Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Gulab Sahab Ki Bani
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उपदेश भागन हम पायो, सतगुरु की बलि जाई । ल राम को सेवक, मिल्यो निसान बजाई ॥४॥ ॥ शब्द २२ ॥ . रे रामराय चरना, जेहि सुमिरे छुटि आवा गवना ॥टेक।। बॉधि पचीसो बाँधहु, तीन देव बसि करु अपना ॥१॥ क्रोध के मसल मेटावहु, दुविधा दुमति दूरि करना ॥२॥ मन राजहिं बसि करि समुझावहु, माया मोह पकरि धरना ॥३॥ सहज समाधि हृदय मह लावहु, ज्ञान ध्यान सुचि दृढ करना ॥४॥ सत्त सरूप सदा भरि निरखहु, लपटि रही गुरु के चरना ॥५॥ कहे गुलाल सुनो भाई संतो, बहुरि न होय जरा मरना ॥६॥ ॥ शब्द २३ ॥ राम राम राम राम जेकरे जिय आवै। प्रेम पूर्न दृढ़ विराग सोई यह पावै ॥१॥ सतगुरु जव दियो प्रसाद प्रीत हूं. लगावै। तन मन न्योछावरि वारि चरन में समावै ॥२॥ निर्मल -
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Serial N9206
1. de No 2
गुलाल साहब की बानी
जीवन-चरित्र सहित
जिस मे
उन महात्मा के अति मनोहर और भक्ति बढ़ाने
वाले पद और साखियाँ शोध कर मुख्य मुख्य
अंगों मे रक्खी गई हैं
और गूढ शब्दों के अर्थ व सकेत भी नोट मे
लिख दिये गये हैं।
[फोई साहव बिना इजाजत के इस पुस्तक को न छा।
इलाहाबाद
वैठोडियर स्टीम प्रिटिग 'वर्भ में प्रकाशित हुई
सन् १९१०
1115
२५४ सफहा]
[दाम SM
Priuted at tho drefore yeam Prinde ork
Wahaiad, try . Ualt.
निवेदन । सतवानी पुस्तक-माला के छापने का अभिप्राय जक्त-प्रसिद्ध महात्माओं की यानी व उपदेश को जिन का लोप होता जाता है बचा लेने का है। अब तक जितनी बानिया हम ने छापी हैं उन में से बिशेप तो पहिले छपी ही नहीं वीं और कोई २ जो छपी थीं तो ऐसे छिन्न भिन्न, बेजोड और अशुद्ध रूप में कि उन से पूरा लाभ नहीं उठ सकता था । हम ने देश देशान्तर से बडे परिश्रम और व्यय के साथ ऐसे हस्त- निखित दुर्लभ ग्रथ या फुटकर शब्द जहाँ तक पिछने पाँच बरस के उद्योग से हो सका असल या नकल कराके मंगवाये और यह कार्रवाई बरा- पर जारी है। भर सक तो पूरे ग्रथ मंगा कर छापे जाते हैं और फुटकर शब्दो की हालत में सर्व साधारन के उपकारक पद चुन लिये जाते है। फोई पुस्तम बिना कई लिपियों का मुकाबला किये और ठीक रीति से शोधे नहीं छापी जाती, ऐमा नहीं होता कि औरों के छापे हुए ग्रों की भाति समझ और बेजांचे छाप दी जाय । लिपि के शोधने में प्राय उन्हीं प्रथकार महात्मा के पथ के जानकार अनुयायी से सहायता ली जाती है और शब्दों के धुनने में यह भी ध्यान रखा जाता है कि यह सर्व माधारन की रुचि के अनुसार और ऐसे मनोहर और हृदय-वेधक हों जिन से आँख हटाने फा जी न चाहे और अत फरन शुद्ध हो। फई यरस से यह पुस्तक-माला छप रही है और जो जो कमरे जान पहती हैं यह आगे के लिये दूर की जाती है। फठिन और अनूठे शब्दो के अर्थ और सकेत नोट में दे दिये जाते हैं। जिन महात्मा की बानी है उन का जीवन-चरित्र भी साय ही लापा जाता है और जिन भक्तों और महापुरुषों के नाम किसी यानी में आये हैं उन के सक्षेप वृत्तात और फौतुक फुट नोट में लिख दिये जाते हैं।
सूचीपत्र जीवन-चरित्र (१-२) पृष्ठ १२ १९५ ४९ ६४ १०० अवधू सा जोगी अकति अलह ाँ जानि अखियाँ खोलि देसु अब अखियाँ प्रभु दरसन नित लूटी अगम निगम सबही थको अगमपुर नीवति धुनि जहें याजई अचरज हम इक देखल अगर अमर पुर देस अजर बियाह कैसे वनि आई अधम मन जानत नाहीं राम अधम मन राम न जान गॅवारो अधर रग फगुवा अवधू निर्मल ज्ञान विचारो ज्ञानी अब मोसो हरि सो जुरलि सगाई, अब हम छोड़ दिहल चतुराई अविगत पागल हो सजनी अविनासी दुलहा हमारा हो अभि अतर हो ठौ लाव मना अर्थ उर्घ को खेल अरे मोर छैला भवरा गैलो काहु न बुझाय अलख पुरुष संग सेलो होरी अलहइमान लगाय अलह हमारी जाति अवधक आयल पिया के सदेसवा अस मन रह गुरु धरन पास अष्ट पायल जब फुल्यो आष्ट कवल दल फूल अष्ट कपल फूलाइ निरतर अष्ट कवल फूलाय पवन अहो मन होरी ૨૪ ३७ .. .. -- ११९ , ४० CC ११ २० ग - ४ सूचीपत्र पठ शब्द गुरू परताप अप माघ च में फागुन मन पलु मारे मनुयाँ चित होलन लागो १०६ ९४ ૧૦ર ४८ चित धरि करह चेता क्या नाह E खिम लिन प्रीति लगी माहि प्रभु .. ३३ ५१ १३१ . ... जग्यो यसत जा के जगर मगर को रोल जनम मुफल भेलो हो जय हम प्रभु पायो बह भागी जात रही मुन्न परिया हो जालिम जबर ससार जाखिम मन को वाँधि जिन आपु ना सैंमारा जोग जुगत को जानि के जो चित लागे राम नाम अस जो कोद प्रेम को गाहक होई जो पै कोइ साँघ सहज धुनि लावे जो कोत उलटि निहारे आप जो कोत चरन कमल चित लावे जो पै साँचि लगन हिय आवे . ४७ झिलिमिलि झलकत नूर झठि लगन नर ख्याल ऋदि सेवा नर करत आस ६५ . त तत्त हिटोलवा सतगुरु तन में राम और कित जाय ८१ सूचीपत्र 1 - १६ नेक गह 9 90 निज नाम शब्द पृष्ट मन चित धरू रे ९३७ मन तुम कपट दूर लुटाव २१ मन तुम काहे न हरि गुन गावो मन तुम चित राम मन तुम सदा चरन चित लाय ३५ मन तू हरि गुन काहे न गावै ४ मन पवना का संगम मन मगन भयो जब प्रभु पायो मन मधुकर सेलत बसत मन माना मैं मनहि जान १२७ मन मुक्ता होवे नाम १०८ मन मे जानिये हो १२१ नन में निर्गुन गति जो आवै २ मन मे मीत ४ मन मे हम सेलें होरी १०५ मन मोर बोले हरि हरि राम ३४ मन मारा गरज समाना मन मोरा ४१ मन राजा सेले होरी एए मन सहज सुन्न चढि करु निवास ५१ मनुवा अगम अमर घर पाया ४ मनुवा मोर भइल रग यातर १०४ मनुवा संग रागाई झुठ मुठ रोलही ५७ माया मोह के साथ मुसलमान जो आरति करई मुना रे निर्फल दिन जाय मूल कँघल चित सावल मेरी नाथ सोहोरी શરૂ मेरे आनद होरी आई री मेरे सतु यसत पर मेरो मन प्रभु सो तागत में उपमा कति करो या पद पट ४ में दिया रे यदा फुर घदती बुष्ट टेक के कारन भूत से फिर अप - ur .
सूचीपत्र शब्द मैं तो खेलांगी प्रभु की में तो राम धफरिया मन लागो मैं बलि २ जाय मेरो मन लागल प्रभु पपा मोर मतबलवा नाम मद मातल मारमन नतयलवा रहल लोभाप मोहि नाप मिलायहु कोने गुना ३० यह ससार अयान यह रासार सपान याही कहन हमारि ६० ६८ ६३ १० ६७ ५ ६४ ३५१ रवि भसि दूनो याधि के रसना राम नाम लव लाई रहित भयो पर नारी राम के काम मेकाम रामचरन धित अटफो राम भजहुलय लाद राम भार पुजिया राम मोर धना राम रहे घर माहि राम राम राम नाम सोई गुन गावै राम राम राम राम भारती हमारी राम राम राम राम जेकरे जिया आये २ मन नामहि सुमिरन करे रे मन मूढ अजानिया रोम रोम में रमि रखो ल लागत मोहिं पियारा लागलि नेह हमारी पिया मोर लागो रंग फूठो खेल बनाया or २९ १ सतगुरु के परताप तो अनँद बधावरा सतगुरु पर पर एE + सूचीपत्र शब्द पृष्ठ सतगुरु जो कीन्ह दाया सतगुरु लगन धरावल सतगुरु सँग होली खेलो सत्त सब्द इक पुरुष हो सत्त सरूप समाइय हो सत्त सब्द तहँ होय बेनु तहँ उठे बधावा सब घट साहय बोल सब्द के परल हिटोलवाहो मब्द सनेह लगावल हो २८ ६२ 99 सन्द समसेर लै १०७ २७ १२२ ७१ ६६ समय लगो हरि नाम हो सरन सँभारि धरि ससि औ सूर पवन भरि मेला ससुरवॉ पथ कैसे जाप हो सहज घर आरति मौज मे लागो सहज सुख दिन दिन हो सांध करहु नर आपु साँचा है सॉचा हरिनाम साधी जन राम नाम भजिये साहब दायम प्रगट सीतल साहव नाम सुखमन सुन्दर राज सुन्दर साहब जानि के सुन्दर साहब मानि के सुन्न मोकाम में सुन सरोवर घाट सुन्न सहर आजूब मुन्न सिखर चढि जाइब हो भुनु सखि मोर बधन इक भारी सुमिरहु रे राम राय चरना सुरति सो निरति अलभ बसत गरमाम जाम सोई दिन से १३८ ११ १०७
जीवन चरित्र
गुरू धारन किया । गुलाल साहय तअनुका वसहरि जिला गाजीपुर के
जिमीदार थे और वहीं पैदा हुए और गृहस्थ आश्रम मे रह कर वहीं
चोला छोडा। इसी तअनुके के एक गाँव का नाम भुरकुडा है जहाँ गुलाल
साहव सतसग करते व कराते रहे। गुलाल साहब की साध गति थी और
उनका तीब्र बैराग और प्रचट भक्ति उनकी अति कोमल और
मधुर
वानी से टपकती है।
।
बावरी साहव दिल्ली
| वीरू साहब
यारी साहब
.
बुल्ला साहव भुरकुडा, जिला गाजीपुर
जगजीवन साहब
गुलाल साहब
दूलमदासजी
भीखा साहव
गोविन्द साहब अहिरौली, जिला
फजाबाद
-
पलटू साहव अयोध्या
BINAIVERY गुलाल साहब की बानी + - उपदेश ॥ शब्द १॥ रे मन मूढ अज्ञानियाँ, तोहि सुधियो न आय। निस वासर भरमत फिरै, दौडत दिन जाय ॥१॥ प्रवल पाँच पायक* लिये, बहु सेना बनाय। काया गढ़ बैठो क्रुतवलिया हासिला ले सब दाम गनाय ॥२॥ किरपी करत वार बहु लागा, हाथै स्वाद कळू नहि आय । स्ना के गुन" धोखे तालत, भादू निर्मल जन्म गॅवाय ॥ ३ ॥ डहकत' फिरत नेक नहिं मानत; अपने हर दम हुकुम चलाय । काहू सत के फद परहुगे चिटुकी देत सो प्रगट नचाय ॥ ४ ॥ गुरु के सब्द तहाँ लै बॉधहु, त्रासित कबहुँ न छूटन पाच । दास गुलाल दया सतगुरु के, याक्यो मन तब गइल बलाय ॥ ५ ॥ "प्यादे । फिौज । भानदनी । रोती। । गोन, धारा जो वेल पर लादा जाता है। ठगाना । “रा हुआ। - २ उपदेश ॥ शव्द २॥ मन मैं निर्गुन गति जो आवै । हानि न होय जीव की कवहीं, गगन मँडल घर छावै ॥ १॥ राजा रंक छत्र-पति भूपति, नाना सुख तजि भयो है दिवाना, पंडित वेद न भावै ॥२॥ सन्यासी वैरागी तपसी, तीरथ रहि रटि* धावै । आतम राम न जानहि प्रानी, तन कहें त्रास दिखावै ॥३॥ ससय मेटि करै सतसगति, प्रेम पंथ पर धावै। मैं आसन माँडै. जगमग जोति जगावै ॥४॥ आवागवन न होइ है कबहीं, सतगुरु सत्त लखावै। कहैं गुलाल यह लगन हमारी, विरला जन कोई पावै ॥५॥ सुन्न नगर ॥ शब्द ३॥ हरि नाम न लेहु गॅवारा हो। काम क्रोध रटत फिरत है।, कबहु न आप संभारा हो 'घूममा ।
उपदेश आपु अपन कै सुधि नहिं जानहु, वहुत करत विस्ताराहो। नेम धरम व्रत तीर्थ करतु है।, चौरासी बहु धारा हो ॥२॥ तस्कर* चोर बसहि घटभीतर, मूसहिं सहन। भेंडारा हो। सन्यासी बैरागी तपसी, मनुवाँ देत पछारा हो ॥ ३ ॥ धंधा धोख रहत लिपटाने, माह रतो संसारा हो। कहें गुलाल सतगुरु बलिहारी, जग तें भयो नियारा हो॥४॥ ܟܢܨ ॥ शब्द ५॥ तुम जात न जान गॅवारा हो। को तुम आहु कहाँ से आयो, कूठो करत पसारा हो॥१ माटी के बुंद पिंड कै रचना, ता में प्रान पियारा हो। लोभ लहरि में मोह को धारा, सिरजनहार विसारा हो ॥२॥ अपने नाह को चीन्हत नाही, नेम धरम आचारा हो। सपनेहुं साहब सुधि नहिं जान्यौ, जम दुत देत पछारा हो॥३॥ उलट्यौ जीव ब्रह्म में मेल्यौ, पाँच पचीस धरि मारा हो। कहैं गुलाल साधु में गनती, मनुवा भइल हमारा हो ॥५॥ अवधू निर्मल ज्ञान विचारो। ब्रह्म सरूप अखंडित पूरन, चौथे पद सौ न्यारो ॥ १॥ ना वह उपजै ना वह बिनसै, ना भरमै चौरासी। सतगुरु सतपुरुप अकेला, अजर अमर अबिनासी ॥२ ना वाके वाप नहीं वाके माता, वाके मोह न माया ।। ना वाके जोग भाग वाके नाही, ना कहु जाय न आया॥३॥ के अदभुत रूप अपार विराजे, सदा रहै भरपूरा । कहें गुलाल साई जन जान, जाहि मिलै गुरु सूरा ॥४॥ *डाँक । भिआँगन । पति । है , ४ उपदेश , १ - ॥ शब्द 9॥ - t अवधू सा जोगी गुरु ज्ञानी। मजै राम जगत है न्यारा, ब्रह्म सरूप पिछानी ॥ १ ॥ काम को मारि क्रोध को जारै, धोखा दूरि बहावै । मन गजंद ज्ञान करि सीकर, पकरि के जेर भरावै॥२॥ सील सतोप के आसन मॉडे, सत्त सरूप बिचारै। जीव ब्रह्म जब मेला होवे, आवागवन निवारै ॥ ३ ॥ अछय अमर अनुभव अनमूरत, कोई सत जन पावै । कहें गुलाल सतगुरु बलिहारी. फिर यह लोक न आवै॥४॥ मन तूं हरि गुन काहे न गावै । तात कोटिन जन्म गंवावै ॥ १ ॥ घर मे अमृत छोडि के, फिरि फिरि मदिरा पावै। छोडहु कुमति मूढ अब मानहु, बहुरि न ऐसा दावै ॥२॥ पॉच पचीस नगर के बासी, निनहि लिये संग धावै । बिन पर उडत रहै निसि बासर, ठौर ठिकान न आवै ॥३ जोगी जती तपी निर्वानी, कपि, ज्यो बाधि नचावै। सन्यासी बैरागी मौनी, धै धै नरक मिलावै ॥ ४ ॥ अब की बार दाव है मेरा, छोडी न राम दोहाई। जन गुलाल अवधूत फकीरा, राखौं जंजीर भराई ॥५॥ मन- में प्रील करहु निज नाम । यह ससार अगम भवसागर, बहत है आठो जाम ॥१॥ अपने घर की सुधि नहि जानत, जल पत्थर परमान। *हाथी । विदर। ॥ शब्द ॥
॥ शब्द ॥ उपदेश इनकी ओट जनम जहेंडावहु,* मनुवॉ फिरत हेवान॥२॥ पाँच पचीस सो प्रबल चोर हैं, तीन देव बेइमान । कुल की कानि अध नहिं सूफत, मुवले कहाँ समान ॥३॥ अगम निगम जिन पथ निहाखो, पछिम उगायो भान। कहैं गुलाल सतगुरु बलिहारी, निकलि गयो असमान॥४॥ भजन करु मनुवाँ वैरागी ॥ टेक ॥ काम क्रोध मद ममता त्यागो, प्रभु चरनन महं पागी १ सुत हित नारि बन्धु परिजन जन, डहत' हैं स्वारथ लागी २ झूठी सेव सेमर फल चाखा, अमृत फल काहे त्यागी॥३ बिप भोजनहि पाइ मत सेविह, सत्त सब्द हिये जागी जन गुलाल सतगुरु वलिहारी, मन मेला मन लागी ॥५ ॥ शब्द १०॥ राम मोर पुंजिया राम मोर धना, निस वासर लागल रहु मना ।। टेक ।। आठ पहर तहें सुरति निहारी, जस बालक पालै महतारी ॥ १ ॥ धन सुत लछमी रह्यो लोसाय, गर्भ मूल सब चल्यो गंवाय ॥२॥ बहुत जतन भेख रचो बनाय, बिन हरि भजन इंदोरन, पाय ॥३॥ हिदू तुरुक सब गयल बहाय, चौरासी में रहि लिपटाय ॥४॥- 'ठगाना । डिाहते हैं । एक फरा का नाम है जो देखने में सुदर लाल रग का होता है पर बहुत कछुवा । । । - - उपदेश कहै गुलाल सत्तगुरु बलिहारी, जाति पॉति अब छुटल हमारी ॥ ५ ॥ ॥ शब्द ११॥ मूढहु रे निर्मल दिन जाय, मानुप जन्म बहुरि नहिँ पाय ॥ १॥ कोइ कासी कोइ प्राग नहाय, पॉच चोर घर लुटहिं बनाय ॥२॥ करि अस्नान राखहि मन आसा, फिरि फिरि नरक कुंड में बासा ॥ ३ ॥ खोजो आप चितै के ज्ञाना, सतगुरु सत्त बचन परवाना ॥४॥ समय गये पाछे पछिताव, कह गुलाल जात है दाव ॥ ५॥ ॥ शब्द १२॥ नगर हम खोजिलै चार अवाटी । निस बासर चहुँ ओर धाइलै, लुटत फिरत सब घाटी १ काजी मुलना पीर आलिया, सुर नर मुनि सब जाती। जोगी जती तपी सन्यासी, धरि मास्यो बहु भाँती॥२॥ दुनिया नेम धर्म करि भूल्यो, गर्व माया मद माती । देवहर पूजत समय सिरानो, कोऊ सग न जाती॥३॥ मानुप जन्म पाय के खोइले, भ्रमत फिरै चौरासी । दास गुलाल चार धरि मरिलौं, जावे न मथुरा कासी ॥४॥ *कुराह चलने वाला। । ।
उपदेश - A . 1 ॥ शब्द १३ ॥ मन तुम नेक गहहु चित राम ॥ टेक ॥ जासु नाम सुर नर नहिं पावहिं, सत महा सुख धाम । पाँच पचीस तीन हैं मूसिद, उन कहें ग्राम न ठाम॥१॥ जारहिँ सहर लुटहिं बिनु लसकर, निसि दिन आठो जाम। जालिम जोर नेक नहिं मानत, परजा दुखित बेरामा २ सत्त,सतोप काया गढ भीतर, गहि लो सुरति सॉ नाम। उर्ध पवन लै धरहु गगन में, बॉधि करहु विसराम ॥३॥ जम जीतौ घर नौवति वाज, किया है जोति मोकाम । जन गुलाल करहिं बादसाही, नूर तजल्ली नाम ॥४॥ ॥ शब्द १४॥ जो पै कोउ चरन कमल चित लावै । तवहीं क्टै करम के फदा, जमदुत निकट न आवे ॥१॥ पॉच पचीस सुनि थकित भये हैं, तिरगुन ताप मिटावै। सतगुरु कृपा परम पद पावै, फिर नहिं भव जल धावै॥२ हर दम नाम उठत हे करारी, सतन मिलिजुलि पावै। मगन भयो सुख दुख नहिं ब्यापै, अनहद ढोल बजावै ३ चरन प्रताप कहाँ लगि वरनॉ, मो मन उक्ति न आवै। कहें गुलाल हम नाम भिखारी, चरनन मे घर पावै ॥४॥ अगम पुर नौवति धुनि जहें बाजई। घन गरजे माती तह बरसै, उलट गगन चढ़ि गाजई ॥१ ससि औ सूर तहाँ नहिं दिसियत, एकै ब्रह्म विराजई। आवै न जाय मरै नहि जीवै, कुहुकि कुहकि मन पागईर टुटेरे । बीमार । ॥ शब्द १५ ॥ - ।
१०
उपदेश
॥' शब्द १९॥
सहज सुख दिन दिन हो, भजि लेहु आनंदराय ॥टेक॥
प्रेम प्रीत धरि रीत चरन सॉ, इत उत चित नहिं जाय ।
सुरति निरति ले गवन किया है,काल निकट नहिं आय॥१॥
आपु अपन को चीन्हत नाहीं, निसि दिन धंधे धाय ।
मोर तोर में लपट रह्यो है, भाँदू भटका खाय ॥२॥
संत साध की रीति न जाने, देवहरि पूजे धाय ।
लोक वेद महें अरुझि रह्यो है, जन्म पदारथ जाय ॥३॥
अगम अगोचर गोचर करि कै, सतगुरु बचन सहाय ।
कहै गुलाल तव जन्म सुफल भयो, घरही मैं घर पाय ॥४
॥ शब्द २० ॥
1
हे मन धावहु तन के मैली
यह संसार नहीं सूझत घट, खोजत निसु दिन गैली ॥१॥
नहीं नाव नहि केवट वेड़ा, फिरत फिरत दिन ऐली ।
पॉच पचीस तीन घट भीतर, कठिन
कलुख
जिय भैली
॥२॥
गुरु परताप साध की सगति, प्रान गगन चढ़ि सैली ।
कहैं गुलाल नाम भयो मेला, जत्म सुफल तय कैली ॥३॥
॥ भब्द २१॥
हे मन सुन्दर सेत सोहाई।
उदित उजल छवि वरनि न आवे, सेत फटिक रोसनाई।१॥
अजर जरे औ बरे अधर में, मानिक जोति जगाई।
कोटिन चंद सर छवि कोटिन, चरनन की बलि जाई।२॥
पूरन ब्रह्म मिल्यो अविनासी, उलटि निरंतर छाई।
सिव के संग सक्ति गुन गावहिं , उमॅगिउमगि रस पाई ॥३॥
तपदेश ११ ऐसा प्रभु भागन हम पायो, सतगुरु की बलि जाई। जन गुलाल राम को सेवक, मिल्यो निसान बजाई ॥४॥ ॥ शब्द २२॥ सुमिरहु रे रामराय चरना, जेहि सुमिरे छुटि आवा गवना ॥टेक॥ पॉचहिँ बॉधि पचीसो वाँधहु, तीन देव बसि करु अपना ॥१॥ काम क्रोध के मसल भेटावहु, दुविधा दुमति दूरि करना ॥२॥ मन राजहिं बसि करि समुझावहु, माया मोह पकरि धरना ॥३॥ सहज समाधि हृदय महें लावहु, ज्ञान ध्यान सुचि दृढ़ करना ॥४॥ सत्त सरूप सदा भरि निरखहु, लपदि रही गुरु के चरना ॥५॥ कहे गुलाल सुनो भाई सतो, बहुरि न होय जरा मरना ॥६॥ ॥ शब्द २३ ॥ राम राम राम राम जेकरे जिय आवै। प्रेम पूर्न दृढ विराग साई यह पावै ॥१॥ सतगुरु जय दियो प्रसाद प्रोत ह लगावै । तन मन न्योछावरि वारि चरन में समावे ॥२॥ निर्मला ।
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उपदेश ११ ऐसा प्रभु भागन हम पायो, सतगुरु की बलि जाई । जन गुलाल राम को सेवक, मिल्यो निसान बजाई ॥४॥ ॥ शब्द २२ ॥ सुमिरहु रे रामराय चरना, जेहिं सुमिरे छुटि आवा गवना ॥टेक॥ पाँचहिँ बॉधि पचीसो बाँधहु, तीन देव बसि करु अपना ॥१॥ काम क्रोध के मसल मेटावहु, दुविधा दुमति दूरि करना ॥२॥ मन राजहिं बसि रि समुझावहु, माया मोह पकरि ध्रना ॥३॥ सहज समाधि हृदय महें दावहु, ज्ञान ध्यान सुचि दृढ़ करना ॥४॥ सत्त सरूप सदा भरि H लपदि रहो गुरु के धरना ॥५॥ कहे गुलाल सुनो भाई सतो, बहुरि न होय जरा मरना ॥६॥ ॥ शब्द २३ ॥ राम राम राम राम जेकरे जिय आवै। प्रेम पूर्न दृढ़ विराग साई यह पावै ॥१॥ सतगुरु जवादियो प्रसाद प्रीत ह लगावै । तन मन न्योछावरि वारि चरन में समावै ॥२॥ 1 निर्मल।
चेतावनी का अग अनुभव घर कै सुधियो न जानत, का साँ कहूं गॅवार । सबै नर गाफिल, कान उतारै पार ॥४॥ कहै गुलाल ॥ शब्द ४॥ - हे मन ऐसी बनिज लदावो। पाँच पचीस तीनि आपा मैं, कसि कै गगन गुफा ठहरावो ॥ १ ॥ सुन्न सिखर पर बाजन बाजै, सुनत सुनत मन भावो । लवकै बिजुली मोती बरसै, चूंगत चुंगत अघावो ॥२॥ चॉद सूर तहवाँ नहिं दिखियत, निसु दिन आनंद भावो । काम क्रोध की गरदन मारो, अनुभव अमल चलावो ॥३॥ उमॅगि उमॅगि प्रभु के रंग रातो, पुलकिता कंठ लगावो । जन गुलाल पिय प्यारी खसम की, जम सिर डंक' वजावो ॥४॥ चमकती है। उमग से। इका ।
चेतावनी का अग ॥ शब्द ५॥ नर करवा कवन विचार, लोगवा पाहुन ॥टेक॥ सॉझ सकार रैन दिन धावहि, सबहि करत व्योहार । भर ढिंढ़-खाइन जनम गवाइन, काहू न आपु सॅभार १ पाँच पचीस नगर के बासी, मनुवॉ है फउदारी । मारि लूटि के डॉड़ लेतु है, का तुम करव गॅवार ॥२॥ समय गये कोउ सग न साथी, धन जोवन परिवार । जम राजा जब धै लै चलि हैं, छुटि है सकल पसार ॥३॥ कुसुम सिंगार पहिरि मति भूलो, ढरत न लागै बार। कहत गुलाल सबै नर गाफिल जम का करिहै हमारा लागा रेंग कूठो खेल बनाया। जहँ लगि ताको सबै पसारा, मिथ्या है यह काया ॥१॥ मार तार छूटत नहिं कवहीं, काम क्रोध अरु माया । आतम राम नहीं पहिचानत, भॉदू जन्म गॅवाया ॥२॥ नेम के आस धरत नर मूढहु, चढत चरख दिन जाया । घुमत घुमत कहिं पार न पावै,का लै आया का ले जाया३ साध संगति कीन्हे नहिं कवहीं, साहब प्रीति न लाया । कहें गुलाल यह अवसर बीते, हाथ कछू नहिं आया ॥४॥ ॥ शब्द७॥ अभि अतर ही लै लाव मना, ना तो जन्म जन्म जहड़ाई होटेक॥ *पेट। सेिनापति । घट । भरमना । ,
१६
मन माया का अग
धन दारा सुत देखि कै, काहे बौराई हो।
काल अचानक मारिहै, कोउ सग न जाई हो ॥१॥
धीरज धरि संतोप करु, गुरु वचन सहाई हो ।
पद पकज अंबुज करु नवका, भवसागर तरि जाई हो
अनेक बार कहि कहि के हारी, कहें लग कहा धुझाई हो
जन गुलाल अनुभौ पद पावो,छुटालि सकल दुनियाई हो॥३
मन माया का अंग
मन तुम काहे न हरि गुन गावो,
कोटिन जन्म भुलावो ॥ टेक ॥
घर
मैं
अमृत छोडि के रे,
फिरि फिरि मदिरा पावा।
छोडहु कुमति मूढ अब मानहु,
बहुरि न ऐसा दावो ॥ १॥
पाँच पचीस नगर के वासी,
उन्हें लिये सेंग धावा।
बिनु पर उड़त, रहत निसु वासर,
ठौर ठिकान न आवा ॥२॥
जोगी जती तपी निर्वानी,
कपि ज्य बॉधि नचावो ।
सन्यासी वैरागी मौनी,
धरि धरि नर्क में नावो ॥३॥
- मम माया का अंग १७ अब की बार दाव है मेरा, छोडौँ न राम दोहाई। कहै गुलाल अवधूत फकीरा, राखों जंजीर भराई ॥४॥ ॥ शब्द २॥ सतो नारि सकल जग लूटा। ब्रह्मा विस्नु सीव सनादिक, सुर नर मुनि नहिँ छूटा ॥१॥ नवा नाथ सिद्ध चौरासी, नारद रिपि दुरवेसा । जोगी जंगम तपि बैरागी, गना गंधर्व अरु सेसा ॥२॥ लछ चौरासी जीव जहाँ लग, ज्ञान बुद्धि हर लीन्हा। तीन लोक मे जाल पसारो, मोह के बसि सब कीन्हा ॥ ३ ॥ बज बॉध सब ही को बॉध्या, वॉधी वॉधि नचाया। कहँ गुलाल कोऊ जन वाचे, जिन सतगुरु पूरा पाया ॥ ४ ॥ ॥ शब्द ३॥ संतो नारि सॉ प्रीति न लावै । प्रीति जो लावै आपु ठगावै, मूल बहुत को गावै ॥ १॥ "फफीर । ठिोटे छोटे देवता जो शिव जी की सेवा में रहते है। 3 १८ मन माया का अग , गुरु को बचन हृदय लै लावै, पाँचौ इंद्री जारै। मनहिं जीति माया बसि करिकै, काम क्रोध को मारै ॥२॥ लोन मोह ममता को त्यागै, दृस्ना जीभि निवारै। सील संतोप सा आसन माड़े, निसु दिन सब्द विचारै ॥ ३ ॥ . जीव दया करि आपु संभारे, साध सगति चित लावै । कह गुलाल सतगुरु वलिहारी, बहुरि न अवजल आवै ॥ ४ ॥ सतो कठिन अपरबाल नारी। सवहीं बरलहि भोग किया है, अजहू कन्या क्वारी ॥ १ ॥ जननी है के सब जग पाला, बहु विधि दूध पियाई। सुदर रूप सरूप सलोना, जोया होइ जग खाई ॥२॥ *विवाह करके । जिोरू।
मन माया का अग -- मोह जाल सॉ सबहिं वझायो, जहँ तक है तन धारी। काल सरूप प्रगट है नारी, इन कहँ चलहु सँभारी ॥३॥ ज्ञान ध्यान सब ही हर लीन्हो, काहु न आपु सँभारी। कहै गुलाल कोऊ कोउ उबरे, सतगुरु की बलिहारी ॥ ४॥ ॥ शब्द ५॥ - 7 अधम मन जानत नाहीं राम । भरमत फिरै आठ हू जाम ॥ १॥ अपनो कहा करतु है सबही, पावत पसुआराम । घुरचिनिया छोड़त नहिं कवहीं, होइ भार भा साम ॥२॥ ऊडत रहत विना पर जामे, त्यागि कनक ले ताम'। नीक, बस्तु के निकट न लागे, भरत है झोरी खामः ॥३ अब की बार कहा करु मेरो, छोडो अपनी हाम। कह गुलाल 'तोहिं जियत न छोडॉ, खातदोहाई राम ॥४॥ ॥ शब्द६॥ अधम मन राम न जान गॅवारो।' या मन ते केते अरुझाने, माया ठि बिस्तारो ॥ १ ॥ यहि परिपच देखि जनि भूलहु; कारन सबै विचारो। हर दम पलक थीर नहिं पैही, छिन महें काल सेंघारो२ *कूठा धुनने की आदत । तिॉया। कच्ची । हँगता। ।
मन माया का अग काम क्रोध मद लाभ न छूटत, धर्महीन औतारो। ऐसा समय बहुरि नहिं पैहो, कहत हैाँ बारंबारो ॥३॥ जे नर सरन राम की आये, ता को कौन विगारो। कहै गुलाल राम को सेवक, सतो कइल विचारो ॥४॥ ॥ शब्द ॥ - मोर मन मतवलवा रहल लोभाय ॥ टेक ॥ वटिया न चलत उबट देत पॉय। तजि अमृत विपही फल खाय ॥१॥ छोड़लस घर वन फिरत वहाय । अकरम काम करत न लजाय ॥२॥ का सॉ कहाँ दुख कहल न जाय । करत अनीत न अंग समाय ॥३॥ कह गुलाल हम सतगुरु पाये। मन वॉधल हम सहज समाये ॥४॥ . करम भरम कुल-कान आदिक का निषेध और उपदेश गुरु व शब्द भक्ति का ॥ गब्द १॥ अस मन रहु गुरु चरन पास, चित चकार जस चद आस ॥१॥ गुरु मरजादा कहि न जाय, कोटि जतन जो रचि बनाय ॥२॥ *कुराह । बिडाई। । - करम भरम ३ जिन जाना सिर चरन रेनु, गुरु के बचन जस काम धेनु ॥३॥ अष्ट जाम जाके वरत जात, विमल विमल धुनि उदित होत ॥४॥ गगन मॅडल मे बजत तूर, धन सतगुरु वहाँ रहत पूर ॥५॥ अति आनंद वहाँ उठत बसंत, गुरु कै फागु कह गुलाल मेरी पुजलि आस सतगुरु वुल्ले दिहल वास ॥४॥ ले खेलत सत ॥६॥ ॥ शब्द २॥ मन तुम कपट दूर लुटाव। भटक को तुम पंथ छोड़ो, सुरत सब्द समाव ॥१॥ करत चालं कुचाल चालत, मकर मेल सुभाव । तीन तिरगुन तपत दिनकर, कैसहू बुझलाव ॥२॥ अति अधीन मलीन माया, मोह में चित लाव । अगम घर की खबरि नाही, मूढ़ता सच पाव ॥३॥ सुन्न सिखर सरोज फूलो, बक नालहि जाव । कह गुलाल अतीत पूरन, , आपु मैं घर पाव ॥४॥ ३ भाई रे धोखे सव अरुझाना । सब्द सरूप नहीं पहिचानहि, तीरथ ब्रत लिपटाना ॥१॥ *यरल।
२२ करम मरम कोउ पेंच अगिन अधोमुख झूले, कोऊ तारी लावै । कोउ जल सैन पवन धुनि' लावै, वाँह उठाय सुखावै॥२ माला पहिरै तिलक बनावै, काथा+ गूदर नावै । मन मुरीद होवै नहिं जब लै, बिरथा भेख बनावै ॥३॥ कोज जोग जज्ञ तप ठाने, कोऊ गुफा में वासा। पट दरसन से जाय न पारे, सब को काल गरासा ॥४॥ भूठि आस विस्वास करत है, सुन्न सदा लपटाना । कह गुलाल कोउ कहन न माने, भरमत फिरत दिवाना। ॥ शब्द ४॥ . काह कहाँ कछु कहत न आवै, नाहक जग बौराई हो । अपनो नाह नेक नहिं जानहिँ, पर पूरुप पहं जाई हो? घर धर कलसलेइ अपराखहि, बहुविधि रचहिँ बनाई है। गावहिं पचरा मूड़ के पावहिं,बोरलहिँ सकल कमाईहो॥२ ऊँच नीच जिव सबहीं मारहि, बैटहिं देव की नाई हो। झूठ वचन कहि कै मन लावहिँ, जस अधा विपिन भुलाई हो ॥३॥ आप अपन को चीन्हत नाहीं, कुल की लाज लजाई हो। काल दंड धैकै जब मिसिहै, अलिहै सब चतुराई हो ॥४॥ आपु अपन के सबहिं सयाने, हम बौराये भाई हो। कहै गुलाल बहि गये सयाने, हमरे कही न जाई हो॥५॥ *खाँसा ते सारं का जाप । किपरी । खाली । सितम । देवीपूजा मे जो गीत गाई जाती है । डुबा दी। **तरह । बिन ! सिलैगा। - करम भरम २३ " नाम रस अमरा है भाई, कोउसाध संगति तें पाई ॥टेक॥ बिन घोटे बिन छाने पीवे, कौड़ी- दाम न लाई। रंग रंगीले चढ़त रसीले, कवहीं उतरि न जाई ॥१॥ छके छकाये पगे पगाये, जूमि भूमि रस लाई । विमल विमल बानी गुन बोले, अनुभव अमल चलाई॥२ जहें जहें जावै थिर नहिं आवै, खालि, अमललै धाई। जल पत्थल पूजन करि मानत, फोकट गाढ बनाई। ॥३॥ गुरु परताप कृपा तैं पावै, घट भरि प्याला फिराई । कहें गुलाल मगन है बैठे, अगिहै हमरि बलाई ॥४॥ ॥ शब्द ६॥ देखो संतो एक अजगूता', सुंदर घर लूटहि जमदूता॥१ इहवॉ देखो उहवाँ अध, उहवॉ देखो इहवाँ फंद ॥२॥ काटे मूड चढ़ावै देवा, इह देखो उह का करि सेवा ॥३॥ जन्म जाति बैठो बहु भॉती, इहें देखाउहें जाति न पॉती॥४ सुत धन मात पिता अरधग, इहें देखो उहें काको संग॥५ कहें गुलाल यह मन को फेर मन जीते सो पूरा सेर ॥६॥ ॥ शब्द ॥ साधी जन राम नाम भजिये, एक सिवाय और सब तजिये ॥१॥ आदि ब्रह्म की उपजी इच्छा तब ऊठो चेतन परिच्छा ॥२॥ चेतन सन्द भयो इक टाँई, पाँच तत्त ले जग उपजाई ॥३॥ *घोथा। सित मैं गढ के बनाया है। प्याला । अचरज । 4 4
करम भरम
चारि खान को किया पसार,
सुर नर नाग सबै औतार ॥४॥
माया मोह सब रच्यो बनाई,
चढ़त चरख फेरत दिन जाई ॥५॥
लोक वेद के परे हैं ख्याल,
बाझि मुए नर माया जाल ॥६॥
सकी वकी* सब गइल हिराई,
प्रभु विन ताकहें कान छोडाई ॥ ७ ॥
अनेक रग को सुखद बनाया,
निस्चै जानु ठगिन है माया ॥ ८ ॥
घर घर फॉस लिये कर धाई,
बच्या सोई जो गुरु सरनाई ॥ ६ ॥
विनु हरि भजन न होवै थीर,
संगति हाय जो पावै पीर+ ॥ १० ॥
तब यह धोखा मिटै रे भाई,
नहि तो घूमत फिरै यहाई ॥ ११ ॥
जो जिय जानै एकै रूप,
भटक न करु कहिं अवर सरूप ॥ १२ ॥
तृस्ना तामस बुरा रे भाई,
सत्त बिना कछु काम न आई ॥ १३ ॥
जन्न मंत्र करै कर्म अनेक,
अपने अपने
के टेक ॥१४॥
करम भरम - -- ॥ शब्द८॥ . याही मत संसार भुलाई ज्ञान हीन कैसे गति पाई ॥ १५ ॥ जोग जज्ञ जो करै कराई, दान धर्म मे बहु मन लाई ॥ १६ ॥ कहै गुलाल यह पाखंड भाई, आपु न चीन्हहु का बौराई ॥ १७ ॥ रसना राम नाम लव-लाई। अंतरगते प्रेम जो उपजे, सहज परम पद पाई ॥१॥ सतगुरु वचन समीर* थीर धरि, भाव से बंद.लगाई। जड़े हस गगन चढि धावै, फाटि जाय अम काई ॥२॥ जोग यज्ञ तप दान नेम व्रत, यह माही लहिं आई। संतन को चरनोदक लै लै, गिरा' जूंठ में पाई ॥ ३ ॥ कहा कहाँ कछु कहल न लागै, नाहक जग चौराई । कहैं गुलाल राम नहि जानत, खुक्तिहै। हमरी बलाई ।। ॥ शब्द ॥ मार मतवलवा नाम मद मातल, प्रेम लगन हिये लाई हो। आठो जाम रैन दिन मातल, और कहूं नहिं जाई हो ॥ १ ॥ उनमुनि धुनि लै भाठी साज्यो, पट रस अधर चढ़ाई हो। लौ की पवन फेरत जल भरि भरि, साँचत मूल सेहाई हो ॥२॥ *वायु । पहा हुआ। मालामा । 1 - करम भरम - चूवत सिखर भरत घटभरिभरि, धै के सुरत उतारी हो। चाखत मनुवाँ मगन मन मानो,लेत है अमी करारी हो॥३॥ सत्त सब्द के नेजा बाँध्यो, ओगरत' नाम अगारी' हो। कहैं गुलाल संत जन पीवहिं, वाही लगन हमारी हो ॥४॥ ॥ शब्द १० नाम रस भला है रे भाई। कोइ सानि जोगेसर खाई ॥ टेक ॥ काया ।ड़ी साफ बनायो, तिरविधि विजया नाई। घोटा पवन को सितल बनायो, छानु सिखर पर जाई ॥१॥ चाखत मनुवा भयो है दिवाना,छकि छकिअमल छकाई। हर हर लहर लेहि रस भरिभरि, अनतहिं जाइ बलाई ॥२॥ जिन पायो तिन ही को भायो, आलम" रहल लजाई । मायामोह में लपटि रहो है, कॉटहिं कॉट अरुझाई ॥३॥ संत सभा में फिरत करारी, अपनी अपनी भाई। कहँ गुलाल सादर विनती करि, किछु किछु हमहूं पाई ॥४॥ ॥ शब्द ११॥ सत्त सब्द तह होय बेनु तहें उठ बधावा ॥१॥ वाजै अनहद घंट बंसी रव* सुन में भावा ॥२॥ बैठि सिंघासन जाय दसहुँ दिसि मानिक छावा ॥३॥ कहैं गुलाल सेाइ भक्त अभैपुर डंक बजावा ॥४॥ मैंठ सेवा नर करत आस, नाम बिना नहिं पैदा बास ॥१॥ तीरथ वरतदेवआराध, केहु पॅछहिना जम बॉधहि बाधा *टपकती है। शिराब । साँग । सॉटा। ससार भाव ।**शब्द । रस्सी। ॥ शब्द १२ ॥ - करम भरम यहि विस्वास भुलै मत कोय,मॉझधार मे बोरिहें सोय ॥२॥ लोक वेद महें रत ससार,रामन चीन्हहिं मुरख गंवार॥४॥ ऐसहि समय गये दिन बीति,बारन ढहत वालु कै भीति ॥५॥ कहँ गुलाल मूढ हम आई, सबहिं सयाने हम वौराई ॥६॥ ॥ शन्द १३ ॥ ससि औ सूर पवनभरि मेला, दृढ करिआसनबैठु अकेला१. उलट नाल गगन घर जावै, विगसै कॅवल चंद दरसावै॥२॥ घंटारव तहं बाज निसाना,अनहदधुनसुनियत दिनु काना सुन्न असुन्न मेंडोर बंधाना,उड़े हंस चढि करत पयाना॥४॥ अगमअगोचरअविगत खेला,मान पुरुप तह करत है मेला५ मन अरु पवन सहज-घर आयो,ऐसी गतिसतन मनभायोद मेटल सुन्न मिलल परगासा,जन्म जन्म कै पूजलि आसा॥ , जनगुलालसतगुरु बलिहारी, जातिपॉतिअबछुटलहमारी॥ : ॥ शब्द १४ ॥ हमरे राम नाम वस्तू है, खलक लेन चहे घाँगा । हमरे कटक फौज कछु नाहीं, हमरे धन सुत जोगा ॥१॥ हमरे मुलुक खजाना नाहीं, रैयत नहिँ बस लोगा। हमरे पूरन नाम भरो धन, दुनिया देखि मरे सेोगा॥२॥ हमरे सग साथ नहिं कोई, अंध भये सब खोजत लोगा। हमरे वेद कितेचा नाही, हमरे व्रत नहि भोगा ॥३॥ राजा रकछत्रपति देखो, काल खडूग मारत सव खोजा । कहै गुलाल निःकल्प रूप भयो, जगत मुए करिरोजा॥४" *घौघा, कोही ।
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प्रेम २० प्रेस। ॥ शब्द १॥ अविगत जागल हो सजनी । खोजत खोजत सतगुरु पावल, ताहि चरनवॉ चितवा लागल हो सजनी ॥ टेक ॥ सॉम समय उठि दीपक वारल, कटल करमवा मनुवा पागल हो सजनी ॥१॥ चललि उवटि बाट छुटलि सकल घाट, गरजि गगनवा अनहदबाजल हो सजनी ॥२॥ गइली अनंदपुर भइली अगम सूर, जितली मैदनवा नेजवा गाड़ल हो सजनी॥३॥ कहें गुलाल हम प्रभुजी पावल फरल लिलरवा पपवा भागल हो सजनी ॥४॥ ॥ शब्द २॥ - लागलि नेह हमारी पिया मोर ॥ टेक ॥ चुनि चुनि कलियाँ सेज बिछावौं, करी में मंगलचार। एकौ घरी पिया नहि अइलें, होइला मोहि धिरकार ॥ १ ॥ आठौ जाम रैन दिन जोहौं, नेक न हृदय बिसार। तीन लोक के साहब अपने, फरलहि मोर लिलार ॥२॥ *फठिन । भाला।
३० प्रेम सत्त सरूप सदा ही निरखौं, संतन प्रान अधार । कहैं गुलाल पावौँ भरि पूरन, मौजै मौज हमार ॥ ३ ॥ ॥ शब्द ३॥ आजु मोरे अनॅद बधावा जियरा कुहकैला, सुनत सुनत सुख पाय ॥ टेक ॥ पाँच पचीस तिनि* चाचरि गावहिं, सो सुख बरनि न जाय ॥१॥ गगन मॅडल में रास रचो है, झमक रहो है छाय ॥ २ ॥ प्रेम पियारा प्रगट भयो जय, ब्रह्म पदारथ पाय ॥३॥ थकित भयो सुधि वुधि हर लीन्ह्यो, इत उत कहीं न जाय ॥१॥ कहें गुलाल भक्ति वर पायो, छूटलि सबहि बलाय ॥ ५॥ ॥ शब्द४॥ रीती। मैं वलि बलि जा मेरो मन लागल प्रभु पंधा ॥ टेक ॥ प्रेम नेम लै लावल हो पावल गुरु पुलकि पुलकि छवि देखल गावल निर्गुन गीती ॥१॥ या तन समय सुहावन हो जानहु परतीती। राम विना कस जीवन हो बालू ज्यॉ भीती ॥२॥ तीन ।
३ सासु सोहागिन विलसहि हो ननदी बिपरीती। गॉव के लोग नहिं आपन हो सवति करै चीती+ ॥३॥ सुनहू सखियाँ सहेलरि हो जो करै कहल हमारं । भवजल नदिया भयावनि हो कैसे उतरब पार ॥१॥ उलटि पवन घर सोधल हो सब रहल जाय । जगमग जगमग त्रिकुटी हो देखि रहल लोभाय ॥ ५ ॥ गंग जमुन बिच मडप हो घर अगम अवास । बिनु पर हंसा उड़ि गवन्यो तहें भूख न प्यास ॥६॥ पाप पुल नहिं दुख सुख हो नहि रोग न सोग । सुखमन सार अमी रस हो तहें जोग न भोग ॥७॥ गगन मगन धुनि गाजै हो देखि अधर अकास । जन गुलाल बसि हरि पद हो तहें करहि निवास ॥८॥ - आजु झरि घरखत, बुद सोहावन । पिया के रीति प्रीति छवि निरखत, पुलकि पुलकि मन भावन ॥१॥ सुखमन' सेज जे सुरति सँवारहि, शिलमिलि झलक दिखावन । गरजत गगन अनंत सब्द धुनि, पिया पपीहा गावन ॥२॥ *पिलास करती है। ििषहा लहाना। +
३४
प्रेम
गनग मॅडल में परम पद पावल जमहिं कइलघर छारी
जन गुलाल साहागिन पिय सँग मिलली भुजा पसारी॥
॥ शब्द १०॥
अब मो सौँ हरि सौँ जुरलि सगाई।
ब्रह्मा वेद उचारत निसु दिन
अनुभव तूर वजाई ॥ १ ॥
संत साध मिल लगन धराई
प्रेम कै घात चलाई।
सुन्न सिखर पर माड़ो लावा
सहज के रूप लगाई ॥२॥
गगन मॅडल में कोहबर राचो
लीखत चित्र बनाई।
सुरति निरति लै सखि सब गावहिं
घर ही नव निधि पाई ॥३॥
लोक वेद नेवछावरि वारौं
जुग जुग मैल बहाई।
कह गुलाल परम पद पावो
सतगुरु व्याह कराई ॥४॥
॥ शब्द ११॥
मन मोर बोलै हरि हरि राम।
और देव से नाहीं काम ॥१॥
प्रेम प्रीति नितही चित लाय,
रैन दिवस कतहूं नहिं जाय ॥२॥
प्रेम गावै। पॉच पचीस लै वैठि अकास, केल करत कोउ सग न पास ॥३॥ सुन्न सिखर पर करि बहु रग, दसौ दिसा में उठत तरंग ॥४॥ कृपा कियो गुरु भयो निस्तार, जन गुलाल भजि उतरहि पार ॥५॥ ॥ शब्द १२॥ राम राम राम नाम सेोई गुन आपुमारि पवन जारि गगना गरजावै ॥ १॥ अतिही आनद कंद* वानि हू सुनावै । सतगुरु जब दया जानि प्रेम हूं लगावै ॥२॥ अगम जोति करत मोति झिलमिल झरि लावै । चित चकोर निरखि जोति आपु में समावै ॥३॥ काम क्रोध लोभ मोह तन मन विसरावै । साई सुधिता धीर सोइ फकीर सोइ कहावै ॥ ४ ॥ जाति मान कुल कै कान गरव हू गंवावै । कह गुलाल सोई सत आपु ही कहावै ॥५॥ ॥ शब्द १३ ॥ मन तुम सदा, चरन चित लाय । जासु नाम सुर नर मुनि तारे, निरखत कलुख, नसाय॥१॥ पाँच पचीस तीन लइ बाँधो, उलटी नाव चलाय । तिरबेनी तट आसन मॉडो, गगन मंडल मठ छाय ॥२॥ *समूह । मुबुद्धि । पाप । ५ प्रेम प्रेम प्रीत के भोजन कीन्ह्यो अमृत पत्र जैवाय । अनत जन्म पर पाहुन आये संत उधारन राय ॥३॥ कह गुलाल साहव घर आये, सेव करब चित लाय ॥४॥ अधर महल पर बैठक पायाँ, अते* जाय बलाय ॥५॥ ॥ शब्द १९ ॥ अॅखियाँ प्रभु दरसन नित लूटी। हौं तुव चरन कमल में जूटी ॥१॥ निर्गुन नाम निरंतर निरखौँ अनंत कला तुव रूपी । विमल विमल बानी धुनि गावॉ कह बरनों अनुरूपी ॥२॥ विगस्यो कमल फुल्योकाया वन, भारत दसहुँ दिस मोती। कह गुलाल प्रभु के चरनन सेॉ डोरि लगी भर जाती ॥३॥ ॥ शब्द २० ॥ हौं अनाथ चरनन लपटानो। पंथ और दिस सूझत नाहीं छोड़ो तो फिरौं भुलानो॥१॥ जासु चरन सुरनर मुनि सेवहिं कहा बरनिमुख करोवयानो। हैं? तो पतित तुम पतित-पावन गति औगति एको नहिं जाना ॥२॥ आठो पहर निरत धुनि होवै उठत गुंज चहु दिसा समाना। भरिभरि परत अगार नैन भरि, पियत ब्रह्म रुचि अमी अघाना ॥३॥ बिगस्योकमल चरन पायो जब यह मत सतन केमन मानो। जन गुलाल नाम धन पायो निरखत रूप भयो है दिवानो॥४ *और जगह । तिक । शराब का फूल । - प्रेम ॥ शब्द २१॥ मेरामन प्रभु सॉ लागल हो, जागल प्रेम मन पागल हो ॥ १॥ घडि घड़ि पल पल जोति मिलो रहै, काम क्रोध मद त्यागल हो । अगम अगोचर सत्त निरंजन, वाजन अनहद वाजल हो॥२॥ एकै सत्त दसा एकै लिये, एकै ब्रह्म विराजल हो। आनंद एक भाव निस बासर, एक भक्ति हम मॉगल हो ॥ ३ ॥ अगम भेद सूझत नहिं बूझत, सहज सहज होइ जागल हो। कह गुलाल साहब किरपा कियो, के तिलक निवाजल हो ॥४॥ ॥ शब्द २२॥ हरि पुर चलु याही विधि जहें संतन वास ॥ टेक ॥ सतगुरु सत्तलखावल पावल मत मूल । प्रेम प्रीत चित लावल मन देखल अस्थूल ॥१॥ चद सूर घर आयल तिरवेनी तीर । निरखि निरखि गति साजल दरसन रघुवीर ॥१॥ सुरति निरति ले जाइब घर अगम अवास । तहवाँ प्रान अनादित काठल जम फाँस ॥३॥ *वसशिश की।
४० प्रेम 1 लोक पुनित* तीरथ व्रत राखहिं सब आस । जन गुलाल सत बोलहिं चरनन विस्वास ॥ ४ ॥ ॥शब्द २३ ॥ अरे मोर छैला भंवरा गैलो काहू न बुझाय ॥ टेक ॥ इक अॅधियारी मग चलल न जाय । वाझल ॲवरा कौनी गति लाय ॥१॥ बिरह के बॉधल भेवरा खसि खसि जाय । सँग लागल भंवरा भैल बलाय ॥२॥ प्रेम बझावल भेवरा चरन लगाय । घर आय भेवरा रहल लाभाय ॥३॥ कह गुलाल थकलीं वृज नारी । हम धन मिलली भुजा पसारी ॥४॥ ॥ शब्द २४ ॥ पावल प्रेम पियरवा हो ताहि रे रूप । मनुवा हमार बियाहल हो ताहि रे रूप ॥ १ ॥ ज्ञान के गछवा लगावल हो ताहि रे तर । मनमत- कइल बधावर हो ताहि रे तर ॥२॥ ऊँच अटारी पिया छावल हो ताहि रे पर । गुरु गम गॉठि दियावल हो ताहि रे पर ॥३॥ अगम धुनि वजन बजावल हो ताहि रे पर। मोतियन चौक पुरावल हो ताहि रे पर ॥ ४ ॥ दुलहिन दुलहा मन भावल हो ताहि रे मन । झुज भर कंठ लगावल हा ताहि रे मन ॥५॥ *पवित्र ।। पेष्ठ ।
- प्रेम -- ॥ शब्द १ गुलाल प्रभू बर पावल हो ताहि रे पद। मनुवा प्रीत लगावल हो ताहि रे पद ॥६॥ २५ सुन्न सिखर चढि जाइब हो, बाजत अनहद तार "टेक॥ उमगि उमॅगि सखि गावहिं हो, मानिक देव लिलार ॥१॥ उलटी नदिया सोहावन हो, सत्त सुखमना बास ॥२॥ दृढ कै सुरति लगावल हो, सतगुरु संग निवास ॥३॥ जीव कै जब निवारहु हो, पॉच पचीस मन मार ॥४॥ यहि विधि ध्यान लगावह हो, करम मेटो संसार ॥५॥ गावल निर्गुन मनारवा हो, जन गुलाल मिला यार ॥६॥ ॥ शब्द २६॥ मन मोरा गरज समाना मन मोराटेका अष्ट जाम को खेल बना है थकित भयो तन जोरा ॥१॥ पॉच सखिन मिलि मंगल गावहि सहजहि उठेकोरा ॥२॥ सिव सक्ती मिलि स्याम घटा पर नीझर झरत हिलोरा॥३॥ धधकि धधकि सुदर बर राजित सतगुरु कियो गठजोरा४॥ कह गुलाल पिय संग सेोहागिनि अचल है सेंदुर मेरा ॥३॥ ॥ शन्द २७॥ छिन छिन प्रीति लगी मोहिं प्रभु की ॥१॥ । आठ पहरचित लगै रहतु है, मिटलि सकल डर उर की।२॥ उमगि उमॅगि उज्जल जल झलकत,अनुभौमानिक वर की॥३ कह गुलाल घर अनॅदमगन भी, चढि सुमेर अव तर की ॥४॥ चिन्ता, घबराहट। ।
॥ शव्द २८॥ - प्रभु जी साँ लागल प्रीति नई। निरखत रूपहिं भई बावरी तन सुधि सबै गई ॥१॥ अष्ट जाम चित्त लगै रहतु है, प्रभुजी के परखें पई।, सहज सरूप सब्द को सेहरा, सा मोहिं आन भई ॥२॥ गगन मॅडल में बानि उठतु है, हर दम नाम नई । अबकी बेर कृपाल दया निधि, लोचन लाल दई ॥३॥ सोई सहीद मगन भन मौला, दोजख भिस्त गई। कह गुलाल घर अनॅद मगन भी, प्रभु सिर तिलक दई॥४ ॥ शब्द २९॥ सतगुरु कै परताप तो अनंद वधावरा। आजु मारे गुरु अतिथि करब हम भॉवरा ॥१॥ पॉच पचीसो सखियाँ चौक पुरावहीं । गुरु जी कै चरनोदक लै छिरकावहीं ॥२॥ तीन जना मिलि डुक मत भॉवर नावहीं । चन्द्र बदन सिर सँदुर माँग बनावहीं ॥३॥ जुग जुग अचल सोहाग तो ग्रीति लगावहीं। दुलहा बनल निरबान तो कंठ लगावहीं ॥४॥ मोतियन माड़ो छइया वजन बजाइया । दास गुलाल सोहागिनि कंत रिझाइया ॥५॥ - ॥ शब्द ३० ॥ अजर वियाह कैसे बनि आई। गुरु के वचन सुनि लगन लगाई ॥१॥ चरनों पड़ी । पिाठन।
- मेम . सुनत सुनत जिव घर मन आई। • वाम्हन मत बुधि नहि ठहराई ॥ २॥ बर मोर तिरविधि जोग न आई। माय मारि अरुभैलै बाप अरु भाई ॥३॥ ऐसो नहिं कोइ व्याह कराई। डोरिया लगलि अब कस छुटकाई ॥ ४ ॥ सनमुख है प्रभु लगन लगाई। अष्ट जाम धुनि नावति वजाई ॥ ५ ॥ तिरवेनी तीरहिं कलस धराई । विपरीती मॉडौ रच्यो बनाई ॥६॥ जरि गैल माँडो उदित सोहाई । तबै प्रभु सँदुर अचल धराई ॥ ७ ॥ कह गुलाल हम पतिवर पाई। जावै नइहर हमरि बलाई ॥८॥ बिनती और प्रार्थना - ॥ शब्द १॥ दीनानाथ अनाथ यह, कछु पार न पावै। वरनों कवनी जुक्ति से, कछु उक्ति न आवै ॥१॥ यह मन चंचल चोर है, निस वासर धावै । काम क्रोध में मिलि रह्यो, ईहै मन भावै ॥२॥ करुनामय किरपा करहु, चरनन चित लावै । सतसगति सुख पाय के, निसु वासर गावै ॥ ३ ॥ *उलटा ४४ विनती-प्रार्थना अब कि बार यह अध पर, कछु दाया कीजै । जन गुलाल विनती कर, अपनो कर लीजै ॥४॥ ॥ शब्द २॥ प्रभुजी हूजिये जन को दयाल । जन अपराधी कोटि औगुनी, तो करिये प्रतिपाल ॥१॥ सुरग पताल मृतलोक जहॉ लग, यह सब तुम्हरो ख्याल । जहें पगु देउँ जहाँ लगि निरखों, तो बड़ ही जंजाल ॥२॥ हर दम नाम तुम्हारो लीये, फिरौँ तो तुम्हरी नाल । घाटि वाढि एकौ न चलायो, लह्यौँ न एको हाल ॥३॥ बकसा सील छिमा से दयानिधि, यह बर देहु गुलाल करिये कृपा बिरद निज जन पर, चलिये अपनी चाल ॥४॥ ॥ शब्द३॥ तुम्हरी मोरे साहब क्या लाऊँ सेवा । अस्थिर काहु न देखऊँ सब फिरत बहेवा ॥१॥ सुर नर मुनि दुखिया देखाँ सुखिया नहिं केवा। डंक मारि जम लुटत है लुटि करत कलेवा । २॥ अपने अपने ख्याल मे सुखिया सब कोई। मूल मंत्र नहिं जानहीं दुखिया भै रोई ॥३॥ अबकी बार प्रभु चीनती सुनिये दे काना। जन गुलाल बड दूखिया दीजै भक्ती दाना ॥४॥ ॥ शब्द४॥ प्रभुजी बरपा प्रेम निहारो। जठत वैठत छिन नहिं बीतत याही रीत तुम्हारो ॥१॥ --- *साथ ।
बिनती-प्रार्थना न समय होय भा असमय होवे भरत न लागत बारो। जैसे प्रीति किसान खेत से तैसा है जन प्यारो ॥२॥ भक्त-बछल है बान। तिहारो गुन औगुन न विचारी। जहें जहें जावे नाम गुन गावत जम को सोच निवारो॥३॥ सेवित जागत सरन धरम यह पुलकित मनहि बिचारो। कह गुलाल तुम ऐसो साहव देखत न्यारो न्यारो ॥४॥ ॥ शब्द ५॥ . प्रभु को तन मन धन सब दीजै। रैन दिवस चित अनत न जावै नाम पदारथ पीजै ॥१॥ जव ते प्रोत लगी चरनन सेॉ जग संगत नहि कीजै। दीन-दयाल कृपाल दया-निध जो आपन करिलीजै ॥२॥ ढूंढत फिरत जहाँ तहें जग मे काहू बोध न कीजै। प्रभु कै कृपा औ संत बचन ले हिरदे मे लिख लीजै ॥३॥ कह वरना बरनत नहिं आवै दिल चरबी न पसीजै। कह गुलाल याही बर मॉगाँ सत चरन मेहि दीजै ॥४॥ प्रभु तुम ऐसे दीन-दयाल । हम अस अधम कुटिल चंडाल ॥१॥ केतिक अधम कहॉ लगिवरना करम धरम की जाल । मोर मोर करत दिन बीतल मारि लेत जम काल ॥२॥ अधम हात जो कारज सीझत पगल माय के ख्यालो। सुमति कुमति निसु बासरभोजनसेोवत परो वेहाल ॥३॥ तुम अस ठाकुर परगट देखत करत सबै प्रतिपाल । मेरु धरनि जल थल मे साहब का जाने वह हाल ॥४॥ *या। याना, सुभाष । माया के रयास में यगा हुआ है।
बिनती-प्रार्थना -- सुमति सरीरहिं आवत नाहीं डालत गर में माल । हिंदू तुरुक माव* में लागो सुद्धि विसरि गइ हाल ॥५॥ हम अबला बल कछु हम नाहीं प्रभु तुम ऐसा लाल । अब की बार यही बर पावौँ लखिये अधम गुलाल ॥६॥ ॥ शब्द ७॥ मभु तेरी माया अगम अपार । तुम जानहु सब सिरजनहार ॥ १॥ सिव ब्रह्मा सब देव मुनि मोहे कीन्हो न किनहूँ विचार । धोखा धोख सभन मे उपुजो काहु न आपु सँभार ॥२॥ छिन में पालो छिन में पाखो छिन में करत सेंधार । तुम्हरे मोह न तुम्हरे माया मूरुख कहत हमार ॥ ३ ॥ जो जन चरन सरन लपदाना सबहि लड़ायो भार । मन क्रम बचन अवर नहि जाने ताको लीन्ह उबार ॥४ धन्न धन्न तुम धन्न प्रभू जी साध सदा रखवार । कह गुलाल राम को सेवक अव को सकत निहार ।। - ॥ शब्द८॥ -- गति पूरन प्रभुराया हो। कह बरनौँ बरनी नहि आवैतुम अनंत जग गाया हो ॥१॥ अधम-उधारन सठ-निस्तारन खल-पावन पद पाया हो जा को नाम रटत सनकादिक भक्ति किसारवढ़ाया हो। गोरखदत्त बसिष्ट व्यास मुनि सुकदेव आदि जनाया हो। अनेक साध संतोप सत्त लिये मनको ध्यान लगाया हो ॥३॥ *मजहब । गिराया।
भेद का अग
सव ब्रह्माजा को थाह न पावहिं नर बपुरा कत पाया हो।
ना पर कृपा कियो सतगुरु ने सहजहिं हरिहिं मिलाया हो।
* अनाथ नाथ तुम चरनन का को विनय सुनाया हो।
ह गुलाल साहब आपन कियो अनहद ढोल बजाया होश
भेद का अंग
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"शष्य १॥
जो मैं सॉचि लगन हिय आवै।
काटै सकल करम के फदा, आनंदपुर घर छावै ॥ १ ॥
पाँच पचीस तीन बस करिकै,
सुखमन
सेज बिछावै।
सुरत साहागिन उडै गगन-मुख, तव चदादरसावै ॥२॥
मूल चक्र गहि के दृढ़ बाँधे, बंक नाल पढ़ि धावै ।
अविगत से यह खेल बना है, आवागवन नसावै ॥३॥
रीकि रीझि दसहू दिसि पूज, पारब्रह्म में समावे।
जन गुलाल भइ प्यारी खसम की,रहसि रहसि गुन गावै॥४
॥ यद २॥
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उलटि देखो, घट में जोति पसार ।
विनु बाजे तहॅ धुनि सव होवै, बिगसि कमल कचनार॥१॥
पैठि पताल सूर ससि बाँधी, साधा त्रिकुटी द्वार।
गंगाजमुन के वारपार विच, भरतु है अमिय करार ॥२॥
इँगला पिंगला सुखमन सोधी, बहत सिखर-मुस धार।
सुरति निरति ले बैठ गगन पर, सहज उठे भानकार ॥३॥
साह डोरि मूल गहि बाँधेा, मानिक वरत लिलार ।
कह गुलाल सतगुरु बर पायो,भरो है मुक्ति भेंडार ॥४॥
। पृत भेद का अग ॥ शब्द३॥ ~ - चित धरि, करहु आपु सॅभार । सुरति डोर लगाउ गगनहि, उठत है झनकार ॥१॥ : चंद सूरज रैन दीवस, नाहिं धर्म अचार । मरन जीवन संग साथी, ऐसाई ब्योहार ॥२॥ हाँ कौन देखै कौन सून, गुन न वार न पार । अगम घर पर जाय वैठो, यह घर नाहि पगार* ॥३॥ प्रेम आगे नेम कैसा, सब भयो जरि छार । कह गुलाल जो नाम मिलिया, अछर नहि विस्तार ॥४॥ ॥ शब्द४॥ मनुवा अगम अमर घर पायो । आठ पहर धुनि लगै रहतु है, विनु कर डंक बजायो ॥१॥ बिनु पग नाच नचावन लागे, विनु रसना गुन गायो। गावनहार के काया न माया, अनुभा रंग बनायो ॥२॥ अर्ध उर्ध के मध्य निरतर, त्रिकुटी जा ठहरायो। लवकै बिजुली उडै गगन मे, मुक्ता तह झरि लायो ॥३॥ भयो अघोर निसु बासर नाही, सुन्न भवन दर पायो। जन गुलाल पिय मिला है सुहागिन, आनंदजोतिजगायो।४ - । ॥ शब्द ५॥ गगना गरजि गरजि मन भावन । चारि सखी चहुँ दिस है गरजत, पचएँ बरसत सावन ॥१॥ *पाही का झोपडा को पद रोज के लिये सेत मे बना लेते हैं। द्विार। 1 ܢܢ - भेद का अग छिमा सील सेंतोप सागर भरी, धनि सतगुरु जिन, अचल वनावन। कह गुलाल बरपा भयो पूरन, मारो धर मन रावन ॥२॥ , ॥ शब्द६॥ . हे मारीसखियाँ लागलि गुरु के सॉट भइलि मनभावना।टेक. पाँच सखी मिलि मंगल गावहिं, मोतियन चौक पुराय । तारी दै दै भॉवरि फेरहि, दुलहा बरनि न जाय ॥ १॥ चौके चार चतुर जन बैठे, आनंद बेद भनाया । चंद्र लगन सिर सेंदुर बाँधल, अमर सोहाग बनाय ॥२॥ नौवति धुनि चहुओर दसौ दिसि, मॉडो उदित साहाय । रोम रोम मनसा भै पूरन, दुलहिन पिया मन भाय ॥३॥ मॉड़ो जारि बरातिन मारल, खाइल गावे के लोग। कह गुलाल हम सबहि सँघारल, पुरन भइल सब जोग ॥४॥ ३ - ॥ शब्द ॥ । . अचरज हम इक देखल, पडित करहु विचार ।। कहा कधव औ कहा सुनव, कहा करव व्यौहार ॥ १ ॥ जगमग अचरज देखल, पंडित भइल विचार । - ज्ञान कथब श्री धुनि सुनय, नाम करव दयौहार ॥२॥ कहवा से जिव आइल, कहवाँ जिव कर,वास । कहवा जीव समाइल, कहवाँ सक्ति निवास ॥३॥ ब्रह्म से जिव आइल, नाभि कँवल में वास । सुन्नहिं सक्ति समाइल, सिव घर सक्ति निवास ॥2॥ लपेट, लगन । पिना जाता है । मॅडवा । । 7 -- भेद को अग अछय अभय अनुभव अनमूरति, सन सजीवन नाथ । जन गुलाल तहँ फिरहिं करारी, कोई संग न साथ ॥४॥ ॥ शब्द १२ ॥ भाई मोहिं यही अचभो भारी । तात कौन पुरुप को नारी ॥१॥ मनि परकासित कहिये भुवंगा, सेा है कुल अधिकारी। को पतिवर्ता को अलवंता, को विभिचारी वारी ॥२॥ कबने नीर कवन जल कहिये, को अमृत को खारी। को है कूप गंगाजल को है, को है सलिल डबारी ॥३॥ को है कोट पतंग कौन है, को है नृपति भिखारी । को है चिउँटी हस्ति कवन है, को जन्मै को मारी ॥४॥ कह गुलाल यह बूझि थको जिव, निरवत को निरवारी। सतगुरु कृपा सत सरनागति, भवसागर ते उवारी ॥५॥ F । ॥ शब्द १३ ॥ -- देखो संतो सुरति चढी असमान, दूजा और न आन् ॥टेक॥ जगमग जोति बरत अति निर्मल, देखि दरस कुरवान॥१॥ निरखि रूप मन सहज समानो, जम कर मरदल मान॥२॥ जन गुलाल पिय प्रेम लगन लगो, दियो सीस को दाना३॥ ॥ शब्द १४ ॥ प्रान पाहुन मार ए री मना ॥ टेक ॥ पॉच पचीस तीन सँग लीये, पवन चढ़ो है घोरा ॥१॥ तत्त सिंहासन बैठक दोन्हो, जगत जोत चहुं ओरा ॥२॥ *अकेला। जिस स्त्री को हाल मे लपका पैदा हुआ है । हायर या गड़हे का पानी।
न भेद का अग पाँच सखी मिलि जेवन बनावहिं,काहु न लगत निहोरा॥३ पतरी' प्रेम परत है परस्पर, सुखमन भरत कटोरा ॥४॥ ज्ञान गुरू के बिंजन परोसहि, सॉझ सकार सबेरा ॥५॥ वहि खियावल अपनहु खायल, चौथे पद पर 'डेरा ॥६॥ कह गुलाल मेरो पाहुन आयो, कबहु न करिहौं फेरा ॥७॥ ॥ शब्द १५ ॥ - एकै नाम अधारा, मेरे एकै नाम अधारा हो। परखि परखि निरखत निस बासर, जग त भयो निनारा हो.॥१॥ अष्ट कमल मे जीव वसतु है, सतगुरु सन्द विचारा हो। ले कै पवन हंस जब गवन्यो, त्रिकुटी भी उँजियारा हो॥२॥ पैठि पताल मूल बंद बॉधी, सुखमन सेज सँवारा हो। निरझर करत अमीतह वरखत, मनुवॉतहॉहमारा हो॥३॥ 'गगन मंडल मे नौवति बाजै, आठ पहर इकतारा हो। माखो ममता चित्त समाना, चौमुख दीपक वारा हो ॥४॥ छूटी देह नेह रहि इक सॉ, आदौ ब्रह्म विचारा हो। कह गुलाल साहब हम पाया, जम का करिहै हमारा हो॥५॥ - नैहर गरब गुमनिया हो, फरलि करम के डार । ससुरे सँगति नहि जाइब हो, करबहु कौन विचार ॥१॥ सासु ननद के मगरा हो, सवति जो हमरी अपारि । सइयाँ हमरे कुबुजवा। हो, हम धन अल्प कुमारि ॥२॥ *भोजन ! पित्तल । कुबहा यानी धूढा । . ।
भेद को अग . अछय अभय अनुभव अनमूरति, सत सजीवन नाथ । जन गुलाल तहे फिरहिं करारी, कोई संग न साथ ॥४॥ ॥ शब्द १२॥ भाई मोहिं यही अचंभो भारी । तात कौन पुरुप को नारी ॥ १॥ ! भनि परकासित कहिये भुवंगा, सो है कुल अधिकारी। को पतिवर्ता को अलवंता, को विभिचारी वारी ॥२॥ कवने नीर कवन जल कहिये, को अमृत को खारी। को है कूप गंगाजल को है, को है सलिल डवारी ॥३॥ को है कीट पतंग कौन है, को है नृपति भिखारी । को है चिउँटी हस्ति कवन है, को जन्मै को मारी ॥४॥ कह गुलाल यह बूझि थको जिव, निरवत को निरवारी । सतगुरु कृपा सत सरनागति, भवसागर तें उवारी ॥५॥ ॥ शब्द १३ ॥ देखो सतो सुरति चढ़ी असमान, दूजा और न आन ॥टेक॥ जगमग जोति बरत अति निर्मल, देखि दरस कुरबान॥१॥ निरखि रूप मन सहज समानो, जम कर मरदल मान॥२॥ जन गुलाल पिय प्रेम लगन लगो, दियो सीस को दान।३॥ ॥ शब्द १४॥ प्रान पाहुन मार ए री मना ॥ टेक॥ पॉच पचीस तीन सँग लीये, पवन चढ़ो है घोरा ॥१॥ तत्त सिंहासन बैठक दीन्हो, जगत जोत चहुँ ओरा ॥२॥ *अकोला । जिस स्त्री को हाल मे लयका पैदा हुआ है । हावर या गदहे का पानी। ।
1 भेद का अग च सखी मिलिजेवन बनावहिं,काहु न लगत निहोरा॥३ तरी प्रेम परत है परस्पर, सुखमन भरत कटोरा ॥४॥ जान गुरू के विजन परोसहि, सॉझ सकार सबेरा ॥५॥ वहि खियावल अपनहु खायल, चौथे पद पर डेरा ६i कह गुलाल मेरो पाहुन आयो, कबहुं न करिहौं फेरा॥७॥ . - ॥ शब्द १५॥ एकै नाम अधारा, मेरे एकै नाम अधारा हो । परखि परखि निरखत निस वासर, जगते भयो निनारा हो ॥ १ ॥ अष्ट कमल मे जीव बसतु है, सतगुरु सब्द बिचारा हो। ले कै पवन हंस जब गवन्यो, त्रिकुटी भी उँजियारा हो॥२॥ पैठि पताल मूल बंद बाँधेा, सुखमन सेज सँवारा हो। निरझर करत अमीतहें बरखत, मनुवॉतहॉहमारा हो॥३॥ गगन मंडल में नौवति बाजै, आठपहर इकतारा हो। माखो ममता चित्त समानो, चौमुख दीपक वारा हो ॥४॥ छूटी देह नेह रहि इक साँ, आदौ ब्रह्म विचारा हो। कह गुलाल साहब हम पायो, जम का करिहै हमारा हो॥५॥ ॥ शब्द १६॥ नैहर गरव गुमनिया हो, फरलि करम के डार । ससुरे सँगति नहि जाइब हो, करबहुं कौन विचार ॥१॥ सासु ननद के भगरा हो, सवति जो हमरी अपारि। सइयाँ हमरे कुंवुजवा हो, हम धन अल्प कुमारि ॥२॥ T । *भोजन । पित्तन । कुबहा यानी धूदा । .
। । - । । भेद का अग गॉव के लोगवा निरवे हो, छिन छिन दैह निहार । पार परोसिन डाहै हो, निस दिन करत कुफार ॥३॥ घर के मर्म नहिं जान्यो हो, महा कठिन दुख भार । अॅचरा पसार धन: विनवै हो, कव दहुँ मरै भतार ॥४॥ भोर भइल मन मान्यो हो, छुटल सकल संसार । जन गुलाल सत चालहि हो, मिललहिं कंत हमार ॥५॥ ॥ शब्द १७ ॥ मन मगन भयो जब प्रभु पायो। ज्ञान गुफा मे निरंतर देख्यो, अनुभा गति तेहि आयो ॥१॥ छोड़ि करम ममता मद त्याग्यो, ससय सोक न आयो। सहज आसन लै उड्यो गगन मे मुक्ता भरि झरि लायो॥२॥ फूल्यो काया उगे मनि मानिक, बिमल बिमल गुन गायो। निसु बासर केवल परगासा, जम दुत निकट न आयो ॥३॥. प्रेम प्रीति हिरदे मे राखे, अनतहिं चित्त न जायो । कह गुलाल अवधूत सेाई है, भेंवर गुफा घर छायो। ४ ॥ शब्द६॥ तेलिया रे तेल पेर बनाई। कोल्हुवा हॉकै घनिया लगाई ॥ १॥ गॉव के लोगवा तेल कोजाई, पनियॉ मिलाय देत डहॅकाई ॥२॥ यह तेलिया अब भयल जेंजाल, का मैं कहाँ ठाकुर' मतवाल ॥ ३ ॥ *झुरते हैं। खुराफात, मगहा टदा । त्रिी 1 ठग लेना । जमींदार । - - क - क्षेद का अग। ५५ कह गुलाल यह निगुन अपार, तैलिया बॉधल वरद की सार* ॥४॥ ॥ शब्द १९॥ मैं तो राम चकरियाँ मन लाऔंगा। तातें सहज, सरूप समाऔंगा ॥ टेक ॥ पाँचहि मारि पचीसहिं मारौं गढ पर दीप बराऔंगा॥१॥ उनमुनि धुनि मे सुरति समाऔं उलटी गंग बहाऔगा॥२॥ सुखमन के घर तारी लाऔं अमी अलूफा पाऔंगा॥३॥ आठो पहर करी असवारी ज्ञान के खडग लगाऔंगा॥४॥ तरकस तेज पवन द लाओं पकरिमवास ले आऑगा॥५॥ साहब रीझे नौवति वकसे निसु दिन डंक बजाआँगा॥६॥ जन गुलाल भयो दप्तरदाखिल बहुरिन भवजल आऔंगा ॥ शब्द २० ॥ वैरागी मन कहवाँ घर तुम किया, तात सहज सरूपी भेप लिया ।टेक॥ क्वनि जुगति तुम आसन मॉडो, कवनी देखो हीया ॥१॥ गंगजमुन तद आसन मॉडो, तिरबेनी तट बारो दीया ॥२॥ कह गुलाल सतगुरु बलिहारी, छोड सकल जग दीया॥३॥ ॥ शब्द २१ ॥ ससुरवॉ पंथ कैसे जाय हो, नैहर अति बड़ कूर ॥टेक॥ काम न जानों गुन नहिं आवे करय कवन हम ज्ञान । संगहि सवति सोहागिन हमरी कैसे रहहि अयमान ॥१॥ *गक-शाला। नौकरी । .
भेद का अग . ॥ शब्द २२॥ सासु ननद घर दारुनि अइली पियवा नाहिं हमार । गाँव के लोगवा लइया लावे भसुरे मिलली भतार॥२॥ का से कहाँ दुख कौन सुने अब निसु दिन डहत अंगार। धन जोबन दूनों हम खोवल पिया नहिं अयलें हमार ॥३॥ नेम धरम कइकै मन लावल करम बुडल संसार । कहैं गुलाल अगमपुर बासी नैहर छुटल हमार ॥४॥ कहाँ जइये घर मिलल भोग, भमत रहत सव फिरत लोग॥१ सहज सरोवर फुलल फूल, विनसता कमल मॅवर रस भूल२ पियत पियत जब भयो है सूर, अनुभौ बाजा बजत तूर॥३ पायो घर जग छुटल फेर, नाम खजाना मिलल ढेर ॥४॥ ऋद्धि सिद्धि मेरे कवन काज, लोक वेद की छुटलि लाज॥५ थकित भये जब पाँच पचीस, तीनों देव मिले जगदीस॥६ कह गुलाल मन मिलल भाव,ज्ञान लहरि गै सिंधु समाय ॥७ ॥ शब्द २३ ॥ पारस नारायन को मोहि लागे। लोहे त कनक कनक ते पारस, अनुभौ गति अनुरागे॥१ काठ ते चंदन चंदन ते मलयज, माल अमोलन लागे । भुंग तें कीट कीट तँ भेग भयो, सत्य लगे जिव जागे॥२ काग तें हंस हस परहंसन", जोगी जुगत समाधे। जीता जोग भोग सब त्यागो, जेइ नर मन को बांधे ॥३ चढ़ि पहार निर्धार जोति मिला, उलटि जु गयो सुभागे। एकै ब्रह्म एक भयो साहब, कह गुलाल मन पागे ॥४॥ "धुगली। जेिठ । सूख जाना। खास मलयागिर का सालिस चन्दन । परमहस ।
1 मेष की रहनी - - ॥ शब्द २४॥ मनुवा संग लगाई भुंठ मुँठ खेलहीं ॥ टेक ॥ मासु ननद धैकै अब लिहलिन्हि, दमदहि बॅधलिन्हि जाई। गोदकै बलकवा छोर'अबलिहलिन्हि,बुढ़ियाचललपराई। घरलुटवौलिन्हि सहर जरौलिन्हि,केहि गोहरावौँ जाई । सवति भैाजिया और जेठनिया, ठाढ़ी रहलिवाई२॥ कुल कुटुम्ब सबही पिस मरलिन्हि, का अब करौं उपाई। ठाढ़ी भइल धन सिर कर धून, का हम लइकै जाई॥३॥ छोड़हुं देस अनॅद तब होइहै, सतगुरु लिटो बचाई । जन गुलाल काया गढ़ जीत्या,दियो निसान बजाई॥४॥ भेष की रहनी ॥ चौपाई ॥ तूमा तीन भारती' वनायो। चौथे नीर भरि हाथ लगाया ॥१॥ सुखमन सीतल पीवत नीर । निकसि दसौ दिसि अनॅद फकीर ॥ २ ॥ कुयरी" करम काट ले आई। ज्ञान खरादे रच्यो बनाई ॥३॥ सतगुरु के घर बैठक दीन । मनुवॉ तहाँ रहत लोलोन ॥४॥ *दामाद को। भागना । मुरझाई हुई । भिरत अर्थात मिनित चार का ही। . - J -- a . 8 भेय की रहनी , . y तिलक तत्त दियो लीलार। अगम भेख बन्यो टकसार ॥५॥ एकादस तिलक दिया जिन धीर । कहै गुलाल अलमस्तं फकीर ॥६॥ असनवटी आसन तारी लावे । द्वादस वैठि गगन घर.धावे ॥ ७ ॥ गगन जोति मे रहे समाई । कह गुलाल आवे नहिँ-जाई, ॥८॥ कोपिन* बाँधे मूल दुवारा। उलटे पवन उठे झनकार ॥६॥ अप्ट कॅवल फूल्यो जव फूल । जन गुलाल हिंडोला फूल' ॥ १० ॥ कंठी करम काटि जो डारे। अजपा जपे जोति तब बारे ॥ ११ ॥ सुमिरन करे वैरुनव तेई। कहें गुलाल अतिथि है सेई ॥ १२ ॥ मुरछल मन फेरे चित. लाई। अगम जोति दसहूँ दिसि छाई ॥ १३ ॥ सत्त सब्द मुरछल याँधै कहूँ गुलाल फिरत सब धाँधे ॥ १४ ॥ पउवा प्रेम पगर जो नावै उनमुनि जाय गगन घर धावै ॥ १५ ॥ *लँगोटा। गुदा धक। खडॉज पॉव। , - । 1 अरिल उद - रिमझिमि बरसै मानिक मोती। कह गुलाल पउवा चढ़ सेती* ॥ १६ ॥ कमरबंद वॉधि,अगम घर जोवै। उलटि सुखमना,गतिहि बिलावै ॥ १७ ॥ बजर फाड़, बाँधे तत सार। कह गुलाल यह रहनि हमार ॥ १८ ॥ ॥ दोहा॥ माला जपौ न मंतर पढाँ, मन मानिक को प्रेम । कंथ गूदरि पहिरौँ नहीं, कह गुलाल मेरे नेम ॥१९॥ गुलाल ताखी 'तत दियो, प्रेम सेल्हि.हिये नाय । सुमिरिनी मन महें फियो, आठ पहर ली लाय ॥२०॥ गूदर धागा नाम का, सूई पवन चलाय । मन मानिक मनि गन लग्यो, पहिर गुलाल बनाय २१. गुलाल माला नाम को, राखो गर मे नाय । ' कोटि जतन छूटे नहीं रहा जोति लपटाय ॥२२॥ . अरिल छंद (१) प्रान चढो असमान सहज घर जाइया । सुन्न सहर झकझोर सुरति ठहराइया ॥ जोग जुगत से नेह ब्रह्म मे समाइया । कहै गुलाल अवधूत सत्य तव पाइया । *सफेद । विन कपाट । साधुयों की टोपी। .
अरिल द
-
रवि ससि दूनों बाँधि निरंतर धावई।
कहै गुलाल अतीथातत्त घर छावई ॥
( ११)
निर्मल रूप अपार सौं'सुरति लगाइयो।
बिनु पग चाला चाल अनॅदपुर जाइया ॥
देत दमामा ढोल सो ज़महिं नचाइया ।
कहै गुलाल सोई सूर सहज घर पाइया ।
(१२)
अकबति* अलह सौं जानि सुवुका सौं बोलना ।।
हर दम हक ही लाइ.रफत नहिं डोलना ॥
पंच फिरिस्ते पकरि नयन नहिं खोलना ।
कहै गुलाल सोइ साफ हिमतः नहिं डोलना ॥
: (१३)
खुब साहब साँ प्रीति सुरंति जो लावई ।
अलह इमान सॉ नूर कसबा तब पावई ॥
इलम इमान लगाइ सुवुका तब पावई।।,
कहै गुलाल फकीर यार साइ.भावई ॥ :
(१४)
सब घट साहब बोल सत्त ठहरावई ।
निसु बासर मौजूद भिस्ता की चलावई ॥
*भाकियत परलोक । किोमलता । सत्य । परन्त, मिलाप । दूत।
हिम्मत । **अच्छे । 'हुनर, गुन । स्वर्ग ।
"
+
,
। - . अरिल.छद साफ साहव सॉ रफत पाक तव पावई। कहै गुलाल फकीर खूब घर छावई ॥ - - ब्रह्म भयो जब पूर सूर सर* लावई। वाजे अनहद घंट निसान समावई॥ भरो पदारथ नाम परखि अघ' जावई। कहै गुलाल प्रभु हेतु साई नर पावई ॥ (१६) आपु करहु नर साफ साहव सत भावई । निसु बासर करि प्रेम राम गुन गावई ॥ जोग जुगत सौं नेह से परखि समावई । कह गुलाल' मन जीति निसान बजावई ॥ (१७) अर्ध उर्ध को खेल कोज नर पावई। चाँद सूर को बाँधि गगन ले जावई । इंगल पिंगल दोउ वॉधि सहज तव आवई । कह गुलाल हर रोज अनॅद'तव आवई ॥ - (१) रहित भयो घर नारी तत मन धीरा। ब्रह्म भयो तय जीव गयो तव पीरा ॥ निसु दिनि लायो ध्यान झरत मनि हीरा । कहै गुलाल सेोई सत अनॅद फकीरा ॥ *तीर । पाप, केश। " P . m धरिल छंद , (१५), अजर अमर पुर देस संत रन साजिया। मन पवना होउ साज नौवति धुनि बाजिया । द्वादस चढि मैदान जुद्ध तब-लाइया । कह गुलाल मन सूरत पर चढ़ि गाजिया ॥ * 11. राम रहे घर माहिं ताहि नहिं मानई। पूजहि पत्थल भीति मया मन सानई ॥ शूठ रहत हरि हाल करम बहु ठानई। कहै गुलाल जड़ भूल आपु नहिं मानई ॥ (२९) सुन्न सहर आजूब सहज धुनि लागई। इंगल पिंगल को खेल अमी तब पागई ॥ पुलकिापुलकि करिप्रेम अनॅद छबि छाजई.. कह गुलाल कोई संत ताहि पंथ लागई। (२२) इसिक अलीसौ साफ अदल सोइ पाइया। रोज रहै मुस्ताक सकूनत आइया । क्योंकर बूझै आपु सभै नर रोइया । कहै गुलाल फकीर सत्त जिन जोइया ।। (२३) तीरथ दान को आस अंध नर धावई। राम ने चीन्हत सॉच सो जन्म गॅवाई ॥ *अचरजी । मालिक । ठिकाना। खोज लिया। . - ܝܨܝ ।
अरिल हद
६५
तिरगुन गुन महें डोलत सवै नचावई ।
कह गुलाल नर भरमि भरमि जहॅडावई ॥
(२४)
झिलिमिलि झलकत नूर नैन पर नूरा ।
हर दम होत अघोर बजत तहे तूरा ।।
रवि ससि दूनों संग रखत पूजत पूरा।
कह गुलाल आनंद गति बोलत सूरा ॥
(२५)
निर्मल हरि को नाम ताहि नहिं मानहीं।
भर्मत फिरें सब ठायें कपट मन ठानहीं ।
सूझत नाही अंध ढूँढ़त जग सानहीं।।
कह गुलाल नर मूढ सॉच नहिं जानहीं।
(२६)
.
माया मोह के साथ सदा नर सोइया ।
आखिर खाक निदान सत्त नहिं जोइया॥
यिना नाम नहिं मुक्ति अंध सब खोइया ।
कह गुलाल सत, लोग गाफिल सब रोइया ।
(२०)
दुनिया विच हैरान जात नर धावई।
चीन्हत नाही नाम भरम मन लावई ॥
सब दोपन लिये संग सो करम सतावई ।
कह गुलाल अवधूत दगा। सब खावई ॥
*उगाते हैं। पिमर में। धोका ।
9
६६ अरित छद म - । - (२८) साहब दायम प्रगट ताहि नहिं मानई। हर दम करहि कुकर्म भर्म मन ठानई ॥ झूठ करहि व्योहार सत्त नहि जानई। कह गुलाल नर मूढ़ हक्क नहिं मानई ॥ (२) याही कहन, हमारि जो कोज मानई। तातें सदा हजूर सही। जो ठानई ॥ रहै सदा निरसंक काल नहिं जानई। कहै गुलाल फकीर माया नहि मानई ।। (३०) गर्व भुलेो नर आय सुझत नहि साँइया । बहुत करत संताप राम नहि गाइया ॥ पूजहिं पत्थल पानि जन्म उन खोइया । कह गुलाल नर मूढ़ सभै मिलि रोझ्या ॥ (३१) सुंदर साहब मानि के नेह लगावई। अर्ध उर्ध को खेल उलदि के धावई ॥ तिरगुन तेल घराय सेा जोति जगावई । कह गुलाल सत लोक तुरत नर पावई ॥ । ३२) भजन करो जिय जानि के प्रेम लगाइया । हर दम हरि सौ.प्रीति सिदक तब पाइया ॥ *सदा । सित्य। - -
अरिल छद्र
,
यहुसक लोग हेवान सुकत नहिं सॉइया ।
कह गुलाल सठ लोग जन्म जहॅड़ाइया ।।
(३३)
एक करो नर सॉच ताहि गुन गाया।
आठ पहर लव लाइ अनते नहिं ज़ाइया ।
लोक बेद की फाँसी तवहिं कटाइया ।
कह गुलाल हरि हेत का तुम बौराइया॥
(३४),
राम भजहु लव लाइ प्रेम पद पाइया ।
सफल मनोरथ हाय सत्त गुन गाइया ॥
सत साध सौ नेह न काहु सताइया ।
कह गुलाल, हरि नाम तबहिं नर पाइया ।
२
1
भूठि लगन नर ख्याल सबै कोइ धाइया ।
हर दम माया सौ रीति सत्त नहि आइया ॥
वहत फिरत हर रोज काल धरि खाइया ।
कह गुलाल नर अध धोख लपटाइया ।..
ऐसा वचन हमार सत्त जो मानिया।
चेत करहु नर आपु वृथा सब जानिया ।।
लोभ लहरि संयूह* ताहि सँग सानिया।
कह गुलाल नर अंध धुंध मन आनिया ॥
+
अरिल छद
कहै गुलाल
-
(३७)
रवि ससि दूनों याँधि के सुरति लगाइया ।
अजपा जपै सुजाप सोहं डोरि लाइया ।
लगन लगो निरंकार सुरति सँग पाइया ।
अतीथ सत्त गुन गाइया ॥
(३)
यह संसार सयान आपु नहि जानई।
तुरत होत विज्ञान खबरि नहिं मानई ॥
लोभ भरो हर रोज राम नहिं जानई ।
कहै गुलाल जम हाथे सबै बिकानई ॥
(३)
सीतल साहब नाम पियत नहिं कोई।
निसु दिन माया सौं हेतु पलक महें रोई ॥
दिन दिन गाफिल होइ काहु नहिं जोई।
कह गुलाल हरि हेतु गाफिल नर सोई॥
(४०)
सुखमन सुंदर राज करत नहिं मानी।
भटकत फिरै संसार सॉच नहिं आनी ॥
मरि मरि रह हर हाल मूंठ सँगे सानी।
कह गुलाल तत ज्ञान आपु पहिचानी ॥
(४१)
उदित भयो जब ज्ञान कर्म मन नासई।
भरो पदारथ नाम अचल पद पावई ॥
अरिल छ
दिन दिन पूरन सोइ संत महें भावई ।
कह गुलाल हरि हेतु कोई नर पावई ॥
(४२)
दोजख दुनिया भोग सवै नर सोइया ।
पॉच पचीस के फेर फिरत मति खोइया ॥
भटकि मरत संसार राम नहिं जोइया ।
कहै गुलाल सत्त बिन सय नर रोइया ॥
(४३)
आसिक इस्क लगाय साहब सौ रीफई।
हरदम रहि मुस्ताक प्रेम रस पीजई ॥
विमल बिमल गुन गाय सहज रस भीजई ।
कह गुलाल सोइ यार सुरति सौं जीवई ॥
(४४)
जगर मगर को खेल कोऊ नर पावई ।
लोक वेद को फेर जो सबै नचावई ।
रूह जगै हर हाल तत्त सोइ पावई ।
कह गुलाल ब्रह्म ज्ञान कोऊ दरसावई ॥
(४५)
जालिम जबर संसार बचन नहिं मानिया ।
बहुत करतु है ज्ञान आपु नहिं जानिया॥
तिरगुन गुन को संगम ज्ञान नसानिया।
कह गुलाल नर अंध नेकु नहिं मानिया ॥
*जगमग।
अरिल छद
F
(४६)
आपु न चीन्हहि आपु सवै जहॅडाइया।
काम क्रोध को संगम सबै भुलाइया ।
रदत फिरै दिन रैन थीर नहिं आइया ।
कह गुलाल हरि हेतु काहे नहिं गाइया ।
(४७)
खालि देखु नर ऑख अध का साइया ।
दिन दिन होतु है छीन अंत फिर रोइया ॥
इस्क करहु हरि नाम कर्म सब खोइया ।
कह गुलाल नर सत्त पाक तब होइया ।
(४०)
मन पवना को संगम कोइ नर पाइया ।
अनहद बजै अपार तो अलख लखाइया ।
अनुभव फरत है ज्ञान सुरति ठहराइया ।
कह गुलाल सोइ सत निसान बजाइया ॥
N
(४९)
अष्ट केवल दल फूल भेंवर रस पाइया ।
सुखमन करत है अमी तो स्वाद से खाइया ।'
नूर तजल्ली* धीच सुरति ठहराइया ।
कह गुलाल मन पाक अगम घर छाइया ॥
*प्रकाश ।
- भरिलोछद (५०) तिरबेनी का तीर नूर करि लागई। इंगल पिंगल को खेल सुन्न चढ़ि गाजई ॥ हर दम मन रहो लीन सुरति रस पागई। कह गुलाल ब्रह्म हेतु सत्त, तब जागई ।। (५१) जालिम मन को बाँधि के सहज नबावई। पाँच पचीस को रफत नूर, कस पावई ॥ उलदि सुखमना देस अचल घर छावई।। क्ह गुलाल हर रोज प्रान तव भावई॥ -- ॥ ५ ॥ . ३ -साँच काहु नर आपु अवर मति धाइया। सतगुरु बचन बिचारि ताहि ठहराइया ॥ गंग जमुन के बीच फूल इक पाइया । कह गुलाल संत साजि के उर्ध समाइया ।। (५३) प्राइ बनी मेरि बाजी राम सौं लाइया । आठ पहर को खेल से सुरति लगाइया ॥ मन पवना दोउ दाव सहज तब लाइया । कह गुलाल सेोइ सत राम गुन गाइया । (५४) अलह हमारी जाति साफियता आवई । खैर सुदाय सौं रफत* अमन सोइ पावई ।। *रस्त, मेल । निर्मलता । शाति । ।
+
१२
भरिल छद
कहा भयो दर हाल* पाक न लखावई ।
कह' गुलाल हर रोज साफियत आवई ॥
(५५)
किसिमा कर्म को धर्म सबै नर धावई।
भटकि मुआ ससार कसब नहिं आवई ॥
जोग जुगत नहिं नेह गाफिल गॅवावई ।
कह गुलाल हर रोज कहा जहंडावई ॥
.
इसिक करहु नर ताहि जाहि मन लाइया ।
हर दम पाक प्रबीन सो ताहि समाइया ॥
बहुरि नहीं अवतार न कर्म सताइया ।
कह गुलाल प्रभु हेतु साई नर पाइया ॥
(५७)
पूरन ब्रह्म निहारि के सुरति लगावई ।
अजपा
जपै
हर हाल जुगत मन लावई ॥
घटत बढ़त नहि कबहिं परम पद पावई ।
कह गुलाल मन जीति निसान बजावई ॥
(५८)
इसिमा अलिफ लगाइ नूर ठहराइया ।
पाँच पचीस को वॉधि उलटि के धाइया ॥
हर दम प्रभु सौं नेह कहू नहिं जाइया ।
कह गुलाल अतीथ ज्ञान तिन पाइया ॥
*अभी । तिरह तरह के । नाम । सीधा ।
।
१ अरिल लद (e) ज्ञान करो मन बॉधि के लगन लगाइया । निरखि रहो तहें नाम तत्त ठहराइया ॥ जुग जुग अचल अपार परम पद पाइया । कह गुलाल सम दृष्टि तबहि नर आइया ॥ (६०)। केवल प्रभु को जानि के इलिम लखाइया । पार होइ तब जीव काल नहिँ खाइया ॥ नेम करहु नर आप दोजख नहिं धाइया। कह गुलाल मन पाक तबहि नर पाइया । । ५ । .. भ्रम भूलो नर ज्ञान राम नहिं जानिया। वहुत करतु है ज्ञान साँच नहि मानिया ॥ झूट दसा ब्योहार कपद बहु ठानिया। कह गुलाल नर मूढ सवै गति हानिया ॥ (६२) अष्ट केवल फूलाइ निरंतर धावई। सुखमन सेज बिछाइ के मन पवढ़ावई ॥ जोग जुगत से नेह अनंद तव आवई । कहै गुलाल फकीर नाम तब पावई ॥ (६३) यह संसार अयाना आपु नहिं जानई । तुरत होय विज्ञान खबरि नहिं आनई ॥ "सुलाना । नादान । , हिंष्टोला पाँच तीन पचीस त्यागा चौथ पद पर जाय । तहें उठत लहरि अनंत बानी सखी देत फुलाय ॥ २ चाँद सूरज खंभ गाडो सुरति डोरि लगाय । मूल चक्र बिचारि बाँधो सुन्न नग्र समाय ॥ ३॥ प्रेम पटरी वैठि के झूलो गगन में आय : हारि हारि मन हारि बैठो अवर कहि नहिं जाय ॥ तहें ज्ञान ध्यान न नेम पूजा अगम घर ठहराय । तह उठत जाति जे प्रेम भरिभरि लपट चहु दिसि धाय।। काम क्रोध जे मोह त्यागो जीव रहो समाय । संत सभा मे जाय वैठो बहुरि इतहि न आय ॥६॥ दसौ दिसि मे फूल फूला जोति जगमग पाय । सत्त रूप सरूप सोभा मा पै वरनि न जाय ॥७॥ प्रेम प्रीति साँ रीति करिके रहो चरन समाय । कह गुलाल जो सरन आयो छोडि सबै बलाय ॥८॥ (२) हिंडोला झूलत गुरुमुख आज ॥ टेक ॥ चेंद सूरज खंभ रोप्यो 'सुरति डोरि लगाय । मंद मंद जो पवढ़ गगनहि रह्यो जाय समाय ॥ १। तह होत अनहद नाद धुनि सुनि सहज चित्त लगाय किंगसि कॅवल अनंत सेोभा भेवर रहे लोभाय ॥ २ ॥ अरध ऊरध उलटि चाल्यो सुखमना ठहराय । गग जमुना सरसुती मिलि पदुम दरसन पाय ॥ ३ ॥ भूलना। ।
हिंडोला - 99 सुन्न सिखर समाधि बैठ्यो जोग जुगत उपाय। डारि तन मन चढ्यो सिर दै जोति लहरि नहाय ॥४॥ अति अथाह अपार देख्यो नैन नाहि समाय । पॉच पचीसे तीनि त्याग्यो बानि निर्गन गाय ॥ ५॥ आदि अत अरु मध्य त्याग्यो अगम गति जो आय । चौथे पद पर बैठ जोगी मौज ढोल बजाय ॥६॥ जग्यो प्रेम जो नेम चरनन साध सगति पाय । त्यागि कर्म सताप तन को पाप दियो बहाय ॥७॥ मारि ममता मन विचाखो हंस रूप कहाय । कह गुलाल फकीर पूरा जो यह रहनि में आय ॥८॥ 44 सन्द कै परल हिंडोलवा हो झूलब ताहि अधार । 'मुलत लत सुख उपजै हो उठे सहज झनकार ॥१॥ हिंडोलवा गुरुमुख झूलब कुलत कुलत जाइ पार । गावहिं पॉच साहागिनि हो छूटल कुलव हमार ॥२॥ आनंद के कुलब हिंडोलवा हो तिहुँ पुर मगलचार । पिय के सँग हम क्लब हो निस्चै प्रिय करतार ॥ ३ ॥ निरखत निरख न आवै हो बरनत परनि न जाय । जो यहि झुलहिँ हि डोलवा हो चरनन चित लाय ॥४॥. कह गुलाल हम झूलब हो सतगुरु के परताप । चरन कमल मन रातल हो तहवाँ पुन्न न पाप ॥५॥ (४) निगुन कुलव हिंडोलवा हो, सत्त सब्द लगि डोर । सिवसक्ती मिलि फूलहि हो, अलब झकोरि झकोरि ॥१॥ - हिंडोला मूल मे खंभवा गडावल हो, पौढ़यो दस द्वार । मन मानिक बरै तहवाँ हो, भीतर बाहर उजियार ॥२॥ सुखमन राग भरावहिं हो, सहज उठे झनकार । धुनि सुनि हंसा रातल हो, विगसि कमल कचनार ॥३॥ मिटलि कामना मन के हो, तब छूटल संसार । अचल अमर घर पावल हो, फिर नहिँ औतारं ॥४॥ संतन मिलि तह झूलहिं हो, अपनी अपनी वार । कह गुलाल हम झूलय हो, क्या झूलहि संसार ॥ ५॥ सत्त सब्द इक पुरुष हो, सुरति निरति लगि डोरि । मन मौज करि बैसब हो, अलब यहारि बहारि ॥१॥ गावहु सखिया सहेलरि हो, आनंद मॅगलचार । चकवा सब्द सुनि ब्याकुल हो, झरत है अधर अधार॥२॥ छेक्यो नगर नौद्वरिया हो, पाँच पचीस घर मारि। तीन देव लै बॉधल हो, अब के करिहै । गोहारि ॥३॥ जीति कायापुर जोगी हो, जम कर नाता तोरि । जन गुलाल सत बोलहि हो, घर आयल मन मार ॥४॥ - हिंडोला अगम झूल अलाय, झुलत अगमहिं पायाटेका सुन सहर में फूल फूल्या, अनॅद मगल गाय । चित्त चचल पगो चरनन, अनत कहि नहिं जाय ॥१॥ नाम लज्जता पुलकि लेवे, सेोक मोह नसाय । शुलत झूलत मन बिरागी, ज्ञान घूघट नाय ॥२॥ *बैठे गे । स्विाद । ठासना । 1 - हिंडोला 8 कुलो जो सहजहि हिंडोलना, विनु मुले झूल कुलाय। नगर मगर हिंडोलना, झन झनक झनकत जाय ॥ ३ ॥ वरन सरन बिलोकि फूले, प्रीति साँ लपटाय । अब कि बेर बिचारि फूले, मूल मॅत्र जो पाय ॥४॥ अचल अगम हिंडोलना, झूलो जो तत्त लगाय । सतगुरु सब्द अपार दीन्हो, ब्रह्म भेद लखाय ॥ ५ ॥ मुलत झूलत प्रान पति भी, मौज फूल कुलाय । कुलै कोई सत पूरा, आपु खेल बनाय ॥६॥ अनंत कला हिंडोलना; अब थको जूलि न जाय । आवा गवन न होय कवहीं, तहाँ जाइ समाय ॥ ७ ॥ कह गुलाल हिंडोलना, झूला जो रूप बनाय । नाम रेंग जो रंग लागो, डंक देत बजाय ॥ ८॥ हिंडोला झूलहु रामे राम ॥ टेक ॥ ध्यान धरु गुरु चरन गहिके, नाम लज्जत आय ! काम क्रोध को पकरिबॉधी, त्रिविधि ताप वहाय ॥१॥ फूलै जो यह ज्ञान हिंडोलना, सत्त सब्द समाय । ' अगम नीगम झूलही मिलि. अनहद डंक बजाय ॥२॥ जोति परचे बरै तहवॉ, सहज खेल बनाय । सिव सक्ती सौं नेह लागो, सुख हिंडोलना पाय॥३॥ अचल अस्थिर भयो जुग जुग, चित कहीं नहिं जाय । - झूलै कलोल हिंडोलना, सतसंग सग लगाय ॥ ४ ॥ . *ढका प्रह।
Co हिंडोला 1 , . . । २ आवा गवन न होय कवहीं, अचल घर पर जाय । झूलै जो सुखद हिंडोलना, मनसूब सूवा पाय ॥ ५॥ नाम पटरी बैठि के, पोदो अगम मे जाय । सुखमन सुक्ख हिंडोलना, शुलित पार लाय ॥ ६ ॥ हद्द छोड़ बेहद्द बैठो, ब्रह्म ब्रह्महिं जाय । लोक लज्जा दूरि डारो आपु आपु समाय ॥ ७ ॥ जाति पाँति न कर्म तहवाँ, एक ब्रह्महि पाय । कह गुलाल हिंडोलना, फूलो जो मंगल गाय ॥ ८ ॥ (८) हिंडोलना कर्म अलावनहार ॥ टेक ॥ पाँच तीन पचीस धावहि, नेकु नहि ठहराय । पुन्न को बीज लैके, बीवहिं खेत बनाय ॥ १ ॥ जन्म उत्तम पाय के रे, माया परल भुलाय । राम नाम न जानु औंदू, चल्यो मूल गॅवाय ॥२॥ भूमि पानि अकास झूलहि, अलहिं सूर फनिंद । ब्रह्मा बिस्नु महेस झूलहि, कुलहि मारुता चंद ॥३॥ तैंतीस कोटि जो देव फूलहिं, माह में लपटाय । बज़ बॉध को बाँध बाँध्यो, सबै वॉधि नचाय ॥ ४ ॥ जोगी जती जो सिटु तलहिं भेख रच्यो वनाय । झूलहिं जो नारद आदि मुनिवर, पार काहु न पाय ॥५॥ *शेषनाग । पिवन, हवा । पाप । हिंडोला १ । जन गुलाल सो सरन आयो 11- सावित्रि लछमी गौरि झूलहि, दसहु दिस मे छाय । हंस विपमा गरुड झूलहि थीर कबहुं न आय ॥ ६ ॥ अरघ ऊरध मध्य धारा झुला त्रिकुटी जाय । गगन मद्धे सुरति मॉडो जोति देहु जगाय, ॥ ७॥ मुला फूलि न जाय प्रभुजी अब न मेाहि मुलाय । राखु चरन लगांय ॥८॥ (e) तत्त हिंडोलवा सतगुरु नावल तहबॉमनुवा सुलत हमार॥टेक ॥ बिनु डोरी विनु खंभे पबढ़ल, आठ पहर झनकार, ॥१॥ गाव सखियॉ हिंडोलवा हो, अनुभौ' मंगलचार ॥२॥ अव नहिं अवनाजबना हो प्रेम पदारथ भइल निनार ॥३॥ छुटल जगत कर गुलना हो, दास,गुलाल मिला है यार ॥४॥ ( १०१) प्रेम प्रीति रत झूलव हो, सुरति कै डोर लगाय । प्रेम प्रीति मन रातल हो, हमरौ मरल भताय ॥ १ ॥ पाँस पचीच तिन' बॉधल हो, सखियाँ संग लगाय । हम धनि पिय कि सोहागनि हो, मरिहै हमरि बलाय ॥२॥ अधर महल पर झूलय हो, फूलल कॉवल हमार। सत्त सब्द गुन गावल हो, कस्यो मंगलचार ॥३॥ झूलन निर्गुन हिडोलवा हो; जग से नाता तोरि कह गुलाल हम क्लव हो, पिय सँग दैगठिजोरि ॥४॥ *पति यानी सन । तिीन । . 11 बारह मासा बारह मासा (१) बारह मासा जो ठहराई, जन्म सुफल तव जानोभाई ॥१॥ ... ॥ असाढ ॥ । मास असाढ जो आइया, सब जिय आसा लाय । प्रभु चरनन चित लागेऊ, इत उत नाहिन जाय ॥२॥ - पुरवा जो पवन झकार ऊठि, बादर चहूं दिस धाइया । गरजि गगन अनंत धुनि छबि, नाम साँ लपटाइया ॥३॥ लपटाइ रहु रे नाम साँ, आनंद कहि नहिं जाइया । प्रेम प्रापत भयो तबहीं, आपु आपु बनाइया ॥४॥ ॥ सावन ॥ सावन स्वास न मानई, गहि गहि रोकत जाय । पिय कै उदेस" न पायो, कैसे क जिय ठहराय ॥ ५ ॥ छंद सुन्न में जानकार झन झन, माति हूं झरि लाइया । धनि भाग विरहिनतासु जीवन, जासु प्रभु गृह आइया ॥६॥ जासु प्रभु गृह आइया, तव अनॅद मंगल गाइया । उठत निर्मल बानि निर्गुन, अभय डंक बजाइया ॥ ७ ॥ *सदेस, खयर।
'बारह मासा ॥ मादी । नादौँ भरम नसावई, ज्ञान के सूरति लाय । चहुँ दिसि दमकै दामिनी, चित चक्रित है जाय ॥८॥ सुखमन सेज सँवारि बहु विधि, अगम रग लगाइया । प्रेम सौं पवढाइ प्रभु को, भाव अंकम* लाइया भाव अंकम लाइया तब कर्म सब जरि जाइया । अकल कला को खेल बनिया,अनंत रूप दिखाइया ॥१॥ कार क्वार पूरन करमना, समय सेाहावन भाया । कहि जल थाह अथाह है, निर्मल बरनि न जाय ॥१९॥ ब्रह्म पूर प्रकास चहुँ दिसि, उदित चंद सोहाइया। एक नाम सौ रंग लागो, मगन माधो भाइया ॥ १२ ॥ तत्त मद्धे तत्त मेखो आवागवन नसाइया । मृग तस्ना को नीर जैसे, भटकि भटकि लजाइया ॥१३॥ ॥ कातिक ॥ 'कातिक कर्म प्रापति भयो, जो जा को जस भाय । अपना अपना अस जस, सो तस वीज मेराय ॥१४॥ - यहि दिवस दस रेंग कुसुम है, पुनि अंत ना ठहराइया । नहि प्रीति प्रानी करत प्रभु साँ,सिर धुने पछताइया ॥१५॥ 'अक में, गोद में । भाना, पसद भाना। मिन मिखाया। । -- यारह मासा सिर धुने पळताड्या, लव हृदय ज्ञान भुलाइया। भरकट मुठी धारै भरमज्यों आपु आपु वधाइया ॥१६॥ ॥ अगहत ॥ - अगहन मास सोभित भयो, जीव जंतु सुख पाय । ऐसा जगत जहान जड़, घर दारा लपटाय' ॥१७॥ छद तू चेतं करु नर बावरे, आया कहाँ कहें जाइया । यह काल कठिन कराल है, धरि साम भारे खाइया ॥१८, खाइया धरि, तबहि सुद्धि भुलाइया । मृग ढस्ना को नीर जैसे, भरमि भदकि लजाइया ॥१६॥ ॥पूर ॥ पूस मास तुसार आयो, कपि जाड़ जनाइया। घर नाम साथ सनीपा नाही, पाल बहुत सताया॥२०॥ साम मोरे छद ज्ञान अगिन उदगारि तापा, कर्म सबहिं जराइया। इक जानि प्रभु को नामलेवे,जाड़ निकट न आइया ॥२१॥ जाड़ निकट न आइया, तव, मनहिं मन मे विचार आये। जिय भाइया। M वारह मासा ८५ जिन जुक्ति जल तेंतन सॅवास्यो, ताहि क्यों चिमुराइया भूलि गे सब बात तबकी, कर्म. माखी साव्या ॥३१॥ माया मोह समूह सागर डुवत थाह न आइया । हरि चेत नाहिं विचेत प्रानी, भरम गोता खाइया ॥४॥ भरम गोता खाइया जत्र, तवहिं मती हेराइया । भयो विहवल जवहिं पानी, सोक मोह लगाइया ॥२५॥ ॥ फागुन । फागुन फूल हुलास, त आनंद भावई। .',घर घर गावहि लोग, तिरास जनाबई ॥ २६ ॥ । प्रान-पति विनु कैसे जीवाँ ऐसा होरी जाइया ।। 'इक नाम सॉनहि संग वनिया, वृथा सम्मत लाइया॥२०॥ वृथा सम्मत लाइया, तब ऐसही दिन जाइया । अब कहा पछतात हो, तुम कहै कवन बुझाइया ॥२८॥ चैत मे यनराय फूला, सुभगः सोमा छाइया। ऊँच नीच सव उद्र पूरन, जा' को जैसा आइया : त्रिगुन ताप संताप है नर, चेत काहे न लाइयां। ताहि क्याँ बिसराइया नर, आस लै लै धाइया । ॥ चत॥ ।। . । सन।
बसत ॥ वैसाख ॥ बैसाख कर्म विचार विनु, नर ठि तौल जोखाइया। वृथा माया मन भुलाया, ' धूर में लपटाइया ॥३२॥ उद जंजाल जाल को फॉद फाँझो, कठिन बॉध धाइया। उध-छोर बंधन होय तय,जब नाथ करहिं सहाइया ॥३३॥ नाथ करहिं सहाइया, तब मैल सवहिं बहाइया। छवि कोटि चद उदय किया है,रूप बरनि न जाइया॥३४ ॥जेठ ॥ जेठ दाया ज्ञान रूपी, संत मन ठहराइया । जिन अगम निगमविचार कीन्हा,तत्त ब्रह्मसमाइया॥३५ । कह गुलाल अपार स्वामी, गुरु कृपा घर आइया। धन भाग जीवन भक्त को, जिन परम पद यह पाइया३६ परम पद यह पाईया, तब सहज घर ठहराइया। भयो अविचल अभय ज्ञानी, समुंद लहरि समाइया॥३५ बसंत . (१) आनंद वसत मन करु धमारि । मगन भई तह पाच नारि ॥ टेक॥ *वजन कराया। - बसत. C9 सदसोहावन ऋतु वसंता हरि को नाम लिये खेलत संत॥१॥ दसौ दिसा में फूले फूल । ऋतु वसंत को इहै मूल ॥२॥ अष्ट जाम तहें उठे गुंजार । रुनझुन वाजै भव के पार॥३॥ आवै नजाय है रहत धीर । खेलत कोज प्रभु फकीर ॥४॥ लोक वेद के छुटलि आस । साध संगति मह लियो बास ॥५॥ कहगुलाल यह जाने कोय। आवा गवन न कवहिं होय ॥६॥ (२) सुलभ वसंत नर नामजान । यहि सिवाय मत झूठ आन॥१॥ कोउ जल किरिया करे तन सतायाकोउ नेती धोती प्रीति लाय ॥२॥ कोउ वैठि गुफा में धरत ध्यान। कोउ भूलि भटकि पूजत पपान ॥३॥ कोउ कर्म धर्म करे विधि विधान । कोउ सुरभि सहस दे विन दान ॥४॥ कोउ तीरथ व्रत मे जाइन्हाय । कारन आसाजन्मजाय॥॥ कोउ नागा दूधा-धारि होय । वन खेड बसि गृह कबों न जोया ॥६॥ कोउ जत्र मंत्र करि जग भुलाय। कोउ मन महें माया हेतु लाय ॥७॥ यहि सिवायजाजाने आन । जमसिरमारैदै निसान ॥८॥ कह गुलाल यह हरित ज्ञान । राम नाम सोसत्त जान ॥९॥ *गाय । टूिटना।
वसंत - (३), उपजै बसंत हरि भजन ज्ञान । पुलकि पुलकि मन ऋतु समान ॥१॥ गुरु के बचन जब कली लाग।प्रेम पदारथ फूल्यो भाग ॥२॥ चित चेरा है करु हुलास । वैठ निरंतर अगम वास ॥३॥ दसौ दिसा मे उठे सार। पंच सखि गावँ अति झकार ॥४॥ गगन मॅडल में लागु रंग। खेलत हुलसत मनु के संग ॥५॥ यह सुख प्रापत जेकरें होय।कारन तेहि कछु रहै न कोय॥६॥ कह गुलाल यह जाने जोय । ता का आवागवन न होय ॥७॥ खेलत बसत मन मगन मार । उमॅगि उमॅगि चित प्रक्षु की ओर ॥१॥ आतम फूल्यो अयोभोर। ऋतु वसंत मिलो मनुवाँ घोर ॥॥ तिहुं पुर मढे भयो सार । दसौ दिसा हरि हरि हिलोर ॥३॥ विमल विमल गावे सुर राग । ऊठत बानी गति अनुराग ॥४॥ आनंद मंगल मोर न तोर। विगसि अन छवि नैन कोर ॥शा धन्य भारा अस मिले वसत। आपहि अपने खेलत संत॥६॥ कह गुलाल नहिं भाग थोर।मान पिया सँग मिलल जोर॥७ (५) चेतहु क्यों नहिं नर हरि वसंत । दिन दस बीते काल - अंत ॥१॥ *जिसको। ।
बसंत 《 चावत धूपत मन को फेर।करत कुमति नहिं सुमति हेर ॥२॥ और ठौर फिरते दिन जाय । मटकि भटकि भ्रम गोता खाय ॥३॥ ऐसे समय न पैहौदाव । छोडो सब कछु लोक चाव ॥१॥ माया ठगनी ठंगो ठगाय । मृग दृसना लालच लोभाय ॥५॥ साध सँगतिनिज इहै भेव । त्यागहु सबै जगत के देव ॥६॥ कह गुलाल यह गति बुझाय। फिर पछितैहा काल खाय ॥७॥ . परसत वसंत मन मगन मार । फूल्यो काया भयो भोर ॥१॥ दुनिया नेम धर्म करै आस । तजत नाम करि करम वास ॥२॥ दुख सुख मरन जिवन है पास । घटत बढत चौरासि बास ॥३॥ ऐसे समय बहुरि न दाव । दीन होत काकै पछिताव ॥४॥ साध सँगति नहि करत भाव । जन्म जात जस लोह तावा. आपु न चीन्हत फिरत अज्ञान । जम सिर मारहिं अत समान ॥६॥ कह गुलाल का करौं बयान । जग नहि मानत वड़ नदान ॥७॥ (७) भल-मन राजा खेलै बसंत। उठत सब्द हरिहरि अनत ॥१॥ खेले नारद औ सुकदेव । नवो जोगेस्वर जानि भेव ॥२॥ *समय।
-
वसत
9
।
+4
1
-
प्रहलाद खेले राखिकानिाअॅवरिक खेलेयक मानि॥३॥
नामदेव खेले लइ करार । कबीर खेले उतरि- पार ॥१॥
नानक खेले जुक्ति जानि । पीपा खेले भक्ति मानि ॥५॥
रयदास खेले डंक देइ । खेले मलूका अगम लेइ ॥६॥
चत्रुभुज खेले कर्म धोय । तुलसी खेले सगुन जाय ॥७॥
यारी खेले सहज भाव । सतगुरू बुल्ला टरे न पाँव ॥८॥
सवसंतन के चरन लागे । खेल गुलाल मेरो फस्यो भाग ॥६॥
(0)
मैं उपमा कवनि करॉगुरुराया उठत सव्द रह्योगगन छाय?
'लहरि लहरि अति उठि झकार निरखि निरखि चित
चन्द्र चकोर ॥॥
निरकरि करत रहत अकास । हंस सरोवर लेत बास॥३॥
अगम अगोचर अतिअथाहावार पार नहिं ठौर राह ॥४॥
जो जावै सो रहत थीर । नाम वसंत खेलत फकीर ॥५॥
यहि सिवाय जो जान आनाजमसिर मारत दे निसान ॥६॥
कह गुलाल यह उत्तम ज्ञानानामभजन से सत्त जान॥७॥
आयो बसंत मनचकित्माराठौरठौर अति उटै झकार॥१॥
नाम कलीजव लग्योगातखो करमतब गियो पात॥२॥
गुरु के वचन जब फूल्यो फूल। फूल्यो फूल भेवर रस भूल॥३॥
आदि अंत मध एक सूर । दसौ दिसा मे बजत तूं॥४॥
'यह वसंत जो जाने कोय। आवागवन कवहिन होय॥५॥
- बरात '५९ संत सभामहें बैठ जाय। सहज सुरति धरि काल खाय॥६॥ कह गुलाल मन भयो थोर । साई फाजिल है फकीर॥७॥ { १०). मेरे ऋतु वसंत घर समय लागुवाजत अनहद फाग . जागु पदका , मनराजातहेरच्यारंगापाँच पचीस तिन लिये सग ॥१॥ खेलत खेल बहुविधि बनाय आनंद मंगल उठि बधाय ॥२॥ राम नाम सॉ बन्योरीति। आठपहर नहिँ टरत प्रीति ॥३॥ सुख सागरमे बैठोजायानिरखि निरखि गतिरही समाय अगम अगोचर अलख राया सिवब्रह्मा जा को खोज न पाय ॥५॥ कह गुलाल सो दिखे हजूर । कोमानै यह बचन फूर ॥६॥ (११) जग्यो बसत जा के उदित ज्ञान । अवर सय नर है हैवान ॥ टेक ॥ 'काम क्रोध दोउ संग जोरः । '" 'करि अँधियार न' होत भार ॥१॥ टकटोरत 'दिन रैन जाय। पस्यो भुलायः ॥२॥ माया परबला महत जान । लेक वेद सघ करत ध्यान ॥३॥ *फाल को।तीन । सच । पशु । " । मह महावन 1 बसत काल अगिनि नित ग्रसत जाय। छतिया छूतिनि धरत खाय ॥४॥ नाम न जानहु सत्त ज्ञान । जातें छूटे जग को तान ॥५॥ कह गुलाल यह वचन भाय। फिर पछितैही जन्म जाय ॥६॥ ( १२ ) खेलत वसंत भयो। अचल रंग । ताल मृदेंग डफ उठि तरंग ॥१॥ काया नगरी मन घिसाम। उलटि गयो तहें एक नाम ॥२॥ आदि अत नहि मध्य तीर । भरत अधर तह भरत नीर ॥३॥ बिगसि कमल भयो उदय भार । थकित भयो मन गयो जोर ॥४॥ पाँच पचीस तिन बॉधि मारि। आनंद मगल करु धन्य भाग जाके बरत जोति । रूप है चुंगत कह गुलाल मोरी पुजलि आस । चरन कमल मह लियो यासा॥ *तीन। धमारि ॥॥ माति ॥६॥ ।
यसत (१३) खेलत वसत आनंद धमारि । सिव ब्रह्मा, जहें मिल मुरारि* ॥१॥ उठत तरेंग तहें बरत जोत । बिमल बिमल धुन बानी होत ॥२॥ तन मन डारि के रहो समाइ । गग जमुन मिलि सिखर पाई ॥३॥ फिरत फिरत तहें करत कोड़ा। घेठो भवन भह थकित गोड़॥४॥ गगन मॅडल मे लगि समाध । ससि औ सूरहि राखु बॉध ॥५॥ लहरि लहरि बहै जोति धार । थकित भयो मन मिलि हमार ॥६॥ कह गुलाल मेरि पुजलि आस । चरन कमल भहें लियो है बास ॥ ७ ॥ (१४) मन मधुकर खेलत बसत । बाजत अनहद गति अनंत ॥१॥ विगसत कमल भयो गुंजार । जोति जगामग कर पसार ॥ २॥ निरखि निरखि जिय भयो अनंद । बाझल मन तब परल फंद ॥३॥ "बिनु । चिोटी। मामद | पाँव । दाहिनी घाई स्यामा परा। -
बसत
अगम
-
S
-
लहरि लहरि बहै जोति धार ।
चरन कमल मन मिला हमार ॥४॥
आवै न जाइ मरै नहिं जीव ।
पुलकि पुलकि रस अमिय पीव- ॥५॥
अगोचर अलख नाथ
देखत नैनन भयो सनाथ ॥६॥
कह गुलाल मोरी -पुजलि आस ।
जम जीत्या भयो जाति बास ॥७॥
(१५)
चलु मारे मनुवाँ हरि, के धाम ।
सदा , सरूप तह
सरूप तह उठत, नाम ॥ टेक॥
गोरखदत्त गये सुकदेव । तुलसी सूर भये जैदेव ॥ १॥
नामदेव रैदास दास । वह दास कबीर के पुजलि आस ।।
रामानंद वह लिय निवास । धना सेन वह कृस्न दास ॥२॥
चतुरभुज नानक सतन गनी।दास मलूका सहज बनी॥४॥
यारी दास वह केसेादास । सतगुरु बुल्ला चरन पास ॥५॥
कह गुलाल का कहाँ बनाय। संत चरन रज सिर समाय॥६॥
॥ होली ॥
।
.
1
(१)
आरति आनंद मंगल गायो सहज के फाग लगायो।
आठ पहर धुनि लगी रहतु है गूंज दसौ दिसि छायो ॥१॥
जागत जाति कलाझलिझलकत निरखत रूप लगाया।
प्रेम पिचुकारीभरिभरि डारत तत्त अवीर-उड़ाया।॥ २॥
होली + 1 हारी होरी होत निरंतर सतगुरु खेल खिलायो।। कहा गुलाल स्वामी.घर आये पुलकि पुलकि लपटायो ॥३॥ (२) { - मेरे आनँद हारी आई-री ॥ देक ॥ आठ पहर धुनि लगी रहतु है, कंटक काल पराई री ॥१॥ विमल बिमल सखिया गुन गावहिं, रंग दसौ दिसि छाई री॥ २॥ अनुभी फाग-परम तत लागो, पायो प्रेम लाभाई री ॥३॥ लोक बेद के धोखा छूटलि, लज्जा गइलि लजाई रो॥४॥ प्राननाथ से, हाड़ा लागल, ब्रह्म पदारथ पाई री ॥५॥ कह गुलाल स्वामी वर पावल, सतगुरु वचन-सहाई री ॥६॥ (३) सतगुरु सँग होरी खेलो अनहद तूर बजाई ॥ टेक ॥ काया नगर मे होरी खेलो प्रेम के परल धमारी। पाँच पचीस मिलिचाचरिगांवहि,प्रभुजी की बलिहारी॥१॥ सहज के फाग पस्यो निस बासर, भरि छूटै पिचकारी । नाद विंदहीं गॉठि पखो जव, परलि. परस्पर मारी॥२॥ *होछ, बाजी। T . . . - . ।
होली
तारी दै दै भाँवरि नावहिं एक तें एक पियारी।
तत्त अबीर उड़ावत कर धरि, काहू कोउ न सँभारी ॥३॥
अब खेलो मन महा मगन है, तन मन सर्वस वारी ।
कह गुलाल हम प्रभु सँग खेलल, पूजलि आस हमारी ।।
(४)
सतगुरु घर पर परलि धमारी,
होरिया में खेलॉ गी ॥ टेक ॥
जूथ जूथ सखियाँ सब निकरी,
परलि ज्ञान कै मारी ॥१॥
अपने पिय सँग होरी खेलाँ,
लोग देत सब गारी ॥२॥
अब खेलो मन महा मगन है,
छूटलि लाज हमारी ॥३॥
सत्त सुकृत साँ होरी खेलो,
सतन की बलिहारी ॥४॥
कह गुलाल पिय होरी खेलो,
हम कुलवंती नारी ॥५॥
(५)
'आरती ले चली बनाई। फगुवा घर घर आनंद गाई ॥टेक॥
पाँच पचीस औ तीन साहागिनि, गावहिंप्रभु साँ
चित लाई ॥१॥
ऊँच नीच मे आरति पूरन, दसौ दिसा में छाई ॥२॥
लोक बेद सब दान दिया है, गगन मे आरति गाई ॥३॥
होली ७ सुर नर नाग देव मुनि थाके । काहु न आरति पाई॥४॥ संत साध महें आरति पूरन । उनहीं आरति पाई ॥५॥ कह गुलाल हम होरी खेले । सतगुरु फाग खेलाई ॥६॥ । कोउ गगन मे होरी खेले । पाँच पचीसो सखियाँ गावहि, बानि दसौ दिसि मेले ॥१॥ देत डंक अनुभौ निसु बासर, शूमि झूमि गति डोले। प्रेम लसित पिचकारी छूटत, तारी दै दै वालै ॥२॥ तत्त अवीर उडत नन छायो, ज्ञानहीनं मति तोले । थकित भयो पग-मग न परत, ढिग- सुधि विसरी, गयो बोले ॥३॥ अब की बार फाग दीजै प्रभु, जान देव नहिं तो लै । कहे गुलाल कृपाल दयानिधि, नाम दान दै गैलै। ॥४॥ (3) समय लगा हरि नाम हो, होरी आई। काया नगर में फाग बनायो, तिर विधि रग लगाई॥१ पाँच सखी मिलि रास रचा है, अगम अबीर उड़ाई। सुखमन भरि पिचुकारी डारत, हिरकत प्रभुहिं बनाई॥२ दसौ दिसा में चाचरि ऊठत, मारु प्रेम बजाई। लागी लगन दरत नहि टारी, सुधि बुधि सबहिं भुलाई॥३ लोक वेद न्योछावरि डारों, ममता मैल वहाई । कह गुलाल पिय साथ सोहागिनि, घरहीं होरी पाई॥४॥ *तब तक गये। 13
होली
चाँद सूर
(क)
प्रेम नेम चाचरि रच्यो । पुलकि पुलकि प्रभु पास ॥टेक॥
उलटे चले, उड़त
अबीर अकास ॥१॥
इंगल पिंगल खेलन लग्यो, सुखमन सहज निवास ॥२॥
तिरवेनी फगुवा बन्यो । मानिक करि चहुं पास ॥ ३ ॥
कुंज कुंज निरती पस्यो, चंद्र वदन प्रभु पास ॥ ४ ॥
कह गुलाल आनंद भयो, पूजलि मन की आस ॥५॥
(e)
निसु बासर होरी खेलै हो, सहज सुन्न धुनि लाई ॥टेका।
बिगसि कमल चाचरी रच्यो है, दुन्द उठ्यो नभ छाई ।
प्रेम भरी पिचकारी छूटत, तत्त अबीर उड़ाई ॥ १ ॥
विनु वाजे तहें बाज़ उठतु है, आनँद नाहिँ समाई।
कै वैराग सखी सब गावहिं, लज्जा जात लजाई ॥२॥
संतन मिलि तहें होरी खेला, नौबत डंक बजाई।
फगुवा दान मिल्यो मन पूरन, जन गुलाल बलि जाई ॥३॥
(१०)
अलख पुरुपसंगखेलोहोरी, गुरु नाम कै डंक बजारी॥टेक॥
ब्रह्मा विस्नु सिव खेल खेलावहि, सब्द कै फाग रचोरी।
आतम नारि सखों लै गवनहि , तत्त कै गाँठि दियोरी॥१
अगम अबीरउड़तदस हूं दिसि, प्रेम पिचुकारि भिंगो री।
मनमोहन छवि रास रच्यो है, सुखमन निरत करो री॥२
लागी लगन टरत नहि टारे, काहू कोउ न बुझोरी।
कह गुलाल हम प्यारी पिया सँग,अनुभौ फाग बनो री॥३॥
होली, (१२) न राजा खेले होरी, अनुभव तत्त अखाड़े ॥ टेक ॥ पनद घंटा वाजु रैन दिन, ता मे सुरति परो री ॥१॥ पाँच सखी मिलि चाचरि गावहिं सुरति सौं निरतिभरो रीर काया नगर में होरी खेलो, रवि ससि दोऊ वटोरी ॥३॥ सुखमन भरि पिचुकारी छूटत, निरंकार अगम झरोरी ४ जाग्यो फाग परम पद लाग्यो, सतगुरु बचन फरोरी॥५॥ कह गुलाल हम होरी खेलल, प्रभु साँ दै गठजोरी ॥६॥ (१३) फागुन समय सोहावन हो, नर खेलहु अवसर जाय ॥ १॥ यह तन बालू मंदिर हो, नर धोखे माया लपटाय ॥२॥ ज्यों अॅजुली जल घटत है हो, नेकु नहीं ठहराय ॥ ३ ॥ पाँच पचीस बड़ि दारुन हो, लूटहिं सहर बनाय ॥ ४ ॥' मनुवाँ जालिम जोर है हो, डॉड : लेत गरुवाय ॥५॥ कह गुलाल हम बाँधल हो, खात है राम दोहाय ॥६॥ , प्रेम कै फरल मनोरवा' हो दस दिस भयो प्रकास ॥१॥ निस दिन नौवति बाजै हो, अनहद उठत अकास॥२॥ पॉच नारि गुन गावहिं हो, पुलकि पुलकि प्रभु पास॥३॥ अधर महल घर बैठक हो, मेटल जम के त्रास ॥४॥ नहि आइव नहिं जाइव हो, चरन कमल में वास ॥५॥ कहै गुलाल मनोरवा हो, छोड़ि देव जग आस ॥६॥ *भारी इ । एक राग का नाम । ।
१०० होली - . (१५) नाम रंग होली खेला जाई, फिर पाछे पछिताई ।। टेक ॥ यहि तन फागु मचो परमारथ, अवधि बदो दिन ढाई १ काल अगिन जब मस्तक जरि है, छूटी सब चतुराई २ अगर गुलाल कुमकुमा केसरि, चेतन अबिर उड़ाई ६ इंगल पिंगल दोउ भरत उर्धमुख, छिरकत प्रभुहि बनाई। दुइ विधि फाग बनो या जग मे, जिन जैसो मन भाई ५, कह गुलाल यह अगम फागु है, बिन सतगुरु नहिं पाई ६ अधर रंग फगुवा मन खेलो रविससि दूनी सँग मेलो टेक॥ मन बैराग चित चोर जे धैकै, नेह निरतर लाई। पाँच पचीस औ तीन मवासी, पकरि गगन ले जाई॥१॥ सुन्न नगर में आसन माड़ो, अद्भुत , भेप बनाई। ब्रह्मा घिस्नु सीव तहें नाहीं, फाग बरनि नहिं जाई॥२॥ नादहिं विंदहिं गॉठि परो है, ज्ञान कि जोति समाई। ऊठत लहरि अनत राग तह, अनुभौ चाचरि गाई ॥३॥ आवागवन रहित जवहीं भयो, जम सिर डक बजाई। कह गुलाल काल जब अइहै, मरिहै हमरी बलाई ॥४॥ (१७) काया वन खेलहु मगन फाग। अधर महल घर रश लाग ।। चित चंचल जन संग लाग। पाँच पचीसो सोउ न जाग ॥२॥ सत सत लागल सहज आग। खेलत खेलत तब फरल भाग ३ मुकर्रर। - ।
होली १०९ तत्तलगल जब सेाहंताग। निरतत मनुवा गतिहिं पाग ॥४॥ देख दमामा दुन्द भाग । तन नेवछावर देत फाग ॥५॥ एक अवरनहि सबहिं त्याग। थकित भयल मनचरन लाग६ कह गुलाल यह अगम फाग । जम जीतल घर राज लाग॥७॥ (१) होरी खुलि खेलो, प्रभु सॉ प्रीति लगाई। सब सखियन एकहि मव कीयो, फाग बरनि नहिं जाई ॥१॥ काया नगर मे होरी खेलो, ससि औ सूर समाई । प्रेम जडित पिचकारी छूटत, नौवति दै दै गाई ॥२॥ दसौ दिसा चाचरि धुनि हावै, सत्त अवीर उडाई । इँगल पिंगल दाउरास बनावहिं, सेा सुख बरनि न जाई॥३ थकित भयोसुधि बुधि हरि लीन्हो, तन मन सवहिं भुलाई। कह गुलाल हम होरी खेल्यो, प्रभु सॉ गॉठि बधाई ॥ ४ ॥ (१६) कोउ आतम भक्ति ज्ञान जाने । तब सहज सुरत मनुवा माने ॥ टेक ॥ याही रीति प्रीति चरनन साँ। खोजि सतगुरु पहिचाने ॥ १ ॥ तवही होय प्रेम पद पूरन । फाग परम पद आने ॥२॥ एका एकी खेल बना जव । सिव घर सक्ति समाने ॥ ३ ॥ - । । - होली य 1 अनत कोटि धुनि बाजा बाजे । अगम निगम लपटाने ॥१॥ थकित भयो रस प्रेम मगन मन । गति काहू ना जाने ॥ ५॥ कह गुलाल हम नागरि* प्रभु सँग । नाम पखो दीवाने ॥६॥ (२०) होरी मन खेले जहें उठत गुंज झनकार । आठ पहर धुनि लगी रहतु है विनु बाजे विनु तार ॥टेक॥ काम क्रोध तहवाँ नहिं देखियत, उहवॉ वार न पारा दसो दिसा में होरी अठत, प्रभुजी के दरवार ॥१॥ विमल बिमल सखियाँ गुन गावहिं, पंचम सुर रुचिकारी। प्रेम पिचकारी भरिभरिमारत, भीजत ब्रह्म अपार ॥२॥ अनुभव फागु खेलत सुख लाग्यो, निर्मल ज्ञान विचार। कोटि सूर ससि कोटि कोटि छवि, क्मका परल बिहार॥३॥ संतन संग मिलि होरी खेलो. प्रीतम चरन निहार । कह गुलाल चरनन बलिहारी, वलि बलि प्रान पियार ॥१॥ (२१) "चित डोलन लागो मौजी चाचरि आयो रो। वाजत ताल मृदंग झोका डफ,साह सुर भरि गायो री॥१॥ काया नगर मे रास रचा है, सखियन कूमक नायो री। अष्ट जाम को खेल बना है, निर्त सोहावन भायो री ॥२॥ *धतुर स्त्री । जिन भावन । झुमका, होली की एक राग का भी नाम है । ។ १०३ होली - +7 अनत कोटि धुनि बाजा बाजे । अगम निगम लपटाने ॥४॥ थकित भयो रस प्रेम मगन मन । गति काहू ना जाने ॥५॥ कह गुलाल हम नागरि* प्रभु सँग । नाम पखो दीवाने ॥६॥ (२०) होरी मन खेले जहें उठत गुंज झनकार । आठ पहर धुनि लगी रहतु है विनु बाजे विनु तार ॥टेक॥ काम क्रोध तहवाँ नहिं देखियत, उहवाँ वार न पार। दसो दिसा में होरी ऊठत, प्रभुजी के दरवार ॥१॥ विमल विमल सखियाँ गुन गावहिं, पंचम सुर रुचिकारा। प्रेम पिचकारी भरिभरि मारत, भीजत ब्रह्म अपार ॥२॥ अनुभव फागु खेलत सुख लाग्यो, निर्मल ज्ञान विचार। कोटि सूर ससि कोटि कोटि छवि, झूमका परल विहार॥३॥ संतन संग मिलि होरी खेलो, प्रीतम चरन निहार । कहगुलाल चरनन बलिहारी, बलि बलि प्रान पियार nen चित डोलन लागो मौजी चाचरि आयो री। वाजत ताल मृदंग झॉश डफ,साहं सुर भरि गायो री॥१॥ काया नगर में रास रचा है, सखियन झूमक नायो री । अष्ट जाम को खेल बना है, निर्त सेोहावन भायो री ॥२॥ “चतुर स्त्री । मिन भावन । मुमका, होली की एक राग का भी नाम है। .
होली अगमअवीर उडतं दसहूं दिसि,मुरलीधुनिछवि छायोरी। कह गुलाल मेरो ऐसो साहब, घरही फाग मचायो री॥३॥ (२२) हर दम बंसी बाजी, बाजि निवाजी मेरे मन मे देक॥ जहें सहज सरूप समाजी, सेत धजा सिर ऊपर गाजी॥१ उमॅगि उमॅगि मानिक मनि घरसत,मुक्ता तहें करि लागीर सत्त सब्द ततकार उठत है, संत सदा सुख राजी ॥३॥ जम जीत्यो घर नौबति बाजै, कह गुलाल गति साजी ॥४॥ (२३) अहो मन होरी मौज ले आव ॥१॥. दम दम जान तपावा, चित धरि ठाम ठमाव ॥२॥ समूह उड़ायो, तिरबिधि रंग बहाव ॥३॥ काया नगर में रास रचा है, सहजहिं नूर जगाव ॥४॥ गगन मॅडल मे चाचरि ऊठत, उघटा ताल भरि गाव॥५॥ कह गुलाल प्रभु आयसु दीन्हो, फागु नाम फल पाव ॥६॥ मेरी नाथ सॉ हारी लागी री टेक॥ पाँच पचीस मिलिचाचर गावहिं, धुधुकि धुधुकि रस पागीरी॥१॥ तत्त अबीर उड़त दसहू दिसि,अनुभव तुरिया जागीरी॥२॥ आठ पहर नौवति तहॅवाज,धुनि सुनि पातक भागीरी।। आनंद उठत रहत निसि बासर, रंगभरी अनुरागीरी॥४॥ *अस्थान मे ठहरायो । ऊँचा । आशा। तत्त अबीर (२४) १०२ होली - - अनत कोटि धुनि बाजा बाजे । अगम निगम लपटाने ॥४॥ थकित भयो रस प्रेम मगन मन । गति काहू ना जाने ॥५॥ कह गुलाल हम नागरि* प्रभु सँग । नाम पयो दीवाने ॥६॥ (२०) होरी मन खेले जहें उठत गुंज झनकार । आठ पहर धुनि लगी रहतु है विनु बाजे बिनु तार ॥टेक॥ काम क्रोध तहवाँ नहिं देखियत, उहवाँ वार न पारा दसो दिसा में होरी जठत, प्रभुजी के दरवार ॥१॥ विमल बिमल सखियाँ गुन गावहिं पंचम सुर रुचिकारा। प्रेम पिचुकारी भरिभरि मारत, भीजत ब्रह्म अपार ॥२॥ अनुभव फागु खेलत सुख लाग्यो, निर्मल ज्ञान विचार। कोटि सूर ससि कोटि कोटि छवि, तमको परल बिहार॥३॥ संतन सँग मिलि होरी खेलो. प्रीतम चरन निहार । कह गुलाल चरनन बलिहारी, बलि बलि ग्रान पियार neu (२१) चित डोलन लागो मोजी चाचरि आयो री। वाजत ताल मृदंग झाँश डफ,साह सुर भरि गायो री॥१॥ काया नगर में रास रचा है, सखियग शूमक नायो री। अष्ट जाम को खेल बना है, निर्त सेोहावन भायो री ॥२॥ *चतुर खी। मन भावन । झुमका, होली की एक राग का भी नाम है । .
होली १०३ अगमअवीर उड़तं दसहूं दिसि,मुरलीधुनिछवि छायोरी। कह गुलाल मेरो ऐसा साहब, घरही फाग मचायो री॥३॥ (२२) हर दम बंसी बाजी, वाजि निवाजी मेरे मन मे ॥टेक॥ जहँ सहज सरूप समाजी, सेत धजा सिर ऊपर गाजी॥१ उमगि उमॅगि मानिक मनि घरसत,मुक्ता तहें करि लागीर सत्त सब्द ततकार उठत है, संत सदा सुख राजी ॥३॥ जम जीत्यो घर नौवति बाजै, कह गुलाल गति साजी ॥४॥ (२३)- अहो मन हारी मौज ले आव ॥१॥. दम दम जान तपावा,चित धरि ठाम ठमाव ॥२॥ तत्त अबीर समूह उड़ावो, तिरविधि रंग वहाव ॥३॥ काया नगर में रास रचा है, सहजहिं नूर जगाच ॥४॥ गगन मॅडल में चाचरि ऊठत, उघटाताल भरि गाव॥५॥ कह गुलाल प्रभु आयसुदीन्हो, फागुनाम फल पाव ॥६॥ (२४) भेरी नाथ सौँ होरी लागी री ॥टेक॥ पाँच पचीस मिलि चाचर गावहिं, धुधुकि धुधुकि रस पागीरी॥१॥ तत्त अबीर उड़त दसहू दिसि,अनुभव तुरिया जागीरी॥२॥ आठ पहर नौयति तहबाज,धुनि सुनि पातकभागी री।। आनंद उठत रहत निसि वासर, रंगभरो अनुरागी री॥४॥ *अस्थान में दहावो आज्ञा। .
१०४ होली - खेलत खेलतमगन भयो मन, मिलि रहु नाम सुहागीरी कह गुलाल पिय हारी दीन्हो, हम धन बड़ी सभागी री ६ (२५) मनुवाँ भोर भइल रंग वाउर। सहज नगरिया लागल ठाउर ॥१॥ ऊदित चंद करे तहें मोती। गरता अमी वह नाम के जोती॥२॥ अॅगना वुहार के बाँधल केसा। कइले सिंगरवा गइलूपिय के देसा ॥३॥ आनंद मंगल वाजत तूर । फरल लिलरवाभइलूंपिय के हजूर॥४॥ कह गुलाल नाम रस पाई। मगन भइल जिव गइल बलाई ॥५॥ " , आजुमन रावला. रचल धमारी । कुहुकि कुहुकि हरि मिलल सुखारी ॥१॥ काया नगर में खेल पसारी।, भरि भरि रूप थकलि नौ नारी ॥२॥ जगर मगर अति लगत पियारी । वाजत अनहद धुनि कनकारी ॥३॥ तहाँ न रवि ससि पुरुप न नारी । आपुहिं अपने भइल बुझारी ॥४॥ *मस्त । ठिकाने । निचुरता है। सिपाही। । 1 - । - होली १०५ कह गुलाल हम फाग विचारी। अव न खेलब सतगुरु बलिहारी ॥ ५ ॥ (२७) को जाने हरि नाम की हारी॥ टेक ।। चौरासी मे रमि रह पूरन, तीहुर' खेल बना री ॥१॥ घूमि घूमि के फिरत दसो दिसि, कारन नाहि छुटोरी॥२॥ नेक प्रीति हिये नाही आयो, नहि सतसग मिलारी॥३॥ कहै गुलाल अधम भी प्रानो, अवरे सवरि गहा री॥४॥ (२८) मैं तो खेलौगी प्रभुजी से होरी ॥ टेक ॥ प्रेम पिचकारी भरिभरि डारत, तत्त अबीर भरि कोरी॥१॥ निसु बासर को फागु परो है, घूमत लगलि ठगौरी ॥२॥ लागो रग सेहिंग गुन गावहिं, निरतत बॉहा जोरी ॥३॥ कह गुलाल सुख वरनिन आवे, चाखत अधर कटोरी ॥४॥ (२९) हम खेल हारी, आनंद डंक बजाई ॥ टेक ॥ काया कोबर भरि भरि लीन्ही, ज्ञान अबीर उडोरी सुखमन भरि पिचुकारी छूटत, सुरति साँ नेह लगा री॥१॥ पाँच सखी मिलि चाचरिंगावहि, सहज कै फाग चनारी। लागी रंग टरत नहिं ठारे, आपु ते आपु पगारी २in प्रेम पदारथ प्रापन मा जय, एक तें एक बझारी । उमगि उमॅगि चित रूपसमाना, तिहु पुर भाग बहोरी॥३॥ तीन तरह अर्थात गुनों का। हाथ पकड के। मलमा । मन 11 ।
२०० रेसता भर्भ अव मारि कै क्रोध को जारि के, चित्त धरि चार को किया यारा ॥३॥ कहै गुलाल सतगुरू किरपा कियो, हाथ मन लियो तब काल मारा ॥१॥ (४) मन मुक्ता होवे नाम रस नित लेवै, हंस है रूप तब दसा पावै ॥१॥ मोती मुक्ता चुंगै कीट में नहिं पगै सदा चेतन्य नहिं सरम आवै ॥२॥ देखि दीदार सॅभारि ले आपु को, और नहिं फेर कहुँ दूरि धावै ३ ॥ कहें गुलाल यहि भॉति जो जन होवे, दिव्य दीदार सो दरस (५) भयो जब दरस तव परस साहब मिला, अवर सब दूर नहिं नेर आया ॥१॥. पाप अरु पुन्न कहें कर्म अरु धर्म कहें, तिक्त ससार तें अलख गाया ॥२॥ अमला अमलै पिवे नाम लेते जिवे, ज्ञान अरु भेद कोउ नाहिं पाया ॥३॥ कह गुलाल वे धन्य सो मुलुक खुलास नहिं आउ माया ॥१॥ *पास । त्यागी । नशा । मिल से रहित । पावै ॥४॥ vi दास है, रेखता - १०० 4 - प्रेम परतीत धरि सुरति सौ निरति करि, याही है ज्ञान सतगुरू पावै ॥ १॥ । न तो धोख धंधा लिये कपट डारे हिये, मोर अरु तार में जन्म जावे ॥ २ ॥ नाम से रीति नहिं साध साँ प्रीति नहि, धोख लिये ज्ञान भरि जन्म धावे ॥३॥ कहै गुलाल यह वचन साँचो सुनो, यही है सत्त जो कोऊ पावे ॥४॥ (७) ज्ञान उद्योत' करि हृदय गुरु वचन धरि -जोग सग्राम के खेत आवै ॥१॥ संत से पूर है सूर मॉड़े रहै, कंच कुच' आदि नहिं ओर आवै ॥ २॥ अगम असाध यह मारि कैसे करे, काटि के सीस आगे धरावै ॥३॥ कहें गुलाल तव राम किरपा करें, जीति मा सूर सो खेत पावै ॥ ४ ॥ (८) राम के काम मेकाम नहिं करत नर, फिरत ससार चहुं ओर धाया ॥ १ ॥ करत संताप सब पाप सिर पर लिये, साध औ सत नहिं नेह लाया ॥२॥- *प्रकाशित किनक कामिनी । -- रसता ९१२ (१२) जिन आपु ना सॅभारा । सो बहि मुए संसारा ॥ १ ॥ चित चेत हूं जो आवे । चित चरन में समावे ॥२॥ तव होय प्रभु कि दाया । तब सतगुरुउन पाया ॥ ३ ॥ जब सतगुरु घालि वानी । तव भरत रतन खानी ॥४॥ यह दिल में में समावे। चित अनत नाहिं जावे ॥५॥ में समाई । गुरु देइ रहु दुहाई ॥ ६॥ गुरू कहे मेरा । तब काज होय तेरा ॥ ७ ॥ तव फरे सतगुरु घानी । तवभयो जुग जुग ध्यानी ८॥ लवलीन होय जवहीं। ताहिं राम मिलै तवहीं ॥६॥ यह भेद कवन पावै । जेहि सतगुरू बतावै ॥१०॥ कहै गुलाल तुम सुनहु संत ज्ञानी ॥११॥ चरन । जव जानी। भजु राम (१३) सतगुरु जो कीन्ह दाया । तव काढ लियो माया ॥ १॥ रे गॅवारा । इस तनहिं का निहारा ॥२॥ यह जायगो रे भाई । जल छोड़ पियो काई ॥ ३ ॥ कहें इस्क है दिवाना । मन कपट मे झुलाना ॥ ४ ॥ यह दाव है रे भइया । तुम काहिी में भुलइया ॥५॥ यह खेल नाहि भाई । दिन ऐस ही चलि जाई ॥६॥ कुफरान जिकिर छोड़ो । पद सांच देव गोड़ो ॥ ७ ॥ तव काज होय होय तेरा । तब नाहि कोउ नेरा॥८॥ *क्या । किस । सच्ची राह में पैर धरो।
रेखता हैं नित रहत वे जिकिर में ठहराने । वइ पाँच हैं विराने ॥६॥ अवर कहीं धावे । तौनिकट नाहिं आवे ॥१०॥ पच्चीस बरजोरे । कुफरान बाज सारे ॥११॥ यह काया कोट गाढी । विकटे जु ठाठ ठाढी ॥१२॥ यह 'भेद नाहि पावे । नर धोख धंध धावे ॥१३॥ यह रहैं जोरे । काहू मुखहुँ न मारे । १४ ॥ जो नाम के अनुरागी । तिननिकट नाहि लागी॥१५॥ वइ मस्त है दिवाने । महबूब साहब जाने ॥१६॥ वे उदासी । नहिं जायें प्राग कासी ॥१७॥ घर ही में साहब सेवे। पग अनत नाहिँ देव ॥१८॥ गुलाल वैरागी । जहिनाम रटन लागी ॥१९॥ (१४) अहो सुना आइ माई । इह कवनि है बडाई ॥ १॥ जिन आव तें संवारा । उन का तेरा बिगारा ॥२॥ तुम वाहि सुकर मानो । साँचे साहब को जाना ॥३॥ यह करम है घनेरा । नर फिरत रहत वारा॥४॥ 'कहिं पत्थल और पानी । जा पूजहिं अज्ञानी ॥ ५॥ यह काम नाहि तेरा । तू का भुलै मैं मेरा ॥६॥ उस द्वार पै जो जाया। फिर कवहिं नाहिं आया ॥५॥ *पाँधो विरोधी दूत नामफे सुमिरन से स्थिर हो जायेंगे । पच्चीस प्रातियाँ जबरदस्त नास्तिकता रूपी वाज सरीखी है। पानी, बुद । या। 15
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रेखता । । वहें भेद है न कोई । वहें जाति नाहिं दोई ॥ ६ ॥ चहें बंधु ना विरादर । वह घात नाहि.आदर ॥ १० ॥ जिन इस्क वही पाया । वइ आवहीं नहिं माया ॥११॥ सय रोज ध्यान धारी । वइ मिलि रहे अपारी ॥ १२ ॥ सुर नर नाग देवा । सवहीं करें जो सेवा ॥ १३ ॥ वइ राम के भिखारी। हर दमै लागि तारी ॥ १४ ॥ चित अनत नाहिं जावे । मौज साहब को पावे ॥ १५ ॥ वइ रहत हैं निनारा । वइ राम के हैं प्यारा ॥ १६ ॥ वेमहल जो धावे । सा का सवावा पावे ॥ १७ ॥ यह भूले जो भाई । सवहि तिन को जाई ॥ १८॥ खबरदार हो बंदा । तुम का भुलो रे अंधा ॥ १९ ॥ मालूम मझवः सेोई । जिन आपु भिस्त जोई ॥ २० ॥ जो अवर कहीं धावे। तो निकट नाहिं आवे ॥ २१ ॥ गुलाल कहत पुकारी । वइ वचन की बलिहारी ॥ २२ ॥ . नर चेत करो वाई । अवर काम नाहि कोई ॥ २३ ॥ - ॥दोहा॥ अगम निगम सबहीं थको, रहो अचल ठहराय । कह गुलाल यह रेखता, कोई विरला साहब पाय । ॥रखता। अहो मन देखो भाई, का कर्म भूलो जाई ॥१॥ जब जोर जबरि जावे, तब खूब खघरि आवे ॥२॥ *वेठिकाने । भिलाई, अच्छा पथ ।
रेखता ॥ का भूलो दिवाना, यह जायगा गुमाना ॥३॥ जब दिल में सिदिक* आवे, तव धोख धंध जावे ॥४॥ यह सुख सितून बड़ाई, तेरे काहु काम न आई ॥ ५ ॥ भजु राम नाम प्यारा, लियो बुन्द तँ निकारा ॥६ इह चित में धरो वोई, अवर काम नाहिं कोई ॥ ७ ॥ इह मन बड़ा बलइया, इह मन करे सहइया ॥८॥ इह मनहिं धोख देवे, इह मन चेता होवे ॥६॥ इह मन बू भइया, इह जन्म पदारथ जड़या ॥१०॥ इह मन नाच नचइया, इह मन आस लेवइया ॥११॥ जिन मनै नहिं पहिचाना, वे भूले फिरहिं दिवाना ॥१२॥ जब हाथ इ मन आवे, तघ दाँव बंद पावे ॥ १३ ॥ इह इस्क करै भाई, इह करकसा बलाई ॥ १४ ॥ जिन इह कि ताया पाया, तिनहिं आपु बनाया ॥१५॥ जायें व मिलि रहे अविनासी ॥१६॥ कह गुलाल जो पावे, बहुरि न भवजल आवे ॥१७॥ जो जिकिर खेल खेले, सेाइ आपु आपु में मेले ॥१८॥ बेमहल न जावे, सो खेल ऐस पावे ॥ १९ ॥ बरे रूह महताब, इस्क लगे वइ सिताब ॥ २० ॥ तब कुफर" न होघे, तव हक्क अदल जोवे ॥ २१ ॥ वइ मस्त है फकीर, दिल घसम है हीर" ॥ २२ ॥ 'सत्य । घिात । आँच, तपन । जल्द, तुर्त । नास्तिकता। 'दिल और ऑरों मे हीर (सारॉश) यानी मालिक का प्रेम बसा है। का मथुरा कासी, रेखता दरद माहि। आवे, काहू जोर ना सतावे ॥२३॥ अवर करत है जो कोई, दोजख भिस्त" मे समाई ॥२१॥ गुन अवर का विचारा, तिन चेत भव संभारा ॥२५॥ एक एक ते विचारा, सोई संत है पियारा ॥२६॥ तिन्हें पीर अपनाया, अवर फिरत हैं चौराया ॥२७॥ इह लोक कर्म जारे, बेमहल बात तारे ॥२॥ सब कहत है ज्ञाना, खबरि अवरि मैदाना ॥२६॥ जोर जुलुम अकस आवे, तोहि कहो को बचावे ॥३०॥ इह माया है ठगइया, खबरदार देखु भइया ॥३१॥ जवून नाहिं खावे, न तो गैव गोता पावे ॥३२॥ चित चेत हो गॅवारा, नहिं जन्म बार वारा ॥३३॥ इक सिद्ध सेव सेवो, वाइ नाम से ली लेवो ॥३४॥ सोइ जोगि ब्रह्मचारी, वोइ सिद्ध है मुरारी ॥३५॥ जिन ऐसा पद पावे, तिन नाम अचल गावे ॥३६॥ कह गुलाल जो पइया, सोइ नाम मे समइया ॥३७॥ जो राम को भजइया, वोइ संत से कहइया ॥३८॥ अवर धोख ही जु धावे, दर धोख सोई पावे ॥३६॥ नाहीं है इस्क यारा, बेमहल को पसारा ॥2॥ जव रे आया करत चौरे ॥४१॥ रूह हक्क नाहिं जाना, तुम का भुलो गुमाना ॥४२॥ इह ऐसी है देही, कोउ काम नाहिं होही ॥४३॥ “दया। अितर में। जुल्म, सगती । निर्क । स्वर्ग । जारे, कुफरान ११८ मगत इरक जिसे बार बार धोख देवे, खबर कबहुं नाहिं लेवे ॥४॥ यह झूठ है पसारा, खबरदार चंदे यारा ॥४॥ इस्क करो साँच साई, जहें काहु जोर न होई ॥६॥ मन सुवानी* सानी, तू खबरि नाहिं जानी ॥४७॥ वाह वाह भाई मेरा, यह जायगा सब तेरा ॥४॥ जुलम न करो कोई, यह काम नाहि कोई ॥४६॥ न हूआ, सेो खाक नाहिं धूवाँ ॥५०॥ जो थोरि लजता पावे, तौ वाही में भावे ॥१॥ जब मन मुरीद होवे, तब जागे भा। सेावे ॥५२॥ सोइ राम रमै भइया, खलक कवन की चलइया॥५३॥ दम बोले, राम राम रमत डोले ॥४॥ न खावे, हक एक ही लगावे ॥५५॥ अस रहनि जो रहइया, मन कर्मना टरइया ॥६॥ जन होवे जो तेरा, तौ कवन करे मेरा ॥५॥ महबूब होय साई, इस्क चरन मे समाई ॥५॥ पीर दरद जाने, कबौं धोखहूं न आने ॥५॥ वे डोला है फकीर, मौज मौज माहिं धीर ॥६॥ जो सरन उन कि जावे, अदभुत पदार्थ पावे ॥६१॥ कह गुलाल सुनु ज्ञानी, तिन राम नाम जानी ॥६॥ "अच्छी वानी। लिज्जत 'या। ढिग । ||नौजही मौज मे धीर (अस्थिर) है। हरि दम जब कुफर - मगरा १९० मंगल (१) गुन जानी गुनधंत नारि, कंत मन भाइल हो । सुभ दिन लगन सेोधाय, तबहिं मन लाइल हो ॥ १ ॥ अर्ध उर्ध के मध्य, तो चौक .पुराइल हो। भुक्ता भरि भरि थाल, तो आरति बनाइल हो ॥२॥ गंग जमुन के घाट, तो कलस धराइल हो । मानिक बरे दिन रात, तो चंवर डुलाइल हो ॥ ३ ॥ चौमुख दीपक बारि, तो मोड़ो,छाइल हो। निझरि झरी तह लाय, अमृत फल पाइल हो ॥ ४ ॥ गावहि सखियाँ सहेलरि, दुलहिन भाइल हो। दास गुलाल साहागिनि, प्रभु सँग पाइल हो ॥ ५ ॥ अविनासी दुलहा हमारा हो । जीतो जोग भाग सब त्यागो, भवसागर साँ न्यारा हो ॥१॥ किरपा कीन्हो सतगुरु दीन्हो, उलटा चौक पसारा हो ॥२॥ तम मन धन न्योछावरि डारों, कंत मिलो प्रभुयारा हो ॥३॥ सुखमन सेज निरतर डास,सोहं चॅवर सुदारा हो ॥४॥ ताही पलंग मोर पिय वैसहि, गावौँ मंगलचारा हो ॥५॥ अगम अपार अनुभव अनमूरत, लोक बेद से पारा हो ॥६॥ *विशाऊँ । 'सुदर रीत से हिलाया। .
१२० मगल कहै गुलाल भाग हम पायो, किया है चरन अधारा हो॥ 1 सतगुरु लगन धरावल, जक्तहुं जानी हो । हरि से है है व्याह, वधू अब रानी हो* ॥ १॥ आयल लगन सेंदेसवा, रोवहिं सब प्रानी हो। छोड़ि है देस हमार, बहुरि नहिं आनी हो ॥ २ ॥ तिरगुन तेल लगाय के, दुलही बनाइल हो। सुखमन करहिं बधावर, तो चौक पुराइल हो ॥३॥ तिरबेनी थल नीर, पवन लेइ जाइल हो । कंचन कलस भराय, तो मानिक जगाइल हो ॥ ४ ॥ अजर अमर कै माँडो, मोतियन छाइल हो। चौमुख दियना बारि, सखी सब गाइल हो ॥ ५ ॥ गावहिं वृज की नारि, तो प्रभुहि रिझाइल हो । कामिनि हृदय हुलास, कंत मन भाइल हो ॥ ६ ॥ पूरब चंद उदय किया, तब भॉवर नाइल हो। संदुर बंदन चारुी, अभय पद पाइल हो ॥ ७ ॥ जन गुलाल साहागिनि, कंत बनाइल हो । पूरन प्रेम हमार, तो नौवति बजाइल हो ॥८॥ (४) मूल कॅवल चित लावल, सुरति चढ़ल असमान । जगमग जोति जगावल, जम कर मरदल मान ॥१॥ *अभी तक (स्त्री) थी मगर मालिक के साथ व्याह होने से रानी हो जाकगी। 'सुदर।
मंगल १ पाँच पचीस धरि बाँधल, तीन देव निरवारि। विगसित कवल मन भावल, पावल देव मुरारि ॥२॥ तन मन सर्वस वारल, आनंद केलि हुलास । हरखि हरखि गुन गावल, प्रभु अपना लियो पास ॥३॥ सुखमन सेज विकावल, पूजलि आस हमार । जन गुलाल पिया विलसहि, रोम रोम बलिहार ॥४॥ (५) आजु मेरे मंगल अनंद बधावर, आरति करवाँ ॥ टेक ।। सहज के थार सत्त की बाती, प्रेम के अच्छत भरयाँ॥१॥ सुन्न सिखर पर आरत होवै, तिरवेनी तट वरबॉ ॥२॥ गगन मॅडल में सखि सब गावहिं, भाँवरदै सुर भरबाँ॥३॥ सिव के घरे सक्ति जब आई, गुन औगुन वीचरवॉ ॥४॥ ऐसी आरति जो नर गावै, बहुरि न भवजल डरवाँ ॥५॥ आरती a -- A मन में जानिये हो, सत्त सब्द चिंत लाय । पूरन आरति करि जेहि आवै, ता के गुरू सहाय ॥ १ ॥ बिन गुरु ध्यान ज्ञान का करिये, अनतहिं जाय बहाया सहज समाधि हृदय जिन लायो, जारो बिपय वलाय॥२॥ सुन्न सिखर जिन आसन माँड़ो, तिरवेनी तट जाय । उडो हंस गगनी चढ़ि धावा, आनंद जोति जगाय ॥३॥ गावे न ठावें न नावे न देवा, सेवा सत्त लगाय । पूरन ब्रह्म अमर अयिनासी, सहजहिं रहो समाय ॥२॥ 10 7
आरती
*
अति अथाह थाह नहिँ अविगत, जलही जल मीलाय।
कह गुलाल पूरन घर पायो, घटिहै हमरि बलाय ॥ ५ ॥
गगन को थार बनाय, प्रेम भरि आरति वारी ।
चौमुख चमकत जोति, उठत झन झनकारी ॥१॥
मन पवना को फेर, सहज घर लागलि तारी ।
उनमुनि लागो बंद, थकित भई नौ दस नारी ॥ २॥
पॉच पचीस तिनि* जारि, सहज घर लागलि तारी।'
लोक बेद कियो दान, दई तब आरति वारी ॥३॥
कोदिन चंद उगाय, अमी रस नाना गारी ।
गुरुमुख भयो प्रसाद, मनहिं मन आरत प्यारी ॥ ४ ॥
धन सतगुरु बलिहारि, चरन छबि पर जिय वारी।
कह गुलाल बौराह, आरति फूललि फुलवारी ॥ ५॥
सहज घर आरति मौज में लागी ॥ टेक ।।
विनु बाजे बाजा धुनि होव, विनु चरनन गति साजी॥१॥
गगन मॅडल अनहद धुनि वाजै,प्रेम प्रीति हिये जागी॥२॥
ब्रह्मा विस्नु सीव तहें नाहीं, अलख पुरुप अनुरागी॥३॥
अधर महल में आरति हावै, सेत छत्र छवि साजी
कोटिन चंद निछावरि वारौं, आरति भइ बड़ भागी॥५॥
संत साध मिलि आरत होवै, कहि गुलाल वैरागी॥६॥
(४)
आरति नैन पलक पर लागी ॥ देक।
निरझर झरत रहत निसु वासर, सब्द सनेही जागी॥१॥
আবে? 1 विनु करताल पखाउज बाजै, बिनु रसना अनुरागी ॥२॥ सुभग सरूप सेोहावन सुंदर, सेत धजा सिर साजी।।३।। सुखमन चेंबर टुरत निःअंतर; आरत हेमरी गाजी कह गुलाल आरति हम पाया, लोक वेद मति त्यागी॥६॥ (५) आरती मनुवॉ मौज की कीजै, प्रेम निरंतर साहब लीजै॥१॥ पहिली आरति अनुभव आवै, जुग जुग अचल परम पद दुसरी आरति दुविधा धोवै, सतगुरु सब्द अगम गति जोवै॥३॥ तिसरी आरति त्रिकुटी थाना, मन पवना लै जोति पावै ॥२॥ समाना॥2॥ . चौथी आरति त्रिभुवनरीझै, सहज सरूपआरती कीजै॥५॥ पंचई आरति पाँचो गाव; गगन मॅडल मे मठ गै छावै॥६॥ छठइँ आरति छ; चक्र वेधावै,उलटि निरंतर सुन्न बसावै सत. आरति सहज धुनि गावै, अनहद सुनि धुनि घंट ' बजावया अठई आरति आपु वनावै,विगसै कमल अमी तव पावै॥ नवई ओरति नौद्वार लगावै,जम जीते तब मंगल गावै० दसई आरति दसो घर पूरा, जीति ,मिलो मनुवा भयो सूरा॥११॥ एकादस आरति करन जिन जानी, कह गुलाल साई ब्रह्म ज्ञानी ॥१२॥ *ग्यारड्यी। . 7 १२४ স্বামী . - ऐसी आरति करु मन लाय,महा प्रसाद ठाकुर के चढ़ाय॥१॥ प्रेम के पत्तरी प्रीति लगाय, भाव के विजन रुचिर बनाया। संत साध मिलि आरत गाय, प्रक्षु के सिर पर चॅवर' ढुराय ॥३॥ सुर नर मुनि सब आस 'लगाय, गिरा परा किनका बिन खाय | सिव ब्रह्माजाको खोजत धाय,प्रभु को जूंठनभागहुं पाय॥५॥ सतगुरु बुल्ले । अलख लखाय, संतन सीत गुलालहुं पाय॥६॥ (७) - अरति मनुवॉ करु बनवारी, सदा सुफल हरि नाम उचारी ॥१॥ सतगुरु सब्द अगम जो पावे, निसु दिन नौबत डंक बजावै ॥२॥ गरजे गगना मनुवाँ हरखे, चौमुख मानिक मोती बरखे ॥३॥ आरति एक अनॅदपुर वारी, सहजहिं सुखमन लागी तारी ॥४॥ ऐसी आरति जिन नर गाया, ता के निकट न आवे माया ॥५॥ (८) हरि हरि राम नाम लीजै । निसु दिन अनहद नौवति दीजै ॥१॥ *चुनकर । खुल्ला साहब गुलाल साहब के गुरु का नाम है । बजाइये । । } - आरती १२५ चौमुख दियना वारि कै मन संपुट कीजै। बिगसि कमल गगना चढ़ो तन को दान दीजै ॥२॥ अगम जोति भरत मोति मुक्ता मनि सीजै । मेम नेम अमी रस आरती भनीजै ॥३॥ अत्ति अभेव अलख देव सेव साँच कीजै आरति आनंद कंद जन गुलाल जीजै ॥ ४ ॥ । हिंदू हृदय जो आरति पावे, राम नाम कै मसला चलावे ॥१॥ गगन मॅडल मे आरति वारे, तब ही जीव निछावरि डारे ॥२ सुन्न को थार सत्त की बाती, सुरति निरति बारैदिन राती ३ सुखमन भॉवरि दै दै गावे, ब्रह्मा बिस्नु सिव संग न भावे? अचल अमूरति आरति तारी,थकित भयो घर नौ दस नारी ॥५॥ रोम रोम आरति बलिहारी,सकल मनोरथ आरती उतारी अजर आस आरति धरि जोरा, आरति सत्त थकित मन मारा ॥ ७ ॥ तन मन धन न्योछावरिवारी,माया मोह त्याग सब झारी गरत सहजहिं सुमिरन करई, आरति चरन सरन तर परई आरति प्रेम नेम जब होई, भला बुरा नहिं चूकै कोई ॥१०॥ आरति फिरि जब निरति समाई, मुक्ता अच्छर सिदिक बनाई ॥ ११ ॥ आरति जव घर बरलि बनाई, रोम रोम पद आरति पाई१२ कह गुलाल हम आरति पाई जन्म जन्म के संस मिटाई१३ *मन को सब ओर से बटोर लो । किहो, गायो। चिरचा । सत्य । + आरती + मुसलमान जो आरति करई, सिदिक सबूरी हर दम धरई। बेमहाल भारति नहिं करई, फजिर वारिआरति जो धरई२ आरति इस्क इमाने धरई, अल्लह अगुने बानी फरई ॥३॥ आरति वैत आपजो होई,दुरमति छोड़ि असल चित जाई? आरति मुसहफा प्रीति परोये,जुलमहिमारि हक्कतवजाये। आरति किसमत करम जब आई, मजहब पाय तब आरति गाई ॥६॥ मन मिरदग आरती गावे, जुलुम जबर काहू न सतावे ॥७॥ आरति बुंद अकिन जब वारा, सुरति विसुरति गयो सब भारा ॥८॥ आरतिपुर अमले जिन पाई, कह गुलाल से है गुर-भाई (११) राम राम राम राम आरती हमारी, दुनिया है सब 1.1 • देवान देव पूजै भारी ॥ टेक ॥ सत्तगुरु जब दियो करार, खवन सुन्यो दै बिचार । याही सिदिक जिव हमार, नेम बरत धारी ॥१॥ जोग जुगत मन हमार, ताप रहै पवन भार । काया थार जाति भरि कै, त्रिकुटी ले वारी ॥२॥ उनमुनी घन गरजि जोर, सुखमन कै करि झकार। बंक नाल मेरु डंड, अलख पुरुप भारी ॥ ३ ॥ सेस फनि मनी अनंद, प्रान प्रभु की करत कंद ।। जीता जोग रोग सेोग, करम भरम डारी ॥४॥ "मालिक के निर्गुन नाम की धुन गाजने लगे। कुरान । - - - . । - आरती १२७ - - अति अथाह नाहि थाह, परस भयो गुरु कि बॉह । नाहि आदि अंत मह, एक ही निहारी ॥५॥ कह गुलाल सुनो यार, आरति पूरन हमार राज करौं दसौ दिसा, छत्तर सिर धारी ॥ ६ ॥ (१२) मन माना मैं मनहि जान, आरत सा ज्ञानी ॥ टेक ॥ द्वादस में सुरति तान, उठत तत्त बानी ॥१॥ गल गल-जीव ब्रह्म मिला, अलख पुरुप भारी ॥ २ ॥ वेद भेद सब खुवार, पत्थल जल मानी ॥ ३ ॥ राम नाम हेतु नाहिं, पसु समान जानी ॥४॥ आप अपने चिन्हत नाहिं, फिरत भुलानी ॥ ५ ॥ कह गुलाल सते फकीर, दुनिया बौरानी ॥६॥ (१३) . : लागत मोहिं पियारा, आरति लागतं माहि पियारा टेका सुखमन के घर आरति मॉड़ो, रवि ससि दूनों वारा ॥१॥ तिरबेनी तिर आरति बारल, भाँवरि देत उतारा ॥२॥ गगन मैंडल मे आरति गावल, मुक्ता भरि भरि थारा ॥३॥ दसौ दिसा में आरति पूरन, धन सतगुरु बलिहारा nen सिव सक्ती जब गाँठि परो है, देखल आपु विचारा ॥५॥ कह गुलाल आरति हम पावल,फगुआ फरल लिलारा॥ "दखल ।
पहाडा . .. ॥ पहाड़ा॥ एका एक अमल जो पावे, साँचा सतगुरु भावे । प्रेम पदारथं हिय में राखे, सुमिरत ही सुख पावे ॥१॥ दुआ दोप जो दुरमति छोडे, तिरगुन ताप बहावे । ' सुरति निरति लै आसन मॉड़े, सकल सेंताप जो आवे॥२॥ तिया तिरकुटी जो मन राखे, झिलिमिलि जोति जगावे । उनमुनि लागो बंद सहज धुनि, चंद मेंडल घर छावे ॥३॥ चौथे पद पर पग जो नावे, अनुऔ डंक बजावे। गगन मॅडल में बाजी माँड़ो, बंक नाल चलि जावे ॥४॥ पॅचऍ परम तत्त जो जाना, सुनि भगवत मन लावे । पाँच पचीस तीनि बसि करि के, सेत छत्र सिर छावे॥ छटएँ छिमा सील जो उपजे, सत्त सॅतास चढ़ावे । नौ दर छोड़ि दसौ दिसि धावे, सहज समाधिजो पावे ॥६॥ सतएँ सदा सरन मन राखे, सब्द कै भेप बनावे । कोटि चंद न्योछावरि वारे, मानिक जोति जगावे ॥७॥ अठऍ अगम जोति जो बारे, दरस परस चित लाये। सोहं सब्द सुरत निस बासर, अनतहिं कतहुं न जावे ॥८॥ नौ नाम निरंजन नौका, कनहरि गुनहि चलावे । साँचै गहे मठ नहिं आवे, भवसागर तरि जावे ॥८॥ दसऍ द्वार कि ताली खोले, अविगति गतिहिँ समावे। सकल कामना मन है पूरन, मन कै मौज मिलावे ॥१०॥ एकादस नाम जो पूरन पावे, अगम निगम नहिं जावे।' कह गुलाल तब सतगुरु चीन्हे, घरहीं में घर छावे ॥११॥ *ध्याम | विट मित्रत । १२९ ॥ मिश्रत॥ . - । ॥ - शब्द १॥ मोहिं नाथ मिलावहु कैाने गुना, प्रभुं करि लीजै अपना जना ॥ टेक ॥ दुख सुख संपति जीव को लागी, अत काल बसि सात जना ॥१॥ यह मन चंचल चोर अन्याई, ६ }, "भक्ति न आवत एक किना ॥२॥ कृपा कियो प्रभु दृष्टि निहास्यो, सब थंकि लागि रहल कोना ॥३॥ अमर मार पिय उपजे न, बिनसे, पुलकि पुलकि मिलि के गवना ॥४॥ कह गुलाल हम भये सोहागिनि, • अब नहिं अवना नहिं जवना ॥५॥ ॥ शब्द २॥ सब्द सनेह लगावल हो, पविल गुरु रीती। पुलकि पुलकि मन भावल हो, ढहली भ्रमभीती ॥९॥ सतगुरु कृपा अगम भयो हो, हिरदय विसराम । अब हम सब बिसरावल हो, निस्चय मन राम ॥२॥ छूटत जग व्योहरवा हो, छूटल सब ठॉव ! फिरव चलब सब थाकल हो, एका नहिं गाँव ॥३॥ *किनफा । ििकनारे । गिरी। दीवार । । - 17 , १३२- मित्रत कह गुलाल सतगुरु वलिहारी । मिलि हौं प्रान पियार हो सजनी ॥६॥ ॥ शब्द ५॥ 4 ऐसन अचरज देखहु जाई। जुग जुग दुविधा पंथ चलाई ॥१॥:.. अपनहिं काया गोपि लुटाई, पारथ बीरन धनुप चढ़ाई २ घर घर नारि पुरुप सँग होई, एकै ठाकुर अवर न कोई३ यह जग मिथ्या फिरत बनाई, चढ़त चरख फेरत दिन जाई४, कहिं राजा कहि दुख सुख-दाई, अपनहिं गोपी कान्ह : कहाई ॥५॥ आतम राम सकल जग छाई,धधा धोख मरत बौराई ॥६॥ कह गुलाल अव राम दोहाई,हम बचली सतन सरनाई॥७॥ ॥ शब्द६॥ प्रभु की सेोभा बनी है रसाल । धन सा घरी धन्न वह पल है, जा सिर उगो है भाल ॥१॥ आठ पहर सनमुख ही निरखो, अनुभा अविगत लाल । जासु दरस सुर नर मुनि ध्यावहि, खोजत फिरत बेहाल ॥२॥ *पारथ अर्युन का नाम है । जघ अर्युन श्री कृष्ण के गुप्त होने पर उन के रनवास को पहुचाने गोकुल को चले तो रास्ते में काबा लोगों ने घेरा-अर्युन ने उनको बान से मार कर भगाना चाहा पर कितना ही धनुष को घढीया यह न चढी और कावा लोगों ने ऐसे बोर के आळत लूट लिया सनको -- ar मित्रत वनी बनी कौतुक पनि आके : अनत कला सा ख्याल । लामी लंपट हीन करम बसि, ता को भयो है दयाल ।। ३ ।। का बरनों छवि वरनि न आवे, अल्प बुद्धि सठ वाल। अपरम्पार पार पुरुपोत्तम, लियो अपनाय गुलाल ॥ ४ ॥ - - साँचा है साँचा हरिनाम, सत रटत है आठौ जाम ।।१।। सनकादिकन्ह लियो सुकदेव, नारद कीन्हो सतन सेवार अंबरीक लियो जनक विटेहालियो जोगेसरन्ह मायाखेहरे धूप्रहलाद भरि लियो करार, लिया है कूवरी कंचन थार४ लिया हनुमान लियो सुग्रीम,लियो विभीपन पंडो भीम नामदेव भरि लियो कधीर, लियो मलूका नानक धीर ६ रैदास लिया है मीराबाई, नरसी जन लियो खेल कन्हाई यारोदास लियो गुरु संग पान, केसा बुल्ला दूनो भाय॥८॥ सतगुरु बुल्ला सहज लखाय,कह गुलाल सव चरन समाय ७ ॥ शब्द॥ H हरि चेतहु रे नर जन्म बाद, डहकत फिरत कहा माया बाद ॥१॥ नर भूले करि पुन्न पाप, जन्म जन्म होवै संताप ॥२॥ *मूरख, दुष्ट । निस्फल । झगडा ।
मित्रत कह गुलाल सतगुरु बलिहारी । मिलि हौँ प्रान पियार हो सजनी-॥६॥ ३ ॥ शब्द ५॥ ऐसन अचरज देखहु जाई ।। जुग जुग दुविधा पंथ चलाई ॥१॥ अपनहिं काया गोपि लुटाई, पारथ वीर न धनुप चढ़ाई, २ घर घर नारि पुरुष सँग होई, एकै ठाकुर अवर न कोई३ यह जग मिथ्या फिरत बनाई, चढ़त चरख फेरत.दिन जाई४ कहिं राजा कहि दुख सुख-दाई, अपनहिं गोपी, कान्ह कहाई॥५॥ आतम राम सकल जग छाई,धधा धेखि मरत बौराई ॥६॥ कह गुलाल अब राम दोहाई,हम बचली संतन सरनाई॥७॥ ॥ शब्द ६॥ प्रभु की सेोभा बनी है रसाल । धन्न सा घरी धन्न वह पल है जा सिर उगो है भाल ॥१॥ आठ पहर सनमुख ही निरखो, अनुभौ अविगत लाल। जासु दरस सुर नर मुनि ध्यावहि, खोजत फिरत बेहाल ॥२॥ 'पारथ अर्युन का नाम है । जघ भर्युन श्री कृष्ण के गुप्त होने पर उन के रनवास को पहुचाने गोकुल को चले तो रास्ते में फ्राबा लोगों ने घेरा-अर्युन ने उनको यान से मार कर भगाना चाहा पर कितना हो भनुप को चढाया वह न घढी और काया लोगों ने ऐसे वीर के आरत लूट लिया। . -- मित्रत - बनी बनी कौतुक बनि आवे अनत कला सा ख्याल । लामी लंपट हीन करम बसि, ता को भयो है व्याल ॥३॥ का वरनों छवि बरनि न आवे, अल्प बुद्धि सठ वाल। अपरम्पार पार पुरुपोत्तम, लियो अपनाय गुलाल ॥ ४ ॥ ॥ शब्द 9॥ माँचा है सॉचा हरिनाम, सत रटत है आठौ जाम ॥१॥ सनकादिकन्ह लियो सुकदेव, नारद कीन्हो सतन सेव ॥२ अंबरीक लियो जनक बिदेहालियो जोगेसरन्ह माया खेह धू प्रहलाद भरि लियो करार,लिया है कूवरी कंचन थार? लियो हनुमान लियो सुग्रीम,लियो विभीपन पंडो भीम नामदेव भरि लियो कधीर, लियो मलूका नानक धीर ६ रैदास लियो है मीराबाई, नरसी जन लियो खेल कन्हाई ७ यारीदास लियो गुरु सँग पाय, केसो चुल्ला दूनो भाय॥८॥ सतगुरु बुल्ला सहज लखाय,कह गुलाल सब चरन समाये ॥ शब्द ॥ हरि चेतहु रे नर जन्म बाद', 'डहकत फिरत कहा माया वादा ॥१॥ नर भूले करि पुन्न पाप, जन्म जन्म होवै संताप ॥२॥ *मरख, दुष्ट । निस्फट । मगहा ।
१३१ मित । 1 . 1 . ॥ शब्द १३, सतो फिर जिवना नहिं हाँदा । का त भरमि भरमि गति खाँदा ॥१॥ माटी को तन माटिहि मिलि है, पवनहिं पवन समौंदा। सकल पदारथ छोड़ि नाम धन, झूठ फंसारी फौंदा ॥२॥ संत साध के रीति न जानहि, मुवल अरु जिंदा गंदा । हरि मद, माते मस्त दिवाने, प्रेम पियाला पिंदा ॥३॥ दोजखभिस्त भिस्त नहिं दोजख,जिकिर" मुहाला किंदा। कह गुलाल अनुभौ जिन गायो,सोई मुसलम जिंदा ॥४॥ ॥ शब्द ९४ ॥ सता जोगी एक अकेला । तातें मरन जिवन नहिं खेला ॥१॥ सत्त सबूरी सहज को कंथा। सेल्ही सुभग सहेला । माति माति मगन घर फेरो, बहुरि न मनुवॉ दुहेला ॥२॥ पॉचहुँ का परपच मिटावो, मन पवना सँग रेला । सुरति निरति ले आसन माँडो, तहाँ गुरू नहिं चेला ॥३॥ आठ पहर इक नाम उठतु है, ज्ञान ध्यान को मेला । कहै गुलाल अगमपुर वासी, संत चरन मन देला ven *होगा। खिताहै। समाय जायगा । फदा । पीते हैं। सुमिरनी **मुश्क्लि । फथरी, गुदरी। मन को मस्त और मगन रख कर कुटी की ओर उलटो तो फिर कुछ कठिनाई न रहेगी ।पिल कर चलना । -- मिश्रत ॥ शब्द १५॥ मन चित धरु रे, परम तत्त में रहु रे ॥ टेक ॥ ढंडस* करु मन से दूर, सिर पर साहव सदा हजूर ॥१॥ रोम रोम जाके पद परगास, संत सभा में पावे वास ॥२॥ 'सत सतोप हृदय करु ज्ञान, काटिं कर्म मिटि आवा जान ३ छोड़ि चंचलता होवहु सूर, निसु दिन करत वदना पर कह गुलाल मेरो नाम अधार, जम जीतल दुख गइल हमार ॥५॥ ॥ शब्द १६॥ जो चित लागै राम नाम अस ॥ टेक ॥ नृपावंत जल पियत अनॅद अति । थकलहि गाँव मिलत है जौन जस ॥१॥ निर्धन धन सुत वॉझ बसत चित । संपति वढत न घटत जौन अस ॥२॥ करत है कपट सॉच करि मानत । मगन होत नर मूढ सकल पसु ॥३॥ प्रेम गलित चित सहन सील अति । सर्व भूत पर करत दया रस ॥४॥ आनंद उदित अगम गति ज्ञानी । त्रिलोक नाथ पति काहे न होइ बस ॥ ५ ॥ सतगुरु प्रीति परम तत सत मत । विमल बिमल वानी मे रहत लस ॥ ६ ॥ { *भगल, अकठ । धिहरा । ठिकाना । 18 मिश्रत अछय अमर आनद है, ज्ञान उदित आलेख । सर्व भूत में पूरि रह्यो है, सो प्रनु छिन छिन देख॥३॥ निस दिन नीवति वाजही, निशर झरे तहें नूर । उमॅगि उमॅगि तहें गावहीं, कोउ बैठे साधू सूर ॥४॥ कह गुलाल की परतीत । तव जिय निस्चय आवई, सबहिं भये तब मीत ॥५॥ सो पावई, सतगुरु मित्रत १४१, ॥ चुने हुए दोहे ॥ सत्त सब्द गुन गायऊ, संतन प्रान अधार । अगम अगोचर दूरि है, कोऊ न पावत पार ॥१॥ उठ तरंग दसहूं दिसा, भाँति भाँति के राग । विन पग नाच नचायऊ, विनु रसना गुन गाय ॥२॥ ज्ञान ध्यान तहवा नहीं, सहज सरूप अपार । जन गुलाल दिल सॉ मिला, साई कंत हमार ॥३॥ *विन जल कॅवला विगसेऊ, विना भेवर गुजार । नाभि कॅवल जाती धरै, तिरबेनी उँजियार ॥४॥ सुखमन सेज बिछायऊ, पवढहिं प्रभू हमार । सुरति निरति ले जायऊ, दसो दिसा के द्वार ॥५॥ पुलकि पुलकि मन लायऊ, आवा गवन निवार । जन गुलाल तह भायऊ, जम का करिहै हमार ॥६॥ मन पवनहिं जीतो जवै, महसुन माहि समाध । सुखमन जोति सँवारेज, बरि बरि होत प्रकास ॥७॥ ओअंकार समाइला, जोति सरूपी नाम । सेत सुहावन जगमगर, जीव मिलल सतनाम ॥८॥ जिन यह ब्रह्म विचारल, साई गुरु हमार। जन गुलाल सत बोलही, कूठ फिरहि संसार ॥६॥ दृष्टि पदारथ फरल साइ, सहज के परलि धमार । अति अटभुत तहें देसल हो,पुलकि पुलकिवलिहार ॥१०॥ वरनत बरनि न आवई, कोटि चंद छबि वार । दसव दिसा पूरब सेाई, सत मदा रखवार ॥१९॥ *महासुन्न । - मिश्रत ५ जिन पावल तिन गावल, अवर सकल श्रम डार । कहै गुलाल मनोरवा, पूरन आस हमार ॥१२॥ प्रेम कै परउ हिंडोलवा, मानिक वरल लिलार। कह गुलाल मनोरवा, पुजवल आस हमार ॥१३॥ अनुभौ फाग मनारवा. दहुँ दिसि परलि धमार । काया नगर में रेंग रचा प्रान नाथ बलिहार ॥१४॥ बिनु बाजे धुनि गाजई, अधरहिं अगम अपार । प्रान तबहिं उठि गवनेऊ, बहुरि नाहिं औतार ॥१५॥: . प्रेम पगल मन रातल, आनंद मंगलचार । तीन लोक के ऊपरे, मिललहिं कत हमार ॥१६॥ जोग जग्य जप तप नहीं, दुख सुख नहिं संताप । घटत बढ़त नहिं छीजई, तहवॉ पुन्न न पाप ॥१७॥ संत सभा में बैठ के आनंद उजल प्रकास । जन गुलाल पिय विल सही पूजलि मन के आस ॥१८॥ बंक नाल चढि के गया आयो प्रभु दरवार । जगमग जोति जगन लगी, कोटि चंद छवि वार ॥१९॥ मुक्ता गरि बरपन लगो, टसो दिसा झनकार । जन गुलाल तन मन दियो, पूरी खेप हमार ॥२०॥ मानिक भवन उदित तहाँ, भाँवर दै दै गाय । जन गुलाल हरखित भयो, कौतुक कह्यो न जाय ॥२१॥ . *फाग के एक राग का नाम । पिलास करता है। - - । पाठक महाशयों की सेवा में प्रार्थना है कि इस पुस्तक-माला के जो दोप उन की दृष्टि में प्राबैं उन्हें हमको कृपा करके लिख भेजें जिस में वह दूसरे छापे मैं डर कर दिये जावै पार जो दुर्लभ ग्रथ सतयानी के उन को मिल उन्हें भेज कर इस परोपकार के काम में सहायता करें। यद्यपि कपर लिखे हुए कारनों से इन पुस्तकों के छापने में बहुत खर्च होता है तो भी मर्व माधारन के उपकार हेतु दाम माध प्राना फी आठ पृष्ठ से अधिक किमी का नहीं रक्खा गया है। जो लोग सबसक्रमर अर्थात पक्के गाहक होकर कुछ पेशगी जमा कर देंगे जिस की तादाद दो रुपये से कम न हो उन्हें एक चौथाई कम दाम पर जो पुस्तके आगे छपेंगी बिना माँगे भेज दी जायंगी यानी रुपये में घार आना छोड़ दिया जायगा परतु डाफ मासूरन उन मे जिम्मे होगा और पेशगी दाम न देने की हालत में बी० पी० कमिशन भी उन्हें देना पडेगा। जो पुस्तफै अथ तक छप गई हैं (जिन के नाम आगे लिरो है) सम एक साथ लेने से भी पक्के गाहकों के लिये दाम में एक चौथाई की कमी कर दी जायगी पर हाफ महसूल और बी० पी० फमिशन, लिया जायगा। अब मीरा बाई के भजन और दरिया साहब विहार के महात्मा का दरियासागर ग्रथ जो अब तक दूसरी प्रति लेख की न मिलने के कारन रुका हुआ था हाथ में लिये गये हैं। मोटर, बेलवेडियर छापाखाना, इलाहाबाद। जून, १९९०ई० १४२ मित्रत - 1 भ . - 4 जिन पावल तिन गावल, अवर सकल भ्रम डार । कहै गुलाल मनारवा*, पूरन आस हमार ॥१२॥ प्रेम कै परल हिंडोलवा, मानिक वरल लिलार । कहँ गुलाल मनेारवा, पुजवल आस हमार ॥१३॥ अनुभौ फाग मनारवा, दहुँ दिसि परलि धमार । काया नगर में रेंग रचा मान नाथ बलिहार ॥१४॥ बिनु बाजे धुनि गाजई, अधरहिं अगम अपार । प्रान तबहिं उठि गवनेऊ, बहुरि नाहिं औतार ॥१५॥ प्रेम पगल मन रातल, आनंद मंगलचार । तीन लोक के ऊपरे, मिललहि कंत हमार ॥१६॥ जोग जग्य जप तप नहीं, दुख सुख नहिं संताप । घटत बढ़त नहिं छीजई, तहवाँ पुन्न न पाप ॥१७॥ संत सभा में बैठ के आनंद उजल प्रकास । जन गुलाल पिय बिलसही+, पूजलि मन के आस ॥१८॥ बंक नाल चढ़ि के गयो आयो प्रभु दरवार । जगमग जोति जगन लगी, कोटि चंद छवि वार ॥१६॥ मुक्ता करि वरपन लगो, दसो दिसा कनकार । जन गुलाल तन मन दियो, पूरी खेप हमार ॥२०॥ मानिक भवन उदित तहाँ, आँवर दै दै गाय । जन गुलाल हरखित भयो, कौतुक कहो न जाय ॥२१॥ *फाग के एक राग का नाम । बिलास करता है। 1 तादाद दो रुपये से कम न हो उन्हें एका चौधाद बम दाम पर मो पुस्तके आगे छपेंगी विना माँगे भेज दी जायंगी यानी रुपये में. हैं) सब एक साथ लेने से भी पक्के गाहकों के लिये इमाम एक पोशाई. की कमी कर दी जायगी पर शक महमृरा प्रारमिशन' पाठक महाशयों की सेवा में प्रार्थना है कि इस पुस्तक-माला के शो दोष उन की दृष्टि में या उन्हें हमको कृपा करके लिख भेजें जिम में यह दृसरे छापे मै दूर कर दिये जावै नार जो दुर्लभ ग्रघ मतयानी के उन को मिल उन्हें भेज कर इस परोपकार के काम में सहायता करें। यद्यपि कपर लिखे हुए कारनों में इन पुस्तकों के छापने में घात मर्च होता है तो भी म साधारन के उपकार हेतु दाम आध माना फी आट पृष्ठ से अधिक किसी का नहीं रपया गया है। जो लोग सब्सक्नबर अर्थात पके गाहक होकर कुछ पेशगी मा, पर, देंगे शिम की आना छोड दिया जायगा परतु हाफ महसूल वन के निम्मे होगा पेशगी दाम न देने की हालत में वो पोल कमिशन मी जी । 1. 42 लिया जायगा ।
संतबाली पुस्तक-माला सुलसी साहब (हाथरस वाले ) की शब्दावली और जीया-चरित्र रत्न मागर मय जीवन-चरित्र गरीवदास जी की वानो मार जीवन-चरित्र कवीर साहब यी शब्दावती पर जीवन-चरित्र, भाग १ दूमरा एडिशन शब्दावली भाग २ असरावनी पलटू साहब की शब्दावली (फुइलिया इत्यादि) और जीवन-चरित्र, - " " " भाग १ " - " शब्दावली, भाग २ धनरदामजी की बानी और जीवन-चरित्र, भाग १ भाग २ दासजी की बानी और जीवन-चरिन जगजीवन साहब की बानी और जीवन-चरित्र, HIT १-- दरिया साह्य ( मारवाइ वाल ) घी बानी भार जीवन-चरित्र, दूसरा एडिशन - भीखा साहब की शब्दावली और जीवन-चरित्र गुलाल साहब (मीसा माहब के गुरू) की बानी सहजो वाई की यानी और जीवन-चरित्र दया बाई को बानी और जीवन-चरित्र गुसाई तुलमीदासजी की बारहमासी अहिल्याबाई का जीवन-चरित्र भी अंग्रेजी पद्य मे छपा है (यह रमनीय पुस्तफ एक मेम ने लिखी है सतवानी पुस्तक-माला की नहीं है) मूल्य मे हाक महसूल व वाल्यू पेप्रवल कमिशन शामिल नहीं है ननेजर, बेलवेडियर प्रेस, हाबाद : - , ।
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