Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Anantgarh Sutra
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26 . . R ( भगवान् महावीर २५ वां निर्वाण शताब्दि के उपलक्ष में) पूज्य श्री अमोलक अपिजी महाराज स्मारक ग्रन्थमाला पुप्प सल्या ८८ * अन्तगड़सून खूलपाठ जोन : 563 ( अनुवाद सहित) 802 सयोजक- पंडित मुनिश्री कल्याण ऋषिजी महाराज دان प्रथमावृत्ति १००० मूल्य-चार रुपये मात्र विक्रम संवत् २०३२ जुलाई मीना १९७५ ई . 3."-:.::: ० unsarimpaliannouTIS|my:ani Destaniumigunguny lipin QuinamuTIADEneurseamlsiumD : AII-IILamsoma anan Unrmm omi aushalmerumaunismusaHugamadCIES HID चौमुखीपुल, रतलाम श्री जैनोदय प्रिंटिंग प्रेस मुद्रक: UIDAIMAHISmalur am ID :SIMINIRDOIml raminant Ek gamaHind alienser carnal सर्व अधिकार प्रकाशक के स्वाधीन - (पश्चिम खानदेश) श्री अमोल जैन ज्ञानालय, धूलिया Kamlam umAIME DHI-TIME प्रकाशक:- til TIHDamII-IHAD : AIR CHIBangulina IHIDI FImami animl TIK AISIPE AIMILAIHP IN CHIDAIMIRIDAIAIRoluminensmiss amil-up: auntSINGEHICONIE AURATim auni-onlikeumi Tra प्रस्तावना परम तारक, देवाधिदेव, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, तीर्थकर भगवन्तों ने जगज्जीवों के कल्याण के लिए जो उपदेश फरमाया है वह निगन्य प्रवचन" कहा जाता है । प्रश्न व्याकरण सूत्र मे कहा गया है कि "सव्वजग जीव रक्खणदयहयाए भगवया पाचगण कहिय" अर्थात् मंसार के सभी जीवो की रक्षा, दया और कल्याण के लिये भगवान् ने प्रवचन फरमाया है । तोर्यकर परमात्मा अर्थरूप से जो फरमाते हैं उसे ही चतुर्दश पूर्वधारी गणधर सूत्ररूप में गूथते हैं । अत्थं भासइ अरहा मुत्त गयन्ति गणहरा निउणं । तीर्थदरो की यह वाणी सत्य है, अनुत्तर है, अनुपम है, सशुद्ध है, प्रतिपूर्ण है, नैयायिक है, शल्य को काटने वाली निदि और मुक्ति का मार्ग बतलाने वाली, निर्वाण और निर्याण देने वाली है । यह अवितथ, असंदिग्ध और ध्रुव है। इस वाणी का आशय लेने वाले सिद्ध होते हैं । वुद्ध होते हैं जन्म मरण से मुक्त होते है, निर्वाण को प्राप्त करते हैं और गभो दुनो का अन्त करते हैं। द्वादशागी स्प जिन वाणी मे आठवां अग 'अन्तगड़दशांग' है । इस अंग सूत्र में उन विशिष्ट पुरुपों महिलाओं और कुमारों का वर्णन किया गया है जिन्होने अपने समस्त कर्मों के आचरण को प्रवल पुरुपार्थ से छिन्न भिन्न करके जन्म मरण प गंमार का अत करके मोक्ष एवं निर्वाण प्राप्त किया है । इन महामगलमय आत्माओं का पुण्यस्मरण भो मंगलमय का कारण होता है अतएव पर्युषण पर्व के मांगलिक दिवसों मे इस "अंतगड सूत्र" को पढ़ने सुनने की परिपाटी जैन समाज में मदिगो गे चली आ रही है।
समस्त स्थानकवासी जैन समाज में पर्युषण पर्व के दिनों मे यह सूत्र बहुत ही श्रद्धा एवं आदर के साथ पढा और सुना जाता है । वस्तुन. इस सूत्र में वर्णित महापुरुषों, महासतियों और कुमारों का जोवन मुमुक्षु आत्माओं के लिये भव्य आदर्श रूप है। जिस प्रकार इन आत्माओं ने ज्ञान-दर्शन और चारित्र की उत्कृष्ट साधना करके निर्वाण प्राप्त किया उसी प्रकार उनके पदचिन्हों पर चल कर प्रत्येक आत्मा निर्वाण प्राप्त कर सकती है। जैन धर्म अहिंसा, संयम, तप, त्याग और तितिक्षा को महत्व देता है, धन, वैभव, राजपाट ऐश्वर्य को नही । जैन धर्म त्याग प्रधान धर्म है, भोग प्रधान नही । जैन धर्म के तीर्थङ्कर स्वय विशाल साम्राज्य को छोड़ कर जगत् के जीवों के कल्याण के लिये निर्गन्य बने । हजारों सम्राट् और महारानियां संसार के वैभव को ठुकराकर तीर्थङ्कर भगवान के पवित्र चरणों की शरण में आईं। कृष्ण वासुदेव और सम्राट् श्रेणिक को महारानियो ने तो तीर्थङ्कर प्ररूपित संयम मार्ग अंगीकार करके जो उत्कृष्ट तप त्याग की साधना की वह बहुत ही अनुपम और प्रेरणास्पद है। महारानियों का विविध तप, गजसुकुमार की तितिक्षा, सुदर्शन श्रावक की दृढता इत्यादि सभी प्रसग मुमुक्षु आत्माओं को सुन्दर प्रेरणा देने वाले है । जगत् के वैभव, सासारिक सुखोपभोग और स्नेही जनों के मोह ममतामयी संबंधों की अनित्यता, अनावश्यकता और अस्थिरता को समझकर इन महान् आत्माओं ने इनका परित्याग करके आत्म कल्याण किया। आज के इस युग मे जबकि भौतिक और सासारिक सुखों को लालसा और पिपासा अत्यधिक बढ रही है और जिसके कारण ससार मे सर्वत्र अशान्ति संघर्ष और विद्वेष आदि निरन्तर बढते चले जा रहे हैं, ऐसे वातावरण में यह परम आवश्यक है कि सर्व सामान्य जनता को वास्तविक सत्यमार्ग बताया जाय, जिनेश्वर भगवन्तों का परम पावन उपदेश गुनाया जाय । इस हितकारी और मगल मय गास्त्रानुसारी धर्म के अनुसरण से हो जगत् का और मानव मात्र का कल्याण हो सकता है। इसी शुभ आशय से श्री अमोल जैन ज्ञानालय, धुलिया जैन धर्म के ग्रन्यो का प्रकाशन करके जनता में धार्मिक भावना को प्रसारित और प्रचारित करने का प्रयास कर रहा है । इस अन्तगड़ सूत्र का प्रकाशन भी इसी संदर्भ में किया जा रहा है। भगवान् महावीर के २५०० वे निर्वाण महोत्सव के उपलक्ष में उनकी हो वाणी का यह प्रकाशन उनके प्रति हमारी यह विनम्र श्रद्धाजली हे । श्री अमोल जैन ज्ञानालय को स्थापना वि सं १९६९ में हुई और तभी से यह संस्था जैन धर्म संवन्धी साहित्य का प्रकाशन करके अला मूल्य मे वितरित कर रही है । इसके छोटे आकार किन्तु सर्वाग पूर्ण प्रकाशन का एक मुद्दा यह भी है कि पैदल विहार करने वाले संत-सतियों के लिये जितना भार कम रहे विहार मे उतनी ही सहूलियत रहती है, ऐमे यह प्रकाशन इस संस्था का ८८ वा पुप्प है। अगले और पुष्प प्रेस मे मुद्रणाधीन है। इस सस्था को मुत्य रूप से प. मुनि श्री कल्याण ऋपिजी म. सा. का शुभाशीर्वाद प्राप्त है जिससे संस्था को भव्य स्वरुप प्रान हुआ है । हम पं. मुनि श्री के अत्यन्त आभारी है। अन्त मे, हमे विश्वास है कि यह प्रकाशन सबके लिये उपयोगी होगा । इसमे वर्णित तत्वों को अपना कर मुमुक्षु मात्मायें अपना कल्याग करे यही शुभ कामना । धुलिया ता० १-६-१९७५ प्रकाशक- थी अमोल जैन ज्ञानालय, धुलिया SH ०-४० -: अमोल प्रकाशन :- (१) श्री आचाराङ्ग सूत्र ५-०० (१८) महासती मदन रेखा १-०० (३४) चन्द्रसेन लीलावती २-५० (२) श्री सूयगडाङ्ग सूत्र ५-०० (१९) रुक्मिणी १-२५ (३५) जयसेन विजयसेन २-०० (३) श्री अन्तगढ सूत्र ४-०० (२०) मल्लिजिन १-५० (३६) सायर तरङ्गिणी २-०० (४) श्री आवश्यकसूत्र (मूल) ०-६० (२१) अभयकुमार ०-७० (३७) नवरत्न राशी-१ १-०० (५) शास्त्र स्वाध्याय ०-५० (२२) ज्ञाना राधना ०-३० (३८) अमृत भजन मंजरी ०-५० (६) गोसुधर्मा स्वामीने सुना-देव२-०० (२३) अक्षय तृतीया ०-५० (३६) अमृत कविता कुज ०-५० (७),गोसुधर्मा स्वामीने सुना-गुरु २-०० (२४) प्रद्युम्नकुमार चरित्र २ ५० (४०) जिन गुण गितिका १-०० (८) जीवन श्रेयस्कर पाठमाला ४-०० (२५) धर्मवीर जिनदास २-५० (४१) आलोयणा (९) चिन्तन के चित्र २-०० (२६) धन्ना शालिभद्र २-५० (४२) विद्वद विनोदिनी १-५० (१०) ध्यानकल्पतरु २-०० (२७) पू श्री अमोलक ऋषिजी २-६० (४३) सुगेय गीतिका ०-७५ (११) पच्चीस बोल का थोकडा ०-५० म. सा. जीवन चरित्र (४४) भक्तामर-हिन्दी-अग्रेजी १-०० (१२) लघुदण्डक का थोकड़ा ०-५० (२८) अमोल जीवन ज्योति पू.श्री २ ०० सहित श्री अमोल सूचि रत्नाकर ४ ०० अमोलक ऋषिजी मराठी चरित्र (४५) तीर्थङ्कर महावीर १०-०० (१४) आतुर प्रत्याख्यान ०-३० (२६) भीमसेन हरिसेन ०-७५ (४६) ऋषभदेव चरित्र-प्रेस कीप्रतिक्षा में (१५) जैन तत्व प्रकाश १५-०० (३०) हरिवश ०-५० (४७) सदा स्मरण (१६) महिला जीवन मणिमाला १२-०० (३१) अमृत चरित्रोद्यान • ६० (४८) धर्म तत्व संग्रह (१६ सती पूरा सेट) (३२) अमृत सुबोध शतक ०-५० (४६) दृष्टान्त शतक (१७) महासती श्रीमती १-०० (३३) महाबल मलिया चरित्र १-५० (५०) नवरत्न राशि भाग-२ नमः श्री वीतरागाय 8 श्रीमद् अन्तकृदशाङ्गसूत्रम् प्रथम-वर्ग काका 46.१0८८८८८८44046 मुल–तेणं कालेणं तेणं समएणं चंपा नाम णयरी होत्था । पुण्णभद्दे चेइए, वणसंडे । १॥ अयं-उस काल और उस समय मे अर्थात् इस अवसर्पिणीकाल के चौथे आरे मे, जिस समय श्रीसुधर्मा स्वामी इस भूतन पर विचरण कर रहे थे, चम्पा नामक नगरी थी । उसके ईशान कोण मे पूर्णभद्र चैत्य था। उसके चारों ओर एक बनाया ॥१॥ मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं अजसुहम्मे थेरे समोसरिए । परिसा णिग्गया, जाव पडिगया ॥२॥ अर्थ-अकाल और उस समय मे आर्य सुधर्मा स्वामी पधारे । परिषद् निकली यावत् धर्मकथा श्रवण करके यापिग चली गई।
अंतकृशान मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं अज्जसुहम्मस्स अंतेवासी अज्जनंबूणाम अणगारे जाव पज्जुवासइ, एवं वयासी-जइ णं भंते ! समणेणं भगवया महावीरेणं आइगरेणं जाव संपत्तेणं सत्तमस्स अंगस्स उवासग- दसाणं अयम8 पण्णत्ते; अट्ठमस्स णं भंते ! अंगस्स अंतगडदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अड्डे पण्णते ? सूत्रम् एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं अट्ठ वग्गा पण्णचा ॥३॥ अर्थ-उस काल और उस समय मे आर्य सुधर्मा स्वामी के शिष्य आर्य जम्बू स्वामी नामक अनगार यावत् पर्यु- पासना करते हुए इस प्रकार बोले-'भगवन् ! यदि धर्मतीर्थ की आदि करने वाले यावत् निर्वाणप्राप्त श्रमण भगवान् महा- वीर ने सातवे अग उपासकदशा का उक्त अर्थ कहा है (जो मैंने आपके मुखारविन्द से श्रवण किया है ) तो आठवे अग अतकृद्दशा का श्रमण भगवान् महावीर, धर्मतीर्थ की आदि करने वाले यावत् निर्वाणप्राप्त, ने क्या अर्थ कहा है ? (आर्य जबू स्वामी का प्रश्न सुन कर श्रीसुधर्मा ने कहा ) 大长长长长长长长长长长长长 हे जम्बू । यावत् निर्वाण को प्राप्त श्रमण भगवान् महावीर ने आठवे अग अतगडदसा (अन्तकृदशा) के आठ वर्ग कहे है ॥३॥ मूल-जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं अट्ठ वग्गा पण्णत्ता, पढमस्स णं भंते ! वग्गस्स अंतगडदसाणं समणेणं नाव संपत्ते णं कति अज्झयणा पण्णत्ता ? * [ २ ] - सूत्रम् अनफगान एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्ते णं अट्ठमस्म अंगस्स अंतगडदसाणं पढमस्स वग्गस्स दस अज्झ- यणा पण्णता । तंजहा- गोयम-समुद्द-सागर-गंभीरे चेव होइ थिमिते य । अयले कंपिन्ले खलु, अक्खोभ-पसेणई विण्हू ॥४। अर्थ-(जम्बू स्वामी ने पुनः प्रश्न किया-) भगवन् ! यदि श्रमण भगवान् महावीर यावत् निर्वाणप्राप्त ने आठवें अग अतगडदगा के आठ वर्ग कहे है, तो भगवन् ! अतगडदशा के प्रथम वर्ग के श्रमण भगवान् महावीर यावत् निर्वाणप्राप्त ने कितने अध्ययन कहे हे ? 六六六 काका (श्रीमुधर्मा स्वामी बोले-) निश्चय ही जम्बू ' यावत् निर्वाणप्राप्त श्रमण भगवान् महावीर ने अंतगडदसा के प्रथम वर्ग के दस अध्ययन कहे हैं । वे इस प्रकार है- (१) गोतम कुमार (२) समुद्र कुमार (३) सागर कुमार (४) गंभीर कुमार (५) थिमित कुमार (६) अचल कुमार (७) काम्पिल्य कुमार (८) अक्षोभ कुमार (6) प्रसेन कुमार और (१०) विष्णु कुमार ।।४।। मूल-जड़ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं पढमस्स वग्गस्स दस अझयणा परगणत्ता, पढमस्म णं भंते ! अझयणस्स के अढे पण्णत्ते ? 长 . एवं खलु जंबू । तेणं कालेणं तेणं समएणं वारवईणामं नयरी होत्था-दुबालस जोयणायामा, नव- [ ३ ] Je- 长长长长 अंतकृशाङ्ग सूत्रम् ? जोयणवित्थिन्ना, धणवइमइनिम्माया, चामीकरपागारा, णाणामणिपंचवरणकविसीसगपरिमंडिया, सुरम्मा, अलकापुरिसंकासा, पमुइयपक्की लिया, पच्चक्खं देवलोगभूया, पासादीया, दरिसणिज्जा, अभिरूवा, पडिरूवा ॥५॥ अर्थ-(जम्बू स्वामी ने प्रश्न किया-) भगवन् ! यदि यावत् निर्वाणप्राप्त श्रमण भगवान महावीर ने आठवे अतगडदसा अग के प्रथम वर्ग के दस अध्ययन कहे है, तो भगवन् ! प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ कहा है (सुधर्मा स्वामी ने उत्तर दिया-) जबू! उस काल और उस समय मे द्वारवती (द्वारिका) नामक नगरी थी वह बारह योजन लम्बी और नौ योजन चौडी थी। कुबेर देव ने सोच-विचार कर उसका निर्माण किया था। उसका परकोटा स्वर्ण का था और उस पर पॉच वर्ण की नाना मणियो से जड़े हुए कगूरे सुशोभित थे । वह अलकापुरी (कुबेर की नगरी) के समान अतिशय रमणीय थी। उसके निवासी सदैव प्रमुदित-हर्षित रहते थे। वह क्रीडा करने के स्थान जैसी मनोरम थी। साक्षात् देवलोक के समान जान पडती थी। दर्शको के चित्त को प्रसन्न करने वाली, दर्शनीय, अभि- रूप और प्रतिरूप अर्थात् अतीव सुन्दर थी ॥५॥ पोकोपको मूल-तीसे णं वारवईए णयरीए बहिया उत्तरपुरच्छिमे दिसीभाए एत्थ ण रेवयए नाम पव्वए होत्था । घण्णो ६॥ अर्थ-उस द्वारवती नगरी के बाहर उत्तरपूर्व दिशा अर्थात् ईशान कोण मे रैवतक नामक पर्वत था। उसका वर्णन समझ लेना चाहिए ॥६॥ 的长长长长长长的 [ ४ ] मूल-तत्थ णं रेवयए पब्बए नंदणवणे नामं उज्जाणे होत्था । वरणओ |७|| नवगान सूत्रम् अर्थ-उस रैवतक पर्नत पर नन्दनवन नामक उद्यान था। उसका वर्णन समझ लेना चाहिए ॥७॥ 《《《《《《《《《《《 मूल-मुरप्पिए नामं जक्खस्स नक्खाययणे होत्था, पोराणे से णं एगेणं वणसंडेणं परिक्खित्ते, अमोगवरपायचे | पुढविसिलापट्टए ||८|| अर्थ-उस उद्यान मे सुरप्रिय नामक यक्ष का यक्षायतन था। वह बहुत पुराना था । वह यक्षायतन एक वनखड मे वेष्टित था। उसके मध्य मे अशोक का एक उत्तम वृक्ष था। उसके नीचे एक पृथ्वीशिलापट्ट था ॥८॥ मूल-तत्थ णं वारवईणयरीए कण्हे णामं वासुदेवे राया परिवसइ, महया रायवरणो।६॥ प अयं-द्वारवती नगरी मे कृष्ण नामक वासुदेव राजा निवास करते थे। वह हिमवान् पर्नत् के समान थे, इत्यादि गना का वर्णन यहाँ समझ लेना चाहिए ।।९।। मूल-से णं तत्थ समुद्दविजयपामोक्खाणं दसरह दसाराणं, वलदेवपामोक्खाणं पंचरह महावीराणं पज्जुगणपामोक्खाणं अधुद्वाणं कुमारकोडोणं, संवपामोक्खाणं सट्ठीए दुइतसाहस्सीणं, महासेनपामोक्खाणं छप्पगणाग बलबग्गसाहस्मीणं, वीरसेणपामोक्खाणं एगवीसाए वीरसाहस्सीणं, उग्गसेणपामोक्खाणं सोलसण्हं रायसाहस्सीणं, रुप्पिणिपामोक्खाणं सोलसरहं देविसाहस्सीणं, अणंगसेणापामोक्खाणं अणेगाणं गणिया- [ ५ ] इक्कीस हजार वीर थे । उग्रसेन आदि सोलह हजार मुकुटबद्ध राजा सूत्रम् अतकृशाङ्ग 长长长长长长。 साहस्सीणं, अण्णेसि च बहूणं ईसर जाव सत्थवाहाणं वारवईए नयरीए अद्धभरहस्स य समत्थस्स आहेवच्चं जाव विहरइ ॥१०॥ अर्थ-वहाँ (१) समुद्रविजय (२) अक्षोभ (३) स्तिमित (४) सागर (५) हिमवन्त (६) अचल (७) धरण (८) पूरण (६) अभिचन्द्र और (१०) वासुदेव, यह दस दसार थे। बलदेव वगैरह पाँच महावीर थे । प्रद्युम्न वगैरह साढे तीन करोड़ कुमार थे। शाम्ब वगैरह साठ हजार दुर्दान्त थे । महासेन आदि छप्पन हजार बलवान् पुरुष थे । वीरसेन आदि अनंगसेना आदि कई हजार गणिकाएँ थी। इनके सिवाय और भी बहुत से सामान्य राजा, युवराज, सार्थवाह आदि थे कृष्ण वासुदेव इन सब का द्वारवती नगरी का तथा सम्पूर्ण आधे भरत क्षेत्र का आधिपत्य कर रहे थे ॥१०॥ मूल-तत्थ णं वारवईए नयरीए अंधगवण्ही णामं राया परिवसइ, महया हिमवंत. वण्णो ॥११॥ अर्थ-उस द्वारिका नगरी मे अन्धकवृष्णि नामक राजा निवास करते थे। वह हिमवान् पर्वत के समान महान थे, इत्यादि राजा का वर्णन समझ लेना चाहिए ॥११॥ मूल-तस्स णं अंधगवरिहस्स रण्णो धारिणी णामं देवी होत्था, वण्णो । १२॥ अर्थ-उन अंधकवृष्णि राजा की धारिणी नामक नामक रानी थी । यहाँ रानी का वर्णन समझ लेना चाहिए ॥१२॥ मूल-तए ण सा धारिणी देवी अण्णया कयाइ तंसि तारिसगंसि सयणिज्जंसि एवं जाव महब्बले- पर का मुमिणद्दसणकहणा जम्म, बालत्तणं, कलाओ य । नोव्बण पणिग्गहणं, कंता पासाय भोगा य ।।१॥ णवरं गोयमकुमारे णामेण, अट्ठण्हं रायबरकनाणं एगदिवसेणं पाणि गेपहावेंति, अट्टङओ दाओ ॥१३॥ सूत्रम् अनादगान अर्थ-धारिणी देवी ने किसी समय पुण्यवन्त के शयन करने योग्य शय्या पर सोते समय सिह का स्वप्न देखा। इत्यादि कयन भगवतीमूत्र मे कथित महावल कुमार के समान समझना चाहिए । यथा-स्वप्न का देखना, स्वप्नपाठकों के समक्ष स्वप्न का कथन, उसका फल, कुमार का जन्म, वाल्यावस्था, कलाओ की शिक्षा, यौवन की प्राप्ति, पाणिग्रहण, पलियां, उनके लिए प्रसादो का निर्माण तथा मनुप्य सम्बन्धी भोगो को भोगना । विशेपता केवल यही है कि यहाँ कुमार का नाम गौतम रक्खा गया । एक ही दिन मे आठ श्रेष्ठ राजकुमारियो के साथ पाणिग्रहण कराया गया । आठ-आठ दात दहेज में दी ।।१३।। 466 मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं अरहा अरिहनेमी आइगरे नाव विहरइ ॥१४॥ पापका अर्थ-उस काल और उस समय धर्मतीर्य की आदि करने वाले यावत् अरिहन्त अरिष्टनेमि, अनुक्रम से विचरण कन्ने हुए यावत् द्वारिका नगरी के बाहर नन्दनवन उद्यान मे तप-संयम से आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे ॥१४।। मूल-चउबिहा देवा आगया, कण्हे वि णिग्गते । १. अर्थ-नारी पकार के देवो का आगमन हुआ, कृष्ण वासुदेव भी धर्मदेशना श्रवण करने के लिए नगरी से [ ७ ] निरन॥१५ अंतकृदृशाङ्ग सूत्रम् क मूल-तए णं तस्स गोतमस्स कुमारस्स जहा मेहे तहा णिग्गए, धम्म सोच्चा, णवरं देवाणुप्पिया । अम्मापियरे आपुच्छामि, देवाणुप्पियाणं अंतिए पव्वयामि; एवं जहा मेहे जाव अणगारे जाए इरियासमिए नाव इणमेव निग्गंथं पावयणं पुग्यो काउं विरइ ॥१६॥ अर्थ-तव गौतम कुमार भी, ज्ञाताधर्मकथा सूत्र मे कथित मेघकुमार के समान आये । धर्मकथा सुनी । नैराग्य उत्पन्न हुआ। भगवान् से 'निवेदन किया-माता-पिता से पूछ कर देवानुप्रिय के निकट प्रव्रज्या अगीकार करूंगा। यावत् वह मेघकुमार के समान अनगार बन गये और ईर्यासमिति आदि से युक्त हुए यावत् निर्ग्रन्थ प्रवचन को ही समक्ष करके विचरने लगे ॥१६॥ मूल-तए णं से गोयमे अणगारे अन्नया कयाई अरहो अरिहनेमिस्स तहारूवाणं थेराण अंतिए सामाइयमाझ्याईएक्कारस अंगाइ अहिज्जइ । अहिज्जित्ता बहूहिं चउत्थ नाव अप्पाण भायेमाणे विहरइ ॥१७॥ अर्थ-तत्पश्चात् उन गौतम अनगार ने किसी समय भगवान् अरिष्टनेमि के शिष्य तथारूप स्थविरों के पास से सामायिक आदि से लेकर ग्यारह अंगो तक अध्ययन किया। अध्ययन करके बहुत उपवास वेला आदि तपस्या से आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे ॥१७॥ मूल-तए णं अरहा अरिडनेमी अन्नया कयाई वारवईनगरीओ नंदणवणाश्रो पडिणिक्खमइ, पडि- णिक्खमित्ता बहिया जणवयविहारं विहरइ ।।१८।। अर्थ-तदनन्तर अर्हत् अरिष्टनेमि किसी समय द्वारिका नगरी से और नन्दनवन नामक उद्यान से बाहर पधारे और जनपदो मे विचरण करने लगे ॥१८॥ 长长长长长 [ ८ ] मनापान सूत्रम् मृल-तते णं से गोयमे अणगारे अन्नया कयाइ जेणेव अरहा अरिहनेमी तेणेच उवागच्छइ, उवा- गचित्ता अरई अरिहनेमि तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेइ, करित्ता वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी इच्छामि णं भंते ! तुम्मेहिं अभएणुपणाए समाणे मासियं भिक्खुपडिमं उपसंपज्जित्ताणं विहरित्तए । एव जहा बदओ तहा वारस भिक्खुपडिमानो फासेइ, फासित्ता गुणरयणं पि तवोकम्मं तहेब फासेति णिव- सेमं, एवं जहा खंदो तहा चिंतेति, तहा आपुच्छति, तहा थेरेहिं कडाहिएहिं सद्धिं सेत्तुजं दुरूहइ, मासियाए संलगाए वारस वरिसाई परियायो नाव सिद्ध ॥१॥ क अर्थ-तब गौतम अनगार अन्यदा किसी समय जहाँ अर्हन्त अरिष्टनेमि थे, वहाँ पहुंचे। पहुँच कर अर्हन्त अरिष्ट- नेमि को तीन बार हाथ जोड कर, आदक्षिण प्रदक्षिणा करके वोले-भगवन् ! आपकी अनुमति प्राप्त करके मैं एक मास की भिक्षुप्रतिमा अगीकार करके विचरना चाहता हूँ । यो भगवती सूत्र में कथित स्कंबकजी के अनुसार वारह ही भिक्षु- प्रतिमाओ को स्पर्गना की । गुणरत्नसवत्सर नामक तप की भी स्पर्शना की। सर्न कथन स्कंधकजी के अधिकार के अनुनार जानना चाहिए । स्कंधक के अनुसार ही भगवान् की आज्ञा लेकर संथारे में सहायक स्थविरों के साथ शत्रुजय पर्गन पर मान्द होकर, एक मास की सलेखना करके, वारह वर्ण तक संयय पालकर यावत् सिद्ध हुए ॥१६॥ मूल-एवं खलु समणेणं भगवया महावीरेणं नाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं पढमस्स बग्गरस पढमस्स अज्झयणस्स अयमद्धे पण्णते ॥२०॥ ง่าย [६] न--(मुभर्मा त्वामी गम्बू स्वामी से कहते है-) इस प्रकार हे जम्बू ! श्रमण भगवान् महावीर वावत् निर्वाण प्राप्त ने आम्वें अन्तगडदसा अंग के प्रथम वर्ग के प्रथम अध्ययन का यह अर्थ कहा है ॥२०॥ अंतकृद्दशाङ्ग सूत्रम् 6468 प्रथम अध्याय समाप्त -एवं जहां गोयमो वहा सेसा वही पिया धारिणी माता, समुद्दे सागरे गंभीरे थिमिए, अयले, कंपिल्ले, अक्खोभे, पसेणइ, विण्हुए, एए एगगमा । पढमो वग्गो, दस अज्झयणा पण्णत्ता । पढमो वग्गो समत्तो अर्थ-जिस प्रकार गौतम कुमार का अधिकार कहा, उसी प्रकार शेष नौ कुमारों के नौ अध्याय कहने चाहिए। नौ ही कुमारो के अंधकवृष्णि पिता तथा धारिणी माता कहना । दूसरे अध्याय में समुद्र का, तीसरे में सागर कुमार का, चौथे मे गभीर कुमार का, पाँचवे में स्थिमित कुमार का, छठे में अचल कुमार का, सातवें में काम्पिल्य कुमार का, आठवें मे अक्षोभ कुमार का, नौवें में प्रसेनजित कुमार का और दसवे अध्ययन में विष्णु कुमार का वर्णन किया है । इन सब का एक-सा ही गम-पाठ है । यह सब कुमार बारह-बारह वर्ष तक संयम पाल कर, शत्रुजय पर्वत पर एक मास की संलेखता करके सिद्ध हुए ॥१॥ प्रथम वर्ग समाप्त PRACKERA५१०१ [ १० ।
अंतहमान सूत्रम् एक का द्वितीय वर्ग कपको DOE मूल-नई० दोचस्स वग्गस्स उक्खेवो । एवं खलु नंबू ! समणेणं नाव संपनेणं अट्ठ अज्झ- यणी परणत्ता, तं जहा- अक्खोभ सागरे खलु, समुद्द हिमवंत अचल णामे य । धरणे य पूरणे वि य, अभिचंदे चेव अट्ठमए ॥१॥ अर्थ-दूसरे वर्ग का उत्क्षेप पूर्नवत् जानना चाहिए । जंबू स्वामी ने प्रश्न किया-भगवन् ! यदि श्रमण भगवान् महावीर ने अंतग उदमा के प्रथम वर्ग का यह अर्थ कहा है तो दूसरे वर्ग का क्या अर्थ कहा है ? श्रीमुधर्मा स्वामी बोले-हे जम्न् । बमण भगवान् महावीर यावत् मुक्ति प्राप्त ने अन्तगडदसा अंग के द्वितीय वर्ग के आठ अध्ययन कहे हैं । वे इस प्रकार :-(१) अक्षोभ (२) मागर (३) समुद्र (४) हिमवन्त (५) अचल (६) घरण (७) पूरण (८) अभिचन्द्र ॥१॥ मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं वारवईए णयरीए वण्ही पिया धारिणी माया । जहा पढमो वग्गो [ ११ ] । अतकृशाङ्ग सूत्रम् ६५६५ तहा सधे अज्झयणा गुणरयणं तवोकम्मं सोलस वासाई परियारो, सेत्तुजे मासियाए संलेहणाए जाव सिद्धा। एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स दोच्चस्स वग्गस्स अयमढे पण्णचे ॥२॥ इति बिउवग्गो। अर्थ--उस काल और उस समय में द्वारवती नगरी में अन्धकवृष्णि नामक राजा थे। वही इन आठो कुमारो के पिता थे । धारिणी माता थी। जैसे प्रथम वर्ग मे गौतम कुमार का वृत्तान्त कहा वैसा ही इन सब का कहना चाहिए। इन्होने भी गुणरत्न संवत्सर तप किया, सोलह वर्षों तक साधुपर्याय का पालन किया । शत्रुञ्जय पर्वत पर एक महीने की संलेखना करके सिद्धि प्राप्त की। श्रमण भगवान् महावीर ने आठवे अग के द्वितीय वर्ग का यह अर्थ कहा है। दूसरा वर्ग समाप्त पापा [ १२ ] ज मान सूत्रम् तृतीय वर्ग (444:44-4444 मूल - जइ० तच्चम्म उक्खेवो । एवं सलु जंबू ! अमरस अंगस्स तच्चस्स वग्गस्स तेरस अझ- यगा पाता, तंजहा अणीयमसेण, अणंतसेण, अजियसेण, अणिहयरिऊ, देवसेणे, सत्त सेण, सारणे, गए, समुहे, दम्गृहे, वण, दारुए, अणादिड्डी ॥१॥ अ-तीसरे वर्ग का उत्क्षेप नमझ लेना नाहिए। यदि श्रमण भगवान् महावीर ने दूसरे वर्ग का यह अर्थ कहा है नो नीम वर्ग का गा अयं कहा है ? हे जम्बू ! श्रमण भगवान् महावीर ने आठवें अंग के तीसरे वर्ग के तेरह अव्ययन गया-(१) अगीयसमेन कुमार का (२) अनन्तसेन कुमार का (३) अजितसेन कुमार का (४) अनिहतरिपु कुमार का (2) बनेन कुमार (s) शत्रुमेन कुमार का (७) सारण कुमार का (5) गजमुकुमाल कुमार का () सुमुख का (१०) (११) पक कुमार का (१२) दारुक कुमार का (१३) अनादृष्टि कुमार का ॥१॥ मृत-नाइ [ भने ! समणेणं नाव संपत्ते णं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं तच्चस्स वग्गस तेरस अन्कयना परात्ता, पढमस्म णं भंते ! अझयणस्म अंतगडदसाणं के अट्ठ पण्णत्ते ? ॥२॥ i-मामी ने प्रश्न किया-भगवन् । यदि श्रमण भगवान् महावीर यावत् निर्वाणप्राप्त ने आठवे अग लिन ना लेतीगरेका नेक अध्ययन रहे हैं तो भगवन् ! प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ कहा है ? ॥२॥ [ १३ ।
सूत्रम् अतरूद्दशाङ्ग + मूल-एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं भद्दिलपुरे णामं णयरे होत्था, वण्णी ॥३॥ अर्थ--सुधर्मा स्वामी ने उत्तर दिया-हे जम्बू | उस काल और उस समय मे भद्दिलपुर नामक नगर था। यहाँ नगर का वर्णन कहना चाहिए ॥३॥ मूल-तस्स णं भदिलपुरस्स णयरस्स बहिया उत्तरपुरच्छिमे दिसिभाए सिरिवणे णामं उज्जाणे होत्था । वएणो ॥४॥ अर्थ-भद्दिलपुर नगर के बाहर उत्तरपूर्न दिग्भाग मे अर्थात् ईशान कोण मे श्रीवन नामक उद्यान था । यहाँ उद्यान का वर्णन कहना चाहिए ॥४॥ मूल-जियसत्तु णामं राया होन्था ॥५॥ अर्थ--उस नगर के राजा का नाम जितशत्रु था ॥५॥ मूल-तत्थ णं भदिलपुरे नयरे नागनाम गाहावई परिवसइ. अड्डे नाव अपरिभूए ॥६॥ अर्थ--भद्दिलपुर नगर मे नाग नामक गाथापति निवास करता था। वह ऋद्धि सम्पन्न यावत् किसी से पराभूत होने वाला नही था ॥६॥ मूल-तस्स णं नागस्स गाहावइस्स सुलसा नामं भारिया होत्था, सुकुमाला नाव सुरूवा ॥७॥ अर्थ -उस नाग नामक गाथापति की पत्नी का नाम सुलसा था । वह सुकुमार शरीर वाली यावत् सुरूपवती थी ॥७॥ [ १४ ।
सूत्रम् मदनान गल-तस्स णं नागस्स गाहावइस्म पुत्त सुलसाए भारियाए अत्तए अणीयससेणणामं कुमारे होत्था, सुकुमाले जाव मुरूबे, पंचधाइपरिक्खित्त; तंजहा-खीरधाई, जहा दढपइन्ने, जाब गिरिकंदरमल्लीणेच चंपगवर- पायव मुहं मुद्रणं परिवहइ ll -नाग गाथापति का पुत्र और मुलसा का आत्मज अणीयससेन नामक कुमार था । वह सुकुमार यावत् गुन्प था। पांच बायो से घिरा रहता था, यया-(१) दूध पिलाने वाली धाय (२) स्नान कराने वाली धाय (३) शृंगार करने वाली चाय (४) गोद में लेने वाली चाय और (५) खेल खिलाने वाली धाय । शेप वर्णन औपपातिक सूत्र मे कथित हप्रतिन कुमार के समान जानना चाहिए, यावत् पर्नत की कंदरा मे जैसे चम्पक वृक्ष निर्वाध रूप से वढता है, उसी प्रकार अणीयमसेन कुमार मुखपूर्वक वृद्धि को प्राप्त होने लगा ॥८॥ मूल--तए णं तं अणीयससेणकुमारं साइरेगअट्ठवासजायं नणित्ता अम्मापियरो कलायरियं नाव भोगममत्थे जाए याचि होत्था || अ-नव अणीयससेन कुमार को आठ वर्ण से कुछ अधिक उम्र का हुआ जान कर माता-पिता ने कलाचार्य को गोर दिया । यावत् वह भोग भोगने में समर्थ हो गया ॥६॥ मृल - तए णं तं अणीयससेणकुमारं उम्मुक्कवालभाव जाणित्ता अम्मापियरो सरिसयाणं जाव वीनाए मवरकरणगाण एगदिवसेणं पाणि गैरहाधिति ॥१०॥ नव मणीयममेन कुमार के माता-पिता कुमार को योवन वय मे प्राप्त हुआ जान कर समान, समान वय गानी मानप और गौवन वाली उन्य सेठी की वत्तीम कन्याओ का एक ही दिन पागिग्रहण करवाते हैं ॥१०॥ एस S -- [ १५ ] अंतकृशाङ्ग सूत्रम् क मोम मूल-तए णं से नागे गाहावई अणीयससेणस्स कुमारस्स इमं एयारूवं पीइदाणं दलयइ, तंजहा- बत्तीमं हिरण-कोडोश्रो जहा महब्बलस्स जाव उप्पि पासायवरगए फुडमाणेहिं मुइगमत्थएहिं भोगभोगाई भुजमाणे विहरइ ॥११॥ अर्थ-तब नाग गाथापति ने अणीयससेन कुमार को इस प्रकार प्रीतिदान दिया-बत्तीस करोड हिरण्य आदि । जैसे भगवतीसूत्र मे महाबल कुमार के दायजे का वर्णन है, उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिए अर्थात् बत्तीस-बत्तीस नग एक सौ अट्ठानवे वस्तुओ के दिथे । यावत् अणीयससेन कुमार अटारी पर रह कर बजते हुए मृदग आदि के साथ मनुष्य- सम्बन्धी कामभोम भोगने लगा ।।११।। मूल-तेणं कालेण तेण समएणं अरहा अरिहणेमी जाव समोसढे, सिरिवणे उज्जाणे अहा जाव विहरइ । १२॥ अर्थ-उस काल और उस समय मे अर्हन्त अरिष्टनेमि यावत् पधारे और श्रीवन नामक उद्यान में उचित स्थान की याचना करके ठहर गये ॥१२॥ मूल-परिसा णिग्गया ॥१३॥ अर्थ-भगवान् की धर्मदेशना श्रवण करने और उपासना करने के लिए परिषद् निकली ॥१३॥ मूल-तए णं तस्स अणीयससेणस्स कुमारस्स महया जणसद्द जहा गोयमे तहा, नवरं सामाइय- माझ्याई चोदस पुबाई अहिज्जइ, बीसं वीसाई परियायो, सेस तहेब जाव सेत्तुज्जे पत्रए पासियाए संलेहणाए जाव सिद्ध ।१४। [ १६ ] .-----with रुस सूत्रन ८०-८८८५ अयं-तब अणीयममेन कुमार भी बहुत लोगों का कोलाहल सुन कर गौतम कुमार की तरह भगवान् अरिष्टनेमि के दर्शनार्थ आया । दीक्षा अगीकार की। विशेपता यह है कि अगीयससेन मुनि ने सामायिक से लगा कर चौदह पूर्वो का जान प्रान किया । बीस वर्ष तक सयम का पालन किया । शेप वर्णन पैसा ही जानना, यावत् शत्रुञ्जय पर्वत पर एक मास का गयारा करके यावत् सिद्धि प्राप्त की ॥१४॥ मूल - एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्ते णं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं तच्चस्स वग्गस्स पढमस्म अज्झयणम्स अयमह पएणत्ते ॥१५॥ अयं-श्रीमुधर्मा स्वामी तीसरे वर्ग का उपसहार करते है-हे जम्दू ! श्रमण यावत् निर्वाणप्राप्त भगवान् महावीर ने पाठव अनगडदमा जग के तीसरे वर्ग के प्रथम अध्ययन का यह अर्थ कहा है ।।१।। मूल- एवं जहा अणीयससेणे एवं सेमा वि, अणंतसेणो, अजियसेणो, अणिहयरिऊ, देवसेण, मत्तु संग्ग छ अज्झयगा एक्कगमा । बत्तीसायो दाओ, बीसं वासाई परियाओ, चोदम पुबाई अहिझति, सेत जाव मिद्धा ॥१६॥ छ?मज्झयणं समत्त । जन-जिग प्रकार अणीयससेन का अधिकार कहा, उसी प्रकार शेप अनन्तसेन, अजितसेन, अनिहतरिपु, देवसेन, जोर नागेन मारो का भी अधिकार कहना नाहिए। सत्र के पिता नाग गाथापति, माता सुलसा, बत्तीस-बत्तीस स्त्रियां, गनीग-नीग नगो का प्रीतिदान, बीम वर्ण की दीक्षा, चौदह पूर्वो का अध्ययन यावत् शत्रुजय पर्वत पर सिद्धि; यह सब पणन न पानी में भी नमजना । इस प्रकार छका अव्ययन समाप्त हुआ ॥१६॥ [ १७ ] अतदशाङ्ग सूत्रम् सपा मूल-जइ णं भंते ! उक्खेवो सत्तमस्स । तेणं कालेणं तेणं समएणं वारवईए णयरीए जहा पढमे, णवरं वसुदेवे गया, धारिणी देवी, सीहो सुमिण, सारणे कुमारे, परणामओ दाश्रो, चोद्दस पुन्वा, त्रीसं वासा परियायो, सेमं जहा गोयमस्स नाव सेत जे सिद्ध ॥१॥ सत्तमज्मयण समत्त । अर्थ-यदि श्रमण भगवान महावीर ने छठे अध्ययन का यह अर्थ कहा है तो सातवे का क्या अर्थ कहा है ? इस प्रकार सातवे अध्ययन का उत्क्षेप कहना चाहिए। सुधर्मा स्वामी ने उत्तर मे कहा-उस काल और उस समय द्वारिका नगरी में इत्यादि पूर्ववत् जानना । विशेषता यह है कि-वसुदेव राजा पितः, धारिणी, देवी माता, सिह स्वप्न देखा । सरण नामक कुमार हुआ । पाँच सौ कन्याओं के साथ एक दिन मे पाणिग्रहण कराया । पाँच-पाँच सौ नगों का दहेज दिया गया। शेष सब अधिकार गौतम कुमार के समान समझना । यावत् शत्रुञ्जय पर्वत पर एक मास की सलेखना करके सिद्धि प्राप्त की ॥१॥ सातवाँ अध्याय समाप्त मूल -जइ उक्खेवो अट्ठमस्स । एवं खलु जंबू । तेणं कालेणं तेणं समएणं वारयईए णयरीए जहा पढमो नाव अरहा अरिहनेमी समोसढे ॥१॥ अर्थ-जम्बू स्वामी ने जव आठवे अध्ययन के अर्थ के विषय मे प्रश्न किया तो श्रीसुधर्मा स्वामी बोले-हे जम्बू उस काल और उस समय मे द्वारिका नामक नगरी थी । उसका कथन प्रथम अध्ययन के अनुसार जानना चाहिए; यावत् अरिहन्त अरिष्टनेमि पधारे ॥१॥ [ १८ ।
सूत्रम् हमान काका मूल-तेणं कालेणं तेणं ममएणं अरहयो अरिडुनेमिस्स अंतेवासी छ अणगारा भायग सहोदरा बोन्या-गरिनय , मरित्तया सरिव्बया, नीलुप्पल-गवल-गुलिय अयसि कुसुमप्पगासा, सिरियच्छंकियवच्छा, कुनुमकु इलमहालया, नलकुम्वरममाणा ||२|| अयं-उन कान और उस समय अरिहन्त अरिष्टनेमि के छह अन्तेवासी (शिप्य) साधु सहोदर भाई थे। गरोगे, ममान त्वचा बाले, ममान उम्र के (दिखाई देने वाले) नील कमल, भैस के सीन, नील की गुटिका एवं निमी के पुल जने कागमान शरीर के वारक, श्रीवत्त स्वस्तिक से अकित वक्ष स्थल वाले, फूलों के समान मुकुमार नया के समान घु पराले सुन्दर बालो वाले नलकूबर के समान सुन्दर थे ॥२॥ मूल-तए गं ते छ अगागारा जं चेत्र दिवस मुंडा भविता अगारात्रो अणगारियं पञ्चइया तं नेव दियनं अहं अग्नेिमि चंदंति मंति, वदित्ता नसमिता एवं वयासी-'इच्छामो णं भंते ! तुम्भेहिं सभणुनाया ममाणा जावज्जीवाए छ? छ?ण अणिक्वित्तेणं तपोकम्मेण संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणा वितरिता।' 'प्रागई देव गुपिया ! मा पडिबंध कोड' ।३। ५ - नानात जिन दिन उन छह महोदर भाइयो ने दीक्षा अगीकार की और अनगार-श्रवस्था धारण की "मी"लोने गिन्न अग्टिनेमि भगवान् को वन्दना नमस्कार करके इस प्रकार निवेदन किया-'भगवन् ! हमारी irm:कि भारी नाना प्राप्त हो जाय तो जीवन पर्यन निरन्तर बेले-बेले की तपस्या करते हुए और संयम TETTL आमा ने भाति करते हुए विनरें S [ १६ ] अंतकृशाङ्ग <A सूत्रम् . भगवान् ने फर्माया-'जिस प्रकार तुम्हे सुख उपजे, वैसा ही करो। उसमें विलम्ब मत करो॥३॥ मूल -- तए णं ते छ अणगारा अरहया अरिडुनेमिणा अब्भणुनाया समाणा जावजीवाए छह छटेणं जाब विहरति ४॥ अर्थ - तत्पश्चात् वह छहों अनगार अर्हत् अरिष्ट नेमि की आज्ञा पाकर जीवन-पर्यन्त के लिए बेले-बेले की तपस्या करने लगे ॥४॥ मूल-तए णं ते छ अणगारा अण्णया कयाइ छहक्खमणपारण गंसि पढमाए पोरिसीए सज्झायं करेंति, जहा गोयमसामी जाव इच्छामो णं भंते ! छडक्खमणस्स पारणाए तुब्मेहि अब्भणुणाया समाणा तिहिं संघाडएहि वारवईए नगरीए जाव अडिराए । अहासुहं ॥१॥ अर्थ-तदनन्तर उन छह अनारों ने बेले का पारणा दिन आने पर प्रथम प्रहर मे स्वाध्याय किया, दूसरे प्रहर मे ध्यान किया, और तीसरे मे मुखवत्रिका पात्रादि की प्रतिलेखना करके, जिस प्रकार श्रमण भगवान् महावीर की आज्ञा लेकर गौतम स्वामी के गोचरी के लिए जाने का वर्णन किया गया है, उसी प्रकार अरिहन्त अरिष्ठ नेमि की आज्ञा लेते हुए कहा-भगवन् ! दो-दो साधुओ का एक-एक संघाड़ो करके-छह साधुओं के तीन संघाड़े करके, आपकी आज्ञा हो तो द्वारिका नगरी मे भिक्षा के लिए अटन करना चाहते है । तब भगवान् ने फर्माया-जिस प्रकार सुख उपजे ॥५॥ मूल-तए णं छ अणगारा अरहया अरिष्टनेमिणा अब्भणुण्णाया समाणा अरहं अरिहनेमि वंदंति, नभंसंति, अरहो अरिडणेमिस्स अंतियाओ सहसंबवणाओ पडिणिक्खमंति । पडिणिक्खमिचा तिहिं संघाडएहिं अतुरियं जाव अडंति ॥६॥ रुका [ २० ] अनानान सूत्रम् अर्थ - तत्पश्चात् छहो अनगारों ने अर्हत् अरिप्टनेमि की अनुमति पाकर, अर्हत् अरिष्टनेमि को वन्दना की, नमस्कार किया और फिर अहंत् मरिष्टनेमि के पास से, सहवाम्रवन उद्यान से बाहर निकले । बाहर निकल कर तीन संवारे करके, स्वरारहित एव ममाधि के साथ द्वारिका नगरी में भिक्षा के लिए भ्रमण करने लगे ॥६॥ मूल-तन्य णं एगे संघाडए वारवईए नगरीए उच्चनीचमज्झिमाई कुलाई घरसमुदाणस्स भिक्खायरियाए अडमायो २ वसुदेवस्स रण्णो देवईए देवीए गिहं अणुपविढे ॥७॥ अर्थ-तदनन्तर उन तीन संघाडों मे से एक संघाडा द्वारिका नगरी के सघन, निर्धन एवं मध्यम कुलो में क्रमश भिक्षा के लिए भ्रमण करता-करता वमुदेव राजा की देवकी रानी के घर में प्रविष्ट हुआ ॥७॥ मूल-नए णं सा देवई देवी ते अणगारे एज्जमाणे पासित्ता हट्ठ-तुहियया भासणाओ अब्भुढेइ, अन्भुद्वित्ता मत्तटुपयाई अणुगच्छइ, अणुगच्छित्ता तिक्खुत्तो आयाहिएं पयाहिणं करेइ, करेत्ता बंदइ णमंसइ, बंदित्ता णमंसित्ता जेणेच भत्तधरे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सीहकेसराण मोयगाणं थाल भरेइ, भरता ते प्रणगारे पडिलाभेड, पडिलाभित्ता बंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता पडिविसज्जेइ ।।८।। जयंदेवकी महारानी ने उन साधुओं को आता देखा तो उसके हृदय मे हर्ष और सन्तोप हुआ। वह आसन से उठी और मात-आठ कदम मामने गई । फिर तीन बार प्रदक्षिणा की, वन्दना की, नमस्कार किया। वन्दना नमस्कार को भोजनगृह मे गई। फिर सिंहकेसर मोदकों का थाल भरा और मुनियों को दान दिया-वहराया । बहराने के बाद फिर नन्दन-नमस्कार करके उन्हें विदा किया ॥६॥ मूलतयाणंतरं च णं दोच्चे संघाडए वारघईए नगरीए उच्च जाव पडिविसन्जेइ ॥६॥ [ २१ ] अतकृशाङ्ग सूत्रम् अर्थ-उन साधुओ के जाने के पश्चात् दूसरा सघाड़ा भी द्वारिका नगरी के उच्च, नीच एवं मध्यम कुलों में भिक्षा के लिए भ्रमण करता हुआ देवकी रानी के घर आ पहुँचा । देवकी को आश्चर्य हुआ कि यह वही साधु है या दूसरे ? उसने उन्हें पूर्वोक्त प्रकार से वन्दना-नमस्कार कर सिंहकेसर मोदक बहराये और विदा किया ॥६॥ मूल-तयाणंतरं च णं तच्चे संघाडे यारवानगरीए उच्चनीय नाव पडिलाइ, पडिलामेत्ता एवं वयामी-किण्हं देवाणुपिया.! कण्हवासुदेवस्स इमीसे वारवईए नयरीए. पारसजोयणायामाए नवजोयण- वित्थिन्नाए पच्चक्खं देवलोगभूयाए समणा निग्गंथा उच्चणीयमज्झिमाई कुलाई घरसमुदाणस्स भिक्खाय- रियाए अडमाणा भचपाणं णो लभंति ? जन्नं ताई व कुलाई भत्त्पाणाए भुजो भुजो अणुप्पविसंति ? ॥१०॥ अर्थ-तत्पश्चात् तीसरा संघाडा भी द्वारिका नगरी के सधन, निर्धन एवं मध्यम कुलों में भ्रमण करता हुआ देवकी रानी के घर पहुंचा । उसे भी वन्दना-नमस्कार करके पहले की भांति मोदक बहराये । बहराने के बाद देवकी ने कहा-देवानुप्रियो कृष्ण वासुदेव की इस द्वारिका नगरी मे, जो बारह योजत लम्बी, तौ योजन चौड़ी और साक्षात् देवलोक के समान है, श्रमण निम्रन्थों को सघन, निर्धन एवं मध्यम घरों में अनुक्रम से भिक्षार्थ भ्रमण करते हुए क्या भोजन-पानी नही मिलता है ? जिससे उन्हें बार-बार एक ही घर में प्रवेश करना पड़ता है ? ॥१०॥ मूल-तए णं ते अणगारा देवइ देवि एवं वयासी-णो खलु देवाणुप्पिए ! कण्हस्स वासुदेवस्स इमीरे वाग्वईए णयरीए जाव देवलोगभूयाए समणा निग्गंथा उच्चणीय नाव अडमाणा भत्तपाणं नो लभति, नो चेव णं ताई चेव कुलाई दोच्चं पि तच्चं पि सत्तपाणाए अणुपविसंति ॥११॥ अर्थ-तब उन अनगारों ने देवकी देवी से कहा-देवानुप्रिये ! कृष्ण वासुदेव की इस द्वारिका नगरी में, जो यावत् पोप [ २२ ।
अनमान सूत्रम 4444 प्रत्यक्ष देवलोक के समान है, निग्रंन्य श्रमणों को सधन, निर्धन एव मध्यम कुलों मे भ्रमण करते भोजन-पानी नहीं मिलता, ऐमी बात नहीं है । यह बात भी नहीं है कि उन्हे दुवारा-तिवारा उन्हीं घरों में प्रवेश करना पडता है ॥११॥ मूल-एवं खलु देवाणुप्पिया ! अम्हे भदिलपुरे नयरे नागस्स गाहावइस्स पुत्ता सुलसाए भारियाए अत्तया छ भायगे सहोदरा, सरिसया नाव नलकुब्बरसमाणा अरहो अरिष्टनेमिस्स अंतिए धम्म सोच्चा गिसम्म मंसारभउधिग्गा भीया जम्मणमरणाणं मुंडा नाव पव्वइया ॥१२॥ अर्थ-( मुनियो ने आगे कहा-) हे देवानुप्रिये ! भद्दिलपुर नगर में रहने वाले नाग गाथापति के पुत्र और गुलना नामक भार्या के आत्मज हम छहों सहोदर भाई हैं । हम एक सरीखे यावत् नलकूवर के समान एक-से दिखाई देते हैं। हम छहो भाइयो ने अहंत् अरिष्टनेमि से धर्म श्रवण करके और अवधारण करके, संसार के भय से उद्विग्न होकर और जन्म-मरण से भयभीत होकर भगवान् के निकट मुडित होकर दीक्षा अंगीकार की है ।।१२।। मूल-तए णं अम्हे नं चेव दिवसं पव्वइया तं चेव दिवसं अरहं अरिहनेमि वंदामो नमसामो, इमं एयास्वं अभिग्गहं अभिगिण्हामो-इच्छामि ण भंते ! तुम्भेहिं अभणुण्णाया समाणा जावज्जीवाए छ छट्ठणं जाब विहरामो। तं अम्हे अज्ज छक्खमणपारणयसि पढमाए पोरिसीए नाव अडमाणा नव गेहं अणप्पचिट्ठा । तं नो खलु देवाणुप्पिए । तं चेव णं अम्हे, अम्हे णं अण्णे ॥१३-१४॥ ज-तब हममे जिम दिन दीक्षा धारण की, उसी दिन अर्हत् अरिष्टनेमि को वन्दना नमस्कार करके इस पकार अभिरह धारण किया-भगवन् ! आपकी आज्ञा हो तो हम यावज्जीवन निरन्तर वेले-बेले का तप करना चाहते है। नगान ने कहा-जने मुग हो वैना करो । तभी से हम भगवान् की आज्ञा प्राप्त करके बेले चेले का पारणा करते कपको [ २३ ।
अतकृशाङ्ग सूत्रम् पापोप विचरते है । आज वेले के पारणक के दिन प्रथम प्रहर मे स्वाध्याय करके, दूसरे प्रहर मैं ध्यान करके यावत् भगवान् की आज्ञा लेकर तीन मंघाड़े करके भिक्षा के लिए अटन करते हुए तुम्हारे घर मे आये । अतएव हे देवानुप्रिये ! हम वह नहीं हैं जो पहले आए थे। हम दूसरे है ॥१३-१४॥ मूल-देवइ देवि एवं वयइ वइत्ता जामेव दिसं पाउब्भूया तामेव दिसं पडिगया ॥१५॥ अर्थ-देवकी देवी को इस प्रकार कहकर मुनि जिस दिशा से आये थे, उसी दिशा मे लौट गये ॥१५॥ मूल-तए णं तीसे देवईए देवीए अयमेवारूचे अज्झत्थिए जाव समुप्पन्ने-एवं खलु अहं पोलासपुरे णयरे अइमुत्ते णं कुमारसमणेणं बालत्तणे वागरिया-तुम णं देवाणुप्पिए ! अट्ठ पुने पयाइस्ससि, सरिसए नाव नलकुधर समाणे । नो चेव णं मारहे वासे अण्णाओ अम्मयाओ तारिसए पुत्त पयाइस्संति तं रणं मिच्छा ॥१६॥ अर्थ-तब उस देवकी देवी को इस प्रकार का विचार उत्पन्न हुआ-निश्चय ही पोलासपुर नगर में अतिमुक्तक कुमार श्रमण ने बचपन में ऐसा कहा था कि हे देवकी ! तू आठ पुत्रों का प्रसव करेगी। वे आठो पुत्र एक सरीखे यावत् नलकूबर के समान सुन्दर होंगे। वैसे पुत्रों को इस भरत क्षेत्र में दूसरी माताएँ जन्म नही देती। उनका यह कथन मिथ्या हुआ ॥१६॥ मूल-इमं पच्चक्खमेव दिस्सइ-भारहे वासे अण्णाओ वि अम्मयानो खलु एरिसए नाव पुत्ते पयायाओ ॥१७॥ अर्थ-यह तो प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है कि भरत क्षेत्र मे अन्य माताओं ने भी इस प्रकार के सुन्दर यावत् पुत्रों का प्रसव किया है ॥१७॥ 长长 [ २४ ] नानान मूत्रन् (4 ชิ้น 45 क मूल-तं गच्छामि णं अरहं अरिहनेमि वंदामि नमसामि, इमं च णं एयावं वागरणं पुच्छिस्सामि त्ति कटु एवं संपेहेड, संहिता कोरियपुरिसे सदावेइ, सदावित्ता एवं बयासी-लहुकरण-जाणप्पवरं जाव उबट्ठनि जहा देवाणंढा नाव पज्जुबासड़ ॥१८॥ -देवी देवकी ने आगे विचार किया-सो मैं अर्हत् अरिष्टनेमि के पास जाऊं, उन्हें वन्दना-नमस्कार करूं और यह प्रन्न पूछे। ऐसा विचार करके उसने कौटुम्बिक पुरुपों को बुलाया और कहा-शीव्र गति वाला उत्तम रथ डास्थित करी । यावत् कौटुम्बिक पुरुपों ने रथ उपस्थित किया । देवकी उस पर आरूढ हुई और जिस प्रकार भगवती गुन में कथित देवानन्दा ब्राह्मणी भगवान के दर्शन करने गई थी, उसी प्रकार देवको देवी भी भगवान् अरिष्टनेमि के दर्शन परने गई यावत् सेवा-भक्ति करने लगी ॥१८॥ मूल-तए णं अरहा अरिहनेमी देवइ देवि एवं वयासी से पूणं तब देवई ! इमे छ अणगारे पासेत्ता अयमेयाचे अज्झथिए नाव समुप्पज्जेत्था-एवं खलु पोलासपुरे नयरे अइमुत्तऐणं तं चैव जाव णिग्गच्छित्ता जेणेव ममं अंतियं तेणव हव्यमागया । से गुणं देवई अट्ठ समझे ? हंता अत्थि ॥१६॥ ज-तब अहं अरिष्टनेमि ने देवकी देवी से कहा-देवकी ! इन छह अनगारों को देख कर तुम्हे इस प्रकार का अध्ययनार यावत् उत्पन्न हुआ कि-योलामपुर नगर मे अतिमुक्तक अनगार ने कहा था, इत्यादि पूर्ववत् । इस तशय को दूर करने के लिए तुम यहां आई हो । हे देवकी । यह बात यथार्थ है ? देवकी बोनी-हां यथार्थ है ॥१६॥ मक्ष एवं खलु देवाणुप्पिए । तेणं कालेणं तेणं समएणं भदिलपुरे णयरे णागे णामं गाहावई परिवमः, पडे ॥२०॥ । २५ ] अतकृहशाच सूत्रम् अर्थ-हे देवानुप्रिये देवकी ! उस काल और उस समय में भद्दिलपुर नगर में नाग नामक गाथापति निवास करता था। वह ऋद्धिमान् यावत् अपराभूत था ॥२०॥ मूल-तस्स णं नागस्स गाहावइस्स सुलसाणामं भारिया होत्था ॥२१॥ अर्थ-उस नाग गाथापति की पत्नी का नाम सुलसा था ॥२१॥ मूल-सा सुलसा गाहावइणी बालत्तेणं चेव नेमित्तएणं वागरिया-एस णं दारिया णिंदू भविस्सइ ॥२२॥ अर्थ-वह सुलसा गाथापतिनी जब बाल्यावस्था में थी, तब नैमित्तिक ने कहा था-यह बालिका मृतवन्ध्या होगी अर्थात् इसके मरे हुए बच्चे होगे ॥२२॥ मूल-तए णं सा सुलसा बालप्पभिति चेव हरिणगमेसी देवमत्तया यावि होत्था । हरिणगमेसिस्स पडिमं करेइ, करेता कल्लाकग्लि बहाया जाव पायच्छित्ता उल्लपडसाडिया महरिहं पुप्फच्चणं करेइ, करेत्ता जाणुपायपडिया पणामं करेइ, करेचा तो पच्छा आहारेइ वा नीहारेइ वा । २३॥ अर्थ-तब से सुलसा बाल्यावस्था से ही हरिणगमेषी देवता की भक्त बन गई। उसने हरिणगमेसी देवता की प्रतिमा बनवाई । प्रतिमा बनवा कर प्रतिदिन स्नान करके, शुद्ध होकर. मंगल कौसुक एवं प्रायश्चित्त करके, गीली साड़ी पहन कर महान् जन के योग्य पुष्पों से उस प्रतिमा की पूजा करती और जमीन पर घुटने टेक कर प्रणाम करती थी । तत्पश्चात् ही आहार नीहार आदि कार्य करती थी ॥२३॥ मूल-तए णं तीसे सुलसाए गाहावइणीए भत्तिबहुमाणसुस्मसाए हरिणगमेसी देवे आराहिए यावि होत्था ॥२४॥ 长长长长 64 [ २६ ] যুপ अनहदगान अयं-तब मुलसा गाथापतिनी की भक्ति, वहुमान और शुधपा से हरिणगमेपी देव आराधित हो गया अर्थात् प्रसन्न हो गया ॥२४॥ मूल-तए णं से हरिणगमेसी देवे सुलसाए गाहावइणीए अणुकंपणट्ठयाए सुलसं गाहावइपिं तुम चणं दोषि मममेव सम उउयाओ करेइ ॥२॥ अर्थ-तव हरिणगमेपी देव ने मुलसा गाथापतिनी की अनुकम्पा के लिए हे देवकी ! तुझे और मुलसा-दोनों को एक ही साथ ऋतुवती किया ॥२५॥ मृल-तते णं तुम्भे दो वि सममेव गमे गिणहह. सममेव गम्मे परिवहह, सममेव दारए पयायह ॥२६॥ अर्थ-तत्पश्चात् तुम दोनो एक ही साथ गर्भ ग्रहण करने लगी, एक ही साथ गर्भ वहन करने लगी और एक ही माय वाला प्रसव करने लगी ॥२६॥ मूल-तए णं सा मुलसा गाहावड़णी विणिहायमावरणे दारए पयाइति ॥२७|| अर्थ-तब वह मुलसा गायापतिनी मृतक बच्चो को जन्म देने लगी ॥२७॥ मूल-तए णं से हरिणगमेसी देवे सुलसाए गाहावइणीए अणुकंपणट्टयाए विणिहायमावराणे दारण करयलसंपुढे गेण्हड़, गेरिहत्ता तब अंतियं साहरइ, साहरिता तं समयं च णं तुम पि नवग्रह मासाणं मुमालदाए पसबमि, जे वि य णं देवाणुप्पिए । तव पुत्ता ते वि य तब अंतियानो करयलसंपुडेणं गंगाइ, गेष्टिता सुलसाए गाहावग्रीए अंतिए साहरइ, तं तव चेव णं देवइ । एए पुचा, यो चेव णं सुलसाए गादायगीय पुत्ता २८-२०॥ 长长长长长长长长长长长长长6 .46 [ २७ ।
6 सूत्रम् अंतकृशाङ्ग कामपाक अर्थ-तव हरिणगमेपो देव सुलसा गाथापतिनी की अनुकम्पा के लिए उसके मरे बालको को करतल-संपुट में ( मिले हुए दोनो हाथो मे ) ग्रहण करके तेरे पास ले आता था। उसी समय नौ मास पूर्ण होने पर तू सुकुमार बालकों को जन्म देती थी । सो तेरे वच्चो का संहरण करके करतल-सपुट में लेकर सुलसा के पास ले जाता था। इस कारण हे देवकी ! वे छह अनगार तेरे पुत्र है, परन्तु सुलसा गाथापतिनी के पुत्र नही है ॥२८-२९॥ मूल-तए णं सा देवई देवी अरहओ अरिट्टनेमिस्स अंतिए एयम? सोच्चा णिसम्म हहतुट्ठ जाव हियया, अरहं अरिद्वनेमि बंदइ नमसइ, वदिचा नमंसित्ता जेणेव ते छ अणगारा तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता ते छप्पि य अणगारे बंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसिचा आगयपाहुया पप्फुयलोयणा कंचुयपडिक्खित्तया दरियबलयवाहा धाराहयकलंबपुप्फगं पिव समूससियरोमकूवा ते छप्पि अणगारे अणिमिसाए दिट्ठीए पेहमाणी पेहमाणी सुचिरं णिरिक्खइ, णिरिक्खित्ता वंदइ, वदिचा नमसइ, नमंसित्ता जेणेव अरहा अरिडणेमी तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता थरहं अरिडनेमि तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ, करेचा वंदइ नमसइ, वंदिता नमंसितो तमेव धम्मियं जाणप्पवरं दुरुहइ, दुरुहित्ता जेणेव वारवई णयरी तेणेव उवागच्छइ, वारवई नयरिं अणुपविसइ, अणुपविसित्ता जेणेव सए गिहे जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता धम्मियाओ जाणप्पवराओ पच्चोरूहइ, पच्चोरूहित्तो जेणव सए वासघरए जेणेव सए सयणिज्जे, तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सयंसि सयणिज्जसि निसीयइ॥ ३०॥ अर्थ-तब देबकी देवी अर्हत् अरिष्टनेमि से यह विषय सुनकर और अवधारण करके हर्षित और सतुष्ट हृदय वाली हुई। उसने अर्हत् अरिष्टनेमि को वन्दना-नमस्कार किया । वंदना-नमस्कार करके जहाँ वे छह अनगार थे, [ २८ ] १८ मनादगान सूत्रम् 2-22 6८९८९सय १९८०-८ पहुँनी । पहुँन कर उन छहों अनगारो को वन्दन-नमस्कार किया । वात्सल्य रस की अविकता के कारण देवकी के स्तनो से दूध जरने लगा। नेत्र प्रफुल्लित हो गये । उसकी कबुकी (चोली) तंग हो गई । हाथों के वलय (चूड़े) तंग हो गये । जैसे मन की धार से निचित कदम्ब का पुष्प विकसित हो जाते है उसी तरह देवकी का रोम रोम विकसित हो उठा। वह उन चलो अनगारों को बहुत देर तक टकटकी लगा कर देखती रही। फिर उनको वन्दना-नमस्कार करके अर्हत् अरिष्टनेमि के पास आई और तीन बार आदक्षिण प्रदक्षिणा करके, वन्दना-नमस्कार करके उसी धर्मयात्रा के काम आने वाले श्रेष्ठ रथ पर गवार हुई। सवार होकर द्वारवती नगरी की ओर चली। नगरी मे प्रवेश करके जहाँ अपना घर था और जहाँ बात नभाभवन था, उसी ओर गई । उस धार्मिक रथ से नीचे उतरी। फिर जहाँ उसका अपना वासगृह था और जहा अपनी गट्या थी, वहां पहुच कर शय्या पर बैठ गई ॥३०॥ मूल-तए णं तोसे देवईए देवीए अयं अज्झथिए ४ समुप्पण्णे एवं खलु यह सरिसए जाब नल- कुबरसमाणे सत्त पुचे पयाया, नो चेव णं मए एगस्स वि बालतणए समुन्झए; एस वि य णं कण्हे वासुदेवे बण्हं २ मासाणं ममं अंतियं पायदए हव्यमागच्छह ॥३१॥ जर्म-तत्पनात् देवकी देवी को इस प्रकार का अव्यवसाय यावत् सकल्प उत्पन्न हुआ-मैंने एक सरीरो यावत् ननवेर के समान गुन्दर सात पुत्रों का प्रसव किया, परन्तु निश्चय ही मैने एक भी वालक के शैशव से आनन्दानुभव नही किया । यह पण वासुदेव हे सो भी छह-छह महीने मे चरण-वन्दना करने आता हे-वह भी प्रतिदिन दिखाई नहीं देता।३१॥ मूल-तं धन्नानो णं ताो अम्मयानो ४ नासिं मण्णे णियगकुच्छिमभूयाई थणदुर्लुद्धाई मरममुल्लावयाई मम्मणपजंपियाई यणमूलकक्खदेसभागं अभिसरमाणाई मुद्धयाइ पुणो य कोमल कमलो- वमेहिं दत्येहिं गिहिऊणं उच्छंगे णिवेसियाई देति सम्मुन्तावए सुमहुरे पुणो पुणो मंजुलप्पभणिए ॥३२॥ ६८८८ [ २६ ।
सूत्रम् अंतकृशाङ्ग 长长长 अर्थ-वोस्तव में वे माताएँ धन्य हैं, पुण्यवती है जो अपनी कू ख से उत्पन्न हुए, स्तनों के दूध मे लुब्ध बने हुए, मधुर-मधुर वचन बोलने वाले, स्तनमूल एवं कांख के भाग मे अधिसरण करने वाले बच्चों को अपने कमलवत् कोमल हाथों से ग्रहण करती है, गोदी मे बिठलाती है, और मीठी-मीठी तोतली बोली बोलती है ॥३२॥ मूल-अहं णं अधना अपुण्णा अकयपुण्णा एत्तो एगयरमवि न पचा, ओहयमणसंकप्पा जाव झियायइ||३३॥ अर्थ-देवकी पुनः सोचती है-मैं अधन्य हूं, पुण्यहीना हूँ. मैने पुण्योपार्जन नहीं किया है, जिससे सात बालकों मे से एक को भी बचपन मे न प्राप्त कर सकी । इस प्रकार मलिनमन होकर यावत् चिन्ता करने लगी ॥३३॥ मूल-इमं च णं कण्हे वासुदेवे रहाए जाव विभूसिए देवईए देवीए पायवं दिए हव्वमागच्छइ ॥३४॥ अर्थ-इधर कृष्ण वासुदेव स्नान करके यावत् विभूषित हुए और देवकी देवी के चरणों मे वन्दना करने के लिए शीघ्र आये ॥३४॥ मूल-तए णं से कण्हे वासुदेवे देवई देवि पासइ, पासित्ता देवईए देवीए पायग्गहण करेइ, करित्ता देवइ देविं एवं वयासी-अएणया णं अम्मो ! तुब्भे ममं पासित्ता हट्ट जाव भवह, किरणं अम्मो ! अज्ज तुम्मे ! ओहय नाव झियायह ॥३५।। अर्थ-तब कृष्ण वासुदेव की देवकी देवी पर दृष्टि पड़ी। उन्होंने देवकी देवी के चरण छुए और फिर कहा-माँ ! अन्य समय तुम मुझे देख कर हर्षित हृदय होती थी; मगर माता ! क्या कारण है कि आज मलिनमन होकर चिन्ता कर रही हो? ॥३५॥ [ ३० ] ।
संतगाज सूत्रम् 46464 मूल-तए णं से देवई देवी कण्डं वासुदेवं एवं वयासी-एवं खलु अहं पुत्ता ! सरिसए जाव समाणे सन पुत्ते पयाया, नो चेव णं मया एगस्स वि बालत्तणे अनुभूए, तमं पि य णं पुत्ता ! ममं छह छहं मासाणं ममं अंनियं पायवंदए हव्यमागच्छसि । तं धन्नाओ णं ताओ अम्मयाओ जाव झियामि ॥३६॥ अर्थ-तत्र देवकी देवी ने कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहा-पुत्र | मैंने एक सरीखे यावत् नलकुबेर समान सुन्दर सात पुत्रो को जन्म दिया, मगर एक के भी गैगव का आनन्द अनुभव नही किया । हे पुत्र ! तुम भी छह-छह महीने में रणवन्दन के लिए मेरे पास आते हो । अतएव धन्य है वे माताएं जो अपनी कूख से उत्पन्न वच्चों को दूध पिलाती है और उनकी तोतली बोली का आनन्द अनुभव करती है, ऐसा सोच कर चिन्तित हो रही हूं ॥३६॥ मूल-तए णं से करहे वासुदेवे देवई' देविं वयासी मा णं तुम्मे अम्मो ! ओहय जाच झियायह, अहगणं तहा वत्तिरसामि जहा णं मम सहोदरए कणीयसे भाउए भविस्सति तिकट्ट, देवइ देविं ताहिं इट्ठाहि कनाहिं जाव वग्गृहि समासासइ, समासासेत्ता तो पडिणिक्खमड, पडिणिक्खमित्ता जेणेव पोसहसाला तेणेव उयागच्छइ, उवागच्छित्ता जहा अभो, णवरं हरिणगमेसिस्स अट्ठमभचं पगेण्हइ, जाव अंजलि कडु एवं क्यासी-इच्छामि णं देवाणुप्पिया ! सहोदरं कणीयसं भाउयं विदिण्णं ॥३७॥ जर्म-तत्पदनात् कृष्ण वासुदेव ने देवकी देवी से इस प्रकार कहा-माता | मन मलिन मत करो, चिन्ता मत करो, में ला प्रयत्न पगा कि मेरे छोटे भाई का जन्म हो । इस प्रकार देवकी देवी को इप्ट, कान्त यावत् वचनों से जापानन देकर वहा से निकले और जहां पोपधगाला थी, वहाँ पहुँने और जैसे ( ज्ञातासूत्र मे कहे अनुसार) अभयकुमार ने देवता का नागपन किया था, उसी प्रकार कृष्ण वासुदेव ने भी आराधन किया। केवल विशेषता यह है कि कृष्ण नफा [ ३१ ।
- पापा अंतकृशाङ्ग सूत्रम् कककका ने हरिणगमेपी देव को लक्ष्य करके तेला किया । जब देवता आया तब कृष्ण ने हाथ जोड़ कर इस प्रकार कहा-देवानु- प्रिय ! मै एक सहोदर छोटा भाई आपके द्वारा प्रदत्त चाहता हूं । अर्थात् आप दीजिए ॥३७॥ मूल-तए णं से हरिणगमेसी देवे कण्हं वासुदेवं एवं क्यासी-होहिइ णं देवाणुप्पिया ! तब देवलोग चुए सहोदरे कणीयसे भाउए; से णं उम्मुक्कबालभावे जोवण गमणुपत्ते अरहो अरिष्टनेमिस्स अंतिए मुडे नाव पव्वइस्सति । कण्ह वासुदेवं दोच्चं पि तच्चं पि एवं बदइ, वदित्वा जामेव दिसं पाउन्भूए तामेव दिसं पडिगए ॥३८॥ अर्थ-तब हरिणगमेषी देव ने कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रिय ! देवलोक से च्युत होकर तुम्हारा सहोदर छोटा भाई उत्पन्न होगा। वह बाल्यावस्था से मुक्त होकर, यौवन अवस्था प्राप्त होने पर अर्हत् अरिष्टनेमि के पास मुण्डित होगा यावत् दीक्षा ग्रहण करेगा । देवता ने दो बार और तीसरी बार भी ऐसा कहा । ऐसा कह कर वह जिस दिशा से आया था उसी दिशा में लौट गया ॥३८॥ मूल-तए णं से कण्हे वासुदेवे पोसहसालारो पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता जेणेव देवई देवी तेणेव उवागच्छइ । उवागच्छित्ता देवईए देवीए पायग्रहणं करेइ, करेता एवं वयासी-होहिइ णं अम्मो ! मम सहोदरे कणीयसे भाउ तिकट्टू देवइ देवि इटाहिं जाव आसासेइ, असासेत्ता जामेव दिसं पाउब्भूए तामेव दिसं पडिगए ॥३६॥ अर्थ-तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव पोषधशाला से बाहर निकले और देवकी देवी के पास गए । देवकी देवी के चरण छुए और फिर इस प्रकार कहा-'माता ! मेरे सहोदर छोटे भाई का जन्म होगा' इस प्रकार कह कर देवकी देवी को [ ३२ ] अनादगात सूत्रम् 2.22 आलानन दिया । आश्वासन देकर जिस दिशा से आए थे, उसी दिशा में लौट गए ॥३६॥ मूल-तए णं सा देवई देवी अण्णया कयाई तंसि तारिसगसि जाव सीहं सुमिणे पासित्ताणं पडि- बुद्धा नाच हट्ठट्ट नाव हियया तं गम्भं सुहंसुहेणं परिवहइ ॥४०॥ अयं-तताल्चात् देवकी देवी ने अन्यदा कदाचित् पुण्यवन्त के शयन करने योग्य उत्तम शय्या पर सोते समय सिह का स्वान देना । देव कर जागृत हुई यावत् हृष्ट-तुष्ट हृदय वाली हुई । उस गर्भ को सुखे-सुखे वहन करती हुई रहने लगी ॥४०॥ मूल-तए णं सा देवई देवी नवरह मासाणं जासुमणारत्तबंधुजीवयलक्खारससरस परिजातकतरुण- दिवाकरसमप्पभं सब्बनयणकंतं सुकुमातं नाव सुरूवं गयतालुयसमाणं दारयं पयाया ॥४१॥ अर्थ-तत्पन्नात् देवकी देवी ने नौ महीने पूर्ण होने पर जपाकुसुम, वधूक के पुप्प, लाक्षारस तथा पारिजात एवं उदित होते हुए सूर्य के समान प्रभा वाले, सब के नेत्रो को प्रिय, मुकुमार यावत् सुन्दर रूप वाले एव हाथी की तालु गमान बालक को जन्म दिया ॥४१॥ मूल-जम्मणं नहा मेहकुमारे, नाव नम्हा णं अम्ह इमे दारए गयतालुसमाणे तं होउ णं अम्ह एयरस दारयस्स नामधेजे गयसुकुमाले ॥४२॥ जर्व-जन्मोत्सव ज्ञातामूत्र में वर्णित मेघकुमार के समान समझना चाहिए । यावत् हमारा यह बालक गज की तान नमान गुठुमार है, अतः हमारे इस वालक का नाम 'गजमुकुमार' हो ॥४२।। मूल-तए णं तस्स दारयस्स अम्मापियरो नामं करेंति गयसुकुमाले त्ति । सेसं जहा मेहे, नाय 668 [ ३३ ] 66 अंतकृदृशाङ्ग सूत्रम् कोपको 长长长长长 अलं भोगसमत्थे जाते यावि होत्था ॥४३॥ अर्थ-तब माता-पिता ने उस बालक का नाम 'गजसुकुमार' स्थापन किया। शेष वर्णन मेघकुमार के समान समझना चाहिए यावत् वह पूर्ण भोग भोगने में समर्थ हो गया ॥४३॥ मूल-तत्थ णं वारवईए णयरीए सोमिले नाम माहणे परिवसइ, अड्डे, रिउव्वेय जाव सुपरिनिहिए यावि होत्था ॥४४॥ अर्थ-द्वारिका नगरी में सोमिल नामक ब्राह्मण निवास करता था। वह ऋद्धिमान् और ऋग्वेद आदि चारों वेदों मे तथा ब्राह्मणों के शास्त्रों में निपुण था ॥४४॥ मूल-तस्स णं सोमिलस्स माहणस्स सोमसिरिणामं माहिणी होत्था, सुकुमाला जाव सुरूवा ॥४॥ अर्थ-उस सोमिल ब्राह्मण की सोमश्री नामक ब्राह्मणी ( भार्या ) थी। वह सुकुमारी यावत् सुरूपवती थी ॥४५॥ मूल-तस्स णं सोमिलस्स माहणस्स धूया सोमसिरीए माहणीए अत्तया सोमाणामं दारिया होत्था, सुकुमाला जाव सुरूवा, रूवेणं जाव लावण्णेणं उक्किट्ठा उक्किट्ठसरीरा यावि होत्था ॥४६॥ अर्थ-उस सोमिल ब्राह्मण की पुत्री एवं सोमश्री ब्राह्मणी की आत्मजा सोमा नामक लड़की थी। वह सुकुमारी यावत् रूपवती थी। वह रूप यावत् लावण्य से उत्कृष्ट थी और उत्कृष्ट शरीर वाली थी ॥४६॥ मूल-तए णं सा सोमा दारिंया अन्नया कयाइ हाया जाब विभूसियो बहूहिं खुज्जाहिं जाव परिक्खित्ता सयाओ गिहाम्रो पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता जेणेव रायमग्गे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता [ ३४ ] b५८० अनहगान सूत्रम् का गयमग्गंसि कणगतिंदूसएणं कीलमाणी कीलमाणी चिट्ठइ ॥४७॥ अर्थ-वह मोमा लड़की अन्यदा किसी समय स्नान करके तथा वस्त्राभूपणों से सुसज्जित होकर वहुत-सी कुब्जा आदि दामियों से यावत् परिवृत होकर अपने घर से निकली । निकल कर राजपथ की ओर गई और राजपथ पर सोने की गंद से कीड़ा करने लगी ॥४७॥ मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं अरहा अरिहनेमी समोसढे । परिसा णिग्गया । ४८|| अर्थ-उस काल और उस समय मे अर्हत् अरिष्टनेमि का पदार्पण हुआ । धर्मदेशना सुनने के लिए जनसमूह निकला ॥४८॥ मूल-तए णं से कराहे वासुदेवे इमीसे कहाए लढे समाणे एहाए जोव विभूसिए, गयसुकुमालेण सदि हस्थिबंधवग्गए सकोरंटमल्लदामेणं छत्तेणं धारिज्जमाणेणं सेयवरचामराहिं उद्ध व्बमाणीहिं वारवईए गयगए ममं मझेणं अम्हो अरिहनेमिस्स पायदए निग्गच्छमाणे सोमं दारियं पासइ, पासित्ता सोमाए दाग्यिाए स्वेण य जोवणेण य लावण्णण य जाब विम्हिए ।।४६ अर्थ-तब कृष्ण वासुदेव भगवान् के आगमन की बधाई पाकर हृष्ट-तुष्ट हुए। उन्होने स्नान किया यावत् निगार लिया । फिर कुमार गनुकुमार के साथ, हाथी पर आरूढ हुए। कोरट की माला का छत्र धारण किया । उत्तम या नामर डोरे जाने लगे। इस प्रकार वे द्वारवती नगरी के बीचो बीच होकर अहंतु अरिष्टनेमि की चरणवन्दना के लिए जा गोगे कि गोगा नदी पर उनकी दृष्टि पड़ी। उसके रूप, यौवन और लावण्य को देख कर कृष्ण यावत् विस्मित हुए ।४६। मूल-ताणं कराहे वासुदेवे कोडुबियपुरिसे सदावेइ, सदावित्ता एवं क्यासी-गच्छह णं तुम्भे [ ३५ ] अंतकृशाङ्ग पापा सूत्रम् एरुरुरुरुरुरुर देवाणुप्पिया ! सोमिलं माहणं जाइत्ता सोमं दारियं गेराहत, गेरिहत्ता करणंतेउरंसि पक्खिवह । तए णं एसा गजसुकुमालस्स कुमारस्स भारिया भविस्सइ । तए णं कोडुंबियपुरिसा जाव पक्खियति ॥५०॥ अर्थ-तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव ने कौटुम्बिक पुरुषों को बुलवाया और बुला कर कहा-देवानुप्रियो ! तुम जाओ और सोमिल ब्राह्मण से याचना करके सोमा लड़की को ग्रहण करो और उसे कन्या-अन्तःपुर में रख दो। बाद में यह लड़की गजसुकुमार कुमार की भार्या होगी। तब कौटुम्बिक पुरुष कृष्ण वासुदेव की आज्ञा के अनुसार यावत् उस लड़की को अतःपुर में रख देते है ॥५०॥ मूल-तए णं से कण्हे वासुदेवे वारवईए णयरीए मझ मझेणं णिग्गच्छइ, णिग्गच्छित्ता जेणेव सहस्संबवणे उज्जाणे नाव पज्जुवासइ ॥५१॥ अर्थ-तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव द्वारवती नगरी के बीचोंबीच होकर निकलते है और जहाँ सहस्राम्रवन नामक उद्यान था, जहाँ अर्हत् अरिष्टनेमि थे, वहाँ जाकर यावत् पर्युपासना करते है ॥५१॥ मूल-तए णं अरहा अरिहनेमी काहस्स वासुदेवस्स गयसुकुमालस्स तीसे य धम्मकहा ॥५२॥ अर्थ-तत्पश्चात् अर्हत् अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव को, गजसुकुमार को और उस महापरिषद् को धर्मकथा सुनाई ॥५२॥ मूल-कण्हे पडिगए ॥५३॥ अर्थ-धर्मकथा सुन कर कृष्ण चले गये ॥५३॥ R [ ३६ ] नलगान सूत्रन् मूल-तए ण गयसुकुमाले अरअहो अरिष्टनेमिस्स अंतियं धम्म सोच्चा नाव एवं वयासी-जं नवरं देवाणुप्पिया ! अम्मापियरं आपुच्छामि, जहा मेहो; णवरं महिलियावज्ज, जाव बड्डियकुले ॥५४|| अब-तहाश्चात् गजनुकुमार अहंतु अरिष्टनेमिनाथ से धर्म श्रवण कर यावत् इस प्रकार बोला-हे देवानुप्रिय ! मैं माता-पिता से आजा लेता हूँ, फिर आपके निकट दीक्षा अंगीकार करूंगा। गजनुकुमार ने मेघकुमार की तरह माता-पिता से पूछा । परस्पर प्रश्नोत्तर हुए (जिसमे स्त्रियो का उल्लेख नही करना ) यावत् कुल की वृद्धि करके दीक्षा लेना, ऐसा कहा ॥५४।। मूल-तए णं कराहे वासुदेवे इमीसे कहाए लडुडे समाणे जेणेब गयसुकुमाले तेणेव उवागच्छइ, उवागन्चित्ता गयमुकुमाल कुमारं आलिंगइ, आलिंगित्ता उच्छंगे निवेसेइ, निवेसित्ता एवं बयासी-तुम सिणं ममं सहोदर करणीयसे भाया, तं मा णं देवाणुप्पिया ! इयाणिं अरहो अरिहनेमिस्स अंतिए मुंडे नाव पव्व- यादि प्रहरगं वारवईए नयरीए महया महया रायाभिसेएण अभिसिंचिस्सामि ॥५॥ अर्थ-तब कृष्ण वासुदेव यह समाचार सुनकर गजमुकुमार के पास आये । आकर गजमुकुमार को आलिंगन मिया, गोद में विठलाया और फिर कहा- मेरे एक ही छोटा सहोदर भ्राता है । अतएव हे देवानुप्रिय ! इस समय जन गरिष्टनेमि भगवान् के निकट मुडित होकर यावत् प्रवजित मत हो। बहुत ठाठ के साथ द्वारिका नगरी के राजा के रूप में तुम्हारा राज्याभिषेक करूंगा ।।५।। मूल--तए णं से गयसुकुमाले कुमारे कण्हेणं वासुदेवेणं एवं वुत्ते समाणे तुसिणीए संचिठ्ठड् ॥५६॥ अर्ग-तब गगनकुमार कुमार कृष्ण वासुदेव के इस प्रकार कहने पर मौन हो रहे ॥५६॥ Si [ ३७ ] - - va अतकृशाङ्ग सूत्रम् मूल-तए णं से गयसुकुमाले कुमारे कण्हं वासुदेवं अम्मापियरं य दोच्चं पि तच्चं पि एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पिया ! माणुस्सया कामा खेलासवा जाव विप्पनहियव्वा अविस्संति ॥५७|| अर्थ-तब गजसुकुमार कुमार ने कृष्ण वासुदेव से और माता-पिता से इस प्रकार कहा-देवानुप्रियो ! मनुष्य सबधी कामभोग श्लेष्म (कफ) के समान है यावत् अवश्य ही त्यागने होगे (तो फिर अभी त्याग देना ही श्रेयस्कर है) ।५७। मूल-तं इच्छामि णं देवाणुप्पिया ! तुब्मेहिं अब्भणुण्णाए समाणे अरहो अरिष्टनेमिस्स अंतिए नाव पव्वइत्तए ॥५८|| अर्थ-अतएव देवानुप्रियो ! मै आपकी अनुमति प्राप्त कर अर्हत् अरिष्टनेमि के पास यावत् दीक्षा अंगीकार करना चाहता हूँ ॥५॥ मूल-तए, णं तं गयसुकुमालं कण्हे वासुदेवे अम्मापियरो य जाहे नो संचाएंति बहुयाहिं अणुलोमाहिं नाव आषवित्तए ताहे अकामाई' चेव एवं चयासी-इच्छामो णं ते जाया ! एगदिवसमवि रज्जसिरिं पासित्तए ( तए णं से गयसुकुमाले कण्हेणं वासुदेवणं अम्मापियरेणं एवं बुत्ते समाणे तुसिणीए संचिडइ) ॥५६॥ अर्थ-तब, जब गजसुकुमार को कृष्ण वासुदेव और माता-पिता बहुत-सी अनुकूल बातों से यावत् समझाने समर्थ न हुए तो इच्छा न होने पर भी इस प्रकार बोले-हे पुत्र ! हम एक दिन के लिए भी तुम्हारी राज्यश्री देखना चाहते है । तब कृष्ण वासुदेव और माता पिता के इस प्रकार कहने पर गजसुकुमार मौन हो रहे ॥५६॥ मूल-तए णं से कराहे वासुदेवे कोडबिय पुरिसे सदावेइ, सद्दावित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव भो 大长长长长 प [ ३८ ] . ना सूत्रम् Pe+ देवाणुपिया ! गय सुकुमालस्म महत्थं जाव रायाभिसेहं उबडवेह ॥६॥ अर्थ-तत्पन्चान् कृष्ण यामुदेव ने कौटुम्बिक पुरुपों को बुलवा कर कहा-देवानुप्रिय । शीन ही गजसुकुमार कुमार महान् अर्थ वाले राज्याभिषेक की तैयारी करो ॥६॥ मूल - तए णं ते कोवियपुरिसा जाब उबट्ठति । ६शा अर्थ-तब वे कोम्बिक पुल्प यावत् तैयारी करते है ॥६॥ मूल-ताए णं से गयसुकुमाले राया नाए महया जाब विहरति ॥६२|| अर्ग-तत्पश्चात् गजमुकुमार राजा हुए, महाहिमवान् पर्वत के समान यावत् राज्य करते विचरने लगे ॥२॥ मूल-तए णं तं गजमुकुमालं अम्मापियरो एवं बयासी-भण नाया ! किं दलयामो ? किं पयच्छामो ? किंवा ते हियइच्छिा ? समत्य ? ॥६३॥ अयं-तव माता-पिता ने गजमुकुमार से कहा-हे पुत्र । क्या देवे ? तुम क्या चाहते हो ? क्या तुम्हारी हार्दिक न्या ? तुम या करने में समर्थ हो । ॥६॥ मल-ताप गं तस्स गयसुतुमालस्स णित्रसमणं जहा महबलस्स सिस्खमणं तहा जाव समंति । ६४|| नई-नये गाना मार ने तीन लाग द्रव्य श्रीभडार से गहण करने को कहा । यावत् दीक्षा-उत्सव का कथन गंगा भगानीगत मे मावन कुमार का कहा है, वैसा मव यहा भी जान लेना चाहिए, यावत् उन्होने दीक्षा अगीकार की।६४। मृल-तए णं से गयमुमाले जार अणगारे जाए इण्यिासमिए जाव गुत्तवंभयारी ॥६५.६ ८८८८८८८८८८ [ ३६ ] अंतकृशाङ्ग सूत्रम् 长长长长长长 - अर्य-तव गजसुकुमार यावत् अनगार हो गए । ईर्यासमिति से युक्त यावत् गुप्त ब्रह्मचारी बनें ॥६५॥ मूल--तए णं से गयसुकुमाले अणगारे जं चेव दिवसं पव्वइए तस्सेव दिवसस्स पुव्वावरणहकाल समयंसि जेणेव अरहा अरिहनेमी तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता अरहं अरिहनेमि तिक्खुचो आयाहिण- पयाहिणं करेइ, करित्ता वंदइ णमंसइ, वंदित्ता नमसित्ता एवं वयासी-इच्छामि णं भंते ! तुम्भेहिं अव्मणुराणाए समाणे महाकालंसि सुसाणंसि एगराइयं महापडिमं उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए । अहासुह देवाणुप्पिया ! मा पडिबंध करेह ॥६६ । अर्थ-तत्पश्चात् गजसुकुमार ने जिस दिन दीक्षा धारण की, उसी दिन मध्याह्न काल मे जहाँ अरिष्टनेमिनाथ थे, वहाँ आये । आकर तीन बार आदक्षिण प्रदक्षिणा की। वदना-नमस्कार किया। फिर कहा-भगवन ! आपकी आज्ञा हो तो मैं महाकाल श्मशान मे एकरात्रिकी भिक्षु की महाप्रतिमा अंगीकार करने की इच्छा करता हूँ। भगवान् ने फर्माया-जैसे सुख उपजे वैसा करो। उसमे विलम्ब मत करो ॥६६॥ मूल--तए णं से गयसुकुमाले अणगारे अरहया अरिडनेमिणा अब्भणुनाए समाणे अरहं अरहनेमि वंदइ, णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता अरहो अरिडणेमिस्म अंतियानो सहस्संबवणाओ उज्जाणाम्रो पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता जेणेव महाकाले सुसाणे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता थंडिलं पडिलेहेइ, उच्चार-पासवणभूमि पडिलेहेइ, इसिं पभारगएणं कारण जाव दोवि पाए साहट्ट एगराइयं महापडिम उवसंपज्जित्ताणं विहरइ ॥६७|| [ ४० ] A- - i.मान सून का 02 - नव गनमुहमार जनगार अहंतु 'अरिष्टनेमि भगवान् से आजा प्राप्त होने पर, अहं अरिष्टनेमि को वन्दना- नमगार, उनके पास मे, महाप्रवन उद्यान से बाहर निकले । निकल कर जहाँ महाकाल श्मशान था, वहाँ पहुँचे। पगार जगेन की प्रतिलेवना की। फिर कुछ नमे हुए शरीर से यावत् दोनो पैर एक स्थान पर (जिनमुद्रा से) स्थापन तक, एकीको भिक्षुवतिमा भगीकार करके विचरने लगे ॥६७।। मूल--इम च णं मोमिले माहणे सामिधेयस्स अट्ठाए बारवईनो नयरीओ बहिया पुमणिगाए ममिटायो य द य कुसे य पत्तामोडं च गेण्हइ, गेरिहत्ता ततो पडिनियचड़, पडिनियत्तित्ता महाकालम्स मुगास्म अद्रमामनेणं बीइवयमाणे २ संझाकालसमयंमि पावरलमणुस्संसि गयसुकुमालं अणगारं पासइ, पामित्ता पग्ड, सरिता प्रामुच्चे एवं बयासी-एस भो से गयसुकुमाले कुमारे अप्पत्थिय जीव परि जिाए. जे गण मम धूयं सोमसिरीए भारियाए अयं सोम दारियं अदिट्ठदोसपइयं कालबत्तिणि वियजा मुडे जाव पञ्चहए तं सेयं खलु ममं गयमुकुमालस्स कुमारस्म वेरणिज्जायणं करेत्तए, एवं संपेहेइ, संपत्तिा दिमापडिलेणं करेइ, करिचा सरसं मट्टियं गेएहइ, गेमिहत्ता जेणेव गयसुकुमाले अणगारे तेणेव आगन्छ, यागन्धित्ता गयसुकुमालस्स अणगारस्स मत्थए मट्टियाए पालि बंधइ, बंधिचा नलंतीओ गियियायो फुल्लियकिमयसमाणे चयरंगारे कदन्लेणं गेएहइ, गेरिहत्ता गयसुकुमालस्स अणगारस्त मत्थए पक्षियइ, परिवविचा भीग तो खिप्पामेव अवक्कमइ, अवक्कमित्ता नामेव दिसं पाउन्भूए तामेव दिसं पटिगाए ।६॥ वर्ग-भर गोमिन ब्राह्मण यज्ञ के लिए लकड़ियां लेने के लिए द्वारवती नगरी से बाहर पहले ही गया हुआ था। [ ४१ सूत्रम् अंतकृयाङ्ग पोप वह लकडियाँ, दर्भ, कुश एवं पत्ते लेकर लौटा । लौटकर महाकाल श्मशान से, न बहुत दूर और न बहुत पास से जा रहा था । मध्या का समय था और विरला ही कोई मनुष्य उधर होकर आता-जाता था। ऐसे समय मे उसने गजसुकुमार अनगार को देखा और देख कर उसे वैर का स्मरण होते ही वह क्रुद्ध हो उठा और बोला-निश्चय यह वही अनिष्ट ( मृत्यु ) की चाहना करने वाला यावत् लज्जारहित गजसुकुमार कुमार है, जो यौवन अवस्था को प्राप्त मेरी पुत्री, सोमश्री की आत्मजा सोमा को बिना दोष देखे ही त्याग कर मुडित यावत् प्रवजित हो गया है । अतएव मुझे गजसुकुमार कुमार से वैर का वदला लेना ही श्रेयस्कर है। सोमिल ब्राह्मण ने ऐसा विचार किया और विचार करके चारों दिशाओं का अवलोकन किया ( कि आसपास मे कोई देख तो नही रहा है ) । तत्पश्चात् उसने गीली मिट्टी ली और गजसुकुमार अनगार के पास पहुँचा । पहुँच कर गजसुकुमार के मस्तक पर मिट्टी की पाल बाँधी । बाँध कर जलती हुई चिता से, फूले हुए पलाश के फूलो के समान खदिर के अगार एक ठीकरे से ग्रहण किये । ग्रहण करके गजसुकुमार अनगार के मस्तक पर डाल दिये । अगार डाल कर वह भयभीत होकर वहाँ से शीघ्र ही भाग गया और जिधर से आया था, उधर 长长长长长长 लौट गया ॥६॥ मूल--तए णं से गयसुकुमालस्स अणगारम्स सरीरयंसि वेदणा पाउब्भूया उज्जला जाव दुरहियासा 长长长长长长 H अर्थ-तत्पश्चात् गजसुकुमार अनगार के शरीर मे अत्यन्त जाज्वल्यमान यावत् दुस्सह वेदना उत्पन्न हुई ॥६६॥ मूल-तए णं से गयसुकुमाले अणगारे सोमिलस्स माहणस्स मणसा वि अप्पदुस्समाणे तं उज्जलं नाव अहियासेइ ॥७०। अर्थ-उस समय गजसुकुमार अनगार ने सोमिल ब्राह्मण पर मन से भी द्वेष न करते हुए उस उज्ज्वल यावत् । ४२ ] . सूत्रम् +>>> •าย: दुगह वेदना को सहन किया ॥७०॥ मूल-तए णं तस्स गयसुकुमालस अणगारस्स तं उज्जलं जीव अहियासेमाणस सुमेणं परिणा- मन पमन्यहि अज्मवमाणेहिं तदावरणिज्जाण कम्माणं खएणं कम्मरयविकिरणकरं अपुन्यकरणं अणुपविट्ठस्स अणते अणुत्तरे जाव केवलवरनाणदंपणे, समुप्पण्णे तो पच्छा सिद्ध नाव पहीणे ॥७१॥ अर्ग-उन जाज्वल्यमान यावत् वेदना को सहन करते हुए गजमुकुमार अनगार को शुभ परिणाम के कारण, प्रगस्त अव्यवसायों के कारण एव ज्ञानावरण तथा दर्शनावरण कर्म का क्षय हो जाने से समस्त कर्म-रज को दूर मरने वाले अपूर्व करण मे प्रविष्ट होने पर अनन्त अनुत्तर (सर्वोत्तम) यावत् केवलज्ञान-दर्शन उत्पन्न हो गये तपम्नात् उन्होंने सिद्धि प्राप्त की यावत् वे सदा के लिए समस्त दु.खो से रहित हो गये ॥७॥ मृल- तन्य णं ग्रहासंनिहिएहिं देवेहिं 'सम्मं श्राराहिय' ति कट्ट दिव्ये सुरहिगंधोदए बुढे, दसद्ध- बन्ने कुमुम निवाइए, चेलुक्खये कए, दिव्ये य गीयगंधब्बनिनाए कए यावि होत्था ॥७२॥ -नव नहीं नमीप मे रहे हुए देवों ने 'गजमुकुमार मुनि ने सम्यक् आराधना की' ऐसा सोच कर दिव्य गुगपिल गोदक की वर्गी, पांन वर्ण के फूलो की वृष्टि की, वस्त्रो की वर्षा करके हर्प प्रकट किया और गीत एव गनिनाद किया अर्थात वायो की ध्वनि की ॥७२॥ मल-तए गु से कराहे वासुदेव पाउपभायाए जाव जलते गहाए नाव विभृमिए हथिखंधवरगए मकोग्टमन्लदामेणं छत्तेणं धारेजमाणेणं सेयवरचामराहिं उद्ध यमाणाहिं २ महया भडचडगरपहगरबंदपरि- किती वाई गरि मझ मजमेणं जाव अरहा अरिहनेमा तेणेव पहारस्थ गमणाए ।७३ । 长长长长长长长长长长长长 [ ४३ ] सूत्रम् अतकृशाङ्ग 长长长长长长长长 的长长长长长 अर्थ-तत्पश्चात् -दूसरे दिन प्रभात होने पर यावत् जाज्वल्यमान सूर्य के प्रकट होने पर कृष्ण वासुदेव ने स्नान किया यावत् वस्त्रालकारो से विभूपित हुए, फिर हाथी के स्कध पर आरूढ हो, कोरट ( कनेर ) की माला का छत्र धारण किये हुए, श्वेत चामर बिजाते हुए, विशाल भटो के समूहों से परिवृत होकर, द्वारवती नगरी के बीचो बीच होकर अरिष्टनेमि के पास जाने के लिए रवाना हुए ॥७३॥ मूल-तए णं से कण्हे वासुदेवे वारवईए णयरीए मझ मज्झेणं णिग्गच्छमाणं एगं पुरिसं पासइ-जुगणं जराजज्जरियदेह जाव किलंतं महइमहालयाओं इट्टगरासीओ एगमेगं इट्टगं गहाय पहिया रत्थापड़ाओ अंतो गिहं अणुप्पसमाणं पासइ ।७४॥ अर्प-उस समय कृष्ण वासुदेव ने द्वारवती नगरी के बीचों बीच से निकलते हुए एक पुरुष को देखा । वह वृद्ध जरा से जीर्ण तथा थका था। वह ईटो के बहुत बडे ढेर मे से एक-एक ईंट लेकर, बाहर राजमार्ग से होकर घर के भीतर प्रवेश करता था-ईटे घर मे रख रहा था ।।७४।। मूल-तए णं से कण्हे वासुदेवे तस्स पुरिसस्स अणुकंपणढोए हत्थिखंधवरगए चेव एग इट्टगं गिण्इ, गिण्हित्ता बहिया रत्थापहाओ अंतोगिहं अणुप्पवेसइ ।।७।। अर्थ-तब कृष्ण वासुदेव ने उस पुरुष की अनुकपा के लिए. हस्ती के स्कंध पर बैठे हुए ही एक इंट उठाई । उठा कर बाहर रथ्या पथ (सडक के मार्ग) से अन्दर के घर मे रख दी ॥७॥ मूल तए णं कण्हेणं वासुदेवेणं एगाए इटगाए गहियाए समाणोए अणेगेहिं पुरिससएहिं से महालए इहगस्स रासी बहिया रत्थापहाओ अंतोघरंसि अणुप्पवेसिए ॥७६) १६ [ ४४ ] अनमतमान सूत्रम् सरसाद पिका अयं-तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव के द्वारा एक ईट उठाने पर अनेक सैकड़ो पुरुपो ने ईटों का वह बड़ा ढेर वाहर रच्याय मे घर के भीतर रख दिया ।।७।। मूल-तए णं से कराहे वासुदेवे वारवईए णयरीए मझ मज्झेणं णिग्गच्छइ, णिग्गच्छित्ता जेणेव अरहा अरिहनेभी तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता नाव चंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता गयसुकुमालं प्रणगारं अपासमाणे अरहं अरिडुनेमि बंदइ, णमसइ वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी-कहिं णं भंते ! मम सहोदरं कणीयसे भाया गयमुकुमाले अणगारे ? जगणं अहं बंदामि णमसामि ॥७७। अर्थ-तदनन्तर कृष्ण वासुदेव द्वारिका नगरी के बीचोंबीच होकर निकले । निकले कर जहाँ अर्हत् अरिष्टनेमि ये, वहाँ पहुँचे । पहुँन कर वन्दन-नमस्कार किया। वन्दन-नमस्कार करने के पश्चात् गजसुकुमार अनगार को न देख कर अहं अरिष्टनेमि से वन्दना-नमस्कार करके पूछा-भगवन् ! मेरे सहोदर लघुभ्राता गजसुकुमार मुनि कहाँ हैं ? उन्हें वन्दना नमस्कार करु ॥७७॥ मूल-तए णं अरहा अरिठ्ठनेमी कण्हं वासुदेवं एवं बयासी-साहिए णं करहा ! गयसुकुमालेणं अणगारेणं अप्पणो अट्ठो ॥७| अर्थ-तब अहंत अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहा-कृष्ण ! गजसुकुमार अनगार ने अपना अर्थ- प्रयोजन निर कर लिया है ।।७।। मूल-तए णं से कराहे वासुदेवे अरहं अरिंढनेमि एवं वयासी-कहरणं भंते ! गयसुकुमालेणं अणगारेयं साहिए अप्पणो अट्टे ||७|| ४५ ॥
长长 सूत्रम् अतकृशान 长长长长长 अर्य-तव कृष्ण वासुदेव ने अर्हत् अरिष्टनेमि से कहा-भगवन् । किस प्रकार गजसुकुमार अनगार ने अपना प्रयोजन सिद्ध किया है ? ॥७६।। मूल-तए णं अरहा अरिङनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-एवं खलु कण्हा ! गयसुकुमालेणं अणगारेणं मम कल्लं पुव्वावरण्डकालसमयंसि वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी-इच्छामि णं जाव उवसंपाज्जित्ताणं विहरइ । तए णं तं गयसुकुमालं अणगारं एगे पुरिसे पासइ, पासित्ता जाव सिद्धे ॥८॥ अर्थ-तब अर्हन्त अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहा-हे कृष्ण | गजसुकुमार अनगार ने कल दोपहर के समय मुझे वन्दन-नमस्कार किया और कहा-'भगवन् ! मै एक दिन की भिक्षुप्रतिमा अगीकार करके विचरना चाहता हूँ।' यावत् वह विचरने लगे। तब गजसुकुमार मुनि को एक पुरुष ने देखा । देखकर उसने उन्हे सहायता दी, जिससे वे यावत् सिद्ध हो गये ॥८॥ मूल-तं. एवं खलु कण्हा ! गयसुकुमालेण अणगारेणं साहिए अप्पणो अट्ठो ॥१॥ अर्थ-इस प्रकार हे कृष्ण ! गजसुकुमार अनगार ने अपना प्रयोजन सिद्ध कर लिया है ॥११॥ मूल- तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहं अरिष्टनेमि एवं वयासी-से के णं भंते ! पुरिसे अप्पत्थिय- पत्थिए जाव परिवज्जिए, जेणं ममं सहोदरं कणीयसं भायरं गयसुकुमालं अणगारं अकाले चेव जीवियाओ ववरोविए ? ||२|| अर्थ-तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव ने अर्हन्त अरिष्टनेमि से कहा-भगवन् ! वह अप्राथित (मृत्यु) का प्रार्थी यावत् लज्जा से रहित पुरुष कौन है, जिसने मेरे सहोदर छोटे भ्राता गजसुकुमार को अकाल मे ही जीवन रहित कर दिया ॥२॥ 长长长长长 [ ४६ ] कर अंगात सूत्रम् मूल-तए णं अरहा अरिहनेमी करहं वासुदेवं एवं पयासी-मा णं कहा ! तुमं तस्स पुरिसस्स पदोसमावज्जाहि, एवं खलु कण्हा ! तेण पुरिसेण गयसुकुमालस्स अणगारस्स साहिज्जे दिण्णे ||८३|| अर्थ-तब भगवान् अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव से कहा हे कृष्ण ! तुम उस पुरुप पर उप मत करो । हे कृष्ण उग पुरुष ने तो गजमुकुमार अनगार को सहायता दी है ।।३।। मूल-कहं णं भंते ! से पुरिमे गयसुकुमालस्स साहिज्जे दिण्णे ? तए णं से अरहा अरिहनमी कगई वासुदेवं एवं वयासी-से नूनं कण्हा ! तमं मम पायदए हव्यमागच्छमाणे वारवईए णयरीए एगं पुरिमं पाममि नार अगुपवेसिए जहा णं कराहा ! तुम तस्स पुरिसस्स साहिज्जे दिण्णे, एवमेव कण्हा ! तेणं पुरि सेणं गयमुकुमालस्स अणगारस्स अणेगभवसयसहस्ससंचियं कम्मं उदीरेमाणेणं बहुकम्मणिज्जरत्थं साहिज्जे दिगणे ||४|| अर्थ-कृष्ण वासुदेव ने कहा-भगवन् ! उस पुरुप ने गजमुकुमार को किस प्रकार सहायता दी है ? तव अन्न अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव से कहा-हे कृष्ण ! तुम मेरे चरण वन्दन के लिए आ रहे थे तब तुमने द्वारिका नगरी में एक पुरुष को देखा था, यावत् अनुकम्पा करके (इंट उठाकर) उसकी सहायता की थी। तो जिस कारण ! तुमने उग पुरुप की सहायता की थी, उसी प्रकार हे कृष्ण ! उस पुरुप ने गजमुकुमार मुनि के कई हजार भवों में गनिन नामों की उदीरणा करके, बहुत कर्मों की निर्जरा के लिए सहायता दी है ।।४।। मृल-तए णं से कराहे वासुदेवे अरहं अरिट्टनेमि एवं वयासी-से णं भंते ! पुरिसे मए कह जागियव्य ? | 长长长长长长长长长 क [ ४७ ] अतकृशाङ्ग रुरुरकर सूत्रम् अर्थ-तव कृष्ण वासुदेव ने अर्हन्त अरिष्टनेमि से कहा-भगवन् ! उस पुरुष को मै केसे पहिचानू ? ॥८॥ मूल-तए णं अरहा अरिहनेमी कण्डं वासुदेवं एवं वयासी-जे णं कण्हा ! तुम बारवईए एयरीए अणुपविसमाणं पासित्ता ठियए चेव ठिइभेएणं कालं करिस्मइ तएणं तुम जाणेज्जासि एस णं से पुरिसे १८६॥ अर्थ --तब अर्हन्त अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव से कहा-हे कृष्ण ! यहाँ से लौटते हुए द्वारिका नगरी मे प्रवेश करते समय, तुम्हे देखते ही जो पुरुष रुक जाएगा और वही भयभीत होकर स्थिति का भेद होने पर काल पूर्ण करेगा, उसी को तुम जान लेना कि वह पुरुष यही है-जिसने गजसुकुमार को सहायता दी है ॥८६॥ मूल-तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहं अरिट्टनेमि वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता जेणेव अभिसेयं हस्थिरयणं तेणेव उवागच्छइ, उवाच्छित्ता हत्थि दुरुहिता जेणव वारवई णयरी, जेणेव सए गिहे तेणेब पहारेत्थ गमणाए ।८७॥ अर्थ-तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव ने अरिहन्त अरिष्टनेमि को वन्दन-नमस्कार किया । वन्दना-नमस्कार करके जहाँ अपना अभिषेक-प्रधान हस्तीरत्न था, वहाँ पहुँचे और उस पर आरूढ़ हुए। फिर जहाँ द्वारिका नगरी और जहाँ स्वयं का घर था, वहाँ जाने के लिए रवाना हुए ।।८७॥ मूल-तए णं तस्स सोमिलस्स माहणस्स कल्लं जाव जलते अयमेयारूवे अज्झथिए नाव समु- प्पन्ने-एवं खलु कण्हे वासुदेवे अरहं अरिष्टनेमि पायदए निग्गए तं नायमेयं अरहया, विरणायमेयं अरहया, सुयमेयं अरहया सिद्धमेयं अरहया भविस्सइ कण्हस्स वासुदेवस्स, तं न नज्जइ णं कण्हे वासुदेवे मर्म केण वि [ ४८ | कायमान सूनम - कुमारेणु मारिम्सइ ति कट्टु भीए सयानो गिहाम्रो पडिणिक्खमइ, कण्हस्स वासुदेवस्स बारवईनयरिं अणुपवि ममाणस्स पुरनो सपक्खि सपडिदिसि हबमागए ।'८८॥ अर्थ-तब उम मोमिल ब्राह्मण को प्रातःकाल होने पर यावत् सूर्य के जाज्वल्यमान होने पर इस प्रकार का अध्य- बनाय यावत् उत्पन्न हुआ-निश्चय ही कृष्ण वासुदेव अरिहन्त अरिष्टनेमि भगवान् के चरणों की वन्दना के लिए निकले है, अतएव उन्हें (मेरा दुष्कृत्य) अरिहन्त भगवान् से ज्ञात हो जाएगा, विशेष रूप से ज्ञात हो जाएगा, वे उसे सुन लेगे; और निम्नय कर लेगे तब कृष्ण वासुदेव न जाने किस कुमृत्यु से मुझे मारेगे ! इस प्रकार विचार करके सोमिल भयभीत हुआ और अपने घर से निकल पड़ा और द्वारिका नगरी मे प्रवेश करते हुए कृष्ण वासुदेव के ठीक सामने, उसी दिशा मे आ पौना ॥८॥ मूल-तए णं से सोमिले माहणे कण्हं वासुदेवं सहसा पासित्ता भीए, ठिए चेव ठिइभेएणं कालं करेइ, धरणितलंसि सब्बंगेहिं धसत्ति संनिवडिए ॥८६॥ जयं-तत्पश्चात् वह मोमिल ब्राह्मण कृष्ण वासुदेव को सहसा देख कर भयभीत हो उठा और खड़ा-खडा ही बितिभेद हो जाने से मर गया। यह सर्वांग से भूतल पर वडाम से गिर पड़ा ॥८६॥ मूल-नए णं से कपहे वासुदेवे सोमिलं माहणं पासइ, पासित्ता एवं बयासी-एस णं भो देवाणु- प्पिया ! से सोमिले माहरणे अपत्थियपत्थिए नाव परिवज्जिए जेण ममं सहोयरे कणीयसे भायरे गयसुकुमाले याणगारे 'प्रकाले चेव नीवियायो ववरोविए, ति कटु सोमिल माहणं पाणेहिं कड्डावेइ, कड्डावित्ता तं भूमि पाणिरणं अमोखावेद, अभोक्खाचित्ता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागए, सयं गिहं अणुपवितु ॥१०॥ 长长长长长长长长长长长长长 [ ४६ ] सत्रम सूत्रम् अर्थ-तव कृष्ण वासुदेव ने सोमिल ब्राह्मण को देख कर कहा-अहो देवानुप्रिय ! यही वह सोमिल ब्राह्मण अप्रार्थित का प्रार्थी यावत् लज्जा से परिवर्जित ! जिसने मेरे सहोदर लघु भ्राता गजसुकुमार अनगार को असमय मे ही मार डाला ! इस प्रकार कह कर सोमिल ब्राह्मण (के शव) को चांडालो से फिकवा दिया और उस भूमि को पानी से साफ करवाया। फिर अपने घर की ओर आए और घर में प्रविष्ट हुए ॥१०॥ मूल-एवं खलु जंबू ! समणेणं भगवया महावीरेणं नाव संपत्तेणं अंतगडदसाणं तच्चस्स वग्गस्स अयम? पणाचे ॥१॥ 长长长长 अतकृशान 长长长长 अट्ठम अज्झयणं समचं अर्थ-श्रीसुधर्मा स्वामी कहते है-हे जम्बू ! श्रमण भगवान् महावीर यावत् निर्वाणप्राप्त ने अन्तकृदशा के तीसरे वर्ग का यह अर्थ कहा है ।।६१॥ आठवां अध्ययन समाप्त एकए प्रसारमात्र सूत्रम् htra तृत्तीय वर्ग नवम् अध्ययन मूल-नवमस्स उक्खेवो । एवं खलु जंबू । तेणं कालेणं तेण समएणं वारवईए नयरीए नहा पढमए जार विहरड़ ॥१॥ अर्थ-नौवं अध्ययन का उपोद्घात पूर्ववत् समझ लेना चाहिए। श्रीसुवर्मा स्वामी ने कहा-हे जम्बू । उस काल जोर उग गमय मे द्वारिका नामक नगरी थी। शेप सव वर्णन प्रथम गौतम कुमार संबंधी कथन के अनुसार समझ लेना गाहिए, यावत् भगवान् नेमिनाथ पधारे और विचरने लगे ॥१२॥ मृल- तत्थ णं वारवईए णयरीए बलदेवे नामं राया होत्था, वण्णो ॥२॥ अयं-द्वारिका नगरी मे बलदेव नामक राजा थे, राजा का वर्णन यहां समझ लेना चाहिए ॥२॥ मूल-तरम ण बलदेवस्स रण्णो धारिणी नामं देवी होत्था, वरणओ ॥३॥ -उग बलदेव राजा की धारिणी नामक रानी थी। यहाँ रानी का वर्णन कह लेना चाहिए ॥३॥ जपाका [ ५१ ] KKR सूत्रम् अतकृशान 长长长长 मूल-तए णं सा धारिणी सीहं सुमिणे जहा गोयमे, णवरं सुमुहकुमारे, पण्णासं कण्णाओ, पन्ना- सदाओ, चोइस पुव्वाई अहिज्जइ. वीसं वासाई परियाओ, सेसं तं चेव जाव सेत्तुंजे सिद्धे ।४। धारिणी रानी ने स्वप्न मे सिह देखा । सब वर्णन गौतम कुमार के समान समझना चाहिए, विशेषता केवल यही है कि कुमार का नाम सुमुख रवखा गया । पचास कन्याओं के साथ उसका विवाह हुआ । पचास दात दी । दीक्षा अगीकार करके चौदह पूर्वो का ज्ञान प्राप्त किया। बीस वर्प दीक्षा पाली। शेष पूर्ववत् यावत् शत्रुञ्जय पर्वत पर सिद्ध हुए ॥४॥ मूल-निक्खेवप्रो-एवं दुम्मुहे वि कूवदारए वि, दोण्ह वि बलदेवधारिणीसुया ॥५॥ अर्थ-निक्षेप-इसी प्रकार दुर्मुख और कूपदारक कुमारो का कथन समझना चाहिए। यह दोनों भी बलदेव और धारिणी के पुत्र थे॥५॥ मूल-दारुए वि एवं चेव, णवरं वासुदेवधारिणीसुए ॥६॥ अर्थ -दारुक कुमार का वृत्तान्त भी ऐसा ही समझना, विशेषता केवल यह है कि वह वासुदेव और धारिणी के पुत्र थे ॥६॥ मूल-एवं अणाधट्टी वि वासुदेवधारिणीसुए तहेव ।।७। अर्थ-अनाधृष्टि कुमार का वृत्तान्त भी ऐसा ही हैं वह वासुदेव और धारिणी के पुत्र थे ।।७।। मूल-एवं खलु जंबू ! समणेणं नाव सपत्ते ण अट्ठमरस अंगस्स अंतगडदसाणं तच्चस्स वग्गरस तेरसमस्स अज्झयणस्स अयमढे पएणत्ते ॥८॥ 长长长长长 - पोको [ ५२ ] सूत्रम् बारहमान इति तबस्स वग्गम्स तेरसमं अज्झयणं समत्त । अयं-हे जम्बू ! श्रमण भगवान् महावीर यावत् निर्वाणप्राप्त ने आठवे अंग अन्तकृदशा के तीसरे वर्ग के तेरहवे अध्ययन का यह अर्थ कहा है ।।८।। तृतीय वर्ग का तेरहवां अध्ययन समाप्त *** 4 4ะ 4 चतुर्थ वर्ग पापा ? मल-जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं तच्चस्स वग्गस्स तेरस अज्झयणा पन्नता, चउत्थस्स वग्गरम अंतगडदमाणं समणेणं नाव संपत्तेणं कति अज्झयणा पण्णता ? ॥१॥ अर्य-जन्यू स्वामी प्रश्न करते हैं-भगवन् ! यदि श्रमण भगवान् महावीर यावत् निर्वाणप्राप्त ने अन्तगडदसा अगा तीसरे वर्ग के तेरह अध्ययन कहे है तो चोये वर्ग के श्रमण भगवान् ने कितने अव्ययन कहे हे ? ॥१॥ मुल-एवं खलु जंबू । समणेण जाव संपणं चउत्थस्स वग्गस दस अज्झयणा पण्णत्ता, तंजहा- जालि मयालि उवयालि, पुरिससेणे य वारिसेणे य । पज्जुन्न संघ अनिरुद्वे सच्चनेमी य दढनमी ॥२॥ [ ५३ ] 24 कुमार ( १० ) दृढनेमि कुमार का ॥२ ॥ अंतकृशान अर्थ-श्रीसुधर्मा स्वामी ने उत्तर दिया-हे जम्बू ! श्रमण भगवान महावीर यावत् निर्वाणप्राप्त ने चौथे वर्ग के दस अध्ययन कहे है । यथा-(१) जाली कुमार का (२) मयाली कुमार का (२) उवयाली कुमार का (४) पुरुषसेण- कुमार का (५) वारिषेण कुमार का (६) प्रद्युम्न कुमार का (७) शाम्बकुमार का (८) अनिरुद्ध कुमार का (6) सत्यनेमि- सूत्रम् अर्थ-भगवन् मूल-जइ णं भंते ! समणेणं नाव सपनेणं चउत्थस्स वग्गस्म दम अज्झयणा पण्णत्ता, पढमस्स अज्झयणस्म के अट्ठ पएणते ? ॥३॥ । यदि श्रमग भगवान् महावीर यावत् निर्वाणप्राप्त ने चौथे वर्ग के दस अध्ययन कहे है तो प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ कहा है ? ||३|| मूल-एवं खलु जंबू ! तेणं कालेण तेणं समएण वारवई णाम णयरी होत्था । जहा पढमे नाव कण्हे वासुदेवे आहेवच्चं नाव विहग्इ । ४॥ अर्थ-इस प्रकार हे जम्बू ! उस काल और उस समय मे द्वारिका नामक नगरी थी । उसका वर्णन प्रथम गौतम कुमार के अध्ययन मे किया गया है, वही यहाँ जानना चाहिए, यावत् कृष्ण वासुदेव उसका शासन कर रहे थे ॥४॥ मूल-तत्थ णं वारवईए णयरीए वसुदेवे राया, धारिणी देवी, वरणो। नहा गोयमो णवरं जालिकुमारे, पएणीसाओं दाओ, वारसंगी, सोलस वासाई परियाओ, सेमं जहा गोयमस्स जाव सेत्तुंजे सिद्ध । ॥ ५४ ] अर्थ -द्वारिका नगरी मे वसुदेव नामक राजा थे। उनकी रानी का नाम धारिणी था, इत्यादि वर्णन पूर्ववब अनाहगाह सूत्रम् ܐܐ ܐ ८८Ko समाना । बारिणी रानी के उदर से जाली कुमार का जन्महुआ । युवावस्था होने पर पचास कन्याओं के साथ उसका विवाह हुआ । पचान दात दी । भगवान् का उपदेश श्रवण करने पर वैराग्य उत्पन्न हुआ। दीक्षा अगीकार की। वारह अगों का अध्ययन किया। सोलह वर्ष तक श्रमणपर्याय पाली । शेप सब वर्णन गौतम कुमार के समान है यावत् शत्रुञ्जय गल मे गिद्धि प्राप्त की ।।५।। मूल –एवं मयालि उबयालि पुरिमसेणे य वारिसेणे य एवं पज्जुन्ने वित्ति, णवरं कण्हे पिया रुप्पिणी माता । एवं संचे विणवरं नंबबई माता । एवं अणिरुद्वे वि. णवरं पज्जुण्णे पिया वेदम्भी माया । एक सच्चनमी वि, गवरं ममुद्दविजए पिया सिवा माता । एवं दढनेमी वि. सव्वे एगगमा । चउत्थस्स वग्गरस निक्खवी ॥६॥ अयं-जमा जाली कुमार का वृत्तान्त कहा, वैसा ही मायाली उपयाली, पुरुपसेण, वारिसेण और प्रद्युम्न कुमारो का भी कहना चाहिए । विशेषता यह कि उन सबके पिता कृष्ण और माता रुक्मिणी थी । शाम्ब कुमार का वृत्तान्त भी ऐलानी जानना, येवल उनकी माता का नाम जाम्बवती था । अनिरुद्ध कुमार का वृत्तान्त भी ऐसा ही है, केवल उनके पिता प्राग्न ये और माता वैदर्भी यो । मत्यनेमि कुमार का वृत्तान्त भी ऐसा ही है, पर उनके पिता समुद्रविजय और माना गिवा देवी थी। दृढनेमि का वृत्तान्त भी ऐसा ही है । इन सब का अधिकार एक मरीखा है। यहां चौथे वर्ग का अनहार पूर्ववत् नमाना नाहिए ।।६।। चतुर्थ वर्ग समाप्त काकाका [ ५५ ] । अंतकृशाङ्ग R पञ्चम वर्ग परेका 《《《《《 मूल-जइ णं भते ! समणेर्ण जाव संपणं चउत्थस्स वग्गस्म अयम? पनने, पंचमस्स णं भंते ! वग्गरस अंतगडदसाणं समणेणं नाव संपत्तेणं के अट्ठ पपणचे १ ॥१॥ अर्थ-अहो भगवान् ! यदि श्रमण भगवान महावीर यावत् निर्वाणप्राप्त ने चौथे वर्ग का यह अर्थ कहा है, तो भगवन् ! उन श्रमण भगवान् यावत् निर्वाणप्राप्त ने अन्तकृद्दशा अग के पांचवे वर्ग का क्या अर्थ कहा है ? ॥१॥ मूल- एवं खलु जंबू ! समणेणं नाव संपत्तेणं पंचमस्स वग्गस्स दम अज्झयणा पण्णता, तंजहा- पउमावई य गोरी गंधारी, लक्खणा सुसीमा य । जंबवइ सच्चभामा, रुप्पिणी मूलसिरी मूलदत्ता वि ॥२॥ अर्थ-हे जम्बू ! यावत् निर्वाणप्राप्त श्रमण भगवान् महावीर ने पाँचवे वर्ग के दस अध्ययन कहे हैं । यथा-(१) पद्मावती रानी का (२) गौरी रानी का (३) गाधारी रानी का (४) लक्ष्मणा रानी का (५) सुसीमा रानी का (६) जम्बूवती रानी का (७) सत्यभामा रानी का (८) रुक्मिणी रानी का यह आठ श्रीकृष्ण की आठ पटरानियाँ है ), (6) मूलश्री रानी का (१०) मूलदत्ता रानी का ॥२॥ मजप [ ५६ । 长长 --- iiदनाम सूत्रम् मृत-जड़ णं भने ! समणेणं जाव संपत्तेणं पंचमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, पढमस्स णं भने ! अझयणस्स के अडे पएणचे ? ॥३॥ नयं-भगवन् । श्रमण भगवान महावीर यावत् निर्वाणप्राप्त ने यदि पंचम वर्ग के दस अध्ययन कहे हैं तो भगवन् । प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ कहा है ? ॥३॥ मूल-एव खलु जंबू । तेणं कालेणं तेणं समएणं वारवई णाम णयरी होत्था, जहा पढमे जाव करहे वासुदेव आहेवच्चं जाव विहरइ ॥४॥ -हे जम्बू । उन काल और उस समय मे द्वारिका नामक नगरी थी। उसका वर्णन प्रथम अध्ययन के समान भी जानना । यावत् कृष्ण वासुदेव उसका आधिपत्य कर रहे थे ॥४॥ मूल-तस्स गणं कएहस्स वासुदेवस्स पउमावई नामं देवी होत्था, वण्णश्रो ॥५॥ अर्थ-उन करण वासुदेव की पद्मावती नामक रानी थी। यहां रानी का वर्णन समझ लेना चाहिए ॥५॥ मुल-तेणं कालेणं तेणं समएणं अरहा अरिहनेमी जाव समोसढे जाव विहरइ ॥६॥ अनं-उस काल और उन समय में अरिहन्त अरिष्टनेमि भगवान् पधारे यावत् विचरने लगे ॥६॥ मृल-करहे निग्गर नाव पजुवासइ ||७|| - पामुदेव और जनसमूह भगवान् को वन्दना करने के लिए निकले यावत् पर्युपासना करने लगे ॥७॥ मूल-ता णं सा पउमाबई देवी इमीसे कहाए लट्ठा समाणो हट्ठा जहा देवई जान पज्जुवासइ ।। 长长长长长长长长长长长长 [ ५७ ] अंतकृशाङ्ग - सूत्रम् अर्थ-तब पद्मावती रानी को यह वृत्तान्त विदित हुआ। वह हर्षित हुई और जिस प्रकार देवकी रानी वंदना करने गई थी, उसी प्रकार पद्मावती रानी भी गई यावत् भगवान की उपासना करने लगी ॥८॥ मूल-तए णं अरहा अरिट्ठनेमी कण्हस्स वासुदेवस्स पउमावईए देवीए जाव धम्मकहा । परिसा पडिगया 18 अर्थ-तत्पश्चात् अर्हन्त अरिष्टनेमि भगवान् ने कृष्ण वासुदेव को और पद्मावती देवी को तथा उपस्थित परिषद् को धर्मकथा सुनाई । धर्मकथा सुनने के बाद परिषद् वापिस चली गई ।।६।। मूल-तए णं कण्हे वासुदेवे अरहं अरिट्टनेमि वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी-इमीसे णं भंते ! वारवईए णयरीए दुवालसजोयणायामाए णबजोयणवित्थिन्नाए जाव पच्चक्खं देवलोगभूयाए किंमूलए विणासे भविस्सइ १ ॥१०॥ अर्थ-तब कृष्ण वासुदेव ने अरिहन्त अरिष्टनेमि को वंदन-नमस्कार किया और फिर प्रश्न किया-'भगवन् बारह योजन लम्बी, नौ योजन चौड़ी और साक्षात् देवलोक के समान इस द्वारिका नगरी का विनाश किस कारण से होगा?' ॥१०॥ मूल- 'कण्हा !" इ अरहा अरिहनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-एवं खलु कण्हा ! इमोसे वारवईए नयरीए नवजोयणविच्छिन्नाए नाव देवलोगभूयाए सुरग्गिदीवायणमूलाए विणासे भविस्सइ ॥११॥ अर्थ-'कृष्ण' इस प्रकार सबोधन करके अर्हत् अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव से कहा-इस प्रकार हे कृष्ण ! नौ योजन वीस्तीर्ण यावत् देवलोक के सदृश इस द्वारिका नगरी का विनाश सुरा (मदिरा), अग्नि और द्वीपायन ऋषि के निमित्त से होगा ॥११॥ 长长长长长长长长 । ५८ ] 44 नारमान सुत्रम् ०८८८८८८८ मृल-तए गं कण्ठस्स वासुदेवस्म अरहयो अरिडुन मिस्स अंतिए एयमटुं सोचा णिसम्म अयमेया- म्चे अज्झथिए नाव समुप्पन्ने-धन्ना णं ते जालि-मयालि-उवयालि-पुरिससेण-वारिसेण-पज्जुण्ण संब- यनिरुद्-दढनेमि-सच्चनमि-पभिडओ कुमारा जे णं चिच्चा हिरणं जाव परिभाएत्ता अरहो अरिहनेमिस्स अंनियं मुंडा जाव पव्वइया; अहरणं अधण्णे अकयपुराणे रज्जे य नाव अंतेउरे य माणुस्सएसु य कामभोगेसु मच्छिा ४, नो मचाएमि अरहो अरिटुन मिस्स नाव पव्वइत्तए १२-१३॥ अर्थ-अहत् अरिष्टनेमि के मुखारविन्द से यह बात सुन कर और उसे अवधारण करके कृष्ण वासुदेव के मन में ग प्रकार का विचार उत्पन्न हुआ-अहा, जाली मयाली, उपयाली, पुरुपपेण, वारिसेण, प्रद्युम्न, शाम्ब, अनिरुद्ध, सुनेमि और नत्यनेमि वगैरह कुमार धन्य हैं जो हिरण्य (चादी-मोना आदि) का त्याग करके यावत् उसका विभाग को अरिहन्त अरिष्टनेमि भगवान् के निकट दीक्षित हुए है। मैं अधन्य हू, मैंने पुण्य का सचय नही किया है । मै राज्य में यावत् अन्त.पुर में एव मनुष्य नवधी कामभोगो मे मूछित हूँ और अर्हन्त अरिष्टनेमि के निकट दीक्षा अंगीकार करने मे समर्थ नहीं हो पाता है ।।१२-१३।। मूल-कगहाइ अर हा अरिहनेमी कण्ह वासुदेवं एवं वयासी-'से नूणं कण्हे ! नव अयं अज्झथिए जाय समुप्पन-धन्ना गं ते जाली नाव पचहत्तए, से एण कण्हा ! अ8 सम? ?, ता, स्थि' ॥22॥ 14- Tण' ग प्रकार सबोधन करके अर्हन्त अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव से कहा-'कृष्ण ! तुम्हे, ऐसा रिराज जाली तुमार आदि धन्य है यावत् मै दीक्षा ग्रहण करने में असमर्थ हूँ। हे कृष्ण | यह बात दोग - अतकृशाङ्ग सूत्रम् कार श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया-हाँ भगवन् ! सत्य है, मुझे ऐसा विचार आया है ॥१४॥ मूल-तं नो खलु क्राहा ! तं एवं भूयं वा भव्वं वा भविस्संइ वा जन्नं वासुदेवा चइता हिरपणं नाव पव्वइस्संति ॥१५॥ अर्थ-तब भगवान् ने कहा-कृष्ण ! ऐसा कभी हुआ नही, होता नही और होगा भी नही कि वासुदेव हिरण्य आदि का त्याग करके दीक्षा ग्रहण करे ॥१५॥ मूल-से केणढणं भंते ! एवं वुच्चइ न एवं भूयं जाव पन्वइस्संति ? अर्थ-कृष्णजी ने प्रश्न किया-भगवन् ! किस कारण से ऐसा कहा है कि ऐसा हुआ नही, होता नही, होगा भी नही कि वासुदेव दीक्षा धारण करे ? मूल-कण्हाइ अरहा अरिहनेमी कण्हं वासुदेवं एवं बंयासी-एवं खलु कण्हा ! सच्चे वि य णं वासुदेवा पुन्वभवे नियाणकडा, से एएणे अट्ठणं कण्हा ! एवं वुच्चइ न एयं भूयं जाव पव्वइस्संति ॥१६॥ अर्थ-'कृष्ण' इस प्रकार सबोधन करके अर्हत् अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव से कहा-हे कृष्ण ! सभी वासुदेव पूर्व भव मे निदान (नियाणा) करते है, इस कारण ऐसा कहा है कि ऐसा हुआ नहीं, होना नही, होगा नही कि वासुदेव दीक्षा धारण करे ॥१६॥ मूल-तए णं से कण्हे वासुदेवे अरह अरिष्टनेमि एवं वयासी-अहं णं भंते ! इनो कालमासे कालं किच्चा कहिं गमिस्सामि ? कहि उववज्जिस्सामि १ ॥१७॥ ke काकाकाको [ ६० ।
समाज सदर सूत्रम 44:44 4+ अयं नतान्चात् कृष्ण वासुदेव ने अहं अरिष्टनेमि से प्रश्न किया-भगवन् । मैं काल के अवसर पर काल करके पता ने जाऊंगा? कहां उतान होऊंगा ? ॥१७॥ मूल-तए णं अरहा अरिठ्ठनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासो-एवं खलु कण्डा ! तुमं बारवईए नय- गए मुरग्गिढीवायणकोवनिड्डाए अम्मापिइनियगविप्पहूणे रामेण बलदेवेण सद्विं दाहिणवेयालिं अभिमुहे जुहि- हिलपामोकवाणं पंचरह पंडवाणं पंडरायपुत्ताणं पासं पंडुमहुरं संपत्थिए कोसबवणकाणणे नग्गोहवरपायवम्स आहे पुढविसिनापट्टए पीयवत्यपन्छाइयमरीरे जराकुमारणं तिक्खेणं कोदंडविप्पमुक्केणं इसुणा वामे पाए विद्ध ममागे कालमासे कालं किच्चा तच्चाए वालुयप्पभाए पुढवीए उज्जलिए नरए नेरइयत्ताए उववज्जिहिसि ॥१८॥ जयं-नव अहन्त अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव से कहा-हे कृष्ण | सुरा, अग्गि और द्वीपायन ऋपि के कोप से द्वारिका नगगे के भन्न हो जाने पर तुम माता, पिता एव अन्य स्वजनो से बिछुड कर केवल राम बलदेव के साथ, निगी नमुद्र के किनारे को ओर, पण्डु राजा के पुत्र युधिष्ठिर आदि पाँच पाण्डवो के पास पाण्डु-मथुरा को जाने के लिए खाना होओगे। मार्ग मे कौगान वृक्ष के कानन मे, एक उत्तम वट वृक्ष के नोत्रे, पृथ्वीशिलापट्टक पर पीत वस्त्र से गुन्हारा गरीर मान्छादित होगा । उस समय जराकुमार अपने धनुप से एक तीदण वाण छोडेगा । वह तुम्हारे वाएँ पर मेधि जाएगा। तब कालमास में काल करके तुम तीसरी वालुकाप्रभा पृथ्वी मे उज्वलित नामक नरक मे नारक FD Tम नोगे ॥१६॥ मूल-तए णं से कराहे वासुदेव अरहयो अरिष्टनेमिस्म अंतिए एयमहूँ सोच्चा निप्सम्म ओहय नाव झियायः ॥१६॥ [ ६१ ।
सूत्रम् अतकृशाङ्ग अर्थ-नेमिनाथ भगवान के मुखारविन्द से अपना भविष्य सुन कर कृष्ण वासुदेव चिन्तित हो गये-आर्त्तध्यान ध्याने लगे ॥१९॥ मूल-कण्हाइ ! अरहा अरिहनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी मा णं तुम देवाणुप्पिया ! ओइय जोव झियाहि, एवं खलु तुम देवाणुप्पिया ! तच्चाओ पुढवीओ उज्जलियाओ नरयाओ अणंतरं उबट्टित्ता डहेब जंबुद्दीचे दीवे भारहे वासे आगमेस्साए उम्मप्पिणीए पुडेसु जणवएसु मयबारे णयरे वारसमे अममे नाम अरहा भविस्मसि । तत्थ णं तुमं बहुई वामाई केलिपरियागं पाउणित्ता सिज्झिहिसि । २०॥ अर्थ- कृष्ण !' इस प्रकार सबोधन करके अर्हत् अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव से कहा-हे देवानुप्रिय तुम चिन्तित मत होओ, आर्त्तध्यान मत करो। देवानुप्रिय ! तुम तीसरी पृथ्वी से, उज्ज्वलित नरक से निकल कर सीधे इसी जम्बूद्वीप मे, भरतक्षेत्र मे, आगामी उत्सर्पिणी काल मे, पुड्र नामक जनपद मे, शतद्वार नामक नगर मे बारहवे अमम नामक तीर्थकर होओगे । उस पर्याय मे तुम बहुत वर्षों तक केवली अवस्था मे रहकर सिद्धि प्राप्त करोगे ॥२०॥ मूल-तए णं कण्हे वासुदवे अरहो अरिष्टनेमिस्स अंतिए एयमहूँ सोच्चा णिसम्म हडतुडे अप्फोडेइ, अप्फोडित्ता वग्गइ, बग्गइत्ता तिवई छिदइ, छिदित्ता सीहनायं करेइ, करित्ता अरह अरिट्ठनमि वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता तमेव अभिसेक्कं हत्थिरयणं दुरूहइ, दुरूहित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जणव सए सोहासणे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्वा सीहासणवरंसि पुरत्थाभिमुहे निसीयइ, निमीइत्ता कोडु- वियपुरिसे सद्दावेइ, सद्दावेत्ता एवं वयासी-गच्छह णं तुमे देवाणुप्पिया ! वारवईए नयरीए सिंघाडग जाव घोसेमाणे एवं वदह-एवं खलु देवाणुप्पिया ! वारवईए णयरीए नवजोयण जाव देवलोगभूयाए सुरग्गिदीवा- 么么长长长长长长长长长长长长长 [ ६२ ] मान सूत्रम् १ यगमूलए विगासे भविम्सइ, तं जे णं देवाणुप्पिया ! ३च्छंति बारबईए नयरीए राया वा जुवगया वा ईसर तलवर मांडविय-कोडुपिय-इभ-सट्ठी वा देवी वा कुमारो वा कुमारी वा अरहयो अग्निमिस्स अंतिए मुंडे नाव पचहत्तए तं गं कराहे वासुदेव सिस्जद, पच्छातुररस वि य से अहापवित्रं वि अणुजाणइ, महया ड्डीमक्कार समुदाणं य से निक्खमण करेइ दोच्चं पि तच्च पि घोसणय घोसेह, घोसइत्ता मयं एयमोणत्तियं पन्चपिगह ॥२१॥ अवं-तत्पन्चात् कृष्ण वासुदेव, अर्हन्त अरिप्टनेमि के मुख से इस अर्थ को सुन कर तथा अवधारण करके हर्पित और गन्तुष्ट हए। उन्होंने हर्ष से ताल ठोकी, और मल्ल की तरह तीन पैर पीछे हट कर खडे हो गए। सिंहनाद किया। फिर भगवान् अरिष्टनेमि को वन्दन-नमस्कार किया । तत्पश्चात् अपने प्रधान हाथी पर आरूढ होकर जहाँ द्वारिका नगरी मोर नहीं अपना भवन था, उधर आगे । प्रधान हाथी से उतर कर जहां बाह्य सभाभवन और अपना सिहासन था, उधर गये । कां नार पूर्व दिशा मे मुन्न करके अपने उत्तम सिहास पर आसीन हुए । फिर कोटुम्बिक पुरुपो को बुलाकर ना देवानुप्रियो ! तुम जाओ और द्वारिका नगरी के शृङ्गाटक (तिकोने) आदि मार्गों मे यह घोषणा करो कि–'हे गनुनिलो । नो योजन नौटी, बारह योजन लम्बी एव माक्षात् देवलोक के ममान इस द्वारिका नगरी का मुरा, अग्नि और सावन के निमित्त से विनाग होने वाला है, अतएव हे देवानुप्रियो । द्वारिका नगरी का जो भी कोई राजा, मगर, पर, नलवर मावि, कौटुम्बिा, उन्य, सेठ, रानी, कुमार या कुमारी अर्हन्त अरिष्टनेमि के समीप मुंडित पनि होना नाता हो, नन्हे कण वागुदेव उसके लिए आना देते हैं। उनके पीछे जो कुटुम्ब रहेगा, उसकी निन्ता- नागभानगे और दीक्षा ग्रहण करने वाले का दीक्षा-उत्सव खूब ठाठ के साथ करेंगे।' दो बार तीन बार वह iiiगे और मंगे ना मुसो वापिन लौटाओ ।।२१।। . ८८८-८८८८८८८. [ ] सूत्रम् अनशान 长长长长长长 . जापाका कुल-तए णं कोडुत्रिय जाव पञ्चप्पिर्णति ॥२२॥ अर्थ-तत्पश्चात् वे कौटुम्बिक पुरुप इस प्रकार की घोपणा करके यावत् आज्ञा वापिस लौटाते है, अर्थात् आज्ञा- नुसार कार्य करने की सूचना करते हैं ।।२२।। मूल-तए णं सा पउमावई देवी अग्हो अरिहनेमिस्स अतिए धम्म सोच्चा निमम्म हद्वतुट्ठ जाव हियया अरहं अरिष्टनेमि बंदइ णमंसइ. वंदित्ता णमसित्ता एवं बयासी-सद्दहामि णं भंते ! णिग्गंथं पावयणं से जहेयं तुम्भे वदह, जं नवरं देवाणुप्पिया ! कण्हं वासुदेवं आपुच्छामि, तए णं अहं देवाणुप्पियाणं अंतिए मुंडा जाव पव्ययामि । 'अहासुहं देवाणुप्पिए ! मा पडिबंधं करेह' ॥२३॥ अर्थ-तब पद्मावती देवी अरिहन्त अरिष्टनेमि भगवान के निकट धर्म श्रवण करके और उसे हृदयंगम करके हर्षित एव सन्तुष्ट हुई । उसका हृदय विकसित हो गया। उसने अरिहन्त अरिष्टनेमि को वन्दना-नमस्कार करके कहा-भगवेन् मैं निग्रंथप्रवचन पर श्रद्धा करती हूँ। आपने जो कुछ फर्माया है, वह सब यथार्थ है । हे देवानुप्रिय ! केवल मैं कृष्ण वासुदेव से पूछ लेती हूँ और फिर देवानुप्रिय के निकट दीक्षा अगीकार करूंगी। तव भगवान् ने फर्माया-देवानुप्रिये ! जिसमें तुम्हे सुख उपजे, वैसा करो। उसमे ढील न करो ॥२३॥ मूल-तए णं सा पउमावई देवी धम्मियं जाणप्पवरं दुरूहइ, दुरूहित्ता जेणेव वारवई नयरी, जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ, उवाच्छिता धम्मियाओ जाणप्पवराओ पच्चोरुहइ, जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता कर यल जाव कट्ट, कण्हं वासुदेवं एव वयासी-इच्छामि णं देवाणुप्पिया ! तुब्भेहि [ ६४ ] माम सूनम """""""" प्रमगुणाया नमागी अन्दयो अन्टिनेमिस्स अंतिए मुंडा जाव पबहउ । 'हासुहं देवाणुप्पिए ।' अयं-ननाम्चात् पचावती देवी धार्मिक (धर्मकार्य मे प्रयुक्त होने वाले) रथ पर आरूढ होकर जिधर द्वारिका नगगे और जिधर अपना भवन था, उघर चली और वहा पहुँच कर धार्मिक रथ से नीचे उतरी। फिर कृष्ण वासुदेव के पास जाकर और हाथ जो कर गावत् मस्तक पर अजलि करके कृष्ण वासुदेव से बोली-'हे देवानुप्रिय ! आपकी अनुमति पाएर में अहन अरिष्टनेमि भगवान् के निकट मु डित एव दीक्षित होना चाहती हूँ।' मग वासुदेव ने कहा-'देवानुप्रिये । जिसमे तुम्हे मुख उपजे, वैसा करो' ॥२४॥ मृल - तए ग में कराहे वासुदेव कोविय पुरिसे सदावेद, सदावित्ता एवं बयासी-खिप्पामेव भो देवाणुपिया! पउमावईए देवीए महत्थ निक्खमणाभिसयं उबट्ठवेद, उवट्ठवित्ता एवं आणत्तियं पच्चप्पिसह । ॥ गण ने कोई वियारिमा नाव पचपिणंति ॥२५॥ मयं-तव कृष्ण वासुदेव ने कोदम्बिक पुरुपो को बुला कर कहा-देवानुप्रियो । शीत्र ही पद्मावती देवी के महान् पान-गहन व्यय बाने-दोनाभिषेक की तैयारी करो और मेरी आना वापिस लौटाओ । तब कौटुम्बिक पुरुपो ने दीनाभिोग की नैयारी करके गाव आना वापिस लौटाई ॥२५॥ मूल-तए गा से कराहे वासुदेवे पउमावई देवि पट्टयंसि दुरूहइ, दुरूहित्ता अट्ठसएणं सोवण्णकलस जाब नियमग्गाभिमेगणं अभिसिंघह, अभिसिंचित्ता सव्यालंकारविभूसियं करेइ, करित्ता पुरिससहस्सबाहिणि मिप्रिय दुरूहावेइ, दुरुदावेत्ता वारवईए गगयरीए मझ मज्झेणं निग्गच्छइ, निग्गच्छित्ता जेणेच रेवयए पबए, गेर मस्संवणे उज्जाण तेणेव उबागच्छद्र, उवागच्छिचा सिवियं ठवेइ, ठवेत्ता पउमावई देवी सीयारो पयो- -- [ ६५ ] सूत्रम् अतछदृशाङ्ग रुहइ, पच्चोरुहित्ता जेणेव अरहा अरिहनेमि तेणव उबागच्छइ, उवागच्छित्वा अरहं अरिष्टनेमि तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ, करिचा वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी-एस णं भंते ! मम अग्गमहिसी पउमावई नामं देवी मम इट्ठा कंता पिया मणुण्णा मणामा अभिरामा जाच किमंग पुण पासणयाए, तगणं अह देवाणुप्पिया । सिस्सिणीभिक्खं दलयामि पडिच्छंतु णं देवाणुप्पिया ! सिस्सिणीभिक्खं । 'अहासुह' ।२६। अर्थ-तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव ने पद्मावती देवी को पाट पर बिठलाया और एक सौ आठ सोने के कलशों से यावत् निष्क्रमण-अभिषेक से अभिषिक्त किया । अभिषेक करके सर्व अलंकारों से विभूषित किया। फिर हजार पुरुषों द्वारा उठाई जाने वाली पालकी मे बिठलाया । द्वारिका नगरी के बीचोंबीच से निकल कर जहाँ रैवतक (गिरनार) पर्वत था और जहाँ सहस्राम्रवन नामक उद्यान था, वहाँ पहुँचे। वहाँ पहुँचने पर पालकी रोकी गई और पद्मावती देवी उससे नीचे उतरो । जहाँ भगवान् अरिष्टनेमि थे, वहाँ पहुँच कर और तीन बार आदक्षिण प्रदक्षिणा करके वन्दन-नमस्कार किया । वन्दन-नमस्कार के पश्चात् कृष्ण वासुदेव ने निवेदन किया-भगवन् ! यह मेरी पटरानी पद्मावती देवी है । यह मुझे इष्ट, प्रिय, मनोज्ञ, अतिशय मनोहर, अभिराम है । यावत् पुनः इसका दर्शन ही दुर्लभ है । ऐसी इस देवी को, हे देवानुप्रिय ! मैं शिष्यनीभिक्षा के रूप मे आपको समर्पित करता हूँ। देवानुप्रिय मेरी यह शिष्यनीभिक्षा अंगीकार करे। तब भगवान ने फर्माया-जैसे सुख हो, वही करो। उसमें ढील न करो ॥२६॥ मूल-तए णं सा पउमावई देवी उत्तरपुच्छिमं दिसिमागं अवक्कमइ, अवक्कमिचा सयमेव आम- रणालंकारं ओमुयड, ओमुइत्ता सयमेव पंचमुट्टियं लोयं करेइ, करित्ता जेणेव अरहा अरिदुनेमी तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता अरहं अरिट्टनेमि वंदइ णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी-आलिचे णं भंते ! जाव धम्म- माइक्खि ॥२७॥ [ ६६ ] अनमान सूत्रम् अर्थ-तत्पश्चात् पद्मावती देवी उत्तरपूर्व दिशा-ईशान कोण मे गई । सर्व अलकार अपने ही हाथ से उतारे। अपने ही हाय ने पनमुप्ठिक लोच किया । लोत्र करने के बाद अर्हन्त अरिप्टनेमि के समीप पहुँची। वहां पहुंच कर भगवान् को वन्दना-नमस्कार किया और फिर कहा-भगवन् ! यह संसार जन्म जरा मरण आदि के दु.खों से जल रहा है, अतिशय जल रहा है । अतएव मै आपकी शरण मे आई हूँ। आप मुझे दीक्षा प्रदान करे और धर्म का उपदेश करे ॥२७॥ मूल-ताए णं अग्हा अरिहनेमी पउमावइ देवि सयमेव पव्वावेड, पन्या वित्ता सयमेव मुडावे, गयमेव जक्खिणीए अज्जाए सिस्पिणित्ताए दलयनि ।।२८|| अयं-तब अर्हन्त अरिष्टनेमि भगवान् ने पद्मावती देवी को स्वयमेव दीक्षा दी, स्वयमेव मुडित किया और स्वयमेव यक्षिणी नामक आर्या को शिप्या के रूप मे प्रदान किया ॥२॥ मूल- तए णं सा जक्खिणी अज्जा पउमावई देवि सयमेव पवावे, पवावेत्ता जाव संजमियव्वं ।२६। अयं-नव यक्षिणी आर्या ने पद्मावती देवी को स्वयमेव प्रव्रजित की अर्थात् हितशिक्षा दी यावत् सयम की साधना न्द्रियों को जीतना, आदि उपदेश दिया ।।२०।। मल-तए ण मा पउमावड़ अज्जा जाया इरियाममिया जाव गुत्तरंभयारिणी । ३० । --नव नह पनावती आर्या हो गई, मिमिति मे युक्त यावत् गुप्त ब्रह्मचर्य को धारण करने वाली ॥३०॥ मन-ए गं सा पउमाई अजा जक्खिणोए अजाए अंतिए सामाइयाई एक्कारस अंगाई पनिम्नइ समिस्जिचा यहई चउन्ध-बट्ट-ट्ठम-दमम-दुवालसहि मासद्ध मासक्खमणेहिं विविहेहिं तवोकम्मलि पपाणं भावमागा विहरइ ।३।। 2-2446.cmkh44444 •rted [ ६० . तकशाङ्ग सूत्रम् अर्थ-तत्पश्चात् पद्मावती आर्या ने यक्षिणी आर्या के निकट सामायिक से प्रारभ करके ग्यारह अंगों का अध्ययन किया। अध्ययन करके बहुत-से उपवास, बेला, तेला, चोला, पचोला, अर्ध मासखमण, मासखमण आदि विविध प्रकार के तपश्चरणों द्वारा अपनी आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी ॥३॥ मूल-तए चं सा पउमाबई अज्जा बहुपडिपुन्नाइ' वीसं वासाई सामण्णपरियागं पाउणित्ता मासि- याए सलेहणाए अप्पाणं झांसेइ, झोसित्ता सहि भत्ताई अणसणाए छेदेइ. छेदित्ता जस्सहाए कीग्इ नग्गभावे मुंडभावे नाव तमहूँ आराहेइ चरिमुस्सासेहिं सिद्धा ।।३२ । पंचमवग्गस्स पढमज्झयणं सम । अर्थ-पद्मावती आर्या ने पूरे बीस वर्ष तक साधु-पर्याय का पालन किया, एक मास की सलेखना का सेवन किया, अनशन करके साठ भक्तो का छेदन किया और जिस प्रयोजन की सिद्धि के लिए नग्नभाव एवं मुडभाव अगीकार किया जाता है, उस प्रयोजन (मुक्ति) की आराधना की । अन्तिम श्वासोच्छ्वास मे सिद्धि प्राप्त की ॥३२॥ पांचवें वर्ग का प्रथम अध्ययन समाप्त 长长长长长长长长长长长长A 长长长长长长长长长长长 [ ६८ हिमान सूत्रम न्दित्तीय अध्ययन मृल-उक्खेव यो बीय अज्झयणस्स । तेणं कालेणं तेणं समएणं बारवई णयरी, रेवयए पव्वए, गंदग्गवणे उजागे ॥१॥ अयं-दुसरे अध्ययन की भूमिका समज लेनी चाहिए। उस काल और उस समय मे द्वारिका नगरी थी। रैवतक परंतवा । नन्दनवन नामक इयान या ॥१॥ मूल-तत्य गं बारवईए णयरीए कण्हे वासुदेवे राया होत्या, तस्स णं कण्हवासुदेवस्स गोरी देवी, वगगयो । २॥ नर्ग-उग द्वारिका नगरी में कृष्ण वासुदेव राजा थे । कृष्ण वासुदेव की गौरी अग्रमहिपी थी, उनका वर्णन समज ना नापिया मूल-अरहा अरिहनेमी समोसढे ॥३॥ अन्न अरिष्टनेमि भगनान् पधारे ॥३॥ मूल कण्हे निग्गए, गोरी जहा पउमावई तहा णिग्गया, धम्मकहा, परिसा पडिगया करहे वि।४] पाकक [ ६६ । का k सूत्रम् अंतकशाङ्ग अर्थ-कृष्ण वासुदेव वंदना करने के लिए निकले । गौरी रानी भी पद्मावती रानी की तरह निकली । धर्मकथा सुनी । परिपद् लौट गई और कृष्णजी भी वापिस लौट गये ॥४॥ मूल-तए णं सा गोरी जहा पउमावई तहा निक्खंत्ता जाव सिद्धा ॥५॥ अर्थ-तत्पश्चात् गौरी देवी ने पद्मावती की तरह दीक्षा अगीकार की और उसी प्रकार ज्ञानोपार्जन करके, तपश्चरण करके तथा सलेखना करके यावत् सिद्धि प्राप्त की ॥५॥ द्वितीय अध्ययन समान 女女女女 ३-८ अध्ययन मूल-एवं गंधारी, एवं लक्खणा, एवं सुसीमा, एवं जंबवती, सच्चभामा, रुप्पिणी, एवं अट्ठ वि पउमावइ-सरिसाओ "अट्ठ अज्झयणा समत्ता" अर्थ-इसी प्रकार गाधारी, लक्ष्मणा, सुसीमा, जाम्बवती, सत्यभामा और रुक्मिणी नामक रानियों का वृत्तान्त जानना चाहिए। इन आठों का एक-सा पद्मावती के समान ही अधिकार है। आठ अध्ययन समाप्त ६-१० अध्ययन मूल-उक्खेवो य नवमस्स, तेणं कालेणं तेणं समएणं वारवई णयरी, रेवयए पव्वए, नंदणवणे, 长长长长长长长 [ ७० ] सूत्रम् उज्जाग, कगहे वासुदेव राया ॥ अयं-नौवं अध्ययन की भूमिका समझ लेना चाहिए, अर्थात् जवू स्वामी ने प्रश्न किया कि श्रमण भगवान् महा- धीर ने आठवें अध्ययन का यह अर्थ कहा है ? तो नौवे अध्ययन का क्या अर्थ कहा है, तब श्री सुधर्मा स्वामी ने उत्तर दिया-उस काल और उस समय मे द्वारिका नामक नगरी थी। रैवतक पर्वत था। नन्दनवन नामक उद्यान था। कृष्ण वामदेव राजा ॥१॥ मृल- तत्थ णं वाग्वईए णयगए करहस्स वासुदेवस्स पुत्तए जंबवतीए देवीए अत्तए संबे नाम कुमारे होन्था, बहीण । तस्स गणं संवस्म कुमारस्म मूलसिरी नाम भारिया होत्था, वण्णो ॥२-३॥ अर्थ-द्वारिका नगरी मे कृष्ण वासुदेव का पुत्र और जाम्बवती का आत्मज साम्ब कुमार था । वह परिपूर्ण त्रियो वाना आदि विगेपणो ने युक्त था। साम्ब की पत्नी का नाम मूलश्री था, उका वर्णन जान लेना चाहिए ॥२-३।। मूल-अग्हा अग्दुिनेमी समोसढे, कण्हे णिग्गए, मूलमिरी वि णिग्गया, जहा पउमावई, नवरं देवाणुप्पिया ! कण्ड बासुदेवं आपुच्छामि, जाव सिद्धा । एव मूलदत्ता वि ॥४ा दसमं अज्झयणं समत्त। पंचमो वग्गो समत्तो नयं-अग्न्ति अरिष्टनेमि भगवान् का पदार्पण हुआ। कृष्णजी वन्दना करने के लिए निकले । मूलश्री भी मिलती। मरेम याग कर मूलश्री ने पनावती की भांति कृष्ण वासुदेव की आज्ञा लेकर दीक्षा ग्रहण करने की इच्छा काट ली नाना आगा लेकर दीक्षा ली यावत् मिद्धि प्राप्त की। इत्यादि वृत्तान्त पद्मावती के समान समझना चाहिए। गुजरना का अधिकार मूलश्री के समान नमाना चाहिए ॥४॥ पाँचवा वर्ग समाप्त १८८८८८८८८८८८८८tnent [ ७१ ।
सूत्रम् अतकृशान षष्ठ वर्ग पाकर भोपाप मूल-जइ णं भंते ! छहस्स उक्खेवो; नवरं सोलस अज्झयणा पण्णत्ता, तंजहा - मकई किंकमे चेव, मोग्गरपाणी य कासवे । खेमए धितिधरे चेव, केलासे हरिचंदणे । १॥ वारत्त-सुदंसणे,-पुण्णभद्द सुमणभद्द सुपइट्ठ मेहे । अत्तिमु अ अलक्खे-अज्झयणाणं तु सोलसयं ॥२॥ अर्थ-भगवन् ! यदि श्रमण भगवान् महावीर ने पाँचवे वर्ग का यह अर्थ कहा है तो छठे वर्ग का क्या अर्थ कहा ? ऐसा उत्क्षेप पूर्ववत् जानना; विशेष यह है कि छठे वर्ग के सोलह अध्ययन कहे है। यथा-(१) मंकाई गाथापति (२) किकम गाथापति (३) मुद्गरपाणि यक्ष (अर्जुन-माली) (४) काश्यप गाथापति (५) क्षेमक गाथापति (६) धृतिधर गाथा- पति (७) कैलाश गाथापति (८) हरिचदन गाथापति () वारत्त गाथा पति (१०) सुदर्शन गाथापति (११) पूर्णभद्र गाथापति (१२) सुमनभद्र गाथापति (१३) सुप्रतिष्ठ गाथापति (१४) मेघ गथापति (१५) अतिमुक्त कुमार और (१६) अलक्ष्य राजा यह सोलह अध्ययनों के नाम है ॥१-२॥ [ ७२.]
समान सुनम 1 وه ره وه ره ز و راز मुन्न-जड़ मोलम अज्झयणा पगगत्ता, पढमस्स णं भंते ! अझयणस्स के अड्डे पण्णचे ? ग्य-यदि छठे वगं के मोलह अध्ययन कहे हे तो हे भगवन् ! प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ कहा है ? मृल-एवं सलु नम्वृ ! तेणं कालेण तेणं समएणं रायगिहे गरे, गुणसिलए चेइए, सेणिए राया ॥१॥ -हे जम्बू । उस कान और ममय मे राजगृह नगर या । गुणगिलक नामक चैत्य था और श्रेणिक राजा था ।। मल-तत्य मं मंकाई णाम गाहावई परिवसइ, अड्डे जाव अपरिभृए ॥२॥ गं-आगजगृह नगर में मका नामक गायापति रहता था। वह ऋद्धिमान् यावत् कभी किसी के द्वारा परा- भन होने गना नहीं या ।।२।। मल-नेगं कालेणं तेणं समए समय भगवं महावीरे आइगरे जाव गुणसिलए जार, विहरइ । परिमा गिरगया ॥३॥ -ग काल और उन मयमय मे धर्मतीर्थ की आदि करने वाले श्रमण भगवान् महावीर पधारे यावत् गुण- मिना ना ने यावत विवरने लगे। भगवान् की चरणवन्दना करने के लिए परिपद् निकली ॥३॥ मूल-तए गं से मंकाई गाहावई इमीसे कहाए लढे जहा पण्णत्तीए गंगदत्तो तहेव, इमो वि द्रपुन कुरचे ठावित्ता, पुरिममहस्मवाहिणीए सीयाए निक्खंते जाव अणगारे जाए-इरियासमिए जाय गुत्त- गंभयारी।। -गव मग गायापनि भगवान् के आगमन का वृत्तान्त श्रवण कर हर्षित हुआ। यावत् भगवती मूत्र मे वर्णित 长长长长长长长长长长长长长长长 [ ७३ ।
सूत्रम् अंतकृशाङ्ग ८९ - गंगदत्त के समान बड़े पुत्र को कुटुम्ब में स्थापित करके, हजार पुरुपों द्वारा वहन करने योग्य पालकी मे बैठ कर भगवान् के पास आए यावत् दीक्षा धारण की । वह ईर्यासमिति से युक्त एव गुप्त ब्रह्मचारी अनगार बने ॥४॥ मूल - तए णं से मंकाई अणगारे समणस्स भगवो महावीरस्स तहारूवाणं थेराणं अंतिए सामा- इयाइएक्कारसंगाई अहिज्जइ, सेसं जहा खंधयस्स । गुणरयणं तवोकम्म, सोलस वासाई परियाओ, तहेव विउले सिद्ध ॥५॥ अर्थ-तत्पश्चात् मकाई अनगार ने श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के तथारूप स्थविरो के निकट सामायिक से ले कर ग्यारह अगों तक का अध्ययन किया। शेष वृत्तान्त भगवती में कथित स्कधक मुनि के समान जानना । गुणरत्न- सवत्सर तप किया । सोलह वर्ष दीक्षा पाली और उसी प्रकार विपुलाचल से सिद्धि प्राप्त की ॥५॥ छट्ठवग्गस्स पढमझयणं पढमज्झयणं समचं । छठे वर्ग का प्रथम अध्ययन समाप्त द्वितीय अध्ययन मूल-दोचस्स उक्खेवो । किंकमे वि एवं चेव जाव विउले सिद्धे ॥१॥ अर्थ-दूसरे अध्ययन का उत्क्षेप । किकम नामक गाथापति का कथन प्रथम अध्ययन मे कथित मकाई गाथापति के समान ही समझना चाहिए यावत् विपुलगिरि से सिद्धि प्राप्त की। बीयं अज्झयणं समचं । द्वितीय अध्ययन समाप्त 大长长长长长长长长长长长 [ ७४ ।
नाहगान सूत्रम् तृतीय अध्ययन मूल-तच्चस्स उक्खेवो । तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नयरे, गुणसिलए चेइए, सेणिए राया चिल्लगा देवी । १॥ अर्थ नीमरे अव्ययन का उत्क्षेप कहना । उस काल और उस समय मे राजगृह नगर था । गुणशिलक नामक नत्य था । श्रेणिक राजा था । चेलना रानी थी ॥१॥ मन - तत्थ ग रायगिहे णयरे अज्जुणए णामं मालागारे परिवसइ, अदु जाव अपरिभृए ।।२।। अर्थ-गजगृह नगर मे अर्जुन नामक माली निवास करता था। वह ऋद्विमान् यावत् अपराभूत था ।।२।। मन-नम्म णं अन्जुणयस्स मालागारम्स बंधुमतीणामं भारिया होत्था, मुकुमाला नाव सुरूवा ३॥ -उग गर्नुन मानाकार की वन्धुमति नामक पत्नी थी। वह मुकुमार यावन् सुन्दर रूप वाली थी ।।२।। मल-तम्म गं अज्जुग्णयस्म मालागारम्प रायगि म बहिया पत्थ णं महं एगे पुष्फाराम होत्था, किंग जार निकुर भूग, दमयन्न कुगुम कुमुमिग पामादीग दरिमणिज्जे अभिरुवे पडिरूवे ॥४॥ गिन नगर से बाहर न माली का एक वा पुष्पाराम (ो का बगीना) था। वह सपन हरियाली 长长长长长长长长长长长长长长 [ ७५ सूत्रम् - तकृशाङ्ग कामको से कृष्णवर्ण था । पाँच वर्ण के फूल वहाँ फूले रहते थे । दर्शकों के चित्त को प्रसन्न करने वाला, दर्शनीय, अभिरूप और प्रतिरूप था-उसे देखते-देखते नेत्र थकते नही थे और पुनः पुनः नया रूप दिखाई देता था ॥४॥ मूल-तस्स णं पुप्फारामस्स अदूरसामंते एत्थ णं अज्जुणयस्स मालागारस्स अज्जय-पज्जय- पिइपज्जयागर अणेग कुलपुरिसपरपरागए मांग्गरपाणिस्स जक्खस्स जक्खाययणे होत्था, पोराणे दिव्वे सच्चे जहा पुण्णभद्दे ॥५॥ अर्थ-उस पुष्पाराम से न बहुत दूर, न बहुत निकट (पुष्पाराम के अन्दर) मुद्गरपाणि नामक यक्ष का यक्षायतन (मन्दिर) था । वह अर्जुन माली के पिता दादा, पडदादा, आदि अनेक पीढियों से मान्य, प्राचीन, दिव्य और सच्चा था। उववाई सूत्र मे पूर्णभद्र चैत्य का जैसा वर्णन है, वही यहाँ जान लेना चाहिए ॥५॥ मूल-तत्थ णं मोग्गरपाणिस्स पडिमा एगं महं पलसहस्सणिप्फणं अयोमयं मोग्गरं गहाय चिट्ठइ ।६। अर्थ-उस यक्षमन्दिर मे मुद्गरपाणि नामक यक्ष की प्रतिमा एक हजार पल * वजन के लोहे के मुद्गर को लिये हुई थी॥६॥ मूल-तए णं से अज्जुणए मालागारे वालप्पभिई चेव मोग्गरपाणिजक्खस्स भने यावि होत्था, कल्लाकल्लि पच्छियपिडगाई गेण्हइ, गेण्डित्ता रायगिहाओ नगरानो पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता जेणेच पुप्फारामे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता पुप्फुच्चयं करेइ, करित्ता अग्गाई वराई पुष्काई गहाय जेणेव मोग्गर- • पाँच रत्ती का एक माशा, सोलह माशो का एक सोनया ( अर्थात् तीन टाका का एक सोनैया ) और चार सोनया का एक पल होता है। 长长长长长长长长长长长 [ ७६ ] सूनम् पागिम्म जक्खाययणे नेणेव उयागच्छद, उयागनिछत्ता मोग्गरपाणिस्स जक्खम्स महरिहं पुष्फच्चयणं करेइ, करिना नामुपायवडिए पणाम कंड, करित्ता तो पच्छा रायमग्गंसि वित्तिं कापमाणे विहरइ ॥७॥ 4-जन माली बनान ने ही मुद्गरपाणि यक्ष का भक्त था । वह प्रतिदिन वांम की टोकरी लेकर राजगृह नगर में निरुतता और पुताराम में आता । वहां जाकर पुप्पो का चयन करता, फिर प्रधान और उत्तम फूल लेकर गुगलागि पक्ष के नन्दिर में जाता और मुद्गरपाणि यक्ष का महार्ह पुष्पार्चन करता था। तत्पश्चात् जमीन पर घुटने टेर नाम करना और उसके बाद राजमार्ग पर पुष्पादि वेत्र कर अपनी आजीविका चलाता था ॥७॥ मूल-तन्य गं रायगिहे णयरे ललिया णामं गोट्ठी परिवसइ, अड्डा जाव अपरिभूया, जंकयसुकया याविहान्या 11 -उन राजगर नगर में ललिता नामक गोष्ठी (मित्र मंडली) रहती थी, वह समृदु यावत् किसी से हार खाने पानी नही कर मनी जो एक भी करती वह अच्छा ही कहलाता था-क्योकि उसके विरुद्ध बोलने का किनी मे माननीया ॥ मल-ता. गं रायगिह गयरे अण्णया कयाइ - पमोए घुडे यावि होत्था । 8|| -रार नगर में रिली समय प्रमोद की-होल्गव मनाने की घोषणा हुई || मुन्न-तए से अज्जुगए मालागारे कल्लं पभूयतरगहिं पुप्फेहिं कज्जमिति कट्ठ पञ्चूमकाल- गमयंनि बधुमतीण भारियाए यदि पच्छियपिउयाई गेहइ, गणिहत्ता सयानो गिहाम्रो पडिणिक्खमइ, पडि- नियमिना रायगि नयां मज मज्मेणं निग्गच्छह, निग्गच्छित्ताजणेच पुष्फाराम तेणेव उवागच्छा,उवागच्छित्ता 长长长长长长长长长长长长 [ ७७ ] कामको . बंधुमईए भारियाए सद्धिं पुप्फुच्चयं करेइ ॥१०॥ अर्थ-तब अर्जुन माली ने विचार किया-कल (उत्सव के कारण) बहुत से फूलों की आवश्यकता होगी। ऐसा विचार करके प्रभात काल मे वह बन्धुमती भार्या के साथ फूलों की टोकरी लेकर अपने घर से निकला और राजगृह नगर के बीच में होकर अपने पुष्पाराम मे पहुँचा वहाँ पहुँच कर उसने बन्धुमती भार्या के साथ फूल चुनना आरंभ किया।१०। मूल-तए णं तीसे ललियाए गोट्ठीए छ गोहिल्ला पुरिसा जेणेव मोग्गरपाणिस्स जक्खस्स जक्खाय- यणे तेणेव उवागया, अमिरममाणा चिट्ठति ॥११॥ अर्थ-तब उस ललिता गोष्ठी के छह गोठिया (मित्र) पुरुष मुद्गरपाणि यक्ष के मन्दिर मे पहुँचे और वहाँ क्रीडा करने लगे ॥११॥ मूल-तए ण से अज्जुणए मालागारे बंधुमईए भारियाए सद्धिं पुप्फुच्चयं करेइ, करित्ता अग्गाई वराई पुष्फाई गहाय जेणेव मोग्गरपाणिस्स जक्खस्स जक्खाययणे तेणेव उवागच्छइ ॥१२॥ अर्थ-तत्पश्चात् अर्जुन माली ने बन्धुमती भार्या के साथ पुष्पों का चयन किया । पुष्पचयन करके उनमें से प्रधान और उत्तम पुष्प लेकर वह मुद्गरपाणि यक्ष के यक्षायतन मे पहुँचा ॥१२॥ - मूल-तए णं ते छ गोहिल्ला पुरिसा अज्जुणयं मालागारं बघुमईए भारियाए सद्धिं एज्जम णं पासइ. पासित्ता अन्नमन्न एवं वयासो-एस णं देवाणुप्पिया ! अज्जुणए मालागारे बंधुमईए भारियाए सद्धि इहं हव्यमागच्छइ, तं सेयं खलु देवाणुप्पिया ! अम्हं अज्जुणयं मालागारं अवोडयबंधणयं करेत्ता बन्धुमईए भारियाए सद्धिं विउलाई भोगभोगाई भुजमाणाणं विहरित्तए त्ति कटटु एयमट्ठ अन्नमन्नस्स पडिसुणेति, 长长长长长 [ ७८ रुरु क माम सूत्रम् १६.८८.. पडिगुणित्ता कवाडंतरेम निलुक्कंति, निच्चता निप्पंदा तुसिणीया पच्छण्णा चिट्ठति । १३॥ अर्थ-उस समय उन छह गोठिया पुस्पो ने अर्जुन मालाकार को बन्धुमती भार्या के साथ आता देखा । देख कर वे आपस मे कहने लगे-देवानुप्रियो ! यह अर्जुन माली वन्धुमती भार्या के साथ इधर आ रहा है तो हमारे लिए अच्छा होगा कि हम अर्जुन माली की मुश्क बाँध कर बन्दुमती भार्या के साथ विपुल भोग भोगें । उन लोगो ने यह कथन आपम में मान्य किया। वे यक्षायतन के किवाडो के पीछे छिप कर निश्चल, निस्पन्द, मौन होकर दुवक रहे ॥१३॥ मूल-तए णं से अज्जुणए मालागार बंधुमतीए भारियाए सद्धिं जेणेव मोग्गरपाणिजक्खस्स जक्साययणे तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता आलोए पणामं करेइ, करित्ता महरिहं- पुष्फुच्चणं कोइ, करित्ता जागुणायवडिए पगामं करड़ ॥१४|| अर्थ-नानात् अर्जुन मानी अपनी वन्धुमती भार्या के साथ मुद्गरपाणि यक्ष के मन्दिर मे पहुँचा । पहुँच कर टिने ही उसने यानी प्रतिमा को नमस्कार किया । नमस्कार करके महार्ह (बड़ो के योग्य ) पुप्पार्चन किया और For Tी पर तुटने देश कर प्रणाम किया ।।१४।। मल- ना गं ते छ गोहिल्ला पुग्मिा दवदवस्स कवाडंतरेस्तिो णिग्गच्छंति, णिग्गच्छित्ता अज्जुणयं मानागार गंगढ़ नि, गांगहत्ता अवप्रोडगवंधण करेंति, करित्ता बंधुमतीए मालागारीए सद्धिं विपुलाई भोग- मोगा में जमाणा विरंति ॥१५॥ --मी गमय । गोटिया पुग्ण दवाव (टपट) किवालो के पीछे से निकले । निकल कर उन्होने गर्नुन '" : FAT मोसाय-पैर वा । दिये और बगुमती मालिन के मात्र मन नाहे भोग भोगते हुए निचरने लगे ।१५॥ 长长长长长长长长长长 Mam- [ ७९ ७६ ।
अंतकृशाङ्ग सूत्रम् काकाको मूल-तए णं तस्स अज्जुणयस्स मालागारस्स अयं अज्झस्थिए जाव समुप्पज्जित्था-एवं खलु अहं बालप्पभिइ चेव मोग्गरपाणिस्स भगवो कन्लाकल्लि जाय वित्ति कप्पेमाणे विहरामि, तं जइ ण मोग्गर- पाणिजक्खे इह सरिणहिते होते, से णं मम-एयारूवं आवई पावेज्जमाणं पासते ? तं ण त्थि णं मोग्गरपाणि- जक्खे इह सनिहिते । सुव्वत्तं तं एस कट्टे ॥१६॥ अर्थ-उस समय अर्जुन माली के मन मे ऐसा विचार उत्पन्न हुआ-मै बचपन से ही प्रतिदिन मुद्गरपाणि भगवान् की पुष्पपूजा भक्ति करता आ रहा हूँ और इनकी पूजा करने के पश्चात् ही अपनी आजीविका करता हूँ। सो यदि मुद्गरपाणि यक्ष यहाँ इस प्रतिमा मे या समीप मे होते तो क्या मुझे इस आपत्ति मे पड़ा हुआ देख सकते ? ( कदापि नही। ) वास्तव मे मुद्गरपाणि यक्ष यहाँ समीप मे नही है । स्पष्ट ही यह कष्ट मात्र है ॥१६॥ मूल-तए णं से मोग्गरपाणिजक्खे अज्जुणयस्स मालागारस्स अयमेयारूवं अज्झत्थियं नाव विया- णत्ता अज्जुणयस्स मालागारस्स सरीरयं अणुपविसइ, अणुपविसित्ता तडतडस्स बंधणाई छिदइ, तं पलसहस्स- णिप्फन्न अयोमयं मोग्गरं गेण्हइ, गेण्हिता ते इत्थिसत्तमे छ पुरिसे घाएइ । १७॥ अर्थ-तब मुद्गरपाणि यक्ष ने अर्जुन माली के इस विचार-अध्यवसाय को जान लिया। उसी समय अर्जुन माली के शरीर मे प्रवेश किया। उसके प्रवेश करते ही सारे बधन तडातड़ टूट गये । उसने एक हजार पल के लोहमय मुद्गर को ग्रहण किया और उन छह पुरुषो का तथा सातवी स्त्री का घात कर डाला। तए णं से अज्जुणए मालागारे मोग्गरपाणिणा जक्खेणं अपणाइडे समाणे रायगिहस्स नयरस्स परिपेरंतेणं कल्लाकल्लि छ इत्थिसत्तमे पुरिसे घाएमाणे विहरइ ॥१८॥ २८ [ ८० ] पर गा। सूत्रम् क -दनन्तर अनुन मानी मुद्गरपाणि यक्ष के द्वारा अधिष्ठित होकर राजगृह नगर के चारों ओर घूमने लगा और पतिस्नि मन पुगो और मातवी जी का बात करने लगा ॥१८॥ गृल-ना गयगिहे नयर सिंघाडग जाव महापहेमु बहुजणो अण्णमण्णस्स एवमाइक्खड़ ४- एवं चनु देवा गुप्पिया! अज्जुण मालागारे मोग्गरपाणिणा अण्णाइट्ट समाणे रायगिहे नयरे बहिया छ इत्थि- मनने पुरिसे घाएमाणे किरइ ॥१३॥ अर्ग-नव रानगृह नगर में, शृंगाटकपयो ( तिकोने मार्ग) में यावत् महापयो में बहुत-से लोग आपस मे इस मार ने नगे-देवानुगियो ! अजुन मानो मुद्गरपाणि यक्ष के द्वारा अधिष्ठित होकर राजगृह नगर से बाहर छह एस्तो लो और मानवी स्नी को प्रतिदिन मार डालता है ।।१६।। मूल-तए णं मे सेणिए राया इमीमे कहाए लढे समाणे कोडुबियपुरिसे सदावेइ, सहावित्ता एवं वयामी एव खलु देवाणुप्पिया ! अज्जुणए मालागारे जाव घाएमाणे विहरइ, तं मा णं तुम्भे केई तणस्स वा दुम्म वा पाणियम्प वा पुरुफलाणं वा अट्ठाए सइ णिग्गच्छउ; मा णं तस्स सरीरस्स बावत्ती भविस्सइ नि कटटु दोनच पि नच्चं पि घोसणयं घोसेद, घामित्ता खिप्पामेव ममेयं पञ्चप्पिणह । २० । वर्ग-ifT गा ने उक्त समाचार सुन कर कौटु विक पुरुषो को बुलवाया । वुलवा कर कहा-देवानुप्रियो । न मानो या पुरुषों और मानवी स्नी का पान करता विनरता है, अतएव तुम नगर मे इस प्रकार की घोषणा कर मोमि-शानुपितो तुममे ने कोई भी काठ के लिए, घान के लिए, पानी के लिए या फूल-फल के लिए, नगर के बाहर परमार नही ऐना न हो कि तुम्हारे गरीर का विनाश हो जाए।' ऐसी घोपणा दो बार और तीन बार मेरी नाना पापिन करो ।।२०।।
सूत्रम् अंतकृशाङ्ग 长长长长长长长4 长长长长长长长 मूल-तए णं कोडुविय जाव पचप्पिणंति ॥२१॥ अर्थ-तत्पश्चात् कौटुम्बिक पुरुष यावत् घोषणा करके आज्ञा वापिस लौटाते है ॥२१॥ मूल-तत्थ णं रायगिहे नयरे सुदंसणे नामं सेट्ठी परिवसइ, अड्ढे ॥२२॥ अर्थ-राजगृह नगर में सुदर्शन नामक श्रेष्ठी (सेठ) निवास करता था। वह ऋद्धिशाली तथा किसी से पराभव पाने वाला नहीं था ॥२२॥ मूल-तए णं से सुदंसणे समणोवासए यावि होत्था, अभिगमयजीवाजीवे जाव विहरइ ॥२३॥ अर्थ-सुदर्शन श्रेष्ठी श्रमणोपासक (श्रावक) था। वह जीवाजीव आदि नौ पदार्थो का ज्ञाता था, यावत् चौदह प्रकार का दान देता हुआ विचरता था ॥२३॥ मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे जाव समोसढे जाव विहरइ ॥२४॥ अर्थ-उस काल और उस समय मे श्रमण भगवान् महावीर यावत् राजगृह नगर में पधारे यावत् नगर से बाहर गुणशिलक चैत्य मे तप-संयम से आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे ॥२४॥ मूल-तए णं रायगिहे णयरे सिंघाडग जाव महापहेसु बहुजणो अपणमण्णस्स एवमाइक्खइ २ जाव किमंग पुण विपुलस्स अट्ठस्स गहणयाए ॥२५॥ अर्थ-तब राजगृह नगर मे शृङ्गाटक यावत् महापथों मे बहुत-से लोग आपस में यो कहने लगे यावत् प्ररूपण करने लगे कि-देवानुप्रियो ! श्रमण भगवान् महावीर स्वामी यावत् गुणशिलक चैत्य मे विचरते है, उनके नाम मात्र का श्रवण करना ही महान् फलदायक है, तो फिर उनके मुखारविन्द से धर्मकथा सुनने और प्रश्नों का उत्तर पाने की तो बात ही क्या है ॥२५॥ [ २ ।
* १ मा सूत्रम् मृन-तगणं तम्म मुमणस्म बहुजणस अतिए एयमई सोचा निमम्म अयमेयारूवे अज्झथिए बार सम्पत्थिा-एवं बलु ममगा जाब विहरइ, तं गच्छामि णं समणं भगवं महावीरं वंदामि नमसामि, एवं पदेड, संपत्तिा जेणेव अम्रापियरो तेणेच उबागच्छड, उवागच्छित्ता करयल नाव कटटु एवं चयासी-एवं मनु अम्मयायो ! ममणे जाव विरह, तं गच्छामि ण समणं भगवं महावीरं वंदामि नाव पज्जुवासामि ॥२६॥ अ-नव बदन जनो के मुल ने यह वृत्तान्त सुन कर और हृदयगम करके सुदर्शन सेठ को ऐसा विचार उत्पन्न मा-आमा भगवान महावीर स्वामी यावत् विचर रहे हैं, अतएव मैं जाऊँ और श्रमण भगवान् महावीर को वदना- नगर प्रकार विनार करके मुदर्शन अपने माता-पिता के पास गया और दोनों हाथ जोड कर तथा मस्तक र if को उन पसार कहने लगा-माता-पिता | श्रमण भगवान् महावीर स्वामी पधारे हैं, अतएव मैं जाता हूँ और मन भगवान महावीर को वन्दना-नमस्कार करके पर्युपासना करूंगा ।।२६।। मन-गए गं तं मुमणमट्टि अम्मापियरो एवं बयासि-एवं खलु पुत्ता ! अज्जुणए मालागारे जान एमागे शि, न मा गं, तुमं पुत्ता ! ममणं भगवं महावीरं वंदए णिग्गच्छाहि, मा णं तव सरीरयस्स नानी भरिम्मइ । तुमएणं इगए चेव ममणं भगवं महावीरं बंदाहि नर्ममाहि ॥२७॥ -र गुगंन मेठ के माता-पिता ने उसमे कहा-हे पुन ! अर्जुन माली यावत् बात करता फिरता हे । तुम मग मग मी गानो तो मना करने जाओगे तो कही ऐना न हो कि अर्जुन मानी के द्वारा शरीर को बाचा ET न पाओ। यो रहे दए हो यमण भगवान् महावीर को नन्दना-नमस्कार करो ॥२७॥ मन-तागं से गदमण सेट्ठी अम्मापियरं एवं बयासी किरणं अहं अम्मयाओ! समणं भगवं महा- 长长长长长长长长 . *.. , [ २३ ] .
- सूत्रम् अंतदृशाङ्ग १ पापा वीरं इहमागयं, इह पत्रं, इह समोसढं इह गए चेव वंदिस्सामि नमंसिस्मामि १ तं गच्छामि णं अहं अम्म- यात्रो ! तुम्भेहिं अब्भणुण्णाए समाणे समणं भगवं महावीरं बंदामि नाव-पज्जुवासामि ॥२८॥ अर्थ तब सुदर्शन सेठ ने माता-पिता से ऐसा कहा-अहो माता-पिता । श्रमण भगवान् महावीर यहाँ आये है, यहाँ प्राप्त हुए है, यहाँ पधारे है, फिर मैं यही घर पर रह कर कैसे वन्दना करूं ? हे माता-पिता ! मैं आपकी आज्ञा पाकर वहाँ जाना चाहता हूँ और श्रमण भगवान महावीर को वन्दना करना चाहता हूँ यावत् उपासना करना चाहता हूँ ॥२८॥ मूल-तए णं तं सुदंसणसेटिं अम्मापियरो जाहे नो संचाएन्ति बहूहिं आघवणाहिं ४ जाव परू- वाहि य परूवित्तए ततो णं ते एवं वयासी-अहासुहं ॥२६॥ अर्थ-तत्पश्चात् सुदर्शन सेठ को उसके माता-पिता जब बहुत प्रकार से कह कर यावत् प्ररूपणा करके समझाने में समर्थ न हुए तो इच्छा न होने पर भी बोले-जैसे तुम्हे सुख हो, वैसा करो ॥२६॥ मूल-तए णं से सुदंसणे अम्मापिईहिं अब्भणुनाए समाणे रहाए सुद्धप्पावेसोई जाव सरीरे सयाओ गिहाओ पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता पायविहारचारेणं रायगिहं नयरं मझमझेणं निग्गच्छइ, निग्गच्छित्ता मोग्गरपाणिस्स जक्खाययणस्स अदूरसामंतेणं जेणेव गुणसिलए चेइए, जेणेव समणे भगवं महा- वीरे तेणेव पहारेत्थ गमणाए ॥३०॥ अर्थ-तदनन्तर सुदर्शन सेठ ने माता-पिता की अनुमति पाकर स्नान किया । शुद्ध एव सभा में प्रवेश करने योग्य वस्त्र धारण किये । शरीर को विभूषित किया। फिर अपने घर से निकल कर पैदल चलता हुआ, राजगृह नगर के बीचों- 长长长长长长长长长长 [ ८४ ] . : পু Ans बीन कर गुगतानि पक्ष के यक्षालय के कुछ पान से जहाँ गुणगिलक चैत्य और जहाँ श्रमण भगवान् महावीर म. नीरगमन ारने लगा ॥३०॥ मूल-नए गं में मोगगरपागी जक्ख सुक्ष्मणं समणोवासयं अदरसामंतेणं वीइत्रयमाणं पासड़, पामिना प्रामुरी नं पलमहस्सनिष्फन्न अग्रोमयं मोग्गरं उन्लालेमाणे उल्लालेमाणे जेणेच सुदंसणे समणो- बाना नेगव पहारन्य गमणाग |३१|| मं-उस गमा मुद्गगाणि यक्ष ने मुदगंन थावक को, न बहुत दूर और न बहुत पास से, जाते देखा देखते हीवह ग! एक बार पल प्रमाण वजन वाले लोहे के उस मुद्गर र को उछालता-घुमाता हुआ मुदर्शन श्रावक की तरफ ही जाने उगा 11211 मृन-ना गं ये मुदसणे ममणोवामए मोग्गरपाणिं जक्खं एज्जमाणं पासइ, पासित्ता अभीए "नन्य अगुम्बिग्गे अक्युभिए अचलिए असंभंते वत्थएणं भूमि पमज्जड़, पमज्जित्ता- करयल जाव एवं वयागो-नमोन्धु गं परनागं जाव मंपत्तागं, णमोत्यु णं समग्णस्त भगवो जाव मंपाविउकामस्म, पुबि पि म भने ! समान भगवत्री महावीरस्म अतियायो धूलए पाणाइयाए पञ्चक्खाए जावजीवाए, थूलए गुमाए, नए 'पदिनादाग, मदारसंतोले कर जावजीवाए, इच्छापरिमाणे का जावजीवाए, तं इयाणि पि नम्र भनिए गव्यं पागाइझायं पाखामि जायजीवाए गव्यं मुसावायं, सव्वं अदत्तादाणं, सव्वं मेहुणं, सव्वं परिणापामामि नापजीवार, मच्वं कोहं जाय मिन्छादसणसल्लं पञ्चश्वामि जावनीवाए, सव्यं असणं गंवादम माम नउब्धि पिप्रारं पचक्सामि जावज्जीवाए । जइ णं एत्तो उपसग्गाओ मुच्चिस्सामि . बना सूत्रम् अंतकृशाङ्ग तो मे कप्पइ पारेत्तए, अह णं एत्तो उपसग्गाओ न मुच्चिस्सामि, तो मे तहा पच्चक्खाए चेव त्ति कटु सागारं पडिम पडिवज्जइ ॥३२॥ अर्थ-तव सुदर्शन श्रमणोपासक ने मुद्गरपाणि यक्ष को आता देखा । देख करके वह डरा नही, त्रास पाया नहीं, उद्विग्न हुआ नही, क्षुब्ध हुआ नही, चलित हुआ नही, घबराया नही, परन्तु वस्त्र से भूमि का प्रमार्जन किया। भूमि का प्रमार्जन करके, हाथ जोड कर, मस्तक पर अंजलि करके इस प्रकार बोला-नमस्कार हो अरिहन्तों को यावत् मुक्ति प्राप्तों को । नमस्कार हो श्रमण भगवान् महावीर को जो यावत् मुक्ति के अभिलाषी है । मैने पहले भी श्रमण भगवान् महावीर के निकट स्थूल णातिपात का जीवनपर्यन्त के लिए त्याग किया था, इसी प्रकार स्थूल मृषावाद का स्थूल अदत्तादान का त्याग किया था, स्वस्त्रीसंतोष व्रत धारण किया था, और जीवन पर्यन्त के लिए इच्छा परिमाण किया था, मगर अब उन्ही भगवन्त के निकट यावज्जीवन सर्वथा प्राणातिपात का त्याग करता हू, सर्वथा मृषावाद का, अदत्तादान का, मैथुन और परिग्रह का यावज्जीवन के लिए त्याग करता हूं, सर्वथा प्रकार से क्रोध का यावत् मिथ्या- दर्शनशल्य का अर्थात् अठारहों पापस्थानकों का और यावज्जीवन के लिए अशन, पान, खादिम और स्वादिम रूप चारों प्रकार के आहार का त्याग करता हू । अगर मै इस उपसर्ग से मुक्त हो जाऊगा तो मुझे इन प्रत्याख्यानों को पारना कल्पता है । यदि इस उपसर्ग से मुक्त न होऊं तो यह प्रत्याख्यान जैसे किये है वैसे ही रहे । ऐसा सकल्प करके सुदर्शन ने सागारी अनशन अगीकार किया ॥३२॥ मूल-तए णं से मोग्गरपाणी जक्खे तं पलसहस्सनिफरणं अयोमयं मोग्गरं उल्लालेमाणे-उल्ला- लेमाणे जेणेव सुदंसणे समणोवासए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता नो चेव णं संचाएति सुदंसणं समणो- वासयं तेयमा सममिपडित्तए ।। ३३ ।। 长长 य [ ८६ ] • "" मूत्रम् अवं-तब मुद्गरपाणि यक्ष स हजार पल प्रमाण भारवाले लोहे के मुद्गर को उछालता-उवारता हुआ, जहां सुजन श्रमगोगया, वहा आया । मगर सुदर्मन श्रमणोपासक को उपसर्ग करने-पीडा पहुँचाने मे समर्थ नही हुआ ।३३। मल नए ण से मोगरप गी जाख मुदंसरां समणीवासयं सवयो समंता परिवोलेमा-परि- यानपाया जाह नो संचागड मुरगणं समोवामयं तेयमा समभिपडित्तए ताहे सुदसणस्म समणोवासयस्स पुरमा नपक्विं मपडिदिसं टिकना मुईसणं ममगोवामयं अग्गिमिमाए दिट्ठीए सुचिरं निरिक्तद, निरिक्खित्ता रायग मालागारस्म गरी निष्पजन्ड, विपत्तिा तं पलसहमणि'फन्नं अयोमयं मांग्गरं गहाय जामेत्र दिन पाउभृा नामव दिस पडिगए ।३४॥ - मुद्गलागि यक्ष नुनन आवो चारो ओर फिरने लगा। फिर भी जब वह सुदर्शन श्रावक को 72 पानाने में गम नही रआ, नव गुदर्शन श्रमणोपासक के ठीक सामने बडा होकर मुदर्शन श्रावर को अपलक दृष्टि में कामना का। देगने के बाद उन यक्ष ने अर्जुन माती के शरीर का परित्याग कर दिया और हजार पल मानिस समय मुगर को लेकर निम ओर मे आया था, उसी जोर अर्थात देवालय की ओर चला गया ॥ ३४ मन-नाए णं मे अजगार मालागारे मोगगरपाणिणा जस्खेणं विप्पमुक्के ममाणे धसत्ति धरणी. नगि गत मंनिगा ३५।। -TETTE TR न मानीको मुद्गरमाणि गक्ष ने त्याग दिया तो वह घडाम से धरती पर सर्वाग से ":॥ मूल-- ताण ने मृदंगणे ममणी गगण नियमग्गमिति यदु पडिग पारेइ ॥ ३६ ॥ स .८८ [ ८७ ] अंतकृशाङ्ग सूत्रम् कनकम अर्थ-तब सुदर्शन श्रमणोपासक ने 'उपसर्ग दूर हुआ' ऐसा जानकर सागारिक प्रतिमा (प्रतिज्ञा ) को पार लिया ।। ३६ ॥ मूल-तए णं से, अज्जुणए मालागारे तओ मुहुचतरेणं आमत्थे समारो उट्ठेइ, उद्वित्ता सुदंसणं समणोबासयं एवं क्यासी-तुब्भे णं देवाणुप्पिया ! के ? कहिँ वा संपत्थिया ? । ३७ ।। अर्थ-तत्पश्चात् वह अर्जुन मालाकार थोडी देर मे आश्वस्त होकर (होश-हवास मे आकर ) उठा । उठ कर उसने सुदर्शन श्रमणोपासक से कहा-देवानुप्रिय ! तुम कौन हो ? कहां जा रहे हो ? ।। ३७ ।। मूल-तए रा से सुदंसणे समणोवासए अज्जुणयं मालागारं एवं वयासी एवं खलु देवाणुप्पिया ! अहं सुदंसो णाम समणोवोसए अभिगयजीवाजीवे, गुणसिलए चेइए समणं भगवं महावीरं वंदित्तए संप- थिए । ३८॥ अर्थ-तब सुदर्शन श्रावक ने अर्जुन मालाकार से कहा-हे देवानुप्रिय ! मैं सुदर्शन नामक श्रमणोपासक जीव और अजीव का जानकार हू । गुणशिलक चैत्य मे श्रमण भगवान् महावीर को वन्दना करने के लिए जा रहा हू॥३८॥ मूल-तए णं अज्जुणए मालागारे सुदंसणं समणोवासयं एवं वयासो-इच्छामि णं देवाणुप्पिया ! अहमवि तुमए सद्धिं समणं भगवं महावीरं वंदित्तए जाव पज्जुवासित्तए । 'अहासुहं देवाणुप्पिया' । ३६ ॥ . 长长长长长 hea ८ [ ८८ ] . मूलन ...- - अर्जुन गाली ने गुदगंन अमोयानक ने न प्रकार व्हा-देवानुप्रिय ! मैं भी तुम्हारे नाय श्रमण गगन मापीर को वन्दना करने और उनकी उपासना करने की अभिलापा करता हूँ। नयमन ने कहा-जने तुम्हे गुल उपजे, वैसा ही करो ॥३६॥ मूल-ना गं से गुमणे ममणोवामा अज्जुणएणं मालागारेणं सदि जेणेव गुणसिलए चेहए जेणेव गमगे भगवं महावरे नंगेव आगा. आगच्छित्ता अज्जुगएणं मालागारेणं सद्धिं समणं भगवं महावीर नियुना जाय पवाद । १० । -नव मुनगंन अमगोपालक गर्नुन माली के साथ जिगर गुणगिलक चैत्य और जिवर श्रमण भगवान् महा- र जारीपना । पढेन कर उगने अर्जुन माली के माय बमण भगवान् महावीर को तीन बार प्रदक्षिणा करके गावापानना नी॥१०॥ मृल -- ता गण ममगे भगवं महागौर मुझसणस्स समणोवासयस अज्जुणयस्स तीसे य धम्मकहा। सुदमा पटिगए ॥१॥ i-TE मग भगवान महावीर ने गुदगंन श्रावक को, अर्जुन को और उपस्थित समूह को धर्म कथा कही। 'मंया नगर गुम्नंग नोट गया ।।४।। मल- ना गं से अज्जणे समगस भगवयो महावीरम्म अंतिए धम्म मोच्चा निमम्म हतुट्ठ जाव ए यामी-गामि गण भने ! गिरगंयं पाश्यगं जाव अभुट्टेभि ? 'ग्रहासुई देवाणुपिया ! ॥४२॥ -मन उमण भगवान महावीर के समीर धर्मस्था मुन कर, हृदयगम करते. हर्षित एव पुन्तुष्ट होकर Thi [ ८६ सूत्रम् 长长长长 अतकृशाङ्ग ! मैं निर्ग्रन्थ प्रवचन पर श्रद्धा करता हूँ। यावत् मेरी आपके निकट दीक्षा लेने की अभिलाषा है। कहा-भगवन् तब भगवान् बोले-देवानुप्रिय ! जैसे तुम्हे सुख उपजे वैसा करो ॥४२॥ मूल-तए णं से अज्जुणए उत्तरपुर त्थिमदिसिभागं अवक्कमइ, श्रवक्कमित्ता सयमेव पंचमुट्ठियं लोयं करेइ, करित्ता जाव अणगारे जाए जाब विहरइ ॥४३॥ अर्थ-तब अर्जुन ने इशानकोण मे जाकर अपने ही हाथ से पंचमुष्ठिक लोच किया । लोच करके यावत् अनगार होकर विचरने लगा ॥४३॥ मूल-तए णं से अज्जुणे अणगारे जं चेव दिवस मुडे नाव पव्वइए तं चेव दिवस समणं भगवं महावीरं बंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसिता एयारूवं उग्गहं उग्गिव्हइ-कप्पइ मे जावज्जीवाए छ8 छटेणं अणि क्खिनेणं तबोकम्मेणं अप्पाणं भावमाणस्स विहरित्तए त्ति कटु अयमेयारूवं अभिग्गहं ओगेण्हइ, ओगिरिहत्ता जावजीवाए जाव विहरइ ॥४४॥ अर्थ-तत्पश्चात् अर्जुन अनगार जिस दिन मुडित एवं प्रवजित हुए, उसी दिन उन्होंने श्रमण भगवान् महावीर को वन्दना-नमस्कार करके इस प्रकार का अभिग्रह ग्रहण किया-मुझे निरन्तर जीवन पर्यन्त षष्ठभक्त अर्थात् बेले-बेले का तप करके, अपनी आत्मा को भावित करते हुए विचरना कल्पता है। उन्होंने इस प्रकार का आजीवन अभिग्रह धारण किया यावत् अपनी आत्मा को तप एवं सयम से भावित करते हुए विचरने लगे ॥४४॥ मूल-तए णं से अज्जुणए अणगारे छडक्खमणपारणयंसि पढमपोरिसीए सज्झायं करेइ, जहा गोरामसामी जाव अडइ ॥४॥ [ ६० ।
TE सूत्रम् -नब गर्नुन अनगार ने बेले की पारणा के दिन प्रथम प्रहर मे स्वाध्याय किया। दूसरे प्रहर में व्यान किया नीम प्रहर में जिन प्रसार गौतम स्वामी भगवान् की आज्ञा लेकर गोचरी के लिए गये उसी प्रकार अर्जुन अनगार भी गजगत नगर में भिक्षा के लिए भ्रमण करने लगे ॥४॥ मूल-तगणं तं अज्जुणयं अणगारं गयगिहे नयरे उच्च जाव अडमाणं बहवे इत्थीओ य पुरिसा य उग य पल्ला य जुयाणा य एवं वामी इमेणं मे पिया मारिए, इमेणं मे माया मारिया, भाया० भगिनी भन्ना० पुन० या० मुगहा मारिया, इमेणं मे अण्णयरे सयणसविपरियणे मारिए त्ति कटु गगइया ग्राकोमंति, अगइया हीलंनि निदंति खिमंति गरिहंति, तज्जति, तालेति ।४६॥ -नव राजगृह नगर मे भिक्षा के लिए अटन-करते हुए अर्जुन अनगार को देख कर बहुत-सी महिलाएँ, मागोटे, वरे और गुवक जन उग प्रकार कहने लगे-उसने मेरे पिता को मारा था, इसने मेरी माता को मारा था, लोको माग था, गने मेरे भाई, बहिन. म्यजन, पुत्र, पुत्री या पुत्रवधू को मारा था, इमने मेरे अमुक स्वजन को, गरीजन या परिजन को माग था। उस प्रकार कह कर कोई-कोई अर्जुन मुनि पर आक्रोश करने लगे, कोई-कोई ना करने नगे. :-को निन्दा करने लगे. कोई खिसियाने (कद्व होते) थे, कोई गहीं करने लगे, यहां तक iri:-TITांना और नाना भी करने लगे ।।४।। मन-ताप गं मे अउगाए अगगार नहिं यहूहि इत्थीहि य पुरिमेहि य डहरेहि य महल्लएहि य माग: य प्रायोज्जमाणे जाव तालेजमाग तेगि मनमा वि अप्पउम्समाणे सम्म महइ सम्म खमइ, निनिया, प्राध्यामेट, सम्म महमाणे खपमागे तितिभावमाण अहियानेमाने गयगिहे णयरे उच्चनीयमज्झिमाई न'मग नाम लभह नो पागं न लभ, जया पाण लमह तो मन लभइ ॥४७॥ m ८८८८ [ ६१ ] अतकृशाङ्ग ধপন্থ को - अर्थ-उस समय अर्जुन अनगार ने बहुत-सी स्त्रियों द्वार, पुरुषों द्वारा, छोटों, बड़ों और युवकों द्वारा आक्रोश यावत् ताडना करने पर मन से भी उनके ऊपर द्वेपभाव न धारण करते हुए उस आक्रोश आदि को समभाव से सहन किया, तितिक्षा की, अध्यास किया। यह सब करते हुए वे राजगृह नगर के उच्च, नीच और मध्यम घरों मे परिभ्रमण करते थे। फिर भी उन्हे भोजन मिल जाता तो पानी न मिलता और यदि पानी मिलता तो भोजन न मिलता ! ॥४७॥ मूल-तए णं से अज्जुणए अणगारे अदीणे, अविमणे, अकलुसे, अणाइले, अविसाई, अपरि- तंतजोगी अडइ, अडिता रायगिहारो णयरामो पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता जेणेव गुणसिलए चेइए जेणेव समणे भगव महावीरे बहेव गोयमसामी जाव पडिदंसह पडिदसित्ता समणेणं भगवया महावीरेणं अब्भ- णुएणाए समाणे अमुच्छिए ४ बिलमिव पन्नगभूएणं अप्पाणेणं तमाहारं आहारेइ ॥४८॥ अर्थ--उस समय अर्जुन अनगार न दीनता धारण करते, न मन को उदास करते, न कलुषित करते, न मलिन करते, न विषाद करते और न ऊबते थे । वह आत्मभाव मे स्थिर होकर भिक्षा के लिए अटन करते । अटन करने के पश्चात् वे राजगृह नगर से बाहर निकले और जहाँ गुणशिलक चैत्य और जहाँ भगवान् महावीर स्वामी थे, वहाँ पहुँचे। पहुँच कर गौतम स्वामी की तरह भगवान को आहार दिखलाया । फिर श्रमण भगवान् महावीर की आज्ञा प्राप्त कर अमूर्छित-अगृद्ध भाव से उस आहार को ग्रहण किया-जैसे साँप बिल में प्रवेश करता है ।।४।। मूल-तए णं समणे भगवं महावीरे अण्णया कयाइ रायगिहाओ पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता बहिया जणवयविहारं विहरइ ।।४।। अर्थ-श्रमण भगवान महावीर अन्यदा कदाचित् राजगृह नगर से निकले । निकल कर बाहर जनपदों में (विभिन्न प्रदेशो मे) विचरने लगे ॥४६॥ 长长长长长长长长长长长长长长长长长 [ ६२ पारा মুদ मूल-ता. णं से अणए अणगारे तेणं उरालेणं विउलेणं पयत्चेणं पग्गहिएणं महागुभागेणं तवो- कम्मेणं अप्पागं भावेमार्ग बहुपडिपुगणे छम्मासे सामण्ण परियाग पाउणइ, अद्धमासियाए सलेहणाए अप्पाणं भूमेह, नौम भत्ताई' अगमगाए चंदेड. छेदित्ता नरसट्ठाए कीरह जात्र सिद्धे ॥५०॥ अर्ग-नव अर्जुन अनगार ने उस उदार एवं विस्तीर्ण प्रयत्न से तथा ग्रहण किये हुए महान् फलदायक तपश्चरण अपनी भात्मा को नावित करते हुए पूरे छह माम तक दीक्षा पाली । अर्द्ध मास की संलेखना का सेवन किया । अन- मन में नौन मनो ग छेदन किया और जिम प्रयोजन के लिए नग्नभाव मुंडभाव धारण किया था, उसे पूर्ण कर यावत् निदिमानी ||1|| तीसरा अध्ययन समाप्त कककककककककककका . चौथा अध्ययन मल-उक्खवप्रो चउत्यस्म अज्झयणस्म । एवं खलु नंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे गयो, गुणमिलए मेहए, तत्थ णं मेगिए राया, कासवे णाम गाहावई परिवमइ, जहा मंकाई, सोलस वासं परिग्यायो, चिउले मिदे ॥४ मर्प-चौथे अध्ययन का उत्लेप कहना नाहिए । मुधर्मा स्वामी बोले-हे जम्बू ! उस कान भोर उस समय मे [ २ ] सूत्रम् अंतकृशाङ्ग' राजगृह नगर था, गुणशिलक नामक चैत्य था । वहाँ श्रेणिक राजा था और काश्यप नामक गाथापति रहता था। जैसा मकाई गाथापति का कथन किया, वैसा ही सब काश्यप का भी जानना । सोलह वर्ष तक संयम का पालन करके विपुलाचल से सिद्धि प्राप्त की ।।४।। चौथा अध्ययन समाप्त =6 长长长长长长 पंचम अध्ययन मूल-एवं खेमए वि गाहावई, सावरं कागंदी नयरी, सोलसवासाई परियाओ, विपुले सिद्धे । ५॥ अर्थ-इसी प्रकार क्षेम गाथापति का भी अधिकार समझना चाहिए। विशेषता यह है कि-क्षेम गाथापति काकंदी नगरी के निवासी थे । सोलह वर्ष तक सयम का पालन करके विपुल पर्वत से सिद्ध हुए ॥५॥ पाँचवाँ अध्ययन समाप्त 长长长长长长 छठा अध्ययन मूल-एवं धितिधरे वि गाहावई, कागंदीए णयरीए सोलसवासाइ परियाओ जाव विपुले सिद्ध ।६। [ ६४ ] सूनम TI अय-गो प्रकार तिघर गाथापति का भी वृत्तान्त जानना चाहिए । वह काकंदी नगरी के निवासी थे। गौतह वा गरम पाल कर विपुल पर्वत से सिद्ध हुए ॥६॥ छठा अध्ययन समाप्त ०१४ .. सातवां अध्ययन मृन्न-एवं केलासे वि गाहावई सागेए णयरे, वारस वासाई परियाओ, विपुले सिद्धे ॥७॥ भयं-लाग गायापति का भी वृत्तान्त ऐसा ही है । वे साकेत नगर के निवासी थे । बारह वर्ष तक सयम पारमितुन पर्वत में मिद्ध हुए ॥७॥ माता अध्ययन समाप्त 2747020 पाठवां अध्ययन मल- हरिचंदणे चि गाहाव३, सागर गयरे वारमयामाई परियाओ, विपुले सिद्ध ll [ ६५ ] अंत कृशाङ्ग अर्थ-इसी प्रकार हरिचन्दन गाथापति का भी वृत्तान्त जानना । साकेत नगर के निवासी थे। बारह वर्ष संयम पाल कर विपुल पर्वत से सिद्ध हुए। पाठवां अध्ययन समाप्त मेको नौवां अध्ययन मूल-एवं वारेत्तए वि गाहावई, णवरं रायगिहे णगरे, बारस वासाई परियाओ, विउले सिद्धे ।।। अर्थ-इसी प्रकार बारवत्तक गाथापति का भी वृत्तान्त जानना चाहिए । वह राजगृह नगर के निवासी थे । बारह वर्ष तक संयम पाला । विपुल पर्वत से सिद्धि प्राप्त की ॥६॥ नौवां अध्ययन समाप्त काकाकाकाका दसवां अध्ययन मूल-एवं सुदंसणे वि गाहाचई, णवरं वाणियगामे णयरे, दूइपलासे चेहए, पंच वासाई परियाओ, विउले सिद्ध ॥१०॥ ८०५९ -गुदगंन गायापनि का भी वृतान्त ऐसा ही समझना चाहिए । विशेषता यह है कि-वाणिजग्राम नगर था, नाम नाम नंत्य या। पांच यांत संयम पाला । विपुलाचल से सिद्ध हुए ॥१०॥ दसवां अध्ययन समाप्त ५.८6444444 सूचन ग्यारहवां अध्ययन मन-एवं पुराग भई विगाहावई, वाणियगामे णयरे, पंच वासाई परियागं, विउले सिद्ध ॥११॥ 'वं-पूगंभन गायापति का वृत्तान्त भी इसी प्रकार समझना चाहिए। वाणिजग्राम नगर था। पांच वर्ष संयम गपातन किया । विपुन पर्वत मे सिद्ध हर॥११॥ ग्यारहवां अध्ययन समाप्त 长长长长 बारहवां अध्ययन मज-एवं मुमणभदे पि गाहावई, सावत्थीए णयरीए बहु वासाई परियामओ, विपुले सिद्धे ।१२। नर्थ -सो पगार गुमनभर गायापति का वृत्तान्त भी जानना चाहिए। वह श्रावस्ती नगरी के निवासी थे। [ १७ ] बहुत वर्षों तक संयम पाला । विपुल पर्वत से सिद्ध हुए ॥१२॥ वारहवां अध्ययन समाप्त सूत्रम् अंतकृशाङ्ग AN 长长长长长长 तेरहवां अध्ययन मूल-एवं सुपइ? वि गाहावई, सावत्थीए णयरोए सत्तावीसं वासाई परियायो, विउले सिद्धे ।१३। अर्थ-सुप्रतिष्ठ गाथापति का वृत्तान्त भी ऐसा ही है । श्रावस्ती नगरी के निवासी थे। सत्ताईस वर्ष संयम का पालन किया। विपुल पर्वत से सिद्ध हुए ॥१३॥ तेरहवां अध्ययन समाप्त चौदहवां अध्ययन मूल-एवं मेहे वि गाहावई, रायगिहे णयरे पहूई वासाई परियाओ, विउले सिद्धे ॥१४॥ अर्थ-मेघ गाथापति का वृत्तान्त भी ऐसा ही जानना चाहिए । राजगृह नगर में रहते थे। बहुत वर्षों तक संयम पाला । विपुल पर्वत से सिद्ध हुए ॥१४॥ चौदहवां अध्ययन समाप्त [ ६८ ] :'. : । मुनम पन्द्रहवां अध्ययन मृल-तेगं वानेणं तंग समएणं पोलासपुर णयरे सिरिवणे उज्जाणे; तत्थ णं पोलासपुरे णयरे जिए नामं गया होत्या ।।१।। ग-उन कान और उन समय मे पोलामपुर नामक नगर और श्रीवन नामक उद्यान था। पोलासपुर नगर मे नामा गना वा ॥२॥ मन्न-नन विजय गगां मिग्निामं देवी होत्था, वरणो । २॥ -मविजय गजा गे गनी श्रीदेवी थी । यहाँ रानी का वर्णन समजना नाहिए ।।२।। मन-मग गं विजय गो पुतो सिगए देनीए अत्तए अइमुत्ने नामं कुमारे होत्या, सुकुमाले ।३। -~- TT और श्रीदेवी का आरमज अतिमुक्त नामक कुमार था। वह सुकुमार शरीर का - पापा ॥३॥ ८६.८८८० मन-गं हालग के समापगं समगे भगवं महावीरे जाव मिरिवणे वितरह ॥४॥ i. और मनमय में यमा भगवान् नावीर स्वामी गवन् श्रीवन उद्यान मे तप-यम से आत्मा : “ kí : 1 211 . [ ६६ ] सूत्रम् अतामाङ्ग काकाको मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं समर स्स भगवो महावीरस्स जे? अतेवासी इंदभूई जहा पन्नत्तीए जाब पोलासपुरे पयरे उच्चनीच जाव अडइ ॥५॥ अर्थ-उस काल और उस समय मे श्रमण भगवान् महावीर के बडे शिष्य इन्द्रभूति (गौतम) नामक अनगार, जिनके शरीर आदि का वर्णन भगवतीसूत्र में कहा है, यावत् बेले की पारणा के लिए पोलासपुर में ऊँच, नीच मध्यम कुलों मे अटन कर रहे थे ॥५॥ मूल-इमं च णं अतिमुचे कुमारे यहाए जाव विभूसिए, बहूहिं दारएहि य दारियाहि य, डिंभएहि य डिभियाहि य कुमारेहि य कुमारियाहि य सद्धिं संपरिबुडे साओ गिहाओ पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता जेणेव इंदवाणे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्वा तेहि बहूहि दोरएहि य जाव संपरिबुडे अभिरममाणे अभि- रममाणे विहरइ ॥६॥ अर्थ-इधर अतिमुक्त कुमार स्नान करके यावत् विभूषित होकर बहुत-से बच्चों, बच्चियों, बालकों, बालिकाओं, कुमारो और कुमारिकाओं के साथ, परिवृत्त हो कर, अपने घर से बाहर निकला । निकल कर जहाँ खेलने की जगह थी, वहां पहुंचा। पहुँच कर उन बच्चों आदि के साथ खेलने लगा ॥६॥ मूल - तए णं भगवं गोयमे पोलासपुरे नगरे उच्चनीय जाव अडमाणे इंदट्ठाणस अदूरसामंतेणं वीइवयइ । तए णं अइमुत्ते कुमारे भगवं गोयमं अदूरसामंतेणं वीइवयमाणं पासइ, जेणेव भगवं गोयमे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता भगवं गोयम एवं वयासी के ण भंते तुम्भे ? किं वा अडह ? ॥७॥ मर्थ-उस समय भगवान् गौतम पौलासपुर नगर मे उच्च नीच यावत् घरों मे भिक्षा के लिए घूमते हुए उस इन्द्र- नोककककोपक पोपको [ १०० ] 14 सूत्रन यान-नागिन बन दूर और न बहुत ममी से अर्थात् कुछ दूर से निकले । तब अतिमुक्त कुमार ने भगवान् गौतम दर जाने देवा । देव कर वह भगवान् गौतम के पास आया। आकर भगवान् गौतम से बोला-भगवन् ! सर : मिनिाम है 130 मृल-तए गं भगवं गोयमे अहमु कुमारं एवं वयासी-अम्हे णं देवाणुप्पिया ! समणा निग्गंया ग्यामिया जाय भयारी, उच्चनीय जाव अडामो1॥ अयं नव भगवान गौतम ने अतिमुक्त कुमार ने कहा-देवानुप्रिय | हम निर्गन्य श्रमण हैं, ईर्यासमिति से युक्त जागा पालन करने वाले हैं। भिक्षा के लिए उन-नीत्र एव मध्यम कुलों में भ्रमण कर रहे हैं ।।८।। मल - तए गं अहमुत्ते कुमारे भगवं गोयमं एवं बयासी एद णं भंते ! तुम्भे नाणं अहं तुम्मं भिक्खं दयामि तिक्टु भगव गोयमं अंगुलीए गेण्ड, गेरिहत्ता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागए ||६|| अर्ग-नव अतिमुक कुमार ने भगवान् गौतम से कहा-भगवन् ! आओ, जिससे मैं तुम्हे भिक्षा दिलाऊँ, इस प्रकार गवान् गौतम को उगनी पकली और उगली पकड कर अपने घर की ओर ले गया || मृल-ताए णं मा मिग्देिवी भगवं गोगमं एज्जमाणं पासइ, पासित्ता हत? आसणाओ अभुट्टेइ, 'पष्टिना जंगोत्र भगां गोयमे नेगोर उवागया, मगर गोयमं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं बंदइ, नमसइ, दिना नमंमित्ता विउलंग अमगापागवाइमसाइमेणं पडिला भेड़, जाव पडिविसज्जड ||१०|| -मनमय निमुन कुमारी माता श्रीदेवी ने भगवान गौतम स्वामी को आते देखा । देखते ही वह समानी गई। नहां भगवान गौतम ये वहाँ जाई । भगवान् गौतम को तीन बार हाथ जोड कर तीन बार स्ररुरुरुरूस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स - [ १०१ ।
सूत्रम् अंतशाग 长长长长长 आदक्षिण प्रदक्षिणा करके वन्दन और नमस्कार किया । वन्दन नमस्कार के पश्चात् विपुल अशन, पान, खादिम और स्वादिम आहार बहराया यावत् विदा किया ॥१०॥ मूल-तए णं से अइमुचे कुमारे भगवं गोयम एवं वयासी-कहिं णं भंते ! तुब्मे परिवसह ॥११॥ अर्थ-उस समय अतिमुक्त कुमार ने भगवान् गौतम से इस प्रकार पूछा-भगवन् ! आप कहाँ रहते हैं ? ॥११॥ मूल-तए णं भगवं गोयमे अइमुच कुमार एवं वयासी-एव खलु देवाणुप्पिया ! मम धम्मायरिए धम्मोवएसए भगवं महावीरे आइकरे जाव संपाविउकामे इहव पोलासपुरम्स बहिया सिरिवणो उज्नारो आहा- पडिरूवं उग्गहं उग्गिहित्ता मंजमेणं तबसा अप्पाणं भावेमाणे विहरह, तत्थ णं अम्हे परिवसामो ॥१२॥ अर्थ-तब भगवान् गौतम ने अतिमुक्त कुमार से कहा-देवानुप्रिय ! मेरे धर्माचार्य, धर्मोपदेशक, भगवान् महावीर धर्मतीर्थ की आदि करने वाले यावत् निर्वाण के अभिलाषी, इस पोलासपुर नगर के बाहर श्रीवन नामक उद्यान में यथोचित-साधु के योग्य स्थान ग्रहण करके सयम और तप से आत्मा को भावित करते हुए विचरते हैं । उसी जगह हम भी रहते है ॥१२॥ मूल-तए णं से अमुचे कुमारे भगवं गोयमं एव वयासी-गच्छामि णं भंते ! अहं तुब्मेहिं सद्धि समणं भगवं महावीरं पायवंदए ? 'अहासुहं देवाणुप्पिया ! ॥१३॥ अर्थ-तब अतिमुक्त कुमार ने भगवान् गौतम से इस प्रकार कहा-भगवन् ! मैं आपके साथ श्रमण भगवान् महा- वीर के चरणों की वन्दना के लिए चलू ? 长长长长长长长 [ १०२ ] । मा सूत्रम् गौतम न्वामी ने उत्तर दिया-देवानुप्रिय । जैसे तुम्हे सुख उपजे वैसा करो ॥१३॥ मल-तए गणं से अइमु कुमारे भगवया गोयमेणं सद्धि जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवा- गन्छः यागन्छित्ता ममणं भगव महावीरं तिक्खुत्तो पायाहिणं पयोहिणं वंदइ जाव पज्जुवासइ ॥१४॥ अयं-तव अतिमुक्त कुमार भगवान् गौतम के साथ श्रमण भगवान महावीर के पास पहुंचा । वहां पहुंच कर उसने भमा भगगन महावीर को तीन बार आदक्षिण प्रदक्षिणा की, वन्दना की यावत् पर्युपासना की ॥१४॥ मृन-तए गं भगवं गोयमे जेरोव समरो भगवं महावीरे तेणेव उवागए जाव पडिदंसेइ, पडि- दमित्ता मंजमग तवमा अप्पारणं भावमारो विहरइ ॥१५॥ चिं-नव भगवान् गौतम स्वामी जहां श्रमण भगवान् महावीर थे, वहां आए। जो आहार लाये थे, वह उन्हे पिनाया. यापन गयम-नए ने जान्मा को भापित करते हुए विचरने लगे ॥१५॥ मन- नए गं ममो भगवं महावीरे अइमुत्तस्स कुमारस्स तीसे य धम्मकहा ॥१६ .. 7व अमन भगवान महावीर ने अतिमुक्त कुमार को और परिषद् को धर्मोपदेश दिया ॥१६।। मन-तए गग में इमचे कुमारे समणस्स भगवनो महावीरस्स अंतिए धम्म मोचा निसम्म हटे, जं नारं देशपिया ! अम्मापियर यापुच्छामि, तग गं अहं देवाणुपियाणं अन्तिए नावपश्चयामि ॥१७॥ Fii भगवान महार में मांग सुनने के अनन्तर अतिमुक्त शुमार हर्षित हुआ, संतुष्ट हुआ और - ' ने माता-पिता ने एक नेता, नाम्नान में देवानुपिय के निकट पत्र ज्या गहण करूंगा ॥१७॥ पाकककका : * [ १०३ ] सूत्रम् KKR अंतकशाङ्ग मूल- अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंधं करेह ॥१८॥ अर्थ-तब भगवान् ने कहा-देवानुप्रिय ! जैसे सुख उपजे वैसा करो। विलम्ब मत करो ॥१८॥ मूल-तए णं से अइमुचे कुमारे जेरोव अम्मापियरो तेव उवागए जाव पव्वइत्तए ॥१६॥ अर्थ-तत्पश्चात् अतिमुक्त कुमार माता-पिता के पास आए, यावत् बोले-मुझे आज्ञा दीजिए, मै दीक्षा ग्रहण करना चाहता हूँ ॥१६॥ मूल - अइमुत्त कुमारं अम्मापियरो एवं बयासी-बाले सि णं तुम पुत्ता ! असंबुद्धे सि तुमं पुत्ता ! कि णं तुम जाणासि धम्म ? ॥२०॥ अर्थ-तब माता-पिता ने अतिमुक्त कुमार से कहा-हे पुत्र ! तू बालक है । हे पुत्र ! तू अबोध है। तू धर्म के विषय में क्या समझता है ? कुछ नही ॥२०॥ मूल--तए णं से अइयुत्ते कुमारे अम्मापियरं एवं वयासी-एवं खलु अम्मयाओ! जं चेव जाणामि तं चेव न याणामि, जं चेव न जाणामि तं चेव जाणामि ॥२१॥ अर्थ-तब अतिमुक्त कुमार ने माता-पिता से कहा-अहो माता-पिता ! जिसको मै, जानता हूँ, उसी को नहीं जानता और जिसे नही जानता, उसी को जानता हूँ॥२१॥ मूल- तए णं अमुचं कुमारं अम्मापियरो एवं वयासी-कहं णं तुर्म पुत्ता ! जं चेव जाणासि तं चेव न जाणासि जं चेत्र न जाणासि तं चेव जाणासि १ । २२॥ ? 长长长长长长 । १०४ ] ...-- . मन सूनम ८९ .८ -नव माता-पिता ने अतिमुक्त कुमार से पूछा-पुत्र ! किस प्रकार तुम जो जानते हो वह नहीं जानते हो और गजाननेही मो जानने ? ॥२२॥ मन --नए गा ये अमुचे कुमार अम्मापियरं एवं बयासी-जाणामि णं अहं अम्मयायो ! जहा जागरगं यम्म मरि अञ्च, न नागामि अहं अम्मयाओ ! काहे वा, कहिं बा, कहं वा फेव चिरेण वा ! न जागामि ग अम्मयायो ! कहिं कम्माययाहिं जीवा नेरइयनिरिक्खजोणियमणुस्सदेवेसु उबवज्जति । जागामि गं यम्मयायो ! जहा मएहिं कम्माययोहिं जीवा नेरइय जाव उववज्जति । एवं खलु अहं पम्म यायो ! ज नेव जागामि तं चेव न जाणामि, जं च न जाणामि तं चेव जाणामि । तं इच्छामि णं 'अम्मयायो! तुम्मे अन्मगुन्नाग नाव पचहत्तए ॥२३॥ उन-नय अतिमुक कुमार ने उत्तर दिया-अहो माता-पिताओ ! मैं जानता हूँ कि जो जन्मा है वह अवश्य गा उग्न में पर गली जानता कि किम निमित्त मे, किम स्थान पर, किस प्रकार और कितने समय में मरेगा ! अहो mi नहीं जानता हूँ कि जीव किन कम से नरक, तिर्यच, मनुप्य और देव गति में उत्पन्न होते हैं, परन्तु गना जीव अपने हा वाधे कम-बधनो ने नरकादि गति में उत्पन्न होते है अहो माता-पिता इस प्रकार में मेमे नही जानता हूँ और जिसे नहीं जानता हूँ उसे जानता हूँ। इस कारण अहो माता-पिता ! मैं आपकी म.सार यात्रा पनित होना नाता ॥२॥ मृन-नए गं यहमु कुमारं अम्मापियरो जाहे नो संचाएति बहूहि आघवणाहिं पण्णवणादि, तं इस्लामी नाया ! दिवसमरि गजमिरिं पासित्तए ॥२४॥ - मि तुमार के माता-पिता जब उने यहुत कह कर एप समना कर तथा सनार के सुग और ... [ १०” ।
अतशाङ्ग सूत्रम् सयमपालन मे होने वाले कष्ट बतला कर संसार के भोगों में लुभाने के लिए समर्थ न हुए, तब कहने लगे-हे पुत्र ! हम एक दिन के लिए भी तेरी राज्यश्री देखना चाहते है अर्थात् तुझे राजा के रूप मे देखना चाहते है ॥२४॥ मूल--तए णं अतिमुचे कुमारे अम्मापिउवयणमणुवत्तमाणे तुसिणीए संचिट्ठइ । २५॥ अर्थ-तब अतिमुक्त कुमार माता-पिता के वचन को मान देकर मौन रह गया ॥२५॥ मूल --अभिमेश्रो जहा महावलस्म, णिक्खमणं नाव सामाइयमाइयाइएक कारस अंगाई अहिज्जइ अहिज्जित्ता बहुइ वासाई सामन्नपरियागं गुणरयणसंवच्छरं तवोकम्म जाब विउले सिद्ध ।२६। अर्थ-जिस प्रकार भंगवती सूत्र मे महाबल कुमार के राज्याभिषेक और दीक्षा का वर्णन है, उसी प्रकार यहाँ जानना चाहिए, यावत् दीक्षा धारण कर अनगार हुए। सामायिक से प्रारंभ कर ग्यारह अंग पढे । बहुत वर्षों तक संयम पाला। गुणरत्नसंवत्सर तप किया, यावत् विपुल पर्वत से सिद्धि प्राप्त की ॥२६॥ [ भगवतीसूत्र शतक ५ उद्देशक ४ मे कहा है-उस काल और उस समय मे श्रमण भगवान् महावीर स्वामो के भद्र एवं विनोत प्रकृति वाले अतिमुक्त अनगार एकदा महावृष्टि होने के बाद जगल गये । वहाँ अतिमुक्त मुनि ने पानी के बहते हुए प्रवाह को पाल बाँध कर रोका। फिर उस पानी मे पात्री रख कर कहने लगे-'मेरी यह नाव तिरती है ! साथ के अन्य साधुओ ने यह खेल देखा और श्रमण भगवान् श्री महावीर स्वामी के पास आकर पूछा-आपका शिष्य अतिमुक्त मुनि कितने भव करके मोक्ष जाएँगा ? भगवान् बोले-वह चरमशरीरी है-इसी भव से मोक्ष जाएगा । अतएव हे आर्यो ! तुम अतिमुक्त मुनि का निन्दाहीलना मत करो। अग्लानभाव से उसकी भक्ति करो-अन्नपानादि से वैयावृत्य करो। स्थविर भगवतो ने वैसा ही किया। ] पन्द्रहवां अध्ययन पूर्ण [ १०६ ] जनमान the गुणरत्नसंवत्सर तप ( कोष्ठक और विधि) सूत्रम् तप दिन पारणा सर्व दिन २ २ ३ ३ ३४ ३२ ३० २८ २६ ३६ ३३ ३० २७ २४ २८ ३० ३० ३२ ३ ३२ १६ । १६ ३० १५ १५ २८ | १४ १४ । २ २६ । १३ । १३ । २ २४ | १२ | १२ । २ ३३ ११ । ११ । ११ ३० १० १० । १० २७ २४ २२ ७ । ७ २४ ६।६ | ४ २५ । ५ । ५ । ५ । ५ । ५ ५ २१४ । ४ । ४ । ४ । ४ । ४.६ २४ । ३ । ३ । ३ । ३ । ३ । ३ । ३ । २० । २ । २ । २ । २ । २ । ३ । २ । २ । २ । २ । १० ? ? ? ? ? १ । १ । । १ । १ । १ ।१।१।१।१। १ । १६ U19 U1619 | ३ | [ १०७ ३२ अत शान सूत्रम् 7 विधि-प्रथम मास मे एकान्तर उपवास, दूसरे में बेले-वेले पारणा, तीसरे मे तेले-तेले पारणा, यावत् सोलहवे महीने में सोलह-सोलह उपवास के पारणा करे। दिन मे उत्कटासन से सूर्य की आतापना ले, रात्रि मे वस्त्र रहित होकर वीरासन से ध्यान करे । इसके सब दिन ४०८, पारणा दिन ७४ और सब दिन ४८२ होते है । सोलहवां अध्ययन मूल-उक्खेवो सोलसमस्स अज्झयणस्स | एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं वाणारसीए नयरीए काममहारण चेइए । तत्थ णं वाणारसीए अलक्खे णामं राया होत्था ॥१॥ अर्थ-सोलहवे अध्ययन का उत्क्षेप कहना चाहिए । श्रीसुधर्मा स्वामी बोले-हे जम्बू ! उस काल और उस समय मे वाणारसी नगरी मे काम-महावन नामक चैत्य था । वाणारसी नगरी मे अलक्ष नामक राजा राज्य करता था ॥१॥ मूल-तेणं कालेणं तेण समएणं समणे भगवं महावीरे जाव समोसरिए, विहरति परिसा णिग्गया ॥२॥ अर्थ-उस काल और उस समय मे श्रमण भगवान् महावीर का पदार्पण हुआ और काममहावन चैत्य में ठहर कर सयम-तप से आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे। भगवान के दर्शन और वन्दन के लिए परिषद् निकली ॥२॥ मूल-तए' णं अलक्खे राया इमीसे कहाए लद्धडे हट्टतुट्ट जहा कूणिए जाच पज्जुवासइ । ३॥ अर्थ-तब अलक्ष राजा को यह वृत्तान्त विदित हुआ तो वह हर्षिन और सन्तुष्ट हुआ । उववाईसूत्र में वर्णित कोणिक राजा के समान सम्पूर्ण साज सज कर वह दर्शनार्थ आया यावत् उपासना करने लगा ॥३॥ पोप 长 [ १०८ ] TITIान सूनम - ":" " मूल-धम्मका ॥४॥ अ-भगवान ने धमल्या सुनाई ॥४॥ मूल-तए णं से अलरव राया समणस्स भगवो महावीरस्स अंतिए जहा उदायणे तहा णिक्खते; गावरं जंठपुतं गज्जे अभिपिचर ॥शा अयंगास्नात् अन्नक्ष राजा ने भगवतीमूत्र वर्णित उदायन राजा के समान श्रमण भगवान् महावीर के निकट सपा अंगीकार की। विशेषता इतनी है कि उदायन ने अपने भागिनेय (भाणेज) को राज्यभार सौंपा था, जब कि अलक्ष ने जाने जो पुरा को रायभार दिया ॥५॥ मूल-एक्काम्म अंगाई अहिज्जइ, बहवासाई परियाओ, विउले सिद्ध ॥६॥ -गीता गढ़ा करने के पश्नात् अलक्ष मुनि ने ग्यारह अंगो का अध्ययन किया । बहुत वर्षों तक सयम का गान किया. यावन् विशुनागत पर्वत मे निद्धि प्राप्त की ॥३॥ सोलहवां अध्ययन समाप्त पष्ठ वर्ग समाप्त 长长长长长长 0908 । १०६ ।
सूत्रम् अंतकृशाङ्ग takke काका सप्तम वर्ग मूत-जइ णं भंते ! • सत्तमस्स वग्गस्स उक्खेवश्रो । जाव तेरस अज्झयणा पण्णत्ता तंजहा- नंदा तह नंदवई, नंदोत्तर नंदसेणिया चेव । मरुया सुमरुया महमरुया, मरुद्दे वा य अट्ठमा ॥१॥ भद्दा य सुभद्दा य, सुजाया सुमणाइया । भूयदिना य बोद्धच्या, सेणियमज्जाण नामाई ॥२॥ अर्थ-श्री जम्बू स्वामी ने भगवान् सुधर्मा से निवेदन किया-भगवन् ! मैंने छठे वर्ग का अर्थ सुना । श्रमण भगवान् महावीर यावत् निर्वाणप्राप्त ने सातवे वर्ग का क्या अर्थ फरमाया है ? तब सुधर्मा स्वामी ने उत्तर दिया-श्रमण भगवान् महावीर ने सातवे वर्ग के तेरह अध्ययन कहे हैं । वे इस प्रकार है-१) नन्दा (२) नन्दवती (३) नन्दोत्तरा (४) नंदसेना (५) मरुता (६ सुमरुता (७) महामरुता (८) मरुदेवी (६) भद्रा (१०) सुभद्रा (११) सुजाता (१२) सुमता और (१३) भूतदत्ता । यह तेरहों श्रेणिक राजा की रानियों के नाम हैं ॥१॥ मूल - जइ णं भंते ! तेरस अज्झयणा परणत्ता, पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं नाव संपणं के अट्ठ पएणचे ? ॥२॥ 长长长长长长长长 [ ११० ।
.re ना सूत्रम् -भगवन् । यदि मातवे वर्ग के तेरह अध्ययन कहे हैं तो प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ कहा है ? ॥२॥ मूल-एवं खलु जंबू ! नेणं कालेणं तेणं ममएणं रायगिहे णयरे, गुणसिलए चेइए, सेणिए राया, गगामा ॥३॥ यं-जन्य उस काल और उस समय मे राजगृह नामक नगर था । गुणगील चैत्य या । श्रेणिक राजा था। मकान तान लेना नाहिए ।।३।। मन-तस्म ण सारण यम्स रण्णो नंदा नाम देवी होत्था, वएणो ॥४॥ गणिक राजा की नन्दा नामक रानी थी वह सुकुमाल यावत् मुल्पा थी ॥४॥ मृल-मामी ममोमडे, परिमा णिग्गया ॥५॥ मग भगवान महावीर स्वामी पधारे । परिपद् धर्म था मुनने के लिए निकली ॥५॥ गल-नए रणं या गंगा देवी इमोमे काए लट्ठा समाणी हट्ठा, कोडुबियपुरिसे सदावेइ, सदावेत्ता नारण हा परमावइ, जार एक्कारम अंगाई अहिन्जित्ता वीसं वासाई परियाय पाउणित्ता जार सिद्धा। एवं नेग्य वि देवी ग्रो गंदागमेणं णेयब्यायो । निक्खेवो ॥६॥ 1- नन्दादेवी भगवान के आगमन का वृतान्त नुन कर हर्षित हुई। कोम्बिक पुरुषों को बुलवा कर मगिरम करवाया । पानी रानी की तरह भगवान के निकट गई। धमकथा मुनी । श्रेणिक राजा की अनुमति Tी। ग्यारह अगोरा अध्ययन किया । बीस वर्ग सयम पाला, यावत् मिद्धि प्राप्त की ॥ यह सप्तम म 'पयन पर्गना। माजी सावन शिला, उनी प्रकार तेरहो रानियों के तेरह अध्ययन कहना नाहिए । यहां T.IT-उमर ममतना नाहिए ।।६।। सप्तम वर्ग समाप्त क [ १:१] सूत्रम् , मतकृशाङ्ग काकाकाको अष्टम वर्ग निकष 长长长长长长 मूल-जइ णं भंते ! अट्ठमस्स वग्गस्स उक्खेवो, नाव णवरं दस, अज्झयणा पण्णता, तंजहा- काली सुकाली महाकाली कण्हा सुकण्हा महकण्हा । वीरकण्हा य बोद्धव्वा, रामकण्हा तहेव य ।। पिउसेणकण्हा नवर्मा, दसमी महासेनकण्हा य ॥१॥ अर्थ-अहो भगवन् ! यदि श्रमण भगवान् महावीर ने सातवे वर्ग का यह अर्थ कहा है तो आठवे वर्ग का क्या अर्थ कहा है ? इस प्रकार का उत्क्षेप कहना चाहिए। सुधर्मा स्वामी ने कहा-हे जम्बू श्रमण भगवान् महावीर ने आठवे वर्ग के दस अध्ययन कहे है, यथा-(१) काली (२) सुकाली (३) महाकाली (४) कृष्णा (५) सुकृष्णा (६) महाकृष्णा (७) वीरकृष्णा (८) रामकृष्णा (8) प्रियसेनकृष्णा और'(१०) महासेनकृष्णा । दस अध्ययनों में इन दस रानियों का वर्णन है ॥१॥ मूल-जइ णं भंते ! अट्ठमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, पढमस्स अज्झयणस्स के अट्ठ परणचे ? ॥२॥ [ ११२ ] मान ? । सूनम - स्वामी ने पुन. नग्न किया-भगवन् । यदि आठवे वर्ग के दस अव्ययन कहे हैं तो प्रथम अध्ययन का TH मृल एवं वन्नु गं ! तेगं काले गं तेणं ममएणं चपा नामं नयरी होत्था, पुण्णभदे चेइए, होगा गया ।३। -नीमुपर्मा वानी ने उतर दिया-हे जम्पू उस काल और उस समय मे चम्पा नाम की नगरी थी। उसके जान गंभद्र नामक नंत्य था। कोगिक नामक राजा राज्य करता था ॥३॥ मूल -नन्य गं पाए गयरीए सेणियस्स रण्णो भज्जा, कोणियस्त रएणो चुल्लमाउया काली नाम देवः दोन्या, वगणी । जहा गदा जार सामाइयमाझ्याई एक्कारस्म अंगाई अहिज्जइ, यहूटिं चउत्थ जाव अप्पागं भावमागा विवाद ॥४॥ -नगा नगरी में श्रेणिक राजा की भार्या और कोणिक राजा की छोटी माता काली नामक देवी थी। मान पगमा ना नाहिए । जना नन्दा रानी का अधिकार कहा, वैसा ही इसका भी जानना चाहिए। यावत् सामानकर, मामागिल मे लेकर ग्यारह अंगो का अध्ययन किया, बहुत-से चतुर्थभक्त पप्ठभक्त आदि तमश्नरण से या मग ने प्रारमा को नावित करती हु विनग्ने नगी ॥४॥ मूल-तए गं मा कानी प्रज्ञा अएणया कयाई जेणेव अज्ज चंदणा अज्जा तेणेव उवागया, एवं यामो-इन्द्रामि गं अजनायो। तुमगुएलाया नमागी रयणालि तपोकम्मं उपसंपज्जित्ताणं विहरित्तए । 'पा मुई ॥१॥ 45 [ ११३ ।
अतकृदशाङ्ग अर्थ-काली आर्या ने किसी समय आर्य चन्दना आर्यिका के समीप जाकर कहा-'अहो आर्याजी ! आपकी आज्ञा हो तो मै रत्नावली तप अगीकार करके विचरना चाहती हूं। तब चन्दनबाला आर्यिका ने कहा-जैसे सुख उपजे वैसा करो ॥५॥ मूल-तए णं सा काली अज्जा अज्ज चंदणाए अभुणुपणाया समाणी रयणावलि तवोकम्म उव- संपज्जित्ताणं विहरह । तंजहा-चउत्थं करेइ, चउत्थं करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारेत्ता छ8 करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारेत्ता अट्ठमं करेइ करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारेत्ता अट्ठ छट्ठाई करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता छठं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारिता अट्ठमं करेइ, करिता सव्वकामगुणियं पारेइ, दसमं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, दुवालसमं करेइ, सव्वकाम०, चौदसमं करेइ, सम्ब०, सोलसमं करेइ, सबकाम०, अट्ठारसमं करेइ, सव्वकाम०, वीसइमं करेइ, सव्वकाम०, बावीसइमं करेइ, सव्वकाम०, चउवीसइमं करेइ, सव्वकाम०, छब्बीसइमं करेइ, सव्वकाम०, अट्ठावीसइमं करेइ, सव्वकामगुण ०, तोसइमं करेइ, सबकाम०, चचीसइमं करेइ. करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारेत्ता चोत्तीसइम करेइ, करित्ता सबकाम० पारेइ, पारित्ता चउत्तीसं छट्ठाई करेइ, करिता सव्वकामगुणियं पारेइ ।। चउत्तीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणिय पारेइ, पारित्ता पत्तीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकाम० पारइ, तीसइम करइ. सन्चकामगु०, अट्ठाइसमं करेइ, सबकाम० पारेइ, छब्बीसई करेइ, सव्वकाम०, चोवी- सइमं करेइ, सबकाम०, वावीसइमं करेइ, सञ्च०, बीसइमं करेइ, सन्दकाम, अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सव्व- 长长长长长长长 [ ११४ ] • सूत्रम् पप कामगुण , मोलगमं करेड़, मध्यकाम, चउसमं करेइ, सव्यकाम० बारसमं करेइ, सबकाम०, दसमं 3 गब्यकामग गि, यं पारंड, अदुभं करइ, सव्यकाम०, छह करेइ, करित्ता सबकाम० पारेइ, चउत्थं करेइ, करिना गन्धकाम०, अदु छट्ठाई करड, करित्ता सबकामगुणि यं पारेड, अट्ठमं करइ, सव्वकाम० पारेइ, छ? कंग्ड, करिता मध्यकाम०, चउत्थं करेड, कारचा सव्वकामगुणं पारइ ॥६॥ -तय कानी नामक आपिका ने आर्या चन्दनवालाजी आयिका की आजा प्राप्त करके रत्नावली तप अंगीकार किया । र म प्रकार-चतुयंभक (एक उपवाम) किया, चतुर्थ भक्त करके सर्वकामगुणित (सब प्रकार के रस भोगने की लिमेट होगमा) पारगालिया, पारणा करके पष्ठ भक्त (बेला) किया, बेला करके सर्वकामगुणित पारणा किया, ािरिया, नेता करके नवं कामगुगित पारणा किया, आठ बेले किये, फिर पारणा किया, चतुर्यभक्त किया, पारणा fr. मन करके पारगा किया, अटम भक्त करके पारणा किया, दशमभक्त (नोला) करके पारणा किया, द्वादगमभक्त THITI) को पारगा ज्यिा, चौदहभक्त (छह उपवास) करके पारणा किया, पोडशभक्त (सात उ.) करके पारणा किया, दामना गान) को पारणा किया, बीमभक्त (नौ उबवास) करते पारणा किया, बावीसभक्त (दश उपवास) Afrया, नौनीमभन (पान्ह उपवास) करके पारणा किया, छब्बीसभक्त (बारह उपवास) करके पारणा किया, मन ( 7.) को पारणा लिया, तीमभक्त (नौदह उपवास) करके, पारणा किया, बत्तीसभक्त (पन्द्रह उ.) Fri, नौनीगमन (नोलन उपपान) करके पारणा किया, फिर नौतोन पप्ठभक्त (वेले) किये, तत्पश्नान म. पारणा किया, फिर पन्द्रह उपवाग करके पारणा किया, उसी प्रकार नौदह उपवास करके, गगन को, ग्यात उपयाग कर, दन उपवान हरने, नो उपवास करके, आठ उपवास राम मोरान करो, पान उपनाम करके, नार उपवाग करके, तीन उपवान करते, दो उपवास * को याम र पाग्गा लिया । गलनात् आठ वेले किये, फिर अष्टमभक्त, पष्ठभक्त और ननुभक्त . . . - उको . बा. 7 [ ११५ ॥
करके पारणा किया । (इसमे सब पारणा सर्वकामगुणित होते है) ॥६॥ रत्नावली तप का कोष्टक इस प्रकार है- अतहाग امام 长长长长长长 ललललल -1 orariterarmarrior लागलगललल तप مادام ماما اسماه الالعاباسال कली नाव M اور امام ماعانه २२ Marwarrior इ. ना r काप r مامانم لہ [ ११६ ] ht Pr सून (२) लावती ताकीएम पारिसाटी के तमोदिन ३४८, पारणक दिन , नत्र महीने १५ और दिन २२ होते नार पनिाटियों मे ५ वां, २ मान, २८ दिन लगते है। (२) मुगानीमारिका ने कनकायनी तपल्यिा । दोनो में अन्तर यह हे-रत्नावली तप में दोनों फूलों की जगह ।। नगानी में उनकी जगह तेला किया जाता है। कनकावनी तप के तमोदिन ४३४, पारणदिन ८ हैं। नत्र १.महीने और १२ दिन होते। नारी परिपाटियों मे ४ वर्ष, ६ महीने, १८ दिन लगते है। मृन-एवं खलु एमा म्यगावलीए तबो कम्मम्म पढमा परिवाडी. एगणं संबच्छरेणं, तिहिं मासेहिं. चार्गमाए 'अहोरनहिं ग्रहामुन जाव यागांच्या भवति ॥७॥ -नानी ता की यह प्रथम परिपाटी है। उसके करने में एक वर्ष, तीन मास और वाईन अहोरात्र (गि गा) जगने । जन प्रकार मून के अनुसार प्रथम परिसाटी की आराधना होती है ॥७॥ लल-तगागंतर च णं दोचाए परिवाडीए चउत्थं करेड़, करित्ता विगइवज पारेड, परित्ता छ? कन्ट, सरिता विगदाज पारड, जहा पढपाए परिवाडीए तहा वीयाए वि, णवरं सम्वत्थ पारणय विगइवज्ज पानि, जार प्रागझिया भवइ ।।३।। -प्रथम परिपाटी पुगं करने के पश्चात् काली नामा आर्या ने दूसरी परिपाटी आरभ की । इस गरी परि-- पीनामा किया, नाभात करके विकृतिहीन (दुध, दही, घी, तेल आदि विगय रहित) पारणा किया, फिर किसानो कार पर विगारहित पारगा किया। इस तरह पहली परिपाटी में गिन क्रम से तपस्या समीम में सीमाटी में भी तमगा की। विशेषता नही कि इस परिपाटी में सब पारणा विगय रहित TET पर रनावती ना की दुगरी परिसाटी की मूनानुगार आरापना की जाती है | 44.4.4 । [ ११० ] सूत्रम् अतकृशान 长长长长长长长 मूल-तयाणंतरं च णं तच्चाए परिवाडीए चउत्थं करइ, अलेवाडं पारइ जाव आराहिया भवइ ।8। अर्थ-दूसरी परिपाटी पूर्ण हो जाने पर तीसरी परिपाटी आरंभ की । उसमें सर्वप्रथम चतुर्थभक्त किया, फिर पष्ठभक्त किया, इत्यादि सब तपस्या प्रथम परिपाटी के क्रमानुसार की। विशेषता यह कि दूसरी परिपाटी में विगय का त्याग किया था और इस परिपाटी में निर्लेप (जिसका लेप न लगे) आहार से पारणा किया ॥९॥ मूल-एवं चउत्था परिवाडी, नवरं सवपारणए आयंबिलं पारे इ, सेसं तं चेव । गाहा- पढमंमि सव्वकामं, पारणयं विइयए विगयवज्ज । ततियंमि अलेवाड, आयंबिलो चउत्थंमि ॥१०॥ अर्थ-इसी प्रकार चौथी परिपाटी में तपस्या की, परन्तु इसमें प्रत्येक पारणा में आयंबिल किया। शेष सब क्रम प्रथम परिपाटी के समान समझना चाहिए । गाथा का अर्थ-प्रथम परिपाटी में सर्वकामगुणित पारणा, दूसरी मे विकृति- वर्जित, तीसरी मे निर्लेप और चौथी में आयंबिल से पारणा किया जाता है ॥१०॥ मूल-तए णं सा काली अज्जा तं रयणावलिं तवोकम्मं पंचर्हि संवच्छरे हिं दोहिं य मासेहिं अट्ठा- वीसाए य दिवसेहिं अहासु जाव राहेत्ता जेणेव अज्ज चंदणा अज्जा तेणेव उवागच्छइ, अज्ज चंदणं च वंदति नमंसति वंदित्ता नमंसित्ता बहूहिं चउत्थ जाव अप्पाणं भावेमाणा विहरति ॥११॥ अर्थ-तब काली आर्यिका रत्नावली तप की पांच वर्ष, दो मास और अठाईस दिनों में शास्त्रानुसार आराधना करके, जहाँ आर्य चन्दना आर्यिका थी वहाँ गई। चन्दना आर्यिका को वन्दन-नमस्कार किया। वन्दना-नमस्कार करके बहुत-से उपवास बेला आदि करके यावत् आत्मा को भावित करती विचरने लगी ॥११॥ प [ ११८ ] समान १.kr मृन-तए णं मा काली अज्जा तेणं उरालेणं नाव धम्मणिमंतए जाया याचि होत्या, से जहा इंगानसगडेड वा जाव हुयासणेइ वा भासरासिपलिच्छिण्णा तवणं तेरणं तवतेयमिरीए अईव उचसोभेमाणी २ चिट्टइ ॥१२॥ अ-कानी आर्या की उन उदार-प्रधान तपस्या के कारण यावत् नस-नस दिखाई देने लगी-वह अत्यन्त कृश और राल हो गई। जमे कोयलों मे भरी गाडी जब चलती है तो कड़-कड़ गन्द करती है, उसी प्रकार उनके शरीर की नदिया गटाने लगी। मगर यह आर्या तपस्या के तेज से प्रज्वलित अग्नि के समान देदीप्यमान थी। जैसे राख से गाग्नि प्रदीप्त रहती है, उसी प्रकार वह आर्या भी देदीप्यमान यी ॥१२॥ मूल-नए गं तोसे कालीए अजाए अण्णया कयाइ पुन्चरत्त वरत्तकालममयंसि अयमज्झन्थिए जहा बंदयम्न, नहा जाव अस्थि मे उट्ठाणं नाव पुरिसक्कारपरक्कमे जाव मे सेयं कल्लं नार जलते अज्ज- नंदग ग्रनं यापुन्छिना, अज्जचंदगाए अजाए अभगुण्णाए समागणीए संलेहणा झूमणा आराहणा भत्त- पाउपडियाइने कालं अगवकपमाणं विहरित्तए तिकट्टु एवं संपेहिता कन्लं जेणेव अजचंदणा अज्जा नेगा यागन्छा, उवागन्छिता अजचंदणं अजं बंदइ नमंसह, वंदित्ता नमंसित्ता एव वयासी-इच्छामि ण 'पनायो ! तन्मेहि प्रमगुराणाया ममागी मलेरणा जाब विहरित्तए । 'प्राई' ॥१३॥ -गाना- मानी गायों को मिली समय अन राशि के पश्चात् धर्म जागरगा करते हुए भगवतीमून मे HTTमुनि । ममान तिर उत्पना । गायत् जहां तक मेरे गरीर में गस्ति है, उत्यान, कर्म, बन, वीर्य, ८७८८८८८०८० - [ ११६ ] अंतकृशाङ्ग सूत्रम् प पुरुषकार और पराक्रम है, तब तक, प्रातःकाल होते ही आर्यचन्दना आर्यिका से पूछ कर, उनकी आज्ञा प्राप्त करके अन्तिम आराधना रूप सलेखना ग्रहण करके, आहार-पानी का परित्याग करके, मृत्यु की कामना न करते हुए विचरना मेरे लिए कल्याणकारी है । इस प्रकार विचार करके, प्रभात होने पर, वह आर्य चन्दना आर्या के पास गईं। वहाँ जाकर उन्हे वन्दन-नमस्कार किया । वन्दन-नमत्त्कार करके कहा-अहो आर्यिके ! आपकी अनुमति प्राप्त करके मै सलेखनाव्रत गहण करके विचरना चाहती हू। तव चन्दनवाला आर्यिका ने कहा-जैसे तुम्हे सुख उपजे वैसा करो ॥१३।। मूल-तएणं सा काली अज्जा चंदणाए अब्भणुएंणाया समाणी संलेहणा झूसिया जाब विहरइ ।१४। अर्थ-तत्पश्चात् चन्दना आर्यिका की अनुमति प्राप्त होने पर काली आर्या ने संलेखना का सेवन किया और यावत् काल की आकाक्षा न करती हुई विचरने लगी ॥१४॥ मूल-सा काली अज्जा अज्जचंदणाए अंतिए सामाइयमाइयाई एक्कारस अंगाई अहिज्जित्ता बहुपडिपुषणाई अढे संबच्छराइ सामण्णपरियागं पाउणिचा मासियाए सलेहणाए अप्पाणं भू.सिचा सढि भत्चाई अणसणाए छेदिता जस्सहाए कीरइ जाव चरिमुस्सासनीसासेहिं सिद्धा ॥१५॥ अर्थ-काली आर्या ने आर्य चन्दना के निकट सामायिक से लेकर ग्यारह अंगों का अध्ययन किया, पूरे आठ वर्षो तक साध्वीपर्याय का पालन किया, एक मास की सलेखना की, अनशन से साठ भक्तों का छेदन किया और अन्त मे जिस प्रयोजन के लिए मुण्डित हुई थी, उसे सिद्ध किया, यावत् चरम उच्छ्वास-निश्वास में सिद्ध हुई ॥१५॥ [ १२० ] प्रथम अध्ययन समाप्त द्वितीय अध्ययन सूत्रम् ८.रूरतसादर मूल-उक्खेवायो चीय अत्झयणस । एवं खलु जंवू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं चंपाणाम गगयरी होन्या । पुगभदे चेहए, कोगिए राया । तत्थ णं सेणियस्स रपणो भज्जा कोणियस्स रपणो चुन्त- माउया मुकानीनामं देवी दोत्था । जहा काली तहा मुकाली विणिक्खंता नाव बहूहिं चउत्थ जाव भावमाणा विहरड़ ॥१॥ अर्ग-उमरे अध्ययन का उत्क्षेप मुधर्मा स्वामी ने कहा हे जम्बू ! उस काल और उस समय मे चम्पा नामक नगरीयो । पूगंभा नाम नंन्य या । कोणिक नाम का राजा या। वहां श्रेणिक राजा की पत्नी और कोणिक राजा की चोटी माना नुसती नाम की रानी थी। जिस प्रकार काली रानी ने दीक्षा ग्रहण की, उसी प्रकार मुकाली ने भी। यावत् पदा-माम बेना आदि नामनरग एव सगम मे आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी ।।१।। मृन-तए गं मुकाली अज्जा अन्नया कयाइ जेणेव अज्जचंदणा अज्जा नाव इच्छामि णं अज्जो ! तुमहिं पमणुनाया समाणी कणगावलीतबोकम्म उवमंपज्जित्ताणं विहरित्तए । एवं जहा रयणावली नहा कल गायनी, नवरं निमु ठाणेमु अट्ठमाई करेइ जहा रयणावलीए छट्ठाई ॥२॥ नाए एक बार किमी मनग मुकाली आर्या नहीं नन्दनवाला भार्या यो वहाँ गई और वन्दना-नमस्कार ने नगी- नारी जागा हो तो मैं नानी तप बंगीकार करना चाहती हूँ। जिस प्रकार रत्नावली तप कहा १९६९ सूत्रम् अंत शाङ्ग 长长长长长长长长长长长长 है, उसी प्रकार कनकावली तप भी कहना चाहिए । विशेषता यह है कि रत्नावली तप मे तीन जगह जहाँ षष्ठभक्त कहे हैं, वहां कनकावली मे अष्टमभक्त (तेला) कहना चाहिए; अर्थात् प्रथम स्थान में आठ बेलों की जगह आठ तेले, तप के मध्य मे चोतीस बेलो की जगह चौतीस तेला और तोसरे स्थान मे आठ वेलों को जगह आठ तेला कहना चाहिए ॥२॥ मूल-एक्काए परीवाडोए संवच्छरो, पंच मासा, वारस अहोरत्ता ।३॥ अर्थ-इस तप को एक परिपाटी मे एक वर्ष पॉच मास और बारह अहोरात्र लगे ॥३॥ मूल - चउण्हं पंच वरिसा, नत्र मासा, अट्ठारस दिवमा, सेसं तहेव । नव वासाई परियाओ जाव सिद्धा ।।।। अर्थ-कनकावली तप की चारो परिपाटियों मे पाँच वर्ष, नौ मास, अठारह दिन लगे । शेष सब कथन पूर्ववत् 长长长长长长长长长长长长长 समझना । सुकाली आर्या नौ वर्ष तक सयम पाल कर यावत् सिद्ध हुई ।।४।। द्वितीय अध्ययन समाप्त तृतीय अध्ययन [ १२२ ] मूल-एवं महाकाली वि, णवरं खुड्डागसीहनिक्कीलियं तवोकम्मं उपसंपज्जित्ताणं विहरइ, तंजहा- . सूत्रम् उन्धं करट, करित्ता सब्यकामगुणियं पाण्ड, परित्ता छ8 करइ, करित्ता सबकामगुणियं पारइ, पारिता नउथं करेइ, करित्ता सयकाम०, अट्ठमं करेइ, करित्ता सब्बकामगु०, छ8 करेइ, करित्ता सबकाम०, दसमं करित्ता मयकाम०, अट्ठमं करेइ, करिता मञ्चकाम०, दुवालममं करेड, करित्ता सबकाम०, दसमं कोड करिना मध्यकाम०, चउदसमं करेड, करित्ता सञ्चकाम०, बालसमं करेइ, करित्ता सव्यकाम०, सोलसमं कोट, मध्यकाम०, चउद ममं करेंड, सव्वकाम०, अट्ठार समं करेंड, सबकाम०, सोलसमं करेड़, सव्वकाम, पीमामं करेड, मव्यमाम०, अट्ठारममं करेड, सधकाम०, वीसइमं करेइ, सञ्चकाम०,सोलसमं करेइ,सयकामगु०, ग्रामम कोड, मव्यकामगुणियं०, चउद्दसमं करेइ. मध्यकाम०, सोलसमं करेइ, सन्यकाम०, वारसमं करइ, मच्याम, नोदममं करोड, मन्चकाम०, दसमं करेइ, सबकामगु०, दुवालसमं करेइ, सव्यकाम०, अट्ठमं करेइ, मा काम०, दामं करेंड, मञ्चकाम०, छई करेइ, मञ्चकामगु०, पारेइ, अट्ठमं करइ, सबकाम०, चउत्थं कन्ड, मञ्चकाम०, परेड, छट्ट करेइ, सबकाम०, चउन्धं करेड, सब्ब० पारेइ ॥१॥ ri-ली प्रहार माहानी रानी का भी अधिकार जानना । विशेष यह है कि उसने लघुमिनिष्क्रीडित तप infri, य- गम ननुभक्त क्रिया, सब प्रकार के रमोपभोग कर पारणा किया, फिर पप्ठभक्त किया, मारिया. फिर ननुधभत्ता किया. पारणा किया, अटमभक्त किया, पारणा किया, पाठभक्त करके HIM, मग frला, पारा किया, आगमत करो पारणा किया,द्वादगमभक्त करके पारणा लिया, दशमभक्त Ifमा, गभाल कर पारगा किया, द्वादशभक्त करते पारणा किया, पोटश भक्त को पारणा किया, 7. पारमारिया, मत करो पारगा किया, पोउगमक्क करके पारणा किया, बीमभक्त कर 4212 4 24 । १२ ।
अंतकशाङ्ग सूत्रय पारणा किया, अष्टादशभक्त करके पारणा किया, बीसभक्त करके पारणा किया, षोडशभक्त करके पारणा किया, अष्टा- दशभक्त करके पारणा किया, चौदहभक्त करके पारणा किया, षोडशभक्त करके पारणा किया, द्वादशभक्त करके पारणा किया, चौदहभक्त करके पारणा किया, दशमभक्त करके पारणा किया, द्वादशभक्त करके पारणा किया, अष्टमभक्त करके पारणा किया, दशमभक्त करके पारणा किया, षष्ठभक्त करके पारणा किया, अष्टमभक्त करके पारणा किया, चतुर्थभक्त करके पारणा किया, षष्ठभक्त करके पारणा किया और अन्त में चतुर्दशभक्त करके पारणा । इस प्रकोर तपस्या करने पर इस व्रत की पहली परिपाटी पूर्ण होती हैं ॥१॥ मूल-तहेव चत्तारि परिवाडीओ । एक्काए परिवाडीए छम्मासा सच य दिवसा; चउण्हं दो वरिसा अट्ठावीस दिवसा । नाव सिद्धा ॥२॥ अर्थ-इसी प्रकार चारों परिपाटी समझना चाहिए। दूसरी परिपाटी मे विगयवर्जित पारणा, तीसरी में निर्लेप पारणा और चौथी परिपाटी मे आयबिल से पारणा किया; ऐसा कहना चाहिए। इस तपस्या की एक परिपाटी में छह मास और सात दिन लगे। चारों परिपाटियों में दो वष और अट्ठाईस दिन लगे । अन्त मे महाकाली आर्या ने संलेखना धारण कर यावत् सिद्धि प्राप्त की ॥२॥ 64 लघुसिंह निष्क्रीडित तप कोष्टक पोप [ १२४ ]
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ननीय अध्ययन ममाप्त
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तगोदिन १५४, पारणा दिन ३३, सब
मास ६, दिन ७ । चारो परिपाटियो
फे २ वर्ष, २८ दिन।
लघुमिह
लघुसिंहनिष्क्रीडित तप
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। १२५ ।
सुनम
अंतदृशाङ्ग सूत्रम् चतुर्थ अध्ययन 长长长长长 长长长长长长长长 मूल-एवं कण्हा वि, णवरं महालयं सीहनिक्कीलियं तवोकम्म; जहेव खुड्डागं, णवरं चोतीसइमं जाव नेयन्वं, तहेव ऊसारेयव्यं ॥१॥ अर्थ-इसी प्रकार कृष्णा रानी का वृत्तान्त भी जानना चाहिए । यावत् दीक्षा धारण करके कृष्णारानी ने महा- सिह निष्क्रीडित तप किया । जैसा लघुसिह निष्क्रीडितव्रत कहा है, वैसा ही महासिह निष्क्रीडित व्रत भी जानना चाहिए। इसमे विशेषता यही है कि लघुसिह निष्क्रीडित तप मे वीसभक्त (६ उपवास) तक तपस्या करके वापिस फिरते हैं, किन्तु इसमे चौतीसभक (१६ उपवास) करके पीछे फिरते है। शेष पूर्वोक्त प्रकार ही घटाना चाहिए ॥१॥ मूल-एक्काए परिवाडीए वरिसं, छ मासा अट्ठारस य दिवसा, चउण्डं छ वरिसा, दो मासा, वारस य अहोरत्ता, सेसं जहा कालीए नाव सिद्धा ॥२॥ अर्थ-इस तपस्या की एक परिपाटी मे एक वर्ष, छह महीने और अठारह दिन लगते हैं। चारों परिपाटियों में छह वर्ष, दो मास तथा बारह दिनरात लगते हैं । शेष वृत्तान्त काली रानी के समान जानना, यावत् सिद्ध हुई ॥२॥ चतुर्थ अध्ययन समाप्त [ १२६ ] पांचवां अध्ययन "गा মুগ मम --- सुकमा वि. गवरं मनमत्तमि भिकबुपडिमं उपज्जित्ताणं विहरइ । पढमे सत्तए एकके भावगम्य दनि पडिगाड एककेरक पाणयम्म, दोच्चे मत्तए दो दो भोयणम्म दो दो पाणगस्म पहिंगाहेड, नन्ने मनए निमिण भोयगस्म तिगिल पागयरस, चउत्थे चउ, पंचने पंच, बडे छ, मत्तम मत्तए मनदनीयो भोयाणम्म पडिग्गाहति; मत्त पारगम्म ॥२॥ पली मार मुका गनी का अधिकार जानना चाहिए । विशेषता यह है कि-उगने मप्त-मतमिला नामा निर्यातमा अगीकार की। क्या-पवम मान दिन तक मदेव एक दनि आहार की और एक दत्ति पानी को गहण । गोमती-मान दिन-दो दत्ति आहारती और दो दत्ति पानी की गलती। तीसरे सप्तक मे तीन दत्ति आहार और नीन पनि पानी की गहण की। उसी प्रकार नौगे नप्ता मे चार-नार दत्तियो, पनिये में पांच-पांन दत्तियां, ... पनि और मानव मे गात दति आदार और मात दत्ति पानी की गहग को ।।१।। मल-एवं पलु मनमत्तमियं भिक्युपडिमं गूगपएणाए गाडदिएहि रोग य बनउगणं भिक्षा - ari IT हिना जेणेव प्रजनंदगा अज्जा तेणेव उवागया ॥२॥ मगर का नाम मि प्रतिमा में उनावान अहोराा लगे । सब दनियां मिल र एक नौ : ममा अनुसार पापा जागान करके ज. आर्य नन्दना नामक आपिका वी. तां गया। MPANJAL -- [ १२. ] अंतकृशाङ्ग काकाकाकाको मूल-अज्ज चंदणं अज्ज वंदह नमसइ, बंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी-इच्छामि णं अज्जाओ! तुम्भेहिं अन्भणुण्णाया समाणी अहमियं भिक्खुपडिमं उवसंपज्जिचाणं वितरित्तए । 'अहासुह' ॥३॥ अर्थ-चन्दना आर्या के समीप पहुँच कर उनको वदना नमस्कार किया। वन्दना नमस्कार करके निवेदन किया- अहो आर्यिकाजी आपकी आज्ञा हो तो अष्टाष्टमिका नामक भिक्षुप्रतिमा अगीकार करके विचरू । चदन बाला आर्या ने कहा-जिस प्रकार सुख हो वैसा करो ॥३॥ मूल-नए णं सा सुवरहा अज्जा अज्जचंदणाए अब्भणुण्णाया समाणी अहमियं भिक्खुपडिम उवसंपज्जित्ताणं विहग्इ । पढमे अट्ठए एक्कक्क भोयणस्स दत्ति, एक्केक्कं पाणगस्स दतिं जाच अट्ठमे अट्ठए अहट्ट भोयणस्स दत्तिं पडिगाहेइ, अह पाणगस्स । एवं खलु एवं अहमियं भिक्खुपडिभं चउसट्ठीए राई- दिएहिं दोहि य अट्ठसीएहि भिक्खासएहिं अहासु जाव आराहित्ता नवनवमियं भिक्खुपडिमं उवसंपजित्ताणं विहरह ॥४॥ अर्थ-तत्पाश्चात् सुकृष्णा मार्या ने आर्य चन्दना की आज्ञा प्राप्त कर अष्टाष्टमिका नामक भिक्षुप्रतिमा अगो- कार की । इसमें पहले आठ दिनों तक एक दात आहार की और एक दात पानी की, दूसरे आठ दिनों तक दो दत्ति आहार की और दो दत्ति पानी की, यावत् आठवे आठ दिनों तक आठ दत्ति आहार की और आठ दत्ति पानी की ग्रहण की। इसकी आराधना में ६४ दिन लगे । सब दत्तियाँ दो सौ अठासो हुई । इस प्रतिमा का सूत्र के अनुसार आराधन करके नवनवमिका नामक भिक्षुप्रतिमा अगीकार करके विचरने लगी ॥४॥ (KKR 长长长长长长 [ १२८ ।
न सूत्रम (२.५ मूल-पढमे नवए एक. भोयग्णस्म दत्ति पडिग्गाडेइ, एक्के पाणयस्स, नाव नवमे नवए नव दनि भोयगरम पडिग्गाहेइ, नव पाणस्स, एवं खलु नवमियं भिक्खुपडिम एक्कासीए राईदिए, नहि पंचोचरेहि भिक्यासरहिं अहासू० ।। अयं-नगमिका, नामक भिअप्रतिमा मे प्रथम नौ दिनों में एक-एक दत्ति भोजन को और एक-एक दत्ति पानी को ग्रहण की, यावत् नो नवा मे नौ-नौ दत्तियां भोजन की और नौ-नो पानी की ग्रहण की । इस प्रकार नव- नामिका नामा भिभुपतिमा रायासी रानि-दिनो मे तया चार सौ पचहत्तर दत्तियो मे पूर्ण हुई ॥५॥ मूल-दसदमियं भिक्युपडिमं उपसंपज्जित्ताणं विसरत, पढमे दसके एक्कैकं भोयणस्स दनि पदिग्गादेड, एकरे पाणयस्म, जाव दसमे दसए दस दस भोयणम्स दतिं पडिग्गाहेइ, दस दस पाणयस्स । एवं चनु एयं दमदममियं भिक्षुपडिम एक्केणं राइदियसएणं अच्छेहि भिक्खासएहिं अहासुत्तं जाव साराहइ.६॥ ८९.. र -नापन्नात् ददामिका नामा भिशुपतिमा अंगीकार को । इसके प्रथम दस दिनो मे एक-एक नि गोगन की और एक-दत्ति पानी को, यावत् दगवें दम दिनों में दम दत्तियों भोजन की ओर दस दत्तियां पानी की । म पीना तो आरापना में नौ दिन लगे । सब दत्तियां पचास कम छह नो (५५०) हुई । इस प्रकार गून के मृगार पाया प्रतिमा का नारापन किया ॥६॥ पन- पाराविना बर्हि नउत्य जाव मामद्धमास विविइतवोकम्मेणं अप्पार्थ भावेमाग्या विहरइ 1७॥ १२.
अतहदशाङ्ग सूत्रम् 长长长长长长 अर्थ-दशदशमिका भिक्षुप्रतिमा का सेवन करने के बाद सुकृष्णा साध्वी बहुत-से उपवास, बेला, मासखमण, अधमासखमण आदि अनेक प्रकार के तप करके अपनी आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी ॥७॥ मूल-तए णं सा सुकण्हा अज्जा तेणं उरालेणं जाव सिद्धा । निक्खेवो। अर्थ-तदनन्तर सुकृष्णा आर्या उस उदार तपस्या से दुर्बल हुई यावत् अन्त में सलेखना करके सिद्ध हुई ॥८॥ पांचवे अध्ययन का निक्षेप । पांचवां अध्ययन समाप्त षष्ठ अध्ययन 长长长长长长长长长长长长长长长 मूल-एवं महाकण्हा वि, णवरं खुड्डागं सब्बोभद्द पडिमं उवर्मपज्जित्ताणं विहरइ, तंजहा- चउत्थ करेइ. करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारेत्ता छट्ट करेइ, करेत्ता सव्वकामगु० पारेइ, पारेत्ता अट्ठमं करेइ, करेत्ता सम्बकाम० पारेइ, दसमं करेइ, सब० पारेइ, दुवालसमं करेइ, सब्वकाम०, पारेत्ता अट्ठमं करेइ, करेत्ता सवकाम०, पारिता दसमं करेइ, करेत्ता सव्वकाम०, पारेत्ता दुवालसमं करेइ, करेत्ता सव्वकाम०, पारिचा [ १३० ] ":"मान मूत्रम् उन्यं करेड, कंचा मनकाम पारिता ?' करेइ मनकाम०, पारिचा दुव लसमं करेड, करिना सबकाम०, पारेता चउत्यं कइ, करिता सम्बकाम० पारेइ, पारेचा छड करेइ, सरिता मञ्चकाम०, पारेचा अट्ठमं करे, करचा मब्य०, परिचा दममं करइ, व रिता सन्च०, परिचा घट्ट करेइ, करिचा सन्चकाम०, पारिता अट्ठमं करंड, करिता मध काम०, पारेता दयमं करेइ, करित्ता सन्चकाम०, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता मन्य काम०, पारित्ता चउन्यं करइ, करित्ता मनकाम०, पारित्ता दसमं करेड, रित्ता सव्यकाम०, परित्ता दुवानमम कन्ड, करित्ता सव्यकाम०. परित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सधकाम०, पारेत्ता छ8 करेइ, करित्ता मध्यकाम, परित्ता अट्ठमं करड, करित्ता मव्यकाम० पारेइ ॥१॥ अयं-इनी प्रकार महाकृष्णा रानी भी दोशा धारण कर विचरने लगी। विगेपता यह है कि महाकृष्णा ने छोटी गवंतोगतिमा को माराधना का । उनकी विधि इस प्रकार है-मनप्रथम नतुर्थभक्त किया, गर्वकामगुणित पारणा किया. गेली पाठक करके पारणा किया, अष्टमभक्त करके पारगा किया, दगमभक्त परके पारणा लिया, द्वादरामभक्त करा पाया किया, फिर आटमभक्त करके पारणा किया, दामभक्त करके पारणा किया, दागमभक्त करने पारणा किया, नाभिक सरो पारगा किना, पठभक्त करके पारणा किया, दादगमभक्त करके पारणा किया, नतुयंभक्त करो पारा गिरा, फिर भक्त, अष्टमभक्त, दामभक्त, गप्ठमक्त, अप्टमभक्त, दशमभक्त, द्वादशमभक्त, नत्तुर्थभक्त, दशमभक्त Tी, नमक, ', मन्न, और अष्टमभक्त किया । इन 4 के बीन मे मकानगुणित पारणा किया ||१|| Tech सूत्रम् मनमवार भद्रप्रतिमा २ m ४ ५ ३ ३ ४ Kokhmeticket ५ २ ५ २ ४ १. ३ مسله مرس २ ४ ५ १ कामकाज ३ तपोदिन ७५, पारणा दिन २५ मूल-एवं खलु एयं खुड्डागसव्वोभद्दम्स तवोकम्मस्स पढमं परिवाडि तिहिं मासेहिं, दसहिं दिवसेहि, अहारत्त नाव आराहेत्ता दोच्चाए परिवाडीए चउत्थ कोइ, करित्ता विगइवज्ज पारेइ, । जहा रयणावलीए तहा एत्थ वि चत्तारि परिवाडीओ, पारणा तहेव । चउण्हं कालो संवच्छरो, मासो दस य दिवसा, सेतं तदेव जाव सिद्धा निक्खेवो ॥२॥ अर्थ-यह लघु सर्वतोभद्र तप की पहली.परिपाटी है । इसे तीन मास एवं दस दिन में शास्त्रानुसार यावत् आरा- धन करके दूसरी परिपाटी आरंभ की । उसमें चतुर्थभक्त आदि तपस्या प्रथम परिपाटी के अनुसार ही की, परन्तु पारणा [ १३२ ] 1666 , बचमाज मूमम गिनित किया। तीसरी परिसाटी में निलप आहार से और चौयो परिपाटी मे आयंबिल से पारणा किया। इस प्रकार जमे रहनावी तपकी चार परिपाटियो मे पारणा की विधि कही थी, वैसे ही यहां भी समझना चाहिए । इस तपस्या की नारा परियाटियों में एक वर्ष, एक मास और दस दिन लगते हैं । शेप वृत्तान्त पूर्ववत् है, यावत् मुकृष्णा ने अन्त मे सले- गना रके निदि प्राप्त की।छठे अध्ययन त निक्षेप ॥२॥ - छठा अध्ययन पूर्ण सातवां अध्ययन मूल-एवं वीरकराहा घि, गयर महालयं सवप्रोभद तबोकम्म उपसंपब्जित्ताणं विहरइ । तंजहा- चऊ कर, करित्ता सव्वगुणियं पारेइ, पारेत्ता छ?' करेइ, सव्यकोम०, अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्यकाम०, दममं करेद, सरित्ता सन्चकाम०, पालम करेइ, सत्यकाम०, चोदसमं करेइ, सबकाम०, सोलसमं करेइ, सयकामगुण, एका लया ॥१॥ 6here सर्प-चौरागा रानी का भी वृत्तान्त इसी प्रकारका जानना चाहिए, यावत् दीना वारण करके विविध प्रकार मात करने लगी। इनमे रिशेषता यह है fo-महासर्वतोभद्रप्रतिमा रूप ता अगीकार किया। वह इस प्रकार-सर्वप्रथम पशुपंगत रिपा, सपं प्रकार के रस का उपभोग करके पारणा फिया, इसी प्रकार पप्ठभक्त करते पारणा किया, अप्टम- [ १३ ॥
संतकृशाङ्ग सूत्रम् भक्त करके पारणा किया, दशमभक्त करके पारणा किया, द्वोदशभक्त करके पारणा किया, चौदहभक्त करके पारणा किया, सोलहभक्त करके पारणा किया। यह पहली लता है ॥१॥ मूल-दसमं करेइ, सव्वकामगुण०, दुवालससं करेइ, सबकामगुण० चोदममं करेइ, सचकाम०, सोलसमं करेइ, सब०, चउत्थं करेइ, सधकाम०,8 करेड, सबकाम० अट्ठमं कग्इ, मन्च०, बीया लया ।२। 长长长长长长 अर्थ-दशमभक्त करके पारणा किया, द्वादशमभक्त करके पारणा किया, चौदहभक्त करके पारणा किया, सोलह- भक्त करके पारणा किया, चतुर्यभक्त करके पारणा किया, पष्ठभक्त करके पारणा किया, अष्टमभक्त करके पारणा किया। यह दूसरी लता है ॥२॥ मूल-सोलममं करेइ, सन्न काम गुणं०, चउत्थं करेइ, सव्वकाम०, छ8 करेड, सबकाम०, अट्ठमं कोइ, सम्मकामगुण, दसमं करेइ, सबकाम०, दुवालसमं करेइ, सबकाम०, चउद्दसमं करेइ, सव्वकाम० तइया लया ॥३॥ अर्थ-षोडशभक्त करके पारणा किया. चतुर्थभक्त करके पारणा किया, पष्ठभक्त करके पारणा किया, अष्टमभक्त करके पारणा किया, दशमभक्त करके पारणा किया, द्वादशमभक्त करके पारणा किया, चौदहभक्त करके पारणा किया, । यह तीसरी लता ॥३॥ [ १३४ ॥ मूल-अट्ठमं करेइ, सव्वकोम०, दसम करेइ, सव्वकाम०, दुवालसमं करेइ, सव्वकाम०, चोदसमं घामान कंग्ड, मध्यकाम०, मोनममं करेड, मञ्चकाम०, चउत्थं कन्ह, सबकाम०, छ8 करेड, सचकामगुणं पारइ, चउभी लया ॥४॥ -अटमभक्त कर पारगा किया, दगमभक्त कर पारणा लिया, द्वादगमभक्त कर पारणा किया, नौदहमक तारा किया, गोभक्त कर पारणा किया, चतुर्थभक्त कर पारणा किया, पप्ठभक्त करके पारणा किया, यह गौची .ता ८८.८..ccc मून - उमममं करेइ, मनकाम०, मोजमर्म कोइ, मयकाम, चउत्थं कंड, मध्यकाम०, बटुं कोड, नयकाम, ग्रामं रेड, सव्यकामगु०, दमम करेड, सचकाम०, दुबालसमं करेइ, मधकाम, पनमा ला || 7-नगमन करके गर्व कामगुगित पारणा ख्यिा, पोटगभक्त करके पारणा किया, चतुर्पभक्त करो पारणा शिला, मत. तर पारणा न्यिा, अष्टमभक्त करके पारगा फिया, दगमभक्त करके पारणा किया, द्वादशभक्त करो पार किया, यह पानी लता ॥५॥ मन-छह कइ, मव्य काम०, अट्टम कोड, मनकाम०, दममं करेइ, मव्यकाम०, दुवालसमं करेड, काम, नोदाम क०, मध्याम०, मोलमम कोइ, सन्यकाम०, चउत्थं क०, समसाम०, छठी लया ६। -मन, ममत, सममरत नाराभक्त, नतुशभक्त, पोउशभक्त और नतुर्थभक्त किया इन सब [ १३५ ] भंतशाङ्ग सूत्रम .tr बीच में सर्वकाणगुणित पारणा किया, यह छठी लता है ।।६।। मूल-दुवालसमं करेइ सम्बकाम०, चोदममं कह, करित्ता सबकाम०. सोलसमं करेइ, सबकाम, चउत्थं करेइ, सव्वकाम, छह करेइ, २ सव्वकाम०, अट्ठमं करेइ, सबकाम०, दसमं करेइ, सव्वकाम०, सत्तमी लया |७|| httCk अर्थ-द्वादशभक्त, चतुर्दशभक्त, षोडशभक्त, चतुर्थभक्त, षष्ठभक्त, अष्टमभक्त और दशमभक्त किया, इन सब उपवासों से बीच सर्वकामगुणित पारणा किया, यह सातवी लता है । । मूल- एक्केक्काए कालो अट्टमासा पंच य दिवसा, चउगह दो वासा, अट्ठ मासा, वीसं दिवसा । सेसं वहब जाच सिद्धा ||८|| अर्थ-इस तपस्या को एक-एक परिपाटी मे आठ-आठ महीना, पांच-पांच दिन लगते हैं। चारों परिपाटियों में दो वर्ष, आठ महीना और बीस दिन लगते है। शेष सब पूर्ववत् ही जानना चाहिए ।।८।। सातवां अध्ययन समाप्त [ १३६ ।
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सूत्र अंतादृशाङ्ग 长长 पाठवां अध्ययन मूल-रामकण्हा वि, णवरं भदोचरपडिमं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ, संजहा-दुवालसमं करेइ, करिचा सव्यकाम० गुणिय पारेइ, पारेचा चोदममं करेइ, करिता सम्वकाम० पारेइ, सोलसमं करेइ, करेत्ता सबकोम० पारेइ, पारेचा अट्ठारसमं कर इ, करित्ता सव्वकाम० पारेइ, पारेत्ता वीसइयं करेइ, करेत्ता सव्वकाम गुणियं पारेइ, पढमा लया ॥१॥ अर्थ-रामकृष्णा रानी का अधिकार भी इसी प्रकार जानना चाहिए । विशेषता केवल यह है कि वह भद्रोत्तर प्रतिमा नामक तपश्चर्या अगीकार करके विचरने लगी। वह इस प्रकार है-द्वादशभक्त (पांच उपवास) करके सर्वकामगुणित (सब रसों के उपभोग की जिसमे छूट हो ऐसा) पारणा किया फिर चतुर्दशभक्त, सोलह भक्त अष्टादशभक्त और वीसभक्त किया । सव के बीच मे सर्वकामगुणित पारणा किया। यह पहली लता हुई ॥१॥ मूल - सोलसमं करेइ, सव्यकाम० अट्ठारसमं करेइ, सव्वकाम, वीसइमं करेइ, सबकाम, दुवालसमं करेइ, सबकाम०, चोदसमं करेइ, सव्वकाम० पारेइ । बीया लया ॥२॥ अर्थ-षोडशभक्त (सात उपवास), अष्टादशभक्त (आठ उपवास) विशतिभक्त (९ उपवास) द्वादशभक्त और चतुर्दशभक्त (छह उपवास) किये । इन सब के मध्य मे सर्वकामगुणित पारणा किया। यह दूसरी लता हुई ॥२॥ मूल-वीसइमं करेइ, सव्वकाम०, दुवालसमं करेइ, सब्वकाम०, चोद्दसमं करेइ, सबकाम०, सोलसमं करेइ, सबकाम०, अट्ठारसमं बरेइ, सव्वकार० तइया लया ॥३॥ 大长长长长长长长长长 长长长长 长长长长长 [ १३८ ]
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सूत्रम शान सर्वतोभद्र प्र० २८.५ ५ ६ । ७ ७ । ८ ५ ७ .kkkस्त्र ww wlwlisa 8 ५ ७ w ७ ६ ७ & ५ तपोदिन ३९२ पारणादिन ४६ सब ४४२ दिन 长长长长长的 नवम अध्ययन नोकामना मूल-एवं पिउसेणकण्हा वि, णवरं मुत्तावलीतवोकम्मं उपसंपज्जित्ताण विहरइ, तंजहा-चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारिता छह करेइ, करेत्ता सव्वकाम०, चउत्थं करेइ०, सबकाम०, अट्ठमं क०, सव्वकाम०, चउत्थं क०, सबकाम० दसमं क.०, सबकाम०, चउत्थं क०, सव्व०, दुवालसमं क०, सच- काम०, चउत्थं करेइ, सबकाम०, चोद्दसमं करेइ, सबकाम०, चउन्थं करेइ, सचकाम०, सोलसमं करेइ, सन्ध- [ १४०॥ net मान सूत्रमा .. कामगु०. चउन्यं बरेड़, मच्चकाम०, अट्ठारसम०, सधकाम०, चउत्यं करेइ, सच काम०, वीसइमं करेड, सन्ध- काम, चउत्यं०, मचकाम०, यावीसइम करेइ, सन्चकाम०, चउन्थं कसब०, चउची सइमं क०. सव्व०चउत्थं करे मध्य., छच्चीमइमं करेड, गव्यकाम०, चउत्थं क., सबकाम०, अट्ठावीमइमं करेइ , सबकाम०, चउत्थं फोड़., मध्य , तीगइमं कोइ, सन्ध. बत्तीसइमं क., सव्यकाम०, चउत्थं करेड, सब० चोत्तीसइमं क. सव्य० उन्ध क. मन्य चोनीमहमं करंड, सब्ब० उत्यं क., सव्व० यत्तीसइम क , सव्यकाम०, चउत्यं क., मनकाम०, एवं नव प्रोमारेइ जाव चउत्थं करेइ, करेता मन्चकामगुणियं पारेइ ॥१॥ मां-पितृन हप्ता रानी का भी वृत्तान्त इसी प्रकार का है । विशेषता यह है कि दीक्षा अंगीकार करने के उगने मुक्तावली नामत तपश्चर्या अगीतार की। वह इस प्रकार है-चतुर्थभक्त करके सामगुणित पारणा किया, शिनमक करके पारगा किया, चतुर्वभक्त करके पारणा किया, इसी प्रकार अप्टमभक्त, पारणा, चतुर्गमक, पारणा, मगरक, पारगा, चनुभक्त, पारणा, दादगभक्त, पारणा, चतुर्थभक्त, पारणा, चतुर्दशभक्त, पारणा, चतुर्थभक्त, पारणा, पानात, पारपा, गतुगंगा, पारगा, अठारहमत, पारणा, चतुर्थभक्त, पारणा, वीसभक्त, पारणा, नतु भगत, पारणा, गगन, पागा, नतुगत, पारगा, नोयोगमक्त, पारणा, छब्बीसभक्त, पारणा, चतुर्थभक्त, पारणा, अट्ठाईसभक्त, पानभरा, पारगा, तीनभात, पारणा, नतु भात, पारणा, बत्तीसभात्त, पारणा, चतुर्थभक्त, पारणा, नौतीस- ना और पारा, पर्वात चीन-चीन में एक-एक उपवास करते हुए सोलस उपवास तक चढना और फिर चौतीस- भानो उगवान से पूर्वोत्त प्रम मे उतरना, यावत् एक उपवास करके पारणा करना । सब जगह पारणा मगमन नमाना या मुमताली तप की प्रथम परिपाटी है ।।१।। मूल- एकाए परिवाडीग कालो एक्वारन मासा पनरस य दिवसा, चउण्डं कालो तिरि वासा दस Loks.८८रूर - [ १४१) य मासा । सेसं तहेव जाव सिद्धा ॥२॥ मतदृशाङ्ग आर्थ-इस बत्त की भी चार परिपाटियां हैं। प्रथम में पारणा में सर्व रसों का उपभोग किया जाता है, दूसरी में विगय का त्याग होता है, तीसरी में निर्लेप आहार से पारणा किया जाता है और चौथी परिपाटी में आयंबिल से पारणा किया जाता है । एक-परिपाटी में ग्यारह मास और पन्द्रह दिन लगते हैं। चारों में तीन वर्ष और इस मास लगते हैं । घोष वृत्तान्त पूर्ववत् समझना यावत् सिद्ध हुई ।।२।। 会长长长长长长长长长长长长 此长长长长长 [ १२ [.txt] नयम अध्ययन पूर्ण का maa name- I LE एसको एक परिपाटी के दपोदिन ३००, पारणादिन ६०, सब एक वर्ष चार परिपाटियो मे चार वर्ष लगते है । तप बारा दशम अध्ययन [ सूप तकरवाज berkhne ke मूल-एवं महासेणकराहा वि, णवरं-प्रायंबिल वड्ढमाणं तवोकम्मं उपसंपजित्ताणं विहरइ, तंजहा- आयंबिलय करेइ, करिचा चउत्थं करेइ, वे आयंबिलाई करेड, करित्ता चउत्थं करेइ, तिरिण आयंबिलाई करेइ, करित्ता चउत्थं करेइ, क्रेत्ता चचारि आयंबिलाई करेइ, करित्ता चउत्थं करेइ, करेता पंच आयंबिलाई करेइ, करिता चउत्थं करेइ करेत्ता छ आयंबिलाई करेइ, करित्ता च उत्थं करेइ करेचा सत्त आयंबिलाई करेइ, करिता चउत्थं करेइ, एकोत्तरियाए वड्डीए आयंबिलाई वड्दति, चउत्थतरियाई नाव आयंबिलसय करेइ, करेत्ता चउत्थं करेइ ॥१॥ अर्थ-महासेनकृष्णा का वृत्तान्त भी ऐसा ही है । विशेषता केवल यही है कि-महासेनकृष्णा रानी ने दीक्षा धारण करने के पश्चात् आयबिल वर्द्धमान तपश्चर्या की आराधना की। उसकी विधि इस प्रकार है-एक आयंबिल करके उपवास किया, दो आयबिल करके एक उपवास किया, तीन आयविल करके एक उपवास किया, चार आयबिल करके एक उपवास किया, पाँच आयबिल करके एक उपवास किया, छह आयबिल करके एक उपवास किया, सात. आयबिल करके एक उपवास किया, इस प्रकार एक एक आयबिल की वृद्धि करती और वीच-बीच मे एक-एक उपवास करती हुई सौ आयबिल तक पहुंची। सौ आयबिल करके एक उपवास किया ॥१॥ मूल-तए ण सा महासेणकराहा अज्जा आयंबिलवड्डमाण तवोकम्मं चउदसवासेहिं तिहि य मासेहिं वीसइ अहोरो हिं अहासुत्त नाव सम्मं कारणं फासेइ जाव पाराहेइ । श्राराहिता जेणेव अज्जचंदणा का पोको . पज्जा नेगेव आगन्छइ, उवागन्छित्ता अज्जचंदणं अज्ज वंदइ-नमंसद, बंदिचा नमंसित्ता चहूहिं चउत्येहिं जार मापाणं भावमागी विहरइ ॥२॥ सुजन उप-इन महामेनामा आर्या ने आयबिल पद्धं मान तप चौदह वपों, तीन महीनों बोर वीस दिनों में, सूत्र के गुमार गम्या प्रकार मे आराधन किया । नागबन करने के बाद जहां चन्दनवाला आयिका थी, वहां गई। जाकर वन्दन- नमार र बदत-गे आवाग बेला तेला मादि तप करती हुई आत्मा तो भावित करती हुई विचरने लगी ॥२॥ मूल-नए णं मा महासेगकण्हा अज्जा तेणं उरानेणं जाव उवसो मेमाणी चिइ । ३॥ अगदानान् महामेनकृष्णा आर्या उन उदार-प्रधान तप के कारण यावत् अतीव शोभती दुई विचरने लगी। मल-ताए गं तीने महासेरणकगहाए अण्णया कयाई पुघरचावरत्तकालसमयंसि चिंता जहा बंध- यम्य वाव अजनंदगं अज्ज गापुच्छइ, यापुच्छिचा नाव संलेहणा नाव कालं अणवखमाणी किरह ॥४॥ - नन्तर महामेना गा मार्या को किसी समय आधी रानि व्यतीत हो जाने के पश्चात् सन्मा मुनि के मनात विचार अपरदा । गायत् उन्होंने प्रायं चन्दना से पूछ कर यावत् नंगना अंगीकार करके गायत् कान को यात्रा नोनिनेगी 11 मूल-तप गं ना महासन्धकपडा अन्जा, अज्जचंदणाए अज्जाए अंतिए सामाइयमाझ्याई एक्का- ग्ग मंगाई पमिनिचा वपडिपुरागाई सचरस वासाई परियाय पाउखिचा मासियाए संलेरणाप चावं [ १४५ 长长长长 सूत्रम् अंतकृशाङ्ग झूसिता सहिमचाई अणसणाए छेदिचा जसहाए कीरइ जाव तम8 आराहेइ, चरमेहि ऊसासनीसासेहि सिद्धा युद्धा॥॥ अर्य-अन्त में, महासेनकृष्णा ने आर्यचन्दना आर्यिका से सामायिक से लेकर ग्यारह अंगों का अध्यनन करके, पूरे सत्तरह वर्ष तक सयम का पालन करके, एक मास की संलेखना का सेवन करके, साठ भक्त अनशन से छेद कर, जिस प्रयोजन के लिए प्रमज्या अगीकार की थी, उसे पूर्ण किया और अन्तिम श्वासोच्छ्वास के बाद सिद्ध-बुद्ध हुई यावत् सर्व दुखों का अन्त किया ॥५॥ मन-अट्ट य वासा आदी, एकोत्तरियाए जाव सरस । एसो खलु परियारो, सेणिय मज्जाण पाययो ॥१॥ का . अर्थ-पहली काली नामक आर्या ने आठ वर्ष तक संयम का पालन किया, दूसरी सुकाली आर्या ने नौ वर्ष, तीसरी ने दस वर्ष, इस प्रकार एक-एक वर्ष बढाते-बढाते दशवी ने सत्तरह वर्ष संयम का पालन किया। यह श्रेणिक राजा की रानियों के संयम का काल जानना चाहिए ॥१॥ दशवां अध्ययन समाप्त 大长长长长 [ १४६ सूचन "चान - उपसंहार मुल-एवं बलु बं! समग भगवया महावीरेणं आइगरेणं नाव संपत्तेणं अहमरस अंगस्स अंत- गढदसागं अयम8 पनगरे । अन्तगाउदसागं अंगस्स एगो सयक्वंधो, अट्ट बग्गा, अट्ठमु चैव दिवसेसु उदिसिज्जति । तत्थ पढम-नियवग्गा दम-दस उदेसगा, तइयवग्गे तेग्म उद्दे सगा, चउत्थ-पंचमवग्गा दस-दस उद्देसगा, छ- गे मोलम उसगा, सत्तामवग्गे तेरम उदे मगा, अहमवग्गे दम उद्द सगा। इति अंतगडदमासु सम अर्य-योनुपर्मा न्यामी बोले-हे जम्बू ! श्रमण भगवान् महावीर, घमंतीयं की आदि करने वाले यावत् मुक्तिप्राप्त में बाटा अंग जन्तालसा का यह अयं कहा है। जनता पंग का एक तरूप है, आठ वर्ग हैं, आठ दिनों में उनका उद्देश होता है। प्रगम और स्विीर वर्ग मे दन-दन उगा है, तीसरे वर्ग मे तेरह, चौथे-पांचवें वर्ग में दस-दस, एके वर्ग में नोनदा माता मे तेरह और नाटो नगं में दन उद्देशक है । मन्तकद्दशासन समाप्त १४० ]
अंतकृशाङ्ग
सरकारकत्सकलसरूल्सयम
關
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सूत्रम्
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