Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Ank-ix
Front matter
४३४३ , विषयानुक्रमणिका अध्याय विषय पृष्ट अध्याय विषय ४१. श्रद्धात्रय-विभाग योग का वर्णन । ६७. बासुदेव के आविर्मा और अवस्थिति का वर्णन ! गीता अध्याय १७. ४२. सन्यासयोग का वर्णन गीता अध्याय १८.४१५६ । ६८. श्रीकृष्ण की स्तुति का वर्णन । ४३. भाष्म आदि का समरभूमि में आना ६९, पाण्डवों का श्येनव्यूह और कौरवों का मकर- और युधिदिर का उनके पास जाकर व्यूह बनाकर युद्ध करना । प्रणाम करना। ४१६७ ७०. युद्ध का वर्णन । ४४. युद्ध का आरम्भ । ४१७९ ७१. धोर युद्ध का वर्णन । १५. द्वन्दू-युद्ध का वर्णन । ४१८३ ७२ युद्ध का वर्णन । ४६. युद्ध का वर्णन। ४१९२ । ७३. युद्ध का वर्णन । ४३५१ ४७. उत्तरकुमार का मारा जाना। ४१९७ ७४. पांच दिन के युद्ध की समाप्ति । ४८. भीष्म के हाथ राजकुमार श्वेत का मारा जाना । ७५. क्रौञ्चव्यूह और मकरन्यूह की रचना। ४३६० ५२०५.७६. धृतराष्ट्र का खिन्न होना । ४९. शङ्ख के युद्ध का वर्णन । ४२१८७७. भीमसेन और द्रोणाचार्य के पराक्रम का वर्णन | ५०. क्रौञ्चव्यूह की रचना । १२२४ ४३६७ ५१. कौरवों का व्यूह बनाना । ७८. युद्ध का वर्णन । ५२. पितामह भीष्म और अर्जुन का युद्ध । ,,२३३ / ७९. छठे दिन के युद्ध की समाप्ति । ४३७९ ५३. दोणाचार्य और धृष्टद्युम्न का युद्ध । २४१ ८०. भीम और दुर्योधन का सवाद । ४३८६ ५४. कलिङ्गराज की मृत्यु । ,,२४६ ८१. इन्द-युद्ध अर्जुन के पराक्रम का वर्णन ,,३८१ ५५. दूसरे दिन के युद्ध की समासि । ,,२५९/८२. द्रोणाचार्य के हाथों विराट के पुत्र शख का ५६. कौरों का गरुडव्यूह और पाण्डवों का अड़चन्द्र । मारा जाना । ४३९४ व्यूह रचकर युद्ध करना । ४२६४ ८३. द्वन्द्व युद्ध का वर्णन । ५७. मङ्गलयुद्ध का वर्णन । ८४, युधिष्ठिर आदि के युद्ध का वर्णन । ४४०६ ५८. पितामह भीष्म और दुर्योधन कीयान-चीन४२७० ८५. युद्ध का वर्णन । ४४१२ ५९. भीम को मारने के लिए श्रीकृष्ण का प्रतिज्ञा ८६. सातवें दिन के युद्ध की समाप्ति । छोड़कर चक्र लेकर दौड़ना और अर्जुन का ८७. दोनों पक्षों की व्यूह-रचना । ४४२३ उनको रोक लेना। ५२७५ : ८८. भीमसेन के हाथों दुर्योधन के आठ छोटे भाइयों ६०. अर्जुन के सार भीम का द्वन्द्वयुद्ध । १२९२ ४४२७ ६१. शाल के पुत्र का वध्र । १२९५ ८९. युद्ध का वर्णन ६२. भीममेन आदि का युद्ध । ९०, शकुनि के भाइयों का और डरावान् का वध । ६३. सापकि और भूरिश्रया की भिड़न्त । ४३०६ ६५. दुर्योधन के माइयों का मारा जाना और चौथे २१. दुर्योपन और घटोत्कच का युद्ध । ४४४६ दिन क युद्ध की समाप्ति । ४३०९१ ९२, घटोत्कच का युद्ध । ६५. विष के उपारयान का वर्णन । ४३१८२३. घटोकाच का युद्ध । ६६. विश्वापायान का वर्णन । ५३२६ १२३० का वधा - भीष्म-पर्व प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ भीगणेशाय नमः। दिव्यागाय नमः। ॐ ॥ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवी सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥ जनमेजय उगच कथं युयुधिरे वीराः कुरुपाण्डवसोमकाः पार्थिवाः सुमहात्मानो नानादेशसमागताः गम्पायन उगच यथा युयुधिरे वीराः कुरुपाण्डवसोमकाः कुरुक्षेत्रे तपःक्षेत्रे शृणु त्वं पृथिवीपते नेऽवतीर्य कुरुक्षेत्र पाण्डवाः सहसोमकाः कोरवाः समवर्तन्त जिगीपन्तो महाबलाः वेदाध्ययनसम्पन्नाः सवें युद्धाभिनन्दिनः आशंसन्तो जयं युद्धे चलेनाऽभिमुखा रणे आभियाय च दुर्धर्पा धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम् प्राग्वाः पश्चिमे भागे न्यविशन्त ससनिकाः ॥ ५ ॥ - - NA [ भीष्मपर्व म हा भारत । ३९९० ] समन्तपञ्चकाद्वाह्य शिविराणि सहस्रशः कारयामास विधिवत्कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः शून्या च पृथिवी सर्वा चालवृद्धावशेपिता निरश्वपुरुपेवाऽऽसीद्रथकुञ्जरवर्जिता ॥ ७ ॥ यावत्तपति सूर्यो हि जम्बूद्वीपस्य मण्डलम् तावदेव समायातं वलं पार्थिवसत्तम एकस्थाः सर्ववर्णास्ते मण्डलं वहुयोजनम् पर्याकामन्त देशांश्च नदीः शैलान्वनानि च तेपां युधिष्टिरो राजा सर्वेषां पुरुषर्षभ व्यादिदेश सवाह्यानां भक्ष्यभोज्यमनुत्तमम् ॥ १०॥ शय्याश्च विविधास्तात तेपां रात्रौ युधिष्ठिरः । एवंवेदी वेदितव्यः पाण्डवेयोऽयमित्युत अभिज्ञानानि सर्वेषां संज्ञाश्चाऽऽभरणानि च योजयामास कोरव्यो युद्धकाल उपस्थिते “॥१२॥ दृष्ट्वा ध्वजाग्रं पार्थस्य धार्तराष्ट्रो महामनाः सह सर्वेमहीपालेः प्रत्यव्यूहत पाण्डवम् ॥ १३॥ पाण्डुरेणाऽऽतपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्द्धनि मध्ये नागसहस्रस्य भ्रातृभिः परिवारितः ॥ ११ ॥ दृष्ट्वा दुर्योधनं हृष्टाः पञ्चाला युद्धनन्दिनः दध्मुः प्रीता महाशवान्भेर्यश्च मधुरखनाः ॥ १५॥ पधिम भाग मे, मुंग हो, टहर गये ॥२५॥ मय वर्णों के मनुस्य उस युद्ध में मम्मिलित होने म. पभात युन्नानन्दन युधिधित ने ममन्नपाक के लिए आये । उन्होंने बहुत मे दंग, नदी, पर्वत, प. पादा निधिपूर्वक हजागे हो म्याग्नि कराये। यन आदि की व्याप्त कर दिया । राना युधिष्ठिर ने गंन्ट ! मापी ग पांदा रंग और मना यहाँ उन मया और उनके वाहनों का दिया मान-पान पर अननगी । उस समय पृ भर पर कार की मामी मिटने और गहन की य्यरम्या कर दी मग मंहगाही , गं । पुरुष, घोर ॥१०॥धर्मगन गुपिटिर ने अपने पक्ष मनिको श्रीद मेमर ली गदा मी जान कोनिम्रप, नग नाम' और आभूषण भी पर नहीं ना ग नागपण दिये जिमय,साग यह जान पंद किये पाया पक्ष rikना. गरजवान पाने के ॥१११२|| उभागना दुपाचन एजार हाधियों में महाि . यांगाने मी भारयांक गारगिजमान । गुद अध्याय १ ] म हा भारत [ ३९.९१ । । ततः प्रहृष्टां तां सेनामभिवीक्ष्याऽथ पाण्डवाः । वभूवुर्हष्टमनसो वासुदेवश्च वीर्यवान् ततो हर्प समागम्य वासुदेवधनञ्जयौ दध्मतुः पुरुषव्याघौ दिव्यौ शङ्खौ रथे स्थितौ ॥ १७ ॥ पाञ्चजन्यस्य निर्घोपं देवदत्तस्य चोभयोः श्रुत्वा तु निनदं योधाः शकृन्मूत्रं प्रसुवुः ॥१८॥ यथा सिंहस्य नदतः स्वनं श्रुत्वेतरे मृगाः सेयुर्निनदं श्रुत्वा तथाऽसीदत तद्बलम् ॥ १९ ॥ उदतिष्ठद्रजो भौमं न प्राज्ञायत किञ्चन अस्तगत इवाऽऽदित्ये सैन्येन सहसाऽऽवृते ॥२०॥ ववर्य तत्र पर्जन्यो मांसशोणितवृष्टिमान् दिक्षु सर्वाणि सैन्यानि तदद्भुतमिवाऽभवत् ॥ २१ ॥ वायुस्ततः प्रादुरभृन्नीचैः शर्करकर्षणः विनिम्नस्तान्यनीकानि शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २२ ॥ उभे सैन्ये च राजेन्द्र युद्धाय मुदिते भृशम् । कुरुक्षेत्रे स्थिते यत्ते सागरक्षुभितोपमे ॥ २३ ॥ तयोस्तु सेनयोरासीदद्भुतः स तु सङ्गमः युगान्ते समनुप्राप्ते द्वयोः सागरयोरिव ॥ २४॥ था। उसके सिर पर श्वेत छत्र लगा हुआ था । महा सुनकर कोरवपक्ष के सैनिक दहल उठे। उनका मनस्वी दुर्योधन ने भी अर्जुन की धजा के अग्रभाग एक साथ मलमूत्र निकल पडा ॥१५॥१८॥ मृगों के को देखकर अपने पक्ष के राजाओं के साथ, पाण्डको झुण्ड जैसे सिंह का शब्द सुनकर भयभीत हो जाते के मुकाबले मे, सेना की व्यूह-रचना की ॥१३॥१४॥ हैं, वैसे ही वे श्रीकृष्ण और अर्जुन की शङ्खध्वनि को युद्ध चाहनेवाले पाञ्चालगण राजा दुर्योधन को देग्य सुनकर अत्यन्त भयभीत हो उठे। सुस्ती के मारे कर बहुत प्रसन्न हुए। ये प्रसन्नतापूर्वक शङ्ख और उनके चेहरे उतर गये । इस समय सेना के चलने- हज़ारों नगाड़े बजाने लगे | अपनी सेना को प्रसन्न फिरने से इतनी धूल उड़ी कि उसमें छिपकर मूर्य और उत्साहित देखकर महात्मा कृष्णचन्द्र और परा अम्त से हो गये ॥१९॥२०॥ इसी समय मेघ घिर कमी पाण्डव बहुत प्रसन्न हुए। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण आये और उनसे जल की जगह मांस और रक्त की और अर्जुन आनन्द के साथ रथ पर चढकर अपने- | वर्षा होने लगी । यह बहुत ही अद्भुत घटना हुई । अपने शङ्ख बजाने लगे | श्रीकृष्ण के पाञ्चजन्य आँधी उठ खडी हुई और सैनिको के ऊपर कड़- शह और अर्जुन के देवदत्त शड्स का गम्भीर शब्द ड़ियाँ-रोड़े वरमाने लगी ॥२।२२।। उम समय युद्ध [ भीमपन म हा भारत ३९९२ ] शून्याऽऽसीत्पृथिवी सर्वा वृद्धवालावशेपिता । ॥२५॥ निरश्वपुरुपेवाऽऽसीद्रथकुञ्जरवर्जिता तेन सेनासमूहेन समानीतेनकौरवः ततस्ते समयं चक्रुः कुरुपाण्डवसोमकाः ॥२६॥ धर्मान्संस्थापयामासुयुद्धानां भरतर्षभ निवृत्ते विहिते युद्धे स्यात्प्रीतिर्नः परस्परम् ॥ २७॥ यथापरं यथायोगं न च स्यात्कस्यचित्पुनः वाचा युद्धप्रवृत्तानां वाचैव प्रतियोधनम् निष्क्रान्ताः पृतनामध्यान्न हन्तव्याः कदाचन ॥ २८ ॥ रथी च रथिना योध्यो गजेन गजधूर्गतः अश्वेनाऽश्वी पदातिश्च पादातेनैव भारत ॥ २९॥ यथायोगं यथाकामं यथोत्साहं यथावलम् समाभाष्य प्रहर्तव्यं न विश्वस्ते न विहले ॥३०॥ एकेन सह संयुक्तः प्रपन्नो विमुखस्तथा क्षीणशस्त्रो विवर्मा च न हन्तव्यः कदाचन ॥ ३१ ॥ के लिए प्रसन्नता प्रकट कर रही दोनो पक्ष की । नुसार युद्ध करेंगे। कोई किसी से अन्यायपूर्वक युद्ध सेनाएँ उमडे हुए दो समुद्रो के समान कुरक्षेत्र मे नहीं करेगा। कोई किसी को युद्ध में धोखा नहीं आमने-सामने स्थित हुई। दोनों सेनाओं का वह | देगा । वाणी का युद्ध करनेवालों से केरल वाणी अद्भुत समागम देखकर जान पडता था कि प्रल्य का ही युद्ध किया जायगा । जो लोग सेना के व्यूह कार में दो समुद्र उमड रहे हैं । कौरव पक्ष में भी | से भागकर या और किसी कारण से बाहर निकल इतनी सेना आकर एकत्र हुई थी कि पृथ्वी शून्य | जायँगे उन पर कोई प्रहार नहीं करेगा । रथी रथी सी हो गई । केवर वारक और बूढ ही बच गये । हाथी का सवार हाथी के सवार के साथ, जवान पुरुप, रथ, हाथी ओर घोडा एक भी नहीं रह घोडे का सवार घुड़सपार के साथ और पैदल सिपाही गया ॥२३॥२६॥ इसके पश्चात् कोरसों, पाण्डयो । पैदल सिपाही के साथ योग्यता, इच्छा, उत्साह और और सामों में धर्मानुसार परस्पर, निम्नलिखित, युद्ध वल के अनुमार युद्ध करेगा। पहले सावधान करके के नियम निधित हुए। यह निश्चय हुआ कि पीछे प्रहार किया जायगा । विश्वास रहने से असार- आरम्भ किया हुआ युद्ध जिस ममय बन्द हो जाया धान, विह्वल और भयभीत हुए-हुए न्यक्ति पर प्रहार करेगा उस समय हम परम्पर पहले नहीं किया जायगा ॥२७॥३०॥ जो पुरुष किसी मित्रता का व्यवहार करेंगे । परस्पर समान ओर समान | दूसरे के साथ युद्ध कर रहा होगा, जो असावधान योग्यता रखनेवाले पुरुष ही एक दूसरे से न्याया होगा और जो ममर से विमुख होगा उस पर कोई के साथ, । ही तरह अ ] महाभारत न सूतेषु न धुर्येषु न च शस्त्रोपनायिपु न भेरीशङ्खाबादेपु प्रहर्त्तव्यं कथञ्चन ॥३२॥ एवं ते समयं कृत्वा कुरुपाण्डवसोमकाः विस्मयं परमं जग्मुः प्रेक्षमाणाः परस्परम् ॥३३॥ निर्विश्य च महात्मानस्ततस्ते पुरुपर्षभाः हृष्टरूपाः सुमनसो बभूवुः सहसैनिकाः ॥ ३४॥ इति श्रीमन्महाभारते भीष्मपर्वणि जम्नृखण्डनिर्माणपर्वणि सैन्यशिक्षणे प्रथमोऽध्याय ॥ १ ॥ वार नहीं करेगा । जिसका कवच कट गया होगा, प्रहार नहीं करेगा । हे महाराज ! इस प्रकार परस्पर जिसका शस्त्र टूट गया होगा या शस्त्र न रह जाने युद्ध के नियम निश्चित हो गये । कौरव, पाण्डव के कारण जो निहत्था होगा, ऐसे लोगो पर कभी और सोमकगण एक दूसरे को देखकर परम प्रसन्न कोई प्रहार नहीं करेगा । सारथी पर, जिन पर बोझ हुए। फिर सब पुरुषश्रेष्ठ वीर प्रसन्नता और उत्साह लादा जाय ऐसे हाथी-घोडे-बल आदि पर, शस्त्रबनाने के साथ अपने-अपने सेनिको सहित अपने-अपने की जीविकागाले या शस्त्र पहुँचानेवाले पर, और खड्स स्थान में ठहर गये ॥३१॥३४॥ तथा नगाडे आदि वजानेवाले लोगो पर कभी कोई भीष्मपर्व का पहला अध्याय ममाप्त हुआ ॥१॥ - अथ द्वितीयोऽ याय. ॥२॥ वैशम्पायन उवाच -- ततः पूर्वापरे सैन्ये समीक्ष्य भगवानृषिः सर्ववेदविदां श्रेष्ठो व्यासः सत्यवतीसुतः भविष्यति रणे घोरे भरतानां पितामहः प्रत्यक्षदर्शी भगवान्भूतभव्यभविष्यवित् वैचित्रवीर्यं राजानं सरहस्यं ब्रवीदिदम् शोचन्तमा ध्यायन्तं पुत्राणामनयं तदा व्यास पात्र-राजन्परीतकालास्ते पुत्राश्चाऽन्ये च पार्थिवाः । ते हिंसन्तीव संग्रामे समासाद्येतरेतरम् ॥ ४ ॥ तेपु कालपरीतेषु विनश्यत्स्वेव भारत कालपर्यायमाज्ञाय मा म्म शोके मनः कृथाः ॥ ५ ॥ दमरा अध्याय ॥२॥ वैशम्पायन ने कहा- हे गजा जनमेजय ! इधर से व्याकुल और पुत्रों के अन्याय को सोचने हुए, सर वेदज्ञ पुरुषों में श्रेष्ट, निकालज्ञ, प्रत्यक्षदर्शी महर्षि एकान्त में स्थित, महाराज धृतराष्ट्र के पास गये और घेदव्यास ने दोनों पक्षों की सेनाओं को देखकर उनमे कहने लंग-हे राजेन्द्र ! तुम्हारे पुनों और जान लिया कि यह घोर संग्राम होगा | नर वे शोक अन्य गनाओं के मरने का समय आ गया है । इम - म हा भा र त [ भीष्मपर्व ३९९४ ] यदि चेच्छसि संग्रामे द्रष्टुमेतान्विशाम्पते चक्षुर्ददामि ते पुत्र युद्धं तत्र निशामय धृतराष्ट्र उवाच--न रोचये ज्ञातिवधं द्रष्टुं ब्रह्मर्पिसत्तम युद्धमेतत्त्वशेषेण शृणुयां तव तेजसा ॥ ७॥ वैशम्पायन उवाच-एतस्मिन्नेच्छति द्रष्टुं संग्रामं श्रोतुमिच्छति वराणामीश्वरो व्यासः सञ्जयाय वरं ददौ व्यास उवाच --एप ते सञ्जयो राजन्युद्धमेतद्वदिष्यति एतस्य सर्वसंग्रामे न परोक्षं भविष्यति ॥ ९ ॥ चक्षुपा सञ्जयो राजन्दिव्येनैव समन्वितः कथयिष्यति ते युद्धं सर्वज्ञश्च भविष्यति ॥ १० ॥ प्रकाशं वाऽप्रकाशं वा दिवा वा यदि वा निशि । मनसा चिन्तितमपि सर्व वेत्स्यति सञ्जयः नैनं शस्त्राणि छेत्स्यन्ति नैनं वाधिष्यते श्रमः । गावल्गणिरयं जीवन्युद्धादस्माद्विमोक्ष्यति ॥१२॥ अहं तु कीर्तिमेतेषां कुरूणां भरतर्षभ पाण्डवानां च सर्वेषां प्रथयिप्यामि मा शुचः ॥ १३ ॥ दिष्टमेतन्नरव्याघ्र नाऽभिशोचितुमर्हसि न चैव शक्यं संयन्तुं यतो धर्मस्ततो जयः ॥ १४ ॥ युद्ध में ये परस्पर भिड़कर मार जायेंगे। समय के सञ्जय तुम्हारे आगे युद्ध का वृत्तान्त आदि से अन्त इस विपरीत भार को समझकर तुम भोक न करना। तक कहेंगे । इनसे युद्ध का वृत्तान्त तनिक भी नहीं हे राजेन्द्र ! यदि तुम यह घोर संग्राम देग्वना चाहो । छिपा रहेगा ॥८॥१०॥ इन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त होगी नो में नुमको दिव्य दृष्टि देने को तैयार हूँ। तुम । और ये मर्पज्ञ होंगे । गुप्त या प्रकट सब बातें इन्हें यही में सब संग्राम देय लेना ॥१६॥ धृतराष्ट्र ने । विदित होती रहेगी। दिन को या रात्रि को जो कुछ कहा- प्रमश्रेिय ! में जाति के हत्याकाण्ट को होगा और दूसरों के मन का जो बात होगी, यह आनी ऑग्गों नहीं देना चाहता । मेरी यह अभि- भी मजय को प्रतीत हो जायगी। इनके शरीर में गा कि आप नेन के प्रभार मे मैं इस युद्ध कोई दान नहीं छ जायगा। उन्हें यान भी नहीं या गर तान्न आदि में अन्न तक मुन गः ॥७॥ होगी ।म युद्ध में केवल ये मन्जय जीते बचेंगे। हे टेन में मम मा गंडव्याम ने धृतगष्ट को । भग्नश्रेष्ट ! में शीघ्र ही पाण्डवों और कांग्यों की गुरु फा वृशान्न गुनने के लिए उमुयागकर इम यानि को, अन्य बना करक, प्रमिद कर दूंगा। गानाकोपर देने हए. पगा- महागन ! य तुम शोक मन यग। यह सब हानी' की लीला । - अध्याय २] म हा भारत [ ३९९५ । वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा स भगवान्कुरूणां प्रपितामहः पुनरेव महाभागो धृतराष्ट्रमुवाच ह इह युद्धे महाराज भविष्यति महान्क्षयः तथेह च निमित्तानि भयदान्युपलक्षये श्येना गृध्राश्च काकाश्च कङ्काश्च सहिता बकैः । सम्पतन्ति नगाग्रेषु समवायांश्च कुर्वते अभ्ययं च प्रपश्यन्ति युद्धमानन्दिनो द्विजाः । क्रव्यादा भक्षयिष्यन्ति मांसानि गजवाजिनाम्॥ १८॥ निर्दयं चाऽभिवाशन्तो भैरवा भयवेदिनः कङ्काः प्रयान्ति मध्येन दक्षिणामभितो दिशम् ॥ १९ ॥ उभे पूर्वापरे सन्ध्ये नित्यं पश्यामि भारत उदयास्तमने सूर्य कवन्धैः परिवारितम् ॥ २०॥ श्वतलोहितपर्यन्ताः कृष्णग्रीवाः सविद्युतः त्रिवर्णाः परिघाः सन्धौ भानुमन्तमवारयन् ॥ २१ ॥ ज्वलितार्केन्दु नक्षत्रं निर्विशेषदिनक्षयम् अहोरात्रं मया दृष्टं तद्भयाय भविष्यति ॥ २२॥ अलक्ष्यः प्रभया हीनः पौर्णमासींच कार्तिकीम्। चन्द्रोऽभूदग्निवर्णश्च पद्मवर्णनभस्थले ॥ २३ ॥ है । तुम या कोई भी इस सर्वनाश को नहीं रोक | दोपहर के समय दक्षिण दिशा की ओर दौड़ते हुए सकेगा । सत्य समझो, जिधर धर्म है उसी पक्ष की भयमूचक भयानक कट-कट शब्द करते हैं। हे जय होगी।॥११॥१४॥ वैशम्पायन ने कहा है राजा भारत ! मैं प्रतिदिन देखता हूँ कि उदय और अस्त जनमेजय ! कुरवश के प्रपितामह भगवान् वेदव्यास के समय मूर्य को कबन्ध घेरले हैं ॥१९॥२०॥ प्रात. ने इतना कहकर फिर राजा धृतराष्ट्र से कहा-- है | और मायँ को, बीच में काले और किनारों पर राजेंद्र ! इस युद्ध में बड़ा भारी हत्याकाण्ड होगा । श्वेन लाल मण्डल सूर्य को घेरे रहते हैं और आस- इस समय महाभयङ्कर उत्पात होते देख पड़ते हैं। पास बिजली चमना करती है । सूर्य, चन्द्र और याज, गिद्ध, कोए, कङ्क पक्षी आर बगलो के झुण्ड नक्षत्र दिन-रात प्रज्वलित रहते हैं । दिन और रानि के झुण्ड घजाओं के अग्रभागों पर गिरते हैं । मास में कुछ अन्तर नहीं देख पड़ता । यह उत्पात तुम्हारे खानेराले पक्षी, युद्ध को निकटवर्ती जानकर, आनन्द वश के लिए बहुत ही भयङ्कर हैं। कार्तिक की प्रकट कर रहे है । वे अदय हाथियो, घोड़ो और पूर्णिमा को पद्मवर्ण नभम्थल में अलक्ष्य, प्रभाहीन, मनुष्यों का मास ग्यायेंगे ॥१५॥१८॥ कडू पक्षी | लाल रग के चन्द्रमा का उदय हुआ है। इससे बड़े । , .
३९९६ ] म हा भारत [ भागापर्व aur स्वप्स्यन्ति निहता वीरा भूमिमावृत्य पार्थिवाः । राजानो राजपुत्राश्च शूराः परिघवाहवः ॥ २४ ॥ अन्तरिक्षे वराहस्य वृपदंशस्य चोभयोः प्रणादं युद्धयतो रात्रौ रौद्रं नित्यं प्रलक्षये ॥२५॥ देवताप्रतिमाश्चैव कम्पन्ति च हसन्ति च वमन्ति रुधिरं चाऽऽस्यैः खिद्यन्ति प्रपतन्ति च ॥ २६ ॥ अनाहता दुन्दुभयः प्रणदन्ति विशाम्पते अयुक्ताश्च प्रवर्तन्ते क्षत्रियाणां महारथाः ॥ २७ ॥ कोकिलाः T: शतपत्राश्च चापा भासाः शुकास्तथा । सारसाश्च मयूराश्च वाचो मुश्चन्ति दारुणाः ॥ २८ ॥ गृहीतशस्त्राः कोशन्ति चर्मिणो वाजिपृष्ठगाः । अरुणोदये प्रदृश्यन्ते शतशः शलभवजाः ॥ २९ ॥ उभे सन्ध्ये प्रकाशन्ते दिशो दाहसमन्विते पर्जन्यः पांसुवर्षी च मांसवर्षी च भारत ॥ ३०॥ या चैपा विश्रुता' राजंस्त्रैलोक्ये साधुसम्मता । अरुन्धती तयाऽप्येप वसिष्ठः पृष्ठतः कृतः ॥३१॥ रोहिणी पीडयन्नेप स्थितो राजशनैश्चरः व्यावृत्तं लक्ष्म सोमस्य भविष्यति महद्भयम् ॥ ३२ ॥ अनभ्रे च महाघोरः स्तनितः श्रूयते स्वनः वाहनानां च रुदतां निपतन्त्यश्रुविन्दवः ॥३३॥ इति श्रीमन्महामारते मी मपर्वणि जम्वृखण्डनिर्माणपर्वणि श्रीवेदव्यामदर्शने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ बलवान् महावीर राजा और राजपुत्र मारे जायेंगे | तोता, सारस, मोर आदि पक्षी दारुण स्वर से बोल ॥२१॥२४॥ रात्रि को आकाश मे लड़ते हुए वराह रहे हैं । लोहे के रग के मुँहवाली एक प्रकार की और विलाय का कठोर शब्द मुझे सुन पडता है, टड़ियाँ घोड़ों की पीठो पर उड़ती देख पड़ती हैं। जो जन-क्षय की सूचना देता है । देवताओं की । अरुणोदय के समय असख्य टीड़ियाँ देख पड़ती हैं। मूर्तियाँ की कॉपनी हैं, कभी पसीजने लगती है, प्रातः और मायँ को दिग्दाह देख पड़ता है । मेघो कमी मुग से रक्त उगटती है और कभी गिर पड़नी मे धूल और माम की घी होती है ॥२८॥३०॥ है। गजेंद्र ! चिना बनाये ही नगाड़े बजने लगते रिलोकी भर में जिनके पातिव्रत्य की बड़ाई होती है है। क्षत्रियों के ग्य विना घोड़े जोते ही चलने उन अरुन्धती (तारा) ने भी यशिष्ठ (तारा) को रगत है ॥२५॥२७॥ कोयल, शतपत्र, चाय, भाम, पीछे छोड़ दिया है । सनथर ग्रह रोहिणी नक्षत । - अध्याय ३] म हा भा र त [३९९७ को पीड़ा पहुँचा रहा है। चन्द्रविम्ब के भीतर का सा शब्द सुन पड़ता है । घोड़ों की आँखों से आंसू चिह्न अपने स्थान पर नहीं देख पड़ता। आकाश निकल रहे हैं । इसलिए हे राजेन्द्र ! निश्चय जानो मण्डल में मेघ न रहने पर भी घोर मेघगर्जन का कि बड़ी विपत्ति आनेवाली है ॥३१॥३३॥ भीष्मपर्व का दूसरा अध्याय ममाप्त हुआ ॥ २ ॥ अथ तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ व्यास उवाच---खरा गोषु प्रजायन्ते रमन्ते मातृभिः सुताः । अनार्तवं पुष्पफलं दर्शयन्ति बनद्रुमाः गर्भिण्योऽजातपुत्राश्च जनयन्ति विभीषणान् । क्रव्यादाः पक्षिभिश्चापि सहाऽश्नन्ति परस्परम् ॥ २ ॥ त्रिविपाणाश्चतुर्नेवाः पञ्चपादा द्विमेहनाः द्विशीर्षाश्च द्विपुच्छाश्च दंष्ट्रिणः पशवोऽशिवाः ॥ ३ ॥ जायन्ते विवृतास्याश्च व्याहरन्तोऽशिवा गिरः । त्रिपदाः शिखिनस्तााश्चतुर्दष्ट्रा विपाणिनः तथैवाऽन्याश्च दृश्यन्ते स्त्रियो वै ब्रह्मवादिनाम्। वैनतेयान्मयूरांश्च जनयन्ति पुरे तव गोवत्सं वडवा सूते श्वा सृगालं महीपते कुक्कुरान्करभाश्चैव शुकाश्चाऽशुभवादिनः स्त्रियः काश्चित्प्रजायन्तेचतस्रः पञ्च कन्यकाः । जातमात्राश्च नृत्यन्ति गायन्ति च हसन्ति च पृथग्जनस्य सर्वस्य क्षुद्रकाः प्रहसन्ति च नृत्यन्ति परिगायन्तो वेदयन्तो महद्भयम् तीसरा अध्याय ॥ ३॥ - व्यासजी कहते हैं-हे राजेन्द्र ! गायों के गर्भ | दांत हैं । वे मुख फैलाये रहते हैं और अमङ्गलसूचक से गधे उत्पन्न होते हैं। माताओं के साथ पुत्र रमण शब्द करते हैं । गरुड़ पक्षियों के सींग, तीन पाव करते हैं । यनों के वृक्षो में ऋतु के बिना ही उस और चोटी देख पडती है । इसी प्रकार ब्रह्मवादियों ऋतु के फल और फल देख पड़ते हैं। स्त्रियों के | की स्त्रियों के गरुड़ पक्षी और मोर, घोड़ियों के भयानक आकार की सन्ताने उत्पन्न होती हैं। गायों के बछड़े, कुतियों के सियार और हथिनियों मांसभोजी पक्षियों के साथ सियार और कुत्ते, एक के कुत्ते उत्पन्न होते हैं | तोते लगातार अशुभ और ही जगह, खाते हैं । ऐसे विचित्र प्राणी जन्म ले | कर्कश शब्द बोलते हैं ॥१॥६॥ किसी-किसी स्त्री के रहे हैं जिनके तीन सींग, चार नेत्र, पांच पाव, दो एक साथ चार-चार पाँच-पाँच कन्याएँ उत्पन्न होती सिर और दो लिड्ग, दो पूँ, तीन पांच और चार । हैं | वे कन्याएँ उत्पन्न होते ही नाचती, गाती, बाजे , ३९९८ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व - प्रतिमाश्चाऽऽलिखन्त्येताःसशस्त्राः कालचोदिताः। अन्योन्यमभिधावन्ति शिशवो दण्डपाणयः ॥ ९ ॥ अन्योन्यमभिमृद्गन्ति नगराणि युयुत्सवः पद्मोत्पलानि वृक्षेषु जायन्ते कुमुदानि च ॥ १०॥ विष्वग्याताश्च वान्त्युग्रा रजो नाऽप्युपशाम्यति। अभीक्ष्णं वर्तते भूमिरकं राहुरुपैति च ॥ ११ ॥ श्वेतो ग्रहस्तथा चित्रां समतिक्रम्य तिष्ठति । अभावं हि विशेषेण कुरूणां तत्र पश्यति ॥ १२ ॥ धूमकेतुर्महाघोरः पुष्यं चाऽऽक्रम्य तिष्ठति सेनयोरशिवं घोरं करिष्यति महाग्रहः ॥१३॥ मघास्वङ्गारको वक्रः श्रवणे च वृहस्पतिः भगं नक्षत्रमाक्रम्य सूर्यपुत्रेण पीड्यते शुकः प्रोष्ठपदे पूर्वे समारुह्य विरोचते उत्तरे तु परिक्रम्य सहितः समुदीक्षते श्वतो ग्रहः प्रज्वलितः सधूम इव पावकः ऐन्द्रं तेजस्ति नक्षत्रं ज्येष्ठामाक्रम्य तिष्ठति ॥ १६ ॥ ध्रुवं प्रज्वलितो घोरमपसव्यं प्रवर्तते रोहिणी पीडयत्येवमुभौ च शशिभास्करी चित्रास्वात्यन्तरे चैव विष्ठितः परुषग्रहः ॥ १७ ॥ वजाती और हँसती हैं । चाण्डाल आदि के घर में } जाता है । केतु चित्रा नक्षत्र में स्थित है । इसमें उत्पन्न काने कुबडे आदि वालक-बालिका हँसते, नाचते । सन्देह नहीं कि कुरुषश के नाश के लिए ही ये और गाते हैं। यह भी महाभयमूचक उत्पात है । उत्पात देख पडते हैं । धूमकेतु पुष्य नक्षत्र में स्थित ये सर काट के द्वारा प्रेरित होकर हाथ में शस्त्र है । इसका परिणाम यह है कि दोनों पक्षों की बहुत लिये हुए मूर्तियाँ लिखते और बनाते हैं । दण्ड हाय सी सेना चोपट होगी । मङ्गल वक्री होकर मघा में लिये वाटक एक दूसरे को मारने के लिये दोडते नक्षत्र में और उसी तरह बृहस्पति श्रवण नक्षत्र में है और युद् करने की इच्छा से कृत्रिम नगरों को स्थित है । शनैश्वर उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में स्थित रौंदते हैं । वृक्षों में कमल और कोकावेली के फल | होकर उसे सता रहा हे ॥११॥१४॥ शुक्र पूर्वाभाद्र- निकरते हैं ॥१०॥ वायु वड़े वेग से चलती हैं। पद नक्षत्र में है और चारों ओर घूमकर उपग्रह के धूल इतनी उड़ती है कि किसी तरह शान्त ही नहीं साथ उत्तराभाद्रपद नक्षन को देख रहा है । केतु प्रह होनी । लगातार भूकम्प होता है । राह सूर्य के पास धुएँ से युक्त अग्नि के समान प्रज्वलित होकर, इन्द्र - .
अध्याय ३] म हा भारत [ ३९९९ । : वक्रानुवकं कृत्वा च श्रवणं पावकप्रभः ब्रह्मराशिं समावृत्य लोहिताको व्यवस्थितः ॥१८॥ सर्वसस्यपरिच्छन्ना पृथिवी सस्यमालिनी पञ्चशीर्षा यवाश्चापि शतशीर्षाश्च शालयः प्रधानाः सर्वलोकस्य यास्वायत्तमिदं जगत् ता गावः प्रस्नुता वत्सः शोणितं प्रक्षरन्त्युत ॥ २० ॥ निश्चेरुर्विपश्चापाखड्गाश्च ज्वलिता भृशम् व्यक्तं पश्यन्ति शस्त्राणि संग्राम समुपस्थितम् ॥ २१ ॥ अग्निवर्णा यथा भासः शस्त्राणामुदकस्य च । कवचानां ध्वजानां च भविष्यति महाक्षयः ॥ २२ ॥ प्रथिवी शोणितावर्ता ध्वजोडुपसमाकुला कुरूणां वैशसे राजन्पाण्डवैः सह भारत ॥ २३ ॥ दिक्षु प्रज्वलितास्याश्च व्याहरन्ति मृगद्विजाः । अत्याहितं दर्शयन्तो वेदयन्ति महद्भयम् ॥ २४ ॥ एकपक्षाक्षिचरणः शकुनिः खचरो निशि रौद्रं वदति संरब्धः शोणितं छर्दयन्निव ॥ २५॥ शस्त्राणि चैव राजेन्द्र प्रज्वलन्तीव सम्प्रति । सप्तर्षीणामुदाराणां समवच्छाद्यते प्रभा ॥ २६ ॥ जिसके देवता हैं उस, तेजस्वी ज्येष्ठा नक्षत्र के ऊपर पी चुकने के पश्चात् गायों के थनों से रक्त की धारा आक्रमण कर रहा है । चित्रा और स्वानि के बीच मे निकलती है ॥१८॥२०॥ धनुपों से अग्नि की चिनगा- स्थित राह सदा वक्री होकर रोहिणी और मूर्य-चन्द्र रियाँ निकटती हैं और ग्वड्ग प्रज्वलित हो रहे हैं । को पीडा पहुँचाता हुआ प्रज्वलित होकर ध्रुव की सव शस्त्र मानों उपस्थित संग्राम को स्पष्ट देख रहे बाट ओर जा रहा है ॥१५॥१७॥ उसी मातोभद्र हैं । शस्त्रों, करचों, जल और चनाओं की आमा चक्र के बीच मघा में स्थित पारक-प्रभ मङ्गल ग्रह अग्नि की सी देस पड़ता है । इससे जान पड़ता है बारम्बार या होकर बृहस्पनियुक्त श्रवण को पूर्ण ' कि बड़ा भारी जनक्षय होगा । जिम ममय पाण्टयों दृष्टि से देख रहा है । पृथ्वी सब प्रकार के अन्नों से के साथ कौरवों का घोर मंग्राम होगा, उम समय परिपूर्ण हो रही है । जब के पेड़ों में पाँच-पाँच वा- पृथ्वी पर रक्त की नदियों यह जायेगी और उनमें लिया और पान के पेड़ों में सैकड़ों बालियाँ देय । घजाएँ डोंगियों के ममान देग पड़ेंगी ॥२१॥२३॥ पड़ती हैं । यही दोनों अन्न प्रधान हैं और इन्हीं के मृगों और पक्षियों के मुगमे अग्निमी निकल रही है और ऊपर मब लोगों का जीवन निर्भर है । यठहों के दूध व भयानक शन कर रहे हैं । यह उन्पात भी कौरवों ----- ४००० ] म हा भारत [ भीमापर । संवत्सरस्थायिनी च ग्रहौ प्रज्वलितावुभौ विशाखायाः समीपस्थौ बृहस्पतिशनैश्चरौ ॥ २७॥ चन्द्रादित्यावुभौ ग्रस्तावेकाला हि त्रयोदशीम् । अपर्वणि ग्रहं यातौ प्रजासंक्षयमिच्छतः ॥२८॥ अशोभिता दिशः सर्वा पांसुवर्षेः समन्ततः उत्पातमंघा रोद्राश्च रात्री वर्षन्ति शोणितम् ॥ २९ ॥ कृत्तिकां पीडयंस्तीक्ष्णैनक्षत्रं पृथिवीपते अभीक्ष्णवाता वायन्ते धूमकेतुमवस्थिताः विषम जनयन्त्येत आक्रन्दजननं महत् त्रिषु सर्वेषु नक्षत्रनक्षत्रेपु विशाम्पते गृध्रः सम्पतते शीर्ष जनयन्भयमुत्तमम् ॥३१॥ चतुर्दशी पञ्चदशी भूतपूर्वा च पोडशीम् इमां तु नाऽभिजानेऽहममावास्यां त्रयोदशीम् । चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्तावेकमासी त्रयोदशीम् ॥ ३२॥ अपर्वणि ग्रहणैतौ प्रजाः संक्षपयिष्यतः मांसवर्ष पुनस्तीबमासीत् कृष्णचतुर्दशीम् शोणितैर्वक्त्रसम्पूर्णा अतृप्तास्तत्र राक्षसाः ॥ ३३ ॥ के लिए महाभय की सूचना दे रहा है। एक पङ्घ,एक | होता है । बारम्बार वेग से आंधी चलती है। इन आँख और पारवाले आकाशचारी पक्षी रात्रि के समय उत्पातों से भयङ्कर युद्ध होने की सूचना मिल रही फ्रोधित होकर दारुण शब्द करते है और मुख से रक्त । है ॥२४॥३०॥ पाप ग्रह बुध पूर्वाषाढ, पूर्वाफाल्गुनी उगलते हैं । श्रवण में स्थित बृहस्पति और चित्रामें स्थित । और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के ऊपर जाकर प्राणियों के शनेश्वर शतपदचक्र में तिर्यग्वेष से विशाखा नक्षत्र को लिए महाभय की सूचना दे रहा है । एक तिथि का वेध रहे हैं । संवत्सरपर्यन्त एक राशि में रहनेवाले ये दोनों | क्षय होने पर चौदहवें दिन, तिथि का क्षय न होने ग्रह अरुणप्रभा के साथ प्रज्वलित से हो रहे हैं । इन्होंने । पर पन्द्रह दिन, अथवा एक तिथि बढने पर सोलहवें सप्तर्षियों की प्रभा को फीका कर दिया हे । भारी धूल | दिन चन्द्रमा या मूर्य को ग्रहण लगता है। किन्तु उडकर प्रभा-हीन सब दिशाओं में छा रही है। एक ही महीने में दो-दो तिथियों का क्षय होकर उत्पातसूचक भयानक मेघ रात्रि को रक्त की वर्षा करते | नरहरे-तेरह दिन पूर्णिमा या अमावस को चन्द्रमा हैं । राहु ग्रह चित्रा के अश में स्थित होकर रोहिणी और सूर्य का ग्रहण मैंने कभी नहीं देखा । इस समय को और स्वानी के अश में स्थित होकर कृत्तिका को बहुन दिनों के पश्चात् यह दुर्योग हुआ है । इससे पीड़ा पट्टेचा रहा है | उत्पातमूचक धूमकेतु का उदय जान पड़ता है कि बड़ा भारी लोरक्षय होगा । कृष्ण । ।
अध्याय ३ ] म हा भारत [ ४००१ । प्रतिस्रोतो महानयः सरितः शोणितोदकाः फेनायमानाः कूपाश्च कूर्दन्ति वृपभा इव ॥ ३४॥ पतन्युल्काः सनिर्घाताः शक्राशनिसमप्रभाः । अद्य चैव निशां व्युष्टामनयंसमवाप्स्यथ ॥३५॥ विनिःसृत्य महोल्काभिस्तिभिरं सर्वतोदिशम् । अन्योन्यमुपतिष्ठद्भिस्तत्र चोक्तं महर्षिभिः ॥ ३६ ॥ भूमिपालसहस्राणां भूमिः पास्यति शोणितम् । कैलासमन्दराभ्यां तु तथा हिमवता विभो ॥ ३७॥ सहस्रशो महाशब्दः शिखराणि पतन्ति च महाभूता भूमिकम्पे चत्वारः सागराः पृथक् । वेलामुद्वर्तयन्तीव क्षोभयन्तो वसुन्धराम् ॥ ३८॥ वृक्षानुन्मथ्य वान्त्युग्रा वाताः शर्करकर्पिणः आभग्नाः सुमहावातैरशनीभिः समाहताः ॥ ३९ ॥ वृक्षाः पतन्ति चैत्यश्चा ग्रामपु नगरेषु च नीललोहितपीतश्च भवत्यग्निर्हतो द्विजैः ॥४०॥ बामाचिर्दुष्टगन्धश्च मुञ्चन्दै दारुणं स्वनम् स्पर्शा गन्धा रसाश्चैव विपरीता महीपते ॥४१॥ चतुर्दशी के दिन मांस की घोर वर्षा हुई है । राक्षसो से हज़ारों घोर शब्द प्रकट हो रहे हैं और उनके के मुग्व रक्त से परिपूर्ण होने पर भी ये तृप्त नहीं शिखर टूट-टूटकर गिर रहे हैं । भूकम्प होता है और होते १३१६३३॥ नदियों का जल लाल हो रहा है । चारों महासागर बदकर, अपनी हद् को छोड़कर, और वे उलटी बह रही हैं । कुओं के जल में फेना उमड़ रहे हैं, मानों सारी पृथ्वी को डुबा देंगे ॥३४॥ उतरा रहा है और उनका जल वायु लगने से एसा ३८॥ आंधी वृक्षों को तोड़ती हुई, ककड़ घरमाती उछल रहा है जैसे बैल कूदते हों । इन्द्र के बज्र के | हुई, ज़ोर से चल रही है । वज्रपात से टूट-टूटकर समान प्रभावाले तारे घोर शब्द के साथ टूट-टूटकर वृक्ष और देवमन्दिर गांवों और नगरों में गिर रहे हैं। गिर रहे हैं । यह रात्रि व्यतीत होने पर तुम्हारे पुत्रों | ब्राह्मणों के हवन करने पर अग्नि की शिसा बाई ओर को महा अन्याय का फल भोगना पड़ेगा । इस उत्पात को घुमती हुई निकलती है और उममें नीला, लाल फा फल जो महर्षियों ने कहा है यह यह है कि और पाला रङ्ग देस पड़ता है । अग्नि से भयानक हजारों राजाओं का रक्त यह पृथ्वी पियेगी । घोर शब्द के साथ दुर्गन्ध निकल रही है ॥३९॥४०॥ उल्कापात के साथ चारों और अन्धकार छा रहा है। स्पर्श, गन्ध, रस आदि में विपरीत भाव देख पड़ रहा फैलास, मन्दर पर्वत और हिमाचल आदि बड़े पर्वतों ! है । घजाएँ बारम्बार हिरती हैं और उनसे धुआं - - ४००२ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व । धूम ध्वजाः प्रमुञ्चन्ति कम्पमाना मुहुर्मुहुः मुञ्चन्त्यङ्गारवर्ष च भेर्यश्च पटहास्तथा ॥४२॥ शिखराणां समृद्धानामुपरिष्टात्समन्ततः वायसाश्च स्वन्त्युग्रं वाम मण्डलमाश्रिताः ॥४३॥ पक्कापक्केति सुभृशं वावाश्यन्ते वयांसि च निलीयन्ते ध्वजापु क्षयाय पृथिवीक्षिताम् ॥४४॥ ध्यायन्तः प्रकिरन्तश्च व्याला वेपथुसंयुताः दीनास्तुरङ्गमाः सर्वे वारणाः सलिलाश्रयाः ॥४५॥ एतच्छुत्वा भवानत्र प्राप्तकालं व्यवस्यताम् । यथा लोकः समुच्छेदं नाऽयं गच्छेत भारत ॥४६॥ वैशम्पायन उवाच --पितुर्वचो निशम्यैतद्धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् दिष्टमेतत्पुरा मन्ये भविष्यति नरक्षयः ॥४७॥ राजानः क्षत्रधर्मेण यदि वध्यन्ति संयुगे वीरलोकं समासाद्य सुखं प्राप्स्यन्ति केवलम् ॥४८॥ इह कीर्ति परे लोके दीर्घकालं महत्सुखम् प्राप्स्यन्ति पुरुषव्याघ्राः प्राणांस्त्यक्त्वा महाहवे ॥ ४९ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवं मुनिस्तथेत्युक्त्वा कवीन्द्रो राजसत्तम धृतराष्ट्रेण पुत्रेण ध्यानमन्वगमत्परम् ॥५०॥ निकल रहा है । भेरी और पटह अङ्गारों की वर्षा करते सार ऐसा कोई उपाय करो जिसमें यह लोक-क्षय न है । ऊँचे वृक्षों के ऊपर बाईं ओर से घूम-घूमकर हो ॥४२॥४६॥ वैशम्पायनजी ने कहा-हे राजा कौए बैठते हैं और अयन्त अमङ्गल शब्द कर रहे । जनमेजय ! अपने पिता वेदव्यास के ये वचन सुनकर हैं । कुछ कौए वारम्बार काव-काव करके ध्वजाओं के । अब धृतराष्ट्र ने कहा है-भगवन् ! यह लोक-क्षय होना अग्रभाव पर आ बैठते हैं और राजाओं के विनाश की। मेरी बुद्धि मे देवकृत है । राजा लोग क्षत्रिय-धर्म के भूचना दे रहे हैं । दुरन्त हार्थी कांपते और चिन्ता- | अनुसार युद्ध में मरकर बीरो के योग्य लोको में जाकर युक्तमे होकर मल-मूत्र त्याग कर रहे हैं । घोड़े अत्यन्त । सुग्य भोगेंगे । यहा उनकी परम कीर्ति होगी और दीनभार धारण किये हुए हैं । हाथियों के पसीना परलोक मे उन्हे सुग्व भागने को मिलेगा ॥४७॥४९॥ निकल रहा है । [इम प्रकार स्वर्ग, आकाश और धृतराष्ट्र के ये वचन सुनकर कवीश्वर व्यासदेव ने दम पृथ्वी पर विविध उत्पान हो रहे हैं जिनमे गनाओं भर सोचकर कहा- हे राजेन्द्र ! इसमें संशय नहीं के लिए महाभय की सूचना मिल रही है । ] है । कि काल इस संसार का विनाश करता है और फिर गजेन्द्र ! अब तुम इन उत्पातों को देखकर ममयानु जगत् की सृष्टि करता है | इस लोक में कोई वस्तु अध्याय ३ ] म हा भारत [ ४००३ । स मुहूर्त तथा ध्यात्वा पुनरेवाऽब्रवीद्वचः असंशयं पार्थिवेन्द्र कालः संक्षयते जगत् सृजते च पुनर्लोकान्नेह विद्यति शाश्वतम् ज्ञातीनां वै कुरूणां च सम्बन्धिसुहृदां तथा ॥ ५२ ॥ धर्म्य देशय पन्थानं समर्थो ह्यसि वारणे क्षुद्रं जातिवधं प्राहुर्मा कुरुष्व ममाऽप्रियम् ॥ ५३॥ कालोऽयं पुत्ररूपेण तव जातो विशाम्पते न वधः पूज्यते वेदे हितं नैव कथञ्चन ॥ ५४॥ हन्यात्स एनं यो हन्याकुलधर्म स्विकां तनुम् । कालेनोत्पथगन्ताऽसि शक्ये सति यथाऽऽपदि ॥ ५५॥ कुलस्याऽस्य विनाशाय तथैव च महीक्षिताम् । अनर्थों राज्यरूपेण तव जातो विशाम्पते लुप्तधर्मा परेणाऽसि धर्मं दर्शय वै सुतान् किं ते राज्येन दुर्धर्प येन प्राप्तोऽसि किल्विपम् ।। ५७ ।। यशो धर्म च कीर्ति च पालयन्वर्गमाप्स्यसि । लभन्तां पाण्डवा राज्यं शमं गच्छन्तु कौरवाः ॥ ५८ ॥ एवं ब्रुवति विप्रेन्द्रे धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः आक्षिप्य वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यं चैवाऽब्रवीत्पुनः ॥ ५९ ।। सदा रहनेवाली नहीं है । तुम इस अनिष्ट घटना को तुम कालप्रेरित होकर, आपकाल न होने पर भी रोकने में समर्थ हो। इसलिए इस समय कौरच, पाण्डव, आपकाल की तरह,जातिमध में लगे हुए हो। अपने कुल सम्बन्धी और सुहृद् आदि को धर्म का मार्ग दिगाओ और अन्य राजाओं के संहार के लिए काल की प्रेरणा और उस पर चलने के लिए उनसे अनुरोध करो || से तुम कुमार्ग में चलाये जा रहे हो । राज्य का लोभ जाति का वध बड़ा ही क्षुद्र और नीच कार्य है । उसे है। इस महान् अनयं का मूल कारण है | तुम एक रोको । चुप रहकर मेरा अप्रिय मत करो । यद में दम धर्म का रोर करने पर उतार हुए हो । मेरा हत्याकाण्ड--जाति-ध-की बड़ी निन्दा की गई । कहा मानो, पुगे को धर्म का मार्ग दिगाओ। है। यह कभी हितकारी नहीं हो सकता है गजेन्द्र राजेन्द्र ! तुम यह गम्प लेकर क्या करे जिनमे साक्षात् काल ही तुम्हारे यहा पुत्र के ग्प में उत्पन पापभागी होना पड़ेगा और अगानि व्यर्य में होगी ! हुआ। मनुस्य या शरीर कुल-धर्म का पालन करना जो मेरा यहा मानोगे ना तुम यश, यम और कीर्ति जो कोई अपने युलधर्म रूप शरीर को नष्ट प्राम होगी । अन्त को स्वर्गीक में जाओगे । इमटिए करना उमे यह पुल-धर्म ही चौपट कर देता है। ऐसा कंगे, जिसमें पाण्डरों को गम्य मिरे और कौरव [ भीष्मपर्व व्यास ४००४ ] म हा भा र त भृतराष्ट्र उवाच-यथा भवान्वेत्ति तथवै वेत्ता भावाभावो विदितो मे यथार्थी। खार्थे हि संमुह्यति तात लोको मां चापि लोकात्मकमेव विद्धि ॥६॥ प्रसादये त्वामतुलप्रभावं त्वं नो गतिर्दर्शयिता च धीरः न चापि ते मदशगा महर्षे न चाऽधर्म कर्तुमर्हा हि मे मतिः ॥६१॥ त्वं हि धर्मप्रवृत्तिश्च यशः कीर्तिश्च भारती कुरूणां पाण्डवानां च मान्यश्चापि पितामहः ॥ ६२॥ व्याम उवाच--वैचित्रवीर्य नृपते यत्ते मनसि वर्तते अभिधत्व यथाकाम छेत्ताऽस्मि तव संशयम् ॥६३ ।। धृतराष्ट्र ड्याच -यानि लिङ्गानि संग्रामे भवन्ति विजयिष्यताम । तानि सर्वाणि भगवञ्छोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥६४॥ उवाच-प्रसन्नभाः पावक ऊर्ध्वरश्मिः प्रदक्षिणावर्त्तशिखो विधूमः। पुण्या गन्धाश्चाऽऽहुतीनां प्रवान्ति जयस्यैतद्भाबिनो रूपमाहुः॥६५। गम्भीरघोषाश्च महास्वनाश्च शङ्खा मृदङ्गाश्च नदन्ति यत्र विशुद्धरश्मिस्तपनः शशी च जयस्यैतद्भाविनो रूपमाहुः ॥६६॥ इप्टा वाचः प्रसृता वायसानां सम्प्रस्थितानां च गमिष्यतां च। ये पृष्ठतस्ते त्वरयन्ति राजन्ये चाऽग्रतस्ते प्रतिषेधयन्ति ॥६७॥ कल्याण तथा सुख प्राप्त करें ॥५४॥५८॥ व्यासदेव | करनी चाहिए ॥५९१६२॥ व्यासजी ने कहा--- के यों कहने पर राजा धृतराष्ट्र ने प्रशसा करके भी राजेन्द्र ! तुम्हारे मन में जो सन्देह है उसे प्रकट उनकी बातों के ऊपर उपेक्षा का भाव दिखाकर | करो । मैं तुम्हारे संशयों को मिटा दूंगा ॥६३॥धृतराष्ट्र कहा—हे भगवन् ! आपकी तरह मैं भी स्थिति और ने कहा- हे भगवन् ! युद्ध में विजय प्राप्त करने- विनाश का यथार्थ हाल जानता हूँ | हे तात ! सब | बालों को जो शुभ लक्षण देख पड़ते हैं, उन्हें कहिए। संमार के लोग स्वार्थ-साधन के मोह मे पडकर स्वार्थ | उन्हें सुनने की मुझे वड़ी अभिलाषा है ॥६॥व्यास- साधने की ही धुन में लगे रहते हैं | मैं ससार के जा ने कहा--हे राजेन्द्र ! हवन के उपरान्त अग्नि ही भीतर है। आपका प्रभाव अतुल है । आप धीर की निर्मल प्रभा देख पडती है । अग्नि की लपट पुरुष हैं । मेरी एक मात्र गति और मुझे उपदेश | दक्षिणापत उठती है । बिना धुएँ की अग्नि की ज्वालाएँ देनेवाले आप ही हैं। इसी लिए मैं आपको मानता ऊपर उठनी हैं । आहुति छोड़ने के समय अग्नि से हूँ। हे महर्षि ! मेरे बेटे मेरे वश में नहीं हैं । मैं स्वयं अत्यन्त पवित्र गन्ध निकलती है । यही विजय का अधर्म करना नहीं चाहता । आप हमारे धर्म, यश, लक्षण है । जिधर शह और मृदङ्ग का शब्द बड़ा काति, धर्य, स्मृति आदि के मूल कारण हैं । आप भारी और गम्भीर होता है, मूर्य और चन्द्रमा का कौरवों और पाण्डवों के माननीय पितामह हैं । इस प्रकाश अत्यन्त उजवल होता है उधर ही जय होना लिए पाण्डों की तरह कौरवों पर भी आपको कृपा निश्चित है । युद्ध में जिनके जाते समय कौए अनुकूल । - 4r ~ अध्याय ३] म हा भारत [ ४००५ । कल्याणवाचः शकुना राजहंसाः शुकाः क्रौञ्चाः शतपत्राश्च यत्र । प्रदक्षिणाश्चैव भवन्ति संख्ये ध्रुवं जयस्तत्र वदन्ति विप्राः ॥६८ ॥ अलङ्कारैः कवचैः केतुभिश्च सुखप्रणादैहेपितैर्वा हयानाम् भ्राजिष्मती दुष्प्रतिवीक्षणीया येषां चमूस्ते विजयन्ति शत्रून् ॥६९ ॥ हृष्टा वाचस्तथा सत्वं योधानां यत्र भारत न म्लायन्ति स्रजश्चैव ते तरन्ति रणोदधिम् ॥७॥ इप्टा वाचः प्रविष्टस्य दक्षिणाः प्रविविक्षतः पश्चात्सन्धारयन्त्यर्थमग्रे च प्रतिषेधिकाः ॥ ७१॥ शब्दरूपरसस्पर्शगन्धाश्चाऽविकृताः शुभाः सदा हर्पश्च योधानां जयतामिह लक्षणम् - ॥७२॥ अनुगा वायवो वान्ति तथाऽभ्राणि वयांसि च । अनुप्लवन्ति मेघाश्च तथैवेन्द्रधनूंपि च ॥७३॥ एतानि जयमानानां लक्षणानि विशाम्पते भवन्ति विपरीतानि मुमूर्पूणां जनाधिप ॥७४॥ अल्पायां वा महत्यां वा सेनायामिति निश्चयः । हो योधगणस्यैको जयलक्षणमुच्यते ॥७५॥ शब्द करते हैं उनकी जय अवश्य होती है। पीछे कौओं हुई " इत्यादि वाक्य कहते हैं ये जय प्राप्त करने में का बोलना शुभ है और आगे बोलना अशुभ है ॥६५॥ समर्थ होते हैं । जिस पक्ष के योद्धा कहते हैं कि ६७॥ ब्राह्मणों का कहना है कि राजहंस, तोते, फ्रौंच, "युद्ध न करना, मारे जाओगे" यह पक्ष अपश्य ही शतपन आदि पक्षी शुभ शब्द करते हुए जिनकी हार जाता है । जिनकी जय होनेवाली होती है उनके प्रदक्षिणा करते हैं उनको अवश्य जय प्राप्त होती है। शब्द, रूप, रम, गन्ध, स्पर्श आदि के कार्यों में कुछ अलकार, कवच, पजा, सिंहनाद और घोड़ों के शब्द भी विकार नहीं देग्य पड़ता-हृदय में मदा हर्ष बना आदि से जिनकी सेना परम शोभायमान और दुनि- रहता है । यायु का अनुकूल होकर चरना, अनुकूल राक्ष्य होती है उन्हीं को जय प्राप्त होती है। हे भारत ! वर्षा होना, पक्षियों का अनुकूट चलकर शब्द करना निधर योद्धाओं के वचन हर्पपूर्ण होते हैं और बारों | और इन्द्रधनुगों का पाठे उदय होना, ये रक्षण विजय के कण्ट की मालाएँ नहीं मुरझातीं ये ही मुग से | के मूचक हैं । हे राजेन्द्र ! इन बातों का प्रतिकूल संपाम-मागर के पार पढने हैं ॥६८७०॥ जो होना हार का और मृयु का टक्षण ममझना चाहिए योदा शनु सेना में प्रवेश करके "मारे डाटता हूँ" ७११७४॥ मना थोदी हो चाहे अधिक, योद्धा त्यादि उत्साह के याश्य यहते हैं, और शमना में | में हर्ष और उमाह देख पड़ना ही जय का मुस्य प्रश होने के लिए उत्सुक होकर "तुम्हारी सेना नष्ट कारण है । एक मनिक भी यदि उमाहहीन होकर ४००६ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व । एको दीर्णो दारयति सेनां सुमहतीमपि तां दीर्णामनुदीर्यन्ते योधाः शूरतरा अपि ॥७६॥ दुर्निवा तदा चैव प्रभग्ना महती चमूः अपामिव महावेगास्त्रस्ता मृगगणा इव ॥७७॥ नैव शक्या समाधातुं सन्निपाते महाचमूः दीर्णामित्येव दीर्यन्ते सुविद्वांसोऽपि भारत ॥७८॥ भीतान्भन्नांश्च सम्प्रेक्ष्य भयं भूयोऽभिवर्द्धते । प्रभग्ना सहसा राजन्दिशो विद्रवते चमूः ॥७९॥ नैव स्थापयितुं शक्या शूरैरपि महाचमूः सत्कृत्य महतीं सेनां चतुरङ्गां महीपतिः उपायपूर्व मेधावी यतेत सततोत्थितः ॥ ८०॥ उपायविजयं श्रेष्ठमाहुर्भेदेन मध्यमम् जघन्य एप विजयो यो युद्धेन विशाम्पते ॥८१॥ महान्दोपः सन्निपातस्तस्याऽऽद्यः क्षय उच्यते । परस्परज्ञाः संहृष्टा व्यवधूताः सुनिश्चिताः ॥८२ ॥ अपि पञ्चाशतं शूरा मृद्गन्ति महती चमूम् भाग खड़ा हो तो बहुत सी सेना भी भाग खड़ी होती । चतुरङ्गिणी सेना को सत्कारपूर्वक अपने वश में रक्खे, है। सेना के पांव उखड़ जाने पर बड़े-बड़े शूरवीर और फिर पहले साम, दान आदि उपायों से विजय भी पीछे हट जाते हैं। जब बड़ी भारी सेना भाग खड़ी प्राप्त करने की चष्टा करे ॥७८/८०॥ भेद से जय होती है तब, भयभीत होकर भागे हुए मृगों के झुण्ड प्राप्त करने का उपाय मध्यम है । युद्ध करके जय की तरह, जल के महाप्रवाह की तरह, वह लौटाई प्राप्त करना अधम उपाय है । जब कोई उपाय काम नहीं जा सकती ॥७५/७७॥ उस संघर्ष के समय न करे तब युद्ध करना चाहिए । वास्तव में युद्ध में बड़े-बड़े चतुर रण-पण्डित सेनापति भी उसे बेसिल- | अनेक दोष हैं। सबसे बडा और पहला दोष यह है सिले भागती हुई सेना को सँभालने और एकत्र करने कि उसमें मनुष्यों का नाश होता है । हे राजेन्द्र ! में असमर्थ हो जाते हैं; बल्कि सब सेना को भागते | एक दूसरे को अच्छी तरह जाननेवाले, उत्साही, स्त्री- देवकर वे आप ही डरकर, निरुत्साह होकर, भागने | पुत्र आदि में आसक्ति न रखनेवाले, दृढ़ निश्चयवाले, को तैयार हो जाते हैं । उन्हें डरे हुए और भागते । दृष्ट, कभी पीठ न दिखानेवाले पचाम वीर पुरुष भी देवकर बची हुई सेना और भी डर जाती है । तब बड़ी भारी सेना को नष्ट कर देते हैं। तत्परता से बड़े-बड़े शूर भी उस महासेना को नहीं रोक सकते । युद्ध करनेवाले पांच, छः, सात मनुष्य भी विजय प्राप्त बुद्धिमान् राजा को चाहिए कि सदा सावधान रहकर कर सकते हैं । इन गुणों से हीन हज़ारों मनुष्य भी अध्याय ४ म हा भा र त [४००७ ... ~ वैशम्पायन उवाच- 'अपि वा पञ्च पट् सप्त विजयन्त्यनिवर्तिनः ॥८३॥ न वैनतेयो गरुडः प्रशंसति महाजनम् दृष्ट्वा सुपर्णोऽपचितिं महत्या अपि भारत ॥८४॥ न वाहुल्येन सेनाया जयो भवति नित्यशः अध्रुवो हि जयो नाम दैवं चाऽत्र परायणम् । जयवन्तो हि संग्रामे कृतकृत्या भवन्ति हि ॥८५॥ इति श्री मन्महामारते भाष्मपर्वणि जम्बूखण्डनिर्माणपर्वणि निमित्ताख्याने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ भाग खड़े होते हैं । असंख्य स्वर्णचड पक्षियों के झुण्ड | सेना बहुत होने से ही सदा जय नहीं होती । जय को गरुड़ अकेले ही मार भगाते हैं । इस प्रकार अकेले , अनिश्चित है । वह देव के अधीन है । जो लोग अपने द्वारा भारी सेना के विनाश को देखकर गरुड़ संग्राम में विजय प्राप्त करते हैं वे कृतकृत्य हो बहुत बड़ी सेना की प्रशंसा नहीं करते । हे राजेन्द्र! { जाते हैं ||८११८५|| मीरपर्व का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥ -एवमुक्त्वा ययौ व्यासो धृतराष्ट्राय धीमते धृतराष्ट्रोऽपि तच्छ्रुत्वा ध्यानमेवाऽन्वपद्यत ॥ १ ॥ स मुहूर्त्तमिव ध्यात्वा विनिःश्वस्य मुहुर्मुहुः । सञ्जयं संशितात्मानमपृच्छद्भरतर्षभ ॥ २ ॥ सञ्जयेमे महीपालाः शूरा युद्धाभिनन्दिनः अन्योन्यमभिनिघ्नन्ति शस्त्रैरुच्चावचैरिह पार्थिवाः पृथिवीहेतोः समभित्यज्य जीवितम् । न वा शाम्यन्ति निनन्तो वर्धयन्ति यमक्षयम् ॥ ४ ॥ भौममैश्वर्यमिच्छन्तो न मृप्यन्ते परस्परम् मन्ये बहुगुणा भूमिस्तन्ममाऽऽचक्ष्व सञ्जय चौथा अध्याय ॥ ४॥ वैशम्पायन ने कहा- हे राजा जनमेजय ! : और आशा छोड़कर विविध अख-शस्त्रों के द्वारा एक महात्मा व्यासदेव जी इतना कहकर जब चले गये। दूसरे की हत्या करेंगे । वे परस्पर मारे जाकर यमपुरी तब उनके वचन सुनकर राजा धृतराष्ट्र ने कुछ देर | को भर भले देंगे, किन्तु शान्त भाव नहीं धारण करेंगे। तक सोचा । फिर बारम्बार सांस छोड़ते हुए धृतराष्ट्र राजा लोग पृथ्वी के ऐधर्य की इच्छा से एक दूसरे ने ज्ञानी संजय से कहा--हे संजय ! सप्रामप्रिय को नहीं देख सकते; एक दुसरे का प्राणान्तक शनु महाबली पराक्रमी राजा लोग युद्ध में जीवन का मोह हो रहा है । इस नीच व्यरहार-युद्ध से कोई - - .००८ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व । r वहूनि च सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च कोटयश्च लोकवीराणां समेताः कुरुजाङ्गले देशानां च परीमाणं नगराणां च सञ्जय श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन यत एते समागताः दिव्यबुद्धिप्रदीपेन युक्तस्त्वं ज्ञानचक्षुपा प्रभावात्तस्य विप्रासस्याऽमिततेजसः सञ्जय उपाच-यथाप्रज्ञं महाप्राज्ञ भौमान्वक्ष्यामि ते गुणान् । शास्त्रचक्षुरवेक्षस्व नमस्ते भरतर्षभ द्विविधानीह भूतानि चराणि स्थावराणि च त्रसानां त्रिविधा योनिरण्डस्वेदजरायुजाः ॥ १०॥ त्रसानां खलु सर्वेषां श्रेष्ठा राजञ्जरायुजाः जरायुजानां प्रवरा मानवाः पशवश्च ये ॥ ११ ॥ नानारूपधरा राजेस्तेषां भेदाश्चतुर्दश वेदोक्ताः पृथिवीपाल येषु यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ॥ १२ ॥ ग्राम्याणांपुरुषाः श्रेष्ठाः सिंहाश्चाऽरण्यवासिनाम् । सर्वेपामेव भूतानामन्योन्येनोपजीवनम् ॥ १३ ॥ लौटना नहीं चाहता । इससे मुझे जान पड़ता है कि पसीने से उत्पन्न होनेवाले और जरायु नाम की झिल्ली पृथ्वी में बहुत से गुण हैं । तुम मेरे आगे पृथ्वी के से उत्पन्न होनेाले । सब जङ्गम जीवों में जरायु से गुणों का वर्णन करो । तुम उन अमित तेजस्वी महर्षि उत्पन्न होनेवाले पशु और मनुष्य श्रेष्ठ हैं ॥९।११।। व्यामदेव के प्रसाद से दिव्य बुद्धि और ज्ञानमयी दिव्य उनमें विविध रूपधारी यज्ञ के साधन रूप पशु प्रधान दृष्टि प्राप्त कर चुके हो ॥१।५|| कुरुक्षेत्र में हज़ारों, | हैं । पशु चौदह प्रकार के हैं । उनमें सात पशु वन लाग्यों, करोड़ों वीर क्षत्रिय आकर युद्ध के लिए एकत्र | के रहनेवाले और सात पशु गॉवों के निवासी हैं । हुए हैं । मैं मुनना चाहता हूँ कि वे कहाँ-कहाँ से | सिंह, बाघ, वराह, भैंसे, हाथी, रीछ और वानर, आये हैं। उनके देशों और नगरो की आकृति-प्रकृति | ये सात जगली पशु हैं । गाय, वझरी, भेड़ा, मनुष्य, सुनने की मुझे वही अभिलाषा है ॥६॥८॥ सञ्जय | घोड़े, खच्चर और गधे, ये सात गाँरों के निवासी ने कहा- हे भरतश्रेष्ठ ! आप बड़े बुद्धिमान् हैं । हैं । हे राजेन्द्र ! वेद में इन चौदह पशुओं का मैं आपको प्रणाम करके पृथ्वी के गुणों का वर्णन | वर्णन है । इनके अनेक उपभेद भी हैं । ग्रामवासियों करता है, सुनिए । हे राजेन्द्र ! प्राणी दो प्रकार के | में मनुष्य और वनवासियों में सिंह प्रधान है । ये हैं । म्यार और जगम, अर्थात् स्थिर और चटनेवाले सब जीर एक दूसरे के द्वारा अपनी जीविका चलाते जाम नान प्रकार के हैं । अण्डे से उत्पन्न होनेगले, ' हैं । स्थावर प्राणी उद्भिज् (पृथ्वी फोड़कर निकलते) , । casma
अध्याय ५]
महा भारत
[४००९
-
उद्भिजाः स्थावराः प्रोक्तास्तेषां पञ्चैव जातयः ।
वृक्षगुल्मलता वल्लयस्त्वक्तारास्तृणजातयः ॥ १४ ॥
तेषां विंशतिरेकोना महाभूतेषु पञ्चसु
चतुर्विशतिरुद्दिष्टा गायत्री लोकसम्मता ॥१५॥
य एतां वेद गायत्री पुण्यां सर्वगुणान्विताम् ।
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ स लोके न प्रणश्यति ॥१६॥
अरण्यवासिनः सप्त सप्तपां ग्रामवासिनः
सिंहा व्याघ्रा वराहाश्च महिपा वारणास्तथा ॥१७॥
ऋक्षाश्च वानराश्चैव सप्ताऽऽरण्याः स्मृता नृप ।
गौरजाविमनुष्याश्च अश्वाश्वतरगर्दभाः ॥१८॥
एते ग्राम्याः समाख्याताः पशवः सप्त साधुभिः ।
एते वै पशवो राजन्याम्यारण्याश्चतुर्दश
भूमौ च जायते सर्व भूमौ सर्वं विनश्यति
भूमिः प्रतिष्ठा भूतानां भूमिरेव सनातनम् ॥ २० ॥
यस्य भूमिस्तस्य सर्व जगत्स्थावरजङ्गमम्
तत्राऽतिगृद्धा राजानो विनिघ्नन्तीतरेतरम् ॥ २१ ॥
इति श्री म महामारते मी पाये जम्ममण्डनिर्माणपर्वगि मोमगुणायन चतुर्थोन्याय ॥४॥
है । उनकी पाँच प्रकार की जातियाँ हैं-~~-वृक्ष, रता । युक्त पवित्र यदमाता गायत्री के इस भेद को जो यो
( जो बहुत दिनों तक पेड़ पर ठहरें, जैस गिरोय जानता है उसरा रिनास नहीं होता ।हे राजेन्द्र !
१ आदि), गुल्म, वल्ली, (एक वर्ष त पृथ्वी पर भूमि से हो सकी उत्पत्ति हाना है और भूमि में
नेपाली बुहड़े आदि की) और त्वसार तृण
ही सरलीन हो जाते हैं। भूमि ही मन प्राणियों
( बाँस आदि) ॥१२॥१४॥ ये स्थारर-जगमगर
या अधिष्ट्वान है। भूमि ही नित्य है जिसके अ-
उनीस भूत (प्राणी) है । पञ्च महाभूत ( आगश,
धीन भूमि है उसमें यश में मर स्थावर-जङ्गमास
पृषी, जल, अग्नि, वायु) मिगवर ये चीपसि जगत् है । भूमि पर अत्यन गंभ होने से ही
हैं। चौरीस वर्णमाली गायत्री अपन पणी में इन्हीं राना रोग एक दूसरे की हत्या करने को उपत
चौवाम भूनों का बोध कराती है । सन गुणों से । हो जाते हैं ॥१५॥२१॥
मम का चौथा अध्याग समाम हुआ ॥ ४ ॥
-
अप परमाणाय ॥५॥
धृतरा आच-नदीनां पर्वतानां च नामधेयानि सञ्जय
तथा जनपदानां च ये चाऽन्ये भूमिमाश्रिताः ॥ १ ॥
४०१० ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व प्रमाणं च प्रमाणज्ञ पृथिव्या मम सर्वतः । निखिलेन समाचक्ष्व काननानि च सञ्जय ॥ २ ॥ सञ्जय उवाच-पञ्चेमानि महाराज महाभूतानि संग्रहात् जगतीस्थानि सर्वाणि समान्याहुर्मनीषिणः भूमिरापस्तथा वायुरनिराकाशमेव च गुणोत्तराणि सर्वाणि तेषां भूमिः प्रधानतः शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः भूमेरेते गुणाः प्रोक्ता ऋपिभिस्तत्त्ववेदिभिः चत्वारोऽप्सु गुणा राजन्गन्धस्तत्र न विद्यते शब्दः स्पर्शश्च रूपं च तेजसोऽथ गुणास्त्रयः । शब्दः स्पर्शश्च वायोस्तु आकाशे शब्द एव तु ॥ ६ ॥ एते पञ्च गुणा राजन्महाभूतेषु पञ्चसु वर्तन्ते सर्वलोकेषु येषु भूताः प्रतिष्ठिताः अन्योन्य नाऽभिवर्तन्ते साम्यं भवति वै यदा ॥ ८ ॥ यदा तु विषमीभावमाविशन्ति परस्परम् तदा देहेर्देहवन्तो व्यतिरोहन्ति नाऽन्यथा आनुपूर्व्या विनश्यन्ति जायन्ते चाऽनुपूर्वशः । सर्वाण्यपरिमेयाणि तदेषां रूपमैश्वरम् ॥ १० ॥ पांचवां अध्याय ॥ ५॥ धृतराष्ट्र ने कहा-हे सजय ! इस पृथ्वी पर | तेज में शब्द, स्पर्श ओर रूप, ये तीन ही गुण हैं। जो नदी, पर्वत, जनपद, यन आदि हैं उनके नाम यायु में शब्द ओर स्पर्श, ये दो गुण हैं । आकाश और परिमाण विशेष रूप से कहीं। सजय ने कहा का गुण केरल शब्द है ॥१६॥ हे महाराज ! यह हे राजेन्द्र ! उक्त पाच महाभूतों की सन्धि से ही सारा ससार पञ्चभूतमय है । जब ये पाचों गुण सम- जगत् के सर पदार्थ बने हैं। इसी से बुद्धिमान् भार से, परस्पर प्रशान्त रूप से, रहते हैं तन सृष्टि विद्वान् टोग पृथ्वी के सर पदायों को समान कहते हैं। की स्थिति बनी रहती है। उसी तरह जर इनमें विषमता आकाश, वायु, तेज, जट और भूमि, ये पाचों महान हो जाती है तब देहधारियों के शरीर छूट जाते हैं भूत उत्तरोत्तर अधिक गुण-मम्पन्न हैं । तत्वज्ञानी | ये सब गुण क्रमश एक-एक से उत्पन्न होते हैं और ऋषियों का कहना है कि पृथ्वी में शब्द, स्पर्श,रए, अन्त को उसी क्रम से एक-एक में टीन हो जाते ग और गध ये पाचों गुण है। जर में शन्द, स, हैं। उन सम्रा परिमाण करना अत्यन्त पटिन है। पए और गम, चार ही गुण हैं; गम नही है। इन गुणों का म्प ईश्वरक्त है ॥७॥१०॥ पाचभौतिक - अध्याय ५] म हा भारत [ ४०११ - तत्र तत्र हि दृश्यन्ते धातवः पाञ्चभौतिकाः तेषां मनुष्यास्तकेंण प्रमाणानि प्रचक्षते अचिन्त्याः खलु येभावान तांस्तर्केण साधयेत् । प्रकृतिभ्यः परं यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥१२॥ सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौचक्रसंस्थितः ॥१३ ।। नदीजलप्रतिच्छन्नः पर्वतश्चाऽभ्रसन्निभैः पुरैश्च विविधाकारै रम्यैर्जनपदैस्तथा ॥ १४ ॥ वृक्षः पुष्पफलोपेतैः सम्पन्नधनधान्यवान् लवणेन समुद्रेण समन्तात्परिवारितः ॥१५॥ यथा हि पुरुपः पश्येदादर्श मुखमात्मनः एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले ॥ १६ ॥ द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान् सर्वोपधिसमावायः सर्वतः परिवारितः ॥१७॥ आपस्ततोऽन्या विज्ञेयाः शेषः संक्षेप उच्यते । ततोऽन्य उच्यते चाऽयमेनं संक्षेपतः शृणु ॥१८॥ इति श्रीमन्महाभारते भीष्मपर्वणि जखडनिर्माणपर्वणि सुदर्शनद्वीपवर्णने पचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ धातु सभी स्थानों में देख पड़ते हैं । मनुष्य तर्क के | पुष्प पूर्ण वृक्ष असख्य हैं । इस धनधान्य-पूर्ण द्वीप द्वारा उनके प्रमाणों का निर्देश करते हैं । किन्तु जो को चारों ओर से खारी समुद्र घेरे हुए है ॥१३॥१५|| भाव (ससार की उत्पत्ति-सम्बन्धी पदार्थ ) अचिन्त्य | जैसे शीशे में मनुष्य अपना मुख देखता है, वैसे ही हैं उनका निरूपण तर्क के द्वारा न करना चाहिए। सुदर्शनद्वीप का प्रतिबिम्ब चन्द्रमा के मण्डल में देख जो विषय या पदार्थ इन्द्रियों से परे है उसी को अचिन्त्य पड़ता है । जम्बूद्वीप के दो अशों में प्लक्षस्थान, दो समझना चाहिए ॥११॥१२॥ हे राजेन्द्र ! अब मैं / अंशों में शाल्मलिस्थान ] दो अंशों में पिप्पल स्थान जम्बूद्वीप का वर्णन करता है। सुनिए । इस जम्बूद्वीप | और दो अशों में महाशशस्थान है । इस स्थान में का दूसरा नाम सुदर्शन द्वीप है । यह चक्र के आकार भी सब प्रकार की औषधिया और पर्वत हैं। इसमें का गोल और दुर्लक्ष्य है । इसके सब स्थानों में नदिया ! नदियां भी हैं । अब मैं जम्बूद्वीप के शेप खण्डों का हैं, जल भरा हुआ है । इसमें मेघ की तरह ऊँचे | वर्णन संक्षेप में करता हूँ; सुनिए ॥१६॥१८॥ पर्वत, तरह तरह के नगर, रम्य जनपद और फल- भीष्मपर्व का पांचवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५ ॥ । ~~~~ ४०१२ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व - अथ यष्टोऽध्यायः ॥ ६ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-उक्तो द्वीपस्य संक्षेपो विधिवद् बुद्धिमंस्त्वया । 'तत्त्वज्ञश्चाऽसि सर्वस्य विस्तरं बेहि सञ्जय . यावान्भूम्यवकाशोऽयं दृश्यते शशलक्षणे तस्य प्रमाण प्रबेहि ततो वक्ष्यसि पिप्पलम् ॥२॥ वैशम्पायन उवाच-एवं राज्ञा स पृष्टस्तु सञ्जयो वाक्यंमत्रवीत सञ्जय उवाच---प्रागायता महाराज पडेते वर्षपर्वताः अवगाढा ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमी हिमवान्हेमकूटश्च निषधश्च नगोत्तमः नीलश्च वैदर्यमयः श्वेतश्च शशिसन्निभः सर्वधातुविचित्रश्च शृङ्गवान्नाम पर्वतः एते वै पर्वता राजन्सिद्धचारणसेविताः एपामन्तरविष्कम्भो योजनानि सहस्रशः तत्र पुण्या जनपदास्तानि वर्षाणि भारत ॥ ६ ॥ वसन्ति तेषु सत्वानि नानाजातीनि सर्वशः इदं तु भारतं वर्षं ततो हैमवतं परम् ॥ ७ ॥ हेमकूटात्परं चैव हरिवष प्रचक्षते दक्षिणेन तु नीलस्य निपधस्योत्तरेण तु ॥ ८ ॥ प्रागायतो महाभाग माल्यवान्नाम पर्वतः ततः परं माल्यवतः पर्वतो गन्धमादनः । । २ ~ ध्या अध्याय ॥६॥ धृतराष्ट्र ने कहा-हे संजय ! तुम संक्षेप में | ये छः सीमापन पूर्व समुद्र से पश्चिम समुद्र तक फैले जम्बूद्वीप का वर्णन कर चुसे; अब उसका वर्णन हुए हैं। इन पर्वतों पर सिद्धगण और चारण रहते पिम्नार के साथ करो । तुम सब तत्वों को अच्छी है ॥३॥५॥ इन पर्वतों के बीच का अन्तर हज़ारों प्रकार जानने हो । महाशश स्थान में जितनी पृथ्वी । योजन का है। यह बीच का पवित्र स्थान रहने के उमफा परिमाण और हाल पहले कहकर गिर ! योग्य है । वे हीमान ग्यण्ड हैं। उनमें अनेक जातियों पिपट पान का वर्णन करना ॥१॥२॥ मंजय ने के प्राणी याम करते हैं। यह भारत है। इसके यदा-हेरानन्द्र ! हिमालय, हेमट, निषध,येड्यमय बाद हमात रण्ड है । हेमकूट परन के बाद हरिवर्ष नाट परी, चन्मतुल्य अनरंत और मर धातुओं के । नोट पति के दक्षिण और और लिमित्र शिगरों में शामित शृङ्गयान् नाम या पर्वत- निषध पनि के उत्तर और मान्यगन् नाम या परत --- नाम का गण्ड अध्याय ६ ] म हा भारत [ ४०१३ - परिमण्डलस्तयोर्मध्ये मेरुः कनकपर्वतः आदित्यतरुणाभासो विधूम इव पावकः योजनानां सहस्राणि चतुरशीतिरुच्छ्रितः अधस्ताच्चतुरशीतिर्योजनानां महीपते ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक्च लोकानावृत्य तिष्ठति तस्य पार्श्वप्वमी द्वीपाश्चत्वारः संस्थिता विभो ॥ १२ ॥ भद्राश्वः केतुमालश्च जम्बूद्वीपश्च भारत उत्तराश्चैव कुरवः कृतपुण्यप्रतिश्रयाः ॥ १३ ॥ विहगः सुमुखो यस्तु सुपर्णस्याऽऽत्मजः किल । सवै विचिन्तयामास सौवर्णान्वीक्ष्य वायसान्॥ १४ ॥ मेरुरुत्तममध्यानामधमानां च पाक्षिणाम् अविशेषकरो यस्मात्तस्मादेनं त्यजाम्यहम् ॥१५॥ तमादित्योऽनुपयेति सततं ज्योतिषां वरः चन्द्रमाश्च सनक्षत्रो वायुश्चैव प्रदक्षिणः स पर्वतो महाराज दिव्यपुप्पफलान्वितः भवनरावृतः सर्वैर्जाम्बूनदपरिष्कृतैः तत्र देवगणा राजन्गन्धर्वासुरराक्षसाः अप्सरोगणसंयुक्ताःशैले क्रीडन्ति सर्वदा ॥१८॥ हैं । यह पर्वत पूर्व सागर तक फैला है । गन्धमादन हैं ॥१०११३।। एक समय पक्षिराज गरुड़ के पुत्र पर्वत पश्चिम समुद्र तक फैला है । माल्यवान् के बाद सुमुख ने सुमेरु पर्वत पर सुपर्ण के शरीरवाले कौओं ही गन्धमादन पर्वत है ॥६९॥ नील और निपध | को देखकर सोचा कि इस सुमेरु पर्वत पर उत्तम, पर्यत के मध्य में दोपहर के सूर्य के समान प्रभाशाली, मध्यम और अधम पक्षियो में कुछ भी अन्तर नहीं बिना धुएँ की अग्नि के तुल्य सुवर्णमय,हज़ारों योजनों | देख पड़ता । इसलिए मैं इसे छोड़कर चला जाऊँगा तक फैला हुआ, मण्डलाकार सुमेरु पर्वत है । सुमेरु [यों सोचकर सुमेरु को छोड़कर पक्षिराज सुमुख की ऊपर की चोटी वयालीस हजार योजन चौड़ीउत्तर कुरुदेश को चले गये ] 1 हे महाराज ! ज्योति- है । पृथ्वी के नीचे का भाग भी चौरासी हज़ार योजन मण्डली में श्रेष्ठ सूर्य, चन्द्रमा, सब नक्षत्र और वायु चौड़ा है। इस पर्वत के ऊपर, नीचे और आसपास उस सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा करते रहते हैं । यहा सब लोक हैं । सुमेरु के चारों ओर भद्राश्च, केतुमाल, के वृक्ष सुन्दर फलों और फलों से लदे रहते हैं। यहां जम्बूद्वीप (अर्थात् भरतखण्ड) और उत्तर कुरु, ये के दिव्य भवन सुवर्णमय और सुवर्ण की सामग्री से चार द्वीप हैं । उत्तर कुरु द्वीप में पुण्यात्मा लोग रहते | सजे हुए हैं ॥१४॥१७॥ वहा देवता, गन्धर्व, असुर, ।
४०१४ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व तत्र ब्रह्मा च रुद्रश्च शक्रश्चाऽपि सुरेश्वरः समेत्य विविधैर्यज्ञैर्यजन्तेऽनेकदक्षिणैः ॥ १९ ॥ तुम्बुरु रदश्चैव विश्वावसुर्हहाहुहूः अभिगम्याऽमरश्रेष्ठांस्तुष्टुवुर्विविधैः स्तवैः ॥ २०॥ सप्तर्पयो महात्मानः कश्यपश्च प्रजापतिः तत्र गच्छन्ति भद्रं ते सदा पर्वणि पर्वणि ॥ २१ ॥ तस्यैव मूर्धन्युशनाः काव्यो दैत्यैर्महीपते इमानि तस्य रत्नानि तस्येमे रत्नपर्वताः २२ ॥ तस्मात्कुवेरो भगवांश्चतुर्थं भागमश्नुते ततः कलांशं वित्तस्य मनुष्येभ्यः प्रयच्छति ॥ २३ ॥ पार्श्वे तस्योत्तरे दिव्यं सर्वर्तुकुसुमैश्चितम् कर्णिकारवनं रम्यं शिलाजालसमुद्गतम् ॥ २४ ॥ तत्र साक्षात्पशुपतिर्दिव्यैर्भूतैः समावृतः उमासहायो भगवान्रमते भूतभावनः ॥ २५॥ कर्णिकारमयीं मालां विभ्रत्पादावलम्विनीम् । त्रिभिनेत्रः कृतोद्योतस्त्रिभिः सूर्यरिवोदितैः ॥ २६ ॥ तमुग्रतपसः सिद्धाः सुबताः सत्यवादिनः पश्यन्ति न हि दुर्वृत्तेः शक्यो द्रष्टुं महेश्वरः ॥ २७॥ तस्य शैलस्य शिखराक्षीरधारा नरेश्वर विश्वरूपाऽपरिमिता भीमनिर्घातनिःस्वना ॥ २८॥ अमरा, गक्षम आदि देवयोनिया नित्य विहार करती है और उसका सोलहवा भाग मनुष्यों को देते हैं ॥२२॥ हैं। ग्रामा, रट और इन्द्र बहुत सी दक्षिणागले पिसि २३॥ उम मुमेरु पर्वत के उत्तर भाग में सब प्रकार प्रसार के यज्ञ करते हैं । नारद ऋषि तथा तुम्बुरु, के सब ऋतुओं के दिव्य फलों से परिपूर्ण, शिलाओं पिधारमु और हाहा-हह आदि गन्धर्ष उनके गुणों पर स्थित परम रमणीय कर्णिकार वन है । यहां या यमान किया करते हैं । महामनस्वी ममर्षिगण और पानी के माय महादेवजी पानों तक लटक रही प्रजापति यया यहां हर प पर जाने हैं ॥१८१ | कनर के फलों की माला पहने विचरते और बिहार २१॥ गजेन्ट ! उम सुमेरु पर्वत की चोटी पर दैत्यों करते हैं । मर भूनगण उन माग रहते हैं । उनके के माप शुमानार्य गहने हैं । ये मवगन और रनों | नीनों मंत्र उदय हो रहे मूर्य के ममान चमोले हैं गोगन पंत उन्ही के अधिकार में है। यक्षगन ॥२४॥२६॥ उत्तम प्रत करनेगले, उप्र तपस्वी, गुग उन्दी शुक्र में धन या बागाई भाग पात मत्ययादी, महामा मिदों को उनके दर्शन मिन्टने अध्याय ६ ] म हा भा र त [ ४०१५ - पुण्या पुण्यतमैर्जुष्टा गङ्गा भागीरथी शुभा प्लवन्तीव प्रवेगेन हदे चन्द्रमसः शुभे । ॥ २९॥ तया झुत्पादितः पुण्यः स ह्रदः सागरोपमः । • तां धारयामास तदा दुर्धरां पर्वतैरपि ॥ ३०॥ शतं वर्षसहस्राणां शिरसैव पिनाकधूकू मेरोस्तु पश्चिमे पार्श्वे केतुमालो महीपते ॥ ३१ ॥ जम्बूखण्डे तु तत्रैव महाजनपदो नृप आयुर्दशसहस्राणि वर्षाणां तत्र भारत ॥ ३२ ॥ सुवर्णवर्णाश्च नराः स्त्रियश्चाऽप्सरसोपमाः अनामया वीतशोका नित्यं मुदितमानसाः जायन्ते मानवास्तत्र निष्टप्तकनकप्रभाः गन्धमादनशृङ्गेषु कुवेरः सह राक्षसः संवृतोऽप्सरसां सङ्घमोदते गुह्मकाधिपः गन्धमादनपाश्र्वे तु परे त्वपरगण्डिकाः ॥३५॥ एकादश सहस्राणि वर्षाणां परमायुपः तत्र हृष्टा नरा राजंस्तेजोयुक्ता महाबलाः स्त्रियश्चोत्पलवर्णाभाः सर्वाः सुप्रियदर्शनाः निलात्परतरं श्वेतं श्वेताद्धरण्यकं परम् वर्षमैरावतं राजन्नानाजनपदावृतम् ॥ ३७॥ हैं । बुरे चरित्रवाले दुष्ट लोग उन महेश्वर के दर्शन पद है । वहा के पुरुषों के शरीर का रङ्ग तपे हुए नहीं पा सकते । उस सुमेरु के शिखर से वे पवित्र सुवर्ण के समान है । वहां की स्त्रियां अप्सराओं के जलवाली गङ्गाजी निकली हैं जिनके तट पर पुण्यात्मा समान होती हैं । उन की आयु दस हज़ार वर्ष की जन रहते हैं । वे लगातार गम्भीर शब्द करती हुई | होती है । उन्हें रोग और शोक नहीं होता । वे सदा प्रबल वेग से चन्द्रकुण्ड में गिरती हैं | गङ्गाजी से प्रसन्न देख पड़ते हैं ॥३२॥३३॥ उसके पास ही गन्ध- ही वह समुद्र-तुल्य पवित्र कुण्ड उत्पन्न हुआ है। मादन पर्वत के शिखर पर यक्षराज कुबेर राक्षसों और बड़े-बड़े पर्वत जिनके वेग को रोकने में असमर्थ है । अप्सराओं के साथ विहार करते हैं । गन्धमादन के उन गगाजी को भगवान् शङ्कर ने सैंकड़ों-हज़ारों | उत्तर भाग में असंख्य छोटे-छोटे पर्वत है। वहां के वर्षों तक अपने मस्तक पर ही धारण कर रक्खा था पुरुष सांवले, तेजस्वी और बड़े पराक्रमी हैं । वहां की ॥२७॥३१॥ हे राजेन्द्र ! जम्बूखण्ड के बीच सुमेरु | त्रियों का शरीर नीलकमल के रङ्ग का है. उनकी के पश्चिम किनारे पर केतुमाल नाम का महा जन सूरत देखनेवालों को मोहनेवाली और प्यारी है। - ४०१६ ] म हा भा र त [ भीमपर्व । धनुः संस्थे महाराज द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे इलावृत्तं मध्यमं तु पञ्च वर्षाणि चैव हि ॥ ३८ ॥ उत्तरोत्तरमेतेभ्यो वर्षमुद्रिच्यते गुणैः आयुः प्रमाणमारोग्यं धर्मतः कामतोऽर्थतः समन्वितानि भूतानि तेषु वर्षेषु भारत एवमेपा महाराज पर्वतैः पृथिवी चिता ॥ ४०॥ हेमकूटस्तु सुमहान्कैलासो नाम पर्वतः यत्र वैश्रवणो राजन्गुह्यकैः सह मोदते ॥४१॥ अस्त्युत्तरेण कैलासं मैनाकं पर्वतं प्रति हिरण्यशृङ्गः सुमहान्दिव्यो माणिमयो गिरिः ॥ ४२ ॥ तस्य पार्श्वे महहिव्यं शुभ्रं काञ्चनवालुकम् । रम्यं विन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः ॥४३॥ दृष्ट्वा भागीरथीं गङ्गामुवास वहुलाः समाः यूपा मणिमयास्तत्र चैत्याश्चापि हिरण्मयाः ॥४४॥ तत्रेष्ट्वा तु गतः सिद्धिं सहस्राक्षो महायशाः स्रष्टा भूतपतिर्यत्र सर्वलोकैः सनातनः ॥४५॥ उपास्यते तिग्मतेजा यत्र भूतैः समन्ततः नरनारायणौ ब्रह्मा मनुः स्थाणुश्च पञ्चमः ॥४६॥ उनकी आयु ग्यारह हजार वर्ष की है। नील पर्वत तरह का हेश न करके बडे मुख से रहते हैं । हे के उत्तर अंश में श्वेतखण्ड है। उसके उत्तर अश में महाराज ! इस तरह यह पृथ्वी बहुत से पर्वतों से घिरी हिरण्यकसण्ड है । उमफे उत्तर अश में अनेक जन हुई है । हेमकूट अयना कलास नाम का जो अत्यन्त पदों में शोभित ऐरातराण्ड है ॥३४॥३७॥ इन पिशाल पर्यन है उस पर यक्षराज कुवेर यक्षों के साथ गण्टों के दक्षिण भाग में भरतपण्ड है । इन सण्डों । रहकर सदा विहार किया करते हैं ।३८।४१शकैलास के का आकार धनुष का माहै । हे राजेन्द्र ! श्वेतारण्ट, उत्तर और मैनाक पर्वत के समीप एक हिरण्यशृङ्ग नाम हिरण्यकपण्ड, इरावृतपण्ड, हरियण्ड और हेमपन- 2 का बड़ा भारी मणिमय पर्पत है। उनके पाम सुवर्ण की ग्यण्ड, ये पाच ग्राण्ड मध्य में है। दक्षिण और भरत. बाइमे परिपूर्ण परम रमणीय बिन्दुसर नाम का दिव्य खण्ड और उत्तर और रास्तापण्ड है । इलाकृतपण्द सरोपर है। वहीं राजा भगीरथ ने बहुत दिनों तक तप मम्मे मध्य में है। ये पण्ड उत्तरोत्तर हर एक की क्रिया और गद्गानी के दर्शन पाय थे । उम सरोवर अंक्षा धर्म, अर्थ, काम, आरोग्य, आयु और परिमाण के रिनारे पर मणिमय यप और मुवर्णमय चैत्यभरन में अधिक है । न मण्डों के निगामी परम्पर किमी हैं ॥४२४४|| इन्द्र ने यहीं पर यन करकं मिद्धि अध्याय ६ ] म हा भा र त [ ४०१७ - तत्र दिव्या त्रिपथगा प्रथमं तु प्रतिष्ठिता ब्रह्मलोकादपक्रान्ता सप्तधा प्रतिपद्यते ॥४७॥ वस्खौकसारा नलिनी पावनी च सरस्वती जम्बूनदी च सीता च गङ्गा सिन्धुश्च सप्तमी ॥४८॥ अचिन्त्या दिव्यसङ्काशा प्रभोरेषैव संविधिः उपासते यत्र सत्रं सहस्रयुगपर्यये ॥४९॥ दृश्याऽदृश्या च भवति तत्र तत्र सरस्वती एता दिव्याः सप्त गङ्गास्त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ॥ ५० ॥ रक्षांसि वै हिमवति हेमकूटे तु गुह्यकाः सी नागाश्च निषधे गोकर्णं च तपोवनम् देवासुराणां सर्वेषां श्वेतपर्वत उच्यते गन्धर्वा निपधे नित्यं नीले ब्रह्मर्पयस्तथा शृङ्गवांस्तु महाराज देवानां प्रतिसञ्चरः ॥ ५२॥ इत्येतानि महाराज सप्त वर्षाणि भागशः भूतान्युपनिविष्टानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च तेषामृद्धिर्वहुविधा दृश्यते दैवमानुषी अशक्या परिसंख्यातुं श्रद्धया तु बुभूपता ॥ ५४॥ यां तु पृच्छसि मा राजन्दिव्यामेतांशशाकृतिम् । प्राप्त की है । परम तेजस्वी भगवान् रुद्र ने भी उसी । ती की धारा देख पड़ती है । ये सातों दिव्य गङ्गाएँ स्थान में रहकर प्रजा की सृष्ठी की है। उसी स्थान तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं । हिमालय पर राक्षस, नर, नारायण, ब्रह्मा, मनु और परम तेजस्वी शङ्कर हेमकूट पर यक्ष, निषध पर साँप और नाग, तपोवन की सब लोग उपासना किया करते हैं । त्रिपथगामिनी गोकर्ण पर्वत पर तपस्वी और नील पर्वत पर ब्रह्मर्पि गङ्गाजी ब्रह्मलोक से चलकर पहले उसी स्थान पर लोग रहते है । शृङ्गवान् पर्वत देवताओं के विचरने गिरी हैं । वहीं से उनकी वस्खौकसारा, नलिनी, का स्थान कहा जाता है ॥४९॥५२॥ हे महाराज ! सरस्वती, जम्बूनदी, साता, गङ्गा और सिन्धु नाम से मैंने जिन सात खण्डों का वर्णन किया है, उन्हीं में प्रसिद्ध सात धाराएँ बहीं हैं ॥४५॥४८॥ ईश्वर ने सब स्थावर-जङ्गम जीत रहते हैं | उनकी देवी और ही लोकोपकार के लिए यह अचिन्त्य दिव्य विधान मानुषी समृद्धि अनेक प्रकार की देख पड़ती है । किया है-पवित्र जलवाली गङ्गाजी की सात धाराएँ | उसकी संख्या करना असम्भव है; किन्तु हित चाहने- वहाई हैं । लोग जहाँ पर इन्द्र की उपासना करते हैं | वाले मनुष्य को उसके ऊपर सर्वथा श्रद्धा रखनी वहीं पर, सहस्र युग व्यतीत होने पर, अदृश्य सरस्व- ' चाहिए। हे राजेन्द्र ! अब मैं आपके प्रश्न के अनुसार ४०१८ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व . . पावे शशस्य द्वे वर्षे उक्ते ये दक्षिणोत्तरे कर्णी तु नागद्वीपश्च काश्यपद्वीप एव च ताम्रपर्णशिलो राजञ्छीमान्मलयपर्वतः एतद् द्वितीयं द्वीपस्य दृश्यते शशसंस्थितम् ॥ ५६ ॥ इति श्री मन्महाभारत भाष्मपर्वणि जम्बूखण्डनिर्माणपगि भूम्याटिपरिमाणविवरणे षष्टोऽध्यायः ॥ ६ ॥ महाशशस्थान का वर्णन करता हूँ-सुनिए । शशस्थान हैं। ताम्रपर्णी नदी और मलयपर्वत उसके सिर के समान के दक्षिण और उत्तर ओर दो खण्ड हैं। उसके आस जान पड़ते हैं | यह शश (खरगोश) के आकार का पास नागद्वीप और कास्यपद्वीप कानों की तरह स्थित [ द्वीप जम्बूद्वीप के दूसरे द्वीप के समान है ॥५३॥५६॥ मीमपर्व का छटा अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ६ ॥ 4 अथ सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ धृतराष्ट्र उवाच- मेरोरथोत्तरं पार्श्व पूर्वं चाऽऽचक्ष्व सञ्जय निखिलेन महाबुद्धे माल्यवन्तं च पर्वतम् सञ्जय उवाच-दक्षिणेन तु नीलस्य मेरोः पावें तथोत्तरे उत्तराः कुरवो राजन्पुण्याः सिद्धनिपेविताः तत्र वृक्षा मधुफला नित्यपुप्पफलोपगाः पुष्पाणि च सुगन्धीनि रसवन्ति फलानि च ॥ ३ ॥ सर्वकामफलास्तत्र केचिदवृक्षा जनाधिप अपरे क्षीरिणो नाम वृक्षास्तत्र नराधिप ये क्षरन्ति सदा क्षीरं पडूसं चाऽमृतोपमम् । वस्त्राणि च प्रसूयन्ते फलेप्वाभरणानि च सर्वा मणिमयी भूमिः सूक्ष्मकाञ्चनवालुका सर्वर्तुसुखसंस्पर्शा निप्पङ्का च जनाधिप musiasini सातवां अध्याय ॥ ७॥ धृतराष्ट्र ने कहा-हे सञ्जय ! तुम बड़े बुद्धिमान् | प्रदेश है । वहाँ के वृक्ष सदा सुमधुर रसयुक्त खादिष्ठ हो । अब मुमेरु के उत्तर ओर स्थित उत्तर कुस्देश फलों और सुगन्धित फलो से शोभित रहते हैं । यहाँ और पूर्व ओर स्थित स्थान का वर्णन करो । माल्यगन् कुछ वृक्ष ऐसे भी हैं जो इच्छाओं को पूर्ण करते हैं। पर्वत का हाल भी कहो ॥१॥ सञ्जय ने कहा-हे | वहाँ के क्षीरी नाम के वृक्ष , रसों से युक्त अमृत- महागज ! मुमेरु के उत्तर ओर और नीलगिरी के सदृश दूध की धारा बरसाते हैं । उन वृक्षों में फल दक्षिण और मिद्-जन-मेरित परम पवित्र उत्तरखुरु । के स्थान पर वस्त्र और आभूषण उत्पन्न होते हैं
अध्याय ७ ]
[ ४०१९
।
पुष्करिण्यः शुभास्तत्र सुखस्पर्शा मनोरमाः ॥ ६ ॥
देवलोकच्युताः सर्वे जायन्ते तत्र मानवाः
शुक्लाभिजनसम्पन्नाः सर्वे सुप्रियदर्शनाः ॥ ७॥
मिथुनानि च जायन्ते स्त्रियश्चाऽप्सरसोपमाः ।
तेपां ते क्षीरिणां क्षीरं पिबन्त्यमृतसन्निभम् ॥ ८ ॥
मिथुन जायते काले समं तच्च प्रवर्धने
तुल्यरूपगुणोपेतं समवेपं तथैव च
एवमेवाऽनुरूपं च चक्रवाकसम विभो
निरामयाश्च ते लोका नित्यं मुदितमानसाः ॥१०॥
दशवर्पसहस्राणि दशवर्षशतानि च
जीवन्ति ते महाराज न चाऽन्योन्यं जहत्युत ॥ ११ ॥
भारुण्डा नाम शकुनास्तीक्ष्णतुण्डा महाबलाः ।
तानिहरन्तीह मृतान्दरीपु प्रक्षिपन्ति च ॥ १२ ॥
उत्तराः कुरवो राजन्व्याग्यातास्ते समासतः
मेरोः पार्श्वमहं पूर्व वक्ष्याम्यथ यथातथम्
तम्य मृर्धाभिषेकस्तु भद्राश्वस्य विशाम्पने
भद्रसालवनं यत्र कालाम्रश्च महाद्रुमः ॥ १२ ॥
४०२० ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व । । - - कालाम्रस्तु महाराज नित्यपुष्पफलः शुभः द्रुमश्च योजनोत्सेधः सिद्धचारणसेवितः तत्र ते पुरुपाः श्वेतास्तेजोयुक्ता महावलाः स्त्रियः कुमुदवर्णाश्च सुन्दर्यः प्रियदर्शनाः चन्द्रप्रभाश्चन्द्रवर्णाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः चन्द्रशीतलगाच्यश्च नृत्यगीतविशारदाः ॥ १७॥ दशवर्यसहस्राणि तत्राऽऽयुर्भरतर्षभ कालाम्ररसपीतास्ते नित्यं संस्थितयौवनाः ॥ १८॥ दक्षिणेन तु नीलस्य निपधस्योत्तरेण तु सुदर्शनो नाम महाञ्जम्बूवृक्षः सनातनः ॥ १९ ॥ सर्वकामफलः पुण्यः सिद्धचारणसेवितः तस्य नाम्ना समाख्यातो जम्बूद्वीपः सनातनः ॥ २० ॥ योजनानां सहस्रं च शतं च भरतर्षभ उत्सेधो वृक्षराजस्य दिवस्पृङ् मनुजेश्वर ॥ २१ ॥ अरत्नीनां सहस्रं च शतानि दश पञ्च च परिणाहस्तु वृक्षस्य फलानां रसभेदिनाम् ॥ २२॥ पतमानानि तान्युर्वी कुर्वन्ति विपुलं स्वनम् मुञ्चन्ति च रसं राजन्तस्मिन्रजतसन्निभम् ॥ २३ ॥ ऊँचा कालान नाम का वृक्ष है । उसके आसपास पर्वत के उत्तर ओर सुदर्शन नाम का, सब इच्छाओं सिद्ध और चारण रहते हैं । उस शुभ वृक्ष में सदा | के अनुसार फल देनेवाला एक जामुन का पड़े है । फल और फल देख पड़ते हैं ॥१३॥१५॥ वहाँ के वह वृक्ष सदा बना रहता है। उसी पेड़ के कारण श्वेत रग के पुरुष बड़े तेजखी और महान् पराक्रमी | सुदर्शन द्वीप का दूसरा नाम जम्बूद्वीप भी है । उस होते हैं । स्त्रियों के शरीर का रङ्ग कुमुद पुष्प का वृक्ष के आस-पास सिद्ध और चारण रहते हैं। वह सा साफ़ और रूप बहुत ही सुन्दर होता है। उनके वृक्ष सौ हज़ार योजन ऊँचा है । वह मानों आकाश शरीर चन्द्र के समान, कान्तियुक्त और मुग्यमण्टल | को छुये लेता है । उस वृक्ष के फलों का विस्तार मुशीतल चन्द्रविग्य के समान होते हैं । उन सबकी | दो हज़ार पाँच सौ 'अरन्नि' (मुट्टी से कुछ कम ) जपानी सदा बनी रहती है। वे नाचने-गाने में निपुण है ॥१९॥२२॥ उन फलों के गिरते समय बड़ा शब्द होती हैं। उनकी आयु दश हजार वर्ष की है । | होता है। उन फलों में रस ही रस भरा रहता है। वहाँ के नर-नारी काटात्र वृक्ष के फलों का रस उन फलों मे सुवर्ण के रङ्ग का रस निकलकर नदी पाने है ।।१६।१८॥ नीलगिरी के दक्षिण और निषध | के रूप में वहता है । यह नदी सुमेरु की । ।
ाय ७ ] म हा भा र त [ ४०२१ । तस्या जम्ब्याः फलरसो नदी भूत्वा जनाधिप । मेरुं प्रदक्षिणं कृत्वा सम्प्रयात्युत्तरान्कुरून् ॥ २४॥ तत्र तेषां मनःशान्तिन पिपासा जनाधिप तस्मिफलरसे पीते न जरा वाधते च तान् ॥२५॥ तत्र जाम्बूनदं नाम कनकं देवभूपणम् इन्द्रगोपकसङ्काशं जायते भास्वरं तु तत् ॥ २६॥ तरुणादित्यवर्णाश्च जायन्ते तत्र मानवाः तथा माल्यवतः शृङ्गे दृश्यते हव्यवाट् सदा ॥२७॥ नाना संवतको नाम कालाग्निर्भरतर्षभ तथा माल्यवतः शृङ्गे पूर्वपूर्वानुगुण्डिका ॥२८॥ योजनानां सहस्राणि पञ्च पण्माल्यवानथ महारजतसङ्काशा जायन्ते तत्र मानवाः ॥ २९॥ ब्रह्मलोकच्युताः सर्वे सर्वे सर्वेषु साधवः तपस्तप्यन्ति ते तीनं भवन्ति अ॒र्ध्वरेतसः रक्षणार्थं तु भूतानां प्रविशन्ते दिवाकरम् ॥३०॥ पष्टिस्तानि सहस्राणि पष्टिरेव शतानि च अरुणस्याऽग्रतो यान्ति परिवार्य दिवाकरम् ॥ ३१ ॥ पष्टिं वर्षसहस्राणि पष्टिमेव शतानि च आदित्यतापतप्तास्ते विशन्ति शशिमण्डलम् ॥३२॥ इति धीमन्महामारते भीष्मपर्वणि जम्यूखण्डनिर्माणपर्वणि मान्यवद्वर्णने सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ प्रदक्षिणा करती हुई उत्तरकुरु प्रदेश में वहती | पड़ती है। माल्यगन् के आस-पास छोटे-छोटे पर्वतों है। उन फलों का रस पीने से जम्बूद्वीप-निवासियों का सिलसिला दूर तक देख पड़ता है । ग्यारह हज़ार के मन में शान्ति रहती है। उन्हें प्यास नहीं लगती; / योजन तक माल्यान् पर्वत फैला हुआ है। वहां वे कभी वृद्ध भी नहीं होते। उस रस के संसर्ग से उत्पन्न होनेवाले मनुष्यों के शरीर का रग मुवर्ण का नदी-किनारे की मिट्टी, वीरवहटी के रज का. जाम्यूनद सा होता है। वे सन ब्रह्मचारी होते हैं। जो लोग सुवर्ण बन जाती है। देवता और उनकी स्त्रियां उसी इस रोक में शुभ कर्म करके ग्रामलोक को जाते है सुवर्ण के सुन्दर आभूषण पहनती हैं । यहां के मनुष्य वे ही, पुण्य क्षीण होने पर, ब्रह्मोक से गिरकर जन्मकाल से ही दोपहर के सूर्य के समान तेजस्वी मान्यवान् पर्वत पर उत्पन्न होते हैं । ये सबके साथ होते हैं ॥२३॥२७॥ हे महाराज ! मान्यपान् पर्वत के अप्या व्यवहार करनेवाले मनुष्य तीन तपस्या करते शिगर पर संपर्तक नाम का कालाग्नि अनि सदा देग्य । हैं और लोकरक्षा के लिए अन्न को सूर्यमण्डल में [ भीमपय ४०२२] म हा भारत प्रवेश करते हैं | उनमें से छाछठ हजार मनुष्य अरुण प्रकार छाछठ हजार वर्ष तक सूर्य के ताप में तपकर के आगे सूर्यमण्डल के आस-पास चल्ते हैं। इस अन्त को चन्द्रमण्डल में प्रवेश करते हैं ॥२८॥३२॥ भीमपर्व का सातवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७ ॥ अथ अष्टमोऽध्याय ॥८॥ धृतराष्ट्र उगाच---वर्षाणां चैव नामानि पर्वतानां च सञ्जय आचक्ष्व मे यथातत्त्वं ये च पर्वतवासिनः सञ्जय उवाच- दक्षिणेन तु श्वेतस्य निषधस्योत्तरेण तु वर्ष रमणकं नाम जायन्ते तत्र मानवाः शुक्लाभिजनसम्पन्नाः सर्वे सुप्रियदर्शनाः निःसपत्नाश्च ते सर्वे जायन्ते तत्र मानवाः दशवर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च जीवन्ति ते महाराज नित्यं मुदितमानसाः ॥ ४ ॥ दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु वर्प हिरण्यं नाम यत्र हैरवती नदी यत्र चाऽयं महाराज पक्षिराट् पतगोत्तमः यक्षानुगा महाराज धनिनः प्रियदर्शनाः महावलास्तत्र जना राजन्मुदितमानसाः एकादश सहस्राणि वर्षाणां ते जनाधिप आयुःप्रमाणं जीवन्ति शतानि दश पञ्च च शृङ्गाणि च विचित्राणि त्रीण्येव मनुजाधिप ॥ ८ ॥ आरा अध्याय ॥ ८॥ धृतराष्ट्र ने कहा-हे सजय ! तुम खण्ड, पर्यत | हैं । नील पर्यन के दक्षिण और निषध पर्वत के उत्तर और पातनिवासी लोगों के नाम कहो। सजय ने कहा ओर हिरण्मय नाम का खण्ड हे । वहा हैरप्रती नदी है राजन्द्र ! श्वेत पर्वत के दक्षिण और नीर पर्वत | वहती है ॥११५। इस खण्ड में पक्षियों के राजा गरुड़ के उत्तर में रमणक नाम का एक खण्ड है । इसी वास करते हैं । वहा के सर मनुष्य यों की उपा- या दूसरा नाम श्वेतपण्ड है । यहा के रहनेवाले सर सना करनेगरे, धनी, प्रियदर्शन, महाबली, नित्य विशुद्ध यशों में उत्पन्न है । वे प्रियदर्शन और सदा प्रसन रहनेवाले और श्रेष्ठ होते हैं। इन सण्डों के सतुष्टचित्त हैं । उनका कोई शत्रु नहीं। रे प्रसन्नता- रहनेवाल की आयु दो हजार पाच सौ वर्ष की होती पून ग्यारह हजार पाच सौ वर्ष ता जीते रहते है। हे नरश्रेष्ट ! शृङ्गान् पर्वत के तीन विचित्र - ।
अध्याय ८ ] म हा भा र त [ ४०२३ -- एकं मणिमयं तत्र तथैकं रौषममद्भुतम् सर्वरत्नमयं चैकं भवनैरुपशोभितम् तत्र स्वयम्प्रभा देवी नित्यं वसति शाण्डिली । उत्तरेण तु शृङ्गस्य समुद्रान्ते जनाधिप ॥ १०॥ वर्षमैरावतं नाम तस्माच्छङ्गमतः परम् न तत्र सूर्यस्तपति न जीर्यन्ते च मानवाः ॥ ११ ॥ चन्द्रमाश्च सनक्षत्रो ज्योतिर्भूत इवाऽऽवृतः पद्मप्रभाः पद्मवर्णाः पद्मपत्रनिभेक्षणाः पद्मपत्रसुगन्धाश्च जायन्ते तत्र मानवाः अनिष्यन्दा इष्टगन्धा निराहारा जितेन्द्रियाः ॥ १३ ॥ देवलोकच्युताः सर्वे तथा विरजसो नृप त्रयोदश सहस्राणि वर्षाणां ते जनाधिप ॥१४॥ आयुःप्रमाणं जीवन्ति नरा भरतसत्तम क्षीरोदस्य समुद्रस्य तथैवोत्तरतः प्रभुः हरिर्वसति वैकुण्ठः शकटे कनकामये अष्टचक्र हि तद्यानं भूतयुक्तं मनोजवम् अग्निवर्ण महातेजो जाम्बूनदविभूपितम् स प्रभुः सर्वभूतानां विभुश्च भरतर्षभ संक्षेपो बिस्तरश्चैव कर्त्ता कारयिता तथा शिखर हैं । एक मणिमय है, दूसरा सुवर्णमय है और | हैं । उनके शरीर से कमल के फूल की गन्ध निक- तीसरा सन रत्नों से परिपूर्ण है । रत्नमय शिखर पर रती है। रे देवगेक से भ्रष्ट होने पर यहाँ जन्म सुन्दर भवन बने हैं, जो उसकी शोभा को और भी | रेनेगले पुण्यामा होते हैं । वे जितेन्द्रिय और देव- बढ़ाते हैं । यहाँ स्वयप्रभा शाण्डिली नाम की देवी | तुन्य होते हैं। न तो उन्हें भूग-प्यास सताती है का निवास है । शृगवान् के उत्तर ओर समुद्र के और न उनको पर्साना आता है । उन पापरहित किनारे पर ऐराप्त नाम का गण्ड है ॥६॥१०॥ न पुरषों को मुगध बहुत प्रिय होती है । उनी आयु तो यहाँ सूर्य का प्रकाश पहुँचना है और न यहाँ के तेरह हजार वर्ष की होती है ॥११॥१५॥ हे राजेन्द्र ! मनुष्य युद्ध ही होते हैं । नक्षत्रों सहित चन्द्रमा ही क्षीरसागर के उत्तर और जो स्थान है यहाँ भगवान् यहाँ प्राश पहुँचाते हैं। यहाँ ये मनुष्यों या जम: पुण्डरीकाक्ष रय पर विराजमान हैं । यह ग्य अग्नि से ही पत्र का सा रह और कमर जैसी आगे होती के रग या, मन के ममान वेगगटा, जाम्बूनद सुवर्ण ~ 5 - ।
४०२६ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व नदी पिवन्ति विपुलां गङ्गां सिन्धुं सरस्वतीम् । गोदावरी नर्मदां च वाहुदां च महानदीम् ॥ १४ ॥ शतदूं चन्द्रभागां च यमुनां च महानदीम् । दृपद्वतीं विपाशां च विपापां स्थूलवालुकाम् ॥ १५ ॥ नदीं वेत्रवतीं चैव कृष्णवेणां च निम्नगाम् इरावती वितस्तां च पयोष्णीं देविकामपि ॥ १६ ॥ वेदस्मृतां वेदवती त्रिदिवामिक्षुलां कृमिम् करीपिणी चित्रवाहां चित्रसेनां च निम्नगाम् ॥ १७॥ गोमती धूतपापां च वन्दनां च महानदीम् कौशिकी त्रिदिवां कृत्यां निचितां लोहितारणीम्॥ १८ ॥ रहस्यां शतकुम्भां च सरयू च तथैव च चर्मण्वती वेत्रवती हस्तिसोमां दिशं तथा ॥ १९ ॥ शरावती पयोष्णी च वेणां भीमरथीमपि कावेरी चुलकां चापि वाणीं शतवलामपि ॥ २० ॥ नीवारामहितां चापि सुप्रयोगां जनाधिप पवित्रां कुण्डली सिन्धुं राजनी पुरमालिनीम् ॥ २१ ॥ पूर्वाभिरामां वीरां च भीमामोघवती तथा पाशाशिनी पापहरां महेन्द्रां पाटलावतीम् ॥ २२ ॥ करीषिणीमसिकी च कुशचीरां महानदीम् मकरी प्रवरां मेनां हेमां घृतवती तथा ॥ २३ ॥ हैं। इन पर्वतों के आस-पास और भी हजारो रत्न इरावती, पितस्ता. पयोष्णी, देविका, वेदस्मृता, वेद- पूर्ण, विचित्र शिखरपाले, छोटे-छोटे, अज्ञात पर्वत वती, त्रिदिवा, इक्षुला, कृमि, करीपिणी, चित्रसेना, हैं। उनमें साधारण जातियों के लोग रहते हैं ॥११॥ चित्रपाहा, गोमती, धूतपापा, वन्दना, गण्डकी, १३॥ हे महाराज ! इस भारतवर्ष में आर्य, म्लेच्छ | काशिकी, कृत्या, निचिता, लोहतारिणी, रहस्या, और सङ्घर जातिया रहती हैं । उन जातियों के लोग | शतकुम्भा, सरयू. चर्मण्यती, वेत्रवती, हस्तिसोमा, जिन नदियों का जल पीते हैं उन प्रधान और अप्र- दिन शरारती, भीमरथी, वेणा, पयोष्णी, कामेरी, धान नदियों के नाम मैं कहता हूँ-~-सुनिए । इस चुलुका, वाणी, शतरला, नीनारा, अहिता, सुप्रयोगा, भरतपण्ड में गङ्गा, सिन्धु, मरस्वनी, गोदावरी, | पवित्रा, कुण्डनी, सिन्धु, राजनी, पुरमारिनी, ॥१४॥ नर्मदा, यादृदा, महानदी, शतद्, चन्द्रभागा, यमुना, २१॥ पूर्वाभिरामा, वीरा, भीमा, ओघवनी, पाशा- सुपती, विपाशा, विपापा, स्थूल माला, कृष्णणा, | शिनी, पापहारिणी महेन्द्रा, पाटलारती, करीपिणी, , अध्याय ९ ] म हा भारत [ ४०२७ । पुरावतीमनुष्णां च शैव्यां कापी च भारत सदानीरामधृष्यां च कुशधारां महानदीम् ॥ २४॥ सदाकान्तां शिवां चैव तथा वीरवतीमपि वस्त्रां सुवस्त्रां गौरीच कम्पनां सहिरण्यतीम् ॥ २५ ॥ वरां वीरकरां चापि पञ्चमी च महानदीम् स्थचित्रां ज्योतिरथां विश्वामित्रां कपिञ्जलाम् ॥ २६ ॥ उपेन्द्रां बहुलां चैव कुवीरामम्बुवाहिनीम् विनदी पिञ्जला वेणां तुङ्गवेणां महानदीम् ॥ २७॥ विदिशां कृष्णवेणां च ताम्रां च कपिलामपि । खलं सुवामां वेदाश्वा हरिश्रावां महापगाम् ॥२८॥ शीघ्रां च पिच्छिलां चैव भारद्वाजीच निम्नगाम्। कौशिकी निम्नगांशोणांवाहुदामथ चन्द्रमाम् ॥ २९ ॥ दुर्गा चित्रशिलां चैव ब्रह्मवेध्यां बृहद्वतीम् यवक्षामथ रोहीं च तथा जाम्बूनदीमपि सुनसां तमसा दासी वसामन्यां वराणसीम् । नीलां धृतवतीं चैव पर्णाशां च महानदीम् ॥ ३१ ॥ मानवीं वृषभां चैव ब्रह्ममेध्यां बृहद्धनीम् एताश्चाऽन्याश्च बहुधा महानद्यो जनाधिप ॥३२॥ सदानिरामयां कृष्णां मन्दगां मन्दवाहिनीम् । ब्राह्मणी च महागौरी दुर्गामपि च भारत ॥३३॥ चित्रोपलां चित्ररथां मंजुलां वाहिनी तथा मन्दाकिनी वैतरणी कोपां चापि महानदीम् ॥३४॥ असिमी, कुशचीरा, मकरी, प्रवरा, मेना, हेमा, | याहिनी, पिनदी, पिञ्जला, वेणा, तुद्गवेणा.'पिदिशा, धृतवती, पुण्याती, अनुष्णा, शन्या, कापी, सदा- | कृष्णणा, ताम्रा, कपिला, गल, सुगामा. वेदाधा, नारा, अधृष्या, कुशधारा, सदाकान्ता, शिवा, वीर- हरिश्रापा, शीघ्रा, पिच्छिला, भारद्वाजी, काशिकी, वती, वस्त्रा, मुबत्रा, गौरी, कम्पना, हिरण्यवती, शोणा, चन्द्रमा, दुर्गा, चित्रशिला, प्रभवेच्या, वृहद्वती, परा, वीरकरा, पञ्चमी, रयचित्रा, ज्योतिरया, विचा यपक्षा, रोही, जाम्बूनदी, ॥२२॥३०॥ सुनसा, मिना, कपिजला, उपेन्द्रा, बहुला, कुर्मरा, अम्बु- तममा, दामी, वसा, यराणी, नाटा, धृतानी, पर्गाशा, . , १०२६] म हा भारत [ भीष्मपत्र ॥१४॥ F नदी पिवन्ति विपुलां गङ्गां सिन्धुं सरस्वतीम् । गोदावरी नर्मदां च वाहुदां च महानदीम् शतदूं चन्द्रभागां च यमुनां च महानदीम् । दृपद्वतीं विपाशां च विपापां स्थूलवालुकाम् ॥१५॥ नदी वेत्रवती चैव कृष्णवेणां च निम्नगाम् । इरावती वितस्तां च पयोष्णी देविकामपि ॥ १६ ॥ वेदस्मृतां वेदवती त्रिदिवामिक्षुलां कृमिम् करीषिणी चित्रवाहां चित्रसेनां च निम्नगाम् ॥ १७ ॥ गोमती धूतपापां च वन्दनां च महानदीम् कौशिकी त्रिदिवां कृत्यां निचितां लोहितारणीम्॥ १८ ॥ रहस्यां शतकुम्भां च सरयूं च तथैव च चर्मण्वती वेत्रवती हस्तिसोमां दिशं तथा ॥ १९ ॥ शरावती पयोष्णीं च वेणां भीमरथीमपि कावेरी चुलकां चापि वाणीं शतवलामपि नीवारामहितां चापि सुप्रयोगां जनाधिप पवित्रां कुण्डली सिन्धुं राजनीं पुरमालिनीम् ॥ २१ ॥ पूर्वाभिरामां वीरां च भीमामोघवती तथा पाशाशिनी पापहरी महेन्द्रां पाटलावतीम् ॥ २२ ॥ करीपिणीमसिनी च कुशचीरां महानदीम् मकरी प्रवरां मेनां हेमां घृतवती तथा ॥ २३॥ हैं । इन पर्वतों के आस-पास और भी हज़ारों रत्न इरावती, वितस्ता. पयोष्णी, देविका, वेदस्मृता, वेद- पूर्ण, विचित्र शिखरवाले, छोटे-छोटे, अज्ञात पर्यन, वती, त्रिदिवा, इक्षुला, कृमि, करीपिणी, चित्रसेना, हैं। उनमें साधारण जातियों के लोग रहते हैं ॥११॥ चित्रवाहा, गोमती, धूतपापा, वन्दना, गण्डकी, १३॥ हे महाराज ! इस भारतवर्ष में आर्य, म्लेच्छ कौशिकी, कृत्या, निचिता, लोहतारिणी, रहस्या, और सकर जातियां रहती हैं । उन जातियों के लोग | शतकुम्भा, सरयू. चर्मण्यती, वेत्रवती, हस्तिसोमा, जिन नदियों का जल पीते हैं उन प्रधान और अप्र- | दिक्' शरावती, भीमरथी, येणा, पयोष्णी, कावेरी, धान नदियों के नाम मैं कहता है-सुनिए । इस चुलुका, वाणी, शतबला, नीवारा, अहिता, सुप्रयोगा, भरतखण्ड में गद्गा, सिन्धु, सरस्वती, गोदावरी, पवित्रा, कुण्डवी, सिन्धु, राजनी, पुरमालिनी, ॥१४॥ नर्मदा, वादा, महानदी, शत, चन्द्रभागा, यमुना, २१॥ पूर्वाभिरामा, वीरा, भीमा, ओधरती, पाशा- दृपद्वती, विपाशा, विपापा, स्थूलबालुका, कृष्णणा, | शिनी, पापहारिणी महेन्द्रा, पाटलावती, करीषिणी, - अध्याय ९ ] म हा भा र त [ ४०२७ -- पुरावतीमनुष्णां च शैब्यां कापी च भारत सदानीरामधृष्यां च कुशधारां महानदीम् ॥ २४॥ सदाकान्तां शिवां चैव तथा वीरवतीमपि वस्त्रां सुवस्त्रां गौरी च कम्पनां सहिरण्वतीम् ॥ २५ ॥ वरां वीरकरां चापि पञ्चमी च महानदीम् रथचित्रां ज्योतिरथां विश्वामित्रां कपिञ्जलाम् ॥ २६ ॥ उपेन्द्रां बहुलां चैव कुवीरामम्बुवाहिनीम् विनदी पिञ्जलां वेणां तुङ्गवेणां महानदीम् ॥ २७॥ विदिशां कृष्णवेणां च ताम्रां च कपिलामपि । खलं सुवामां वेदाश्वां हरिश्रावां महापगाम् ॥ २८ ॥ शीघ्रां च पिच्छिलां चैव भारद्वाजींच निम्नगाम्। कौशिकी निम्नगांशोणां वाहुदामथ चन्द्रमाम् ॥ २९ ॥ दुर्गा चित्रशिलां चैव ब्रह्मवेध्यां बृहद्वतीम् यवक्षामथ रोही च तथा जाम्बूनदीमपि सुनसां तमसां दासी वसामन्यां वराणसीम् । नीलां धृतवतीं चैव पर्णाशां च महानदीम् ॥ ३१ ॥ मानवीं वृपभां चैव ब्रह्ममेध्यां बृहद्धनीम् एताश्चाऽन्याश्च वहुधा महानद्यो जनाधिप ॥३२॥ सदानिरामयां कृष्णां मन्दगां मन्दवाहिनीम् । ब्राह्मणी च महागौरी दुर्गामपि च भारत ॥ ३३ ॥ चित्रोपलां चित्ररथां मंजुलां वाहिनी तथा मन्दाकिनी वैतरणी कोपां चापि महानदीम् ॥ ३४ ॥ असिनी, कुशचीरा, मकरी, प्ररा, मेना, हेमा, । वाहिनी, चिनी, पिजला, येणा, तुगणा.' पिदिशा, घृतपती, पुण्यस्ती, अनुष्णा, शव्या, कापी, सदा- कृष्णणा, ताम्रा, कपिला, ग्यलु, मुनामा. येदाचा, नारा, अश्ष्या, कुशधारा, सदाकान्ता, शिवा, वीर- हरिश्राना, शीघ्रा, पिच्छिला, भारद्वाजी, यती, बना, सुरखा, गौरी, कम्पना, हिरण्यग्नी, शोणा, चन्द्रमा, दुर्गा, चित्रशिला, प्रमोध्या, वृहद्वती, यरा, वीरकरा, पञ्चमी, रयचित्रा, ज्योतिरपा, विश्वा- | यक्षा, रोही, जाम्यूनदी, ॥२२॥३०॥ सुनसा, मित्रा, कपिजला, उपेन्द्रा, बहुला, कुर्मरा, अम्बु- । नममा, दामी, वमा, वराणसी, नीला, नानी, पर्णाशा, । - कौशिकी, [ भीष्मपर्व म हा भा र त ४०२८ ] शुक्तिमतीमनङ्गां च तथैव वृषसाह्वयाम् लोहित्यां करतोयां च तथैव वृषकाहयाम् ॥३५॥ कुमारीमृपिकुल्यां च मारिपां च सरस्वतीम् । मन्दाकिनी सुपुण्यां च सर्वां गङ्गां च भारत ॥ ३६ ॥ विश्वस्य मातरः सर्वाः सर्वाश्चैव महाफलाः तथा नद्यस्त्वप्रकाशाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥३७॥ इत्येताः सरितो राजन्समाख्याता यथास्मृति । अत ऊर्ध्वं जनपदान्निबोध गदतो मम ॥३८॥ तत्रेमे कुरुपाञ्चालाः शाल्वा माद्रेयजाङ्गलाः शूरसेनाः पुलिन्दाश्च वोधा मालास्तथैव च ॥३९॥ मत्स्याः कुशल्याःसौशल्याः कुन्तयःकान्तिकोसलाः चेदिमत्स्यकरूपाश्च भोजाःसिन्धुपुलिन्दकाः ॥४०॥ उत्तमाश्च दशार्णाश्च मेकलाश्चोत्कलैः सह पञ्चालाः कोसलाश्चैव नैकपृष्ठा धुरन्धराः ॥४१॥ गोधा मद्रकलिङ्गाश्च काशयोऽपरकाशयः जठराः कुकुराश्चैव सदशार्णाश्च भारत ॥४२॥ कुन्तयोऽवन्तयश्चैव तथैवाऽपरकुन्तयः गोमन्ता मण्डकाः सण्डा विदर्भा रूपवाहिकाः ॥ ४३ ॥ अश्मकाः पाण्डुराष्ट्राश्च गोपराष्ट्राः करीतयः अधिराज्यकुशाद्याश्च मल्लराष्ट्रं च केवलम् ॥४४॥ - - मानी, वृक्षमा, ब्रह्ममध्या, वृहद्धनि, निरामया, | जानी हुई नदियों के नाम आपको सुना दिये । ये कृष्णा, मन्दगा, मन्दवाहिनी, ब्रह्माणी. महागारी, | नदिया विश्व की माता हैं । इनमें स्नान करने से दुर्गा, चिनोत्पला, चित्ररथा, मञ्जुला, वाहिनी, मन्दा महाफल प्राप्त होता है ॥३१॥३८॥ हे महाराज ! किनी, वैतरणी, कोपा, शुक्तिमती, अनगा, वृषसा, अब मैं भारत के जनपदों और देशों के नाम आप लोहित्या, करतोया, वृपका, कुमारी, ऋषिकुल्या, | के आगे कहता हूँ, सुनिए । कुर पाश्चाल, शाल्व, । मारिपा, सरस्वनी, मन्दाकिनी, सुपुण्या, सगगा, । माडेय-जागल, शूरसेन, पुलिन्द, बोध, माल, मत्स्य, इतनी नदियां हैं । इनके अतिरिक्त और भी हज़ारों कुशल्य, सौशल्य, कुन्ति, कान्तियोशल, चेदि, मत्स्य, नदियां हैं, जिन्हें साधारण रूप से सब लोग नहीं कम्प,भोज,सिन्धु-पुलिन्द,॥३९॥४०॥उत्तम,दशार्ण, जानते । मैंने अपनी स्मरणशक्ति के अनुमार सर । मेकट, उत्कट, पाञ्चाल, कोशल, नैस्पृष्ट, घुरन्धर, - अध्याय ९ ] म हा भा र त [ ४०२९ वारवास्या यवाहाश्च चक्राश्चक्रातयः शकाः विदेहा मगधाः स्वक्षा मलजा विजयास्तथा अङ्गा वङ्गाः कलिङ्गाश्च यकृल्लोमान एव च मल्लाः सुदेष्णाः प्रह्लादा माहिकाः शशिकास्तथा॥ ४६ ॥ चाह्निका वाटधानाश्च आभीराः कालतोयकाः । अपरान्ताः परान्ताश्च पञ्चालाश्चर्ममण्डलाः ॥४७॥ अटवीशिखराश्चैव मेरुभूताश्च मारिप उपावृत्तानुपावृत्ताः स्वराष्ट्राः केकयास्तथा ॥४८॥ कुन्दापरान्ता माहेयाः कक्षाः सामुद्रनिष्कुटाः । अन्ध्राश्च बहवो राजन्नन्तगिर्यास्तथैव च ॥४९॥ चहिगिर्याङ्गमलजा मगधा मानवर्जकाः समन्तराः प्रावृपेया भार्गवाश्च जनाधिप ॥ ५० ॥ पुण्ड्रा भर्गाः किराताश्च सुदृष्टा यामुनास्तथा । शका निपादा निपधास्तथैवाऽऽनर्तनैर्ऋताः ॥ ५१ ॥ दुर्गालाः प्रतिमत्स्याश्च कुन्तलाः कोसलास्तथा । तीरग्रहाः शूरसेना ईजिकाः कन्यका गुणाः ॥५२॥ तिलभारा मसीराश्च मधुमन्तः सुकन्दकाः काश्मीराः सिन्धुसौवीरा गान्धारा दर्शकास्तथा॥ ५३॥ अभीसारा उलूताश्च शैक्ला वाहिकास्तथा दावींचवा नवा दर्वा वातजामरथोरगाः बहुवाद्याश्च कौरव्य सुदामानः सुमाल्लिकाः गोध, मद्रकलिङ्ग, काशि, अपरकाशि, जठर, कुक्कुर, | चर्ममण्डल,अटपीशिखर, मेरुभूत, उपावृत्त, अनुपावृत्त, दशार्णकुक्कुर, कुन्ति, अन्ति, अपरफुन्ति, गोमन्त, स्वराष्ट्र, केकय, कुन्दापरान्त, माहेय, कक्ष, सामुद्र- मन्दक, सण्ड, विदर्भ, रूपाहिक, अश्मक, पाण्डुराष्ट्र, / निष्कुट, अन्ध्र,अन्तगिरी, बहिगिरी, अगमलज, मगध, गोपराष्ट्र, करीति, अधिराज्य, कुशाद्य. मल्लराष्ट्र ,बार- मानार्जक, समन्तर, प्रावृपेय, भार्गम, ॥४११५०॥ वास्य, अपराह, चक्र, चक्राति, शक, विदेह, मगध, पुण्ड, भर्ग, किरात, सुदृष्ट, यामुन, शक, निषाद, स्वक्ष, मलज, विजय, अङ्ग, बङ्ग, कलिङ्ग, यकृल्लोम, | निपध, आनर्त, नैर्ऋत्य, दुर्गाल, प्रतिमस्य, कुन्तल, मल्ल, सुदेष्ण, प्रह्लाद, माहिक, शशिक, वाहीक, | कोशल, तीरग्रह, शूरसेन, ईजिक, कन्यकागुण, बाटधान,आभीर,कालतोयक,अपरान्त, परान्त, पञ्चाल, / तिलभार, मसीर, मधुमन्त, सुकन्दक, काश्मीर, , .
४०३० । म हा भा र त [ भीम - वध्राः करीपकाश्चापि कुलिन्दोपत्यकास्तथा ॥ ५५॥ बनायवो दशा पार्श्वरोमाणः कुशविन्दवः कच्छा गोपालकक्षाश्च जाङ्गलाः कुरुवर्णकाः ॥ ५६ ॥ किराता वर्वराः सिद्धा वैदेहास्ताम्रलिप्तकाः ओण्ड्रा म्लेच्छाः सैसिरिभ्राः पार्वतीयाश्च मारिप॥ ५७ ।। अथाऽपरे जनपदा दक्षिणा भरतर्षभ द्रविडाः केरलाः प्राच्या भूपिका वनवासिकाः ॥ ५८॥ कर्णाटका महिपका विकल्पा भूपकास्तथा झिल्लिकाः कुन्तलाश्चैव सौहृदा नभकाननाः ॥ ५९॥ कौकुट्टकास्तथा चोलाः कोङ्कणा मालवा नराः । समकाः करकाश्चैव कुकुराङ्गारमारिपाः ॥६०॥ ध्वजिन्युत्सवसङ्केतास्त्रिगर्ताः शाल्वसेनयः व्यूकाः कोकवकाः प्रोष्ठाः समवेगवशास्तथा ॥६१ ॥ तथैव विन्ध्यचुलिकाः पुलिन्दा वल्कलैःसह मालवा बल्लवाश्चैव तथैवाऽपरबल्लवाः ।। ६२ ।। कुलिन्दाःकालदाश्चैव कुण्डलाः करटास्तथा मूपकास्तनवालाश्च सनीपा घटस्तृञ्जयाः ॥ ६३ ॥ अठिदापाः शिवाटाश्च तनया सुनयास्तथा ऋपिका विदभाः काकास्तगणाः परतङ्गणाः ॥६४॥ उत्तराश्चाऽपरम्लेच्छाः क्रूरा भरतसत्तम यवनाश्चीनकाम्बोजा दारुणा म्लेच्छजातयः ॥६५॥ सकृग्रहाः कुलत्थाश्च हूणाः पारसिकैः सह सिन्धुमीवीर, गान्धार, दर्शक, अभीसार, उळूत, | इनके अतिरिक्त दक्षिण दिशा के जनपदों के नाम शैगल, वाहक, दार्जी, वानर, दर्य, वातज, आमरथ, सुनिये । द्रविड़, केरल, प्राध्य, भूपिक, पनवासिक, उरग, बहुराध, सुदाम, मुमल्लिक, यध, करीपक, कर्णाटक, माहिपक, विकल्प, मूषक, झिल्लिक, कुन्तल, कुलिन्द, उपत्यक, यनायु, पारोम, कुशविदु दश, | सौटद,नभकानन, काकुहक, चोल कोकण, मालक, कच्छ, गोपारकक्ष, जागल, कुरुपर्णक, किरात, वर, समा, करक, कुखुर, अनार, मारिप, ध्वजिनी, मिद, वैदेए, ताम्ररितक, उ, म्लेच्छ, ससिरिध, उ सरसईत, निगर्न, शाल्यमेनि, व्यूक, कोकवक, और पानीय इत्यादि ॥५११५७|| हे राजेन्द्र ।। प्रोष्ट, समगवश, विध्यचुलिक, पुलिन्द, बन्कर, ।
अध्याय ९ ] म हा भा र त [ ४०३१ । तथैव रमणाश्चीनास्तथैव दशमालिकाः क्षत्रियोपनिवेशाश्च वैश्यशूद्रकुलानि च शूद्राभीराश्च दरदाः काश्मीराः पशुभिः सह ॥६७॥ खाशीराश्चाऽन्तचाराश्च पह्नया गिरिगह्वराः आत्रेयाः सभरद्वाजास्तथैव स्तनपोषिकाः ॥६८॥ प्रोपकाश्च कलिङ्गाश्च किरातानां च जातयः तोमरा हन्यमानाश्च तथैव करभञ्जकाः ॥ ६९ ॥ एते चाऽन्ये जनपदाः प्राच्योदीच्यास्तथैव च । उद्देशमात्रेण मया देशाः सङ्कीर्तिता विभो ॥ ७०॥ यथागुणवलं चापि त्रिवर्गस्य महाफलम् दुह्येत धेनुः कामधुक् भूमिः सम्यगनुष्ठिता ॥७१ ॥ तस्यां गृद्धयन्ति राजानः शूरा धर्मार्थकोविदाः । ते त्यजन्त्याहवे प्राणान्वसुगृद्धास्तरविनः ॥७२॥ देवमानुपकायानां कामं भूमिः परायणम् अन्योन्यस्याऽवलम्पन्तिसारमेयायथाऽऽमिपम् ॥ ७३ ॥ राजानो भरतश्रेष्ट भोक्तुकामा वसुन्धराम् नचाऽपितृप्तिः कामानां विद्यतेऽद्यापि कस्यचित् ॥७४॥ तस्मात्परिग्रहे भूमेर्यतन्ते कुरुपाण्डवाः माला, वल्ला, अपरवल्लर, कुलिन्द, काटद, कुण्डल, | रहती है । यह देशों की नामापी मने सक्षेप में करट, मूपक, तनाल, सनीप. घट, सुजय, आलिंद, | आपको सुना दी है । इन देशों के अतिरिक्त और भी पाशिगट, तनय, सुनय, ऋषिक, विदभ, काम, तद्गण, अनेक देश पूर्व और उत्तर में हैं ॥६५/७०॥ है अपरतङ्गण ॥५८६४॥ उत्तर और अपर म्लेच्छ, महाराज ! अच्छी तरह भूमि का पालन करने से यह यग्न, चीन, काम्बोज, दारण, सकृद्ग्रह, कुलत्य, कामधेनु के समान धन-मम्पत्ति और मुग देती है। हण, पारसीक, रमण-चीन, दशमालिक, क्षत्रियों के पृथ्वी मे ही धर्म, अर्थ,काम का महाफर प्राप्त होता है। सीमान्त पर उपनिवेश, श्यों और शूद्रों के जनपद इनी लिए धर्म और अर्थ के ज्ञाता महापटी शूर द, आभीर, दरद, काम्मीर, पत्ति. गाशार, अन्लचार, राजा लोग यमु (धन ) और यमुन्धग (पृथ्वी ) परुन, गिरिगहर, आत्रेय, भरद्वाज, स्तनपोषिक, के लिए लड़कर युद्ध में प्राण त्याग देते हैं। देवनाओं प्रोपक, पलिक, किरात, नामर रन्यमान और कर- और मनुष्य को मर रमाएँ पृथ्वी में ही पूर्ण होती मञक इत्यादि । हे राजेन्द्र ! इन सब देगों में हैं। हे भानश्रेष्ट ! मॉम के टुकड़े के लिए जैसे कुत्त क्षत्रिय, वैश्य, रस, आभार और अन्य टेक जातियों रहने देगा पदनमेही राजा रोग पृथ्वी के टुकड़ों - - - ४०३२ ] म हा भारत [ भीमपर - साना भेदेन दानेन दण्डेनैव च भारत ॥७५॥ पिता भ्राता च पुत्राश्च खं द्योश्च नरपुङ्गव भूमिर्भवति भूतानां सम्यगच्छिद्रदर्शना ॥७६॥ हात श्री मन्महाभारत मा मपवाण जम्बूसनानमाणपवाण भारायनादेशादनामस्थने नवमोऽध्याय ॥९॥ के लिए आपस में लडते-झगडते हैं । सृष्टि के आदि । भेद, दण्ड आदि उपायों से भूमि प्राप्त करने के यत्न से अब तक कोई भी मोग करके तृप्त नहीं हुआ। में लगे हुए हैं। हे पुर श्रेष्ठ महाराज ! अच्छी तरह वास्तव मे मनुष्य की इच्छाओं का अत हा नहीं ह । इसी पालित आर सुरक्षित पृथ्वी ही प्राणियो के लिए पिता, कारण इस समय कोरव आर पाण्डव भी साम, दान, भाई, पुत्र, स्वर्ग और सर्वस्त्र है ॥७१।७६॥ भीमपर्व का नया अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥ अथ दशमोऽध्याय ॥१०॥ धृतराष्ट्र उवाच--भारतस्याऽस्य वर्षस्य तथा हैमवतस्य च प्रमाणमायुषः सूत वलं चापि शुभाशुभम् अनागतमतिक्रान्तं वर्तमानं च सञ्जय आचक्ष्व मे विस्तरेण हरिव तथैव च ॥ २ ॥ सञ्जय उपाच--चत्वारि भारते वर्षे युगानि भरतर्षभ कृतं त्रेता द्वापरं च तिप्यं च कुरुवर्द्धन ॥ ३ ॥ पूर्व कृतयुगं नाम ततस्त्रेतायुगं प्रभो संक्षेपाद् द्वापरस्याऽथ ततस्तिष्यं प्रवर्तते ॥ ४ ॥ चत्वारि तु सहस्राणि वर्षाणां कुरुसत्तम आयुःसंख्या कृतयुगे संख्याता राजसत्तम तथा त्रीणि सहस्राणि त्रेतायां मनुजाधिप द्वे सहस्त्रे द्वापरे तु भुवि तिष्ठन्ति साम्प्रतम् ॥ ६ ॥ न प्रमाणस्थितियस्ति तिप्येऽस्मिन्भरतर्षभ गर्भस्थाश्च म्रियन्तेऽत्र तथा जाता म्रियन्ति च॥ ७ ॥ महावला महासत्वाः प्रज्ञागुणसमन्विताः दशवां अध्याय॥१०॥ धृतराष्ट्र ने कहा-~हे मूत सजय ! इस भारत भारतवर्ष में क्रमश सत्ययुग, नेतायुग, द्वापरयुग और वर्ष, हमरतार्य और हरिपर्य के मनुष्यों की आयु बल, कलियुग नाम के चार युग होते हैं । सत्ययुग के और भूत भविष्य-वर्तमान शुभाशुभ पर आदि मुझे | लोगों की आयु चार हजार वर्ष की, त्रेतायुग के लोगों मुनाओ ॥१२) सनय ने यहा-हे भारतन्द्र इस | की आयु तीन हनार वर्ष की और द्वापर युग के 1111 म हा भारत [४०३३ प्रजायन्ते च जाताश्च शतशोऽथ सहस्रशः जाताः कृतयुगे राजन्धनिनः प्रियदर्शनाः प्रजायन्ते च जाताश्च मुनयो वै तपोधनाः महोत्साहा महात्मानो धार्मिकाः सत्यवादिनः । प्रियदर्शना वपुष्मन्तो महावीर्या धनुर्द्धराः ॥ १० ॥ वराही युधि जायन्ते क्षत्रियाः शूरसत्तमाः त्रेतायां क्षत्रिया राजन्सर्वे वै चक्रवर्तिनः सर्ववर्णाश्च जायन्ते सदा चैव च द्वापरे महोत्साहा वीर्यवन्तः परस्परजयैषिणः ॥ १२ ॥ तेजसाऽल्पेन संयुक्ताः क्रोधनाः पुरुषा नृप लुब्धा अनृतकाश्चैव तिष्ये जायन्ति भारत ॥ १३ ॥ ईर्ष्या मानस्तथा क्रोधो मायाऽसूया तथैव च । तिष्ये भवति भूतानां रागो लोभश्च भारत ॥ १४ ॥ संक्षेपो वर्तते राजन्द्वापरेऽस्मिन्नराधिप गुणोत्तरं हैमवतं हरिवर्षं ततः परम् इति श्रीमन्महाभारते भीष्मपर्वणि जम्यूखण्डनिर्माणपर्वणि भारतवर्षे कृतायनुरोधेनायुर्निरूपणे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ समाप्त जम्बूसण्डविनिर्माणपर्व। लोगों की आयु दो हज़ार वर्ष की होती है । कलियुग द्वापरयुग में सभी वर्ण उत्पन्न होते हैं । वे बड़े उत्साही, के लोगो की आयु का कुछ ठीक नहीं है । इस युग वीर्यशाली और एक दूसरे को जीतने की इच्छा रखने- मे कुछ जीव गर्भावस्था मे ही और कुछ उत्पन्न होते वाले हुआ करते हैं । द्वापरयुग में ही मनुष्यों के गुण ही मर जाते हैं ॥३७|| सत्ययुग में महाबली, महा घटने लगते हैं। कलियुग में जो लोग जन्म लेते हैं सत्त्व, प्रज्ञासम्पन्न, धनी, प्रियदर्शन, मुनि लोग उत्पन्न वे थोड़े तेजवाले, क्रोधी, लोभी, होते हैं। उनकी सन्ताने भी ऐसी ही होती हैं। होते हैं । उनके मन में सदा ईर्ष्या, अभिमान, क्रोध, त्रेतायुग में उत्साही, महात्मा, परम धार्मिक, सत्यवादी, कपट, असूया, राग-द्वेप और लोभ का आविर्भाव हुआ प्रियदर्शन, लम्बे-चौड़े डील-डौल के, महावीर्य, युद्ध करता है । उत्तम गुणसम्पन्न हैमवतवर्ष और हरिवर्ष विशारद, चक्रवर्ती क्षत्रिय लोग उत्पन्न होते हैं।।८।११॥ की स्थिति भी ऐसी ही जानिए ॥१२॥१५॥ मारपर्व का दशवा अध्याय समाप्त हुआ ॥१०॥ - और मिथ्यावादी । । . अथ एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-जम्बूखण्डस्त्वया प्रोक्तो यथावदिह सञ्जय विष्कम्भमस्य प्रब्रूहि परिमाणं तु तत्त्वतः ४०३४ ] म हा भा र त [ भीमपर - .. । समुद्रस्य प्रमाणं च सम्यगच्छिद्रदर्शनम् शाकद्वीपं च मे बेहि कुशद्वीपं च सञ्जय शाल्मलिं चैव तत्त्वेन क्रौञ्चद्वीपं तथैव च ब्रूहि गावल्गणे सर्व राहोः सोमार्कयोस्यथा सञ्जय उवाच-राजन्सुवह्वो द्वीपा यैरिदं सन्ततं जगत् । सप्त द्वीपान्प्रवक्ष्यामि चन्द्रादित्यौ ग्रहं तथा ॥ ४ ॥ अष्टादशसहस्राणि योजनानि विशाम्पते पट्शतानि च पूर्णानि विष्कम्भो जम्बुपर्वतः ॥ ५ ॥ लावणस्य समुद्रस्य विष्कम्भो द्विगुणः स्मृतः । नानाजनपदाकीणों माणविद्रुमचित्रितः नैकधातुविचित्रैश्च पर्वतैरुपशोभितः सिद्धचारणसङ्कीर्णः सागरः परिमण्डलः शाकद्वीपं च वक्ष्यामि यथावदिह पार्थिव शृणु मे त्वं यथान्यायं त्रुवतः कुरुनन्दन जम्बूद्वीपप्रमाणेन द्विगुणः स नराधिप विष्कम्भेण महाराज सागरोऽपि विभागशः क्षीरोदो भरतश्रेष्ठ येन सम्परिवारितः तत्र पुण्या जनपदास्तत्र न म्रियते जनः ॥ १० ॥ कुत एव हि दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुता हि ते शाकद्वीपस्य संक्षेपो यथावद्भरतर्षभ ग्यारहवां अध्याय ॥ ११ ॥ धृतराष्ट्र ने कहा- हे संजय ! तुमने जग्बूखण्ड ! समुद्र घेरे हुए है । खारी समुद्र का परिमाण उससे का हाल तो सुना दिया। अब जम्बूखण्ड का परिमाण | दूना, अर्थात् सैंतीस हज़ार दो सौ योजन का है। और विस्तार, समुद्र का परिमाण, शाकद्वीप, कुशद्वीप, इस समुद्र में अनेक जनपद और मणि-विद्रुम आदि शाल्मलिद्वीप, क्रौञ्चद्वीप और चन्द्र, सूर्य, राहु आदि रत्न हैं । अनेक धातुओं से शोभित और सिद्ध-चारण- का सब हाल मुझसे कहो ॥१॥३॥ सजय ने कहा सेरित बहुत से पर्यत भी इसमें हैं । हे राजेन्द्र ! अब है राजेन्द्र ! इस पृथ्वी को बहुत से द्वीपों ने घेर | शाकद्वीप का वर्णन सुनिए ॥५॥८॥ शाकद्वीप का रक्खा है । अब मैं आपसे मानों द्वीप, चन्द्र, मूर्य और ! पिस्तार जम्बूद्वीप से द्विगुण है । शाकद्वीप को क्षीर- राह का वर्णन करता हूँ ॥४॥ जम्बूद्वीप का परिमाण | सागर घेरे हुए है । इस द्वीप में बहुत से पवित्र जन- अटारह हज़ार छ: सौ योजन का है । उसे खारी पद हैं । यहा रहनेवाले लोग अमर हैं । वे सर तेजस्वी - अध्याय ११ ] म हा भारत [ ४०३५ . - - उक्त एप महाराज किमन्यत्कथयामि ते धृतराष्ट्र उपाच-शाकद्वीपस्य संक्षेपो यथावदिह सञ्जय ॥ १२ ॥ उक्तस्त्वया महाप्राज्ञ विस्तरं ब्रूहि तत्त्वतः सञ्जय उपाच-तथैव पर्वता राजन्सप्ताऽत्र मणिभूपिताः ॥ १३ ॥ रत्नाकरास्तथा नयस्तेषां नामानि में शृणु अतीव गुणवत्सर्वं तत्र पुण्यं जनाधिप ॥ १४ ॥ देवर्षिगन्धर्वयुतः प्रथमो मेरुरुच्यते प्रागायतो महाराज मलयो नाम पर्वतः ततो मेघाः प्रवर्तन्ते प्रभवन्ति च सर्वशः ततः परेण कौरव्य जलधारो महागिरिः ततो नित्यमुपादत्ते वासवः परमं जलम् ततो वर्ष प्रभवति वर्षकाले जनेश्वर ॥ १७॥ उच्चैगिरी रैवतको यत्र नित्यं प्रतिष्ठिता रेवती दिवि नक्षत्रं पितामहकृतो विधिः ॥ १८॥ उत्तरेण तु राजेन्द्र च्यामो नाम महागिरिः नवमेघप्रभः प्रांशुः श्रीमानुज्ज्वलविग्रहः यतः उयामत्वमापन्नाः प्रजा जनपदेश्वर धृतराष्ट्र उपाच- -सुमहान्संशयो मेऽद्य प्रोक्तोऽयं सञ्जय त्वया ॥ २० ॥ प्रजाः कथं सूतपुत्र सम्प्राप्ताः श्यामतामिह -सर्वेष्वेव महाराज द्वीपेषु कुरुनन्दन ॥ २१ ॥ और क्षमाशील हैं । वहा दुर्भिक्ष कभी नहीं पड़ता। हैं । मेरु के पश्चिम में, पूर्व को विस्तीर्ण, मल्य नाम महाराज! मैंने आपसे सक्षप मे शाकद्वीप का हाल का पर्वत है। वहीं से मेघ उत्पन्न होकर सनन जल कहा है। अब आप ओर क्या सुनना चाहते हैं | की वर्षा करते हैं । उसके पश्चात् जलधार नाम या ॥९।१२।। धृतराष्ट्र ने कहा- हे महाप्राज्ञ । तुमने | पर्वत है। इन्द्र यहीं से जल रेफर वर्षा ऋतु में वरसाते सक्षेप से शाकद्वीप का वर्णन कहा । अब विस्तार के हैं ॥१४|१७|| उसके पास ही बहुत ऊँचा तक साथ इसका वर्णन करो ॥१३॥ सजय ने कहा- नाम का पर्वत हे । ब्रह्माजी के विधान के अनुसार हे महाराज ! शाकद्वीप में विविध मणिरत्न शोभित | सती नक्षत्र दहा दिव्य रूप से निरानमान है। सात पर्वत और विविध रत्नों की खाने तथा नदिया | सुमेरु के उत्तर ओर अत्यन्त ऊँचा, नवीन मेघ के भी हैं । वहा के सर पदार्थ बहुगुणपूर्ण हैं । वहा रङ्ग का, उजाल कान्तिराला श्याम नाम का महा- का श्रेष्ठ पर्वत मेर है उसमें देवता ओर ऋषि रहते । पर्वत है । वहा रहने से ही प्रजा का रङ्ग स्माम हुआ सञ्जय उपाच- ४०३६ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व । - गौरः कृष्णश्च पतगस्तयोर्वर्णान्तरे नृप श्यामो यस्मात्प्रवृत्तोवै तस्माच्छयामो गिरिःस्मृतः।।२२॥ ततः परं कौरवेन्द्र दुर्गशैलो महोदयः केसरः केसरयुतो यतो वातः प्रवर्तते तेषां योजनविष्कम्भो द्विगुणः प्रविभागशः वर्षाणि तेषु कौरव्य सप्तोक्तानि मनीषिभिः ॥ २४ ॥ महामेरुर्महाकाशो जलदः कुमुदोत्तरः जलधारो महाराज सुकुमार इति स्मृतः ॥ २५॥ रेवतस्य तु कौमारः श्यामस्य मणिकाञ्चनः केसरस्याऽथ मौदाकी परेण तु महापुमान् ॥ २६ ॥ परिवार्य तु कौरव्य दैर्घ्य हस्खत्वमेव च जम्बूद्वीपेन संख्यातस्तस्य मध्ये महाद्रुमः ॥२७॥ शाको नाम महाराज प्रजा तस्य सदाऽनुगा । तत्र पुण्या जनपदाः पूज्यते तत्र शङ्करः ॥ २८॥ तत्र गच्छन्ति सिद्धाश्च चारणा दैवतानि च धार्मिकाश्च प्रजा राजंश्चत्वारोऽतीव भारत ॥ २९॥ वर्णाः स्वकर्मनिरता न च स्तेनोऽत्र दृश्यते दीर्घायुपो महाराज जरामृत्युविवर्जिताः ॥ ३० ॥ है । धृतराष्ट्र ने कहा-हे संजय! तुम्हारे इस कयन हैं । इन पहले कहे गये सातों पर्वतों में महामेरु, पर मुझे बड़ा सन्देह हो रहा है। वहा के मनुष्य महाकाश, जलद, कुमुद, उत्तर, जलधार और मुकुमार किस तरह सांपले हो गये ॥१८॥२१॥ संजय ने नाम के सात वर्ष हैं । रैवतक पर्वत का कौमारवर्ष, कहा-हे महाराज ! सभी द्वीपों में ब्राह्मण गोरे, क्षत्रिय | श्यामगिरि का मणिकाञ्चनवर्ष केसर का मौदाफीवर्ष साले और वैश्य मिश्र रङ्ग के होते हैं । हे भरतश्रेष्ठ! | है । उसके पश्चात् महापुमान् नाम का एक पर्वत है। श्यामगिरि में अर्थात् उसके पास की भूमि में उत्पन्न यह पर्वत शाकद्वीप की लम्बाई और चौड़ाई को घेरे होने के कारण वहा के लोग सारले होते हैं । इसी हुए है । इस खण्ड में एक ऐसा शाकवृक्ष है जिसका मे उस पति का नाम श्याम है । अब अन्य परतों परिमाण जम्बूद्वीप के समान है । सब प्रजा उस वृक्ष का वर्णन सुनिए। श्यामगिरि के पथात् अत्यन्त ऊँचा | के अधीन है । उक्त पर्वत में अत्यन्त पवित्र जनपद दुर्गशल है । उस पर्वत पर बड़े-बड़े मिह रहते हैं । बसे हुए हैं । यहां के लोग महादेवजी की उपासना उसके पधात् केमर पर्वत है, यहा से वायु प्रकट करते हैं। उम द्वीप में सिद्ध, चारण और देवाण होता है । ये सर पर्वत क्रमशः एक दूसरे से दूने आया-जाया करते हैं । वहां चारों वर्गों की प्रजा है। 1 अध्याय ११ ] म हा भा र त [ ४०३७ प्रजास्तत्र विवर्द्धन्ते वाविव समुद्रगाः नद्यः पुण्यजलास्तत्र गङ्गा च बहुधा गता सुकुमारी कुमारी च शीताशी वेणिका तथा महानदी च कौरव्य तथा माणिजला नदी ॥ ३२ ॥ चक्षुर्वर्धनिका चैव नदी भरतसत्तम तत्र प्रवृत्ताः पुण्योदा नद्यः कुरुकुलोद्वह ॥ ३३ ॥ सहस्राणां शतान्येव यतो वर्पति वासवः न तासां नामधेयानि परिमाणं तथैव च ॥३४॥ शक्यन्ते परिसंख्यातुं पुण्यास्ता हि सरिद्वराः । तत्र पुण्या जनपदाश्चत्वारो लोकसम्मताः मङ्गाश्च मशकाश्चैव मानसा मन्दगास्तथा मङ्गा ब्राह्मणभूयिष्ठाः स्वकर्मनिरता नृप ॥३६ ॥ मशकेषु तु राजन्या धार्मिकाः सर्वकामदाः मानसाश्च महाराज वैश्यधर्मोपजीविनः ॥ ३७॥ सर्वकामसमायुक्ताः शूरा धर्मार्थनिश्चिताः शूद्रास्तु मन्दगा नित्यं पुरुषा धर्मशीलिनः ॥ ३८॥ न तत्र राजा राजेन्द्र न दण्डो न च दण्डिकः। खधर्मेणैव धर्मज्ञास्ते रक्षन्ति परस्परम् ॥ ३९ ॥ एतावदेव शक्यं तु तत्र द्वीपे प्रभापितुम् एतदेव च श्रोतव्यं शाकद्वीपे महौजसि ॥४०॥ इति श्रा म महाभारते भीष्मपर्वाण भूमिपर्वणि शारद्वीपवर्णने एकादशोऽध्याय ॥ ११ ॥ उन सबकी आयु बहुत बडी हे । वे अपने-अपने धर्म । जलयाली नदिया है । इन्द्र उन नदियो का जल लेकर में अत्यन्त अनुराग रखते हैं। यहा न तो चोरों का वर्षा करते हैं। उन श्रेष्ठ नदियों के नाम गिनाना भय हे, न बुढापा है और न मृत्यु है ।।२२।३०॥ ओर उनके परिमाण का वर्णन करना सहज नहीं जैसे वर्षाकाल में नदिया बढ़ती हैं, वैसे ही वहा की । हे ॥३१॥३४॥ वहा लोक-सम्मत चार जनपद हैं, प्रजा क्रमश बढती है । वहा असग्य शाखाओंवाली जिनके नाम मङ्ग, मशक, मानस ओर मन्दग हैं। गङ्गा,सुकुमारी, कुमारी, शीताशी, वेणिका, मणिजला, मन प्रदेश में अपने कर्मों में निरत ब्राह्मण रहते हैं। महानदी ओर चक्षुर्वपनिका आदि महानदिया बहती मदशक प्रदेश में सर्वकामप्रद धार्मिक-श्रेष्ट क्षत्रिय रहते हैं । इनके अतिरिक्त ओर भी सैंकड़ों-हजारो पवित्र । हैं । मानम प्रदेश में सर्वकाम-सम्पन्न पेश्य और मन्दग , ।
५०३८ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व प्रदेश में परम धार्मिक शूद्र रहते हैं । हे राजेन्द्र ! : हुए एक दूसरे की रक्षा करते हैं। हे महाराज ! उज्ज्वल इन प्रदेशों में न तो राजा है, न राजदण्ड है और प्रभासम्पन्न शाकद्वीप का इतना ही हाल कहा जा न दण्ड के योग्य काम करनेवाले लोग हैं । वहां के सकता है और इतना ही सुनने का विषय है ॥३५॥४०॥ रहनेवाले धर्मज्ञ लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते मीष्मपर्व का ग्यारहवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ११ ॥ -- अथ द्वादशोऽध्यायः ।। १२ ।। सञ्जय उवाच-उत्तरेषु च कौरव्य द्वीपेषु श्रूयते कथा एवं तत्र महाराज ब्रुवतश्च निबोध मे ॥ १ ॥ घृततोयः समुद्रोऽत्र दधिमण्डोदकोऽपरः सुरोदः सागरश्चैव तथाऽन्यो जलसागरः परस्परेण द्विगुणाः सर्वे द्वीपा नराधिप पर्वताश्च महाराज समुद्रैः परिवारिताः ॥ ३ ॥ गौरस्तु मध्यमे द्वीपे गिरिर्मानः शिलो महान् । पर्वतः पश्चिमे कृष्णो नारायणसखो नृप ॥ ४ ॥ तत्र रत्नानि दिव्यानि स्वयं रक्षति केशवः प्रसन्नश्चाऽभवत्तत्र प्रजानां व्यद्धत्सुखम् कुशस्तम्बः कुशद्वीपे मध्ये जनपदैः सह सम्पूज्यते शाल्मलिश्च द्वीपे शाल्मलिके नृप ॥ ६ ॥ क्रौञ्चद्वीपे महाकौञ्चो गिरी रत्नचयाकरः सम्पूज्यते महाराज चातुर्वण्येन नित्यदा गोमन्तः पर्वतो राजन्सुमहान्सर्वधातुकः यत्र नित्यं निवसति श्रीमान्कमललोचनः बारहवां अध्याय ।। १२ ।। संजय ने कहा-ह राजेन्द्र ! अब में उत्तर द्वीप में कृष्ण पर्वत है, जिसमें नारायण रहते है ||१४|| दिशा में स्थित द्वीपों का वर्णन करता हूँ, सुनिए । भगवान् नारायण स्वयं वहां के रत्नों की रक्षा करते इन दीपों में घृत के समुद्र, दधि के समुद्र, मुरा के हैं और प्रसन्न होकर वहां के निवासियों को सुख देते ममुद्र और जल के समुद्र है । इन द्वीपों और सागरों | हैं । कुशद्वीप में वहां की प्रजा कुशस्तम्ब की और का परिमाण परस्पर एक-एक मे द्विगुण है । इनमें | शान्मटि द्वीप में यहा की प्रजा शाल्मलि वृक्ष की पूजा ममुद्रों में घिरे हुए द्वार भी हैं । मध्यम द्वीप में करना है। कांचीप में श्रेष्ट रनों की खान महाकौञ्च मनःशिला धातु का गार नामक पर्यन है। पथिम / पति है। यहां के चारों वर्ण उमी पर्वत की पूजा करते अध्याय १२ ] म हा भारत [ ४०३९ मोक्षिभिः सङ्गतो नित्यं प्रभुनारायणो हरिः कुशद्वीपे तु राजेन्द्र पर्वतो विद्रुमैश्चितः खनामनामा दुर्द्धो द्वितीयो हेमपर्वतः द्युतिमान्नाम कौरव्य तृतीयः कुमुदो गिरिः ॥१०॥ चतुर्थः पुष्पवान्नाम पञ्चमस्तु कुशेशयः पष्ठो हरिगरिन म पडेते पर्वतोत्तमाः तेषामन्तरविष्कम्भो द्विगुणः सर्वभागशः औद्भिदं प्रथमं वर्ष द्वितीयं वेणुमण्डलम् ॥ १२ ॥ तृतीयं सुरथाकारं चतुर्थं कम्बलं स्मृतम् धृतिमत्पञ्चमं वर्ष पष्टं वर्ष प्रभाकरम् ॥ १३ ॥ सप्तमं कापिलं वर्ष सप्तैते वर्पलम्भकाः एतेषु देवगन्धर्वाः प्रजाश्च जगतीश्वर बिहरन्ते रमन्ते च न तेषु म्रियते जनः न तेषु दस्यवः सन्ति म्लेच्छजात्योऽपि वा नृप ॥ १५ ॥ गौरप्रायो जनः सर्वः सुकुमारश्च पार्थिव अवशिष्टेषु सर्वेषु वक्ष्यामि मनुजेश्वर ॥ १६ ॥ यथाश्रुतं महाराज तदव्यग्रमनाः शृणु क्रौञ्चद्वीपे महाराज क्रौञ्चो नाम महागिरिः ॥ १७॥ क्रौञ्चात्परो वामनको वामनादन्धकारकः अन्धकारात्परो राजन्मनाकः पर्वतोत्तमः हैं । हे राजेन्द्र ! कुशद्वीप में विविध धातु-मण्डित | कार हे । चौथे वर्ष का नाम कम्बल है । पाच वर्ष और विद्रुमयुक्त प्रथम पर्वत गोमन्त है ! इस पर्वत पर का नाम धृतिमान् है । छठे वर्ष का नाम प्रभाकर भगवान् नारायण मुक्त पुरुषों के सग सदा निवास है । सात वर्ष का नाम कापिल है । वहा यही सात करते हैं ॥५॥९॥ इस द्वीप में दूसरा पर्वत हेममय वर्ष अर्थात् खण्ड प्रधान हैं । इन सत्र वर्षों में देना, हेमगिरि है। तीसरा पर्वत दीप्तिशाली कुमुद गिरि है। गन्धर्व और मनुष्य प्रसन्नचित्त से विहार किया करते चौथा पत पुष्पान्हे ! पाचवा पर्वत कुशेशय है । छठा हैं । इनमें रहनेवाले लोग अजर-अमर हैं । इन दो पर्पत हरिगिरि है । कुशद्वीप में ये छ. श्रेष्ठ पर्वतराज | (खण्डों) में दस्यु या म्रेच्छ जाति के लोग नहीं हैं । इनका फासला परस्पर दूना है ।।९।१२।। कुश- रहते । इन वर्षों के लोग गोरे रग के और सुकुमार द्वीप के पहले वर्ष का नाम उद्भिद् है । दूसरे वर्ष हैं ॥१३॥१६॥ हे महाराज ! अब में अन्य द्वीपों का का नाम वणुमण्डल है। तीसरे वर्ष का नाम सुरया- वर्णन, जैसा मुन रक्खा है, सुनाता हूँ। क्रौञ्चद्वीप ।
[ भीष्मपर
म हा भारत
४०४०]
॥ १९ ॥
॥ २०॥
॥ २१ ॥
॥ २२॥
॥ २३ ॥
मैनाकात्परतो राजन्गोविन्दो गिरिरुत्तमः
गोविन्दात्परतो राजनिविडो नाम पर्वतः
परस्तु द्विगुणस्तेषां विष्कम्भो वंशवर्द्धन
देशांस्तत्र प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु
क्रौञ्चस्य कुशलो देशो वामनस्य मनोनुगः
मनोनुगात्परश्चोप्णो देशः कुरुकुलोद्वह
उप्णात्परः प्रावरकः प्रावारादन्धकारकः
अन्धकारकदेशातु मुनिदेशः परः स्मृतः
मुनिदेशात्परश्चैव प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः
सिद्धचारणसङ्कीर्णो गौरप्रायो जनाधिप
एते देशा महाराज देवगन्धर्वसेविताः
पुष्करे पुष्करो नाम पर्वतो मणिरत्नवान्
तत्र नित्यं प्रभवति खयं देवः प्रजापतिः
तं पर्युपासते नित्यं देवाः सर्वे महर्पयः
वाग्भिर्मनोनुकूलाभिः पूजयन्तो जनाधिप
जम्बूढीपात्प्रवर्तन्ते रत्नानि विविधान्युत
द्वीपेपु तेषु सर्वेपु प्रजानां कुरुसत्तम
ब्रह्मचर्येण सत्त्येन प्रजानां हि दमेन च
आरोग्यायुःप्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः
गाणे गरन्टीप्लेने भारत
॥ २४॥
॥ २५॥
॥ २६॥
॥ २७॥
प्या- १२ ] म हा भारत [ ४०४१ उक्ता जनपदा येषु धर्मश्चैकः प्रदृश्यते ॥ २८॥ ईश्वरो दण्डमुद्यम्य स्वयमेव प्रजापतिः द्वीपानेतान्महाराज रक्षस्तिष्ठति नित्यदा ॥ २९॥ स राजा स शिवो राजन्स पिता प्रपितामहः । गोपायति नरश्रेष्ठ प्रजाः सजडपण्डिताः ॥ ३० ॥ भोजनं चाऽत्र कौरव्य प्रजाः स्वयमुपस्थितम् । सिद्धमेव महावाहो तद्धि भुञ्जन्ति नित्यदा ॥ ३१ ॥ ततः परं समा नाम दृश्यते लोकसंस्थितिः चतुरस्र महाराज त्रयस्त्रिंशत्तु मण्डलम् ॥ ३२ ॥ तत्र तिष्ठन्ति कौरव्य चत्वारो लोकसम्मताः । दिग्गजा भरतश्रेष्ठ वामनरावतादयः ॥ ३३ ॥ सुप्रतीकस्तथा राजन्प्रभिन्नकरटामुखः तस्याऽहं परिमाणं तु न संख्यातुमिहोत्सहे ॥ ३४ ॥ असंख्यातः स नित्यं हि तिर्यगूमधस्तथा । तत्र वै वायवो वान्ति दिग्भ्यः सर्वाभ्य एव हि ॥ ३५ ॥ असम्बद्धा महाराज तानिगृह्णन्ति ते गजाः पुष्करैः पद्मसङ्काशैविकसद्भिर्महाप्रभैः ॥ ३६ ॥ शतधा पुनरेवाऽऽशु ते तान्मुञ्चन्ति नित्यशः । श्वसद्भिर्मुच्यमानास्तु दिग्गजैरिह मारुताः ॥ ३७॥ आगच्छन्ति महाराज ततस्तिष्ठन्ति वैःप्रजाः द्वीपों के रहनेवाले लोगो में ब्रह्मचर्य, सत्य, दम, उपस्थित होता है और वे उसे ही खाकर रहते हैं आरोग्य और आयु आदि बाने उत्तरोत्तर दूनी हैं ॥२९॥३१॥ हे राजेन्द्र ! श्वेतद्वीप के पश्चात् समा ॥२४॥२८॥ इन द्वीपों में एक ही जनपद, एक ही नाम की, चौकोर और तेंतीस मण्डलवाली, वस्ती देख कार्यक्रम और एक ही धर्म है । सब लोको के ईश्वर पड़ती हे । हे कोख ! इस स्थान में लोकप्रसिद्ध प्रजापति स्वयं दण्ड धारण किये हुए इन द्वीपों की वामन, ऐरावत, सुप्रतीक और प्रभिन्नकरटामुख नाम रक्षा करते है । हे राजेन्द्र ! वे प्रजापति ही राजा के चार दिग्गज हैं । इन दिग्गजों के परिमाण और हैं, कल्याणस्वरूप हैं, कल्याणदायक हैं । वही पिता आधार का अनुमान करना असम्भव है । वे नीचे, हैं, वही पितामह हैं । चेतन और जड़, दोनों प्रकार ऊपर और आस-पास अनन्त विस्तृत हैं ||३२|३५|| की प्रजा की रक्षा वही करते हैं। इन द्वीपों के वहा चारों ओर से बड़े वेग से वायु चलती है । निवासियों के पास पका-पकाया भोजन स्वय ही ! वे गज पहले उस वायु को रोकते है और फिर प्रफुल्ल- ।
४०४२]] म हा भा र त [ भीष्मपर्व - . धृतराष्ट्र उवाच-परो वै विस्तरोऽत्यर्थं त्वया सञ्जय कीर्तितः ॥३८॥ दर्शितं द्वीपसंस्थानमुत्तरं ब्रूहि सञ्जय सञ्जय उवाच-- उक्ता द्वीपा महाराज ग्रहं वै शृणु तत्त्वतः स्वर्भानोः कौरवश्रेष्ठ यावदेव प्रमाणतः परिमण्डलो महाराज स्वर्भानुः श्रूयते ग्रहः ॥४०॥ योजनानां सहस्राणि विष्कम्भो द्वादशाऽस्य वै । परिणाहेन पत्रिंशद्विपुलत्वेन चाऽनघ पष्टिमाहुः शतान्यस्य बुधाः पोराणिकास्तथा । चन्द्रमास्तु सहस्राणि राजन्नेकादश स्मृतः ॥४२॥ विष्कम्भेण कुरुश्रेष्ट त्रयस्त्रिंशत्तु मण्डलम् एकोनपष्टिविष्कम्भं शीतरश्मेर्महात्मनः सूर्यस्त्वष्टौ सहस्राणि द्वे चाऽन्ये कुरुनन्दन विष्कम्भेण ततो राजन्मण्डलं त्रिंशता समम् ॥ १४ ॥ अष्टपञ्चाशतं राजन्विपुलत्वेन चाऽनघ श्रूयते परमोदारः पतगोऽसौ विभावसुः ॥४५॥ एतत्प्रमाणमर्कस्य निर्दिष्टमिह भारत स राहुश्छादयत्येतौ यथाकालं महत्तया ॥४६॥ चन्द्रादित्यौ महाराज संक्षेपोऽयमुदाहृतः इत्येतत्ते महाराज पृच्छतः शास्त्रचक्षुपा ॥४७॥ सर्वमुक्तं यथातत्त्वं तस्माच्छममवाप्नुहि यथोद्दिष्टं मया प्रोक्तं सनिर्माणमिदं जगत् ॥४८॥ कमउ-तुन्य अपनी सूहों से उम वायु को सयत म्प गोल है । उमका व्यास वारह हज़ार योजन और में फैलाते हैं । यही यायु जगत् में फैटकर सर प्रजा । परिधि छत्तीस हजार योजन है । अन्यान्य पाराणिक के प्राणों की रक्षा करती है ॥३६॥३८॥ धृतराष्ट्र ने । पण्डितों का कहना है कि राहु का परिमाण छ: कहा- मंजय ! तुमने द्वीपों की स्थिति का वर्णन हजार योजन है । चन्द्रमा का व्याम ग्यारह हजार नो पिम्नार के माय किया; अब चन्द्र. मूर्य और योजन और परिवि नैनीस हज़ार योजन है । किसी- गद आदि का वर्णन करो ॥३२॥ मजय ने कहा किमी के मन में चन्द्रमा का परिमाण उनमठ हजार 1 में दारों का वर्णन कर चुरा, अब योजन है ||१०|१३|| सूर्य का व्यास दस हज़ार गह या वर्णन मुनिए । मुनाह, राह पह का आकार । याजन और परिरि तीम हजार योजन है। किमी- मागिन अध्याय १३ ] म हा भारत [ ४०४३ तस्मादाश्वस कौरव्य पुत्रं दुर्योधनं प्रति श्रुत्वेदं भरतश्रेष्ठ भूमिपर्व मनोनुगम् ॥४९॥ श्रीमान् भवति राजन्यः सिद्धार्थः साधुसम्मतः। आयुर्वलं च कीर्तिश्च तस्य तेजश्च वर्धते यः शृणोति महीपाल पर्वणीदं यतत्रतः प्रीयन्ते पितरस्तस्य तथैव च पितामहाः ॥ ५१ ॥ इदं तु भारतं वर्ष यत्र व महे वयम् पूर्वेः प्रवर्तितं पुण्यं तत्सर्वं श्रुतवानसि ॥ ४२ ॥ इति श्री ममहामारते भी मपणि भूमिपणे उत्तरद्वीपादिमस्थानवर्णने द्वादशोऽध्याय ॥ १२ ॥ समाप्तमिद भूमिपर्व । किसी के मत में सूर्य का परिमाण अट्ठापन योजन जो क्षत्रिय इस भूमिपर्व को सुनता है उसे लक्ष्मी हे । मूर्यमण्डल का परिमाण इतना ही निर्दिष्ट है। और सिद्धि प्राप्त होती है । उसकी आयु, तेज ओर राहु दोनों से बड़ा है, इसलिए चन्द्रमा और सूर्य के बल बढता है । जो राजा पर्व के दिन सयत होकर मण्डलों को ढक लेता है । है महाराज | चन्द्रमा इस कथा को सुनता है उसके पिता, पितामह आदि ओर सूर्य तथा राहु का हाल सक्षेप से मैंने सुना पुरखे प्रसन्न होते हैं। हम लोग जिस भारतर्प में बसते दिया ॥४४१४८॥ अब आप स्वय शान्त भान धारण | हैं, उसमें रहनेवाले पहले के लोग जिन पुण्यकार्यो को करके अपने पुत्र दुर्योधन को आश्वासन दीजिए । कर गये हैं, वे सब आपके सुने हुए हैं ॥४९॥५२॥ भीमपर्व का बारहवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ १२ ॥ अथ भगवद्गीतापर्व । अथ योदशोऽध्याय ॥ १३ ॥ अथ गावल्गणिर्विद्वान्संयुगादेत्य भारत प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य भूतभव्यभविष्यवित् ध्यायते धृतराष्ट्राय सहसोत्पत्य दुःखितः आचष्ट निहतं भीमं भरतानां पितामहम् सञ्जय उवाच-सञ्जयोऽहं महाराज नमस्ते भरतर्षभ हतो भीष्मः शान्तनवो भरतानां पितामहः ॥ ३ ॥ तरहवां अध्याय ।। १३॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमजय! अब प्रणाम करता हूँ । हे भरतश्रेष्ठ ! भरतपरा के पितामह, भूत-भविष्य के ज्ञाता, प्रत्यक्षदर्शी, सजय समर भूमि महाराज शान्तनु के पुत्र, भीष्मजी मारे गये । जो से लौटकर एकाएक चिन्ताकुल धृतराष्ट्र के पास योद्धाओ के अगुआ और धनुर्द्धर वीरो के रक्षक आश्रय- पहुँचे और कहने लगे हे महाराज ! मैं सजप आपको स्वरूप थे, वही कुरु-पितामह भीष्मजी इस समय शम्पायन उवाच------
[ भीष्मपर्ने
म हा भारत
४०४४ ]
-
ककुदं सर्वयोधानां धाम सर्वधनुप्मताम्
शरतल्पगतः सोऽद्य शेते कुरुपितामहः ॥ ४ ॥
यस्य वीर्य समाश्रित्य द्यूतं पुत्रस्तवाऽकरोत् ।
स शेते निहतो राजन्संख्ये भीष्मः शिखण्डिना॥ ५ ॥
यः सर्वान्पृथिवीपालान्समवेतान्महामृधे
जिगायकरथेनैव काशिपुर्यां महारथः ॥ ६ ॥
जामदग्न्यं रणे रामं यो युध्यदपसम्भ्रमः
न हतो जामदग्न्येन स हतोऽद्य शिखण्डिना ॥ ७ ॥
महेन्द्रसदृशः शौर्ये स्थैर्ये च हिमवानिव
समुद्र इव गाम्भीर्य सहिष्णुवे धरासमः ॥ ८ ॥
शरदंष्ट्रो धनुर्वक्त्रः खड्गजिह्वो दुरासदः
नरसिंहः पिता तेऽद्य पाञ्चाल्येन निपातितः ॥ ९ ॥
पाण्डवानां महासैन्यं यं दृष्ट्वोद्यतमाहवे
प्रावेपत भयोद्विग्नं सिंहं दृष्ट्व गोगणः
परिरक्ष्य स सेनां ते दशरात्रमनीकहा
जगामाऽस्तमिवाऽऽदित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ११ ॥
यः स शक्र इवाऽक्षोभ्यो वर्षन्वाणान्सहस्रशः।
जघान युधि योधानामव॒दं दशभिर्दिनः ॥१२॥
स शेते निहतो भूमौ वातभग्न इव द्रुमः
तव दुर्मन्त्रिते राजन्यथा नाऽर्हः स भारत
इति श्रीममहामारते भीष्मपर्वाण भगवद्गीतापवणि भामह युश्रवणे योदशोऽध्याय. ॥ १३ ॥
अध्याय १४ ] म हा भा र त [ ४०४५ अस्त हो गये। जिन्होंने इन्द्र की तरह बेखटके हज़ारों | कुमन्त्रणा के कारण, आंधी में टूटे हुए पेड़ की तरह बाण बरसाकर दस दिन मे दस करोड़ (या लाख) | पृथ्वी पर पड़े हुए हैं। वे कदापि ऐसी दशा के योद्धाओं को मार डाला वही भीष्म आज, आपकी | योग्य न थे ॥८॥१३॥ भीमपरा तेरहवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ १३ ॥ अथ चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-कथं कुरुणामृपभो हतो भीष्मः शिखण्डिना कथं रथात्स न्यपतत्पिता मे वासवोपमः कथमाचक्ष्व मे योधा हीना भीष्मेण सञ्जय वलिना देवकल्पेन गुर्वर्थे ब्रह्मचारिणा तस्मिन्हते महाप्राज्ञे महेष्वासे महावले महासत्वे नरव्याघे किमु आसीन्मनस्तव आत्ति परामाविशति मनः शंससि मे हतम् । कुरूणामृपभं वीरमकम्पं पुरुपर्पभम् ॥ ४ ॥ के तं यान्तमनुप्राप्ताः के वाऽस्याऽऽसन्पुरोगमाः। केऽतिष्ठन्के न्यवर्त्तन्त केऽन्ववर्त्तन्त सञ्जय के शूरा रथशार्दूलमद्भुतं क्षत्रियर्पभम् तथाऽनीकं गाहमानं सहसा पृष्ठतोऽन्वयुः यस्तमोऽर्क इवाऽपोहन्परसैन्यममित्रहा सहस्त्ररश्मिप्रतिमः परेषां भयमादधत् अकरोदुष्करं कर्म रणे पाण्डुसुतेषु यः ग्रसमानमनीकानि य एनं पर्यवारयन् चोदयां अध्याय ॥ १४ ॥ धृतराष्ट्र ने कहा-हे संजय ! इन्द्र-सदृश, कुरु- की सूचना सुनने से मुझे घोर दुःख उपन्न हो रहा कुल्ल-चूडामणि, मेरे चचा भीष्म किस तरह शिखण्डी है ॥१४॥ भीष्मजी जब युदयात्रा पर थे तब कौन- के हाथों मारे गये और रथ से गिरे ? पिता की प्रसन्नता | कौन वीर उनके पीछे गये थे, कौन-कौन वीर उनके के लिए जन्म भर ब्रह्मचारी रहनेवाले देवतुन्य भीम आगे चले थे, कौन-कौन उनके साथ बने रहे और के बिना इस समय मेरे पुत्रों और योद्धाओं का क्या कौन-कौन लौट आये ! जब वे शत्रुमेना में घुसे थे हाल है ? महाप्राज्ञ, बड़े उत्साही, महाबली, महात्मा तब किन-किन वीरों ने उनके पृष्टभाग की रक्षा की भीष्म के मारे जाने पर तुम्हारे मन की क्या दशा थी ? जैसे सूर्यदेव अधिकार को दूर करते हैं यने । दुई थी ? उन कुरकुलाग्रगण्य पुरुषश्रेष्ठ भीष्म के मरने । महावीर भीष्म जब शनुमेना को मारने और गई ।
[ भीष्मपर म हा भा र त ४०४४ ] । ककुदं सर्वयोधानां धाम सर्वधनुष्मताम् शरतल्पगतः सोऽद्य शेते कुरुपितामहः यस्य वीर्यं समाश्रित्य द्यूतं पुत्रस्तवाऽकरोत् । स शेते निहतो राजन्संख्ये भीष्मः शिखण्डिन।॥ ५ यः सर्वान्पृथिवीपालान्समवेतान्महामृधे जिगायकरथेनैव काशिपुर्यां महारथः जामदग्न्यं रणे रामं यो युध्यदपसम्भ्रमः न हतो जामदग्न्येन स हतोऽद्य शिखण्डिना ॥ ७ ॥ महेन्द्रसदृशः शौर्ये स्थैर्यै च हिमवानिव समुद्र इव गाम्भीर्य सहिष्णुत्वे धरासमः शरदंष्ट्रो धनुर्वक्त्रः खड्गजिह्वो दुरासदः नरसिंहः पिता तेऽद्य पाञ्चाल्येन निपातितः ॥ ९ ॥ पाण्डवानां महासैन्यं यं दृष्ट्वोद्यतमाहवे प्रावेपत भयोद्विग्नं सिंहं दृष्ट्व गोगणः ॥१०॥ परिरक्ष्य स सेनां ते दशरात्रमनीकहा जगामाऽस्तमिवाऽऽदित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ११ ॥ यः स शक्र इवाऽक्षोभ्यो वर्षन्वाणान्सहस्रशः। जघान युधि योधानामव॒दं दशभिर्दिनः ॥ १२ ॥ स शेते निहतो भूमौ वातभन्न इव द्रुमः तव दुर्मन्त्रिते राजन्यथा नाऽर्हः स भारत ॥ १३ ॥ इति श्रीमन्महामारते भाष्मपर्वाण भगवद्गीतापवणि माममृ युथवणे योदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ शर-शय्या पर पड़े हुए हैं । आपके पुत्र दुर्योधन ने । सदृश, गम्भीरता में समुद्र के समान और सहन- जिनके भरोसे जुआ खेला था, उन्हीं भीष्म को समर शीलता में पृथ्वी के बराबर थे, वही वाणम्पी दाद, मे शिखण्टी ने मार गिराया । जिन महारयी ने काशी । धनुपम्पा मुग्व और खड्गरूपी जिहा से भयानक पुरा में अकेले रथ पर बैठकर सब राजाओं को परास्त वीर आज शिखण्डी के हाथों मारे गये । जिन्हें युद्ध किया, जिन्होंने परशुराम से बिना किमी प्रकार के के लिए उद्यत देखकर पाण्डयों की सेना भय और क्षोम के निडर होकर युद्ध किया, जिन्हें साक्षात् । व्याकुलता के मारे वैसे ही काप उठी थी जमे सिंह परशुगम भी नहीं मार मके, यही महानदी भीष्म को देखकर गाय कापने लगता है वहीं गनुपीर-धाती आज शिग्रण्टी के हाथों मरे पड़े हैं ॥१७॥ जो महावीर भीष्म दम दिन आपकी सेना की रक्षा करने नगना में मरेन्द्र के तुन्य, स्थिरता में हिमाय्य के हुए, अनेक कटिन कर्म करके, अब मूर्य के समान अध्याय १४ ] म हा भारत [४०४७ कथं च नाऽजयद्भीप्नो द्रोणे जीवति सञ्जय ॥१८॥ कृपे सन्निहिते तत्र भरद्वाजात्मजे तथा भीष्मः प्रहरतां श्रेष्ठः कथं स निधनं गतः ॥ १९ ॥ कथं चाऽतिरथस्तेन पाञ्चाल्येन शिखण्डिना । भीष्मो विनिहतो युद्धे देवैरपि दुरासदः ॥ २० ॥ यःस्पर्द्धते रणे नित्यं जामदग्न्यं महाबलम् अजितं जामदग्न्येन शक्रतुल्यपराक्रमम् ॥ २१ ॥ तं हतं समरे भीष्मं महारथकुलोदितम् सञ्जयाऽऽचक्ष्व मे वीरं येन शर्म न विद्महे ॥२२॥ मामकाः के महेष्वासानाऽजहुः सञ्जयाऽच्युतम्। दुर्योधनसमादिष्टाः के वीराः पर्यवारयन् ॥ २३॥ यच्छिखण्डिमुखाः सर्वे पाण्डवा भीममभ्ययुः । कञ्चित्ते कुरवः सर्वे नाऽजहुः सञ्जयाऽच्युतम् ॥ २४ ॥ अश्मसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम यच्छत्वा पुरुपव्यानं हतं भीमं न दीर्यते ॥ २५॥ यस्मिन्सत्यं च मेधा च नीतिश्च भरतर्पभे अप्रमेयाणि दुर्धर्षे कथं स निहतो युधि ॥ २६ ॥ मौर्वीचोपस्तनयित्नुः पृपत्कपतो महान् धनुर्हादमहाशब्दो महामेघ इवोन्नतः ॥२७॥ करने में प्रवृत्त हुए ? द्रोणाचार्य के जीते-जी भीष्म वृत्तान्त विस्तार के साथ मुझे सुनाओ । दुर्योधन की क्यों नहीं जय प्राप्त कर सके ? भारद्वाज द्रोणाचार्य आज्ञा से मेरे पक्ष के कौन-कौन वीर भीष्म की और कृपाचार्य के समीप रहने पर भी श्रेष्ठ योद्धा सहायता कर रहे थे? जिस समय शिखण्डी आदि भीष्म किस तरह मारे गये ? पाञ्चालराज के पुत्र पाण्डव पक्ष के योद्धा भीष्म के सामने आये थे उस शिखण्डी ने किस तरह उन अतिरथी भीष्म को युद्ध समय कौरव वीर क्या भीष्म को छोड़कर हट गये मारा, जिनका सामना देवता भी नहीं कर सकते । थे ? मेरा हृदय अत्यन्त कटिन और पत्थर का बना थे ॥१८॥२०॥ युद्ध में महापगकमी परशुरामजी की हुआ है, इसी कारण श्रेष्ठ वीर भीष्म के मरने का बराबरी का दावा रखनेवाले, समर में परशुरामजी से | समाचार सुनकर भी फट नहीं जाता उन अग्रमेय भी न हारनेवाले, इन्द्र के समान पराक्रमी भीष्म युद्ध बलशाली भरनश्रेष्ठ भीष्म में मत्य, मेधा, नीति आदि में किस तरह मारे गये ! हे संजय ! मैं उनके मरने | सद्गुण सदा पिराजमान रहते थे। फिर वे किम का समाचार पाकर बहुत ही दुःखिन हूँ। तुम सब तरह युद्ध में मारे गये! ॥२१।२६।। जिन महामेष- [ भीष्मर म हा भा र त ४०४६ कृतिनं तं दुराधर्ष सञ्जयाऽस्य त्वमन्तिके कथं शान्तनवं युद्धे पाण्डवाः प्रत्यवारयन् ॥ ९ ॥ निकृन्तन्तमनीकानि शरदंष्ट्रं मनस्विनम् चापव्यात्ताननं घोरमसिजिहंदुरासदम् ॥ १० ॥ अनर्ह पुरुषव्याघ्र हीमन्तमपराजितम् पातयामास कौन्तेयः कथं तमजितं युधि ॥ ११ ॥ उपधन्वानमुग्रेषु वर्तमान रथोत्तमे परेपामुत्तमाङ्गानि प्रचिन्वन्तमथेपुभिः ॥ १२ ॥ पाण्डवानां महत्सैन्यं ये दृष्ट्वोयतमाहवे कालाग्निमिव दुर्धर्ष समचेष्टत नित्यशः परिकृप्य स सेनां तु दशरात्रमनीकहा जगामाऽस्तमिवाऽऽदित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ १४ ॥ यः स शक्र इवाऽक्षय्यवर्ष शरमयं क्षिपन् जघान युधि योधानामव॒दं दशभिर्दिनः ॥ १५ ॥ स शेते निहतो भूमौ वातभुग्न इव द्रुमः मम दुर्मन्त्रितेनाऽऽजौ यथा नाऽर्हति भारत ॥ १६ ॥ कथं शान्तनवं दृष्ट्वा पाण्डवानामनीकिनी प्रहर्तुमशकत्तत्र भीम भीमपराक्रमम् ॥ १७॥ कथं भीष्मेण संग्रामं प्राकुर्वन्पाण्डुनन्दनाः के हदय में भय उत्पन्न करनेवाले दुष्कर कर्म करने | वेगशाली, हीमान् , अपराजित, असाधारण, पुरुपसिंह, लगे थे तब शत्रुसेना के किन-किन वीरों ने उनका दुर्धर्ष भीम को रोका ? पितामह के वाण ही दात सामना किया ॥५॥८॥ हे संजय ! तुमने क्या समीप | थे, धनुष ही मुख था, और खग ही जिह्वा थी । रहकर सब युद्ध देखा था ? पाण्डवों ने किस तरह उग्र धनुप और तीक्ष्ण बाण धारण करनेवाले तथा पितामह को रोका पाण्डयों की महासेना जिन इन्द्र की तरह असंख्य वाण बरसाकर दस दिन में भीष्म को युद्ध के लिए उद्यत और कालानल के समान दस करोड़ (या लाख) योद्धाओं के मारनेवाले भीष्म दुर्धर्ष देखकर मर रहे पुरुष की तरह तड़पने लगती पितामह, मेरी कुमन्त्रणा के कारण, मरकर आज थी वे, दम दिन तक शत्रुसेना को मारकर, दुष्कर आनी से टूटे हुए पेड की तरह अपने अयोग्य गति कर्म करके, केमे सूर्य की तरह अस्त हो गये ? सजय ! पाञ्चाल सेना के वीर फिस अर्जुन ने किम तरह उन उत्तम रथ पर बैठे हुए, तरह भीमपराक्रमी भीष्म को रोकने में समर्थ हुए , शत्रुओं के मिगे को तीक्ष्ण वाणों से काटनेवाले, । ॥९॥१७पाण्डर लोग किस तरह भीष्म से युद्ध । को पहुँचे।
अध्याय १४ ] म हा भा र त [४०४७ । कथं च नाऽजयद्भीपमो द्रोणे जीवति सञ्जय ॥१८॥ कृपे सन्निहिते तत्र भरद्वाजात्मजे तथा भीष्मः प्रहरतां श्रेष्ठः कथं स निधनं गतः ॥ १९ ॥ कथं चाऽतिरथस्तेन पाञ्चाल्येन शिखण्डिना भीष्मो विनिहतो युद्धे देवैरपि दुरासदः ॥ २० ॥ यःस्पर्द्धते रणे नित्यं जामदग्न्यं महाबलम् अजितं जामदग्न्येन शक्रतुल्यपराक्रमम् ॥ २१ ॥ तं हतं समरे भीष्मं महारथकुलोदितम् सञ्जयाऽऽचक्ष्व मे वीरं येन शर्म न विद्महे ॥ २२ ॥ मामकाः के महेष्वासानाऽजहुःसञ्जयाऽच्युतम्। दुर्योधनसमादिष्टाः के वीराः पर्यवारयन् ॥ २३ ॥ यच्छिखण्डिमुखाः सर्वे पाण्डवा भीष्ममभ्ययुः। कञ्चित्ते कुरवः सर्वे नाऽजहुः सञ्जयाऽच्युतम् ॥ २४ ॥ अश्मसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम यच्छ्त्वा पुरुपव्याघ्र हतं भीष्मं न दीर्यते ॥२५॥ यस्मिन्सत्यं च मेधा च नीतिश्च भरतर्षभे अप्रमेयाणि दुर्धर्षे कथं स निहतो युधि ॥ २६ ॥ मौर्वीघोपस्तनयित्नुः पृपत्कपतो महान् धनुर्वादमहाशब्दो महामेघ इवोन्नतः ॥२७॥ करने में प्रवृत्त हुए ? द्रोणाचार्य के जीते-जी भीष्म | वृत्तान्त विस्तार के साथ मुझे सुनाओ । दुर्योधन की क्यों नहीं जय प्राप्त कर सके ? भारद्वाज द्रोणाचार्य | आज्ञा से मेरे पक्ष के कौन-योन वीर भीष्म की और कृपाचार्य के समीप रहने पर भी श्रेष्ठ योद्धा सहायता कर रहे थे । निस समय शिखण्डी आदि भीष्म किस तरह मारे गये पाञ्चालराज के पुत्र पाण्डव पक्ष के योद्धा भीष्म के सामने आये थे उस शिखण्डी ने किस तरह उन अतिरथी भीष्म को युद्ध समय कौरव वीर क्या भीष्म को छोड़कर हट गये में जिनका सामना देवता भी नहीं कर सकते थे। मेरा हृदय अत्यन्त कठिन और पथर का बना थे ॥१८॥२०॥ युद्ध में महापगक्रमी परशुरामजी की हुआ है इसी कारण श्रेष्ठ वीर भीष्म के मरने या वरानरी का दाना रखनेगले, समर में परशुरामनी से समाचार सुनसर भी पट नहीं जाता । उन अप्रमेय भी न हारनेगले, इन्द्र के समान पराक्रमी भीष्म युद्ध वशाली भरतश्रेष्ट भीष्म में सत्य, मेवा, नीति आदि में किस तरह मारे गये ? हे सजय ! मैं उनके मरने ! सद्गुण सदा पिरानमान रहत थे। फिर वे किम का समाचार पाकर बहुत ही दु खिन हूँ। तुम सर तरह युद्ध में मारे गये ॥२१॥२६॥ निन महामेव मारा, .
[ भीष्मपर ४०४८ ] म हा भा र त योऽभ्यवर्पत कौन्तेयान्सपाञ्चालान्समृञ्जयान् । निघ्नन्पररथान्वीरो दानवानिव वज्रभृत् ॥ २८॥ इप्वस्त्रसागरं घोरं वाणग्राहं दुरासदम् कार्मुकोर्मिणमक्षय्यमद्वीपं चलमप्लवम् ॥ २९ ॥ गदासिमकरावासं हयावर्त्त गजाकुलम् पदातिमत्स्यकलिलं शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनम् ॥ ३० ॥ हयान्गजपदातींश्च रथांश्च तरसा वहून् निमजयन्तं समरे परवीरापहारिणम् ॥ ३१ ॥ विदह्यमानं कोपेन तेजसा च परन्तपम् वेलेव मकरावासं के वीराः पर्यवारयन् ॥ ३२ ॥ भीष्मो यदकरोत्कर्म समरे सञ्जयाऽरिहा दुर्योधनहितार्थाय के तस्याऽस्य पुरोऽभवन् ॥ ३३ ॥ के रक्षन्दक्षिणं चक्र भीष्मस्याऽमिततेजसः पृष्ठतः के परान्वीरानपासेधन्यतव्रताः ॥३४॥ के पुरस्तादवर्तन्त रक्षन्तो भीष्ममन्तिके केऽरक्षन्नुत्तरं चक्रं वीरा वीरस्य युध्यतः ॥ ३५॥ वामे चक्रे वर्तमानाः केऽनन्सञ्जय सृञ्जयान् । अग्रतोऽग्यमनीकेषु केऽभ्यरक्षन्दुरासदम् सदृश भीष्म ने प्रत्यश्चा के शब्दरूपी गम्भीर गर्जन आर नौगारहित अस्त्रसागर में भीष्म ने वेग के साथ के साथ धनुष के टवारशब्द-रूपी बिजली की कडक शत्रुपक्ष के हाथी, घोडे, रय, पैदल आदि को डुबा से सव दिशाओं को प्रतिव्यनित कर दिया, जलधारा दिया होगा। वहीं भीष्म किस तरह मारे गये जिनका सदृश वाणवर्षा से सृञ्जयों, पाचालों ओर पाण्डमों । क्रोप अग्नि से भी बढकर भीषण था, जिनका तेज की सेना को छा लिया, और दानव-दलन इन्द्र के शत्रुओं के लिए असह्य और ताप पहुँचानेगाला था, समान शत्रुपक्ष के रथी, अतिरथी आदि योद्धाओं को उन भीष्म के वेग को, समुद्र के वेग को तट की मारकर तहस-नहस कर दिया, वे वीर भीष्म कैमे | भूमि के समान, किस-किस वीर ने रोका॥२७॥३२॥ मारे गये । उनके अस्त्रों का सागर अपार था। उसमें शत्रुपीरघाती भीम जब दुर्योधन के हित के लिए पण ही ग्राह थे, धनुष ही तरतें थीं, गदा और खड्ग युद्ध में प्रवृत्त हुए ता कौन वीर उनके आगे-आगे ही मगर ये, हाथी और घोड़े ही आरत (भैपर) थे, थेफिन वीरों ने उनके रथ के दक्षिण चक्र की पैदल सिपाही ही मठरी के समान थे, यास और , रक्षा की थी किन पीरों ने दृढ़ प्रतिज्ञा के साथ दुन्दुभि आदि का शब्द ही गर्जन था। उस द्वीप | उनके पीछे आक्रमण करनेवाले शत्रुओं को रोका था।
अध्याय १४ ] म हा भारत [ ४०४९ । पार्श्वतः केऽभ्यरक्षन्त गच्छन्तो दुर्गमां गतिम् । समूहे के परान्वीरान्प्रत्ययुध्यन्त सञ्जय ॥ ३७॥ रक्ष्यमाणः कथं धीरैर्गोप्यमानाश्च तेन ते दुर्जयानामनीकानि नाऽजयंस्तरसा युधि सर्वलोकेश्वरस्येव परमेष्ठी प्रजापतेः कथं प्रहर्तुमपि ते शेकुः सञ्जय पाण्डवाः ॥ ३९ ॥ यस्मिन्द्वीपे समाश्वास्य युध्यन्ते कुरवः परैः तं निमग्नं नरव्याघ्र भीष्मं शंससि सञ्जय ॥४०॥ यस्य वीर्य समाश्रित्य मम पुत्रो वृहद्बलः न पाण्डवानगणयत्कथं स निहतः परैः ॥ ४१ ॥ यः पुरा विवुधैः सर्वैः सहाये युद्धदुर्मदः कांक्षितो दानवान्नद्भिः पिता मम महाव्रतः ॥ ४२ ॥ यस्मिजाते महावीर्ये शान्तनुर्लोकविश्रुतः शोकं दैन्यं च दुःखं च प्राजहारपुत्रलक्ष्मणि ॥ ४३ ॥ प्रोक्तं परायणं प्राज्ञं स्वधर्मनिरतं शुचिम् वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञं कथं शंससि मे हतम् ॥ १४ ॥ सर्वास्त्रविनयोपेतं शान्तं दान्तं मनस्विनम् हतं शान्तनवं श्रुत्वा मन्ये शेपं हतं बलम् ॥४५॥ किन धीरो ने उनके बायें पहिये की रक्षा की थी ! तुल्य प्रतापी पितामह के ऊपर प्रहार कर सके ? किन वीरों ने उनके बायें पहिये का वचार करते | जिन दीपम्वरूप भीष्म के सहोर कौरवों ने शत्रुपक्ष समय सृञ्जय वीरों से युद्ध किया था । किन वीरों ने की सागर-समान मेना में प्रवेश करने का साहस अत्यन्त दुर्गम अग्रपनी सेना के अप्रभाग की रक्षा किया था उन्हीं भीष्म के ड्यने की सूचना तुम दे की थी ! किन पीरो ने कष्ट और दुर्गति सहकर रहे हो । मेरा यलपान् पुन जिन भीष्म के बट का भी भीष्म पितामह के पार्श्व भाग की रक्षा की थी ! आश्रय लेकर पाण्डवों को कुछ नहीं समझता था किन-किन चोरों ने हमारे पक्ष की मेना में रहकर यही भीम फिम तरह शत्रुओं के हायो मारे गये ! गदल के वीरों का सामना किया था ? हे मंजप ! ॥३९॥४१॥ ममय में दाना-दमन के रिए देवताओं सब बांगे ने भीष्म की किम तरह रक्षा की : भीष्म ने जिन मारत-धारी युदुर्मः भाम में महायता पितामह के यादुपट से सुरक्षित होकर भी कारपक्ष प्राम करने की इच्छा की थी, जिन भीम के जन्म के के पार किम कारण पाण्डरगना को पराम्न नहीं ममप लोक-प्रमिद दालनु का गोरु, दुःप और पर ग ॥३३॥३८॥ पाण्डव ही किस तरह प्रजापगी । दानता दर हो गई थी, उन मामाज आने [ भीष्मपन म हा भा र त ४०५० ] धर्मादधर्मों बलवान्सम्प्राप्त इति मे मतिः यत्र वृद्धं गुरुं हत्वा राज्यमिच्छन्ति पाण्डवाः ॥ ४६ ॥ जामदग्न्यः पुरा रामः सर्वास्त्रविदनुत्तमः अम्वार्थमुद्यतः संख्ये भीष्मेण युधि निर्जितः ॥४७॥ तमिन्द्रसमकर्माणं ककुदं सर्वधन्विनाम् हतं शंससि मे भीष्मं किं नु दुःखमतः परम् ॥ ४८ ॥ असकृत्क्षत्रियव्राताः संख्ये येन विनिर्जिताः । जामदग्न्येन वीरेण परवीरनिघातिना ॥४९॥ न हतो यो महावुद्धिः स हतोऽद्य शिखण्डिना। तस्मान्नूनं महावीर्याद्भार्गवाशुद्धदुर्मदात् ॥ ५०॥ तेजोवीर्यवलैर्भूयाशिखण्डी द्रुपदात्मजः यः शूरं कृतिनं युद्धे सर्वशास्त्रविशारदम् ॥ ५१ ॥ परमास्त्रविदं वीरं जघान भरतर्षभम् के वीरास्तममित्रनमन्वयुः शस्त्रसंसदि ॥ ५२॥ शंस मे तद्यथा चाऽऽसीयुद्धं भीष्मस्य पाण्डवैः । योपेव हतवीरा मे सेना पुत्रस्य सञ्जय ॥ ५३॥ अगोपमिव चोद्भान्तं गोकुलं तद्वलं मम पौरुपं सर्वलोकस्य परं यस्मिन्महाहवे ॥ ५४॥ परासक्ते च वस्तस्मिन्कथमासीन्मनस्तदा जीवितेऽप्यद्य सामर्थ्य किभिवाऽस्मासु सञ्जय ॥५५॥ तत्पर, वेद-वेदाग के तत्त्व के ज्ञाता भीष्म के मरने । श्रेष्ट भीष्म की मृत्यु का समाचार सुनने की अपेक्षा की बात तुम कैसे कह रहे हो ॥४२॥४४॥ सर अधिक दु ख का समाचार मेरे लिए और क्या हो अत्रों की विद्या में पारदर्शी, शान्त, दान्त, मनस्वी सकता ह ॥४५॥४८॥ शगीरदलन क्षत्रियकुल- भीमजी क्या मरे, मेरे पक्ष की बची हुई सर सेना | नाशकारी परशुरामजी के हाथ से भी जो पितामह चौपट हो गई । वृद्ध कुरगुर भीष्म को मारकर नहीं मरे, वही आज शिखण्डी के हाथ से मारे गये ! पाण्डव रोग राज्य प्राप्त करने की इच्छा कर रहे हैं, यह | इसमे जान पडता है कि शिग्वण्डी तेज आर वल में देगकर मुझे जान पड़ता है कि धर्म की अपेक्षा | परशुरामजी मे भी बदसरह । उसने जन दिव्य अस्रों अधर्म ही प्रबल है । सब अखों के जाननेवाले परशु- के ज्ञाता महागीर भरतश्रेष्ठ भीष्म रामजी भी एक समय अग्या के लिए युद्ध ठानकर कान-कौन पीर उसके साथ थे। ॥४९॥५२॥ हे सजय! जिनसे पराम्न हो चुके हैं उन देवगन-सदृश धनुर्दर पाण्डवों के साथ भीष्म ने जैसा युद्ध किया सो मुझसे मारा था तर अध्याय १४ ] म हा भारत [ ४०५१ घातयित्वा महावीर्यं पितरं लोकधार्मिकम् अगाधे सलिले मग्नां नावं दृष्ट्वेव पारगाः भीष्मे हते भृशं दुःखान्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः। अद्रिसारमयं नूनं हृदयं मम सञ्जय यच्छत्वा पुरुषव्याघ्र हतं भीष्मं नदीर्यते यस्मिन्नस्त्राणि मेधा च नीतिश्च पुरुपर्पभे ॥ ५८॥ अप्रमेयाणि दुर्धर्षे कथं स निहतो युधि न चाऽस्त्रेण न शौर्येण तपसा मेधया न च ॥ ५९ ॥ न धृत्या न पुनस्त्यागान्मृत्योः कश्चिद्विमुच्यते। कालो नूनं महावीर्यः सर्वलोकदुरत्ययः ॥ ६०॥ यत्र शान्तनवं भीमं हतं शंससि सञ्जय पुत्रशोकाभिसन्तमो महद्दुःखमचिन्तयम् आशंसेऽहं परं त्राणं भीष्माच्छान्तनुनन्दनात् । यदाऽऽदित्यामिवाऽपश्यत्पतितं भुवि सञ्जय ॥ ६२ ॥ दुर्योधनः शान्तनवं किं तदा प्रत्यपद्यत नाऽहं स्वेपां परेपां वा बुद्धया सञ्जय चिन्तयन् ॥ ६३ ॥ शेष किञ्चित्प्रपश्यामि प्रत्यनीके महीक्षिताम् । दारुणः क्षत्रधर्मोऽयमृपिभिः सम्प्रदर्शितः ॥६४ ॥ कहो । इस समय मेरे पुत्र की सारी सेना अनाथ विधवा अवश्य ही पयर का कहना चाहिए । अग्नरिघा, मेधा की तरह, रक्षकहीन गो-कुट की तरह, बहुत ही और नानिज्ञान में अप्रमेय भीम युद्ध में कमे मारे व्याकुल हो गई होगी । युद्धकाल में मन यारों को गये । ॥५६॥६॥ हे मंजय ! भीम को भी ममर में जिनके चाहुबल का भरोमा था उन भीम को मरा हुआ मुनकर मुझे निधय हो गया कि कोई परलोकवासी हुआ सुनकर मेरा हृदय व्याकुल हो रहा । अयरिया, शीर्य, तप, मेधा या शृति के द्वाग मृत्यु ॥५३॥५५॥ उन महागर भीष्ण के जानकार ! के हाथ मे यन नहीं सकता । महावीर्य गारी दर. में हम कैमे ममर्थ और शक्तिशाली थे ! अगाध जल निकस काल मभी को प्रम लेता है । में पुन-दोक में नाा के डूब जाने पर पार जाने की इम्मा गगने- ' में अन्यन्न मन्नम होने पर भी अनपाटे माान दाग सारे लोग जो दुःपिल होते है, भीम के मरने मे का पार न कर भाम के दाग आन पक्ष के यमे ही पिन और दुःपिन मेरे पुत्र हो रहे होंगे। बनार की आशा स्पिदृपया । मुन्न भाग कायदा है संजय ! पुरुषधेट भाग के मरने की मूगना निभय ग । हे गंजय ! दोन ने जर भीम या गुनकर भी मेग हदय नहीं फटना, इमतिय उभे . मूर्य का नाम पर गिग्ने देग नर उमने क्या .
[मा न म हा भारत ४०५२ ] . यत्र शान्तनवं हत्वा राज्यमिच्छन्ति पाण्डवाः । घयं वा राज्यमिच्छामो घातयित्वा महाव्रतम् ॥६५॥ क्षत्रधर्मे स्थिताः पार्था नाऽपराध्यन्ति पुत्रकाः । एतदायेंण कर्तव्यं कृच्छ्रास्वापत्सु सञ्जय ॥६६॥ पराक्रमः परा शक्तिस्तत्तु तस्मिन्प्रतिष्ठितम् अनीकानि विनिघ्नन्तं ह्रीमन्तमपराजितम् ॥६७॥ कथं शान्तनवं तातं पाण्डुपुत्रा न्यवारयन् यथा युक्तान्यनीकानि कथं युद्धं महात्मभिः ॥ ६८ ॥ कथं वा निहतो भीष्मः पिता सञ्जय मे परैः । दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौवलः ॥ ६९ ॥ दुःशासनश्च कितवो हते भीष्मे किमब्रुवन् यच्छरीरैरुपास्तीणां नरवारणवाजिनाम् ॥ ७०॥ शरशक्तिमहाखड्गतोमराक्षां महाभयाम् प्राविशन्कितवा मन्दाः सभां युद्धदुरासदाम् ॥ ७१ ॥ प्राणद्यूते प्रतिभये केऽदीव्यन्त नरर्षभाः के जीयन्ते जितास्तत्र कृतलक्ष्या निपातिताः ॥७२॥ अन्ये भीष्माच्छान्तनवात्तन्ममाऽऽचक्ष्व सञ्जय। न हि मे शान्तिरस्तीह श्रुत्वा देवव्रतं हतम् ॥७३॥ कहा ॥६०६३॥ मुझे जान पड़ता है कि इस युद्ध | मारनेवाले भीष्म को पाण्डवों ने किस तरह रोका ! में दोनों पक्षों के राजाओं की सेना न बचेगी। ऋषियों किम तरह उन पर आक्रमण किया ! उस समय सब ने क्षत्रिय-धर्म बड़ा कठोर बताया है। क्योंकि उसी | सेना फिम तरह संयुक्त हुई थी ! नामी धीरों ने परस्पर क्षत्रिय-धर्म के अनुमार पाण्डर लोग भीष्म को मार फिस तरह युद्ध किया ॥६६६८॥ युरुपितामह भीष्म कर राज्य प्राप्त करने की इच्छा करते हैं; अया यों को शत्रुओं ने रिम तरह मारा ? भीष्म के मरने पर कहो कि हम लोग ही महारती भीष्म की हत्या | दुर्योधन, कर्ण, दुःशासन और मायाची शकुनि ने पगार राज्य करने की इच्छा करने ॥६४१६५|| क्या कहा ! जिम भयकर युद्ध-सभा में मनुष्यों, पाण्डयों ने नो क्षत्रिय-धर्म का पालन मात्र किया है, हाथियों और घोड़ों के शरीर चौसर की विमात की उना मुल आराध नहीं । काट-ममय अर्थात् / तरह मिठे थे, बाण शक्ति महामह तोमर आदि शग आरकार में आर्य को याही करना चाहिए । परामम पासे के ममान थे और प्राणों की बाजी लगी थी, ही परम गनिभामजी महारगममी थे। उन उसमें पुरुषश्रेष्ठ भाप के सिरा और किन युक्शिा- मागरमी, मागा, आगजित और गगेना को रद क्षत्रियों ने मांडा की थी! उनमें फोन जाते,
अध्याय १५ ]
म हा भारत
[ ४०५३
पितरं भीमकर्माण भीष्ममाहवशोभिनम्
आति मे हृदये रूढां महतीं पुत्रहानिजाम् ॥७॥
त्वं हि मे सर्पिपेवाऽग्निमुद्दीपयसि सञ्जय
महान्तं भारमुद्यम्य विश्रुतं सावलौकिकम् ॥ ७५॥
दृष्ट्वा विनिहतं भीष्मं मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।
श्रोष्यामि तानि दुःखानि दुर्योधनकृतान्यहम् ॥ ७६ ॥
तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यवृत्तं तत्र सञ्जय
यद्वृत्तं तत्र संग्रामे मन्दस्याऽबुद्धिसम्भवम् ॥७७॥
अपनीतं सुनीतं यत्तन्ममाऽऽचक्ष्व सञ्जय
यत्कृतं तत्र संग्रामे भीष्मेण जयमिच्छता ॥७८॥
तेजोयुक्तं कृतास्त्रेण शंस तच्चाऽप्यशेपतः
तथा तद्भवाद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥७९॥
क्रमेण येन यस्मिंश्च काले यच्च यथाऽभवत् ॥८॥
इति श्रीमन्महाभारते मी मपर्वाण + गवद् तापवंणि धृतराप्रश्नं चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
कौन हारे और कौन मरकर गिरे ? ये सब बाते मेरे । देखकर जिस तरह मेरे पुत्रों ने पश्चाताप किया, सो
आगे कहो ॥६९।७३।। युद्धभूमि के आभूषण-स्वरूप | मुझे सुनाओ | उस घोर सग्राम में जो घटनाएँ हुई
भीमकर्मा भीष्म के मरने की सूचना सुनकर मेरे हृदय हैं, वे मेरे आगे कहो । दुरामा दुर्योधन की बुद्धि के
में अशान्ति की अग्नि सुलग उठी है । मेरे हृदय में कारण जो नातिसङ्गत या अनीतिपूर्ण घटनाएँ हुई
जो पुत्रों की हानि की अग्नि उठी है उसे मानों घी | हैं, जय-लाभ की इच्छा रग्वनेगाले अखधारी भीम
डालकर तुम प्रज्वलित कर रहे हो । सर लोकों में | ने जो-जो तेजस्विता के कार्य किये हैं और कौरस-
प्रसिद् जिन महापुरप भीम ने सेनापति-पद का पाण्डयों की सेना में जिसने जिससे जैसा युद्ध किया
भारी बोझ अपने सिर पर रिफा था उन्हें मरा हुआ है, सो सर मेरे आग विस्तार के साथ कहाँ १७४१८०॥
भीमपर्व का चौदहवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ १४ ॥
--
अथ पचदशोऽध्यायः ॥ १५॥
सञ्जय उगच त्वयुक्तोऽयमनुप्रश्नो महाराज यथाऽर्हसि
न तु दुयोधने दोपमिममासंक्तुमर्हसि
य आत्मनो दुश्चरितादशुभं प्राप्नुयान्नरः
एनसा तेन नाऽन्यं स उपाशक्तुिमर्हति
सजय ने कहा- महाराज ! आपने अपने । कार दुर्योधन के सिर पर देश को गटगे लादना
योग्य ही प्रश्न रिय; किन्तु इम कुफ्त के लिए। टीक नहीं । जो मनुष्य अपने दोरों के कारण अशुभ
॥ २ ॥
परवा अपाय ॥ १५ ॥
[ भीष्मपर्व ४०५४ ] म हा भा र त । महाराज मनुष्येषु निन्यं यः सर्वमाचरेत् स वध्यः सर्वलोकस्य निन्दितानि समाचरन् ॥ ३ ॥ निकारो निकृतिप्रज्ञैः पाण्डवैस्त्वत्प्रतीक्षया अनुभूतः सहाऽमात्यैः क्षान्तश्च सुचिरं बने ॥ ४ ॥ हयानां च गजानां च राज्ञां चाऽमिततेजसाम्। प्रत्यक्षं यन्मया दृष्टं दृष्टं योगवलेन च ॥ ५ ॥ शृणु तत्पृथिवीपाल मा च शोके मनः कृथाः । दिष्टमेतत्पुरा नूनमिदमेव नराधिप नमस्कृत्वा पितुस्तेऽहं पाराशर्याय धीमते यस्य प्रसादादिव्यं तत्प्राप्त ज्ञानमनुत्तमम् ॥ ७ ॥ दृष्टिश्चाऽतीन्द्रिया राजन्दूराच्छ्वणमेव च परचित्तस्य विज्ञानमतीतानागतस्य च व्युत्थितोत्पत्तिविज्ञानमाकाशे च गतिः शुभा । अस्त्रैरसङ्गो युद्धेषु वरदानान्महात्मनः शृणु मे विस्तरेणेदं विचित्रं परमाद्भुतम् भरतानामभूद्युद्धं यथा तल्लोमहर्पणम् तेप्वनीकेषु यत्तेपु व्यूढेषु च विधानतः दुर्योधनो महाराज दुःशासनमथाऽब्रवीत् ॥ ११ ॥ दुःशासन रथास्तूर्ण युज्यन्तां भीष्मरक्षिणः फल भोगता है उसका, और के ऊपर उस पाप की, | हूँ॥५६॥ मैंने जिनके प्रभार से दिव्य ज्ञान, आशङ्का करना अनुचित है । हे राजेन्द्र !जो व्यक्ति | अतीन्द्रिय दृष्टि, परचित्त-विज्ञान, आकाशगति, दूर- मनुष्य-समाज में निन्दनीय व्यवहार करता है, यह श्रयण, शाखयहिभूत व्यक्तियों की उत्पत्ति का ज्ञान सबका यन्य है। आपको और आपके मन्त्रियों की और त्रिकाल का ज्ञान प्राप्त किया है उन्हीं महात्मा धूर्तता को पुरिमान् पाण्डा अच्छी तरह जानते है | व्यासदेव के वरदान से अस्त्र-शस्त्र मेरे शरीर को किन्नु येवट आपया ही मुगदंगकर ये बहुत ममय | सर्श नहीं कर सकते । अब उन्हीं आपके पिता नक यन में रहे और मय पुट सहते गं ॥१४॥ बुद्धिमान् व्यामदेवजी को प्रणाम करके कारतों और गजेन्द्र ! मने प्रयक्ष और योगर मे हामी, बोदे, पाण्डों के अद्गुन रोमहर्पण युद्ध का वृत्तान्त वर्णन गना आदि या जो हार देगा है मो मुनिए । पृया करता है सुनिए। ॥७॥१०॥ हे महाराज ! दोनों गोर न पानिए। नगविर! इस गमय जो हो और की मेनार जर मोर्चेबन्दी करके अपने-अपने गादमा पर गही योग में दंग पुरा मान में युद्ध के लिए उघन हुई तब दुर्योग्न ने
अाय १५ ]
म हा भा र त
[ ४०५५
अनीकानि च सर्वाणि शीघ्र स्वमनुचोदय ॥ १२ ॥
अयं स मामभिप्राप्तो वर्षपूगाभिचिन्तितः
पाण्डवानां ससैन्यानां कुरूणां च समागमः ॥ १३ ॥
नाऽतः कार्यतमं मन्ये रणे भीष्मस्य रक्षणात् ।
हन्यादगुप्तो ह्यसौ पार्थान्सोमकांश्च समृञ्जयान् ॥ १४ ॥
अब्रवीच विशुद्धात्मा नाऽहं हन्यां शिखण्डिनम्।
श्रूयते स्त्री ह्यसौ पूर्व तस्माद्वयो रणे मम ॥१५॥
तस्मादीष्मो रक्षितव्यो विशेषेणेति मे मतिः ।
शिखण्डिनो वधे यत्ताः सर्वे तिष्ठन्तु मामकाः ॥ १६ ॥
तथा प्राच्याः प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्योत्तरापथाः।
सर्वथाऽस्त्रेषु कुशलास्ते रक्षन्तु पितामहम् ॥१७॥
अरक्ष्यमाणं हि वृको हन्यासिहं महाबलम् ।
मा सिंह जम्बुकेनेव घातयामः शिखण्डिना ॥१८॥
वामं चक्रं युधामन्युरुत्तमौजाश्च दक्षिणम्
गोतारोफाल्गुनं प्राप्तौफाल्गुनोऽपि शिखण्डिनाः॥ १९ ॥
संरक्ष्यमाणः पार्थेन भीष्मेण च विवर्जितः
यथा न हन्याद्गाङ्गेयं दुःशासन तथा कुरु ॥ २० ॥
इति श्रीमन्महाभारते भीष्मपर्वणि भगवद्गीतापणि दुर्योधनदुःशासनसवारे पचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
कहा-हे दुःशासन ! तुम भीष्म पितामह की रक्षा वीर मिलकर उनकी रक्षा और शिखण्डी को मारने
के लिए शीघ्र रथों को तैयार कराओ; सेना को का प्रयत्न करें । पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर
सुसज्जित और सावधान होने की आज्ञा दो । बहुत । दिशा से आये हुए सब वीर, सब अस्त्र-कुशल योद्धा,
दिनों से मैंने सेना सहित कौरवों और पाण्डवों की | पितामह की रक्षा करे । महाबली सिंह भी अरक्षित
जिस भिड़न्त को सोच रक्खा था वह आज उपस्थित मे तुच्छ भेड़िये के हाथ मारा जा सकता है।
है। इस युद्ध में महारथी भीष्म की रक्षा करना ही इस समय हमें यह यत्न करना चाहिए कि सिंहरूप
हमारा प्रधान कार्य है । सुरक्षित रहने पर वे पाण्डव, भीष्म को शृगालरूप शिखण्डी मार न सके । देखो,
सोमक और सृञ्जय आदि का विनाश अवश्य कर युद्धस्थल में अर्जुन शिखण्डी की रक्षा कर रहे हैं।
सकेंगे ॥११॥ विशुद्ध-स्वभाव भीष्म ने यह युधामन्यु अर्जुन के बाये पहिये की और उत्तमौजा
प्रतिज्ञा की है कि "मैं युद्ध में शिखण्डी पर वार नहीं उनके दहिने पहिये की रक्षा कर रहे हैं । इस समय
करूँगा । मैंने सुना है कि शिखण्डी पहले स्त्री था; ऐसा उपाय को जिसमे पितामह के द्वारा उपेक्षित,
इसी लिए युद्ध में शिखण्डी को मैं नहीं मारूँगा"।
और अर्जुन के द्वारा सुरक्षित, शिखण्डी भीष्म को
पितामह की इस प्रतिज्ञा के कारण मेरे पक्ष के सब मार न सके ॥१५॥२०॥
दशा
भीमपर्वका पद्रवा अध्याय समाप्त हुआ |॥ १५॥
४०५६ ] म हा भारत [भीष्मपर्ण सञ्जय उवाच- अथ पोडमोऽध्याय ॥ १६ ॥ -ततो रजन्यां व्युष्टायां शब्दः समभवन्महान् । क्रोशतां भूमिपालानां युज्यतां युज्यतामिति ॥ १ ॥ शङ्खदुन्दुभिघोपैश्च सिंहनादेश्च भारत हयहेषितनादैश्च रथनेमिखनैस्तथा ॥ २ ॥ गजानां वृहतां चैव योधानां चापि गर्जताम् । श्वेलितास्फोटितोत्क्रुष्टैस्तुमुलं सर्वतोऽभवत् ॥ ३ ॥ उदतिष्ठन्महाराज सर्व युक्तमशेषतः सूर्योदये महत्सैन्यं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥ ४ ॥ राजेन्द्र तव पुत्राणां पाण्डवानां तथैव च दुष्प्रधृष्याणि चाऽस्त्राणि सशस्त्रकवचानि च ततः प्रकाशे सैन्यानि समदृश्यन्त भारत स्वदीयानां परेपां च शस्त्रवन्ति महान्ति च तत्र नागा रथाश्चैव जाम्बूनदपरिष्कृताः विभ्राजमाना दृश्यन्ते मेघा इव सविद्युतः स्थानीकान्यदृश्यन्त नगराणीव भूरिशः अतीव शुशुभे तत्र पिता ते पूर्णचन्द्रवत् धनुर्भिक्रष्टिभिः खङ्गैर्गदाभिः शक्तितोमरैः योधाः प्रहरणैः शुभैस्तेप्वनीकेप्यवस्थिताः गजाः पदाता रथिनस्तुरगाश्च विशांपते व्यतिष्ठन्वागुराकाराः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १०॥ सालहवा अध्याय ॥ १६॥ सजय कहते हैं---हे राजेन्द्र ! रात्रि व्यतीत / दोनों पक्ष की सेना दुईप अस्त्र-शस्त्र और काच होने पर राजाओं के "तैयार हो जाओ, तैयार हो | आदि से सनद्ध होर युद्ध के मैदान में डट गई। जाओ" इस शब्द से, शहा और दुन्दुभियों को युद्ध-भूमि में सुवर्ण-शोभित हाथी दामिनीयुक्त मेघों पनि से, मनियों के मिहनाद से और रयों के पहियों के समान, 'सनिकों से घिरे हुए रय विविध नगरों के की घरघराहट से दसों दिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं। समान और पितामह भीष्म पूर्णचन्द्र के समान घोदों के हिनहिनाने से, हाथियों के चिग्धादने से, शोभायमान हुए । धनुष, ऋष्टि, मह, गदा, तोपर योनाओं के गम्भीर गर्नन और गम टोरने के शब्द और अयान्य चमसाले दाख धारण किये योडा, से दमों दिशाएँ मर गई ||१३|| सुर्योदय ये उपरान्त राग्यों हाथी, रथी, घोड़े और पंदर मिपाही मण्डल अप म हा भारत [ ४०५७ ध्वजा बहुविधाकारा व्यदृश्यन्त समुच्छ्रिताः । खेषां चैव परेषां च द्युतिमन्तः सहस्रशः काञ्चना माणिचित्राङ्गा ज्वलन्त इव पावकाः अर्चिष्मन्तो व्यरोचन्त गजारोहाः सहस्रशः ॥ १२ ॥ महेन्द्रकेतवः शुभ्रा महेन्द्रसदनेष्विव सन्नद्धास्ते प्रवीराश्च ददृशुर्युद्धकांक्षिणः उद्यतैरायुधैश्चित्रास्तलबद्धाः कलापिनः ऋपभाक्षा मनुष्येन्द्राश्चमूमुखगता बभुः शकुनिः सौबलः शल्य आवन्त्योऽथ जयद्रथः । विन्दानुविन्दौ कैकेयाः काम्बोजश्च सुदक्षिणः ॥ १५ ॥ श्रुतायुधश्च कालिङ्गो जयत्सेनश्च पार्थिवः बृहदलश्च कौशल्यः कृतवर्मा च सात्वतः ॥१६॥ दशैते पुरुषव्याघ्राः शूराः परिघवाहवः अक्षौहिणीनां पतयो यज्वानो भूरिदक्षिणाः ॥१७॥ एते चाऽन्ये च बहवो दुर्योधनवशानुगाः राजानो राजपुत्राश्च नीतिमन्तो महारथाः ॥१८॥ सन्नद्धाः समदृश्यन्त स्वेप्वनीकेष्ववस्थिताः वद्धकृष्णाजिनाः सर्वे वलिनो युद्धशालिनः ॥ १९ ॥ हृष्टा दुर्योधनस्याऽर्थे ब्रह्मलोकाय दीक्षिताः समर्था दश वाहिन्यः परिगृह्य व्यवस्थिताः ॥ २०॥ वाधकर खड़े हुए ॥४।१०॥ विविध आकार की | अनुपिन्द,कैकय-गण, काम्बोजराज सुदक्षिण, कलिङ्ग- ध्वजाएँ फहरा रही थी। दोनों ओर की माणि-सुवर्ण- | राज श्रुतायुध, राजा जयत्सेन, बृहद्बल और कृतवर्मा मण्डित हज़ारों घजाएँ जलती हुई अग्नि के समान यादव, ये बडी-बड़ी दक्षिणा देकर यज्ञ करनेवाले, और अमरावती में स्थित इन्द्र की पताका के समान परिघतुल्य भुजदण्डयाले पुरुषश्रेष्ठ दम राजा आपकी शोभित हुई । युद्ध की इच्छा रखनेराले वीर, अख ओर दस अक्षौहिणी सेना के नायक बनाये गये शस्त्र लिये, उत्सुकता के साथ उन पताकाओं की ॥१४॥१७॥ इनके अतिरिक्त दुर्योधन के यशी शोभा देख रहे थे ॥११॥१३॥ प्रधान योद्धा लोग | नीति-विशारद अनेक राजा तथा राजपुत्र अपनी कवच, शस्त्र, तल, तूणीर आदि से सन्जित होकर अपनी सेना लिये यहा उपस्थित देख पड़े। वैसा सेना के अगले भाग में खड़े हुए थे । सुवल के बेटे | मनोहर माला पहने, कृष्णाजिन-शोभित, अग्रलोक शकुनि, शल्य, जयद्रय, अगन्ति के राजा पिन्द और ! जाने की दीक्षा लिये हुए प्रसन्नचित होकर दस - ,
[ भीष्मपर्व
म हा भारत
४०५८ ]
+
।
।
एकादशी धार्तराष्ट्री कौरवाणां महाचमूः
अग्रतः सर्वसैन्यानां यत्र शान्तनयोऽग्रणीः
॥ २१ ॥
श्वेतोष्णीपं श्वेतहयं श्वेतवर्माणमच्युतम्
अपश्याम महाराज भीमं चन्द्रमिवोदितम् ॥२२॥
हेमतालध्वज भीम राजते स्यन्दने स्थितम् ।
श्वेताभ्र इव तीक्ष्णांशुं ददृशुः कुरुपाण्डवाः ॥ २३ ॥
सृञ्जयाश्च महेष्वासा धृष्टद्युम्नपुरोगमाः
जृम्भमाणं महासिंहं दृष्ट्वा क्षुद्रमृगा यथा ॥२४॥
धृष्टद्युम्नमुखाः सर्वे समुद्विविजिरे मुहुः
एकादशैताः श्रीजुष्टा वाहिन्यस्तव पार्थिव ॥ २५॥
पाण्डवानां तथा सप्त महापुरुपपालिताः
उन्मत्तमकरावौं महाग्राहसमाकुलौ ॥२६॥
युगान्ते समवेतौ द्वौ दृश्यते सागराविव
नैव नस्तादृशो राजन्दृष्टपूर्वो न च श्रुतः
अनीकानां समेतानां कौरवाणां तथाविधः ॥२७॥
इति श्रीमन्महाभारते भीष्मपर्वणि भगवद्गातापीण मैन्यवर्णने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
अक्षौहिणी सेना के साथ युद्धभूमि में खड़े थे | व्याकुल हो जाते हैं वैसे ही धृष्टद्युम्न आदि सृञ्जय-
॥१८॥२०॥ इनके अतिरिक्त पितामह भीष्म की गण भीष्म को देखकर चिन्तित हो गये। हे महाराज !
अधिनायकता में दुर्योधन की एक अक्षौहिणी सेना जैसे आपके पक्ष की समृद्धि-सम्पन्न ग्यारह अक्षौहिणी
खड़ी हुई । हे राजेन्द्र ! महारथी भीष्म श्वेत पगड़ी | सेना प्रधान-प्रधान पुरुषों के द्वारा रक्षित थी, वैसे
और श्वेत कवच धारण किये श्वेत घोड़ों से शोभित | ही पाण्डव-पक्ष की सात अक्षौहिणी सेना भी प्रधान
रथ पर पूर्ण चन्द्रमा के समान विराजमान हुए। पुरुषों के बाहुबल से सुरक्षित थी। हे राजेन्द्र !दोनों
तालचिह्न-युक्त धजा से शोभित रजतमय रथ पर चढ़े पक्ष की सेना उन्मत्त मकरवृन्दयुक्त, महाग्राहपरिवृत,
हुए, श्वेत मेघ के बीच स्थित चन्द्रमा के समान, युगान्तकाल के क्षोभ को पहुँचे हुए दो महासागरों
पितामह भीष्म को दोनों पक्ष के योद्धा देखने लगे | के समान देख पड़ रही थी। हे राजेन्द्र ! मैंने
॥२१॥२३॥ भीम को सेनापति के रूप से सेना के कौरवों की इतनी बड़ी सेना एकत्र होते कभी न तो
अप्रभाग में देखकर धृष्टद्युम्न आदि सृञ्जय और पाण्डव | देखी है और न सुनी है ॥२४॥२७॥
व्याकुल हो गये । सिंह को देखकर जैसे क्षुद्र मृग
भीमपर्व का हलवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ १६ ॥
म हा भारत [ ४०५९ अब शप्तदशो अध्याय ॥ १७ ॥ - सञ्जय उवाच:-यथा स भगवान्व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । तथैव सहिताः सर्वे समाजग्मुर्महीक्षितः मघाविषयगः सोमस्तद्दिनं प्रत्यपद्यत दीप्यमानाश्च सम्पेतुर्दिवि सप्त महाग्रहाः द्विधाभूत इवाऽऽदित्य उदये प्रत्यदृश्यत ज्वलन्त्या शिखया भूयो भानुमानुदितो रविः ॥ ३ ॥ ववाशिरे च दीप्तायां दिशि गोमायुवायसाः लिप्समानाः शरीराणि मांसशोणितभोजनाः ॥ ४ ॥ अहन्यहनि पार्थानां वृद्धः कुरुपितामहः भरद्वाजात्मजश्चैव प्रातरुत्थाय संयतो जयोऽस्तु पाण्डुपुत्राणामित्यूचतुररिन्दमौ युयुधाते तवाऽर्थाय यथा स समयः कृतः सर्वधर्मविशेषज्ञः पिता देवव्रतस्तव समानीय महीपालानिदं वचनमब्रवीत् इदं वः क्षत्रिया द्वारं स्वर्गायाऽपावृतं महत् गच्छध्वं तेन शक्रस्य ब्रह्मणः सहलोकताम् ॥ ८ ॥ एप वः शाश्वतः पन्थाः पूर्वैः पूर्वतरैः कृतः सम्भावयध्वमात्मानमव्यग्रमनसो युधि नाभागोऽथ ययातिश्च मान्धाता नहुपो नृगः । संसिद्धाः परमं स्थानं गताः कर्मभिरीशैः सनहवा अध्याय ॥ १७॥ ! संजय ने कहा-हे महाराज ! व्यासजी ने | मुर्दो और घायलों का मांस खाने के लिए उत्सुकता जो कहा था उसी के अनुसार सव राजा लोग एकत्र | दिखाते हुए, दिग्दाह-युक्त दिशा की ओर मुख करके होकर युद्ध के लिए आये । उस दिन चन्द्रमा पितृ- घोर अशुभ शब्द करने लगे। पितामह भीष्म और लोक के निकटवर्ती हुए । सातों महाग्रह अग्नि के आचार्य द्रोण नित्य प्रातः उठकर शुद्ध-चित्त से जय समान प्रज्वलित होकर आकाश में देख पड़े। उदय तो पाण्डवों की मनाते थे, किन्तु अपनी प्रतिज्ञा के होने पर सूर्यमण्डल प्रज्वलित ज्वालाओं से युक्त और अनुसार आपकी ओर से पाण्डयों के साथ युद्ध करते बीच से दो टुकड़े हुआ सा देख पड़ा ॥१॥३॥ मांस ॥४६॥ पितामह ने पहले सब राजाओं को बुला- और रक्त खाने-पीनेवाले सियारों और कौओं के झुण्ड कर कहा-हे नरपतियो ! क्षत्रिय के लिए स्वर्ग जाने
[ भीष्मपर्व
१०६०
म हा भारत
।
अधर्मः क्षत्रियस्यैप यद्वयाधिमरणं गृहे
यदयोनिधनं याति सोऽस्य धर्मः सनातनः
एवमुक्ता महीपाला भीष्मेण भरतर्षभ
निर्ययुः स्वान्यनीकानि शोभयन्तो रथोत्तमैः ॥ १२ ॥
स तु वैकर्त्तनः कर्णः सामात्यः सह बन्धुभिः ।
न्यासितः समरे शस्त्रं भीष्मेण भरतर्षभ ॥ १३ ॥
अपेतकर्णाः पुत्रास्ते राजानश्चैव तावकाः
निर्ययुः सिंहनादेन नादयन्तो दिशो दश ॥ १४ ॥
श्वेतश्छत्रैः पताकाभिर्ध्वजवारणवाजिभिः
तान्यनीकानि शोभन्ते गजै स्थपदातिभिः ॥ १५ ॥
भेरीपणवशब्दैश्च दुन्दुभीनां च निःस्वनै
रथनेमिनिनादैश्च बभूवाऽऽकुलिता मही ॥ १६ ॥
काञ्चनाङ्गदकेयूरैः कार्मुकैश्च महारथाः
भ्राजमाना व्यराजन्त साग्नयः पर्वता
इव ॥१७॥
तालेन महता भीष्मः पञ्चतारेण केतुना
विमलादित्यसङ्काशस्तस्थौ कुरुचमूपरि ॥१८॥
ये त्वदीया महेप्यासा राजानो भरतर्षभ
अवर्तन्त यथादेशं राजशान्तनवस्य ते ॥ १९ ॥
की खुली राह संग्राम ही है। उसी द्वार से तुम भीष्म से उनकी कहा-सुनी हो चुकी थी, और भीष्म
लोग इन्द्रलोक और ब्रह्मलोक को जाओ । नाभाग, | के जीते-जी युद्ध न करने की प्रतिज्ञा वे कर चुके
ययाति, मान्धाता, नहुष नृग आदि प्राचीन राजा थे । कर्ण के सिरा अन्य सब राजा और आपके सन
लोग इसी तरह के कार्य से सिद्धि प्राप्त करके उक्त पुन सिंहनाद से दसों दिशाओं को कॅपाते हुए युद्ध
परम पवित्र स्थानों को गये हैं ॥७॥१०॥ रोगी होकर | के लिए गुडे हुए ॥११॥१४॥ श्वेत छत्र, पताका,
घर में पड़े-पड़े मरना क्षत्रिय के लिए अर्थम है।
ध्वजा, हाथी, घोड़े, रथ, पैदल आदि के द्वारा सेना
युद्ध में प्राणत्याग करना ही क्षत्रिय का सनातन धर्म | की बड़ी शोभा हुई । मेरी, पणन, दुन्दुभि और रयों
है। हे महाराज ! मीष्म के यों कहने पर राजा के पहियों का शब्द गूंज उठा । सुवर्ण के वजुन्ले
रोग उत्तम-उत्तम रयों पर मार हो-होकर अपनी- पहने हुए महारथी लोग अग्नियुक्त पर्वत के समान
अपनी सेना के अगडे भाग में आ गये । उम मयय | शोभायमान हुए । कारसेना के अधिपति पितामह
उनी बद्दी शोभा दुई । केवल कर्ण अपने सहचरों माम पञ्चतारामण्टित महानाटकंतु-युक्त आदित्यवर्ण
और मित्रों के साथ युद्ध-भूमि की ओर नहीं गये । रय पर मूर्य के समान गोमा को प्राप्त हुए ॥१५॥
अध्याय १७ ] म हा भारत [ ४०६१ - स तु गोवासनः शैव्यः सहितः सर्वराजभिः । ययौ मातङ्गराजेन राजाहेण पताकिना पद्मवर्णस्वनीकानां सर्वेषामग्रतः स्थितः ॥ २०॥ अश्वत्थामा ययौ यत्तः सिंहलांगूलकेतुना श्रुतायुधश्चित्रसेनः पुरुमित्रो विविंशतिः ॥ २१ ॥ शल्यो भूरिश्रवाश्चैव विकर्णश्च महारथः एते सप्त महेष्वासा द्रोणपुत्रपुरोगमाः ॥ २२॥ स्यन्दनैर्वरवर्माणो भीष्मस्याऽऽसन्पुरोगमाः तेपामपि महोत्सेधाः शोभयन्तो रथोत्तमान् ॥ २३ ॥ भ्राजमाना व्यरोचन्त जाम्बूनदमया ध्वजाः जाम्बूनदमयी वेदी कमण्डलुविभूपिता ॥ २४॥ केतुराचार्यमुख्यस्य द्रोणस्य धनुषा सह अनेकशतसाहस्रमनीकमनुकर्पतः ॥ २५॥ महान्दुर्योधनस्याऽऽसीनागो माणिमयो ध्वजः । तस्य पौरवकालिङ्गकाम्बोजाः ससुदक्षिणाः ॥ २६॥ क्षेमधन्वा च शल्यश्च तस्थुः प्रमुखतो रथाः । स्यन्दनेन महाहण केतुना वृषभेण च प्रकर्षन्नेव सेनाग्रं मागधस्य कृपो ययौ ॥२७॥ तदङ्गपतिना गुप्तं कृपेण च मनस्विना शारदाम्बुधरप्रख्यं प्राच्यानां सुमहद्बलम् ॥ २८॥ १८।। हे राजेन्द्र ! आपके पक्ष के राजा लोग भीम | चले । उनकी सुवर्णदण्ड-मण्डित ऊँची पजाएँ रयों के चारों ओर अपनी-अपनी जगह पर तैनात हो पर फहरा रही थीं ॥१९॥२४॥ आचार्य-प्रधान द्रोण गये । गोगासन देश के महाराज शव्य, राजोचित | की धजा सुवर्णमय वेदी, कमण्डलु और धनुष के पताका से शोभित गजराज पर सवार होकर, अपने | चिह्न से युक्त देख पड़ती थी। विपुल सेना का सञ्चालन अधीन राजाओं के साथ युद्ध के लिए चले । पमपर्ण ! करनेवाले दुर्योधन की घजा में मणिमय नाग या चित अश्वत्थामा रथ पर सवार होकर सबके आगे चलने था। दुर्योधन के आगे पौरस, कलिगराज, काम्बोज- लो । उनकी पताका में सिंह की पूंछ का चिह्न था। राज सुदक्षिण, महाली क्षेमधन्वा और शल्य चले । श्रुतायुध, चित्रसेन, पुर मित्र, विविंशति, शल्य, भूरि- मगर-नरेश वृषधज महामूल्य रथ पर मार होकर श्रग और किर्ण, ये सात महाधनुर योद्धा श्रेष्ठ, शरद् ऋतु के मेघ के समान पूर्व दिशा की सेना के काच पहनकर अश्वत्थामा और भीष्म के आगे-आगे आगे-आगे शत्रु सेना के सामने आये ॥२पारा ।
४०६२ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व अनीकप्रमुखे तिष्ठम्बराहेण महायशाः शुशुभे केतुमुख्येन राजतेन जयद्रथः ॥ २९॥ शतं रथसहस्राणां तस्याऽऽसन्वशवर्तिनः अष्टौ नागसहस्राणि सादिनामयुतानि पट् ॥३०॥ तसिन्धुपतिना राज्ञा पालितं ध्वजिनीमुखम् । अनन्तरथनागाश्वमशोभत महद्बलम् ॥ ३१ ॥ पष्टया रथसहौस्तु नागानामयुतेन च पतिः सर्वकलिङ्गानां ययौ केतुमता सह ॥३२॥ तस्य पर्वतसङ्काशा व्यरोचन्त महागजाः यन्त्रतोमरतूणीरैः पताकाभिः सुशोभिताः ॥ ३३ ॥ शुशुभे केतुमुख्येन पावकेन कलिङ्गकः श्वेतच्छत्रेण निप्केण चामरव्यजनेन च ॥ ३४॥ केतुमानपि मातङ्गं विचित्रपरमांकुशम् आस्थितः समरे राजन्मेघस्थ इव भानुमान् ॥३५॥ तेजसा दीप्यमानस्तु वारणोत्तममास्थितः भगदत्तो ययौ राजा यथा वज्रधरस्तथा ॥३६॥ गजस्कन्धगतावास्तां भगदत्तेन सम्मितौ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ केतुमन्तमनुव्रतौ ॥ ३७॥ स स्थानीकवान्व्यूहो हस्त्यङ्गो नृपशीर्पवान् । वाजिपक्षः पतत्युग्रः प्रहसन्सर्वतोमुखः ॥ ३८ ॥ अनदेश के राजा वृपकेतु और महामा कृपाचार्य | चमर. व्यजन आदि से शोभित होकर युद्ध के लिए सर मेनाओं की रक्षा करने लगे। यशस्वी जयद्रय चले ॥३२॥३५|| इन्द्र के समान तेजस्वी राजा भगदत्त रय पर बंटकर चले । उनकी पजा में चांदी के अपने हाथी पर चढ़कर चले । राजा केतुमान् भी वराह का चिट था । एक लाग्य रय, आठ हजार विचित्र अनुश से शोभित हायी पर चढ़कर मेर के हाथी और माट हजार घुड़मगार उनके साथ थे । ऊपर रािजमान आदित्य के समान शोभायमान हुए। यमेना के आगे रहकर अमायरस, हामी और घोड़ों भगदत्त के ही समान तेजस्वी वार चिन्द और अनुपिन्द मे शाभिा मेना की रक्षा करने रंगे ॥२८॥३१॥ नाम के दोनों भाई भी गमराजों पर चढ़कर चले। परिवार के माय माठ हजार रप और यन्त्र-नोमर-द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म,गुरु-पुत्र अघत्थामा, पासीक गगार-पनाया आदि में शोभित पानामार दम हज़ार और यूपाचार्य ने उस व्याह की रचना की थी। दायी भी अमिर्गपना, धन छन, पाण्यामरण, उग गृह में अमन्य रय और हामी उमक आ जान - अध्याय १८ ] म हा भारत [ ४०६३ द्रोणेन विहितो राजन्राज्ञा शान्तनवेन च तथैवाऽऽचार्यपुत्रेण वाहीकेन कृपेण च ॥ ३९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मीष्मपर्वणि भगवद्गीतापर्वणि सैन्यवर्णने सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ पड़ते थे । राज-समाज उस व्यूह का सिर था । घोड़े हुआ सा आगे बढ़ने लगा ॥३६॥३९|| उसके पट थे । वह सर्वतोमुख सेना का व्यूह हँसता भीष्मपर्व का सत्रा अध्याय समाप्त हुआ ॥ १७ ॥ ०- अथ अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८॥ सन्जय उपाच-ततो मुहूर्तात्तुमुलः शब्दो हृदयकम्पनः अश्रूयत महाराज योधानां प्रयुयुत्सताम् शङ्खदुन्दुभिघोपैश्च वारणानां च बंहितैः नेमियोपै रथानां च दीर्यतीव वसुन्धरा हयानां हेपमाणानां योधानां चैव गर्जताम् क्षणेनैव नभो भूमिः शब्देनाऽऽपूरितं तदा पुत्राणां तव दुर्धर्ष पाण्डवानां तथैव च समकम्पन्त सैन्यानि परस्परसमागमे तत्र नागा रथाश्चैव जाम्बूनदविभूषिताः भ्राजमाना व्यदृश्यन्त मेघा इव सविद्युतः ध्वजा बहुविधाकारास्तावकानां नराधिप काञ्चनाङ्गदिनो रेजुर्खलिता इव पावकाः खेपां चैव परेषां च समदृश्यन्त भारत महेन्द्रकेतवः शुभ्रा महेन्द्रसदनेष्विव काञ्चनैः कवचैरूरा ज्वलनार्कसमप्रभैः सन्नधाः समदृश्यन्त ज्वलनार्कसमप्रभाः अटारहवां अध्याय ॥ १८ ॥ सजय कहते हैं-हे महाराज ! इसके पश्चात् उठा ॥१॥३॥दोनों पक्षों की सेना परस्पर की भिडन्त दम भर में योद्धा लोगों का कोलाहल सुन पड़ने लगा। से काप उठी । उस समय युद्ध-भूमि में सुपर्ण-भूषित क्षण भर में ही शङ्खों और दुन्दुभियों की पनि, हाथी और रय बिजली-समेत मेघों के समान देख हावियों की चिग्धाड़, घोड़ों की हिनहिनाहट, पड़ने लगे। दोनों ओर की-प्रज्वलित अग्नि के योद्धाओं के गर्जन और रयों के पहियों की घरघराहट समान अनेक प्रकार की जाएँ इन्द्रभान में स्थित से पृथ्वी मानों फटने लगी और आकाशमण्डल गूंज । महेन्द्रकेतु के समान शोभायमान हुई ॥
१०६४ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व कुरुयोधवरा राजन्विचित्रायुधकार्मुकाः डद्यतैरायुधैश्चिस्तलबद्धाः पताकिनः ऋपभाक्षा महेष्वासाश्चमूमुखगता वभुः पृष्टगोपास्तु भीष्मस्य पुत्रास्तव नराधिप दुःशासनो दुर्विपहो दुर्मुखो दुःसहस्तथा विविंशतिश्चित्रसेनो विकर्णश्च महारथः सत्यवतः पुरुमित्रो जयो भूरिश्रवाः शलः ॥ ११ ॥ रथा विंशतिसाहस्रास्तथैयामनुयायिनः अभीषाहाः शूरसेनाः शिवयोऽथ वसातयः ॥ १२ ॥ शाल्वा मत्स्यास्तथाऽम्वष्ठास्त्रैगर्ताः केकयास्तथा। सौवीराः कैतवाःप्राच्याःप्रतीच्योदीच्यवासिनः।। १३ ॥ द्वादशैते जनपदाः सर्वे शूरास्तनुत्यजः महता रथवंशेन ते ररक्षुः पितामहम् ॥ १४ ॥ अनीकं दशसाहस्रं कुञ्जराणां तरविनाम् मागधो यत्र नृपतिस्तद्रथानीकमन्वयात् ॥१५॥ रथानां चक्ररक्षाश्च पादरक्षाश्च दन्तिनाम् अभवन्वाहिनीमध्ये शतानामयुतानि पट् ॥ १६ ॥ पादाताश्चाऽग्रतोऽगच्छन्धनुश्चर्मासिपाणयः अनेकशतसाहस्रा नखरमासयोधिनः अक्षौहिण्यो दशेका च तव पुत्रस्य भारत अदृश्यन्त महाराज गङ्गेव यमुनान्तरा इति श्रीमन्महामारते मीमपर्वणि भगवद्गीतापर्वणि मैन्यवर्णने अष्टादशोऽध्याय ॥१८॥ और सूर्य के ममान प्रभायुक्त क्यों से भूपित वीर शर और इनके अधीन बीस हजार रथी भीष्म के अमि और सूर्य के ममान देस पड़ने रंगे । कौरस पिछले भाग की रक्षा करने रंगे ।।८।१२।। अभीपाह, पक्ष के योदाओं ने विचित्र आयुध, धनुष और शूरसेन, शिवि, यसाति, शाल्व, मस्य, अम्बष्ट, निगर्न, प्रत्यक्षा आदि को सँभाला । महाधनुर्दर ऋपमाक्षगण | कैकेय, सौगार, वैता और पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, इन सेना के अगले भाग में स्थित हुए। हे महाराज ! बारह देशों के वीर जीवन की आशा छोड़कर श्यों आपके पुर दुर्जय, दु शासन, दुर्मुग, दु मह, पिपिंशति, ! के द्वारा पितामह की रक्षा करने लगे। मगधराज चित्रमेन, रिवर्ण, मसात, पुरमित्र, जय, भूरिश्रया, । दस हजार रेगशाली कुरसेना साथ रेकर, भीष्म के अन्याय १९ ] म हा भारत [ ४०६५ पास रहकर, उनकी रक्षा करने लगे । इस सारी । शस्त्रं लेकर युद्ध के लिए आगे बढ़े। हे राजेन्द्र ! सेना के साठ लाख मनुष्य रथों के पहियों की और ! आपके पुत्र की ग्यारह अक्षौहिणी सेना यमुना से हाथियो के पांवों की रक्षा करने लंग । लाखों पैदल | मिलने को चली हुई गङ्गा के समान देख पड़ने सिपाही धनुष, ढाल-तलवार, नखर और प्रास आदि | लगी ॥१३॥१८॥ भीष्मपर्व का अठारहवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ १८ ॥ अथ एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ धृतराष्ट्र उनाच-अक्षौहिण्यो दशैका च व्यूढा दृष्ट्वा युधिष्ठिरः । कथमल्पेन सैन्येन प्रत्यव्यूहत पाण्डवः यो वेद मानुपं व्यूहं देवं गान्धर्वमासुरम् कथं भीष्म स कौन्तेयः प्रत्यव्यूहत सञ्जय सञ्जय उवाच-धार्तराष्ट्राण्यनीकानि दृष्ट्वा व्यूढानि पाण्डवः अभ्यभापत धर्मात्मा धर्मराजो धनञ्जयम् ॥ ३ ॥ महर्वचनात्तात वेदयन्ति वृहस्पतेः संहतान्योधयेदल्पान्कामं विस्तारयेद्वहून् सूचीमुखमनीकं स्यादल्पानां बहुभिः सह अस्माकं च तथा सैन्यमल्पीयः सुतरां परैः एतद्वचनमाज्ञाय महर्पयूह पाण्डव एतच्छ्रुत्वा धर्मराज प्रत्यभाषत पाण्डवः एप व्यूहामि ते व्यूहं राजसत्तम दुर्जयम् अचलं नाम वज्राख्यं विहितं वज्रपाणिना ॥ ७ ॥ । - उनीसद अध्याय ॥ १९॥ धृतराष्ट्र ने कहा-हे संजय ! इस ग्यारह / का मत है कि शत्रु सेना की अपेक्षा अपनी सेना थोड़ी अक्षौहिणी सेना को व्यूह रचना करके सड़े देखकर हो तो उस सेना को समेटयार शत्रु से युद्ध करना और मानुष, दैव, गान्धर्व, आसुर आदि व्यूहों की चाहिए । यदि शत्रु-मेना से अपनी सेना अधिक हो रचना के ज्ञाता पितामह भीष्म को युद्ध के लिए | तो सेनापति को अधिकार है कि यह इच्छानुमार तयार देखकर भी बुद्धिमान् युधिष्ठिर ने अपनी सेना अपनी सेना को फैलाकर शव से युद्ध करे । जब थोड़ी होने पर क्या ग्ययाल करके भीष्म से युद्ध की थोड़ी सेना को बहुत सेना से गुद करना पड़े तब तैयारी और व्यूह की रचना की ? ॥१२॥ सजय ने उसे सूचीमुग व्यूह की रचना करनी चाहिए। कहा कि हे महाराज ! राजा दुर्योधन को सेना को हमारी सेना शगुमना की अपेक्षा माया में थोड़ी व्यह-रचनापूफि सुसजित देग्पकर धर्मराज युधिष्ठिर है, इसलिए तुम भी, बृहस्पति की नीति के अनुसार, ने अपने भाई से कहा-हे अर्जुन ! महर्षि वृहसति । सूचीमुग यह की रचना करो ॥३६॥ यह मुन- १०६६ ] [ भाग - यः स वात इवोद्भूतः समरे दुःसहः परेः । स नः पुरो योत्स्यते ये भीमः प्रहरतां वरः तेजांसि रिपुसेन्यानां मृगन्पुरुषसत्तमः अग्रेऽग्रणीर्योत्स्यति नो युद्धोपायविचक्षणः यं दृष्ट्वा कुरवः सर्वे दुर्योधनपुरोगमाः निवर्तिप्यन्ति सन्त्रस्ताः सिंहं क्षुद्रमृगा यथा ॥ १० ॥ तं सर्वे संश्रयिप्यामः प्राकारमकुतोभयाः भीमं प्रहरतां श्रेष्ठं देवराजमिवाऽमराः ॥११॥ नहि सोऽस्ति पुमाँल्लोके यः संक्रुद्धं वृकोदरम् । द्रष्टुमत्युग्रकर्माणं विपहेत नरर्पभम् ॥१२॥ एवमुक्त्वा महावाहुस्तथा चक्रे धनञ्जयः व्यूह्य तानि वलान्याशु प्रययो फाल्गुनस्तथा ॥ १३ ॥ सम्प्रयातान्कुरुन्दृष्ट्वा पाण्डवानां महाचमूः गङ्गेव पूर्णा स्तिमिता स्पन्दमाना व्यदृश्यत ॥ १४ ॥ भीमसेनोऽग्रणीस्तेषां धृष्टद्युम्नश्च वीर्यवान् नकुलः सहदेवश्च धृष्टकेतुश्च पार्थिवः ॥१५॥ विराटश्च ततः पश्चाद्राजाऽथाऽक्षौहिणीवृतः भ्रातृभिः सह पुत्रैश्च सोऽभ्यरक्षत पृष्ठतः ॥ १६॥ चक्ररक्षौ तु भीमस्य माद्रीपुत्रौ महाद्युति द्रौपदेयाः ससौभद्राः पृष्ठमोपास्तरस्विनः कर अर्जुन ने युधिष्ठिर से कहा-हे महाराज ! मैं | होकर अपने पक्ष के रक्षक, योद्धाओं में श्रेष्ठ, भीम- आपके लिए इन्द्र के बताये अचल दुर्जय दुर्भेद्य वज्र सेन का आश्रय लेंगे। इस पृथ्वी पर ऐसा कोई नहीं नाम के व्यूह की रचना करता हूँ । संग्राम में शत्रु- है जो क्रोधित भीमसेन से नेत्र मिला सके ॥१०॥१२॥ पक्ष के लिए आंधी की तरह दुःसह, युद्धलक्षण-निपुण, अब महावीर अर्जुन अपनी सेना का व्यूह बनाने योद्धा पुरुपो में अग्रगण्य, महाबली भीमसेन हमारे लगे । परिपूर्ण और स्थिर गङ्गाप्रवाह की तरह पाण्डों पक्ष के अग्र योद्धा होकर शत्रुपक्ष के तेज को नष्ट की महासेना, कौरव-सेना को अपनी ओर आते करेंगे ॥६९॥ क्षुद्र मृग जैसे सिंह को देखकर भय देखकर, मन्द गति से आगे बढ़ने लगी। महापरा- से भाग खड़े होते हैं वैसे ही दुर्योधन आदि कौरव क्रमी भीमसेन, धृष्टद्युम्न, नकुल, सहदेव और धृष्टकेतु भीमसेन के सामने नहीं ठहर सकेंगे । देवता जैसे ! उस सेना के आगे-आगे चलने लगे ! महाराज विराट इन्द्र का आश्रय लेते हैं वैसे ही हम लोग बेखटके ! और एक अक्षौहिणी सेना के साथ धर्मराज युधिष्ठिर ram ।
अध्याय १९ ] म हा भा र त [४०६७ -- धृष्टद्युम्नश्च पाश्चाल्यस्तेषां गोप्ता महारथः सहितः पृतनाशूरै रथमुख्यैः प्रभद्रकैः ॥१८॥ शिखण्डी तु ततः पश्चादर्जुनेनाऽभिरक्षितः यत्तो भीष्मविनाशाय प्रययौ भरतर्षभ ॥ १९ ॥ पृष्ठतोऽप्यर्जुनस्याऽऽसीयुयुधानो महाबलः चक्ररक्षौ तु पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ ॥२०॥ कैकेयो धृष्टकेतुश्च चेकितानश्च वीर्यवान् भीमसेनो गदां विभ्रद्वजसारमयीं दृढाम् ॥ चरन्वेगेन महता समुद्रमपि शोषयेत् ॥ २१॥ एते तिष्ठन्ति सामात्याः प्रेक्षन्तस्ते जनाधिप । धृतराष्ट्रस्य दायादा इति वीभत्सुरब्रवीत् ॥ २२॥ भीमसेनं तदा राजन्दर्शयस्व महावलम् ब्रुवाणं तु तथा पार्थं सर्वसैन्यानि भारत ॥ २३॥ अपूजयस्तदा वाग्भिरनुकूलाभिराहवे राजा तु मध्यमानीके कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ २४॥ वृहद्भिःकुञ्जरैमत्तैश्चलद्भिरचलैरिव अक्षौहिण्याऽथ पाञ्चाल्यो यज्ञसेनो महामनाः । विराटमन्वयात्पश्चात्पाण्डवार्थं पराक्रमी ॥ २५॥ तेषामादित्यचन्द्राभाः कनकोत्तमभूपणाः नानाचित्रधरा राजनथेष्वासन्महाध्वजाः ॥२६॥ चले । उनके साथ पुत्र और भाई भी चले ॥१३॥ पाचारनन्दन युधामन्यु, उत्तमौजा, कैरेय, धृष्टकेतु १६॥ महातेजस्वी नकुल और सहदेव भीमसेन की | और महावीर चेक्निान अपने अनुचरों सहित उनके दहनी-चाई और उनके रय के पहियों की रक्षा करते । रथ के पहियों की रक्षा करने रंगे ॥१४॥२१॥ ये चरे । अभिमन्यु और द्रौपदी के पुत्र उनके पिटने सर योदा ध्यान से आपकी सेना को देखने देंगे। भाग की रक्षा में नियुक्त हुए । महारयी धृष्टद्युम्न हे महागन ! फिर अर्जुन ने भाममेन से कहा- प्रभद्रकगण के साय उन सरकी रक्षा करने लगे। मर धृतराष्ट्र के पुत्र है । ये आपके माग में है। अर्जुन के द्वारा सुरक्षित शिगण्डी भी भीष्म-गध के यह सुनकर पाण्डयों को मना मरग उनकी दिए रहे यन के माय उनके पीछे चले । महार प्रशमा करने लगे ॥२२॥२॥ मागज युरिटिर युयुधान अर्जुन के पिटटे भाग की रक्षा करने लगे। यहुन बंद मन हापी पर चढ़कर धीच की सेना में । - .
४०६८ ] म हा मा र त [ भीष्मपर्व - समुत्सार्य ततः पश्चाद्धृष्टद्युम्नो महारथः भ्रातृभिः सह पुत्रैश्च सोऽभ्यरक्षाधिष्टिरम् ॥२७॥ स्वदीयानां परेषां च रथेषु विपुलान्ध्वजान् अभिभूयाऽर्जुनस्यैको रथे तस्थौ महाकपिः ॥२८॥ पदातास्त्वग्रतोऽगच्छन्नसिशक्त्यष्टिपाणयः अनेकशतसाहस्रा भीमसेनस्य रक्षिणः ॥२९॥ वारणा दशसाहस्राःप्रभिन्नकरटामुखाः शूरा हेममयैर्जालैर्दीप्यमाना इवाऽचलाः ॥३०॥ क्षरन्त इव जीमूता महार्हाः पद्मगन्धिनः राजानमन्वयुः पश्चाज्जीमूना इव वार्पिकाः भीमसेनो गदां भीमा प्रकर्षन्परिघोपमाम् प्रचकर्ष महासैन्यं दुराधर्षो महामनाः ॥३२॥ तमर्कमिव दुष्प्रेक्ष्यं तपन्तमिव वाहिनीम् न शेकुः सर्वयोधास्ते प्रतिवीक्षितुमन्तिके वजो नामैप स व्यहो निर्भयः सर्वतोमुखः । चापविद्युद्ध्वजो घोरो गुप्तो गाण्डीवधन्वना ॥ ३४ ॥ यं प्रतिव्यूह्य तिष्ठन्ति पाण्डवास्तव वाहिनीम् । अजेयो मानुषे लोके पाण्डवैरभिरक्षितः विराजमान हुए। महामनस्वी राजा द्रुपद एक अक्षौहिणी | गजराजों के कपोलों पर मद वह रहा था, उससे सेना साथ लिये महापराक्रमी राजा विराट के साथ कमल की सुगन्ध निकल रही थी । वरसते हुए मेघ चले। इन वीरों के रयों में सूर्य और चन्द्र के समान या पर्वत के समान दस हजार हाथी महाराज युधिष्ठिर प्रभाशाली, सुवर्णमण्डित, विविध चिहों से युक्त पताकाएँ । के पीछे चले ॥२९॥३०॥ महाबाहु भीमसेन परिध- रंगी हुई थीं। इसके पश्चात् महारथी धृष्टद्युम्न सब सदृश भयानक गदा हाथमें लेकर महासेना को लिये सेना, भाई और पुत्र आदि को साथ रेकर महाराज हुए शत्रुसेना के सामने जाने के लिए उद्यत हुए। युधिष्टिर की रक्षा करने लगे । अर्जुन का वानरचिह- जिस समय वे शत्रुसेना का सहार करने लगे उस युक्त घजागाला रथ पाण्डव सेना के सर रथों से | समय सूर्य के समान दुष्प्रेक्ष्य हो उठे । किसी में श्रेष्ठ था। उसकी ध्वजा सत्र ध्वजाओं से ऊँची यी साहस न था कि उनकी ओर क्षेत्र उठाकर देख भी ॥२५॥२८॥ अमरय पैदल सेना भीगसेन की रक्षा लेता ॥३१॥३३॥ अर्जुन ने वज्रव्यूह की रचना की करने के लिए सह, शक्ति और अष्टि आदि अनेक | थी। यह व्यूह निर्भय, सर्वतोमुख ओर घोर था । शन रिये आगे-आगे चलने लगी। मुनर्णजालमण्डित | धनुष उसमें बिजली के समान चमरते थे । उस व्यूह , अध्याय १९ ] म हा भा र त [ ४०६९ - सन्ध्यां तिष्ठत्सु सैन्येषु सूर्यस्योदयनं प्रति प्रावात्सपृपतो वायुर्निरभ्रे स्तनयित्नुमान् ॥ ३६॥ विष्ववाताश्च विववुर्नीचैः शर्करकार्पणः रजश्वोझ्यत महत्तम आच्छादयज्जगत् पपात महती चोल्का प्राङ्मुखी भरतर्षभ उद्यन्तं सूर्यमाहत्य व्यशीर्यत महास्वना ॥३८॥ अथ संनह्यमानेपु सैन्येपु भरतर्षभ निष्प्रभोऽभ्युद्ययौ सूर्यः सघोपं भूश्चचाल च ॥ ३९ ॥ व्यशीर्यत सनादा च भूस्तदा भरतर्षभ निर्धाता वह्वो राजन्दिक्षु सर्वासु चाऽभवन् ॥ ४० ॥ प्रादुरासीद्रजस्तीवं न प्राज्ञायत किञ्चन ध्वजानां धूयमानानां सहसा मातरिश्वना ॥४१॥ किङ्किणीजालवद्धानां काञ्चनस्रग्वराम्बरैः महतां सपताकानामादित्यसमतेजसाम् ॥४२॥ सर्व झणझणीभूतमासीत्तालबनविव एवं ते पुरुषव्याघ्राः पाण्डवा युद्धनन्दिनः व्यवस्थिताः प्रतिव्यूह्य तव पुत्रस्य वाहिनीम् । असन्त इव मज्जानो योधानां भरतर्षभ ॥१४॥ दृष्ट्वाऽग्रतो भीमसेनं गदापाणिमवस्थितम् ॥४५॥ इति श्रीमहाभारते मीमाणे भगवदानापाग पाण्वमन्या एकोनम्तिोऽणायः॥ १९ ॥ की रक्षा स्वयं अर्जुन कर रहे थे । मनुष्यों के लिए मेना के मुसजित होने पर सूर्यदेव प्रमादीन हो गये। अजेय उस व्यूह में अपनी सेना को सुरक्षित रसकर पृषी महाशब्द के साथ कांपने और फटने लगी पाण्डर लोग आपकी सेना के सामने डट गये । अब ॥३८॥४०॥ सब दिशाओं में बारम्बार निर्यात गाद सूर्योदय होने पर सर सनिक, सन्ध्यानन्दन करने होने लगा और ऐनी धून छा गई कि कुछ भी नहीं गे। उस समय आकाशमण्डल में मेध न रहने पर । दिगाई पड़ता था। किंकिणीजाशोभित, मरण- भी रिजली कड़कने लगी और सामने में येग के माप । मागयुक्त, यमिता गया और छोटी मण्डियों में अटान, धूल उदाती और कहादिया परमानी पोर आंधी घटने सूर्य के समान तेज गे गुण पनाएँ प्रकारका वायु के सगी । सारे जगत् में अरामा छा गया ॥३४॥३७॥ गमे कारने लगी । आंधी भरने पर ताद के मन दिशा में भारी उन्झारात भा ! सूर्य की और यो जो दमा होती है यही दशा गार जगन् मा हाम्द करके पर उन्का पृथ्वी पर गिगा भग्न गई । महागन ! पुरषदेत मुदलिय पान - १०७० ] म हा भारत [ भीमपर्व गदा हाथ में लिये भीमसेन को आगे चलते देखकर । व्यूहरचना करके इस तरह स्थित हुए मानों शत्रुसेना प्रसन्न हुए और अपनी सेना के विरोधियों के विरुद्ध को निगल जायगे ॥४११४५॥ भीष्मपर्व का उन्नीसर्वा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ११ ॥ - - अथ विंशोऽध्यायः ॥२०॥ धृतराष्ट्र उपाच-सूर्योदये सञ्जय के नु पूर्व युयुत्सवो हृष्यमाणा इवाऽऽसन् । मामका वा भीष्मनेत्राः समीपे पाण्डवावा भीमनेत्रास्तदानीम् ॥ १॥ केषां जघन्यौ सोमसूर्यो सवायू केपां सेनां श्वापदाश्चाऽभपन्त । केषां यूनां मुखवर्णाः प्रसन्नाः सर्वं मे त्वं ब्रूहि मेवं यथावत् ॥ २ ॥ सञ्जय उवाच-उभे सेने तुल्यमिवोपयाते उभे व्यूहे हृष्टरूपे नरेन्द्र उभे चित्रे वनराजिप्रकाशे तथैवोभे नागरथाश्वपूर्णे उभे सेने बृहत्यौ भीमरूपे तथैवोभे भारत दुर्विपो तथैवोभे स्वर्गजयाय सृष्टे तथैवोभे सत्पुरुषोपजुष्टे ॥४॥ पश्चान्मुखाःकुरवो धार्तराष्ट्राःस्थिताःपार्थाःप्राङ्मुखा योत्स्यमानाः दैत्येन्द्रसेनेव च कौरवाणां देवेन्द्रसेनेव च पाण्डवानाम् ॥५॥ चक्रे वायुः पृष्ठतः पाण्डवानां धार्तराष्ट्राऊश्वापदा व्याहरन्त गजेन्द्राणां भदगन्धांश्च तीवान्न सेहिरे तव पुत्रस्य नागाः । दुर्योधनो हस्तिनं पद्मवर्णं सुवर्णकक्षं जालवन्तं प्रभिन्नम् समास्थितो मध्यगतः कुरूणां संस्तूयमानो वन्दिभिर्मागधैश्च ॥ ७ ॥ बीमवां अध्याय 1] २०॥ धृतराष्ट्र ने कहा है संजय ! सूर्योदय के ! कृतार के समान जान पड़ने लगे । दोनों ओर की पश्चात् सेनापति भीष्म की अनुगामिनी कौरव-सेना । सेना प्रसन्न और उत्साहित थी। दोनों ओर विचित्र और भीमसेन के द्वारा सुरक्षित पाण्डवों की सेना, हाथी, घोड़े और रथ असत्य थे। दोनों पक्ष के दोनों में से किस पक्ष की सेना ने पहले प्रसन्नता- सैनिक अपरिमित, भयड्सर, दुर्वियह देख पड़ते थे। कि युद्ध के लिए ललकारा ! चन्द्र, सूर्य और वायु दोनों पक्षों में सत्पुरुष थे जो स्वर्ग प्राप्त करने के किमके अनुकूल और किसके प्रतिकूल देख पड़े ? लिए तैयार थे। आपके पुत्र पश्चिमाभिमुख और मासभोजी पशु-पक्षी फिस सेना की ओर चिल्लाने पाण्डव पर्माभिमुख थे ||३४|| कौरनों की सेना गे! किम पक्ष के नौजवानों में प्रसन्नता और दैत्येन्द्र सेना की तरह और पाण्डयों की सेना देव- उसाह देख पड़ता था। ये सब याने विस्तार के सेना की तरह शोभित हो रही थी । वायु पाण्डयों साप मुझसे कहो ॥१२॥सजय ने कहा-हे राजेन्द्र ! पीछे की ओर चल रही थी। मासाहारी पशु-पक्षी दोनों पक्ष की सेना जब परस्पर ममीप पहुँच गई| आपकी सेना की ओर मुग करके गरज रहे थे। तर दोनों पक्ष के वीर व्यह बना करके जगलों की | दुर्योधन-पक्ष के हाथी पाण्टयों के गजराजों को तीन अध्याय २० ] म हा भारत [ ४०७१ चन्द्रप्रभ श्वेतमथाऽऽतपत्रं सौवर्णस्रग्भ्राजति चोत्तमाङ्गे तं सर्वतः शकुनिः पार्वतीयः साई गान्धारैर्याति गान्धारराजः॥८॥ भीष्मोऽग्रतः सर्वसैन्यस्य वृद्धः श्वेतच्छत्रः श्वेतधनुः सखड्गः । श्वेतोष्णीपः पाण्डुरेण ध्वजेन श्वेतैर श्वैः श्वेतशैलप्रकाशैः ॥९॥ तस्य सैन्ये धार्तराष्ट्राश्च सर्वे वाहीकानामेकदेशः शलश्च ये चाऽम्वष्ठाःक्षत्रिया ये चसिन्धोस्तथासौवीराःपञ्चनदाश्च शूराः॥१०॥ शौणैर्हयै रुक्मरथो महात्मा द्रोणो धनुष्पाणिरदीनसत्वः आस्ते गुरुः प्रायशः सर्वराज्ञां पश्चाच भूमीन्द्र इवाऽभियाति ॥११॥ वार्धक्षत्रिः सर्वसैन्यस्य मध्ये भूरिश्रवाः पुरुमित्रो जयश्च शाल्या मत्स्याः केकयाश्चेति सर्वे गजानीकैतिरोयोत्स्यमानाः॥१२॥ शारद्वतश्चोत्तरधूर्महात्मा महेष्वासो गौतमश्चित्रयोधी शकैः किरातैर्यवनैः पल्हवैश्च सार्धं चमूमुत्तरतोऽभियाति ॥१३॥ महारथैर्वृष्णिभोजैः सुगुप्तं सुराष्ट्रकवि हितरात्तशस्त्रैः बृहदलं कृतवर्माभिगुप्तं वलं त्वदीयं दक्षिणेनाऽभियाति ॥१४॥ संशप्तकानामयुतं रथानां मृत्युर्जयो वाऽर्जुनस्येति स्पृष्टः येनाऽर्जुनस्तेन राजन्कृतास्त्राः प्रयातारस्ते त्रिगर्ताश्च शूराः ॥१५॥ मद-गन्ध के सहने में असमर्थ थे ॥५६॥ कौरव-सेना चढ़कर धनुप हाथ में लिये सब राजाओं के पीछे-पीछे के बीच पद्मवर्ण, सुवर्ण की जजीर से शोभित और महाराज के समान चलने लगे । वृद्धक्षन के पुत्र, । जाल-मण्डित मस्त गजराज पर दुर्योधन विराजमान | भूरिश्रया, पुरमित्र और जय, ये सेना के बीच में थे। बन्दी और मागध उनकी स्तुति कर रहे थे। और युद्ध की इच्छा रखनेवाले शाल्व, मस्य, केकय । सुवर्ण की माला और चन्द्रमा की तरह श्वेत छन आदि देशों के वीर भी हाथियों की सेना साप लिये उनके मस्तक पर था । गान्धारराज शकुनि पहाड़ी युद्धभूमि में डटे हुए थे ॥१०॥१२॥ प्रधान धनुर, गान्धार देश के लोगों की सेना साथ लिये दुर्योधन | विचित्र युद्ध में प्रवीण, महामा कृपाचार्य अपने साथ को चारों ओर से घर हुए चलते थे । चैत छत्र, में शक, फिरात, यान आदि की सेना लिये मना धनुष, पगड़ी, पना, कैलाससदृश श्वेत घोड़े और | के उत्तर भाग में स्थित हुए । अर्जुन की मृत्यु या • सह आदि युद्धसामग्री से सुशोभित होकर पितामह | अर्जुन को जानने के लिए ही जिनकी सृष्टि दुई माम सर सेना के आगे चल रहे थे ॥७१२|| उनके और अर्जुन के अग्नविद्या के गुर ने ही जिन्हें अख. साप की सेना में आपके पुत्र, यासास, शल, अक्ट, रिचा मिपाई है, वे मंशमकों के अगुत रयी और सन्धा, सौवीर और महापूर पचनदप्रदेश के श्रेष्ठ | शूर रिगर्तगण बहुत सी मेनामटिन दुर्योधन के माय शूर थे । महामा द्रोणाचार्य लाल घोड़ोंगरे रय पर | चले ॥१३॥१५॥ हे राजेन्द्र ! असन्त उत्तम एक ४०७२ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व । - समान सायं शनसहस्त्रं तु नागानां तब भारत नागे नागे रथशतं शतमश्वा रथे रथे ॥ १६ ॥ अश्वेऽश्वे दश धानुष्का धानुप्के शतचर्मिणः । एवं व्यूढान्यनीकानि भीष्मेण तव भारत ॥ १७॥ संव्यूह्य मानुपं व्यूहं देवं गान्धर्वमासुरम् दिवसे दिवसे प्राप्ते भीष्मः शान्तनवोऽग्रणीः ॥ १८॥ महारथौघविपुलः समुद्र इव घोपवान् भीष्मेण धार्तराष्ट्राणां व्यूहः प्रत्यङ्मुखो युधि ॥ १९ अनन्तरूपा ध्वजिनी नरेन्द्र भीमा त्वदीया न तु पाण्डवानाम् । तां चैव मन्ये बृहती दुष्षधां यस्या नेता केशवश्चाऽर्जुनश्च ॥ २० ॥ इति श्रीमन्महाभारते मीमपर्वणि मगबद्रीतापर्वणि सैन्यवर्णने विंशोऽध्यायः ॥२०॥ लाख हाथियों का व्यूह पितामह ने बनाया था। कभी गान्धर्व और कभी आसुर व्यूह की रचना एक-एक हाथी के साथ सौ-सौ रथ थे । एक-एक करके उन्होंने घोर युद्ध किया । समुद्र के रथ के साथ सौ-सौ घोड़े थे । प्रत्येक घोड़े के साथ | शब्दपूर्ण महारथों से युक्त उन व्यूहों की सेना पश्चिमा- दस-दस धनुर्द्धर वीर थे। हर धनुर्द्धर योद्धा के साथ भिमुख स्थित थी । हे महाराज ! आपकी सेना जैसी चार-चार ढालयाले थे । इस प्रकार व्यूहरचना करके असख्य और भयानक है वैसी पाण्डवों की सेना नहीं पितामह भीष्म युद्ध में प्रवृत्त हुए । एक ही प्रकार है। किन्तु श्रीकृष्ण और अर्जुन जिसके अगुआ हैं के व्यूह से नहीं लड़े । कभी मानुप, कभी दैव, / वही, मेरी सम्मति में, बड़ा और दुर्जय है ॥१६॥२०॥ भीमपर्व का बीसको अध्याय समाप्त हुआ ॥ २० ॥ अथ एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥ सञ्जय उवाच-बृहतीं धार्तराष्ट्रस्य सेनां दृष्ट्वा समुद्यताम् विपादमगमद्राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्टिरः व्यूह भीष्मेण चाऽभेद्यं कल्पितं प्रेक्ष्य पाण्डवः । अभेद्यमिव सम्प्रेक्ष्य विवर्णोऽर्जुनमब्रवीत् धनञ्जय कथं शक्यमस्माभियोंछमाहवे धार्तराष्टैर्महावाहो येषां योन्डा पितामहः कीगवा अध्याय ॥ २१॥ सजय कहते हैं कि हे महाराज ! दुर्योधन | युधिष्ठिर ने खिन्न घर में कहा-हे अर्जुन ! पितामह की मारी सेना को युद्ध के लिए तैयार और भीष्म भीम जिनके पक्ष के योद्धा हैं उनसे हम लोग किम को अमेष ब्यूह की रचना करते देखकर राजा तरह युद्ध कर सकेंगे ! शनुदमन महावी महामा अध्याय २१ ] म हा भारत [ ४०७३ । अक्षोभ्योऽयमभेद्यश्च भीष्मेणाऽमित्रकर्पिणा । कल्पितः शास्त्रदृष्टेन विधिना भूरिवर्चसा ॥ ४ ॥ ते वयं संशयं प्राप्ताः ससैन्याः शत्रुकर्पण कथमस्मान्महाव्यूहादुत्थानं नो भविष्यति अथाऽर्जुनोऽब्रवीत्पार्थं युधिष्ठिरममित्रहा विषण्णमिव सम्प्रेक्ष्य तव राजन्ननीकिनीम् ॥ ६ ॥ प्रज्ञयाऽभ्यधिकाञ्शूरान्गुणयुक्तान्वहूनपि जयन्त्यल्पतरा येन तन्निबोध विशाम्पते तत्र ते कारणं राजन्प्रवक्ष्याम्यनसूयवे नारदस्तमृपिर्वेद भीष्मद्रोणौ च पाण्डव एनमेवाऽर्थमाश्रित्य युद्धे देवासुरेऽब्रवीत् पितामहः किल पुरा महेन्द्रादीन्दिवौकसः ॥ ९ ॥ न तथा वलवीर्याभ्यां जयन्ति विजिगीपवः यथा सत्यानृशंस्याभ्यां धर्मेणैवोयमेन च ॥ १०॥ ज्ञात्वा धर्ममधर्म च लोभं चोत्तममास्थिताः युद्धयध्वमनहंकारा यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ११ ॥ एवं राजन्विजानीहि ध्रुवोऽस्माकं रणे जयः । यथा तु नारदः प्राह यतः कृष्णस्ततो जयः ॥ १२ ॥ गुणभूतो जयः कृष्णे पृष्ठतोऽभ्येति माधवम् । तद्यथा विजयश्चाऽस्य सन्नतिश्चाऽपरो गुणः ॥ १३ ॥ भीष्म के रचे हुए, शासानुसार कान्रित, अक्षोभ्य | पितामह भीष्म और द्रोणाचार्य इमे जानते है ॥६ और अभेद्य व्यह को देशकर हम लोग अपनी सेना- पहले देवासुर-मंग्राम में पितामह ब्रह्मा ने महेन्ट आदि सहित प्राणों के सहट में पड़ गये हैं । अब यताओ, : देवताओं से कहा था कि विजय की प्यागनेगले इस समय हम कैसे इस महागृह से अपनी रक्षा रोग जैगे सस्य, दया, धर्म के द्वारा जय ग्राम करने कर मांगे ॥१५|| हे महाराज ! युधिष्ठिर को कोरय-है यर और वीर्य के दाग नहीं । इसरिए धर्मा सेना के कारण यो विपाद में पड़े देगार अर्जुन धर्म और लाभ के विषय को अच्छी तरह जानकर, ने कहा--हे महाराज ! मंग्या में पोरे लोग जिस ! अमदार-न्य होरर, उपम के साथ युद्ध करो। दहा से प्रशा, शार्प, गुण और साया में अधिक गंगों जहां धर्म है या जय ॥२१२|| महर्षि नारद फोहग मरते हैं यह दा सुनिए । महर्षि नारद, कायदना कि जहां पण हे यही जप । अन्यान्य ४०७४ ] म हा भारत [ भीमपर्व अनन्ततेजा गोविन्दः शत्रुपूगेषु निय॑थः । पुरुपः सनातनमयो यतः कृष्णस्ततो जयः ॥ १४ ॥ पुरा ह्येष हरिभूला विकुण्ठोऽकुण्ठसायकः । सुरासुरानवस्फूर्जन्नब्रवीत्के जयन्विति ।। १५ ॥ कथं कृष्ण जयेमेति यैरुक्तं तत्र तैर्जितम् । तत्प्रसादाद्धि त्रैलोक्यं प्राप्तं शकादिभिः सुरैः ॥ १६ ॥ तस्य ते न व्यथां काश्चिदिह पश्यामि भारत । यस्य ते जयमाशास्ते विश्वभुक् त्रिदिवेश्वरः ॥ १७ ॥ इति श्रीमन्महामारते मी मपर्वणि भगवद्गीतापर्वणि युधिष्टिरार्जुनसवादे एकविंशोऽध्यायः॥ २१ ॥ गुण जसे श्रीकृष्ण में हैं वैसे ही विजय भी उनमें है प्रश्न के उत्तर में जिन्होंने कहा था कि हम श्रीकृष्ण वे जहां जाते हैं वहीं विजय भी उनके साथ जाती है। के अनुगत हैं, हमीं जय प्राप्त करेंगे, वे ही विजयी अतएव जहां शत्रुओं के बीच श्रीकृष्ण हमारे साथी | हुए थे। इन्द्र आदि देवताओं ने श्रीकृष्ण के ही हैं यहां हमारी ही जय निश्चित है। श्रीकृष्ण कभी प्रसाद से त्रैलोक्य का राज्य प्राप्त किया है । हे भरत- व्यथित होनेवाले नहीं हैं। उनका तेज अनन्त है। कुलश्रेष्ठ! वही त्रिदिवेश्वर वासुदेव जब आपकी विजय अव्यर्थलक्ष्य, इन्हीं श्रीकृष्ण ने पहले जनार्दन हरि का की आशा कर रहे हैं तब आपको किस प्रकार रूप रखकर, देवताओं और असुरों के सामने प्रकट की चिन्ता है ? आप क्यों व्याकुल हो रहे हैं । होकर, पूछा था कि कौन जय प्राप्त करेगा । इस ॥१३॥१७॥ मामपर्व राइकोमा अध्याय समाप्त हुआ ॥ २१ ॥ अथ द्वाविंशोऽध्यायः ।। २२ ।। सजय उगाच- ततो युधिष्ठिरो राजा खां सेनां समनोद प्रतिव्यूहन्ननीकानि भीष्मस्य भरतर्षभ यथोद्दिष्टान्यनीकानि प्रत्यव्यूहन्त पाण्डवाः । स्वर्ग परममिच्छन्तः सुयुद्धेन कुरूद्वहाः मध्ये शिखण्डिनोऽनीकं रक्षितं सव्यसाचिना । धृष्टद्युम्नश्चरन्नग्रे भीमसेनेन पालितः अनीकं दक्षिणं राजन्युयुधानेन पालितम् । श्रीमता सात्वताग्न्येण शक्रेणेव धनुष्मता ॥ ४ ॥ वाईम अध्याय ॥ २२ ॥ मंनय यहते हैं महाराज ! इसके उपरान्त / सेना का, भीष्म के विरुद्ध, म्यूह बनाफर धर्मयुद्ध के पुरखुट-प्रधान युरिष्टिर आदि पाण्ड: अपनी सारी द्वारा स्वर्ग या गन्य प्राप्त करने के दिए तयार हुए।
अध्याय २२ ] म हा भा र त [४०७५ महेन्द्रयानप्रतिमं रथं तु सोपस्करं हाटकरत्नचित्रम् युधिष्ठिरः काञ्चन भाण्डयोक्त्रं समास्थितो नागपुरस्य मध्ये ॥५॥ समुच्छ्रितं दन्तशलाकमस्य सुपाण्डुरं छत्रमतीव भाति प्रदक्षिणं चैनमुपाचरन्त महर्षयः संस्तुतिभिर्महेन्द्रम् पुरोहिताः शत्रुवधं बदन्तो ब्रह्मर्पिसिद्धाः श्रुतवन्त एनम् । जप्यैश्च मन्त्रैश्च महौषधीभिः समन्ततः स्वस्त्ययनं त्रुवन्तः ततःस वस्त्राणि तथैव गाश्च फलानि पुष्पाणितथैव निष्कान् । कुरूत्तमो ब्राह्मणसान्महात्मा कुर्वन्ययौ शक इवाऽमरेशः ॥८॥ सहस्रसूर्यः शतकिङ्किणीकः परार्धजाम्बूनदहेमचित्रः रथोऽर्जुनस्याऽग्निरिवाऽर्चिमाली विभ्राजते श्वेतयः सुचक्रः ॥९॥ तमास्थितः केशवसंग्रहतिं कपिध्वजो गाण्डिववाणपाणिः धनुर्धरो यस्य समः पृथिव्यां न विद्यते नो भविता कदाचित् ॥१०॥ उद्वर्त्तयिष्यंस्तव पुत्र सेनामतीव रौद्रं स विभर्ति रूपम् अनायुधोयः सुभुजो भुजाभ्यां नराश्वनागान्युधिभस्म कुर्यात् ॥११॥ स भीमसेनः सहितो यमाभ्यां वृकोदरो वीररथस्य गोता तं तत्र सिंहपभमत्तखेलं लोके महेन्द्रप्रतिमानकल्पम् ॥१२॥ सबके बीच में शिखण्डी को रखकर स्त्रय अर्जुन उनकी भरण और अनेक प्रकार के फल-फूल आदि से सन्तुष्ट रक्षा करने लगे । भीमसेन सेना के अगले भाग में | करके देवराज इन्द्र की तरह युद्धयात्रा की । हे महा- स्थित धृष्टद्युम्न की और इन्द्र के समान प्रधान धनुर्द्धर | बाहु ! पृथ्वी पर अद्वितीय धनुर योद्धा, महागीर युयुधान दक्षिण भाग से सघ सेना की रक्षा फारले । अर्जुन ने भपासका रूप धारण किये हुए आरोपों लगे। राजा युधिष्ठिर हाथियों के झुण्ड के बीच की सेना को नष्ट करने की इच्छा से बायें हाथ में महेन्द्रयान सदृश, युद्ध की सामग्री से परिपूर्ण, | गाण्डीर धनुप लिया; और हजार सूर्यों की तरह सुवर्णरत्नचित्रित, सुवर्णभाण्डयुक्त श्रेष्ठ रथ पर सवार उजाल, अग्नि की तरह शिखायुक्त, शताकिणी- हुए । उनके माथे पर हाथीदात की मूठयाला, ऊँचा, | शोभित, सुवर्णमाण्डित, अच्छे पहियोंगले, श्वेत घोड़ों श्वेत छन लगा हुआ था। महर्षिगण स्तुति करते हुए | से युक्त, कपिघज रथ पर चढ़कर युद्धयाना की। उनकी प्रदक्षिणा करने लगे ॥१६॥ पुरोहित लोग उनके रथ पर स्वय श्रीकृष्ण सवार हुए ॥७॥१०॥ शनुसंध की घोषणा के साथ आशीर्वाद देने लगे। सिंह के समान निर्भय, इन्द्र के समान पराक्रमी, ब्रह्मर्षि और सिद्धगण जप, मन्त्र और महौषधियों के मस्त हाथी के समान दपी, महारली, पराक्रमी और द्वारा स्वस्त्ययन और स्तुति करने लगे। इसके पश्चात् | बिना शस्त्र लिये केवल वाओं से ही मनुष्यों और कुरुश्रेष्ट युधिष्ठिर ने ब्राह्मणों को हजारों गायें, कण्ठा- | हाथियों का सहार करने में समर्थ भीममेन-नाल - ४०७६ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व - समीक्ष्य सेनाग्रगतं दुरासदं संविव्यथुः पङ्कगता यथा द्विपाः। वृकोदरं वारणराजदर्प योधास्त्वदीया भयविनसत्वाः ॥१३॥ अनीकमध्ये तिष्ठन्तं राजपुत्रं दुरासदम् अब्रवीद्भरतश्रेष्ठं गुडाकेशं जनार्दनः ॥ १४॥ वासुदेव उवाच—य एप रोपात्प्रतपन्वलस्थो यो नः सेनां सिंह इवेक्षतेच स एप भीष्मः कुरुवंशकेतुर्येनाऽऽहृतास्त्रिशतं वाजिमेधाः ॥१५॥ एतान्यनीकानि महानुभावं गृहन्ति मेघा इव रश्मिमन्तम् । एतानि हत्वा पुरुषप्रवीर कांक्षस्व युद्धं भरतर्पण ॥१६॥ इति श्रीमन्महमारते भी पर्वणि मगवद्गीतापर्वणि श्रीकृष्णार्जुनसादे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ और सहदेव के साथ-अर्जुन के रथ की रक्षा करने | और हमारी सेना को सिंह के समान देख रहे कुरु- लगे। सेना के अगले भाग में भीमसेन को आते। कुलकेतु पितामह भीष्म खड़े हैं । इन्होंने तीन सौ देखकर आपके दल के योद्धाओं की दशा भय के | अश्वमेध यज्ञ किये हैं। मेव जैसे सूर्य को छिपाये हों, मारे दलदल में फंसे हुए हाथियों की सी हुई॥११॥ वैसे ही यह कौरवपक्ष की सेना उनके चारों ओर १३॥ अव भगवान् श्रीकृष्ण ने सेना के बीच में रहकर उनकी रक्षा कर रही है । हे पुरुपश्रेष्ट ! इस स्थित दुर्द्धर्ष राजकुमार अर्जुन से कहा- हे अर्जुन ! सेना को मारकर भरतश्रेष्ठ भीष्म के साथ युद्ध करो वह देखो, सेना के मध्य में सूर्य के समान तप रहे | ॥१४|१६|| भीष्मपर्व का बाईसवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ २२ ॥ अथ प्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३॥ सञ्जय उवाच--धार्तराष्ट्रवलं दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् । अर्जुनस्य हितार्थाय कृष्णो वचनमब्रवीत् श्रीभगवानुवाच-शुचिर्भूत्वा महाबाहो संग्रामाभिमुखे स्थितः । पराजयाय शत्रूणां दुर्गास्तोत्रमुदीरय ॥ २ ॥ सञ्जय उवाच-एवमुक्तोऽर्जुनः संशथे वासुदेवेन धीमता । अवतीर्य रथात्पार्थः स्तोत्रमाह कृताञ्जलिः ॥ ३ ॥ तेईमवा अध्याय ॥ २३ ॥ संजय कहते हैं कि हे राजेन्द्र ! इसके पश्चात् महाराज ! बुद्धिमान् श्रीकृष्ण के उपदेश करने पर दुर्योधन की सेना को युद्ध के लिए तैयार देखकर | अर्जुन रथ से उतरकर, हाथ जोड़कर, भगवती कात्या- श्रीकृष्ण ने अर्जुन के हित के लिए कहाहे अर्जुन! यनी की स्तुति इस प्रकार करने लगे हे सिद्धसेनानि ! संग्राम के आरम्भ में, शत्रुओं की पराजय के लिए. हे आयें ! हे मन्दराचल पर निवास करनेवाली ! हे पवित्रतापूर्वमा दुर्गास्तोत्र का पाठ करो ॥१२॥ हे । कुमारी ! हे काली ! हे कपालिनी ! हे कपिला !
अध्याय २३ ] म हा भारत [ ४०७७ - । अर्जुन आच--नमस्ते सिद्धसेनानि आर्ये मन्दरवासिनि । कुमारि कालि कापालि कपिले कृष्णपिङ्गले भद्रकालि नमस्तुभ्यं महाकालि नमोऽस्तु ते । चण्डि चण्डे नमस्तुभ्यं तारिण वरवर्णिनि कात्यायनि महाभागे करालि विजये जये । शिखिपिच्छध्वजधरे नानाभरणभूषिते ॥ ६ ॥ अदृशूलप्रहरणे खड्गखेटकधारिण गोपेन्द्रस्याऽनुजे ज्येष्ठे नन्दगोपकुलोद्भवे महिपास्मृप्रिये नित्यं कौशकि पीतवासिनि । अट्टहासे कोकमुखे नमस्तेऽस्तु रणप्रिये उमे शाकम्भरि श्वेते कृप्णे कैटभनाशिनि हिरण्याक्षि विरूपाक्षि सुधूम्राक्षि नमोऽस्तु ते ॥ ९ ॥ वेदश्रुति महापुण्ये ब्रह्मण्ये जातवेदसि जम्बूकटकचैत्येषु नित्यं सन्निहितालये ॥१०॥ त्वं ब्रह्मविद्या विद्यानां महानिद्रा च देहिनाम् । स्कन्दमातर्भगवति दुर्गे कान्तारवासिनि स्वाहाकारः स्वधा चैव कला काष्ठा सरस्वती । सावित्री वेदमाता च तथा वेदान्त उच्यते ॥ १२ ॥ स्तुताऽसि त्वं महादेवि विशुद्धेनाऽन्तरात्मना । जयो भवतु मे नित्यं त्वत्प्रसादाद्रणाजिरे ॥ १३ ॥ हे कृष्णपिङ्गला! हे भगरती ! मैं आपको प्रणाम करता | पीताम्बर पहननेपाली हे अ-हास करनेवाली! हे कोक- हूँ । हे तारिणी ! हे वरवर्णिनी ! हे भद्रकाली ! हे मुखा ! हे रणप्रिया ! हे देवी! मैं आपको नमस्कार करता महाकाली ! हे चण्डी ! हे चण्डरूपिणी! हे कात्यायनी! | हूँ॥३८॥हे उमा! हे शाकम्भरी ! हे श्वेता! हे कृष्णा! हे महाभागा ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। हे हे कैटभनाशिनी ! हे हिरण्याक्षी ! हे विरूपाक्षी ! कराली ! हे विजया ! हे जया ! हे मयूरपिच्छयजा- हे धुम्राक्षी ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे धारिणी ! हे अनेक आभूषण पहननेवाली ! हे अत्यन्त | वेदश्रुति ! हे महापुण्या ! हे ब्रह्मण्या ! हे अग्नितधू ! हे उत्कट त्रिशूल-खड्ग और खेटक धारण करनेपाली ! | जम्बूकटक-चैत्य आदि स्थानों में नित्य रहनेवाली देवी ! हे श्रीकृष्ण की बड़ी वह्न !हे नन्दगोप के कुल में जन्म आप सब विद्याओं में ब्रह्मविद्या और सब शरीरधारियों लेनेवाली! हे महिष का रक्त पीनेवाली ! हे कौशिकी ! हे | में महानिद्रा के सरूप से स्थित हैं । हे भगती ।
४०७८ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व . कान्तारभयदुर्गेषु भक्तानां चाऽऽलयेषु च नित्यं बससि पाताले युद्धे जयसि दानवान् ॥१४॥ त्वं जम्भनी मोहिनी च मायाहीः श्रीस्तथैव च । सन्ध्या प्रभावती चैव सावित्री जननी तथा ॥ १५॥ तुष्टिः पुष्टिधृतिर्दीप्तिश्चन्द्रादित्यविवर्धिनी भूतिभूतिमतां सङ्घये वीक्ष्यसे सिद्धचारणैः ॥ १६ ॥ सञ्जय उवाच-ततः पार्थस्य विज्ञाय भक्तिं मानववत्सला अन्तरिक्षगतोवाच गोन्विदस्याऽग्रतः स्थिता ॥१७॥ देव्युवाच-स्वल्पेनैव तु कालेन शत्रू प्यसि पाण्डव नरस्त्वमसिं दुर्धर्ष नारायणसहायवान् ॥ १८ ॥ अजेयस्त्वं रणेऽरीणामपि वज्रभृतः स्वयम् इत्येवमुक्त्वा वरदा क्षणेनाऽन्तरधीयत लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो मेने विजयमात्मनः । आरुरोह ततः पार्थों रथं परमसम्मतम् ॥ २० ॥ कृष्णार्जुनावेकरथौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः य इदं पठते स्तोत्रं कल्य उत्थाय मानवः ॥२१॥ यक्षरक्षः पिशाचेभ्यो न भयं विद्यते सदा नऽचापि रिपवस्तेभ्यः सर्पाद्या ये च दष्ट्रिणः ॥ २२ हे स्कन्दजननी ! हे दुर्गा ! हे दुर्गम स्थान में रहने- १६॥ अर्जुन की भक्ति देखकर मनुष्य-वत्सला वाली ! आप स्वाहा, स्वधा, कला, काष्ठा, सरस्वती, कात्यायनी प्रसन्न हुई और श्रीकृष्ण के आगे प्रकट सावित्री, वेदमाता और वेदान्तस्वरूपिणी हैं। मैं | होकर अर्जुन से कहने लगीं- हे पाण्डव ! तुम विशुद्ध चित्त से आपकी स्तुति करता हूँ | आशीर्वाद | नारायण की सहायता से शीघ्र ही संग्राम में शत्रुओं दीजिए कि मैं आपकी कृपा से विजय प्राप्त कर सकू को जीत लोगे । तुम युद्ध में शत्रुओं के लिए अजेय ।।९।१३॥ भक्तों की रक्षा के लिए आप सदा दुर्गम हो । तुमको तो साक्षात् इन्द्र भी नहीं जात सकते।" मार्ग और भयानक स्थान तथा पाताल-तल में रहती अत्र वरदायिनी भगवती अन्तर्द्वान हो गई। वरदान हैं और संग्राम-भूमि में दानवों को हराती हैं । आप पाकर अर्जुन ने अपने को विजयी समझ लिया । वे जम्भनी, मोहिनी, माया, ही, श्री, सन्च्या, प्रभारती, श्रीकृष्ण के साथ रथ पर बैठकर दिव्य शव बजाने लगे मावित्री, जननी, तुष्टि, पुष्टि भृति,चन्द्र-सूर्य-विपर्दिनी, ॥१७॥२०॥ जो कोई प्रातःकाल उठकर इस दुर्गास्तव दीप्ति और मम्पन्न पुरुषों को सम्पत्ति हो । मिद्ध- को पढ़ता है उसे यक्ष, राक्षस, पिशाच, शत्रु, सर्प, चारण सदा रणक्षेत्र में आपके दर्शन पाने हैं ॥१४ | हिंसक पशु और राजकुल आदि से भय की आशका wor धृतराष्ट्र ने यहा-हे सजय ! रिस पक्ष के आक्रमण किया। रिम पक्ष क टोग उत्साहित और अध्याय २४ ] म हा भारत [ ४०७९ न भयं विद्यते तस्य सदा राजकुलादपि विवादे जयमाप्नोति वद्धो मुच्यति वन्धनात् ॥ २३ ॥ दुर्ग तरति चाऽवश्यं तथा चोरौर्वमुच्यते संग्रामे विजयन्नित्यं लक्ष्मी प्राप्नोति केवलाम् ॥ २४ ॥ आरोग्यवलसम्पन्नो जीवेद्वर्षशतं तथा एतद् दृष्टं प्रसादात्तु मया व्यासस्य धीमतः ॥ २५ ॥ मोहादेतौ न जानन्ति नरनारायणापी तव पुत्रा दुरात्मानः सर्वे मन्युवशानुगाः ॥ २६ ॥ प्राप्तकालमिदं वाक्यं कालपाशेन गुण्ठिताः द्वैपायनो नारदश्च कण्वो रामस्तथाऽनघः अवारयंस्तव सुतं न चाऽसौ तद्गृहीतवान् ॥ २७ ॥ यत्र धर्मों द्युतिः कान्तिर्यत्र हीः श्रीस्तथा मतिः। यतो धर्मस्ततः कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जयः॥ २८॥ इति श्रीमहाभारते भी मपर्वणि भगवातापर्वणि दुर्गास्तोरे योविंशाऽध्याय ॥ २३ ॥ नहीं रहती । वह मनुष्य विवाद मे विजय प्राप्त करता है, मोह-वश होकर ने महर्पि नर और नारायण (अर्जुन बन्धन से छुटकारा पाता हे तथा मङ्कट और आपत्ति से | और श्रीकृष्ण) को नहीं पहचान सके । व्यास, नारद, छूट जाता है। यदि चोर डाकू घेर लें तो इस स्तोत्र को | कप, परशुराम आदि महर्पियों ने आपके पुत्र को पढ़ने से वे सब भाग जाते है। यह स्तोत्र पढ़ने से बहुत समझाया, परन्तु अपनी मूढ़ता के कारण दुर्योधन युद्ध में विजय, लक्ष्मी, आरोग्य, बल ओर दीर्घ जीवन | ने उनका कहा नहीं माना । हे महाराज ! जहा धर्म प्राप्त होता हे ॥२१।२५|| हे राजेन्द्र ! मैंने बुद्धिमान् है वहीं युति और कान्ति है। जहा लोकलज्जा है वहीं महात्मा ब्यासदेव की कृपा से युद्ध का सर हाल देखा | श्री ओर बुद्धि है । सत्य तो यह है कि जहा धर्म ह नहीं है। आपके दुरात्मा पुन काल्पाश में फंसे हुए हैं। इसीसे | श्रीकृष्ण हैं ओर जहा श्रीकृष्ण हैं वहीं जय है।।२६।२८॥ भीमपर्व का तेईमवा अध्याय समाप्त हुआ ।। २३ ॥ अथ चतुर्विशोऽध्याय ॥२४॥ धृतराष्ट्र उपाच-केपां प्रहृष्टास्तत्राऽग्रे योधा युध्यन्ति सञ्जय । उदग्रमनसः के वा के वा दीना विचेतसः चाचीगवा अध्याय ॥ २४॥ वीरों ने पहरे प्रसन्नतापूर्वक युद्धभूमि में ग्रंश और । किम पक्ष के रोग व्याकुल देय पड़े । किम दल के ४०८० म हा भारत [ भीष्मपर्व - के पूर्व प्राहरंस्तत्र युद्धे हृदयकम्पने मामकाः पाण्डवेया वा तन्ममाऽऽचक्ष्व सञ्जय ॥ २॥ कस्य सेनासमुदये गन्धमाल्यसमुद्भवः वाचः प्रदक्षिणाश्चैव योधानामभिगर्जताम् ॥ ३ ॥ सञ्जय उपाच---उभयोः सेनयोस्तत्र योधा जहपिरे तदा स्रजः समाः सुगन्धानामुभयत्र समुद्भवः संहतानामनीकानां व्यूढानां भरतर्षभ संसर्गात्समुदीर्णानां विमर्दः सुमहानभूत् वादित्रशब्दस्तुमुलः शङ्गभेरीविमिश्रितः शृराणां रणशूराणां गर्जतामितरेतरम् उभयोः सेनयो राजन्महान्व्यतिकरोऽभवत् । अन्योन्यं वीक्ष्यमाणानां योधानां भरतर्षभ कुञ्जराणां च नदतां सैन्यानां च प्रहृप्यताम् ॥ ७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मीष्मपर्वणि मगवद्गीतापर्वणि धृतराष्ट्रसजयसवादे चतुर्विशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ वीरों ने हृदय को कँपा देनेवाले उस युद्ध में पहले दोनों पक्ष के लोग व्यूह बनाकर एकत्र हो परस्पर पहल प्रहार किया? किस और के गरज रहे योद्धाओं | घोर युद् कर रहे थे । हे भरतश्रेष्ठ ! दोनों और के की मालाएँ नहीं सूखी ? किस पक्ष के लोगों की । वीर एक दूसरे को देखकर सिंहनाद कर रहे थे । मालाओं की सुगन्ध में विकार नहीं आया ? किस | दोनों पक्ष के याद्रा रण में शूरता दिखानेवाले थे। दल के वीरों के अनुकूल वायु चल रही थी ! तुम शङ्ख, नगाडे आदि वाजों का शब्द चारी ओर गूंज ये सब बातें मुझे सुनाओ ॥१३॥ संजय ने कहा रहा था । उस शब्द को हाथियों, घोड़ों, रयों और हे राजेन्द्र ! उस समय दोनों पक्ष के योद्धा प्रसन्न । पैदलों का शब्द और भी बढ़ा रहा था । यह दृश्य और उत्साहित दिखाई पड़ रहे थे। दोनों ओर के | अद्भुत ही था ॥४|७|| चीरों की मालाएँ और उनकी गन्ध पहले की सी थी। भीमपर्व का चौत्रीमा अध्याय ममाप्त हुआ 1) २४ ॥ । - 平平 七 अध्याय २५, गीता अध्याय १ } म हा भारत [४०८१ श्रीमद्भगवद्गीता॥ धृतराष्ट्र उवाच --धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय मञ्जय उवाच-दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता अत्र शूरा महेवासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्ति भोजश्च शैव्यश्च नरपुङ्गवः युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम । नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्त्रवीमि ते ॥ ७ ॥ भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिर्जयद्रथः अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः पर्चासना अध्यार॥५॥-गीतास पहला अध्याय] धृतराष्ट्र ने पूछा-हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र । किया है ॥३॥ इस सेना में भीग और अर्जुन के मे युद्ध के लिए एकत्र हुए कौरवों और पाण्डयो ने समान युद्ध करनेगले शूर और धनु र देस पड़ते आगे फिर क्या किया ? ॥११॥ संजय ने कहा कि हे । हैं ॥४॥ युयुधान, विराट, महारथी द्रुपद, धृष्टकेतु, राजेन्द्र ! राजा दुर्योधन पाण्टव सेना को व्यूह-रचना । चेकितान, महाबली काशिराज, पुरुजित् , कुन्निभोज किये गड़ी देसफर द्रोणाचार्य के पाम जाफर कहने । पुरुषश्रेष्ठ शैव्य, 1111 विनमशाली युधामन्यु, महावीर रगे----||२|| हे आचार्य ! देखिए, आपके शिष्य उत्तमांजा, अभिमन्यु, द्रौपदी के पाचों पुत्र आदि मय बुद्धिमान् हुपदपुर धृष्टद्युम्न ने पाण्डवों की महती : महारथी चीर पाण्डवों की सेना में हैं ||६|| अपहमारी मेना को व्यूह बना करके उचित स्थान पर स्थापित । सेना के प्रधान जो बार सेनापति हैं उनके नाम मी ४०८२ ] म हा भारत [ भीमाश्व अपर्याप्तं तदस्माकं वलं भीष्माभिरक्षितम् । पर्याप्तं विदमेतेषां वलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥ अयनेषु च सर्वेषु यथा भागमवस्थिताः । भीष्ममेवाऽभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥ तस्य सञ्जनयन्हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्ख दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥ ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । सहसैवाऽभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥ ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शहौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥ पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः पौण्डं दध्मौ महाशङ्ख भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥ अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । नकुलः सहदेवश्च सुघोपमणिपुप्पको ॥ १६ ॥ काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चाऽपराजितः ।। १७ ॥ द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शसान्दध्मुः पृथक् पृथक् ॥ १८ ॥ सुनिए ॥७॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! आप, भीष्म पितामह, कर्ण, के साथ ही ऊँचे स्वर से शङ्ख बजाया ॥१२॥ इसके में जय प्राप्त करनेवाले कृपाचार्य, अश्वत्थामा, पश्चात् शङ्ख, भेरी, पणव, नगाड़े, गोमुख आदि विकर्ण, सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रया, जयद्रथ ॥८॥ हज़ारों बाजे एकाएक बजाये जाने लगे। इससे बड़ा और अन्य बहुत से शूरवीर अनेक अस्र-शस्त्र लिये शब्द हुआ ॥१३॥ उधर श्वेत घोड़ो से युक्त बड़े रस मेरे निमित्त प्राण तक दे देने को तैयार हैं । वे सब पर बैठे हुए माधव और अर्जुन ने अपने दिव्य शह युद्ध में निपुण हैं ||९|| भीष्म-द्वारा रक्षित हमारी बजाये ॥१४॥ श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य गड, अर्जुन ने सेना अपार है और भीमसेन द्वारा रक्षित पाण्टयों । देवदत्त शड्ड, भीमसेन ने पॉण्ट्र नाम का महागस, की मेना, उसके मुकाविले में, थोड़ी है ॥१०॥ इस ॥१५|| राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नाम का समय आप लोग अपने-अपने निर्दिष्ट स्थान पर, व्यह शट्स, नकुल ने सुघोष शत और सहदेव ने मणिपुष्पक के प्रदेश-दारों में, स्थित होकर भीष्म पितामह की । शड्स बनाया॥१६॥ इसी प्रकार काशिराज, शिरसण्टी, ही रक्षा करें ॥११॥ अब महाप्रनापी कुरुवृद्ध पितामह । धृष्टद्युम्न, विराट, सात्यकि ॥१७॥ द्रुपद, अभिगन्यु ने दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए मिहनाद करने । और द्रौपदी के पुत्रों ने अलग-अलग अपने-अपने अध्याय २५, गीता अध्याय १ ] म हा भारत [ ४०८३ - स घोपो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः । प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २० ॥ हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते अर्जुन उवाच-सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ २१ ॥ यावदेतानिरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥ योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥ मन्जय उवाच -एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥ भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति तत्राऽपश्यस्थितान्पार्थः पितृनथ पितामहान् । आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पोत्रान्सखींस्तथा ॥ २६ ॥ श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्वन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥ कृपया परयाऽऽविष्टो विपीदन्निदमब्रवीत् अर्जुन उवाच- -दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥२८॥ शन यजाये ॥१८॥ यह शलों की तुमुल धनि पृथ्वी- किन लोगों के साथ मुझे युद्ध करना होगा और कौन मण्डल और आकाशमण्डल को प्रतिघनित करती लोग मुझमे युद्ध करेंगे, यही में जानना चाहता है हुई आपके पुनो के हृदयो को चीरने लगी ॥१९॥ ॥२२॥२३॥ मनय कहते हैं कि गुदांकरा अर्जुन के हे महाराज ! अब कपिधज अर्जुन कोरसो को यथा ये वचन सुनकर श्रीकृष्ण ने रथ को दोनों मेनाओं स्थान स्थिन देगकार, शस्त्रों का चलना आरम्भ होने के मध्य मे ले जाकर गढ़ा कर दिया और अर्जुन में समय, अपने धनुष को उठाकर, श्रीकृष्ण से कहने कहा-हे पार्य ! भीम, द्रोण आदि सर योदा, गना लंग हे वासुदेव ! दोनो मेनाओं के मध्य में मेरा लेग और कांग्प ये मन एकर है, देगन्दी ॥२४] खरे चरिए ॥२०॥२१॥ में देगना चाहता है कि २५|| अर्जुन ने देगा कि उनके पिता, मिनाम', दुवुनि दुर्योधन का प्रिय करने की इच्छा मे युद के आचार्य, मामा, भाई, पुत्र, पीर, मित्र, ॥२६॥ समुर पिप यहा पर कान टोग आये हैं। इस समय । और सुटद् आदि मर आमाय और मागीय संग - ४०८४ ] महाभारत [ भीमप - । सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुप्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्पश्च आयते गाण्डीवं स्त्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा खजनमाहवे ॥ ३१ ॥ न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगेर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥ येपामर्थे कांक्षितं.नो राज्यं भोगाः सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥ आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः मातुलाः श्वशुराः पौत्राः स्यालाःसम्बन्धिनस्तथा॥ ३४॥ एतान्न हन्तुमिच्छामि नतोऽपि मधुसूदन अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किन्नु महीकृते ॥ ३५ ॥ निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याजनार्दन । पापमेवाऽऽश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥ ३६॥ तस्मान्नाऽर्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्सवान्धवान् । स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ ३७ ॥ मरने-मारने के लिए तैयार खड़े हैं ॥२७॥ तब करुणा न राज्य और न सुख ही । हे गोविन्द ! हम लोग के आवेश से खिन्न होकर अर्जुन ने कहा- है। भाई-बन्धुओं को मारकर राज्य, सुखभोग या जीवन वासुदेव ! ये सब स्वजन युद्ध के लिए उपस्थित हैं | लेकर क्या करेगे ? ॥३२॥ जिनके लिए हम राज्य, ॥२८॥ इन्हें देखकर मेरा शरीर काप रहा है, हाथ भोग ओर सुख की चाह करते हैं ये आचार्य, पिता, पांव सुन्न हुए जाते हैं, रोमाञ्च हो आया है ॥२९॥ पुन, पितामह, मामा, ससुर, पोते, साले, समधी, हाथ से गाण्डीव धनुप गिर पड़ रहा है, मुख सूखा नातेदार आदि सब तो युद्ध में, प्राणो की और धन जा रहा है, त्वचा मानो जली जा रही है। मेरा की ममता छोड़कर, लड़ने को तैयार हैं ॥३३॥३४॥ मन भ्रान्त सा हो रहा है | मुझसे रथ पर बैठे नहीं हे मधुसूदन ! इस तुच्छ पृथ्वी की कौन कहे, मैं रहा जाता ॥३०॥ हे केशा ! मुझे सब लक्षण विष- | तो त्रिलोकी के राज्य के लिए भी इन लोगों को रीत ही देख पड़ते है । युद्ध में भाई-बन्धुओं को { मारना नहीं चाहता, ये लोग मुझे भले ही मार डाले मारने से मुझे कुछ कल्याण नहीं देख पडता ॥३१॥ : ॥३५॥ हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने से हे श्रीकृष्ण ! इस तरह मैं न तो विजय चाहता हूँ, । ही हमे क्या प्रसन्नता होगी। इन आततायियों को अध्याय २५, गीता अध्याय १ ] म हा भारत [ ४०८५ - यद्यप्यते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः कुलक्षयकृतं दोपं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥ कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मानिवर्तितुम् । कुलक्षयकृतं दोपं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९ ॥ कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ ४०॥ अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥४१ ।। . सङ्करो नरकायैव कुलमानां कुलस्य च पतन्ति पितरो ह्येपां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ४२ ॥ दोपैरेतैः कुलनानां वर्णसङ्करकारकैः उत्सायन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥ उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥४४॥ अहो वत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥४६॥ मारकर हम पाप के ही भागी होंगे ॥३६॥ इसलिए / हे वार्णेय ! कुलस्त्रियों के दृपित होने पर वर्णसङ्कर बन्धु-बान्धों सहित धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना उचित | संतान उत्पन्न होती है ॥४१॥ वर्णसङ्कर सतान उत्पन्न नहीं है । हे माधव ! इन लोगों को मारकर हम कैसे | होने पर कुल का सहार करनेगलों सहित सारा मुखी हो सकेंगे ! ॥३७॥ इन लोगों का चित्त लोभ कुल नरकगामी होता है । कुल का विनाश करने के वश में हो रहा है, इसी कारण यद्यपि ये लोग बालों के पितर, पिंड और तर्पण लुप्त हो जाने के कुलक्षय के दोष और मिनद्रोह के पातक को नहीं कारण, नरक में गिरने है ॥४२॥ कुटनाशक लगा देख पाने, ॥३८॥ तथापि हमको तो इस पाप मे ! के इन वर्णमङ्करकारी दोषों मे सनातन जानिधर्म और अलग हो जाना चाहिए, क्योंकि हम कुलक्षय के दोष ! कुलधर्म मिट जाते हैं ॥४३॥ हे जनार्दन ! हम को अच्छी तरह जानते हे ॥३९॥ हे भगवन् ! कुल का लोगो ने सुना है कि जिन मनुष्यों के कुटधर्म नष्ट नाग होने पर सनातन कुल्लधों का नाश होता है। हो जाते हैं वे चिरकाल तक नरक में पद रहने हैं। कुलधर्म के नष्ट होने पर कुल को अधर्म छा देता है । बड़े पेद की बात है कि हम रायमुस के लोभ में ||१०|| अर्म के बढने पर कुटवियां दूषित होनी हैं । । म्यजनों को मारने का पाप करने को उयन हैं ||५|| ।
४०८६ ] म हा भारत [ भागी सजय उराच--एवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविनमानसः ॥४७॥ इनिश्राम महाभारत भी मपर्वणि भगवद्गानामपनिषरस प्रयावद्यार्या योगगास्य श्री गाजुनमगादेऽर्जुनविषादयोगी नाम प्रधमाऽध्याय ॥५॥ परणितु पपिशोऽध्यार ॥२५॥ यदि मैं किसी प्रकार से अपना वचार न करें, बहुत ही श्रेष्ट होगा।॥४६॥ मजय कहते हैं-हे महाराज! निहत्या खडा रहूं और उस दशा में ये धृतराष्ट्र के युद्धभूमि में श्रीकृष्ण से यो कहकर, धनुष और बाण पुत्र शस्त्र लेकर मुझको मार डालें तो यह मेरे लिए फेकार, शोकाकुट अर्जुन रथ पर बट गये ।।४७|| भीमपर्व का पञ्चामा अध्याय समाप्त हुआ ।। २५ ।। -गीना रा पहरा अन्याय समाप्त हुआ। अथ पडविंशाऽध्याय ॥२६॥ मजय उवाच--तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् विपीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः श्रीभगवानुवाच-कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् अनार्यजुष्टमस्व→मकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥ क्लैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ट परन्तप अर्जुन आच--कथं भीष्ममहं संग्व्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजाविरिसूदन गुरूनहत्वा हि महानुभावाञ्थेयो भोक्तुं भक्ष्यमपीह लोके । हत्वाऽर्थकामांस्तुगुरूनिहैब भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५॥ न चैतद्विद्मः कतरन्नोगरीयो यद्वा जयेम यदिवानो जयेयुः। यानेव हत्वान जिजीविपामस्तेऽवस्थिताःप्रमुखेधार्तराष्ट्राः॥६ ।। उन्यामा अध्याय ॥ २६ ॥-गातारा दूसग अध्यय सजय कहते हैं कि हे राजेन्द्र । इस प्रकार कहा-हे शत्रुनाशन ! पूजा के योग्य भीष्म पितामह करणा के वशीभूत होकर, नेत्रों में आसू भरे हुए, और द्रोणाचार्य के ऊपर में किस तरह प्रहार करूँगा' ग्विन्न अर्जुन से श्रीकृष्ण ने कहा-॥१॥ हे अर्जुन ! । किस तरह उनसे युद्ध करूँगा ॥४॥ महानुभार बड़े- इस बुरे समय में तुम्हें यह कापुरुषों का सा निन्द- बूढों की हत्या न करके जो इस लोक में भीख मागकर नीय, स्वर्ग की गति में विघ्न डालनेवाला मोह केसे खाना पड़े तो यह बहुत अच्छा है ! लालची गुरुजन हुआ ? हे अर्जुन । तुम इस समय यह कायरपना, का वध करके इस लोक में रुधिर-लिप्त भोग भोगने यह लोगों का सा भार, छोडो । तुम ऐसे वीर पुरपों । को मिलेंगे । मैं वैसा सुख नहीं चाहता ||५|| मुझे के योग्य यह भार नहीं है । हे परन्तप ' हृदय की पता नहीं कि इस युद्ध में किस पक्ष की हार-जीत क्षुद्र दुवैल्ला को छोडकर उठो ॥२॥३॥ अर्जुन ने होगी, ओर मेरे लिए हार अच्छी है या जीत । जिनमें , अध्याय २५, गीता अध्याय २ ] म हा भारत मजय आच--- कार्पण्यदोपोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यच्छ्यः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ७ नहि प्रपश्यामिममाऽपनुयायच्छोकमुच्छोपणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाऽऽधिपत्यम्॥ ८॥ -एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं वभूव ह ॥ ९ ॥ तमुवाच हपीकेशः प्रहसन्निव भारत सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥१०॥ श्रीभगवानुगाच-अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भापसे गतासूनगतार॑श्च नाऽनुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥ न त्वेवाऽहं जातु नाऽऽसं न त्वं नेमे जनाधिपाः । नचैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥ देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कोमारं यौवनं जरा तथा देहान्तरप्रातिर्धारस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥ मानास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ मारे जाने पर हम स्वय जीना नहीं चाहते वे ही न करना चाहिए उनका शोक करते हुए तुम ऐसी बातें धृतराष्ट्र हमारे सामने युद्ध करने को पड़े हैं कह रहे हो जो सुनने में नो अन्धी जान पटनी हैं, ॥६॥ हे भगान् ! मेरी प्रवृति इस समय करणा के परन्तु बास्ना में अच्छी है नहीं । देगा, जो पण्डिन दोष से बेकाम हो रही है और मेरा चित्त धर्म के हैं वे जीने या मरे किमी के दिए शोक नहीं करते विषय में कुछ काम नहीं देना । मै आपका शरणागत ॥११॥ पहले भी मैं, तुम और ये मर राना लेग शिष्य हूँ। मैं आपसे पूछता हूँ, मेरे लिए जो निधिन उपस्थित थे, और इसके पश्चात भी मैं, तुम और प से रामे अच्छा हो उनी का उपदेश कीजिए ये सन ग्हंगे ॥१२॥ देह गर्ग आना को दम देह || पृथ्वी का निष्कण्टक ममृद्ध राज्य और देश में जमे बचपन, जगनी, बुढ़ापा आदि दगाएँ प्राम नाओं या आधिपत्र प्राम होने पर भी मेरे इम, इन्द्रियों होती है यमे ती एक मगर छोडकर मर शरीरको को निकम्मा करनेगरे, शोक को मिटानेगा कोई प्राम होना । जो धीर पुरपी या टमम व्यापुरता उपाय ना देय पड़ता । मारिए मैं गुस् न करेंगा को प्राम नारी होता ॥१३॥ पियों के माय इन्द्रियों ॥८॥ मजय कहते हैं कि हे मनुदमन ! पीकंग या मम्बन्ध राशीत-उण, मुगदग आदि का गोन्दि से यों कह कर अर्जुन ना हो गये ॥१॥ तर देनेगाअर्जुन : उन सम्बर की होता श्रीरण ने मार दोनों गनाओं के योग मुम्न हो कर कभी ना हो जाता है, अनय नित्य है। र अर्जुन मे कार-१०॥ अर्जुन : जिनका गर । भारत र तुम उने मान बगे है के पुन ।
४०८८ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व -- । - । यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुष पुरुपर्पभ समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥ नाऽसतो विद्यते भावो नाऽभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥ अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् विनाशमव्ययस्याऽस्य न कश्चित्कर्तुमर्हति अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्मायुध्यस्व भारत ॥ १८॥ य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् उभौ तोन विजानीतो नाऽयं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥ नजायते म्रियते वा कदाचिन्नाऽयंभूत्वा भविता वानभूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणोन हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥२०॥ वेदाऽविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् कथं स पुरुपः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥ वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानिदेही॥२२॥ नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोपयति मारुतः ॥ २३ ॥ पुरुपश्रेष्ठ ! यह अनित्य मम्बन्ध अपने सयोग-वियोग । जो कोई इमे मरनेवाला समझता है, वे दोनों अज्ञानी से जिस पुरुष को दुखी नहीं कर पाता वही सुख ' हैं; क्योंकि जीवात्मा न तो किसी को मारता है और और दुःख को समान समझनेवाला धीर पुरुष अमृत न किसी के द्वारा मारा जाता है ॥१९॥ जीनामा भाव अर्थात् मुक्ति को प्राप्त होता है ॥१५॥ तत्त्वदर्शी का न तो जन्म या मरण है और न वह बारम्बार पुरुषों ने यह सिद्धान्न किया है कि जो नहीं (असत्) उत्पन्न या वर्द्धित होता है । वह अजन्मा, नित्य और है यह हो नहीं सकता, और जो है (सत् ) उसका पुराणपुरुप है। शरीर के नष्ट जाने पर भी अभार नहीं होता । आत्मा सर्वत्र व्याप्त है, उसका जीगमा का विनाश नहीं होता ॥२०॥ जो पुरुष विनाश नहीं है । उस अन्यय पुरुष को कोई नष्ट जीगमा को अविनाशी, अज, अन्यय और नित्य नहीं कर सकता। यह देह अनित्य है, किन्तु शरीरी जानता है वह न तो किसी को मारता है और न जीगमा नित्य है । यह अग्निाशी और अप्रमेय है। किमी के द्वारा किसी को मरवाता है ॥२१॥ मनुष्य इसलिए है भारत ! तुम युद्ध करो ॥१६॥१८॥ जो 'जैसे मलिन वस्त्र उतारकर नये वस्त्र पहनता है वैसे कोई दम जांगमा को मारनेवाला समझना है, और ही यह आन्मा जीर्ण शरीर को छोड़कर दूसरा नया -22:wwwssss अध्याय २६; गीता अध्याय २ ] म हा भारत [ ४०८१ । अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमलेद्योऽशोप्य एव च नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥ अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नाऽनुशोचितुमर्हसि ॥ २५॥ अथ चनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नेनं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ।। जातस्य हि ध्रुवो मृत्युधुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्यऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७॥ अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८॥ आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चाऽन्यः। आश्चर्यवञ्चैनमन्यःशृणोति श्रुत्वाऽप्येनं वेद न चेव कश्चित्॥२९॥ देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥३०॥ स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धाद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥ डारीर ग्रहण कर लेता हे ॥२२॥ आमा को शस्त्र होनेवाली वार्ता के लिए शोक करना अयोग्य है काट नहीं सकते, अगि उमे जला नहीं सकती, ॥२७॥ हे भारत ! मा प्राणियों का आदि और जल उसे गीला नहीं कर सकता, वायु उसे मुगा अन्न अव्यक्त है केवट जन्म और मृयु के मध्य का नहीं सकती ॥२३॥ यह अच्छेद्य, अदाा, अरेय समय व्या ( प्रकट ) है । इमलिए उसके बारे में और अशोप्य है। वह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, । शोक करना वृथा है । ॥२८॥ कोई इस जीनामा अचल और मनातन है ॥२४॥ यह नेत्र आदि को आचर्य सा देयता है, कोई आधर्य मा वर्णन इन्द्रियों की पहुँच से बाहर, अचिन्स और स्किार- , करता है और कोर्ट आचर्य मा गुनता है । कोई देगे रहित है । इस कारण तुम जापामा को ऐमा ममदा- भी है किजीममा का वर्णन मुनकर भी हमके बारे में कर गोफ और मोह न कगे ॥२५|| जांगमा को कुछ नहीं जान सकते ॥२॥हे भारत ! यह देहधारी जो तुम निसजात समझते हो, या नियमृत ही जागमा सभी देशों मे नित्य आय । इस कारण रामदाते हो, नी मी हे महापाद ! उसके लिए तुमको विगी प्राणी के लिए गोच करना तुम उचित नहीं गोकन करना चाहिए, ॥२॥ क्योकि जो उपन ॥३०॥ मा अतिरिक्त अपने अर्थात क्षत्रिय के धर्म हुआ है उसकी मृयु निधित है और मेरी जो का भी गया' को नुम् इन नाह में शामिभूत या गरता है उसमा जन्म निमित। अतपरम आन्य कार न होना चाहिए । शनिय के लिए धर्म-युद्ध
४०९० ]
म हा भा र न
[ भीमपर्व
-
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥
अथ चेत्त्वमिमं धयं संग्रामं न करिप्यास
ततः स्वधर्म कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥
अकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाऽकीर्तिमरणादातिरिच्यते ॥ ३४ ॥
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः
येषां च त्वं वहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥
अवाच्यवादांश्च वहन्वदिष्यन्ति तवाऽहिताः
निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ३६ ॥
हतोवा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वावा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८॥
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिोंगे विमां शृणु।
बुद्धया युक्तो यया पार्थ कर्मवन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥
नेहाऽभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४०॥
से बढ़कर और कोई श्रेष्ठ काम हो ही नहीं सकता उन्ही की दृष्टि मे तुम कुछ भी रहोगे ॥३५॥
॥३१॥ हे पार्थ ! युद्ध तो आप से ही प्राप्त, खुला । मनु-पक्ष के लोग तरह-तरह से तुम्हारी निन्दा करेगे।
हुआ स्वर्ग का द्वार है, वह बड़भागी क्षत्रियो को । तुम्हारी सामर्थ्य की निन्दा होने से बढकर दुख
प्राप्त होता है ॥३२॥ जो तुम यह धर्मयुद्ध नहीं की वात ओर क्या है ॥३६॥ मारे जाओगे तो स्वर्ग प्राप्त
करोगे तो अपने कर्तव्य ओर कीर्ति को गाकर पाप होगा और जो शत्रुओं पर विजय पाओगे तो पृथ्वी.
के भागी बनोगे। ||३|| चिरकाल तक लोगो में मण्डल का राज्य करोगे । इसलिए हे अर्जुन ! युद्ध
तुम्हारी निन्दा की चर्चा होती रहेगी । तुम्हें यह का दृढ़ निश्चय करके तैयार हो जाओ ॥३७|| सुग्व..
प्रतीत ही है कि प्रतिष्टित आर कीर्तिशाली पुरप के दु ग्य, राम हानि, जय-पराजय को समान ममझकर
लिए निन्दा मृयु से भी बढ़कर है ॥३४॥ जो लोग युद्ध करो। इस तरह तुम पाप के भागी नहीं बनोगे
अब तक तुम्हारा बहुत सम्मान करते आये है वहीं | ॥३८॥ हे पार्थ ! यह मैंने तुमको सारयशास्त्र
महारथी योदा ममझेंगे कि तुम मय के मारे युद्ध । (आमतत्व के ज्ञान ) की बुद्धि बनाई है। अब इसी
नहीं करते हो । जिनसी दृष्टि में तुम बहुत कुछ थे | बुद्धि को कर्मयोग के अनुसार तुममे कहता हूँ॥३९॥
अध्याय २६, गीता अयाय २ ] म हा भा र त [ ४००१ व्यवसायात्मिका घुद्धिरेकेह कुरुनन्दन वहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥ यामिमां पुप्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नाऽन्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥ कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषवहुला भोगेश्वर्यगति प्रति ॥४३॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ १४ ॥ त्रैगुण्यविषया वेदा निस्वैगुण्यो भवाऽर्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥ यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके नावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥४६ ॥ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥४७॥ इम बुद्धि स युक्त होकर तुम कर्म-चपन से छूट ऐश्चर्य की प्राप्ति के सापन स्वरूप बहुविध क्रिया जाआग । यह कर्मयोग का अनुष्ठान की फिर प्रकाशक क्यो की ओर जिनरा चित्त आकृष्ट हो नही हाता आर इसमें दाप भा नहीं होता । इस धर्म रहा है आर जो भाग तथा ऐश्चर्य के भूग्व हैं, उन का थोडासा अनुष्टान भी मनुष्य को पड। वडा विप अविकी मूढ पुरुषों की बुद्धि समाधि या एकाग्रता त्तियों से पचा लेता ह ॥४०॥ हे कुरनन्दन ' इस के विषय में स्थिर नहीं होती । कामनापरतन्त्र लोगों कर्मयोग में निश्चयामिश एक ही बुद्धि होती ह । के लिए रदे-शाम चर्मपर का प्रतिपादन करते हैं। किन्तु जिन लोगों में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं है, हे अर्जुन ! तुम शीत-उष्ण, सुख दुग्य आदि द्वन्द्व अर्थात् जो निवरहीन या अव्यवस्थित चित्त हैं, उनकी धर्मो को सहते हुए पर्यशाल, योगक्षेम-रहित, प्रमाद- बुद्धिया अनन्त और बहुत आगाओंाली होती है शून्य आर निष्काम चनो ॥४२।४५|| यद्यपि पड़े ॥४१॥ जो लोग लम्बी-चादा आर कानों को सुप बहुत अधिक जर रहता है पिर दनंगली वाक्यारी पर लट्ट हैं, बहुपरदायक वर्म भा मनुष्य उग मर जर को अपने व्याहार में नहीं काण्डमूरक वेदनात्य ही जिन्हें प्रनिग्रद हैं, जो रोग लाता, यह तो उतने ही नर से काम लेता है निनने फरमान के सिवा और कुछ भी नही स्वीकार में मि उमर स्नान आदि करने और गाने-पीने करते और इच्छाओ के दाम हैं उन अपिया मूद आदि का काम हो जाय, स, इतना हा प्रयोजन पुरषो की बुद्धि एकाग्रता के विषय मे स्थिर नहीं व्युमन मतिया बाण का मर वेदों में है, अर्थात् है, जो रोग वर्ग गोही परम पुरपार्थमाधक वेद के एक अा उपनिषद् का श्रवण करने में ही समाने हैं, जमकर्म परदायक आर भोग तथा सम्पूर्ण रहों का प्रयो न निदा नायगा क्योंकि भारा जत्याय ४०९२ ] महाभारत [ भाग योगस्थः कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय सिद्धयसिद्धयोःसमोभृत्वा समवं योग उच्यते॥४८॥ दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ १९ ॥ बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५० ॥ कर्मजं वुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । जन्मवन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥ यदा ते मोहकलिलं वुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ ५२ ॥ श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ ५३॥ अर्जुन उवाच-स्थितप्रज्ञस्य का भापा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभापेत किमासीत ब्रजेत किम् ॥ ५४ ॥ श्रीभगगनुगच-प्रजहाति यदा कामान्सन्पिार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवाऽऽत्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥ सिद्धि के लिए पूरे वेदों के अनुष्ठान की न तो पुरुष इस लोक मे पुण्य और पाप दोनो को छोड आवश्यकता है और न एक जन्म में उनका अनुष्ठान देता है । इमलिए तुम कर्मयोग के लिए यन कगे। ही पूर्ण हो सकता है ॥४६॥ हे अर्जुन ! तुम्हें कर्म ईश्वर की आराधना और कर्तव्य कर्म के संपादन द्वारा करने का ही अधिकार है । कर्म करो, फिन्तु कर्मपाल बन्धन के कारण म्प कर्मों से अपने को मुक्त करने की इच्छा मत करो। तुम कर्मफल का कारण मत का कौगल ही योग है ॥५०॥ कर्मयोगी ज्ञानी पुरम वना ओर कर्म-त्याग में तुम्हारी आसक्ति न हो कर्म के फल को त्यागकर, जन्म-मरण के बन्धन में ॥४७॥ तुम आसक्ति छोड़कर, ईश्वरानुरक्त होकर, मुक्ति प्राप्त करते हुए, अनामय अमृत पद को प्राप्त सिद्धि ओर असिद्धि को समान समज्ञते हुए, कर्म के होते हैं ॥५१॥ जब तुम्हारी बुद्धि मोह की दलदल अनुष्ठान में प्रवृत्त हाओ । सिद्रि आर असिद्धि को से निकल आनेगी तब तुम्हें सुनने योग्य और सुने समान समझना ही तो योग हे ॥४८॥ हं धनञ्जय ! हुए विषय से वैराग्य उत्पन्न हो जायगा ॥५२॥ तुम्हारी बुद्धियोग की अपेक्षा फलापेक्षी कर्म अत्यन्त निकृष्ट | बुद्धि अनेक प्रकार के वैदिक और लौकिक विषयों ह । इसलिए तुम फल की इच्छा छोडकर बुद्धि का को सुनकर चकरा सी गई है । जब तुम्हारी बुद्धि ही आश्रय लो । फल की चाह रखनेवाले कृपण या निश्चल होकर समाधि मे स्थित होगी तब तुम्हें योग दीन हैं ॥४१॥ कर्मयोग-विषयिणी बुद्धि मे युक्त ! अर्थात् तत्वज्ञान प्राप्त होगा ॥५३॥ अर्जुन ने पूछा- । answer अन्याय २६ गीता अयाय २ । महा भारत - दुःखेप्यनुद्विग्नमनाः सुखेपु विगतस्पृहः वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६॥ यः सर्वत्राऽनभिन्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् । नाऽभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्टिता ॥ ५७ ॥ यदा संहरते चाऽयं कूमोऽङ्गानीच सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्टिता ॥५८ ॥ विपया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः रसवर्ज रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते यततो यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥ तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिना ॥६१ ॥ ध्यायतो विपयान्पुंसः सङ्गस्तेपूपजायते सङ्गात्सआयते कामः कामाक्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ।। क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाट्ट बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ।। है यामुदेव ! समाविम्य और पिता व्यक्ति का चाहिए ॥५॥ निरार देधार्ग व्यक्ति को इन्टियां रक्षण क्या है। मितनुदि पुरुप की भाषा, अपम्या भी विषयों को मंद देना , आर या निगहा नया व्यवहार क्या और कमा int॥५॥ व्यक्ति मामर्थन गने के कारण पि गाट यादव ने कहा हे अर्जुन ! जो व्यक्ति पर नाह जाता है, किन्तु मिना नहीं कहा जा गाना का नागनाओं का साग दवा , मिगी आमा १५.०अर्जुन ! प्रा दिया अग्ने में ही मन्नध रहनी है, यही मिनप्रस कहलाता पिएगातार गन कानमा किन् पुरा के भी 41 मिना निगम गिल नारी होता मनको सिको गनी और जो मुग की रानी समतामगिर पानि पुल या ॥५६॥ जो पुर आदि पर ममता स ग्नेट नहीं लिया गोद देना गानीमा नि? माने या यमना at rzTE पुरण का परमप्राट मा. गि "पनि मेय। ॥७॥ ग पुग्यो यो उनमे में TRE 3. Entire in पीमांक: EtRRITRA महाभारत [ भीमपत्र । रागद्वेषवियुक्तैस्तु विपयानिन्द्रियैश्चरन् आत्मवश्यविधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥१४॥ प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते प्रसन्नचेतसो ह्याशु वुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥६५॥ नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चाऽयुक्तस्य भावना । न चाऽभावयत शान्तिरशान्तस्य कुतः सुग्नम् ॥ ६६ ॥ इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते तदस्य हरति प्रज्ञां वायु वमिवाऽम्भसि ॥६७॥ तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८॥ या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥ ९ ॥ आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वेस शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥ बिहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । ईश्वरपरायण आर समाहित होने पर जिसकी इन्द्रिया ! सुख कहा ॥६६॥ चिपया में विचरनेवाली इन्द्रियों रिपयों की ओर चलायमान नहीं होती उसी की का अनुगामी मन मनुष्य का प्रना को से ही चारों प्रज्ञा निश्चल है, वही स्थितप्रज्ञ ह । विषयों के और डापाडोल करता रहता है, जसे नदी में नान चिन्तन से उधर आसक्ति होती है। आसक्ति से ! आदि को आधी इधर-उपर हिलानी रहती ||६७|| इच्छा होती है, इच्छासे क्रोध, क्रोध से मोह, मोह से इसलिए हे महाराहु अर्जुन स्थिरबुद्धि और दृदप्रज्ञ स्मृतिभ्रश, स्मृतिभ्रश से बुद्धिनाश ओर बुद्धिनाश रही ह सिसकी कि इन्द्रिया विषयों से हटाई जारर से निाश होता हे ॥६११६३॥ निसने आमा या पश में कर ली गई हैं। जिनसरी बुद्धि अज्ञान से मन को वश में कर लिया है, वह राग-द्वप-हीन ओर अ कार से टकी हुई हे उनके लिए यह ब्रह्मनिष्टा आत्मपशीभूत इन्द्रियों के द्वारा विषय भोग करके भी रात्रि के समान है ॥६८॥ उम ब्रह्मनिष्ठा की रात आमप्रसाद (सतोप) प्राप्त करता है ॥६॥ सन्तोष में नितद्रिय योगी जागते रहते हैं । ओर सर प्राणी के अमरम्बन से सब प्रकार के दु ख नष्ट हो जाने निस पियनिष्ठा रुस दिन में जागते रहते हैं, यह हैं । निसे सन्तोष प्राप्त हो जाता है उसकी बुद्धि दिन ही तत्वदर्शी मुनि के लिए रात्रिरस है ॥६९॥ शीघ्र ही स्थिर हो जाता है ॥६॥ जो अयुक्त अर्थात् सत्र नठिया जैसे अचरप्रतिष्ठ आपूर्यमाण समुद्र अजितेन्द्रिय है यह बुद्धिहीनता के कारण कुट विचार जाकर मिल जाती हैं जैसे ही सब काम ( अर्थात् नहा कर माता । जो विचार नहीं कर सफ्ना उसे ' विषयवामनाएँ) जिसमें लान हो जाते हैं वही योगी शान्ति नहीं प्राप्त होती और जो अशान है उमे शान्ति पाता ह—मुक्त होता ह । कामनामी अर्थात में 1111 २७, गाना अध्याय ३ ] म हा भार न [ ४०९५ निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥७१ ॥ एपा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२॥ इति श्रीम महामाग्ने भीमपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीनाम्प ने म ब्रह्मविद्याया योगशास्त्रे श्रीरणार्जुनमगादे गाग्ययोगोनाम द्वितीयोऽध्याय ॥२॥ पर्वणि तु षड्दिशोऽव्याय ॥ २६ ॥ भोगार्थी पुरुष उस शान्ति या मुक्ति को नहीं प्राप्त कर अर्जुन ! यह ब्राह्मी स्थिति (ब्रह्म में लीन होने की अवस्था) सकता ॥७०॥ हे पार्थ ! जो पुरुप सब इच्छाएँ त्यागकर । है । ब्रह्मज्ञाननिष्ठ पुरुष इस स्थिति को पाकर मोहित निस्पृह,निरहङ्कार, निर्मम होकर----इन्द्रिय-विषयो का नहीं होते । अन्तकाल में भी इस ब्रह्मनिष्टा में स्थित उपभोग करता है वही शान्ति प्राप्त करता है ॥७॥ हे ! होनेवाला पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होता है ।।७२।। भीमपर्व का छन्त्रीमा अध्याय ममाप्त हुआ ।। २६ ॥--[गीना मा दमग अध्याय समाप्त आ] अथ मातरिशोऽध्याय ॥ २७ ॥ अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन तरि कणि घोरे मां नियोजयसि केशव व्यामिश्रेणेव वाक्येन वुद्धिं मोहयसीव मे तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमानुयाम् ॥ २ ॥ श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्दिविधा निष्टा पुराप्रोक्तामयाऽनघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥ न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य पुरुपोऽश्नुते न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणेः सत्ताईगवा अध्याय ॥ २७ ॥---[गीता का नीगग अध्याय) अर्जुन ने कहा --हे केशर ! यदि तुम्हारा यह चुका है कि इस लोक में निष्टा दो प्रकार की है। सिद्धान्त है कि कर्म की अपेक्षा ज्ञान ही श्रेष्ठ है, तो पिमल चित्तपाले माग्य मतापदम्बियों का ज्ञानयोग फिर मुझे इस घोर कर्म, हत्याकाण्ड, में क्यों नियुक्त और कर्मयोगियों का कर्मयोग मार्ग है ॥३॥ पुरुष करते हो ! ॥१|| तुम कभी तो ज्ञान की और कभी । कर्म किये बिना नैष्कर्म्य (ज्ञान ) को नहीं प्राम कर्म का प्रशसा करके मेग युमि को मानों मोह में होता । ज्ञान प्राह किये बिना केरल मन्याम में भी डाट रहे हो । इसलिए निधय करके मुझसे एक मिदि नरी ग्राम की जा सकती ॥१॥ कोई पुरता ही वात कही, जिसमे मुझे कल्याण ग्राम हो ॥२॥ पर भा भी कर्म किये रिना नहीं रह माना। श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन ! मैं पहले ही यह हाला न गने पर भी प्रानि के गुण विरा करके म हा भारत [ भीमपर्व कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियान्विमूढारमा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥ यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्याऽऽरभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मवन्धनः तदर्थ कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा सहोवाच प्रजापतिः अनेन प्रसविष्यध्वमेप वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥ देवान्भावयताऽनेन ते देवा भावयन्तु वः परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ इष्टान्भोगान्हि बो देवा दास्यन्ते यज्ञ भाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुक्ते स्तेन एव सः ॥१२॥ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥ अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥ उससे कर्म करा लेते हैं ||५|| जो व्यक्ति कर्मेन्द्रियों | प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ सहित सब प्रजा को उत्पन्न को संयत करके मन ही मन इन्द्रियों के विषयों का करके कहा कि तुम इसी यज्ञ के द्वारा फलो-फलो । ध्यान करता है, यह मुद्दामा पुरुष कपटाचारी कह यह यज्ञ ही तुम्हारे मनोरथों को पूर्ण करेगा ॥१०॥ लाता है ॥६॥ जो व्यक्ति ज्ञानेन्द्रियों को वश मे तुम लोग यज्ञ के द्वारा देवताओं को सन्तुष्ट करो करके अनासक्त भाव से कर्मेन्द्रियों से कर्म करता है ! ओर वे देवता तुम्हारी वृद्धि करें । इस तरह का वही कर्मयोगी श्रेष्ठ है ॥७॥ इमसे तुम नियमित कर्म दूसरे को परिवर्द्धित अथवा सन्तुष्ट करने से दोनो को का निर्वाह करो । कर्म छोड़ देने से तो कर्म करना परम कल्याण प्राप्त होगा ॥११॥ यज्ञ से सन्तुष्ट ही श्रेष्ठ है । कर्मत्याग कर देने मे तुम शरीर धारण देवगण तुम्हें अभिलपिन फट देंगे । जो पुरुष देवताओं भी नहीं कर सकते ॥८॥ यज्ञ या विष्णु के लिए के दिये हुए भोग्य पदार्थो को, देवताओं को अर्पण जो कर्म किया जाता है उसके अतिरिक्त ओर मब ! फिये पिना, स्वयं भोग करता है वह चार है ॥१२॥ कर्म बन्धनम्बम्स हैं । इस कारण तुम आमक्ति छोड़ सजन पुरुष यज्ञ मे बचा हुआ पदार्थ या करके कर भगाप्रीत्यर्थ कर्म करो ॥९॥ पूर्व ममय में सब पातकों से छुटकारा पा जाते हैं । जो लोग
जगार २५ गायाम:
।
-
कर्म ब्रह्मांड्वं विद्धि ब्रह्माऽक्षरसमुद्भवम् ।
नस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं बने प्रतिष्टितम्
एवं प्रवर्तितं चक्रं नाऽनुवर्त्तयतीह यः
अघायुरिन्द्रियागमो मोघं पार्थ स जापति ॥ १३ ॥
यस्त्वात्मरनिरव स्यादात्मतृप्तश्र मानवः
आत्मन्येव च मन्तुष्टस्तम्य कार्य न विद्यते ॥ १७ ॥
नेत्र तन्य कृतेनाऽथा नाऽनेनेहे कथन
न चाऽन्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥१८॥
नम्मादमतः मननं कार्य कर्म ममाचर
असतो पाचग्न्कर्म परमानोनि पूम्पः
कर्मणय हि मंसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकमंग्रहमवापि सम्पयन्कर्तुमहमि
यद्यदाचरति श्रेष्ठम्नत्तदेवेनगे जनः
म यत्प्रमाणं कुम्ने लोकम्नदनुपर्नने ॥१॥
न में पार्थाऽस्ति कर्नव्यं त्रिषु लोक शिमन ।
नाऽनयाप्तमाप्तव्यं वर्त पर व कर्मणि
यदि यहं न बनेंयं जानु कर्मण्यनन्दिनः
मम यमाऽनुवर्तन्ने मनुष्याः पार्थ मशः ॥ २३ ॥
४०९८ ] म हा भारत [ भीमप - उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥ सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुलॊकसंग्रहम् ॥ २५॥ न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोपयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ २६ ॥ प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥२७॥ तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्त्वा न सजते ॥ २८ ॥ प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नचिन्न विचालयेत् ॥ २९ ॥ मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याऽध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यख विगतज्वरः ॥ ३० ॥ ये में मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ लिए पृथ्वीमण्डल में अप्राप्य कुछ नहीं देखता इमी | जिनकी बुद्धि अहङ्कार से अभिभूत हो रही है वे से मेरे लिए कर्तव्य कर्म भी कुछ नहीं है, तो भी मैं । लोग अपने को ही उन कर्मों का करनेवाला समझते कर्म करता हूँ ॥२२॥ यदि मैं आलम्य टोडकर कर्म । है ॥२७॥ इन्द्रिया ही विषयो की इच्छा करती है, न कर तो सभी लोग, मेरे अनुगामी होकर, कर्म । यह जानकर गुण-कर्म-विभाग के तत्व को जानने- करना छोड़ दें ॥२३॥ हम प्रकार मेरे कम न करने वाडा पुरम सिम्यो में आसत नहीं होना ॥२८॥ मे इन मव लोगों के नष्ट होने की आगवा है। जो लोग प्रकृति के मन्त्र आदि गुणों में विमुग्ध होकर ऐसा करने मे मैं वर्णमद्दर का करनेवाला और प्रजा इन्द्रियों के वशीभूत होते हैं वैसे अन्पदर्शी विमुद्र की मरिनता का मूल कारण बन जा सकता हूँ ॥२४॥ व्यक्तियो को, सर्पज्ञ पुस्प का कर्तव्य है कि, कभी इमलिए मूह लोग जैसे फल की कामना से कर्म कर्म से विचग्नि न करे ॥२०॥ तुम मुझमें मर कर्म करते हैं वैसे ही ज्ञानी पुरुष आमक्ति त्यागकर, लोगो अर्पण करके नया यह मोचकर कि मैं अन्तर्यामी के धर्म की रक्षा के लिए, कर्म करते रहते हैं ॥२५॥ पुस्प के अधीन होकर कर्म करता है,-कामना, जानी लोग कर्म में आमक्त, निर पुरषो की बुद्धि ममता ओर शोक त्यागकर-ममर के लिए तैयार को भ्रम में न डारकर म्पय नरह-तरह के कर्म करते । हो जाओ ॥३०॥ जो रोग अमृयाहीन और श्रद्धायुक्त हुए उन्हें कर्म करने में पगाते है ॥२६॥ मभी कर्म होकर मदा मेरे अनुगामा होते हैं, वे मर कर्मों के प्रति के गुणरप इन्द्रियों के द्वारा होते है, किन्तु । बन्धन से छुटकाग पा जाते है ॥३१॥ जो लोग अन्याय २७, गीता अध्याय ३ ] म हा भारत [ ४००० - । ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नाऽनुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥ सदृशं चेष्टते खस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि प्रकृति यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥ इन्द्रियस्येन्द्रियस्याऽर्थे रागद्वेयौ व्यवस्थितो । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥ श्रेयान्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः अर्जुन उवाच ---अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय वलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥ श्रीभगवानुवाच काम एप क्रोध एप रजोगुणसमुद्भवः महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ॥३७ ॥ धूमेनाऽऽवियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च यथोल्बेनाऽऽवृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥ आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवेरिणा कामरूपेण कौन्तेय · दुप्रेणाऽनलेन च ॥ ३९ ॥ इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याऽधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येप ज्ञानमावृत्त्य देहिनम् ॥४०॥ अमूया के वश होकर इस मरे मत को ईर्ष्या की धर्म की अपेक्षा कुछ गुण-हीन होने पर भी अपना दृष्टि से देखते हैं और मेरे मत के अनुमार नहीं धर्म श्रेष्ठ है । पराया धर्म अत्यन्त भयङ्कर है । इस- चलते, उन सर्वज्ञान-विमूढ़ पुरुषों को अचेत और लिए अपने धर्म के पालन में मर मिटना भी श्रेयस्कर नष्ट समझो; अर्थात् वे ब्रह्म और कर्म के विषय मे है ॥३५॥ अर्जुन ने पूछा--हे वासुदेव ! यह पुरुष निमोहित होकर नष्ट होते हैं ॥३२॥ ज्ञानी व्यक्ति किमकी प्रेरणा से, इच्छा न होने पर भी, बलपूर्वक भी अपने स्वभाव के अनुरूप कर्म करते है । इसलिए नियुक्त सा होकर पापकर्म करता है ॥३६॥ वासुदेव जब सभी प्राणी स्वभाव के अनुगामी होते है तत्र ने कहा-हे अर्जुन ! यह काम ही कोध के रुप इन्द्रियनिग्रह करने से क्या हो सकता है ? ॥३३॥ मे परिणत, रजोगुण से उत्पन्न, अत्यन्त उग्र और हर एक इन्द्रिय मे अनुकूल विषय के प्रति आसक्ति महापापरूप है। इसे तृप्त करना बहुत ही कटिन और प्रतिकूल विषय के प्रति देष है । ये दोनों बातें काम है । यही मुक्ति के मार्ग में बाधा पहुंचानेवाला मोक्षप्राप्ति में बाधक है । इसलिए इनके वशीभूत शत्रु है ॥३७॥ जेसे धुएँ से अग्नि, मैल से दर्पण होना उचित नहीं ॥३४॥ अच्छी तरह अनुष्टित पराये । और जरायु (एक प्रकार की महीन झिल्ली ) से ।
४१०२ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व । न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥ एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कमैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥ कर्मणो ह्यपि वोद्धव्यं वोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च योद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७॥ कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥ यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ २० ॥ निराशीयतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाऽऽप्नोति किल्विपम् ॥ २१ ॥ उसी प्रकार भजता हूँ । हे पार्थ ! सभी मनुष्य मेरे | के लोगों ने मुझे डमी तरह जानकर कर्म किये हैं | ही मार्ग का अनुगमन करते हैं ॥११॥ मनुश्य-टोक | बडे-बूढे जिस तरह कर्म करते आये है उसी तरह में सब कर्म शीघ्र ही मफल होते हैं और उनकी तुम भी कर्म करो ॥१५॥ इस लोक में क्या कर्म है सिद्धि प्राप्त होती है । इमी कारण मनुष्य, कर्मों की ओर क्या अकर्म है, इसकी मीमासा करने में ज्ञानी सिद्धि चाहते हुए, इस रोक में देवताओं की पूजा | लोग भी मोहित हैं । मैं अब वहीं कर्म तुममे कहता करते है, किन्तु वास्ता में वे मर मेरे ही उपासक है जिसे जानकर तुम अशुभ से, ससार से, मुक्त हो हैं ॥१२॥ हे पार्थ ! गुण और कर्म के विभाग के | जाओगे, सुनो ॥१६॥ कर्म की गति बहुत ही अगम्य अनुमार मैंने ही ब्राह्मण आदि चारों वर्गों की मृष्टि है, इस कारण मनुष्य को कर्म (पिहित कर्म ), की है। मैं उनका कती भी हूँ और असता भी अकर्म (निषिद्ध कर्म) और किम (कर्मत्याग) ॥१३॥ म संमार की सृष्टि करनेवाला होकर भी | तीनों का ज्ञान प्राम करना चाहिए ॥१७॥ जो मनुष्य अदिप्त है । कर्म मुझे सर्म नहीं कर सकते, क्योंकि । कर्म करते रहते भी अपने को कम न करनेवाला मुझमें कर्म फट की इच्छा ही नहीं है। जो पुम्प और कर्म के न करते रहने भी कर्मयुक्त समझता है, मुझे इस तरह जानना है, यह कर्मबन्धन में नहीं | वही मनुष्यों में धीमान् , योगी और सर कर्म करने- बैंगना ॥१॥ मोक्ष की इच्छा ग्गने गारे पूरसार । गठा है ||१८) पट की कामना मे जिसके सर अन्याय २७, गांता अध्याय ३ ] महाभारन - यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वानीतो विमत्सरः समः सिद्धावसिद्धो च कृत्वाऽपि न नियध्यने॥ २२॥ गतसङ्कस्य मुक्तस्य जानावस्थितचेतसः यज्ञायाऽऽचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३ ॥ ब्रह्माऽर्पणं ब्रह्म हविब्रह्मानो ब्रह्मणा हुनम् । ब्रह्मव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २२॥ देवमेवाऽपरे यनं योगिनः पर्युपासते ब्रह्मानावपरे यनं यलेनवोपजुह्वति श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निपु जुह्वनि शब्दादीन्धिपयानन्य इन्द्रियाग्निपु जुद्धति ॥ २६ ॥ सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चाऽपर आत्मसंयमयोगानी जुह्वति ज्ञानदीपिने द्रव्ययताम्तपोयना योगयज्ञाम्तथाऽपरे स्वाध्यायज्ञानयनाथ यनयः मंशितव्रताः अपाने जुहति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे प्राणापानगती मध्या प्राणायामपरायणाः - । .- महा भारत [ भीष्मपर्व अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षापितकल्मपाः ॥३०॥ यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् नाऽयं लोकोऽस्त्ययजस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥ एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥३२॥ श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप सर्व कर्माऽखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४॥ यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यति पाण्डव येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥३५॥ अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥३६॥ यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥३७॥ आमन्यानरूप योगाग्नि में ज्ञानेन्द्रियों के, कर्मेन्द्रियों | रूप अमृत भोनन करके सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते के ओर प्राणवायु के कर्मों की आहुति दे देते है||२७॥ हैं । हे कुरश्रेष्ठ | यज्ञहान व्यक्ति के लिए यह कोर्ट-कोई व्रतधारी यतिगण द्रव्यदान, कृच्छू-चान्द्रायण अन्पसुखमाला मनुष्यलोक ही नहीं रहता, फिर उसके आदि तपस्यारूप यज्ञ, चित्त वृत्ति-निवारण द्वारा लिए स्वर्ग आदि के सुस की सम्भावना कहा ॥३१॥ ममाधिम्प यज्ञ, वेदाध्ययनरम्प यज्ञ ओर वेदार्थज्ञान- इस प्रकार तरह-तरह के यज्ञों का वर्णन वेद में प यज्ञ आदि कई एक यज्ञ करते है ॥२८॥ कोई विस्तार के साथ किया गया है । ये सन यज्ञ कर्म प्रयनशील तीक्ष्णवनधारा पुस्प अपान वायु में प्राण से उत्पन्न हैं, आमा के साथ इनका कोई ससर्ग नहीं गायु का हरन करके पूरक, तथा प्राण मे अपान है । तुम यह जानकर मुक्ति प्राप्त करोगे ॥३२॥ हे वायु का हनन करके रेचक और प्राण नया अपान शनुदमन पार्थ ! द्रव्यभय देव आदि यज्ञों की अपेक्षा की गति रोककर कुम्भकम्प प्राणायाम करते हैं। ज्ञानयज्ञ ही श्रेष्ठ है, क्योंकि फटसहित सभी को ॥२९॥ और, कोई नियताहाग होरर अन्त करण की समाप्ति झान में ही होती है ॥३३॥ हे अर्जुन ! वृत्ति में प्राणेन्द्रियों की आहुति देते हैं। ये मत्र तुम तत्वदर्शी ज्ञानियों के समीप जार प्रणाम, प्रन यज्ञरेत्ता गानी इन यतों के द्वारा पाप का नाम और मेगा करके ज्ञान सागो। तुम्हारी भक्ति से यति ॥३०॥ येमा पुरष यन करते हुए 'यार' प्रमन्न होकर तुम्हे जान का उपदेश देंगे ॥३४॥ है
अगा? २०, गाता अगाए ।
--
नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनाऽऽत्मनि विन्दति ॥ ३८॥
श्रद्धावाँलभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः
ज्ञानं लब्ध्वा पगं शान्तिमचिरेणाऽधिगच्छति ॥ ३२ ॥
अलश्चाऽश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति
नाऽयं लोकोऽस्ति न पगेन मुख मंशयात्मनः॥१०॥
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नमंायम्
आत्मवन्तं न कर्माणि निवनन्नि धनञ्जय ॥११॥
नग्मादलानसम्मृतं हत्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः ।
छित्वनं संगयं योगमानिष्टोत्तिष्ट भारत ॥१२॥
४१०६ ] महाभारत [ भीम ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी योन द्वेष्टि न कांक्षति । निर्द्वन्द्वो हि महावाहो सुखं वन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तयोगैरपि गम्यते । एक सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥ संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्नुमयोगतः योगयुक्तो मुनिब्रह्म न चिरेणाऽधिगच्छति योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघन्नश्नन्गच्छन्स्वपश्वसन् ॥ ८ ॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिपन्निमिपन्नपि इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्त्तन्त इति धारयन् ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाऽम्भसा ॥१०॥ उनतीमवा अध्याय ॥ २०॥गानाका पाचवा अध्याय] अर्जुन ने कहा- हे श्रीकृष्ण ! आप कर्मों का को मिलने वाला मोक्षपद कर्मयोगी पुरुष को भी न्यास (त्याग) और कर्मयोग दोनों का उपदेश कर मिलता है। जो लोग कर्मसन्यास और कर्मयोग दोनों रहे हैं । इनमें कोन श्रेष्ठ है, सो निश्चय करके कहिए को एक मात्र से देखते हैं, वे ही सचमुच तत्वदी ॥१॥ भगवान् ने कहा-हे पार्य ! कर्मत्याग और हैं, ॥५॥ किन्तु कर्मयोग के निना केवल सन्यास से कर्मयोग, दोनों के द्वारा मुक्ति प्राप्त होती है, किन्तु मोक्ष की प्राप्ति बडी कठिनाई से होती है । कर्म- दोनों में कर्मयोग ही प्रधान है ॥२॥ द्वेष ओर इच्छा योगी बहुत शीघ्र ब्रह्म को प्राप्त हो जाते हें ॥६॥ से शून्य व्यक्ति ही निय सन्यामी है । क्योंकि इस जो व्यक्ति योगी होकर पिशुद्धामा बन चुका है, तरह के निर्द्वन्द्व पुस्य ही ससार के बन्धन से बचे जिसने शरार ओर इन्द्रियो का वश में कर लिया है रहते हैं ॥३॥ मृद लोग ही मन्याम आर योग के । ओर जो अपने आमा को सर प्राणियों के आमा जुदे-जुदे फल बताते हैं, ज्ञानी लोग नहीं । जो के समान जानना है, यह ससार-निर्वाह के लिए कर्म व्यक्ति मन्यास और योग, दोनों में से कार एक करके भी उममें लिप्त नहीं होता जा तत्वदी का ही अनुष्ठान विशेष रप मे करते है, ये दोनों कर्मयोगी पुरप देगकर, सुनकर, छर, मूंघकर, के ही यमार्य पर की प्राम करते है ॥४॥ सन्यामियों गार, चरकर, सोकर, बातचीत कर और त्याग, अध्याय २९; गीता अध्याय ५ ] म हा भारत [ ४१०७ । कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये ॥ ११ ॥ युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमानोति नैष्ठिकीम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निवध्यते ॥ १२ ॥ सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽऽस्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥ न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोग स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥ नाऽऽदत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनाऽऽवृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५ ॥ ज्ञानेन तु तदज्ञानं येपां नाशितमात्मनः तेपामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् तदवुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्टास्तत्परायणाः गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननि—तकल्मपाः ॥१७॥ विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥ ग्रहण, उन्मेष-निमेष आदि सभी प्रकार के कर्म करके द्वार-युक्त देहपुर में मुग्य से रहते हैं। वे कर्म में समझता है कि मैं कुछ भी नहीं करता --इन्द्रिया अपने को या अन्य को प्रवृत्त नहीं करने ॥१३॥ ही अपने-अपने विषय में प्रवृत्त होती हैं ॥८॥ जो लांकरता ईधर सब जानों के कर्तृव और कर्मों की आसक्ति से बचकर, ब्रह्म में कर्मफलों को समर्पण सृष्टि नहीं करता, और फिमी को कर्मफल का भागी करता हुआ कर्म करता है, वह उसी तरह पाए में नहीं बनाता । अविद्या प्रकृति ही जीर को कर्म, लिप्त नहीं होना जैमे कमल का पत्ता जल में नहीं प्रवृत्त करती है ॥१४॥ ईश्वर किमी के पाप या रिप्त होता ॥१०॥ कर्मयोगी पुरुष आमक्ति त्याग पुण्य का प्राहक नहीं हे, ज्ञान पर अमान का पर्दा कर --मन की शुद्धि के लिए - शरीर, मन, बुद्धि रहने से सर जीर मोह के द्वारा बन्धन को प्राप्त और पिशुद्ध इन्द्रियों के द्वारा कर्म किया करत है होते है ॥१५॥ जिनका ज्ञान अपने असभा को ॥११॥ ईश्वर-परायण न्यक्ति कर्मफल-परित्यागपूर्वक नष्ट कर चुकना है, उनका प्रमज्ञान सूर्य के समान मुक्ति प्राप्त करते हैं । किन्तु ईश्वर-रिमुग व्यक्ति कर्म- । प्रभागमान होना ॥१६॥ ईश्वर में ही जिनकी का की इच्छा करके कामनारश मगार-बन्धन में अचल युद्धि और निष्टा है, जो ईयर को ही आमा वैध जाता है ॥१२॥ देहधारी लोग इन्द्रियों को यदा मानते हैं और जिनका ईश्वर ही परम आश्रय है, ये मन में मर कर्मों का त्याग कामे, ना- शान के द्वारा पारगन्यहोर मुक्ति प्राप्त करने में . । में करके, ४१०८ ] म हा भारत [ भीगार्म इहैव तैर्जितः सर्गों येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोपं हि समं ब्रह्म तस्माद्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥ न प्रहृप्योत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाऽप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥ बाह्यस्पर्शप्वसत्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षय्यमश्नुते ॥ २१ ॥ ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२॥ शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक् शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३॥ योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथाऽन्तज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४॥ लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृपयः क्षीणकल्मपाः छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५॥ कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥ स्पर्शान्कृत्वा बहिर्वाह्यांश्चक्षुश्चैवाऽन्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७॥ ॥१७॥ ब्रह्मज्ञानी लोग विद्या-पिनय सम्पन्न ब्राह्मण, है और वे अन्त को ब्रह्म में समाधि लगाकर अवि- गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को समान दृष्टि से नाशी सुख भोगने को समर्थ होने हैं ॥२१॥ पण्डित देखते हैं अर्थात् सब में ब्रह्म को देखते हैं ||१८|| ! लोग विषयो से उपन्न मुख में आसक्त नहीं होते. इस प्रकार जिनका चित्त सर्वत्र तुल्यभार से स्थित क्योंकि वे सुग्व ता दु.स ही का कारण और नष्ट है वे जीवन्मुक्त होते हैं । ममदर्शी पुरष ब्रह्मभान को होनेवाले होते है ॥२२॥ जो पुरुष इस लोक में, प्राप्त होते हैं, क्योंकि निर्दोष ब्रह्म सर्वत्र ममभार से जीवित अपम्था में, काम और क्रोध के वेग को मह स्थित हे ॥१९॥ जो व्यक्ति ब्रह्म के ज्ञाता होकर सकते हैं वे ही योगी ओर सुखी हैं ॥२३॥ जो लोग अन्य में स्थित होते हैं, वे प्रिय या अप्रिय वस्तु के आमा में ही सुग्व पाने हैं, आमाराम हैं और आमा मिग्न-न मिटने में हर्ष या उद्वेग नही प्रकट करते, में ही दृष्टि रखते हैं, वे ब्रह्मनिष्ट योगी प्रद्म मे रीन क्योंकि वे मोह त्यागकर स्थिर बुद्धि को प्राप्त हो हो जाते हैं ॥२४॥ जो लोग पाप के नाश करने, चुकते हैं ॥२०॥ जो वाद्य पियय में आमक्त नहीं मंगाय के छेदन करने, चित्त को वश में करने और होते उनका चित्त महा शान्ति-सुम का अनुभव करना मरका हित करने में तत्पर हैं । नत्त्वदर्शी पुरप ही अध्याय ३०, गीता अध्याय ६ ] म हा भारत [ ४१०९ यतेन्द्रियमनोबुद्धिमुनिर्मोक्षपरायणः विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८॥ भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् सुहृदं सर्वभूनानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९ ॥ इति श्रीमन्महामारते. भीमपर्वणि श्रीमगवद्गीतास्पनिषनरा ब्रह्मविद्याया योगशास्ने श्रीर' गार्जुनमयादे माग्व्यांगोनाम पञ्चमोऽध्याय:॥५॥ पर्वणि तु उनतिशोन्यायः ।। २९ ॥ मुक्ति प्राप्त करने है ॥२५|| जिन संन्यासियों ने चित्त को बहिष्कृत, दोनो नेत्रो को भौहों के बीच मे स्था- को वश में कर लिया है तथा काम और क्रोध से पित तथा नाक के भीतर विचरनेवाले प्राणवायु और छुटकारा पाकर आत्मतत्व का ज्ञान प्राप्त कर लिया । अपाननायु की वृत्ति को तुल्यभावापन्न कर चुके हैं, है, ये इस लोक और परलोक दोनों मे मुक्ति प्राप्त ये ही जीवन्मुक्त है ॥२७॥२८॥ सभी लोग मुझे यज्ञ करते हैं ॥२६॥ जो मोक्षपरायण मुनि इन्द्रिय, मन और तपस्या का भोग करनेवाला, सब प्राणियों का और बुद्धि को वश में करके इच्छा, भय ओर क्रोध महान् ईश्वर और मुहृद् समझकर शान्ति पात हैं ॥२०॥ को दूर कर चुके हैं और जो चित्त से वाह्य विषयो ममिपर्व का उनीमा अध्याय ममाप्त हुआ ॥२९॥ गीता सापांचया अध्याय ममा | अथ निशाध्याय ॥३०॥ श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥ १ ॥ यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव नह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन आरुरुक्षोर्मुनेयोगं कर्म कारणमुच्यते योगारुढस्य तस्येव शमः कारणमुच्यते यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मन्वनुपजते सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारुढस्तदोच्यते नीरया अगार॥३०॥-नाराला अश्याग] भगगन ने कहा-हे अर्जुन ! जो कर्मफल कीया । ज्ञानयोग के दर्ने पर चढ़ने की रप्या रखनेवारे न रगकर कर्तय कर्म करना है, यही मन्यामी और यही व्यक्ति के दिए उमया कारण या आय कर्मयोग ही गोगी । कार अग्निहोत्र और कर्मों का त्याग करने- । इसी प्रकार कानयोग में आग्द हो जाने पर नाग पुरष कभी योगी या मंन्यासी नहीं का जा। मन को की रिमृति ही ज्ञान परिगा या वाण गम्ना ॥१॥ पण्डिन रोग कर्मफट-न्याग-प मन्याग की गई। ॥३॥ आमनि का म्ट जो पियोग को ।। योग करने । मरिए कर्मकर की या और उमर महल, उगमा त्याग कर जो मनुष्य नेगा पुरष की योगी नहीं हो माना ॥२॥ मिग-भोगगरियो में, या उनके गानों में, अनता म हा भा र त [ भाग - यं लब्ध्वा चाऽपरं लाभं मन्यते नाऽधिकं ततः। यस्मिंस्थितो न दुःखेन गुरुणाऽपि विचाल्यते ॥ २२ ॥ तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् । स निश्चयेन याक्तव्यो योगो निर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥ सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यवत्वा सर्वानशेषतः मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २१ ॥ शनैः शनैरुपरमेद् बुद्धया धृतिगृहीतया आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ २५ ॥ यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥ प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुस्वमुत्तमम् उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मपम् ॥२७॥ युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मपः सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८॥ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चाऽऽत्मनि ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९॥ यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति । तस्याऽहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥ योगी का अन्त करण किसी विषय की ओर न डिग-दर्शी अन्त करण के द्वारा सर्वत्र विचरनेवाली इन्द्रियों कर सर्वथा उपरत रहता है, जिस अवस्था में ज्ञानी को सयत कर, अत्यन्त प्रयन के साथ, साधक शास्त्र पुरष समाधि में ज्योति स्वरूप आत्मा की उपलब्धि और आचार्य के उपदेश से उत्पन्न निश्चय के बल करके अपने आत्मा मे ही सन्तुष्ट रहता है, ॥२०॥ से योगाभ्यास करे । स्थिर बुद्धि के द्वारा अन्त करण निस अास्था में योगी विषय और इन्द्रिय के परे | को आत्मसमाहित करके धीरे-धीरे विषयों से निवृत्त नथा आमम्प बुद्धि के विपर्याभूत नित्य सुख का हो, अन्य किसी विषय का चिन्तन न करे ॥२४॥२५॥ अनुभा करता हुआ आत्मस्वरुप से विचलित नहीं अन्त करण चञ्चल हो तो उस, पियों से हटावर, होता और जिस अगस्था में जाडा-गर्मी आदि दुप आत्मा में समाहित कर ॥२६॥ इसके द्वारा रजोगुण अभिभूत नहीं कर सकते तथा जिस अवस्था मे तिरोहित, चित्त प्रशान्त आर ससार-दोष विनष्ट होता दुर का ऐश भी नहीं रहता, उस अपस्था का नाम तथा ब्रह्मभार की प्राप्ति के कारण निरतिशय सुख योगावम्या है ।।२१।२३॥ सङ्कल्प-जनित इच्छाओं की प्राप्ति होती है ॥२७|| इस तरह चित्त को वश और सब काम्य वस्तुओं का त्याग करके, विषयद्रोप- । में करन से योगी व्यक्ति पापशून्य होकर ब्रह्मसाक्षात- ४११४ ] म हा भारत [ मीणा - - एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः त्वदन्यः संशयस्याऽस्य छेत्ता नापपद्यते ॥३९॥ श्रीभगवानुगन----पार्थ नैवेह नाऽमुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । नहि कल्याणकृत्कश्चिदुर्गति तात गच्छति ॥१०॥ प्राप्य पुण्यकृताँल्लोकानुपित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥११॥ अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ १२॥ तत्र तं वुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्माऽतिवर्तते ॥४४॥ प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगात्संशुद्धकिल्विपः अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥४५॥ तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाऽधिको योगी तस्माद्योगी भवाऽर्जुन॥ ४६॥ योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनाऽन्तरात्मना श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥४७॥ इति श्रीम'महाभारने भीमपाणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिष मु ब्रह्मविद्यायो योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनमवादे अध्यामयोगी नाम परोऽध्याय ॥६॥ पर्वणि तु निंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ करता है । ॥३७॥ कर्मफल की इच्छा और कर्म के | व्यक्तियों के उपभोग्य स्वर्गलोक में जाकर, वहा सैंकड़ों अनुष्टान से रहित व्यक्ति क्या टिन्न-भिन्न हुए मेध | वर्ष तक रहकर, अन्त को सदाचारी धनी पुरयों के की तरह पिनष्ट हो जाता है ? ||३८) हे मधुसूदन ! घर में या बुद्धिमान् योगियों के वंश में उत्पन्न होते आपके सिवा और कोई मेरे सराय को दूर करने मे हैं ॥४१॥ योगियों के कुल में जन्म पाना अत्यन्त ही समर्थ नहीं है । इसलिए आप ही मेरे सन्देह को दूर दुर्लभ है ॥४२॥ हे भारत ! योगभ्रष्ट व्यक्ति उसी कीजिए ॥३९॥ भगवान् ने कहा- हे पार्थ ! शुभ कुल में जन्म लेकर--पूर्व जन्म की स्मृति बनी रहने अनुष्टान मे लगे रहने से कभी दुर्गति नहीं होती । के कारण—मुक्ति पाने के लिए पहले की अपेक्षा इसलिए इस तरह के योगभ्रष्ट पुरुष इम लोक में और भी अधिक यत्न करते हैं ॥४३॥ वे यदि विन- पतित या परलोक में नरकगामी नहीं होते ॥४॥ वश वैसा करने की इच्छा नहीं करते तो पूर्व देहत वे तो अश्वमेध यज्ञ आदि शुभ अनुष्ठान करनेवाले अभ्यास या पूनमस्कार उन्हें ब्रह्मनिष्ठ बनाते हैं ॥४४] अन्याय ३१, गीता अध्याय ७ ] म हा भा र न [ ४११५ तब ये योग-जिज्ञासु होकर वेदोक्त कर्मफल से भी | से भी श्रेष्ट है, ज्ञानी से भी श्रेष्ठ है और कर्म बढ़कर फल को प्राप्त होते हैं । तात्पर्य यह है कि ! करनेवालों से भी श्रेष्ठ है । इसलिए तुम भी योगी निष्पाप योगी बड़े यत्न से इसी तरह कई जन्मों में बनो ॥४६॥ जो श्रद्धा सम्पन्न होकर मुझमें दृदय सिद्धि प्राप्त कर अन्त को श्रेष्ठ गति प्राप्त करता है लगाकर मुझे भजता है, वह मब प्रकार के योगियों ॥४५॥ हे अर्जुन ! मेरे मत से योगी पुरुष तपस्वी से श्रेष्ट है ॥४७|| भी पा सा नागना अन्याय गमाल हुआ ॥ ३० ॥-[गीता का छटा व्याय गमाल हुआ अब एशोऽध्यायः ॥ ३ ॥ श्रीभगवानुमान मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥ ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेपतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥ मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चियतति सिद्धये यतनामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः ॥ ३ ॥ भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिग्टधा अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि में पराम् जीवभूतां महावाहो ययेदं धार्यते जगत् एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा मत्तः परतरं नाऽन्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७ ॥ तीगअपार ॥ गीगा' ४११८ ] म हा भारत [ মাগণ। अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामवुद्धयः परं भावमजानन्तो ममाऽव्ययमनुत्तमम् ॥ २४॥ नाऽहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाऽभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ।। वेदाऽहं समतीतानि वर्तमानानि चाऽर्जुन । भविष्याणि च भूतानि मांतु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥ इच्छाद्वेपसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत सर्वभूताति संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ २७ ॥ येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्म कर्म चाऽखिलम् ॥ २९ ॥ साधिभूताधिदेवं मां साधियज्ञं च ये विदुः प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥ इति श्रीम-महाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतामपनिषन्मु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्र श्रीकृष्णार्जनमवादे बानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ पर्वणी नु पत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ अव्यक्त हूँ और प्रपञ्च से परे हूँ। किन्तु अनभिज्ञ और शीत-उष्ण आदि द्वन्द्व धर्मों से उत्पन्न मोह में पुरुष मेरे नित्य और शुद्ध स्वरूप को न जानने के अभिभूत होते हैं ॥२७॥ जिन पुण्यात्मा पुरुषों के कारण मेरे मनुष्य, मीन, कच्छप आदि रूपों की पाप का अन्त हो चुका है, शान-उष्ण आदि द्वन्द्वों कल्पना करते हैं ॥२४॥ मैं योगमाया के प्रभाव स से उत्पन्न मोह मिट चुका है, वे दृढ़व्रत महात्मा मुझे सदा आच्छन्न हूँ कभी सब लोगों के निकट प्रकाश भजते हैं ॥२८॥ जो लोग मेरा आश्रय लेकर अजर- मान नहीं होता । इसी कारण लोग मायामूह होकर ! अमर होने के लिए यन करते हैं वे सम्पूर्ण कर्मयोग मुझे नहीं जान पाते ॥२५॥ हे अर्जुन ! मुझे कोई । और अखण्ड ब्रह्म को जानते हैं ॥२९॥ जो लोग नहीं जानता; परन्तु मैं सब भूत, भविष्य, वर्तमान । अधिदैव, अधिभूत और अधियज्ञ सहित मुझको जानते चगचर प्राणियों के विषय में पूर्ण ज्ञान रखता हूँ हैं, वे योगी मृत्यु-समय में भी मुझे नहीं भूलते ॥३०॥ ॥२६॥ सब प्राणी संसार में जन्म पाकर इच्छा-देप। मीभपर्व का इनाममा अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ३१ ॥-गीता रा मातवा अयाय ममाम हुआ] ---० अथ दारिशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ अर्जुन उगाच- -कि तद्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम आधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते अध्याय ३२; गाना अन्याय ८ ] महाभा र न अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन प्रयाणकाले च कथं शेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥ श्रीभगवानुवाच -अक्षरं ब्रह्म परमं खभावोऽध्यात्ममुच्यते । भृतभावोद्भवकरो बिसर्गः कर्मसंजिनः अधिभूतं भरो भावः पुरुपश्चाऽधिदेवतम् । अधियज्ञोऽहमेवाऽत्र देहे देहभृतां वर अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मनावं याति नाऽस्त्यत्र संशयः ॥ ५ ॥ यं यं वापि म्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् तं तमेवेति कौन्तेय सदा तद्भावभाषितः ॥ ६ ॥ तम्मात्सर्वेषु कालेपु मामनुग्मर युध्य च मय्यर्पितमनोवृद्धिर्मामेवेप्यस्यसंशयम् अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नाऽन्यगामिना परमं पुरुपं दिव्यं याति पार्थाऽनुचिन्तयन् ॥ ८ ॥ करि पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुम्मरेद्यः सर्वस्य धातारमनिन्त्यरूपमादित्यवर्ण तमसः परस्तात ४१२० ] म हा भारत [ भीमपत्र - । प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगवलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्त्त तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥ १० ॥ यदक्षरं वेदविदो बदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्तं पदं संग्रहण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च मूाधायाऽऽत्मनः प्राणमास्थितोयोगधारणाम्॥ १२ ॥ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥ अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः तस्याऽहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥ मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् नाऽऽप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमांगताः ॥ १५ ॥ आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनाऽर्जुन मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥ सहत्रयुगपर्यन्तमहर्यब्रह्मणो विदुः रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥१७॥ को मुझमें अर्पित करके नि सन्दह मुझे ही प्राप्त व्रत धारण करते हैं, उस परब्रह्म के पद को प्राप्त होओगे ॥७॥ हे पार्थ । जो मनुष्य अभ्यास-योगयुक्त | करने का उपाय मैं तुम्हारे आग सक्षेप मे कहता और अनन्यगामी चित्त से प्रकाशमय परम पुरुप का | हूँ-सुनो ॥११॥ जो पुरुप चक्षु आदि सब इन्द्रियो चिन्तन करता है, वह उन्हीं में लीन होना हे ॥८0 के द्वारों को रोक करके अन्त करण को हृदय में यह परम पुरष सर्वज्ञ, सनातन, सबका नियामक, | समाहित करता है और प्राणवायु को दोनों भौंहों के मूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम, सबका विधाता, बुद्धि ओर बीच स्थापित करके योगधारण-पूर्वक, एकाक्षर-सम्पन्न मन से अगोचर, मूर्य के समान प्रकाश पूर्ण और प्रणा का उच्चारण ओर प्रणा का प्रतिपाद्य जो मैं अज्ञान-रस मोहान्धकार से परे है ॥९॥ जो पुरुप हूँ उसका स्मरण करता हुआ, शरीर सागता हे वह अन्त-समय में सारपान और भक्तियुक्त होकर, योग उत्तम गति प्राप्त करता हे ॥१२॥१३॥ जो प्रतिदिन बल से प्राणवायु को दोनों भौंहों के बीच स्थापित लगातार अनन्य भाव से हदय में मेरा स्मरण करता करके, निक्षेप-विहीन हृदय में ध्यान करता है वह ? है, उस नित्ययुक्त योग के लिए मैं सुलभ हूँ ॥१४॥ उन्हीं परम पुरुप परमेश्वर को प्राप्त करता ह ॥१०॥ यह महापुस्प मुझे पा जाने पर, मोक्षलाभ के उपरान्त हे पार्थ । वेदज्ञ लोगो के मत से जो अक्षय ब्रह्म ह, फिर दु खपूर्ण नश्वर जन्म नहीं प्राप्त करता ॥१५॥ थीतराग यनि रोग जिसमें अपने चित्त को लगाते हैं हे पार्थ । ब्रह्मलोक पर्यन्त सर लोक ऐसे हैं कि और जिम जानने के लिए लोग गुरकुल में ब्रह्मचर्य । वहा से आपर जीर को फिर जन्म लेना पड़ता है, अध्याग ३२, गीता अध्याय ८ ] [ ४१२१ अव्यक्ताहयक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे राव्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाऽव्यक्तसंज्ञके ॥ १८॥ भृतग्रामः स एवाऽयं भूत्वा भृत्या प्रलीयते । राध्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥ परस्तम्मान भावोऽन्योव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २० ॥ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ २१ ॥ पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्याऽन्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२ ॥ यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्याप्ति भरतर्षभ ॥ २३॥ अग्निज्योतिरहः : शुक्रुः पपमासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २१॥ धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः पण्मासा दक्षिणायनम् । नत्र चान्द्रमसं ज्योतियोगी प्राप्य निवर्तते शुमकृष्णे गती घेते जगतः शाश्वते मने । एकया यात्यनात्तिमन्ययाऽऽवर्त्तने पुनः ४१२२ ] म हा भारत [ भागापर्व नैते स्मृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेयु कालेषु योगयुक्तो भवाऽर्जुन ॥२७॥ वेदेषु यज्ञेषु तपःसुचैव दानेयु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानसुपेति चाऽऽद्यम् ॥२८॥ इति श्रीमन्महामारने भी मपर्वणि श्रीमद्भगवहीन सूपनिष सुब्रह्मविद्याया योगशास्त्रे धीरणार्जुनगंवाद अक्षग्यदायोंग नाम अष्टमोऽध्याय 11 पणि तु द्वारिंशोऽध्याय ॥ ३२ ॥ का वर्णन सुनो जिसमें गमन करने से योगी लोग ! और कृष्ण, दो सनातन गतिया निरूपित हुई हैं आवृत्ति और अनावृत्ति को प्राप्त होते है ॥२३॥ एक में जाने से अनावृत्ति और दूसरी में जाने से जिम स्थान मे दिन शुक्लवर्ण और अग्नि की तरह | पुनरावृत्ति होती है ॥२६॥ हे पार्थ ! इन दोनों प्रभायुक्त होता है और छः महीने उत्तरायण होता है, । गतियों को जाननेवाला योगी कभी मोह को प्रास वहा जाने से ब्रह्मज्ञ लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं । नहीं होता । इसलिए तुम सदा योगयुक्त रहो ॥२७॥ ॥२४॥ जिस स्थान में रात्रि धूमवर्ण और कृष्णपर्ण अधिक क्या, योगी पुरुष इस ज्ञान के प्रभार से तथा छः महीने दक्षिणायन होता है, वहा गमन करने | वेद, यज्ञ, तप और दान के निर्दिष्ट सब पुण्यफलो से कर्मयोगी पुरुप चन्द्रज्योति स्वर्ग को प्राप्त होफर को अनिक्रम करके आदि में परम पद को प्राप्त फिर लौटते है ॥२५॥ इस तरह जगत् की, शुक्ल ! होता है ॥२८॥ भीमपर्व का वत्तीयवा अध्याय गमाप्त हुआ ॥३२॥--[गीता का आठवा अध्याय ममाप्त हुआ] अथ जयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ श्रीभगवानुवाच ---इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १ ॥ राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् प्रत्यक्षावगमं धर्म्य सुसुखं कर्तुमव्ययम् अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्याऽस्य परन्तप अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्मनि मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाऽहं तेप्ववस्थितः ॥ ४ ॥ तेंतीसवा अध्याय ॥ ३३ ॥-[गानाका नवमा अध्याय] भगवान् ने कहा-हे पार्थ ! तुममें असूया नहीं | अविनाशी है ॥२॥ हे शत्रुओं के दमन करनेवाले है; इसलिए मैं तुमसे विज्ञान-समन्वित गुह्यतम ज्ञान अर्जुन ! जो लोग इस धर्म में अश्रद्धा करते हैं वे कहता है, सुनो । इमे जान लेने से सब अमङ्गलों मुझे प्राप्त न होकर, मृत्यु और ससार के मार्ग में मे बच जाओगे ॥१॥ यह सब विद्याओं से श्रेष्ठ है; ) भटकते है ॥३॥ मैं आमा के रूप से सम्पूर्ण विश्व यह गुट से भी गुहातम, परम पवित्र, धर्मसङ्गत और ) में व्याप्त हूँ, सब प्राणी मुझमे ही स्थित है; किन्तु ram अव्याय ३३, गीता अध्याय ९ ] महाभारत [ ४१२३ न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममाऽऽत्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥ यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं घायुः सर्वत्रगोमहान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृति यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥ प्रकृति स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् न च मां तानि कर्माणि निवन्नन्ति धनञ्जय उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते अवजानन्ति मां मूढा मानुषी तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥ मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृति मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥ महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥ कोई भी मेरा अधिष्ठान नहीं है । हे पार्थ ! मेरी | होने के कारण ये अपश हैं ||८|| परन्तु मैं 'ऐशी' शक्ति देखो ॥४॥ मैं अलिप्त हूँ, इसलिए कोई कर्मों से अलिप्त रहकर उदासीन भाव से स्थित है, भी प्राणी मुझमें स्थित नहीं है । यद्यपि मैं सबको | इसी से मै कभी सृष्टि आदि कार्यों का विषय नहीं धारण किये हुए है, किन्तु किसी में अधिष्ठित नहीं हूँ। वनता। मैं अविकृत ज्ञानस्वरूप हूँ ॥१।। मेरे अधिष्ठान मेरे आत्मा ने ही सब प्राणियो की सृष्टि की है ॥५॥ के प्रभार से प्रकृति सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करती वायु जैसे सर्वत्र जानेवाला होने पर भी नित्य आकाश | है और यह ससार वार-यार उत्पन्न होता है ॥१०॥ में स्थित है, वैसे ही सब प्राणियों को मुझमे स्थित जिनकी आशा, कर्म ओर ज्ञान विफल है, जिनके समझो ॥६॥ हे अर्जुन ! प्रलयकाल में सब प्राणी अन्त करण मे पिक का लेश भी नहीं है और जो मेरी अधिष्ठित प्रकृति में लीन होते हैं, आर कल्प के लोग राक्षसी आसुरी आदि मोहमयी प्रकृति का आरम्भ में मैं फिर उनकी सृष्टि करता हूँ ।।७। इसी आश्रय ठिये हुए हैं-उसके वशीभूत हैं---यही मेरे तरह मैं अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर इन प्राणियो । सर्वभूत-महेश्वरम्प परम तत्व को अगन न होकर, की वारपार सृष्टि करता है। प्रकृति के वश मे । मुझको मनुष्य-देहपारी जानकर, मेरी अप्रज्ञा करते । सब महाभारत [ भामर । - सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥ जानयज्ञेन चाऽप्यन्ये यजन्तो मामुपासते एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥ अहं ऋतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहापधम् मन्त्रोऽहमहमेवाऽऽज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥ पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७॥ गतिर्भर्त्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं वीजमव्ययम् ॥१८॥ तपाम्यहमहं वर्ष निगृह्णाम्युत्सृजामि च अमृतं चैव मृत्युश्च सदसञ्चाऽहमर्जुन विद्यामां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।।२०।। तेतं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥२१॥ अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । हैं ॥११।१२॥ चिन्तु महामागण दैवी प्रकृति का यजु हूँ ॥१७|| मैं गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय रेकर, मुझे सर प्राणियों के आदि आर शरण, सुहृद्, प्रभाव, प्रलय, निधान, ल्यस्थान आर अव्ययरूप में जानकर, अनन्य हृदय से मेरा आराधना अक्षय बीन हूँ॥१८॥ मैं र्या करता हूँ और तपता किया करते हैं ॥१३॥ ने सदा दृढव्रत और सयत होकर हूँ में जल को पृथ्वी से खींचता हूँ आर पृथ्वी पर मरे नामों का कीर्तन, निरन्तर भक्ति के साथ मुझे । बरसाता हूँ । अमृत, मृयु, सत् आर असत् में ही नमस्कार और मेरी उपासना करते हैं ॥१४॥ आर, हूँ ॥१९॥ निद विहित क्मों का अनुष्शन करने कोई तत्त्वज्ञानरूप यव, को अभेद भापना, काई । चाले सोमपाया विगत-पाप महामागण यज्ञानुष्ठानपूर्वक पृथर-कल्पना आदि के द्वारा, आर कोई मुझे सर्वरूप | मेरा उपासना करस स्वर्ग प्राप्ति का इच्छा किया करते ममझर रद आदि नाना रपों से मेरा आराधना हे । उसक पश्चात् वे परम पवित्र स्वर्गलोक में पहुँच पिया करत हैं ॥१५॥ हे पार्थ। यत, स्वधा, औपनि, कर सम्पूर्ण उष्ट देवभागों का उपभोग करते हैं मन्त्र, आज्य, अग्नि आर हरन मेरे हा रूप है ॥१६॥ ॥२०॥ स्वर्गगेर के भोग भोगन से पुण्य क्षीण हाने में ही इस जगत् का मिना, माता, विधाता और पर व फिर मनुन्यलाम में लौट आते हैं। वे इस पितामह हूँ। म पय, पवित्र, आकार, सन् , माम और प्रसार भोगाभियपी आर वेदनयपिहित कर्मकाण्ड के - अध्याय ३३, गीता अध्याय ९ ] म हा भारत [ ४१२५ । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥ येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥ अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनाऽतश्च्यवन्ति ते ॥ २४ ॥ यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः भूतानि यान्ति भूतेज्यायान्ति मद्याजिनोऽपि माम् २५ ॥ पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः यत्करोपि यदनासि यज्जुहोपि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७॥ शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मवन्धनः संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८॥ समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेप्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मांभक्त्या मयि तेतेपु चाऽप्यहम्॥ २९ ॥ अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ३० ॥ अनुष्टान में तत्पर होकर बारम्बार आवागमन के फेर पुरुष मुझे पत्र, पुष्प, फल, जल आदि कुछ भी में पर रहते हैं ॥२१॥ जो लोग अनन्य हृदय स अर्पण करता है उसकी वह भक्तिपूर्वक दी हुई मामग्री मेरा चिन्तन और उपासना करते हैं, उन सर नित्य- मैं महण करता हूँ ॥२६॥ हे पार्थ ! तुम जो कुछ भक्तियुक्त व्यक्तियों क योग-क्षेम को मै वहन करता करते हो, जो गाने-पीत हो, जो हरन करने हो, हैं ॥२२॥ जो लोग भक्ति और श्रद्धा के साथ पवित्र । जो देते हो और जो तर करने हो यह मन मुझे दय मे अन्य देवनाओं की पूजा करते है वे भी । अरण कर दी ॥२७॥ ऐसा करने में कनियन अमिरिक मेरी ही उपामना करते है ॥२३॥ में शुभाशुभ फट में मुक्त होकर, गन्यानयोगयुक्त दृढय ही मा यों का भोक्ता और प्रभु है, किनु ये मेरे मे मुक्तिन्याभकि, नुन अन्न को मुदो ग्राम होओगे नर को पागल न होने के कारण सग मे भार ॥२८॥ में सर प्राणियों में ममान भार में स्थित है। मा करते है ॥२४॥ देवात में अनुरज व्यनि ! कोई मेरा गिर गा गा नहींजो रोग भगिक देगा को, मिनिष्ट गलि पिन को, भूतो मुझे भनी । ये मुरमें ही मिला या सीन हो भी आगधना मे निरत गति भूगग को और मेरे । और में भी उन गणों कोदय में गाना ॥२॥ पामर मुझे प्राम हो । ॥२५॥ जो परिका मा । अगन्न दुगनारी मति भी अन्य देना में का ।
११२६ ॥ महाभारत [मय । क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्ति निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियों वैश्यास्तथाशूद्रास्तेऽपियान्ति परांगतिम्॥ ३२ ॥ किं पुनर्ब्राह्मणा पुण्या भक्ता राजर्पयस्तथा अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजख माम् ॥ ३३ ।। मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैयसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥३४॥ इति श्रीमम० मी-मपर्वणि श्रीमद्भगवीतामपनिष म् मनविधायशोगशास्त्रे श्रीरानगवादे गवियागनगायोगानाम नमोऽध्याय ॥९॥ पर्वणि तु पचिंशोऽध्याय ॥ ३३ ॥ कर मेरी उपासना करने से साधु गिना जा सकता। ब्राह्मणों आर भक्तिपरायण रानपियों के मेरे शरणागत है, क्योंकि उसका अध्ययसाय बहुत श्रेष्ठ है, और होने पर उनकी परम गति के बारे में तो कुछ कहना वह शीघ्र ही धार्मिक होकर निरतर शान्ति सुग्य भोग ही नहीं है । हे अर्जुन ! तुम इस अनित्य ओर करता हे ॥३०॥ हे पार्थ | मेरा भक्त कभी नष्ट या असुखमय लोक में मुझे ही भजो ॥३३॥ अनन्य- भ्रष्ट नहीं होता |॥३१॥ स्त्री, शूद्र, वेश्य अथवा और दृदय और अनन्य-भक्त होकर मुझे ही प्रणाम करी । पाप-योनि पुरष भी मेरी शरण में आने से, परम गति मुझमें इस प्रकार मन लगाने से, मेरी पूजा करने से, को प्राप्त होते है ॥३२॥ अतएर पवित्र पण्डित । अन्त मे तुम मुझको प्राप्त होओगे ॥३४॥ भीष्मपर्व का तेनीगवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३३ ।। - [गीता मा नचमा अध्याय माप्त हुआ] । अथ चतुत्रिंशोऽ याय ॥ ३४॥ श्रीभगवानुपाच-भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥१॥ न में विदः सुरगणाः प्रभवं न महर्पयः अहमादिहि देवानां महीणां च सर्वशः यो मामजमनादि च बेत्ति लेकमहेश्वरम् असंमूढः स मत्र्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते चौतामा ध्याय ॥ ३४ ॥-गाना का दसवा अध्याय) कृष्णचन्द्र जी कहते हैं-~-हे महागहो। तुम | कोई भी मेरे प्रभार को नही जानते । मैं ही सत्र मुझ पर परम प्रीति रखते हो, इस कारण तुम्हारे देवताओं ओर महर्पियो का आदि हूँ ॥२॥ जो मुझे हित की कामना से जो मैं फिर श्रेष्ठ उपदेश करता। अनादि, अज और सब लोकों का महान् ईश्वर जानते हूँ उसे मन लगाकर सुनो ॥१॥ देवता या ऋषिगण, हैं वे इस जीपलक में मोहशून्य और सब पापों से अ याय ३४, गीता अध्याय १० ] म हा भारत [ ४१२७ बुद्धिर्शनमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः क्षमा सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाऽभयमेव च अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः महर्पयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥ एतां विभूति योगं च मम यो वेत्ति तत्वतः । सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नाऽत्र संशयः ॥ ७ ॥ अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते इति मत्वा भजन्ते मां वुधा भावसमन्विताः ॥ ८ ॥ मच्चित्ता मगनप्राणा बोधयन्तः परस्परम् कथयन्तश्च मां नित्यं तुप्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥ तेपां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि वुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥ तेषामेवाऽनुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भाखता ॥ ११ ॥ अर्जुन उवाच ---परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् पुरुपं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥ मुक्त हो जाते हैं ।।३।। बुद्धि, ज्ञान, असमोह, क्षमा, स्फति होती है । ज्ञानी पण्डित लोग ऐसा ही मान- सत्य, दम, शम, सुख, दुस, भय, भाव, भय, अभय, कर मेरी आराधना किया करते हैं ।।८॥ वे मन और ॥४॥ अहिंसा, समता, तुष्टि, तपस्या, दान, यश, प्राण को मुझमें ही स्थापित करके, एक दूसरे को मेरा अयश आदि सब भिन्न-भिन्न भार प्राणियों में मुझसे ज्ञान कराते है । वे मेरा वर्णन करके सन्तुष्ट होते है, ही होते हैं ॥५|| पूर्व समय के सनक आदि चारों शान्ति प्राप्त करते हैं और मुझम ही रमते हैं ॥२॥ वे ऋषि, भृगु आदि सातों महर्षि और सर मनु मेरे ही निरन्तर भक्तियुक्त होकर प्रीतिपूर्वक मेरी उपासना प्रभार से सम्पन्न ओर मेरे ही मन से उत्पन्न हुए हैं। किया करत हैं, मैं भी उन्हे वह बुद्धियोग देता हूँ, सर लोग उन्हीं की सन्तान हैं ॥६॥ इसमे सन्देह / जिसके द्वारा वे मुझे प्राप्त होते हैं ॥१०॥ उन पर नहीं कि जो कोई मेरे योग ओर मेरी विभूतियों को कृपा करने के लिए मैं उनके हृदय में स्थित होकर जानता है वह स्थिर ज्ञान का अधिकारी होकर अचल समुनपल ज्ञान-दीपक के द्वारा अज्ञान-जनित अन्धकार योग से युक्त होता है जाम इस जगत् की उत्पत्ति | को दूर करता हूँ ॥११॥ अर्जुन ने कहा-हे केगा! का कारण हूँ, मुझमे ही मनुष्यों की बुद्धि आदि की । देवर्षि नारद, अमित, देवर, व्यास और अन्यान्य ।
४१२८ ] म हा भा र त [ भीमा । - आहुस्त्वामृपयः सर्वे देवपि रदस्तथा असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीपि मे ॥ १३ ॥ सर्वमेततं मन्ये यन्मां वदसि केशव नहि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः स्वयमेवाऽऽत्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुपोत्तम । भूतभावन भृतेश देवदेव जगत्पते वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥ कथं विद्यामहं योगिस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केपु केषु च भावेपु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥१७॥ विस्तरेणाऽऽत्मनो योग विभूति च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नाऽस्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥ श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नाऽस्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥ अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥ आदित्यानामहं विष्णुज्योतिषां रविरंशुमान् । मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥ ऋषिगण आपको परब्रह्म, परमधाम, परम पवित्र, | सकूगा ? आप किस किस भाव का ध्यान करूंगा। शाश्रत पुरप, दिव्य, आदिदेन, अजन्मा अए असीम- १६.१५॥ अर आप प्लिर सिस्तार के साथ अपने प्रतापशाली कहते हैं, इस समय आप भी अपने को | योग और विभूतियों का वर्णन कीजिए । आपके पैमा ही बनला रहे हैं ॥१२॥१३॥ हे वासुदेन ! आप अमृततुल्य वचन सुनकर मेरे कान पिसी तरह तम जो कहते हैं, यह सब सत्य ही है । देवता या दाना ही नहीं होते ॥१८॥ भगवान् ने कहा- हे कुरतुल. कोई भी आपको स्पष्ट रूप से नहीं जानते । आप श्रेष्ठ । मेरी विभूतियों की तो सरया ही नहीं है, स्य अपने को जानते हैं ॥१४॥ हे पुस्पोत्तम ! हे । इसलिए मैं अपनी प्रधान-प्रधान दिव्य विभूतियों का भूतभावन ! हे भृतेश । हे देव-देव ! हे जगदीश्वर! वर्णन करता हूँ ॥१९॥ हे पार्थ ! मैं सब प्राणियों अब आप अपनी उन विभूतियों का विस्तार से वर्णन में अन्तर्यामी आमा हूँ। मैं ही सनका आदि, मय कीजिए जिनसे आपने सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर और अन्त हूँ॥२०॥ मैं आदिस्यों में विष्णु, ज्योतिर्मय रकपा है ॥१५॥ हे विभो । आप परम योगी हैं पदार्थों में अशुमाली सूर्य, मरद्गण में मरीचि, नक्षनरी में निम तरह मदा ध्यान-चिन्तन करके आपका जान मे चन्द्रमा, ॥२१॥ वेदों में सामवेद, देवताओं में अन्याय ३४, गीता अध्याय १० ] म हा भारत [ ४१२९ वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः इन्द्रियाणां मनश्चाऽस्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥ रुद्राणां शङ्करश्चाऽस्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् वसूनां पावकश्चाऽस्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥ पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् । सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ २४॥ महीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥२५॥ अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवीणां च नारदः गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ २६ ॥ उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥२७॥ आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् प्रजनश्चाऽस्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८॥ अनन्तश्चाऽस्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चाऽस्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥ प्रहादश्चाऽस्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् । मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥३०॥ पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । झपाणां मकरश्चाऽस्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥ सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाऽहमर्जुन इन्द्र, इन्द्रियों में मन, भूतगण में चेतना, ॥२२॥ | उच्चैःश्रा और हाथियों में ऐरापन हूँ। हे अर्जुन ! रमों में शकर, यक्षों और राक्षसों में कुवर, वसुओं में मनुष्यों मे राजा, ॥२७|| आयुधों में यन, गउओं में अग्नि, पनों में सुमेरु, ॥२३॥ पुरोहितों में : में कामधेनु और उत्पत्ति के कारणों में कामदेय है। वृहस्पति, सेनापतियों में स्कन्द, जलाशयों मे मागर, मैं विषैले सों में यामुकि, ॥२८॥ पिहीन नागों ॥२४॥ मर्पियों में भृगु, बायो में प्रणा, यज्ञों में में शेष, जलचरों में यरुण, पितृगण में अर्यमा, नियन्ता जायज्ञ, स्थायरों में हिगालय, ॥२५॥ वृक्षो मे रोगों में यमरान, ॥२९॥ दैलों में ग्रहाद, गणना पीरल, देवर्षियों में नारद, गन्धों में चित्ररथ, मिझो , करनेवालों में काल, पशुओं में सिंह, पक्षियों में में कपिल, ॥२६॥ घोरों में समुद्र के मयने से उत्पन्न । गर, ॥३०॥ वेगशादियों में पग्न, शनधारियों में . - ४१३० म हा भारत [ भीष्मपर्व अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥३२॥ अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । अहमेवाऽक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥ मृत्युः सर्वहरश्चाऽहमुद्भवश्च भविप्यताम् कीर्तिःश्रीर्वाश्च नारीणां स्मृतिमेंधा धृतिःक्षमा ॥ ३४ ॥ बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्पोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥३५॥ द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्वं सत्त्ववतामहम् ।। ३६ ॥ वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीपताम् । मौनं चैवाऽस्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥३८॥ यच्चाऽपि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥ नाऽन्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप। एप तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥ यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा तत्तदेवाऽवगच्छ त्वं मम तेजोऽशसम्भवम् ॥४१॥ राम, मस्यों में मगर आर नदियों में गङ्गा हूँ ॥३१॥ शीलों में जय, उद्योगियों में उद्मम ओर सत्वशालियों हे अर्जुन | सों में आदि, मध्य ओर अन्त में हैं में सत्व मैं हूँ॥३६॥ वृष्णिाशियों में वासुदेन, पाण्डों अर्थात् सृष्टि, स्थिति, प्ररय मैं हूँ। विद्याओं में आत्म में तुम, मुनियों में ब्यास ओर करियों में शुक्र मैं हूँ विद्या, नाद करनेवालों में नाद, ॥३२॥ अक्षरों में । ॥३७॥ दण्डधारियो में दण्ड, जय की इच्छा रखने- अनार, समासों में द्वन्द्व, अक्षयों में काल, विधाताओं वालों में नीति, गुह्य विषयों में गोपन का कारण मान में सर्वतोमुस विधाता, ॥३३॥ सहार करनेवालों में | और ज्ञानियों में ज्ञान मैं हूँ ॥३८॥ हे अर्जुन ! सब मृत्यु और अभ्युदयशीलों में अभ्युदय मैं हूँ। नारियों प्राणियों का ओर जो कुछ वीज है सो मैं हूँ। चराचर में कीर्ति, श्री, नाणी, स्मृति, मेवा, धृति और क्षमा जगत् मे ऐसी कोई वस्तु नहीं जो मेरे पिना हो।॥३९॥ मैं हूँ ॥३४॥ सामवेद में वृहत्साम, छन्दों में गायत्री, इसी कारण मेरी दिव्य विभूतियों की साया नहीं महीनों में अगह्न और ऋतुओं में बमन्त मैं हूँ है । हे पार्थ ! यह सक्षेप से मैंने अपनी दिन ॥३५॥ छरनाओं में बूत, तेनस्त्रियों में तेन, जय-विभूतियों का वर्णन कर दिया ॥४०॥ तात्पर्य यह अध्याय ३५, गीता अध्याय ११ । म हा भा र त [४१३१ अथवा वहुनैतेन किं ज्ञातेन तवाऽर्जुन विष्टभ्याऽहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥४२॥ इति श्रीम महाभारते भीमपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपानिपन्स ब्रह्मविद्यायां योगशास्ने श्रीकृष्णार्जुनसवादे विभ्रतियोगोनामदशमोऽध्याय ॥१०॥ पर्वणि तु चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ है कि ससार में जो कुछ विभूतियुक्त, श्रीसम्पन्न या करके जानने की आवश्यकता नहीं है । बहुत कहने वृद्धिशाली वस्तु है उसे मेरे तेज के अश से उत्पन्न की आवश्यकता नही--मैं अपने एक अश से इस समझो ॥४१॥ हे पार्थ ! मेरी विभूतियो को अलग जगत् को व्याप्त और धारण किये हुए स्थित हूँ॥४२॥ भी मप पा चौनामवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३४ ॥ [गीता का दमा अध्याय गमाप्त हुआ] अथ पञ्चत्रिंशोऽध्याय ॥ ३५ ॥ अर्जुन उवाच -मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाऽव्ययम् ॥ २ ॥ एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुपोत्तम मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽऽत्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥ श्रीभगवानुवाच –पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च पश्याऽऽदित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा वहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याऽऽश्चर्याणि भारत पैतीसरा अध्याय ॥ ३५ ॥- गीता का ग्यारहवां अध्याय) अर्जुन ने कहा- हे नासुदन ! आपने मुझ पर की मुझे बड़ी ही अभिनाया है । ॥३|| जो आप कृपा होने के कारण जो परमगुह्य अध्यात्मविषय का मुझे यह रूप देसने या अधिकारी समझें तो वह वर्णन किया, उसके द्वारा मेरे दृदय से मोह का रूप दियरा दें ॥४॥ भगवान् ने कहा-हे पार्थ । अँधेरा दूर हो गया है ॥१॥हे कमरनयन ! मैंने मेरे अनेक प्रकार के, अनेक वर्ण और आकारवाई, आपके श्रीमुरग से प्राणियों की उत्पत्ति ओर रय का सैंकड़ों-हजारों दिव्य रूप देयो ॥५॥ हे भारत ! वर्णन तथा आपका अक्षय अनन्त माहाम्य सुना। मेरे इस रूप में बटन से अदृष्ट आश्चर्य और ॥२॥ हे पुरषोत्तम ! आपने जो अपने ईश्वररूप का आदित्यगण, यमुगण, रदगण, मरुद्गण, अश्विनी- वर्णन किया, उस विश्वव्यापी पिराट् रूप को देखने । कुमार तथा और जो कुछ देगना चाहते हो सोसा ४१३२ ] म हा भारत [ मारपर्व । इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याऽद्य सचराचरम् मम देहे गुडाकेश यच्चाऽन्यद् द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥ सञ्जय उवाच- एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥ अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥१०॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥ दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुस्थिता यदि भाः सदृशी सास्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥ तत्रैकस्यं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥ ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभापत अर्जुन उवाच-पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् । ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृपीश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्॥ १५ ॥ देगे ॥६॥ मेरे शरीर में चराचर जगत् एकत्र देखोगे; सहस मूर्यों का उदय हो तो शायद महामा कृष्ण किन्तु तुम इसी दृष्टि से मेरा यह विश्वरूप नहीं देख , के उस तेजोमय रूप की प्रभा का अनुभव किया मकले ॥७॥ में तुम्हें दिव्य दृष्टि देता है; तुम मेरी जा सके ॥१२॥ अर्जुन ने श्रीकृष्ण के उस विश्वरूप विभूति को देयो ॥८॥ संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं- में मनुष्य, देवता, पितर आदि को अनेक स्थलों में हे महारान ! अब महायोगेधर हरि ने अपना यह ईश्वर-विभक्त और सब जगत् को एकत्र देशो ॥१३॥ तर मस दिगाया ॥९॥ अर्जुन ने देगा कि अनेक मुग्य, उन्होंने अत्यन्त पिस्मित होकर, सिर झुकाकर, हाय अनेस नयन, अनेक दिव्य आभूपण, अनेक उद्यन | जोड़कर कृष्णचन्द्र को प्रणाम किया। अर्जुन के रोंगटे दिव्य दान, ॥१०॥ दिव्य माला और वय उमरस पड़े हो गये ॥१४॥ उन्होंने कहा-हे विधरप! की गोमा वा रहे हैं । यह अनेक अद्भुत दायों में आपके शरीर में सब देवताओं, जरायुज-अटक- में शोभित, दिव्य अनुपन आदि गे गण्डिन, सानो- स्वेदज-उद्भिज मय प्राणियों, कम गरान पर पित मुग, अनन्न, परम प्रसारामान ग्प देखकर अर्जुन भगगन् प्रामा, दिव्य ऋषियों और नागों आदि की आग हो गये ॥११॥ यदि आकाश में एक माप देग रहा है॥१५भगा ! अनेक बारी, . -- अध्याय ३५, गाना अध्याय ११ ] म हा भारत [ ४१३३ अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । नाऽन्तं न मध्यं न पुनस्तवाऽऽदि पश्यामि विश्वेश्वरविश्वरूप १६।। किरीटिनं गदिनंचक्रिणंच तेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम्। पश्यामित्वांदुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कातिमप्रमेयम्।। १७ ॥ स्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुपो मतो मे ॥ १८ ॥ अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामित्वां दीप्तहुताशवक्त्रंखतेजसा विश्वमिदंतपन्तम्।। १९ ॥ द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः। दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥ अमी हि त्वासुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताःप्राञ्जलयो गृणन्ति । वस्तीत्युक्या महर्पिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोप्मपाश्च । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥ रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो वहुवाहूरुपादम् वहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाःप्रव्यथितास्तथाऽहम् ॥ २३ ॥ अनेक उदरों, अनेक मुग्वों ओर अनेक नेत्रोगले वीर्य ओर जमाएँ अनन्त हैं ॥१९॥ आप अकेले ही आपके अनन्त रूप को तो में देख रहा हूँ, परन्तु सब दिशाओ को, पृथ्वीमण्डल ओर अन्तरिक्ष को हे विश्वेश्वर ! हे विश्वरूप ! आपका आदि, मध्य ओर व्याप्त किये हुए हैं । हे महात्मा ! आपके इस उम्र अन्त कुछ नहीं देख पड़ता ॥१६॥ मैं देख रहा हूँ और अद्भुत रूप को देखकर सब लोग अत्यन्त कि आप किरीट, गदा ओर चक्र धारण किये, तेजोराशि, भयभीत और उद्विग्न हो रहे हैं ॥२०॥ सब देवता सूर्य और अग्नि के सदृश तेजस्वी, परम दीप्तिमान्, आपके शरणागत होकर "त्राहि त्राहि" कर रहे हैं। दुर्निरीक्ष्य ओर अप्रमेय हैं ॥१७॥ मोक्ष की इच्छा | कोई-कोई डरकर, हाथ जोडकर, आपसे रक्षा के रसनेवालों के लिए आप अक्षय, परब्रह्म, ज्ञातव्य लिए प्रार्थना कर रहे हैं । महर्पि ओर सिद्धगण "स्वस्ति" विषय हैं । आप इस विश्व के परम निदान या कहकर आपकी स्तुति कर रहे हैं ॥२१॥ रद, अधिष्ठान हैं । आप अव्यय, नित्य धर्म के रक्षक और आदित्य, वसु, साध्य, मरुद्गण, पितर, गन्धर्व, यक्ष, सनातन पुस्प हैं ॥१८॥ प्रदीप्त अग्नि आपके मुख असुर, विश्वेदेवा, सिद्धगण ओर अश्विनीकुमार आदि मण्डल में विराजमान है । आपका तेज समग्र विश्व देवता विस्मय के साथ आपके रूप को देख रहे हैं को तपा रहा है । चन्द्र और सूर्य आपके नेत्र हैं । ॥२२॥ हे महानाहों ! आपके अनेक मुखों, अनेक आपका आदि, मध्य ओर अन्त नहीं है । आपका । बाहों, अनेक ऊरओं, अनेक नेत्रों, अनेक चरणों, ४१३४ ] म हा भारत [ मा111 नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्ण व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वांप्रव्यथितान्तरात्मा धृति नविन्दामि शमंच विष्णो २४॥ दंष्ट्राकरालानि च तेमुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥२५॥ अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वेसहैवाऽवनिपालसङ्घः । भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथाऽसौ सहाऽस्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥२६॥ वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गः ॥२७॥ यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाऽभिमुखा द्रवन्ति । तथा तवाऽमीनरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥२८॥ यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवाऽपि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥२९॥ लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैज़लद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥३०॥ आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववरप्रसीद विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमायं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥३१॥ अनेक उदरों और अनेक दष्ट्राओं आदि से युक्त इस | से कराल मुखों के भीतर चले जा रहे हैं। उनमें भयङ्कर रूप को देखकर तीनों लोकों सहित मैं किसी-किसी का मस्तक चूर्ण हो गया है, और वे अत्यन्त व्यथित हो रहा हूँ॥२३॥मैं आपको आकाश आपके दातों की सन्धि में चिपके हुए देख पड़ते स्पर्शी, दीप्तिशील, विविधवर्णयुक्त, विशाल लोचन, हैं ॥२६॥२७॥ जैसे सब नदियों का प्राह समुद्र मुख फैलाये देखकर किमी तरह धैर्य और शान्ति | में जाता है, वैसे ही सब नर-वीर आपके समुज्ज्वल धारण करने के लिए समर्थ नहीं होता ॥२४॥ हे मुखमण्डल में अपने आप दौड़-दौड़कर प्रवेश कर जगीश्वर ! कालाग्नि-सदृश भयङ्कर दन्तावली से ! रहे हैं ॥२८॥ पतङ्गे जैसे जान-बूझकर प्रबल वेग परिपूर्ण आपके इस मुसमण्डल को देशकर मैं व्याकुल | से प्रचलित अग्नि के भीतर जा गिरते हैं, वैसे ही हो रहा हूँ। मुझको दिग्भ्रम सा हो रहा है । हे | ये सब चीर उत्साह के साथ आपके मुसो में प्रवेश देवेश ! हे जगन्नाय ! हे विष्णु ! आप प्रसन्न हो कर रहे हैं |२९|| हे विष्णु ! आप प्रज्वलित मुरा ॥२५॥ हे देवदेय ! सब राजाओं सहित कर्ण, जयद्रथ, की परम्परा में चारों ओर के सब लोगों को लीलते दुर्योधन, भीष्म ओर द्रोण आदि धृतराष्ट्रपुत्रों के पक्ष जा रहे हैं। आपकी दीप्ति अत्यन्न अधिक प्रफुरित बाले योद्धाओं के साथ शिपण्डी, धृष्टद्युम्न आदि सब होकर सम्पूर्ण जगत् को, व्याप्त करती हुई, तीन हमारे पक्ष के योद्धा शीघ्रता के साथ आपके दवाओं | वेग से तपा रही है ||३०|| इसलिए मेरे आगे प्रस्ट अध्याय ३५, गीता अध्याय ११ ] म हा भारत श्रीभगवानुगच--कालोऽस्मिलोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वान भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताःप्रत्यनीकेपुयोधाः॥३२॥ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वाशत्रून् क्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥३३॥ द्रोणं च भीष्मंच जयद्रथं च कर्ण तथाऽन्यानपि योधवीरान् । मया हतांस्त्वंजहि माव्यथिष्ठा युद्धयख जेतासि रणे सपत्नान्३४॥ मनय उपाच---एतच्छुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाऽऽह कृष्णं सगद्गदं भीत भीतः प्रणम्य ॥३५॥ अर्जुन उपच-स्थाने हपीकेश तब प्रकीर्त्या जगत्प्रहृप्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वेनमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥३६॥ कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मनगरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकरें। अनन्त देवेशजगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥३७॥ त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥३८॥ वायुर्यमोऽग्निवरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च । कीजिए कि आप कोन हैं। हे देवेश! आपको नमस्कार सहज ही उन्हे युद्ध में मारो । किसी तरह का हे, आप प्रसन्न हों । मैं नहीं जानता कि आप सन्ताप मत करो । इस समय उटर युद्ध में प्रवृत्त फिसलिए ऐसे सहार के भयानक कार्य में प्रवृत्त हुए हो जाओ, नि सन्देह तुम शत्रुओं को जीत लोगे | जान पड़ता है कि आप आदि पुरुप होगे। ॥३४॥ वासुदेव की बाते सुनकर अत्यन्त भयभीत जो हो, आपका विशेष परिचय प्राप्त करने की मुझे हुए ओर कापते हुए अर्जुन ने हाथ जोड़कर, वडी अभिलापा हे ॥३१॥ भगवान् ने कहा --मैं बारम्बार प्रणाम करके, गद्गद् वाणी से कहा- सब लोगों का नाश करनेवाला काल हूँ । इस समय ॥३५॥ हे हृषीकेश! समय पर आपके माहात्म्य का रोफसहार में प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे सिना, भिन्न- कीर्तन करने से सम्पूर्ण जगत् सन्तुष्ट और अनुरक्त भिन्न सेना-विभागों में स्थित, सभी योद्धा इस समय होता है, राक्षसगण या दुष्ट राजा रोग भय के मारे काल का कोर बनेंगे ॥३२॥ इसलिए तुम युद्ध के | इधर-उधर दसो दिशाओं में भाग जाते हैं, योग तप लिए तेयार हो जाओ । शत्रुओं को मारकर, यश प्राप्त आर मन्त्र आदि से सिद्धि पाये हुए पुरप आपको करके, सुसमृद्ध राज्य करो। हे सव्यसाची ! ये सब प्रणाम करते है ॥३६॥ हे अनन्त । हे महात्मा ! हे लोग मेरे ही प्रभाव से पहले ही से नष्टप्राय हो चुके | देवेश ! हे जगन्निनास ! आप ब्रह्म के भी आदिका हैं, इस समय तुम तो इन लोगों के सहार का निमि- हैं, उनके भी गुरु हैं ! फिर आपको क्यों न त्तमात्र हो ॥३३॥ मैं द्रोण, कर्ण, भीष्म, जयद्रथ जगत् के लोग प्रणाम करें? हे अनन्त आप आदि- और अयान्य योद्धाओं को मार चुका हूँ । अब तुम देव और सनातन पुरष हैं ॥३७॥ आप इस विश्व ४१३६ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व नमोनमस्तेऽस्तुसहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥३९॥ नमः पुरस्तादथ पृष्टतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्व समाप्नोपि ततोऽसि सर्वः ॥४॥ सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वाऽपि ॥४१॥ यच्चाऽवहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु एकोऽथवाऽप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥४२॥ पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुगरीयान् । नत्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ४॥ तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कार्य प्रसादये त्वामहमीशमीडयम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियःप्रियायाऽर्हसि देव सोढुम् ॥४४॥ अदृष्टपूर्वं हृपितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव में दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥४५॥ किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रवाहो भव विश्वमूर्ते ॥४६॥ का परम आश्रयस्थान हैं । आप ही ज्ञाता और आप समय आपसे क्षमा की प्रार्थना कर रहा हूँ ॥४२॥ ही ज्ञेय हैं । आप ही परमधाम विष्णुपद हैं । आप हे अपरिमित प्रभावशाली महापुरुष ! आप सबके सर्वत्र व्याप्त हैं ॥३८॥ आप वायु, अमि, यम, वरण पिता, पूज्य, गुरु और गुरु से भी बढ़कर गौरवशाली और चन्द्र है । आप पितामह और प्रपितामह हैं। हैं । त्रिभुवन में कोई भी आपके समान या आपसे हे सब लोकों के ईश्वर! आपको सहस्र-सहस नमस्कार श्रेष्ठ नहीं है ॥४३॥ आप सभी के नियन्ता और है ॥३९॥ हे विश्वात्मन् ! हे विश्वस्प ! आपको स्तुति के पात्र हैं । इसलिए मैं दण्डवत् प्रणाम करके आगे, पीछे और मब ओर प्रणाम है । आपकी शक्ति | आपकी प्रसन्नता के लिए प्रार्थना करता हूँ । जैसे अनन्त और पराक्रम अपार है । सभी पदार्य आपका पिता पुत्र का, सुहृद् सुहृद् का, प्रिय प्रिय व्यक्ति सप है। इसी कारण आपको सरस कहते हैं का अपराध क्षमा करता है, वैसे ही आप भी मेरे 18 विभो । मैंने आपसी महिमा न जानकर, सर अपराध क्षमा कीजिए ॥४४॥ हे देवेश ! हे प्रमाद या प्रणय के कारण आपको मगा समझ, जगनिवाम ! आपके इस अदृष्टपूर्ण रूप को देगकर कृष्ण याय ! हे सगा!" आदि कहा है। मैं जैमे मन्तुष्ट हुआ है, धमे ही भय के मारे मेरा ॥४२॥ आपके अचिन्त्य प्रभारशात्री होने पर भी, अन्त कारण बहुत ही विचलित हो रहा है। गदिए ब-यापनों के गागने और पाले भी भोजन, विहार, देर ! प्रागन दृजिए: मुझे यही अपना पाले या गगन, आगन आदि समय अनेक प्रकार की कर दिगाए ॥४५॥ मे आपका या फिरीट, गदा, गा-दिलीप | उग आग के लिए में हम मक आदि में शामित पाला गादरने के लिए
अन्याय ३५, गीता अध्याय ११ ]
[ ४१३७
मन्जय उपाच-
श्रीभगवानुवान-मया प्रसन्नेन तवाऽर्जुनेदं रूपं परंदर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमायं यन्मे वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥४७॥
नवेदयज्ञाध्ययनैर्न दानेन च क्रियाभिर्न तपोभिस्यैः ।
एवंरूपः शक्य अहंनृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वारूपं घोरमीङ् ममेदम्।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मेरूपमिदं प्रपश्य ॥४९॥
-इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास चभीतमेनं भूत्वा पुनःसौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥
अर्जुन उगन-दृष्ट्दं मानुपं रूपं तव सौम्यं जनार्दन
इदानीमम्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः
श्रीमगगनुपाच-सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकांक्षिणः ॥ ५२॥
नाऽहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ ५ ॥
मत्कर्मकृन्मस्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः
निवरःसर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५॥
निधाममहामारने भागमगादीवामपानिप पानीमाRETर्जुनगा विधापनामाय||११॥
पीपीपार ॥१५॥
४१३८ ] म हा भारत [ मीणपर्व देखना अत्यन्त कठिन है । देवता भी इस देखने की रूप देख सकता है ॥५४॥ पुत्र आदि में अनासक्त, इच्छा रखते हैं ॥५२॥ हे शत्रुसन्तापन ! वेदाध्ययन, प्राणियों से वैर न रखनेवाला और मेरी भक्ति की ही दान, तप या यज्ञ करके भी कोई मेरे इस विश्वरूप ! पुरुषार्थ या परमार्थ माननेवाला पुरुष, जो मेरा आश्रय को नहीं देख सकता ॥५३॥ मेरा अनन्य भक्त ही ग्रहण करके मेरे ही उद्देश से सब कर्म करता है, शास्त्र से, परमार्थ से और तादात्मय रूप से मेरा यह वही मुझे प्राप्त होता है ||५५|| भीमा का पैतागवा अभ्याय समाप्त हुआ ॥ ३५ ॥-[गीता का ग्यारहवां अध्याय ममाम हुआ) अथ षविंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥ अर्जुन उवाच- एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ये चाऽप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच-मय्यावश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते सर्वत्रगमाचन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥ संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः क्लेशोऽधिकतरस्तेपामव्यक्तासक्तचेतसाम् अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते तेपामहं समुद्धr मृत्युसंसारसागरात् भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥ छत्तीमा अध्याय ॥ ३६॥ गीता का बारहवां अध्याय) अर्जुन ने कहा- हे केशर ! आप विश्वरूप, ध्यान करते हैं, वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं ॥३॥४॥ सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् है । जो लोग तद्गत हृदय उनमें विशेषता यही है कि देहाभिमानियों की अव्यक्त से आपकी उपासना करते हैं, और जो लोग अव्यक्त ब्रह्म में निष्ठा होना अनायास साध्य नहीं है। इसी और निर्षिशेष पद की उपासना करते हैं, उन दोनों कारण अव्यक्त ब्रह्म की उपासना करने में अत्यन्त में कौन श्रेष्ठ है! यह बतलाइए ॥१॥ भगगन् नेवेश होता है ||५|| और जो लोग अनन्य भार से फादा--जो रोग श्रद्धा के माय मुझमें ही मन लगा- मुझमें ही मन को लगाकर, मुझको ही सत्र मार्ग कर मेरे ही टिगे कर्मों का अनुपान करते हैं वे ही, मेरे अणि कर, एकान्त भक्ति के साथ मेरा ध्यान और गत में, श्रेष्ठ है ॥२॥ जो लोग मर प्राणियों का उपामना करते हैं, ॥६॥ उन्हें मैं बहुत ही दीनारा हित करते है, गत्र सममुदि कर अव्यक्त प्रम का ! मृत्यु-दपित सँगार से उबार लेता हूँजी इस यारा ।
अध्याय ३६; गाना अध्याय १२ ] म हा भारत [ ४१३९ मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यास मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोपि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाऽऽप्तुं धनञ्जय ॥ ९ ॥ अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १०॥ अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥ श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते । ध्यानाकर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥१२॥ अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥ सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः मय्यर्पितमनोबुद्धियों मे भक्तः स मे प्रियः ॥१४॥ यस्मानोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । होमर्पभयोद्वेगेर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५॥ अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥ ।
। मा ६ . यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥१७॥ समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥१८ ।। तुल्यनिन्दास्तुतिौनी सन्तुष्टो येन केनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥ ये तु धामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥२०॥ इति श्रीमन्महामाग्ने भीमपर्वणि श्री. दगाबीतारापनिय सुब्रह्मविद्याया योगशाचे धाकृ' यार्जनमवादगनावमागयोगोनामदादशोऽध्याय १२ पर्वणि तु पटींशोऽध्यायः ॥ ३६॥ हर्ष, द्वेप, शोक और आकांक्षा से रहित मेरा भक्त । तथा जो कुछ मिल जाय उसी में जो सन्तुष्ट और स्थिर है, वहीं मुझे प्रिय है ॥१७॥ जो शत्रु-मित्र, मान बुद्धिवाला है, वही मेरा भक्त मुझे प्रिय है ॥१८॥१९॥ अपमान, शीत-उष्ण, मुख-दुःख और स्तुति-निन्दा जो लोग श्रद्धापूर्वक मेरा आश्रय लेकर इस धर्मररूप को समान मानता है, जो बाणी को संयत रखता है । अमृत की उपासना करते हैं,वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।॥२०॥ मीमा उत्तीमवा अध्याय ममा हुआ ॥३६॥-[गीता का बारहवा अध्याय ममाप्त हुआ] अथ मप्तारिंशोऽधायः ॥ ३७॥ अर्जुन उवाच-"प्रकृति पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं यं च केशव" श्रीमगगनुपाच- इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम तक्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारी यतश्च यत् । स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु मैतीसवां अध्याय ।। ३७ --[गीताकार.वा अध्याय) अर्जुन ने कहा-हे केशव ! मैं आपके श्रीमुग विषय के ज्ञाता लोग, क्षेत्रज्ञ कहते हैं ॥१॥ हे अर्जुन ! से प्रति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और जय का । सब क्षेत्रों में मुझको ही क्षेत्रज्ञ समझो । क्षेत्र और वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥१॥ भगवान् ने क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है वही, मेरे मन से, यथार्थ ज्ञान हे अर्जुन ! इस गरीर को क्षेत्र कहते हैं । इस क्षेत्र । है ॥२॥ यह क्षेत्र जैसे स्वभाव से युक्त, जिन इन्द्रियाँ के विश्य को जो अच्छी तरह जानता है उमे, इम के विकार से युक्त, जिस प्रकार की प्रकृति और पुरण गरा, मायकारों का माय पर नहीं हैं। महाभारत के पुग्नी में मिलना है अनः यहाँ दिया है। - - 1 कहा- अयाय ३७, गीता अध्याय १३ । म हा भार न - ऋपिभिर्वहधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चिनैः ॥४॥ महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः इच्छा द्वेपः सुखं दुःखं सातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥ अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा शान्तिरार्जवम् आचार्योपासनं शौचं स्थर्यमात्माविनिग्रहः इन्द्रियार्थेपु वैराग्यमनहङ्कार एवं च जन्ममृत्युजराव्याधिःखदोपानुदर्शनम् असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिपु नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिपु मयि चाऽनन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी विविक्रदेशसवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा नेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नाऽसदुच्यते ॥ १२ ॥ ।
४१४२ ] म हा भारत -[ भीमपर्न : । । सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च वहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चाऽन्तिके च तत् ॥१५॥ अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं प्रसिष्णु प्रभविष्णु च ज्योतिपामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ज्ञानं क्षेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य धिष्ठितम् ॥ १७ ॥ इति क्षेत्र तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥ प्रकृति पुरुपं चैव विद्धयनादी उभावपि विकारांश्च गुणाश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १९ ॥ कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥२०॥ पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुड्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ब्रह्म मेरा निशिप रप है । यह न तो मत् है और | से स्थित सा जान पड़ता है। वही सन प्राणियों की न असत् ||१२|| उसके हाथ-पार, नेत्र, कान और सृष्टि, रक्षा और सहार करनेवाला है ।।१६।। यह मुगल र विद्यमान है और यह स्वय सत्र व्याप्त ज्योतिर्मय पदार्थों की योनि और अज्ञान से परे है। हो रहा ॥१३॥ यह सब प्रकार की इन्द्रियों से वह ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञानगम्य और सके हृदय में रहित, चिन्तु इन्द्रियों और उनके मन विषयों का अतर्यामी रस से स्थित है ॥१७॥ हे की तेय ! प्रमाराम है। यह सा-रहित होरर भी सम्मा मैने या सक्षेप से तुम्हारे आगे ज्ञान-ज्ञेय और क्षेत्र आधारम्बाप है । यह गुण-तरीन है, रिन्नु मय गुणों क्षेत्रा का वर्णन कर दिया। मेरे भक्त लोग इन बातों ा भोग करनेगा|१|| परसा चराचर को जानकर मेरे भार को प्राप्त होते है ||१८|| प्राणियों के भीतर और बार है । यह मूरमतम और पुरप दोनों को अनादि जानो । देश, होने का कारण अशियो । म दारथ होरर मी आदि किार और गुस दुप आदि गुण मय प्रति ॥१५॥ या गर अगियों में अस्मि में उपत हैं। पुरण प्राति में स्थित रापर भर पर मा मिन मिल पापा foमिन मिल रप गुणों का भोग करना है ||१|| मगर और मन । - अध्याय ३७; गाना अध्याय १३ । म हा भा र त [ ४१४३ उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः परमात्मेति चाऽप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥ य एवं वेत्ति पुरुपं प्रकृतिं च गुणैः सह सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥ ध्यानेनाऽऽत्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना। अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चाऽपरे ॥ २४॥ अन्ये वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते । तेऽपि चाऽतितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥२५॥ यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्वं स्थावरजङ्गमम् क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६॥ समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥ समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परांगतिम् ॥ २८॥ प्रकृत्येव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ २९ ॥ इन्द्रियों के कर्तृत्व के विषय में प्रकृति कारण है, और करत है।॥२४॥कोई स्त्रय इस प्रकार न जानने के कारण सुग-दुःख के भोग के विषय में पुरुष कारण है औरों (आचार्य आदि) के निकट सुनकर उसके अनुसार ॥२०॥ शुभाशुभ कर्मों को करानेवाला इन्द्रियससर्ग आमा का चिन्तन और उपासना करते हैं । ये श्रुतिपरा- ही पुरुष के देव-तिर्यक् आदि सत्-असत् जन्मों का यण लोग भी मृत्यु को जीतकर मुक्ति प्राम कर लेते हैं कारण है ॥२१॥ प्रकृति अर्थात् देह में रहकर वह ॥२५॥ हे भारत ! स्थावर या जद्गम जो कोई वस्तु उत्पन्न पुरुष प्रति के गुणों का भोग करता है । यह परम । होती है,यह क्षेत्र और क्षेत्र के मयोग से उत्पन्न होती है पुरुष उपदष्टा, अनुमन्ना (अनुमोदक), भता और । उम मंयोग का कारण अधिक ही है ॥२६॥ जो लोग भोक्ता भी है। उसी को महंधर और परमामा भी चराचर प्राणियों में परमामा को देगते है,और उन चग- कहते हैं ॥२२॥ जो इस प्रकार पुरप और प्राति । चर प्राणियों के पिनष्ट होने पर भी उम परमामा को को जानता है, यह गुणों के माथ गदा गया अपिनागी देगते हैं, यही परमार्थ-दी है ॥२७॥ गनमान रहकर भी फिर मंमार में जन्म नहीं स्टेना । जो लोग परमामा को सर ममान भार मे गि ॥२३॥ कोई रोग ध्यान और मन के द्वारा आमा देगी।, और अविद्या के द्वारा आरही अपने आना मेंही आमा को देगते।। कोई गायोग द्वाग और की हत्या नहीं करने, यही मुलि नाम करते हैं- यो कर्मयोग के द्वारा उस परमामा के दर्शन प्राम परम गति पाने । ॥२८॥ जो पर टंगता है कि ।
म हा भारत [ भीमा । यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥३०॥ अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्माऽयमव्ययः शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ।। यथा सर्वगतं सौम्यादाकाशं नोपलिप्यते सर्वत्राऽवस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥ यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः क्षेनं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥ श्रेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तर ज्ञानचक्षुषा भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३४ ॥ इतिश्रामन्म०मीष्मपर्वणि श्रामद्भगवद्गातासपानेषम् ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनमगादे क्षेत्रक्षेत्रनाविभागयोगानामत्रयोदशोऽध्याय १३ पर्वणि तु सप्तींशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥ सब कर्मों को प्रकृति ही करती है, आत्मा स्वय काई सव पदार्थों में स्थित होकर भी किसी में लिप्त नहीं कार्य नहीं करता, उसी का देखना उचित है ॥२९॥ है, वैसे ही आत्मा सब देहों में होता हुआ भी देह जब लोग यह देखते हैं कि सब भिन्न-भिन्न प्राणी के गुण-दोपों में लिप्त नहीं होता ॥३२॥ हे भारत ! एक प्रकृति में ही स्थित हैं, और प्रकृति से ही उनका जैसे एक ही सूर्य इस असीम विश्व को पूर्ण रूप से विस्तार होता है, तब ये सच्चिदानन्द ब्रह्म को प्राप्त प्रकाशित करता ह, वैसे ही एकमात्र परमात्मा सन होते हैं ॥३०॥ यह सनातन परमा मा देह में रहता शरीरों को प्रकाशित किये हुए है ॥३३॥ जो लोग हुआ भी स्वयं अनादि और निर्गुण होने के कारण विशेष रूप से ज्ञानचक्षु के द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के न तो कुछ कर्म करता है, और न कभी किसी | भेद को देखते हैं, और भौतिक प्रकृति से मोक्ष के उपाय प्रकार कर्मफल में लिप्त होता है ॥३१॥ जैसे आकाश को जानते हैं, वेही परम पद को प्राप्त होते हैं ॥३४॥ भीमपर्व का मंनीसवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३७ ॥-[गीता का तेरहवां अध्याय गमाप्त हुआ] अध अष्टविंशोऽध्यायः ॥ ३८॥ श्रीभगानुपाच---परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ १ ॥ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः सगेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥ अमवा अध्याय ॥ ३८॥ [गता का चौपड्या अध्याय) भगगन ने कहा-हे पार्थ ! सर्वश्रेष्ट मुनिगण | ज्ञान का आश्रय लेकर लोग मेरे स्वरूप को प्राम निमे जानकर परम सिद्धि प्राप्त करते हैं, उस ज्ञान करते हैं, और फिर सृष्टि-काल में भी जन्म नहीं या में तुम्हारे आगे वर्णन करता हूँ, सुनो ॥१॥ इस लेते । उन्हें प्रलय-काल में भी व्यथित नहीं होना अध्याय ३८: गीता अध्याय १४ ] म हा भारत [ ४१४५ । मम योनिर्महद्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम् । सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः तासां ब्रह्म महद्योनिरहं वीजप्रदः पिता सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः निवनन्ति महावाहो देहे देहिनमव्ययम् तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चाऽनघ रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् तन्निवध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निवध्नाति भारत सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत रजस्तमश्चाऽभिभूय सत्त्वं भवति भारत रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्वं रजस्तथा ॥ १०॥ सर्वद्वारेपु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥ पडता ॥२॥ हे भारत ! मेग 'महत्' प्रकृति ही है । वह तृष्णा ओर आसक्ति मे उत्पन्न हुआ है । मव जी के गर्भाधान का स्थान है । मैं उसी मे वह देहधारियों को कर्म के बन्धन मे बाध रखता गर्भ स्थापित करता हूँ॥३॥ उसी से सब प्राणियों की है ॥७॥ तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न हुआ है । वह देह- उत्पत्ति होती है । हे कोन्तेय ! सब योनियो मे जो धारियो को मोह, आलस्य और निद्रा से आच्छन्न मूर्तिया उत्पन्न होती हैं उनका पिता मैं ब्रह्मस्वरूप कर रग्यता है ॥८॥ सत्वगुण सब जीग को सुखी, रजो- है । महत्तत्व उनकी योनि है । उसमे मैं बीज स्था गुण कर्मासक्त और तमोगुण ज्ञान का नाश करके पिन करता हूँ ॥४॥ प्रकृति से उत्पन्न सत्त्व, रज, नम प्रमाद के वश मे कर देता है ॥२॥ मत्त्वगुण, रजोगुण नाम के तीनो गुण ही जीनों को सुख-दु.ग्व मे और तमोगुण को, रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण आबद्ध करते हैं ॥५॥ उन तीनों गुणो मे, निर्मल होने को, तमोगुण, सत्त्वगुण और रजोगुण को अभिभूत के कारण, मत्त्वगुण ही सब इन्द्रियो का प्रकाशक करके प्रकट होता है।॥१०॥ सत्त्वगुण जब बढता है तब है । उसी के प्रभाव में दहधारी लोग अपने को इस शरीर की सब इन्द्रियों में ज्ञान का प्रकाश होता सुपी आर ज्ञानी समझते हैं॥६॥ रजोगुण अनुरागा मक है। रजोगुण जब बढ़ना है तब लोभ, (अग्निहोन आदि । - ४१४६ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व । लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा रजस्येतानि जायन्ते बिडे भरतर्षभ ॥ १२ ॥ अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥ यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् तदोत्तमविदाँल्लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥ रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिापु जायते तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते कर्मणः सुकृतस्याऽऽहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्। रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥ सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च प्रमादमोही तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७॥ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥ नाऽन्यं गुणेभ्यः कतीरं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् जन्ममृत्युजरादुःखेर्बिमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥ अर्जुन उवाच-कैलिरेस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो किमाचारः कयं चेतांस्त्रन्गुिणामतिवर्तते की) प्रवृत्ति, (घर आदि) कर्म का आरम्भ, म्पृहा और आदि का योनियों में जन्म लेता ह॥१५॥सात्तिक कर्म अशान्ति उत्पन्न होता है ॥२१११२॥ नमोगुण के का 'फट अति निर्मल सुप है, राजम कर्म का फल बढ़ने पर विक-हीनता, अप्रवृत्ति, प्रमाद और माह दु ग्य है और तामम कर्म का फट अज्ञान ह॥१६॥मन्त्र उपस्थित होता है ॥१३॥ सत्वगुण बढ़ने की अवस्था में में ज्ञान, रजोगुण में लोभ आर नमागुण से प्रमाद. यदि कोई मृत्यु को प्राप्त होता है तो वह हिरण्यगर्भ माह तथा अज्ञान उत्पन्न होता ह॥१॥ मात्विक रोग के उपासक लोगों के ममुचल गको का गाना अपंगति प्राम करत है । गजम लोग मध्यगति प्राप्त है ॥१५॥ रजोगुण बदन की अगम्या में यदि कोई मृत्यु करते है । जयन्य-गुण-मम्भूत भ्रम-माह के वशीभूत को प्राप्त होता है तो वह मनुष्य गेम में जन्म लेकर नाममलंगग अयोगति प्राप्त करने है ॥१८॥ कि आदि कमी में आमक्त होता । नमोगुण बदन की अगम्या मर गुणो या मर कार्यों का कत्ती ममझने में और में यदि किमी का प्राणान्न होता है तो यह पशु । आमा को इन नीनो गुणो से पर जानने मनुष्य अन्याय ३९, गीता अध्याय १५) महा भारत { ४१४७ । श्रीभगवानुवाच-~-प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव न द्वष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२॥ उदासीनवदासीनो गुणयों न विचाल्यते गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३॥ समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥२५॥ मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पने ॥ २६ ॥ ब्रह्मणी हि प्रतिष्टाऽहममृतम्याऽव्ययम्य च शाश्वतम्य च धर्मम्य सग्यम्यकान्तिकस्य च ४१४८ ] म हा भा र त [ भीमपर्व अधश्चोर्ध्व प्रस्मृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुवन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥ न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नाऽन्तोन चाऽऽदिर्न चसम्प्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन च्छित्वा ॥ ३ ॥ ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गतान निवर्तन्ति भूयः। तमेव चाऽऽयं पुरुपं प्रपद्ये यतःप्रवृत्तिःप्रमृता पुराणी ॥ ४ ॥ निर्मानमोहा जितसङ्गदोपाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥ न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ममैवांऽशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः मनःपष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कपति ॥ ७ ॥ शरीरं यदवाप्नोति यच्चाऽप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाऽऽठायात् ॥ ८ ॥ श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च उनतालीसवाँ अध्याय ॥ ३९॥-गीना का पन्द्रहवां अधाय] भगगन ने कहा--हे अर्जुन | मसार एक आते । जिसमे पुगनी (प्राचीन समार की ) प्रवृत्ति अक्षय अवय (पीपल) वृक्ष है । इमनी नड़ ऊपर प्रवर्तित हुई ह उमा आदि-पुस्प के में शरणागत है और शारगाएँ नीचे है। द टमके पत्ते है । इसके यो यहकर उन्हीं के शरणागत होना चाहिए ॥४॥ विषय को जो जानता ह नहीं वेदज्ञ है ॥१॥ इस जिन्होंने मान, माह आर पुत्र आदि के प्रति आगति वृक्ष की भागाएँ नीच और उपर गई है । यह त्याग दी है, सुख दुप आदि द्वन्द्वमा में अपना मरा आदि गुणों के द्वारा परिगर्दिन और ग्प-ग्ग हुटमाग पर गिया है वहा आमज्ञाननिष्ट, निष्काम, आदि पियों के द्वाग पल्लविन दृआ ग्ना है। अविद्या गून्य महामा उक्त अव्यय पद को प्राप्त करने नांचे, मनुष्योक में, कर्मवधन र प ज पी हुई है ॥॥ मूर्य, चन्द्र और अग्नि जिमे प्राशित करन १॥२॥म वृक्ष कारप नहीं देग पड़ता। में असमर्थ , जिसे प्राप्त र निर हा मे लीटना गा आदि, न अतयह किम अगर नहाता, नी मेरा परमधाम ॥६॥ इगजीय मि, मो भी नहीं जाना जाता । मुर निर्ममा- सम्म मनानन नी मेराही गई। यह प्रति Pार दाग उग जड़ जमाप टुप वृक्ष में द्रियों मन को आय माना है नाटयर गगी जद यो गांजना गादि ॥३॥ उगान गायु फगे मे गमकरोती, जिन्होंने पारिपार में टियर नहीं होनीर जर गरार या गाण गाना या सल -
अव्याय ३०, गीता अध्याय १५ ]
म हा भारत
[४१४९.
अधिष्टाय मनश्चाऽयं विपयानुपसेवते
उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि भुजानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नाऽनुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
यतन्तो योगिनश्चेनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाऽग्नो तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा
पुष्णामि चौपधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥
सर्वस्य चाऽहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाऽहम् ॥१५॥
द्वाविमौ पुरुपौ लोके क्षरश्चाऽक्षर एव च
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥
उत्तमः पुरुपस्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः
यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥१७॥
यम्माल्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथिनः पुरुपोत्तनः ॥१८॥
४१५० ] म हा भारत [ भीपाप यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ एतद् बुध्वा बुद्धिमाँस्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २०॥ इति श्रीम० भीमपाणि श्रीमद्भगाहीतासृपनिषत्सु ब्रह्मविद्याया योगशाने श्रीकृष्णार्जुनसवादे पुस्योत्तमयोगो नाम पददशोऽध्याय.॥१५॥ पर्वणि तु ऊनचन्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ प्राणी क्षर हैं, और कूटस्थ पुरुष अक्षर है ॥१६॥ इनके कहलाता हूँ ॥१८॥ जो व्यक्ति मोह-शून्य होकर अतिरिक्त और एक उत्तम पुरुप है, उसका नाम । मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वही सर्वज्ञ है----यही सब परमात्मा है । वह इन तीनो लोको में प्रवेश करके प्रकार से मुझे भजता है ॥१९॥ हे पार्थ ! मैंने सबका प्रतिपालन कर रहा है ॥१७॥ वही अव्ययं तुमको यह परम गुह्य शास्त्रीय विषय सुनाया है। ईश्वर है । मैं क्षर और अक्षर दोनो पुरुषों से वढ इसे जानने पर लोग बुद्धिमान् और कृतकार्य होते कर है। इसी कारण लोक आर वेद में मैं पुरुषोत्तम | हैं ॥२०॥ मी मप का उनतालीमवां अध्याय समाप्त हुआ ॥३०॥---गीता मा पन्द्रहवा अध्याय ममात हुआ} अथ चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥ श्रीभगवानुवाच-अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥ २ ॥ तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नाऽतिमानिता । भवन्ति सम्पदं देवीमभिजातस्य भारत दम्भो दोऽभिमानश्च क्रोधः पासण्यमेव च अज्ञानं चाऽभिजातस्य पार्थ सम्पदमाऽऽसुरीम्॥ ४ ॥ देवी सम्पद्विमोक्षाय निवन्धायाऽऽसुरी मता । मा शुचः सम्पदं देवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥ ५ ॥ चारोमयाँ अध्याय ४० - [गीता का मोलवा अध्याय) वासुदेव ने कहा--हे अर्जुन ! जो लोग देवी । लोभशून्यता, कोमलता, हो, अचञ्चटना, ॥२|| तेज, सम्पत्ति का लक्ष्य कर जन्मते हैं उनमें अभय, चित्त-, क्षमा, धृनि, शोच, अद्रोह और अभिमान का अभाव शुचि, आमज्ञान की निष्टा, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, ये हवाम गुण स्वाभाविक होते हैं ||२|| जो लोग नप, मरलता, ॥१॥ अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, आयुरी सम्पत्ति को लक्ष्य करके जन्म देते हैं उनमें शान्नि, दुष्टता का अभाव, मत्र प्राणियों पर दया, दर्प. अभिमान, क्रोध, निष्ठरता और अज्ञान अध्याय ४० गीता अध्याय १६ । म हा भा र त [४१५१ । द्वौ भूतस! लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च देवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः न शौचं नाऽपि चाऽऽचारोन सत्यं तेपु विद्यते ॥ ७ ॥ असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहेतुकम् एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः मोहादगृहीत्वाऽसद्ग्राहान्प्रवर्त्तन्तेऽशुचित्रताः ॥ १० ॥ चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः आशापाशशतैर्वद्धाः कामक्रोधपरायणाः ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनाऽर्थसञ्चयान् ॥ १२ ॥ इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥ असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चाऽपरानपि आदि दुर्गुण स्वाभाविक होते है ॥४॥ देवी मम्पत्ति लोग इस प्रकार की ममझ का आश्रय लेने हैं । ये मोक्ष का ओर आसुरी सम्पत्ति बन्धन का कारण मालिनचित्त, उग्रकों ओर अहितकारी लोग जगत् होती है | हे अर्जुन ! तुम दे की मापत्ति को लक्ष्य के नाश के लिए उद्यत होते है ॥२॥ दम्भ, अभि- करके उत्पन्न हुए हो, इमलिए शोक मन करी ॥५॥ मान, मट ओर अपवित्र मद्य-मांस आदि में उनकी हे पार्थ ! इम लोक मे देव और आसुर दो विशेष रुचि होती है । वे मोहवश यह मोचकर कि प्रकार के प्राणा होते है | मैं तुमको दर प्राणियों 'इम देवता की आरापना करके में बहन-सा द्रव्य का विषय विस्तार के माय सुना चुका | अब आसुर प्राप्त करंगा", क्षुद्र देवताओं की आरारना में प्रवृत्त प्राणियों का विषय सुनो ॥६॥ आसुर स्वभाव के होते है और कामभोग को परम पुरुषार्थ ममझकर लोग यम में प्रवृत्ति और अधर्म मे निवृत्ति का विषय मरणपर्यन्न अमीम चिन्ता मे चूर रहते हैं ॥१०॥ नह। जानते । वे शांच, आचार और मत्य मे शून्य ११।। बहुत-मी आशाओं के फन्दे में बो दृपये होते हैं ।।७॥ ये जगत् को अमत्य, अप्रतिष्ट, मा. कामना करने और कामना पूर्ण करने के लिए अन्याय- भाविक, अनीश्वर, सी-पुरुष के ममर्गमात्र में उपन्न पूर्वक धन उपार्जन करने की चेष्टा करते है ॥१२॥ और कामहेतुक बतलाते है ॥८॥ ये अप बुद्धिवाले । "मैंने आज यह माम किया, तिर यह मनोरय पूर्ण ४१५२] म हा भा र न [ भीष्मपर्व ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥१४॥ आढयोऽभिजनवानम्मिकोऽन्योऽस्ति सहशोमया यक्ष्ये दास्यामि मोदिप्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ।। अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचो आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयजेस्ते दम्भेनाऽविधिपूर्वकम् ॥१७॥ अहङ्कारं बलं दर्प काम क्रोधं च संश्रिताः मामात्मपरदेहेपु प्रद्विपन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ १८॥ तानहं द्विपतः ऋरान्संसारेपु नराधमान् क्षिपाम्यजत्रमशुभानासुरीष्वेव योनिपु ॥ १९ ॥ आसुरी योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥ त्रिविधं नरकम्येदं द्वारं नाशनमात्मनः कामः क्रोधस्तथा लोभस्तम्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥ एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारेस्त्रिभिर्नरः आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ २३ ॥ होगा; मेरे पास यह धन है, आगे चलकर वह धन क्रोध और इर्ष्या के वशाभूत होकर नाममात्र के लिए भी प्राप्त होगा; ||१३|| आज इम शत्रु को मारा है, यज्ञ आदि करते हैं ॥१७॥१८॥ मैं उन विद्वेषी. कल उम शत्रु को भी माझंगा, मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी ऋरस्वभार, नगधमा को निरन्तर इम मसार में आसुर हुँ, मुग्वी हूँ ॥१४॥ धनमाली है, मैं मिद ह, बलान् योनियों के बीच गिराता रहता है ॥१॥हे कोन्तेय ! ह, कुलीन है, मेरे ममान और कोट नहीं है, मैं यन मूढ पुरुष आसुर योनि को प्राप्त होकर फिर मुझे कम्गा, दान कम्गा, आमोद-प्रमोट कम्म्गा". इम नहीं पा मत, इस कारण उत्तरोत्तर अपम गनि प्रकार व अज्ञानमोहित लोग मोह और चित्तविकारो को ही पहुँचते रहते है ॥२०॥ हे अर्जुन ! काम, मे आच्छन्न और कामभाग में आमक्त होकर नाह क्रोध और लोभ, ये तीन नरक के द्वार हैं। इन्हीं नाह के निकृष्ट विचार करते हैं और अन्न को नरकगामी में आत्मविनाश होता है । इमटिए यत्नपूर्वक उनसे होते है ॥१५॥१६॥ रे लोग सय-पुजिन, नम्रता बचना चाहिए ॥२१॥ इनमे छुटकारा पा सरुने पर हिन, धन-मद में चूर और अहङ्कार, बल, दर्प, काम, मनुष्य आत्मकल्याण-लाभपूर्वक परम गति प्राप्त करना । 1 अध्याय ४१, गीता अध्याय १७ ] म हा भारत [४१५३ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । झावा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहाऽहसि ॥ २४ इतिश्रीमहाभीमपण श्रीमद्भगवद्गीतामपनियम ब्रह्मविद्यायो योगशास्त्र श्रीकणार्जुनसवादे देवासुरसपद्विभागयोगो नाम पाडशोऽध्याय १६ पर्वणि तु चत्वारिंशोऽध्याय ॥ ४० ॥ हे ॥२२॥ जो कोई शास्त्र की विधि न मानकर का निश्चय करने मे शास्त्र ही प्रमाण हे । इसलिए स्वेच्छाचार में प्रवृत्त होता है, वह परम गति या तुम शास्त्र के विधान को जानकर कर्तव्य-पालन में सुग्व शान्ति नहीं पा सकता ॥२३॥ कार्य-अनार्य । लग जाओ ॥२४॥ मामपत्र का नालीमवा अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ४० ॥-[गीता का सालहवा अध्याय ममाप्त हुआ] अथ एक्चत्वारिंशाऽध्याय ।। ४ ।। अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥ श्रीभगवानुराच-त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥ सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छूद्धः स एव सः ॥ ३ ॥ यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः । प्रेतान्भूतगणांश्चाऽन्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥ अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागवलान्विताः कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः मां चैवाऽन्तःशरीरस्थं तान्विद्धद्यासुरनिश्चयान्॥ ६ ॥ आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । इस्तालीसवा च्याय ॥ ४१।--[गीता का सत्रहवा अध्याय अर्जुन ने पूछा हे कृष्णचन्द्र ! जो लोग | होती है । यह पुस्प श्रद्धामय ह | जिसकी जैसी शास्त्रविपि को छोडकर श्रद्धापूर्वक यज्ञ आदि करत श्रद्धा हे वह वेसा ही है ।।३।। साचिर पुरप देवताओं हैं, उनकी यह श्रद्धा साचिका हे, या राजसी अथवा की, राजस पुस्प यक्षों ओर राक्षसो की तथा तामस नाममा ? ॥१॥ भगवान् ने कहा-हे अर्जुन देह पुस्पों भूनों ओर प्रेतो की पूजा करते हैं ॥४॥ जो धारियो का श्रद्धा सात्त्विती, रातमी आर तामसी, मनुष्य दम्भ, अहवार, काम, राग आदि की प्रबलमा तीन प्रकार की होती है ॥२॥ तीनो प्रकार की | के साथ अगास्त्राय कठोर तप में लगे रहकर शरीरस्थ श्रद्धा स्वाभानिस ह । सच की श्रद्धा सच के अनुरूप तत्त्वों को आर शरीर के भीतर स्थित मुझ आत्मा को ।
४१५४ ] म हा भा र न [ भीमपव - यज्ञस्तपस्तथा दानं तेपां भेदमिमं शृणु आयुःसत्त्ववलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥८॥ कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूनविदाहिनः आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः यातयाम गतरसं पूति पर्युपितं च यत् उच्छिष्टमपि चाऽमेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥१०॥ अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥ अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चेव यत् । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥ विधिहीनमस्सृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३॥ देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥ अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियाहितं च यत् स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥ क्लेश पहुँचान हैं, वे अचेत पुरुष आसुर प्रकृति के फल की कामना छोडकर अवश्य कर्तव्य समझकर हैं ॥५॥६॥ हे अर्जुन ! मब पुरुषों को आहार भी मन की एकाग्रता के साथ विधिपूर्वक जो यज्ञ किया तीन तरह का प्रिय होता है । यज्ञ, तप आर दान जाता है, वह सात्तिक यज्ञ है ॥११॥ हे भरतश्रेष्ठ ! भी विविध होते हैं । इन सके लक्षण मैं कहता फर की कामना से या दम्भ के लिए जो किया है, सुनो ||७|| आयु, सच, बठ, आरोग्य, सुख जाता है वह यज्ञ राजस है ||१२|| ऐसे ही विधि- और प्रीति को बढानेवाला, सरस, स्निग्ध, हदय- । हीन, श्रद्धाहीन, अन्नदानशून्य, तथा बिना ही मन्त्र पोषक आहार मात्तिक लोगो को रुचता है ||८|| आर दक्षिणा के किया गया यज्ञ तामस कहलाता अत्यन्त कटु, अत्यन्त पट्टा, अत्यन्त नमकीन, अत्यन्त हे ॥१३॥ देवता, ब्राह्मण, गुरुजन ओर पण्डित आदि गर्म, अत्यन्त तीक्ष्ण, अत्यन्त दाही, दु ग्य, गोफ और | की पूजा, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा, गेग को बढ़ानेवाला आहार राजस पुरपो को प्रिय ये शारीरिक नप के अङ्ग हे ॥१४॥ किसी को कष्ट होता है ॥९॥ वासी, जिमका रम नष्ट हो चुका है, | न पहुँचानवाला वाक्य, सत्य, प्रिय, हितकारी वाक्य दुर्गन्मयुक्त, टा, अपवित्र, कई दिन का बना आहार और साध्याय (वेदपाट ) का अभ्यास, ये बागमय तामम लोगों को प्रिय होता है ॥१०॥ हे धनञ्जय ! तर के अङ्ग है ॥१५॥ मन की पवित्रता, मोम्यभार, , अध्याय ११. गीता अध्याय १७ ] म हा भा र त [४१५५ मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥ श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्रिविधं नरैः अफलाकांक्षिभिर्युक्तः सात्त्विक परिचक्षते ॥ १७॥ सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चेव यत् क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् मृढग्राहेणाऽऽत्मनो यत्पीडया क्रियते तपः परस्योत्सादनार्थ वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥ दातव्यमिति यहानं दीयतेऽनुपकारिणे देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥ यत्तु प्रत्युपकारार्थ फलमुहिश्य वा पुनः दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥ अदेशकाले यहानमपात्रेभ्यश्च दीयते असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥ तम्मादोमित्युदाहृत्य यनदानतपः क्रियाः प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥ तदित्यनभिसन्धाय फलं यजतपःक्रियाः दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकांक्षिभिः ॥ २५॥ मौन, आ मनिग्रह ( मन का दमन ) आर भाव की ह ॥१०॥ फेरर इम भान मे कि दना ही चाहिए, शुदि, ये मानम नप के अङ्ग है ॥१६॥ यह विधि जो अपना उपकार न करनेवाले को, दंगकाल और नप मात्तिक आदि भेद से तीन प्रकार का है। पान का विचार करके, दिया जाना है वह माचिका फट की इच्छा छोडकर एकाप्रभार में अत्यन्त श्रद्धा दान है ॥२०॥ प्रयुपकार या गटाभ आदि के के साथ किया गया ना मात्रिक ह ॥१७॥ मकार, उद्देश मे अनिच्छापूर्वक जो दिया जाता है, वह गाम मान और पूना की प्राप्ति के लिए दम्भपूर्वक जो । दान है ॥२१॥ अनुपयुक्त स्थान में, अनुपयुक्त समय किया जाता है, यह नागरान् फयाग तप गतम में, अयोग्य पान को अमबार और निरम्बार माध ॥१८॥ मूदना-पर्षक आमा नो पीडा परचाकर जो दिया जाता है. ! नामग दान ॥२२॥ ॐ या दूसरे को कर पहुंचाने के निप, दुसरे की नत्, गत्, ये युग के रिए, जो नर किया जाता है, नानग इन्हीं नामों में सामगो, यता और बेटी राधिान वय के नीन नाम है | पूनमय में ४१५६ ] म हा मारत [ भीरमपर्व । सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥ यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते । , कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाऽभिधीयते ॥२७॥ अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥२८॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवदीतामूपनिपन्स ब्रह्माविद्याया योगशाचे श्रीकृष्णार्जुनमवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ पर्वणि तु एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥ हुआ है ॥२३॥ इसी कारण ब्रह्मवादियों के विधान अवसर पर परमेश्वर के उद्देश से किये गये कर्मों में में कहे गये यज्ञ, दान, नप आदि कर्म "ओ" कह "सत्" शब्द का प्रयोग किया जाता है ॥२६॥२७॥ कर किये जाते है ||२४|| फल की कामना न रखने अश्रद्धा से किया गया हबन, दान, तप और अन्य वाले मोक्षाभिलापी लोग "तत्" कहकर यज्ञ, तप, । कर्म "असत्" कहलाते हैं । हे पार्थ ! वे कर्म दान आदि विविध कर्म करते हैं ॥२५॥ सद्भाव, । इस लोक मे फलदायक होते हैं और न परलोक में साधुभाव, मगलकर्म और यज्ञ-तप-दान आदि के काम आते हैं ॥२८॥ भीष्मपर्व का इकनालामवा अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ४१ ॥--[ गीता का मतारहवां अध्याय समाप्त हुआ] - न -- अथ द्विवन्वारिंशोभ्यायः ॥ ४२ ॥ अर्जुन उवाच--संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृपीकेश पृथकेशिनिपूदन श्रीभगवानुवाच--काम्यानां कर्मणांन्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहर्मनीषिणः यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यामिति चाऽपरे निश्चयं शृणु मे भरतसत्तम त्यागो हि पुरुपव्याघ त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥ वयालासयाँ अध्याय ।। ४२ --[गीता का अठारहवा अध्याय] अर्जुन ने कहा है महागहो! हे हृषीकेश! | है ॥२॥ कुछ लोगो का कहना है कि कर्म का दोग- मन्याम का और त्याग का तत्व में अलग-अलग सुनना तुल्य त्याग कर देना चाहिए । अन्य लोग कहते है चाहना है ॥१॥ श्री भगवान् ने कहा----हे अर्जुन ! कि यन, दान, तप आदि कर्मों का त्याग न करमा विद्वान् जानियों ने काग्य कर्म के त्याग को ही चाहिए ॥३॥ हे भरतकुलश्रेष्ठ ! अब तुम त्याग के मंन्याम आर सब कर्मपदों के त्याग को ही त्याग कहा चार में निश्चय सुना । हे पुरुपसिंह ! त्याग तीन तत्र त्यागे अन्याय ४२, गीता अध्याय १८ ] म हा भारत [ ४१५७ यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीपिणाम् एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥ कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥ ९ ॥ न द्वेष्टयकुशलं कर्म कुशले नाऽनुपज्जते त्यागी सत्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥ न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते अनिष्टमिष्टं मिथं च त्रिविधं कर्मणः फलम् भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥ पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निवोध मे सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥ प्रकार का ह॥४॥ यज्ञ, दान आर तप का कम करना साचित त्याग कहलाता है ॥९॥ सत्त्व- किसी तरह न करना चाहिए । यज्ञ, टान नाप आदि । गुणयुक्त, मेकाहि सन्देहहीन पापशीर व्यक्ति दुख कर्म विकियों के चित्त को शुद्ध करते हैं ॥५॥ हे । के विषय से द्वेष आर सुख के विषय में अनुराग भारत । मेरे विचार मे आसक्ति और फल की इच्छा कभी नहीं रग्वता ॥१०॥ देहपारी पुरुप सर कर्मों छोडकर कम करना चाहिए ॥६॥ नित्य क्मो का का त्याग कर भी तो नहीं सकता । हे पार्थ । जो त्य ग कभी न करना चाहिए । यहा मेरा उत्तम अर कर्म का न्याग करनेवाला है वही वास्तव में त्यागी निधिन मत ह ! मोह के कारण नित्य कर्मों का त्याग कहा जा सकता ह ॥१शा कर्म के विविध पल हैं, तामस कहलाता है ||७|| अयन्त दुखद समझकर शा- इय, अनिष्ट आर इष्टानिष्ट | जो लोग त्यागी नहीं है रीरिस लेश और भय के कारण किये गये कर्म के त्याग परलोक में जाकर इन फलों को प्राप्त करते हैं को राजस कहते है । राजस त्यागी व्यक्ति कभी त्याग चिन्तु सन्यासा लोग इन फलों को नहीं पाते॥१२॥ का पर नहीं पा मक्ता ॥८॥ आसक्ति आर फल हे अर्जुन ! कर्ममिद्धि के निमित्त तत्व निर्णय करने- वी प्रयाशा से चकर, अवश्य कर्तव्य समदार, पाले माग्व्यशास्त्र मे शरीर, पा, मिन भिन्न इन्द्रिया, याग ।
४१५८ ] म हा भारत - अधिष्टानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् विविधाश्च पृथक्चेष्टा देवं चैवाऽत्र पञ्चमम् शरीरवाड्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥१५॥ तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः यस्य नाऽहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान हन्ति न निवध्यते ॥१७॥ जानं ज्ञेयं परिनाता त्रिविधा कर्मचोदना करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः प्रोच्यते गुणसङ्खयाने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥ सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते आविभक्तं विभक्तपु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकम् ।। २० पृथक्त्वेन तु यज्ञानं नानाभावान्पृथविधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥ यत्तु कृत्स्नबढेकस्मिन्कार्ये सक्रमहेतुकम् अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ नियतं सङ्गरहितमरागद्वेपतः कृतम् भिन्न भिन्न उनकी चेष्टाए आर देव, ये पाच मर कर्मों । ज्ञान, जय आर ज्ञाता, यह तान प्रभार की कर्म के कारण कहे गये है ॥१३॥न्यायमगत या अन्याय प्रवृत्ति ह । करण, कर्म, कर्ना, यह विविध वर्ममप्रह पूर्ण, मभी काया वे--निन्हे मनुष्य मन, नाणी आर । है ॥१८॥ ज्ञान, कर्म आर वर्मा, ये नानो गुण भेट वाया से करते हैं---यही पाच कारण है ||१४|१५|| र अनुमार रिसिभ है । हे अर्जुन । मायशास में बुद्धि परिमार्जित न होने के कारण नो मनुष्य उपा इनका वर्णन निम तरह किया गया है मो में बहला विगय क्या आमा को ना मभझता है, वह । ह, सुनो ॥१॥ मनुष्य निमरे द्वाग मा रिभक्त दुर्मान कुछ भी नहीं जानता ॥१६॥ निमम अह- प्राणियो म मा अविभक्त अयय भार देगना है, कार या भार नहा है और निमी बुद्धि अग्नि है, यह माधिक ज्ञान है |॥२०॥ जिमो द्वारा विभिन्न रह इन मर गमो को मायर भी नहा मरता, उमे प्राणियों में भिरभिन भार देग पड़न है, " गग नागिरथ या पाप भा ना भागना पड़ता ॥१७॥ नान है ॥२॥ तो मम्पूर्ण मा, REयाय में ॥ - 1 ४२; गाना अव्याय १८ ] म हा भा र त [ ४१५९ अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्तिकमुच्यते ॥ २३ ॥ यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २१ ॥ अनुवन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य व पौरुषम् मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥ मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः सिद्धयासिद्धयोनिर्विकारः कती सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥ रागी कर्मफलप्रेप्सुलुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्पशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७॥ अयुक्तःप्राकृतः स्तब्धः शठो नैकृतिकोऽलसः । विपादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८॥ युद्धेर्भदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु प्रोच्यमानमशेपेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥ २९ ॥ प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकायें भयाभये वन्धं मोक्षं च यावेत्ति वुद्धिःसा पार्थ सात्त्विकी॥ ३० ॥ यया धर्ममधर्म च कार्य चाऽकार्यमेव च अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥ अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता सर्वार्थाविपरीतांश्च वुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥३२॥ ससक्त, अकारण, अन्य आर तत्वार्थहान है वह तामस ॥२६॥ रागयुक्त, कर्मफल की इच्छा रगनेवादा, ज्ञान है ॥२२॥ कर्तृत्व के अभिमान और कामना मे लोभी, हिवनि, अशुचि, हर्पगोकयुक्त कागजम शून्य मनुष्य के द्वारा राग ओर द्वेष छोडकर किया है ॥२७॥ अयोग्य, अमानपान, विवेक-विहीन, उप- गया कर्म माविक कहलाता है ॥२३॥ मकाम आर यभाव, शठ, आरसी, विपण्गचित्त और दीर्घसूत्री अहकारी व्यक्ति के द्वारा बड़े परिश्रम मे किया गया का नामम है ।।२८॥ हे पार्थ ! गुग भेट मे बुद्धि कर्म राजम है ॥२४॥ भावी शुभाशुभ, अर्थ-श्रय, और धृति के भी नान भेद है; उसे सुनो । मैं अग हिंमा और पोस्प का पयाल न करके मोह मे शिम अटग विस्तारपूर्वक उनका वर्णन करना ई ॥२०॥ कर्म का आरम्भ किया जाना है वह तामम है ॥२५॥ जिन बुनि के द्वारा प्रवृत्ति-निवृनि, काप-आर्य, महान्य, अटकार-हनि, धर्य और उमाह में सम्पन्न, भय-अभय, बन्ध-मक्ष आदि विषय भली प्रकार जाने गिदि और अनिदि में निर्विकार की माषिक हे जाते हैं, यह मापक ||३०|| जिपके द्वारा ..
४१६० म हा भारत [ भीष्मपर्व । । धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः योगेनाऽव्यभिचारिपया धृतिःसा पार्थसात्त्विकी ॥ ३३ ॥ यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन प्रसङ्गेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥ यया स्वप्नं भयं शोकं विपादं मदमेव च न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥३५॥ सुखं त्विदानी त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥ यत्तदने विपमिव परिणामेऽमृतोपमम् तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मवुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ।। विपयन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् परिणामे विपमिव तस्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८॥ यदने चाऽनुवन्धे च सुखं मोहनमात्मनः निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥ न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदभिः स्यानिभिर्गुणैः ॥४०॥ अधर्म, कार्य-अकार्य, विशेष रूप मे नहीं जाने जाते, ' करने पर सब प्रकार के दु ख शान्त होते हैं उस वह बुद्धि राजमी है ॥३१॥ जो बुद्धि अज्ञान में त्रिविध सुग्य का वर्णन करता है-- मुनो ॥३६॥ जो आच्छन्न होकर अधर्म को धर्म और मब पढाथों का पहले तो विष-मा किन्तु परिणाम में अमृत-मा होता म्प उरटा दिग्यानी है, वह नाममी है ||३२|] जो । है नया जिसके द्वारा आ मा और युदि की प्रसन्नता धृति योगाभ्याम के कारण अन्य विषय को धारण न होती है, वही माषिक मुग्य है ॥३७॥ विषयों और या मन, प्राण और इन्द्रियों के मब कार्यों को । इन्द्रियों के सयोग द्वारा जो पहले अमृत सा और धारण करती है वह माधिन। है ॥३३॥ ना भूति । अन्न को रिप-मा जान पड़ता है, यह गजग मुग धर्म आदि के मापन्य मे---फल यी आशा मे-है ॥३८॥ जो पहले भी और पछि भी आमा यो धर्म, अर्थ, काम यो धारण करना है, यह गनमी है मोह में दारता है तथा जो निद्रा, आलस्य और प्रमाद १३४!! दुमी पुरुष निगो प्रभाव में यम, भय, मे उग्न होता है, वह नामम मम ॥३०॥ गोर, दिपार और मद का त्याग नहीं कर मरते, पर मर जी और मर्ग में मरदाता इन माभाविक का नाममा । ॥३॥ भग्नंट ! जिम मुम तनों गुणों के अधीन की कोई ऐसा नहीं गि में अन्यमयाजी नग जाता है और जिसे ग्राम में इन नोनों गणो मे मे एक गुण न हो ॥४०॥ इन .
अध्याय ४२, गीता अध्याय १८ ] म हा भारत [४१६१ । ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवेर्गुणैः ॥४१॥ शमो दमस्तपः शौच क्षान्तिरार्जवमेव च ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥ शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाऽप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥ कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्याऽपि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥ स्त्रे स्वे कमण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥४५॥ यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ ४६॥ श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाऽनोति किल्विषम् ॥४७॥ सहज कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाऽग्निरिवाऽऽवृताः ॥४८॥ असक्रवुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः नैष्कर्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाऽधिगच्छति ॥ १९ ॥ प्राकृतिक तीनो गुणो के द्वारा ब्राह्मण, क्षनिय घट्य हैं । हे अर्जुन ! अपने-अपने कर्म में लगे हुए लोग और शूद्र, इन चारों वर्षों के कर्मों का विभाग दुआ| जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त करते हैं, सो सुनो ॥१५॥ है ॥४१॥ शम, दम, शाच, क्षमा, सररता, ज्ञान, जिन से सब प्राणियों की प्रवृत्ति प्रकट हुई है और विज्ञान और आस्तिकता, ये ब्राह्मणों के स्वाभाविक जो इस विश्व भर में सर्वत्र व्याप्त हैं उनकी, अपने- कर्म है ॥४२॥ शूरता, तेज, धृति, निपुणता या सत्र अपने कर्मों के पालन द्वारा, पूजा करने से मनुष्य के प्रति अनुकूलता, युद्ध से विमुख न होना, दान मिद्धि प्राप्त करते हैं ।।४६|| भली प्रकार से अनुष्ठित और स्वामिभान, ये क्षत्रियों के साभाविक कर्म है ॥४३॥ पर धर्म की अपेक्षा अङ्गहीन अपना धर्म ही श्रेष्ट है; पेती, गो-पालन और वाणिज्य-व्यापार करना वैश्य क्योंकि स्वभान-निर्दिष्ट कार्य करते रहने में देश नही के स्वाभाविक कर्म है । द्विजों की अर्थात् तानों वर्गों भोगना होना ॥४७॥ हे पुन्तीपुत्र ! जैसे अग्नि धुएँ की सेवा करना ही शूद्र का स्वाभाविक कर्म है ॥४॥ मे आच्छन्न रहता है, वैसे ही मर कर्म दीपों से इस प्रकार चारों वर्गों के मनुष्य अपने-अपने स्वाभा- आवृत हैं । इसलिये अपने स्वाभाविक कर्म यो, दोष पिक कर्म में लगे रहने से अभी मिद्धि प्राप्त करते । युक्त होने पर भी, छोइ बैठना कदापि उचित नहीं - ४१६२ ] म हा भारत [ भामपन । - सिद्धि प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाऽऽग्नोति निवोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्टा ज्ञानस्य या परा ॥ ५०॥ बुद्ध्या विशुद्धयायुको धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विपयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ।। विविक्तसेवी लम्वाशी यतवाकायमानसः ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२॥ अहङ्कारं वलं दर्प कामं क्रोधं परिग्रहम् विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चाऽस्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ५५॥ सर्वकर्मापयपि सदा कुर्वाणो मद्वयपाश्रयः मप्रसादाढवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥५६॥ चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः वुद्धियोगमपाश्रित्य मञ्चित्त. सततं भव ॥ ५७॥ मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि अथ चेत्त्वमहट्कारान्न श्रोप्यसि विनंक्ष्यसि ॥ ५८॥ ॥४८॥ अनासत्त, जितद्रिय, म्हारय व्यक्ति याग करे। ममतामय होनर शान्त भाव धारण करे। मयाम के द्वारा सत्र प्रकार के कर्मा को निवृत्तिरूप नी रस प्रकार अनुग्णन करता है, वहा बामपद पर मपगुद्धि प्राप्त करते है ॥२०॥हे अर्जुन ! अब मैं प्राप्त कर मरता ह ||३|| वह ब्रह्मनिष्ठ बार प्रसन उममे यह विषय पाहताहगि, निममे मिद पुस्प ब्रम पित्त हार ग्राम भार लोभ के वीभूत नहीं होता। पटको प्राप्त होत है, मन गाकर मुनी ॥५०॥ एमे यह मर जीरा को ममापि मे देगता है। मेर पर ग्थ्य या चाहिए कि बुद्धि को विशुद बनासर धर्य भी उमरी भक्ति मुन्टाती है ॥५४॥ वह अh के द्वारा उमे मयत बरे, रद आदि विषयों के भोग भतिक प्रभाव म मर पापया और गया। या पागार गगद्वपरहिन ना॥५१॥ न वाणी भाव का नानर अन्न को मुग ही गाडी 17 आर गायी वृशियों या गयन गग्य या है !!..॥ मनु-य भेग आप्रय गायमा पान आश्रय भार पाना याम या अभ्याम को । Pान बग्न दृ मग पाय घर मे माथार ग मा भादार की, ज्यान पान में ||-0॥ प्रा IITE ||६|| अनंन । मातिग र, मर, दप, पाम, मान, मारपीर गाय का मर म मुंग आण यमगण में भाग। .
अध्याय ४२; गीता अध्याय १८ ] म हा भा र त [ ४१६३ यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे मिथ्यय व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९॥ स्वभावजेन कौन्तेय निवद्धः स्वेन कर्मणा कर्तुं नेच्छसि यन्मोहाल्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६ ॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत तत्प्रसादात्परांशान्ति स्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥ इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया विमृश्यैतदशेपेण यथेच्छसि तथा कुरु सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः इप्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥ मन्मना भव मद्भक्तो मयाजी मां नमस्कुरु । मामेवैप्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥६५॥ सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६॥ इदं ते नाऽतपस्काय नाऽभक्ताय कदाचन न चाऽऽशुश्रूपये वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥ ६७ ।। बुद्धियोग का आश्रय लेकर निरन्तर मुझम ही चित्त माया के बल से उन्हें कठपुतली की भाति घुमा रहा लगाये रहो ॥५७|| ऐमा करने मे तुम, मेरे अनुग्रह है ॥६॥ तुम सब प्रकार मे उमी ईश्वर की शरण से, सब प्रकार के दुःग्वा से छुटकारा पा मांगे । में जाओ। उसके प्रसाद से ही तुम परम शान्ति और और जो तुम अहङ्कार के वश होकर मेरा कहा नहीं मोक्ष-पद प्राप्त करोगा६२॥ हे पार्थ ! मेने नुम्हारे आगे सुनोगे तो विनष्ट हो जाओगे ||५८॥ यदि तुम अह- | गृह्य मे भी गुद्यतम इस ज्ञान का वर्णन किया है । द्वार के कारण "मैं युद्ध नहीं करूगा" ऐसा समझने । अब तुम भन्ली प्रकार इम पर विचार करके जो चाहो हो, तो तुम्हारा ऐमा विचार करना व्यर्थ है; क्योकि मो करो ॥६३॥ तुम मुझे अयन्त प्रिय हो, इसी प्रकृति ही तुमको युद्ध में प्रवृत्त करेगी ॥५२॥ तुम कारण मै तुमसे परमगुन्य हित की बात कहता हूं, सुनो माह के वश होकर इस समय जिस कार्य को नहीं करना ॥६४|| नुम मुझमें चित्त समर्पण करया, मेरे अनन्य चाहते वही कार्य तुमको, क्षत्रियधर्म के वशीभूत भक्त होकर, मेरे उदेश मे प्रणाम और मेरी आराधना होकर, अवस्य करना पड़ेगा ।।६०॥ हे अर्जुन ! । करो। मैं अङ्गीकार करना है, तुग अन्य मुझे पाग ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित होकर अपनी : ||६५il तुम मर धर्मों को छोडकर मेगे ही गाण ।
४१६४ ] म हा भारत [ भीषणपर्व सञ्जय उपाच- । य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तप्यभिधाम्यति भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥६८॥ न च तस्मान्मनुष्येपु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ।। ६९ ।। अध्येप्यते च य इमं धयं संवादमावयोः ज्ञानयज्ञेन तेनाऽहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥७॥ श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः सोऽपि मुक्तः शुभॉल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥ ७१ ॥ कच्चिदेतच्छ्रतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥७२॥ अर्जुन उवाच- नष्टोमोहः स्मृतिर्लव्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत । स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः संवादमिममश्रौपमद्भुतं रोमहर्पणम् ॥७४ ॥ व्यासप्रसादाच्छुलवानेतद्गुह्यमहं परम् योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५॥ राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥७६॥ आओ । में तुमको सब पापों से छुडाऊँगा, तुम शोक करेगा ॥७०|| जो मनुष्य असूया से पचा रहनर परम मत करो ॥६६|| मैंने तुम जो उपासना बताई श्रद्धा के माथ हमारे तुमारे इस समाद को सुनेगा वह, जो उपदेश दिया है, वह तुम कभी धर्मानुष्ठान-हीन, सब पापों से चार, पुण्यम करनेवालों के पवित्र भक्ति रहित, सुनने की इच्छा न रखनेवारे आर विशेप । लोगो को जायगा ॥७॥ हे पार्थ । बतलाओ तुमने कर मेरे द्रोही को न सुनाना ॥६७|| जो पुरुष भक्ति एकाग्रचित्त होकर यह सबाद सुना है न ? अज्ञान परायण होरर मेरे भक्तों के आगे इस परमगुळ विषय मे उपजा हुआ तुम्हारा मोह दूर हुआ कि नहीं' या वर्णन करेगा, यह नि सन्देह मुज्ञो प्राप्त होगा ॥७२॥ अर्जुन ने कहा-हे अच्युत ! आपनी कृपा ॥६८॥ इम लोर में उमसे बदकर मुझे प्यारा और । मे मेरा सन मोह मिट गया आर मुझे पूर्वस्मृति प्राप्त वोट न होगा। उसमे पदार मेरा प्रिय करने वाग हो गई । मेरा सर सदेह दूर हो गया। अब मैं आप भी और कोई नहीं होगा ॥६॥ हमारे तुम्हारे इम की आज्ञा का पाग्न करूगा ॥७३॥ मञ्जय यहते धर्ममय माद को जो कोई मुनगा या पढ़ेगा ' हैं हे महाराज धृतराष्ट्र ! मैंने यम प्रभार महामा यह, मेरी सम्मान में, ज्ञान-यज्ञ से मेरी आराधना वासुदेव और अर्जुन का यह अद्भुत लोमहर्पण -- ह, ।
अध्याय ४२, गीता अन्याय १८ ] म हा भारत [ ४१६५ तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः विस्मयो मे महान्राजन्हप्यामि च पुनः पुनः॥७७॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः तत्र श्रीर्विजयो भूतिधुवा नीतिमतिर्मम ॥७८॥ इति भी महाभारते शतसाहपया संहिताया वैयासिययां भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्दीतामपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायो योगशामे श्रीपणार्जुनसवादे संन्यामयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ।। पवणि तु दिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ समाप्तं भगवदीतापर्व । संवाद सुना है ||७४|| व्यासजी के प्रसाद से यह परम | स्मरण बारम्बार करके मुझे बड़ा विस्मय और हर्ग हो गुह्य योग मैंने योगेश्वर कृष्ण के मुख से सुना और रहा है ॥७७|| इस समय मुझे जान पड़ता है कि यह अद्भुत परम पवित्र सवाद सुनकर तथा बारम्बार । जिस ओर योगेश्वर वासुदेव और धनुर्द्धर अर्जुन है स्मरणकर मुझ बड़ा हर्ष हो रहा है ॥७५/७६॥ हे ' उसी पक्ष को अवश्य राजलक्ष्मी, विजय और अभ्यु. महाराज ! वासुदेव के उस अलौकिक विश्वरूप का | दय प्राप्त होगा। उधर ही नीति भी है ॥७८॥ भीष्मपर्व का बयालीसवाँ अध्याय समान हुआ । भगवद्गीता का अठारहको अध्याय समाग हुआ । ।। भगवडीतापर्व समाप्त ।। .AN- ----- भगवद्गीतापर्व समाप्त हुआ।
अध्याय ४३ ] म हा भा र त [ ४१६७ अथ भीष्मपर्व। वशम्पायन उराच-गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहः । या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वदेवमयो हरिः सर्वतीर्थमयी गङ्गा सर्ववेदमयो मनुः गीता गङ्गा च गायत्री गोविन्दति हृदि स्थिते । चतुर्गकारसंयुक्त पुनर्जन्म न विद्यते पट्शतानि सविंशानि श्लोकानां प्राह केशवः । अर्जुनः सप्तपञ्चाशत्सप्तपष्टिं तु सञ्जयः धृतराष्ट्रः श्लोकमेकं गीताया मानमुच्यते भारतामृतसर्वस्वगीताया मथितस्य च ॥ सारमुद्धृत्य कृष्णेन अर्जुनस्य मुखे हुतम् मन्नय उनाच-ततो धनञ्जयं दृष्ट्वा वाणगाण्डीवधारिणम् पुनरेव महानादं व्यसृजन्त महारथाः पाण्डवाः सोमकाश्चैव ये चैपामनुयायिनः दध्मुश्च मुदिताः शङ्खान्वीराः सागरसम्भवान् ॥ ७॥ ततो भेर्यश्च पेश्यश्च क्रकचा गोविपाणिकाः सहसैवाऽभ्यहन्यन्त ततः शब्दो महानभूत् ॥ ८ ॥ तेंतालीसना अध्याय ॥४३॥ उशम्पायन न कहा--ह राजा जनमेजय । निकालकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मुग्य में दे दिया गाना का उपदेश स्वय श्राकृष्णनी न पिया है, उसी ॥११५|| सञ्जय कहते हैं- हे महाराज ! अर्जुन को जो भी भाति पढ़ना चाहिए, आर शास्त्रों का क्या फिर गाण्डीर धनुष ओर वाण हाथ में लेते देखकर प्रयोजन है। गीता में सब शास्त्रा का सार है, हरि में मा महारथी योद्धा सिंहनाद करने लग । पाण्डा सन देवता हैं, गगाजी में मर तीर्थ है और मनु मे और सृञ्जयगण, तथा जो लोग उनके साथी थे। सर वेदों का सार है । गीता, गगा, गायत्री आर भी, समुद्र से निकर हुए बदिया शत बजाने लगे। गोपिन्द -~- इन चार गकारों का अनुशीलन करने से मन लागों की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा । उम पुनर्जम नहीं होता । गीता के ६२० श्लोक धाकृष्ण समय एकाएक चारों आर भेरी, पेशी, जयमद्गल जीने, ७५ अर्जुन ने और ६७ सजय ने कहे हैं। आर गोशृङ्ग आदि तरह-तरह के बारे बनने लगे। एक श्लोक धृतराष्ट्र का कहा हुआ है । भारत का । उनका यह तुमुर शब्द चारों ओर गूंज उठा ॥६॥ अमृत-सर्वस्य जो गीता का मथितार्थ है उसका मार । हे महारान ' देवता, गर्म, पिनर, सिद्ध और चार- ४१६८ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व तथा देवाः सगन्धर्वाः पितरश्च जनाधिप सिद्धचारणसङ्घाश्च समीयुस्ते दिदृक्षया ऋपयश्च महाभागाः पुरस्कृत्य शतक्रतुम् समीयुस्तत्र सहिता द्रष्टुं तद्वैशसं महत् ॥१०॥ ततो युधिष्टिरो दृष्ट्वा युद्धाय समवस्थिते ते सेने सागरप्रख्ये मुहुः प्रचलिते नृप ॥ ११ ॥ विमुच्य कवचं वीरो निक्षिप्य च वरायुधम् अवरुह्य स्थाक्षिप्रं पद्यामेव कृताञ्जलिः ॥ १२ ॥ पितामहमभिप्रेक्ष्य धर्मराजो युधिष्ठिरः वाग्यतः प्रययौ येन प्राङ्मुखो रिपुवाहिनीम् ॥ १३ ॥ तं प्रयान्तमभिप्रेक्ष्य कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः अवतीर्य रथातूर्णं भ्रातृभिः सहितोऽन्वयान् ॥ १४ ॥ वासुदेवश्च भगवान्पृष्टतोऽनुजगाम तम् तथा मुख्याश्च राजानस्तञ्चित्ता जग्मुरुत्सुकाः ॥ १५ ॥ -किं ते व्यवसितं राजन् यदस्मानपहाय वे पद्भयामेव प्रयातोऽसि प्राङ्मुखो रिपुवाहिनीम् ॥ १६ ॥ भीमसेन उवाच-के गमिष्यसि राजेन्द्र निक्षितकवचायुधः दंशितेष्वरिसैन्येषु भ्रातृनुत्सृज्य पार्थिव ॥ १७ ॥ नकुल उवाच -एवं गते त्वयि ज्येष्ठे मम भ्रातरि भारत भीम दुनोति हृदयं ब्रूहि गन्ता भवान्क नु ॥ १८ ॥ णगण युद्ध देखन की इच्छा से यहा आकर एकत्र 'जोड़े पैदल चल दिये । युधिष्ठिर को इस प्रकार जाते होने लगे। महाभाग ऋषि लोग भी एकत्र होकर, । देखकर अर्जुन शीघ्र ही रथ से उतर पड़े और भाइयों इन्द्र को आगे करके, वह हत्याकाण्ड देखने के लिए के साथ उनके पीछे चले । हे राजेन्द्र ! वासुदेव भी यहा आ गये ।।९।१०॥ अब धर्मराज युधिष्ठिर ने उनके पीछे-पाछे जाने लगे । अन्यान्य राजा लोग भी दोनों ओर की सेना को युद्ध के लिए प्रस्तुत और उत्सुकता के साथ राजा युथिष्ठिर के पीछे-पीछे चले बारम्बार सागरतुल्य चलायमान देवा तो कवच ॥११।१५|| अव अर्जुन ने राजा युविष्ठिर से कहा- उतारकर शस्त्र रख दिये । ये रथ से उतरकर, पूर्व- हे महाराज ! आप यह क्या करते हैं ? हम लोग मुग्व होकर, शत्रुसना की ओर चले । पितामह भीष्म को छोड़कर पैदल ही शत्रु-सेना में आप जारहे हैं ! को सामने देवकर धीर युधिष्टिर मौन भाव में हाथ ॥१६॥ भीममेन ने कहा--हे राजन्द्र ! आप करच अर्जुन उवाच अध्याय ४३] म हा भारत [४१६९ सहदेव उवाच-अस्मिन्रणसमूहे वै वर्तमाने महाभये उत्सृज्य क नु गन्तासि शत्रूनभिमुखो नृप ॥ १९ ॥ सञ्जय उवाच-एवमाभाप्यमाणोऽपि भ्रातृभिः कुरुनन्दनः नोवाच वाग्यतः किञ्चिद्गच्छत्येव युधिष्ठिरः ॥ २० ॥ तानुवाच महाप्राज्ञो वासुदेवो महामनाः आभिप्रायोऽस्य विज्ञातो मयेति प्रहसन्निव ॥ २१॥ एप भीम तथा द्रोणं गौतमं शल्यमेव च अनुमान्य गुरून्सर्वान्योत्स्यते पार्थिवोऽरिभः॥ २२ ॥ श्रूयते हि पुराकल्पे गुरुनननुमान्य यः युद्धयते स भवेद्वयक्तमपध्यातो महत्तरैः ॥ २३ ॥ अनुमान्य यथाशास्त्रं यस्तु युद्धयेन्महत्तरैः ध्रुवस्तस्य जयो युद्धे भवेदिति मतिर्मम ॥ २४॥ एवं युवति कृष्णेऽत्र धार्तराष्ट्रचमं प्रति हाहाकारो महानासीनिःशब्दास्त्वपरेऽभवन् ॥ २५ ।। दृष्ट्वा युधिष्ठिरं दूराद्धार्तराष्ट्रस्य सेनिकाः मिथः सङ्कथयाञ्चक्रुरेपो हि कुलपांसनः ॥ २६ ॥ व्यक्तंभीत इवाऽभ्येति राजाऽसौभीष्ममन्तिकम् । युधिष्ठिरः ससोदर्यः शरणार्थ प्रयाचकः ॥ २७॥ और मन शस्र फेककर, भाइयों को छोड़कर, कवच नापर्य ममझ गया । ये भीष्म, टोण, कृप, गन्य आदि और शरत्र आदि मे सुसज्जित शत्रुओं के मामन कहा बई-बूदा मे आज्ञा देकर शत्रुओं मे युद्ध करना चाहते जा रहे है ! ॥१७|| नकुल ने कहा है भरतश्रेष्ठ है ॥२१॥२२॥ मैने पहले मुन रसमा है और मुन्न आप हम लोगों के बड़े भाई है। आपको यो जाते मयं भी जान पड़ता है कि जो मनुश्य गार निधि देखकर मेरा तय भय और दुःव मे पीड़ित हो रहा के अनुमार गुग्जन, युद्ध और बान्धर आदि मे | आर यहां जाते हैं ! ॥१८॥ महदेव ने कहा आश लेकर प्रबर मात्र में युद करता है यह अन्य हे नाश ! इस भयानक युद्धारम्भ यो समय हम छोइ विजयी होता है । और जो कोई गुरजन या मम्मान कर शत्रुओ के माम्ने आप यहो जा रहे है ! ॥१०॥ रिना स्यि, उनकी आग बिना पि, युद्ध करना है गन्नय कहते है -2 कारस-गज ! भाइयों के .यो , या अनुओ गे पगग्न होता ॥२३॥२८॥ श्रीर कहने पर भी युधिष्ठिर कुछ उत्तर न देकर यमे ही इस प्रकार का ही हरिपा दृयोधन को मना जाने रंगे ॥२०॥ महाधिमान् भरण ने हंगरा में बना पालामा हाने गया । युटगांग नोमान अनुन आमे कहा पायो ! मनका हाभा अनेक रंग मुभिर को आतंदगार ४१७० ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व । धनञ्जये कथं नाथे पाण्डवे च वृकोदरे नकुले सहदेवे च भीतिरभ्येति पाण्डवम् ॥ २८॥ न नूनं क्षत्रियकुले जातः सम्प्रार्थिते भुवि यथाऽस्य हृदयं भीतमल्पसत्वस्य संयुगे ॥ २९॥ ततस्ते सैनिकाः सर्वे प्रशंसन्ति स्म कौरवान् । हृष्टाः सुमनसो भूत्वा चैलानि दुधुवुश्च ह ॥३०॥ व्यनिन्दंश्च तथा सर्वे योधास्तव विशाम्पते । युधिष्ठिरं ससोदर्य सहितं केशवेन हि ॥ ३१ ॥ ततस्तत्कौरवं सैन्यं धिक्कृत्वा तु युधिष्ठिरम् । निःशब्दमभवत्तूर्णं पुनरेव विशाम्पते ॥३२॥ किं नु वक्ष्यति राजाऽसौ किं भीष्मः प्रतिवक्ष्यति। किं भीमः समरश्लाघी किं नु कृष्णार्जुनाविति ॥ ३३ ॥ विवक्षितं किमस्यति संशयः सुमहानभूत् उभयोः सेनयो राजन्युधिष्ठिरकृते तदा ॥३४॥ सोऽवगाह्य चमूं शत्रोः शरशक्तिसमाकुलाम् । भीप्ममेवाऽभ्ययात्तूर्णं भ्रातृभिः परिवारितः ॥ ३५॥ तमुवाच ततः पादौ कराभ्यां पीड्य पाण्डवः । भीमं शान्तनवं राजा युद्धाय समुपस्थितम् ॥ ३६ ॥ महाशब्द करने लगे। दुर्योधन की सेना के योदा हर्ष प्रकाश करने लगे। हे राजेन्द्र ! आपके पक्ष के लोग दूर से युधिष्ठिर को आते देखकर परस्पर कहने । योद्रा लोग भाइयों सहित युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण की लग-ये कुलकलक युधिष्टिर अवश्य युद्ध से भयभीत । निन्दा करने लगे। इस प्रकार युधिष्ठिर को धिक्कार होकर भीष्मपितामह के पास आ रहे हैं । भाइयो । दे चुकने पर कौरव-सेना में सन्नाटा छा गया । उस सहित राजा युधिष्ठिर शरणप्रार्थी होकर आ रहे हैं। समय दोनों पक्ष के योद्धाओं के मन में, युधिष्ठिर ॥२५॥२७॥ अर्जुन, भीम, नकुर आर सहदेव के के बारे में, तरह-तरह की शङ्काएँ होने लगी। वे सहायक होने पर भी युधिष्ठिर क्यों भयभीत हो गये। सोचने लगे कि अन्तिम राजा युधिष्टिर क्या कहना ये अल्पपराक्रमी युधिष्ठिर युद्ध से भयभीत हो गये , चाहते हैं ! भीष्म क्या उत्तर देंगे' समरप्रिय भीम- हैं, इससे जान पड़ता है कि इनका जन्म जगप्रसिद्ध सेन क्या कहेंगे? श्रीकृष्ण और अर्जुन ही क्या क्षत्रियकुल में नहीं हुआ ॥२८॥२९॥ अ. सैनिक कहना चाहते हैं ? ॥३०॥३४॥ भाइयों-सहित राजा टोग प्रसन्नता से कारनों की प्रशमा करने लगे । युधिष्टिर गर-शक्ति मड्कुट कारस सेना के भीतर कुछ लोग प्रमन्न होकर दुपट्टे आदि हिला-हिलाकर । पहुँचकर चतुराई से भीष्म पितामह की ही ओर चले ।
अध्याय ४३ ] म हा भारत [ ४१७१ युधिष्ठिर उवाच-आमन्त्रये त्वां दुर्धर्ष त्वया योत्स्यामहे सह अनुजानीहि मां तात आशिपश्च प्रयोजय भीष्म उवाच-यद्येवं नाऽभिगच्छेथा युधि मां पृथिवीपते शपयं त्वां महाराज पराभावाय भारत ॥ ३८॥ प्रीतोऽहं पुत्र युध्यस्व जयमाप्नुहि पाण्डव / यत्तेऽभिलपितं चाऽन्यत्तदवाप्नुहि संयुगे ॥ ३९ ॥ त्रियतां च वरः पार्थ किमस्मत्तोऽभिकांक्षसि । एवङ्गते महाराज न तवाऽस्ति पराजयः ॥४०॥ अर्थस्य पुरुपो दासो दासस्वर्थो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज वद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥४१॥ अतस्त्वां क्लीववद्वाक्यं ब्रवीमि कुरुनन्दन भृतोऽस्म्यर्थेन कौरव्य युद्धादन्यत्किमिच्छसि ॥ ४२ ॥ युधिष्टिर उपच-मन्त्रयस्व महावाहो हितैपी मम नित्यशः युध्यस्व कौरवस्याऽर्थे ममैप सततं वरः ॥४३॥ भीम उपाच- -राजकिमत्र साह्यं ते करोमि कुरुनन्दन कामं योत्स्ये परस्याऽर्थं ब्रूहि यत्ते विवक्षितम् ॥ १४ ॥ युद्ध के लिए उद्यत खड़े हुए भीष्म के पास पहुँचकर, दास नहीं है । मुझे धन से ही कारगों ने अधीन उनके पास स्पर्शकर राजा युधिष्ठिर कहने लगे-हे समर कर रक्ग्वा है । हे कुरनन्दन । डमीस नपुसकों की दुर्द्धप । हे तान ! मेरा निवेदन यह ह कि हम लोग तरह मैं तुमसे कहता हूं कि मुझे कारखों ने धन आपके साथ युद्ध करेगे । आप आज्ञा और आगी ओर वृत्ति देकर अपने अधीन बना रकवा है । बाद दीजिये ॥३५॥३६॥ भीष्म ने कहा- हे भरत बोलो. तुम युद्ध-साहाय्य के अनिरिक्त मुझमे और क्या श्रेष्ट ! जो तुम इस तरह आकर मुझसे युद्ध की चाहते हो ॥४१॥४२॥ धर्मराज युधिष्टिर ने कहा- अनुमति न मागते तो मैं तुमको पराजय का शाप दे हे प्राज्ञ ! आप मदा मेरा हित चाहते हुए सम्मति देता । हे पुत्र ! अब मैं तुम पर अयन्त प्रसन्न है। दें और दुर्योधन के लिए युद्ध करे । [ अर्थात् मन तुम युद्ध मे जय प्राप्त करो, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो। से तो मेरा हित चाहें और शरीर मे दुर्योधन का जाओ, युद्ध करो। हे पार्थ ! और तुम मुझमे क्या पक्ष रेकर युद् करें] यही घर में मागता ॥४३॥ चाहते हो। मुझसे यथेष्ट वरदान माग लो। हे भीष्म ने कहा - हे कारसश्रेष्ट ! मैं इस विषय में तुम्हें महाराज ! ऐसा होने से किसी तरह तुम्हारी पराजय क्या सहायता दे सकता है। मे दुयोरन के दिए नही हो सकती। ॥३८॥४१॥ हे राजेन्द्र ! यह युद्ध करनगा । इस कारण युद्ध के आ मय है कि मनुष्य धन का दाम है; धन किमी का चाहो मी कहो ॥४४॥ युधिष्टिर ने कहा- ।
४१७० ] म हा भारत [ भीपापर्व धनञ्जये कथं नाथे पाण्डवे च वृकोदरे नकुले सहदेवे च भीतिरभ्योति पाण्डवम् છે ૨૮ / न नूनं क्षत्रियकुले जातः सम्प्रार्थिते भुवि यथाऽस्य हृदयं भीतमल्पसत्त्वस्य संयुगे ॥ २९ ॥ ततस्ते सैनिकाः सर्वे प्रशंसन्ति स्म कौरवान् । हृष्टाः सुमनसो भूत्वा चैलानि दुधुवुश्च ह ॥३०॥ व्यनिन्दंश्च तथा सर्वे योधास्तव विशाम्पते । युधिष्ठिरं ससोदर्य सहितं केशवेन हि ॥ ३१ ॥ ततस्तत्कौरवं सैन्यं धिक्कृत्वा तु युधिष्टिरम् । निःशब्दमभवत्तूर्णं पुनरेव विशाम्पते ॥ ३२ ॥ किं नु वक्ष्यति राजाऽसौ किं भीपमःप्रतिवक्ष्यति। किं भीमः समरश्लाघी किं नु कृष्णार्जुनाविति ॥ ३३ ॥ विवक्षितं किमस्येति संशयः सुमहानभूत् उभयोः सेनयो राजन्युधिष्ठिरकृते तदा ॥ ३४॥ सोऽवगाह्य चमूं शत्रोः शरशक्तिसमाकुलाम् । भीप्ममेवाऽभ्ययात्तर्ण भ्रातृभिः परिवारितः ॥ ३५ ॥ तमुवाच ततः पादौ कराभ्यां पीड्य पाण्डव भीष्मं शान्तनवं राजा युद्धाय समुपस्थितम् ॥ ३६ ॥ महाशब्द करने लगे। दुर्योधन की सेना के योद्धा । हर्ष प्रकाश करने लगे। हे राजेन्द्र ! आपके पक्ष के लोग से युधिष्ठिर को आते देखकर परस्पर कहने योद्धा लोग भाइयो सहित युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण की लगे-ये कुलकर युधिष्ठिर अवश्य युद्ध से भयभीत निन्दा करने लगे। इस प्रकार युधिष्ठिर को धिक्कार होकर भीष्मपितामह के पास आ रहे हैं । भाइयो | दे चुकने पर कोरम-सेना में सन्नाटा छा गया । उस सहित राजा युधिष्ठिर शरणप्रार्थी होकर आ रहे हैं। समय दोनों पक्ष के योद्धाओं के मन में, युधिष्ठिर ॥२५॥२७॥ अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव के के बारे में, तरह-तरह की शङ्काएँ होने लगीं। ये सहायक होने पर भी युधिष्ठिर क्यो भयभीत हो गये? सोचने लगे कि अन्तिम राजा युधिष्ठिर क्या कहना ये अल्पपराक्रमी युधिष्ठिर युद्ध से भयभीत हो गये चाहते है ! भीष्म क्या उत्तर देंगे: समरप्रिय भीम- हैं, इससे जान पडता है कि इनका जन्म जगप्रसिद्ध । सेन क्या कहेंगे 2 श्रीकृष्ण और अर्जुन ही क्या क्षत्रियकुल में नहीं हुआ ॥२८॥२९॥ अब मैनिक कहना चाहते हैं ? ॥३०॥३४॥ भाइयों-सहित राजा लोग प्रसन्नता से कौरवों की प्रशसा करने लगे । युधिष्ठिर शर-शक्ति सकुल कोरप-सेना के भीतर कुछ लोग प्रसन्न होकर दुपट्टे आदि हिला-हिलाकर । पहुँचकर चतुराई से भीष्म पितामह की ही और चले ।
अध्याय ४३ ] म हा भा र त [ ४१७७ सञ्जय उवाच- राञ्जय उवाच- अनुमान्याऽथ कौन्तेयो मातुलं मद्रकेश्वरम् । निर्जगाम महासैन्यादातृभिः परिवारितः ॥ ८८॥ वासुदेवस्तु राधेयमाहवेऽभिजगाम वै तत एनमुवाचेदं पाण्डवार्थे गदाग्रजः ॥८९॥ श्रुतं में कर्ण भीष्मस्य द्वेषात्किल न योत्स्यसे। अस्मान्वरय राधेय यावद्भीप्मो न हन्यते ॥९० ॥ हते तु भीष्मे राधेय पुनरेष्यसि संयुगम् धार्तराष्ट्रस्य साहाय्यं यदि पश्यास चेत्समम् ॥ ९१ ॥ कर्ण उवाच-- न विप्रियं करिष्यामि धार्तराष्ट्रस्य केशव त्यक्तप्राण हि मां विद्धि दुर्योधनहितैपिणम् ॥ ९२ ॥ -तच्छत्वा वचनं कृष्णः संन्यवर्तत भारत युधिष्ठिरपुरोगैश्च पाण्डवैः सह सङ्गतः अथ सेन्यस्य मध्ये तु प्राक्रोशत्याण्डवाग्रजः । योऽस्मान्वृणोति तमहं वरये साह्यकारणात् ॥ ९४ ॥ अथ तान्समभिप्रेक्ष्य युयुत्सुरिदमब्रवीत प्रीतात्मा धर्मराजानं कुन्तीपुत्रं युधिष्टिरम् ॥ ९५॥ अहं योत्स्यामि भवतः संयुगे धृतराष्ट्रजान् । युप्मदर्थं महाराज यदि मां वृणुयेऽनघ ॥ ९६ ॥ करो । जाओ युद्ध करो ॥८७॥ सञ्जय कहते हैं केशव ! मै कभी दुर्योधन का अप्रिय नहीं कर सकता। हे महाराज ! राजा युधिष्ठिर इस प्रकार शल्प को दुर्योधन के हित के लिए प्राण तक दे देने में भी सम्मानित करके भाइयो के साथ भयङ्कर शत्रुमेना से । मुझे कोई सङ्कोच नहीं हो सकता ॥२२॥ हे भारत! बाहर निकल आये ॥८८॥ उधर वासुदेव ने कर्ण के । कर्ण के ये वचन सुनकर यहां से लौटकर श्रीकृष्ण पास जाकर कहा-हे वीर ! मैंने सुना है कि तुम फिर पाण्डयों के पास आ गये । अब पाण्डों के बड़े भीम से विद्वेष रखने के कारण जब तक मंग्रामभूमि भाई युशिष्ठिर ने मेना के मध्य में पड़े होकर बड़े में भीप्प रहेंगे तब तक युद्ध नहीं करोगे ! इमलिए, ऊँचे स्पर से कहा- इस युद्ध-भूमि में जो कोई हमारा जब तक भीष्म मारे न जाएँ तब तक तुम हम ही लोगों , हित चाहनेगय हो उमे हम अपने पक्ष में सम्मि- की ओर से युद्ध करो । जो तुम दोनों पक्षों को लित होने के दिए युलाते हैं । यह हमारी महायता समान दृष्टि में देगते हो तो भीष्म के मारे जाने पर करने के लिए आ सस्ता है ॥२३॥९॥ तर (येश्या फिर दुर्यो पन की सहायता के लिए उस और जाकर के गर्भ में उत्पन्न धृतराष्ट्रको पुन ) युगुने पाण्टों युद्ध करने लगना ॥८॥३१॥ कर्ण ने कहा-हे । की ओर देगकर प्रसन्नतापूर्वक युधिशिम कहा- - ४१७६ महा भारत शान्य नाच- । शल्य उवाच-यदि मां नाऽधिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चयः । शपेयं त्वां महाराज पराभावाय वै रणे ॥ ७९॥ तुष्टोऽस्मि पूजितश्चाऽस्मि यत्कांक्षसि तदस्तु ते । अनुजानामि चैव त्वां युद्धयस्व जयमामुहि ॥ ८० ॥ ब्रूहि चैव परं वीर केनाऽर्थः किं ददामि ते एवइते महाराज युद्धादन्यत्किमिच्छसि ॥८१ ॥ अर्थस्य पुरुषो दालो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥८२ ॥ करिप्यामि हि ते काम भागिनेय यथेप्सितम् । ब्रवीम्यतः क्लीववत्त्वां युद्धादन्यत्किमिच्छसि ॥ ८३ ॥ युधिष्ठिर उवाच-मन्त्रयस्व महाराज नित्यं मन्द्रितमुत्तमम् काम युद्धय परस्याऽर्थे वरमेतं वृणोम्यहम् -किमत्र बेहि साह्यं ते करोमि नृपसत्तम कामं योत्स्ये परस्याऽर्थे बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः॥ ८५॥ युधिष्टिर उवाच-स एव में वरः शल्य उद्योगे यस्त्वया कृतः । सूतपुत्रस्य सङ्ग्रामे कार्यस्तेजोवधस्त्वया ॥८६॥ शम्प उगन-सम्पत्स्यत्येप ते कामः कुन्तीपुन यथेप्सितम् । गच्छ युध्यस्त्र विश्रब्धः प्रतिजाने वचस्तव ॥ ८७ ॥ शारदे देता । तुमने आसमग मम्मान किया, हम- । हे राजेन्द्र ! में यही प्रार्थना करता हूँ कि निय मेरे में में गुम पर गन्तुष्ट । नुम जो नाहते हो की हिन को मानिए और इच्छानुमार कार में की और होगा | मैं तुमको आता देना इ. गुद करो और जय मे युद्ध कीजिए॥४॥य ने कहा- युधि- पाओ ॥७९१८०॥ तुम और क्या चाहने हो। मैं ; टि! मैं तुम्हारी क्या महायता कर सकता है ! गुगका स्या दं! योटी, गुम मााप्य के अनिशि. मुझे कोरयों ने धन के द्वारा अपने वश में कर दिया और या नाहन ||८गजेन्द्र ! पामय ग कारण में उन्ही की और से गुम पारगा। है कि मनुथ मन का दाम, न किमी या दाम 1८५|| युधिष्टिर ने कहा- मागानी ! मी नदी। मुझ मन माग यो ने अग यश गं गादान आग्मे मागा जो आप न मान गुर्ण पामा में नमी यो न तुम । आर मप्राममया या उमा और नेन अग्नी गुद-मामा : दिना गा यता गटांग मारा करने का 11८६|| prilमपामाइ गुणापर गाय ने कहा - लाहारीमा पारामा भिटाकण गंदी में मत । 4-m अध्याय ४४ ] म हा भारत [ ४१७९ - सौहृदं च कृपां चैव प्राप्तकालं महात्मनाम् । दयां च ज्ञातिषु परां कथयाञ्चक्रिरे नृपाः ॥१०६॥ साधु साध्विति सर्वत्र निश्चेरुः स्तुतिसंहिताः । वाचः पुण्याः कीर्तिमतां मनोहृदयहर्पणाः ॥१०७॥ म्लेच्छाश्चाऽऽर्याश्च ये तत्र ददृशुःशुश्रुवुस्तथा। वृत्तं तत्पाण्डुपुत्राणां रुरुदुस्ते सगद्दाः ॥१०८॥ ततो जघ्नुर्महाभेरीः शतशश्च सहस्रशः शङ्खांश्च गोक्षीरनिभान्दध्मुर्हृष्टा मनस्विनः ॥१०९॥ इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रया सहिताया वैयासिक्या भीष्मपर्वणि भीष्मववर्षणि भीष्मादिसम्मानने त्रिच गरिंशोऽध्याय ॥ ४३ ।। की स्तुति करते हुए उन्हे साधुवाद देने लगे ॥१०४। सकडो-हजारो नगाड़ों और दूध के समान खेत रङ्ग १०७॥ वहा म्लेच्छ जाति या आर्यजाति के जिन के शङ्खा को मनम्बी वीरगण प्रसन्न होकर बजाने लोगो ने पाण्डयो को देखा या सुना, वे सभी लोग लगे ॥१०८।१०९॥ गद्गद् होकर आम की धारा बहाने लगे। इसी समय भीष्मपर्व का नेतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४३ ॥ अथ चतुश्चवारिंशोऽध्याय ॥ ४४ ॥ धृतराष्ट्र उवाच- एवं व्यूढेष्वनीकेषु मामकेवितरेषु च के पूर्व प्राहरंस्तत्र कुरवः पाण्डवा नु किम् ॥ १ ॥ सनय उवाच -भ्रातृभिः सहितो राजन्पुत्रो दुःशासनस्तव भीमं प्रमुखतः कृत्वा प्रययौ सह सेनया ॥ २ ॥ तथैव पाण्डवाः सर्वे भीमसेनपुरोगमाः भीष्मेण युद्धमिच्छन्तः प्रययुहृष्टमानसाः चालीसवाँ अध्याय ।। ४४ ॥ धृतराष्ट्र ने पूछा--हे सञ्जय ! दोनों ओर की। साथ युद्ध करने की इच्छा से आगे बढ़े । इसके सेना में व्यूह-रचना हो चुकने पर किसने पहले प्रहार अनन्तर दोनों पक्षों की सेना में भेरी, मृदङ्ग, गोक्ष, किया ? कारों ने या पाण्डवों ने ॥१॥ सञ्जय ने मुरज आदि याजो का शन्द, रथ के पहियों वा शब्द, यहा-हे राजेन्द्र ! आपके कुँवर दु शासन, दुर्योधन वोरों की फिलकार और मिंहनाद का शब्द, हाथियों की आज्ञा के अनुमार, भीष्म को आगे करके और घोड़ों का शब्द चारों ओर गूंज उठा। दोनों सना-सहित युद्ध के लिए आगे बढ़े। पाण्डव रोग ओर के योद्धा नर्जन-गन और मिहनाद करने टाट भी भीममेन को आगे करके प्रमन्नतापूर्वक भीम के ' कारते एक दूसरे की ओर झपटने लगे । बड़ा भारी ४१७८ ] म हा भारत । भीष्मपर्व - - युधिष्ठिर उवाच- एह्येहि सर्वे योत्स्यामस्तव भ्रातृनपण्डितान् । युयुत्सो वासुदेवश्च धयं च चूम सर्वशः घृणोमि त्वां महावाहो युद्ध्यस्व मम कारणात् । त्वयि पिण्डश्च तन्तुश्च धृतराष्ट्रस्य दृश्यते ॥ ९८॥ भजस्वाऽस्मान्राजपुत्र भजमानान्महायुते न भविष्यति दुवुद्धिर्धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्पणः ॥ ९९ ॥ मञ्जय उगच-ततो युयुत्सुः कौरव्यान्परित्यज्य सुतास्तव जगाम पाण्डुपुत्राणां सेनां विश्राव्य दुन्दुभिम् ॥१०॥ ततो युधिष्ठिरो राजा सम्प्रहृष्टः सहानुजः जग्राह कवचं भूयो दीप्तिमत्कनकोज्ज्वलम् ॥१०१॥ प्रत्यपद्यन्त ते सर्वे स्वरथान्पुरुषर्षभाः ततो व्यूहं यथापूर्व प्रत्यव्यूहन्त ते पुनः ।। १०२॥ अवादयन्दुन्दुभीश्च शतशश्चैव पुष्करान् सिंहनादांश्च विविधान्विनेदुः पुरुषर्षभाः ॥१०३॥ रथस्थान्पुरुपव्याधान्पाण्डवान्प्रेक्ष्य पार्थिवाः धृष्टद्युम्नादयः सर्वे पुनर्जहृपिरे तदा ॥१०४॥ गौरवं पाण्डुपुत्राणां मान्यान्मानयतां च तान् । दृष्ट्वा महीक्षितस्तत्र पूजयाश्चक्रिरे भृशम् ॥१०५॥ हे महागज ! यदि आप लेग मुझे ग्रहण करे तो मैं आ गये। राजा युधिष्ठिर ने प्रसन्न होकर फिर सुवर्ण- आपके पक्ष में होकर दुर्योपन आदि में युद्ध करने मय चमकीला कवच पहन लिया । ओर-और योद्धा को उद्यत हु ॥१५॥९.६॥ युधिष्ठिर ने कहा-हे । लोग भी अपने-अपने रयो पर चदकर, पहले की भाई ययुन्सु ! आओ आओ । वासुदेव आर हम सत्र तरह फिर व्यूह बनाकर, अमरय नगाड़े आदि बनाने तुमको चरण करते हैं। तुम हमारी ओर होरर, हमारे हुए घोर मिहनाट करने लगे ॥१००।१०३॥ पुरप- माय होकर, अपन मद भाइयों मे युद्ध करा । धृत मिह धृष्टद्युम्न आदि राजा लोग पाण्डवों को फिर रथ गष्ट के पग और पिण्ड की रक्षा तुम्हीं मे होगी। पर मगर और युद्ध करने को उचन देयर अत्यन्त गरपुन ! में अनुमति देना कि तुम हमार पक्ष प्रसन्न हुए । मान्य पुरषों के मान की रक्षा करनेवाले में आ जाओ । अयन्न अमहनी दुर्बुद्धि दर्योपन पाण्डयों का गौरव देगार सर गजा लोग उनरी नि मन्दर माग जायगा ॥७९॥ मन्नय रहते प्रशमा करते हुए उनके ममयानुक्ट माहार्द, पग- P- गजेन्टमय परमात युयुमु अपने भाइयों । नुता और वधु-यान्वयों के प्री अमागरण दया मागदया उसका यी पापट्या या सेना में ! आदि या ना करने लगे। पारा और रोग पाण्ड -- अध्याय ४४ ] म हा भा र त [४१७९ सौहृदं च कृपां चैव प्राप्तकालं महात्मनाम् । दयां च ज्ञातिपु परां कथयाश्चक्रिरे नृपाः ॥१०६॥ साधु साध्विति सर्वत्र निश्चेरुः स्तुतिसंहिताः । वाचः पुण्याः कीर्तिमतां मनोहृदयहर्पणाः ॥१०७॥ म्लेच्छाश्चाऽऽर्याश्च ये तत्र ददृशुःशुश्रुवुस्तथा। वृत्तं तत्पाण्डुपुत्राणां रुरुदुस्ते सगद्गदाः ॥१०८॥ ततो जघ्नुर्महाभेरीः शतशश्च सहस्रशः शङ्खांश्च गोक्षीरनिभान्दध्मुहृष्टा मनस्विनः ॥१०९॥ इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रया संहितायां वैयासिक्या भीष्मपर्वणि भीष्मववपर्वणि भीष्मादिसम्मानने त्रिचत्वारिंशोऽध्याय. ॥४३॥ की स्तुति करते हुए उन्हे साधुवाद देने लगे ॥१०४। सैकडों-हजारों नगाड़ो और दूध के समान नेत रङ्ग १०७|| वहा म्लेच्छ जाति या आर्यजाति के जिन के शहा को मनस्वी वीरगण प्रसन्न होकर बजाने लोगों ने पाण्डवों को देखा या सुना, वे सभी लोग लगे ॥१०८।१०९॥ गद्गद् होकर आमू की धारा बहाने लगे। इसी समय भीष्मपर्व का नेतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४३ ॥ अथ चतुथवारिंशोऽध्याय ॥ ४४ ॥ धृतराष्ट्र उवाच..एवं व्यूढेष्वनीकेषु मामकेवितरेषु च के पूर्व प्रारंस्तत्र कुरवः पाण्डवा नु किम् ॥ १ ॥ सञ्जय उवाच --भ्रातृभिः सहितो राजन्पुत्रो दुःशासनस्तव भीमं प्रमुखतः कृत्वा प्रययौ सह सेनया ॥ २ ॥ तथैव पाण्डवाः सर्वे भीमसेनपुरोगमाः भीष्मेण युद्धमिच्छन्तः प्रययुहष्टमानसाः चवालीसवाँ अध्याय ॥ ४४ ॥ धृतराष्ट्र ने पूछा--हे सञ्जय ! दोनों ओर की साथ युद्ध करने की इच्छा से आगे बढ़े । इसके सेना में व्यूहरचना हो चुकने पर किसने पहले प्रहार अनन्तर दोनों पक्षों की सेना में भेरी, मृदङ्ग, गोशृङ्ग, किया ? कौरवों ने या पाण्डवो ने ' ॥१॥ सन्नय ने मुरज आदि वाजों का शब्द, रथ के पहियों का शब्द, कहा- हे राजेन्द्र ! आपके कुँवर दुःशामन, दुयोधन वांगे की किलकार और मिहनाद का शब्द, की आज्ञा के अनुमार, भीम को आगे करके आर घोड़ों का गन्द चारों ओर गूंज उठा। दोनों मना-सहित यद के लिए आगे यदे! पाण्डव योग और के योदा नर्जन-गर्जन और मिहनाद करने भी भाममेन को आगे करके प्रसन्नतापूर्वक भीष्म के ' कारले एक दूसरे की और झपटने लगे। बड़ा भाग - ! हाथियों ४१८०] म हा भा र त [ भीष्मपर्व वेडाः किलकिलाशब्दाःक्रकचा गोविषाणिकाः । भेरीमृदङ्गमुरजा यकुञ्जरनिःस्वनाः उभयोः सेनयोगसंस्ततस्तेऽस्मान्समाद्रवन् । वयं तान्प्रतिनर्दन्तस्तदाऽऽसीत्तुमुलं महत् ५॥ महान्त्यनीकानि महासमुच्छ्रये समागमे पाण्डबधार्तराष्ट्रयोः । चकम्पिरे शसमृदङ्गनिःस्वनैःप्रकम्पितानीव वनानि वायुना॥६॥ नरेन्द्रनागाश्वरथाकुलानामभ्यागतानामशिवे मुहूर्ते । बभूव घोपस्तुमुलश्चमूनांवातो तानामिव सागराणाम् ॥ ७ ॥ तस्मिन्समुत्थिते शब्दे तुमुले लोमहर्पणे भीमसेनो महाबाहुःप्राणदद्गोवृपो यथा ॥ ८ ॥ शङ्खदुन्दुभिर्निोपं वारणानां च वृंहितम् सिंहनादं च सैन्यानां भीमसेनरवोऽभ्यभूत ॥ ९ ॥ हयानां हेपमाणानामनीकेपु सहस्रशः सर्वानभ्यभवच्छब्दान्भीमस्य नदतः स्वनः ॥ १० ॥ तं श्रुत्वा निनदं तस्य सैन्यास्तव वितत्रसुः जीमूतस्येव नदतः शक्राशनिसमस्वनम् ॥ ११ ॥ वाहनानि च सर्वाणि शकृन्मूत्रं प्रसुवुः शब्देन तस्य वीरस्य सिंहस्येवेतरे मृगाः ॥ १२ ॥ दशयन्धोरमात्मानं महाभ्रमिव नादयन् विभीपयंस्तव सुतान्भीमसेनः समभ्ययात् कोलाहल आकाश तक छा गया ॥२॥५॥ इस तरह ञ्चकारी तुमुल शब्द के उठने पर महाबाहु भीमसेन दोनों पक्षों की मुठभेड़ होने पर पाण्डवों और कारयों वली साड की तरह गरजने लगे | भीमसेन के उस की भारी सेनाएँ, आंधी से हिलाये गये चनों की तरह, शब्द ने शव और नगाडे के शब्द, हाथियों की शह और मृदङ्ग आदि के शब्दों से उत्तेजित होकर, चिंघार, हजारों घोड़ो की हिनहिनाहट और सैनिकों आन्दोलित हो उठी । हे महाराज ! उस अशुभ घोर के सिंहनाद आदि सब प्रकार के शब्दो को दबा ममय में हाथी, घोड़े, रथ आदि से परिपूर्ण दोनो लिया। मेघ के समान गम्भीर गब्द से गरजते हुए सेनाओं में वैसा ही कोलाहल सुन पड़ने लगा जैसे मिमेन के उस, इन्द्र के वज्र के से, शब्द को सुन- तूफान आने के समय शाम को प्राप्त ममुद्र में भया कर कौरवसेना अत्यन्त भयभीत हो उठी ।।८।११॥ नक शब्द उटना है ॥६७ हे राजेन्द्र ! उस रोमा जमे क्षुद्र मृगगण सिंह का भयङ्कर शब्द सुनकर अन्य ४४ ] म हा भारत [ ४१८१ - तमायान्तं महेष्वासं सोदर्याः पर्यवारयन् छादयन्तः शरवातैर्मेघा इव दिवाकरम् ॥ १४ ॥ दुर्योधनश्च पुत्रस्ते दुर्मुखो दुःशलः शलः दुःशासनश्चाऽतिरथस्तथा दुर्मर्पणो नृपः ॥ १५ ॥ विविंशतिश्चित्रसेनो विकर्णश्च महारथः पुरुमित्रो जयो भोजः सौमदत्तिश्च वीर्यवान् ॥ १६ ॥ महाचापानि धुन्वन्तो मेघा इव सविद्युतः आददानाश्च नाराचान्निर्मुक्ताशीविपोपमान् ॥१७॥ अथ ते द्रौपदीपुत्राः सौभद्रश्च महारथः नकुलः सहदेवश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्पतः ॥१८॥ धार्तराष्ट्रान्प्रतिययुरर्दयन्तः शितैः शरैः वरिव महावेगैः शिखराणि धराभृताम् तस्मिन्प्रथमसंग्रामे भीमज्यातलनिःस्वने तावकानां परेपांच नाऽऽसीत्कश्चित्पराङ्मुखः ॥ २० ॥ लाघवं द्रोणशिष्याणामपश्यं भरतर्षभ निमित्तवेधिनां चैव शरानुत्सृजतां भृशम् ॥ २१ ॥ नोपशाम्यति नि?पो धनुपां कूजतां तथा विनिश्चेरुः शराः दीप्ता ज्योतीपीव नभस्तलात् ॥ २२ ॥ मल-मूर कर देते हैं वैसे ही हाथी-घोड़े आदि वाहन चाहते हैं, वैसे ही ये लोग वाण वर्षा से भीमसेन को भीमसेन की गर्जना से डरकर मल मूत्र-त्याग करने ढकते हुए चारों ओर से उन्हें घेरने की चेष्टा करने लगे । महावीर भीमसेन मेघगर्जनतुल्य अयन्त घोर लगे ॥१४|१७|| इधर द्रौपदी के पाचों पुत्र, अभि- शब्द करके अपने घोर रूप से आपके पुत्रों को डराते मन्यु, नकुल, सहदेव और धृष्टद्युम्न आदि वीरगण हुए कौरवमेना की ओर बढ़े ॥१२।१३।। तब दुर्यो- पर्वत के गियरों पर जमे वजों की वर्षा होती है वैसे धन, दुर्मुख, दुःसह, अतिरथ, दुःशामन, शल, दुर्म-. ही दुर्योधन आदि के ऊपर बाण बरसाने लगे। र्पण, विविंशति, चित्रसेन, महारथ, विकर्ण, पुरमित्र, । भयानक प्रन्यच्चा शब्द से परिपूर्ण उम भयकर युद्ध जय आदि महावीर, भोजवंशी यादव कृतवर्मा और पाण्डवपक्ष या कारवपक्ष का कोई भी योदा विमुग्य मोमदत्त के पुत्र आदि सब वीर बिजली-महित बादलों नही हुआ ॥१८॥२०॥ हे महाराज ! उम ममय में की तरह बड़े-बड़े धनुषों को नहाकर. केंचुल मे द्रोणाचार्य के शिया के हाथ की म्फति अपनी आंगों निकले नागों के सम्पाले, नारान वाणों को तर-से देखने लगा । ये लोग निमित्तोधी और गदोधी कमों से निकालने लगे। मेघ जैसे मूर्य को ढकना | बाणों की वर्षा वेगमे कर रहे थे। धनुषों की टोरियों ११८४ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व तावुभौ कुरुशार्दूलौ परस्परवधैपिणौ गाङ्गेयस्तु रणे पार्थ विध्वा नाऽकम्पयद्वली तथैव पाण्डवो राजन्भीष्म नाऽकम्पयाधि । सात्यकिस्तु महेष्वासः कृतवर्माणमभ्ययात् ॥११॥ तयोः समभवद्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् सात्यकिः कृतवर्माणं कृतवर्मा च सात्यकिम् ॥ १२ ॥ आनछुतुः शरैर्घोरेस्तक्षमाणौ परस्परम तौ शराचितसर्वाङ्गो शुशुभाते महावलौ ॥ १३॥ वसन्ते पुष्पशवलौ पुष्पिताविव किंशुको अभिमन्युर्महेष्वासं बृहद्वलमयोधयत् ततः कोसलराजाऽसावभिमन्योर्विशाम्पते ध्वज चिच्छेद समरे सारथिं च न्यपातयत् ॥ १५ ॥ सौभद्रस्तु ततः क्रुद्धः पातिते रथसारथी वृहद्बलं महाराज विव्याध नवभिः शरैः ॥ १६ ॥ अथाऽपराभ्यां भल्लाभ्यां शिताभ्यामरिमर्दनः । ध्वजमेकेन चिच्छेद पाणिमेकेन सारथिम् ॥१७॥ अन्योन्यं च शरैः क्रुद्धौ ततक्षाते परस्परम् मानिनं समरे दृतं कृतवैरं महारथम् ॥ १८॥ भीष्मपितामह कालदण्डतुल्य धनुप लेकर अर्जुन की । महाबली वीर घायल होकर वसन्त में फूले हुए दास और बढ़े। तेजस्वी अर्जुन भी लोकप्रसिद्ध गाण्डीव के पेडो के समान शोभायमान हुए । महाधनुर्द्धर धनुप लेकर भीष्म की ओर झपटे ॥७९॥ परस्पर अभिमन्यु ने कोशलेश्वर राजा बृहद्बल के ऊपर आम- वध करने की इच्छा रखनेवाले वे दोनों वीर युद्ध करने ! मण किया । राजा बृहद्बल ने अभिमन्यु के रथ की गे। अर्जुन को अपने बाणों के प्रहार से भीष्म घजा काट डाली और उनके सारथी को मार गिराया तनिक भी विचलित नहीं कर सके, वैसे ही अर्जुन ॥१३॥१५]] अभिमन्यु ने भी मुद्र होकर नर बाण भी प्रहार करके भीम को विचलित करने में असमर्थ मारकर उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया । इसके ही रहे । उधर महाधनुर्द्धर सायकि कृनामी से युद्ध अनन्तर दो तीक्ष्ण मल्ल वाण लेकर एक से उनके करने लंग। दोनों का रोमाञ्च उत्पन्न कर देनेवाला । रथ की धजा काट डाली और एक से उनके पृष्ठ- घोर युद्ध होने लगा । दोनों वीर एक दूमरे पर रक्षक सारथी को मार डाला । इस प्रकार दोनों ही आमामण करके प्रहार करने रंगे ॥१०॥१२॥ शत्रुनादान वीर तीक्ष्ण बाणों के द्वारा परस्पर प्रहार दोनों के शरीर यागों से घायल हो गये। दोनो । करने लगे ॥१६॥१८॥ हे महाराज ! भीमसेन ने अध्याय ४५] म हा भा र त [४१८५ - भीमसेनस्तव सुतं दुर्योधनमयोधयत् तावुभौ नरशार्दूलौ कुरुमुख्यौ महावलौ ॥ १९ ॥ अन्योन्यं शरवर्षाभ्यां बवृषाते रणाजिरे तौ वीक्ष्य तु महात्मानौ कृतिनौचित्रयोधिनौ ॥ २०॥ विस्मयः सर्वभूतानां समपद्यत भारत दुःशासनस्तु नकुलं प्रत्युयाय महावलम् ॥ २१ ॥ अविध्यनिशितैर्वाणैर्वहुभिर्मर्मभेदिभिः तस्य माद्रीसुतः केतुं सशरं च शरासनम् ॥ २२॥ चिच्छेद निशितैर्वाणैः प्रहसन्निव भारत अथैनं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् ॥ २३ ॥ पुत्रस्तु तव दुर्धर्षो नकुलस्य महाहवे तुरङ्गाश्चिच्छिदे वाणैर्ध्वजं चैवाऽभ्यपातयत् ॥ २४ ॥ दुर्मुखः सहदेवं च प्रत्युद्याय महाबलम् विव्याध शरवर्षेण यतमानं महाहवे ॥ २५॥ सहदेवस्ततो वीरो दुर्मुखस्य महारणे शरेण भृशतीक्ष्णेन पातयामास सारथिम् ॥ २६॥ तावन्योन्यं समासाद्य समरे युद्धदुर्मदौ त्रासयेतां शरैघोरैः कृतप्रतिकृतैपिणी ॥ २७॥ युधिष्ठिरः स्वयं राजा मद्रराजानमभ्ययात् तस्य मद्राधिपश्चापं द्विधा चिच्छेद मारिष ॥ २८॥ महारथी, अभिमानी आर युद्ध में निपुणता दिखाने- कुपित हाकर आपके पुत्र ने नकुल के ऊपर पच्चीस वाले आपके पुत्र दुर्योधन के ऊपर आक्रमण किया । तुद्रक बाण मारकर उनकी ध्वजा काट गिराई और ने दोनों चित्रयांनी महाबली पीर युद्धभूमि मे परस्पर । रथ के घाडों को भी मार डाला ॥२१॥२४॥ उधर बाणों की वर्षा करक ऐसा युद्ध करने लगे कि उसे | दुर्मुख ने समरप्रिय पराक्रमी सहदेव क सामने पहुँच- देवकर सब प्राणियों को बडा आश्चर्य हुआ ॥१८ । कर अनेक बाणा से उन्हें घायल किया । सहदेव ने २०॥ दु शासन ने महागली नकुल पर अक्रमण अत्यन्त तीक्ष्ण वाण मारकर उनके सारथी को मार करके उनको तीक्ष्ण दस बाण मारे । नकुल ने हँस- डाला । ये दोनो वीर भी इस प्रकार आक्रमण करके कर अयन्त तीक्ष्ण बाणो के द्वारा दु शामन क वे जय की इच्छा से एक दूसरे पर वाण बरसाने लगे वाण, धनुष आर उनकी घजा काट डाली। इससे । ॥२५/२७|| स्वय महाराज युधिष्ठिर मद्रराज शल्य ४१८८ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व भगदत्तं रणे शूरं विराटो वाहिनीपतिः अभ्ययात्त्वरितो राजंस्ततो युद्धमवर्तत ॥४९॥ विराटो भगदत्तं तु शरवर्षेण भारत अभ्यवर्पत्सुसंवृद्धो मेघो वृष्टया इवाऽचलम् ॥ ५० ॥ भगदत्तस्ततस्तूर्णं विराटं पृथिवीपतिम् छादयामास समरे मेघः सूर्यमिबोदितम् ॥ ५१ ॥ वृहत्क्षत्रं तु कैकेयं कृपः शारद्वतो ययौ तं कृपः शरवर्षेण च्छादयामास भारत ॥ ५२ ॥ गौतम कैकेयः क्रुद्धः शरवृष्टयाऽभ्यपूरयत् तावन्योन्यं हयान्हत्वा धनुश्छित्वा च भारत ॥ ५३ ॥ विरथावसियुद्धाय समीयतुरमर्पणौ तयोस्तदभवद्युद्धं घोररूपं सुदारुणम् ॥ ५४॥ द्रुपदस्तु ततो राजन्सैन्धवं वै जयद्रथम् अभ्युद्ययौ हृष्टरूपो हृष्टरूपं परन्तपः ततः सैन्धवको राजा द्रुपदं विशिखैस्त्रिभिः ताडयामास समरे स च तं प्रत्यविध्यत ॥ ५६ ॥ तयोस्तदभवाद्धं घोररूपं सुदारुणम् ईक्षणप्रीतिजननं शुक्राङ्गारकयोरिव ॥ ५७॥ वाणों से शिवण्ई। को घायल कर दिया; इसमे थे । के मध्य देवकर कृपाचार्य के ऊपर वाण बरसाना विचलित हो गये । फिर शिखण्डी ने भी अस्थामा आरम्भ किया । युद्धभूमि में दोनों के धनुष कट गये के ऊपर तीक्ष्ण बाण परसाना आरम्भ किया। इसी और रथ के घोड़े मर गमे । तब दोनों ही स्वगायुद्ध तरह वे दोनो वीर एक दूसरे को बाणों से घायल करने लगे ॥५२।५. ॥ शत्रुमर्दन राजा द्रुपद क्रोध करने लगे ॥४६१४८|| हे भारत ! वाहिनीपति राना के का होकर मिन्धुपति जयद्रय के मामने पहुँचे । गिट ने महासूर भगदत्त के पास जाकर युद्ध आरम्भ मिन्धुपनि जयद्रथ ने उनको तीन बाणों से घायल कर दिया। विराट ने युद्ध होकर, परन के उपर किया । द्रुपद भी जुद्ध होकर जयद्रय के ऊपर बाणा जटापा के ममान, भगदत के ऊपर वाण वामाये । की वर्षा करने लंग। गुम और मगल के तुन्य उन मर जमे गूर्य को दकाने हैं, यरी ही भगदत्त ने दोनों वारों के भयावर युद्ध को देखकर दर्शक रोग याणों में राजा विराट को दम दिया ||४१५२॥ अयन्त सन्तुष्ट हुए.॥५५॥५॥ हे महागज ! महा- कमयाग वृहशान के पास पहचकर मानार्य बाण । बाली आपके पुत्र मिण महापार ध्रुनसान थे. यामाने लगे। राशन ने भी आने यो यागरिझर. : मामन जाकर अपन्न घार मंपाम करने लगे। दोनों - अध्याय ४५] म हा भा र त [ ४१८९ । - । विकर्णस्तु सुतस्तुभ्यं सुतसोमं महाबलम् अभ्ययाज्जवनैर श्वैस्ततो युद्धमवर्तत ॥ ५८॥ विकर्णः सुतसोमं तु विध्वा नाऽकम्पयच्छरैः । सुतसोमो विकर्णं च तदद्भुतमिवाऽभवत् ॥ ५९ ॥ सुशर्माणं नरव्याघ्रश्चेकितानो महारथः अभ्यद्रवत्सुसंक्रुद्धः पाण्डवार्थे पराक्रमी ॥ ६०॥ सुशर्मा तु महाराज चेकितानं महारथम् महता शरवर्पण वारयामास संयगे ॥ ६१ ॥ चेकितानोऽपि संरब्धः सुशर्माणं महाहवे प्राच्छादयत्तमिपुभिर्महामेघ इवाऽचलम् ॥ ६२॥ शकुनिः प्रतिविन्ध्यं तु पराकान्तं पराक्रमी अभ्यद्रवत राजेन्द्र मत्तः सिंह इव द्विपम् ॥ ६३॥ यौधिष्ठिरस्तु संक्रुद्धः सौबलं निशितैः शरैः व्यदारयत सङ्ग्रामे मघवानिव दानवम् ॥ ६४॥ शकुनिः प्रतिविन्ध्यं तु प्रतिविध्यन्तमाहवे व्यदारयन्महाप्राज्ञः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥६५॥ सुदक्षिणं तु राजेन्द्र काम्बोजानां महारथम् । श्रुतकर्मा पराक्रान्तमभ्यद्रवत संयुगे ॥६६॥ सुदक्षिणस्तु समरे साहदेविं महारथम् विध्वा नाऽकम्पयत वे मैनाकमिव पर्वतम ॥६७॥ ही समान तेजस्वी और वीर थे । इस कारण कोई वैमे ही गान्धारपति शकुनि महापराक्रमी युधिष्ठिर-पुत्र किसी को विचलित न कर सका । उनका युद्ध देग- प्रतिविन्थ्य के ऊपर झपटे । इन्द्र जैसे दानव को क्षत- कर मवको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥५८/५९|| पाण्डयों विक्षित कर डालें वैमे ही युधिष्टिर के पुत्र ने कुपित के हितैषी महारथी चेकितान क्रुद्ध होकर मुशर्मा के होकर वाणी मे शनि को अयन्त घायट कर सामने आये । वाणां करके सुशर्मा महारथी चेकि- दिया ॥६३३६५|| सहदेव के पुत्र महागर श्रुतकमा तान के आक्रमण को रोकने लगे। मेघ जैसे पर्वत काम्बोज देयके निवामी महापराक्रमी महारया मुदक्षिण के ऊपर जल वर्षाते हैं, येमे ही चेकितान क्रोधान्ध : के पास झपटकर पहुंचे । घोर वाणों की वर्षा कमी होकर मुशर्मा के ऊपर बाण बरसाने टगे॥६०।६२॥ मुदक्षिण मनाक पर्यन मग श्रुतकर्मा को युद्ध में न सिंह जैसे उन्मत्त हाथी को देगकर उधर झपटता है, हटा मरे । श्रुतकर्मा ने तीक्ष्ण बाणों में मुदक्षिण 1 ४१९० ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व श्रुतकर्मा ततः क्रुद्धः काम्बोजानां महारथम् । शरैर्वहुभिरानछेद्दारयन्निव सर्वशः ॥ ६८॥ इरावानथ संक्रुद्धः श्रुतायुपमरिन्दमम् प्रत्युद्ययौ रणे यत्तो यत्तरूपं परन्तपः आर्जुनिस्तस्य समरे हयान्हत्वा महारथः ननाद वलवन्नादं तत्सैन्यं प्रत्यप्रयत् ॥७०॥ श्रुतायुस्तु ततः क्रुद्धः फाल्गुनेः समरे हयान् । निजघान गदाग्रेण ततो युद्धमवर्तत ।। ७१।। विन्दानुविन्दाबावन्त्यो कुन्तिभोज महारथम् । ससेनं ससुतं वीरं संससज्जतुराहवे ॥७२॥ तत्राऽद्भुतमपश्याम तयोोरं पराक्रमम् अयुध्येतां स्थिरौ भूत्वा महत्या सेनया सह ॥७३॥ अनुविन्दस्तु गदया कुन्तिभोजमताडयत् कुन्तिभोजश्च तं तूर्णं शरवातेरवाकिरत् ॥७४॥ कुन्तिभोजसुतश्चाऽपि विन्दं विव्याध सायकैः । स च तं प्रतिविव्याध तदद्भुतमिवाऽभवत् ॥७५॥ केकया भ्रातरः पञ्च गान्धारान्पञ्च मारिष ससैन्यास्ते ससैन्यांश्च योधयामासुराहवे ॥७६॥ वीरवाहुश्च ते पुत्रो वैराटिं रथसत्तमम् उत्तरं योधयामाप्त विव्याध निशितैः शरैः ॥ ७७॥ को घायल कर दिया ॥६६।६८१ उधर अर्जुन के के साथ युद्ध करने आये । युद्ध में उन दोनों का पुर, शत्रुपक्ष के लिए कालसदृश, इरावान् ने ऋद्ध घोर पराक्रम मैने दया । वे उस भारी सेना के साथ होकर पुपित श्रुतायु का मामना किया । वे शन के युद्ध करने लगे। अनुचिन्द ने कुन्तिभोज को एक घोड़ों को मारकर, सिंहनाद करके, उमकी सेना गदा मारी । कुन्तिभोज ने भी उनके ऊपर बाण कोचलिन करने लंगे। श्रुतायु ने भी युद्ध होकर चगये । कुन्तिभान के पुत्र ने विन्द के ऊपर बाग गदा के प्रहार मे उरायान् के घोड़ी को मार दाया। छोरे । निन्द ने भी कुन्तिभोज के पुत्र को वाणों में इसी नार दोनों का तुमुल संग्राम होने लगा ॥६९] वायर किया। उनका युद्ध देगकर ममी को आर्य ७१॥ अवन्ति देश में राजा चिन्द और अनुरिन्द आ ||७२।७५ ककय देश के राजकुमार पाना दोनों बार, पुत्र और मना महिन, महाराज युन्निभान | भाई आनी मंना को माग रेकर मन्यगुहा गान्धार अध्याय ४५] म हा भा र त [ ४१९१ - उत्तरश्चाऽपि तं वीरं विव्याध निशितैः शरैः । चेदिराट् समरे राजन्नुलूकं समभिद्रवत् ॥७८॥ तथैव शरवर्षेण उलूकं समविद्धयत उलूकश्चाऽपि तं चाणैर्निशितैलोमवाहिभिः ॥७९॥ तयोर्युद्धं समभवद्धोररूपं विशाम्पते दारयेतां सुसंक्रुद्धावन्योन्यमपराजितौ ॥ ८०॥ एवं द्वन्द्वसहस्राणि रथवारणवाजिनाम् पदातीनां च समरे तव तेषां च संकुले मुहूर्तमिव तयुद्धमासीन्मधुरदर्शनम् तत उन्मत्तवद्राजन्न प्राज्ञायत किश्चन ॥८२॥ गजो गजेन समरे रथिनं च रथी ययौ अश्वोऽश्वं समभिप्रायात्पदातिश्च पदातिनम् ॥८३॥ ततो युद्धं सुदुर्धर्ष व्याकुलं समपद्यत शूराणां समरे तत्र समासाद्येतरेतरम् ॥८४॥ तत्र देवर्षयः सिद्धाश्चारणाश्च समागताः प्रेक्षन्त तद्रणं घोरं देवासुरसमं भुवि ॥८५॥ ततो दन्तिसहस्राणि रथानां चाऽपि मारिप । अश्वौघाः पुरुपौधाश्च विपरीतं समाययुः ॥८६॥ देश के पाँच राजकुमारों से युद्ध कर रहे थे। आपके । के हजारो रथ, हाथी, घोड़े आदि पर सवार और पुत्र परिसाहु, श्रेष्ठ रथी विराट पुत्र उत्तर के साथ युद्ध | पेदल वीर योद्धा परस्पर अत्यन्त घोर द्वन्द्वयुद्ध करने की इच्छा से, आगे बढे । पीरबाहु ने उत्तर को ना लगे। क्षण भर तो वह द्वन्द्वयुद्ध भली प्रकार देखा माणों से घायल किया । महापीर उत्तर ने भी इतने जा सका, किन्तु फिर सब लोग ऐसे भिड़ गये और बाण बरसाये कि पीरबाहु उनसे आच्छादित हो गये। अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा ऐसी होने लगी कि कुछ ॥७५/७८॥ महावीर चेदि-पति उलूक के सामने | भी नहीं देख पड़ता था। उस समय रथ के साथ आये और उन पर बाण बरसाने लगे। उलूक ने भी स्थ, हाथी के साथ हाथी, घोड़े के साथ घोड़ा और उनके ऊपर तीक्ष्ण वाणों की वर्षा की। युद्ध करते- पैदल के साथ पैदल भिड़ गया और अत्यन्त घोर करते दोनों के शरीर इतने घायल हो गये कि तिल युद्ध होने लगा ॥८११८३॥ शूर वीर लोग एक दूसरे भर भी शरीर बाणों के धार से शून्य नहीं रह गया; के सामने जाकर दारण सग्राम करने लगे। युद्ध किन्तु कोई किसी को हरा नहीं सका ॥७८1८०॥ | भूमि में पहुँचकर देवर्षि, सिद्ध ओर चारणगण वह हे राजेन्द्र ! इस तरह कोरों और पाण्डयों के पक्ष | देवासुर-युद्ध के समान भयानक सग्राम देखने लगे। - ४१९० ] म हा भा र त [ भपिपर । श्रुतकर्मा ततः क्रुद्धः काम्बोजानां महारथम् । शरैर्बहुभिरानछेद्दारयन्निव सर्वशः ॥ ६८॥ इरावानथ संक्रुद्धः श्रुतायुपमरिन्दमम् प्रत्युद्ययौ रणे यत्तो यत्तरूपं परन्तपः ॥६९॥ आर्जुनिस्तस्य समरे हयान्हत्वा महारथः ननाद वलवन्नादं तत्सैन्यं प्रत्यपूरयत् ॥७०॥ श्रुतायुस्तु ततः क्रुद्धः फाल्गुनेः समरे हयान् । निजधान गदाग्रेण ततो युद्धमवर्तत ॥७१॥ विन्दानुविन्दावावन्त्यो कुन्तिभोज महारथम् । ससेनं ससुतं वीरं संससजतुरावे ॥७२॥ तत्राऽद्भुतमपश्याम तयोर्पोरं पराक्रमम् अयुध्येतां स्थिरौ भूत्वा महत्या सेनया सह ॥७३॥ अनुविन्दस्तु गदया कुन्तिभोजमताडयत् कुन्तिभोजश्च तं तूर्णं शरवातैरवाकिरत ॥७४॥ कुन्तिभोजसुतश्चाऽपि विन्दं विव्याध सायकैः । स च तं प्रतिविव्याध तदद्भुतमिवाऽभवत् ॥७५॥ केकया भ्रातरः पञ्च गान्धारान्पञ्च मारिप ससैन्यास्ते ससैन्यांश्च योधयामासुराह ॥७६॥ वीरवाहुश्च ते पुत्रो वैराटि रथसत्तमम् उत्तरं योधयामास विव्याध निशितः शरैः ॥ ७७॥ को घायल कर दिया ॥६६॥६८॥ उधर अर्जुन के | के माथ युद्ध करने आय । युद्ध पुत्र, शत्रुपक्ष के लिए कालसदृश, इरावान् ने मुद् घोर पराक्रम मैने देगा । ये उस भारी सेना के साथ होकर युपिन श्रुतायु का मामना किया । वे शत्रु के युद्ध करने लगे। अनुरिन्द ने पुन्तिभोज को एक घोड़ों को मारकर, मिहनाट करके, उमकी मेना मटा मारी | युन्तिभोज ने भी उनके ऊपर बाण यो पिचटिन करने लगे। श्रुतायु ने भी उद्र होकर पाये । कुन्तिभोज के पुत्र ने पिन्द के उपर बाग गहा के प्रकार मेगवान् के घादा को मार डाटा। छोदे । पिन्ट ने भी कुन्तिमान के पुत्र को यागों में इसी माह दोनो का तुमुर मप्राम होने लगा॥६५॥ शायर किया । उनका गुद देगार मा यो आचर्य ७॥ अनि देश के राजा विन्द और अनुपिन्दरआ ||७२ सय देश के राजकुमार यांनो दोनों बार, पुष और मेना मदिन, मारान दुनिमान | माई अग्नी मंना यो माय लेकर गन्य गाभार में उन दोनों का अध्याय ४५] म हा भारत [४१९१ उत्तरश्चाऽपि तं वीरं विव्याध निशितैः शरैः । चेदिराट् समरे राजन्नुलूकं समभिद्रवत् ॥७८॥ तथैव शरवण उलूकं समविद्धयत उलूकश्चाऽपि तं वार्निशितैोमवाहिभिः ॥७९॥ तयोर्युद्धं समभवद्धोररूपं विशाम्पते दारयेतां सुसंक्रुद्धावन्योन्यमपराजितो ॥ ८०॥ एवं द्वन्द्वसहस्राणि रथवारणवाजिनाम् पदातीनां च समरे तव तेषां च संकुले ॥८१॥ मुहूर्तमिव तयुद्धमासीन्मधुरदर्शनम् तत उन्मत्तवद्राजन्न प्राज्ञायत किञ्चन ॥८२॥ गजो गजेन समरे रथिनं च रथी ययौ अश्वोऽश्वं समभिप्रायात्पदातिश्च पदातिनम् ॥८३॥ ततो युद्धं सुदुर्धर्ष व्याकुलं समपद्यत शुराणां समरे तत्र समासाद्येतरेतरम् ॥८॥ तत्र देवर्पयः सिद्धाश्चारणाश्च समागताः प्रेक्षन्त तद्रणं घोरं देवासुरसमं भुवि ततो दन्तिसहस्राणि स्थानां चाऽपि मारिप । अश्वौघाः पुरुपौधाश्च विपरीतं समाययुः ॥८६॥ देश के पान राजकुमारो मे युद्ध कर रहे थे। आपके , के हजारो रय, हाथी, घोड़े आदि पर सवार और पुत्र वीरवार, श्रेष्ठ रथी विराट-पुन उत्तर के साथ गुद ' पैदर यीर योदा परस्पर अयन्त घोर द्वन्द्वयुद्ध करने की इम्मा से, आगे बद । वीरवार ने उत्तर को नर लगे। क्षण भर तो यह दन्दयुद्ध भी प्रकार देगा वाणों से घायल किया। महावीर उत्तर ने भी इतने जा सका, किन्तु फिर मन लोग ऐसे भिड़ गये और याण वरसाप कि पीरबाट उनसे आच्छादित हो गये। अग्न-शयों की वर्षा ऐमी होने लगी कि कुछ ॥७५/७८॥ महागर चेदि-पति उदा के मामने भी नहीं देग पड़ता था। उम ममय रस के मार आये और उन पर याण वरगाने लगे। उदक ने भी रस, हाथी के माग हामी, घोड़े के माप घोड़ा और उनसे कार तीक्ष्ण बाणों की वर्ग की। युद्ध करने पैदल के माय पैदल भिद गया और अन्यन्न घोर करने दोनों के शरीर इतने पापा हो गये कि तिर । युद होने लगा ॥८११८३|| शूर वीर लोग एक दुर्मर भर भीदारीर वाणों के भार मे शून्य नहीं रा गया; के मागने जाकर दारुण मंग्राम करने लंगे। युद. नि यो मिमी को हरा नहीं ममा ॥७८1८०॥ । भूमि में पहुंचकर देवर्षि, निद और चारणगण वह हे गजेन्ट ! हम तरह का और पाण्डों के पक्ष देशमुर-युद के समान भयानक मंग्राम देगने उगे। - ।
४११२ ] म हा भारत [ भीष्मपये तत्र तत्र प्रदृश्यन्ते रथवारणपत्तयः सादिनश्च नरव्याघ युद्धयमाना मुहुर्मुहुः ॥८७॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि द्वद्वयुद्धे पचच गरिंशोऽध्याय ॥१५॥ मैंने देखा कि हजारों रथों, हाथियो, घोडो आर पुरुषो । घोड़े और पेदर पारम्बार गरजार युद्ध करते दिखाई के दल विशृङ्खल होकर इधर-उधर दौड़ते ओर युद्ध देते थे ॥८४८७॥ कर रहे थे । प्रत्येक स्थान पर अनेकानेक रथ, हाथी भीष्मपर्व का पैंतालीसमा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४५ ॥ अध पचवारिंशोऽध्याय ॥ ४६॥ सञ्जय उपाच-राजशतसहस्राणि तत्र तत्र पदातिनाम् निर्मर्यादं प्रयुद्धानि तत्ते वक्ष्यामि भारत न पुत्रः पितरं जज्ञे पिता वा पुत्रमौरसम् न भ्राता भ्रातरं तत्र स्वस्नीयं न च मातुलः ॥ २ ॥ न मातुलं च स्वस्त्रीयो न सखायं सखा तथा । आविष्टा इव युध्यन्ते पाण्डवाः कुरुभिः सह ॥ ३ ॥ स्थानीक नव्याघ्राः केचिदभ्यपतन्रथैः अभज्यन्त युगैरेव युगानि भरतर्षभ रथेपाश्च रथेषाभिः कूवरा रथकूवरैः सङ्गतैः सहिताः केचित्परस्परजिघांसवः न शेकुश्चलितुं केचित्सन्निपत्य रथा रथैः प्रभिन्नास्तु महाकायाः सन्निपत्य गजा गजैः ॥ ६ ॥ वहुधाऽदारयन्कुद्धा विषाणैरितरेतरम् सतोरणपताकैश्च वारणा वरवारणेः छिया सवा अध्याय ॥ ४६ ॥ सञ्जय बोले- हे महाराज! इस समर में सहस्रों किसी को पहचानता ही नहीं था । पाण्डवगण प्रेत पैदल सैनिकों ने जिस प्रकार मर्यादा का उल्लङ्घन बाधाग्रस्त से होकर कारों के साथ युद्ध कर रहे करके युद्ध किया, सो मैं कहता हूँ, सुनिए ॥१॥ उस थे ॥२॥३॥ कुछ पुरपसिह वीर, जो रथो पर सवार समय पिता ने पुत्र का, सगे भाई ने सगे भाई का, थे, दूसरे पक्ष के रथारूढ़ वोरों पर टूट पड़े । रथों भानजे ने मामा का, मामा ने भानजे का और मित्र से रथ ऐसे भिड गये कि जुएँ से जुआँ, रथदण्ड से ने मित्र का कुछ भी विचार नहीं किया मानों कोई । रपदण्ड और रयानर से रयकूपर टूटने लगे । रथों अध्याय ४६ ] म हा भारत [ ४१९३ । - अभिस्कृत्य महाराज वेगवद्भिर्महागजैः दन्तैरभिहतास्तत्र चुकुशुः परमातुराः अभिनीताश्च शिक्षाभिस्तोत्रांकुशसमाहताः अप्रभिन्नाः प्रभिन्नानां सम्मुखाभिमुखा ययुः ॥ ९ ॥ प्रभिन्नैरपि संसक्ताः केचित्तत्र महागजाः क्रौञ्चवन्निनदं कृत्वा दुद्रुवुः सर्वतोदिशम् ॥ १० ॥ सम्यक्प्रणीता नागाश्च प्रभिन्नकरटामुखाः ऋष्टितोमरनाराचैर्निर्विद्धा वरवारणाः प्रणेदुर्भिन्नमर्माणो निपेतुश्च गतासवः प्राद्रवन्त दिशः केचिन्नदन्तो भैरवान्रवान् ॥१२॥ गजानां पादरक्षास्तु व्यूढोरस्काः प्रहारिणः ऋष्टिभिश्च धनुर्भिश्च विमलैश्च परश्वधैः ॥ १३ ॥ गदाभिर्मुसलैश्चैव भिन्दिपालेः सतोमरैः आयसैः परिधश्चैव निस्त्रिंशैविगलैः शितैः ॥१४॥ प्रगृहीतैः सुसंरब्धा द्रवमाणास्ततस्ततः व्यदृश्यन्त महाराज परस्परजिघांसवः ॥१५॥ राजमानाश्च निस्त्रिंशाः संसिक्ता नरशोणितेः । प्रत्यदृश्यन्त शूराणामन्योन्यमभिधावताम् से कुछ रथ ऐसे भिड़ गये कि वे किसी ओर चल ही । इधर-उधर भागने लगे।।७।१०॥ अच्छी प्रकार सिपाये नहीं सकते थे। कुछ वीर एक दूसरे के प्राण लेने । गये कुछ हाथी ऋष्टि, तोमर, नाराच आदि शस्त्रों से की इच्छा से घोरतर सम्राम कर रहे थे। जिनके मद घायल होकर सूंड उठाकर चिल्लाते हुए पृथ्वी पर बह रहा है, ऐसे बड़े बड़े हाथी हाथियों से भिड़कर गिरते देग पड़े । मर्मस्थल पर वार होने से कुछ तो घायल हो रहे थे॥१७॥ तोरण-पताका अम्बारी) मर गये और कुछ भयानक स्वर से चिल्लाते हुए इधर- आदि से शोभित वेगशाली गजराज परस्पर भिड़कर | उधर भागने लगे ॥११॥१२॥ हे महाराज ! विशाल दाँतों के प्रहार से एक दूसरे को फाइने और व्यथित छातीवाले शस्त्रधारी लोग, जो हाथियों के पाओं के होकर घोर चीकार करने लगे। हस्तिविद्या में निपुण पास उनकी रक्षा के लिए रहते हैं, एक दृमरे को लोगों के द्वारा सुशिक्षित मद-हीन हाथी, अकुश को मारने के लिए उद्यत होकर ऋष्टि, धनुष, चमका चोट पाकर, मस्त हाथियों के सामने जाकर आक- फरसे, गदा, मुगल, भिन्दिपाल, तोमर, याण, बेग्न, मण कर रहे थे । बहुत से गजराज मदसानी गजराजों | तयार आदि अग्न-शस्त्र हाय में लिये येग से इधर- के समीप जाकर पांच पक्षी का सा शब्द करते हुए उपर दौड़ते देग पद रहे थे ॥१३॥१५॥ परम्पर : । - , म हा भारत [ भीष्मपर्व अवक्षिप्तावधूतानामसीनां वीरवाहुभिः सञ्जज्ञे तुमुलः शब्दः पततां परमर्मसु गदामुसलरुग्णानां भिन्नानां च वरासिभिः दन्तिदन्तावभिन्नानां मृदितानां च दन्तिभिः ॥१८॥ तत्र तत्र नरौघाणां कोशतामितरेतरम् शुश्रुवुर्दारुणा वाचः प्रेतानामिव भारत हयैरपि हयारोहाश्चामरापीडधारिभः हंसैरिव महावेगैरन्योन्यमभिविद्वताः ॥ २०॥ तैर्विमुक्ता महाप्रासा जाम्बूनदविभूषणाः आशुगा विमलास्तीक्ष्णाः सम्पेतुर्भुजगोपमाः ॥ २१ ॥ अश्वरम्न्यजवैः केचिदाप्लुत्य महतो रथान् शिरांस्याददिरे वीरा रथिनामश्वसादिनः ॥ २२॥ बहूनपि हयारोहान्भल्लैः सन्नतपर्वभिः रथी जघान सम्प्राप्य बाणगोचरमागतान ॥ २३॥ नवमेघप्रतीकाशाश्चाऽऽक्षिप्य तुरगान्गजाः पादैरेव विमृद्गन्ति मत्ताः कनकभूपणाः ॥ २४॥ पाट्यमानेषु कुम्भेषु पार्श्वेष्वपि च वारणाः प्रासैर्विनिहताः केचिद्विनेदुः परमातुराः ॥ २५॥ आक्रमण करनेवाले वीरों के हाथों में नररक्त-रञ्जित हाथों से छूटे हुए, सुवर्णमण्टित, तीक्ष्ण धारवाले बाण चमकीले स्वङ्ग थे । वीर पुरुषों के हाथों से उठी और सो की ताह सर्वत्र गिर रहे थे। शीघ्रगामी घोड़ा गिरी हुई नलवारे शत्रुओं के मर्मस्थलों पर पड़ रही पर सवार योद्धा लोग रथों पर पहुंचकर रथारूढ़ वीरों थी और उससे घोर शब्द हो रहा था । युद्धभूमि मे के सिर काट डालते थे ॥२०॥२२॥ रथ पर सवार जगह-जगह गदा-मुशल आदि के प्रहार से दलित, योद्धा लोग भी घुड़सवारो को अपने पास आते देख- ग्वगों के वार से घायल, हाथियों के पाओं से रौंदे कर, तीक्ष्ण और झुके हुए भल्ल बाण मारकर, मार गये और उनके दाँतों से दले गये मनुष्य बुरी तरह डालते थे । जल भरे बादल के समान नीले, सुवर्ण- कराह रहे थे । प्रेती की सी---नरक की यन्त्रणा भूपण-भूपित, मस्त हाथी अपने मस्तक और कपोल भोगनेवालों की सी- उनकी आर्तगणी सुननेवालों काटे जाने पर भी हाथियों को गिराकर रौंद डालते के हृदय को दहला रही थी ।१६।१९।। चर और थे । कुछ हाथी प्रास नाम के शर के प्रहार से पीड़ित कलेंगी से शोभित हंसतुल्य घोड़ों पर सवार योद्दा होकर आतुर भाव से चिल्ला उठते थे । कुछ लोग एक दूसरे पर आक्रमण कर रहे थे । चीरों के | हाथी, सपार और घोड़े को गिराकर, दल मलकर श्रेष्ठ अयाय ४६ ] म हा भा र त [ ४१९५ ॥ साश्वारोहान्हयान्कांश्चिदुन्मथ्य वरवारणाः सहसा चिक्षिपुस्तत्र संकुले भैरवे सति ॥ २६ ॥ साश्वारोहान्विपाणाग्रेक्षिप्य तुरगान्गजाः रथौघानभिमृद्गन्तः सध्वजानभिचक्रमुः ॥२७॥ पुंस्त्वादतिमदत्वाच्च केचित्तत्र महागजाः साश्वारोहान्हयाञ्जध्नुः करैः सचरणैस्तथा ॥ २८॥ अश्वारोहैश्च समरे हस्तिसादिभिरेव च प्रतिमानेपु गात्रेपु पार्श्वेष्वभि च वारणान् आशुगा विमलास्तीक्ष्णाः सम्पेतुर्भुजगोपमाः ॥ २९ ॥ नराश्वकायान्निर्भिय लौहानि कवचानि च निपेतुर्विमलाः शक्त्यो वीरवाहुभिरर्पिताः ॥३०॥ महोल्काप्रतिमा घोरास्तत्र तत्र विशाम्पते द्वीपिचर्मावनद्धैश्च व्याघ्रचर्मच्छदैरपि ॥ ३१ ॥ विकोशैविमलैः खगराभिजग्मुः परान्रणे अभिप्लुतमभिक्रुद्धमेकपाविदारितम् ॥ ३२ ॥ विदर्शयन्तः सम्पेतुः खड्गचर्मपरश्वधैः केचिदाक्षिप्य करिणः साश्वानपि रथान्करैः ॥ ३३ ॥ विकर्षन्तो दिशः सर्वाः सम्पेतुः सर्वशब्दगाः । शंकुभिर्दारिताः केचित्सम्भिन्नाश्च परश्वधैः ॥३४॥ हस्तिभिर्मुदिताः केचित्क्षुण्णाश्चाऽन्ये तुरङ्गमैः । रथनेमिनिकृत्ताश्च निकृत्ताश्च परश्वधैः ॥ ३५ ॥ डाल देते थे ॥२३॥२६॥ उस भयानक युद्ध मे कुछ । हुई उल्यासदृश शशियाँ मनुष्यों, घोड़ों और हारियों हाथी दाँतों से और सूंड से घोड़े तथा उसके सगर के शरीरों में घुसकर दद करचों को तोड़कर बाहर को ऊपर उछाल देते और रयों को तोड़ते-फोड़ते निकल जाता थीं । परिगण व्याघ्र चर्म की म्यानों से दुए इधर-उधर विचर रहे थे। कोई-योई मदोन्मत्त , चमारे पग निमार निभायर शत्रुओं को बाट महागज मूंड से घोड़े और उसके सार को गीचार' रहे थे ॥३०॥३३॥ हे महारान ! उम युद्ध में हजारों पाओं सरोद डालते थे। सर्प के समान भीषण वाण योदा शक्तियों के प्रहार में कटे हुए, परशुओं के उन हाथियों के दाँतों पर, देह पर और वांग पर प्रहार मे छिन्न भिन्न, हाथियों के पाओ से दटे गये, गिर रहे थे ॥२७॥२०॥ वीर पुरणों के हाथों से छ। । घोगों के पाओं मे युचले गये और रस के पहियों से - म हा भारत [ भीमपर्व व्याक्रोशन्त नरा राजंस्तत्र तत्र स्म वान्धवान्। पुत्रानन्ये पितृनन्ये भ्रातृ॑श्च सह वन्धुभिः मातुलान्भागिनेयांश्च परानपि च संयुगे विकीर्णान्त्राः सुवहवो भग्नसक्थाश्च भारत ॥३७॥ वाहुभिश्चाऽपरे छिन्नः पार्थेषु च विदारिताः । क्रन्दन्तः समदृश्यन्त तृपिता जीवितेप्सवः ॥३८॥ तृपापरिगताः केचिदल्पसत्वा विशाम्पते भूमौ निपतिताः सङ्घये मृगयाञ्चक्रिरे जलम् ॥ ३९ ॥ रुधिरौघपरिक्लिन्नाः क्लिश्यमानाश्च भारत व्यनिन्दन्भृशमात्मानं तव पुत्रांश्च सङ्गतान् ॥४०॥ अपरे क्षत्रियाः शूराः कृतवैराः परस्परम् नैव शस्त्रं विमुञ्चन्ति नैव क्रन्दन्ति मारिप ॥४१॥ तर्जयन्ति च संहृष्टास्तत्र तत्र परस्परम् आदश्य दशनैश्चाऽपि क्रोधात्सरदनच्छदम् ॥४२॥ भ्रुकुटीकुटिलैबक्त्रैः प्रेक्षन्ति च परस्परम् अपरे क्लिश्यमानास्तु शरार्ता बणपीडिताः ॥४३॥ निप्कूजाः समपद्यन्त दृढसत्वा महावलाः अन्ये च विरथाः शूराः स्थमन्यस्य संयुगे ॥४४॥ प्रार्थयाना निपतिताः सक्षुण्णा वरवारणैः अशाभन्त महाराज सपुप्पा इव किंशुकाः ॥४९॥ घायल पड़े कराह रहे थे । कोई पुत्र को, कोई पिता । लोग, रक्त से नहाये हुए, प्लेश पा रहे थे और अपनी को, कोई भाई को, कोई मामा को, कोई भानजे को और आपके पुत्रों की निन्दा कर रहे थे।॥३८॥४०॥ और कोई अन्य भाई-बन्धुवों को स्मरण करके अयन्त उनमें से कुछ अत्यन्त शूर साहसी क्षत्रिय अधमरे दीन स्वर से विलाप कर रहा था ॥३३॥३७॥ बहुतों होने पर भी क्रोध के मारे दाँतों से होठ चवा रहे थे; की आतें बाहर निकल पड़ी थीं, जाँघ टूट गई थीं, न तो ने विलाप करते थे और न कराहते थे । वे उस हाथ कट गये थे, कोखें फट गई थी और कोई प्यास समय भी भौहे टेदी किये, होंठ चबाते हुए, शनु से व्याकुल हो रहा था। ऐसे लोग जीपन की इच्छा की ओर देख रहे थे। उस समय भी उनमें उसाद मे रो रहे थे। कुल लोग अवमरे पड़े थे और प्याम और प्रसन्नता की कमी नहीं थी। कोई-कोई महा. से व्याकुल होकर जल माँग रहे थे। हे भारत ! कुल वली योद्धा वाणों से घायल होकर भी चुपचार - ।
अन्याय ४७ ] म हा मारत - सम्बभूवुरनेकेषु वहयो भैरवस्वनाः वर्तमाने महाभीमे तस्मिन्वीवरक्षये ॥ ४६॥ निजघान पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं रणे खस्त्रीयोमातुलं चाऽपि स्वस्त्रीयं चाऽपि मातुलः॥४७॥ सखा सखायं च तथा सम्बन्धी वान्धवं तथा । एवं युयुधिरे तत्र कुरवः पाण्डवैः सह वर्तमाने तथा तस्मिन्निमर्यादे भयानके भीप्समासाद्य पार्थानां वाहिनी समकम्पत ॥४९॥ केतुना पञ्चतारेण तालेन भरतर्षभ राजतेन महावाहुरुच्छ्रितेन महारथे वभौ भीप्सस्तदा राजश्चन्द्रमा इव मेरुणा ॥ ५०॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपथपर्वणि मगुलयुद्धे पट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ।। पड़े थे । रथ नष्ट हो जाने पर कोई कोई वीर पुरुप | सम्बन्धी ने सम्बन्धी को ओर वान्धर ने वान्धर को दूसरा रथ माग रहे थे कि इसी समय हाथियो के धक्के उस मर्यादाहीन युद्ध में मारना आरम्भ कर दिया था से पृथ्वी पर गिर पड़े और हाथियो के पाओं के नीचे । ॥३५॥४८॥ हे भारत! उस मर्यादाशून्य घोरतर संग्राम कुचल गये ॥४१॥४५|| उनके रक्तरञ्जित शरीर फले में पाण्डवों और कौरवों के पक्ष के बहुतेरे वीर मारे गये। हुए ढाक के वृक्ष के समान शोभा पा रहे थे । श्रेष्ठ सम्राम में भीम के बाणो के प्रहार से पाण्डप-पक्ष की वारों का विनाश करनेवाले उस युद्ध में, सेनाओं के सारी सेना विचलित हो उठी। सोने-चाँदी से मण्डित, मध्य, अनेक प्रकार के भयानक शब्द सुन पड़ ऊँचे, पञ्चतारा और ताल के चिह से शोभित घजा- रहे थे। पिता ने पुत्र को, पुत्र ने पिता को, भानजे वाले रथ पर सवार महावीर भीष्म सुमेरु पर्वत पर ने मामा को, मामा ने भानजे को, मित्र ने मित्र को, स्थित चन्द्रमा के समान शोभायमान थे ॥५१॥५०॥ भीष्मपर्व का छियालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।। ४६ ।। अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्याय ॥ ४७ ॥ रात्रय उवाच--गतपूर्वाह्नभूयिष्टे तस्मिन्नहनि दारुणे वर्तमाने तथा रौद्रे महावीरवरक्षये दुर्मुखः कृतवर्मा च कृपः शल्यो विविंशतिः । भीम जुगुपुरासाद्य तव पुत्रेण चोदिताः ॥ २ ॥ सनासपा अध्याय ॥ १७ ॥ रात्रय कहते हैं-हे महाराज ! म अगन्त मे वीर पुरुषों का नाम हुआ। मदागर दुर्मर, त- दारण दिन या पूर्व-भाग ममाप्त होने के समय बहुन । वर्मा, नाग, शन्य और गिनि, ये यादा दृयों- -
४१९८ ]
म हा भा र त
[ भीष्मपर्व
।
-
।
एतैरतिरथैर्गुप्तः पञ्चभिर्भरतर्षभः
पाण्डवानामनीकानि विजगाहे महारथः
चेदिकाशिकरूपेषु पञ्चालेषु च भारत
भीष्मस्य बहुधा तालश्चलत्केतुरदृश्यत ॥ ४ ॥
स शिरांसि रणेऽरीणां रथांश्च सयुगध्वजान् ।
निचकर्त महावेगैर्भल्लैः सन्नतपर्वभिः
नृत्यतो रथमार्गेपु भीष्मस्य भरतर्षभ
भृशमार्तखरं चक्रुर्नागा मर्मणि ताडिताः
अभिमन्युः सुसंक्रुद्धः पिशङ्गैस्तुरगोत्तमैः
संयुक्तं रथमास्थाय प्रायाद्भीष्मरथं प्रति
जाम्बूनदविचित्रेण कर्णिकारेण केतुना
अभ्यवर्तत भीमं च तांश्चैव रथसत्तमान्
॥ ८॥
स तालकेतोस्तीक्ष्णेन केतुमाहत्य पत्रिणा
भीप्मेण युयुधे वीरस्तस्य चाऽनुरथैः सह
॥ ९ ॥
कृतवर्माणमेकेन शल्यं पञ्चभिराशुगैः
विध्वा नवभिरानछैच्छिताः प्रपितामहम् ॥१०॥
पूर्णायतविसृष्टेन सम्यक्प्रणिहितेन च
ध्वजमेकेन विव्याध जाम्बूनदपरिष्कृतम्
धन की आज्ञा से भीष्म के पास जाकर उनकी रक्षा : देखकर प्रपल पराक्रमी कुमार अभिमन्यु बुद्ध होकर
करने लगे ॥१।२|| पाँच अतिरथा चीरों के द्वारा चारों पिगलवण घोड़ों से शोभित, सुपर्णमण्डित, कर्णिकार-
और से सुरक्षित होकर महारपी भीष्म पाण्डवों की ; चिर-युक्त घना से अलकृत रथ पर बैठकर महारथी
सेना के भीतर पहुँचे । चेदि, काशी, करुष और भीम और उनके अनुगामी वीरों के सामने पहुंचे।
पानालदेश की मेना के भीतर भीष्म को नालचिव- ॥६८|| अभिमन्यु ने बहुत से बाण भीम की घना
युत पजा फहराती देग पड़ने लगी। ये अमंग्य में मारे और भीम की रक्षा करनेवाले उन प्रधान पांच
संनिकों के रय, याहन, पजा और मिर आदि अहो । रथी वीरों को भी उन्होंने बाणों से घायल किया ।
को अपने तीक्ष्ण बाणों से काट-काटकर गिराने लंग इम प्रकार ये घोर युद्ध करने लगे। अभिमन्यु महा.
॥३।५।। गुदभूमि के मध्य उनके रथ की राह में चार अर्जुन के पुन । उन्होंने कृतवर्मा को एक
पड़नेपाटे गजगज मनबट में पायल होकर गिटाने वाण और शप को पाँच याग मारे । इस प्रकार
और कानर पनि करने टगे। मप्रकार मंग्रामभूमि अन्य यारों को घायट और उद्विग्न करके अपने पिता.
में भीम या बाणों में अपने मानिकों का पिनास हल मह भीष्मकार भी उन्होने नरयाण छांदे ॥१०॥
ग हा भारत । । । । कला हीन पा । पर देगा(मांग आदि गोनाओं के बीग के मपम शिकार भी, पूर्णता पांचथी अध्याय ४७] [ ४१९९ दुर्मुखस्य तु भल्लेन सर्वावरणभेदिना जहार सारथेः कायाच्छिरः सन्नतपर्वणा ॥१२॥ धनुश्चिच्छेद भल्लेन कार्तस्वरविभूपितम् कृपस्य निशिताग्रेण तांश्च तीक्ष्णमुखैः शरैः ॥ १३ ॥ जघान परमक्रुद्धो नृत्यन्निव महारथः तस्य लाघवमुद्रीक्ष्य तुतुपुर्देवता अपि ॥ १४ ॥ लब्धलक्षतया काणेः सर्वे भीष्ममुखा रथाः । सत्ववन्तममन्यन्त साक्षादिव धनञ्जयम् ॥१५॥ तस्य लाघवमार्गस्थमलातसदृशप्रभम् दिशः पर्यपतच्चापं गाण्डीवमिव घोपवत् ॥ १६ ॥ तमासाद्य महावेगैर्भाप्मो नवभिराशुगैः विव्याध समरे तूर्णमार्जुनि परवीरहा ॥ १७॥ ध्वजं चाऽस्य त्रिभिर्भल्लश्चिच्छेद परमौजसः । सारथिं च त्रिभिर्याणराजघान यतव्रतः ॥ १८ ॥ तथैव कृतवर्मा च कृपः शल्यश्च मारिपः विध्वा नाऽकम्पयत्काणि मैनाकमिव पर्वतम् ॥ १९ ॥ स तेः परिवृतः शूरो धार्तराष्ट्रमहारथैः ववर्य शरवर्षाणि काणिः पञ्च रथान्प्रति ॥ २० ॥ इसके पश्रात् एक तीक्ष्ण बाण से भीष्म की सुवर्ण- ने समझा कि वीर अभिमन्यु अपने पिता अर्जुन के ही मण्डित घजा काट डाली ॥११॥ फिर क्रुद्ध होकर समान बलवान् और पराक्रमी हैं । अभिमन्यु अग्नि के राब प्रकार के आचरणों को काटनेवाले, सनतपर्व, ममान दुईप और तेजस्वी देरा पड़ने लगे। उमममय एक माल बाण मे उन्होंने दुर्मुग्प के सारथी का मिर महावीर मोम ने येग और स्फत्ति के माय वीर अभि- और अन्य तीक्ष्ण भल्ल बाण से कृपाचार्य का सुपर्ण- मन्यु पर आक्रमण किया। ना बाण उनके नगर गण्डित धनुष काट डाला। ये गमरभूमि में नृयमा में मारे, तीन भल बाणों से पजा काट डाली और कर रहे थे । अग्ने तीक्ष्ण बाणो से शत्रुओं के छोडे । तीन ही बाणों में उनके गारया को जर्जर कर दिया दए बागो को छिन्न-भिन्न करके ये आने गाण्डीय ॥१५॥१८॥ इमी ममय फूतरी, याचार्य और मान्य अन्य श्रेष्ठ धना का प्रपशा को बजाते हुए स्फतिं भी अभिमन्यु के उपर निरन्नर गायों की वर्षा करने का साथ निरने लगे। उनके हाथ की रनि देशकर गो; किन्तु गीर अभिमन्यु ननिक भी ग्विस्ति नही देवता भी मन्तुष्ट हुए ॥१२॥१४॥ उनका लक्ष्य कभी हुए। उसके पधात् अर्जुन के पुत्र ने, दुर्योधन पा १२०० ] म हा भारत [ भीष्मपव : ततस्तेषां सहस्राणि संवार्य शरवृष्टिभिः ननाद बलवान्कार्णिीष्माय विस्तृजशरान् ॥ २१ ॥ तत्राऽस्य सुमहद्राजन्वाह्वोबलमदृश्यत यतमानस्य समरे भीष्ममर्दयतः शरैः ॥ २२ ॥ पराक्रान्तस्य तस्यैव भीष्मोऽपि प्राहिणोच्छरान् । स तांश्चिच्छेद समरे भीष्मचापच्युताशरान् ॥ २३ ॥ ततो ध्वजममोघेषु प्मस्य नवभिः शरैः चिच्छेद समरे वीरस्तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ॥ २४ ॥ स राजतो महास्कन्धस्तालो हेमविभूषितः । सौभद्रविशिखैश्छिन्नः पपात भुवि भारत तं तु सौभद्रविशिखैः पातितं भरतर्षभ दृष्ट्वा भीमो ननादोच्चैः सौभद्रमभिहर्पयन् ॥ २६ ॥ अथ भीष्मो महास्त्राणि दिव्यानि सुबहूनि च । प्रादुश्चक्रे महारौद्रे रणे तस्मिन्महाबलः ॥२७॥ ततः शरसहस्त्रेण सौभद्रं प्रपितामहः अवाकिरदमेयात्मा तदद्भुतमिवाऽऽभवत् ॥ २८॥ ततो दश महेष्वासाः पाण्डवानां महारथाः । रक्षार्थमभ्यधावन्त सौभद्रं त्वरिता रथैः ॥ २९॥ विराटः सह पुत्रेण धृष्टद्युम्नश्च पार्पतः भीमश्च केकयाश्चैव सात्यकिश्च विशाम्पते ॥३०॥ यारी के ऊपर वाण बरमाना और उनके चलाये हुए । पजा को भी काट डाग। यह देगकर कारगना अप-सी यो नष्ट करना आरम्भ किया। अभिमन्यु के लोग निल्लाने लगे। महागार भीम का रजतमय भीम के ऊपर अगाय बाग यग्गाकर मिहनाद करने मणिभूषित नाभनयुक्त ग्य अभिमन्यु के बाणों में रंग ॥११॥२१॥ उग गुदभूमि में बागों के मारे । दुरड़े-टुकड़े होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ।।२२।२५।। माम पादित हो गये । इम दृषर कर्म में अभिमन्यु गुरप्रिय उमाही भीममेन यह दंगकर, अभिमन्युको या अगागरण यादय प्रकट हुआ | महागीर भाम उमाहित करने में रिए, नामसर मिनाद यग्न अभिमन्यु पं. अन परामम को देगार उन पर गंगे। नर मागक्रमी भान ने मुममि में अनेरा मशरफे माग । अभिमन्यु ने ये गरमाग प्रभार दिय महा-अपयुत माग याग अमिमा माट नय मागे नाममा के प्रसार मान या या अन यार्प और : । www.
अ याय ४७ ] म हा भारत 722) [ ४२०१ - - तेषां जवेनाऽऽपततां भीष्मः शान्तनबो रणे । पाञ्चाल्यं त्रिभिरानछत्सात्यकि नवभिः शरै ॥ ३१ ॥ पूर्णायतविस्तृष्टेन क्षुरेण निशितेन च ध्वजमेकेन चिच्छेद भीमसेनस्य पत्रिणा ॥ ३२ ॥ जाम्बनदमयः श्रीमान्केसरी स नरोत्तम पपात भीमसेनस्य भीपमेण मथितो रथात् ॥३३॥ ततो भीमस्त्रिभिर्विध्वा भीष्मं शान्तनवं रणे । कृपमेकेन विव्याध कृतवर्माणमष्टभिः ॥ ३४ ॥ प्रगृहीताग्रहस्तेन वैराटिरपि दन्तिना अभ्यद्रवत राजानं भद्राधिपतिमुत्तरः ॥ ३५ ॥ तस्य वारणराजस्य जवेनाऽऽपततो रथे शल्यो निवारयामास वेगमप्रतिमं शरैः ॥ ३६ ॥ तस्य क्रुद्धः स नागेन्द्रो वृहतः साधुवाहिनः । पदा युगमधिष्ठाय जघान चतुरो यान् ॥ ३७॥ स हताश्वे रथे तिष्ठन्मद्राधिपतिरायसीम् उत्तरान्तकरी शक्ति चिक्षेप भुजगोपमाम् ॥३८॥ तया भिन्नतनुत्राणः प्रविश्य विपुल तमः स पपात गजस्कन्धात्प्रमुक्तांकुशतोमरः ॥ ३९ ॥ स्फत्ति दग्वार सब गगा को बडा आश्चय हुआ ॥२६॥ वर्मा को घायट किया ॥३१॥३४॥ उसी समय हाथी २८॥ उस समय अभिमयु का रक्षा के लिए पाण्डव पर सपार महावीर उत्तर कुमार महागीर मद्रराज शल्य पक्ष के दस महामनुर्द्धर-पुत्र सहित राजा विराट, क स मुख आये। महापराक्रमी शल्य उत्तर कुमार पदन दन धृष्टद्युम्न, भामसन क्य, आर सा यकि के हाथी क ग को रोकने के लिए आग बढ़ आर आदि-पडे वग स वहा पहुच गय ॥२९॥३०॥ भाष्म चाण बरसाने लगे । उत्तर कुमार के हाथा ने कुपित ने उन लोगो का शाघ्रता के साथ आत देखकर धृष्टद्युम्न होकर शल्य के रथ पर पाँओं रग्वार पाँओं से उसके के ऊपर तान वाण आर सायनिक ऊपर नत्र वाण चारा उत्तम घोडा को मार डाग॥३५/३७॥ तर गर ण्य छुरे के समान ताण वाण मे भामसेन | पिना घोड़ों के रथ पर उठे हुए पीर गल्य ने विपेटे सब की सुषण-दण्डयुक्त सिंह विहशोभित घजा काटकर के समान भयानर लाहे का शक्ति उत्तर के ऊपर गिरा दी । यह देखकर महापराक्रमी भीम नोध स चगई। उससे उत्तर का करच हट गया, उनकी अपार हो गय । उहाने भी तान बाणों से भाप्मको ऑगों के आगे अँधेरा छा गया आर अनुश तोमर एक वाण से कृपाचार्य को ओर .. आदि गारि... दशा म उत्तर ४२०२ ] म हा भा र त [ भीपापर्य - उत्तरं वै हतं दृष्ट्वा असिमादाय शल्योऽपि अवप्लुत्य रथोत्तमात् । तस्य वारणराजस्य चिच्छेदाऽथ महाकरम् ॥४०॥ भिन्नमर्मा शरशतैश्छिन्नहस्तः स वारणः भीममार्तस्वरं कृत्वा पपात च ममार च ॥४१॥ एतदीशकं कृत्वा मद्रराजो नराधिप आरुरोह रथं तूर्ण भास्वरं कृतवर्मणः ॥४२॥ वैराटिभ्रातरं तदा। कृतवर्मणा च सहितं दृष्ट्वा शल्यमवस्थितम् ॥ ४३ ॥ श्वेतः क्रोधात्प्रजज्वाल हविपा हव्यवाडिव स विस्फार्य महच्चापं शकचापोपमं वली ॥४४॥ अभ्यधावजिघांसन्वै शल्यं मद्राधिपं वली महता रथवंशेन समन्तात्परिवारितः ॥४५॥ मुअन्वाणमयं वर्ष प्रायाच्छल्यरथं प्रति तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य मत्तवारणविक्रमम् ॥ ४६ ॥ तावकानां रथाः सप्त समन्तात्पर्यवारयन् मद्रराजमभीप्सन्तो मृत्योर्दष्ट्रान्तरं गतम् ॥४७॥ वृहद्बलश्च कौसल्यो जयत्सेनश्च मागधः तथा रुक्मरथो राजाल्यपुत्रः प्रतापवान् ॥४८॥ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजश्च सुदक्षिणः । वृहत्क्षत्रस्य दायादः सैन्धवश्च जयद्रथः ॥४९॥ कुमार हाथी से नाचे गिरकर मर गये। अब शल्य ग्वन के समान, कोच से जल उठे | वली श्वेत इन्द्र-धनुप ऐकर रथ से उतर पडे । उन्होंने उम हायी की मूंड के ममान अपने धनुप को चढ़ाकर बाणों की वर्षा काट डाली। मर्मस्थल में सेंकडो पण लगने आर करते हुए शल्य को मारने के लिए उनकी ओर दाड़े सूंड कट जाने से भयानक आर्तनाद करता हुआ यह ॥४२॥४६॥ मदोन्मत्त हाथी के समान पराक्रमी श्वेत गजराज गिरकर मर गया ॥३८॥४१॥ शल्य इस तरह को आते देखकर, मृत्यु के मुख में पड़े हुए शल्य की अपना कार्य करके गीघ्रता के साथ कृतवर्मा के सुवर्ण- रक्षा करने के लिए, आपके पक्ष के सात पीर रथी- मय रथ पर सवार हो गये । विराट के दूसरे पुत्र | बृहद्बल, जयसेन, शल्य का पुत्र रक्मरथ, विन्द, श्वेत अपने भाई उत्तर की मृत्यु ओर कृतवर्मा के रय अनुपिन्द, जयद्रय और सुदक्षिण-- बडे-बड़े धनुष पर शल्य को स्थित देवकर, आहुनि पड़ने से अग्नि चढ़ाकर आगे बढ़े ॥४७॥४९॥ उनके धनुप धनघटा -- PM अध्याय ४७ ] म हा भा र त ४२०३ - । : । नानावर्णविचित्राणि धनपि च महात्मनाम् विस्फारितानि दृश्यन्ते तोयदेष्विव विद्युतः ॥ ५० ॥ ते तु वाणमयं वर्ष श्वेतमूर्धन्यपातयन् निदाघान्तेऽनिलोद्धृता मेघा इव नगे जलम् ॥ ५१ ॥ ततः क्रुद्धो महेष्वासः सप्तभल्लैः सुतेजनैः धनूंपि तेपामाच्छिद्य नमर्द पृतनापतिः ॥ ५२ ॥ निकृत्तान्येव तानि स्म समदृश्यन्त भारत ततस्ते तु निमेपार्धात्प्रत्यपद्यन्धपि च ॥ ५३॥ सप्त चैव पृपत्कांश्च श्वेतस्योपर्यपातयन् ततः पुनरमेयात्मा भल्लैः सप्तभिराशुगैः निचकर्त महाबाहुस्तेषां चापानि धन्विनाम् ते निकृत्तमहाचापास्त्वरमाणा महारथाः रथशक्तीः परामृश्य विनेदुभैरवान्रवान् ॥ ५५॥ अन्वयुर्भरतश्रेष्ठ सप्त श्वेतरथं प्रति ततस्ता ज्वलिताः सप्त महेन्द्राशनिनिःस्वनाः ॥ ५६ ।। अप्राप्ताः सप्तभिर्भल्लैश्चिच्छेद परमास्त्रवित् ततः समादाय शरं सर्वकायविदारणम् ॥ ५७॥ प्राहिणोद्भरतश्रेष्ठ श्वेतो रुक्मरथं प्रति तस्य देहे निपतितो वाणो प्रजातिगो महान् ॥ ५८ ॥ ततो स्वमरथो राजन्सायकेन दृढाहतः निषसाद रथोपस्थे कश्मलं चाऽविशन्महत् ॥ ५९ ॥ के बीच बिजली के समान चमकने लगे। गर्मी के काट डाला । तब क्रोव से काँपते हुए उन वीरों ने अनन्तर वायु से बल पकडे हुए बादल जेसे पर्वत के सिंहनाद करके उल्का-सदृश, इन्द्र के वज्र के तुल्य ऊपर जल की वर्षा करते हैं, वैसे ही वे वीर श्वेत के चमकीली सात शक्तियाँ एक साथ उठाकर स्फत्ति के ऊपर वाण बरसाने लगे । महावीर श्वेत ने क्रोध करके साथ श्वेत के ऊपर फेकी । श्वेत ने तीक्ष्ण सात बाणों तीक्ष्ण सात भल्ल वाणों से सातो के धनुष काट डाले से मध्य में ही उन शक्तियों को काट गिराया॥५३॥५६ ॥५०॥५२॥उन वीरों ने स्मृति के साथ फिर ओर धनुष इसके पश्चात् सनके शरीरो को भिन्न करने को हाथ में लेकर श्वेत के सात बाण मारे । किन्तु श्वेत रखनेवाला एक श्रेष्ठ अमोघ वाण लेकर श्वेत ने र ने फिर भी स्फूर्ति के साथ सात भल्ल वाणों से उन्हे । - रथ के ऊपर चलाया । वह वज्रतुल्य वाण जोर से ४२०४ ] म हा भारत [ मीमपवं । तं विसंज्ञं विमनसं त्वरमाणस्तु सारथिः अपोवाह न सम्भ्रान्तः सर्वलोकस्य पश्यतः ॥६॥ ततोऽन्यान्पट् समादाय श्वेतो हेमविभूषितान् । तेपां षण्णां महावाहुजशीर्पाण्यपातयत् ॥६॥ हयांश्च तेपां निर्भिद्य सारथींश्च परन्तप शरैश्चैतान्समाकीर्य प्रायाच्छल्यरथं प्रति ॥ ६२ ॥ ततो हलहलाशब्दस्तव सैन्येषु भारत दृष्ट्वा सेनापति तूर्णं यान्तं शल्यरथं प्रति ततो भीष्मं पुरस्कृत्य तव पुत्रो महाबलः वृतस्तु सर्वसैन्येन प्रायाच्छ्वेतरथं प्रति ॥ ६४॥ मृत्योरास्यमनुप्राप्तं मद्रराजममोचयत् ततो युद्धं समभवत्तुमुलं लोमहर्पणम् ॥६५॥ तावकानां परेपां च व्यतिपक्करथद्विपम् सौभद्रे भीमसेने च सात्यकौ च महारथे ॥६६॥ कैकेये च विराटे च धृष्टद्युम्ने च पार्पते एतेषु नरसिंहेपु चेदिमत्स्येषु चैव ह ववर्प शरवर्षाणि कुरुवृद्धः पितामहः ॥६७॥ इति श्री महाभारत भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि श्वेतयुद्धे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥ आफर लगा और रुक्मरय अयन्न व्यथित और मूटिन । पितामह के माय. मब सेना लेकर श्रेन को रोकने के होकर ग्य पर गिर पड़े। स्थी को अचेन देसकर । लिए गये। इस प्रकार आपके पुन ने जाकर, भीष्म का मारशी सब लोगों के मामने रथ को युद्धभूमि मे हटा महायता मे, मृत्यु-मुग में पड़े हुए महराज गन्य को ले गया ॥५.७६०॥ श्वन ने फिर और सुवर्ण-मण्डिन । साहम दिया। इसके पश्चात् अयन्न भयानक युद्ध नाण छः बाण चलाकर गेप छः रचियों को घना होने लगा। हाथी और रथ एक दूसरे से भिड़कर बाट दाटी । इस प्रकार उनके घोड़ा और माथियो । गेमान उपन्न करने वाला युद्ध करने लगे। आप को पायद नया उन्हें भी याणवी मे बिहट करके और पाण्डया की मैना प्राणों का मोह छोडकर गुम मसागर अंत मदगजन्य कमानने आये। हे महा करने न्दगी । कुम्-पितामह भी न उम गमय पति के गजमेनानि न जा बाल्य के ग्य के मामले माग अभिमन्यु, भीमगन, महारीमायकिकोग, पीन ना आय मेना में बहा कोदाल होने लगा गिट, प्रद्युम्न और टि-गम्य आदि देगी पी मना ॥३१॥३॥ आरके महारपुर दुर्गोग्न, माम-केर निग्ला र याग वामान मंग॥६४/६७|| भागारमा मना मग अध्याय ममाम अ॥ १७॥ 1 - . ४८) 1 म हा भारत [ ४२०५ । अथ अष्टचत्वारिंशोऽध्याय ॥ १८ ॥ धृतराष्ट्र उवाच – एवं श्वेते महेष्वासे प्राप्ते शल्यरथं प्रति कुरवः पाण्डवेयाश्च किमकुर्वत सञ्जय भीष्मः शान्तनवः किंवा तन्ममाऽऽचक्ष्व पृच्छतः। सञ्जय उगाच - राजशतसहस्राणि ततः क्षत्रियपुङ्गवाः श्वेतं सेनापति शूरं पुरस्कृत्य महारथाः राज्ञो वलं दर्शयन्तस्तव पुत्रस्य भारत शिखण्डिनं पुरस्कृत्य त्रातुमैच्छन्महारथाः अभ्यवर्तन्त भीष्मस्य रथं हेमपरिष्कृतम् जिघांसन्तं युधां श्रेष्ठं तदाऽऽसीत्तुमुलं महत् । तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि महावैशसमच्युत तावकानां परेषां च यथा युद्धमवर्तत तत्राऽकरोद्रथोपस्थाञ्शून्याञ्शान्तनवो बहून् ॥ ६ ॥ तत्राऽद्भुतं महच्चके शरैरार्छद्रथोत्तमान् समावृणोच्छरैरर्कमर्कतुल्यप्रतापवान् नुदन्समन्तात्समरे रविरुधन्यथा तमः तेनाऽऽजौ प्रेषिता राजशराः शतसहस्रशः ॥ ८ ॥ क्षत्रियान्तकराः संख्ये महावेगा महाबलाः शिरांसि पातयामासुर्वीराणां शतशो रणे अड़तालीसमाँ अध्याय ॥ ४८ ।। धृतराष्ट्र ने पूछा-हे सञ्जय । धनुरश्रेष्ठ श्वेत भीष्म के सुवर्णमण्डित रथ के पास पहुंचे ॥३४॥ हे कुमार जव कुपित होकर शल्य के रथ की ओर चले तब राजेन्द्र | उस समय आपके ओर शत्रुपक्ष के सैनिकों भीष्म पितामह आर कोरवो या पाण्डवों ने क्या किया ? मे परस्पर महाभयानक युद्ध हुआ ओर बहुत से लोग ॥१२॥ सञ्जय ने कहा-हे महाराज ! हजारों क्षत्रिय हत तथा आहत हुए । सुनिए, यह सत्र वृत्तान्त मैं श्रेष्ठ वीरगण, सेनापति श्वेत को आगे करके, आपके विस्तार के साथ कहता हूँ। मूर्य के समान तेजस्वी बीर पुत्र राजा दुर्योधन को अपना बल और पराक्रम | भीष्म ने निरन्तर बाण-वर्षा के द्वारा वीरों के सिर दिखाने लगे। श्रेष्ठ योद्धा भीष्म जब पाण्डवसेना का काट-काटकर बहुत से रथों के आसनों को शून्य कर सहार करने लगे तब उनसे अपनी रक्षा करने के दिया । उनके वाणों ने सूर्यमण्डल तक को भी आ- लिए, शिखण्डी को आगे करके, वे सत्र महारथी च्छादित कर दिया। मूर्यदेव उदय होकर जैसे अन्ध- ४२०६ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व । - गजान्कण्टकसन्नाहान्वफ्रेणेव शिलोच्चयान् । रथा रथेपु संसक्ता व्यदृश्यन्त विशाम्पते ॥१०॥ एके रथं पर्यवहंस्तुरगाः सतुरङ्गमम् युवानं निहतं वीरं लम्बमानं सकार्मुकम् ॥ ११ ॥ उदीर्णाश्च हया राजन्वहन्तस्तत्र तत्र ह वद्धखड्गनिपङ्गाश्च विध्वस्तशिरसो हताः ॥ १२ ॥ शतशः पतिता भूमौ वीरशय्यासु शेरते परस्परेण धावन्तः पतिताः पुनरुत्थिताः ॥ १३ ॥ उत्थाय च प्रधावन्तो द्वन्द्वयुद्धमवानुवन् पीडिताः पुनरन्योन्यं लुठन्तो रणमूर्धनि ॥ १४ ॥ सचापाः सनिपगाश्च जातरूपपरिष्कृताः विस्तब्धहतवीराश्च शतशः परिपीडिताः ॥१५॥ तेन तेनाऽभ्यधावन्त विसृजन्तश्च भारत मत्तो गजः पर्यवतद्धयांश्च हतसादिनः सरथा रथिनश्चापि विमृद्गन्तः समन्ततः स्यन्दनादपतत्कश्चिन्निहताऽन्येन सायकैः ॥१७॥ हतसारथिरप्युच्चैः पपात काष्ठबद्रथः युध्यमानस्य संग्रामे व्यूढे रजति चोत्थिते ॥१८॥ कार को नष्ट करते हैं, वैसे ही वीर भीष्म भी युद्धभूमि | रहे थे । खड्ग, दाल और तरकस बाँधे हुए वीरो के में असंख्य वीरो को नष्ट करने लगे । हे महाराज ! सिर कट गये थे, और उन्हें लादे हुए घोड़े इधर-उधर भीष्म के चलाये हुए सैकड़ों-हज़ारो क्षत्रियों का नाश भागे जा रहे थे। सैकड़ो योद्धा वीरशय्या पर मरे पड़े करनेवाले बाण बेग के साथ जा-जाकर महापराक्रमी , थे। अनेक वीर पुरुष एक दूसरे के पीछे दोड़ते, योद्धाओं के मस्तक काटने लगे । भीष्म के बाणों से गिर पड़ते, फिर उठते और पृथ्वी पर लोट जाते थे । सिर कट जाने पर महापराक्रमी रथी लोग रथो पर द्वन्द्वयुद्ध में परस्पर प्रहार से व्यथित वीर आर्त शब्द से गिरने लगे ॥५॥९॥ उस युद्धभूमि में काँटेदार कर रहे थे । मदोन्मत्त हाथी अपने पाओ से घोड़ो करच पहने हुए हाथी, बज्र से फटे पर्वता के समान, । और उनके सवारों को रौंदते हुए चले जा रहे थे। बाणों से छिन्न-भिन्न होकर गिरते देख पडते थे। रयो पर बैठे वीर पुरुष चारों ओर के योद्धाओं को रयों के ऊपर रय टूट-टूटकर गिर रहे थे। बहुत से कुचलते और काटते हुए चले जाते थे। दूसरे के वाण रयों को घोड़े खींचते चले जाते थे और उनमें, धनुष से मरकर कोई रथ पर से पृथ्वी पर गिर रहा था। हाथ में लिये, मरे हुए नवयुवक वीरों के शरीर लटक सारयी के मर जाने पर छिन्न-भिन्न अनेक बड़े-बड़े ।
अध्याय ४८ ] म हा भारत [ ४.२०७ । धनुःकूजितविज्ञानं तत्राऽऽसीत्प्रतियुद्धयतः गावस्पर्शेन योधानां व्यज्ञास्त परिपन्थिनम् ॥ १९ ॥ युद्धयमानं शरै राजनिसञ्जिनीध्वजिनीरवात् । अन्योन्यं वीरसंशब्दो नाऽश्रूयत भटैः कृतः ॥ २० ॥ शब्दायमाने संग्रामे पटहे कर्णदारािण युध्यमानस्य संग्रामे कुर्वतः पौरुपं खकम् ॥ २१ ॥ नाऽश्रोपं नामगोत्राणि कीर्तनं च परस्परम् । भीष्मचापच्युतैर्वाणैरार्तानां युद्धयतां मृधे ॥ २२॥ परस्परेषां वीराणां मनांसि समकम्पयन् तस्मिन्नत्याकुले युद्धे दारुणे लोमहर्पणे ॥ २३ ॥ पिता पुत्रं च समरे नाऽभिजानाति कश्चन चके भन्ने युगे च्छिन्ने एकधुर्ये हये हतः ॥ २४॥ आक्षिप्तः स्यन्दनाद्वीरः ससारथिरजिह्मगैः एवं च समरे सर्वे वीराश्च विरथीकृताः ॥२५॥ तेन तेन स्म दृश्यन्ते धावमानाः समन्ततः गजो हतः शिरश्छिन्नं मर्म भिन्नं हयो हतः अहतः कोऽपि नैवाऽऽसीद्भीष्मे निघ्नति शात्रवान्। श्वेतः कुरूणामकरोत्क्षयं तस्मिन्महाहवे ॥ २७॥ रथ गिरकर घायलों को चूर-चूर कर डालतेथे ॥१०॥ फटे जा रहे थे । द्वन्द्वयुद्ध करते दुए वीर अपना-अपना १८॥ हे महाराज ! उस समय इतनी धूल उड़ी कि पराक्रम दिखाते समय जो अपने नाम-गोन का उच्चा- युद्धभूमि मे अँधेरा छा गया। परस्पर युद्ध करते हुए रण करते थे या कुछ कहते सुनते थे सो कुछ भी नहीं लोग केवल धनुप का शब्द सुनकर यह समझते थे | मुन पड़ता था । पितामह भीष्म के धनुष से छूटे हुए कि उनसे युद्ध करनेवाला कहां पर स्थित है; उन्हे | बाणों के प्रहार से आर्त, परस्पर युद्ध करनेवाले, वीर युद्ध करनेवाले का शरीर नहीं देख पड़ता था। शरीर उस अत्यन्त दारुण युद्ध में विचलित होउठे।।२१।२३॥ का स्पर्श करने पर ही ज्ञात होता था कि यह दूसरा पिता और पुत्र भी परस्पर न पहचानने के कारण योद्धा है । कोई किसी को नेत्रों से नहीं देख पाता था। आपस में ही युद्ध करने लगे । बहुत से रथों की यह सेना में इतना कोलाहल हो रहा था कि परस्पर युद्ध व्यवस्था थी कि उनके पहिये कट गये, जुआ टूट गया करनेवाले वीरों को अपने प्रतिद्वन्द्वी का सिंहनाद भी और एक धुरा भी कट गया। भीष्म के बाणों से मर- नहीं सुन पड़ता था ॥१९॥२०॥ संग्रामभूमि में घोर मरकर सारथी और रथी रथों पर से गिर रहे थे। इस कोलाहल मचा हुआ था, नगाड़ों के शब्द से कान प्रकार प्रायः सभी वीरों के रथ टूट-फट गये। वे । 14 ४२०८ म हा भा र त [ भीष्मपर्व - । । राजपुत्रान्रथोदारानवधीच्छतसङ्घशः चिच्छेद रथिनां वाणैः शिरसि भरतर्षभ ॥ २८॥ साङ्गदा वाहवश्चेव धनपि च समन्ततः रथेषां रथचक्राणि तूणीराणि युगानि च छत्राणि च महाणि पताकाश्च विशाम्पते हयोधाश्च रथौघाश्च नरौघाश्चैव भारत वारणाः शतशश्चैव हताः श्वेतेन भारत वयं श्वेतभयागीता विहाय रथसत्तमम् ॥ ३१ ॥ अपयातास्तथा पश्चाद्विभुं पश्याम धृष्णवः शरपातमतिक्रम्य कुरवः कुरुनन्दन ॥ ३२ ॥ भीमं शान्तनवं युद्धे स्थिताः पश्याम सर्वशः। अदीनो दीनसमये भीष्मोऽस्माकं महाहवे ॥ ३३ ॥ एकस्तस्थौ नरव्याघ्रो गिरिमारिवाऽचलः आददान इव प्राणान्सविता शिशिरात्यये ॥ ३४ ॥ गभस्तिभिरिवाऽऽदित्यस्तस्थौ शरमरीचिमान् । स मुमोच महेष्वासः शरसङ्घाननेकशः ॥३५॥ निन्नन्नमित्रान्समरे बज्रपाणिरिवाऽसुरान् ते बध्यमाना भीष्मेण प्रजहुस्तं महाबलम् ॥३६ ॥ इधर-उधर दौडकर पैदल ही युद्ध करते देख पड़ते थे। ३०॥ हे महाराज ! हमारे पक्ष के वीर उस समय कहीं हाथी मर गया, कही मिर कट गया, कहीं छोड़ा श्वेत के पराक्रम से बहुत ही भयभीत होकर रथ आदि गिर गया। बाण के प्रहार से किमी का मर्मस्थल कट वाहनों को छोड़कर युद्धभूमि से भागने लगे। कुरु गया । भीष्म पितामह शत्रुपक्ष की सेना का संहार | सेना के सब वीर, वाणों की मार बाहर आकर, कर रहे थे । कोई भी ऐसा नहीं रह गया जिसके भीष्म और श्वेत का युद्ध देखने लगे । उस सङ्कटसमय शरीर में घाव न लगा हो ॥२३॥२७॥ उधर महावली में भी हम लोगो ने देखा कि धीर धीर पितामह भीष्प श्वेन भी कौरवपक्ष के हजारों राजाओं और राजकुमारो सुमेरु पर्यन की तरह अटल होकर अपने स्थान पर का संहार कर रहे थे । वे भी अपने बाणों के प्रहार | स्थित हैं । सूर्यदेव जैसे गर्मियों में अपनी किरणों से से रथ-सवारों के मस्तक, अगद-विभूषित हाथ, धनुष, पृथ्वी का रस ग्वींचते हुए सन्तप्त हैं, वैमे ही भाप्प तरकम, रथ, रयों के पहिये, छत्र और घजाएँ काटने अपने तीक्ष्ण बाणों से श सैनिकों के प्राण सींचते लगे। उनके बाणों के प्रहार से हज़ारो हाथी, घोड़े हुए युद्धभूमि में विराज रहे थे ॥३१॥३५॥ वज्रपाणि और मनुष्य मर-मरसर पृथ्वी पर गिर रहे थे ॥२७॥ इन्द्र ने जैम दत्यमेना का नाम किया था, मे ही , अ... ४८] म हा मारत । ४२०९ खयूथादिव ते यूथान्मुक्तं भूमिपु दारुणम् तमेवमुपलक्ष्यको हृष्टः पुष्टः परन्तप ॥३७॥ दुर्योधनप्रिये युक्तः पाण्डवान्परिशोचयन् जीवितं दुस्त्यजं त्यक्त्वा भयं च सुमहाहवे ॥ ३८ ॥ पातयामास सैन्यानि पाण्डवानां विशाम्पते । प्रहरन्तमनीकानि पिता देवव्रतस्तव ॥ ३९ ॥ दृष्ट्वा सेनापति भीष्मस्त्वरितः श्वेतमभ्ययात् । स भीष्म शरजालेन महता समवाकिरत् श्वेतं चापि तथा भीष्मः शरौघैः समवाकिरत् । तौ वृपाविव नर्दन्तौ मत्ताविव महाद्विपौ ॥४१॥ व्याघ्राविव सुसंरब्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः अरस्त्राणि संवार्य ततस्तौ पुरुपर्पभौ ॥ ४२ ॥ भीष्मः श्वेतश्च युयुधे परस्परवधैपिणौ एकाहा निर्दहेगीप्मः पाण्डवानामनीकिनीम् ॥४३॥ शरैः परमसंक्रुद्धो यदि श्वेतो न पालयेत् पितामहं ततो दृष्ट्वा श्वेतेन विमुखीकृतम् ॥४४॥ प्रहर्ष पाण्डवा जग्मुः पुत्रस्ते विमना भवत् । ततो दुर्योधनः क्रुद्धः पार्थिवैः परिवारितः ॥४५॥ महाधर्नुधर भीष्म असल्य वाण बरसाकर शत्रुपक्ष का साये । दो सॅॉड़ों की तरह गरजते हुए वे दोनों वीर सहार कर रहे थे। पाण्डवपक्ष की सेना भीष्म के दो मदोन्मत्त हाथियों के समान अथवा दो क्रुद्ध व्याघ्रों हाथों अपना नाश होते देख जर्जर होकर इधर-उधर | के तुल्य एक दूसरे पर प्रहार करने लगे॥३६॥४२॥ भागने लगी। भीष्म ने जब देखा कि पाण्डवसेना श्वेत एक दूसरे के वध की इच्छा से दोनो पुरुषश्रेष्ठ वीर को अकेले छोड़कर भागी चली जा रही है तब वे अस्त्र शस्त्र छोडते और दूसरे के अस्त्रो को रोकते थे। बहुत ही प्रसन्न हुए। दुर्योक्न का प्रिय करने के लिए हे महाराज ! यदि महाबली श्वेत पाण्डवसेना की रक्षा उद्यत, सुदृढ शरीर, आपके पिता देवव्रत भीष्म उस न करते तो अत्यन्त कुपित भीष्म पितामह एक ही समय जीवन का मोह छोडकर निर्भय होकर शीघ्रता दिन में सम्पूर्ण सेना को अपने बाणो से भस्म कर के साथ पाण्डवो की सेना का सहार करते हुए सेना डालते । हे महाराज ! अन्त को पराक्रमी श्वेत ने पति श्वेत के पास पहुँचे । कुरुसेना का संहार करते अपने युद्धकौशल से पितामह भीष्म को युद्ध से हटा हुए श्वेत भीष्म के ऊपर असंख्य वाणो की वर्षा करने | दिया ! भीम को शिथिल देखकर पाण्डव अत्यन्त लगे । भीष्म ने भी श्वेत के ऊपर असंख्य वाण बर प्रसन्न हुए । दुर्योधन को बड़ा खेद उत्पन्न हुआ। :
४२१० ] म हा भारत 1. 1 ससैन्यः पाण्डवानीकमभ्यद्रवत संयुगे दुर्मुखः कृतवर्मा च कृपः शल्यो विशाम्पतिः ॥ ४६ ॥ भीष्म जुगुपुरासाद्य तव पुत्रेण नोदिताः दृष्ट्वा तु पार्थिवैः सर्वैर्दुर्योधनपुरोगमैः ॥४७॥ पाण्डवानामनीकानि बध्यमानानि संयुगे श्वेतो गाङ्गेयमुत्सृज्य तव पुत्रस्य वाहिनीम् ॥४८॥ नाशयामास वेगेन वायुर्वृक्षानिवौजसा द्रावयित्वा चमू राजन्यैराटिः क्रोधमूछितः ॥ ४९ ॥ आपतत्सहसा भूयो यत्र भीष्मो व्यवस्थितः । तौ तत्रोपगतौ राजशरदीप्तौ महाबलौ ॥ ५० ॥ अयुध्येतां महात्मानौ यथोभौ वृत्रवासवौ अन्योन्यं तु महाराज परस्परवधैपिणौ ॥ ५१ ॥ निगृह्य कार्मुकं श्वेतो भीष्मं विव्याध सप्तभिः । पराक्रमं ततस्तस्य पराक्रम्य पराक्रमी ॥ ५२॥ तरसा वारयामास भत्तो मत्तमिव द्विपम् श्वेतः शान्तनवं भूयः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥ ५३॥ विव्याध पञ्चविंशत्या तदद्भुतमिवाऽऽभवत् तं प्रत्यविध्यद्दशभिर्भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥ ५४॥ न्याकुन्द हो गये ॥४३॥४५॥ इसके पश्चात् महावीर आ गये उहाँ भीष्म पितामह थे। ये दोनों महापराक्रमी दुर्योधन क्रोध के आवेश में आकर, सेना और सत्र वीर वृत्रासुर और इन्द्र की तरह एक दूसरे को मारने राजाओं को साथ लेकर. पाण्डवसेना से युद्ध करने की इच्छा से एक दूसरे पर वाणी की वर्षा करते हुए के लिए आगे बढ़े। दुर्मुप, कृतरा, कृपाचार्य, गन्य घोर युद्ध करने लगे। श्वन ने धनुष हाथ में देकर आदि सन वीर आपके पुत्र की प्रेरणा मे जाकर भीष्म भीष्म के ऊपर मात बाण छोड़े। पराक्रमी भीषण ने की रक्षा करने लगे। दुर्योधन अदि राजाओं को युद्ध पराक्रम करक, मदोन्मत्त हाथी जैसे मदोन्मत्त हाथी में पाण्डव सेना का संहार करते देम्बकर परम पराक्रमी के पराक्रम को रोकना है, मे ही श्वन के उस पराक्रम श्वेन भीम को छोड़कर उन्हीं की ओर दौदे । प्रार को व्यर्थ कर दिया ॥५०॥५३॥ महावीर श्वेन ने फिर ऑपी जमे पेड़ों को गिरानी है यमे ही श्वेत ने कुछ पाम बाण भीम को मारकर अद्भुत कर्म कर दियाया। दोसर कारों की मेना का महार माग्ना आरम्भ भीम ने भी दम तीक्ष्ण वाण घेत को मारे । उन किया ॥४५॥४१॥ पिराट के पुत्र श्रेन हम प्रकार वाणी के लगने मे श्वेत तनिक भी व्यथित नहीं हुए दुर्योधन की मेना को भगाकर फिर एकाएक यहाँ पर और पर्वत की तरह अपर भार हो गई है ।
अध्याय ४८ ] म हा भारत [ ४२११ । स विद्धस्तेन वलवान्नाऽकम्पत यथाऽचलः वैराटिः समरे क्रुद्धो भृशमायम्य कार्मुकम् ॥ ५५ ॥ आजघान ततो भीष्मं श्वेतः क्षत्रियनन्दनः । सम्प्रहस्य ततः श्वेतः सृक्विणी परिसंलिहन् ॥५६॥ धनुश्चिच्छेद भीष्मस्य नवभिर्दशधा शरैः सन्धाय विशिखं चैव शरं लोमप्रवाहिनम् ॥ ५७॥ उन्ममाथ ततस्तालं ध्वजशीर्य महात्मनः केतुं निपतितं दृष्ट्वा भीष्मस्य तनयास्तव ॥ ५८॥ हतं भीष्मममन्यन्त श्वेतस्य वशमागतम् पाण्डवाश्चाऽपि संहृष्टा दध्मुः शङ्खान्मुदायुताः॥ ५९ ॥ भीष्मस्य पतितं केतुं दृष्ट्वा तालं महात्मनः ततो दुर्योधनः क्रोधात्स्वमनीकमनोदयत् ॥ ६०॥ यत्ता भीष्म परीप्सध्वं रक्षमाणाः समन्ततः मा नः प्रपश्यमानानां श्वेतान्मृत्युमवाप्स्यति ॥ ६१ ॥ भीष्मः : शान्तनवः शूरस्तथा सत्यं ब्रवीमि वः । राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा त्वरमाणा महारथाः ॥ ६२॥ वलेन चतुरङ्गेण गाङ्गेयमन्यपालयन् वाहीकः कृतवर्मा च शलः शल्यश्च भारत ॥ ६३ ॥ जलसन्धो विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः त्वरमाणास्त्वराकाले परिवार्य समन्ततः उन्होने धनुप चढ़ाकर फिर भीष्म को बहुत मे बाण | दुर्योधन ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपने सेनापतिओं से मारे । क्रोध के मारे ओंठ चाटते हुए सेनापति श्वेत ने कहा---तुम लोग पत्नपूर्वक चारों ओर से पितामह हँसकर नव वाणों से भीम के धनुष के दस खण्ड की रक्षा करो। हम लोगो के देखते हुए शूर पितामह कर डाले ॥५३॥५६॥ इसके पश्चात् एक तीक्ष्ण बाण भीष्म श्वेत के हाथों नहीं मारे जा सकते, यह मैं लेकर श्वेत ने भीष्म के रथ की तालचिह्न-युक्त धजा तुमसे सत्य कहता हूँ ॥५७।६२॥ राजा के ये वचन काट गिराई । हे महाराज ! भीष्म के रथ की घजा सुनकर महारथी लोग स्फूर्ति के साथ भीष्म की रक्षा को कटकर गिरते देखते ही आपके पुत्रो न समझा करने लगे। चतुरगिणी सेना साथ में लिये हुए वाहीक, कि श्वेत के वश में होकर अब पितामह मारे गये । | कृतवर्मा, शल, शल्य, जलसन्ध, विकर्ण, चित्रसेन आर पाण्डर लोग भी प्रसन्न होकर शङ्ख बजाने लगे । तर निविंशति आदि महारथी चारों ओर से भीम की रक्षा ४२१२ ] म हा भारत [भामपय । । शस्त्रवृष्टिं सुतुमुलां श्वेतस्योपर्यपातयन् तान्क्रुद्धो निशितैर्वाणैस्त्वरमाणो महारथः ॥६५॥ अवारयदमेयात्मा दर्शयन्पाणिलाघवम् स निवार्य तु तान्सन्केिसरी कुञ्जरानिव महता शरवर्षेण भीष्मस्य धनुराच्छिनत् ततोऽन्यद्धनुरादाय भीष्मः शान्तनयो युधि ॥६७ ॥ श्वतं विव्याध राजेन्द्र कङ्कपत्रैः शितैः शरैः ततः सेनापतिः क्रुद्धो भीष्मं बहुभिरायसैः ॥६८॥ विव्याध समरे राजन्सर्वलोकस्य पश्यतः ततः प्रव्यथितो राजा भीष्मं दृष्ट्वा निवारितम् ॥ ६९ ॥ प्रवीरं सर्वलोकस्य श्वेतेन युधि वै तदा निष्ठानकश्च सुमहांस्तव सैन्यस्य चाऽभवत् ॥७॥ तं वीरं वारितं दृष्ट्वा श्वेतेन शरविक्षतम् हतं श्वेतेन मन्यन्ते श्वेतस्य वशमागतम् ततः क्रोधवशं प्राप्तः पिता देवव्रतस्तव ध्वजमुन्मथितं दृष्ट्वा तांच सेनां निवारिताम् ॥७२॥ श्वेतं प्रति महाराज व्यसृजत्सायकान्वहून् तानावार्य रणे श्वेतो भीप्मस्य रथिनां वरः ॥७३॥ धनुश्चिच्छेद भल्लेन पुनरेव पितुस्तव उत्स्सृज्य कार्मुकं राजन्गाङ्गेयः क्रोधमृछितः ॥७४ ॥ करते हुए धन के ऊपर बाण यरसाने लगे। महा को घायल कर दिया । सेनापति श्वेन ने क्रुद्ध होकर पगममा श्वेन ने भी खुद होकर अपने हाथ की स्फत्ति सब लोगों के सामने लोहनिर्मित बहुत मे बाण भीम दिगात एए. तीक्ष्ण बाणों में उनके बाणों को रोक को मार । उम प्रहार मे भीम विल-मेत गरे । दिया । गित जमे हाथियों को पिमुप कर देता है, युद्ध में त्रिभुवनश्रेष्ठ वीर भीष्म की यह दशा देगार धीही बोरगर श्वेत ने बाण मारकर उन चारो को राजा दुर्योधन बहुत व्यथित हुए और आपके पक्ष यो हटा दिया । उन यांगे योग प्रकार हटा करके सना भी गानों गन्नाटे में आ गई। अंत के बाणोंगे घाने परत मे पाग बागाकर भाग निामह का वापर गया यह दशा देगकार गर गेसमम पिया धनुर याट दाग ॥६२६७॥ मां ने फत्ति मे . किमान अर धन को वश में आ गये और न उन्हें मग धनुरयर पदापित मीण याणा मन अभी मार टांगे ॥६७१७१॥ आरपिता मांग । ।
अध्याय ४८ ] म हा भा र त [ ४२१३ अन्यत्कार्मुकमादाय विपुलं बलवत्तरम् तत्र सन्धाय विपुलान्भल्लान्सप्त शिलाशितान् ॥ ७५ ॥ चतुर्भिश्च जघानाऽश्वाश्वेतस्य पृतनापतेः ध्वजं द्वाभ्यां तु चिच्छेद सप्तमेन च सारथः ॥ ७६ ॥ शिरश्चिच्छेद भल्लेन संक्रुद्धोऽलघुविक्रमः हताश्वसूतात्स रथादवप्लुत्य महावलः ॥७७॥ अमर्पवशमापन्नो व्याकुलः समपद्यत विरथं रथिनां श्रेष्ठं श्वेतं दृष्ट्वा पितामहः ॥ ७८॥ ताडयामास निशितैः शरसङ्घः समन्ततः स ताड्यमानः समरे भीष्मचापच्युतैः शरैः ॥ ७९ ॥ स्वरथे धनुरुत्सृज्य शक्तिं जग्राह काञ्चनीम् । ततः शक्ति रणे श्वेतो जग्राहोयां महाभयाम् ॥ ८॥ कालदण्डोपमा घोरां मृत्योर्जिह्वामिव श्वसन् । अब्रवीच तदा श्वेतो भीम शान्तनवं रणे ॥ ८१ ॥ तिष्ठेदानी सुसंरब्धः पश्य मां पुरुषो भव एवमुक्त्वा महेष्वासो भीमं युधि पराक्रमी ॥ ८॥ ततः शक्तिममेयात्मा चिक्षेप भुजगोपमाम् पाण्डवार्थे पराक्रान्तस्तवाऽनर्थ चिकीर्षुकः ॥ ८३ ॥ हाहाकारो महानासीत्पुत्राणां ते विशाम्पते दृष्ट्वा शक्तिं महाघोरां मृत्योर्दण्डसमप्रभाम् ॥८४॥ अपनी कटी हुई धजा और भागी हुई सेना देखकर घोडो के रथ से महारली श्वेत उतर पडे । वे क्रोध मोध के मारे अवीर हो उठे । उन्होंने संभलकर श्वत | के मारे व्याकुल हो गये । श्रेष्ठ रथी श्वेत को रथ-हीन के ऊपर बाण वरसाना आरम्भ किया। किन्तु श्रेष्ठ । देखकर भीष्म ने उनको अनेक तीक्ष्ण बाण मारे । रथी श्वेत ने उन बाणों को मार्ग में ही रोककर एक भल्ल महावीर श्वेत ने इस प्रकार भीष्म के वाणो से जर्जर वाण से भीष्म का धनुष काट डाला । इससे अ यन्त होकर धनुप तो अपने रथ पर डाल दिया ओर एक क्रुद्ध होकर भीष्म ने ओर अत्यन्त दृढ धनुप हाथ में यमदण्डतुल्य सुवर्णभूपित कालजिह्वा के समान महा- लिया और उस पर सात भल्ल वाण चढाकर चार से भयानक शक्ति हाथ में ली । वह शक्ति हाथ में लेकर श्वेन के चारों घोड़े मारे, दो से ध्वजा काटी और एक श्वेत ने कहा--- "हे भीष्म ! अब सँभल जाओ, मेरा से सारथी का सिर काट डाला ॥७२॥७७|| बिना पराक्रम देखो और पुरुष बनो।" अब पाण्डवों का - । ।
४२१४१ म हा भा र त [ मा । श्वेतस्य करनिर्मुक्तां निर्मुक्तोरगसन्निभाम् अपतत्सहसा राजन्महोल्केव नभस्तलात् ॥ ८५॥ ज्वलन्तीमन्तरिक्षे तां ज्वालाभिरिव संवृताम् । असम्भ्रान्तस्तदा राजन्पिता देवव्रतस्तव ॥ ८६ ॥ अष्टभिनभिर्भीष्मः शक्ति चिच्छेद पत्रिभिः । उत्कृष्टहेमविकृतां निकृतां निशितैः शरैः ॥८७॥ उच्चुकुशुस्ततः सवें तावका भरतर्षभ शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा वैराटिः क्रोधमूछितः ॥ ८८ ॥ कालोपहतचेतास्तु कर्तव्यं नाऽभ्यजानत क्रोधसम्मूछितो राजन्वैराटिः प्रहसन्निव ॥८९॥ गदां जग्राह संहृष्टो भीष्मस्य निधनं प्रति क्रोधेन रक्तनयनो दण्डपाणिरिवाऽन्तकः ॥ ९०॥ भीष्मं समभिदुद्राव जलौघ इव पर्वतम् तस्य वेगमसंवार्य मत्वा भीष्मः प्रतापवान् ॥ ९१ ॥ प्रहारविप्रमोक्षार्थं सहसा धरणीं गतः श्वेतः क्रोधसमाविष्टो भ्रामयित्वातु तांगदाम् ॥ ९२ ॥ रथे भीष्मस्य विक्षेप यथा देवो धनेश्वरः तया भीष्मनिपातिन्या स रथो भस्मसात्कृतः ॥ ९३ ॥ हित और आपकी निकृष्टता करने की इच्छा मे पराक्रमी । क्रोध से अधीर हो उठे । उनके सिर पर काल सवार वंत ने वह शक्ति भीष्म के ऊपर चलाई ||७७१८३|| था, इसमे वे कुट निधय नहीं कर सके कि अब क्या उम शक्ति को देगकर आपके पुत्र हाहाकार करने करना चाहिए। इसके पश्चात् क्रोध से नेत्र लान्ट रगे। केंचुली से निकटे हुए पिले मर्प के समान, करके, दण्डपाणि यमराज के समान गदा हाथ में लेकर, फाउदण्ड ऐमी महायोर यह शक्ति श्वेत के हाथ मे भीष्म को मारने के लिए उनकी ओर श्वेत दोहे ॥८॥ छटार आकाश में भारी उन्का के ममान चालामया १०॥ जल का प्रवाह जैसे पर्वत की ओर नटता है, दंग पड़ी। किन्नु उम दारिश को देगकर महापराक्रमीयमे ही श्वेत को आनी ओर आते दग्पकर, उनके भाग तनिक भी पिचरित नहीं हुए।।८३१८६। उन्होंने वेग को न रकनेवाला समझकर, टम प्रहार मे रक्षा आट-नर नाग याग नटायर उम मुर्गमयी घोर करने के लिए, महामना माया एकाएक रस से कूद शक्ति को मय में दो दुकादम करके गिरा दिया। पड़े । उार श्वेन ने मोर के मारे गहा पुगार या उगति की यादमागकर आपके गुरप्रमनता मेम के सर की युतुल्य येन के हाग कमर गिलान गयो नष्ट दरमा एटी हुई यह गदा सर गिरी । उगमा चोट अन्याय ४८ ] म हा भारत [ ४२१५ सध्वजः सह सूतेन साश्वः सयुगवन्धुरः विरथं रथिनां श्रेष्ठं भीपमं दृष्ट्वा रथोत्तमाः ॥ ९४ ॥ अभ्यधावन्त सहिताः शल्यप्रभृतयो रथाः ततोऽन्यं रथमास्थाय धनुर्विस्फार्य दुर्मनाः ॥ ९५ ॥ शनकैरभ्ययाच्वेतं गाङ्गेयः प्रहसन्निव एतस्मिन्नन्तरे भीष्मः शुश्राव विपुलां गिरम् ॥ ९६ ॥ आकाशादीरितां दिव्यामात्मनो हितसम्भवाम् । भीष्म भीम महाबाहो शीघ्र यत्नं कुरुष्व वै ॥२७॥ एप ह्यस्य जये कालो निर्दिष्टो विश्वयोनिना । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं देवदूतेन भापितम् ॥९८॥ सम्प्रहृष्टमना भूत्वा वधे तस्य मनो दधे विरथं रथिनां श्रेष्ठं श्वेतं दृष्ट्वा पदातिनम् ॥ ९९ ॥ सहितास्त्वभ्यवर्तन्त परीप्सन्तो महारथाः सात्यकिर्भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्पतः ॥१०॥ कैकेयो धृष्टकेतुश्च अभिमन्युश्च वीर्यवान् एतानापततः सर्वान्द्रोणशल्यकृपैः सह ॥१०१॥ अवारयदमेयात्मा वारिवेगानिवाऽचलः स निरुद्धेषु सर्वेषु पाण्डवेषु महात्मसु ॥१०२॥ श्वेतः खड्गमथाऽऽकृप्य भीष्मस्य धनुराच्छिनत् । तदपास्य धनुश्छिन्नं त्वरमाणः पितामहः ॥१०३॥ से धजा, सारथी, घोडे, जुआ, धुरा आदि सहित का यही समय निर्दिष्ट किया है ।"||९५/९८|| देव- वह रथ चूरचूर हो गया। भीष्म को रथ-हीन देखकर | दूत के कहे हुए ये वचन सुनकर भीष्म बहुत प्रसन्न शल्य आदि सब योद्धा अन्य रथ लेकर उनके पास हुए और श्वेन को मारने का दृढ निश्चय करके युद्ध पहुँचे ॥९१६९४॥ तब कुछ खिन्न से होकर, दूसरे के लिए प्रस्तुत हुए । इधर श्वेत को रथ-हीन और रथ पर चढकर, पितामह भीष्म धनुष चढाकर धीरे- पेदल देखकर उनकी महायता करने के लिए सायकि, धीरे श्वेत की ओर बढे । हे राजेन्द्र ! इसी मध्य में भीमसेन, धृष्टद्युम्न, केकेय, धृष्टकेतु, पराक्रमी अभि- भमि ने आने हित की सूचना देनेवाली यह दिव्य मन्यु आदि वीर रथ लेकर आगे बढे । महाप्रतापी आकाशवाणी सुनी "हे भीम ! हे महाराहो ! शीघ्र ! भीम ने द्रोण, कृप, शन्य आदि के साथ इन समो श्वेत को मारने का यत्न करो । विधाता ने इसे मारने मध्य में ही रोक्ने का यन किया । जल के वेग को ४२१६ ] म हा भा र त [ भीम वधे तस्य मनो दधे -- । देवदूतवचः श्रुत्वा ततः प्रचरमाणस्तु पिता देवव्रतस्तव ॥१०४॥ अन्यत्कार्मुकमादाय त्वरमाणो महारथः क्षणेन सज्यमकरोच्छकचापसमप्रभम् ॥१०५॥ पिता ते भरतश्रेष्ट श्वेतं दृष्ट्वा महारथैः घृतं तं मनुजव्याीमसेनपुरोगमः ॥१०६॥ अभ्यवर्तत गाङ्गेयः श्वेतं सेनापतिं द्रुतम् आपतन्तं ततो भीप्मो भीमसेनं प्रतापवान् ॥१०७॥ आजघ्ने विशिखैः पष्टया सेनान्यं स महारथः । अभिमन्यु च समरे पिता देवव्रतस्तव ॥१०८॥ आजघ्ने भरतश्रेष्ठस्त्रिभिः सन्नतपर्वभिः सात्यकिं च शतेनाऽऽजो भरतानां पितामहः ॥१०९ ।। धृष्टद्युम्नं च विंशत्या कैकेयं चाऽपि पञ्चभिः । तांश्च सन्मिहेष्वासान्पिता देवव्रतस्तव ॥११०॥ वारयित्वा शोरैः श्वेतमेवाऽभिदुद्रुवे ततः शरं मृत्युसमं भारसाधनमुत्तमम् ॥१११॥ विकृप्य बलवान्भीप्मः समाधत्त दुरासदम् । ब्रह्मास्त्रेण सुसंयुक्तं तं शरं लोमवाहिनम् ॥११२॥ ददृशुर्देवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः स तस्य कवचं भित्वा हृदयं चाऽमितौजसः ॥११३॥ जैसे परत गेस्ता ह, मे ही पराक्रमी भीम ने वाण से घिरे हुए सेनापति श्वेत की ओर भीष्म पितामह ने पर्या करके पाण्डवों को आर उनके वीरों को आगे अपना रथ दाडाया ॥१०२।१०७। उधर से श्वेत नहीं बढ़ने दिया ॥९८१०२॥ महागीर निर्भय श्वेत की सहायता करने को आते हुए प्रतापी भीमसेन को ने यह देखकर साहस के साथ खड्ग निकाल्पर उनके साठ वाण मारकर भीष्म ने रोक दिया। इसी प्रकार प्रहार में भीष्म का धनुप फिर पाट डाला। कटे हुए उन्होंने अभिमन्यु को बहुत ही तारण तीन बाण धनुष को भीष्म ने पृथक् फेंक दिया। देवदूत के वचन मारे । सायकि को सो बाण मारे । धृष्टद्यम्न सुनकर श्वेत को मारने के लिए शीघ्रता करते हुए बीस गण मारे और कय को पाँच बाण मारे । पितामह ने इन्द्रधनुष-तुल्य प्रभापूर्ण दूसरा धनुष लेकर हे महाराज । आपके पिता भाम इम प्रभार शत्रुपक्ष क्षण भा में चढ़ा लिया । अब भीममेन आदि वीरों के इन वीरों को धार बाणों से हटा करके श्वेत के - को ।
अ १४८ ] म हा भा र त [ ४२१७ । जगाम धरणी वाणो महाशनिरिख ज्वलन् अस्तं गच्छन्यथाऽऽदित्यः प्रभामादाय सत्वरः॥११४॥ एवं जीवितमादाय श्वेतदेहाजगाम ह तं भीष्मेण नरव्याघ्र तथा विनिहतं युधि ॥११५॥ प्रपतन्तमपश्याम गिरेः शृङ्गमिव च्युतम् अशोचपाण्डवास्तत्र क्षत्रियाश्च महारथाः ॥११६॥ प्रहृष्टाश्च सुतास्तुभ्यं कुरवश्चाऽपि सर्वशः ततो दुःशासनो राजश्वेतं दृष्ट्वा निपातितम् ॥११७॥ वादित्रनिनदै|रैर्नृत्यति स्म समन्ततः तस्मिन्हते महेष्वासे भीप्मेणाऽऽहवशोभिना ॥११८॥ प्रावेपन्त महेष्वासाः शिखण्डिप्रमुखा रथाः ततोधनञ्जयो राजन्वाष्र्णेयश्चाऽपि सर्वशः ॥११९॥ अवहारं शनैश्चक्रुनिहते वाहिनीपतौ ततोऽवहारः सैन्यानां तव तेषां च भारत ॥१२॥ ताबकानां परेषां च नर्दतां च मुहुर्मुहुः पार्था विमनसो भूत्वा न्यवर्तन्त महारथाः चिन्तयन्तो वधं घोरं द्वैरथेन परन्तपाः ॥१२१॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीमापर्वणि श्वेतवधे अष्टाचत्वारिंशोऽध्याय ॥४८॥ ऊपर आक्रमण करने के लिए आगे बढे ||१०८। का शरीर, पर्वत के पटे हुए शिखर की तरह, सरके ११०॥ इसी समय भीष्म ने एक भार को सह सपने सामने पृथ्वी पर गिर पडा। श्वेत की मृत्यु देखकर वाले, कालरूप, श्रेष्ठ, रोऍदार तीक्ष्ण नाण को तरक्स पाण्डव ओर उनके पक्ष के समक्षत्रिय लोग शोर प्रस्ट से निकाला । फिर उस भयानक बाण को ब्रह्मास्त्र करने लगे। इधर आपके पुत्र ओर सत्र कुरु सेना से अभिमन्त्रित करके श्वेत के हृदय को लक्ष्य करके अत्यन्त प्रसन्न हुई । कोरस सेना मे बडे आनन्द के छोड़ा । देवता, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस आदि साथ बाजे बजे और दु शासन आनन्द के मारे नाचने सपने देखा कि वह नाण करच तोडकर पराक्रमी श्वेत के हृदय में प्रवेश हो गया है ।महावज्र के समान लग ॥११५:११८॥ युद्ध दुई भीष्म के हाथ से विराट के पुत्र श्वेत की मृत्यु देखकर [शोक और भय प्रबलित वह वाण उसी तरह प्राण रेयर श्वेत के | के मारे] शिखण्डी आदि महाधनुर्द्धर वीर कॉपने लगे। शरीर से निकल कर पृथ्वी मे प्रवेश होगया, जिस तरह अन महागीर अर्जुन ओर वासुदेव ने सेनापति की अस्त होते हुए मूर्य प्रभा को लेकर चले जाते हैं | मृत्यु देखकर युद्ध रोपने की आज्ञा दी । दोनों पक्ष ॥११११११५|| पितामह के हाथ से मारे गये श्वेत के वीर सेनिन गरजते हुए धीरे-धीरे विश्राम के लिए -- ।
४२१८ । म हा भा र त { भीमपर्व अपने-अपने डेरों को चले गये । द्वन्द्वयुद्ध मे श्वेत की । और व्याकुल होकर टेरों को लौटे ॥११८।१२१|| मृत्यु होने के कारण महारथी पाण्डव लोग चिन्तित भीष्मपर्व का अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ || ४८ ॥ - अथ एकोनपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ १९ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-श्वेते सेनापतौ तात संग्रामे निहते परैः किमकुर्वन्महेष्वासाः पञ्चाला पाण्डवैः सह सेनापति समाकर्ण्य श्वेतं युधि निपातितम् । तदर्थं यततां चाऽपि परेपां प्रपलायिनाम् ॥ २ ॥ मनः प्रीणाति मे वाक्यं जयं सञ्जय शृण्वतः। प्रत्युपायं चिन्तयन्तः सज्जनाः प्रत्रवन्ति मे ॥ ३ ॥ स हि वीरोऽनुरक्तश्च वृद्धः कुरुपतिस्तदा कृतं वैरं सदा तेन पितुः पुत्रेण धीमता तस्योद्वेगभयाचाऽपि संश्रितः पाण्डवान्पुरा सर्व वलं परित्यज्य दुर्ग संश्रित्य तिष्ठति पाण्डवानां प्रतापेन दुर्ग देशं निवेश्य च सपत्नान्सततं वाधनार्यवृत्तिमनुष्ठितः आश्चर्य वै सदा तेषां पुरा राज्ञां सुदुर्मतिः ततो युधिष्ठिरे भक्तः कथं सञ्जय सूदितः प्रक्षिप्तः सम्मतः क्षुद्रः पुत्रो मे पुरुषाधमः न युद्धं रोचयेद्भीष्मो न चाऽऽचार्यः कथशन ॥ ८ ॥ उनचासवाँ अध्याय ॥ १९ ॥ धृतराष्ट्र ने कहा- हे सञ्जय ! सेनापति श्वेत बना रहा । पिता मे क्लेश होने के कारण यह पाण्डवों के मारे जाने पर धनुर्द्धरश्रेष्ठ पाचालों और पाण्डयों के यहाँ चला आया था और अपनी सेना से पृथर ने युद्धभूमि में फिर क्या किया ? ॥१॥ मेनापति श्वेत ! होकर दुर्ग में रहता था । पाण्डवो का आश्रय पाकर की मृत्यु, उमकी सहायता करनेवालों का भागना उसने दुर्गम स्थान को आवाद किया और शत्रुओं का और अपने पक्ष की विजय सुनकर मुझे अयन्त हर्ष नाश कर अपना व्यवहार अच्छा रकमा । मेरा पुन हो रहा है। मेरे पक्ष के योदा उपाय करते हुए यद्यपि दुर्योधन उन्मत्त और नीच है। कुरुकुलश्रेष्ठ भीष्म, दया से काम लेते हैं नथ.पि शूर पितामह भीम का। महा मा द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, मैं और गान्धारी, किमी हम पर अनुग्रह है। धेन का अपने पिना मे सदायर की रम्छा नहीं था कि यह युद्ध हो । उधर बासुदेव, ।
अध्याय ४९ ] म हा भारत [ ४२१२ न कृपो न च गान्धारी नाऽहं सञ्जय रोचये । न वासुदेवो वार्ष्णेयो धर्मराजश्च पाण्डवः न भीमो नाऽर्जुनश्चैव न यमौ पुरुपर्षभौ वार्यमाणो मया नित्यं गान्धार्या विदुरेण च जामदग्न्येन रामेण व्यासेन च महात्मना दुर्योधनो युध्यमानो नित्यमेव हि सञ्जय ॥ ११ ॥ कर्णस्य मतमास्थाय सौवलस्य च पापकृत् दुःशासनस्य च तथा पाण्डवानन्वचिन्तयत् ॥ १२ ॥ तस्याऽहं व्यसनं घोरं मन्ये प्राप्तं तु सञ्जय श्वेतस्य च विनाशेन भीष्मस्य विजयेन चः ॥ १३ ॥ संक्रुद्धः कृष्णसहितः पार्थः किमकरोयुधि अर्जुनाद्धि भयं भृयस्तन्मे तात न शाम्यति ॥ १४ ॥ स हि शूरश्च कौन्तेयः क्षिप्रकारी धनञ्जयः मन्ये शरैः शरीराणि शत्रूणां प्रमथिष्यनि ॥ १५ ॥ ऐन्द्रिमिन्द्रानुजसमं महेन्द्रसदृशं वले अमोघक्रोधसङ्कल्पं दृष्ट्वा वः किमभून्मनः तथैव वेदविच्छूरो ज्वलनार्कसमद्युतिः इन्द्रास्त्रविदमेयात्मा प्रपतन्समितिञ्जयः ॥१७॥ परम धार्मिक युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और से अन्यन्त क्रुद्ध होकर कृष्णमहित अर्जुन ने युद्ध में सहदेव भी इस युद्ध को रचिकर नहीं मानते थे । क्या किया? मुझ से सब वृत्तान्त कह।। हे सञ्जय ! ॥१।१०॥ पहले मैं, गान्धारी, विदुर, परशुराम आर अर्जुन से मुझे बडा भय है । वह किसी प्रकार दूर महात्मा व्यास आदि दुरात्मा दुर्योधन को अनेक प्रकार नहीं होता । मुझे स्पष्ट जान पडता है कि शूर आर से समझाया ओर रोका था कि पाण्डो से युद्ध मत स्फूर्तिशालि अर्जुन अवश्य अपने बाणों से शत्रुओं के करो; किन्तु उस उद्दण्ड हठी ने हमार रोकने को नहीं । शरीरों को टुकडे टुकडे कर डालेंगे॥१३॥१५॥ अर्जुन माना। हमारे उपदेश की अवहेला करके कर्ण, का क्रोध कभी निष्फल नहीं हो सकता । उनका शकुनि आर दु शासन की सम्मति मानकर दुष्ट दुर्यो- अभिप्राय भी अधूरा नहीं रह सकता । वेदज्ञ, शूर, धन पाण्टयों से, ईर्ष्या रग्वने के कारण, युद्ध करने मूर्य आर अग्नि के समान तेजस्वी, बट में महेन्द्र और लगा। उसने पाण्डयो की कुछ अपेक्षा नहीं की । मैं । विष्णु के सदृश, इन्द्रास्त्र के ज्ञाना, अप्रमेय पराक्रमी, समझता हूँ, अब उसके ऊपर घोर सङ्कट आनेवाला इन्द्रतुल्य अर्जुन को समर के लिए उद्यत देयकर है ॥११॥१३॥ श्वेत की मृत्यु और भाप की विजय तुम्हारे मन मे कमा भार प्रकट हुआ था यज के । है ४२२० ] म हा भारत [ भीष्मपव वज्रसंस्पर्शरूपाणामस्त्राणां च प्रयोजकः सखड्गाक्षेपहस्तस्तु घोपं चके महारथः स सञ्जय महाप्राज्ञो द्रुपदस्याऽऽत्मजो बली । धृष्टद्युम्नः किमकरोच्वते युधि निपातिते ॥ १९ ॥ पुरा चैवाऽपराधेन वधेन च चमूपतेः मन्ये मनः प्रजज्वाल पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ २० ॥ तेषां क्रोधं चिन्तयंस्तु अहःसु च निशासु च । न शान्तिमधिगच्छामि दुर्योधनकृतेन हि कथं चाऽभून्महायुद्धं सर्वमाचक्ष्व सञ्जय ॥ २१॥ सञ्जय उपाच-शृणु राजन्स्थिरो भूत्वा तवाऽपनयनौ महान् । न च दुर्योधने दोपमिममाधातुमर्हसि ॥ २२ ॥ गतोदके सेतुवन्धो यादृक्ताहातिस्तव सन्दीप्ते भवने यद्वत्कूपस्य खननं तथा ॥ २३॥ गतपूर्वाह्नभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि दारुणे तावकानां परेपां च पुनर्युद्धमवर्तत ॥ २४ ॥ श्वेतं तु निहतं दृष्ट्वा विराटस्य चमूपतिम् कृतवर्मणा च सहितं दृष्ट्वा शल्यमवस्थितम् ॥ २५ ॥ ऐसे म्प आर स्पर्शवाले अमोघ अखों का प्रयोग करने } सुनिए । आप ही इस विपत्ति के आने का मूल कारण में निपुण, ग्वड्गयुद्ध में अद्वितीय अर्जुन ने क्रोप करके | हें । इस बारे में दुर्गोपन के ऊपर दोपारोपण करना क्या किया ? ॥१५॥१८॥ हे सञ्जय ! युद्ध में श्वेत । अनुचित ह । जल को चाढ निकल जाने पर पुल के मारे जाने पर महारथी, पराक्रमी धृष्टद्युम्न ने क्या | वॉरना या गृह के दम हो जाने पर कुआँ खोदना किया ? मुझे निश्चय जान पडता है कि दुर्योपन ने जैसे व्यर्थ होना ह वैमे ही अब आपका यों कहना पहले जो कुत्र्यवहार किये हैं उनसे ओर सेनापति श्वेत आर सोचना व्यर्थ है ॥२२॥२३॥ अस्तु, अब आप को मृत्यु से पाण्डवों के हृदय में असह्य क्रोर की युद्ध का वर्णन मुनिए । वह दारण दिन का पूर्वभाग अग्नि प्रज्वलित हो उठी होगी । हे मञ्जय ! दुर्योधन व्यतीत हो जाने पर दूसरे भाग में फिर कारवों आर के अपराध से उपन्न होनेतारे पाण्डवों के अनिवार्य पाण्डों में युद्ध होने लगा । विराट के पुत्र सेनापति मोध को मोचकर मुझे दिन को या रानि को कभी श्वेत को मरा हुआ आर कृतार्मा सहित शल्य को गुद्र घड़ी भर शान्ति नहीं मिलती। अब तुम बतलाओ, के लिए प्रस्तुत देखकर पीर गड, आहुति पड़ने पर वह महायुद्ध किस प्रकार हुआ? ॥१९॥२१॥ सञ्जय ' अग्नि के समान, योर से प्रचलित हो उठे। बहुत ने कहा---हे महाराज ! आप चित्त को एकाग्र करके ! मे स्था के द्वारा चारों ओर से सुरक्षित वीर शई ।
अध्याय ४०. ] म हा भारत । ४२२१ - शङ्करः क्रोधाप्रजज्वाल हविषा हव्यवाडिव स विस्फार्य महञ्चापं शकचापोपमं बली ॥ २६॥ अभ्यधाव जिघांसन्वे शल्यं मद्राधिपं युधि महता रथसंघेन समन्तात्परिरक्षितः ॥ २७॥ सृजन्वाणमयं वर्ष प्रायाच्छल्यरथं प्रति तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य मत्तवारणविक्रमम् ॥ २८॥ तावकानां रथाः सप्त समन्तात्पर्यवारयन् मद्रराज परीप्सन्तो मृत्योर्दष्ट्रान्तरं गतम् ॥ २९ ॥ बृहद्बलश्च कोसल्यो जयत्सेनश्च मागधः तथा रुक्मरथो राजन्पुत्रः शल्यस्य मानितः ॥ ३० ॥ विन्दानुविन्दावावन्त्यो काम्बोजश्च सुदक्षिणः । बृहत्क्षत्रस्य दायादः सैन्धवश्च जयद्रथः ॥ ३१ ॥ नानाधातुविचित्राणि कार्मुकाणि महात्मनाम् । विस्फारितान्यदृश्यन्त नोदयष्विव विद्युतः ॥ ३२ ॥ ते तु वाणमयं वर्ष शद्धमूर्ध्नि न्यपातयन् निदाघान्तेऽनिलोडूता मेघा इव नगे जलम् ॥ ३३ ॥ ततः क्रुद्धो महेष्वासः सप्तभल्लेः सुतेजनेः धनूंपि तेपामाच्छि घ ननर्द पृतनापतिः ॥ ३ ॥ ततो भीष्मो महाबाहुविनद्य जलदो यथा तालमात्रं धनुर्गा शहमभ्यवद्रणे ॥३५॥ सपना ऐसा धनुर गदागर मराज दायको समान चमकी। उन्होंने माग मारने के लिए उनकी और को और तीन यणी वामाना आरा रिया। नर मागी पीसी पर लगे ॥२४॥२७॥ मोमर के युपिन समान नीण भागों में से पनु समान गयी सिट पुर साल यो अने देगार, पटयर नापामगार मग को मृतु-गुग मे बनाने के लि, आरके मा मंग मेगये ममान गाजीपमानित पाये गा महा याद, जयगेन, मामा, अनुरागरमा माग गर्ने । ति, अनुविन्द गुरक्षित और जपाए --या की मनोगत गोगनी पग परो र आगे यः ॥२८३१॥ अशा संयमा मगर ममत मन उनी में ३५३६|| सरम में काम wormindiamsimitendwwwsindianimadhusa ४२२२ ] म हा भारत [ भीमपव तमुद्यन्तमुदीक्ष्याऽथ महेष्वासं महावलम् सन्त्रस्ता पाण्डवी सेना बातवेगहतेव नौः ॥३६॥ ततोऽर्जुनः सन्त्वरितः शङ्खस्याऽऽसीत्पुरःसरः । भीष्माद्रक्ष्योऽयमयेति ततो युद्धमवर्तत ॥३७॥ हाहाकारो महानासीद्योधानां युधि युध्यताम् । तेजस्तेजसि सम्पृक्तमित्येवं विस्मयं ययुः ॥ ३८॥ अथ शल्यो गदापाणिरवतीर्य महारथात् शङ्खस्य चतुरो वाहानहनद्भरतर्षभ ॥ ३९ ॥ स हताश्वाद्रथातूर्णं खड्गमादाय विद्भुतः वीभत्सोश्च रथं प्राप्य पुनः शान्तिमविन्दत ॥४०॥ ततो भीष्मरथात्तूर्णमुत्पतन्ति पतत्रिणः यैरन्तरिक्ष भूमिश्च सर्वतः समवस्तृता ॥४१॥ पञ्चालानथ मत्स्यांश्च केकयांश्च प्रभद्रकान् भीमः प्रहरतां श्रेष्ठः पातयामास पत्रिभिः ॥४२॥ उत्सृज्य समरे राजन्पाण्डवं सव्यसाचिनम् । अभ्यद्रवत पाञ्चाल्यं द्रुपदं सेनया वृतम् प्रियं सम्बन्धिनं राजशरानवकिरन्यहून् अग्निनेव प्रदग्धानि बनानि शिशिरात्यये ॥४४॥ शरदग्धान्यदृश्यन्त सैन्यानि द्रुपदस्य ह अत्यतिष्ठद्रणे भीग्मो विधूम इव पावकः ॥४५॥ के लिए महावीर अर्जुन स्फत्ति के साथ शड्ड के आगे जाने पर उनकी रक्षा हुई ॥३७॥४०॥ इधर भीष्म आ गये । उस समय युद्ध करते हुए योद्धाओं में भारी के रय से स्कृति के साथ इतो बाण बरसने लगे कि हाहाकार मच गया । एक तेज जमे दूसरे तेज से जा उनमे चारों ओर आकाश और पृची व्याप्त हो गई। भिड़ता है, वैसे ही भीष्म और अर्जुन को मन्मुख श्रेष्ठ योद्धा भीष्म पाञ्चाल, मस्य, कैकेय, प्रभद्रक देखकर मवको बडा आश्रय हुआ । उधर शल्य और । आदि देशों के चारों को अपने बाणा से मार-मारकर शच मे युद्ध होने लगा। शल्य ने अपने रय से गिराने लगे। वे मव्यसाची पाष्टव को छोड़कर, उतरकर गहा के प्रहार मे शस के रय के चारों | अपनी सेना के बीच स्थित, प्रिय सम्बन्धी पाचाल. घोड़ों को मार डाला । तर उम रप से उतरकर बङ्ग राज द्रुपद के मामने पहुंचे, और उन पर बाण वर- हाय में लेकर शश अर्जुन के रथ पर चले गये । यहा साने लगे। गर्मियों में दागनल से जालों को ।
अध्याय ४९
म हा भारत
[ ४२२३
मध्यन्दिने यथाऽऽदित्यं तपन्तमिव तेजसा ।
न शेकुः पाण्डवेयस्य योधा भीष्म निरीक्षितुम्॥ ४६ ॥
वीक्षाश्चक्रुः समन्तात्ते पाण्डवा भयपीडिताः ।
त्रातारं नाऽध्यगच्छन्त गावः शीतार्दिता इव ॥४७॥
सा तु यौधिष्ठिरी सेना गाङ्गेयशरपीडिता
सिंहेनेव विनिर्भिन्ना शुक्ला गौरिव गोपतेः ॥४८॥
हते विप्रगुते सैन्ये निरुत्साहे विमर्दिते
हाहाकारो महानासीत्पाण्डुसैन्येषु भारत ॥४९॥
ततो भीष्मः शान्तनवो नित्यं मण्डलकार्मुकः ।
मुमोच वाणान्दीप्ताग्रानहीनाशीविषानिव ॥ ५०॥
शरैरेकायनीकुर्वन्दिशः सर्वा यतव्रतः
जघान पाण्डवरथानादिश्याऽऽदिश्य भारत ॥ ५१ ॥
ततः सैन्येषु भग्नेषु मथितेषु च सर्वशः
प्राप्ते चाऽस्तं दिनकरे न प्राज्ञायत किञ्चन ॥ ५२॥
भीष्मं च समुदीर्यन्तं दृष्ट्वा पार्था महाहवे
अवहारमकुर्वन्त सैन्यानां भरतर्षभ
॥ ५३ ॥
इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि शखयुद्धे प्रथमदिवसापहारे एकोनपचाशत्तमोऽध्याय ॥ ४९ ।।
जलाता है वैसे ही भीष्म पितामह अपने बाणो से । विमर्दित होकर-पाण्डवों की सेना इधर उधर भागने
पाञ्चालसेना का सहार करने लगे ॥४१॥४५॥ युद्ध-
लगी । घोर हाहागर मच गया ॥४५/४९॥ भीम
भूमि में पितामह भीष्म बिना धुएँ की अग्नि के समान
पितामह के मण्डलाकार धनुप से चमकीली अग्रभाग
देख पड़ते थे । दोपहर के सूर्य के समान अपने तेज , वाले, पिपैले सर्प-तुल्य वाण निरन्तर निकल रहे थे।
से तपते हुए भीष्म को पाण्डसना का कोई योद्धा नेत्र | जिधर भीष्म बाण बरसाते थे उपर ही सेना में भगदड़
भरकर देख भी नहीं सकता था। शीतपीड़ित गाय-
मच जाती थी। भीष्म पितामह ललकार लटकारकर
बैलों की तरह भयपीड़ित पाण्डा-सेनिक चारों ओर | पाण्डवपक्ष के वीरों को मार रहे थे । सेना उन्मथित
देखने लगे। उन्हें कोई अपनी रक्षा करनेवाला न
होकर भाग रही थी, इसी समय सूर्य भी अस्ताचल
देख पड़ता था । सिंह के आक्रमण करने पर जेसे पर पहुँच गये । अॅमेरे में कुछ नहीं सूझ पड़ता था।
गायों के झुण्ड भाग खड़े होते हैं वैसे ही भीष्म के युद्धभूमि में भीष्म का अनिवार्य पराक्रम देवकर पाण्डवों
वाणों से पीड़ित होकर--हत-आहत, निरत्साह, ! ने सैनिकों को युद्ध रोकने की आज्ञा दे दो ॥५०५३||
भीष्मपर्य का उनचासाँ अन्याय समाप्त हुआ ॥ ४० ॥
४२२० । महा भारत अप पजासत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥ मन्नग उवाग--कृतेऽवहारे सैन्यानां प्रथमे भरतर्षभ भीप्मे च युद्धसंरब्धे हृष्टे दुयोधने तथा धर्मराजस्ततस्तूर्णमभिगम्य जनार्दनम् भ्रातृभिः सहितः सर्वः सर्वश्चैव जनेश्वरः शुचा परमया युक्तश्चिन्तयानः पराजयम् वाष्र्णेयमब्रवीद्राजन्दृष्ट्वा भीष्मस्य विक्रमम् ॥ ३ ॥ कृष्ण पश्य महावासं भीमं भीमपराक्रमम् । शरर्दहन्तं सन्यं मे ग्रीष्मे कक्षमिवाऽनलम् ॥ ४ ॥ कथमनं महात्मानं शभ्यामः प्रतिवीक्षितुम् । लेलिायमानं मन्यं मे हविप्मन्तमिवाऽनलम् ॥ ५ ॥ गतं हि पुम्पव्याचं धनुप्मन्तं महाबलम् दृष्ट्वा विपद्रुनं सेन्यं समरे मार्गणाहतम् शरयो जेतुं यमः कुलो बज्रपाणिश्च संयुगे । चरणः पाशभृतापि कुचेगे या गदाधरः न तु भीष्मी महातेजाः शश्यो जेतुं महाबलः । मोऽहमेवढ़ने मना भीष्मागाधजलेडाव आरमनी युतिदायल्यानीममामाय काय यनं याम्यामि याणेय श्रेयो में ननजापितम् ॥ १ ॥ ।
अव्याय ५० ] म हा भारत [ ४२२५ । न त्वेतान्पृथिवीपालान्दातुं भीष्माय मृत्यवे । क्षपयिष्यति सेनां मे कृष्ण भीष्मो महास्ववित् ॥ १० ॥ यथाऽनलं प्रज्वलितं पताः समभिद्रुताः । विनाशायोपगच्छन्ति तथा मे सैनिको जनः ॥ ११ ॥ क्षयं नीतोऽस्मि वाष्र्णेय राज्यहेतोः पराक्रमी । भ्रातरश्चैव मे वीराः कर्शिताः शरपीडिताः ॥१२॥ मत्कृते भ्रातृहान राज्याझ्ष्टास्तथा सुखात् । जीवितं बहु मन्येऽहं जीवितं ह्यद्य दुर्लभम् ॥ १३ ॥ जीवितस्य च शेपेण तपस्तप्स्यामि दुश्चरम् न घातयिष्यामि रणं मित्राणीमानि केशव ॥ १४ ॥ रथान्मे बहुसाहस्रान्दिव्यैरस्त्रैर्महाबलः घातयत्यनिशं भीष्मः प्रवराणां प्रहारिणाम् ॥१५॥ किंनु कृत्वा हितं मे स्याद् ब्रूहि माधव मा चिरम् । मध्यस्थमिव पश्यामि समरे सव्यसाचिनम् ॥ १६ ॥ एको भीमः परं शक्त्या युध्यत्येव महाभुजः केवलं बाहुवीर्येण क्षत्रधर्ममनुम्मरन् ॥१७॥ गदया वीरघातिन्या यथोत्साहं महामनाः करोत्यसुकरं कर्म रथाश्वनरदन्तिपु ॥ १८॥ नीका नहीं है उस, भीष्मरम्प अथाह समुद्र मे इन। कष्ट सहते आये है । राज्य के लिए पराक्रम करके जा रहा है। हे वासुदेव ! मै गन को ना जाऊँगा, भीम के द्वारा में अवश्य नष्ट होऊँगा । मैं इस समय वहाँ जीग्न व्यतीत करना मुझे भ्रष्ट जान पड़ता है। अपना और अपने भाइयों का जीवन ही अयन्त इन राजाओं को और इतनी सेना को व्यय भीम के काटिन समान रहा है। इस समय तो जीरन ही दुर्लभ हो मृत्युमुग में भेजना मुझे ठीक नहीं जैनना । जान पड़ता है ॥११॥१३॥ में शेष जीपन कठोर महालों के ज्ञाता भीष्म यहुन शाम मेरी मम्पूर्ण मेना ना करके भरे ही पिता दूंगा किन्न रण में इन मित्रों नष्ट कर देंगे ॥८॥१०॥ जैसे गानी अपि में की हत्या नहीं कग मांगा। गायर! महारती एज़ारों पता जरने के लिए करते हैं, मे ही मेरे भाग ने मेरे पक्ष के कई इनार श्रेष्ट पोदाओं को गनिर पर विनाश के लिए भीम के माग्न जाते आने दिला अग्गे मे मर दाग है और ये मी हैं। मुझे प्राणों में भी अधिक पार ये भाई यागोगे प्रसार निमंना या महार रेगे। म टिए प्रहार मे पावित हो रहा है। मेरे ही सारण भात. यत दामना मे पद नारकि का यरने में मग नेह में आज तक मुग और राम में भर हार फागोगा । म अनुन मुझे ममान मेन्याकुल ४२२६ ] महा भारत [ भीष्मण्व नाऽलमेप क्षयं कर्तुं परसैन्यस्य मारिप आर्जवेनैव युद्धेन वीर वर्षशतैरपि एकोऽस्त्रवित्सखा तेऽयं सोऽप्यस्मान्समुपेक्षते । निर्दह्यमानान्भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना ॥ २० ॥ दिव्यान्यस्त्राणि भीष्मस्य द्रोणस्य च महात्मनः। धक्ष्यन्ति क्षत्रियान्सर्वान्प्रयुक्तानि पुनः पुनः ॥ २१ ॥ कृष्ण भीष्मः सुसंरब्धः सहितः सर्वपार्थिवैः । क्षपयिप्यति नो नूनं यादृशोऽस्य पराक्रमः ॥ २२ ॥ स त्वं पश्य महाभाग योगेश्वर महारथम् भीमं यः शमयेत्संख्य दावाग्निं जलदो यथा ॥ २३ ॥ तव प्रसादागोविन्द पाण्डवा निहतद्विषः स्वराज्यमनुसम्प्राप्ता मोदिष्यन्ते सवान्धवाः ॥ २४॥ एवमुक्त्वा ततः पार्थो ध्यायन्नास्ते महामनाः । चिरमन्तर्मना भूत्वा शोकोपहतचेतनः शोकात तमथो ज्ञात्वा दुःखोपहतचेतसम् ॥ २५॥ अब्रवीत्तत्र गोविन्दो हर्पयन्सर्वपाण्डवान् मा शुचो भरतश्रेष्ठ न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥ यस्य ते भ्रातरः शूराः सर्वलोकेषु धन्विनः अहं च प्रियकृद्राजन्सात्यकिश्च महायशाः ॥२७॥ से देख पड़ते हैं ॥१४॥१६॥ अकेले भीमसेन क्षत्रिय- | चार्य के दिव्य अस्त्र बारम्बार प्रयुक्त होकर हमारे धर्म के अनुसार यथाशक्ति बाहुबल से युद्ध करते हैं । पक्ष के सब क्षत्रियों को भस्म कर डालेंगे। हे कृष्ण- महामनस्वी वीर भीम शत्रुघातिनी गदा से उत्साहपूर्वक चन्द्र ! भीष्म का जैसा पराक्रम है, उसे देखकर स्पष्ट रसों, हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों के दलों में दुष्कर जान पड़ता है कि वे अपने पक्ष के सब राजाओं के कर्म अवश्य करते हैं, किन्तु ये अकेले सो वर्ष में भी साथ, क्रुद्ध होकर, हमारी सारी सेना को नष्ट कर सरल युद्ध के द्वारा शत्रु सेना का संहार नहीं कर देंगे ॥२०॥२२॥ इसलिए हे जनार्दन ! शीघ्र वह वीर सकते ॥१७॥१९॥ तुम्हारे प्रिय सग्या ये अर्जुन हो । यताइए जो युद्ध में भीष्म को बैसे टण्डा कर सकता सब दिव्य अत्रों को जानते है । सो ये भीष्म, द्रोण हो जैसे दावानल को मेव शान्त कर देते हैं । हे आदि के द्वारा हमारे पक्ष का नाश होने देग्यकार भी योगेश्वर ! हे महाभाग! आपके ही प्रसाद मे पाण्डम लापरवाही दिला रहे हैं । महात्मा भीम और द्रोणा- लोग शत्रुओं को मारकर अपना राज्य पायेंगे और - अध्याय ५० ] म हा भारत [ ४२२७ - । विराटदुपदौ चोभी धृष्टद्युम्नश्च पार्पतः तथैव सबलाश्चेमे राजानो राजसत्तम ॥ २८॥ त्वत्प्रसादं प्रतीक्षन्ते त्वद्भक्ताश्च विशाम्पते एप ते पार्पतो नित्यं हितकामः प्रिये रतः ॥ २९ ॥ सैनापत्यमनुप्राप्तो धृष्टद्युम्नो महाबलः शिखण्डी च महाबाहो भीष्मस्य निधनं किल ॥ ३० ॥ एतच्छुत्वा ततो धर्मो धृष्टद्युम्नं महारथम् अब्रवीत्समितौ तस्यां वासुदेवस्य शृण्वतः ॥ ३१ ॥ धृष्टद्युम्न निबोधेदं यत्त्वां वक्ष्यामि मारिप नाऽतिक्रम्यं भवेत्तच्च वचनं मम भापितम् ॥३२॥ भवान्सेनापतिर्मह्यं वासुदेवेन सम्मितः कार्तिकेयो यथा नित्यं देवानामभवत्पुरा ॥ ३३ ॥ तथा त्वमपि पाण्डनां सेनानीः पुरुपर्पभ स त्वं पुरुषशार्दूल विक्रम्य जहि कौरवान् ॥ ३४ ॥ अहं च तेऽनुयास्यामि भीमः कृष्णश्च मारिप । माद्रीपुत्रौ च सहितौ द्रौपदेयाश्च दंशिताः ॥३५॥ ये चाऽन्ये पृथिवीपालाः प्रधानाः पुरुपर्पभ तत उद्धर्पयन्सन्धृिष्टद्युम्नोऽभ्यभापत ॥३६॥ भाई- इ-बन्धु सहित आनन्द करेगे ॥२३॥२४॥हे महा. करनेवाले, महापली धृष्टद्युम्न सेनापति है । हे महा- राज! यों कहकर महामनस्त्री युधिष्ठिर शोक से व्याकुल बाहो ! विश्वाम रपिए, ये शिग्यण्डी ही भीष्म के लिए अवस्था में बहुत देर तक ध्यानारस्थित मे बैठे रहे । मृत्युस्वरूप है ॥२५॥३०॥ धार्मिकभ्रष्ट युधिष्टिर यह तर उन्हें शोक से व्याकुल और दु सित जानकर सुनकर उम मभा के मध्य में वासुदेव के मामने श्रीकृष्णचन्द्र जी सब पाण्डयों को प्रसन्न करते हुए धृष्टद्युम्न से बोले-हे धृष्टद्युम्न ! मरी बातों को मन हम प्रकार कहने लगे-हे पाण्डवश्रेष्ठ ! आप शोक लगाकर मुना । मुझ पूर्ण विश्वाम है कि मैं जो कहूँगा, न करें। आप शोक करने के योग्य नहीं हैं. क्योंकि , उमे तुम नहीं टालागे । नुम वासुदेव के ममान प्रतापी आपके चारों भाई त्रिलोक-प्रमिद्ध योदा और अद्वितीय हो! पहले कार्तिकेय जमे देवताओं के मेनापति हुए वीर है । मैं, महायशस्वी सा यकि, विगट, द्रुपद, थे, वेमे ही तुम पाण्डयों के मेनापनि हो । हे पुरुष धृष्टद्युम्न और अपनी सेनाओं सहित ये सब राजा रोग | मिह ! नुम अपना यट और पराक्रम दिनाकर कारणों आपका प्रिय करनेवाले और भक्त हैं । मर आपके ) का महार करा ॥३१॥३४॥ में, भाममन, श्रीष्ण, पाकांक्षी और हितनिन्ता है। आपके हिर्नपी, प्रिय नाड, महदेव, दादी के पाँचों पुत्र और अन्य प्रदान । ।
४२२८ म हा भा र त [ भीष्मपर अहं द्रोणान्तकः पार्थ विहितः शम्भुना पुरा । रणे भीम कृपं द्रोणं तथा शल्यं जयद्रथम् ॥३७॥ सर्वानद्य रणे हप्तान्प्रतियोत्स्यामि पार्थिव अथोत्कृष्टं महेष्वासः पाण्डवैर्युद्धदुर्मदैः ॥३८॥ समुद्यते पार्थिवेन्द्र पार्पते शत्रुसूदने तमब्रवीत्ततः पार्थः पार्पतं पृतनापतिम् ॥ ३९ ॥ व्यूहः क्रौञ्चारुणो नाम सर्वशत्रुनिवर्हणः यं बृहस्पतिरिन्द्राय तदा देवासुरेऽब्रवीत् ॥ ४०॥ तं यथावत्प्रतिव्यूह परानीकविनाशनम् अदृष्टपूर्वं राजानः पश्यन्तु कुरुभिः सह ॥४१॥ यथोक्तः स नृदेवेन विष्णुर्वज्रभृता यथा प्रभाते सर्वसैन्यानामग्रे चक्रे धनञ्जयम् ॥ ४२ ॥ आदित्यपथगः केतुस्तस्याऽद्भुतमनोरमः शासनात्पुरुहूतस्य निर्मितो विश्वकर्मणा ॥ ४३ ॥ इन्द्रायुधसवर्णाभिः पताकाभिरलङ्कृतः आकाशग इवाऽऽकाशे गन्धर्वनगरोपमः ॥४४॥ मृत्यमान इवाऽऽभाति रथचर्यासु मारिष तेन रत्नवता पार्थः स च गाण्डीवधन्वना ॥४५॥ प्रधान राजा लोग, सब तुम्हारे पीछे सहायता के लिए | बतलाया था, वहीं व्यूह हम लोग रचेंगे । वह व्यूह चलेंगे ॥३५॥३६॥ युधिष्ठिर के वचन सुनकर वहाँ । अनुसेना को नष्ट कर देता है। कोरर ओर अन्य उपस्थित सब लोगों को प्रसन्न करते हुए धृष्टद्युम्न कहने राजा लोग पहले कभी न देखे हुए उस व्यूह को लगे-~-भगवान् शङ्कर ने मुझे द्रोण का काल बनाया देखेगे ॥३९॥४१॥ धृष्टद्युम्न को यह उपदेश देकर है । हे महाराज ! मैं युद्ध मैं भीष्म, कृप, द्रोण, शल्य | धर्मराज युधिष्ठिर ने रात्रि को विश्राम किया । प्रात और दर्पयुक्त जयद्रथ आदि सब महारथियों से युद्ध काल पाण्डवों ने इस तरह क्रौञ्चव्यूह की रचना की, करूँगा ॥३६॥३८|| महावीर धृष्टद्युम्न जब इस प्रकार सर सेना के अग्रभाग में अर्जुन स्थित हुए। अर्जुन के युद्ध के लिए प्रस्तुत हुए तर सर पाण्डव प्रसन्न होकर रथ की ध्वजा इन्द्र की आज्ञा से विश्वकर्मा ने बनाई थी। सिंहनाद और जय शब्द करने लगे। अर धर्मराज वह धजा पब के रङ्ग की अनेक पताकाओं से शोभित युधिष्टिर ने सेनापति धृष्टद्युम्न से कहा---हे चीर ! थी । वह आकाशस्थिन गन्धर्व नगर के समान अन्त. जर देवताओं और असुरों का मग्राम हुआ था तर रिक्ष में फहरा रही थी। उसे देखने से जान पड़ता महामनस्वी गृहस्पति ने इन्द्र को जो दुर्भय कौश्चन्यूह था कि मानों यह नृत्य सी कर रही हो। सूर्य के समीप [ ४२२९ अध्याय ५०] म हा भारत - वभूव परमोपेतः सुमेरुरिव भानुना शिरोऽभूदुद्रुपदो राजा महत्या सेनया वृतः ॥४६॥ कुन्तिभोजश्च चैद्यश्च चक्षुर्ध्या तौ जनेश्वरौ दाशार्णकाः प्रभद्राश्च दाशेरकगणैः सह ॥१७॥ अनूपकाः किराताश्च ग्रीवायां भरतर्षभ पटच्चरैश्च पौण्ड्रेश्च राजन्पौरवकैस्तथा ॥४८॥ निपादैः सहितश्चाऽपि पृष्ठमासीद्युधिष्ठिरः पक्षौ तु भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्पतः ॥४९॥ द्रौपदेयाभिमन्युश्च सात्यकिश्च महारथः पिशाचा दारदाश्चैव पुण्ड्राः कुण्डीविषैः सह ॥ ५०॥ मारुता धेनुकाश्चैव तङ्गणाः परतङ्गणाः वाल्हिकास्तित्तिराश्चैव चोलाः पाण्ड्याश्च भारत ॥ ५१ ॥ एते जनपदा राजन्दक्षिणं पक्षमाश्रिताः अग्निवेशास्तुहुण्डाश्च मालवा दानभारयः ॥ ५२॥ शवरा उद्भसाश्चैव वत्साश्च सह नाकुले नकुलः सहदेवश्च वामं पक्षं समाश्रिताः रथानामयुतं पक्षो शिरस्तु नियुतं तथा पृष्ठमवुदमेवाऽऽसीत्सहस्राणि च विंशतिः ॥ ५ ॥ ग्रीवायां नियुतं चाऽपि सहस्राणि च सप्ततिः । पक्षकोटिप्रपक्षेषु पक्षान्तेषु च वारणाः स्थित होकर ब्रह्मा जैसे शोभित होते है, वैसे ही उम भीमनन, धृष्टद्युम्न, महारया मा यकि, बीटी कपाँची प्रकाशमान पजा के समीप अर्जुन की शोभा दुई पुत्र, अभिमन्यु पिशाचगण, पुण्गण, दग्द, कुन्टी- ॥१२॥४५॥ बहुत सी मेना गापारिय हुए राजा द्रुपद पि, मारन. धेनुरू, ताण, पग्नमण, याहाक, नित्तिर, उस व्या के मग्नक में स्थित हुए । कुन्निभोन और गांर चार आदि देशों के पीर दक्षिणा में, और दिपनि दोनों राजा नेत्र के स्थान में गित हुए। अमिषशरठ, मार, दानभारि, सयर, उदग, पम सागंदशीय, प्रभाकगण, दाशरस, अनुपम और और नापुर आदि बांगे की मेना के मार नकुल मिसनमण उगी गन के मान में गित | और मांस्य यारक्ष में मिल रए ॥४९॥५॥ धर्मगन गरिराय पटगर, पद पाया और नि- यूह के दोनों पक्षों में दम हमार (1) दाण गार उसके प्रभाग मे गित मा ६।५०॥ मे दम पर (FATT) में दम यगड (एक ४२३० ] म हा भा [ भीमराव । जग्मुः परिवृता राजञ्चलन्त इव पर्वताः जघनं पालयामास विराटः सह केकयैः ॥५६॥ काशिराजश्च शैव्यश्च रथानामयुतैस्त्रिभिः एवमेनं महाव्यूह व्यूह्य भारत पाण्डवाः ॥ ५७॥ सूर्योदयं त इच्छन्तः स्थिता युद्धाय दंशिताः । तेषामादित्यवर्णानि विमलानि महान्ति च श्वेतच्छनाण्यशोभन्त वारणेषु रथेषु च ॥ ५८॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्मणि भीष्मपर्वणि क्रौंचव्यूहनिर्माणे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥ अर्बुद ) बीस हजार और गर्दन में एक नियुत सत्तर रक्षा कर रहे थे । हे राजन् ! इस प्रकार सूर्योदय हजार रथ रक्खे गये । उसके चारो ओर, पक्षों और | की प्रतीक्षा करते हुए सव वीरों सहित राजा युधिष्ठिर उनके किनारों में--प्रकाशमान पर्वतों के समान-~ आदि पाण्डय व्यूह की रचना करके, काच आदि सुवर्ण-भूपित हाथियों के झुण्ड चले । कैकेय देश के पहनकर, युद्धभूमि में स्थित हुए। उनके हाथियों राजाओं सहित राजा विराट उस व्यूह के जङ्घा भाग और रथो के ऊपर सूर्य के समान चमकीले अत्यन्त की रक्षा कर रहे थे। काशिराज और शैव्य तीस निर्मल श्वेत छत्र तने हुए थे ॥५४।५८॥ हज़ार रथों सहित उस व्यूह के दूसरे जड्डा भाग की भीष्मपर्व का पचासमाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५० ॥ सञ्जय उवाच--- अप एसपश्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥ क्रौञ्चं ततो व्यूहमभेयं तनयस्तव रक्ष्यमाणं महाघोरं पार्थेनाऽमिततेजसा आचार्यमुपसङ्गम्य कृपं शल्यं च पार्थिव सौमदति विकर्ण च सोऽश्वत्थामानमेव च ॥ २ ॥ दुःशासनादीन्भ्रातृ॑श्च सर्वानेव च भारत अन्यांश्च सुबहश्शूरान्युद्धाय समुपागतान् प्राहेदं वचनं काले हर्पयंस्तनयस्तव नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः एकारन अन्याय ॥ ५१ ॥ सञ्जय कहते हैं कि हे महाराज ! महातेजस्वी सोमदत्त-तनय, विकर्ण, अश्वत्थामा, दु शासन आदि पाण्टयों के रचे हुए उस दुर्भेद्य महा यूह को देखकर भाइयों और युद्ध के लिए आये हुए अपने पक्ष के अन्य ? आपके पुत्र दुर्योधन ने द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, शल्य, । शूरवीरों को सम्बोधन करके उत्साहित और प्रसन अध्याय ५१ ] म हा भारत [ ४२३१ ." एकैकशः समर्था हि यूयं सर्वे महारथाः पाण्डुपुत्रारणे हन्तुं ससैन्यान्किमु संहताः ॥ ५ ॥ अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् पर्याप्तमिदमेतेषां वलं भीमाभिरक्षितम् संस्थानाः शूरसेनाश्च वेत्रिकाः कुकुरास्तथा आरोचकास्त्रिगर्ताश्च मद्रका यवनास्तथा शत्रुञ्जयेन सहितास्तथा दुःशासनेन च विकर्णेन च वीरेण तथा नन्दोपनन्दकैः चित्रसेनेन सहिताः सहिताः पारिभद्रकैः भीष्ममेवाऽभिरक्षन्तु सहसैन्यपुरस्कृताः ततो भीष्मश्च द्रोणश्च तव पुत्राश्च मारिप अव्यूहन्त महाव्यूह पाण्डनां प्रतिवाधकम् ॥१०॥ भीष्मः सैन्येन महता समन्तात्परिवारितः ययौ प्रकर्षन्महतीं वाहिनी सुरराडिव ॥ ११ ॥ तमन्वयान्महेष्वासो भारद्वाजः प्रतापवान् कुन्तलेश्च दशाणेश्च मागधैश्च विशाम्पते ॥ १२ ॥ विदर्भमैकलैश्चैव कर्णप्रावरणैरपि सहिताः सर्वसन्येन भीष्ममाहवशोभिनम् ॥ १३॥ गान्धाराः सिन्धुसौवीराः शिवयोऽथ वसातयः । शकुनिश्च स्वसैन्येन भारद्वाजमपालयत् ॥१४॥ करते हुए कहा-॥१४॥ हे बोरो ! तुम सब अनेक | त्रिगत, मद्रक, यवन आदि देशों के राजा लोग और शस्त्र और शास्त्र जाननेवाले हो । तुममें से हर एक शत्रुनय, दुःशासन, विकर्ण, सुधीर, चित्रसेन, नन्दक, वीर पाण्डवों को और उनकी सेना को नए कर उपनन्दक, पारिभदक आदि सब वीर अपनी-अपनी सकता है । फिर जब सभी मिलकर यह यन्न कर सेना साथ लेकर भीष्म पितामह की रक्षा करें ||७९ रहे हो तब इसमें क्या सन्देह किया जा सकता है ! इस तरह दुर्योधन के कहने पर महातेजस्वी भीष्म, हमारी सेना अपार है और उसके रक्षक महापराक्रमी । द्रोण और आपके सब पुत्र पाण्डवों के आक्रमण भीष्म हैं । पाण्डवों की सेना परिमित है और उसके को रोकनेवाले महान्यूह की रचना करने लगे रक्षक भीमसेन है॥४॥६॥इस समय मेरा यही कहना महावीर भीष्म बहुत सी सेना साथ लेकर इन्द्र की है कि संस्थान, शूरसेन, वेत्रिक, कुकुर, आरोचक, तरह आगे चले । गान्धार, सिन्धु-सौवीर, शिवि, ४२३२ ] म हा भारत [ भीमराव । ततो दुर्योधनो राजा सहितः सर्वसोदरैः अश्वातर्विकर्णश्च तथा चाऽम्बष्ठकोसलैः ॥ १५ ॥ दरदैश्च शकैश्चैव तथा क्षुद्रकमालवैः अभ्यरक्षत संहृष्टः सौबलेयस्य वाहिनीम् ॥ १६ ॥ भूरिश्रवाः शलः शल्यो भगदत्तश्च मारिपः विन्दानुविन्दावावन्त्यौ वामं पार्श्वमपालयन् ॥१७॥ सौमदत्तिः सुशर्मा च काम्बोजश्च सुदक्षिणः । श्रुतायुश्चाऽच्युतायुश्च दक्षिणं पक्षमास्थिताः ॥ १८ ।। अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः महत्या सेनया साध सेनापृष्टे व्यवस्थिताः ॥ ९९ ॥ पृष्ठगोपास्तु तस्याऽऽसन्नानादेश्या जनेश्वराः । केतुमान्वसुदानश्च पुत्रः काश्यस्य चाऽभिभूः ॥ २० ॥ ततस्ते तावकाः सर्वे हृष्टा युद्धाय भारत दध्मुः शङ्खान्मुदा युक्ताः सिंहनादांस्तथोन्नदन् ॥ २१ ॥ तेषां श्रुत्वा तु हृष्टानां वृद्धः कुरुपितामहः सिंहनादं विनद्योच्चैः शहं दध्मौ प्रतापवान् ॥ २२ ॥ ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पेग्यश्च विविधाः परैः । आनकाश्चाऽभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ २३ ॥ वसाति, कुन्तल, दशार्ण, मगध, विदर्भ, मेकल, की रक्षा कर रहे थे ॥१४॥१८॥ अश्वत्थामा, कृपा- कर्णप्रावरण आदि देशों की वीर सना को साथ लिये । चार्य, कृतवर्मा, केतुमान् , वसुदान, काशिराज पुत्र हुए महाप्रतापी द्रोणाचार्य उनके पीछे चले ॥१०॥१४॥ अदि अनेक देशो के राजा अपनी-अपनी सेना को अपनी बहुत सी सेना के साथ वीर शकुनि द्रोणाचार्य साथ लेफर उस व्यूह के पृष्ठभाग की रक्षा कर रह के पाछे चले । उनके पीछे राजा दुयाधन अपने सत्र थे । इस प्रकार व्यूह बन जाने के पश्चात् आपकी भाइयों को साथ लेकर चले । दुर्योधन के साथ अश्वा वीर माहिना के सब सनिक, प्रसन्नतापूर्वक युद्ध के तक, विकर्ण, वामन, कोशल, अम्बष्ट, दरद, शक, लिए उत्साहित होकर, शङ्ख बजाने और सिंहनाद क्षुद्रकमारव आदि देशों के प्रसन्नचित्त बार पुरुषों | करने लगे ॥१९॥२१॥ कुरुवृद्ध पितामह भीष्म भी की सेना थी । भूरिश्रया, सल, शल्य, भगदत्त, विन्द उस शब्द को सुनकर शङ्ख बजाने आर सिंहनाद और अनुविन्द उम सेना के पाम भाग का रक्षा कर करने लगे। उधर पाण्डवों की सेना में भी शङ्ख, रहे थे । सोमदत्त-तनय, सुशर्मा, काम्बोजपति सुद । नगाडे, डङ्के आदि अनेक प्रकार के बाजे बनने क्षिण, श्रुतायु ओर अच्युनायु सेना के दक्षिण भाग लगे । यह गम्भार शब्द चारो ओर गूंज उठा। महा - ।
अध्याय ५२] म हा भा र त { ४२३३ ततः श्वेनैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थिती प्रदध्मतुः शङ्खवरौ हेमरत्नपरिष्कृतौ ॥ २४ ॥ पाञ्चजन्यं हृपीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः पौण्डूं दध्मौ महाशङ्ख भीमकर्मा वृकोदरः ॥ २५॥ अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः नकुलः सहदेवश्च सुघोपमणिपुष्पको ॥ २६॥ काशिराजश्च शेव्यश्च शिखण्डी च महारथः धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्च महारथः ॥२७॥ पाशाल्याश्च महेष्वासाद्रौपद्याः पञ्च चाऽऽत्मजाः। सर्वे दध्मुर्महाशडान्सिंहनादांश्च नेदिरे ॥ २८ ॥ स घोपः सुमहांस्तत्र वीरैस्तैः समुदीरितः नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयत् ॥ २९॥ एक्मेते महाराज प्रहृष्टाः कुरुपाण्डवाः पुनर्युद्धाय सञ्जग्मुस्तापयानाः परस्परम् ॥३०॥ इति श्रीमहाभारते भीमपर्वणि भीष्माणि कारपत्र्यहरचनाया एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥५१॥ प्रभारशाली नारायण और अर्जुन रथ पर मवार दुए। धनुर्दर दृपद, द्रौपदी के पांचों पुत्र और अभिमन्यु उस रथ में श्वेत रग के घोड़े जुते हुए थे॥२२॥२४॥ आदि भी मिह की तरह गरजकर दशा बनाने लगे केशा ने पानजन्य, अर्जुन ने देवदत्त, भीमरी ॥२५॥२८॥ इन मर गीरी का मिहनाद और शानाद भीमसेन ने पौण्ड, कुन्नीपुर युधिष्टिर ने अनन्तविजय, पृथ्वी नया आराशमण्डल में प्रतियनित हो उठा । नकुल ने मुगोप और महदा ने मणिपुथक नाम का है राजेन्द्र कौरव और पाण्डव लोग प्रसन्नतापूर्वक दिव्य गा बजाया । काशिराज, शंव्य, महारथी फिर एक दूसरे को मन्तापित करने रए युद्ध के लिए शिरगण्टी, पेटद्युस, विराट, महावीर सा यकि, महा उधन १० ॥२९॥३०॥ भाणारया एवानगे अध्याय ममाप्त हुआ ।। ५१ ।। - " + -- अद्विपवागतमोऽगाय ॥ ५२ ।। तराष्ट्र उवाच - एवं व्यूढेपनीकेषु मामकेवितरेषु च कथं प्रहरतां श्रेयाः सम्प्रहारं प्रचकिरे गप उपान-समं व्यूहेष्वनीकेषु सन्नमविरघजम् अपारमिव सन्दश्य सागरप्रनिमं बलम् ४२३४ ] म हा भारत [ भीमा - तेषां मध्ये स्थितो राजन्पुत्रो दुर्योधनस्तव अब्रवीत्तावकान्सर्वान्युयध्वामिति दंशिताः ॥ ३ ॥ ते मनः क्रूरमाधाय समाभित्यक्तजीविताः पाण्डवानभ्यवर्तन्त सर्व एवोच्छ्रितध्वजाः ततो युद्धं समभवत्तुमुलं लोमहर्पणम् तावकानां परेपांच व्यतिपक्तरथद्विपम् मुक्तास्तु रथिभिर्वाणा रुक्मपुङ्खाः सुतेजसः सन्निपेतुरकुण्ठाग्रा नागेषु च हयेषु च तथा प्रवृत्ते संग्रामे धनुरुषम्य दंशितः अभिपत्य महावाहुर्भीष्मो भीमपराक्रमः ॥ ७ ॥ सौभद्रे भीमसेने च सात्यको च महारथे कैकेये च विराटे च धृष्टद्युम्ने च पार्पते एतेषु नरवीरेषु चेदिमत्स्येपु चाऽभिभूः ववर्ष शरवर्षाणि वृद्धः कुरुपितामहः अभिद्यत ततो व्यूहस्तस्मिन्वीरसमागमे सर्वेषामेव सैन्यानामासीद्वयतिकरो महान् सादिनो ध्वजिनश्चैव हतप्रवरवाजिनः विद्रुतरथानीकाः समपद्यन्त पाण्डवाः बावनवाँ अध्याय ॥ ५२ ॥ धृतराष्ट्र ने पूछा-- हे सञ्जय ! कौरवों और : सेना घोर युद्ध करने लगी। हाथी से हाथी और रथ पाण्डवों की सेना में इस प्रकार व्यूह-रचना हो चु- से रथ भिड गये । रथों पर से युद्ध करने वाले वीर कने पर वे रण-निपुण योद्धा किस प्रकार युद्ध करने । हाथियों और घोड़ों पर सुवर्णपुट्सयुक्त तीक्ष्ण अकुण्ठिन लगे ? ॥१॥ सञ्जय ने कहा- हे राजेन्द्र ! सेनाओ बाण मारने लगे॥४६॥ हे राजन् ! इस प्रकार भयानक में व्यूह-रचना हो चुकी, चारों ओर ऊँची घजाएँ , समर छिड़ने पर महावली भीष्म कवच पहनकर, धनुष फहराने लगी । वह अपार सेना समुद्र सी प्रतीत होने उठाकर, शत्रुपक्ष के अभिमन्यु, महावीर भीमसेन, महा- लगी। आपके पुत्र राजा दुर्योधन ने उस अपार सैन्य- सी अर्जुन, केकेय, विराट, धृष्टद्युम्न,चेदि और मस्यदेश सागर के मध्य में खड़े होकर अपने योद्धाओं को युद्ध | आद के वीर योद्धाओं पर निरन्तर बाणों की वर्षा आरम्भ करने की अनुमति दी। ॥२॥३॥ फहगती करने लगे। महावीर भीष्म के आने पर उस व्यूह हुई ऊँची घजाओं से शोभित रथों पर विराजमान की शृहला नष्ट हो गई, सब यादा क्षोभ से विह्वल पारगण, जीवन का मोह छोड़कर, क्रोधपूर्वक पाण्डवों । हो गये । मैनिकों ने अपने को विपत्ति में पड़ा हुआ की सेना पर आक्रमण करने लगे। दोनों ओर की ममझा ||७|१०|| पाण्डवों के बहुत से पैदल, धुड़- : । ~~-~- T. 3 अन्याय ५२ ] अर्जुनस्तु नव्याघ्रो दृष्ट्वा भीष्म महारथम् बाणेयमत्रवीत्क्रुद्धो याहि यत्र पितामहः ॥ १२ ॥ एप भीष्मः मुसंकुद्धो वाष्र्णेय मम वाहिनीम् । नाशयिष्यति सुव्यक्तं दुर्योधनहिने रतः एप द्रोणः कृपः शल्यो विकर्णश्च जनार्दन । धाराष्ट्राश्च सहिता दुयोधनपुगेगमाः ॥ १२ ॥ पश्चालानिहनिष्यन्ति रक्षिता दृढधन्वना सोऽहं भीमं वधिप्यामि सैन्यहेतोर्जनार्दन ॥ १५ ॥ तमब्रवीदासुदेवो यत्तो भव धनञ्जय पप त्वां प्रापयिष्यामि पितामहरथं प्रति एवमुक्त्वा ततः शोरी रथं तं लोकविश्रुतम् । प्रापयामास भीष्मम्य रथं प्रति जनेश्वर ॥ १७॥ चलद्वहुपताकेन बलाकावर्णवाजिना ममुन्टिनमहाभीमनदवानरकेतुना महता मेघनादेन रथेनाऽमिततेजसा विनिघ्नन्कारवानीकं शूरसेनांश्च पाण्डवः प्रायाधरणदः शीघं मुहदां हर्षवर्धनः तमापतन्तं वेगेन प्रभिन्नमिव धारणम् वामयन्तं रणे शृगन्मर्दयन्तं च मायः मन्धवप्रमावर्गातः प्रान्यमापीर केकयः - - ४२३६ ] म हा भारत | भीष्मपर्व सहसा प्रत्युदीयाय भीष्मःशान्तनवोऽर्जुनम् । को हि गाण्डीवधन्वानमन्यः कुरुपितामहात् ॥ २२ ॥ द्रोणवैकर्तनाभ्यां वा रथी संयातुमर्हति ततो भीष्मो महाराज सर्वलोकमहारथः ॥ २३ ॥ अर्जुनं सप्तसप्तत्या नाराचानां समाचिनोत् द्रोणश्च पञ्चविंशत्या कृपः पञ्चाशता शरैः ॥ २४॥ दुर्योधनश्चतुःपष्टया शल्यश्च नवभिः शरैः सैन्धवो नवभिश्चैव शकुनिश्चाऽपि पञ्चभिः विकर्णो दशभिर्भल्लै राजन्विव्याध पाण्डवम् । स तेर्विद्धो महेष्वासः समन्तान्निशितैः शरैः ॥ २६ ॥ न विव्यथे महाबाहुर्भिद्यमाम इवाऽचलः स भीष्मं पञ्चविंशत्या कृपं च नवभिः शरैः ॥२७॥ द्रोणं पष्टया नरव्याघ्रो विकर्णं च त्रिभिः शरैः। शल्यं चैव त्रिभिर्वाण राजानं चैव पञ्चभिः ॥ २८॥ प्रत्यविध्यदमेयात्मा किरीटी भरतर्षभ तं सात्यकिविराटश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ २९॥ द्रौपदेयाभिमन्युश्च परिवत्रुधनञ्जयम् ततो द्रोणं महेष्वासं गाङ्गेयस्य प्रिये रतम् ॥ ३०॥ महापराक्रमी अर्जुन पीरों को डराते और तीक्ष्ण दस भल्ल आण मारकर चारो ओर से अर्जुन को बाणों से मारते युद्ध के लिए आ रहे हैं, यह देखकर घायल कर दिया । उन वीरो ने चारों ओर से वाण प्राच्य, सौवीर, कैकेय और सन्धव आदि महावीरो से मारकर भरार को क्षत विक्षत तो कर दिया, किन्तु सुरक्षित पितामह भीष्म शीघ्र ही उनकी ओर आगे | महाधनुर महाबाहु अर्जुन पर्वत की तरह अचल रहे । कुर पितामह भीष्म, गुर द्रोणाचार्य आर अतुल खडे रहे ॥२४।२७। इसके पश्चात् अर्जुन ने भी बरशाली कर्ण के बिना आर कान व्यक्ति युद्धभूमि | मोम को पचीस, कृपाचार्य को नव, द्रोणाचार्य को में गाण्डीयन्या महारथी अर्जुन के सामने जा सकता। साठ, विकर्ण को तीन, शल्य को तीन और दुर्योधन ॥२१॥२३॥ महावीर भीष्म ने अर्जुन के पास पहुँच- को पाँच बाण मारकर सो घायल कर दिया । कर उनको सतहत्तर नाराच बाण मारे । साथ ही उमा समय सायकि, विराट, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु और द्रोणाचार्य ने पचीस, कृपाचार्य ने पचाम, दुर्योधन द्रौपदी के पाँचों पुत्र अर्जुन की सहायता आर रक्षा ने चौसठ, शल्य ने नव, अश्वथामा ने साठ, जयदय के लिए उनके पास आ गये । भीम का प्रिय और ने नय, शनि ने पाँच बाण और विपर्ण ने सहायता करने वाले द्रोणाचार्य से युद्ध करने के लिए .
अध्याय ५२ ] म हा भारत [ ४२३७ अभ्यवर्तत पाञ्चाल्यः संयुक्तः सह सोमकैः । भीष्मस्तु रथिनां श्रेष्ठो राजन्विव्याध पाण्डवम् ॥ ३१ ॥ अशीत्या निशितैर्वाणैस्ततोऽक्रोशन्त तावकाः । तेशां तु निनदं श्रुत्वा सहितानां प्रहृष्टवत् ॥ ३२ ॥ प्रविवेश ततो मध्यं नरसिंहः प्रतापवान् तेषां महारथानां स मध्यं प्राप्य धनञ्जयः ॥ ३३ ॥ चिक्रीड धनुषा राजॅल्लक्षं कृत्वा महारथान् ततो दुर्योधनो राजा भीष्ममाह जनेश्वरः ॥ ३४ ॥ पीड्यमानं स्वकं सैन्यं दृष्ट्वा पार्थेन संयुगे एप पाण्डुसुतस्तात कृष्णेन सहितो बली ॥ ३५॥ यततां सर्वसैन्यानां मूलं नः परिकृन्तति त्वयि जीवति गाऽन्य द्रोणे च रथिनां वरे ॥ ३६ ॥ त्वत्कृते चैव कर्णोऽपि न्यस्तशस्त्रो विशाम्पते । न युध्यति रणे पार्थं हितकामः सदा मम ॥ ३७॥ स तथा कुरु गाङ्गेय यथा हन्येत फाल्गुनः एवमुक्तस्ततो राजन्पिता देवव्रतस्तव ॥३८॥ धिवक्षात्रं धर्ममित्युक्त्वा प्रायात्पार्थरथं प्रति । उभौ श्वेतहयौ राजन्संसक्तो प्रेक्ष्य पार्थिवाः ॥ ३९ ॥ सिंहनादान्भृशं चक्रुः शसान्दध्मुश्च मारिप द्रौणिर्दुर्योधनश्चैव विकर्णश्च तवाऽऽत्मजः ॥ ४० ॥ उनके सामने सोमको सहित धृष्टद्युम्न आये। इधर देखिए, कर्ण हमारे हितेपी हैं, वे अस्त्र-शस्त्र त्याग श्रेष्ठ रथी भीष्म ने फिर अर्जुन को अस्सी गाण मारे । किये बठे हैं आर पाण्डयों से युद्ध नहीं करते । ऐसा यह देखकर कोरवपक्षीय लोग प्रसन्न होकर कोलाहल उपाय कीजिए जिससे अर्जुन मारे जायें ॥२७॥३८॥ करने लगे। उनका वह शब्द सुनकर अर्जुन बहुत ही दुर्योग्न के ये पचन सुनकर और "हा, क्षान-धर्म को मुद हुए और उन महारथियों के मध्य में प्रवेश करके, धिक्कार है !" कहकर भीष्म अर्जुन के रथ के सामने चारों को लक्ष्य-लक्ष्य करके बाण मारने रगे। यह आये । दोनों के रयों में श्वेत रङ्ग के घोड़े जुते हुए थे। देराकर दुर्योधन ने अब भीष्म से कहा-हे पितामह ! उनको युद्ध में निरत देखकर राजा रोग वारम्बार आप और गुरु द्रोणाचार्य के जीवित रहते ही ये बली , सिंहनाद करने आर शड्स यजाने लगे। महावीर अर्जुन, कृष्ण के साथ आफर, हमारी सेना का नाश अश्वत्थामा, राजा दुर्योधन और विकर्ण भी पाण्डवों कर रहे हैं । ये हमारी जड़ काटने को प्रस्तुत हैं । ' के साथ युद्ध करने की इच्छा से महावीर भीम के ४२३८ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व - - परिवार्य रणे भीष्मं स्थिता युद्धाय मारिष तथैव पाण्डवाः सर्वे परिवार्य धनञ्जयम् ॥४१॥ स्थिता युद्धाय महते ततो युद्धमवर्तत गाङ्गेयस्तु रणे पार्थमानछन्नवभिः शरैः ॥४२॥ तमर्जुनः प्रत्यविध्यद्दशभिर्मर्मभेदिभिः ततः शरसहस्रेण सुप्रयुक्तेन पाण्डवः ॥४३॥ अर्जुनः समरश्लाघी भीष्मस्याऽवारयद्दिशः शरजालं ततस्तत्तु शरजालेन मारिष ॥४४॥ वारयामास पार्थस्य भीष्मः शान्तनवस्तदा उभौ परमसंहृष्टावुभौ युद्धाभिनन्दिनौ ॥४५॥ निर्विशेषमयुध्येतां कृतप्रतिकृतैपिणौ भीष्मचापविमुक्तानि शरजालानि सङ्घशः ॥४६॥ शीर्यमाणान्यदृश्यन्त भिन्नान्यर्जुनसायकैः तथैवाऽर्जुनमुक्तानि शरजालानि सर्वशः ॥४७॥ गाङ्गेयशरनुन्नानि प्रापतन्त महीतले अर्जुनः पञ्चविंशत्या भीष्ममाछैच्छितैः शरैः ॥ ४८ ॥ भीष्मोऽपि समरे पार्थं विव्याध निशितैः शरैः । अन्योन्यस्य हयान्विध्वाध्वजौच सुमहावलौ ॥ ४९ ॥ रथेषां रथचक्रे च चिक्रीडतुररिन्दमौ ततः क्रुद्धो महाराज भीष्मः प्रहरतां वरः पास आ गये । इसी तरह पाण्डवगण भी कौरवों से | को व्यर्थ कर दिया ॥४११४५॥ इस प्रकार वे दोनों महायुद्ध करने के लिए अर्जुन को घेरकर युद्धभूमि | वीर प्रसन्नतापूर्वक एक दूसरे के प्रहार को व्यर्थ करते में स्थित हो गये ॥३८॥४१॥ इसके अनन्तर महा हुए तुल्यरूप से युद्ध करने लगे। जितने वाण भीष्म भयानक संग्राम होने लगा | महापराक्रमी पितामह के धनुष से निकलते थे, उन्हें अर्जुन व्यर्थ कर देते ने अर्जुन के ऊपर नव वाण छोड़े । महारथी अर्जुन थे; और जितने याण अर्जुन के गाण्डीर धनुष से ने भी मर्मभेदी दस बाण भीष्म को मारे | इसके ] निकलते थे, वे भीष्म के बाणों से कट-कटकर पृथ्वी पश्चात् उन्होंने हज़ारों वाण बरसाकर भीष्म को चारो पर गिर पढ़ते थे।४५/४८|| महावीर अर्जुन ने भीष्म ओर से आच्छादित कर दिया। पितामह भीष्म ने को पच्चीस वाण मारे, और भीष्म ने भी अर्जुन को भी असंख्य वाण चलाकर अर्जुन के चलाये बाणों ! नत्र बाण मारे । हे राजेन्द्र ! शत्रुओं का मान-मर्दन :
अध्याय ५२ ] म हा भा र त [ ४२३९ andindiadesisekasurtantiaRA वासुदेवं त्रिभिर्वाणराजघान स्तनान्तरे भीष्मचापच्युतैस्तैस्तु निर्विद्वो मधुसूदनः ॥ ५१ ॥ विरराज रणे राजन्सपुष्प इव किंशुकः ततोऽर्जुनो भृशं क्रुद्धो निर्विद्धं प्रेक्ष्य माधवम् ॥ ५२ ॥ सारथिं कुरुवृद्धस्य निर्विभेद शितैः शरैः यतमानौ तु तो वीरावन्योन्यस्य वधं प्रति ॥ ५३॥ न शक्नुतां तदाऽन्योन्यमभिसन्धातुमाहवे । तौ मण्डलानि चित्राणि गतप्रत्यागतानि च ॥ ५४॥ अदर्शयेतां वहुधा सूतसामर्थ्यलाघवात् अन्तरं च प्रहारेषु तर्कयन्तौ परस्परम् राजन्नन्तरमार्गस्थौ स्थितावास्तां मुहुर्मुहुः उभौ सिंहरवोन्मिभं शतशब्दं च चक्रतुः ॥ ५६॥ तथैव चापनिोपं चक्रतुस्तौ महारथौ तयोः शङ्खनिनादेन रथनेमिखनेन च ॥ ५७॥ दारिता सहसा भूमिश्चकम्पे च ननाद च नोभयोरन्तरं कश्चिद्ददृशे भरतर्षभ ॥ ५८॥ वलिनी युद्धदुर्धर्षावन्योन्यसदृशावुभौ चिन्हमात्रेण भीष्मं तु प्रजजुस्तत्र कौरवाः ॥ ५९ ॥ करनेवाले वे दोनों महावीर एक दूसरे के घोडे, धजा, अपने-अपने सारथी की सामर्थ्य और स्फूर्ति के प्रभार रथचक्र, रथदण्ड आदि को बाणो से बेपते हुए युद्ध- | मे तरह-तरह के मण्डल ओर गत-प्रत्यागत आदि क्रीड़ा करने लगे। इसके पश्चात् महापराक्रमी भीष्म कोशल दिखाने लंगे । एक दूसरे के ऊपर प्रहार करने न क्रुद्ध होकर तरक्स से तीन बाण निकालकर धनुप का अवसर खोजता था। दोनों वीर सिंहनाद, शड- पर चढ़ाकर श्रीकृष्ण की छाती में मारे । भीष्म के नाद ओर धनुप का शब्द कर रहे ये ॥५२॥५७॥ धनुप से छूटे हुए बाणों से घायल होकर श्रीकृष्णचन्द्र उन महारथियों के शवनाद और रथचक्र फिरने के फले हुए पलाश के वृक्ष के समान शोभा को प्राप्त घोर शब्द से पृथ्वी हिलती थी, फटी जाती थी, और हुए ॥४८॥५२॥ श्रीकृष्ण को घायल देखकर महावीर आर्तनाद कर रही थी। उस समय कोई भी यह अर्जुन ग्रोध से अधीर हो उठे । उन्होंने भी तीन निश्चय नहीं कर सकता था कि भीम ओर अर्जुन बाण मारकर भीष्म के सारथी को घायल कर दिया। में कौन निर्मल है ओर कोन बल्वान् है | क्योंकि ये दोनों पीर एक दूसरे के पथ के लिए चेष्टा करके | दोनो ही बली, युद्धदुर्द्धर्प और समान पराक्रम दिखा भी उसमें कृतकार्य नहीं हो सकते थे। दोनों वीर रहे थे। कारस लोग भीष्म को और पाण्डा लोग । ।
४२४० ] महाभारत [ मा व - तथा पाण्डुसुताः पार्थ चिह्नमात्रेण जज्ञिरे तयोर्तृवरयोदृष्ट्वा तादृशं तं पराक्रमम् ॥ ६०॥ विस्मयं सर्वभूतानि जग्मुर्भारत संयुगे न तयोविवरं कश्चिद्रणे पश्यति भारत धर्मे स्थितस्य हि यथा न कश्चिद्वृजिनं क्वचित् । उभौ च शरजालेन तावदृश्यौ बभूवतुः ॥६२ ॥ प्रकाशौ च पुनस्तूर्णं बभूवतुरुभौ रणे तत्र देवाः सगन्धर्वाश्चारणाश्चर्षिभिः सह ॥ ६३ ॥ अन्योन्यं प्रत्यभापन्त तयोर्दृष्ट्वा पराक्रमम् न शक्यौ युधि संरब्धौ जेतुमेतौ कथञ्चन ॥ ६४ ॥ संदेवासुरगन्धर्वैलोकैरपि महारथौ आश्चर्यभूतं लोकेषु युद्धमेतन्महाद्भुतम् नैतादृशानि युद्धानि भविष्यन्ति कथञ्चन नहि शक्यो रणे जेतुं भीष्मः पार्थेन धीमता ॥ ६६ ॥ सधनुः सरथः साश्वः प्रवपन्सायकारणे तथैव पाण्डवं युद्धे देवैरपि दुरासदम् ॥ ६७॥ न विजेतुं रणे भीष्म उत्सहेत धनुर्धरम् आलोकादपि युद्धं हि सममेतद्भविष्यति ॥ ६८॥ इति स्म वाचोऽश्रूयन्त प्रोच्चरन्त्यस्ततस्ततः गाङ्गेयार्जुनयोः संख्ये स्तवयुक्ता विशाम्पते ॥१९॥ अर्जुन को घना के चिह्नमात्र से पहचान पाते थे, । असावधानी या दोप नहीं देख पडता था। वे कभी उनके शरीर को कोई नहीं देख पाता था। क्योंकि एक दूसरे को वाण वर्षा से ढक रेते थे ओर कभी एक तो ने एक स्थान पर नहीं ठहरते थे, दूसरे धूल उन बाणों के जाल कट जाने पर उनके रथ प्रस्ट भी अधिक उड़ रही थी, तीसरे वाण-जाल उन्हें | हो जाते थे ॥६०६३|| हे राजेन्द्र 1 दोनों पुरप- लिपा लेते थे ॥५७६०॥ युद्धभूमि में दोनों का सिंहों का अनुल पराक्रम देखकर देवता, गर्म, ऐसा अद्भुत पराक्रम देखकर अपने और पराय सरको चारण और महर्पिगण परस्पर कहने रगे कि मनुष्य बड़ा आधर्य हो रहा था । हे भारत ! जैसे धर्मा मा की कोन रहे, देवना, असुर और गन्धर्षगण भी सम्राम पुरप में किञ्चित् भर पाप मी नहीं देग्य पड़ता, वैसे में इन दोनों पीरों को परास्त नहीं कर सकते । यह ही उन दोनों के युद्धकौशल में यहीं पर कुछ भी बड़ा अद्भुत सप्राम, ऐसा सग्राम कभी न होगा | अध्याय ५३ ] म हा भारत [ ४२४१ - त्वदीयास्तु तदा योधाः पाण्डवेयाश्च भारत अन्योन्यं समरे जस्तयोस्तत्र पराक्रमे ॥ ७० ॥ शितधारैस्तथा खड्गविमलैश्च परश्वधैः शरैरन्यैश्च बहुभिः शस्त्रैर्नानाविधैरपि ॥७१ ॥ उभयोः सेनयोः शूरा न्यकृन्तन्त परस्परम वर्तमाने तथा घोरे तस्मिन्युद्धे सुदारुणे द्रोणपाञ्चाल्ययो राजन्महानासीत्समागमः इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि भीमार्जुनयुद्धे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥ ५२ ।। धनुप हाथ में लिए और रथ पर सगर भीष्म कभी । सूचक वाक्य चारों ओर सुनाई पड़ रहे थे । उधर अर्जुन से हारनेवाले नहीं हैं, ओर देवताओं के लिए, आपके आर पाण्डयो के पक्ष के योद्धा तीक्ष्ण खड्ग, भी दुर्द्धर्ष अर्जुन का भीष्म से सग्राम में परास्त होना परशु, बाण आदि तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्रों से एक सम्भव नहीं। जब तक सृष्टि की स्थिति है तब तक दूसरे के शरीरों को काट रहे थे । इवर भीष्म ओर भी चाहे यह युद्ध होता रहे, परन्तु दोनों मे से कोई । अर्जुन का घोर युद्ध हो रहा था, उधर द्रोणाचार्य हारनेवाला नहीं हे ॥६३।६९॥ हे महाराज भीष्म आर धृष्टद्युम्न भी दारण सग्राम कर रहे थे॥६९/७२॥ और अर्जुन से युद्ध होते समय इसी प्रकार के प्रशसा भीष्मपर्वका बारननाँ अध्याय समाप्त हुआ ।। ५२ ॥ | अध विपञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥ ५३ ॥ धृतराष्ट्र उवाच -कथं द्रोणो महेष्वासः पाञ्चाल्यश्चाऽपि पार्पतः । उभौ समीयतुर्यत्तौ तन्ममाऽऽचक्ष्व सञ्जय दिष्टमेव परं मन्ये पौरुपादिति मे मतिः यत्र शान्तनवो भीप्मो नाऽतरयुधि पाण्डवम् ॥ २ ॥ भीप्मो हि समरे क्रुद्धो हन्यालोकांश्चराचरान् । स कथं पाण्डवं युद्धे नाऽतरत्सञ्जयोजसा सञ्जय उपाच-शृणु राजन्स्थिरो भूत्वा युद्धमेतत्सुदारुणम् न शक्याः पाण्डवा जेतुं देवैरपि सवासवः तिरपनगाँ अध्याय ॥ ५३॥ धृतराष्ट्र ने यहा-हे सञ्जय । महाधनुर्दर कहो । मैं पौरुष की अपेक्षा देने को ही श्रेष्ठ सम- द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम ने रणभूमि में प्रवेश करक झता है। देखो, जो भीष्म युपित होकर युद्धभूमि किस प्रकार युद्ध किया । उसका सम्पचार मुझसे ' में चराचर जगत् को नष्ट कर सकते हैं वही भीष्म ।
४२४२ ] म हा भारत भीपाप . द्रोणस्तु निशितैर्वाणैधृष्टद्युम्नमविध्यत सारथिं चाऽस्य भल्लेन रथनीडादपातयत् तथाऽस्य चतुरो वाहांश्चतुर्भिः सायकोत्तमैः । पीडयामास संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नस्य मारिष धृष्टद्युम्नस्ततो द्रोणं नवत्या निशितैः शरैः विव्याध प्रहसन्वीरस्तिष्ठ तिष्ठेति चाऽब्रवीत् ॥ ७ ॥ ततः पुनरमेयात्मा भारद्वाजः प्रतापवान् शरैः प्रच्छादयामास धृष्टद्युम्नममर्षणम् आददे च शरं घोरं पार्पतान्तचिकीर्पया शकाशनिसमस्पर्श कालदण्डमिवाऽपरम् हाहाकारो महानासीत्सर्वसैन्येपु भारत तमिपुं सन्धितं दृष्ट्वा भारद्वाजेन संयुगे ॥१०॥ तत्राऽद्भुतमपश्याम धृष्टद्युम्नस्य पौरुपम् यदेकः समरे वीरस्तस्थौ गिरिविाऽचलः तं च दीप्तं शरं घोरमायान्तं मृत्युमात्मनः चिच्छेद शरवृष्टिं च भारद्वाजे मुमोच ह ॥ १२ ॥ तत उच्चुक्रुशुः सर्वे पश्चालाः पाण्डवैः सह । धृष्टद्युम्नेन तत्कर्म कृतं दृष्ट्वा सुदुष्करम् अर्जुन को नहीं मार सके; परन्तु एक तरह से उनसे । महारठी द्रोणाचार्य ने फिर वाण बरसाकर धृष्टद्युम्न हार ही गये ॥१॥३॥ सञ्जय ने कहा --हे राजेन्द्र ! को ढक दिया । अब धृष्टद्युम्न को मारने के लिए अब में द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्न के दारण युद्ध का । उन्होने यजम्प, मृत्युदण्ड-तुल्य, एक अन्य वाण हाय समाचार कहता हूँ, ध्यान देकर मुनिए । इन्द्र सहित में लिया । द्रोणाचार्य ने यह बाण जब धनुप पर देवता कभी युद् में पाण्डवों को नहीं जीत सकते। चढ़ाया तर सब सैनिक हाहाकार करके चिल्ला उठे महावीर द्रोणाचार्य ने अनेक प्रकार के वाणों से ॥१०॥ हे भारत ! उस समय धृष्टद्युम्न का अद्भुत अन धृष्टद्युम्न को धायर करके एक भल्ल वाण मारकर । पारुप देग पड़ा।वे तनिक भी विचलित न होकर वहीं उनके मारथी को रथ पर से मार गिराया । इसके पर पति के समान अचल पड़े रहे । मूर्तिमान् मृत्यु पभात् मृद्ध होकर उनके चारों घोड़ो को चार के मम न उम प्रचलित याण के राह में ही, अपन याण मारे ॥४६॥ तव सृष्टद्युम्न ने भी तीक्ष्ण धार वाण से, दो टुकड़े करके धृष्टद्युम्न बाण घासाने रगे। वाले नये बाणों से द्रोणाचार्य को प्रायल किया और इस प्रकार धृष्टद्युम्न के हाथों यह दुष्कर कार्य होने पर गरी, गोरहो" करपार दर्य प्रस्ट किया। पाण्टर और पाघारगण प्रसन्नतापूर्वक आनन्दभ्यनि अध्याय ५३ ] म हा भारत [ ४२४३ । ततः शनि महावेगां स्वर्णवैदूर्यभूषिताम् द्रोणस्य निधनाकांक्षी चिक्षेप स पराक्रमी ॥ १४ ॥ तामापतन्ती सहसा शक्तिं कनकभूपिताम् त्रिधा चिच्छेद समरे भारद्वाजो हसन्निव शक्ति विनिहतां दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ववर्ष शरवर्याणि द्रोणं प्रति जनेश्वर शरवर्ष ततस्तत्तु सन्निवार्य महायशाः द्रोणो द्रुपदपुत्रस्य मध्ये चिच्छेद कार्मुकम् ॥१७॥ स च्छिन्नधन्वा समरे गदां गुर्वी महायशाः द्रोणाय प्रेपयामास गिरिसारमयी बली सा गदा वेगवन्मुक्का प्रायाद् द्रोणजिघांसया । तत्राऽद्भुतमपश्याम भारद्वाजस्य पौरुपम् ॥ १९ ॥ लाघवाद्वयंसयामास गदां हेमविभूपिताम् व्यंसयित्वा गदां तां च प्रेषयामास पार्पतम् ॥२०॥ भल्लान्सुनिशितान्पीतान्रुक्मपुडान्सुदारुणान् । ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ॥ २१ ॥ अथाऽन्यद्धनुरादाय धृष्टद्युम्नो महारथः द्रोणं युधि पराक्रम्य शरैर्विव्याध पञ्चभिः ॥ २२ ॥ रुधिराको ततस्तौ तु शुशुभाते नरर्षभौ वसन्तसमये राजन्पुष्पिताविर किंशुको ॥ २३॥ करने लगे ॥११॥१३॥ इसके पश्चात् प्रतापी धृष्टद्युम्न यशस्वी धृष्टद्युम ने कुपित होकर आचार्य को मारने ने द्रोणाचार्य को मारने की इच्छा से स्वर्णमयी, ग्रेडूर्यमणि के लिए उनके ऊपर एक वज्र-तुल्य दृढ़, पर्वत- से विभूपित, महागशालिनी एका विकराल शक्ति फेंसी । तुल्य भारी, गदा फंसी ॥१७॥१९॥ पराकमी द्रोणा- महावीर द्रोण ने हँसते-हँसते मार्ग में ही उस शक्ति 'चार्य ने अपने पराक्रम से उमे निष्फल करके सुवर्ण- के तीन ग्यण्ड कर डाले । महारली धृष्टद्युम्न उम पुन युक्त अयन्त तीक्ष्ण भल्ल बाण धृष्टद्युम को शक्ति को इस प्रकार व्यर्थ देगकर द्रोणाचार्य के मारे । ये बाण शृष्टद्युम्न का करच तोड़कर उनके उपर बाण बरसाने लंग ॥१३॥१६॥ महारथी द्रोणा हृदय का रक्त पाने लगे । अब वीर अष्टम ने उमी चार्य ने उस याण-जाल को व्यर्थ करके धृष्टद्युम्न क्षण अन्य धनुष कर पराक्रमपूर्वक पाँच याण का धनुप काट डाला । धनुर कट जाने पर महा होगाचार्य को मारे ॥२०॥२२॥ उम समय दन ।
४२४४ ] म हा भारत [ भीमार - .. अमर्पितस्ततो राजन्पराक्रम्य चमूमुखे द्रोणो द्रुपदपुत्रस्य पुनश्चिच्छेद कार्मुकम् ॥ २४ ॥ अथैनं छिन्नधन्वानं शरैः सन्नतपर्वभिः अभ्यवर्पदमेयात्मा वृष्टया मेघ इवाऽचलम् ॥ २५ ॥ सारथिं चाऽस्य भल्लेन रथनीडादपातयत् अथाऽस्य चतुरो वाहांश्चतुर्भिनिशितैः शरैः ॥ २६ ॥ पातयामास समरे सिंहनादं ननाद च ततोऽपरेण भल्लेन हस्ताच्चापमथाऽच्छिनत् ॥ २७ ॥ स च्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । गदापाणिरवारोहल्यापयन्पौरुपं महत् ॥ २८ ॥ तामस्य विशिखैस्तूर्णं पातयामास भारत रथादनवरूढस्य तदद्भुतमिवाऽभवत् ॥ २९॥ ततः स विपुलं चर्म शतचन्द्रं च भानुमत् । खरं च विपुलं दिव्यं प्रगृह्य सुभुजो वली ॥३०॥ अभिदुद्राव वेगेन द्रोणस्य वधकांक्षया आमिषार्थी यथा सिंहो वने मत्तमिव द्विपम् ॥ ३१ ॥ तत्राऽद्भुतमपश्याम भारद्वाजस्य पौरुषम् लाघवं चाऽस्त्रयोगं च वलं वाह्वोश्च भारत ॥३२॥ यदेनं शरवर्पण वारयामास पार्पतम् न शशाक ततो गन्तुं क्लवानपि संयुगे ॥३३॥ दोनों वीरों के शरीर रुधिर से तर होकर वसन्त किया ॥२३॥२७॥ धनुप कट जाने और सारपी काल में फूले हुए ढाक के पेड़ों के समान दिखाई । सहित घोडों के मरने पर धृष्टद्युम्न ने हाथ में एक पड़ने लगे। हे महाराज ! अमित पराक्रमी द्रोणाचार्य गदा ली। वह गदा लेकर पराक्रम प्रकट करने के ने क्रुद्ध होकर फिर धृष्टद्युम्न का धनुष काट डाला। लिए वे रथ से उतर रहे थे, इसी समय द्रोणाचार्य मेघ जैसे पर्वत के ऊपर जल बरसाता है, वैसे / ने बाणों से वह गदा भी काट डाली । यह देख- ही वे धृष्टद्युम्न के ऊपर सनतपर्व व ण बरसाने लगे। कर सबको बड़ा ही आश्चर्य हुआ । अब वलशाली इसके पश्चात् आचार्य ने एक भल्ल बाण से उनके धृष्टद्युम्न शतचन्द्रयुक्त, अन्यन्त मनोहर, बड़े आकार- सारथी को और चार बाणों से चारो घोड़ों को मार वाली ढाल और दिव्य ग्वग लेकर आचार्य को मारने कर, एक बाण से धनुष काट डाला और सिंहनाद के लिए, मस्त हाथी के सामने सिंह के समान, ।
अध्याय ५३ ] म हा भारत (४२४५ - - निवारितस्तु द्रोणेन धृष्टद्युम्नो महारथः न्यवारयच्छरौघांस्तांश्चर्मणा कृतहस्तवत् ॥ ३४ ॥ ततो भीमो महाबाहुः सहसाऽभ्यपतद्वली साहाय्यकारी समरे पार्पतस्य महात्मनः ॥३५॥ स द्रोणं निशितैर्वाण राजन्विव्याध सप्तभिः । पार्पतं च रथं तूर्णं स्वकमारोहयत्तदा ॥३६ ॥ ततो दुर्योधनो राजन्भानुमन्तमचोदयत् सैन्येन महता युक्तं भारद्वाजस्य रक्षणे ॥३७॥ ततः सा महती सेना कलिङ्गानां जनेश्वर भीममभ्युद्ययौ तूर्णं तव पुत्रस्य शासनात् ॥ ३८ ॥ पाञ्चाल्यमथ सन्त्यज्य द्रोणोऽपि रथिनां वरः । विराटदुपदौ वृद्धौ वारयामास संयुगे ॥३९॥ धृष्टद्युम्नोऽपि समरे धर्मराजानमभ्ययात् ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं लोमहर्पणम् ॥४०॥ कलिङ्गानां च समरे भीमस्य च महात्मनः जगतः प्रक्षयकरं घोररूपं भयावहम् ॥४१॥ इति श्री गहाभारते भीष्माणि भीष्माणि धृष्टद्युम्नद्रोणयुद्धे विपञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥ ५३ ॥ झपटे ॥२८॥३१॥ उस समय महावीर द्रोणाचार्य आचार्य की रक्षा करने के लिए बहुत सी सेना के ने बापट, अखप्रयोग, पारुष और हाय की स्फत्ति साथ कलिङ्ग-नरेश को भेजा ॥३५॥३७॥ आपके दिग्पाई । उन्होंने अकेले ही बाणवी करके धृष्टद्युम्न पुत्र की आज्ञा पाकर कालिग देश की सेना भीममेन को रोक दिया । असाधारण बलशाली होने पर भी के ऊपर आक्रमण करने के Pिए दीद पड़ी। प्रष्ट धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्य के पास तक नहीं जा सके। रथी द्रोणाचार्य तत्र धृष्टद्युम को छोड़कर वृद्ध राजा केरल हाय की स्फत्ति दिग्वाते हुए, ढाल घुमाकर. विराट और दुपट के सामने आ गये और एक मात्र उन बाणों के आधान की रक्षा करते रहे ॥३२॥३४॥ दोनों में युद्ध करने लगे। हे महाराज ! घर शृष्टद्युम्न इमी ममय महापराक्रमी भीममेन वीर धृष्टद्युम्न की युदभूमि में राजा युधिष्टिर के पास गये उभर पराक्रमी सहायता के लिए यहाँ आ गये । उन्होंने नाश्ण भीमगन के साय कहि देश की मना का यदा धारवाले सात याण द्रोणाचार्य को मारे । भीममेन भयानक, जगत् का नाम करने गग. समाम होने या महायता पाझर शृष्टद्युम्न स्फति के साथ उनके ग्गा ॥३८॥४१॥ रस पर मयार हो गये । राना दुर्योधन ने भी भामा या निरपनग अयाय मगाम ॥ ५३॥ ।
४२४६ ग हा भारत [ भाषापर्व - अथ चतुपश्चागत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥ धृतराष्ट्र उवाच--तथा प्रतिसमादिष्टः कालिङ्गो वाहिनीपतिः कथमद्भुतकर्माणं भीमसेनं महावलम् चरन्तं गदया धीरं दण्डहस्तमिवाऽन्तकम् योधयामास समरे कालिंगः सह सेनया सजय उवाच ---पुत्रेण तव राजेन्द्र स तथोक्तो महाबलः महत्या सेनया गुप्तः प्रायाद्भीमरथं प्रति तामापतन्ती महती कलिंगानां महाचमूम् रथाश्वनागकलिलां प्रगृहीतमहायुधाम् भीमसेनः कलिंगानामा द्भारत वाहिनीम् केतुमन्तं च नैपादिमायान्तं सह चेदिभिः ततः श्रुतायुः संक्रुद्धो राज्ञा केतुमता सह आससाद रणे भीमं व्यूढानीकेपु चेदिपु रथैरनेकसाहौः कलिंगानां नराधिप अयुतेन गजानां च निपादैः सह केतुमान् ॥ ७ ॥ भीमसेनं रणे राजन्समन्तात्पर्यवारयत् चेदिमत्स्यकरूपाश्च भीमसेनपदानुगाः अभ्यधावन्त समरे निपादान्सह राजभिः ततः प्रववृते युद्धं घोररूपं भयावहम् ॥ ९ ॥ चीवनयाँ अध्याय || ५४ ॥ धृतराष्ट्र ने कहा- हे सञ्जय ! विशाल सेना केतुमान् को आते देखकर भीमसेन चेदि देश के के सञ्चालक कलिगराज ने, मेरे पुन की आज्ञा वीरों को साथ लेकर उनके सामने आये। उस समय पाकर, दण्डपाणि यमराज की तरह गदा हाथ में क्रोध से अपीर श्रुतायु भी, व्यूह रचकर खड़ी हुई लेकर विचरते हुए अद्भुतकर्मा महापराक्रमी भीमसेन सेना के द्वारा सुरक्षित होकर, राजा केतुमान् के साथ से फिम प्रकार युद्ध किया ? सब वृत्तान्त मुझे सुनाओ भीमसेन के सामने आये ॥३६॥ कलिङ्गराज ने कई ॥१२॥ सञ्जय ने कहा – हे राजेन्द्र ! महाबलशाली । हज़ार रथों से आर महावीर केतुमान् ने निपाद-सेना कलिङ्ग-नरेश आपके पुत्र की आज्ञा से बहुत सी सेना तथा दस हज़ार हाथियों से भीमसेन को घेर लिया। साथ लेकर भीममेन के रथ की ओर बहे । घड़े, उबर भीममेन के आगे स्थित चेदि, मस्य और कम्प हाथी, रथ आदि पर मगर और अस्त्र-शस्त्र हाथ में देश के वीर और अन्य बहुत से राजा निपाद-सेना लिये कलिङ्ग टेश के सैनिकों को तथा निपादनन्दन से युद्ध करने के लिए आगे बढे । इस प्रकार एक ।
अध्याय ५४ ] म हा भा र त [ ४२४७ - न प्राजानन्त योधाः स्वान्परस्परजिघांसयां । घोरमासीततो युद्धं भीमस्य सहसा परैः ॥ १० ॥ यथेन्द्रस्य महाराज महल्या दैत्यसेनया तस्य सैन्यस्य संग्रामे युध्यमानस्य भारत ॥ ११ ॥ वभूव सुमहाशब्दः सागरस्येव गर्जतः अन्योन्यं स्म तदा योधा विकर्पन्तो विशाम्पते ॥ १२ ॥ महीं चक्रुश्चितां सर्वां शशलोहितसन्निभाम् । योधांश्च स्वान्परान्वापि नाऽभ्यजानञ्जिघांसया ॥ १३ ॥ स्वानयाददते स्वाश्च शूराः परमदुर्जयाः विमर्दः सुमहानासीदल्पाना बहुभिः सह कलिंगैः सह चेदीनां निपादैश्च विशाम्पते कृत्वा पुरुषकारं तु यथाशक्ति महावला: ॥१५॥ भीमसेनं परित्यज्य संन्यवर्तन्त चेदयः सर्वेः कलिंगरासन्नः सन्निवृत्तेपु चेदिपु ॥ १६ ॥ स्ववाहुवलमास्थाय सन्न्यवर्तत पाण्डवः न चचाल रथोपस्थागीमसेनो महाबलः शितैरवाकिरद्वाणैः कलिंगानां वरूथिनीम् कालिंगस्तु महेष्वासः पुत्रश्चाऽस्य महारथः ॥ १८ ॥ दूसरे को मारने की इच्छा से परस्पर बदकर दोनों डालते थे । कलिग देश के सनिक और निषादगण पक्षों के वीरों में घोर समाम होने लगा ॥७॥१०॥ सन्या में अधिक थे। उनके साथ थोड़ी संरयागले हे राजेन्द्र ! जैसे इन्द्र ने बहुत बड़ी दैत्य-मेना के चेदिगण का युद्ध होने लगा । चटिगण ने पहले साथ युद्ध किया था वैसे ही भीममेन भी शत्रुदल के यथाशक्ति अपना पराक्रम और पौरुष दिगाया, परन्तु साय अ यन्त घोर संग्राम करने लगे। उस समय उम अन्न को ये शत्रुमेना का आक्रमण न राम सके महासेना का कोलाहल महासागर के गर्जन के समान और अन्यन्त व्यथित होकर, भीमगेन को छोड़कर, जान पड़ने लगा । योद्धा लोग एक दूसरे के शरीरों भाग पड़े हुए । इस प्रकार चे दिगण के विमुग होने को काट रहे थे, इस कारण मारी पृथ्वी मांम और पर महागर भीममन, आपने यायर का आश्रय रा को कीचड़ से परिपूर्ण हो गई ॥१०।१३|| रण- लेकर, कदिासेना के सामने जाकर संग्राम करने दुर्मद गोरगण, हिंसाप्रवृत्ति के वश होने के कारण, रगे॥१३॥१७|| अटट भार से रथ पर स्थित भीम- अपने-पराये का स्याल नहीं कर मरते थे। वदन लोग मेन नावण बाण चटाकर करिना को मारने अपने ही पक्ष के लोगों को -आमीयों को और प्रायः करने दंगे । तर महाधनुर्दर कटिगगन ।
४२४८ ] म हा भारत भीमपर्व शकदेव इति ख्यातो जनतुः पाण्डवं शरैः ततो भीमो महावाहुर्विधुन्वन्रुचिरं धनुः योधयामास कालिंगं ववाहुवलमाश्रितः शकदेवस्तु समरे विस्तृजन्सायकान्वहून् ॥ २० ॥ अश्वाञ्जघान समरे भीमसेनस्य सायकैः तं दृष्ट्वा विरथं तत्र भीमसेनमरिन्दमम् ॥ २१ ॥ शकदेवोऽभिदुद्राव शरैरवकिरशितैः भीमस्योपरि राजेन्द्र शक्रदेवो महाबलः ॥ २२ ॥ ववर्ष शरवाणि तपान्ते जलदो यथा हताश्वे तु रथे तिष्ठन्भीमसेनो महाबलः ॥ २३ ॥ शकदेवाय चिक्षेप सर्वशैक्यायसी गदाम् स तया निहतो राजन्कालिङ्गतनयो रथात् ॥ २४ ॥ विरथः सह सूतेन जगाम धरणीतलम् हतमात्मसुतं दृष्ट्वा कलिंगानां जनाधिपः ॥ २५॥ रथैरनेकसाहस्रीमस्याऽवारयदिशः ततो भीमो महावेगां त्यक्त्वा गुर्वी महागदाम् ॥ २६ ॥ निस्त्रिंशमाददे घोरं चिकीर्षु कर्म दारुणम् चर्म चाऽप्रतिमं राजन्नार्यभं पुरुषर्षभ ॥ २७॥ नक्षत्रैरर्धचन्द्रश्च शातकुम्भमयश्चितम् कालिंगस्तु ततः क्रुद्धो धनुामवमृज्य च ॥२८॥ और उनके पुत्र शक्रदेव, दोनों युद्धभूमि में भीमसेन जल बरसात हे वसे ही शनदेन भीमसेन के ऊपर के ऊपर तीक्ष्ण वाण बरसाने रगे । उस समय बाण बरसाने लगे । बिना घेड़ो के रथ पर स्थित भीमसेन अपने बाहर का आश्रय लेकर, धनुष महापराक्रमी भीमसेन ने एक सुदृढ़ गदा उठासर चढ़ाकर, कलिङ्ग देश की सेना से घोर युद्ध करने शकदेव के ऊपर फेंकी । उस गदा के आघात से लगे । करिङ्ग देश के राजकुमार शत्रदेव ने बहुत महावीर शक्रदेव, उनमा रथ, ध्वजा, घोड़े आर से बाणों से भीममेन के रथ के घोडों को मार सायी सरस्व चूर चूर हो गया ॥२१॥२५॥ पुर की डाला ॥१७॥२१॥ इस प्रकार उन्हें रथ हीन करके मृत्यु देग्यकर महारथी कलिगराज बोध से अधार असग्य बाण बरसाते हुए शकदेव भीममन के हो उठे । उन्होंने कई हजार रथों से भीमसेन को आक्रमण करने को दोडे । मेव जसे वर्षाकाल में घेर लिया । तन महावीर भीममेन ने भयानक कर्म ऊपर अध्याय ५४ ] महा भा र त [ ४२४९ । marcoacanciscendanseree प्रगृह्य च शरं घोरमेकं सर्पविषोपमम् प्राहिणोद्धीमसेनाय वधाकांक्षी जनेश्वरः ॥ २९॥ तमापतन्तं वेगेन प्रेरितं निशितं शरम् भीमसेनो द्विधा राजंश्चिच्छेद विपुलासिना ॥ ३० ॥ उदकोशच्च संहृष्टस्त्रासयानो वरूथिनीम् कालिङ्गोऽथ ततः कुद्धो भीमसेनाय संयुगे ॥ ३१ ॥ तोमरान्प्राहिणोच्छीघ्रं चतुर्दश शिलाशितान् । तानप्राप्तान्महाबाहुः खगतानेव पाण्डवः ॥ ३२ ॥ चिच्छेद सहसा राजन्नसम्भ्रान्तो वरासिना । निकृत्त्य तु रणे भीमस्तोमरान्वै चतुर्दश ॥३३॥ भानुमन्तं ततो भीमः प्राद्रवत्पुरुषर्षभः भानुमांस्तु ततो भीमं शरवर्पण छादयन् ॥३४॥ ननाद वलबन्नादं नादयानो नभस्तलम् न च तं ममृपे भीमः सिंहनादं महाहवे ॥३५॥ ततः शब्देन महता विननाद महास्वनः तेन नादेन वित्रस्ता कलिंगानां वरूथिनी न भीमं समरे मेने मानुपं भरतर्षभ ततो भीमो महाबाहुर्नर्दित्वा विपुलं स्वनम् करने की इच्छा से गदा छोडकर खड्ग और हेममय । अत्यन्त तीक्ष्ण चौदह बाण छोड़े। वे सब तोमर नक्षत्रों तथा अर्द्धचन्द्र के चिह्न से शेभित अति दृढ | बाण आकाशमार्ग से होकर ज्योही भीमसेन के पास वृपभचर्म की ढाल ले ली ॥२५॥२८॥ महाबली पहुंचे त्याही उन्होंने खड्ग से उन बाणों को काट कलिङ्गराज ने भीमसेन को देखकर क्रोधपूर्वक धनुप । डाला । कलिङ्गराज के मारे हुए तोमर बाण कट पर प्रत्यश्चा चढाकर, उनको मारने के लिए, एक जाने पर विक्रमशाली भीमसेन कुँअर भानुमान् को विषेले सर्प-तुल्य भयानक बाण हाथ में लिया। ताककर दौड़े। कुँअर भानुमान् असंख्य बाणों से कलिगराज ने धनुप पर चढाकर वह वाण छोड़ भीमसेन को छाकर आकाश को कैंपानेवाला सिंह- दिया परन्तु भीमसेन ने तीक्ष्ण धार वाले खड्ग से नाद करने लगे ॥३१॥३५|| भानुमान् के सिंहनाद उस बाण के दो खण्ड कर डाले । वे कौरयो के | को महावीर भीमसेन सह नही सके । वे भी कुद्ध मन में त्रास उत्पन्न करते हुए बडे आनन्द से सिंह- | होकर ज़ोर से गरजने लगे । उस शब्द से कलिङ्ग- नाद करने लगे ॥२८॥३१॥ अव महावीर कलिङ्ग- सेना भयभीत होकर काँाने लगी । उस सेना को नाथ ने क्रोध से अधीर होकर भीमसेन के ऊपर भीमसेन कोई असाधारण देवता जान पड़ने लगे । - ४२५०] म हा भारत [ भीमपर्व .. । - - सासिर्वेगवदाप्नुत्य दन्ताभ्यां वारणोत्तमम् आरुरोह ततो मध्यं नागराजस्य मारिप ॥३८॥ ततो मुमोच कालिंगः शक्तिं तामकरोद् द्विधा । खड्ड्रेन पृथुना मध्ये भानुमन्तमथाऽच्छिनत् ॥ ३९ ॥ सोऽन्तराऽऽयुधिनं हत्वा राजपुत्रमरिन्दमः गुरुं भारसहं स्कन्धे नागस्याऽसिमपातयत् ॥ ४०॥ छिन्नस्कन्धः स विनदन्पपात गजयूथपः आरुग्णः सिन्धुवेगेन सानुमानिव पर्वतः ॥४१॥ ततस्तस्मादवप्लुत्य गजाद्भारत भारतः खड्गपाणिरदीनात्मा तस्थौ भूमौ सुदंशितः ॥ ४२ ॥ स चचार वहून्मार्गानभितः पातयन्गजान् अग्निचक्रमिवाऽऽविद्धं सर्वतः प्रत्यदृश्यत ॥४३॥ अश्ववृन्देषु नागेषु रथानीकेषु चाऽभिभूः पदातीनां च सद्धेषु विनिघ्नन्शोणितोक्षितः ॥४४॥ श्येनवद्वयचरदीमो रणेऽरिषु वलोत्कटः छिन्दस्तेषां शरीराणि शिरांसि च महावलः ॥१५॥ खड्ड्रेन शितधारेण संयुगे गजयोधिनाम् पदातिरेकः संक्रुद्धः शत्रूणां भयवर्धनः ॥४६॥ सम्मोहयामास स तान्कालान्तकयमोपमः मूढाश्च ते तमेवाऽजौ विनदन्तः समाद्रवन् ॥४७॥ हे राजेन्द्र ! इसके पश्चात् गम्भीर गर्जन करते हुए चन्किार करके पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके गिरने भीमसेन हाथ में तलवार लिये रथ पर से कूद पड़े के पहले ही भीमसेन उसके ऊपर से नीचे कूद और बड़े वेग से दौड़े। वे भानुमान् के हाथी के पड़े । अब ग्वद्ग हाथ में लिये हुए भीमसेन दर्ष के दोनों दाँतों पर पांओं रखकर उसके ऊपर चढ़ गये । साथ अजेय हाथियों का सहार करने लगे। वे उस उस समय वह हाथी शिवरयुक्त पर्वत सा जान गज-सेना के मध्य अग्निचक्र के समान चारों ओर पड़ने लगा | महापीर भीममेन ने हाथी के ऊपर फिरने लगे !!४०१४३॥ हाथियों पर सार असाय जाकर पहले ग्वद्ग से भानुमान् का सिर काट । योद्धाओं के मिर काटने, चारों को रिमोहित करने गिगया ॥३५॥३९॥ और फिर हाथी के कन्धे पर हुए क्रोधित भीममेन अफेटे ही काल के समान युद्ध तयार का एक हाय मारा | इसमे यह हाथी घोर भूमि में विचरने लगे ॥४४४७॥ वीरगण विमद से अध्याय ५४ ] म हा भारत [४२५१ सासिमुत्तमवेगेन विचरन्तं महारणे निकृत्य रथिनां चाऽऽजौ रथेषाश्च युगानि च ॥ ४८ ॥ जघान रथिनश्चाऽपि बलवारिपुमर्दनः भीमसेनश्चरन्मार्गान्सुबहून्प्रत्यदृश्यत ॥४९॥ भ्रान्तमाविद्धमुद्धान्तमाप्नुतं प्रसृतं प्लुतम् सम्पातं समुदीणं च दर्शयामास पाण्डवः ॥५०॥ केचिदग्रासिना छिन्नाः पाण्डवेन महात्मना विनेदुर्भिन्नमर्माणो निपेतुश्च गतासवः छिन्नदन्ताग्रहस्ताश्च भिन्नकुम्भास्तथा परे वियोधाः स्वान्यनीकानि जनुर्भारत वारणाः निपेतुरुया च तथा विनदन्तो महारवान् छिन्नांश्च तोमरान्राजन्महामात्रशिरांसि च ॥५३॥ परिस्तोमान्विचित्रांश्च कक्ष्याश्च कनकोज्ज्वलाः । ग्रैवेयापयथ शक्तीश्च पताकाः कणपस्तिथा ॥ ५४॥ तूणीरानथ यन्त्राणि विचित्राणि धपि च भिन्दिपालानि शुभ्राणि तोत्राणि चांऽकुशैः सह ।। ५५ ॥ घण्टाश्च विविधा राजन्हेमगर्भान्सरूनपि पततः पातितांश्चैव पश्यामः सह सादिभिः छिन्नगात्रावरकरौनिहतैश्चाऽपि वारणैः आसीद्भूमिः समास्तीर्णा पतितैर्भूधरैखि ॥ ५७॥ होकर भयानक शब्द करते हुए भीमसेन की ओर । सूंड, मस्तक, आदि अङ्ग कट गये। उन्होंने दौड़े। शत्रुदलनाशन भीमसेन रथों के दण्ड और चीत्कार करते हुए इधर-उधर दौड़कर, गिरकर, युग आदि को तोड़ते-फोड़ते और योद्धाओं को मारते । अपने ही पक्ष के सैनिकों को कुचल डाला ॥५१॥५३॥ इधर-उधर भ्रान्त, उद्धान्त, आविद्ध, आप्तुत, प्रसृत, हे राजेन्द्र ! उस युद्ध में तोमर, अंकुश, महायत, प्लुत, सम्पात और समुदीर्ण आदि प्रकार-प्रकार की योद्धाओं के सिर, विचित्र कम्बल, सुवर्णमण्डित गतियों और पैतरों से विचरने लगे ॥४७॥५०॥ बाँधने की रस्सियाँ, हाथी-घोड़ों की गर्दन बाँधने की भीमसेन के भयङ्कर खड्ग-प्रहार से हाथियों के | रस्सियाँ, शक्ति, पताका, तरकस, बाजे, विचित्र धनुष, मर्मस्थल कट-कट गये और वे ऊँचे स्वर से चिल्लाते | मुद्गर, भिन्दिपाल, तोत्र, अंकुश, घण्टा, म्याने और हुए पृथ्वी पर गिरने लगे । कुछ हाथियों के दाँत, ( तलवारें आदि सामग्रियाँ गिरती और गिरी हुई चारों ।
४२५२ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व । विमृद्यैवं महानागान्ममर्दाऽन्यान्महाबलः अश्वारोहवरांश्चैव पातयामास संयुगे ॥ ५८ ॥ तद्वोरमभवद्युद्धं तस्य तेषां च भारत खलीनान्यथयोक्त्राणि कक्ष्याश्च कनकोज्ज्वलाः॥ ५९ ।। परिस्तोमाश्च प्रासाश्च ऋष्टयश्च महाधनाः कवचान्यथ चर्माणि चित्राण्यास्तरणानि च तत्र तत्राऽपविद्धानि व्यदृश्यन्त महाहवे प्रासैर्यन्त्रविचित्रंश्च शस्त्रैश्च विमलैस्तथा ॥ ६१ ॥ स चक्के वसुधां कीर्णा शवलैः कुसुमैरिव आप्नुत्य रथिनः कांश्चित्परामृश्य महाबलः ॥ ६२ ॥ पातयामास खड्नेन सध्वजानपि पाण्डवः मुहुरुत्पततो दिक्षु धावतश्च यशस्विनः ॥६३॥ मार्गाश्च चरतश्चित्रं व्यम्मयन्त रणे जनाः स जघान पदा कांश्चिद्वयाक्षिप्याऽन्यानपोथयत्॥ ६४॥ खड्नेनाऽन्यांश्च चिच्छेद नादेनाऽन्यांश्च भीपयन् । ऊरुवेगेन चाऽप्यन्यान्पातयामास भूतले ॥६५॥ परे चैनमालोक्य भयात्पञ्चत्वमागताः एवं सा बहुला सेना कलिङ्गानां तरखिनाम् ॥ ६६ ॥ ओर देख पड़ती थीं। हाथियों की सूड़ों और छिन्न पुष्प खिल रहे हैं ||५७६२॥ उस समय महावीर भिन्न लाशों के ढेर पर्वत के समान देव पड़ते थे। भीमसेन उछल-उछलकर खड्ग के प्रहार से रथों और ॥५३॥५॥ हे राजेन्द्र ! महाबली पराक्रमी भीमसेन घोडों पर सवार योद्धाओं के सिर और ध्वजाए काट- इस प्रकार हाथियों की सेना का विनाश करके घोड़ों काटकर गिराने लगे। वे बारम्बार धावन, उत्पतन तथा उनके सवारों को मारने और गिराने लगे। आदि गतियो के अनुसार पैंतरे बदलकर चारों ओर उस समय कौरव पक्ष के योद्धाओं के साथ महावीर | फिर रहे थे। उनका यह पराक्रम ओर स्फूर्ति देख- भीमसेन का बड़ा भयानक युद्ध होने लगा । उम कर लोगों को बड़ा आश्चर्य हो रहा था। किसी- महासग्राम में लगाम, जोत, सुवर्णमण्डित चमकती किसी योद्धा को उन्होंने पाओं से कुचलकर मार हुई बाँधने की रस्सियाँ, प्रास, ऋष्टि, काच, ढाल, डाला । किसी को खींचकर पटक दिया। किसी तरह-तरह के आस्तरण ओर आभूपण पृथ्वी पर को गड्ग के प्रहार से दो-टुकड़े कर डाला । चारों ओर निखर पड़ने के कारण ऐसा जान पड़ने । कोर्ट उनके भयानक मिहनाद से ही डरकर मर लगा मानों पृथ्वी पर भान्ति भान्ति के श्वेत कुमुद्र गया। कुछ लोग उनकी जाँघों के भार से पृथ्वी पर अध्याय ५४ ] म हा भारत [ ४२५३ परिवार्य रणे भीष्मं भीमसेनमुपाद्रवत् ततः कालिंगसैन्यानां प्रमुखे भरतर्षभ श्रुतायुपमभिप्रेक्ष्य भीमसेनः समभ्ययात् तमायान्तमभिप्रेक्ष्य कालिंगो नवाभिः शरैः ॥ ६८॥ भीमसेनममेयात्मा प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे कालिंगवाणाभिहतस्तोत्रादित इव द्विपः ॥ ६९ ॥ भीमसेनः प्रजज्वाल क्रोधेनाऽग्निरिवधितः अथाऽशोकः समादाय रथं हेमपरिष्कृतम् भीमं सम्पादयामास रथेन रथसारथिः तमारुह्य रथं तूर्णं कौन्तेयः शत्रुसूदनः ॥७१ ॥ कालिंगमभिदुद्राव तिष्ठ तिष्ठेति चाऽब्रवीत् ततः श्रुतायुर्वलवान्भीमाय निशिताशरान् ॥७२ ॥ प्रेषयामास संक्रुद्धो दर्शयन्पाणिलाघवम् स कार्मुकवरोत्स्सृष्टैनवभिनिशितैः शरैः ॥७३॥ समाहतो महाराज कालिंगेन महात्मना सञ्चुकुशे भृशं भीमो दण्डाहत इवोरगः ॥७॥ क्रुद्धश्च चापमायम्य वलवद्वालिनां वरः कालिंगमवधीत्पार्थो भीमः सप्तभिरायसेः ॥७५॥ शुराभ्यां चक्ररक्षी च कालिंगस्य महावलो । सत्यदेवं च सत्यं च प्राणिोद्यमसादनम् ॥ ७६ ॥ गिर पड़े । बहुत लोग उन्हें देखकर ही भय के मारे अथा अकुश मारने से जैसे हाथी उत्तेजित हो मर गये ॥६२।६६|| इस प्रकार उम अमित कलिङ्ग उठता है, यमे ही उन बाणों के लगने से भीममेन सेना को जब भीमसेन मारने लगे तब उम सेना के कोर के मारे प्रज्वलित हो उठे । इमी ममय मारया लोग भीष्म की शरण में गये। भीष्म के साथ फिर ' अशोक भीममेन के पाम मुवर्णमण्डिन रप लेकर करिनमंना भीममेन की ओर बढ़ी । भीममेन उम पहुँचा । भीममेन उस रथ पर सवार हुए और "टहर कटिङ्गसेना के साथ श्रुनायु को आते देराकर उनकी तो जा, टहर तो जा" कहते हुए कनिमराज की और और चले । पराक्रमी कलिहाराज श्रुतायु ने भीमसेन दौडे ॥६६॥७२॥ ययान् कलिगराज ध्रुनायु ने युक्ति को आने देगकर उनी यक्ष स्थल में तीक्ष्ण नव होकर म्फत्ति कमाय मीममेन के उपर मय बागडोद। बाण मारे। धन पड़ने मे जमे अमिजल उटनी है, । महाग्री पगमी भाममन ने कारिगरान के धनुष से - ४२५४ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व . ततः पुनरमेयात्मा नाराचैर्निशितैस्त्रिभिः केतुमन्तं रणे भीमोऽगमयद्यमसादनम् ॥७७॥ ततः कलिंगाः सन्नद्धा भीमसेनममर्षणम् अनीकैर्वहुसाहौः क्षत्रियाः समवारयन् ॥ ७८॥ ततः शक्तिगदाखड्गतोमरप्टिंपरश्वधैः कलिंगाश्च ततो राजन्भीमसेनमवाकिरन् ॥७९॥ सन्निवार्य स तां घोरां शरवृष्टिं समुस्थिताम् । गदामादाय तरसा सन्निपत्य महाबलः ॥ ८० ॥ भीमः सप्तशतान्वीराननयद्यमसादनम् पुनश्चैव द्विसाहस्रान्कलिंगानरिमर्दनः ॥ ८१ ॥ प्राहिणोन्मृत्युलोकाय तदद्भुतमिवाऽभवत् एवं स तान्यनीकानि कलिंगानां पुनः पुनः ॥ ८२ ॥ विभेद समरे तूर्णं प्रेक्ष्य भीमं महारथम् हतारोहाश्च मातङ्गाः पाण्डवेन कृता रणे ॥८३॥ विप्रजग्मुरनीकेयु मेघा वातहता इव मृद्गन्तः स्वान्यनीकानि विनदन्तः शरातुराः ॥ ८४ ॥ ततो भीमो महावाहुः खड्गहस्तो महाभुजः सम्प्रहृष्टो महाघोपं शङ्ख प्राध्मापयद्बली ॥ ८५॥ छुटे हुए वाणों की चोट खाकर, डण्डे से मारे गये विषले दौड़े । गदा के प्रहार से उन्होंने सात सौ क्षत्रियों सर्प के तुल्य अत्यन्त कुपित होकर धनुप चढाया । को मार गिराया । इसी तरह भीष्म के सामने ही इसके पश्चात् लोहमय सात बाणों मे कलिगराज | दो सहस्र और वीरों को मारा । यह बड़ा अद्भुत को, दो बाणों से उनके चक्ररक्षक सत्यदेव को और कार्य हुआ। भीमसेन इस तरह कलिङ्ग देश की तीन तीक्ष्ण नाराच बाणों से केतुमान् को मार कर सेना को समर में वारम्वार छिन्न-भिन्न करने लगे। गिरा दिया ॥७२१७७॥ अब कलिङ्ग देश के क्षत्रिय असंख्य हाथियों पर सवार योद्धा भीम के हाथों लोग क्रोध-वश होकर कई सहस्र सैनिकों सहित मारे गये । सवारों से हीन, बाण की चोट खाये भीमसन से संग्राम करने लंग। मैंकड़ो कलिङ्गदेशीय हुए हायरी, सेना में प्रवेश होकर, यायु से हटाये गये वीरगण शक्ति, गदा, खड्ग, तोमर, ऋष्टि, परश्वध | मेघों की तरह चिल्लाते और गरजते हुए अपनी ही आदि शस्त्र भीमसेन के ऊपर बरसाने लगे ||७८ सेना को कुचटने और रौंदने लगे 1८०८४॥ इमी ७२|| महाबली भीमसेन उस वाण आदि शत्रों की समय पङ्ग हाथ में लिये हुए भीममेन हर्प के साथ चरी को निकल करके, भारी गदा टेकर, वेग से मस बजाने लगे । उम शब्द से मब कलिगसेना - अध्याय ५४ ] म हा भारत [ ४२५५ । - .. । सर्वकालिंगसैन्यानां मनांसि समकम्पयत् मोहश्चाऽपि कलिंगानामाविवेश परन्तप प्राकम्पन्त च सैन्यानि वाहनानि च सर्वशः । भीमेन समरे राजन्गजेन्द्रेणेव सर्वशः मार्गान्वहुन्विचरता धावता च ततस्ततः मुहुरुत्पतता चैव सम्मोहः : समपद्यत ॥ ८८॥ भीमसेनभयत्रस्तं सैन्यं च समकम्पत क्षोभ्यमाणमसम्बाधं ग्राहेणेव महत्सरः त्रासितेषु च सर्वेषु भीमेनाऽद्भुतकर्मणा पुनरावर्तमानेषु विद्रवत्सु च संघशः ॥ ९०॥ सर्वकालिंगयोधेपु पाण्डनां ध्वजिनीपतिः अब्रवीत्स्वान्यनीकानि युध्यध्वमिति पार्पतः ॥ ९१ ॥ सेनापतिवचः श्रुत्वा शिखडिप्रमुखा गणाः भीममेवाऽभ्यवर्तन्त स्थानीकैः प्रहारिभिः ॥ ९२ ॥ धर्मराजश्च तान्सर्वानुपजग्राह पाण्डवः महता मेघवर्णेन नागानीकेन पृष्ठतः ॥ ९३ ॥ एवं सन्नोद्य सर्वाणि स्वान्यनीकानि पार्पतः । भीमसेनस्य जग्राह पाणि सत्पुरुपैर्वृतः ॥ ९४ ॥ नहि पञ्चालराजस्य लोके कश्चन विद्यते भीमसात्यकयोरन्यः प्राणेभ्यः प्रियकृत्तमः ॥ ९५॥ के लोग बहुत व्याकुल हो गये । उनके दिल धडकने कर और भागी हुई कलिङ्गसेना को फिर वापस आते लगे । अनेक पैंतरे बदलकर, बारम्बार उछलकर, हुए देख पाण्डव-सेना के प्रधान सेनापति धृष्टद्युम्न इधर-उधर दौड़कर, गजराज सदृश भीम को वीर. ने अपनी सेना को युद्ध करने की आज्ञा दी। सेना- सेना का संहार करते देख शत्रुपक्ष के वीर बहुत ही पति की आज्ञा पाकर शिखण्डी आदि योद्धा लोग व्याकुल हो गये । जैसे कोई विकट ग्राह बड़े तालाब बहुत से रथी-अतिरथी आदि के साथ, भीमसेन की को मय डाले वैसे ही भीमसेन ने भी उस सेना को | सहायता करते हुए शत्रुसैना से युद्ध करने लगे मथ डाला । सब सैनिकों के हृदय काँपने लगे। ॥९०१९२॥ धर्मराज युधिष्ठिर भी मेघवर्ण हाथियों वे भय के मारे प्राण लेकर इधर-उधर भाग खड़े का भारी दल साथ लिये उन लोगों के पीछे सहायता हुए ॥८५/८९॥ भीमसेन का यह अद्भुत कार्य देख- ' के लिये चले । इस प्रकार अपनी सारी सेना को । । - ४२५६ ] म हा भारत [ भीमपी सोऽपश्यच्च कलिंगेषु चरन्तमरिसूदनः भीमसेनं महावाहुं पार्पतः परवीरहा ॥९६ ॥ ननद बहुधा राजन्हष्टश्चाऽऽसीत्परन्तपः शहूं दध्मौ च समरे सिंहनादं ननाद च ॥९७॥ स च पारावताश्वस्य रथे हेमपरिष्कृते कोविदारध्वजं दृष्ट्वा भीमसेनः समाश्वसत् ॥ ९८॥ धृष्टद्युम्नस्तु तं दृष्ट्वा कलिंगेः समभिद्रुतम् भीमसेनममेयात्मा त्राणायाऽऽजौसमभ्ययात् ।। ९९ ॥ तो दूरात्सात्यकिं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नवृकोदरौ कलिंगान्समरे वीरौ योधयेतां मनखिनौ ॥१०॥ स तत्र गत्वा शैनेयो जवेन जयतां वरः पार्थपार्वतयोः पाणि जग्राह पुरुषर्षभः ॥१०१॥ स कृत्वा दारुणं कर्म प्रगृहीतशरासनः आस्थितो रौद्रमात्मानं कलिंगानन्ववक्षत ॥१०२॥ कलिंगप्रभवां चैव मांसशोणितकर्दमां रुधिरस्यन्दिनीं तत्र भीमः प्रावर्तयन्नदीम् ॥१०३।। अन्तरेण कलिङ्गानां पाण्डवानां च वाहिनीम् । तां सन्ततार दुस्तारां भीमसेनो महाबलः ॥१०४॥ युद्ध की आज्ञा देकर वीर धृष्टद्युम्न भीमसेन के पार्श्व देखकर महापीर धृष्टद्युम्न उनकी रक्षा करने के लिये स्थान पर स्थित होकर उनकी महायता करने लगे । आगे बढे ॥९६१९९॥ महावीर सात्यकि ने दूर से उनके साथ और भी बहुतरे श्रेष्ठ योद्धा थे । भीम भीमसेन आर धृष्टद्युम्न को कलिङ्ग सेना के साथ युद्ध सेन आर सात्यकि से बढ़कर और कोई भी धृष्टद्युम्न करते देखा तो वे भी शीघ्र ही वहाँ पहुँचकर उनके को प्रिय नहीं था ॥२३॥९५|| भीममेन को शत्रु पार्श्वभाग को रक्षा करने लगे। महावीर भामसेन ने सेना के मध्य काल की भाति विचरते देखकर, धनुष हाथ में लेकर, रादभार धारण कर,ऐसा दारण महाबली शत्रुनाशन पाञ्चालनन्दन, प्रसन्नतापूर्वक युद्ध किया कि कलिङ्गदेशीय वीरों के शरीरों का गरजने और शङ्ख बजाने लगे । धृष्टद्युम्न के कपोत कटकर ढेर लग गया, रक्त की नदी बह चली और के रङ्गाले घोडों से युक्त, सुवर्णमण्डित, रथ पर उनमें मास की कीचड मच गई । कलिङ्ग-सेना कोविदार ( राल कचनार )चिह्न की घजा पहराते आर पाण्डर सेना के मध्य यह भयानक रक्त की देखार भीमसेन को भी आश्वास हुआ । कलिङ्गसेना नदी वहने लगी । उस दुरतर नदी के उस पार को भीमसेन पर आक्रमण करने के लिये दौडते महाबली भीमसेन ही उतर सके, और सब लोग ।
अध्याय ५४ ] म हा भारत [ ४२५७ । - भीमसेनं तथा दृष्ट्वा प्राक्रोशस्तावका नृप कालोऽयं भीमरूपेण कलिंगैः सह युध्यते ॥१०५॥ ततः शान्तनवो भीपमः श्रुत्वा तं निनदं रणे । अभ्ययात्त्वरितो भीमं व्यूढानीकः समन्ततः ॥१०६॥ तं सात्यकिर्भीमसेनो धृष्टद्युम्नश्च पार्वतः अभ्यद्रवन्त भीष्मस्य रथं हेमपरिष्कृतम् ॥१०७॥ परिवार्य तु ते सर्वे गाड्न्यं तरसा रणे त्रिभित्रिभिः शरैघोरीष्ममानच्छुरोजसा ॥१०८॥ प्रत्यविध्यत तान्सर्वान्पिता देवव्रतस्तव यतमानान्महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगेः ॥१०९॥ ततः शरसहस्रेण सन्निवार्य महारथान् हयान्काञ्चनसन्नाहान्भीमस्य न्यहनच्छरैः ॥११०॥ हताश्वे स रथे तिष्ठन्भीमसेनः प्रतापवान् शक्तिं चिक्षेप तरसा गाङ्गेयस्य रथं प्रति ।।१११॥ अप्राप्तामथ तां शक्तिं पिता देवव्रतस्तव त्रिधा चिच्छेद समरे सा पृथिव्यामशीर्यत ॥११२॥ ततः शैक्यायसी गुरू प्रगृह्य बलवान्गदाम् भीमसेनस्ततस्तूर्णं पुप्लवे मनुजर्षभ ॥११३॥ सात्यकोऽपि ततस्तूर्ण भीमस्य प्रियकाम्यया । गाङ्गेयसारथिं तूर्णं पातयामास सायकैः ॥११॥ डूब गये ॥१००।१०४॥ हे महाराज ! उस समय तीनों चीरों ने भीम को नीन-तीन तीक्ष्ण बाण आपके पक्ष के योद्धा चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे--- | मारे | आपके पिता देववत ने भी तीन-तीन बाण यह साक्षात् काल ही भीमसेन का रूप रखकर तीनों पीरों को मारे । इसके पथात् एक सहस्र याण कलिङ्ग-सेना के साथ युद्ध कर रहा है ! तर भीष्म छोड़कर भीष्म ने तीनो महारथियों का वेग रोककर पितामह अपनी सेना का चिल्लाना सुनकर, व्यह- कई तीक्ष्ण बाणों से भीमसेन के सुवर्ण-भूपित घोड़ों रचनापूर्वक सेना साथ लेकर, शीघ्रता से भीमसेन को मार डाला ॥१०८।११०॥ रिक्त रथ पर स्थिन की ओर दौड़े ॥१०५।१०७|| उधर महाबली भीम- प्रतापी भीमसेन ने वेग से भीष्म के रथ के ऊपर सेन, धृष्टद्युम्न और सायकि, भीष्म के रथ के पास एक शक्ति चलाई । भीम ने बाणों से राह में ही उम पहुँचकर, उनका रय घेरकर, युद्ध करने लगे। शक्ति को तीन टुकड़े करके पृथ्वी पर गिरा दिया। - [ भीमपर ४२५८ ] म हा भारत भीष्मस्तु निहते तस्मिन्सारथौ रथिनां वरः वातायमानस्तर श्वेरपनीतो रणाजिरात ॥११५॥ भीमसेनस्ततो राजन्नपयाते महावते प्रजज्वाल यथा वह्निर्दहन्कक्षमिवैधितः ॥११६॥ स हत्वा सर्वकालिङ्गान्सेनामध्ये व्यतिष्ठत नैनमभ्युत्सहन्केचित्तावका भरतर्षभ ॥११७॥ धृष्टद्युम्नस्तमारोप्य स्वरथे रथिनां वरः पश्यतां सर्वसैन्यानामपोवाह यशस्विनम् ॥११८॥ सम्पूज्यमानः पाञ्चाल्यैर्मत्स्यैश्च भरतर्षभ धृष्टद्युम्नं परिष्वज्य समयादथ सात्यकिम् ॥११९॥ अथाऽब्रवीद्भीमसेनं सात्यकिः सत्वविक्रमः प्रहर्पयन्यदुव्याघ्रो धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ॥१२०॥ दिष्टया कलिङ्गराजश्च राजपुत्रश्च केतुमान् शक्रदेवश्च कालिङ्गः कलिङ्गाश्च मृधे हताः ॥१२१॥ खवाहुबलवीर्येण नागाश्वरथसंकुलः महापुरुपभूयिष्ठो धीरयोधनिपेवितः ॥१२२॥ महाव्यूहः कलिङ्गानामेकेन मृदितस्त्वया एवमुक्त्वा शिनेनप्ता दीर्घवाहुररिन्दम ॥१२३॥ तब भीमसेन एक लोहमया गदा लेकर रथ से उतर प्रताप आर पराक्रम को नहीं सह सका, किमी में पडे । इसी समय महापीर सात्यकि ने भीमसेन का उनमा सामना करने का साहस नहीं देख पडता प्रिय करने की इच्छा से तीक्ष्ण वाण मारकर भीष्म के था । इसी समय महारथी धृष्टद्युम्न उनके पास आये सारथी को मारकर रथ पर से गिरा दिया । सारथी ओर उनको अपने रथ पर बिठा कर युद्धभूमि से के मरते ही इधर-उधर अव्यवस्थित रूप से भागते ले गये । पाञ्चाल अर मस्य देश की सेना के हुए घोडे भीष्म के रथ को युद्धभूमि से हटा रे सब लोग भामसेन की प्रशसा कर रहे थे । भीमसेन, गये ॥११११११५॥ महावत भीष्म के युद्धभूमि से धृष्टद्युम्न को गले से लगाकर, सात्या के पास गये हटते ही भीमसेन फिर प्रचलित होकर, मूखी घास ॥११६।११९॥ यदुश्रेष्ठ पराक्रमी सायकि धृष्टद्युम्न को अग्नि की तरह, शनुसेना को नष्ट करने लगे। के सामने भीममेन को प्रसन्न करते हुए कहने लगे- कलिङ्ग देश की सेना के मव वीरों को मारकर 'हे वृकोदर । बडे ही भाग्य की बात ह कि तुमने भीमसेन अपनी सेना के मध्य पहुँच गये । हे कलिङ्गराज श्रुतायु, राजकुमार केतुमान् , शक्रदेव महाराज ! आपरी सेना का कोई भी वीर उनके और सम्पूर्ण कलिगसेना को मार डाला । अपने । हटा अध्याय ५५ म हा मा र त ४२५९ - स्थाद्रथमभिद्रुत्य पर्यप्वजत पाण्डवम् ततः स्वस्थमास्थाय पुनरेव महारथः तावकानवधीत्क्रुद्धो भीमस्य बलमादधत् ॥१२४॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मववपर्वणि द्वितीययुद्धदिवसे कलिगराजवधे चतुप्पश्चाशत्तमोऽध्यायः ।।५४॥ बाहुबल और पराक्रम से हाथियो, घोडो, रथो और | से उतरकर भीमसेन के रथ पर जाकर उनको गले महाबली पुरुषों से कलिङ्गसेना को दुर्भेद्य महाव्यूह , से लगा लिया । महारथी सात्याक फिर अपने रथ नष्ट-भ्रष्ट करके तुमने दुष्कर और अद्भुत कर्म किया पर आकर भीमसेन की सेना को साथ लेकर आपकी है " महावीर सात्यकि ने अब शीघ्रता से अपने रथ । सेना का संहार करने लगे ॥१२०११२४॥ भीष्मपर्व का चौपनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५४ ॥ अश पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ सन्जय उवाच--गतपूर्वाह्नभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि भारत रथनागाश्वपत्तीनां सादिनां च महाक्षये द्रोणपुत्रेण शल्येन कृपेण च महात्मना समसज्जत पाञ्चाल्यस्त्रिभिरेतैर्महारथैः ॥ २ ॥ स लोकविदितानश्वान्निजघान महाबलः द्रोणेः पाञ्चालदायादः शितैर्दशभिराशुगैः ॥३॥ ततः शल्यरथं तूर्णमास्थाय हतवाहनः द्रौणिः पाञ्चालदायादमभ्यवर्षदथेपुभिः धृष्टद्युम्नं तु संयुक्तं द्रौणिना वीक्ष्य भारत सौभद्रोऽभ्यपतत्तूर्णं विकिरन्निशिताशरान् स शल्यं पञ्चविंशत्या कृपं च नवाभः शरैः अश्वत्थामानमष्टाभिर्विव्याध पुरुषर्षभः पचपनवाँ अध्याय ॥ ५५ ॥ सञ्जय कहते हैं-हे महाराज ! इस दिन का । घोडों को ताण दस बाणों से मार टाला । घोड़ों आधा भाग व्यतीत हो जाने पर असंख्य रथ, हाथी, की मृत्यु हो जाने पर अश्वत्थामा शल्य के रथ पर घोड़े, उनके सवार और पैदल मारे जा चुके थे। चढ़कर धृष्टद्युम्न के ऊपर बाण बरसाने लगे ॥१४॥ पाञ्चालपुत्र धृष्टद्युम्न अकेले ही तीन महारथियो वीर अभिमन्यु धृष्टद्युम्न को अश्वत्थामा से युद्ध करते अश्वत्थामा, शल्य और कृपाचार्य- से युद्ध करने | देखकर अन्यन्त तीक्ष्ण बाण बरसाते हुए उनके पास लगे । महावीर धृष्टद्युम्न ने अश्वत्थामा के प्रसिद्ध श्रेष्ठ | पहुँचे । उनके वहाँ पहुँचकर उन्होंने शन्य के ऊपर महा मारत भागपर्व - . आर्जुनिं तु ततस्तूणं द्रोणिर्विव्याध पत्रिणा । शल्योऽथ दशभिश्चैव कृपश्च निशितेत्रिभिः ॥ ७ ॥ लक्ष्मणस्तव पोत्रस्तु सोभद्रं समवस्थितम् । अभ्यवर्तत संहृष्टस्ततो युद्धमवर्तत ॥ ८॥ दोर्योधनिः सुसंक्रुद्धः सोभद्रं परवीरहा विव्याध समरे राजस्तदद्भुतमिवाऽभवत् अभिमन्युः सुसंकुद्धो भ्रातरं भरतर्षभ शरैः पञ्चाशते राजन्क्षिप्रहस्तोऽभ्यविध्यत लक्ष्मणोऽपि पुनस्तस्य धनुश्चिच्छेद पत्रिणा । मुष्टिदेशे महाराज ततस्ते चुक्रुशुर्जनाः तद्विहाय धनुश्छिन्नं सौभद्रः परवीरहा अन्यदादत्तवांश्चित्रं कार्मुकं वेगवत्तरम् ॥१२॥ नौ तत्र समरे युक्ती कृतप्रतिकृतेपिणो अन्योन्यं विशिस्तीक्ष्णैर्जन्नतुः पुरुपर्पभो ॥ १३ ॥ ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा पुत्रं महारथम् पीडितं तव पौत्रेण प्रायात्तत्र प्रजेश्वरः ॥ १४ ॥ सन्निवृत्ते तव सुते सर्व एव जनाधिपाः आर्जुनि रथवंशेन समन्तात्पर्यवारयन् ॥१५॥ स तैः परिवृतः शुरैः शूरो युधि सुदुर्जयः न स्म प्रव्यथते राजन्कृष्णतुल्यपराक्रमः ॥ १६ ॥ पञ्चास, कृपाचार्य के ऊपर नव और अश्वत्थामा के साथ पाँच सौ वाण अपने चचेरे भाई लक्ष्मण को ऊपर आठ बाण चलाये । तब अश्वत्थामा ने बड़े मारे । लक्ष्मण ने भी एक बाण मारकर अभिमन्यु वेग से अभिमन्यु को बाणों से घायल करना आरम्भ के धनुष की मुष्टि काट डाली । यह देखकर लोग किया । शल्य ने भी वारह और कृपाचार्य ने भी । चीत्कार कर उठे ॥८॥११॥ शत्रुनाशन अभिमन्यु तीन वाण अभिमन्यु को मारे ॥५॥७॥ हे राजेन्द्र ! ने कटा हुआ धनुप फेंककर दूसरा धनुष हाथ में आपके पात्र लक्ष्मण ने जब अभिमन्यु को युद्ध करते लिया । वे दोनों वीर परस्पर जय की इच्छा से देखा तब ये भी क्रोध करके, पास पहुँचकर, र दूसरे अयन्त तीक्ष्ण वाण बरसाने लगे। इसके करने लगे । उसके पथात् वे परस्पर घोर युद्ध करने पश्चात् राजा दुर्योधन अभिमन्यु के हाथों अपने पुत्र लगे। अभिमन्यु ने क्रोध मे अधीर होकर स्फति के ! को पीड़ित देखकर शीघ्र उस स्थान पर पहुँचे । तब । । । एक अध्याय ५५ ] म हा भारत [ ४२६१ - सौभद्रमथ संसक्तं दृष्ट्वा तत्र धनञ्जयः अभिदुद्राव वेगेन त्रातुकामः स्वमात्मजम् ततः सरथनागाश्वा भीष्मद्रोणपुरोगमाः अभ्यवर्तन्त राजानः सहिताः सव्यसाचिनम् ॥१८॥ उद्भूतं सहसा भौम नागाश्वरथपत्तिभिः दिवाकररथं प्राप्य रजस्तीत्रमदृश्यत तानि नागसहस्राणि भूमिपालशतानि च तस्य वाणपथं प्राप्य नाऽभ्यवर्तन्त सर्वशः ॥२०॥ प्रणेदुः सर्वभूतानि वभूवुस्तिमिरा दिशः कुरूणां चाऽनयस्तीत्रः समदृश्यत दारुणः ॥ २१ ॥ नाऽप्यन्तरिक्षन दिशो न भूमिर्न च भास्करः । प्रजज्ञे भरतश्रेष्ठ शस्त्रसङ्घः किरीटिनः ॥ २२ ॥ सादिता रथनागाश्च हताश्वा रथिनो रणे विप्रद्रुतरथाः केचिद् दृश्यन्ते रथयूथपाः ॥ २३ ॥ विस्था रथिनश्वाऽन्ये धावमानाः समन्ततः तत्र तत्रैव दृश्यन्ते सायुधाः साङ्गदर्भुजैः ॥ २१ ॥ हयारोहा हयांस्त्यक्त्वा गजारोहाश्च दन्तिनः । अर्जुनस्य भयाद्राजन्समन्ताद्विप्रदुद्रुवुः भीष्म, द्रोण आदि सब योद्धाओं ने रथो के समूह ममय सब प्राणी युद्धभूमि में निरन्तर आर्तनाद और से चारो ओर से अभिमन्यु को घेर लिया ॥१२॥१५॥ । कोलाहल करने लगे । दिशाओं में अंधेरा छा गया। बासुदेव के समान पराक्रमी युद्धदुर्मद शूर अभिमन्यु कौरयो के दारुण अन्याय का फल उस समय प्रत्यक्ष शूरवीरों के मध्य घिर जाने पर भी विचलित या देख पड़ने लगा । अर्जुन के वाण अन्तरिक्ष, दिशा, खिन्न नहीं हुए । अर्जुन ने जब अभिमन्यु को रयो उपदिशा, पृथ्वीमण्डल आदि सब स्थानों में व्याप्त के मध्य घिरा हुआ देग्या तब, उनकी रक्षा के लिये, देख पड़ते थे ॥१९॥२२॥ बाणों के अतिरिक्त पृथ्वी, ने क्रुद्र होकर उसी ओर चल पड़े ॥१६॥१८॥ आकाश या सूर्यमण्डल कुल भी नहीं देख पड़ता हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदलों के पाओ से उड़ी था । उस समय हाथियों और घोड़ों के झुण्ड और हुई धूट ने ऊपर उटकर मूर्यमण्डल तक को छ। उनके मबार मर-मरकर पृथ्वी पर गिरते देख पड़ने लिगा । हजारों हाथियों और घोड़ों पर सार राजा थे और रपट-टूटकर गिर रहे थे। रथियों से हान लोग किमी प्रकार अर्जुन के बाणों की राह से चच रथ इधर-उधर दाहन देग्य पड़ते थे। रम-हीन होकर कर उनके पास तक नहीं पहुँच मरते थे । उस रथी लोग इधर-उधर दाद रहे थे। स्ान म्यान पर --- ४२६२ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व - । रथेभ्यश्च गजेभ्यश्च हयेभ्यश्च नराधिपाः पतिताः पात्यमानाश्च दृश्यन्तेऽर्जुनसायकैः ॥ २६ ॥ सगदानुद्यतान्वाइन्सखड्गांश्च विशाम्पते सप्रासांश्च सतूणीरान्सशरान्सशरासनान् ॥ २७॥ सांकुशान्सपताकांश्च तत्र तत्राऽर्जुनो नृणाम् । निचकत शरैरुप्रै रौद्रं वपुरधारयत् ॥ २८॥ परिघाणां प्रदीप्तानां मुद्राणां च मारिप प्रासानां भिन्दिपालानां निस्त्रिंशानां च संयुगे ॥ २९ ॥ परश्वधानां तीक्ष्णानां तोमराणां च भारत वर्मणां चाऽपविद्धानां काञ्चनानां च भूमिप ॥३०॥ ध्वजानां चर्मणां चैव व्यजनानां च सर्वशः । छत्राणां हेमदण्डानां तोमराणां च भारत ॥३१॥ प्रतोदानां च योक्त्राणां कशानां चैव मारिष । राशयः स्माऽत्र दृश्यन्ते विनिकीर्णा रणक्षितौ ॥ ३२ ॥ नाऽऽसीत्तत्र पुमान्कश्चित्तव सैन्यस्य भारत योऽर्जुनं समरे शूरं प्रत्युद्यायात्कथञ्चन यो यो हि समरे पार्थ प्रत्युद्याति विशाम्पते । स संख्ये विशिखैस्तीक्ष्णैः परलोकाय नीयते ॥ ३४ ॥ तेषु विद्रबमाणेषु तब योधेषु सर्वशः अर्जुनो वासुदेवश्च दधमतुर्वारिजोत्तमौ ॥३५॥ अगद आदि आभूषणों से शोभित कटे हुए हाथ पडे को काटते हुए देख पड रहे थे। परिघ, मुद्गर, थे । अर्जुन के भय से हाथियो के सवार हाथी प्रास, भिन्दिपाल, निस्त्रिंश, तीक्ष्ण परश्वध, लोमर, छोडकर ओर घोड़ों के सवार घोड़े छोड़कर चारों ढाल, धजा, करच आदि सर्वत्र पड़े हुए थे और ओर भागे जा रहे थे। अर्जुन के बाणों की चोट से अन्यान्य शल, छन, सोने के दण्ड, अकुश, प्रतोद, । वीर लोग हाथी, घोड़े, रथ आदि वाहनों के ऊपर कांडे, योन आदि के ढेर इधर-उधर बिग्वर रहे थे। मे गिरते या गिरे हुए देय पडते ये ॥२३॥२६॥ इन दिन्न-भिन्न वस्तुओ से समग्र समरभूमि आच्छादित भयङ्कर मूर्ति धारण किये हुए अर्जुन युद्धभूमि हुई पड़ी थी ॥२॥३२॥ हे राजेन्द्र । आपकी और कोई इधर-उधर योद्धाओं के गदा, बग, तरकस, धनुष, ऐसा साहसी वीर नहीं थ', जो इम सग्राम में अर्जुन चाण, अंकुश, पताका आदि सहित उठे हुए हायों के सम्मुग्व खड़ा होता । जो मनुष्य अर्जुन के सामने हुए अध्याय ५५ ] म हा भारत [ ४२६३ । । तत्प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा पिता देवव्रतस्तव अन्नवीत्समरे शूरं भारद्वाजं स्मयन्निव ॥ ३६॥ एप पाण्डुसुतो वीर कृष्णेन सहितो बली तथा करोति सैन्यानि यथा कुर्याद्धनञ्जयः ॥ ३७॥ न ह्येष समरे शक्यो विजेतुं हि कथश्चन यथाऽस्य दृश्यते रूपं कालान्तकयमोपमम् ॥ ३८ ॥ न निवर्तयितुं चाऽपि शक्येयं महती चमूः । अन्योन्यप्रेक्षया पश्य द्रवतीयं वरूथिनी ॥३९॥ एप चाऽस्तं गिरिश्रेष्टं भानुमान्प्रतिपद्यते चक्षुपि सर्वलोकस्य संहरन्निव सर्वथा ॥ ४० ॥ तत्राऽवहारं सम्प्राप्तं मन्येऽहं पुरुपर्पभ श्रान्ताभीताश्च नो योधान योत्स्यन्ति कथञ्चन ॥४१॥ एवमुक्त्वा ततो भीष्मो द्रोणमाचार्यसत्तमम् । अवहारमथो चक्रे ताबकानां महारथः ॥ १२ ॥ ततोऽवहारः सैन्यानां तव तेषां च भारत अस्तं गच्छति सूर्येऽभूत्सन्ध्याकाले च वर्तति ॥ १३ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि द्वितीययुद्धदिवसानहारे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ गया वहीं, उनके तीक्ष्ण बाण की चोट से, सुरपुर मुख देखकर प्राण लेकर भागी ही जा रही है। सिधारा । आपके पक्ष के सब योद्धा जब भाग गये इस समय इन मनिकों को लोटाना सर प्रकार तब वासुदेव और अर्जुन दोनों हर्ष की सूचना के असम्भव है । सरकी दृष्टि को नष्ट करते हुए मूर्य लिए शख बजाने लगे ॥३३॥३५|| हे राजेन्द्र । नारायण भी अर अस्ताचल पर पहुँच गये हैं। देशात भीष्म ने जब अपनी सेना को इस प्रकार हे पुरुषश्रेष्ट | मैं ममझता हूँ कि आज का युद्ध अर साहस छोड़कर भागते हुए देखा तन उन्होंने हँसकर समाप्त किया जाय । हमारे योद्धा यके और भयभीत टोणाचार्य से कहा -हे आचार्य ! ये वासुर सहित हुए-हुए हैं, इस कारण अब ये किमी प्रकार युद्ध वीर अर्जुन अपने योग्य ही युद्ध कर रहे हैं । इनका न कर सकेंगे ॥३९॥४१॥ है महाराज ! यह रम्प साक्षात् यम के समान देग पड़ता है । इम कहकर महारयी भीम ने युद्ध गेम दिया । मूर्य अम्न समय ये समर में किसी प्रकार जीत नहीं जा मस्ते। हो गये, मायकाट हो गया, यह देखकर दोनों पक्ष ॥३६॥३८॥ देगो, यह विशाल मेना एक दूसरे का के योदाआ ने युद्ध ममाम कर दिया ॥४२॥१३॥ भीष्म का पचपन अध्याय ममास हुआ ॥ ५५ ॥ 1 ४२६४ ] महाभारत [ भीमपत्र अथ पटपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ सञ्जय उवाच-प्रभातायां च शवयाँ भीष्मः शान्तनवस्तदा । अनीकान्यनुसंयाने व्यादिदेशाऽथ भारत गारुडं च महाव्यूह चक्रे शान्तनवस्तदा पुत्राणां ते जयाकांक्षी भीष्मः कुरूपितामहः ॥ २ ॥ गरुडस्य स्वयं तुण्डे पिता देवव्रतस्तव चक्षुषी च भरद्वाजः कृतवर्मा च सात्वतः अश्वत्थामा कृपश्चैव शीर्पमास्तां यशस्विनी त्रैगरथ कैकेयैर्वाटधानैश्च संयुगे ॥ ४ ॥ भूरिश्रवाः शलः शल्यो भगदत्तश्च मारिप मद्रकः सिन्धुसौवीरास्तथा पाञ्चनदाश्च ये ॥ ५ ॥ जयद्रथेन सहिता ग्रीवायां सन्निवेशिताः पृष्टे दुर्योधनो राजा सोदर्यैः सानुगैर्वृतः विन्दानुविन्दाबावन्त्यौ काम्बोजश्च शकैः सह । पुच्छमासन्महाराज शूरसेनाश्च सर्वशः मागधाश्च कलिङ्गाश्च दासेरकगणैः सह दक्षिणं पक्षमासाद्य स्थिता व्यूहस्य देशिताः ॥ ८॥ कारूपाश्च विकुञ्जाश्च मुण्डाः कुण्डीवृपास्तथा । वृहद्वलेन सहिता वाम पार्श्वमवस्थिताः उपनयाँ अध्याय || ५६ ॥ समय ने कहा- --हे महाराज ! प्रात.काल मद्रक, मिन्धु-मावीर, पञ्चनद आदि देशों की सेना शनुनापन भीष्म ने सैनिकों को युद्ध के लिये तैयार के माय भूरिश्रया, मल, शन्य, भगदत्त और जयद्रथ होने की आज्ञा दी। पितामह भीष्म ने उम दिन उसकी ग्रीवा के स्थान पर स्थित हुए। अपने अनुगत आएक पुत्रों की विजय की इच्छा से गरुड़ व्यूह नाम राजाओं और भाइयों सहित राजा दुर्योधन उमर के दुर्भय व्यूह की रचना की । उम न्यूह के मुप पृष्टभाग की रक्षा करने लगे ४६|| अन्ति देश के पर म्ययं देयत्रन भीष्म स्थित हुए। दोनों नेत्रों के विन्द और अनुविन्द अपने माय काम्बोज, शक, स्थान पर महामा द्रोणाचार्य और यादयश्रेष्ट यनरमी ग्मेन आदि देशों की सेना लेकर उनके पुछ शित हुए ॥१॥३॥ मम्पूर्ण निगर्न, कैकेय और गाट. स्थान पर गई हुए। मगर और कटिङ्ग देगा की धान देश की मना माय लेकर यशस्वी अवयामा मेना नया दामंकगण उमर दक्षिण पक्ष की रक्षा और मागचार्य मानक के Pान पर गई हुए। में नियुक्त हुए । कारप, पिमुन, मुण्ट, कुण्डीयूष .. ।
अध्याय ५६ । म हा भा र त [ ४२६५ - - न्यूढं दृष्ट्वा तु तत्सैन्यं सव्यसाची परन्तपः । धृष्टद्युम्नेन सहितः प्रत्यव्यूहत संयुगे ॥ १० ॥ अर्धचन्द्रेण व्यूहेन व्यूहन्तमतिदारुणम् दक्षिणं शृङ्गमास्थाय भीमसेनो व्यरोचत नानाशस्त्रौघसम्पन्न नादेश्यैर्नृपैर्वृतः तदन्वेव विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ १२ ॥ तदनन्तरमेवाऽऽसीनीलो नीलायुधैः सह नीलादनन्तरश्चैव धृष्टकेतुर्महावल ॥ १३॥ चेदिकाशिकरूपैश्च पौरवैरपि संवृतः धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च पञ्चालाश्च प्रभद्रकाः ॥ १४ ॥ मध्ये सैन्यस्य महत स्थिता युद्धाय भारत तत्रैव धर्मराजोऽपि गजानीकेन संवृतः ततस्तुसात्यकी राजन्द्रौपद्याः पञ्च चाऽऽत्मजाः। अभिमन्युस्ततः शूर इरावांश्च ततः परम् ॥ १६ ॥ भैमसेनिस्ततो राजन्केकयाश्च महारथाः ततोऽभूद् द्विपदां श्रेष्ठो वाम पार्श्वमुपाश्रितः ॥१७॥ सर्वस्य जगतो गोप्ता गोप्ता यस्य जनार्दनः । एवमेतं महाव्यूहं प्रत्यव्यूहन्त पाण्डवाः वधार्थ तव पुत्राणां तत्पदं ये च सङ्गताः ततः प्रववृते युद्धं व्यतिपक्तरथद्विपम् ॥ १९ ॥ आदि की सेना के साथ राजा बृहद्बल उसके वामपक्ष पाले नालायुधधारिणी सेना सहित राना नील स्थित की रक्षा में नियुक्त हुए ॥७९॥ हे महारान शनु हुए । नाल के पथात् चेदि, याशी, वरूप आदि देशों पक्ष की ऐसी व्यूहरचना देखकर धृष्टद्युम्न के साथ का सेना के साथ धृष्टकेतु स्थित हुए | धृष्टद्युम्न, मिरर अर्जुन ने भी अपनी सेना काव्यूह बनाया। शिग्वण्डा, पाञ्चारमण आर प्रभद्रयगण व्यूह के माय हे राजेन्द्र । पाण्डो ने आपसी सेना के व्यूह के भाग में स्थित हुए ||१०१५|| यहीं पर हाथियों के विरुद्ध अर्द्धचन्द्र नाम के दुर्भव व्यूह की रचना का । दर का साथ रिये धर्मराज युधिपिर स्थित हुए। उसके दक्षिण भाग में अन शस्त्र धारण रिये हुए वामभाग में सात्यनि, द्रौपदा के पाँचों पुन, शूर अनेक देशों के राजाओं के साथ भीमसेन स्थित हुए। अभिमन्यु, इरागन् , घटोत्रच आर महारथी कैरेयगण उनके पाछे विराट और महारथा द्रुपद आर उनके स्थित हुए। इसके पश्चात् ही सब जगत् की रक्षा - ४२६६ ] म हा भारत [ भोप्मपर्व तावकानां परेषां च निन्नतामितरेतरम् हयौघाश्च रथौघाश्च तत्र तत्र विशाम्पते ॥ २० ॥ सम्पतन्तो व्यदृश्यन्त निघ्नन्तस्ते परस्परम् धावतां च रथोघानां निघ्नतांच पृथक्पृथक् ॥ २१ ॥ बभूव तुमुलः शब्दो विमिश्रो दुन्दुभिस्वनैः । दिवस्पृङ् नरवीराणां निघ्नतामितरेतरम् सम्प्रहारे सुतुमुले तव तेषां च भारत ॥ २२ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मयधपर्वणि तृतीये युद्धर्दिवसे परस्परव्यूहरचनायां पट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५६॥ करनेवाले वासुदेव के द्वारा सुरक्षित पुरुपोत्तम महावीर घायल होने और मारे जाने लगे। स्थान-स्थान पर अर्जुन स्थित हुए। हे राजेन्द्र ! पाण्डवो ने आपके रथो ओर हाथियों पर सवार झुण्ड के झुण्ड वीरगण पुत्रों ओर उनके पक्षवाले राजाओं को मारने के लिए युद्ध करते और एक दूसरे को मारते देख पड़ने लगे इस व्यूह की रचना की ॥१५॥१२॥ इसके पश्चात् । उस तुमुल सग्राम में परस्पर प्रहार करते हुए दोनो पक्ष दोनो पक्ष के रथी, घोड़ो ओर हाथियो के सवार के वीर पुरुषों का कोलाहल, चीत्कार और नगाड़ी तथा पैदल वीर परस्पर युद्ध करने लगे। वे परस्पर का गम्भीर शब्द आकाश तक गूंज उठा।।१९।२२॥ भीष्मपर्व का छप्पनवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५६ ॥ अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥ सञ्जय उवाच- ततो व्यूढेवनीकेषु तावकेपु परेपु च धनञ्जयो रथानीकमवधीतव भारत शरैरतिरथो युद्धे दारयन्रथयूथपान् ते वध्यमानाः पार्थेन कालेनेव युगक्षये ॥ २ ॥ धार्तराष्ट्रा रणे यत्नात्पाण्डवान्प्रत्ययोधयन् प्रार्थयाना यशो दीप्तं मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥ ३ ॥ एकाग्रमनसो भूत्वा पाण्डवानां वरूथिनीम् । वभ हुशो राजंस्ते चाऽसज्जन्त संयुगे ॥ ४ ॥ सत्तारन माँ अध्याय ॥ ५७ ॥ माय ने कहा - हे महाराज ! दोनों पक्ष की करने की इच्छा से कौरवपक्ष के सब बीर पाण्डपक्ष मेना जय व्यह बना करके करने लगी तर के वीरा के साथ यथाशक्ति युद्ध करने रंगे | उन्होंने गमम्प महावीर अर्जुन बाणवर्षा से स्थरक्षकों को कई बार पाण्टर-मेना को ग्नि-भिन्न कर दिया। गिरा-गिरायर रशी वारों को मारने रंग। यहा प्राप्त पाण्डवपक्ष के वीर भी वारम्पार कौरस सेना को चिन्त- अध्याय ५७ ] म हा भा र त [ ४२६७ - - । - द्रवद्भिरथ भग्नैश्च परिवर्तद्भिरेव च पाण्डवैः कौरवेयैश्च न प्राज्ञायत किञ्चन ॥ ५ ॥ उदतिष्ठद्रजो भौमं छादयानं दिवाकरम् न दिशः प्रदिशो वापि तत्र हन्युः कथं नराः अनुमानेन संज्ञाभिर्नामगोत्रैश्च संयुगे वर्तते च तथा युद्धं तत्र तत्र विशाम्पते न व्यूहो भिद्यते तत्र कौरवाणां कथञ्चन रक्षितः सत्यसन्धेन भारद्वाजेन संयुगे तथैव पाण्डवानां च रक्षितः सव्यसाचिना नाऽभिद्यत महाव्यहो भीमेन च सुरक्षितः सेनाग्रादपि निप्पत्य प्रायुध्यस्तत्र मानवाः उभयोः सेनयो राजन्व्यतिपक्तरथद्विपाः हयारोहहयारोहाः पात्यन्ते स्म महाहवे ऋष्टिभिर्विमलाभिश्च प्रासैरपि च संयुगे ॥ ११ ॥ रथी रथिनमासाद्य शरैः कनकभूपणैः पातयामास समरे तस्मिन्नतिभयङ्करे ॥ १२ ॥ गजारोहा गजारोहान्नाराचशरतोमरैः संसक्तान्पातयामासुस्तव तेपां च सर्वशः ॥१३॥ भिन्न ओर अस्त-व्यस्त करने लगे ॥१४॥ दोनों पक्ष । कर रहे थे । इस कारण कोई भी पक्ष दूसरे पक्ष के की सेना इधर-उधर दोड़ने, भागने और फिर लौटने | व्यूह को तोड़ नहीं पाता था। दोनों ओर के सैनिक के कारण एक मे ही ऐसी मिल गई कि कौन किस बीर सेनाव्यूह के अग्रभाग से निकल-निकलकर युद्ध पक्ष का है, यह जानना बड़ा कठिन सा हो गया । कर रहे थे। रथ, हाथी आदि उनके वाहन एक रणक्षेत्र से उड़ी हुई धूलि ने भगवान सूर्य को और दूसरे से भिड़े हुए देख पड़ते थे । उस भयङ्कर संग्राम सब दिशाओं को क्षणभर में ही टककर चारों ओर में घुड़मवार योद्धा तीक्ष्ण ऋष्टि, प्रास आदि शस्त्रों घने अंधेरे का राज्य कर दिया। उस समय केवल से घुड़सवारों को मारते और गिराते थे ॥८॥११॥ अनुमान और नाम-गोन के उच्चारण पर विश्वास करके रथी योद्धा सुवर्ण भूपित बाणों से अपने प्रतिद्वन्द्वी लोग एक दूसरे पर प्रहार करते थे; कोई किसी को | रथी वीरो को मारते और गिराते थे। हाथियों पर पहचान नहीं पाता था ॥५।७|| कौरवपक्ष के व्यूह सवार योद्धा नाराच घाण, तोमर आदि चलाकर की रक्षा महारथी द्रोणाचार्य कर रहे थे, और पाण्डव- गजारूढ़ वीरों को मारते । किमी हाथी के सगर पक्ष के व्यूह की रक्षा महावीर भीमसेन और अर्जुन ! ने दूसरे को केश पकड़कर ग्वींच लिया और सद्ग - - ४२६८ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व कश्चिदुत्पत्य समरे वरवारणमास्थितः केशपक्षे परामृश्य जहार समरे शिरः ॥१४॥ अन्ये द्विरददन्ताग्रनिर्भिन्नहृदया रणे धेमुश्च रुधिरं वीरा निःश्वसन्तः समन्ततः कश्चित्करिविपाणस्थो बीरो रणविशारदः प्रावपच्छक्तिनिर्भिन्नो गजशिक्षास्त्रदिना ॥ १६ ॥ पत्तिसङ्घा रणे पत्तीन्भिन्दिपालपरश्वधैः न्यपातयन्त संहृष्टाः परस्परकृतागसः ॥ १७॥ रथी च समरे राजन्नासाथ गजयूथपम् सगजं पातयामास गजी च रथिनां वरम् ॥ १८ ॥ रथिनं च हयारोहः प्रासेन भरतर्षभ पातयामास समरे रथी च हयसादिनम् पदाती रथिनं संख्ये रथी चापि पदातिनम् । न्यपातयच्छितैः शस्त्रैः सेनयोरुभयोरपि ॥ २०॥ गजारोहा हयारोहान्पातयाञ्चक्रिरे तदा हयारोहा गजस्थांश्च तदद्भुतमिवाऽभवत् ॥ २१॥ गजारोहवरैश्चापि तत्र तत्र पदातयः पातिताः समदृश्यन्त तैश्चापि गजयोधिनः ॥ २२ ॥ पत्तिसङ्घा हयारोहैः सादिसङ्घाश्च पत्तिभिः पात्यमाना व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २३ ॥ से उसका सिर काट डाला । हाथियों के दाँतो से | को, घोड़े के सवार ने प्रास से रथी को, रथी हृदय फट जाने पर कुछ वीर बारम्बार श्वास लेते घोडे के सवार को, पैदल ने तीक्ष्ण शस्त्रों से रथी यो हुए मुख से रक्त वहा रहे थे । कोई युद्धनिपुण वीर ओर रथी ने पैदल को मार गिराया । दोनों सेनाओं हाथी के दाँत पर पाओ रग्वकर चढ गया, शत्रु ने मे यही मार-काट देख पडती थी॥१७॥२०॥ हाथियों शक्ति मारकर उसे अधमरा कर दिया और यह कॉप- ' के सवार घुडसवारों को और घुड़सवार हाथियों के कर गिर पड़ा ॥१२॥१६॥ पैदल सिपाहियों के झुण्ट सगरों को मारने लगे। हाथियों के सवार पैदलों को के झुण्ड युद्ध में भिन्दिपाल, परश्वध आदि शखो मे , ओर पैदल वीर हाथियों के सवारों को, ऐसे ही पैदल सेना का संहार करते देव पड़ते थे। किसी घुड़मवार पैदलों को और पैदल घुड़सवारों को सही रथी ने हाथी के सवार को, हाथी के सवार ने रथी । की संख्या में मार-मारकर गिरा रहे थे ॥२१॥२३॥ -- ।
अध्याय ५७ ] म हा भारत [ ४२६० । - - ध्वजैस्तत्राऽपविद्धैश्च कार्मुकैस्तोमरैस्तथा प्रासैस्तथा गदाभिश्च परिधः कम्पनस्तथा ॥ २४॥ शक्तिभिः कवचैश्चित्रैः कणपैरंकुशैरपि निस्त्रिंशैविमलैश्चाऽपि स्वर्णपुङ्खः शरैस्तथा ॥ २५॥ परिस्तोमैः कुथाभिश्च कम्बलैश्च महाधनैः भूभीति भरतश्रेष्ठ स्रग्दामैरिव चित्रिता ॥ २६ ॥ नराश्वकायैः पतितैर्दन्तिभिश्च महाहवे अगम्यरूपा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा ॥ २७॥ प्रशशाम रजो भौमं व्युक्षितं रणशोणितः दिशश्च विमलाः सर्वाः सम्बभूवुर्जनेश्वर ॥ २८॥ उत्थितान्यगणेयानि कवन्धानि समन्ततः चिह्नभूतानि जगतो विनाशार्थाय भारत ॥ २९ ॥ तस्मिन्युद्धे महारौद्रे वर्तमाने सुदारुणे प्रत्ययन्त रथिनो धावमानाः समन्ततः ततो भीष्मश्च द्रोणश्च सैन्धवश्च जयद्रथः पुरुमित्रो जयो भोजः शल्यश्चापि ससौवलः ॥ ३१ ॥ एते समरदुर्धर्षाः सिंहतुल्यपराक्रमाः पाण्डवानामनीकानि वभंजुः स्म पुनः पुनः ॥३२॥ तथैव भीमसेनोऽपि राक्षसश्च घटोत्कचः सात्यकिश्चेकितानश्च द्रौपदेयाश्च भारत असख्य धनुष, ध्वजा, तोमर, विचित्र कम्बल, महामूल्य , गई । सब दिशाएँ निर्मल हो गई ॥२४।२८॥ जगत् कम्बल, प्रास, परिघ, गदा, कम्पन, शक्ति, कवच, के नाश के चिह्न स्वरूप असल्य कबन्ध उठने लगे। विचित्र कणप, अंकुश, निविंश, स्वर्णपुर वाण, क्षुद्र उस महादारुण युद्ध में इधर-उधर सब योद्धा दौड़ते कम्बलासन आदि वस्तुएँ इधर-उधर पड़ी हुई थीं। देख पड़ने लगे। उस भयानक समर में सिंह के उनसे वह युद्धभूमि विचित्र मालाओं से विभूषित सी । समान पराक्रमी समर-दुर्द्धर्ष महापीर भीष्म, द्रोण, जान पड़ती थी। हाथियों, घोड़ों और मनुष्यो के शवों | जयद्रथ, पुरुमित्र, जय, भोज, शल्य और शकुनि के ढेर से वह भूमि अगम्य सी हो रही थी। सब ओर । आदि महावीर वारम्बार पाण्डवसेना के व्यूह को मास और रक्त की कीचड़ देख पड़ती थी । युद्ध में | तोड़ने और उसका संहार करने लगे ॥२९॥३२॥ इतना रक्त गिरा कि वह उठी हुई धूलि उससे बैट पूर्व समय में जैसे देवताओं ने दानवों को पीड़ित aaaaa . .
४२७० ] म हा भारत भीष्मपर्व - तावकांस्तव पुत्रांश्च सहितान्सर्वराजभिः द्रावयामासुराजी ते त्रिदशा दानवानिव ॥ ३४ ॥ तथा ते समरेऽन्योन्यं निघ्नन्तः क्षत्रियर्पभाः । रक्तीक्षिता घोररूपा विरेजुदानवा इव ॥३५॥ विनिर्जित्य रिपून्वीराः सेनयोरुभयोरपि व्यदृश्यन्त महामात्रा ग्रहा इव नभस्तले ॥ ३६ ॥ ततो रथसहस्रेण पुत्रो दुर्योधनस्तव अभ्ययात्पाण्डवं युद्धे राक्षसं च घटोत्कचम् ॥३७॥ तथैव पाण्डवाः सर्वे महत्या सेनया सह द्रोणभीष्मौ रणे यत्तौ प्रत्युद्ययुररिन्दमौ ॥३८॥ किरीटी च ययौ क्रुद्धः समन्तात्पार्थिवोत्तमान् । आर्जुनिः सात्यकिश्चैव ययतुः सौबलं बलम् ॥ ३९ ॥ ततः प्रववृते भृयः संग्रामो लोमहर्पणः तावकानां परेषां च समरे विजयपिणाम् ॥ ४० ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि तृतीयेयुद्धदिवसे सकुलयुद्धे सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ।। किया था वैसे ही भीमसेन, घटोत्कच, सात्यकि, राक्षस घटोत्कच से युद्ध करने को आगे बढ । उधर चेकितान और द्रौपदी के पाँचों पुत्रों ने, अपने पक्ष शत्रुदमन पाण्डवगण भी यत्नपूर्वक द्रोण और भीष्म के अन्य राजाओं के साथ मिलकर, आपके पुत्रों को । से युद्ध करने के लिए चले ॥३६॥३८॥ क्रोधित युद्ध में मार भगाया । युद्ध में परस्पर प्रहार करते । अर्जुन शत्रुपक्ष के राजाओं को मारने लगे । अभिमन्यु हुए क्षत्रियश्रेष्ठ वीर रक्त से सनेहुए, घोररूप, दानव-से | ओर सात्यकि दोनों ही वीर शकुनि की सेना पर जान पडने लगे।।२३२३५॥ दोनों समाओं के रिट आक्रमण करने चले। हे राजेन्द्र 'इसके अनन्तर गण शत्रुओं को जीतकर, आकाश में प्रधान ग्रहो के | संग्राम में विजय चाहनेवाले दोनों पक्ष के वीर फिर समान, युद्धभूमि में विराजमान हुए । हे महाराज ! रोमहर्पण घोर युद्ध करने लगे ॥३९॥४०॥ तब आपके पुत्र राजा दुर्योधन सहस्र रथ साथ लेकर भीष्मपर्व का सत्तावनवाँ अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ५७ ।। अथ अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ ततस्ते पार्थिवाः क्रुद्धाः फाल्गुनं वीक्ष्य संयुगे । रथैरनेकसाहः समन्तात्पर्यवारयन् अथैनं रथवृन्दन कोष्टकीकृत्य भारत मग उवाच-- ..
अन्याय ५८ ] म हा भारत [ ४२७१ । गरैः सुवहुसाहस्रैः समन्तादभ्यवारयन् शक्तीश्च विमलास्तीक्ष्णा गदाश्च परिघैः सह । प्रासान्परश्वधांश्चैव मुद्गरान्मुसलानपि चिक्षिपुः समरे क्रुद्धाः फाल्गुनस्य रथं प्रति । शस्त्राणामथ तां वृष्टिं शलभानामिवाऽऽयतिम् ॥४॥ रुरोध सर्वतः पार्थः शरैः कनकभूषणैः तत्र तल्लाघवं दृष्ट्वा वीभत्सोरतिमानुपम् देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः साधु साध्विति राजेन्द्र फाल्गुनं प्रत्यपूजयन् ॥ ६ ॥ सात्यकिश्चाऽभिमन्युश्च महत्या सेनया वृतौ गान्धारान्समरे शूराञ्जग्मतुः सहसौवलान् तत्र सौवलकाः क्रुद्धा वार्णेयस्य रथोत्तमम् । तिलशश्चिच्छिदुः क्रोधाच्छस्त्रैर्नानाविधैर्युधि सात्यकिस्तु रथं त्यक्त्वा वर्तमाने भयावहे अभिमन्यो रथं तूर्णमारुरोह परन्तपः तावेकरथसंयुक्तौ सौवलेयस्य वाहिनीम् व्यधमेतां शितैस्तूर्ण शरैः सन्नतपर्वभिः ॥१०॥ द्रोणभीष्मौ रणे यत्तौ धर्मराजस्य वाहिनीम् । नाशयतां शरैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रपरिच्छदः अट्टापनयाँ अध्याय ।। ५८ ॥ सञ्जय ने कहा- हे महाराज ! कोरवपक्ष के पिशाच, नाग, राक्षम आदि मर दर्शक "धन्य-धन्य" राजा लोग महावीर अर्जुन को युद्ध के लिए सामने कहकर उनकी प्रगमा करने लगे ॥१६॥ माल्यकि आने देग्यफर, क्रोध के आदेश में आकर, असन्य रयो ओर अभिमन्यु दोनों वार बहुन मी मना माय देकर मे उन्हें घेरकर उनके रथ के ऊपर बाण, तीक्ष्ण शक्ति, शूर गान्धार मेना और शकुनि से युद्ध करने चरे। गदा, परिघ, प्रास, परशु, मुद्गर, मुगल आदि विभि शनि के मैनिकों ने युद्ध होकर मात्यकि केट गखों की वर्षा करने लगे ॥१॥ अर्जुन ने भी ग को दाखों मे ग्यण्ड-पण्ड करके काट टाग। दीड़ियों की पडित के समान आती हुई उन दाखवा तर मात्यकि उम भयानक समय में अभिमन्यु के को स्वर्णपु वाणो से मध्य में ही रोक दिया । अर्जुन गग पर चले गये । दोनों वीर एक ही रथ पर बैठ- कर नाण वाणों मे गयुनिया मेना का महार करने की यह असाधारण स्फत्तिं देगकर देव, दानर, गन्धर्व, Dianacaracanadaniaadiamme - ।
४२७२ ] ग हा भारत [ भीमपय -- । - ततो धर्मसुतो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । मिपतां सर्वसैन्यानां द्रोणानीकमुपाद्रवन् ॥१२॥ तत्राऽऽसीत्सुमहाद्धं तुमुलं लोमहर्पणम् यथा देवासुरं युद्धं पूर्वमासीत्सुदारुणम् ॥ १३ ॥ कुर्वाणौ सुमहत्कर्म भीमसेनघटोत्कची दुर्योधनस्ततोऽभ्येत्य तावुभावप्यवारयन् ॥ १४ ॥ तत्राऽद्भुतमपश्याम हैडिम्बस्य पराक्रमम् अतीत्य पितरं युद्धे यदयुध्यत भारत ॥ १५॥ भीमसेनस्तु संक्रुद्धो दुर्योधनममर्पणम् हृद्यविध्यत्पृपत्केन प्रहसन्निव पाण्डवः ॥ १६ ॥ ततो दुर्योधनो राजा प्रहारवरपीडितः निपसाद रथोपस्थे कश्मलं च जगाम ह ॥ १७॥ तं विसंज्ञं विदित्वा तु त्वरमाणोऽस्य सारथिः । अपोवाह रणाद्राजंस्ततः सैन्यमभज्यत ॥ १८ ॥ तसस्तां कोरवीं सेनां द्रवमाणां समन्ततः निघ्नन्भीमः शरैस्तीक्ष्णैरनुवबाज पृष्ठतः ॥ १९ ॥ पार्वतश्च रथश्रेष्ठो धर्मपुत्रश्च पाण्डवः द्रोणस्य पश्यतः सैन्यं गाङ्गेयस्य च पश्यतः ॥ २० ॥ लगे ७१०॥ उधर द्रोण ओर भीष्म सावधान हो पराक्रम दिखाने लगा। भीमसेन ने कर कङ्कपत्रयुक्त तीक्ष्ण बाण से युधिष्टिर की सेना अमहनशील दुर्योधन के हृदय में एक तीक्ष्ण बाण को नष्ट करने लगे । तब राजा युधिष्ठिर, नकुल और मारा । भीमसेन के वज्रतुल्य बाण की चोट से मूछित सहदेव सब सैनिको के सामने ही द्रोण की सेना को होकर राजा दुर्योधन रथ पर गिर पडे । उन्हें अचेत मारने लगे । जैसे पूर्वकाल मे देवताओं ओर दत्यो देखकर सारथी शीघ्र ही रणभूमि से हटा ले गया । का युद्ध हुआ था वैसे ही वे लोग घोर युद्ध करने दुर्योधन की यह दशा देखकर सब सैनिक निस्त्साह लगे ॥११॥१३॥ भीमसेन ओर घटोत्कच को युद्ध आर भयभीत होकर भागने लगे ॥१४॥१८॥ कौरव- में कर्म करते देखकर राजा दुर्योधन उनके सना को इधर-उधर भागते हुए देखकर तीक्ष्ण वाणों सामने गये और उन्हें रोकने का यत्न करने लगे। की वर्षा करते हुए भीमसेन उसके पीछे दोड़े । राजा हे राजेन्द्र ! उस समय हम रोगो ने भीमसेन के पुत्र युधिष्ठिर और धृष्टद्युम्न दोनो वीर द्रोणाचार्य और घटोकच का ऐसा अद्भुत पराक्रम देखा कि हम चकित भीष्म के मामने ही उनकी सेना से रह गये । वह उस समय भीममेन से भी बहकर से मार गिराने लगे। महारथी भीष्म आर द्रोण आपके क्रुद्ध होकर तीक्ष्ण बाणों L अ याय ५८ ] म हा भारत १२७३ - । जनतुर्विशिखैस्तीक्ष्णैः परानीकविनाशनैः द्रयमाणं तु तत्सैन्यं तव पुत्रस्य संयुगे ॥ २१ ॥ नाऽशक्नुतां वारयितुं भीष्मद्रोणौ महारथौ वार्यमाणं च भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना ॥ २२ ॥ विद्वत्येव तत्सैन्यं पश्यतोोणभीष्मयोः नतो रथसहस्रेषु विद्रवत्सु ततस्ततः ॥ २३॥ तावास्थितावेकरथं सौभद्रशिनिपुङ्गवौ सौवली समरे सेनां शातयेतां समन्ततः ॥ २२॥ शुशुभाते तदा तौ तु शैनेयकुरुपुङ्गवौ अमावास्यां गतो यद्वत्सोमसूर्यों नभस्तले ॥२५॥ अर्जुनस्तु ततः क्रुद्धस्तवसैन्यं विशाम्पते ववर्ष शरवर्षेण धाराभिरिव तोयदः ॥ २६ ॥ वध्यमानं ततस्तत्र शरैः पार्थस्य संयुगे दुद्राव कौरवं सैन्यं विषादभयकम्पितम् ॥ २७॥ द्रवतस्तान्समालक्ष्य भीष्मद्रोणौ महारथौ न्यवारयेतां संरब्धौ दुर्योधनहितैपिणौ ॥ २८ ॥ ततो दुर्योधना राजा समाश्वस्य विशाम्पते न्यवर्तयत तत्सैन्यं द्रवमाणं समन्ततः ॥ २९॥ यत्र यत्र सुतस्तुभ्यं यं यं पश्यति भारत तत्र तत्र न्यवर्तन्त क्षत्रियाणां महारथाः ॥ ३० ॥ भागे हुए सेनिको कोरोन नहीं सके। वे उन सनिका पा करने लगे ।।२३।२६॥ ममग्र कारस सेना अर्जुन को मना करते थे, तो भी भयभीत सनिक भागत ही के वाणो से पीड़ित होकर, विषाद आर भय में जाने थे ॥१९॥२३॥ सहस्रो रथ इधर उधर भागते अभिभूत हो, युद्धभूमि से भागने लगी । दुर्योधन के देख पड रहे थे। इसी समय अमावस्या के दिन हितपी महारथी भीष्म आर द्रोण सनियों को भागने आकाग स्थित सोम सूर्य के समान एक रथ पर स्थित देग्यपर उन्हे लौटाने की चेष्टा करन लग। राजा गिनिकुरभूषण सात्यकि आर अभिमन्यु दोनो पीर, दुर्योधन ने चारो ओर भागती दुई मेना को आशन चारों ओर वाण बरसार, शकुनि की सेना को नष्ट का रोटाया ॥२७||२९|| निमने जहाँ मे आपके करने लगे । अर्जुन भी क्रोध के रश होरर आपकी पुत्र को देगा वह यहीं मे लाट पड़ा । महारथी मेना के मेघो की जलपर्या के समान, चाण- क्षत्रियों को लाटते देखकर और-आर मागरण सैनिक - [ भीष्मपत्र ४२७४ ] महाभारत WW । । । । तान्निवृत्तान्समीक्ष्यैव ततोऽन्येऽपीतरे जनाः अन्योन्यस्पर्धया राजेंल्लज्जया चाऽवतस्थिरे पुनरावर्ततां तेषां वेग आसीद्विशाम्पते पूर्यतः सागरस्येव चन्द्रस्योदयनं प्रति ॥३२॥ सन्निवृत्तांस्ततस्तांस्तु दृष्ट्वा राजा सुयोधनः अब्रवीत्त्वरितो गत्वा भीम शान्तनवं वचः ॥३३॥ पितामह निवोधेदं यत्त्वां वक्ष्यामि भारत नाऽनुरूपमहं मन्ये त्वयि जीवति कौरव ॥ ३४ ॥ द्रोणे चाऽस्त्रविदां श्रेष्ठे सपुत्रे ससुहृज्जने कृपे चैव महेप्यासे द्रवते यद्वरूथिनी ॥३५॥ न पाण्डवान्प्रतिवलांस्तव मन्ये कथञ्चन तथा द्रोणस्य संग्रामे द्रौणेश्चैव कृपस्य च ॥ ३६॥ अनुग्राह्याः पाण्डुसुतास्तव नूनं पितामह यथेमां क्षमसे वीर वध्यमानां वरूथिनीम् ॥३७॥ सोऽस्मि वाच्यस्त्वया राजन्पूर्वमेव समागमे । न योत्स्ये पाण्डवान्संख्ये नाऽपि पार्पतसात्यकी ॥ ३८॥ श्रुत्वा तु वचनं तुभ्यमाचार्यस्य कृपस्य च कर्णेन सहित. कृत्यं चिन्तयानस्तदैव हि ॥ ३९ ॥ भी स्पर्धा आर रजा के कारण भागना छोडकर खडे अश्व मामा और आपन समान बशाठी पराक्रमी हैं, हो गये । हे महाराज । चद्रमा का उदय देखकर या ये आप लोगा को अपने पराक्रम से अशक्त बना समुद्र जैसे उमड़ पडता ह से ही सव सेना राजा सकते हैं ॥३३॥३६॥ आप इस प्रकार सेना का को देखकर वेग से गट पडा ॥३०॥३२॥ योद्धाआ नाश होते देखकर भा क्षमा कर रहे हैं, इससे मुझे मा लाटते देखकर राना दुर्योधन न गाघ्रता से भाप्म निश्चय नान पडता है कि आप पाण्टयों पर कृपा के पास जाकर कहा ह पितामह । मै आपसे जो करक उह एसा करने म वाप। नहीं पहुपात । हे कहता हूँ, सो सुनिए । पुत्र और सुहृदा सहित अस्त्र पितामह ! यदि आपका ऐसा हा अभिप्राय था, तो विद्या निपुण द्रोणाचाय के, आपरे आर महावनुदर पहल सम्मति के समय ही आपको कह देना था कि कृपाचाय के जीवित रहत मेरी सेना का इस प्रकार "मैं धृष्टद्युम्न, सात्यनि आर पाण्डयो स युद्ध नहीं भागना आप लोगों के पराक्रम के अनुरूप मैं नहीं मांगा।" मैंने केवल आपके और द्रोणाचार्य तथा मान सस्ता । मैं रिमी प्रभार यह मानने के लिए कृपाचाय के वचन पर विश्वास करसे ही, पण के प्रस्तुत नहीं हूँ कि पाण्डवगण सग्राम में द्रोणाचार्य, साथ कर्तव्य की सम्मति से यह युद्ध आरम्भ - म हा भारत वृद्ध और गतायु होकर भी जो कुछ कर सरना है अध्याय ५९ ] । १२७५ यदि नाऽहं परित्याज्यो युवाभ्यामिह संयुगे । विक्रमेणाऽनुरूपेण युध्येतां पुरुपर्पभौ ॥४०॥ एतच्छ्रुत्वा वचो भीष्मः प्रहसन्यै मुहुर्मुहुः । अब्रवीत्तनयं तुभ्यं क्रोधादुदृवृत्य चक्षुपी ॥४१॥ बहुशोऽसि मया राजंस्तथ्यमुक्तो हितं वचः अजेयाः पाण्डवा युद्धे देवैरपि सवासः ॥४२॥ यत्तु शक्यं मया कर्तुं वृद्धेनाऽद्य नृपोत्तम । करिष्यामि यथाशक्ति प्रेक्षेदानी सबान्धवः ॥४३॥ अद्य पाण्डुसुतानेक ससैन्यान्सह बन्धुभिः । सोऽहं निवारयिष्यामि सर्वलोकस्य पश्यतः ॥४४॥ एवमुक्ते तु भीष्मेण पुत्रास्तव जनेश्वर दध्मुः शङ्खान्मुदा युक्ता भेरी सञ्जनिरे भृशम् ॥४५॥ पाण्डवा हि ततो राजश्रुत्वा तं निनदं महत् । दध्मुः शहांश्च भेरीश्च मुरजांश्चाऽप्यनादयन् ॥ ४६॥ इति श्रा महाभारते भाप्मपणि भामापवणि तृताय युद्धदिवसे भाप्मदुर्योधनसाद अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥५॥ क्यिा ह । यदि युद्ध म आप लोग मेरा मान नहीं वह यथाशक्ति रुगा। तुम अपने भाइयों सहित चाहत तो अब अपने पराक्रम के अनुरूप । मेरा पराक्रम देखो। इस समय सत्र नागों के सामने युद्ध करसे शत्रुओं का नष्ट काजिए ॥३७॥४०॥ मैं अओला ही सना आर भाइ-बधुओं सहित पाण्डमों दुर्योधन के य पचन सुनकर महावीर भीष्म बारम्बार का रोकृगा ॥४१४४॥ हे महाराज | महारथी भाप्म हँसरर आर फिर कोसना लार र आपर क ये पचन सुनकर आपके पुत्रगण प्रसन्न होकर पुर से गोले ---हे रामेद्र । मैंने बहुत पार तुमसे शङ्ख जान रंग । ममरभूमि के म य कौरवसेना म सत्य आर हितकारा वचन कहे हैं । मैं तुमसे कई नगाई आदि नाने ननने लगे । पाण्डवगण भी उम चार कह चुका हूँ कि इन्द्रसहित सन देवता भी युद्ध महानाद को सुनकर शव, भेरी, मुरज आदि नाने म पाण्टयों का पराय नहीं कर सकते। मैं इस समय बनान गे ॥४५/४६॥ गड़ना | भाष्मपर्म का अट्टापननाँ अ याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥ अथ एकानपटितमाऽध्याय ॥५०॥ नृतराष्ट्र उगन-प्रतिज्ञाते ततस्तस्मिन्युद्धे भीग्मेण दारणे क्रोधितो मम पुत्रेण दु.खितेन विशेषतः ४२७६ ] म हा भा र न [ भीमपर्व -- - . - भीष्मः किमकरोत्तत्र पाण्डवेयेयु भारत पितामहे वा पञ्चालास्तन्ममाऽऽचक्ष्व सञ्जय ॥ २ ॥ गञ्जय उवाच गतपूर्वाह्नभूयिष्टे तम्मिन्नहनि भारत पश्चिमां दिशमास्थाय स्थिते चाऽपि दिवाकरे ॥ ३ ॥ जयं प्राप्तेपु हृष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु सर्वधर्मविशेषज्ञः पिता देवव्रतस्तव अभ्ययाजवनेर श्वैः पाण्डवानामनीकिनीम् महत्या सेनया गुप्तस्तव पुत्रेश्च सर्वशः प्रावर्तत ततो युद्धं तुमुलं लोमहर्पणम् अस्माकं पाण्डवैः सार्धमनयात्तव भारत धनुपां कूजतां तत्र नलानां चाऽभिहन्यताम् । महान्समभवच्छब्दो गिरीणामिव दीर्यताम् ॥ ७ ॥ निष्ठ स्थितोऽस्मि विद्धयेनं निवर्तस्व स्थिरो भव। स्थिरोऽस्मि प्रहरवेति शब्दोऽश्रूयत सर्वशः काञ्चनेषु तनुत्रेषु किरीटेषु ध्वजेपु च शिलानामिव शैलेषु पतितानामभूद ध्वनिः पतितान्युत्तमाङ्गानि वाहवश्च विभूपिताः व्यचेष्टन्त महीं प्राप्य शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १० ॥ उनमठवाँ अध्याय ॥ ५० ॥ धृतराष्ट्र ने कहा – हे माय ! युद्ध में मेरे जाना देववन भीष्म भारी सेना लेकर आपके पुत्रों के दुःग्वित पुत्र की प्रार्थना से कुपित होकर प्रतिज्ञा करने माथ शीघ्रगामी घोडो से युक्त रथ पर बैठकर पाण्डव- के पश्चात् भीष्म ने पाण्डवा के माथ केमा युद्ध किया। मना की ओर बढ़े ॥३॥५॥ हे भारत ! इसके अनन्तर और पाञ्चाला सहिन पाण्टयों ने भीम के साथ किम पाण्डो के माथ कौरवों का घोर युद्ध होने लगा। प्रकार कमा युद्ध किया । सव वृत्तान्त ठीक-ठीक हे कुरुश्रेष्ट ! आपकी ही अनीति इम घोर युद्ध का कहा ॥१२॥ मञ्जय ने कहा-हे महाराज ! उस मूल कारण है । उम ममय रणभूमि में निरन्तर पर्वत दिन का पूर्व भाग समाप्तप्राय हो चुका था; मूर्यदेव के गिग्वर फटने के ममान भयानक धनुपों की टङ्कार कुल पथिम आकाश की ओर झुक चले थे और और नाल ठोकने का कठोर अन्न चारो ओर सुन पाण्टय लोग विजयलाभ करके प्रमन्नता प्रकट कर पडने लगा। सब और "टहर तो जा!" "टहरा रहे य, टमी ममय भीष्म ने यथागक्ति युद्ध करके है," "यह है," "लौटो," "स्थिर होकर ग्वडे पाण्टयो.को रोकने की प्रतिज्ञा की। मय धर्मो के रहो !" "पडा है, प्रहार करी" टुत्यादि शब्द ही म हा भारत 7 १६॥ कोड-गोर गम की पीड़ित अन्याय ५०.] [४२७७ हृतोत्तमाङ्गाः केचित्तु तथैवोद्यतकार्मुकाः प्रगृहीतायुधाश्चाऽपि तस्थुः पुरुषसत्तमाः ॥ ११ ॥ प्रावर्तत महावेगा नदी रुधिरवाहिनी मातङ्गाङ्कशिला रौद्रा मांसशोणितकर्दमा ॥ १२ ॥ वराश्वनरनागानां शरीरप्रभवा तदा परलोकार्णवमुखी गृध्रगोमायुमोदिनी ॥ १३ ॥ न दृष्टं न श्रुतं वापि युद्धमेतादृशं नृप यथा तव सुतानां च पाण्डवानां च भारत नाऽऽसीद्वथपथस्तत्र योधैर्युधि निपातितेः गजैश्च पतितैनीलेगिरिशृङ्गैरिवाऽऽवृतः ॥१५॥ विकीणः कवचैश्चित्रैः शिरस्त्राणैश्च मारिष शुशुभे तद्रणस्थानं शरदीव नभस्तलम् ॥ १६ ॥ विनिर्भिन्नाः शरैः केचिदन्त्रापीडप्रकर्पिणः अभीताः समरे शत्रूनभ्यधावन्त दर्पिताः तात भ्रातः सखे वन्धो वयस्य मम मातुल । मा मां परित्यजेत्यन्ये चुक्रुशुः पतिता रणे ॥ १८ ॥ अथाऽभ्यहि त्वमागच्छ कि भीतोऽति कयास्यसि । स्थितोऽहं समरे मा भैरिति चाऽन्ये विचुक्रुशुः ॥ १९ ॥ सुन पड़त थे । सुवर्ण-मण्डित लोहकवच, किरीट- गिना के ममान उनमे पड़े थे | माम और गहा की मुकुट, चना आदि के ऊपर बाण लगने से थमा कीचड़ में ये अगम्य हो रही गीं । गे नदियाँ पग्दो हा घोर दाद होता था, जैसा कि पर्वत के ऊपर फट मागर की ओर बहने लगीं ॥१०॥१३॥ हे महागज! फटकर शिनाओं के गिरने से होता है ॥६॥ पाण्डया के माप आयफ पुत्रों का जमा घर गुम मकदो-हजागे कटे हुए विभूपिन मिर और हार पृथ्वी हुआ यमा युर न किसी ने देगा होगा और न मुना पर गिरकर नइप रहे थे । कुछ वीरश्रेष्ठों के करन्ध, होगा । गिर एए. पोदाओं और गिनिशाना तुल्य नीर मिर कट जाने पर भी यह धनुर याण हार में गा के हाथियों के मार्ग में गमरामि परिपूर्णता रिये, या शग उठाये प्रहार करने यो रिए गुदभूमि उटी । उसमें रणों के नग्ने यी गाना नही में पड़ेगे। उग मगप यो मनुश्य, हाती, गोड़े दिगो टप करना और शिरगणों के दाग युद-मामि आदि का भरोग मे याने रप गायी नदियों बा. गाना के अमगा के गमान दोन | च। गिल, मीट आदिमागभानी पशु-पक्षी उणे देगार अलन्न प्रसन्न हो । पियों को अब रमा, दीनभान राम । 1 ४२७८ ] म हा भारत भीष्मपर्व - तत्र भीष्मः शान्तनवो नित्यं मण्डलकार्मुकः । मुमोच बाणान्दीप्तामानहीनाशीविपानिव शरैरेकायनीकुर्वन् दिशः सर्वा यतव्रतः जघान पाण्डवरथानादिश्य भरतर्षभ ॥ २१ ॥ स नृत्यन्यै रथोपस्थे दर्शयन्पाणिलाघवम् अलातचक्रवद्रास्तत्र तत्र स्म दृश्यते ॥ २२ ॥ तमेकं समरे शूरं पाण्डवाः सृञ्जयैः सह अनेकशतसाहस्रं समपश्यन्त लाघवात् ॥ २३ ॥ मायाकृतात्मानमिव भीमं तत्र स्म मेनिरे पूर्वस्यां दिशि तं दृष्ट्वा प्रतीच्यां ददृशुर्जनाः ॥ २४ ॥ उदीच्यां चैवमालोक्य दक्षिणस्यां पुनः प्रभो । एवं स समरे शूरो गाङ्गेयः प्रत्यदृश्यत ॥ २५॥ न चैवं पाण्डवेयानां कश्चिच्छक्नोति वीक्षितुम् । विशिखानेव पश्यन्ति भीष्पचापच्युतान्वहून् ॥ २६ ॥ कुर्वाणं समरे कर्म सूदयानं च वाहिनीम् व्याक्रोशन्त रणे तत्र नरा बहुविधा बहु ॥ २७ ॥ अमानुपेण रूपेण चरन्तं पितरं तव शलभा इव राजानः पतन्ति विधिचोदिताः ॥ २८ ॥ की ओर दौडने लगा । बहुत मनुष्य रणस्थल मे गिर- मे अपने हाथो को स्कृति दिखाते हुए, अलानचक्र कर "हाय पिता !, हाय भाई', हाय मावा, हाय की तरह, वर उभर सब जगह दिखाई पड़ने लगे। बन्धु !, हाय वयस्य !, हाय मामा ! मुझे मत छोडो" भीष्म के हाथ की स्फूर्ति के कारण पाण्टव और कहकर ऊँचे स्वर से रो रहे थे। बहुत लोग "आओ, । सृञ्जयगण युद्ध-भूमि मे एकमात्र वीर भीष्म को सैकड़ों- पास आओ, तुम क्या भयभीत हो गये हो? कहाँ । हजारो के तुल्य देख रहे थे ॥२०१२३॥ वहाँ के जाओगे ? मैं युद्ध में हूँ। तुम भयभीत होना नहीं।" सब वीर उनको मायाग जानने लगे । वे पल भर में कहकर चिल्ला रहे थे ॥१७॥१९॥ उम समय भीम | पूर्व ओर, पल भर में पश्चिम ओर, क्षण भर में दक्षिण पितामह हाथ मे मण्डलाकार धनुष लेकर नागमदृश | ओर और क्षण भर मे उत्तर ओर देख पडते थे । प्रचलित अप्रभागमाले बाण छोड़ने लगे। सयतत्रत भीष्म क धनुप मे निकले हुए वाण ही पाण्ट पक्ष महावीर भीष्म बाण-वर्षा द्वारा दमो दिगाआ को वीरा देख पडते थे, भीष्म की मूर्ति को कोई एकाकार करते हुए. पाण्डपक्ष के वीरो के नाम ले- नहीं देख सकता था ॥२४।२६।। वीरगण उन्हें सेना लेकर उन्हें मारने लंग। हे महाराज ! वे सभी स्थानो का नाग और अद्भुत कर्म करते देखकर अनेक प्रकार अध्याय "० ] महाभारत [ ४२७० । । : भीष्माग्निमभिसंक्रुद्धं विनाशाय सहस्रशः नहि मोघः शरः कश्चिदासीद्भीष्मस्य संयुगे ॥ २९ ॥ नरनागाश्वकायेपु वहुत्वाल्लघुयोधिनः भिनत्त्येकेन बाणेन सुमुखेन पतत्त्रिणा ॥ ३० ॥ गजकण्टकसन्नद्धं वज्रेणेव शिलोच्चयम् द्वौत्रीनपि गजारोहान्पिण्डितान्वर्मितानपि ॥ ३१ ॥ नाराचेन सुमुक्तेन निजघान पिता तव यो यो भीमं नरव्याघ्रमभ्येति युधि कश्चन ॥ ३२ ॥ मुहूर्तदृष्टः स मया पतितो भुवि दृश्यते एवं सा धर्मराजस्य वध्यमाना महाचमूः ॥३३॥ भीप्मेणाऽतुलवीर्येण व्यशीर्यत सहस्रधा प्राकम्पत महासेना शरवण तापिता ॥ ३४ ॥ पश्यतो वासुदेवस्य पार्थस्याऽथ शिखण्डिनः । यनमानाऽपि ते वीरा द्रवमाणान्महारथान् ॥ ३५ ॥ नाऽशक्नुवन्नारयितुं भीप्मवाणप्रपीडितान महेन्द्रसमवीर्येण वध्यमाना महाचमृः ॥३६॥ अभज्यत महाराज न च द्वो सह धावतः आविद्धनरनागाश्वं पतितध्वजकूवरम् ॥३७॥ म चिल्लान और आतनाट सरन लग। महसा क्षत्रिय चार्यशानी भीष्म के हाथों मारा नाती हुई युधिष्ठिर गण पतहों ना तरह माहित होरर आप ही अपने का मेना महरा भागा में पँटकर इधर-उपर भागन नाश र पि उन अमानुपिय रप म पिचग्नेबारे रगा । युधिष्ठिर का मेना महा मा वासुदंच और अर्जुन नद भामरस अग्नि म गिर गिरसर भम्म होने लग। के मामन ही भीम के नामों से कम्पायमान और भाम व घाण मनुष्य, हाथी, घोई आदि मस पादित होरर भागने लगी ॥३१॥३५॥ मनापतिगण शरारों पर गिरकर व्यथ नहीं जात थ । नत्र म पर्वन बारम्बार या ग्रं भा भीम के वाणों म पाड़ित परने के समान, उना एक ही ग्राण स ई बड़ तर भागता हु मैना का नहीं रोक सके। ह हासी कट कर गिर पड़ते थे ॥२४॥३१॥ राजन् । प्रधान प्रगान यांदा भी मदद महश वीय नागच वाण मारकर पय माय दो-दो तीन तीन मम्पन भामरे I की चार द्वार, साथिया हाथियों के मवारों को मार गिराते थे। महागन नावार भीम के पास जाता था या उमीक्षामा कर ध्वा पर गिर पड़ना था । म क तुप और और आश्रितों का गदर, रणभूमि मे भागने लंग। हम प्रसार पदों की सना अचेत मी हॉरर अन्यत हामार ने 71 युद्धभूम में मनुष्य, हाथी बार ४२८०] म हा भा रस [ भीष्मपर्व । अनीकं पाण्डुपुत्राणां हाहाभूतमचेतनम् जघानाऽत्र पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा ॥३८॥ प्रिय सखायं चाऽऽक्रन्दे सखा दैवबलात्कृतः । विमुच्य कवचान्यन्ये पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः ॥ ३९ ॥ विमुक्तकेशा धावन्तः प्रत्यदृश्यन्त भारत तद्गोकुलमिवोद्धान्तमुद्धान्तरथयूथपम् ॥ ४० ॥ ददृशे पाण्डुपुत्रस्य सैन्यमार्तस्वरं तदा प्रभज्यमानं सैन्यं तु दृष्ट्वा यादवनन्दनः ॥४१॥ उवाच पार्थं बीभत्सुं निगृह्य रथमुत्तमम् अयं स कालः सम्प्राप्तः पार्थ यस्तेऽभिकांक्षितः ॥ ४२ ॥ प्रहरस्व नरव्याघ्र न चेन्मोहाद्विमुह्यसे यत्वया कथितं वीर पुरा राज्ञां समागमे ॥ ४३॥ भीष्मद्रोणमुखान्सर्वान्धार्तराष्ट्रस्य सैनिकान् । सानुवन्धान्हनिप्यामि ये मां योत्स्यन्ति संयुगे॥ ४४ ॥ इति तत्कुरु कौन्तेय सत्यं वाक्यमरिन्दम वीभत्सो पश्य सैन्यं स्वं भज्यमानं ततस्ततः॥ ४५ ॥ द्रवतश्च महीपालान्पश्य यौधिष्ठिर चले दृष्ट्वा हि भीष्मं समरे व्यात्ताननमिवाऽन्तकम् ॥ ४६ ॥ घोड़े मर-मरकर गिरने लगे। रथ, ध्वजा, रथदण्ड अर्जुन से कहा-हे पार्थ ! यह वही समय है जिस आदि के ढेर के ढेर स्थान-स्थान पर पड़े हुए थे की तुम प्रतीक्षा कर रहे थे । हे पुरुपसिंह ! इस ॥३५॥३८॥ उस महायुद्ध में भाग्य के वशीभूत होकर समय तुम भीष्म पर प्रहार करो; नहीं तो मोहवश पिता पुत्र को, पुत्र पिता को आर मित्र अपने प्रिय होकर तुम कुछ नहीं कर पाओगे | पहले वीर राजाओ मिन को मार रहे थे । पाण्डवपक्ष के बहुत से योद्धा की मण्डली में तुमने प्रतिज्ञा की थी कि भीष्म, कवच और केश खोलकर इधर उधर प्राणों की रक्षा द्रोण आदि कारव-पक्ष के जो योद्धा युद्धभूमि में मुझ- करते हुए भागते देख पड़ते थे । सिंह के आने से से युद्ध करने आगे उनको और उनके अनुचरो को गायों के झुण्ड जसे व्याकुर होकर भय के मारे में अवश्य माझंगा।" ॥४११४४॥हे शत्रुनाशन ! इस चिल्लाते हुए इधर उधर भागते है वैसे ही उद्धान्त समय वह अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करो। यह देखो, हमारी रपयूथप-पूर्ण पाण्डव-मेना आर्तनाद शब्द करती हुई सेना के राजा रोग और युधिष्टिर के पाम को मेना, इधर-उधर भाग रही थी ॥३८॥४१॥ तर यदुनन्दन मुग्व फैलाये मृत्यु के ममान आते हुए भीष्म को देख- श्रीकृष्ण ने सनिको को भागते देवकर, रख लेटाकर, कर, भागी जा रही है । सिंह को देखकर भयभीत अन्याय ५९ .. म हा भारत [ ४२८१ । भयार्ताः प्रपलायन्ते सिंहाक्षुद्रमृगा इव एवमुक्तः प्रत्युवाच वासुदेवं धनञ्जयः ॥१७॥ नोदयाऽश्वान्यतो भीप्मो विगाहैतद्वलार्णवम् । पातयिष्यामि दुर्धर्षं वृद्धं कुरुपितामहम् ॥ १८ ॥ मञ्जय उवाच -ततोऽश्वान्रजतप्रख्यानोदयामास माधवः यतो भीप्मरथो राजन्दुष्प्रेक्ष्यो रश्मिवानिव ॥ १९ ॥ ततस्तत्पुनरावृत्तं युधिष्ठिरवलं महत् दृष्ट्वा पार्थं महावाहुं भीष्मायोद्यतमाहवे ॥ ५० ॥ ततो भीष्मः कुरुश्रेष्ठ सिंहवाद्विनदन्मुहुः धनञ्जयरथं शीघ्र शरवरवाकिरत् ॥ ५१ ॥ क्षणेन स रथस्तस्य सहयः सहसारथिः शरवर्पण महता सञ्छन्नो न प्रकाशते ॥ ५२ ॥ वासुदेवस्त्वसम्भ्रान्तो धैर्यमास्थाय सत्त्ववान् । चोदयामास तानश्वान्विचितान्भीप्मसायकैः ॥ ५३ ।। ततः पार्थों धनुर्गृह्य दिव्यं जलदनिःस्वनम् । पातयामास भीष्मस्य धनुश्छित्वा त्रिभिः शरैः॥ ५४ ।। स च्छिन्नधन्वा कौरव्यः पुनरन्यन्महद्धनुः निमिपान्तरमात्रेण सज्जं चक्रे पिता तव हए-दृ मृगो के समान मब भागे चले जा रहे है करके शीघ्र ही बाणवर्या में अर्जुन कारय ढक दिया। ॥४५॥४७॥ यह सुनकर अर्जुन ने कहा- हे वासुदेव ! यह ग्य क्षण भर मेघना और मारथी यामुव महित जहाँ पर भीष्म पितामह का रथ है यहाँ इस मैन्य. भीम के बाणों से अदम्य हो गया । मत्यमापन मागर के मध्य में होकर मेग ग्य ले चलिए । मैं वासुदेव धैर्य धारणपूर्वक, तनिक भी विचलित न हो- अस्य हुन दुई कुरुवृद्ध पितामह भीम को मार कर, भीष्म के प्राणों मे पीडित अर्जुन के रस के गिगऊँगा ॥४७४८॥ मञ्जय कहते है---हे राजेन्द्र! घोड़ों को हॉफने लंग ॥५१॥५३।। अर्जुन ने मंत्र मके अनन्नर मामने ग्य को हांका और जहाँ पर ममान गरजनेगा दिव्य गाण्डीर धनुष चढ़ाकर भीम का मूर्य के समान दुनिराश्यग्य स्खदा या यहाँ नाश्ण बाण से भीष्म या धनुष काट दाया । धनुष पर श्वेत घोड़ो से शोभित अर्जुन का रस पटुना दिया। कट जाने पर युरकुल-निटक भीम ने तुरन्त दुमग युधिष्टिर की सेना अर्जुन को भीम से युद्ध करने के १, धनुर हाथ में दिया और उन पर नर्गन डोग रिए उघन दंगकर लोट पड़ी ॥४१॥५०॥ एमके नदा । उमे दोनो मानों में गानन लंगे। पचार फुट-प्रधान भीष्म ने बारम्बार मिनाद अर्जुन ने युरित होकर यह धनुन यादडाटा ४२८२ ] महा भारत [ भीष्मपर्व विचकर्ष ततो दोभ्यां धनुर्जलदनिःस्वनम् अथाऽस्य तदपि क्रुद्धश्चिच्छेद धनुरर्जुनः तस्य तत्पूजयामास लाघवं शान्तनोः सुतः साधु पार्थ महावाहो साधु भो पाण्डुनन्दन ॥ ५७ ॥ स्वय्येवैतद्युक्तरूपं महत्कर्म धनञ्जय प्रीतोऽस्मि सुभृशं पुत्र कुरु युद्धं मया सह ॥ ५८ ॥ इति पार्थं प्रशस्याऽथ प्रगृह्याऽन्यन्महडनुः मुमोच समरे वीरः शरान्पार्थरथं प्रति ॥ ५९ ॥ अदर्शयद्वासुदेवो हययाने परं वलम् मोघान्कुर्वशरांस्तस्य मण्डलान्याचरल्लघु ॥६०॥ तथा भीष्मस्तु सुदृढं वासुदेवधनञ्जयो विव्याध निशितैर्वाणः सर्वगात्रेषु भारत ॥ ६१ ॥ शुशुभाते नव्याघ्रौ तौ भीष्मशरविक्षतौ मोहपाविव संरब्धौ विषाणलिखिताङ्कितो पुनश्चाऽपि सुसंरब्धः शरैः शतसहस्रशः कृष्णयोर्युधि संरब्धो भीष्मोऽथाऽवारयद्दिशः ॥ ६३ ॥ वाणेयं च शरैस्तीक्ष्णैः कम्पयामास रोपितः । मुहुरभ्यर्दयन्भीष्मः प्रहस्य स्वनवत्तदा ॥ ६४॥ ततस्तु कृष्णः समरे दृष्ट्वा भीष्मपराक्रमम् सम्प्रेक्ष्य च महावाहुः पार्थस्य मृदुयुद्धताम् ॥ ६५ ॥ ॥५४॥५६|| तब अर्जुन की स्फत्ति की प्रशसा करके महावीर भीष्म ने तीक्ष्ण बाणों से वासुदेव और अर्जुन भीम कहने लगे- हे महाबाहो ! शाबाश ! ऐसा दोनों को घायल कर टाला। भीम के बाणों से अद्भुत कर्म तुम्हारे योग्य ही है । हे वस अर्जुन ! गरीर क्षत-विक्षत हो जाने पर, सींग की चोटों से मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ । अब तुम दृढ़तापूर्वक मेरे घायल होकर गरजते हुए दो साँड़ों के श्री- साथ युद्ध करो। इस प्रकार अर्जुन की प्रशसा करके कृष्ण और अर्जुन शोभायमान हुए ॥६०।६२॥ भाम और धनुष लेकर वे फिर युद्ध करने और वाण बर- ने फिर क्रुद्ध होकर बाण-वर्षा करके चारों ओर से साने लगे ॥५७५९॥ वासुदेव ने घोड़े हाँफने श्रीकृष्ण और अर्जुन को छिपा दिया । वे अट्टहास निपुणता दिखाते हुए मण्डलाकार रय-गति से भाम करके तीक्ष्ण बाणों के प्रहार से श्रीकृष्ण को चिलित के उन बाणों को व्यर्थ कर दिया । हे राजेन्द्र ! तर करके बारम्बार अर्जुन को पीड़ित करने टगा।६३०६४।। । समान, अध्याय ५९ ] म हा भारत [ ४२८३ भीमं च शरवर्षाणि सृजन्तमनिशं युधि प्रतपन्तमिवाऽऽदित्यं मध्यमासाद्य सेनयोः ॥६६॥ वरान्वरान्विनिघ्नन्तं पाण्डुपुत्रस्य सैनिकान् । युगान्तमिव कुर्वाणं भीम यौधिष्ठिरे वले अमृष्यमाणो भगवान्केशवः परवीरहा अचिन्तयदमेयात्मा नाऽस्ति यौधिष्ठिरं वलम् ॥ ६८॥ एकाह्रा हि रणे भीष्मो नाशयेद्देवदानवान् । किन्नु पाण्डुसुतान्युद्धे सवलान्सपदानुगान् ॥ ६९ ॥ द्रवते च महासैन्यं पाण्डवस्य महात्मनः पते च कौरवास्तूर्णं प्रभग्नान्वीक्ष्य सोमकान् ॥ ७० ॥ प्राद्रवन्ति रणे दृष्ट्वा हर्पयन्तः पितामहम् सोऽहं भीमं निहन्म्यद्य पाण्डवार्थाय दंशितः ॥ ७१ ।। भारमेतं विनेप्यामि पाण्डवानां महात्मनाम् । अर्जुनो हि शरैस्तीक्ष्णैर्वध्यमानोऽपि संयुगे ॥ ७२ ॥ कर्तव्यं नाऽभिजानाति रणे भीष्मस्य गौरवात् । तथा चिन्तयतस्तस्य भूय एव पितामहः प्रेषयामास संक्रुद्धः शरान्पार्थरथं प्रति ॥ ७३ ॥ तेषां बहुत्वात्तु भृशं शराणां दिशश्च सर्वाः पिहिता बभूवुः न चाऽन्तरिक्षन दिशो न भूमिर्न भास्करोऽदृश्यत रश्मिमाली ॥७४ ॥ भानु-बारघाती श्रीकृष्ण ने देखा कि युद्ध में भीष्म पितामह को नष्ट करना तो उनके लिए कोई बात ही नहीं। घोर पराक्रम दिग्या रहे हैं, किन्तु अर्जुन उनके माय चार पाण्डयों की और सोमकों की सेना को भागतं कोमल युद्ध कर रहे हैं। दोनों मेनाओं के मध्य में देखकर कौरव लोग पितामह को आनन्दित करते हुए खड़े होकर भीष्म निरन्तर बाणार्या करते हुए सूर्य उनका पात्रा कर रहे हैं । अतएव पाण्डयों के हित के समान तप रहे थे। वे मानों प्रलय कर देंगे, इस के लिए आज मैं ही भीष्म को मासिँगा । यद्यपि भीम प्रकार युद्ध करके युधिष्टिर पक्ष के चुन-चुने श्रेष्ट तीक्ष्ण याण मार रहे है; किन्नु अर्जुन, पितामह के यादाओं को मार रहे थे। श्रीकृष्ण यह नहीं सह सके। गौरा की रक्षा के लिए, अपने कर्तव्य का पालन नहीं उन्होंने सोचा कि पाण्डवों की मेना बहुत थोड़ा रह करते ॥६॥७३॥ कृष्ण भगवान् यो मन ही मन विचार गई है ॥६५।६८) भीष्म पितामह युद्ध में आकर एक कर रहे थे, और उधर भीम पितामह युद् होकर अर्जुन ही दिन में मय देवताओं और दानवों का संहार कर के ऊपर दारुण याण यरमाने दगे । भीम के चलाये सरले है, फिर सेना और अनुचरों सहित पाण्डयों . हुए अमेय वाण दमों दिशाओं में भर गये । उस समय ४२८१ ] म हा भा र त [ भीमपर्व - - यवुश्च वातास्तुमुलाः सधूमा दिशश्च मर्वाः क्षुभिता बभूवुः । द्रोणो विकर्णोऽथ जयद्रथश्च भूरिश्रवाः कृतवर्मा कृपश्च श्रुतायुरम्बष्ठपतिश्च राजा विन्दानुविन्दौ च सुदाक्षिणश्च प्राच्याश्च सौवीरगणाश्च सर्वे वसातयः क्षुद्रकमालवाश्च ॥७६ ॥ किरीटिनं त्वरमाणाऽभिसनिदेशगाः शान्तनवस्य राज्ञः तं वाजिपादातरथोघजालैरनेकसाहस्रशतैर्ददर्श ॥७७॥ किरीटिनं सम्परिवार्यमाणं शिनेनसा वारणयूथपैश्च ततस्तु दृष्ट्वाऽर्जुनवासुदेवौ पदातिनागाश्वरथैः समन्तात् ॥७८॥ अभिद्रुतौ शस्त्रभृतां वरिष्टौ शिनिप्रवीरोऽभिससार तूर्णम् स तान्यनीकानि महाधनुष्माञ्शिनिप्रवीरः सहसाऽभिपत्य ॥७९ ॥ चकार साहाय्यमथाऽर्जुनस्य विष्णुर्यथा वृत्रनिपूदनस्य विशीर्णनागाश्वरथध्वजौघं भीष्मेण चित्रासितसर्वयोधम् ॥८०॥ युधिष्ठिरानीकमभिद्रवन्तं प्रोवाच सन्दृश्य शिनिप्रवीरः क्व क्षत्रिया यास्यथ नैप धर्मः सतां पुरस्तात्कथितः पुराणैः ॥ ८१ ॥ मा स्वां प्रतिज्ञा त्यजत प्रवीराः स्वं वीरधर्म परिपालयध्वम् । तावासबानन्तरजो निशाम्य नरेन्द्रमुख्यान्द्रवतः समन्तात् ॥ ८२ ॥ पार्थस्य दृष्ट्वा मृदुयुद्धतां च भीमं च संख्ये समुदीर्यमाणम् । अमृप्यमाणः स ततो महात्मा यशस्विनं सर्वदशाहभर्ता ॥८३॥ अन्तरिक्ष, दिशा, पृथ्वीतल या सूर्यमण्टल कुछ भी सात्यकि उनकी सहायता के लिए आघ्र अपना रथ नहीं मुझ पड़ता था । धुएँ के रङ्ग को प्रचण्ट आँधी दोडांत हुए रहीं पहुंचे ॥७५/७२॥ विष्णु ने जम चलने लगी । सर दिशाएँ क्षाभ को प्राप्त हुई ॥७३॥ इन्द्र की सहायता की थी, वैसे ही प्रधान धनुर्द्धर ७५॥ टोण, विकर्ण, जयद्रथ, भूरिश्रया, कृतवर्मा, यादयश्रेष्ट मात्यकि एकाएक उम मेना में प्रवेशकर कृपाचार्य, श्रुतायु, अग्घष्टगज, पिन्द, अनुपिन्द, सुद अर्जुन की महायता करन लंग। सात्यकि ने देगा क्षिण, प्राच्य, सांवग्गिण, यमानिगण, शुद्रकगण, कि भीम ने पाण्डपक्ष की मेना के मन चांरा को मालपगण आदि मन गजा भीम की आज्ञा मे भयभीत कर दिया है और हाथी, घोड़े. स्थ, घना शीरतापूर्वक युद्ध करने के लिए अर्जुन की ओर दी । आदि काट-काटकर उनके देर लगा दिये हैं । भीष्म मात्यकि ने देगा कि हाथी-घोडे-नय पैदल इन चार को युधिष्टि की भागता हुई मेना का पीला करने अजगारी अमाय मेना चारों ओर मे अर्जुन यो दगार मात्सकि ने अपना मेना के वीरों मे कहा--- घर रहा। इस प्रकार वामुंदर और अर्जुन को क्षनिया ! कहाँ भाग चट मा रह हो । प्राचीन चतुरहिणी मेना म गित दंगकर महापगमाम। पण्डिनों का कहना है कि युद्ध में भागना क्षत्रिय या अध्याय ५० ] म हा भा र त । १२८५ - विसृज्य वाहान् उवाच शैनेयमभिप्रशंसन्दृष्ट्वा कुरूनापततः समग्रान् ये यान्ति ते यान्तु शिनिप्रवीर येऽपि स्थिताः सात्वत तेऽपि यान्तु॥ ८४ ॥ भीम रथात्पश्य निपात्यमानं द्रोणं च संख्ये सगणं मयाऽद्य । न मे रथी सात्वत कौरवाणां क्रुद्धस्य मुच्येत रणेऽद्य कश्चित् ॥ ८५॥ तस्मादहं गृह्य रथाङ्गमुग्रं प्राणं हरिप्यामि महावतस्य निहत्य भीष्म सगणं तथाऽऽजौ द्रोणं च शैनेयरथप्रवीरी ॥८६॥ प्रीतिं करिष्यामि धनञ्जयस्य राज्ञश्च भीमस्य तथाऽश्विनोश्च । निहत्य सर्वान्धृतराष्ट्रपुत्रांस्तत्पक्षिणो ये च नरेन्द्रमुख्याः ॥ ८७॥ राज्येन राजानमजातशत्रु सम्पादयिष्याम्यहमद्य हृष्टः ततः सुनाभं वसुदेवपुत्रः सूर्यप्रभं वज्रसमप्रभावम् ॥ ८८॥ क्षुरान्तमुद्यम्य भुजेन चक्र रथादवमुत्य सङ्कम्पयन्गां चरणैर्महात्मा वेगेन कृष्णः प्रससार भीष्मम् ॥ ८९ ॥ मदान्धमाजौ समुदीर्णदर्प सिंहो जिघांसन्निव वारणेन्द्रम् सोऽभिद्रवन्भीप्ममनीकमध्ये क्रुद्धो महेन्द्रावरजः प्रमाथी व्यालम्बिपीतान्तपटश्चकाशे घनो यथा खे तडिताऽवनद्धः सुदर्शनं चाऽस्य रराज शोरेस्तच्चक्रपद्मं सुभुजोरुनालम् ॥ ९१ ॥ यथाऽऽदिपद्मं तरुणार्कवर्णं रराज नारायणनाभिजातम् तत्कृष्णकोपोदयसूर्यबुद्धं क्षुरान्ततीक्ष्णाग्रसुजातपत्रम् ॥ ९२ ॥ धर्म नहीं है । हे वीरो ! अपनी प्रतिज्ञा को मत तोड़ो। यह कौतुक देग्यो । आज कौरवमना का एक भी वीर अपने वीर-धर्म का पालन करो ॥७९॥८२॥ यशस्वी मेरे क्रोध से नहीं बच सकना । मैं अभी भयकर चक्र श्रीकृष्ण ने भी देग्या कि मब क्षत्रिय भागे चले जा हाथ में लेकर भीष्म को मार डागा । इस प्रकार रहे हैं, भीष्म पितामह सम्राम में प्रचण्ड रूप धारण भीष्म, द्रोणाचार्य और उनके अनुचरों को मारकर करते जा रहे हैं, अर्जुन कोमल युद्ध कर रहे हैं और युधिष्टिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव का प्रिय कांग्रमेना के वीर दौड़-दौड़कर आक्रमण कर रहे काँगा । धृतराष्ट्र के सब पुरों को और उनके पक्ष । सब यादवो के स्वामी कृष्णचन्द्र से यह नहीं के मुग्य राजाओ को मारकर आज में प्रमन्नतापूर्वक देगा गया । वे मात्यकि की प्रशसा करते हुए कुपित राजा युधिष्ठिर को राजामहामन पर विद्याऊँगा होकर कहने लगे-1८२१८४॥ हे यदृश्रेष्ठ ! जो जा ८८॥ अन महामा यामुदेव ने घोड़ी की गम हाय रहे हैं उन्हें जाने दो। जो पड़े हैं ये भी माग जायें। में छोड़ दी। महमान-गा, यदुन ही तीक्ष्ण, आज में अकेला ही भीष्म को और अनुचरों महित मूना प्रभा मान चक्र यो दाथ में लेकर घुमान योग को मारकर रस से मिराता है. नुन पडू-गई हुए ये रथ में यूट पंद । मिट जमे गजराज को ४२८६ ] म हा भारत भीमपव । ॥ ९३॥ । तस्यैव देहोरुसरः प्ररुढं रराज नारायणवाहुनालम् तमात्तचक्रं प्रणदन्तमुच्चैः क्रुद्धं महेन्द्रावरजं समीक्ष्य सर्वाणि भूतानि भृशं विनेदुः क्षयं कुरूणामिव चिन्तयित्वा । स वासुदेवः प्रगृहीतचक्रः संवर्तयिष्यन्निव सर्वलोकम् ॥ ९४॥ अभ्युत्पतन्लोकगुरुवभासे भूतानि धक्ष्यन्निव धूमकेतुः तमाद्रवन्तं प्रगृहीतचक्रं दृष्ट्वा देवं शान्तनवस्तदानीम् असम्भ्रमं तद्विचकर्ष दोभ्यां महाधनुर्गाण्डिवतुल्यघोपम् उवाच भीष्मस्तमनन्तपौरुपं गोविन्दमाजावविमूढचेताः ॥ ९६ ॥ एह्येहि देवेश जगन्निवास नमोऽस्तु ते माधव चक्रपाणे प्रसह्य मां पातय लोकनाथ रथोत्तमात्सर्वशरण्य संख्ये ॥ ९७॥ त्वया हतस्याऽपि ममाऽद्य कृष्ण श्रेयः परस्मिन्निह चैव लोके । सम्भावितोऽस्म्यन्धकवृष्णिनाथ लोकैस्त्रिभिर्वीर तवाऽभियानात्।। ९८ ॥ रथादवप्लुत्य ततस्त्वरावान्पार्थोऽप्यनुद्रुत्य यदुप्रवीरम् जग्राह पीनोत्तमलम्बबाहुं वाबोर्हरिं व्यायतपीनबाहुः निगृह्यमाणश्च तदाऽऽदिदेवो भृशं सरोपः किल चाऽऽत्मयोगी । आदाय वेगेन जगाम विष्णुर्जिणुं महावात इवेकवृक्षम् ॥१०॥ मारने के लिए दौड़े वैसे कृष्णचन्द्र भीष्म को मारने ह वैमै ही लोकगुरु वासुदेव चक्र हाथ में लेकर, के लिए कारवमेना की ओर दौड़े ॥८८।२०॥ उस जीवलोक को जलानेवाले प्रलयकाल के अग्नि के समान, समय उनके शरीर का पीताम्बर आकाश में पिर भीष्म पितामह की और बैग में दौड़े ॥२३॥२५॥ बिजली मे युक्त मे के ममान शोभा को प्राप्त होने श्रीकृष्ण को अपनी ओर चक्र लेकर आते देखकर लगा। श्रीकृष्ण के कोपरप मूर्य को उदय में प्रफुल्लिन, महात्मा भीष्म तनिक भी रिचलिन नहीं हुए। सुग्धारमहरा तीण अग्रभाग रस पत्तों मे शोभित, वे अविचलिन भाव से गाण्डीव के ममान श्रेष्ट धनुष श्रीकृष्ण के गरारम्प मंगवर में उत्पन्न बाह-मृणाल की टोरी बजाते हुए कहने लगे -हे श्रीकृष्ण ! हे पर स्थित, सुदर्शन चक्र रम पम-विष्णु की नाभि जगन्नियाम चक्रपाणि : आएको मैं प्रणाम करना में उपन्न, बालमृर्य-निभ, सृष्टि के आदिकाल के हैं। आप प्राणियों की रक्षा करने वाले शरण्य है । पम के समान---गांभा को प्राप्त हुआ ||२०१३॥ आप बरपूर्वस इम श्रेष्ट रथ पर मे मुझे मार गिरा। मुद श्रीशण को चन हाय में दिये देखकर मर आप मुझको माग्गे तो मुझे हम रोक और परलीय प्राणी ऊँचे म्बर में हाहाकार करने लगे। मयने में मन्याय प्राम होगा। हे यदुनाथ ! आप मुझे ममझा कि अप पुरयुट का नाश हुआ। धूमोतु माग्न दौड, मम भंग प्रनिष्ठा और कार्मि और भी जमे चगचर जगत को जाने के टिए उटिनाता बद गः ॥१६॥२८॥ मांग के ये यचन सुनकर वेग अन्याय ५० म हा भा र न । २८७ । पार्थस्तु विष्टभ्य वलेन पादौ भीपमान्तिकं तूर्णमभिद्रवन्तम् । बलान्निजग्राह हरि किरीटी पदेऽथ राजन्दशमे कथञ्चित् ॥१०१ ।। अवस्थितं च प्रणिपत्य कृष्णं प्रीतोऽर्जुनः काञ्चनचित्रमाली। उवाच कोपं प्रतिसंहरेति गतिर्भवान्फेशव पाण्डवानाम् ॥१०२॥ न हास्यते कर्म यथाप्रतिज्ञं पुत्रैः पे केशव सोदरैश्च अन्तं करिष्यामि यथा कुरूणांत्वयाऽहमिन्द्रानुज सम्प्रयुक्तः ॥१०३॥ ततः प्रतिज्ञां समयं च तस्य जनार्दनः प्रीतमना निशम्य स्थितः प्रिये कौरवसत्तमस्य रथं सचक्रः पुनरारुरोह ॥१०॥ स तानभीषून्पुनराददानः प्रगृह्य शझं द्विषतां निहन्ता विनादयामास ततो दिशश्च स पाञ्चजन्यस्य खेण शोरिः ॥१०५॥ व्याविद्धनिष्काङ्गदकुण्डलं तं रजोविकीर्णाञ्चितपद्मनेत्रम् विशुद्धदंष्टं प्रगृहीतशहं विचुक्रुशुः प्रेक्ष्य कुरुप्रवीराः ॥१०६॥ मृदङ्गभेरीपणवप्रणादा नेमिस्वना दुन्दुभिनिःस्वनाश्च ससिंहनादाश्च बभूवुरुयाः सर्वेप्वनीकेषु ततः कुरूणाम् ॥१०७॥ के माथ उनके सामने जाने न लिए उद्यत श्री कृष्ण योगेश्वा कृणचट उम ममय बोध में ये, इस कारण चन्द्र ने कहा- हे भीष्म । तुम्हीं इस महाविनाश यद्यपि अजुन ने उनको राक्ना चाहा, ना भी व के गुर कारण हा । तुम्हारे ही कारण आज दुर्योधन उमी प्रकार अर्जुन को ग्वीचन हुए भीष्म की ओर भाई-बन्धुआ महित क्निष्ट होगा । हे भीष्म 'पत में चरे नमे प्रघर आँधी किमी वृक्ष गो गीच ल नाना आमत राना को उसमे रोना ही धार्मिक मन्त्रियों है। दम पग पर नार अर्जुन पूरी पाआ या क य है। यदि कोई गजा का विपर्यय के जमाकर श्रीकृष्ण को रोग मं । उन दोनों पाओ कारण उम उपदश को न मानकर धर्म रिद कार्य अर्जुन ने अपने शोर भर पकड़ रकम ००१०१।। यान छोड़ना चाहता उममो घाइदना ही श्रेयस्कर सुवर्ण की विचित्र माग पहने हुए अर्जुन ने श्रीकृष्ण होना है । महानुभाव यदुवीर वासुदेव के वचन सुन ये चरणों में मिर रग दिया और उ* प्रगान बग्ने कर भीष्म ने कहा है जनार्दन' देर ही प्रकार है। के लिए यह अपना मोर माग मैने हित कामना में बारम्बार भृतराष्ट्र से कहा कि पातिए । आप है। पाण्ड। यो एकमात्र गनि। यादयो न आने हित के लिए कम को छोड़ दिया है पृष्णचन्द्र में आने भारयों और पुत्रा वीपण सा, तुम भी दुर्योधन को त्याग दो। परन्तु उहोने गार या रिनी प्रनिता पर चुराई उंग देवाम बुद्धि विपरीत होने के कारण मेग यह हितो- अय पूर्ण पगंगा। मैं आप! में आय देश नहीं सुना । इमी ममय पिशायाह वार अर्जुन पुग्यु' या साार परंग ॥१०॥१०॥ अन पग उदयर यदीर श्रीकृष्ण के पी दी। यो प्रनिग और शरय मुनर जनार्दन या पार अन ने जाकर धारण ये दोनों हाथ पर रिपे। ! 7 हो गया । ये 7 भर का बाप में शिया । र पेगव।
१२८८ ] म हा भा र त [ भीमराव । । । गाण्डीवघोपः स्तनयित्लुकल्पो जगाम पार्थस्य नभो दिशश्च । जग्मुश्च वाणा विमलाः प्रसन्नाः सर्वा दिशः पाण्डवचापमुक्ताः॥१०८॥ तं कौरवाणामधिपो जवेन भीष्मेण भूरिश्रवसा च सार्धम् अभ्युद्ययावुद्यतवाणपाणिः कक्षं दिधक्षन्निव धूमकेतूः ॥१०९॥ अथाऽर्जुनाय प्रजिघाय भल्लान्भूरिश्रवाः सप्त सुवर्णपुह्वान् । दुर्योधनस्तोमरमुग्रवेगं शल्यो गदां शान्तनवश्च शक्तिम् ॥११०॥ स सप्तभिः सप्त शरप्रवेकान्संवार्य भूरिश्रवसा विस्तृष्टान् शितेन दुर्योधनवाहुमुक्तं क्षुरेण तत्तोमरमुन्ममाथ ॥१११॥ ततः शुभामापतती स शक्तिं विद्युत्प्रभां शान्तनवेन मुक्ताम् । गदां च मद्राधिपवाहुमुक्तां द्वाभ्यां शराभ्यां निचकर्त वीरः ॥११२॥ ततो भुजाभ्यां चलवद्विकृप्य चित्रं धनुर्गाण्डिवमप्रमेयम् माहेन्द्रमस्त्रं विधिवत्सुघोरं प्रादुश्चकाराऽद्भुतमन्तरिक्ष ॥११३॥ तेनोत्तमास्त्रेण ततो महात्मा सर्वाण्यनीकानि महाधनुष्मान् । शरौघजालैर्विमलाग्निवर्णैर्निवारयामास किरीटमाली ॥११४॥ शिलीमुखाः पार्थधनुःप्रमुक्ता रथान्ध्वजाग्राणि धपि वाहून् । निकृत्त्य देहान्विविशुः परेषां नरेन्द्रनागेन्द्रतुरङ्गमाणाम् ॥११५॥ तरह खड़े रहकर फिर लौटकर अर्जुन के रथ पर व्याप्त हो गया । अर्जुन के धनुप से छूटे हुए विमल सवार हुए । घोड़ों की रास हाथ में लेकर उन्होंने वाण सब ओर फैलने लगे। मूखी घास को जलाने पाञ्चजन्य शद के शब्द मे आकाशमण्टल और चारो के लिए उद्यत अग्नि के ममान राजा दुर्योधन, धनुष दिशाओ को प्रतिधनित कर दिया। कृष्णचन्द्र निष्क, और वाण हाथ में लेकर, भीष्म और भूरिश्रवा के साथ अगद, कुण्टल आदि भूषण पहने हुए थे। उनके अर्जुन की ओर चल ॥१०७।१०९। इसके पश्रात् कयों और कमठमी नत्री की पलकों पर धूल जम अर्जुन के ऊपर भूरिश्रया ने सुवर्णपुद्ध सात भल्लवाण, रही थी। श्वेत दाँत और दाढ़ चमक रही थीं। ऐसे म्प दुर्योधन ने बडे वेग मे तोमर, शल्य ने गदा ओर भीष्म मे हाथ में गड्स लिये श्रीकृष्ण को देखकर सब श्रेष्ट ने शक्ति मार्ग । महाधनुर अर्जुन ने भूरिश्रवा के सानो कुरुवार ऊँचे स्वर मे चिल्लाने लगे ॥१०४११०६॥ वाणा को मान बाणों मे और दुर्योधन के तोमर को उम ममय काम मेना के मध्य मृदह, भेरी, पटह,पणा, तीक्ष्ण तुरप्रवण से निकल करके भीष्म की बिजली दुन्दुभि आदि बाजा का गड, ग्यो के पहियों की के ममान चमकीली शशि और गन्य की भारी गदा घाघराहट और उग्र मिहनाद चारों आरला गया। को दो बागो मे काट टाला॥११०।११२॥ इमके अर्जुन के गाण्डीर धनुष का गब्द बिजली की कड़क पथात् अर्जुन ने विचित्र अप्रमेय गाण्डीव धनुषको दोनो कममान आकारामण्डल में और मब दिशाओं में , हाथों मे वींचकर रिधिपूर्पक आकाश में अमोघ माहेन्द्र अन्याय ५९.] म हा भारत ततो दिशः सोऽनुदिशश्च पार्थः शरैः सुधारैः समरे वितत्य । गाण्डीवशब्देन मनांसि तेपां किरीटमाली व्यथयाञ्चकार तस्मिंस्तथा घोरतमे प्रवृत्ते शसस्वना दुन्दुभिनिःस्वनाश्च । अन्तर्हिता गाण्डिवनिःस्वनेन चभूवुरुग्राश्वरथप्रणादाः ॥११७॥ गाण्डीवशब्दं तमथो विदित्वा विराटराजप्रमुखाः प्रवीराः पाञ्चालराजो द्रुपदश्च वीरस्तं देशमाजग्मुरदीनसत्वाः ॥११८॥ सर्वाणि सैन्यानि तुतावकानि यतो यतोगाण्डिवजः प्रणादः । ततस्ततः सन्नतिमेव जग्मुर्न तं प्रतीपोऽभिससार कश्चित् ॥११९॥ तस्मिन्सुघोरे नृपसम्प्रहारे हताः प्रवीराः सरथाश्वसूताः गजाश्च नाराचनिपाततप्ता महापताकाः शुभरुवमकक्ष्याः ॥१२०॥ परीतसत्वाः सहसा निपेतुः किरीटिना भिन्नतनुत्रकायाः दृढं हताः पत्रिभिरुयवेगः पार्थेन भल्लैर्विमले: शिताः ॥१२१॥ निकृत्तयन्त्रा निहतेन्द्रकीला ध्वजा महान्तो ध्वजिनीमुखेपु । पदातिसङ्घाश्च रथाश्च संग्व्ये याश्च नागाश्च धनञ्जयेन ॥१२२॥ वाणाहतास्तूर्णमपेतसत्वा विष्टभ्य गात्राणि निपेतुरुाम् गेन्द्रेण तेनाऽस्त्रवरेण राजन्महाहवे भिन्नतनुत्रदेहाः ॥१२३॥ अब छोड़ा। धनुर्दर अर्जुन उम उत्तम संख और विमल मारा गया । रिमी शत्रु को अर्जुन के मामने जाने अग्निवर्ण बाणा के द्वारा सम्पूर्ण गमेना को रोकन का माहम नहीं हुआ । उम घोग्ता युद्ध में अर्जुन के लंग । अर्जुन को धनुप में छट हुए बाण ग्य, घना, नाण भल्ल पाणी की गहरी चोट पाकर ग्य, गोद धनुष, बार आदि काटकर शत्रुपक्ष के मनुष्य हाथी, घोड़े माग्यी, वीरगयी आदि मा मरकर गिर रहे थे । नागन आदि के शगंग में प्रवेश होने लंग ॥११३।११५।। याण लगने में प्राणहीन कर सुवर्णा गया अर्जुन ने युद्ध मे नीषण बाणो मे दमों दिशाओं को पनाका-शोभित हाऔर उनके उपर के गोदा पृथ्या श्याम करक गाण्डीय धनुर के गदग शत्रुओं के हदयों पर गिर रहे थे ॥१११११२१॥ उमंग गर्ग अर्जुन को न्याशित करना आम किया । उग पर मप्राम के बागी म जिनर करन कट गये और जागर में गाण्डी के शट ने गा, दन्दुभि. प. गोद, पट गया. पंग गोर गोमा मा माकर मिने नंगा गयां आदि यो उस शब्दों को वितरिया । गाण्डार जिना यन्त्र गटगा और निन यो पनि को मुनकर गिट आदि वार गना और है, पर वो चमेना के ग क र कट-ट गिनि मंग । अर्जुन गयाग गगने गरी मामा पागागज दुपट निर्भय भारी अर्जुन के पास आ गये ॥११॥११८॥ महागा ! आयी मार्ग मेना में भी लाल, गोई और पान ने अनी या Trt पर मिलेग पक्षा १२॥ जहां निमनं गाडार धनुरागदार मुनारायदमदा - ।
४२९२ ] म हा भारत [ भीमर्य अथ पष्टिनमोऽध्याय ।। ६० ।। सञ्जय उवाच-व्युष्टां निशां भारत भारतानामनीकिनीनां प्रमुखे महात्मा । ययौ सपत्नान्प्रति जातकोपो वृतः समग्रेण वलेन भीमः तं द्रोणदुर्योधनबाह्निकाश्च तथैव दुर्मर्पणचित्रसेनौ जयद्रथश्चाऽतिवलो वलोधैर्नृपास्तथाऽन्ये प्रययुः समन्तात् ॥ २ ॥ स तैर्महद्भिश्च महारथैश्च तेजस्विभिर्वीर्यवद्भिश्च राजन् रराज राजा स तु राजमुख्यैर्वृतः स देवैरिव वज्रपाणिः तस्मिन्ननीकप्रमुख विपक्का दोधूयमानाश्च महापताकाः सुरक्तपीतासितपाण्डुरामा महागजस्कन्धगता विरेजुः सा वाहिनी शान्तनवेन गुप्ता महारथैर्धारणवाजिभिश्च वभौ सविद्युत्स्तनयिल्लुकल्पा जलागमे छौरिख जातमेघा ततो रणायाऽभिमुखी प्रयाता प्रत्यर्जुनं शान्तनवाभिगुप्ता सेना महोग्रा सहसा कुरूणां वेगो यथा भीम इवाऽऽपगायाः ॥ ६ ॥ तं व्यालनानाविधगृढसारं गजाश्वपादातरथौघपक्षम् व्यूह महामेघसमं महात्मा ददर्श दूरात्कपिराजकेतुः ॥ ७॥ विनिर्ययौ केतुमता रथेन नरर्पभः श्वेतहयेन वीरः वरूथिना सैन्यमुखे महात्मा बधे धृतः सर्वसपत्नयूनाम् सूपस्करं सोत्तरवन्धुरेपं यत्तं यदूनामृपभेण संख्ये कपिध्वज प्रेक्ष्य विपेदुराजौ सहैव पुत्रैस्तव कौरवेयाः साठयाँ अध्याय ।। ६०॥ मञ्जय कहते हे- हे भारत । रात्रि न्यतीत है। रङ्ग के झण्ड फहरा रहे थे । वह कारसेना भाप्म, गई | शत्रुओ के ऊपर क्रुद्ध भीष्म पितामह अपनी अन्य महारथिया, हाथियो ओर घोडो से, सौदामिनी मा सेना माथ लेकर शत्रुसेना मे युद्ध करने के मण्डित मेघमाला के समान, शोभित हुई। इसके लिए युद्धभूमि को चरे | उनके साथ बहुत सी सेना पश्चात् भीम द्वारा सुरक्षित वह कौरवसेना सहसा लेकर द्रोणाचार्य, दुर्योधन, वाहार, दुर्मर्पण, चित्रमेन, अर्जुन मे युद्ध करने के लिए पाण्डवमेना के मामन, महारली जयद्रथ और अन्य सब महारथी राना चले। भयङ्कर नदीप्रवाह के समान, आगे बढ़ने लगी॥४६॥ उन सर तेजस्वी महापली राजा लोगों के मध्य में महावार अर्जुन ने दूर से हाथियो, घोडो, रथो आर महारथी भीम देगण महित इन्द्र समान शोभा पदलों से परिपूर्ण उस मेघमाला के ममान कारयमेना को प्राप्त हुए ॥१३॥ उस मेना के मध्य हाथियों को अपनी ओर आते देगा। रे अपने पक्ष की मना और रयों के ऊपर लाल, पीले, श्वेत आदि अनेक को साथ लेकर, श्वेत घोड़ो मे युक्ता रथ पर चढ़कर, अध्याय ६० ] म हा भा र त [१२९३ । प्रकर्पता गुप्तमुदायुधेन किरीटिना लोकमहारथेन तं व्यूहराजं ददृशुस्त्वदीयाश्चतुश्चतुर्व्यालसहस्रकर्णम् ॥ १०॥ यथा हि पूर्वेऽहनि धर्मराज्ञा व्यूहः कृतः कौरवसत्तमेन तथा न भूतो भुवि मानुषेषु न दृष्टपूर्वो न च संश्रुतश्च ॥ ११ ॥ ततो यथादेशमुपेत्य तस्थुः पाञ्चालमुख्याः सह चेदिमुग्न्यैः । ततः समादेशसमाहतानि भेरीसहस्राणि विनेदुराजौ ॥१२॥ शङ्खखनास्तूर्यरथस्वनाश्च सर्वेष्वनीकेषु ससिंहनादाः ततः सवाणानि महावनानि विस्फार्यमाणानि धनूंषि वीरैः ॥ १३ ॥ अणेन भेरीपणवप्रणादानन्तर्दधुः शङ्खमहास्वनाश्च तच्छवशब्दावृतमन्तरिक्षमुद्धृतभौमद्रुतरेणुजालम् महावितानावततप्रकाशमालोक्य वीराः सहसाऽभिपेतुः रथी रथेनाऽभिहतः ससूतः पपात साश्वः सरथः सकेतुः ॥ १५॥ गजो गजेनाऽभिहतः पपात पदातिना चाऽभिहतः पदातिः । आवर्तमानान्यभिवर्तमानोरीकृतान्यद्भुतदर्शनानि प्रासैश्च खगश्च समाहतानि सदश्ववृन्दानि सदश्ववृन्दैः सुवर्णतारागणभूषितानि सूर्यप्रभाभानि शरावराणि ॥१७॥ विदार्यमाणानि परश्वधैश्च प्रासैश्च खड्गश्च निपेतुरुाम् गजेत्रिपाणैर्वरहस्तरुग्णाः केचित्ससूता रथिनः प्रपेतुः ॥१८॥ शत्रुमेना के सामने चले | आपके पुत्र, सब कारवगण फिर क्षण भर में धनुष ओर बाण चढाने का शब्द और उनके सैनिक अर्जुन के सुन्दर रथ ओर सारथी । आर शङ्खों का शब्द इतना बढ़ गया कि उसमें भेरी, को देखकर अ यन्त व्याकुल हुए ॥७॥२॥ ण्डवो पणा आदि का शब्द छिप गया । आकाशमण्डल मे ने आज जिस व्यूह की रचना की थी उसके दानो । धूल का नम्बू सा तन गया । रथी योद्धा के प्रहार से और चार हजार गजराज थे। महारथी अर्जुन शस्त्र दृसरा रथी रथ, सारथी ओर घोडों समेत मरकर हाथ मे लिये सावधान होकर उस व्यूह की रक्षा पृथ्वी पर गिर पड़ा । इमी प्रकार हाथियों और घोडो कर रहे थे। आपके पक्ष के वीर उत्सुक होकर उस के समारो के प्रहार से मरकर हाथी और घोड़े पृथ्वी श्रेष्ठ व्यूह को देखने लगे । धर्मराज युधिष्ठिर ने पहले । पर गिरने लगे। इधर-उधर दोड़ते हुए घुड़सवार दिन जसा अद्भुत अदृष्टपूर्व व्यूह रचा था यसा ही । लोग, दूसरे घुडसवारो के हाथों, प्रास और शक्ति यह ब्यूह भी था। इसके अनन्तर समरभूमि में हजारों ! आदि शस्त्रों के प्रहार से मरकर पृथ्वी पर गिरने भेरी, शङ्ख आदि बाजे वजने लगे। उसके साथ न्य- लगे। उस समय उनकी दशा अद्भुत देय पड़ती थी। ध्वनि आर सिंहनाद भी सुन पड़ने लगा ॥१०११३॥ । सुवर्ण-नारागण-भूपित, सूर्य के समान प्रभामम्पन्न म हा भारत [ भीष्मपर्व गजर्षभाश्चाऽपि स्थपभेण निपातिता वाणहताः पृथिव्याम् । गजौघवेगोद्धतसादितानां श्रुत्वा विपेदुः सहसा मनुष्याः ॥ १९॥ आर्तस्वनं सादिपदातियूनां विषाणगात्रावरताडितानाम् सम्भ्रान्तनागाश्वरथे मुहूर्ते महाक्षये सादिपदातियूनाम् ॥ २० ॥ महारथैः सम्परिवार्यमाणो ददर्श भीष्मः कपिराजकेतुम् तं पञ्चतालोच्छ्रिततालकेतुः सदश्ववेगाद्भुतवीर्ययानः ॥ २१ ॥ महास्त्रवाणाशनिदीप्तिमन्तं किरीटिनं शान्तनवोऽभ्यधावत् तथैव शक्रप्रतिमप्रभावमिन्द्रात्मजं द्रोणमुखा विसस्त्रः ॥ २२ ॥ कृपश्च शल्यश्च विविंशतिश्च दुर्योधनः सौमदत्तिश्च राजन् । ततो रथानां प्रमुखादुपेत्य सर्वास्त्रविकाञ्चनचित्रवर्मा ॥ २३ ॥ जवेन शृरोऽभिससार सर्वांस्तानर्जुनस्याऽऽत्मसुतोऽभिमन्युः । तेषां महास्त्राणि महारथानामसह्यकर्मा विनिहत्त्य काणिः ॥ २४ ॥ वभौ महामन्त्रहुतार्चिमाली सदोगतः सन्भगवानिवाऽग्निः ततः स तूर्णं रुधिरोदफेनां कृत्वा नदीमाशु रणे रिपूणाम् ॥ २५॥ जगाम सौभद्रमतीत्य भीष्मो महारथं पार्थमदीनसत्वः ततः प्रहस्याऽद्भुतविक्रमेण गाण्डीवमुक्तेन शिलाशितेन ॥ २६॥ विपाठजालेन महास्त्रजालं विनाशयामास किरीटमाली तमुत्तमं सर्वधनुर्धराणामसक्तकर्मा कपिराजकेतुः ॥ २७॥ तरकस, प्राम, परश्वध और खड्ग आदि के प्रहार से ध्वजा से शोभायमान, बंगगाली घोड़ों से युक्त, रथ कट-कटकर ये पृथ्वी पर गिरने लगे ॥१४॥१८॥ पर सवार महाबली भीम उस समय महाअख, बाण बहुत से स्थी और मारी हाथियों की मूड और आदि से प्रकाशमान अर्जुन की ओर चले ॥२०१२२।। दाँतो के प्रहार से मरकर आर हाथियों के मार श्रेष्ठ उनके माथ ही इन्द्र के ममान प्रभावशाली अर्जुन रथियों के वाणो की चोट ग्याकर पृथिवी पर गिरने पर आक्रमण करने के लिए द्रोण, कृप, अल्प, लंगे । उम ममय अनेक पेदल भी हाथियों के वेग विविशति, दुर्योधन, सोमदत्त के पुन आदि बीर मी और दोनों की चाट से पीड़ित होकर आर्तनाद करने चले । इसी समय सब अली के ज्ञाता, सुरणकर- लगे ॥१८॥२०॥ इम प्रकार घुड़मगार और पैदल धारी अभिमन्यु बडे येग के साथ युद्ध के लिए इन कम होने लगे। हाथी, घोडे और रथ भ्रान्न मे रोगों के आगे आये । भीमकमी अभिमन्यु-कृपाचार्य होकर इधर-उधर दौड़ने लंगे। उम ममय महारथी आदि महाबली बीग के अस्त्र-गस्त्रों को काट-काटकर भीष्म ने महारथियों के साथ स्थित अर्जुन के रथ की महामन्त्र द्वारा आहुतियों को प्राप्त, ज्वालामाली अग्नि पजा दूर पर देग्यी । पाँच नाल ऊँची तालचिद्रयुक्त के ममान शोभायमान हुए ॥२३॥२५॥ उधर परम . Sxs अध्याय ६१ ] म हा भारत [ ४२९५ । भीष्मं महात्माऽभिववर्ष तूर्णं शरोघजालेविमलश्च भल्ले: तथैव भीष्माहतमन्तरिक्षे महास्त्रजालं कपिराजकेतोः ॥ २८ ॥ विशीर्यमाणं ददृशुस्त्वदीया दिवाकरेणेव तमोभिभूतम् एवंविधं कार्मुकभीमनादमदीनवत्सत्पुरुषोत्तमाभ्याम् ददर्श लोकः कुरुस्मृञ्जयाश्च तद द्वैरथं भीप्मधनञ्जयाभ्याम् ॥ २९ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मणि भीष्मपधपर्वणि भीमार्जुनद्वैरणे पष्टितमोऽध्याय ॥ ६०॥ पराक्रमी भीष्म पितामह युद्ध मे शत्रुओं के रक्त की पक्ष के योद्धाओं ने आचर्य के साथ देखा कि सूर्य नदी बहाकर, अभिमन्यु को लाँघकर, अर्जुन के जम अपनी किरणों मे घने अंधेरे को नष्ट कर देते समीप जाकर वाणो की वर्षा करने लगे । हँसते हुए हैं, वैसे ही अर्जुन के अस्रजाल को भीष्म ने आकाम अर्जुन ने अद्भुत गाण्डीव यनुप चढाकर इतने वाण में ही अपने दिव्य अस्त्रो से नष्ट कर दिया । कौरन, छोड़े कि भीष्म के सब अस्त्र शस्त्र खण्ड-ग्वण्ट होकर सृञ्जय और अन्य मब लोग प्रदान योदा भीष्म और कट गये। इसके पश्चात् वे भीष्म के ऊपर अमोघ अर्जुन का इम प्रकार प्रबल धनुष चढ़ाने के धीर तीक्ष्ण भल्ल बाग बग्माने लंगे। ह महाराज ! आपके डाद के साथ द्वन्द्व युद्ध देखने लगे ॥२५॥२०॥ भीष्मपर्व का साठवाँ अध्याय ममाप्त हुआ । ६० ।। अय एक पष्टिनमोऽध्याय ॥ ६ ॥ मञ्जय उवाच द्रौणि रिश्रवाः शल्यश्चित्रसेनश्च मारिपः पुत्रः सायमनेश्चैव सौभद्रं पर्यवारयन संसक्तमतितेजोभिस्तमेकं ददृशुर्जनाः पञ्चभिर्मनुजव्याघेर्गजैः सिंहशिशुं यथा नाऽतिलक्ष्यतया कश्चिन्न शोर्य न पराक्रमे बभूव सदृशः काणे ऽस्त्रे नाऽपि च लाघवे ॥ ३ ॥ तथा तमात्मजं युद्धे विक्रमन्तमरिन्दमम दृष्ट्वा पार्थः सुसंयत्तं सिंहनादमथाऽनदत् ॥ १ ॥ हरमठा अन्याय ॥ ६१ ॥ समय ने कहा - महागज ! अधथामा, युद्ध कर रहा पा | रक्षर, पराक्रम, अपप्रयोग, भरिभरा, शल्य, चिम्मन और शाल के पुत्र, ये मर स्फत्ति आदि किमी बात में कोई योमा अभिमन्यु की एकत्रित होकर एक माय अभिमन्यु युद्ध करने : यगरा नही या गला का ॥१॥३॥ अर्जुन आने गे। मरने देगा कि तेजपी माग्य अभिमन्यु इन दानापन पुर यो युद्ध में दमा पराक्रम प्रार पाँची योदाओं के मामन. पाँच गजगजी के मन्मुग पारने देगका आनन्द । मिहनार करने लगा एक गिह-गाक के ममान, निर्भय भार में गदा गमेन्ट : आरे पक्ष के गोदाओ ने अभिमन्यु की ।
१२९.६ ] म हा भार न [ भीमराव - पीडयानं तु तत्सैन्यं पौत्रं तव विशाम्पते दृष्ट्वा त्वदीया राजेन्द्र समन्तात्पर्यवारयन् धजिनी धार्तराष्ट्राणां दीनशत्रुरदीनवत् प्रत्युद्ययौ ससौभद्रस्तेजसा च वलेन च तस्य लाघवमार्गस्थमादित्यसदृशप्रभम् व्यदृश्यत महच्चापं समरे युध्यतः परैः स द्रौणिमिपुणैकेन विध्वा शल्यं च पञ्चभिः । ध्वज सांयमनेश्चैव सोऽष्टाभिश्चिच्छिदे ततः ॥ ८ ॥ रुक्मदण्डां महाशक्तिं प्रेपितां सौमदत्तिना शितेनोरगसङ्काशां पत्रिणाऽपजहार ताम् ॥ ९॥ शल्यस्य च महावेगानस्यतः समरे शरान् निवार्याऽर्जुनदायादो जघान चतुरो हयान् भूरिश्रवाश्च शल्यश्च द्रौणिः सांयमनिः शलः । नाऽभ्यवर्तन्त संरब्धाः काणेर्वाहुवलोदयम् ॥ ११ ॥ ततस्त्रिगर्ता राजेन्द्र मद्राश्च सह केकयैः पञ्चविंशतिसाहस्रास्तव पुत्रेण चोदिताः -॥ १२ ॥ धनुर्वेदविदो मुख्या अजेयाः शत्रुभियुधि सहपुत्रं जिघांसन्तं परिवत्रुः किरीटिनम् टम प्रकार कौरवमेना को मथने देयकर चारो और यक्ति काटकर गिरा दी। तब शल्य उन पर मकड़ों में उन पर आक्रमण किया नित्र शगुनागन अभिमन्यु कम बरसाने लगे। अभिमन्यु ने फत्ति के मार ने निर्भय भार मे, तेज और बल के माथ, उन लोगों चार बाणों में शल्य के रथ के चाग घोड़ो को मार के मन्मुग आकर अत्यन्न घोर सग्राम करना आरम्भ डाला । उम ममय भिश्रा, शल्य, अश्वन्यामा और किया ॥१६) गनुओं के माथ युद्ध करने ममय दाल कोर्ट भी अभिमन्यु के सामने टहरकर युद्ध नहीं अभिमन्यु का राष्ट्र धनुष मूर्यमण्डल के समान प्रभा कर मका १७१०॥ हे महागन ! एमके पभात मम्पन्न और घूमता हुआ दंग पड़ने लगा। अभिमन्यु युद्ध में अंजय, प्रधान-प्रधान धनुर्वेद के विद्वान् , ने अश्वत्थामा को एक और दान्य को पाँच बाण ग्ण-निपुण योद्धा लोग आपके पुत्र की आजा मे माग्कर आय वाणी में गल के पुत्र की धजा के अभिमन्यु और अर्जुन में युद्ध करने चले । एम कई दरुद कर डॉट । ना मोमदन के पुत्र ने पर्माम हजार मुग्य योदाओं ने मुरग-दण्डयुक्त, नागमा एक महागात अभिमन्यु वय देगा की मेना के मात्र जाकर चारों और मैं प. उपा नगई । अभिमन्यु ने एक ही याण में यह अर्जुन और अभिमन्यु को दिया ॥१२॥१३॥ मह और अध्याय ६१ } म हा भा र त [१२९७ । । तौ तु तत्र पितापुत्रौ परिक्षिप्तौ महारथौ ददर्श राजन्पाञ्चाल्यः सेनापतिररिन्दम स वारणरथौघानां सहस्रैर्वहुभिर्वृतः वाजिभिः पत्तिभिश्चैव वृतः शतसहस्रशः ॥ १५ ॥ धनुर्विस्फार्य संक्रुद्धो नोदायित्वा च वाहिनीम् । ययौ तं मद्रकानीकं केकयांश्च परन्तप ॥ १६ ॥ तेन कीर्तिमता गुप्तमनीकं दृढधन्वना संरब्धरथनागाश्वं योत्स्यमानमशोभत ॥ १७॥ सोऽर्जुनप्रमुखे यान्तं पाञ्चालकुलवर्धनः त्रिभिः शारद्वतं वाणैर्जत्रुदेशे समार्पयत् ततः स मद्रकान्हत्वा दशैव दशभिः शरैः पृष्ठरक्षं जघानाऽऽशुभल्लेन कृतवर्मणः दमनं चाऽपि दायादं पौरवस्य महात्मनः जघान विमलाग्रेण नाराचेन परन्तपः ॥ २० ॥ ततः सायमनेः पुत्रः पाञ्चाल्यं युद्धदुर्मदम् । अविध्यत्त्रिंशता वाणैर्दशभिश्चाऽस्य सारथिम् ॥ २१ ॥ सोऽतिविद्धो महेष्वासः स्मृकिणीपरिसंलिहन् । भल्लेन भृशतीक्ष्णेन निचकर्ताऽस्य कार्मुकम् ॥ २२ ॥ अथेनं पञ्चविंशत्या क्षिप्रमेव समार्पयत अश्वांश्चाऽस्याऽवधीद्राजन्नुभौ तौ पाणिसारथी॥ २३ ॥ शत्रुविजया सेनापति धृष्टद्युम्न ने अर्जुन और अभिमन्यु उधर चली । उस ममय वह सेना बहुत ही शोभा के रथ को इस प्रकार अनुसेना से घिरते देखकर को प्राप्त हुई । धृष्टद्युम्न ने अर्जुन के पास जाकर मव सेना को उनकी सहायता के लिए बढ़ने की कृपाचार्य के कये में तीन बाण मारे । फिर महराज आज्ञा दी । क्रुद्ध धृष्टद्युम्न कई हजार गजो, ग्यो शल्य को दम बाणो से व्याकुट करके भीरतापूर्वक और घोड़ो के मवारों को तथा पैदल मेना को साथ एक भल्ल बाण से नार्मा के पृष्टरक्षक को मार धनुष चढ़ाकर मद्र, कैकेय आदि देशों की मना डाला । इसके अनन्नर एक भारी नाराच वाण में मे युद्ध करने चले ॥१४॥१६॥ रथों, हाथियो, घोड़ों पौरवपुन दमन को मार डाला ॥१७॥२०|| तब शल और पैदलो मे परिपूर्ण वह पाण्डव-सेना दृद धनुप- के पुत्र ने युदुर्मट धृष्टद्युम्न और उनके सारथी को वाले दस बाण मारे । श्रेष्ट योदा धृष्टद्युम्न उन बाणों में धृष्टद्युम्न के द्वारा सुरक्षित और सच्चारित होकर १२०८ ] म हा भा र त गमपर्व - -- प स हताऽश्वे रथे तिष्ठन्ददर्श भरतर्षभ पुत्रः सांयमनेः पुत्रं पाञ्चाल्यस्य महात्मनः ॥ २४ ॥ स प्रगृह्य महाघोरं निस्त्रिंशवरमायसम् पदातिस्तूर्णमानछंद्रथस्थं पुरुषर्षभः ॥ २५॥ तं महौधमिवायान्तं खात्पतन्तमिवोरगम् भ्रान्तावरणनिस्त्रिंशं कालोसृष्टमिवान्तकम् ॥ २६ ॥ दीप्यमानमिवाऽऽदित्यं मत्तवारणविक्रमम् अपश्यन्पाण्डवास्तत्र धृष्टद्युम्नश्च पार्पतः ॥ २७॥ तस्य पाञ्चालदायादः प्रतीपमभिधावतः शितनिस्त्रिंशहस्तस्य शरावरणधारिणः ॥ २८॥ वाणवेगमतीतस्य तथाऽभ्याशमुपेयुपः त्वरन्सेनापतिः कुछो विभेद गदया शिरः तस्य राजन्सनिस्त्रिंशं सुप्रभं च शरावरम् हतस्य पततो हस्ताद्वेगेन न्यपतद्भुवि ॥ ३० ॥ तं निहत्य गदाग्रेण स लेभे परमां मुदम् पुत्रः पाञ्चालराजस्य महात्मा भीमविक्रमः ॥ ३१ ॥ तस्मिन्हते महेवासे राजपुत्रे महारथे हाहाकारो महानासीत्तव सैन्यस्य मारिप ॥३२॥ अयन्त घायल होकर क्रोध के मारे दाँत पीसने लगे। स्कृति से धृष्टद्युम्न के रथ के पास पहुँचे त्याही धृष्टद्युम्न उन्होंने एक तीक्ष्ण भल्ल बाण में मनु का धनुष काट ने अवमर पाकर गदा मे उनका सिर चूर्ण कर दिया। कर पञ्चाम बाण और मार । अब धृष्टद्युम्न हे महागज ! गढा के प्रहार मे मृत्यु को प्राप्त होकर के पुत्र के सारथी, घोडे और पावरक्षको को मार गल पुत्र गिर पडे; उनके हाथ मे चमकीली तलवार डाला ॥२११२३॥ हे महागज ! गल के पुन इम और टाल पृथ्वी पर गिर पड़ी। अपने शत्रु को गदा के प्रकार निना घोडे और मारथी के रथ पर अपने को आधान में मारकर पानाल-पुत्र धृष्टद्युम्न बहुत ही प्रसन्न असहाय निम्पाय देगका बोध के मार धृष्टद्युम्न । हुए ॥२८॥३१॥ धनुग्श्रेष्ट महारया गल पुत्र के मरने को माग्न के लिए एक श्रेष्ट मन लेकर ग्य में कूद पर आप सेना में हाहाकार मच गया । इम कर पैदल ही दौड़े । पाण्डयों और धृष्टद्युम्न ने देवा । पश्चात महावीर शर अपने पुत्र को मृत्यु देखकर कि यह बा आमाग मे गिरे हुए बडे मी या काल ग्रोध के मारे वेग मे दौड़ते हुए युद्धप्रिय शृष्टद्युम्न प्ररित मृत्यु के ममान आ रहा है ॥२४॥२४ा महा के पास पहुँने । कारों और पाण्डवों की मेना के चार सार-सूत्र वाण-वंग के मार्ग को गैरकर व्योंही मामने ये पोर मग्राम करने लगे। हाथी को जम ने दाल [ ४२०० म हा भारत काइ अनुरुग मारता है वैसे ही महावीर शल न धृष्टद्युम्न असा दर को ही श्रेष्ठ समझता हूँ; क्याफि पाण्डर- पक्ष के चार ही निरन्तर मेरे पक्ष के वीरो को मारते । पाण्डयों की प्रममा करते हो और उन्ह अन्यप, चर आन हैं। ह माय ! तुम हर एक बार मो गाय ६२ ] शृतराष्ट्र ने कहा ततः सांयमनिः क्रुद्धो दृष्ट्वा निहतमात्मजम् । अभिदुद्राव बेगेन पाञ्चाल्यं युद्धदुर्मदम् ॥३३॥ तो तत्र समरे शूरौ समेतौ युद्धदुर्मदौ ददृशुः सर्वराजानः कुरवः पाण्डवास्तथा ॥ ३४ ॥ ततः सांयमानः क्रुद्धः पार्पतं परवीरहा आजघान त्रिभिर्वाणैस्तोत्रेरिख महाद्विपम् ॥ ३५ ॥ तथैव पार्पतं शूरं शल्यः समितिशोभनः आजधानोरसि क्रुद्धस्ततो युद्धमवर्तत ॥३६॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि चतुर्थयुद्धदिवसे मायमनिपुत्रवधै एकपष्टितमोऽध्याय ॥ ६१ ॥ धृष्टद्युम्न के हृदय मे प्रहार किया । इस प्रकार उनका को तीन बाण मारे । उधर शल्य ने भी क्रुद्ध होकर घोर मग्राम होने लगा ॥३२॥३६॥ भीष्मपर्व का इकमठवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६१ ।। अथ द्विपष्टितमोऽध्याय ॥ ६ ॥ मृतराष्ट्र उवाच - देवमेव परं मन्ये पौरुपादपि सञ्जय यत्सैन्यं मम पुत्रस्य पाण्डुसैन्येन वाध्यते नित्यं हि मामकांस्तात हतानेव हि शंससि अव्यग्रांश्च प्रहृष्टांश्च नित्यं शंससि पाण्डवान् ॥ २ ॥ हीनान्पुरुषकारेण मामकानद्य सञ्जय पातितान्पात्यमानांश्च हतानेव च शंससि युध्यमानान्यथाशक्ति घटमानाञ्जयं प्रति पाण्डवा हि जयन्त्येव जीयन्ते चैव मामकाः ॥ ४ ॥ सोऽहं तीवाणि दुःखानि दुर्योधनकृतानि च । श्रोष्यामि सततं तात दुःसहानि बहूनि च बासठया अध्याय ।। ६२ ।। ह माय ! मैं पौरुष की पक्ष यी मना के रिनाम का वर्णन करने हो ॥३॥ मेरे पक्षवाली को पारुप मेहान और निदन यताकर प्रमन्न और उमाही बताने ।। मरे पक्ष के गया १२०८ ] मा भा र त [ भीष्मपर्व - । स हताऽश्वे रथे तिष्ठन्ददर्श भरतर्षभ पुत्रः सांयमनेः पुत्रं पाञ्चाल्यस्य महात्मनः ॥ २४ ॥ स प्रगृह्य महाघोरं निस्त्रिंशवरमायसम् पदातिस्तूर्णमानछंद्रथस्थं पुरुपर्पभः ॥२५॥ तं महौषमिवायान्तं खात्पतन्तमिवोरगम् भ्रान्तावरणनिस्त्रिंशं कालोत्सृष्टमिवान्तकम् ॥ २६ ।। दीप्यमानमिवाऽऽदित्यं मत्तवारणविक्रमम् अपश्यन्पाण्डवास्तत्र धृष्टद्युम्नश्च पार्पतः ॥ २७॥ तस्य पाञ्चालदायादः प्रतीपमभिधावतः शितनिस्त्रिंशहस्तस्य शरावरणधारिणः ॥ २८॥ वाणवेगमतीतस्य तथाऽभ्याशमुपेयुषः त्वरन्सेनापतिः क्रुद्धो विभेद गदया शिरः ॥ २९॥ तस्य राजन्सनिस्त्रिंशं सुप्रभं च शरावरम् हतस्य पततो हस्ताद्वेगेन न्यपतद्भुवि ॥ ३० ॥ तं निहत्य गदाग्रेण स लेभे परमां मुदम् पुत्रः पाश्चालराजस्य महात्मा भीमविक्रमः ॥३१॥ तस्मिन्हते महेष्वासे राजपुत्रे महारथे हाहाकारो महानासीत्तव सैन्यस्य मारिप ॥ ३२ ॥ अयन्त घायल होकर क्रोध के मारे दाँत पीसने लंगे। । म्फत्ति मे धृष्टद्युम्न के रथ के पास पहुँचे त्याही धृष्टद्युम्न उन्होंने एक तीक्ष्ण मल्ल बाण से शत्रु का धनुष काट ने अवसर पाकर गढामे उनका सिर चूर्ण कर दिया। कर पच्चीस वाण और मार । अब धृष्टद्युम्न ने गल है महागज ! गढा के प्रहार मे मृत्यु को प्राप्त होकर के पुत्र के सारथी, घोडे और पावरक्षकों को मार गल युर गिर पडे; उनके हाथ मे चमकीली तलवार डाला ।२१।२३।। हे महाराज ! गल के पुत्र इस । और टाल पृथ्वी पर गिर पड़ी। अपने शत्रु को गदा के प्रकार विना घाई और मारपी के रथ पर अपने को । आधान से मारकर पाञ्चाल-पुत्र धृष्टद्युम्न बहुत ही प्रसन्न असहाय निरुपाय देखकर क्रोध के मारे धृष्टद्युम्न । हुए ॥२८॥३१॥ धनुद्धग्श्रेष्ठ महारपी गल-पुत्र के मरन को माग्ने के लिए एक श्रेष्ठ खग लेकर रथ मे कूद पर आपकी सेना में हाहाकार मच गया। इसके कर पैदल ही दौडे । पाण्डवो और धृष्टद्युम्न ने देखा | पश्चात् महावीर शल अपने पुत्र की मृत्यु देखकर कि वह बार आकाश मे गिरे हुए बडे मर्प या काल क्रोध के मारे वेग मे दौडते हुए युद्धप्रिय धृष्टद्युम्न प्ररित मृत्यु के ममान आ रहा है ॥२॥२७॥ महा के पास पहुँने । कौरवों और पाण्डवों को मेना के चार शल-पुत्र बाण-वेग के मार्ग को लाँघकर याही मामने वे घोर मंग्राम करने लगे। हाथी को अप पर आते हैं। मजय! तुम हर एक बार मरे । प्रमन्न और पाटीदनामा नाफा अध्याय ६ म हा भारत नगष्ट्र ने कहा-ह मञ्जय ! पारुष की अभादव को ही श्रेष्ठ समझना है, क्योंकि पाण्डर. वीर ही निरन्तर मेरे पक्ष के बाग को मारने : पाण्डयों की प्रांगा पानी और न अपप्र, [ १२०.०. ततः सांयमनिः क्रुद्धो दृष्ट्वा निहतमात्मजम् । अभिदुद्राव वेगेन पाञ्चाल्यं युद्धदुर्मदम् ॥३३॥ तौ तत्र समरे शुरौ समेतौ युद्धदुर्मदौ ददृशुः सर्वराजानः : कुरवः पाण्डवास्तथा ॥ ३४ ॥ नतः सांयमनिः क्रुद्धः पार्पतं परवीरहा आजघान त्रिभिर्वाणस्तोत्रेरिख महाद्विपम् तथैव पार्पतं शृरं शल्यः समितिशोभनः आजघानोरसि क्रुद्धस्ततो युद्धमवर्तत ॥ ३६॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि चतुर्थयुद्धदिवसे मायमनिपुनवचे एकपष्टितमोऽध्याय ॥ ६१ ।। कोई अकुश मारता है वैमे ही महावीर गल ने धृष्टद्युम्न धृष्टद्युम्न के हृदय में प्रहार किया। इस प्रकार उनका को नीन वाण मारे । उधर शल्य ने भी क्रुद्ध होकर घोर मग्राम होने लगा ॥३२॥३६॥ भीष्मपर्व का कमठ्याँ अध्याय ममाप्त हुआ || ६१ ॥ अथ द्विपष्टितमाऽध्याय ॥ ६ ॥ धृतराष्ट्र उवाच दैवमेव परं मन्ये पौरुपादापि सञ्जय यत्सैन्यं मम पुत्रस्य पाण्डुसैन्येन वाध्यते नित्यं हि मामकांस्तात हतानेव हि शंससि अव्ययांश्च प्रहृष्टांश्च नित्यं शंससि पाण्डवान् ॥ २ ॥ हीनान्पुरुपकारेण मामकानद्य सञ्जय पातितान्पात्यमानांश्च हतानेव च शंससि युध्यमानान्यथाशक्ति घटमानाञ्जयं प्रति पाण्डवा हि जयन्त्येव जीयन्ते चैव मामकाः ॥ ४ ॥ सोऽहं तीवाणि दुःखानि दुर्योधनकृतानि च श्रोप्यामि सततं तात दुःसहानि घट्टानि च यामठवा अन्याय ॥ ६२॥ पक्ष कामना के पिनास का वर्णन यग्ने हो । मेरे पक्षवारों को पारप मेहान और निहन यार ॥१॥ । - अव्याय ] म हा मारत 7221 [ १३०१ । ततस्तु तावका राजन्परीप्सन्तोऽऽर्जनि रणे । मद्रराजरथ तूर्ण परिवार्याऽवतस्थिरे दुर्योधनो विकर्णश्च दुःशासनविविंशती दुर्मर्पणो दुःसहश्च चित्रसेनोऽथ दुर्मुखः सत्यवतश्च भद्रं ते पुरुमित्रश्च भारत एते मद्राधिपरथं पालयन्तः स्थिता रणे ॥१७॥ तान्भीमसेनः संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नश्च पार्पतः द्रौपदेयाभिमन्युश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवो ॥१८॥ धार्तराष्ट्रान्दश स्थान्दशैव प्रत्यवारयन् नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्तो विशाम्पते ॥ १९ ॥ अभ्यवर्तन्त संहृष्टाः परस्परवधैषिणः ते वै समेयुः संग्रामे राजन्दुर्मन्त्रिते तव ॥ २० ॥ तस्मिन्दशरथे क्रुद्धे वर्तमाने महाभये नावकानां परेपा या प्रेक्षका रथिनोऽभवन् ॥ २१ ॥ शस्त्राण्यनेकरूपाणि विसृजन्तो महारथाः अन्योन्यमभिनर्दन्तः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ॥ २२ ॥ ते तदा जातसंरम्भाः सर्वेऽन्योऽन्यं जिघांसवः । अन्योन्यमभिमर्दन्तः स्पर्धमानाः परस्परम् ॥ २३॥ अन्योन्यस्पर्धया राजन्नातयः सङ्गता मिथः । महास्त्राणि विमुश्चन्तः समापेतुरमर्पिणः ॥ २२॥ आवेश में आकर गल्य को तीन बेढब वाणो मे घायल शत्रुमेना के उक्त दमो योनाओं को रोकने की चेष्टा किया । यह देखकर अप पक्ष के येदा लोग करने लगे। हेगनेन्द्र ! आपा बुरी मम्मति के कारण अभिमन्यु पर आक्रमण करने के लिए मान्य के चारों तीये मर क्रोम होकर परम्पर यकी उछा मे और आ गये । दुर्योधन, दु गागन, किर्ण, पिकिंगति युन करने लगे। ॥१८॥२०॥ इम ममग अन्य गली दुर्मर्पण, दुमह, नित्रमेन, दमुंग, मन्यात और पुरमित्र, और योदा युद बन्द कर उन लोगों का पोर नाम ये दम यांदा गन्य के रथ की रक्षा करने लगे। देगने नंगे । उम ममय ये महारया यांदा, परामर ॥१४॥१७॥ हे महागज ! उधर भामंगन, धृष्टद्युम्न, यध की इच्छा मे, मोय में नेत्रमा यग्य, मानाद दोपदी के पानों पुत्र, अभिमन्यु, नपुर और महदेव, पूर्वक, गर्ग के गाल अत्र-मार यग्ने लगे। ये दमा योमा मिया अमग्य अम-शामों के दाग ॥२१॥२४॥ उमाकर दुर्गेधन ने पार, दीग 1221 ४३०१ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व । धृष्टद्युम्नहतानन्यानपश्याम महागजान् पततः पात्यमानांश्च पार्पतेन महात्मना ॥४५॥ मागधोऽथ महीपालो गजमैरावणोपमम् प्रेपयामास समर सौभद्रस्य रथं प्रति तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य मागधस्य महागजम् जधानकेषुणा वीरः सौभद्रः परवीरहा ॥४७॥ तस्याऽऽवर्जितनागस्य काणिः परपुरञ्जयः राज्ञो रजतपुझेन भल्लेनाऽपाहरच्छिरः ॥४८॥ विगाह्य तद्गजानीकं भीमसेनोऽपि पाण्डवः व्यचरत्समरे मृद्गन्गजानिन्द्रो गिरीनिव ॥४९॥ एकप्रहारनिहता भीमसेनेन दन्तिनः अपश्याम रणे तस्मिन्गिरीन्वञहतानिव भग्नदन्तान्भग्नकटान्भग्नसक्थांश्च वारणान् भग्नपृष्ठत्रिकानन्यान्निहतान्पर्वतोपमान् नदतः सीदतश्चाऽन्यान्विमुखान्समरे गतान् । विद्रुतान्भयसंविग्नांस्तथा विशकृतोऽपरान् ॥ ५२ ॥ भीमसेनस्य मार्गेषु पतितान्पर्वतोपमान् अपश्यं निहतानागान्राजनिष्ठीवतोऽपरान् ॥ ५३॥ वमन्तो रुधिरं चाऽन्ये भिन्नकुम्भा महागजाः । विह्वलन्तो गताभूमि शैला इव धरातले ने असख्य हाथियों को मार गिराया। मे प्रत्येक हाथी को पृथ्वी पर गिरा देते थे। युद्धभूमि ऐरावत सदृश एक बड़े हाथी पर मार मगधराज में पड़े हुए वे हार्थी वत्र से फटे हुए, पर्वतों के अभिमन्यु के रथ की ओर चले । शत्रुनाशन अभिमन्यु शिखर से जान पड़ते थे ॥४८॥५०॥ कुछ हाथियों ने मगधराज के महाराज को, आने देवकर, एक ही के दाँत, कुल हाथियों के मस्तक, कुछ हाथियों की याण मे मार डाला॥४४॥४७॥ इसके पश्चात् एक चाँदी पीट टूट फट गई और वे पृथ्वी पर गिर पड़े । कुछ के समान चमकीले भल्ल वाण में मगधराज का सिर काट हार्थी समर में भाग खड़े हुए। कुछ हाथियों ने के भीतर प्रवेश कर भीममेन टरकर मल-मूत्र त्याग कर दिया। कोई-काई पर्वत हाथियों को किन-भिन्न कर वज्रपाणि इन्द्र के ममान मा हाथी भीममेन के वेग से ही गिरकर मर गया । ममरभूमि में विचरने लगे। ये एक ही एक प्रहार कोई हाथी चोट खाकर चीकार करता हुआ आत- ॥ ५४॥ -- महावीर धृष्टद्युम्न गिराया। इधर अध्याय ६२ } म हा भारत - - मेदोरुधिरदिग्धाङ्गो वसामज्जासमुक्षितः व्यचरत्समरे भीमो दण्डपाणिरिवाऽन्तकः गजानां रुधिरक्लिन्नां गदां विभ्रवृकोदरः घोरः प्रतिभयश्चाऽऽसीरिपनाकीव पिनाकधृक् ॥ ५६ ॥ सम्मथ्यमानाः कुद्धेन भीमसेनेन दन्तिनः सहसा प्राद्रवन्क्लिप्टा मृद्गन्तस्तव वाहिनीम् ॥५७ ॥ तं हि वीरं महेप्यासं सौभद्रप्रमुखा रथाः पर्यरक्षन्त युध्यन्तं वज्रायुधमिवाऽमराः ॥ ५८॥ शोणिताक्तां गदां विभ्रदुक्षितां गजशोणितैः । कृतान्त इव रौद्रात्मा भीमसेनो व्यदृश्यत व्यायच्छमानं गदया दिक्षु सर्वासु भारत अपश्याम रणे भीमं नृत्यन्तमिव शङ्करम् ॥ ६०॥ यमदण्डोपमां गुर्वीमिन्द्राशनिसमस्वनाम् अपश्याम महाराज रौद्रां विशसनी गदाम् ॥६१ ॥ विमिश्रां केशमज्जाभिः प्रदिग्धां रुधिरेण च पिनाकमिव रुद्रस्य क्रुद्धस्याऽभिप्ततः पशून् ॥ १२ ॥ यथा पशूनां सङ्घातं यष्ट्या पालः प्रकालयेत् । तथा भीमो गजानीकं गदया समकालयत् गदया वध्यमानास्ते मार्गणैश्च समन्ततः स्वान्यनीकानि मृद्गन्तः प्राद्रवन्कुञ्जरास्तव ॥६॥ नाद करने लगा। किसी किमी हाथी का मम्नक भीममन की रक्षा करने लंग ॥५५॥५८॥ हाथियों फट गया और यह निरन्तर रक्त बहने मे दुर्बल हो- के रस मे भीगी हुई गदा को लिये भीममेन यमगज कर पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥५१॥५४॥ भीममेन के की तरह भयकर देस पड़ते थे। गदा घुमाते हुए सर अङ्ग मैदा, रक्त, यसा, मजा आदि मे मन गये भीमसेन नृय करते हुए शङ्कर की नगह जान पड़ते और ये दण्डपाणि यमराज के तुल्य गदा हाथ मे लिये थे । यमदण्ट की मी भाममन की गदा बहुत भाग विचरले देख पड़ने लगे | भीममेन के हाथों मे थी और वज्र के तुल्य उममे गन्न होता था। उम मर्दित हाथियों का दल उलटे लौटकर आपकी ही भयवर गदा रहा, मन्ना, केग आदि लिपटे हुए सेना को कुचलने लगा। देवता जैमे इन्द्र की रक्षा ये । वह गदा पशु को माग्नवाले रद के पिनाक' करते हैं वैसे ही अभिमन्यु आदि महाधनुर बार धनुष की नगह थी ॥५९६२॥ नमे पशुपाल टण्डे म हा भारत [ भीष्मपत्र महावात इवाऽभ्राणि विधमित्वा सवारणान् । अतिष्ठत्तुमुले भीमः श्मशान इव शूलभृत् ॥६५॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि चतुर्थदिवसे भीमयुद्धे द्विपष्टिनमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥ से पशुओं को मारता है वैसे ही भीमसेन गदा के । ही पक्ष की सेना को मथने और कुचलने लगे । द्वारा हाथियों के सवारों की मेना को मारने लगे। आँधी मे छिन्न-भिन्न मेघों के ममान हाथियों के दल भीमसेन की गदा और चारों ओर से आ रहे वाणो को नष्ट-भ्रष्ट करके भीमकर्मा भीममेन मशानवासी के आघात मे घायल होकर भागे हुए हाथी अपने भूतनाथ शङ्कर के समान गोभित हुए. ॥६३॥६५॥ भीष्मपर्व का बासठवाँ अध्याय ममास हुआ ।। ६२ ।। + - अथ त्रिपष्टितमोऽध्याय ॥ ६३ ॥ मञ्जय उवाच -- हते तस्मिन्गजानीके पुत्रो दुर्योधनस्तव भीमसेनं नतेत्येवं सर्वसैन्यान्यचोदयत् ततः सर्वाण्यनीकानि तव पुत्रस्य शासनात् । अभ्यद्रवन्भीमसेनं नदन्तं भैरवान्रवान् तं वलौघमपर्यन्तं देवैरपि सुदुःसहम् आपतन्तं सुदुष्पारं समुद्रमिव पर्वणि ॥ ३ ॥ रथनागाश्वकलिलं शङ्खदुन्दुभिनादितम् अनन्तरथपादातं नरेन्द्रस्तिमिनहदम् ॥ ४ ॥ तं भीमसेनः समरे महोदधिमिवाऽपरम् सेनासागरमक्षोभ्यं वेलेब समवारयत् तदाश्चर्यमपश्याम पाण्डवस्य महात्मनः भीमसेनस्य समरे राजन्कर्मातिमानुपम् ॥ ६ ॥ उदीर्णान्पार्थिवान्सर्वान्साश्वान्सरथकुञ्जरान् असम्भ्रमं भीमसेनो गदया समधारयत् तिरमठवाँ अध्याय ।। ६३ ।। मनय ने कहा ... हे राजेन्द्र ! हाथियों की के वेग को जमे तटभूमि रोकती है वसे ही भीमसेन सेना के यो मारे जाने पर आपके पुत्र दुर्योधन ने उम असभ्य रथ हाथी-घोड़े-पैदल आदि से पूर्ण, उड़ी अपनी मेना को भीममेन के वध की आज्ञा दी। उम हुई धूल से व्याप्त, देवनाओं के लिए भी दु मह ममय आपके पक्ष की मना भयानक शब्द करके कोरप-मेना के रंग को रोकने लगे॥१॥५॥ हे राजेन्द्र भीममेन पर आक्रमण करने के लिए दौड़ी। ममुद्र इम युद्ध में हमने भीमसेन का अद्भुत पराक्रम और - - अध्याय ६३ ] म हा भारत [१३०७ स संवार्य बलौघांस्तान्गदया रथिनां धरः अतिष्ठत्तुमुले भीमो गिरिमारिवाऽचलः तस्मिन्सुतुमुले घोरे काले परमदारुणे भ्रातरश्चैव पुत्राश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्पतः द्रौपदेयाऽभिमन्युश्च शिखण्डी चाऽपराजितः । न प्राजहन्भीमसेनं भये जाते महावलम् ततः शैक्यायसी गुर्वी प्रगृह्य महतीं गदाम् अधावत्तावकान्योधान्दण्डपाणिरिवाऽन्तकः ॥ ११ ॥ पोथयन्नथवृन्दानि वाजिवृन्दानि चाऽभिभूः । कर्पयन्रथवृन्दानि वाहुवेगेन पाण्डवः ॥ १२ ॥ विनिघ्नन्व्यचरत्संख्ये युगान्ते कालवद्विभुः ऊरुवेगेन सपन्रथजालानि पाण्डवः बलानि सम्ममर्दाशु नवलानीव कुञ्जरः मृद्गन्रथेभ्यो रथिनो गजेभ्यो गजयोधिनः ॥ १४ ॥ सादिनश्चाऽश्वपृष्ठेभ्यो भूमौ चाऽपि पदातिनः । गदया व्यधमत्सर्वान्यातो वृक्षानिवौजसा ॥ १५॥ भीमसेनो महावाहुस्तव पुत्रस्य वै वले साऽपि मज्जावसामांसः प्रदिग्धा रुधिरेण च ॥ १६ ॥ अदृश्यत महारौद्रा गदा नागाश्वपातनी तत्र तत्र हतैश्चाऽपि मनुष्यगजवाजिभिः ॥१७॥ अलौकिक काम देखे। वे अनायाम उन मब राजाओ को | दाड़े, और प्रलयकाल के अग्नि की तरह आसपास और चतुरगिणी सेना को केवल गदा की मार से रोकने के शत्रुओं को भस्म करते हुए युद्धभूमि में घूमने लंग । महापराकमा भीममेन ने गदा के द्वारा उम लगे। ये घोड़ो को खदेड़सर और घुटनों के बैग सेना का वेग रोक लिया । वे पर्वतराज सुमेरु की / से रथों को गीचकर उन पर के योदाओं को मारने तरह अचल बने रहे । उस भयानक युद्ध लगे। हाथी जमे नरकुर को जहुल को मय डालना भीमसेन के पुत्र, भाई, धृष्टद्युम, द्रोपदी के पाँचों पुत्र, ह वैम ही वे ग्यों, घोड़ों, हाथियों के मयारों और अभिमन्यु और शिखण्डी ने भीमसेन का माथ नहीं पदलों को गदा के प्रहार मे नष्ट करने लगे। प्रबर छोड़ा।६।१०॥ भीमसेन लोहे की गदा हाथ में लेकर आंधी मे उमड़े वृक्षों की तरह कांपते हुए योद्धा साक्षात् काल की तरह आपके योद्धाओं को मारने गिरने लगे ॥११॥१६॥ उम ममय भीममेन की गहा के समय - - १३०८ ] म हा भारत । भीष्मपर्व - रणाङ्गणं समभवन्मृत्योरावाससन्निभम् पिनाकमिव रुद्रस्य क्रुद्धस्याऽभिन्नतः पशून् ॥१८॥ यमदण्डोपमामुनामिन्द्राशनिसमखनाम् ददृशुभीमसेनस्य रोड़ी विशसनी गदाम् आविद्धयतो गदां तस्य कौन्तेयस्य महात्मनः। वभी रूपं महाघोरं कालस्येव युगक्षये ॥ २०॥ तं तथा महतीं सेना द्रावयन्तं पुनः पुनः दृष्ट्वा मृत्युमिवाऽऽयान्तं सर्वे विमनसोऽभवन् । २१ ।। यतो यतः प्रेक्षते स्म गदामुयम्य पाण्डवः तेन तेन स्म दीर्यन्ते सर्वसैन्यानि भारत ॥ २२ ॥ प्रदारयन्तं सैन्यानि वलेनाऽमितविक्रमम् ग्रसमानमनीकानि व्यादितास्यमिवान्तकम् ॥ २३ ॥ तं तथा भीमकर्माणं प्रगृहीत महागदम् दृष्ट्वा वृकोदरं भीष्मः सहसैव समभ्ययात् ॥ २४ ॥ महता रथघोपेण रथेनाऽदित्यवर्चसा छादयन्दारवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ २५ ॥ तमायान्तं तथा दृष्ट्वा व्यात्ताननमिवाऽन्तकम् । भीष्मं भीमो महाबाहुः प्रत्युदीयादमर्पितः ॥ २६ ॥ में रक्त, मास, मंदा, मजा और वमा लिपी हुई थी, गढा नानकर जिवर देखते थे उधर ही सेना टरकर इसी कारण वह बहुत भयङ्कर देख पडती थी। चागे भागने लगती थी ॥२०॥२२॥ हे महाराज ! इस और पडी मनुष्यों, हाथियो, बोड़ो आदि के शवों में प्रकार सन्य महारकर्ता, मुख फैलाय हुए काल के वह ममरभूमि काल की वध्यभूमि के समान जान ममान भयङ्कर, भीममेन भयायनी गढा के प्रहार से पड़ने लगी। सब लोगो को महावीर भीममेन की वह सना को छिन्न भिन्न कर रहे थे। यह देखकर महावीर प्रचण्ड गदा यमराज के दण्ड सी, इन्द्र के बन सी, भीष्म मेघ के ममान गरजनेवाल और सूर्यमण्डल के और मंहारकर्ता शङ्कर के पिनाक धनुप मा जान ममान प्रकाश पूर्ण रथ पर बैठकर वर्षा के मेघ की पड़ती थी ॥१६:१९|| उम गदा को लिये घूमते हुए तरह वाण बरमाने हुए भीममेन के सन्मुख दौड़े भीममेन उस मुमय प्रलयकाल में यमराज के समान ॥२३॥२५॥ माक्षात् काल के समान भीष्म को अते शोभा को प्राप्त हुए। सब वीरों को मारने और दसकर भीममेन और भी क्रुद्ध हो उठे और एकाएक भगाने हुए भीमसेन को आने देवकर कोरव पक्ष के ढाडकर उनके मर्माप पहुँचे । नव सत्यपरायण मान्यकि मब लोग बहुत ही व्याकुट हुए । महानगर भीममेन ' भी दृढ धनुष हाथ में लेकर बाण-वर्षी मे दुर्योधन अध्याय ] म हा भारत । तस्मिन्क्षणे सात्यकिः सत्यसन्धः शिनिप्रवीरोऽभ्यपतत्पितामहम् । निघ्नन्नमित्रान्धनुपा दृढेन सङ्कम्पयंस्तव पुत्रस्य सैन्यम् ॥ २७॥ तं यान्तमश्वे रजतप्रकाशैः शरान्वपन्तं निशितान्सुपुवान् नाऽशक्नुवन्धारयितुं तदानी सर्वे गणा भारत ये त्वदीयाः ॥ २८॥ अविध्यदेनं दशभिः पृपत्करलम्बुपो राक्षसोऽसौ तदानीम् शरैश्चतुर्भिः प्रतिविद्धयतं च नप्ता शिनेरभ्यपतद्रथेन ॥ २९ ॥ अन्वागत वृष्णिवरं निशम्य तं शत्रुमध्ये परिवर्तमानम् प्रद्रावयन्तं कुरुपुङ्गवांश्च पुनः पुनश्च प्रणदन्तमाजौ ॥ ३०॥ योधास्त्वदीयाः शरवरवर्पन्मेघा यथा भूधरमम्बुवेगैः तथाऽपि तं धारयितुं न शेकुर्मध्यन्दिने सूर्यमिवाऽऽतपन्तम् ॥ ३१ ॥ न नत्र कश्चिन्नविषण्ण आसीहते राजन्सोमदत्तस्य पुत्रात् स वै समादाय धनुर्महात्मा भूरिश्रवा भारत सौमदत्तिः ॥ ३२ ॥ दृष्ट्वा रथान्वान्व्यपनीयमानान्प्रत्युद्ययौ सात्यकि योद्भुमिच्छन् ॥ ३३ ॥ इति श्री महाभारते भाप्मपवणि भीष्मपरणि सा यमिभूरिश्रवस्ममागमे त्रिषष्टितमाऽध्याय ॥ ६३ ॥ की सेना को कम्पित आर नष्ट करते हुए भीष्म का बारम्बार सिंहनाद करते देख, पर्वत के ऊपर जलपर्ण राजेद्र । आपन पक्ष का कोई व समान वाणा का पा करने लगे, कितु वे किसा भी वार श्वेत घोडो से युक्त रथ पर उठे हुए ताण प्रसार सा यनि वेग का या रथ को रास नहीं वाण बरसा रहे, शिनिवार सा यमि का रोक नहीं सर । उस समय सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रया के सका ॥२६।२८|| केर राक्षस अम्बुप ने सामने अतिरिक्त और सभा व्याकुल हा गये । वीर भूरिश्रवा नाकर उनको दस बाण मारे । महावार सा यमि ने ने जब अपने पक्ष क पारा को सायकि क युद्ध माशल रथ पर स चार वाण मारकर उमे शिथिल कर दिया और पराक्रम से पाड़ित देखा ना वे सायकि की आर अपना रथ आग पढाया । हे राजन् ! आपरे स्पधा करने की इच्ग से, बडे वेग से, अनुप हाथ पक्ष क योद्धा लोग, उन वृष्णिपशावतस सा यकि का म रेफर उनके स मुख पहुँच ॥२९॥३३॥ शत्रुसेना के मय विचरकर कारवा का विमुख परक भाप्मपर्व का तिरसटयाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६३ ॥ अथ चतु पष्टितमोऽध्याय ॥६४ ॥ भञ्जय उनार -ततो भूरिश्रया राजन्सात्यकि नवभिः शरै. प्राविध्यपृशसंक्रुद्धस्तोत्रैरिव महाद्विपम् कौरवं सात्यकिश्चैव शरैः सन्नतपर्वभिः अवारयदमेयात्मा सर्वलोफस्य पश्यतः ओर दौड पड़ । ० ४३१० म हा र त 1 ना 1 । .. । : ततो दुर्योधनो राजा सोदर्यैः परिवारितः सौमदत्तिं रणे यत्तः समन्तात्पर्यवारयत् तं चैव पाण्डवाः सर्वे सात्यकि रभसं रणे परिवार्य स्थिताः संख्ये समन्तात्सुमहौजसः ॥ १ ॥ भीमसेनस्तु संक्रुद्धो गदामुद्यम्य भारत दुर्योधनमुखान्सर्वान्पुत्रांस्ते पर्यवारयत् रथैरनेकसाहस्रः क्रोधामसमन्वितः नन्दकस्तव पुत्रस्तु भीमसेनं महाबलम् विव्याध विशिखैः पभिः कङ्कपत्रैः शिलाशितैः । दुर्योधनश्च समरे भीमसेनं महारथम् ॥ ७॥ आजधानोरसि क्रुद्धो मार्गणैर्नवभिः शितैः ततो भीमो महाबाहुः स्वरथं सुमहाबलः आरोह रथश्रेष्ठं विशोकं चेदमब्रवीत् एते महारथाः शूरा धार्तराष्ट्राः समागताः मामेव भृशसंक्रुद्धा हन्तुमभ्युद्यता युधि मनोरथद्रुमोऽस्माकं चिन्तितो बहुवार्षिक: सफलः सूत चाऽद्येह योऽहं पश्यामि सोदरान् । यत्राऽऽशोकसमुत्क्षिप्ता रेणवो रथनेमिभिः ॥ ११ ॥ चामटवाँ अध्याय ॥६४ ॥ ने -हे महाराज ! भूरिश्रवा ने आपकं पुत्र नन्दक ने, बहुत मे ग्थी योद्धाओं के क्रोध में अधीर होकर सात्यकि को नव वाण मारे । माथ मिलकर, क्रोधपूर्वक तीक्ष्ण कङ्कपत्रपित बाण उदारहदय सात्यकि ने भी मबके सन्मुख झुके हुए उनको मारे । दुर्योपन ने भी क्रुद्ध होकर भीमसेन नीक्ष्ण असल्य वाण मारकर भरिश्रया को लौटा दिया। की छाती में नव वाण मारे ॥५८॥ अमितपराक्रमी अब राजा दुर्योधन अपने भाइयो को माथ लेकर भीममेन ने अपने रथ पर बैठकर मारथी अशोक से रिश्रया की रक्षा के लिए पहुँचे । दुविन जिम कहा- "हे मारथी ! ये धृतराष्ट्र के पुत्र बहुत ही प्रकार चारों ओर से घेरकर भूरिश्रया की रक्षा करने क्रोधित होकर मुझे मारने को प्रस्तुत हैं; इन्हें मारने लगे उसी प्रकार अन्यान्य महावली पराक्रमी पाण्डव का मेग बहुत पुराना सङ्कल्प है, सो आज उसे सफल पक्ष के पीर मात्यकि को घेरकर उनकी रक्षा करने । ममझो; क्योंकि भाइयो ममेन दुर्योधन मेरे सामने है। लगे ॥१४॥ भीममेन क्रोध के आदेश में जन गदा अन्तरिक्ष में वाण ही वाण और रथ के पहियो से हाथ में लेकर आपके पुत्रों पर प्रहार करने ल्ग तर उड़ी हुई धूल ही धूल देस पड़ेगी । सुयोधन प्रस्तुत । मञ्जय कहा--- 1 अध्याय ६१] म हा भा र त १३१२ - प्रयास्यन्त्यन्तरिक्षं हि शरवृन्दैर्दिगन्तरे तत्र तिष्ठति सन्नद्धः स्वयं राजा सुयोधनः ॥ १२ ॥ भ्रातरश्चाऽस्य सन्नद्धाः कुलपुत्रा मदोत्कटाः । पतानद्य हनिप्यामि पश्यतस्ते न संशयः ॥ १३ ॥ तस्मान्ममाश्वानसंग्रामे यत्तः संयच्छ सारथे । एवमुक्त्वा ततः पार्थस्तव पुत्रं विशाम्पते ॥ १४ ॥ विव्याध निशितैस्तीक्ष्णैः शरैः कनकभूषणेः । नन्दकं च त्रिभिर्वाणैरभ्यविध्यत्स्तनान्तरे तं तु दुर्योधनः पष्टया विद्ध्वा भीमं महाबलम् । त्रिभिरन्यैः सुनिशितैर्विशोकं प्रत्यविध्यत ॥ १६ ॥ भीमस्य च रणे राजन्धनुश्चिच्छेद भासुरम् मुष्टिदेशे भृशं तीक्ष्णैस्त्रिभिर्भल्लैर्हसन्निव ॥१७॥ समरे प्रेक्ष्य यन्तारं विशोकं तु वृकोदरः । पीडितं विशिखैस्तीक्ष्णैस्तव पुत्रेण धन्विना ॥ १८ ॥ अमृष्यमाणः संरब्धो धनुर्दिव्यं परामृशत् पुत्रस्य ते महाराज वधार्थ भरतर्षभ समादधत्सुसंक्रुद्धः क्षुरप्रं लोमवाहिनम् तेन चिच्छेद नृपतेर्भीमः कार्मुकमुत्तमम् ॥ २० ॥ सोऽपविद्धय धनुश्छिन्नं पुत्रस्ते क्रोधमूछितः । अन्यत्कार्मुकमादन सस्वरं वेगवत्तरम् ॥ २१ ॥ सन्दधे विशिखं घोरं कालमृत्युसमप्रभम् तेनाऽजधान संक्रुद्धो भीमसेनं स्तनान्तरे ॥ २२ ॥ ग्वडा हे और उसके मतवाले भाई भी साथ देने को । भीमसेन को साठ वाण मारपर मारथी को तीन तुले हुए है । म आज तुम्हारे सन्मुग्व ही इन्हें यमपुरी | बाणो से घायल किया । इसके अनन्तर हँसकर तीन भेज दूंगा। इसलिए तुम इस युद्ध मे चतुरता के बाणों से भीमसेन का धनुष काट डाला ॥१४|१७|| साथ मेरा रथ चलाओ " ||८१४॥ हे महाराज ! सारथी को घायल देखकर भीमसेन को क्रोध चढ भीमसेन ने यो कहकर बहुत से स्वर्णमण्डित तीक्ष्ण ! आया । उन्होंने आपके पुत्र को मारने के लिए दिव्य बाण दुर्योधन को मारे । नन्दक की वक्ष स्थल में धनुष और तुरन बाण हाथ में लेकर दुर्योधन का भी तीन बाण मारे । दुर्योधन ने 1 महाबली । धनुष काट डाला ॥१८॥२०॥ तर दुर्योधन ने क्रोध । .. ।
न हा भा र त भीष्मा स गाढविडो व्यथितः स्यन्दनोपस्थ आविशत् । स निपण्णो रथोपस्थे मूर्छामभिजगाम ह ॥ २३ ॥ तं दृष्ट्वा व्यथितं भीममभिमन्युपुरोगमाः नाऽमृप्यन्त महेवासाः पाण्डवानां महारथाः॥ २४ ॥ ततस्तु तुमुलां वृष्टिं शस्त्राणां तिग्मतेजसाम् । पातयामासुरव्यग्राः पुत्रस्य तव मूर्धनि ॥ २५॥ प्रतिलभ्य ततः संज्ञां भीमसेनो महाबलः दुर्योधनं त्रिभिर्विध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः ॥ २६ ॥ शल्यं च पचविंशत्या शरैर्विव्याध पाण्डवः रुक्मपुङ्खमहेष्वासः स विडो व्यपयाद्रणात् प्रत्युद्ययुम्ततो भीमं तव पुत्राश्चतुर्दश सेनापतिः सुपेणश्च जलसन्धः सुलोचनः ॥ २८॥ उग्रो भीमरथो भीमो वीरवाहुरलोलुपः दुर्मुग्यो दुष्प्रधर्षश्च विवित्सुर्विकटः समः विमृजन्तो वहन्वाणान्क्रोधसंरक्तलोचनाः भीमसेनमभिद्रुत्य विव्यधुः महिता भृशम् ॥३०॥ पुत्रांस्तु नब मम्प्रेष्य भीममेनो महाबलः मृक्षिणी विलिहन्वीरः पशुमध्ये यथा वृकः ॥ ३१ ॥ अभिपत्त्य महाबाहुर्गममानिव बेगिनः सेनापतेः क्षुरप्रेण शिरश्चिच्छेद पाण्डा ॥२७॥ - अन्याय ६४ ] म हा भारत |१३१३ सम्प्रहम्य च हृष्टात्मा त्रिभिर्वाणैर्महाभुजः जलसन्धं विनिर्भिद्य सोऽनयद्यमसादनम् ॥ ३३ ॥ सुपेणं च ततो हत्वा प्रेषयामास मृत्यवे उग्रस्य स शिरस्त्राणं शिरश्चन्द्रोपमं भुवि ॥३१॥ पातयामास भल्लेन कुण्डलाभ्यां विभूषितम् । वीरवाहुं च सप्तत्या साश्वकेतुं ससारथिम् ॥३५॥ निनाय समरे वीरः परलोकाय पाण्डवः भीमभीमरथौ चोभौ भीमसेनो हसन्निव ॥ ३६॥ पुत्रौ ते दुर्मदौ राजन्ननयद्यमसादनम् ततः सुलोचनं भीमः क्षुरप्रेण महामृधे ॥३७॥ मिषतां सर्वसैन्यानामनयद्यमसादनम् पुत्रास्तु तव तं दृष्ट्वा भीमसेनपराक्रमम ॥ ३८ ॥ शेपा येऽन्ये भवंस्तत्र ते भीमम्य भयार्दिताः । विद्रुता दिशो राजन्वध्यमाना महात्मना ॥ ३९ ॥ ततोऽब्रवीच्छान्तनवः सर्वानेव महारथान् एप भीमो रणे कुद्धो धार्तराष्ट्रान्महारथान् ॥ ४०॥ यथाप्राग्न्यान्यथाज्येष्ठान्यथाशूरांश्च सङ्गतान् । निपातयत्युग्रधन्वा तं प्रगृह्णीत मा चिरम् ॥४१॥ एवमुक्तास्ततः सर्वे धार्तराष्ट्रस्य सैनिकाः अभ्यद्रवन्त संक्रुद्धा भीमसेनं महाबलम् ॥ ४२ ॥ तुल्य होंठ चवाते हुए, गरुड़ के से वेग मे उनके मामने तुरप्र वाण से सुलोचन को भी मार डाला। मामने जाकर एक क्षुरप्र वाण से मेनापति का सिर इनके बिना जो आपके पुत्र वहाँ उपस्थित थे वे भी, काट डाला । फिर तीन वाणो म जलमन्ध और भीमसेन के पराक्रम और प्रहार मे, भय करके इधर- सुपेण को यमराज के घर भेज दिया। इसके अनन्ता उधर भाग पडे हुए और कुर मार डाले गये ॥३५॥ भल्ल वाण से उग्र का शिरस्त्राणमहिन कुण्डल-गोभित ३९॥ हे महाराज ! नव पितामह भीम ने कौरवपक्ष मस्तक काट गिराया ॥३०॥३५॥ घोड़े, घजा और के महारथियो से कहा-हे वीगे! उग्रबन्ना भीममेन मारथी को नष्ट कर उन्होने वीरवाह को सत्तर बाणों क्रोधवश होकर प्रधान-प्रधान वीगे को मार रह है, से मारा तथा वेगशाली भीमरथ और भीम को भी इसलिए तुम लोग शांघ्र ही उन पर आक्रमण करो मारकर यमलोक पहुँचा दिया । फिर सब सेना के ||४०१४१॥ यह आज्ञा पाकर दुर्योधन के मानिक ४३१४ ]. म हा भारत [ भीष्मपर्व - water भगदत्तः प्रभिन्नेन कुञ्जरेण विशाम्पते अभ्ययात्सहसा तत्र यत्र भीमो व्यवस्थितः ॥ ४३॥ आपतन्नेव च रणे भीमसेनं शिलीमुखैः अदृश्यं समरे चक्रे जीमृत इव भास्करम् ॥४४॥ अभिमन्युमुखास्तत्तु नाऽमृप्यन्त महारथाः भीमस्याऽऽच्छादनं संख्ये स्वबाहुवलमाश्रिताः ॥ ४५ ॥ त एनं शरवर्पण समन्तात्पर्यवारयन् गजं च शरवृष्टया तु विभिदुस्ते समन्ततः ॥ ४६॥ स शस्त्रदृष्टयाऽभिहतः समस्तैस्तेमहारथैः प्राग्ज्योतिपगजो राजन्नानालिङ्गः सुतेजनैः ॥४७॥ सञ्जातरुधिरोत्पीडः प्रेक्षणीयोऽभवद्रणे गभस्तिभिरिवाऽर्कस्य संस्यूतो जलदो महान् ॥४८॥ सञ्चोदितो मदनावी भगदत्तेन वारणः अभ्यधावत तान्सर्वान्कालोत्सृष्ट इवाऽन्तकः ॥ ४९ ॥ द्विगुणं जवमास्थाय कम्पयंश्चरणैर्महीम् तस्य तत्सुमहद्रूपं दृष्ट्वा सर्वे महारथाः ॥ ५०॥ असह्यं मन्यमानाश्च नाऽतिप्रमनसोऽभवन् । ततस्तु नृपतिः क्रुद्धो भीमसेनं स्तनान्तरे आजघान महाराज शरणाऽऽनतपर्वणा सोऽतिविद्धो महेष्वासस्तेन राज्ञा महारथः ॥ ५२॥ क्रोधविह्वल हो भीमसेन पर आक्रमण करने चले । मंघ सा जान पड़ने लगा ॥४५॥४८॥ महाबली उन्मत्त महागजराज पर सवार भगदत्त भीमसेन के भगदत्त ने क्रुद्ध होकर हाथी को आगे बढ़ाया । पास पहुँचे। उन्होंने असख्य बाणो की वर्षा से गजराज पहले की अपेक्षा दुगणे वेग से बढ़ा । उसके भीमसेन को उसी प्रकार छा लिया जैसे मेघ मृर्य को पॉआ के भार मे पृथ्वी काँपने लगी। यह हाथी छिपा लेते है ॥४२॥४४॥ यह अभिमन्यु आदि वीर कालप्रेरित मृत्यु के तुल्य योद्धाओं के ऊपर दौडा। न सह सके। उन्होंने क्रोध करके वाणो से राजा उस हाथी का भयानक आकार देखकर सब योद्धा भगदत्त और उनके हाथी को ढक दिया । महारथियों बड़े उद्विग्न और व्याकुल हुए ॥४९॥५१॥ राजा के प्रहार से प्राग्ज्योतिपेश्वर भगदत्त का हाथी रक्त भगदत्त ने क्रोध में आकर भीमसेन के वक्षस्थल में मे तर हो गया । यह उस समय मूर्यकिरण मण्डित तीक्ष्ण बाण मारा । मर्मस्थल में भगदत्त के बाण की अध्याय ६४ ] म हा भा र त मूर्च्छयाऽभिपरीतात्मा ध्वजयष्टिं समाश्रयत् । तांस्तु भीतान्समालक्ष्य भीमसेनं चमूर्छितम् ॥ ५३ ॥ ननाद बलवन्नादं भगदत्तः प्रतापवान् ततो घटोत्कचो राजन्प्रेक्ष्य भीमं तथा गतम् ॥ ५४ ॥ संक्रुद्धो राक्षसो घोरस्तत्रैवाऽन्तरधीयत् स कृत्वा दारुणां मायां भीरूणां भयवर्धिनीम् ॥ ५५॥ अदृश्यत निमेपार्धाद्धोररूपं समास्थितः ऐरावतं समारूढः स वै मायाकृतं स्वयम् ॥ ५६ ॥ तस्य चाऽन्येऽपि दिङ्नागा बभूवुरनुयायिनः । अञ्जनो वामनश्चैव महापद्मश्च सुप्रभः ॥ ५७॥ त्रय एते महानागा राक्षसः समधिष्टिताः महाकायास्त्रिधा राजन्प्रस्रवन्तो मदं बहु तेजोवीर्यवलोपेता महावलपराक्रमाः घटोत्कचस्तु स्वं नागं चोदयामास तं तदा ॥ ५९ ॥ सगजं भगदत्तं तु हन्तुकामः परन्तपः ते चाऽन्ये चोदिता नागा राक्षसस्तैमहावलैः ॥ ६० ॥ परिपेतुः सुसंरब्धाश्चतुर्दष्ट्राश्चतुर्दिशम् भगदत्तस्य तं नागं विषाणैरभ्यपीडयन् ॥ ६१ ॥ स पीड्यमानस्तै गैर्वेदनातः शराहतः अनदत्सुमहानादमिन्द्राशनिसमस्वनम् ॥६२ ॥ चोट खाकर भीमसेन अयन्त व्यथित हो घजा के हुआ । उसके मायावल से अञ्जन, वामन आर महा- डण्डे का आश्रय लेकर बेठ गये। शत्रुपक्ष के योद्धाओ पद्म नाम के तीनो दिग्गज सन्मुख देस पड़े ॥५४॥ को डरे हुए ओर भीमसेन को मूर्छित देखकर ५९॥ वे भा ऐरारत के पीछे चले। उन तीनों दिग्गजों प्रभावशाली भगदत्त गम्भीर गब्द मे गरजने लगे के मद बह रहा था। वे बडे डील डोयाले चार- ॥५१॥५४॥ हे राजेन्द्र ! भीमसन की यह दशा चार दाँतो से शोभित आर तेज-वीर्य-बट-बंग पराक्रम देखकर राक्षस घटो कच बहुत क्रुद्ध हुआ। वह तुरन्त मम्पन्न थे । उन पर विकराल राक्षम बैटे हुए थे माया वल से अन्तर्द्वान होकर, कातरो को दहला घटोत्कच ने हाथों में हाथी को नष्ट करने के लिए देनेगली माया उत्पन्न कर, मायामय ऐरावत हायी भगदत्त के हाथी के मन्मुग्य अपना हाथी बढ़ाया।. पर चढ़कर लोगो के सामने भयवर रूप से प्रकट अन्य नीन हापी भी उसी के साथ गक्षमी द्वारा म हा भारत [ भीमपर तस्य तं नदतो नादं सुघोरं भीमनिःवनम् श्रुत्वा भीष्मोऽब्रवीद्रोणं राजानं च सुयोधनम् ।। ६३ ॥ एप युध्यति संग्रामे हैडिम्वेन दुरात्मना भगदत्तो महेप्वासः कृच्छ्रे च परिवर्तते ॥६४ ॥ राक्षसश्च महाकायः स च राजाऽतिकोपनः एतो समेतो समरे कालमृत्युसमावुभौ श्रूयते चैव हृष्टानां पाण्डवानां महास्वनः हस्तिनश्चैव सुमहान्भीतस्य रुदितध्वनिः ॥ ६६ ॥ तत्र गच्छाम भद्रं वो राजानं परिरक्षितुम् अरक्षमाणः समरे क्षिप्रं प्राणान्विमोक्ष्यति ॥६७॥ ते त्वरचं महावीर्याः किं चिरेण प्रयामहे महान्हि वर्तते रोद्रः संग्रामो लोमहर्पणः ॥६८॥ भक्तश्च कुलपुत्रश्च शृरश्च पृतनापतिः युक्तं तम्य परित्राणं कर्तुमम्माभिरच्युत ॥ ६९ ॥ भीष्मस्य तद्वचः श्रुत्वा सर्व एव महारथाः द्रोणभीप्मो पुरस्कृत्य भगदत्तपरीपमया उत्तमं जबमाम्याय प्रययुर्यत्र सोऽभवत नान्प्रयानान्ममालोक्य युधिष्टिरपुगेगमाः ॥ ७९ ॥ । ॥ ७०॥ AurwAAAAAdiwww अध्याय ६४ ] म हा भारत [ ४३१७ पञ्चालाः पाण्डवैः सार्ध पृष्टतोऽनुययुः परान् । तान्यनीकान्यथालोक्य राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ॥७२॥ ननाद सुमहानादं विस्फोटमगनेरिव तस्य तं निनदं श्रुत्वा दृष्ट्वा नागांश्च युध्यतः ।। ७३ ।। भीष्मः शान्तनवो भूयो भारद्वाजमभापत न रोचते मे संग्रामो हैडिम्वेन दुरात्मना ॥७४॥ बलवीर्यसमाविष्टः ससहायश्च साम्प्रतम् नैप शक्यो युधा जेतुमपि वज्रभृता स्वयम् ॥७५॥ लब्धलक्षः प्रहारी च वयं च श्रान्तवाहनाः पञ्चालै पाण्डवेयैश्च दिवसं क्षतविक्षताः ॥ ७६ ॥ तन्न मे रोचते युद्धं पाण्डवैर्जितकाशिभिः घुष्यतामवहारोऽद्य श्वो योत्स्यामः परैः सह ॥७७।। पितामहवचः श्रुत्वा तथा चक्रुः म्म कौरवाः । उपायेनाऽपयानं ते घटोत्कचभयार्दिताः कौरवेषु निवृत्तेषु पाण्डवा जितकाशिनः सिंहनादान्भृशं चक्रुः शङ्खान्दध्मुश्च भारत ॥ ७९ ॥ एवं तदभवद्युद्ध दिवसं भरतर्षभ पाण्डवानां कुरूणां च पुरस्कृत्य घटोत्कचम् ॥८॥ कौरवास्तु ततो राजन्प्रययुः शिविरं स्वकम् बीडमाना निशाकाले पाण्डवेयैः पराजिताः ॥ ८१॥ पहुँचे । इधर युधिष्ठिर आदि पाण्डय और पाञ्चालगण हमारे वाहन बहुत थक गये हैं। पाञ्चालले आर पाण्डवों गत्रुओं को आते देखकर उनके पीछे दाडे । प्रतापी ने हमे घायल भी कर दिया है । आन पाण्डयां का घटोकच ने उन सबको आते देविकर घोर सिंहनाद जय हुई है । इस कारण, मेरी ममझ मे, आज उनमें किया ॥७०।७३॥ उम महाशब्द को सुनकर और युद्ध करना उचित नहीं ह | आज का युद्ध समाप्त दिग्गजों को युद्ध करते देखकर भीष्म ने द्रोणाचार्य कर दीजिए, कल शत्रुओ में युद्ध किया जायगा से कहा--हे आचार्य । दुरामा घटोत्कच के साथ ॥७३।७७॥ घटोग्च से डरे हुए वाग्वो ने भीम के युद्ध करने को मरा अन्त करण नहीं चाहता । इस ये पचन सुनकर, उनके बताये उपाय के अनुसार, समय यह वीर्यशाली ओर सहायसम्पन्न हो रहा है। मेना को युद्ध से रोक दिया । कौरवों के युद्ध ममाप्त इस समय इन्द्र भी इमे जीत नहीं सकते। विशेषकर करने पर विजयी पाण्डवगण शव, येणु आदि वाजे ४३१८ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व : शरविक्षतगात्रास्तु पाण्डुपुत्रा महारथाः युद्धे सुमनसो भूत्वा जग्मुः स्वशिविरं प्रति ॥ ८२ ॥ पुरस्कृत्य महाराज भीमसेनघटोत्कची पूजयन्तस्तदाऽन्योन्यं मुदा परमया युताः ॥ ८३॥ नदन्तो विविधान्नादांस्तूर्यस्खनविमिश्रितान् सिंहनादांश्च कुर्वन्तो विमिश्रान्शङ्खनिःस्वनैः ॥ ८४ ॥ विनदन्तो महात्मानः कम्पयन्तश्च मेदिनीम् । घट्टयन्तश्च मर्माणि तव पुत्रस्य मारिप प्रयाताः शिविरायैव निशाकाले परन्तप दुर्योधनस्तु नृपतिर्दीनो भ्रातृवधेन च ॥८६॥ मुहूर्त चिन्तयामास वाष्पशोकसमाकुलः ततः कृत्वा विधिं सर्व शिविरस्य यथाविधि । प्रदध्यौ शोकसंतप्तो भ्रातृव्यसनकर्शितः ॥८७ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि चतुर्थदिवसाबहार चतु.पष्टितमोऽध्यायः ।। ६४ ॥ बजाते हुए सिंहनाद करने लगे। हे भारत ! उम के मर्मस्थल को पीड़ा पहुँचानेवाले बाजे और शव के दिन कौरवों के साथ घटोत्कच और पाण्डवो का युद्ध गब्द के माय मिहनाद करते तथा पृथ्वी को कॅपाते इस प्रकार हुआ ॥७८१८०॥ पाण्डवा में पराजित हुए गत्रि को अपने गिनिरों में पहुँचे । भाइयों के और लज्जित होकर कौरव अपने-अपने शिविर को मारे जाने के शौक से राजा दुर्योधन बहुत ही चिन्तित गये । वायल पाण्डवगण भी घटोत्कच और भीमसेन और अधमरे से हो गये । शिविर के यथायोग्य कार्य- की प्रशसा करते हुए प्रसन्न मन मे अपने शिविरा पूर्ण करके वे फिर अपने भाइयों का शोक मनाने को गये ॥८११८३॥ वे आनन्दित होकर दुर्योधन लगे ॥८४१८७|| भीष्मपर्व का चौमटवां अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ६ ॥ अब पचपष्टितमोऽयाय ॥ ६५॥ शृतगष्ट्र उवाच--भयं मे सुमहज्जातं विस्मयश्चैव सञ्जय श्रुत्वा पाण्डुकुमाराणां कर्म देवैः सुदुष्करम् ॥ १ ॥ पुत्राणां च पराभावं श्रुत्वा सञ्जय सर्वशः चिन्ता में महती सूत भविष्यति कथं विति ॥ २ ॥ ध्रुवं विदुरवाक्यानि धक्ष्यन्ति हृदयं मम यथा हि दृश्यते सर्व देवयोगेन सञ्जय अन्याय ६५] म हा भा र न १३१० 1 यत्र भीप्ममुखान्सर्वान्शस्त्रज्ञान्योधसत्तमान् । पाण्डवानामनीकेषु योधयन्ति प्रहारिणः केनाऽवध्या महात्मानः पाण्डुपुत्रा महाबलाः । केन दत्तवरास्तात किं वा ज्ञानं विदन्ति ते ॥ ५॥ येन क्षयं न गच्छन्ति दिवि तारागणा इव पुनः पुनर्न मृष्यामि हतं सैन्यं तु पाण्डवैः ॥ ६ ॥ मय्येव दण्डः पतति दैवात्परमदारुणः यथाऽवध्याः पाण्डुसुता यथा वध्याश्च मे सुताः॥ ७ ॥ एतन्मे सर्वमाचक्ष्व याथातथ्येन सञ्जय न हि पारं प्रपश्यामि दुःखस्याऽस्य कथञ्चन ॥ समुद्रस्येव महतो भुजाभ्यां प्रतरन्नरः पुत्राणां व्यसनं मन्ये ध्रुवं प्राप्तं सुदारुणम् घातयिष्यति मे सर्वान्पुत्रान्भीमो न संशयः । नहि पश्यामि तं वीरं यो मे रक्षेत्सुतान्रणे ध्रुवं विनाशः सम्प्राप्तः पुत्राणां मम सञ्जय तस्मान्मे कारणं सूत शक्तिं चैव विशेषतः पृच्छतो वै यथातत्त्वं सर्वमाख्यातुमर्हसि दुर्योधनश्च यच्चके दृष्ट्वा स्वान्विमुखान्रणे ॥ १२ ॥ पैंसठवा अध्याय ॥ ६५ ॥ धृतराष्ट्र ने कहा हे सञ्जय ! पाण्डयो के के तारागण के समान अक्षय बने हुए अद्भुत कर्म सुन-सुनकर मेरे मन मे बहुत ही भय पड़ता है, उन्हें किसी ने वरदान दे दिया है, अथवा और आश्चर्य उत्पन्न हो रहा है । हे सञ्जय ! पुत्रों वे कुछ प्रहार-मन्त्र जानते हैं । यह मुझे असह्य हो की पराजय मुनकर मैं इसी चिन्ता से व्य कुल हो ! रहा है कि वारम्वार पाण्डव मेरी सेना और योद्धाओं रहा हूँ कि आगे चलकर और क्या होगा । देवाधीन को नष्ट करते जा रहे हैं । देवकोप से मुझ पर ही घटनाओं को देखकर मुझे जान पडता है कि विदुर ! दारुण दण्ड पड रहा है । हे मञ्जय ! तुम मुझे की बात न मानने के कारण मुझे पीछे से पश्चाताप वताओ, पाण्डर क्यों नहीं मरते और मेरे पुत्र ही करना पड़ेगा। उन महात्मा ने जो कहा है यह | क्यों मरते हैं । ॥५॥८॥ जैसे मनुष्य बावल से नर- उसी प्रकार हो रहा है ॥१४॥ हे वत्स ! सव समय कर समुद्र के पार नहीं जा ममता मे ही मैं भी वे प्रधान योद्धा लोग महाबली भीष्म के साथ युद्ध इस दु.ग्वसागर के पार जाने का उपाय नहीं देखता। करके उन पर प्रहार करते है और आकाशमण्डल मेरे पुत्रों के लिए दारण मङ्कट उपस्थित है । मुझे हैं । जान ४३२० । म हा भारत [ भीमपर्व - भीष्मद्रोणौ कृपश्चैव सौबलश्च जयद्रथः द्रौणिर्वाऽपि महेष्वासो विकर्णो वा महाबलः ॥ १३ ॥ निश्चयो वाऽपि कस्तेपां तदा ह्यासीन्महात्मनाम्। विमुखेपु महाप्राज्ञ मम पुत्रेपु सञ्जय ॥ १४ ॥ सञ्जय उवाच -शृणु राजन्नवहितः श्रुत्वा चैवाऽवधारय नैव मन्त्रकृतं किञ्चिन्नैव मायां तथाविधाम् ॥१५॥ न वै विभीषिका काञ्चिद्राजन्कुर्वन्ति पाण्डवाः । युध्यन्ति ते यथान्यायं शक्तिमन्तश्च संयुगे ॥ १६ ॥ धर्मेण सर्वकार्याणि जीवितादीनि भारत आरभन्ते सदा पार्थाः प्रार्थयाना महद्यशः ॥ १७॥ न ते युद्धान्निवर्तन्ते धपिता महावलाः श्रिया परमया युक्ता यतो धर्मस्ततो जयः ॥ १८॥ तेनाऽवध्या रणे पार्था जययुक्ताश्च पार्थिव तव पुत्रा दुरात्मानः पापेप्वभिरताः सदा निष्ठुरा हीनकर्माणस्तेन हीयन्ति संयुगे सुवहूनि नृशंसानि पुत्रैस्तव जनेश्वर ॥ २० ॥ निकृतानीह पाण्डनां नीचैरिव यथा नरैः सर्वं च तदनादृत्य पुत्राणां तव किल्विषम् ॥ २१ ॥ जान पड़ता है कि अकेला ही भीमसेन मरे सब पुत्री । सुनिए । पाण्डव कुछ मन्त्रप्रयोग, मायाजाल या को मार डालेगा। युद्ध में मेरे पुत्रों की रक्षा कर विभीपिका दिखाकर जय प्रप्त नहीं करते। वे शक्ति मकनेवाला कोई चीर नहीं देख पड़ता । इस कारण और धमन्याय के अनुसार ही युद्ध करते हैं। हे राजेन्द्र ! मेरे पुत्र अपय मारे जायंगे ॥८॥११॥ हे सञ्जय ! पाण्डव लोग यश प्राप्त करने की इच्छा से धर्मपूर्वक पाण्डवों की जय और मेरे पुत्रों के नाश का कारण ही जीविका-निर्वाह आदि सब कार्यों का आरम्भ तुम विशेष रूप से मुझसे कहो। अपने पक्ष की | करते हैं ॥१५|१७|| श्रीयुक्त पाण्टर अपने धर्म के मैना जब युद्ध-स्थल से हट गई तब दुर्योधन, भीम, । अनुपर्ती होकर ही युद्ध कर रह है। जहाँ धर्म है. दोण, शकुनि, जयद्रथ, कृपाचार्य, अश्वथामा और यही जय है । इसी कारण धर्मनिरल पाण्डव ममर किर्ण आदि महाबली वीरो ने क्या किया ? मेरे में असभ्य और विजयी हो रहे हैं । आपके पुत्र पुनो को रण से विमुग्य देगकर उन पूरो के हृदय दुरान्मा, निष्ठुर, ओछे कार्य करनेवाले और पापी हैं में क्या भार उत्पन्न हुआ ! ॥११॥१४॥ माय ने इमा मे पराजय पा रहे है । आपके पुत्र अब तक कहा-हे गजेन्द्र ! मेरी बातो को मन लगाकर बाबा पाण्डया के साथ नीचा कामा, नृांम, । - अध्याय ६५ म हा भारत सापन्हवाः सदैवासन्पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज न चैतान्बहुमन्यन्ते पुत्रास्तव विशाम्पने ॥ २२॥ तस्य पापस्य सततं क्रियमाणस्य कर्मणः साम्प्रतं सुमहदघोरं फलं प्राप्तं जनेश्वर स वं भुंच्य महाराज सपुत्रः ससुहृज्जनः नाऽवबुध्यसि यद्राजन्वार्यमाणः सुहृज्जनैः ॥ २४ ॥ विदुरेणाऽथ भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना तथा मया चाऽप्यसकृढार्यमाणो न वुध्यसे ॥ २५ ॥ वाक्यं हितं च पथ्यं च माः पथ्यमिवोषधम् । पुत्राणां मतमाज्ञाय जितान्मन्यसि पाण्डवान् ॥ २६ ।। शृणु भूयो यथातत्त्वं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । कारणं भरतश्रेष्ठ पाण्डवानां जयं प्रति ॥२७॥ तत्तेऽहं कथयिष्यामि यथाश्रुतमरिन्दम दुर्योधनेन सम्पृष्ट एतमर्थं पितामहः दृष्ट्वा भातृरणे सर्वान्निर्जितांस्तु महारथान् शोकसम्मृढहृदयो निशाकाले स्म कौरवः ॥ २९ ॥ पितामहं महाप्राज्ञं विनयेनोपगम्य ह यदब्रवीत्सुतस्तेऽसौ तन्मे शृणु जनेश्वर ॥३०॥ दुर्योवन उगच -द्रोणश्च त्वं च शल्यश्च कृपो द्रौणिस्तथैव च कृतवर्मा च हार्दिक्यः काम्बोजश्च सुदक्षिणः ॥३१॥ निन्दित व्यवहार करते आये है; किन्तु पाण्टयो ने आपको मना किया, पर आप नहीं समझे । हित आपंक पुत्री के छम और अपराधों की कुल अपेक्षा आर पथ्य के वचन अपको वैसे ही नहीं रचत जमे नहीं की। पाण्डर मदा धर्म के आश्रय रहे हैं । गेगी को पथ्य और औपति नहीं अच्छी लगती। आपके पुत्र उन्हें तुच्छ समझकर उनसे दुर्यपहार , पुत्री के मन को ठीक समझकर आप समझते हैं कि करते रहे हैं ॥१८॥२२॥ उसी पार का यह घोर पाण्डव पराजय पा जायेंग ॥२२॥२६॥ हे महाराज ! परिणाम मिल रहा है । उमे आप अपने सुहृदो और । पाण्डयो के जयलाभ का कारण जो आप मुझमें पुत्रों आदि के माय भोगिए । महा-मा विदुर, भीष्म पूटने है मो में, जैसा सुना है यमा ही, कहना हूँ। और द्रोणाचार्य ने आपको कई बार मना किया परन्तु यही बात पहले दुर्योधन ने भीष्म पितामह में पूठी आपने उधर ध्यान नहीं दिया। मैंने भी बार-बार थी। उन्होंने इसके उत्तर में जो कहा, मो में आप ॥ २८ ॥ । ।
१३२२ ] म हा भा र न [ भीमपर wwwmaradisma भूरिश्रया विकर्णश्च भगदत्तश्च वीर्यवान् महारथाः समाख्याताः कुलपुत्रास्तनुत्यजः ॥३२॥ त्रयाणामपि लोकानां पर्याप्ता इति मे मतिः । पाण्डवानां समस्ताश्च नाऽतिष्ठन्त पराक्रमे ॥ ३३ ॥ तत्र मे संशयो जातस्तन्ममाऽऽचक्ष्य पृच्छतः । यं समाश्रित्य कौन्तेया जयन्त्यस्मान्क्षणे क्षणे ॥ ३४ ॥ भीष्म उवाच-शृणु राजन्वचो मह्यं यथा वक्ष्यामि कौरव बहुशश्च मयोक्तोऽसि न च मे तत्वया कृतम् ॥ ३५ ॥ क्रियतां पाण्डवैः सार्धं शमो भरतसत्तम एतत्क्षेममहं मन्ये पृथिव्यास्तव या विभो भुंक्ष्वेमां पृथिवीं राजन्भ्रातृभिः सहितः सुखी। दुहृदस्तापयन्सन्निन्दयंश्चाऽपि वान्धवान् न च मे कोशतस्तात श्रुतवानसि वै पुरा तदिदं समनुप्राप्तं यत्पांडूनवमन्यसे ॥३८॥ यश्च हेतुरवध्यत्वे तेपामक्लिष्टकर्मणाम् तं शृणुप्य महाबाहो मम कीर्तयतः प्रभो ॥ ३९ ॥ नाऽस्ति लोकेषु नद्भूतं भविता नो भविष्यति । यो जयेत्पाण्डवान्सर्वान्पालिताञ्छाईधन्वना ॥४०॥ को सुनाता हूँ ॥२७॥२८॥ हे नराविप ! महाबली महापुरुप हे ' ॥३१॥३४॥ भीष्म ने कहा- हे माटयों को पराजिन देखकर शोकाकुल दुर्योधन गत्रि दुर्योधन ! मै तुमसे जो कहता हूँ उमे ध्यान देकर को पितामह के पाम जाकर बोले--॥२९॥३०॥ हे सुनो । मैं तुमसे कई बार कह चुका हूँ, पर तुमने पितामह : आप, महानगर आचार्य द्रोण, शल्य, कृप, उमे माना नहीं । हे दुर्योधन ! मै तुममे अब भी अश्वथामा, कृतवर्मा हार्दिक्य, काम्योजाधिप सुदक्षिण, कहता हूँ कि पाण्डयों मे मन्धि कर लो। मन्धि भरिश्रया, विकर्ण और भगदत्त ये मी महारथी, करने मे तुम्हारा और मत्र पृथ्वी का कल्याण होगा। कुन्टीन और जमकर युद्ध करनेवाले योद्धा है। मेरी पाण्डवो मे मिलाप करके तुम मित्रों और भाई-बन्धुओं ममझ मे आपके समान योद्धा तीनों लोकों में द्वितीय । यो आनन्दित करते हुए भाइयो के माथ बड़े सुख नहीं है । पाण्डव पक्ष के मब योद्धा मिलकर भी ' मे गन्य करो । हे बम ! तुमने पहले पाण्टयो का आपके पराक्रम को नहीं सह मक्ते । मुझे बड़ा अपमान किया; मैंने मना किया, पर तुमने नहीं सुना मशय है कि पाण्डव और किमी के आश्रय से क्षण. अब उमका परिणाम भोग रह हो ॥३५॥३८॥ हे क्षण हम लोगों को जीत रहे है । बताइए, यह कौन , कुलराज ! प्रत्येक काम को महज ही कर सकनेवाले 1 -- याय, به म हा भारत [ ४३२३ यत्तु मे कथितं तात मुनिभिर्भावितात्मभिः । पुराणगीतं धर्मज्ञ तच्छृणुष्व यथा तथम् ॥४१॥ पुरा किल सुराः सर्वे ऋषयश्च समागताः पितामहमुपासेदुः पर्वते गन्धमादने ॥४२॥ नेपांमध्ये समासीनः प्रजापतिरपश्यत विमानं प्रज्वलद्भासा स्थितं प्रवरमम्बरे ॥४३॥ ध्यानेनाऽऽवेद्य तद्ब्रह्मा कृत्वा च नियतोऽञ्जलिम्। नमश्चकार हृष्टात्मा पुरुप परमेश्वरम् ॥४४॥ ऋपयस्त्वथ देवाश्च दृष्ट्वा ब्रह्माणमुत्थितम् स्थिताः प्राञ्जलयः सर्वे पश्यन्तो महदद्भुतम् ॥४५॥ यथावञ्च तमभ्यर्च्य ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः जगाद जगत. स्रष्टा परं परमधर्मपित् ॥ ४६॥ विश्वासुर्विश्वमूर्तिर्विश्वेशो विष्वक्सेनोविश्वकर्मा वशीच। विश्वेश्वरो वासुदेवोऽसि तस्माद्योगात्मानं दैवतं त्वामुपैमि॥ ४७ ॥ जय विश्वमहादेव जय लोकहिते रत जय योगीश्वर विभो जय योगपरावर ॥४८॥ पद्मगर्भविशालाक्ष जय लोकेश्वरेश्वर भूतभव्य भवन्नाथ जय सोम्यात्मजात्मज पण्डय जिस कारण अनध्य हैं, वह भा सुनो। हे जानकर, प्रसन्नतापूर्वक उठकर, पवित्र हृदय से हाथ जनाधिप । भगवान् कृष्ण रवय जिन पाण्डया की जाडरर ब्रह्माजी ने उनको प्रणाम दिया। अपि रक्षा कर रहे ह उह पगनय कर सम्नेवाला या आर देवता भा यह अद्भुत घटना देखकर आर ब्रह्मा मार मरनेवाला प्राणी ताना लामा म कोई नहीं देख जी को उस प्रकार अभ्यर्थना करत देख हाथ जोड पड़ता । ऐसा प्राणी न भा हुआ हे आर न होगा। कर खड़ हो गये । जगत् के रक्षर ब्रह्मानी उन ह वस । पूर्व समय म आ मज्ञाना मुनिया से जो | परमदेव विष्णु नागयण को देखकर उनकी पूजा पुराणगाथा मैन सुन रक्खा मैं कहता हू, मन करके इस प्रकार स्तुति करने लगे-||४२१४६॥ हे रगार सुनो ॥३९॥४१॥ पून समय म सब देवना तुम विश्व वसु, विश्वमूर्ति, विश्वश, विश्वक्सेन, आर पि गधमादन पर्वत पर कमासन ब्रह्माजा के विश्वकर्मा, नियामफ, वासुदेव आर योगी हो । हे प्रभो । पास गये। उन सबके मध्य में स्थित ब्रह्माजा ने मै तुम्हारी शरण म हूँ ॥४७॥ है महादर । तुम्हारा अतरिक्ष म एक परम प्रसाशमान श्रेष्ठ विमान देखा। जय हो । हलोमहितपी ! तुम योगीश्वर, योगपरापार इसरे अनतर ध्यान के द्वारा परमपुरष परमेश्वर को ॥४८॥ पद्मनाभ और विशालक्ष हो। तुम समेश्वरों वहा दन म हा भा रन [ भामा । -- असंख्येयगुणाधार जय सर्वपरायण नारायण सुदुप्पार जय शाईधनुर्धर ॥ ५०॥ जय सर्वगुणोपेत विश्वमूर्ते निरामय विश्वेश्वर महावाहो जय लोकार्थतत्पर ॥ ५१ ॥ महोरग वराहाऽद्य हरिकेश विभो जय हरिवास दिशामीश विश्ववासामिताव्यय ॥ ५२ ॥ व्यक्ताव्यक्तामितस्थान नियतेन्द्रिय सक्रिय । असंख्येयात्मभावज्ञ जय गम्भीरकामद अनन्तविदित ब्रह्मन्नित्यभृतविभावन कृतकार्य कृतप्रज्ञ धर्मज्ञ विजयावह ॥ ५४॥ गुह्यात्मन्सर्वयोगात्मन्स्फुटसम्भूत सम्भव भूताय लोकतत्त्वेश जय भूतविभावन ॥ ५५॥ आत्मयोने महाभाग कल्पसङ्क्षेपतत्पर उद्भावन मनोभाव जय ब्रह्म जयप्रिय ॥ ५६ ॥ निसर्गसर्गनिरत कामेश परमेश्वर अमृतोद्भव सद्भाव मुक्तात्मन्विजयप्रद ॥ ५७॥ प्रजापतिपते देव पद्मनाभ महावल आत्मभूत महाभूत सत्वात्मन् जय सर्वदा ॥५८॥ पादौ तव धरा देवी दिशो बाहू दिवं शिरः मूर्तिस्तेऽहं सुराः कायश्चन्द्रादित्यों च चक्षुपी ।। ५९ ।। के ईश्वर, निगेकनाथ, माम्य, आ मना मज, ४९|| अमान्य हो, तुम आ मरूप के ज्ञाता हा । तुम गम्भीर मर गुणों के आगार, नारायण, अनन्त आर अनन्त हो, तुम सत्र कामनाओं का परदनेवाले हो । महिमागर हो। ह शाह धनुष धारण कानेवाले । अपिदित ' तुम ब्रह्म हो, तुम नित्य हो, तुम भूतभावन ॥५०॥ हे मर्व गुण-सम्पन्न ! तुम विश्वमूर्ति, निगमय, हो । तुम कृता य आर कृतज्ञ हो । तुम धर्मज्ञ और महागह. महमूर्ति, आदिसारण, रिगल्पा, नय-परानय से अतीत हो। तुम गुह्यरप, सर्व- व्यापक, पानावरमार्ग, दिपार और वि के यागम्बरा गया, भूतभावन, ॥५३५५|| आ म. आपार हो। तुम अमित हो, अन्यय हो, ॥५१॥५२॥ योनि, महाभाग, कम्पान्त में सहार-निरत, ब्रह्म और तुम या और अन्य हो। तुम अमिनाया है, जनप्रिय ह।। तुम नगर्गिक-सृष्टि-निरत, कामेश, तुम निद्रिय हो, तुम म कर्म करनेगले हो, तुम परमेश्वर, अमृतमामृत, र स्वभावमम्पन, मामा । .
ययाय ६. म हा भारत - वलं तपश्च सत्यं च कर्मधर्मात्मकं तत्र तेजोऽग्निः पवनः श्वास आपस्ते खेदसम्भवाः ॥ ६॥ अश्विनौ श्रवणौ नित्यं देवी जिह्वा सरस्वती वेदाः संस्कारनिष्ठा हि त्वयीद जगदाश्रितम् ॥ १ ॥ न संख्यानं परीमाणं न तेजो न पराकमम् न वलं योगयोगीश जानीमस्ते न सम्भवम् ॥६२ ॥ त्वद्भक्तिनिरता देव नियमैस्त्वां समाश्रिताः अर्चयामः सदा विष्णो परमेशं महेश्वरम ऋपयो देवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः पिशाचा मानुपाश्चैव मृगपक्षिसरीसृपाः ॥ ६४ ॥ एवमादि मया सृष्टं पृथिव्यां त्वत्प्रसादजम् । पद्मनाभ विशालाक्ष कृष्ण दुःखप्रणाशन ॥६५॥ त्वं गतिः सर्वभूतानां त्वं नेता त्वं जगद्गुरुः । त्वत्प्रसादेन देवेश सुखिनो विवुधाः सदा पृथिवी निर्भया देव त्वत्प्रसादत्सदाऽभवत् तस्माद्भव विशालाक्ष यदुवंशविवर्धनः ॥६७॥ धर्मसंस्थापनार्थाय दैत्यानां च वधाय च जगतो धारणार्थाय विज्ञाप्यं कुरु मे विभो ॥ ६८॥ विजयाद, प्रजापति पति र पद्मनाभ महापली, परिमाण तज, वर आर ज म कुछ नहा जानते । आ मभूत, महागूत, धर्मम्प आर संप्रद हो । है देव ' तुम महेश्वर और परमेश्वर हो । हम तुम्हारे तुम्हारी जय हो ॥५६।५८|| पृथ्वा तुम्हारे दोना आश्चित होकर भक्ति क साथ नियमपूर्वक तुम्हारी चरण हैं । दिशाएँ तुम्हार हाथ है । अतरिक्ष तुम्हारा । पूजा करते हैं । हे विशाललाचन । हे कृष्ण । हे मस्ता है । मैं तुम्हारा मूति हूँ। देवगण तुम्हारा | दु खनशन | मेने ऋपि देवता, गर्म, राक्षस, शरार हैं । चन्द्र सूर्य तुम्हो नेत्र हैं । सङ्कल्प, तप नाग, पिशाच मनुष्य मृग पक्षी कीट सरासृप आदि आर सत्य तुम्हारा पर है । धर्म कम तुम्हारा आ मा को तुम्हारे प्रसाद से उन क्यिा ह ॥६॥६५॥ है । अग्नि तुम्हारा तज हे । वायु तुम्हारा श्वास ह। हे दवेश ' तुम सब प्राणियो का गति हो । तुम्ही जल तुम्हारा स्वेद ह । अश्विनीकुमार तुम्हारे कान है। समा आदि हो । दवगण तुम्हारे ही प्रमाद से मन सरस्मता देवा तुम्हारी जिह्वा हैं । वेद तुम्गरी सुख भोगते हैं । तुम्हारे ही प्रसाद मे यह पृथ्वी सस्कारनिष्ठा हैं । यह सब जगत् तम्हारे ही आश्रित निर्भय भार से स्थित है। इस समय तुम धर्म का हैं ॥५९६१॥ हे योगाश हम तुम्हारी सख्या, स्थापना, दत्यो के विनाश और पृथ्वी का भार उतारने - - ।
४३२६ ] म हा भारत मम्मपद । । यत्तत्परमकं गुह्यं त्वत्प्रसादादिदं विभो वासुदेव तदेतत्ते मयोगीतं यथातथम् ॥६९॥ स्पृष्ट्वा सङ्कर्पणं देवं स्वयमात्मानमात्मना कृष्ण त्वमात्मनाऽस्राक्षीः प्रद्युम्नं चाऽऽत्मसम्भवम्॥७॥ प्रद्युम्नादनिरुद्धं वं यं विदुर्विष्णुमव्ययम् अनिरुद्धोऽसृजन्मां वै ब्रह्माणं लोकधारिणम् ॥ ७१॥ वासुदेवमयः सोऽहं त्वयैवाऽस्मि विनिर्मितः विभज्य भागशोऽऽत्मानं व्रज मानुपतां विभो॥ ७२ ॥ तत्राऽसुरवधं कृत्वा सर्वलोकसुखाय वै धर्म प्राप्य यशः प्राप्य योगं प्राप्स्यसि तत्वतः।। ७३॥ स्वां हि ब्रह्मर्पयो लोके देवाश्चाऽमितविक्रम तेस्तैर्हि नामभिर्युक्ता गायन्ति परमात्मकम् ॥७४॥ स्थिताश्च सर्वे त्वयि भूतसङ्घाः कृत्वाऽऽश्रयं त्वां वरदंसुवाहो । अनादिमध्यान्तमपारयोगं लोकस्य सेतुं प्रवदन्ति विप्राः ॥७५॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि विश्वोपाग्न्याने पञ्चपष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥ के लिए पृथ्वी पर यदुवश में असतार लो। हे प्रभो ! मनुप्पी को मुग्वी बनाने के लिए तुम असुरों की इम मेरी प्रार्थना के अनुमार कार्य करी ॥६६।६८॥ मारकर धर्म की स्थापना करो। फिर यश प्राप्त मैने तुम्हारी ही कृपा से वेद में मय गुह्य विषयों का करके अपने लोक को चले आओ। हे विष्णु ! कनिन किया है । तुम्हों ने अम्मा के द्वारा आत्म देवपिंग 1 और बमर्पिगण पृथक-पृथक तुम्हारे उन स्वरम्प मर्पण की मृष्टि की है । तुमने आमा में नानी को गाकर, तुम्हे परम अद्भुत कहकर, तुम्हारी आन्मन म्यग्र प्रद्युम्न की मुष्टि की है। प्रधुन में ही नुन किया करते हैं । मर मागी तुम्ही में नि अध्यय अनिरुद की मृष्टि की है और अनिन्द्ध ने है । वादा लोग नुम्हाला आश्रय पाकर तुम्ही को ही मुटिका गप में मुझे उत्पन्न किया है । अतएय अनादि, मध्यहान, अनन्त, अमीम और गमा का मैं तुम्हारी आमा मे ही उत्पन्न हुआ है । अब नुम कारण काहन ॥७३७५|| अपने अाम मनुष्यनगर प्रहण करे ॥६९/७२।। भाग या मटयां अध्याय ममता ॥ ६ ॥ । - अप पदपटिनमोऽध्याय ॥६६॥ भीम थान- ततः स भगवान्देवो लोकानामीरेश्वरः ब्रह्माणं प्रत्युवाचेदं जिग्धगम्भीरया गिग अध्याय ६६ ] म हा भारत विदितं तात योगान्मे सर्वमेतत्तयोप्सितम् तथा तद्भवितेत्युक्त्वा तत्रैवाऽन्तरधीयत ॥ २ ॥ ततो देवर्पिगन्धर्वा विस्मयं परमं गताः कौतूहलपराः सर्वे पितामहमथाऽब्रुवन् को न्वयं यो भगवता प्रणम्य विनयाद्विभो वाग्भिः स्तुतो वरिष्ठाभिःश्रोतुमिच्छाम तं वयम् ॥ ४ ॥ एवमुक्तस्तु भगवान्प्रत्युवाच पितामहः देवब्रह्मर्पिगन्धर्वान्सर्वान्मधुरया गिरा यत्तत्परं भविष्यं च भवितव्यं च यत्परम् भूतात्मा च प्रभुश्चैव ब्रह्म यच्च परं पदम् तेनाऽस्मि कृतसंवादः प्रसन्नेन सुरर्पभाः जगतोऽनुग्रहार्थाय याचितो मे जगत्पतिः मानुपं लोकमातिष्ट वासुदेव इति श्रुतः असुराणां वधार्थाय सम्भवख महीतले संग्रामे निहता ये ते दैत्यदानवराक्षसाः त इमे नृषु सम्भूता घोररूपा महाबलाः तेषां वधार्थं भगवान्नरेण सहितो वशी मानुषी योनिमास्थाय चरिष्यति महीतले ॥ १० ॥ छाछठया अध्याय ॥ ६६ ।। भीष्म कहते हैं कि हे दुर्योवन! तब देवाधिदेव । मधुर स्वर मे कहा - हे महात्मा पुरुषो ' तत्-पद- भगवान् विष्णु ने स्निग्ध गम्भीर स्वर से ब्रह्मा से वाच्य, सबसे श्रेष्ठ, भूत-भविष्य-वर्तमान तीनो कालों कहा-~-हे "वत्स ! मैंने योगबल से तुम्हारे अन्त - मे नित्य, सब प्राणियों के आत्मा ओर प्रभु, परब्रह्म करण की बात जान ली है । हे ब्रह्मा ! मैं तुम्हारी यह हैं । उन्होंने प्रसन्न होकर मुझसे वार्तालाप किया प्रार्थना पूर्ण करूँगा।" यह कहकर नारायण यहाँ , है । मैने जगत के हित के लिए उनसे प्रार्थना की से अन्तद्वीन हो गये ॥१॥२॥ तब देवता, ऋषि, । है। मैंने उनसे प्रार्थना की है कि हे प्रभो । तुम गन्ध आदि सब अत्यन्त आश्चर्य के साथ ब्रह्माजी वसुदेव के पुत्र-रूप से मनुष्य-लोक में अवतार लो से बोले- हे रिभो! आपने जिनको प्रणाम किया ॥५॥८॥ सग्राम में मारे गये सब महावली दैत्य, और जिनकी नम्रभाव से स्तुति की, ये कौन हैं ? हम : दाना और राक्षस पृथ्वी पर उपन्न हुए हैं। उन के लिए तुम नर के साथ पृथ्वी पर जन्म लो। जानने के लिए अयन्त उत्सुक हैं ॥३॥ देवताओं, गन्धों और ऋपियो के यों पूछने पर ब्रह्माजी ने ' सब देरना भी मिटकर उन्हें जीत नहीं सकते। । - वध ।
४३२८ ] म हा भारत । भीष्मपर्व नरनारायणी यौ तौ पुराणावृपिसत्तमौ सहितो मानुपे लोके सम्भूतावमितगुती अजेयौ समर यत्तौ सहितैरमरैरपि मूढास्त्वेतो न जानन्ति नरनारायणापी ॥ १२ ॥ तस्याऽहमग्रजः पुत्रः सर्वस्य जगतः प्रभुः बासुदेवोऽर्चनीयो वः सर्वलोकमहेश्वरः ॥ १३ ॥ तथा मनुष्योऽयमिति कदाचित्सुरसत्तमाः नाऽवज्ञेयो महावीर्यः शङ्खचक्रगदाधरः एतत्परमकं गुह्यमेतत्परमकं पदम् एतत्परमकं ब्रह्म एतत्परमकं यशः एतदक्षरमव्यक्तमेतद्वै शाश्वतं महः यत्तत्पुरुपसंझं वे गीयते ज्ञायते न च एतत्परमकं तेज एतत्परमकं सुखम् एतत्परमकं सत्यं कीर्तितं विश्वकर्मणा ॥ १७॥ नम्मारसेन्द्रैः सुरेः सर्वेकश्चाऽमितविक्रमः । नाऽवजेयो वासुदेवो मानुपोऽयमिति प्रभुः यश्च मानुपमात्रोऽयमिनि बृयात्स मन्दधीः हृषीकेशमवज्ञानात्तमाहुः पुरुषाधमम् ॥ १९ ॥ योगिनं तं महात्मानं प्रविष्टं मानुषी तनुम् अवमन्येहासुदेवं तमाहुस्ताममं जनाः ॥ २० ॥ महानजम्बो प्रानान प्रापि ना नागयण पृथ्वी पर विश्वकमा ने उन्हीं को पामतंज, पामसुम और परम- असा लेंगे। गूद लोग उसे नहीं जानते ॥२॥१२॥ मत्य कहा । दला, इन्द्र, अनु या मनुष्य, मिनी में उनका बहा आमा होकर मर जगत का गमी को उन पगमगी बासुंर या अनादर न करना आ है । गर लोको के मा वासुदेव नुम मरो. चाहिए। जो मानि गनुय उनको मनुष्य समझने पूजनीय उन मामी यायशाटी गाव-नम गटा , उमं: पान गुमाम याने जोपाल कममय मुदायो मनुभ्य समझकर यमी उनकी उगमागमा मामा यो मनुष्य या नमस्कार अरबान याना । पागणा, पगाट, रनम, उगानाहा गरनार उन पनयन, मन रमाउन नेमाया भगमन या जान नही मरना घंट मग पुग्न गहने श्री 12312॥ माया ॥२७१२१॥ जाग - .
अयाय ६६ ] महाभारत देवं चराचरात्मानं श्रीवत्साई सुवर्चसम् पद्मनाभं न जानाति तमाहुरतामसं बुधाः ॥ २१ ॥ किरीटकौस्तुभधरं मित्राणामभयङ्करम् अवजानन्महात्मानं घोरे तमसि मज्जति एवं विदित्या तत्वार्थ लोकानामीश्वरेश्वरः वासुदेवो नमस्कार्यः सर्वलोकः सुरोत्तमाः ॥ २३ ॥ भीम उवाच-एवमुक्त्वा स भगवान्देवान्तर्षिगणान्पुरा विस्मृज्य सर्वभूतात्मा जगाम भवनं स्वकम् ॥ २४ ॥ ततो देवाः सगन्धर्वा मुनयोऽप्सरसोऽपि च । कथां तां ब्रह्मणा गीतांश्रुत्वा प्रीता दिवं ययुः॥ २५ ॥ एतच्छतं मया तात ऋषीणां भावितात्मनाम्। वासुदेवं कथयतां समवाये पुरातनम् ॥ २६॥ रामस्य जामदग्न्यस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः व्यासनारदयोश्चाऽपि सकाशाद्भरतर्षभ एतमर्थं च विज्ञाय श्रुत्वा च प्रभुमव्ययम् वासुदेवं महात्मानं लोकानामीश्वरेश्वरम् यस्व चैवाऽऽत्मजो ब्रह्मा सर्वस्य जगतः पिता । कथं न वासुदेवोऽयमय॑श्चेज्यश्च मानवैः ।। २९ ॥ वारितोऽसि मया तात मुनिभिर्वेदपारगैः मा गच्छ संयुगं तेन वासुदेवेन धन्विना ।। ३० ।। कौस्तुभ किरीटधारी ओर मित्रों को अभय देनेगले मार्कण्डेय, व्यास आर गारद ने भी मुझसे यही बात योगी ईश्वर का अपमान करता है यह घोर पाप का कही है । हे बम जागरिता ब्रह्मा जिनमे उत्पन्न भागी होता है। हे देवताओं ! उन लोकमहेश्वर हैं, उन सब लोको के ईश्वर महात्मा वासुदेव की यह भगान् वासुदेव को इस प्रकार जानकर सब लोगों महिमा जानकर कान मनुष्य उनकी पूजा और को प्रणाम करना चाहिए ।।२२।२३।। भीष्म कहते । सत्कार नहीं करेगा ? हे दुर्योधन ! पूर्व समय में मैंने हैं --देवताओं और प्रपियो से इस प्रकार नारायण ओर शुद्धहृदय योगी मुनियों ने आकर तुम्हें रोका की महिमा कहबार नमाजी अपने लोक को चले या और कहा था कि वासुदेव और पाण्डयों से युद्ध गये । हे दुर्योधन ! उन ऋषियों से ही मैंने यासंदर मन कागे। तुमने मोहवा होकर किमी का कहना की यह पुरानी कथा सुनी है ॥२४१२६|| परशुराम, | नहीं माना और अब तक नहीं समझते हो। तुम ।
४३३० ] म हा मा र त [ भीमपत्र मा पाण्डवैः साईमिति तत्वं मोहान्न बुध्यसे । मन्ये त्वां राक्षसं ऋरं तथा चाऽसि तमोवृतः ॥ ३१ ॥ यस्माद् द्विपसि गोविन्दं पाण्डवं तं धनञ्जयम् । नरनारायणो देवौ कोऽन्यो द्विष्याद्धि मानवः ॥ ३२ ॥ तस्माद्रवीमि ते राजन्नेप वै शाश्वतोऽव्ययः । सर्वलोकमयो नित्यः शास्ता धात्रीधरो ध्रुवः ॥ ३३॥ यो धारयति लोकांस्त्रींश्चराचरगुरुः प्रभुः योद्धा जयश्च जेता च सर्वप्रकृतिरीश्वरः ॥ ३४ ॥ राजन्सर्वमयो ह्येप तमोरागविवर्जितः यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ३५ ॥ तस्य माहात्म्ययोगन योगेनाऽऽत्ममयेन च धृताः पाण्डुसुता राजञ्जयश्चैपां भविष्यति ॥३६॥ श्रेयोयुक्तां सदा बुद्धिं पाण्डवानां दधाति यः । वलं चैव रणे नित्यं भयेभ्यश्चैव रक्षति ॥३७॥ स एप शाश्वतो देवः सर्वगुह्यमयः शिवः वासुदेव इति ज्ञेयो यन्मां पृच्छसि भारत ॥ ३८ ॥ ब्राह्मणैः क्षत्रियवध्यः शृद्धैश्च कृतलक्षणैः सेव्यतेऽभ्यर्च्यते चैव नित्ययुक्तैः स्वकर्मभिः ॥ ३९ ॥ ऐसे तमोगुणा हो रहे हो कि मैं तुमको क्रूर राक्षस धर्म है, आर उसा पक्ष को जय प्राप्त होगा।३३।३५|| समझता हूँ। तुम उन्ही वासुदेव आर पाण्टयोमहित इन्हीं के आ मयोगरल स पाण्डय सुरक्षित हैं। इस अर्जुन से द्वेषभान रखते हा । तुम्हार विना आर लिए यहा स्त्रिया होंगे। जो पाण्डवों को सदा उत्तम कान मनुष्य नर-नारायण के अतार अर्जुन आर सम्मति दते आर महायता करत है, वे श्रीकृष्ण ही धाकृष्ण से द्रोह करेगा ? ॥२७॥३२॥ हे दुयायन ! सदा सर प्रसार के भय मे उनी रक्षा करते हैं। तुमसे मैं फिर कहता हूँ, ये श्राकृष्ण शाश्वत, अध्यय, हे भारत | तुमने जो मुझस पूछा था, वह सर मेने सर्वरोगमय, नित्य, शासक, पिपाता, विश्व पार और , तुम्हारे आग वणन कर दिया। वे मामय, पाण्डयो ध्रुव हैं । यही त्रिलोक का धारण करनेवाले धर्म, । के सहायक, महा मा वासुदन कहलाते हैं | ब्राह्मण, चराचर क गुर, प्रभु, योद्धा, विजेता, सनरी प्रकृति क्षत्रिय, वश्य और शूद्र नि य एकाग्र होकर उनका और ईश्वर है । ये सत्त्वगुणमय हैं, तमोगुण और सेना आर पूजा करते हैं। सङ्कर्षण बल्देव द्वापर रतोगुण से इनसा कुछ मग्नन्ध नहीं। ये परम से युग के अन्त में, कलियुग के आरम्भ मे, सावत परम भगवान् वासुदेव जिम पक्ष में हैं उमी पक्ष में | विपि से, जिनकी उपासना और गुणगान करते है, .
अध्याय ६७ । महा भारत द्वापरस्य युगस्याऽन्ते आदी कलियुगस्य च सात्वतं विधिमास्थाय गीतः सङ्कर्षणेन वै ॥४०॥ स एव सर्व सुरमर्त्यलोकं समुद्रकध्यान्तरितां पुरी च । युगे युगे मानुयं चैव वासं पुनः पुनः सृजते वासुदेवः ॥ ४१ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मावपर्वणि विश्वोपाख्याने पम्पष्टितमोऽध्याय ॥ ६६ ॥ वही विश्वकर्मा व सुदेव हर एक युग में देवलोक, निवासस्थान आदि की सृष्टि करते है ॥३६॥४१॥ सत्यलोक, समुद्र के भीतर की पुरी और मनुष्यों के भीष्मपर्य का छाछठवा अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ६६ ।। । अथ सप्तपटितमोऽध्याय ।। ६७ ॥ दयोबन उवाच--वासुदेवो महद्भूतं सर्वलोकेपु कथ्यते तस्याऽऽगमं प्रतिष्ठां च ज्ञातुमिच्छे पितामह ॥ १ ॥ भीष्म उवाच --वासुदेवो महद्भुतं सर्वदेवतदैवतम् न परं पुण्डरीकाक्षाद दृश्यते भरतर्षभ ॥ २ ॥ मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयत्यद्भुतं महत् सर्वभूतानि भूतात्मा महात्मा पुरुषोत्तमः आपो वायुश्च तेजश्च त्रयमेतदकल्पयत् स स्पृष्ट्वा पृथिवीं देवीं सर्वलोकेश्वरः प्रभुः अप्सु वै शयनं चके महात्मा पुरुषोत्तमः सर्वतेजोमयो देवो योगात्सुप्वाप तत्र ह मुखतः सोऽग्निमसृजत्प्राणादायुमथाऽपि च सरस्वती च वेदांश्च मनसः ससृजेऽच्युतः मड़सठयाँ अध्याय ॥ ६७ ॥ दुर्योधन ने कहा है पितामह ! जो वासुदेव और अद्भुत कहते है । ये सब प्राणियों के आमा सब लोकों में महान् प्राणी या परम पुरुप माने जाते अव्यय पुरुष ही जल, वायु, तेज आदि तत्वों को हैं उनका आविर्भाव और स्थिति जानने की मेरी बड़ी और चराचर जगत् को उत्पन्न करते हैं । उन सर्व- इच्छा है । कृपा करके कहिए ॥१॥ भीष्म ने कहा- देवमय देव पुरुषोत्तम ने योगबल से पृथ्वी को प्रकट हे कुरुकुलश्रेष्ठ ! वासुदेव जी महामत्वमम्पन्न और : कर सागर-जल की शय्या पर गयन करके मुख से देवनाओं के भी देवता हैं । उनसे श्रेष्ठ और कोई । अग्नि को, प्राण से वायु को और मन से मरस्वती नहीं है । चिपि महर्षि मार्कण्डेय उनको महत् । तथा वेद को प्रकट किया ।।२।६इस प्रकार पहले १३३२ म हा मा रन [ भीष्मपर्व १ । एष लोकान्ससर्जाऽऽदौ देवांश्च ऋपिभिः सह । निधनं चैव मृत्युं च प्रजानां प्रभवाप्ययौ ॥ ७ ॥ एष धर्मश्च धर्मज्ञो वरदः सर्वकामदः एप कर्ता च कार्यं च पूर्वदेवः स्वयं प्रभुः भूतं भव्यं भविष्यच्च पूर्वमेतदकल्पयत् उभे सन्ध्ये दिशः खं च नियमांश्च जनार्दनः॥ ९ ॥ ऋषीश्चैव हि गोविन्दस्तपश्चैवाऽभ्यकल्पयत् । स्रष्टारं जगतश्चाऽपि महात्मा प्रभुरव्ययः ॥ १० ॥ अग्रज सर्वभूतानां सङ्कर्पणमकल्पयत् तस्मान्नारायणो जज्ञे देवदेवः सनातनः ॥ ११ ॥ नाभौ पद्मं बभूवाऽस्य सर्वलोकस्य सम्भवात् । तस्मात्पितामहोजातस्तस्माज्जातास्त्विमाःप्रजाः॥ १२ ॥ शेपं चाऽकल्पयद्देवमनन्तं विश्वरूपिणम् यो धारयति भूतानि धरां चेमां सपर्वताम् ॥ १३ ॥ ध्यानयोगेन विप्राश्च तं विदन्ति महौजसम् । कर्णस्रोतोभवं चाऽपि मधुं नाम महासुरम् ॥ १४ ॥ तमुग्रमुग्रकर्माणमुग्रां बुद्धिं समास्थितम् ब्रह्मणोऽपचितिं यातुं जघान पुरुषोत्तमः ॥ १५ ॥ तम्य तात वधादेव देवदानवमानवाः मधुसूदनमित्याहुपयश्च जनार्दनम् ॥ १६॥ उन्होंने देवता, ऋषि और उनके मब लोक उत्पन्न मर्पण को उत्पन्न किया । मकर्षण से देनदेय करके फिर अमृत, मृत्यु, प्रना की उ पति और प्रलय मनातन नायण उत्पन्न हुए ॥७॥११॥ इनकी नाभि के कारण आदि का सृष्टि की । वे धर्मज्ञ, धर्म, से कमल निकला, कमल मे ब्रह्मा उन हुए और याद, मच यामना देनेवारे, कती, कार्य, आदि के मामा से माग प्रजा को उत्ति हुई है। लोग जिन्ह आदि और सयप्रभु हैं। पहले उन्होंने भूत, भरिभ्य, अनन्त करते है, जिन्होंने पर्वतों महित एम पृथ्वी गंगान, दोनो मन्च्यामाद, दिगाएँ, आकाश और को 'गरण कर गया है, उन शेषनाग को भी उन्हीं मानिया ग्ने । मामा प्रभु अपय ने फिर प्रभु ने उपन्न किया है । बालग लोग प्यानयोग के कानिगण, ना और गन् की मृष्टि कानेगार प्रजा. द्वारा उन यामुदेव को जान माती। उसकी पनि यो उपन्न किया । फिर मर प्राणियों को अप्रन मधु नाम से अमुर ने प्रजातियो यान से उगान "३३३ अध्याय ६७ । म हा भार न वराहश्चैव सिंहश्च त्रिविक्रमगतिः प्रभुः एप माता पिता चैव सर्वेषां प्राणिनां हरिः ॥१७॥ परं हि पुण्डरीकाक्षान्न भूतं न भविष्यति मुखतः सोऽसृजद्विप्रान्बाहुभ्यां क्षत्रियांस्तथा ॥ १८ ॥ वैश्यांश्चाऽप्युरुतो राजन्शूद्रान्वै पादतस्तथा तपसा नियतो देवो निधानं सर्वदेहिनाम् ब्रह्मभूतममावास्यां पौर्णमास्यां तथैव च योगभूतं परिचरन्केशवं महदाप्नुयात् ॥ २०॥ केशवः परमं तेजः सर्वलोकपितामहः एवमाहुर्हृषीकेशं मुनयो वै नराधिप ॥ २१ ॥ एवमेन विजानीहि आचार्य पितरं गुरुम् कृप्णो यस्य प्रसीदेत लोकाम्तेनाऽक्षया जिताः।। २२॥ यश्चैवैनं भयस्थाने केशवं शरणं व्रजेत सदा नरः पठंश्चेदं स्वस्तिमान्स सुखी भवेत् ॥ २३ ॥ ये च कृष्णं प्रपद्यन्ते ते न मुह्यन्ति मानवाः । भये महति मन्नांश्च पाति नित्यं जनार्दनः ॥ २४ ॥ स तं युधिष्टिरो ज्ञात्वा याथातथ्येन भारत सर्वात्मना महात्मानं केशवं जगदीश्वरम् प्रपन्नः शरणं राजन्योगानां प्रभुमीश्वरम् ॥ २५॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्माणि विश्वोपारयाने मप्तपटिनमोऽध्याय ॥१७॥ होकर उन्हें मारना चाहा था। उम उप्रमनि अमुर मनु'य उन गयोग मा परमा मा चामुंदय को प्राम को मारने के कारण देवता, दानव और माना उन्हें कर माता ॥१॥२०॥ रही तेज और नगर मधुसूदन कहते हैं । ऋषिगण उन्हीं को जनार्दन गत् के म्यामी है । मुनिगण उनका मान करते है ॥१२१६॥ यही वाराह नामह, और हैं। यही आचार्य, पिता और गुर।जिम पर गमन या रस रविकर समय-समय पर प्रस्ट १९ प्रसन्न होते है उनी अक्षयीक प्रामजी है । वे पुण्डरीकाक्ष हरि मरके माना और पिता है। भयदिनकर उन गुंदर के शरणागत उनमे भेट कोई भी नहीं हो सकता। उनके मुग और मदा म उपान्यान यो पाना'. या परम- में बाग, यो मे क्षत्रिय, ऊरआमेर और माल और पाममुग ग्राम या। जो मिला पाओम गृह उपन्न हुए । अाम और पूर्णिमा प्रगा या मे नाना | महाभय में पांतर में नर होकर उनकी आमाधना करने में मनुष्यों को पना करना। गंन्ट : धर्मगत ४३३४ ] म हा भार न भाप्मपर युधिष्ठिर उन म्हाभाग भगवान् योगेश्वर कृष्ण को चुके हैं ||२१॥२५॥ ऐसा जानकर सर प्रकार से उनके शरणागत हो । भाष्मपर्व का सडसटयाँ अध्याय समाप्त हुआ || ६७ ।। --0-- । अथ अष्टपष्टितमोऽध्याय ॥ ८॥ भीम उनाच--- -शृणु चेदं महाराज ब्रह्मभूतं स्तवं मम ब्रह्मर्षिभिश्च देवैश्च यः पुरा कथितो भुधि साध्यानामपि देवानां देवदेवेश्वरः प्रभुः लोकभावन भावज्ञ इति त्वां नारदोऽब्रवीत् ॥ २ भूतं भव्यं भविष्यं च मार्कण्डेयोऽभ्युवाच ह । यज्ञं त्वां चैव यज्ञानां तपश्च तपसामपि देवानामपि देवं च त्वामाह भगवान्भृगुः पुराणं चैव परमं विष्णो रूपं तवेति च वासुदेवो वसूनां त्वं शक्र स्थापयिता तथा देवदेवोऽसि देवानामिति द्वैपायनोऽब्रवीत् पूर्वे प्रजानिसर्गे च दक्षमाहुः प्रजापतिम् स्रष्टारं सर्वलोकानामगिरास्त्वां तथाऽब्रवीत् ॥ ६ ॥ अव्यक्तं ते शरीरोत्थं व्यक्तं ते मनसि स्थितम्। देवास्त्वत्सम्भवाश्चैव देवलस्त्वसितोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥ शिरसा ते दिवं व्याप्तं वाहुभ्यां पृथिवी तथा । जठरं ते त्रयो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः अडसठयाँ अध्याय ॥ ६८॥ भाष्म कहत है--हे राजद्र । पूर्व समय में भविष्य-वतमान रूप कहा ह । महपि भृगु ने उनसे भगवान् प्रजापति ने जसे वासुदेव का स्तुति का दरदेव आर उनके रूप को विष्णु का पुरातन थी वह मैं कह चुका, अब महपियों आर देवताआ परमरूप रहा ह ॥१४॥ महाप दूपायन व्यास न ने जैसे उनसरी महिमा का वर्णन किया था, यह उन्ह इद्र का स्थापित करनेवाग, वसुआ में नासुदेव दमय स्तर में तुम्हारे आगे कहता हूँ, सुना । आप दवताओं में देवदेर कहा ह। कुछ श्रष्ठ ऋपिया महर्षि नारद ने उनो गेम्भावन, भाषज्ञ, साध्यगण न रहा ह कि वासुदेव पूर्णकालीन सृष्टि के कल्प और देवगण के प्रभु आर देवेश्वर कहा है | महपि म प्रजापति दक्ष थे । अङ्गिरा ऋपि न उनमा सर मारण्डेय ने यज्ञों का यज्ञ, तप का तप और भूत प्राणियो का सृष्टि करनेवाला कहा ह । महपि असित अध्याय ६८ ] म हा भारत [१३३५ । एवं त्वामभिजानन्ति तपसा भाविता नराः आत्मदर्शनतृप्तानामृपीणां चाऽसि सत्तमः राजर्षीणामुदाराणामाहवेष्वनिवर्तिनाम् सर्वधर्मप्रधानानां त्वं गतिर्मधुसूदन इति नित्यं योगविद्भिर्भगवान्पुरुपोत्तमः सनत्कुमारप्रमुखैः स्तूयतेऽभ्यर्च्यते हरिः एप ते विस्तरस्तात संक्षेपश्च प्रकीर्तितः केशवस्य यथातत्वं सुप्रीतो भज केशवम् ॥ १२ ॥ सजय उवाच-पुण्यं श्रुत्वैतदाख्यानं महाराज सुतस्तव केशवं बहु मेने स पाण्डवांश्च महारथान् ॥ १३ ॥ तमनवीन्महाराज भीष्मः शान्तनवः पुनः माहात्म्यं ते श्रुतं राजन्केशवस्य महात्मनः ॥ ११ ॥ नरस्य च यथातत्वं यन्मां त्वं पृच्छसे नृप यदर्थ नृपु सम्भूतो नरनारायणावृपी ॥ १५॥ अवध्यो च यथा वीरौ संयुगेप्वपराजितो यथा च पाण्डवा राजन्नवध्या युधि कस्यचित् ॥ १६ ॥ प्रीतिमान्हि दृढं कृष्णः पाण्डवेयु यशस्विपु तस्माद्रवीमि राजेन्द्र शमो भवतु पाण्डवः ॥१७॥ दक्ट का कथन ह कि 'अव्यक्त गासुदेव के शरीर आगफ्ना आर स्तुनि किया करते है । पुत्र ! मनन से आर "यक्त' वासुदेव के अन्त करण से उत्पन्न हुआ यह भगवान पामुदा का माहाम्य तुम्हार आंग दिनार । उन्ही मे सब देवता प्रकट हुए है ॥५॥७॥ में और मक्षेप म भी कह दिया । म नागोराम मनचुमार आदि ऋषियों का कहना है कि वासुदेव प्रसन्न होकर तुम वासुदेव को भी॥८॥१२॥ मनप के मिर मे आकाश और बाद मे पृथ्वी व्याप्त है। वहते.-- महागन' भाम के मुगमे या पवित्र उनके उदर में तीनो रोक है । यही मनातन पुरप उपायान गुनकर गजा योग्न न मन ही मन हैं । तप मे अन्त करण विशुद्ध होने पर मनुष्यगण महारथी पाण्डया को और धारण यो आनष्ट उनको जानते हैं । आमदर्शन मे तृप्त ऋरियों में और यहा समझा ॥१३॥ मरे पथाभ मने कि र मुदेव ही श्रेष्ट है। वही युद्ध मे न लाटनगरे दुर्योधन मे या उदार गपियों या और सर प्रगन धर्मो का गति मने बासुंदर और अर्जुन या मायन । इस प्रकार योग के जान गार गन-युगार अभी मनु-पक में मन का काम का मुना। मुने नित्स भगान् पुरषोतम हरि की पूग. Mयान । पानी मानुगर प्रम अनुमार ।
४३३६ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व - - ---0- पृथिवीं भुंव सहितो भ्रातृभिर्वलिभिर्वशी नरनारायणौ देवाववज्ञाय न शिष्यसि ॥ १८॥ एवमुक्त्वा तव पिता तूष्णीमासीद्विशाम्पते व्यसर्जयञ्च राजानं शयनं च विवेश ह राजा च शिविरं प्रायात्प्रणिपत्य महात्मने शिश्ये च शयने शुभ्रे रात्रिं तां भरतर्षभ ॥ २० ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विश्वोपाख्याने अष्टपष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥ सकता, वह भी तुम सुन चुके ॥१४॥१६॥ हे राजेन्द्र ! | कर उनका अनादर करने से अवश्य ही तुम्हारा विनाग भगवान् केशव पाण्डवो पर अन्यन्त प्रसन्न और अनुरक्त होगा। पितामह भीष्म इतना कहकर चुप हो रहे हैं । इसी लिए मैं तुमसे बारम्वार कहता हूँ कि अब दुर्योधन उनके पास से उठकर, उनको प्रणाम करके, तुम पाण्डवो से सन्धि कर लो और भाइयों के साथ अपने शिविर मे गये और पलंग पर लेट रहे ॥१७॥२०॥ सुख से राज्य करो। नर और नारायण से द्रोह रग्व- भीष्मपर्व का अड़सठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।। ६८ ।। अथ ऊनमप्ततितमोऽध्याय ॥ ६९ ॥ सञ्जय उवाच- व्युपितायां तु शर्वर्यामुदिते च दिवाकरे उभे सेने महाराज युद्धायैव समीयतुः अभ्यधावन्त संक्रुद्धाः परस्परजिगीषवः ते सर्वे सहिता युद्धे समालोक्य परस्परम् ॥ २ ॥ पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च राजन्दुर्मन्त्रिते तव व्यूही च व्यूहा संरब्धाः सम्प्रहृष्टाः प्रहारिणः ॥ ३ ॥ अरक्षन्मकरव्यूह भीप्मो राजन्समन्ततः तथैव पाण्डवा राजन्नरक्षन्व्यूहमात्मनः स निर्ययौ महाराज पिता देवव्रतस्तव महता रथवंशेन संवृतो रथिनां वरः उनत्तरवाँ अध्याय ॥ ६० ॥ सञ्जय ने कहा- हे महाराज ! रानि व्यतीत होने सन्मुग्ब आये । हे राजेन्द्र ! यह सब आपकी ही पुरा पर दोनों ओर की सेनाएँ युद्ध के लिए रणभूमि को सम्मति का फल्ट है | कौरवपक्ष के प्रसन्नहृदय योना चली । पाण्डव और कौस्य जयप्राप्ति के लिए उमुक करच और गत्र धारणकर मकस्यह की रचना करके और प्रोध से अधीर होकर परम्पर युद्ध करने को भीष्म के चारों ओर स्थित हुए। महाबाह भीष्म चागे ।
अध्याय ६९ म हा भारत [ ४३३७ : इतरेतरमन्वीयुर्यथाभागमवस्थिताः रथिनः पत्तयश्चैव दन्तिनः सादिनस्तथा तान्दृष्ट्वाऽभ्युद्यतासंग्व्ये पाण्डवा हि यशस्विनः। श्येनेन व्यूहराजेन तेनाऽजय्येन संयुगे अशोभत मुखे तस्य भीमसेनो महावलः नेत्रे शिखण्डी दुर्धो धृष्टद्युम्नश्च पार्पतः ॥ ८ ॥ शीर्षे तस्याऽभवद्वीरः सात्यकिः सत्यविक्रमः । विधुन्वन्गाण्डिवं पार्थो ग्रीवायामभवत्तदा अक्षौहिण्या समं तत्र वामपक्षोऽभवत्तदा महात्मा द्रुपदः श्रीमान्सह पुत्रेण संयुगे ॥ १० ॥ दक्षिणश्चाऽभवत्पक्षः कैकेयोऽक्षौहिणीपतिः पृष्ठतो द्रोपदेयाश्च सौभद्रश्चाऽपि वार्यवान् ॥ ११ ॥ पृष्ठे समभवच्छ्रीमान्वयं राजा युधिष्ठिरः भ्रातृभ्यां सहितो वीरो यमाभ्यां चारुविक्रमः ॥ १२ ॥ प्रविश्य तु रणे भीमो मकरं मुखतस्तदा भीष्ममासाद्य संग्रामे छादयामास सायकैः ॥ १३ ॥ ततो भीष्मो महास्त्राणि पातयामास भारत मोहयन्पाण्डुपुत्राणां व्यूढं सैन्यं महाहवे ॥ १४ ॥ ओर से मकरव्यूह की रक्षा करने लगे॥१४॥ पितामह । अक्षाहिणीपति ककेय राजकुमार [पाँचा भाई ] दक्षिण जन घजाओ से शोभित असरय रथो के साथ निकले भाग की रक्षा करने लगे। द्वापदा क पाँचो पुन, ना अमरय रथी, पदर, हाथियो आर घोडो के सपार अभिमन्यु धर्मराज युधिष्ठिर, नकुल आर सहदेव उम यथास्थान स्थित होकर उनके पीछे पीछे चले । उपर | व्यूह के पृष्ठभाग की रक्षा करने लंगे। इसके अनन्तर पाण्डवों ने कारयो को युद्ध के लिए उद्यत देखकर । भीमसेन शत्रुओं के मार यूह में प्रवेश हो गये । स्येनव्यूह की रचना की ॥५॥७॥ महाबली भीमसन ! उन्होंने भीष्म के पाम पहुँचकर उन्हे बाणो मी वर्षा उस व्यूह के मुखभाग मे, शिखण्डी आर धृष्टद्युम्न से ढक दिया । महाबली भीष्म भी पाण्टयों की, व्यूह नेत्रो के स्थान पर, सत्यपराक्रमी सायकि सिर के ' के मध्य खडी हुई, सेना को मोहित करते हुए अन्यो स्थान पर ओर गम्भीर गाण्डीव धनुप का शब्द करते का प्रयोग करके असरय तीक्ष्ण बाण घरमाने लगे हुए अर्जुन ग्रीवा के स्थान पर स्थित हुए। महामा ॥११॥१४॥ अपना सेना का भीष्म के बाणो से मोहित द्रुपद अपने पुत्रों के साथ एक अक्षौहिणी मेना लेकर आर उमाहहीन देग्यकर वीर अर्जुन शीघ्र यहाँ पहुँच यूह के गमभाग का रक्षा करने लगे ॥८॥१०॥ ! गये। उन्होने दृढ आर नावण महस्रो वाण भीष्म के ऊपर .
४३३८ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व huadactactrwadieast - सम्मुह्यति तदा सैन्ये त्वरमाणो धनञ्जयः भीष्मं शरसहस्त्रेण विव्याध रणमूर्धनि प्रतिसंवार्य चाऽस्त्राणि भीममुक्तानि संयुगे । खेनाऽनीकेन हृष्टेन युद्धाय समुपस्थितः ॥ १६ ॥ ततो दुर्योधनो राजा भारद्वाजमभापत पूर्व दृष्ट्वा वधं घोरं वलस्य बलिनां वरः ॥ १७॥ भ्रातृणां च वधं युद्धे स्मरमाणो महारथः आचार्य सततं हि त्वं हितकामो ममाऽनध ॥ १८ ॥ वयं हि त्वां समाश्रित्य भीमं चैव पितामहम् । देवानपि रणे जेतुं प्रार्थयामो न संशयः किमु पाण्डुसुतान्युद्धे हीनवीर्यपराक्रमान् स तथा कुरु भद्रं ते यथा वध्यन्ति पाण्डवाः ॥ २० ॥ एवमुक्तस्ततो द्रोणस्तव पुत्रेण मारिप अभिनत्पाण्डवानीकं प्रेक्षमाणस्य सात्यकः ॥ २१ ॥ सात्यकिस्तु तनो द्रोणं वारयामास भारत तयोः प्रववृते युद्धं घोररूपं भयावहम् ॥ २२॥ शैनेयं तु रणे क्रुद्धो भारद्वाजः प्रतापवान् अविध्यनिशितैर्वाणदेशे हसन्निव ॥ २३ ॥ भीमसेनस्ततः कुद्धो भारद्वाजमविध्यत संरक्षन्सात्यकि राजन्द्रोणाच्छस्त्रभृतां वरात् ॥ २४ ॥ छोडे । भीष्म ने भी अपने बाणो मे स्फूर्ति के माथ परास्त कर मरते है । पराक्रम आर वीर्य से हीन उन बाणो को व्यर्थ कर दिया । अपने पक्ष की पाण्डयो को आप लोगों की सहायता से जीत रेना सेना को प्रसन्न तथा उसाहित करते हुए ये घोर , तो कोई आश्चर्य की बात ही नहीं है | इसलिए वह युद्ध करने लगे ॥१५॥१६॥ पहले दिन बहुत सी उपाय शीघ्र कीजिए जिससे पाण्डर मारे जा सके सेना और कई भाइयों के मारे जाने से राजा दुर्योधन ॥१७॥२०॥ मञ्जय कहते हैं----हे महाराज! युद्ध भूमि योही अत्यन्त बुद्ध थे। इस समय युद्ध की अवस्था ! में दुर्योधन ने आचार्य से जब यह प्रार्थना की तब देखकर उन्होंने द्रोणाचार्य से कहा- -~-हे आचार्य ! ! द्रोणाचार्य सात्यकि के मामने ही पाण्डा-मेना का आप निरन्तर नित्य मंग भराई मोचा करते है। हम महार करने लगे ! उधर सात्यकि भी द्रोणाचार्य को आपके और पितामह के आश्रय मे देवताओं को भी | रोकने की चेष्टा करने लगे। द्रोणाचार्य और सात्यकि ।
अ याय ६९ ] म हा भा र न [ ४३३० । - ततो द्रोणश्च भीष्मश्च तथा शल्यश्च मारिष भीमसेनं रणे क्रुद्धाञ्छादयाञ्चक्रिरे शरैः ॥ २५ ॥ तत्राऽभिमन्युः संक्रुद्धो द्रौपदेयाश्च मारिप विव्यधुनिशितैर्वाणः सर्वास्तानुद्यतायुधान् ॥ २६ ॥ द्रोणभीष्मौ तु संक्रुद्धावापतन्तौ महावलौ प्रत्युद्ययौ शिखण्डी तु महेष्वासो महाहवे ॥२७॥ प्रगृह्य बलवद्वीरो धनुर्जलदनिःस्वनम् अभ्यवर्पच्छरैस्तूर्ण छादयानो दिवाकरम् ॥ २८ ॥ शिखण्डिनं समासाद्य भरतानां पितामहः अवर्जयत संग्राम स्त्रीत्वं तस्याऽनुसंस्मरन् ॥ २९ ॥ ततो द्रोणो महाराज अभ्यद्रवत तं रणे रक्षमाणस्तदा भीष्मं तव पुत्रेण चोदितः ॥३०॥ शिखण्डी तु समासाद्य द्रोणं शस्त्रभृतां वरम् । अवर्जयत सन्त्रस्तो युगान्ताग्निमिवोल्वणम् ॥ ३१ ॥ ततो वलेन महता पुत्रस्तव विशाम्पते जुगोप भीष्ममासाद्य प्रार्थयानो महद्यशः ॥ ३२ ॥ तथैव पाण्डवा राजन्पुरस्कृत्य धनञ्जयम् भीष्ममेवाऽभ्यवर्तन्त जये कृत्वा दृढां मतिम् ॥ ३३ ॥ स दारण युद्ध होने लगा । प्रतापगाला आचार्य न चढापर स्फत्ति माथ उन्हाने इतन वाण परसाये मोध से कुछ मुसम्राकर सात्यकि के जत्रुस्थान पर मि मूय नारायण उनस सि गये । पितामह भीष्म दस बाण मारे ॥२१॥२३॥ उधर महायला भामसेन ने शिवण्डा को युद्ध के लिए मन्मुग्ब देखकर भी कुपित होकर प्रधान अस्त्रविद्याविशारद द्रोणाचार्य उनके पहर के सामान का ध्यान करके, उन पर के हार में मान्यपि की रक्षा करने के लिए उन वाण नहीं चया ॥२७॥२८|| उधर दुयापन । पर निरन्तर असह्य बाण वरसाने लगे। ना द्राण, आज्ञानुमार आचार्य द्राण, भाम की रक्षा के लिए, भाम आर गन्य कुपित होकर भीममेन को वाण शिखण्डा समुग्य आये । प्रलयकार के प्रचण्ट मारने लगे। द्रोण और भाम का मिटकर युद्ध अग्नि के तुल्य प्रालिन प्रधान योद्धा आचार्य को करते देख अभिमन्यु आर द्वापदा के पाचा पुत्र स मुख देग्यरर शिखण्डा भय के मारे उनमे घगार शववारी द्रोण क मर्मस्थला में ताक्ष्ण गाण मारने अयत्र चले गये । इमी मध्य म यहत सामना माय लगे। ॥२४१२६॥ इसी मध्य म शिखण्डा भा वहा रिये दुर्योधन वहाँ आर भाप्म का रक्षा करने लगे। आ गये । मेघ के समान गरजनेवाले धनुष को पाण्डवगण भी अर्जुन को आग कसे, जयाभ के ४३४० ] म हा भा रन [ भात - तयुद्धमभवद्धोरं देवानां दानवैरिव जयमाकांक्षतां संग्व्ये यशश्च सुमहाद्भुतम् ॥ ३४ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपर्वणि पञ्चमदिवमयुद्धारम्भे ऊनसप्ततितमोऽध्याय ॥ ६९ ॥ लिये, भीष्म के समीप पहुँचने की चेष्टा करने लगे। के पीर योद्धा भिड़मर देवताओ आर दानयों का सा तर परस्पर या आर विजय की कामना से दोनों पक्ष । पोर मग्राम करने लगे ॥३०॥३४॥ भीमपर्व का उनत्तरवा अध्याय ममाप्त हुआ ।। ६० ॥ .. अथ सप्ततितमोऽध्याय ॥ ७० ॥ मञ्जय आच ---अकरोत्तुमुलं युद्धं भीष्मः शान्तनवस्तदा भीमसेनभयादिच्छन्पुत्रांस्तारयितुं तव पूर्वाह्ने तन्महारौद्रं राज्ञां युद्धमवर्तत कुरूणां पाण्डवानां च मुख्यशूरविनाशनम् ॥ २ ॥ तस्मिन्नाकुलसंग्रामे वर्तमाने महाभये अभवत्तुमुलः शब्दः संस्पृशन्गगनं महत् ॥ ३ ॥ नदद्भिश्च महानागैर्हेपमाणैश्च वाजिभिः भेरीशसनिनादैश्च तुमुलं समपद्यत ॥ ४ ॥ युयुत्सवस्ते विक्रान्ता विजयाय महाबलाः अन्योन्यमभिगर्जन्तो गोप्टेष्विव महर्पभाः शिरसां पात्यमानानां समरे निशितैः शरैः अश्मवृष्टिरिवाऽऽकागे वभूव भरतर्षभ कुण्डलोप्णीपधारीणि जातरूपोज्ज्वलानि च पतितानि स्म दृश्यन्ते शिरांसि भरतर्षभ सत्तरपा अध्याय ॥ ७० ॥ सञ्जय न कहा- हे महाराज | भीमसेन से हाथिया की चिंघार, घोडो की हिनहिनाहट, भेरा जोर आपके पुत्रों की रक्षा करने के लिये भाप्म घोरतर शङ्ख आदि का शब्द चारो ओर गूंज उठा ॥१४॥ सग्राम करने लगे। दिन के पूर्वभाग में कोरयो, युद्धार्थी चारगण परस्पर विजय की अभिलापा से पाण्टनों आर दोनों पक्षों के राजाओं का भयवर गोशाला में स्थित मॉडों का तरह तर्जन गजन करने युद्ध हुआ । उस युद्ध म अनेक प्रधान पीर मृत्यु लगे । तक्षिण वाणा से कट कटकर योद्धाओं के मिर के मुग का कार वनने लगे| युद्धभूमि मे ऐसा पृथ्वी पर गिर रहे थे, ऐमा जान पडता था कि । कोलाहल उठा कि आमाशमण्टर तक छा गया । मना आमाश से शिलाओ की वर्षा हो रही ह । - [ ४३४१ अन्याय ७० ] म हा भारत - : विशिखोन्मथितेर्गात्रैर्वाहुभिश्च सकार्मुकैः सहस्ताभरणश्चाऽन्यैरभवच्छादिता मही कवचोपहितैर्गार्हस्तैश्च समलंकृतैः मुखैश्च चन्द्रसङ्काशै रक्तान्तनयनैः शुभैः गजवाजिमनुष्याणां सर्वगात्रेश्च भूपते आसीत्सर्वा समास्तीर्णा मुहूर्तेन वसुन्धरा ॥ १० ॥ रजोमेघैश्च तुमुलैः शस्त्रविद्युत्प्रकाशिभिः आयुधानां च निर्घोपः स्तनयित्नुसमोऽभवत् ॥ ११ ॥ स सम्प्रहारस्तुमुलः कटुकः शोणितोदकः प्रावर्तत कुरूणां च पाण्डवानां च भारत ॥ १२ ॥ तस्मिन्महाभये घोरे तुमुले लोमहर्पणे वपुः शरवर्षाणि क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥ १३ ॥ आक्रोशन्कुञ्जरास्तत्र शरवर्पप्रतापिताः तावकानां परेषां च संयुगे भरतर्षभ संरब्धानां च वीराणां धीराणाममितौजसाम् । धनुर्ध्यातलशब्देन न प्राज्ञायत किञ्चन ॥ १५ ॥ उत्थितेषु कबन्धेषु सर्वतः शोणितोदके समरे पर्यधावन्त नृपारिपु वधोद्यताः कुण्डल और पगडी आदि से शोभित, सुवर्ण के गण उम भयङ्कर सग्राम मे निरन्तर वाणी करने आभूषणो से चमकते हुए, मनुष्यों के सिर ढेर के ढेर लगे । दोनों सेनाओं के हाथी वाणप्रहार से पीडित पड़े देग्य पडते थे । कुण्टल-भूपित मस्त को, आभूपण- होकर चिल्लाने लगे। उनके चिल्लाने आर वीरो के युक्त हाथो और आभूपण भूपित शरीरों से पृथ्वी ठिप सिंहनाद तथा ताल ठोकने के शब्द मे और कुछ माई ॥५॥८॥ काचयुक्त देहो, अलङ्कारयुक्त हाथो, । नहीं सुन पडता था ॥१२।१५|| मीत्र रक्त प्रवाह के लाल नेत्रों मे विकट रक्तरन्जित मुण्टो, हाथियो घोडो मध्य से वीरो के कवन्ध उठ-उठकर घोर युद्ध करने ओर मनुष्यों के छिन्न-भिन्न अङ्ग-प्रत्यङ्गों का क्षण भर लगे। राजा लोग आर मेनिक भत्रिगण शत्रुओं को मे ही युद्धभूमि में ढेर लग गया । उस समय उड़ी ! मारने के लिये चारों ओर दोड़ रहे थे । मोटी-मोटी हुई धूल धनघटा के समान, शस्त्र-अस्र बिजली के , भुजाओ वाले महाबली क्षत्रियगण वाण, शक्ति, गदा समान, अस्त्र-शस्त्रो का शब्द मेघगर्जन के समान और ओर ग्वट्ग आदि शस्त्रो से एक दूसरे को मारने लगे। रक्त का प्राह वर्षा की जलधारा के समान जान । याणों की चोट से विद्वल होकर हाथी और घोड़े पड़ता था ॥९॥११॥ हे राजेन्द्र ! युद्धनिपुण क्षत्रिय ' अपने सवारो को गिराकर युद्धभूमि मे दर भागने - - ४३४२ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व शरशक्तिगदाभिस्ते खङ्गैश्चाऽमिततेजसः निजघ्नुः समरेऽन्योन्यं शूराः परिघवाहबः ॥१७॥ वभ्रमुः कुञ्जराश्चाऽत्र गरैर्विद्धा निरंकुशाः अश्वाश्च पर्यधावन्त हतारोहा दिशो दश ॥ १८ ॥ उत्पत्य निपतन्त्यन्ये शरघातप्रपीडिताः तावकानां परेपां च योधा भरतसत्तम ॥ १९ ॥ वाहानामुत्तमाङ्गानां कार्मुकाणां च भारत गदानां परिघाणां च हस्तानां चोरुभिः सह ॥ २० ॥ पादानां भूषणानां च केयूराणां च सङ्घशः राशयस्तत्र दृश्यन्ते भीम भीमसमागमे ॥ २१ ॥ अश्वानां कुञ्जराणां च स्थानां चाऽनिवर्तिनाम् । सङ्घाताः स्म प्रदृश्यन्ते तत्र तत्र विशाम्पते ॥ २२॥ गदाभिरसिभिः प्रासैर्वाणश्च नतपर्वभिः जघ्नुः परस्परं तत्र क्षत्रियाः काल आगते ॥ २३ ॥ अपरे वाहुभिर्वीरा नियुद्धकुशला युधि बहुधा समसज्जन्त आयसैः परिधैरिव ॥ २४ ॥ मुष्टिभिर्जानुभिश्चैव तलैश्चैव विशाम्पते अन्योन्यं जतिरे चीरास्तावकाः पाण्डवैः सह ॥ २५॥ पतितः पात्यमानश्च विचेष्टद्भिश्च भृतले घोरमायोधनं जने तत्र तत्र जनेश्वर ॥ २६ ॥ विरथा रथिनश्चाऽत्र निस्त्रिंशवरधारिणः अन्योन्यमभिधावन्तः परस्परवधैषिणः ॥ २७ ॥ रंग । बहुत लोग वाणां के प्रहार में पीडित होकर याण आदि के प्रहार कर रहे थे ॥२०१२३॥ पाहु- उडर-उटल कर पृथ्वी पर गिर पडते थे ॥१६॥१७॥ युद्धनिपुण वय वीरगण रोहे के बेग्न एमे हाथों में उस युद्ध में मर स्थान भुत्रा, मिर, धनुष, गदा, नग्न मिदकर कुदनी के दाँप पेच दिया रहे थे। अनेक और हाथों के केयूर आदि आभूषण पिपरे हुए दंग चार दान न रहने के कारण शत्रुओं को मे, घुटने, पदते । स्थान-म्यान पर हाथियो, गादी और ग्यो यथद आदि म माग्ने लंग। परल मेनर पृथ्वी पर के गुण्ट भिदं दृप टिगोचर होन थे । क्षत्रियगण गिरकर नदपंत रहने पर भी घोर युज कर रहे थे। मानो काल्परित र परम्पर गदा, गगन, प्राम, म टूट जाने पर अनक बी एक दुसरे को मारने [ ४३४३ अध्याय ७१ ] म हा भारत. . ततो दुर्योधनो राजा कलिङ्गैर्बहुभिर्वृतः पुरस्कृत्य रणे भीमं पाण्डवानभ्यवर्तत ॥ २८ ॥ तथैव पाण्डवाः सर्वे परिवार्य वृकोदरम् भीप्ममभ्यद्वन्क्रुद्धास्ततो युद्धमवर्तत ॥ २९ ॥ इति श्री महाभारत भीष्मपर्वणि भीष्मवयपर्वणि मकुन्टयुद्धे सप्तनितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥ के लिए दौड़ रहे थे । इतने में राजा दुर्योवन बहुत लोग भी भीमसेन को आगे करके पितामह भीष्म के मी कलिङ्गदेश की सेना साथ लेकर, भीष्म को आगे मन्मुग्य आय ॥२७॥२०॥ करके, पाण्डवा पर आक्रमण करने चले । तब पाण्टव भीष्मपर्व का सत्तरवाँ अध्याय ममाप्त हुआ ।। ७० ॥ । - अथ एकसप्ततितमोऽध्याय ॥ ७१ ॥ मञ्जय आच- दृष्ट्वा भीष्मेण संसक्तान्भ्रातृनन्यांश्च पार्थिवान् । समभ्यधावद्गाङ्गेयमुद्यतास्त्रो धनञ्जयः पाञ्चजन्यस्य निर्धापं धनुपो गाण्डिवस्य च ध्वजं च दृष्टा पार्थस्य सर्वान्नो भयमाविशत् ॥ २ ॥ सिंहलांगूलमाकाशे ज्वलन्तमिव पर्वतम् असजमानं वृक्षेषु धूमकेतुमिवोत्थिनम् वहुवर्ण विचित्रं च दिव्यं वानरलक्षणम् अपश्याम महाराज ध्वजं गाण्डीवधन्वनः विद्वानं मेघमध्यस्थां भ्राजमानामिवाऽम्बरे ददृशुर्गाण्डिवं योधा रुक्मपृष्टं महामृधे आशुश्रुम भृशं चाऽस्य शक्रस्येवाऽभिगर्जतः । सुघोरं तलयोः शब्दं निम्नतस्तव वाहिनीम् ॥ ६ ॥ इमहत्तावां अन्याय ॥ ७१ ॥ ने यहा--हे महागज ! भाइयों और निन्दगोभिन, निरनिनित. गाना, के अन्य गजाओ को भीम में युद्ध करने देगार अर्जुन रप धूमन के ममान. आकाग को एनादिय भी शर कर उधर ही दौड़े। पागजन्य दशा का पजा देगी ॥१॥४॥ उम नुगुर मप्राम में गांचाओ गद और गाण्डीर धनुा का गर्जन मुनर नया न अनुन के गुर्गममा नीट गरे मनुष अर्जुन के गम का पजा देगकर कार पक्ष के वार को पनाया पं. सर रिमी के गमान ग यानी भयभीत गप मामा ने अर्जुन यो गंमत! आग मग या महार या अन मञ्जय ४३४४ ] म हा भारत { भीमपर - .. चण्डवातो यथा मेघः सविद्युत्स्तनयित्नुमान् । दिशः सम्प्लावयन्सर्वाः शरवः समन्ततः ॥ ७ ॥ समभ्यधावद्गाङ्गेयं भैरवास्त्रो धनञ्जयः दिशं प्राची प्रतीची च न जानीमोऽस्त्रमोहिताः॥ ८ ॥ कान्दिग्भृताः श्रान्तपत्रा हताश्वा हतचेतसः । अन्योन्यमभिसंश्लिष्य योधास्ते भरतर्षभ भीष्ममेवाऽभ्यलीयन्त सह सर्वैस्तवाऽऽत्मजैः । तेपामार्तायनमभूद्भीष्मः शान्तनवो रणे ॥ १० ॥ समुत्पतन्ति वित्रस्ता रथेभ्यो धिनस्तथा सादिनश्चाऽश्वपृष्ठेभ्यो भूमौ चाऽपि पदातयः ॥ ११ ॥ श्रुत्वा गाण्डीवनिर्घोपं विस्फूर्जितमिवाऽशनेः । सर्वसैन्यानि भीतानि व्यवालीयन्त भारत ॥१२॥ अथ काम्बोजजैर श्वैर्महद्भिः शीघ्रगामिभिः गोपानां वहुसाहर्वालैर्गोपायनैर्वृतः ॥ १३ ॥ मद्रसौवीरगान्धारेस्त्रैगतश्च विशाम्पते सर्वकालिङ्गमुग्व्यैश्च कलिङ्गाधिपतिर्वृतः ॥ १४ ॥ नानानरगणौघैश्च दुःशासनपुरःसरः जयद्रथश्च नृपतिः सहितः सर्वराजभिः ॥ १५ ॥ इन्द्र के समान गम्भीर शब्द से गरजने लगे। उनक खोसर आपके पुत्रो के साथ भीष्म के शरणागत ताल ठोकने का कठोर शब्द निरन्तर सुन पडने लगा। हुए। तब पितामह उनसी रक्षा करने लगे ॥८॥१०॥ जसे प्रचण्ड वायु और बिजली के साथ गरजता हुआ भयविह्वल रथी रथो पर से, घुडसार घोडो पर मे मेघ सब स्थान जल बरमाना ह, वमे ही अर्जुन भी आर हाथियो के सवार हाथिया पर से पृथ्वी पर सर्वत्र बाण बरमा रहे थे ॥५॥७॥ व भयवर अत्र गिरने लगे। विजली की कडक जमा गाण्डार धनुष शस्त्र बरमाते हुए भीष्म की ओर दाडे । उनके अस्त्र का शब्द सुनकर सैनिकगण भय के मारे प्राण पर प्रहार मे हमारी ओर के लोग अयन्त माहित होकर भागने लगे ॥११॥१२॥ हे राजेन्द्र ! उस समय यह निश्चय नहीं कर सकते थे कि कोन दिशा पूर्व कलिङ्गराज ने मद्र, मागीर, गान्धार, निगर्न आदि है और कान दिशा पशिम ह । कारव पक्ष के देशो की सेना प्रधान प्रधान कलिङ्ग देश के धीर, योद्धाओं में मे किमी के वाहन थक गये थे, फिी काम्बोज देश के शीघ्रगामी घोडे आर अमरय गोप- के वाहन मर गये थे और कोई अचेत हो गया था। मना माथ रेकर युद्ध के लिये प्रस्थान किया । असत्य वे भागकर, हताहन होकर, दिशा-विदिशा का ज्ञान | सेना आर राजाओं के साथ राजा जयव्य, दुशासन .
अध्याय ७१ ] म हा भारत [ ४३१५ - । - हयारोहवराश्चैव तव पुत्रेण चोदिताः चतुर्दश सहस्राणि सौवलं पर्यवारयन् ॥ १६ ॥ ततस्ते सहिताः स विभक्तरथवाहनाः अर्जुनं समरे जघ्नुस्तावका भरतर्षभ ॥१७॥ रथिभिरणैर श्वैः पाटातैश्च समीरितम् घोरमायोधनं चके महाभ्रसदृशं रजः ॥ १८ ॥ तोमरप्रासनाराचगजाश्वरथयोधिनाम् चलेन महता भीष्मः समसज्जकिरीटिना ॥ १९ ॥ आवन्त्यः काशिराजेन भीमसेनेन सैन्धवः अजातशत्रुर्मद्राणामृपभेण यशस्विना ॥ २० ॥ सहपुत्रः सहामात्यः शल्येन समसज्जत विकर्णः सहदेवेन चित्रसेनः शिखण्डिना ॥ २१ ॥ मत्स्या दुर्योधनं जग्मुः शकुनिं च विशाम्पते । द्रुपदश्चेकितानश्च सात्यकिश्च महारथः ॥ २२ ॥ द्रोणेन समसज्जन्त सपुत्रेण महात्मना कृपश्च कृतवर्मा च धृष्टद्युम्नमभिद्रुतौ ॥ २३ ॥ एवं प्रबजिताश्वानि भ्रान्तनागरथानि च सैन्यानि समसज्जन्त प्रयुद्धानि समन्ततः ॥ २४ ॥ के अनुगामा होकर, युद्ध के पिये चढे । आपके पुन माथ, पुत्र और मन्त्री आदि के माथ अनातरानु राजा दुर्योधन का आज्ञा से चादह हतार मुरय-मुग्य युधिष्ठिर शल्य के माय, मिण महदेर के माय घुडसवार शकुनि के साथ चले ॥१३॥१६॥ हे आर चित्रमन शिरवण्डा के माथ युद्ध करने लगे। महारान ' कुस्पक्ष के योद्धा एकर होकर अग ह करश्रष्टदुर्योपन और शनि के माय मस्य देश अन्ग रथों आर पाहनो पर चढ़कर अर्जुन में भिड़ के पीरगण युद्ध करने रंग । द्रुपद, चस्तिान आर गये । उस युद्धभूमि मे रथों, हाथिया, घोडा मायकि मियर अश्वथामा और दाणागार्य मे युद्ध और मनुष्यों के चल्ने मे इतनी धूर उडा कि यरने लगे । राचार्य आर कृतामा दोनों सृष्टकेतु आगमण्डल महामेघ से घिरा हुआ सा जान पड़ने मे भिड़ गये ॥२०॥२३॥ इम प्रसार रथ, हाथी आर लगा । महारथी भीम ये माथ बहन मी चतुङ्गिणी ! घोड़े चारो और पिग्ने लगे और उन पर नगार योदा सेना थी । । सनिक तोमर, प्राम, नाराच आदि लोग परम्पर प्रहार करते हुए युद्ध यग्न गे। उम गया के द्वारा अर्जुन से युद्ध करने ल्गे॥१७॥१०॥ ममय मेाहीन आसारामण्टर में निर्ग नमान रगा और घोर शट के माय भयानर उन्यागत अन्तिराज यागरान के साथ, जयव्य भीमभेन के ४३४६ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व । निरभ्रे विद्युतस्तीत्रा दिशश्च रजसाऽऽवृताः प्रादुरासन्महोल्काश्च सनिर्घाता विशाम्पते ॥ २५॥ प्रादुर्भूतो महावातः पांसुवर्षे पपात च नभस्यन्तर्दधे सूर्यः सैन्येन रजसाऽऽवृतः ॥ २६ ॥ प्रमोहः सर्वसत्वानामतीव समपद्यत रजसा चाऽभिभूतानामस्त्रजालैश्च तुद्यताम् ॥ २७॥ वीरवाहुविसृष्टानां सर्वावरणभेदिनाम् सङ्घातः शरजालानां तुमुलः समपद्यत ॥ २८॥ प्रकाशं चक्रुराकाशमुद्यतानि भुजोत्तमैः नक्षत्रविमलाभानि शस्त्राणि भरतर्षभ ॥ २९ ॥ आर्पभाणि विचित्राणि रुक्मजालावृतानि च सम्पेतुर्दिक्षु सर्वासु चर्माणि भरतर्षभ ॥ ३० ॥ सूर्यवर्णेश्च निस्त्रिंशः पात्यमानानि सर्वशः दिक्षु सर्वाखदृश्यन्त शरीराणि शिरांसि च ॥ ३१ ॥ भग्नचक्राक्षनीडाश्च निपातितमहाध्वजाः हताश्वाः पृथिवीं जग्मुस्तत्र तत्र महारथाः ॥ ३२ ॥ परिपेतुर्हयाश्चाऽत्र केचिच्छस्वकृतत्रणाः स्थान्विपरिकर्पन्तो हतेपु रथयोधिपु ॥ ३३ ॥ शराहता भिन्नदेहा बद्धयोक्त्रा हयोत्तमाः युगानि पर्यकर्पन्त तत्र तत्र म्म भारत ॥ ३४ ॥ होता दिग्या दिया । चागे और आप नीचे-ऊपर धूल योद्धाओ के गूर्यमा चमकीले गद्गों में छिन्न भिन्न काग । अंग चलकर देले यामाने रगी। मना की मिर और शरीर मत्र पडे हुए देखने में आने लगे। मे आकासमण्दर में सूर्य छिप गये । उम घट महाथियों के ग्यों के पहिये हट गये, धजाएँ कट और अगम मय प्राणी न्याहान संग ॥२४॥२७ गट, घोड और गाग्थी मा गए और व महारथी चय गौर पुरपा का झंटे हुए याण किट दान पृषी पर गिन संग । यतंगे योद्धाआ के मा जाने के माथ गर्वन गिग्नं ग । योजाआ के गये पर मागविहीन गोड, याणा मे गायट होकर, युगमाष्ट गण मे घटकर और उपन र आरा में योगींचने म उधर दीदने दंगपं ॥३१॥३३॥ समान हिगाई पईन गानित मुरण जामन गाने पर हंगामा कि किमी पगकमी याला कराया दो हट-टार रिमाया ॥२८॥३०॥ पालीम गा, माना और गंझ को मार दाग। -- अध्याय ७१ म हा भा र त { ४३४७ । - अदृश्यन्त ससूताश्च साश्वाः सरथयोधिनः एकेन बलिना राजन्वारणेन विमर्दिताः गन्धहस्तिमदस्रावमाघ्राय वहवो रणे सन्निपाते वलौघानां वीतमाददिरे गजाः सतोमरैर्महामात्रैर्निपतद्भिर्गतासुभिः बभूवाऽऽयोधनं छन्नं नाराचाभिहतैर्गजैः ॥ ३७॥ सन्निपाते वलौघानां प्रेषितर्वरवारणः निपेतुर्युधि सम्भग्नाः सयोधाः सध्वजा गजाः ॥ ३८ ॥ नागराजोपमैहस्तै गैराक्षिप्य संयुगे व्यदृश्यन्त महाराज सम्भग्ना रथकूवराः ॥ ३९ ॥ विशीर्णरथसङ्घाश्च केशेग्वाक्षिप्य दन्तिभिः द्रुमशाग्वा इवाऽऽविध्य निप्पिष्टा रथिनो रणे ॥४॥ रथेषु च रथान्युद्धे संसक्तान्ववारणाः विकर्षन्तो दिशः सर्वाः सम्पेतुः सर्वशब्दगाः ॥ ४१ ।। तेषां तथा कर्पतां तु गजानां रूपमावभौ सरःसु नलिनीजालं विपक्तमिव कर्पताम् ॥ ४२ ॥ एवं सञ्छादितं तत्र बभूवाऽऽयोधनं महत् सादिभिश्च पदातैश्च सध्वजैश्च महारथैः ॥४३॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवयपर्वणि सड्कुटयुद्धे एक्मततितमोऽध्याय ॥ ७१ ।। कहीं किसी मदोन्मत हाथी के मद की गन्ध पाकर हाथी ने मड से क्रिमी योद्धा के कश पकडकर उसे वहुन से हाथी भय से भाग ग्वड़े हुए आ उनके ग्वींच लिया और वृक्ष की शाया की तरह गट पाओ मे अनेक हाथी कुचले गये॥३४॥३६॥ नाराच डाला ॥३७॥४०॥ कहीं पर ग्य मे भिड़े हुए ग्थ को बाणों के प्रहार से मरकर गिरे हुए हाथियों से वह सींचंत हुए हाथी इधर उधर फिर रहे थे। उम ममय युद्धभूमि भर गई । हाथियों की पीठ में तोमर-अकुछ वे हाथी मरीर में परस्पर लिपटे हुए कमरों को मे लिये महारत भी मर-मरकर गिरन लंग। ग्वीचत मे जान पड़ने थे । इस प्रकार यह रणभूमि उम घोर मग्राम में हारियों के आक्रमण से योद्धा घुड़मगरी, पंढली और ध्वनाओं मे गोभित महा- ओर झण्डमहित हाथी गिरने लगे। श्रेष्ट हायी मूड़ से रथिया में परिपूर्ण हो रही थी ॥४१॥४३॥ रथो को गींचकर नोड़ टालते थे । कहीं पर किमी भीमारी का इकहत्तरवा अध्याय ममाम हुआ ।। ७१ ॥ - आदि हाथ ४३४८ ] म हा भारत [ भाष्मपर्व umunun । । . अथ द्विमप्ततितमोऽयाय ॥ ७ ॥ सञ्जय उनाच-शिखण्डी सह मत्स्येन विराटेन विशाम्पते भीप्ममाशु महेष्वासमाससाद सुदुर्जयम् द्रोणं कृपं विकर्ण च महेष्वासं महावलम् राजश्चाऽन्यान्रणे शूरान्वहूनाईद्धनञ्जयः सैन्धवं च महेष्वासं सामात्यं सह बन्धुभिः प्राच्यांश्च दाक्षिणात्यांश्च भूमिपान्भूमिपर्षभ ॥ ३ ॥ पुत्रं च ते महेष्वासं दुर्योधनममर्पणम् दुःसहं चैव समरे भीमसेनोऽभ्यवर्तत सहदेवस्तु शकुनिमुलूकं च महारथम् पितापुत्रौ महेष्वासावभ्यवर्तत दुर्जयो युधिष्ठिरो महाराज गजानीकं महारथः समवर्तत संग्रामे पुत्रेण निकृतस्तव माद्रीपुत्रस्तु नकुलः शूरसंक्रन्दनो युधि त्रिगर्तानां वलैः सार्धं समसज्जत पाण्डवः अभ्यवर्तन्त संक्रुद्धाः समरे शाल्वकेकयान् । सात्यकिश्चेकितानश्च सौभद्रश्च महारथः धृष्टकेतुश्च समरे राक्षसश्च घटोत्कचः पुत्राणां ते स्थानीकं प्रत्युद्याताः सुदुर्जयाः ॥ ९ ॥ सेनापतिरमेयात्मा धृष्टद्युम्नो महाबलः द्रोणेन समरे राजन्समियायोग्रकर्मणा ॥ १० ॥ नहत्तरवाँ अयाय ॥ ७ ॥ सञ्जय न कहा----हे रासह राना विराट आर । युद्ध करन गये । महारथा शनि आर उनके पुत्र भिग्वण्टी मानता के माथ महाधनुर्द्धर भाप्म क ममुग्व उन म सहदव युद्ध करने लगे । महारया युपिपिर आये । महारग पराममा द्रोण, कृप, पिवर्ण आर | हाथिया का सेना मे युद्ध करने के लिये गये । समर अन्य नहुन से राजाआ म अर अजुन युद्ध करने म इद्रतुन्य पराममा नकुर त्रिगत दशक बाग से रगे ॥१३॥ अमा य और वधुओं सहित जयद्रय, पूर्व युद्ध करन ग || सायरि चकितान और और दक्षिण दिशा के नरपतिया तया आपने पुत्र अभिम यु, ताना तीर कुपित हार गाय और वैश्य महाधनुदर दृयोपन आर दु मह मे अरे भाममैन । दंग की मना मे युद्ध करन गे । राक्षम पोक्च - अध्याय ७२ ] म हा भारत [ ४३४९ । एवमेत महेष्वासास्तावकाः पाण्डवैः सह समेत्य समरे शूराः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे मध्यन्दिनगते सूर्य नभस्याकुलतां गते कुरवः पाण्डवेयाश्च निजघ्नुरितरेतरम् ॥ १२ ॥ ध्वजिनो हेमचित्राङ्गा विचरन्तो रणाजिरे सपताका रथा रेजुर्वेयाघ्रपरिवारणाः ।। १३ ।। समेतानां च समरे जिगीपूणां परस्परम् बभूव तुमुलः शब्दः सिंहानामिव नर्दताम् ॥ १४ ॥ तत्राऽद्भुतमपश्याम सम्प्रहारं सुदारुणम् यदकुर्वन्रणे शूराः सृञ्जयाः कुरुभिः सह ॥ १५ ॥ नैव खं न दिशो राजन्न सूर्य शत्रुतापन विदिशो वाऽपि पश्यामः शरैर्मुक्तैः समन्ततः ॥ १६ ॥ शक्तीनां विमलाग्राणां तोमराणां तथाऽस्यताम् । निस्त्रिंशानां च पीतानां नीलोत्पलनिभाःप्रभाः॥ १७ ॥ कवचानां विचित्राणां भूषणानां प्रभास्तथा खं दिशः प्रदिशश्चैव भासयामासुरोजसा ॥ १८ ॥ वपुर्भिश्च नरेन्द्राणां चन्द्र सूर्यसमप्रभैः विरराज तदा राजंम्तत्र तत्र रणाङ्गणम् रथसङ्घा नरव्याघ्राः समायान्तश्च संयुगे विरेजुः समरे राजन्ग्रहा इव नभस्तले आर धृष्टकेतु कारवो की रथ-सना स युद्ध करने गण परस्पर भिडार मिहों के समान गरजने लंग । लग । महाबली मेनापति धृष्टद्युम्न उग्रकर्मा द्रोणाचार्य ॥११॥१४॥ हम लोग वह कारनों ओर सञ्जयों का से युद्ध करने गये ॥८।१०। इस प्रकार दोनो ओर के अद्भुत युद्ध देग्वने लगे। दिशा, विदिशा, आकाश महारथी योद्धा परस्पर भिड़कर प्रहार करने लगे। या सूर्य कुछ नहीं देय पडता था, चारो ओर बाण उस समय ठीक मध्याह्न था, आकाशमण्टल मूर्य ही वाण छाये हुए थे। शक्ति,तोमर, ग्यङ्ग, विचित्र कवच की प्रचण्ट किरणो से परिपूर्ण था। कारव आर पाण्डव और प्रकार प्रकार के मणिजटित स्वर्णमय आभूपणो परस्पर प्रचण्ड प्रहार कर रहे थे । सुवर्णचित्रित पनाका- की चमक मेमन दिशाएँ और आसागमण्डल जगमगा युक्त, व्याघ्रो की ग्वालों से मढ़े हुए,सुन्दर रथ रण उठा । रणभूमि में प्रत्येक स्थान पर राजालोग चन्द्रमा भूमि में दौडने लगे |जयलाभ के लिये उन्सुक वीर आर मर्य के समान प्रकाशमान हो रहे थे । रयो - ड ४३५० ] म हा भारत [ भीष्मपर .. - relaainaarasweateriacsidainainiti भीष्मस्तु रथिनां श्रेष्ठो भीमसेनं महावलं अवारयत संक्रुद्धः सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥ २१ ॥ ततो भीष्मविनिर्मुक्ता रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः । अभ्यन्नन्समरे भीमं तैलधौताः सुतेजनाः ॥ २२॥ तस्य शक्तिं महावेगां भीमसेनो महाबलः क्रुद्धाशीविषसङ्काशां प्रेपयामास भारत ॥ २३॥ तामापतन्ती सहसा रुक्मदण्डां दुरासदाम् चिच्छेद समरे भीष्मः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥२४॥ ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च कार्मुकं भीमसेनस्य द्विधा चिच्छेद भारत ॥ २५॥ सात्यकिस्तु ततस्तूर्णं भीष्ममासाद्य संयुगे आकर्णप्रहितैस्तीक्ष्णनिशितैस्तिग्मतेजनः ॥ २६ ॥ शरैर्वहुभिरानछुत्पितरं ते जनेश्वर ततः सन्धाय वै तीक्ष्णं शरं परमदारुणम् ॥ २७॥ वाष्र्णेयस्य रथाद्भीप्मः पातयामास सारथिम् । तस्याऽश्वाः प्रगुता राजनिहते रथसारथी ॥ २८॥ तेन तेनैव धावन्ति मनोमारुतरंहसः ततः सर्वस्य सैन्यस्य निःस्वनस्तुमुलोऽभवत् ॥ २९ ॥ हाहाकारश्च सअज्ञे पाण्डवानां महात्मनाम् अभ्पद्रवत गृह्णीत हयान्यच्छत धावत ॥ ३० ॥ पर बैठे हुए वीर आकाश में इधर-उधर चलते हुए में काट डाला; इसके पश्चात् एक तीक्ष्ण भल्ल बाण से ग्रहों के समान जान पड़ने लगे ॥१५॥२०॥ हे ' भीममेन का धनुष भी काट डाला ॥२१॥२५॥ इतने भारत ! उधर महारथी भीम ने मे सायकि ने ग्रीनता के साथ भीष्म के पास जाकर सेना के मामने ही सुवर्णपुश, गिलाओं पर रगड़े उनको बड़े ताण-नाश्ग बाण मारे । भीष्म ने एक हए, नल-धील वाण बग्माकर बटी भीममन को आगे तीक्ष्ण भयानक याण मारकर मायकि के साग्धा को बदन में रोका । नय भीममन को ग्रोध चह आया । ग्य मे गिरा दिया । मारथी के मर जान पर ये तेज उन्होंने बुपित नाग के ममान एक शक्ति बड़े वेग मे घोड़े अम्न-त्र्यम्त भाव मे माया का रस टिय भाम के ऊपर फेंकी। भीम ने उम सुरर्ण-दण्टमयी किन्ने स्टगे ॥२६॥२९॥ तब युद्धभूमि में कौरवपक्ष गाति को, अपने ऊपर गिरते देगकर, नाश्ण बाणों के टोग आनन्द कालाहट और पाण्टयपक्ष के लोग होकर मर ।
अन्याय ७३ म हा भारत [ ४३५१ - इत्यासीत्तुमुलः शब्दो युयुधानरथं प्रति एतस्मिन्नेव काले तु भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥ ३१ ॥ न्यहनत्पाण्डवीं सेनामासुरीमिव वृत्रहा ते वध्यमाना भीष्मेण पञ्चालाः सोमकैः सह ॥ ३२ ॥ स्थिरां युद्धे मतिं कृत्वा भीष्ममेवाऽभिदुद्रुवुः । धृष्टद्युम्नमुखाश्चाऽपि पार्थाः शान्तनवं रणे ॥ ३३ ॥ अभ्यधावञ्जिगीपन्तस्तव पुत्रस्य वाहिनीम् तथैव कौरवा राजन्भीष्मद्रोणपुरोगमाः ॥ ३४ ॥ अभ्यधावन्त बेगेन ततो युद्धमवर्तत ॥३५॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मववपर्वणि पञ्चमदिवमयुद्धे द्विसप्ततितमोऽध्याय ॥ ७२ ।। हाहाकार करने लगे। पाण्डव लोग अपने सैनिको से का दृढ निश्चय करके भीम के ऊपर प्रचण्ड आक्रमण कहने लंग-टोडो, घोडा को पकड़ा, रोक लो। किया । पाण्डयों ने ओर धृष्टद्युम्न ने भी आक्रमण इसी अवसर में भी म पितामह उसी प्रकार पाण्डवसेना कर दिया । भीष्म, द्रोण आदि कौरव-वीर उन्हे का सहार करने लगे जिस प्रकार इन्द्र दानवो की रोकने की चेष्टा करने लगे। दोनो ओर घमासान सेना को नष्ट करते है । भीष्म के हाथो मारे जाते युद्ध होने लगा ॥३०॥३५॥ हुए सोमको ओर पाञ्चालो ने युद्ध मे मरने या मारने भीष्मपर्व का बहत्तरवॉ अध्याय समाप्त हुआ ।। ७२ ॥ अथ त्रिसप्ततितमोऽध्याय ॥ ७३ ।। सञ्जय उवाच-विराटोऽथ त्रिभिर्वाणे प्ममार्छन्महारथम् । विव्याध तुरगांश्चाऽस्य त्रिभिर्वाणैर्महारथः तं प्रत्यविध्यदृशभिीष्मः शान्तनरः शरैः रुक्मपुखैर्महेष्वासः कृतहस्तो महाबलः द्रौणिर्गाण्डीवधन्वानं भीमधन्वा महारथः अविध्यदिपुभिः पढिहस्तः स्तनान्तरे ॥ ३ ॥ कार्मुकं तस्य चिच्छेद फाल्गुनः परवीरहा अविध्यच्च भृशं तीक्ष्णैः पत्रिभिः शत्रुकर्शनः ॥ ४ ॥ तिहत्तरवाँ अध्याय ॥ ७३ ॥ मञ्जप ने कहा--हे महाराज ! तर राजा | सहित सारथी को भी तीन ही वाण मारे । भीष्म ने विराट ने महारथी भीष्म को तीन बाण और घोडो । उनको दस बाण मारे । भयानक धनुर्धारी महारथी --0 १३५२ म हा भारत । मापापत्र : । सोऽन्यत्कार्मुकमादाय वेगवान्क्रोधमूर्छितः अमृप्यमाणः पार्थेन कार्मुकच्छेदमाहवे अविध्यत्फाल्गुनं राजन्नवत्या निशितैः शरैः वासुदेवं च सप्तत्या विव्याध परमेपुभिः नतः क्रोधाभिताम्राक्षः कृष्णेन सह फाल्गुनः । दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य चिन्तयित्वा पुनः पुनः॥ ७ ॥ धनुः प्रपीडय वामेन करेणाऽमित्रकर्शनः गाण्डीवधन्वा संक्रुद्धः शितान्सन्नतपर्वणः जीवितान्तकरान्घोरान्समादत्त शिलीमुग्वान् । नैस्तुणं समरेऽविध्यद द्रोणि बलवतां वरः नस्य ने कवचं भित्वा पपुः गोणितमाहवे न विव्यथे च निर्भिन्नो द्राणिर्गाण्डीवधन्वना ॥१०॥ नथैव च शगन्द्राणिः प्रविमुञ्चन्नविद्वलः नम्था स समरे गजंत्रातुमिन्छन्महानतम् नम्य नत्ममहत्कर्म गंमुः कुरुसत्तमाः यत्कृष्णाभ्यां समेनाभ्यामभ्यापनन संयुगे म हि नित्यमनीकेषु युध्यनेऽभयमास्थितः अखग्राम समंहारं द्रोगात्प्राप्य सुदुर्लभम् ॥ १३ ॥ - अन्याय ७३ ] म हा मा रत { ४३५३ । ममैप आचार्यसुतो द्रोणस्याऽपि प्रियः सुतः । ब्राह्मणश्च विशेषेण माननीयो ममेति च ॥ १४ ॥ समास्थाय मतिं वीरो बीभत्सुः शत्रुतापनः कृपां चक्रे रथश्रेष्ठो भारद्वाजसुतं प्रति ॥ १५ ॥ द्रौणिं त्यक्त्वा ततो युद्धे कौन्तेयः श्वेतवाहनः । युयुधे तावकान्निघ्नस्त्वरमाणः पराक्रमी दुर्योधनस्तु दशभिर्गाधपत्रेः शिलाशितैः भीमसेनं महेष्वासं रुक्मपुङ्खः समार्पयत् ॥ १७॥ भीमसेनः सुसंक्रुद्धः परासुकरणं दृढम् चित्रं कार्मुकमादत्त शरांश्च निशितान्दश ॥ १८॥ आकर्णप्रहितैस्तीक्ष्णैवेगवद्भिरजिह्मगैः अविध्यत्तूर्णमव्यग्रः कुरुराज महोरसि तस्य काश्चनसूत्रस्थः शरैः सञ्छादितो मणिः । रराजोरसि खे सूर्यो ग्रहेरिव समावृतः ॥ २० ॥ पुत्रस्तु तव तेजस्वी भीमसेनेन ताडितः नाऽमृप्यत यथा नागस्तलशब्दं मदोत्कटः ॥ २१॥ ततः शरैर्महाराज रुक्मपुत्रैः शिलाशितैः भीमं विव्याध संक्रुद्धस्त्रासयानो वरूथिनीम् ॥ २२ ॥ तो युध्यमानौ समरे भृशमन्योन्यविक्षतौ पुत्रौ ते देवसङ्काशौ व्यरोचेतां महावलो ॥ २३ ॥ कृपापूर्वक अश्वत्थामा को छोडकर कौरवमेना के आर २०॥ जैसे मदमत्त गजराज तल-शब्द को सुनकर वीरो को मारने चले गये ॥१३।१६।। हे महाराज ! नहीं सह सकता, यमे ही मानी दुर्योधन भीममन के दुर्योधन ने सुवर्णपुर दम तीक्ष्ण वाण भीममेन को वाणो की चोट पाकर उनके तर-गब्द और मिह- मारे । भीमसेन ने भी कुपित होकर जीवनहारी नाद को नहीं मह मके। उन्होंने क्रोध से अधीर विचित्र वाण निकाले और महाग से कान नक धनुष होकर अपनी मेना की रक्षा करने के लिये भीममेन ग्वींचकर दुर्योधन के वक्षस्थल में ये बाण मारे । पर विकट बाण बरमाये । इस प्रकार घायल होकर उनको छाती में काञ्चनमूत्र प्रथित मणि शोभायमान भी देवतुल्य भीममेन और दुर्योधन परस्पर युद्ध करने थी। वह मणि बाणा मे आच्छादित होने पर ग्रहो लगे ॥२१॥२३|| उधर देवराज-मदृश अभिमन्यु ने घिरे हुए सूर्य के समान जान पड़ने लगी ॥१७ . चित्रमेन को दम और पुरुमित्र को सान बाण मारकर - saoudaiamsirmanatakariwadi - ।
४३५४ । म हा भार न [ भीष्मपर्व - .. । - चित्रसेनं नरव्याघ्र सौभद्रः परवीरहा अविध्यदृशभिर्वाणः पुरुमित्रं च सप्तभिः ॥ २४ ॥ सत्यव्रतं च सप्तत्या विध्वा शक्रसमो युधि नृत्यन्निव रणे वीर आति नः समजीजनत् ॥२५॥ तं प्रत्यविध्यद्दशभिश्चित्रसेनः शिलीमुखैः सत्यवतश्च नवभिः पुरुमित्रश्च सप्तभिः ॥ २६ ॥ स विद्धो विक्षरन्रक्तं शत्रुसंवारणं महत् चिच्छेद चित्रसेनस्य चित्रं कार्मुकमा निः ॥२७॥ भित्त्वा चाऽस्य तनुत्राणं शरेणोरस्यताडयत् ततस्ते तावका वीरा राजपुत्रा महारथाः ॥ २८ ॥ समेत्य युधि संरब्धा विव्यधुनिशितैः शरैः तांश्च सर्वान्शरैस्तीक्ष्णैर्जघान परमास्त्रवित् ॥ २९ ॥ तस्य दृष्ट्वा तु तत्कर्म परिवत्रुः सुतास्तव दहन्तं समरे सैन्यं बने कक्षं यथोल्वणम् अपेतशिशिरे काले समिद्धमिव पावकम् अत्यरोचत सौभद्रस्तव सैन्यानि नाशयन् ॥ ३१ ॥ तत्तस्य चरितं दृष्ट्वा पोत्रस्तव विशाम्पते लक्ष्मणोऽभ्यपतत्तूर्ण सात्वतीपुत्रमाहवे ॥ ३२ ॥ महर्ति के माय मत्ता चाणों मे भीम को घायल करक मयको याण मोरे ॥२७॥२०॥ हे महाराज ! किया।ये आनन्द मे नृत्य मा करने लगे। यह दंगकर आपके पुत्रों ने अभिमन्यु की यह अद्भुत फर्ति हमारे पक्ष के लोगों को यहाट और अंडा उग्न देगार चारो और में उन्हें घेर लिया। गिगिर के दृआ। नर चित्रमेन ने दम बाण, भीम ने नव वाण अन्त में प्रचलित अग्नि जम मृगी लकड़ियों के दर और पुरमित्र ने मात वाण अभिमन्यु का मारे १२.१५ को जला देना है. यमे ही अभिमन्यु श्रेष्ट वाणा में २६॥ अभिमन्यु के शरीर में रविर की भागबाने लगा आपके पक्ष के यादाओं को नष्ट करने गंग ॥३०॥ अभिमन्यु न चिगन का बटिया धनुर और उत्तम ३२॥ उनकी गनि दंगकर आपके पार मण फार फाटयर एक बार बाण उनके यक्ष पर में गोधना के मात्र उनके मामने आये। महारगी अभिमन्यु माग । आज पक्ष के गार और महाrit गनपुर म में शिर होकर : याण मग को मिटार प्रांगण, नशा मागों में अभिमन्यु पर और नान याग उन मामी को मार । उधर दामा आसमय पनि । गिता अभिगाए नगी नांग यागो मे अभिमन्यु या जागा रिन. भीनीण या में गा प्रहांगे या न मिन यग्ना आपण किया। दोनों की मांग अदान अध्याय ७३ ] म हा भारत ४३५५ अभिमन्युस्तु संकुद्धो लक्ष्मणं शुभलक्षणम् । विव्याध निशितैः पड्भिः सारथिं च त्रिभिः शरैः॥ ३३ ॥ तथैव लक्ष्मणो राजन्सौभद्रं निशितैः शरैः अविध्यत महाराज तदद्भुतमिवाऽभवत् ॥ ३४ ॥ तस्याऽश्वांश्चतुरो हत्वा सारथिं च महाबलः । अभ्यद्रवत सौभद्रो लक्ष्मणं निशितैः शरैः ॥ ३५॥ हताश्वे तु रथे तिल्लक्ष्मणः परवीरहा शक्तिं चिक्षेप संक्रुद्धः सौभद्रस्य रथं प्रति ॥ ३६ ॥ तामापतन्ती सहसा घोररूपां दुरासदाम् अभिमन्युः शरैस्तीक्ष्णौश्चिच्छेद भुजगोपमाम् ॥ ३७॥ ततः स्वरथमारोप्य लक्ष्मणं गौतमस्तदा अपोवाह रथेनाऽऽजौ सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥३८॥ ततः समाकुले तस्मिन्वर्तमाने महाभये अभ्यवञ्जिघांसन्तः परस्परवधैपिणः तावकाश्च महेप्वासाः पाण्डवाश्च महारथाः जुह्वन्तः समरे प्राणानिजम्नुरितरेतरम् ॥४०॥ मुनकेशा विकवचा विरथाश्छिन्नकार्मुकाः वाहुभिः समयुध्यन्त स्मृञ्जयाः कुरुभिः सह ॥४१॥ ततो भीपमो महावाहुः पाण्डवानां महात्मनाम् । सेनां जघान संकुद्धो दिव्यैरस्त्रैर्महाबलः ॥ १२ ॥ हतेर श्वैगजेस्तत्र नरैर श्वैश्च पातितः रथिभिः सादिभिश्चैव समास्तीर्यत मेदिनी ॥ ४३ ॥ इति श्री महाभाग्ने भीमपर्वणि भाप्मवधपणि मकुटयु त्रिमप्ततितमोऽध्याय ॥ ७३ ।। थी ॥३२॥३४॥ महारथी अभिमन्यु ने कई बाणों में शक्ति को मामन मे आने देगकर उमे नीण बाणों लक्ष्मण के माथी और रय के चागं घोड़ों को मार में काट डाला ॥३५॥३७॥ नब धूपाचार्य न जाकर डाग । लक्ष्मण ने अभिमन्यु को अपनी ओर आने लक्ष्मण को अपने ग्य पर चिटा लिया। मार्ग मेना दस क्रुद्ध होकर उस पिना घोड़ और मारथा के के मन्मुख ही ये लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिये रथ पर में उनके ऊपर एक तीक्ष्ण शक्ति फेकी। वहीं मे हट गये । उम महाभयानक युद्ध में महा- अभिमन्यु ने म्फत्ति में उस घोरम्पपिणी नागिन मी धनुर्दर कौरव और पाण्टय लंग परपर प्रहार करने waadivasisawarilaikoiravirainine - ४३५६ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व , --- के लिए एक दूसरे की ओर दोड़ने लगे ॥३८१४०॥ की सेना को नष्ट करने लगे। उनके बाणों से असंख्य इस समर में सृञ्जयों के केा खुल गये, कवच कट हाथी, हाथियों के मवार, धोड़े और सवार, स्थ, गये और रथ टूट गये | शस्त्र और धनुप न रहने पर रथो के सवार और पैदल इतने गिरे कि समरभूमि वे कौरवसेना के साथ बाहुयुद्ध करने लंगे। उधर । उनसे व्याप्त हो गई ॥४११४३।। महा पराक्रमी महाबाहु भीष्म क्रोवपूर्वक पाण्डवपक्ष भीष्मपर्व का निहत्तरवा अध्याय ममाप्त हुआ ।। ७३ ।। अथ चतु:सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥ सञ्जय उवाच-अथ राजन्महाबाहुः सात्यकियुद्धदुर्मदः विकृष्य चापं समरे भारसाहमनुत्तमम् प्रामुञ्चत्पुङ्खसंयुक्ताशरानाशीविपोपमान् प्रगाढं लघु चित्रं च दर्शयन्हस्तलाघवम् ॥ २ ॥ तस्य विक्षिपतश्चापं शरानन्यांश्च मुञ्चतः आददानस्य भूयश्च सन्दधानस्य चाऽपरान् विपतश्च परांस्तस्य रणे शत्रून्विनिघ्नतः ददृशे रूपमत्यर्थं मेघस्येव प्रवर्पतः तमुदीर्यन्तमालोक्य राजा दुर्योधनस्ततः रथानामयुतं तस्य प्रेषयामास भारत तांस्तु सर्वान्महेष्वासान्सात्यकिः सत्यविक्रमः । जघान परमेप्यासो दिव्येनाऽस्त्रेण वीर्यवान् ॥ ६ ॥ स कृत्वा दारुणं कर्म प्रगृहीतशरासनः आससाद ततो वीरो भृरिश्रवसमाहवे चौहत्तरवाँ अध्याय ।। ७४ ।। सञ्जय ने कहा – हे महाराज ! युद्धप्रिय को मारते हुए मात्यकि, बरसते हुए मेघ के समान, महावीर मात्यकि ने बोझ को सह सकनेवाला उत्तम देख पड़ने थे ॥११४॥ सात्यकि को पराक्रमपूर्वक धनुष ग्वींचकर शत्रुपक्ष की मेना के ऊपर पिपले सर्प- शत्रुसेना का नाश करते देखकर राजा दुर्योधन ने मदृश सुवर्णपुरयुक्त बाण बरमाना आरम्भ किया । उनका मामना करने के लिए दम हजार रथी योद्धा उम ममय वे अर्जुन से सीखा हुआ प्रगाढ़, लघु, चित्र भेजे । धनुर्द्धरो मे श्रेष्ट वीर्यशाली सात्यकि ने दिव्य हम्तलापन (हाथ की स्फत्ति) दिगाने लगे । धनुप अन से उन सब वीरो को मार डाला । महावीर चढ़ाकर वाण छोड़ते हुए, फिर तरकम से बाण निकाल- मायकि इस प्रकार दारुण कर्म करके धनुप हाथ कर धनुष पर चढ़ाते हुए और उन्हे छोड़कर शत्रुओं लिये भूरिश्रया से युद्ध करने लगे ॥५/७|| कुरुकुल .
अध्याय ७४ ]
म हा भारत
(४३५७
www
स हि सन्दश्य सेनां ते युयुधानेन पातिताम् ।
अभ्यधावत संक्रुद्धः कुरूणां कीर्तिवर्धनः
इन्द्रायुधसवर्ण तु विस्फार्य
सुमहद्धनुः
स्पृष्टयान्वज्रसङ्काशाशरानाशीधिपोपमान्
सहस्रशो महाराज दर्शयन्पाणिलाघवम्
शरांस्तान्मृत्युसंस्पर्शान्सात्यकेश्च पदानुगाः ॥१०॥
न विपहुस्तदा राजन्दुद्रुवुस्ते समन्ततः
विहाय सात्यकि राजन्समरे युद्धदुर्मदम् ॥ ११॥
तं दृष्ट्वा युयुधानस्य सुता दश महाबलाः
महारथाः समाख्याताश्चित्रवर्मायुधध्वजाः ॥ १२ ॥
समासाद्य महेष्वासं भूरिश्रवसमावे
ऊचुः सर्व सुसंरब्धा यूपकेतुं महारणे ॥ १३ ॥
भो भो कोरबदायाद सहाऽस्माभिर्भहावल
पहि युध्यस्व संग्रामे समस्तेः पृथगेव वा ॥ ११ ॥
अस्प्तान्वा त्वं पराजित्य यशः प्रामुहि संयुगे ।
वयं वा त्वां पराजित्य प्रीतिं धास्यामहे पितुः ॥ १५ ॥
एवमुक्तस्तदा शृरेस्तानुवाच महाबलः
वीर्यश्लाघी नरश्रेष्टस्तान्दष्ट्वा समवस्थितान्
साचिदं कथ्यते वीग यद्येवं मतिग्द्य वः
युध्यध्वं सहिता यत्ता निहनिष्यामि वो रणे ॥१७॥
म हा भा र त [ भीमपर्व - -- एवमुक्ता महेप्वासास्ते वीराः क्षिप्रकारिणः महता शरवर्षेण अभ्यधावन्नरिन्दमम् ॥१८॥ सोऽपराहे महाराज संग्रामस्तुमुलोऽभवत् एकस्य च वहूनां च समेतानां रणाजिरे ॥ १९॥ तमेकं रथिनां श्रेष्टं शरैस्ते समवाकिरन् प्रावृपीव यथा मेरु सिपिचुर्जलदा नृप ॥ २० ॥ तैस्तु मुक्ताशरान्घोरान्यमदण्डाशनिप्रभान् । असम्प्राप्तानसम्भ्रान्तश्चिच्छेदाऽऽशु महारथः ॥ २१ ॥ तत्राऽद्भुतमपश्याम सौमदत्तेः पराक्रमम् यदेको बहुभियुद्धे समसज्जदभीतवत् ॥ २२ ॥ विस्मृज्य शरवृष्टिं तां दश राजन्महारथाः परिवार्य महावाहुं निहन्तुमुपचक्रमुः ॥ २३॥ सौमदत्तिस्ततः क्रुद्धस्तेषां चापानि भारत चिच्छेद समरे राजन्युध्यमानो महारथैः ॥ २४ ॥ अथैपां छिन्नधनुपां शरैः सन्नतपर्वभिः चिच्छेद समरे राजशिरांति भरतर्षभ ॥ २५ ॥ ते हता न्यपतन्राजन्वज्रभग्ना इव द्रुमाः तान्दृष्ट्वा निहतान्वीरो रणे पुत्रान्महावलान् ॥ २६ ॥ वाणयो विनदराजन्भूरिश्रवसमभ्ययात् रथं रयेन समरे पीडयित्वा महावलो तुम मय मिटकर ही युद्ध करो । मैं तुम मयका युद्ध यन के ममान. भयावर बाणों को पाम तक नहीं आद में मारेगा। अब माफि के दम। धनुर्दर-श्रेष्ट दिया, उन्हें मध्य में ही काट डान्टा ॥११।२१।। म रातिशाली पुत्र प्रकट ग म आक्रमण याम्फे भूरिया के अनन्नर ये चीर भरिश्रया को चारों और म. पर बाण मामान लंग ॥१६॥१८॥ है महागज ! कर मार डारने की चेष्टा काग्ने लंगे। महावीर भूगि. नांगर पर अंकले भूरिश्रग उन दमा वांगमधार श्रा ने युपित होकर विधि वाणों में उनके भनु गुम करते नंग । वर्षाऋतु में गा अंग पर्वत पर जट याटकर उनके गिर काट टा। भूरिश्रा य याणी यामात को ही ये चीर यांना भग्निंग पर लागे में मरकर, रात म हँटे ए. वृक्षा काभान्नि, पृष्टी और गवाणों या वर्षा करने मामी भूरि पर गिर पंद।।२२।२प्राष्णिकमी मारमा परि गननी उन यांग क नगए, पदण्ड और युद्ध में अपने महार पुती का मग्ना देगर मोर - . N.V अध्याय ७१ म हा भारत - तावन्योन्यं हि समरे निहत्य रथवाजिनः विरथावभिवल्गन्तो समेयातां महारथी ॥ २८॥ प्रगृहीतमहाखड्डो तौ चर्मवरधारिणों शुशुभाते नरव्याघ्रौ युद्धाय समवस्थितो ॥ २२॥ ततः सात्यकिमभ्येत्य निस्त्रिंशवरधारिणम् भीमसेनस्त्वरन्राजन्रथमारोपयत्तदा ॥ ३० ॥ तवाऽपि तनयो राजन्भूरिश्रवसमाहवे आरोपयद्रथं तूर्ण पश्यतां सर्वधन्विनाम् ॥ ३१ ॥ तस्मिंस्तथा वर्तमाने रणे भीमं महारथम् अयोधयन्न संरध्धाः पाण्डवा भरतर्षभ ॥ ३२ ॥ लोहितायति चाऽऽदित्ये त्वरमाणो धनञ्जयः पञ्चविंशतिसाहस्रान्निजघान महारथान् ॥ ३३ ॥ ने हि दुर्योधनादिष्टास्तदा पार्थनिबर्हणे सम्प्राप्यैव गता नाशं शलभा इव पावकम् ॥ ३१ ॥ ततो मत्स्याः केकयाश्च धनुर्वेदविशारदाः परिवस्तदा पार्थं सहपुत्रं महारथम् ॥ ३५ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु सूर्येऽस्तमुपगच्छति सर्वेषां चैव सेन्यानां प्रमोहः समजायत मे गरजते हुए भरिश्रया के पाम आये । अब उन क माय दारण मग्राम करने रंगे ॥३०॥३२॥ क्रमा दानो चीरा ने परम्पर आक्रमण करके घोर युद्ध किया । भगवान् सूर्य का विच रार हो उटा, क्योंकि दोनो के रथ चूर्ण हो गये, घोडे आर मारथी नष्ट मन्ध्याकार निस्ट था। महावीर अर्जुन ने बड़ी फत्ति हो गये । तर नाश्ण ग्वन आर ढाट रेकर पृथ्या के माय उतने ही समय में पचास हजार पिया या पर कूद पड़े और एक दूसरे पर आक्रमण कग्ने रग । महार कर डाग । दयापन का आना मे ये महारथी उस ममय युजमि में दोनो की अपूर्व शोभा हुई पार, अर्जुन पर आक्रमण करने, उसी प्रकार नष्ट ॥२६॥२०॥ मी ममय भामपगममा भीममन ने हो गये जिम प्रकार पना अग्नि में गिरकर भस्म हो गघिता म दार-नवार हाथ में रिये दृप मा यकि जाते है |॥३३॥३१|| तर युदचतुर मम्य और कैकेय या अग्ने ग्य पर गदा यिा। उपर दयोधन ने देश के वांग ने अभिमन्यु महित अर्जुन पर आनमण भी माता के मा आर मा योदाओ के मन्मुप क्यिा । दमी समय मर्यदेव अम्नाचर पर पटुंन गये। भूरिया को अपने रथ पर विटारिया महाग! अन्धकार होने के कारण मर मनिकलोग भ्रान्त पाण्टा लोग नीधपूर्वक आक्रमण काक माग्यो भान होने लगे। मायाकार देगर भीम ने युद्ध गरने ४३६० म हा भा र त [ भीष्मपर्व । । अवहारं ततश्चक्रे पिता देवव्रतस्तव सन्ध्याकाले महाराज सैन्यानां श्रान्तवाहनः ॥ ३७ ॥ पाण्डवानां कुरूणां च परस्परसमागमे ते सेने भृशसंविग्ने ययतुः खं निवेशनम् ॥ ३८॥ ततः स्वशिविरं गत्वा न्यविशंस्तत्र भारत पाण्डवाः सृञ्जयः सार्धं कुरवश्व यथाविधि इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि पञ्चमदिवसावहारे चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ।। की आज्ञा दी॥३५॥३७॥ कारवों ओर पाण्डनों की और कौरवगण अपनी-अपनी सेना के साथ दरों पर सम्पूर्ण मेना और वाहन बहुत थक गये थे। मब लोग आकर विश्राम करने लगे ॥३८॥३९॥ अपने-अपन डंगे को लौट चले । हे सृञ्जय ! पाण्डव भीष्मपर्व का चौहत्तरवा अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ७४ ॥ अथ पञ्चसप्ततितमोऽध्याय ॥ ७५ ।। मञ्जय उवाच ते विश्रम्य ततो राजन्सहिताः कुरुपाण्डवाः व्यतीतायां तु शर्वया पुनयुद्धाय निर्ययुः तत्र शब्दो महानासीत्तव तेषां च भारत युज्यतां रथमुख्यानां कल्प्यतां चैव दन्तिनाम् ॥ २॥ सन्नह्यतां पदातीनां हयानां चैव भारत शदुन्दुभिनादश्च तुमुलः सर्वतोऽभवत् ॥ ३ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा धृष्टद्युम्नमभापत व्यूह व्यूह महावाहो मकरं शत्रुनाशनम् ॥ ४ ॥ एवमुक्तस्तु पार्थेन धृष्टद्युम्नो महारथः व्यादिदेश महाराज रथिनो रथिनां वरः पचहत्तग्या अन्याय ॥ ७ ॥ गन्जय वाहन --- महागज ! प्रान.काल होने दंग पडून टगे । उनका घोर बालाहट दर दर तक पर विश्राम के अनन्ना उसका मुमकिन होकर मुनाई पहन लगा ||१|| ना गजा मिंटर में पाण्डर और गाय फिर गुदभूमि में उपम्पिन । धृष्टद्युम्न को, गनुपक्ष के लिए बदा भयङ्कर, मकर या. चांग और नगा आदि का दाद न I ग्वने यी आना दी। आशा पाकर भी रोग मान- होगगनाओं को उनम जुन दृप , मंदी, बन्दी में मंद न दंग मागज दाद और मगंग महिनाद और करनटन नाग और मला अजुन मगह के मानक भाग में पिन ।
अव्याय ७५ ] म हा भारत । शिरोऽभूद द्रुपदस्तस्य पाण्डवश्च धनञ्जयः चक्षुपी सहदेवश्च नकुलश्च महारथः ॥ ६ ॥ तुण्डमासीन्महाराज भीमसेनो महाबलः सौभद्रो द्रौपदेयाश्च राक्षसश्च घटोत्कच सात्यकिधर्मराजश्च व्यग्रीवां समास्थिताः पृष्ठमासीन्महाराज विराटो वाहिनीपतिः धृष्टद्युम्नेन सहितो महत्या सेनया वृतः केकया भ्रातरः पञ्च वामपार्श्व समाश्रिताः धृष्टकेतुर्नरव्याघ्रश्चेकितानश्च वीर्यवान् दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिती व्यूहस्य रक्षणे ॥१०॥ पादयोस्तु महाराज स्थितः श्रीमान्महारथः कुन्तिभोजः शतानीको महत्या सेनया वृतः ॥ ११ ॥ शिखण्डी तु महेप्यासः सोमकैः संवृतो वली । डरावांश्च ततः पुच्छे मकरस्य व्यवस्थितौ ॥ १२ ॥ एवमेतं महाव्यूह व्यूह्य भारत पाण्डवाः सूर्योदये महाराज पुनयुद्धाय दंशिताः ॥१३॥ कौरवानभ्ययुस्तूर्णं हस्त्यश्वरथपत्तिभिः समुच्छ्रितैर्ध्वजैश्छत्रेः शस्त्रैश्च विमलेः शितैः ॥ १४ ॥ व्यूढं दृष्ट्वा तु तत्सैन्यं पिता देवव्रतस्तव कौञ्चेन महता राजन्प्रत्यव्यूहत वाहिनीम् ॥१५॥ हुण् । महारथी नकुश आर महदेव उमक दोनो नेता भोन आर गतान क बहन मी मेना को माय रेयर के स्थान पर नियुक्त हुए । भाममन मुग्नभाग में स्थित उसके दोनों चरणो की रक्षा करन ग । मामागण हुए। अभिमन्यु, द्वापदा के पाँचो पुत्र, राक्षम घटो रच, महिन पार गिपण्डी और [ नागर या मे उपन्न ] मायाक आर धर्मरान गर्दन के म्यान पर गई हुण्| महाचरी गगन् उमा पुठभाग सी रक्षा करने में महागन विगट और धृष्टद्युम अमन्य मेना माय नियुसरण पाण्ट गण मयोदय के समय हम प्रकार पर उनके पृष्टभाग की रक्षा करन गंगे। कोय मारामार मायून रर फिर मग्राम के लिए कारों देश के पाँची भाई राकुमार गमभाग की आर गता में अंगे आये । चतुमिणा मेना अमग्य हाथा, धृष्टकेतु नया पार्यगा चरितान दक्षिण भ ग गी घेई, ग्य, दर, 330 फहगती ई पना, छत्र, रक्षा करने लगे ॥१०॥धी श्रम न् युनि ताप उतार अब आप आदि में पटत शोभा को ..
४३६२ ] म हा भा र त { भीमपर्व । : । -- तस्य तुण्डे महेष्वासो भारद्वाजो व्यरोचत अश्वत्थामा कृपश्चैव चक्षुरासीनरेश्वर ॥ १६ ॥ कृतवर्मा तु सहितः काम्बोजवरवाहिकैः शिरस्यासीन्नरश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुप्मताम् ॥१७॥ ग्रीवायां शूरसेनश्च तव पुत्रश्च मारिप दुर्योधनो महाराज राजभिर्वहुभिर्वृतः ॥१८॥ प्राग्ज्योतिषस्तु सहितो मद्रसौवीरकेकयैः उरस्यभून्नरश्रेष्ठ महत्या सेनया वृतः स्वसेनया च सहितः सुशर्मा प्रस्थलाधिपः वामपक्षं समाश्रित्य दंशितः समवस्थितः ॥ २०॥ तुपारा यवनाश्चैव शकाश्च सह चूचुपैः दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता व्यूहस्य भारत ॥ २१ ॥ श्रुतायुश्च शतायुश्च सौमदत्तिश्च मारिप व्यूहस्य जघने तस्थू रक्षमाणाः परस्परम् ॥ २२ ॥ ततो युद्धाय सञ्जग्मुः पाण्डवाः कौरवैः सह । सूर्योदये महाराज ततो युद्धमभून्महत् ॥ २३ ॥ प्रतीयू रथिनो नागा नागांश्च रथिनो ययुः हयारोहान्रथारोहा रथिनश्चाऽपि सादिनः ॥ २४॥ प्राप्त हुई ॥११॥१४॥ ह राजेन्द्र ! महावार भाष्म ने सुशर्मा अपनी सेना साथ लेकर चामपक्ष की रक्षा पाण्डव-सेना को व्यह-रचना देवकर कारस मेना में करने लगे। तुपार, यवन, शक और चूचुपगण क्रोचव्यूह की रचना की। श्रेष्ठ धनुर्द्धर द्रोणाचार्य उस दक्षिणपक्ष की रक्षा करने लगे । श्रुतायु, शतायु और व्यूह के मुग्वभाग की रक्षा करने लगे। अश्वत्थामा भूरिश्रवा एक दूसरे की सहायता करने के लिए और कपाचार्य दोनो नेत्रों के स्थान में स्थित हुए। जाँघो के स्थान में स्थित हुए ॥२०॥२२॥ इमके, काम्बोज, बाहीकगण ओर कृनामा उसके मस्तकम्यान पश्चात् काय आर पाण्टर परस्पर युद्ध करने लगे। में नियुक्त हुए । शूरमेन आर अमरय शूर गजाओं दोनो ओर के वीर प्राणो का मोह छोड़कर भिड गये। के साथ महाराज दर्योधन उमकी गर्दन के स्थान में उम सकुल युद्ध मे हाथियों के सार रथो के ऊपर, स्थित हुए । प्राग्ज्योनिपपुर के राजा भगदत्त, महराज ग्या लोग हाथियों के ऊपर, घुड़सवार घुड़मगारो पर, आल्य और मिन्धुदेश के राजा जयद्रथ, मावीर और घुडमबार लोग रथी-घोडा आर हाथियों के ऊपर, यंदा की अमाय मना माय लेकर, उमर ग्या लोग हाथियों के सगरों पर और हाथियों के यक्ष म्पट की रक्षा करने लगे ॥१५॥१९॥ गजा । मबार घुड़मगे के ऊपर आक्रमण करके प्रहार अन्याय ७५ ] म हा भार न सादिनश्च हयान्राजन्रथिनश्च महारणे हस्त्यारोहान्हयारोहा रथिनः सादिनस्तथा रथिनः पत्तिभिः सार्ध सादिनचाऽपि पत्तिभिः । अन्योन्यं समरे राजन्प्रत्यधावन्नमर्पिता: ॥ २६ ॥ भीमसेनार्जुनयमैगुप्ता चाऽन्यैर्महारथैः शुशुभे पाण्डवी सेना नक्षत्रैवि शर्वरी ॥२७॥ तथा भीष्मकृपद्रोणाल्यदुर्योधनादिभिः तवाऽपि च वभौ सेना ग्रहैयौरिव संवृता ॥ २८॥ भीमसेनस्तु कौन्तेयो द्रोणं दृष्ट्वा पराक्रमी अभ्ययाजबनेर श्वेर्भारद्वाजस्य बाहिनीम् द्रोणस्तु समरे क्रुद्धो भीमं नवभिरायसेः विव्याध समरश्लाघी मर्माण्युटिश्य वीर्यवान् ॥ ३० ॥ हढाहतस्ततो भीमो भारद्वाजम्य संयुगे सारथिं प्रेषयामास यमस्य सदनं प्रति ॥ ३१ ॥ स सङ्गृह्य स्वयं वाहान्भारद्वाजः प्रतापवान् । व्यधमत्पाण्डवीं सेनां तूलराशिमिवाऽनलः ॥ ३२ ॥ ते वध्यमाना द्रोणेन भीष्मेण च नरोत्तमाः सृञ्जयाः केकयेः सार्धं पलायनपराऽभवन् ॥ ३३ ॥ तथैव तायक सेन्यं भीमार्जुनपरिक्षतम् मुद्यते तत्र तत्रैव समदेव बगङ्गाना ॥ २१ ॥ कग्ने रंग । पैदल, सी और घुड़मगार परस्पर घोर भीमगन ने युद्धभूमि में आचार्य द्रोण को देगका आक्रमण करने लगे। भाममन, अनुन, नकुर, महदेव उनसरी मना पर आग्रमण किया ।नर आनार्याण और अन्य महारथी नीरगनाओ मे मुरक्षित पाण्डय. ने मार करके भीमगन मर्मयों में ना याग मेना नक्षत्रमण्डन-मण्डित गत्रि के ममान शोभित ! मार । भाममेन ने इस प्रकार में विगत और मुद्ध ॥२२॥२६॥ माग ! आपके पापा मेना भी होकर उनके मामी को मार डाग॥२९॥३१॥ अर भाग, कोण.एम.चाप, गन्य र दुर्योग्न आदि अनेक मार दागा गाय पाय घोड़ी को गम पकड़कर ग्य योग द्वारा लक्षिनरामिन आसार गत द. अजमेरयां उगती, मही मद के ममान जान पद: २७।२८ मा पारटक गी मना को भग्न यग्ने गग अनन्ना मार्ग पर माननी मप्रार मान गयोग के प्रा में पादित और । ।
४३६२ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व । । तस्य तुण्डे महेष्वासो भारद्वाजो व्यरोचत अश्वत्थामा कृपश्चैव चक्षुरासीनरेश्वर ॥ १६ ॥ कृतवर्मा तु सहितः काम्बोजवरवाहिकैः शिरस्यासीन्नरश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥१७॥ ग्रीवायां शूरसेनश्च तव पुत्रश्च मारिप दुर्योधनो महाराज राजभिर्वहुभिर्वृतः ॥१८॥ प्राग्ज्योतिषस्तु सहितो मद्रसौवीरकेकयैः उरस्यभून्नरश्रेष्ट महत्या सेनया वृतः स्वसेनया च सहितः सुशर्मा प्रस्थलाधिपः वामपक्षं समाश्रित्य दंशितः समवस्थितः ॥ २० ॥ तुपारा यवनाश्चैव शकाश्च सह चूचुपैः दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता व्यूहस्य भारत ॥ २१ ॥ श्रुतायुश्च शतायुश्च सौमदत्तिश्च मारिप व्यूहस्य जघने तस्थू रक्षमाणाः परस्परम् ॥ २२ ॥ ततो युद्धाय सञ्जग्मुः पाण्डवाः कौरवैः सह । सूर्योदये महाराज ततो युद्धमभून्महत् ॥ २३ ॥ प्रतीयू रथिनो नागा नागांश्च रथिनो ययुः हयारोहान्रथारोहा रथिनश्चाऽपि सादिनः ॥ २४ ॥ प्राप्त हुई ॥११॥१४॥ ह राजेन्द्र | महापार भाष्म ने मुशर्मा अपनी सेना साथ लेकर वामपक्ष की रक्षा पाण्डव मना की व्यूह रचना देग्यकर कारन मना में करने रंगे । तुपार, यवन, शम आर चूचुपगण गौच यह की रचना का। श्रेष्ठ धनुर्द्धर द्रोणाचार्य उस दक्षिणपक्ष की रक्षा करने रगे। श्रुतायु, शतायु आर व्यूह के मुग्वभाग की रक्षा करने लगे। अश्वत्थामा रिश्रया एक दूसरे की महायता करने के लिए और कृपाचार्य दोनो नेत्रों के स्थान में स्थित हुए। जाँघो के स्थान में स्थित हुए ॥२०॥२२॥ दमके काम्नान, वाहकिगण और कृनामा उमके मस्लरम्यान पश्चात् काग्र आर पाण्डर परस्पर युद्ध करने लगे। में नियुक्त हुए । शूग्मेन आर अमाय गूर गजाओ दोनो ओर के वीर प्राणो का मोह छोड़कर भिड गये। के माथ महागज दयाधन उमना गर्दन के म्यान म उम सकुर युद्ध में हाथियों के सार ग्थों के उपर, यित हुए । प्राग्ज्योनिपपुर के राजा भगदत्त, मद्रगज ग्या लोग हाथियो क ऊपर, घुड़मगर घुइमरागे पर, शन्य आरमिन्धुदेश के राजा जयव्य, मौरीर और घुइमगार रोग रया-घोदो आर हाथियों के ऊपर, यंदश की अमाय मना माय लेकर, उमक ग्या लोग हाथियों के समारों पर और हाथियों के यक्ष म्यर की रक्षा कान ग ॥१५॥१०॥ राना मगार घुड़समाग के उपर आक्रमण करके प्रहार ।
अध्याय ७६ म हा भा र न { ४३६५ कम्पनेषु च चापेषु कणपेषु च सर्वशः क्षेपणीयेपु चित्रेषु मुष्टियुद्धेषु च क्षमम् ॥ ६ ॥ अपरोक्षं च विद्यासु व्यायामे च कृतश्रमम् । शस्त्रग्रहणविद्यासु सर्वासु परिनिष्ठितम् आरोहे पर्यवस्कन्दे सरणे सान्तरप्लुते सम्यक्प्रहरणे याने व्यपयाने च कोविदम् नागाश्वरथयानेषु वहुशः सुपरीक्षितम् परीक्ष्य च यथान्याय वेतनेनोपपादितम् न गोप्ट्या नोपकारेण न च वन्धुनिमित्ततः न सौहृदबलेर्वाऽपि नाऽकुलीनपरिग्रहैः ॥ १० ॥ समृद्धजनमार्य च तुष्टसम्बन्धिवान्धवम् कृतोपकारभूयिष्टं यशस्वि च मनस्वि च स्वजनैस्तु नरैर्मुख्यैर्वहुशो दृष्टकर्मभिः लोकपालोपमेस्तात पालितं लोकविश्रुतम् ॥ १२ ॥ बहुभिः क्षत्रियैर्गुप्तं पृथिव्यां लोकसम्मतेः अस्मानभिगतेः कामात्सवलैः सपदानुगेः ॥ १३ ॥ महोदधिमिवाऽऽपूर्णमापगाभिः समन्ततः अपक्षेः पक्षिसङ्काशे रथैर्नागेश्च संवृतम् ॥ ११ ॥ है । उनको भुजाएँ मोटी और दृढ़ है। हमारी मेना आक्रमण करने नगा हटन आदि में निपुण ॥१ अपार है और शस्त्र नया करच आदि में सुजित हमन मत्रको हामी, बोडे, ग्य आदि की मगरियों है ॥१४॥ मय योदा गगयुद्ध, मल्लयुद्ध, गदायुद्ध में अनेक बार परीक्षा देकर अच्छे उचित वेतन पर और प्राम, ऋष्टि, तोमर, परिष, मिन्दिपाल, शक्ति, नौकर साहै। हमार्ग मेना में जो लोग संग गय मुशल आदि शस्त्रों के युद्ध में मुशिक्षित है। वे कम्पन है ये गोष्टी, उसकार, यधुओं की सिफारिस, मगर गुन, चापयुद्ध, कम्पयुद्ध, नित्रयुद्ध, क्षेपणाययुद्ध या माहार्द आदि का कारण न सो गया मी और मुष्टियुद्ध आदि में मांगा ममर्थ हैं। उनका लक्ष्य योदा युगन, आय, ममृदिगानी, यगी और मनाना भी नहीं चूकता | मर रोग मा प्रकार के व्यायाम है। उनके मम्मी नया भाई-मधु मदा माष्ट गगे का और मय प्रकार या युविधा का प्रत्यक्ष अभ्याम जाने और उनसे भी उपसार करने में यमी नाही यि हए । मा प्रसार के गर नलाना उन हातः ॥१२॥rमागं मना जगन में प्रगित । अन्ली प्रकार विदित है।हामी अहि पर नई अनेक बार जिनक काम देगा से मुग, उनग्ने, दूर पर कूदन, अच्छी प्रकार प्रा र सरोकार नुस्य, मजन मार्ग गेला , मनाक ४३६४ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व अभिद्येतां ततो व्यूहौ तस्मिन्बीरवरक्षये आसीद्वयतिकरो घोरस्तव तेपां च भारत ॥३५॥ तदद्भुतमपश्याम तावकानां परैः सह एकायनगताः सर्वे यदयुध्यन्त भारत ॥३६॥ प्रतिसंवार्य चाऽस्त्राणि तेऽन्योन्यस्य विशाम्पते। युयुधुः पाण्डवाश्चैव कौरवाश्च महाबलाः ॥३७॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मत्रवपर्वणि पष्टदिवसयुद्धारम्भे पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥ उद्विग्न होकर सृञ्जय और कैकेयगण उनके सन्मुग्व हुई दोनो सेनाओ का घोर युद्ध देखकर हम लोग से भागने लगे। इमी प्रकार भीमसेन और अर्जुन के । विस्मित हो गये । हे भारत ! शस्त्र धारण किये कौरव बाणो मे पीडित आपकी सेना भी, मद पिये हुए वेश्या और पाण्डव शत्रु-सेना का विनाश करते हुए भयानक विमूढ गी हो गई ॥३२॥३४॥ दोनो संग्राम करने लगे ॥३५॥३७॥ ओर की मेना मरकर नष्ट होने लगी । परस्पर भिड़ी भीष्मपर्व का पचहत्तरवा अध्याय समाप्त हुआ ।। ७५॥ के समान, -.-- - अथ पट्मप्ततितमोऽध्यायः ।। ७६ ॥ धृतराष्ट्र उवाच एवं वहुगुणं सैन्यमेवं बहुविधं पुरा व्यूढमेवं यथाशास्त्रममोघं चैव सञ्जय हृष्टमस्माकमत्यन्तमभिकामं च नः सदा प्रह्वमव्यसनोपेतं पुरस्ताद दृष्टविक्रमम् ॥ २ ॥ नाऽतिवृद्धमवालं च न कृशं न च पीवरम् लघुवृत्तायतप्रायं सारयोधमनामयम् ॥ ३ ॥ आत्तसन्नाशस्त्रं च बहुशस्त्रपरिग्रहम् असियुद्धे नियुद्धे च गदायुद्धे च कोविदम् ॥ ४ ॥ प्रासर्टिनोमरेवाजो परिघेप्यायसेषु च भिन्दिपालेषु शक्तीपु मुसलेषु च सर्वशः लिहताना अन्याय ॥ ७६ ॥ पनगष्ट्र ने यहा- मजय माग मना ध्यमनी में अदने और अनेक युमा में पगनाम दिया अमाग 1 न्युर-ग्पना भी शारिक अनु. मुंफ है। हमारी मेना में कोई अयन गृह, बारा पाया जातामार यांसा युद्ध में दास, हम दवट या यान मोटा मगर मनिक मानि। अनुगम, उमा, प्रगनगिन, मवमान आदि माटी.नम्र और सभ्य:, माराम यांनी अध्याय ७७ म हा भा र त [ ४३६७ . । उक्तो हि विदुरेणाऽहं हितं पथ्यं च नित्यशः । न च जग्राह तन्मन्दः पुत्रो दुर्योधनो मम ॥ २४ ॥ तस्य मन्ये मतिः पूर्वं सर्वज्ञस्य महात्मनः आसीयथागतं तात येन दृष्टमिदं पुरा ॥ २५ ॥ अथवा भाव्यमेवं हि सञ्जयतेन सर्वथा पुरा धात्रा यथा सृष्टं तत्तथा नैतदन्यथा ॥ २६ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मावपर्वणि धृतराष्ट्रचिन्ताया पट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ।। भी आज तक न देग्या होगा। ऐसी भारी सशस्त्र । बातें कहीं, मुझे समझाया, परन्तु मेरे पुत्र मन्दमति सेना युद्ध में अनायास मारी जा रही है ! यह भाग्य का दुर्योवन ने एक नहीं सुनी । महात्मा विदुर सर्वज्ञ ही टोप है ! हे सञ्जय ! मुझे यह सब विपरीत ही है। उन्होंने इस विरोध का फल पहले ही से दिव्य जान पडता हे । अहो ! ऐमी दुर्जय सेना भी युद्ध ज्ञान-शक्ति से देव पिया था। उन्होंने जो कुछ मे पाण्डयो को नहीं मार सकी ! ।।२०।२२।। अवश्य । कहा था, वही हो रहा है; अथवा विधाता ने ही यह ही पाण्डवो की ओर से देवता आकर युद्ध कर लिम्व रक्ग्वा था । यह होनी ही थी । होनी को कौन रहे है और मेरी सेना को नष्ट कर रहे है। टाल सकता है ! विधाता ने जो पहले लिख रक्खा सञ्जय ! महात्मा विदुर ने नित्य मुझसे हित की हे वह अवश्य होगा ॥२३॥२६॥ भीष्मपर्व का छिहत्तरवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७६ ॥ अथ सप्तमप्ततितमोऽध्याय ॥ ७७ ॥ सत्रय उवाच-आरमदोपात्वया राजन्प्राप्तं व्यसनमीदृशम् । नहि दुर्योधनस्तानि पश्यते भरतर्षभ यानि त्वं दृष्टवान्राजन्धर्मसङ्करकारिते तव दोपात्पुरा वृत्तं द्यूतमेव विशाम्पते तब दोपेण युद्धं च प्रवृत्तं सह पाण्डवैः त्वमेवाऽद्य फलं भुंव कृत्वा किल्विपमात्मना ॥ ३ ॥ आत्मनैव कृतं कर्म आत्मनैवोपभुज्यते इह च प्रेत्य वा राजंस्त्वया प्राप्तं यथातथम् ॥ ४ ॥ सतहत्तरवाँ अध्याय ॥ ७७ ॥ सञ्जय ने कहा-हे महाराज ! आप अपने आप ही इसमें अधिक दोपी हैं | पहले आपके ही ही दोष से ऐसे दु.ख और सङ्कट मे पडे हैं । आप दोप से जुए की क्रीडा ईई और आपके ही दोष मे धर्ममङ्कर की जिन बातो को जानते थे उनका ज्ञान युद्ध हुआ । इसलिए अब अपनी भूल का परिणाम दुर्योधन को नहीं था। इस कारण दुर्योधन की अपेक्षा | भोगिए । लोग अपने किये का फल इम लोक या ४३६६ ] म हा भारत [ भीमपर । - नानायोधजलं भीमं वाहनोर्मितरङ्गिणम् क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्राससमाकुलम् ॥१५॥ ध्वजभूषणसम्बाधं रत्नपट्टसुसञ्चितम् परिधावद्भिरश्वैश्च वायुवेगविकम्पितम् अपारमिव गर्जन्तं सागरप्रतिमं महत् द्रोणभीष्माभिसंगुप्तं गुप्तं च कृतवर्मणा कृपदुःशासनाभ्यां च जयद्रथमुखैस्तथा भगदत्तविकर्णाभ्यां द्रौणिसौवलवाह्निकैः ॥१८॥ गुप्तं प्रवीरैलॊकश्च सारवद्भिर्महात्मभिः यदहन्यत संग्रामे दैवमत्र पुरातनम् नैतादृशं समुद्योगं दृष्टवन्तो हि मानुपाः ऋपयो वा महाभागाः पुराणा भुवि सञ्जय ॥ २० ॥ ईदृशोऽपि वलौघस्तु संयुक्तः शस्त्रसम्पदा वध्यते यत्र संग्रामे किमन्यद्भागधेयतः ॥ २१ ॥ विपरीतमिदं सर्व प्रतिभाति हि सञ्जय यत्रेदृशं वलं घोरं पाण्डवान्नाऽतरद्रणे ॥ २२ ॥ पाण्डवार्थाय नियतं देवास्तत्र समागताः युध्यन्ते मामकं सैन्यं यथाऽवध्यत सञ्जय ॥ २३ ॥ है। पृथ्वा भर म प्रसिद्ध, अपनी इच्छा से हमार अनुगत घोडा का वेग देखकर ऐसा जान पडता ह कि यह अनेक क्षत्रिय पार अपनी सेना आर अनुचर आदि सन्यमागर वायु के ग स क्षोभ प्राप्त हो रहा के साथ हमारा सेना की रक्षा करते है। समुद्र जसे ह । उम अपार मेना में सिंहनाद, गङ्खनाद आदि अनेक नदियो से पूर्ण होता ह, वमे हा हमारी सेना का अब्द उममे गरजने का निधोप सा सुन पडता में अनेक राजाओ की सनाएँ आकर सम्मिलित हुई ह ॥१२॥१६॥ द्रोण, भीष्म, कृतवर्मा, कृपाचार्य, है। हमाग मेना के हाथी, पाडे आदि वाहन पक्ष दु शामन, जयद्रथ, भगदत्त, विरुण अश्वथामा,शमुनि हान होने पर भी पक्षिया के ममान तेज है। हमारी बाहाफ आदि अनेक लोकप्रमिद्ध पराक्रमी महारथा मेना ममुद्र तुल्य है । अनेर बोद्धा उम में नल के उम मेना का रक्षा कर रहे है । इतने पर भा जन ममान भरे पडे हैं । नहुँतरे पाहन उसमें तरङ्गो के रह मना पाण्टयो के हाथ मे मारी ना रही ह तन समान है । क्षेपणा, ग्वत, गटा, शक्ति, शर, प्राम मै हमे अपने दुर्भाग्य अथवा दरकोप के बिना और आदि गम जरजाग के ममान है | घना, गहने, क्या कह ॥१७१०॥ मेरे पक्ष के समान सेना ग्वा आदि उममा गाभा बढ़ा रहे है । दाइते हुए आर युद् ना उद्योग प्राचीन ऋपियो और मनुष्यों ने । ?
अध्याय ७७ ] म हा भारत [१३६७ । उक्तो हि विदुरेणाऽहं हितं पथ्यं च नित्यशः । न च जग्राह तन्मन्दः पुत्रो दुर्योधनो मम ॥ २४॥ तस्य मन्ये मतिः पूर्वं सर्वज्ञस्य महात्मनः आसीद्यथागतं तात येन दृष्टमिदं पुरा ॥ २५॥ अथवा भाव्यमेवं हि सञ्जयतेन सर्वथा पुरा धात्रा यथा सृष्टं तत्तथा नैतदन्यथा ॥ २६॥ इति श्रा महाभारत भाष्मपर्वणि भीष्म पर्वणि धृतराष्ट्रचि ताया पट्सप्ततितमोऽध्याय ॥ ७६ ॥ भा आज तक न देम्वा होगा। ऐसी भारा सास्त्र बातें कहीं, मुझे समझाया, परन्तु मेरे पुत्र मदमति मेना युद्ध मे अनायास मारा जा रही है ! यह भाग्य का दुर्योधन ने एक नहा सुनी । महात्मा विदुर सर्वज्ञ ही टोप ह । हे सञ्जय | मुझे यह सब पिपरान ही है । उहाने इस विरोध का फल पहले ही से दिव्य जान पडता ह । अहो । ऐसी दुर्नय मेना भी युद्ध ज्ञान शक्ति से देव पिया था। उन्होने जो कुछ म पाण्डगो का नहीं मार समा॥२०१२२।। अवश्य कहा था, वहा हो रहा ह, अथवा विधाता ने ही यह हा पाण्डगो का ओर से देवता आकर युद्ध कर लिख ग्वावा था । यह होनी ही थी ।होनी को कान रहे है और मेरा मेना रा नष्ट कर रह ह । ह टाल मरता ह । विमाता ने जो पहले लिख रखा सञ्जय महा मा विदुर ने नि य मुझमे हित का ह वह अपश्य होगा ॥२३॥२६॥ भीष्मपर का निहत्तरवा अध्याय समाप्त हुआ || ७६ ॥ अथ सप्तसप्ततितमोऽध्याय ॥ ७७ ।। आत्मदोपात्त्वया राजन्प्राप्तं व्यसनमीदृशम् । नहि दुर्योधनस्तानि पश्यते भरतर्षभ यानि त्वं दृष्ट्वान्राजन्धर्मसङ्करकारिते तब दोपात्पुरा वृत्तं द्यूतमेव विशाम्पते तव दोषेण युद्धं च प्रवृत्तं सह पाण्डवैः त्वमेवाऽद्य फलं मुंव कृत्वा किल्विषमात्मना ॥ ३ ॥ आत्मनैव कृतं कर्म आत्मनैवोपभुज्यते इह च प्रेत्य वा राजंस्त्वया प्राप्तं यथातथम् ॥ ४ ॥ सतहत्तरवॉ अध्याय || ७७ ॥ सञ्जय ने कहा---हे महाराज आप हा इसमें अधिक दोपी है । पहले आपके ही हा दोष से ऐसे दु ख आर सङ्कट मे पडे हैं । आप दोष से जुए की गाडा हुई ओर आपके ही दोष मे धर्मसकर की जिन बातो को जानते थे उनका ज्ञान युद्ध हुआ । इसलिए अब अपनी भूल का परिणाम दुर्योधन को नहीं था। इस कारण दुर्योधन की अपेक्षा | भोगिए । लोग अपने क्यि का पल इस रोया सञ्जय उवाच- । आप अपने । ।
४३६८ ] म हा भा र त [ भीमपर्व तम्माद्राजस्थिरो भूत्वा प्राप्येदं व्यसनं महत्। शृणु युद्धं यथा वृत्तं शंसतो मे नराधिप भीमसेनः सुनिशितैर्वाणैर्भित्वा महाचमूम् आससाद ततो वीरः सर्वान्दुर्योधनानुजान् ॥ ६ ॥ दुःशासनं दुर्विषहं दुःसहं दुर्मदं जयम् जयत्सेनं विकर्ण च चित्रसेनं सुदर्शनम् चारुमित्रं सुवर्माणं दुष्कर्णं कर्णमेव च एतांश्चाऽन्यांश्च सुबहून्समीपस्थान्महारथान् ॥ ८ ॥ धार्तराष्ट्रान्सुसंक्रुद्धान्दृष्ट्वा भीमो महारथः भीष्मेण समरे गुप्तां प्रविवेश महाचमूम् अथाऽऽलोक्य प्रविष्टं तमूचुस्ते सर्व एव तु जीवग्राहं निगृहीमो वयमेनं नराधिपाः ॥ १० ॥ स तैः परिवृतः पार्थो भ्रातृभिः कृतनिश्चयैः । प्रजासंहरणे सूर्यः क्रूरैरिव महाग्रहैः सम्प्राप्य मध्यं सैन्यस्य न भीः पाण्डवमाविशत् । यथा देवासुरे युद्धे महेन्द्रं प्राप्य दानवान् ॥ १२ ॥ ततः शतसहस्त्राणि रथिनां सर्वशः प्रभो उद्यतानि शरैस्तीस्तमेकं परिवबिरे ॥ १३ ॥ परलोक में अवश्य भोगते हे । सो आपको यह फल कर भामसेन को जारित ही पकड लेग॥१०॥ दुर्यो- ठीक ही मिग ह ॥१५|| अब आप इस सङ्कट का, धन के भाइयों ने यह निश्चय करके भीमसन को भीमसेन आदि से अपने पक्ष के युद्ध का, वृत्तान्त चारों ओर से घेर लिया । उस समय महावीर भीमसेन मुनिए । महापराक्रमी भीमसेन ने तीक्ष्ण बाणों से मे र महाग्रहा से घिरे हुए सूर्य के समान भीष्म के द्वारा सुरक्षिन मेना के न्यूह को तोड डाला। जान पडे । भीममन व्यूह के भीतर जा करके, देवा- उन्होंने उमके भीतर प्रवेश करके दु गासन, दुपिपह, सुर मग्राम में दानों के मामने महेन्द्र के समान, द मह, दुर्मट, जय, जयमन, विकर्ण, चित्रमेन, निर्भय भार मे ग्वडे हो गये | अब शस्त्रो के युद्ध में मुदीन, चार मित्र, सुवर्मा, दुष्कर्ण, वर्णआदि दुयोधन । निपुण महम्रो रथी श्रेष्ट अस्त्र-शस्त्र उठाकर भीमसेन के भाइयों आर बहन मे महारथियो को देवा । भीम- को, चारों ओर से घेरकर मारने को उद्यत हुए । मेन मिहनाद करत हुए उनके पास पहुँचे ॥५॥१॥ भीममन भी आपके पुत्रो की कुछ अपेक्षा न करके भीममन को देखकर द शामन आदि और आपम मे | कौरस सेना के हाथिया, घोड़ो, रथों आर उनके यान लगे कि भाइयो ! इम ममय हम मर मिर. । मगारों को मारने तथा तोड़ने लंगे । भीमसेन उधर प्रग्यकाल - अध्याय ७७ ] म हा भा र त [४३६० awara । स तेषां प्रवरान्योधान्हस्त्यश्वरथसादिनः जघान समरे शूरो धार्तराष्ट्रानचिन्तयन् ॥ १४ ॥ तेषां व्यवसितं ज्ञात्वा भीमसेनो जिघृक्षताम् । समस्तानां वधे राजन्मर्ति चक्रे महामनाः ॥ १५ ॥ ततो रथं समुत्सृज्य गदामादाय पाण्डवः जधान धार्तराष्ट्राणां तं वलौघं महार्णवम् भीमसेने प्रविष्टे तु धृष्टद्युम्नोऽपि पार्षतः द्रोणमृत्सृज्य तरसा प्रययौ यत्र सौवलः निवार्य महतीं सेनां तावकानां नरर्पभः आससाद रथं शून्यं भीमसेनस्य संयुगे ॥१८॥ दृष्ट्वा विशोकं समरे भीमसेनस्य सारथिम् धृष्टद्युम्नो महाराज दुर्मना गतचेतनः अपृच्छद्वाप्पसंरुद्धो निःश्वसन्वाचमीरयन् मम प्राणैः प्रियतमः क्व भीम इति दुःखितः ॥ २० ॥ विशोकस्तमुवाचेदं धृष्टद्युम्नं कृताञ्जलिः संस्थाप्य मामिह वली पाण्डवेयः पराक्रमी ॥ २१ ॥ प्रविष्टो धार्तराष्ट्राणामेतद्वलमहार्णवम् मामुक्त्वा पुरुपव्याघ्रः प्रीनियुक्तमिदं वचः ॥ २२॥ प्रतिपालय मां सूतनियम्याऽश्वान्मुहूर्तकम् । यावदेतानिहन्म्यद्य य इमे मद्धोद्यताः ॥ २३ ॥ कौरवसेना के प्रधान प्रधान पुस्पा को मार रहे थे, इधर आपसी महती सेना को छिन्न भिन्न करके मार्ग को आपके पुन उन्हें घेरकर जीता ही पडने की चष्टा निष्कण्टर बनाते हुए धृष्टद्युम्न भीमसेन के रिक्त रथ करने लगे । उनके अभिप्राय को जानकर पली भीम के पास जा पहुँचे । व्याकुल आर अचेत-मे धृष्टद्युम्न सेन ने उनको मारने का विचार किया ॥११॥१५॥ के नेत्रों मे आँसू भर आये। वे श्वास लेते हुए बडा तर वे रथ से उतरकर गढा हाथ में लेकर अकेले ! व्याकुलता के साथ दुषित भाव से सारथी से पूछने ही दुर्योधन की अपार सेना को चापट करने लंगे। लगे—मेरे प्राणो मे भी प्यारे भीममेन वहाँ हैं । इस प्रकार जर महागीर भीमसेन कारस सेना में प्रवेश ॥१६॥२०॥ भीमसेन के सारथी विशोकने हाथ जोड हो गय तर धृष्टद्युम्न, द्राणाचार्य से युद्ध करना छोड- कर धृष्टद्युम्न से कहा- महारली भीमसेन मुझे यहाँ कर, भीमसन के पास पहुँचने का चेष्टा करने लगे। लोडकर अफले ही काग्र-मेना के भीतर प्रवेश कर -- ४३७० ] म हा भारत [ भीष्मपर्य - ततो दृष्ट्वा प्रधावन्तं गदाहस्तं महावलम् सर्वेपामेव सैन्यानां संहर्पः समजायत •॥२४॥ तस्मिन्सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयानके भित्वा राजन्महाव्यूह प्रविवेश वृकोदरः ॥ २५॥ विशोकस्य वचः श्रुत्वा धृष्टद्युम्नोऽथ पार्पतः । प्रत्युवाच ततः सूतं रणमध्ये महाबलः ॥ २६॥ न हि मे जीवितेनाऽपि विद्यतेऽय प्रयोजनम् । भीमसेनं रणे हित्वा स्नेहमुत्सृज्य पाण्डवः ॥ २७ ॥ यदि यामि विना भीमं किं मां क्षत्रं वदिष्यति । एकायनगते भीमे मयि चाऽवस्थिते युधि ॥२८॥ अस्वस्ति तस्य कुर्वन्ति देवाः शक्रपुरोगमाः । यः सहायान्परित्यज्य स्वस्तिमानाबजेद गृहम् ॥ २९ ॥ मम भीमः सखा चैव सम्बन्धी च महाबलः । भक्तोऽस्मान्भक्तिमांश्चाऽहं तमप्यरिनिपूदनम् ॥ ३० ॥ सोऽहं तत्र गमिप्यामि यत्र यातो कोदरः । निघ्नन्तं मां रिपून्पश्य दानवानिव वासवम् ॥ ३१ ॥ एवमुक्त्वा ततो वीरो ययौ मध्येन भारत भीमसेनस्य मार्गेपु गदाप्रमथितैर्गः ॥ ३२ ॥ गये हैं। हे पुरुपमिह ! वे जाते समय मुझसे कह । किसी प्रकार भी जीवित नहीं रह सकता । यदि मै गये है कि हे भूत ! 'कारवगण मुझ मारन या पकडन भीममेन को यो शत्रुओं के मध्य अकेला छोड़कर को प्रस्तुत । जब तक मैं उन्हें मारका यहाँ लोट चला जाऊगा तो सब क्षत्रिय मुझे क्या कहेंगे ! न आऊँ नय तक घोड़ो को रोककर तुम यहाँ ठहरो।' ॥२६॥२८॥ जो व्यक्ति अपने सहायक को छोडकर ॥२१॥२३॥ हे राजकुमार ! व मुझसे यो कहकर आप निर्विन अग्ने घर चला जाता है उसका इन्द्र गदा लेकर शनुसेना में प्रवेश कर गये । उन्हें देखकर आदि देवता अनिष्ट करते है। भीगमेन मरे मग्या, मत्रमेना प्रसन्नता से कोलाहल करने लगी | भयानक मम्बन्धी और भक्त हैं । मै भी मनुनागन भीममेन युद्ध करते हुए आपके मया भीममेन महा यह का अयन्त अनुगत भक्त हू । चाहे जो हो, मै इम को तोडकर भीतर प्रवेश कर गये है ॥२४॥२६॥ ममय वहीं जाऊगा जहाँ भीमसेन गये हैं | हे मृन! भीममेन के मारथी विशोक के ये वचन सुनकर जमे इन्द्र दानों को मारते हैं वैसे ही मैं शत्रुओं को धृष्टद्युम ने फिर कहा--हे मृत : ग्ण में भीममन नष्ट करेंगा ॥२९॥३१॥ हे महाराज ! जिम मार्ग को अफेले छोड़कर, पाण्टयो का नह त्यागकर, मैं से भीममेन गटाबहार के द्वारा गजसेना को नष्ट करते : । .
अव्याय ७७ ] म हा भारत { ४३७१ । - स ददर्श तदा भीमं दहन्तं रिपुवाहिनीम् वातो वृक्षानिव वलात्प्रभञ्जन्तं रणे रिपून् ॥ ३३ ॥ ते वध्यमानाः समरे रथिनः सादिनस्तथा पादाता दन्तिनश्चैव चक्रुरातखरं महत् ॥ ३४ ॥ हाहाकारश्च सञ्जज्ञे तव सैन्यम्य मारिप वध्यतो भीमसेनेन कृतिना चित्रयोधिना ॥३५॥ ततः कृतास्त्रास्ते सर्वे परिवार्य वृकोदरम् अभीताः समवर्तन्त शस्त्रदृष्टया परन्तप ॥३६॥ अभिद्रुतं शस्त्रभृतां वरिष्टं समन्ततः पाण्डवं लोकवीरः । सैन्येन घोरेण सुसंहितेन दृष्ट्वा बली पार्वतो भीमसेनम् ॥ ३७॥ अथोपगच्छच्छरविक्षताङ्गं पदातिनं क्रोधवियं वमन्तम् । आश्वासयन्पार्पतो भीमसेनं गदाहस्तं कालमिवाऽन्तकाले ॥ ३८ ॥ विशल्यमेनं च चकार तूर्णमारोपयच्चाऽऽत्मरथे महात्मा । भृशं परिष्वज्य च भीमसेनमाश्वासयामाम स शत्रुमध्ये ॥ ३९ ।। भ्रातृनथोपेत्य तवाऽपि पुत्रस्तम्भिान्विमर्दै महानि प्रवृत्ते । अयं दुरात्मा द्रुपदस्य पुत्रः समागतो भीमसेनेन सार्धं ॥ १० ॥ तं याम सवें महता बलेन मावो रिपुः प्रार्थयतामनीकम् । श्रुत्वा तु वाक्यं तममृष्यमाणाज्येप्टानया नोदिना धार्तराष्ट्राः॥ २१ ॥ हुए गये थे उसी मार्ग मे महावीर शृष्टद्युम्न अनुमना निपुण भीमगन के ऊपर आनमण र । था। म घुमकर भाममन के पास पहुंचे। वहाँ जाकर यह देगका महापर्ग भृष्टयम न बाणो मे क्षत-विक्षत, उन्होंने देगा कि महावीर भीगमन गगना को पदल, अने, ग्रोप-विध उगते हुए, प्रलयगल में और मर रानाओ को गढा को प्रहार में मार-मारकर दण्डपाणि यमगज के ममान, गढा श में दिये वृक्षा यी भान्ति गिग गई है । स्था, धुदनगर, भामनन को आयाम दिया ||३६३८|| पृष्टयान ने हाधियों के मार, पंदल, नाई और हाथी मनी पर जाकर नामंगन को अपने ग्य पर चदा ग्यिा निजयुद्ध के यग्नोर भीमन की गहा के भयदा और अलो प्रशार गरें मेम्गार उनके घावों की प्रमअयन पाटिन र आनगदमाग। नांदा दर यो । उनी समय प्काएक गजा टुयोधन मोरमना मार मन गया ॥३२॥३॥ ने अमर आने भयो म कहा- कानी! उस अग्विाभिमाद नगग भामगन या नागे पर दुगना दम भीममेन के पाम महायता करने और निर्भपार में.मरवण यामा पहन गया। आओ. हम मा बटन मा मना गोगे । इस प्रकार नागना पर गुर. मारेकर इन दोनों को माग्न या यन करें।
५३७२ ]
म हा भारत
। भीष्मपर्व
वधाय निप्पेतुरुदायुधास्ते युगक्षये केतवो यद्वदुग्राः
प्रगृह्य चाऽन्त्राणि धनंपिवीराज्यां नेमिघोपेः प्रविकम्पयन्तः॥ ४२ ॥
शरेरवपन्द्रुपदस्य पुत्रं यथाऽम्बुदा भूधरं वारिजालेः
निहत्य तांश्चाऽपि शरैः सुतीक्ष्णैर्न विव्यथे समरे चित्रयोधी॥ १३ ॥
समभ्युदीणांश्च तवाऽऽत्मजांस्तथा निशम्य वीरानभितः स्थितारणे ।
जिघांसुरुमं द्रुपदात्मजो युवा प्रमोहनास्त्रं युयुजे महारथः॥ ४४ ॥
क्रुद्धो भृशं नव पुत्रेषु राजन्देत्येपु यद्वत्समरे महेन्द्रः
नतो व्यमुह्यन्त रणे नृवीराः प्रमोहनास्त्राहतवुद्धिसत्वाः ॥ १५ ॥
प्रदुद्रुवुः कुरवश्चैव सर्वे सवाजिनागाः सरथाः समन्तात्।
परीतकालानिय नष्टसंज्ञान्मोहोपेतांस्तव पुत्रान्निशम्य ॥४६॥
एतम्मिन्नेव काले तु द्रोणः शस्त्रभृतां वरः
द्रुपदं त्रिभिरासाय शरेविव्याध दारुणः ॥२७॥
सोऽतिविद्धस्ततो राजन्रणे द्रोणेन पार्थिवः
अपायाद द्रुपदो राजन्पूर्ववैग्मनुम्मरन्
जित्वा तु द्रुपदं द्रोणः गई दध्मो प्रतापवान् ।
तन्य गहन्वनं श्रुत्वा विमुः गर्वमोमकाः ॥१९॥
अथ श्राव तेजबी द्रोणः शत्रभृतां वरः
प्रमोहनाण रणे मोहितानात्मजांम्तव
।
:
॥१८॥
॥ ५०॥
1110७ ] म हा मारत । ततो द्रोणो महाराज त्वरितोऽभ्याययौ रणात् । तत्राऽपश्यन्महे श्वासो भारद्वाजः प्रतापवान् ॥ ५१ ॥ धृष्टद्युम्नं च भीमं च विचरन्तौ महारणे मोहाविष्टांश्च ते पुत्रानपश्यत्स महारथः ॥ ५२॥ ततः प्रज्ञास्त्रमादाय मोहनास्त्रं व्यनाशयत् अथ प्रत्यागतप्राणास्तव पुत्रा महारथाः पुनयुद्धाय समरे प्रययुीमपार्वती ततो युधिष्ठिरः प्राह समाहूय स्वसैनिकान् ॥ ५४॥ गच्छन्तु पदवीं शक्त्या भीमपार्पतयोयुधि सौभद्रप्रमुखा बीरा रथा द्वादश दंशिताः ॥ ५५॥ प्रवृत्तिमधिगच्छन्तु नहि शुद्धयति मे मनः त एवं समनुज्ञाताः शूरा विक्रान्तयोधिनः बाढमित्येवमुक्त्वा तु सर्वे पुरुषमानिनः मध्यन्दिनगते सूर्ये प्रययुः सर्व एव हि केकया द्रौपदेयाश्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् अभिमन्युं पुरस्कृत्य महत्या सेनया वृताः ते कृत्वा समरे व्यूह सूचीमुखमरिन्दमाः विभिदुर्धार्तराष्ट्राणां तद्रथानीकमावे ॥ ५९॥ सब सोमरुगण बहुत ही भयभीत हो गये। । श्रेष्ठ अब दुर्योधन आदि महारथी फिर सचेत होकर जय योद्धा भीमसेन अमृत तुल्य जल पीकर, विश्राम करो, की इच्छा स भीमसेन और धृष्टद्युम्न के साथ युद्ध स्वस्थ हुए। ये फिर प्रस्तुत होकर धृष्टद्युम्न के दाम करने लगे १५०१५४॥ हे भारत ! यमराज युधिष्ठिर युद्धभूमि में आये और शत्रुसेना को नष्ट करने लगे।] ने अपन सेनिको को बुधकर कहा-है वीरो ! तुम ॥१७४९॥ उधर द्रोणाचार्य ने जब सुना कि धृष्टद्युम्न लोग गीघ्र धृष्टद्युम्न ओर भीममेन के पास जाओ। ने सम्मोहन अस्त्र के द्वारा दुर्योधन आदि आपके अभिमन्यु आदि बारह वीर रथी जागर शीघ्र ही पुत्रों को मोहित ओर अचेत कर दिया ह, तारे धृष्टद्युम्न ओर भीममेन की सूचना लाने । उनकी शीघ्रता के साथ उनके पास पहुँचे । वहाँ पहुँचकर कुछ मृचना न पाने से मेरा चित्त व्याकुल हो रहा होणचार्य ने देखा कि धृष्टद्युम्न आर भीमसेन युद्धभूमि । हे ।।५४१५६॥ धर्मराज की यह आज्ञा पाकर, अपने में सेना का सहार कर रहे है और आपके सर पुत्र पारुप का अभिमान रखनेगर, ये सब योद्धा ठीक मूछित हो रहे हैं। ता आचार्य ने प्रज्ञास्त्र का मध्याह्न के ममय भीममेन और धृष्टद्युम्न के पास प्रयोग करके सम्मोहनास्त्र को शान्त कर दिया । । चले । अभिमन्यु को आगे करके, बहुत सी सेना ४३७४ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व - तान्प्रयातान्महेप्वासानभिमन्युपुरोगमान् भीमसेनभयाविष्टा धृष्टद्युम्नविमोहिता न संवारयितुं शक्ता तव सेना जनाधिप मदमूर्छान्वितात्मा वै प्रमदेवाऽध्वनि स्थिता ॥ ६१ ॥ तेऽभिजाता महेष्वासाः सुवर्णविकृतध्वजाः । परीप्सन्तोऽभ्यधावन्त धृष्टद्युम्नवृकोदरौ ॥ ६२॥ तौ च दृष्ट्वा महेष्वासावभिमन्युपुरोगमान् बभूवतुर्मुदा युक्तौ निघ्नन्तौ तव वाहिनीम् ॥ ६३ ॥ दृष्ट्वा तु सहसा यान्तं पाश्चाल्यो गुरुमात्मनः । नाऽशंसत वधं वीरः पुत्राणां तव भारत ततो रथं समारोप्य कैकेयस्य वृकोदरम् अभ्यधावत्सुसंक्रुद्धो द्रोणमिष्वस्त्रपारगम् ॥६५॥ तस्याऽभिपततस्तूर्णं भारद्वाजः प्रतापवान् कुद्धश्चिच्छेद वाणेन धनुः शत्रुनिवर्हणः अन्यांश्च शतशो वाणान्प्रेषयामास पार्पते दुर्योधनहितार्थाय भर्तृपिण्डमनुस्मरन् ॥६७॥ अथाऽन्यनुरादाय पार्पतः परवीरहा द्रोणं विव्याध विंशत्या रुक्मपुङ्खः शिलाशितैः ॥ ६८ ॥ माथ लेकर, कैकेयराज, धृष्टकेतु और द्रौपदी के पाँचो वीरो को आते देखकर भीममेन और धृष्टद्युम्न भी बहुत पुत्र शत्रुमेना की ओर चले ॥५६:५८|| मूचीब्यह प्रसन्न हुए ॥६२।६३॥ धृष्टद्युम्न ने जब द्रोणाचार्य के आकार मे मेना ले चलकर उन वीरो ने कारयो को आते देगा तब आपके पुत्रों को मारने की इच्छा की रथ-मेना को छिन्न-भिन्न करना आरम्भ किया । लोड दी । हमके अनन्तर भीममेन को शीघ्र कैकेय- भीममेन के भय से व्याकुल ओर धृष्टद्युम्न के बाणों गज के रथ पर विटाकर वे अपने गुरु, धनुर्विद्या- पादित आपकी मना अभिमन्यु आदि महारथियों की विशारद, द्रोणाचार्य मे युद्ध करने चले ||६४॥६५॥ गह को नहीं रोक मका। नशा पिये हुए अचेत प्रतापी द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न को क्रोध से व्याकुल खो की नाह कुरुपक्ष के मैनिक राह में गई थे होकर अपनी ओर आते दंग एक बाण में उनका ॥५९/६१॥ मुर्णिमण्टित धनाओ मे ग्रोभायमान : धनुष काट डाला । दुर्योधन के हित के लिए, प्रभु रयों पर मार महायनुर्दर अभिमन्यु आदि शंगण, के ऋण से छुटकारा के लिए, द्रोणाचार्य जी मत्रमेना को नष्ट करते हुए, भीमगेन और धृष्टद्युम्न धृष्टद्युम्न के उपर नकदी बाण बरमाने लगे ॥६६॥ को और गीता मे बने मंग। अभिमन्यु आदि ६७|| गमीग्नागन धृष्टद्युम ने दूसरा धनुप लेकर अध्याय ७८ । म हा भारत { ४३७५ - - - तस्य द्रोणः पुनश्चापं चिच्छेदाऽमित्रकर्शनः हयांश्च चतुरस्तूर्ण चतुर्भिः सायकोत्तमैः ॥६९॥ वैवस्वतक्षयं घोरं प्रेषयामास भारत सारथिं चाऽस्य भल्लेन प्रेषयामास मृत्यवे ॥ ७०॥ हताश्वात्स रथातूर्णमवप्लुत्य महारथः आरुरोह महावाहुरभिमन्योर्महारथम् ॥ ७१ ॥ ततः सरथनागाश्वा समकम्पत वाहिनी पश्यतो भीमसेनस्य पार्यतस्य च पश्यतः ॥७२॥ तत्प्रभग्नं चलं दृष्ट्वा द्रोणेनाऽमिततेजसा नाऽशक्नुवन्वारयितुं समस्तास्ते महारथाः ॥ ७३॥ वध्यप्नानं तु तत्सेन्यं द्रोणेन निशितैः शरैः व्यभ्रमत्तत्र तत्रैव क्षोभ्यमाण इवाऽर्णवः ॥७४॥ तथा दृष्ट्वा च तत्सैन्यं जहृपे तावकं वलम् दृष्ट्वाऽऽचार्य सुसंक्रुद्धं पतन्तं रिपुवाहिनीम् चुक्रुशुः सर्वतो योधाः साधु साध्विति भारत ॥७५॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मन पपर्वणि सकु युद्ध द्रोणपराक्रमे सप्तमप्ततितमोऽध्याय ॥ ७७ ॥ बीस तक्षिण सुवर्णपुर बाण द्रोणाचार्य को मारे । हुई । भीमसेन, धृष्टद्युम्न आदि देखते रहे; किन्तु सैनिको ट्रेणाचार्य ने फिर मेनापति धृष्टद्युम्न का धनुप काट को रोक नहीं सके ||७११७३।। महातेजस्वी द्रोणा- डाला । इसके पश्चात् चार बाण मारकर उन्होंने चार्य के तीक्ष्ण वाणों से मरती हुई यह सारी सेना, धृष्टद्युम्न के रथ के चारो घोडो को मार डाला । माथ । क्षोभ को प्राप्त समुद्र के समान, विचलित ओर ही एक भल्ल बाग से धृष्टद्युम्न के सारथी को मार भ्रान्त हो उठी । शत्रुसेना की यह दशा देखकर गिराया ॥६८/७०|| अब महावीर धृष्टद्युम्न स्फत्ति के आपके पक्ष के लोग बहुत प्रसन्न हुए । आचार्य द्रोण साथ उस रथ से उतरकर अभिमन्यु के उत्तम रथ पर को क्रुद्ध होकर शत्रुसेना का सहार करते देख कौर- सवार हो गये । हे कोरच ! उस समय द्रोणाचार्य के पक्ष के योद्धा लोग उन्हे साधुवाद देते हुए उनकी विक्ट वाणो के प्रहार से पाण्दन-सेना भाग बडो प्रशसा करने लगे ॥७४७५|| भीष्मपर्व का सतहत्तरवा अध्याय समाप्त हुआ ।। ७७ ॥ । अथ अष्टमप्ततितमोऽध्याय ॥ ७८ ॥ मञ्जय उगाच- ततो दुर्योधनो राजा मोहात्प्रत्यागतस्तदा शरवः पुनर्भीमं प्रत्यवारयदच्युतम् ।
४३७६ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व एकीभृतास्ततश्चैव तव पुत्रा महारथाः समेत्य समरे भीमं योधयामासुरुयताः भीमसेनोऽपि समरे सम्प्राप्य स्वरथं पुनः समारुह्य महावाहुर्ययो येन तवाऽऽत्मजः प्रगृह्य च महावेगं परासुकरणं दृढम् सजं शरासनं सङ्ख्ये शरैर्विव्याध ते सुतम् ॥ ४ ॥ ततो दुर्योधनो राजा भीमसेनं महावलम् नाराचेन सुतीक्ष्णेन भृशं मर्मण्यताडयत् सोऽतिविद्धो महेष्वासस्तव पुत्रेण धन्विना क्रोधसंरक्तनयनो वेगेनाऽऽक्षिप्य कार्मुकम् ॥ ६ ॥ दुर्योधनं त्रिभिर्वाणैर्वाह्वोरुरसि चाऽर्पयत् स तत्र शुशुभे राजा शिखरैगिरिराडिव तौ दृष्ट्वा समरे क्रुद्धौ विनिघ्नन्तौ परस्परम् दुर्योधनानुजाः सर्वे शूराः सन्त्यक्तजीविताः ॥ ८ ॥ संस्मृत्य मन्त्रितं पूर्व निग्रहे भीमकर्मणः निश्चयं परमं कृत्वा निग्रहीतुं प्रचक्रमुः तानापतत एवाऽऽजो भीमसेनो महाबलः प्रत्युद्ययौ महाराज गजः प्रतिगजानिव ॥ १० ॥ सञ्जय कहते है हे महाराज ! मोह दूर होने मारा । भीम के भयानक वाणों की गहरी चोट खाकर पर राजा दुर्योधन मंचन होकर फिर भीममन पर भी दुर्यो पन विचलित नहीं हुए, अचल पर्वत की भाति वाण बरमाने लगे । आपके सब पुत्र मिलकर भीमसेन अपने स्थान पर ही स्थित रहे ॥५॥७॥ अब भीमसेन मे युद्ध करने लगे ॥१॥२॥ महामन्त्री भीमसेन फिर ओर दुर्योधन को इस प्रकार परस्पर प्रहार करते अपने रथ पर बैठकर दुर्योधन के पाम आये । गनुओ देवकर दुर्योवन के सब छोटे भाई, पहले की सम्मति को मारनेवाला विचित्र दृढ़ यनुप लेकर, उम पर स्मरण करकं, भीममेन को जीते ही पकड़ने के लिए भीममेन बडे वेग के माय दयोवन के चागे और मे घेरने चले । वे लोग प्राणों की अपेक्षा अगों में नीण बाण माग्ने लंग ॥३॥४॥ वीर दुर्योधन त्यागकर चारो ओर मे भाम पर वाण बरमाने लगे । ने भी भाममन के मर्मस्थल में नाराच बाण माग । ||९|| उन वीरो को अपनी ओर आने देग्य भीममेन दृर्यो पन के प्रहार में अयन्न पीदिन होने पर महा भी, हाथियों के मामने गजराज की तरह, उन मत्रकी बाद भीगमन ने क्रोध में नेत्र लाल करके दो वाण और दौड़े । यसबी भीममन ने कुपित होकर आपके दयोधन की भुजाओं में और एक बाण यन स्थल में पुत्र चित्रमेन को एक दारण नाराच बाण मारा । हे टोरी चढाकर, अध्याय ७८ ] म हा भारत । । .. भृशं क्रुद्धश्च तेजस्वी नाराचेन समार्पयत् चित्रसेन महाराज तव पुत्रं महायशाः ॥ ११ ॥ तथेतरांस्तव सुतांस्ताडयामास भारत शरैर्वहुविधैः सङ्खये रुक्मपुङ्खैः सुतेजनैः ॥ १२ ॥ ततः संस्थाप्य समरे तान्यनीकानि सर्वशः अभिमन्युप्रभृतयस्ते द्वादश महारथाः ॥ १३ ॥ प्रेपिता धर्मराजेन भीमसेनपदानुगाः प्रतिजग्मुर्महाराज तव पुत्रान्महावलान् ॥ ११ ॥ दृष्ट्वा रथस्थांस्ताञ्शृरान्सूर्याग्निसमतेजसः सर्वानेव महेप्वासान्भ्राजमानाश्रिया वृतान् ॥ १५ ॥ महाहवे दीप्यमानान्सुवर्णमुकुटोज्ज्वलान् तत्यजुः समरे भीमं तव पुत्रा महाबलाः ॥ १६ ॥ तान्नाऽमृप्यत कौन्तेयो जीवमाना गता इति । अन्वीय च पुनः सर्वास्तव पुत्रानपीडयत् ॥ १७॥ अथाऽभिमन्युं समरे भीमसेनेन सङ्गतम् पार्पतेन च सम्प्रेक्ष्य तव सैन्ये महारथाः ॥ १८ ॥ दुर्योधनप्रभृतयः प्रगृहीतशरासनाः भृशम श्वैः प्रजवितैः प्रययुर्यत्र ते रथाः ॥ १९ ॥ अपराह्ने महाराज प्रावर्तत महारणः तावकानां च बलिनां परेपां चेव भारत ॥ २० ॥ भारत! इसके अनन्तर आपके अन्यान्य पुत्रों को मम्पन्न, मुवर्ण के मुकुट धारण किये उन बीग को भी अनेक प्रकार के सुवर्णपुल तीक्ष्ण बाण मारे दया भीममेन को पकड़ने का विचार दाद दिया ॥२०॥१२॥ उम ममय राजा युधिष्ठिर के भेजे हुए ॥१३॥१६॥ महानी भीमसेन को छोड़कर आपके महाग्यी अभिमन्यु आदि बारहो महारथी वहाँ पहुँच पुत्र भाग गये । भीममन के लिए यह अमा हुआ गये । भीमगेन को इस प्रकार दुर्योधन के भाइयों के कि आपके पुत्र जान लेकर भाग ना मरे । भीममन मध्य घिति देगकर लोग आपके पुत्रों को रोकने पीला करक नाश्य वाणों में उन्हें पीड़ित करने लगे। और भीममेन को महायता पहुँचाने के दिए दौड़ । वीर शृष्टद्युम्न और भाममेन के माय महापराक्रमी हे गजेन्द्र : आपके पुत्रो ने ग्यां पर स्थित, मूर्य अभिमन्यु आरके पुत्रों का पीछा करते हुए उन्हें तीक्ष्ण और अग्नि के तुल्य तेजबी, मूग, महानुद्धर, भी- याणा के प्रहार में पादित करने लगे। दुर्योधन आदि ४३७८ ] म हा भा र त [ भाप्मपर - - । अभिमन्युर्विकर्णस्य हयान्हत्वा महाहवे अथैन पञ्चविशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् ॥ २१ ॥ हताश्वं रथमुत्सृज्य विकर्णस्तु महारथः आरुरोह रथ राजंश्चित्रसेनस्य भारत ॥ २२ ॥ स्थितावेकरथे तौ तु भ्रातरौ कुलवर्धनौ आर्जुनि शरजालेन च्छादयामास भारत ॥ २३ ॥ चित्रसेनो पिकर्णश्च काणि पञ्चभिरायसे. विव्याध तेन चाऽकम्पत्काणिर्मरुरिव स्थित. ॥ २४ ॥ दु.शासनस्तु समरे केकयान्पञ्च मारिष योधयायास राजेन्द्र तदद्भुतमिवाऽभवत् द्रौपदेया रणे क्रुद्धा दुर्योधनमवारयन् शरैराशीविपाकार पुत्र तव विशाम्पते ॥ २६ ॥ पुत्रोऽपि तव दुर्धर्षो द्रौपद्यास्तनयारणे सायकैर्निशितै राजन्नाजघान पृथक्पृथक् ॥ २७॥ तैश्चाऽपि निद्ध शुशुभे रुधिरेण समुक्षित गिरि. प्रस्त्रवणैर्यद्ववैरिकादिनिमिश्रित ॥ २८ ॥ भीमोऽपि समरे राजन्पाण्डवानामनीकिनीम् । कालयामास वलवान्पाल पशुगणानिन ॥ २९ ॥ चारगण धनुप कर स्फात्तशाग घाड़ा से युक्त रथा परत न ममान तनिक भा व्यथित नहा हुए । इधर पर चढकर, उन महारथिया के पास पहु7। हे क्म्य दा र पाँचा गनकुमारा से ट शामन अद्भुत राजद । निम समय कारवा आर पाण्टमा म यह युद्ध करन गे । द्वापदा र पुत्रा माघार युद्ध होने गा उम ममय दिन का तासरा दुर्योग्न का भयङ्कर पण मार ॥२॥२६॥ दुर्योधन पहर था ॥१७॥२०॥ महागार अभिमयु न विरण में चारा घाड़े मार बार आर पञ्चाम क्षुद्रम वाणा ग्प म घायर करने ग। द्वापदा पुत्रा के वाणा मे रट घायर किया। जिसण पहरे रथ का गडपर मग्नि भन्न आर रघिर से मन्नद्ध हारर दयों पन चित्रमन क पिचिन ग्थ पर मगार हए । एक हा गर व झरना म गाभित परत न ममान दग्व पड़ने ग्य पर उस दाना भाया का रखर अभिमन्यु न गे॥२७॥२८॥ उपर प्रतापा भीष्म पितामह, पशुआ माय पाणों म उह दर प्रिया ॥१.२३|| नर का पशुपार व तरह पाण्यमना का मारन आर दनय आर विश्ण न हमर पार वाण अभिम यु भगान ग । उम समय सेना के दक्षिण भाग में या -ना में मारे, चिन्नु महापार अभिमन्यु मुमेर शत्रुमन अजुन गाण्डीर धनुष का शब्द सुन क्रुद्ध होकर भा नम्ण वाणा म उनम स हर एक का भयानर ~ अध्याय ७० म हा भारत [ ४३७० । ततो गाण्डीवनिर्घोषः प्रादुरासीद्विशाम्पते दक्षिणेन वरूथिन्याः पार्थस्याऽरीन्धिनिघ्नतः ॥ ३० ॥ उत्तस्थुः समरे तत्र कवन्धानि समन्ततः कुरूणां चैव सैन्येपु पाण्डवानां च भारत ॥ ३१ ॥ शोणितोदं शरावर्त गजद्वीपं हयोर्मिणम् रथनौभिर्नरव्याघ्राः प्रतेरुः सेन्यसागरम् ॥ ३२ ॥ छिन्नहस्ता विकवचा विदेहाश्च नरोत्तमाः दृश्यन्ते पतितास्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३३ ॥ निहतैमत्तमातङ्गैः शोणितौघपरिप्लुतैः भूर्भाति भरतश्रेष्ठ पर्वतराचिता यथा ॥ ३४ ॥ तत्राऽद्भुतमपश्याम तव तेषां च भारत न तत्राऽऽसीरपुमान्कश्चिद्योयुद्धं नाऽभिकांक्षति ॥ ३५ एवं युयुधिरे वीराः प्रार्थयाना महद्यशः तावकाः पाण्डवैः सार्धमाकांक्षन्तो जयं युधि ॥ ३६ ॥ इति श्रा महाभारते भाप्मपर्वणि भाष्मा पर्वणि सड्कुल्युद्ध अष्टसप्ततितमोऽध्याय ॥ ७८ ॥ पडने लगा । युद्धभूमि के मध्य कारपो आर पाण्टयो आदि अग और काचशून्य शरीर इधर-उधर पडे की सेना मे हजारो शूरचार पुस्पो के कवन्ध उठ हुए थे | रक्त से सन्नद्ध हजारो मस्त हाथियो के उठकर युद्ध करने लग। योद्धा लोग रथरूप नासाओ शरारो के ढेर लगे हुए थे, जिनसे समरभूमि पर्वत- पर चढकर उस अपार मेन्यसागर के पार जाने की मयो सी जान पडती थी । यह अद्भुत दृश्य दिसाई चेष्टा कर रहे थे । सग्राम में मारे गये मनुष्य, हाथी, पड रहा था कि दोना और कोई भी सनिक युद्ध से घोडे आदि का रक्त उसमे जल के समान भरा हुआ विमुख होना नहीं चाहता था। हे महाराज | आपके था । असख्य बाण भैनर के समान देग्य पड़ने थे। पक्ष के योद्धा लोग जय और या प्राप्त करने की घोडो की गति तरङ्गी मी समता कर रही थी। इच्छा से, जीवन का मोह त्यागकर, पाण्डवों से युद्ध हाथिया के शरीर टापू ऐसे उतरा रहे थ ॥२९॥३२॥ कर रहे थे ॥३३१३६॥ युद्ध भूमि में हजागे पीरो के कटे हुए सिर, हाथ भाप्मपर्व का अठहत्तरला अध्याय ममाप्त हुआ ।। ७८ ॥ अथ ऊनाशीतितमोऽध्याय ॥ ७९ ॥ सञ्जय उवाच-ततो दुर्योधनो राजा लोहितायति भास्करे संग्रामरभसो भीमं हन्तुकामोऽभ्यधावत ४३८० ] म हा भारत [ भीष्मपर्व । - -- तमायान्तमभिप्रेक्ष्य नृवीरं दृढवैरिणम् भीमसेनः सुसंक्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् अयं स कालः सम्प्राप्तो वर्षपूगाभिवाञ्छितः । अद्य त्वां निहनिष्यामि यदि नोत्सृजसे रणम् ॥ ३ ॥ अद्य कुन्त्याः परिक्लेशं वनवासं च कृत्स्नशः द्रौपद्याश्च परिक्लेशं प्रणेष्यामि हते त्वयि ॥ ४ ॥ यत्पुरा मत्सरी भृत्वा पाण्डवानवमन्यसे तस्य पापस्य गान्धारे पश्य व्यसनमागतम् कर्णस्य मतमास्थाय सौवलस्य च यत्पुरा अचिन्त्य पाण्डवान्कामाद्यथेष्टं कृतवानसि याचमानं च यन्मोहाहाशाहमवमन्यसे उलकस्य समादेशं यद्ददासि च हृष्टवत् तेन त्वां निहनिष्यामि सानुवन्धं सवान्धवम् । समीकरिप्ये तत्पापं यत्पुरा कृतवानसि एवमुक्त्वा धनुर्घोरं विकृप्योड्राम्य चाऽसकृत् । समाधत्त शरान्धोरान्महाशनिसमप्रभान् पविंशतिमसंक्रुद्धो मुमोचाऽऽशु सुयोधने ज्वलिताग्निशिखाकारान्वजकल्पानजिह्मगान् ॥१०॥ उन्नामीरा अध्याय ।। ७०. ।। मन्नय ने कहा है गजेन्द्र ! मूर्यदेव या दूर कामगा ॥१॥४॥ हे गान्धारी के पुत्र! पहले ईया विभ्व अन्नाचट के पास पहुंचकर लार रग का हो कोका होकर नुमने पाण्टयों का अपमान किया था, चा। उसी समय गजा दुर्योधन ने घोर युद्ध करके उमी पाप का परिणाम यह प्रागमाइट उपस्थित है। भीमगन को मार टान के छि भयानक आक्रमण वर्ण आर गनि की मम्मति मानकर, पाण्डो को किया। जाग या ग्न को आते दंगर युपित तुच्छ ममदा कर. तुम मनमाना अन्याय कर चुके हो। मगन ने मारा हैदयों ग्न : यदि तुम युन धारण जब मधि करिए गंय तर तुमने मोहम मासान नागेनी आनुमारित होकर उनमा अमान किया और फिर आने इन नसामे यातदिनी जिम गमर योगा उदराग अनेक यह बचन याला में। र पा. गडी गमा आगलागत नम पान यमका नुमने जो ये पाप वियह उन शान्त को माग जननी युनायो, यनाम कान करिए म यह नुमको. नुम्हार याधु-बाययों नगीना, मन का गाया को र अनुनगंयो मामा गा||५८॥ महागन!
अध्याय ७० ] म हा भा र त [१३८१ । । ततोऽस्य कार्मुकं द्वाभ्यां सूतं द्वाभ्यांच विव्यधे। चतुर्भिरश्वाञ्जवनाननयद्यमसादनम् ॥ ११ ॥ द्वाभ्यां च सुविकृष्टाभ्यां शराभ्यामरिमर्दनः । छत्रं चिच्छेद समरे राजस्तस्य नरोत्तम ॥ १२ ॥ पडभिश्च तस्य चिच्छेद ज्वलन्तं ध्वजमुत्तमम् । छित्वा तं च ननादोच्चस्तव पुत्रस्य पश्यतः ॥ १३ ॥ रथाच्च स ध्वजः श्रीमान्नानारत्नविभृपितात् । पपात सहसा भूमौ विद्युजलधरादिव ज्वलन्तं सूर्यसङ्काशं नागं मणिमयं शुभम् ध्वजं कुरुपतेच्छिन्नं ददृशुः सर्वपार्थिवाः ॥१५॥ अथैनं दशभिर्वाणैस्तोत्रैग्वि महाद्विपम् आजघान रणे वीरं म्मयन्निव महारथः ॥ १६ ॥ ततः म राजा सिन्धूनां रथश्रेष्ठो महारथः दुर्योधनस्य जग्राह पाणि सत्पुरुपैर्वृतः ॥१७॥ कृपश्च रथिनां श्रेष्ठः कौरव्यममितोजसम् आरोपयद्रथं राजन्दुर्योधनममर्पणम् ॥१८॥ स गाढविद्धो व्यथितो भीमसेनेन संयुगे निपसाट रथोपस्थे राजन्दुर्योधनस्तदा ॥ १९ ॥ परिवार्य ततो भीमं जेतुकामो जयद्रथः रथैरनेकसाहनेभीमस्याऽवारयहिशः ॥ २०॥ अब भीममेन ने प्रचण्ड अनुप चढाया। उम पनुप निर्ग चमकना है, रमे ही दो रन क पिपिप गा- को बारम्बार घुमाते हुए भीमसेन ने पतुल्य, चम भूपित ग्य में सुन्दर घना गिर पटा । मर गनाओ कील, अग्निशिया के ममान ठव्याम वाण दुयापन , ने आचर्य के माथ देगा कि कुरराज की यह मर्य को मारे ॥१०॥पिर दो वाणी से दयापन साधनुप के ममान प्रभा-पूर्ण, मणिमय, ममुग्ज्य नागचिरयुक्त काटकर दोबाण उनकमारथी को मार । चार घणा धना गिर पड़ा ॥११॥१५॥ अा भीममेन ने हनकर, में दिया घोड़ो को मार डाग, दो बणों में ऊपर ! गगन में मन्ना पर असुगप्रहार की तरह, कुम्गज का कत्र काट डाग आर छ याणो मे ऊँची पना तो दम नाण मारे । तर महारथी मिन्धुरान जयद्रय, स्ट निगः । अद्भुत म्फत्ति के माथ ये कार्य के प्रयान प्रगन चोरी के माथ, आकार दुर्योधन के भीममेन चे बाम गरनने लगे । अमे मेर में | पार्श्वदेश र रक्षा करने लगे । इमी ममय महारया -- ४३८२ ] म हा भारत [ भागमपर्व । । - धृष्टकेतुस्ततो राजन्नभिमन्युश्च वीर्यवान् केकया द्रौपदेयाश्च तव पुत्रानयोधयन् ॥ २१ ॥ चित्रसेनः सुचित्रश्च चित्राङ्गश्चित्रदर्शनः चारुचित्रः सुचारुश्च तथा नन्दोपनन्दको ॥ २२ ॥ अष्टावते महेष्वासाः सुकुमारा यशस्विनः अभिमन्युरथं राजन्समन्तात्पर्यवारयन् आजधान ततस्तूर्णमभिमन्युर्महामनाः एकैकं पञ्चभिर्वाणः शितैः सन्नतपर्वभिः ॥ २४ ॥ वज्रमृत्युप्रतीकाशैर्विचित्रायुधनिःसृतैः अमृप्यमाणास्ते सर्वे सौभद्रं रथसत्तमम् ॥ २५॥ वपुर्मार्गणैस्तीक्ष्णैर्गिरि मेरुमिवाऽम्बुदाः स पीड्यमानः समरे कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः ॥ २६ ॥ अभिमन्युर्महाराज तावकान्समकम्पयत् यथा देवासुरे युद्धे वज्रपाणिर्महासुरान् ॥२७॥ विकर्णस्य ततो भल्लान्प्रेषयामास भारत चतुर्दश रथश्रेप्टो घोरानाशीविपोपमान् ॥ २८॥ स तैर्विकर्णस्य रथात्पातयामास वीर्यवान् ध्वजं सूतं हयांश्चैव नृत्यमान इवाऽऽहवे ॥ २९ ॥ कृपाचार्य ने क्रोधी राजा दुर्योधन को, भीमसेन के | पाँच-पाच बाण इर एक योद्धा को मारे।।२२।२५॥ बाणो मे अयन्त आहन और पीडित देशकर, अपने । वे लोग अभिमन्यु के इस पराक्रम को न सह सकने रथ पर विया लिया ॥१६॥१८॥ राजा दुर्योधन रथ । के कारण, पर्वत पर जैमे मेघ जल बरसाते हैं वैसे के ऊपर अचेत-मे होकर बैठ गये। मिन्धुराज जयद्रथ | ही, अभिमन्यु के ऊपर तीक्ष्ण वाण बरसाने लगे । न भीममन को जानने के लिए हजारो रथों के मध्य युद्धनिपुण अभिभन्यु उनके वाणप्रहार से अन्यन्त में घेर पिया। उधर धृष्टकेतु, पराक्रमी अभिमन्यु, । पीडित होकर बहुन क्रुद्ध हो उठे । देवासुर-मग्राम संयगण और दोपदी के पाँचों पुत्रों ने आपकं पुत्रों में इन्द्र ने जैसे असुरो को पीड़ित किया था यमे ही म युम्न आरम्भ किया ॥११॥२१॥ तर चित्रमेन, । वे उन लोगो को पीड़ित करने लगे ॥२५॥२७॥ सुचित्र, चिराग, चित्रदर्शन, चारचित्र, सुचार, नन्द प्रधान ग्थी अभिमन्यु ने स्फत्ति के साथ विकर्ण के और उपनन्द, ये आगे आटो याम्बी पुत्र अभिमन्यु ऊपर मर्प-महश चौदह भल्ल वाण चलाकर उनके स्थ गुद्ध काग्न स्टंग । चार अभिमन्यु ने विचित्र धनुष यो घना काट डाली और सारथी तथा घोड़ी को मे निकल एज या मृत्यु के ममान मन्ननर ताण भी मार गिराया। इसके अनन्नर वे फिर पिरुण पर - । - अध्याय ७९ म हा भारत [ ४३८३ पुनश्चाऽन्याशरान्पीतानकुण्ठाग्राशिलाशितान्। प्रेषयामास संक्रुद्धो विकर्णाय महाबलः ॥ ३० ॥ ते विकर्ण समासाद्य कङ्कवहिणवाससः भित्या देहं गता भूमिं ज्वलन्त इव पन्नगाः ॥ ३१ ॥ ते शरा हेमपुङ्खाग्रा व्यदृश्यन्त महीतले विकर्णरुधिरक्लिन्ना वमन्त इव शोणितम् ॥ ३२ ॥ विकर्ण वीक्ष्य निभिन्नं तस्यैवाऽन्ये सहोदराः । अभ्यद्रवन्त समरे सौभद्रप्रमुखान्रथान् ॥ ३३ ॥ अभियात्वा तथैवाऽन्यान्रथांस्तान्सूर्यवर्चसः । अविध्यन्समरेऽन्योन्यं संरम्भाशुद्धदुर्मदाः दुर्मुखः श्रुतकर्माणं विध्वा सप्तभिराशुगैः ध्वजमेकेन चिच्छेद सारथिं चाऽस्य सप्तभिः ॥ ३५ ॥ अश्वााम्बूनदैर्जालेः प्रच्छन्नान्वातरंहसः जधान पड्भिरासाद्य सारथिं चाऽभ्यपातयत् ॥ ३६ ॥ स हताश्वे रथे तिष्ठश्रुतकर्मा महारथः शक्तिं चिक्षेप संक्रुद्धो महोल्का ज्वलितामिव ॥ ३७ ॥ सा दुर्मुखस्य विमलं वर्म भित्वा यशस्विनः विदार्य प्राविशद्भूमि दीप्यमाना स्वतेजसा ॥ ३८॥ तं दृष्ट्वा विरथं तत्र सुतसोमो महारथः पश्यतां सर्वसैन्यानां रथमारोपयत्स्वकम् ॥ ३९ ॥ नाक्ष्ण बाणों की वर्षा करने लगे। वे कङ्कपत्र-युक्त वीर एक दूसरे पर प्रहार करने लगे ॥३२॥३४॥ दर्मुस बाण उद्भ हुए नाग की भान्ति विकर्ण के शरीर को न श्रुतकमा को मान वाण मारे। फिर एक बाण से रथ फांडकर पृथ्वी मे प्रवेश हो गये ॥२८॥३१॥ ये की धजा काटकर सात बाणो से सारथी को मार मुवर्णपुङ्ख बाण विकर्ण के रक्त मे मनकर रक्त नमन डाला । इसके अनन्तर सुवर्ण की जाली मे ढके हुए, करते हुए-से जान पड़ने लगे। किर्ण के अन्य वायु के समान वेग से जानेवाले, घोडा को भी छ भाई उन्हें साद्धानिक रूप से घायल देखकर, उनका । वाणो मे मार डाला । महारथी श्रुतकर्मा ने निना रक्षा करने के लिए, अभिमन्यु आदि बारहो महा मारथी और विना घोडो के रथ पर म उन्का के रथियों की ओर दोड़े। इस प्रकार उन लोगो का समान प्रचलित एक भयानक यकि दुर्मुग्न के ऊपर परस्पर घोर सम्र होने लगा । युद्धपरायण दोनो ओर के । फेला ॥३५॥३७|| वह विकट शक्ति दुर्मुग्न का कवच ४३८४ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व - । । श्रुतकीर्तिस्तथा वीरो जयत्सेनं सुतं तव अभ्ययात्समरे राजन्हन्तुकामो यशस्विनम् ॥४०॥ तस्य विक्षिपतश्चापं श्रुतकीर्तेर्महास्वनम् चिच्छेद समरे तूर्णं जयत्सेनः सुतस्तव ॥४१॥ क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन प्रहसन्निव भारत तं दृष्ट्वा छिन्नधन्वानं शतानीकः सहोदरम् ॥ ४२ ॥ अभ्यपद्यत तेजस्वी सिंहवन्निनदन्मुहुः शतानीकस्तु समरे दृढं विस्फार्य कार्मुकम् ॥ ४३ ॥ विव्याध दशभिस्तूर्णं जयत्सेनं शिलीमुखैः । ननाद सुमहानादं प्रभिन्न इव वारणः ॥४४॥ अथाऽन्येन सुतीक्ष्णेन सर्वावरणभेदिना शतानीको जयत्सेनं विव्याध हृदये भृशम् ॥४५॥ तथा तस्मिन्वर्तमाने दुष्कर्णो भ्रातुरन्तिके चिच्छेद समरे चापं नाकुलेः क्रोधमूर्छितः ॥४६ ॥ अथाऽन्यद्धनुरादाय भारसाहमनुत्तमम् समादत्त शरान्घोराशतानीको महाबलः ॥४७॥ तिष्ट तिष्टेति चाऽऽमन्त्र्य दुष्कर्णं भ्रातुरग्रतः । मुमोचाऽस्मै शितान्वाणाज्वलितान्पन्नगानिव ॥ ४८ ॥ को तोडकर पृ"पी मे प्रवेश हो गई। श्रुतकर्मा को को तोडने वाले तीक्ष्ण बाण जय मेन की छाती मे रख- हीन देगकर महागली सुनमाम ने सब सेना के मारे ॥४१॥४५॥ इस प्रकार नकुल के पुत्र शता- मामन अपने रथ पर विटा ग्यिा। अब महागीर नीक ने जब जय सेन को पीडित किया तब दुष्कर्ण श्रुतकीर्ति आपमे पुत्र यशस्वी जयमेन को मारने ने क्रोध करके जय मेन के मामने ही शतानीक का के लिए उनकी और चले ॥३८१४०।। महापौर श्रुत- बाणमाहित धनुष काट डाला। अब महाबली शतानीक कीर्ति धनुप चढ़ाकर उन पर बाण वरसाने लगे। ने बोझ को सम्भालनेवाला अन्य श्रेष्ट लेकर उमा ममय आपके पुत्र जय मेन ने तीक्ष्ण क्षुरप्र दृश्वर्ण से "टहरो, टहरो" कहकर ऋद्ध सर्प के बाण में उनका धनुष काट डाग। शतानीक ने | समान भयङ्कर वाण बरमाना आरम्भ किया। उन्होंने अपने भाई का धनुष कटने देवकर जय मन पर एक बाण मे दुष्कर्म का धनुष काटकर दी बाणा आक्रमण किया। शतानीक ने तद धनुप रहाकार मे मारथी को मार डाला । इसके पश्चात् स्फूर्ति के जयमन को दम वाण मारे । फिर महावीर दशनानीक । साथ मात वाण दुषर्ण को मारे । इसी मध्य में चारह गजगन को भाति गानकर मा प्रकार के आवरणों तीक्ष्ण बाणों से उनके वायुगामी घोड़ों को मार डाला। वनुप अन्याय ७० म हा भारत [ ४३८५ . .. ततोऽस्य धनुरेकेन द्वाभ्यां सूतं च मारिष चिच्छेद समरे तूर्णं तं च विव्याध सप्तभिः ॥ १९ ॥ अश्वान्मनोजवांस्तस्य कर्बुरान्वातरंहसः जधान निशितैस्तूर्ण सर्वान्द्वादशभिः शरैः ॥ ५० ॥ अथाऽपरेण भल्लेन सुयुक्तेनाऽऽशुपातिना दुष्कर्णं सुदृढं क्रुद्धो विव्याध हृदये भृशम् ॥ ५१ ॥ स पपात ततो भूमौ वजाहत इव द्रुमः दुष्कर्णं व्यथितं दृष्ट्वा पञ्च राजन्महारथाः ॥ ५२ ॥ जिघांसन्तः शतानीकं सर्वतः पर्यवारयन् छायमानं शरवातैः शतानीकं यशस्विनम् ॥ ५३ ॥ अभ्यधावन्त संक्रुद्धाः केकयाः पञ्च सोदराः । तानभ्यापततः प्रेक्ष्य तव पुत्रा महारथाः ॥ ५५ ॥ प्रत्युद्ययुर्महाराज गजानिव महागजाः दुर्मुखो दुर्जयश्चैव तथा दुर्मर्पणो युवा शत्रुञ्जयः शत्रुसहः सर्वे क्रुद्धा यशस्विनः प्रत्युबाता महाराज केकयान्भ्रानरः समम् ॥ ५६ ॥ रथैर्नगरसङ्काशेर्हयैर्युक्तमनोजवैः नानावर्णविचित्राभिः पताकाभिरलंकृतेः ॥ ५७॥ वरचापधरा वीरा विचित्रकवचध्वजाः विविशुस्ते परं सेन्यं सिंहा इब बनादनम् शतानीक ने एक भल्ल याण ऐमा मारा कि निममें जुद आपके पानी पुत्र विचिन कवच धारणकर, धनुष दृफर्ण का हृदय फट गया । उम प्रहार मे वजाहत हाथ में लेकर, पिचित्र भूषणों में भूपित घोदी मे वृक्ष की तरह मरकर दुष्कर्ण पृथ्वी पर गिर पड़ । यु और पनाकाओ मे अमृत ग्यो पर बटकर, ॥४६॥५२॥ हे राजेन्द्र ! दृफर्ण को मृत्यु को देगकर कैकेय देश के राजकुमागे पर आक्रमण करने नले । दमुग, दुर्जय. दुर्मपण, अनुनय और अगह, ये महागन जमे मागतों पर अनमण करने के लिए आप पानों पुत्र शतानांक को मारने के दिए वाणो दौडन है, वैसे ही आपके पांचो गजकुमार चले। मिह का वर्ग करते हुए उनकी ओर दौड़े। उधर कैकेय जैम यन में प्रवेश करते है कम ही वे लोग शत्रुमेना के देश के गजकुमार पांचों भाई उन पांचों माहागंग भीतर प्रोस करने लंगादोनों ओर के मनिक यमराज मे युर करने दोई॥५२॥५६॥ या देयका अयन्न की नगर्ग को मृतकों में परिपूर्ण करनगला घोर 1 1 मा ४३८६ ] म हा भा र त । तेषां सुतुमुलं युद्धं व्यतिपक्तरथद्विपम् अवर्तत महारौद्रं निशतामितरेतरम् अन्योन्यागस्कृतां राजन्यमराष्ट्रविवर्धनम् मुहूर्तास्तमिते सूर्य चक्षुर्युद्धं सुदारुणम् ॥६०॥ रथिनः सादिनश्चाऽथ व्यकीर्यन्त सहस्रशः ततः शान्तनयः क्रुद्धः शरैः सन्नतपर्वभिः नाशयामास सेनां तां भीष्मस्तेपां महात्मनाम् । पञ्चालानां च सैन्यानि शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥ ६२ ।। एवं भित्वा महेप्वासः पाण्डवानामनीकिनी कृत्वाऽवहारं सैन्यानां ययौ स्वशिविरं नृप ॥ ६३ ॥ धर्मराजोऽपि सम्प्रेक्ष्य धृष्टद्युम्नवृकोदरौ मूर्ध्नि चैतावुपाघ्राय प्रहृष्टः शिविरं ययौ ॥ ६४ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मश्यपर्वणि पष्टदिवमावहार ऊनागातितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥ युद्ध करने लगे । वीर योद्धा एक दृमरे को मारने सेना को मारकर अपनी सेना को लौटा लिया। सब और प्रहार करने लगे । रथो मे रथो की, हाथिया लोग अपने शिविरो को लौट चले। इधर धृष्टद्युम्न से हाथियो की और घोडो मे घोड़ो की मुठभेड होने और भीमसेन भी कौरवो की सेना को नष्ट करके लगी ॥५७५१॥ उमा समय सूर्यनारायण अस्ताचल युधिष्ठिर के पास पहुचे । धर्मराज युधिष्टिर भी धृष्टद्युम्न पर पहुंच गये । रथी ओर घुड़मगार लोग कट कटकर आर भीममेन से मिलका, प्रेमपूर्वक उनका मस्तक गिर रहे थे । तब पितामह भीष्म ने क्रोच अवीर मॅघकर, अपने शिविर को लौट चले ||६०६४॥ होकर तीक्ष्ण वाणो से कैकेय और पाञ्चाल देश की भीष्मपर्व का उनामावा अध्याय ममाम हुआ ॥ ७९ ॥ , अथ अगानितमोऽ याय ॥ ८० ॥ मञ्जय उपाच-अथ शूरा महाराज परस्परकृतागसः जग्मुः स्वशिविराण्येव रुधिरेण समुक्षिताः विश्रम्य च यथान्यायं पूजयित्वा परस्परम् । सन्नद्धाः समदृश्यन्त भूयो युद्धचिकीर्षया ॥ २ ॥ अम्मीॉ अध्याय || ८० ॥ माय ने कहा- हे राजेन्द्र ! रक्त मे भीगे रपनेवाले कौरवों आर पाण्टयों ने रात्रि को विश्राम हुए क्षत्रियगण अपने शिराि को गये । परस्पर द्रोह किया । प्रात काल होने पर परस्पर यथोचित पूजा अध्याय ८० ] म हा भारत [१३८७ ततस्तव सुनो राजंश्चिन्तयाऽभिपरिप्लुतः विस्त्रवच्छोणिताक्ताङ्गः पप्रच्छेदं पितामहम् सैन्यानि रौद्राणि भयानकानि व्यूढानि सम्यग्बहुलध्वजानि । विदार्य हत्वा च निपीड्य शृरास्ते पाण्डवानां त्वरिता महारथाः॥ ४ ॥ सम्मोद्य सर्वान्युधि कीर्तिमन्तो व्यूहं च तं मकरं वज्रकल्पम् प्रविश्य भीमेन रणे हतोऽस्मि घोरैः शरैर्मृत्युदण्डप्रकाशेः क्रुद्धं तमुद्दीच्य भयेन राजन्सम्मृञ्छितो न लभे शान्तिमद्य । इच्छे प्रसादात्तव सत्यसन्ध प्राप्तुं जयं पाण्डवेयांश्च हन्तुम् ॥ ६ ॥ तेनैवमुक्तः प्रहसन्महात्मा दुर्योधनं मन्युगतं विदित्वा तं प्रत्युवाचाऽविमना मनस्वी गङ्गासुतः शस्त्रभृतां वरिष्ठः परेण यत्नेन विगाह्य सेनां सर्वात्मनाऽहं तव राजपुत्र । इच्छामि दातुं विजयं सुखं च न चाऽऽत्मानं छादयेऽहं त्वदर्थे ॥ ८ ॥ एते तु रौद्रा वहबो महारथा याखिनः शूरतमाः कृतास्त्राः । ये पाण्डवानां समरे सहाया जितक्लमा रोपवियं वमन्ति ॥ ९ ॥ ते नैव शक्याः सहसा रिजेतुं वीर्योद्धताः कृतवैरास्त्वया च । अहं सेनां प्रतियोत्स्यामि राजन्सर्वात्मना जीवितं त्यज्य वीर ॥ १० ॥ , आर सकार करके मन फिर घच आदि पहनकर प्राप्त नहीं हाती । हे स यसन्न ! में आपके हा युद्ध का तयाग मा ||१२| ह महार न आपर प्रसाद से पाण्डया को मारकर विजय प्राप्त करना पुत्र दुर्योवन के शगर म अनेक घार थे आर उनसे चाहता ह॥३।६|| शस्त्र धारिया म श्रेष्ठ, अविचलित, निरला हुआ रक्त शरार म लाल चदन मा शाभित मनस्या भाष्म पितामह दयापन का अयन्त कुपित हो रहा था। पिता से व्याकुल दुयापन न भाप्म आर दीन दग्यार मुमरराते हुए रहन ल्गे-||७|| पितामह के समाप आर कहा-पाण्डन पक्ष में हे रानन्द्र । मैं शत्रुसना में प्रवेश कर बड़े यन योद्धा लागा ने आर पाण्डवा ने हमारा भयानर, के माथ, यथाशक्ति पराक्रम करसे, तुमको पिनय राद, व्यूह-रचना से सुरक्षित, अनेन घजाआ म आर सुप मा भागा नाना चाहता है। तुम्हार शोभित सेना का छिन्न भिन, पीडित, निहत आर लिए पराक्रम करने म तनिक भा कमी नहीं रखना, मोहित करसे भारा यश प्राप्त क्रिया ह । हमारे रितु य राहम्प, यशम्बा, अस्त्र निपुण, महाशूर दुभद्य, मृयुद्वारतुल्य मरव्यूह म प्रवश हापर अनम महारथी गना ममर म पाण्डवों की सहायता भीमसन ने यमदण्ड महश घोर वाणास मुझे अरमरा कर रहे है । वे युद्ध मे न विश्रान्त होनेवाले पीर कर दिया ह । भाममेन को कुपित हुआ देग्वार तुम्हारा सेना र ऊपर मोध का पि उगग्ने है। भय क मार मै मुद्रित सा हो रहा है। मुझे शाति तुमने उनसे वर बढा रक्या ह ॥८॥ उन वार्यशाला ।
[ भीष्मपत्र ४३८८ ] म हा मा र त । रणे तवाऽर्थाय महानुभाव न जीवितं रक्ष्यतमं ममाऽय सर्वास्तवाऽर्थाय सदेव दैत्यान्घोरान्दहेयं किमु शत्रुसेनाम् ॥ ११ ॥ तान्पाण्डवान्योधयिष्यामि राजन्प्रियं च ते सर्वमहं करिष्ये । श्रुत्वैव चैतद्वचनं तदानीं दुर्योधनः प्रीतमना बभूव ॥ १२ ॥ सर्वाणि सैन्यानि ततः प्रहृष्टो निर्गच्छतेत्याह नृपांश्च सर्वान् । तदाज्ञया तानि विनिर्ययुद्भुतं गजाश्वपादातरथायुतानि ॥ १३॥ प्रहर्पयुक्तानि तु तानि राजन्महान्ति नानाविधशस्त्रवन्ति स्थितानि नागाश्वपदातिमन्ति विरेजुराजौ तव राजन्बलानि ॥ १४ ॥ शस्त्रास्त्रविद्भिनरवीरयोधैरधिष्टिताः सैन्यगणास्त्वदीयाः रथोघपादातगजाश्वसङ्केः प्रयाद्भिराजो विधिवत्प्रणुन्नैः ॥१५॥ समुद्धतं वै तरुणार्कवर्ण रजो वभौ च्छादयत्सूर्यरश्मीन् रेजुः पताका रथदन्तिसंस्था वातेरिता भ्राम्यमाणाः समन्तात् ॥ १६ ॥ नानारङ्गाः समरे तत्र राजन्मेधैर्युता विद्युतः खे यथेव वृन्दैःस्थिताश्चाऽपि सुसम्प्रयुक्ताश्चकाशिरे दन्तिगणाः समन्तात् ॥ १७ ॥ धनुपि विस्फारयतां नृपाणां बभूव शब्दस्तुमुलोऽतिघोरः विमश्यतो देवमहासुरोधैर्यथाऽर्णवस्यादियुगे तदानीम् ॥ १८॥ वीरों को मगर मे हम समय कान एकाएक जीत शीघ्रतापूर्वक शिविरों में निकले । अनेक शस्त्रों से मकता है। परन्तु हे वीर ! मै जाग्न का माह गोभित आपकी अगर चतुरङ्गिणी सेना युद्धभूमि बोदकर तुम्हारे हित के टिए पूर्ण चटा के माथ में पहुंचकर बहुत ही थे,भायमान हुई ॥१२॥१४॥ युद्ध करेगा । में अपने जीवन की रक्षा न करके शाय अब चलाने में चतुर वीर क्षत्रियों के द्वारा तुम्हार शाओं मे युद्ध करंगा । तुम्हारे लिए मैं मचाटिन आपकी मेना ग्थ, हाथी, घोड़े आदि के भागेना का कान यहे, मम्पूर्ण देवताओ और देन्यो झुण्डो मे शोभित है। रही थी। भेना के चलन में को भी भाग का मकताम पाण्डवों मे घोर युद्ध इतनी धूल उड़ा कि उममें सूर्य का प्रभाग तक लिए कर तुम्हाग प्रिय कार्य कगंगा ॥१०११२॥ यह गया। ग्या और हाथिया के ऊपर बड-बंद झण्टे वायु मुनकर दोगन गहन र प्रसन्न हए । उन्हें प्रतानि मे फहग रहे थे। उस युद्ध भूमि में, अनेक चित्रों में ग: ग. रिलाना में कुल याहार, यही यु, श्रेणीबद्ध हाथियों के झुण्ट चांगे और आकाश योग। अब उन्होंने मर गगानी को और मागमपिजीमहिन माय ममान गोमायमान हो रहे मना या युग निमिन गुमभूमि में चने की ॥१५॥१७॥ सत्ययुग मे देवता और दन्य आ.11 दरोगन को आम का गं ri गाट को मय गहे थे तर मगुद्र मनमा चार गम्भीर मासा, 4 प्रमदिन मर गना रोग गया मा, यमाल गांग के धनुप चढ़ाने । . A.NAAKA अध्याय ८१ ] म हा भारत [ ४३८९ तदुग्रनागं बहुरूपवर्ण तवाऽऽत्मजानां समुदीर्णमेवम् बभूव सैन्यं रिपुसैन्यहन्तृ युगान्तमेघौघनिभं तदानीम् इति श्रा महाभारते भाप्मपर्वणि भाष्मपर्वणि भाप्मया रनसादे अशातितमोऽध्याय ॥ ८० ॥ पर सुनाई पड़ रहा था । उग्र हापियो से युक्त, निधि मारनेवाला वह आपकी सेना उम समय प्रल्यकाल रूपों आर वर्गों से शोभित, जुद्ध शत्रुमेना को के मेघा के समान जान पड़ने लगा ॥१८॥१९॥ भाष्मपर्वमा अस्माा अध्याय समाप्त हुआ ।। ८० ॥ , अप एकागातिनमोऽ याय ॥ ८१ ॥ सञ्जय उवाच – अथाऽऽत्मजं तव पुनर्गाङ्गेयो ध्यानमास्थितम् । अब्रवीद्भरतश्रेष्ठः सम्प्रहर्षकरं वचः भीष्म उपाच- अहं द्रोणश्च शल्यश्च कृतवर्मा च सात्वतः अश्वत्थामा विकर्णश्च भगदत्तोऽथ सौबलः विन्दानुविन्दावावन्त्यो वाहीकः सह वाह्निकैः । त्रिगर्तराजो बलवान्मागधश्च सुदुर्जयः बृहद्बलश्च कौसल्यश्चित्रसेनो विविंशतिः रथाश्च बहुसाहस्राः शोभनाश्च महाध्वजाः देशजाश्च हया राजन्स्वारुढा हयसादिभिः गजेन्द्राश्च मदोवृत्ताः प्रभिन्नकरटामुखाः ॥ ५ ॥ पादाताश्च तथा शूरा नानाप्रहरणध्वजाः नानादेशसमुत्पन्नास्त्वदर्थे योद्धुमुद्यताः एते चाऽन्ये च बहवस्त्वदर्थे त्यक्तजीविताः देवानपि रणे जेतुं समर्था इति मे मतिः इक्यासावाँ अध्याय ॥ ८१ ।। ने कहा कि हे महारान उस दिन नरेश, कासलनरश बृहद्बल, चित्रसेन, निरिशति, चिता मे मग्न आपके पुत्र दुर्योधन से भाष्म ने ये कृपाचार्य, अनेक दशों की सशस्त्र पदर सेना, उसाह बढानेवाले वचन कहे-हे राजेन्द्र । मेरा महाधनाओ मे शेभित रथा के हनारों योद्धा, बुद्धि म यह आता ह कि मैं द्रोण शल्य, कृतमा, धाडा के सवार हाथियो के मबार आर तुम्हारे अश्वथामा, निसर्ण, भगदत्त, शकुनि, विन्द, अनु लिए युद्ध करने को आये अनेक देशो के असम्य विन्द, पाहार देश के पीरों सहित बाहार, सोम योद्धा यदि जारन का मोह छेडकर युद्ध कर दत्त, जयद्रथ, त्रिगतराज, नव्यान् आर दुर्नय मगध तो वे देवताओं को भी परानित कर सकते हैं। सञ्जय म हा भारत [ भीष्मपथ -.-.-mannuncim अवश्यं हि मया राजंस्तव वाच्यं हितं सदा । अशक्याः पाण्डवा जेतुं देवैरपि सवासवः ॥ ८॥ वासुदेवसहायाश्च महेन्द्रसमविक्रमाः सर्वथाऽहं तु राजेन्द्र करिप्ये वचनं तव पाण्डवांश्च रणे जेष्ये मां वा जेष्यन्ति पाण्डवाः । एवमुक्त्वा ददावन्मे विशल्यकरणी शुभाम् ॥ १० ॥ ओपधीं वीर्यसम्पन्नां विशल्यश्चाऽभवत्तदा ततः प्रभाते विमले स्वेन सैन्येन वीर्यवान् ॥ ११ ॥ अव्यूहत स्वयं व्यूह भीप्मो व्यूहविशारदः । मण्डलं मनुजश्रेष्टो नानाशस्त्रसमाकुलम् ॥ १२ ॥ सम्पूर्ण योधमुख्यैश्च तथा दन्तिपदातिभिः रथेरनेकसाहस्रः समन्तात्परिवारितम् ॥ १३॥ अश्ववृन्देमहद्भिश्च ऋष्टिनोमरधारिभः नागे नागे रथाः सप्त सप्त चाऽश्वा रथे रथे ॥१४॥ अन्वश्वं दश धानुष्का धानुष्के दश चर्मिणः । एवं व्यूढं महाराज तब सैन्यं महारथैः ॥१५॥ स्थितं रणाय महते भीप्मेण युधि पालितम् । दगाऽश्वानां सहस्राणि दन्तिनां च तथैव च ॥ १६ ॥ FAAAAAAAAM.-4 अध्याय ८१ ) म हा भारत [ १३०१ । स्थानामयुतं चाऽपि पुत्राश्च तब दंशिताः चित्रसेनादयः शृरा अभ्यरक्षन्पितामहम् ॥१७॥ रक्ष्यमाणः स तैः शूरैगोप्यमानाश्च तेन ते सन्नद्धाः समदृश्यन्त राजानश्च महाबलाः ॥ १८॥ दुर्योधनस्तु समरे दंशितो रथमास्थितः व्यराजत श्रिया जुष्टो यथा शक्रस्त्रिविष्टपे ॥ १९ ॥ ततः शब्दो महानासीत्पुत्राणां तब भारत रथघोपश्च विपुलो बादित्राणां च निःस्वनः ॥ २० ॥ भीपमेण धार्तराष्ट्राणां व्यूढः प्रत्यङ्मुखो युधि । मण्डलः स महाव्यूहो दुर्भेद्योऽमित्रघातनः ॥ २१ ॥ सर्वतः शुशुभे राजन्रणेऽरीणां दुरासदः मण्डलं तु समालोक्य व्यूह परमदुर्जयम् ॥ २२ ॥ स्वयं युधिष्ठिरो राजा वजं व्यूहमथाऽकरोत् तथा व्यूढेप्वनीकेषु यथास्थानमवस्थिताः ॥ २३ ॥ रथिनः सादिनः सर्वे सिंहनादमथाऽनदन् विभित्सवस्ततो व्यूहं निर्ययुर्युद्धकांक्षिणः ॥ २१ ॥ इतरेतरतः शूराः सहसैन्याः प्रहारिणः भारद्वाजोययौ मत्स्यं द्राणिश्चापि शिखण्डिनम् ॥ २५ ॥ स्वयं दुर्योधनो राजा पार्पतं समुपाद्रवत् नकुलः सहदेवश्च मद्रराजानमीयतुः ॥ २६ ॥ ॥१४॥१७॥ ममी महावटी गजा जर कान आदि युधिष्टिर ने मण्टरव्यूह दंगकर बत्र-व्यूह की रचना पहनकर प्रस्तुत हो गये तब गजा दयापन करच या। उनकी और के स्थ, हाथी और घोडे ययास्थान पहनकर रथ पर सवार हुए । उम ममय वे मर्ग में स्थित हो गये । योद्धा लोग मिहनाद करने देगे। स्थित इन्द्र के ममान शोभायमान हु ! आपके पुत्र दोनों ओर के वीर पुरुष तरह-तरह के अन-दास घोर मिहनाद करने लगे। निरन्तर ग्यो की घरग- रेकर युद्ध करने आर यह नोड़ने के मान्य मे आगे हट और बाजों का गन्न बहने लगा। शत्रुओं के अहे ॥२३॥२५॥ मनागर द्रोग मम्यगज मे, अश्व- दिए अभेद्य, महावीर भामरचित, कोया की मेना यामा गिगाटा में, महागज दुयॉरन दुपट मे, नगर ग मण्डाकार यह बहुत ही शोभित हुआ। उम और मदेव महगन दान्य में नया अवन्ति देगा ये या मुग पश्चिम की ओर या ॥१८।२२।। धर्मगज विन्द आर अनुपिन्ट रावान् मे द्वन्दबुद्ध करने लगे। - ४३९२ ] म हा भारत [ भीष्मपर A -- । विन्दानुबिन्दावावन्त्याविरावन्तमभिद्रुतौ सर्वे नृपास्तु समरे धनञ्जयमयोधयन् ॥ २७॥ भीमसेनो रणे यान्तं हार्दिक्यं समवारयत् चित्रसेनं विकर्ण च तथा दुर्मर्पणं विभुः ॥ २८॥ आर्जुनिः समरे राजंस्तव पुत्रानयोधयत् प्राग्ज्योतिपो महेष्वासो हैडिम्ब राक्षसोत्तमम् ॥ २९ ॥ अभिदुद्राव वेगेन मत्तो मत्तमिव द्विपम् अलम्बुपस्तदा राजन्सात्यकि युद्धदुर्मदम् ॥ ३० ॥ ससैन्यं समरे क्रुद्धो राक्षसः समुपाद्रवत् भूरिश्रवा रणे यत्तो धृष्टकेतुमयोधयत् ॥ ३१ ॥ श्रुतायुपं च राजानं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः चेकितानश्च समरे कृपमेवाऽन्वयोधयत् ॥ ३२ ॥ शेषाः प्रतिययुर्यत्ता भीष्ममेव महारथम् ततो राजसमूहास्ते परिवबुर्धनञ्जयम् ॥३३॥ शक्तितोमरनाराचगदापरिघपाणयः अर्जुनोऽथ भृशं क्रुद्धो वाष्र्णेयमिदमब्रवीत् ॥ ३४ ॥ पश्य माधव सैन्यानि धार्तराष्ट्रस्य संयुगे व्यूढानि व्यूहविदुपा गाङ्गेयेन महात्मना ॥ ३५ ॥ युद्धाभिकामाञ्शूरांश्च पश्य माधव दंशितान् । त्रिगर्तराज सहितं भ्रातृभिः पश्य केशव ॥ ३६॥ अन्य गजा लोग मियर महावीर अर्जुन मे भिड़ चरिनान का कृपाचार्य मे घोर युद्ध छिड़ गया ॥२०॥ गये। महापग भाममेन ने नई या के माय ग मे ३२॥ अन्यान्य पारगण त परता के साथ भीममेन हार्दिश्य पर आक्रमण किया। अभिमन्यु ने चित्रमेन, के मन्मुग उपस्थित हुए | उस समय महसों क्षत्रिय मिण और दमण पर आक्रमण किया ॥२॥२५॥ गना शक्ति नोमर, नाराच, गटा, पति आदि अग्न अंग महोमत्त हाया परमा भिदत है मे । गक्षम रंपर चाग और में अनुन पर आक्रमण करने रंगे । गरन सना भगदत्त मे युन काग्न रगा। उधा उनके मध्य में विशनाने पर, अयन्न सुद्ध होकर, गम भाषा मे पर पग्ना ना मगर अनुन ने श्रारण से कहा है श्रीकृष्ण दाया गया गामि मुग आया । श्रिया देगो, महानुभाष भाम ने दुर्योधन के लिए गृह- नाम, भगंगा किया गयुमेर गगना, पहा मेन मगर के रिए मन्मुग । , अध्याय ८१ म हा भा र त [१३०३ अद्यैतानाशयिष्यामि पश्यतस्ते जनार्दन य इमे मां यदुश्रेष्ट योद्धुकामा रणाजिरे ॥३७ ॥ एतदुक्त्वा तु कौन्तेयो धनुर्ध्यामवमृज्य च ववर्ष शरवर्षाणि नराधिपगणान्प्रति ॥ ३८ ॥ तेऽपि तं परमेष्वासा शरवरपूरयन् तडागं वारिधाराभिर्यथा प्रापि तोयदाः ॥३९॥ हाहाकारो महानासीत्तव सैन्ये विशाम्पते छाधमानो रणे कृष्णौ शरैदृष्ट्वा महारणे ॥४०॥ देवा देवर्षयश्चैव गन्धर्वाश्च सहोरगैः विस्मयं परमं जग्मुर्दृष्ट्वा कृष्णो तथा गतौ ॥११॥ ततः क्रुद्धोऽर्जुनो राजन्नन्द्रमस्त्रमुदैरयत् तत्राऽद्भुतमपश्याम विजयस्य पराक्रमम् ॥४२॥ शस्त्रवृष्टिं परैर्मुक्तां शरॊधैर्यदवारयत् न च तत्राऽप्यनिर्भिन्नः कश्चिदासीद्विशाम्पते ॥ ४३ ॥ तेषां राजसहस्राणां हयानां दन्तिनां तथा द्वाभ्यां त्रिभिः शरैश्चाऽन्यान्पार्थो विव्याध मारिप॥ १४ ॥ ते हन्यमानाः पार्थेन भीष्मं शान्तनवं ययुः । अगाधे मन्जमानानां भीष्मः पोतोऽभवत्तदा ॥ ४५ ॥ आपतद्भिस्तु तैस्तत्र प्रभग्नं तावकं वलम् । संचुक्षुभे महाराज वातैरिव महार्णवः इति श्रा महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपथपर्वणि सप्तमयुद्धदिवसे एकाशातितमोऽध्याय ॥ ८१ ।। ग्बड़े हैं । भाइयो सहित विगत दश के गजा भी युद्ध अ यत आनन्द कोलाहल करने लगी ॥३८॥४०॥ करन आये है । इस समय युद्ध की उन्या से जो देवता, ऋषि, गन्धर्व ओर नागगण अत्यन्त निस्मित लोग मेरे सन्मुख आये हैं, उनको मैं तुम्हारे मन्मुस हुए । नत्र अर्जुन ने क्रोध से अपार होकर शत्रुसना ही मार टागा ॥३३॥३७॥ अअ धनुप की टोरी' पर ऐद्र अत्र ठोडा । हम लोग अर्जुन का अद्भुत जाकर पीर अर्जुन मन पारो पर याण-वर्षा करने पराम्म देखने लगे। वे अपने अस्त्रो से शत्रुओं के अस्त्रो लगे । वर्षापार में जसे बादलों की जलपारा मेतालान का रोकार सर घायल करने लगे। कारवा की भर जात हे, वमे ही राजाओ के वाणजाल मे श्रीकृष्ण सेना के महस्रो राजाओ मे ऐसा कोई न था निसे दो, और अर्जुन ढरे गये। यह देखकर आपनी सेना तीन या एक वाण से अर्जुन ने घायल न किया हो ४३९२ ] म हा भा रन [ भीष्मपर्व विन्दानुविन्दावावन्त्याविराबन्तमभिद्रुतौ सर्वे नृपास्तु समरे धनञ्जयमयोधयन् ॥ २७॥ भीमसेनो रणे यान्तं हार्दिक्यं समवारयत् चित्रसेनं विकर्णं च तथा दुर्मर्पणं विभुः ॥ २८॥ आर्जुनिः समरे राजंस्तव पुत्रानयोधयत् प्राग्ज्योतिपो महेष्वासो हैडिम्वं राक्षसोत्तमम् ॥ २९ ॥ अभिदुद्राव वेगेन मत्तो मत्तमिव द्विपम् अलम्बुपस्तदा राजन्सात्यकिं युद्धदुर्मदम् ॥३०॥ ससैन्यं समरे कुडो राक्षसः समुपाद्रवत् भूरिश्रवा रणे यत्तो धृष्टकेतुमयोधयत् श्रुतायुपं च राजानं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः चेकितानश्च समरे कृपमेवाऽन्वयोधयत् ॥३२॥ शेपाः प्रतिययुर्यत्ता भीष्ममेव महारथम् ततो राजसमूहास्ते परिवबुर्धनञ्जयम् ॥३३॥ शक्तितोमरनाराचगदापरिघपाणयः अर्जुनोऽथ भृशं कुन्द्रो वार्णेयमिदमब्रवीत् ॥ ३४ ॥ पश्य माधव सेन्यानि धार्तराष्ट्रस्य संयुगे व्यूढानि व्यूहविदुपा गाङ्गेयेन महात्मना ॥ ३५॥ युद्धाभिकामानशूरांश्च पश्य माधव दंशितान् । त्रिगर्तराज सहितं भ्रातृभिः पश्य केशव ॥ ३६॥ अन्य गजा लोग मिटकर महार अर्जुन मे भिड़ अंकितान का कराचार्य मे घोर युद्ध छिड़ गया ॥२०॥ गये। महायगं भानमन न बंद या क माय ग में ३२॥ अन्यान्य वीरगण वापरता के माय भीममन हार्टियर आममग किया। अभिमन्यु ने निमन. के. मन्मुग उपस्थित हुए। उम ममप महसी क्षत्रिय विस और दमांग पर अकमकिया ॥२५॥२०॥ गजा माहित नामर, नागर, गदा, परिध आदि मग्न गि महोगना मिनी म हो गक्षम कर चांगे और ग अजुन पर आक्रमण करने लंगे। गरमा गत भगान में गुट बन गया। था उनके मध्य में शिजाने पर, अयन युरोकर, गम अपर मोमेकर योग्ना का मार अन ने श्रीण गे कहा - श्रीरण ! शासन मा. मामुपाया दगी, मानगर भाग ने दृधिन मे. रिए त्य- मामे, मंगवाया भाग ग्लना को .. यदा में गौर ममा दिप मागुग .......
अ याय ८१ ] म हा भारत [ १३०३ cuasmmssandramsaramsiwanamara mma - अन्येतानाशयिष्यामि पश्यतस्ते जनार्दन य इमे मां यदुश्रेष्ट योद्धुकामा रणाजिरे ॥३७॥ एतदुक्त्वा तु कौन्तेयो धनुर्ध्यामवमृज्य च ववर्ष शरवर्षाणि नराधिपगणान्प्रति ॥ ३८ ॥ तेऽपि तं परमेप्यासा शरवरपूरयन् तडागं वारिधाराभिर्यथा प्रावृपि तोयदाः ॥ ३९ ॥ हाहाकारो महानासीत्तव सैन्ये विशाम्पते छाधमानौ रणे कृष्णौ शरैदृष्ट्वा महारणे ॥ ४०॥ देवा देवर्षयश्चैव गन्धर्वाश्च सहोरगैः विस्मयं परमं जग्मुर्दृष्ट्वा कृष्णौ तथा गतौ ॥ ४१ ॥ ततः कुद्धोऽर्जुनो राजन्नेन्द्रमस्त्रमुदैरयत् तत्राऽद्भुतमपश्याम विजयस्य पराक्रमम् ॥४२॥ शस्त्रवृष्टि परैर्मुक्ता शरॊधैर्यदवारयत् न च तत्राऽप्यनिर्भिन्नः कश्चिदासीद्विशाम्पते ॥ १३ ॥ तेषां राजसहस्राणां हयानां दन्तिनां तथा द्वाभ्यां त्रिभिः शरैश्चाऽन्यान्पाथों विव्याध मारिप॥४४॥ ते हन्यमानाः पार्थेन भीष्मं शान्तनवं ययुः । अगाधे मजमानानां भीमः पोतोऽभवत्तदा ॥४५॥ आपतद्भिस्तु तैस्तत्र प्रभग्नं तारकं वलम् संचुक्षुभे महाराज वातैरिव महार्णवः ॥ ४६ ॥ इति श्रा महाभारत भीष्मपर्वणि भीष्मपथपणि सप्तमयुद्धदियमे एकाशीतितमोऽध्याय ॥ ८१ ॥ खडे हे भाइयों सहित गित दश के राना भा युद्ध अयत आन द कोगहल करने गा॥३८॥४०॥ करन आये है । इस समय युद्ध की इच्छा म जो देवता, ऋषि, गन्धर्व और नागगण अयत विस्मित लोग मरे सन्मुख आये हैं, उनको मै तुम्हारे ममुग्न हुए । नत्र अर्जुन ने नाध से अपार होकर गमना ही मार डाहगा ॥३३॥३७॥ अर धनुष की डोरी पर ऐद्र अस्त्र गोडा । हम लोग अर्जुन का अद्भुत नारर चार अर्जुन मर चारो पर वाण-चर्या करन पगनम देपन रंगे । वे अपने अनामे गनुआ क अस्त्रों लग विमान में जसे बादलों की नलपारा मे तागन रा रोक्कर ममा घायर करन लंगे। कारों की भर जात हैं, चमे ही राजाओ के वाणजार मे श्रारण सेना के महला गनाआ में ऐसा कोई न था निसे दो, आर अर्जुन ढंक गये। यह देखकर आपरी सना तान या एक नाण मे अनुन ने घायल न किया हो .. ।
४३९४ ] म हा भा र त [ भीमपर्व ॥४१।१३।। उन्होंने अस्त्र के प्रभाव मे सेनाभर के के पास पहुंचे । अथाह सङ्घट-सागर में पडे सैनिकों हाथियों, घोडों, रथो के मारों और पढलों को दो- के लिए भीष्म पितामह उबारनेवाली नार हुए। तूफान दो तीन-तीन वाणो मे घायर कर दिया। अर्जुन के उठने में महासागर की तरह, अर्जुन के प्रहारो से बाणों मे पीडित मर लग रक्षा के लिए पितामह भीष्म आपकी मारी मना क्षोभ को प्राप्त हो गई ॥४४॥४६॥ भाष्मपर्व का क्यामीमाँ अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ८१ ॥ मनय याच अथ द्वयशानिनमोऽध्याय ॥ ८२ ।। तथा प्रवृत्ते संग्रामे निवृत्ते च सुशर्मणि भग्नेषु चापि वीरपु पाण्डवेन महात्मना क्षुभ्यमाणे वले तूर्ण सागरप्रतिमे तब प्रत्युद्याते च गाङ्गेय त्वरितं विजयं प्रति ॥ २ ॥ दृष्ट्वा दुर्योधनो राजा रणे पार्थस्य बिक्रमम् । स्वरमाणः समभ्येत्य सर्वांस्तानबवीन्नृपान् ॥ ३ ॥ तेषां तु प्रमुखे शूरं सुशर्माणं महाबलम् मध्ये सर्वस्य सेन्यस्य भृशं सहर्पयन्द्रिय ॥ ४ ॥ एप भीष्मः शान्तनयो यो कामो धनञ्जयम् । मर्वात्मना कुरुश्रेष्ठस्त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ॥ ५ ॥ नं प्रयान्तं रणे वीरं मर्वसन्येन भारतम् संयत्ताः समरे सर्व पालयध्वं पितामहम् घाटमित्यवमुक्त्वा तु तान्यनीकानि सर्वशः नरेन्द्राणां महागज समाजग्मुः पितामहम ....... ~ अ याय ८२] म हा भारत । ४३०५ ततः प्रयातः सहसा भीष्मः शान्तनवोऽर्जुनम् । रणे भारतमायान्तमाससाद महावलः महाश्वेताश्वयुक्तेन भीमवानरकेतुना महता मेघनादेन रथेनाऽतिविराजता समरे सर्वसैन्यानामुपयान्तं धनञ्जयम अभवत्तुमुलो नादो भयाद् दृष्ट्वा किरीटिनम् ॥ १० ॥ अभीपुहस्तं कृष्णं च दृष्ट्वाऽऽदित्यमिवाऽपरम् । मध्यन्दिनगतं संख्ये न शेकुः प्रतिवीक्षितुम् ॥ ११ ॥ तथा शान्तनवं भीमं श्वेताश्वं श्वेतकार्मुकम् । न शेकुः पाण्डवा द्रष्टुं श्वेतं ग्रहमिवोदितम् ॥ १२ ॥ स सर्वतः परिवृतस्त्रिगतैः सुमहात्मभिः भ्रातृभिः सह पुत्रैश्च तथाऽन्यैश्च महारथः ॥१३॥ भारद्वाजस्तु समरे मत्स्य विव्याध पत्रिणा ध्वजं चाऽस्य शरेणाऽऽजौ धनुश्चैकेन चिच्छिदे ॥ १४ ॥ तदपास्य धनुश्च्छिन्नं विराटो वाहिनीपतिः अन्यदादत्त वेगेन धनुर्भारसहं दृढम् शरांश्चाऽऽशीविपाकारावालितान्पन्नगानिव द्रोणं त्रिभिश्च विव्याध चतुर्भिश्चाऽस्य वाजिनः ॥ १६ ॥ ध्वजमेकेन विव्याध सारथिं चाऽस्य पञ्चभिः । धनुरेकेपुणाऽविध्यत्तत्राऽक्रुध्यद द्विजर्पभः देखकर आपके पक्ष के सनिरगण भय के मार आर्त अन्य महारथा लोग भाष्म के चारो ओर रहकर नाद करने लगे। मध्याह्न क मृय के समान तेजस्वी उनी रक्षा कर रहे थे ॥१२॥१३॥ द्रोणाचार्य ने घोड़ो की राम हाथ मे लिये, रथ पर विराज एक मिट पाण विराट क हदय में मारकर कई मान थे । उनकी ओर कोर्ट नेत्र उठाकर भी देग्व वाणो मे उनका धनुष और घना गाट डाला। नहीं सकता था ॥११॥ मे हा श्वेत घोडागले विगट ने उमी क्षण वह कटा हुआ धनुप कार वत धनुप धारण किये, आमाग में स्थित और एर बहुत ही दृढ़ धनुप हाथ में रिया । उम श्वेत शुक्र ग्रह के समान भीम पितामह यी और पर ज्वग्नि मुग सर्प क ममान बहुत मे बाण चढ़ा पाण्डर लोग भी अच्छी प्रकार देगा नहीं सकते थे । पर उहान तीन बाण द्रोण को मारे, चार बाणों विगतदेश के राना, राजपुर, गना के भाई आर मे उनक घाई मार डारे, एक वाण में उनरा घना धाकृष्ण, . रथ पर, .
म हा भा र न [ भाप्मपव - तस्य द्रोणोऽवधीदश्वाञ्झरै. सन्नतपर्वभिः अष्टाभिर्भरतश्रेष्ठ सूतमेकेन पत्रिणा ॥१८॥ स हताश्वादवप्लुत्य स्यन्दनाद्धतसारथिः आसरोह रथं तूर्णं पुत्रस्य रथिनां वरः ततस्तु तो पितापुत्रौ भारद्वाजं रथे स्थितौ महता शरवर्पण वारयामासतुर्वलात् ॥ २०॥ भारद्वाजस्ततः क्रुद्धः शरमाशीविषोपमम् चिक्षेप समरे तूर्ण शहं प्रति जनेश्वर ॥ २१ ॥ स तस्य हृदयं भित्वा पीत्वा शोणितमाहवे । जगाम धरणी वाणो लोहिताईवरच्छदः ॥ २२ ॥ स पपात रणे तूर्ण भारद्वाजशराहत. धनुस्त्यक्त्वा शराश्चैव पितुरेव समीपतः ॥ २३ ॥ हतं तमात्मजं दृष्ट्वा विराटः प्रावद्भयात् उत्सृज्य समरे द्रोणं व्यात्ताननमिवाऽन्तकम् ॥ २४ ॥ भारद्वाजस्ततस्तूर्ण पाण्डवानां महाचमूम् दारयामास समरे शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २५॥ शिखण्डी तु महाराज द्रौणिमासाय संयुगे आजघान ध्रुवोर्मध्ये नाराचेस्त्रिभिराशुगैः ॥ २६ ॥ स वभो रथशार्दूलो ललाटे संस्थितेत्रिभिः शिखरै. काञ्चनमयमरुस्तिभिरिबोच्छ्रितैः ॥२७॥ काट यी, पर वाण म उनमा धनुष काराग चिराण र, रस पार सपिररमित हो पृथ्वी म पार पाँच बाणों म उन साग्या का मार गिराया । प्रवेग हा गया । दाण के प्राण म पाड़ित रानकुमार जाणामाय न भी बार में अपार होकर आट गाणी गस पिता के ममुष पृथ्वी पर गिर पंड । उनक मे उनो पाद और मारया ना मार गग ॥१ हाथ म धनुष-बाण छकर गिर गया ॥१०॥२३॥ १८ गिर अपन गप में उनसर (अर गह विराट ने जन अपने पुत्र की मयु दगी तब व मुग्न परन्द गये और अपन कुमार के माथ उहान पगय टु पार ममान द्रोणाचार्य को बड़ार हाणायक पर ती गाण रमाये सिरे महार भयभीत हा युद्ध म हर गये | अब महारथी दाणा नहीं म। दोणाचार्य ने प्रार की चाय पण्डपक्षी मना या, मादा नाग की पशपतिmगायण जया राय माया म महार करने में शिमण्डी ने अश्वथामा ।
अध्याय ८२ ] म हा भार न - : अश्वत्थामा ततः कुरो निमेपार्धाच्छिखण्डिनः। ध्वजं सूतमथो राजंस्तुरगानायुधानि च शरैर्बहुभिराच्छिद्य पातयामास संयुगे स हताश्वादवप्नत्य रथाद्वै रथिनां वरः ॥ २९ ॥ खड्गमादाय सुशितं विमलं च शरावरम् श्येनवद्वयचरस्क्रुद्धः शिखण्डी शत्रुतापनः सखड्गस्य महाराज चरतस्तस्य मंयुगे नाऽन्तरं ददृशे द्रोणिस्तदद्भुनभिवाऽभवत् ॥ ३१ ॥ ततः शरसहस्राणि वहनि भरतर्षभ प्रेषयामास समरे द्रोणिः परमकोपनः ॥३२॥ तामापतन्ती समरे शरवृष्टिं सुदारुणाम् असिना तीक्ष्णधारेण चिच्छेद वलिनां वरः ॥ ३३ ॥ ततोऽस्य विमलं द्रोणिः शतचन्द्रं मनोरमम् । चर्माऽच्छिनदसिं चाऽस्य बण्डयामास संयुगे ॥ ३४ ॥ शिस्तु बहुमो गजन्तं च विव्याध पत्निभिः । शिरवण्डी तु ततः म्यहं ग्वण्डितं तेन सायकैः ॥ ३५ ॥ आविध्य व्यस्मृजत्तृर्ण ज्वलन्तमिव पन्नगम् तमापतन्तं सहसा कालानलसमप्रभम् चिच्छेद समरे द्रोणिर्दर्शयन्पाणिलाधवम् शिखण्डिनं च विव्याध शरर्वद्दुभिगयसेः के पास जाकर उनकी भौहों के मध्य में तीन बाण पर प्रहार करने या असाान या मारे । मम्ना में लगे हुए तीन यागों में अभयामा मा य? अभय की यात जान पड़ी ॥२८॥३१॥ नीन उन्नत शिमगे में गोभित गुणगय मुसा हम अमंगा, मग iram मिर यो ममान जान पड़ने लगे ॥२४॥२७॥ उमान र मागी यामानानेगे । माग नम होकर गिरण्डी के माग्यो. चना और कोई भने नंगन टन टारगी आदिको पानी में नए पर दिया । अर यो दमदा करा ना माने FATEGN ना नगर शरा Finnहाय मेरा दाट. र प्रागनी को ना मान र नगरपान गरी गगना यो ना पान । भागमा को उन मिस मनाnicillm ४३९८ म हा भा र त [ भीमपर शिखण्डी तु भृशं राजस्ताड्यमानः शितैः शरैः। आरुरोह रथं तूर्णं माधवस्य महात्मनः ॥३८॥ सात्यकिश्चाऽपि संक्रुद्धो राक्षसं क्रूरमाहवे अलम्बुपं शरैस्तीक्ष्णैर्विव्याध बलिनां वरः ॥ ३९ ॥ राक्षसेन्द्रस्ततस्तस्य धनुश्चिच्छेद भारत अर्धचन्द्रेण समरे तं च विव्याध सायकैः ॥ ४० ॥ मायां च राक्षसी कृत्वा शरवरवाकिरत् तत्राऽद्भुतमपश्याम शैनेयस्य पराक्रमम् ॥११॥ असम्भ्रमस्तु समरे वध्यमानः शितैः शरैः ऐन्द्रमस्त्रं च वाणेयो योजयामास भारत ॥ ४२ ॥ विजयाद्यदनुप्राप्तं माधवेन यशखिना तदनं भस्मसात्कृत्वा मायां तां राक्षसी तदा ॥४३॥ अलम्बुपं शरैरन्यैरभ्याकिरत सर्वतः पर्वतं वारिधाराभिः प्रापीय बलाहकः ॥४४॥ नत्तथा पीडितं तेन माधवेन यशस्विना प्रदुद्राव भयाद्रक्षस्त्यक्त्वा सात्यकिमाहवे ॥ १५ ॥ नमजेयं राक्षमेन्द्रं मंग्व्ये मघवना अपि शैनेयः प्राणदजित्वा योधानां नव पश्यताम् ॥ ४६ ।। ---RANAV अध्याय ८२] म हा भा र त । - न्यहनत्तावकांश्चाऽपि सात्यकिः सत्यविक्रमः । निशितैर्वहुभिर्वाणैस्तेऽद्रवन्त भयार्दिताः ॥४७॥ एतस्मिन्नेव काले तु द्रुपदस्याऽऽत्मजो वली । धृष्टद्युम्नो महाराज पुत्रं तव जनेश्वरम् ॥४८॥ छादयामास समरे शरैः सन्नतपर्वभिः स च्छाद्यमानो विशिखैधृष्टद्युम्नेन भारत ॥४९॥ विव्यथे न च राजेन्द्र तव पुत्रो जनेश्वर धृष्टद्युम्नं च समरे तूर्ण विव्याध पत्रिभिः ॥ ५० ॥ षष्टया च त्रिंशता चैव तदद्भुतमिवाऽभवत् तस्य सेनापतिः क्रुद्धो धनुश्चिच्छेद मारिप हयांश्च चतुरः शीघ्र निजघान महाबलः शरैश्चैनं सुनिशितैः क्षिप्रं विव्याध सप्तभिः ॥ ५२ ।। स हताश्वान्महावाहुरवप्लुत्य रथावली पदातिरसिमुद्यम्य प्राद्रवत्पार्पतं प्रति ॥ ५३॥ शकुनिस्तं समभ्येत्य राजगृद्धी महाबलः राजानं सर्वलोकस्य रथमारोपयत्स्वकम् ॥ ५४॥ ततो नृपं पराजित्य पार्वतः परवीरहा न्यहनत्तावकं सैन्यं वज्रपाणिरिवाऽसुरान् ॥ ५५॥ कृतवर्मा रणे भीमं शरेरार्छन्महारथः प्रच्छादयामास च तं महामेघो रविं यथा ॥ ५६ ॥ ततः प्रहस्य समरे भीमसेनः परन्तपः प्रेषयामास संक्रुद्धः सायकान्कृतवर्मणे ॥ ५७॥ हुए ॥४३॥४७॥ इसी समय महाबली धृष्टद्युम्न ने उतरकर, गा लेकर, पैदल ही धृष्टद्युम्न की ओर गजा दुर्योधन को विकट बाणो मे विहट कर दिया। दोहे । महावी शकुनि ने शीघ्रता से आकर दयों न किन्तु दुर्योधन ने भी बड़ी स्फूर्ति के साथ धृष्टद्युम्न के को अपने रय पर चढ़ा लिया । शगुदमन शृष्टयन मर्मस्थलों में न बाण मारे । तर मेनापति धृष्टद्युम्न राजा दुर्यो पन को पगजित करके उनकी मना को ने उद होकर दुर्योधन का धनुष काट डाय, चागे नष्ट करने लगे ॥५३॥५५॥ मा जम गर्य पर आ घोड़ों को मार गिगया और उन्हें तीक्ष्ण मान बाणों मग करें मे ही कृतार्मा ने भी भामरा भीमपर मे पीड़िन किया ॥४८॥५२॥ राजा दुर्योधन रय से अनमग करके उन्हें दागों मे दस दिया। भीममेन ४१०० ] म हा भारत [ भीमपर्व AKArces तैरर्धमानोऽतिरथः सात्वतः सत्यकोविदः नाऽकम्पत महाराज भीमं चाऽऽर्छच्छितैः शरैः॥ ५८ ॥ तस्याऽश्वांश्चतुरो हत्वा भीमसेनो महारथः सारथिं पातयामास सध्वजं सुपरिष्कृतम् शरैर्वहुविधैश्चैनमाचिनोत्परवीरहा शकलीकृतसर्वाङ्गो हताश्वः प्रत्यदृश्यत हताश्वश्च ततस्तूर्णं वृषकस्य रथं ययौ स्यालस्य ते महाराज तव पुत्रस्य पश्यतः भीमसेनोऽपि संक्रुद्धस्तव सैन्यमुपाद्रवत् निजघान च संक्रुद्धो दण्डपाणिरिवाऽन्तकः ॥ ६२ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्वेरथे द्वयशीतितमोऽध्याय. ॥ ८२ ॥ भी क्रोधपूर्वक हँसत हुए कृतार्मा पर वाण वरसाने , वाणो से घायल किया। इस प्रकार व्यथित और घायल लगे; किन्तु वे उससे विचलित नहीं हुए। वे तीक्ष्ण कृतवर्मा दुर्योधन के सन्मुख ही, बिना घोड़ो के रथ बाणों से भीमसेन को व्यथित करने लगे।।५६५८॥ से उतरकर, अपने साले वृपक के रथ पर चले गये । भीमसेन ने उनके चारो घोड़े मारकर ध्वजा काट भीममेन क्रोध करके कौरव-सेना के पीछे दौड़कर दण्ई- डाली, मारी को भी मार डाला और उन्हे मी अनेक पाणि यमराज की तरह उसे नष्ट करने लगे ||५९/६२॥ भीष्मपर्व का बयामीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।। ८२ ॥ अथ त्र्यशीतितमोऽध्याय ।। ८३ ।। धृतराष्ट्र उवाच -बहनि हि विचित्राणि द्वेस्थानि म्म सञ्जय पाण्डूनां मामकैः सार्धमश्रोपं तब जल्पतः न चव मामक किश्चिद्धृष्टं शंससि सञ्जय नित्यं पाण्डुसुतान्हृष्टानभग्नान्सम्प्रशंससि जीयमानान्विमनसो मामकान्विगतोजसः बदसे संयुगे सूत दिष्टमेतन्न संशयः मञ्जय याच ---यथाशक्ति यथोत्साहं युद्धे चेटन्ति तावकाः दर्शयानाः परं शक्त्या पौरुपं पुरुपर्पभ निगमाया अन्याय ।। ८३ ॥ गजा धृतराष्ट्र ने कहा- मजय! मने तुम्हारे मुग योग के द्वन्द्वयुद्ध का ममाचार सुना । तुम तो निन्य आन पक्ष के बल र बाग के मार पाण्ट पक्ष के । टया को ही प्रसन्न और विजयी बनाते हो; मरी hauts म हा भा र त । अध्याय ८३ ] 7221 { ४१०१ गङ्गायाः सुरनद्या वै स्वादु भूत्वा यथोदकम् । महोदधेर्गुणाभ्यासाल्लवणत्वं निगच्छति तथा तत्पौरुषं राजस्तावकानां परन्तप प्राप्य पाण्डुसुतान्वीरान्व्यर्थं भवति संयुगे घटमानान्यथाशक्ति कुर्वाणान्कर्म दुष्करम् न दोपेण कुरुश्रेष्ठ कोरवान्गन्तुमर्हसि तवाऽपराधासुमहान्सपुत्रस्य विशाम्पते पृथिव्याः प्रक्षयो घोरो यमराष्ट्रविवर्धनः आत्मदोपात्समुत्पन्नं शोचितुं नाऽहंसे नृप नहि रक्षन्ति राजानः सर्वथाऽत्राऽपि जीवितम्॥ ९ ॥ युद्धे सुकृतिनां लोकानिच्छन्तो वसुधाधिपाः । चमू विगाह्य युद्धयन्ते नित्यं स्वर्गपरायणाः पूर्वाहे तु महाराज प्रावर्तत जनक्षयः तं त्वमेकमना भूत्वा शृणु देवासुरोपमम् ॥ ११ ॥ आवन्त्यौ तु महेष्वासो महासेनौ महावलौ । डरावन्तमभिप्रेक्ष्य समेयातां रणोत्कटौं ॥ १२ ॥ तेषां प्रववृते युद्धं सुमहल्लोमहर्षणम् इरावांस्तु सुसंक्रुद्धो भ्रातरौ देवरूपिणौ ओर के किसी वीर की विजय वार्ता, प्रमन्नता या प्रशसा न दीजिए । हे महाराज ! आपके ही दोप से यह नहीं सुनाते । तुम जो युद्ध मे मेरे पुत्रो और वीरो ' लोकनायक सग्राम आरम्भ हुआ ह । आप अपने ही को मदा परास्त, व्याकुल और पराक्रम हीन बताते दोष पर इस प्रकार वृथा शांक न करे । पुण्या माओं हो, सो इसका कारण देव ही ह, इसमें सन्देह नही । के लोको को प्राप्त करने की इच्छा से क्षत्रियगण ॥१३॥ सञ्जय ने कहा-हे राजेन्द्र ! हमारे सभी युद्ध मे जीवन का मोह छोडकर युद्ध करते हैं, नित्य योद्धा श्रेष्ठ हैं । यथाशक्ति समय-समय पर पौरुष सर्ग की इच्छा मे शत्रुमेना में प्रवेग करके वे आगे दिग्वाने में कुछ कमी नहीं रखते । किन्तु जेसे यारी ही बढकर आक्रमण करते हैं ||१०|| दिन के पूर्व ममुद्र से मिलने पर गङ्गा आदि महानदियों का मीठा भाग मे देवासुर-सग्राम के समान जो भयानक युद्ध जल खारी हो जाता है, उसे ही हमारे पक्ष के वीरो | हुआ उसका समाचार आप मन लगाकर मुनिए । का पराक्रम पाण्डयों के सामने निष्फल हो जाता है उम युद्ध मे असाय योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए। ||६आपके पक्ष के वीर भरसक दुष्कर कर्म करके हे राजेन्द्र ! अन्ती देश के राजा रणदुर्मद महाधनुर्धर जय की चेष्टा करते है, इमलिए आप उनको दोष । पिन्द आर अनुपिन्द दोनों इरावान् को देखकर उनक ๆ 31 १४०० ] म हा भा र त [ भीष्मपर - । तैरर्यमानोऽतिरथः सात्वतः सत्यकोविदः नाऽकम्पत महाराज भीमं चाऽऽर्छच्छितैः शरैः॥ ५८ ॥ तस्याऽश्वांश्चतुरो हत्वा भीमसेनो महारथः सारथिं पातयामास सध्वजं सुपरिष्कृतम् ॥ ५९ ॥ शरैर्बहुविधैश्चैनमाचिनोत्परवीरहा शकलीकृतसर्वाङ्गो हताश्वः प्रत्यदृश्यत ॥ ६० ॥ हताश्वश्च ततस्तूर्णं वृषकस्य रथं ययौ स्यालस्य ते महाराज तव पुत्रस्य पश्यतः भीमसेनोऽपि संक्रुद्धस्तव सैन्यमुपाद्रवत् निजघान च संक्रुद्धो दण्डपाणिरिवाऽन्तकः ॥६२ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपधपर्वणि द्वरथे द्वयशीतितमोऽध्याय ॥ ८२ ॥ भी क्रोधपूर्वक हँसते हुए कृतवर्मा पर बाण बरसाने । बाणो मे घायल किया। इस प्रकार व्यथित और घायल लगे, किन्तु वे उसमे विचलित नहीं हुए। वे तीक्ष्ण कृतवर्मा दुर्योधन के मन्मुग्व ही, विना घोडो के रथ बाणों से भीममेन को व्यथित करने लगे ॥५६५८॥ से उतरकर, अपने साले वृपक के रथ पर चले गये । भीमसेन ने उनके चारों घोड़े मारकर ध्वजा काट भीममेन क्रोव करके कौरव-सेना के पीछे दौड़कर दण्ड- डाली, मारथी को भी मार टाला और उन्हें भी अनेक पाणि यमराज की नरह उसे नष्ट करने लगे ॥५९।६२।। भीष्मपर्व का बयामागाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८२ ॥ अब व्यशीतितमोऽध्याय ॥ ८३ ॥ धृतराष्ट्र उवाच बहूनि हि विचित्राणि द्वैरथानि म्म सञ्जय पाण्डनां मामकैः सार्धमश्रोपं नव जल्पतः न चैव मामकं किञ्चिदृष्टं शंससि सञ्जय नित्यं पाण्डुसुतान्दृष्टानभग्नान्सम्प्रशंससि जीयमानान्विमनमो मामकान्धिगतोजसः बदसे संयुगे मूत दिष्टमेतन्न संशयः मन्नय उगच-यथाशक्ति यथोत्साहं युद्धे चेष्टन्ति तावकाः दर्शयानाः परं शक्रया पाम्पं पुरुपर्पभ निगमायाँ अन्याय ॥ ८३ ॥ गाभाराष्ट्र ने कहा- मनय! मने तुगर मुग योग के द्वन्द्वयुद्ध का समाचार मुना । तुम तो निय जन पक्ष को यात मचांग के माय पाण्डा के , पाण्डमां को ही प्रसन्न और विजयी बनगंत मरी -- ।
wwwsssanscomaaaaashaiccessor अन्याय ८३ 7221 गङ्गायाः सुरनद्या वै स्वादु भूत्वा यथोदकम् । महोदधेर्गुणाभ्यासालवणत्वं निगच्छति तथा तत्पौरुपं राजस्तावकानां परन्तप प्राप्य पाण्डुसुतान्वीरान्व्यर्थं भवति संयुगे घटमानान्यथाशक्ति कुर्वाणान्कर्म दुष्करम् न दोषेण कुरुश्रेष्ठ कौरवान्गन्तुमर्हसि तवाऽपराधात्सुमहान्सपुत्रस्य विशाम्पते पृथिव्याः प्रक्षयो घोरो यमराष्ट्रविवर्धनः आत्मदोपात्समुत्पन्नं शोचितुं नाऽर्हसे नृप नहि रक्षन्ति राजानः सर्वथाऽत्राऽपि जीवितम् ॥ ९ ॥ युद्धे सुकृतिनां लोकानिच्छन्तो वसुधाधिपाः । चमू विगाह्य युद्धयन्ते नित्यं स्वर्गपरायणाः पूर्वाह्ने तु महाराज प्रावनत जनक्षयः तं त्वमेकमना भूत्वा शृणु देवासुरोपमम् ॥ ११ ॥ आवन्त्यौ तु महेष्वासो महासेनौ महावलौ । इरावन्तमभिप्रेक्ष्य समेयातां रणोत्कटौ ॥ १२ ॥ तेषां प्रववृते युद्धं सुमहल्लोमहर्षणम् इरावांस्तु सुसंक्रुद्धो भ्रातरौ देवरूपिणौ ओर के किसी वीर की विजय-वार्ता, प्रसन्नता या प्रशसा न दीजिए । हे महाराज ! आपके ही दोप से यह नही सुनाते । तुम जो युद्ध में मेरे पुत्रो और वीरो लोकनाशक सग्राम आरम्भ हुआ है । आप अपने ही को सदा परास्त, व्याकुल और पराक्रम हीन बताते दोष पर इस प्रकार वृथा शोक न करे । पुण्यात्माओं हो, सो इसका कारण दैव ही है, इसम सन्देह नहीं । के लोको को प्राप्त करने की इच्छा से क्षत्रियगण ॥१॥३॥ मञ्जय ने कहा-हे राजेन्द्र ! हमारे सभी युद्ध में जीवन का मोह छोड़कर युद्ध करते हैं, नित्य योद्धा श्रेष्ठ हैं । चे यथाशक्ति समय-समय पर पौरुष स्वर्ग की इच्छा से शत्रुसेना में प्रवेश करके वे आगे दिग्वाने में कुछ कमी नहीं रखते । किन्तु जमे खारी ही बढकर आक्रमण करते हैं ।।७।१०॥ दिन के पूर्व समुद्र से मिलने पर गद्गा आदि महानदियो का मीठा । भाग मे देवासुर-सग्राम के समान जो भयानक युद्ध जल खारी हो जाता है, वैसे ही हमारे पक्ष के वीरो | हुआ उसका समाचार आप मन लगाकर मुनिए । का पराक्रम पाण्टको के सामने निष्फल हो जाता है उम युद्ध मे अमंन्य योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए। ॥४६॥ आपके पक्ष के वीर भरसक दुष्कर कर्म करके ; हे राजेन्द्र ! अन्ती देश के राजा रणदुर्मद महाधनुर्धर जय की चेष्टा करते है, इसलिए आप उनको दोष । पिन्द और अनुविन्द दोनों इरावान् को देखकर उनके 721 ४४०२ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व । विव्याध निशितैस्तूर्णं शरैः सन्नतपर्वभिः तावेनं प्रत्यविध्येतां समरे चित्रयोधिनी युध्यतां हि तथा राजन्विशेषो न व्यदृश्यत । यततां शत्रुनाशाय कृतप्रतिकृतैपिणाम् ॥ १५ ॥ इरावांस्तु ततो राजन्ननुविन्दस्य सायकैः चतुर्भिश्चतुरो वाहाननयद्यमसादनम् ॥ १६ ॥ भल्लाभ्यां च सुतीक्ष्णाभ्यां धनुः केतुं च मारिप । चिच्छेद समरे राजस्तदद्भुतमिवाऽभवत् ॥ १७॥ त्यक्त्वाऽनुविन्दोऽथ रथं विन्दस्य रथमास्थितः । धनुर्गृहीत्वा परमं भारसाधनमुत्तमम् ॥ १८॥ तावकस्थौ रणे वीरावावन्त्यौ रथिनां वरौ । शरान्मुमुचतुस्तूर्णमिरावति महात्मनि ताभ्यां मुक्ता महावेगाः शराः काञ्चनभूषणाः । दिवाकरपथं प्राप्य च्छादयामासुरम्वरम् ॥ २० ॥ इरावांस्तु रणे क्रुद्धौ भ्रातरौ तौ महारथौ ववर्ष शरवर्पण सारथिं चाऽप्यपातयत् ॥ २१ ॥ तस्मिंस्तु पतिते भूमौ गतसत्वे तु सारथौ रथः प्रदुद्राव दिशः समुद्भान्तह्यस्ततः ॥ २२ ॥ तौ स जित्वा महाराज नागराजसुतासुतः पौरुपं ख्यापयंस्तूर्णं व्यधमत्तव वाहिनीम् ॥ २३ ॥ सन्मुग्व आये । वे वीर घोर युद्ध करने लगे । इगवान् था । युधामन्यु ने चार वाणी से अनुविन्द के चारो ने कुपित होकर उन देयम्पी दोनों भाइयों को तीक्ष्ण घोडे मारकर दो भल्ल बाणो से उनका ध्वज और धनुष बाणों मे घायल किया । चित्र-युद्ध में निपुण उन काट डाला । यह अद्भुत कर्म जान पड़ा । तब अनु- दोनों भाटयों ने भी इरान् को अनेक बाण मारकर विन्द अपना रथ छोडकर विन्द के रथ पर चले गये। घायल कर टाला ॥११॥१५॥ शनुग्ध की कामना उन्होंने दृमरा दृढ धनुष हाथ मे लिया एक ही रथ से यत्नपूर्वक उन लोगो ने एमा युद्ध किया कि देखन पर स्थित दोनो भाई धीर इरावान् के ऊपर शीघ्रगामी चकित रह गये । जो कार्य एक वीर करता था और तीक्ष्ण वाण बरमाने लंग ॥१५॥१९॥ उनके वही, उमके उत्तर में, दृमग भी करता था । किमी चलाये हुए मुवर्णभूषित वाणो ने आकाग मे जाकर के पराक्रम में कुछ भी विशेषता नहीं देय पडनी मूर्यमण्टल को छिपा लिया । इरानान् ने भी कुपित ।
अध्याय ८३ ] म हा मा र त [ ५४०३ - सा वध्यमाना समरे धार्तराष्ट्री महाचमूः वेगान्बहुविधांश्चक्रे विषं पीत्वेव मानवः ॥ २४ ।। हैडिम्बो राक्षसेन्द्रस्तु भगदत्तं समाद्रवत् रथेनाऽऽदित्यवर्णेन सध्वजेन महावलः ॥२५॥ ततः प्राग्ज्योतिपो राजा नागराजं समास्थितः। यथा बज्रधरः पूर्व संग्रामे तारकामये ॥ २६॥ तत्र देवाः सगन्धर्वा ऋषयश्च समागताः विशेषं न स्म विविदुहडिम्बभगदत्तयोः ॥ २७॥ यथा सुरपतिः शक्रस्त्रासयामास दानवान् तथैव समरे राजा द्रावयामास पाण्डवान् ॥ २८॥ तेन विद्राव्यमाणास्ते पाण्डवाः सर्वतोदिशम् । त्रातारं नाऽभ्यगच्छन्तः खेष्वनीकेषु भारत ॥ २९॥ भैमसेनि रथस्थं तु तत्राऽपश्याम भारत शेपा विमनसो भूत्वा प्राद्रवन्त महारथाः ॥ ३० ॥ निवृत्तेषु तु पाण्डूनां पुनः सैन्येषु भारत आसीनिष्टानको घोरस्तव सैन्यस्य संयुगे ॥ ३१ ॥ घटोत्कचस्ततो राजन्भगदत्तं महारणे शरैः प्रच्छादयामास मेहं गिरिमिवाऽम्बुदः ॥ ३२ ॥ होकर उन दोनो भाइयो पर बाण नरमाय और उनके । घटोच के मन्मुग्व आये ॥२४।२६॥ समर देखने सारथी को मार डाला । जग सारथा मर गया तर आये हुए देवताआ. गधों ओर ऋपियों ने देग्या घोड़े रथ को लेकर इधर उपर भागने लगे। उन दोनो कि घटोत्कच आर भगदत्त मे कोई किमी से कम भाइयो को विमुख करके इरावान् अपना पार प दिखाते पराक्रम नहीं प्रकट कर रहा था। जैसे इन्द्र ने दानवों हुए आपकी सेना को नष्ट करने लगे ॥२०२३] को भयभीत कर दिया था वैसे ही राजा भगदत्त युधामन्यु के प्रहारो मे पीडित होकर दुर्योधन की ने पाण्डवसेना को भयभीत करके भगा दिया। पाण्डयो महासेना, विष पिये हुए मनुष्य की भान्ति, उद्भ्रान्त नी सेना इस प्रकार भयभीत होकर अपनी रक्षा करने होकर इधर-उधर फिरने लगी। इधर महापराक्रमा वाला कोई न देख,भागने लगी॥२७/२९|| हे राजेन्द्र ! घटो कच मूर्यवर्ण घजा से मोभित रथ पर वठार उस समय हमने भगदत्त के सन्मुख केवल घटोत्कच भगदत्त से युद्ध करने के लिए दौड़ा। जसे पहले को ही देख पाया । शेष महारथी उन्साहहीन होकर तारकामय-युद्ध में वनपाणि इन्द्र ऐरारत पर चढ़कर भाग पडे हुए थे। पाण्डयों की सेना घटोत्कच को शोभित हुए थे, वैसे ही भगदत्त गजराज पर चढकर देखकर फिर लाट पड़ा । आपनी सेना में घोर गोला.
४४०४ ] म हा भा रन [ भीष्मपर निहत्य ताहारान्राजा राक्षसस्य धनुश्च्युतान् । भैमसेनि रणे तूर्णं सर्वमर्मस्वताडयत् ॥ ३३ ॥ स ताड्यमानो बहुभिः शरैः सन्नतपर्वभिः न विव्यथे राक्षसेन्द्रो भिद्यमान इवाऽचलः ॥३४॥ तस्य प्राग्ज्योतिपः क्रुद्धस्तोमरांश्च चतुर्दश प्रेषयामास समरे तांश्चिच्छेद स राक्षसः ॥३५॥ स तांश्छित्वा महावाहुस्तोमरान्निशितैः शरैः । भगदत्तं च विव्याध सप्तत्या कङ्कपत्रिभिः ॥३६॥ ततः प्राग्ज्योतिपो राजा प्रहसन्निव भारत तस्याऽश्वांश्चतुरः संग्व्ये पातयामास सायकैः ॥ ३७ ॥ स हताश्वे रथे तिष्ठन्राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् शक्तिं चिक्षेप वेगेन प्राग्ज्योतिषगजं प्रति ॥ ३८॥ तामापतन्ती सहसा हेमदण्डा सुवेगिनीम् त्रिधा चिच्छेद नृपतिःसा व्यकीर्यत मेदिनीम् ॥ ३९ ॥ शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा हैडिम्बः प्राद्रवद्भयात् यथेन्द्रस्य रणात्पूर्व नमुचिर्दैत्यसत्तमः ॥ ४० ॥ तं विजित्य रणे शूरं विक्रान्तं ग्व्यातपौरुषम् । अजेयं समरे वीरं यमेन वरुणेन च ॥४१॥ पाण्डवीं समरे सेनां सम्ममर्द म कुन्नरः यथा वनगजो राजन्मृद्श्चरति पद्मिनीम् ॥ १२ ॥ हर मच गया । पर्वत के ऊपर तरस रहे मेघ की चाण भगदत्त को मार । उन्होंन हमते हँसते वाणों भान्ति घटोनच भगदत्त के ऊपर ताक्ष्ण माण रमाने से घटोक्च के चारों घाडा को मार डाला। बिना लगा ॥३०॥३२॥ राजा भगदत्त ने घोत्कच के प्राणों । घोडा के रथ पर मे घटाफच ने भगदत्त के हाथा को काटार उमफे मर्मस्थल मे ई वाण मार । जमे को एक दारुण शक्ति मारा । भगदत्त ने उस सुवर्ण- तोडे जाने पर भा पर्वत पिनरित नहीं होता मे हा दण्ट गोभित शक्ति को आते दग्खकर उसके तीन घटोच्च अनेक वाणो की चौट ग्यार भी विचरित , टुकडे कर दारे । यह शक्ति क्ट कुटकर पृथ्वी पर नहीं हुआ । भगदत्त ने युद्ध होकर घोपच यो गिर पडा ॥३६॥३९|| पहले दानवराज नमुचि जैसे चौदह तोमर मारे ॥३३॥३५॥ उमने बात का पान युद्ध से भाग खड़ा हुआ था यमे हा शक्तिको व्यर्थ में उन तोमरों को काट डाटा और क्यनयुक्त मत्तर देखकर घटो कच भय के मार भाग ग्वडा हुआ | - अध्याय ८३ । म हा भारत { १४०५ । - मडेश्वरस्तु समरे यमाभ्यां समसज्जत स्वनीयो छादयाश्चक्रे शरौघैः पाण्डुनन्दनौ ॥४३॥ सहदेवस्तु समरे मातुलं दृश्य सङ्गतम् अवारयच्छरौघेण मेघो यद्वदिवाकरम् ॥४४॥ छाद्यमानः शरोघेण हृष्टरूपतरोऽभवत् तयोश्चाऽप्यभवत्प्रीतिरतुला मातृकारणात् ॥४५॥ ततः प्रहस्य समरे नकुलस्य महारथः अश्वांश्च चतुरो राजश्चतुर्भिः सायकोत्तमैः प्रेषयामास समरे यमस्य सदनं प्रति हताश्वात्तु रथातूर्णमवप्लुत्य महारथः ॥४७॥ आरुरोह ततो यानं भ्रातुरेव यशस्विनः एकस्थौ तु रणे शूरौ दृढे विक्षिप्य कार्मुके ॥४८॥ मद्रराजरथं तूर्णं छादयामासतुः क्षणात् स च्छाद्यमानो वहुभिः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥४९॥ स्वत्रीयाभ्यां नरव्याघ्रो नाऽकम्पत यथाऽचलः। प्रहसन्निव तां चाऽपि शस्त्रवृष्टिं जघान ह ॥ ५० ॥ सहदेवस्ततः क्रुद्धः शरमुगृह्य वीर्यवान् मद्रराजमभिप्रेक्ष्य प्रेषयामास भारत स शरः प्रेपितस्तेन गरुडानिलवेगवान मद्रराजं विनिर्भिद्य निपपात महीतले ॥ ५२ ॥ दुर्जय महावली घटोकच को पराजित कर, जङ्गली शल्य अपने भानजो का पराक्रम देखकर बहुत प्रसन्न हाथी जैसे कमलपन को रौंदता फिरे से ही, भगदत्त हुए, और माता के सम्बन्ध का विचार करके नकुल- हाथी से और बाण के प्रहार से पाण्डवसेना को नष्ट महदेव को भी हर्प हुआ ॥४३॥४५॥ फिर महारथी करते हुए विचरने रगे ॥४०॥४२॥ हे महाराज ! शल्य ने हँसकर नकुट के रथ के चारों घोड़ों को इयर मद्रराज शल्य अपने भानजे नकुल-सहदेव से युद्ध मार डाला । महारथी नकुट उस विना घोड़ी के रथ करने लगे। उन्होने बाणवी करके उनको आच्छादित । से कूदकर सहदेव के रथ पर चले गये । तर ये दोनो कर दिया। मातुल शल्य को युद्ध करते देग्यकर भाई एक ही रथ पर सवार होकर, क्रोधपूर्वक शल्य सहदेव ने अपने बाणों से वैसे ही उन्हें छा लिया जैमे के रथ पर असर य वाण बरसाने लगे ॥४६॥४९॥ मेध मूर्य को छिपा लेते हैं । बाणजाल में डिपे हुए , भानजो के बाणों से आच्छन्न होकर भी पुरुषसिंह - ।
४४०६ म हा भा र त [ भीष्मपर्व - । स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थे महारथः निषसाद महाराज कश्मलं च जगाम ह तं विसंज्ञं निपतितं सूतः सम्प्रेक्ष्य संयुगे अपोवाह रथेनाऽऽजौ यमाभ्यामभिपीडितम् ॥ ५४ ॥ दृष्ट्वा महेश्वररथं धार्तराष्ट्राः पराङ्मुखम् सर्वे विमनसो भूत्वा नेदमस्तीत्यचिन्तयन् निर्जित्य मातुलं संख्ये माद्रीपुत्रौ महारथौ दध्मतुर्मुदितौ शङ्खौ सिंहनादं च नेदतुः ॥ ५६॥ अभिदुद्रुवतुर्दृष्टौ तव सैन्यं विशाम्पते यथा दैत्यचमूं राजन्निन्द्रोपेन्द्राविवाऽमरौ ॥ ५७॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्वन्द्वयुद्धे त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ।। शल्य पर्वत के समान अटल खड़े रहे और हँस-हँस भारत ! आपके पक्ष की सेना इस प्रकार शल्य को कर उन बाणों को काटने लगे। सहदेव ने क्रुद्ध होकर समर से हटने देखकर समझी कि अब शल्य जीवित एक चमकीला उग्र वण निकालकर शल्य के वक्षः नहीं हैं । महारथी नकुल-सहदेव इस प्रकार मातुल स्थल में मारा। यह तीक्ष्ण बाण शल्य के हृदय को को मे पराजित कर प्रसन्नतापूर्वक शङ्खध्वनि विदारण करके पृथ्वीतल में प्रवेश हो गया ॥४९॥ और सिंहनाद करने लगे। हे राजेन्द्र ! जैसे इन्द्र और ५२॥ उस प्रहार से बहुत घायल और व्यथित होने उपेन्द्र ने दैन्य-मेना को भगा दिया था वैसेही नकुल- के कारण शल्य मूठित होकर गिर पड़े। उनका सहदेव आपकी मेनाको नष्ट करनेटगे॥५३३५७|| सारथी उनके रथ को समरभूमि से ले भागा। हे भीष्मपर्व का तिरासीवा अध्याय समाम हुआ ॥ ८३ ॥ अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥ सञ्जय उवाच-ततो युधिष्ठिरो राजा मध्यं प्राप्ते दिवाकरे श्रुतायुपमभिप्रेक्ष्य प्रेपयामास वाजिनः अभ्यधावत्ततो राजा श्रुतायुपमरिन्दमम् विनिमन्सायकैस्तीक्ष्णैर्नवभिनतपर्वभिः स संवार्य रणे राजा प्रेपितान्धर्मसूनुना शरान्सप्त महेष्वासः कौन्तेयाय समार्पयत् ॥ ३ ॥ चांगसी अन्याय ॥ ८४ ॥ सजय ने कहा--हे महागज ! मयंटव जब युधिष्टिर श्रुतायुप् के समीप अपना रथ ले गये । आमाश के मध्य में आय, मध्याद होगया, तर धर्मगन युधिष्ठिर ने श्रुतायुप को नर वाण मारे। उन बाणों से - ।
अव्याय ८१] म हा भारत पपुः - ते तस्य कवचं भित्वा शोणितमाहवे असूनिव विचिन्वन्तो देहे तस्य महात्मनः पाण्डवस्तु भृशं क्रुद्धो विद्धस्तेन महात्मना रणे वराहकर्णेन राजानं हृद्यविध्यत अथाऽपरेण भल्लेन केतुं तस्य महात्मनः रथश्रेष्ठो रथातूर्णं भूमौ पार्थो न्यपातयत् केतुं निपतितं दृष्ट्वा श्रुतायुः स तु पार्थिवः पाण्डवं विशिस्तीक्ष्णे राजन्धिव्याध सप्तभिः॥ ७ ॥ ततः क्रोधात्प्रजज्वाल धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः यथा युगान्ते भूतानि दिधक्षुरिव पावकः कुद्धं तु पाण्डवं दृष्ट्वा देवगन्धर्वराक्षमाः प्रविव्यथुमहाराज व्याकुलं चाऽप्यभूजगत् सर्वेषां चैव भृतानामिदमासीन्मनोगतम् त्रील्लोकानद्य संकुद्धो नृपोऽयं धक्ष्यतीति वै ॥ १० ॥ ऋपयश्चैव देवाश्च चक्रुः स्वस्त्ययनं महत् लोकानां नृप शान्त्यर्थं क्रोधिते पाण्डवे तदा ॥ ११ ॥ स च क्रोधसमाविष्टः सृक्षिणी परिसंलिहन् । दधाराऽऽत्मवपुर्घोर युगान्तादित्यसन्निभम् ॥ १२ ॥ ततः सैन्यानि सर्वाणि तावकानि विशाम्पते । निराशान्यभवंस्तत्र जीवितं प्रति भारत अपनी रक्षा करके श्रुतायुप ने मान नाण युधिष्टिरको हो उठता है बमगजा युधिष्ठिर नाधय। अनि मोर ।। वाण क्यच नाडकर उनके गागर में प्रपा मेजर टंट। उनको युपिन देगार प्रय मा आगला होकर उनका गम पीने लगे ॥१४॥ ऐमा जान में देना, गर्म, राक्षम आदि उदिन । उट, माग पड़ा, मानों वे उनके प्राणी मोमोज रहे हैं। धर्मगन नगत व्यतु । गया । उन मन या मनमा कि ने श्रुतायुग के प्रहार मे व्यथित होकर कयरा वर्ण आज गना युधिष्टिा पुरिन र नाना गंगको ण उनमें हृदय में माग, और एक मल्ल याग में मामकर डांग | मरोरा या रच्ययामना उनकापना गाटार गिग दा1 श्रुतायुग्ने पिर गुधि- । और युधिष्ठिर के योर या गाना पिया गि से बहुत तीक्षण मात याग मरे। युगानराः गिनि सम्पयन-पाट जाने 1-18|| शामिल अनिमें प्राणियों को जगने के लिए प्रमाग ! अष्ट गुप्रिया रे ग या मा पहर मनि ४४०८ ] म हा भा र त [ भीष्मपव - । wwwimarwarimaal - । । स तु धैर्येण तं को सन्निवार्य महायशाः श्रुतायुपः प्रचिच्छेद मुष्टिदेशे महाधनुः ॥ १४ ॥ अथैनं छिन्नधन्वानं नाराचेन स्तनान्तरे निर्विभेद रणे राजा सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥ १५ ॥ सत्वरं च रणे राजन्तस्य वाहान्महात्मनः निजघान शरैः क्षिप्रं सूतं च सुमहावलः ॥ १६ ॥ हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा दृष्ट्वा राज्ञोऽस्य पौरुपम् । विप्रदुद्राव वेगेन श्रुतायुः समरे तदा ॥१७॥ तम्मिञ्जिते महेष्वासे धर्मपुत्रेण संयुगे दुर्योधनवलं राजन्सर्वमासीत्पराङ्मुखम् ॥ १८ ॥ एतत्कृत्वा महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः व्यात्ताननो यथा कालस्तव सैन्यं जघान ह ॥ १९ ॥ चेकितानस्तु वार्ष्णेयो गौतमं रथिनां वरम् प्रेक्षतां सर्वसैन्यानां छादयामास सायकैः ॥ २० ॥ सन्निवार्य शरांस्तांस्तु कृपः शारद्वतो युधि चेकितानं रणे यत्तं राजन्विव्याध पत्रिभिः अथाऽपरेण भल्लेन धनुश्चिच्छेद मारिप सारथिं चाऽम्य समरे क्षिप्रहस्तो न्यपातयत् ॥ २२ ॥ अश्वांश्चाऽस्याऽवधीद्राजन्नुभौ तौ पाणिसारथी। सोऽवप्लुत्य रथातूर्णं गदां जग्राह सात्वतः ॥ २३ ॥ धारण करके, मोध मे नंगे को सलाम करके, होठ मी सना शाघ्रता के माथ इधर उधर भागने लगी। चगने लगे । यह देगका कौरपक्षमागे ने जाग्न मुग्प पाये हुए काल के ममान युधिष्ठिर को आत की आमा छोड़ दी । किन्तु इसके उपरान्त धर्मराज देखकर मेना भागा आर वे चुन चुनकर प्रधान पीरों युधिष्टिर ने धर्य का आश्रय कर कोर को यान्न यो माग्ने ग॥१३॥१०॥ उधर महारथी चस्निान दिया। उन्होंने ध्रुतायुर का धनुष काट डाग, माग्या अपनी मना महन पाचार्य मे युद्ध करने लगे। आर शादी को मार दाग और मन मेना के मन्मुग्य उन्होंने कृपाचार्य के उपर अमाग बाण यरमाये । यक्ष में एक नागर याण माग । युधिष्टिर सा कृपाचार्य ने भी उन वाणी को काटकर अपने याणी मा पासा देगार गम मे उनपर श्रुतायुष भाग में चेग्निान की पायल कर दिया। वार वृपाचार्य गई हए । उनी य" दना देगका गना दुर्योधन ने एक भल बाण में चेकितान का धनुष काट - अध्याय ८४ म हा भा र त स तया वीरघातिन्या गदया गदिनां वरः गौतमस्य हयान्हत्वा सारथिं च न्यपातयत् ॥ २४ ॥ भूमिष्ठो गौतमस्तस्य शरांश्चिक्षेप पोडश शरास्ते सात्वतं भित्वा प्राविशन्धरणीतलम् ॥२५॥ चेकितानस्ततः क्रुद्धः पुनश्चिक्षेप तां गदाम् । गौतमस्य वधाकांक्षी वृत्रस्येव पुरन्दरः ॥ २६॥ तामापतन्ती विमलामश्मगर्भा महागदाम् शरैरनेकसाहौरियामास गौतमः ॥ २७ ॥ चेकितानस्ततः खड्गं क्रोधादुद्धृत्य भारत लाघवं परमास्थाय गौतमं समुपाद्रवत् ॥ २८॥ गौतमोऽपि धनुस्त्यक्त्वा प्रगृह्याऽसिं सुसंयतः । वेगेन महता राजंश्चेकितानमुपाद्रवत् ॥ २९ ॥ तावुभौ वलसम्पन्नौ निस्त्रिंशवरधारिणी निस्त्रिंशाभ्यांसुतीक्ष्णाभ्यामन्योन्यं सन्ततक्षतुः॥ ३० ॥ निस्त्रिंशवेगाभिहतो ततस्तौ पुरुपर्पभो धरणीं समनुप्राप्तौ सर्वभूतनिषेविताम् मूर्छयाऽभिपरीताङ्गौ व्यायामेन तु मोहितो ततोऽभ्यथावद्वेगेन करकपः सुहृत्तया ॥ ३२ ॥ चेकितानं तथा भूतं दृष्ट्वा समरदुर्मदः रथमारोपयञ्चैनं सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥ ३३ ॥ डाला, दूसरे से सारथी यो मार डाला आर अन्य चाणो हुए ये बम हा चेक्निान ने क्रोधक कृपाचार्य को से उनके घोड़ो को और पार्श्वरक्षक तथा सारथी को मारने के लिए गदा चलाई । पृपाचार्य ने वर्ड मान्न मार डाला ॥२०॥२४॥ता पितान ने बदा म्फर्ति बाण मारकर उम भारी गदा को निष्कर का दिया के साथ रथ पर मे उतरकर, वीर-घानिनी गटायर, ॥२५॥२७॥ ता क्रोध करके चेक्निान ने नयार कृपाचार्य के घोदो महित रथ ओर मारी योटिन- निकाली, आर पाचार्य को और रंग मे दी। मिन्न कर दिया । अब कृपाचार्य ने पृथ्वी पर पड़े- कृपाच, ये भी धनुर छोड़कर गहा हाय मेलेका न गड़े मोलह वाण चेकितान को मारे । रे बाण पक बड़े ग मे चेकितान की ओर दौड़े। दोनो वीर चेकितान के शरीर को भेदते हुए पृथ्वी में प्रश परम्पर पर वारकर पायद जम्ने गगे ॥२८१३०] हो गये । इन्ट जमे वृत्रासुर को मारने के रिए उद्यन अन्न को युद्ध सग्ने करने विश्रन्न होकर प्रहारों में [ भष्मपर्व म हा भारत - ४४१० । तथैव शकुनिः शूरः स्यालस्तव विशाम्पते आरोपयद्रथं तूर्णं गौतमं रथिनां वरम् ॥३४॥ सौमदत्तिं तथा क्रुद्धो धृष्टकेतुर्महाबलः नवत्या सायकैः क्षिप्रं राजन्विव्याध वक्षसि ॥ ३५॥ सौमदत्तिरुरःस्थैस्तै शं वाणैरशोभत मध्यन्दिने महाराज राश्मिभिस्तपनो यथा ॥ ३६॥ भूरिश्रवास्तु समरे धृष्टकेतुं महारथम् हतसूतयं चके विरथं सायकोत्तमैः ॥३७॥ विरथं तं समालोक्य हताश्वं हतसारथिम् महता शरवर्षेण च्छादयामास संयुगे ॥ ३८ ॥ स तु तं रथमुत्सृज्य धृष्टकेतुर्महामनाः आरुरोह ततो यानं शतानीकस्य मारिप ॥३९॥ चित्रसेनो विकर्णश्च राजन्दुर्मर्पणस्तथा रथिनो हेमसन्नाहाः सौभद्रमभिदुद्रुवुः अभिमन्योस्ततस्तैस्तु घोरं युद्धमवर्तत शरीरस्य यथा राजन्वातपित्तकफैस्त्रिभिः ॥११॥ विरथांस्तव पुत्रांस्तु कृत्वा राजन्महाहवे न जधान नरव्याघ्रः स्मरन्भीमवचस्तदा ॥ ४२ ॥ ततो राजा बहुशतैर्गजाश्वरथयायिभिः संवृतं समरे भीमं देवैरपि दुरासदम् ॥४३॥ घायल आर अचेत होकर, दोनो ही पृथ्वी पर गिर केतु के वाण लगने से, अपूर्व शोभा हुई। इसके पंडे । युद्धप्रिय भीमसेन अपने मित्र चेकितान की पश्चात् बहुत से वाण बरसाकर उन्होंने धृष्टकेतु के यह दशा देखकर सर सेना के आगे ही उन्हें अपने मारी ओर घे डो को मार डाला तथा रथ को तोड ग्य पर उठा रे गये | उपर आपके साले शूर शकुनि ने डाला । फिर अमाय बाणो से उन्ह भी छिपा दिया । भी श्रेष्ठ रथी कृपाचार्य को अपने रथ पर बिठा लिया ॥३५॥३८॥ धृष्टकेतु वह रथ छोडकर शतानीक के ॥३१॥३४॥ अ महावीर धृष्टकेतु ने वृद्ध होकर भूरि- रथ पर सवार हुए । मोने का करच पहने हुए रथी श्रया के हृदय में नये उग्र बाण मारे । जमे मध्याह्न चित्रसेन, विकर्ण और दुर्मर्पण, अभिमन्यु से युद्ध के समय मूर्य का मण्डल अपनी प्रचण्ट किरणो से करने लगे 1 जमे शरीर में पान, पित्त आर कफ का शोभा को प्राप्त होता है मे ही भूरिश्रया की, धृष्ट परस्पर युद्ध हो वसे ही ये तीनो वीर अभिमन्यु से अध्याय ८५ म हा भारत { ४४११ । na naman inn minn. । प्रयान्तं शीघ्रमुवीक्ष्य, परित्रातुं सुतांस्तव अभिमन्युं समुद्दिश्य बालमेकं महारथम् ॥४४॥ वासुदेवमुवाचेदं कौन्तेयः श्वेतवाहनः चोदयाऽश्वान्हपीकेश यत्रैते बहुला रथाः ॥४५॥ एते हि वहवः शूराः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः यथा हन्युन नः सेनां तथा माधव चोदय ॥४६ ॥ एवमुक्तः स वार्ष्णेयः कौन्तेयेनाऽमितौजसा । रथं श्वेतहयैर्युक्तं प्रेपयामास संयुगे निष्ठानको महानासीत्तव सैन्यस्य मारिप यदर्जुनो रणे क्रुद्धः संयातस्तावकान्प्रति ॥४८॥ समासाद्य तु कौन्तेयो राज्ञस्तान्भीप्मरक्षिणः । सुशर्माणमथो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥४९॥ जानामि त्वां युधां श्रेष्ठमत्यन्तं पूर्ववेरिणम् । अनयस्याऽद्य सम्प्राप्तं फलं पश्य सुदारुणम् ॥ ५० ॥ अद्य ते दर्शयिष्यामि पूर्वप्रेतान्पितामहान् एवं सञ्जल्पतस्तस्य वीभत्सोः शत्रुघातिनः ॥ ५१ ॥ श्रुत्वाऽपि परुपं वाक्यं सुशर्मा रथयूथपः न चैनमब्रवीत्किञ्चिच्छुभं वा यदि वाऽशुभम् ॥ ५२ ॥ . अभिगम्याऽर्जुनं वीरं राजभिडभिर्वृतः पुरस्तात्पृष्ठतश्चैव पार्श्वतश्चैव सर्वतः ॥ ५३ ॥ युद्ध करने लगे । अभिमन्यु ने उनके ग्य तो नष्ट । ॥४३।४६|| नब कृष्ण भगगन थंत घाड़ा संशोभित कर दिये, किन्तु भीममेन की प्रतिज्ञा का स्मरण ग्य को उधर ही ले चलं । ग्रुद्ध होकर मार अर्जुन करके उन्हें जीवित से रहित नहीं किया । इमी कारयो का मामना करने पहुँच गये । उन्हें आने समय अलौकिक तेजस्वी भीष्म पितामह, राजा दुर्यो- । देयकर कौरव पक्ष के योग्गण घोर भयमूचक शब्द धन आदि मत्र वीरों की रक्षा के लिए, बालक मेचीकार करने लगे ॥४७॥४८॥ भीष्म पितामह के अभिमन्यु से युद्ध करने चले। यह दंगकर अर्जुन वायट मे सुरक्षित राजाओं के पास पहुंचकर अर्जुन ने कहा है श्रीकृष्ण ! जहाँ पर ये बहुत मे ग्य न मुर्शमा में यहा- सुगर्मा ! तुम मेरे पहले के है वहीं पर शीघ्र मेरा रस ले चलो। वह देगी, मनु और रम मग्राम में प्रधान योद्धा हो । आज तुम आनी दुर्नीति का पर भोगेगे। तुमकां मृत पिन युदचतुर मव वीर पुरुष मेरी सेना को मार रहे है ।
४४१२ ] महाभा र त [ मा परिवार्याऽर्जुनं संख्ये तव पुत्रैमहारथः शरैःसञ्छादयामास मेघरिव दिवाकरम् ॥ ५४ ॥ ततः प्रवृत्तः सुमहान्संग्रामः शोणितोदकः तावकानां च समरे पाण्डवानां च भारत ॥ ५५ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सप्तमयुद्धदिवमे सुशर्मार्जुनसमागमे चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥८॥ से मिलने के लिए यमराज के यहाँ भेज दूंगा ॥४९।। तीक्ष्ण बाणों से --मेघ मे मूर्य के समान -अर्जुन ५१॥ये कठोर वचन सुनकर मुशर्मा ने कुछ उत्तर को आच्छन्न कर दिया। इसी प्रकार कौरवो और नहीं दिया। उन्होने आगे-पीछे और आसपास स्थित । पाण्डवों का परस्पर युद्ध होने लगा ॥५१॥५५॥ राजमण्डली के साथ मम्मुख जाकर, धनुप चढाकर, भीष्मपर्व का चौरासीवा अध्याय ममाप्त हुआ ।। ८४ ॥ ० अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥ सञ्जय उवाच-सताड्यमानस्तु शरैर्धनञ्जयः पदाहतो नाग इव श्वसन्वली। वाणेन वाणेन महारथानां चिच्छेद चापानि रणे प्रसह्य ॥ १ ॥ सञ्छिद्य चापानिचतानि राज्ञां तेपारणे वीर्यवतां क्षणेन । विव्याध वाणैर्युगपन्महात्मा निःशेषतां तेष्वथ मन्यमानः ॥ २ ॥ निपेतुराजौ रुधिरप्रदिग्धास्ते ताडिताः शक्रसुतेन राजन् । विभिन्नगात्राः पतितोत्तमाया गतासवश्छिन्नतनुत्रकायाः ॥ ३ ॥ महीङ्गताः पार्थवलाभिभूता विचित्ररूपा युगपद्विनेशुः । दृष्ट्वा हतांस्तान्युधि राजपुत्रांस्त्रिगर्तराजः प्रययौ रथेन ॥ ४ ॥ तेषां रथानामथ पृष्ठगोपा द्वात्रिंशदन्येऽभ्यपतन्त पार्थम् । तथैव ते तं परिवार्य पार्थं विकृप्य चापानि महारवाणि ॥ ५ ॥ अवीवृपन्वाणमहोघवृष्टया यथा गिरि तोयधरा जलौघः । संपीड्यमानस्तु शरोघवृष्टया धनञ्जयस्तान्युधि जातरोपः ॥ ६ ॥ पचामीवाँ अध्याय ॥ ८५॥ मन्नय कहते है है राजेन्द्र ! गजाओ के एकदम नष्ट कर टालने के लिए एक माथ अर्जुन ने बाणों में अयन्त पीदिन अर्जुन छेड़े हुए मर्प के मयको बाण मारे । इससे उन सबके कवच कट गये, ममान लम्चे श्वाम लेने हुए अद्भुत कर्म करने लगे। ये घायल हो गये और उन गानों में रक्त बहने लगा। उन्होंने ममी महागणियों के बाण काटने के पथात अनेकों के मिर कट गये। उनकी लाशे पृथ्वी पर अरपूर्वक मक्के धनुष काट टार । उन मयको गिरने गी ||१४|| गजकुमारों की मृत्यु देखकर
अध्याय ८५
४१३
पष्ट्या शरैः संयति तेलधौतर्जघान तानप्यथ पृष्टगोपान् ।
रथांश्च तांस्तानवजित्य संन्ये धनञ्जयः प्रीतमना यावी॥ ७ ॥
अथाऽस्वर-दीप्मवधाय जिष्णुलानि राजन्समरे निहत्य ।
त्रिगर्तराजो निहतान्समीक्ष्य महात्मना तानथ वन्धुवर्गान्॥ ८
रणे पुरस्कृत्य नराधिपांस्ताअगाम पार्थं त्वरितो वधाय ।
अभिद्रुतं चाऽस्त्रभृतांबरिष्टं धनञ्जयं वीक्ष्य शिखण्डिमुग्न्याः॥ ९ ॥
अभ्युद्ययुस्ते शितशस्त्रहस्ता रिरक्षिपन्तो रथमर्जुनस्य
पार्थोऽपितानापततःसमीक्ष्य त्रिगर्तराजासहितान्नृवीरान॥ १० ॥
विध्वंसयित्वा समरे धनुष्मान्माण्डीवमुक्तैर्निगिनः पृपत्तः ।
भीष्म यियासुर्युधि सन्ददर्श दुर्योधनं सैन्धवादीश्च राजः ॥ ११ ॥
संवारयिष्णूनभिवारयित्वा मुहूर्तमायोध्य वलेन वीरः
उत्स्सृज्य राजानमनन्तवीर्या जयद्रथादींश्च नृपान्महोजाः॥ १२ ॥
ययौ ततो भीमबलो मनस्वी गाङ्गेयमाजो शरचापपाणिः ।
युधिष्टिरश्च प्रचलो महात्मा समाययो चरितो जातकोपः॥ १३ ॥
मद्राधिपं समभित्यज्य संग्ये वभागमाप्तं तमनन्तकीर्तिः।
सार्धं समादीसुतभीमने पलं ययो शान्तनवं रणाय ॥ १४ ॥
नैः सम्पयुक्तः स महारथान्येनहासुतः समरे चित्रयोधी।
न विव्यथेशान्तनवोमहात्मासमागतेः पाण्डुसुतः समस्तः॥१५॥
[ भाष्मपत्र म हा भारत अथैत्य राजा युधि सत्यसन्धो जयद्रथोऽत्युग्रवलो मनखी। चिच्छेद चापानि महारथानां प्रसह्य तेयां धनुपा वरेण ॥ १६ ॥ युधिष्ठिरं भीमसेनं यमौ च पार्थं कृष्णं युधि सञ्जातकोपः। दुर्योधनः क्रोधविपो महात्मा जघान वाणैरनलप्रकाशैः ॥ १७ ॥ कृपेण शल्येन शलेन चैव तथा विभो चित्रसेनेन चाऽऽजो विद्धाःगरस्तेऽतिविवृद्धकोपैर्देवा यथा दैत्यगणैः समेतैः ॥ १८ ॥ छिन्नायुधं शान्तनवेन राजा शिखण्डिनं प्रेक्ष्य चजातकोपः। अजातशत्रुः समरे महात्मा शिखण्डिनं क्रुद्ध उवाच वाक्यम्॥ १९ ॥ उक्त्वा तथा त्वं पितुरग्रतो मामहं हनिप्यामि महावतं तम् । भीमशरोपविमलार्कवणः सत्यं वदामीति कृता प्रतिज्ञा ॥ २० ॥ त्वया च नैनां सफलां करोपि देवव्रतं यन्न निहंसि युद्धे । मिथ्याप्रतिनो भव माऽत्र वीर रक्षस्व धर्मस्वकुलं यशश्च ॥ २१ ॥ प्रेक्षस्व भीम युधि भीमवेगं सर्वांस्तपन्तं मम सैन्यसङ्घान् । शरोघजालेरतितिग्मगैः कालं यथा कालकृतं क्षणेन ॥ २२ ॥ निकृत्तचापः समरेऽनपेक्षः पराजितः शान्तनवेन चाऽऽजौ। विहाय बन्धूनथ सोदरांश्च क्व यास्यसे नाऽनुरूपंतवेदम् ॥ २३ ॥ दृष्ट्वा हि भीष्मं तमनन्तवीर्यं भग्नं च सेन्यं द्रवमाणमेवम् । भीतोऽसि नृनं द्रुपदस्य पुत्र तथा हि ते मुखवर्णोऽग्रहृष्टः॥ २४ ॥ गये । भ्य को माग्ना युधिष्टिर या । नार्य या, भर और निगन आदि ने भी धारण और पाण्डया परन्तु उन मगय गाय को दस अर्जुन की । चाग और गे ताण घाण मोर ॥१६.१८।। महायता के पि भाम के गन्मुग आ गये ॥२॥१३॥ पाण्टर और धारण नोप मे अधीर हो उठे । भीष्म घट महामी पाँची पाण्डर मिस पर माय मम ने गिगण्डी का धनुष याट टाग, इमम भयभीत हो में गुम यग्ने आय, गिन्तुद्धि में निपुण नाम कर रणभूमि मेष्टने रंग। उम ममय युपित होकर ननरी गभित ना र ॥१३॥१५॥ तन में युमिति ने शिमण्टामा ! तुम अग्ने गयम पगममा गायटरने या आकर, श्रेष्ट पिलाक अगे मुझमे या प्रतिज्ञा र चुके कि अनुरा, मर पाण्डकी क पना "मगणनीण गाणी में भीष्म पितामा यो मांगा। पाट टा। प्रारम अगागा दमन, अग्नि या पाना।" किम ममम मुरम मा न यारा पुष्टि अना ननिता मो नह। पूर्ण यांना या मर पश्य मी मर। नर गि ना माग अगानिस धर्म गुमानि STATER, श्री अपने मामा मंगे॥१०॥२१॥ देगी ' .
अध्याय ८५] म हा भारत अज्ञायमाने च धनञ्जयेऽपि महाहवे सम्प्रसक्ते नृवीरे । कथं हि भीष्मात्प्रथितः पृथिव्यां भयंत्वमद्य प्रकरोपिधीर ॥ २५ ॥ स धर्मराजस्य वचो निशम्य रुक्षाक्षरं विप्रलापानुवद्वम् । प्रत्यादेशं मन्यमानामहात्मा प्रतत्वरे भीमबधाय राजन्॥ २६ ॥ तमापतन्तं महता जवेन शिखण्डिन भीममभिद्रवन्तम् । निवारयामास हि शल्य एनमस्त्रेण घोरेण सुदुर्जयेन ॥ २७ ॥ स चाऽपि दृष्ट्वा समुदीर्यमाणमस्त्रं युगान्ताग्निसमप्रकाशम् । न सम्मुमोह द्रुपदस्य पुत्रो राजन्महेन्द्रप्रतिमप्रभावः ॥ २८ ॥ तस्थौ च तत्रैव महाधनुप्मान्शरैस्तदस्त्रं प्रतिवाधमानः । अथाऽऽददे वारुणमन्यदस्त्रं शिखण्ड्यथोयंप्रतिघातमस्य ॥ २९ ।। तदस्त्रमस्त्रेण विदार्यमाणं खस्थाः सुरा ददृशुः पार्थिवाश्च । भीपमस्तुराजन्समरे महारमा धनुश्च चित्रंध्वजमेव चाऽपि ॥ ३० ॥ छित्वाऽनदत्पाण्डुसुतस्य वीरो युधिष्ठिरस्याऽजमीढस्य राजः। ततः समुत्सृज्य धनुःसवाणं युधिष्ठिरं वीक्ष्य भयाभिभृतम्॥ ३१ ॥ गदां प्रगृह्याऽभिपपात संख्ये जयद्रथं भीमसेनः पदातिः । तमापतन्तं सहसा जवेन जयद्रथः सगदं भीमसेनम् ॥ ३२ ॥ काल जसे क्षण भर में जगत् का सहार करता है के लिए आग बढे । उधर शल्य ने दुर्जय अमोघ वैमे ही भयानक वेग से तीक्ष्ण बाण वामाकर पिता अस्त्र का प्रयोग करके उन्हें मध्य में ही रोक लिया। मह मेरी मेना का सहार कर रहे हैं । इम समय प्रल्यकाल की अग्नि क ममान प्रकाशपूर्ण अप को धनुष कट जाने पर समर मे हटकर, भीष्म से परा देखकर इन्द्रतुम्य पराक्रमी शिग्राण्डी ननिक भी विच- जित होकर, बन्धुओं और भाइयों को छोड़कर तुम लित नहीं हुए । शिग्मण्डी ने वहीं पड़ रहकर अनेक महाँ जा रहे हो। यह कार्य तुम्हार योग्य नहीं है। याणी मे उम अख को व्यर्थ कर दिया। उन्होंने द्रुपदपुत्र! तुम अनन्तपराक्रमी भीम का पराक्रम शन्य के अत्र को व्यर्य करने के लिए वारण-अन्य और अपनी सेना का भागना देवकर भयभीत हो मा प्रयोग किया । आकाश में स्थित दंगण और गये हो। तुम्हाग मुग्य मन्द देवि पड़ता है । घोर पृथ्वी पर गजा टोग यह अम्र के दाग अब या गेका युद विड़ा हुआ है, अर्जुन कहीं पीछे है । ऐमे ममय जाना देगने लगे ॥२६॥३०॥ उधर पिनामह भीम प्रमिद वीर होकर तुम भीष्म में क्या भयभीत हो ने गना युधिष्ठिर का धनुष और विचित्र पत्रकार रहे हो ॥२२॥२५|| धर्मराज के प्रेमे गे और कर मिहनाद किया । भीममेन ने जब युधिष्टिरको निरस्कार-पूर्ण वचन सुनकर वीर शिरपण्डी भीष्म-वध भयपादित देणा तर ये धनुष-बाण छोड़कर, ना के लिए, पूर्ण शक्ति लगाकर, चटा करने रगे। हाय में लेकर, पैदल ही जपद्रय के ऊपर मटे। शिरण्डी बड़े वेग के साथ भीम पर आक्रमण करने गदा यि भीममेन योगटार आने देगार जयटर 1 [ भीमपत्र म हा भा र त ४४१६ विव्याध घोरैर्यमदण्डकल्पैः शितैः शरैः पञ्चशतैः समन्तात्। अचिन्तयित्वा स शरांस्तरस्वी वृकोदरः क्रोधपरीतचेताः ॥ ३३ ॥ जधान चाहान्समरे समन्तात्पारावतान्सिंधुराजस्य संख्ये । ततोऽभिवीक्ष्याऽप्रतिमप्रभावस्तवाऽऽत्मजस्त्वरमाणोरथेन॥ ३४ ॥ अभ्याययौ भीमसेनं निहन्तुं समुद्यतास्त्रो सुरराजकल्पः। भीमोऽप्यथैनं सहसा विनय प्रत्युद्ययौ गदया तर्जयानः ॥ ३५ ॥ समुद्यतां तां यमदण्डकल्पां दृष्ट्वा गदांते कुरवः समन्तात् । विहाय सर्वे तव पुत्रमुग्रं पातं गदायाः परिहर्तुकामाः ॥ ३६ ॥ अपक्रान्तास्तुमुले सम्प्रमः सुदारुणे भारत मोहनीये । अमूढचेतास्त्वथ चित्रसेनो महागदामापतन्ती निरीक्ष्य ॥ ३७॥ रथं स्वमुत्सृज्य पदातिराजौ प्रगृह्य खई विपुलं च चर्म । अवप्नुतः सिंह इवाऽचलायाजगामाऽन्यं भूमिप भूमिदेशम्॥ ३८ ॥ गदाऽपि साप्राप्य रथं सुचित्रसाश्वं ससूतं विनिहत्य संख्ये। जगाम भूमिज्वलिता महोल्काभ्रष्टाऽम्बरादामिव सम्पतन्ती॥३९॥ आश्चर्यभृतं सुमहत्वदीया दृष्ट्वैव तद्भारत सम्प्रहृष्टाः सर्वे विनेदुः सहिताः समन्तात्पुपूजिरे तव पुत्रस्य शौर्यम् ॥ ४० ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपवणि सप्तमयुददिबसे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ।। ८५ ॥ ने यमदण्ड-तुल्य तीक्ष्ण पाँच सौ बाण मारे । उन यह गदा गिरने के पहले ही चित्रसेन ढाल-तलवार वाणों का कुछ विचार न करके कुपित भीमसेन ने लेकर, पर्वत-शिरवर से कूदते हुए सिंह की तरह, जयद्रथ के बढिया घोड़ा को गठा मे मार डाला ॥३० निर्भय भाव मे रथ मे कूद पडे । हे महाराज ! दुर्यो- ३४॥ तब इन्द्रतुल्य राजकुमार चित्रमेन भीमसेन को धन आदि वीरगण चित्रमेन की इम विचित्र चातुरी मारने के लिए शस्त्र उठाकर वेग मे दौडे। भीममेन को देखकर बहुत प्रमन्न हुए। वे मिहनाद करने भी एकाएक मिहनाद करके गदा घुमाते हुए चित्रमेन और आपके पुत्र की शूरता को सराहने लगे। वह पर झपटे । कारवपक्ष के वीर उम यमदण्टतुल्य गढा गदा उस विचित्र रथ पर गिरकर घोड़े, सारथी और को देखकर उसके उग्र प्रहार मे बचने के लिए, ग्य को चूर चूर करके, आकाश से गिरी हुई भारी आपके पुत्र चित्रमन को छोड़कर, भाग पड़े हुए । उल्का की तरह, वेग मे पृथ्वी में घुम गई ॥३५॥४०॥ भीष्मपर्व का पचासीवाँ अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ८५ ॥ अप पटशतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥ मन्नय उयान-विरथं तं समासाद्य चित्रसेनं यशस्विनम् रथमारोपयामास विकर्णस्तनयस्तर ~~ RA.~ X अन्याय ८६ ] म हा भा र त [४४१७ । तस्मिंस्तथा वर्तमाने तुमुले संकुले भृशम् भीष्मः शान्तनवस्तूर्णं युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ २ ॥ ततः सरथनागाश्वा समकम्पन्त स्मृञ्जयाः मृत्योरास्यमनुप्राप्तं मेनिरे च युधिष्ठिरम् ॥ ३ ॥ युधिष्ठिरोऽपि कौरव्यो यमाभ्यां सहितः प्रभुः । महेष्वासं नरव्याघ्र भीम शान्तनवं ययौ ततः शरसहस्राणि प्रमुञ्चन्पाण्डवो युधि भीष्म सञ्छादयामास यथा मेघो दिवाकरम् ॥ ५ ॥ तेन सम्यक्प्रणीतानि शरजालानि मारिप प्रतिजग्राह गाङ्गेयः शतशोऽथ सहस्रशः तथैव शरजालानि भीष्मेणाऽस्तानि मारिप आकाशे समदृश्यन्त खगमानां वजा इव निमेपार्धेन कौन्तेयं भीष्मः शान्तनवो युधि । अदृश्यं समरे चक्रे शरजालेन भागशः ततो युधिष्ठिरो राजा कौरव्यस्य महात्मनः नाराचं प्रेपयामास क्रुद्ध आशीविपोपमम् असम्प्राप्तं ततस्तं तु क्षुरप्रेण महारथः चिच्छेद समरे राजन्भीपमस्तस्य धनुश्च्युतम् ॥ १० ॥ लियामाया अन्याय ।। ८६ ॥ माय ने कहा-- ---हे महाराज ! आपके पुत्र मर्य का विन्ध छिप जाता है । भीष्म ने युधिष्टिर विकर्ण ने मनस्वी चित्रमन का टूटा हुआ स्य देवकर, आदि के उन अमग्य बाणो पर कुल भी ध्यान नहीं शीघ्र यहाँ जाकर, उन्हें अपने ग्य पर बिठा दिया। दिया। ये युधिष्ठिर आदि पर अमग्य बाण बरमान उम भयानका मग्राम में भीष्म यीघ्रताक युधिष्टिर । लंग। वे वाण आकाश में उड़न तुप पक्षियों की और बंद । यह देगार सृञ्जयगण और उनक झुण्डो की तरह जान पड़ते थे॥७॥ भीम ने पल भने युधिष्ठिर को बाणों मे अश्य मा कर दिया। वाहन हाथी, घोड़े आदि भय के मारे कांप उंट। उन्होंने ममझ लिया कि युधिष्ठिर मृत्यु के मुम ना गजा युधिष्ठिर ने मोर ग अधीर होकर भीम पड़ गये है।।१३।। तर नकुल और महदेव के माश म्यय धर्मराज युधिष्ठिर महाधनुर्दर नग्श्रेष्ट भीम के महारसी भाम ने युगिरि के उम कानुन्य याण को मन्मुग जाकर बाण घरमाने लगे। उनके वागजाः में भीष्म का ही टिप गया अमे पनघटा में भूषणभूपिन घोड़ी को भी मार द्वारा । म - को पिर मर्ग के ममान एका नागर ग्राण मारा । मार्ग में ही याद डायः ॥८॥१०॥ और उनके मुवर्ण- ।
[ भाप्मपत्र ४४१८ ] म हा भा र त .-1 । तं तु च्छित्वा रणे भीप्मो नाराचंकालसम्मितम्। निजघ्ने कौरवेन्द्रस्य हयान्काञ्चनभूपणान् ॥ ११ ॥ हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः आरुरोह रथं तूर्णं नकुलस्य महात्मनः ॥ १२ ॥ यमावपि हि संक्रुद्धः समासाद्य रणे तदा शरैः सञ्छादयामास भीष्मः परपुरञ्जयः ॥ १३ ॥ तो तु दृष्ट्वा महाराज भीष्मवाणप्रपीडितो जगाम परमां चिन्तां भीष्मस्य वधकांक्षया ॥ १४ ॥ ततो युधिष्ठिरो वश्यान्राज्ञस्तान्समचोदयत् भीष्मं शान्तनवं सर्वे निहतेति सुहृद्गणान् ॥ १५ ॥ ततस्ते पार्थिवाः सर्वे श्रुत्वा पार्थस्य भापितम् । महता रथवंशेन परिवत्रुः पितामहम् स समन्तात्परिवृतः पिता देवव्रतस्तव चिक्रीड धनुपा राजन्पातयानो महारथान् ॥ १७ ॥ तं चरन्तं रणे पार्था ददृशुः कौरवं युधि मृगमध्यं प्रविश्येव यथा सिंहशिशुं वने ॥१८॥ तर्जयानं रणे वीरांस्त्रासयानं च सायकैः दृष्ट्वा त्रेसुमहाराज सिंह मृगगणा इव ॥ १९ ॥ रणे भारतसिंहस्य ददृशुः क्षत्रिया गतिम् अग्नेर्वायुसहायस्य यथा कक्षं दिधक्षतः ॥ २० ॥ युधिष्टिर म्फति में वह रथ छोडकर नकुल के स्य रथों के द्वारा चारो ओर से भीष्म को घेर लिया। पर चढ़ गये । शत्रुनाशन भीष्म को व मे विवल होकर, महावीर भीष्म अयन्त क्रुद्ध होकर, मण्डलाकार धनुष नकुल-महदेन के आगे जाफर, उन पर बाणा घुमाकर, बाण घरमाने और पाण्टरपक्ष के वीरो को करने रंग ॥११११३॥ नकुल और महादेव को भीष्म मार-मारकर गिगते हुए विचरने लगे ॥१६॥१७॥ के बागों में अयन्न पीड़ित देयकर राजा युधिष्टिर, उम ममय पाण्डमेना के वीर योद्धा लोग भीष्म को पिनाम के वर के एि. अ यन्त चिन्तित हो उठे। मृगों के मध्य सिंह के ममान देगकर भय के मार उन्होंने अपने पक्ष के मित्र रानाओ को आजादी अचेत मे हो गये । मृगो को मिह के ममान पाण्डा- किमय लोग मिकर पितामा को मार टा॥१४। मेना को मारते और भयभीत करते हुए भीष्म पितामह १५॥ या आग पाते ही मर गताओं ने अमाय मिहनाट कग्न रग । उनके नजन-गईन म मनुमना - .. .
अध्याय ८६ । म हा भारत { ४१० शिरांसि रथिनां भीष्मः पातयामास संयुगे तालेभ्यः परिपक्कानि फलानि कुशलो नरः ॥ २१ ॥ पतद्भिश्च महाराज शिरोभिर्धरणीतले वभूव तुमुलः शब्द पततामउमनामिव ॥ २२ ॥ नस्मिन्सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयानके सर्वेपामेव सैन्यानामासीद्वयतिकरो महान् ॥ २३ ॥ भिन्नेषु तेषु व्यूहेषु भत्रिया इतरेतरम् एकमेकं समाहूय युद्धायैवाऽवतस्थिरे ॥ २४ ॥ शिखण्डी तु समासाद्य भरतानां पितामहम् । अभिदुद्राव वेगेन तिष्ट तिप्टेति चाऽब्रवीत् ॥ २५ ॥ अनादृत्य ततो भीष्मस्तं शिखण्डिनमाहवे प्रययौ सृञ्जयान्क्रुद्धः स्त्रीत्वं चिन्त्य शिखण्डिनः ॥ २६ ॥ सृञ्जयास्तु ततो दृष्ट्वा हृष्टं भीष्मं महारणे सिहनादांश्च विविधांश्चः शहविमिश्रितान् ॥ २७ ॥ ततः प्रवृते युद्धं व्यतिपक्तरथद्विपम् पश्चिमां दिशमासाद्य स्थिते सवितरि प्रभो ॥२८॥ धृष्टद्युम्नोऽथ पाञ्चाल्य. सात्यकिश्च महारथः । पीडयन्तौ भृशं सैन्यं शक्तितोमरवृष्टिभिः ॥ २९ ॥ भागने गा । भत्रिया ने देखा कि सूखा हुइ घास के उससे युद्ध करन लगा ॥२१॥२४॥ द्रुपद के पुत्र ढेर को या उन को वायु का महायना में प्रचण्ट शिग्वण्डा भाप्म मे ' ठहरो टहरो" कहकर उनका अग्नि जसे नाता ह म हा भाष्म पितामह सेना और दाड़े । महागीर भीष्म शिवण्डा क स्त्रीभार पर को नष्ट करते हुए फिर रहे हैं ।।१८।२०।। सुनिपुण विचार करस उह ठाडकर सृञ्जयगण की आर युद्ध पुरुष जसे ताड क परे फलों का पड मे तोड तोड करने चरे गये । सृञ्जयगण प्रसन्नतापूनम शवनाद पर गिराता ह से ही भाम रदियो क मिरा का ओर सिंहनाद करने गे। उस समय सूयदेव पश्चिम अपन बाणों से काट-काटकर गिरा रहे थे। भाप्प , दिशा मे पहुँच चुर थे । प्राणों की ममता होडार के पाणा से क्टे पीरा के सिर पृथ्या पर, शिलापान कौरस आर पाण्व दारण युद्ध करन लगे ॥२५॥२८॥ के ममान, शब्द के साथ गिर रहे थे । हे रानेद्र । महारती धृष्टद्युम्न आर पराममा सा यार असरय इस प्रकार यह युद्ध क्रमश अयत घोर हो उठा। तामर, शक्ति, वाण आदि शस्त्रा से कारवपथ की मनिक लाग यर-उधर हट गये आर व्यूह रचना सेना को पीडित करने लगे। उनके बाणों से अयत नष्ट हा गर्द । हरएक बार मर वार को युग वुलारर | व्यषित होन पर भा सनिक लोग चतुराई के साथ [ भीष्मपव ४४२० ] म हा भारत - । शस्त्रैश्च वहुभी राजञ्जन्नतुस्तावकारणे ते हन्यमानाः समरे तावका भरतर्षभ ॥३०॥ आयाँ युद्धे मतिं कृत्वा न त्यजन्ति स्म संयुगम् । यथोत्साहं तु समरे निजध्नुस्तावका रणे ॥३१॥ तत्राऽऽक्रन्दो महनासीत्तावकानांमहात्मनाम् । वध्यतां समरे राजन्पार्पतेन महात्मना ॥ ३२ ॥ तं श्रुत्वा निनदं घोरं तावकानां महारथौ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पार्यतं प्रत्युपस्थिती ॥३३॥ तौ तस्य तुरगान्हत्वा त्वरमाणौ महारथौ छादयामासतुरुभौ शरवर्षेण पार्पतम् ॥३४॥ अवनुत्याऽथ पाञ्चाल्यौ रथातूर्ण महाबलः आरुरोह रथं तूर्णं सात्यकेस्तु महात्मनः ततो युधिष्टिरो राजा महत्या सेनया वृतः आवन्त्यौ समरे क्रुद्धावभ्ययात्स परन्तपौ ॥३६ ॥ तथैव तव पुत्रोऽपि सर्वोद्योगेन मारिप विन्दानुविन्दौ समरे परिवार्याऽवतस्थिवान् ॥३७ ॥ अर्जुनश्चापि संक्रुद्धः क्षत्रियान्क्षत्रियर्पभः अयोधयत संग्रामे वज्रपाणिरिवाऽसुरान् ॥ ३८ ॥ द्रोणस्तु समरे क्रुद्धः पुत्रस्य प्रियकृत्तव व्यधमत्सर्वपञ्चालास्तूलराशिभिवाऽनलः ॥ ३९ ॥ युद्ध करते रहे । वाग्गण और भी उमाह ने माप । युधिष्टिर तुद्ध होकर, बहुन मी मेना साथ रेपर, शत्रुओं की सेना का महार करने लगे । शृष्टयुर के चिन्द और अनुविन्द के सन्मुग्व आय । यह देखकर पाणों मे अयन्त पाडित होरर नहुत से मनिक ऊचे राजा दुर्योधन भी बहुन मी सेना माथरे चिन्द और सर में चिल्लाने लगे॥२०१३२॥ उनका घोर चा गार अनुपिन्द का रक्षा के लिए उनके पास पहुँचे । इधर मुनकर आन्ति देश व गमा विन्द आर अनुपिन्ट पगनमी अजुन, जुद्ध होकर, दानों को मारने के भ्रष्टयुम्न व पाम पहुँचे । उहोंने धृप्रद्युम्न के घोडे । टिए उद्यत इन्द्र की तरह काँग्रमेना का महार करने मारकर उनको भी गाणी मे रिपा दिया। धृष्टद्युम्न रंग ॥३६॥३८॥ दुर्योपन का हिन चाहनेवार द्रोणा- शामता के माथ विना घादी के रथ मे उतार चार्य भा न होरर, अग्नि जमेई के ढेर को जलाती माया के रथ पर चरे गये ॥२३॥३॥ धर्मगन है मे ही पाश्चारमना को नष्ट करने लगे। दुर्यो पन - ।
अव्याय ८६ म हा भारत [११२१ - दुर्योधनपुरोगास्तु पुत्रास्तव विशाम्पते परिवार्य रणे भीम युयुधुः पाण्डवः सह ॥४०॥ ततो दुर्योधनो राजा लोहितायति भास्करे अब्रवीत्तावकान्सर्वास्त्वरध्वमिति भारत ॥४१॥ युध्यतां तु तथा तेषां कुर्वतां कर्म दुप्करम् । अस्तं गिरिमथाऽऽरूढे अप्रकाशति भास्करे ॥ ४२ ॥ प्रावर्तत नदी घोरा शोणितोपतरगिणी गोमायुगणसङ्कीर्णा क्षणेन क्षणदामुखे ॥४३॥ शिवाभिरशिवाभिश्च स्वद्भिभैरवं रवम् घोरमायोधनं जज्ञे भूतसङ्घः समाकुलम् ॥४४॥ राक्षसाश्च पिशाचाश्च तथाऽन्ये पिशिताशिनः । समन्ततो व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥१५॥ अर्जुनोऽथ सुशर्मादीन्राज्ञस्तान्सपदानुगान् विजित्य पृतनामध्ये ययौ स्वशिविरं प्रति युधिष्ठिरोऽपि कोरव्यो भ्रातृभ्यां सहितस्तथा । ययौ स्वशिविरं राजा निशायां सेनया वृतः ॥४७॥ भीमसेनोऽपि राजेन्द्र दुर्योधनमुग्वान्रथान् अवजित्य ततः संन्ये ययो स्वशिविरं प्रति ॥ १८ ॥ दुर्योधनोऽपि नृपतिः परिवार्य महारणे भीष्म शान्तनवं तूर्ण प्रयातः शिविरं प्रति ॥ १९ ॥ आदि आपके पुत्र, भीष्म के आसपास रहार, पाण्डवों उमके स्निा विचरने रंगे । राक्षम, रिशार आदि युद्ध करने लगे । मृर्य भगान् क्रमश रक्तवर्ण के मामाहारी जीप चारों ओर दियाई पईने लगे। होकर जर अम्ताचल पर पहुंच गये ना दुर्योधन ने प्रमार ह रणभूमि मयड़ों हमरो भूती में परिपूर्ण अपने पक्ष या सेना मे कहा- तुम लोग गांप्रता के होरर अयल भयानक हो उटी ॥४॥४॥ मध्या माय जाकर शत्रुमेना का महार यरो॥३०॥४१॥ यह होने पर अमग्य मेना महिन सुगमा आदि गनाओ आज्ञा मुनकर सर योदा लोग युदभूमि में अमापारण यो हगर परम्मी अदुन आने गिरि योग। मदर और अगम्य गना को माया पराकम दिगांत हुए दुष्पर काम करने लगे। उम युधिष्टिर भी शिविर में नोट भाये । मनमन भीगना ममय रणभूमि में भयावर रस की नदी या चर्ग। अयन्न भयानक शब्द करते हुए मिपारों के मुण्ड दुर्योधन अति प्रधान सथियो यो हगार ने शिर मे न।
14 ४४२२ ] म हा भा र त । द्रोणो द्रौणिः कृपः शल्यः कृतवर्माचसात्वतः। परिवार्य चमू सर्वां प्रययुः शिविरं प्रति तथैव सात्यकी राजन्धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः परिवार्य रणे योधान्ययतुः शिविरं प्रति ॥ ५१ ॥ एवमेते महाराज तावकाः पाण्डवैः सह पर्यवर्तन्त सहिता निशाकाले परन्तप ततः स्वशिविरं गत्वा पाण्डवाः कुरवस्तथा न्यवसन्त महाराज पूजयन्तः परस्परम् ॥ ५३ ॥ रक्षां कृत्वा ततः शूरा न्यस्य गुल्मान्यथाविधि । अपनीय च शल्यानि स्नात्वा च विविधैर्जलैः ॥ ५४ ॥ कृतस्वस्त्ययनाः सर्वे संस्तूयन्तश्च वन्दिभिः । गीतवादित्रशब्देन व्यक्रीडन्त यशस्विनः मुहूर्तादिव तत्सर्वमभवत्स्वर्गसन्निभम् नहि युद्धकथां काश्चित्तत्राऽकुर्वन्महारथाः ते प्रसुप्ते वले तत्र परिश्रान्तजने नृप हस्त्यश्ववहुले रात्रौ प्रेक्षणीये वभूवतुः ॥ ५७ ॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सप्तमदिवसयुद्धाबहारे पडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥ को लौटे ॥४६॥४८॥ भीष्म पितामह के साथ महारथी गये, मरहम-पट्टी हो गई । स्नान आदि करके. वस्त्र लोग और दुर्योधन आदि अपने शिविर को लौट पड़े । धारणकर, सब लोग बड़े आनन्द के माथ आमोद- द्रोण, कृपाचार्य, अश्वथामा, शल्य और कृतवर्मा भी प्रमोद करने लगे ॥५२॥५४॥ ब्राह्मण लोग स्वस्त्ययन- सैनिकों के साथ अपने डेरों को लौटे । सान्यकि पाट और अन्दाजन प्रशमा करने लगे। कौरवो और और धृष्टद्युम्न भी योद्धाओ के माथ अपने शिविरों पाण्डवो के डेरे स्वर्ग के विमान-से जान पड़ते थे । में गये ॥४९॥५१॥ इस प्रकार कौरव और पाण्डव उस समय वहाँ युद्ध की चर्चा भी नहीं थी । योद्धा पक्ष के वीर रात्रि के ममय लौट गये । अपने-अपने लोग इस प्रकार आमोद-प्रमोद करके सो रहे । हो में जाकर उन्होंने परस्पर यथोचित सत्कार दिख हाथी, घोड़े आदि भी विश्राम करने लगे । शान्ति लाया तथा रक्षा का प्रबन्ध, गुल्म की स्थापना आदि हो जाने से उम स्थान की अपूर्व शोभा दुई ॥५५॥५७॥ कार्य किय । पायलों के अलोमे गन्य आदि निकाले भीष्मपर्व का छियामाचा अन्याय ममाप्त हुआ ॥ ८ ।
अध्याय ८७ ] म हा मा र त [.४२३ अथ सप्ताशीतितमोऽध्याय ॥ ८७ ॥ सञ्जय उपाच – परिणाम्य निशां तां तु सुखं प्राप्ता जनेश्वराः । कुरवः पाण्डवाश्चैव पुनयुद्धाय निर्ययुः ततः शब्दो महानासीत्सैन्ययोरुभयोर्नृप निर्गच्छमानयोः संग्व्ये सागरप्रतिमो महान् ततो दुर्योधनो राजा चित्रसेनो विविंशतिः भीष्मश्च रथिनां श्रेष्ठो भारद्वाजश्च वै नृप एकीभूताः सुसंयत्ताः कौरवाणां महाचूमम् व्यूहाय विदधू राजन्पाण्डवान्प्रति दंशिताः भीष्मः कृत्वा महाव्यूहं पिता तब विशाम्पते । सागरप्रतिमं घोरं वाहनौर्मितरङ्गिणम् अग्रतः सर्वसैन्यानां भीष्मः शान्तनवो ययौ । मालवैर्दाक्षिणात्यैश्च आवन्त्यैश्च समन्वितः ततोऽनन्तरमेवाऽऽसीद्भारद्वाजः प्रतापवान् कुलिन्दैः पारदैश्चैव तथा क्षुद्रकमालवैः द्रोणादनन्तरं यत्तो भगदत्तः प्रतापवान् मगधैश्च कलिङ्गेश्च पिशाचैश्च विशाम्पते प्राग्ज्योतिपादनु नृपः कौसल्योऽथ वृहद्बलः मेकलैः कुरुविन्दैश्च त्रैपुरैश्च समन्वितः मत्तामीवाँ अध्याय ॥ ८७ ।। ने कहा-ह राजन्द्र । इस प्रकार कारन व्यूह बनाया | माल्य, अयन्ती आर दक्षिण के देशो आर पाण्डव पक्ष के पारगण रात्रि भर सुख का निद्रा की सेना तथा राजा लोग भीष्म के माथ सारी सेना सोकर प्रात फिर युद्ध के लिए प्रस्तुत हो अपने के आगे चले । उनके पाछे पराक्रमी द्रोणाचार्य चल। शिविरो से निकले। दोनो ओर की सेना में युद्धयात्रा उनके साथ कुलिन्द, पारद आर क्षुद्रक-मालव आदि के समय समुद्र के उमड पड़ने का सा घोर कोलाहल देशों के राना अपनी अपनी सेना साथ लेकर चले, होने लगा ॥१॥२॥ उस समय राजा दुयोधन, चित्र- | ॥७॥ द्रोणाचार्य के पीछे मगध, कलिग आर पिशाच आदि देशों की सेना साथ लिये प्राग्ज्योतिष सेन, विविंशति, महारथी भीष्म ओर महाबली द्रोणा चार्य आदि वीरो ने एकत्र होकर व्यूह की रचना । पुर के राजा प्रतापी भगदत्त का दल चला। उन पीछे मेफल, दुरविन्द आर त्रिपुरा आदि देशों की की ॥३४॥ भीम ने समुद्र-सा अपार गम्भीर महा- सञ्जय ४४२४ ] महाभारत [ भीमपव - वृहद्धलतात्ततः शूरस्त्रिगर्तः प्रस्थलाधिपः काम्बोजैर्वहुभिः : साधं यवनैश्च सहस्रशः द्रौणिस्तु रभसः शूरत्रैगर्तादनु भारत प्रययौ सिंहनादेन नाटयानो धरातलम् ॥ ११ ॥ तथा सर्वेण सैन्येन राजा दुर्योधनस्तदा द्रोणेरनन्तरं प्रायात्सोदयपरिवारितः ॥१२॥ दुर्योधनादनु ततः कृपः शारद्वतो ययो एवमेष महाव्यूहः प्रययौ सागरोपमः ॥ १३ ॥ रेजुस्तत्र पताकाश्च श्वेतच्छत्राणि वा विभो अङ्गदान्यत्र चित्राणि महााणि धनुंपि च ॥ १४ ॥ तं तु दृष्ट्वा महाव्यूह तावकानां महारथः युधिष्ठिरोऽब्रवीत्तूर्णं पार्पतं पृतनापतिम् ॥१५॥ पश्य व्यूह महेप्वास निर्मितं सागरोपमम् प्रतिव्यूहं त्वमपि हि कुरु पार्पत सावरम् ॥ १६ ॥ ततः स पार्पतः क्रूरो व्यूह चक्रे सुदारुणम् । शृङ्गाटकं महाराज परव्यूहविनाशनम् ॥१७॥ शृङ्गाभ्यां भीमसेनश्च सात्यकिश्च महारथः स्थैरनेकसाहम्रैस्तथा हयपदातिभिः ॥ १८॥ सेना साथ लिये कोगलेश्वर वृहद् च- । उनके पीछे अपने प्रधान मेनापति धृप्रद्युम्न से त काल कहा कि त्रिगत आर प्रस्थल देन के राजा सुगनी हुन मा, हे वीरश्रेष्ट । कारों ने ममुद्र-तुल्य ब्यूह की रचना काम्बोन आर यान देश का, सेना साथ लफा चर का ह । तुम भा इसके प्रयुत्तर मे कोई दुर्भेद्य श्रेष्ठ ॥८॥१०॥उनके पाठे अश्वथामा पृथ्वामण्डलमा पाने व्यूह गाघ्र बनाओ । "नो आज्ञा" कहकर महावला हुए चल । उनके पीछे दुर्याधन सब भाइयोंको साथ लिये । धृष्टद्युम्न ने उमी क्षण शत्रु के व्यूह को तोडनेवाला हुए चले । टम प्रकार यह समुद्र-तुल्य सेना शृङ्गाटक (सिंघाडे के आकार का ) व्यूह बनाया महान्यूह की रचना करसे युद्ध के लिए आगे बढी । ॥१५॥१७॥ उस यूह के शृङ्गद्वारा म कई हतार पतारा, श्वेत टर, पिचित्र अङ्गद आदि भूपण पहु स्थ, हाथा, घोडे आर पदल सेना साथ लेकर पीर मूल्य वस्त्र आर धनुष आदि अस्त्र शस्त्र उम मेना रो भीममन आर स यकि स्थित हुए । नाभिदेश में अपूर्व शोभा को बढ़ा रहे थे॥११॥१४॥हे महारान ! कपिचन अर्जुन, मध्यदशम वर्मराज युधिष्टिर, नकुर उपर महारथी युपिष्टिर ने कारता का महा-यह दख आर महदेव पिराजमान हुए । व्यूहरचना की ग्ला कर उमो प्रयुत्तर म दूसरा यह रचने के लिए मेनिपुण आर आर धनुर राजा लोग अपनी अपनी मना के साथ स्थान स्थान उस व्यूह की रक्षा करन राजा विराट, द्रोपदी के पाँचों पुत्र और राक्षम घटो फच आदि राये गये । पाण्टयगण इस प्रकार शनि, भेरी आदि बाजों का शब्द, सिंहनाद, आस्फोटन ( ताल ठोकना) आर आहान आदि का महाव्यह सुसजित करके जय की अभिलाषा से युद्ध शब्द सेना के कोलाहल मे मिलकर आकाश तक अध्याय ८७ } म हा भा र त - । ताभ्यां वभो नरश्रेष्ठः श्वेताश्वः कृष्णसारथिः । मध्ये युधिष्ठिरो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १९ ॥ अथोत्तरे महेष्वासाः सहसैन्या नराधिपाः व्यूह तं प्रयामासुयूंहशास्त्राविशारदाः ॥ २० ॥ अभिमन्युस्ततः पश्चाद्विराटश्च महारथः द्रौपदेयाश्च संहृष्टा राक्षसश्च घटोत्कचः ॥ २१ ॥ एवमेतं महाव्यूह व्यूह्य भारत पाण्डवाः अतिष्ठन्समरे शूरा योद्धकामा जयैपिणः ॥ २२ ॥ भेरीशब्दैश्च विमलैर्विमित्रैः शङ्खनिःस्वनैः क्ष्योडितास्फोटितोत्क्रुष्टै दिताः सर्वतो दिशः ॥ २३ ॥ ततः शूराः समासाद्य समरे ते परस्परम् नेत्रैरनिमिषै राजन्नवैक्षन्त परस्परम् ॥ २४ ॥ नामभिस्ते मनुष्येन्द्र पूर्वं योधाः परस्परम् युद्धाय समवर्तन्त समाहृयेतरेतरम् ॥ २५ ॥ ततः प्रववृते युद्धं घोररूपं भयावहम् तावकानां परेषां च निन्नतामितरेतरम् ॥ २६ ॥ नाराचा निशिताः संख्ये सम्पतन्ति म्म भारत। व्यात्तानना भयकरा उरगा इव सशः ॥ २७॥ निष्पतुर्विमलाः शक्त्यस्तैलधौताः सुतेजनाः । अम्बुदेभ्यो यथा राजन्भ्राजमानाः शतदाः ॥ २८ ॥ गूंज उठा ॥२१॥२३॥ ना शूर वीर योद्धा लोग एक टगे ॥१८॥२०॥ उनके पार प्रधान रया अभिमन्यु, दमरे से भिड़कर परस्पर टकटका लगार देयने लगे। फिर अपने-अपने मममक्ष को मारकर. नाम ले लेकर, युद्ध के लिए युनाने और प्रहार करने लगे। दोनों ओर के योदा लोग घोर ममाम करने म प्रवृत्त हुए । उस समय चारो ओर तुमुल रंग । मुख पाये हुए पिले मर्प के ममान भयङ्कर नाराच बाण --मंत्र में चमकता दूर शिनरी के ममान--- तेट से शुद् की हुई गाझियो और मन, चना मे आग्लादिन को हुई पर्वत के शिगर के तुम्य -
[ भीष्मपर
४४२६ ]
म हा भारत
:
।
गदाश्च विमलैः पट्टैः पिनद्धाः वर्णभूपितैः
पतन्त्यस्तत्र दृश्यन्ते गिरिशृङ्गोपमाः शुभाः ॥ २९ ॥
निस्त्रिंशाश्च व्यदृश्यन्त विमलाम्बरसन्निभाः ।
आर्पभाणि विचित्राणि शतचन्द्राणि भारत ॥३०॥
अशोभन्त रणे राजन्पात्यमानानि सर्वशः
तेऽन्योन्यं समरे सेने युद्धयमाने नराधिप ॥ ३१ ॥
अशोभेतां यथा देवदैत्यसेने समुद्यते
अभ्यद्रवन्त समरे तेऽन्योन्यं वे समन्ततः
॥ ३२ ॥
रथास्तु रथिभिस्तूर्णं प्रेपिताः परमाहवे
युगैर्युगानि संश्लिप्य युयुधुः
पार्थिवर्षभाः ॥ ३३ ॥
दन्तिनां युध्यमानानां सङ्घर्षात्यावकोऽभवत् ।
दन्तेषु भरतश्रेष्ट सधूमः सर्वतोदिशम्
॥३४॥
प्रासैरभिहताः केचिद्गजयोधाः समन्ततः
पतमानाः स्म दृश्यन्ते गिरिशृङ्गानगा इव ॥ ३५ ॥
पादाताश्चाऽप्यदृश्यन्त निघ्नन्तोऽथ परस्परम् ।
चित्ररूपधराः शृरा नखरप्रासयोधिनः ॥३६ ॥
अन्योन्यं ते समासाय कुरुपाण्डवसैनिकाः
अस्त्रैर्नानाविधै|रै रणे निन्युर्यमक्षयम् ॥३७॥
ततः शान्तनबो भीप्मो रथघोपेण नादयन्
अभ्यागमद्रणे पार्थान्धनुःशब्देन मोहयन् ॥३८॥
म्वर्णमण्ठित गदाएँ युद्धभूमि मे इधर-उधर वारो पर भिड़कर युद्ध करते हुए हाथियों के दाँत दांतो से
गिरने लगी ॥२४॥२॥ निर्मल आकाश के ममान टकगने लगे और उनमें धुएँ महित अग्नि की चिनगा-
नीली चमकीली तलवारें गाँड़े, कटारी], शतचन्द्र रियाँ निकलने लगीं। कोई-कोई हाथी के सबार प्राम
शोभित मुदृढ ढालें चारों ओर युद्धभूमि की शोभा नामक शास्त्र के प्रहार मे मरकर पर्वत के शिखर पर
को बढाता दुई चमकती देख पड़ने लगीं ॥२८॥३०॥ मे टूटकर गिरे हुए बड़े वृक्ष के ममान जान पड़े।
दोनों ओर के वीर परस्पर घोग्नर युद्ध के लिए उद्यत पैदल योद्धा लोग नन्यर और प्राम आदि शस्त्रो से
देवनाओं और दैत्यों के ममान जान पड़ते थे ! श्रेष्ट शत्रुपक्ष के पंढलों को मारने और गिराने लगे । इम
क्षत्रिय रथी, रथयुग में शत्रुपक्ष के रययुगो को गीचते प्रकार कौरवो और पाण्डयों की मेना के योदा परम्पर
हुए, भिकर युद्ध करने गंगे ॥३१॥३३॥ मन भिड़कर एक दृमरे को मारने और मरने लंग ॥३४॥
अध्याय ८८ म हा भा र त { ४४२७ । पाण्डवानां रथाश्चाऽपि नदन्तो भेरवं स्वनम् । अभ्यद्रवन्त संयत्ता धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ॥ ३९ ॥ ततः प्रववृते युद्धं तव तेषां च भारत नराश्वरथनागानां व्यतिपक्कं परस्परम् ॥४०॥ इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मपधपर्वणि अष्टमदिवमयुद्धारम्भे सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥ ३७|| उस समय महावीर भीष्म रथ की घरघराहट भयानक शब्द और सिंहनाद करते हुए आगे बढे । से युद्धभूमि को कँपाते और चनुप की धनि मे इस प्रकार दोनो ओर के मनुष्य, रथ, हाथी और पाण्डमो को तथा उनकी मेना को मोहित करत आ घोडे परस्पर भिड़ गये और घोर कोलाहल के साथ पहुचे । धृष्टद्युम्न आदि पाण्डवपक्ष के महारथी भी दारुण युद्ध होने लगा ॥३८॥४०॥ भीष्मपर्व का सत्तामीयाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८७ ।। अथ अष्टाशीतितमोऽध्याय ॥ ८८ ।। मञ्जय उवाच-भीष्मं तु समरे क्रुद्धं प्रतपन्तं समन्ततः न शेकुः पाण्डवा द्रष्टुं तपन्तमिव भास्करम् ॥ १ ॥ ततः सर्वाणि सैन्यानि धर्मपुत्रस्य शासनात् । अभ्यद्रवन्त गाड्य मर्दयन्तं शितैः शरैः ॥ २ ॥ स तु भीष्मो रणश्लाघी सोमकान्सह सृञ्जयान् । पञ्चालांश्च महेष्वासान्पातयामास सायकैः ॥ ३ ॥ ते वध्यमाना भीग्मेण पञ्चालाः सोमकैः सह । भीष्ममेवाऽभ्ययुस्तूर्णं त्यक्त्वा मृत्युकृतं भयम् ॥ ४ ॥ स तेषां रथिनां वीरो भीष्मः शान्तनवो युधि । चिच्छेद सहसा राजन्याहूनथ शिरांसि च सञ्जय ने कहा-हे राजेन्द्र ! पाण्डव लोग गण ओर सोमकगण भीष्म के बाणो से अत्यन्त गहापरामामी, सूर्य के समान तेजस्त्री, महावीर भीम पीड़ित होकर भी हटे नहीं । वे जीवन को आशा की क्रुद्ध भयानक मूर्ति को युद्धभूमि मे अच्छी प्रकार छोडकर युद्ध करते हुए उनपर आक्रमण करने लगे। देव नहीं सकते थे । पाण्डवपक्ष के योद्धा लोग ' पराक्रमो भीष्म ने किसी का हाथ काट डाला, किमी राजा युधिष्ठिर की आज्ञा से भीम के ऊपर बाण का सिर काट डाला । उन्होंने रथी योद्धाओ के रयों बरसाते हुए युद्ध करने के लिए आगे बढे । तब युद्ध- के टुकड़े-टुकड़े कर डाले । युद्धभूमि मे भीष्म के प्रिय वीर भीष्म पितामह असख्य तीक्ष्ण बाण चलाकर बाणों के प्रभाव से घोड़ो से गिरे--मरे----दुए घुड़- सोमक, सृञ्जय और पाञ्चाल वीरो को मारने और सवारों के सिर, सवारों से रिक्त पृथ्वी पर पड़े हुए गिराने लगे ॥१३॥ युद्ध में उत्साह रखनेवाले पाञ्चाल पर्वतशिखर सदृश गजराज और रथ आदि स्थान- - ४४२८ ] म हा भा र त [ भाप्मपव - । विरथान्रथिनश्चके पिता देवव्रतस्तव पतितान्युत्तमाङ्गानि हयेभ्यो हयसादिनाम् निर्मनुष्यांश्च मातङ्गाशयानान्पर्वतोपमान् अपश्याम महाराज भीष्मास्त्रेण प्रमोहितान् ॥ ७ ॥ न तत्राऽऽसीत्पुमान्कश्चित्पाण्डवानां विशाम्पते । अन्यत्र रथिनां श्रेष्ठाद्भीमसेनान्महाबलात् स हि भीमं समासाद्य ताडयामास संयुगे । ततो निष्ठानको घोरो भीष्म भीमसमागमे वभूव सर्वसैन्यानां घोररूपो भयानकः तथैव पाण्डवा हृष्टाः सिंहनादमथाऽनदन् ॥१०॥ ततो दुर्योधनो राजा सोदर्यैः परिवारितः भीष्मं जुगोप समरे वर्तमाने जनक्षये भीमस्तु सारथिं हत्वा भीष्मस्य रथिनां वरः प्रद्रुताश्वे रथे तस्मिन्द्रवमाणे समन्ततः ॥ १२ ॥ सुनाभम्य शरेणाऽऽशु शिरश्चिच्छेद भारत क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन स हतो न्यपतद्भुवि ॥ १३॥ हते तस्मिन्महाराज तव पुत्रे महारथे नाऽमृप्यन्त रणे शूराः सोदराः सप्त संयुगे ॥ १४ ॥ आदित्यकेतुर्वह्वाशी कुण्डधारो महोदरः अपराजितः पण्डितको विशालाक्षः सुदुर्जयः ॥ १५ ॥ स्थान पर महसी की मन्या ग देख पड़ने लगे ॥४७॥ को मार डाला । नत्र उनके रथ को लेकर घोड़े है गजेन्द्र ! उमममय पाण्डवपक्ष से एकमात्र महारथी इधर उधर अस्त-व्यस्त गति से भागने लगे। इसी माहमा भीममेन बल-परानाम प्रकट करते हुए महावीर अपसर में बली भीममेन ने तीक्ष्ण तुरन बाण मे भीष्म पर आक्रमण करके उन्हें रोकने की चेष्टा राजकुमार मुनाभ का सिर काट डाला ।।११।१३।। करने लंग । भीममन और भीष्म मे भयानक मग्राम हे महाराज ! आपके पुत्र महारथी मुनाम की मृत्यु होने लगा। पाण्डय लोग उन्माद और प्रमन्नता प्रकट होन पर महोदर भाई की हत्या से अयन्त शुद्ध होकर करते हुए मिहनाद करने लंग ॥८1१०|| अपने अतुल-पराक्रमी आदित्यकेतु, बहाशी, कुण्डधार, भाइयों महिन गजा दृयोधन भीष्म की रक्षा करते महोदर, अपराजित, पण्डितक और दुर्जय विशालाक्ष, दग पदने थे । श्रेष्ट ग्यी भीममेन ने भीम कमायी ये माना राजकुमार भीममन में युद्ध करने के लिए - - - - आदि यकतु न मत्तर बाण, वहामी ने पांच बाण, ॥१७॥१०॥ पराक्रम भीममन गनुआ के वाण प्रहार अध्याय ८८ । । ४४२०. पाण्डवं चित्रसन्नाहा विचित्रकवचध्वजाः अभ्यद्रवन्त संग्रामे योद्धुकामारिमर्दनाः महोदरस्तु समरे भीमं विव्याध पत्रिभिः नवभिर्वज्रसङ्काशैनमुचिं वृत्रहा यथा ॥१७॥ आदित्यकेतुः सप्तत्या वह्वाशी चाऽपि पञ्चभिः । नवत्या कुण्डधारश्च विशालाक्षश्च पञ्चभिः ॥ १८॥ अपराजितो महाराज पराजिप्णुमहारथम् शरैर्बहुभिरानछद्भीमसेनं महावलम् ॥ १९ ॥ रणे पण्डितकश्चेनं त्रिभिर्वाणेः समार्पयत् स तन्न ममृपे भीमः शत्रुभिर्वधमाहवे धनुः प्रपीड्य वामेन करेणाऽमित्रकर्शनः शिरश्चिच्छेद समरे शरेणाऽऽनतपर्वणा ॥ २१ ॥ अपराजितस्य सुनसं तव पुत्रस्य संयुगे पराजितस्य भीमेन निपपात शिरो महीम् ॥ २२ ॥ अथाऽपरेण भल्लेन कुण्डधारं महारथम् प्राहिणोन्मृत्युलोकाय सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ २३॥ ततः पुनरमेयात्मा प्रसन्धाय शिलीमुखम् प्रेपयामास समरे पण्डितं प्रति भारत स शरः पण्डितं हत्वा विवेश धरणीतलम् यथा नरं निहत्याऽऽशु भुजगः कालचोदितः ॥ २५ ॥ दौड़े। ये सब विचित्र कवच, धजा और अन्त्र-शस्त्रो । को न मह मके, क्रोध में अमीर हो उ । उमान मे गोभित थे ॥१४११६पाणि इन्टने में बॉय हाथ में धनुप चदाकर गागामा नाण-धार प्रमुर को पीडित किया था बमे ही चीर महादर बाल बाण में अपगजिन का, मुन्दा नामिका गे ने भाममेन को वनुयना मार मी कामनाहर, मुण्ट काट दाया । फिर मसना के सामने एक भल बाग में कुम्दवार को मार गिराया ॥२० कुण्टधार ने नये बाण, विशालाक्ष ने पाँच वाण, २३|| पण्टिनका पर भी एक नाग बाण छोदा । पण्डनक ने नान बाण और मामको नका 'कालाग्नि पिपले मर्प के ममान यह याण पनि या ग्पनेवारे अपगजिन ने बहन माग मारे के प्राण लेकर गया में प्रवेश हो गया। पहले में मन प्रहार का अंग माण करकं उन्होंने तीन - .---- ४४३२ ] म हा भारत [ भीष्मपर्व युद्ध के बारे में उपालम्भ न देनाः हम अपनी इच्छा ! दृढ मति करके, स्वर्गलाभ को परम फल समझकर, के अनुसार यथाशक्ति युद्ध करेंगे |॥३९॥४१॥ मैं | पाण्डवों से युद्ध करो। इन्द्र सहित देवता और दैत्य तुमसे फिर कहे देता हूँ कि भीमसेन युद्ध में धृतराष्ट्र मिलकर भी पाण्डवों को नहीं जीत मफते। इसलिए के जिस पुत्र को पायेंगे उसे नित्य अवश्य मारेगे । यह युद्धमें स्थिर मति करके पाडो से युद्ध करो॥४२१४४॥ सत्य समझो । इसलिए हे राजेन्द्र ! तुम युद्ध के लिए भीष्मपर्व का अट्टासीयाँ अध्याय ममाप्त हुआ !! ८८ ॥ अथ ऊननवतितमोऽध्याय ॥ ८९ ॥ धृतराष्ट्र उवाच- दृष्ट्वा मे निहतान्पुत्रान्वहुनेकेन सञ्जय भीप्मो द्रोणः कृपश्चैव किमकुर्वत संयुगे अहन्यहनि मे पुत्राः क्षयं गच्छन्ति सञ्जय मन्येऽहं सर्वथा सूत देवेनोपहता भृशम् ॥ २ ॥ यत्र मे तनयाः सर्वे जीयन्ते न जयन्त्युत यत्र भीष्मस्य द्रोणस्य कृपस्य च महात्मनः सौमदत्तेश्च वीरस्य भगदत्तस्य चोभयोः अश्वत्थाम्नस्तथा तात शूराणामनिवर्तिनाम् ॥ ४ ॥ अन्येषां चैव शूराणां मध्यगास्तनया मम यदहन्यन्त संग्रामे किमन्यद्भागधेयतः न हि दुर्योधनो मन्दः पुरा प्रोक्तमवुध्यत वार्यमाणो मया तात भीप्मेण विदुरेण च गान्धार्या चैव दुर्मेधाः सततं हितकाम्यया नाऽबुध्यत पुरा मोहात्तस्य प्राप्तमिदं फलम् ॥ ७ ॥ नवासा अध्याय ।। ८९ ।। शृतराष्ट्र ने कहा हे माय ! एक भीमसेन भी मेरे पुत्र जिया नहीं होते, बल्कि हारते ही जाने के हाथों मरे अनेक पुत्रों की मृत्यु देगकर भीम, हैं; रमे दुर्भाग्य के अतिरिक्ष और क्या कहा जा द्रोणाचार्य और वृपाचार्य ने क्या किया। दिन पर माता है !॥३५॥ पहले मैं, भीष्म पिदुर, गान्धारी दिन मो पुर मारे जा में है, इसमे मुझे या निश्चय आदि ने हितकामना मे दुर्बुद्धि दुर्योधन को बहुत होता कि मेरे पुत्री पर देर यायांपा ॥१॥२॥ समझाया बुझाया, युद् न करने के लिए कहा, किन्तु महामा होण, भीम. महामा यूपाचार्य, भूरिश्रम, मोहवश उमने क्रिमा का कहना नहीं सुना। उमा भगदत्त, अपामा तथा आर-आर शूर और ममाम का यह घोर परिणाम मिट रहा है - युपित भीमसेन पाटन विमानमा क्षत्रियों दी महायता SITE निय मेरे मद पुत्रों को मार गह, यह विदुर की M .
अध्याय ८० । म हा भारत १४३३ - यद्भीमसेनः समरे पुत्रान्मम विचेतसः अहन्यहनि संक्रुद्धो नयते यमसादनम् सञ्जय उवाच - इदं तत्समनुप्राप्तं क्षत्तुर्वचनमुत्तमम् न बुद्धवानसि विभो प्रोच्यमानं हितं तदा निवारय सुतान्द्यूतात्पाण्डवान्मा दुहेति च सुहृदां हितकामानां त्रुवतां तत्तदेव च न शुश्रूपसि यद्वाक्यं मर्त्यः पथ्यमिवौषधम् । तदेव वामनुप्राप्तं वचनं साधुभाषितम् विदुरद्रोणभीष्माणां तथाऽन्येषां हितैषिणाम् । अकृत्वा वचनं पथ्यं क्षयं गच्छन्ति कौरवाः ॥१२॥ तदेतत्समनुप्राप्तं पूर्वमेव विशाम्पते तस्मात्त्वं शृणु तत्त्वेन यथा युद्धमवर्तत ॥ १३ ॥ मध्याह्ने सुमहारौद्रः संग्रामः समपद्यत लोकक्षयकरो राजस्तन्मे निगदतः शृणु ततः सर्वाणि सैन्यानि धर्मपुत्रस्य शासनात् । संरब्धान्यभ्यवर्तन्त भीष्ममेव जिघांसया ॥ १५ ॥ धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सात्यकिश्च महारथः युक्तानीका महाराज भीष्ममेव समभ्ययुः विराटो द्रुपदश्चैव सहिताः सर्वसोमकैः अभ्यद्रवन्त संग्रामे भीष्ममेव महारथम् ॥ १७॥ बात न मानने का ही फल हे ॥६॥८॥ सञ्जय ने जो होना था सो नो हो ही गया, अआ आप युद्ध का कहा हे स्वामी ! पहले विदुर ने आपसे कहा था वर्णन सुनिए । उम दिन मध्याह्न के समय ऐसा घोर कि हे राजेन्द्र ! अ प पुत्रो को यूत-क्रीडा से रोकिए; युद्ध हुआ कि उसमें असस्य क्षत्रिय मारे गये । धर्मपुत्र पाण्डयो के साथ द्रोह या दुर्व्यवहार न कीजिए । युधिष्ठिर की आज्ञा से पाण्डयो की सब मेना भीम किन्तु हे महाराज ! रोगी जमे अपपि नहीं पीता, | को मार डालने के लिए सुमजित होकर आगे बढ़ी । औपचि पीना उसे नहीं रचता, वैसे ही आपने अपने धृष्टद्युम, शिखण्डी, सेना सहित महारथी मायकि. हितचिन्तक विदुर, भीष्म, द्रोण, गन्धारी ओर अन्य सोमकगण महित राजा विराट, राजा द्रुपद, केयदेश सुहृदों को बाते नहीं मानी । इसी कारण से इम की सेना साय लिए हुए धृष्टकेतु और कुन्तिभोज आदि महारयी चारों ओर मे भीम पर आक्रमण करने समय कौरपो का नाश हो रहा हे ॥९।१२॥ अस्तु ॥ Dowww ४४३४ ) म हा भारत [ भीष्मपव । केकया धृष्टकेतुश्च कुन्तिभोजश्च दंशितः युक्तानीका महाराज भीष्ममेव समभ्ययुः ॥ १८ ॥ अर्जुनो द्रौपदेयाश्च चेकितानश्च वीर्यवान् दुर्योधनसमादिष्टान्राज्ञः सर्वान्समभ्ययुः ॥ १९ ॥ अभिमन्युस्तथा शुरो हैडिम्बश्च महारथः भीमसेनश्च संक्रुद्धस्तेऽभ्यधावन्त कौरवान् ॥ २० ॥ त्रिधाभूतैरवध्यन्त पाण्डवैः कौरवा युधि तथैव कौरवै राजन्नवध्यन्त परे रणे ॥ २१ ॥ द्रोणस्तु रथिनः श्रेष्ठान्सोमकान्सृञ्जयैः सह अभ्यधावत संक्रुद्धः प्रेपयिष्यन्यमक्षयम् ॥ २२ ॥ तत्राऽऽक्रन्दो महानासीत्कृञ्जयानां महात्मनाम्। वध्यतां समरे राजन्भारद्वाजेन धन्विना ॥ २३ ॥ द्रोणेन निहतास्तत्र क्षत्रिया वहवो रणे विचेष्टन्तो ह्यदृश्यन्त व्याधिक्लिप्टा नरा इव ॥ २४ ॥ कूजतां क्रन्दतां चैव स्तनतां चैव भारत अनिशं शुश्रुवे शब्दः क्षुक्लिष्टानां नृणामिव ॥ २५॥ तथैव कौरवेयाणां भीमसेनो महाबलः चकार कदनं घोरं क्रुद्धः काल इवाऽपरः ॥ २६ ॥ वध्यतां तत्र सेन्यानामन्योन्येन महारणे प्रावर्तत नदी घोरा रुधिरौघप्रवाहिनी ॥२७॥ के लिए चले ॥१३।१८। दुर्योधन की आज्ञा से जो उ. में युद्ध करन लगे । महाधनुर दंण के महारथी लोग भीममेन पर आक्रमण करने आ रहे थे याणा में पीड़ित हाका मृनयगण अनाद करने उनमे युद्ध करने के दिए महायत्री अर्जुन. द्रौपदी रगे। टेण के बाणों मे पीदिन हाशर बहुत मे त्रिय है का पाँची पुन और चेकितान चल । कोच में अधार व्याधि पादित मनु यो क तरह युद्ध भूमि में गिरकर हो ग भीमगेन, घटाकच और अभिमन्यु कारयों के तदपने लंग ॥२२ २४॥ युद्धभूमि में कुछ लोग अस्पष्ट मन्मुग आये । पाण्डो और वीरों के तीन-नान गाल में कराह रहे थे, कुर और मे चिल्ला ग थे, दर, अगरकर, पणा युद्ध करने और माग्ने- पुट वियर कर थे और कुछ लोग थमे हाय मग्ने नंग ॥१०॥२॥ महामी मांग युपित होकर हाय कर रदय जग भूगप्यागम व्याकुल मनुष्य किया मामकों और मा यो समर मेगन यामागे यांनी नानाप्रकार के अननार मुनाई पन ३ २ म हा भा र त । ४८३५ अध्याय ८० - । स संग्रामो महाराज घोररूपोऽभवन्महान् कुरूणां पाण्डवानां च यमराष्ट्रविवर्धनः ॥ २८ ॥ ततो भीमो रणे क्रुद्धो रभसश्च विशेषतः गजानीकं समासाद्य प्रेषयामास मृत्यवे ॥ २९ ॥ तत्र भारत भीमेन नाराचाभिहता गजाः पेतुर्नेदुश्च सेदुश्च दिशश्च परिवभ्रमुः ॥३०॥ छिन्नहस्ता महानागाछिन्नगात्राश्च मारिप क्रौञ्चवद्वयनदन्भीताः पृथिवीमधिशेरते ॥ ३१ ॥ नकुलः सहदेवश्च ह्यानीकमभिद्रुतौ ते हयाः काञ्चनापीडा रुक्मभाण्डपरिच्छदाः ॥ ३२ ॥ वध्यमाना व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः पतद्भिस्तुरगै राजन्समास्तीर्यत मेदिनी ॥ ३३ ॥ निर्जिह्वश्च श्वसद्भिश्च कूजद्भिश्च गतासुभिः हयैर्वभौ नरश्रेष्ठ नानारूपधरधरा ॥ ३४ ॥ अर्जुनेन हतैः संख्ये तथा भारत राजभिः प्रवभौ वसुधा घोरा तत्र तत्र विशाम्पते ॥ ३५ ॥ रथैर्भग्नै जैग्छिनैनिकृत्तैश्च महायुधैः चामरयंजनैश्चैव च्छत्रेश्च सुमहाप्रभैः ॥३६ ॥ ॥२५॥२७॥ इधर क्रोधाध भामसेन दूसरे काल की तरह क्राश्च पक्षा का तरह आर्तनाद करते हुए पृथ्वी पर कारवसेना या नष्ट करने लग | परस्पर ग्रह र करत हुए गिरने लग ॥२८॥३१॥ उधर नकुल आर सहदर सनिको रे रक्त से रहराती हुई नदी बह चला । घोडों के दल मे प्रवश हो पडे आर सुरण के गहनों ह राजे छ । यह पौरन पाण्डया का युद्ध एमा घोर । से भूपित सैक्डो हजारों घोडों का काट मारमा हुआ कि उमम मरे हुए मनु यों मे यमपुरा भर ग | गिरान लगे! धाडा के क्ट पटे अगों आर शरारा होगी । भीमसेन क्रोध पूर्ण स्वर से सिंहनाद करते से पृथ्वी भर गई ॥३२॥३४॥ ह राजेन्द्र । किमी हुए दुयाधन के ह थिया का सेना में प्रवेश होकर , घाड की निहा कर गई, कोई घोड़ा थमसर तार उस छिन्न भिन्न करन लगे । भामसन के नाराच जोर से हापने लगा पाई घोड़ा घायर पक्षी का मा वाणों का चोट खार बडे पड हाथी नठ जाते थे । आर्तनाद करने लगा और कोइ घोडा मर गया । अने। हाथी गिर रहे थे, अनेरा भयभात होर । इस प्रकार अनक चेटाएँ करते हुए पाड़ित घोडी का चिल्ल ते आर आर्तन द करते भाग रहे थे । बड़े बड़ दर नष्ट भ्रष्ट हो गया । हे भारत । महावीर अर्जुन हाथियो की मूंड कट गई, शरार फट गये आर वे संबडा रानाओं को अपने प्राणों मे मार-मारकर म हा भा र त [ भीमपत्र । । नानाप्रकार हारैर्निकै सकेयूरैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः उप्णीपैरपविद्धैश्च पताकाभिश्च सर्वशः अनुकः शुभै राजन्योक्त्रैश्चैव संरश्मिभिः सङ्कीर्णा वसुधा भाति वसन्ते कुसुमैरिव एवमेप क्षयो वृत्तः पाण्डूनामपि भारत कुद्धे शान्तनवे भीष्मे द्रोणे च रथसत्तमे ॥ ३९ ॥ अश्वत्थानि कृपे चैव तथैव कृतवर्मणि तथेतरेषु क्रुद्धेपु तावकानामपि क्षयः इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मनधपर्वणि अष्टमदिवसयुद्धे ऊननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥ गिराने लगे। उस समय युद्धभूमि बहुत ही भयानक शोभित हा रही थी जैसे वसन्त-ऋतु में देख पडने लगी । टूटे हुए रथ, कटी हुई धजा, के फलों से किसी बड़े उद्यान की शोभा होती है । कटे हुए श्रेष्ठ शस्त्र, चामर, व्यजन, चमकील छत्र, । हे महाराज ! भीष्म, महारथी द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, हार, निष्क, केयूर, कुण्डल शोभित सिर, पगडिया, कृपाचार्य, कृतवमी आदि क्रुद्ध होकर पाण्डवसेना पताका, घोडो के जोत, लगामे, रास और अनेक को नष्ट कर रहे थे, और पाण्डवपक्ष के भीम, अर्जुन, प्रकार के अन्य सामान सारी युद्धभूमि में जहाँ-तहाँ अभिमन्यु आदि योद्धा क्रुद्ध होकर कौरव-सेना का बिखरे पड़े थे ॥३५॥३८॥ उनमे वह भूमि वैसे ही सहार कर रहे थे ॥३९॥४०॥ भीष्मपर्व का नवासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८९ ॥ अथ नवतितमोऽध्याय ॥ १० ॥ वर्तमाने तथा रौद्रे राजन्वीरवरक्षये शकुनिः सौबलः श्रीमान्पाण्डवान्समुपाद्रवत् ॥ १ ॥ तथैव सात्वतो राजन्हार्दिक्यः परवीरहा अभ्यद्रवत संग्रामे पाण्डवानां वरूथिनीम् ततः काम्बोजमुख्यानां नदीजानां च वाजिनाम् । आरट्टानां महीजानां सिन्धुजानां च सर्वशः ॥ ३ ॥ वनायुजानां शुभ्राणां तथा पर्वतवासिनाम् । वाजिनां वहुभिः संख्ये समन्तात्परिवारयन् ॥ ४ ॥ नब्बयाँ अध्याय ॥१०॥ मञ्जय ने कहा-हे राजेन्द्र ! इस प्रकार शत्रुदमन हार्दिक्य (कृता) भी पाण्डवो की सेना लोकनायक महामंग्राम आरम्भ होने पर मुबल के म युद्ध करने के लिए आगे बढ़े ॥११२॥ काम्बोज पुत्र शकुनि पाण्टनों पर आक्रमण करने चले । यदुवंशी देश के, नदी-तट के देश के, आरए देश के, मिन्धु सञ्जय उवाच- ।
अध्याय ०० म हा भारत । ११३७ - । । ये चाऽपरे तित्तिरिजा जवना वातरंहसः सुवर्णालंकृतैरेतैर्वर्मवद्भिः सुकल्पितैः हयैर्वातजवैर्मुख्यैः पाण्डवस्य सुतो वली अभ्यवर्तत तत्सैन्यं हृष्टरूपः परन्तपः अर्जुनस्य सुतः श्रीमानिरावान्नाम वीर्यवान् । स्नुपायां नागराजस्य जातः पार्थेन धीमता ऐरावतेन सा दत्ता अनपत्या महात्मना पत्यौ हते सुपर्णेन कृपणा दीनचेतना भार्यार्थ तां च जग्राह पार्थः कामवशानुगाम् । एवमेप समुत्पन्नः परक्षेत्रेऽर्जुनात्मजः स नागलोके संवृद्धो मात्रा च परिरक्षितः पितृव्येण परित्यक्तः पार्थद्वेपाद दुरात्मना रूपवान्वलसम्पन्नो गुणवान्सत्यविक्रमः इन्द्रलोकं जगामाऽऽशु श्रुत्वा तत्राऽर्जुनं गतम्॥ ११ ॥ सोऽभिगम्य महाबाहुः पितरं सत्यविक्रमः अभ्यवादयदव्यग्रो विनयेन कृताञ्जलिः ॥ १२ ॥ न्यवेदयत चाऽऽत्मानमर्जुनस्य महात्मनः इरावानम्मि भद्रं ते पुत्रश्चाऽहं तव प्रभो देश के, बनायु देश के, स्थलज और पर्वतीय देश के उत्पन्न करने के लिए, स्त्री-रूप से स्वीकार कर लिया। असख्य घाडो पर सवार पीरो ने पाण्डवसेना पर इस प्रकार दूसरे के क्षेत्र में अर्जुन के वीर्य से इरावान् आक्रमण किया। तीता के रङ्ग के, स्फत्र्तिगाली, सुवर्ण का जन्म हुआ ॥७।९।। इरानान् नागलोक में ही के साज से अलकृत आर सुवर्ण के जालो से सुरक्षित ! माना के पास रहे और उसी ने उन्हे पाल-पोसकर बढिया घोडा से युक्त रथ पर अर्जुन के पुत्र इरानान् । बडा क्यिा । इरानान् का चाचा अश्वमेन अर्जुन में उधर से कौरवसेना का वेग रोकने के लिए आगे द्रोह रखता था, उसने इरावान् को उसी विद्वेष के वढे ॥३६॥ पराक्रमी दरावान् नागराज ऐरावत की कारण त्याग दिया। सयविक्रमी नागराज इरागन् ने कन्या के गर्भ में अर्जुन के वीर्य से उत्पन्न हुए थे । उस समय सुना कि अर्जुन इन्द्रलोक को गये हैं। गरड़ ने उस कन्या के पहले पति को मार डाला । तब वे अकाश मार्ग से इन्द्रलोक मे पिता के पास था । तब उस दु.खित कन्या को ऐरारत ने सन्तान हान देखकर अर्जुन के अणि कर दिया । काम के जोड़कर, अपना परिचय देकर, अर्जुन से कहा- वश ओर अनुगत उस स्री को अर्जुन ने, सन्तान गये । वहाँ पहुँचकर इरावान् ने नम्रत पूर्वक हाथ हे प्रभो ! आपका कल्याण हो, मैं आपका पुत्र हूँ।
४४३८ । म हा भा र त [ मा - मातुः समागमो यश्च तत्सर्वं प्रत्यवेदयत् नच्च सर्व यथावृत्तमनु सस्मार पाण्डवः ॥ १४ ॥ परिष्वज्य सुतं चाऽपि आत्मनः सदृशं गुणैः । प्रीतिमाननयत्पार्थों देवराजनिवेशने सोऽर्जुनेन समाज्ञप्तो देवलोके तदा नृप प्रीतिपूर्व महावाहुः स्वकार्य प्रति भारत ॥ १६ ॥ युद्धकाले त्वयाऽस्माकं साह्यं देयमिति प्रभो । वाढमित्येवमुक्त्वा तु युद्धकाल इहाऽऽगतः ॥१७॥ कामवर्णजवैरश्वैर्वहुभिः संवृतो नृप ते हयाः काञ्चनापीडा नानावर्णा मनोजवाः ॥१८॥ उत्पेतुः सहसा राजन्हंसा इव महोदधौ ते त्वदीयान्समासाद्य यसङ्घान्मनोजवान् ॥ १९ ॥ क्रोडैः क्रोडानभिनन्तो घोणाभिश्च परस्परम् । निपेतुः सहसा राजन्सुवेगाभिहता भुवि ॥ २० ॥ निपतद्भिस्तथा तैश्च हयसङ्घः परस्परम् शुश्रुवे दारुणः शब्दः सुपर्णपतने यथा ॥ २१ ॥ तथैव तावका राजन्समेत्याऽन्योन्यमाहवे परस्परवधं घोरं चक्रुस्ते हयसादिनः ॥ २२॥ तम्मिंस्तथा वर्तमाने संकुले तुमुले भृशम् उभयोरपि संशान्ता हयसङ्घाः समन्ततः ॥ २३ ॥ फिर इरायान् ने अपनी माता के माथ अर्जुन के वर्णनाले, सुवर्णभूपिन, विचित्र घोड़े लेकर युद्धभूमि समागम का समाचार कहा । अर्जुन को भी पहले में आ गये । ये घोड़े ममुद्र के मध्य में उड़ते हुए का मय वृत्तान्त स्मरण हो आया ॥१०॥१४॥ उन्होंने हमो के ममान शोभा दे रहे थे। वे दिव्य घोड़े अपने ही ममान मब गुणों मे युस पुत्र को गले से आपके घोड़ों के मध्य घुमकर थूथन से थूयन में लगाकर प्रसन्नतापूर्वक कहा-हे पुत्र ! तुम प्रीति. । और छाती में छाती में प्रहार करते हुए आगे बढ़े पूका यही इन्द्रलोक में रहो । जब युद्ध होगा तर ॥१७॥२०॥ उनके वेग मे और चलने में उक्ने हुए तुम हमारी महायता काना। पिता की अ.जापाशर गरद के पहा का घेर गन्द होने लगा। है करक गगन् यहीं रहने गे॥१५१७|| म ममय गजेन्द्र ! आपके पक्ष के घोड़े और घुरमवार भी गुट उति ने पर यो गान् यथेष्ट वेग और : मिडकर प्रचार करने लंगे। उम घोर युद्ध में दोनों अध्याय ०० म हा भारत [ ४४३० प्रक्षीणसायकाः शूरा निहताश्वाः श्रमातुराः । विलयं समनुप्राप्तास्तक्षमाणाः परस्परम् ॥ २४ ॥ ततः क्षीणे हयानीके किञ्चिच्छेपे च भारत सौबलस्याऽनुजाः शूरा निर्गता रणमूर्द्धनि ॥ २५॥ वायुवेगसमस्पर्शाञ्जवे वायुसमांश्च ते आरुह्य वलसम्पन्नान्वयःस्थांस्तुरगोत्तमान् गजो गवाक्षो वृपभश्चर्मवानार्जवः शुकः पडेत वलसम्पन्ना निर्ययुर्महतो वलात् ॥२७॥ वार्यमाणाः शकुनिना तैश्च योधैर्महावलैः सन्नद्धाः युद्धकुशला रौद्ररूपा महावलाः ॥ २८॥ तदनीकं महाबाहो भित्वा परमदुर्जयम् वलेन महता युक्ताः स्वर्गाय विजयैषिणः ॥ २९ ॥ विविशुस्ते तदा हृष्टा गान्धारा युद्धदुर्मदाः । तान्प्रविष्टांस्तदा दृष्ट्वा इरावानपि वीर्यवान् ॥ ३० ॥ अब्रवीत्समरे योधान्विचित्रान्दारुणायुधान् यथैते धार्तराष्ट्रस्य योधाः सानुगवाहनाः ॥ ३१ ॥ हन्यन्ते समरे सर्वे तथा नीतिर्विधीयताम् वाढमित्येव मुक्त्वा ते सर्वे योधा इरावतः ॥ ३२॥ जध्नुस्तेषां वलानीकं दुर्जयं समरे परैः तदनीकमनीकेन समरे वीक्ष्य पातितम् ॥ ३३ ॥ ओर के घोडे शिथिल हो गये । शूरो के प्राण समाप्त पराक्रमी योद्धाओं की मेना चली। शकुनि और उनके हा गये । घोड़े मारे गये आर वे स्वय भा अधिक भाई वायुवेगगामी बढ़िया घोडा पर मार होकर परिश्रम करने के कारण शिथिल हो गये। वे वीर सेना के अगले भाग में स्थित हुए ॥२५॥२८॥ परस्पर प्रहार करके मरने लगे। वीरगण ओर घोडे । राजेन्द्र । गान्धार देश के राजा और उनके ही भाई स्वर्ग की गति अथवा विजय का इच्छा मे रत्माह मर मरकर पृथ्वी पर गिरने लगे ॥२१॥२४॥ वह घुडसवार सेना थोडी ही रह गई । उसी समय युद्ध- । पूर्वक अपने युद्धकुशल रोदरप बली मनि माथ शत्रुओं की सेना मे प्रवेश हुए । इरागन् ने निपुण शकुनि अपने महान गज, गवाक्ष, वृषभ, चर्मवान् , आर्जव और शुक नाम के छ भाइयों के | उनको अपनी मेना में प्रग होते देवकर, विचित्र अल्वारों आर शस्त्रों से सुशोभित और श्रेष्ट वोटों साथ युद्ध के लिए उपस्थित हुए ! उनमे साथ महा- । - - - -- ।
म हा भा र त [ भी 14 ४४१० ] .. अमृष्यमाणास्ते सर्वे सुवलस्याऽऽत्मजा रणे । इरावन्तमभिद्रुत्य सर्वतः पर्यवारयन् ॥ ३४ ॥ ताडयन्तः शितैः प्रासैश्चोदयन्तः परस्परम् ते शूराः पर्यधावन्त कुर्वन्तो महदाकुलम् ॥३५॥ पुरावानथ निर्भिन्नः प्रासैस्तीक्ष्णैर्महात्मभिः स्रवता रुधिरेणाऽक्तस्तोत्रैर्विद्ध इव द्विपः ॥ ३६॥ पुरतोऽपि च पृष्ठे च पार्श्वयोश्च भृशाहतः एको वहुभिरत्यर्थं धैर्याद्राजन्न विव्यथे ॥३७॥ इरावानपि संक्रुद्धः सर्वांस्तान्निशितैः शरैः मोहयामास समरे विध्वा परपुरञ्जयः ॥ ३८॥ प्रासानुत्कृप्य तरसा स्वशरीरादरिन्दमः तैरेव ताडयामास सुवलस्याऽऽत्मजात्रणे ॥ ३९ ॥ विकृप्य च शितं खई गृहीत्वा च शरावरम् । पदातिर्दुतमागच्छजिघांसुः सौबलान्युधि ततः प्रत्यागतप्राणाः सर्वे ते सुवलात्मजाः भूयः क्रोधसमाविष्टा इरावन्तमभिद्रुताः ॥४१॥ इरावानपि खड्न दर्शयन्पाणिलाघवम् अभ्यवर्तत नान्सन्सोवलान्वलदर्पितः ॥ १२ ॥ पर मगार, अपने मंनिक लोगो में कहा- -----योग! मारे । इममे रावान् के शरीर मे रहा. बहने लगा फार प्रेमा उपाय कंग निगम ये शत्रुपक्ष के योदा ॥३२॥३६॥ 7 अकुरा मे आहत गजराज के समान अनुराग और याहनी महित मांगे जाय ॥२९॥३२॥ ग्रो मे बिल हो गये । बहुत लोगों के प्रहार करने अब गान् के मय योदा गओ यो दुर्जय मना पर भी धीर डाय न पिनलित नहीं हुए। शत्रुदमन पर अग्रमण करके उमे नष्ट यग्ने या चटा करने गगन ने प्राधान्य कर मयको अयन्त तीक्ष्ण ग। युनि और उनमें भी आना मेना या बाण मार । उन नक्षण वाणां के लगने में शनि शामिना को नष्ट हुए देग मायगे अगर के भार अनम हो गये । गान् ने उन्ही प्रासी रगन र आममा कांगे ये रिए दी। म. जो उन में प्रवेश गंप , मुनि महान गगन् पो पारो अंग !ि गर क. गाया की वायर किया ॥३६,३९ मा पक्षात् शांना बागार मंगना पर firन युनि के भाइयों को मारने के गिर द्वारा पाने का मगर : नये. मानरमा श्री गुमटाकाली उनकी अपोंग गो ग्राम . गम और दीद। निगी का माला दूर ।.४१ अध्याय १० म हा भारत - लाघवेनाऽथ चरतः सर्व ते सुबलात्मजाः अन्तरं नाऽभ्यगच्छन्त चरन्तः शीघ्रगैर्हयः ॥४३॥ भूमिष्ठमथ तं संख्ये सम्प्रदृश्य ततः पुनः परिवार्य भृशं सवें ग्रहीतुमुपचक्रमुः ॥ ४२ ॥ अथाऽभ्याशगतानां स खड्नेनाऽमित्रकर्शनः असिहस्तापहस्ताभ्यां तेषां गात्राण्यकृन्तत ॥ ४५ ॥ आयुधानि च सर्वेषां वाहूनपि विभूपितान् अपतन्त निकृत्ताङ्गा मृता भूमौ गतासवः ॥ ४६॥ वृपभस्तु महाराज बहुधा विपरिक्षतः अमुच्यत महारोदात्तन्माद्वीरावकर्ननात् ॥१७॥ तान्सर्वान्पतितान्दृष्ट्वा भीतो दुर्योधनस्ततः अभ्यधावत संक्रुद्धो राक्षसं घोरदर्शनम् ॥४८॥ आHशृति महेप्यासं मायाविनमग्न्दिमम् वैरिणं भीमसेनस्य पूर्व वकवधेन वे ॥१९॥ पश्य वीर यथा ह्येप फाल्गुनस्य सुतो वली मायावी विप्रियं कर्तुमकान्मे वलक्षयम् त्वं च कामगमस्तात मायास्त्रे च विशारदः कृतवैरश्च पार्थेन तम्मादेनं रणे जहि ॥ ५० ॥ छिन्न भिन्न होकर मर गये। वृषभ भी बटुन घायर हुई और वे क्रुद्ध होकर रागान् पर आक्रमण करने को दोड़े । महावटी इरागान् भी नटवार के हाथ हो गये, किन्तु उग भयहरमपाम मे फिमा प्रभार फेऊन, स्फत्ति दिग्वाते हुए उनकी ओर बढ़ने लगे उनक प्राण बन गये ।।४३१४ा है महागज : ॥४०॥४२॥ शनि के यहां भाई शीघ्रगामी घोड़ी ऋष्यम का पुत्र गक्षम अग्युप बदा गायावी या पर मवार थे, और शीघ्रता के माथ घोडी को घुमा । यह आरसी और में युद्ध करता था । भीमगन पर रहे थे: किन्तु किमी प्रकार वे इरागान् के ऊपर उनके मित्र अफ दन्य को मारकर उनके शत्रु । आक्रमण न कर पाये । इरावान् को पैदल देग नाग । चुके थे । शकुनि के भाइयो यो मृत्यु देशका दुर्योगन और में घेरकर अनि के भाइयों ने उसे पकड़ लेना । मन ही मन यन भयभीन टुये । उन्मान योग यहा । ये जा निकट पहुँन गये तप रागन् ने अम्बुप के पास जाकर या वारक देगा, नाण तयार में उनके गगरो, अ और आयुगे अर्जुन या पुत्र गान बड़ा मान्य होने के कारण में दोदा यो मार गा। मन मंग बड़ा अनिय नया अरयाग में यह हाशे को पाटना आम किया । एक तृपभ को छोड़ कर गप पोनों ... लिपा । तुम भी मामयुर में बड़े चतुर हो । - .
[ भीमपच ४४४२ ] म हा भा र त - वाढमित्येवमुक्त्वा तु राक्षसो घोरदर्शनः प्रययौ सिंहनादेन यत्राऽर्जुनसुतो युवा ॥ ५२ ॥ आरुढैयुद्धकुशलैर्विमलप्रासयोधिभिः वीरैः प्रहारिभिर्युक्तैः स्खैरनीकैः समावृतः ॥ ५३ ॥ हतशेषैर्महाराज द्विसाहहयोत्तमैः निहन्तुकामः समरे इरावन्तं महाबलम् ॥ ५४॥ इरावानपि संक्रुद्धस्त्वरमाणः पराक्रमी हन्तुकामममित्रनो राक्षसं प्रत्यवारयत् ॥ ५५॥ तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य राक्षसः सुमहाबलः त्वरमाणस्ततो मायां प्रयोक्तुमुपचक्रमे ॥ ५६ ॥ तेन मायामयाः सृष्टा हयास्तावन्त एव हि । स्वारूढा राक्षसैघोरैः शूलपटिशधारिभिः ॥ ५७॥ ते संरब्धाः समागम्य द्विसाहस्राः प्रहारिणः । अचिराद्गमयामासुः प्रेतलोकं परस्परम् ॥ ५८॥ तस्मिंस्तु निहते सैन्ये तावुभौ युद्धदुर्मदो संग्रामे समतिष्ठेतां यथा वै वृत्रवासवौ ॥ ५९॥ आद्रवन्तमभिप्रेक्ष्य राक्षसं युद्धदुर्मदम् इरावानथ संरब्धः प्रत्यधावन्महाबलः ॥६० ॥ समभ्याशगतस्याऽऽजो तस्य खड्ड्रेन दुर्मतेः । चिच्छेद कार्मुकं दीप्तं शरावापं च सत्वरम् ॥६१ ॥ जहाँ चाहो यहा जा सकते हो। भीमसेन से तुम्हारी को आत देखकर महावली राक्षस अलग्बुप शीघ्रता घोर शत्रुता है। इसलिए तुम तुरन्त जाकर इरावान् का । के साथ माया का प्रयोग करने लगा। इरावान् के वध करो ॥४८॥५१॥ दुयाधन के यो कहने पर धोर- | साथ जितने घोडे और सेना थी, उतने ही घोडे और गप गक्षम अलम्बुप मिंहनाद करता हुआ अर्जुन क उन पर सवार शूल-पहिश धारी घोर राक्षस उसने पुत्र इगवान् के पाम जाने के लिए आगे यहा । उस । प्रकट किये। दोनों ओर के सवार और घड़े परस्पर के साथ ऐसे युद्धनिपुण योद्धाओं की सेना भी चली टड़कर मर गये ॥५५/५८॥ सब सेना नष्ट हो जाने जो निर्मल ग्राम नाम के शस्त्रो में युद्ध करते थे पर, वृत्रासुर आ( इन्द्र के सम.न, युद्ध में अजेय दोनों ॥५२॥५४॥ उधर महाबली इरावान् क्रुद्ध होकर वीर आमने-सामने आये । राक्षस को अपनी ओर शीघ्रता के माथ उम राक्षम को रोग्ने चले । इरागान् ! आते देखकर महाबली इरावान् भी युद्ध होकर उसकी .
अध्याय २० ] म हा भारत । । स निकृत्तं धनुर्दृष्ट्वा खं जवेन समाविगत् इरावन्तमभिक्रुद्धं मोहयन्निव मायया ॥६२ ॥ ततोऽन्तरिक्षमुत्पत्य डरावानपि राक्षसम् विमोहयित्वा मायाभिस्तस्य गात्राणि सायकैः ॥ ६३ ॥ चिच्छेद सर्वमर्मज्ञः कामरूपो दुरासदः तथा स राक्षसश्रेष्ठः शरैः कृत्तः पुनः पुनः ॥६४ ॥ संवभूव महाराज समवाप च यौवनम् माया हि सहजा तेषां वयो रूपं च कामजम् ।। ६५ ॥ एवं तद्राक्षसस्याऽई छिन्नं छिन्नं वभूव ह इरावानपि संकुद्धो राक्षसं तं महावलम् ॥६६ ॥ परश्वधेन तीक्ष्णेन चिच्छेद च पुनः पुनः स तेन वलिना वीरश्च्छि धमान इरावता ॥६७॥ राक्षसोऽप्यनदधोरं स शब्दस्तुमुलोऽभवत् । परश्वधक्षतं रक्षः सुनाव बहुशोणितम् ॥६८॥ ततश्चक्रोध वलवांश्चके वेगं च संयुगे आयङ्गिस्तथा दृष्ट्वा समरे शत्रुमृर्जितम् ॥६९ ॥ कृत्वा घोरं महद्रूपं ग्रहीतुमुपचक्रमे अर्जुनस्य सुतं वीरमिरावन्तं यशस्विनम् ॥ ७० ॥ संग्रामशिरसो मध्ये सर्वेषां तत्र पश्यताम् तां ॥ ७१ ॥ दृष्ट्वा तादृशीं मायां राक्षसस्य दुरात्मनः और दाड़े । राक्षस जा पाम पहुँचा तर इरावान् ने जाता था। हे राजेन्द्र ! गक्षमों में माया पदारमा ताण खड्ग मे उममा धनुष आर तम काट डाग होता है, अपनी अगम्या और प यो रमाके १५९।६१॥धनुप कट जान पर रह कामपा राक्षम अनुमार परिवर्तन कर माने । कारण उमगत अयन्त नुद्ध इराकान् गो माया मे मोहित मा करता के अङ्ग बारम्बार काट जाने पर भी मनाने हुआ आमाग मे बैग में नरा गया । दुर्दप रागन् ये॥६२।६६|| गान भी अयन्न मुद हर मा आकाश में पहुँच गये और बाणा से गक्षम के परमर मर ग वाम्यगर उस वा गम के आदी मर्मस्थों को काटने लगे। राक्षग भ्रष्ट अपयुष को काटने । जमे कोई वृक्ष याटा जा रहातो. बारम्बार गाणों से अ कटे जाने परभा नहीं मरा। को काटा जा गा गरम गाने गा| उमंग या माया ने फिर-फिर जवान औr मामोरा न A मे गया धागर व नरें। उम गक्षम ने १४४६ ] म हा भा र स [ भी 4 । वर्तमाने तथा रौद्रे संग्रामे भरतर्षभ उभयोः सेनयोः शूरा नाऽमृष्यन्त परस्परम् ॥ ९१ ॥ आविष्टा इव युध्यन्ते रक्षोभूता महाबलाः तावकाः पाण्डवेयाश्च संरब्धास्तात धन्विनः ॥९२ ॥ न स्म पश्यामहे कश्चित्प्राणान्यः परिरक्षति संग्रामे दैत्यसङ्काशे तस्मिन्वीरवरक्षये इति श्री महाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि इरावद्वधे नवनितमोऽध्याय ॥ ९० ॥ युद्ध कर रहे थे । प्रायः द्रोणाचार्य का पराक्रम देख ॥८८1९०॥ हे राजेन्द्र ! उस भयानक सग्राम में कर पाण्डव बहुत ही भयर्भात हो गये | वे द्रोणाचार्य कोई भी शत्रु के प्रहार से शान नहीं रह सकता के प्रहारों से पीडित होकर कहने लगे-आचार्य द्रोण था । सभी भूतग्रस्त मे होकर प्रवल वेग से युद्ध कर अकेले ही हम सबको और हमारी सेना को नष्ट कर रहे थे । देवासुर-सग्राम के समान भयानक उस युद्ध सकते हैं । फिर इम समय तो पृथ्वी के सभी श्रेष्ट मे कोई भी प्राणो का मोह रखकर युद्ध करता नहीं योद्धा उनके साथ है । अब वे क्या नहीं कर मकने' दिखाई देता था ॥९११९३॥ भीष्मपर्व का नब्बेवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ०० ॥ अथ एकनपतितमोऽध्याय ॥ ०१ ॥ धृतराष्ट्र उवाच - इरावन्तं तु निहतं दृष्ट्वा पार्थी महारथाः संग्रामे किमकुर्वन्त तन्ममाऽऽचक्ष्व सञ्जय -इरावन्तं तु निहतं संग्रामे वीक्ष्य राक्षसः व्यनदत्सुमहानादं भैमसेनिर्घटोत्कचः नदतस्तस्य शब्देन पृथिवी सागराम्बरा सपर्वतवना राजश्चचाल सुभृशं तदा अन्तरिक्षं दिशश्चेव सर्वाश्च प्रदिशस्तथा श्रुत्वा सुमहानादं तव सैन्यस्य भारत ॥ ४ ॥ उरुस्तम्भः समभवद्वेपथुः स्वेद एव च सर्व एव महाराज तावका दीनचेतसः टक्यानगग अन्याय ॥ १ ॥ प्रतराष्ट्र ने पूछा--हं मन्नय ! युद्ध में मरे हुए उसके गरजने के शब्द मे पर्वत, वन, समुद्र आदि गगन को देगकर फिर पाण्डवों ने क्या किया ॥१॥ माहित पृथ्वी, अन्तरिक्ष, दिशा, विदिशा आदि सर मलय ने कहा--हे महाराज ! मगर में गगन की कांपन जगे। 13 महाशद मुनकर आपके सानिक मयुदेपर घटा कब ने योर मे घोर मिनाट दिया। लोग यानि गगे; उनके शरीर में पसीना बहने लगा सन्जय उवाच--- .
अध्याय ९१ म हा भारत [ ४४४७ - सर्वतः समचेष्टन्त सिंहभीता गजा इव नर्दित्वा सुमहानादं निर्घातमिव राक्षसः ज्वलितं शृलमुद्यम्य रूपं कृत्वा विभीपणम् । नानारूपप्रहरणैतो राक्षसपुङ्गवः आजघान सुसंकृद्धः कालान्तकयमोपमः तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य संक्रुद्धं भीमदर्शनम् स्ववलं च भयात्तस्य प्रायशो विमुखीकृतम् । ततो दुर्योधनो राजा घटोत्कचमुपाद्रवत् प्रगृह्य विपुलं चापं सिंहवाद्विनदन्मुहुः पृष्ठतोऽनुययौ चैनं स्रवद्भिः पर्वतोपमैः कुञ्जरैर्दशसाहस्रैर्वङ्गानामधिपः खयम् तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य गजानीकेन संवृतम् पुत्रं तब महाराज चुकोप स निशाचरः ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ १२ ॥ राक्षसानां च राजेन्द्र दुर्योधनवलस्य च गजानीकं च सम्प्रेक्ष्य मेघवृन्दमिवोदितम् ॥ १३ ॥ अभ्यधावन्त संक्रुद्धा राक्षसाः शस्त्रपाणयः नदन्तो विविधान्नादान्मेघा इव सविद्युतः ।। १४ ॥ शरशक्त्यृष्टिनाराचैनिघ्नन्तो गजयोधिनः भिन्दिपालैस्तथा शुलैर्मुद्गरैः सपरश्वधैः ॥१५॥ आर पाओ जकड-से गये । हे राजेन्द्र । उस समय हाथ में लेकर सिंहनाद करते हुए घटोत्कच की ओर आपके पक्ष के सब सेनिक सिंह से भयभीत हुए हाथी चले ॥६॥१०॥ गङ्गदेश के राजा दस हजार मस्त की तरह दीन भाव से इपर-उधर छिपने लगे॥२॥६॥ हाथियों का दल रेकर दुर्योधन के साथ चले। दुर्योधन राक्षस घटोत्कच वह भयङ्कर शब्द करके, घोर रूप को आने देखकर राक्षस घटोत्कच अत्यन्त युद्ध होकर रखकर, शूल हाथ में लिय काक की तरह दाड़ा । उनकी ओर चला । तर राक्षममेना के साथ दुर्योपन उसके साथ विविध अस्त्र-शस्त्र धारण क्येि अनेक की सेना का घोर युद्ध होने लगा ॥१०॥१३॥शन भया ने राक्षस भी चले । इसके अनन्तर भयानक धारण किये हुए राक्षसगण घनघटा के समान हाथियों की सेना को आने देख, कुद्ध होकर, बादल में बिजली राक्षस घटोकच को अ ते आर उसके भय से अपनी सेना को युद्ध से हटते देखकर राजा दुर्योधन धनुप । कडकने का सा शब्द करते हुए दौडे । वे हाथियों ४४१८ ] - ramaniasarana - पर्वताप्रैश्च वृक्षैश्च निजघ्नुस्ते महागजान् भिन्नकुम्भान्विरुधिरान्भिन्नगात्रांश्च वारणान् ॥ १६ ॥ अपश्याम महाराज वध्यमानान्निशाचरैः तेषु प्रक्षीयमाणेषु भनेपु गजयोधिपु ॥ १७॥ दुर्योधनो महाराज राक्षसान्समुपाद्रवत् अमर्षवशमापन्नस्त्यवत्वा जीवितमात्मनः मुमोच निशितान्वाणान्राक्षसेपु परन्तप जधान च महेष्वासः प्रधानांस्तत्र राक्षसान् ॥ १९ ॥ संक्रुद्धो भरतश्रेष्ठ पुत्रो दुर्योधनम्तव वेगवन्तं महारौद्रं विद्युज्जिहूं प्रमाथिनम् शरैश्चतुर्भिश्चतुरो निजघान महाबलः ततः पुनरमेयात्मा शरवर्षं दुरासदम् ॥ २१ ॥ मुमोच भरतश्रेष्ठो निशाचरवलं प्रति तत्तु दृष्ट्वा महत्कर्म पुत्रस्य तब मारिप ॥ २२ ॥ क्रोधेनाऽभिप्रजज्वाल भैमसेनिर्महावलः स विस्फार्य महच्चापमिन्द्राशनिसमप्रभम् ॥ २३ ॥ अभिदुद्राव वेगेन दुर्योधनमरिन्दमम् तमापतन्तमुवीक्ष्य कालस्कृष्टमिवाऽन्तकम् न विव्यथे महाराज पुत्रो दुर्योधनस्तव अथैनमब्रवीत्क्रुद्धः क्रूरः संरक्तलोचनः ॥ २५॥ के योद्धाओ को वाण, शक्ति, नाराच, भिन्दिपाल, राक्षसों पर आक्रमण करने और तीक्ष्ण वाण बरसाने गुल, मुद्गर, परश्वध आदि से और बडे-बडे हाथियों लगे । वे अयन्त कुपित हाफर मुख्य मुख्य राक्षसों को को पर्वतों के शिग्वरो ओर वृक्षों मे मारने लगे। हे मारने लगे ।।१७।१९॥ दुर्योधन ने महावीर वेगवान, राजेन्द्र : उम समय देग्व पड़ा कि गक्षमो के प्रहार से महाराद, विद्युजिह्व और प्रमाथी इन चार प्रधान बर्ड एक हाथियों के मस्तक फट गये, कई एक के शरीर राक्षमो को चार ही वाणो से मार डाला। इसके पश्चात् कट-फट गये आर कई एक के शरीर में रक्त की धारा व मारी राक्षससेना के ऊपर कठोर वाण बरमाने बहने लगी ।।१३।१७। इस प्रकार गजसेना जब नष्ट लंग। हे महाराज दुर्योधन का यह अद्भुत कार्य देखकर हो गई आर शेष हाथी भाग खडे हुए तब महाराज घटोत्कच बहुत कुपित हुआ। वह वज्रपात के समान दयोधन क्रोध के आवेग मे जीवन की ममता छोडकर घोर शब्द करनेवाला सुद्र : धनुप चढाकर दुर्योधन की अध्याय ०२ म हा भा र त { ४४०० अद्याऽऽनृण्यं गमिष्यामि पितृणां मातुरेव च । ये त्वया सुनृशंसेन दीर्घकालं प्रवासिताः ॥ २६॥ यञ्च ते पाण्डवा राजश्छलबूते पराजिताः यच्चैव द्रौपदी कृष्णा एकवस्त्रा रजस्वला ॥२७॥ सभामानीय दुर्बुद्धे वहुधा क्लेशिता त्वया तव च प्रियकामेन आश्रमस्था दुरात्मना ॥ २८॥ सैन्धवेन परामृष्टा परिभूय पितॄन्मम एतेपामपमानानामन्येषां च कुलाधम ॥ २९॥ अन्तमद्य गमिप्यामि यदि नोत्रमृजसे रणम् एवमुक्त्वा तु हैडिम्बो महाद्विस्फार्य कार्मुकम् ॥ ३० ॥ सन्दश्य दशनैरोष्ठं सृकिणी परिसंलिहन शरवर्पण महता दुर्योधनमवाकिरत् पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव बलाहक ॥ ३१ ॥ दनि श्री महाभारते भाप्मपणि भाष्मनधपवणि हेडिम्पयुद्ध एक्नवतितमोऽध्याय ॥ ९१ ॥ ओर च ॥२०॥२४॥ गजेन्द्र । उस काल सदृश इच्छ। स पाण्डया का कुछ भी विचार न करके, राक्षस को अपनी ओर आत दखकर घरधी। दुर्योगन उनकी अनुपस्थिति में द्रोपदी को वलपूर्वक ले जाकर तनिक भा विचरित नहीं हए । घटोस्च ने अयत कष्ट प, चाया । तुम्हारे इन सब दुष्कर्मों का फल शोध से दुयाधन को लकारकर कहा- र दुमति आन मै तुमको दूंगा | नो तुम प्राण बचाकर युद्ध क्षत्रिय । तुमने मरे पिता और उनके भाइयों का से भाग नही गय तो अपश्य मैं तुम्हारे प्राण लेकर क्पट के पाँसो स हराकर बहुन दिन तक प्रास म माता पिता का ऋण चुकाऊँगा" ॥२५/२९॥ वीर रहन के लिए विवश क्यिा केवल एक धोती पहने हुए घटा च इस प्रकार तीन वचन कहकर क्रोध के मारे रजस्वला द्रापदी का मभा में बुलवाकर क्लश दिया | दाता से होंठ चबाने ओर हाठ चाटने लगा। उसने आर उनमा अपमान किया, मरे पिता आर चाचा धनुप चहापर, मेघ जसे पर्वत पर जल बरसाते हैं जन बनास मे थे तब तुम्हारे आज्ञाकारी बहनोई नाच वैस ही दुयाधन पर वाण वपी करके उनसे रथ को प्रकृति सिन्धुराज जयद्रथ ने तुम्हारा प्रिय करन की छिपा दिया ॥३०॥३१॥ भीष्मपर काम माँ अयाय समाप्त हुआ ॥ ९१ ॥ अप विनवतितमोऽध्याय ॥९॥ सञ्जय उपाच-ततस्तद्वाणवपं तु दुःसहं दानवैरपि दधार युधि राजेन्द्रो यथा वर्ष महाद्विपः ४१५० } म हा भारत [ भीष्म AKAMA । -- ततः क्रोधसमाविष्टो निःश्वसन्निव पन्नगः संशयं परमं प्राप्तः पुत्रस्ते भरतर्षभ ॥ २ ॥ मुमोच निशितांस्तीक्ष्णान्नाराचान्पञ्चविंशतिम् । तेऽपतन्सहसा राजस्तस्मिन्राक्षसपुङ्गवे आशीविषा इव क्रुद्धाः पर्वते गन्धमादने स तैर्विद्धः स्रवरक्तं प्रभिन्न इव कुञ्जरः दधे मतिं विनाशाय राज्ञः स पिशिताशनः जग्राह च महाशक्तिं गिरीणामपि दारिणीम् ॥ ५ ॥ सम्प्रदीप्तां महोल्काभामशनिं ज्वलितामिव समुद्यच्छन्महावाहुर्जिघांसुस्तनयं तव तामुद्यतामभिप्रेक्ष्य बङ्गानामधिपस्त्वरन् कुञ्जरं गिरिसङ्काशं राक्षसं प्रत्यचोदयत् स नागप्रवरेणाऽऽजौ वलिना शीघ्रगामिना यतो दुर्योधनरथस्तं मार्ग प्रत्यवर्तत रथं च वारयामास कुञ्जरेण सुतस्य ते मार्गमावारितं दृष्ट्वा राजा वङ्गेन धीमता घटोत्कचो महाराज क्रोधसंरक्तलोचनः उद्यतां तां महाशक्तिं तस्मिंश्चिक्षेप वारणे ॥ १० ॥ बावना अध्याय ।। ९.२ ॥ मन्नयन कहा----हे महाराज : गजगज जमे , क्रोधान्ध होकर दुर्योधन को मारने के अभिप्राय से बादल की बूंदो को सहज ही मह रेता है वैसे ही । एक बड़ी उल्का के समान प्रज्वलित और पर्वता को दुर्योधन ने घटो कच के प्रहार अनायास मह लिये। नोड़ टालनेवाली महाशक्ति अपने हाथ में ली ॥४।६।। अयन्न मुद्ध होकर, नाग की तरह लम्बी-लम्बी घटोत्कच को वह शक्ति तानते दंग्यकार पर्वत सदृश मोम लेकर, दयाधन क्षण भर के लिए चिन्ता में पड़ ऊँने हाथी पर मवार वनादेश के राजा ने अकस्मात् गये । हम पंथात् उन्होंने उम गक्षम को तीक्ष्ण । दुर्योधन के रथ के आगे आकर उनको हाथी की पभीम नागन बाण मां गन्धमादन पर्वत पर युषित आद में कर लिया ॥७२॥ हे राजेन्द्र ! महावीर मी मे गिरे यमे हाय बाण महमा गटीका के घटोत्कच ने जय देया कि यङ्गाधिप ने दुर्योधन के मर मि॥१॥ हाथी के में मद यहना है मे रथ को छिपा दिया तब उमने वह महाशक्ति बङ्गगज पटी कार में शरीर में यह बदन रगा। उन की पर ही खीचकर मारी। उम दाक्ति की सजा मे गणित गायः गटी रुच ने अपन्न नाट गाकर यह हामी मुप में राम उगलता हुआ । - ...4A म हा भारत - । SaansonaSanaswwwimmm । अध्याय ९२ ] [ ४१५१ स तयाऽभिहतो राजस्तेन बाहुप्रमुक्तया सञ्जातरुधिरोत्पीडः पपात च ममार च पतत्यथ गजे चाऽपि वङ्गानामीश्वरो वली जवेन समभिद्रुत्य जगाम धरणीतलम् ॥ १२ ॥ दुर्योधनोऽपि सम्प्रेक्ष्य पतितं घरवारणम् प्रभग्नं च वलं दृष्ट्वा जगाम परमां व्यथाम् ॥ १३ ॥ क्षत्रधर्म पुरस्कृत्य आत्मनश्चाऽभिमानिताम् । प्राप्तेऽपक्रमणे राजा तस्थौ गिरिविाऽचलः ॥ १४ ॥ सन्धाय च शितं वाणं कालाग्निसमतेजसम् । मुमोच परमक्रुद्धस्तस्मिन्धोरे निशाचरे ॥ १५ ॥ तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य वाणमिन्द्राशनिप्रभम् लाघवान्मोचयामास महात्मा वै घटोत्कचः ॥ १६ ॥ भूयश्च विननादो क्रोधसंरक्तलोचनः त्रासयामास सैन्यानि युगान्ते जलदो यथा ॥ १७॥ तं श्रुत्वा निनदं घोरं तस्य भीमस्य रक्षतः आचार्यमुपसङ्गम्य भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥ १८ ॥ यथैप निनदो घोरः श्रूयते राक्षसेरितः हैडिम्बो युध्यते नूनं राज्ञा दुर्योधनेन ह ॥ १९ ॥ नैप शक्यो हि संग्रामे जेतुं भृतेन केनचित् । तत्र. गच्छत भद्रं वो राजानं परिरक्षत ॥ २०॥ गिर पड़ा और मर गया । बङ्गनरेश स्फात के साथ | राक्षस को मारा ।।१३।१५|| मायावी राक्षस ने उस हाथी पर से पृथ्वी पर कूद पड़े ॥९।१२॥ उस श्रेष्ठ वाण के प्रहार को महज ही निष्फल कर दिया। हाथी की मृत्यु और अपनी सेना का भागना देखकर यह क्रोधान्य होकर मारी सेना को भयभीत करता राजा दुर्योधन को बड़ा दृःख हुआ । अपनी सेना ! हुआ प्रलयकाल के मेघ के समान घोर सिंहनाद करने को भागत और पराभव स्वीकार करते देखकर, अभि लगा ॥१६॥१७॥ पितामह भीष्म उस राक्षस का मान और क्षत्रिय-धर्म के विचार मे, दुर्योधन पर्वत | भयानक शब्द सुनकर द्रोणाचार्य के पास जाकर की तरह अटल होकर वहीं खड़े रहे। इसके अनन्तर । कहने लगे---हे आचार्य ! यह राक्षस जैसा धार क्रुद्ध होकर उन्होने एक कालाग्नि के ममान चमकीला शब्द करके गरज रहा है, उससे जान पड़ता है कि भयङ्कर तीक्ष्ण वाण धनुष पर चढ़ाकर उस रोद दुर्योधन से इसका विकट युद्ध हो रहा है । आपका ४१५४ ] म हा भा र त [ भीष्मपर्व चतुर्भिरथ नाराचैरावन्त्यस्य महात्मनः जधान चतुरो वाहान्क्रोधसंरक्तलोचनः ॥४०॥ पूर्णायतविसृष्टेन पीतेन निशितेन च निर्विभेद महाराज राजपुत्रं बृहद्बलम् स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् । भृशं क्रोधेन चाऽऽविष्टो रथस्थो राक्षसाधिपः ॥ ४२ ॥ चिक्षेप निशितांस्तीक्ष्णाञ्छरानाशीविषोपमान् । विभिदुस्ते महाराज शल्यं युद्धविशारदम् ॥ ४३ ॥ इति श्री महाभारत भीष्मपर्वणि भीष्मरधपणि हैडिम्बयुद्धे द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ।। ३८॥ महाबली घटोकच ने अर्थचन्द्र वाण से सिन्धु । को मारे । घटोत्कच के वाणो से अत्यन्त व्यथित राज जयद्रथ की सुवर्णभूषित वराहचियुक्त ध्वजा होकर पराक्रमी बृहद्बल रथ पर से गिर पड़े । इसके काट गिराई । अन्य कई बाणा से उनका धनुप भी अनन्तर रथ पर सवार राक्षसराज घटोत्कच ने क्रोध काट डाला । क्रोध से लाल नेत्र करके घटोत्कच ने से विह्वल होकर पियले सर्प के समान भयङ्कर तीक्ष्ण चार नाराच बाणो से अमन्तिराज के रथ के चारा घोड़े वाण मारकर युनिपुण शल्य को भी घायल कर दिया मार डाले । फिर कार्ड तीक्ष्ण बाण राजकुमार बृहद्बल ॥३९॥४३॥ भीष्मपर्व का बावनवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ १२ ।। - अय विनवतितमोऽध्याय ॥ १३ ॥ मञ्जय उवाच - विमुखीकृत्य सर्वांस्तु तावकान्युधि राक्षसः जिघांसुर्भरतश्रेष्ठ दुर्योधनमुपाद्रवत् तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य राजानं प्रति वेगितम् अभ्यधावञ्जिघांसन्तस्तावका युद्धदुर्मदाः ॥ २ ॥ तालमात्राणि चापानि विकर्पन्तो महारथाः तमकमभ्यधावन्त नदन्तः सिंहसवत् अथेनं शरवर्षण समन्तात्पर्यवाकिरन् पर्यतं वारिधाराभिः शरदीय बलाहकाः ॥ ४ ॥ निरानयाँ अन्याय || ३ || मायने पाहा--हे महागन ! राक्षम बटोकन उनकी और यदा । आपके पक्ष के सब योद्धा घटो ग प्रकार योग्यपक्ष के, मर यारो को युद्धक्षेत्र कच को महारथी दुर्योधन की ओर जाते देखकर, में घटा कर दुर्योधन को गाग्ने के अभिप्राय मे ऊँचे दद धनुप गांचंत और मिहनाद करते हुए उसी अध्याय ९३ ] म हा भा र त [ ४४५५ स गाढविद्धो व्यथितस्तोत्रादित इब द्विपः । उत्पपात तदाऽऽकाशं समन्ताद्वैनतेयवत् व्यनदत्सुमहानादं जीमूत इव शारदः दिशः खं विदिशश्चैव नादयन्भैरवस्वनः राक्षसस्य तु तं शब्दं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः । उवाच भरतश्रेष्ठ भीमसेनमरिन्दमम् ॥ ७ ॥ युध्यते राक्षसो नूनं धार्तराष्ट्र महारथैः यथाऽस्य श्रूयते शब्दो नदतो भैरवं स्वनम् ॥ ८ ॥ अतिभारं च पश्यामि तस्मिन्राक्षसपुगये पितामहश्च संक्रुद्धः पश्चालान्हन्तुमुद्यतः तेपांच रक्षणार्थाय युध्यते फाल्गुनः परैः एतज्ज्ञात्वा महाबाहो कार्यद्वयमुपस्थितम् ॥१०॥ गच्छ रक्षस्व हैडिम्बं संशयं परमं गतम् भ्रातुर्वचनमाज्ञाय स्वरमाणो वृकोदरः ॥ ११ ॥ प्रययौ सिंहनादेन त्रासयन्सर्वपार्थिवान् वेगेन महता राजन्पर्वकाले यथोदधिः ॥१२॥ तमन्वगात्सत्यधृतिः सौचित्तियुद्धदुर्मदः श्रेणिमान्वसुदानश्च पुत्रः काव्यस्य चाऽभिभूः ॥ १३ ॥ अभिमन्युमुखाश्चैव द्रौपटेया महारथाः क्षत्रदेवश्च विक्रान्तः क्षत्रधर्मा तथैव च ॥१४॥ प्रकार घटोत्कच के ऊपर वाण बरसाने लगे, जिस से युद्ध कर रहा है। ऐसा जान पडता है कि यह युद्ध प्रकार सरकार के मेघ पर्वत पर जल रसाते है घटो फच के रिस अयन्त भयावह हो रहा है। यह ॥१॥४॥ महापराक्रमी घटो कच, अश-पीडिन गज इस समय मइट म जान पड़ता है। उधर पितामह राज के तुल्य सनिकों के पाणी से पीड़ित होर भीम कुद् होरर पाञ्चाल मैना का महार करने गये सहमा गरड के तुल्य आशश म चला गया और है। वीर अनुन शनुआ मे युद्ध करके पानारों की यहाँ जाकर शरद् ऋतु के मेव के समान जोर में रक्षा कर रहे है । हे भाई भीम ! म ममय ये दी गरजने लगा। उसके मिहनाद में आकाश, पृथ्वी, ही कार्य है । तुम शीघ्र ही जाकर प्रागमइट में दिशा आर विदिशा आदि स्थान गूंज उठे ॥५३॥ पड़े हुए पटोकच का रक्षा और अर्जुन की महायता धर्मरान युपिष्टिर ने राक्षस घटोत्कच का किट ! कागे ॥७॥११॥ धर्मपुत्र युधिष्ठिर की आना पार सिंहनाद सुनकर भीमसेन से कहा- भाई ! वह । महारी भीममेन अग्ने मिहनाद में शत्रुप के घटो कच का भीषण सिंहनाद सुन पड़ता है । रम- रानाओं को भीत और उद्विग्न करने दर, पर्याय रथी के पत्रों में उमड़ रहे ममुद्र या तरह, या ग से दीद। - N .-TO ४४५६ ] म हा भारत [ भीमप - . अनूपाधिपतिश्चैव नीलः स्ववलमास्थितः महता रथवंशेन हेडिम्वं पर्यवारयन् ॥ १५ ॥ कुरैश्च सदा मत्तः पटसहस्रैः प्रहारिभिः अभ्यरक्षन्त सहिता राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम् सिंहनादेन महता नेमिघोषेण चैव ह खुरशब्दनिपातैश्च कम्पयन्तो वसुन्धराम् ॥१७॥ तेपामापततां श्रुत्वा शब्दं तं तावकं बलम् भीमसेनभयोद्विग्नं विवर्णवदनं तथा ॥ १८॥ परिवृत्तं महाराज परित्यज्य घटोत्कचम् ततः प्रववृते युद्धं तत्र तेषां महात्मनाम् ॥ १९ ॥ तावकानां परेपां च संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्तो महारथाः ॥ २० ॥ अन्योन्यमभिधावन्तः सम्प्रहार प्रचक्रिरे व्यतिप्वक्त महारौद्रं युद्धं भीरुभयावहम् ॥ २१ ॥ हया गजैः समाजग्मुः पादाता रथिभिः सह । अन्योन्यं समरे राजन्प्रार्थयानाः समभ्ययुः ॥ २२ ॥ सहसा चाऽभवत्तीनं सन्निपातान्महद्रजः गजाश्वरथपत्तीनां पदनेमिसमुद्धतम् ॥ २३ ॥ धूम्रारुणं रजस्तीन रणभूमि समावृणोत् नेव स्वे न परे राजन्समजानन्परस्परम् ॥ २४ ॥ पिता पुत्रं न जानीते पुत्रो वा पितरं तथा निर्माटे तथा भृते वेशसे लोमहर्षणे ॥ २५॥ भामगेन रे माथ युद्धदमद म यति, माचित्ति, मना पाप मना का कोहल सुनकर भीमरान के श्रेणिमान, वमुदान, काशिरान तनय अभिभू, द्रोपरी भय स गाउ हो उठी। सर सनिर उसाहनि र पो पुत्र अभिम यु, भरदार, भानधर्मा और अपना व्यातुर भार से बगेस्च को छोड़कर लाट पड़े। मना महित अनूपाविपति राना नार आदि पार रे इम समय दोनों ओर से घोर युद्ध होने लगा । उम 11281१५॥ इन रोगों न घगाच ये पाम नामर भयदर ममर में सर महारथी परस्पर आक्रमण करत उमे गुन करनेवार और मदा मस्त रहने गर, हुए विविध शस्त्रा मे प्रहार करने लगे। दोनों और हतार हाशियों ने मय में कर लिया । म प्रकार के घुड़मगार, हाथियों के सबारा से और पैदल योद्धा माग गया था यान ग । ग्या के रथिया रपारकर प्राणपण से युद्ध करन लगे। परागत सिंहनाद और पदों का गमों पं र म प्रयापन गा । कारवपक्ष की मन 1॥१२॥ उम ममय रयों क पहिया से तथा पग्ला हाथिया आर घोड़ा व दोड़ने से धुएँ के रन अध्याय ०३ म हा भा र न 1१४५७ । -- .. शस्त्राणां भरतश्रेष्ठ मनुष्याणां च गर्जताम् सुमहानभवच्छब्दः प्रेतानामिव भारत ॥ २६ ॥ गजबाजिमनुष्याणां शोणितान्त्रतरहिणी प्रावर्तत नदी तत्र केशर्शवलशाद्वला ॥ २७ ॥ नराणां चैव कायेभ्यः शिरसां पततां रणे शुश्रुवे सुमहाञ्छन्दः पततामश्मनामिव ॥ २८॥ विशिरस्कर्मनृप्यश्च च्छिन्नगात्रेश्च वारणः अश्वः सम्भिन्नदेहेश्च सङ्कीर्णाऽभूद्वसुन्धरा ॥ २९ ॥ नानाविधानि शस्त्राणि विसृजन्तो महारथाः । अन्योन्यमभिधावन्तः सम्प्रहारार्थमुद्यताः ॥३०॥ हया हयान्समासाद्य प्रेपिता हयसादिभिः समाहत्य रणेऽन्योन्यं निपेतुर्गतर्जाविताः ॥ ३२ ॥ नरा नरान्समासाद्य क्रोधरक्तक्षणा भृशम् उरांस्युरोभिरन्योन्यं समाश्लिप्य निजन्निरे ॥ ३२ ॥ प्रपिताश्च महामारणाः परवारणः अभ्यघ्नन्त विपाणाग्रेरणानेव संयुगे ॥३३॥ ने जातरुधिरोत्पीडाः पताकाभिग्लंकृताः संसक्ताः प्रत्यदृश्यन्त मेघा इव सविनः ॥ ३२ ॥ केचिद्भिन्ना विपाणाम्रर्भिन्नकुम्भाश्च तोमरः विनदन्तोऽभ्यधावन्न गर्जमाना घना इय ॥३५॥ । । AA~~ PANNAPNAM म हा भा र म { भीष्मपत्र १४५८ ] ॥ ३७॥ केचिद्धस्तैर्द्विधा च्छिन्नैश्छिन्नगात्रास्तथाऽपरे निपेतुस्तुमुले तस्मिंश्छिन्नपक्षा इवाऽद्रयः ॥ ३६ ॥ पार्श्वस्तु दारितैरन्ये वारणैर्वरवारणाः मुमुचुः शोणितं भूरि धातूनिव महीधराः नाराचनिहत्तास्त्वन्ये तथा विद्धाश्च तोमरैः विनदन्तोऽभ्यधावन्त विशृङ्गा इव पर्वताः ॥ ३८॥ केचित्क्रोधसमाविष्टा मदान्धा निरवग्रहाः रथान्हयान्पदातींश्च ममृदुः शतशो रणे ॥ ३९ ॥ तथा हया हयारोहस्ताडिताः प्रासतोमरैः तेन तेनाऽभ्यवर्तन्त कुर्वन्तो व्याकुला दिशः ॥ ४० ॥ रथिनो रथिभिः सार्धं कुलपुत्रास्तनुत्यजः परां शक्तिं समास्थाय चक्रुः कर्माण्यभीतवत् ॥ ४१ ॥ स्वयंवर इवाऽऽमदें प्रजन्हुरितरेतरम् प्रार्थयाना यशो राजन्स्वर्ग वा युद्धशालिनः ॥ १२ ॥ तस्मिंस्तथा वर्तमाने संग्रामे लोमहर्पणे धार्तराष्ट्रं महत्सैन्यं प्रायशो विमुखीकृतम् ॥ ४३ ॥ इति श्री महाभाग्ने भाष्मपर्मणि भीष्मपर्वणि सकुल्लयुद्धे निनवनिनगोऽध्याय ॥ १३ ॥ हाधियों ने मस्तक तोमर के प्रहार मे कट गये थे। घोदा और पदलो को रौंदने लगे ॥३७॥३०॥ गनुपा वे इधर-उधर चिल्लाने हुए दौड़ते फिरते थे और के घुड़मवारी के प्रास, नामर आदि शखों की चोट आकाश में गरजने एप बाट क मगान जान पदने गासर घाड़ा के दल इधर-उधर भागने और सन सेना । कुछ हाथियों को मेंटे कट गई और कई एक के को उद्विग्न करने रगे । चीरतशो में उत्पन्न क्षत्रिय दागर यापरी गये। जिन पक्ष कट गये हों उन सी योद्धा मरन का हद निधय करके, अपनी शक्ति पर्वता के ममान ये हाथी पृपा पर गिरने रंगे ॥३४॥ की पराकाष्ठा दिगांत हुए निर्भय होकर रवा योद्धाओं ३६॥ागियों ने बड़े-यो हाथियों की कोमे दालों में युद्ध करने लगे । योद्धाओं के लिए वह रणभूमि मादा। उनके पागंगे में वैसे ही रह की स्यार की मभा मी हो रही थी । वे विजयक्रानि धाग या वीज पर्वत में गर आदि धातुणे. बहती या सर्गगनि प्राप्त करने की इच्छा से [उन्मत्त-मे होकर है। नाराक्ष बागा में निरत और नामंग से घायट परम्पर प्रहार करने लगे। हे महाराज ! इस संग्राम मरने र यी [गार मार गिर जाने गे] में दुर्योधन की अधिकाश संना पराम्न होकर भाग गिरगन्ग पल-गे दंग पहन ग । युट महाग मलाई ११४३॥ Er Antir tim र प्रसार या भाग्यो, भगमनमा अध्याय माप आ॥२३॥ ०- -- RAAGane