Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Seetri

Shri Kalu · 2012/02/01

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नमो सिरि-तवगच्छायरिय-सयलागमरहस्सवेदीणं- सिरिविजयदाणसूरिगुरूणं । प्राचीनाचार्यकृतान्ताष्य-चूर्णिसहिता चिरन्तनाचार्यकृता सित्तरी। -~- सम्पादक:-परमार्हत-श्रीकुमारपालदेवशासनपुनीतश्रीअणहिलपुरपत्तनवास्तव्यो-मोजकजातीयः-मुश्रद्धासंपन्नो- मोहनलालात्मजः पंडितोऽमृतलालः । >> वि० सं० १९९९ ] [वीर म २४१० ENTERTICASSETTE मूल्य-रु ३-०-० प्रतय ७०० * प्राचार गनरपानार" मा मनो-धा मुनाया मानमविय, श्रीमाली वगा मु. भोई सित्तरीना प्रकाशनमा द्रव्य सहायकोना मुपारक नामो २०१) अमदावादनिगमी धर्मप्रेमी गाह शनालाल इकमचंदना गगास्वरूप धर्मपत्नी धीरनन्हेन, परम पूजनीय परम कारणिक गुरुदेर महामहोपाध्याय श्रीमद् नयूविजयजी गणियरनी शुभ निश्रामा श्री विनयदानसूरीश्वरजी ज्ञानमदिर. अने पौषध शाळाना मुबर अने मनोहर व्याख्यान हॉलमा सं १९९८ ना अशाट म ६ थी फरावया माडेला श्री भगवती महाबनना भवणनी पुण्यस्मृति निमित्ते । २००) मांगरोळनिवासी धमप्रेमी शाह जगमोहनदाम जेठालाल २००) अमराबाद निवासी धर्मग्रेमी शाह चीमनलाल कालीदास मुरक -या एकाचद भाइ थी महोदय प्रिन्टींग प्रेस, दारापीठ-भावनगर RECIP. anma विषयानुक्रमणिका पत्र पत्र गाथा २-३ ४ १ २ विषय प्रकाशकनुं निवेदन। प्रस्तावना । शुद्धिपत्रक। ग्रन्थसमर्पण। ताडपत्रीय बे प्रतिकृतिओ। ३ १२ ३ ३ ४ ३-४ विषय होय ? तेना उत्तरमा अनेक विकल्पो। मूलप्रकृतिओने आश्री चन्ध, उदय अने सत्तामा प्रकृतिस्थानवर्णनादि । मूलप्रकृतिने आश्री वन्ध-उदय-सत्तास्था- नविषयक परस्पर सवेधना सात विकल्पो। मूलप्रकृति विपयक सवेधना सात विक- ल्पोनो जीवस्थानोने आश्री विचार । मूलप्रकृति विषयक सवेधना सात विक- स्पोनो गुणस्थानोने आश्री विचार । उत्तरप्रकृतिओनी प्रकृतिसमुत्कीर्तना । ज्ञानावरणीयकर्म अने अतरायकर्मनी ४ गाथा ४ १-२ ५ मंगलाचरण अने अभिधेयनिर्देश । बन्ध, उदय, सत्ता, उदीरणा, क्षपणा तथा उपशामनार्नु सामान्य स्वरूप । जीव केटली प्रकृतिओने बांधतो केटली वेदे ? अने केटली सत्तामा २ ५ ६ गाथा विषय उत्तरप्रकृतिखोने वामी बन्धादिस्थानोनु निरुपण अने तेमन परस्पर संवेध। -९ वर्शनावरणीयकर्मनी उत्तरप्रकरित्रोने आश्री बन्धादिस्थानोनु कवन । दर्शनावरणीयकर्मनी उचरप्रतिधोने आश्री पन्धाविस्थानोनो सवेष । उ. वेदनीय, भास्कर्म अने गोत्रकर्मने आश्री बन्धादिस्थानोनु निरूपण अने तेमनी सवेध मोहनीयकर्मना उत्तरप्रकृतिओने आश्री बन्धस्थानो। मोहनीयकर्मनी उचरपतिओने आश्री उदयस्थानो। गाथा विषय १२-१३ मोहनीयकर्मना उत्तरप्रकृतिओने आधी सत्तास्थानो। १४ मोहनीयकर्मनी उत्तरप्रकृतिकोना बन्ध स्थानोने लगता भागा । १५-२० उत्तरप्रकृतिने आश्री मोहनीयकर्मना बन्यस्थानोनो उदयस्थानी साथे संवेध, तेने लगता भोगायो, भागाबोनी सर्व सख्यानु प्रमाण अने पक्षवृन्दोनी सख्या । १०-१४ २१-२३ उत्तरप्रकृतिओने मामी योहनीयकर्मना बन्धस्थानोनो सप्तास्थानो साधे संवेध। २४ नामकर्मना उत्तरप्रकृतिओने आश्री बन्धस्थानो। नामकर्मना बन्यस्थानोना विकल्पो। २० ८-९ ९ ९ पत्र गाथा विषय २५-२७ नामकर्मनां उत्तरप्रकृतिओने आश्री उदयस्थानो तथा तेने लगता भांगा। २०-२६ २८ नामकर्मनां उत्तरप्रकृतिओने आश्री सत्तास्थानो। २६-२७ २९-३१ नामकर्मना बन्ध-उदय-सत्तास्थानोनो परस्पर सवेध। २७-३१ ३२-३७ आठे कर्मनी उत्तरप्रकृतिओनां बन्ध. उदय-सत्तास्थानो अने तेना सवेधना जीवस्थानोने आश्री स्वामीओ। ३१-३५ ३८-४९ आठे कर्मनी उत्तरप्रकृतिओना बन्ध- उदय-सत्तास्थानो अने तेना सवेधना गुणस्थानोने आश्री स्वामीओ। ३५-५० ५०-५२ आठे कर्मनी उत्तरप्रकृतिओनां बन्ध- गाथा विषय उद्य-सत्तास्थानो अने सवेधनो गत्या- दिमार्गणास्थानोने आश्री विचार । ५०-५४ ५३ आठे कर्मना उदीरणास्थानोने उदय- स्थाननी माफक समजी लेवानी भलामण । ५४ उदीरणा सिवाय उदयमा आवती एक- तालीस प्रकृतिओनां नामो । ५५-५६ ५५-५९ कया गुणस्थानमा कई प्रकृतिओ बधाय ? तेनु निरूपण। ५६-५८ शु बधी गतिओमा बधी प्रकृतिओ प्राप्य छे ? ए प्रश्रनु निराकरण । ५८-५९ उपशमश्रेणिनु स्वरूप । ५९-६३ अनन्वानुबन्धीनी उपशमना । ५९-६१ यथाप्रवृत्तकरणनु स्वरूप । ५९

पत्र
५९-६०
६३-६८
विषय
अपूर्वकरणनु स्वरूप।
स्थिविषावनु स्वरूप ।
अनुभागवावनु खरूप।
गुणणि वरूप
गुणसंक्रमण स्वरूप।
अनिवृत्तिकरणनु स्वरूप ।
मवातरे अनवानुवन्धीनी विसयोजनानु
.
६८
विषय
उपशमश्रणिधी प्रतिपात्तनो क्रम ।
६२-६६ क्षपकणिनु स्वरूप ।
६७-६८ क्षपकणिवाळा प्राणिना कर्मप्रकृतिवे
दनविषयक मतान्तर ।
झमकणि आरोहणनु अतिम फळ ।
विशेष ज्ञान माटे भलामण ।
सित्तरिप्रकरणनी रचनामां रद्दी गयेली
अणय पूरी करवा माटे बहुश्रुतीने
विज्ञप्ति अने दोपोनी क्षमायाचना ।
परिशिष्टानि ।
६९
दर्शनत्रिकनी उपशामना।
मोहनीयकर्मनी शेष प्रकृतिओनी
उपसामना।
६२-६३

प्रकाशकनुं निवेदन। आजे सित्तरी ग्रन्थ तेना भाष्य अने चूर्णि सहित प्रसिद्ध थाय छे, तेथी अमोने अनिर्वचनीय आनन्द थाय छे. श्रीमुक्तावाई- ज्ञानमंदिरनु आ नवमु प्रकाशन जाहेर थाय छे. अमारी आ ऊगती सस्था टूक वखतमा आटला सुदर अने सर्वोपकारी प्रकाशनोनो लाभ श्रुतभक्त जिज्ञासु जनोने सादर आपी शकी छे, ते पू. आगमप्रज्ञ प्रवचनप्रभावक प्रखरवक्ता सुविहिताग्रणी गुरुवर्य श्री उपाध्यायजी महाराज श्री जंबूविजयजी गणिवरना महान् उपकारने आभारी छे. आ ग्रन्थ कर्म विपयनो छे अने प्राकृत भाषामा छे. अत्यार सुधी ए अप्रगट रहेलो प्रथम वार प्रकाशित कराय छे. तेनु संपादनकार्य आ सस्थाना एक प्राण समा विद्वान् कार्यकर पंडित अमृतलाल मोहनलाले कयु छे तेओ पाटणना वतनी छे. केवल जैनाश्रित गणाती भोजक ज्ञातिना छे, छता तेओ केटला विद्वान् छे अने प्रभुश्री वीरशामनना केवा अडग श्रद्वालु तथा सत्यना खरा सेवक छे ए तेओए आ जटिल ग्रंथना करेला समर्थ सपादनथी वाचकोने स्वयमेव सुविदित थशे तेमना आ यशस्वी कार्यथी भोजक ज्ञाति तो शु परतु जैन कोम पण गौरव लेशे एवी अमोने खात्री छे. तेओनो आ प्रथम उत्माह छे. पूज्य श्री गुरुदेवना 3 शुभ आशीर्वाद अने टेकाथी ते सफलताथी पार उतर्यो छे एमा शकाने स्थान नथी.

आ अन्धना विद्वान् सपादके अन्य अने प्रन्यकर्ता आदि उपयोगी विपयो उपर प्रकाश पाडती एक ऐतिहासिक महत्त्व घगवती प्रस्तावमा लखेली छ, जे आ साये सामेल जछे स्टले सत्संबधि अमारे काई कहेवानु नयी सीपि आदि अनेक विषयोमा आजे नविन कपोल कल्पित प्ररुपणाओ करनार आचार्य श्री सागरानन्दसूरिनी उसूत्रीयता जगजाहेर छे तमणे, ' आठ वर्षनी अदर पण दीक्षा अपाय, अनादि मिथ्यात्वी प्रथम सम्यक्त्व पामे त्यारे सर्वविरती करता पण वधु निर्जरा करे छ, अनादि मिथ्यात्वी पहेलबहेल क्षायक सम्यक्त्व उपार्जन करे छ,' इत्यादि के कुमतो जैन समाजमा प्रगट कर्या छे आ पथनो स्वाध्याय करनाराने ते असत्य होवानु तेना विषयानुसार अचूक पूरवार बशे मौलिक जैन शाखोरूपी सूर्य ज्या सुधी श्री जैन शासनमा सपे छे त्यांसुधी सेमना एके कुमत टकी शके तेवा नथी, ते निर्विवाद छे कर्मसाहित्यमा आ अति उपयोगी पन्ध छे अभ्यासीओ, साहित्यप्रेमीओ, अने झानसमाहको आ महामूला प्रकाशनने शीघ्र अपनावी लेशे, ए स्पष्ट सुनिश्चित पात छे पूज्य श्री गुरूवय्ये आ प्रथनां घुफो विगैरे तपासी जवानी महती कृपा करी छे से साये आ सपादनमा विद्ववर्य मुनिरा जमी पुण्यविजयजीए पण स्तुत्य मदद करेली छे, ते उपरात पाटण, वडोदरा आदि मडारोना कार्यवाहकोए प्रतिओ पूरी पाडवानु सुदर सौजन्य ताब्यु छ, तेओ सर्वनो सेमज पूज्य श्री गुरुदेवना सदुपदेशथी आ ग्रन्थ प्रकाशनमा ध्यषहाय करी ज्ञानभ क्विी पुण्योपार्जन करनारा पुण्यशालीओनो पण आ स्थळे अमो भाभार मानीए छीए ॐशादि शाह खूबचद पानाचद विना। विक्रम संवत् १९९६ मा पूज्यपाद परम शासन प्रभावक व्याख्यात चूडामणि परम गुरुदेव उपाध्यायजी श्रीमद् जंबूविजयजी महाराज साहेबने मे प्रस्तुत ग्रन्थना सम्पादन माटे इच्छा दर्शावी. तेओश्रीए सम्मति आपी. मारा जीवनमां कोई पण पुस्तकनु सम्पादनकार्य नहि करेल होवाथी मन सहज आनाकानी पण करवा लाग्यु, पण प्रवर्तक श्री १००८ श्रीकान्तिविजयजी महाराजना शिष्य-प्रशिष्य पं० श्रीचतुरविजयजी तथा साक्षरवर्य मुनि श्रीपुण्यविजयजी पासे आठ वर्पथी सशोधनपद्धतिनु निरीक्षण करेल होवाथी आ ग्रन्थना सम्पादन माटे मने हाम थई । बेश क ते हाममा पूज्य श्री उपाध्यायजी महाराजना आशीर्वाद साथे उपर्युक्त मुनियुगलनी हुफ पण पायारूप हती। सित्तरी-प्रस्तुत प्रकरणनां सित्तरी सतरी सयरी सत्तरी सत्तरिया सयरिया तथा सप्ततिका ए प्रमाणे एकार्थिक नामो मळे छे। आ प्रकरण सीत्तेर गाथाओथी सूत्रित होवाथी तेनो सित्तरी एवो नामनिर्देश प्राचीनकाळथी थतो आव्यो छे । आज रीते वीजा केटलाय अन्थो तेमनी पद्यसख्या उपरथी नामांकित थयेला छे । एक समय एवो पण हतो के ज्यारे ते ते ग्रन्थोना पद्यसख्या- आना उदाहरण तरीके आचार्य शिवशर्मकृत शतक, आचार्य सिद्धसेनकृत द्वात्रिंशिकाप्रकरण, आचार्य हरिभद्रकृत पञ्चाशक- प्रकरण, विंशतिविंशतिकाप्रकरण, घोडशकप्रकरण, अष्टकप्रकरण, आचार्य जिनवल्लभकृत पडशीतिप्रकरण आदि अनेकानेक प्राचीनतम जैनाचार्यकृत प्रन्थोना नामोनो निर्देश करी शकाय तेम छे । " ( कर्मग्रन्थद्वितीयविभागनो प्रस्तावनामाथी ) . सूचक नामनी आगल ते ते प्रन्योनो विषम पीवी ग्रन्थनु माम स्थापित अतु। दाखला तरीफे दमणमत्तरी कालसचरी यात्रा सप्ततिका विचारपट्त्रिंशिका गुरुगुणपत्रिंशिका परमसुखपश्चविंशतिका विगैरे विगैरे । आ सवधमा एम कल्पना करी शकाय के सप्तविका निशिका पचविंशतिका आदि अन्धो वेटली ज पचसख्यावाळा अन्य प्रयोना अस्तित्वमा तेना विशेष ज्ञान माटे पटले सेळमेळ थवाना भयथी निश्चयात्मक ओळखाण माटे पोवानो अभ्रान्त नामनिर्देश मागी ले। अने तेथी ज पाछळथी रचा येला सित्तेर पद्यमय आदि ग्रन्थोने पूर्वाचार्योए विशेष नामथी विभूपित कर्या छ । आ उपरथी एम कडेवामा जरा य हरकत नथी जणाती के प्रस्तुत प्रकरणना रचनाकाल समये तेवु एके य सित्तेर पद्यमय प्रकरण नहिं होय, जेथी आ प्रकरणनु सित्तरी एखु सामान्य नाम प्रसिद्ध थयु हो । गाथासख्या-आ प्रकरणनी गाथासख्याना निर्णयमा आपसुधी बहु ज विसवाद रहो छ । प्राचीनमा प्राचीन ताडपत्रीय प्रतिओमा पण गाथाओनी सख्या एक बीजीथी विपम ज मळी आवे छे। आ वस्तुनु स्पष्टीकरण पृ पा मुनिमहाराज श्रीचतुरविजयजीसपादिव कर्मग्रन्थ द्वितीय विभागनी प्रस्तावनामा पू पा विर्य मुनि श्रीपुण्यविजयजीए कयु छे, छता अमने अमारा प्रस्तुत प्रकाशनमा ए वस्तुने पधारे विशद करवानी आवश्यकता जणाय छ । कर्मपन्य द्वितीय विभागमा सिचरि प्रकरणनी ७२ गाथाओ मूलगाया तरीके स्वीकारी छे अने तेने लगती विस्तृत छणावट प्रस्तावनामा करी छ, पख अमोए आ प्रकाशनमा सिसरीनी ७१ गाथाओ ज मूल गाया तरीके मानी छे । तेनु कारण ए छे के-उपर्युक्त फर्मप्रन्थ द्वितीय विभागा चउ पणुत्रीमा सोलस० ( गा० २५) ए गायाने पेना सम्पादकीए मूलगाथा तरीके मानी लीधी छे परतु ए गायाने चर्णिकारे " पाढंतरं " लखीने पाठान्तर गाथा तरीके निर्देशी छे, एटले चउ पणुवीसा सोलस० गाथा मूलनी नथी ए माटे चूर्णिकारनो सचोट पुरावो होवाथी सित्तरीप्रकरणनी ७१ गाथाओ घटित थाय छे । आद्य गाथाने मंगलगाथा तरीके समजवाथी सित्तरीनी सित्तेर गाथाओ बराबर थई जाय छे । विषय-प्रस्तुत प्रकरण खास अभ्यासनो ग्रंथ होईने टीका, टवा तथा विवेचन साथे अनेक वार मुद्रित थई चूक्यु अने तेथी ज तेने लगतु तज्ज्ञोए लखेल होवाथी अमोए ग्रन्थना विषय माटे विषयानुक्रमणिका जोवानी भलामण सिवाय कशु य लख्यु नथी । सित्तरीकार-पू. पा. मुनिश्री पुण्यविजयजीए कर्मग्रंथ द्वितीयविभागनी प्रस्तावनामां सित्तरीना कर्ता सबधी विस्तृत विवेचन कर्यु छे जे अमोए आवश्यक समजी अक्षरशः नीचे आप्यु छे. " सप्ततिकाप्रकरणकारने लगतो प्रश्न विवादग्रस्त छ । सामान्य प्रचलित मान्यता एवी छे के एना प्रणेता श्री चन्द्रर्पिमहत्तर छे, अने आ रूढ मान्यताने अनुसरवा खातर पूज्य गुरुवर श्री चतुरविजयजी महाराजश्रीए पण कर्मग्रन्थना प्रथम विभागनी प्रस्तावनामां अने आ विभागमा सप्ततिकाना शिर्पकमां " श्रीचन्द्रर्षिमहत्तरविरचित " एम जणाव्यु श्रीचन्द्रर्षिमहत्तरविरचित " एम जणाव्युं छे, परतु विचार करता आ रूढ मान्यताना मूळमां कोई पण आधार जडतो नथी । सप्तविका प्रकरण मूलनी प्राचीन ताडपत्रीय प्रतोमा चन्द्रर्षिमहत्तरनामगर्भित जे “ गाहग्गं सयरीए०" ( आ गाथा अमे १ संशोधनमा उपर्युक्त कां२ प्रतिमा ते गाया उपर अन्यकर्तृका चेयं गाथा एवो पाठ पण छ। (जुओ पत्र २० पृष्ठि १ टिप्पणी ८ मी) उपर लखी आन्या छीए) जोवामा आवे छे ए पण आपणने सत्सरिना प्रणेता चन्द्रर्षि महतर होवा मादेनी साक्षी आपदी नथी। ए गाया तो एटल ज जणावे छ के-" पन्द्रर्षि महत्वरना मतने अनुसरती टीकाना आधारे सत्सरिनी गाथा (७० ने बदले वधीने) नव्यासी थई छे"। वा उल्लेखमा सित्तरिप्रकरणनी गाथामा पधारो केम थयो एनु कारण ज मात्र सूचववामा आन्यु छे, पण एना कर्ता विपे एथी कशी य प्रकाश पडतो नथी । आचार्य श्रीमलयगिरि पण टीकानी शरुआतमा के अंतमा ए माटे कशु य जणावता नथी। एटले आ रीते सित्तरिना प्रणेता अगेनो प्रभ अणउकल्यो ज रहे छ । सिचरिप्रकरण चन्द्रपिमहचरप्रणीत होवानी मान्यता अमने तो भ्रममूलक ज लागे छे अने ए तेना अंतनी “ गाहम्ग सयरीएक गाथामा आवता चन्द्रर्षिमहत्तर ए नामश्रवण मात्रमाथी ज जन्म पामेल छे अने टवाकारे करेला असम्बद्ध अर्थथी प भ्रममा उमेरो थयो छ । खरु जोता चन्द्रर्षि महत्सराचार्य पचसग्रह मन्थनी रचना करी छे तेमा सग्रह करेला अथवा समावेला शतक, सप्ततिका, कषायप्राभृत, सत्कर्म अने कर्मप्रकृति ए पैांचे अथो चन्द्रर्षि महत्तरना पहेला थई गएल आचार्योनी कृतिरूप होई प्राचीन ज छे १ “गाहग्ग सयरोए गाथानो पर्थ टवाकारे आ प्रमाणे कर्यों छ- चद्रयहत्तरना मतने अनुसरवावाळी सित्तर गाथावडे आ अन्य रचायेक छ । तेमा टोकाकचरे रचली नवी गाथामो उमेरता नेवाशी याय छे ॥११॥ विवेचन-ए सप्ततिकापन्यकर्ता चश्महत्तर आचार्य तो पूर्व सित्तर ज गाथा करी हती' इत्यादि। (श्रेयस्करमडळनी आत्ति) २ सयगाह पच गया जहारिह जैग एत्य सखिता । दाराणि पच बहषा देण जाहस्थाभिहाणमिण ॥ २ ॥ पञ्चसग्रहः । पचाना शतक-मप्त अत्यारनी रूढ मान्यता मुजब खरेखर जो सप्ततिकाकार अने पंचसंग्रहकार आचार्य एक ज होत तो भाष्यकार चूर्णिकार आदि प्राचीन ग्रन्थकारोना ग्रन्थोमां जेम शतक सप्ततिका कर्मप्रकृति आदि ग्रन्थोना नामनो साक्षी तरीके उल्लेख मळे छे तेम पंचसंग्रह जेवा प्रासादभूत ग्रन्थना नामनो उल्लेख पण जरूर मळवो जोईतो हतो, परतु एवो उल्लेख क्याय जोवामां नथी आवतो ए एक सूचक वस्तु छे, अने आ उपरथी आपणे ए अनुमान करी शकीए छीए के 'सप्ततिकाना प्रणेता पंचसंग्रहकार करतां कोई जुदा ज आचार्य छे के जेमनु नाम आपणे जाणता नथी, अने ते प्राचीनतम आचार्य छ । मप्ततिकानो रचनाकाळ-भगवान् श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमणे तेमना विशेपणवंती ग्रन्थमा सित्तरी कर्मग्रन्थमा आवता विषयने अगे चर्चा करी छे त्या सित्तरिप्रकरणना नामनो उल्लेख कर्यो छे एटले आ प्रकरण महाभाष्यकार श्रीजिनभद्रगणि क्षमा- श्रमणना काळ पहेलां रचाई चूक्यु हतु ए निर्विवाद हकीकत छे । भगवान् श्रीजिनभद्रगणिनो समय विक्रमनी सातमी सदीनो गणाय छे, एटले ए पूर्वे आ प्रकरण रचायुं हतुं एम मानवामां कशी हरकत नथी। अहीं साथे साथे ए वात ध्यानमा रहे के महत्तर पद अने गर्षि सिद्धर्पि पार्श्वर्षि चन्द्रर्पि आदि जेवां ऋपिपदान्त नामो पञ्चसङ्ग्रह ।" ( पञ्चसंग्रह गाथा १ मलयगिरिटीका ) तिका-कषायप्राभृत सत्कर्म कर्मप्रकृतिलक्षणाना ग्रन्थानाम् , अथवा पञ्चानामर्थाधिकाराणा योगोपयोगमार्गणा-वन्धक-बन्दव्य बन्धहेतु-बन्धविधिलक्षणाना सङ्ग्रह बंधम्मि । भणिया उईरणाए, चत्तारि कहष्णु होजाहि ? ॥ ९१ ॥ " इत्यादिका गाथा । १ “ सयरीए मोहबधट्ठाणा पंचादओ कया पंच । अनियट्टिणो छलुत्ता, णवादओदीरणापगए ॥ ९० ॥ सयरीए दो विगप्पा, सम्मामिच्छ समोह- UTAR सामान्य रीने पाठला जमानानां होई सित्तरि प्रकरणनी रचनानो समय अने चन्द्रर्पिमहत्तर ए नामनो संबध पण विपमताभर्यों छ । ए कारणसर पण सितरिना प्रणेता चन्द्रषिमहत्तर ठरवा नथी । मित्तरिप्रकरणकार विपे करता विशेष अमे अत्यारे कशु ज कही शकता नथी ।" आ उपरात ' चन्द्रपिमहत्तर सितरिना प्रणेता नथी' ए विपेनो सबळ पुरायो श्रीचन्द्रषिमहचरना पोताना ज शब्दोमा मळी आवे छे-" एवमेकादश भद्गाः मततिकाकारमतेन ।” (जुओ पत्र-७ पृष्ठि २ नी टिप्पणी)। सप्ततिकाना निर्माताना सवधमा जेम टवाकारे भ्रम पैदा कयों छे ते ज रीते अवचूरीकार आदिए पण भ्रमित अर्थ लखीने आ वस्तुमा गुचषण ऊभी करेली छ । ज्या सुधी विशेष साधनसामग्री प्राप्त न थाय त्या सुधी मित्तरीप्रकरणना प्रणेता सबधी विशेष खुलासो थवो मुस्केल छे। अत्यारे तो फक्त एटल ज सिद्ध थयु के चन्द्रर्षिमहत्तर करता पूर्वकालीन कोई आचाय सित्तरिप्रकरणना निर्माता छ । सित्तरीचुण्णी-चूर्णिग्रन्थोनु महत्त्व अति घणु छ । जो ए प्रन्यो न होत तो टीकापन्थोनी रचना मुश्केलीभरी घनत, अथवा जेवी अने जेटली ए रचना विशद थई शकी छे तेवी ए न बनी शकत २ वस्तु आपणे अनेक टीकाकार आचार्योए पोताना प्रन्थनी आदिमा अता, वेम ज कोई कोई वार मध्यमा नोंघेल चूर्णिप्रन्थोना उपकारित्व अने प्राधान्य उपरथी सहेजे समजी सकीए छोए । आचार्य श्रीमलयगिरिजीए पण सप्ततिकाटीकानी आदि, मध्य अने अंदमा चूर्णिनो उपकार अने वेने ज अनुस- रीने टीकारचना थई शकी छे सेवु स्पष्ट जेणान्यु छ । टीकानी आदिमा श्रीमलयगिरिजीए "चूर्णयो नावगम्यन्ते, सप्तवर्मन्बु- अरनिश वर्णिविचारयोगाद् मन्दोऽपि शको विरर्ति विधानुम् । सप्ततिकाटीकानी बादिमा । 'परं चूर्णिता तद् नान विवक्षितमिस द्विभिः" एम लखीने चूर्णिग्रन्थो माटे बहुवचननो उपयोग कर्यो छे ते उपरथी सप्ततिकाप्रकरण उपर प्रस्तुत प्रसिद्ध कराता चूर्णिग्रन्थ उपरात बीजा पण चूर्णिग्रन्थो होवा जोईए एम मानवाने कारण छे परंतु हजु सुधी आ चूर्णिग्रन्थ सिवाय वीजी कोई चूर्णी अमारा जोनामां आवी नथी । आचार्य श्रीमलयगिरिजीए जे चूर्णिना आधारे टीका रची छे ते चूर्णि प्रस्तुत चूर्णि ज छे ए वस्तु टीकामा प्रमाण तरीके नोंघेला चूर्णिना पाठो उपरथी जाणी शकाय छे । चूर्णिनी भाषा-चूर्णि ए एक प्रकारनो प्राकृत टीकाग्रन्थ छ । प्राचीनकाळमां जैनसस्कृतिमा प्राकृत भाषाने मौलिकस्थान होई तेनी प्रत्येक कृतिओ-पछी ते सूत्र हो, नियुक्ति हो, भाष्य हो के गमे ते हो-प्राकृतभापामा ज गूथवामां आवती हती । ए नियमने अनुसरी चूर्णिग्रन्थोनी रचना पण प्राकृतभाषामां अथवा प्राकृतबहुलभाषामां करवामा आवती हती । प्रस्तुत सप्ततिका- चूर्णी पण ए नियमना अपवादरूप न होई एनी रचना पण प्राकृतप्रधान भाषामा ज थएली छे चूर्णिकार-सप्ततिकाचूर्णिकारे चूर्णिमां पोतानो नामोल्लेख कोई पण स्थळे कर्यो नथी । तेम ज आ विपे आचार्य श्रीमलय- चूर्णिकृत्-चूर्णिकार " सिवाय विशेष कशु य लखता नथी । एटले अमे पण चूर्णिकार कोण ? ए विषे कशुंज कही शकता नथी. आत्मानदसभा प्रकाशित कर्मप्रन्थ प्रथम विभागना परिशिष्टमा श्वेतावरीय कर्मसाहित्यविषयक ग्रन्थोनी नोंधमां सप्ततिका उपर चूर्णि टीकृता सम्यकू । अनुपकृतपरोपकृतार्णकृतस्तान् नमस्तुपें ॥" ( सप्ततिकाटीकाना अतमा )। स्माभिरपि न विवक्षितम्, एवमुत्तरत्रापि चूर्णिकारमार्गानुसरण परिभावनीयम् ।" ( गाथा ४७ मीनी टीकामा ) । " यैरेषा विषमार्था, सप्ततिका मुस्फु- गिरिजी पण सित्तरिनी टीकामां ॥

तथा श्रीचन्द्रर्पिमहचरकत प्राकृतटीका नोंधी छे। ते वे ग्रन्थो पैकी या ग्रन्थ चूर्णि छे, चन्द्रपिमहत्तरकृत प्राकृतटीका नयी, कारण के एक स्थळे चर्णिकारे चन्द्रपिमहचरना मवधी विरुद्ध प्रतिपादन कर्यु छे पटले आ पूर्णिना कर्ता चन्द्रर्पिमहत्तर नयी ए निर्विवाद वात छ । चूर्णिग्रन्थनो रचनासमय-शतकवृहणि अने शतकलघुचूर्णि पछी सप्ततिकाचूर्णीरपाई हशे ए हकीकत चूर्णिमा आवता निन्न लिखित पाठोधी समजी शकाय तेम छ-" एयासि अस्थविवरणा जहा सयगे" ( पत्र ३ पृष्ठि १), " जीवट्ठाणाण विवरणा जहा सयगे" ( पत्र ४ पृष्ठि १), " एपसि विवरण जहा सयगे" (पत्र ४ पृष्ठि २)" एएसिं भेओ सरुवनिरू षणा य जहा सयगे" (पत्र ५ पृधि २)" भेओ य अत्यनिरुवण च जहा सयगे" (पत्र ९ पृष्ठि २) (पत्र ९ पृष्ठि २) "एपसि विवरणा भेषो य जहा सयगे वहा भाणियब्वो" (पत्र १७ पृष्ठि १)। शतकथहर्णि अत्यारे लभ्य नथी । जे चूर्णि मुद्रित थई छे ते शतकलघुचूर्णि छ, कारण के शवक गाथा ३५ मीना भाज्य तथा दीकामा लघुर्णि पया यहचूर्णिना मसातरोनी जे एकी साथे नोंध भाष्यकार श्रीमान् चक्रेश्वरपरि तथा टीकाकार मलधारीय श्रीहेमचन्द्रमरिजीए लीधी छे ते पैकी लघुचूर्णि तरीकेनो अभिप्राय मुद्रित पूर्णिमा मळे छे, तेम ज आचार्य श्रीमलय गिरिजीए पश्चसग्रहटीकामा तया सप्ततिकाटीकामा जे शतकपहचूर्णिना पाठो प्रमाण तरीके नोंच्या छे ते पाठो मुद्रित शतकचूर्णिमा नयी मछवा । शतकवृहणि ए जुदो ज प्रथ छे जे अत्यार सुधी मळी शक्यो नथी। शतकबृहचूर्णिना रचयिता कोण हता? एत्य अण्णे अण्णारिस पति-सवग-सीणकसायाण निदा-पयलाण उदओ अलि तिन घडइ कारण पुन्बुस । (पत्र ७ पूछि १-२ विशेष हकीक्त माटे या पाठ उपर अमारी टिप्पणी जुओ) १ तेनी रचना क्यारे थई १ तथा तेनुं ग्रन्थप्रमाण केटलु ' इत्यादि बाबतोनी कशी य माहिती मळती नथी। परतु शतकलघुचूर्णिना कर्ता श्रीचन्द्रर्षिमहत्तर छ । ए विषेनो उल्लेख खभात-श्रीशान्तिनाथजी ताडपत्रीय भडारनी प्रतिना अंतमा मळता नीचेना उल्लेखने आधारे जाणी शकाय छे--“ कृतिराचार्य श्रीचंद्रमहत्तरशिताबरस्य । शतकस्य प्रथस्य । प्रशस्तचू ..। दि ६ शनी लिखितेति आ वस्तु अति अपूर्व होवाथी ते प्रतिना अंतिम पत्रार्धनो ब्लोक पण अमे आप्यो छे ( जुओ प्रतिकृति-२ )। श्रीमत् चन्द्रमहत्तराचार्यना समय निर्णय माटे अमने साधनो मळ्यां नथी । प्रस्तुत चूर्णि शतकलघुचूर्णि पछीज रचाई होय तो श्रीचन्द्रर्षिमहत्तर पछीनो तेनो रचनाकाळ ठरे । सप्ततिकाभाष्यना प्रणेता नवांगीवृत्तिकार श्रीअभयदेवसरिना पूर्वे प्रस्तुत चूर्णिनु निर्माण थई चूक्यु हेतु । सप्ततिका अन्तर्भाष्य-मूलग्रन्थमा आ भाष्यनी गाथाओ अंतर्गत करवाथी ज मूलग्रन्थनी अभिधेयपरपरा सचवाती होवाथी आ भाष्यने अन्तर्भाष्य कहेवामां आवतुं हशे । सप्ततिकाप्रकरणनी दरेक गाथानी व्याख्या रूपे आ भाष्य नथी, पण मूलग्रन्थमा जे १ शतकलघुचूर्णिना कर्ता मवधी आज पर्यत क्यारे य कशु प्रमाण नहोतु मळ्यु । विक्रम संवत् १९९७ मा श्रीमोहनलाल दीपचद चोकसी- ( खभातनिवासी ए खभातना भंडारनी केटलो एक प्रतिओना मो-माथा वगरना अस्तव्यस्त सेळमेळ थयेला, चोटेला तथा बेटेला ताडपत्रोनो जथ्यो साक्षरवर्य श्रीपुण्यविजयजी महाराज उपर मोकली आप्यो हतो । तेमाथी अनिपरिश्रम वेठा घणा ग्रन्यो तेओश्रीए जूदा पाडता शतकलघुचूर्णिना पत्रो मेळवी छेला पानानो अर्धभाग पण मेळवेलो, जेथौ शतकलघुचूर्णिकारना निर्णयनो सुयश तेओभाने वर छ । २ - नमिऊण महावीर, कम्मट्ठफ्रूवण कगिस्सामि । वघोदय-सतेहि सत्तरियाचुनिअणुमारा ॥" ( सप्ततिकाभाप्यगाथा १ ) स्थळे अर्थानुसथाननी अपूर्णता जणाय ते स्थळे चूर्णिकारे, तेमने अनुसरता टीकाकार आचार्य श्रीमलयगिरिजीए वेम ज मप्ततिकाप्रकरणनी मूलप्रविओना विद्वान् लेखकोए लखेली आ भाष्यनी गाथाओ दृष्टिगोचर थाय छ। चूणि तेम ज ससखिका- टीकामा अवर्भाव्यगाथा तरीके नोंघेली गाथाओ सिवाय चूर्णिमा आवती गाथाओ अन्तर्भाष्यगाथाओ इशे के कम ? ते माटे निर्णय थई शके तेम नथी । चूर्णिकारे तथा टीकाकारे नोंघेली अन्तर्माध्यगाथाओ कुल १० छ । गमे तेम हो, प्रस्तुवमन्थना अवमा माष्य घूर्णिनी समाप्ति बतावी छे तेथी अन्तर्माप्य सपूर्णपणे आ ग्रन्थमा समाविष्ट होवानु कल्पी शकाय तेम छ। सशोधन-(१) मूल तथा चूर्णिपन्थनी प्रतिओमा केटलेक स्थळे अनुस्वारने बदले परसवर्णों होषाथी प्रस्तुत मुद्रणमा मने जेमना तेम कायम राख्या छ । (२) प्राकृवव्याकरणना वैकल्पिक नियमवाळा पाठभेदोने मात्र उदाहरण पूरता नोंधी बीजा षधाने छोडी दीधा छ । (२) चूर्णिप्रतिओमा जे जे पाठो खडित लाग्या ते ते पाठो अमे [ ] आवा कोष्टकनी अंदर उमेरीने मुक्या छे, दाखला तरीके "सम्मामिच्छदिहि [मिच्छदिहि]णो” पत्र २८ पृष्ठि २ । (४) चूर्णिमा जे पाठो अशुद्ध होय ते पाठोने कायम राखी तेनी साये ठेना वे स्थानमा घटता शुद्ध पाठोने अमे ( ) आवा कोष्ठकनी वचमा राखेल छे, दाखला तरीके "अणायजा(एजा) पत्र २२ पृष्ठि २ टिप्पणी २ । सशोधनमा उपयुक्त प्रतिओ प्रस्तुत प्रथना सशोधनमा अमे ६ प्रविओनो उपयोग कर्यों छे । वे पैकी त्रण प्रविओ मूलमन्थनी छे, अने प्रण चूर्णिप्रन्धनी - - | छे । खे१, खेर अने खे३ सज्ञक प्रतिओ मूलग्रन्थनी छे । सं, कां? अने कां२ सज्ञक प्रतिओ चूर्णिग्रन्थनी छे । ते प्रतिओनो परिचय आ नीचे आपीए छीए । १-२-३ खे१ खे२ अने खे३ संज्ञक प्रतिओ-आ त्रणे य प्रतिओ पाटण खेतरवसहिना पाडाना भडारनी छे. ते भडार हालमा श्रीजेसींगलाल भगवानभाई झवेरीनी देखरेखमा छ। त्रणे य प्रतिओ नाना नाना प्रकरणोना सग्रहरूपे लखायेली ताडपत्रीय पोथीओनी अतर्गत थएली छे। शुद्धि त्रणे य प्रतिओनी ठीक ठीक छे। दरेक प्रतिना प्रत्येक पत्रनी पृष्ठि दीठ ३ अथवा ४ पक्तिओ छे । खे१ प्रति १९ पत्रोमा लखायेली छे। तेनी गाथासख्या ९१ छ । प्रतिनी लिपि सारी अने हालत मध्यम छ। प्रस्तुत मुद्रणमा आ प्रतिने खास बाधक कारण सिवाय मूलमा राखी छे। तेनी लबाई-पहोळाई १५४२ इच प्रमाण छे । प्रतिना अंतमा कशो य उल्लेख नथी। खेर प्रति दश पत्रोमा लखायेली छे । तेनी गाथासख्या ९२ छ । लिपि सारी, स्थिति मध्यम छ । समस्त पोथीना अंतमा "सवत् [१२]७८ वर्षे माघ वदि ४ भौमे" आवी टुकी पुष्पिका मळे छ । खे३ प्रति ९३ गाथाप्रमाण छ । लिपि सारी अने स्थिति मध्यम छ । पोथीनी लंबाई-पहोलाई १४४१३ इच प्रमाण छ । अंतमां कशो य उल्लेख नथी। ४ सं संज्ञक प्रति-आ प्रति पाटण-श्रीसंघना भडारनी छ । आ भंडार श्रीहेमचन्द्राचार्य जैन ज्ञानमंदिरमा सुरक्षित छ । तेनी देखरेख पाटण श्रीसघे नियत करेला ज्ञानमदिरना वहीवटकर्ताओनी कमीटी राखे छ । आ प्रति अति प्राचीन छ । ताडपत्रीय था।

प्रतिओमो जे विषमाक्षरी प्रतिो होय छे तेमा आ प्रतिनी गणना पई शके तेम छ । प्रविनी लिपिनो ख्याल आवे ते माटे असे प्रतिना ६९ मा तया ८२ मा पत्रनी एक एक पृष्टिनो ब्लॉक आप्यो छे (जुओ प्रतिकति १) । सामान्य नाडपत्रीय प्रतिओ करता आ प्रति विपमाक्षरवाळी होवा छता एनी लिपिनी स्पष्टवा तथा शुद्धि अत्युत्तम छ । आज कारणसर आ प्रतिने अमे अमारा प्रस्तुत सपादनमा मुख्यत्वे करीने खास बाधक कारण सिवाय प्रमाणभूत राखेल छ । आ प्रति विना अमार आ सपादन दुष्कर बनत । प्रतिनां महातना पाच पानाना नाना मोटा टूकडा मात्र छ, अने अतना दे पण पत्रो नथी, तेथी ग्रन्थसमाप्तिमा लसाती लेखकादिनी पुष्पिका वगेरे अमे आपी शकवा नथी । आ प्रतिना ११७ पत्रो छ, दरेक पत्रनी प्रत्येक पृष्ठिमा पाचथी आठ सुधी ओळीओ छ, दरेक पछिमा ४५ थी ५१ सुधी अक्षरो छ । प्रतिनी लबाई-पहोलाई १२x२ इच प्रमाण छ । लेखन समय संभववा विक्रमनो ११ मो शतक होय क्षेम लागे छ । प्रतिनी स्थिति सामान्य रीते ठीक गणाय । ५-६ का? कार सत्रक प्रतिओ-श्रा बन्ने प्रविओ पू पा प्रवर्तक श्रीमान कान्तिविजयजी महाराजना वडोदराना ज्ञान महारनी छे । आ भडार हालमा श्री चदुलाल पुरुषोत्तमदास झवेरीनी देखरेखमा सुरक्षित छ। कार प्रति-आ प्रति ताडपत्र उपर लखाएली छे । अनुमानथी विक्रमना तेरमा शतकमा लसाएली लागे छ । प्रतिना पत्र ९६ थे, वचमा अंतरे अतरे २७ पत्रो नथी तेम अवमा पण २५ थी ३० पत्रोनु उखाण त्रूटे छे । एकदरे आ प्रति अति चूटित प्रति कहेवाय । संशोधनमा मा प्रति ठीक ठीक मददगार थई छे, एकदरे शुद्धि पण ठीक छ । प्रतिनी हालत जीर्ण छ । तेनी ।

लबाई-पहोलाई १७४२ इंच प्रमाण छ । दरेक पत्रनी पृष्ठि दीठ ओछामा ओछी ३ अने वधारेमा वधारे ६ पंक्तिओ छे, प्रत्येक पंक्तिमा ६५ थी ७० अक्षरो छ । कार प्रति~आ प्रति पू. पा. प्रवर्तक श्रीमान् कान्तिविजयजी महाराजश्रीए अमदावाद डहेलाना भंडारनी प्रति उपरथी लखावी छे । प्रतिना अभावे प्रस्तुत सप्ततिकाचूर्णिनु संपादन अधूरु ज रहेत, कारण सं अने कां? प्रतिओ अंतसुधी पूरी नथी । प्रति अत्यत अशुद्ध छे । प्रति नवी होवाथी तेनी हालत सारी छ । प्रतिनी लंबाई-पहोळाई ११४५ इंच प्रमाण छ । पत्र- सख्या ४९ छ। प्रत्येक पत्रनी एक एक पृष्ठिमां तेर तेर पंक्तिओ छे, दरेक पक्तिमा ५२ थी ६० अक्षरो छ । प्रतिना अंतमा " श्री सत्तरिभास चूरणप्रथसमाप्तमिदं ।। ग्रंथापथ आ प्रमाणे लख्यु छे. आ ग्रन्थमां तथा प्रस्तावनामा उपयुक्त मुद्रित ग्रन्थोनी माहिती कर्मग्रन्थ प्रथम विभाग-श्री आत्मानन्द सभा ( भावनगर ) तरफथी प्रकाशित " सटीकाश्चत्वारः कर्मग्रन्था. " कर्मग्रन्थ द्वितीय विभाग-श्री आत्मानन्द सभा ( भावनगर ) तरफथी प्रकाशित " शतकनामा पञ्चमकर्मग्रन्थः तथा सप्ततिका- भिधानः षष्ठः कर्मग्रन्थः "। सप्ततिका भाष्य भीमन्मेरुतुङ्गाचार्यविरचित वृत्ति साथे, श्री जैन धर्म प्रसारक सभा ( भावनगर ) द्वारा प्रकाशित | शतकचूर्णि=भी राजनगरस्थ वीरसमाज द्वारा प्रकाशित " सचूर्णिक शतकप्रकरणम् " । बन्ध-शतकप्रकरण-भाष्य तथा वृत्ति सहित, श्री राजनगरस्थ वीरसमाज द्वारा प्रकाशित । ॥ ।

पञ्चसग्रह-वे टीका सहित ( विभाग बीजो) भी मुक्ताबाई ज्ञानमदिर (डभोई) द्वारा प्रकाशित । फर्मप्रकृति-पूर्णि तथा टीकावययुज, श्री मुकाबाई शानमदिर (उभोई) द्वारा प्रकाशित । कर्मग्रन्थ सार्थ द्वितीय विभाग-त्री जीवविनयजीकृत टवा तथा विवेचन सहित, श्री श्रेयस्कर मडळ (महेसाणा) वरफथी प्रकाशित (नबी आवृत्ति) प्रन्थमा अमे जे जे स्थळे "शतक" अथवा "शतकप्रकरण" लस्यु छे ते आचार्य श्रीशिनशमछत बन्धशतकप्रकरण समजवु । ऋणस्वीकार तथा आभार-प्रस्तुत ग्रन्थना प्रण फॉर्म सुधीनी कॉपी तथा मुफोनु निरीक्षण करवा बदल पथा प्रस्तुस प्रन्यनी अणे य हस्तलिखित प्रतिओ मेळववामा प्रवध करषा बदल चेम ज स्थळे स्थळे अनेक वार अनेक सदेहोने टाळवा बदल, तेम ज प्रन्थमा आवता उपशमणि-क्षपकणिना स्वरूपने सागोपाग समजाववा बदल साक्षररत्न पू पा मुनिश्रीपुण्यविजयजीनो, तथा आखा य पथना अफसंशोधनमा सहायकर्ता, अनेक स्थळे सशोधनने लगता महत्त्वना सूचनोना सूचक, प्रस्तुत ग्रन्थना सम्पा इनमा उपेनक परमपूजनीय सुगृहितनामधेय परमगुरुदेव उपाध्यायजी श्रीमद् जविजयजी महाराज साहेबनो, म ज जेओए पोताना बहीवट नीचे पालना श्रीमुक्ताबाई ज्ञानमदिरद्वारा आ अन्य प्रकाशित करी मने आ क्षेत्रमा प्रथम अनुभव अयों के ते भीखूबचदमाईनो पण यथाविधि ऋणस्वीकार कर छु । जे जे भखारोना वहीवटको सबमोष आटला लावा समय सुपी प्रतिओनो एपयोग करवा माटे धीरज राखी छे तेमनो सप्रेम आमार मालु छु। .

क्षमायाचन-आ ग्रन्थना सपादनमा विलब वधारे थयो तेनु एक कारण तो ए छे के मारो आ क्षेत्रमा प्रथम परिश्रम, अने बीजु मारी पत्नी कमळा अने पुत्र जयंतनु अकाळे अवसान थयुं एटले कार्यमा अति शिथिलता आवी, एक तो तेने लीधे तथा अल्पज्ञताने लीधे सशोधनमा रहेली त्रुटीओने क्षम्य गणवा विद्वगणने नम्र विनंति करीने प्रस्तावना पूर्ण करूं छं। सम्पादनेन यत् किश्चित् , लेभे सुकृतममृतः । तेन बोधिमवाप्नोतु, तन्माता हरकुंवरी ।। अमृतः विजया दशमी विक्रम १९९८ वागोळनो पाडो-पाटण KC शुद्धिपत्रक पत्र-पूछि-पश्य पत्र-पृष्टि-पङ्कपर अशुदम् वाणई दिएणव दोमगा दिए णव पो भगा १४-२-९ ४६१-१२ १। अवषये १ अवषगे अडुत्तराणि अट्ठावीस- २०११० अहुतराणि -म यष करें ति णपत्र ५४-२-७ -चिराचिरमुभा पिराबिर सुभा एकतीसा एक्मतीसा अट्ठवीस तिस्थगररहिय विस्थगरसहिय जाए जोए मणियविहीणा भणियविहिणा पगइसम्भावो' ति गइ पगइसम्भावो त्ति जत्थ त्तिनगर दुचरिमष दुचारिमभव- अजसकिचि जस्सकित्ति (पटित सम्भाव्यते) ३०-२-९ एते दस वघसवाणि ५८-२-४ ३६-१-२ एते दस (१) धध-सतानि जुगल भगो यमत्त- उपमत्तेसु भगोप मच उपमण्सु ग्रन्थ-समर्पण- .. ...... .. 1401 ............... ........................00000000000000000000000 Remoramin.mmmmmmon Immmmmmmmmm... शासनदिवाकर-सकलागमरहस्यवेदीस्वर्गस्थ-आचार्यदेव श्री १००८ श्री विजयदानसूरि-पट्टप्रभावक-सिद्धान्तमहोदधि-परम पूज्य श्री १००८ श्री गुरुदेव आचार्यश्री विजयप्रेमसूरिवर, वर्तमान जिनशासनमा विचरता मुनिगणमां कर्मसाहित्यना निष्णात तरीके आपनुं स्थान अजोड छे, एवा निस्पृह विद्वानोना सत्यमतनी साथेमळतो थईने हुं आ कर्म विषयक श्री सित्तरी ग्रन्थ- मारुं प्रथम संपादन आप कृपालुना करकमलमां सादर समर्पण करी कृतार्थ थाउंछु लि० नम्र सेवक अमृतनी आप कृपालुना चरणारविन्दमा कोदिशः वंदनावली + areyan प्रतिकृति (१) FARSATARAJAPART'नेयमेवधनाDATANTRBHATARNATTERESC praniraasaramRomangrerter सकलसत्वयणाममणधिलाखलाड यसयतारिणथीसालगियो पपलियतिरस्यास्मगलोय यारिखजन्मजागरसपकामिहीच. संजालकामाच्यउरीडाणशलोगय खसिंथलिएपदोयरण्यालय ख्यागिरहोतजवाणिनिति लियनियमामासानाशक्षिससे সীকতারনা सीअसूशेजोगायतस्तिण्टिय उडा उदयरवावसुल्यवान लहालयस्यशिविलमुगुलालिमा अवियाजोगादयनिसला काश निलनियालेनावियागुल HARIRI KULIA-s. Medalchiterarenath PETREYasureraking Fireimaratirernam १ যিযাম্ভাবমূয়সৰসাৰছিল Pantopperimentallecite- Vartary-cgs Ali IKREREKA Bela c veneta Gala Alkhaleeda DUDES PRELIMELISEbbana नोभिउदपोरासंगलिTORITar गीसंघयगापाससामजिएंगमयलट सिविलोमड्यगउपायोख्यग उपलगायालयाजमारमंद्धि उथस्यमबविण्दथ्यसंसयंगिरानी शसंगालिलागल्यासायपना FR/RRIEVENTपकाकाने मकोयरियगानी साक्ष्यामिमालिक मिश्तिोसंगालिबानिलारस देवध्यारंगालियनमधाम कंपन्यगरि सत्याशि हरध्यापसललमवियनिगमलार संतकमिगोभिरगोनवयम मप्ततिकाचूर्णि पत्र ६९ मुद्रितपत्र ३९ पृष्ठि २, तथा पत्र ८२ मुद्रित पत्र ४७ पृष्ठि २ ( श्रीसंव भंडार-पाटण)

प्रतिकृति (२)
+
साविमाप्रसादाईवस्तारुससंसानसंपाहिमलावलिसाकमसमुतिसाका-
लालकतिराचार्यश्रीवधमहाशि तोवरस्थाशतकस्य प्रेक्षकाशप्टी
शानातिकालिखिानति
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-
A
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शनकलघुचूर्णिकार श्रीचन्द्रर्षि महत्तर छ एम सूचवतु शतकलघुचूर्णिनु अन्त्य पत्रार्थ
(थी शातिनाथजी मडार-खमात )

ISISE ॐ णमो कम्मातीताणं जिणाणं । णमो सयलागमरहस्सवेईणं सिरिविजयदाणमरीणं । पाईणायरियकयचुण्णिसमेया चिरंतणायरियविरइया सित्तरी। ॥ नम सर्वशाय ॥ सिद्धिविवंधणबंधुदय-संतखवणविहिदेसओ सिद्धो । भगवं भवजणगुरू, विक्खायजसो जयइ वीरो॥ एक्कारस वि गणहरा, सो वेइगोयरस्स पारगया । सवसुयाणं पभवा, सुयकेवलिणो जयंति सया ॥ सुह-दुक्ख-तकारणसरूवपरिणाणाओ सबजीवाणं सोक्खकारणाऽऽयोण-दुक्खकारणपरिचागनिमित्तो सबदुक्खविमोक्ख- लक्खणो परमसुहलंभो त्ति सुह-दुक्ख-तकारणनिदेसो कायवो । दोसोवसमणाओ उत्तरकालं आरोग्गसुहलंभ इव सो सुहो १ 'यति वी" का २॥ २ बचोगोचरस्य ॥ ३-भादान--॥

सामावि चि पढममेव दुक्रव-वकारणपरत्रण परमरिसओ करेंति चि, पच्छा सुहकारण-सुहाण परूवण ति । ताइ च कम्मपगइयातिमहागयेसु भणियाइ । ते य गथा दुरपगाह ति काउ कालदोसोपहयमेहा-ऽऽउ-बलाण अजकालियाण साहूण अणुग्गहत्य आयरिएण कय पमाणनिप्पण्णनामय सत्तरि चि पगरण । व विवरिस्सामो। तस्स मगला मिषेय- गिदेस-सवधत्था पढमगाहा- सिद्धपपहिं महत्य, वधोदय-सन्तपैगइठाणाण । वोच्छ सुण सखेव, नीसद दिट्ठिवायस्स ॥१॥ सिद्धपरहिं महत्थ० गाहा । मगलपरिग्गहियाइ सत्थाइ निष्फत्तिं गच्छति, सिस्स-पसिस्सपरपराए पइटाहिति चेति सिद्धसहो मगलत्थो । महत्व वषोदय-सताण सखेव घोच्छ ति अमिषेयनिहसो । विहिवायरस निस्सदो चि सबधो । एस पिंडत्यो। इयाणि अवयवा विवरिसति'सिद्धपरहि ति सिद्धानि-निष्ठां गतानि न खोहिअतीत्यर्थ उदाराणि पयाणि जेसु गथेनु वे सिद्धपदा गथा । के ते? मण्णवि-कम्मपगतियाइया कतियादिघउदीमाशुओगदारवित्थरा । कम्हा? सवण्णुमणियत्थाणु- सारिचउविबुद्धिसपनगणहरगहियचप्पामनाओ । तेसिं वधाओ वष उदयाओ उदय सताओ सत कहिऊण 'महत्य सखेव १ ण। ता स ॥ २ पयडिठा ने २ से ३ ॥ ३ निस्संद खे १ से ३॥ ४ जे दिचउचिहा कति स ।। ५-प्रथितत्व प्रामाण्यात् का , टिप्पणी ॥ - वोच्छं' ति संबज्झइ। सिद्धपएहिं ति पंचमीनिद्देसो, सिद्धपदेहितो त्ति वुत्तं भवइ । अहवा ससमयसिद्धाणि पयाणि जीवट्ठाण- गुणट्ठाणाणि, तेहिं सिद्धपएहिं ति । आहारस्स करणभावेण विवक्खियत्ताओ तेषु तान्याश्रित्य बंधोदय-संताणि भवंति, भण्णंति त्ति भणियं होति । अहवा सेना परिभासादिपदेहि तेसु चेव गंथेसु पसिद्धेहि वोच्छं ति, करणत्थे चेव तैयिता । ' महत्थं ति निपुणं गंभीरं दुरवगाहपयत्थवित्थारविसयं सुहगहण-गुणण-धारणत्थं संखेवं वोच्छं ति संखेवो चेव विसेसिजति । नणु संखेवसद्देणेव महत्थो ति गम्मतीति चेत्, सच्चमेतं, संखेवसहस्स महागंथविसयत्तवहिचाराभावाओ; किंतु मा होज अक्खाणा-ऽऽलावग-संगहणीओ व अप्पत्थो ति महत्थगहणं । केसिं महत्थं संखेवं ? ति, उच्यते-'बंधोदय-संतपगति- ठाणाणं' तत्थ बंधो ति-मिच्छत्तादिसामण्ण-विसेसपच्चयनिमित्तो जीवस्स कम्मपोग्गलाणं च अभेदसंबंधपरिणामो तप्तायः- पिण्डवत् । तस्सेव विवागपत्तस्स अणुभवणं उदओ। बंधसमयप्पमिति जाव अणण्णहाकयं अखवियं वा ताव तमेव संत वुच्चति । तेर्सि बंधोदय-संताणं पगतीउ बंधोदय-संतपगतीउ, पगति त्ति-सभावो, तेसिं ठाणाणि बंधोदय-संतपगतिठाणाणि । उदयग्गहणेण उदीरणा खवणा य गहिया । कहं ? उदओ दुविहो-ठिइखओदओ पओगोदओ य । तत्थ डिदिखओदओ उदओ बुच्चइ, पओगोदओ उदीरण त्ति । इदाणी उदयग्गहणेण खवणा कहं गहिया ? इति चेत् , उच्यते-खीयमाणं मगपगडत्तणेण अण्णपगइत्तणेण वा वेइजइ ति काउं णीसेसवेओ खओ त्ति, तम्हा उदयग्गहणेण उदीरणा खवणा य गहिया । संतग्गणेण १ आधारस्य ।। २ "सज्ञा च परिभाषा च विधिनियम एव च । अतिदेशोऽधिकारथ पदिर सूत्रलक्षणम् ॥" इति लक्षण ॥ ३ तृतीया ॥ ४ व्यभिचाराभावात् ॥ 2 उवसामणा गहिया कह १ सवस्सेच उवसामणा मवति ति काउ । एवमेते छ अत्याहिगारा एयम्मि सत्थे बणिजति । पगइगहणेण ठिति अणुमाग-पएसाण बुदासो, ठाणग्गहणेण एगेगपगइवयोदय-सताण दासो। पगडाणबंधोदय-सताण मेष गहण एत्य मूलचरपगइपविमचाण बषोदय-सतपगतिठाणाणमेव महत्थ सखेव 'घोच्छ मणामि ति समयति । 'सुण' चि सीसस्स चित्तसमाहाणत्व सोविदिओवयोगजणणस्थ च आयरिओ मणइ मुण ति । 'सखेव' ति संखेको पिंडो समुबओ चि एगट्टा । निस्सद 'विहिवायरस' त्ति परिकम्म १ मुच २ पढमाशुओग ३ पुढगय ४ चूलियामय ५ पचविकमूलमेयस्स विहिवायरस, तत्थ चोदसण्ह पुराण चीपाओ अग्गेणीयपुवाओ, तस्स वि पचमवत्यूज, वस्स वि वीसपाहुडपरिमाणस्स कम्मपगडिणामधेज चउत्थ पाहुड तओ नीणिय, चउवीसाणुओगदारमइयमहण्णवस्सेव एगो बिंदू, वओ वि इमे तिणि अत्याहिगारा नीणिया, तम्हा नीसदो दिविवायस्स चि भण्णइ । त नीसद विहिवायस्स बघोदय संतपगइठाणाण महत्व संखेच वोच्छ सुण ति सवधो ॥१॥ आह-मणिय 'बधुदय-सतपगइठाणाण सखेव वोच्छ' ति, कि त पत्तेगमेव तेसि संखेवो मण्णइ उपाहु सखेवसखेवो चि, मण्णइन पत्यसंखेवो सखेवसंखेवो भनाइ चि। तदुद्देसत्य पराक्यपदसणोवकम करेमाणो सयमेवाऽऽयरिओ माह मणइ- कइ वधतो वेयइ, कइ कह का पयइठाणकम्मसा। मूलुत्तरपडीसु, भगविगप्पा उ चोद्धचा ॥२॥ १ सेगस २५२वा सन्तपयडिठरणाणिखे ३॥ ३ यडिठाणसतसारखे ॥ ४ डीण, भग खे३॥ ५ प्पा य बो खे॥ 1.

कइ बंधतो वेयइ कइ० त्ति । कइसद्दो परिमाणपुच्छायां । कइ कम्मपगडीओ बंधमाणो वेएइ कइ कम्मपगडीओ ? 'कइ वा पगइठाणकम्मंसा' इति तस्सेव कति कम्मपगइठाणाई संतकम्माई ? ति; एयम्मि पगरणे एयं वण्णिजइ। वासद्दो तेर्सि तिण्हं पि विगप्पदंसणत्थो । एयं संवेधपरूवणं कासु पगईसु संभवति ? इति चेत्, उच्यते-'मूलुत्तरपगईसुं' ति मूलपग- तीओ अट्ठ नाणावरणाई, उत्तरपगईओ अट्ठावण्णं सयं आभिणिवोहियनाणावरणाई । 'भंगवियप्पा उ बोद्धव' ति एयासु मूलत्तरपगईसु बंधोदय-संते पडुच्च बहू भंगा संभवंति त्ति जाणियचा ॥२॥ उद्दिटक्कमेणं मूलपगतीणं पगइसमुक्तित्तणा, बंधुदय-संताणं पगतिठाणा य पुवं परूविजंति, पच्छा तेसिं संवेहो । तत्थ मूलपगती अट्ठविहा, तं जहा~णाणावरणिजं जावंतरायियमिति । एयासिं अत्थविवरणा जहा सेयगे । मूलपगडीणं बंधं पडुच्च पगतिठाणाणि चत्तारि, तं जहा–अट्ठविहं सत्तविहं छविहं एकविहं ति । सबपगईओ जुगवं बंधमाणस्स अट्ठविहं पगइठाणं, तं जहण्णुक्कोसेणं अंतोमुहुत्तकालियं | आउगवजाओ सत्त कम्मपगडीओ बंधमाणस्स सत्त- विहं, तं जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं तेत्तीसं सागरोवमाई देखूणाई अंतोमुहुत्तूणपुवकोडीतिभागब्भहियाई लभंति । आउग- मोहणिजवजाइं बंधमाणस्स छविहं, तं जहण्णेण एकं समयं उक्कोसेणं अंतोमुहुत्तं । सत्तण्ह कम्माणं बंधवोच्छेदे जाते एकं वेयणिजं बंधमाणस्स एगविहं, तं जहण्णेण एगं समयं उक्कोसेण पुत्वकोडी देसूणा । १ वेयति का २ ॥ २ °णाति सं° का १ का २ ॥ ३ वति उच्य का २ ॥ ४ जाव अत' का १ का २ ॥ ५ पश्यन्तु शतक- प्रकरणस्य ३८-३९ गाथासूने, तच्चूर्णिं च ॥ ६ चत्वारि का २॥ ७ षण्मासोनानीत्यर्थ ॥

इयाणि उदय पडुन तिणि ठाणाइ, त जहा–अडविह सत्तविह चउबिह । अट्ठविहकम्मपगडीओ जुगव एमाणस्स अठ्ठविह, त कालओ अणादीय वा अपजवसिय, अणादीय वा सपञ्जवसिय, सादीय वा सपञ्जवसिय अमन मवेहिकिच । तत्थ ज सादीय सपजवसिय त जहण्पेण अतोमहुच उक्कोसेण अवड पोग्गलपरियट्ट देसूण । मोहणिज्जवलाओ सत्त कम्म पगडीओ वेदेमाणस्स सनविह, त जहण्णेण एगसमइय उकोषेण अंतोमुहुत्तिग । पातिकम्मवजाओ चत्तारि बेयमाणस्स चउबिह, व जहण्णेण अंचोमुहुतिग उक्कोसेण पुश्कोडी देखणा । इयाणि सन्तकम्म पहुँच तिणि पगइठाणाइ, त जहा-अविह सचविह चउबिह ति। मबकम्मपगडीममुदओ अट्ठविह सन, त अाइप वा अपसवसिय अाइय वा सपजवसिय अमव भवेऽहिकिन्छ । मोहणिजे खीणे सचविह, त अजहण्णमणु कोसेण अंतोमुहुचिग । बाइकम्मक्खए चउबिह लब्मइ, त जहण्णेण अंतोमुहुत्तिय उकोसेण पुषकोडी देखणा । बधुदय-सताण पगइठाणसमृकित्तणा कया । इदाणिं सवेहपरूषणत्थ भण्णइ- अट्ठविह-सत्त-छब्बधगेसु अद्वेव उदय सतसा । एगविहे तिविगप्पो, एगविगप्पो अवधम्मि ॥३॥ अढविहसचछब्बषएसु० गाहा । 'अढविहसत्तछब्बधगेसु अडेव उदयसतसा' इति जो अवविह वा सत्तविह वा छबिह वा वषद तस्स अट्ठविहो उदओ अट्ठविह चेव सत मवति । कम्हा ? अट्ठविह सत्तविह-छविहवधमा णियमा मरागिणो, त च १ 'बहपो का १॥२ मतिय को ३ ॥३-४ णातिय का ३॥

सरागत्तं मोहणिजोदयाओ हवइ, उदए सति संतं नियमादेव तदेव, तम्हा अट्ठविह-मत्त-छन्बंधगेसु अट्टविहा उदय-संता लब्भंति । 'एगविहे तिविगप्पो' ति एगविहवंधगम्मि तिण्णि विगप्पा लभंति, तं०-~एगविहो बंधो मत्तविहो उदओ अट्ठविहं संतं ति; एयं जस्स मोहणिजं सवं उपसंतं तं पडुच्च, उपसंतत्ताओ उदओ न होड संतभावेण अस्थि त्ति, एम पढमो वियप्पो । एगविहो बंधो सत्तविहो उदओ सत्तविहं संतं ति; एसो जस्स मई मोहणिज्जं खीणं तं पडुच्च, एसं वितिओ । एगविहो बंधो चउबिहो उदओ चउचिहं संतं ति; एसो जस्स घाडकम्माणि चत्तारि वि खीणाणि जोगपच्चडओ य बंधो तं पडुच, एम तइओ वियप्पो । 'एगवियप्पो अवंधम्मि' ति जोगाभावाओ बंधो नत्थि, तस्म संमारत्थस्म वि अजोगिणो चत्तारि वि अघाति- कम्माई उदय-संतत्तणेण अस्थि त्ति, एसो एगो चेव वियंप्पो पंचरहस्मक्खरुच्चारणकालपरिमाणो, परओ मिट्ठो हवड ॥ ३ ॥ मूलपगडीओ पड्डुच्च एए सत्त वियप्पा भणिया । इयाणि ते चेव विगप्पा जीवट्ठाण-गुणहाणेसु मग्गिजति, केमु ठाणेमु केत्तिया संभवंति ? त्ति । पुवं ताव जीवट्ठाणेसु भण्णड । तत्थ इमा गाहा- सत्त-ऽटुबंध अद्रुदय-सन्त तेरससु जीवठाणेसु । एगम्मि पंच भंगा, दो भंगा होंति केवलिणो॥ ४ ॥ सत्तबध अगुदयसंत तेरमसु जीवठाणेसु० त्ति । जीवट्ठाणाणं विवरणा जहा मर्यगे । गत्तविही बंधो अट्टविहो उदओ अढविहं संतं ति, एसो वियप्पो सन्निपंचिंदियपजत्तगवजाणं तेरमहं जीवट्ठाणाणं आउगवंधकालं मोनणं मकालं लभड; १ मा तदे° का १ का २ ॥ २ स चीओ। 1 ।। ३ निगमोगा - ॥ परमार गार्णिा एसो विगप्पो चिर काल लम्भइ चि काउ अविहधविगप्पाओ पुष मणिओ । अङ्कविहो बधो अडविहो उदओ अट्टविह संत ति, एमो विगप्पो एएमि चेव तेरसण्ह जीवट्ठाणाण उगवघकाले अंतोमूहुचकाल लम्मा एसो थोवकालिओ चि काउ पन्छा मणिओ । 'एगम्मि पच भग' ति समिपचिंदियपक्षतगम्मि मूलिल्ला पच मगा भवति । कह । सत्तऽबधगाण भावना पूर्ववद् योज्या । छबिहो धो अट्ठविहो उदओ अट्ठविह सत ति, एसो विगप्पो सेदीए वट्टमाणस्स छबिहवधगस्स मोहणिजस्म पधे वोच्छिण्णे सुहुमसपरायस्स लब्मति । एगविहो पयो सत्तविहो उदओ अट्ठविह सत ति, एसो विगप्पो सनिस्स उपसतस्स लम्मइ । एगविहो पधो सचविहो उदओ सत्तविह सत ति, तरसेव खीणकसायरस लभ । 'दो भगा होति केवलिणो चि अंतिमा दो भगा केवलीण बहकमेण सबोगि अजोगीण भवति । केवलिगहण मणोविणाणरहिया सणिणो ण दुति ति सूपणत्य ॥४॥ इदाणि ते चेष सत्त विगप्पा गुणडापेसु माग्गिजति चि तयट्ठा इमा गाहा- अट्ठसु एगविगप्पो, छस्सु वि गुणसन्नियम दुविगप्पो । पत्तेय पत्तेय, वधोदय-सतकम्माण ॥ ५॥ असु० गाहा । 'अट्टर' चिगुणड्डाणाणि चोइस, त०-मिच्छद्दिहिपमिती जाव अजोगि चि, एएसि विवरण जहासयगे, १ चिरकाल का १ ॥ २ रागस्स का १ । रागस्स का २॥ ३ तगरस का १ का ३॥ ४ श्यता शतकप्रकरणस्य नवम माया तपकिंध। .

अद्वसु गुणट्ठाणेसु-सम्मामिच्छदिट्ठी अपुवकरणादि जाव अजोगिकेवलि त्ति, एएसु एकेको विगप्पो लब्भइ । तत्थ सम्मामिच्छट्ठिी-अपुवकरण-अणियट्टीणं सत्तविहो वंधो अट्ठविहो उदओ अट्ठविहं संतं ति एसो एगो भंगो । कहं ? आउँ- बंधऽज्झवसायरहिया मोहणिजस्स य नियमा बंधगा वायरकसायवेयग त्ति कोउं । सुहुमसंपरायस्म छविहो वंधो अट्ठविहो उदओ अट्ठविहं संतं ति एसो विगप्पो एगो लब्भइ । कहं ? वायरकसायाऽभावाओ आउगं मोहं च न बंधइ, सरागो त्ति काउं सेसाणि सवाणि बंधइ त्ति । उवसंतकसायस्स एगविहो बंधो सत्तविहो उदओ अट्ठविहं संतं ति एसो विगप्पो एगो लब्भइ । कहं ? रागाभावाओ वेयणिज्जवजाणं बंधो नत्थि, उवसंतत्ताओ मोहणिजस्स उदओ नत्थि, संतभावेण अत्थि त्ति काउं । खीणकसायस्स एगविहो बंधो सत्तविहो उदओ सत्तविहं संतं ति एसो एगविकप्पो लम्भइ । कहं ? मोहणिजं सबहा खीणं ति उदय-संतेहिं नत्थि, सजोगि त्ति वेयणिजस्स बंधो अत्थि त्ति काउ । मजोगकेवलिस्स एगविहो बंधो चउविहो उदओ चउविहं संत ति एसो एगो विगप्पो लन्भइ । कहं ? चउण्हं घाइकम्माणं उदय-संतखएणं केवली भवइ, मरीरसंवं. घाओ चत्तारि वि अघाईणि उदय-संतत्तणेण अत्थि, जोगसहियत्ताओ वेयणिजस्म बंधो अत्थि ति काउं । अजोगिकेव- लिस्स बंधो नत्थि, चउविहो उदओ चउविहं संतं ति एसो एगो विगप्पो लभड, कहं ? जोगाभावाओ बंघो नत्यि, मरीर- संबंधाओ उदय-संता अत्थि त्ति । 'छस्सु वि गुणसन्निएसु दुविगप्पो' त्ति मिच्छद्दिट्ठी-सासायणसम्मदिद्वि-अविरयमम्महिहि-संजयासंजय-पमत्त-अपमत्तसंज- १ एको वि' का २ ॥ २ उस्स यं स का १ ॥ ३ कातुं । मु का १॥ ४ जोगिकेव 1 1 म ॥ Tal एसु एएसु छसु गुणठाणगेसु दो दो विगप्पा भवति, त०–अढविहो बधो अविहो उदओ अट्टविह सत ति, एसो आउय- बघकाले सोर्सि लन्मइ ! कह ! आउगवघऽज्यवसाणठाणाणि एएसु लन्मति चि काउ । मत्तविहो बधो अविहो उदओ अविह सत ति, ऐसो वीओ विगप्पो आउगवधकाल मोसूण सेस सब काल लन्मइ ति । कह १ सल्वे वायरमोहस्स उदये पति ति काउ । 'पचेय पत्तेय षधोदयसतकम्माण' ति एय पय मधेसि मामण्ण, पचेय पचेय गुणहाणेसु एकेको दो दो वा विगप्पा होति ति वृत्त मवह ॥५॥ मूलपगडीण बघोदय-सताण सवेहो सामित्त च भणियाणि । इयाणि उचरपगडीण पगइसमुक्त्तिणा चघोदय-सताण अणसमुकिवणा सवेहो य अप्पप्पणो ठाणे मण्णिहिति । तत्थ पगइसमुकित्तणा नाणावरणाईण, त०- पच नव दोष्णि बहानीसा चउरो तहेच पायाला । दोण्णि य पच य भगिया पयडीओ आणूपुन्बीए । (शतकप्रकरणगाथा ३९) इति । एएसि मेओ सरूवनिरूवणा य जहा सयगे । पगइसमुकित्तणा कया । इयाणि बघोदय सताण ठाणसमुक्त्तिणा, पुब ताव नाणावरणस्स बधवाणाह तुल्लपगइचाओ अंतराइयस्स य जुगव भणति । इमा गाहा- वधोदय-सतसा, नाणावरणतराइए पच । वधोवरमे वि तहा, उद-सता होंति पचेव ॥६॥ १ टाणेसु का ॥ २ सो थिइयो का । को २ ॥ ३ प्राचीनकर्मस्त गाथेय दशमी । केनापि विपयिता प्रक्षिसेय गाथा सम्बपि मूम्सूतादर्शपूपल-पते ॥ ४ पाइणो तत्तुल० का १ का २ ।। ५ ति । तत्थ इमा का १ को २ ॥ 3 बंधोदयसंतंसा णाणावरणंतराइए पंच० त्ति । नाणावरणिजस्स आमिणि-सुओहि-मणपञ्जव-केवलणाणावरणाणं एयासिं पंचण्हं पगतीणं समुदओ एक चेव बंधाइट्ठाणं । कम्हा १ धुवबंधादित्ताओ। अंतराइयस्स दाण-लाभ-भोगोवभोग-वीरियंतराइगाणं एगं चेव बंधाइट्ठाण, पंचण्हं पगतीणं समुदओ धुवबंधाइत्तादेव । इयाणि संवेहो–णाणावरणस्स पंचविहं बंधमाणो पंचविह एइ पंचविहं चेव संत । कथम् ? ध्रुवकत्वात् । एवमंतराइयस्म वि । 'बंधोवरमे वि तहा उदसंता होंति पंचेव' ति दोण्ह वि जुगवं पंचण्हं पगईणं बंधवोच्छेए जाए उदय-संता पंचेव भवंति, ध्रुवकत्वादेव । उदओ संतं च जुगवं फिट्टति त्ति काउं अण्णो विगप्पो नत्थि ॥ ६॥ इयाणि दंसणावरणस्स बंधाइट्ठाणा भण्णंति- बंधस्स य संतस्स य, पगईठाणाणि तिन्नि तुल्लाणि। उदयट्ठाणाणि दुवे, चउ पणगंदसणावरणे ॥७॥ बंधस्स य संतस्स य पगईठाणाई तिणि तुल्लाई० ति । दमणावरणस्म तिणि बंधट्ठाणाणि, तं०-नवविह छविहं चउ- विहं । तत्थ नवविहं-निहानिद्दा पयलापयला थीणद्वी निदा पयला चक्खुदंमणावरणीयं अचक्युदंमणावरणीय ओहिदम- णावरणीयं केवलदंसणावरणीयमिति, एएसि नवन्हं कम्माण समुदओ एगं बंधट्ठाणं । कथम् ? ध्रुवबन्धित्वात् । ततो थीणगि- द्वितिगस्स जुगवं बंधे वोच्छिण्णे सेसाणं छण्हं कम्माणं एगं बंधडाणं । तओ निदा-पयलाणं बंधे योच्छिणे सेमाणं चउण्हं कम्माणं एक बंधट्ठाणं । एए चेव संतस्स वि तिणि हाणा-नवण्ह ममुदओ एक संतट्ठाण, नवगाओ संनाओ थीणगिद्वि- ? १ वण्ह के का १ का २ ॥

विगे जुगव खविए छबिह सत, तओ निदा पयलाहिं जुगव खवियाहिं चउबिह सतट्ठाण, तेण मण्णइ-वधस्स य सतस्स य पगईठाणाइ विष्णि तुलाई । 'उदयद्वाणाइ दुवे' चि-दसणावरणे दोणि उदयट्ठाणाणि । के ते ' भण्णइ-'चउ पणग' वि पउन्ह समुदओ पचन्ह वा । तस्य चत्तारि चक्खुदसण-अचक्खुदसण-ओहि केवलदसणावरणाणि, एएसिं चउण्ह पगडीण समुदओ धुवोदय चि काउ एग उदयवाण । एएसु निदापणगाण अण्णयरे छुढे पच भवति, एय एक उदयड्डाण। अण्णो । नस्थि विगप्पो । कम्हा ? निदापणगाउ दुगाइ जुगव न उदेति ति काउ । निदादओ अधुवोदया, कह ! कालायिय- वेक्खाओ । 'दमणावरणे ति एयाणि बघोदय-सन्ताण ठाणाणि दमणावरणे जाणियबाणि ॥ ७॥ इयाणि सवेहावसरो सो मण्णइ- वीयावरणे नववधपसु चउ पच उदय नव सता। छ च्चड वधे चेव, चउ बधुदए छलसा य ॥८॥ बीयावरणे णवषयगेसु० गाहा । बीयावरण-दसणावरण, वम्मि बीयावरणे जे नवविह बधति तेसिं चउविहो पचविहो वा उदओ भवइ, सत पड्डच नवविह घेव । 'छ चउ बधे चेव' ति जे छब्बधगा तेसि पि चउबिहो पचविहो वा उदओ । सत पडुच्च नवविह घेव, कह ? छबिहबधगम्मि थीणगिद्धितिगस्स खओ नत्थि त्ति । चउबिहबधगे वि उवसमसेटिं पडुच्च एव चेव । खरमसेटीए छबिह चउविहषधगाण चउपिहो उदओ एगो घेव, पचोदयस्स सभवो नस्थि, कह १ खवगा अचवविसुद्ध चि १ दओ ति का 1 ॥२ गादि दुगा ॥ ३ लाश्यपेक्खा का १॥४ म्मि य बी का ३ ॥ ५ छविहबध का २॥

काउं, तेण निदा-पयलाणं उदओ नत्थि,-"नाइविसुद्धस्स सकिलिट्ठस्स वा निहोदयो” ( ) त्ति वयणाओ। चउविहबंधगस्स चेव खवगस्स जाव थीणगिद्धितिगं न खीणं ताव चउत्विहो उदओ, नवविहं संतं । तओ थीणगिद्वितिगे खीणे 'चउबंधुदए छलंसा य' ति चउबिहो बंधो चउविहो उदओ छविहं संतं ति ॥ ८॥ उवरयबंधे चउ पण, नवंस चउरुदय छै चउ संताई।वेयणिया-ऽऽउय-गोए, विभज्ज मोहं परं वोच्छं॥९॥ उवरयबंधे चउ पणे नवंस. त्ति गाहा । 'अंस' इति संतकम्मं भण्णड । दंमणावरणस्स बंधे वोच्छिण्णे चड पणगमुदया नवविहं संत, एय उवसंतकमायं पडुच्च । कहं ? उवमामग-उबसतेसु निद्दा-पयलोदओ मंभवड, मंतकम्मे भणियं-"निहादुगस्स उदओ खीणग-खवगे परिचञ्ज" । नवविहं संतं, उवममसेढीए थीणगिद्वितिगम्म खओ नन्धि त्ति । 'चउ उदय छचउ संताई ति चउविहो उदओ छ संतगाई ति एयं खीणकसायस्स चरिमममयं मोत्तूणं सेमकाल लब्भइ । चउविहो उदओ चउविहं संतं ति एयं तस्सेव दुचरिमसमए निदादुगे खपिए चरिमसमए लभति । एवं एगादम विगप्पा दसणावरणे | एत्थ अणे अण्णारिसं पदंति-'खवग-खीणकमायाणं निद्दा-पयलाणं उदओ अस्थि' त्ति kar १ छ च चउ संता। खे ३ । छ व चउरंसा । रो ॥ २ णग उदय नवविहं सतं । असइ ग ।। प्रस्नु तिर तत्र पत्राभावान तत्पाठभेदोऽत्र निर्देष्टु शक्यते ॥ ३ 'रणे वधे का २ ॥ ४ 'अण्णे' इति प्राचीनकर्मस्तवकागा I T" प्राचीन कमन्नये- "निदा पयला य तहा खीणदुचरिमम्मि उदयवोच्छेओ।' निद्राप्रनलयो क्षीणकपागस्य दिनरमगमगे उपसार । चरमममी पार - तन घड, कारण पुच्चुच । रदयाभाव १ अपरे पुराहु-उपशान्तमोहे मिहाप्रचल्योहदय्य्यवच्छेद , पमानामपि हि लिदाणां घोलनपरिणामे भवत्युदय सपकाणां स्वतिविशुपवाद् न निद्रोदयसम्भव ॥ (त्रयस्त्रिंक्षाराममायापूर्वाद तडीका )। श्रीच पिमहतरा अपि प्राचीनकर्मस्तवकारमतानुगा । तद्यथा--- 'मोपूण खौणराग इदियपज्जतगा उदोरेंति । निहापयम अक्तमा क्षीण रागम्, किमुच भवति । क्षीणकषायान्त्यावलिकान मुक्या शेप काळ तदारतो जीवा द्रियपर्यास्या पर्याप्त निद्राप्रचलयोरुदीरका । (पञ्चसके प्रकृत्युदीरणायामशेनवियतितमी गाया तस्वोपनटीका च)। यायाचायमहोपाध्यायधीयशोविजया अप्येतदेव कर्मपरुतिटीकाया प्रतिपादयन्ति स्म- कमस्तवकायदय क्षपकोणमोहयोरपि निमादिक्स्पोदपमिच्छन्ति सम्मते उदये मत्युदीरणाया अवश्यम्भावात् क्षीणायगमन्स्याबलिकामाविन मुप्तवा तदारत भर्नेऽपि जीवा पत्रिमपमाझ्या पर्याप्ता निवायचल्योपदीररा टन्या । तदुज तन्मतानुसारणव पश्चमढवे-मोत्तूण सीणराग इदियपबत्तगा उदी | रनि । निहापयला । इति । (प्रकृत्युनीरणायामशादशमाबारीकायाम्)। यत् पुन श्रीमद्विवार्पिपाद पञ्चसद्हस्थसप्ततिकासन तत्वोपज्ञटीकाया च “सबगे मुहुमम्मि चळवधम्मि अषधगम्मि खोणाम्म । छस्सत चउदयो पचण्ड वि कह इच्छति ॥ १४ ॥ क्षपण्या बावरकमाये सूक्ष्मकपाये चतुर्वन्ध अवध पक्षीणकपाय यद प्रकृत्तय सद्भावेन भवन्ति चतपणामुया, एवमेकाश भगा सक्षतिकाकारमतेन । कर्मस्तवकारमतेन पथानामप्युदयो भवति ततश्च भयोवश मना । एवं दर्शनावरणत्रिक- संवेष इति गापा ॥१४॥' इत्यत्र उपर्युकस्वमतक्षुण्ण प्रतिपादित तत् सप्ततिकाप्रकरणस्य सहस्वेन तदाश्रयानरोधादिति बोध्यम्, न पुनरस्त्रायें समविश्वप्रतिपादनाशोदावनीयति ॥

'वेयणियाऽऽउगगोए विभजे' ति । इदाणि वेयणियस्स बंधादिट्ठाणा भण्णंति-वेयणियस्स सामण्णेण एकं बंधट्ठाणं सायं वा असायं वा, दो वि जुगवं न बज्झंति, विरुद्धत्वात् । उदयट्ठाणं पि एकं चेव दोण्हमण्णयरं, दो वि जुगवं न उदेति विरुद्धत्वादेव । दो संतढाणाणि-दो वा एकं वा । जाव अण्णयरं न खीणं ताव दो हवंति, एकयरे खीणे एगं भवइ । इयाणि संवेहो-असायं बंधतस्स असायमुदयं साया-ऽसायाणि दो वि संतं, अहवा असायं बंधं० सायमुदयं दो वि संतं, अहवा सायं बंध० असायमुदयं दो वि संतं, अहवा सायं बंधं० सायमुदयं दो वि संतं । बंधे उवरए असायमुदयं साया- ऽसायाणि दो वि संतं, अहवा सायमुदयं साया-ऽसायाणि दो वि संत; अहवा असायमुदगं साए खीणे असायं संतं, एयं एक समयं लब्भइ; अहवा सायमुदयं असौए खीणे सायं संत, एयं पि एकं समय लव्भइ । वेइजमाणं मोतूण इयरं पढमं खविजति ति । वेयणिज्जे एए अट्ठ भंगा । इयाणिं आउगस्स बंधादिट्ठाणा भण्णंति- 'आउग' ति आउगस्स बंधं पडुच्च सामण्णेणं एकं बंधट्ठाणं चउण्हमण्णयरं, विरुद्धत्वात् दुगादि जुगवं न यज्झति । उदयं पडुच्च एकं ठाणं सामण्णेण चउण्हमण्णयरं, विरुद्धत्वात् दुगादिणो जुगवं न उति त्ति । दो संतट्ठाणाणि-ठाणं पडुच्च सामण्णेणं एकं वा दो वा । एकं ति चउण्हमण्णयरं, ताव जाव अण्णं परभवियाउयं न वज्झति, परभवियाउए पद्धे जाव अण्णत्थ न उप्पजति ताव दोण्हं संतट्ठाणं । इदाणिं संवेहावसरो-आउगस्स तिण्णि अवत्था-बंधपुवकालावत्था बंधकाला- १ वेदनीया-ऽऽयु-गोत्राणा भङ्गसङ्ख्यासूचिकेय गाथा त्रिष्वपि मूलसूत्रादर्शेषु उपलभ्यते-"गोयम्मि सत्त भंगा, अट्ट य भंगा हवंति वेयणिए । पण णव णव पण भंगा, आउचउक्के वि कमसो उ ॥" २ °साये खी' का १ ॥ ३ णाणि भ' का १ ॥ ४ 'याउं न का १ ॥

वत्या पधुत्तरकालावत्या इति । वधपुवकालावत्थाए एको, सेसाण दोण्ह चत्तारि वा दो का विगप्पा । नेरइयरस निरयावय उदय निरगाउम सत ति पधपुछकाले । तिरियाउप यति निरयाउय उदय निरय तिरियाय सत, अहवा मणुयाउय यषति निरयाउगमुदय निरय मशुस्साउगाणि सतं ति, एए दो मगर रघकाले । उपरए बघे निरयाउग उदय निरय तिरियाउय सत, अद्दया निरपाउगमुदय निरय मशुस्साउगाणि दो वि सत, एए दो भगा बधुत्तरकाले भवति । देव निरयाउगाण पघकाले धुचरकाले य पोपरसबोगो नस्थि । कम्हा १ भण्णइ--देव-नैरपिया देवेसु नेरपिगेसु प न उववञ्जति ति काउ। तेण निरयाउगेण पच भमा । एव देवाउगेण वि पच भगा, नवर देवाउगगुदय देवाउग सत ति माणियह । तिरिक्खस्स तिरिक्खाउगसूदय तिरिक्खाजग सत ति नपुवकाले । निरयाउग बघह तिरियाउगमुदय नरय तिरियाउगाणि सत, अइवा विरिसाउग बघा विरिपाउग उदयं तिरिय तिरियाउगाणि सन, अहत्रा मणुयाउग ववह तिरियाउग उदय तिरिय मणुस्सा उगाणि सत, अहवा देवाउग पधइ विरियाउग उदय तिरिय देवाउमाणि सत ति, एए चचारि भगा वधकाले । धे चोच्छिण्णे विरियाउगमुदय तिरिय निरयाउमाणि दो वि सत, अहसा तिरियाउगमुदय तिरिय-तिरियाउगाणि सत, अहवा तिरियाउगमुदय तिरिय मणुयाउमामि दो वि सत, अहवा तिरियाउगमुदर्य तिरिय देवाउगाणि सत; एए चचारि भगा मधुचरकाले । एए तिरियाउगेण णव मगा लद्धा, तिरिक्खा चउस वि गईसु उववाति ति काउ । एव मश्याउगेण वि नव "स्स राज्यं स ॥ २ याउ व कां ॥ ३ शुयाड का ३ ॥ ४ एव चचा का १ ॥ ५ पि दो वि स को स प्रताप मा पनित । गातिरि ॥

मंगा, नवरि मणुयाउगमुदयं मणुस्साउगं संतं ति आलावो भाणियो । एवं आउगभंगा सबे सहिया अट्ठावीसं । इदाणिं गोत्ते बंधाइट्ठाणा भण्णंति-'गोएं' ति गोयस्स हाणं पडुच्च एकं बंधट्ठाणं-उच्चं नीयं वा। दो वि जुगवं न बज्झंति, विरुद्धत्वात् । ठाणं पडुच्च सामण्णेण एकं उदयट्ठाणं उच्च-नीयाणमण्णयरं । दो वि जुगवं न उदेति, विरुद्धत्वात् । दो संतहा- पाणि-दो वा एकं वा । उच्चा-णीयाण समुदओदोण्णि । तेउकाय-वाउकाया उच्चागोयं उज्वलंति, तिरिक्खेसु चेव उववजंति ति काउं, तिरिक्खेसे चेव उच्चागोयस्स उदओ नत्थि त्ति तम्मि उच्चागोए उबलिए नीयागोयमेव एगं संतं । अहवा नीयागोए अजोगिदुचरमसमए खविए उच्चागोए सेसे एवं वा एक संतवाणं ति । इदाणि 'कइ बंधंतो वेयइ कइ ? त्ति एयस्स अवसरो- नीयागोयं बंधइ नीयागोयमुदयं नीयागोयं संतं, एसो भंगो तेउकाइग-वाउक्काइगे पडुच्च, तओ अणंतरुवट्टिए वा सेसजीवे पडुच्च । अहवा नीयं बंधं नीयमुदयं नीयमुच्चं सन्तं, अहवा नीयं बंधं उच्चमुदयं नीयमुचं संतं, अहवा उचं बंधं नीयमुदयं नीउच्चं संतं, अहवा उच्चं बंधं उच्चमुदयं नीउच्चं संतं । बंधे उवरए उच्चमुदयं नीउच्चं संतं, अहवा उच्चमुदयं उच्चं संत एए बंधोवरमे दो भंगा । ईसु नीयागोयस्स उदओ नत्थि त्ति काउं अण्णो विगप्पो नत्थि त्ति । एए गोयम्मि सवे सत्त भंगा । एवं वेयणिया-ऽऽउग-गोएँ 'विभज' ति विभजेद् , विकल्पयेदित्यर्थः । तथा चैव विभक्ताः । 'मोहं परं वोच्छ ति अओ परं मोहणिजस्स पगइसमुकित्तणा बंधाइट्ठाणाणं सामण्णेणं परूवणा संवेहो य भण्णइ ।। ९॥ १ एसु त्ति सं का २ ॥ २ °सु उच्चा' का १ ॥ ३ णं । इयाणिं का १ का २ ॥ ४ प्रतिष्वित्यर्थ , प्रमत्तगुणस्थानकादयोगिगुणस्थानक- पर्यन्तवर्तिप्विति भाव ॥ ५ एसु 'वि सं का २ ॥

तत्य पगइसमकित्तणा-मोहणीय दुविह-दसणमोहणीय चरिचमोहणीय च । मेओ य अत्यनिरूपण च जहा सयगे । तत्य पहाणाणि- वावीस एकवीसा, सत्तरेसा तेरसेव नव पच। चउ तिग दुग च एक, बधट्ठाणाणि मोहस्स ॥१०॥ बावीस० गाहा । २२ । २१ । १७ । १३ । ९।५।४।३।२।१। एयाणि मोहणिखस्स दम वषट्ठाणाणि ॥१०॥ एग चदो य चउरो, एत्तो एक्काहिया दसुकोसा । ओहेण मोहणिजे, उदयट्ठाणा नव हवति ॥११॥ एक व दो व० गाहा । १।२।४।५।६।७।८।९।१०। एयाणि मोहणिजे मामण्णेण सबजीवे पहुन्छ नव उदयट्ठाणाणि । एपाओ दो विगाहाओ उपरि सभेदाओ वणिहिति ॥ ११ ॥ अद्वैग-सत्तग-छ-चउ-तिग-दुग एगाहिया भवे वीसा । तेरस पारेकोरा, एत्तो पचाइ एक्कूणा ॥ १२ ॥ अट्ठ० गाहा । २८ । २७ । २६ । २४ । २३ । २२ । २१ । १३ । १२।११।५।४।३।२।१। एयाणि मोहणिजे पण्णरस सवाणाणि । तत्थ अट्ठावीसा सबमोहपगडिसमुदओ । तओ सम्मचे उबलिए सत्तावीसा । तओ मम्मा- मिच्छे उबलिए छहीसा, अणाइमिच्छदिडिस्स वा । अट्ठावीसाओ अणताणुषधिसु विसजोइएसु चउचीसा । तओ मिच्छत्ते १ स्यन्तां शतकप्रकरणस्य 16-18 गाये, तच्चूर्णिय ॥ २ रस ते खे २ ॥ ३ एको व दो व चउ से ३ । एको य दो से २॥ ४ °णिज्जा उ खे ॥ ५ ट्रयसवयचउतियदु खे २ खे ३ ॥ ६ कारस, से २ से ३ ॥ ७ पा छधीसा । मट्ठा का २॥

खविए तेवीसा । तओ सम्मामिच्छत्ते खविए बावीसा । तओ सम्मत्ते खविए एकवीसा। तओ अट्टकसाए खविए तेरस । तओ नपुंसगवेए खविए बारस । तओ इत्थिवेए खविए एक्कारस । तओ छन्नोकसाए खविए पंच । तओ पुरिसवेए खविए चत्तारि । तओ कोहसंजलणे खविए तिष्णि, माणे दोण्णि, मायाए खवियाए एको ।। १२ ॥ संतस्स पगइठाणाणि ताणि मोहस्स होंति पन्नरस। बंधोदय-संते पुण, भंगविगप्पे बेहू जाण ॥१३॥ संतस्स पगइठाणाणि० गाहा । पुबद्धं पढियसिद्धं । मोहणिजस्स संतवाणाणं परूवणा कया। 'बंधोदयसंते पुण भंगवि- गप्पे बहू जाण' त्ति बंधोदय-संताणं बहुगा भंगा जाणियबा ॥ १३ ॥ पुवं बंधहाणाणि सामण्णेणं उद्दिद्वाणि ताणि इयाणि सभेयाणि वक्खाणिजंति- छ ब्बावीसे चउँ इगवीसे सत्तरस तेरसे दो दो।णवबंधए वि दोन्नि उ, एकेकमओ परंभंगा ॥१४॥ छ ब्बावीसे० गाहा। बावीसवंधगस्स छ ब्बंधविगप्पा भवंति । का य बावीसा ? के य तस्म भेया ? भण्णति- मिच्छत्तं, सोलस कसाया, तिण्हं वेयाणमेगयरं, हासरइ-अरइसोगाणं दोण्हं जुयलाणमेगयरं, भयं, जुगुच्छा चेति । एयामि बावीसाए पगडीणं एगं चेव बंधहाणं तं बंधमाणस्स मिच्छद्दिहिस्स । एयाए बाबीमाए छन्भेया, तं०-तिवेद-हासरड- अरइसोगजुवलेहि उँटुंति, तिण्णि दुगा छ त्ति । मिच्छत्तेण विणा सा चेव बाबीसा एकवीमा भवइ । नवर दोण्हं वेयाण- १ तत्तो कोहसंजलणाए खवियाए तिपिण, तो माणसंजलणाए खवियाए दोषिण, तओ मायासजलणाए खवियाए पको का ॥ २ वटुं जा खे ३ ॥ ३ 'उ एकवीस स° थे २ ॥ ४ य दुगुं का १ का ३ ॥ ५ उट्टेति का १ का ? ॥ ६ णा स चेव का 1 का २ ॥

मेगयर ति माणियव । किं कारण ' नपुसवेओ मिच्छत्तपचओ चि काउ नत्थि । एत्थ चत्वारि भगा दुवेय हासरह अरइसोग- जुवलेहि उट्ठति, दो दुवगा चचारि । सा चेव एगवीसा अणताणुबधिरहिया सचरस । नवर वारस कसाया पुरिसवेओ चि माणिया । किं कारण ! इस्थिवेयस्स अणताणुषधिसहचरियचाओ। एस्थ दो भगा हासरह-अरइसोगजुवलेहिं । ते चेव सत्तरस अपचक्खाणावरणरहिया वेरस । एत्थ वि अणतरुचा चेव दो भगा । ते चेव पचक्खाणावरणरहिया नव । एत्थ वि वे चेव दो मगा। ते चैव बलगदुग मय-जुगुच्छारहिया पच । इओ पमिइ विगप्पो नस्थि । ते चेन पुरिसवेयरहिया पचारि । कोहसजलपेण विणा विष्णि । माणेण विणा दोणि | मायाए विणा एको ॥ १४ ॥ पघट्ठाणाणि मणियाणि इदाणि 'कह षषतो वेएइ कई चि एयस्स अवसरो । पुबुद्दिद्वाणि उदयहाणाणि वध बध पह सविगप्पाणि मण्णति- दस वावीसे णवे इकवीस सचाइ उदयठाणाणि। छाई णव सत्तरसे, तेरे पचाइ अद्वैव ॥१५॥ दस बावीसे नव एकषीस० गाहा । बावीसबधगस्स मिच्छहिद्विस्स सत्ताइ दसताणि चत्तारि उदयड्डाणाणि, त०---सत्त अट्ठ नव दस चि ७1८1९।१०। तत्थ सचोदओ-मिच्छत अपचक्खाण पच्चक्खाणावरण सजलणाण य चउण्ह कोहाई- गमेगयर विग, किं कारण ? कोहम्मि वेइलमाणे सो कोहा बेइखति, वजातीयकत्वात् , एव माण माया-लोमा वि, तिण्ह १ सग नं १ को १ ॥ २ बाइउ ति को १॥ ३ रिति । स चेव को १ का २॥ ४ जुगलगदुगमयदुगु को । जुयलदुग अं॥ ५ वगषीस स खे॥६ यकम्मला । छा खे३॥ 2 वेयाण एगयरं, तिण्णि वि जुगवं न उदेति, विरुद्धत्वात, हासरइ-अरइसोगाणं दोण्ह जुयलाणमेगयर, एए विरुद्धत्तणो जुगवं न उप॑ति । एयासि सत्तण्हं पगईणं धुवोदओ मिच्छद्दिहिस्स ठाणं पडुच्च । एयम्मि सत्तोदए चउवीसं भंगा, 10-- चत्तारि कोह-माण-माया-लोमे तिणि वेए हासरइ-अरहसोगे दोणि वि जुर्वले अहिगिच्च उठेंति परोप्परगुणिया २४ । एयम्मि चेव सत्तोदए भएण वा दुगुंछाए वा अणंताणुबंधिए वा छुढे अट्ठ । एत्थ भय-दुगुंछा-ऽणताणुचंधीहिं अट्ठगे तिणि चउबी- साओ लभंति । अणंताणुबंधिउदयरहिओ मिच्छद्दिडी कम्मि काले भवइ ? भण्णइ-सम्मद्दिड्डी अणताणुवंधिणो विसंजो- चउवीससंतकम्मिओ जाओ, पुणो वि मिच्छत्तं गंतूण अणंताणुबंधिणो बंधमाणस्स बंधावलियाए अगयाए अर्णताणु- बंधीणं उदयो नत्थि, तम्मि काले आवलियामेत्तं कालं मिच्छद्दिट्ठी अणंताणुबंधिउदयरहिओ लब्भइ, नान्यत्र । तम्मि चेव सचोदए भय-दुर्गुच्छाए वा भय-अणताणुबंधिए वा दुगुच्छ-अणंताणुबंधिए वा छुढे नवोदओ भवइ । तत्थ वि ते चेव तिण्णि विगप्पा । एकेकाम्म य चउवीसं भंगा। तम्मि चेव सत्तोदए भय-दुगुच्छोए अणंताणुवंधीहि य छुढेहिं दसोदओ भवड । तम्मि दसोदए एगा चेव चउवीसा । बावीसबंधगस्स उदयट्ठाणा सविगप्पा भणिया इति । इदाणि एकवीसबंधगस्स सत्ताइ-नवंतगाई तिण्णि उदयट्ठाणाई, तं जहा-७।८।९। तत्थ सत्तोदओ अर्णताणुवंधि- अपञ्चक्खाण-पञ्चक्खाणावरण-संजलणाणं कोहाईण चउण्हं पि एगर्यरं चउक, तिण्ह वेयाणमन्नयर, दोण्ह जुयलाणमेगयर । १ "द्धत्ताओ का १॥ २ जुगले का १ का २ ॥ ३ यपत्तु का २॥ ४ ओ । त' मा १॥ ५ च्छा-अ' का रं, तिण्ह स॥ ७'ण एगय का २ ॥ यइत्तु एएसि सत्तण्ड कम्माण समुदओ सासायणस्स धुवोदओ ठाण पड्छ । एयम्मि सचोदए एगा घउवीसा कोहाह वेय-जुपले य अहिकिच। तम्मि चेव सचोदए भए वा दुगुच्छाए वा छूढाए अट्ठोदओ । एत्य भय-दुगुच्छाहिं दो चउवीसाओ अडगाण । तम्मि चेय सत्तोदए मय-दुगुच्छाहि छूढाहिं नवोदओ भवति तम्मि नवोदए एगा चउवीसा। सबाओ चचारि । एय असेदिगय पडुच्च । सेदिगय पडुष दुविहो आएसो-जेसि अणताणुषधिसहिओ सेटिं पडिवजति तेसि आएसेण सेढीओ परिवडमाणो वि सासणो लमह । जेसि अणवाशुबधिरहिओ सेटिं पडिवलइ तेसि आएसेण सेढीओ परिवडमाणो सासणो न लम्मइ । कह ? मण्णवि-अणताणुबधिरहियस्स सासणमावो न समवइ ति काउ । जइ अणताणुवपिरहियस्स सासणभावो लमेज तो छादि णववाणि चत्वारि उदयट्ठाणाणि लमेल | जम्हा दोण्ह वि मएण चचारि न लन्भति तम्हा अणताणुवधिसंतरहिस्स सासणभावो नत्थि त्ति सद्धेय । 'छादी नव सत्तरसे' चि सत्तरसवधगस्त छादी नववाणि चत्तारि उदयडाणाणि, त०-छ सत्त अट्ट नव ति। सत्तरस- बघगा दो-सम्मामिच्छट्टिी असजयमम्मदिडी य । तत्थ सम्मामिच्छद्दिहिस्स सत्तरसपघगस्स तिणि उदयट्ठाणाणि- ७।८।९। वत्य सचोदओ-सम्मामिच्छच, अणताशुबधिवाण तिण्ह कसायाण चउप्पगाराणमेगयर, तिण्ड वेदाण एग पर, दोण्ह जुवलाणमेगयर ति । एयासि सचण्ह पगडीण सम्मामिच्छद्दिहिस्स धुवोदओ ठाण पड्डच्च । एयम्मि सत्तोदये एगा चउबीसा पूर्ववत् । एयम्मि चेव सत्तोदए भएण वा दुगुछाए वा छुड़ाए अटोदओ । एत्थ भय दुगुलाहिं दो चउवी- १ एण वा का ३ ॥ २ घिसतरहि १ का २॥ ३ दिएणय ।

साओ अट्ठगाणं । तम्मि चेव सत्तोदए भय-दुगुंछाहिं छूढाहिं नवोदओ होइ । एयम्मि नवोदए एका चउबीसा । सबाओ चत्तारि चउबीसाओ । इयाणिं असंजयसम्मदिहिस्स सत्तरसबंधगस्स छादि-नवंताणि चत्तारि उदयट्ठाणाणि-६ । ७।८।९। तत्थ छलोदओ उवसमसम्मदिहिस्स वा खाइगसम्मदिहिस्स वा-अणंताणुबंधिवजा तिणि कसाया, तिण्हं वेदाणं एगयरं, दोण्हं जुवलाणं एगयरं ति । एए छकम्मा अविरयसम्मदिहिस्स धुवोदओ ठाणं पडुच्च । तत्थ छलोदए एगा चउचीसा पूर्ववत् । तम्मि चेव छलोदए भएण वा दुगुंछाए वा वेदगसम्मत्तेण वा एगयरेण सत्तोदओ। एत्थ भय-दुगुंछा- सम्मत्तेहि सत्तगाणं तिण्णि चउव्वीसाओ भवंति । तम्मि चेव छक्कगे भय-दुगुंछाए वा भय-सम्मत्तेण वा दुगुंछा-मम्मत्तेण वा छुढेण अट्ठोदओ । एत्थ वि तेहिं चेव तिहिं दुगेहिं अट्ठगाणं तिणि चउव्वीसाओ। तम्मि चेव छक्के भय-दुगुंछ-सम्मत्तेहिं छुढेहि नवोदओ होइ । एत्थ नवोदए एका चउव्वीसा । सबाओ अट्ठ । सत्तरसबंधगस्स मवाओ वारस चउच्चीमाओ। 'तेरे पंचादि अटेव' ति तेरसबंधगस्स पंचादि-अट्ठगंताणि चत्तारि उदयहाणाणि, तं-५।६। ७।८ । जाणि असंज- यसम्मदिद्विस्स छलोदयादीणि चत्तारि उदयट्ठाणाणि वुत्ताणि ताणि चेव अपचक्खाणावरणरहियाणि संजयासंजयस्म पंचा- दि-अद्वगंताणि उदयट्ठाणाणि सविगप्पाणि भवंति । सबाओ अट्ठ चउच्चीसाओ ॥ १५ ॥ चत्तारि आइ णवबंधएसु उक्कोस सत्तै उदयंसा। पंचविहवंधगे पुण, उदओ दोण्हं मुणेयवो ॥१६॥ १ 'के तिहिं भ° फा १ ॥ २ तमुदयं खे ३ ॥

चचारि आदि नववधएसु उकोस सचमुदयस० चि । नवविहवघगस्स सजयस्स चउरादि सचगताणि चत्तारि उदयट्ठा पाणि-४।५।६।७। जाणि चेव संजयासंजयस्स पचादि-अट्ठगताणि उदयट्ठाणाणि ताणि चेव पच्चक्खाणावरणरहियाणि सजयस्स चउरादि-सत्तोदयताणि चत्वारि उदयट्ठाणाणि सविगप्पाणि भवति । 'पचविहवधए पुण उदओ दोण्ह मुणेयद्यो' ति पचविहधगस्स दोण्ह कम्माण समुदओ ति एक उदयट्ठाण । दोणि-चउण्ह सजलणाण एगयर, तिण्ह वेयाणमे- गयरं । एत्थ तिवेद-सजलणचउकेहिं पारैस मगा भवति ॥१६॥ ऐत्तो चउवधादी, एककुदया हवति सचे वि । वधोवरमे वि तहा, उदयाभावे वि वा होजा ॥१७॥ चउविहषधगस्स वेदोदए पुरिसवेदवधे य जुगव फिट्टे एकमेव उदयट्ठाण लब्मति, त०-चउण्ह सजलणाण एगयर । एत्थ चत्तारि भगा । कह भण्णइ-कोयि कोहेण उवट्ठाइ कोयि माणेण उवट्ठाइ कोइ मायाए कोइ लोमेण । एत्थ अण्णे अण्णारिसं पढति । तच्चदम्- 'पचामो य घटक सम्ममाणस हाति वे चेव । वेएहि परिहीणा चउरो चरिमेसु कसिणेमु ॥ ( ) ॥ तच कसायपाहुडादिसु विहडति चि काउ परिसेसिय। तिविहवधगस्स एको उदओ-कोहसजलणवजाण विण्ह कसा १ णि त०–४ का १ का २॥ २ ति । एत्य बि मह। 'प का रभगा भवति-पकनपुसकवेदोदयामाघे चतुष्कत्यमौ प्येक(एक लीवेदोवयामाये एके(क) चतुका म्) एषमन्ये द्वादश ॥ १६॥ को २ ॥ ४ गायेय पूर्णी मक्षरशो वनारिताऽस्ति ॥ ५ स्वस्तिकविकान्तर्गत पाइ सप्रती नास्ति ।

याणमण्णयरं । कहं ? कोहसंजलणाए उदए वट्टमाणो नियमा चउबिहबंधगो, बंधोदओदीरणा य जुगवं फिइंति त्ति काउं । एत्थ तिणि भंगा। दुविहबंधगस्स एको उदओ माया-लोहसंजलणाणं अण्णयरं । माणसंजलणाए भावणा जहा कोहस्स । एत्थ दोभंगा। एगविहबंधगस्स एगं उदयट्ठाणं लोहसंजलणा । मायाए भावणा जहा कोहस्स। एत्थ एगो मंगो। इदाणिं अबंधगस्स एगं उदयट्ठाणं, लोभसंजलणाए एगाए सुहुमकिट्टी वेदेइ त्ति । 'उदयाभावे वि वा होज' ति तस्सेव अबंधगस्स उदयाभावे वि संतं लब्भति, उवसंतकसायं पडुच्च ॥ १७ ॥ इदाणि सामण्णेणं सबोदएसु सबबंधगे पडुच्च सव्वभंगा केत्तिया होज ? ति तनिरूवणत्थं भण्णइ- एक्कग छक्केकारस, दस सत्त चउक्क एकगं चेव । एए चउवीसगया, चउवीस दुगेक्कमेकारा ॥१८॥ एक्कग छक्केकारस० गाहा । दसोदए एक्का चउव्वीसा । नवोदए छ चउवीसाओ। अट्ठोदए एकारस । सत्तोदए दस छलोदए सत्त । पंचोदए चत्तारि । चउरोदए एका चउव्वीसा । 'चउवीस दुर्ग' ति दुगोदए पंचविह-चउबिहेवंधगं पडुच्चे एक्का चउनीसा । 'एक्कमेकारे त्ति एक्कोदए चउबिह-तिविह-दुविह-एक्कविहबंधगे य पडच्च ४ । ३।२।१।१ । अबंधगे य यथासङ्खथमेकादश भङ्गा भवन्ति सो वि ॥ १८ ॥ इदाणिं सबोदयपरिमाणनिरूवणथं मण्णइ- १ 'या, बार दुगेक्कम्मि एका से१ से२ ॥ २ "एतच मतान्तरेणोफम्, अन्यथा स्वमते दादा भता रोदितम्या गिरीयटीकायाम् ॥ ३ ह एककं पडु स ॥ ४ च वारस अट्ट चउभगो हि एकाप च' कां२ ॥ इति श्रीमलय- ३ चचारि आदि नववधएम उक्कोस सचदयस० ति । नवविहरषगस्स सजयस्स चउरादि-सत्तगताणि चत्तारि उदयद्वा- पाणि-४।५।६।७। जाणि चैव सजयासजयस्स पचादि-अट्ठगताणि उदयट्ठाणाणि ताणि चेव पचक्खाणावरणरहियाणि सजयस्स घउरादि-सचोदयवाणि चचारि उदयवाणाणि सविगप्पाणि भवति । 'पचविहवधए पुण उदओ दोण्ह मुणेयों' ति पचविहवघगस्स दोह कम्माण समुदओ ति एक उदयट्ठाण । दोणि-चउण्ह सजलणाण एगयर, तिण्ड वेयाणमे- गयर । एत्य तिवेद-सजलणचउकेहिं पारस मगा भवति ॥१६॥ ऐचो चउवधादी, एककुदया हवति सो वि । वयोवरमे वि तहा, उदयाभावे वि वा होजा ॥१७॥ चउविहबधगस्म वेदोदए पुरिसवेदवधे य जुगव फिडे एकमेव उदयट्ठाण लन्मति, १०-चउण्ह सजलणाण एगयर । एस्थ चत्तारि भगा । कह ! भण्णइ-कोयि कोहेण उवठ्ठाइ कोयि माणेण उवठ्ठाइ कोइ मायाए कोइ लोमेण । एत्य अण्णे अण्णारिस पदति । तदर- पंचामो य चउका सम्ममाणस्स हाति ते चेव । एहि परिहीणा चतरो चरिमेसु कसिणेसु ॥ ) ) त च कसायपाहुडादिसु विहडति चि काउ परिसेसिय। तिविहवधगस्स एको उदओ-कोहसजलणवलाण विण्ह कसा १ णि त०-४ का १ का ३ ॥ २ ति। एत्य वि अट्ठ । 'पं को २॥ ३ रममा भवति–एकनपुखफवेदोदयाभावे चतुष्कद्वयमलो प्येक(एक सीवेदोदयामा पके(क) चतुष्क(म्) एवमन्ये बादश॥ १६ को १॥ ४ गाथेय पूणों अक्षरशो जतारिताऽस्ति ॥ ५ स्वस्तिकद्विकान्तर्गत पाठ सप्रती नास्ति । ५ याणमण्णयरं । कहं ? कोहसंजलणाए उदए वट्टमाणो नियमा चउविहबंधगो, बंधोदओदीरणा य जुगवं फिति त्ति काउं। एत्थ तिण्णि भंगा। दुविहबंधगस्स एको उदओ माया-लोहसंजलणाणं अण्णयरं । माणसंजलणाए भावणा जहा कोहस्स । एत्थ दोभंगा। एगविहबंधगस्स एग उदयट्ठाणं लोहसंजलणा । मायाए भावणा जहा कोहस्स । एत्थ एगो मंगो। इदाणि अबंधगस्स एग उदयहाणं, लोभसंजलणाए एगाए सुहुमकिट्टी वेदेइ ति । 'उदयाभावे वि वा होज' ति तस्सेव अबंधगस्स उदयाभावे वि संतं लब्भति, उवसंतकसायं पडुच्च ॥ १७ ॥ इदाणिं सामण्णेणं सबोदएसु सबबंधगे पडुच्च सबभंगा केत्तिया होज ? ति तनिरूवणत्थं भण्णइ- एक्कग छक्के कारस, दस सत्त चउक्क एक्कगं चेव । एए चउवीसगया, चउवीस दुगेक्कमेक्कारा ॥१८॥ एक्कग छक्केकारस० गाहा । दसोदए एक्का चउबीसा । नवोदए छ चउवीसाओ। अट्ठोदए एकारस । सत्तोदए दस । छलोदए सत्त । पंचोदए चत्तारि । चउरोदए एका चउन्नीसा । 'चउवीस दुर्गे' त्ति दुगोदए पंचविह-चउबिहवंधगं पडुच्चे एक्का चउदीसा। 'एकमेकारे' ति एक्कोदए चउबिह-तिविह-दुविह-एक्कविहवंधगे य पडुच्च ४।३।२।१।१ । अबंधगे य यथासङ्खयमेकादश भङ्गा भवन्ति सच्चे वि ॥ १८ ॥ इदाणिं सच्चोदयपरिमाणनिरूवणत्थं भण्णइ- १ या, वार दुगेक्कम्मि एक्का' खे१ खे२ ॥ २ "एतच मतान्तरेणोक्तम्, अन्यथा स्वमते द्वादशैव भना वेदितव्या" इति श्रीमलय- गिरीयटीकायाम् ॥ ३ ह एक्ककं पडु स ॥ ४ च यारस अट्ट चउभगो हि एकाए च कार ॥ AS ३ नेवपचाणउयसए, उदयविगप्पेहि मोहिया जीवा। अउणत्तरिएंगत्तरिपयर्विदसएहि विन्नेया ।।१९।। नवपचाणउयसऐ उदयविगप्पेहि मोहिया जीवा० गाहा । 'उदयविगप्पेहि ति उदगमेदेहिं । दसण्व पगतीण समुदओ एग उदयद्वाण १०।९।८।७।६।५।४।२।१। एगाए पगईए एगो उदओ । एष सो उदयमेदा एचिया हवति ९९५ । एऐहिं मोहिया जीवा । एएसि उप्पत्ती–सोसि दसोदयादि दुगोदयपअपसाणाण मूलमेदा पिडि- अति, एत्य एकेकम्मि चउहीसं मगा अस्थि चि काउ चउबीसाए गुणितु एफोदयभेदेहि वि एकारसहि छूदेहि नवसपा पचाणउया हवति । 'अउणचरिएगा रे र पार' त एकूणसत्चरिसएहिं एगत्तरेहि 'पदवदेहि ति फम्मपगडिसमुदएहिं । नेगु '। एएहि मोहिया जीव चि सबज्यति । एयरस उप्पत्ती-दसोदयमगो 1, अट्ठोदय० अहि, सचोदय० सहि, छलोर्दय० छविं, पचोदय. ति । कि कारण १ तम्मि तम्मि उदये तत्तियाण कम्माण समुदओ चि कम्मसमुदएण गुणिया मेलिजति । तेसु एफेफम्मि उपचीस भगा अस्थि यपिंडे एकोदए जे एकारस भगा ते छुन्मति । एएहि अउणचरिसयाणि ऐकास- र से२॥ ३ एरुदय ॥४।। जाप पगा का ॥ ५ पसि मो काम गच का२॥

चराणि पदवृन्दानां भवन्ति ॥ १९ ॥ णवतेसीयसएहि, उदयविगप्पेहि मोहिया जीवा। अउणत्तरिसीयाला, पयवंदसएहिं विन्नेया ॥२०॥ नवतेसीयसएहिं उदय० गाहा । 'उदयविगप्पेहिं' ति उदयमेदेहिं । दसण्हं पगतीणं समुदओ एगो उदओ।१०।९। ८।७।६।५।४।२।१। एगाए पगतीए एगो उदओ । एवं सबे उदयमेदा पिंडिया नवसया तेसीया । एएहिं मोहिया जीवा । एएसिं उप्पत्ती-सवेसिं दसोदयाइ-चउरोदयपजवसाणाणं मूलभेदा पिंडिजंति । एत्थ एकेकम्मि चउव्वीसं भंगा अस्थि त्ति काउं चउवीसाए गुणितु दुगोदय-एगोदयविगप्पेहि वारस-एकारसहि छुढेहिं नवसया तेसीया भवति । 'अउणत्तरि सीयाला पदवंदसएहि विष्णेय' ति एगूणसत्तरिसएहिं सीयालअहिएहिं 'पदवंदेहि' ति कम्मपगडिसमुद- एहि ति । तेसु सबोदएसु कम्मपगडीओ एत्तियाओ भवंति । तेहिं मोहिया जीव त्ति संवज्झति । एयस्स उप्पत्ती-दसोदयमंगो दसहिं गुणिजति, एवं नवोदयभंगा नवहिं गुणिजंति, अट्ठोदय० अट्टर्हि, सत्तोदय० सत्तर्हि, छलोदय० छहिं, पंचोदय० पंचहि, चउरोदय० चउहि, दुगोदयभंगा दुहिं गुणिजंति । किं कारणं ? तम्मि तम्मि उदए तत्तियाण कम्माण समुदओ ति काउं । दसोदयादी चतुरुदयपजवसाणा उदया अप्पप्पणो कम्मसमुदएण गुणिया मेलिजंति २८८ । तेसु एफेफम्मि चउहीसं १ "इयं चोदयस्थानसत्या पदसराया च ये मतान्तरेण चतुर्विधसमकाले विकोदये द्वादश(नता शति ) मना उफास्तानबिरुत्य वेदितय्या ॥ १९॥ यदा पुनरेते नाधिक्रियन्ते तदा इयमुदयस्थानसहपा-नवतेसीय.” इति श्रीमलयगिरीयटीकायाम् ॥ २१ । जाव एगा' १ को२॥ ३ गोदओ का? कार ॥

नवपचाणउयसए, उदयविगप्पेहि मोहिया जीवा। अउणचरिऐगरिपयविंदसएहिं विनेया ॥१९॥ नवपचाणउपसएं उदयविगप्पेहि मोहिया जीवा गाहा ! 'उदयविगप्पेहि दि उदयमेदेहि । दसण्ह पगतीण समुदओ एग उदयद्वाण १०।९।८।७।६।५।४।२।१।एगाए पगईए एगो उदओ। एव सः उदयमेदा एसिया हवति ९९५ । एएँहि मोहिया जीवा । एएसिं उप्पची-सवेसि दसोदयादि दुगोदयपजवसाणाण मूलभेदा पिंडि- अनि, एत्य एकेकम्मि चउहीस मगा अस्थि ति काउ चउहीसाए गुणितु एक्कोदयमेदेहिं वि एकारसहिं छुडेहिं नवसया पचाउया हवति । 'अउणचरिएगारिपदवदसएहिं विण्येय' चि एकूणसत्चरिसएहिं एगपरेहि 'पदवदेहि ति फम्मपगडिसमृदएहि । तेसु सबोदएसु कम्मपगडीओ एचियाओ हवति ६९७१ । एएहि मोहिया जीव ति सपज्झति । एपस्स उप्पत्ती-दसोदयमगो दसहि गुणिलाइ, एव नवोदयमगा नहिं गुणिजति, अहोदय. अहि, सचोदय० सहि, छलोदय० छहिं, पचोदय. पचाहि, चउरोदय० पउहि, दुगोदय० दुर्हि गुणिअति । किं कारण ? तम्मि सम्मि उदये ततियाण कम्माण समुदओ त्ति काउ । दसोदयादि दुगोदपपञ्जवसाणी अप्पप्पणो कम्मसमुदएण गुणिया मेलिसति । तेसु एकेडम्मि चउधीस भगा अस्थि त्ति काउ चउजीसेहिं गुणिजति । तम्मि उदयपिंडे एकोदए जे एकारस भगा ते छुन्मति । एएहिं अउणचरिसयाणि एकस- १ नास्तीय गामा खेप्रती ॥२ रिसीयाला प खेर। पादप कर॥४ । जाच एगा को१ का॥ ५'पसिमो को। १-११ दए की ॥ १२ णा उदया अप्य २॥ १३ गत कर।

ममा अस्थि ति काउ चउशीसाए गुणिलति । तम्मि उदयपिंडे दुगोदयचउघीसाए एकोदयएकारसहिं य छुढेहिं अउणचरि सयाणि सीयालागि पयवदाण भवति ।। २०॥ इदाणि 'कह वा पगतिट्ठाणकम्मस' (मा० २) चि एय मण्णइ । बावीसाइबधमाणाण तम्मि तम्मि उदयडाणे कति सवठ्ठाणाणि होज ति तबिरूवणस्य मण्णति- 'तिपणे उ वावीसे, इगवीसे अट्ठवीस सत्तरसे । छ ञ्चेव तेर णवबधासु पचेव ठाणाणि ॥ २१॥ बावीसषगस्स मिच्छदिहिस्स पउण्डमण्णयरे उदयहाणे वट्टमाणस्स तिणि सवडाणाणि, त०-अट्ठावीसा सचावीसा छबीस चि । एएसि अत्थो पुरविवरीओ । तत्य दसोदए तिणि वि सतढाणाणि अस्थि । कह ? अणताणुषधीण उदओ अस्थि त्ति फाउ । नवोदए वि एमेव । जस्थ अणताशुषधीण उदओ नस्थि तत्थ अट्ठावीसा चेव । कह ? भण्णइ-चउबीस- सतकम्मिओ सम्मदिड्डी मिच्छत गतूण अणताणुवधिणो बघिउमाढतो, वधावलियाए अगयाए उदओ न होइ वम्हा तस्स अट्ठावीसा सत पडब । एव अट्ठोदए वि तिणि वि भाणियवाणि । सचोदए अट्ठावीसा चेव । कह ? भण्णइ-चउघीससत कम्मिगस्स सम्मवाओ परिवडियमेचस्स अणताशुनधीण उदयामावे मिच्छत्तोदए षकमाणे अणताणुषधिणो नियमा वति (चन्झति) चि । एव पानीसवधगस्स चचारि उदयट्ठाणाणि पडुछ दस सतमेदा लष्मति । १ गाषेयं पूर्णावक्षरयोऽवतारिताऽस्ति ।। २ वय वा खे३॥

'हगवीसे अट्ठवीस' ति एगवीसबंधगस्स तिसु वि उदयट्ठाणेसु एग व संत अट्ठावीसा । कह १ पढमसम्मत्तं उप्पाएत्तु समसम्मदिट्ठिाणे वट्टमाणो सासणभावं गच्छति, तओ सासणभावं गच्छंतस्स सबमोहपगडीओ अस्थि ति कार्ड ताणुबंधिसहिता अठ्ठावीसा। उवसमसेढीओ ओयरतो वि कोइ सासणभावं गच्छति सो एत्थ णाहिकओ । एवं एकवीसबंधगस्स तीसु वि उदयट्ठाणेसु तिणि वि अट्ठावीसाओ लभंति । 'सत्तरसे छच्चेव' त्ति सत्तरसबंधगस्स चउसु उदयट्ठाणेसु वट्टमाणस्स सामण्णेण छ संतढाणाणि, ते ०-अट्ठावीसा २८॥२७॥ २४ । २३ । २२ । २१ । तत्थ नवोदयहाणे एगवीसवजाणि पंच संतहाणाणि । कहं ? वेयगमम्मदिदि मम्मामिच्छद्दिट्टि वा पडुच्च अट्ठावीसा चउवीसा य लभंति, अट्ठावीससंतकम्मिगो सम्मत्तं मम्मामिच्छत्तं बागच्छति त्ति काउं। चउगडगा य पञ्जत्ता सम्माहिद्विणो अणंताणुबंधिणो विसंजोएंति त्ति काउं असंजतमम्मद्दिहिस्म चउवीमा लभइ । मो चेव कोड सम्मामिच्छत्तं पि जाइ ति सम्मामिच्छादिद्विस्स वि चउवीसा लन्भइ । सत्तावीमा मम्मामिच्छद्दिहि पडुन, कहं ? मिच्छट्टिी मम्मत्तं उबले सम्मामिच्छत्तसंते वट्टमाणो कोइ सम्मामिच्छत्तं जाइ ति काउं । तेवीमा मणुमस्म अट्ठण्डं परिमाणं उम् िपट्टमाणम्म वेयगसम्मद्दिहिस्स खवणाए अन्भुट्टियस्स अणंताणुवंधि-मिच्छत्ते य खविए नेवीमा लभड । तस्मेव मम्मामिन्छत्ते ग्वविए बावीसा । सा य उसु वि गईसु लब्भइ । किं कारणं ? भण्णइ-"पट्टयगो पुण गपुओं द्वागो होर नठगी गईग।" । त्ति वयणाओ। मिच्छत्ते सम्मामिच्छत्ते य खविए पच्छा चउसु वि गईमु उपचाओ बद्धाउग पडुन । अट्ठोदर वि एपाणि १ 'पिण अट्ठा का१ कार ॥ २ तं०-२८ ! 1 ॥ ३ 'गा प ग ॥ ४ त द्वार त्ति का ॥ ter.

- पूर्ववत् पच वेयगसम्मदिहि-सम्मामिच्छट्ठिीण मावेयवाणि । तत्थ वेयगसम्मच सम्मामिच्छतेण विणा जो अहोदओ सो उपसमसम्मदिद्विस्स खाइसम्मदिविस्स पा मवह । तत्थ उवसमसम्मदिहि पडच अट्ठावीसा घउवीसा य लन्मइ । वत्थ अट्ठावीसा पढमसम्मत्त उपाडितस्स, उवसमसेदीओ परिवडमाण वा पडुच दो वि लग्मति । खाइगसम्माहिद्विस्स एगवीसा लन्मइ । एव अट्ठोदए छ सम्हाणाणि । एयाणि छ वि सवडाणाणि सत्तोदए वि तहा माणियवाणि जहा अट्ठोदए। छलोदए वि तिष्णि संतवाणाणि लम्मति–२८ । २४ । २१ । कह । वेयगसम्मत सम्मामिच्छचेण विणा छलोदओ हवह । तत्थ उसमसम्मदिद्धि पहुच अट्ठाधीमा चउवीसा य पूर्ववद् भावयितश्या । एगवीसा खाइगसम्मबिहिस्स । एव सत्तरसवधगस्स सामण्णेण चउसु वि उदयहायेसु बीस संवडाणाणि । 'तेरेनववधगेसु पवेव ठाणाणि' ति वेरस-नवविहवघगाण-देसविरय सजयाण जहा असजयसम्महिहिस्स चउसु वि उदयट्ठाणेसु मावणा मणिया तहा माणिया । नवरं बावीस-एगवीससताण परमवो न भाणियहो । तत्थ तेरसबधगस्स तिरि- खस्स अट्ठावीसा चउवीसा च, एए मोसूण सेसा र सभवति । कह ? मण्णइ-वेवीसा बावीसा य खाइगसम्मत्त उपाएन्तस्स, सो उप्पाएको नियमा मशुओ त्ति काउ, तेण णस्थि । एगवीसा तिरिक्खेसु सजयाऽसजएसु नत्थि । कह मण्णह-संखेजवासाउपसु तिरिक्खेसु खाइगसम्मदिट्टी ण उववजाइ, असंखेलवासाउएस उववजेजा, तत्थ वि देसविरई १'गस्स या स ॥२ र २८ । २४ । २३ । २२ । २१ । नय २८ । २४ । २३ । २२ । २१ । यध २॥ ३ति २८1 २४ । २३ । २२ । २१ देर की । ४ माविय की ॥ ५ सा ए च । "सा य प कार ॥ - नत्थि । तम्हा तिण्णि वि मणुयदेसविरएसु भावेयवाणि । एवं तेरस-नवबंधगाणं अप्पप्पणो उदये पडुच्च सत्तरस सत्तरस संतवाणाणि भवंति ॥ २१॥ पंचविह-चउविहेसुं, छ छक्क सेसेसु जाण पंचेव । पत्तेयं पत्तेयं, चत्तार' उ बंधवोच्छेए ॥ २२ ॥ पंचविहचउविहेसु छ छक्क० ति । पंचविहबंधगस्स दुगोदए वट्टमाणस्स छ संतवाणाणि भवंति, तं०-अट्ठावीसा, २८ । २४ । २१ । १३ । १२ । ११ । अट्ठावीसा चउवीसा य उवसमसेटिं पडुच्च । एकवीसा दोसु वि सेढीसु । खवगसेढीए जाव अट्ठ कसाया ण खविजंति ताव एगवीसा । अट्ठकसाए खविए तेरस । तओ नपुंसगवेए खविए वारस । तओ इत्थिवेए खविए एकारस | जाव पुरिसवेयस्स बंधो ताव छण्णोकसाया धरंति । एवं पंचविहवंधगस्स छ संतढाणाणि । इयाणि चउबिहबधगस्स चउण्हं संजलणाणं अण्णयरोदए वट्टमाणस्स छ संतवाणाणि, तं०-२८ । २४ । २१ । ११ । ५। ४ । एयाणं छण्हं संतढाणाणं आदिमाणि तिणि संतवाणाणि उवसमसेढीए चेव । चउविहबधगो एकारससंत- कम्मिगो एकोदए । कहं ? भण्णइ-नपुंसगवेएण उवट्टियस्स नपुंसग-इत्थिवेयसंतक्खए पुरिसवेयवंधवोच्छेए य जुगवं कए तस्स एकारस संतं । सो य चउबिहबंधगो अवेयगो सत्त कम्मसे जुगवं खवेइ, खविए चत्तारि संतं । एमेव इत्थिवेएण वि उववियस्स, नवरि नपुंसगवेओ पढमं खिज्जइ ति। तओ अंतोमुहुत्तेण इत्थिवेयस्स उदयसंतक्खओ पुरिमवेयवंधवोच्छेओ य जुगवं भवइ । एवं वा एकारससंतकम्मिओ । पुरिसवेएण उवट्ठियस्स छण्णोकसायखवणकाले पुरिसवेयेस्स बंधोदयवोच्छेए १ "रि य च खे३ ॥ २ 'ति-२८ । का१ । 'ति-अट्ठा का२ ॥ ३ ण खिजंति कार ॥ ४ °मादि तिण्णि स ।। ५ यगस्स 1१॥

जुगव कए तओ पचसतकम्मिओ भवइ समयणदुपावलियमेच काल । पुरिसवेए वीणे चउसतकम्मिगो अंदोमुडुत्तकाल । 'सेसेस जाण पच पचेय पचेय' ति सेसेस विविडवघगाइसु एकेकम्मि उदयद्वाणे पत्तेय पत्य पच पच सतवाणाणि । तत्य तिविहवधगस्स कोहवजाण तिण्ह सजलणाण अण्णयरवेयगस्से २८ । २४।२१। ४ । ३ सवडाणाणि भवति । अट्ठावीस-पउहीस एकवीसा य उवसमसेटिं पदुध लन्मदि। चचारि विणि य खवगसेडीए लम्मति । कह १ कोहसजलणाए पदमहिईए आवलियांसेसे पो उदो उदीरणा य जुगव फिति, समऊणदुआवलियब पढमहिती य धरह, त पिबद्ध तत्ति एण कालेण खय गच्छद, ताव विविहबधगस्स चउबिह एकोदए संत लन्मदा कोहसंजलणाए खवियाए तिणि भवति अंतो मुहतकाल । एव तिविहबधगस्स पच सतड्डाणाणि । एमेव दुविधगम वि माया-लोमाण अण्णयर देयमाणस्स २८ । २४।२१।३।२। तिणि वे ये पडुछ खवगसेटिं लन्मति-माणसबलणाए बघोदए फिडे समगदुमावलियबद्ध पदमडिईए लग्मइ त सविक्षत खविजत समयऊणाहिं दोहिं बावलियाहि खीयइ, ताव सत तिणि । वओ माणसजलणाए खीणाए दोणि लन्मति । एव दुविहवघगस्स सहाणि पच सतढाणाणि । एगविवधगस्स पच संतवाणाणि-२८।२४।२१।२।१। तत्य एकम्मि लोभोदए बङ्कमाणस अड्डावीसाईण तिण्ड भावणा जहा तिविहबधगस्स । खवगसेटीए दोणि एकच १ इत भारभ्य बर्वेषु मोहनीयसत्तास्थानेषु 'समयूगडपावलिय." इत्येतत्स्थाने श्रीमलयगिरीय टीकायां समययोनावलिकाद्रिक०" इति मता तर सन्मठे ॥ २ एकम्मि से कर ॥ ३ स्स पच २॥ सेस घ सकार॥५मणति । ६२ । पूर्वष। ति का ७ य खबगसेदि पहुच ल र ॥ पा - संतवाणाणि लन्भंति । तत्थ दोणि मायासंजलणाबंधोदए फिट्टे, समयऊणदुयावलियभावना पूर्ववत् । तओ मायाए खीणाए एकं लोभसंजलणा एव । इयाणिं अबंधगस्स 'चत्वारि उ बंधवोच्छेए' त्ति बायर[लोभ]बंधोदए वोच्छिण्णे सुहमलोभोदए वट्टमा- णस्स चत्तारि संतढाणाणि लब्भंति, तं जहा-२८।२४।२१।१। आइल्लाणि तिण्णि उवसामगस्स । एग लोभसंजलणा- संतं खवगसेढीए लब्भइ, सेसा खविय त्ति काउं लोमं वेएइ, सो चेव संतं ति । एवमबंधगस्स चत्तारि संतहाणाणि ॥ २२ ॥ दस नव पन्नरसाई, बंधोदय-सन्तपैगइठाणाई। भणियोइं मोहणिजे, एत्तो णामं परं वोच्छं ॥२३॥ दस नव पण्णरसाइं० गाहा । कण्ठया । मोहणिजस्स बंधोदय-संताणं संवेहो भणिओ । 'एत्तो नामं परं वोच्छं' ति इतो परं नामस्स पगइसमुक्कितणा बंधोदय-संतवाणनिरूवणा संवेहो य भण्णइ ॥ २३ ॥ तत्थ पगइसमुकित्तणा, तं०-नामस्स कम्मस्स बायालीसं पिंडपगडीओ गइनामाइ० । एएसि विवरणा भेओ य जहा सयगे. तहा भाणियबो । तत्थ पुर्व बंधट्ठाणणिरूवणा- तेवीस पन्नवीसा, छब्बीसा अट्ठवीसँ उगुतीसा। तीसेक्कतीसमेगं, बंधट्ठाणांणि नामस्स ॥ २४ ॥ तेवीस पण्णवीसा० गाहा । २३ । २५।२६।२८।२९।३०।३१।१ एगमिति, एयाणि सामण्णेण चउगइए अहिगिच्च १ तं । ए' सं ॥ २ पयडिठाणाणि । खे३ ॥ ३ याणि मो' खे३ ॥ ४ कंठा । मो' कार ॥ ५ 'जवंधों' कार ॥ ६ पश्यन्तु शतकप्रकरणस्य ३८-३९ गाथे तच्चूर्णि च ॥ ७ °स गुणती खे३ ॥ ८°णाइ ना खे२ ॥

अट्ठ अघडाणाणि । तत्थ विरियमहपाउण बघमाणस्स पच चघडाणाणि, त जहा-२३१२५३२६॥२९॥ ३०॥ तत्य एगि दियपाउग्ग बघमाणस्स तिण्णि अषड्डाणांति, त--२३।२५।२६ । तत्थ तेवीसा इमा-तिरियगइ एगिदियजाइ ओरालिय तेय कम्मपसरीर हुड सठाण वण गप रस फास विरियगइपाउग्गाशुपुषी अगरुयलहुग उपयाय यावर वायर-सुहुभेगयर अपजत्तग पत्तेग-साहारणाणमेगयर अथिर असुह मग अणाएज अजसं निमेण ति २३॥ एएसि तेवीसाए कम्मपगईण एग चेव बंधड्डाण एगिदियअपजत्तगसंजुत्त वधमाणस्स मिच्छहिडिस्स । एत्थ तेवीसाए चचारि मगा, त जहावापरं अपक्षचग पत्तेय १ मायर अपनच साहारण २ सुदुम अपजचग पचेय ३ सुहुम अपजचम साहारण १ एव सैबे विचचारि। एसा तेवीसा परापाय-माससहिया पशुवीसा भवद, सा तिरियमइयाइ जाव य थावर चाव अविकण, तओ उपरि एव भाणियब- यावर पापर-महुमाणमेगपर पजत्तग पत्तेय साहारणाणमेगयर थिरा ऽथिराणमेगमर मुमा सुमाणमेगयरं भग अणाएज जसा जसाणमेगयर निमेणमिति २५ । एपासि पशुवीसाए पगडीण एम येच वषट्ठाण एगिदियपजतगसहिय वधमाणस्स मिच्छादिहिस्स । एयम्मि पशुवीसे एगिदियपजत्तगपाउग्ग वधमाणस्स वीस भगा, त जहा-बायर पक्षच पचेय-थिरा- थिर-सुमा सुम-जसा जसेहिं अदु मगा उठेवि, वायर पसल च साहारण थिरा थिर-सुमा सुभ-अजसकिची िचत्वारि भगा, सुकुम पसर च पचेय-साहारण थिरा ऽथिर महाऽसुह अजसकित्तीहि अट्ट मगा, एच सधसमासो वीस । सुकुम साहारयहि जसकितीए पो नत्पिति। एसा चेव पश्वीसा आयाबुलीयएगयरसहिया छबीसा भवति, नवरि एव माणि १ जाणि-२३ कोर॥ २ मेमिति । पक, कौर ॥ ३ के यच कां ॥ ४ ई-धाय धर॥

यवं-पराघायं ऊसासं आयावुञ्जोयाण एगयरं थावरं वायरं पजचं पत्तेयं थिरा-ऽथिराणमेगयरं सुभा-ऽसुभाणमेगयरं दूभगं अणाएजं जसकित्ति-अजसकित्तीणमेगयरं निमेणमिति २६ । एयासि छवीसाए पगडीणं एग चेव बंधट्ठाणं एगिदियपञ्ज- तगपाउग्गं आयावुञ्जोयएगयरसहियं बंधमाणस्स मिच्छद्दिहिस्स । एयाए छवीसाए सोलस भंगा आयावुलोय-थिरा-थिर- सुभा-ऽसुभ-जसा-जसेहिं उठेति, आयात्रुञ्जोवा सुहुम-साहारणेहि बंधं न एंति त्ति काउं । एगिदियपाउग्गा बंधा भणिया । इयोणिं बेइंदियपाउग्गं बंधमाणस्स तिणि बंधट्ठाणाणि-२५ । २९ । ३० । तत्थ पणुवीसा-तिरियगइ वेइंदियजाइ ओरालियं तेयर्ग कम्मगसरीरं हुंडसंठाणं असंपत्तसेवट्टसंघयणं ओरालियंगोवंगं वण गंध रस फास तिरियाणुपुत्वी अगरुलहु उवघाय तस बायर अपज्जतर्ग पत्तेयं अथिरं असुहं दुभगं अणाएजं अजसकित्ति निमेणमिति । एयासिं पणुवीसाए पगडीण एग चेव बंधट्ठाणं बेइंदियअपजत्तगपाउग्गं बंधमाणस्स मिच्छद्दिहिस्स । एत्थ अपसत्थपरियत्तमाणीहिं एगो चेव भंगो, अपजत्तगेण पसत्थपरिवत्तमाणीओ बंधं न एन्ति त्ति काउं । एमा चेव पणुवीसा पराघाय-ऊमाम-अपसत्थविहायगति- पज्जत्तग-दूसरसहिया अपज्जत्तगरहिया एगणतीसा भवति । नवरि एवं भाणियचं-उवघायं पराघायं ऊसासं अपसत्थविहा- यगइ तसं बायरं पजत्तगं पत्तेयं थिरा-थिराणमेगयरं सुभा-ऽसुभाणमेगयरं दुभगं दूसरं अणाएजं जसा जसाणमेगयरं निमेणमिति । एयासिं एगूणतीसाए पगतीणं एगं चेव बंधट्ठाणं तं बंधमाणस्स मिच्छद्दिहिस्स । एत्थ अट्ठ भंगा थिरा- थिर-सुहा-ऽसुह-जसा-जसेहिं । एसा चेव एगूणतीसा उजोयसहिया तीसा भवइ । एत्थ वि ते चेर्वं अट्ठ भंगा । एवं १ "णि बेदि कार । एवमन्यत्रापि ॥ २ "णि, तं जहा~२५ का२ ॥ ३ त्तं सेव सं ॥ ४ व मंगा का१ ॥

सेइदिय चउरिदियपाउग्गं वषमाणस्स तिणि विणि बघडाणाणि, नवर अपप्पणो जाई माणिया । इयाणि पचिदियतिरिक्खपाउग्ग बघमाणस्स तिणि बघड्डाणाणि, ते जहा-२५ । २९ । ३० । वत्य पणुवीसा जहा वैइदियअपजत्तगपाउम्ग बघमाणस्स तहा चेव, नवर पचिंदियजाती भाणियबा । एत्य एगो चेव भगो । एगणतीसा इमा-तिरियगइ पचिंदियाइ ओरालियं तेय कम्मग हुड सठाण असपर ओरालियगोवग वण्यादि तिरियाणपुरी अगलहु उवधाय परापाय ऊसास पसस्था ऽपसत्यविहायगईर्ण एगा उस वायर पञ्जत्त पलेय थिरा थिराणमेगयर सुहा मुद्दाणमेगयरं सुभग दूमगाणमेगयर सुस्सर दुस्सराणमेगयर आएल अणाएजयाणमेगयर बसकित्ति अजसकित्तीण मेगयर निमेणमिति । एयासि एगणतीसाए पगतीण एग वषट्ठाण त बघमाणस्स मिच्छद्दिहिस्स । एसा पढमा एगणतीसा। हुड असपच च सासणो ण वधति ति वितिया एगणतीसा एव घेव, नवर पचण्ह सठाणाण पचण्ह सषयणाणमेकयर तु, त पधमाणस्स मिच्छदिद्धिस्स चा सासणसम्मदिद्विस्स व चि माणियच । एस्थ एगणतीसे छायालसयाणि अद्दुत्तराणि भगाण मवति ४६०८ । छ सठाणाणि छसघयण पसत्था ऽपसत्यविहायगति थिरा थिर सुहा ऽसुह सुमग मग सुस्सर- दूसर आएज अणाएज जसकिषि-अजसकिचीहिं भगा कायदा ४६०८ । पढमा एगणतीसा उमओयसहिया तीसा मवति, सा मिच्छद्दिहिस्स। वितिया एगणतीसा उजोयसहिया तीसा मवति, सा मिच्छद्दिहिस्स वा सासणसम्मद्दिहिस्स वा । -भगा जतिया एगणतीसे वत्तिया देव एत्य वि । तिरियपाउम्ग समत्त । १त०-२५ बी र ॥ २ सेवार्तसहननमित्यर्ष ॥ ३ हा तस स॥ ४ जमेगयर त कां॥ ५ यधपाउ' कार ॥ '- - तत्थ मणुयगइपाउग्गं बंधमाणस्स तिण्णि बंधट्ठाणाणि, तं०-२५ । २९ । ३० । तत्थ पणुवीसा जहा बेइंदियअप- जत्तगपाउग्गं बंधमाणस्स तहा चेव । नवरं मणुयगइ पंचिंदियजाइ मणुयगइपाउग्गाणुपुबी य भाणियवा । एत्थ एगो चेव भंगो । एगूणतीसा तिविहा । तत्थ पढमा जहा पंचिंदियतिरिक्खाणं तहा चेव । वितिया वि एगूणतीसा जहा 'पंचिंदियति- रियाणं तहा चेव । नवरं आद्यन्तवर्जानि संघयण-संठाणाणि भाणियवाणि । सा मिच्छद्दिहि-सासणाणं । तत्थ तइया एगूण. तीसा मणुस्सगति पंचिंदिय० ओरालिय तेयग कम्मग समचउरंससंठाण ओरालियंगोवंग वारिसभनारायसंघयणं वण्ण गंध रस फास मणुयाणुपुचि अगरुलहु उवधाय पराघाय ऊसास पसत्थविहायगइ तसं बायरं पज्जत्तगं पत्तेयं थिरा-ऽथिरं० सुहा-ऽसुहाण एगयरं सुभगं सुस्सरं आदेख्नं जसा-ऽजसाणमेगयरं निमेणमिति । एयासिं एगूणतीसाए पगतीणं एग चेव बंधट्ठाणं तं बंधमाणस्स मिच्छदिहिस्स वा सासणस्स वा सम्मामिच्छद्दिहिस्स वा असंजयसम्मदिहिस्स वा । एसी तइया एगूणतीसा । एत्थ एगूणतीसाए सामण्णेण छायालसयाणि अद्दुत्तराणि भंगाण ४६०८ । छसंठाण६-छसंघयण३६-पसत्था- ऽपसत्थविहायगति७२-थिरा ऽथिर१४४-सुहा-ऽसुह२८८-सुभग-दूभग५७६-सुस्सर-दूसर११५२-आएग्जा-ऽणाएज २३०४जसा- ऽजसेहिं ४६०८ उट्ठति । इयाणि तीसा भण्णइ-जा तइया एगूणतीसा सा तित्थयरसहिया तीसा भवति । एयासिं तीसाए पगईणं एग चेव बंधट्ठाणं, तं तित्थयरसहियं बंधमाणस्स असंजयसम्मदिहिस्स । एयं देव-नेरइया बंधंति । एत्थ अट्ठ भंगा थिरा० २ सुहा० २ जसा० २ एएहिं कायवा । मणुयगइपाउग्गं सम्मत्तं । १ पंचेंदि कार, एवमन्यत्रापि ॥ २ पञ्चेन्द्रियजाति ॥ ३ स्थिरा-स्थिरयोरेकतरत् ॥ ४°सा तिइया का। तृतीया ॥ ५ समत्तं। का? कार ॥

इयाणि देवगइपाउग्ग । तत्थ चचारि वषट्ठाणाणि-२८ । २९ । ३०।३१ । तत्थ अठ्ठावीसा देवगति पचिदिय० वेउविय तेय कम्म समचउरर्स वेधियअगोवंग वण्णादि ४ देवाशुद्धि अगलहु उर्व० परा० ऊमास पसत्यविहा० तस बादर पच पचेय विरा०२ सुहा०२ सुभग सुस्सर आएज जमकित्ति अजमकिचीणमेगयर निमेणमिति । एयाण अठ्ठावीसाए पगतीण एक पहाण त पधमाणस्स मिच्छ० सासण. सम्मामिच्छ० असूजयसम्मदिष्टि संजयासजय० सजयरस वा । एत्य अट्ठावीसाए अट्ट भगा थिरा थिर मुहा-सुह-जसा जसेहिं कायथा । एसा चेत्र अट्ठावीसा तित्थयरसहिया एगणतीसा | भवति । एत्य वि ते चैव अट्ठ भगा। व देवगइपाउग्ग असजयसम्महिटियादओ ववति । इदाणि तीसा-देवगइ पचिंदिय० घेउविय आहारग तेय कम्म समचउरस वेउबियगोवगा आहारयगोवगा वण्णादि ४ देवाशुपुधि अगरुलहु उवषाय परा० ऊसास विहोगई पसत्या वस चादर पसच पचेय पिर मुम सुमग मुस्सर आएज जसकित्ति निमेणमिति । एयासि तीसाए पगडीण एग वधट्ठाण, आहारगद्गसहिय देवगइपाउग्ग त वधमाणस्स अपमचसजयस्स वा अपुबकरणस्स वा । एत्थ मेदो नत्यि, विसद्धी षषद चि । एसा चेव तीसा तित्थयरसहिया एगतीसा भवति । एत्थ वि नत्थि मेदो देवगइपाउग्ग संम्मच । इदाणि निरयगइपाउग्य पधमाणस्स एक चेव बहाण अट्ठावीसा, त जहा-निरये पचिदिय वेउशिय तेय कम्म हुड वेउवियगोवग वण्णादि ४ निरयाशुपछि अगरु० उव० परा० ऊसास अपसस्थविहा० तस चादर पजत पचेय अथिर असुम १ बघाय प कार ॥ २थिय ऽथिर सुहाऽमुह सु कर । स्थिरा स्थिरयोरेकतरत्, शुमा शुभयोरेकतरदित्यय ॥ ३ विहगापसस्थ त॥४ समसको। ॥ ५ यगति पर।

दूभग दूसर अणाएज अजस निमेणमिति । एयासिं अट्ठावीसाए पगडीणं एक बंधट्ठाणं निरयगइपाउग्गं तं बंधमाणस्स मिच्छद्दिहिस्स । एत्थ नत्थि भंगो अविशुद्धत्वात् । “एगं" ति देवगइपाओगे बंधे समत्ते जसकित्तीए चेव एगाए बंधो। एत्थ एगो भंगो। "एक" ति देवगइपाउग्गे बंधे वोच्छिण्णे अपुवकरणाईणं तिण्हं एका जसकित्ती बज्झइ । एत्थ नत्थि विगप्पो ॥ २४॥ सबबंधाणं भेयनिरूवणा भण्णइ- चउ पणुवीसा सोलस, नव वाणउई 'सआ य अडयाला । इगियालुत्तर छायालसया' एकेकवंधविहीं ॥ पाढतरं । इयाणिं तेवीसादि बंधहाणेसे भंगसंखा भण्णइ-एगिदियअपज्जत्तपाउग्गं तेवीसं बंधमाणस्स सचे चत्तारि भंगा । एगि- दियपज्जत्तगपाउग्गं पणुवीसं बंधमाणस्स वीसं भंगा, बेइंदिय-तेइंदिय-चउरिदिय-पचिंदियतिरिय-मणुयाऽपज्जत्तगपाउग्गं बंध- माणाणं एकेको भंगो, सवे पणुवीसं । छब्बीसे आयावेण अड, उजोएण अह, सवे सोलस । अट्ठावीसे देवगतीए अट्ठ, निर- यगईए एगो, सो नव । एगणतीसे पंचिंदियतिरियपाउग्गं बंधमाणस्स छायालीसं सयाणि अदुतराणि, मणुस्सगतीए वि एचिया चेव, बेइंदिय-तेइंदिय-चउरिदियपाउग्गे एकेके अट्ठ अट्ठ भंगा, देवगइपाउग्गं तित्थयरसहियं एगणतीसं बंधमाणस्स १ स्स । एत्थ का१ ॥ २ स्वस्तिकद्विकमध्यग पाठ सप्रतावेव ॥ ३ णं निरू' का। णं भंगनिरू' कार ॥ ४ नास्तीय गाथा खे१खे२- प्रत्यो ॥ ५ सया य का१। सयाइ अखे३ ॥ ६ °ला । एयालु खे३ ॥ ७ °या इकिक खे३ ॥ ८ ही ॥ अन्यकर्तृका चेयं गाथा । इया का२ ॥ ९सु बंधसं स ॥

भद्रमाणस । अट्ट । सबे समुहया वाणासयाणि अडयालाणि । तीसबधे पंचिंदियतिरियपाउग्ग बघमाणस्स छायालसयाणि अकुतराणि, वेडदिय-वेइदिय चउरिदिपपाउग्ग० अट्ठ अट्ट मगा, मणुयगइपाउग्ग तिथपरसहिय तीस वषमाणस्स अड, देवगइपाउग आहा रणसहिय तीस वधमाणस एको मगो। सबसमुदओ छायालसयाणि एगचसालाणि । एगतीस बघमाणस्स एगो भगो। एगविह धमाणस्स एगो भगो। एव वषट्ठाणाणि सविगप्पाणि भणियाणि । इयाणि उदयवाणाणि मणति- वीसिगवीसा चउवीसगांति पगाहिया उइगतीसा। उदयट्ठाणाणि भवे,नव अट्ठय होति नामस्स॥२५॥ २०१२१ ॥ २४ ॥ २५॥ २६ । २७ । २८।२९ । ३० । ३१ १९१८ एयाणि पारस सामण्णेण ससारस्थाण उदयद्वाणाणि । वस्य एमिदिपपाउग्गाणि पच उदयवाणाणि-२१ । २४ । २५ ॥ २६ ॥ २७ । ससारत्याण सजोगीण जीवाण नामकम्मम्मि पारस धुवोदया, व जहा-वैजहग कम्मइम सरीर वण्णाई ४ अगरुलहु थिर अधिर सुभ असुभ निमेणमिति । तत्थ एगवीसा-सिरियगई एगिदियजाति तिरियाणपुरी थावर चादर-सुहमाण एगयर भग अणाएम उई सकी। स २॥ २ "ति-गयीस चउव्वीसा गाहा । इगवीसाइ-गतीसताणि उदयटाणाणि भवे नव अट्ट य होतिनामस्स २१॥ २४ ॥ ॥ ३ पीसेगमीसव स खैर खैर। वीसच का? ॥ ५ गादि इगतीसग सि एग- हिया। उ है। खेर खे।। ६ यायेय पूर्णावक्षरशोऽस्तारिता ॥ ७ णि एकारस च ।

एत्थ एकवीसाए पंच भंगा, तं जहा-बायरं पजत्तगं दूभगं अणाएजं जसकित्ती एको भंगो, बादरं पजत्तगं दुभगं अणाएजं अजसं एको, वायरं अप्पजत्तगं दूभगं अणाएजं अजसं एको, एवं बादरेण तिण्णि भंगा । सुहुमे छूढे सुहुमं पजत्तं दुभगं अणाएजं अजसं एको, सुहुमं अपज्जत्तं दूभगं अणाएजं अजसं एको, एवं सुहुमेण बिण्णि २ । सुहुमेणं अपज्जत्तगेण य सह जसकित्तीए उदओ नत्थि । सबसमासो पंच । तओ सरीरत्थस्स आणुपुर्वि अवणेऊण ओरालियसरीरं हुंडसंठाणं उवघायं पत्तेय-साहारणाणमेगयरे छुढे चउवीसोदओ। एत्थ एकारस भंगा-बायरं पजत्तगं पत्तेय साहारण-जसा-जसेहिं चत्तारि ४, वायरा-उपजत्त-पत्तेय-साहारण-अजसेणं दोण्णि २, एवं बायरे छन्भंगा । सुहुम-पजत्ता-ऽपज्जत्तग-पत्तेय-साहारण अजसेणं चत्तारि ४, सुहुमेण अपजत्तेण य जसकित्तीए उदओ नत्थि ति सवे दस १० । अण्णो बायरवाउकाइयस्स ओरालियं छड्डेऊण वेउत्वियं करेंतस्स करणअपजत्तगकाले चउचीसा लब्भइ । कहं ? भण्णइ-पव्वुत्ताओ एकवीसाओ आणुपुविमवणेऊणं वेउव्वियसरीर-हुंडसंठाण-उवधाय-पत्तेगे य छुढे चउहीसा । एत्थ एक्को भंगो। किं कारण ? तेउकाय-वाउकाइगेसु साहारण- जसकित्तीओ नत्थि ति काउं । एवं चउच्चीसोदयभंगा सवे एकारस ११ । तस्सेव सरीरपज्जत्तीए पज्जत्तगस्स तम्मि चेव पजत्तगसहियाए चउवीसाए पराधाए छूढे पणुवीसा । एत्थ सत्त भंगा, तं०-बायर-पज्जत्तग-पत्तेय-साहारण-जसा-ऽजसेहि चत्तारि, सुहुम-पजत्त-पत्तेग-साहारण-अजसेणं दोण्णि २, वेउवियसरीरस्स सरीरपजत्तीए पजत्तगस्स पराघाए छुढे पणुवीसा, एत्थ एगो भंगो । एवं पणुवीसोदए सवे सत्त ७ । तस्सेव आणापाणुपज्जत्तीए पज्जत्तगस्स ऊसासे छूढे छवीसं । एत्थ वि १ °ण बेण्णि । का। द्वौ भनावित्यर्थ ॥ २ °त्तीउद सं ॥ ३ स्स एको(क) आ कार ।।

अह । सो समुहया पाणउंइसयाणि अडयालाणि । तीसमधे पचिंदियतिरियपाउग्ग बघमाणस छायालसयाणि अगुवराणि, वेइदिय-वेइदिय-चाउरिदियपाउग्ग० अट्ठ अट्ट मगा, मणुयगइपाउमा वित्थयरसहिय तीस पचमाणस्स अट्ठ, देवगदपावग्ग आहा रगसहिय तीस बघमाणस्स एको भगो। सबसमुदओ छायालसयाणि एगचत्तालाणि । एगतीस वषमाणस्स एगो भगो। एगविह पषमाणस एगो भगो । एव पड्डाणाणि सविगप्पाणि भणियाणि । इयाणि उदयहाणाणि मन्पाति- 'वीसिगवीसा चउवीसगति पगायिाउइगतीसार उदयवाणाणि भवे, नव अट्ठय होंति नामस्स॥२५॥ २०१२१ । २४ । २५ २६ । २७ । २८ २९ ३० ३१ । १।८।एयार्षि पारस सामण्णेण ससारस्थाण उदमडाणाणि । तस्य एगिदियपाउग्गाणि पंच उदपट्टाणाणि-२१ । २४ २५ २६ २७ । ससारस्थाण सजोगीण जीवाण नामकम्मम्मि पारस धुवोदया, द बहावेजग कम्महरा सरीर पणाई ४ अगरुलइ थिर अधिरं शुभ अशुभ निमेणमिति । तत्य एगवीसा-तिरियगई एगिदियजाति तिरियापुत्री थावर पादर-सुइमाण एगयर मग अणाएज जसफिक्ति अनसकिचीणमेगपर पजत्ता उपजताणमेगपर, एया णव धुवोदयसहिया एकवीसा अतरगईए वक्ष्माणस्स ! १ अाईस चार॥२ हि-गयीस उन्यीसा गाहा । इगपीसागतीसवाणि उदयवाणाणि मवे नव अट्ट ये हौतिनामस्स २१ । २४ ।सं ॥ ३ धीसेगधीसब ख. खेर खेर ।। १ बीर्सच कर ॥ ५ गादि गतीसम ति पग- दिया। उ खै खैर खैर। ६ गाय पूर्णवक्षरशोऽवतारिता णि एकारस से .

एत्थ एकवीसाए पंच भंगा, तं जहा-बायरं पञ्जत्तगं दूभगं अणाएजं जसकित्ती एको भंगो, बादरं पजत्तगं भगं अणाएजं अजसं एको, बायरं अप्पजत्तगं दूभगं अणाएजं अजसं एको, एवं बादरेण तिण्णि भंगा । सुहुमे छुढे सुहुमं पञ्जत्तं दूभगं अणाएजं अजसं एको, सुहुमं अपजत्तं दूभगं अणाएजं अजसं एको, एवं सुहुमेण विणि २ । सुहुमेणं अपज्जत्तगेण य सह जसकित्तीए उदओ नत्थि । सबसमासो पंच । तओ सरीरत्थस्स आणुपुचि अवणेऊण ओरालियसरीरं हुंडसंठाणं उबघायं पत्तेय-साहारणाणमेगयरे छुढे चउवीसोदओ। एत्थ एकारस भंगा-बायरं पजत्तगं पत्तेय साहारण-जसा-ऽजसेहिं चत्तारि ४, बायरा-ऽपजत्त-पत्तेय-साहारण-अजसेणं दोण्णि २, एवं बायरे छब्भंगा । सुहुम-पज्जत्ता-ऽपजत्तग-पत्तेय-साहारण अजसेणं चत्तारि ४, सुहुमेण अपजत्तेण य जसकित्तीए उदओ नत्थि त्ति सवे दस १० । अण्णो वायरवाउकाइयस्स ओरालियं छड्डेऊण वेउत्वियं करेंतस्स करणअपजत्तगकाले चउबीसा लब्भइ । कहं ? भण्णइ-पव्वुत्ताओ एकवीसाओ आणुपुविमवणेऊणं वेउब्वियसरीर-हुंडसंठाण-उवघाय-पत्तेगे य छूढे चउच्चीसा । एत्थ एको भंगो । किं कारणं ? तेउकाय वाउकाइगेसु साहारण- जसकित्तीओ नत्थि त्ति काउं । एवं चउबीसोदयभंगा सत्वे एक्कारस ११ । तस्सेव सरीरपज्जत्तीए पजत्तगस्स तम्मि चेव पजत्तगसहियाए चउवीसाए पराघाए छुढे पणुवीसा । एत्थ सत्त भंगा, तं०-वायर-पज्जत्तग-पत्तेय-साहारण-जसा-ऽजसेहिं चत्तारि, सुहुम-पजत्त-पत्तेग-साहारण-अजसेणं दोणि २, वेउवियसरीरस्स सरीरपजत्तीए पजत्तगस्स पराघाए छुढे पणुवीसा, एत्थ एगो भंगो । एवं पणुवीसोदए सवे सत्त ७ । तस्सेव आणापाणुपज्जत्तीए पज्जत्तगस्स ऊसासे छुढे छत्चीसं । एत्थ वि १ ण वेण्णि । का१ । द्वौ भन्नावित्यर्थ ॥ २ °त्तीउद स ॥ ३ °स्स एक्को(क) आ° कार ॥

ते चैव सत्त ममा ७ । अहवा एयम्मि चेर उदए ऊसासे अशुदिपणे आयाधुजोयाण एगयरे उद्दण्णे छवीसा । तत्थ आयावेण पसेय-जसा जसेहिं दो भमा, उओवेण पचेग-साहारण जसा जसेहि चचारि भगा, तेउकाइय-चाउकाइयाण आयात्रुलोव जसकिनीओ नत्थि । सब छवीसोदए तेरस भगा १३ । एस्थ चेर ऊमासछबीसे आयावुजोयाण एगयरे छुढे सत्तावीसोदओ हव । एत्य छन्मगा, त०--आपावै पचेय जसा जसेहिं दोणि २, उजोय पत्तेग साहारण जमा ऽजसेहि चत्तारि ४, एव सघोदया पायालीस ४२ । बेइदियपाउग्गाणि छ उदयट्ठाणाणि, त०-२१ । २६ । २८ । २९ । ३० । ३१ । एस्थ एकवीसा तिरियगइ इ तिरियाणुपुति तस पायर पञ्जचा पजचाणमेगयर दूभग अणाएज जसा जसाणमेगयर, एए नव धुनोदयसहिया सा भवह, वेइदियस्स पाचगस्स वा अपजत्तगस्स या अंतरगइए वट्टमाणस्स । एत्थ एक्चीसे तिणि मगा-पजतग जमाऽजसेहिं दो भगा, अपाचगा जसकिचीए एगो मगो, सो तिष्णि । एव तेइदिय चरिदियाण तिणि तिणि भगा । वस्सेष बेइदियरस सरीरथम आशुषुशिमषणेत्ता ओरालिय हुड ओरालियगोवग छवट्ठसघयण उपधाय पचेगेसु छुदेसु पेण भगा । तस्सेव सरीरपजत्तीए पजत्तयस्स परायाए अपसत्यविहगे य छुढे अट्ठावीसा । तोदओ पसस्थविहायगती य नस्थि ति काउ । तस्सेर आणापाशुपजत्तीए पत्तगस्स । चेव दो भगा । अहवा एयम्मि व अट्ठावीसे ऊमासे अणुदिण्णे उजोवे वा उइण्णे १२॥३ वराग कां ।। छवीसा।

एगूणतीसा । एत्थ वि ते चैव दो भंगा । सवे वि चत्वारि । तस्सेव ऊसासएगूणतीसे भासापजनीए पजत्तगस्स दूसर-सूस- राणमेगयरे छूढे तीसा भवइ । एत्थ चत्वारि भंगा सुस्सर-दूसर-जसा-ऽजसेहिं कायवा ४ । अण्णे भणंति-सुस्सरं विगलिं- दियाण णत्थि तण्ण, संतकम्मे उक्तत्वात् । अथवा तम्मि चेव ऊसासएगूणतीसे सरे अणुदिण्णे उज्जोए वा उहण्णे तीसा । एत्थ दो भंगा उज्जोव-जसा-जसेहिं । सधे छब्भंगा । तम्मि चेव सरसहिए तीसे उज्जोवे छुढे एगतीसा भवइ । एत्थ चत्तारि भंगो दुस्सर-सर-जसा-जसेहिं कायवा । सव्वुदयविगप्पा बेइंदियाणं बावीसा । एवं तेइदिय चउरिदियाण वि । सबै वि छावढि ६६ । विगलिन्दियपाउग्गं सम्मत्तं । इयाणिं पंचिंदियतिरियपाउग्गाणि अट्ठ उदयट्ठाणाणि, तं०-२१ । २५ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१ । एत्थ एकवीसा तिरिक्खगइ पंचेंदियजाइ तिरिक्खाणुपुचि तसं बादरं पजत्ता-ऽपत्ताणमेगयरं सुभग-दूभगाणेमण्णयरं आएग्ज- अणाएजाणमेगयरं जसा-ऽजसाणमेगयर, एए नव धुवोदयसहिया एकवीमा, अंतरगतीए वट्टमाणस्म पज्जत्तगस्म वा अप- अत्तगस्स वा । एत्थ नव भंगा, पजत्तग-सुभग-भग-आएज-अणाएज-जमा-ऽजसे हिं कायवा अट्ट, अपजत्तग-दूभग-अणा- एज-अजसकित्तीहि एको, सवे नव । अण्णे आयरिया भणंति -सुभग-आएज्जा उ जुगवं उपेंति, दूभग-अणाएजा जुगवं उदेति । तम्ही एत्थ पंच भंग ति । वेउवियस्स तिरिक्खस्स पर्णवीसादओ संभवंति । ते पच्छा वक्खाणिज्जंति । मरीरत्थस्म १ "स्थि तण्णो, सं' का२। तद् न, इत्यर्थ ॥ २ गा सुस्मर-दुस्सर-ज' का ॥ ३ 'चट्ठी । वि का। कार ॥ ४ जत्तमे स फार ॥ ५ "णमेगयर का१ का२ ॥ ६ अड, अ° का२ ॥ ७ 'वं ति । तम्हा का१ ॥ ८ 'म्हा तत्थ का० ॥ ० 'वीमोदया सं" ग॥

ते चैव सच मगा७ । अहवा एयम्मि चे उदए ऊमासे अशुदिपणे आयाधुजोयाण एगयरे उइण्णे छवीसा । तत्थ आयावेण पचेय-जसाजसेहिं दो मगा, उनओवेण पत्नेग साहारण सा ऽनसेहिं चत्वारि भगा, तेउकाइय-पाउकाइयाण आयावुजोव- जसकित्तीओ नस्थि । सो छवीसोदए तेरस भगा १३ । एत्थ चेन ऊसासछबीसे आयादुजोयाण एगयरे छुढे सत्तावीसोदओ हवइ । एत्य छन्मगा, त०-आया पचेय जसा जसेहिं दोणि २, उजोय पत्तेग माहारण-जसा जसेहिं चचारि ४, एव एगिदियाण सहोदया बायालीसं ४२ । इयाणि बेइदियपाउग्गाणि छ उदयट्ठाणाणि, त०-२१ । २६ । २८ । २९ । ३० । ३१ । एत्थ एकवीसा तिरियगइ बेइदियजाइ तिरियाणुपुति तस बायर पञ्जचा पजत्ताणमेगयर मग अणाएज जसा जमाणमेगयर, एए नव धुवोदयसहिया एकवीसा भवइ, वेइदियस्स पजचगस्स वा अपञ्जत्तगरस वा अतरगइए वदृमाणस्स । एत्थ एकवीसे तिणि मगा-पजतग जसा जसेहिं दो मगा, अपजचगा जसकित्तीए एगो मगो, सबै तिष्णि । एव तेइदिय चउरिदियाण तिणि तिणि ममा । तस्सेव वेइदियरस सरीरत्थस्म आणुपुरिमवणेचा ओरालिय हुड ओरालियगोवग छवट्ठसघयण उवधाय पचेगेसु छुढेसु छबीसा । एत्थ वि ते चेव तिष्णि भगा । तस्सेव सरीरपजत्तीए पजचयस्स पराघाए अपसत्थविहगे य छुढे अट्ठावीसा । एत्य दो भगा जसा जसेहि, अपचोदओ पसत्यविहायगती य नत्थि त्ति काउ । तस्सेव आणापाणुपजत्तीए पछत्तगस्स उसासे छुढे एगूणवीसा । एत्थ वि ते घेव दो भगा । अहवा एयम्मि चेच अड्डाचीसे ऊसासे अशुदिण्णे उखोवे वा उइण्णे १ बजला स॥ २३१। तस्य २॥ ३तरा ग का॥

-- एगूणतीसा । एत्थ वि ते चेव दो भंगा । सत्वे वि चत्तारि । तस्सेव ऊसासएगणतीसे भासापजनीए पजत्तगस्स दूसर-सूस- राणमेगयरे छूढे तीसा भवइ । एत्थ चत्तारि भंगा सुस्सर-दूसर-जसा-जसेहिं कायबा ४ । अण्णे भणंति-सुस्सरं विगलिं- दियाण णत्थिं तण्ण, संतकम्मे उक्तत्वात् । अथवा तम्मि चेव ऊसासएगूणतीसे सरे अणुदिण्णे उज्जोए वा उइण्णे तीसा । एत्थ दो भंगा उज्जोव-जसा-जसेहिं । सवे छब्भंगा । तम्मि चेव सरसहिए तीसे उज्जोवे छूढे एगतीसा भवइ । एत्थ चत्तारि भंगो दुस्सर लसर-जसा-जसेहिं कायवा । सव्वुदयविगप्पा वेइंदियाणं बावीसा । एवं तेइदिय-चरिंदियाण वि । सो वि छावैलुि ६६ । विगलिन्दियपाउग्गं सम्मत्तं । इयाणि पंचिंदियतिरियपाउग्गाणि अट्ठ उदयट्ठाणाणि, तं०-२१ । २५ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१ । एत्थ एकवीसा तिरिक्खगइ पंचेंदियजाइ तिरिक्खाणुपुचि तसं बादरं पजत्ता-ऽपजत्ताणमेगयरं सुभग-दूभगाणेमण्णयरं आएज- अणाएजाणमेगयरं जसा जसाणमेगयरं, एए नव धुवोदयसहिया एकवीसा, अंतरगतीए चट्टमाणस्म पज्जत्तगस्स वा अप- जत्तगस्स वा । एत्थ नव भंगा, पजत्तग-सुभग-दूभग-आएज-अणाएज-जमा-ऽजसेहिं कायवा अंह, अपजत्तग-दूभग-अणा- एज-अजसकित्तीहि एको, सवे नव । अण्णे आयरिया भणंति-सुभग-आएज्जा उ जुगवं उयति, दूभग-अणाएजा जुगवं उदेति । तम्ही एत्थ पंच भंग त्ति । वेउवियस्स तिरिक्खस्स पहुंचीसादओ संभवंति । ते पच्छा वक्खाणिजंति । सरीरत्थस्म १ "स्थि तण्णो, सं° कार। तद् न, इत्यर्थ ॥ २ गा सुस्सर-दुस्सर-ज का ॥ ३ पट्ठी। वि' का। कार || ४ जत्तमे स का२ ॥ ५ णमेगयरं का१ कार ॥ ६ अड, अ कार ॥ ७ वं ति । तम्हा का१ ॥ ८ 'म्हा तत्थ का२ ॥ ० 'वीसोदया सं° म ॥

आणुपुहिमवणेऊण ओरालिय छन्ह सठाणाणमेगयर ओरालियगोग छन्ह सषयणाणमेगयर उवधाय पत्तेगे छुढे छवीसा । एत्थ वे सयाणि एगूणणउयाणि भगाण । छ सठाण छ सघयण पअत्तग भूभगभग आएसअणाएजाण एगयर जसाऽ जसेहिं वे सयाणि अवासीयाणि लन्मति, हुड सठाण असंपत्त-सेवह अपजच मग अगाएज अजसकित्तीहि एगो भगो, सचे समुदिया दो सयाणि एगूणणउयाणि २८९ । सुभगा ऽऽएजाणे युगपद्भावना सर्वत्र पूर्ववत् । एव माविए सबोदएम मगविगप्पा जहासमव योज्या: । सरीरपजचीए पजत्तमस्स परापाय पसत्या ऽपसत्यविहायगईणमण्णयरे छुढे अट्ठावीसा। पत्थ भगाण पचसयाणि छावत्तराणि लब्मति । जे छवीसे पुवमणिया भगा अपजत्तगमगरहियाणि विहायगइजुवलेण गुणियाणि पचसयाणि छावत्तराणि भवति ५७६ । तस्स आणापाशुपजत्तीए पजत्तगस्स ऊमासे छुढे एगूणतीसा । अहना ऊसासे अशुदिपणे उलोए वा उद्दण्णे एगणतीसा । एत्थ एकारससयाणि चावण्णाणि भगाण । पचछावचरा ऊसासेण, उलोएण वि तत्तिया चेव, सद्दे वि १९५२ । ऊसासएगणतीसे मासापजचीए पजत्तकडस्म सुस्मर मराणमेगयरे छुढे तीसा भवति । अहवा सरे अणुदिण्णे उज्जोए वा उदिण्णे तीसा मवह। एत्थ सत्तरससयाणि अट्ठावीसाणि भगाण । अट्ठा वीमाए पुन्चुत्ता छावचरा पंचसया मगाण उखोय-सरदुवेर्ण तिहि गुणिया १७२८ भवति । मरसहियाए तीसाए उजोवे छुढे एकतीसा भवइ । एत्य एकारससयाणि पावण्णाणि मगाण, जे वीसोदए सरसहिया मगा, उज्जोवमगरहिया ११५२ भवति । पागयतिरिक्वाण सच्चुदयपिंडो एगणपण्णसपाणि छऽमहियाणि भगाण १९०६ । १ एजमेग से कार ॥२ प दूभग-अणायजा(पज्जा)ण युग कोर ॥ ३ या वि का ॥ ४ ण तीहिं का ॥

इयाणिं वेउवियस्स तिरिक्खस्स पंच उदयट्ठाणाणि, तं जहा-२५ । २७ । २८ । २९ । ३० । एत्थ पणुवीसा ओरालियं विजहित्तु विउचियंतस्स करणअपजत्तगस्स | पुवुत्तपजत्तगतिरिक्खएकवीसे आणुपुविरहिए वेउवियसरीर-समचउ- रंस-वेउत्वियंगोवंग-उवघायपत्तेगे छुढे पणुवीसा । एत्थ अट्ठ भंगा सुभग-भग-आएजा-ऽणाएज-जसा-ऽजसेहिं कायवा । सुभ- गा-ऽऽएजा पूर्ववत् । तस्सेव सरीरपञ्जत्तीए पजत्तगस्स पराघाय-पसत्थविहायगईए छूढेहिं सत्तावीसा । एत्थ वि ते चेव अट्ठ भंगा, अपसस्थविहायगती विउवियंतस्स नत्थि त्ति किया। तस्सेव आणापाणुपज्जत्तीए पञ्जत्तगस्स ऊसासे छुढे अट्ठावीसा। [एत्थ अट्ठ भंगा ।] अहवा सरीरपज्जत्तगस्स ऊसासे अणुदिण्णे उजोए वा उदिण्णे अट्ठावीसा । एत्थ वि अट्ठ भंगा। सबसमुदओ सोलसभंगा, ऊसासेण पुव्वत्ता अट्ठ, उज्जोवेणं अट्ठ त्ति । ऊसासअट्ठावीसाए भासापजचीए पजत्तगस्स सूसरे छूढे एगण- तीसा भवइ । अहवा तम्मि चेव ऊसासअट्ठावीसे सरे अणुदिण्णे उज्जोए वा उइण्णे एगणतीसा । एत्थें वि पुत्वत्ता सोलस भंगा। सुस्सरेण अट्ठ, उज्जोवेण अट्ठ, दुस्सरं वेउवियस्स नत्थि त्ति । सुस्सरसहिए एगूणतीसे उज्जोवे छूढे तीसा भवइ । एत्थ उजोव- सहिया अट्ठ भंगा। सवे वेउवियस्स छप्पण्णं भंगा ५६ । पंचिंदियतिरिक्खस्स सबोदयविगप्पाणं एगूर्णपणं सयाणि चावट्ठाणि ४९६२ । पंचिंदियतिरिक्खोदया समत्ता । इदाणि मणुस्साणं सामण्णेण एकारस उदयट्ठाणाणि चउवीसरहियाणि सहोदयट्ठाणाणि, तं जहा-२० । २१ । २५। १ "णि-२५ स ॥ २ ३० । तत्थ का१ कार ॥ ३ विविर का१ कार ॥ ४ हागई वि' का१ ॥ ५ 'त्थ पुस ॥ ६ णवनस का ॥ण पंच स' कार ॥ ७ वाविट्ठा का ॥ ८ °दयो सम्मत्तो। कार ॥

२६ । २७ । २८ २९ ३० ३१।९।८। तत्थ सामण्णमास्साण पच उदयट्ठाणाणि-~२१ । २६ । २८॥ २९॥ ३० । वस्थ एकवीसा वीसा अट्ठावीसा ब्रहा पचिंदियतिरिक्खाण तहा चैव सविगप्पा । एगूणतीसा तीसा य उजोवर हिपा वहा चेव, वेउश्चियसजए मोषण उजोको मशुयाण नधि त्ति फाउ | एगणतीसे मगाण पचसयाणि छाबत्तराणि । तीसोदए एक्कारस सपाणि पावणापि । पागयमशुस्साण सबोदयसमुदओ छबीससयाणि दुगादियाणि २६०२ । इपाणि वैडविपरस मणुयस पच उदयद्वाणाणि, २०-२५ । २७।२८ । २९ । ३० । एत्थ पणुवीसा मणुयगति पचिदियजाई वेबिय समचउरस वेडविरंगोवंग उवधाय वस वायर पअत्त पत्तेग सुभग द्मगाणमेगपरं आएग्जा ऽणाएजा णमेगयर जसाजसाणमेगयर, एए तेरस धुवोदयसहिया पशुवीसा मवइ । सामण्णेण एय मणिय । एत्थ अट्ट मगा समग- भा-आपआ पाएज-जसा जसेहि कारवा। देसविरयसंजयाण सक्षपसत्थो भगो । सुमगा ऽऽएजा पूर्ववत् । तस्सेव सरी पलसीए पसतपस्स परापाय पसस्थविहाए छुढे सत्तावीसा । एस्थ वि ते वेब अट्ट भगा, अपसत्यचिडायगी विउवयतस्स नथिति किया । आणापाशुपजचीए पजचगरस ऊसासे छुढे अट्ठावीसा । एत्य विते व अह । अह्वा सजयस्स उचर विउबिस्स सरीरपजचीए पजत्तगस्स उसासे अशुदिण्णे उजोए वा उदिण्णे अट्ठावीसा एत्थ एको भगो। किं कारण ? सज- याण दुभगा प्रणाएज-अजसकिचीओन उपति ति काउ । सद्दे नव । मासापजत्तीए पसत्तास्म ऊसासअट्ठावीसे सूसरे छुढे स्पूणतीसा, अहवा सरे अशुदिण्णे सजयस्स उलोचे घा उद्दण्णे एगणवीसा, एत्थ वि ते वेव नव मगर । सरसहियाए एरा १ प्यापि पा सकी । एकविंशती पत्रिंशतावष्टाविंशती च क्रमा ९-२८९-५७६ मा ॥ २२० । तत्थ कार ॥

णतीसाए संजयस्स उज्जोवे छूढे तीसा भवइ । एत्थ एगो मंगो। वेउब्वियस्स मणुसस्स सबोदयविगप्पा पंचत्तीसं ३५ । इदाणि आहारगसंजयस्स वि ताणि चेव पंच उदयट्ठाणाणि । जहा वेउवियस्स तहा भाणियत्वं । नवरं आहारग- सरीर आहारगअंगोवंगाणि वत्तवाणि, अण्णं च दूभग-अणाएज-अजसकित्तीओ न भाणियवाओ । पणुवीस-सत्तावीसे एकेको भंगो, अट्ठावीस-एगूणतीसे दो दो भंगा-उञ्जोएण विणा उज्जोवेण य, तीसोदए एक्को उज्जोयसहिओ भंगो । आहारगसंज- यस्स सबोदयविगप्पा सत्त । इयाणि केवलीणें दस उदयट्ठाणाणि, तं जहा-२० । २१ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१ । ९।८। एत्थ वीसा-मणुयगई पंचिंदियजाइ तस बादर पजत्तग सुभग आएज जसकित्ति, एयाणि अट्ट धुवोदयसहियाणि वीसा । एत्थ एगो भंगो । एसा अतित्थयरकेवलिस्स समुग्धायगयस्स कम्मतिगकायजोगे वट्टमाणस्स । स चेव वीसा तित्थगरस्स कम्मति- गकायजोगिस्स तित्थगरनामसहिया एगवीसा । एत्थ एंगो मंगो । सा चेव वीसा ओरालियसरीर छन्हें संठाणाणमेगयरं ओरालियंगोवंग वजरिसभनारायसंघयणं उवधाय पत्तेयसहिया छबीसा भवति, ओरालियमिस्सकायजोगे वट्टमाणस्स भवइ । एत्थ छन्भंगा लब्भति छसंठाणविगप्पेहिं । ते सामण्णमणूसोदए अस्थि चेव के पत्तेयं न भणिज्जंति । सा चेव छच्चीसा १ तीसे उद' का१ ॥ २ °णं उद स ॥ ३ ८ । तत्थ काका२ ॥ ४ जोग(गि)स्स । सा चेव वीसा तित्थगरणामसहि कार ॥ ५ गो । सा सं ॥ ६ गो । सच्चेव का१ कार ॥ ७ °चंगा व का१ ॥ ८ स्वस्तिकद्विकान्तर्गत पाठ सप्रती नास्ति ॥ ९ ति। सञ्चेव का१ कार ॥

विस्थगरसहिया सत्तावीसा भवइ । एत्य एगो भगो, सबे पसत्य चि काउ। अट्ठावीसा-अतित्थगरकेवलिस्स तीसोदए वट्टमाणस्स तओ सरे निरूद्ध एगणवीसा भवइ, तओ ऊसासे निरुद्धे अट्ठावीसा भवइ । एत्थ च्छ भगा सठाणेहिं । ते सामण्णोदयगहणेहि गहिया। एगणतीसोदओ मणिओ। अहवा तित्थगरकेवलिस्स एकचीसोदए वइमाणस तओ सरे निरुद्ध तीसा भवर, तओ ऊसासे निरुद्ध एगणतीसा भवति । एत्थ अतिस्थगरस्स छन्मगा सठाणेहिं चेव । ते सामण्णग हणेण गहिया । तित्थगरस्स एगो । तीसोदए छसठाण पसत्था ऽपसत्थविहागइ-सुस्सर दूसरेहिं चउहीस भगा लम्मति । ते वि सामष्णगहषेण गहिया । वित्थगरस्स सररहियस्स एको । एकचीसोदो तित्थगरस्स, सामण्णमणुयस्स तीसोदए वित्थ गरनामे छुढे एकतीसा मवइ । एत्थ एको भगो, सो पसस्थ चि काउ । तत्थ नवोदओ म गइ पचिंदियजाइ तस बादर पजच एमग आएज जसकिची तित्थगरमिति । एत्थ अजोगिस्स तित्थगरस्स एएसि कम्माण समुदओ एक उदयट्ठाण, मेो नत्थेि त्ति । वित्थगरनामरहिया ते चेव अड अतित्थगरस्स अजोगिस्स भवति । एत्थ वि नत्यि मेओ। एव केवलीण दस उदया भणिया। एत्य वीसाह २० । २१ । २७ । २९ । ३० । ३१ । ९।८। अट्ठसूदएसु एकेको विसेसमगो वि लन्मइ ति अह लद्धा । एत्थ पत्तेय तित्थगरस्स छन्मगा, अतित्थगरस्स दो मगा। सबमणुओदयविगप्पाण छवीस सयाणि पावण्णाणि । मशुओदया समचा। १ पेण ग कर ॥ २ कतीसो का कार एवमन्यत्रापि ॥ ३ गो, पदमसठाणे(ण) ति काउ । ती कार ॥ ४ गुस्सग का कार॥ ५ स्थिा तित्थ को कार॥६ सा २०। कांविना ॥

इयाणि देवाणं छ उदयट्ठाणाणि, तं जहा-२१ । २५ । २७ । २८ । २९ । ३० । एत्थ एकवीसा देवगइ पंचिंदिय० देवाणुपुवि तस बादर पजत्तग सुभग-भगाणमेगयरं आएजा-ऽणाएजाणमेगयरं जसा जसाणमेगयरं एए नव धुवोदयसहिया एकवीसा । तत्थ अट्ठ भंगा सुभग-दूभग-आएजा-ऽणाएज-जसा-ऽजसेहिं कायवा, दूभग-अणाएज-अजसा पिसायाईणं संभवंति । सरीरत्थस्स आणुपुष्विमवणेऊणं वेउवियं समचउरंसं विउवियंगोवंग उवधाय पत्तेगे छुढे पणुवीसा । एत्थ वि ते वेव अट्ठ । सरीरपज्जत्तीए पजत्तगस्स पराघाय पसत्थविहागइ छुढे सत्तावीसा । एत्थ वि ते चेव अह, देवाणं अपसत्यविहागई नत्थि । तस्सेव आणापाणुपज्जत्तीए पज्जत्तकडस्स ऊसासे छुढे अट्ठावीसा । एत्थ वि अट्ट । अहवा सरीरप- जत्तीए पजत्तयस्स ऊसासे अणुदिण्णे उजोवे उदिण्णे अट्ठावीसा । तत्थ वि अट्ठ । सवे अट्ठावीसे सोलस । ऊमास- अट्ठावीसे भासापजचीए पजत्तगस्स सुस्सरे छूढे एगणतीसा भवइ, दूसरं देवाणं नत्थि । अहवा सरे अणुदिण्णे उजोए वा उइण्णे एगूणतीसा भवइ । एत्थ सरेण अह, उज्जोवेण अट्ठ, सव्वे सोलस भंगा । उत्तरवेउब्वियं करेंतस्स देवस्स उज्जोवो लब्भइ । सुस्सरसहिए एगणतीसे उज्जोवे छूढे तीसा भवइ । एत्थ अट्ठ भंगा । सव्वोदयविगप्पे पडुच्च देवाणं चउ- सहि उदयविगप्पा ६४॥ इयाणि नेरइयस्स पंच उदयट्ठाणाणि-२१ । २५ । २७ । २८ । २९ । जहा देवाणं तहा नेरइयाणं पि भाणियई । नवरिं दुभगं अणाएजं अजसं अपसत्थविहा० दूसरं च अप्पप्पणो उदयट्ठाणे' भाणियव्वाणि, उज्जोवो नेरइयाणं नथि त्ति । १ °सरो नत्थि। कार ॥ २'णेसु भा का१ का२ ॥

सबोदया अपसत्य ति एकेको विगप्पो, पच भगा ॥ २५ ॥ इयाणि विस्साइगेसु उदयड्डाणेसु एक्ककम्मि उदयविगप्पा केचिया पिंडिया होज ति, वषिरूवणत्य मण्णति- ऐगवियोरेकारस तेतीसा छस्सयाणि तेतीसा। वारससत्तरससयाणऽहिगाणि बि पचसीईहिं ॥२६॥ १।४२।११।३३।६००। ३३ । १२०२ । १७८५ ॥ २६॥ अॅउणत्तीसेकारससयहिगसत्तरस-पचसट्ठीहिं । २९१७ । ११६५ । १।१। एकेकग च वीसादडदयतेसु उदयविही ॥ २७ ॥ तेसि विगप्पनिरूवणा- "पण नव नव नवमेयऽगग उदयविहि एकवीसम्मि । इगि-विगल सगल-माणुसतित्यगर उमराणनिरयाण ४२ ॥ ७ असार य एक वायर सुहुमे य पवणवेउब्वे । एगिदियाण भगा एकारस होति पचीसे "॥ विल्हव सत्त एक्कमेव उदया कमेण पणुनौसे । देव-नर तिरियवेठबिगिदिमाहार-नरहए ३३ ॥ एएपणउयदुधयाणि दोण्ह तरस नव च छब्बीसे । नर तिरियाणं हगि विगलिंदियउपया कमेणेए ६.० ॥ मह हग छक एगेगेम्ग कमेण सगिपीसे । सुर नर तिरि-एगिदिय तित्यययऽऽहारनेरइए १३ ॥ १ णिवीसार का ॥ २ गायेय चूर्णावक्षरशोऽवतारिता ॥ ३ यालेका सविनायन । ४ गायेय चूर्णावक्षरशोऽवतारिता ॥ ५ सित्युपये एको मा ।। ६ र सुराण कार ॥ ७ वैठियतिरथ ॥

'छावत्तरपंचसया, सोलस दुसु दुसु नवेग छक्क दुग । तिरिय-नरा-ऽमर-तिरि-नरविउव्वि-निर-विगलगा-ऽऽहारे १२०२॥ बावणेकारसया, बारस छावत्तरा य पचसया । दुसु सोलस नवगेगं, दुगेगमिति उगुणतीसाए । सगलतिरि-विगल-नर-देव-तिरिय-मणुयाविउव्वि-तित्थयरे । आहारग-नेरइए, कमेण भगा मुणयव्वा १७८५ ॥ बावण्णेकारसया, सत्तरससयाणि अट्ठवीसाणि । दुसु अढेगऽद्वारस, एफेकं चैव तीसाए । नर-तिरिय-देव-तिरि-नरविउन्धि-विगलाण तित्य आहारे २९१७ । कमसो इगितीसाए, वारस एको य भगा उ ॥ बावणेकारसया, विगलाणं तित्थ सगलतिरियाणं ११६५ । कमसो नव-ऽद्वगुदए, एकेको चेवऽजोगिम्मि । इयाणि विगलाईणं उदयपिंडं भण्णइ- छावट्ठी चोवट्ठी, बायाला विगल-देव-इगिउदया । मणुयाण विप्पण्णहिया, छच्चीससया उ सन्बुदया ॥ तिरियाणगुणपण्णसया, अहिया बावट्टि पंच निरयाणं । सत्तत्तरिमेव सया, एकाणउया उ सन्चुदया ७७९१ ॥ इदाणिं तिरियाण पंचसंतिगोदयनिरूवणं- २इगि विगल सगलपचंसिगा उ चत्तारिआइओ उदया । उगुवीसऽद्वारस विसयअहनउई य न य सेसा ॥ एगिदियसुहुमअपजत्तगस्स तिणि भंगा, एगिदियवायरअपज्जत्तगस्स तिण्णि, सुहुमपजत्तगस्स ५, बायरपजत्तगस्स ८; सो १९ । एए पंचसंतिगोदया एगिदियाणं । सेसा चउसंतिगोदया । विगलिंदियाणं एकवीस-छबीसोदएसु नव नव भंगा; सवे अट्ठारस १८ । पंचिंदियाण एकवीसे नव ९, छबीसे दो सया एगणनउया, सव्वे दो सया अट्ठाणउया। एएसु सन्चेसु १ इमे भगा अष्टाविंशत्युदये ॥ २ गायेय खे१प्रतावस्ति ।

उ-चाऊओ अगतरागए पडुच्च अडचरी लज्मह । सेसोदएसु न समवइ, पजत्दगो नियमा मशुपगइ वघड ति काउ । सबप चसतियपिंडो तिष्णि सथाणि पशुतीसाणि ३३५ । उहाणाणि भणियाणि । इयाणि संतवाणनिरूवणा- तिदुनउई उगुनउई, अद्वैच्छलसी यऽसीई उयुसीती। अ? च्छ प्पण्णचरि, नव अट्ट य णामसताणि ॥ २८ ॥ ९३ । ९२ । ८९।८८।८६।८०। ७९ । ७८ । ७६ । ७५।९।८। एयाणि बारस नामम्मि सतट्ठाणाणि । तस्थ तेणउई-मति ४ जाति ५ सरीरे ५सरीस्सपाय ५ षषण ५ सरीरसठाण ६ सरीरअंगोवग ३ सरीरसषयण ६ वण्ण ५ गध २ रस ५ फास ८ आणुपुधि ४ अगरुलई सरीरउवचाय परापाय ऊसास आयव ऊजोव विहायगइ २ तस थावराइवीस निमेण वित्थगरमिति सबसमुदओ तेणवती । वो तित्थगरनामेण विणा बाणउई । तेणउईओ आहारगसरीर सपाय आहा रंगसरीरयषण आहारगअंगोवगेण विणा ८९ । तओ विस्थगरनामे फेडिए अट्ठासीई भवइ । तओ देवगइ देवगइपाउग्गाशु पुषी उबलिए छासी भवइ । अहवा असीइसतकम्मिगस्स निरयगइपाउम्ग पधतस्स निरयगइ निरयाशुषधि वेउषियचउक च धमाणसं छासीई, असीइसतकम्मिगस्स देवगइपाउग्ग बघतस्स देवगह देवापुचि विउविचउक च वधमाणस्स वा छासीई मवइ । तओ नरयगह नरयाशुपुदि वेउवियसरीर-सपाय पक्षण अगोवगे उघलिए असीई मवह । तओ मशुयगइ मणुयाशुपुदीए १ गावर्ष पूर्णावक्षरशोऽवत्तारिता ॥ ३य छल खे। खे२ खेर ॥३गु । पैर । गुणसीई । खे३ ॥ छप्प २२ ॥ ५ ५ सघा कार ॥ ६ हु उय की कार ॥ ७ "सीई म क ॥ ८ स्स वा छा सं ॥ .

उबलियाए अत्तरी भवइ । एए अक्खवगाणं संता । इयाणि खवगाणं भण्णंति-तेणउईओ निरयगयि तिरियगइ एगिदिय- जाइ बेइंदियजाइ तेइंदियजाइ चउरिदियजाइ निरयाणुपुधि तिरियाणुपुरी आयाव उजोव थावर सुहम साहारण, एएहिं एग- तनिरय-तिरियपाउग्गेहिं तेरसहिं नामेहिं खविएहिं असीती भवइ । बाणउईओएयम्मि चेव तेरसनामे खविए एगूणासीई भवति । एगूणनउतीओ तेरसनामे खविए छावत्तरी भवइ । अट्ठासीओ तेरसनामे खविए पंचसत्तरी भवइ । तित्थगरकेवलिस्स अजो- गिस्स चरमसमए वट्टमाणस्स वेइज्जंतीओ मोतूण सेसाओ दुचरिमसमए खयं गच्छति । ताओ य इमाओ वेदिजंति, तं०- मणुस्सगइ पंचिंदियजाइ तस बादर पजत्त सुभग आदेज जसकित्ति तित्थगरमिति । एयाओ नव चरमसमए धरंति । एयं एक संतवाणं । तित्थगरनामरहियं अतित्थगरस्स तमेव अह भवंति । एवं संतट्ठाणपरूवणा कया । एत्थ अण्णे अण्णारिसाणि संतढाणाणि विगप्पयंति, ताणि आगमे जुत्तीहि य न घडंति । कहं ? भण्णइ-सरीर- नामसंबद्धाणि बंधण-संघायनामाणि ताणि सरीरनामेहि समं बज्झति वा उबलिजंति वा खविजंति वा वेइज्जति वा उईरि- अंति वा, तम्हा सरीरनामे फेडिजंते ते वि नियमा फिटृति त्ति काउं । तम्हा न घडंति त्ति काउं परिहरियाणि ॥ २८ ॥ अटु य बारस बारस, बंधोदय-संतपयडिठाणाइं।ओहेणाऽऽएसेण य, जत्थ जहासंभवं विभजे॥२९॥ अट्ठ य बारस० गाहा । अट्ठ य बारस बारस जहकमेण बंधोदय-संतढाणाणि । एए ओघेणं आएसेण य जे जत्थ जहा १ 'अन्ये ' श्रीशिवशर्मसूरिप्रमुखा । तथा च कर्मप्रकृतौ सत्ताधिकारे नाम्न सत्तास्थानससूचक गाथासूत्रम्-" ति-दुगमय छ 'पचग- तिगनउई नउइ इगुणनउई य । चउ-तिग-दुगाऽहिगाऽसी, नव अह य नामठाणाइ ॥ १४ ॥ " वेउ वाऊओ अणतरागए पडुछ अहचरी लम्भइ । सेसोदएसु न समवइ, पजचगो नियमा मणुयगह बघ त्ति काउ । सबप चसवियपिंडो तिष्णि सयाणि पशुतीसाणि ३३५ । उदट्ठाणाणि मणियाणि । इयाणिं सवट्ठाणनिरूवणा- तिदुनउई उगुनउई, अद्वैच्छलसी यऽसीई उगुसीती । अट्टै च्छ प्पण्णचरि, नव अट्ठ य णामसताणि ॥ २८ ॥ ९३ । ९२ । ८९.८८।८६८०।७९ । ७८ । ७६ । ७५। ९।८।एयाणि वारस नामम्मि सतवाणाणि । तत्थ तेणउई-गति ४ जाति ५ सरीरे ५ सरीरसपाय ५ बधण ५ सरीरसठाण ६ सरीरअगोवग ३ सरीरसघयण ६ वण्ण ५ गध २ रस ५ फास ८ आणुपुदि ४ अगरुलई सरीरउवधाय परायाय ऊसास आयव ऊोव विहायगइ २ तस थावराइवीस निमेण तित्थगरमिति सबसमुदओ वेणवती । वओ तित्यगरनामेण विणा चाणउई । तेणउईओ आहारगसरीर सधाय आहा रंगसरीरयषण आहारगअगोवगेण विणा ८९ । तओ वित्थगरनामे फेडिए अट्ठासीई भवद । तओ देवगइ देवगइपाउग्गाशु- पुडी उबलिए छासी भवइ । अहवा असीइसवकम्मिगस्स निरयगइपाउग्ग बघतस्स निरयगइ निरयाणुपुति वेउविपचउक च घमाणसं छासीई, असीइसतकम्मिगस्स देवगइपाउम्ग बघतस्स देवगइ देवाणुपुधि विउविचउक च वधमाणस्स वा छासीई मवह । तओ नरयगइ नरयाशुषुधि वेउशियसरीर-सपाय षषण अंगोवगे उबलिए असीई भवह । तओ मशुपगह मणुयाशुपुबीए १ गाय चूर्णावक्षरशोऽवसारिता ॥ २ एय छल से खेर खेर ॥ इगु खे खेर । ६ गुणसीई । खे॥ ४ छप्प २२ ॥ ५ २५ सघा कोर ॥ ६ हु उष का कार ॥ ७'सीई म क ॥ ८ स्स वा छा सं ॥ T --- उबलियाए अत्तरी भवइ । एए अक्खवगाणं संता । इयाणि खवगाणं भण्णंति-तेणउईओ निरयगयि तिरियगइ एगिदिय- जाइ बेइंदियजाइ तेइंदियजाइ चउरिदियजाइ निरयाणुपुचि तिरियाणुपुवी आयाव उजोव थावर सुहम साहारण, एएहिं एग- तनिरय-तिरियपाउग्गेहिं तेरसहिं नामेहिं खविएहिं असीती भवइ । बाणउईओ एयम्मि चेव तेरसनामे खविए एगूणासीई भवति । एगणनउतीओ तेरसनामे खविए छावत्तरी भवइ । अट्ठासीओ तेरसनामे खविए पंचसत्तरी भवइ । तित्थगरकेवलिस अजो- गिस्स चरमसमए वढमाणस्स वेइजतीओ मोतूण सेसाओ दुचरिमसमए खयं गच्छति । ताओ य इमाओ वेदिजंति, तं०- मणुस्सगइ पंचिंदियजाइ तस बादर पञ्जत सुभग आदेज जसकित्ति तित्थगरमिति । एयाओ नव चरमसमए धरंति । एयं एक संतहाणं । तित्थगरनामरहियं अतित्थगरस्स तमेव अट्ठ भवंति । एवं संतट्ठाणपरूवणा कया। एत्य अण्णे अण्णारिसाणि संतहाणाणि विगप्पयंति, ताणि आगमे जुत्तीहि य न घडति । कहं ? भण्णइ-सरीर- नामसंबद्धाणि बंधण-संघायनामाणि ताणि सरीरनामेहिं समं बझंति वा उज्वलिजंति वा खविजंति वा वेइजंति वा उईरि- तिवा, तम्हा सरीरनामे फेडिजते ते वि नियमा फिटृति त्ति काउं । तम्हा न घडंति त्ति काउं परिहरियाणि ॥ २८ ॥ अ य बारस बारस,बंधोदय-संतपयडिठाणाई।ओहेणाऽऽएसेणय, जत्थ जहासंभवं विभजे॥२९॥ अट्ठ य बारस० गाहा । अट्ठ य बारस बारस जहक्कमेण बंधोदय-संतढाणाणि । एए ओघेणं आएसेण य जे जत्थ जहा तिगनउई नउइ इगुणनउई य । चउ-तिग-दुगाऽहिगाऽसी, नव अट्ठ य नामठाणाइ ॥ १४ ॥ १ . अन्ये ' श्रीशिवशर्मसूरिप्रमुखा । तथा च कर्मप्रकृतौ सत्ताधिकारे नाम्न सत्तास्थानमसूचक गाथासूत्रम्-" ति-दुगमय छ पचग- १ सभवति ते तत्थ तहा माणियहा । 'ओषेणे ति सामण्णेण, अमुग बघमाणस्स एत्तियाणि उदयट्ठणाणि, एचियाणि सवडा पाणि समवति ति एसो निदेसो ओयो । आएसो-मिच्छादिहियाईण गइयाईण य पत्तेय पत्तेय बघोदय सतढाणाण सवेहो मण्णइ सो आएसों' भण्णा ।। २९॥ इयाणि कइ बघतो वैएइ कह ! चि, कह वा पगइट्ठाणकम्मस ! चि, एयस्स अवसरो । त भण्णइ- नव-पचोदय-सन्ता, तेवीसे पन्नवीस छबीसे । अट्ठ चउरऽट्टवीसे, नव सत्त गुतीस तीसम्मि ॥३०॥ एगैगमेगतीसे, एगे एगुदय अट्ट सन्तम्मि । उवरयबधे दस दस, वेयगसंतम्मि ठाणाइ ॥३१॥ नव पचोदय० गाहा । एगेग० गाहा । ' नवपचोदयसंता तेवीसे पण्णवीसे छबीसे 'ति तेवीस पशुचीस छडीसषधगाण पत्तेय पचेय नव नव उदयट्ठाणाणि, पच पच सतढाणाणि । तस्थ तेवीसवधगाण नव उदयट्ठाणाणि-२१ । २४।२५। २६ ॥ २७॥ २८ । २९ । ३० । ३१ । एकवीसोदओ अवरगईए वड्डमाणाण एगिदिय-चे. तेव० पचिंदियतिरिक्ख मणु स्साण तेवीसनधयाण लन्मह । कह ? भण्णह-एगिदियऽपलत्तगेसु तेर्सि उववाओ अस्थि चि । चउवीसोदओ एगिदियपक्ष चा उपजचगे बहिकिच । पशुवीसोदओ एगिदियपजत्तगे तिरिय-मशुयउचियमिच्छदिद्विणो य अहिकिच । छपीसोदओ एगि दिपपलचग वै० तेच० पचिंदियविरिय-मशुयपबत्ता उपजचए पडुच्च । सत्तावीसोदओ एगिदियपजचगे तिरिय मणुयवेउबिये १ सो बुचर । क कार ॥२ मेग इगती खे१ ॥

? अहिकिच । अट्ठावीस-एगणतीस-तीसोदया बेइंदिय-ते०-च०-पंचिंदियतिरिय-मणुयपजत्तगे य अहिकिच्च । एकतीसोदओ वे०- ते-च०-पंचिंदियतिरिक्खे य अहिकिच । सेसा सवे तेवीसं ण बंधति । इयाणि तेसिं चेव तेवीसबंधगाणं पंच संतढाणाणि- ९२ । ८८ । ८६ । ८० । ७८ । एत्थ एकवीसोदए पंच वि संभवंति मणुस्सवजे सधे अदिगिच, मणुस्सेसु अत्तरी न संभ- वह त्ति । कहं ? अत्तरीए मणुस्सगई२ उवलिय त्ति काउं । चउवीसोदए पंच वि संभवंति, वेउधिओदए वट्टमाणे एगिदिए मोत्तूण सेसाणं एगिदियाणं । वेउवियस्स असीइ-अद्वत्तरिवाणि तिणि । वेउविए मणुयदुगं नियमा अस्थि । कह? भण्णइ-वेउधियछकं उवलेउं पच्छा मणुयदुगं उबलेइ ति काउं । पणुवीसे वि पंच वि । अत्तरी तेऊ वाऊपजत्तगे अवेउ- बिगे पडुच्च लब्भइ । सेसपजत्तगेसु अत्तरी न लन्मइ, तेऊ-वाऊवजो पञ्जत्तगो मणुयगई२ नियमा बंधइ त्ति काउं । वेउ- विए असी वि न लब्भइ । छबीसे वि पंच वि । अत्तरी तेउ-वाउपजचगे अवेउलिए बे०-ते०-च-पंचिंदियतिरिक्खपजत्ताऽ- पजत्तगे य अहिकिच्च । ते तेऊ-चाऊयो अणंतरागया विगल-सगलतिरिक्खा जाव मणुयगई न बंधंति त्ति ताव अट्ठत्तरी लब्मइ । सेसेसु अत्तरी नत्थि । सत्तावीसे अत्तरिवजाणि चत्तारि संतट्ठाणाणि बायरएगिदिय नर-तिरियवेउबिगे य अहि- किच । कहं ? सत्तावीसोदओ तेऊ-वाऊणं नत्थि, तेसु आयाधुजोया णत्थि त्ति काउं । अट्ठावीस एगुणतीस-तीस-२८ । २९ । ३० । ३१ एगतीसोदएसु नियमा अद्वत्तरिवजाणि चत्तारि संतट्ठाणाणि विगलिंदिय-तिरिय-मणुए य अहिकिच्च । नवरं एक- तीसोदओ मणुयाणं तेवीसबंधगाणं नत्थि । एवं तेवीसबंधगस्स नव वि उदयट्ठाणे पडुच्च चत्तालीसं संतवाणाणि । पणुवीस- १ "णि तं०-१२ । 'फा कार ॥ २ लतिरि° रा ॥ ३ °त्ति अट्ट स ॥ -- छवीसपधगाण पि एव चेव, नवर देवे वि पडुध २१।२५। २७ । २८ । २९ । ३०, एएसु उदयट्ठाणेसु पाणउई अड्डा सीई य दो सतढाणा लम्मति । दोव्ह वि पधाण नवविहउदए पड्डुच्च चचालीस चचालीस सतढाणाणि । अट्ठ पउरऽढवीसे 'त्ति अट्ठावीसवधगस्स अट्ठ उदयट्ठाणाणि, चत्तारि सताणि। तत्थ उदपट्ठाणाणि, त०-२१॥२५॥ २६ ॥ २७ ॥ २८॥ २९ । ३० । ३१ । एत्थ एकवीसा तिरिय-मणुए खड्ग घेयगसम्मद्दिडिणो पडुच लन्भइ । पणुवीमा आहारगसजए विरिक्ख मणुए य वेउविगे सम्मदिद्विणो मिच्छादिद्विणो य अहिगिच लन्भइ । छबीसा जहा एकवीसा, विरिक्ख मशए पडुच्च । सत्तावीसा आहारगसजए तिरिक्ष मणुयवेउबिए य पडुच्च । एव अट्ठावीसा एगूणतीसा वि । तीसा तिरिय मणुयेसम्मदिहि-सम्मामिच्छदिहि [ मिच्छदिहिणो आहारग-वेउशियसजए य पडुच्च । एकतीसा तिरिक्खसम्महिडि सम्मामिच्छदिहि मिच्छदिहिणी पडुच्च । इयाणि सतवाणाणि, त०-९२।८९ । ८८।८६ । एकवीसोदए अट्ठावीसवघगस्स सट्ठाणाणि-९२ । ८८ । पशुरीसोदए ते चेव दोणि । किं कारण ? आहारसजओ नियमा आहारसतकम्मिओ तस्स पाणउई चेव, सेसा तिरियमणुया वेउशिया आहारसतकम्मिगा वि, विणा कि, एएण दोणि । छवीस सत्तावीस-अट्ठा- पीस एगणतीसे वि ताइ चेव दोणि सतढाणाणि । तीसोदए चत्तारि वि सतढाणाणि-९२ । ८९ । ८८।८६ । वाणउई अडासीती य सिद्धा घेव, एगूणणउई कह ? मण्णइ-मणुस्सो तित्थगरनामसतकम्मिगो वेयगसम्मट्टिी पुरषद्धनिरयाउगो निरयामिरहो मिच्छत्त गओ उस्स तित्थगरनामवधामावाओ निरयपाउग्ग अठ्ठावीस वधमाणस्स एगणनउई मवइ । छासी- १ प सामण्णेण गय वि उदय पडुध तीस सत का ॥ २ यमिच्छडिष्टिको सम्मामिच्छहिडिणो सम्मद्दिछिणो माहा कोर ॥

L तीसंतकम्मिओ कहं ? भण्णइतित्थगरा-ऽऽहारचउक-देवदुग-निरयदुग-वेक्षियचउकरहिया तेणउई असी भवति, तस्संतक- म्मिगो तिरिक्खो मणुस्सो वा सबपजत्तीहि पजत्तगो जइ विसुद्धो तो देवपाउग्गं बंधइ, तस्स देवदुगे वेउछियचउके य छुढे छासीती भव; जइ संकिलिट्ठो तो निरयगइपाउग्गं बंधइ, तस्स निरयदुग वेउवियचउक्के य छुढे वा छासीती। एकतीसोदए तिणि संतवाणाणि-९२ । ८८। ८६ । एगणनउई तिरिक्खेसु नत्थि, तिरिक्खेसु तित्थगरसंतऽभावाओ । छासीइभावणा पूर्ववत् । अट्ठ वि उदयहाणा देवगइपाउग्गं बंधमाणस्स, तस्स एगणनवुईवजाणि सामण्णेण तिणि संतवाणाणि लब्भति । तीसेकतीसोदया दोणि निरयगइपाउग्गं बंधमाणस्स, तस्स चत्तारि वि संतवाणाणि लभंति । एवं अट्ठावीसवधगस्स अट्ठ वि उदयट्ठाणे पडुच्च एगणवीसं संतढाणा । नव सत्तुगुतीस तीसम्मि 'ति एगूणतीस-तीसबंधगाणं नव नव उदयट्ठाणाणि, सत्त सत्त संतट्ठाणाणि । तत्थ उदयट्ठा- णाणि एकवीसाईणि एकतीसंताणि नव । तत्थ एकवीसोदओ एगणतीसं तिरिय-मणुयपाउग्गं बंधमाणाणं एगिदिय-विगलिं- दिय-तिरिय-मणुयपजत्ताऽपजत्तग देव-नेरइये य अहिगिच्च । चउवीसोदओ एगिदियपजत्ता-ऽपञ्जत्तगे य अहिगिच । पणुवी- सोदओ एगिदियपजत्तग-देव-नेरइय-वेउवियतिरिय-मणुयमिच्छदिट्ठिणो अहिगिच । छवीसा एगिदियपजत्तग-विगलिंदिय- पंचिंदितिरिय-मणुयपजत्ता-ऽपजत्तगे अहिगिच । सत्तावीसोदओ एगिदिय-देव-नेरइय-तिरिय-मणुयवेउविय-मिच्छद्दिहिणो अहिगिच्च । अट्ठावीसा अउणतीसा य विगलिंदिय-तिरिय-मणुय-देव नेरइय-वेउवियतिरिय-मणुए य पडुच । तीमा विगलिंदिय- पंचिंदियतिरिक्ख-मणुयपजत्तगे देवे य उजोयवेयगे पडुच्च । एकतीसा विगलिंदिय-पंचिंदियतिरिए य पडुन । इयाणिं देवग- इपाउग्म तित्थगरसहिय एJणतीस वधमाणस्स मणुसस्स असजयसम्मदिडिस्स २१ । २६ । २८ । २९ । ३० उदया लन्मति । २५।२७।२८।२९।३० उदया आहारगसजए वैडबियसंजए असजए सजयाऽसंजए य अहिगिच ।नवर तीसो दओअसजय सजयाऽसजयाण नस्थि, किं कारण ? वेउबिए उसोवस्स तेसिं उदओनस्थिति काउ। इदाणि सतढाणाणि,त- ९३ ॥ १२॥ ८९.८८1८६ । ८०। ७८ तत्थ विगलिंदिय पचिंदियतिरिक्खपाउग्ग एगणतीस वषमाणाण एगिदिय- विगलिंदिय-पचिंदियतिरिक्खपजत्ता-उपजचाण एकवीसोदए पच सतढाणाणि ९२।८८।८६ । ८०।७८ । एव जाव एगतीसोदओ ताव नेयव जहा तेवीसबषगस्स नीय । मणुस्सगइपाउग्ग एगूणतीस पघमाणाण एगिदिय-विगलिंदिय-पचिं दियविरियाण विरियगइ मणुपगइपाउग्ग बघमाणाण मणुयाण च अत्तरिवजाणि ताणि घेव चचारि सतहाणाणि अप्प- प्पणो उदयहाणेसु जहासमव भाणियवाणि । देव-नेरइयाण पचिंदियतिरिय मणुयगइपाउग एगणतीस वधमाणाण अप्प- प्पणो उदयट्ठाणेसु दो दो सट्ठाणाणि-१२ । ८८ । नवर नेरइयस्स मिच्छदिडिस्स तिस्थगरसंतकम्मगस्स मणुस्सगइपा. उग्ग वधमाणस्स अप्पप्पणो पचसु उदयहाणेसु एगणनउई लन्मइ ८९। इदाणि एगणतीस तित्थगरसहिय देवगइपाउग्ग बध- माणस्स असंजयसम्मदिहिस्स एकवीसोदये दो सवाणि-९३ । ८९ । एव पचवीस छबीस सचावीस-अट्ठावीस एगूणतीस तीसोदएसु वि । नवरि २५ । २६ । २७।२८।२९ । ३० वीसोदएसु असंजय सजयाऽसजय सजए वा वेउदिए पडुम्ब दो दो संवाणि वाणि चेव तेणउह-एगणनउयाणि, नवरि असजय-देसविरयाण तीसोदओ नत्यि । आहारगसजय पडुच एएसुपेव १ णि, अस स॥

उदएसु एकेक संतट्ठाणं तेणउई, तित्थगरा-ऽऽहारगसंतसहिय त्ति काउं । सद्देसि सामण्णेण उदयट्ठाणेसु जहकमेण संतवाणाणि ७।५।७।७।६।६ । ६।६।४ । एगणतीसबंधगस्स सबसमुदओ चउप्पण्णं संताणि । इदाणिं तीसबंधगस्स नव उदयहाणाणि, सत्त संतडाणाणि जहा एगणतीसं तिरियगइपाउग्गं बंधमाणाणं एगिदिय-विग- लिंदिय-पंचिंदियतिरिय-मणुय-देव-नेरइयाणं विही भणिओ तह चेव उजोवसहियं तिरियगइपाउग्गं तीसं बंधमाणाणं एगि- दियाईणं उदय-संतढाणाणि । नवरं मणुयगइपाउग्गं तित्थगरसहियं तीसं बंधमाणाणं देव-नेरइयाणं विसेसो भण्णइ-देवस्स एकवीसोदए वमाणस्स बे संतवाणाणि-९३१८९/ तम्मि चेव उदए नेरइयस्स एगूणणउई एगा।कि कारणं १ भण्णइ- जस्स तित्थगरा-ऽऽहारगाणि जुगवं संताणि सो नेरइएसु न उवचजइ त्ति काउं । एवं २५ । २७ । २८ । २९ । ३० तीसोद- एसु भाणियवाणि, नवरि तीसोदओ नेरइयस्स नत्थि। कहं ? उज्जोवस्स उदयाभावाओ । जो आहारगसहियं तीसं बंधइ तस्म तीसोदए चेव एक संत वाणउई, तित्थगरबंधाभावात् । एवं सामण्णेण तीसबंधगाणं नवसु उदयट्ठाणेसु जहम संताणि-७। ५।७।५।६।६।६।६।४ । सबसमुदओ तीसबंधगस्स बावणं ॥३०॥ 'एगेगमेगतीसे 'त्ति एगतीसबंधगस्स एगं उदयट्ठाणं तीसा । किं कारणं ? देवगइपाउग्ग आहारगतित्थगरसहियं एक- तीसं बंधमाणो अप्पमत्तसंजओ अपुवकरणो वा, ते वेउध्वियं न करें-ति ति। एगं संतवाणं तेणउई । कहं ? तित्थगरा-ऽऽहारस- हियं बंधइ ति काउं । ' एगे एगुदये असंतम्मि 'त्ति एगविहवंधगस्स एगं उदयहाणं तीसा । कारणं इमं-अपुवादओ वेउ- १ 'कमेणं सं° का ॥ Z बिय न करेंति, विशुद्धत्वात् । अट्ट सतढाणाणि-९३ ॥ ९२ । ८९ । ८८।८०। ७९ । ७६ । ७५ । मूलिल्ला चत्वारि वि उवसमसेडीए खवगसेटीए वा अणियविम्मि जाव तेरस णामाणि न खीयति ताव लम्मति । तेरस नामे खविए अणियट्टि- सुहुमसपराएसु उवरिल्ला चचारि वि लक्ष्मति । 'उवरयवघे दस दस वेदग सतम्मि ठाणाणि 'ति अबधगाण दस उदयट्ठाणाणि-२० । २१ । २६ । २७। २८ । २९ । ३०।३१।९।८।वीस-एकवीसा समुग्धायगयाण अतित्थगर वित्थगराण कम्मतिगकायजोगीण । छबीस सत्ता- चीसा तेसिं चेव ओरालियमिस्सकायजोगे घट्टमाणाण । अट्ठावीसा अतिस्थगरस्स ऊसासे निरुद्धे । एगणतीमा तस्सेव सरे निरुद्धे । अहया अउणचीसा तित्थगरस्म ऊमासे निरुद्ध । तीसा अतित्थगरस्स समावत्थस्स । अहवा तित्थगरस्स सरे निरुद्ध वा ३० । समावस्थस्स वित्थगरस्स एकतीसा । तित्थगरस्स अजोगिस्से परिमसमए वट्टमाणस्स नवोदओ । अतित्थगरस्स अजोगिस्से परिमसमए वट्टमाणस्स अड्दओ । दस सतट्ठाणाणि अणतरुत्ताणि अट्ट नव अट्ठ य, एते दस । तत्थ वीसोदए वे सतष्ठाणाणि-एगणासीती पण्णत्तरी य । एव छबीस अट्ठवीसोदएसु वि । एकवीसोदए दो सतढाणाणि-असीती छावत्तरी व य। एवं सत्तावीसे वि । एगूणवीसे चत्तारि-८०। ७९ । ७६ । ७५, तित्थगर अतित्थगर पडुच्च । वीसोदए अह, त- ९३ । ९२ । ८९।८८1८०1७९ । ७६ । ७५ । मूलिल्ला चचारि उनसतकसाय पडच । उपरिला चचारि वि खीणकसाय- वित्यगरा ऽतित्थगरफेवलिणो पडुन्छ । एकतीसोदए वे सतवाणाणि-असीई छावत्तरी य, तित्थगरकेवलिं पडुच्च । नवोदए । १ "णि, त-२० । का। णि, त जहा-२० कार ॥ २ स्स नवो का कार ॥ ३ "स्स अदु को कार ॥

अजोगिस्स तिणि संताणि-८० । ७६ । ९ । मूलिल्ला दो जाव दुचरिमसमओ ताव, अंतिमो चरिमसमए भवइ । अट्ठो- दए अतित्थगरस्स अजोगिस्स तिण्णि संतहाणाणि-७९ । ७५ । ८ । भावना पूर्ववत् । एवमबंधगस्स दससु वि उदयट्ठा- णेसु । सबाणि तीसं संतढाणाणि ॥ ३१ ॥ उत्तरपगईणं बंधोदय-संतभेया संवेहो य भणियाणि । इदाणिं जहा भणियं तहा परिवाडीए जीवट्ठाण-गुणट्ठाणेसु सामित्तं भण्णइ- तिविगप्पपगइठाणेहि जीवगुणसन्निएसु ठाणेसु।भंगा पउंजियवा, जत्थ जहासंभवो भवइ ॥३२॥ तिविगप्पपगइठाणेहिं० गाहा । तिण्णि विगप्पा बंधोदय-संत ति, ते जेसिं णाणावरणाइपगइट्ठाणाणं ते तिविगप्पपगइ- हाणा, तेहिं तिविगप्पपगइट्ठाणेहिं ' जीवगुणसन्निएसु ठाणेसु 'त्ति जीवट्ठाण-गुणहाणनामगेसु ठाणेसु 'भंगा पउंजियव 'त्ति पूर्वाभिहिता विकल्पाः प्रयोक्तव्याः, 'जत्थ जहा संभवो भवइ 'त्ति जत्थ त्ति-जीवट्ठाण-गुणहाणेसु जहासंभवं ति-जत्थ जो विगप्पो जहा संभवइ तहा भणइ ।। ३२ ॥ पुवं ताव जीवट्ठाणं पडुच्च सामित्तं भण्णइ- तेरससुजीवसंखेवएसु नाणंतराय तिविगप्पो। एकम्मिति-दुविगप्पो, करणं पइ एत्थ अविगप्पो ॥३३॥ तेरससु जीवसंखेवएसु० गाहा । 'तेरससु 'त्ति सनिपंचिंदियपजत्तगं मोत्तूण सेसेसु तेरससु जीवट्ठाणेसु ' नाणंतराय १ वो होइ ॥ खे१ खे२ ॥

लिय न करेंवि, विशुद्धत्वात् । अह सतहाणाणि-९३ ॥ ९२ । ८९ । ८८1८०। ७९ । ७६ । ७५ । मूलिला चचारि वि उसमसेडीए खवगसेदीए वा अणियविम्मि जाव तेरस पामाणि न खीयति ताव लन्मति । तेरस नामे खविए अणियट्टि- सुहमसपराएसु उपरिक्षा चत्तारि वि लन्मति । ' उवरयषधे दस दस वेदग सतम्मि ठाणाणि 'ति अवधगाण दस उदयट्ठाणाणि-२०।२१ । २६ । २७। २८ । २९ । ३० । ३१ । ९।८। वीस-एकवीसा समुग्धायगयाण अतित्थगर वित्थगराण कम्मतिगकायजोगीण । छवीस सत्ता- बीसा वेसिं चेव ओरालियमिस्सकायजोगे वट्टमाणाण । अठ्ठावीमा अतित्थगरस्स ऊमासे निरुद्ध । एगूणतीमा तस्सेव सरे निरुद्ध । अहया अउणत्तीसा वित्थगरस्स ऊसासे निरुद्ध । तीसा अतित्थगरस्स ममावत्थस्म । अहवा तित्थगरस्स सरे निरुद्ध वा ३० । समावत्यस्स वित्थगरस्स एकतीसा । तित्थगरस्स अजोगिस्मै चरिमसमए वट्टमाणस्स नवोदओ । अवित्थगरस्स अजोगिस्सै चरिमसमए वमाणस्स अड्दओ । दस सतहाणाणि अणतरुत्ताणि अह नव अट्ट य, एते दस । तत्थ वीसोदए वे सतढाणाणि-एगणासीवी पण्णचरी य । एव छवीस अट्ठीसोदएसु नि । एकपीसोदए दो सतढाणाणि-असीवी छावचरी पा एवं सत्तावीसे वि । एगूणवीसे चत्तारि-८०/७९ । ७६ । ७५, वित्थगर अतित्यगर पहुच । तीसोदए अट्ठ, त- ९३ । ९२ ॥ ८९।८८1८०।७९ । ७६ । ७५ । मूलिल्ला चचारि उपसतमसाय पडुच । उवरिल्ला चत्तारि नि खीणकसाय- विस्थगरा-तित्यगरकेवलिणो पड्डुच्च । एकतीसोदए वे सतढाणाणि-असीई छारतरी य, तित्थगरकेवलि पडुच्च । नवोदए १ णि, त-२० । श्री। णि, त जहा-२० कार ॥ २ स नयो की कार ॥ ३ "स्स अटुं' को कार ।

अजोगिस्स तिणि संताणि-८० । ७६ । ९ । मूलिल्ला दो जाव दुचरिमसमओ ताव, अंतिमो चरिमसमए भवइ । अट्ठो- दए अतित्थगरस्स अजोगिस्स तिणि संतट्ठाणाणि-७९ । ७५ । ८ । भावना पूर्ववत् । एवमबंधगस्स दससु वि उदयट्ठा- णेसु । सहाणि तीसं संतढाणाणि ॥ ३१ ॥ उत्तरपगईणं बंधोदय-संतभेया संवेहो य भणियाणि । इदाणिं जहा भणियं तहा परिवाडीए जीवट्ठाण-गुणहाणेसु सामित्तं भण्णइ- तिविगप्पपगइठाणेहि जीवगुणसन्निएसु ठाणेसु।भंगा पउंजियवा, जत्थ जहासंभवो भवइ ॥३२॥ तिविगप्पपगइठाणेहिं० गाहा । तिणि विगप्पा बंधोदय-संत ति, ते जेसिं णाणावरणाइपगइट्ठाणाणं ते तिविगप्पपगइ- हाणा, तेहिं तिविगप्पपगइट्ठाणेहिं ' जीवगुणसन्निएसु ठाणेसु 'त्ति जीवट्ठाण-गुणट्ठाणनामगेसु ठाणेसु 'भंगा पउंजियव 'त्ति पूर्वाभिहिता विकल्पाः प्रयोक्तव्याः, 'जत्थ जहा संभवो भवइ 'त्ति जत्थ त्ति-जीवट्ठाण-गुणहाणेसु जहासंभवं ति-जत्थ जो विगप्पो जहा संभवइ तहा भणइ ॥ ३२॥ पुवं ताव जीवट्ठाणं पड्डुच्च सामित्तं भण्णइ- तेरससु जीवसंखेवएसु नाणंतराय तिविगप्पो। एकम्मिति-दुविगप्पो, करणं पइ एत्थ अविगप्पो ॥३३॥ तेरस सु जीवसंखेवएसु० गाहा । 'तेरससु 'त्ति सन्निपंचिंदियपजत्तगं मोत्तूण सेसेसु तेरससु जीवट्ठाणेसु ' नाणंतराय १ वो होइ ॥ खे१ खेर ।

तिविगप्पो 'सि णाणावरणतराइयाण बधाई तिण्णि विगप्पा भवति, त०-पचविहो पधो पचविहो उदओ पचविह सत ति ध्रुवत्वात् प्रयाणामपि । 'एकम्मि तिदुविगप्पो 'त्ति एकम्मि समिपचिंदियपजत्तमम्मि तिविगप्पो वा दुविगप्पो वा। विविगप्पो भणिओ । दुविगप्पो मुहुमसपराइयचरिमसमयम्मि मधे वोच्छिण्णे पचविहो उदओ पचविह सत ति, उवसत खीण- कसाएर मवह । एव दुविमप्य । अण्णो विगप्पो नस्थि, उदय संवाणि जुगव खिजति ति काउ। 'करण पई एत्थ अवि- गप्पो 'ति मणकरण केवलिणो वि अत्यि तेण सणिणो, मणोविण्णाण पडुच्च ते सन्त्रिणो न भवति । एवमिदिप पि पडुच्च सनिणो न भवति । जे करण पडच समिणो तेसु' अविगप्पो "त्ति विगप्पा तिष्णि वि नत्यि ॥ ३३ ॥ इपाणिं दसणावरण भण्णइ- तेरे नव चउ पणग, नव सन्तेगम्मि भगमेकारा। वेयणिया उय-गोए, विभन्न मोह पर वोच्छ॥३॥ तेरे पब चउ पणग० गाहा । 'तेरे गव चउ पणग नव सत "ति सनिपजत्नग मोत्तूण तेरससु जीपठाणेसु नवविहो बयो, चउ पणग उदओ, गव सत वि, एए दोणि विगप्या समवति । 'एकम्मि भगमेकार 'त्ति सनिपजत्तगम्मि दसणा- वरणस्स जे एकारस भगा मणिया ते सवे सभवति, मिच्छदिटिप्पभिई जाव खीणकमाओ ते मवे समिणो ति काउ । 'वेय- णियाउयगोए विमल' इति एएसि विण्ह कम्माण भगा जीवट्ठाणेसु विगप्पेपहा, जहासमव वि मणिय भवइ । तत्थ वेय- णिय गोत्ताण भगनिरूपणत्थमन्तर्माष्यगाथा- बाजे करक कार ॥२ मज्य इति स । मज तिक॥

'पजत्तगसनियरे, अट्ट चउकं च वेयणियभंगा । सत्तग तिगं च गोए, पत्तेग जीवठाणेसु ॥ १ ॥ वेयणियस पुत्वभणिया अट्ठ भंगा । सनिपजत्तगस्स ते सवे संभवंति । कहं ? केवलिणो वि करणं पडुच्च सन्निणो त्ति । इयर 'त्ति सन्निपजत्तगं मोत्तूण सेसा तेरस तेसु पत्तेगं पत्तेगं मूलिल्ला चत्तारिभंगा भवंति । कहं ? सवे वेयणियस्स बंधगत्ति। 'सत्तग तिगं च गोए 'त्ति जे गोयस्स सत्त भंगा भणिया ते सवे सनिपज्जत्तगम्मि संभवंति । पढमभंगो तेउ-वाऊओ अणंतरं उवट्टित्तु सन्निम्मि उववन्नमेत्तस्स लव्भइ । एवं सेसेसु वि। सन्निपजत्तयं मोतूण सेसेसु तेरससु तिण्णि तिणि भंगा- पढम-विइय-चउत्था, सेसा न संभवंति, उच्चागोओदओ तिरिएसु नत्थि त्ति काउं ॥१॥ इयाणि आउगमंगनिरूवणत्थं अन्तर्भाष्यगाथा- पजत्ताऽपजत्तग, समणो पज्जत्त अमण सेसेसुं । अट्ठावीसं दसगं, नवगं पणगं च उस्स ॥ २ ॥ सन्निपज्जत्तगस्स आउगस्स पुव्वुत्ता अट्ठावीसं भंगा ते सचे संभवंति, चउगतिगा सन्निणो त्ति काउं । सनिअपज्जत्तगस्स दस । कहं 'जे तिरिक्खस्स देवगति-निरयगतिसहिया भंगा ते मोत्तूण सेसा पंच, एवं मणुसस्स वि पंच, ते दो वि सन्नि- अपजत्तगा लभंति, तम्हा सनिअपज्जत्तगस्स ते सवे दस । असनिपज्जत्तगस्स नव, जे तिरियाउगेण नव भंगा ते सो संभवंति, सो तिरिक्खो त्ति काउं । सेसेसु एक्कारससु पत्तेयं पत्तेयं पंच पंच संभवंति, सनिअपज्जत्तगस्स तिरिक्खस्म जे पंच १ इत आरभ्यागेतना दशाऽपि चूर्णिगता अन्तर्भाप्यगाथाः सर्वप्वपि मूलसूत्रादपु केनचिन्मनीषिणा विशेषप्रतिपत्त्यर्थ न्यम्ता दृश्यन्ते ॥ २ °स्स पुयभणियस्स पुब स ॥ ३ °ति पते तिरिक्ख त्ति कार ।।

. . , , भगा ते सन्धे समवति, सेसा न समवति, एए तिरिक्ख ति काउ ॥२॥ इदाणि मोहणिज्ज मण्णइ ॥ ३४ ॥- अट्ठसु पचसु एगे, एग दुग दस य मोहवधगए। तिग चउ णव उदयगए, तिग तिग पन्नरस सन्तम्मि ॥ ३५॥ असु पचसु० गाहा । असु पचन एकम्मि य जीवहाणेनु जहफमेण 'एग दुग दस य मोहयगय 'चि मन अप- अवगा मुहुमपञ्जचगो य एए अह, एए नियमा मिच्छदिद्विणो नि काउ एएसु अहसु एको वधरिगप्पो पारीमा । तस्म छ- ब्मेया पुवमणिया। बादरएगिदिय वे० ते. चारिदिय अमनिपजनगो य एते पच, एनेसु पचमु नि दो दो पढाणा णि-बावीसा एकवीसा य, जहा पुत्र समेदा दो वि मणिया, मिच्छत्त सामणच च अस्थि ति काउ । 'एगे ति मन्त्रिप अचगम्मि दस अधडाणाणि नावीसादि-एकताणि समेदाणि पुखमणियाणि । 'तिग घउ नव उदयगय 'त्ति एएसु जहकमेण अडसु तिण्णि तिष्णि उदयट्ठाणाणि-दम नव अह नि । अर्णवाशुष घिसहिया मिच्छद्दिहिस्स उदया । अर्णवाणुपधिरहिया नस्थि । कह १ मिच्छच गतूण अतोमुत्तस्म आरतो तेसु न उसव. अइ ति फाउ। एककम्मि उदपम्मि नपुसगवेदेणं घेच अट्ट अट्ठ भगा। सेमा न समवति । वायरएगिदियपजचगादिसु पचसु चत्वारि चचारि उदया, त जहा-दस नव अट्ट सत्त ति, अर्णताशुषधिसहिया एन । वायरएगिदिय विगलिंदियाण नपुमगवेदे व अड्ड? भगा उठावेयवा । असत्रिपजचगस्म तिहिं वि वेदेहि उद्यावेयहा । 'नति एकम्मि मनिपजत्तगम्मि नव १ श्रीमलयगिरिपादास्तु पादरैनिय दि त्रि-वर्षिया ऽमशिपद्रियाणा पचानामपि पर्याधाना नघुमवेपस्यैवोदयमिच्छन्ति परयन कर्म उदयट्ठाणाणि, तंजहादसाइ-एगोदयपज्ञवसाणाणि तिगरहियाणि पुत्ववक्खाणियाणि सभेदाणि । 'तिग तिग पण्णरस संतम्मि 'त्ति असु पंचसु य जीवट्ठाणेसु तिण्णि तिण्णि संतवाणाणि, तं जहा-२८।२७ ॥२६॥ पुधवक्खाणियाणि | एगम्मि पण्णरस वि संतहाणाणि, तंजहा-अट्ठावीसाइ-एगपजवसाणाणि सभेदाणि पुवभणियाणि । इयाणि 'कति बंधंतो वेदेइ 'त्ति संवेहो भण्णइ-असु जीवट्ठाणेसु बावीसं बंधमाणेसु तिण्णि उदयट्ठाणाणि, तं०- दस नव अट्ठ ति । एकेके तिण्णि तिणि संतवाणाणि, तं०-२८ । २७ । २६ । एवं सबोदए पडुच्च नव संतहाणाणि । पंचसु वि जे बावीसबंधगा तेसि पि एवं चेव । एकवीसबंधगस्स तिणि उदयट्ठाणाणि, तं०-नव अट्ट सत्त त्ति । एकेक- म्मि एकेक चेव संतं अट्ठावीसा । कारणं पुव्वुत्तं । एवं एकवीसबंधगस्स तिण्णि संताणि बावीसबंधगसंतसहियाणि सवाणि वारस । सन्निपजत्तगम्मि बावीसादिबंधगाणं अबंधगाणं च ओघुद्देसविहिणा भावेत्तु भाणियवं ॥ ३५॥ मोहो भणिओ । इयाणिं नाम भण्णइ- पण दुग पणगं पण चउ, पणगं पणगा हवंति तिन्नेव । पण छ प्पणगं छच्छ, प्पणगं अट्ठट्ठ दसगं ति ॥ ३६ ॥ सत्तेव अपज्जत्ता, सामी तहसुहुम बायरा चेव। विगलिंदिया य तिन्नि उ,तह य असन्नी य सन्नी य ॥३७॥ १ मी सुहुमा य वा खे२ खे३ ॥ मन्थद्वितीयविभागपृ० १९९-२०० ॥

2 1 पण दुग पणग० गाहा । सचेव अपजत्ता गाहा } एयाओ दो नि गाहाओ जुगव वक्वाणिजति । ' पण दुग पणग' ति सत्तण्ह अपजचगाण पच पच बढाणाणि, वे वे उदपाणाणि, पच पच सतवाणाणि । नत्थ वहाणाणि, त०- २३ १२५१ २६ । २९।३० । एपाइ तिरिय मशुयपाउग्गाइ सचिगप्पाइ पुखमपिण्याइ । उदयहाणाइ एगिदियवायर-सु- हुम अपजत्तगाण दोणि-एकवीसा चउबीसा य । एकवीसे सुदुमअपजत्तगस्म एगो भगो, यादरअपजचगस्स एको । घउदीसोदए सुहुमएगिदियअपमत्तगस्स पचेय-माहारणेहिं दो मगा । एवं पादरअपजत्तगस्स पि । मबसमुदओ छ ६ । पचेय पत्तेयं विण्णि तिष्णि-२१२४ सु०१ सु०२, वा०१ पा०२। गिलिदिय असण्णि सण्णिअपजचगाण पत्तेय पत्ते दोणि दोणि उदयवाणाणि-२१ । २६ । एकवीसोदए एको मगो, छबीसे एको, सके दो पत्तय पत्तेय, नवार सनिअप- अचगस्स तिरियस्म दो, मणुयस्स दो, सधे चत्तारि । पत्तेय पत्तेय पच पच सतहाणाणि, त०-१२। ८८।८६ । ८०। ७८ । एतेसि विवरण पूर्ववत् । सत्तण्ह अपञ्जत्तगाण मामित्त मणिय । पण चउ पणगीति सुहुमपजचगस्स पच पहाणाणि, चचारि उदयट्ठाणाणि, पच सतहाणाणि । घडाणाणि जहा अपजत्तगाण | उदयट्ठाणाणि त०-२१ । २४ । २५ । २६ । सुकुमस्स पजत्तगस्म एकवीसोदए एगो भगो, चउत्रीसोदए पत्तेय साहारणेहि, पशुवीसोदए दो, छबीसोदए दोणि सधे सत्त । पशुवीस छवीसोदये जे साहारणेण सम दो भगा ते अट्ठचरिवजा चउसतकम्मिया, सेसा पच वि भगा पचसतकम्मसिओदया । सताणि अपजत्तगसतवत् । 'पणमा इवति तिण्णेव' ति पादरएमिंदियपजत्तगस्स पर चघडाणाणि, पच उदयट्ठाणाणि, पच सवडाणाणि । वर्ष संतढाणाणि पूर्ववत् । उदयट्ठाणाणि तं०-२१ । २४ । २५ । २६ । २७ । तत्थ एकवीसोदए दो भंगा जसा-ऽजसेहिं । चउवीसोदए पंच भंगा, तं०-पत्तेय-साहारण-जसा-जसेहिं चत्तारि, वेउवियस्स एको । पणुवीसे वि ते चेव पंच । छबीसे वि ऊसासेण ते चेव पंच, ऊसासे अणुदिण्णे आयावुज्जोयाणं एगयरे उदिण्णे आयावे जसा-जसेहि दोण्णि, उज्जोवे पत्तेग- साहारण-जसा-जसेहिं चत्तारि, सवे एक्कारस । सत्तावीसे छब्भंगा । सवे एगूणतीसं । पणुवीम-छविसोदएसु पत्तेग-अजसकि- त्तिसहिओ एकेको भंगो, एकवीस-चउबीसोदए सवे उदयभेदा, णवरि चउबीसोदए वेउवियोदयं मोत्तूणं; सत्बे सहिया अट्ठ, एए पंचसंतंसिकोदया। सेसा चउसंतसिगोदया एकवीसं । 'पण छ प्पणगं' ति बेइंदियपजत्तस्स पंच बंध० छ उदय० पंच संताणि । बंधसंताणि पूर्ववत् । उदयट्ठाणाणि तं०-२१ । २६ । २८ । २९ । ३० । ३१ । अपजत्तगोदयरहिया सव्वुदयभेदा वीसं । तेसु पुत्वभणिया एकवीस-छवी- सोदयविगप्पा चत्तारि एए पंचसंतकम्मिया । सेसा सोलस चउसंतकम्मिया । एवं तेइंदिय-चउरिंदियाण वि । 'छ च्छ पणगं' ति असन्निपजत्तगस्स छ बंधट्ठाणाणि छ उदयट्ठाणाणि पंच संतवाणाणि । बंधट्ठाण-संतढाणाणि जहा बेइंदियपजत्तगस्स । नवरं अट्ठावीसा निरयगइ-देवगतिपाउग्गं पि बंधंति त्ति अट्ठावीसा छूढा, तम्हा छब्बंधट्ठाणाणि । उद- यहाणा जे सनितिरिक्खस्स पजत्तगस्स भणिया वेउवियरहिया ते चेव, असण्णीसु वेउत्वियं नत्थि । अपजत्तगोदयदुगरहिय- सव्वुदयाणं पिंडो एगूणपण्णसयाणि चउरऽहिगाणि । एएसिं मज्झे एकवीस-छबीसोदयविगप्पा २९६ पंचसंतकम्मिया । सेसा सवे वि चउसंतकम्मिया ।

अड्डाढ दसक' वि सनिपचिंदियपजत्तस्स सहाणि यघडाणाणि । वीस चउनीसोदय-नवोदय अट्ठोदयरहियाणि मन्च दयहाणाणि अड। एगिदिय विगलिंदिय केवलिउदयवज्ञा अपजत्तोदयदुगहियभगवउकरहिया सबुदयविगप्पा सण्णि- पजचास्स उदयविगप्पा मवति । एत्य पचसतिगोदयाणि असभिपजत्तगसरिसाणि । नव अङ्करहियाणि सबसताणि । पुन्य मणिपाणि ताणि सपिजत्तगरस सवाणि सवाणि । पधुदय-सवाणि मणियाणि । इपाणि 'कइयवतो वेएह कह" ति एयस्स अवसरो, त भण्णइ---सहुमएगिदियअपात्तगाण तेवीसबषगाण एकवीसोदए पर सवाणि-९२ १८८।८६।८०। ७८ एव चउवीसोदएपि, म वि दसा एव पशुचीस- छबीस-अउणचीस-तीसवधयाण पि। सो वि पण्णास। एव सत्चन्ह पि अपजनगाण, नवरि अप्पप्पणी उदयट्ठाणेसु भाणियव । मुहुमपजचगाण तेवीसपघमाण एकवीसोदए पच सवाणि पुष्युत्ताणि । एव २४ । २५। २६ उदएसु । सहे वीस । एव २५ । २६ । २९ । ३० बघगाण पि । सबसमुदओ सय । पायरएगिदियपजचगाण तेवीसवषगाण २१ । २४ । २५1 २६ उद- एसु पच पच सवाणि, सचावीसोदए पत्तारि, सो वि चउवीस । एव २५ । २६ । २९ । ३० पधगाण सि । सव्युदएस सय वीसुत्तर । बेइदियपजत्तगाण कीसवधगाण एकवीस-छधीसोदएसु पच पच सत्तट्ठाणाणि पुव्युत्नाणि । २८ । २९ । ३० । ३१ उदयेसु चचारि बचारि सताणि । सबे वि छबीस । एव २५।२६ । २९ । ३० बधगाण पि । सबसमुदओ वीसुत्तर सय । एव तेहदिय-चरिदियाण पि । असण्णिपजचगाण पि ऐच चेव, नयरि अट्ठावीसवधगाण तीस एकतीसोदएसु तिष्णि १ स्वस्तिकद्रिकान्तवती पाठ का प्रतावेव ॥ २०णि। एष २८ णि । २८ । को३ ॥ ३ एयचे का कारण - तिणि संताणि ९२ । ८८। ८६ । सबसमुदओ छत्तीसुत्तरं सयं । सनिपज्जत्तगाणं तेवीसबंधगाणं जहा बेइंदिय-पज्जत गाणं, सबै छवीसं । एवमेव पणुवीसबंधगाणं पि, नवरि देवाणं पणुवीसबंधगाणं पणुवीस-सत्तावीसोदएसु दो दो संताणि- ९२ । ८८ । सो वि पणुवीसबंधगाणं तीसं । एवं छबीसवंधगाणं पि तीसं । अट्ठावीसबंधगाणं जहा ओघे तहा भाणि- यवं, सवे एगूणवीसं । एगणतीसबंधगाणं जहा पणुवीसबंधगाणं, सवे तीसं । नवरि विसेसो भण्णइ-अविरयसम्मद्दिडिं पडुच्च २१ । २६ । २८ । २९ । ३० उदएसु दो दो संताणि ९३ । ८९ । एवं संजय-संजयासंजय-असंजयाणं वेउवीणं २५। २७ उदयेसु ते चेव दो दो लभंति । अहवा आहारगसंजए पडुच्च तेणउती, नेरइए तित्थगर-संतगमिच्छदिदि पडुच्च एगूणनवुती लब्भइ । सन्चे चोदस । एगूणतीसबंधगस्स सबसमुदओ चोयालीसं भवंति । तीसबंधगाणं जहा पणुवीसबं- धगाणं, नवरि देवाणं मणुयगइपाउग्गं तित्थगरसहियं बंधमाणाणं २१ । २५ । २७ । २८ । २९ । ३० उदएसु दो दो संताणि ९३ । ८९ एते बारस, सो बायालीसं । एकतीसबंधयाणं तीसोदए तेणवुती एक । एगविहबंधगाणं अट्ठ । अबं- धगाणं अट्ठ। सबसमुदओ सनिपज्जत्तगस्स २०८ । करणं पइ सन्नीणं केवलीणं २० । २१ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१।९।८ उदएसु सवाणि छबीसं संताणि ॥ ३६॥ ३७॥ जीवट्ठाणेसु सामित्तं भणियं । इदाणिं गुणहाणेसु सामित्तं भण्णइ- नाणंतराय तिविहमवि दससु दोहोति दोसु ठाणेसुमिच्छा-साणे बीए,णव चउ पण णव य संतंसा॥३८ १ "णि ताणि-९२। स ॥२°णं तेणवु सं का२ ॥ .

णाणतराय तिविहमवि० गाहा । णाणावरणतरायिगाण 'तिविहमवि 'त्ति पधोदय-सताणि 'दमसु प्रति मिच्छाइ जाव सुहुमरागो वाव पचविहो घो, पचविहो उदओ, पचविह सत ति । एष विप्पगार पि अस्थि, कमायाणुदए वमृति ति काउं । 'दो होति दोसु ठाणेसु 'ति उदय-सवाणि दोणि, एयाणि उपसत स्वीणकसाएसु दोहुँ भवति, सुगुमरागचरिमस- मए बधो वोच्छिण्णो, छउमत्थचाओ उदय सता अस्थि । ते य खीणकसायस्म चरिमसमए दो वि खिजति । 'मिच्छासाणे वितिए नव चउ पण नव य सतम' चि वितिय ति-दसणावरण तस्स मिच्छदिहि-सासणमम्मदिहीसु दो मगा मवति, ०-नवविहो बधो चउ पणग उदओ नवविह सत ति । सेसा भगा न समवति, थीणगिद्वितिगस्म नियमा ते वधग त्ति काउ॥ ३८॥ मीसाइ नियट्टीओ, छ चउ पण णव य सतकम्मसा । चउषध तिगे चउ पण, णवस दुसु जुयल छस्सता ॥ ३९ ॥ मिस्मादिनियडीओ छ चउ पण नव य सतकम्मसति । मिस्सो चि-सम्मामिच्छद्दिट्टी, नियट्टि चि-अपुरकरणो, सम्मामिच्छट्टिीपमिती जाव अपुवकरणद्वाए सखेजविमो भागो वाव छबिहो वो, थीणगिदितिगस्म पधाभावाओ, चउ पणग वा उदओ, नव सवाणि, एए दो वि भगा सबेसु समवति । चउपप तिगे चउ पण णवस' ति अपुखकरणदाए सखेजइमे मागे गए निहापयलाण वधो वोच्छिाइ नि, तओ पमिइ चउक्षगो घुघद । अपुवकरणो अणियट्टी सुहुमरागो १ सु समव को। ॥ २ मिस्सा खेर ॥३हीप, च्छ व खे ॥

य चत्तारि 'बंधति त्ति चउबंधगा वुच्चंति । एएसु तिसु वि चउ पणगं वा उदओ, नव संताणि उवसमसेटिं पडुच्च । अपुव- करण-अणियट्टि पइ खवगस्स वि लभंति, नवरि चत्तारि चेव उदओ, निद्दादुगोदओ नत्थि । 'दुसु जुगुल छस्सन्त ' त्ति दुसु त्ति-अणियट्टि-सुहुमरागखवगेसु अणियट्टिअद्धाए संखेजेसु भागेसु गएसु थीणगिद्धितिगे खविए ततो पभिइ छस्संतक- म्मिगो बुच्चइ । अणियट्टी सुहुमरागो य एएसु दुसु चउविहो बधो, चत्तारि उदया, छ संताणि | जुगलं ति-बंधोदया चत्तारि चत्तारि । निदादुगस्स खवगा अचंतविसुद्ध त्ति काउं उदयाभावाओ एगो चेव भंगो ॥ ३९ ॥ उवसंते चउ पण णव, खीणे चउरुदय छच्च चउ संतं वेयणियाऽऽउय गोए, विभज्ज मोहं परं वोच्छं ॥४०॥ उवसंते चउ पण णव० ति । उवसंतकसायम्मि कसाओदयाभावाओ नत्थि बंधो, चउ पणगं वा उदओ, नव संतं । एए दो भंगा भवंति, अच्चंतविसुद्धो न भवति त्ति काउं। 'खीणे चउरुदय छ च चउ संत' ति खीणकसायम्मि चत्तारि उदओ, अत्यन्तविशुद्धत्वात् निद्दा-पयलाणं उदओ नत्थि, छ संतं ताव जाव दुचरिमसमओ, चरिमसमए चत्तारि उदओ, चत्तारि संतं । कहं ? भण्णइ-निद्दा-पयलाओ दुचरिमसमए खीयंति त्ति काउं । ' वेयणिया-ऽऽउय-गोएसु विभन्ज 'त्ति वेयणिया- ऽऽउ-गोताण भंगा गुणहाणेसु भाणियब ति भणियं भवइ । वेयणियस्स विवरणानिमित्तं अन्तर्भाष्यगाथा- चउ छस्सु दोनि सत्तसु, एगे चउ गुणिसु वेयणियभंग । त्ति १ बंधइ ति स का ॥ २ °दओ, छ का१ ॥ ३ संता खै२ खे३ ॥ ४ 'णिय-आउगो खे१ ।।

मिच्छदिद्विप्पमिह जाव पमचसजउ ति एएमु छसु ठाणेसु वेयणियस्स आदिल्ला चत्वारि भगा पत्तय पत्तेय मवति, सबै वि साया ऽसाय बघति चि। 'दोणि सत्तसु' त्ति अप्पमत्तपमिति जाव सजोगिकेवली एएसु मत्तम गुणट्ठाणेसु वेय- णियस्स वइय चउत्था भगा लन्मति, एए सो साय चैत्र वधति ति । 'एगे च ति अजोगिकेनलिम्मि अविल्ला चत्तारि भगा, सायाऽसाय सबे ससारत्था वेदेति चि । पचम छट्ठा भगा जाव दुचरिमसमओ ताव भवति । तम्मि समए अवैदिज. माणअण्णयरवेयणीए खीणे परिमसमए सत्तम अड्डमा मगा भवति । 'गुणिसु' त्ति गुणड्डाणेसु वेयणियमगा भणिया । गोयमियाणि भण्णइ- गोए पण चड दो विसु, पगट्ठसु दोणि एकम्मि ॥ ३ ॥ ति 'गोए पण चउ 'त्ति गोयस्स आइमा पच वि भगा मिच्छदिहिस्स, एए चेव पढमवला चत्तारि भगा सासणस्म, दो वि उच्चा नीय यधति ति । पढममगो सासणस्म नत्यि, कह ? तेउ-बाउसु सामणो नत्थि, तओ अणवरागओ वि सासणो नत्यि ति। दो तिसु' ति सम्मामिच्छदिहि अविश्य देमविरयाण चउत्थ पचमा दो वि भगा, एए नीयागोय न पति चि। अण्णे आपरिया मणति-देमविरपस्स एको भगो पचमो समवइ, कह १ मण्णइ-पग्गहेण षय नाइए उच्चागोयस्स उदभो ) ति चयणायो । 'एगऽसुतिगोयस्म पचमो भगोप मनसजयपभिइ जाव सुहुमरागो ताव हवइ । कह। भण्णइ-पधोदय पडुच्च तेसि उच्च चेव ति । छट्ठो भगो उवसतकमाय खीणकसाय-सजोगिफेवलीण, कमाओदयअमावाओ १ साणो त ॥ २ पगण इत्येतस्पाने टीकाया सामण इति पाठ ॥ - गोयस्स अबंधग त्ति काउं । एवं अहसु वि एकेको चेव भंगो। 'दोणि एकम्मि' त्ति अजोगिकेवलिम्मि अंतिमा दो भंगा भवंति । जाव दुचरिमसमओ ताव छट्ठो भंगो । दुचरिमसमए नीयागोए खविए चरिमसमए सत्तमो भंगो ॥ ३ ॥ इदाणिं आउगभंगनिरूवणत्थं अन्तर्भाष्यगाथा- अट्ट च्छाहिगवीसा, सोलस वीसं च बार छ दोसु । दो चउसु तीसु एकं, मिच्छाइसु आउगे भंगा ॥ ४ ॥ मिच्छदिहिस्स आउगस्स अट्ठावीसं पि भंगा संभवंति, चउगडए पडुच्च । सासणसम्मद्दिहिस्स छवीसं भंगा, कहं ? भण्णइ-तिरिय-मणुएसु जे निरयाउगवंधभंगा ते सासणस्स नस्थि, जेण निरयाउगं न बंधइ ति चउगइए पडुच्च तेण सेमा छब्बीसा भवइ । सम्मामिच्छद्दिहिस्स सोलस, कहं ? नेरइय-तिरिय-मणुय-देवाणं आउयबंधकाले जे भंगा ते वाररा वि न संभ- वंति, सम्मामिच्छभावे वट्टमाणो आउगं न बंधइ त्ति । सेसा चउगइए पडुच्च सोलस संभवंति । असंजयसम्मद्दिहिस्स वीसं भंगा, कहं ? भण्णइ-तिरिय-मणुएसु निरयगइ-तिरिय-मणुयपाउग्गा बंधकाले जे छन्भंगा, देव-नेरइएसु तिरियपाउग्गा बंधकाले भंगा दो, सो अट्ठ, एए असंजयसम्मदिहिस्स न संभवंति, कहं ? भण्णइ-तिरिय-मणुया जे असंजयसम्मदिट्टी ते देवाउगं मोत्तूणं सेसाउगाणि न बंधंति त्ति, देव-नेरइया मणुस्साउयं बंधति त्ति, सेसा भंगा चउगईए पडुच्च अविरयसम्म- दिट्ठी सबहिं उववजइ ति काउं लभंति । देसविरयम्मि बारस भंगा, कहं ? भण्णइ-तिरिय-मणुयाणं बंधपुवकाले दोण्णि, बंधकाले देवाउगं बंधइ त्ति दोण्णि, बंधुत्तरकाले अढ वि भंगा लभंति, कहं ? भण्णइ-चत्तारि वि आउगाणि वंधित्तु देस- विरई पडिवाइ, परिणामपञ्चएणं ति काउं । 'छद्दोसु' ति पमत्ता-ऽपमत्तसे छ छ भंगा, कहं ? भण्णइ--मणुयाणं बंधपुत्व- ? ७ कालभगो, देवाउगस्स पथकालभगो, बधुचरकालमगा य चत्तारि वि लष्मति सो छ, परिणामपचएण सजम लन्भइ ति काउ । निरय विरिय-मणुयाउसवकम्मिगो नियमा सजमायो परिषडइ । 'दो चउमुनि मणुयाण वधपुबमगो देवाउयब- धुत्तरमगो य एए दो वि अपुरकरणाइ जाव उपसंतकसाओ ताव लन्मति, कह ? मण्णइ-एए देवाउग न वधति चि, देवाउग पषिता वि उपसमसेटिं पडिजति ति काउ । बदाउगो खवगसेटिं न पडिवजइ । 'तीमु एक ति मणुयाण वषपुनर्ममा खीणकसाय सोगिकेवलि-अजोगिकेवलीण य एको चेच सेसा नस्थि ॥४॥ वेयणिया ऽऽउग-गोयाणि मणियाणि । 'मोह पर वोच्छ' इयाणि मोहणीय मण्णा ॥४०।- गुणठाणगेसु अट्ठसु, एगेग मोहवघठाण तु । पचाऽनियटिठाणे, वधोवरमो पर तत्तो ॥४१॥ गुणठाणगेसु० गाहा । 'गुणट्ठाणगेसु अट्ठमु चि मिच्छाइ अपुष्करणतेसु अट्ठसु गुणहाणेमु एकेक मोइणिजस्म वध- द्वाण । मिच्छद्दिद्विस्स चाचीमा, सासणस्स एकवीमा, सम्मामिच्छहिट्ठि अविस्यसम्मद्दिहिस्स य सनरस, देसविरयस्स तेरस, पमत्त अपमच अपुषाण नव । एए सबे घषट्ठाणा जहा हेडा समेया मविगप्पा चेन एत्थ वि तहा चेव, नवरि अपमत्त अपुराण एफको चेव भगो, अरविशोकरहितत्वात् । 'पचानियट्टिठाणे ति अनियट्टिठाणे पच वडाणाणि, त०-५।४।३।२। १ । अविगप्पा चेव । 'यधोवरमो पर तत्तो' ति तओ पर बधो नत्थि, अनियडीओ उमरि मोहणिजस्स पधो नत्थि, वाय रकसाओदयामावाओ सुहुमराग-उवसतेसु ॥४१॥ मणियाणि वषट्ठाणाणि । इयाणि उदओ मण्णइ- सत्ताइ दस उ मिच्छे, सासायण-मीसए णवुक्कोसा। छाई णव उ अविरए, देसे पंचाइ अद्वैव ॥४२॥ विरए खओवसमिए, चउराई सत्त छ च्चऽपुवम्मि।अणियट्टिबायरे पुण, एको व दुवे व उदयंसा ॥४३॥ एगं सुहुमसरागो, वेएइ अवेयगा भवे सेसा । भंगाणं च पमाणं, पुबुद्दिण नायवं ॥ ४४ ॥ सत्ताइ दस उ मिच्छे०तिण्णि गाहाओ । मिच्छद्दिहिस्स सत्ताइ-दसंताणि चत्तारि उदयट्ठाणाणि, जहा बावीसबंधगस्स तहा चेव । 'सासायणमीसए नवुक्कोस' ति सासायण-सम्मामिच्छद्दिट्ठीणं पत्तेयं पत्तेयं सत्ताइ-नवंताणि तिण्णि तिण्णि उदय- ट्ठाणाणि, सासणस्स जहा एकवीसबंधगस्स, जाणि हेतुओ सत्तरसबंधगस्स सम्मामिच्छत्तेण सत्ताइ-नवंताणि ताणि चेव सम्मा- मिच्छदिहिस्स सभेयाणि । 'छाई नव उ अविरए' त्ति असंजयसम्मद्दिहिस्स छाई नवंताणि चत्तारि उदयट्ठाणाणि, जहा हेट्ठा वेयग-उवसम-खड्गसम्मत्तेण समं सत्तरसबंधगस्स भणियाणि ताणि चेव असंजयसम्मद्दिहिस्स सभेयाणि भाणिय- वाणि । 'देसे पंचाइ अटेव' त्ति देसविरयस्स पंचाइ-अटुंताणि चत्तारि उदयहाणाणि, जहा हेट्ठा तेरसबंधगस्स उदयट्ठाणाणि ताणि चेव ।। ४२ ।। 'विरए खओवसमिए चउराई सत्त' त्ति जे सभावसंजया सेढीए हेट्टओ वट्टमाणा ते खओवसमियविरया वुच्चंति । के ते ? भणइ---पमत्ताऽपमत्ता य । तेसिं दोण्हं चउराइ-सत्तगंताणि चत्तारि उदयहाणाणि । ते जहा सामण्णेणं नवविहबंधगस्स भणिया ते चेव दोण्ह वि सरिसा । 'छच्चऽपुवम्मि' ति अपुवकरणस्स चउराइ-छकंताणि तिण्णि उदयट्ठाणाणि, तं०-४ ।

५।६। तत्य पचारि चउण्ह सजलणाणमेगपरं, तिह वैयाणमेगयर, दोण्ह जुपलाणमेगयेर ति । एत्थ एका चउदीमा 1ते चेष भयेण वा दुगुच्छाए वा सह पच भवति । एत्य दो चेव चउवीसाओ । वम्मि चैव दोण्ह नि छुटे छलोदओ । एत्थ कि एका चउवीसा ।' अणियहि पायरे पुण एको व दुवे व उदयस 'ति अणिपट्टिस्म दुगोदओ एकोदओ व ति दो उदयट्ठा पाणि । तत्थ दुमोदओ जहा हेडा पचविहरषग पड्डच्च भणिओ तहा चेव । एत्य वारस भगा । एत्थ एकेकोदयमेया जे पउदिह विविह-दुविह एगविहषधगे पड्डुच मणिया एत्थ वि ते चेव, नत्ररि एकोदओ ति काउ मामपणेण चत्तारि भगा ॥४३॥ 'एग सुहुमसरागो वैदेइ पनि एक लोमस्स सुकुमकिदि सुहुमसपराओ वेदवि, तेणेर सुद्धमसपराओ वुबइ । एत्थ एको चेव मगो । एव एकोदयविगप्पा सन्चे पच । 'अवेयगा भवे सेम' ति उमरिल्ला सद्दे मोहणिजस्म अवेयगा । 'भगाण च एमाण पुबुद्दिष्टेण णायब 'ति जे भगविगप्पा तेमि पमाण हेहओ भणियविहिणा भाणियब ।। ४४॥ इदाणि सामण्णेण दमोदयाइसु मिच्छाइगे पड्डुच्छ सहचउचीममेयनिरूवणत्या इमा गाहा- एक छडेक्कारेकारसेव एकारसेव व तिन्नि । एए चउवीसगया, वार दुगे पच एकम्मि ॥ ४५ ॥ एक छडेकारे० गाहा । दसोदए मिच्छद्दिष्टुिं पहुच एका चबासा, भगुहारण जहा हेहा । णोदए मिच्छदिहिस्स चउ- वीसाओ तिष्णि, सासण-सम्मामिच्छ-असजयमम्मदिहि पडुच्च एकेका । मबाओ नि नोदए छ । अट्ठोढए मिच्छदिहिस्स विष्णि, सासण सम्ममिच्छदिट्ठीण दो दो, असजयस्स तिष्णि, सजयासजय पडुच्च एका चउदीमा । एउमट्ठोदए सबाओ गि १२ । ए स ॥ २ अति । तस्थ प कौर ॥ ३ ये सो' ति रा ॥ ४ ठाण म कार ॥

एकारस । सत्तोदए मिच्छदिद्वि-सासण-सम्मामिच्छद्दिट्ठीणं पत्तेयं पत्तेयं एकेका, असंजय-संजयासंजयं पडुच्च तिण्णि तिण्णि, पमत्ता-ऽपमत्तसंजयाणं एकेका । सबाओ वि सत्तोदए एकारस । छलोदए असंजयसम्मदिहिस्स एका, संजयासंजय-पमत्ता- ऽपमत्तसंजयाणं पत्तेयं पचेयं तिण्णि तिण्णि, अपुवकरणं पडुच्च एका । सबाओ वि छलोदए एक्कारस । पंचोदए संजयासं- जयस्स एक्का, पमत्ता[-ऽपमत्ता]ण पत्तेयं पत्तेयं तिण्णि तिण्णि, अपुवकरणं पड्डुच्च दो । सबाओ वि पंचोदए नव । चउरो- दए पमत्ताऽपमत्त-अपुवकरणं पडुच्च पत्तेयं पत्तेयं एकेका । सवाओ वि चउरोदए तिण्णि । 'बार दुगे' त्ति अणियट्टि पडुच्च दुगोदए बारस भंगा वेयतिग-संजलचउक्केहि उद्वेति । 'पंच एकम्मि' ति एकोदए अनियट्टि पडुच्च चत्तारि विगप्पा, सुहुम- रागं पड्डुच्च एको, सो य सुहुमकिट्टि वेएइ ॥ ४५ ॥ एएसिं उदयविगप्पपयवदनिरूवणत्थं अन्तर्भाष्यगाथा-- बारसपणसहसया १२६५, उदयविगप्पेहि मोहिया जीवा । चुलसीतीसत्तत्तरि ८४७७ पर्यवंदसएहिं विण्णेया ॥ ५ ॥ एएसि उपायणा--सबाओ चउवीसाओ एगत्थ मेलयित्तु एकेकम्मि चउवीसं भंगा अत्थि ति चउचीसेहिं गुणिजंति दुगोदयविगप्पा बारस, एगोदयविगप्पा पंच, एए वि सवे छुब्भति । छुढे उदयविगप्पा भवंति । उदयविगप्पो नाम जावइ- याओ पगडीओ जुगवं उइजति तासिं समुदओ उदयविगप्पो भण्णइ । दसोदयातिविगप्पा जाव चउरोदओ ते अप्पप्पणो । विगप्पेहि गुणेत्तु मेलवित्तु एकेकम्मि उ चउवीसं भंगा संति ति चयुवीसेहिं गुणिजंति, दुगोदयविगप्पा दोहिं गुणिजंति, एको- १ स्वस्तिकयुगलमध्यग पाठ कारप्रतावेव ॥ २ ° यविद खे२ से३ ॥ ३ लवित्त का२ ॥ RA ५।६। तस्थ चचारि चउण्ड सजलणाणमेगयर, तिण्ह वैयाणमेगपर, दोण्ह जुयलाणमेगयेर ति । एत्थ एका चउदीमा ते घेव मरेण वा दुगुच्छाए वा सह पच भवति । एत्य दो चेव चउचीमाओ । तम्मि चेव दोण्ह वि छूढे छलोदओ । एस्थ वि एका चउकीमा । अणिपट्टि बायरे पुण एको र दुवे व उदयम 'ति अणिपट्टिस्म दुगोदओ एकोदओ व ति दो उदयट्ठा पाणि । तत्थ दुगोदओ जहा हेडा पचविहपधग पडच भणिो तहा वेव । एत्य चारस भगा । एत्थ एकेकोदयमेया जे चाउविह तिविह दुविह एगविहबधगे पडच मणिया एत्य वि ते चेव, नवरि एकोदओ त्ति काउ सामण्णेण चत्वारि भगा॥४३|| 'एग सुकुमसरागो वैदेड 'चि एक लोभस्म सुहुमकिवि सुहुमसपराओ वेदेति, तेणेव सुहमसपराओ बुचा । एत्य एको चैव भगो। एवं एकोदयविगप्पा सच्चे पच । 'अवेयगा भवे सेम' ति उपरिल्ला सबे मोहणिजस्स अवेयगा । 'भगाण च यमरण पुब्बुदिदेश गायब 'ति जे भगविगप्पा तेसिं पमाण हेहो भणियपिहिणा भाणियच ।। ४४ ।। इदाणि सामण्णेण दसोदयाइस मिच्छाइगे पडुच सबचउचीममेयनिरूपणत्या इमा गाहा- एक छडेकारेकारसेव एकारसेव णव तिनि । एए चउवीसगया, वार दुगे पच एकम्मि ॥ ४५ ॥ एक छडेकारे० गाहा । दसोदए मिच्छद्दिष्टि पडुच एका घउनीसा, भगुडावण जहा हट्ठा । णमोदए मिच्छहिद्विस्स चउ- वीसाओ तिष्णि, सासण-सम्मामिच्छ असजयसम्मदिहि पडुच्च एकेका । सबाओ वि नवोदए छ । अट्ठोदए मिच्छदिद्विस्स तिणि, सासण सम्ममिच्छट्टिीण दो दो, असजयस्स तिष्णि, सजयासजय पडुच्च एका चउड़ीसा । एवमट्ठोदए सबाओ नि १। प स ॥ २ शति । तत्थ प कार ॥ ३ चे सधे ति रा ॥ ४ द्वाण स कार ॥

एक्कारस । सत्तोदए मिच्छद्दिट्ठि-सासण-सम्मामिच्छद्दिट्ठीणं पत्तेयं पत्तेयं एकेका, असंजय-संजयासंजयं पडुच्च तिण्णि तिण्णि, पमत्ता-ऽपमत्तसंजयाणं एकेका । सबाओ वि सत्तोदए एक्कारस । छलोदए असंजयसम्मद्दिहिस्स एका, संजयासंजय-पमत्ता- ऽपमत्तसंजयाणं पत्तेयं पत्तेयं तिण्णि तिण्णि, अपुवकरणं पडुच्च एका । सबाओ वि छलोदए एक्कारस । पंचोदए संजयासं- जयस्स एक्का, पमत्ता[-ऽपमत्ता]ण पत्तेयं पत्तेयं तिण्णि तिण्णि, अपुवकरणं पडुच्च दो । सवाओ वि पंचोदए नव । चउरो- दए पमत्ता-ऽपमत्त-अपुवकरणं पडुच्च पत्तेयं पत्तेयं एकेका । सबाओ वि चउरोदए तिण्णि । 'बार दुर्गे' त्ति अणियट्टि पडुच्च दुगोदए बारस भंगा वेयतिग-संजलचउकेहिं उट्ठति । 'पंच एक्कम्मि' त्ति एक्कोदए अनियट्टि पडुच चत्तारि विगप्पा, सुहुम- रागं पडुच्च एको, सो य सुहुमकिट्टि वेएइ ॥ ४५ ॥ एएसिं उदयविगप्पपयवदनिरूवणत्थं अन्तर्भाष्यगाथा-- वारसपणसटुसया १२६५, उदयविगप्पेहिं मोहिया जीवा । चुलसीतीसत्तत्तरि ८४७७ पर्यवंदसएहिं विण्णेया ॥ ५ ॥ एएसिं उप्पायणा--सबाओ चउवीसाओ एगत्थ मेलयित्तु एकेक्कम्मि चउबीसं भंगा अस्थि त्ति चउवीसेहिं गुणिजंति; दुगोदयविगप्पा वारस, एगोदयविगप्पा पंच, एए वि सवे छुन्मति । छुढे उदयविगप्पा भवंति । उदयविगप्पो नाम जावइ- याओ पगडीओ जुगवं उइजंति तासिं समुदओ उदयविगप्पो भण्णइ । दसोदयातिविगप्पा जाव चउगेटओ ते अप्पप्पणो विगप्पेहिं गुणेत्तु मेलवित्तु एकेकम्मि उ चउवीसं भंगा संति ति चयुवीसेहिं गुणिजंति, दुगोदयविगप्पा दोहि गुणिजंति, एको- १ स्वस्तिकयुगलमध्यग पाठ कारप्रतावेव ॥ २ ' यविंद' रो२ से३ ॥ ३ लवित्तु का ॥

दपविगप्पा एकेण गुणेषु सर्वे मेलिया पयवदविगप्पा भवति । पयवदविगप्पो नाम उदयमज्झगयाण पगईण पत्तेयपगइगणणा पयवदविगप्पो । एव मिच्छहिडियादीण सामण्णेण भणिय ॥ ५॥ झ्याणि मिच्छदिद्वियाइयाण पत्तेय पत्तेय उदयविगप्पनिरूवणत्य अन्तर्माप्यगाथा- अट्ठग चउ चउ चउरष्टुगा य चउरो य हॉति चउवीसा । मिच्छाद अपुचता, पारस पणग घ अणियट्टे ॥६॥ मिच्छस्स अणताशवधिणा सह दसाइ-अट्ठगतेसु उदएसु चत्वारि चउवीसाओ लम्मति, अणताणुवषिणा विणा णवाइ-स तगतेसु उदएसु चत्वारि चउनीसाओ । सो अट्ट । सासणस्स चचारि । सम्मामिच्छदिद्विस्स चत्वारि । असजयसम्मद्दिहिस्स वेयगसम्मचेण नवाइ-सत्तर्गतेस चचारि चउवीसाओ, वेयगसम्मत्तेण विणा खड्गसम्मदिहिस्स वा उवसमसम्मदिहिस्स पा अट्ठाइ छलतेसु उदएसु चचारि चउबीसाओ । सबाओ वि अड। एष सजयासजयस्स वि अट्ठाइ-पचगतेसु उदएसु मावे'- दछ । एव सबाओ वि अह । पमत्ता ऽपमचसजयाण पि वेयगसम्मत्तेण सह विणा य सत्ताइ-चउरतेसु उदयट्ठाणेसु वि भावे पई । एकेकस्स अट्ठभट्ट । अधकरणस्स वेषगसम्मत्तेग विणा छलाइ-चउरतेसु चत्वारि चउबीमाओ लम्मति । दुगोदए अणि. यहिस्स बारस, एकोदर चैत्तारि सुहुमरागस्स एको ॥६॥ मिच्छाइ अपुरताणं जाओ चवीसाओ अप्पप्पणो पयवदेहिं गुणिए पचेय पचय एयाणि आगयफलाणि हवति- १"यन्च । रि ॥ २-३ भगा* सटिप्पनकम् ॥ ४ भगों" मटिप्पनकम् ।

'अट्ठट्ठी यत्तीसं, वत्तीसं सट्टिमेव बावण्णा । चोयोल चोयालं, वीसा वि य मिच्छमाईसु ॥ ७ ॥ सामण्ण-विसेसेण उदयविगप्पा उदयपया य भणिया । इयाणि जोगाइएहिं ते चेव गुणिजति त्ति- जोगोवओग-लेसाइएहिं गुणिया हवंति कायवा ।जे जत्थ गुणट्ठाणेसु होति ते तत्थगुणकारा॥४६॥ जोगोओगलेसाइएहिं० गाहा । 'जोगोवओगलेसाइएहिं ' ति मिच्छद्दिठ्ठीपभिइसु जे जोगादओ तेहिं तेसिं उदयदंडा उदयपया य गुणेयहा, 'जे जत्थ गुणट्ठाणेसु भवंति ' त्ति जेसु गुणट्ठाणेसु जत्तिया जोगादओ भवंति ' तइ तत्थ गुणकारो' त्ति तम्मि गुणट्ठाणे तत्तिया गुणकारभेया भवंति ति भणियं । मिच्छाइ-अपुवंताणं उदयविगप्पसमासबावण्णं चउवीसाए तिवे- यसंभवाए गुणेऊणं, मणजोगा चत्तारि वइजोगा चत्तारि ओरालियकायजोगो एएहिं नवहिं जोएहिं गुणिजंति, सवेसि साम- ण्णं ति काउं । जे बारस दुगोदया जे य पंच एक्कोदयविगप्पा एए सद्दे वि सत्तरस, ते णवहिं गुणित्तु पुखरासिम्मि पक्खिव । वेउवियकाओगिमिच्छद्दिद्विस्स अट्ठ वि उदयविगप्पा । वेउवियमीस-ओरालियमीस कम्मइगकायजोगीणं पत्तेयं पत्तेयं चत्तारि १ गाथेयं चूर्णिकृताऽन्तर्भाष्यगाथात्वेनाऽनिर्दिष्टाऽपि तत्रोदयपदप्ररूपणार्थमियमन्तर्भाष्यगाथा--अट्ठी बत्तीस० इति सप्ततिका- टीकागतश्रीमलयगिरिनिर्देशप्रामाण्यादन्तर्भाष्यगाथातया संस्थापिता ॥ २ °याल दोसु वीसा, मिच्छामाईसु सामन्न ॥ ७ ॥ खे२ खे३।। मिच्छद्दिहिस्स जाणि सत्ताइ उदयट्ठाणाणि ७ । ८ । ९ । १० तेसु पत्तेयं पत्तेय जाओ चउव्वीसाओ ताओ सवाओ पत्तेय पत्तय उदयठाणेहि गुणिज्जन्ति । सत्तोदयचउवीसा सत्तहि गुणिया सत्त चेव ता हुति । एव सेसेसु वि । सन्चे मिच्छद्दिहिस्स ६८ । एव सैसेसु गुणहाणेसु भावेयव्वं ।" सटिप्पनकम् ॥ ४णे हवंति खेर खे३ ।। ३ १ 3 3 १ . H चचारि । एएस अगतायुवक्षिणा विणा उदया ण लम्मति, किं कारण १ वेदगसम्महिट्ठी अणताणुषधिणो विसजोगेतु पुणो जइ मिच्छत्त पडिवजह, जहण्येण अंतीमहत्तावसेसाउगो मिच्छत्त पडिवसइ, मिच्छच पडिवपणो अणताणुवधिको नियमओ वषद, बचावलियाइय पवेएइ ति, तम्हा उप्पण्णम वा अतरगईए का बढमाणस्म अणताशुषधिरहिया उदया न लम्भति । सासणस्स वेउछियकाओगि ओरालियमिस्स-कम्मइयकायजोगीण पत्तय पत्तेय चत्तारि चत्तारि । मम्मामिच्छहिडिम्म वेउधि यकापजोगिम चचारि । असजयसम्मबिडिस्म वैउबियकायजोगिस्म अट्ठ । एए सन्चे चोयाल भरइ ति । तिवेयगेसु एए सवे उन्मति ति चउवीसाए गुणेतु पुखरासिम्मि पक्खिव । सामणस्स वेउवियमीमस्म चत्तारि । एत्थ नपुसगवेओ न लब्मइ, कह ? उहिपमिस्मकाओगिर नपुमगवेयगेसु सासणो न उप्पसह ति काउ ! असजयस घेउनियमीमस्म कम्मइगकायजो मिस्स य पचेय पचेय अहह । एत्थ इरिथचेदोन लन्मइ, कह ? इस्थिवेयगेसुन उववजह ति काउ । सामान्य प्रतीत्येद, | सदावर्याद दोज इथिवेदेसु । वैयगसम्मत्तेण विणा नपुमगवेदेण जे उदया चत्तारि ते रहगे पडच लम्मति । ते य खइ । यसम्मदिविणो देयमस्स वा दिद्विदुगखविपस्स आहारकाओगि आहारमिस्सकायजोगिस्म पत्तय पत्तेय अऽट्ट। एएसु दो चेदा लग्मति । कह ' इत्थी ऍवधरी वेउवियलद्धिसहिया नस्थिति काउ । एए चउप्पगारा वि मेलिया छत्तीस भवति । दुवेयजुय त्ति काल सोलसेहिं गुणितु पुखरासिम्मि पक्खिव । असजयसम्मदिद्विस्म ओरालियमिस्सकायोगिस्स अहूँ । एत्थ इथि नसमवेया न लन्मति । कह ? मस्सेसु सम्मदिट्टी इथि नपुसगेसुन उववाह ति प्राचुर्यवचनम्, फादाचिरका १ जोएतु कार ॥ २ धावलियातीतामनन्तानुबधीन् प्रवषयत इति ॥ ३ पूर्वज्ञानधारिणी ॥ ४ छ । इस्थि° कात ॥

भवति । एगवेयजुय त्ति अट्टहिं गुणेत्तु पुवरासिम्मि पक्खिव । पक्खित्ते आगयं' १३०८१ । ईयाणि जोगपयट्ठाणाणि-मिच्छाइ-अपुवंताणं उदयपयविगप्पा " अठ्ठीबत्तीस" ( अन्तर्भाष्यगाथा ७)त्ति गाहाए भणिया । मिच्छाइ-अपुवंताणं उदयपयविगप्पाणं ३५२ चउवीसाए गुणित्तु, नवहिं जोगेहिं गुणित्तु; बारस दोहि पएहिं गुणे- ऊण, एकोदया पंच तेहिं सहिया २९ नवहिं जोएहिं गुणेऊणं पुखरासिम्मि पक्खिन । वेउत्वियकायजोगिस्स मिच्छद्दिहिस्स अट्ठी । वेउवियमिस्स-ओरालियमिस्स-कम्मइगकायजोगीणं पत्तेयं पत्तेयं छत्तीसं छत्तीसं अणंताणुवंधिणा सह उदया, कारणं पुन्वुत्तं । सासणस्स वेउवियकायजोगि-ओरालियमिस्स-कम्मइगकायजोगीणं पत्तेयं पत्तेयं वत्तीसं वत्तीसं । सम्मामि- च्छद्दिहिस्स वेउब्वियकायजोगिस्स बत्तीसं । असंजयवेउब्वियकायजोगिस्स सट्ठी । एए सवे मेलिया ३६४ चउबीसेहिं गुणित्तु पुवरासिम्मि पक्खिव । सासणस्स वेउत्वियमिस्सस्स ३२ । एत्थ नपुंसगवेओ नत्थि, कारणं पुवुत्तं । असंजयस्स वेउवियमी. सस्स कम्मइगकायजोगिस्स य पत्तेयं पत्तेयं सहि सहि । एत्थ इत्थिवेदो नत्थि, कारणं भणियं । आहारगिस्स आहारगमि- स्सस्स य पत्तेयं पत्तेयं चोयालं चोयालं, एत्थ इत्थिवेओ नत्थि, कारणं पूर्ववत् । एए तिप्पगारा वि २४० । एए दुवेयजुय त्ति काउं दुवेयसंभवेहिं सोलसहिं गुणितु पुखरासिम्मि पक्खिर । असंजयस्स ओरालियकायमीसजोगिस्स सट्ठी । एत्थ इत्थि- १ टीकाया योगगुणकारे विकल्पाना सर्वाग्रम् १४१६९ अस्ति, दृश्यता कर्मग्रन्थद्वितीयविभागपृ. २१७ । श्रीजीवविजयस्तु स्तबुकार्थे १४२९७ भन्ना आदता अवलोकयन्तु कर्मग्रन्थसार्थद्वितीयविभागपृ. २७२ ॥ २ इयाणिं इति पाठ सप्रती नास्ति ॥ ३ रगकायजोगिस्स का१ का२ ॥ । " I 2 नपुसगवेया नत्थि, कारण पूर्ववत् । एए एगवेयजय ति काउ पुरिमवेयसमवेहिं अट्ठहिं गुणेनु पुवरासिम्मि पक्खित्ते आगर्य ८९३४९ बोगपय । इदाणि उवओगे पह उवओगडडया उवओगपया य मण्णति-मिच्छहिट्ठी सासायणाण पत्तेय पत्तेय पच पच उस ओगा। सम्मामिच्छरिडीयाइयाण तिण्ह छ छ उपओगा। पमत्ताइ सुकुमवाण पचन्ह सन सत्त उवओगा मिच्छाइ-अपुछ- ताण सँगसगउदयहाणविगप्पा सगसगउवओगेहि गुणेऊण, मवपिंड ३२० चउहीसेहिं तिवेयसमवेहि गुणेतु, दुगोदय एगो- दयविगप्पा सचरस सतुवओगेहिं गुणेऊण तेसु वेव पक्खित्तसु आग ७७९९ । ईयाणि उवओगपय सिं चेव मिच्छाइ अपुछताण मगसगउदपट्ठाणविगप्पा मगमगउदयपएहिं गुणेऊण सगसगउव ओगेहिं गुणेनु सब सपिंडेत्तु २१२० चउवीसेहिं विवेयसमवेहिं गुणेजा । दुगोदय एगोदयविगप्पा एगणतीसा मतुवओगेहि गुणेऊण तेसि घेव पक्खिचे आगय ५१०८३ उवओगपया। । 2 १ पुग्युत्त । एए कां ॥ २ टीकाया योगपगुणनायम् ५५७१७ अस्ति यता कर्मप्र पदितीयविभागप० २१९ । श्रीजीपविज यावस्तबुका ९७६७७ योगपदानि, निरीक्ष्यतो कमप्रन्यसाद्वितीयविभागपृ. २७४ ॥ ३ अट्ठाइ चटरता उदयविगप्पा ते मिच्छाइयणट्ठाणेसु पत्तय पत्तेय जे उबओगा मणिया तेहिं अट्ठाइ-चउरता सम्वे वि गुणिज्जन्ति । मटिप्पनकम् ॥४ मता तरेण सप्तसप्ततिशतानि युतराणि । उक च-उदयावओगेर्मु सगसपरिसया तिउत्तरा हाति ७७३ । ) इतिग्रोमलयगिरिपादा । एताविधानज्ञानार्थ इरमा कर्म प्रत्याद्वितीयविभागष्ट २९ ॥५श्याणि इति पाठ सप्रती नास्ति ।। ६ मतान्तरेण पुन पञ्चाशत् सहसमणि प्रीणि शतानि पञ्चदशोत्तरामि इयाणि लेसं पइ-मिच्छाइ जात्र असंजयमम्मद्दिट्टि ति ताव छ ६ लेसाउ । उवरिमतिगाणं तिणि लेसाओ । एत्तो परंतु एका चैव सुफलेमा । मिच्छाइ-अपुवंताणं सगसगउदयट्ठाणविगप्पा सगसगलेसार्हि गुणेऊणं सवं पिंडियं काउं २२० चउवीसेहि तिवेयसंभवेहिं गुणेऊण, दुगोदय-एगोदय० सत्तरस एकाए लेसाए गुणेत्तु तेसु चेव पक्खित्तेसु आगयं ५२९७ लेसादंडं । तेसिं चेत्र मिच्छाइ-अपुवंताणं सगसगउदयट्ठाणविगप्पा सगसगउदयपयविगप्पेहिं गुणेऊण सगसगलेसाहिं य गुणेऊणं संपिडिए १५९२ चउवीसेहिं तिवेयसंभवेहिं गुणेऊण, उवरिमएगूणतीसं एकाए सुक्कलेसाए गुणेतु पुवरामिम्मि पक्खित्ते आगयं ३८२३७ लेसापयं ॥ ४६॥ सामण्णेणुदया भणिया । इदाणं संत भण्णइ- तिन्नेगे एगेगं, तिग मीसे पंच चउसु नियहिए तिन्नि । एकार बायरैम्मी, सुहुमे चउ तिन्नि उवसंते ॥ ४७ ॥ तिण्णेगे एगेगं० गाहा । मिच्छद्दिहिस्स तिणि संतढाणाणि, तं०-२८ । २७ । २६ । एएसि भावणा जहा बावीस- ५०३१५ । उक्त च-पन्नास च सहस्सा, तिन्नि सया चेव पन्नारा ५०३१५ ॥ ( )" इति श्रीमलयगिरिमहर्षय सङ्ख्याविधिजिज्ञासुभिर्द्रष्टव्यं कर्मग्रन्थद्वितीयविभागे २२० तम पृष्ठम् ॥ १ लेसार इति पाठ. संप्रती नास्ति ॥ २ सु तिगऽपुग्वे । ए खे३ । अयमेव पाठ शोभन , पर चूर्णिकारैः टीकाकृद्भिव नियट्टीए तिनि इति पाठो विवृत्त इति नाहतोऽयं समीचीनोऽपि पाठो मूले ॥ ३ 'रम्मि अ, सुखे२ ॥ ४ तं जहा-२८ । कार ॥ । एतद्भग- पधगस्स । ' एकक' ति सासणस्स एक सत अट्ठावीसा। एयस्स मावणा जहा एकवीसवधगस्म । 'तिग मिस्से 'ति मम्मा- मिच्छदिहिस्स तिष्णि सट्ठाणाणि २८॥ २७ २४॥ मावणा जहा सम्मामिच्छद्दिहिस्म मत्तरसवधगस्म । 'पच चउसु 'नि असंजयसम्महिडि-सजयासजय पमत्ता-ऽपमत्तेसु एएसु चउसु पच पच सट्ठाणाणि, त०-२८ । २४ । २३ । २२ । २१ । एएसिं मावणा बहा सत्तरस तेरस-नवविषयगाण । 'नियहिए निम्णि' ति अपुधारणम्मि तिणि सत्तट्ठाणाणि, त०- २८ । २४ । २१ । अट्ठावीस चउवीसा उबसममम्मदिहि पडुच्च उरममसेवीए लन्मइ । एकवीमा दोसु वि सेढीसु, पदाउगो खहगमम्महिटी उपसमसेदीए लब्मा ति काउ ।' एकारस वायरम्मि 'चि यायरो-अणियट्टी तम्मि एकारम सतहापाणि, त जहा-२८।२४।२१ । १३ । १२।११।५।४।३।२।१। अनीसा चउवीसा य उरसमसेदीए । एकवीमा दोसु वि सेढीसु, खवगसेटीए जाप अट्ट कसाया ण सीणा ताव लम्मद । सीणेसु तरम भवति । तओ नपुसगवेए खीणे पारस । तओ इथिए खीणे एकारस । छष्णोकसाए खीणे पच । पुरिसवेए खीणे चत्तारि । कोहसनलणाए खीणाए तिण्णि माणसजलणाएं बीणाए दो । मायासबलणाएं सीमाए एक कह १ भण्णइ-मायासजलणाए खवियाए तओ अतोमहु- तेण लोहम्स किट्टीओ काऊण पन्छा विणासिजति ति काऊण । 'सुद्धमे उ ति सुकुमसपराइमम्मि चत्वारि सतढाणाणि, त०-२८ । २४ । २१ | १ | अट्ठावीस-चवीस एकवीसाओ उवसमसेटीए उवसम खड्गसम्महिट्ठीण । एक खगसेटीए 'ति का का२ ५ २ जहा-२८ । श्रीकांत ३ मदिसि ॥ ४-५ ५ बवियाए, कार ॥ ६'चत्तारि' तिस का२॥

भवइ लोभसंजलणाए । 'तिणि उवसंते 'त्ति उवसंतकसायम्मि तिणि संतवाणाणि, तं जहा-२८ । २४ । २१ । उवसम- सम्मदिहि-खइगसम्मदिद्विणो पडुच्च । सामण्णेणं संताणि भणियाणि । इयाणिं कइ बंधंतो वेएइ कइ कइ वा पगइसंतढाणाणि ? मिच्छद्दिहिस्स बावीसं बंधमाणस्स दसाइ-अलुतेसु उदएसु तिण्णि तिण्णि संतवाणाणि । सत्तोदए एकं । जत्थ जत्थ अणंताणु- बंधिणा विणा उदओ तत्थ तत्थ एकं संतं अट्ठावीसा, कारणं पुव्वुत्तं । सत्वे संता दस । सासणस्स जहा एकवीसबंधगस्स तहा । सवाणि तिणि संताणि । सम्मामिच्छदिहिस्स जहा सत्तरसबंधगस्स सम्मामिच्छद्दिहिस्स भावणा तहा । सवाणि नव संताणि । असंजयसम्मद्दिष्टि-संजयासंजय-पमत्ता-ऽपमत्तसंजयाणं पत्तेयं पत्तेयं सत्तरस सत्तरस संताणि । जहा सत्तरसबंध- गस्स असंजयसम्मदिद्विस्स भावणा तहा भाणिया । अपुवकरणस्स तिसु वि उदयट्ठाणेसु पत्तेयं पत्तेयं तिण्णि तिण्णि संतवा- णाणि । सवाणि नव । अणियट्टिस्स दुगोदए पंचविहबंधगस्स छ संतवाणाणि, तं०-२८ । २४ । २१ । १३ । १२।११। चउविहबंधगस्स एकोदए छ संतढाणाणि, तं०-२८ । २४ । २१ । ११ । ५।४ । एएसिं भावणा जहा चउविहवंधे । सबाणि वि छ संतट्ठाणाणि । तिविह-दुविह-एगविहबंधगाणं पत्तेयं पत्तेयं पंच पंच संतहाणाणि । जहा हेट्ठा ओघबंधे भणियं तहा चेव । सबसमुदओ सत्तावीसं । ' सुहुमे चउ तिण्णि उवसंते ' ति अबंधगस्स सुहुमसंपरागस्स एक्कोदए वट्टमाणस्स ताणि चेव चत्तारि संतहाणाणि । उवसंतकसायस्स अबंधगस्स अवेयगस्स तिण्णि संतवाणाणि-२८ । २४ । २१ । एवं मोहणिजस्स संवेहो समत्तो ॥४७॥ १ क । तं जत्थ का१ ॥

2 इयाणि गुणहाणेसु नामस्स संवेहो बधाईण मण्णइ- छ नव छक्क तिग सत्त दुग दुग तिग दुग ति अट्ट चउ । दुग छक्क चऊ दुग पण, चउ चउ दुग चउ घेणेग चऊ ॥४८॥ एगेगमट्ठ एगेगमट्ठ छउमत्थ-केवलिजिणाण । ऐग चऊ एग चऊ, अट्ट चउ दु छक्कमुदयसा ॥४९॥ छण्णव छ ति गाहा । [एगेगम?० गाहा ] मिच्छद्दिहिस्स सामण्णण छब्बघडाणाणि, त०-२३ । २५ । २६ । २८१२९| ३. तेवीसा एगिदियअपजचगपाउग्ण चउविगप्प [चघमाणस्स ] जहा हेडओ भणिय नहा चेव । पशुवीस जहा एगिदियपअचग-चे० ते-चपचिदियतिरिय मणुयअपजचगाण पाउग्ग बघमाणस्म तहा चेव । छबीमा जहा एगि दियपजत्तगपाउग्ग आयायुञ्जोएगयरसहिय पधमाणस्म । अट्ठावीसा देव-नेरइगपाओग्ग बघमाणस्म । एए सो सविगप्पा वहा चेव । एगणतीसा वित्यगरमहिय देवगइपाओग्ग बघ मोनूण सेमा मझे, वित्थगरसधो सम्मत्तपञ्चइओ ति नस्थि । सेसा सबविगप्पा ९२४० । तीसा वि तित्यगरसहिप मणुयगइपाओग्ग वध, आहारगसहिय देवगइपाओग्ग घ भोत्तूण, कह । जहकम सम्मच सजमपबहआओ नस्थि । सेसा सविगप्पा सो ४६३२ ।। १छवचऊ से२ ॥ २ पण एग च । पणगेग व सैर ॥ ३ एण चउ पण चउ, अ० पेर । एग चड प० खे३ ॥ ४ वसहि स । क. प्रतिस्तु सण्डिता ॥ ५ व्वे विग स । कां प्रति गरिन् ।

'चउ पणुवीसा सोलस, नव चत्ताला सया य वाणउई । वत्तीसुत्तरछायालसया मिच्छस्स बंधविही ॥ ८ ॥ मिच्छदिहिस्स नव उदयट्ठाणाणि-२१ । २४ । २५ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१ । एत्थ एकवीसाई सदो- दयविगप्पा आहारगसंजय७ वेउवियसंजय३ केवलिट उदए मोत्तूण मिच्छद्दिहिस्स सेसा सवे घेत्तवा जहा हेढओ। जाया मिच्छद्दिहिस्स सव्वुदया ७७७३ ।। इयाणि मिच्छदिहिस्स छ संतठाणाणि, तं०-९२ । ८९।८८।८६। ८०। ७८ । तत्थ बाणउई चउगइगमिच्छद्दिहिगे पडुच्च । एगणनउई वेयगसम्मदिठ्ठी वित्थगरनामबंधगो मिच्छत्तं गओ नरएसु उवजिउकामो तं पडुच्च नेरइएसु उववण्णस्स अंतोमुहुत्तं लब्भइ । अण्णेसु नत्थि । अट्ठासीई चउगइगे मिच्छद्दिट्ठिणो पड्डुच्च । छासीई असीई य एगिदिएसु देवगइ-निरय- गइपाउग्गे य उबलिए लब्भइ । तओ उच्चट्टियाणं विगलिदिएसु उववण्णाणं पि लब्भइ। पंचेंदियतिरिय-मणुएसु वि उववण्णाणं जाव सबपज्जत्तीभावं न गच्छंति ताव लभंति । पजत्तिभावे गए वि अंतोमुहुत्तं जाव निरय-देवगइपाउग्गं न बंधंति तात्र लम्भंति । अट्ठसत्तरी तेउ-वाउजीवेहि मणुयगइउबलिए पडुच्च लन्मइ । तओ उपट्टियाणं विगलिंदिय-पंचिंदियतिरिक्खेसु उववण्णाणं अंतोमुहुत्तकालं जाव मणुयगई न बंधइ ताव लब्भति । १ चूर्णिकृताऽन्तर्भाष्यगाथात्वेन नोलिसितापीय गाथा त्रयोविंशत्यादिषु च वन्धस्थानेषु यथासङ्ख्यं भन्नसल्यानिरूपणार्थमियमन्तर्भा- व्यगाथा-च" इति श्रीमन्मलयगिरीयटीकावचनप्रमाणेन प्रतिष्टितात्रान्तर्भाष्यगाथातयेति ॥ २ उया । व से१ ३ ॥ ३ 'सव्वसमुदओ " संटिप्पणी ॥ ४ चण्णिउका कार ॥ ५ इ । तिरि° स । का१ प्रतिस्तु खण्डिता ॥ ERA " १३९२६ एव सामण्णेण षधोदय सवाणि भणियाणि । इयाणि कद बघतो वेपइ कह वा से सताई'' ति एय भण्णइ-मिच्छ दिहिस्स तेवीस वषमाणस्म नव वि उदयट्ठाणाणि सविगप्पाणि समवति, नवरि २१ । २५। २७ । २८ । २९ । ३० उदएम जे देव-नेरइये पडून मगा ते सखे न समवति । कह । एगिदियअपजत्तगजाइ देवा न वधति, एगिदियबाइच नेरहपा न पति ति काउ । पच सतहाणाणि-९२ १८८1८६ । ८०१७८ । एत्थ मूलिल्लेसु चउसु उदयट्ठाणेसु पच पच संवढाणाणि । पशुवीस-छधीसोदयेमु तेउ-चाउकाइए पाच अट्ठसत्तरी लज्मइ, छबीसे विगलिंदिप पचिदियतिरिक्खे वा तेउ वाऊओ अणतरागए पडुच । २७ । २८ । २९ । ३०। ३१ एएसु पचसु चत्तारि चत्तारि सतढाणाणि अत्तरिवजाणि ७॥ कह । पजत्तगकाले वेउ वाउजीवे मोनूण सेसेसु न मवति ति सबोदए पडच तेवीसवधगस्स सतहाणाणि चत्तालीसा एव पणु वीस छवीसषधगाण पि । नवरि देवो वि अप्पणो सहोदएसुवट्टमाणोएगिदियपजनगपाउग्ग बघा तत्थ वायर पञ्जत्तय पत्तेय थिरा ऽथिरसुमा सुभ-द्मग अणाएज-जसा ऽजसेहि अट्ट भगा लन्मति, सेसा नसमवति कम्हा सुहुम साहारण अपजत्नगेसु देवो न उबवजह ति । सवमावणा तहेव, सो चत्तालीस । छबीसे पधे सववधविगप्पे देवी बधह, सतभावणा वहेच, सो ४०॥ अट्ठावीमवयमस्स मिच्छद्दिहिस्स दोणि उदया-३० ।३१ । तीसा पचिंदियतिरिय मणुए पडुच, एकतीसा पचिंदियति रिए पडुच्च । अट्ठावीसबधगस्स चचारि सतहाणाणि-९२ । ८९ । ८८।८६ । तत्थ तीसोदए चचारि वि । तत्थ एगण- जबुती तित्थगरनामवयमो वेयगसम्मदिट्टी मिच्छत्त पडिवण्णो निरयामिमुहो निरयपाउग्ग अट्ठावीस बघइ, त पडुच । १६। पय सा का प्रती पत्राभाव ॥२२ समय कराया प्रति सछिन्ता ॥३ व्वीस य स क ॥

सेसाणि संताणि तिरिय-मणुयाणं सामण्णाणि । एक्कतीसोदए एगणनवुतीवजाणि तिणि संताणि । कहं ? तित्थगरसंतं तिरि- एसु नत्थि ति । सवाणि सत्त । एगूणतीसं विगलिंदिय-तिरिय-मणुयपाउग्गं बंधमाणस्स नव वि उदयट्ठाणाणि, छ संतट्ठा- णाणि जहा छवीसबंधगस्स तहा भाणियई । नवरि नेरइगस्स मणुयगइपाउग्गं एगणतीसं बंधमाणस्त अप्पणएसु पंचसु उदयट्ठाणेसु एगूणनवुती लब्भइ, अण्णत्थ न । देव-नेरइगोदएसु ९२ । ८८ । मणुओदएसु ९२ । ८८ । ८६ । ८० । विग- लिंदिय-पंचिंदिओदएसु अप्पप्पणो मूलिल्लेसु दुसु पंच पंच, उवरिल्लेसु अत्तरिवजाणि चत्तारि । एगिदिओदएसु य अप्प- प्पणो मूलिल्लेसु चउसु पंच, सत्तावीसोदए अत्तरिवजाणि चत्तारि । सामण्णेणं एकवीसाइसु उदएसु संताणि ६ । ५। ६ । ५।५।५।५।४ । ४ । सवाणि वि मिच्छद्दिहिस्स संताणि पणयाला । तीसं विगलिंदिय-पंचिंदियतिरियपाउग्गं बंध- माणस्स एवं चेव, नवरि एगूणणवुती नत्थि । कहं ? एगणनउइसंतकम्मिगो तिरियगइपाओग्गं न बंधइ ति । सेसाणं भाव- णा जहा एगूणतीसबंधे । सामण्णेणं तीसबंधगस्स उदएसु जहक्कमेण संताणि ५।५।५।५।४ । ४ । ४ । ४। ४ । सवाणि चत्तालीसं। एवं मिच्छद्दिहिस्स बंधोदय-संताणं संवेहो भणिओ । इदाणिं सासणस्स बंधोदय-संताणि भण्णंति-'तिग सत्तग दुर्ग' ति तत्थ तिण्णि बंधट्ठाणाणि-२८ । २९ । ३० । अट्ठावीसा पंचिंदियतिरिय-मणुयाणं देवगइपाउग्गं बंधमाणाणं । एत्थ बंधविगप्पा अट्ठ थिरा-थिर-सुभा-ऽसुभ-जसा-ऽजसेहिं कायवा । एगूणतीसा एगिदिय-विगलिंदिय-पंचिंदियतिरिय-मणुय-देव- १ सु दुसु पं का ॥

नेरइयाण सासणाण पचिंदियतिरिय मणुयपाउग्म एगूणतीस वघमाणाण । एत्य उपविगप्पाण ६४०० । कह ? हुडसठाण छेवढवजाणि पच सठाण-सघयणाणि पसस्था-पसस्थविहायगइ थिरार सुभार सुमगर सुस्मर२ आएजर जसा जसेहि कायबा ३२०० तिरियगइपाउग्गेण । एयाणि एत्तियाणि चेव मणुयगइपाउग्गेण नि । विगुणिए मवपिंडो भवइ ६४०० । तीसा वेसिं चेव एगिदियाईण पचिंदियतिरियपाओग्ग उओक्सहिय तीस वधमाणाण । एत्य वधविगप्पा ३२०० । कह ? विगलिंदियपाउग्ग सासणो न बधइ ति । 'अट्ट य सय चोपडि, बत्तीस सया य सासणे मेया । भट्ठापीसाईसु, सब्वाणऽहिगछपणउइ ९६०८ ॥ ॥ सासणस्स सत्त उदयवाणाणि, त०-२१ । २४।२५। २६ । २९ । ३०।३१। तत्थ एकत्रीमा एगिदिय विग- लिदिय पचिंदियतिरिय-मणुय-देवे पहुच । नेरहगेसु मामणो न उपवाइ ति न गहिओ । एत्थ विगप्पा एगिदियघायरप- अचगेण जे भवति ते य दोणि । सुहुमेसु अपसत्तेसु य सामणो न उबबबइ नि तेण ण गहिया । विगलिंदिय पचिंदिय- तिरिय मणुएसु य पजतगेण जे विगप्पा ते सके समवति । ते य एगिदिय विगलाण पत्तेय पत्तेय दो दो, सेसाण अहट्ठ भगा । देवाण वि अह । सो वि पत्तीस । चउबीसोदए एगिदिएसु उववण्णमेत्तस्म एत्य विगप्पा वायर पजत्न-पत्तेग जसा- ऽजसेहिं दोण्णि, सेसा णव ण समवति, सासणो साहारण-सुहुम तेउ-चाउसु न उपवजइ नि । पणुवीसोदओ सासणस्म देवेसु १ अट्ठसय चो खेर । पूर्णिकृद्रिरतर्भाप्यगाथात्वेनानिर्दियाऽपीय गाया उकामासस्यानिरुपणामियमन्तर्भाग्यगाथा-भट्ठ इति श्रीमलयगिरीयटीकानिर्देशानुसारेण सस्थापिताऽत्रान्तर्भाग्यगाथातयेति । तया चेय गाया है। प्रतौ नास्ति ।

उववण्णमेत्तस्स । एत्थ भंगा अह । छच्चीसोदओ विगलिंदिय-पंचिंदियतिरिय-मणुएसु उववण्णमेत्तस्स आईए लब्भइ सासणो। एत्थ विगप्पा अपजत्तगोदयं मोत्तूण सेसा सवे संभवंति । सवसमुदओ ५८२ । सत्तावीस-अट्ठावीसोदया ण संभवंति । कम्हा? अंतमहत्ते गए एए दो वि उदया लब्मंति, सासणभावो आईए छडावलियमेत्ते किंचूणे लब्भह ति । एगूणतीसोदओ देव- नेरइयाण सट्ठाणगयाणं सम्मत्ताओ परिवडमाणाणं । एत्थ नव भंगा-नेरइगस्स एको, देवस्स अट्ठ, सो वि नव । तीसो- दओ तिरिय-मणुयाणं पढमसम्मत्तं उप्पाडेत्तु परिवडमाणाणं, देवस्स वा उत्तरवेउब्वियस्स । एत्थ विगप्पा तिरिय-मणुयाणं पत्तेयं पत्तेयं ११५२, देवस्स अट्ठ । सवाणि २३१२ । एकतीसोदओ पंचिंदियतिरियाणं सम्मत्ताओ परिवडमाणाणं एत्थ विगप्पा पंचिंदियतिरियाणं जे ते सवे संभवंति ११५२ । बत्तीस दोणि अट्ट य, बासीयसया य पंच णव उयया । बारऽहिगा तेवीसं, वावण्णेकारससया य ॥१०॥ सव्वसमुदओ ४०९७ ॥ सासणस्स दो संतवाणाणि-९२ । ८८ । कहं ? आहारगसरीरनामं बंधित्तु उवसमसेढीओ परिवडमाणो सासणभावं कोई गच्छइ त्ति तस्स बाणउई । अट्ठासीती चउगइयाणं सम्मत्ताओ परिवडमाणाणं लब्भइ । अण्णे भणंति-सासणस्स एकं संतं ति अट्ठासीई चेव । जे एवं भणंति ते उवसमसेढीओ परिवडमाणं अयाणंता भणंति । सामण्णेण बंधुदय संताणि भणियाणि । इदाणि संवेहो-अट्ठावीसबंधगस्स सासणस्स दो उदया-तीसा य एकतीसा १ किञ्चिदूने ॥ २ चूर्णिकारैरन्तर्भाष्यगाथात्वेनानुल्लिसिताऽपीय गाथा उक्तरूपाया एव भासद्ख्याया निरूपणार्थमियमन्त प्यगाथा- बत्तीस०" इत्याचार्यश्रीमलयगिरीयटीकावचनप्रामाण्यादुपस्थापिताऽत्रान्तर्भाष्यगाथातयेति ॥ ?

य। अपक्षचगकाले सासणो देवगइपाउगमन बघ नि सेसोदया न सभवति । तीसोदए दो सताणि-९२१८८ मणुए पडछ । तिरिए पडुन अट्ठासीती घेव । एकतीसोदए एक सत अट्ठासीई, उपसमसेनी तिरिक्खस्स नस्थिति काउ। एगू पतीस तिरिय मणुयपाओग्ग बधमाणस्म सच वि उदयट्ठाणाणि । एगिदिय विगलिंदिय पचिदियतिरिय मणुप देच नेइपाण अपप्पणो मणिोदए एक चेव सत्त अड्डासीती, नवारि मणुस्सस्स तीसोदए दो सताणि । एव तीमवधगस्म वि भावयव । एकचीसोदयाइसु सामण्णेण संताणि १।१।११।१।२।१। सवाणि अह । इयाणि सम्मामिच्छदिहिस्स बधाहाणा भण्णति--'दुग तिग दुग'ति । तत्थ दोणि पहाणाणि-२८ । २९ । अड्डात्रीसा तिरिय मशुयाण सम्मामिछदिवीण देवगहपाउग्ग बघमाणाण ! सेसगाहपाउम्गाणि मणुप तिरिया सम्मामिच्छदि द्विणो न पचति ति न समवति । एत्थ पविगप्पा अह। एगणतीसा देव नेरझ्याण मणुयगइपाउग्ण अघमाणाण, एस्थ गि दे चेव घिरा ऽधिर सुमाऽसुम जसा जसेहिं अट्ठ भगा, सेमाणि जुगलाणि पमस्थाणि चि ! सम्मामिच्छदिहिस्स विष्णि उदयढाणाणि-२९।३०।३१। एत्थ एगणतीसा देव नेरहगे पश्च, नत्र भगा ।वीसा पचिंदियतिरिय मणुये पहुच सविगप्पा सभवति । एकतीसा पचिन्दियतिरियाण सरिगणा सर्भवति । सम्मामिच्छहिडिम्स सबोदयविगप्पाण ३४१५। दो संवडाणाणि-९२१८८1 १ भवति । सुर्वेष्वाद । त्रिशदये मत्रा २३०४ ॥ २ भयति । सर्वापु प्रतिष । एत्रियदये विकल्पा ११५२ ॥

इदाणि 'कइ बंधतो वेएई 'त्ति-सम्मामिच्छद्दिहिस्स अट्ठवीसबंधगस्स दो उदयट्ठाणाणि ३० । ३१ । एकेकम्मि दो दो संताणि । एगूणतीसबंधगस्स एक उदयट्ठाणं एगूणतीसा । तम्मि दो वि संतट्ठाणाणि । सामण्णेणं एगूणतीसादिसु वि उदएसु संताणि जहकमेण २।२।२ । सवाणि छ । सम्मामिच्छदिद्विस्स बंधाईणि भणियाणि । इदाणिं असंजयसम्मदिहिस्स बंधाइट्ठाणा भण्णंति-'तिगऽट्ट चउ 'ति । तत्थ बंधट्ठाणाणि तिण्णि, तं०-२८ । २९ । ३० । अट्ठावीसा जहा सम्मामिच्छद्दिहिस्स तही । एगूणतीसा वि मणुयगइ- पाओग्गा तहेवें । तित्थगरसहिया देवगइपाउग्गा एगूणतीसा मणुयाणं भवइ । विगप्पा ते चेव अट्ठ। तिरिएसु तित्थगर- बंधो नत्थि ति न संभवइ । तीसा तित्थगरसहिया मणुयगइपाउग्गं बंधमाणाणं देव-नेरइयाणं लब्भइ। विगप्पा ते चेव अट्ठ। अट्ठ उदयट्ठाणाणि-२१ । २५ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१ । तत्थ एकवीसा नेरइय-तिरिय-मणुय-देवे पडुच्च । बद्धाउओ खइग-वेयगसम्मट्ठिी सबहिं उववजइ ति नेरइय-तिरिएसु वि लब्भइ । एत्थ विगप्पा अपजत्तोदयविग- प्पविवजिया सवे संभवंति । अपजत्तगेसु न उववज्जइ ति अपज्जत्तोदया न संभवंति । पणुवीस-सत्तावीसोदया देव-नेरइए वेउ- वियतिरिय-मणुए य पडुच्च, नेरइगो खड्ग-वेयगसम्मट्ठिी देवो तिविहसम्मदिट्ठी वि । उदयविगप्पा सवे वि । छबीसोदओ तिरिय-मणुयाणं । तिरियाण वेयग-खड़गसम्मट्ठिीणं बावीससंतकम्मिगं पडुच्च । एवं मणुयाण वि । उवसमसम्मद्दिट्ठी मणुएसु न उववजइ ति न गहिओं । अट्ठावीस-एगूणतीसा नेरइगाईणं सबेसि पि । भावना पूर्ववत् । तीसा तिरिय-मणुय-देवाणं । १ कई'त्ति कार ॥२ अत्राष्टाविंशतिबन्धे विकल्पा अष्टौ ॥ ३ अत्राप्यष्टौ भना ॥ ४ °णं खइग-वेयगस' का१ ॥ ५ °ओ । उदय एकत्तीसा तिरियाण | उदयविगप्पा सबेसि पि सो समवति । पत्तारि संतवाणाणि-९३ । ९२ । ८९ । ८८ । तत्य तेणउती अप्पमत्तो अपुदो वा तित्थगरा ऽऽहारगसजुत्त एक चीस पवित्नु पच्छा असजओ जाओ देवो वा जाओ त पडुच्च । वाणबुती आहारग घधित्तु मिच्छत्त गतूण चउगइगेसु उव वण्यो सत्य उत्थ सम्मत्त पडिवण्णस्सा देव मणुगेसु मिच्छच अपडिवण्णस्स वि लन्मइ । एगणणबुती देव-नेरइग मणुयाण असजयसम्मदिट्ठीण, ते तिणि वि तित्थगरनाम पति त्ति काउ । तिरिएस तित्थगरसतकम्मिओ न उवयजा ति तिरिओ न गहिओ । अठ्ठासीवी पउगड़गाण सम्मदिट्ठीण लब्मइ । इदाणं 'कइ वर्षतो वेएइ 'चि-असजयसम्मदिहिस्स अट्ठावीसवधगस्स अट्ठ उदयट्ठाणाणि, त-२१ । २५ । २६ । २७ ॥ २८ ॥२९॥ ३० ॥ ३१ । तिरिय मणुए पडच्च । २५ । २७ उदया वेउविय येव पडुचे, वेयग खड्गमम्मदिद्विणो पडुच्छ । एफेकम्मि उदए दो दो सत्ताणि-९२। ८८ एगणवीस बघमाणस्म सामण्णेण मत्त उदयट्ठाणाणि एकतीसवजाणि । कह ! एगूणवीसंबधो दुविहो-मणुयगइपाउग्गो देवगइपाउग्गो य । तत्थ देवगइपाउग्ग वित्थगरमहिय एगूणतीस बघमा जस्स मयस्स सच वि उदया समवति । एकेकम्मि दो दो सताणि-९३ । ८९ । मावना पूर्ववत् । एगणतीम मणुयगइ- पाउग्ग वधमाणाण देव नेरहयाण पच उदया, त जहा-२१२५।२७।२८।२९ । एकाम्मि दो दो सताणि, त०-१२। ८८1नवर देवस्स-उसोपवेयगस्स तीसोदयाहियोणि छ, तम्मि वि दो मताणि । तीसा वित्थगरसहिय मणुपगइपाउग्ग विगप्पा ५७६ । भट्ठा कर ॥ १ च । एके' की। च येउव्यियपेय कोर ॥ २ या छ। कार ॥ - तीस बंधमाणाणं देव-नेरइयाणं ताणि चेव अणंतरुत्ताणि पंच छ च उदयहाणाणि । तेसु एकेकम्मि उदये दो दो संताणि, तं०-९३ । ८९ । देवस्स नेरइयस्स एगणणती चेव तित्थगरा-ऽऽहारसंतकम्मिगो नेरइगेसु न उबवजइ त्ति । सामण्णेणं सबोदएसु संताणि-४।४।४।४।४।४।४।२। सवाणि तीसं । इदाणिं देसविरयस्स बंधट्ठाणाई भण्णं ति-'दुग छक्क चउ 'त्ति दो बंधा, छ उदया, चत्तारि संताणि । तत्थ बंधट्ठा- णाणि दोण्णि, तं०-२८ । २९ । तत्थ अट्ठावीसा मणुस्सस्स वा कम्मभूमितिरियस्स वा तप्पडिभागैतिरियस्स वा । देव- गइपाओग्गं अट्ठावीसं वंधमाणस्स एत्थ अट्ट बंधविगप्पा पूर्ववत् । एगूणतीसा तित्थगरसहियं देवगइपाओग्गं बंधमाणस्स मणुस्सस्स । तिरिक्खेसु न संभवइ तित्थगरनाम । तत्थ वि अट्ठ भंगा ।। छ उदयट्ठाणाणि, तं०-२५ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१ । मूलिल्ला चत्तारि वि वेउब्वियस्स; एकेक्कम्मि उदए एकेको भंगो, सवे पसत्थ त्ति काउं । तीसा तिरिय-मणुयाणं । एकतीसा तिरियाणं । तिरिय-मणुयाणं देसविरयाणं केसिंचि वेउबियलद्धी संभवइ । एत्थ तीसोदए तिरिय-मणुओदयविगप्पाणं एकेकस्स चोयालीसं सयं । कहं ? छ संठाण-संघयणा सरदुग-विहाइदुगेण गुणिया चोयालं सर्य भवइ । भग-अणाएज-अजसकित्तीओ गुणपञ्चयओ न उदेति तम्हा ताणि जुग- लाणिण संभवंति । एकतीसे तिरियाणं एत्तिया चेव विगप्पा । चत्तारि संतवाणाणि, तं०-९३ । ९२ । ८९ । ८८ । तत्थ तेणउई तित्थगरा-ऽऽहारगदुगं अपमैत्ता-पुत्रेण वा बद्धं १ णा भण्णं' का? कार ॥ २ गस्स अर्द्धत्तीयद्वीपबहिर्तिन इति । देव का२ ॥ ३ मत्तेणापु कार ! का प्रति खण्डिता ॥

पुणो देसविरओ जाओ त पडछ । सेसाण मावणा जहा असजयसम्मदिहिस्म । सामण्ण बधुदय सताणि मणियाणि । इदाणिं सवेहो-मणुसस्स अट्ठावीसबधगस्स पच उदया एकतीसवजा । तत्थ एकेम्मि दो दो सताणि-९२।८८। एव तिरिक्खस्स वि, नवरि एकतीसोदए वि दोणि-९२ । ८८ । एगणतीसब धगस्स मशुसस्स पच उदया-२५ । २७ । २८ । २९ । ३० । एत्थ एकेकम्मि दो दो सवाणि-९३ । ८९ | देसविरय स्स सहोदएस जहकमेण ४।४।४।४।४।२। सबे बावीस । इयाणि पमत्तसजयस्स पधाई भणति-'दुग पण चउ 'चि पमत्तसजयस्स दोण्णि बहाणाणि, पच उदया, चत्तारि सवाणि । वस्थ बधहाणाणि २८ । २९ । जहा मणूसस्स दसचिरयस्स तहा माणियछ । तत्थ पच उदया-२५ । २७ । २८ । २९ । ३० । सबाणि वि आहारगसजयस्म निउबियस्स वा सभरति । तीसा समावत्यसजयस्स वि । विउद्या हारगाण एकेको भगो, नवरि अट्ठावीम एगणतीसोदएसु दो दो भगा। तीमोदए जहा देम विरयस्स १४४ । सबे बि १५८ । चत्तारि संवाणि ताणि चेव जाणि देसविरयस्स । इदाणि सवेहो-अट्ठावीसवधमस्स पच वि उदया। एककम्मि दो दो सताणि-९२1८८1 आहारगसजयस्म बाण उई चेव । कह ? आहारगसतकम्मिओ आहारगसरीर उप्पाएछ ति काउ । पमचो वित्थगरसतकम्मिओ अट्ठावीस न वघड १ या व०-२१॥

M त्ति; तेण न तित्थगरसंताणि गहियाणि । एगूणतीसबंधगस्स वि पंच वि उदया। एकेक्कम्मि दो दो संताणि-९३ । ८९ । आहारगसंजयस्स तिणउई । कहं ? भण्णइ-आहारगसंजओ एगूणतीसबंधगो नियमा आहारग-तित्थगरसंतकम्मिगो ति । वेउवियस्स वि दो वि । पमत्तसवोदएसु जहकमेण संताणि-४।४।४।४।४। सो वि वीसं । इदाणिं अप्पमत्तस्स बंधाई भणति-' चउ दुग चउ 'त्ति अपमत्तस्स चत्तारि बंधट्ठाणाणि, दो उदया, चत्तारि संताणि । तत्थ बंधट्ठाणाणि, तं०-२८ । २९ । ३० । ३१ । अट्ठावीसा एगूणतीसा य जहा पमत्तसंजयस्स देवगइपाओग्गं अट्ठा- वीसं बंधमाणस्स | आहारगदुगसहिया तीसा भवइ । एको भंगो । एकतीसा तित्थगरा-ऽऽहारगदुरोहिं' य सहियं देवगइ- पाओग्गं बंधमाणस्स । चउसु वि बंधेसु विगप्पो नत्थि । कहं ? अथिर-असुभ-अजसकित्तीओ पमत्तम्मि वोच्छिण्णाओ त्ति । दो उदयट्ठाणाणि-एगूणतीसा तीसा य । एत्थ एगूणतीसा पमत्तसंजओ आहारगं वेउवियं ना उप्पाएत्तु तस्स अंते अप्पमत्तभावं गच्छइ त्ति । दो भंगा । एवं तीसाए वि; तीसा सभावत्थस्स वि । सभावतीसोदए विगप्पाणं १४४ । सो वि १४८। चत्तारि संताणि जहा पमत्तस्स । इदाणि संवेहो-अट्ठावीसबंधगस्स दोसु वि उदएसु एकं संतं अट्ठासीवी । एगूणतीसबंधगस्स वि दोसु वि एकं संतं एगणनउई । तीसबंधगस्स दोसु वि एकं संतं बाणउती । एकतीसबंधगस्स दोसु वि एकं संतं तेणउई । तित्थगरं आहारगं वा १ 'हिं सहि का१ ॥ २ °स्स । सभा' स ।।

7 पुणो देसविरओ जाओ त पहुच । सेसाण मावणा जहा असजयसम्मादिहिस्म । सामण्येण वधुदय सताणि भणियाणि । इदाणि सवेहो-मणुसस्स अट्ठावीसवधगस्स पच उदया एकतीसवज्ञा । वस्थ एकम्मि दो दो सवाणि-९२ / ८८ । एव तिरिक्खस्स कि, नवरि एकवीसोदए वि दोण्णि---९२ । ८८ । एगूणतीसब धास्स मशुसस्स पच उदया-२५ । २७ । २८ । २९ । ३० । एत्थ एककम्मि दो दो सताणि-९३ । ८९ । देसविस्य स्स सबोदएसु जहकमेण ४।४।४।४।४।२। सधे चावीस । इयाणि पमचसजयस्स वधाई भण्णति-'दुग पण चउ पति पमचसनयस्म दोणि वधट्ठाणाणि, पच उदया, चत्तारि सवाणि । वस्थ बधाणाणि २८ । २९ । जहा मणूसस्स दसविरयस्स तहा भाणियछ । तस्थ पच उदया-२५ । २७ । २८ ! २९ । ३० । सहाणि वि आहारगसजयस्म विउवियस्स वा सभवति । तीसा समावत्यसजयस्स वि । विउवा ऽऽहारगाण एकेको भगो, नवरि अट्ठावीस एगूणतीसोदएसु दो दो भगा। तीमोदए जहा देम विरयस्स १४४ । सद्दे वि १५८ । चचारि संताणि वाणि पेव जाणि देसविरयस्स । इदाणिं सवेहो-अट्ठावीसबधगस्स पच वि उदया । एककम्मि दो दो सवाणि-९२ । ८८ । आहारगसजयस्स बाण उई चेव । कह ? आहारगसतकम्मिओ आहारगसरीर उप्पाएइ ति काउ । पमत्तो तित्थगरसतकम्मिओ अट्ठावीस न बघइ १ या, त०-२५ | का ॥

त्ति; तेण न तिस्थगरसंताणि गहियाणि । एगणतीसबंधगस्स वि पंच वि उदया । एकेकम्मि दो दो संताणि-९३ । ८९ । आहारगसंजयस्स तिणउई । कहं ? भण्णइ-आहारगसंजओ एगणतीसवंधगो नियमा आहारग-तित्थगरसंतकम्मिगो त्ति । वेउवियस्स वि दो वि । पमत्तसहोदएसु जहकमेण संताणि-४ । ४।४।४।४। सबै वि वीसं । इदाणिं अप्पमत्तस्स बंधाई भणति-'चउ दुग चउ 'त्ति अपमत्तस्स चत्तारि बंधट्ठाणाणि, दो उदया, चत्तारि संताणि । तत्थ बंधट्ठाणाणि, तं०-२८ । २९ । ३० । ३१ । अठ्ठावीसा एगूणतीसा य जहा पमत्तसंजयस्स देवगइपाओग्गं अट्ठा- वीसं बंधमाणस्स | आहारगदुगसहिया तीसा भवइ । एको भंगो । एकतीसा तित्थगरा-ऽऽहारगदुगैहिँ य सहियं देवगइ- पाओग्गं बंधमाणस्स । चउसु वि बंधेसु विगप्पो नत्थि । कहं ? अथिर-असुभ-अजसकित्तीओ पमत्तम्मि वोच्छिण्णाओ ति । दो उदयट्ठाणाणि-एगूणतीसा तीसा य । एत्थ एगूणतीसा पमत्तसंजओ आहारगं वेउल्वियं वा उप्पाएत्तु तस्स अंते अप्पमत्तभावं गच्छइ त्ति । दो भंगा । एवं तीसाए वि; तीसा सभावत्थस्स वि । सभावतीसोदए विगप्पाणं १४४ । सवे वि १४८॥ चत्तारि संताणि जहा पमत्तस्स । इदाणि संवेहो-अट्ठावीसबंधगस्स दोसु वि उदएसु एकं संतं अट्ठासीती । एगूणतीसबंधगस्स वि दोसु वि एकं संतं एगणनउई । तीसवंधगस्स दोसु वि एकं संतं पाणउती । एकतीसबंधगस्स दोसु वि एकं सतं तेणउई । तित्थगरं आहारगं वा १ "हिं सहि का१ ॥ २ स्स । सभा स ।

जस्स सतकम्म सो नियमा त बघ चि । एकेकम्मि वषे एकक संत ! एकके उदए चत्तारि चचारि मवाणि । मबाणि वि अट्टा इदरणि अपुष्करणस्स बधाई भण्णवि-'पणगेग घउ ति अपुवकरणस्म पच बधट्ठाणाणि, एको उदओ, चत्तारि 'सता णि । तत्य बबट्टाणाणि-२८।२९ । ३० ३१ । १। मूलिल्ला चत्तारि वि जहा अपमत्तस्स । एको-देवगइपाओग्गे वधे बोच्छिण्णे जसकिची एका बज्झति। एगो उदओ तीसा । विगप्पा वरिसमसंघयण छ सठाणा मरदुग-खगइदुगेहि चउदीमा ! अण्णे भणति-मूलिल्ला तिणि संघयणा छ सठाणा सरदुग खगइदुगैहि गुणिया यावत्तरी, तिसघयणो उपममसेहि पडिवेजड ति । एव अणियाट्टि सुहुमसपराय-उपसतकसायाण | अपुवस्स सता वे चेव जे अप्पमचस्स । इयाणि सवेहो-२८॥२९॥ ३० ॥ ३१ बधगाण तीसोदए सतभारणा जहा अप्पमतमजयस्म तहा चेव । एगविह वधगस्स एको उदो तीसा, सताणि चत्तारि वि । कह १ अट्ठावीस एगणतीस तीस-एकतीमबधगा वि बघवोच्छेय करेतु एकविह पति अपुष्करणद्वाए सखेजहमे मागे सेसे ति, तेण चत्तारि वि सताणि सभवति ॥४८॥ इदाणि अणियविस्स वधादी भणति-'एगेगमट्ठ' ति अणियट्टिस्म एको वयो, एको उदओ, अट्ट सताणि । तत्थ बषट्ठाण जमकित्ती । उदओ वीसा । सताणि, त०-९३ । ९२ । ८९ । ८८।८०। ७९ । ७६ । ७५ । मूलिल्ला चत्तारि १ एकको का। २ सतहापाणि का ॥ ३ यणिणो कार ॥ ४ बजति ति । का३ ॥

वि खवगसेढीए ताव जाव तेरस नामाइं अखीणाई उवसमसेढीए वा । उपरिमाइं चत्तारि वि जहकमेणे तेहिंतो तेरसनामे खीणे खवगसेढीए भवंति । इयाणि संवेहो, भेदाभावाओ न भवइ । सुहुमरागस्स बंधाई भण्णंति-'एगेगम' ति सुहुमस्स एको बंधो, एक्को उदओ, अट्ट संताणि । जहा अणियट्टिस्स तहा चेव; नवरि मूलिल्लाणि चत्तारि संताणि उवसमसेढीए चेव । 'छउमत्थकेवलिजिणाणं एक चऊ एक चऊ अट्ठ चउ दु छकमुदयंस' त्ति छउमत्थग्गहणेणं उत्रसंतो खीणकसाओ य गहिया, छउमत्थजिणा एए । केवलिजिणाणं सजोगि-अजोगीणं गहणं । जहक्कमेणं गाहापच्छिमऽद्धभणियाणि उदय-संताणि । तत्थ उवसंतकसायस्स 'एक चउ' त्ति एक उदयट्ठाणं तीसा; चत्तारि संताणि, तं०-९३ । ९२ । ८९ । ८८ । उवसमसेढीए खओ नत्थि त्ति काउं । खीणकसायस्स एको उदओ तीसा । एत्थ विगप्पा चउवीसं, वारिसहं संठाणछकं सरदुग-खगतिदुरोहिं गुणिया २४ । तत्थ तित्थगरसंतकम्मिगस्स खीणकसायस्स सवे पसत्थ ति उदयविगप्पो एक्को चेव । चत्तारि संताणि, तं०-८०। ७९ । ७६ । ७५ । तत्थ असीती छावत्तरी य तित्थगरसंतकम्मियस्स, एगूणासीती पण्णतरी य अतित्थगरसंतकम्मियस्स । इयाणि सजोगिकेवलिस्स–'अट्ठ चउ' त्ति अट्ठ उदया, तं०-२० | २१ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३०।३१ । पुत्वविवरीयाणि एयाणिः चत्तारि संताणि-८० । ७९ । ७६ । ७५ । इयाणि संवेहो-वीस-छबीस-अट्ठावीस एगूणतीस- १ वि ताव स ॥ २ °ण तिहिंतो स ॥ ३ 'हिओ, छ' का ॥ ४ तत्थ इति पाठ स-कारप्रत्यो स्ति ॥ ५ सतट्टाणाणि का१ ॥

- तीसोदया अतित्थगराण । एकेकम्मि दो दो सताणि-७९ । ७५ । सवे दस । एकवीस-सत्तावीम एगणतीस-तीस एकती । सोदपा तित्यमराण । एकेकम्मि दो दो सवाणि-असीवी छावत्तरी य । सवे दस । एगणतीसा तीसा य तित्यगरा ऽति- स्थगराण सामण्ण । सबाणि सजोगिस्स वीस सताणि । इयाणि अजोगिकेवलिस्स-'दो छकमुदयस' चि दो उदया-८।९। तत्थ अड्डुदओ अतित्थगरअनोगिस्म, नवो- दओ तिस्थगरस्स । छ सवाणि-८०१ ७९ । ७६ । ७५।९।८ातत्य अकृदये तिमि सवाणि-७९ । ७५1८ तत्थ आदिमा दो ७९ । ७५ जाव दुचरिमसमओ ताव लन्मति । दुचरिमसमए सरीरसहगयाण कम्माण खए कए सेसा अट्ट 11 सत, त चरिमसमए लन्मति । नवोदए तिण्णि, त जहा-८०। ७६ । ९ । आदिमा दो ८० । ७६ जार दुचरिमसमओ, चरिमे नव लन्मति ॥ ४९ ।। एव ओषेण गुणड्डाणेसु बधुदय सताणि भणियाणि । इयाणि गइयादिएसु निदेसेण वधुदय-संताणि नामस्म भण्णति- दो छकटु चउक, पण नव एकार छकग तुदया। नेरइयाइसु सन्ता, ति पच एकारस चउक्क ॥ ५० ॥ दो छकडचउक० गाहा । निस्पादिसु बंधति । नेरइय-तिरिय मशुप-देवेसु जहकमेण दोणि छ अट्ट चत्तारि घट्ठा. १ मामो ७९ 1 से ॥२ नवगेका ले। नयेशा खेर ॥ ३ हा।दो छह चउमणिरया कार॥ ४ रित्ति बध स ।

पाणि ति । तत्थ नेरइय० दो बंधट्ठाणाणि-२९ । ३० । तत्थ एगूणतीसा मणुय-पंचिंदियतिरिक्खपाओग्गं बंधमाणस्स, सो विगप्पा संभवंतीति । तीसं पंचिंदियतिरिक्खपाओग्गं उज्जोवसहियं बंधमाणस्स सबविगप्पा वीसं । तित्थगरसहियं मणुयगइपाओग्गं तीसं बंधमाणस्स विगप्पा अट्ठ पुच्चुत्ता । इयाणि तिरिक्खस्स छ बंधट्ठाणाणि, तं०-२३ । २५ । २६ । २८ । २९ । ३० । सबाणि वि सविगप्पाणि जहा हेट्ठओ भणियाणि तहा भाणियवाणि । नवरि एगूणतीस-तीसबंधगेसु तित्थगरा-ऽऽहारबंधविगप्पा ण संभवंति, तित्थगरा- ऽऽहारगं न बंधंति ति । इदाणि मणुयस्स अट्ट बंधट्ठाणाणि-२३ । २५ । २६ । २८ । २९ । ३० । ३१ । १। सबाणि सविगप्पाणि संभ- वंति । कम्हा ? चउगइपाउग्गं मणुओ बंधइ ति । इदाणि देवस्स चत्तारि बंधट्ठाणाणि, तं०-२५ । २६ । २९ । ३०। पणुवीस-छबीसा बायर-पजत्तग-पत्तेयसंजुत्तं एगिदियजाई बंधमाणस्स । एत्थ भंगा थिरा-थिर-सुभा-सुभ-जसा-जसेहिं कायदा अट्ठ, छच्चीसे आयावुजोएहि य सोलस । एगूणतीसा मणुयगइ-पंचिंदियतिरिक्खपाओग्गं बंधमाणस्स सविगप्पा तहेव । तीसं उज्जोयसहियं पंचिंदियतिरियपाओग्गं बंधमाणस्स सविगप्पा तहेव । वितिया तित्थगरसहियं मणुयगइपाओग्गं तीसं बंधमाणस्स, एत्थ अट्ठ विगप्पा । एवं नेरहगादीणं बंधट्ठाणाणि भणियाणि । इदाणि उदयट्ठाणाणि-'पण नवेकारछक्कगं तुदय' ति नेरइगादीणं जह- कमेण उदया भण्णंति । तत्थ नेरइगस्स उदयट्ठाणाणि पंच, तं०-२१ । २५ । २७ । २८ । २९ । जहा हेट्टा भणियं वहा पेव । तिरिक्खस्स नव उदयहाणाणि-२१ । २४ । २५ । २६ । २७ २८ २९ ३० ३१ । एगिदिय विगलिंदिय- पचिंदियतिरियाण जाणि उदयद्वाणाणि ताणि समाणि तिरिक्खस्म, सल्वे तिरिक्त नि काउ। तेग समि उदयट्ठाणाणि सविगप्पाणि माणियवाणि । मणुयाण उदयडाणाणि एकारस, त०-२०।२१ । २५ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१।९।८। ममा- वमशुयाण घेउवियाण आहारगसजयाण नित्थगर अतित्यकेवलीण मजोगि अनोगीण उदयद्वाणाणि सबाणि मणुओदया बुञ्चति तम्हा डेहओ भणियविहिणा माणियवाणि । देवस्स छ उदयट्ठामाणि-२१ । १५ । २७ । २८ । २९ । ३० । हेट्ठो मविगप्पाणि भणियाणि । 'सवा ति पच एकारस पाउक' ति नेरइगादीण जहकमेण मताणि । तत्प नेरहपस्म तिणि सताणि-१२। ८९ । ८८ । कह ! वेणउइसतकम्मिगो नेरदपसु न उनवञ्जति नि, दषगह निरयगइपाउग्गविरहियाणि वि सताणि न ममाति ति। विरिक्खस्स पच सताणि, त०-९२ । ८८।८६ । ८०। ७८ । कह ? तिस्थगरसताणि तेरमनामखीणाणि य सताणि न समवति ति। मशुस्साण एकारस सवाणि, १०-१३९२।८९।८८।८६१८०। ७९ । ७६ । ७५।९।८। मणुयगइ १-२ णित नहा-२१ । २ ॥

संतविरहियं संतं मोतूण सेसाणि संताणि णाणाजीवे पडुच्च संभवंति । देवस्स चत्तारि संताणि-९३ । ९२ । ८९ । ८८ । उवरिल्लाणि न संभवंति, देवगइआइविरहितत्वात् । इदाणिं 'कइ बंधतो वेदेति कति ? (गा० २) ति एयरस अवसरो-नेरइयस्स तिरियगइपाउग्गं एगूणतीसं बंध- माणस्स पंच वि उदयहाणाणि, एकेके दो दो संताणि-९२ । ८८ । तित्थगरसंतकम्मिओ तिरियगई न बंधइ त्ति एगूण- णवुती नत्थि । मणुयगइपाउग्गं एगणतीसं बंधमाणस्स थे पंच वि उदयट्ठाणाणि, एकेक्कम्मि 卐 तिणि संताणि, तं०-९२ । ८९ । ८८ । तित्थगरसंतकम्मिओ मिच्छद्दिट्ठी एगूणतीसं बंधइ जाव ताव सम्मत्तं न पडिवजइ । पडिवण्णो तीसबंधगो भवइ । तिरियगइपाओग्गं उज्जोवसहियं तीसं बंधमाणस्स पंच वि उदया, एकेके दो दो संताणि--९२ । ८८ । मणुयगइपाओग्गं तित्थगरसहियं तीसं बंधमाणस्स पंच वि उदया, एकेकम्मि एकेकं संतं एगणनवुती। एवं सव्वुदएसु सबबंधेसु य सबग्गेणं तीसं संताणि । इदाणिं तिरिक्खस्स-तेवीसबंधगस्स एकवीसातीणि नव उदयट्ठाणाणि । आदिल्लेसु चउसु पंच पंच संताणि, उवरि- ल्लेसु पंचसु चचारि चत्तारि संताणि अट्ठत्तरिवजाणि, कारणं पूर्ववत् । एवं पणुवीस-छवीस-एगूणतीस-तीसबंधगाणं पि । नवरि एगूणतीसं मणुयगइपाउग्गं बंधमाणस्स अट्ठत्तरिवजाणि चत्तारि संताणि सव्वुदएसु भाणियवाणि । अठ्ठावीसबंधगस्स अट्ठ उदयट्ठाणाणि, तं०--२१ । २५ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१ । तत्थ २१ । २६ । २८ । २९ । ३० १ 'च उद सं का१ ॥२ स्वस्तिकद्विकमध्यग पाठ संप्रतौ नास्ति ॥ ३ च उद' सं ॥ ४ एकं का? कार ॥

खड्ग वेयगसम्मदिवीण पुबबद्धाउगाण, वेगसम्मट्ठिी जो' बावीससतकम्मिओ, अण्णो ण लभद। एककम्मि दो दो सवाणि, १०-९२ १८८पणुवीस-सचावीसोदया वेउबियरस समवति । सबत्य दो दो सवाणि । तीसेकतीसोदया सम्म- द्दिति मिच्छट्ठिीण, एककम्मि तिणि तिणि सताणि-९२ । ८८1८६ । छासीई सम्मदिट्ठीण ण सभवति, दवदुगादि विरहिवत्वात् । एव सबबधगेसु सम्बुदए सबग्गेण दो सताणि अहारसुचराणि सतभैयाण २१८ । पदाणि मशुसस्स---तेवीसबधगस्स सत्त उदयट्ठाणाणि, १०-२१ ॥ २५॥ २६ ॥ २७ ॥ २८ ॥ २९ ॥ ३०॥ पश्वीस सत्तावीसा वेउविय पडुच, सेसा सजओदय चि काउ न समवति । एकेके पत्तारि चत्तारि सताणि त०-९२ । ८८।८६। ८० । नवरि पशुवीस सत्तावीसोदएसु दो दो सताणि-९२१८८ । सेसाणि तित्थगरसताणि, मणुयगहरहिय च न सभ- वह । सवाणि वि चउबीस | एव पणुवीस-छतीसवधगाण पि । मणुयगइ तिरियगइपाउम्ग एगणतीस उजोवमहिय तीसवध गाण पि एव चेव जहा तेवीसषधगस्स । अट्ठावीसवधगस्स सच उदयट्ठाणाणि, १०-२११२५/२६ । २७ । २८ । २९ । ३० । तत्थ एकवीस छबीसा असजयसम्महिहि पडुछ । पणुवीस सचावीसा आहारगसजयस्स वेउवियरस वा । अड्डावीस-ए। णतीसा असजयसम्मद्दिहि वेउबिया-ऽऽहारगाण सामण्णा । तीसा सम्मद्दिट्ठीण मिच्छद्दिष्ठीण च । एकेकम्मि दो दो सताणि पाणउई अट्ठासीती य । आहारगसजयस्स पाणउई चेव । तीसोदये चचारि सताणि--९२ । ८९ । ८८1८६ । तत्थ एग- णनबुती निरयगइपाउस अट्ठावीसं घमाणस्स मिच्छहिद्विस्त । सेसाण मावणा जहा ओथे। अट्ठावीसबधमस्म सता १६१ १ जो मोहणीयषायी र ॥ २ णि मेया का ३ 'तीस तीसवय स ॥

एगूणतीसा-देवगइपाउग्गं तित्थगरसहियं एगूणतीसं बंधमाणस्स जे अट्ठावीसबंधगस्स भणिया ते चैव सत्त उदया, उद- यभावणा तहेव । नवरि तीसोदओ वि सम्मदिहिस्स चेव, जेण एगूणतीसबंधो तित्थगरनामसहिओ ति । संताणि उदयेसु जहक्कमेण-२।२।२।२।२।२।२ । तेणउती एगूणणउती य संताणि । आहारगसंजयस्स तेणवुती चेव । आहा- रगसहियं तीसं बंधमाणस्स दोणि उदया-२९ । ३०। एगूणतीसा आहारगसंजओ अंतिमकाले अप्पमत्तो भवति तं पडुच्च । ऐक्केकं संत बाणवुती । एकतीसबंधगस्स एको उदओ तीसा, एक संतं तेणउइ । एगविहबंधगस्स एक्को उदओ तीसा, अट्ठ संताणि, तं०-९३ । ९२ । ८९ । ८८। ८० । ७९ । ७६ । ७५ । अबंधगस्स उदया दस, तं०-२०।२१ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१ । ९।८। वीस-छबीस-अट्ठावीसोदएसु दो दो संताणि--७९ । ७५ । एकवीस-सत्तावीस- एकतीसोदएसु दो दो संताणि-८० । ७६ । एगूणतीस-तीसोदएसु चत्तारि चत्तारि संताणि-८० । ७९ । ७६ । ७५ । नवोदए तिण्णि-८०। ७६ । ९ । अट्ठोदए तिण्णि-७९ । ७५। ८ । एवं सबबंधोदए पडुच्च संताणि १८७ । मणुसस्स भणियं । इदाणिं देवस्स-पणुवीसबंधगस्स छावि उदयट्ठाणाणि । एकेके दो दो संताणि--९२ । ८८ । एवं छबीस-एगूणतीसबंधगाणं पि एवं चेव । उज्जोवसहियं तीसं बंधगाणं पि एवं चेव । तित्थगररहियं तीसं बंधमाणस्स छावि उदयट्ठाणाणि । एक्कक्के दो दो संताणि-९३ । ८९ । सबग्गेण सहि संताणि ६० ॥५०॥ गई पडुच्च भणियं । इदाणि इंदियं पडुच्च भण्णइ- २ एकं स ॥ १ अस्मिन् स्थाने श्रीमलयगिरिपादास्तु १५९ सत्तास्थानानि ज्ञापयन्ति । दृश्यता कर्मग्रन्थद्वितीयविभागपृ०२३८ तमम् ।।

प इगि विगलिंदिय सगले, पण पच य अट्ट वधठाणाणि । पण छक्ककारुदया, पण पण वारस य सन्ताणि ॥५१॥ इगि विगलिंदियगाहा । 'इगि विगलिंदिय सगले पण पच य अट्ट बघठाणाणि ।' 'इगि ति एगिदिओ। एगि दिय विगलिंदिय-पचिंदियाणं जहकमेण पट्टाणाणि पच पच अट्ठ नि । एस्थ एगिदियरस पच पट्ठाणाणि, १०-२३ । २५ ॥ २६ ॥ २९ ॥ ३०॥ देवगइपाउम्गे एगणतीस तीसविगप्पे मोतूप सेसाथि महाणि मविगप्पाणि भवति । निगलिदि. याण विष्र्ड पि ते चैव पच हाणा सविगप्पा । पचिंदियाणं सबाणि वडाणाणि सविगप्पाणि माणियवाणि । इदाणि उदयट्ठाणाणि-'पण छक्केकारुदए चि जहकमेण एगिदियादीण उदयट्ठाणाणि पच छ एकारस । तत्थ एगि दियाण पच उदयहाणाणि, त बहा-२१।२४।२५। २६ । २७ । मविगप्पा जहा हेदुओ मणिया तहा चेव । गि- लिंदियाण छ उदयहाणाणि, त०-२१॥ २६ ॥ २८।२९।३०।३१। जहा हेढओ मविगप्पाणि मणियाणि तहा चेव। पचिदियाण एकारस उदयद्वाणाणि, त०-२० । २१ । २५ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१।९।८ एगिदिय विगलिंदियाण उदयविगप्पे मोत्तूण सेसा सवे पचिंदियाण उदयविगप्पा भवति । इयाणि सतढाणाणि-'पण पण पारस य सवाणि' चि एगिदिय विगलिंदियाण पच पच सताणि-९२ । ८८ । २मचि २॥

८६ । ८० । ७८ । कारणं पुच्चुत्तं । पंचिंदियाणं सवाणि वि संताणि । सामण्णेणं बंधुदय-संताणि भणियाणि । इयाणि 'कइ बंधंतो वेएइ कति ? कति वा पगइहाणकम्मंस (गा० २)त्ति एयरस अवसरो-एगिदियस्स तेवीसं बंधमाणस्स पंच वि उदयट्ठाणाणि--२१ । २४ । २५ । २६ । २७ । आइल्लेसु चउसु पंच पंच संताणि, सत्तावीसे अत्तरिवजाणि चत्तारि संताणि | एवं पणुवीस-छबीस एगूणतीस-तीसबंधगाणं पि । सबग्गं १२० । विगलिंदियाणं तेवीसादिबंधमाणाणं छावि उदयट्ठाणाणि । मूलिल्लेसु दोसु पंच पंच संताणि, उवरिल्लेसु चउसु अत्तरिवजाणि चत्तारि चत्तारि संताणि । कारणं पुवुत्तं । सबग्गं १३० । पंचिंदियाणं तेवीमं बंधमाणाणं छ उदय- हाणाणि, तं०-२१ । २६ । २८ । २९ । ३० । ३१ ! पंचिंदियतिरियाणं मणुयाणं उदयविगप्पा भाणियबा । मूलिल्लेसु दोसु पंच पंच संताणि-९२ । ८८।८६ । ८० । ७८, उवरिल्लेसु चउसु अत्तरिवजाणि चत्तारि चत्तारि संताणि । पणु- वीसबंधगस्स अट्ट उदयट्ठाणाणि-२१ । २५ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१ । एएसु उदएसु जहक्कमेण संताणि- ५।२।५।२।४।४।४।४। पशुवीस-सत्तावीसा वेउबिए देवे य पडुच्च । सेसाणि पसिद्धाणि । एवं छबीसबंध- गस्स वि । अट्ठावीसबंधगस्स अट्ट उदयट्ठाणाणि, तं०-२१ । २५ । २६ । २७ । २८ । २९ । ३० । ३१ । एएसु उदएसु जहक्कमेणं संताणि २ । २।२।२।२।२।४ । ३ । अत्थो हेट्टओ पुच्चुत्तो । एगणतीसबंधगस्स ताणि चेवऽढ उदय- हाणाणि । एएसु उदएसु संताणि, तं०-७ । ४ । ७। ४ । ६ । ६ । ६।४। अत्थो हेटुओ पुव्वुत्तो । तीसवंधगस्स १ "णि, तं जहा-२१ । कार ॥ - . ताणि पेव अट्ठ उदयट्ठाणाणि । तेसु जहकमेण सताणि-७।४।५।४।६।६।६। ४ । अस्थो पुच्चुत्तो । एग- तीस एगविहरघमाण चे जहा मणुपस्स संवेहो मणिओ वहा भाणियव । सबग्ग'२०० । एव इदिय पहुच मवेहो भणिओ॥५१॥ इय कम्मपगडिठाणाणि सुड वधुदय सन्तकम्माण । गइयाइपहिं अट्ठस, चउप्पगारेण नेयाणि ॥ ५२ ।। इय कम्मपगडिति गाहा । इयं चि मणियविहिणा कम्माण पगवाणाणि कम्मपगइहाणाणि । 'सुटु' ति अच वमुवोग करेत्तु । ताणि काणि कम्मपगइटाणाणि १ मणति-वधुदय-सतकम्माण ठाणाणि । 'गइआइएहि ति- मद इदिए य काए, जाप घेये कसाय णाणे य । सजम दसण लेसा, भय सम्मे सणि आहारे । ति एएहिं चोइसहिं असु अणुओगदारे नेयवाणि । काणि ताणि जेसु नेयवाणि १ मण्णति- सेतपयपकवणया, वम्वपमाण च बेत फुसणा य । कालतर च भापो, अप्पायडुग च दापह ॥ तत्य सतपयपरूवणया-एव बधुदय सताण सवेहो गुणद्वासु ओघेण भणिओ, आदेसेण वि गइ इदिए य पड्डुच्च मग्ग गहाणेसु मणिओ, तेणऽशुमाणेण कायादिगेसु वि मग्गणहाणेसु माणियव । तओ दवपमाणादीणि सच वि अणुओगदाराणि माणियवाणि । 'पउप्पगारेण नेयाणि' चि पगइ ठिति अणुभाग प्पएसपगारेण नेयवाणि । पगतीए बघुदय सते मणितु १च अवनगाण व जहा कार ॥२ ग २२६ । एव कार ॥ ३ पसु म से२॥ ४-५ गाथेमा सर्वेष्वपि मूलस्त्रादर्शधूपलभ्यते ॥

तओ ठिति-अणुभाग-प्पएसाणं बंधुदय-संताणं ठाणाणि तेणेव विहिणा भाणियवाणि ॥ ५२ ॥ इदाणिं उदओदीरणाणं विसेसनिरूवणत्थं भण्णइ । कम्हा ? उदयसभावा उदीरण त्ति काउं । उदयस्सुदीरणाए, सामित्ताए ण विजइ विसेसो । मोत्तूण ये ईयालं, सेसाणं सव्वपयडीण॥५३॥ उदयस्सुदीरणाए० गाहा । उदओ नाम कालपत्तस्स दवस्स अणुभवणं । उदीरणा अकालपत्ताणं दवाणं उदए पाडणं । उदीरणा कहं ? भण्णइ-उदयावलियबाहिरिल्लठितीहितो कसायसहिया-ऽसहिएणं जोगकरणेणं दलियं आकड्डिय उदयपत्त- दलिएण समं अणुभवणं ति भणियं भवइ । तेसिं उदय-उदीरणाणं सामित्तं पडुच्च नत्थि विसेसो । किं भणियं भवइ ? जो णाणावरणाईणं कम्माणं वेयगो सो चेत्र तेसिं उदीरगो त्ति भणियं भवइ । कम्हा ? जत्थ उदओ तत्थ उदीरणा, जत्थ उदी- रणा तत्थ उदओ । एत्थ अतिपसत्तं लक्खणं ति, पुणो नियमणं करेति-' मोतूण य ईयालं' एकचत्तालीसं पगईओ मोत्तूण सेसाणं सबपगईणं नत्थि विसेसो, एकचत्तालीसाए कम्मपगडीणं उदीरणाए विणा वि उदओ लब्भइ ॥५३॥ काणि ताणि कम्माणि ? कह वा लब्भति ? भण्णति-- नाणंतरायदसगं, दंसणनव वेयाणिज्ज मिच्छत्तं । सम्मत्त-लोभ-वेया-ऽऽउगाणि नव नाम उच्चं च ॥ ५४ ॥ १ 'त्ताओ न वि सेर खे३ ।। २ य एयालं खे२ । य इगुयाल खे३ ॥ ३ 'चं वा ॥ खे३ ॥

माणतराय दसग० गाहा । पचण्ह पाणावरणाण, पचण्हमतरायाण, उपरिल्लाण चउण्ह दमणावरणीयाण, एएसिं चोद्द- सण्ह कम्माण साजीवाण उदओदीरणा य वाव जाप खीणकसायदाए आरलिया सेम नि । तओ आवलियामेच काल उदए वट्टमाणाण उदीरणा णस्थि । कह ? आवलियागय न उदीरिजइ चि, उदयावलियाओ उवरिल्लाओ ठितीओ उदीरि । अति चि काउ । निदापणगाण सरीरपजचीए पजत्तयाण पितिपसमयाओ आढवेत्तु उदओ मवह उदीरणाए विणा वि, । जाब इदियपञ्जचीए पजत्तउ चि । तओ वितियसमयपमिनि उदओ य उदीरणा य भगति चि । एम आगमो-तेसि जम्मि । समए उदओ फिट्ट चि तम्मि समए उदीरणा य जुगव फिट्टति । दोण्ह वेदणियाण मद्दे पमचा जीवा वेदगा उदीरगा य । अप्पमचसजएसु उदीरणा नस्थि त्ति उदओ चेव चि । एम आगमो-मिच्छत्तस्स पढममम्मत्त उप्पाएतेण अतरकरण कय, तत्य पढमहितीए आलियासेलाए उदीरमाणस्थि, उदओ चैव । वैदगसम्मत्तस्म खइगमम्मत उप्पाएतेण मिच्छत्त सम्मामिच्छ चाइ खवियाइ, तओ सम्मत्त सभोवट्टणाए उबडिय अंतोमुहुचद्वितीय जाय, तओ खीपमाण खीपमाण आरलियामेनसेस जाय, तो पमिद उदओ चेव, उदीरणा णत्यि । अहवा उसमसेटिं पडिवअवस्स अवरकरणे कए पढमद्वितीए आवलिय- सेसाए उदओ चेव, उदीरणा णस्थि । लोमसजलणाए सबसचाण उदओ य उदीरणा य ताव जार सुहमसपराइगद्धाए आवलियाक्सेस ति । तो आवलियामत काल उदओ चेन, उदीरणा णत्थि । तिण्ह वेयाण तेण तेण वैदेण सेटिं पडिव- ण्णस्स अतरकरणे कए पढमद्वित्तीए जाव आवलियासेस त्ति ताव उदओ य उदीरणा य जुगर । तवो आवलियामेत्त काल उदयो चेव, उदीरणा नस्थि । चउण्ह आउगाणऽप्पडप्पणो अते आवलियमेत काल उदओ चेव, उदीरणा नस्थि । अण्ण च-मणुस्साउगस्स सबे अप्पमत्ता जीवा अणुदीरगा वेयगा चेव । नव नाम उच्चं चेति मणुस्सगति-पंचिंदियजाइ-तस- वादर-पजत्त-सुभग-आदेज-जसकित्ति-तित्थगरनामाणं एएसिं नवहं कम्माणं उच्चागोयस्स य सवे सजोगिजीवा उदीरगा वेयगा य, अजोगिजीवा अणुदीरगा वेयगा चेव । सेसाणं कम्माणं उदय उदीरणा य जुगवं आढति जुगवं फिटृति ॥५४॥ उदओदीरणाणं विसेसो भणिओ । इदाणिं गुणट्ठाणमहिकिच को काओ पगईओ बंधइ ? को काओं न बंधति ? ति, बंधविसेसनिलवणत्थं भण्णइ- तित्थगरा-ऽऽहारगविरहियाउ अज्जेइ सवपयडीओ। मिच्छत्तवेयगो सासणो वि उगुवीससेसाओ ॥ ५५ ॥ तित्थगराहार० गाहा। 'तित्थगरा-ऽऽहारविरहियाउ अजेति सवपगतीओ मिच्छत्तवेयगो' त्ति बंध पडुच्च वीसुत्तरं पग- तिसतं गहियं, तं०-णाणावरणा पंच सणावरणा णव साता-ऽसातं मिच्छत्तं सोलस कसाया नव नोकसाया चत्वारि आउ- गाणि चत्तारि गतीओ पंच जातीओ पंच सरीराणि, पंच पंच बंधण-संघाया सरीरग्गहणेणं गहिया, छ संठाणा छ संघयणा तिणि अंगोवंगा वण्ण-गंध-रस-फासा सामण्णेण गहिया चत्तारि आणुपुवीओ अगरुलहु उबघाय पराघाय उस्सास आयाव उजोव विहायगइदुगं तस-थावरादिवीसं निमेणं तित्थगरनाम उच्चा-नीयागोयं पंच अंतरायमिति । एयं वीसुत्तरं पगइसयं । १ एतदर्थसाधिकेमा गाथा निष्वपि मूलसूत्रादर्शेषु लभ्यते-मणुयगइ जाइ तस वायरं व पजत्त सुभग आएज । जसकित्ती तित्थयरं, णामस्स हवंति णच पया ॥ २ 'दओदी का२ ॥ ३°ओ पगतीओ न का२ ॥ ४ गवजियाउ खे१ ॥ ५ राइय का? कार॥

एयाओ वीयुत्तराओ पगडिसयाओ तित्थगर आहारगमरीर आहारगगोवग च मोतूण सेसाओ सचरसुत्तर पगतिमय अजेइ- वघड मिच्छदिट्टी, वित्थगरा-ऽऽहारगाति सम्मच सजमपचयाति ति न बधति । 'सासणो वि उगुवीमसेसाई ति सासण सम्मदिडी एगूणवीससेस-एकुत्तर पगडिसय बघति । कह ? मण्णइ-पुच्चुत्ताणि तिष्णि, मिच्छत्तपच्चयाणि सोलस, त०- मिच्छत्त नपुसगवेओ निरयाउग निरयगह एगिदिय वेन्ते. चउरिदियजाइ हुडसठाण असपत्तसेवट्ठ सघयण निरयाशुपुति आताव थावरं सुहुम अपजच साहारणमिति । एपाणि सोलस मिच्छत्तोदयनिमित्ताणि सासणम्मि मिच्छत्तोदयाभावाओ वध न एति । एया एगूणवीस मोजूण सेसा सवाओं' वति ॥ ५५ ॥ छायालसेस मीसो, अविरयसम्मो तियालपरिसेस । तेपन्न देसविरओ, विरओ सगवन्न सेसाओ ॥ ५६ ॥ छायाल० गाहा । 'छापालसेस मीसो ति मीसो-सम्मामिच्छट्ठिी छायालीस पगडीओ मोनूण सेसाओ चोवरि पगडीओ वधइ । तत्थ छायालीसा पुबुत्ताणि एगूणवीस, सासणम्मि पशुवीस वोच्छिजति, त०-थीणगिद्धितिग अणवा- शुवषिष्ट इत्यिवेदो तिरियाउग विरियमइ आधन्तवजाणि चत्तारि चत्तारि सठाण सघयणाणि तिरियाणुपुष्धी उजोव अप- सत्यविहायगह दूहग दुस्सर अणाएल नीयागोयमिति । एयाणि सकिलिहतरी बघा चि, सासणाओ सम्मामिच्छो विसुद्ध- १ बेइदिय तेदिय चउ का१ कार ॥२ ओ य व कां ॥ ३ सेसा । खे३ ॥

तरो ति, अणंताणुबंधिउदयरहियत्ताओ । अन्यच्च-आउगं च न बंधइ ति, मणुस्स-देवाउगाणि वि बंधाओ फेडियाणि । एयाओ छायालीसं पगडीओ मोतूण सेसाणि बंधति । 'अविरयसम्मो तियालपरिसेसे 'ति अविरयसम्मद्दिट्ठी तेयालीसं पगडीओ न बंधति, तं०-अणंतरुत्ताओ छायालीसाओ मणुयाउगं देवाउगं तित्थगरनामं च अविरयसम्मो बंधा त्ति फेडिए सेसाणि तेयालीसं, ताओ मोत्तूण सेसाओ सत्तसत्तरि पगडीओ बंधइ त्ति । 'तेवण्ण देसविरओ' त्ति तेवण्णं पगडीओ देसविरओ न बंधति । काओ ? भण्णइ-जा असंजयसम्मद्दिट्ठी ण बंधति ताओ तेयालीसं, असंजयसम्मदिट्ठीम्मि दस वोच्छिज्जंति, तं०-अपच्चक्खाणावरणीया४ मणुयाउगं मणुस्सगई ओरालियसरीरं वजरिसभनारायसंघयणं ओरालियंगो- वंगं मणुयाणुपुत्री, एयाओ तेयालीससहियाओ तेवणं भवंति । एयाओ मोत्तूण सेसा सत्तही ता बंधति । 'विरओ सगप- ण्णसेसाओ' त्ति विरओ-पमत्तसंजओ सत्तावणं पगडी न बंधति । का ता ? पुच्चुत्ता तेवण्णं देसविरयम्मि पञ्चक्खाणावरण- चउकं वोच्छिजति । एएहिं सत्तावण्णं भवंति । एए भोत्तूण सेसाओ तेवढि ताओ बंधति ॥ ५६ ॥ उगुसद्विमप्पमत्तो, बंधइ देवाउँयस्स इयरो वि । अट्ठावन्नमपुत्बो, छप्पन्नं वा वि छबीसं ॥ ५७ ॥ उगुसहिमप्पमत्तो बंधति० ति । इयाणिं बंधियवाओ थोत्राओ ति ताओ भण्णंति-एगूणसट्ठी पगडीओ अपमत्तसंजओ बंधति । का ता ? जाओ तेवढि पमत्तसंजओबंधइ तम्मि छ पगडीओ वोच्छिजंति, तं०-असायं अरति सोग अथिरं असुभं अजसकित्ती, एयाओ मोत्तूण सेसाओ सत्तावणं, तम्मि आहारगसरीरं आहारगअंगोवंगं च बंधति, छूढे एगूणसट्ठी भवति । १ °सेस त्ति अ° का१ ॥ २ सेसा ते° का२ ॥ ३ इगुस रो२ ॥ ४ 'उगं च इ° से३ ।।

2 - 2 'देवाउगस्स इयरी विति देवाउग अप्पमचसनओ वि वति । एएण वयणेण किं भणिग भगति ? आउग पमनसजओ चेन पपति, तेण आदत कयाइ अप्पमत्तभावम्मि नि हो नि, अप्पमनो आउग न आढवेति षधिउ ति तस्मयणस्थ 'देवाउग इयरो वि' त्ति कय । 'अट्ठावण्णमपुरो छप्पण्ण या वि छबीस' वि । एगूणसडीओ दवाउग न घधति ति फेडिए अट्टा- वण्ण अपुबकरणो वधति साब जाव अपुवकरणद्धाए सखेजइमो मागो ति । तत्थ निदा पयलाण बधे वोच्छिण्णे छप्पण सो चेव बघति ताव जाय अपुवकरणद्धाए सखेबइमो भागो सेसो ति । तत्थ दवगड पचिदिपजाइ घेउविगा ऽऽहारग तेया-कम्म- इगसरीर समचउरससठाण वेउवा ऽऽहारगगोवग वण्ण गध रम फाम दरगइ-आणुपुछी अगरुलहु उपचाय पराघाय ऊमास पसत्यविहायगइ वस चादर पजत्त पचेग थिर सुभग सुस्सर आदल निमेण तित्थगरमिति । एयामि तीमाए पगडीण जुगव बधे वोच्छिष्णे छबीस पति सो पेव ताव जाय अपुवकरणद्वाए चरिमसमओ चि । एया अपुरकरणम्मि तिणि अवस्था भणिया ॥ ५७॥ वावीसा एगूण, वधइ अट्ठारस ति अनियही । सतरस सुहुमसरागो, सायममोहो सजोगि त्ति ॥५॥ पावीमा एगण बघा अट्ठारस चि अणियट्टि चि । चावीसमाइ काऊण एगूण पधद तार जाय अट्ठारस ति अणियट्टी, १ यीसंप खे ॥ २ रस तिम° से। खे ॥

तं०-२२ । २१ । २० । १९ । १८ । अपुवकरणस्स चरिमसमए हास-भय-रति-दुगुच्छाणं बंधे वोच्छिण्णे सेसा बावीसं, ता अणियट्टी बंधति, अट्ठाणवुती न बंधति ताव जाच अणियट्टिअद्धाए संखेजा भागा भवंति, एगो भागो सेसो ति । तत्थ पुरिसवेयस्स बंधे वोच्छिण्णे एकवीसं बंधइ, नवनउई न बंधइ ताव जाव सेसद्धाए संखेजइमो भागो ठिओ त्ति । तत्थ कोह- संजलणाए वंधे वोच्छिण्णे वीसं बंधइ, सतं न बंधइ ताव जाव सेसद्धाए संखेजइमो भागो ठिओ ति । तत्थ माणसंजलणाए बंधे वोच्छिण्णे एगूणवीसं बंधइ, एगुत्तरं सयं न बंधइ ताव जाव सेसद्धाए संखेजइमो भागो ठिओ त्ति । तत्थ मायासंज- लणाए बंधे वोच्छिण्णे अट्ठारस बंधइ, विउत्तरं सयं न बंधइ ताव जाव अणियट्टिअद्धाए चरिमसमओ त्ति । एया पंच अवस्था अणियट्टिम्मि भणिया । 'सत्तरस सुहुमरागो' त्ति सुहुमसंपराओ सत्तरसं कम्मपगडीओ बंधति । अणियट्टिचरि- मसमए लोभसंजलणाए बंधे वोच्छिण्णे सेसा सत्तरस-पंच णाणावरण चत्तारि दंसणावरण सायावेयणिय जसकित्ति उच्चा- गोयं पंच अंतराइयमिति । एया सत्तरस बंधति, तिउत्तरसयं न बंधति ताव जाव सुहमसंपराइगस्स चरिमसमओ त्ति । 'सायममोहो सजोगि' त्ति सायावेयणीयं कम्मं अमोहो वि बंधति । केदूर ? भण्णइ-जाव सजोगि त्ति । सुहुमरागस्स चरिमसमए पंच नाणावरण चत्तारि दंसणावरण जसकित्ति उच्चागोय पंचण्हं अंतराइयाणं बंधे वोच्छिण्णे सातस्स बंधो ताव अस्थि जाव उवसंत-खीणकसाय-सजोगिकेवलिचरिमसमओ त्ति । कम्हा ? जोगपञ्चइगं ति काउं । सेसाणं कम्माणं बंधो नत्थि । अजोगिकेवलिम्मि बंधपच्चयाभावाओ सबेसि पि बंधो नत्थि ॥ ५८॥ १ गा गय त्ति, एगो कार ॥

एसो उ वधसामित्चोहो गइयाइएसु वि तहेव । ओहाओ साहेज्जा, जत्थ जहा पगडिसम्भावो ॥५९॥ एसो उ बधसामित्तोपोगाहा । जो मिच्छहिडियाइ सजोगिपञ्जवसाणो बधमेदो मणिओ एसो बधसामित्तोपो वुच्चइ । 'गइयाइएसु वि वहेब' ति आएसेण गइयाइगेसु चोदससु मग्गणहाणेसु 'तहेव' ति जहा ओघे भणिय तहा 'ओघाओ साहेला' ओषमणियाओ बधविहीओ भणियविहीणा साहेत्तु भणेज । 'जस्थ जहा पगइसम्भावो' त्ति गइ-इदियाइसु जेणं पुण कारणेण जहा पगतिसन्मावो जुअइ ति भवपञ्चहग-गुणपञ्चहगेण जोगा जोग जाणितु भाणियह वि भणिय भवइ ।।५९॥ इदाणि संत पडुच्छ सबकम्माणि सबईसु अस्थि नस्थि चि तन्निरूवणस्थ मण्णइ- तित्थयर देव-निरयाउय च तिसु तिसु गईसु बोधव । अवसेसा पगडीओ, हवति सबासु वि गईसु ॥ ६ ॥ वित्यगर दव निरयाउ० गाहा । 'तित्थगर देवनिरयाउग च तिसु विसु गईसु पोछ' ति | वित्थगरनाम देवाउग निर याउगमिति एते तिष्णि वि तिस तिसु गतीसु अत्थिा निरयगति देवगति मणुयगति एयासु वित्थगरनाम अस्थि, तिरि- क्खेस तित्थगरसतकम्मिगो' न उववाह चि काउ तिरियगतीए वित्थगरसतकम्म नस्थि । तिरिक्त मणुय देवगतीसु देवा उर्ग अस्थि, नेरगा देवाउय न यधति न उवचजति ति काड, तेण निरयगईए देवाउग नत्थि । तिरिय मणु-नेरइएसु एएस १ण जेण पगारण जहा कार ॥२'गो नोवव का।।

तिसु निरयाउगं अत्थि, देवा निरयाउगं न बंधंति न उववजंति ति काउं, तेण देवेसु निरयाउगं नत्थि । 'अवसेसा पगईओ भवंति सबासु वि गतीसु' सेसाओ सबपगईओ सवगतीसु वि संतकम्मं पडुच्च अत्थि ॥ ६०॥ इदाणिं उवसमणाए अवसरो पत्तो, तं भण्णइ- पढमकसायचउकं, दंसणतिग सत्तगा वि उवसंता । अविरयसम्मत्ताओ, जाव नियहि त्ति नायवा ॥ ६१ ॥ पढमकसायचउकं० गाहा । पढमकसाया-अणंताणुबंधिणो४ 'दसणतिगं' सम्मत्त-मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्तादि 'सत्त- गा वि त्ति एयाओ सत्त वि कम्मपगडीओ ' उवसंत' ति उवसामियाओ । 'अविरयसम्मत्ताओ जाब नियट्टि' त्ति अविर- यसम्मदिद्वि-संजयासंजय-पमत्ता-ऽपमत्तसंजय-अपुवकरणा एएसु सवेसु उवसंता लभंति । किं भणियं भवइ ? अपुवकरणं मोत्तूण सेसा एएसि उवसामगाउ, अपुवकरणम्मि नियमा उवसंता लभंति । तत्थ उवसामणा अणंताणुबंधीणं भण्णइ-असंजयातीणं तिण्हं अण्णयरो अण्णयरे जोगे तिहिं विसुद्धाहिं लेसाहिं सागा- रोवओगे य वट्टमाणो अंतोकोडाकोडीठितिसंतकम्मिओ परियट्टमाणीओ सुभपगतीओ चेव बंधति । समए समए असुभाणं कम्माणं अणुभागं अगंतगुणहाणी पकरेति, सुभाणं कम्माणं अणंतगुणवड्डी पकरेति। ठितिबंधे वि पुण्णे पुण्णे पलिओवर्मसंखे- १ मस्स संकार ॥ .

। जहमाग ओसरिजण पड़ । करणकालाओ पुब पि अंतोमुत्त विसुज्झतो अच्छति। अच्छित्तु एस्थ तिण्णि करणाई करेइ अतो सहुत्तिपाइ, त जहा-अहापवत्तकरण अपुखकरणं अणियट्टिकरण ति । चउत्थी उपसतद्धा । तत्थ अहापत्तकरण नाम समए समए अणतगुणाए विसोहीए वकृति, न तत्थ ठिविषाओ का स्मधाओ वा गुणसेही वा गुणसकमो घा अस्थि । तत्थ असखे- अलोगागासपपसमेचाणि रिसोहिडाणाणि । जे पढमसमए पडिरसति तेमि छडाणवडियाणि असखेजाणि ठाणाणि । तत्थ पदमसमए जहष्णिया विसोही थोपा, पितिपसमये जहणिपा विसोही अणतगुणा, ववियसमए जहणिया विसोही अणतगुणा, । एव जाव तस्स करणस्म सखेजइमागो चि । तो पढमसमए अहापवत्तस्स उकस्सियाए विमोहीए पडिवण्णस्स जा विसोही सा अणवगुणा, तओ जो जइण्णियाओ नियत्तो ती उचरिश्लप जहण्णय घिसोहिट्ठाण अणतगुण, तओ पितियसमए उकस्मिया विसोही' अणवगुणा, तओ उपरिल्ल जहण्याय ठरण अणवगुण, वो उतियममए उकस्मिया विसोही अण तयुमा । एव बहण्णय उकस्सिय च अमुयतेण अणतगुणाए सेदीए नेय जाव अहापपत्तकरणस्स अतिमजहण्ण ति। तो उकस्साणि ठाणाणि अणतगुणाए सेटीए नेयवाणि जाच अहापवत्तकरणस्स दुचरिमाओ उकसियाओ ति । दुचरिमा उक्क स्सियाओ विसोहीओ चरिमसमय उकस्सिया विसोही अर्णतगुणा । एव अहापवचकरण भणिय। अपुवकरणस्स असखेजलोगागासपएसमेचाणि विसोहिठाणाणि । तस्स पढमसमए पडिवलमाणाण उड्डाणपडियाणि असखेलाणि ठाणाणि । वत्थ पदमसमए जहणिया जा विसोही थोना, मा य अहापवनचरिमसमयचरिमाणचिसोहीओ १बी एव अकार वि अणंतगुणा, तओ अपुत्वकरणस्स पढमसमयम्मि चेव उक्कस्मिया विसोही अणंतगुणा, तओ बितियसमए जहणिया विसोही अणंतगुणा । एवं जहण्णयं उकस्सयं च सेढीए नेतन्वं जाव अपुवकरणस्स चरिमसमओ ति । अपुवकरणस्स चरिम- समए जहणिया विसोही दुचरिमसमयउकस्सगाओ विसोहीओ अणंतगुणा, तस्सेवुकस्सिया विसोही अणंतगुणा । अपुत्व- करणं ति किं भणियं भवइ ? अपुर्व अपुर्व किरियं नियच्छति त्ति अपुवकरणं । तस्स पढमसमए ठितिघाओ रसघाओ गुण- सेढी गुणसंकमो अण्णो ठितिवंधो य जुगवं पंवत्तंति [ ति ] अपुवं करणं भण्णइ । तत्थ ठितिघाओ नाम ठितिसंतकम्मस्स अग्गग्गाओ उक्कोसेणं सागरोवमसयपुहत्तं जहण्णेणं पलिओवमस्स असंखेजइभागं ठिति छिदित्तु तं दलियं हेढओ जाओ ठिती- ओ न खंडेति तत्थ छुभति । अंतोमुहुत्तेण तं दलियं उकिरति । तओ पुणो हेटाओ पलिओवमस्स संखेजइभागं तेणेव कमेण छिदति निखिवति य । एवं अपुवकरणद्धाए ठितिखंडसहस्साणि बहूणि गयाणि भवंति । तओ अपुवकरणद्धा समत्ता भवति । अपुवकरणस्स पढमसमए जं ठितिसंतकम्मं तं तस्सेव चरिमसमए संखेजगुणहीणं जाय । तत्थ अणुभागघाओ णाम जं असुभपगतीणं अणुभागसंतकम्मं तस्स अणंतिम भागं मोत्तूण अंतोमुहुत्तेण समए समए अणंता अणुभागा विणासिज्जति । तओ पुणो सेसस्स अणतिम भागं मोत्तूण अंतोमुहुत्तेण अणता भागा विणासिज्जंति । एवं पुणो पुणो एगम्मि ठितिखंडगकाले अणेगाई अणुभागखंडगसहस्साई जति । एवं बहूहिं ठितिखंडेहिं अपुवकरणं परि- समत्तं भवति । १ पत्त त्ति अ° कार ॥

तत्य गुणसेदी णाम कालओ अपुवकरणद्धाओ अणियष्टिकरणद्वाओ य विसेसाहिगो गच्छो दृषिजति । अवोमहत्त- पमाणमेचासु ठितिसु उवरिलाउ ठितीउ दलिय घेतूण उदयावलियाउ उवरिल्लीसु ठितीसु अवोमुत्तप्पमाणमेत्तासु दलिय निखिवति । ज पढमसमए निखिप्पमाण दलिय त गुणसेडीए मूलिल्लठितीए थोष, तो वितियठितीए असखेजगुण, एव जाव अंतोमुहुत्त अंतिमिया ठिति ति । एव वितियसमयगहिय पढमसमयगहियाओ दलियाओ असखेजगुण नेयद । विति यसमए वि निखिप्पमाण एव चेव माणियक्ष । एव ततियसमए वि गहण निक्खेवाइ नेयवाइ । गुणसेढीनिक्खेवो सेसे सेसेसु समएन । एसा गुणसेटी। गुणसंकमो नाम-अपुवकरणस्स पढमसमए जं परपगइ सकामेइ अणताणुषधियाईण असुहाण दलिय त थोर, विति यसमए ज परपगइ सकामिअति त असखेजगुण, तवियसमए असखेजगुण, एव नेयह । एसो गुणसकमो । अण्णो ठिविवधो ति अपुचकरणस्स पदमसमए अण्णो खुडलओ ठितिवधो आदविक्षति | ठितिबधो ठितिखडग च जुगव आढप्पति जुगव च निढविजति । एव एए पाहिगारा अपुष्करणस्स पढमसमए जुगव आदविलति । एव अपु बकरण भणिय। अणियट्टिकरणं णाम अण्णोण नाइबद्दति परिणामादीहिं ति अणियट्टी । किं भणिय भवइ ? भण्णह-अणियट्टिट्ठाण जे पदमसमए पडिवण्णा वेसि सबेसि परिणामो तल्लो, बितियसमए वि जत्तिया वट्टति तेसि ससिं परिणामो तुलो, एव १ स्वस्तिकविकान्तर्वती पाठ कारप्रतेरस्ति ।

। नेया ताव जाव चरिमसमए वि सवेसि तुल्लो परिणामो । अणियट्टीकरणस्स परिणामट्ठाणाणि अंतोमुहुत्तप्पमाणमेत्ताणि । अणियट्टिकरणस्स एकम्मि एकम्मि समए वट्टमाणाणं विगप्पो नत्थि । तस्स वि पढमसमए पुन्वुत्ता पंच अहिगारा जुगवं पवत्तंति । एवं अणियट्टिअद्धाए संखेजेसु भागेसु गएस अणंताणुबंधीणं अंतरं करेति, हेट्टओ आवलियामेत्तं मोत्तूणं । तओ उपरि अंतोमुहुत्तमेत्तं ठिति खंडइ । तत्थ उकिरिजमाणं दलियं परपगतीसु बज्झमाणासु संकामेति । अंतोमुहुत्तेणं ठिति- बंधगद्धाए समं अंतरं कीरमाणं कयं भवति । तओ दुसमयकए अंतरे चत्तारि वि पढमकसाए जुगवं च उवसामेति, तम्मि चेव समए पढमट्ठितिआवलियागयं दलियं थिबुगसंकमेणं वेदिजमाणीसु पगडीसु संछुभति उवरिमठितिगयं च उवसामेति । उवसामणा णाम जहा धूली पाणिएण सित्ता दुहणादीहिं कोट्टिया निप्फंदा भवति, एवं कम्मधूली वि विसोहिपाणियपरि- सित्ता अणियट्टिकरणकिरियाकोट्टिया उदय-उदीरण-संकम-णिहत्ति-णिकायणाणं ण जोग्गा भवति । तं पढमसमए थोवं दलियं उवसामेति, वितियसमए असंखेजगुणं दलियं, तइयसमए असंखेजगुणं, एवं जाव अंतोमुहुत्तं कालं । एवं अणंता- गुवधिणो उवसंता भवंति । एवं एकीयमएण भणियं । अण्णेसिं आयरियाणं अणताणुबंधीणं उवसामणा नाम नत्थि, विसंजोयणा णाम अणंताणुबंधीणं भवति । ते कहं विसंजोइजति ? भण्णइ-पुव्वुत्ता असंजयादओ तिण्णि वेदगसम्मद्दिविणो चउगइगा-नारग-देवा अविरयसम्मट्ठिी, तिरिया अविरयसम्मद्दिट्ठी देसविरया य, मणुया अविरया देसविरया विरया य । एए जहासंभवं विसोहिवेगेण परिणया अर्णताणुबंधिणो विसंजोयणथं तिण्णि करणाई करिति, तं०- अहापवत्तं अपु- १ सामिप तम्मि स ॥ ११ . पकरण अणियहिकरण च । करणाण लक्खण पुन्बुत् । पूर्ववत् ठितियायादि जाव अणियट्टिकरण पत्तो अणताशुषधिणो ठिति उपतो उबडेतो पलिओवमस्स असखेजइमागमेत करोति । उट्टणाविही जहा कम्मपगडीसगहणीए उबलणसकमे दहा माणियव । त पलिओवमस्स असखेजविभागठिविकय पज्झमाणियासु मोहपगवीस परिणामेति । पढमसमए थोष परिणा- मेति, वितियसमए असखेजगुण, एव जाव चरिमसमए सइसकमेण असखेजगुण परिणामेति, आवलियागय मोत्तण । आव लियागय थियुकसकमेण वेदिञ्जमाणीस पगडीसु सकामेति । एव अणवाणुवषिणो विसजोड्या भवति ताहे चउचीससवक म्मिओ भवति । अणवाणुबधीण बिसजोयणा भणिया । इदाणिं दसणतिगस्स उक्सामणा भण्णति-तत्थ मिच्छत्तम उवमामगो मिच्छद्दिट्ठी वेदगमम्मट्टिी य, इयरेसिं दोण्ह ।। वेयगसम्माहिटी चेव उवसामगो । तत्थ मिच्छहिहिस्स मिच्छत्तउक्सामणे विही जहा कम्मपगडीसगरणीए पढमसम्मत्त । उप्पाएत सा चेव माणियबा, नवरि मिच्छहिडिस्म चेत्र सम्मत्त देमविरह मजविरह वा सम्मचसहिय पडिवजमाणस्स, त पडुच असजय दसविरय पमचा ऽपमचसजएसु दरिमणतिग उवसत लन्मइ, सेढीओ वा परिवाडियाण असजयादीण। इयाणि वेयगसम्मद्दिहिस्स मिच्छतादितिग उवसामेन्तस्स विही भणति-सो उपसमसेदि पडिजिउकामो पदम अणता- गुवधिको विसजोएति, ते विसजोएन्तस्स विही मणिओ | तओ अतोमुहुरेण दसणमोहविग सजमे बद्दमाणो उवसामेति, अणताणुषधिणो विसजोएन्वस्स जाणि करणाणि अहापवत्तादीणि परूविताणि जाव अणियद्विअाए अन्तरकरण कय वि १ मिच्छदिही वेगसम्मदिही' सैटिप्पनकम् ॥

ताव एत्थ वि तहा चेव भाणियत्वं । अंतरकरणं करेंतो वेदगसम्मत्तस्स पढमट्टितं अंतोमुहुर्त दुवेति, सेसाणं दोण्हं आवलिय- मेत्तं पढमठिति ठवेत्ता किंचूणमुदुत्तप्पमाणमेत्तं ठितिं खंडेति । बज्झमाणीणं पगतीणं ठितिबंधद्धापमाणमेत्तेण कालेणं उक्कि- रिजमाणं दलियं सम्मत्तस्स पढमहितीए पक्खिवति, सम्मत्तस्म बंधाभावाओ । एवं अंतरं कीरमाणं कयं भवति । मिच्छत्त- सम्मामिच्छत्ताणं पढमद्वितीओ सम्मत्तस्स पढमठितीए थियुगसंकमेणं संकामेति । एवं सम्मत्तस्स पढमद्वितीए झीणाए उव- समसम्मट्ठिी भवति । एवं तिणि वि उवसंताई बुचंति । तओ अंतोमुडुत्तेण उवसंतदसणमोहणिज्जो चरित्तमोहं उवसामे- उकामो अहापवत्तादीणि तिण्णि करणाणि करेति । तेसिं लक्खणं पुन्वुत्तं, नवरि अहापवत्तकरणं अपमत्तगुणट्ठाणे भवति, अपुवकरणं अपुवकरणगुणट्ठाणम्मि चेव । तत्थ द्वितिघायादीणि पुव्युत्ताणि । नवरि सवासिं असुभपगतीणं अवज्झमाणीणं अपुवकरणपढमसमए चेव गुणसंकमो पवत्तति । अपुवकरणद्धाए संखेजइमे भागे गए निदा-पयलाणं बंधो वोच्छिजति । तओ बहहिं ठितिखंडगसहस्सेहिं गएहिं अपुवकरणद्धाए संखेज्जा भागा गया भवंति । तत्थ परभवियाणं नामाणं तीसाए पगडीणं बंधवोच्छेदो भवति । तओ ठितिखंडगपुहत्ते गते अपुवकरणद्धाए चरिमसमए हास-रइ-भय-दुगुंछाणं चउण्हं कम्माणं वंधवोच्छेदो, हास-रति-अरति-सोग-भय-दुगुंछाणं च छण्हं कम्माणं उदयवोच्छेदो य, सबकम्माणं च अपसत्थउवसमणा- निहत्ति-निकायणाकरणाई च वोच्छिज्जति । एएसु असंजयादि-अपुर्वतेसु सत्त कम्माणि उत्रसंताणि लब्भंति । 'सत्ता नव य पनरम, सोलस अट्ठारसे व 'उगुवीसा । एगाहि दु चउवीसा, पणुवीमा वायरे जाण ।। १ गाथेमा सर्वेपु मूलसूत्रादर्शेषूपलभ्यते ॥ २ उगवी खे२ ॥

, सत्तहनव० गाहा । तओ वितियसमए अणियडिओ जाओ। अणियट्टिम्मि वि ठिविधायादीणि तहेव । एच ठितिसत- कम्म मोहस्स परिहायमाण परिहायमाण अणियविस्स पदमसमयद्वितिसताओ' सखेजगुणहीन जाय । अणियट्टिअद्धाए सखे- जेसु भागेसु गएस ताहे एकवीसाए पगतीण अंतर करेइ । एत्थ अपुवकरण अणियट्टिअद्धासु अणेगाइ वत्तबगाइ जहा कसायपाहुढे कम्मपगडिसगहणीए वा वहा वचन्छ । अतर किच्चा नपुमगवेद उवमामेइ, उवसामणाविही पूर्ववत् । : एव अड्ड उवसताणि । तओ अतोमुडुत्तण इस्थिवेय उवसामेह, उवसामिए नव । तओ अतोमुडुत्तेण छन्नोकमाए उक्सामेह, एव पण्णरस उपसता भवति । तम्मि पेष समए पुरिसवेयस्स वधोदयवोच्छेओ भवति । तओ समऊणदुआवलियाहिं पुरि- सवेय उवसामेह, उपसते सोलस । तओ अतोमदुत्तेण अपञ्चक्खाणावरण-पच्चस्खाणावरणकोहे दो वि जुगर उवसामेइ, एर अट्ठारस । सम्मि चैव समए कोहसजलणाए पोदयोदीरणावोच्छेओ य । तओ समऊणदुआचलिएहिं कोहसजलण उर सामेह, एगूणवीस । तो अंदोमुहुत्तेण अपञ्चक्खाणावरण पञ्चक्खाणावरणमाणे दो वि जुगव उयमामेह, उपसते एकत्रीस । सम्मि व समए माणसजलगाए बधोदयोदीरणावोच्छेओ य । तओ समऊणदुआचलिएहिं माणसजलण उवसामेति, उस सवे कावीस । तो अवोमुडुत्तेण अपचक्खाणावरण पचक्खाणाचरणमायाओ दो वि जुगव उचमामेइ, उवसते चउबीस । तम्मि क्षेत्र समए मायासजलणाए बधोदओदीरणावोच्छेओ य । तओ सेकाले लोभवेयगो लोभवेयगद्धाए दोसु तिमागेसु बीयडिवीओ दलिय आणेत्तु पढमहिति करेति । तत्थ पढमो तिमागो अस्मकपणकरणद्धा, तम्मि विसोहीए वट्टमाणो अपु- १ ओ भससे कार ॥२ घोच्छिन्नति । वमो स कार ॥

बफडगाई करेइ । मायासंजलणाए बंधे वोच्छिण्णे तओ समऊणदुआवलिएहि मायासंजलणं उवसामेइ, उपसंते पणुवीर्स । अस्मकण्णकरणे वट्टमाणो एवं अस्सकण्णकरणद्धाए कयाए तओ लोभवेयगद्धाए विइए तिभागे वट्टमाणो लोभसंजलणाए किट्टीओ करेइ जाव अंतगयं । किट्टीकरणद्धाए चरिमसमए अपचक्खाणावरण-पञ्चक्खाणावरणलोभे दो वि जुगवं उचसा- मेह, उपसंते सत्तावीसं उवसंता भवंति । तम्मि चेव समए लोहसंजलणाए बंधवोच्छैओ बायरलोभोदयवोच्छेओ य । तओ सेकाले सुहुमसंपराइओ होइ । किट्टीकयाओ दलियाओ आणेत्तु पदमट्टिर्ति करेइ वेएइ य । 'सत्तावीस सुहुमे, अट्ठावीस पि मोहपयडीओ । उक्सतवीयरागे, उवसता होति नायव्वा ।। सत्तावीसं सुहुमे० गाहा । सत्तगाओ आढवेत्तु जाव पणुवीसं ताव बायरो त्ति अनियट्टी तम्मि उपसंताई लभंति । सत्तावीसं सुहुमरागम्मि उवसंताई लभंति । सुहुमसंपराइगद्धा अंतीमुहुत्तं, तम्मि काले सुहुमकिट्टीकयं समऊणदुआवलिय- बद्धं च उवसामेति । सुहुमसंपराइगस्स चरिमसमए लोभसंजलणा उवसंता भवति । तम्मि चेव समए पंचन्हं णाणावरणी- याणं चउन्हें दंसणावरणीयाणं पंचण्डं अंतराइयाणं जसकित्ति उच्चागोयस्स य बंधवोच्छेदो । तओ सेकाले उवसंतकसाओ भवति, तम्मि 'अट्ठावीसं पि मोहपगडीओ उवसंतवीयरागे उवसंता हुंति नायव 'त्ति उवसंतकसायम्मि अट्ठावीसं पि मोहपगडीओ उवसंताओ भवंति । उवसंवत्ताओ वीयरागो उवसंतवीयरागो, सो जहण्णेणं एकं समयं उक्कोसेणं अंतोमुहुत्तं कालं लभइ । तस्स परिवडणं नियमा भवक्खएण वा अद्धाखएण वा । भवक्खओ मरंतस्स, अद्धाखओ उवसंतद्धाए पुण्णाए १ इमा गाथा विष्वपि मूलसूत्रप्रतिषु वियते ॥ २ संच मो से२ ।।

परिवहति । सो अहा आरुढो तहा घेव परिवडति, जहिं उदओदीरण वधादओ ठिया वहि तहिं पग्विडतस्म ते आढवि अति, एव जाब पमत्तसजओ वाव परिवति, तओ हेडिल्ल अणतरदुग पि कोइ पारड, मामणभार पि गच्छति कोइ । जो भवक्खएण परिवडति तस्स पहमममए चैव सबकरणाइ पवत्तति । एम विसेमो-उकोसेण एगभवे दो चाराओ उवमम सेटिं पडिवजति, जो दुवे वारे उवसमसेटिं पडिवजह तस्म नियमा तम्मि भवे खवगसेदी नस्थि, जो एकमि उपममसेटिं पडिवाइ तस्स खवगसेढी होआ था । विसेसफ्वचो जहा कम्मपगडिसगहणीए ।। ६१ ॥ एव उसमसेटी पलविया । इदाणि खवगसेढी भण्णइ- पढमकसायचउक, इचो मिच्छत्तमीससम्मत्त । अविरयसम्मे देसे', पमत्त अपमत्त खीयति॥ १२॥ पढमकसायचउक० गाहा । जो खवगसेटिं पडिपजति सो नियमा मणूसो अहवामाओ उपरि घट्टमाणो । सो पढममेव : अणताणुषधिणो विसजोएइ वा खबेइ ति वा एगट्ठ । विसजोयविही पुषभणिया वहा चेर । एव अणताणुवषिणो विसजो- एत्तु 'एतो मिच्छचमीससम्मत्त' ति तओ अनोमुहुत्तेण दमणमोहखवणस्थ तिणि करणाणि करेइ, करणाण लक्षण पुब्बुत्त जाव अणियष्टिकरण वार पूर्ववत् वक्तव्यम् । अणियट्टिद्धाए वट्टमाणो दमणतिगस्स ठितिसत उबद्रुतो उपटेंतो पलिओवमस्स असंखेाइमाग करेइ, तओ मिच्छचदलिय सम्मामिच्छत्त सम्मत्तेसु पक्खिवति-पढमसमए थोष, वितिय- १ से, विरय पमतऽप्पमत्ते य खी खे। स्वर ॥

समए असंखेजगुणं, एवं जाव अंतोमुहुत्तेण कालेणं सवं संकामेति । चरमसमए आवलियागयं मोत्तूण सेसं सबसंकमणाए संकामेति, एवं मिच्छत्तं खवियं भवति । तओ अंतोमुहुत्तेणं सम्मामिच्छत्तं पि एएणेव कमेणं मम्मत्ते पक्खिवति, एवं सम्मा- मिच्छत्तं खवियं भवति । तओ मम्मत्तं उबट्टिजमाणं उवट्टिजमाणं अंतोमुहुत्तेणं कालेणं अंतोमुहुत्तठितीयं जायं। तं कमेण वेदिजमाणं वेदिजमाणं समयाहियावलियसेसं जाय, तम्मि समए उदीरणा फिट्टति । तओ उदएण चेव वेदेंतो वेदेंतो चर- मसमयवेयगसम्मद्दिट्ठी जाओ । तओ सेकाले खइगसम्मट्ठिी जाओ । एवं दंसणतिगस्स खवणा भणिया। एए सत्त कम्मंसे को खवेति ? भण्णति-'अविरयसम्मे देसविरय-पमत्ता-ऽपमत्ते य खीयंति 'त्ति । असंजयसम्मदि- हीपभिति जाव अप्पमत्तसंजओ ताव एए सत्त वि कम्मसे खवेति । जइ बद्धाउगो तो एत्थं चेव द्वाति । अवद्धाउगो तो अंतोमुहुत्तेणं पुणो चरित्तमोहखवणनिमित्तं अहापवत्ताईणि तिण्णि करणाणि करेति । तेसिं लक्खणं परिभासा य पुव्वुत्ता । अणंतर जहा उवसामगस्स तहा चेव द्वितिघायादीहिं कम्माणि खविजमाणाणि खविजमाणाणि अणियट्टिअद्धाए पलिओव- मस्म असंखेजहभागमेत्तठितिगाणि जायाणि । अणियट्टिवायो योणगिद्धितिग णिरयतिरियणामाउ । संखेज्जइमे सेसे, तप्पाओगाउ खीयति ॥ अणियट्टिबायरे थीण० गाहा । अणियट्टिअद्धाए असंखेजेसु भागेसु गतेसु थीणगिद्धितिग निरयगति तिरियगति एगि- दिय-०-०-चउरिदियजाइ निरय-तिरियाणुपुबीओ आयाव उज्जोव थावर सुहुम साहारणमिति एएसिं सोलसण्हं कम्माणं १ सर्वास्वपि मूलसूत्रप्रतिषिय गाथोपलभ्यते ॥

उबलणविहिणा उद्विजमाणा उपविजमाणा पलिओवमस्स असखेजइभागमेचा ठिती जाया। तो बज्ममाणियासु गुण- संकमेण छुम्मवाणि छुर्भताणि खीणाणि भवति । 'एतो हणइ कसायहग पि पच्छा पुसग इति । तो जोकमायछक, छुम्मद सजलणकोहाम्म । एत्तो हणह० गाहा अट्ट कसाया-अपचक्खाणावरण पञ्चक्खाणावरणा। एए अट्ट वि पुत्र खवितुमावत्ता अतोमुहुच खवि अमाणा खविजमाणा गया न ताव खविया । वत्थ किर सोलम पुग्वुवाणि कम्माणि सविउमादत्ताणि सविजमाणाणि खविल । माणाणि अतरे खीणाणि भवति । पच्छा अट्ठ कसाया उचलणविहिणा अदोमुहुनेण खीयति ति । एय एगेसि मत । अपणे यायरिया भणति-सोलस कम्माणि पुब खविउमाइरिङ्गति, तओ अतरे पुत्र अडकमाया खीयति, पच्छा सोलमकम्माणि, एम सुत्ताएसो । तओ अतोमुहुत्तेण गवण्ह नोकसायाण चउण्ह सजलणाण च अतरकरण करेति । अतरकरणविही जहा कम्म- पगडीसगहणीए । अतर करतु नपुसगवेय खवेत्तुमाढवेति, खवणविही उबलणालक्खणेण । अवरकरणस्स उपरिमठिति दलिय उवडिलमाण उबविजमाण पलिओवमस्स असखेजदमागमेत जाय । तओ त परपगईसु असखेजगुणेण सछुन्ममाण । सछुम्ममाण अतोमुहुचेण सड़ मवति । एव नपुमगवेदो खीणो । तओ अंतोमुहुर्तण इस्थिवेदो वि य एएणेच कमेण खय गच्छति । तओ सत्त वि नोकसाए जुगव खवेत्तुमाढवेति । तओ पमिति छण्णोकसाया पुरिसवेदम्मि न सकमति, कोहस- जलगाए सकमति । वओ खविजमाणा खविजमाणा अतोमहत्तेण 'तो नोकसायछक पि छुमति सजलणकोहम्मि' ति १-२ माण स ॥ ३ गायेमा सर्वेष्वपि मूलसूत्रादाधु लभ्यते । - छन्नोकसाया कोहसंजलणाए संछुद्धा । तम्मि चेव समए पुरिसवेयस्स बंधोदयोदीरणवोच्छेओ, समऊणदुआवलियबद्धं मोतूण सेसदलियखओ य, तओ सेकाले अवेयगो । कोहं वेदेमाणस्स कोहद्धाए तिण्णि तिभागा-अस्सकपणकरणद्धा किट्टिकरणद्धा किट्टिवेयगद्ध त्ति । तत्थ अस्सकण्णक- रणद्धाए वट्टमाणो अणंताई समए समए अपुवफड्डगाईचउण्हं संजलणाणं करेति । किट्टिकरणद्धाए वट्टमाणो समए समए चउण्हं संजलणाणं बारस किट्टीओ करेति, एकेकस्स कसायस्स तिष्णि तिण्णि पढमकिट्टी वितियकिट्टी ततियकिट्टि ति । एवं कोहेण पडिवण्णस्स । माणेण पडिवण्णो कोहे खविए उबलणालक्खणेणं सेसाणं तिण्ह कसायाणं नव किट्टीओ करेति पुवक- मेणं । मायाए पडिवण्णो कोह-माणेहिं खविएहिं सेसदुगस्स छकिट्टीओ करेति पुचकमेणं । लोभेणं पडिवण्णो हेट्ठतिगे खविए लोभस्स तिणि किट्टीओ करेति । एसा किट्टीकरणविही। तत्थ किट्टीवेयगद्धा-किट्टीकरणद्धाए निट्टियाए कोहेण पडिवण्णो सेकाले पढमकिट्टीदलियं वितियठितिगयं उकड्वेत्तु पढमठितियं करेइ वेदेइ य । पढमट्ठितिकरणं जहा कम्मपगडिसं- गहणीए । तं कमेण वेदेति जाव समयाहियावलिया सेस ति। तम्मि समए वितियकिट्टीओ दलियं उकड्डित्तु पढमठिति करेइ वेदेइ य, तं पि कमेण वेदेति जाव समयाहियावलिया सेस त्ति । तओ सेकाले कोहस्स ततियकिट्टीओ दलियं कड्डित्तु ततियकिट्टीए पढमठिर्ति करेति वेदेति य ताव जाव समयाहियावलिया सेस ति ॥ ६२ ॥ पुरिसं कोहे कोहं, माणे माणं च छुहइ मायाए । मायं च छुहइ लोभे, लोभं सुहुमं पितोहणइ।। ६३ ॥ १ में च तो खे२ । 'म पि सो ह' खे३ ॥

पुरिर्स कोहे. गाहा । पुरिसवेयस्स बधे कोच्छिण्णे वओ समपूणदुयावलियमेषेण कालेण अस्सकपणकरणद्वाए वड्डमाणी पुरिसवेयं धैर्देवो कोहम्मि सदसकमणाए सछुमति । एव पुरिमवेओ खीणो भवति । 'कोह माणे ति विसु वि कोहवैद गद्धासु वकुमाणो कोहसजलण माणसंबलणाए य खिवतो खिवतो जाव ततियकिहिवेदगराए चरिमममओ ताव आगओ, तम्मि समए कोहसजलगाए बधोदोदोरणा य जुगव फिकृति, सवक्रम्म पि समयणदुआवलियवद्ध मोतूण सह माणम्मि परिखत, तओ सेकाले माणस्स पढमकिडीओ दलिय ओकडिनु पढमठिति करेति वेदेह य वात्र जाच अवोमुडुत्त । कोहस्स वये बोच्छिण्णे कोहसजलणाए दलिय ओफद्विति, तो समऊणदुआवलियमेत्तेणं कालेण खीयमाणं खीयमाण माणम्मि सबसकमेण सकमति । एव माणस पठमकिवीए पढमट्टिई समयाहियावलिया सेस चि । तओ सेकाले माणस्म चितियकि डीओ दलिय उडिन्तु पदमठिति करेह वेदेड य कमेण वाव जार ममयाहियावलिया सेम ति । ततो सेकाले माणस्स ततियकिडीओ दलिय उकाडतु पदमाहिति करेति वैदइ य कमेण वार जाव समयाहियानलिया सेम ति । तम्मि समए | मरणस्स बधोदओदोरणा य जुगल फिति, सतकम्म पि समयूणदुआरलियाबद्ध मोत्तूण सेस पब मायाए सछुद्ध । 'माणे च छुमति मायाए' ति तओ सेकाले मायाए पदमकिट्टीओ दलिय ओकडेच पदमठिर्ति करेइ वेदेह य कमेण वार जाव अंतीमत्त काल । भाणसजलणाए पवे कोच्छिण्णे वओ समऊणदुआवलियमेषेण कालेण मायासजलणम्मि सबसकमेण माणं सछुमति । तओ मायाए पढमकिडीए पढमठितीए ममयाहियावलियाए सेसाए तओ सेकाले मायाए मितियकिट्टीओ दलिय ओकवि पढमठिति कोइ चैदेड य ताच जार ममयाहियावलिया सेम चि । शो सेकाले मायाए ततियकिडीओ दलियं ओकड्डित्तु पढमठिति करेइ अंतोमुहुत्तप्पमाणं वेदेइ य ताव जाव समयाहियावलिया सेस त्ति । तम्मि समए मायाए बंधोदओदीरणा य जुगवं फिटृति, संतकम्मं पि समऊणदुयावलियवद्धं मोतूण सेसं सवं लोभसंजलणम्मि पक्खित्तं । तओ सेकाले लोभस्स पढमकिट्टीओ दलियं ओकड्डित्तु पढमठिति करेइ अंतोमुहुत्तप्पमाणमेतं, तं च लोभवेयगद्धाए तिभागो वेदेइ य । मायासंजलणाबंधे वोच्छिण्णे तओ समऊणदुआवलियमेत्तेणं कालेणं लोभम्मि मायासंजलणा सबसंक्रमेण संकंता भवति, 'मायं च छुभति लोभे ति गयं । एवं लोभसंजलणाए पढमकिट्टीओ पढमहिती समयाहिश्रावलियसेसा जाया । तओ सेकाले लोभस्स बितियकिट्टीओ दलियं ओकड्डित्तु पढमहितिं करेइ बीयतिभागमेत्तं । तं वेयंतो वितियकिट्टीओ तइयकिट्टीओ य दलियं घेत्तूणं सुहुमसंपराइयकिट्टीओ करेइ । तेसिं लक्खणं जहा कसायपाहुडे । एवं अंतोमुहुत्तं किट्टीओ करेति ताव जाव लोभस्स वितियकिट्टीए पढमहिती समयाहियावलियसेस त्ति । तम्मि समए लोभसंजलणाए बंधवोच्छेओ बायरकसा- याणं उदओदीरणावोच्छेओ य अनियट्टिकालवोच्छेओ य जुगवं भवंति । तओ सेकाले सुहुमसंपराइगकिट्टीओ दलियं ओक- ड्डित्तु पढमट्टिर्ति करेइ ततियतिभागमेत्तं वेदेइ य । तओ सुहुमसंपराइओ बुच्चइ । अतीयम्मि आवलिया छड्डियाओ ताओ सवत्थ वेतिजमाणीसु थिबुगसंकमेणं विपञ्चंति । एसो पुवमवक्खाणिओ अत्थो, अओ इयाणि मणितो । 'लोभं सुहुमं पि तो हणति' ति सो सुहुमसंपराइगो लोभस्स सुहुमकिट्टि वेदेमाणो सुहुमकिट्टीकयं दलिय समयूणदुआवलियबद्धं च समए समए खवेइ ठितिघायादीहिं । एवं जाव सुहुमसंपराइगद्धाए संखेजा भागा गय त्ति । तओ संखेजइमे लोभसंजलणं सबोवणाए उबढेत्तु सेससहुमसंपराइगद्धाए संकमं करेइ, सा य अंतोमुहुत्तमेचा । तओ पमिति मोहस्स ठितिघाओ नत्थि, सेसाणं कम्माण ठितिघातादओ पवचति चैव । त ओवट्टियाठिति उदओदीरणाहिं वेदतो घेदेंतो गओ ताव जाव समयाहियारलिया सेस ति । तम्मि समए उदीरणा पुखुचा फिडा । उदएण चेव वेदेति ताव जाव चरिमसमओ त्ति । तम्मि ममए सुकुमस पराइगस्स पचण्ह णाणावरणाण चउण्डं दसणावरणाण जसकित्ती उच्चागोय पचण्हमतराइगाण एएसिं सोलसण्ह कम्माण बधवोच्छेओ मोहणिजस्स उदय-सतवोच्छेदो य भवति । तओ सेकाले खीणकसाओ जाओ। तस्स खीणकसायस्स ठिति पानादओ पूर्ववत् । एव खीणकसायद्धाअंतोमुहुत्तपमाणमेत्ताए सखेजेसु भागेसु गतेसु सखेजइमे सेसे पच जाणवरण छहस- णावरण पचन्हमतराइगाण एएसि सोलसह फम्माण ठिविसतकम्म सबोवडणाए उबवेत्तु सेसखीणकसायद्धासम करेइ । तओ पमिह एयासि ठितिपाओ फिट्टो, सेसाण अस्थि चेव, नगरि निहादुगस्स एकेण समएण ऊणियठिविं उचेह । दलिय पहुच्च कालो उ तुल्लो। 'खोपसाय दुचरिमे मिह पयल च हणह छठमयो । आवरणमतराए छउमस्यो चरिमसमम्मि ॥ खीणकसायदुचरिमे निद्द पपल च हणति छउमत्यो ति । एव खीणकमाओ कम्माणि तिणि उदएणेव खतो खतो गओ ताव जाव समयाहियावलिया सेस ति । निद्दादुगवजियाण चोदसण्ह कम्माण उदीरणा फिवा । तओ आलियामेत्त काल उदएणेर वेइजति ताव जाव खीणकसायस्स दुचरिमसमओ ति । तम्मि दुचरिमसमए निदादुगाणि थियुगाणि अण्णाहिं सकताणि एव निदादुग खीण उदयाभावाओ। 'आवरणमतराए छउमत्यो चरिमसमयम्मि' ति एयासिं चोदसण्ह पग र गाथेमा सर्वेष्वपि मूलसूत्रपुस्तकेधूपलभ्यते ।

डीणं उदय संतखओ खीणकसायस्स चरिमसमए भवति । तओ य सेकाले आवरणविग्धरहिओ केवली भवति । मंभिन्न पासतो, लोगमलोग च सव्वओ सव्व । त नत्थि ज न पासइ, भूयं भव्य भविस्म च ।। ( आवश्यकनियुक्तिगा० १२७ ) संभिण्णं पासंतो० गाहा । जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं पुवकोडिं देसूणं केवली विहरिय समुग्घायं गंतूण वा अगं- तूण वा अपाइकम्माणं खयनिमित्तं सुहुमकिरियमप्पडिवाइं झाणमन्भुवेइ, पुवं ताव मणजोगं बायरं निरंभइ, तओ वइजो- तओ कायजोगं वायरं निरंभति, तओ मणजोगं सुहुमं निरंभइ, तो वइजोगं, तओ सुहुमं कायजोगं निरंभंतो सुहु. मुस्मासो सुहुमकिरियमप्पडिवाइज्झाणं समल्लियइ । तम्मि झाणम्मि वट्टमाणो आउगवजाणि सबकम्माणि उबट्टेति ठिति. रसघाएहिं ताव जाव चरिमसमयसजोगिकेवलि त्ति । तस्स चरिमसमयसजोगिकेवलिस्स सबकम्माणि उबट्टिजमाणाणि उच्चट्टिजमाणाणि सबोवट्टणाए उत्पट्टियाणि अजोगिकेवलिकालसमठितियाणि जायाणि । जेसिं कम्माणं अजोगिम्मि उदओ नस्थि तेसिं ठिति समऊणं ठवेइ, दलियं पडुच्च, न कालं । तम्मि चेव समए ओरालिय-तेया-कम्मइगसरीरसंबद्धाणं बधण संघाय छन्हं संठाणाणं पढमसंघयण ओरालियंगोवंगं वण्ण गंध रस फास अगरु० उवधाय पराघाय विहग० २ पत्तेय थिराथिर सुभासुभ निमेणणामाणं एएसि कम्माणं उदओदीरणाणं वोच्छेओ, ऊसास-सरा हेदुओ निरुद्धा । तओ सेकाले अजोगिकेवली जाओ, तस्स कालो अजहण्णमणुक्कोसिओ अंतोमुहुत्तिओ । तम्मि काले वट्टमाणो उवरयकिरियं अप्पडिवाई झाणं झियाइ कम्माणं खवणनिमित्तं । एवं सो अजोगिकेवली ठिति-पायाइरहिओ उदयवंताणि ठितिखएणं अणुभवंतो खवेइ । जेसिं उदओ नत्थि ताणि ठितिखएणं वेयंतो वेदिजमाणिगासु थिबुगसंकमेणं संकामेंतो वेदिजमाणपगतित्तणेण १२ वैदेतो वेतो जाति धाव जाव दुचरिमसमओ ति ॥ ६३ ॥ देवगइसहगयाओ, दुचरिमसमयभवियम्मि खीयति।सविवागेयरणामा,णीयागोय पि तत्थेव ॥१४॥ देवगइसहगपाओ० गाहा । 'देवगइमहगयाउ'त्ति दवगतिणा मह एगतेण धो जासिं वाओ देवगइसहगयाओ। काओ ताओ ? मण्णवि-देवगति वेउवा ऽऽहारगमरीरा एएसिं चेव बंधण सघाया वेउवा ऽऽहारगसरीरअगोवगा देवाणुपुत्री य, एयाओ देवगइसहगयाओ । 'दुचरिमममयमवियम्मि खीयति' ति दोणि समया सेसा भवसिद्धियत्तणस्स जस्म सो दुचरिमममयमवसिद्धिओ तम्मि दुचरिमवसिद्धियम्मि खीमति, काओ खीयति ! देवगइमहगयाओ । 'सविवागेयरणामा णीयागीय पि तस्येव' विवागो णाम उदओ, जेसि उदओ णामकम्माण नत्थि ते सविनागेयरनामा अणुदयणामानामित्यर्थ । के ते १ भण्णति त०-ओरालियन्तेय-कम्महगसरीर एतेसिं चेव वधणा विणि सपाया तिणि छ सठाणा छ सघयणाणि ओरालियसरीरअगोवग वण्ण गप रम फास मणुयाणुपुरी अगरुलङग उवधाय पराधाय उस्माम पसत्था ऽपमत्थविहायगति अपक्षचग पत्तेय थिराथिर सुमासुम मग सुस्सर दुस्सर अणादेज अंजसकित्ति निमेणमिति । एयाओ देवगइसहगयाहि सम दुचरिमसमयमवियम्मि खय गच्छति । अण्ण च 'नीयागोय पि तत्येव'चि तत्व समए णीयागोय पि खय गच्छति, उद- यामावाओ । अण्णयरवेयणीय ति साया मायाण अण्णयर वैयणीय जस्स उदओ नस्थि त पि तत्व समए खय गच्छति । १ ओ दामो।दे कार ॥ २ टोकाया यश कीर्ति इति पाठ ।।

जति साएण पडिवण्णो तो असायं पुवं खवेति, जइ असाएण अजोगितं पडिवण्णो तो सायवेयणीयं पुर्व खवेति ।। ६४ ॥ अन्नयरवेयणिजं, मणुयाउं उच्चगोय नाम नव । वेएइ अजोगिजिणो, उक्कोस जहन्न एकारं ॥६५॥ अण्णयरवेयणीयं० गाहा । 'अण्णयरवेयणीयं' सायं असायं वा खवियसेसं मणुस्साउग उच्चागोयं णामम्मि णव पग- डीओ 'वेदेति' अणुभवति 'अजोगिजिणो' अजोगिकेवली उक्कोसेणं वारस पगडीओ वेदेति, जहण्णेणं एकारस तित्थगरवि- रहियाओ चेव वेदेति ॥ ६५ ।। पुव्वुद्दिद्वाणि णव णामाणि तण्णिरूवणत्थं भण्णति- मणुयगइ-जाइ तस बायरंच पज्जत्त सुभगमाएजं ।जसकित्ती तित्थयरं,णामस्सहवंतिणव एया॥६६॥ मणुयगतिजाति० गाहा । गाहासिद्धो चेव अत्थो ॥ ६६ ॥ तँच्चाणुपुब्बिसहिया, तेरस भवसिद्धियस्स चरिमम्मि । सन्तंसगमुक्कोसं, जहन्नगंवारस हवंति॥६७॥ तचाणुपुत्रीसहिया० गाहा । ततियाणुपुत्री मणुयाणुपुत्रीत्यर्थः, तेण सहिता तच्चाणुपुविसहिता ताणि वारस तेरस भवंति, भवसिद्धिगस्स चरिमसमए भवंति । 'सन्तंसगमुक्कोसं' संतकम्ममुक्कोसेणं भवति । 'जहण्णगं वारस हवंति' जहण्णेणं तित्थग- १ अत आरभ्य प्रन्थपरिसमाप्तिपर्यन्तं कार प्रतेरेव पाठ , सं-का१ प्रत्यो खण्डितत्वात् ॥ २ 'यणीयं, म से२ ॥ ३°य णामं च । वे ख१ । 'य नामेणं | वे खे३॥ ४ “अत्रैव मतान्तर दर्शयति-तचाणुपुब्वि." इति सप्ततिकाटीकायाम् ॥ he रणामरहिया ता व वारस चरिमसमए मवति । अण्णे आयरिया मणति-भशुपाशुपुदी दुचरिमसमए व खविअ ति, कम्हा ! उदयाभावाओ । तम्हा वारस सन्ताणि उक्कोसेण, जहण्योण एकारम चरिमसमए भवति ॥ ६७ ॥ मणुयगइसहगयाओ,भव-खेतविवागजीवोमुत्तिावेयणियन्नयरुञ्च,च चरिमभवियस्स खीयति॥६॥ मणुयगइसहगयाउ० गाहा । मणुपगतिणामेण सह उदओ जेसि गामाण ताओ मणुयगतिसहगयाओ। 'भपखेतविवा- गजीववाग' चि भवविवागा खेतविषागा जीवविवागा य । तस्य भरविवागा पशुपाउग, खेतविवागा मशुयाणुपुबी, सेसा णि णव जीवविवागाणि । एयाणि एकारस, 'वेयणियण्णयरुश्च च' अण्णयर वेयणीय उच्चागोय वा 'चरिममवियस्स खीय- ति' ति एयाणि तेरस परिममवसिद्धियस्स खीपति ति । ततो कम्मविमोक्खममए चेव उड्ड गच्छति आलोकान्तम् ॥६॥ अह सुइयसयलजयसिहरमरुयणिरुवमसहावसिद्धिसुहाअणिहणमवावाह,तिरयणसार अहवति।६९ अह सुतिय० माहा । 'अर्थ' इति आनन्त कर्ममोक्षानन्तरमेव प्रामोति 'सुतिय' सुद्ध जिरजर्ण 'सगल' सपुण्ण अखड 'जगसिहर' लोगग्ग 'अरूज' वाहिरहिय 'णिरुषम' उवमाणं जस्स नत्यि एरिस वारिस ति, 'महावसिद्धिमुह जहा संसार- मुहाणि कृत्रिमाणि ण तहा सिद्धिसुह, चाहिरकारणनिरपेक्षमित्यर्थः, 'अणिहण' निहण बस्स पत्थि त अणिहण अबावाह णाम अविणासित । मुद्ध सपुष्ण [ोगग्ग] वाहिरहियं शिवम अणिण अशावाह महाकसिद्धिसह 'तिरपणसारं अशमवति' चि १ वागं ति । २ । वागसा । । । ३ श्व, अचरिमसमयम्मि स्त्री पे३ ॥

णाण-दसण-चरित्ताणि तिरयणं तेर्सि सारं-फलं तं अणुभवंति ॥ ६९ ॥ दुरहिगम-णिउण-परमत्थ-रुइर-बहुभंगदिट्ठिवायाओ।अस्था अणुसरियबा, बंधोदय-संतकम्माणं॥७०॥ दुरहिगम० गाहा । अहिंगमिउंदु ति दुरहिगमो पमाण-णय-णिक्खेवादीहि अणुगम्मतो तम्हा दुरहिगमो, णिउणो णाम सूक्ष्मः, परमह वि-तत्तं, रुचिरं-रम्यं हृदयप्रह्लादकरं, बहुभंग त्ति-बहुविगप्पं, दुरहिगमं च णिपुणं च परमार्थ च रुचिरं च बहुभंगं च जं तं दुरहिगम-णिउण-परम-रुचिर-बहुभंगं । किं तं ? दिहिवाओ, ततो दिडिवायाओ 'अत्था अणुमरि- यबा बंधोदयसंतकम्माण' ति बंधोदय-संताणं अत्था अणुसरियवा-चिन्तेयच्च त्ति । एते अट्ठा दिट्ठिवाए विगप्पेण चिंतिया ततो दिट्टिवायाओ एते साहेयव त्ति भणियं भवति ॥ ७० ॥ इदाणि आयरिओ अप्पणो पमादभावं अप्पागमत्तं च पदंसन्तो अण्णेसिं आयरियाणं अप्पमायं बहुश्रुतत्वं च प्रख्यापयन् इमं भणति- जो जत्थ अपडिपुन्नो, अत्थो अप्पागमेण बद्धो त्ति । तं खमिऊण बहुसुया, प्रेऊणं परिकहिंतु ॥७१॥ १ अस्माद् गाथासूत्रादनन्तर सर्वेष्वपि मूलसूत्रादर्शेष्विय गाथा वरिवर्तते-गाहग्गं सतरीए, चंदमहत्तग्मयाणुसारीए । टिकाए णिय. मियाण, एगणा होइ उई उ ।

- जो जत्थ अपडिपुष्पो० गाहा । 'जो जत्थ ति जो अत्यो घोदय-सतेसु 'अपडिपुण्णों खडो जाओ 'अप्पागमेण बद्धोचि आगमो-मुच अप्पो आगमो जस्स सो तहा तेण अप्पागमेण बद्धो ति काउ 'त खमिऊण बहुसुता' त अवराह खमिऊण दोसं अधेतृण बहुसता दिष्टिवायण्णे 'पूरेऊण परिकहेतु' चि त विगल अत्थ पूरेऊण-मगल करेत्तु परिकहिंतु- । मणतु चि ॥ ७१॥ समास-युणिया सित्तरी समत्ता ॥

पत्र-पृष्ठी ६४-२ प्रथमं परिशिष्टम् । अस्मिन् ग्रन्थे प्रमाणतयोद्धृतानां शास्त्रीयावतरणानामकारादिक्रमेणानुक्रमः। अवतरणादि पत्र-पृष्ठी अवतरणादि अट्ठग चउ चउ चउर- ३९-२ एतच्च मतान्तरेणोक्तम् ( टिप्पणी) अट्ठ-च्छाहिगवीसा एत्तो हणइ कसाय- अट्ठ ऽ8-8ग छक्क २५-२ खवगे सुहुमम्मि चऊ-(टिप्पणी) अट्टही बत्तीसं खीणकसाय दुचरिमे अह य सय चोवहि ४५-२ गइ इदिए य काए अणियट्टिबायरे थी- गाहग्ग सतरीए (टिप्पणी) इगि विगल सगल पंच- २६-१ गोयम्मि सत्त भगा उक्तरूपभङ्गसङ्ख्या- (टिप्पणी) ४५-२ चउ छस्सु दोन्नि सत्तसु उक्तरूपाया एव भङ्ग- चउ पणुवीसा सोलस एगणणउयदुसवा- २५-२ छ चत्तारि य एक ६६-२ ५४-२ ८-१ - २५-२ " पत्र-पृष्ठी ३२-१ ३२-१ पत्र-पृष्ठी २६-१ २६-१ २५-२ २७-१ २६-१ ४४-१ २५-२ ४६-१ अवतरणादि छावट्ठी चोवट्ठी छावत्तरपषमया तिण्ड सर एके- तिदुगसय छ-पचग (टिप्पणी) तिरियाणुगुपण्णसया वयोविंशत्यादिषु च (टिप्पणी) नर-तिरिय देव तिरि नर- नाइविसुद्धस्स सकिलिहस्स निदादुगस्स उदओ निदापयला य तहा (टिप्पणी) पच नव दोणि अहा- पचाओ य चउक पग्गहेण वय-जाई अवतरणादि पजत्तगसनियरे पज्जताऽपज्जचग पवगो पुण मणुओ पण नव नव नवगेग- बत्तीस दोणि अह य घारसपणसहसया वावण्णेकारसया बा- बावण्णेकारसया दि- चावणेकारसया स- मणुयगइ जाइ तस बा-(टिप्पणी) मवान्तरेण पुन पवा- मतान्तरेण समशतानि मोचूण खीणराग २६-१ - ५६-२ ४१-२ ३ पत्र-पृष्ठी २६-१ ६२-१ १६-२ अवतरणादि पत्र-पृष्ठी अवतरणादि कर्मस्तवकारादयः (टिप्पणी ) ये तु सगलतिरि-विगल-नर-दे- ७-२ संज्ञा च परिभाषा च २-१ सत्तऽट्ट नव य पनरस सत्तावीस सुहुमे ५४-२ सतपयपरूवणया समयद्वयोनावलिका- (टिप्पणी) समिन्नं पासतो द्वितीयं परिशिष्टम् । सप्ततिकाचूर्णि-टिप्पण्यन्तर्गतानां ग्रन्थकृन्नाम्नां सूची। ग्रन्थकृनाम पत्र-पृष्ठी ग्रन्थकून्नाम ६-१,१२-२,२७-१,४९-२ / चन्द्रर्षिमहत्तर ( टिप्पणी) अण्णे अण्णे आयरिया २२-१,३६-२,६४-२,६८-१ / चूर्णिकार अण्णेसिं आयरियाणं चूर्णिकृत् एगेसि ६४-२ जीवविजयाः चंदमहत्तर (टिप्पणी) ६९-१ टीकाकृत् चन्द्रर्षिपादाः ७-२ प्राचीनकर्मस्तवकार पत्र-पृष्ठी ४२-१,४६-१ ४०-१,४३-१,४५-२ ४१-१,४१-२ ४२-१ ७-१,७-२ - पत्र-पृष्ठी ७-२ . (टिपण्णी) मथनाम मळयगिरि (टिप्पणी) पत्र-पृष्टी ४०-१,४३-१ ४५-२,१६-१ ३२-२,४१-२ प्रथकृत्राम यशोविजया शिवशर्मनि समतिकाकार मलयगिरिपाद मलयगिरिमहर्षयः - रन्थनास अनीणीयपुन्व अन्वर्भाष्य हत्तीय परिशिष्टम् । मप्ततिकाचूर्णि-टिप्पण्यन्तर्भूताना ग्रन्थनाम्नां सूची। प्राथनाम पभ-पृष्ठी कम्मपगई २-२ कम्मपगडिसगहणी ६१-१,६२-२,६३-२,६४-२,६५-१ ३७--१,३९-१,३९-२ फर्मप्रकृत्ति (टिप्पणी) ३२-१,४०-१,४३-१ १२-२,६२-२,६६-१ ४५-२,४६-१ दिहिवाय १-२,२-२,६९-१ पश्वसइद (टिप्पणी) (दिप्पणी) " मागम पत्र-पृष्ठी ग्रन्थनाम प्राचीनकर्मस्तव मलयगिरीयटीका " शतक ३-१,४-१,४-२ ५-२,९-२,१७-१ ६-१,२२-१ सतरी " पत्र-पृष्ठी ग्रन्थनाम (टिप्पणी) ५-२,६-१ समतिकाटीका (टिप्पणी) १४-१,१६-२ सप्ततिकाप्रकरण ३-१,४-१,४-२ सयग ९-२,१७-२ सतकम्म चतुर्थ परिशिष्टम् । सप्ततिकाचूर्ण्यन्तर्गतानां पारिभाषिकशब्दानामनुक्रमः । पत्र-पृष्ठी अहापवत्तकरण ६०-२ आएसो ६०-१ उदओ उदयविगप्पो शब्द अंस अणियट्टिकरणं अणुभागधाओ अपुग्वकरणं पत्र-पृष्ठी ५९-२ २७-२ २१-१,५५-१ पत्र-पृष्ठी पत्र-पृष्ठी २-१,५५- ६८-१ ६८-२ २७-२ २-१ उदीरणा उवसतवीयरागो सवसाममा ओघ समो सिओवसमिया खेतविवागा गुणसकमो गुणसेढी जीवविवागाणि ठितिघामो ठिसिवयो ततियाणुपुष्वी तिरयण पगति पयवदविगप्पो बधो वायरो भवविवागा २-१ ३८-१ ६८-२ ४०-२,६३-१ २-१ मुहुमसपराओ -eyed

Seetri

Author
Shri Kalu
Title
Seetri
File name
Seetri
Text
OCR done
Citation
1963
Published
2012/02/01
Publisher
Byawar, Muni Shri Hajarimal Samiti
Language
Sanskrit
Pages
186
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Classification
Literature
DLI number
407829
Barcode
99999990071055.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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