University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
संस्कृत भाषा प्रथम पुस्तकम्
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Initial
श्रो३ ॥
संस्कृत-भाषा-प्रथमं पुस्तकम्।
परीक्षितगढ़ (ज़िम्मेरठ ) निवासि--स्वामि--
तुलसीराम-शर्म-विरचितम् ॥
निर्मात्रा तुलसीराम स्वामिना स्वप्रबन्धन स्वकीये
स्वामियन्त्रालये मुद्रितम् प्रकाशितञ्च ।।
मेरठ
संवत् १९५३ ता० २१-२-१७
इसकी रजिस्टरी कराई गई और किसीको
छापनेका अधिकार नहीं है ।
"ऋगादिभाष्यभूमिकेन्दूपरागे द्वितीयोऽशः"
ऐमा और सतना संक्षेपये अब तक कोई नहीं छया : शब्दप्रमाण
द्वारा “मन्त्रब्राह्मण दोनों वेद हैं वा क्या" : इत्यादिका निर्णय
७१ प्रमाणों से किया है। इसमें अथर्ववेद, तैत्तिरीय, शतपयत्रा०,
माख्य, आपस्तम्ब, प्रातिशाख्य, कात्यायन, बौधायन, परिशिष्ट,
मीमांसा, मनुस्मति, ऐतरेयब्रा०, अष्टाधान महाभाध्य, शौशिकस्य,
अमरकोश, लघुशब्देन्दुशेखर, निरुक्ताननेको माध्य, ऋग्वेद, यजुर्वेद,
वेदान्तमूत्र, न्यायदर्शन, तैत्तिरीयासक, पिङ्गलसूत्र, चरणव्यड़,
न्यायविस्तर इन २७ ग्रन्थों से बहुत से प्रमाण सङ्ग्रह करके ( मैंने
तुलसीराम स्वामीने बनाया )
भूमिका ॥ मैंने इस पुस्तकको इसलिये लिखा है कि भारतके ऋषि मह- र्षियोंने यद्यपि पुराने समयके अनुसार संस्कृतभाषाके उत्तम २ ग्रन्थ रचे, परन्तु समयके हेर फेरसे अाज कलके समयमें नई शिक्षाप्रणाली के शानदान सुगम प्रतीत नहीं होते। हां, पूर्ण परिश्रम करने पर तो पूर्ण फलदायक हैं, परन्तु जिस प्रकार आज कल छोटे २ विद्यार्थी "प्राइमर" पढ़ते २ ही परस्पर "अंगरेजी शब्द बोल २ कर प्रति- दिन उत्साहको बढ़ाते हैं, जब तक इसी प्रकार हमारी देववाणी की पुस्तके प्रचरित न की जाये तब तक देववाणीका जीर्णोद्धार दुर्घट है। द्वितीय कारण पुस्तक लिखनेका यह भी है कि आज कल प्रायः शिक्षित पुरुष संस्कृत में रुचि करते हैं परन्तु न तौ उनको कोई अध्यापक ही सुलभतासे मिलता न अब तक संस्कृतमें कोई ऐमी पुस्तक निर्मित हुई कि जिससे विना अध्यापकके स्वयम् कुछ सोख सकें। उनको ये पुस्तकें स्वयम् संस्कृत सिखावेंगी॥ पांच वारकी छपी ६००० प्रथम पुस्तकों के शीघ्र चुक जानेसे छठी थार छपी है इससे मैंने अपना श्रम सफल समझा। द्वितीय भाग ३ वार और तृतीय भाग दो वार छप चुके हैं। चतुर्थ भाग छप तुलसीराम स्वामी ज्ञापन ॥ हमारे यहांसे "वेद-1 नामक मासिक पत्र प्रतिमाम मनोहर वैदिक- सिद्धान्तों की व्याख्यासे विभूषित प्रकाशित होता है जिसके द्वारा वैदिकधर्मका गौरव देश देशान्तरमें प्रचरित होता है । वार्षिक मूल्य केवल १) मात्र ॥ तुलसीराम स्वामी-सम्पादक "वेदप्रकाश"-मेरठ । *" प्रोम संस्कृत-भाषा-प्रथमं पुस्तकम् ॥ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ल ए ऐ ओ औ अं अः* ॥ ध्यान क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ टठडण। त थ द ध न । पकव भ म । य र ल व। श ष स ह ॥ बारह अक्षरी है - - Copera क का कि की कु कू के के को को कं कः । इसी प्रकार, ख खा खि खी खु खू खे खे खो इत्यादि जानो। ज के नीचे चिन्दी लगानेसे ज़ होला है। ऐसे ही स क स इद म जानो ॥ कार । भर। अब । तब । जब । हम । तुम । वह । क्षेत्रल । पाटक । पू. जका । शोभन । संवत् । बैठक। शोभाराम । अपदेव । अंगरेज ॥ श्रायो।जा- ओ। बैठो। चलो । हहरो । साओ ॥ काम कर। जल भर । शव घर सा। तब मत पड़ना। जब हम जावेंगे । तुम कहां जाते हो। यह नहीं जाता। तुम केवल अठं रहले हो । अतालीसवां संवत् है। अपने पाठकसे पो !! संयुक्त अक्षर-उदाहरण सहित ।। न+त+ रत्र, यन्त्रालय छापखानेका नाम ।क+-क्र, कालचकका हेर फेर है। ज+य-ज्य, अंगरेजका राज्य है। स+तः-स्त, हमारी पुस्तक न+द-न्द, मन्दिर में बैठो । ण+=ष्ट, परिडतका कहना मानो। द-दह, यह रद्दी कागज है। द+य=द्य, र+य-ई, विद्यार्थी पढ़ते हैं। र+बर्ब, अर्थ मत करो। व+य-व्य, ख+य-ख्य, व्याख्यान सुनने को चलो। स+=स्क, ल- स्कर चोरका नाम है। ग+ग, यह छोटा ग्राम है। न+तन्त, सबका अन्त है। * यद्यपि स्वरोंमें अ इ उ ऋ ल हस्व, और पा ऊ ऋ ए ऐश्रो पौदीर्घ, तथा अ३ ३ उ३ ३ ३ ए३ ऐ३ ओ३ औ३ मत हैं इस कारण र स्वरोंको २२ भेद हैं तथा “अं, नः" ये दो स्वर नहीं किन्तु अ के साथ अनुस्वार और विसर्ग का स्वरूप है परन्तु सम्प्रति भाषामें ऐसा ही प्रचार होरहा है । मानो। । Prioneewwman......
(४) and-more । -- पर-म, प्रथम पुस्तक पढ़ो। द ऋ-दू, दृढका अर्थ मजबूत है। र -र्ग, क कान को कहते हैं। श व-श्व, शर-अ, द ध-दु, ईश्वरमें श्रद्धा करो। द व-द, यह द्वितीय पुस्तक है। त स-त्म, कुत्ला बुराई कहाती है। र ---, अर्थ हाथ धोनेकेलिये जल को कहते हैं । त ऋ-तु, तृतीय पुस्तक पढ़। म बम्ब, च छ-छ. कम्बल अच्छा है। पन-म, स व-स्व, स्वा देखता था। का , प --ण, कृष्ण बड़े योगी थे। म म -म्म, गुम्मट ऊंची है। त व-- त्व, त्वम् का अर्थ त है। क य-क्य, क्या करते हो। ष ठ-हु, षष्ठ छडेका, माथ है । कुष्ठ रोगका नाम है। ष ट-ट, दुष्ट बुरेको कहते हैं। ग ऋ-गु, गृह को जानो।त त-त, मत्त पागलको कहते हैं। श य-श्य, श्याम कम्बल है। बद-ब्द, शब्द सुनो । क तक्त, रक्त बहता है। स य-, पड़नेका अभ्या- स करो। म य-य, त य-त्य, आलस्य त्यागदो। ल द--लद, जल्दी मत करो। कम-कन, ङ क-डू, रुक्मका कडूण है । न द र-द्र, र य य-सूर्य, इन्द्र सूर्यको कहते हैं । स त र-स्त्र, शास्त्र के अनुसार चलो। र ध व-र्व, ग न-गन, अग्निशिखा सदा ऊर्ध्वगामिनी रहती है । कप-क्ष, क्षमा करो। ज अ-ज्ञ, ज्ञानसे सुख मिलता है ।। संख्या एक से सौ तक ॥ ११ ४१ ५१ ६१ ७१ ८१ ९१ । , । २ १२ ३२ ६२ ७२ ८२ ३ १३ ६३ ७३ २३ २४ १४ ७४ ८४ ५ १५ ३५ ६५ १५ ८५ m, ६ २६ १६ ७६ ६ ८६ २५ १७ ३७ ४७ ८७ २ ५७ H १८ ३८ ४८ ५९ ६ १८ १९ २ ९ ३० २० ३० ४० ५० ६० (५) । 10 मैं माता ment- प्रथमः पाठः १॥ सः-वह स्वम्-तू अहम्- तौ-वे दोनों . युवाम् तुम दोनों आदान-ग्र दोनों ते-वे ( सब) ययम्-तुम ( सत्र) वयम्-हम (सस) गम् ( ) (धातु)-जाना आगम (धातु) आना सः गच्छति-बह जाता है सः आगच्छति-वह प्राता है तो गच्छतः-वे दोनों जाते हैं तौ आगच्छतः-वे दोनों आते हैं ते गच्छन्ति-वे (सब) जाते हैं ले प्रागन्ति- वे (मा) पाते हैं त्वम् गच्छसि-तू जाता है त्वम् आगच्चसि-तू आता युवाम् गच्छयः-तुभ दोनों जाते हो युयाम् आगच्छथः-तुम दोनों प्राते हो ययम् गच्छथ -तुम (सब) जाते हो यवम् आगछदेव-तुम (सब) आले हो अहम् गळाभि में जाता हूं अहम् प्रागच्छा प्राकाम् गच्छावः- हम दोनों जाते हैं। आवाम् आगच्छावः-हम दोनों भात वयम गच्छामः-हम (सब) जाते हैं वयम् आगच्छामः-हम (सब) पाते हैं द्वितीयः पाठः २॥ ( नीचे लिखे वाक्योंका संस्कृत बनाओ) हम जाते हैं। वे जाते हैं। तुम जाते हो। वह पाला है। तू जाता है। हम दोनों आते हैं। तुम दोनों जाते हो। वे दोनों जाते हैं। देवदत्त भाता है। शोभाराम आता है । विष्णुदत्त आता है । तृतीयः पाठः ३॥ तिष्ठतिा-ठहरता है। पश्यति-देखता है। पठति-पढ़ता है। धावति-दौड़ता है। क्रीडति-खेलता है। लिखति-लिखता है। (नीचे लिखे वाक्योंका संस्कृत बनाओ) मैं ठहरता हूं। वे पढ़ते हैं। तुम खेलते हो। हम देखते हैं। यह दौड़ता लिखता है। वे दोनों पढ़ते हैं । तुम दोनों खेलते हो। हम दोनों *"सब” कहनेसे बहुवचन समझो अर्थात् दो से अधिकका अर्ध समायो। ति. सः, न्ति, सि, यः, थ, मि, विः, मः, ये नौ प्रत्यय लगाकर भी नौ २ रूप “गच्छति" आदि के समान बना लो।
(६ ) ----- or । घरको - लिखते हैं। ये दोनों जाते हैं । विष्णु मित्र लिखता है। यशदत पढ़ता है। शोभाराम खेलता है। चतुर्थः पाठः ४ ॥ गृह शब्दकी सात विभक्तियां- गृहम्- गृहात-घरसे ' दोनों घर Jain५. गृहाभ्याम्-दोनों घरोंसे " गृहाणि " (सम) घर गृहे (भब) घरोंसे गृहम्म गृहस्प-घरका, के, की। । दोनों घरोंको गृहयो:-दोनों घरोंका, के, की गृहाणि ।' (सब) घरों को यहाणा-(सब) घरोंका, के, की गृहण-घरसे, के साथ गृहे-घर में, पै, पर ३. गृहाभ्याम्-दोनों घोंसे, के साथ: गृहयो:-देन परोंसें, पे, पर गृहै: (सश) घरोंमे, के साथ "गृहे यु-(सब) घरों में, , पर (गृहाय--घर के लिये इसी प्रकार मन्दिर, पुस्तक, धन, ४ गृहाभ्याम्-दोनों घरोंके लिये बन, पुटर, फल, स्थान आदि शब्दोंकी (गझेभ्यः-(सब्ब) घरों के लिये विशक्तियां जाना॥ (संस्कृत बनाओ) तुम घरको जाले हो। हम मन्दिर भाते हैं। तुम घर भाते हो। यह घर केलिये दौड़ता है। वे पुस्तकको लिखते हैं। वह पुस्तक के साथ से. लता है। हम मन्दिर से जाते हैं। तुम मन्दिर में पढ़ते हो। जे दोनों पुस्तक को लिखते हैं । तुम दोनों घर केलिये दौड़ते हो ! हम ( सब ) मन्दिर भाले हैं। वे ( सय ) पुस्तकों को पढ़ते हैं। यह धन खेलता है। हम बनमें पुष्कों को देखते हैं। यज्ञदत फलों केलिये दौड़ता है। पवमः पाठः ५॥ मनहीं। सुष्टु -अच्छे । वरम् अच्छे। नितान्तस-बिल्कुल । त्वरया जल्दी ॥ सः न पठति वह नहीं पढ़ता । ते त्वरया धान्ति-जलदीसे दौड़ते हैं। यूयम् गा पठय-तुम (सब) अच्छे पढ़ते हो । ययम् नितान्तम् न कोडामः-- हम हिश्शुरन नहीं खेलते । सः स्वरया पठति वह जल्दीसे पढ़ता है। ते घरम् लिखन्तिःचे अछे लिखते हैं । यूयम् त्वरया गच्छथ-तुम जल्दीसे जाले भी वयम् त्वरया न धावामा हम जल्दीसे नहीं दो सुम दोनों घर में नहीं पढ़ते॥ -- (७) aurane.. Matherane marathi-40-1lkarninguitman षष्ठः पाठः६ पुल्लिङ्ग ) कौन । का-(स्त्रीलिङ्ग) कौन । किम् (नपुंसक) क्या। अस्ति है । भवति-है। ददाति देता है, देती है। कः गच्छति कौन जाता है। का गच्छति कौन आती है । विष्णु भित्रः किम् ददाति-विष्णु मित्र क्या देता है। सः कः अस्तिः-वह कौन है। यशोदा का भवति-पशोदा कौन है । त्वम् कः--त कौन ॥ (नीचे लिखे वाक्यों का संस्कृत बनाओ.) विष्णु शर्मा क्या पड़ता है। रुक्मिणी क्या देती है। मैं क्या पढ़ता हूं । तुम क्या लिखते हो। यह कौन दौड़ता है । मैं क्या लिखता हूं। कौन नहीं पढ़ता। घरसे कौन आता है। मन्दिर में कौन पढ़ना है। घर में कौन दौ- इता है। कोन अच्छा लिखता है । कीन नहीं लिखता । कौन घरसे नहीं आता । धर्मदत्त क्या पढ़ता है। धिभिन्न क्या लिखता है ॥ । । सप्तमः पाठः॥ हूं --कहां । तत्रजहां। वहां । जंत्र-वहां । उपरिः । नौ नीचे तत्र कः पठति--यहां कौन पढ़ता है। अन्ज अहम् लिखामि--यहां मैं लिखता । बागचन्द्रः उ परि गच्छति--कृष्ण चन्द्र ऊपर जाता है। ब्रहम् नौः न पठा- मि-मैं नीचे नहीं पड़ता। सः अपरि हिम् पठति--बष्ट अपर क्या पढ़ता है। (नीचे लिखे वाक्योंका संस्कृत बनाओ) वह नीचे नहीं जाता। तुम बहू क्या पढ़ती हो। हम यहां नहीं आते। वे नीचे जाते हैं। ऊपर कौन है ( राज) वहां क्या लिखते । मैं यहां बिल्कुल नहीं आता। वहां कौन नहीं पड़ता। ऊपर कौन खेलता है। हम नीचे नहीं जाते। तुम घरमें क्या पढ़ते हो ।वे वहां नहीं खेलते । हम ऊपर पढ़ते हैं। वे (सब) वहां मन्दिर में क्या पढ़ते हैं। हम ( सन ) घरको नहीं जाते। तुम दोनों नीचे क्या पड़ते हो । अष्टमः पाठ ८॥ दूरम्-दूर । च=और । तदनु-उसके बाद । एवम् ऐसा । एषः (पुंलिङ्ग) यह । एषा=(स्त्रीलिङ्ग) यह । एतत् ( नपुंसक ) यह । “यो (पु० ) जो। या=(स्त्री०) जो। यत्-(नपुं०) जो । यथा जैसे । तथा वैसे। सा-(स्त्री) वह । ततः (नपुंसक ) वह ॥
(८) ते दूरम् गच्छन्ति-बे जाते हैं । एषा का अस्ति-यह (स्त्री) कौम है। या गच्छति माँ पठति--जो जाती है वह पढ़ती है । एषः यथा पठति तथा लिखति--यह जैसे पढ़ता है, वैसे लिखता है । वयम् तदनु गच्छामः-हम (सब) उसके बाद जाते हैं । सः यूयम् च कुत्र गच्छथ-वह और तुम कहां जाते हो। यूयम् वयम् च तत्र न पठामः-तुम ( सब) और हम (सब) वहां नहीं पढ़ते। अहम् युवाम् च न क्रीडामः-मैं और तुम दोनों नहीं खेलते। अत्र तत्र घ वयम् एतत् न पढामः-यहां और वहां हम यह नहीं पढ़ते ॥ (नीचे लिखे वाक्योंका संस्कृत बनाओ) वे और तुम (सब) कहां जाते हो। हम दोनों और तुम दोनों ऐसे नहीं पढ़ते जैसे यह पढ़ता है। वह जो (नपुंसक) पढ़ता है सो नहीं लिखता। विष्णु- मित्र कहां जाता है और उसके बाद क्या पढ़ता है। हम दूर नहीं जाते । नवमः पाठः। । -मेरा, मेरी, तव-तेरा, तेरी। तस्य-उसका, के, की। अस्माकम-हमारा, रे, री। युष्माकम-तुम्हारा, रे, री। तेषाम्--उनका, के, की । यस्य- जिस का, के, की। येषाम्-जिनका, के, की ॥ पुस्तकम्-पोथी। लेखनी--कलम। वस्त्रम्--कपड़ा। मसीपात्रम्--दायात । पत्रम्--कागज । उपानत--जसा । उपवस्त्रम्--रुमाल । पाषाणपट्टिका-स्लेट ॥ मम पुस्तकम-मेरी पोथी। तब वस्त्रम्-तेरा कपड़ा । तस्य लेखनी-उसका कलम। तेषाम् पुस्तकम्-उनका पुस्तक । येषाम् पुस्तकम्-जिनका पुस्तक । मम उपानत् कुत्र अस्ति-मेराजूता कहां है। तब मसीपात्रम् कुत्र अस्ति-तेरी दायात कहां है। सः मम पुस्तकम् न ददाति-वह मेरी पोथी नहीं देता। वि- ष्णु मित्रः तेषाम् गृहं गच्छति-विष्णु मित्र उनके घरको जाता है। एतत् युष्मा- कम् उपवस्त्रम् अस्ति-यह तुम्हारा रुमाल है। एतत् कस्य अस्ति ?--यह किसका है? । मम पापाणपहिका-मेरी स्लेट ॥ (नीचे लिखे वाक्यों का संस्कृत बनाओ) यह मेरी दावात नहीं देता। तुम ( सब ) मेरा पुस्तक पढ़ते हो। मैं तुम्हारा पुस्तक नहीं पढ़ता । वे सब हमारे घरको जाते हैं । मेरा जता कहां है। यह ( नपुंसक ) तुम्हारा पुस्तक है। तुम्हारी स्लेट घर में है ॥ - १९९ (*) rolhapur माम - । युष्मान दशमः पाठः १० ॥ माम्-मुझको । त्याम्-तुझको । तम्-उसको। प्राधाम्- हम दोनोंको । युवाम्-तुम दोनोंको। तौ-(पु०) उन दोनोंको। अस्मान्- हम (सों) को। युष्मान-तुम (सबों) को । तान्-(पु०) उन (सबों) को । मारयति--मारता है। क्रोइयति--खेलाता है । भलै यति--घुड़कता है। भोजयति-खिलाता है। हारूय- ति-हंसाता है । पाठयति-पढ़ाता है । जानाति--जानता है । जानीतः- धे दोनों जानते हैं। जानन्ति-वे (सब) आतते हैं। सः माम् मारयति-वह मुझको मारता है। तो मां आनीतः-वे दोनों मुक को जानते हैं । सः अस्मान् जानाति--वह हम (मबों) को जानता है। नन्दकि- शोरः माम् क्रीडयति नन्दकिशोर मुझको खेलाता है। विष्णुशर्मा अस्मान हास- यति-विष्णुशर्मा हम (सबों) को हंसाता है। प्रियदर्शनः आवाम् भोजयति-प्रिय- दर्शन हम दोनोंको खिलाता है । गम्भुशर्मा अस्मानासयति-शम् शर्मा हम (सब) को घुड़कता है। अहम् त्वाम् पाटयामि--मैं तुझको पढ़ाता हूं। प्राधाम युवाम् भोजयावः--हम दोनों तुम दोनोंको खिलातेहैं । ते आनन्ति के (सय) तुम (सबों) को जानते हैं । तो त्वाम् मारयतः--वे दोनों तुझको मारते हैं। अहम् तम् पाठयामि--मैं उम (पु०) को पढ़ाता हूं। त्वम् तौ (6) मत्संसि-तू उन दोनोंको घुड़कता है। सः तान् (पु०) क्रीडयति-वह उन सयों को खेलाता है। नीचे लिखे वाक्यों का संस्कृत बनाओ) .... वे सब) मुझको मारते हैं। हम (सब) उसको जानते हैं। मैं उसको नहीं मानता हूं। मैं तुझको नहीं जानता। तू मुझको जानता है । एकादशः पाठः ११॥ एकादश: मया-मैंने। त्वया-तूने। तेन-उसने । मायाभ्याम्-हम दोनोंने । युवाम्याम्-तुम दोनोंने । ताभ्याम्-उन दोनोंने । अस्माभिः-हम (सबों) ने। युष्माभिः-तुम (सबों) ने। तैः-उन (सबों) ने। कृतम्-(नपुंसक) किया। पठितम्- (नपुंसक) पढ़लिया । भुक्तम् (नपुंसक) खालिया। भारितः-( पुरुष ) मारा। पाठितः-( पुरुष ) पढ़ाया। अलङ्कृतम्-( नपुंसक ) सजायदिया। स्थानम- मकान ॥ मया भुक्तम्-मैंने खालिया । त्वया स्थानम् अलङ्कृतम-तूने मकाने सजाय दिया। मया धर्मदत्तः पाठितः-मैंने धर्मदत्त पढ़ाया । सेन अहं मारि- तः उसने मुझे मारा। मया सः मारितः-मैंने उसे मारा ॥ । - namastanistr. AtARLAnirus-in- Maraturmerent mmupriymarwanamusamirarammarmawokemoompanioration (१०) (नाचे लिखे वाक्योंका संस्कृत बनाओ) हम ( सबों ) ने पढ़ लिया । तुम.( मयों ) ने नहीं पढ़ा। उन दोनोंने अच्छा पढ़ा। हम दोनों ने स्थान सजाय दिया। उसने बिलकुल नहीं पढ़ा । उन दोनोंने मकान सजाय दिया। हम (रुयों) ने नहीं पड़ा। भुक्ता-खाय ली। मारितामारी, पीटी। पाउिता-पढ़ा दी । अलङ्कृता-- सजाय दी ॥ मया पाठशाला अलङ्कृता-मैंने पाठशाला सजाय दी । तेन यशोदा पाठिता--उसने यशोदा पढ़ा दी। युवाभ्याम् यशोदा मारिता-तुम दोनोंने यशोदा मारी, पीदी । ( नीचे लिखे वाक्यों का संस्कृत बनाओ) उसने सुभद्रा पढ़ाई । यह उसमे पढ़ाई है। मैंने यह (स्त्री) नहीं पीटी । यह ( स्त्री ) क्या देती है। तुम कहाँ जाते हो । द्वादशः पाठः १२० किं त्वया देवनागरीपाठशाला दृष्टा-क्या तूने देवनागरी पाठशाला देखी. दृष्टा-देखी । तत्र कति छात्राः पठन्ति-वहां कितने विद्यार्थी पड़ते हैं। सपा दशतम्-सबासौ।तत्र कीदृशी पाठनव्यवस्थास्सि--वहां कैसी पढ़ाने की रीत्ति है। किं कथयामि अत्युत्तमाऽस्ति- क्या कहूं अत्युत्तम है । छात्राणां भोजनादि- प्रबन्धस्य का व्यवस्थास्ति-विद्यार्थियोंके भोजनादि प्रबन्धकी क्या व्यवस्था है। बासाथै छात्रालयो वर्त्तते भोजनादिप्रबन्धोऽपि देवनागरीप्रचारिण्याः सभायाः सकाशात् सञ्जायते--रहनेको छात्रालय (बोर्डिङ्गहौस) है, और भोजनादि प्र- बन्ध भी देवनागरीप्रचारिणी सभाको पोरसे हो जाता है। परन्तु केवलं संस्कृ- ताध्येतृणामेवैष नियमः प्रायो दृश्यते-परन्तु केवल संस्कृत पढ़ने वालों का हो यह नियम प्राय. देखा जाता है। सत्र गत्वा तावत् भवता किं कृतम् ?-वहां जाकर पहिले आपने क्या किया ? तावत् छात्राणां पाठः श्रुतः-पहिले वि- द्यार्थियोंका पाठ सुना। तदनु योन्यतानुसारतः पारितोषिकं दत्तम्-उसके बाद योग्यतानुसार इनाम दिया । त्रयोदशः पाठः १३ ॥ हरिवर्षस्थं प्रति पातालस्थ उवाच । हरिवर्षस्य । (इंग्लिशमैनसे पातालस्थ ( अमेरिकन् ) बोला।
क ty ( १९) - प्रिय मित्र ! इदानीमार्यावर्त कस्य राज्यमस्ति ?=प्यारे मित्र ! आज कल पार्यावर्त (हिन्दुस्तान) में किसका राज्य है ? । महाराज्याः महारागीका । तत्र किमपि “कण्टकादि,, तु नास्ति: वहां कुछ “झगड़ा बखेडा,, तो नहीं है ? । नहि नहि निष्कण्टकराज्यं वर्तते नहीं २ निष्कण्टक राज्य वर्त रहा है। इदानी भवान् कुत प्रायाति.=अब पाप कहांसे पाते हैं ? । गान्धारतः कन्धारसे। तत्र कस्य राज्यमस्ति : वहां किसका राज्य है । तत्रापि महाराध्याः =वहां भी महाराणीका। अहो ! अत्यानन्दम् अहो ! बड़े श्रानन्द की आत है। चतुर्दशः पाठः १४॥ (चिट्ठी लिखनेकी रीति) महाशय। अयं ममात्मज उत्तमचन्द्रनामा संस्कृतविद्याध्ययनार्थ मया प्रेपितः सन् आगच्छति तन्ममोपरि महती कृपां कृत्वाऽ- ध्यापनीयोऽयम् । अलं विद्वत्सु ॥ १ आपाढशुक्ला १३ भवता कृपाकाक्षी सं०४४ रविः चन्द्रदत्तः यह मेरा पुत्र उत्तमचन्द्र नाम संस्कृत विद्या पढ़ने के लिये मेरा भेजा हुआ पाता है सो मेरे ऊपर बही कृपा करके इसे पढ़ाइये विद्वानों के लिये अधिक क्या लिखू ॥ इति तुलसीराम स्वामिकृतं प्रथमं पुस्तकम् ॥ . :XX:- --News sh -- ये पुस्तक स्वामियन्त्रालय मेरठ से मिलेंगे। *तोप बन्दूक का आविष्कार) ) लघुकौमुदी भाषाटीका सहित २) सुश्रुत मूल १) न्यायदर्शनवात्स्यायन भाष्य सहित १) भर्तृहरिशतक तीनों भाषा- टीकासहित ।)॥ दशोपनिषद् बड़े मूल मोटाअक्षर काशी के छपे १) सीताच- रित्र नावल (मधमभाग हिन्दीभाषा ) ) पं० गुरुदत्त एम० ए० का ईशोपनि- पद्भाष्य ।) कात्य या पूर्वार्थ ॥) वेश्यानाटक !) आर्यसमाजके नियम मोटे अक्षर पुष्ट काग़ज़ पर ।) सेंकड़ा, २॥) हज़ार । सामान्य कागज़ पर सेंक- डा, २) हज़ार । व्याख्यानका विज्ञापन =) सेंकड़ा १२) हज़ार वेदप्रकाश मासिकपत्र मूल्य १) धार्षिक दमयन्तीस्वयंवरनाटक ३) धर्मप्रचार )॥ वायुमण्डल ) हार- मोनियमगाइड 14) वैदिकट्रैक्ट अंग्रेजी १ नं० )। २ नं० )। ३नं० )॥ सत्यदर्पण =) ज्योतिषदर्शन) व्याख्यानसागर ॥) योगानुमार सन्ध्याविधि =) बालोपकारो शिक्षा =) दान करण विधि =) पदार्थविद्या ॥) सभाप्रसन्न ।) स्वामीजी का चित्र ( रङ्गीन ) -)॥ ० गुरुदत्त का चित्र ( रङ्गीन) -)॥ सादेचित्र दोनों प्रत्येक -) खेतीकी विद्याके मुख्य सिद्धान्त ॥८) रामायणका आरह खण्ड )। विना गुरुके संस्कृत व्याकरणमें प्रवेश और संस्कृत बोलने लिखनेका सामान्य बोध कराने वाली-संस्कृतभाषा प्रथम पुस्तक )॥ द्वितीय -) तृतीय पु० =)॥ चतुर्थ छपरहा है। चाणक्यनीतिसार भाषा टोकामा )। प्रश्नोत्तररत्न माला भाषाटीका सहित इगो में आर्यविवाहमङ्गलाष्टक -) आर्य वर्षटपञ्जरी ) भजनेन्दु -) महन्त अल्ल फुशल के उत्तरमें-ऋगादि भाष्य० उपराग प्रथम -)॥ द्वितीय - शास्त्रार्थकिराणा ) अक्षरप्रदीप (बालकोंको) १) में १०० एकप्रति ) नालिकाविष्कार ॥ अर्थात् तोप बन्दूल बारुद (शतघ्नी भु गुण्डी अग्निवरी) का आविष्कार ( ईजाद ) प्राचीन आर्यावर्त में ही ऋषि मुनियोंने किया था और "इसको जुद मन के मांगधरथोलडम शबाटरनने सन् १३२० में अयते प्रथम आविष्कृत किया,, यह विचार तब तक ही है जब तक इस पुस्तक द्वारा मर्वसाधारण ने शुक्रनीति, नीतिप्रकाशिका और महाभारत तथा डाक्टर गस्टैनोपर्ट, बेकन माहयके “ विमोसोट्यम् आफ थिंगज़ " मेजर जेनेरल वाईल आदि के प्रमाणोंसे विभूषित इस पुस्तकको नहीं देखा है। मूल्य )। पता-पं० तुलसीरामस्थामी-सम्पादक वेदप्रकाश मेरठ 美美身爱隻要爱爱美雲要變美婆婆!要美美美 105 EXI CARNI प्रो३म् COM संस्कृत-भाषा-द्वितीयं पुस्तकम् ॥ ANAS परीक्षितगढ़ ( जिला मेरट) निवासि- IMRA स्वामि-तुलसीराम-शर्मणा विरचितम् प्रकाशित हाला इटावामगरे सरस्वती यन्त्राग ये-तुम्ममौराम स्वामिनः C I 301 IMA प्रयत्येन मुद्रितम् ॥ M AN भंवत् १९५३ । १२ । ४ । ९६ इम की रजिस्टरी कराई गई किसी को छापने का अधिकार नहीं है। INES तृतीयवार १००० प्रति] [मन्य -)। wwmonium- Part mummm भूमिका ॥ जिस उद्देश्य से मैंने यह पुस्तक बनाया था वह उद्देश्य सफल होते देख कर (जो कि गुणा ग्राहकां गे ५०२० प्रथम ३००० द्वितीय तथा २५०० तृतीय पुरन के हाथों हाथ ले ली ) मुझे उत्साह होता है कि अब की बार इस द्वितीय पुस्तक में करछ और आवश्यक संशोधन करके अत्यन्त शुद्ध छपाऊ सो धुम बार शुद्ध छ- पने का विशेष उद्योग किया है उतने पर भी यदि मेरी समझ को भूल वा छापे की अशुद्धि कोई पाई जावे तो पाठकगगा क्षमापूर्वक शुद्ध कर के मुझे भूचना दें जिस से अगले मुद्रण में वह न्यूनता न रहे और मैं उन का कृतज्ञ होऊ इति ॥ ० ० सं० १९५३ ] तुलसौगाम स्वामी पवित्र यज्ञोपवीत कार्यालय॥ उत्तम शुद्ध बने बनाये न मिलने से माहुतां को कष्ट उठाना पड़ता है, भद्दे मिलते हैं, अशुद्ध, विधिविरुद्ध भूत्र घार गा करगे पढ़ने हैं क्योंकि कोई कार्यालय ऐसा नहीं जहां शास्त्रोक्त विधि से शुद्ध पूर्वक विश्वास्य यज्ञोपवीत बनते हो । इसी अभाव के दूर करने को उपरोक्त कार्यालय में शुद्ध ब्राह्मगा जो कम से कम माध्यामात्र करते हागे पूरना, बदना, ग्रन्थि लगाना आदि सब काम उन्हीं से कराये जायगे । (घीम २० का नाम कोडी है) उत्तम रेशम के यज्ञोपवीत ५) कोड़ी महाराजों लायक । दूसरे दर्जा रेशम का ३) कोड़ी। भूत के दर्जा प्रथम १) कोड़ी धार्थ बांटने वालों को दर्जा दूमस ॥) कोठी । अर्ध मोस्न, विशेष लेने वालों दर्जा तीसरा ॥) कोही j को कमीशन भी दिया जायगा पत्र व्यव- हार करो पसन्द म आवे वापिस कर दो केवल हाक व्यय का टोटा ग्राहक की होगा । अअश्य देखिये ॥ छुट्टनलाल स्वामी परीक्षितगढ़, जि० मेरठ M [३] ओ३म् संस्कृत-भाषा-द्वितीयं पुस्तकम् ॥ कर्ता मैं गया हूं प्रथमः पाठः १॥ (गम धातु के भूत भविष्यत् वर्नमान और विधि काल के रूप) भूतक्रिया की भविष्यक्रिया अगच्छवह गया है गमिष्यति-यह जायगा तो अगच्छताम-घे दोनों गये हैं गमिष्यतःधे दोनों आयंगे अगच्छन्-घे मय गये हैं ते गमिष्यन्ति-वे मग सायंगे स्वम् अगन्छः=तू गया है स्वम् गमिष्यसि तू जायगा युवाम् अगच्छतम् = तुम दोनों गये हो युवाम् गमिष्यथ: तुम दोनों जाओगे यूयम् अगच्छत--तुम मच गये हो यूयम् गमिष्यथ तुम मय जाओगे अहम् अगच्छम् अहम् गमिष्यामि मैं जाऊंगा आवाम् अगच्छाव हम दोनों गये आवाम् गमिष्याव: हम दोनों जायंगे वयम् अगच्छामः हम सब गये हैं वयम् गमिष्यामः-हम सब जायंगे द्वितीयः पाठः २ ॥ कर्ता वर्तमानक्रिया की विधिक्रिया गल्लति-वह जाता है गन्छनु, गच्छतात्-वह नावे सौ गच्छतः वे दोनों जाते हैं ती गञ्छताम्-वे दोनों जायें ते गच्छन्ति वे सब जाते हैं गच्छन्तु-वे सब जाते त्वम् गच्छमि-तू जाता है *त्वं गच्छ, गच्छात-तू जा युवाम् गच्छथः तुम दोनों जाते हो युवां गनम तुम दोनों जाओ यूगम् गच्छथ-तुम सब जाते हो ययं गच्छन:-तुम सब जाओ अहम् गच्छामि=मैं जाता हूं अहम् गच्छानिः-मैं जाऊं मायाम् गच्छावः हम दोनों जाते हैं प्रावां गद्धाव-६१ दोनों जावं वयम् गच्छामः हम सब जाते हैं वयं गन्दाम हम सब जानें - ते .. * “स्वम्" इत्यादि में म्' को () . अनुस्वार रहता है जब कि व्यञ्ज. न परे हो। Amstarmoma. नमक Puram- [४] जिस प्रकार गम (जाना) धातु के रूप हुये इसी प्रकार प्रागम (भाना) धातु के भी जानने चाहिये केवल गम के पूर्व “प्रालगाने से बनते हैं जैसे:- आगच्छति--माता == माता है । आगच्छत् आया है। प्रागमिष्यति-प्रावेगा। भा. गच्छमात्र । D का तृतीयः पाठः ३॥ कृत्वा करके । भुक्त्वाखा के । गत्वासा के । मत्वामान के श्रुत्वा सुन के । मेलित्वा, मिलित्वा मिल के । आगत्यमा के । प्रणस्य-प्रणाम करके। पृष्ठा-पूंछ के । भादायले कर । दत्या=दे कर । किं विष्णु मित्रः गृहं गमिष्यति ? या विष्णु मित्र घर को जायगा ? । किं स्वं मन्दिरात भागनिष्यसि ?= रूपा तू मन्दिर से प्रावे गा ? । अहं मन्दिगत् म आगमिष्यामि मैं मन्दिर से नहीं पाऊगा । किं तो मां पृष्ठा गमिष्यतः क्या वे दोनों मुफ को पूंछ के जायंगे ? । नोनहीं । ते पुस्तकं दत्वा गमिष्यय- न्ति=वे सब पुस्तक को देकर जायंगे । अहं पाठं श्रुत्या भागमिष्यामि=मैं पाठ । सुन के प्राऊंगा । किं युवां पठित्वा न गमिष्यथ:=पा तुम दोनों पढ़ के नहीं जानोगे ?महाशय ! प्रावां पटिस्या एव गमिष्यावः=महाशय ! हम दोनों पढ़ के हो जायंगे । मया गत्वा भुक्तम्-मैंने जा के खालिया । किं सः भुक्त्या गमिष्यति=क्या वह खा के जायगा ? । यूयं कदा गमिष्यथ तुम सब कब जाओगे। विष्णु मित्रः पुस्तकम् मादाय अगच्छन् विष्णु मित्र पुरलक को लेकर गया ते मम पुस्तकम् आदाय अगच्छन्-वे मब मेरी पुस्तक को लेकर गये हैं। ती भाष यो: पाषाणापट्टिकाम् श्रादाय अगच्छताम् वे दोनों हम दं ना की मलेट को ले कर गये हैं । अहं भुक्ता अगच्छम्-मैं खा कर गया हूं। त्वं पठित्या अगच्छः== तू पढ़ के गया है । युवां मिलित्वा अगच्छत्तम्-तुम दोनों मिल के गये हो । वयं मिलित्वा न अगच्छाम-दम मन मिल के नहीं गये हैं । यूयम् भाययो: उप. वस्त्रम् आदाय अगच्छत-तुम मब हम दोनों के रूमाल को लेकर गये हो । वयं युषयोः उपवस्त्रम् आदाय न अगच्छाम हम सब तुम दोगों का रुमाल लेकर नहीं गये हैं। त्वं श्रुत्वा पागच्छ-तू सुन के प्रा । अहं पठित्वा गच्छानि=मैं पढ़ के जाऊ ।। स मम वस्त्राणि मादाय गच्छतु वह मेरे कपड़े लेकर जावे। युवा a + सः के आगे जो (:) विसर्ग है वह व्यञ्जन परे हो तो लुप्त कर दिया जाता है।
HamarpaRRE aanavigen-Imamarpay- [५] पठित्वा गच्छतम्-तुम दोनों पढ़ के लाओ । श्राबां न गच्छाव-हम दोनों न आर्वे । सौ श्रुत्वा न श्रागच्छताम् वे दोनों सुन के न पावें । ते गच्छन्तु -वे मब जावें । यूयं न गलत-तुम सब मत आयो । वयं न गच्छाम हम सब न जायें । यूयं मम उपानहम् प्रादाय न गच्छत-तुम मा मेरा जूता लेकर मत जाप्रो । त्वं तत्र न गच्छनास-तू वहां मत जा । वयं पठित्वा न गच्छाम-हम मन पढ़ के न जायें। यदा श्रहं गमिष्यामि तदा त्वम् प्रागमिष्यसि जब मैं जा- ऊंगा तब तू आवेगा ॥ चतुर्थः पाठः ४ ॥ (नीचे लिखे वाक्यों का संस्कृत बनामो) वह वहां न जावे । तुम यहां मत प्रामो। हम वहां जायंगे। तुम यहां प्रारोगे । वे दोनों वहां न जावें । तुम दोनों वहां जानोगे । हम वहां नहीं जायंगे। यहां प्रायो। वहां मत जानो। हम सब वहां गये हैं । तुम दोनों यहां नहीं पाये हो । वे वहां गये हैं। तुम सब वहां नहीं गये हो । तुम सब पढ़ कर जाओ। हम दोनों मिल के जायंगे । तुम मब खाके जाश्रो। तुम सब मेरी पुस्तक लेकर मत जाओ । हम दोनों तुम दोनों की स्लेट लेकर जांयगे। पया तुम व्यास्यान को सुन के नहीं पाओगे ? ॥ (संस्कृत में भाषा बनाओ) अहं पठित्वा गमिष्यामि । त्वं मम वस्त्रम् आदाय गच्छ- तात् । मम कथनं श्रुत्वा आगच्छ । अहं पुस्तकम् आदाय अग- च्छम् । यूयं कुत्र गत्वा आगच्छत। किं स गृहात् न आगमिष्यति ? अहं वेदं श्रुत्वा गमिष्यामि । स तत्र किं कृत्वा अगच्छत् । किं युवां मम पुस्तके भादाय अगञ्छतम् ? । किं स मन्दिरात् आग- मिष्यति ? । वयं तत्र न अगच्छाम । किं स उपरि अगच्छत् । भावां नीचैः न अगच्छाव । किं स न पठति । अहं तत्र गत्वा न पठिष्यामि । स गच्छतु तत्र ॥
mmmmmmmmmunpan. Pommastaliancome [६] A पञ्चमः पाठः ५॥ (स्था-ठहरना) की, भतकालिक क्रिया फती, वर्तमानकालिक क्रिया प्रतिष्ठत्वह ठहरा है तिष्ठति-बह ठहरता ती अतिष्ठताम्-वे दोनों ठहरे हैं तो तिष्ठतः वे २* ठहरते हैं ते अतिष्ठन् वे सब ठहरे हैं ते तिष्टंन्ति-वे ३ ठहरते हैं त्वम् प्रतिष्ठः तू ठहरा है तिष्ठसि तू ठहरता है युवाम् प्रतिष्ठतम्-तुम दोनों ठहरे हे। युवां तिष्ठथः तुम २ ठहरते हो यूयम् अतिष्ठत-तुम सब ठहरे हो यूयं तिष्ठय=तुम ३ ठहरते हो अहम् प्रतिष्ठम्=मैं ठहरा हूं प्रह तिष्ठामि=मैं ठहरता श्रावाम् अतिष्ठाव हम सब ठहरे हैं मावां तिष्ठावः हम २ ठहरते অষ प्रतिष्ठाम हम सघ ठहरे हैं वयं सिष्ठाम:-हम ३ ठहरते हैं कर्ती, भविष्यत्कालिकक्रिया कता विधिक्रिया स्थास्यति-वह ठहरेगा तिष्ठतु, तिष्ठतास-बह ठहरे ती स्थास्यतः-२ ठहरेंगे सिष्ठताम्ये २ ठहरें स्थास्यन्ति= ३ टहरेंगे ते तिष्टन्तु-घे ३ ठहरें स्थास्यसि-तू ठहरेगा स्वम् तिष्ठ, तिष्ठतात्-तू ठहर युवा स्थास्यथः तुम २ ठहरोगे युवाम् तिष्ठतम्-तुम २ ठहरो स्थास्यथ-तुम ३ ठहरोगे यूयम् तिष्ठत-तुम ३ ठहरो अहं स्थास्यागि=मैं ठहरूंगा अहम् तिष्ठानि-मैं ठहरू प्रावां स्थास्याष:-हम ठहरगे श्रावाम् तिष्ठाव-हम २ ठहरें वयं स्थास्यामः-हम ३ ठहरेंगे ययम् तिष्ठाम हम ३ ठहरें यूयं षष्ठः पाठः ॥ सा सत्र न तिष्ठति वह वहां नहीं ठहरता । अहम् कुत्र सिष्ठानि-मैं कहां ठहरु । यूयम् सत्र न तिष्ठत-तुम ३ वहां मत ठहरो । ते गृहे तिष्ठन्ति=वे ३ घर में ठहरते हैं । वयम् उपरि स्थास्यामः हम ३ ऊपर ठहरेंगे। किं यूयम् * २ अङ्क से द्विवचन ३ अङ्क से बहुवचन समझना चाहिये ।
[७] : स्थास्यथ ? क्या तुम सब नीचे ठहरोगे ? । युवा तत्र न प्रतिष्ठतम्=तुम दोनों वहां नहीं ठहरे हो । स्वम् दूरम् तिष्ठ-तू दूर ठहर । किं वयम् तत्र न तिष्ठाम ? क्या हम ३ वहां न ठहरें? । यूयम् तत्र प्रागत्य तिष्ठत=तुम ३ वहां पाकर ठहरो । वयम् नपरि गत्वा प्रतिष्ठाम हम ३ ऊपर जाके ठहरे है। त्वं सं प्रणम्य तिष्ठमात्-तू उम को प्रणाम करके ठहर । तो श्रुत्वा न अतिष्ठताम्= ये २ सुन के नहीं ठहरे हैं। प्राहं सत्यं मत्वा प्रतिष्ठम्=मैं सत्य मान के ठहरा हूं। अहं भुक्त्वा स्थास्यामि=मैं खाके ठहरूगा । विद्यार्थी पृष्ठा भगच्छत् विद्यार्थी पूंछ के गया है। सः पठित्वा तिष्ठतु वह पढ़ के ठहरे । वयं पठित्वा न स्था- स्यामः हम ३ पढ़ के नहीं ठहरेंगे । ते प्रणम्य प्रतिष्ठन्के प्रणाम करके ठहरे हैं। यूयं श्रुत्वा तिष्ठत-तुम ३ सुनके ठहरो। तो आगत्य तिष्ठताम्वे२ प्राके ठहरें। किं त्वं भुवस्वा म स्थास्यसि ?क्या तू खाके नहीं टहरेगा ? । अहं पठित्वा न मि-मैं पढ़ के नहीं ठहरूंगा ॥ स्यास्या सप्तमः पाठः ७॥ है पढ़ा है कता भूतक्रिया, कर्ता, वर्तमानक्रिया, अपठत्-तुम मे पढ़ा पठति यह पढ़ता है ती अपठताम्-उन दोनोंने पढ़ाहै। सो पठत:=वे २ पढ़ते हैं अपठन्=तन्हों ने पढ़ा है ते पठन्ति-वे ३ पढ़ते त्वम् अपठः-तूने पढ़ा है त्वम् पठसि-तू पढ़ता युवाम् अपठतम्-तुम २ मे पढ़ा है युवाम् पठथः तुम दोनों पढ़ते हो मे यूयम् अपठत-तुम ३ यूयम् पठण-तुम ३ पढ़ते हो अहम् अपठम्=मैंने पढ़ा महम् पठामि=मैं पढ़ता हूं श्रावाम् अपठाव-हम २ मे पढ़ा है भावाम् पठायः हम २ पढ़ते हैं वयम् अपठाम-हम ३ पढ़ा वयम् पठामः हम ३ पढ़ते कर्ता, भविष्यक्रिया, कतो, विधिकिया, पठिष्यति यह पढ़ेगा पठतु, पठतात्वह पड़े ती पठिष्यतः वे २ पढेंगे ती पठताम्-थे २ पढ़ें पठिष्यन्ति=वे ३ पढ़ेगे पठन्तु-वे ३ पढ़ें स्वम् पठिष्यसि-तू पढ़ेगा स्वम् पठ,पठतात्-तू पढ़ है है सः -- [८] युवाम् पठिष्यथ:-तुम २ पढ़े। गे यूयम् पठिष्यथ-तुम ३ पढ़ोगे अहम् पठिष्यामि=मैं पहूँगा भावाम् पठिष्यावः हम दोनों पढ़ेंगे वयम् पठिष्यामः-हम ३ पढ़ेंगे युवाम् पठतम्-तुम २ पड़ो यूयम् पठत-तुम ३ पढ़ो अहम् पठानि=मैं पढू ? आवाम् पठाव-हम २ पढ़ें? वयम् पठाम हम ३ पढ़ें अष्टमः पाठःE | । - - m भोक्तम्=खामे को । माटुंम् बुहारने को। पातुम्= पीने को । गन्तुम्=जाने को । चिन्तयितुम् याद करने की । स्वप्तुम् साने को । पठितुम्=पढ़ने को। जागरितुम् =जागने को। ज्ञातुम् जानने को। सङ्गन्तुम् मिलने को । हन्तुम् मारने को । प्रष्टुम्बकने को। भागन्तुम् प्राने को । हसितुम्-हँसने को । संमन्तुम् = सलाह देने को । प्रास्तुम् बैठने को। जेतुम् =जीतने को । स्थातुम् ठहरने को। उत्थातुम्-उठने को। पराजेतुम्हारने को। कर्तुम् करने को । मम्-मरने को। हत्तुम् मल त्यागने को। मन्तुम् मानने को । भारयितुम् मारने को । जीधितु- म्= शौने को । सीवितुम्सीने को। चोरयितुम् चुराने को । मधमः पाठः ॥ ५ [ रामशब्द (पुंल्लिङ्ग ) की सात विभक्तियां ] राम.राम, मे रामात्, दु-राम से रामौ २ रामों, ने रामाभ्याम्-२ रामों से रामा:सब रामों, ने रामेभ्यः सब रामों से रामम् राम को रामस्य-राम का, के, की, रामौ रामों को रामयोः-२ रामों का, के, की रामान्-३ रामों को रामाणाम्-३ रामों का, के, की रामे-रोम ने, से, के साथ रामे राम में, पै, पर ३१ रामाभ्याम्-२ रामों ने, से, के साथ ७ रामयोः-२ रामों में, पै, पर । रामः सब रामों ने, से, के साथ रामेषु=३ रामों में, पै, पर रामायाम के लिये हे राम श्री राम रामाभ्याम्-२ रामों के लिये हे रामौ-२ रामेभ्यः-३ रामों के लिये रामा:-३ ४ सम्बोधन momen- [] जिस प्रकार राम शब्द की ७ विभक्तियां हैं इसी प्रकार कदम्ब, मुकुन्द, दघ, पुरुष, यशदत्त, देवदत्त, विष्णु मित्र प्रादि अकारान्त ( पुंलिङ्ग) शब्दों की विभक्तियां जानो। ५ - ३ -- - . तेः-उन - ३ दशमः पाठः १०॥ [ तद् शब्द (पुंल्लिङ्ग) की ७ विभक्तियां ] स:-वह, उसने तस्मात्स से तौ-वे २, उन्होंने ताम्याम्=उन २ से ते-वे ३, उम्होंने तेश्य:-मन से तम्-उमको सस्य-उस का, के, की तौम २, को सयो:-उम२ का, के, की तान्-उन ३ को तेषाम् =उन ३ का, के, की सेन- उस से, मे, के, माथ तस्मिन् उम में, पै, पर ताभ्याम्-उन २ से, गे, के माथ तयो:-उन २ में, पै, पर से, मे, के साथ तेषु-उन ३ में, पे, पर तस्मस के लिये ताभ्याम्-तुन २ के लिये सम्बोधन इस का नहीं होता तेभ्यःसन ३ के लिये इसी प्रकार यद् (जो) शब्द के भी रूप हैं किन्तु इतना भेद है कि प्रथमा विभक्ति के एक वचन में यः, ऐमा रूप होता है आगे न्यौ, ये, यम्, यो, यान, येन, याभ्याम् , यः इत्यादि मय तद् शब्द के समान हैं सा पढ़ने वालों को बुद्धि से समझने और समझाने चाहिये ।। एकादशः पाठः ११ ॥ विष्णा मित्रः भं. गच्छति-विष्णु मित्र खाने को जाता है । यज्ञदत्तः ग्राम गन्तुम् आगच्छतु यज्ञदत्त ग्राम को जाने को प्रावे । त्वं पठितुं गच्छ-तू पढ़ने को जा। त्यं वेदान् ज्ञातुं पठमि-तू वेदों को जानने को पढ़ता है। किं त्वं प्रष्टुम् अगच्छः ? क्या तू पूंछने को गया है ? । देवदत्तः मम्भन्तुम् गत्वा प्रागच्छ. त-देवदत्त मलाह करने को जाके प्राया है। किं स तस्मिन् गृहे स्थातुं अगच्लू- स् ? क्या वह उस घर में ठहरने को गया है ? । म किं कर्तुम् पठतु ?=बह क्या करने को पड़े ? । अहं वेदं मन्तु अपठम् =मैं ने वेद को मामले को पढ़ा है । स वस्त्रं सोवितुं गच्छति किम् ?=यह कपड़ा ( नपु. ) सोने को जाता <iwanny [१०] .ANA.1 11 । है क्या ? । शोभारामः गृहं माष्टुं गच्छतु-शोभाराम घर बुहारगे को जावे । ती पाटं चिन्तयितुम् अगच्छनाम् वे दोनें। पाठ (को) याद करने केो गये हैं । सः गृहम् प्रागन्तुं धावति वह घर पाने को दौड़ता है। स श्रामने प्रास्तुं गच्छतु= वह प्रासन पे बैठने को जावे । प्रावाम् भासनात् उत्थातुं न इच्छायः हम २ भासन से उटने को नहीं चाहते । किं म तेन मत्तुंम् सुच्छति ?= क्या वह उस के साथ मरने को चाहता है ? । स्वं तं मारयितुं गच्छसि-तू सस को मारने को जाता है। द्वादशः पाठः १२ ॥ सः धनं दत्वा अपठत्वह धन देकर पढ़ा । किं युवां धनाय पठथः क्या तुम २ धन के लिये पढ़ते हो ? । वयं धनाय न अपठाम हम धम के लिये महीं पढ़े हैं। तो धर्माय पठतः वे दोनों धर्म के लिये पढ़ते हैं। विद्यार्थी नियमं कृत्वा पठतु-विद्यार्थी नियम करके पढ़े। अहं भुक्त्वा पठिष्यामिः-मैं खाके पढूंगा । किं स्वं ग्रामं गत्वा पठिष्यमि ? क्या तू ग्राम को जाकर पढ़ेगा ? । भावां सत्यं मत्वा अपठात्र-हम २ सत्य मान के पढ़े हैं । वेदं चोरयितुं पठति= वेद चुराने को पढ़ता है। यूयं जलं पातुं गच्छप=तुम ३ जल पीने को जाते हो । त्वं स्वप्तुं गच्छ-तू सोने की जा । किम् अहं जागरितुम् तिष्ठानि? क्या मैं जा- गने को ठहरू ? । अहं विष्णु मित्रं हन्तुं न गमिष्यामि मैं विष्णु मित्र को मारने को नहीं जाऊंगा । सो हमितुम् अगच्छताम्ये २ हंमने को गये हैं । यादत्तः देवदत्तं जेतुम् अगच्छत्यादत्त देवदत्त को जीतने गया है । युधां पर। जेतुं ग. मिष्यथ:=तुम २ हारने को जानोगे । देवदत्त विष्णु मित्रौ हत्तुं गच्छताम्= =देवदत्त विष्णा मित्र २ मलत्यागने को जावें । दशरथः जीवितुं न इच्छति दशरथ जीने को नहीं चाहता । अहं ग्रामं गन्तुम् इच्छामि=मैं ग्राम को जाना चाहता हूं। ती सुदर्शनेन मङ्गन्तुं प्रागच्छताम्-वे २ सुदर्शन से मिलने को आवे । अहं या. दत्तविष्णु मित्राभ्यां पुस्तकं दातुं न इच्छामि=मैं यज्ञदत्त विष्णु मित्रों २ के लिये पुस्तक देने को नहीं चाहता ।। त्रयोदशः पाठः १३ ॥ ( संस्कृत से भाषा बनाओ) स रामाय वस्त्रं ददातु । अहं रामात् उपानहम् आदातुम् इच्छामि। आवां रामस्य उपवस्त्रम् भादाय गमिष्यावः । वयं रामे - [११] ने पुस्तक नहीं विश्वास कृत्वा महामः । हे राम ! किंवं पठिष्यसि ? । अहं तं पृष्ट्वा गच्छानि ? । त्वं ताभ्याम मिलित्वा न आगच्छः । युवां तेभ्यः पुस्तकं दत्वा गमिष्यथः किम् ? । अहं तस्मात् न पठि- प्यामि । त्वं तपोः पुस्तकं न पठ । स तेषु विश्वासं कृत्वा न प्रा. गच्छति । ये पठन्ति ते गमिष्यन्ति । यत् जानामि तत् पठामि। येन सङ्गन्तुम् अगच्छम् स न मिलितः । यस्मै धनं दत्तं स नास्ति। यस्मात् भयं भवति तस्य समीपे न गच्छ । चतुर्दशः पाठः १४ ॥ [ भाषा से संस्कृत वाक्य बनाओ ] उस ने क्या पढ़ा है ? । तुम पुस्तक नहीं पढ़ोगे ? । हम पढ़ा है । तुम दुष्ट पुस्तक मत पड़ो । विद्यार्थी श्रेष्ठ पुस्तक को पढ़े। क्या तुम उम का पुस्तक लेकर गये हो ? । म ने उन २ का पुस्तक नहीं पढ़ा है । वे २ मेरा पुरता पढ़ते हैं। वेद को पढ़े . तू विद्या नहीं। २ विद्याध्य- यम के लिये जायंगे । पाा तू हमारा पुस्तक लेकर माय. ! यदि तू यहां भावे गा तब हम तु को नहीं १ पढ़ायेंगे ( १ पाठयि ध्यान: ) ॥ पश्चदशः पाठः १५ ॥ सुप्मद् ( अर्थात् तू, तुम ) शब्द की ७ विमतियां । तीनो लिङ्गों में समान रूप होते हैं । ! त्वम्-तू, तूने तुभ्यम् , ते-तेरे लिये युवाम्-तुम २, ४१ युवाभ्याम् ,वाम् =तुम्हारे लिये ( यूयम्-तुम ३, तुम ३ ने युष्मभ्यम् , व-तुमारे ३ लिये त्वम् , त्वा-तुक को त्वत्-तुझ से युवाम् , वाम-तुम २ को युवाभ्याम्-तुम २ से ( युष्मान् वः-तुम ३ का । युष्मत-तुम ३ से । त्वया तूने, तु से, तेरे साथ । तत्र, ते तेरा, रे, री युवाभ्याम्=तुम २,मे,तुमन्तारे माथ ६१ युषयोः वाम्-तुम दोनों का केकी युरुमाभिः-तुम ३ ने, से, तुम्हारे साथ युष्माकम् नः-३ तुम्हारा,रे,री - or तुमने २ Home [१२] । น - । मया- --मैंने, मुक ना मेरे साथ थे, पर -तुक में, पै, पर युरुमद् और अस्मद् शब्द के स- युवयोः तुम २ में पै, पर म्बोधन के रूप महीं होते। । युष्मासु-तुग ३ में, पै, पर घोडशः पाठः १६॥ अम्मद् ( अर्थात् में हम ) शब्द की ७ विभक्तियां । इस के भी ३ लिङ्गों में समान ही रूप होते हैं। अहम्-मैं वा मैंने मत्-मुझ मे भावाम्-२ हम वा हम दोनों ने ५ श्राद्याभ्याम् हम २ से घयम्-हम ३ वा हम३ ने अस्मत्-हम३ से माम् , मामुक को मम, मे मेरा, रे, री श्रावाम् , नौ-हम २ को माययोः, नौ-हमारा २ रे, री अस्मान, ना-हम ३ को अस्माकम् , ना हमारा३,२,री ! मयि मुक में, पै, पर प्राधाभ्याम् हमरने,मे,हमारेमाथ ७ शावयोः : हम २ में, अस्माभिः हम ३ ने,मे, हमारे माथ भस्मासु-हम ३ में, पै, पर मह्यम्, मे--मेरे लिये आधाभ्याम् नौ हमारेरके लिये सम्बोधन नहीं होता ॥ अस्मभ्यम् ,नः हमारे ३ के लिये सप्तदशः पाठः १७ ॥ दा धातु-देना के भूत, भविष्यत् , वर्तमान, विधि, कर्ता, भूतकालिकक्रिया, कर्ती, अददात्=उस ने दिया, दी है दास्यति वह देगा ती अदत्ताम्-उनर ने दिया, दी है तो दास्यतःचे २ देंगे =उन ३ ने दिया, दी है ते दास्यन्ति= ३ देंगे सम् अददा: तूने दिया, दी त्यम् दास्यमि-तू देगा युवाम् अदत्तम्-तुम २ ने दिया, दी युवाम् दास्यथः-तुम २ दोगे यूयम् अदत्त-तुम ३ ने दिया, दी है यूयम् दास्यथ=तुम ३ दोगे अहम् अददाम्=मैंने दिया, दी है अहम् दास्यामि=मैं दूंगा भावाम् अदद हम २ ने दिया, दी है आवाम् दास्यायः-हम २ देंगे वयम् अदम-हम३ ने दिया, दी है वयम् दास्यामः हम ३ देंगे ४ भविष्यक्रिया, PANA RamannawwwmantTTONEMAMATAmar देहि, दत्तात्-तू दे [ १३ ] कर्ता, वर्तमानक्रिया, की, विधिक्रिया, ददाति-शाह देना ददातु. दत्तात् वह देवे ती दस-वे २ देने हैं ती दत्ताम्-वे २ देयें त ददतिघे ३ देते हैं। ददतु-वे ३ देवें स्वम् ददासि तू देता है त्वम् युवाम् दत्यः-तुम २ देते हो युवाम् दत्तम् =तुम २ दो यूयम् दत्य-तुम ३ देते हो यूयम् दत्त-तुम ३ दो प्रहम् ददामि मैं देता हूं अहम् ददानि-मैं दूं प्रावाम् दहः हम २ देते आवाम् ददाव-हम २ दें वयम् दद्मः हम ३ देते हैं वयम् ददाम हम ३ दे इस दा धातु-देना, से पहिले प्रा लगाने से "लेना” अर्थ हो जाना है परन्तु उस दशा में प्रात्मनेपद के रूप होते हैं जैसेः- कती भूतक्रिया। कती भविष्यक्रिया आदत्त भादास्यते अददाताम् ती प्रादास्येते प्राददत ते भादास्यन्ते त्वम् प्रादत्थाः स्वम् प्रादास्यसे युवाम् प्राददाथाम् युवाम् आदास्येथे यूयम् दद्ध्वम् यूयम् प्रादास्यध्ये अहम् भाददि अहम् भादास्ये भावाम् प्रादवहि प्रावाम् श्रादास्यावह वयम् श्रादयहि वयम् प्रादास्यामहे की वर्तमानक्रिया । का वर्तमानक्रिया भादत्त यूयम् श्रादद्धे तौ प्राददाते प्रहम् प्राददे प्राददते आवाम् भादवहे त्वम् भादसे वयम् नादग्रह युधाम् प्राददाथे से ते wevanamadrasRNam RamerammamtamawomewwIONARAINIK LAWTOmkutb [१५] त ७ हनी विधिक्रिया युवाम् शाददाथाम् प्रादनम् यूयम् श्रादहम् शाददाताम् अहम् भाददै भाददाम् भानाम् प्राददाबह वयम् भाददामहे अर्थ परस्मैपद के तुल्य ही है ।। अष्टादशः पाठः १८ ॥ नरसिंहः मह्यं मातार सिंह मुझ को क्या देता है । विष्णा शर्मा आवाभ्याम् भौजन्ः २ स्याल - विष्णुशर्मा हम २ दो को भोजन देगा। अहम् युष्मल्य ल्य वस्त्रं न दास्यामि में तुम ३ को वस्त्र नहीं दूंगा । किं स त्या पुस्तकम् प्रादास्यते ? क्या यह तुझ से पुस्तक लेगा ? । अहम् तब उपवस्त्रं न ददानि- मैं तेरा रुमाल न दूं । त्वम् तस्य उपानहम् देहि-तू उम का जूता दे। अहम् त्वयि भारं न ददामि मैं तुक पर भार नहीं देता । कस्य अपि वस्तु न आद. ताम्-किमी का भी वस्तु न ले । त्वम् मह्यं पुस्तकं दत्तात्-तू मुक्क पुस्तक दे । स आवाभ्याम् मङ्गन्तुम् मागच्छति वह हम २ से मिलने को प्राता है। म स्वकीयं पुस्तकं मह्यम् अददात्नुस ने अपना पुस्तक मेरे लिये दिया त्वम् तस्मै किमपि अददा: ? तूने उम के लिये कुछ दिया है ? । अहम् यवाभ्यां किमपि न अददाम्=मैंने तुम २ को कुछ नहीं दिया है। ती पायाभ्यां किम् भदत्ताम् ?=उन दानाने हम २ को क्या दिया है ? । युवा तेभ्यः स्वं पुस्तकम् । श्राददाथाम् -तुम २ उन से अपना पुस्तक ले लो। प्रायां तुभ्य वस्त्रं न दास्यायः- हम २ तुझ को कपड़ा नहीं देंगे । त्वं मोहचमिहस्य पुस्ताम् अादातू मोह- नसिंह का पुस्तक ले ले । अहं तव समीपे न आगमिष्यामि मैं तेरे ममीप में नहीं पाऊंगा । त्वं मग पुस्तक लेखनी च कदा दास्यसि ? तू मेरा पुरता और कुलम कब देगा ? । सः अस्मत् लेखनी सादत्तनुस ने हमसे कलम लिया है । जनविंशः : पाठः १ ( भाषा से संस्कृत बनाओ ) वह तुम्हारे लिये कुछ देने को पाया है। सहायक जन देगा । हम उसके मझोप में पढ़ने को नहीं जायंगे। वे सब हमारे ममीप में पढ़ने को नहीं पाये Polindememuaamanamam MN [१५] तु ते इत्यादि, हैं । क्या तुम उन का पुस्तक नहीं दोगे ? । हम स्वकीय (अपनी) पुस्तक तुम के लिये नहीं देंगे । क्या तुम नस के साथ मिलने को जाओगे ? । हम उन से मिलने को नहीं गये । नुम्लारा मुहृद् कब प्राधेगा । हग मित्र में मिलने का गये । तुम्हारा मुहद् कौन है ? । यह हमारे साथ नहीं जायगा । उम ने मत्या - थंप्रकाश का पढ़ा है। वह उस के माथ मिलने को नहीं गया है। क्या ने सत्यार्थप्रकाश को नहीं पढ़ा है। विंशः पाठः ॥ "कीड" धातु “खेलना” के भूत, भविष्यत्, वर्तमान और विधि । की, भूतक्रिया, की वर्तमान क्रिया, अक्रो उत्-वह खेला है क्रीडति-ग्रह खन्नता नो क्रीडताम्-वे २ खेले हैं क्रीतः-वे २ खेलते हैं अक्रो डन्-वे ३ सेले हैं क्रीडन्ति-वे ३ खेलते हैं आनीहः-त खेला की युधाम् अको छतम्-तुम २ खेले हो निधिकिया, यूयम् अमीहत-तुम ३ खेले हो क्रीडनु की इतात्नह खेले ती क्रीडताम् =वे २ खेन्ने अहम् मक्रीडम् -मैं खेला हूं क्रीडन्तु-वे ३ खेल्ने आवाम् अक्रोडाव-हम २ खेले हैं वयम् प्रक्रो डाम हम ३ खेले हैं त्वम् क्रीड, क्रीडनात्--तू खेल कती भविष्यत् क्रिया, युवाम् क्रीतम्तुम २ से जो, यूधम् क्री डत्त-तुम ३ क्रीडिष्यति-वह खेलेगा खेलो तो अहम् क्रीडानि- मैं खेलू, फ्रीडिष्यतः-२ खेलेंगे भावाम् क्रीडा हम २ खेलें ते क्रीडिष्यन्ति-वे ३ खेलेंगे वयम् क्रीडा--हग ३ खेल्ने त्यम् त खेलेगा इमो प्रकार हस" धातु “ हम ना " युवाम् क्रीडिष्यथः तुम २ खेलोगे के भी रूप, भूत, भलिप्यन्. वर्तमान यूयम् क्रो डिष्यथ तुम ३ खेलोगे और विधि क्रियाओं के जानने चा- अहम् क्री डिष्यामि= मैं खेलूंगा हिये। जैसेः- श्रावाम् क्रोध्यिायः हम २ खेलेंगे प्रहमत यह हमा है वयम् क्रीडिष्यामः-हम ३ खेलेंगे इत्यादि ते की दुष्यमि-तू . [ १६ ] -1... ते कती एकविंशः पाठः ॥ "पश्य ( दृश् )” धातु-"देखना ” के भूतक्रिया आदि ॥ की भूत क्रिया, कता भविष्यत् क्रिया अपश्यत्-तुमने देखा, द्रक्ष्यति वह देखेगा अपश्यताम्-उन २ ने देखा द्रक्ष्यतः-वे २ देखेंगे अपश्यन्-उन ३ ने देखा ते द्रक्ष्यन्ति-वे ३ देखेंगे इत्यादि त्वम् द्रक्ष्यमि-तू देखेगा, विधिक्रिया युवाम् द्रक्ष्यथः तुम २ देखोगे, पश्यतु, पश्यतात्=वह देखे यूयम् द्रक्ष्यथ-तुम ३ देखोगे, पश्यताम्-वे २ देखें, प्रहम् द्रक्ष्यामि=मैं देखूगा, ते आवाम् द्रक्ष्याव: हम २ देखेंगे त्वम् पश्य, पश्यतात्-तू देख, वयम् द्रक्ष्यामः हम ३ देखेंगे, युवाम् पश्यतम्=तुम २ देखो इत्यादि। वर्तमानक्रिया-सः पश्यति इत्यादि । संस्कृत से भाषा बनायो । नेत्राभ्यां स न पश्यति । अहम् तैः न क्रीडिष्यामि, । त्वं तत्र मां विष्णुमित्रेण सह अपश्यः । अहं त्वा तत्र गत्वा द्रक्ष्या- मि । युवाम् बाल कैः अक्रीडतम् ? । अहं तु न अक्रीडम् । स अक्रीडत् । यूयं राजगृहं द्रक्ष्यथ न वा ? । स मया क्रीडिष्यति । वं मह्यं लेखनी दास्यसि ? । न अहं तुभ्यं किञ्चित् अपि दा- स्यामि । पश्य मे ऐश्वर्यम् । पश्यत मृगम् ॥ द्वाविंशः पाठः २२ ॥ "लिख” धातु"-लिखना” के भू० भ० वर्त० विधि ॥ कती भन क्रिया कर्ती, भविष्यक्रिया मः अग्नि खत्म ने लिखा है इत्यादि म: लेखिष्यति यह लिखेगा इत्यादि । की वर्तमानक्रिया कर्ती विधिक्रिया सः लिखति वह लिखता है इत्यादि । सः लिखतु,लिखतात्-वह लिखे इत्यादि।
[१७] कर्ता, शः पाठः २४ ॥ प्रयोविंशः पाठः २३ ॥ "स्मृ” धातु="यादकरना” के भू० भ० वर्त्तः विधि । कता, भूतक्रिया, कर्ता, भविष्यक्रिया सः अस्मात् उस ने याद कियाहै इत्यादि सः स्मरिष्यति यह याद करेगा इत्यादि वर्तमान किया कती, विधिक्रिया सः स्मरतिघह याद करता है इत्यादि। मः स्मरनु,स्मरतात् वह याद करे इत्यादि चतुर्विशः मः मूक्ष्माणि अक्षराणि पश्यतिवह बारीक अक्षरों को देखता है । तो वृथा की हतः-वे २ वृथा खेलते हैं। ते किं लिख न्ति ? ये क्या लिखते हैं ? । त्वं मातरं स्म(सि-तू माता को याद करता है । युवाम् किं पश्यथः ?-तुम २ क्या देखते हो ? । यूयम् यथा क्रीडय-तुम वृथा खेलते हो । प्रहम् सारस्वतम् लिखामि=मैं सारस्वत लिखता हूं । प्रावाम् स्तं पाठ स्मरावा हम २ अपने पाठ को याद करते हैं । वयम् त्वाम् न पश्यामः हम तुम को नहीं देखते हैं । सः न अक्रीडत्-वह नहीं खेला है । तो निखतः वे २ लिखते हैं । ते पिताम् न स्मरन्ति-वे पिता को नहीं याद करते। त्वम् तं न अपश्यः=सम को नहीं देखा है । युवाम् म अक्रो उत्तम्-तुम २ नहीं खेले हो । यूयम् किम् अलिखत?= तुम ने क्या लिखा है ? । महम् प्राचार्य्यम् अस्मरम्=मैंने गुरु है । आवाम् इन्द्रप्रस्थम् अपश्याव=हम २ ने दिल्ली को देखा है । वयम् न अक्रीडाम हम नहीं खेले हैं । संस्कृत से भाषा बनामो॥ स सायं लेविष्यति । तौ पाठं न स्मरिष्यतः । ते उत्सवं द्रक्ष्यन्ति । किं त्वं न क्रीडिष्यसि ? । युवाम् मध्यान्हे किं ले- खिष्यथः ?। यूयम् भ्रातरं न स्मरिष्यथ ? । अहं समाजद्रक्ष्यामि। भावाम् न क्रीडिष्यावः । वयम् अष्टाध्यायी लेखिष्यामः ॥ भाषा से संस्कृत बनाओ। वह पाठ को याद करे । वे २ पुस्तक को देखें। वे न खेलें । तू अष्टाध्यायी को याद किया
mathummarANRAMMARTememerammmmom
[१८]
-
को लिख । तुम २ अपने पाठ को याद करो । तुम ३ उत्सव न देग्यो । अब मैं
न खेन्नू । हम २ पुस्तक लिखें । हम ३ पाठ याद
पञ्चविंशः पाठः २५॥
निम्नलिखित संस्कृत चिट्ठी, ऐमी रीति से लिखी है कि इस
पुस्तक के समस्त प्राशय वाले पद आजायें ॥
मित्रवर्य
अस्माकं भृत्यः युष्माकं समीपे अगच्छत् न वा ? अहम्
तुभ्यम् प्रणामं कृत्वा तव यशः श्रुत्वा धन्यवादं दत्वा त्वया प्रे-
पितं पत्रं पठित्वा अानन्दं मत्वा हर्पम् भादाय तुभ्यं किञ्चित्कष्टं
दातुं लिखामि, त्वया सह व्याकरणं पठितुम् आगत्य कश्चित्कालं
तव पार्थे स्थास्यामि तदा तर्पचतुष्टयं व्याकरणं पठिष्यामि; अहं
च वेद पर्यन्तं पठितुं, तेषां पारं गन्तुं, तेन ब्रह्म ज्ञातुं, गुम्कुले
स्थातुं, पण्डितैः शास्त्रार्थ कतै सन्यं मन्तुम् , अविद्या मार्ट, ब्रह्म
लोकहितं च चिन्तयितुं, धार्मिकैः सङ्क, सत्पुरुषेषु आस्तु, दु-
जनेभ्यः दूरे स्थातं, अधार्मिकान् जेतुम् , इच्छामि, यदि ययं
आशिपी दास्यथ तहि स्वनेत्राभ्यां तत्सर्व द्रक्ष्यामि, वेदार्यान् ले-
विष्यामि, शास्त्रविचारे क्रीडिव्याभि, परं ब्रह्म स्मरिष्यामि--
इति आश्विन कृष्णाटम्यां सोमे संवत् १९४७ वि ॥
भवन्मित्रवर्यः
भवदत्तः
इति
पुस्तकों की सूची ॥ ऐमा और इतना संक्षेप से अब तक कोई नहीं छपा ! "ऋगादिभाष्यभूमिकेन्दूपरागे हितीयोऽशः" शब्दप्रमागा द्वारा मात्र ब्राह्मण दोनों वेद हैं का क्या ? इत्यादि का निर्णय ०१ प्रमाणों से किया है । सम में अथर्ववेद, तैत्तिरीय, शतपथब्रा०, साङ्ख्य, भापतम्ब, प्रातिशाख्य, कात्यायन, बौधायन, परिशिष्ट, मीमांसा, मनुस्मृति, ऐतरेय ब्रा०, अष्टाध्यायी, महाभाष्य, कौशिकसूत्र, अमरकोश, लघुशब्देन्दुशेखर, निरुक्त, सायणभाष्य, ऋग्वेद, यजद, वेदान्तसूत्र, न्यायदर्शन, तैत्तिरीय प्रारण्यक, पिङ्गलमूत्र, घर गाव्यह, न्यायविस्तर इन २७ ग्रन्थों से बहुत से प्रमाण संग्रह करके ५० तुलसीराम स्वामी ने बनाया -)। प्रथमोऽशः -)। संस्कृत ग्रेमेटिकल प्राइमर ॥ बिना गुरु के संस्कृत मिखाती हैं-संस्कृत का प्रथम पुस्तक ) द्वितीय -) सनीय में अध की वार छपाने में सन्धि का विषय बढ़ाया गया है मूल्य घटाया =)। चतुर्थ भी तैयार हो रहा है ॥ प्रश्नोत्तरशतक ( आर्यधर्म पर ) =) प्रब. न्धाोदय ।-) शिक्षाध्याय )। प्रायुर्वेदशब्दार्णवकोष ॥३) यमयमी सूक्त पादरी यिनियम आदि के दिये दूपगों से उद्धारपूर्वक अर्थ संस्कृत तथा भाषा ) भजीन्दु -) शास्त्रार्थ किराणा =) रामायण का पाल्हा पहली लड़ाई )। अष्टाध्यायी ) भर्तृहरिनीतिशतक भाषा टीका ) गणरत्न महोदधि कोष १॥) मनुभाष्यभूमिका १॥) तारीखदुनियां " (नागरी) मंसार की उत्पत्ति को कितमे वर्ष हुये ज्ञात होता है 4) यज्ञोपवीतश० -) फसे सभाशवीनी (उर्दू) (वेश्यागामियों को दुर्दशा दिग्वाई =)॥ यही नागरी में। ॥ कुमारीभूषण -) उपनिषद् संस्कृत और पापाटीका ईश ७) केन ।) कठ ॥) प्रश्न ॥a) मुगल क ) मागदूषय =) तैत्तिरीय ॥1) ये सात उप निषद् भिन्न २ तौ ३॥) के हैं परन्तु मातों इकट्ठे ३) में । विदुरनीति =) दशोप निषद् ।-) जीवनयात्रा ५ मामा के धर्म है ३) मीताचरित्र नावल नागरी प्रथम भाग ) ॥) उर्दू में चारों भाग १॥) प्रति भाग ॥) दमयन्तीस्वयंवरना. टक ) ये दोनों नये छपे है ॥ इकट्ठे पुस्तक लेग धानों के। ४) में ५) के, ७) में १०) के, २०) में ३०) के और ५०) में १००) के पुस्तक मिलेंगे। पता-पं० छुट्टनलाल स्वामी परीक्षितगढ़ (जि. मेरठ) .
स्वामी औषधालय परीक्षितगढ़ जि० मेरठ
१ ज्वरघ्न भस्म १) तोला।
मित्य घर तथा तेश्या में रामवाणा है धातुर्थक में भी कुछ २ काम देती है
२ “मतीसारारि चर्ण"
यह सूर्ण सब प्रकार के दस्तों में जब २ दिशा से ग्रामो हाथ पांव धो कर
(मासे की फंकी करनी ॥) हिची।
३ ददुघ्न
४ अ
दाद को धो कर नित्य लगा दो तीन दिन में प्राराम होगा ।) टिटवी।
प्रभूनारि
यह प्रकं मभी वैद्य जानते हैं भूखं नहीं, माथी छटांक प्रातः सायं पीथे ।
सौभाग्य शुंठीपाक इसके माथ बला अपकारी है १) खोतल १
५ खांसी की गोली
मुख में गेर घुगती रहेगी माठ घटी तक रखने से भाराम भाग होता है
१०८ का दाम १)
६
सुरमा
सुधाजन
इमे नेत्रों में लगागे से सत्र नेत्र रोग नष्ट होते हैं कुछ दिन मेघन से फुल्ली
तक जाती रहती है। नेत्र माफ होते हैं ।) तोला ।
७ -योगगजगुग्गुल वटी-गोली ।
प्रमिटु श्रीषध है। भिन्न २ अनुपानी से अनेक रोगों पर काम देती है और नि.
स्यप्रति को बदहज़मी जो प्रायः निखने पढ़ने प्रादि बैठने का काम करने वालों को
रहनी है १ गोली मायकाल नित्य खामे से सर्वथा दूर रहेगी १०८ गोली का मूल्य १)
१-छाक व्यय पुस्तकादि सब बस्तुओं का मूल्य के अतिरिक्त ग्राहक को देगा
होगा।
२-कमीशम-४) में ५) तथा ७) में १०) और २०) में ३०) का माल मिलेगा
पता-छुट्टमलान स्वामी
परीक्षितगढ़-जिना, मेठ
美美美美美美美美美美美美美美美美美爱蛋蛋美雲 1 ओ३म् ॥ संस्कृत-भाषा-तृतीयं -तृतीयं पुस्तकम्॥ परीक्षितगढ़ ( जिला मेरठ ) निवासि- स्वामि-तुलसीराम-शार्म-विरचितम् ॥ 美美美美美髮美 醫美美美美美美美美美美美英英英英英美美美美美美美美美美美美美美美美 A SANSKRIT- GRAMMATICAL PRIMER, HIRD PART, WIE BY Pundit Tulsi Ram Sharma, Parichatgarh District Meerut Printed at the Saraswati Press Allahabad. INR IN IN संवत् १९५२ ता० ७ । । ५ इसकी रजिस्टरी कराई गई और किसी को छापने का I IAS INEMA IASANA Socond Edition अधिकार नहीं है। द्वितीयवार १००० मूल्य 1000 Copies. mmsmeenA Lon- WAN ma MIT
SAMRAPAGAtoms
ओ३म्
भूमिका
इस पुस्तक
में सामान्यतया व्याकरण का मुयन्तप्रकरणा इसलिये
पूरा कर दिया है कि प्रश्न केवल कारक समास और तद्धित तथा बड़ा
मकर या तिङन्त रहा है सो चतुर्थपुस्तक में संक्षेप से उस को भी लिख देने
का विचार है । प्रथमवार सन्धि विषय में कई सन्धि छूट गई थी हम
धार वे भी सम्मिलित कर दी हैं। अब कि चारों भाग छपकर तैयार
हो जावेंगे तब एक छोटामा संस्कृतव्याकरण पूरा हो जायगा । प्रथमवार
की छपी १५०० पुस्तकों के इतना शीघ्र बिक जाने के कारण मैंने अपने
परिश्रम को सफल समझा और विदित हुआ कि पाठकवर्ग इस
पुस्तक को सपयोगी समझते हैं । सो चारों भाग पढ़ने पर निश्चय
है कि उम को घर बैठे संस्कृत समझने और लिखगे तथा बोलने
को शक्ति हो जावेगी। चतुर्थभाग अपना प्रारम्भ होगया ।
और प्रथम पुस्तक ४००० कापी छपी थीं सो सश समाप्त हुई
अब चतुर्थ वार छपी है॥
तुलसीराम स्वामी
हुति।
का
रेलमाडी
. अथ संस्कृत-भाषा-तृतीयं-पुस्तकम् ॥ । (१)-जब इ, उ, ऋ, लू, वर्णों से कोई स्वर पर होता है तो उक्त धारों वर्गा के स्थान में क्रम से य व र और ल ये आदेश किये जाते जो किसी वर्ण के स्थान में दूसरा वर्ण बनाया जाता है तो उसे “आदेश" कहते हैं ॥ उदाहरण, जैसे:-दधि+ओदनम् दध्योदनम् यहां इ को य । और मधु+मत्र-मवत्र यहां उ को व् । और पितृ+अर्थ:-पित्रर्थः यहां को । और लु+इत्-लित् यहां ल को ल होता है । (३जब ए प्रो ऐ भी से परे कोई स्वर होता है तब उक्त चारों वर्षों को भय अब प्राय और স্মা ये आदेश क्रम से होते हैं । जैसे:-ने+अनम्-नय- नम् । मा+अति-भवति । नै+अकः नायकः । पौ+क:=पावकः । ४) परन्तु अब एक पद के अन्त में ए या भी होते हैं और इन से आगे हस्व होता है तब प्र का लोप हो जाता है। १५-जिस शब्द के अन्त में विभक्ति हो उस (विभक्तिसहित) को पद -- ५ ६ अ व उ ऋ ल ह्रस्व, और आ ई ऊ ऋ ए श्री ऐ लौ दीर्घ और अ३, १३, उ ३. ऋ३. ल ३, ए ३. श्री ३, ऐ३, औ३, ये प्लत कहाते हैं । उदाहरण ( देखो संख्या ४) जैसे:-ते+अत्र तेत्र । पदो+अत्र-पटोच ॥ *७-अवर्ण से इ वर्ण मिल के दोनों को ए होता है और भवर्ग से उ वर्ण मिल के दोनों को प्रो आदेश होता है । जैसे:-उप+इन्द्र-उपेन्द्रः । सूर्य+ 3- दयः-सूर्योदयः ॥ -परन्तु जहां २ हमने वर्ण शब्द कहा है वहां २ हव, दीर्घ और सभने चाहिये । जैसे-संख्या ७ में अवर्ण कहने से अ, प्रा ३, और सुवर्ण कहने से छ, ई, ३ ३, समके जाते हैं और संख्या १ में भी इ, उ, ऋ, ल कहने में हस्व दीर्घ गत तीनां समो जाते हैं। उदाहरगा संख्या ७ का जैसे:--गङ्गा+उद- लत तीनों Humay Manoopnepali mandate ( ४ ) ... r-....- कम्गडोदकम् । ईश्वर+अतिः ईश्वरोतिः । अम्बा+इन्द्रः अम्बेन्द्रः । देव+ ईशः देवेशः । उदाहरण संख्या १ में जैसे:-नक्षमी+आगमनम् लक्ष्म्यागमनम् । वधू+मासनम् वध्वासनम् इत्यादि जानो। लुत को ११ नियम से मन्धि का निषेध है। -अ, आ, ३, ये तीनों आपम में सवर्ण कहाते हैं और इ, ई, ३ इत्यादि समस्त स्वरों के हस्थ, दीर्घ, प्लुत तीनो भेद सवर्ण कहाते हैं । १०-जब अ उ ऋ वर्णों से कोई इन का ही मवर्ण स्वर पर हो तर दोनों को मिल के एक दीर्घ प्रादेश होता है जैसेः-दैत्य+अरि: दैत्यारिः श्री+ ईशः=श्रीशः । भानु+मदयः=भानूदयः । होतृ+ऋकार:--होतकारः ॥ ११- अब किसी सम्बोधनान्त ( दूर मे बुलाने) में स्वर हो तो वह प्लत होता है और प्लुत को अगले स्वर से सन्धि नहीं होती। जैसे-देवदत्त ३ एहि । यहां श्र+ए को मिल कर ऐ नहीं होता इसी प्रकार पुत्र ३ इति इत्यादि । १२--स और तवर्ग को श भोर वर्ग क्रम से होता है यदि श और चवर्ग से मेल हो तो। जैसे-रामस+चिनोतिरामश्विनोति । मत्-चित्-मच्चित् । राजन्+अयाजञ्जय । समिध+चौयते समिञ्चीयते इत्यादि । १३-स और तवर्ग को क्रम से ष और टवर्ग आदेश होते हैं यदि प और ट वर्ग से मेल हो तो। जैसे-तत्+टोकातट्टीका । तत्+टीकते-तट्टीकते । अग्नि- मथ+टङ्कारः अग्निमदृङ्कारः । उद्+दङ्कनम् उदृङ्कनम् । टित्+ढाणा=टिष्टा- गञ् । पेष+प्ता-पेष्टा । शिष+तः शिष्टः इत्यादि । १४-पद के अन्त में य व ल क भ घ ढ ध जब ग ड द ख फ च ट तक प धादि से परे ङ , य, न, म, हे तो पूर्वोक्त अक्षरों में जो जिम वर्ग का हो उस को उसी वर्ग का अनुनासिक अक्षर प्रायः आदेश होता है । जैसे-एतद्+मु. रारिः एतन्मराशिः। यहां तवर्ग के द् को म परे है इसलिये सवर्ग को अनुना- सिक न होता है । तत्+मात्रम्=तन्मात्रम् । चित्+मयम्-चिन्मयम् इत्यादि । १५-सवर्ग से नकार परे हो तो उस को भी लकार ही हो जाता है । जैसे- सत्+लयः तम्मयः । विद्वान्+लिखतिविदाम्लिखति न को अनुनासिक लॅ हुवा ॥ १६-च ट त क प को ज ड द ग ब प्रादेश होते हैं यदि स्वर वा हयवरल क ढ घ घ भ ज ल द ग ब परे हों। जैसे-अच+अन्तः-अन्तः । पट+मात्र पत्र । तत्+अत्र-तदन्न । बाक+यथा-धाग्यथा। ककुष्+ऐन्द्रो-ककुबैन्द्रौ । वाक+बजम्बावजम् इत्यादि । । + am Atterwouless * जो नाक में बोले जाते हैं जैसे कु, अ, पा, न, म, प्रादि ।
- १६ (५) १७-किसी वर्ग के दूसरे तीसरे चौथे अक्षरों को उन २ का पहला अक्षर प्रा. देश होता है यदि ख फ छ ठ थ प ट त क प परे हे तो जैसे-सद्+यानम्= उत्थानम् । यहां तवर्ग का तीसरा इ वर्ण है उस को पहिला त् प्रादेश हुआ । स्वगन-सत्र-लक्तत्र । इत्यादि ॥ १८-यदि किसी वर्ग के प्रथम द्वितीय तृतीय वा चतुर्थ वर्ण से ह परे हो तो ह को उभी वर्ग का चतुर्थ अक्षर प्रादेश होता है। जैसे वाक् हामः बा- ग्घ्रासः। यहां ह को कवर्ग का चतुर्थ घ प्रादेश होकर नियम के अनुसार को ग होगया। ऐसे ही-स्वच+हीनः-त्वको नः। षट्+ह मन्ति-पष्वसन्ति । तत्+ हविः तदधिः । ककुप+हामः ककुठभासः । इत्यादि । १९- भ घ ढ घजब इन्यादि से परे श को छ आदेश होता है यदि कोई स्वर वा ह य व र ल न छु म परे हों। जैसे-तच्+शिवः--तच्छिवः इत्यादि ।। २०-यदि अनुस्वार से पांचों वर्गों में से किसी वर्ग का अक्षर परे हो तो उस अनुस्वार को उसी वर्ग का पांचवां अक्षर प्रादेश होता है। जैसे-त्यं+करोपि-: वकषि। यहां अनुस्वार को कवर्ग परे है इसलिये कवर्ग का पञ्चम ङ् होकर ककार में मिल गया । इसी प्रकार त्वं+लनोपित्यन्त नोषि । इत्यादि । २१-यदि इस्व स्वर से परे जण न हैं। और इन से परे स्वर हो तो इन को द्वित्व होता है । जैसे मुगण+इह-सुगमिह । राजन्+इह-राज निह । प्रत्य- इनमात्मा-प्रत्यास्मा इत्यादि । २२-जन्म थ, त और स परे हों तथ विमर्ग (:) को स् होता है। जैसे:-.. राम:+थं वदति-रामस्थं वदति । देवः तिष्ठतिदेवस्तिष्ठति । यदत्तः सु. नति यादत्तस्सनोति । इत्यादि । २३-यदि विसर्ग से ट ठ और घ परे हों तो विसर्ग को प्रादेश होता है। जैसे:-रामः+टीकते रामष्टीकते । बाल+ठं पठति-बालष्टं पठति । का पगढः कषगढः । कः+षष्ठः काषष्ठः इत्यादि । २४-यदि च छ और श परे तो विसर्ग को श् होता है। जैसे:-हरिः+ चन्द्रः हरिश्चन्द्रः । धनुः+छत्रे-धनुश्लो। शंभुः+शङ्कते शंभुशङ्कत । मृत्यादि। २५-यदि व्यञ्जन परे हों तो म् को अनुस्वार (') होता है। जैसे:- । New waseneements AmrawaRN Home . - .. स्वम् तिष्ठसि स्वं तिष्ठसि । प्राधाम्+गच्छावः आवां गच्छावः । यूयम्+क्रीष्ठ- थम्यूयं क्रीडथ । वयम्+दास्यामः । वयं दास्यामः। धर्मानुकून्नम्+धमम्+देहि धर्मानुकूलं धनं देहि । हरिम्+वन्दे-हरिं वन्दे इत्यादि । २६-यदि प्रकार से परे के विमर्ग को ही परे हो तो उ होता है। जैसे:- रामः+अर्ध्याम+उ+अर्यः, इस में संख्या ७ से अ+उ को पो होकर रामो+ अर्ध्यः, फिर संख्या ४ से अ का लोप होकर रामो पर्यः ॥ २७-यदि ह, य, व, र, ल, न, म, झ, ढ, ध, घ, भ, ल, ड, द, ग, घ, परे हो तो अः को पो होता है । जैसे:-चौर:+हरति चौरो हरति । नरः+याति- नरो याति । अश्वः+रहति साश्वो रहसि । वायवः+धान्ति-वायवो बान्ति । का लोका-को लोकः । शिष्यः+नमति-शिष्यो नमति । रुग्या+म्रियते-रुग्णो मियते । वातः+ननायति-बातो अनानायति। कः ढोकते को ढोकते। धर्मः+घरति-धर्मो धरति । इन्द्रः+घटतेपन्द्रो घटते । पण्ठितः भवति-प- गिडतो भवति । परमेश्वरः+जानाति-परमेश्वरो जानाति । शोभन:+हमरु:- शोभनो उमरुः । देवदत्तः+दास्यति देवदत्तो दास्यति । दूतः+गमिष्यति-दूसो गमिष्यति । दुष्टः+बाधते-दुष्टो बाधते । इत्यादि । २८--यदि इ, उ, ए, ओ, ऐ, ओ, वर्षों से परे विसर्ग हो और विमर्ग से कोई स्वर वा ह, य, व, ल, न, म, #, ढ, ध, घ, भ, ज,उ, द, ग, टा, ये वर्ण परे हों तो विसर्ग को र् होता है। जैसे-शत्रुः+हतः शत्रुर्हतः । हरिः+याति हरियांति । हरेः+ वचनम् हरेर्वचनम् । बाहो+लम्बः बाहोलम्बः । देवैः गौः+गच्छति-गीगछति । कपिः+मृतः कपिमृतः । वायुः+का वायुझ. ना। शंभुः+ढौकते शंभु।कते । वायुः+धरतिषायुर्धरति । इन्दुः+उदेति= इन्दुरुदेति। पत्युः+भार्या=पत्युर्भाये।। विष्णुः+जागर्ति विष्णु जागर्ति। शंभोः+ झुमरुः शंभीई मरः । परयुः+दयिता-पत्युदयिता। कपेः+गर्जनम् कपेर्जनम् । पादयोः+wध:=पादयोबन्धः । इत्यादि । २९-यदि सः और एषः से व्यञ्जन परे हो तो विसर्ग का लोप होजाता है। जैसे-सः गच्छतिस गच्छति । एषः+क्रीडतिएप क्रोति । इत्यादि । ३०-सन्धि उस को कहते हैं जो वर्ण वा पद आपस में मिलकर बोले जाते और उन में जो प्रादेशादि होते हैं । और वह सन्धि इस नियम में होता है- सAmraemonorma ANORAamoumm-onurammar Prava पुल्लिङ्ग ॥ संहितैकपदे नित्या, नित्या धातूपसर्गयोः ॥ नित्या समासे वाक्ये त सा विवक्षामपेक्षते ॥ १॥ अर्थः :--एक पद में और धातु+उपमर्ग में और समाम में मन्धि नित्य अर्थात् अवश्य होता है। और जब पद २ मिलकर वाश्य बनता है तब वक्ता के माधीन है। यह संक्षेप से सन्धि का प्रकरगा पूरा हुआ ॥ Hemb AM - अब अकारान्तादि कम से पल्लिङ्गपाचक शब्दों के सात विभक्तियों और सम्बोधन के रूप दिखनाते हैं- ३१-जिम शब्द का कछ अर्थ हो परन्तु वह के बन्न धातु वा प्रत्यय न हो वह प्रातिपदिक कहलाता है । ३२-प्रातिपदिक से प्रागे भात विभक्तियां होती हैं। अकारान्त राम" शब्द की मात विभक्तियों का वर्णन “संस्कृत भाषा द्वितीय पुस्तक" में गिग्य प्राये हैं उसी रीति से ममम्त अकारान्त शब्दों के रूप होते हैं । परन्तु मर्वनाम संतक शब्दों के रूप में भेद है:- ३३-१, विश्व, उभ, नुभय, अन्य, अन्यता, इनर, इनरप्रत्ययान्त, हता- प्रत्ययान्त, मम, मिम, नेम, एक, पूर्व, पर, अधर, दलिगा, उत्तर, अपर, अधर, स्व, अन्तर, त्यद्, तद्, यद्, एनद्, इदम् , अदम, द्वि, किम् , युरुमद, अस्मद् भयत् । ये ३३ प्रातिपदिक सर्वनाम कहाते हैं । इन में से सर्व ( सम्र ):-- एकवचन-मर्यः-मब मव ने प्रथमा विर्भाक्त द्विवचन--सी= * २ मब, ३ मयों ने बहुवचन-सर्वे * ३ मब, ३ सयों ने एकवचन-मर्यम्-मब को द्वितीया वि० द्विवचन-मा-२ मां को ( बहुवन-मर्वान् ३ सबों को एकवः-सवंगा-सब ने, मे, के माथ ततीया बिल द्विव०---सर्वाभ्याम्-२ मा ने, से, बहुब०-सा-३ सदा ने, मे, - * आगे २ अङ्क से द्विवचन और ३ अङ्क से दो से अधिक ममतो ।। RAMAmandakumma.mammumpirmanmarwar-stepment HAN wapantravawdi २ MAmerime mammumarmume- अकारान्त ॥ चतुर्थी वि० पञ्चमी वि० . १ ३०-सर्वस्मै-सब के लिये २ व.-सर्वाभ्याम्-२ मबा के लिये ( ३ बहुवा-सवेम्यः-३ सबों के लिये १ २०-वस्मात्सब से २०-माभ्याम् -२ मबों से ३ ३०-सर्वेभ्यः-३ सबों से १५-मर्वमा मध का, के, की ठी वि० २ १०-सयाः-२ मबों का, के, की (३ व०-- ममेषाम्-३ सो का, के, की १ व०-मयसिमन्सब में, चै, पर सप्तमी वि० २०-मवयोः-२ गबों में, पै, पर ३ २०-सवेघु-३ सत्रों में, पै, पर सम्बोधन में ! १ हे सर्व हे सब । सम्बोधन हे शब्द के प्रथमा विक २ हे सर्वा-२ सबी बिना भी होता है ॥ ३ हे सर्वे=३ हे सो अकारान्त सर्वनाम "घि व लव शब्द [ विश्वस्मै ( विश्वस्मिन् १* २ विश्वी শিমু। विल्या विश्वेभ्यः विश्वेषु १ विश्वम् सम्बो. हे विश्व মিয়া विश्वाम्याम् धन १ ९ हे विश्वी २ विश्वान् ৰিংক: । विश्यस्य अर्थ-मर्व शब्द के २ विश्वाभ्याम् विश्वयाः समान जानी। विश्वेषाम् “उमदीनां सर्वनाम से सघ विभक्तियों के बल द्विवधन हो पाते हैं। जैसे १ उभी दोनों, ने ५ उभाभ्याम्दानों से २ उमौ-दोनों को ६ उभयो:दानों का, के, की ३ उभाभ्याम् दोनों ने, से, के साथ ७ उपयोः दोगों में, पै, पर उमाभ्याम्-दोनों के लिये हे उगौ-हे दोनो विश्वः ४ ७ ३ विश्वे २ ( विश्वस्मात् A- ५ । हे विश्व १ विश्वेन ३ w ३ विश्वैः धन १ *१,२,३,४,५,६,७ ये अङ्क पुस्तक भर में प्रथमा द्वितीयादि विभक्तियों के हैं । AamrQMALKunkumar mainment www an Hereryolm woman पुल्लिङ्ग ॥ ५ प्रस्यस्थ २ सम्बोधन अन्य शब्द ( और वा दूसरा ) अन्य:-और वा दूमा अन्यात अन्यो= २ और वा दृमरे प्रन्याभ्याम् अन्ये - ३ और वा दूसरे अन्येभ्यः अन्यम्= और को, वा दृमरे को अन्या और दोनो की, वा दूमरों को ६ अन्ययाः अन्यान् = श्री. सब को, वा दूम को अन्येषाम् । अन्येनः- और से, के साथ अन्यस्मिन् ३ र अन्याभ्याम् और दोनों भे, के साथ प्रन्ययाः अन्यः-और सबों में, के माथ সন্তু [ अन्यस्मै पूर्व शवों के तुल्य ही विभक्तार्य हे अन्य अन्याभ्याम् जानने चाहिये ।। हे अन्यो । अन्येभ्यः हे प्रन्ये नभय शब्द ( बहुतों वा एक के दो भाग ) सर्वनाम में सब विभक्तियों के केवल एकवचन और बहुवचन होते हैं, द्विवचन नहीं होता । जैसे:---- १-उभयस्मिन् ३-मयम्यः ३-उभयेषु १-उभयम् १--तुमयसात १-हे उभध ३ नभयान (३-लमयेभ्यः ३-हे उभये १-उभयस्य ६ सम्बोधन प्रथमा विभक्ति ३-उभयेषाम् के तुल्य जानी ॥ अन्य तर शब्द (कोई एक)- [अन्यतर: कोई एक (अन्यताम् किमी एक को १९ अन्य तरीकाई दो अन्यतरी:-किन्हीं दो को अन्यतरे कोई भब । अन्यतरान् किन्हीं सब को [अन्यतरेंगा-किसी एक ने, के माध अन्यतरस्म-किसी एक के लिये २ अन्यतराभ्याम् किन्हीं दो ने, के साथ ४९ अन्यतयाम् = किन्हीं दो के लिये किन्हीं सब ने, के साथ (अन्यतरेभ्यः-किन्हीं मय के लिये । अन्यतरस्मात् इसी प्रकार पलभी अन्यत्र सन् अन्यतराम्याम् षष्ठी या सप्तमी के ६ सान्यतस्योः अन्तर यो ( अन्यतरेभ्यः रूपों के अर्थ जानो ( अन्यतरेषाम् अन्यतयेषु १-उभयस्मै - १ १-उभयः ३-उपये ४ ७ २ ५ १--तमयेन ३-उमयैः 3D अन्यतः अन्यतरा womarwomantmuATORImamaewweeeee 4-coom MailuLJARAN +Animal purn १० प्रकारान्त॥ , इसी प्रकार “इतर (दूसरा ) “कतर,” “कतम ( कौनसा ) “सम (सम) और एक शब्द के रूप तथा अर्थ, जानो ॥ उदाहरण, जैसे:- सर्वो अनः चन्द्रं पश्यति सब लोग चांद को देखता है । मया सर्वे गमि. ष्यन्ति मेरे साथ सब जायगे। अहं सनि पाठयामि=मैं सब को पढ़ाता हूं तैः सर्वैरध्ययन कृतम्-उन सबों ने पढ़ लिया । यजमानः सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो धन ददाति यजमान सब ब्राह्मणों के लिये धन देता है। सर्वेभ्यो याचनं वरं नास्ति सब से मांगना अच्छा नहीं है । सर्वेषां पश्य पराक्रमम्=सबों का पराक्रम देख । सर्वस्मिन् ग्रामे मूर्या वसन्ति-सब ग्राम में मूर्ख बसते हैं। हे सर्वे यूयं नाट्य न पश्यत-हे सबो तुम नांच मत देखो । विश्वे देवाः पश्यत यू. यम् हे सब देवताओ तुम देखो। विश्वभ्यो जनेभ्यः शुभं चिन्तनीयम्सब लोगों के लिये भलाई मोचनी चाहिये । विश्वे भद्राणि पश्यन्तु =मय, सुखों को देखें। समी विद्यामम्पन्नौ भवतः दोनों विद्यायुका दोनों विद्यायुका हैं। इदम् अन्येषां गृहम्=यह औरो का घर । द्वयोरन्यतरः पगिडतोऽस्ति-दोने में कोई एक पशिष्ठत है ।युष्मास्व- न्यतरेण भुक्तम्-तुम सब में किसी एक ने खालिया। सोऽस्मदिनरः पुरुषोऽस्ति-वह दूसरा पुरुष है । युष्मासु कतमः शूरोऽस्ति--तुम में कौनमा शूर है। - स्मासु कतरस्मै दास्यसि द्रव्यम्=तू हम में कौन से के लिये द्रव्य देगा। यः प. गिडतोऽस्ति तस्मै दास्यामि जो पण्डित है उस के लिये दूंगा ॥ ३४-पूर्व, पर, अवर, दक्षिगा, उत्तर, अपर, अधर, स्व, अन्तर इन · सर्व- नामों के प्रथमा विभक्ति के बहुवचन और पञ्चमी तथा मप्तमी के एकवचन में दो दो रूप होते हैं । अन्य सब रूप मर्व शब्द के तुल्य हैं । जैसे:- प्रथमा बहुवचम । उत्तरे, उत्तरा: पूर्वे, पूर्वाः पहिले सब अपरे, अपरा:-दूसरे मष परे, परा:- अगले सब प्रघरे, अघरा:-नीचे के सब प्रवरे, प्रवरा:-उरले मब स्वे, स्वा: अपने सब दक्षिणे, दक्षिणा:-दहिने सत्र अन्तरे, अन्तरा:भीतर वा बाहर के सब स पूर्वेषां कीर्ति श्रुत्वा हृष्टो भवति वह पहलों की कीर्ति को सुन कर प्रसन्न होता है । तेस्मत् परे भवन्ति वे हम से अगले हैं । अवरस्य वाक्पं न श्रूयते- उरले का वचन नहीं सुना जाता है। हम से बांये सब पुखिङ्ग । ११ Arthr.M. - पञ्चमी का एक वचन सप्तमी का एक वचन- पूर्वस्मात् , पूर्वात्=पहिले से पूर्वस्मिन्, पूर्वपहिले में परस्मात् , परात्परले से परस्मिन्, परेपरले में अवरस्मात् , अवरात-उरले से अवरस्मिन्, अवरेजुरले में दक्षिणस्मात् , दक्षिणात्-दहिने से दक्षिास्मिन्, दक्षिणे-दहिने में सत्तरस्मात्, उत्तरात-बांये से सतरस्मिन्, उत्तरे-बाये में अपरस्मात् , अपरात्-दूमरे से अपरस्मिन्, अपरेदूमरे में अधरस्मात्, अधरात् नीचे के से अधस्मिन्, अधरे नीचे के में स्वस्मात्, स्वात्-अपने से स्वस्मिन्, स्वेअपने में अन्तरस्मात्, अन्तरात्बाही या अन्तरस्मिन्, अन्तरेखाहरी वा भीतरी से भीतरी में ३५-प्रथम, चरम, तय, मल्प, भई, कतिपय, और नेम शब्द के प्रथमा विभक्ति के बहुवचन में दो २ रूप होते हैं । जैसेः १-प्रथमाः, प्रथमे-पहिले सत्र । १-अर्धाः, प्र? आधे मब । १-चरमाः, घरमे पिछले सय । १--कतिपयाः, कतिपये-कुछ १-द्वितयाः, द्विलये दो प्रकार के सब या कितने ही सब। ५-अल्पाः, अरूपे थोडे सब । शेष रूप राम शब्द के मदृश होते हैं । नेमाः, नमे-आधे सब । शेष नेम शब्द के रूप सर्व शब्द के तुल्य जानो पपोंकि नेम शब्द की सर्वनाम संजा कह च के हैं । ३६-जिन शब्दों के अन्त में तीय ( प्रत्यय ) है उन के चतुर्थी पञ्चमी और सप्तमी के एकवधनों में दो २ रूप होते हैं । जैसेः द्वितीयस्मै, द्वितीयाय-दूसरे के लिये तृतीयस्मै, तृतीयाय-तोमर के लिये द्वितीयस्मात् , द्वितीयात्-दूसरे से तृतीयस्मात् , तृतीयात्--ती मरे से -- ४ ५ Buriamrended AIMmhe amardwwwnwLAMUNpmusmanAmAyworivariompoonawmnaras ५२ प्राकारान्त ॥ ७ 1 ५ - २ ६ द्वितीयस्मिन् , द्वितीये = दूसरे में तृतीयस्मिन् , तृतीये-तीसरे में ३७-"निर्जर" (देवता) शब्द के रूपों में भी भेद है । जैसे:- । १ निर्जर:=देवता। [ १ निजगत्, निर्जरमः १ २ २ निर्जग, निरमी २ निर्जराभ्याम्-२ देवता से निर्जराः, मिर्जरमः (३ मिर्जरेभ्यः-३ देवता में निर्जरम् , निर्ज मम् १ निरस्य, निर्जनमः २ निर्जरी, निरमो २ निरये:, निरमोः ३ निर्जरान, निर्जनमः ३ निर्जाम् , निर्जरमा १ निर्धारण, निर्जरमा । १ निर्जरे, निर्जरमि २ निग्योः, निर्जरमोः ३ निर्ज: देयता ने ३ निर्जरेषु-३ देवता में १ निर्जराय, निर्जरसे १ हे निर्जर हे देवता ४ २ २ निर्जनाभ्याम् २ निजग, हे निर्मामी ३ निर्जरेभ्यः- ३ निर्जराः, हे निर्जसः उदाहरगाानि:- निर्जरमा मध्ये प्रथमः परमेश्वरीस्ति । युष्मासु कतमश्चमोऽस्ति । द्वि. तये युदाय गच्छन्ति । प्ररूपेन पुरुषार्थेन कार्थ्याग भिदिरपि अल्पा भवति । अर्द्ध पण्डिताय दास्यामि । कतिपयाः वीराः युद्धाय ममर्था भवन्ति । नेम मयं देहि। द्वितीयस्माद् गृहात् आगच्छामि । तृतीयस्मिन् गृहे कोऽस्ति । कतिपये गिजरसः प्रत्यक्षाः न भवन्ति । वायुजलयोः निरसोः कोऽधिकोऽस्ति । उभावपि तुल्यौ ३ २ निर्जराभ्याम् सम्बोधन ( आकारान्ता: ) आकारान्त विश्वपा" (मर्वरक्षक, सबकी रक्षा करने वाला) शब्द के रूपः- विश्वका विश्वपा विश्वपः विश्वपी विश्वपाभ्याम् ५ विश्वपाभ्याम् মিনা: विश्वपाभिः विश्वपाभ्यः विश्याम् विश्व पे विश्वपः নিম্নবী विश्वपाभ्याम् ६ विश्वको विश्वपः विश्वपाभ्यः विश्व पाम् my sansar yound- --rowse romamaramseementum mummunimummrature { विश्वपासु १० हे कवयः पुँल्लिङ्ग ॥ १३ মিনার हे विश्वाः विश्वपोः सं० हे विश्वपी हे विश्वपा: इसी प्रकार शंखध्माण (शङ्ख बजाने वाला) नादि शब्दों के रूप होते हैं। जैसेः १-शङ्खधमाः २-शङ्खध्मी ३-शवमाः इत्यादि ॥ उदाहरगानि- विश्वपां जगदीश्वरं स्तत्वा पाठः कार्यः-सर्वरक्षक परमेश्वर की स्तति कर के पाठ करना । शङ्खध्माः युद्धे शङ्खान धमन्ति-शङ्ख बजाने वाले युद्ध में शङ्ख को बजाते हैं। विश्वपा ईश्वरे सर्वेषां रक्षा कृतामरक्षक ईश्वर ने मन की रक्षा की। वयं विश्वप: पानं कर्त गच्छामः हम मत क्ष की प्रार्थना करने को आते हैं । विश्वपि विश्वे जनाः तिष्ठन्ति= सर्वरक्षक में सब जन ठहरते हैं । इत्यादि । (कारकारान्त ) इकारान्त पलङ्ग “कवि” शब्द के रुप जैसे कविः-कवि भादर" कवेः-कवि से कधी-२ कवि कविभ्याम्-२ कवियों से कवयः-३ कवि कविभ्यः=३ कधियों से कत्रिम् कवि को कवेः-का, के, को की=२ कवियों को कव्याः-२ का, के, की कवीन्-३ कवियों को कवीनाम=३ का, के, की, कधिना-कवि ने, के माथ की-में, पै पर कविभ्याम्-२ ने, के साथ कन्यो:--२ में, पै, पर कविमि:=३ ने, के साथ कविषु-३ कवये- कधि के लिये हे कवे हे कवि कविभ्याम् =२ कवियों के लिये सं. है कबी हे २ कवियो उकारान्त भानु” शब्द के रूप जैसे भानुः सूर्य भानुना-सूर्य ने, के साथ भानू-२ भानुभ्याम्-२"" मानवः-३ भानुभिः-३ भानवे सूर्य के लिये भान-२ " का भानुभ्याम्-२ भानून-३॥ का भानुभ्यः-३ ५ . ह ३ 20 कविभ्यः-३ -- ३ " भानुम् मूर्य को ४ Rampawa Mod १४ इकारोकारान्त ॥ सं० -- भानोः सूर्य से | भानौ-सूर्य में, पै, पर भानुभ्याम्-२ ७ { भान्यो:-२ ,, भानुभ्यः-३" भानुषु-३ भानो-सूर्य का, के, की । हे भानो भावोः-२ हे भान भाननाम्-३ हे भानसः ३८-इमी प्रकार हरि, ऋषि, मुनि, गिरि, रवि, कन्नि, निधि, विधि आदि इकारान्तों और वायु, पायु, मायु, विष्णु, शम्भु, प्रभु, विभु आदि उकारान्त पुं- लिङ्ग शब्दों के रूप जानने चाहिये । केवल पति शब्द में इतना भेद है कि:- तृतीया-एकवचन-पत्यापति ने, के साथ चतुर्थी-एकव०-पत्ये पति के लिये पञ्चमी, षष्ठी-एकबा-पत्युः-पति मे, वा का, के, की सप्तमी-एकवचन-पत्यौपति में, पै, ३९-शेष मम रूप कवि शब्द के मदृश होते हैं। हां, पति शब्द जब कि- सी शब्द से मिलकर समास में प्राता है तो यह भेद नहीं होता किन्तु सभी रूप "कवि, के तुल्य होते हैं। जैसे:- भूपसिना ( तृ०१) प्रजापतये (चतु०१) गोपतेः (षष्ठी१) गोपती (सप्तमी१) इकारान्त “कति शब्द (कितने) के रूप केवल बहुवचन में आते हैं। जैसे:- १ कति कितने ५ कतिभ्यः-कितनी से ६ कतीनाम् " का, के, की ३ कतिभिः कितनो ने, के साथ ७ कतिषु में, पै, पर ४ कतिभ्यः-कितनों के लिये उदाहरणानि:- कविः काव्यं करोति कधि काव्य को बनाता है। हरी क्रोतः=२ हरि खेलते हैं । ऋषयस्तपश्चः-सब ऋषि तप करते थे। रामो विश्वामित्रं मुनि पप्रच्छ रामचन्द्र ने विश्वामित्र मुनि को पूंला था । वी गिरी कीदृशौ शोभेते- दो पर्वत कैसे सुहाते हैं। किं त्वं रवीन बहून् मन्यमे? क्या तू मूर्यों को बहुत से मानता है ? । कलिनाधर्मों वर्धितः कलियुग ने अधर्म बढ़ाया है। न कलिरधर्म हेतुरस्ति=कलियुग अधर्म ~~ हेतु नहीं । द्वौ निधी प्राप्तौ-दो - - m 24-h-n गुदा - १ द्वौ-दो पुंलिङ्ग ॥ १५ खजाने पूरे हैं। तैर्विधिभिः कार्य करणीयम्सुन विधियों के साथ कार्य करमा चाहिये । वायवे स्वाहा=वायु के लिये प्राप्ति । शम्भत्रिष्णभ्यां नमः शम्भु और विष्णु दोनों के लिये नमस्कार । प्रभुभ्यो नम:=प्रभुओं के लिये नमस्कार । अशी-रोगे पायोः रुधिरवर्षा भवति-बवासीर-रोग में से रुधिरवर्षा होती है। शम्भुविष्णुभ्यां धनुषी गृहाण=शम्भु और विष्णु से २ धनुषों को ग्रह पा कर । वायूनां कोपः वायुओं का क्रोध । घरकारके मायो पर्पटस्य क्वाथं पिबेत्= उपर कारक पित्त में पितपापड़े का क्वाथ (काढ़ा) पीवे। मायुधास्वोमहवलम्-- पित्त वायुषों का बड़ा बल है। कविषु चातुर्य भवति-कत्रियों में चतुराई होती है। हे हरे ! मां रक्ष-हे हरि मुस को बचा । हे मुनयो! धर्म ब्रूत-हे मुनियो! धर्म को बतायो । कति छात्राः पठन्ति:= कितने विद्यार्थी पढ़ते हैं ? । कतीनां छात्राणां पाठः श्रुतः ? =कितने विद्यार्थियों का पाठ सुना । इत्यादि । ३९-“द्वि" शब्द केवल द्विवचन में भाता है। जैसे:- ५ द्वाभ्याम्=दोनों से २ द्वौदोनों को ६ द्वयोः दोनों का, के, की द्वाभ्याम् दोनों ने, से, के साथ ७ द्वयोः दोनों में, पै, पर ४ द्वाभ्याम् दोनों के लिये सम्बोधन नहीं होता ॥ ४०-सखि शब्द में बहुत भेद हैं । जैसे:- ( सवा मित्र सखायम् मित्र को [सख्या-से, ने मरवायो-२, २ सखायौ-२" सखिभ्याम् -२ मखाया-३॥ सखीन्-३ सखिभिः सख्ये-के लिये सख्युः सख्युः-का, के, की सखिभ्याम्-२" मखिभ्याम्-२ ॥ सख्यो: सखीनाम्-३॥" मख्यो-में सखे “त्रि” शब्द केवम्न बहुवचन में प्राता है सख्यो:-२" सं० हे रसायो १-त्रयः । २-त्रीन् । ३-त्रिभिः । सखिषु-३ हे सखायः ४-त्रिभ्यः । ५-त्रियः । ६. प्रयाणाम् । ७-त्रिषु । उदाहरणामि- पाठयसि-तू कितने विद्यार्थियों को पढ़ाता है। कतिभिः 8 ३ -से - - ४ ५ ह २ सखिभ्यः-३ सखिभ्यः-३ - कति छात्रान् Amwomaecon ३ १६ ईकारान्त ॥ - पप्या पिप्यः १ २ पप्यो (पपीम् २ सखिभिः क्रीडसि-तू कितने मित्रों के साथ खेलता है। सखिभ्यो हितं करणी- यम्-मित्रों के लिये हित करना चाहिये। द्वौ सखायी परस्परं हमतःदो मित्र आपस में हंसते हैं। सख्यो विश्वमिहि-मित्र में विश्वास कर । सखीनां वचनं हितकारि भवति=मित्रों का वचन हितकारी होता है । सस्युर्मा बिभीत=मित्र से मत डरो। त्रयाणां भागः-तीनों का भाग। ४१-ईकारान्त पपी (सूर्य) शब्द के रूप । जैसे: [पपीः पपी ३ १ पपीभ्याम् ५ र पपीभ्याम् ७ र पप्योः । पप्यः (पपीभिः पपीभ्यः (पपोष पप्ये ( पप्यः हे पपीः पप्पो ४ ( पपीभ्याम् ६ र पप्योः सं० हे पप्यो पपीन् पपीभ्यः पप्याम् हे पप्यः इसी प्रकार ल्वातप्रमो» आदि शब्दों के रूप हैं । पपी: उदेति मूर्य उदय होता है । वातप्रमीं पश्य-बायुमापने वाले को देख । पप्या शुक्रः उदेति सूर्य के साथ शुक्र उदय होता है। याताम्ये पारितोषिकं देयम् वायुमापक के लिये इनाम देना चाहिये । पथ्यः अर्चिषो निस्सरन्ति=सूर्य से किरणें निकलती हैं। वातप्रम्यो बुद्धि पश्य-वायुमापक की बुद्धि को देख ॥ ! बहुश्रेयसी ( बहुश्रेयस्यै ! बहुश्रेयस्याम् १९ बहुश्रेयस्यौ बहुश्रेयसीभ्याम् बहुश्रेयस्योः बहुश्रेयष्यः बहुश्रेयसीभ्यः बहुश्रेयसीषु [ बहुश्रेयमीम् ! बहुश्रेयस्याः हे बहुश्रेयसि बहुश्रेय त्यो बहुश्रेयसीम्याम् सं०१ हे बहुश्रेयस्यो बहुश्रेयसीन् ( बहुश्रेयसीभ्यः हे बहुश्रेयस्यः | बहुश्रेयस्या । बहुश्रेयस्याः बहुश्रेयसीभ्याम् बहुश्रेयस्योः । बहुश्रेयसीभिः बहुश्रेयसीनाम् ४२-बहुलक्ष्मी शब्द में केवल प्रथमा विभक्ति के एकवचन में इतना भेद है कि- महुलक्ष्मी:, यह विसर्गान्त रूप होता है । शेष सब रूप बहुश्रेयस) के तुल्य होते हैं। ४ ५ पुंलिङ्ग ॥ प्रध्या ५ [ प्रध्ये २ w प्रध्यः २ ४ । नीभिः हे नीः ७ ईकारान्त प्रधी ( पगिडत ) शब्द के रूप । जैसेः- (प्रधीः [ प्रध्याः प्रधिय प्रध्या प्रधीम्याम् प्रधीभ्याम् प्रध्योः प्रघोभिः प्रधीभ्यः प्रधीषु मध्यम् । प्रध्या: ! हे प्रधि प्रध्या ४ प्रधीभ्याम् प्रध्योः हे प्रध्यौ प्रधीभ्यः प्रधीनाम् हे प्रथ्यः ४३-चमी प्रकार ग्रामणी और सेनानी शब्दों के रूप हैं । परन्तु भातमी के एकवचन में इतना भेद है कि:-ग्रामण्याम् । मेनान्याम् । शेष प्रधीवत् ॥ ४४--जिन शब्दों में केवल एक स्वर है उन के रूप भिन्न हैं। जैसे:- नीः [ नियम् [ निया निये नियो मियो ३ ९ नीभ्याम् नीभ्याम् नियः नियः नीभ्यः निया: । निया: [ नियाम् ५ . नीभ्याम् ६ रं नियोः नियोः सं० २ हे नियो नीभ्यः नीमाम् हे नियः - सुश्री, और न्यवक्री” आदि शब्दों के रूप भी «नी" शब्द के तुल्य जानो परन्तु सुश्री" शब्द के सम्बोधन एकवचन " शब्द के सम्बोधन एकवचन में ह्रस्व इकार रहता है। जैसेः हे सुनि॥ “सुधी” और “शुद्धधी, शब्द भी “सुश्री” शब्द के ४६-~-क्रोष्टु" शब्द उकारान्त है परन्तु «भानु” शब्द के तुल्य नहीं क्योंकि उस के रूपों में बहुत भेद है । जैसे: क्रोष्टा क्रोष्ट्रे, क्रोष्टवे कोष्टारि, क्रोष्टी क्रोष्टारो कोष्टुभ्याम् क्रोष्ट्रोः, क्रोष्ट्वोः क्रीप्टारः क्रोष्टुभ्यः क्रोष्टुषु क्रोष्टारम् हे क्राष्टः क्रोष्टारी सं० हे क्रोटारी क्रोष्टून क्रोप्नुपः हे क्रोधारः कोष्टा, क्रोष्टुना फोटुभ्याम् कोष्टीः, क्रोष्ट्री: क्रोष्टुभिः क्रोष्ट्रनाम् ( नीषु तुल्य हैं। ४ क्रोष्टुः, क्रोष्टोः १ काभ्याम् कोष्टुः, क्रोष्टोः my १८ अकारान्त॥ उदाहरणानि:- - को सब पपी: उदेति-मूर्य उदय होता है। वातप्रम्यौ गच्छतः दो वायुमापक जाते हैं । करलो राजाम: a महुश्रेयस्यः" भवन्ति=कलियुग में राजे लोग बहुत स्त्रियों धाले, हैं । बहुलक्ष्मी नरं सर्वे चाटु वदन्ति हुन वाले पुरुष लोग खुशामद को कहते हैं। प्रध्यौ पश्य=* २ विशेषबुद्धि वानों को देख । ग्रा. मारयः पश्य-ग्राम के नेताओं को देख । सेनान्या महायुद्धं कृतम् सेनापति ने बड़ा युद्ध किया । नीभ्यां गच्छ-२ ले चलने वालों के साथ जा । सुश्रीभिः राजभिः महान् यजः कृतः उत्तम धन वाले राजों ने महान् (बड़ा) यज्ञ किया। यवक्रयः यवान् देहि जौ खरीदने वाले के जौ दे। सुधीभ्या दक्षिगां देहि२ उ. त्तम बुद्धि वालों के लिये दक्षिमा दे। शुद्धधीभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः पवित्रघुद्धि- ब्राह्मणों के लिये नमस्कार । क्रेष्टुः मा बिभीत-गाल से मत डरो। वातप्रमो. भ्यां तद्विद्यां गृहाण २ वायुमापकों से उन की विद्या को ग्रहगा कर । बहुश्रेयसीनां धातुः क्षीगो भर्याप्त बहुत स्त्री वालों का धातु क्षीण होता है। बहुस्नधम्या: मान्यं सधै कुर्वन्ति-बहुधनी का मान्य सब करते हैं । प्रधीम्यः किं न सिध्य- ति तीव्रबुद्धि वालों से पा नहीं सिद्ध होता ? । ग्रामगोर्धनं देहि=२ ग्राम के नेताओं का धन दे। सेनानीनां बलं पश्य-सेनापतियों के बला को देख । सुप्रियां “चाटुकाराः” मा भवत=बहुधनियां की खुशामद करने वाले" मत होओ। यव- योरस्ति धैर्याम्=२ जो खरीदने वालों में धैर्य है । क्रोष्टुषु परस्परस्य रुतं शृणु-टगालों में आपस के शब्द को सुन । हे बहुश्रेयमि ! बहु मा क्रो-हे बहुस्त्रीक बहुत मत क्रीडा कर । हे महुलक्ष्म्या गवं मा कुरुतम्= २ हे बहु ध. नियो ! गर्व मत करो। हे ग्रामण्यः कृषकान् दुःखितान् मा कुरुत हे ग्राम के नेताओ ! कृषकों को दुःखित मत करो । इत्यादि । अति चमः अतिचम्बा [प्रतिचम्वाः अतिधम्वाम् १ २ प्रतिचयो ३ अप्तिचमभ्याम् ५ १ अतिवमभ्याम् ७ प्रतिधम्योः । अतिचम्वः प्रतिचमाभिः तिचमभ्यः अतिचमष अतिचमूम् (असिचस्व [प्रतिवम्वाः हे अतिचमु प्रतिघम्वी ४ अतिचमूभ्याम् ६ अतिवम्वोः सं० हेअतिचम्वी (अतिवमन् সুদিঘমুম: अतिचमूनाम् (हे प्रतिधम्वः * द्विवचन का चिन्ह अङ्क २ है ॥
पुल्लिङ्ग १९ AVRAN स्वभूः ५ खलव: ६ खस्नपत्रोः खम्नषा (स्वभुवे ४ खजस्वी ४ हे स्वभुवः [खन पू: ( खलप्वः स्वभुवः खलवी खमपूभ्याम् १ १ स्वभुवी ५ स्वभूभ्याम् खलपूयः स्वभुवः स्वभूभ्यः खलप्वम् खलप्य: स्वमुत्रम् स्वभुवः खलप्वी २ १ स्वभुवी ६ १ स्वभुषोः गुलपूनाम् स्वभुवः स्वभूनाम् रखस्नरिव মা মুমি खलपूभ्याम् खस्नप्वोः ३ स्वभूभ्याम् ७ / स्वभुयोः स्खलपूभिः खलपूषु स्वभूभिः स्वभूषु खानप्ले हे खलपूः स्वभूः खस्नपूभ्याम् सं० स्वभूभ्याम् सं० हे स्वभुवी खलपूभ्यः स्वभूभ्यः ४७- स्वयम्भ' शब्द भी स्वभूग " के तुल्य है । परन्तु “ वर्षाभू" « पुन " "दृन्भ" " काभ, ये चार शब्द ये चार शब्द “स्वभू” के तुल्य नहीं किन्तु “खलपू " शब्द के मदृश हैं । और “सुलू " पवन " मादि शब्द तो खलपू " शब्द के तुल्य हैं ही। जैसे:- अतिवमविजयते अधिक मेना बाला जीतता है । खलप्या कीदृशी स्फू. तिः प्राविष्क्रियतबुहारने वाले ने कैसी फुरती प्रकट करी है । जीवात्मा परमात्मा च द्वावपि स्त्रभुवी स्तःजीव और ब्रह्म दोनों ही अजन्मा ( स्वभू ) हैं । योऽपि स्वयम्भुवः सन्ति जीव ईश्वरः प्रकृतिश्च-तीनो ही अजन्मा हैं जीव, ईश्वर और प्रकृति । शब्दायमान वर्षाभ्वं पश्य=बोलते मैं डक को देख । कि शास्त्रं पुनर्भुवं निन्दतिया शास्त्र दूसरे बर को निन्दा करता है । ? «य- यस्वः” “सुरुवः सन्ति यवकाटने वाले" “अच्छे काटने वाले हैं। स्वयम्भवे ममः स्वयम्भ के लिये नमस्कार । वर्षाभत्रः भयं मा कुरु-मैंटक से भय मत कर । :यवस्वोः, हम्सा लूनी व काटने वालों के, २ हाथ कट गये। हे स्वय- म्भः परमेश्वर ३ अस्मान् रक्ष-हे अजन्मा परमेश्वर हम को रक्षा कर । हे ख- लप्त्री तिष्ठतम् ऐ बुहारने वालो ठहरो ॥ ऋकारान्त "विधातृ” शब्द ॥ -विधाता रविधातारी इसिधासारः २-विधातारम् २विधातारी ३विधातून ३-विधात्रा विधातृभ्याम् ३विधातृभिः ४-विधात्रे विधातुभ्याम् ३विधातृभ्यः - .. २० ar, ओ, प्रौकारान्त ॥ १-पिता रपितरौ ३पितॄन् १-गौः ५-विधातुः २विधातम्याम् ३विधातृभ्यः ६-विधातुः विधात्रोः ३विधातृगाम् ७-विधातरि विधात्रोः ३विधातृषु सं० हे विधातः हे विधातारौ हेविधातारः रप्रितरी ३पितरः २-पितरम् प्रागे विधातु शब्द के सदृश है ॥ ४८- धातृ नतृ” “त्वष्टु” «क्षत्तृ "होत” प्रशास्त) इत्यादि शब्दों के रूप तो विधातृ" शब्द के तुल्य हैं परन्तु “जामातृ” “भ्रातृ" परन्तु “जामात” भातृ” और “न” शब्द के रूप प्रथमा और द्वितीया के द्विवचन तक पितृ" शब्द के तुल्य हैं । ४९-केवल “नु" शब्द के षष्ठी बहुवचन में-नगाम्, नृणाम् । ये दो रूप होते हैं। मोकारान्त "गो” शब्द के रूप ॥ गावी ३गावः । २-गाम् शाखौ ३गाः । ३-गवा रंगोभ्याम् ३गोभिः । ४-गवे गोभ्याम् ३गोभ्यः । ५-गोः गोभ्याम् ३गोभ्यः । ६-गोः गयोः ३गवाम् । ७-गवि गयोः ३गोषु । सं०-हे गौः रहे गावी हे गावः । “यो मादि शब्दों के रूप «गो" शब्द के सदृश हैं। ऐकारान्त “रै” शब्द ॥ रायो ३रायः । २-रायम् रायो ३रायः । ३-राया शम्याम् ३राभिः । ४-राये राभ्याम् राभ्यः। ५-रायः राभ्याम् ३राभ्यः । ६-रायः रायोः ३रायाम्। ७-रायि रायोः ३राम । सं०-हेराः रहे रायौ ३हे रायः॥ औकारान्त "ग्लौ" शब्द ॥ शलावा ३लावः । २-ग्नावम् ग्लावी ३जनावः। ३-लावा ग्लोभ्याम् ३ग्लोभिः । ४-लावे ग्लीभ्याम् ३ग्लौम्यः। ५-रलायः ग्लोभ्याम् ग्लौभ्यः । ६--नावः ग्लावो: ३ग्लावाम् । ७-लावि चलायोः ३ग्लौष । सं०-हेग्लीः रहेग्लावी हैग्लावः ॥ सब ऐकारान्त शब्द रे" शब्द के तुल्य और सब नौकारान्त शब्द ग्लो” शब्द के तुल्य हैं। उदाहरण- हे विधातः ! दयां कुरु-हे ईश्वर ! दया कर। पितरौ मेत्रस्व-२ पितरों को सेवाकर । धात्रा जगत् रचितम् प्रभु ने जगत रचा। पितामहो नपने मिष्टं १-रा: १-ग्लीः - ". ३३, मिङ्ग । .. २१ oricket ददाति बाबा पोते के लिये मिठाई देता है। त्वष्टुः मन्जूषामानय बढई से सिन्दुकधी को ला । सेवा क्षत्तुः धर्मोऽस्ति सेवा शूद्र का धर्म है। प्रशास्तुणा- माना मन्तव्या हाकिमों की प्राज्ञा माननी चाहिये । जामात्र कन्यां ददाति- जामाता के लिये कन्या को दान करता है। नृषु देवेष च किमन्तरमस्ति मनुष्यों और देवतों में या अन्तर । भातरौ रामलक्ष्मणौ बभूमतुः रामलक्ष्मण २ भाई थे। गां देहि गौको दे। द्यौः प्रकाशते=आकाश प्रकाशित होरहा है। राया सर्वाणि कार्याणि सिध्यन्ति धन के साथ सब कार्य सघते हैं। ग्लावः करा: शीतलाः सन्ति चन्द्रमा की किरणें ठगढी हैं । इत्यादि । हकारान्त “मधुलिह” शब्द ।। -मधुलिट् , इ २ मधुलिहौ ३ मधुनिहः २-मधुनिहम् २ मधुनिही ३ मधुनिहः ३-मधुलिहा २मधुलिड्भ्याम् ३मधुनिभिः ४--मधुलिहेश्मधुलिड्भ्याम् ३मधुलिङ्म्यः ५-मधुमिहः २मधुलिड्भ्याम् ३मधुलिड्भ्यः ६- मधुलिहः २मधुलि होः३मधुलिहाम् ७-मधुलिहि २ मधलिहोः ३ मधुलिट्स, मधुनिट्सु ॥ ५०-प्रथमाविभक्ति में हे लगाने से सम्बोधन बनता है। १-मित्र ध्रुक , मिनध्रुम् , मिनध्रुट , भित्रध्रुड् । २ मित्रदुही ३ मित्रद्रहः । २-मित्रद्नुहम् मित्रद्रही ३मित्रद्रुहः । ३-मित्रद्रुहा मिनध्रुभ्याम् , मित्रध्रुड्भ्याम्। ३मित्रभूमिः, मित्रभिः । ४-मित्रद्रुहे मित्रध्रुग्भ्याम् , मित्रध्रुभ्याम् ३मित्र. ध्रुभ्यः, मित्रध्रुभ्यः । ५-मित्रद्रुहः मित्रध्रुग्म्याम् , मित्रध्रुभ्याम् ३मिन्नध्रुग्भ्यः, मिनध्रुभ्यः । ६-मित्रद्रुहः रमिनद्रुहोः ३मित्रगुहाम् । ७-मित्रद्रुहि मिन्ननुहोः मित्रघंटत्सु, मित्रध्रुट्स, मित्रध्रुक्षु । सम्बोधन प्रथमा के तुल्य है। १-गोधुक् , गोधुम् २ गोदुहौ ३ गोदुहः । २-गोदुहम् २ गोदुहौ ३ गोदुहः । ३-गोदुहा २ गोधुभ्याम् ३ गोधुग्भिः । ४-मोदुहे २ गोधुरभ्याम् ३ गोधुग्भ्यः । ५-गोदुहः २ गोधुभ्याम् ३ गोधुग्भ्यः । ६-गोदुहः २ गेदुहोः ३ गोदुहाम् । ७-गोदुहि ३ गोदुहोः ३ गोधुक्षु । सं० प्रथमा के तुल्य ५१-तत्वमुह स्नु और स्निा शब्दों के रूप मित्र ह” शब्द के w तुल्य हैं। १-भारबाट् , भारवाड २ भारवाही ३ भारवाहः । २-भारवाहम् २ भार. वाही ३ भारोहः । ३-भारोहा २ भारवाड्भ्याम् ३ भारवाभिः । ४-भारोहे Home- २२ हार,मकारान्त ॥ N ........ ... ने भारबाभ्याम् ३ भारवाड्यः । ५-भारोहः २ भारवाड्भ्याम् ३ भाग्वाभ्यः । ६-भारोहः २ भारोहोः ३ भारौहाम् ७-भारोहि २ भारोहोः ३ भारवाट्सु । सम्बोधन धना के तुल्य जानी ॥ १-मनहान २ अनड्डाही ३ ममदाहः । २-अनशाहम् २ अनड्वाही ३ अ- महुहः । ३-अमडुहा २ अनडुद्भ्याम् ३ अनडुद्भिः । ४-अनछुहे २ अनडुभ्याम् । ३ अनहुभ्यः ५-अनाहः २ भनठुझ्याम् ३ अनहद्भ्यः । ६-प्रमहः २ अन. छुहोः । ३अम/हाम् । ७--मनहु हि २ अनछुहोः ३ अनछुत्सु । सम्बो०- हे अम- वन् २ हे अमवाही ३ हे अनछुवाहः ।। ५२-“तुरामाह” शब्द “मधुलि के तुल्य है परन्तु इतना भेद है कि जहां ह को ड् वा ट् होता है वहां २ मा को पा ऐसा मूर्धन्य होता है । जैसे- तुराषाङ् । तुगषाट् । इत्यादि । मधुग्निट् रसं लेढि=ोरा रस को चाटता है । मित्रद्रहः मुखं नाऽवलोक- नीयम्= मित्रद्रोही का मुंह न देखना चाहिये। गेोदुहम् प्रायस्व-गौदुहने वाले को बुलाना । तमुहा भूमः कृतः तस्वभूला भग किया । म्नुहः दन्तधावनं समीचीनं सम्पद्यते मिहोड़े की दतीन अच्छी बमती है । स्निहे प्रियं वस्तु देहि- प्यारे के लिये प्यारी वस्तु दे । भारीही भारम् उद्धर-धो उठाने वाले से बोक उतार । अनडुहां बलं पश्य-बैलों का बल देख । तुरापाड् जानवर्षाः करोति= इन्द्र जल वर्षाओं को करता है । इत्यादि । रेफानन-चतुर" शब्द केवल बहुवचन में है जैसे:- १-चत्वारः । २-चतुरः । ३--चतुर्भिः । ४-चतुभ्यः । ५-चतुभ्यः । ६-च- तुर्णाम् । ७-चतुर्यु। मकारान्त "प्रशाम्” शब्द- १~-प्रशान् २ प्रशामौ ३ प्रशामः । २-प्रशामम् २ प्रशामी ३ प्रशामः । ३-प्रशामा २ प्रशान्भ्याम् ३ प्रशानिमः । ४-प्रशामे २ प्रशान्भ्याम् ३ प्रशाम्भ्यः । ५-प्रशामः २ प्रशाम्भ्याम् ३ प्रशाम्पः । ६-प्रशामः २ प्रशामोः ३ प्रशामाम् । ७-प्रशामि २ प्रशामोः ३ प्रशान्सु । हे प्रशान् । हे प्रशामौ । हे प्रशामः ॥ ५३-०किम्शब्द सर्वनाम है और उस के रूप “सर्व” शब्द के तुल्य होते हैं । जैसे-कः को के । कम् को कान् । इत्यादि ।
- - - पुंलिङ्ग ॥ मकारान्त “इदम्" शब्द सर्वनाम । जैसेः- १-अयम् । इमी । इमे । २-इमम् । इमौ । इमान्, एनान् । ३-अनेन, एनेन । प्राभ्याम् । एभिः । ४-अस्मै । प्राभ्याम् । एभ्यः । ५-अस्मात् । भाभ्याम् । एभ्यः । ६-अस्य । अनयोः, एनयोः । एषाम् । ७--अस्मिन् । अनयोः, एनयोः । एषु । उदाहरण- चतुभ्यो देह=चारों के लिये दे। प्रशामं पश्य-प्रशाम् को देख। इमो कस्य पुत्री स्तः=ये २ किस के पुत्र हैं। अनेन व्याकरणम् मधीतम् एनम् न्यायमध्या- पय=इम ने व्याकरण पढ़लिया इस को न्याय पढ़ाव । इत्यादि । नकारान्त. “राजन्” शब्द । जैसेः १-राजा । राजानौ । ३राजानः । २-राजानम् । राजानी । ३रातः । ३-राजा । राजभ्याम् ३राजभिः । ४-राज्ञे । २राजभ्याम् । ३राजभ्यः । ५-राज्ञः । २ राजभ्याम् । ३राजभ्यः । ६-राजः । राज्ञोः । राज्ञाम् । ७-राजि, राजनि । राज्ञोः । ३राजसु । सम्बो० हेराजन् । रहेराजानौ । हेराजानः ॥ १-यया । श्यवानी । ३यज्धानः । २-यज्वानम् । २यज्यानो । ३यज्वनः । ३-यज्वना । श्यज्वभ्याम् । ३यज्वभिः ४-यउयने । श्यज्यभ्याम् । ३यउपयः । ५-यज्वनः । त्यउवभ्याम् । ३यजत्रभ्यः । ६-यज्वनः । श्ययनोः । यज्वनाम् । ७-यज्वनि। श्यज्वनोः । ३यज्वमु । सं०-हे यज्वन् । २हे यज्वानो । ३हेयज्वानः ।। ५४-“ब्रह्मन्” शब्द অতনু के तुल्य परन्तु म को ण हो जाता है। जैसे-ब्रह्माणी । ब्रह्माणः । इत्यादि । १-ब्रह्महा । ब्रह्महणी । ३ब्रह्महणः । २-ब्रह्महणम् । २ब्रह्महणौ। ब्रह्मनः । ३-ब्रह्मना । ब्रह्महभ्याम् । ३ब्रह्महमिः।४-ब्रह्मघ्ने । ब्राहभ्याम् । ३ब्रह्महभ्यः । ५-ब्रह्मनः । ब्रह्महभ्याम् । ३ब्रह्महभ्यः । ६-ब्रह्मनः । ब्रानोः । ३ब्रहानाम् । ७-ब्रहानि, ब्रह्माणि । ब्रह्मनोः । ३ब्रह्महसु । सम्बोधन- हे ब्रह्महन् । २ हे ब्रह्महणौ । ३हे ब्रह्महणः ॥ १-मघवा, मघवान् । २मघवानी, मघवन्ती । मघवानः, मघवन्तः । २-मघवानम्, मघवन्तम् । मघवानी, मघवन्तौ । मघोनः, मघवतः । ३-मघोना, मघवता । २मघवम्याम् , मघवद्भ्याम् । ३मघवभिः, मघवद्भिः । भी है - . ४ नकारान्त ॥ .. ४-मघोगे, मघवते । मघवभ्याम् , भवद्भ्याम् । मघवभ्यः, मघवम्यः । ५-मघोना, मघवतः । मघवभ्याम् , मघवद्भ्याम् । मघवभ्यः, मघवद्भ्यः । ६-मघोनः, मघवतः । मघोनोः, मघवतोः । मघोनाम् , मघवताम् । ७-मघोनि, मघवति । मघोनोः, मघवतोः । मघवसु, मघवत्सु । संबी० हे मघवन् । हे मघवानी, हे मघवन्तौ । हे मघवानः, हे मघवन्तः ॥ १-श्वा । श्वानी । श्वानः । २-श्वानम् । श्वानौ । शुनः । ३-शुना । श्वम्याम् । श्वमिः । ४-शुने । श्वभ्याम् । श्वभ्यः । ५-शुनः । श्वभ्याम् । श्वस्यः । ६-शुनः । शुनोः । थुनाम् । ७-शुनि । शुनोः । श्वसु । सम्बो० हे श्वन् । हे श्वानौ । हे श्वानः ॥ १- युवा । युवानी । युवानः । २-युवानम् । युवानी। यूनः । ३-यूना । युवभ्याम् । युवभिः । ४-यूने । युषभ्याम् । युवभ्यः । ५-यूनः । युवभ्याम् । युवभ्यः । ६-यूनः । यूनोः । यूनाम् । ७-यूनि । यूनोः । युवसु । सं०-हे युधन् । हे युवानौ । हे युवानः ॥ उदाहरण- राजा प्रजाः पालयति राजा प्रजाओं को पालता है। यज्वानः यजन्ति= यज्ञका लोग यज्ञ करते हैं। ब्रह्मणे नमः ब्रह्मा के लिये नमस्कार । ब्रमनः दण्डय-ब्रह्महत्यारों को दगड दे। मघयतो भागः इन्द्र का भाग। श्वभिर्भुक्त कुत्तों ने खालिया। यूनां विवाहः कार्य: जवानों का विवाह करना चाहिये। राजानं पश्य-राजा को देख । ब्रह्मणः प्रसा: प्रजायन्ते ब्रह्म से प्रजा उत्पन्न होती हैं। ब्रह्महणेा नरकं यान्ति-ब्रह्महत्यारे भरक को जाते हैं। राक्षसाः शुनो भुजते राक्षस लोग कुत्तों को खाते हैं । हे राजन् पाहि माम्-हे राजा बचा मुक्त ।हे युवानी कुत्र गच्छथः हे २ जवानो कहां जाते हो । हे ब्रह्महणः धिक युष्मान् हे ब्रह्महत्यारो धिक्कार है तुम को । इत्यादि । पथिन् ,, शब्द ॥ १-पन्थाः । पन्थानी । पन्थानः । २-पन्थानम् । पन्थानी । पथः । ३-पथा । पथिभ्याम् । पथिभिः । ४-पथे । पथिभ्याम् । पथिभ्यः । ५-पथः । पथिभ्याम् । पधिभ्यः । ६-पथः । पयोः । पथाम् । ७-पथि । पथोः । पथिषु । सं० हे पन्थाः । हे पस्थानौ । हे पन्थानः ॥ पथिन् शब्द तुल्य ही मिथिन् शब्द है ॥ के anwww - पुंलिङ्ग ॥ ९-ऋभुक्षाः । ऋभुक्षाणी । ऋभुक्षाणः । २-ऋभुक्षाणम् । अभुक्षाणी । ऋभुक्षः । ३-ऋभुक्षा । ऋभुक्षिभ्याम् । ऋभुक्षिभिः । ४-ऋभुक्षे । ऋभुक्षिभ्याम् । ऋभुक्षिभ्यः। ५-ऋभुक्षः । ऋभुक्षिभ्याम् । ऋभुक्षिम्यः । ६-ऋभुक्षः । ऋभुक्षोः । ऋभुक्षाम् । -ऋभुक्षि । ऋभुक्षोः । ऋभुक्षिषु । सं०हे ऋभुक्षाः । हे ऋभुक्षाणा । हे ऋभुक्षाणः ।। "पश्चन्” शब्द केवल बहुववनान्त है । जैसेः १-पञ्च २-पञ्च ३-पञ्चभिः ४-पञ्चभ्यः ५-पञ्चभ्यः ६-पञ्चानाम् ७-पञ्चसु ॥ "अष्टन्” शब्द भी बहुवचनान्त है। जैसेः १-अष्टी, अष्ट । २-अष्टौ, अष्ट । ३-अष्टभिः, अष्टामिः । ४-अष्टभ्यः, अष्टाभ्यः । ५-अष्टभ्यः, अष्टाभ्यः । ६-अष्टानाम् । ७--अष्टसु, अष्टासु ।। सप्तन्” और “नवन्” तथा “दशन्” शब्द भी “पञ्चन्" के तुल्य उदाहरण- कस्य ग्रामस्य पन्थानं गच्छसि किस ग्राम के मार्ग को जाता है (तू)। मधा दधि मन्थति मथनी से दही बिलोता है। ऋभुक्षे भागः=बुन्द्र के लिये भाग । पञ्च पुरुषा प्रागता:-पांच पुरुष प्राये । सप्तानां सिन्धूनां पारे=मात समुद्रों के पार में । अष्टासु ग्रामेषु भ्रान्तः आठ ग्रामों में भमा । हे ऋभुक्षाः हे इन्द्र ।। जकागन्त “ऋत्विज” शब्द । जैसेः १-ऋत्विक , ऋत्विग। ऋत्विजौ। ऋत्विजः।२-ऋत्विजम् । ऋत्विजी। ऋत्विजः। ३-ऋत्विजा । ऋत्विाभ्याम् । ऋत्विग्भिः । ४-ऋत्विजे । ऋत्विग्भ्याम् । ऋत्विभ्यः । ५-ऋविजः । ऋत्विम्भ्याम् । ऋत्विग्म्यः ।६-ऋत्विजः । ऋत्विजोः । ऋत्विनाम् । ७-ऋत्विजि । ऋत्विकोः । ऋत्विक्ष । सम्बोधन प्रथमा के तुल्य इसी प्रकार रथयुज” आदि कारान्त शब्दों के रूप हैं । ५५ परन्तु समाज " . देवेज* " “विश्वसूज*" “ पात्रमृग *" आदि कई शब्द “मम्राज" के तुल्य हैं । यथा- १-सम्राट्, सम्राङ् । सम्राजी । सम्राजः । २-सम्राजम् । सम्राजी । सम्राजः । ३-समाजा । समाझ्याम् । समाभिः । ४-समाजे । समाभ्याम् । समाभ्यः । ५-समाजः । समाभ्याम् । समाभ्यः । ६-समाज: । समाजोः । समाजाम् । २ - * इन शब्दों को भाष्यकार रथयुज" के सदृश मानते हैं । Home amaA awar २६ डा, दकारान्त ॥ AAPM AN-AARAM.Ankur 9-समाजि । ममाजोः । समासु । सम्बोधन प्रथमा के तुल्य ऐसे ही परिव्राट् । परिव्राजी । इत्यादि जामो ॥ १-विश्वाराङ् , ट् । । विश्वराजी । विश्वराजः । २-विश्वराजम् । विश्वराजौ। विश्वराजः । ३-विश्वराजा । विश्वाराभ्याम् । विश्वाराभिः । ४--विश्वराजे । विश्वाराड्म्याम् । विश्वाराङ्म्यः । इत्यादि । ५६-जहां २ ज को इवा ट् होता है वहां २ विश्व को विश्वा होजाता है। उदाहरण- वेद्याः समन्तात् ऋत्विनः शोभन्ते वेदी के चारों ओर ऋत्विज ( हवन फर्ता) सुहाते हैं। रथयुजम् आह्वय य-रथजीता को बुला । तेन समाजा को योत्स्यतिनुस समाट् ( शहंशाह ) के साथ कौन युद्ध करेगा । देवेजे नमः=देव দুস के लिये नमस्कार । विश्वसुजः प्रजाः प्रजायन्ते-विधाता से प्रजा उत्पन्न होती हैं । पश्य पात्रमृजो हस्तौ-देख बरतन मांजने वाले के, हाथों को । अयं विश्वाराहस्ति-यह विश्वाराट् है । दकारान्त तद् ” शब्द सर्वनाम द्वितीयपुस्तक में लिख चुके हैं। और "त्यन्' शब्द भी उस के तुल्य ही है । जैसे-स्यः त्यो त्ये । त्यम् त्यो त्यान् । त्येन त्याभ्याम् इत्यादि जानो ॥ और “यद्” शब्द भी तद् के ही सदृश है। जैसे- १-यः । यौ। ये । २-यम् । यौ। यान् । ३-येन । याभ्याम् । इत्यादि । ५७-"एतद्” शब्द के रूपों में कुछ ही भेद है । जैसे:- -एषः । एतौ । एते । २-एतम् , एनम् । एसो, एनौ । एनान् , एनान् । ३- एतेन, एनेन । एताभ्याम् । एतैः । ४~-एतस्मै, एताभ्याम् । एतेभ्यः । ५--- एतस्मात् । एताभ्याम् । एतेभ्यः । ६-एतस्य । एतयोः, एनयोः । एतेषाम् । ६-एतस्मिन् । एतयोः, एनयोः । एतेषु ॥ दकारान्त “युष्मद् और “ अस्मद् " शब्द के रूप द्वितीय पुस्तक चुके हैं और वे तीनों लिङ्ग अर्थात् पुंलिङ्ग स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग में एक से ही रहते हैं। - में प्रा- पुलि - - उदाहरण- स गच्छतिवह जाता है । त्यं पश्य= मुस को देख । येन दूषितं तं मा- रय-जिस ने बिगाड़ किया उस को मार । एतस्मै किं दास्यसि इस के लिये क्या देगा (तू)। तय गृहं क्वास्ति तेरा घर कहां है । मयि पापं नास्ति=मुक में पाप नहीं है। १-द्विपात् , द्विपाद् । द्विपादौ । द्विपादः । २--द्विपादम् । द्विपादौ । द्विपदः । ३-द्विपदा । द्विपाझ्याम् । द्विपादिः । ४-द्विपदे । द्विपाद्भ्याम् । द्विपाभ्यः । ५-द्विपदः । द्विपाभ्याम् । द्विपाभ्यः । ६-द्विपदः । द्विपदोः । द्विपदाम् । ७-द्विपदि । द्विपदोः । द्विपारसु । सं०-हे द्विपात् इत्यादि । थकारान्त “अग्निमय शब्द । जैसे:- -अग्निमत् द्। अग्निमयो । अग्निमयः। २-अग्निमयम् । अग्निमयौ। अग्निमयः। ३-अग्निमथा । अग्निमद्भ्याम् । अग्निमभिः । ४-अग्निमथे । अग्निमद्भ्याम् । अग्निमयः । इत्यादि । चकारान्त “प्रत्यच्” शब्द । जैसेः- १-प्रत्यङ् । प्रत्यञ्ची । प्रत्यञ्चः । २-प्रत्यञ्चम् । प्रत्यञ्चौ । प्रतीचः । ३-प्रतीधा । प्रत्यग्भ्याम् । प्रत्यग्भिः । ४-प्रतीचे । प्रत्यग्भ्याम् । प्रत्यग्भ्यः । ५-प्रतीचः । प्रत्यभ्याम् । प्रत्यभ्यः । ६-प्रतीचः । प्रतीचोः । प्रतीचाम् । ७-प्रतीचि । प्रतीचीः । प्रत्यक्षु । सं०-हे प्रत्यङ् इत्यादि ॥ “उदच्” शब्द के रूप । जैसे:- १-उदङ् । उदञ्ची। उदञ्चः । २-उदञ्चम् । सदची। उदीयः । ३-उदीचा । उदग्भ्याम् । उदग्भिः । ४-उदीचे। उदग्भ्याम् । उदग्भ्यः । ५----उदोषः । उदग्भ्याम् । उदभ्यः । इत्यादि । १-सम्यङ् । सम्यञ्चो। सम्यञ्चः। -सम्यञ्चम् । सम्यञ्चौ। समीचः। ३-समीचा । सम्यग्भ्याम् । सम्यग्भिः । ४-समीचे । इत्यादि । १-सघ्राङ्। सध्रपञ्ची। सध्रपञ्चः। २-सध्रपञ्चम् । सघ्रपञ्चौ। सोचः । ३-सध्रीचा । सध्राभ्याम् । सघ्राग्भिः। ४-सध्रीचे । इत्यादि । १-तिर्यङ् । तिर्यचौ। तिर्यञ्चः। २-तिर्यञ्चम् । निर्यचौ। तिरश्चः । ३-तिरश्चा। तिर्यग्भ्याम् । तिर्यभिः। ४-तिरश्चे। तिर्यग्भ्याम् । तिर्यस्यः । इत्यादि।
२८ द्, तकारान्त ॥ - १-पयोमुग, क्। पयोमुची । पयोमुधः । २-पयोमुचम् । पयोमुघौ। पयोमुचः । ३-पयोमुचा । पयोमुग्भ्याम् । पयोमुग्भिः । ४-पयोमुचे । इत्यादि। ७-बहुवचने-पयोमुक्षु ॥ उदाहरण- द्विपाद् मनुष्यः चतुष्पाभ्यो बुद्धिमान् भवति दुपाया मनुष्य चौपायों से बुद्धिमान् है। अग्निमथाऽग्निः उन्मथितः अग्निमथ् ने अग्नि मथा । प्रत्यचं पश्य-पीछे चलते को देख । उदीचा कुत्र विश्रामः कृतः उत्तर को चलने वाले ने कहां विश्राम किया। समीचे नमः-सीधा चलने वाले के लिये नमस्कार । समीचः पन्थाः=सीधा चलने वाले का मार्ग । समीचि प्रसीदति लोकः-सीधा चलने वाले पर प्रसन्न होता है संसार । हे अग्निमत् क यासि-हे अग्निमथ कहां जाता है ( तू )। शृण तिरश्चां कीदृशः शब्दः=सुन तिरछा चलने वालों (सर्पादि) का कैसा शब्द है । पयोमुचः प्रावृषि वर्षन्ति बादल वर्षा में बरसते । पयोमुचां गर्जनं शृणुयादलों के गर्जने को सुन ॥ तकारान्त महत् " शब्द ॥ १-महान् । महान्सी। २-महान्तम् । महान्ती। महतः । ३-महता। महद्भ्याम् । महद्भिः । ४-महते। महद्भ्याम् । महद्भ्यः । ५-महतः । महद्भ्याम् । महद्भ्यः । ६-महतः । महतोः । महताम् । ७-महति । महतोः । महत्सु । सं०-हे महन् । हे गहान्तौ । हे महान्तः ॥ १-भवान् । भवन्ती। २-भवन्तम् । भवन्तौ । ३-भवता । भवद्भ्याम् । इत्यादि आगे महत् शब्द क सदृश जानो ॥ "ददत्” शब्द (ददत के ऋकार का लोप हुवा है)। १-ददन् । ददतौ । ददतः २-ददतम् । ददती । ३-ददता । ददद्भ्याम् । आगे महत्" के सदृश है ॥ इसी ददत् के तुल्य अक्षत्" जाग्रत् " "दरिद्रत्" ॥ शासत् और चकासत्, के रुप भी जानी। जैसे:- महामयं ततः यह बड़ा वृक्ष है । भवते नमस्करोमिश्राप को नमस्कार करता हूं। धनं ददता क्रोधः कृतः=धन देते हुए ने क्रोध किया। जक्षते ब्राल. णायाऽर्म परिवेषय-खाते हुए ब्राह्मण के लिये अन्न परोम । जाग्रतश्चोरा बि- महान्तः। भवन्तः । भवतः । - - पुंलिङ्ग भ्यति-जागते से चोर उरते हैं । दरिद्रतः हास्यं सर्वे कुर्वन्ति-दरिद्र होते की हंसी सब करते हैं । शामति रामे प्रजाः प्रसीदन्ति स्म-राज्य करते हुए रामचन्द्र जी पर प्रजा प्रसन्न होती थीं। चकामतम् रविं पश्य-चमकते हुए सूर्य को देख । हे महन् गर्व मा कुरू-बड़े ! गर्व मत कर ॥ पकारान्त गुप्शब्द ॥ १-गुप्, गुब् । गुपी। गुपः। २-गुपम् । गुपौ । गुपः ३-गुपा । गुरुभ्याम् । गुभिः। ४--गुपे। गुब्भ्याम् । गुरुभ्यः । ५-गुपः । गुट याम् । गुठभ्यः । ६-गुपः । गुपोः । गुपाम् । ७-गुपि । गुपोः । गुप्सु । सं०-हे गुप् , ब् । हे गुपौ । हे गुप इसी प्रकार « अतृप ” “ द्रुप ” आदि के रूप शकारान्त “तादा" शब्दः- १-तादृक् , तादृग् । तादृशौ । तादृशः । २-तादृशम् । तादृशी । तादृशः । ३-ताशा । तादृग्भ्याम् । तादृभिः । ४-तादृशे । तादृग्भ्याम् । तादृभ्यः । ५-तादृशः । तादृग्भ्याम् । तादृग्भ्यः । ६-तादृशः । तादृशोः । तादृशाम् । ७-ताश । तादृशोः । तादृक्षु । हे तादृक् , ग् । हे तादृशौ । हे तादृशः ॥ इमो प्रकार - यादृश् .. “ईदृश् ” “को दृश्” «दिश, श्रादि जानी ॥ " शब्द में भेद इतना है कि- १-- विट, ड् । विशौ । विशः । २---विशम् । विशौ । विशः । ३-विशा । बिड्भ्याम् । विभिः । ४ ---विशे । इत्यादि । ७ --विट्स ॥ ५-- शत्रुनश " शब्द में अधिक भेद है । जैसे:- १ -- शत्रुनट् , ड्, ग्, क् । शत्रुनशी । शत्रुनशः । इत्यादि । ३-द्विव० शत्रुगड्भ्याम् , शत्रुनग्भ्याम् । इत्यादि । "मर्मस्पृश्” शब्द “तादृश्” के तुल्य है । जैसेः- अयं मर्मस्पृक् शरोऽस्ति=यह मर्म-(मुलायम जगह) भेदी बाण है । धनगु- पम् उस्थापय-धमरक्षक को उठा । अतृपो " राक्षसा भवन्ति-"केवल अपना ही प्राण पालने वाले" ( असुवृप ) राक्षस होते हैं। दूपे मा देहि=अहङ्कारी के लिये मत दे । तादूशस्तु ईद्रुक एव साधु-वैसे से तो ऐसा ही अच्छा । यादृशः पावे तिष्ठति तादूक स्वयं भवति-जैसे के पास बैठता है वैसा स्वयं होजाता है। कीदृशि पुरुषे विश्वसितव्यम्=कैसे पुरुष में विश्वास करना चाहिये ? । हे विद । ५८. विश ma ।
३० घ, सकारान्त ॥ - - घृतं विक्रीणीषे हे वैश्य घृत बेचता है (तू)। विशो राजो हितं कुर्यु:=प्रजाएं राजा का हित करें । शत्रुन अयं योहाशतनाशक है यह सिपाही । ६०-दधृष्” शब्द षकारान्त है पर सादृश् के तुल्य रूप हैं । १-रत्नमुट, छ । रत्नमुषौ । रत्नमुषः । २-रत्नमुषम् । रत्नमुषो । रत्नमुषः । ३-रत्नमुषा । रत्नमुभ्याम् । इत्यादि । “षष्” शब्द केवल बहुवचनान्त है । जैसे:- १--षट्, ह ।२-षट्, छ । ३-षभिः । ४-षड्भ्यः । ५-षड्भ्यः । ६-षमाम् । ७-षट् ॥ "पिपठिष"शब्द । १-पिपठीः । पिपठिषो। पिपठिषः । २-पिपठिषम् । पिपठिषौ। पिपठिषः । ३.पिपठिषा। पिपठीभ्याम् । पिपठौर्भिः।४-पिपठिषे। पिपठीभ्याम्। पिपटीयः। ५-पिपठिषः। पिपठीभ्याम् । पिपठीWः। ६-पिपठिषः। पिपठिषोः। पिपठिपाम् । ७-पिपठिपि । पिपठिषोः । पिपठीषु । सम्बो० प्रथमा के तुल्य है । "चिकीर्ष” शब्द । -चिकोः । चिकीपा । चिकीर्षः । २-चिकीर्षम् । चिकी! । चिकीर्षः । ३-चिकीर्षा । चिकीर्ष्याम् । चिकीर्भिः।४-चिकीर्ष । चिकीभ्याम् । चिकीर्यः । ५-चिकीर्षः । धिकीयाम् । विकीर्यः । ६-चिकीर्षः । चिकीर्षोः । चिकोर्षाम् । ७-चिकीर्षि । त्रिकीर्षोः । चिकीर्षु । हे चिकीः । हे चिकीर्षी । हे चिकीर्षः ॥ "विहस्" शब्द (विद्दसु के उकार का लोप हुभा है) -विद्वान् । विद्वांसी । विद्वांसः । २-विद्वांमम् । विद्वांसी । विदुषः । ३-विदुषा । विद्वद्भ्याम् । विद्धिः । ४-विदुधे। विद्वद्भ्याम् । विद्वद्भ्यः । ५-विदुषः । विद्वद्भ्याम् । विद्वयः । ६-विदुषः । विदुषोः । विदुषाम् । ७-विदुषि । विदुषोः । विद्वत्सु । सं०-हे विद्वान् । हे विद्वांसी । हे विद्वांसः ॥ -पुंस्, शब्द के रूप- १-पुमान् । पुमांसौ। पुमांसः । २-पुमांसम् । पुमासी। पुंसः । ३-पुंसा । पुंभ्याम् । पुंभिः । ४-पुंसे । घुभ्याम् । घुभ्यः । ५-पुंसः । पुं पाम् । 'भ्यः । मं०-६-पुंसः । पुंसोः । पुंसाम् । ७-पुंसि । पुंसोः । पुंसु। हे पुमन् । हे पुमांसी। हे पुमांसः ॥ - पुंलिङ्ग ॥ RamnyAHAmr. - .. है । असू । अमी - - "उशनस्” शब्द- १-उशना । मुशनसी । उशनसः । २-उशनमम् । सशनमौ। उशनमः । ३-उशनसा । उशनोभ्याम् । उशनोभिः । ४-उशन मे । उशनीभ्याम् । उशनोभ्यः । ५-उशनसः । उशनोभ्याम् । उशनोभ्यः । ६-उशनमः । उशनसोः । उशनमाम् । ७-शनसि । उशनसोः। उशनस्सु । सं०-हे उशनः, हे उशन, हे उशनन् । हे उश- नसी। हे उशनसः ॥ ६१-इसी प्रकार “पुरुदंशम” और अनेहम्" शब्द के रूप हैं परन्तु स. म्बोधन में केवल एक ही सूप होता है। जैसेः-हे पुरुदंशः । हे अनेहः ॥ ६२-4 वेधस्" शब्द भी “ सशनम् तुल्य परन्तु प्रथमा के एकवचन में-वेधाः । ऐसा विसर्गान्त रूप होता है । ६३-और “चन्द्र मस्” “सुयशम्॥ वृद्धश्रवम्॥ प्रादि सकारान्त शब्द «वे. धस" के ही तुल्य हैं । ६४-४ अदस्” शब्द सर्वनाम में भेद है। जैसे- १-असी। २-अमुम् प्रमू । अनून ३-अमुना । श्रमूभ्याम् । ममीभिः । ४-अमुष्मै । प्रमभ्याम् । अमीभ्यः । ५- अमुष्मात् । अमूभ्याम् । अमीभ्यः । ६-अमुष्य । अमुयोः । अमीषाम् । ७-अमुस्मिन् । अमुयोः । अमीषु ।। ६५-साधारण (अमुक) अर्थ में “प्रदम्" शब्द के रूप इस प्रकार होते हैं। जैसे- १--अमुकः । अमुको । अमुके । २-अमुकम् । अमुको । प्रमुकान् । ३-अमुकेन । प्रमुकाभ्याम् । अमुकैः । ४-अमुकम्मै । अमुकाभ्याम् । अमुकेभ्यः । ५-अमुकस्मात् । श्रागे सर्व, शब्द तुल्य जानो॥ यह अकारादि क्रम से प्रायः सब शब्दों की प्रक्रिया ( जो पुल्लिंग हैं ) दिखाई॥ उदाहरणा- रत्नमुट नरकं याति-रत्नचोर नरक को जाता है । षट्स ऋतुषु वसन्त श्रा- मन्ददः छहों ऋतुओं में वसन्त श्रानन्ददायक है । पिपठिषं पाठयपढ़ना चाहने वाले को पढ़ाव। चिकीर्षः कार्याणि सिद्ध्यन्त्येव करना चाहने वाले के काम सिद्ध ही होते हैं। विदुषां भूषणं विद्या विद्वानों का भूषण विद्या है । पुं. - । ५ ३२ Ani - सु धैर्य भवप्ति पुरुषों में धौरज होता है । उशनसः दैत्याः शिक्षा गृह्णन्तिस्म= शुक्राचार्य से दैत्यों ने शिक्षा को ग्रहण किया था। अनेहा पुना ज्याति फिर नहीं पाता। वेधाः देवानां मध्ये प्रथम: ब्रह्मा देवतों के बीच में पहिला है । चन्द्रमसः करा: शीतलाः सन्ति चन्द्रमा की किरणें ठगढी हैं। सुयशसां यश एव धनम् नेकनामों को कीर्ति ही धन है। वृद्धश्रवाः स्वर्गराजोऽस्ति=वन्द्र स्वर्ग का राजा है । अमुं देवदारुं पुरः पश्य-इस देवदारु (वृक्षविशेष) को आगे देख । अमुकस्मै दीयताम्-फलाने के लिये दीजिये। इति पुल्लिँङ्ग स्वरूपम् अथ स्त्रीलिङ्गस्वरूपनिरूपणम्- आप प्रत्ययान्त "गङ्गा” शब्दः- १-गङ्गा । गङ्गे। गङ्गाः २- गङ्गाम् । गडगे । गङ्गाः । ३-गङ्गया । गङ्गाभ्याम् । गङ्गाभिः । ४-गङ्गायै । गङ्गाभ्याम् । गङ्गाभ्यः । ५-गङ्गायाः । गङ्गाम्याम् । गङ्गाम्यः । ६-गङ्गायाः । गङ्गयोः । गङ्गानाम् । ७-गङ्गायाम् । गङ्गयोः । गङ्गासु । हे गङ्गे । हे गङ्गे । हे गङ्गाः इसी प्रकार दुर्गा, अम्बिका, रमा, शिवा, सौता, अादि के रुप जानो ॥ "सर्वा” शब्द सर्वनाम- १-सर्वा । सर्व । सर्वाः २-साम् सर्व । ३-सर्वया । साम्याम् । सर्वाभिः । ४-सर्वस्यै । सर्वाभ्याम् । सर्वाम्यः । ५-सर्वस्याः । सर्वाभ्याम् । सर्वाभ्यः । ६-मवस्याः । सर्वयोः । सर्वासाम् । ७-सर्वस्याम् । सर्वयोः । सर्वासु । सम्बोधन-गङ्गावत् ॥ इसी प्रकार विश्वा, सभा, अन्या, अन्य तरा, वृतरा आदि के रुप जानो (जो शब्द पुल लिङ्ग सर्वनाम में गिनाये हैं “एकापर्यन्त) ६६-जब दूसरे शब्द से मिलकर सर्वनाम आता है तो कहीं २ गङ्गा के तुल्य भी रूप, स्त्रीलिङ्ग में होते हैं और पुल्लिङ्ग में राम शब्द के तुल्य । जैसे- उत्तरपूर्वस्यै, उत्तर पूर्वायै । इत्यादि । द्वितीया, तृतीया में भी ऐसे ही दो २ रूप होते हैं । ६७- जरा शब्द को गङ्गा से भेद है। जैसे:- । मा - स्त्रीलिङ्ग॥ १-जरा । जरसी, जरे । जसः, जराः । २-जरसम्, राम् । जरसी, जरे । अरमः, जराः । ३-जरमा, लारया। जराभ्याम् । जराभिः । ४ --सारसे, जरायै । साराभ्याम् जराभ्यः । ५-अरसः, तारायाः । जराभ्याम् । जराभ्यः । ६-अरसः, जरायाः। रसोः, जरयोः । जरसाम् , जराणाम् । ७-जरसि, जरायाम् । जरसोः, जारयोः । जरासु । सं० हे जरे । हे जरसी, हे बरे । हे जरमः, हे जराः ॥ गोपा, विश्वपा, मिधिपा, श्रादि स्त्रीलिङ्ग शब्द भी "पुमिग विश्वपा शब्द के ही तुल्य हैं। इकारान्त “मति" शब्द । जैसेः- १-मतिः । मती। मतयः । २-मतिम् । मती । मतीः । ३-मत्या । मतिभ्याम् । मतिभिः । ४-मत्यै, मतये। मतिभ्याम् । मतिभ्यः।५-मत्याः, मतेः। मतिभ्याम् । मतिभ्यः । ६-मत्याः, मतेः । मत्योः । मतीनाम् । ७-मत्याम् , मती । मत्योः । मतिषु । सं०-हे मते । हे मती । हे मतयः ॥ इमी प्रकार गति, धृति, बुद्धि, रुचि, कृति, भूति, रति, शुद्धि, भक्ति, पछि मूर्ति, कीर्ति, ख्याति प्रादि शब्दों को भी जानो ॥ उदाहरण हिमवतो गङ्गाऽवतरति=हिमवान् ( पर्वत ) से गङ्गा उतरती है सवा गृहस्यसामग्री कः संस्करोति सब, गृहस्थसामग्री को कौन संस्कारकरता है। विश्वया रुच्या ईश्वरं चिन्तय सारी रुधि से ईश्वर को यादकर । उभे कृती कस्य स्तः=दोनों करतूत किम की हैं। अन्यस्यै कन्यायै दीयताम् और कन्या के लिये दीजिये। अष्टासु अन्यतरा रुक्मिणी भवति आठों में कोई एक रुक्मिणी है। सर्वाभ्य इतरा यशोदा प्रतीयते सब से निराली यशोदा प्रतीतहोती है। एकस्याः ललनायाः भाषणं साधुतममस्ति=एक स्त्री का बयान बहुतअच्छा है। उत्तरपूर्वस्यां दिशि धूमकेतुमदेति-सत्तर और पूर्व (दिशा) में पूंचलतारा उगता है। उत्तरपूर्वायां ज्येष्ठे मासे सूर्य उदेतिउत्तरपूर्व (दिशा) में उयेष्ठ मास में भूर्य उगता है । द्वितीयस्यां नृतीयायां वा कक्षायां रक्षको जागर्ति-दूसरी वा तीसरी कक्षा में चौकीदार जागता है। जरया पलितो देवदत्तः बुढापे से देवदत्त पलित (जिम के शिरके बाल पकगये) है। परम पितन सेवस्व-बुढापे में पितरों को सेवाकर । गोपे जलं देहि-गौपालनेवाली के लिये जल दे। ईश्वरस्य शक्ति.
३४ इ, ईकारान्त ॥ N/0.4-1...hr ran विश्वपाअस्ति ईश्वर की शक्ति सबकीरक्षिका है । क्वचिद् गृहस्थे स्त्रियो निधिपाः भवन्ति-किसी गृहस्थ में स्त्रियां धनरक्षिका होती हैं। वृद्धत्वे मतिः प्रायः नश्यति=बुढापे में बुद्धि बहुधा नष्ट हो जाती है। गतिरपि शिपिला जा- यते-चाल भी ढीली होजाती है। धृति धर्मस्य लक्षणं जानीहि धैर्य को धर्म का लक्षण जान । बुद्ध्या विचारय=बुद्धि से विचार । रुचेरधिकं न भक्षणीयम् रुचि से अधिक न खानाचाहिये । साधोः कृतिं पश्य-साधु की करनी को देख । भूत्यै यतस्व-ऐश्वर्य के लिये यत्नकर । रतेविरमरति से विरामकर । ख्यात्यै लोको मियते यश के लिये संमार मरता है । इत्यादि और भी । ६८ -त्रि" शब्द बहुवचनान्त है और यहां स्त्रीलिङ्ग में उस के रूप ऐसे हते हैं। जैसे:- १-तिस्त्रः । २--तिस्रः । ३-तिसृभिः । ४-तिसभ्यः । ५-तिसभ्यः । ६-तिसुणाम् । ७-तिसृषु ॥ उदाहरण- तिस्त्रः कन्याः क्रीहन्ति-तीन कन्या खेलती हैं । तिसृषु कन्यासु नास्ति दोषः तीनों कन्याओं में दोष नहीं है । इत्यादि । चतुर" शब्द रेफान्त है पर रूप «त्रि" शब्द के तुल्य हैं । जैसे- १-चतस्त्रः ॥२--चतस्त्रः।३-चतसृभिः।४-चतसभ्यः।५-चतसृभ्यः । ६-चतमणाम् । ७.-चतरुषु॥ - "हि" शब्दः --- गीर्यः । गौया । । १-द्वे । २-वे । ३-द्वाभ्याम् । ४-द्वाभ्याम् । ५-द्वाभ्याम् ६-द्वयोः । ७-द्वयोः ॥ (ईप्) ईकारान्त “गौरी” शब्दः- १-गौरी । गौया । २-गौरीम् । गौरीः । ३-गौर्या । गौरीभ्याम् । गौरीभिः । ४-गौर्यै । गौरीभ्याम् । गौरीभ्यः । ५--गीर्याः । गौरीभ्याम् । गौरीभ्यः । ६-गौर्याः । गौर्योः । गौरीणाम् । ७-गौर्याम् । गोर्योः । गौरीषु । मम्बो०-हे गौरि । हे गौयी । हेगौर्यः ।। इसी प्रकार नदी, गोमती, देवी, काली प्रादि के रूप जानो । ७०-लक्ष्मी” “तरी“तन्त्री भादि में इतना भेद है कि प्रथमा के एक- वचन में विसर्गान्त रहता है। जैसेः-१-लक्ष्मीः । १-तरीः । १-तन्त्रीः । इत्या- दि । शेष रूप गौरी” के तुल्य हैं ।
R- स्त्रीलिङ्ग ॥ ३५ NAAM - । श्रियः । थियो । श्रियः । - ७१- स्त्री" शब्द को लक्ष्मी शब्द से भेद है। जैसे:- १-स्त्री। स्त्रियौ । स्त्रियः । २-स्त्रियम् , स्त्रीम्। स्त्रियौ । स्त्रियः, स्त्रीः । ३-स्त्रिया। स्त्रीभ्याम् । स्त्रीमिः । ४-स्त्रियै। स्त्रीभ्याम् । स्त्रीभ्यः । ५-स्त्रियाः । स्त्रीभ्याम् । स्त्रीभ्यः । ६-स्त्रियाः। मित्रयोः । स्त्रीणाम् । ७-स्त्रियाम् । स्त्रियोः । स्त्रीषु । मम्बो०-हे स्त्रि । हे स्त्रियो । हे स्त्रियः ॥ ७२-श्री" शब्द को स्त्री से भी भेद है । जैसे-- १-श्रीः । श्रियो । २-श्रियम् । ३-प्रिया । श्रीभ्याम् । श्रीभिः । ४-प्रिय, श्रिये । श्रीभ्याम् । श्रीभ्यः । ४-श्रियाः, श्रियः । श्रीभ्याम् । श्रीभ्यः । ६-प्रियाः, श्रियः । श्रियोः । श्रीणाम् । ७-शियि, श्रियाम् । नियोः । श्रीषु । सम्बोधन-हे श्रीः । हे श्रियौ। हे श्रियः ॥ उकारान्त “धेनु” शब्दः- १-धेनुः । घेनू । धेनवः । २-धेनुम् । धेनू । धेनूः । ३-धेन्वा । धेनुभ्याम् । धेनुभिः। ४-धेन्वै, धेनवे । धेनुभ्याम् । धेनुभ्यः । ५-धेन्वाः, धेनोः । धेनुभ्याम् । धेनुभ्यः । ६-घेन्याः, धेनोः । घेन्योः । धेनूनाम् । ७-धेन्वाम् , धेनौ । धेन्वोः। धेनुषु । हे धेनो। हे धेनू । हे धेनवः ॥ क्रोष्ट्री" शब्द “गौरी” शब्द सदश "भू" शब्द " शब्द श्री तुल्य है। 'स्वयम्भ " शब्द जैसे पुंलिङ्ग में लिखा है वैसे ही यहां भी जानी ॥ ७३-~~“स्वस” शब्द पुंलिङ्ग धातृ के तुल्य है केवल द्वितीया बहुवचन में इतना भेद है कि स्वसः ॥ ७४-- मात" शब्द पित के तुल्य में इतना भेद जैसे “यो शब्द गो” के तुल्य है। रैशब्द पुंलिङ्ग के तुल्य नीर शब्द दिल के तुल्य है तथा और शब्द भी जो पुंलिङ्ग श्रीकारान्त हैं स्त्रीलिङ्ग में भी उसी प्रकार हैं । हकारान्त "उपानह" शब्द- १-पानत् , उपामद् । उपानही । उपानहः । २-उपामहम् । उपानही । उपानहः । ३-उपानहा । उपानद्भ्याम् । उपानद्भिः। ४-उपानहे । उपानद्भ्याम् । उपानद्भ्यः। - । है केवल द्वितीया बहुवचन -मातृः मातः ॥ है POEmpie ह, व, रेफान्त ॥ Mr.nrmmune- । ५-उपानहः । सपानद्भ्याम् । उपानयः।६-उपानहः । उपानहोः । सपामहाम् । ७-उपानहि । सपानहोः । उपानत्सु । सं०-हे उपामत् , द्॥ १-उष्णिग, क्। उष्णिहो । उष्णिः । इत्यादि । ३-नष्णिगभ्याम् । उष्णिभिः । ४ - उशिग्भ्यः । ७~-उष्णिक्षु । शेष बीच २ के रूप उपानह के सदृश हैं । "दिव्” शब्द- १-धीः । दिवौ। दिवः । २-दिवम् । दिवी। दिवः । ३-दिवा । द्युभ्याम् । द्युभिः । ४-दिवे । द्युभ्याम् । धुभ्याम् । धुभ्यः । ५-दिवः । धुभ्याम् । द्युभ्यः । ६-दिवः । दिवोः । दिवाम् । ७-दिवि । दिवोः । धुषु । सं०-हे द्यौः । हे दिवौ । हे दिवः ।। गिर" शब्दः-१-गीः । गिरी। गिरः । २-गिरम् । गिरौ । गिरः । ३-गिरा । गोयाम् । गीर्भिः । ४-गिरे । गोाम् । इत्यादि । ७-गीषु ॥ “पुर" शब्दः- १-पूः । पुगे । पुरः । ३, ४, ५-पूाम् । ७-पूर्ष । इत्यादि । उदाहरण- चतमणां दिशां मध्ये तमो व्याप्तम् =चारों दिशाओं के बीच में अन्धकार व्याप्त है। वे गती स्तो मनस्विनाम्दो गतियां हैं धीरों की। गौर्या शिवः मायाति गौरी के साथ शिव पाता है। नद्याः कूलं विघटयति पूरःगदी के किनारे को तोड़ता है बाढ़ । गोतम्यै देहि गोतमी के लिये दे। हे देवि किमहं करवाणि-देवि मैं पा कम । काली पश्य-काली को देख । व्यापारे लक्ष्मीनिवसति व्यापार में लक्ष्मी रहती है। तर्यामुपविश्य पारं गच्छ-माव में बैठकर पार को चल । तन्त्री वादय:सितार की बजा । स्त्रियो भीरवः सन्ति स्त्रियां डरपोक हैं । श्रिये यतस्वलक्ष्मी के लिये यनकर । धेनू मां पयो मधुरमस्ति गौवों का दुग्ध मोठा है। क्रोष्ट्रयाः खरतरः शब्दः गिदड़ी का कडा शब्द है। स्त्रीणाम् धुश्री प्रशस्येते स्त्रियों की भौहें प्रशंमाकोशाती हैं । स्वयम्भुवः प्रकृत्याः कार्यं जगत् अनादि प्रकृति का कार्य जगत् है । स्वसुः पुत्रोऽयम्=यह बहिन का बेटा है । मातुः, मातरं स्मर=माता को स्मरण कर । दिवि चन्द्रः प्रकाशते प्रकाश में चन्द्र प्रकाशता है । नावमारूहनाय को चढ़ । उपानहां प्रहार:=जतों को चोट । उष्णिहाधीतेषितम् (छन्द ) के साथ । - स्त्रीलिङ्ग ॥ an इमे। इमाः । आभिः। प्राभ्यः । ५-अस्याः पढ़ता है । शरदि द्यौः* स्वच्छा भवति शरद् में भाकाश स्वच्छ होता है । पक्षिणां गिरः शृणु-पक्षियों को वाणियो को सुन । श्रासु पूर्ष के निवसन्ति= इन पुरियों में कौन खमते हैं। “किम्” शब्द सर्वनाम स्त्रीलिङ्ग में सर्वा के तुल्य है। जैसे :- १-का। के। काः । २-काम् । के। काः । ३-क.या । काभ्याम् । काभिः । ४-कस्य । काम्याम् । काभ्यः । ५-कस्याः । इत्यादि । “इदम्” शब्द सर्वनाम स्त्रीलिङ्ग १--श्यम् २ इमाम् । इमे ३-अमया । प्राभ्याम् । ४-अस्यै । बाभ्याम् । अस्याः । प्राभ्याम् । भाभ्यः । ६-अस्याः । भनयोः । प्रासाम् । ७-अस्याम् । अनयोः : । प्रासु॥ त्यद् , तद् , यद् , एतद् , ये सर्वनाम स्त्रीलिङ्ग में: १-स्या । त्ये । त्याः । २-त्याम् । त्ये । त्याः । भागे सर्वा के तुल्य ॥ १-सा । ते । ताः । २-ताम् । ते । ताः । श्रागे सर्वा के १-या। ये । याः । २-याम् । ये । याः । इत्यादि । १-एषा । एते । एताः । २~-एनाम् , एताम् । एते, एने । एताः । एनाः । ३-एतया, एनया । ६, ७-एतयोः, एनयोः । शेष सर्वा के तुल्य चकारान्त “वाच्” शब्द- १-वाक्, ग् । वाची । वाचः । २-वाचम् । वाचीवाचः । ३-वाचा । वाम्याम् । वाग्भिः। ४-वाचे । वाग्भ्याम् । वाग्भ्यः । ५--वाचः । वाभ्याम् । वाभ्यः । ६-वाचः । वाचोः । वाचाम् । ७-वाचि । बाचोः । वाक्षु । हे वाक्, ग् । इसी प्रकार त्वच्” शब्द भी जानो । पकारान्त अप, शब्द केवल बहुवचन में जाता है ( जल का नाम है) १--प्रापः।२--अपः । ३-अद्धिः । ४अभ्यः । ५-अभ्यः । ६-अपाम् । ७-मासु ॥ शकारान्त “दिग्” शब्द “वाच्” के तुल्य है । जैसे- १-दिक, दिग् । दिशौ। दिशः । २-दिशम् । दिशी । इत्यादि ॥ तुल्य - - Dowwwin- * आकाशवाचक स्त्रीलिङ्ग है ॥
३८ श, प, सकारान्त ॥ ANALAMNNAusm ४ इसी प्रकार “दृश, शब्द भी जानो ॥ पकारान्त विष, शब्दः-१-विट् , वि । त्विषो। विषः । भागेर रत्नमुष, ( देखो पृष्ठ ३० ) के तुल्य जानो ॥ • सजष और अाशिष शब्दों के रूप"पिपठिष के तुल्य (देखो पृष्ठ ३०) लामो ॥ सकारान्त “अदस्” शब्द सर्वनामः- १-असौ । प्रमू। अमूः । २-श्रमम् । अमू । अमः। ३-अमुया। प्रमभ्याम् । अमूभिः। -अमुष्य । अमभ्याम् । अमभ्यः । ५ --प्रमुष्याः । अमभ्याम् । प्रमभ्यः । ६-अमुष्याः । प्रमुयोः । अमपाम् । ७-अमुष्याम् । अमुयोः । अमषु ॥ उदाहरणा- सुपुत्रोऽयं कस्याः कुक्षी जातः यह सुपुत्र किम की कुक्षि में उत्पन्न हुआ है ? । अस्याः साध्या: इस माध्वी ( पतिव्रता ) को । यस्याः देव्याः कन्येऽयं सा काऽस्ति? =जिस देयो को यह कन्या है वह कहां है ? । एषा अस्ति यह है। त्यया कि प्राप्तम्-उस ने क्या पाया ? । एताः कन्या:-ये कन्यायें । याच्यर्था नियताः मर्व-वागी में अर्थ, नियत हैं सब । वृक्षस्य त्वचमुत्पाटय-वृक्ष की त्वचा (काम) को नधेड़ । अद्भिर्गात्राणि शुद्धान्ति=जल से शरीर शुद्ध होते हैं। पूर्व- स्यां दिशि मूर्य उदेति-पूर्वदिशा में सूर्य उगता है। दृशं वर्धय-दृष्टि को बढ़ा । त्विषो बिभ्यति तेज से डरते हैं । अाशिषां पात्रम् = असीसों का पात्र । अमषां महिषीना अहोभाग्यम्=इन रानियों का अहोभाग्य । अमुष्य पुत्रमीश्वरो ददा. तु-इस के लिये पुत्र ईश्वर देवे ॥ इति सक्षेपतः स्त्रीलिङ्गशब्द निरूपणम् ॥ अथ नपुंसकलिङ्गशब्दनिरूपणम् ॥ प्रकारान्त “ज्ञान" शब्दः-१-ज्ञानम् । जाने । ज्ञानानि । नागे गृहशब्द ( देखो प्रथमपुस्तक ) के तुल्य और समस्त अकारान्त नपुंमक इसी के तुल्य जैसे-वनम् । धनम् । फलम् । पुष्पम् । मन्दिरम् । इत्यादि । ७५-केवल छतरप्रत्ययवाले, इतमप्रत्ययवाले, अन्य, अन्यतर और इतर इन ५ सर्वनामों में प्रथमा के एकवचन में इतमा भेद है:- १-कतात् । कतमत् । अन्यत् । अन्यतरत् । इतरत् । प्रागे गृहशब्द के तुल्य हैं। श्रीपा, मधुपा, विश्वपा भादि प्राकारान्त भी नपुंभक में हस्वान्तहोकर- .. नपुंसकलिङ्ग ॥ १-श्री पम् । श्रीपे । श्रीपानि । १-मधुपम् । मधुपे । मधुपानि । इत्यादि गृह- शब्द के तुल्य ही होजाते हैं। इकारान्त वारि (जन) शब्दः-१-वारि । वारिणी। वारीगि । २-वारि। वारिणी। वारीणि । ३-बारिणा । वारिभ्याम् । वारिभिः।४-वारिणे । वारिभ्याम् । वारिभ्यः । ५-धारिणः। बारिभ्याम् । वारिभ्यः। ६-बारिणः । वारिसोः। वारीणाम् । ७-धारिणि । वारिणोः । वारिषु। हे वारे, हे वारि। हे वारिणी । हे वारीणि ॥ ७६-इसी प्रकार « सुधी " शब्द भी ह्रस्व होकर जानना चाहिये परन्तु तृतीयादि विभक्तियों में पुल लिग ( देखो पृष्ठ १७ पं० २०) तुल्य ही होता है। ७७-कारान्तों में केवल अस्यि, दधि, मविथ और अक्षि इन चार शब्दों का तृतीयादि विभक्तियों में भेद है। जैसे-३-प्रस्था। दधा । सक्था । अक्षणा । ४-प्रश्ने । दधने । सवने । अक्षणे । श्वई-अस्थः । दधः । सक्थः । अक्षणः । ६ । ७--अस्थि, अस्थनि । अस्थाः । दधि, दधनि । दनोः । सक्थि, सक्थनि । सक्योः । अक्षिण, अक्षणि। अक्षणोः । शेष सब सूप वारि शब्द के तुल्य जानो ।। उकारान्त «मधु” शब्द वारि शब्द के तुल्य है ।। ७८-“सुलु” शब्द इस्त्र होकर सुधी के तुल्य हो जाता है। ऋकारान्त धातृ" शब्दः-१-धातृ । धातृणी । धातृणि । २-धातृ । धातृगी । धातृरिण। ३-धातुणा इत्यादि वारि शब्द के तुल्य जानो। ऐसे ही जात श्रादि भी। -~~ “प्रद्यु” और “सुनु” शादि भी हस्त्र होकर मधु के तुल्य हैं । ८०-ऐकारान्त “परै” को ह्रस्व होकर-प्ररि होजाता है और वारि के तुल्य होता है केवल ३-४-५-पराभ्याम् । ३---प्रराभिः । ४-५-प्रराम्यः । ७-प्रराम् । इतना भेद है। उदाहरण-प्रते जानाम्न मुक्तिः =सिंघाय ज्ञान से मुक्ति नहीं । धनानि के न सेवन्ते धनी को कौन नहीं सेवा करते । धमानि दहत्यग्निावों को फूकता है अग्नि । द्वे फले गृहाण-दो फल ले । कतरत् कुलं सुशीलम्-कौनसा कुन्न भुशील है । कर्मणोऽन्यदेव फलम् = कर्भ का अन्य ही फम्न है । द्वयोरन्यतरत फल गृहाण-दो मैं किसी एक फल को लेले । अहमितरदेव ग्रहीष्यामि मैं और ही लूंगा। विश्वपं दैवतं किमस्ति-विश्वरक्षक दैवत कौन है। ब्रह्मैव-ब्रह्म ही है । मधुपानि भ्रमर कुलानि रुवन्ति मधु पौने वाले भौंरों के-झुण्ड बोलते हैं। वारी- णि वर्षन्ति = दल हर्ष हैं । वारिभिरापूरितं नमामले से भरगया भाकाश । - ह,र, म, न, द, तकारान्त ।। * - एषां कुलामेव मुधिन का कुल ही सुबुद्धि है । अस्थां संयोगः हड्डियों का जोछ । दधि पिध-दही पी । अक्षिणी सन्मालय-२ पाखें खोल । अस्थि प्रा. घातो जात: हड्डी में चोट लगी है । सर्पिः दुग्धं मैरेयं वा मधु बदन्ति-घी, दूध वा मदिरा का मधु करते हैं । सुलु मृत्यकुलम् अच्छा काटने वाला नौकरों का झगद । एक ब्रह्म जगतो धातृ वत्तंते-एक ब्रह्म जगत् का धत्ता है। तदेव सर्वस्य जास-वही सब का जानने वाला ।। हकारान्त स्वनाह” शब्दः-१-स्वनयुत्, वनखुट् । स्वाही । स्वनडांहि । इसी प्रकार द्वितीया में। और तृतीया से लेके पुल लिङ्गक तुल्य जानो (देखी पृष्ठ २२) रेफान्त “धारण शब्द :-५-वाः । वारी । वारि । इमी प्रकार द्वितीयाधि- भक्ति भी । ३-- वारा । वायाम् । वाभिः । ४-वारे । वार्याम् । वाभ्यः । ५--वारः । वायाम् । इत्यादि । * चतुर" शब्द बहुवचन में ही होता है-१-चस्वारि । २-चत्वारि । भागे पुल लिङ्ग के तुल्य ( देखो पृष्ठ २२ ) हैं । मकारान्त «किम्" शब्द सर्वनाम-१-किम् । के । कानि । २-किम् । के। कानि । भागे पुल लिङ्ग सबंशब्द के जुल्य ( देखो पृष्ठ २२ ) है ।। १-इदम् । इमे । इमानि । २-इदम्, एनत् । इमे, एने । इमानि, एनानि । मागे पुल लिग ( देखो पृष्ठ २३ ) के तुल्य है ।। नकारान्त महन्" शब्द-१-अहः । अही, अहनी । अहानि । २-महः । अाही, अहनी । अहानि । ३-अहा । अहोभ्याम् । अहोभिः । ४-प्रहे। अहो. भ्याम् । अहोभ्यः । ५-अहूः । अहोभ्याम् । अहोभ्यः । ६--अहः । अहोः । अहाम् । 3-महि, प्रहनि । महोः । अहस्सु । सम्बो० प्रथमा तुल्य है ॥ “दण्डिन्। शब्दः-१-दगिष्ट । दशिडनी । दण्हीनि। २-दगिद्ध । दविडनी । दगडीनि । भागे पुल लिङ्ग के तुल्य है । “मुपथिन्" शब्दः-१-सुपथि । सुपथी । सुपन्यानि । २-पथि । सुपथी। मुपस्थानि । आगे पुल लिङ्ग पथिन् शब्द ( देखो पृष्ठ २४ ) के तुल्य जानी ॥ दकारान्त तद् " शब्द सर्वनाम-१-तद् । ते । तानि । २ सद् । ते। सागि । भागे पुल लिङ्ग के तुल्य है । इसी प्रकार त्यद्, यद्, एतद्, भी जानो। सकारान्त शरुत्" शब्द-१-शरुत् । शकती। शन्ति । २-शकृत् । शकती। शक्रन्ति । आगे महत् शब्द ( देखो पृष्ठ २८ ) के तुल्य “ददत् शब्दः-१-ददत् । ददती । ददति, ददन्ति । २-ददत् । ददती। ददति, ददन्ति । प्रागे पुझि के तुल्य है इसी प्रकार शासत्, चकासस् , जाग्रत् जक्षत् और दरिद्रत के रूप भी जानी ॥ । जानो। - AL नपुंसकलिङ्ग ॥ ४१ ...." . - षकारान्त-“धनुष" शब्दः-१-धनुः। धनुषी । धपि । २-धनुः । धनुपी । धषि । ३-धनुषा । धनुाम् । धनुर्भिः । ४-धनुषे । धनुर्ध्याम् । धनुभ्यः । ५-धनुषः । धनुभ्यांम् । धनुभ्यः । ६-धनुषः । धनुषाः । धनुषाम् । ७-धनुपि । धनुषोः । धनुष्षु ॥ स्वमछुत् यानं गच्छति--प्रच्छे बैल बाला यान (रथ) जाता है । वारि निम- ग्नो बालाजल में डूब गया बालक। चत्वारि वेदपुस्तकानि सन्ति=वेद पुस्तकें धार हैं । कानि २ ? कौन २ ? । ऋग्यजःसानाऽथर्वनामकामि=ऋग् १ यजुः २ सोम ३ अथर्व ४ नामक । इमानि धर्मपुस्तकानि सम्ति=ये धर्म-पुस्तक हैं। अही व्यतीते दो दिन बीतगये। दगडी नि यतिकुनानि शोभन्ते-दण्ड वाले र न्यासियों के झुगड सुहाते हैं। बनान्यपि सुपन्थानि जातानि-वन भी सुमाः वाले होगये । तदिनं व्यर्थम् यह दिन व्यर्थ है । एतान्यहानि उष्णानि ये दिन गर्म हैं । यानि दिनानि गतानि तानि पुनर्ना गमिष्यन्ति जो दिन गये वे फिर न आयेंगे । तस्य शक्त् अवरुद्धम्=तुम का दस्त (पाखाना) रुक गया। अमत्यं महत् पापम् झूठ बड़ा पाप है। गृहं हर्ष ददत् प्रतीयते-घर हर्ष देता प्रतीत होता है । राजकुलं शासत् महीयते-हुकूमत करता हुवा राजकुस्न महिमा पाता है। भकामत् सक्नमयं हम्यं पश्य-चमकते हुए सुनहरे महल का देख । जाग्रत् ज्योतिः पश्य-जागती ज्योति को देख । जक्षत् वानर कुल लार यतिखाते हुए वानरों का झंड जल्दी करता है। सम्प्रति गृहाणि दरिद्रन्ति सन्ति आज कल घर गरीब होते हुए हैं। ऐन्द्रं धनुः पश्यतुन्द्र के धनुष (अर्थात् सूर्य का प्रकाश जलकणां पर पड़ के उत्पन्न हुए ) को देख । धनुषि वाणः सन्धीयत-धनुष में वाण (तीर) लगाया जाता है। सकारान्त “पयस्” शब्द । १=पयः । पयमी । पयांसि २-पयः । पयसी पयांसि । ३-पयोम्याम् प्रागे पुंलिङ्ग वेधम्” के तुल्य है । ( देखो पृष्ठ ३१ ) ।। “अदम् शब्दः-१-प्रदः । प्रभू । प्रमूनि । २-भदः । अमू । प्रमनि । भागे पुलिंग के तुल्य है । ( देखो पृष्ठ ३१ ) ।। पयो वर्षन्ति जलदा:बादल जल वर्माते हैं। पयसा कमलामि शोभन्ते जाल से कमल सुहाते हैं। निर्मामदः पयः=यह जल निर्मल है । अमनि वनानि कानि=ये बन सूख गये । अम सरसी स्वच्छे स्तः ये दो तालाब स्वच्छ हैं इत्यादि । इति नपुंसकलिङ्गस्वरूपनिरूपणम् समाप्तोऽयं तृतीयश्च भागः ॥
पु० ) चाणक्यमार भारमल )। नीमे निस्तकादि पं० छुट्टनलाल स्वा . परीनिगढ जि० मेरठ से मिलेंगे। ऋगादिभाष्यभूमिकेन्दूपरागे प्रथमोश:-)| तारीखदुनियां (नागरी) =) तथा द्वितीयोंशः -) यज्ञोपवीतशङ्कासमाधि -) भजनेन्दु -) सात उपनिषद् भाषा और संस्कृत भाष्य ३) भजमप्रकाश )। पृथक २ ईश =) केन ।) कठ ॥) प्रश्न । संस्कृत भाषा प्रथम मुराडक ॥१) माण्डूल्य ३) तैत्तिरीय ॥) तथा द्वितीयं पु० -)। मातृशिक्षा ।) वेश्यानाटक उर्दू ) कामिनीकल्पद्रुम ।) रामायण का प्रल्हा पहली मार )। कुमारीभूषमा -) किराणाशास्त्रार्थ ) विदुरनीति मूल ) रामचन्द्रदर्शन )१२॥ दशोपनिषद् मूल ।) कलियुग लीला )१२॥ दमयन्तीस्वयंवर नाटक ) जीवनयात्रा ) अष्टाध्यायी मूल ३) सीताचरित्र नावन (नागरी) प्र० भाग 1) भर्तृहरिनीतिशतक भाषा टोकासहित ) तथा उर्दू चारों भाग १॥॥) प्रति भाग ॥) गणरत्नमहोदधि १॥) कोष+ प्रायुर्वेदशब्दार्णव १) (वैद्यककोष) कमीशन- इकट्ठ लेने वालों को ४) में ५) का, ७) में १०) का, और २०) में ३०) का माल दिया जावेगा ॥ डाकव्यय सब का मूल्य के अतिरिक्त है । विधिपूर्वक बने हुए यज्ञोपवीत ।। रेशम के अव्वल दर्ज के २० का मूल्य ५) दूसरे २) भूत के दूसरे ॥) तीसरे 1-) प्रवल दर्जे १) २
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