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Satyagrahgeeta

Row,pandita Kshama · 2012/08

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॥श्रीः॥ सत्याग्रहगीता प्रथमोऽध्यायः गम्भीरो विपयः कायं श्रेष्ठः सत्याग्रहात्मकः । कृत्स्ने जगति विख्यातः क मे लघुतमा मतिः ॥१॥ (1) समस्त संपारमें विख्यात सत्याग्रहामक यह श्रेष्ठ और गम्भीर विषय कहाँ! और मेरी बहुत तुच्छ वुद्धि कहाँ! हाब्दगारवहीनाई युद्धस्तस्य गौरवम् । व्याख्यातुमसमास्मि गुणैर्दियविभूषितम् ।।२।। (२) चन्दमंदारके गुरुवमे हीन में दिव्य गुर्गामे विभूषित इम युद्धके गौरवका वर्णन करनेमें अशक्त हूं। त्यापि देशमक्याई जातास्मि विवशीकृता । अत एवास्मि तदातुमुद्यता मन्दधीरपि ॥३॥ (३) तो भी अपने देशके प्रेममे विवश होकर मन्बुद्धिवाली हो मी टमै गानेने उद्यत हो गई हूँ। दुहिता शङ्करस्याहं पण्डितस्य क्षमामिया । अममापि कार्ग श्रोतव्या वस्तुगौरवात् ॥ ४॥ (1) मेरा नाम क्षमा है-शंकर पण्डितकी मैं की है। कविक मामि अझमा अयान असमय में है। तोमी विश्यके गौरवके कारग मेरा कहना मुनना चाहिए । + * २ . सत्याग्रहगीता भारतावनिरत्नाय सिद्धतल्यमहात्मने । गान्धिर्वशप्रदीपाय गीतिमेनां समर्पये ॥५॥ (५) भारत भुमिक जो रहनस्वरूप है, गान्धी वंशके लिए जो दीपक समान है, उस सिद्धतुल्य महात्माको यह गीति में समर्पण करती हूँ। बहुवर्षाणि देशार्थ दीनपक्षावलम्बिना । कृषिकाणां सुमित्रण कृतो येन महोद्यमः ॥६॥ (६) जिसने किसानोंका मित्र घनकर गरीबोंका पक्ष लेकर देशके लिये बहुन वर्षांतक श्रम किया। यश्चापूर्वगुणैर्युक्तः पूज्यतेऽखिलभारते । सतां बहुमतो देशे विदेशेष्वपि मानितः ।।७॥ (७) अपूर्व गुणोंसे युक्त होनेके कारण जिसकी समस्त भारतमें पूजा होती है, स्वदेशमें सत्पुख्य जिसका मान करते हैं, और विदेशोंमें भी जो आदर आता है। मनस्विनस्त्रयस्त्रिंशत्कोटिनृणां हितैपिणः । पुण्यं शुद्धात्मनः पुण्यासिद्धानां चातिरिच्यते ॥८॥ (८) तैतीस करोड़ मनुष्योंके हितके अभिलापी, शुद्ध भारमा- वाले उस मनस्वीका पुण्य सिद्धोंके भी पुण्यसे बढ़कर है। वीतरागो जितक्रोधः सत्याहिंसाव्रतो मुनिः । स्थितधीनित्यसत्त्वस्थो महात्मा सोऽभिधीयते ।।९।। (९) आसक्तिविहीन, शोधको जीतनेवाला, सत्य और अहिंसाके प्रत- को धारण करनेवाला, स्थिरबुद्धिवाला, सदैव सत्वगुणमें स्थित ( मनुष्य) महात्मा कहलाता है। अपूर्वकीर्तियुक्तस्य निर्ममस्यानहइतेः। माहात्म्यमस्य भूपानां वैभवादतिरिच्यते ॥१०॥ १०) ऐसे अपूर्व पीर्तिसे युक्त, अहंकार रहित, स्वार्थ रहिस पुरुषकी महता राजवैभवसे घौष्ट है। PATH प्रयमोऽध्यायः २ विनीततमवेपोऽसौ विलासविरतान्तरः । निर्धनान् महता दैन्येनातिशेते निजेच्छया ॥ ११ ॥ (११) अतिविनीत वेशवाला, विलाससे विरक्त मनवाला और अपनी इच्छासे ही महान निधनताको स्वीकार करते हुए यह निर्धनोंसे भी बढ़कर है। क्षुत्पिपासामिभूतेषु ग्रामीणजनकोटिपु । अल्पान्नेन निज देहमस्थिरोपं चकार सः ॥ १२ ॥ (१२) गांव कोडों लोगोंके भूख और प्यासमे अभिमूत होने के कारण उसने योटा अन्न खाकर अपना शरीर केवल हड्डीपसलीकी अवस्थाको पहुंचा दिया। पुरा किलाफ्रिकारखण्डं मारतीया हि केचन । वाणिज्यव्यवसायार्थमगच्छन् परिवारिणः ॥ १३ ॥ (१३) पुरातन समये कई एक भारतीय जन व्यापारके लिए परिवारसहित आफ्रिका देशमें गए थे। अथ गच्छत्सु वर्षेषु पीडितास्ते निवासिमिः । बोरादिभिः सुगौराङ्गैः कृष्णवर्णदुराग्रहः ॥ १४ ॥ ( १४) कुछ साल बीतनेपर गोरे रगवाले, काले रसके साथ दुराग्रह करनेवाले वहीं रहनेवाले बोरादि जातियोंद्वारा उन्हें पीडा होने लगी। तद्भयान्मोक्षमिच्छन्तो न्यायधर्मविशारदम् । महात्मानमयाचन्त साहाय्यं परमं जनाः ।। १५॥ (१५) उनके मयसे मुक्ति प्राप्त करने के लिए उन भारतीयोंने न्यायधर्म में पारंगत महामासे सहायता मांगी। क्लेशार्तानां परं मित्रं सत्यवार गान्धिवंशजः । पान्धवानां विमोक्षार्थमाफ्रिकादेशमबजत् ॥ १६ ॥ (६) वह दुःखसे सन्तत मनुष्योंका परम मित्र, सत्यवचनवाला गांधी वंशमें उत्पन्न, अपने माईयोंकी मुक्ति के लिए आफ्रिका देशको गया।

सत्याग्रहगीता जातमन्युः पराक्षेपाद वसन् विंशतिवत्सरम् । स्ववन्धूनां हितार्थाय शत्रुभिर्युयुधेऽभयः ॥ १७ ॥ (७) दूसरोंके आक्षेपसे त्रुन्द हुभा वह नीस वर्पतक यहां रहकर थापने भाईयोंके हिपके लिए निर्भय होकर शनुस टड़ा। बोरादिभिर्विदेशस्थाः पशुवत्ने खलीकृताः । अस्वाश्चानेकनिबन्धैर्दुःसहै: शासनाभिधैः ॥ १८ ॥ (14) बोराप्रभूति जातियोंद्वारा विदेशमें रहनेवाळे वे लोग पशुओं के समान दुर्व्यवद्वत हुए। शासन के नामवाले कई प्रकार के अनेक दुस्सह रुकावटोसे उन्हें दराया जाता था। तेन विंशतिवर्ष हि सततं शान्तचेतसा । अनुद्वेगकरोपायैरुद्यमः साधुना कृतः ॥ १९ ॥ (१९) उस साधुने सतत शान्तचित्तसे उद्वेग उत्पन न करनेवाले उपारों द्वारा बीस वर्ष पर्यंत उद्यम किया। आइग्ललोकान् स विज्ञाप्य भारतीयपरिस्थितिम् । अल्पं फलागम दृष्ट्वा व्यष्टजदेशमाङ्गलम् ॥२०॥ (२०) अंग्रेज लोगोंको भारतीय परिस्थिति परिचित करवाकर, परिणामको भल्प देखकर उसने अंग्रेजों के देवाका परित्याग कर दिया। प्रौदेन वयसा युक्तोऽप्यानतः क्लेशसञ्चयैः । ज्यवर्तत निगं देश दीन दुर्भिक्षपीडितम् ॥२१॥ (२१) पीढ़ अवस्थावाला होकर भी यह शसञ्चयोंसे नत होकर दुर्भिक्षसे पीड़ित अपने दीन देशको लौट आया। ग्रामीणानां क्षुधाानां क्षेत्रे क्षेत्रेऽपि निर्जले । दृष्ट्वास्थिपञ्जरान् भीमान् विष्णोऽभूद्दयाकुलः ॥२२॥ (२३) मृत्यसै मनाए हुए मामीगो प्रयक जलरहित अनमें डि. यो नर पार देखकर दयाद होकर वह दुःखी हुआ।

प्रयमोऽध्यायः ५ इतररवधूतानामन्त्यनानामवस्थया । द्रवीभूतो महात्मासी दीनानां गीतमो यथा ।। २३॥ (२३) गौतम अर्थात् बुद्धके ममान यह महामा दूमरों द्वारा निराहत दीन हरिजनों (अनों) की अवस्यास पिपल गया। निर्धनत्वाचनुर्भूमेः पावल्याच बान्धवाः । तिरस्कृता मवन्तीति मानेन किल निश्चितम् ।। २४ ।। (२४) जन्मभूमि अयार भारतवपके निधन होने के कारण व्या परवरा यांन अंग्रेजों के अधीन होनेके कारग माई अयात् स्वदेशीय तन तिरस्कृत होते हैं, यह बात उसी बुद्धिमानने निश्चित कर ली। वयमाङ्ग्लयुगे बद्धा मविप्यामोऽधिकाधिकम् । विवशा दुर्बलायेति घोषितं दूरदर्शिना ।।२५।। (२५) अंग्रेजों के बन्धनमें वान्धे हुए हम अधिरसे अधिक विवश और दुबल होते जाएंगे। यह बात रम दूरदर्शीने समझ ली। इहालैः स्थापितं राज्यं देशलुण्ठनलोलुपैः । इत्यस्थिपञ्जरा एवं जनानामत्र साक्षिणः ॥२६॥ (२६) यहाँ अयांमारतवर्ष में देशको लूटने के लिए लोमी अंग्रेजोंद्वारा यह राज्य स्थापित किया गया है । टस वातक साझी यहाँक टोगोंकी 'हट्टीयोंके पझरही दे रहे हैं। अहो घोरमिदं पापमौदासीन्यं जनेषु वः । मोगैश्वर्यप्रसक्तानामतिनिन्यं यशोहरम् ॥२७॥ (२०) अहो मोग तथा ऐश्वयमें संटन आप लोगोंकी लोगविषयक टदासीनता बहुत निन्दनीय तथा यश हरनेवाली है। यह घोर पाप है। किमुत्तरं कृतीनां वः परलोके प्रदास्यय । इति राज्याविकारस्थानपृच्छदीरचेतनः ॥२८॥ (२०)टस धीर-देवनावाटेने राज्य के अधिभरियोंको यह सवाल पूछा कि आप परलोम्मे जाकर अपनी कृतियों क्या रचर देंगे। ।

सत्याग्रहगीता स्ववान्धवानसी पौरा-मोहसुप्तानबोधयत् । स्वधर्मः परमो धर्मो न त्याज्योऽयं विपद्यपि ।। २९ ।। (२९) मोहनिद्राम सोए हुए अपने नागरिक भाईयोंको उसने जगाया और कहा कि अपना धर्म ही परम धर्म है, विपत्तिमें भी अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। कर्मकाणां स्थिति तेषां कष्टमूलं च वेदितुम् । त्यक्तभोगो विपद्धन्धुामे ग्रामे चचार सः ।। ३० ।। (३०) विपत्तिमें मित्र वह भोगोंको छोड़कर किसानोंकी स्थिति तथा उनके कष्टके मूलको जाननेके लिये गाँव गाँवमें घूमा। अनापृष्टया हते शस्ये दुर्भिक्षं समजायत । तस्मादथ कराधिक्यादीनानां कष्टसम्भवः ॥३१॥ (३) अनावृष्टिसे फसलके मष्ट हो जाने पर अकाल पड़ गया। उससे कर बढ़ गया और उससे दीनोंको कष्ट उत्पन्न हो गया। मासपटकं निरुद्योगा निवसन्ति कृपीवलाः। अत एव हि संवृद्धिदारिद्यस्य पदे पदे ॥३२॥ (३२)किसान छः महिने तो बिना काम के रहते हैं इसलिए यहाँ कदम कदम पर दरिद्रता बढ़ती जा रही है। विधेयं तान्तवं तस्मादल्यलाममपि ध्रुवम् । येन सुष्टुपयोगः स्यात्कालस्येति जगाद सः ।। ३३ ।। (३३) वह योला कि आप लोग सूत काते; इससे थोडा लाभ भी चाहे हो तो भी निश्चित तो है ही। और समयका भी ठीक उपयोग होता है। कुर्वन्तो नित्यमेवं हि स्वातन्त्र्यं प्राप्स्पयाचिरात् । स्वातन्त्र्याद्धि मनुष्याणां प्रियमन्यन्न विद्यते ॥३४॥ (३५) सदैव ऐसा करनेसे भापको शीग्रही स्वतन्त्रता मिल जाएगी। आदमियों के लिए स्वतन्यतासे बढ़ कर दूसरी कोई प्रिय वस्तु नहीं है।

प्रथमोऽध्यायः ७ - अथ चेत्तान्त धम्यं न करिष्यथ धान्यवाः । बद्धाः परयुगे नित्यं दासभावे निवत्स्यय ॥३५॥ (३५) हे भाईयो! यदि धागा कातने का धर्म न करोगे तो दूसरोंके बंधनमे बान्धे गए सदेव दासमावमें निवास करोगे। जीवन्तोऽपि न जीवन्ति परदास्यधुरन्धराः। पारतन्त्र्यमुदाराणां मरणादतिरिच्यते ॥३६॥ (३६) दूसरोंके दास्यरूपी धुराको धारण करते हुए (मनुष्य) जीते हुए भी नहीं जीते हैं। उदार जनोंकी परतन्त्रता मरनेसे भी बढ़कर है। दासमावे स्थितैः कष्टं सोढव्यमतिदुस्सहम् । दासोनाति स्वकं खाद्यं काकशङ्की पदे पदे ।।३७॥ (३७) दास्यभावमें पड़े हुए को अति दुस्सह कष्ट भी सहारने पड़ेंगे । दास अपने ही भोजनको कल्वे के समान कदम कदम पर शंकित होकर खाता है। उत्तिष्ठत ततः शीघ्र वान्तवे कुल्तोद्यमम् । पटकारो जनो येन प्रतिपद्येत तत्फलम् ॥३८॥ (३८) इसलिए शीघ्र ही टटकर सूदकर्ममे उद्यम करो जिससे कपड़े बनानेवालेको उनका फल मिले। हस्तनिर्मितवासांसि प्राप्स्यत्येवं जनोऽखिलः। ततो देशोदयप्राप्तिरिति भूयो न्यवेदयन् ॥३९॥ (३९) सब लोगोंको इस प्रकार हायसे बने वस्त्र मिलेंगे। उससे देशका उदय होगा यह बात उसने फिर बताई।

द्वितीयोऽध्यायः अटता दक्षिणे देशे यत्नेन परिपश्यता। निर्जनो निर्जलो ग्रामः प्रतिपन्नो महात्मना ॥१॥ (१) दक्षिण देशमें घूमते हुए यत्नपूर्वक देखते उस महान्माको निर्जन जलरहित गॉव मिला। कस्मिंश्चिद्विजने देशे सोऽपश्यत्काञ्चिदन्त्यजाम् । जीर्णाम्बरधरां दीनां कर्शिताङ्गी मलीमसाम् ॥ २॥ (२) किसी निर्जन देशमें उसने किमी शूद्राको देखा जिसने पुराने कपडे पहने हुए थे और जो दीन थी, और मैली थी। अमङ्गला च तां पश्यन्नुद्विमोऽभूद्दयाकुलः । मालिन्यं ते कुतो भद्र इति पप्रच्छ सादरम् ॥३॥ (३) उसे अमङ्गलरूपमें देख कर दयासे व्याकुल हो कर वह उदिम हो गया । 'हे भदे, तेरा यह मैलापन किसलिए है।' उसने आदरपूर्वक पूछा। अर्धनग्ना च साऽवादीलजानतमुसी मुनिम् । दीनानां दुःसहं कष्टं दुर्योधं तात सुस्थितैः ॥ ४॥ (") और लज्जासे नीचे मुख किए हुए वह मुनिसे चोली "दिनोंका दु सह कष्ट सम्पत्तिशीलोंकी समझमें मुश्किलसे आता है। दश वर्षाण्यहोरात्रं धृतं वस्त्रमिदं मया । जलाभावात्तु तन्नित्य न शक्नोमि प्रमार्जितुम् ।।५।। (५)"यह घन दशवर्ष पर्यन्त मेंने धारण किया है । जलाभावक कारण इसे धो नहीं सकती हूँ। यदृच्छया जले प्रासे वस्त्रस्याधं प्रमार्जये । शुष्केण वेष्टिता तेन शिष्टमधं च धावये ।।६।। (१)"अप इछानुसार पानी मिल जाता है तो कपडे आधेको धो लेवी हैं। जय वह सूख जाता है तो उसे छपेट कर शेषके माधेको धोती हूं।

द्वितीयोऽध्यायः ९ न शक्यं तन्जलामावान्मार्जितुं च पुनः पुनः । एफवना कयं तात विमला स्यामहं यत ॥७॥ (७) "बलेके न मिलनेके कारण वारबार घोना नहीं हो सका। हे तात, एक वस्नबाली होनेके कारण स्वच्छ कैमे व ? मद्वदर्धपरिच्छना जनानां सन्ति कोटयः । एकाहाराय कृच्छ्रेण धारयन्त्यो निजानमून् ।। ८॥ (6) “मेरे समान आधे नंगे, एक बार सानेवाले, मुदिकलमे अपने शरीरको धारण किए हुए करोड़ों मनुष्य हैं।" अन्त्यजाया वचः श्रुत्वा करुणं करुणामयः । अपनीय निजस्कन्यादुत्तरीयं ददौ मुनिः ॥९॥ (९) शुद्ध लढकीके करणामय वचन सुनकर दयाल गान्धीजीने अपने कन्धे से ओढनी उतार कर उसे दे दी। अथ तां विस्मिता नारी कृपालुगान्धिरब्रवीत् । कुरु मद्रे सदा सूत्रं हितं ते कर्तने ध्रुवम् ॥१०॥ (१०) टस विस्मित नारीको कृपालु गान्धीने कहा, "हे भद्रे ! सदा सूत कातो-तुम्हारा कल्याण कावनेमें निश्चित है ध्यायं ध्यायं दशां दीनां बन्धूनां दुःखितोऽभवत् । तदुद्धारमनुध्यायन् विनिद्रोऽगमयन्निशाम् ॥११॥ (1) माईयो की दीन दशा सोच सोच कर वह दुःखी हो गया । डाके टद्वारको सोचते हुए उसने जागते ही रात गुजार दी। यावन्न वेष्टिताः सर्वे यन्धवो मे यथोचितम् । स्थास्यामि स्वल्पवेशोऽहमिति तेन धृतं व्रतम् ॥१२॥ (१२) जब तक मेरे सब माई ययोचित रूपसे कपड़े नहीं पहन लेते तब तक मैं थोड़े कपड़े पहनूंगा । यह व्रत उसने धारण कर लिया।

सत्याग्रहगीता नमस्कन्धस्ततः पवादाजानुपटवेष्टितः । जनहासमनादृत्य त्यक्तभोगो जितेन्द्रियः ॥१३॥ (१३) पीछेसे नंगे कन्धे रखता हुआ, घुटनों तक कपडा लगाकर भोगोको त्याग कर, जितेंद्रिय हो कर संसारकी सीकी अवहेलना की। नगरानगरं गच्छञ्छीतोष्णसमवासितः । दुर्दैवं ग्राम्यलोकानां पौरेभ्यः स न्यवेदयत् ॥ १४ ॥ (१४) शीत काल तथा गर्मियोमें वही वस्त्र पहनता हुभा गाँव के लोगोंका चुरी प्रारब्ध अर्थात् बुरा हाल उसने नगर निवासियों को बताया। लुप्तधर्मः किलास्माभिरस्पृश्या इति दृपिताः । निष्कासिताश्च संसर्गादन्त्यजा भयकम्पिताः ॥१५॥ (१५) हम लोगोने धर्महीन होकर अन्त्यजों को अस्पृश्य- छुनेके अयोग्य कहकर दूपित किया है । भयसे कॉपते हुए उन लोगोको हमने संसर्गसे निकाल दिया है। अथ चित्रं फिमन स्याद्यदि वोरादयः परे। अस्मानप्यवमन्येरन्नामिकास्थान्त्यजानिव ॥ १६ ॥ (१६) इसमें क्या विस्मय है यदि बोरादि दूसरे लोग अफ्रिका में रहनेवालोंको हमें भी शुद्रोंके समान माने ? अधर्मस्य फलं नूनं दत्तं देवाज्ञया हि नः । तस्मादेव वयं माता धिकृता राष्ट्रियान्त्यजाः ॥१७॥ (१७) भगवानकी भाशाने हमें निश्चयसे अधर्मका ही फल दिया है। इसलिए हम अस्पृश्य राष्ट्रकी सरह विकारे गए हैं। अहो दशा दुरन्तेयं नोपेक्ष्या मानुपात्मभिः । पहिष्कारोऽन्त्यजानां हि मारतस्यैव लाञ्छनम् ॥१८॥ (१८) मनुष्यकी भाग्मा रखनेवालों को अपनी इस पुरी दशाकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए । शुद्रोंका यहिफार भारत के लिए फल है।

द्वितीयोऽध्यायः ११ शूद्रो वा ब्राह्मणो वापि क्षत्रियो वा कृषीवलः । देवदृष्टया समाः सर्वे विकृतिस्तु नरोद्भवा ॥ १९॥ (१९) शूद्र, ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा किसान भगवानको दृष्टिन सब समान है। विनर तो मनुष्यमे बनाए हैं। मेदः कृतो मनुष्येण न यात्रा समर्शिना । शीलं चिहं सुजातस्य न जातिन च जीविका ॥२०॥ (२०) भेद तो मनुष्यने किए हैं न कि समदर्शी विधाताने । श्रेष्ट कुटी रत्पन्च मनुष्यका चिन्द शील है, न तो जाति है और न वृत्ति । अतोऽन्स्यमानवज्ञातुं नाधिकारोऽस्ति कस्यचित् । अमी मलिनकर्माी इत्युक्तिर्ननु किल्विपम् ।। २१ ॥ (२१) इस लिए हरिजनों का निरादर करने के लिए किमी का मी अधिकार नहीं है। यह मलिन कामके योग्य हैं यह कहना तो पाप ही है। अतस्तेषां समुद्धारो धर्मो गुरुतमो हि नः । तदेव साधनं सम्यग् देशस्योद्धारसिद्धये ॥ २२ ॥ (२२) इसलिए उनका उद्धार ही हमारा सबसे यहा धर्म है । देशके उद्वारकी सफलता के लिए वही ठीक साधन है दुराग्रहमिमं तस्मादुत्सृज्य कृतनिधयाः । नक्तन्दिवं प्रयस्यामो दीनानां हितकाम्यया ॥२३॥ (२३) इसलिए निश्चयपूर्वक इस दुराग्रहा परित्याग करके रात दिन हम दीनोंक हितकी इच्छा से यत्न करें। विद्यालये मठादी च निषिद्धास्तानतः परम् । निश्शझं स्वीकारण्यामो निष्कारणबहिष्कृतान् ॥ २४ ॥ (२४) आइंदा विद्यालय तथा मयदि में निषिद्ध एवं बिना कारणसे बहिष्कृत इनको इम निर्भय हो कर स्वीकार कर लेंगे।

सत्याग्रहगीता इत्युक्त्वा पुनरारेभे वक्तुं कर्षकदुःस्थितिम् । अहो पौरा न विज्ञाता युप्माभिः क्षेत्रिणां दशा ॥ २५ ॥ (२५) यह कह कर किसानों की दुर्दशा फिरसे कहनी शुरू कर दी-"अहो नागरिको! आप लोगोंने खेती करनेवालोंकी दशाको नहीं जान पाया। तदारिद्यमपाकुतुं तान्तवं ह्येकसाधनम् । अतस्तदुद्यमायैव प्रोत्साहं कर्तुमर्हथ ॥ २६ ॥ (२६)" उनकी दरिद्रताको दूर करनेके लिए सूत ही एकमात्र उपाय है। इसलिए उस उद्यमके लिए आपको बहुत उत्साह करना योग्य है। धनाढ्या वा दरिद्रा वा समाः सर्वे परस्परम् । अतः स्वार्थ परित्यज्य वर्तध्वं धर्मतत्पराः॥२७॥ (२७) धनी हो या गरीब सब आपसमें समान हैं। इसलिए स्वार्थ- को छोडकर आप धर्ममें तत्पर होकर व्यवहार करें। स्वदेशोदयकामाश्चेत्स्वान्धवहितेप्सवः । तदवगच्छताये नः शोचनीयामधोगतिम् ॥ २८ ॥ (२८) आप यदि अपने देशके उदयकी इच्छा रखते है, यदि अपने भाईयों के हितकी इच्छा रखते है, तो भविष्यमें आनेवाली हमारी अवनत तथा शोचनीय अवस्थाको समझिए । पुरा फस्मादयं देशः प्रख्याताभ्युदयः स्थितः। दारियेणाधुना प्रस्तः कस्माचेति विमृश्यताम् ॥ २९ ॥ (२९) पुरातन कालमें इस भारत देशकी उद्घति क्यों प्रसिद्ध थी और अब किसलिए दारिखसे यह प्रस्त है ? यह सोचिए । परदेशीयवस्त्राणां विधातव्या बहिष्कृतिः । विदेशवसनासक्तिः स्वदेशोद्यमनाशिनी ।। ३० ॥ (३.) परदेशमें पने पोंका पहिष्कार करना चाहिए । विदेशीय पों में भासति से अपने देश के उधम का नाश होता है।

द्वितीयोऽध्यायः पुराऽऽसनिह निःसख्याः पटकारा विशारदाः। अंशुकैरुत्तमर्येषां सम्भृतं निखिलं जगत् ॥ ३१ ॥ (३१) पुरातन कालमें यहाँ अवगिनत चतुर कपडे दनानेवाले थे। जिनके बनाए सुंदर कपडों से समस्त संसार भरपूर रहता था। इतोऽब्दानां शतात्पूर्व विच्छिन्ना अधिकारिभिः । पटकारकराङ्गुष्ठाः कृतास्ते नष्टजीविकाः ॥ ३२ (३२) आजसे १०० वर्ष पूर्व अधिकारी वर्गने वस्त्र बनानेवाली के हाथोंके अंगूठे काटकर उनकी आजीविकाका नाश कर दिया था । ध्वस्तोऽनेन विघातेन देशस्योद्यम उत्तमः । पराधीना वयं जाता आग्लदेशावलम्बिनः ॥ ३३ ॥ (३३) इस चोटपे देशके उत्तम व्यवसायका नाश हो गया था और हम अग्रेजोंका सहारा लेनेवाले तया पराधीन हो गये थे । अथाालासुरसाम्राज्ये धर्महीने प्रतिष्ठिते । शिल्पानां भारतीयानां विनाशोऽभूच्छनैः शनैः ।। ३४ ॥ (३४) फिर अंग्रेजों रूपी राक्षसोंके धर्महीन साम्राज्यकी स्थापना हो जाने पर शनैः शनैं भारतीय कलाओंका नाश हो गया। पदे पदेऽधिकारो नो विच्छिन्नः परतस्करैः। येन व्यक्तित्वहीनाः स्मो हृतपक्षाः खगा इव ।। ३५॥ (३५) विदेशीय चोरॉने कदम कदम पर हमारा अधिकार ऐसा नष्ट किया जिससे हम पक्षहीन पक्षियों के समान व्यक्तित्वहीन हो गए। नपुंसका वयं जाता हतशस्त्रादिसाधनाः। पुंस्त्वापहरणान्नान्यः परं शोच्यो हि विप्लवः ॥ ३६॥ (३६) शस्त्रादि साधनोंका अपहरण हो जाने पर हम नपुंसक हो गये। पुंस्त्वके अपहरणके समान अन्य कोई शोचनीय विप्लव नहीं है।

तृतीयोऽध्यायः कोटयो नरनारीणामुपदेशं महात्मनः । निशम्यापुर्महोत्साहं निष्ठां च देगकर्ममु ।। ४३॥ (१३) कोदो स्त्रीपुरमॉन महा नाके उपदेशो मुनका महान् टन्साह और देशके कामि श्रद्धा प्राप्त की। पारा मोहतमस्मता जागरित्वा शनैः शनैः । त्यक्तमोगा अजायन्त मुनेस्तस्यानुयायिनः ॥ ४४ ।। (४१) महानिद्राम सोए हुए पुरके टोग धीरे धीरे जागकर मोगा- को छोड़कर रस महामाके अनुयायी वन गए ! परदेशीयवस्त्राणि निर्दह्य बहो जनाः । श्वेतखादिवराः सन्तः सञ्जाता देशसेवकाः ।।१५।। (१५) बहुवसे लोग परदेशमें दने हुए वनोंको जलाकर सफेद खादीको धारण करनेवाले देशमेवक बन गए। आरब्धं विविध शिल्पं युवकैयवसायिमिः । गुञ्जनं तन्तुचक्रस्य श्रूयते स्म गृहे गृहे ॥४६॥ (४६) यमसील युदोंने नाना प्रकारके शिस गुरू किए । चरन्देकी झंवर घर घरमें मुनाई देने लगी। तृतीयोऽध्यायः ततो विचारयन् प्रश्नान् बहूनेकापमानतः । अहिंसा परमो धर्म इति निर्णयमागतः ॥१॥ (१)च्च फिर एकाप्र मन होना बहुत नोंको सोच्ठा हुआ वह इस निर्णयपर पहुँचा कि ' अहिंसा' सबसे बड़ा धर्म है। हिंसां न कोऽपि कुर्वीत मनोवाकायकर्ममिः । . अहिंसर्यव सिद्धिः स्यादित्याह स पुनः पुनः ॥२॥ (२) कोई भी मनुष्य मन, वचन अया कर्मसे हिंसा न करे। अहिंसासे ही सिदि प्रात होगी यह बात उसने बार बार बताई।

सत्याग्रहगीता साधैंकशतमब्दानां स्थिता लोकास्तमोवृताः । हीना देशाभिमानेन राष्ट्रोन्नतिपराङ्मुखाः ॥ ३७॥ (३७) लोग डेदसौ वर्षपर्यन्त अन्धकारसे धिरे दुए टहरे रहे। राष्ट्रकी उन्नतिसे पराइमुख हुए निज देशके अभिमानसे हीन थे। विमानिताः स्वदेशे च विदेशे च तिरस्कृताः । अधोमुखाश्च दासत्वान्नस्तिताः पशवो यथा ॥३८॥ (३८) अपने देशमें निराहन, विदेशमें तिरस्कृत, दासत्वके कारण नीचा मुख किए वे नाकमें नकेल डाले पशुओंके समान थे। भारताभ्युदयायाऽतः कुरुध्वं दृढनिश्चयम् । परदेशीयवस्तूनां विदध्वं बहिष्कृतिम् ॥ ३९॥ (३९) इसलिए भारतवर्षके उत्थान के लिए दृढनिश्चय कर लो। विदेशीय वस्तुओका बहिष्कार करो। नैवल्यमुपयास्यन्ति बहिष्कारेण चाङ्गलाः । तयापारे च विध्वस्ते स्वातन्त्र्य ना सुनिश्चितम् ॥४०॥ (४०) पहिफारसे अंग्रेज निर्यल हो जाएंगे। उनका व्यापार नष्ट हो जाने पर हमारा स्वातन्य निश्चित रूपसे भाएगा। खादिवतात्परं वासो नैव धार्य कदाचन । स्वार्थत्यागात्स्वदेशार्थ नान्यच्छ्यो हि विद्यते ॥४१॥ (४) सादी पखको छोटकर दूसरा पत्र नहीं पहनना चाहिए । स्वार्थम्यागके अलावा अपने देशका कल्याण नहीं है। इत्यादिशन् महात्मासी देशपन्धन पुरे पुरे। प्रोत्साई हतचेतस्सु लोकेए समधुक्षयत् ॥ ४२ ॥ (11) मगर मारमें अपने भाई भोको आदेश देते हुए उन महामा- जीने मरे हुए ममशाठे टोगों में साइमा दिया। है । + तृतीयोऽध्यायः कोटयो नरनारीणामुपदेशं महात्मनः । निशम्यापुर्महोत्साहं निष्ठां च देशकर्मसु ॥ ४३ ॥ (१३) कोही स्त्रीपुरषोंने महात्माके उपदेशको मुनकर महान् उत्साह और देशके काममि श्रद्धा प्राप्त की। पौरा मोहतमस्सुप्ता जागरिला शनैः शनैः । त्यक्तमोगा अजायन्त मुनेस्तस्यानुयायिनः ॥ ४४ ॥ (४३) महानिद्राम सोए हुए पुरके लोग धीरे धीरे आगकर मोगा- को छोड़कर उस महारमाके अनुयायी बन गए । परदेशीयवस्त्राणि निर्दय बहवो जनाः । श्वेतखादिधराः सन्तः सजाता देशसेवकाः ॥ ४५ ॥ (४५) बहुतसे लोग परदेशमें बने हुए वस्त्रोंको जलाकर सफेद खादीको धारण करनेवाले देशसेवक बन गए। आरब्धं विविघं शिल्पं युक्कैर्व्यवसायिमिः । गुञ्जनं तन्तुचक्रस्य श्रूयते स्म गृहे गृहे ॥४६॥ (४६) उद्यमशील युबर्कोने नाना प्रकारके शिल्ल शुरू किए । चरखेकी झंकार घर घरमें मुनाई देने लगी। तृतीयोऽध्यायः ततो विचारयन् प्रश्नान् बहूनेकापमानतः । अहिंसा परमो धर्म इति निर्णयमागतः ॥ १ ॥ (.) तब फिर एकाग्र मन होना बहुत प्रश्नोंको सोचता हुआ वह इस निर्णयपर पहुँचा कि ' अहिंसा' सबसे बड़ा धर्म है। हिंसां न कोऽपि कुर्वीत मनोवाकायकर्ममिः । . अहिंसयैव सिद्धिः स्यादित्याह स पुनः पुनः ॥२॥ (२) कोई भी मनुष्य मन, वचन अयदा कर्मसे हिंसा न करे। अहिंसासे ही सिद्धि प्रात होगी यह बात उसने बार बार बताई।

सत्याग्रहगीता अथ सन्त्रासिते लोके चम्पारण्याभिषे स्थले। आङ्गलैः प्रबलोन्मत्तैरुदभूत्कष्टसञ्चयः ॥ ३॥ (३) चम्पारण्य नामके स्थानपर प्रकृष्ट बलसे उम्मत हुए अंग्रेजोसे लोगोंके सताए जानेपर बहुत दुःखके समूहकी उत्पत्ति हुई। दुःखग्रस्तस्य लोकस्य साहाय्यार्थं जगाम सः । प्रतिस्थलं जितात्मायमहितद्वेषवर्जितः ॥४॥ (४) वह दुःखग्रस्त लोगोंकी सहायताके लिए शत्रुओंमें द्वेपबुद्धि न रखता हुआ प्रत्येक स्थानमें गया। वित्रस्तं कर्मकल्लोकं कुस्वामिभ्यो विमोच्य सः । न्यवर्तत निजावासं नीतिशास्त्रविशारदः॥५॥ (५) डरे हुए कर्मचारियोंको स्वामियोंसे छुटकारा दिलाकर नीतिशास्त्रमें चतुर यह अपने स्थानको लौट गया। ततो जनपदान् कैरानुपयातो विपद्गतान् । स्वबान्धवान् समुत्सृज्य विवशन्मरणोन्मुखान् ॥६॥ (६) सदनन्तर निहत्थे मरणोन्मुख अपने भाइयोंको छोड़ कर पह विपत्तिम पड़े हुए केरा जिल्हेमें पहुँचा । एवं स्थिते कथं दातुं मन्दभाग्याः कृपीवलाः । दारियरक्षसा ग्रस्ताः शनयुकरं पणम् ॥ ७॥ (0) ऐसी परिस्थितिम मन्दभाग्यवाले किसान पदिणरूपी राक्षस- से मतिशत जमीन टैक्स () कैसे दे सकेंगे। करादानस्य दारिप हेतुरासीन चान्यथा । रानापि सरसः गुफास्यः पातु न पारयेत् ॥८॥ (८) कर ऐनेका परिणमे छोड़कर अन्य कोई कारण नहीं था। पर गटाप पूर्ण हो जाने पर राना भी पानी महीं पी साता है। मस्त हुए 4 १७ तृतीयोऽध्यायः एकवर्षावकाशं ते प्रार्धयन्त कृषीवलाः। करुणं करदानाय निघृणानधिकारिणः ॥९॥ (९) कृषीवलोंने दुःखपूर्वक निर्दयी अधिकारियोंसे कर देनेके लिए एक वर्षका अवकाश मांगा। तयाचनां विरस्कृत्य पापाणहृदयास्तु ते । करादाने हरिप्यामः क्षेत्राणीति व्यतर्जयन् ।। १० ॥ (.) उन पयरके समान कटोर मनगलोंने उनकी प्रार्थनाका तिरस्कार करके ऐसी धमकी दी कि करके न देनेमें हम खेतीको छीन टेंगे। शोचनीयां कथामेतामाकर्ण्य स दयानिधिः । द्रवीभूतश्विरं तस्थौ ध्यायंस्तन्मुक्तिसाधनम् ।। ११ ॥ (१) वह दयाका समुद्र अर्थात् महादयालु महाग्मा इस शोचनीय कयाको सुनकर पिघल गया और उनके मोक्षके साधनको सोचने लगा। ततोऽधिकारिणो द्रष्टं महात्माऽभिजगाम सः । वाचोयुक्तिभिरर्थ्याभिः प्रयते च प्रसादने ॥ १२ ॥ (१२) फिर अधिकारियोंको देखने के लिए वह महात्मा पहुँचा और इसने युक्तिपूर्ण वचनों क्या प्रार्थनाओंसे उनको प्रसन्न दरनेका यत्न किया। स्वयले विफलीभूते मुवादरपि संयमी । अन्यायिनो नृपप्रेप्यान् बिरोढुं निश्चिकाय सः ॥ १३ ॥ (१३) संयमशील महात्माने सुन्दर वचनोंसे भी अपने यत्न विफल देखकर अन्यायी राजाके नोकरोंके साथ विरोध करनेका निश्चय किया। स्वनिश्चयानुरोधेनाऽऽकारयच महासभाम् । तत्रानेकरूपन्यासविदधे कार्यनिर्णयान् ॥ १४ ॥ (१४) और अपने निश्चयके अनुरोधसे महासभा करवाके वहाँ कई प्रस्तावों द्वारा कार्यका निर्णय किया। के सत्याग्रहगीता रानभृत्यास्तु दुर्वृत्ताद् व्यरमन्न मनागपि । भूयोऽपि कृषिकान् दीनान् बलात्कारैरपीडयन् ॥१५॥ (१५) राजाके नौकर अर्थात् सरकारी अफसर तो अपने बुरे घ्यवहारसे जरा भी न हटे।किन्तु उन्होंने दीन किसानोंको वलाकारोंसे दुःखी किया। अथ न्याय्यसमाचारो महात्माऽन्वर्थनामकः । सत्याग्रहस्य तत्त्वानि व्याख्यौ ग्रामवासिनाम् ।। १६ ॥ (१६) तब न्यायपूर्वक आचरण करनेवाले नामानुसारी गुणोवाले महात्माने गॉवके निवासियोंकी सत्याग्रहके सार तत्व बताए । स्वधर्म प्रतिपद्यध्वं पुरुषत्वं च रक्षत । इत्यप्रवीत्स धर्मात्मा स्वबन्धूनाफ्रिके यथा ॥ १७ ॥ (१७) अपने धर्मका पालन करो । पुरुषत्वकी रक्षा करो।ये बातें अपने भाइयोंको वैसे ही बताई जैसे आफ्रिकामें बताई थी। राज्याधिकारिणां वर्गे लोकानामहितोद्यते । प्रजानामधिकारोऽस्ति बलात्तेपां विरोधने ॥१८॥ १८) राज्य के अधिकारियों के प्रजाके अहितके लिए उद्यत होनेपर प्रजाको उनका बलपूर्वक विरोध करनेका अधिकार है । एकतथ स्थितो मानी राजभृत्यो महाबलः । अन्यतश्च प्रजावों नतकायो भयादितः ॥१९॥ (१९) एक ओर वो अभिमानी महाबली राजाका भृत्य (-वर्ग) है और दूसरी ओरसे दुःखी, झुका हुआ, भयग्रस्त प्रमावर्ग था । अपमानमिमं सोडें कथं शक्नुथ बान्धवाः । त्यक्लाधिकारिणो भीतिमुनिष्ठत सपौरुषम् ।। २० ।। (२०) हे भाईयो ! आप इस अपमान सहारन कैसे कर सकते हैं? आप अधिकारियोंके भयको छोड़कर बलपूर्वक उठिये । से .

तृतीयोऽध्यायः अहिंसका जितक्रोधाः प्रवर्तध्वं स्वकर्मणि। शस्त्रास्त्रबलहीनानां बलं सत्याग्रहः परम् ।। २१ ॥ (1) हिंमारहिव शोघ जीतकर, अपने अपने कामॉमें प्रवृत्त हो जाइए । शास्त्र और अखके दलसे बिहीन मनुप्योंका महान् बल सत्याग्रह है। भक्तव्यं शासनं दुष्टं प्रदातव्यो न भूकरः । सोढव्यः सर्वथा दण्डः सत्याग्रहमुपाश्रितः ।। २२।। (२२) सत्याग्रहके आश्रय लेनवालोंको दुष्ट शासन तोड़ना होगा, भूकर नाहीं देगा, दण्ड सर्वया महारना होगा। अद्भुतं फलमेतस्य प्राप्स्यामो नचिराद् ध्रुवम् । इति प्रोत्साहयन्नाह स गुर्जरकृपीवलान् ॥ २३ ।। (२३) गुर किमानाको प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने कहा कि हमें शीही इसका अद्भुत फल मिटना निश्चित है। प्रान्तस्यास्य जनः कृत्स्नः सत्यवीयर्यादिमिर्गुणः । अनुचक्रे स्त्रकान्वन्धूनाफ्रिकाखण्डवर्तिनः ॥ २४ ॥ (२४) इस प्रान्तके समस्त जनोंने सय वीयर्यादि गुणोंमे सपने आफ्रिकादेशनिवामी भाइयॉन अनुसरण किया। हतगोभूमयश्चापि सत्याग्रहमुनिष्टिताः । ग्राम्यास्तस्पुरनुद्विग्नास्त्यक्तमोगार्थसंपदः ।।२५।। (२५) सत्याग्रहमें श्रद्धा रम्बनेवाले गाँवके लोग अपने भोगमामग्री- का त्याग कर गी और जमीनके हर जाने पर भी यनुदिन रहें। शासकानां तमश्छन्ने हृदि नानारुणोदये । वान्ते प्राप संसिद्धिं सत्याग्रहमहानतम् ॥ २६॥ (२६) अन्धकारसे ढके हुए शामके हृदयमें ज्ञानरूपी सूर्यके उदय हो जाने पर सन्याग्रहका महान वन वपके मन्तमें सफल हुआ।

सत्याग्रहगीता करदानासमर्थेभ्यो देयः संवत्मरोऽवधिः । करदानक्षमेभ्यस्तु परिग्रायः करो द्रुतम् ॥२७॥ (२७) जो लोग 'कर' देनेमें असमर्थ हैं उन्हें तो एक सालकी अवधि (मोहलत ) देनी चाहिए। जो कर देनेमें समर्थ है उनसे तो जल्दी ही ले लेना चाहिए। यथावं हृतवस्तूनि प्रतिदेयानि सत्वरम् । इति शासितुराज्ञाऽभूद्यथा लोकैरपेक्षितम् ।।२८ ॥ (२८) जैसे लोगों की इच्छा थी तदनुसार ही शासककी आता हुई कि अपहरण की गई वस्तुएं जिसकी है उन्हें जल्दी लौटा देनी चाहिए। सर्वतः सफलीभूते गुर्जरेषु महावते । हर्षविस्मयसङ्कीर्ण प्रजानामभवन्मनः ।। २९॥ (२९) गुर्जरोंके सयामह नतके सब ओर सफल हो जाने पर प्रनाम मन हर्प तथा विस्मयसे पूरित हो गया। ग्रामीणा: कैरदेशस्य धैर्यसत्त्वादिसदगुणैः। मानास्पद्मजायन्त भारतस्याखिलस्य च ॥३०॥ (३०) धैर्य और सत्यादि गुणोंसे कैरा जिल्हा निगसिजन समस्त भारतके मानके पात्र हो गए। कीर्तिस्सत्याग्रहस्यापि प्रस्ताऽखिलभारते । लोकानां मतभेदेऽपि तत्प्रभावः सुमानितः ॥ ३१ ॥ (३१) सत्याग्रहका यश समन भारतवर्ष में फैल गया। लोगों मठभेद होनेपर भी उसका प्रभाव अच्छी तरहसे माना गया।

चतुर्थोऽध्यायः ततस्तीरे सबर्मत्या नाम्ना सत्याग्रहाश्रमम् । महात्मा स्थापयामास सदनं सानुयात्रिकः ॥१॥ (१) इसके बाद सारमती नदी के किनारे उस महामाने अपने साथियोंके साथ सम्याग्रहाश्रमरूपी घरकी स्थापना की। सत्यमेव प्रमाणं यन्मनोवाकायकर्ममिः । तस्मिन् पुण्यनिवासे तद्यथार्थो हि स आश्रमः ॥२॥ (२) क्योंकि उस पुण्य निवासमें मन, वचन तथा शरीरसे सन्यही प्रमाण है; इसवास्ते वह आश्रम यथार्थ नामवाला था। अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रही। स्वदेशवस्तुनिष्ठा च निर्मीती रुचिसंयमः ॥३॥ (३) आसा, सत्य, किसीकी वस्तु न चुराना, ब्रह्मचर्य, किसी भी वस्तुका संग्रह न करना, स्वदेशमै दनी वस्तुओंमें श्रद्धा, नीटरपन, रुचि, संयम, अन्त्यजानां समुद्धारो नवैतानि व्रतानि हि । भारतोत्कर्षसिद्धयर्थमाश्रमस्य महात्मनः ।।४।। (४) हरिजनोंका समुद्धार-ये नौ ब्रत महात्मा आश्रममें भारत- के अभ्युदयनरी सिद्धिके लिए हैं। निर्ममो नित्यसत्त्वस्थो मितागी मुस्मिताननः । सुकलत्रः शिशुप्रेमी पितेवाश्रमवासिनाम् ॥५॥ (५) मोहरहिव, सदैव सत्वगुणमें स्थिति रसनेवाला, थोडा सानेवाला, हसमुख अनुरूप, पत्नीका पति, क्योंके साथ प्रेम करनेवाला, आश्रमनिवासियोंको पितासमान, ૨૨ सत्याग्रहगीता ध्यायन क्लेशान् स्वबन्धूनां तद्धितकपरायणः । विराजते मुनिर्बुद्धो बोधिद्रुमतले यथा ॥६॥ (६) अपने भाइयोंके केशोरो सोचता हुआ, उनके ही हितम लगातार लगा हुआ, बोधी वृक्षके नीचे बैठे वुद्धके समान शोभा दे रहा है। साक्षात्सत्यप्रदीपोऽयं दीप्यतेऽखिलभारते । स्वबन्धूनामपाकुर्वन् हृदयान्मोहनं तमः ॥७॥ (७) अपने भाइयों हृदयोंसे मोहजनित अन्धकारको दूर करता हुआ वह साक्षात् सत्यका प्रदीप ही भारतवर्ष में जगमगा रहा है। चलं सर्ववलेभ्योऽपि सत्यस्यैवातिरिच्यते । सत्यवानबल: श्रेयान् सबलात्सत्यवर्जितात् ।। ८॥ (८) सब बलोंसे सत्यका ही बल बढ़ कर है। सत्यवादी दुर्बल होना हुआ भी असत्यवादी बलबानसे अच्छा है। तो चरन्ति धर्मेण प्रजा वा राज्यशासकाः। समृद्धिर्जायते तेपामन्येषां तु क्षयो ध्रुवः ॥९॥ (९) इस लिए जो प्रजा अथवा शासक धर्मका आचरण करत हैं उनकी उग्रति होती हैं। दूसरोका तो नाश निश्चित है। इति तत्रभवान् गान्धिराख्याति सहवासिनः । अनुयायिननांश्चान्यान् वचसा लेखतोऽपि च ॥१०॥ (१०) यह बात पूज्य गान्धीजी अपने साथियों, अनुयायिजनों, सया दूसरों को भी वचन तथा लेख द्वारा बताते हैं। असहयैरद्भुतालोकः सदगुणैर्धर्मसञ्चितैः । विराजते महात्माऽसौ ताराभिर्गगनं यथा ॥११॥ (1) असंख्य अद्भुत चमत्कृतिवाले, धर्मपूर्वक सचित शुभगुणों से यह महारमा ऐसे शोमा देता था जैसे तारागोंसे भाराश शोभा देता है।

चतुर्योऽध्यायः २३ महान्मा प्राह अधर्ममपि दृष्ट्वा यः प्रतिबन्टुं न वाञ्छति । सत्ये सत्यपि यो भीत्या न च तत्प्रतिपद्यते ॥१२॥ (१२) महामानी बोले-जो मनुष्य अधर्मको देख कर भी उसे रोकना नहीं चाहता है, और सयके होते हुए भी जो ढरसे उसका ग्रहण महीं करता है, क्लीवयोख्मयोचापि निष्फलं जीवनं तयोः । स्वार्थनाशमयाद्यत्तौ रक्षतोऽनृतजीवनम् ॥ १३ ॥ (१३) उन दोनों ही नपुंसकोंका जीवन निष्फल है । क्योंकि स्वार्थ के नाश होनेके दरमे वे इछे जीवन रक्षा करते हैं। सहिष्णुरप्यघस्याहं सर्वयास्मि निरोधकः । सत्यस्य प्रतिपत्तास्मि भयदस्यापि निश्चितम् ॥ १४ ॥ (१४) सहिष्णु होता हुआ भी में पापका पूर्ण रूपसे निरोधक हूँ। सत्यक भयंकर होनेपर भी मैं निश्चितरूपसे उसका अनुयायी हूँ। बलात्कारोऽपि साधीयान चाध्यात्मिकमीस्ता। अहिंसा निजपापन्नी दमनी च द्विपामपि ॥ १५॥ (१५) आध्यात्मिक भीरपनये बलादार भच्छा है। अहिंसा अपने पापको नाश करनेवाली है और शत्रुओंश दमन करनवाली है। अहिंसा पालयेन्मयों धीरो मृत्युमुसेऽपि सन् । यस्य धैर्यमिदं नास्ति स कुर्वीत बलात्कृतिम् ॥ १६ ॥ (१६) धैर्यशील मनुष्य मृत्युके मुख में भी गया हुमा अहिंमाका पालन करे। जिसका धैर्य न हो वह वलसे काम हिंसामपि समाश्रित्य वरं मृत्युमुसे गतम् । न पुनः स्वात्मरक्षार्थ कृत निन्धं पलायनम् ।। १७॥ (१७) हिंसाका आश्रय टेकर मौत के मुखमें जाना अच्छा है न कि अपनी रक्षाके लिए निन्दनीय भागना । - सत्याग्रहगीता । करोति मनसा हिंसां स हि मीरुः पलायिता। आत्मनो मृत्युकातर्यादात्महिंसां करोति च ॥ १८ ॥ (१८) जो मनुष्य मनसे हिंसा करता है वह दरपोक है और भगोडा है। और अपनी मौतके डरसे वह अपनी ही हिसा करता है। अस्य सात्त्विकधर्मस्य समुद्धारविधायकः । शनैः शनैर्बल प्राप्य दुर्निगारो भविष्यति ॥ १९ ॥ (१९) यह सात्विक धर्म अर्थात् सत्याग्रहरूपी धर्म, इसका उद्धार करनेवाला शनै शनै बल पाकर अजय बन जाता है। अत एव मया दत्तं नाम सत्याग्रहाश्रमः । सत्यानुयायियुक्ताया विनीतवसतेर्मम ॥ २० ॥ (२०) इसलिए मैंने अपने नाचीज निवासस्थानको ' सत्याग्रहाश्रम नाम दिया है, क्योंकि यह सत्यके ही अनुयायीयोंसे युक्त है। इति सत्यादिधर्माणाममोघं बलमद्भुतम् । वर्णयन् ग्राहयामास व्रतानि सुबहून् गुरः ।। २१ ॥ (२१) इस प्रकारसे सस्यादि धर्मोके कभी निष्फल न होनेवाले अद्भुत बलका वर्णन करते हुए उसने बहुत सारोंसे उन व्रतोंका ग्रहण . करवाया। न केनाप्यहमासायं करिष्ये चन्द्रवासरे। सम्भाषणमिति प्राज्ञो मौनव्रतमधारयत् ॥ २२ ॥ (२२) सायकाल तक सोमवारके दिन मैं किसीसे भी बात न करूगा यह सोच कर बुद्धिमानने मौन धारण किया। अतः प्राप्ते गरिठेऽपि कार्ये तं नैव चिक्तिशुः ॥ तस्य व्रतसमाप्तिं तु प्रतीक्षाश्चक्रिरेऽनुगाः ॥ २३ ॥ (२३) इसलिए भारी भर्थात् आवश्यक राम पडने पर भी उसके अनुयायिगण उसे कष्ट नहीं देते थे। प्रत्युत् उसके व्रतकी समाप्तिकी प्रतीक्षा करते थे।

सत्याग्रहगीता जगतः सुव्यवस्थाथ निर्णेतुं च स्वतां स्वतः। संग्रवृत्तमिदं युद्धमिति ख्यापितमाङ्गलैः ॥२॥ (२) अंग्रेजोंने यह पात मशहूर कि संसारकी सुव्यवस्था करने के लिए और अपनी वस्तुका अपने आप हो निर्णय करने के लिए यह युद्ध शुरू किया गया है। यूयं प्राप्स्यथ युद्धान्ते स्वातन्त्र्यं चिरमीप्सितम् । साहाय्यं कुरुतास्माकमित्यासीद्राजवाचिकम् ॥३॥ (३) राजाने अर्थात् अग्रेजी सरकारने यह वचन दिया कि तुम लोगोंको अर्थात् भारतीयोंको युद्धके अन्तमें चिराभीष्ट स्वतन्त्रता मिलेगी इस लिए हमारी सहायता करो। अथालच्छलनिःशङ्को देशकल्याणतत्परः । आइग्लान् सेवितुमारेभे सपक्षानीतिकोविदः ।। ४ ॥ (४) नीतिमें चतुर ( गान्धीजी) देशके कल्याणमें उद्यत अंग्रेजोंके कपटकी शंका न करता हुआ अपने पक्षवालोंके साथ अंग्रेजोंकी सेवा करने लगा। क्षतलोकस्य सेवार्थ तेन सद्धो विनिर्मितः । युध्यध्वमाङ्ग्लराष्ट्रा) बान्धवा इति चाब्रवीत् ॥ ५॥ (५) जख्मी लोगों की सेवाके लिए उसने सङ्घ बनाया । और यह भी कहा कि भाईयो! अंग्रेज राज्य के लिए आप लड़ाई कीजिए । साम्राज्यस्योपकारे हि भारतस्य हितं स्थितम् । इति मत्वागमद्गान्धिदेहल्यां युद्धसंसदम् ॥६॥ (६) साम्राज्यकी भलाईमें ही भारतकी भलाई है यह समझ कर गान्धी देहलीमें (होनेवाली) युद्धकी परिषदमे गए। स्वार्थलाममथ त्यात्वा सेवका देशात्सलाः । व्यसृजन परसंग्रामे निजप्राणान् सहस्रशः ॥७॥ (७) देशसे प्रेम करनेवाले हजारों सेवकोंने स्वार्थको लोड़ कर दुसरोके युद्ध में प्राणोंम त्याग किया।

पञ्चमोऽध्यायः २७ समाप्ते तु महायुद्धे प्रजामर्दनदुस्सहम् । देशे दास्यमगाद वृद्धिं स्वातन्त्र्यस्य तु का क्या ॥ ८॥ (6) महायुद्ध के समात हो जाने पर प्रनाको कुचल ढालनेवाला दुस्सह दामच बढ़ गया। पिन स्वतंत्रताकी तो बात ही कही ! गान्धिश्चक्रे शठेरालमारतं प्रेक्ष्य वञ्चितम् । सत्याग्रहसमारम्ममाफ्रिकायां पुरा यया ॥९॥ (९) दुष्ट अंग्रेजों द्वारा भारतको ठगा हुआ देखकर गान्धीने उमे पहले आमितामें सत्याग्रह रिया या वैसे (यहीं भी) शुरू किया। विरम्यतां निनोद्योगादिति लोकानियोध्य च । तपोमिलचननिरहिंसावतमाचरत् ॥ १० ॥ (१०) अपने अर्थात् जो काम आप व्ययमाय स्पमें करते है टममे भाप हट जाइए, अर्याद काममे असहयोग करें। लोगोंको यह समझा- कर (स्वयं) तप, टपवास और ध्यान द्वारा महिमा बतका पालन किया। यथावत्प्रस्तुते युद्धे बलात्कारविवर्जिते । देहल्यां वणिनां सत्याग्रहिणां च रणोऽभवन् ।।११।। (1) बलात्कारपे रहित युद्ध के ययावत् अर्थात् जमा होना चाहिए वैसे ही प्रस्तुत हो जाने पर देहलीमें सत्याग्रह करनेवाली और व्यापारियों का युद्ध हुआ। वणिरुपयेषु लोकेसु मिलितेषु कुतूहलान् । आग्नेयासाम्यमुज्यन्त रामभृत्यैर्यदृच्छया ॥ १२ ॥ (१२) याजारोंमें तमाशा देखनेराटा एकति होने पर सरकारी कर्म- चारियोंने अपनी इच्छानुसार ही गोलियां चलाई। प्रोत्मादयितुमुद्विग्नानहिंसाया दृट्यते । सेवितुं च क्षदान् गान्धिदेहलीमगमछुतम् ।। १३ ।। (१३) रहिम्न सोगाने पहिसारे ८ में पोसाहित करने लिप तया उरमी टोगोश सा रनके लिए गान्धीजी अन्दीही दाटीचे गए।

२८ सत्याग्रहगीता निरुद्ध शासकादेशादर्धमार्गे महात्मनि । उत्थितस्तीवसंरम्भो धृतसत्यव्रतेप्वपि ॥ १४ ॥ (१४) आधे रास्ते में सरकारी आज्ञासे महात्माजीके रोक दिय जाने पर सत्याग्रहियोंमें भी तीन संक्षोभ पैदा हो गया। प्रवाजितौ समे काले भारताद्देशनायकौ । किचल्यूसत्यपालाख्यावमृत्सरनिवासिनी ॥ १५ ॥ (१५) उसी समय 'किचलू' तथा 'सत्यपाल' नामके अमृतसरके रहनेवाले दो देशनायकोंको देशनिकाला मिला। याचमानस्तयोर्मुक्तिं राजप्रतिनिधि ततः । ताडितो जनसंमर्दो रक्षकैः कारणं विना ।। १६ ॥ (१६) उन दोनों ( नेताओं) की मुक्ति को राजप्रतिनिधिसे याचना करता हुआ जनसमूह बिना किसी कारणके सिपाहियों द्वारा पीटा गया। रक्षिणामपचारेण क्रोधान्धा जनताऽभवत् । आग्लान पञ्च निहत्याथ राजहाण्यनाशयत् ।। १७ ॥ (१७) सिपाहियोंके दुर्व्यवहारसे जनता से अन्धी हो गई। पाँच अंग्रेजोंको मार कर सरकारी इमारतोंका नाश कर दिया । आगली प्रमदा काचित्क्रुद्धलोकैः प्रताडिता । रक्षिता वितरैः कैश्विनीताऽभूनिर्भयं स्थलम् ॥१८॥ (१८)ोधमें आए लोगोंने किसी एक अंग्रेज रमणीको पीटा। और कई दुसरीने उसकी रक्षा की (तथा ) उसे निर्भय स्थलको ले गए। ततो दिनद्वयादाइग्लो डायरो नाम दुर्नरः । महासेनामधिष्ठाय सेनानी तमागमत् ।। १९ ।। (१९) इसके याद दो दिनमें दायरनामा दुष्ट अंग्रेज जनरल महासेनाका सेनापतित्व लेकर शीघ्र आ गया।

पञ्चमोऽध्यायः तत्र चोपस्थिते तस्मिञ्जनवृन्दमपामरत् । गृहीताच जनाः केचित्पुनः शान्तिः प्रतिष्ठिता ॥२०॥ (२०) ठपके वहाँ आ जाने पर लोगोंका समूह हट गया। कई लोग पकड लिए गए। फिर शान्ति स्थापित हो गई। पौराण्डिण्डिमयोपेग समाहृय दुरात्मकः । जनयात्राः समाथापि निषेधामीत्यगर्जयन् ।। २१ ॥ (२१) वह दुरामा नकारेकी आवजमे पुरनिवामियों को बुलाकर गना कि लोगोंका यातायात और समा (सम्मेलन) बन्द करता हूं। विना मेऽनुज्ञया कोऽपि न गच्छेन्नगराबहिः। इति च ख्यापयामास नररूपी स राक्षसः ॥ २२॥ (०२) उम नररूपी राक्षमने यह आज्ञा दी कि मेरी अनुमति बिना मगरसे बाहर कोई न जाए। कृतेऽपि घोपणे तस्मिन्नयुतं तीर्थसेविनः । पुरेऽमृतसरे धर्मोत्सवाय मिलितास्तदा ।। २३ ॥ (२३) ऐसी घोषणा के किए जानेपर भी करोडों तीर्य-सेवा करने- वाले (लोग) उस समय धर्मके उ सबके लिए अमृतसर शहरमें इन्हे हुए। जाल्यन्वालाख्य उद्याने प्राकारेणावृते फिल । तत्र तेषूपविष्टेषु गुलिकाटिरापतम् ॥ २४ ॥ (२४) वहाँ यादरकी दीगरसे घिरे हुए जात्यानवाला नामक टपानमें बैठे हुए लोगोंपर गोलियोंकी वषां या गिरी । आग्रेयसंनिपातोऽयं प्रापर्वत चमूपतेः । घोराजया नृशंसस्य विना पूर्वप्रमोधनम् ।। २५॥ (२५) निर्दयी मेनापतिकी भीषन आज्ञामे रिना पहले बताए दो गोलियोन मनिरात आरम्भ हुआ।

सत्याग्रहगीता बन्दीकृताः स्थले तस्मिन् यात्रिकास्ते भयार्दिताः। परस्परं निपीड्योचैरक्रन्दन भयनिहलाः ॥२६॥ (२६) उस स्थान पर भयसे पीडित यात्री वन्दी बना लिए गए। वे (लोग) भयसे व्याकुल परस्पर जोरसे गले लगकर रोने लग गए । निदोपोऽय जनस्तोम इति ज्ञात्वापि निश्चितम् । नैव स्वकर्मणो घोराद् व्यरमत्स पिशाचकः ॥ २७॥ (२७) उस जनसमूहको पूरी तरहसे निदाप समजकर भी वह नरपिशाच अपने घोर कर्मसे न हटा । यन गाढो जनौघोऽभूत्तप्रवास्कन्दमाचरत् । इमे लोकाः शरव्यं में मिति कत्यनः ॥२८॥ (२८) जहाँ ही रोगोंकी भीड होती थी यहीं छटाग लगाता । यह यस्ता था कि ये लोग मेरे वो मुन्दर निशा है। शासता तेन सेनान्या दत्ताऽऽज्ञेति भयङ्करी । याफ्रान्ताऽऽङ्गली तर सर्पयुरुरसा जनाः ॥ २९ ॥ (२९) उस शासक अग्रेजने भयंकर आज्ञा दी थी कि जहाँ अंग्रज युवतीपर हमला हुवा था वहाँ टोग पेट पर भाडेही पर सरक सरक कर घलें। यः फोऽपि दैयसंयोगाद् पोराज्ञां तामलड्ययन् । हा कष्टं मन्दमाग्योऽमौ ताडितो निर्दयं यत ॥ ३०॥ (३.) भोपएकी या है कि जहाँ योई दैवयोगमे भर्यात अन. पानमे उप घोर भाताका सपन करता या यह मन्दभाय निर्दयता. पूर्वक पीय जाग था। अध्यापराय शिप्याच समाहता दिने दिने । अतिदूरनिवासभ्यस्वन्नशानामनादरात् ।। ३१ ।। (1) प्रतिदिन अभ्यार और सियो नी देखना का उन्हें बहुत दूर दूर पति पुष्टाया जाता था।

पञ्चमोऽध्यायः ३१ अथाज्ञामनु संप्राप्ता गुरुशियाः सहस्रशः । पैशाचवृत्तिना तेन राजमार्गे प्रताडिताः॥३२॥ (३२) आनाके अनुसार आए हुए हजारों अध्यापकों और शिप्योंको उस पिशाचवृत्तिवाटेने राजमार्गम बुरी तरहसे पीटा। दारुणानामसंख्यानां पापानां दारुणं फलम् । परत्र लप्स्यते दुष्टः काव शङ्का भवेन्ननु ॥३३॥ (३३) अमरय दारुग पापोंका दाग फल दुष्टको और कहीं अर्थात् परलोकम मिलेगा इसमें क्या शंका हो सकती है? घोरकृत्ये कृतेऽप्यस्मिण्डायरेण दुरात्मना । साम्राज्याधिकृता नैनं दोपास्पदमनीगणन् ॥ ३४ ॥ (३४ ) ऐमा घोर फुकर्म करने पर भी दुरामा डायरको सरकारी अधिकारियोंने दोपी न हराया। प्रत्युतायमभूदझै रानगृह्यः सुमानितः । सन्जनस्त्वाइग्लदेशेऽपि निन्दितथ तिरस्कृतः॥ ३५॥ (३५) प्रत्युत् अज्ञानी राजगृहवालासे यह सम्मानित हुआ। पर सजनोंने तो अंग्रेजोके देशमें भी उसकी निन्दा की आर निरस्कार किया। अयोग्यो ह्यधिकारेण योजितवेन्नराधमः । नाशं करोति सर्वत्र शस्त्रपाणिः कपिर्यथा ॥३६॥ (३६) अयोग्य और नीच नर अधिकारमें नियुक्त होने पर शस्त्र हायमें लिए यन्दरके समान सर्वत्र नाश करता है। तेनापूर्वप्रसनेन गान्धिर्भूत्वातिदुःसितः। कीर्तिमुद्रां नृपालब्धां प्रत्यार्पयत निर्भयम् ।। ३७ ॥ (३०) इस अपूर्व याठमे अति दुःवित हुए गान्धीजीने निर्भीक होकर राजाकी भोरमे संप्राप्त कीर्तिमुद्रा टसे टोटा दी।

३२ सत्याग्रहगीता रवीन्द्रनाथपूर्वा ये मानिताश्चक्रवर्तिना। तेऽपि सम्मानमुद्राणां परित्यागमकुर्वत ।। ३८॥ (३८) रवीन्द्रनाथादि (लोग ) जो सम्राट द्वारा सम्मानित उन्होंने भी सम्मानमुद्राओंका परित्याग किया। राष्ट्रसंसदि वार्पिक्यां निर्णया विविधाः कृताः । महात्मनोऽनुमोदेन नेहरूलज्पतादिभिः ।। ३९ ।। (३९) वार्षिक राष्ट्रसभा (काँग्रेसमें) नेहरू तथा लजपतरायने महात्माजीके अनुमोदनसे कई प्रकारके निर्णय किए। आङ्ग्लवस्तुबहिष्कारः प्रत्याख्यानं करस्य च । धिक्कारो राजभृत्यानां धृतमेतद्नतत्रयम् ॥ ४० ॥ (४०) अंग्रेजी वस्तुओंग बहिफार, कर देनेसे इन्कार, राजकीय अर्थात अंग्रेजी सरकारके नौकरोंको धिक्कारना, ये तीन व्रत धारण किए। पष्ठोऽध्यायः। सान्त्वनाथ ततोऽस्माकं युवराज इहागतः । भारतीयास्तु दुःखार्ता औदासीन्येन गुण्ठिताः । ॥१॥ (1) तब हमारी सान्त्वनके लिए युवराज यहाँ आया। भारतीय लोग तो दुःखसे पीडित (होनेके ) औदासीन्यसे लपेटे थे। मुम्बापुरी नरेशस्य कुमारे समुपागते । सर्वे पोरजनास्तस्थुनिजोधमपराङ्मुखाः ॥२॥ (२) राजकुमारके यम्यई नगरमें पहुंचने पर सय नगरनिवासी अपने कामोंसे पराङ्मुख होकर खड़े हो गए। प्रविष्टे नगरं तस्मिन् सार्वभौमकुमार। रथ्याः शून्या अवर्तन्त संवृतानि गृहाणि च ॥३॥ (३) सम्राटके एकेके नगरमें प्रवेश करने पर गलियो खाली हो गई और घर बन्द हो गए।

पष्ठोऽध्यायः ३३ दुष्कर्मनिरतेष्वेवमयोग्येप्वधिकारिपु । राजा वा राजपुत्रो वा पुरा प्रियतमोऽपि सन् ॥४॥ (४) अयोग्य अधिकारियोके इस प्रकार दुष्कर्ममें निरत होने पर राजा हो या राजपुत्र हो जो पहले अयन्त प्रिय भी रह चुका हो, दृष्टया दुःखार्तलोकानां प्रतिभात्यतिगर्हितः। अत एव द्विपीवामी जातास्तत्र पराङ्मुखाः ॥५॥ (५) दुःखसे सन्तप्त लोगों की दृष्टि से वह अति निन्दनीय प्रतीत होता है । इस लिए ये लोग उससे ऐसे पराङ्मुख हुए जैसे शत्रु हो। पारसीका नृपासक्ता आङ्गलेया जनास्तथा । स्वागतं राजपुत्राय चक्रिरे स्वार्थतत्पराः ॥६॥ (६) राजाको प्यार करनेवाले स्वार्थी पारसियों तथा आंग्रजोंने राजकुमारका स्वागत किया। भारतं शासितुं शक्यं धर्मेणैव हि केवलम् । न स्वार्थलोलुपत्वेन न च निघृणभावतः ॥७॥ (७) भारतवर्षका शासन न तो स्वार्थ लोभसे और नही निर्दयतासे हो सस्ता है। केवल धर्मसे ही भारतका शासन हो सकता है भिन्नप्रकृतिभिर्लोकैर्विदेशे बलमिच्छुभिः । ज्ञेया जनमनोवृत्तिः प्रमाणं हि प्रजाहितम् ॥ ८॥ (6) विदेशमें पल चाहनेवाले भिन्न प्रकृतिवाले लोगोंको प्रजाकी मनोवृत्तिको ही इसके हित के लिए प्रमाण समझना चाहिए। अज्ञानाद्भवति द्वैधं द्वैधाद्भवति शत्रुता । शनुवाद्विप्लवो भावी ततो नाशः प्रशासितः ॥९ (९) शानसे वैध होता है । धसे शनुता उत्पन्न होती है। पातासे विप्लव होता है। उससे राज्य करनवालेका नाश होता है। ।

। सत्याग्रहगीता मत्ताः स्वार्थप्रधानाथ वाणिजा आगला इमे। संस्कृति भारतस्यास्य प्राक्तनी ज्ञातुमक्षमाः ॥१०॥ (१०) स्वार्थमें लिप्त (स्वार्थही है प्रधान जिनमें ) अभिमानी ये अग्रेजी व्यापारी इस भारतवर्षकी पुरानी संस्कृतिको समझने में भसमर्थ हैं। पुरा भारतवर्षेऽस्मिन् सर्वविद्याकलाश्रये । प्रख्याताभ्युदये राजत्याला अज्ञा इव स्थिताः ॥११॥ (११)जय प्राचीन काल में यह भारतवर्ष सब विधाओं और कलाओका आधार होने के कारण अम्युदयके लिए प्रसिद्ध था तब अग्रेज लोग अज्ञानियोंके समान रहते थे। क नः प्राचीन उत्कर्षों वेदशास्त्रादिभूषितः । क तत्कालदशाऽऽडालानां मृगचर्मकवाससाम् ।। १२ ।। (१२) वेदशास्त्रादिसे विभूषित हमारी प्राचीन उन्नति कहां और मृगचर्म मात्र वस्त्रोंको पहननेवाले अंग्रेजोंकी उस समयकी दशा कहा? स्वभावज क सौजन्यं भारतस्य हि सात्त्विकम् । काङ्गलानां नु पारुष्यमविश्वासोऽसहिष्णुता ॥ १३ ॥ (१३) कहा भारतवासियोका सस्वगुणोत्पन्न स्वाभाविक सौजन्य, और कहा अग्रेजों की कठोरता, अविश्वास और असहिष्णुता ? जनी कथमिमौ मिन्नौ स्वभावाच्छिक्षया तथा । विनानुरागन्धेन भवेतां सहवर्तिनौ ॥१४॥ (१४) स्वभाव तथा शिक्षासे ये दो भिन्न भिन्न लोग प्रेमके घधनके बिना कैसे सहयोगी बने। धर्मकञ्चुकिनां हन्त परद्रव्यापहारिणाम् । भारतीयाः स्त्रमौल्येण द्विपामामिपता ययुः ॥१५॥ (१५)अहो कष्ट है कि भारतवर्ष के लोग अपनी मूर्खताके कारण धर्मके पेशधारी भारतवर्ष धन चुरानेवाले शत्रुओंके शिकार पन गए थे।

पष्ठोऽध्यायः ३५ उच्चावचेषु लोकेषु कष्टं संजायते सदा । मतान्तरासहिष्णुत्वाद् धर्मद्वेपस्य चोद्भवात् ॥ १६ ॥ (१६) ऊारके तथा निम्नस्तरकै लोगोंमें मवान्तरको असहिष्णुता वया धर्मद्वपके उत्पन्न होने के कारण सदैव कष्ट पैदा हो जाता है। हिन्मुसलमानानां वैरित्वं नाशकारि नः । पारसीकैच विद्वषो देशोत्कर्पस्य का कया ॥ १७ ॥ (१७) हिन्दु क्या मुसलमानोंका वैर हमारे नारान कारण है। और पारसियोंके साप द्वेष चलता है; वो टन्नतिकी कया कैसे हो? उक्तपूर्वो हि सम्मानो राजपुत्र प्रदर्शितः । आङ्गलैः पारसीकय कुतोऽपि स्वार्थकारणात् ।। १८॥ (१८) पहले बताया गया राजपुत्रमें प्रदर्शित आदर अंग्रेजों तथा पारसियोंके उसी स्वार्यही कारण था। अयोद्विग्नाथ संक्रुद्धा भारतस्येतरे जनाः । हिन्दूमुसलमानाय पारसीकरयुत्सत ॥ १९ ॥ (१९) मारतके अन्यलोग हिन्दु और मुसलमान उद्विग्न और क्रुद्ध होकर पारिमियों के साथ युद्ध करने टो। अनाहतस्वदेशास्ते पारसीकास्तिरस्कृताः । जातिभ्यामितराभ्यां च ताडिताः पशवो यथा ॥२०॥ (२०) अपने देशका अनादर करनेवाले पारसियोंने दूसरी दोनो जातियोंने तिरस्कृत किया और पासमान पीय। दुष्कर्मणा स्वबन्धूनां महात्माभूद्विलजितः । नृशंसा डायरप्रख्या इमे इन्तेत्ययत ॥२१॥ (२१) अपने माईयोंकि दुष्कर्मसे महा'मा बिलजित हुए। ये योगायरादिसमान निर्दयी है इतना समझकर उन्हें दुःख हुआ।

सत्याग्रहगीता शान्त्या साधयितुं राज्यमयोग्या मम बान्धवाः । इति तत्पापशुद्धयर्थं स्वयं लङ्धनमाचरत् ॥ २२ ॥ (२२) मेरे भाई अर्थात् भारतीय जनता शान्तिपूर्वक राज्य लेने में असमर्थ है। इससे उस पापकी शुद्धिके लिए उन्होंने स्वयं उपवास किया। सप्तमोऽध्यायः अथो दिनेषु गच्छत्सु घोरः कलिरुपस्थितः । मलबारविभागेपु मोपलाहिन्दुलोकयोः ॥१॥ (१) कुछ दिन जाने पर मलबार विभागोंमें मोपला और हिन्दु लोगोंमें घोर युद्ध उपस्थित हुआ। चतुर्षे हि तन्जन्यमवलन्मूढवृत्तयोः । यत्र नाशं गता व्यर्थ नराः पञ्चशतोत्तराः ॥२॥ (२) मूवृत्तिवाली उन दोनो जातियों में पैदा हुआ युद्ध चार वर्ष पर्यंत चलता रहा-जिसमें व्यर्थ में पाँचसोसे उपर व्यक्ति मारे गये। यथा यथा प्रजामध्ये जायते भिन्नधर्मतः । द्वेषस्तथा तथोत्को देशस्य परिहीयते ॥ ३॥ (३) धर्मभेदका आश्रय लेकर जम जब प्रजाम द्वैप होता है वैसे वैसे ही अर्थात् तदनुसार ही देशके उफर्पकी हानी होती है। पारतन्त्र्याभिभूतस्य देशस्याभ्युदयः कुतः । अतः स्वातव्यमाप्तव्यमैक्यं स्वातन्त्र्यसाधनम् ॥ ४॥ (४) परतन्त्रा से अभिभूत देशकी उन्नति कैसी हो सस्ती है। इस लिए स्वतन्त्रता प्राप्त करनी चाहिए-स्वतन्त्रताके लिए साधन एकता है।

सतमोऽध्यायः ३७ अविगेषः परं शम्नं परतन्त्रीकृतात्मनाम् । तदमावे महाँल्लामो लुब्यस्यैव हि शामितः ॥ ५॥ (५) जिन लोगोंने अपनको परतन्त्र कर दिया है उन बडा हय्यार परस्परका अविरोध है। उसके अमावमें लोमो शामका निश्चयहीमे लाम है। अज्ञानमूलमुत्सृज्य परस्परविरोधनम् । युयुत्सून् योनयेद्वन्धून् विनीतो देशसेवकः ॥६॥ (६) विनीत देशमेवरको चाहिए कि वह मलानमूलक परम्परके विरोधको छोडकर युद्धकी इच्छा करनेवाले माईयोंको मेल कराए। अवाल्पनैव कालेन चौरिचारामिषे स्थले । महत्सङ्कटमुद्भूतं सत्याग्रहविपकम् ।। ७॥ (6) योदे ही काटमें फिर सत्याग्रहको दूपित करनेवाला चौरि चौरा नामक स्थानमें एक महान संकट पैदा हो गया। समायां प्रविरुद्धायां राज्चतन्त्राधिकारिमिः। धृष्टः कचिदान्त सनीवा राजरक्षिणः ॥८॥ (८) राज्यतन्त्रक अधिकारीयों द्वारा जर ममा रोकी गई ठो कई दीठ मनुष्योने राज्यकी रक्षा करनेवाले अात् सिराहियों जीते जीतेही जला दिया। अयशुम्यमिदं कर्म प्रतिस्तू प्रशासकाः । उपलक्षद्वयं नृणां विक्षिपुर्वन्धनालये ॥९॥ (९) शामॉन इस निन्दनीय कर्मा प्रतिश्चर करने के लिए कोई दो टाच टगमग मनुन्योंगे कैद, दाल दिया। अनुष्टितज्य कृत्येऽम्मिन् हाहाकारः ममृन्यितः । निशम्य तं महात्मामा विषादं परमं गतः ॥१०॥ (१०) पेमा काम हो जाने पर हाहायर सा हो गया टमे मुनकर घे महाना परम दुसको प्रात एए।

३८ सत्याग्रहगीता धृतवतोऽपि कालज्ञः प्रमाथधानमाथिता। यथायोग्यं नु सञ्चार्यावित्यपि व्यपृशत्स्वयम् ॥ ११ ॥ (११)सत्याग्रहरूपी प्रतको धारण करनेवाले गांधीजी मनमें यह सोचने लगे कि हिंसा और आहेसा दोनोंका व्यवहार भटग अलग होना चाहिये। स्वदेश्या भीरुका नेति विप्लवोऽयमसाधयत् । प्रमाथं शवयुः कर्तुमिति गान्धिरमन्यत ॥ १२ ॥ (१२) इस विप्लवने प्रमाणित कर दिया है कि अपने देशवासी भीर नहीं हैं। गान्धीजीने वह स्वीकार कर लिया कि हमारे लोग युद्ध करने में समर्थ होंगे। परतन्त्रैर्वलात्कारासिद्धिः खलु न लभ्यते । शान्तियुक्तो वरं ध्वंसो न जयोऽपि प्रमाथजः ॥ १३ ॥ (१३) परतन्त्र मनुष्योंको बलात्कार अर्थात् युद्ध द्वारा सिद्धि नहीं मिल सकती है । शान्तिसे युक्त नाश भी अच्छा है न कि युद्ध द्वारा प्रास विजय। एवं जानन्नपि प्राज्ञोऽनोधगद्राष्ट्रियाञ्जनान् । प्रयोगोऽसहकारस्य त्यज्यतामिति सर्वतः ॥१४॥ (१४) बुद्धिमान मनुष्यने इतना समझकर अपने देशीय भाइयों- को समझाया कि असह योगका प्रयोग सब जगह ही छोड़ देना चाहिए, अर्थात् बन्द कर देना चाहिए। निधनमिदं श्रुत्वा विस्मितास्ते वभापिरे । परिवर्तननाशोऽस्मादहो नूनं भविष्यति ॥ १५ ॥ (१५) यह निषेध सुनकर विस्मित होकर वे बोले कि इससे परिवर्तन का नाश निश्चित है। तत उग्रे ममारब्धे परिवर्तनकर्मणि । नतशीर्षाः लोकाः सद्य एवोन्मुसा बभुः ॥१६॥ (१६) परिवर्तन कार्यके शुरू हो जाने पर जो लोग पहले सिर शुगए हुए थे वे शीघ्र ही सामने भागए।

सप्तमोऽध्यायः उद्धता येऽभवन्नाशलास्ते नम्रत्वमुपागताः । मानुष्यं भारतीयानामगीचक्रुस्ततः परम् ॥ १७॥ (७)जो अंग्रेज उद्धत थे, वे नम्र हो गए। इसके पीछे उन्होंने मारतीयोंकी मनुष्यता स्वीकार कर ली। ये पुरा तमसाक्रान्ता देशभक्तिविवर्जिताः । जडा दास्यकनिष्णाता नानाधर्मविभाजिताः ॥ १८ ॥ (१८)जो पहले अंधकारसे आक्रान्त ये अर्यात् जो ज्ञानरहित थे इसी लिए देशभक्तिमे हीन थे। जड़ ये-केवल दासत्वमें ही स्नापित थे, कई प्रकारके धर्मास विभाजित थे। अलसा मूढविश्वासाः प्राप्य तेऽद्य प्रबोधनम् । गता अद्भुतमेकत्वमित्याझ्लैरवलोकितम् ॥ १९ ॥ (१९)जो आलसी तया मूढ विश्वासवाले थे वे भी साज जागृति- को पाकर अद्भुत प्रकारके एक्यको प्राप्त कर चुके हैं। यह बात अंग्रेजोंने देख ली। अद्य यावन्मदोन्मत्ता आङ्गला मृदयोऽभवन् । तिरस्कृतांच देशीयानाचीकमन्त वेदितुम् ।। २० ।। (२०) आज तक जो अंग्रेज अमिमानमे उन्मत्त थे वे अब कोमल हो गए और वे मनात भारतीय जनोंको समझनेकी अभिलापा करने लगे। अन्यदेव हि संजातं भारतं परिवर्तनात् । दासमा मुमुक्षुभ्यस्त्रासमाङ्ग्लाः प्रपेदिरे ॥ २१ ॥ (२.) परिवर्तन द्वारा भारतवर्ष कुछ दूसरी ही वस्तु यन गया है। दासबसे मुक्ति पानेवालोंसे अंग्रेज टरने टगे। मापणस्य कृते गान्धी राजद्रोहीति निश्चितः। आत्मसंयमयुक्तोऽपि कारागार प्रवेशितः ॥ २२ ॥ (२२) माषण करने के कारण गान्धीको राजद्रोही समजा गया । भानमंयमसे युक्त होता हुआ भी वह कैदमें दाल दिया गया।

४० सत्याग्रहगीता अश्रद्धयोऽपि नेतृणां ग्राम्याणां स प्रियोऽभवत् । कृष्णस्यैवावतारोऽयमिति तैश्च सुपूजितः ॥२३॥ (२३) नेताओं (सरकारी अफसरों) द्वारा अनास्त होता हुआ भी वह प्राम्य लोगोंका प्रेमपात्र धना। उन्होने उसे कृष्णका ही अवतार समझ कर उसरी पूजा की। समदुःखसुखः शान्तः सिद्धार्थ इव मानितः । निन्ये वर्षद्वयं कुर्वन् कर्तनं वन्धनालये ॥ २४ ॥ (२४) दुःख और मुख में एक समान, शान्त प्रकृतिवाला, सिद्धार्य के समान पूजित (महारमा) ने कैदखाने में ही चरखा कातते दो वर्ष बिता दिए। अथ भिन्नमतैः कैश्चिन्नायकैर्नेहरूमुखैः । स्वराज्यपक्ष इत्याख्यः स एको विनिर्मितः ॥२५॥ (२५) अब (मोतीलाल) नेहरू भादिक पई भिन्न मतवालों ने 'स्वराज पार्टी'माम का एक सा बनाया। वयं लप्स्यामहे राज्यं यथान्यायं च धर्मतः । तमिद्ध नेतरोपाय इति तैनिश्चितं जनैः ॥२६॥ (२६) हम न्यायपूर्वक और धर्मपूर्वक राज्य को प्राप्त करेंगे। उस की मिदी के लिए और कोई उपाय नहीं है यह उन लोगों ने धित कर दिया। निमुक्ताय द्विवर्षान्ते च्याधिहेतोर्महात्मने । मालवीयादिभिर्मुव्यनिधयोऽयं निवेदितः ॥ २७ ।। (२०) विमार हो जाने के कारण दो वर्ष के पार जय महामा को मुक्ति मिटी गे माटवीपारि गएपों में यह निर्णय बताया। सम्मिनये पिम्दापि निनाभिमततत्त्वतः । स्वराज्यनयरादिभ्यो गान्धिः स्वानुमति ददौ ।। २८ ।। (१८) अपने मी हाम्तमे पर मीन पिस्त होने पर भी anनीतिशायी गानभानी मनि दे।

अष्टमोऽध्यायः ४१ शस्त्रोपचारनिस्मत्त्वो विषण्णः कार्यनाशतः। न्यवर्तताश्रमं शान्तं महात्मा विगतस्पृहः ।।२९ ।। (२९) शस्त्र के प्रयोग के कारन दुर्वल, कार्यनाश होनेसे दुखी वह महामा अपने शान्त आश्रम को लौटा। अष्टमोऽध्यायः त्यक्तराष्ट्रीयकार्योऽपि स्वदेशोदयलालसः । स्थितः कुर्वनिनं धर्म मुनिवर्पचतुष्टयम् ॥ १॥ (1) मुनि अर्थात् मुनितुल्य गान्धी राष्ट्रीय (गजकीय) कार्य को छोडे भी स्वदेश के उदय की इच्छा रखता हुआ चार वर्ष पर्यंत अपना धर्म पालन करता रहा। लोकानानं निराक्तुं सुग्रन्यास्तेन मुद्रिताः । ख्यापितानि स्वतत्त्वानि वृत्तपनमुखेण च ॥२॥ ) लोगों के अज्ञान के दूर करने के लिए उसने सुन्दर ग्रन्य उपवाए और समाचार पॉद्वारा अपने सिद्धान्तो का प्रचार किया। लौकिका बहवस्तेन लोकोद्धाचिकीर्पया। ब्रह्मचर्यादयो धर्मा उपदिष्टाः पृथक पृथरु ।। ३ ।। (३) लोगों के उद्धार करने की इच्छा से उसने ब्रह्मचर्यादि लौकिक धर्मों का पृथत् पृथक उपदेश दिया। दीनानामेव कल्याणं परमं ध्यायता मदा। महात्मना दिवारानं कृतस्तेभ्यः परिश्रमः ॥४॥ (४) सदा दोन जनों के हित कोही बहुत ध्यान में देखते हुए उन्होंने दिन रात उन के लिए परिश्रम किया।

सत्याग्रहगीता अन्याय्या नियमा हन्त शासकैहयः कृताः। न तु केनापि ते मान्या इत्यादिक्षन्त नायकाः ॥५॥ (५) शोक है कि शासको ने बहुत सारे नियम न्यायविरुद्ध बनाए है। नायको ने यह दीक्षा दी कि वे नियम किसी को भी मानने नहीं चाहिए। राज्ये न्याया विधीयन्ते सुव्यवस्था हि रक्षितुम् । मुसार्थमेव लोकानां न तान् पीडयितुं वृथा ॥६॥ (६) राज्य में सुव्यवस्था बनाए रखने केही लिए न्याय किए जाते हैं। लोगों के मुखही के लिए ( वे बनाए जाते हैं), उन्हें वृथा दुःख देने के लिए नहीं। नियमाश्चत्प्रणीयन्ते बलाजनविमर्दकाः । लोकानामधिकारोऽस्ति प्रभइक्तुं तान् हि निर्भयम् ॥ ७॥ (७) यदि नियमों का निर्माण वलपूर्वक लोगों को सताने के लिए किया हो तो लोगों को उन्हें निर्भीक होकर तोड़ने का अधिकार है। अधा यदि सह्यन्ते नियमाः सुचिरं जनैः । तदा विवर्धते तेजः शासितुः स्वार्थकारिणः ॥८॥ (८) यदि लोग धर्मविहीन नियमों को बहुत देर तक सहारते हैं तो इससे स्वार्थी शासको का तेज बढ़ता है। सहमानाचिरं वासं भारं धुर्या वृपा इव । प्रत्यहं दुर्यला भूत्वा ध्रुवं प्राप्स्यन्त्यधोगतिम् ॥९॥ (९) चिसाल तक पञ्जाली का भार उठाए हुए बैलों के समान टरको देर तक सहारते २ वे दुर्वल होकर नीच अवस्था को प्राप्त होंगे। हितार्थमेव लोकस्य व्यवस्यति मुनौ सदा । जलरोशामिकुण्डे हि निंशलोटिजनाः स्थिताः ॥१०॥ (१०) मुनि अर्थात् गाधीजी के सदैव लोगों के हितही के लिए यरन करने पर तीस करो टोग गाग्नि के चुद में जल रहे थे।

अष्टमोऽध्यायः ४३ अयाझ्न्लेबसमायुक्तः सझ्यो मारतमागतः । राजनीतिप्रवीणेन मैमनेन स्वविष्ठितः॥११॥ (1) राजनीति में चतुर “सेनन" की अध्यक्षता में ग्रहों से सनायुन्छ एक सङ्घ भारतवर्ष में आया। समासदनिवर्गेभ्यो वृताः सचिवमण्डलान् । उदारोद्यमिनोही ही स्थितिपालस्त्र च यः॥१२ ।। (१२) सहके समापद मचित्र मण्डल के तीनों ही दर्गों से अयान टदार (टेबरपाट), रानी (टदरसार्टी), और स्थिनिपाल (कनजरवेटिव पार्टी) से ये। टदार के दो, टपनी के दो, और स्थितिपाट के तीन ये। सजातो दासमावो नः सदोपादाम्लशासनान् । पुरा ते निर्णयन्तीति प्रतीक्षां चक्रिरे जनाः।।१३।। (१३) अंग्रेजी शासनके दोषपूर्ण होने से ही हमारा दासमाव हुआ है। इस बात का निर्गय पहले होगा-यह मोचर टोग इन्तजार करने टगे। नकोऽपि मारतीयोऽस्य सदस्य समिकः कृतः । किमतचित्रमाङ्लावदम्मलेगपराङ्मुखाः ।।१४।। (१४) इस मट्ट दा मदन्य भारतीयों में से एक भी नहीं था। इसलिए यदि प्रत्र हमारे दुःखों मे परान्नुन्न है क्यान दुःनों को नहीं माने तो इम में विम्मय ही क्या है? समनीयस्व सङ्यस्य मित्रासोमारतस्थितिम् । रहिप्कारः कृतो लोनिवि नायरत्यया ।। १५॥ (५) नायकों के निश्चय नुमार मारदही स्थिति को जानने के टिर पर हुए समीय माटोगाने रहेकार दिया। समनप्रमुसे सथे मुन्यानगरमागते । मशानमिव साक्षात्तन् कृष्णबजमयं यमौ ॥१६॥ (१६) सेनन की मापसा में आए हुए टम मह के दम्दई नगर में पहुँचने पर वह नगर मान के महान महान महान होगा।

सत्याग्रहगीता बद्धवातायनद्वारा निवृत्तनिखिलोद्यमाम् । पुरी शून्यामपश्यंस्ते दग्धां पाम्पेपुरीमिव ॥१७॥ (१७) उस (सा) को जल चुकी हुई पाम्पेय पुरी के समान वह नगरी दिखाई दे रही थी। लोगोंने खिड़किया और दरवाजे बन्द कर लिए थे और वे समस्त उद्यम अर्थात् कामसेट चुके थे। लोकसान्त्वनकामेन सैमनेन नियन्त्रिताः । देश्याः केचिद्विनिर्मातुं कार्यसम्पादिका सभाम् ॥१८॥ (१८) लोगों के सान्त्वना की इच्छा रखते सैमनने कार्यकारिणी सभा को बनाने के लिए कई एक भारतीय लोगों को बुलाया । आमन्त्रणमिद कैश्चिदल्पैरेवोररीकृतम् । इतरे तु विदूरस्था अतिष्ठनिरपेक्षकाः ॥ १९ ॥ (१९) इम निमन्त्रण को थोड़े ही लोगों ने स्वीकार किया । दूसरे तो निरपेक्ष होकर दूर ही ठहरे रहे। वाह्यतः केवलं कृत्वा भारतस्यावलोकनम् । परमार्थमविज्ञाय स्वदेशं समितिययौ ॥२०॥ (२०) सभा अर्थात् सङ्घ घाहरसे ही केवल भारतवर्ष को देखकर परमार्थ अर्थात् वास्तविकताको बिना समझे अपने देशको चली गई। पुनः सप्तर्पयस्तेऽमी स्वदेशप्रियकाङ्क्षिणः । वृथैव भारत देशमचिरेण समागताः ।।२१।। (1) फिर ये सात ऋपि अपने देश का हित चाहनेवाले शीघ्र ही व्यर्थ में भारत को आए। रक्षितं चाइग्लराज्येन स्वतन्त्रं भारतं भवेत् । इतीष्टमाङ्गलैः कैश्विदुदारैः समदृष्टिभिः ॥२२॥ (२२) कई एक उदार समदृष्टिवालों अंग्रेजोने यह चाहा कि अंग्रेजों द्वारा रक्षित यह देश स्वतन्त्रता को प्राप्त करेगा।

नवमोऽध्यायः आइालदेशहितायैव ग्रेपिताः पुरुपा इमे । ग्रसितुं भारतं वर्ष नापनेतुं तदापदः ॥२३॥ (२३) अंग्रेजोंके देश की भलाई के लिए भेजे गए थे लोग भारत को खाने (आए थे) न कि उसकी आपदाओंको दूर करने (आए थे)। कस्त्यजेन्मानुपोऽपूर्व स्वेच्छया परमं निधिम् । अनायासेन सम्प्राप्त प्रतिष्ठोत्कर्षकारणम् ॥ २४ ॥ (२४) कौन मनुष्य मानको बढानेवाले अपने आप ही अनुपम और बिना किसी उद्यम से प्राप्त बडे खजाने को छोडे ? स्त्रदेशमथ निर्याते तस्मिन्समनसप्तके। अतृप्तिारते वृद्धा द्वयोः प्रीतेस्तु का कथा ॥२५॥ (२५) उस सैमन सप्तकके अपने देशको चले जाने पर भारतवर्ष में असन्तोप हो गया। दोनो के प्रेम की वो बात ही क्या ? सैमनाद्या अतस्तेऽपि चक्रगोष्ठया निराकृताः। भारतीयाङ्ग्लयुक्ताया आङ्ग्लसाम्राज्यमन्त्रिभिः ॥ २६ ॥ (२६) इस लिए अंग्रेज साम्राज्यद्वारा समनादि वे लोग अंग्रेजों तथा भारतीयोंकी गोलमेज कोन्फ्रेंस बाहर किए गए। नवमोऽध्यायः अत्रान्तरे महासझ्यो राष्ट्रियो मिलितोऽभवत् । कलकत्तापुरेऽसङ्ख्यनरनारीसमाकुलः ॥१॥ (१) इसी बीचमें कलकत्तानगर में अनगनित नरनारियों की भीडवाला देशका महासङ्घ एकत्रित हुआ। राजप्रतिनिधेर्यत्र वाचिता पत्रिकोच्चकैः। स्वराज्यमचिरायूयं प्राप्स्यथेति प्रसान्त्वनी ॥२॥ (२)जहाँ अर्थात उस सङ्घ वायसायका पत्र यह सान्त्वना देता हुआ पदा ऊंचे गया कि आप को स्वराज्य जल्दी मिलेगा।

सत्याग्रहगीता एकादशाब्दतः पूर्व मान्तेगूवाक्यभङ्गतः। चश्चिता आविणे पो राष्ट्रिया न विशश्वसुः॥३॥ (३) देशीय अर्थात् भारतीय लोगोंको ११ वर्ष पहले मान्टेग्यु के प्रतिज्ञाभङ्गरूपी वचनों द्वारा प्रतारित होने के कारण अर्विन के पन में विश्वास नहीं किया। निस्सारं वचनं तस्य विनिश्चित्य महाजनैः। पत्र प्रत्यर्पितं तस्मै पुनर्वञ्चनभीरुभिः ॥४॥ (४) महाजनों, अर्थात् देशके मुख्य नेताओंने, दूसरी बार भी धोखा मिलनेसे डरकर यह निश्चय किया कि उसके वचन में कुछ तत्व (सार) नही है वह पत्र लौटा दिया। एकसंवत्सरापूर्व भारतं प्राप्नुयात्पदम् । कानडाप्रमुसर्देशः सदृशं निजशासने ॥५॥ (५) एक वर्ष से पहले भारतवर्ष को कैनेडा आदि देशों के समान अपने शासन करने योग्य स्थान प्राप्त हो। जन्मसिद्धाधिकारं चेद्भारतीया न लम्भिताः । यतिप्यतेऽसिलो देशः पूर्णस्वातन्त्र्यसिद्धये ॥६॥ (६)पदि भारतीयोंको अपना जन्मसिद्ध अधिकार न प्राप्त हुभा समस्त देश पूर्ण स्वतन्त्रता को सिद्ध करने लिए यत्न करेगा। इति सन्देशवाय ते पाहिपनाविणप्रभोः। देहलीनगरस्थस्य राष्ट्रियाः सश्यनायकाः ॥७॥ (.) देसी मार में बैठे हुए कप्रिय के मतभेनि मर्विन महोदय (पायमराप) को यह सन्देश भेगा।

नवमोऽध्यायः ६७ प्रतिज्ञा च कृता मुख्यः स्वराज्यस्याभिकाडिसमिः । सन्नीकर्तुं जनान् सर्वान् धर्मयुद्धाय माविने ॥८॥ (6) स्वराग्य के इपारु नेताभोंने अयान भरिप्य में मानेगले धर्म- पुद के लिए देश के लोगों को तय्यार करने की प्रतिक्षा की। निधित्यैवं पुरोगास्ते स्वाधिकारममीप्सवः । मनोरयस्य संसिद्धिमेकादं प्रत्यपालयन् ॥९॥ (१) मरने मधिग्रर की इच्या रमनेवालों नेतागोंने इस प्रघर करके एक परन्त अपने मनोरय की समिति की प्रतीक्षा की। चक्रगोष्ठयां वयं सवा मारतस्य परिस्थितिम् । निर्गप्पामो यथायोन्यमित्याह प्रभुरार्विणः ॥१०॥ (1.) भनि प्रमु भर्याय यायमराप भनि' ने यह कहा कि हम भारत समस्त परिस्थिति निर्गप पयायोग्य गोटमेन' समा में गगे।

सत्याग्रहगीता *खयनिग्रहचन्द्राब्दे मिलिता प्रथमेऽहनि । अन्तिम निर्णयं कर्तुं लवपुर्या महासभा ॥१३॥ (१३) अन्तिम निर्णय के लिए महासभा लाहौर शहरमें सन इस्वी १९३. की पहली तिथिको हुई। प्रेरयन्तो जनान् सर्वाञ्छासनानां व्यतिक्रमे । स्वयं च तानि भक्ष्यामो नायकैरिति निश्चितम् ॥१४॥ (१४) नेताओने यह निश्चय किया कि सब नियमोके उल्लघन करने के लिए मजाको प्रेरित करते हुए हम स्वय भी उन्हें भग करेंगे। तथापि शान्तिवात्सल्यान्महात्मा नीतिकोविदः । आग्लराज्येन सन्धातुं चकारोचितलेसनम् ।। १५ ॥ (१५) तो भी शान्तिप्रिय होने के कारण नीति में चतुर महारमाने अग्रेजी राज्यके साथ सन्धि करनेके लिए उन्हें उचित लेख लिखा । प्रार्थयामास पत्रेऽमौ दुष्टशासननिर्हतिम् । मोचनं च स्वबन्धूनां दारिद्यव्याधिविप्लवात् ॥१६॥ (१६) उसने अर्थात् , महात्माजीने पत्रमें पुरे शासनको हटाने और अपने देशनिवासी भाईयों के दरिद्रता और बिमारीके झगडोंसे छुडमानेके लिए प्रार्थना की। *अत्र खपहिग्रहचन्द्रेतिपदै सङ्ख्या गृह्यते । तद्यथा-खमाकाशमेक चह्नयो दक्षिणाग्निगाईपन्याहवनीयात्रय । महा ख्यादयो नय चन्द्रश्चैक इति । अहाना वामतो गतिरिति सङ्केतमनुसृत्य त्रिंशदुत्तरनयशताधिका- सहनमाया विवक्षिता भवति । (हम लोग ख का अर्थ भामाश है-वह एक है। भात तीन है। प्रद नी । चंद एक है। इनको भयात् १२१ को उल्टाया ज्ञाप तो १९११ बनता है।)

५० सत्याग्रहगीता येन देशस्य सम्पत्तेः प्रजानां शिक्षणादिपु । सुकर्मसु भवान् कुर्याद्विनियोग यशस्करम् ॥३॥ (३) जिससे अर्थात् सेनाविभागमें सेना पर किए गये खर्चों की कमी से आप देश की सम्पत्ति का यशोप्रद प्रयोग प्रजाकी शिक्षादि सुकाम कर सकें। लवणं नाम दैवेन दत्तं नृणां यथानिलः । अधो लवणस्यायं करस्तस्मान्निरस्यताम् ॥४॥ (४) नमक तो भगवानने हवा के समान मनुष्यों को प्रदान किया है। नमक पर लगाया कर धर्मानुकूल नही है- इसलिए इसे आप हटा दीजीए। वर्षे वर्षे भवत्येव भूकरोऽप्यधिकाधिकः । कुर्वाणो निर्धनॉल्लोकान् परतन्यांश्च कर्पकान् ॥५॥ (५) लोगोको निर्धन बनाता हुआ और किसानोंको परतन्त्र बनाता हुआ भूमिपर लगाया हुआ कर भी प्रति वर्ष पढता जा रहा है। अपसारय दुःखानि लोकानां त्वरितं सखे । किं हि कार्य प्रभुत्वेन विमुखेन प्रजाहितात् ॥६॥ (६) हे मिन, लोगों के दुखों को शीघ्र ही दूर करो । जो प्रभुत्व प्रजाकी भलाईसे विमुख हो उसके क्या लाभ । लोकस्य नाशक मयं फलकार्यपि शासितुः । अतः स्वार्थ परित्यज्य सात्त्विकी बुद्धिमाश्रितः ॥७॥ (७) शासक के लिए लाभदायक होता हुआ भी मप अर्थाव माराव प्रजाके लिए नाशक है । इसलिए स्पार्थ को छोड़कर साविक बुद्धिका भाध्य देता हुभा। नियन्द्धि विक्रयं तस्य स्वात्मघातुकास्तुनः । स्वामिनः परमो धर्मः प्रजानां हितकारिता ॥८॥ (८)आमपातक पस्तु की विधी पन्द करो। स्वामीश परमधर्म प्रमाबी मटाई करने में है।

सत्याग्रहगीता यद्यधयं तमारोपं वदेयुः समदर्शिनः । तदा तत्प्रकटीकर्तु प्रजा अर्हन्ति निर्भयाः ॥१५॥ (१५) यदि समदर्शी अर्थात् पक्षपातरहित मनुष्य उस ऋण आरोपको अयुक्त समझें तो प्रजा निर्भय होकर उस पर प्रकाश डाले। अतः कृताञ्जलिर्याचे सावधानमिमाः सखे । चिन्तयेः समदृष्टया त्वं देशस्योक्ता मयापदः ॥१६॥ (१६) इसलिए हे सखे, मैं हाथ जोडकर प्रार्थना करता हूँ की मेरे द्वारा बताए गए देशकै दु.खाँझो आप सावधान होकर निष्पक्ष दृष्टिसे सोचिए। निरङ्कुशाः प्रवर्तन्ते यस्मिन् राज्येऽधिकारिणः । शासनं तद्वरं नष्टं प्रमाहितविवर्जितम् ॥१७॥ (१७) जिस राज्यमें अधिकारी लोग बिना रोकटोकके कार्यमें प्रवृत्त होते हैं, प्रजाती भलाईसे रहित वह शासन नष्ट हुभा ही टीक है। अतः कार्य हि राज्यस्य समयपरिवर्तनम् । जनलेशानपाकर्तुमुपायोऽन्यो न विद्यते ॥१८॥ (१८) इसलिए राज्य में पूरा पूरा परिवर्तन आना चाहिए। लोगों दुःखों को दूर करने के लिए दूसरा कोई उपाय नहीं है। स्वदेशस्य विमोक्षार्थ प्राणैरपि धनरपि । गान्धवा मे फरिप्यन्ति प्रयासं प्रलं वाम् ॥१९॥ (१९) ने देशको स्वतन्य करने के लिए मेरे भाई अपान भारतातीभवश्यमेव धनभी कार मस्ट पानगे। निर्णययकगोष्ठधास्तु न प्रमाणं भविष्यति। पाशामिकशरत्योहि कुतो वादेन निर्णयः ॥२०॥ (२.)ोटी भयो गोरमेन मार पिया गया निर्णय माग मही पाना मापा । पशुपति राज्यामि शनि का परस्पर निर्णय बाराशेसता।

दशमोऽध्यायः स्वार्थकतत्परत्वेन क्रियते यदि निर्णयः। यद्यालाच प्रवर्तरन् स्वव्यापरिकवृद्धये ॥ २१ ॥ (२१)भने वाम ही सपर रहकर यदि निर्गय किया जाए और पदि अंग्रेज जाति अपने व्यापार की वृद्धिमान में दीदगीरहकर प्रवृत्त हो। मारत दुर्बलत्वेऽपि सञ्चप्यत्युचितं बलम् । पराद्रक्षितुमात्मानं मृत्योरालिङ्गनादिय ।। २२ ।। (२२) मृत्यु के आलिंगन के समान अपने आपको शीसे रक्षा फरने के लिए दुर्वल होता हुआ भी भारतवर्ष पर्याप्त सचिनो इम्हा करेगा। देशसेवाप्रवृत्तानां यूनां साहसिनां गणः । अतिप्रसमवृत्तीनां वर्धते हि दिने दिने ॥२३॥ (२३) देशसेवाम प्रस भति पलवान और साहसी पुरकोंका समूह दिन प दिन यह रहा है। सङघोऽयं मुककोटीनामसमर्थोऽपि रक्षणे। शासितः सर्वदा मन्ये भवत्येव भयङ्करः ॥ २४ ॥ (२५) मेरे विचारमें पद फरोड़ों गूगों समूह अपनी रक्षोमें भगमर्थ होगा हुमा भी शासके लिए सदा भयंसर ही होता है। दुर्चला ननु गण्यन्ते शान्तिमार्गावलम्बिनः । परं सत्याग्रहाद्विद्धि नास्ति तीयतरं बलम् ॥२५ ।। (२५) शान्ति मार्ग पर पटनेवाले दुलही माने जाते है पर भार सयाम पारीमतर यष्ट न समझो। अगो यस्तदलेंनर पिरोनं निमितं मया । आलीयं हठात्कार प्रतिरोत्म्यामि तेन च ॥२६॥ (२१)मीलिए मैंने रमी परमेही भार वा परमेडी गापिरोपरदेशनिय रिसा। भोर भंडारा एि गएट सीमेगा ५४ सत्याग्रहगीता तदमोघवल जानञ्छूद्धया च समन्वितः । यदि स्यां विमुखः कार्ये भविष्याम्यतिनिन्दितः ॥२७॥ (२७) उसके अर्थात सत्याग्रहके कमी निष्फल न होनेवाले घलको समझना हुभा और श्रद्धा रखता हुआ मैं अपने कामसे मुंह मोट एं अर्थात् न करूं तो मैं बहुत निन्दित हो जाऊँगा। सत्याग्रहेण बद्धोऽहं भक्ष्यामि नृपशासनम् । घोपयिष्ये च सर्वत्र व्रतस्थास्याद्भुतं बलम् ॥२८॥ (२०) सत्याग्रहसे वान्धा हुआ मैं राजाके शासनको तोडूंगा और सब स्थानोंपर इस घत के अद्भुत बल की घोषणा करूंगा। शान्तिसत्त्वप्रधानोऽपि मार्गोऽयं विपमः परम् । न सत्यस्य जयः प्रायः क्लेशाद्घोरतमाहते ॥२९॥ (२९) शान्तिरूपी बलमें प्रधान होता हुआ भी यह मार्ग बहुत कठिण है। सत्यकी विजय प्रायः घोरतम अर्थात् अति कठिण लेश उठाए बिना नही मिलती है। उद्घोण्यते च सद्भावो मया प्रस्तुतकर्मणः । यतिप्ये तबलेनैव भेत्तुमाग्लदुराग्रहम् ।।३०।। (३०) मुझे अपने प्रस्तुत कामकी सद्भावना की घोषणा करने होगी और उसीके बलसेही अंग्रेजोंका दुराग्रह तोडनेका यत्न करूंगा। सदुपायेन तेनाहमहिसकावलम्बनः । जगते दर्शयिष्यामि दुनयानाङ्ग्लशासितुः ॥ ३१॥ (३३) अहिंसाकाही एकमात्र सहारा लेकर उसी सदुपायसे अर्थात् सत्याग्रहसेही अंग्रेज शासकको बुरी नीतिका संसारके सामने उद्घाटन करूंगा। एकलक्ष्योऽय चेल्लोकश्वरेद्धिसाविवर्जितः। क्लेशैरार्दीभविष्यन्ति पापाणहृदयान्यपि ॥३२॥ (३२) यदि हिंसा सहित संसार एक लक्ष्यमें रत होकर हिसारहित भाचरणको प्रयोगमें प्राणतो ( उसके) ऐशोसे पथरके भी हदय नरम हो जाएंगे।

दशमोऽध्याय. अहिंसावतनद्धोऽहं राजशासनमङ्गतः । भवन्तं निरुत्सामि दुर्नयांश्व प्रकाशये ।। ३३॥ (३३) अहिंसा का पालन करता हुआ मैं रानशासनको तोडनेसे आपको रोगा अर्थात् आपसे लडूंगा। और तुरी नीति पर प्रकाश ढारगा। अधर्मप्वपनीतेपु भारतस्य भविप्यति । आङ्गलैः सुगमो मार्गो विधातुं मित्रतां पुनः ॥३४॥ (३४) मधोके दूर हो जाने पर भारतको अंग्रेजों के साथ फिर मित्रता करनी सुगम हो जाएगी। वाणिज्यमेव हेतुश्चेदाइग्लानां वसतेरिह । भारतस्य स्वतन्त्रत्वे कुतस्तेषां विरोधिता ॥३५॥ (३५) यदि अप्रेजोंको यहा अर्यात् भारतमें व्यापार मात्रके ही लिए है तो भारतकी स्वतन्त्रतामें उन्हें क्यों आपत्ति होगी। अतः शासनमन्याय्यं निष्कासयितुमर्हसि । विधातुं च सतामेकां संपदं भूरिचेतमाम् ।। ३६॥ (३६) आपको इसलिए अन्यायपूर्ण शासनको हटाना योग्य होगा और बुद्धिमान सपुरुषों की एक समाभी करनी होगी। जात्यादिग्रहमुक्तानां जगत्कल्याणकारिणाम् । येनाङ्ग्लभारतीयानां मैत्री स्थाप्येत शाश्वती ॥३७॥ (३७) आत्यादि महासे मुक्त एव ससारभरका कल्याण चाहने घाले भारतीय और अग्रेनों की शाश्वत मित्रता स्थापित होगी। परमेतदनादृत्य यदि स्थास्यमि निर्दयः । अधर्मस्य फलं घोरं प्रतीक्षेया ध्रुवं ततः ॥३८॥ (३८) यदि तु आप इस पत्रमा निरादर करके निर्दय हुए रहरे अधर्मके घोर फलकी आपने अवश्य इन्तजार करना होगा। रहेंगे तो ५६ सत्याग्रहगीता एकादशे दिने चाहं मासस्यास्य सुनिश्चितः । राजशासनभङ्गाय प्रस्थास्ये सानुयानिकः ॥३९॥ (३९) इस मासके ग्यारहवें दिन मैं अपने साथिओंके साथ राज- शासनको तोड़नेके लिए प्रस्थान क्संगा यह पछा निश्चय है। अधापु विधानेषु पापिष्ठो लावणो नयः । तस्य भङ्गमतः पूर्व करिष्येऽहं सहानुगः ॥ ४०॥ (४०) अधार्मिक नियमोमें नमक सम्बन्धी नियम सबसे अधिक पापीयान है। इसलिए अपने अनुयायियों के साथ उसको सबसे पहले तोडूंगा। अन्याय्याल्लोकदृष्टयास्मानियमाद्दीनघातुकात् । यतिष्ये रक्षितुं दीनान् हृतजीवनसंश्रयान् ॥४१॥ (४१) दीनोंकी हत्या करनेवाले और लोगोंकी दृष्टिम अन्याय करनेवाले इस नियमसे मैं उन दीनोंकी रक्षा के लिए यत्न करूंगा जिनके जीवनका सहारा हरा जा चुका है। दुष्टशासनमस्माभिः कथं सोढमियचिरम् । इति विस्मयते लोको दास्यभारनतः परम् ॥४२॥ (४२) दास्यभावसे अन्यन्त झुके अथवा दबे हुए लोग पर हैरान हैं कि हमने बुरे शासनको इतनी देरके लिए सहन कैसे किए हैं। सज्जोऽस्मि विफलीकर्तुमधिकार प्रशासितुः । निरुद्ध मयि सन्त्यन्ये कार्यदक्षाः सहस्रशः ॥४३॥ (४३) मैं शासकके अधिकारको निष्फल करनेके लिए उद्यत हूँ। मेरे पकडे जानेपर हजारों दुसरे कार्यकुशल जन मौजूद हैं। सत्याग्रहप्रशान्तात्मा देशभक्तिप्रचोदितः । अधुना मारते लोकः सञ्जातो दण्डनिर्भयः ॥४४॥ (५४) सत्याग्रह द्वारा प्रशान्त प्रकृतिवाली देशभक्तिसे प्रेरित मारतकी जनता भय दण्डसे निर्भय हो गयी है। इस बात दशमोऽध्यायः संवाद कर्तुकामचन्मया सह सचिस्तरम् । देहल्यां भवतः शीत्रमागमिष्यामि सनिधी ॥४५॥ (४५) यदि तुम विस्तारपूर्वक मेरे साय यात करना चाहते हो तो मैं शीवही देहलीमें आपके पास ना जाऊंगा। न तनधिया पत्रं मयेदं लिखितं सखे । परन्तु धर्म्यमावेन दुर्विधानहरुत्सुना ॥४६॥ (४६) हे मित्र-यह पत्र मैंने आपको धमकाने के लिए नहीं मत्युत् दुर्विधानको धर्ममावसे रोकनकी इच्छासे लिखा है। इदमाङ्गलस्य मित्रस्य हस्तेन प्रहिणोम्यहम् । रेनल्डाख्यस्य देवेन नियुक्तस्येव कर्मणि ॥४७॥ (४०) यह पत्र में रेनल्ड नामके एक अंग्रेज मित्रके हाय भेज रहा हूँ। यह मिग्र मानो इसी कामके लिए भगवानमे नियुक्त किया गया है। एकादशोऽध्यायः अर्विणस्य महात्मासी प्रत्यपालयदुत्तरम् । अतिक्रान्तेऽपि सप्ताह प्रतिलेखं न चाप सः ॥१॥ (१) उस महाग्माने 'मार्दिन' अयात् पायसराय के उत्तरी प्रतीक्षाफी ससाद के गुजर जाने पर भी उत्तर न मिला। ययोक्तमय मासस्य महात्माइनि निश्चिते । निगामाश्रमात्यातर्धर्मयात्राचिकीर्पया ॥२॥ (२) जमे कहा था (मेडी) निश्चित दिनपर महामा प्रातःकालक समय धर्मपाना परनेरी इच्छामे माश्रममे निट पड़े।

सत्याग्रहगीता दण्डहस्तोऽल्पपाथेयी नमस्कन्धोऽल्पवेष्टितः। साप्टसप्ततिशिष्यश्च प्रतस्थे दाण्डिपल्लिकाम् ॥३॥ (३) हाथ में दण्डा उठाए-यानाके लिए कुछ थोडासा भोजन लिए, मङ्गै कन्धेवाले, थोडे कपडे पहने, ७८ शिष्योंसे युक्त, दण्डी नामके गाँवकी ओर चल पडे। सर्वे श्रद्धान्विताः शिप्या अहिंसावलवेदिनः । यथोक्तकारिणश्वासन् गान्धिनैव स्वयं वृताः॥४॥ (४) सारेही शिष्य अहिंसाके बलको समझनेवाले, श्रद्धासे युक्त, कहनेके अनुसार काम करनेवाले, अर्थात् आज्ञाकारी, गान्धीजीने स्वयंही चुने थे। सहानुगैर्महात्मासौ भक्तुं लवणशासनम् । दूर सार्धशतकोशं प्रचचालाभि सागरम् ॥५॥ (५) वे महात्मा अपने अनुगामियों के साथ नमकके नियमको भङ्ग करनेके लिए १५० मीलकी दूरी पर समुद्र की ओर चल पड़े। प्रभाते प्रस्थितं गान्धि ग्रामीणास्त दिदृक्षवः । पञ्चक्रोशायते मार्गे विस्मिताः सङ्कुलाः स्थिताः ॥६॥ (६) प्रातःकालमें चले हुए गान्धीजी को देखनेकी इच्छासे गाँवके लोग पांच कोस लम्बे रास्ते में अर्थात कतारें बनाकर विस्मिस हुए इक्छे जुड़कर ठहरे थे। नाश्रमं पुनरेप्यामि यावद्देशो न मुच्यते । इति तस्य व्रत ज्ञात्वा लोका वर्मन्यनागरुः ॥७॥ (७) जब तक देश स्वतन्त्र नहीं होता है तब तक आश्रमको नहीं टीटूंगा उनकी इस प्रतिज्ञाको जानकर लोग रास्ते में जागने छगे।

एकादशोऽध्यायः धयेयमन्तिमा यात्रा कर्तव्या सम्प्रदायतः। अतः पद्यां चरिप्यामि जगादेति शुचिव्रतः ॥८॥ (८)वे पवित्र व्रतवाले कहने लगे कि यह यात्रा धार्मिक है इमलिए इसे सम्प्रदायानुमार अर्थात् ययोचित धार्मिक यात्रानुसार करनी चाहिए। पांसुलेनाध्वना गच्छन् विललम्बे प्रतिस्थलम् । उपदेष्टुं जनान् सर्वान् प्रस्तुतं कार्यगौरवम् ॥९॥ (९) लोगोंगे प्रस्तुत कार्यके महत्त्वको समानेके लिए दह (गान्धीजी) धूलि भरे रास्तेसे वाटा हुआ जगह जगह पर ठहरता गया। बान्धवा अयि वर्तध्वं सत्याग्रहनियन्त्रिताः। विधि क्षारस्य मतेति ग्राम्यलोकानबोधयन् ।।१०॥ (१०) हे भाईयो-सत्याग्रहसे संयमित होकर व्यवहार करो । नमस्को विधि अर्थात् नियमझो तोदो। यह बात उन्होंने गाँवके लोगों को समझाई। अधिकारपदान्याः सपदि त्यक्तुमर्हथ । इति विज्ञापितास्तेन ग्रामेशास्तानि तत्यजुः ॥११॥ (1)हे आर्यों अर्याद मदटोगो! आप अपने अधिकारोंको फौरन होद दो। इस प्रकारकी आज्ञा पानेपर गांवके मुग्य लोगोंने अयवा गाँवके मालिकोने उनका परित्याग कर दिया। महात्मा तीरमम्बोघेर्न यावत्प्रत्यपद्यत । तावदेवालयमनहुर्दिशताधिकाः ।।१२।। (१२) महामा ज्योंही समुद्रके किनारे पहुँचे कि संप्रेकि दासयको दो सौ से अधिकने छोड़ दिया। उपस्थितस्ततो गान्धिश्चत्वारिंशत्तमे दिने। दाण्डिग्रामं निरानन्दं लवणक्षेत्रसंयुतम् ।।१३।। (१३) वर गान्धी चालिम दिन नमक्के क्षेत्रमे युक, मानन्द- रहित दण्डिग्रामको पहुंचे।

६० सत्याग्रहगीता प्रागेव ध्वंसनं कर्तुं नियुक्तमिरधिभिः । उन्मूलितानि सर्वाणि क्षेत्राणि लवणस्य हि ॥ १४ ॥ (१४) पहले से ही विधंस के लिये नियुक्त प्रामरक्षक छोगों ने सब नमकके क्षेत्र मूलसे नष्ट कर दिये थे। महात्मा तत आरेमे क्षारनिष्कर्षमम्युधेः । परःशतानां ग्राम्याणां समेतानां समक्षतः ।। १५ ।। (१५) तब महात्माने सौ से अधिक आए हुए गाँवके सामने समुद्रसे नमक निकालना शुरू किया। गान्धिना शासने भने क्षणात्तदनुयायिनः । क्षारन्यासमुपादाय न्यवृतच्छिविरं निजम् ।।१६।। (१६) गान्धीके शासन तोड़ने पर उसके अनुयायी शीघ्रही नमककी अमानन अर्थात् रखे हुए नमकको लेकर अपने शिविरको लौटे। . दण्डकाष्ठायुधोपेतास्तनिवासमतार्कितम् । रक्षकास्तत आगत्य तेभ्यः सर्वमपाहरन् ॥ १७॥ (१७) रक्षको अर्थात सिपाही लोगोंने दण्ड (ढण्डे ), लकडी और हथ्यारोंसे युक्त हो उनके घरों में अचानक जाकर वहाँसे सब कुछ हरलिया। विधिभङ्गोयता लोकाः प्रत्यावर्तन्त सागरम् । कृत्वा च लवणं भूरि न्यक्षिपस्तद् गृहे गृहे ॥१८॥ (१८) नियम तोडने को तत्पर हुए तुले हुए लोग सागरको फिर लौट आए, बहुत सारा नमझ बना बनाकर घर घरमें फेका-अर्थात् दिया। अनिरुद्धस्वतो गान्धिर्विसृज्य पुरुषान् शतम् । जगाम ग्राममन्यं स च्छेत्तुं लवणशासनम् ॥१९॥ (१९) तव गान्धी बिना रोकटोक सौ मनुष्योको छोड़कर नमकको नियमको तोदने के लिए दूसरे गाँवमें गये।

एकादशोऽध्यायः ६१ मुम्बापुया च तत्काले यथा सर्वासु दिक्षु च । क्षारं निष्पादितं लोकै शासनं मचतुमिच्छुमिः ॥२०॥ (२०) उस समय बम्बईमें और सर स्थानों में (दिशा का अर्थ स्थान ) शासनको तोडनेकी इच्छासे लोगों ने जब नमक बनाया। लवणस्य कृतिर्नीता हास्यतामधिकारिभिः । अनाहता ततथाग्रुद्धतरात्ममानिमिः ।। २१ ।। (२१) तर अपने आपको बटा माननेवाले उद्धत अंग्रेज अफसरोंने नमकको बनाने (काम) का उपहास किया और उसका निरादार पिया। क्षारनिप्पादनेन्छामी असते वडवानिवत् । क्रोधो भयं च सञ्जावे शासितुर्मूढचेतसि ।। २२ ॥ (२२) वडवानिके समान नमक बनाने की इच्छाके फैल जानेपर मूढ बुद्धिमें क्रोध और भय दोनों पैदा हो गए। प्रस्थितो धार्सनग्राम गान्धिरासिध्यतां द्रुतम् । इति प्रतिनिधेराज्ञां प्राप्नुवन् ग्रामरक्षिणः ॥२३॥ (२३) धार्सन नामक ग्रानमें जाते हुए गान्धीको शीघही पदो-गौरके रक्षको वायसरायकी यह आना मिली। अथ रात्री कराडिस्थः सुखसुप्तः परिश्रमात् । मधुमासस्य पञ्चम्यां गान्धिरग्राहि रक्षकैः ॥२४॥ (२४) य राठ के समय यावटके कारण मुम्बमे सोता हुआ कराडीमें स्थित हुआ गान्धी मधुमामकी पाँची सारीखको सिपाहियों द्वारा पकडा गया। यत्वया शासनं मनं दण्डाईस्न्यमतो मतः । इति राजनिदेर्श ते प्रमोध्यैनमदर्शयन् ।। २५ ॥ (२५) शामन भंग करने कारण मुम दण्डके योग्य माने गर हो यह राजकी भाशा टन्होंने जगा कर उन्हें दिमलाई।

। ६२ सत्याग्रहगीता तरजन्यां तमोमय्यां निन्युः सपदि रक्षिणः । लोकविक्षोभमाशङ्कय जवात्पुण्यपुरान्तिकम् ।। २६॥ (२६) लोगोम क्षोभ हो जानेकी शङ्कासे सिपाही लोग जल्दीही तेजीसे उसे अन्धेरी रातमें पुण्यपुरके भीतर लिवाले गए। प्रतिपेदे स पुण्यात्मा रक्षितः पुण्यपत्तनम् । चिक्षिपे च ततो नीतो यरोडाबन्धनालये ॥२७॥ (२७) रक्षित-सिपाहियों द्वारा रक्षित वह पुण्यारमा ( गान्धी) पुण्यपत्तनको पहुँचा । वहाँसे लिवा लेगया यरवादां कैदखानेमें डाल दिया गया। क्षणेन बन्धुभिः स्निग्धैर्गान्धिख वियोजितः। स्वैरचारिष्वनेकेषु गौराङ्गेवपराधिपु ॥२८॥ (२८) अनेकों अपराधियों अंग्रेजोके स्वतन्त्रतापूर्वक फिरते हुओंमें गान्धी क्षणही प्रेमी बन्धुओंसे एथन किया गया। हाहाकारेऽपि सजाते गान्धिवन्धनवार्तया । प्रशस्योऽभवदाचारो लोकानां सुनियन्त्रितः ॥२९॥ (२९) गान्धीके पकडे जानेके समाचारसे हाहाकर मचजाने पर भी लोगों का आचरण सुसंयमित होकर उत्तम रहा। महात्मना यथादिष्टं तथा कार्यमकारितैः। विदेशाम्बरमयादिबहिष्कारपुरस्सरम् ॥३०॥ (३०) महात्माने जैसी आज्ञा दी थी वैसेही उन्होंने विदेशी कपड़े तथा मद्यादिक बहिष्कारको आगे रखकर तदनुसार काम किया। द्वादशोऽध्यायः तीवसंवेगतो यत्नः क्षारनिर्माणकर्मणि। मुम्बापुयां च सोत्साहैः सत्याग्रहिमिराश्रितः॥१॥ (1) यम्बई नगरमें उत्साहशील सत्याग्रही जनोंने नमझ बनानेका यान यड़ी तेजीसे दिया।

द्वादशोऽध्यायः ३३ सर्वात्मना निमनोऽभूत्कार्ये तस्मिनहर्निशम् । एकचित्तो जनः कृत्स्नो निरस्तविषयान्तरः ॥२॥ (२) दूसरे २ कामोंसे हटकर सब लोक एकाग्रचित्त होकर दिनरात उसी काममें ही पूर्ण रूप से लग गए। मिलितो जलस्तीरे नराणामुदधिः परः । अक्षोभ्यः क्लेशवात्यामिः कार्यगाम्भीर्यदुस्तरः॥३॥ (३) मनुष्यों का महान समुद्र अर्थात् बहुत सारे लोग क्लेशरूपी हवाके झोंकोंसे न हिलनेवाला, प्रस्तुत कार्यके गाम्भीर्यके कारण दुस्तर समुद्र के किनारे इकट्ठा हुआ। वडालादासनादारावस्कन्दः कृतो जनैः । क्षेत्रेपु राजकीयेषु लवणस्य जिहीर्पया ॥ ४ ॥ (४) नमको हरनेकी इच्छासे राजकीय अर्थात् सरकारी नमक क्षेत्रों में लोगोंने धार्मन तथा बहाला से घेरा डाल दिया। प्रत्यहं शतशो लोका गृहीताः पुररक्षकैः । तथापि नरनारीणां श्रेणयः सर्वतोऽचलन् ॥५॥ (५) प्रतिदिन पुररक्षकों अर्याद सिपाहियोंने सैकडोंकी संख्या लोगोंको पकडा तोमी स्त्री-पुरुषों की कतार सय भोरसे चल रही थीं। अनुभूतं परं कष्टं कारामु बहुभिर्ननः । अदृष्टपूर्वसझलेशैविमवोत्तरजीविभिः ॥६॥ (६) जिन लोगोंने ऐशको नहीं देखा था, जो सम्पत्तिशील थे, ऐसे मनुतमे लोगोंने फेदमें महान कष्ट सहारे। क्षारन्यासप्रदेशेषु नरनारीकदम्बकम् । क्षाराकर्षसमुद्युक्तमतिकार्येण ताडितम् ॥७॥ (0) नमक रखने के अनुतमे स्थानों में नम: निमटने कार्य, मा हुमा नरनारियांग समूह पड़ी कामे पीट गया।

सत्याग्रहगीता अहो पूजास्पदं तेषां श्लाध्यमाचरणं सलु । कृत्स्नपातसहिष्णूनामहिंसावतधारिणाम् ॥८॥ (८) अहो ! सब प्रभारके आघातोंको सहारनेवालो अहिंसा प्रतको धारण करनेवालो उनका आचरण निश्चयसेही पूजाके योग्य है। दण्डप्रहारसद्धिनिर्भयदृष्टपौरुपैः। राष्ट्रीयरुग्णगेहानि पूर्यन्ते स्म क्षतैनः ॥९॥ (९) देशके हस्पताल, दण्डोके महारसे जखमी, निर्भीक, मार खाए हुए, जिन पर बल प्रयोग किया गया है ऐसे लोगोंसे भरे जाने लगे। मस्तके ताडिताः केचिदुरसि प्रहृताः परे । केचिद्भग्नास्थिकाथान्ये निष्कृष्टोपस्थभागकाः ॥१०॥ (१०) कइयों के मस्तको पर मारें पड़ीं, कई छातियों पर पीटे गए-कश्योंकी हड्डियाँ तोडी गई, कइयोंके उपस्थभाग बैंच लिए गए। हृतवस्त्राः परे केचिद्दे निष्ठरताडिताः । धरण्यां मूर्छिताः पेतुः प्रशान्ता देशसेवकाः ॥११॥ (११) और कइयोके वस्त्र उतार लिए गए। कइयोको गुदास्थानमें में कठिन आघात पहुँचाए गए। अर्थात् चोटें लगाई गई । शान्त स्वभाववाले देशसेवक पृथिवीपर मूञ्छित होवर गिर पड़े। ततो रक्षिभिराकृष्टा भारतीयनरासुरैः । कण्टकावृतिषु क्षिप्ताः खातकेषु जलेऽथवा ।।१२।। (१२) तब इसके पीछे नररूपमें असुर तुल्य भारतीय सिपाहियों द्वारा खेंचे गए, (कई ) काटोम, साइयोमें अथवा जल में फेंक दिए गए। अहो नैच्यमचिन्त्य तद्देशमन्धुविधातिनाम् । मूच्छितानपि हिंसन्तो यदेते न व्यरंसिपुः ॥१३॥ (१३) अहो। उन देशमाइयों को मारनेवालोकी नीयता सोचनमें नहीं भा समची है। क्योंकि मूळ पाये हुए लोगों का मारनेसे वे न हटे।

सत्याग्रहगीता अत्याचारस्य वृत्तान्तो रक्षिवर्गस्य धार्सने । प्रसिद्धि नीयमानोऽपि शासकैरवधीरितः ॥२०॥ (२०) धार्सन स्थानमें सिपाहियोंका अत्याचार अर्थात सिपाहियों द्वारा किया गया अग्याचार प्रसिद्धिको पहुंचा हुआ भी शासकोंसे अवधीरित किया गया अर्थात जानते हुए भी शासकोंने उस अन्याचार की परवाह न की। एवं चन्दीक्रियन्ते स्म लोकास्तावदिने दिने। अतिघोरमभूद्यावदाङ्ग्लराज्यं सुदुःसहम् ॥२१॥ (२३) इस प्रकार प्रतिदिन लोग कैदी बनाए जा रहे थे । यहाँ तककी अंग्रेजी राज्य महा भयानक और बहुतही दुस्सह हो गया। अहो उदारसत्त्वानामिदं युद्धं महामृतम् । येशुगौतमकृष्णानां सत्त्वोत्कर्पण सम्मितम् ॥ २२॥ (२२) अहो ! येशु बुद्धदेव तथा कृष्णादि उदार महात्माभोंके सत्व- गुणयुक्त उम्कर्षसे मिलता जुलता यह युद्ध अत्यद्भुत था। अहो सत्याग्रहस्यायं प्रभावः परमोर्जितः । यः पाशवबलं शत्रोधुवं परिभविष्यति ॥ २३ ॥ (२३) अहो ! सत्याग्रहका यह बहुत ऊँचा प्रभाव है जो शके पशुतुल्य पलको शीघ्रही पराजित करेगा। स्वराज्यकाग्रचित्तानां मुम्बापुरनिवासिनाम् । प्रवृत्तिः शासन भत्तुमतिभूमिं गताञ्जसा ॥ २४॥ (२४) स्वराज्य (माप्ति) के लिए एकाग्र हृदयवाले यम्यई मारके निवासियों के मनकी प्रवृत्ति बहुत येगसे शामनको तोड़ने के लिए पराकाष्टाको पहुँच गई।

द्वादशोऽध्यायः ६७ निषिद्धेष्वपि सर्वत्र सभासम्मेलनादिपु । सर्वतः सम्मिलन्ते स्म राष्ट्रीयाः कार्यसाधकाः ॥२५॥ (२५) कामको सिद्ध करनेवाले भारतीय जन सन स्थानोंपर सभा- सम्मेलनको मनाई होते हुए भी सब ओर इस्टे होने लगे थे। प्रतिरोढुं समर्थः कः सवन्तीनां समागमम् । सिन्धुसंयोगकामानां तत्समा हि प्रजागतिः ।।२६ ।। (२६) सिन्धु अर्थात् समुद्र के संयोगको इच्छा रखनेवालो नदियोंकी गतिको कौन रोक सकता है ? ऐसीही प्रजाकी गति है। व्याख्यास्यन्तः सुवक्तारो धर्मयुद्धस्य गौरवम् । कृता बद्धमुखाः सद्यो रुद्धा नीवाश्च बन्धनम् ॥ २७ ॥ (२७) धर्मयुद्धके महत्वको बतानेकी इच्छा रखनेवालों सुवक्ता- जनों के मुंह बन्द किए गए अर्यात उन्हें वोलमेसे रोका गया-ये शीत्रही रोके गए और कैदखानेको लिवा लिए गए। निर्दोपाः सज्जना एते न्यायमङ्गाभिशंसिताः । परीक्षणार्थमाहृता न्यायागारे परेयवि ॥२८॥ (२८) दूसरेही दिन न्यायभंग करनेके लिए निर्देश करनेवाले ये निदॉप सजन परीक्षाके लिए न्यायागारमें बुला लिए गए। गुप्तमावेदितः कृत्यं शासकैयचिकीर्पितम् । न्यायाध्यक्षोऽददाद्दण्डं निर्दिशन् बन्धनावधिम् ॥ २९॥ (२९) शासकों को जो करना अभीष्ट था वह धात न्यायाधीशको गुप्त प्रकारसे बता दी गई थी। इसलिए कैदको अवधि बताते हुए उसने उन्हें दण्ड दे दिया। मण्डलं नरनारीणां व्यापूतानां स्त्रकर्मसु । निस्सारित बलानित्य निणर्दण्डताडनैः ।। ३०॥ (३०) अपने कामों में व्यस्त नरनारियोंके मण्डलको सदैव निर्दयतापूर्वक दिए गए हण्डोंके तान द्वारा जबरदस्ती निकल दिया जाता था।

सत्याग्रहगीता । देशभक्तो निजप्राणान् मन्यते यस्तृणोपमान् । ताडनात्तस्य किं दुःखं बन्धनाचस्य किं भयम् ॥ ३१ ॥ (३१) जो देशभक्त अपने प्राणों को तृणके समान मानता है उसे मार खानेसे दुःख क्या? कैदसे भय क्या ? सेवकेष्वपनीतेषु प्रत्यहं च सहस्रशः। कृतमेवेतरैः काय यथादिष्टं महात्मना ॥३२॥ (३२) प्रतिदिन हजारों, सेवकोंके हठाए जानेपर दूसरे महारमाके कथानुसार काम करते थे। त्यक्तविद्यालया नैके व्यापृतास्तरुणाः स्थिताः । न्यायवादिभिपग्वर्यास्तथा च त्यक्तवृत्तयः ॥३३॥ (३३) इस कार्यमें लगे हुए युवकों में ऐसे बहुत थे जिन्होंने विद्या- लय छोड़ दिए थे । और जज तथा डाक्तरोंने अपनी नौकरियां छोड़ दीं। यदा यदा मृपाख्यानैर्वलाद्धा हि नायकाः । तदा तदा स्थितो लोको गौरवाद्विरतोद्यमः ॥३४॥ (३४) जैसे रही अभियोग (जब जब) ही झुठे आख्यानोंद्वारा नेतालोग पकड़े गए वैसे ही लोग अभिमानपूर्वक अपने कारोबारसे विरत होगए। कार्यालयेषु सर्वेषु बद्धद्वारेषु सर्वतः । मुम्बापुरी निरुद्योगा भवति स्म पुनः पुनः ॥ ३५॥ (३५) सब कारखानोंके बन्द हो जानेसे बम्बई नगरी फिर निरयोग हो जाती थी। अथो दिनेषु गच्छत्सु योपितः सत्कुलोद्भवाः । आत्मानं राष्ट्रकृत्येषु सानन्दं समयोजयन् ॥ ३६ ॥ (३१) समय गुजरने पर कुलीन स्त्रियां भानंदपूर्वक अपनेको राष्ट्रके कामों में लगाने लग पड़ी।

द्वादशोऽध्यायः नारीणां विविधाः सुझ्या विदुपीमिविनिर्मिताः । कार्यक्रमप्रचारार्थ राष्ट्रसंसदुपाश्रयाः ॥ ३७॥ (३७) राष्ट्रसंपद स्यात् कांग्रेसरर आधारित नारियों के विविध सद्ध कार्यकम के प्रचार के लिए विदुषी नारियोंने बनाए। आसायं प्रातरारभ्ध निश्चला योषितः स्थिताः। आपणेषु निल्याना विदेशाम्बरविक्रयम् ।। ३८ ।। (३८) स्त्रियों मुबहसे लेकर सायंचल तक विदेशी कपडे की विधी को रोकने के लिए दुकानों में निश्वल होकर मर गई। परदेशीयवत्राणि वहिप्कृस्त यान्यवाः । उपयोगो यतस्तेपां देशनाशस्य कारणम् ।। ३९।। (३९) हे माइयो ! परदेशीय कपड़ों का बहिष्कार कीजिए क्यों कि उन प्रयोग देश के नाश का कारण है। फ्रीणीचं खरं वासो दीनानामन्नदायकम् । इति ग्राहकलोकांस्ताः प्रार्थयन्ते स्म सेविकाः ।। ४०॥ (१०) मेविकाएं प्राइक टोगों से यह प्रार्थना करने लगी कि दीन दनों ग्रे मोबन देनेवाले सहर के काई को मरीदिए । तरुणीनां गणः स्थित्वा मधोहस्य सन्नियों । परमर्यकरं रानो न्यरुणन्मद्यविक्रयम् ।। ४१ ।। (१) युवतियों के समूहने शगयर के पाम मरे होत राना भयान भंडार मन बनाने के घाग शरायकी विभी को रोक दिया। अहो मद्यमिद नूनं गान्धवा आत्मयानकम् । निवर्तनमतस्तस्मात्सर्वविधारणात् ।। ४२॥ (५३) माईयो । शया भारही मामघातक है। इसलिए रममारियमरी (मय) मे मार र आदए ।

७० सत्याग्रहगीता मद्यपानपरित्यागात् क्षीयन्ते सङ्कटानि वः । दीनानां सकुटुम्बानामित्यूचुस्ताः सुराप्रियान् ॥४३॥ (४३) शराब पीने में आसक्ति रखनेवालोंको उन्होंने कहा कि मद्यपान के परित्याग से कुटुम्ब सहित दीनता को प्राप्त हुए आप लोगों के कष्ट दूर हो जाएंगे। अनादृतास्तरुण्यस्ता ग्राहकैः पानलम्पटैः। शप्ता विक्रयिकैश्चापि स्ववृत्तिमजिहासुभिः ॥ ४४ ॥ (४४) पान के लोभी ग्राहकों ने और उन बेचनेवालोंन जो अपनी आजीविका छोडना नहीं चाहते थे उन युवतियों का निरादर के या और उन को गालियां भी दी। सर्वकष्टसहिष्णूनां स्थितानां शौण्डिकापणे । सेविकानां दृढो यत्नः शनैः सफलतामगात् ।। १५ ।। (४५) सब कष्टोंको सहारनेवाले शरावको दुकानों में सड़ी हुई सेविकाकों का दृढ यत्न सफलता को प्राप्त हुआ। अवगम्य सुरासक्ताः प्रचलद्युद्धगौरवम् । व्यसनाद्विमुखीभूय मद्यस्थानानि तत्यजुः ॥४६॥ (४६) शराब में आसक्त लोगोंने वर्तमान अर्थात् तत्कालीन युद्ध के गौरवको समझकर व्यसनसे मुँह फेर कर शराबघर को छोद दिया। संक्चुरापणान् केचिन्मद्यविक्रयजीविनः । इतरे स्वार्थनिष्ठास्तु हिंसकां वृत्तिमाचरन् । ४७।। (४७) मघकी वित्रीसे आजीविका कमानेवाले कई लोग दुकानापर गए। और कई स्वार्थी लोग कसाई की पत्ति करने लगे। विदेशीयानि वस्त्राणि विहाय नचिराजनाः । वसितुं सदरं वासः प्रारभन्त सगौरवम् ।। ४८॥ (५८) शीघ्रही लोग विदेशी वस्त्रों पर परित्याग कर के गौरवपूर्वक खारके कपडे पहरने लगे।

प्रयोदशोऽध्यायः ७३ निर्मये जनसन्देऽस्मिन् भीपणं तद्रथद्वयम् । अमिद्राव वेगेन ध्वंसयत्सुबहूजनान् ॥६॥ (१) पहुत लोगों का नाश करता हुभा यह रथ का जोड़ा दस निर्मिक जनसमूह में शोरसे दौद निम्ला। निदीपा निहता नैके दारुगायां महापदि । निकीय मृत रथ्या दग्धेरिव पतङ्गकैः ॥७॥ (0) उस भीपग तया महान् संकट में यहुत से निर्दोष मनुष्य मारे गए । जले हुए पोंके समान, मृत शरीरोंसे गलियाँ भरपूर हो गई। तौकस्तुरगारूढः समायानाग्लकिङ्करः । मर्दितो रथयोर्मध्ये सत्वरं पञ्चतां गतः ॥८॥ (८) घोडेपर घटा हुमा एक अंग्रेजी नोरर अर्याव अफसर यहाँ भाता तुभा दोनों रयों के बीच में मसला गया और शीघ्र ही मृत्यु प्राप्त हो गया। अथ वीरेप्पनेकैपु पिद्धप्वपि विधातुकैः । नियलाः सइफूले तस्मिन्निवरे निर्मयाः स्थिताः ॥९॥ (९) विहिसिक अनोंडारा भने वीरों के मारे जानेपर भी पर समभीर में निर्भय होर निप्रट पड़े रहे। घटना स्वबान्धवान् विद्धान पद्धा काचिदुपासरत् । हता प गुलिकादृष्टया पौः संयोनिता मृतः ॥१०॥ (1.)भने भाईयों को जन्मी हुमा देशम धेई यही वहाँ भापपी। पर गोलियों से मारी गई और दूसरे पनगाठों मे उसे मरे हुए लोगों में मिटा दिया।

त्रयोदशोऽध्यायः अथो दिनेषु गच्छत्सु लोकक्षोभ उपस्थितः । पुरे पेशावरे चापि चौरीचौरानुबोधकः ॥१॥ (१) समय गुजरने पर पेशावर शहरमें 'चौरी चौरा' की घटना को याद दिलानेवाला अर्थात् उस जैसा लोकक्षोभ हो गया। निरुद्धा नायका यावद्वत्सलाः कारणाहते । क्षुभिता जनता तावत्संयतापि व्रतेन सा ॥२॥ (२) जप जनता के प्यारे नेतागण विना कारण कैद कर लिए गए तो सत्याग्रह के व्रत से नियत्रित होती हुई भी वह जनता क्षुब्ध होगई। गृहीवान् रक्षकैर्नेतून देशभक्त्यैव दोपिणः । तज्जयं घोपयन्नुच्चैर्जनौघोऽनुससार तान् ॥३॥ (३) देशभक्ति ही के कारण दोषी ठहराए गए नेताओं के सिपाहियों द्वारा पकड़े जाने पर लोगों का समूह ऊँची आवाजसे उनको जय- जयकार के नारे लगाता हुआ उनके पीछे चल पड़े। जनकोलाहलास्तैरथ विप्लवशदिभिः । रक्षिभिः प्रार्थि साहाय्यमाइग्लसैन्यस्य सत्वरम् ॥४॥ (५) विप्लव की आशका करते हुए लोगों के कोलाहल से भयभीत सिपाहियों ने शीघ्रही भग्रेजी सेना की सहायता के लिए प्रार्थना की। अभ्यापतत् क्षणादेव तज्जनौधे र्थद्वयम् । अग्न्यस्त्रगुलिकापूर्ण लोकविध्वंसनोद्यतम् ॥५॥ (५)शीम ही लोगों के नाश के लिए उद्यत बन्दूकों तथा गोलियों से मेरे दो रथ उस जनसमूह में भा पहुंचे।

प्रयोदशोऽध्यायः निर्भये जनवृन्देऽस्मिन् मीपणं तद्रयद्वयम् । अमिदुद्राव वेगेन ध्वंसयत्सुबहूजनान् ॥६॥ (६) बहुत लोगों का नाश करता हुआ वह रथ का जोड़ा टस निर्मिक जनसमूह में ज़ोरसे दौड़ निकला। निदोपा निहता नैके दारणायां महापदि । विकीच मृत रथ्या दग्धैरिव पतङ्गकः ॥७॥ (७) उस भीपण वया महान् संकट में बहुत से निर्दोष मनुष्य मारे गए । जले हुए पवनों के समान, मृत शरीरासे गलियाँ भरपूर हो गई। तत्रैकस्तुरगारूढः समायानाम्लकिङ्करः । मर्दितो रथयोर्मध्ये सत्वरं पञ्चतां गतः ॥८॥ (८) घोड़ेपर चढा हुआ एक अंग्रेजी नोकर अथांब अफसर वहाँ आता हुमा दोनों रयों के बीच में मसला गया और शीघ्र ही मृत्यु प्राप्त हो गया। अथ वीरेप्वनेकेषु विद्धप्वपि विधातुकैः । निश्चलाः सङ्घले तस्मिनितरे निर्मयाः स्थिताः ॥९॥ (९) विहिसिक जनोंद्वारा अनेकों वीरों के मारे जानेपर भी कई एक उस मीट में निर्भय होकर निवल खड़े रहे। दृष्ट्वा स्वबान्धवान् विद्धान वृद्धा काचिदुपासरत् । हता च गुलिकावृष्टया परैः संयोजिता मृतः ॥१०॥ (1.) अपने माईयों को जस्मी हुआ देखकर कोई चूढी वहाँ मापहुँची। यह गोलियों से मारी गई और दूसरे पक्षवालों ने उसे मरे हुए रोगों में मिला दिया।

७४ सत्याग्रहगीता सार्भको जरठः कश्चित्कम्पितो घोरदर्शनाव । दृष्ट्वा मृतस्थितान्भूमौ भीतः प्राचलदग्रतः ॥ ११॥ (11) बच्चे को उठाए एक बूदा भयंकर दृश्य को देखकर कांप उठा, जमीनपर मरे हुओं के देखकर डरा हुआ आगे चल दिया। चालं रक्षितुकामोऽपि कर्तव्यमविदन् बत । प्राविशत्तुमुले तस्मिन् भ्रान्तचित्त इवानले ॥१२॥ (१२) बचे को बचानेकी इच्छा रखता हुभा भी वह क्या करना चाहिये सो न समझकर कोई भ्रान्तचित्त जिस तरह अग्नि में जा गिरे उसी तरह उस संग्राम में घुस गया। कुरुध्वं गुलिकाक्षेप मयीति करुणं त्रुवन् । नृशंसैस्तद्वचः श्रुत्वा सार्मको हत एव सः ।। १३ ॥ (१३) “मेरे ऊपर गोलियाँ करो' वह सफरुग स्वर में बोला । निर्दय लोगों ने उसका वचन सुनकर बशेखहित उसे मार ही दिया। शकटेषु शवान् सर्वान् राशीकृत्य दुरात्मकाः । अनावेद्यैव बन्धुभ्यः काष्ठवचिक्षिपुर्जले ॥१४॥ (१४) दुरामाओंने सब मृत शरीरों को रथों में इकट्ठा करके उनके रिश्तकारों को बिना बताए ही उन्हें लकड़ी के समान पानी में फेंक दिया। ततो यावत्स विक्षोभो वर्धते स्म जने पुनः । तावदाज्ञापिताः क्षेप्तुमाग्नेयास्त्र परीक्लाः ॥१५॥ (१५) जब लोगोंमें फिर से हलचल बहुत बढ गई सो धीवाल सिपाहियों को तो चलाने की भाशा दी गई । आज्ञा सेनापतेघौरा सैनिकैस्तैरनाहता। परिणाम हणीकृत्य स्वप्रवृत्तेः मुदारुणम् ॥१६॥ (1) अपनी प्रकृति के भयंकर परिणाम को तृणसमान सुध्छ गिनकर उन सिपाहियों ने सेनापति की घोर भाशा की परवाह न की। .

त्रयोदशोऽध्यायः रसगार्य स्वदेशस्य वयं सैन्ये नियोजिताः । उपद्रवादमित्राणां न तु हन्तुं स्त्रवान्यवान् ।। १७॥ (10) हम शत्रुओं के मंकटपे अपने देशको रक्षा करने के लिए सैनाने मरती किए गए थे न कि अपने माइयों को मारने के लिए। सम्पातं न करियामो निःशस्त्रेषु स्वबन्धुषु । हन्येमहि बघाहविदित्यवोचन् घरीवताः ॥१८॥ (१८) घरीवालों ने कहा कि यदि हम मारने योग्य हैं तो हमें मार दीजिए । हम निशस्त्र माझ्यापर गोलियाँ नहीं चलाएंगे। निजानोडनद्धस्तरक्षणात्स चम्पतिः । सनिकानामनेकपा वधदण्डं समादिशन् ।। १९॥ (१९) टमी क्षग अपनी आना के रहुंधनमे क्रुद्ध हुआ टम सेनापत्रिने अनेक मिपाहियों को मृत्युदण्डकी आज्ञा दी। एकस्तु तेषु वीरेपु यावन्नी प्रवासितः। संनिका अवशिष्टाय कृताः कारानिवासिनः ।। २०॥ (२०) टनमें से एक वीर को आजीवन परदेशनिगम मिला । शेष मित्राही पन्दीदा टियाए। सजनाः खल ते पूज्यास्त्वक्तस्वातन्त्र्यनीविताः । परिहतुं स्वबन्धूनां वध देशप्रयासिनाम् ॥ २१ ॥ (२१) अपने देश के लिए यनशील हन्या रोकने के लिए भाईयों को स्प्यापूर्वक अपने जीवन और स्वातंत्र्य का परित्याग करनेवाले दे सहन धन्य है। राष्ट्रीयाणां यो न्यस्य लोकानाट्न्ला गताः पुरान् । अचिरातु न्यवर्तन्त मविमानाः ससनिकाः ॥२२॥ (२३) टोगों को देशीय प्रांत मारतीय टोगों के हवाले कर अंग्रेज बाहर निकल गर, पर शीग्रही मित्राहियों और वाई जहानों के साथ टोरभार!

प्रयोदशोऽध्यायः पुण्याचारेऽभ्युपेतेऽपि येशुक्रिस्तानुयायिभिः । कथं नु शासकैरित्यं परं दौरात्म्यमाश्रितम् ॥२९॥ (२९) इसामसीह के अनुयायी शासक वर्गने पुण्याचरण का स्वीकार करने पर इस प्रकार निर्दयता का व्यवहार क्यों दिया? कैस्तवेदेन किं काय दशाज्ञाभिश्व किं फलम् । को वायवरितैः पुण्यैर्येशुक्रिस्तमहात्मनः ॥३०॥ (३०) ईसाई वेद का क्या लाभ है ? दश आज्ञाओं का क्या फल है" महारमा ईसामसीह के पुण्यस्वरूप चरित्रों से क्या अभिप्राय है ? किंवा धर्मोपदेशेन प्रार्थनामन्दिरेण वा । किं च पातेन जानुभ्यां किं वा ध्याननिमीलनः ॥३१॥ (३१) धर्मोपदेश से क्या ? प्रार्थना मन्दिर से क्या' घुटनों के बल गिरने से क्या ध्यान से नेत्र बंद करने से क्या। किं दृष्टान्तैरदारस्तैः किं येशोः कीर्तितेर्गुणैः । सत्यदानदयाधर्मक्षमाधृतिमुखैरपि ।। ३२ ।। (३२) उन उदार दृष्टान्तो से क्या ? सस्य-दान-दया धर्म-क्षमा धैर्य आदि इसाके गुणोंके गानसे क्या ? ईश्वरस्य वयं पुत्रा इति नित्याभिमानिनः । कयं कापटिका एते विशेयुर्येशुमन्दिरम् ॥ ३३ ॥ (३३) हम भगवानके पुत्र है-सदैव इस बात पर गर्व करने- थाले, कपाचरणवाले ये लोग कैसे ईसा के मन्दिर में पहुँचेंगे? स्तधर्मप्रसारार्धमायान्तीहोपदेशकाः। आगला मारतं वर्पमिति किं न विडम्बना ॥ ३४॥ (३४) अप्रेत उपदेशक यहाँ ईसाई धर्म के प्रचार के लिए आते है, यह क्या विडम्बना नहीं है।

पकड़ा गया। ७६ सत्याग्रहगीता निपिढेऽपि हठादाइलैनिष्कमे नगराहिः। कृतमुल्लङ्घनं कैश्चित्तचो रुद्धाय नायकाः ॥ २३ ॥ (२३) अंग्रेजों द्वारा नगर के बाहर जाने से निपिद होने पर भी कई लोगों ने उनका हठपूर्वक उल्लघन किया। फिर नेताओं को प्रस्थिता लोकयात्राथ स्वानुकम्पाप्रदर्शिनी । पेशावरस्य रथ्यासु जयघोष वितन्वती ॥२४॥ (२४) अपनी सहानुभूतिस प्रदर्शन करती हुई पेशावर की गलियों में जयघोष के नारे लगाते हुए लोगों के जलस निकल पड़े। आरब्धो गुलिकाक्षेपो जनौघे सैनिकः पुनः । जनाः सप्त न्यहन्यन्त बहवश्व परिक्षताः ॥२५॥ (२५) सिपाहियों ने उस जनसमूह में फिर गोलियाँ फेंकना शुरू क्यिा । सात आदमी मारे गए और बहुतसे जख्मी हो गए। इति पेशावरस्याभृत्संहारोऽतिभयावहः । प्रलयान्तेऽप्यविस्मार्यो महाक्लेशार्दितर्जनः ॥२६॥ (२६) इस प्रकार पेशावर नगर का सहार ऐसा भयंकर हुआ जो महाक्लेश से पीडित लोगों को प्रलय के अन्ततक भी न भूलनेवाला था। किमुत्तरं प्रदास्यन्ते शासका दुष्टबुद्धयः । स्वकर्मणां परे लोके येशक्रिस्तानुवर्तिनः ॥२७॥ (२०) ईसमसीह के पीछे चलनेवाले दुष्टबुद्धि शासक परलोक में अपने काँका क्या उत्तर देंगे? किं धर्मेण प्रमोर्येशोस्त्यक्तासोः माणिनां कृते । तदौदार्यविरुद्ध चेद्वर्तेरन्ननुयायिनः ॥२८॥ (२८) प्राणियों के लिए प्राणम्याग करनेवाले ईसा के धर्म से क्या लाम है यदि उसके मनुयायी जन उसकी उदारता के विरुद्ध भाचरण प्रयोदशोऽध्यायः ७७ पुण्याचारेऽभ्युपेतेऽपि येशुक्रिस्तानुयायिमिः । कथं नु शासकैरित्य परं दौरात्म्यमाश्रितम् ॥ २९॥ (२९) इसामसीह के अनुयायी शासक वर्गने पुण्याचरण का स्वीकार करने पर इस प्रकार निर्दयता का व्यवहार क्यों किया? ऊस्तवेदेन किं काय दशाज्ञाभिश्च किं फलम् । को वार्थश्चरितैः पुण्यैर्येशुक्रिस्तमहात्मनः ॥३०॥ (३०) ईसाई वेद का क्या लाभ है ? दश आज्ञाओं का क्या फल है ? महारमा ईसामसीह के पुण्यस्वरूप चरित्रों से क्या अभिशय है ? किंवा धर्मोपदेशेन प्रार्थनामन्दिरेण वा । किं च पातेन जानुभ्यां किं वा ध्याननिमीलनैः ॥३१॥ (३१) धर्मोपदेश से क्या ? प्रार्थना मन्दिर से क्या ? घुटनों के बल गिरने से क्या? ध्यान से नेत्र बंद करने से क्या ? किं दृष्टान्तैरुदारेस्तैः किं यशोः कीर्तितेर्गुणैः । सत्यदानदयाधर्मक्षमाधृतिमुखैरपि ॥ ३२॥ (३२) उन उदार दृष्टान्तो से क्या ? सत्य-दान-दया-धर्म-क्षमा-य आदि इसाके गुणोंके गानसे क्या ? ईश्वरस्य वयं पुत्रा इति नित्यामिमानिनः । कथं कापटिका एते विशेयुर्येशुमन्दिरम् ।। ३३ ।। (३३) हम भगवानके पुत्र है--सदैव इस बात पर गर्व करने- पाले, कपाचरणवाले ये लोग कैसे ईसा के मन्दिर में पहुंची। स्तधर्मप्रसारार्धमायान्तीदोपदेशकाः । आगला भारत वर्षमिति किं न विडम्बना ॥३४॥ (३४) अंग्रेज उपदेशक यहाँ ईसाई धर्म के प्रचार के लिए माते है, यह क्या विडम्बना नहीं है?

त्रयोदशोऽध्यायः येशुना बोषितो धर्मो भारते न हि नूतनः । स एनादिः समुद्घष्टो वेदशास्त्रैः सनातनैः ।। ४१ ॥ (४१) ईसामसीह का बताया हुआ धर्म भारत के लिए कोई नई चीज़ नहीं है। पुरातनकालीन वेदों क्या शास्त्रों ने उसे अनादि कहकर पुकारा है। येशोः पूर्वमसौ जातः सिद्धार्थो नाम मास्करः । अज्ञानतिमिरं हतुं जगतो निजतेजसा ।। ४२ ॥ (४२) अपने तेज से संसार के अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करने के लिए वह सिद्धार्थनामका सूर्य ईसा से पहले उत्पन्न हुआ था। किं चित्र भारतीयाश्चेदाचरेयुः सुसंयताः । धर्मनिष्ठां यपातत्त्वं सत्याग्रहनियोधने ।। ४३ ।। (४३) यदि भारतीय लोग सुसंयत होकर सत्याग्रहरूपी युद्ध में यथावत् धर्मनिष्टा का आचरण करें तो उसमें क्या हैरानी है ? वर स्वार्थपरा आङ्ग्लाः शिक्षेरन् यदि भारतात् । सहिष्णुत्वमनौपम्यं पाश्चात्त्येषु यदश्रुतम् ।। ४४ ॥ (४१) यदि स्वार्थी अंग्रेज ऐसी अनुपम सहिष्णुता भारतीय जनों से (भारतवर्ष से)जो पहले कभी पाश्चान्यों से नहीं सुनी गई सीखे, तो हो। अच्छा जगतः शिक्षणायेदं कल्पते युद्धमद्भुतम् । यदस्यामोधतत्त्वानि न्यदर्शिपत कार्यतः ॥ ४५ ॥ (४५) संसार के सिखाने के लिए इस अद्भुत युद्ध की कल्पना की गई है जो इसके भमोघ तत्त्वों को कार्यद्वारा हो रवाएगी।

७८ । सत्याग्रहगीता किं पुनः शिक्षयेयुस्ते येशुधर्मस्य बोधकाः । सौम्यवृत्तीजनानत्र हिन्दुधर्मानुसारिणः ॥ ३५॥ (३५) सौम्य स्वभाववाले हिन्दु धर्म पर चलनेवालों को ईसा के पदानेवाले फिर क्या सिखाएंगे? वरं यदि यतेरस्ते परिवर्तयितुं स्वकान् । रोगिणामनिवार्या हि चिकित्सा न खरोगिणाम् ।। ३६ ॥ (३६) अच्छा तो यह हो कि ये लोग अपनेही लोगों का परिवर्तन करें। रोगग्रस्त लोगों की ही चिकित्सा अनिवार्य है न कि तन्दुरस्तों (स्वस्थों) की। लोमः परधनस्यापि व्याधिरित्येव गण्यते । अनेन व्याधिना ग्रस्ताः पाश्चात्त्या वृद्धिलालसाः ॥३७॥ (३७) दूसरोंके धन का लोभ भी बिमारी ही समझी जाती है। अपनी वृद्धी की लालसा में भाए हुए पायान्य लोग इसी बिमारी में च्याधेरस्माद्धि जायन्ते व्यापयोऽन्ये महोल्वणाः । ते पुनः क्रमशो नाशमुपनेष्यन्ति रोगिणः ॥ ३८ ॥ (३८) इसी रोगसे ही अन्य महानाप देनेवाली बिमारियाँ पैदा होती है। फिर वे क्रमशः रोगी काही नाश ले आती है। स्वदेशे सुखहीनस्सन् विदेश स्वीकरोति यः। न तेन फलमेष्टव्यं देशयोरुभयोरपि ॥३९॥ (३९) अपने देश में मुख न पाकर जो विदेश को स्वीकार करता है वह दोनों देशों से फल की इच्छा नहीं रख सकता। भारने नानुरक्ताश्वेच्छासका: पक्षपातिनः । तेपामवस्थितरत्र हेतुः स्वार्धेकनिष्ठता ॥ ४० ॥ (४.) पक्षपाती अर्थात् अपने देश में पक्षपात रखनेवाले शासक परि भारतवर्ष में अनुरत नहीं तो उनके पहरे इस देश में रहने का कारण शेयर स्वार्थनिष्क्षही है।

त्रयोदशोऽध्यायः येशुना बोषितो धर्मो मारते न हि नूतनः । स घनादिः समुघुष्टो वेदशास्त्रैः सनातनैः ॥ ४१ ।। (४१) ईसामसीह का बताया हुआ धर्म भारत के लिए कोई नई चीज़ नहीं है। पुरातनकालीन वेदों तथा शास्त्रों ने उसे अनादि कहकर पुगरा है मैं येशोः पूर्वमसौ जातः सिद्धार्थो नाम मास्करः । अज्ञानतिमिरं हतुं जगतो निजतेजसा ।। ४२॥ (४२) अपने तेज से संसार के भज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करने के लिए वह सिद्धार्थनामका सूर्य ईसा से पहले उत्पन्न हुआ था। किंचित्रं भारतीयाश्चेदाचरेयुः सुसंयताः । धर्मनिष्ठां ययावत्त्वं सत्याग्रहनियोधने ॥४३॥ (१३) यदि भारतीय लोग सुसंयत होकर सत्याग्रहरूपी युद्ध ययावत् धर्मनिष्टा का आचरण करें तो उसमें क्या हैरानी है? वरं स्वार्थपरा आम्लाः शिक्षरन् यदि मारवाद । सहिष्णुत्वमनौपम्यं पाचात्त्येषु यदश्रुतम् ॥ ४४ ॥ (४४) यदि स्वार्थी अंग्रेज ऐसी अनुपम सहिष्णुता भारतीय जनों से (भारतवर्ष से) को पहले कमी पाश्चात्यों से नहीं सुनी गई सीखे, तो अच्छा हो। जगतः शिक्षणायेदं कल्पते युद्धमद्भुतम् । यदस्यामोधतत्वानि न्यदर्शिपत कार्यतः ॥ ४५ ॥ (१५) संसार के सिखाने के लिए इस अद्भुत युद्ध की कल्पना की गई है जो इसके अमोघ हावों को कार्यद्वारा हो यठाएगी।

चतुर्दशोऽध्यायः अल्पमात्रे गते काले सञ्जातं घोरसङ्कटम् । सोलापुरे प्रभुत्वस्य लाञ्छनं शासितुः परम् ॥१॥ (1) थोड़े समयके अनन्तर अर्थात् कुछ काल बीतनेपर शोलापूर शहरमै शासक के प्रभुत्वपर बड़े कलंक के समान एक घोर सङ्कट पैदा हो गया। मद्यपानं निराकर्तुं राष्ट्रीयैः कार्यनिष्ठितः । वालीद्रुमेषु कृतेषु कुप्यन्ति स्माधिकारिणः ॥२॥ (२) मद्यपान को हटाने के लिए कार्यक्रम में तत्पर भारतीय जनों के तालवृक्षों के कटानेपर अधिभरी जन प्रोध में आगए। आज्ञानुवर्तिमिस्तेपामारब्धं राजपूरुपैः । प्रहर्तुं निधणं काढ़ः खजूरीतरुघातिनः ॥ ३॥ (३) उन खगूर के वृक्षों को तोडनेवालों को आज्ञाकारी राजपुरुषों ने निर्दयतापूर्वक दण्डों से मारना शुरू किया। विक्षोमिनिर्यात्रा प्रस्तुता महती पुनः । शासितुर्दुष्कृतं घोरं प्रतिपेटुं समन्ततः ॥ ४ ॥ (१) शासम्सारा किए गये घोर दुराचरणों को आसपाम में रोसने के लिए विशुध लोगों ने महान यात्रा की। हठोऽस्मिन् लोकविक्षोभे रक्षी देवेन कयन ! रानहाण्यदान्त केनापि तुमुले तथा ॥५॥ (५) टोगों ये उस हटव में प्रारम्धा एक सिपाही किमी प्रमासे मारा गया। किसी ने उस मुख धुर में सरकारी हमारयों को जरा दिया।

चतुर्दशोऽध्यायः निसिसे तद्वधारोपे जनविप्वधिकारिभिः । रक्षार्थ त समाइतमाइलसैन्यं पुरान्तरात् ॥६॥ (६) अधिग्ररिचाने टस दषय आरोप उनसमूह पर कर देने पर पुरके मीतर से रक्षा के लिए अंग्रेजो सेना दुलाली। सध्यपूर्णाविकारेश्व सैनिक स्वरवृत्तिमिः । अत्याचाराः कृता घोरा इतिहासेपु दुर्लमाः ॥७॥ (0) स्वेच्छाचारी सैनिकों ने पूर्वाधिकार प्राप्त करने पर ऐसे घोर अत्याचार किए तो इतिहास में दुलंम है। स्वेच्छया गुलिकाक्षेपस्तैः कृतोऽनपराधिषु । जनस्यापहृतं विचं धर्पिताश्व कलागनाः॥८॥ (6) निदीप अनवापर टन्होंने स्लेच्छापूर्वक गोटियाँ चलाई। लोगों का धन र टिपा। और ऊँचे कुटों की खियोंरर बलात्कार किए। बलात्कारपरिनुपरथ दुनयपीडितः। प्रतिरदो जनमार्गे राजमृत्यवहो रथः ॥ ९॥ (९) धुरी नीति से पीडित-दलाकारों से शुन्ध-सोगों ने राज्यमं- धारियों की दयनेवाटारय रास्ते रोक दिया। जनीयरपयोर्मध्ये तदा स्तम्म इव स्थितः । धनश्रेष्ठीति विख्यातो नायको लोकमानितः॥१०॥ (1) लोगों के समूह और रय के दरम्यान घननेष्टी इस नाम से शिल्पाव, टोगों में पूज्य, एक नायक स्लम्स के समान सहा हो गया। संवदेयं जनयोक्सान्वयेयं च कोपिवान् । निर्गम्यतां द्रुत तावदित्यादरलान् स उपादिशन् ।।११।। (31) जन तक मैं खुद हुए लोगों को सात्वना देश है और इनमें बाबा बार अलीमे निश्ठ वाईए । ।

८२ सत्याग्रहगीता विक्षोमितो जनौषश्च श्रेष्ठिना सान्त्वितः शनैः । साहाय्येन वयस्यानां त्रयाणां सहचारिणाम् ॥१२॥ (१२) अपने तीन मित्रों की सहायता से सेठ ने शनैः २ जनसमूह शान्त किया। सान्त्वयित्वा जनस्तोमं रक्षितप्वधिकारिषु । कृतघ्नैः सवयस्योऽयं राजकीयैरदूप्यत ॥१३॥ (१३) जनसमूह को शांत करके अधिकारियों की रक्षा करने पर भी कृतन राजकर्मचारियों ने मित्रोंसहित इसे दोपी टहराया। रक्षकस्य निहन्तारश्चत्वारोऽमी जना इति । मिथ्याभिशंसनाक्षिप्ता निरुद्धास्तेऽधिकारिभिः ॥१४॥ (१४) 'रक्षकोंकी हत्या करनेवाले यही चार मनुष्य हैं। इसी प्रकार के झुटे कलंकों से अभिक्षिप्त करके उन चारों को अधिकारियों ने रोक लिया। एवं तेष्वभियुक्तेषु लोकमान्येषु नेषु । सजातो भारत वर्षे हाहाकारो यतस्ततः ॥१५॥ (१५) संसार में माननीय उन लोकनायकों के अभियुक्त बनाए जाने पर भारतवर्ष में हर जगह (जहाँ कहीं) हाहाकार हो गया। धर्मशास्त्रेण किं कार्य किं न्यायेन प्रयोजनम् । क्रियते कुप्रयोगश्वेत्प्रभुत्वस्याधिकारिभिः ॥१६॥ (१६) यदि अधिकारीवर्ग धर्मशास्त्र तथा न्यायका कुप्रयोग करते हैं तो फिर उन दोनों से क्या लाभ है? का प्रतिष्ठा हि धर्मस्य निर्दोषा यदि पिताः । न्यायाध्यक्षच किं तैर्वा ये चरेयुरधर्मतः ॥१७॥ (१७) यदि निदोंप मनुष्यों पर दोष लगाए जाएं तो धर्म का क्या स्थिति हुई ? उन न्यायाध्यक्षो का क्या फायदा है जो अधर्मपूर्वक भाचरण चतुर्दशोऽध्यायः ८३ निरागसोऽपि चत्वारः ख्यापिता अपराधिनः । तत्पुर्या दण्डपालेन प्रत्यक्षन्तान्त्यनिर्णयम् ।।१८।। (16) चारों मनुष्यों के निरपराधी होते हुए भी वे चारों अपराधी व्हराए गए । टस नगर के दण्डपाल ने अन्तिम निर्गय की प्रतीक्षा की। चतुर्पु दह्यमानेषु प्राणसंशयवझिना। अदोपास्ते विमुच्यन्तामिति लोका ययाचिरे ॥१९॥ (१९) जब वे चारों प्राणों के संशयरूपी अग्नि से जल रहे थे तो लोगोंने उन्हें निदोंप बताकर उनके छुड़ाए जाने के लिए प्रार्थना की। वयाप्यनाहता तेषां बन्धमुक्त्यभिकाक्षिणाम् । प्रजात्रासोद्यतर्याच्या दुष्टराज्याधिकारिमिः ॥२०॥ (२०) वो भी प्रजाको ब्रास देनेमें तत्पर दुष्ट राज्याधिकारियोंने भाईयों के कैद से छुड़ाने की इच्छा रखनेवालों की यह याचा अस्वीकार कर दी। अय मासेषु गच्छत्सु चत्वारो देवविप्टुताः। मुम्बापुरीमनीयन्त विचारायान्तिमाय ते ॥२१॥ (२१)फिर कई महीनों के बाद वे चारों प्रारम्य के अमागे आहत अन्तिम पिचार के लिए बम्बई नगर को टिका लिए गए। आसीद्धर्मसमा युक्ता चतुर्भिायदर्शिमिः । तेपामाग्लास्त्रयद्यान्यो गोविन्दाख्यः स्वदेशनः ।।२२।। (२२) चार न्यायदर्शियों मे धर्मसभा युन हुई। उनममे तीन अंग्रेज ये और चीया गोविंद नाम का भरने देश का भादमी या अर्यात् भारतीय था। इमे प्रयोऽपि निदीपाश्चतुर्थ स्वल्पसंशयः । इति निर्णय आचख्ये गोविन्देन हि तत्त्वतः ॥२३॥ (२३) गोविन्दने टीम २ यह निर्णय यताया कि इनमे टीन तो निप पर चीयमें कुछ सन्देह है।

सत्याग्रहगीता देशीयप्राशिवाकस्य निर्णयस्समदर्शिनः । तत्सहायरवज्ञातो मोक्तुमेताननिच्छुभिः ।। २४ ।। (२४) इन को कैद से छोड़ने की इच्छा न रखनेवालों उन सहा- यकों ने उस भारतीय पक्षपातरहित भारतीय बज के पहिले निर्णयही उपेक्षा की। न्यायाध्यक्षोऽथ गोविन्दः करालप्रतिनिर्णयात् । नाशक्नोद्रक्षितुं साधून देशबन्धूननागसः ॥२५॥ (२५) अब यह गोविन्द न्यायाध्यक्ष अपने निरपराधी चरित्रकाले देशबन्धुओंको कठोर प्रतिनिर्णय से न बचा सका। अपराधिन इत्याङ्गलैनिश्चिते न्यायदर्शिमिः । वधदण्डः समादिष्टचतुर्णामपि बन्दिनाम् ॥२६॥ (२६) अंग्रेजी जजोरा इनके अपराधी हराए जानेपर इन चारों बन्दियों को लिए उन्हों ने बधदण्ड की आज्ञा दी। का नाम गणना प्राणैर्देश्यानां परशासितः । वरं हि तस्य ते नष्टा न जीवन्तो विरोधिनः ॥२७॥ (२७) परदेशीय अर्थात् अंग्रेज शासकों की दृष्टि में भारतीयों के माणों का पया गिनती है? उसके लिए तो ये मरे ही ठीक है न कि जीते हुए विरोध करते। तेनान्यायेन सञ्जातो महाक्षोमः समन्ततः । निदोषिरक्षणाशक्तं तप्यते स्म च भारतम् ॥२८॥ (२८) इस अन्यायसे सब ओरसे महान चोभ हो गया। और निरपराधियों की रक्षामें असमर्थ भारतवर्ष जलने लगा। दुरात्मन्याङ्गले राज्ये न्याय एवं विधीयते । यस्यार्थः केवलं पीडा प्रजानां न तु रक्षणम् ।। २९।। (२९) दुरामा अंग्रेजके राज्यमें न्याय ऐसाही है। जिसका अभिप्राय केवल प्रजाको सन्ताप देनाही है न कि रक्षा करना। . ।

। चतुर्दशोऽध्यायः एकोऽपि वस्तुतो न्यायो द्विविधः स्यात्प्रयोगतः । आङ्ग्लायकः सदोपाय देश्यायको निरागसे ॥३०॥ (३०) वास्तवमें एकही प्रकारका न्यायप्रयोगमें दो प्रकारका हो सकता है। अपराधी अंग्रेजके लिए तो एक प्रकारका और निरपराधी मारतीयके लिए दूसरे प्रकारका । किं काय परराज्येन सततं पक्षपातिना। हितेप्सुना सवर्णानां देशजानां विघातिना ।।३१॥ (३१) भारतीयोके विघातक, अपने जैसे वर्णवालों के लिए हिवैषी त्या सदैव पक्षपातपूर्ण ऐसे राज्यसे क्या लाभ है ? पाश्चात्त्येषु बनेकेषु कृतघातेप्वनेकदा। न्यायो व्यनक्ति केनापि व्याजेन किल सौम्यताम् ॥३२॥ (३२) कई पाश्चान्योंके अनेकबार अपराध करने पर भी किसी यहानेसे न्याय-सौम्याच प्रकाशित करता है। अर्थे तु भारतीयस्य न्यायो मिन्नप्रकारकः । शङ्कालवोऽपि पर्याप्तो यदाक्षेप्तुमनागसम् ॥३३॥ (३३) भारतीयके लिए तो न्याय दूसरी ही प्रकारका होता है क्योंकि निरपराधीको अभियुक्त सिद्ध करनेके लिए शंकाका कणमात्र मी पर्याप्त हो सम्ता है। अनेनैव प्रकारेण भारतीयाः सहस्रशः । बन्धनं वापि दण्डं या निर्दोपा अपि लम्मिताः ॥३४॥ (३४) इस प्रकारमे हजारों भारतीय निर्देोप होते हुए भी मे कैसे कैद भयका दण्ड दीप दिए गए। धिग् राज्यं यन्न जानीयात् सत्यासत्यविवेचनम् । निजोत्कर्षमदोन्मत्तः कुतः कर्मफलं स्मरेत् ।।३५॥ (३५)जो राज्य सन्यासत्यके विवेचनको नहीं समझता है उसे विसर है। अपनी उन्नतिके मदमे उन्मत्त हुमा मनुष्य अपने कर्मक फलामो कसे सोदेगा सत्याग्रहगीता किंवा श्रेयः प्रतीक्ष्येत स्वार्थिनः परशासितः। भारते यः स्थितोऽप्यस्मिन् स्वदेशाभिमुसः सदा ॥३६॥ (३६) स्वार्थपर उस अंग्रेज शासक्से किस कल्याणकारी आशा की जा सकती है जो भारतमै बैठा हुआ दृष्टि अपने देश ही पर लगाए रहता है। पञ्चदशोऽध्यायः यथा यथा प्रजापीडा गता वृद्धि तथा तथा । क्रमो राष्ट्रियकार्यस्य परां कोटिमुपागतः ॥ १॥ (१) ज्यों प्रजाका दुःख बढ़त गया त्यो ही राष्ट्रीय उँची कोटिपर पहुँचता गया। राष्ट्रीयसंसदध्यक्षैरनुमत्या सभासदाम् । युद्धसङ्घाः प्रतिस्थानं यथाविधि विनिर्मिताः ॥२॥ (२) राष्ट्रीय संसदके (काँग्रेसके) अध्यक्षोंने सभासदोंकी अनुमत्य- नुसार यथाविधि हर स्थानमें (सत्याग्रह ) युद्धसङ्घ बना दिए । अध्यक्षाधिष्ठिताथैते साङ्गोपाङ्गवलोजिताः। कृत्स्नराष्ट्रीयकार्याणामनुयोज्याः प्रकल्पिताः॥३॥ (३) अध्यक्षों द्वारा अधिष्ठित-सागोपाग अर्थात् पूर्णरूपसे बलक कारण वृद्धिको प्राप्त, सब राष्ट्रीय कामोंके लिए काम करनेवाले नियुक्त कर लिए गये। जनप्रस्थानहेतो; समामेलनतोऽपि वा। ध्वजारोपनिमित्तं वा लवणस्य कृतेऽपि वा ॥४॥ (५) छोगोंके प्रस्थान के कारण हो, या सभाके लिए हो अथवा ध्वजा भयांत राष्ट्रीय झंडेके गाइनेके लिए हो।

८७ पञ्चदशोऽध्यायः पितो युद्धसझ्यश्चेत्तदा राज्याधिकारिमिः । अध्यक्षः सपरीवारः लिप्यते स्म हि बन्धने ॥५॥ (५) यदि युद्धसङ्घ दोपी हरा लाता या तो टसका नेता स-परिवार कैदखानेमें डाल दिया जाता था। निषिद्धास्वपि संसत्सु समवेयुर्दिवानिशम् । राष्ट्रकार्योद्यता लोकाः सर्वेपु नगरेप्वपि ॥६॥ (६) समाओंके निषिद्ध होनेपर भी राष्ट्रीय काम करनेमें तत्पर लोग सब नगरोम दिनरात इकठे होते थे। अथैकस्मिन् रखेारे मुम्बापुर्यामजायत । अत्याचारः परं गो रक्षोवृत्त्यनुरूपकः ॥ ७ ॥ (0) एक रविवारके दिन मुम्बापुरीमें सिपाही वृत्तिके अनुरूपही एक बहुत घृणित अत्याचार हुआ। मिलिता युद्धसङ्ग्रेऽस्मिन्नीतेऽवन्तिकया स्त्रिया। ध्वजारोपणकार्याय नरनार्यः सहस्रशः ॥८॥ (८) भवन्तिकावाईके नेतृवत्राले इस युद्धमङ्घमें झंडा गाड़ने लिए हजारोंकी संख्या में स्त्री-पुरुष इक्ठे हो गए। कार्येमुमिनिपिद्धेऽपि दारुणैरधिकारिमिः। सत्याग्रहपरैर्लोकः स निषेधो निराकृतः ।।९।। (९) निर्दयो अधिकारियों द्वारा इस काम पर निबंध डाले जाने पर भी सयाग्रहमें लग्न जनताने टस निषेधकी परवाह न की। समाप्ते ध्वजकार्येऽय तत्रस्या सवनायिका । अवन्तिका निरुद्धाभूत् प्रसमं राज्यशासकैः ॥१०॥ (10) झंडाकार्यकी समाप्ति होने पर राज्यशासकोने जबरदस्ती वहकि खड़ी हुई वह सबको नेत्री रोख ली।

८८ सत्याग्रहगीता समर्पोऽथ महाञ्जातो मुम्बापुर्या सुविश्रुतः। रक्षिणां दण्डहस्तानां देशसेवाजनस्य च ।। ११ ॥ (१) बम्बई नगरमें लाठी हायमें लिए हुए रक्षकों तथा देशसेवा संलग्न लोगोंका विख्यात महान् युद्ध हुआ। सेविकाभ्यो यदा हर्तुं न शेकू राष्ट्रियध्वनान् । रक्षिणः पशुतुल्यास्ते प्रहतु ताः समुद्यताः ॥१२॥ (१२) पशुतुल्य सिपाही जब सेविकाओके हाथोंसे राष्ट्रीय झंडोंको छीनने में असमर्थ हो गए तो उन्होने उन्हें (सेविकाओंकी) पीटना शुरू किया। रक्तस्रावाप्लुताथापि पताकानां स्वपालवत् । अकुर्वन् रक्षणं यावन्मुमूर्छर्देशसेविकाः ।। १३ ।। (१३) खून से लथपथ होकर भी उन्होंने झड़ेकी रक्षा तबतक की जबतक वे बेहोश न हो गई। सहावन्तिकया क्षिप्ताः कारायां काश्चिदङ्गनाः। अन्या नीतास्तमोमय्यां रजन्यां निर्जनं वनम् ॥ १४ ॥ (१४) कई एक स्त्रियाँ भवन्तीकाके साथही कैदमें डाल दी गई। कई अन्धेरे रात में निर्जनवनमें लिवा ली गई। विसृष्टास्तत्र सन्नार्यों विविधक्लेशपीडिताः। मीपिताश्च नरव्याघनिरन्नाश्च निराश्रयाः ॥१५॥ (१५) यहीं छोड़ी हुई विविध प्लेशोंसे पीड़ित भूखी और भाश्रयहीन उन साध्वी नियों को उन पशुतुल्य मनुष्योंने डराया। दशक्रोशविदूरस्थाद् भयानकवनस्थलात् । स्वगेहं निर्भय पद्भधां न्यवर्तन्त्र सहिष्णवः ॥१६॥ (१६) सहिष्णु रमणियाँ दस कोसकी दूरीपर स्थित उस भयानक मवस्थष्ठीसे निर्भय होकर अपने घरोंको छोटीं।

सत्याग्रहगीता कलेवरं वशीकर्तुं समर्थोऽपि प्रशासकः । निश्चितानां महोत्साहमपहर्तुं न शक्नुयात् ॥ २३॥ (२३) शासक शरीरको वश करने में समर्थ होता हुआ भी निश्चित मनवालोंके महान उत्साहको न हर सका। अलं शमयितुं दीपं बालोऽपि श्वासलेशतः । निर्वापयितुमर्कस्य ज्योतिस्तु प्रभुरस्ति कः ॥२४॥ (२४) दीपकको बुझाने के लिए एक बच्चा भी छोटीसी साँसद्वारा समर्थ हो सकता है पर सूर्यकी ज्योतिको बुझाने के लिए कौन समर्थ हो सकता है? भिन्द्यात्प्रायेण मल्लोऽपि शिलास्तम्भ वृहत्तरम् । कल्पान्तेऽपि न शक्तः स्याद्वक्रीकतुं मनागपि ॥२५॥ (२५) मल एक पत्थरके बने हुए स्तम्भको तोड़ तो चाहे ले पर कल्पके अन्त तक भी चाहे यत्न करे उसे टेढ़ा तो थोड़ासा भी न कर सकेगा। जलमुत्कथितं चापि पुनर्गच्छति शीतताम् । मनस्तु क्षुभितं नृणां न निवर्तेत लक्ष्यतः ।। २६ ॥ (२६) उबलता हुआ पानी फिर ठण्डा हो जाता है पर मनुष्योंका क्षुब्ध हुआ २ मन लक्ष्यसे नहीं हटाया जा सकता है। शक्यो वारयितुं चापि कथंचिडवानलः । न तु मोहयितुं शक्यः सकृजागरितो जनः ॥२७॥ (२७) वडवाग्नि किसी प्रकारसे चाहे निवारण की जा सके पर एक बार जागृतिको प्राप्त हुआ २ मनुष्य फिरसे मूढ़ नहीं बनाया जा सकता है। अत एव प्रबुद्धास्ते महोत्साहप्रचोदिताः । देशकार्यपये जग्मुर्भारतीयाः पुरः पुरः ।। २८ ।। (२०) इसलिए घड़े उत्साहसे प्रेरित हुए २ जागृतिको प्राप्त घे भारतीय लोग देशशर्यके मार्ग पर आगे २ बढ़े। अर्थात् पीछे न हटे।

पोडशोऽध्यायः । अधया नियमास्तस्मिन् काले कविद्विनिर्मिताः । प्रनानासयितुं भूयः रै राज्याधिकारिमिः ॥१॥ (1) टस समय फिर निर्दयी राज्याधिकारियों द्वारा प्रजाभोंको डराने के लिए कई एक धर्मविरुद्ध नियम बनाए गए। परदेशीयवस्राणां विक्रयस्य निरोधकाः । दोषिणः कल्पिता नून्नशासनस्य प्रमावतः ॥२॥ (२) नए शासनके प्रमावसे विदेशी वस्रोंकी त्रिीको रोकनेवाले कई लोग दोषी हराए गए। नियमोलयिनश्चति वीराः स्वार्थपराङ्मुखाः। प्रत्यहं शतशो सुद्धा देशसेवासमुद्यताः॥३॥ (३) स्वायमे परामुग्ग अयांत निस्वार्थी देशमेवाके लिए उपर दीर प्रतिदिन सरदोंकी संग्न्याम कर करलिए गए। एवं नानाप्रकारेण ननेपु त्रासितेप्वपि । कार्यमेकफलासझं प्राचल द्विरति विना ॥४॥ (४) म प्रसर लोगों के कई प्रकारमे दराए जाने पर भी एक पलमें रगा हुआ अर्थात् एक रक्ष्यमें रखा हुमा कार्य चिनविराम घटना दृष्ट्वा निवयमेतपां धन्यानां देशसेविनाम् । स्वायंगुन्यो वणिम्लोम्छमकर्मोपचक्रमे ॥५॥ (५)दन सीमाम्यशीट देशमेवकों के निप्रय देखकर म्बार्यन मुन्ध पगिक टोगोंने कपट म्यवहार करना शुरू रिया। वद्वियाद्विरंस्याम इत्याग्रुत्यापि वनकाः । प्राहिप्वन् परवसाणि रजन्यां नगरान्तरम् ॥६॥ (१)'हम विदेशी माटी दिदी न करेंगे यह प्रविमा रके भी टन टगोंने राम ही दूसरे नगरो परदेश यस भेजे।

सत्याग्रहगीता कापट्यं वणिजां बुद्ध्वा तद्वाणिज्यं रुरुत्सवः । कुमाराः सैनिका रात्री सावधानमजागरूः ॥७॥ (७) व्यापारी लोगोंके कपट व्यवहारको जान कर उनके व्यापार रोकनेकी इच्छा रखनवाले कुमार सैनिकोंने रातमें अवधानपूर्वक जागरण किया। ततस्साहसमाश्रित्य छद्मजीवी वणिग्जनः । प्रजिघाय स्ववाणिज्यं यन्वयानैरहन्यपि ॥८॥ (८) कपटकी आजीविकावाले व्यापारी जनोंने साहसका आश्रय लेकर दिनमें ही हवाई जहाजी अथवा मोटारकारों अपने व्यापारकी वस्तुए भिजवा दी। सैनिका अचलोत्साहा रथानां शिश्यिरे पुरः। विदेशवस्त्रपूर्णानां तद्विक्रयरुरुत्मया ॥९॥ (९) विदेशी वस्त्रोंकी बिक्रीकी रोकनेकी इच्छासे अचल उत्साहवाले सैनिक उन वस्त्रोंसे भरे हुए रथोंके सामने ही सोगए । दर्शितापूर्वधयस्तैस्तरुणैर्देशसेवकः । आत्मानं धर्पित मत्वा प्राकुप्यन्नधिकारिणः ॥ १०॥ (१०) उन युवक देशसेवकोंके अपूर्व धैर्य दिखलाने पर अधिकारी लोग अपनेको हारा हुआ समझ कर अति क्रुद्ध हुए। शयितानामुपर्येव स्थाः सम्मारसम्भृताः । वाह्यन्तामिति पापात्मा दण्डपालः समादिशत् ॥ ११ ॥ (११) पापी दण्डपालने सोते हुओंके उपरसे ही मालके भरे हुए रयोंके गुजार देनेशी आज्ञा दे दी। दारुणे शासने तस्मिन् प्रवृत्ते चाप्यशेरत । पुरस्ताद्यन्त्रयानानां निर्भया देशसेवकाः॥१२॥ (१२) रस भीपण भाशा पास होने पर भी देशसेवक निर्भीक घोरर मोटरोंके सामने टोट गए।

पोडशोऽध्यायः ९३ अथैकस्मिन् दिनेऽनर्थः सञ्जातोऽतिभयङ्करः । कारणं यस्य घोराज्ञा नृशंसस्याधिकारिणः ॥ १३ ॥ (५) अब एक दिन एक भयंकर अनर्थ हो गया जिसका कारण निर्दयी अधिकारीकी घोर आज्ञा थी। चायुर्नाम युवा कश्चित्साहसी तनुजो गणोः । गमनोन्मुसयानाने दण्डवत्पतितो भुवि ।। १४ ॥ (१४) यायू नाम का गणु (गणेश) का पुत्र एक साहसी युवक, घटने के लिए उधत मोटरके सामने दण्डके समान जमीन पर गिर पड़ा। रक्षकरप्यपाकृष्टः पशुकपं पशुपमैः। अशेत स युवा भूमौ स्थस्याग्रे कृताञ्जलिः ।। १५ ।। (१५) पशुवत्-पशुतुल्य-स्वभाववाले रक्षकों द्वारा खेंचा गया भी बह युवक हाय यान्धे जमीन पर सो गया। स सारथिः पराधीनो देहस्योपर्यवाहयत् । स्यं तस्य कुमारस्य चूर्णयन्नामस्तकम् ॥१६॥ (१५) मोटरके गुजरने पर यहा कोलाहल मच गया। देशसेवकों हर मोरमे गणुके पुत्र के पास पहुंचे। याने तस्मिन्नतिक्रान्ते सञज्ञे सम्भ्रमो महान् । परिवयः समन्ताच्च गाणवं देशसेवकाः ॥ १७ ॥ (10) पराधीन उस मोटर चलानेशलेने कुमारके मस्तको तोदते हुए मोटर टमके शरीरके उपरसे गुजार दी। देहस्योपर्यतिक्रान्ते यानेऽस्मिन्नपि घातुके । नानान् गणुपुत्रस्य प्राणा वीरस्य कृत्स्नशः ॥१८॥ (14) इस हत्या प्रनेवाली मोटरके उसके मरीरके ऊपरसे गुजर गने पर भी धीर गगु पुत्रके मग मन्दीसे न निम्।

सत्याग्रहगीता मुञ्छितस्तरुणो नीतो दयाद्रदेशबन्धुभिः । गेहं गोकुलदासेन कल्पितं रोगिणां कृते ॥ १९ ॥ (१९) दयाल देशसेवकों (भाईयों) द्वारा वह मूछिन युवा गोकुलदास द्वारा बनाए गए हस्पतालमें लिवा लिया गया। तस्योत्तरक्रियायाः प्राक् स्थापितः प्रेतमन्दिरे । आनिशान्तं शवस्तस्य दर्शनाय दिक्षुभिः ॥२०॥ (२०) उसकी उत्तरक्रिया अर्थात् मरणोपरान्त क्रियाकलापसे पहले दर्शनेच्छुक जनोंके दर्शनके लिए रात भर उसका मृत शरीर प्रेतमन्दिर (मुर्दाखाने) में रखा गया। अथाजग्मुर्जना रात्रौ मन्दिरं तत्सहस्रशः । गणुपुत्रमलङ्कतुं गन्धपुष्पसरादिभिः ॥२१॥ (२१) रातमें हज़ारो लोक गणुपुत्रके शरीरको सुगन्धित पुष्पमालाओंसे सजानेके लिए आए । तं युवानं नमश्चद्वाच तरुणैः समम् । आशिपश्वावदनार्यः स्पृशन्त्यस्तत्पदद्वयम् ॥२२॥ (२२) बूढ़ोने युवक जनोंके साथ उस युवकको प्रणाम किया । उसके दोनो चरणोंको छूती हुई स्त्रियोंने उसे आशीर्वाद दी। अन्येारनु तं जग्मुः श्मशानं शतशो जनाः । महावीरगर्योग्य मानं तस्य चिकीर्षवः ।।२३॥ (२३) उस महावीरको गतिके समान आदर देनेकी इच्छासे दूसरे दिन सैकड़ों मनुष्य उसके पीछे गए। किं धनरसुमिः किं वा स्वदेशार्थमनर्पितैः। इतीव शासितुं लोकान् स युवा जीवितं जहौ ॥२४॥ (२५) 'जो धन और प्राण स्वदेशी सेवाम अर्पण नहीं किए उनसे पया प्रयोजन है?' छोगोंको मानो यह शिक्षा देता हुआ अथवा एसी आशा देवा बह युवक मर गया।

सत्याग्रहगीता जाड्योपहतचेतस्त्वं नृणां निर्लज्जकर्मणाम् । रुणद्धि सुतरां वृद्धि देशस्यापि तु नाशकम् ।। ३१ ।। (३१) लज्जाहीन कामोंमें आसक्त मनुष्योंकी बुद्धि उतिके कार्यों में रकावट होती है और देशका भी नाश करती है। भारभूता भुवः सन्ति प्रेततुल्या नरा इमे । स्वार्थकतत्परत्वेन देशस्यैव विनाशकाः ॥३२॥ (३२) ये प्रेत अर्थात् मृतक्के समान मनुष्य पृथिवीके लिए भार- स्वरूप होते हैं। स्वाथैक पर होने के कारण देशहीके नाशक होते हैं। वरं ते नैव जाताः स्युर्देशकल्याणघातुकाः । प्रवृत्तिस्तामसी येपो देशदासत्वकारणम् ॥ ३३॥ (३३) देशके कल्याणको नष्ट करनेवाले ये लोग उत्पन्न ही न हों तो अच्छा है। जिनकी तमोगुणमयी प्रवृत्ति देशके दासत्वका कारण होती है। परेभ्योऽपि स्वदेशीयाः शत्रवस्ते महत्तराः । इति चेतसि कर्तव्यं देशमुक्तिमभीप्सुमिः ॥ ३४ ॥ (३४) देशकी मुक्ति चाहनेवालोंको यह समझ लेना चाहिए कि ऐसे लोग स्वदेशीय होते हुए भी दूसरोंसे भी बढ़कर शत्रु हैं। परस्य निर्जयात्पूर्व स्वार्थमनान् वणिग्जनान् । देशभक्ता वशीकुर्युः सदुपायेन केनचित् ॥ ३५ ॥ (३५) देशभक्तोको दूसरोंको जीतनेकी अपेक्षा किसी अच्छे उपायसे इन स्वार्थमग्न व्यापारी जनोंको वशमें लाना चाहिए। किंनिमित्त निरोद्धव्यो विदेशाम्बरविक्रयः इति बोधयित्तव्यास्ते वचनैः सोपपत्तिभिः ॥३६ ।। (२६) विदेश वस्त्रोंका बेचना किसलिए बन्द करना चाहिए-म पात युक्तियुक्त वचनों द्वारा उन्हें समझानी चारी पोडशोऽध्यायः ९७ लोकाः परयुगे बद्धा वालेभ्योऽप्यपलाः किल । रोदनेन जयेद्रालो दासस्तु न कयश्चन ॥ ३७॥ (३०) दूसरोंकी पन्जालिम वान्धे हुए लोग बच्चोंसे भी अधिक असहाय होते हैं। बच्चा तो रोकर जीत लेता है, दास तो किसी भी प्रकारसे नहीं जीतता। प्रति शत्रुमशक्तानां चलमेकं हि केवलम् । परवस्त्रयहिप्कारः परं सत्याग्रहायुधम् ॥ ३८॥ (३८) शाके प्रति निवल लोगोंका एक मात्रही बल है-विदेशी वनोंका बहिष्कार और सत्याग्रह यही महान् हप्यार। अस्यायुधस्य माहात्म्यं न बुद्धमखिलैर्जनः । सन्त्येव केचिदद्यापि सत्याग्रहविनिन्दकाः ।। ३९ ॥ (३९) सर मनुष्योंने इस हथ्यारके माहात्म्यको नहीं समझा है। आज भी सम्याग्रहकी निन्दा करनेवाले कई एक टोग विद्यमान हैं। स्वार्थत्यागमुदारागां चाक्षिपन्ति परेऽधमाः । सङ्ख्या त्वेषां विमूढानां हीयते देवतः शनैः ॥ ४०॥ (१०) अघम शालोग उदार प्रकृतिदालोंके स्वार्यन्यागकी निन्दा करते हैं; इन मूोंकी संख्या प्रारम्यवशात् प्रतिदिन न्यून हो रही है। सत्याग्रहस्य माहात्म्य यदुक्तं गान्धिना पुरा । तेन तत्संशयालुभ्यः पुनय विशदीकृतम् ॥ ४१ ॥ (४१) गान्धीने पहले सो सम्याग्रह का महाव बढाया या उसके अपर्याद सम्याग्रहके बारेमें संशयालुओंके प्रति फिर वो महाव टसीने विशद कर दिया। देशसेवक एकैकः सोत्साहमवयोधयेत् । देशबन्यून विमूढांस्तान् सत्याग्रहसुवैमवम् ॥ ४२ ॥ (१२) प्रत्येक देशसेवक अपने टन मूर्ख देशभाईयोंको टमारपूर्वक सत्याग्रहके मुन्दर वैमनमे समस्यए। ७ सत्याग्रहगीता जाड्योपहतचेतस्त्वं नृणां निर्लज्जकर्मणाम् । रुणद्धि सुतरां वृद्धि देशस्यापि तु नाशकम् ॥ ३१ ॥ (३१) लज्जाहीन शामि भासक्त मनुष्योंकी बुद्धि उबतिक कार्योमें रुकावट होती है और देशका भी नाश करती है। भारभूता भुवः सन्ति प्रेततुल्या नरा इमे । स्वार्थकतत्परत्वेन देशस्यैव विनाशकाः ॥३२॥ (३२) ये प्रेत अर्थात् मृतकके समान मनुष्य पृथिवीके लिए भार- स्वरूप होते हैं । स्वार्थक पर होनेके कारण देशहीके नाशक होते हैं। वरं ते नैव जानाः स्युर्देशकल्याणघातुकाः । प्रवृत्तिस्तामसी येषां देशदासत्वकारणम् ॥ ३३ ॥ (३३) देशके कल्याणको नष्ट करनेवाले ये छोग उत्पन्न ही न हों तो अच्छा है। जिनकी तमोगुणमयी प्रवृत्ति देशके दासत्वका कारण होती है। परेभ्योऽपि स्वदेशीयाः शत्रवस्ते महत्तराः । इति चेतसि कर्तव्यं देशमुक्तिमभीप्सुभिः ॥ ३४ ॥ (३५) देशकी मुक्ति चाहनेवालोंको यह समझ लेना चाहिए कि ऐसे लोग स्वदेशीय होते हुए भी दूसरोंसे भी बदकर शत्रु हैं। परस्य निर्जयात्पूर्व स्वार्थमन्नान वणिग्जनान् । देशभक्ता वशीकुर्युः सदुपायेन केनचित् ॥ ३५ ॥ (३५) देशभक्तोंको दूसरोंको जीतनेकी अपेक्षा किसी अच्छे उपायसे इन स्वार्थमन च्यापारी जनोंको वशमें लाना चाहिए। किंनिमित्त निरोद्धव्यो विदेशाम्बरविक्रयः । इति बोधयित्तच्यास्ते वचन: सोपपत्तिभिः ॥३६॥ (३६) विदेश वनोंका मेचना किसलिए चन्द करना चाहिए-या चात युक्तियुक्त वचनों द्वारा उन्हें समझानी चाहिए।

पोडशोऽध्यायः लोकाः परयुगे बद्धा वालेभ्योऽप्यवलाः किल । रोदनेन जयेद्रालो दासस्तु न कयञ्चन ।। ३७ ।। (३०) दूसरोंकी पजालिमें यान्धे हुए लोग पच्चोंसे भी अधिक असहाय होते हैं । यचा तो रोकर जीत लेता है, दास तो किसी भी प्रकारसे नहीं जीतता। प्रति शत्रुमशक्तानां यलमेकं हि केवलम् । परवस्त्रवहिप्कारः परं सत्याग्रहायुधम् ॥ ३८॥ (३८) शाके प्रति निर्मल लोगोंका एक मात्रही वल है-विदेशी वोंका यहिष्कार और सत्याग्रह यही महान् हय्यार। अस्यायुधस्य माहात्म्यं न युद्धमखिलैर्जनः । सन्त्येव केचिदद्यापि सत्याग्रहविनिन्दकाः॥ ३९ ॥ (३९) सर मनुष्योंने इम हप्यारके माहात्म्यको नहीं समझा है। आज भी सम्याग्रहकी निन्दा करनेवाले कई एक लोग विद्यमान हैं। स्वार्थत्यागमुदाराणां चाक्षिपन्ति परेऽधमाः । सख्या त्वेषां विमूढानां हीयते दैवतः शनैः ॥ ४० ॥ (४०) अधम शालोग उदार प्रकृतिवालोंके स्वार्थत्यागकी निन्दा करते हैं। इन मूम्बाकी संख्या प्रारब्धवशाद प्रतिदिन न्यून हो रही है। सत्याग्रहस्य माहात्म्यं यदुक्तं गान्धिना पुरा । तेन तत्संशयालुभ्यः पुनय विशदीकृतम् ॥४१॥ (1) गान्धीने पहले जो सस्याप्रद का महाव यताया था उसके अर्थात् सत्याग्रहके बारेमें संशयालुओं के प्रति फिर वो महाय उसीने पिशद कर दिया। देशसेवक एकैकः सोत्साहमवबोधयेत् । देशबन्धून् विमूढांस्तान् सत्याग्रहसुवैमवम् ॥ ४२ ॥ (१२)त्येक देशसेवक अपने उन मूर्व देशमाईयोंको उत्सापूर्वक सत्याग्रह सुन्दर वैमवको समझाए।

सत्याग्रहगीता कार्यमेतन्महाकष्टं कामं भवतु दुर्गमम् । तथापि न खलु त्याज्यं सुधीरदेशसेवकैः ॥४३॥ (४३) वह काम बड़ी मिहनतका और कठिण चाहे भले ही हो तोभी सुधीर देशसेवकों को इसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए। सुगमं यत्तु कायं स्यात्फलतो लघु तद्भवेत् । दुर्गमं चापि सत्कार्य पुष्णाति फलगौरवम् ॥ ४४ ॥ (४४) जो काम सुगम होता है वह फलसे छोटा हो सकता है। और अच्छा काम दुर्गम अर्थात् कठिन होता हुआ भी फलके गौरवको पुष्ट करता है। अजरा तस्य कीर्तिः स्यायेन मूढस्य चेतसि । तत्त्वं निरूढिमानीतं सुवचोभिः सयुक्तिकैः ॥ ४५ ॥ (४५) जो मनुष्य मूखीके मनमें सुन्दर युक्तियुक्त वचनोंस तरखको बिठा देता है उसका यश कभी पुराना नहीं होता है। उत्पादयितुकामश्चेदुत्साह बन्धुमानसे। निस्पृहः स चरेन्नित्यं स्वयं निरभिमानतः ॥ ४६॥ (४६) जो आदमी अपने भाईके मनमें उत्साह पैदा करने को इच्छा रखता है उसको अभिमानरहित नित्यमेव निस्पृध विचरण करना चाहिए। राजाय विभवाठ्योऽयं स्तिोऽयं पारसीयकः। नेमाः शक्या निरुत्साहाः परिवर्तयितुं जनाः॥४७॥ (४७) यह राजा है-यह धनी है - यह ईसाई है या पारसी है। ये दुपल हैं-निएसाह है-इस लिये ये पदले महीं जा सकता है। इति मत्वा न भेतव्यं देशसेयां चिकीर्षुभिः । दासमावपरिशिष्टेरवलम्ब्या हि धीरता ॥४८॥ (५८) ऐसा समसार देशसेवा करनेकी इच्छा रखनेवालोंको डाला नहीं चाहिए । शासभावों को भोको निश्पसे या माध्य सेना पाहिए।

सप्तदशोऽध्यायः श्रुत्यापि वचनं युक्तं जनश्चेद्विमुखः स्थितः । मनाशो न भवेत्तेन देशभक्तो मनागपि ॥ ४९ ॥ (४९) यदि युक्तवचन सुनकर भी लोग विमुखही रहे तो देशभक्तको जरा मी निराश नहीं होना चाहिए। हरेद्यौक्तिकवादेन विकल्पान् मन्दचेतसाम् । यावच नाप्नुयात्सिद्धिं जह्यात्कार्य न सेवकः ॥ ५० ॥ (५.) सेवकको चाहिए कि मन्दबुद्धीवाले लोगोके संशयोंको युक्तियुक्त वचनोंसे दूर करे । और जबतक सफलता न मिले अपना काम न छोड़े। पुनः पुनः कृतो यत्नः प्रबोधाय जडात्मनाम् । न सिध्येद्यदि कर्तव्या समाजात्तदहिप्कृतिः ॥५१॥ (५१) थार बार समझाने के लिए यत्न करने पर भी यदि जडात्माओंको सिद्धि न मिले तो उनकी समाजसे बहिष्कृति कर देनी चाहिए। बहिष्कारे कृते तेपामाशु शुद्धिर्मविष्यति । दृढेन व्यवसायेन कटमेवं समुत्तरेत् ।। ५२॥ (५२) उनका बहिष्कार करने पर शीघ्रदी शुद्धि हो जाएगी । दृद उद्योगसे इस प्रकार कष्टको पार करना चाहिए । सप्तदशोऽध्यायः दिनरथ व्यतिक्रान्तैररुध्यन्ताधिकारिभिः । राष्ट्रीयपरिवर्तेऽस्मिन् देशमक्ताः सहस्रशः॥१॥ (.) इस प्रकार दिन गुजरने पर अधिकारी लोगोंने इस राष्ट्रीय भान्दोलनमें हजारों देशमकोंको केदार लिया।

१०० सत्याग्रहगीता अदण्ड्या अपि चत्वारः सोलापुरनिवासिनः । वधाज्ञाविषयीभूताः स्थिता मृत्युप्रतीक्षिणः ॥२॥ (२) शोलापुरके रहनेवाले चार व्यक्ति दण्डके अयोग्य होने पर भी मौतकी आज्ञाका विषय बन जानेसे अर्थात् दण्डके अधिकारी समझे जानेके कारण मृत्युकी प्रतीक्षा कर रहे थे। भारतेनापि कृत्स्नेन तन्मोक्ष प्रार्थितेऽपि च । प्रापिता एव ते हन्त साधवो यमसन्निधिम् ॥३॥ (३) और समस्त भारतके उनको छुटानेकी प्रार्थना करने पर भी शोंक है कि वे सजन यमके पास पहुँचा दिए गए थे- अर्थात् मार डाल गये थे। अन्यायेऽस्मिन् कृते जातः क्षोभः सर्वासु दिक्ष्वपि । तत्रापि वोर्सदग्रामे भयोत्पादी विशेषतः ॥ ४॥ (1) इस अन्यायके किए जानेपर सब दिशाओं में हलचल मच गई । यहाँ बोर्सद ग्राममें विशेष रूपसे हलचल हो गई। आसीडीलावती नाम कुलीना गतभर्तृका । त्यक्तस्वार्थी स्वदेशार्थ परार्थवतचारिणी ॥५॥ (५) एक लीलावती नामवाली उच्च कुलोत्पन विधवा अपने देशके लिए स्वार्थका त्याग करनेवाली और परोपकारका पत पालनेवाली थी। मुम्बापुयां पितुर्गेहं सुखावासं विराज्य सा । प्रयाता बोर्मदग्रामे वस्तु सत्यानुगैः सह ॥६॥ (६) यम्बई नगरमें सुखपूर्ण पिताके घरका परित्याग करके अपने भनुचरों के साथ यह पसंद प्राममें रहनेके लिए चल पड़ी। ग्रामीणेषु परं स्निग्धा सौम्पत्तिः सुभापिणी। पर्यश्रमदहोरात्रं स्वयंसेवकमध्यगा ॥७॥ (.) प्रामके लोगों में बहुत प्रेम रखनेवाली, सौम्यपत्तिवाडी, मोटा पोलनेवादी पा स्वयंसेवको मध्यमें रहती हुई दिनात परिश्रम करनेही सप्तदशोऽध्यायः श्रुत्वा सा वधवृत्तान्त सोलानगरबन्दिनाम् । बभूवातिसमुद्विग्ना सन्नारी समदुःखिता ॥८॥ (८) वह साध्वी स्त्री शोलाए नगरके कैदियोंके वधवृत्तान्तको सुनकर बड़ी समुद्विम और उनके दुःसमें दुःखी हुई। निपिद्धास्वपि यात्रासु प्रस्थानं समयोजयत् । नैकग्राम्याइनाभिः सा सम्मानार्थ निरागसाम् ॥९॥ (९) यात्राओंके निषिद्ध होने पर भी उस साध्वी स्त्रीने बहुतसी गाँवकी खियोंके साथ उन निरपराधी जनों के सम्मान के लिए यात्राकी योजना बनाई। प्रस्थानस्य स्वयं नेत्री धीरा लीलावती ततः। यथा वितर्कित पूर्व गृहीता रक्षकैहठात् ॥१०॥ (०) तय प्रस्थानकी स्वयमेव नेत्री बनी हुई वह धैर्यशालिनी लीलावती जैसा कि पहले माना गया है था सिपाहियों द्वारा इसे पकड़ ली गई। रक्षिमण्डपमानीतां दुरास्मा रक्षकाधिपः । पप्रच्छ तां वहून प्रश्नान् चिकीर्षुर्दारुणां व्यथाम् ॥११॥ (११) पोलीस स्थानमें लाई गई से दुरामा पोलीसके अफमरने बहुत व्यथा पहुँचाने की इच्छासे बहुउसे प्रम पर्छ । किं ते नाम पिता कस्ते कृतः प्राप्ताऽसि दुर्मुखि । इति सा रक्षिणा पृष्टा यथाहं प्रत्युवाच वम् ॥१२॥ (१२) 'हे बुरे मुंहवाली, तुम्हारा नाम क्या है?',' कौन है?' 'कहाँ से आई हो?' इस प्रकारके पूछे जाने पर उसने यथायोग्य उसे उत्तर दिया। तुम्हारा पिता . १०२ सत्याग्रहगीता पृष्टा पुनः पितुर्वृत्तममया सोत्तरं ददौ। प्रष्टव्य भवता नेदं न पित्रा कार्यमस्ति वः॥१३॥ (१३) पिताका हाल पूछे जाने पर उसने निर्भय होकर उत्तर दिया कि 'आपको मेरे पिता के साथ कुछ वास्ता नही है, आपको यह यात नहीं पूछनी चाहिये। एवमुक्तस्तया कोपी गर्हमाणो नराधमः । लज्जामानविहीनश्व कपोले तामताडयत् ॥१४॥ (१४) इस प्रकार उत्तर पाकर उस क्रोधी, नीच, सजा और मानसे रहित मनुष्यने उसे मुंह पर धपेड मार दी। दृष्ट्वा तामविल्धानां सहमानां च दुप्कृतिम् । युद्धमन्युः पुनः साध्वी प्रजहार खलाधमः ॥१५॥ (1५) जब उस नीच मनुष्यने उसे दुष्कर्मको सहारते देखा और रुकावट न दासते देखा तो उसने उस साधी स्त्री फिरसे मारा । प्रहारैरवसीदन्ती मूछिता निपपात सा । हठानीतापरेधुश्च प्रातः कारालयं द्रुतम् ॥ १६ ॥ (११) महारोसे दुःखित हुई मूर्षित हुई वह गिर पड़ी और दूसरे दिन जल्दीहीसे पैदखानेको लिवा ली गई। अचिरादेप वृत्तान्तो राक्षसीयस्य कर्मणः । प्रससर्प प्रतिग्रामं तनी सर्पविष यया ।। १७॥ (10) म राक्षसी कर्मश समाचार शीमदी प्रत्येक गावों ऐसे पटा जमे शरीर साप विष फैटता है। अय गर्यो बलात्कारः पृधिव्यामपुरायुतः। उद्विग्रनाम्योकेषु विक्षोममुदपादयन् ॥ १८ ॥ (16) धिरी पर पहले गुने गए पगित पटारमा सकिर गायोगाम हटपट हो गई।

सप्तदशोऽध्यायः नियोगोऽसा समारोधी निरस्तश्च दिनलिमिः । लीलावत्याच मानायं प्रस्थान निवित जनः ॥ १९ ॥ (१९) यह समा निषेध करनेवाली आज्ञा तीनही दिनमि हटा दी गई। आर टीलावतीके मानके लिए लोगोंने प्रस्थान करने निश्चय किया। निर्दिष्टदिवसे चाय सार्घसाहलयोषिताम् । स्तोमो युवतिद्धानां वोर्सदग्राममन्वगात् ।। २० ॥ (२०) निर्दिष्ट दिन पर १५०० युवतियों क्या दिया झुंह दोर्मद नगरको पहुँच गया। लीलावत्या जयोदयोपं प्रतिध्वनिविछितम् । कुर्वाणः प्राविशत्सङ्यो बोसदस्य महापयम् ।। २१ ।। (२१) टीलावतीके जयजयकार गूजते हुए नारे लगाता हुए यह सङ्घ बोर्मदकी बढ़ी सदरम धुस गया। बिगाले महिलाव्यूहे समवेयुपि निर्भयम् । तस्युग्रे वयोवृद्धाः पञ्चायुवतयोऽखिलाः ॥ २२ ॥ (२२) निर्मयवाक साय चलेत हुए टस विशाल महिलासके अग्रमागमें बृद्ध स्त्रियाँ थीं और टनके पीछे सब युवतीयों थीं। व्यवस्थिता यथायोग्य प्रारमन्त सदङ्गनाः । उद्गरीतुं जयोद्धोपं देशसख्याः कुलस्त्रियः ।। २३ ।। (२३) देशकी सम्बिया अर्थात् देश हित चाहनेवाली कुलीन साध्वी स्त्रिया ययायोग्य सही होकर उपजयके नोर लगाने टरा पहीं। क्षणाभ्यापतद् दुरावस्थत सगर्जनम् । आग्नेयास्तव दण्डव्य सन्नद्धं रक्षिणां लम् ॥ २४ ॥ (२) शीही बन्दूकों व्या लागयोंमे आमूपित गबंटी हुई सिपाहियोंकी सेना आती हुई दिखाई दी। .

१०४ सत्याग्रहगीता राज्याधिकृतदासास्ते प्रधावन्तोऽतिवेगतः । भीषणाकृतयः प्रापुर्याम्यस्वीजनसनिधिम् ॥ २५ ॥ (२५) बहुत जोरसे दौडने हुए राज्यके अधिकारस्थित नौकर भीषण आकृतियोवाले गाँवकी स्त्रियोंके पास पहुँच गए। अयि दास्यश्च वेश्याच स्वस्वगेहानि गच्छत । स्तन्यं वा दत्त डिम्मेभ्यः सन्तर्पयत वा विटान् ।। २६ ॥ (२६) हे दासियो ! धेश्याओ अपने २ घरोको जाओ। या तो बोंको दूध पिलाओ या विटोंकी कामतृप्ति करो। न किञ्चिदिह कार्य वस्त्वरितं गम्यतामितः । गोष्ठकेषु करीपाणि कुरुध्वं च यथोचितम् ॥ २७ ॥ (२०) 'तुम्हारा यहाँ कुछ काम नहीं है । यहाँसे शीघ्र चली जामो गोप्टमें ययोचित उपले करो। अथ चेन निवर्तध्वे परं ताडनमाप्स्यथ । इत्यनेकैर्दुरालापैर्दुष्टास्तेऽतर्जयन्त ताः ।। २८ ।। (२८)'यदि टोटकर नही जामोगी तो पड़ी मार देगी। इस भकारके अनेकों दुर्वचनोंसे दुष्टोंने उन्हें फटकारा । अनादृत्य दुरुक्तानि निर्भयाः सपताकिकाः । घोपयन्तः स्थिता नार्यो जयशब्दं पुनः पुनः ॥ २९॥ (२९) बड़े उटाए हुए थेखियो पिर जयजयकारके मारे लगाती हुई निर्भयतापूर्वक उनके दुर्य चनोंश निरादर करके टपरी रही। शान्तत्तिषु तास्वेवं स्थितामु नरराक्षमाः। अभ्यद्रयन सर्वेग वे ग्राम्यस्रीजनमध्यतः ।। ३० ।। (२.) मरस्पी राक्षस उन्हें इस प्रगर गातयति मी भी देसमजारस उन गावकी पियाबीचसे भारमण किया।

सत्याग्रहगीता याः पुनः स्तनयोर्मध्ये ध्यजान्नार्यो जुगुहिरे । कुहितास्ता नरैनींचैनिपेतुर्मुच्छिता भुवि ।। ३७॥ (३७) जिन स्त्रियोंने अपनी छातियोंके वीचमें झंडोंको छिपाया हुमा था उन्हे जन नीच आदमियोंने पीटा तो वे मूलित होकर जमीन पर गिर पड़ी। इतरास्तु पराभूता व्यकीर्यन्त पृथक पृथक् । विद्राविताः सफूत्कारं रक्षिमिश्च भयानकैः ॥ ३८ ॥ (३८) और दूसरी हारी हुई अलग अलग हो कर बिखर गइ । भयानक सिपाहियोंने उन्हें चीखें मार मार कर भगा दिया। ग्रामाधिकारिणों मुख्या आहूता रक्षकैस्ततः । मूर्छितं योपियां वृन्दमपनेतुं स्थलान्तरम् ॥ ३९ ।। (३९) तदनन्तर गाँवके अधिकारियों के नेतागणोंको बुलाकर सिपाहियोंने उन मूर्छित स्त्रियों के झुंइको दूसरी जगह लिवाले जाने के लिए कहा। बलात्कारस्थलं तच कोलाहलसमन्धितम् । राज्याधिकारिणः प्रापुः केनचिद्भिपजा सह ॥ ४०॥ (४०) राज्यके अधिकारी लोग किसी डॉक्टर अथवा वैद्यके साथ कोलाहलसे युक्त उस बलास्कारके स्थान पर पहुँचे । उपचारेण नार्यस्ताः पुनः संज्ञां विलम्भिताः । देहलेशार्दिताथापि न जहुर्ध्वजरक्षणम् ।। ४१ ॥ (४१) चिकित्सा द्वारा वे नियां चेतनस्वको प्राप्त हुई। शारीरिक कष्टसे दुःखी हुई भी उन्होंने ध्वजाकी रक्षा नही छोडी। दातुकामाञ्जलं नार्यः प्राहुस्तानधिकारिणः । कृपयापि वरं मृत्युनं तु पानमरेः करात् ॥ ४२ ॥ (४२) पानी पीलानेवालों को उन स्त्रियोंने कहा कि प्याससे मर जाना अच्छा है न कि शत्रु हापसे पानी पीना ।

सप्तदशोऽध्यायः १०७ प्रत्युत्तरमिदं दत्त्वा दासेभ्यो नृपतेश्च ताः। वीराङ्गनाः स्वगेहानि बोर्सदीयाः पुनर्ययुः ॥ ४३ ॥ (४३) राजाके नौकरोंको यह उत्तर देकर वे बोर्सदकी वीर रमणियाँ अपने घरोंको चली गई। अचिरेणाहमाज्ञप्ता राष्ट्रियैर्वान्धवैस्ततः । प्रेक्षितुं योर्सदीयानां क्षतस्त्रीणां दशां स्वयम् ॥ ४४ ॥ (४४) शीघही अपने देशीय बन्धुओंने मुझे उन बोर्सद निवासिनी जख्मी स्त्रियोंको स्वयं जाकर देखनेको कहा। प्रस्थिताहमतः शीघ्रमङ्गनात्रयसङ्गता । उपःकालेऽपरेाश्च प्रापं भाद्रणपल्लिकाम् ॥ ४५ ॥ (४५) इसलिए शीघ्रही मैं तीन खियोंको साथ लेकर दूसरे दिन प्रातःकालमें भाद्रण नामके गाँवमें पहुंची। अपश्यं योपितो नैकाः क्लेशार्ता भाद्रणे तथा। निर्भग्नमस्तकाः काश्चिद्भिन्नाङ्गब्यथिताः परा ॥ ४६॥ (४६) और भाद्रण नामके गाँवमें मैंने बहुत स्त्रियों को क्लेशसे दुःखी देखा । कईयोंके माथे टूटे हुए थे और कई अङ्गोंके टूट जानेके कारण दुःखीं थीं। पर्याटिपं प्रतिग्राम सह पल्या महात्मनः । पांसुदूपितमार्गेण गाढदुर्भिक्षशसिना ।। ४७॥ (४७) भयंकर दुर्भिक्षकी सूचना देनेवाले मिट्टीसे भरे रास्तेसे मैं महात्माजीकी पस्नीके साथ प्रत्येक गाँव में फिरती रही। प्रेक्षितं वोर्सदस्याथ चतुःशालं मया पथि। यत्र स्वधर्मतः प्रापुरचिरात्कीर्तिमङ्गनाः ॥४८॥ (५८) तब मैंने बोसंदके उस पाजारको देखा जहाँ स्त्रियोंने अपने धर्मके बलसे शीघही यशको प्राप्त किया था।

१०८ सत्याग्रहगीता विसऐपु निवासेपु ग्रामीणैस्त्यक्तकर्ममिः । न कोऽपि ददृशे तस्मिन् ग्रामे रक्षिजनादृते ॥४९॥ (१९) गाँवके निवासियोंने घरों और काम-धन्धोंको छोड़ देनेके कारण उस गाँवमें सिपाहियोंके शिवाय कोई नहीं दिखाई देता था। नातिदूरे स्थलादस्माद् ग्राममन्यं वयं गताः । निवेशं चक्रिरे यत्र त्यक्तगेहाः कुटुम्बिनः ॥५०॥ (५०) उस स्थानके निकटही हम एक दूसरे गाँवमें गई जहाँ घरवार छोड़े परिवारके साय गृहस्थी तम्बू लगाए निवास करते थे। सविस्तरं न आख्याता कथा शिविरवासिभिः । अत्याचारस्य गर्वस्य यथावृत्तं हि बोर्सदे ॥५१॥ (५१) हमें शिबिरनिवसियोंने बोर्सदके घृणित अत्याचारकी कहानी जैसी की तैसी विस्तारपूर्वक सुना दी। अल्पमात्रक्षता नार्यो वर्त्मनि प्रेक्षिता मया । प्रत्यायान्त्यः सरित्तीराज्जलपूर्णघटान्विताः ॥५२॥ (५२) जलसे भर घड़ोंको उठाए हुए थोडे घावोंवाली स्त्रियोंको मैंने नदी तटसे लौटते देखा। वयं ततोऽभ्यगच्छाम ग्राममन्यं वृहत्तरम् । यत्र नैका वसन्ति स्म योपितः क्षतविक्षताः ॥५३॥ (५३) वहाँसे हम एक दूसरे घडे गाँवको पहुँची जहाँ घावोंसे आहत बहुतसी स्त्रियाँ थीं। अहो मया महद् घोरं ग्रामेऽस्मिन्नवलोकितम् । यदपश्यमहं नारीमाङ्गेष्वपि हिंसिताः ॥५४॥ (५५) महो! उस गाँवमें हमने एक महा भयंकर बात यह देखी कि यहाँ खियां मर्माहों में भी आहत हुई थी।

सप्तदशोऽध्यायः १०९ उरसि महताः काश्चित्परावृत्तकराः पराः । इतराय क्षतोपस्था हन्त साक्षान्मयेक्षिताः ॥ ५५॥ (५५) हाय ! कई स्त्रियोंको शातियोंमें मारा गया था। कईयोंकि हाय उलटा दिए गए थे। कई योनिस्थानमें जख्मी थीं। ऐसा मुझे साक्षात देखनेमें आया। निश्चितामिः सुयोपिद्भिः पीडिताभिरपि स्वयम् । स्वागतं कृतमस्माकमादरेण तितिक्षुमिः ॥५६॥ (५६) उन सहनशील सुदृढ निश्चय बालियोंने स्वयं पीढित होने पर भी हमारा आदरके साय स्वागत किया। देशमक्ति विलोक्यासाममृतां च सहिष्णुताम् । योषितामृजुवत्तीनामभूमाकुलविस्मिताः ॥५७॥ (५७) इन सरल स्वभावशाली स्त्रियोंकी अद्भुत सहिष्णुता तथा देशमक्ति देखकर मैं विस्मित और व्याकुल हो गई। प्रस्थानाय नियुक्तावेदपि भूयो गमिप्यथ । इति पृष्टा मया नार्यः सोत्साहं मामवादिषुः॥५८॥ (५८) मैंने उन स्त्रियोंस पूछा कि 'यदि आपको प्रस्थानके लिए फिर नियुक्त किया जाय तो क्या आप जाएंगी?' इस पर उत्साहपूर्वक वे बोली- प्रस्थान यदि कार्य नः श्वोऽपि सज्जा वयं स्थिताः। सकृदेव हि नश्यन्ति न पुनर्द्विः शरीरिणः ॥५९॥ (५९) हमें यदि प्रस्थान करना हो तो हम कलही तय्यार हो जाएंगी। शरीरधारी एकही बार मरते हैं न कि दो बार। जातस्य चेद् ध्रुवो मृत्युर्देशकार्ये वरं मृतिः। जीवनं न तु दासस्य देशद्रोहविधायिनः ॥६०॥ (६०) यदि उत्पन्न हुए शरीरकी मृत्यु निश्चितही है वो मरना देशके कार्यके लिए प्रेयस्कर है। देशके साय द्रोह करनेवाले वासका जीना श्रेष्ठ नहीं है।

सत्याग्रहगीता निशम्य वचन तासाभद्भुतं विस्मिताऽभवम् । अत्यशेरत यस्मात्ता धैर्येण पुरुषानपि ।।६१॥ (६३) मैं उनके अद्भुत वचन सुनकर विस्मित हो गई थी। क्यों कि वे अपने धैर्यसे पुरुपोंको भी मात कर रही थी। उरोभागक्षतामेकामपृच्छमहमङ्गनाम् । ध्वजः किं न त्वया त्यक्तो रक्षितव्येऽपि चात्मनि ॥१२॥ (६२) हृदयस्थलमें आहत एक स्त्रीको मैंने पूछा कि 'अपनी रक्षा अवश्य करनी चाहिए यह समझती हुई भी तुमने झंडेका परित्याग क्यों नहीं किया था. सा च प्राह पताकेयं नासा ग्रामस्य कीर्तिता। कथं भद्रे त्येजयं तां स्वयं ग्रामनिवासिनी ॥ ६३॥ (६३) उसने कहा 'हे भद्र स्त्री! यह शडा गाँवकी नाक मानी जाती है। मैं स्वयं गाँवकी रहनवाली होकर इसे कैसे छोड़ सकती हूँ? देशभक्तिरपूर्वेय स्वार्थत्यागोद्भुतस्तथा । ग्राम्याणां सलु पूजाही न तज्ज्ञानं न तद्धनम् ॥ ६४ ॥ (६४) गाँवके लोगोकी अपूर्व देशभक्ति और अद्भुत स्वार्थ- त्याग ही पूजाके योग्य है न कि उनका धन और ज्ञान। स्वराज्यनिष्ठता तासां महोत्साहश्च योपिताम् । हेपयेत्सुबहून् पौरान कातरान् स्वार्थतत्परान् ॥६५॥ (६५) उन स्त्रियोंकी स्वराज्यमें श्रद्धा तथा महान् उत्साह पहुवसे स्वार्थपर एवं डरपोक नगर निवासियोंको लजित कर सकते है। ग्रामाद् ग्राममगच्छाम कृत्स्नेऽपि दिवसे वयम् । शृण्वत्यस्ता कथामेकां पश्यन्त्यश्वेतराः क्षताः॥ ६६ ॥ (६६) एक ही कयाको सुनती हुई और दूसरी आहत बियोको देखती हुई हम दिनभर एक गाँधमें पिरती रहीं।

अष्टादशोऽध्यायः अय चास्तमिते भानो न्यवर्तामहि माद्रणम् । अनुकम्पाकुलात्मानः शोचनीयविलोकनात् ॥ ६७॥ (६७) शोचनीय श्योंके देखने के कारण करणासे व्याकुल हम सूर्यके मस्त होने पर फिर भाद्रण गाँव में पहुंची। कृतो मया महान् यत्नः प्राप्तया नगरी पुनः। लोकान् ज्ञापयितुं वृत्तं दुःखदं स्वयमीक्षितम् ॥६८॥ (६८) नगरमें पहुंचकर अपने देखे हुए वृत्तान्तको लोगोंसे चतानेके लिए मैंने बहुत यल किया। अतिवृत्तमिदं सम्यग् विचार्यमिति याचितः । अनादृत्य प्रमाक्रन्दमुदासीनः स्थितोऽर्विणः ॥६९॥ (६९) "अर्विन ' (वायसराय) को प्रार्थना की गई कि इस वृत्तान्तको भली प्रकारसे सोचना चाहिए । पर उसने इस ओर ध्यान न दिया तथा उदासीन रहा। बलात्कारोऽपि सोढव्यः पृथिव्यामश्रुतोऽपि सन् । दासत्वग्रस्तदेशस्य क्षमाया नापरा गतिः ॥७॥ (७०) इस पृथिवी पर पहले कभी मुननेमें न आए हुए बलात्कारको भी सहारना चाहिए। दासत्वसे ग्रस्त देशके लिए क्षमाके सिवाय और कोई चारा नहीं है। अष्टादशोऽध्यायः सारं सत्यव्रतस्येदं तितिक्षा नाम निश्चला । स्वातन्त्र्यमनयैव स्यादिति श्रद्धा महात्मनः ।। १ ।। (1) महान्मामा यह विश्वास है कि दृढतापूर्वक सहारनेकी शक्ति ही सत्यव्रतका तत्त्व है। स्वतंत्रता इसीसे मिल सकती है।

११२ सत्याग्रहगीता अशक्यमपि सम्भाव्यमवाप्तुं दृढनिश्चयैः । चरितैनरवीराणां दृढीकृतमिदं पुरा ॥२॥ (२) पुरातन कालमें नर-वीरोंके चरित्रोंसे यह बात पक्की हो चुकी है कि कठिन काम भी दृढनिश्चयवालों द्वारा सिद्ध किया जा सकता है। दिवसैरथ गच्छनिर्विक्षोमे वृद्धिमागते । मुच्यन्तां बन्दिनो मुख्या इत्यासीद्राजशासनम् ॥३॥ (३) कई दिनों के बीतने पर जब हलचल वृद्धिको पहुँचा तो राजाने बन्दी किए हुए नेताओंको कैदसे मुक्त कर देनेके लिए भाज्ञा दी। निर्दिष्टेऽथ दिने गान्धिर्विजितात्मा व्यमुच्यत । बन्धनाद्वान्धवैरन्यैः सह म्लानैश्विरं बत ॥४॥ (४) निर्दिष्ट अर्थात् मुकररा दिन पर संयमशील गान्धी अपने चिरकालके दुर्बल शरीरवाले साथियोंके साथ कैदसे मुक्त कर दिए गए। . निशायाश्चरमे यामे दर्शनार्थं महात्मनः । मुम्बापुयाँ जनैर्मार्गः सङ्घलोऽभूत्सहस्रशः ॥५॥ (५) रातके अन्तिम प्रहरमें महारमा दर्शनके लिए आए हुए हजारों लोगोंसे बम्बईकी सड़क भर गई। खदागमप्रतीक्षेषु नागरेवर्धरात्रतः। 'प्रत्युपस्येव पुण्यात्मा पुण्यपुर्याः समागमत् ॥६॥ (६) नागरिकोंके श्राधी रातसे उनके आनेकी प्रतीक्षा करने पर प्रातःकालमें वे पुण्यारमा पुण्यपुरीसे भा पहुँचे। उद्गुणत्सु सहस्रपु जयघोष महात्मनः । स्मिताननः स आरूढो यन्त्रयानं कृताञ्जलिः॥७॥ (.) हजारों मनुष्यों के जयजयकारके नारे लगाने पर गादीमें बैठा हापापमोडे महारमा स रहा था।

अष्टादशोऽध्यायः दिवमवसम्पन्न स्वागत तन्महात्मनः। लोकपृयस्य मतीनृपतेरपि दुर्लभम् ।।८।। (८) टोगोंमें अथवा संपारमें माननीय पवित्र यसवाले टम महासाको जो स्वागत प्राप्त हुआ वह राजा के लिए भी दुलंम है। बहिरन्तय सङ्कीर्ण तस्यासीद्वासमन्दिरम् । जनाधर्नययोपेण नन्दग्निस्तं दिक्षुमिः ॥९॥ (९) टनके निवासम्यान अन्दर बाहर जयघोपमै टनका अभिनंदन करनेवाले दर्शनामिलापी जनोंमे मर गया। यदागच्छं महात्मानं द्रष्टामा तदालयम् । मणिमन्दिरनामानं दृष्टोऽमा प्युपासितः ॥१०॥ (1.) में बब टनके दर्शनकी इच्छाये मगिमन्दिर नामके घर पर पहुँची तो वे लोगों द्वारा घिरे हुए बैठे थे। वृत्तान्तवाहक कैश्चिन्नानाप्रश्नोचरप्सुमिः । चित्रकर्मोद्यतैश्चित्रं वर्णवद्भिर्महात्मनः॥१॥ (1) कई सन्देश लानेवालाप, कई अपने प्रश्नोंके टत्तरकी इच्य. वालोमे, वस्वीर दनानेमें उपरवालोंमे, तस्वीर वर्णन करनवालोंपे । विवियुवकस्तोमर्देशसेवापरायणः! दर्शनार्थं च संप्रातर्मवदन्त्यैः परःशतैः ।।१२॥ (१२) देशसेवापरायण नाना प्रकारके युवक झंडोंसे तया मेरे बैमे कई सैकडों दर्शन के लिए आर हुभोंसे- अद्भुतं तस्य माहात्म्यं शास्ति यत्किल मारतम् । विभूतिः कापि सा दिव्या न शक्तिः खलु मानुपी ॥१३॥ (३) टसन भारत पर शासन करनेवाला महत्त्व कुछ अद्भुत ही या । वह कोई दिन्य विभूती थी, मानुनी शक्ति नहीं थी। मात्त्विका ये गुणाः पूर्व कृष्णेनामिहिताः स्वयम् । ते सर्वे निवसन्त्यस्मिन्नवरे पुण्यकर्मणि ॥१४॥ (४) स्वयं कृगजीन जो पहले सात्त्विक गुग दगए ये वे सारे के सारे इस पुण्यम॑वाले अष्ट मनुष्यमें निवास करते थे।

११४ सम्याग्रहगीता निक्षिप्तं विधिना तेजस्तस्मिन् गान्धी महात्मनि । जन्मभूमि तमोग्रस्तां विद्योतयितुमात्मनः ।।१५।। (१५) विधाताने भनी अन्धकारमस्त जन्मभूमि प्रशगिन फरने के लिए उस गान्धीनामके महामामें (भरना)वेशनल दिया था। न परं भारतं यपं विदूरा अपि भूमयः । मासिताः सत्यदीपेन मालितेन महात्मना ।। १६ ।। (१६) महाग्मा द्वारा जप्टाए गए सम्यस्वरूपी दीपम्मे केवल भारवही मही प्रत्युत सुदूर देश भी प्रकाशित हो गए थे। लोकधर्मपरिग्लाने पधर्मस्य च क्षयात् । सञ्जातः सर्वतः क्षोभो लोकायासन विपद्गताः ॥१७॥ (७) लोकधर्म भर्याद प्रजाधर्मकी ग्लानि हो जाने पर व्या राजाके धर्मके क्षय हो जाने के कारण सपही जगह पर हलचल मच गई थी और कोग विपत्तिमें पड़ गए थे। तस्मादधर्मनाशाय प्रशान्तः स्थापनाय च । गान्धिरूपेण भगवानवतीर्णः किमु स्वयम् ॥१८॥ (१८) इसलिए अधर्मके माशके लिए और प्रगाव शान्तिको स्थापित करने के लिए मानो गान्धी रूपमेंही स्वयं भगवानने अवतार लिया था। सत्यं विजयता लोके मुक्तं भवतु भारतम्। नन्दन्तु सुखिनः सर्वे देशनाथ विदेशजाः ॥१९॥ इति क्षमायाः कृतिषु सत्याग्रहगीता समाप्ता । (१९) संसारमें सत्यकी विजय हो । भारत स्वतन्त्र हो । देशीय तथा विदेशीय सब लोग सुखी होकर प्रसन्न हो। -समाप्त-

Satyagrahgeeta

Author
Row,pandita Kshama
Title
Satyagrahgeeta
File name
Satyagrahgeeta
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,n.m.tripathi
Language
Sanskrit
Pages
112
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313065
Barcode
99999990321790.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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