Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Chetana Ki Prachand Kshamta Ek Drashan
Front matter
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चेतना की प्रचण्ड क्षमता-
एक दर्शन
लेखक:
घेदमति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
प्रकाशक:
अखण्ड-ज्योति प्रकाशन
मथुरा
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देव-मन्दिर के देवता और
के देवता और परमात्मा
"स्वर्गादि उनलांना, अन्नति, पृथ्वी, जन आदि की उत्पत्ति
गुगी गब परमात्मा ने जोरपाना की नना का विचार किया ।
नना या विचाराने ही उनान गर्यप्रचम प्रमाण अपंदा किये । यह
पण अण्डाकार धे और उनमें भपको लक्षण थे, पिर उनमें परमा-
"गाने दे किया रे गुन बना गुग मे वाली, पाणी मे अणि मन ।
गो बार दो बदनिये जो नामिका पहलाये । उनी प्राणी जगात
प्राणों में या सोन नेत्रों के हित बने । उनमें गुनने की गति उत्त
ई. पोटेन्दिर राशिमा प्रवट,फिर लगा नव्याने
गेग रोम में भोपाधिया, शिरपणा यमन मोर मन में गन्ना
का। फिर नाभि धनी, गाभि अपान देयता उन यता
काट शिक्षउपाय नल से गाल गोपनि।"
"रापताना अशोकः लपनं गुमर
। परगारमा जामे माग और पानी अभी भी हान्न
बीपीसिंगार में गिराया पहे, जी को
गोमयाजमार पाप उमरे, नि उन्होंने
मामा यी परमा.मा में उगादन गरेर
--
लिगामा: :: :.: .
उन्हें बोकारनामाया
मेजनी मिशाला वाओ - ':
तब माने मनुष्य शरीर दिलाना :: : ।
अग्नि में पानी कामना
सूर्य ना बनार, ना मोल में
कानों में पनी सोपधि मन पर... ::
ܗ݈ܽܫ.
--
बनारस्य में निा गया।
निधाई तीन लिये भगान-ग्रन लोग दिनरान उन्ही की तिने मकर मनुष्य पी मन्दिर को भग्न और गन्दा किया जाने । यताओं को ग्थल पजा मिलनी चाहिये पर यदि वनाओं की मंगप्टिको एक मात्र पनीर का उपदेश कर जायेगा तो उस परमात्मा की प्राप्ति मे आनन्द मा नया होगा जो इन सभी पनियों को भी उत्पन्न करने वाला आनन्द और सृष्टि का गल है । गारी परिपूर्णानाये गो गाना में ही उगे प्राप्त किये बिना आदिमक नग : परमात्मा को परे प्रान किरा जाये? यह गंगार में सामने जटिल और गम्भीर प्रश्न ? ऐतरेय पनिपट इन प्रग की लकी दिशा में एक गाणं शोध इनमें सच्चों को बोनग्न ने गगनाया गया है, यह बताया गया है कि इन्द्रियों की पासना ममुप्प मी आरण्यकता नहीं बन देव पत्तियों की आर- धागे होगी मना तो बुनि-ज्ञान और गलना को करते हैं । वृद्धि परमात्मा को प्रतिनिधि है अर्थात् मनुष्य देव भनियो में कारगी सपा । उसे सदियों का स्वामी बन फर द पनियों का नाम उठाना चाहिये और अपनी बालिका गवं भागिय मनमोगर विकाग गा विराद मना को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। मी परम पुरमा मोर पाहा. गोग । जो अपनी प्रियो घा स्वामी बन गया उसे अपने नए गएको विराट् मा में परिवनित पोरन बनी। अभी तक का शान मेगन मारमा नका नामित पा रात्रीय पारगामी मे बियाम कमाने के कारण म नया दिनी में पक्षानुना और न र जीवन-विधान से मार-मान भाग जाना यामापियापार अपना ना पोलिभाना गरियो । पर ।
माम से बड़ा और उनका स्थानी, ;
बौद्धिक शक्तियों को देना नाहित...!'
नसों और सास शून्य स्थानो (यो ।...
महत रानी है। पहनने मति : .
निकलती बोर मोरनमी "
.
मस्तिष्क धनेगी अनुभूति करना है। (: } . " !
गोलहरे तर नली जाती है और ..
पानान कराती है। आy: ... '
से मी पानिकों को मी मिती : 1
मांगगिलों को जोडने मानीना
निले जब जीन की मांगो . ::::: ...
स्या आदिमी अनी में ...... ; ;
को नीरनी और मोदी ! :
पाकिलोको - Sri ,
अनि यन्त्र free, ........ "
* * , s i ;; } } ; :::. .::
.
मानन्ध जोगी 17 :: '.....
को 73... ५.. . . . . . ::
4.मः: :: : :
। प्रियुटी मध्य रे ग भाग गे हैं, जहां ज्योनिलिन के वर्णन होने है
पर शरीर रचना भारती उगे केवल दोनों पुतलियों ने सम्बन्धिन
पनो । यादनल एमनटी नानिम्धिन सूर्य चफ (गोलर पावसान)
गम्य और योग विद्या में मका अपना विशिष्ट मान्य है
पर उभीमानीर-रचना मानती नही जानते यहां तक कि नाभि
जग मान्यपूर्ण गल्धान का जिममे कि गर्भावस्था में मारे मतीन को
गोषण मिलना , बंशानिक गुछ भी नहीं जानते है । तो भी यह
4.ग माग्यपूर्ण नही कि उन्होने बन जानकारियों के आधार पर
न मिद गरी किया यि गनिमी सम्पूर्ण सत्रियों का
नधियान, यदि मलिक नहीं बना लो इन सभी इन्द्रियों को
ना अपना कारोबार नगर कार उसे नष्ट कर देने में ही जुट जाली
श्री. आनी ममम्म गुम नामावाओं या परिसर में ही गोविन
र नी. या मालिनी नगना इन्द्रिय गुम नमानाय नकार
मार कान में शरीर में विदा कर फिर दुर्ग योनियो की ननाम
भगनी जानी और ग्राम बना चलना साना जय नमः
गतियार प्रशनि अमान आवरण और तन्द्रियों की दिप्माओं
मोना, नी बार लगा । मजद में पली नर को दाने हा
मन्या वा देवाय महिमान मोजमा ।
पनामानि विग ग गयनो र निदेयः नविना महित्वना।
पजुद १६
गोगनी देयाः (i) जिन देवता (जोपामा)
य; मलि
बीमा नर सागवानी
an.
--
अन जातो. मंट मानियों
।
मामा मामी : अपमानिकामी मोनिया
.
१
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मंटर (मग्निक का भीनी भाग) कर नोला जाये तो मंदर
पान की अधिक होगी।'
या धन मानिया मथा मात्र नहीं है दम पर प्रयोग हुये
और प्रयोगों से मर मिल हो गया । मिनिममूरे च्य
ग्रे मैटर) में या मारे गुण विद्यमान है जो परमात्मा में होने की
कल्पना की जानी वर के बारे में मान्यता है कि यह मयंचापी,
शनिमान, गबंदृष्टा, अजर-अमर सनातन धादि। पूर्ण विकनिन,
पतिया में वार गारे लक्षण तो मनात है। वैज्ञानिक प्रयोगों में यह
जी पाट हो गया है न गमकानों पर मैकगिल यूनियनिटी मान्टि-
बन्न मं० वियर पापी में निर्देशन में पोज चल रही है।)
उनकी प्राणे आज नाही ना गाल पूर्णपगे भारतीय दमन को प्रमा-
णि मागी।
यह प्रयोग गनिक नगमारी पन्नों की विद्य नपनि यदा-
पर किये गये । एमः रोगी को लगदाट के दाग मलित कदम
भाग को गया गया को उसने बनाया नि: मैं नारे आगामी
गि का बोबो गारागण धम को मिलने की सलापान हो
है, आकरमा गीगा भयंकर जलन देगी या नवीन हो
उटा । जायद जमकी निपनि गीता में भगवान विराट् । देखने
पाले भजन की-गी हो गई हो। को बाद जन प्राण
माको शबा गई तो उसने अजीब यनियाँ गुनी और मार
मित पार दिशा निम जो पनियां अपने मान-पान मुगा रही
मी मोजारात में ना नक्षत्रों को परिमण आदिको माग
पगाओं में विस्फोट आदि यो भी मार पीयां गुगाई की
एम. बार और अनजनक मान लेनिनवाया
गया तो रोगी एयगर गया रेमो मनोमा
TT भागमा विमानोमा मेरो
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माग गरीरही आपलागि करना है। उनका मामान विनामवं
किया बालाप सम्पूर्ण शरीरको प्रभावित करता।
जननेन्द्रिय गी गणना पूरक इन्द्रिय में न करके बनेपनियो
गप में ग्वना परिधि में ही मिना गया है। कारण किडनी की
गंवेदनशीलता जाननिय में एक विशेष माग गचंदन उगन्न बाकी
। योमलता का आनल त्वचाहीनी और देती । बजनों
पाप ग्वन आनिगन बचा के माध्यम होना । उनी
गरम पालना ही मशं में जलकरण को गुरगुदा देनी । भाव
विभोर स्थिति में बिछु? ए प्रियपान को अधया नफन न्यजन को
उपालिका में धानी में मनाये बिना चंग नही पा । पाल्पा शेर
अनिसायीको गोदी में नंगा चंचल भागरिक कारणों की मदद
मीना ना गम गा में आगरिक मानन्द की वनात्मक
अनुमति भी जाती है । बानिय हमारे भाव मंगान को कम
प्रभावित नहीं मारनी। इसलिए उगे दांतीय मे बनाया
जाना और पानी पर्सना लिए प्रपन पर. नाटा
.
-
भागीय गंग्यान में इन-छान : जय मांजूर । आज तो
का जान-निक आधार पर उलट गया पर प्राचीन काल में
गि... पानीमा और अननीयता की प्रचुन मा
पा । सदराचारियों को मानने या गायी दुष्ट
नाम गमनाम में अपने कामना ।
1 पर जन पर पानी प्रतिमा समान
गुचाकी का मानना कोपा माराम
नाभी, पुत्र साबित हो रे मन
जिनामा नाम से
सपनाम।
ना? मग
साधारणतया इतना ही नमःला आला
करने के निगे जिन तह ना लगाया जा
भी बाहरी भानु प्रभावों में लेकर मिना किया ।
है अपने कमर महत करती है। या पर
जो अलग्निः अवयों को करने में ना "
मानव को पोगासीन भी
नाम लिने नीम और 4
मग माती :
--
कार गरमा HिTry :
गोर नाम:
...
-
माती। पिनन ही मन, पानी भी नगर बने हैं। कहना
मो मिट्टी या बारगी पर पग्न और कार में मन लेने में इंग
दुर आवरण में और भी आमानी में पान प्रभाव माम कर
मी की मदा गला ही पा जाताहाय-पनों में नी
मोजे भी पान निये जाने पर नाय, मु, आँग, गाल आदि पर तो
कोई मोजे भी नहीं पाने जाने । पानी त्वचा गुनी हो गाने गती
अन्यन ने गे मीन-आयोगितामय नही मानली- बसों
की मांग की हैन प्रात प्रभाव से प्रभावित होती है, अन्यान त्वचा
शरीर मा मरक्षण गार पकने में पूरी नाना है। बता ने उसका
गुष्ठ उपकार निया बन्न और पनावीही बनाया।
परीर पर चमड़ी का क्षेत्रपाल जगभग २५० वर्ग फट होगा
। वजन ६ पोष्टः । गवर्ग पननी यह पलकों पर होनी है .५ मिनी
मीटर पर तलयों में गयर मोटी होती. ६०० मिनी मीटर ।
साधारणतया उगमी मटाई में नेवार ३०० मिली मीटर की ती
। उग पागवानीय जगपित होते है जो गुयोन की मः-
यता मे गे गा मरने है। औपतन नको मे निकाल में १०
छन पीना पार निकालना । । गर्मी पाने पर या अधियः पति-
श्रम करने पर जद मीर का राजन गरमी टनानी
मारने के लिए पद मियां नेत्री ने पीना दार निकाली
और पान ला परती। पर मदियो में पनीर या गरम ने
नती जर का पीला पद मिमु मा । भोवर की माँ
चावको मामला मी
नामी परमधामन" नाम।
मीनानी निकाला एक प्रकार
व गा.प्रकारका छोट कोहली
यह छेद गर्वमा बन्द हो जाये तो आनी पार
जमाने में अगाधी का मोनोगमा बनमारो
या कि उसो गरीर पर मोम पोत तिर जागी
बह उगे हटा नहीं करना और ताना मामला
घुट-घटकर मर जाता मानवार पर मोम
कारना और गाना ! i...
बन्द हो जाने में नवसापोदेर में : १
पनते-पनो मर गया। नारी मिता...',
सोनाम दर
- स्वचा में निगेर न मानो "कारियम" ममता मीन परनी चिकनाई की चममा मन मोल बना नीरजयिनानगली. मी प्रकार बनानी रंक गणिका गलानिक' नामक रमा उत्पन्न करनी है। नी के कारण गोसा, काना, गेागीला आदि मनुष्य गायोगा। चोट लग जाने परभा स्थल की पूर्ति करने के लिए नीप- जीपीनी पटानी पटने और वा पार जल्दी भारी रोगगाधना में पटवयों की स्वता की पर। (१) म नियम-गयार भी (२) बटन न्यूमोटमाटी () टम-न्यतोगग गछिन (४) टग पयलीटर अंजान पाटी परसा ()टम गेनानि पूरक (६) गोरिया या भग राय । हाप पंगेंगी पोगवे, पनी नलये आदि पर जा--- यो माटी गद्दी-गी पाई जाती उगे पेपिनी-मान। घना परतों में कितनी बतुरे विशमन । १) गान्धि, (२) ग्वेद अधि, (३) रोल अन्धि [४) वा बना, अन्न बना (५) नागु, (६) मनायोग (6) रन, नलिया बनने में मुख्य है. म अनिम्ति अधिर गहराई में जानने पर उनमें जीरो बन पुछ मिलेगा। बार वना सम्बन्धी मारोक्तिः जानकारी हुई। गवनामयः परिचय यह है कि दालानुओं को मान कर मनिलाय. मका उनी जानसाती पाने का अति महत्वपूर्ण मायं त्वचा का। गंगाः मालिका सम्बन्ध बनाने-तुओं को पनीर गार गाने गिलाने का कार्य जमी द्वारा मगन होना । मनाएर उगे अन्न मानिनो अधिकार और मन बनाया गया सनी मालिनी की कि यदि उन विनर निरा जाप को मानन्य समम्म प्राधियों का काम कर सकती है। मागे देखा जा सकता । नामा मसला ༣ ས། ཙན༌སྶ stཝཤུ་-པརུ }
है, चखा जा सकता है । स्पर्श सुख तो उसका प्रधान कार्य है - मैन
ही नहीं-काम संदन के अन्य प्रकार भी लगभग उसी से बात
अनुभव होते हैं और हलचल मचाने वाली अन्तःस्थिति उसन्न
करते हैं।
त्वत्रा अन्य इन्द्रियों का भी कार्य कर सपने में समय।
मूलतया यह शक्ति उसमें पूरी तरह विद्यमान है। काम में न जाने
से ही वह प्रसुप्त पड़ी है। योग साधनाओं द्वारा यदि चना की
संवेदनशीलता बढ़ाली जाय तो अन्य इन्द्रियों की शतिः बनारर
त्वचा से ही काम चलाया जा सकता है। वह बनी हुई अनलियों
की शक्ति अन्य उपयोगी कायों में खर्च हो सकती है। जिनकी
इन्द्रिय नष्ट हो गई है वे अभ्यास करके त्वना से हो उन प्रयोग
को पूरा कर सकते हैं । नेत्रों का काम त्वचा कर सरने में मम
इस सम्बन्ध में रूस में लगातार कई उदाहरण सामने आये और
वहाँ इस सम्बन्ध में काफी खोज भी हो रही है।
त्वना के पारदर्शी परत फेवल आर-पार मिाने बालेको
नहीं हैं। वे ऐक्सरे का काम करते हैं यदि जो विनिता
मके तो एक्सरे यन्त्र के स्थान पर अपनी लना गंगा
अगात और अदृश्य का एक बड़ा भाग हमारे सामा
सकता है।
कुछ समय पूर्व मामले में पा नितिन मामा
दिगया गया का कि किस प्रकार विना औगों को मार
मार्ग से देखने का नाम निया आमा मानी ।
की २२ वर्षीया मुगाची जोमा कमीना ने अपने हा गडी
नीगरी योनी गली में पुष्टि को RT for
दिया । आंध में मजबूट पट्टी कराकर दो की में
उनने पन दो गरिमोरे महारे पापार मार
गुमाया को मिली न परवाना तो
[ मांक
मीर में मंचाप्न चनना को बमुनी प्रयोजन पूरा कर सकने बी धमना या मान हुआ और नगन्य विज्ञान को एक नई मोध करने मीणा मिनी अभी जम अध्याय में एक कली और अभी । चिननंही लोगों नेतनाम गिया कि क्या उनमें या उन गुम्पियों में भी गोलिया- जानि म गोज में वर्ष पवर्गीय नटली और प्रयाग में आई है, जिगने गोजागुलेगोवा की अपेक्षा और भी अधिक लोगों को आपनयंगित गार दिया । सम्वादवाना निवाला म्बिनेको के अनुनार गायों की श्रीमती ओल्गा निजगोवा ने अपनी ६ वर्षीय पुत्री में या प्रतिभा और भी अधिन बड़ी-पी पाईनो उगने गोपियन विज्ञान एमादगी गम्मुग्ग उगे पण किया और मां नराः ये अभुत परीक्षण नाराये । बिछी परंपर में उसने गाली और मकेर गोटे टकर अन्नग कर दी। गरे बाद रंग-बिरंगे कागजों की पनन्ने उगने वरतीय र छाती परिनित लोगी में पोटी पावाने । बच्ची माग पत्री धी गो उगेनी चाली रजीन गिनायें दी गई और उसने उन्हें गाय ने हार ठीय समा पा दिया। ग. माद और भी पाठिन परीक्षा नियों के अनिता या मरीन ने किनी अन्य भाग में भीगी शनि है। इस परीक्षण किया गया तो या बाल भी गती निवानी, जमने दह व या पील, पंर आदि में भी बंगाही अनुभव प्रस्तुत किया गंगा हाल ने मारलीभी क्या चीजों को बिना भी नरमी पर- पान या गाभारती म परीक्षा में पांच मेन्टीमीटर दूर पीजों समाना जो गली में पारवा गोमाता पा लिया। र महीने बार उगने एलरी संघाती में और भी अधिन र पर हुई जीनो को देने और मागमा यो पाने में सपना साकीनी
प्रकार उसने पैर की उंगलियों से छुकर कितनी ही वस्तुओं का मो.
सही परिचय बताया।
रूस के वैज्ञानिकों का ध्यान तब से इस दिशा में अधिरा
है और उन्होंने उस सन्बन्ध में लगातार मोध कार्य किया
मनोविज्ञान शाखा के वरिष्ठ शोधमत्ता प्रो. सोन्टान
प्लातोनोव ने कहा है-मानवीय चेतना विध न गी व्यापाताको
देखते हुए इस प्रकार की अनुभूति अप्रत्याशित नहीं है। नो में जो
शक्ति काम करती है वही अन्यत्र ज्ञान तन्तुओं में विमान
विकसित करने पर मस्तिष्क को वैसी ही जानकारी मिल माली
जैसी आँखों से मिलती है ।
प्रो० एलेक्जोदर स्मिोंव ने कहा है कि.-~या को जाहिक
वात नहीं है । वरन् सामान्य विज्ञान गम्मत सिद्धाको नाती
दिलचस्प प्रतिपादन है। एक अजनी गवना दूगरे अनी में भी काम
कर सकती है।
निझोरी तागिल पंडागोगीकल स्टीट्यूट में बनायो.
मोकी ने अपने अनेक छात्रों में इस तरह की विशेषतामा सो
कुछ छात्राएं ऐगी मिल गई जिनमें एक गीमा नारी
शक्ति मोजूद है उसे याने पर माता की माला भी
आगा की गई है । इस तरह की क्षमता आप अयोगी
हाप की गलियों में अधिक पानी गई और
नापियों में यह अतीन्द्रिय तत्व अधिक आयुगमा
नाग तन्तुओं में आ जाती है उसकपाका बीमा पर HE
संवेदनशील नहीं रह जाता, TRE मा और गर्म में
प्टिगोचर नहीं होते।
त्वना या माय मागको
माध्यम मिद शेगी। मन ममल पत्रिका
८ }
[नuri
कितनी मूल्यवान उगवा और भी चा उपयांग है। साधना विमान में पत्रा साधना मर्गा म्प" वाहने है मया क्षेत्र अति च्यापना, विस्तृत और प्रभा- रोल्पामा माना गया । हमारी रक्त सम्पदा जिगे हम ना व नाम से जानते हैं। मोटेतार पर वह बाल रंग का पानी है, जो ना नालियो में ऐगे ही मन मौजी घुमक्कड की र मता फिरता रहता है । यदि बानीकी से देखा जाय तो किमी या नगर की जल च्यवस्था की तरह रक्तसंचार प्रक्रिया भी मने- कानेक गुत्थियों को सुलझाती हुई व्यवधानों का निराकरण करती हुई गनिमीन हो रही है, 1 जगकी गतिविधियां देखकर आग्नयंचक्ति स, जाना पढ़ता है। मारे वीर मरन, को एक परिक्रमा प्रायः टेढ़ मिनट में पूरी हो जाती है। हम और फेफड़े के बीच की दूरी पार करने में उसे पार ६ रे नि नगर्ने है, जब कि उगे मस्लिप्पा तकरला पहुँचने में मंभिष्ट लग जाते हैं। बता प्रवाह सा जाने पर हृदय भी ५ मिनट जी लेता है, पर मस्तिर नीन मिनट में ही खुल जाता है। हृदय फेद होगको मृत्युओ में प्रधान कारण धमनियों में रक्त की मलाई रुक जाना ही होता है । और न द के मनुष्य शरीर में पांच से छ नीटर नया पन गाममें से ५ नोटर तो निरन्तर गतिशील और एमनीटर पनि कालीन आवश्यकता मे लिए सुरक्षित रहना । २८ पगटे में हम गो १३ जार लीटर जून का जापान-निर्यान बरला परत । १० वर्ष में पलना गन पेंका गमेंटा जाता है जिसे पर एमः मागीमाटमा गार निमा जाय तो उसे '१०० फुट घेरेको • मानती में भाजा गोगा। ननाथम यदि एक बार ही ना जमेसानी किनगानी गरेगी जितनी कि दम टन दोन की बार टनर उमा जाने में लगानी पड़ेगी। मरीन में REET मा । १६ r-NA उसे (१) जो तापमान रहता है, उसका कारण रक्त प्रवाह के कारण व होने वाली ऊष्मा ही है । अपने चार वर्ण और चार आश्रमों की तरह रक्त के भो नार वर्ण हैं। भगवान मनु ने मनुप्य जीवन की क्रम व्यवस्था न ना? भागों में की थी । लेण्ड स्टीनर ने रक्त की चार श्रेणियों का हो द्घाटन किया था । सव मनुष्यों का रक्त एक जैसा नहीं होता, मरे बीच कुछ रासायनिक भिन्नता रहती है । इसी को ध्यान में रोम ए० (२) बी0 (8) ए०बी० (४) ओ०न चार नामों में वर्गीकरण किया है। किसी की नसों में किसी का रक्त चड़ाने में पने यह विधि वर्ग मिला लिया जाता है अन्यथा भिन्न मत ना देनेगे रोगी भयकर विपत्ति में फस जायगा और मृत्यु सट गाना खड़ा होगा। हमारा रक्त लाल रंग का एम. गावा तरल पदार्थ जो लगने पर जम जाता है उसे दो भागों में विभत्ता कर मरते । (2) तरल पदार्थ-प्लाज्मा (२) ठोस कणसारखत्य । लामा, नामर५ प्रतिशत होता है, इस भूरे, पीले रंग को पानी जंगी ter जा समाता है। उसमें नमन, ग्नुकोज, प्रोटीन आदि परे । ठोस पदार्थ उस में घुल नहीं पाते और तरते ते न टोग it को तीन भागों में विभनः गार गकते है(१) परियोगापाका कण (२) यूगोसान्ट गन के, मंद गण (2) गड़ियां। लाल कण मोर के प्रत्यक , और कोपर एवं आदिमजन पहुँचाते हैं , मल पनिानी याना माता गंग को ढोकर फैसलों का ले जानामि यहां से गांमहागडी बाहर निकाला जा सके। मफेद गण वस्तुनः गोगाणु हैं उनकी गंगा नदी ६५. लाल कणों के पीछे एक रन्गा गंगा नहाय [वना की प्रारमनारद MARA -
यनियमाना जाता है। किसी भाग में यदि रोगीट
मला कानो या न माग अमेयने को नकाल जापचते है।
भावश्यकता के समय अपनी जानि वृद्धि कर लेने की इनमें अमन
.
गंगों के बीटाणा गया,
पानो, आहार, छाया चोट आदि के
माध्यम से शरीर में प्रवेण पार जाने हैं । ये इनने भयर होने कि
वन ने सारे गरीर पर बना कर नमन है और विनी को भी
गोगग्रमा मारने मान के मुंह में प्रवेल सकते हैं। विरगो लाग
पावाद किम रोग कीटाणुओं मे भरे माओं के चाह में आत्म.
"सागरने लिए हमें येन को मुहद गेना दी है। यदि यह
गिनी होगी ना पग-पग पर गृगु नयुट गामने गा मा ५
चन गोपा लोग कीटाणुओं में अधिक प्रबन्न होते है और ये
भाओं को मार बाट बार धनमायी करने में प्राय: सफल ही रही
। म गे जग गे भी बहलो गो गहीद होना मला है। मृत दे
कणोंगर को गोद पीर में देखा जाना चार नगड़ी
सो कार चार निकलना है। अपनी विशेषताओं को आधार पर उन
वाणो गीभी पाई जानिय तो है या यूटोफिन, ओमिनी
पिन, गोपिल, लिम्फोमाइट, मोनोसाट आदि। इनका आवम्याना
को अधिनः बद जाना या पट जाना भी बिनाका चिपरासी
माता कृति फोगाटोनिग' और नमी सोपेनिया -
।
मामनराया प्रतिपन मिनी मोटरसा में ५० हजार
पर गभी-भीमा परमाद पराईमात्र
जापती पालि आमपाली निरीगर
की समाधनाजानी।।
नगलामा मेन बल प्रतिपाद में
नीहारमोन, मोजा, सलीला,
माद
.
पदार्थ मिले होते हैं। इस हल्के पीले रंग के तरल पर
और श्वेत रक्त कणिकाएं तथा विम्वाणु तेरा करते है ।
कण इतते छोटे होते हैं कि वे ३००० की संख्या में
लाइन में रख दिये जाय तो एक इन से भी कम लम्बाई होगी।
मनुष्य के शरीर में २५,०००,०००,०००,००० लाल
वे चार महीने जीवित रह कर मर जाते हैं और उनका नाम
के लिए नये पैदा हो जाते हैं।
रक्त की चाल धमनियों में प्रतिघण्टा ६.५ मिमीना।
रक्त कणिकाएं लौह और आक्सिजन से मिलाकर बने पाय मो.
ग्लोविन अपने साथ प्रोटीन, प्राण वायु आदि अपने पोशाक
अपने ऊपर लाद कर नलता है और उस गुराम को शरीर में
कण तक पहुंचाता है । उसे दुहरा काम करना है। भार.
योगी पदार्थों का पहुंचाना, उधर से कान आगामी
हानिकारक गन्दगियों को समेट कर फेफरे बारा वा
जाने के लिए उन तक पहुँचाना, यह वारी सुनाई
है । अपने काम को रक्त द्रुत गति से करता है।
गन्दगी साफ करने के रमोद महाराज और नालाई मारली."
ट्यूटी देने में उसे कोई आपत्ति नहीं होती।
लाल रक्त कणिका प्रायः ८ महीने में लग १५.५. 1211
सारे शरीर के लगा देने के बाद बुढी होकर मर ::
जिम्मे उनका आन्त्येदि गंगाररमा और गायक-7
मल द्वारों में बाहर निकालने की पानी
है। हमारा छोटा गा शरीर यमः बनवा
के बराबर जीवधारी गोको
.
नानियों की गला भीमानी जवान में 17:
फोट नालाकों को पदमीभी:::::
२]
ना छोटा आकाराने मी वेतनी बड़ी लान में होंगे
मी मगरल पृथ्वीना चार बार परिक्रमा गरम ।
पर महाजा या कि वन में नीन जानि के गण गाने
मान न कणों की चोगी । अब यमचारियों में १ कोट
- नाय वन नाण और ५० लान नान बना दिया और
। मन में प्राय , ११ इलायन गण होते हैं। इन का मुख्य
गार मागे प्रवेश करने वाले अपया भीतर ही पंया
गया गाणुओं में नकर को परान्न करना और उनसे.
जगना माना गयारा निहाल देना होगा बीमारियां भी
प्रबाट होगी जब ये प्रथा काण गंगापना महाग्ने। अबधा में
पना भी नहीं बनना और नग निवारण पाधियांमकान
गोदागीनरी भीकर निपटा दिया जाना बाना
गरीर में प्रवेश नाराया जाय या पिनी दुसरं नि ना कोई आज
पहनी नीद में आरोपित कराया जाय तो मा त कणिकाग
मापदायक विमल विनोगामार देगी और ने न देने पर
“नाने का कारण लोग विकी नागी मोवी का चढ़ाते
ना अपने नामजानीमानी गाआपण नोनयन
कारण शोछिन गालो की पधियां देकर चुप कर दिया जाता।
तोम मि. न. रिमी नोट जादिन पर
बाकी को जमा की भागका महानिकार
गोगो मारमा परन, बारमाहीमा
पर गयो मार ! मनमाना :
गाजार प्राय: :जीनि
नाल मगर मातोदिन की
गाना या नाय गो गया और पाया
मारिन ।
नाम :-
रक्त के अभाव में हृदय तो पाँच मिनट भी अपना राम
लेता है, पर मस्तिष्क तीन मिनट में ही निर्जीव हो जाना
वाँई पसलियों में हवी, १०वीं और ११वीं के नीचे आना
के पीछे तिल्ली का स्थान है यह लाल बैगनी रज की है।
एकत्रित रहता है । उसकी १२ सेन्टीमीटर लम्बाई तथा मन्त्रीमा
चौड़ाई होती है । वजन १५० मे २०० ग्राम तमाम
एकत्रित करने और निकालने की विशिष्ट क्षमता है।
पुराने जर्जर लाल रक्त कण अक्सर इसी में समाधिरको
रहते हैं । गर्भावस्था में उसे रक्त बनाने के विकागाने २४
काम करना पड़ता है । किसी दुर्घटना के समय शिक;
जाय अथवा मज्जा में कोई दोष उत्पन्न हो जाय तोकिलोमाग
आपत्ति काल में विशेष कार्य करना पड़ता है और उनकी
वहीं से हो जाती है।
बाहरी रोग कीटाणुओं के आक्रमण में शरीर भी माना
तिल्ली का मुख्य कार्य है । तदिक, टापा, गिनिमार,
मलेरिया आदि लोगों के विषाणुओ से नहने पानी TET
तिल्ली में ही तयार होती है जब उना वजन भी आTEE
कसार यूकीमिया तो किसी गगी 4x7
प्रसार में मारे पेट परीक्षा मारा।
रजा मंचार की दुनिया बदल महल और माया: ।
उसे न शन्दों में व्यास किया जा मरना और ना
पिया जा सकता है शिर भी पह. दम अ
... !
विलक्षण नहीं है। ना. मंचार मुमकिर
दुनिया को यदि दीरः नार में ममता ना ग बार 1
नीनि-नानि अपनाई जातो पिट और म1ि
पास किया नागरता।
उक्त ममदा, त्वचा और मणिबीमतीगीर पर
बनाना
TET घटक अमन गया विलक्षण है। गाई पाच-छ: पीट कीपन
मानवी बाया में परमात्मा ने इसमें अधिक आन पर दिये है कि
आवमगिर गहने और मानने में कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
मगर में मय यताओं का आवाग है। जीक्ति और जागा देवताओं
मामानिध्य प्राप्त करने पर भी कोई व्यनिन देवगनाओं का
नाम न उठा पाये गोमग यही दुर्भाग्यता और क्या होगी।
३
-
सपा -
प्रचण्ड पुरुषार्थ का प्रतिफल मनुष्य जन्म
मनुष्य परमात्मा का पुमा राजा माना जाता।
व सभी विशेषतायें हैं, जिनके आधार पर उगेम गृति काम
श्रेष्ठ प्राणी कहा जा सोमो तय का पी
मनुष्य और छोटे-छोटे कोगीजीय अभीका मा:
अन्तर नही है। प्रकाश आमाकी गयनम मामी
विश्य गंगात। कीट का मन पर
पनीर में जो कुछ आभयं नती, बोन और मा '
गव एम. वीर्य कोग में विद्यमान समीर ! : 1
हैं.जि. कोप दिया गृण गुब (प्रोमोमोज और RT)
वार
विद्यमान रहती है. कोजागे नारी
वानी होती । वर्ग की ६ या कामी या दो
नीनी होगी या पोली माः मारे
काम
वाले हैं।
में
।
(ोधन) पाये जाने । प्रत्यापन दिन माती
।
[ नाम:
में काम अवयर (नयम-भागन) जिी 'ओवर्ग, जा.
जियप्रकट होना, यहां निकलता मिनिटजी
पर पंगेनीपान का अवयव होला, उनमें चला जाता है
जलपार कर गांगवानीनरी नीवाल चिपक जागा, जय
4. नागना नहीं होगी, माणिक मंग, नाथ ओवन-याप धूला
पार निकल जाताचिन्न यदि काम की छानी भी को
एप पा गयोग मिले गो का मामा नि पुरा काम बीर्य-मोर
(पगं) गर्माय गजामार ओरग में मिल जा । वम और मर्म
मा मिनाही गर्भाधान महलाना।
गुरप हीरा चीयं-गांप (धर्म) मानी में
बनी
2.यानि याना, विया नमी बनी नही दया या मरना।
पन्माणका निमः याग ....... मिलीमीटर होना,
जमायः नः नाभिकः सामान . crocococco मिलीमीटर
मोनाका अध्ययन करने के लिये गतिमानी मममी
मी (
मायोप) की आपल्याला नी नोनी भी लायाम
आता मागम प्रजनन गोगों गानो चिना बन्दयर मामा-
माप का बन पानाजी मार दी। एनम होम भी बीमार
का गुनि आना:ोगा। नो अपर लिपा पिता
STORE पर जोर जन भी या मनुष्य मार्गा
काम । तिना आयाम र मिनी मनमानी मना । ।
गृह परम में नाग पिलो नाग नगीना
न जान पामाणी पिनी यानी याद मनाय
: मयता का पिता माना ना कमनिी पर का
भार मामा भीरमार
पणी मनाने पर, मग का मन की
TRA : नन पर नाना,
."
तब उसे सृष्टि के छोटे से छोटे जीव और जरें-जरे में बातो की प्रतिच्छाया दिखाई देती, तब न किसी के साथ कैप होता न भो। शक्ति, क्रियाशीलता, संतोष और आनन्द की विभूतियों में आनाका हो गया होता। यह निशचित हो गया है कि जीवन प्रणाली नाभिक में ही है और वह शक्ति रूप में है। उसका कोई आकार नहीं है एक अमीनाका नाभि साइटोप्लाज्मा (नाभिक के अतिरिक्त कोष में जलवायु, मैस भनिन आदि जो भी है, सब साइटोप्लाज्मा पहलाता) का तुम अंश लेकर दो अमीवाओं में बदल जाता है, दोनों की आमा भिन्न-भिन्न हो जाते हैं, लगता है ये दोनों अलग-अलग विनार मानो के रूप में जन्मे हो । पर ही विनार प्रणाली या केन्द्रीभल मला का अनेक रूपों विभन होना सा ही है । यस्तुनः नेगना गारे में एक ही है। उन विश्वव्यापी चेतना को जब हम एक मात्र का के कप में देखते हैं तो यही गवंशति.मान, सर्वव्यापी र ईश्वर के रूप में दिखाई देने लगता है। सरिता नामा मनुष्य और लोग मोटों के जीवन में कही जीव मनाता है। नीम अवस्यायें विराट् में नम और तुम पानी निका गाहन पर हम भारतीय भी योगी हटा, और मन कोपे।मान के पुरम, गति के पुजजाम,और ITEETर या गन्वन्दन ही था जिसने में मीन में माता । निस प्रसार र अमीराम, iail चाओं में बदल जाता है, उसी प्रकार गया. आत्म-नेतना पानी-गर आना | एक वीन- पोट कर दो हो जाते हैं । म किना प्रेरणा काम करती है। शिकागोर ति पार बन हैं। चार-पाठ, आठ-गोरा गाना-वनीगा कमरा (मा) ही बने और पान की प्रासन: .. - 1 २८] [ मानी प्रवाशा न के पल (माग्ला) की मी हानी है। फिर एक जट और नट में ट्रय की भवन बननी है, यह ट्यब आकृति ही मीन ग्यानों में मुलगार मनिता थे। नीन भाग (१) अग्रभाग (फोर- ग). (२) मध्य मलिक (मित्रन), (३) पिता मलिक (विहाई- नंग) बन जाने। गोषी या बनना अभी भी जारी माता है, मृत्य योग मां शरीर में पोपण नगर प्रायः कोप के लिये पानी मिल, प्रकृति (नाटोप्लाज्मा) भाग जुटाना माना है. जब अनेक गोप एकत्र हो गाना फिर गुम्ना मीना (मानन बार) बनना प्रारम्भ होगा और ग र नीचे का मनोर बनना हआ चला जाता है। या. गोप प्रत्ययान की पपिनियों के अनुर अपने आप मुहले, नीधे होते, प.हे और कांगनहाने चले जाने और पर प्रकार नौ महीने की अवधि में विकगिन वरचा बन जाना। आठ, दा पाट वगन का बलय गो पाण्ट के मनुष्य में बदल जगा । गुम्बर की नीला मीही विचित अन्यमा जो बोलनता गमनाय नम:, यही उन पर मूल कांप (पमं) में भी और बार अपने आप में एक griनंगार था । मनुष्याकृति में एक पिता और पंजानिय क्षमताओं ने परिपूर्ण परीर देने का उलंय नो मी मा पि. मनुष्य पान और मसान मोर अमान, बार अवमान कोसी तरह मग गा , किन्तु पि मा बाबर मनी मामी आमिर ननावामीन बनाना चला जाताना नीतिमा भी अपदिला. प्रसार में पानी पनी मानी और जीपन मुषित. या मध्य प्रालि ने नोकामाचा माना। पाना मनपर विरलः परमाग भी दिने रमी. मा उमजा मागम परमात्मा सीपिप गियान: सानाम: नामा माग । r
मनुष्य की
उम आनन्द की परिभाषा गार पाना दूसरे जीवों के लिये दिन
क्योंकि उनमें बुद्धि विवेक को ऐसी क्षमता नहीं, जैनो मनुष्य में मनु
चाहे तो इस शरीर की विज्ञान मग पत्तियों का प्रयोग गरो.
महत्तम रूप और सौभाग्य, को विधाला. विराट् शोर में दिन
कर सकता है। यही स्थिति जिनमें मनुष्य को न तो कोई अभागे.
न अनान, अशक्ति हो, न अक्षमता, सबसे अधिक आनन्-लाम
और मामर्थ्य से परिपूर्ण हो सकती है।
क्षमता सामर्थ्य
मनुप्प गया-गुजरा उस स्थिति में-जन आदी मामला
पहचानने और उनका उपयोग करने में सक्षा बलें। मान और
असाधारण जग यिति में-जन कर अपनी गरिमा मार्ग और
असीम क्षमता पर विश्वानहरे। साधारणतया कराल
की कमीही यह याटिना: जिगो. नाग में
पटना है।
मनुष्य की क्षमता का मोटा मोजारमा
मिनि म पावत्या की गतिविधियों का पाया
मिलाजा माना है। अपनीमना प्रारRTE
रहित बिति में यदि ना अतिरिका TET
माधम मान्न और विजमिा मिति में शरीर
पमा पर माना होगा।
निः श्रीगोमा आममपी पर 27 शि:
नागार करा.
उंटावी .
माहिए । अनाया गः पापा
मगर
मक्रियता भी जाम किया।
नाना नायिका रिमा और
अनजानी है। बीज को मार
३० ]
। - -- पांधा बनते समय गो प्रगति काम दृष्टिगोचर होनाका पीछ गमा या मिथिल कहाँ होना है ? जग विकास प्रक्रिया में प्रामान: अभिवृद्धि होती चलनी है; फिर कोई कारण नहीं कि प्रथम चरण में मनुष्य सारा किया जाने वाला पुरणाचं आगे चलकर अधिकाधिक वनका चले । यदिदमी फमिक विकास की प्रक्रिया को अपनाये का, माय, उममें मिथिलना न आने दी जाय तो मनुष्य देव पाता के बचने काम बान्ता रह सकता है। पिता मे मीर से निकला हुआ शुक..णु ना छोटा ना कि आलपिन की नोक पर उसमे हजारों भाई बंट गरने । उने बिना शक्तिशाली मूक्ष्म-गंग यन्त्र के गुनी अत्रियों ने गो देगा नमः नहीं जा सकता । रतिक्रिया गे जो भंधन मिया होनी है । उनी योन गंस्थान में तीन विच त स्पन्दन उठने आरम्भ हो जाते हैं। जनो की उत्तेजना मे वह मान्न पटा जीव उन जिन ही उटना और अपनी स्वतन्त्र राना गा निर्माण गारने के लिए नहयोगी गो नलाम में न गिा में परिभ्रमण करता है । उस समय उगना हाथ, पैर, भागात गुछ नहीं होते, तो भी अपनी आन्तरिक आकांक्षा में प्रेरित होकर अभीष्ट माथी को खोजने के लिए बनी तेजी से दाता है कि किन, जाते ही वोट से भी उनका अनुपात बला-पढ़ा राता है। मुशाणु को दिवाणु तपः पचने में अपने साकार कर स्थान की दूनी के अनुपात में उतनी लम्बी पाना पानी पनी जितनी कि उगे मनुष्य के बराबर आकार का होने पर पूरी की पतो दूरी नापनी पहली । लगाना पर मालन नमान्य पायो अमीर गोरधनी पूर्ति के लिए निपलोग बागी पवार फे नगतुल्य प्रतिस्पर्धा माना जा नरसा मसति माद होनपदना देने नीति अपनाती है। जो उनकी पौर पर मान्य कार में मनात या पुरुषार्थ नहीं पार पाते, दर में हो एक बार म तो रोज अनुप्राण का मामला - सफल होता है और न ण वनने का-प्रगति पथ पर अग्रसर होने । धेय प्राप्त करता है। शुरु और डिम्ब का मिल कर बना हुआ 'कलल' विजयी नेगेटिव और पाजेटिव दो.दो धाराओं के सम्मिलिन जाल प्रवाह की तरह सक्रिय हो उता है । गंगा यमुना का यह मिलन तीर्थराज सुगम बनता है । सहयोग और सहकारिता कालो और सघन आत्मीयता का-जोवन के पहले ही दिन जो पारपा TRE है; उसका सतारिणाम तत्काल देखने को मिलता है। या महाला यदि आगे भी जारी रखी गई होती, उसका महत्व मुलान कि गया होता तो मनुष्य प्रगति गररो-मनसे न ज.ने यहां से पर पहुँचा होता । भ्रूण कलल आरम्भ में बाल की नोक परना पिन्तु वह एक महीने के भीतर ही तनी प्रगति गाला; from में ५० गुना और वजन में ८००० गुना वर जा जोकोनि निपनि जल बिन्दु के अतिरिक्त ओर नहीं था. वो एक में नौथाईन गा चुनयुना बन जाता है । उसे पनीय, free की मेज परमा गायतोगति गोकरा - भाना पड़ेगा । उग, गिर और ः यो दवा ना र छ को जगह होगे । काय तो गटोने पर 11 नगर नगों में बता पारगाना या ना ? की गृगनामा गति नाम माग पnिii :: ::. जब कामं मप में परिणाम होने थे रोग; . माधन और पतिको किनरार भी ari . इगर। यह प्रत्यक्ष प्रमान तीन RT for गया कार्य-निर्माण का शिलानी प्रो जीय की अदभुत गृहगामा गनि, पर मद का मा पाप नही गया। । ।
गाला करीर में अमीम मात्रा में पाय, पराम ने है। उगे रानुगार मात्रा में प्राप्त करने में प्रापर या नकार नहीं होती, पर यह नही विकास के निदान को नमाना लि. निर्वाह मात्र के लिए न्यूनतम लिया जाय, अन्यथा अनावश्यकः मंग्रा उसके लिए अन्ततः भार बनंगा और विपति उत्पन्न करेगा। मंग- रयुगः भुजीथा' का पाठ प्रत्येग प्रगनिमीन को पाना पड़ा। भी उग सनातन मिन्दान्त मे अपरिचित नही होगा । उसे अपने पनीर मे धारों ओर एक परत चढ़ानी पानी है। जो गर्भागय में उपलका मामग्री में से छना हुआ. उपयुन पापक पदार्थ तो पण ना जाने देती है। इसे सयम और मर्यादा का आयल का मयो । पनीर गार की दृष्टि से ग मिल्ली को 'ट्रोफांटनाल्ट' कहते हैं । गम्मानि के सगुन में से मात्र उपगुना निर्वाह चीनार बनेगी ध्यपन्या या तिल्ली हीवनाती है । आपिरजन और मापन मिधिन सण का उप- योगी आहार उसके शरीर में गी पिल्ली हागन बार मीनर पचता है। बात इतने गे ही नमाप्त नहीं होनी । पप के शरीर में मन भी बनता है। उसे बाहर निकालना आपल्या । जिल्नी ही उस मन को बाहर जाती है और माता का में धन ली। उनकी सपाई माता केरल, नां अपनी निजको नया नाम माध हो करनी परती है। उपलब्धि गीतकार पग्लिाग पा मिला अपनाया जाना कितना आवस्यका हनन नो पर । पण बालन को गुनमा और अभिवृद्धि गम्भव नीम पा- पाथित बुद्धिमान' लोग दोनों हाथों में मनाया नमा बार का परित्याग : लिए मना कम मामी की मुटाते । पानतः उन भार मानी विधानता बीपनी कार को कोच मतदार में दुबो दंने गा मारण कानी । अनुमानों के लिए लालादिनने वाले लोग सोचार नरों के अनुग्रह मिनी नामग्री नीम पर पर पाना मी प्रमान] .
। यह कुकल्पना सर्वथा निरर्थक ही सित होती है । तोग मानते हैं कि माता का रक्त होण की नसों में माहिर वास्तविकता बनी है नहीं । बनने का अपना स्वतन्त्र हो। यह वात अलग है कि उसके निर्माण की साधन सामग्री मा. शरीर से उपलब्ध होती है। दूसरे महीने में रण के ऊपर पान.. जापिट के कप में धारण कर लेगा। वह जानता र म को सुरक्षा मंग्राम में आरना पड़ता है। जीवन पर गला नम:। जो इन रण क्षेत्र में उतरने से डरता है-गुणिधानों की हो रहने के गाने देखा है, वह पाला कुछ नहीं गोना पड़ा। मा से थाने में जितने गरले उसकी तुलना में उनमे परने पर, बेमौत मरने वाले लायर्गको सम्मानली जानी।" भी शरीर गम्पदा बनी तो गाय हीरा भी का? की नोक या नना मार शिवानं शरीर को पेट में part : नही ना, पर जब आप न गातोगरी आगामी सी । बोगटे हुए शरीर पर माता कामा । गार ही मरे नलने-फिरने , उन गाने प्रभावित करनीली किमया मा गुरक्षात्मक जीवन गधारक शेत में की रना पता है, और गानन्या गीता : - .... सांप होने की जो मिटा म... चिनीपो.गायनी तो प्रगति की अोर सम्भावना मा. it " । एक महीने का पानी मा ? ' नम्बा होता है, सभी में अगरे । बनगारानी गोली 14 - ६ - पण ओंग बाटन पाद कारलो पालो । आगया गुटों मनो के न मिलना- जालना ता । पोछ, कार में गंगा बनना। शिर उसी आग समग लागवतः या विकार पापा 'T | गरीर भी मत जाना आदिम स्मृतियो को धारण विभागो है और अपना काम यही से आरम्भ करनी। किन्तु पिकमिन नीर उमंग अपना काम चलता नीं देखता। पालतः यह अपनी मनी में जुटता है । गुर्दो के पयिनन में देवी जाने वाली प्रायः आगे भी चलनी नो नो पशु-प्रवृत्तियों में बट-गलत जगह भगा और आत्म-गोरख के अनुसार उन्मन्नरोष प्रकृति हाल बना और अनुक्ति अपना लेना कुछ भी कठिन न रह जायगा। परे महीने में प्रण की गो नियति होगी। दूगर महीने में उगला फाग बनता चला जाता है। पहले महीने की तुलना में जगमी लम्बाई 5 गुनी और वजन ५०० गुना बना । मानिने के निशान-बीर की रही-अग्थियो का त्राधिकार का गाल-गी अवधि में विनिर्मिन ने आरन हो जाते। तीसरे महीने में यो गरीर के अन्य अवयवोपन, न और हनन पारने देगे जाते हैं, पर गय अधिरः उपन्द-युगल जो में होती है। ये होती तो अनगा रखनी की तरह, पर उनी मापन किया देखते ही बनती पूर्ण मनुष्य की जान जितना लिन पनि से काम करती है, उसी तुममा ग प यो आत प्रार: मार गुना अधिक पुराणानं गार नही होती । जीव भेगमा गोमा क्षमता नामा प्रारमिमा पग्लियसंग दगी जागिः नाम या पता चलता। यदि इगे जिनका जाय तो पेटमा पादन पति अत जर तर अपनी लिलाना परियार सातारा पनीर में अत्यधिक महत्वपूर्ण अवयव दो मलिन मान निगरे महीने का आरोपमा मना की मार
की दो समताएं ही ऐसी हैं जो मनुष्य को अभीष्ट गति और
दिशा देती हैं। विकास साधनों के आधार पर नहीं, को दो
दो विभूतियों के आधार पर होता है। सफलता और उप
तो इन दो तत्वों की प्रतिक्रिया मन्य हैं। गर्भय गिगु इन्है -
करने की आवश्यकता समझता है और तिमी योग्य हो सरनेमी
में आने के लिए दो महोने की अवधि पूरी होते ही वाग को
महत्वपूर्ण केन्द्रों के विकसित करने में जुट जाता है। उन दिनों का
जितना श्रम होता है उतना ही यदि जन्मकाल के आगना भी
जा सके तो मनुष्य को जान समदा और भावविभूती
उन्नति हो सकती है । ऐसा मनुष्य देवामा खर गा.
जीवनयापन बार गता है।
लिंग भेद मी पृथरता तीसरे महीने से प्रारम् ।
जससे पूर्व सपा में उभय-निगी पक्षण होगे है। दोनों
किमा चुनाव करता है पर उनकी आन नाम
निर्भर है। जीव मी मामी ये: आधार पर ही Fir
अभ्यम्न लिंग विनित होने लगता ।
उगी मामने गले मे है। जिसे भी भीमा ::
उसमें पानी पीवार और दो मी र म ।
जमोहीम जीवन मं.. :::
बारम्भ भीगर और TTME
होता है। उदर के सुरक्षित या
माग
करना ना मा पर कार को मारा
विकरणों में नया मा नागरिका
विधाम, गादिया गया :
करना पडा।ग पालन होगा जो गान x १
अंग पर लोग प्राप्तीका दुगरे बारे "
स्थिति का सामना करने
--
room
चाहिए । यह अनुदान पाई और नहीं दे नाना । जीव को
चनको उपार्जिन करना पड़ना। जन्म लेने ही कर अपने को
नई पायरियलियों में टक्कर मने, गांध बनाने लिए नाममान
गरमागी जन्म काल में चालक की विचित्र गतिविधियों
में यात्रा गरुना है। नवजात शि] जन्म लेते ही पला,
रांगना, चिल्लाता है, हाथ-पर पीटना, या मब क्या
उसका मामध्यं गम्पादन प्रयत्न ही कहा जा सकता : गर्म रखनु बटने की
जंगे पायलम्बन का उतरदायिन्च सम्मानना पडता है। नत्र माना
उमक विकास में मीमित महयोग ही दे पाती।।म गंगारा की
नियम है कि जीव को अपने बलबूते निर्वाह और प्रगति : नान
जदाने परत । गायोग को आदान-प्रदान में मिलान्त परीकिना
है। उदर अनुदान नोजमण घटते ही जाने ? माना की नामा
गर्भकाल जितनी का मिलती है । उनका अनुपात प्रमा: पटना जमा
। बालक दम कमी को अपने स्वावलम्बी प्रधानों में पूरी पाता।
पेट से बाहर आने में कष्ट तो माता को लगा.. पर उनक
तार आने की प्रन्यिा में प्रवल पेप्टा और अन्य आगांक्षा मिती
तो गाम कर रही होती है । गर्भग्ध शिनु अतिशय दुर्वा गोद
माता को कितनी ही ना होने पर भी बाहर आ गोगा ।उने
'गाला का पेट पीर पर ही चार मिनालना पगा। मी प्रय
यदि जमने के तुरन्त बाद मानमः , मिलाप नाप
गोटे तो उनका जीविताना पाठिन हो जाएगा । नीति
पर गार वायो रे पानी के छोटे देकर पाना कमि उपायों में
वो को रोने, चिल्लाने के लिए प्रोत्साहन कालीन
दिना गरे गाना दुध न पिलगी। निमो नमाज
वानर को भी देनी। जब नये लिए मार्ग 37. ।
नोचिन्नानागीमागको प्रपन्दता का आभाग लिया।
जीन को जानने में समान
लनाडा-पावन ।
HAN , " उत्तरदायित्व सम्भालने, नगे लोगों ने माथानमन .. स्थितियों को समझने, नये साधन उपयोग करने यो त नवीनता ने परिचित ही नहीं अन्यस्त भी होना पड़ा। क्या कुछ सीखना और क्या कुछ करना पड़ता है इन समय तो अपने लिएकाटिन ही है। जीव को प्रगति से जाति में आने और त का सामना करने में कितने प्रयल पुष्पा और कितनी की आवश्यकता पड़ती है इसे देखकर उसकी मौत का अनुमान लगाया जा साना है। मात्मा की शामश्यं का मल लोग परमात्मा है। अनन्त ममर्थता का जई। फिर उससे अधिनियम साथ जुड़ा हुआ आत्मा ही क्यों गिनी प्रकार अगायनम: बन्नमय गोश पाय-यरमा मांग का पिटारानी।गो. वोग में आता सत्ता ओत-प्रोत है। अपने आली सपने नांदे को जिन प्रवन पुला के मारे firinsan गमर्थता उसमें मल बनी सनी: । और rif; को देने से ही द और न कि मामला । नगंगार में प्राकीनीन frriwar प्रेरणा से विभिन्न जाने fifram - . - ३) साग । अगणित शेरों में प्रसार संगार मन्त्रीपदावा है । driभी भी ARY । कार्य करती है। म्नायु मन में विधान धागा जनार : बसपा केन्द्र है। इन्द्रिय पन्नी पर मायामा के द्वारा केन्द्र ता मनमा पचाना और बोमे :
अप्रायद्वाना सम्मान कानानानी पनि का काम मन:गंधान
की नमग्न गतिविधियां दमी के द्वारा संचागि होती है ।
।
विधान सम्बन्धित ममग्न हलन में प्रकाश नारंगीकारामम्मन्न
ली। गूर्य की प्रकाश किरणे वनपनियों को अभिवृद्धि एवं
प्राणियों में प्राण मंचार या प्रयोजन पून कन्ली है और भी बाल
मान उनके द्वारा होता है । वायु के माथ होने वाली अभिवृद्धिको
या प्रमाण नत्यही मंजोता है।
माध्यामिरा अलंकानों मंचित न वो बाया,प्रकार यो पिणामोर
नाप को प्रिय माना गया है । मन क्षेत्र में नको जनच भावना, कला
और प्रिया कप में दृष्टिगोचर होनी है। यानी विराट् पुरण
गा प सुविस्तृत शरीर ही है। इसमे विध न सलमा, प्रकार
पज और नार को तम ए में प्रतिपादिन किया गया।
आन्तरिक स्थिति में हर-कर पारगं. बाहर की यिनि बनी
जा सकती है । नमी जानते हैं कि मनःनि यति ही पली-युग पनि-
पत्पिन्न करती। अन्तरंग को बदलने पहिरन नाजही चला
जा सकता है । शारीग्निः निधति में सुधार पनियनंन करता तो
उग उपकरण के अन्तराल में काम कर की धग धमकाओं को दाना
सम्मानना होगा । नारवाने की मशीन टपीको नमानाचा
कि विन धारा था भाप नए शिमला में भी
जमल हो गई। मशीनों पोटेमाल करना नीति,
साधार तो शति सोलों पर निर्भर गावंत या
करने के लिए आहार-विहार की माला
पविला उपचार पर माना जापान
नी माल समता । देवनामा भी नापाको २ नमा
नारदाची धम शशिनी HTTER
काही। मीर तीन नको काम
.
-
तारों का ठीक स्थिति में होना आवश्यक है। जिससे शक्ति संगार में अवरोध उत्पन्न न होने पाये। अवयवों को कई प्रकार की बुरी आदतें घेर लेती हैं-इन्द्रियों को उच्छृखलता बरतने का अभ्यास पड़ जाता है -दुर्व्यसनों को दली प्रक्रिया के अन्तर्गत लिया जा सकता है। आलस्य में अवयवों मी अशक्तता का दोष कम और आन्तरिक स्फूर्ति की न्यूनता का कारण अधिक काम कर रहा होता है। इन दोप दुर्गुणों को ठीक करने के लिए मात्र शारीरिक अवयवों को दोप देना अथवा उसी की ठोंक पीट करना पर्याप्त न होगा। शरीर में संव्याप्त अन्तःचेतना की भी देश भाल करनी होगी । यही स्थूल शरीर का अध्यात्म विज्ञान है । यदि स्तर की गहराई तक पहुंचा जा सके और वहाँ सुधारने उभारने का कोशल प्राप्त हो सके तो शरीरगत दोय दुर्गुणों, दुर्बलता एवं रुग्णता को-निरस्त कर सकना सरलतापूर्वक सम्भव हो सकता है।
अद्भुत और विलक्षण मानवी काया मानवी शरीर यों उपेक्षित परिभाषा में एक 'चलता-फिरता पर । भोलिक दृष्टि से उगनी और कुछ व्यारया हो भी नहीं गयती । वनस्पतियों में पाये जाने वाले रसायन ही न्यूनाधिक मात्रा में उगमें भी पाये जाते हैं । जना, वृद्धि और मरण के चक्र में काम- पान की तरह मनुष्य भी भ्रमण करता है आहार और नाम नेने की प्रिया हो पोधों की तरह उसे भी जीवित रगती है। फिर भी पौधे और मनुष्य के बीच पाये जाने वाले अन्तर पर दृष्टिपान करने में हमें दोनों के बीच हर क्षेत्र में मोनिकः अन्नर दृष्टिगोचर होना । विशिष्टता मानवी काया के रोम-गोम में गंव्याप। आस्मिक गरिमा पर विचार करना पीन्द्र के लिए छोटकर मान चार मंचना और उसकी क्षमता पर विचार करें तो इस क्षेत्र में भी मर गुरु अर- भुवोखता है। वनस्पति तो क्या-पिटेना के प्राणि-गेम भी वे विशेषताएं नहीं मिलती जो मनुष्य के छोटे और भवन में भग्निस्ति । कलाकार ने अपनी नानी कला को गरे निर्माण पनीरचनाकार सामंधान और सीमान SETTER: पगदा-एमदाग 1.
-- सम्बेदनाओं तक सर्वत्र असाधारण ही असाधारण दृष्टिगोचर होता है । यह सोद्देश्य होना चाहिए । अन्यथा एक ही घटक पर कलाकार का इतना श्रम और कौशल नियोजित होने की क्या आवश्यकता थी? यह मात्र संयोग नहीं है और न इसे रचनाकार का कौतुल-पोतहत कहा जाना चाहिए । मनुष्य को विशेप प्रयोजन के लिए बनाया गया । इस 'विशेष' को सम्पन्न करने के लिए उसका प्रत्येक उप. करण इस योग्य बनाया गया है कि उसके कण-कण में विशेषता देशी जा सके । इन साधन उपकरणों के सहारे ही वह आत्म-मल्याण एवं विश्व-कल्याण जैसे महान् प्रयोजन सम्पन्न कर सपने में समर्थ हो सकता है सृष्टा ने इसी साज-सज्जा से अलंत करके उसे इस मंसार में अभीप्ट कर्तव्यों का निर्वाह करने के लिए भेजा है। हृदय की धड़कन में सिकुड़ने की-सिस्टोल और फलने की- डाइस्टोल क्रिया होती रहती है। इसी क्रिया के कारण रक्त-संचार होता है और जीवन के समस्त हियाकलाप चलते हैं। यह ना प्रव ह नदी नाले की तरह नहीं चलता, वरन् पम्पिग स्टेशन जैसी विणेपता उसमें रहती है । पम्प में झटका मारने की क्रिया होती है। उससे गति मिलती है । नीचे की दिशा में तो प्रवाह अपने आप भी होता है, पर ऊपर की ओर ले जाना हो तो उसके पीछे शक्तिः या दवाव होना आवश्यक है। आकुंचन-प्रकुचन से झटया लगता है और उसके दबाव से रक्त-चक्र नीचे जाने और उ.पर आने की दोनों आर- कताएं पूरी कर लेता है । हृदय की धड़कन रक्त के पनिश्रा में काम आने वाली गति की व्यवस्था करती है। कोई यन्त्र लगातार काम करने से गरम हो जाता है। श्रम के साथ विधाम भी आवश्यक है। श्रम में शक्ति का व्य होगा. विश्राम उसको फिर में जुटा देता है। हृदय के आनन-गन में जहाँ शटके द्वारा शक्ति उत्पादन की आवश्यकता पूरी होती. या इन दोनों क्रियाओं केकीन मकान की अवधि में किसान F चननावी? ४२ ] भीममिलना कलापरन मिनट.वभाग मंगशिपाचट माग में ना बोलीमा अवधि मी अग्य विभाग उस गंधान में प्रवाहित होगी। समायः विषा मादलों को गोवारियोग्राम के माध्यम से निकामनयी चारध्य परीक्षा की जानी। सय गगानी पंप भी आजीन यमी विधान का मामा।०:०पनयामा बार-बार भन्न जीरनीर को गाजगी प्रदान कालो राशनी में पिन वायु मारन-आई- आमा गंग को पार निकालना और गुद मा आनिमजन को पागेर पोषण के लिए उपलब्ध कराना यह बाग नरमायान पड़ों को नियाना पापी आंग भी नजीग पाने पानी बहन पतनी पाय ननिकाय चाली। न ४० दिवाली के मिलने गे पर बासकोट-~~यम वगना की नया गार पं.?" कायत । नवी माया प्राय: नी. दाम मनपा वगंधागे भी का सामना । न वायु भी माना। पुती म पालने का। अपन मि नोन की ५५. गने बिना में फल माल ।। माधापनमा उपनामाविमजनका प्रतिनम भी पर पानामपि दान मात्री को माना अम्बाग लाल लिया जाय तो नीन गुती अमांग १३. शामिल गाणा जामीन उपग कालाम मीनार For गुना अधिक प्राको नया प्रकार का का या नगा ६९ नमा। जिन गान गांगहान मजा धनीमानी भी प्रकाना:- भागनाराजी : प्रतिमान मे सानिमाला मामला सामानोमानिस पासा निकालने में नाकाम उगो शय पद वृद्धि में अत्यधिक लाभ मिलेगा। गहरी और लम्बी सांस लेने की सामान्य प्रणाली, डीप नीरिंग, भौतिक विज्ञान की प्राणायाम प्रक्रिया कहलाती है। इसमें आध्यात्मिक आधारों को भी मिला दिया जाय तो फेंफड़े स्वास्थ्य सम्बर्धन में अद्भुत भूमिका निभाने लगते हैं । हदय और फेंफड़े ही नहीं अन्य छोटे दीखने वाले अवयव भी अपना नाम अद्भुत रीति से सम्पन्न करते हैं। गुदों की गांठे देगने में मुट्ठी भर आकार की भूरे कत्थई रङ्ग की-सेम के बीज जगे आकृति की लगभग १५० ग्राम भारी हैं। प्रत्येक गुर्दा प्रायः ४ इन लम्बा, २.५ इंच चौड़ा और २ इंच मोटा होता है। जिस प्रकार फेंपाड़े सांस को साफ करते हैं, उसी प्रकार जलश की सफाई न गुर्दो के जिम्मे है । गुर्दे रक्त में घुले रहने वाले नमक, पोटेशियम, कैल्शियम, मैगनीशियम आदि पर कड़ी नजर रखते हैं । इनारी माना जरा भी बढ़ जाय तो शरीर पर घातक प्रभाव डालती है। शरीर में जल की भी एक सीमित मात्रा होतो चाहिए। रक्त में क्षारीय एवं अम्लीय अंश न बढ़ने पाये इसका ध्यान भी गुों को ही माना पाला है । छानते समय इन सब बातों की सावधानी ये पुरी तरह पाते हैं। गुर्दे एक प्रकार की छजनी हैं । उसमें १० लारा से भी अधिक नलि. काँए होती हैं। इन सबको लम्बी कतार में रमा जाग तो ये ११० किलोमीटर लम्बी डोरी बन जायेंगी। एक घण्टे में गुर्दे कहानी जिसका वजन शरीर के भार से दूना होता है। विटामिन भगीना अम्ल, हारमोन, शकर ज से उपयोगी तब रक्त को वापिस करणे जाते हैं। नमक ही जबसे जादा अनावश्यक मात्रा में होगा। यदि यह रहना शुरू करदे तो सारे शरीर पर मुमन लाने लगेगी ।। ग ही हैं जो इन अनावश्यक को निरन्तर बाहर हंकने में लगे रहो! दोनों गुदों में परस्पर अति सघन सहयोग | गगव हो जाय तो दूसरा उसका बोझ अपने सर उठा लेना। प्रतिदिन प्राय: दो लीटर मूत्र निकालते हैं। मनुष्य अनावश्यक और हानिसार ४४ ] [गना की प्रगट क्षमता
ग्राम ने बाज नहीं आना । नका प्रायश्चित करना
पमा नगमा, फापट. मपट, पांणयम, का, मंगमि
लोहा, हि.टालिन, यन्यिा. मीनिय, याच पनि मिति,
मादोजन आदि पदार्थों की प्रचलित आहार पनि भरमाः ।।
गुग यचरे को मूत्र मार्ग में बाहर करने की चानमाला
बगार गान का उत्तन्यायिय नियाले। आपने कान में
शनिक भी बोल का तो मनुष्य जोन की कार पल जागा जोर
ग्रने प्राण गया देगा।
आमाशय या मांटा काम भोजन जम करना माना जाता।
पर यह प्रिया कितनी जटिल और विलक्षण ।ग पर पित
करने से आप मिल जाना पटना में घाबी ली की
अदभुत रसायनमालाममा दी जाती - जिनमें नमी के
माधार पर मल में गुल बना दिया जाना जाता है। काजन और
म.rian मा चिति को नगरी में बदलने में लिए उमगे बीच
अमाधारण परिखनन होत ने आंधन नायक सम्मिमा
मिन्नत दिन स्नर के प्रयोगों की नमार भर में पहली भी आमा
नहीं दी जा सकती। आगरा में पाये जाने वाले लवणार,
गट आदि भोजन को आटे की धन है । नवादापों
में राने वाले रोग कोटाकों का नाम रो। मीन नाम
गिलकार प्रोटीनों ने पटोन' बनाते हैं। पसिमाज में पाये जाने
पाले सनीन आदि नाय को मालित कानों
पानामा गन्न बनाने का अधिः प्रसार के अन
प्रति सनी विमाण प्रति किया जाने माने गमावनिमः
प्रयोग मनुमत प्रयोग पिया का मामय होने की
पाल्पना भी नही की जा सकती। आमालयकी नानानि प्रयोगमा
या-नयामक पितो लोरममा का
मनोमानी गरी बिमला नेहमी यामाना।
यों तो कता की कारीगरी का परिचय रोम-रोम और कपाल में दृष्टिगोचर होता है, पर आँख कन जैसे अवयवों पर हुई कारीगरी तो अपनी विलक्षण संरचना से बुद्धि को पकित ही कर देती है । आँग जैसा कैमरा मनुष्य द्वारा कभी बन सकेगा। इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कैमरों में नाभ्यान्तर-फोकल लेन्य-को बाला जा सके ऐसे कैमरे कहीं नहीं बने । फोटो लेने के लिये अच्छे कैमरों के लेन्स भी पहले एक निश्चित नाभ्यान्तर पर फिट करने होते हैं। फिल्मों तक में फोटो दृश्य और कैमरे की दूरी का सन्तुलन मिलाकर फोक्स सही करना पड़ता है। इस व्यवस्था को बनाये बिना अभीष्ट फोटो खिंच ही नहीं सकेगा। किन्तु नेत्र संरचना में ऐसा नहीं करना पड़ता । वे निकट से निकट और दूर से दूर को भीगों को तिना आगे-पीछे हटाये-मजे में देखते रह सकते हैं। प्रिजा या पीडायमेन्शनल के मरे अद्भुत माने जाते हैं। पर वे भी रजों या वर्गीकरण उस तरह नहीं कर सकते जैसा कि आगे करली हैं। गुरक्षा सफाई का 'प्रवन्ध' जैसा आंखों में है वैसा किसी कमरे में नहीं । परले उलटा फोटो लेते है, फिर दुबारा प्रिंट करके उन्हें सीधा करना पड़ा। कन्तु आंग्रे सीधा एक ही बार में सही फोटो उतार लेती है। कान जैसा,साउण्ड फिल्टर' यन्त्र कभी मनुष्य द्वारा बन गगा, मी आशा नहीं की जा सकती। यिो और यावलग की आगा पर निश्चित 'फीकोन्मी' पर ही गुणी जामाती है । कालो नाम इस प्रकार की कोई कठिनाई नहीं है। येनिमी भी गरम की नीची हलकी आवाज सुन सकते है । कई आपापा मार गुनने या कोलाहल के बीच अपने ही अनि की वान गुन लो पी हमारे ही कानों में होती है। अनि नाफपारने लिए टार' का प्रयोग किया जाता है । कुछ यन्नों में ' बका गिटिम पर मिटम'मध्वनि माफ की जाती है। उसमें लोधन लिट : और ऋण प्लेट मोड' के माय 'निर' मोदना पता ना रही । -- vs ] [ चागा पीपा शमना . - एमः भीमा नाम आयाज माफ होगी। किन्नु कान की नीतियां मंदिग, नियम और अकम में ननी या प्रणाली विमान कि वे आवाज को उसके अमनी रप में बिना किसी मटिना के मुना गः । न मात्र सुनने की है उन मदन के अनुरप अपना चिलन श्रीर मार्ग निर्धारित मारने के लिए प्रेरणा ने बानी विशन प्रणाली मानी में विद्यमान है । गांप की पुनका गुनाही या प्रणाली में गावधान बरसी और माग चलने की प्रेरणा देने लिए लोग गार देनी है। ऐसी बादशीर संरना किन्हीं यनि-मालिक बन्नी में मम्मर नही होगरानी। शरीर पूरा जादू पर। । उगती गोपिका, नाभाल लिग प्रकार जीवन-गरण की गुत्थियां स्वय मुनगाने : ओर मगची गाया को गमर्थ बनाये रहने में योगदान करने, या दिवशी बनना। अन्नमय कोण जिगे स्थूल शरीर भी पाते है । पन्मदरी विनि कारीगरी गे मा-पूरा है । उगये गिनी भी अवयर पर हरि किया जाय उसमें एक ने एना बड़ी-बड़ी धपने-अपने ताए प्रतीत होंगी। अवयव ही नहीं इकाई भी अदभत गरीर को यह अंग अवश्य ही नी, जिन पकाने का बना । ये भी कम विलक्षण और अभुत गी। जीवन जी एकाई कोणिया जिने मल मामीका भी बात पर नका गवरी छोटा भिन्तु मूल पटका है, जिस प्रकार पदार्थ का मन घट्यः परमाणु होला है उनी प्रकार कोमा को जीन या गुलः प्रहार जाता है । यो मनीर-मलों परखों गोरियामओ ने बनासकालीन मरन को गिना अपने आप में अपना दिलासा लिन मा बागायनिक पदामों ने मिलकर बनी हमर साय में माभिम' उनी को रोशा कामाजिदी पर मानाशीपष्ट करता kamena? !
यही से सारी हलचलों का प्रवाह चलता है। अब यह स्वीकार कर लिया गया है कि रासायनिक खोखता कलेवर मान है, उसका मन जीवन नाभिक के केन्द्र में सन्निहित है और वह 'विशत' रूप है। प्रकार अब जीवन की व्याख्या एक विशिष्ट विद्युत प्रवाह केस में की जाने लगी है और यह माना जाने लगा है कि यह विजयी सामान्य विद्युत जैसी दिखाई पड़ने पर भी उसके भीतर एक मुशाय- स्थित क्रम व्यवस्था ही नहीं जीवनोपयोगी नेतना भो विमान। जड़ के अन्तर्गत इस चेतना की विद्यमानता इन्हीं दिनों मटीम वैज्ञानिकों द्वारा स्वीकार की गई है । अब मनुष्य सर्वथा जल-मारा रासायनिक संयोग नहीं रहा । वह निन्मय स्वीकार कर लिया गया। किंग्स कालेज लन्दन के डा०विल्किन ने अपने अन्वेषणका निष्कर्ष बताया कि-कोशिका अपने आप में उतनी आश्चर्यजनक नहीं है जितनी उसके अन्दर के दूसरे कण और क्रियायें महत्वपूर्ण है, इनमें से नाभिक का केन्द्रक ( न्यूक्लियस ) और उसमें लिपटे हुये कोमोसोग, स्पूतनिक की तरह कोशिका के आकाण में स्थित 'रोन्टोसोम' जो गोको के विकास में सहायक होता है, पारदशी गुब्बारे जैसा वह भाग हो भोजन को शक्ति में बदलता है, वह भी एक एक बढ़ कर आर्य जनक हैं । न्यूविनयस कोमिका का वह गुम्बदाकार भाग है, तो पूरे शरीर का सूत्र संचालन होता है । गुण मूत्र (कोमोसोग ) की जटिलता और भी अधिक है, क्योंकि उन पर व्यक्ति के गुण, मादित विकास और अनुवांसिता आधारित है, इसलिए इन में वैज्ञानिक तीव्रता में जुट गये । 'जीन्स' जिन्हें आज का ज्ञानिक जीवन की कार्ड मागना , इन्हीं गुण-गुत्रों का ही एक अत्लल सुक्ष्म अवयव है। जिन प्रार डोरे में थोड़ी-थोड़ी दूर पर गांठें लगा देते हैं। इन नगमलों में भी गांठें लगी हुई हैं, इन गांठों को ही 'जीन्म कहते हैं, एक कोशिका । [ चननामीण नारद जीम जो कुण्डली मार बंठे रहने है, उ यदिनींच करनीधा कर दिया जाय तो ५ फीट तक लम्चे पढेच मकान हैं । हमारा मन कि माणिकाओं की ईटों में बना हुआ होता है और एक युवक पनीर में यह सोशिकायें ६०० अब तक होती है, इसलिए यदि सम्पूर्ण नगर ग. 'जीन्ग' मां खींच कर रस्मी बनाई जाये नो वह सनी नही होगी, जिगी गारं ब्रहार को नाप लिया जाना सम्भव हो जायगा। आत्मा सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है। सम्भवतः यह जोन्म उस मार- तीय मत की पुष्टि करें । पर जीन्ग को ही भात्मा नहीं मान जना चाहिए। वह बतन आत्मा का एक अणु हो सपना पर आत्मा नहीं। सूर्य एक आत्मा है, उसकी एक किरण वा मे चलता है, जोर किमी स्थान पर वहां की ऊर्गा पचाती रहती है. वहा मराव उगी सका उस किरण जाल से मूर्य भी न्यान-स्थान नी गोजमयर लगाना हो । या किरणें भी प्रकाश में छोटे अणु (मटम) गे बने है और प्रत्यक अणु में गूयं जंगी अगवायें विद्यमान होती है, उतनी ही ऊर्जा (एनओं) उतनी ही चमक और मी ही आकृति, पर या गुयं नतीको मकना पार तो गुर्य का एक अणु मात्र है । अणु को पकड़ा, लोहा और मोटा जा सकता है पर गूर्य को तो टालने की शक्ति विज्ञान ने मापा ६ । गूयं अपन आप में एक स्वतन्त्र सत्ता है । 'जीन्स भी ऐने ही है। मनुष्य का पृछ छोटा या बड़ा रोगा, उमर धान काले, भूरे या घुघराले होना, नाक वाली का पानी गा, जाने नीली, गाली या भूरी होगा यह भारी बनायट जीन को बनावट पर नियंद. यदि विस्तृत मोज की जाय तो गर्भय मिन भाम दिन छानुवर्ती निर्माण संभव हो जायेगा। अगुवांशिका (टी) गंगा इलाज भी तव सम्भव .. जीवधारी पृथ्वी पर आने वाले तीर लिया ना मो.. कान सम्भव है। आलम, गा मा मार्ग अंगालो मनुष्प भी बनाया जा गले पर यह सब मनुष्य का पी. कमी पर्दे में काम करने वाली गाषित कराचा पर होगा मार ༣ gx: : སr', ve । जीवों का विकसित रूप नहीं वरन् वह अमंथुनी क्रिया द्वारा हो । हुआ है, यह भारतीय दर्शन की मान्यता है । जो आज की वैज्ञानि दृष्टि में सत्य सिद्ध हो रहा है पर वह मनुष्य के लिए नितामा गम्भा नहीं। यह वात हम नहीं वह वैज्ञानिक भी जिन्होंने जीन्समा भी रासायनिक विश्लेपण कर लिया है, मानने लगे हैं । डा० विलिस ने बताया कि जोन्स सर्पिल आकार के अणुओं से बने होते हैं, यह अण 'डी आक्सी रावो क्लिक एसिड' ( संक्षेप में डी० एन० ए०) के नाम से जाने जाते हैं। इन्हें केवल एक लाख गुना बढ़ा कर दिया वाली (मैग्नीफाइङ्ग पावर) पुर्दबीन (माइक्रोस्कोप) रो ही देवा जाना सम्भव है । इस दिशा में हारवर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिका के मा० जेम्स वाट्सन और कैम्ब्रिज यूनीवर्सिटी की डिश लैबोरेटरी के डा० फ्रांसिस फ्रिक ने विस्तृत अनुसन्धान किये। उन्होंने चार प्रमुग नाइट्रोजन योगिकों १. एडीनाइन, २. साटो साइन, ३. गुप्मादन और थाईमाइन और फास्फेट व एक प्रकार की शनंग रासायनित संयोग से प्रयोगशाला में ही डी० एन० ए० अणु ( मालेगल) मा मारल बनाकर सारे गंगार को आश्चर्यचकित कर दिया। यह जीवन- जगत् में हलचल पैदा करने वाली खोज थी। उसके आधार पर अग- थुनी कृत्रिम गर्भाधान ही संभव न हुआ वन चिहिला और गरी विकास की अनेक अदभुत सफलताओं का स्रोत गुल गया । श्री. एन. ए० को गफलता एक दिन ऐगे शनीर बना गांगी, जो बाजारों में साधारण मनुष्यों की तरह पूमा-फिरा करेंगे, फिर भी कोई समान पायेगा कि क्या ये कृत्रिम मानव है । १९६२ में इन तीन वैज्ञानिकों को जब इस गम्पा में नोबल पुरस्कार दिया गया तो उन्होंने ही पहा--"मा हाव में आ गया , मूत्रधार नहीं" सम्भव है, एक दिन वह भी हाय लग जायेगा और तब आज जो मनुप्य प्रजाति के जाने पर मामला है वय पनि उमर ५० ] [ गंगा को प्रणाम ना भी ना धमना-पादन] गिन पर चलने लग; पर अभी तो स्थिति यह है कि मनुष्य जीवन मार्ग निविधियाँ जिनका आदेश जीन्म के द्वारा मिलता है,वह किमी और गी। जीन्स तो उसके आदेश कोगिया नक पहनाते रहते है। एक जोगिका से दुगनी को गिका तप सारे शरीर का कार्य मंचालन जीन में दिये गये द्वारा आदेशों पर चलता है । यह आदेश भी किनी भाषा में नहीं होने पर उसकी भी एका नसायनिक पद्धति है। जीन्म से कोई तत्त्व कोशिका में गया नो का भाग पानी और ही ऊपर से कोई और तत्त्व की पहुँचाने की भावग्यकला प्याम रए में प्रनाट हुई । किसी ने कहा नहीं पर हम उठे और पानी पिया । पानी पीने की प्रेरणा जीन्स ने फोशिकाओं को दी, हाथ में उठा कर पी निया पर जीम को बाद आदेश किसने दिया। पापा जीन्महीनी पछा भी यह । यदि ऐसा होता तो प्रयोगशाला में बनने वाला डी गन एक भी अपनी इच्छा से विकसित होने लगता । प्रगित बजानिक मुनर ने १७ वर्ष तकः मनिग्रयों पर विविध प्रयोग मार दिया कि जीव का प्रत्येक कोश' प्रोटीन मे बना और जब एम प्रोटीन ना रामायनिर विलेपण किया जाता तो उसने अनेक प्रकार के एसिडन' और रागायनिक द्रव्य पाये जाते हैं। जो पालते, घटते और बरते भी राहो । उसने ऐसे अनेक प्रयोग किए और या प्रयत्न किया रि. रामायनिक स्थिति में परिपतन फर गया शारीरिक रचना में कोई परिवर्तन किया जा भरला । नमें उसे कोई गफलता न मिली । पयोंकि इन तत्वों के गृल में जो जीन' नामक तत्व मा उस पर किनी प्रकार की प्रतिक्रिया नही होती थी । अर्थात् उस पर लाप, विष, मीत आदि का भी प्रभारी रापा। ऐसे प्रयोग पहले भी हो गुरे थे।ग पार जर गलर में PER किरणों का प्रयोग किया और गुण-गुना को भर 'जीन' रायः पानी तो उसमें असाधारण एलपन हुई और दोन महिला पंजा पाकार प्रकार पिल्लल ही भिन्न निराला और -- .... -- -
तरह इस सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ कि 'जीन' ही जीवन में
सम्बन्धित कोई तत्व है और उससे अधिक कोई जानकारी शातित
प्राप्त नहीं कर सके।
हाँ यह अवश्य हुआ कि उन्होंने कोश के मूल को जय मा
दर्शन यंत्रों से देखा तो उस परमाणु में ही उन्हें विशाल महाग
झाँकी अवश्य मिली। यह देखा गया कि वहाँ कई सूर्यो जितनी
और चमक विद्यमान है तो भी जीन के उस कारण शरीर की
तक कोई जानकारी वैज्ञानिक प्राप्त नहीं कर सके।
अभी इस जीन्स से भी कोई अति सुक्ष्म और समापी
सत्ता है, इसका प्रमाण उसी की संरचना से मिल जाता है। उका
णार्थ डी० एन० ए० पर ही० लगभग एक अरब एमीनो एसिड कम
से लगे रहते हैं, इन्हें वह अक्षर कह सकते हैं जो मिल कर जीग की
आकांक्षा को व्यक्त करते हैं । जैसे भूख-प्यास, बोलना, उठना-गंगा,
मिलना-जुलना, सोना, स्वप्न देखना आदि। इनका ही प्राम मा
के गुणों का निर्धारण करता है। मरोड़ी हुई सीड़ी की शक्ल में या
अणु एक जीन्स की शक्ल में दिखाई देते है। उन सब की अनुभाग
अलग-अलग हैं, इससे यह पता चलता कि जीन्स जहां गोगितामी
आत्मा है, वहां वह शरीर गत् गम्पूर्ण चेतना का एक अज भर
और उससे अधिक कुछ नहीं ।
शरीर को सामाजिकता के अधीन रहना पसा , मार
होता, प्रत्येक जोन्स एक स्वतन्त्र अस्तित्व होता तो नागरीर के
प्रत्येक अङ्ग गे मनुष्य पैदा करना आरम्भ कर देता। मा :
नहीं कर सकता, मनुष्य भी परमात्मा का पश, पर आ
दायरे में निर्माण, पागन और महान कार्य बिमा कमान?
विग्य-रचना के अधीन। जमती अपनी नामामाथि
अलग नहीं होती तो वा अपनी का में जन्म और मृतका काम
हो जाता।
-
[नना का प्रकाशन
सुविकसित संतान के लिए वैज्ञानिक प्रयास मनुष्य शरीर नना यिनक्षण और अद्भुत है कि विज्ञान के नारा बड़ी-बड़ी गुत्थियों को सुलझा लेने तधा रहस्यों को समक्ष जो न बाद भी मनुष्य शरीर को पूरी तरह नहीं समला जा सका । अपनी काया को ही लिया जाय-हम जानते हैं कि हमारी पाया ना स्थूल भाग-गलमय गोग-छोटी-छोटी कोशिकाओं (मल्न) बना न कोशिकाओं के अन्दर एव मारटोप्लाज्म' (बमामय पीला सा वर पदार्थ,) भरा रहता है। इनके बीच में अवस्थिति होता है, कोशिका का नाभिक अथवा गेन्द्र यः (न्यू पिलयन) । पुरुष की शुक्राणु कोगिना अपया नारी को जमाणु या टिग्वाणु कोपिका के नाभिक में छोटे-छोटे धागे जैसे गुण सूप [ फोगोलोग होते है । एक नाभिक में गरे २३ मा ६४ जोड़े होते हैं। नहीं में नागों की संख्या में 'गोल' चिपके रहते है। नये मनुष्य शरीर के निर्माण तथा उनमें अनुषांगिकीय गुण धर्मों का विकास की पर निर्भर करता है । पर जोला गया है ? कसे पर अपनी आश्चर्यजनक भूमिका पूती मो? सर पर गे पिज्ञान अभी पर्दा मला ना मा है। जो नम्बध में वी तेजी से शोध कार्य मनोवल में ? नाका प्रचण्समा एक दन] द रहस्य खुले भी हैं, फिर भी वह नहीं के बराबर हैं । अभी तक के अध्ययन के आधार पर 'जीन्स विद्युन्मय पुटपाक या पुड़ियां (पैकेट ) हैं। माना जाता है कि रचना कई तरह के न्यूक्लियस अम्लों के संयोग से हुई है। उसमें अभी केवल दो के बारे में जाना जा सका है । वे हैं ( १) डोलन ए० ( डी आक्सी राइबो न्यूक्लीक एसिड ) ( २ ) आर एन (राइबो न्यूक्लीक एसिड )। जीन्स की संरचना के बारे में अभी तक नहीं जाना जामा है, किन्तु यह जानकारियां निश्चित रूप से हो गयी कि शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग की विशिष्ट रचना से लेकर अनेक परामगर सभा रोगों तथा गुणों के विकास की आश्चर्यजनक क्षमता इनमें है। गुणों और कार्य-कलापों को कैसे नियन्त्रित किया जाय यह पता विज्ञान अभी नहीं लगा सका है, किन्तु यह माना जाने लगा। यदि 'जीन्स' के गुणों और कार्य-प्रणाली को प्रभावित किया जा मो. तो आश्चर्यजनक उपलब्धियां प्राप्त हो सकती है । यह अन्ना को छोटे से घटमा एक कोशिका के नाभिक में रहने वाले नगर वाले विद्युन्मय पैकेट मनुष्य के आस-पास के वातावरण मेर विचारों और भावनात्मक विशेषताओं में गंगार परणाम समर्थ हैं। के विकास सम्बना भारतीय मारो कि उस पर अनुवांशिकता के माथ-गाय वाला वासा भी प्रभाव पड़ता है। पहले दम मान्यता के प्रति उदार लगी थी। यह सप्ट हो गया है कि अपने माता या चेप्टाओं द्वारा व्यक्ति जिन ग्यगाव-युगों को रि माता वंशानुक्रम से प्राप्त नहीं होने और न ही पी. अति न विशेषताओं को वंशानुक्रम द्वारा आने वनों को 7:"। ५४ [ नेतना गोप्रमाः पाता मनुष्य के विकास
शानिए यदि एक व्यनि, में अनेक भाषा मीमी है, तो या,
पापा-मान को अपने बच्चों को बंशानुक्रम द्वारा नही दे गयना ।
मां को भी नापा-मान की प्रचलित विधियों को ही अपनाना होगा
सम्मा मानन गारनी पड़ेगी। वहीं दूसनी और यह भी पट हो गया
वंशानुक्रम का निश्चित प्रभाय मन्नान पर पड़ता है। जामवं-
ीि ( जगटिनग ) का गारा दांचाही मी आधार पर रहा।
17 विनोई भी व्यनि, जन्मली कर के बीज बोकार मंगे
गुलाब के फूलों की आशा नहीं कर सकना । मोरया ये. अष्टों को
गकर उनमें गे मोर या कोन निकाल मकना लेकिन किन
पौधों की चीज बोये जाने , उन उनी जन पौधं आपरमजतं
? गे चहा और बिल्ली में विन्दी ही भयो पंदा होगी ?
गका उतर जानुपाणिकला अर्थात् नियमित बंग पनपन, जिनके
कारण ही ऐगा होता है । जो बरन जिम बंग की होगी, जगया चीज
माने जाने पर मा ही पान होगा। आनुवनिकला मे गाम कर का
ग भी शामिल और पीजो का कर तथा रंग भी। उदा.
लिये बया पक्षी का लिया करने वाला धांगना बनाना विगीको
मियाना नही पाना ।
आनुवनिता अपने पूर्वजोग मिनी बानी विना
गना नाम । मानिस जान र जीयो को मार
पनी अपने माता-पिता ने अमल मन पर
कमें
मिलती माणीको 'जीन'। माता माता पीर
पानसी कोमिनाजो मिलकर मा।। 'जीन' मालिका
एक भाग । अगर किसी पर-पृ. Tोन गर
पान में जागर दो दिया जाये तो का भी मन भीगा
मनो-पास नगगी । जनयी मागिताओं ने
मोifri। उनी महिला र
ना
. अधिकांश पौधों और जीवों की उति नर और मा होती है। कुछ 'जीन' नर से और कुछ माया में मिलते। अायो झाड़ी के बीज गुलाव तो नहीं, लेकिन ऐसा पौधा लवश उमा है, जिसमें एक की बजाय दो तरह के फूल हो । काली बिल्ली का। एकदम सफेद हो सकता है। यदि कोई पोधा या जानवर कोनर विशेपता के "जीन" आनुवंशिकता द्वारा प्राप्त करता है, और दोन का प्रभाव वरावर रहता है तो दोनों के मिलने से तीसरी उत्पन्न होती है । अगर लाल गाय और सफेद रंग गा मां उनका बछड़ा न तो सफेद होगा और न लाल। यह भूग, मानो के बीच के रङ्ग का हो सकता है । ऐगा हो जाने के नियमो. निक व्याख्या आनुवंशिकता के सिद्धान्त के आधार पर की जाती 'जीन' ही इस आनुवंशिकता के बाहर हैं और आनुवंशिमला मी :- यादी इकाई है। अभी तक किये गये परीक्षणों से ही जाना जाम कि व्यक्ति की शारीरिक विशेषता जगे 7, 7, सून का प्रसार नम्बाई टिगनापन आदि मबी आनुमति और पित्रागत होते हैं। ये भारी गि गुण भी मान माता-पिता सेना प्राप्त होते, वरन वे दादा, परदादा समा अन्य गांवों में संग्रमित होकर आते हैं। बंशानुगत गुणों में माmifTTA प्रत्येक गुण में आधा होगा। यानी मोम पोवा और ला एक गोयाई । पूर्व, नार पिन गुण का मोलहवा मागहोगा अति सानो ?? एक चौथाई भागता । मे १ गोपाः रात से आते है। व्यक्ति के. गंमार नो नो नाम मम्पदा और साधन । म " कोग, के निर्माण के पटना नीग-ओमीनी -- , -- - - मात्री और अपना आणि मी आधुनिक गीजों द्वारा भी होगा। भारतीय मनापी न गृमनाओं से परिचित की व गुगन्नति के लिए माता-पिता पा चरिणगन, तपस्वी-गंयमी होना अनिवार्य बनलान छ । र प्रकार व्यवस्थित कार व्यनि, न केवल न्योन्य मति जना, जननी बनने की क्षमता में, अपितु उन अनेक विशिष्ट मनानी, किनियों गे सम्पन्न बनना है, जिगरी मनुष्य की कामना श्री गरिमा। आनुवंशिकता का प्रभाव विलगीधा जोर दल का उदारण लिा किती माना-पना मानों को पाकिनी एप को टीचील ग (अग रोग) को नोगका यः अयं नादि Tी विजयी का जाम ही टीबी० (धव नोग), दिन का याः अ. नि. चचे केसरीर में रोमी वृति या नस्पता- गान. शिक्षय रोग के नोटाप मीर में पानी की जा पारगे। पनी प्रसार मान लीजिए कि कोई कार, जो अपने काम में पलाक्ष: । याः कार्यदक्षता बरचे में जानाजान में नहीं जान होती । अपितु यदि वाले को भी मुगल का दानाको 'गेमागीली का नाम मिनालाही सोगा Iri, ग चना समय दारा किन भीमाती गाना उपयोग गम्भव हो, जा चळगीनी के काम का। सीलिए भानुपियना और पर्यायानो समान दिया जाना । आनुषिकमा हाजिन न पाम हो । पछ जना गोनाहारी आनुवनि को माना जाता। मनाममा गुणगानुकरण : नागमोमोलोगों का आधार पर पार चीन, जो पक्किम निदिन' । माता-
।
'जीन' का व्यवहार या आचरण से सीधा सम्बन्ध नी ।
जीन शरीर के उत्तक तथा अङ्गों के विकास को निर्देशित निर्माता
करते हैं । इस प्रकार वे शरीर की क्रियाशीलता को भी नित
करते हैं। शरीर की ये क्रियाएं स्पष्टत: व्यवहार को भी प्रमा
करती हैं और उस रूप में जीन्स का सम्बन्ध व्यवहार से भी।
है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति वंशानुग्राम से छोटो स.
टूटदार अंगुलियां या वहरे कान प्राप्त करता है तो निनाही
क्षेत्रों में उसकी योग्यता सीमित हो जायगी इसी प्रकार शाशरिर
क्रियाओं में भाग लेने वाले हजारों रासायनिक तत्व भी जीन्ग
ही निर्धारित होते हैं। जैसे हष्टि के लिए प्रकाश संयती तत्य या
रक्त के जमने में कई रासायनिक तत्व योग देते हैं। तलका
उपस्थिति सशक्तता या दुर्वलता का सम्बन्ध जीन से ही होता।
ऐसे अनेक लक्षण वंशानुक्रम से सम्बन्धित होते हैं।
वंशानुक्रम के आधारभूत घटकों, जीन्म और प्रोमोमोलो
अध्ययनों के निलप बस तथ्य के होता है हि मंतति निर्माण ।
गुक्ष्म आधार कितना व्यापर और जटिल होता है। पीडित भोजन
मात्र से ही गरीर मुहद्ध नहीं हो जाता। इसके विपरीत उनको मुर
ही भोजन के बम-परिसारका कारण आधार बनीमा
पाने-पहनने की चिन्ता करतेने कोही जीवन का माय मान
बंटने वाले अन्नमय कोश निर्माणका आधार
जमे अन्त-व्यत और दूपिन, विगत अनाने का और भाकी.
नियों को भी उग विकृति का अभियान जाने।
पर जीन, युग्म शरीर के किनी कि
विकास का निर्देश कला है। जांच, भी, या .
काले हैं या हल्के. स्थापित है जथा लान, या
सामान्द बाल हैं या नहाल मामा. या
होने की सम्भावना है. श्रवण शक्ति. सामान्य पाक
-
M
, ना मामान्य है या कि "हेगोपीलिया" का दोप, रज-बोध पाट या वर्णाधना दोपहै, उंगलियां या अंगटों की नग्या सामान्य है या कम-अधिन है, किमी जोर में कोई गन्नी छोटी- बड़ी तो नहीं है, नभी अवयव नामान्य हैं या कुछ अवयव बिम्प , आदि सभी शारीरिक 'फरेक्टरिपिटकन' जीन-युग्मों पर ही निर्भर पाते हैं। ग२५ वर्ष की आयु जव " नी फ्रान्सीनी दार्शनिक मान्टंन को ४५ वर्ष की आयु में पधरी की बीमारी हुई। उनके पिता को यह में आरण एमआ। जबकि मान्टेन के जन्म के समय उनके पिता गिफ कीम वर्ष के थे। उस समय उन्हें यह रोग नहीं था। लेकिन उनके जीरा मंग गंग के आधार विद्यमान थे। मार्दन की पिनाय की पथरी की बीमारी कई पीढ़ियों से चली आ रही थी। वालयों का लेपटो मीमियाँ' लोग जीन्म ही नम्बन्धिन होता है। यह जीन, "मी वायन ट्रान्मफरे गन्जाइम" बनने देता, तो बच्ने दूध में रहने वाली मिटाम-गलेपटांग-यो पना नही पाते । फलतः यह ग्रन में जमा होनी वाली और जिगर में इट्ठी होकर बच्चे का पेट गराय गर देती है तथा मृत्यु का भी गारण बन बैठती है। "पकोटमे टारटिग टेनोपंधिका" नाममा रोगका कारण भी मुख्यत: जीन्स की वितियां ही होती है। आग का कमर. टोनो लास्टीमा-जोन-दप पाही परिणाम । जीग पी 'एप्रोडोप्लानिया'-~-विनि के कारण दच अधिकामिल कर । वे जल्दी मरते है । बच गये तो भो चंग-ति में अमन ते । ने टोप व सी मालिा गर्भवती होने पर स्वयं की भी प्राण-क्षा नीर पानी को पीलान तो सतनी पानामी समानमान [
1
9 भावा पाढ़ा का निमाण
अच्छा बीज अच्छी जमीन में बोया जाय तो उनमें :
पौधा उगेगा और उस पर बढ़िया फल-फूल आवेंगे। इन त ।
गिक्षित, क्या अशिक्षित सभी परिचित हैं ? जिन्हें कपि गरी
से अच्छा प्रतिफल पाने की आकांक्षा है वे इस तथ्य पर जाना
ही ध्यान रखते हैं कि उत्पादन के मुलभुत आधारों को मा
साय जुटाया जाय और उनका स्तर ऊंचा रखा जाय ।
यो विवाह एक निजी मामला गमला जाना और गंगा
त्पादक को भी व्यक्तिगत क्रिया-कलापको परिती मिनिट
हैं । पर वस्तुतः यह एक सार्वजनिक सामाजिक एवं मायभीम का
। क्योंकि भावी पीढ़ियों के निर्माण की आधारशिला पारी ।
और विश्व का भविष्य उज्ज्वल एवं गुमन्मन बनाने की कि
धन समृद्धि पर टिकी हुई नहीं है, परख दमनात पर निर्भर है कि
भावी नागरिकों का शारीरिक, बौद्धिक एवं नालिक्षिा गर
होगा? धातु, स्मारते या हथियार नहीं, किमी सामी ना.
विक सम्पदा वहां के नागरिक ही होती है। जो भी
होंगे, उनी स्तर का समाज, समय एवं बावाला बोगा।
भावी प्रगति की बात गोगो में गुममापि निर्माणमा लामा
जुटाने की बान भी ध्यान में तो नामि।
परेन पशुओं का नाम गाला सां, fri
बारे में हमारे प्रयाग मा होस गीगा
हो । जिन्हें देश को पाने में AT will
ममरते मा प्रजनन प्रविधि र ।
प्रोत्साहन में निरा यंगद्धि की योगा ।
मानव प्राणी पीना गीग-नागावी.'
जनी किलिों बननीया
1
.
[नया का प्रय: ।
करना या गोचना-दिनारना समाज या कनं व्य नहीं है ? क्या बच्चे मात्र माता-पिता की ही सम्पत्ति है ? क्या उनका स्तर नमाज को प्रभावित नहीं करना? इन बातों पर यदि गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि किनी गट या समाज का भविष्य उगकी भावी पीढ़ियों पर निर्भर है । यदि मुयोग्य नागरिकों को जन- न हो तो भोजन, चिकित्सा अथवा शिक्षा का प्रबन्ध भर कर देने में काम नहीं चलेगा। इस सुधार का काम सुयोग्य जनकः-जननी द्वारा गुविकसित मन्तान उत्पन्न करने का उत्तरदायित्व निचाहने से होगा । पर नगारी विवाह के दिन में ही आरम्भ हो जाती है। यदि पनि- पली की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्थिति मुयोग्य गन्तान के उत्पादन तथा भरण-पोषण से उपयुक्त नहीं है तो उनके द्वारा की जाने वाली वंशवृद्धि अवांछनीय स्तर की ही बनेगी और उसका दुष्परिणाम ममन्त समाज को भुगतान पड़ेगा। बंशानुग्राम विज्ञान की चर्चा इन दिनों जोरों पर है। जनन न में पाये जाने वाले गुण-सूत्रों को भावी पीढ़ियों के निर्माण का गारा श्रेय दिया जा रहा है। इन जीव कणों में हेर-फेर करके ऐने उपाय में जा रहे है जिनके आधार पर मन चाहे आकार-प्रकार की सन्तानों को जन्म दिया जा सके। पल अत्युन्माह में अभी तक आंभिक गफलना ही मिली है। पयोकि. गुण सूत्रों ने आकृति तक में अभीप्ट परिवर्तन प्रस्तुत नहीं किया फिर प्रकृति के परिवर्तन की नो बात ही पना की जाय? प्रयोगशालाओं में ऐमी विधि-चदन्या मोची जा रही है जिसने अनीप्टनर की गन्तान पैदा की जा सके। इस दिशा में जी तोड़ प्रयत्न होना है और सोचा जा ना चि. बिना माता का लर सुधारे अपवा बिना वातावरणको निम्ता निय बजानिक विद्या के को लाधार पर मुगन्तित उत्सादन यो पदन्या पान्तिका शिया-पन्नाप कारागापन परजी मारगी। पानाकी नामना- वन ] [ 22 रासायनिक संयोग में हेर-फेर करो गोशाला के म परिवर्तन करके मनुप्य का वर्तमान स्तर बदला जा गोगा नगा पिछले बहुत दिनों से सोचा जा रहा है । इस सन्दर्भ में गुग तो और जीन्स की खोज खबर ली जा रही थी अब एन. नये गरण में विधान ने प्रवेश किया है और माना है कि यदि कोगाओं के स्तर में नल पर वर्तन करना हो तो वह रासायनिक हेर-फेर से नहीं विद्यमान fre प्रवाह में ही कुछ उलट-पुलट करके सम्भव हो सकेगा। अब सामन मुख्य नहीं रहे उनका स्थान विद्य त ने ले लिया है। यह समझा जाता रहा है कि पिता के शुक्राणु गभग मी आकृति के होते हैं जैसे कि पानी के पूछदार कोडे दिवाई पो। वर्गीकरण की दृष्टि से उनके दो भाग किये जा गाते में एक जित दूसरा पूछ । शुक्राणु का नाभिक शिर भाग में होगा I उमरे चलने, दौड़ने में गति प्रदान करती है। पेट अगनर लिनी रगी जिमसे शुरू कीट आगे बढ़ता है और नियनन के समय दो कर बिम्य अणु के साथ जाकर मिल जाता है। यह रोने नी स्थिति ही गर्भ धारण है। एक नया प्राणी ग गुयोग गंवोग में उत्पन्न होता है। शुक्राणु और दिम्याण की गोग. मामा म्थन । उनले भीतर भी बटन बारीक कण होते हैं। प्रोमोगोग-~गे भी कम जीत को प्रजनन शनि का करानी का सामान में भी प्रोटीन की कुछ मात्रा और 4 cro (श्री जोगी वाओन्य पिलर एगिट ) नामाः पामीर : परम्पत की गावीरिक और मानगिर दिममानिरी । वे विशेष केवल मामा-गावातील भी मातृ पक्ष और पितृ पक्ष की पीली दरगाह आती हैं। उनमें भी गंयोग-विचार शाम ! और कुछ नमानमात्मर विशेष भतीजी। मा. [ नारी .". 7 .1 पुथल के कारण सभी भाई-बहिन एक जैसे आकार प्रकार के नहीं बन पाते यद्यपि उनमें बहुत-सी विशेषताएं एक जैसी भी वनी रहती हैं। 'दि ग्रेव न्यू वल्डं' नामक ग्रन्थ में जीव विनानी एटलन हवसले ने टिम्ब और शुक्र कीटों के क्रिया-बालाप का मात्र रासाय- निक गंयोग नहीं माना है वे उन्हें 'अल्फा' 'बीटा' और 'गामा' किरणों गा उत्पादन मानते हैं। पूर्वजों के जीन्स अपने माथ जिन विशेषताओं को लपेटे चलते है उनमें बहुत सी अच्छी होती हैं और बहुत सी बुरीं । परम्परागत बीमारियों का लिपटा हुआ कुचक्र परिधान निश्चित रूप से बुरा है। अफ्रीका महाद्वीप के कांगो देश में तीन चार फुट ऊँचे वीनों की बड़ी संग्या है वे शिकार पर निर्वाह करते हैं और आदिवासी यायावरों की तरह एक स्थान से दूसरे स्थान में अपने डेरे डालते रहते हैं । पेरु के जमलों में यूम जाति के ऐसे आदिवासी पाये गये है जिनकी ऊँचाई तीन फुट से अधिक ऊँची नहीं बढ़ती वरन् कुछ नीची ही रह जाती है । माल्योनंटों के रोम कंथलिक चर्च द्वारा प्रमाणित 'रीजन फ्राम दी जन्मल' पुस्तक में उन बीनी जातियों की पंण परम्परा पर अधिक प्रकाश डाला गया है । इन 'यूस' जाति के यौनों की अधिक संख्या ब्राजील, बोलीलिया तथा कारा नदी के तट पर पाई जाती है। यह लोग २० कबीलों में बेटे हुए हैं। बंगलोर में वी. एन. धिम्मया नामक एक नाई के पर ऐमा चालक जन्मा पा जो जन्म के समय तो केवल ५.१४ पोण्ड का था पर कुछ दिन बाद तेजी से उसका गरीर फल्ने फूलने लगा। ११ वर्ष की उसर पर पहुँचने तपा वह १६२ पौण्ड भारी और ५० एन्च जना गया । इतना ही नहीं उसकी छाती ४६ इन्न की हो गई। लगभग फुटबाल गंगा गोल-मटोल वह दिखाई पड़ने लगा। बढ़ोतरी हन रोजी ईसिएर महीने पुराने कपड़े रद्द करना और नये बनवाना
उस गरीब आदमी के लिए अत्यन्त कठिन हो गया। अगर
ही रहा कि खुराक साधारण स्तर को बालकों जितनी ही बनी।
न्यूयार्क विश्व-विद्यालय के तत्वावधान में चाले नगर
प्रयोगशाला ने इस असम्भव समझे जाने वाले कार्य को सम्मा
दिखाया है। विश्व-विद्यालय के अनुसंधान सम्बन्धी अपामा म
मण्ड इवेल तथा जीव विज्ञान केन्द्र के निर्देश जगनिमी
द्वारा इस शोध निष्कर्ष की चर्चा करते हुए कहा गया हिवा.
म्परा से चली आ रही आकृति-प्रकृति तमा शारीरिक, मानगि
स्थिति में अब आमूल-चूल परिवर्तन कर साना सम्मान हो सकेगा।
वंश परम्परा की बीमारियों पर काबू प्राप्त किया जा सकेगा। म
कोपों की शल्य क्रिया करना उनमें दुसरे कोपों की जांति पर
लगा सकना सम्भव होने में यह भी शगा हो जायगा for
विशिष्टताओं वाले बच्चे पैदा किया जा सके। गन् १६६३ मामा
पुरस्कार प्राप्त करने वाले विज्ञानी मा० आर्थर मारने
कैलीफोनिया के स्टेन फोर्ड विश्वविद्यालय में जीवा
'डी. एन. ए.' बोजा था । अब उगोगने ली प्रगती
कि जीव कोपों की मिलति में इच्छानुमार एवं आवागा
बदल किया जा सके।
न कंचन वंश परमरा कोटियन मागुण भीग मुक
बलवृद्धि तथा दीपंजीयनगी दृष्टि कोना
गुधार पनियांग अपशिन । यः सा मामा "
अथवा आहार-विहार के मोटे परिगामी ..
सकता। मनुष्य का सीन भवन भिनटाने
कोशा या मल नहीं है। वहीं, गमगी:
और स्वस्थ रखता है और ग, दुर्वर बना i
धकेल देता है।
A
६४ ]
[चना ::::::
नित्य निरन्तर कायाकल्प
मामान्यतया या कोमाग हट कर बंटनी की और न
मोगाओं को जगा दगी पानी । बमली की कांना प्रायः
'४-५ दिन में पुरानी गे बदन कार न हो जाना। जिम प्रकार गोर
अपनी गंगुली बदलता है, उसी प्रकार हम भी अपनी नमती र नधि
पांचवे दिन बदल देगी यह चान आश्चर्यजनीकानी पर
सानुना होगा यही ना । जिन्दगी भर में जाना चार बाली
की गोली बदलनी पटली है। यही हाल मीन के भीतर काम गर्न
पाले प्रगुण गायन प्रोटीन का । का भी प्रायः ८० दिन में पूनी नमः
बदल कर नया आ जाता है। या परिनन अपनी प्रयंज नगाली
'अनुरुप ही होता है अनु अन्तर न पाने में यह प्रतीत नही होता
नि पुरानी के चले जाने और नई के न्यानापान ने गंगा तुम पनि-
पतन
हुआ है।
इस परिवर्तन ग्राम को चलाने की सीमा र अवयव की
अन्नग-अलग । किमी अत्यय का कायाकल्प जल्ली-जली होना
जिगी गा देन-दर में भी प्रकार उनके काम कानो सानो
नही अधिनी भिन्न-भिन। या कनिय सामने की पक्षा
रिपोर्ट के अनुगार मनुष्य के गर्दै २०० वर्ष तमः, नका,
पगली १००० वर्ष समः, पं.पडे १५०० वर्ष लामो यो ccc
वर्ष नना जीवित ने कोच गमाल में बनी। पदि जन:
सम्मान र ला जाय तोलने समय नरः अपना अभिनय गनी
प्रकार बनाने कर सकती हैं। इनके उल्ली सगद लाने का
परी ---उनले लगातार गाम बिना जागा और दोन-चीन में
मरम्मत का अपमान मिलना। यदि इनकी पापादन नो
मिना समे मनुष्य को पतमान जीवन अवधि में कई नगी
होनाली।
नामो नाममता-एमा दांन]
न्यूयार्क युनिवसिटी के डाc मिलन चोपेरू और र इन्स्टीट्यूट के डा० ऐलोक्सिस करलन द्वारा किये गये प्रयोग ही निष्कर्ष निकला है कि कोगा जब तक अपनी से में सक्षम रहती हैं तब तक बुढ़ापा किसी प्रकार छाने नही जैसे-जैसे वे नई पौध उगाने की क्रिया शिथिल गली में अवयव कठोर और निष्क्रिय होते नले जाते है और अना: या मुख में जा घुसते हैं । यदि इन कोगाओं की क्षमता पटनी और उन्हें उत्पादन की अपनी स्वाभावित सरगना सwिar for शील रहने का उपाय निकाला जाय तो शरीर को समान को उसे दीर्घायुपी तो बनाया ही जा सकता है। कामिक गति से-स्थल से मुझम के शेत्र में प्रोग विज्ञान अब रासायनिक पदार्थों की परिधि लांगर जा पहुंचा है जहां शक्ति शक्ति का ही नामाम शेष र मा। परीर एवं मन के प्रयोजनों में लगी इन धाराको निमा विध त नाम दिया है। वैज्ञानिक भी मी मापी विधा के प्रयोग भाग rif पीटी को गुविशामिन बनाने और उनका मार गुमा प्रयत्नशील हैं । मानवी काया के निर्माण में भी HTT जनन-रग में पाये जाने वाले गुण-गुम में पा :मि। दूसरा अध्यन -विसिव । भामा से प्रामापित किया मागापौर श्रीमामा प्रभाव समान में उचल fri Tr: पोरल मोर को गिनी ना किसी महत्वपूर्ण परिवर्तन ग वनामा मिथिला लिए रासायनिक अनया नुमरी माग बार। पर लिए चिन्नन गो कपलने वानी : परिस्थितियां होनी चाहिए।ग मध्य भारत - -- - ६६] । मांचा जाने लगा है कि माता-पिता का स्तर सुधारे विना सुसन्तति मी मगल्या प्रयोगशालाओं द्वारा हल न हो सकेगी । वनस्पति अथवा पशुओं में सुधार उत्पादन सरल है, पर मनुष्यों में पाये जाने वाले मिलन तत्व में उत्कृष्टता भरने की आवश्यकता यान्त्रिक पद्धति कदा- चितही पूरी पार गवेगी । 'गुण-मूत्रा में हेर-फेर करके तत्काल जिस नई पीढ़ी का स्वप्न इन दिनों दिया जा रहा है, उसे म्यूटेशन-आकस्मिक परिवर्तन प्रक्रिया महा जा सकता है। म्यूटेगन के सन्दर्भ में पिछले दिनों पैवलव, मैगछुगल, गारगन, मुलर, प्रकृति जीव विज्ञानियों ने अनेक माध्यमों जोर उपकरणों, से विविध प्रयोग किये हैं। जनन रस को प्रभावित पारने के लिए उनने विद्य तीय और रासायनिक उपाय अपनाये । सोचा या गया था कि उससे अभीष्ट शारीरिक और मानसिक क्षमता सम्पन्न पोढ़ियां उत्पन्न होगी, पर उनसे मात्र परीर को ही दृष्टि से थोड़ा हेर-फेर हुआ । विशेषतया बिगाड़ प्रयोजन में ही सफलता अधिक मिनी, गुधार को गति अति मन्द रही। गुणों में पूर्वजों की अपेक्षा कोई अतिरिक्त सम्भव न हो सका। एक जाति के जीवों में दूसरे जाति के जीवों की फल में लगाई गई और वर्णगर सन्तान उत्पन्न की गई।। यह प्रयोग उसी जीवधारी तक अपना प्रभाव दिनाने में सफल हुए । अधिक से अधिक एक गोली कुछ बदली-बदली सरी जन्मी इसके बाद वह कम सामप्त शे गया । पोदी और गधे के संयोग से उत्पन्न होने वाले बच्चर अगली पीढ़ियों को जन्म देने में असमर्थ रहते हैं। पर्णणः गन्तान उत्पन्न करके पूर्वजों की अपेक्षा अधिक गगता और समर्थ पीढ़ियों उपजाने का उत्साह अब क्रमशः घटता पना जा रहा है। इस सन्दर्भ में प्रथम आवश्यकता तो यही रहती है शिप्रा एक ही जाति के जीवों में संकरण स्वीकार करती है। मार उपनानियों में ही प्रत्यारोपण सफल हो सकता है । यदि गरीर
रचना में विशेष अन्तर होगा तो संकरण प्रयोगो
मिलेगी, दूसरी बात यह है कि काया की दृष्टि से धोका por
प्रक्रिया में हो भी सकता है । गुणों में नहीं । वश गा मो
तगड़ी तो हुई, पर अपने पूर्वजों को अपेगा अपार या
सकी । इन प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकाला रि उनका
अपने विकास-क्रम के साथ जुड़ी हुई है. यह वारगे ना?
विकसित नहीं की जा सकती।
सुमन्तति के सम्बन्ध में मानिक प्रयोग अधिागे
इतना ही कर सकते हैं कि रासायनिक हेर-फेर को भारी
से अपेक्षाकृत थोड़ी मजबूत पीलियां तयानी करदें, पर उनी
बौद्धिक एवं सामाजिक उत्कृष्टता भी होगी इसकी गारण्टीना
सकती। ऐसी दशा में उज्ज्वल भविष्य का निर्माण माने
नागरिकों का सर्वतोमुखी गृजन कहाँ सम्भव होगा?
उग अल्गुल्लाह में अब वंशानुक्रम लगभग सोमा
है और सोना जा रहा है कि अभिमाययों को गुपोबार
ध्यान, दिया जाय । एम. भोर भगीय गतिलो
उत्पादन से रोका जाग, दूसरी ओर गुगोगा, गुममा r F... !
लोगों को प्रसना के लिए प्रोगात या भागा'
मागला न रहे, वरन गागानिक निकायमा Air
जाय बिमारी किन ही नही जानो में
कातियों को दिया ययन में ये 7 in
स्वाहालि दी जाय।
जगनी के तीन प्रगिस और format
पर गंगुन गन्ध प्रमाणित माताना.
लेषकों के नाम है डा आरन वकालत
० फिट्ज से । अहोने वाम र मा
--
६८ ]
[ पानी पर:
विबा मायनों के कारण मनान पर होने वाले दुष्प्रभाव को मानवी भविष्य में लिए चिन्ताजनक बनाया है। मन्त्रों का गंगुत. मन fr'अनियन्त्रिन' विवाह प्रथा का कारण पीढ़ियों का सर तरह गिना जाना, उनने म बात को भी दु:खद बताया है कि निम्न वगं मी सन्तान बढ़ रही हैं और उच्चस्तर के लोगों की संख्या तथा मनाने घटनी चली जा रही हैं । पीलियों में आयन्मियः परिवर्तन म्यूटेगनके विशेष पोध- मार्ग नियर या निष्कर्ष यह है कि मानसिक दुवंलना के कारण गुण गों में ऐगी अशक्तता आती है जिसके कारण पीढ़ियां गई-गुजरी बनती। इगने विपनीत मनोवल सम्पन्न व्यत्तियों की आनरिक पुरणा उनके जनन रस में ऐसा परिवर्तन कर सकती है जिसने रोजरबी और गुणवान ही नहीं शारीरिक दृष्टि से भी परिपुष्ट मनाने उत्पन्न हों। वंश परम्परा से जुड़े हुए दुष्ट, उपदंग, क्षय, दमा, मधु- मेर आदि रोगों की तरह विधेयात्मक पक्ष यह भी है कि मनोबल के आधार पर उत्पन्न पेलनात्मक समर्थकता पीढ़ी दर पीढ़ी भागे दहे मोर उसका सरपरिणाम शनीर, मन अपया योगो पर प्रत्यक्ष दृष्टि- गोधरानः । चमलारी आनुषंगियः परिवर्तन इसी आधार पर गरमयी मार रासायनिक परिवर्तनों की लिए भौतिक प्रयान इन प्रयोजन को पूर्ति नागर सपते । यह तय हमें एन निष्कर्ष पर पचाता है कि जिग प्रकार परिवार नियोजन के द्वारा अयोधनीर उत्पादन रोकने का प्रयास किया जाता है, उसी प्रकार समर्थ और गुयोग्य गन्तानोत्पादन के लिए आवश्यकः शान, साधार-मापन एवं प्रोत्साहन उपलब्ध कराया जाय। अनियन्त्रित विवाह व्यवस्था के सम्बन्ध में दून्दी विचार- पील पशि, भारी चिन्ता व्यतः फर रहे हैं और यह सोच रहे है कि जगदाध में चिदमः मम्मत नियन्त्रण स्वदन्या विचे दिना काम भी पानेगा । हिन्दु समाज में इन दिनों पिदार पाया जिननी ६.ना भी पक्षमता-पुनः दर्लग] [ ६६ ." । . . श भोंड़ी क्यों न हो गई हो उन पर 'गमारा अवश्य है। नियन्त्रण का स्वरूप क्या हो, या अलग मा. भीतिक समस्या का हल हिन्दू समाज में अभी भी बिमा :: विवाह प्रक्रिया पर समाज का नियन्त्रण होना नारिएमा म्परा की ओर विश्व के विचारगील वर्ग का ध्यानमा र जा रहा है कि विवाह पर नामाजिक नियमाना जा संसार में किया जाना चाहिए। बीमा कम्पनियां इस बात की पुरी :- कि वीमा कराने वाले के पूर्वज किम आयु में मरे में कोन ? पर से यही पाया गया है कि पूर्वजों की आयु में मिमी अवधि तक ही सामान्यत: उनको पीरियां भी निकालो। रंमप्ट पर्ल ने बहुन शोधों के उपगला गया पर किसन्तानका दोपंजीवन यदि जभीष्ट होतो ! जननी को पहले अपने आर से प्रारम्भ करना । गुप्रसिद्ध वंशानिमः जे० पी० जानने आमा । कि अगले दो मोबागों के भीतरोग और मोदित की तक वर्ण वाचा पापित होगी और विय: ३. उगमा विशेष मागमा जाममा। मानव जाति या free 5 मुगन्तति निर्माणमा प्रक्रिया पर निर्भर .... । विचार करना पडेगा और मादक आभार ' जोहा विकार धन और योगी ।। मन्द में विचार पक्ष प्रा .. जिर नियन्त्रणमा वालिद : : हर और भयोग लानको ? ::: भी कुछ तांबला नगा। . -. - ७० ॥
गर्भस्थ शिशु का इच्छानुवर्ती निर्माण
महाभारत में एक या आनी है कि एक बार कुपित होकर
अवस्थामा में उतरा के गर्भय मिगु (पत्रीसिन ) पर आग्नेयास्त्र
प्रयोग किया । पदीक्षित या फे उबर में हो अगता पीड़ा मे जलने
गरे लगा। मां ने भी उगे जाना ! उनाने सरपूर्ण समर्पण भाव में
परमात्मा का गण किया तवा बच्चे की भारी पाई।"
गग्य निगु गोको अलाव नक नारीद गवाना जर नकमा
का पीरन छिन । दरअमल आयान्त्र मन्न पनि भी, जो संकला-
गानि द्वारा बनाई गई थी। बारी पनि, हात दूर में मंगलम
मानदि गामा जल और मर गकता है, और फिर
पर पर प्रति विवाग जोन रक्षा पो मायना ने उन
को बनाया जानना नो गये. बोरी मनोमि में भी
ཎ༌བii qf :༣འི༑ ༑ ༢i ·།
की मसदना नातामानामि का पने करते
से गुण, गर्ग और पाप की पूर्व गोरा कर देनी भी फिर भी
पसार निरनर शिन, प्रिया-लाप, मान-मान आगर-विहार
भरियकार मानि भानगी पी, मिलने परचा जी मनोभूमि मेटल
बनाको प्रचार सममा-एक दान ]
[ १
जाता था, जिसमें यह चाहती थीं। शशिधान : उनके पहले सभी बच्चे शानो, सन्त और बहानिष्ठ हो ! की प्रार्थना पर उन्होंने अन्तिम गर्भस्थ बोको माला ढाला। उसी ने पिता का राण-मिलापन राजनीतिज्ञ हुआ। आयुर्वेद के विशेष अन्य सुधत गा में जी | ... "पूर्व पश्ये ऋतुन्नाना या नर मंगला । नाम अनो दर्शये तत।" अर्थात्-तु स्नान के पश्चात् fir : को देखती है। बच्चे का सपना और मुयातनि उनी इस लिये वह सर्व-प्रथम अपने पति का दर्शन गरे । यह सभी तय भावना निशान से सम्मानित न दिखाई देने पर उनकी माता मेंनोई कोर: अव पाश्चात्य देशों के नेशानिककार और गरेप: । .. मानने लगे हैं। डा0 पाउन मग ममा मामी , गर्भावस्था में भी गाभणी मान-भाराची ... पर नंगा प्रभाव माग गम में: यह सभी तथ्य गुननति निर्मामान गुनन्तति के मंबन्ध में नामायामाला REAT: माता-पिता बन्य मुगर होनो मन समी । गादियानमान : - ! पाया हो तो बाये बिना गीमित है। मान्य करती। हज योग के बाकी ~ी .:. जिनने नमः कण आग मी मी TRITTER: मिका नयानयाराम ::: यह परम्मनागत प्रभाव पिनगी मिरम: माता की कितनी ही पीलो पो . * . ANT , . .. ७२ मा ::
मालान में उभर सकती. उगी प्रकार पिता के पूर्वजों में नहीं पता भी मन्नान में प्रकट हो सकती हैं। यह ऐमी विलक्षण भी मानी जिनका माता-पिता को तात्कालिक शारीति नान- धिन में कोई मीधा गम्बन्ध न हो। गाना-पिता की शारीरिक, मानसिक स्थिति में भिन्न एवं विपरीत प्रकार के बालकों के जन्मने का कारण दहने हुए जीव विधानी एली मिप्याप पर पहुंचे हैं कि रज एवं शुक्र कीटों के भीतर भने पाने जीवाणओं की परपरागत गंचिन सम्पमा अवसर पाकर पनि प्राटिन होनी और उमी में एगी विभिन्नताये सामने आती गती ! अनान गन्नान गो मुयोग्य सुविकसित देखना हो तो माता-पिता को शारीरिक मानसिक स्थिति को पर्याप्न न मानकर यस परम्परा की विशेपना पर भी ध्यान देना होगा। पनीर से गिन विभिन्न उपभागों द्वारा मनुष्य के विभिन्न अंग प्रत्यत्र बनने हैं उन प्रक्रिया को अनुमानन में रखने के लिए मीर में पाछ रामायनिक पदार्थों की आवश्यकता होती है। जिन्हें गोजाम' पाहने नऐ जाम में चे मम्मावनायें व्यक्त रहती है जिनके उपर पनीर और मन में गमयनुसार अनेको भनी बुरी विशेषतायें उभरती मानी है। प्रजनन के लिए काम आने वाला कोपन्द्र दो अधं घटकों में विभाजित होता है । नानी वर्ग के कोष अन्ट' भोर पुरुष वर्ग भगोए शुक्राणु कालाने है। इन दोनों का मिलन ही मनुप्य के जीवन भारम्भ का धीगा। जीप गोप में ४६ 'मोमोसोम होने हैं। इन्हें तितर-बितर नक पृषक-पृथक पा माना जा सकता है। इनमें । तो नर नारी में जमे होने का मार्ग पनीर निर्माण भर होता है। मैप दो नर मादा अलग-अलग होते है इन्हें भवन कोमोनीम कहते हैं । शानियों की भाषा में 'एस' और 'पाई' कहते हैं। नर में एक पाना की पर भगना-एक दान ]
.
'एक्स' और एक 'वाई होती है पर मादा मेंदीनी :
बालक बालिका का जन्म होना पुर्णवमा नरनो मिति:
है। उसमें यदि को प्रधानता होगो को नही
यदि 'य' का अस्तित्व है तो लड़या उपगा। हममें भर
कोई हाय नहीं, क्योंकि उसमें को सास गरी २ :
कन्याओं की अधिकता में आज जो नानी दोग:
बह सर्वया गलत है । यह नर पक्ष ही है जिनमें
प्रमुखता है तो कन्यायें हो कन्या होती गीत :
से किसी के अणु प्रबल होंगे तो आपति-
लिए हुए वाला जनगंगा
वर्ण महर पद्धति को कुल समयमा
मिल स्तर के दक्तो के गरिमामी काला
थी कि उसका हश्य परिणाम का मिलना :
मिथण दूगरी में लिया जाय तो शक ;
निकलता है। घोटीबाट म के गम में ":
है वह घोड़े की
तुलना मेंला भोगी :
दस से मजबूत होता है। सामानो'
है। उसकी उन्नति का प्रयोगा।'
यह प्रयोग किये गये हैं और गाने में:
गई है। मानिग विहिनामा मा 'xii
को प्रोत्साहिन यिामाता ।
गद १८६मा::
मंदले न नेतृत मटर विनी ?'
मि. पीड़िता ने चीनी !
रहते है और याम:
मापूर्ण मनेत था । इस शोध के अनुसार वे इतना अनुभव सम्पा- गग कर सके कि वे मिश्रित जाति के पौधों में बदले हुए रङ्ग, आकार, प्रकार, स्वाद, फूल आदि में सम्भावित परिवर्तन की पूर्व पापणा कर देता और वह अनुमान प्रायः सही हो निकलता। मेंडेल द्वारा ग्यापिन वे एक शताब्दी से भी अधिक पुराने सिद्धान्त अभी भी उग क्षेत्र में प्रामाणिक माने जाते हैं । किन्तु यह उत्साह बहुत आगे तक न बढ़ सका । तात्कालिक धोडा हयमान लाभ भर ही वर्ण शङ्करत्व का होता है अन्तत: उग्री परिणाम ही निकलते हैं । गधी और घोड़ी से उत्पन्न 'खच्चर' नपुग होते हैं, उनकी पीढ़ियाँ आगे नहीं चलती । गधी और घोड़े के गंयोग से उत्पन्न बच्चे तो माता पिता दोनों की तुलना में गये गुजरे होते हैं। कलमी वृक्षों पर फल जल्दी, मीठे और बड़े तो जरूर आते ३. पर ये उत्तने गुणकारी नहीं होते। फिर उन वृक्षों का विकास एवं जीवन तो निश्चित रूप से अपेक्षाकृत स्वल्प होता है। इस प्रकार का तात्कालिक नाभ अन्ततः घाटे का सौदा ही सिद्ध होता है। इस दृष्टि से जातिगत वर्ण शरत्व की महिमा जो पिछले दिनों बहुत गई जाती थी, अब धूमिल पड़ गई है और जहां तक सुसन्तति का प्रश्न के पूर्वजों की वंश परम्परा को ध्यान में रखने पर बहुत जोर दिया जाने लगा है। आनुवंशिकी अन्वेषण में शोध कार्य की शृङ्खला में एक के कार एक उपयोगी पाली जुड़ती ही चली गई है। हालेण्ड के वैज्ञानिक अगोदकी ने इस दिशा में बहुत कार्य किया। इस दिशा में मेडल पिशर हाल्टेन, राइट, मटन, मार्गन, हर्मन मूलर, फ्रेडरिक मीशर, लीनस मांनिग फ्रिपा, पाटमन क्रिक; माल निरेन वर्ग, रार्ट- हाले, प्रभृति वनानिकों ने विश्व के विभिन्न देशों में शोध संस्थानों ६. अन्तर्गत पात काम किया । अनेक विश्व विद्यालयों ने इस मनापीच धमता-एका दर्शन ] [७५ - - । अन्वेषण को महत्व दिया, प्रयोगशालायें बनाई तथा को समनने तथा उनमें हेर-फेर करने की स्मिा में आगाम :- की । मुविकासित जातियो अपनी रक्त शुद्धि पानी को रही हैं और उनमें अपने ही कुल वर्ग के अन्नात निया : जोर दिया जाता रहा है। मिश्र के शाला भी बहुत कठोर थे । योरोप के नाम परिमान में मनाया। ध्यान दिया जाता रहा है। हीमोफीलिया, एलेप्टी सरिता, पोलोनी, मोरे अक्सर सगोत्र विवाहों के कारण हो। सानिमार; .. कठोर बन्धनों में सेंधी आलिया भागशः नी ऐशी दशा में उभयपक्षीय गंगट उपनाम: का समर्थन करते बनना है और न मान । हिम. पीड़ियों का गुधार सम्मन कोरिया जाम? म गन्दर्भ में पल नि:: गुक्ष्म तल-गुण गुणों का नि मार रानाभाला लाय. समा: ।। आधार पर समाधन लिया और गुभिागिय नीलिमारने :: : । अग्न या मार्ग :: : 1 र गुमला ! यमद्वारा गुमानिant; में उमर कि पी-पत्नी :::: .. . M -- " नपरोकी नामी-.. वांछितममा मंगरमाग कामगार आनुवगिती दिनान गर : -- - पाटन किये हैं। जिनमें आधार पर यह सम्भावना स्पष्ट हो गर्म , कि अभीष्ट विपतामों से सम्पन्न मनुष्य का निर्माण सम्भव पंका दोष प्रवाह को हटाया भी जा सकता है और ये नर-नारी- गुम्मी की बचन विशेषताओं में ही दियासित हो सकती है। और वितियां कमण: समाप्त की जा सकती हैं यह उपलब्धियां भावी मनुष्य विकास की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। भाणा की जानी चाहिए कि यदि यह प्रयास आगे बढ़ते रहे तो समुन्नत वर्ग का मनुष्य निर्माण पर नव ना स्वप्न न रह कर एक तथ्य बन जायगा । जन टियर (आनुवंशिकी) के विशेषज्ञ पियरेलुई और मार्क गण में महमत हैं कि एम विज्ञान की सहायता से मानवी पीढ़ियां एममः अधियः गुवक गित बनाई जा सकेंगी और वह दिन आयगा जब म धनी पर 'सुपरमैन' ( देव मानव ) ही प्रधान रूप से पाये जायेगे । पर दो नाबेल पुरस्कार विजेता जैक मोनो और प्रो० निको- नाय विनिन म सम्बन्ध में बहुत गंदिग्ध है। वे कहते है वंश पर- ग्परागत अवरोध तने अधिक और इतने जटिल हैं कि उन सवका धार परियार बार गुपनगन पीढ़ी का निर्माण तो अभी आवाग कुसुम की पहा जा सकता है। । एप्रिम 'जीन' का निर्माण एक बड़ी दार्शनिक गुत्थी उत्पन्न पता या गुलभाता है अब तक जड़ चेतन का भेद इस आधार पर किया जाता रहा है कि जर वे हैं जिनमें रेनना नहीं । अब हर जद को पेतन मानना पड़ेगा या हर चेतन को जद । शरीर और आत्मा मोग.दर्भ में आत्मवादी दर्शन यह परिभाषा करता रहा है कि शरीर का गौर आत्मा तन , पर अब कृत्रिम जीन का निर्माण यह मिस करता है कि जल को विकसित करने चेतन की स्थिति में या पाया ना सकता है । मून्दतः हर जड़ में चेतना विद्यमान है। इस प्रतिपादन में वेदान्त नी अहंन मान्यना की पुष्टि भी होती है जिसके पाना की धमजा-एन. वर्णन ] [ ७७ .. अनुसार इस जगत् को ब्रह्मगय बताया गया है और हनी : अस्तित्व से ही इनकार किया गया है । अध्यात्म विद्या इस प्रकार के सफल निष्कर्ष बहुत पाने निकाल चुकी है कि तप साधना से पति-पत्नी के शरीरों में विमान गुणसूत्र परिष्कृत किये जा सकते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही. तियों का निराकरण किया जा सकता है और साधना जी से सुसम्पन्न व्यक्ति यदि ब्रह्मचर्य पालन की तरह ही नुसंतति कमान का प्रयोजन मामने रखे तो निस्सन्देह ऋषि परम्परा की पीडितों का सृजन हो सकता है और आनुवांशिकी विज्ञान जिस महामानव आदि पूर्वज को विनिर्मित करने में संलग्न है वह प्रयोजन पुरा किया जा सकता है। भावनाओं का भावी सन्तति पर प्रभाव अध्यात्म विद्या मूलतः भावनाओं के परिकार पूर्ण आत्मा को परमात्मा से, जीव को ब्रह्म से जोड़ने का कार्य करती है। भार- नाओं का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर अनिवार्य मासे पाना मानो अब विज्ञान भी मानने लगा है। आरम्भ में जिन दा० पाउन उल्लेख किया गया है उन्होंने इस दिशा में काफी हानि अनुसंधान किया है । एक प्रत्यक्षदर्शी घटना का वर्णन करना imi हैं-"एक स्त्री अपने बच्चे को नींद लाने वाली गोली देर किनी आवश्यक कार्य से बाहर चली गई। लौटने पर कर बना गा पाया। स्त्री को इससे बहुत दुःख हुआ और वा शोक-मन को बनी। उसी अवस्था में उसने दूसरी बार गर्भ धारणाया। पहले या प्रति उसका शोक ज्यों का त्यों बना रहा, धमनिये मग म रोगी हुआ । दूसरे वर्ष ही उसकी मलिक रोग में मृत्यु हो गः । अब वह और दुःखी रहने लगी। इन अवस्था में तीगमा म , म हठी, सुस्त और कमजोर हुआ। दांत निकलने समय उसी भी मृग हो गई। चौथा पुत्र भी ऐसे ही गया। कि पांचवी बार मी -- 1 । ७८ ] [ चेतना की प्रकार क्षमता-पाय- - परिस्थितियों में मुखद परिवर्तन आये, जिससे उस स्त्री की मानसिक प्रगन्नना बढ़ी। वह पहले की तरह हँसने-खेलने लगी। इस वार जो बच्चा हुआ बह पूर्ण स्वस्थ, निरोग और कुशाग्र बुद्धि का हुआ।" टा० फाउलर का मत है कि क्रोध, आश्चर्य, घृणा, अहंकार गम्भीरता आदि के अवसर पर माता की नासिका, मुख और आकृति में जम परिवर्तन उठाव, गिराव होते हैं, वैसे ही बच्चे की नाक, मुंह, माथे आदि अवयवों की शक्ल भी बनती है। गर्भाधान के बाद स्त्री प्रसन्न नहीं रहती शोक या चिन्ता-ग्रस्त रहती है, तो बालक के मस्तिष्क में पानी की मात्रा बढ़ जाती है। यदि ४ वर्ष के बच्चे के मिर का व्यास वीस इन्च से अधिक हो तो मानना चाहिये कि वह जल-गंचय का शिकार हुआ है, उसकी माँ गर्भावस्था में दुःखी रही है। भय, विक्षेप, अशुभ चिन्तन, उत्तेजना से जिस तरह अङ्गों भद्दापन, बेडोल और खराब मुखाकृति वनती है, उसी तरह शुभ- सझल्प और प्रसन्नतापूर्ण विचारों से बच्चा स्वस्थ, सुन्दर और चरित्रवान बनता है। इसीलिये कहा जाता है---"गर्भावस्था में माँ को सत्य भाषण, उत्साह, प्रेम, दया, सुशीलता, सौजन्यता, धर्माचरण और ईश-भत्ति का अनुगमन करना चाहिये। यह बच्चे होनहार और प्रतापी होते है, जबकि क्रोध, ईर्ष्या, भय, उद्विग्नता आदि अधम त्तियों के बच्चे भी अधम, उत्पाती और स्वेच्छाचारी होते हैं। गलत खान-पान भी उसमें सम्मिलित है। इसके अतिरिक्त जो महत्वपूर्ण बातें गर्भस्थ शिशु को प्रभावित करती है, उनमें से वातावरण मुख्य है। ध्रुव ऋपि-आश्रम में जन्मे थे। उनकी गां सुनीति बड़ी नेक स्वभाव और ईश्वर भक्त थी। अपने महान तेजस्वी होने में वातावरण भी मुख्य सहायक था, भवकि उत्तानपाद के दूसरे बेटे में वैसी तेजस्विता न उभर सकी। एका पारखात्याने वातावरण के प्रभाव का अध्ययन इस में . - पहनाको प्रचण्ड क्षमता-एमा दर्गन ] [ ५० प्रकार किया-"एक बार एक कमरे का फर्श और दीवार मार नील-पोत कर नीला कर दिया। उस कमरे में श्वेत रंग लोग का एक जोड़ा रखा गया। कुछ समय बाद खरगोश के दो बच्चे हुए, दोनों के वालों में नीले रंग को झलक थी। इससे पता चलता बच्चे के मस्तिष्क में ही नहीं, वातावरण का सूक्ष्म प्रभाव स्थन जो पर भी पड़ता है। गर्भवती का निवास ऐसे स्थान पर होना चाहिये जहाँ चारुता हो, मोहकता और आकर्षण हो । हरे वगीचों, गेले. फलों आदि से घिरे स्थान, देवस्थान और विशेष रूप से सजे सजाये, साफ- सुथरा स्थान गर्भस्थ बच्चों पर सुन्दर प्रभाव डालते हैं। स्पेन के किसी अंग्रेज परिवार में एक बार एक स्नी गर्भवती हुई । गर्भवती जिस कमरे में रहती थी, उसमें अन्य दिनों के माम एक इथोपियन जाति के बहादुर का चित्र लगा हुआ था। वह गिन उस स्त्री को अति प्रिय था। कमरे में वह उस चिन को बहुत भावना- पूर्वक देखा करती थी। दूसरे काम करते समय भी उसे उस निका स्मरण बना रहता था। अन्त में जब उसे बालक जन्मा तो को माता-पिता अंग्रेज होते हुये भी लड़ने की आकृति जोर वर्ण:यो पियनों जैसा ही था। उस चित्र को मुद्यायति से बिल्कुल मिलना- जुलता, उसी के अनुरूप था। घरों में भगयान के, महापुरुषों के मित्र लगाये भी इसीलिये जाते हैं कि उनकी भात्रियों से निकलने वाले सूक्ष्म भावना प्रवाह का लाभ मिलता रहे। वातावरण के साथ-साथ गभिणी के साथ व्यवहार, यार और बातचीत भी बहुत सीम्य, शिष्ट ओर उदार होनी नागि। क्रोध, मारपीट, धमकाना, डांटना, दवाकर राना आदि कुटिममा का बच्चे पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कई बार का प्रसार के आदरण बहुत ही दुःखदायी और स्पष्ट परिलक्षित होते हैं। एक बार एक व्यक्ति ने समुद्री-यात्रा के दौरान किमी बात में अप्रगत होतो गर्भवती पत्नी को जोर का धक्का माना। गिरते-गिरने की - में 7 [चना की प्रनाममा. रमन - अंजीर हाथ में पर गई। उसने वार गिरने में गम्भलग हिन्न का व्यक्ति बहा कर निकाला। उसने हरे का बार किया, जिमी उग स्त्री की जंजीर पलटे हुये हाथ की तीन उमलियां बाट ग, यात्री मट में चली गई। जहाज के चले जाने पर गुछ मल्लाहों ने उनकी कक्षा की। बाद में उस स्त्री को जो सन्तान हुई यह देखकर सब जाश्वयंचकिल पर गये विः उगवी तीन जमानियां ही नहीं भी और करवानमः गानमिया दृष्टि से अपूर्ण, झोधी तथा गंकाशील स्वभाव का था। धमाका पैदा करने वाला ऐगा कोई व्यवहार गर्भवती नहीं पारना चाहिये, जिमगे मनिषा में तीन आयात नगे। दो शरीर पर बुरा प्रभाव पर सकता है। बच्चों के मान लिया निर्माण में माता-पिता की घनिष्ठा, प्रगान प्रेम, परस्पर विश्वास का सबसे सुन्दर प्रभाव पड़ता गर बात तो यह है कि माता-पिता या संकल्प बच्चे गो उसी प्रकार पकाता है, जिस प्रकार मादा पल्मा पानी में रहकर में न अपने अण्डों को पकाली है। विटा गुणों का वर्ग में जादिनांदी भेगपूर्ण भाषनागों में होता है, ननिय गर्भावग्या में नो-पुरानो अधिनांगमय माध-गाम विवाना चा।ि पवित्र आचार प्रगान भणी रगनी चाहिये, ग बच्चे शीर तीन मिजाज भी पूर्ण स्वस्थ होते है। न उदाहरण से या वातार भीटीमीर मिनी प्राजील मीनी विदा किया। सांवलामा, पर उगमनमा अधिन भी। नीता प्रेग मा । पर उन माननी M [भा। गछ दिन बार उसने मा सो मा । पा गोरखपी पी. परमजीत पेतना को प्रभाव पान वनी रहती थी इसलिये वह अपनी नई पत्नी को भी उसी भार में देखा करता था। इस स्त्री से एक कन्या उत्पन्न हुई, जो बागोनिसन लड़की की तरह साँवली ही नहीं मुखाकृति से भी मिलती-जुलती गो। यह गर्भावस्था में पिता के मस्तिष्क में जमा हुआ पत्नी प्रेम संस्कार ही था, जिसके कारण वालिका ने उसका रंग और ना ग्रहण किया। इन समस्त उदाहरणों से स्पप्ट है कि गर्भस्थ शिशुओं का . नुवर्ती निर्माण सम्भव है । अपने रहन-सहन, स्वभाव और सालों स्वस्थ और सुन्दर बनाकर भावी बच्चों में भी वारा सो सद्गुण, तेजस्विता और मन स्विता का विकास किया जा सकता। यह वात माता-पिता दोनों को मालूम होनी चाहिये । विज्ञान द्वारा इस तथ्य का पता तो लगा ही लिला गगा। कि शरीर अरवों कोपाणुओं से बना है, पर उसका आरम्भ पर से होता है, इन टुकड़ों में एक माता का भाग होता है- for का। यह आरम्भिक जीवन गोप-जैव रसायनों का एक मिया मात्र है। इसके चारों ओर एक गोल बड़ा रहता है । इस पर भीतर जीव द्रव ( प्रोटोप्लाज्म ) के दो भाग हैं। गोलमा गग 'भाग कोप केन्द्र (न्यूक्लियस) कहलाता है। उसके नारों ओर हल्ला शुक्र कीटाणु (साइटोप्लाज्म ) है । गुण गुवों की विकृतियां और लग्णता की अगर कट माग और असाध्य रोगों के रूप में उभरती हैं। मामूली बुगार आहार-विहार की गड़बड़ी से हो सकते है और में भागीदा दारू से अच्छा किया जा सकता है। पर जब बीमारी गहराई में एसी वैठी होती है-उसकी जड़ कोशिकाओं के अनमें प्रति जाती है तो साधारण रासायनिक पदायों की पोन कोन की हो पाती और शुद्ध उत्पादन की नन्हका उमादन भी बुतार यांनी -- ८२] । [ चना की प्रकट ATTET :
मगर चलता रहता है। बहुन बार तो यह कोशिकागल गुण मूनों
मेठी हुई गणता विकृत आकृति एवं प्रगति बनाने लगती है।
।' स्वास्थ्य मंरक्षण में लेकर दीर्घ जीवन तक के सूत्रों
कामियाओं के उस कक्ष में भरे पड़े है जिन्हें 'जीन' बहने हैं । इनकी
भाजनक क्षमता का एक छोटा-या प्रमाण तब प्रत्यक्ष देखा जाता
जब ये बिकान का लक्ष्य सामने नराकर अपने विस्तार में प्रवृत
होगा।
आग्नयं तो देखिये भ्रूण कलल धामम परते समय पहली
कोणिका का भार एक भाग पदम लागु भाग गीगावर
होता है, पर २८५ दिनों में वह भार लगभग गात पोहो जाना।
गुवा शरीर में ७० अरव गोशिकाएं पाए जानीनय जान
निशु में भी वे घरों की नंग्या क्षेत्र में प्रण कर गुगी होगी।
मागे अनेक और लघु में विराट बनने का घर मा अदा
।
गोणिकाओं के प्रमुख तीन भाग होले (१) कन्नर
(२) जीवद्रव ( ३ ) गोमिया मिति। मोनिया के भावर .
पदार्थ का बाहर आना या बाहर पाले फा भीगर माला न मिति में
जोगारही होता है । या मिति अनुपयुक्त पदामों को भीतर जाने में
अवोधका काम का जीवन जी सानिगाभाग
माटोनाम कहते , गोपिका रे करने, कार पाय दो बार
निकालने एवं नाम लेने का नाम कल्ली: मोगिया कर
एक एना, गाला पदार्थ का है जिने बनियानामित
जाने पर पूरी गरे बिना नियन्त्रण भी
। जीवन मे समस्त राम नाम:
यश पर विभिन्न गोपिला अपने
बालागों में गंदन की कामनार में की जाती
मला। सगोवा और गया
पायापटपमा-
इसके अपवाद हैं। उनमें विखण्डन से ही नये जीव का लिम आरम्भ हो जाता है। नाभिक के दो भाग हुए ति दो लोगोमा अस्तित्व तैयार । उनका जन्म, जनन, परिवर्तन और मृत्यु मा मिन. सिला ऐसे ही चल पड़ता है। साधारणतया दो जनन कोशिकाओका परस्पर मिलन भी किसी जीव जाति की पीढ़ियाँ बनाने और माने का आधार रहता है। इन कोपों के जीन्स को विकसित एवम् परिपत किया जा सकता है। यह प्रयोजन मानव शारीरिक उधेड़ बुग से नहीं करने मानसिक ऊर्जा का सम्वेग तीव्र करने से सम्पन्न हो सकता है। तभी और पेड़-पौधों में इस स्तर की उलट पुलट भौतिक प्रयोगों में भी ए। हद तक सम्भव हो गई है पर मनुष्य की कायिक स्थिति में भी फेर किया गया है पर प्रकृति की जिसमें स्वस्थता की मूलभूत क्षमा भी सम्मिलित है-प्रबल मनःशक्ति को ही अपेक्षा करती है। मनोबल तीन हो तो सङ्कल्प शक्ति एवम् चित्त की एकाग्रता के आधार पर सम्पन्न किये जाने वाले ध्यानयोग जैसे उपायों से बोगिता अन्तरंग स्थिति में हेर-फेर किया जा सकता है। एक औसत कोशिका का आकार व्याग सन्नी मीरा दो हजारवां भाग होता है। देखते-देखते इनमें से लागों मोती और जन्मती रहती हैं। माता और पिता से मिर्फ दो नमों कोशिश सारे पैतृक गुणों का सार लेकर आपस में मिलती है और उसी गिल के अधार पर एक नये प्राणी पा सृजन होना। से दो 387 कोशिकाएं जैब इन्जीनियरिन को गिद्धाल पर पल भारदार +नान में जुट जाती हैं और सफलता प्रयंकः अपना कार्य प्रणाममा में आरम्भ करके प्रजनन स्थिति माने तक का कर कर लेती हैं। सभी मनुष्यों और मानुयेत्तर अन्य प्राणियों में जीवा उदभव की यही पद्धति है । इनष्ट के प्रसिद्ध प्रति भात्री का [ चेतना की प्रष्ट क्षमता पर द ४]
शाधिन ने प्राणियों और वनसलियों के मृल अग्नित्य के मयंध में
दिप अध्ययन कर १६ वीं शताब्यो के नृनीय और चावलक में का
मिक निकाला कि विभिन्न जीवों की विभिन्न मानियो नमा
उपजागियों में भरभुत समानतायें है ।
लर पं. प्रगिन्द्र प्रनिगाग्री हाधिन ने प्राणियों और
नियों
मूल अशिलन्य के सम्बन्ध में दो ग्रन्या का प्रतिपादन
लिया निगमान जीवधारी एकही आदि जीव विपिन
और परिवतिन रप है । परिस्थितियों का गामना करने के लिए नीयों
में अपने आपमें आवश्यक परिवनंन किये। धाधिन का कथनी
:शि परिस्थिनियो गा रवाय और प्राणी को जीधित कनेकोन्या
न दोनों तत्वों का समन्वय ही जीवा की अगगिन
प्रानियों के उदभव का मूल कारण है।
जव समस्त जीवाधारी की आत्मानना की मात्रामा
१ और उनके बीच एकता की मधन मानावना किमान
फिर उनका पुनः विभाजन सयोजन कर गयो नी जी
जाति का नगन किया जा सता आजमी पनि
मन्मन उपयुत्त हो । बजानिक ग मायना पो
और अभिनय उत्पादन पी गुत्र प्र.मनाये मेरा
क संजन। जनके मा भात्री सामान मान
गिक से पनी उपसुनवालो ने भनी ती दिनार
रागार में माना और गम माना ।
मामी भागात विचार पर
नयी पीढ़ी का निर्माण की मगायनाने ।
पता: यार
[
प्रायश्चित्त प्रक्रिया से भागिये मत
में
रसीली (एक प्रकार उभरी हुई गांठ की बीमारी) की
मरीज एक स्त्री एक वार श्रीमती जे० सी० ट्रस्ट के पास गई और
अपने रोग की चिकित्सा के लिए कोई औषधि देने की प्रारंना मरने
लगीं । श्रीमती ट्रस्ट अमेरिका की विश्व विख्यात गल हैं गिनाने
धर्म और अध्यात्म को वैज्ञानिक रूप प्रस्तुत
करने का प्रगलही
नहीं किया, अपितु अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियों से गाय पी।
और पतित लोगों का भला भी किया है। उनके प्रबनन और माता
त्मिक गवेषणायें सुनने के लिए बड़े-बड़े वैज्ञानिक समापना ।
ट्रस्ट ने उस महिला को बहुत ध्यान में गा और
लगी-आप नहीं समझ सकती, पर जिन्हें प्रकाश की गति और
अवस्था का ज्ञान होता है वे यदि कोई न भी बताये को भी, किमी
के भी अन्तरङ्ग की बात जान रोते हैं। आप के शरीर में मुझे,
काले रंग के अणु दिवाई देते हैं जो ग बार प्रीति
जीवन में कहीं कोई त्रुटि, विद्या पाणी अने निरः प्रवृतियां
आप दुसरों ने किराती रहती है। आर प्रायनित का गाम ?
कि तो हम विश्वास दिलाते हैं कि आपका पर छोटे छोटा गाना
६]
[ तनावी प्राटामा-गर, दो
गया भविष्य में अवण्यम्मायी कठिन रोगों का निवारण भीमनेही
मला।
न्त्री बोली-~-माता जी ! मैं आपके पास चिपिलानिए
आ उपदेश तो बनेरे पादरियों, मन्त और धार्मिक व्यक्तियों में
गुन की। औपधि दे सकती है, तो दीजिए, अन्यथा मन का में
जाये।
जग महिला की तरह मैकड़ों लोगों के जीवन विकार पा
होते है, मन में दूषित पाम ग्रोध, लोभ, मद मगर आदि विकार
उठने रहते है, उनमे प्रेरित जीवन में जो पाप गम्भव है उन लोग
गया नामान्य दरें की तरह अपना लने हैं। काम वागना पानि
पर किसी भी नारी को देनार उन गित उमा भी
गिगी को दुश्मन की ननद देना और बंगा की याद
समसार कारला है नाभी व्यकिही बानी दिल, चन,
कपट, और मिलावट तक पाते है भनी उनमे मनाममा विना
ही अतिशयों न हो? जब उसने या बना जामा पनीर
विकारों का काम भोग भोगना पंगा, या पापा-या लोग.
गोगा और बीमारियों को रप में
पानी नमार को की
प्रायचित कर पाप बोस ने मा को नका मार दी।
विचा को कियानुनी पितान
'-
न केवल तर्क संगत रही वरन् विज्ञान सम्मत भी हो गई है। श्रीमती ट्रस्ट के समझाने से उस महिला पर बड़ा प्रभार पड़ा । उसने अपने जीवन के सारे दोप स्वीकार किये और बाबा उसे क्रोध बहुत आता है इसी दुर्भाव के कारण वह अनेकों पाप पार चुकी है । उसने कई बार चोरी भी की है और भूठ-मूठ कहार नोगों को लड़ाया भो। उसने अपने सारे ऐच स्वीकार कर लिये सोया ट्रस्ट के कहने से उसने कुछ दिन तक उपवास किया, उससे उस गाँठ भी अच्छी हो गई और मन की अशान्ति भी दूर हो गई। श्रीमती ट्रस्ट ने इसी तरह एक नवजात शिशु के रोग उसकी मांगे प्रायश्चित्त कराकर ठीक किये। उन्होंने ऐसे सैकड़ों व्यक्तियों से निका सन तप कराकर उन्हें शरीर और मन से शुद्ध बनाया वह सब उपरोन वैज्ञानिक सत्य का ही प्रतिफल था। एकबार इंगलैंड के डाक्टरों ने एक प्रयोग किया। बदर के एडिनल में "मेडुलरी भाग" में हल्की-सी विद्युत् करेन्ट प्रा करके देखा कि उससे "एडिलीन" हारमोन के साथ की माशा वढ़ गई उस समय बन्दर की मुख मुद्रा में भयानक होलाण उभर आये। फिर उन्होंने कुछ तोब रमायनों द्वारा उस भाग को "शून्य" कर दिया और तब फिर विद्युत करेन्ट प्रवाहित किया "एडिलीन" बन्दर उम गमए पास क्रोधित भी नहीं हुआ। इसके साथ एक मे व्यक्ति का Triram गया जिसने किसी महिला के पर्स की चोरी करनी थी। उग गमा वह अत्यन्त भयभीत था कि कही पुलिस पर न ल भोर पी जाये। डाक्टरों ने उसकी जांच की तो पाया कि उनका मागको नाड़ी संस्थान उत्तेजित है और उसमे मीर के परे मन मेरा. लिज्म ) पर असर पड़ रहा है ऐसे समय नी अगर वाली की रियां होने की सम्भावना डाक्टरों ने भी की। गोक की स्थिति में "यलमा फोलिकल टेकुलेटिंगमामीन failer बहुत थोड़ा निकला। .. ८ ] [गना की प्रचार र" में कमी हो जाने आदि के उदाहरण में भी पानी निष्कर्ष निपललाई निः युरी भावनायं मनुष्य गरीर पर प्रतिकाल प्रभाव faपित गप गे टालती है। यही गंग के रुप में उत्पन्न होने म- लिये यदि रोग में स्थायी बचाव करना है तो अपने मनोमय नपान को शुद्ध रखना ही पड़ेगा। साथ ही माध साथ ही माध असतक जो मदिनमा गन में मर गई हैं उन्हें प्रायश्चित्त द्वारा परिभाजित करना होगा। जब ना मनुष्य इन्हें स्वीकार नहीं करता वह अन्तर्वहन न बन नही "हारमोन्म यया है" और उनका मनुष्य परीने गया गम्बन्ध, यह ममाने से उत्त, तथ्य की गहराई में प्रवेश किया जा मनाता है। मनुष्य शरीर में दो प्रकार की अभिर्या (ग)ोनी । अधियां एक ऐगे कोणों ( मल्ल ) के समुदाय को महंगे; गो जिगी गांट की सवल में बदल जाने और जिनसे मनन गमावनिमः याय निकालता रहना है न सार को ही हारमोन्ग" का । . प्रतिपय यह होती है जिनका सम्बन्ध नलिकालो साता है. दुगरी गलिका विहीन (पटनेन ने पटन) कोली गरपन्ध ननिकानों में नही होता ये साध मनिाबी गलि. अनुगार निकालनी और मनुष्य पनीर पर प्रभार रानी गर्वाधिक मात्रा की। अनी मानिस बार में दयान जान पाये । जब जानेंगे तब पूर्व को मनार, म विजन ही आश्चर्यजनक सपनामा मागे ना माग नही जानो पर अब दिशान मा मनाने का दुधी भावनाओ के द्वारा को पा ..! साकार लामायनिक मला मालिक भारतीय और दिया गया और पानी को पदना पी। कमानी मानद - उतरने लगे हैं कि वस्तुतः शरीर का सारा संचालन अधिकांश देव शक्तियों-ग्रहों-उपग्रहों या सूक्ष्म आकाश भाग से ही हो। "ओकाल्ट एनाटामी एण्ड दि वाइबिल" पुस्तमः में डाल होगा हेलिन ने--कोलम्बिया विश्व-विद्यालय के डा. लुहन वर्मन ने निगम -व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाली ग्रन्थियाँ (सोडा रेगुन परसनैलिटी) के हवाले से बताया है कि मनुष्य के शरीर में अपनी ग्रन्थियाँ हैं जो देखने में छोटी होती है, पर उनका महार मा है। पाचन क्रिया से लेकर मनोवेगों तक का सारा नियम ग्रन्थियों से ही होता है इन्हें वाहिनी हीन (क्ट लेरा) महिला (ग्लेण्ड्स) कहा जाता है अन्तःलावी हारमोन्स इन प्रपियों में ही स्त्रवित होकर शारीरिक उतार-चढ़ाय, घटना-घड़ना, पापा आदि का कारण बनते हैं। एनाटामी मेडिकल कालेज कर्नल विश्वविद्यालय के प्रोमा 'डा० चार्ल्स आर स्टार्क यार्ड ने इन प्रन्थियों के आधार पर मन जीवन की एक नई धारणा प्रस्तुत की है जो भारतीय आधार शोधों से शत-प्रतिशत मेल खाती है। To rri firmitif आन्तरिक लाव वाली प्रन्थियां एक महान शाम में धारण से लेकर मृत्यु तक स्त्रियों पुरुषों तथा मनसा रोगी वाले जीवों तक का नियन्त्रण करती है। "फिजीकोनामी' सोशलाजी की मान्यतायें भी सब " अमर" में और उसके प्रचण्ड प्रभाव को स्वीकार करने लगो डेस्टिनी" के लेखक डा० ईयो गकी कार में तो यहां तक है कि अन्नः मावी (इलो गाइन पा) मन्षियों पर 29 रखने वाले लोगों ने ही निहाम पर अधिकार या aran को कहीं में कहीं बदल दिया है। नेपोलियन बोनापार्ट पा देते हुये उन्होंने लिया है कि यदि वाटल के मन के गमन की बोनापार्ट की "पिचुटी ग्लष्ट" ( पीय मन्धि ) में मी १०] [ नानी REATE जाती तो वह हारता नहीं । जो नंपोलिन अत्यन्त दूरदर्शी निर्णय भी गुग्गज ले लेने की क्षमता खाता था उसकी विवेक बुद्धि बुरी तरह रहामा गई । जिस समय वह एल्वा में निर्वासित था उस समप लेगर्ड अम्धि नडरादा गई। यह सारी बातें तव प्रकाश में आई जब सेंट हेलेना में उसके शव की अन्त्य परीक्षा ( पोस्ट मार्टम ) की गई। जब तक उसने एन ग्रन्थियों पर नियन्त्रण रखा, जब तक उसकी अन्त:यानी ग्रन्थियाँ सशक्त रहीं नेपोलियन सारी दुनिया को जीतता रहा पर जैसे ही वह इन शक्तियों से वंचित हुआ वह नष्ट ही होगया। योग साधनायें इन देव-शक्तियों के विकास का ही वैज्ञानिक उपग्राम हैं। आने वाले दिनों में जबकि अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के पदार्थ ( मंटर) की खोज होगी और उसकी तुलना ग्रहों के पदार्थ से की जायेगी तो लोग आश्चर्य करेगें कि मनुष्य गरीर में आकाश तत्व किग विलक्षणता के गाथ उपस्थिति है और कितने आश्चर्यजनक ढङ्ग में मनुष्य को अपनी इच्छा से बाँधे हुए है। "ओकाल्ट एनाटामी एण्ड दि बाइबिल' पुस्तक के वैज्ञानिक निरायः ने उस तरह का तुलनात्मक अध्ययन, जिस तरह "कुण्डलिनी तन्त्र" में भारतीय योगियों ने किया है वैसा तो नहीं किया पर उसने माना नि अन्धियों का सम्बन्ध निश्चित रूप से नक्षत्रों ( स्टार्स ) मे। उन्होंने इन्हें "आन्तनक्षत्र" (इन्टोरियर स्टार्स ) लिखा है और बताया है कि सूर्य और हरिग्रह पीनियल ग्लप्ड से सम्बन्ध रखते ने तृतीय नेत्र प्रन्धि भी कहा जाता है उससे 5 मध्य में "आज्ञा- पन" काही स्पष्ट प्रमाण मिलता है आज्ञा-चक्र जारत करने वाला "." ध्वनि मुन मरता है । मार सरफ, को दूरवती घटनाये देश सुन सकता है । यह सूर्य शक्ति का भाय है। परण और चन्द्र का सम्बन्ध, पिचट्री अन्धि' से है। माये. उतार चलाद ने मन पर उतार चढ़ाव होता है यह इन पोमोजली की एकता का प्रमाण है । वृहपति उपवृक्क (एडिनल ) गानीमन ममता एक गंन । [६१ . पर, प्रजननं ग्रान्थ ( गोनाड्स) पर मकल बुद्ध का गाना ( थायराइड्स ) सूर्य का पैरा थायराइड्स ( उपगल ग्रन्थि ) से मना है इन ग्रहों के उतार चढ़ाव इन ग्रन्थियों को प्रभावित करते है। सूक्ष्म अवयवों का विज्ञान सामान्य शरीर विज्ञान के अनुसार यह जाना-माना जात हैं कि देह के इन्जन को चलाने के लिए हृदय, पुरास, जमा आतें, जिगर, गुर्दे, वृक्क, मस्तिष्क आदि अङ्गों का क्रिया कानात प्रमुख उत्तरदायित्व वहन करता है। उनकी बनावट और प्रिया पद्धति शब्दच्छेद आदि द्वारा समझी समझाई जाती है और बीमार पड़ने पर इन्ही में कहीं खरावी कमजोरी तलाश की जाती है। की गतिशीलता एवं शुद्धता इन्हीं प्रमुख अङ्गों की स्थिति पर निर्भर रहती है । ज्वर, खाँसी, दस्त, व्रण दर्द, सूजन, शिथिलता, अशा आदि रोगों के वाह्य लक्षण भीतरी अवयवों में विकार आने के फलस्वरूप ही दृष्टिगोचर होते हैं। विज्ञान के अन्य क्षेत्रों की भांति शरीर विज्ञान माग में जितनी गहराई के साथ प्रवेश किया जाता है, उगे ही हत्वपूर्ण रहस्य प्रकट होते चले जाते हैं प्रानीन काल में पराली ने नृष्टि का आदि कारण माना जाता था। पर नगीन मी . णु, प्रकाश, चुम्बक, ईथर, गैस, ताप आदि तत्वों के साथ करना पदार्थ का मूल कारण सिद्ध करती हैं । म्यूल पंच नल को क्ष्म तत्वों के मिश्रण मात्र हैं। उनका अब कोई अगिा। हीं माना जाता। शरीर विज्ञान में अब हृदय अमाशय आदि को माता आदि मानता है । उसके मूल संचालन में दूसरे तत्वों एवं मम भा. स्वों का हाथ बताया जाता है। इन्हीं पर हमारे बारथ्य बाबा आधार निर्भर रहता है। , [ नेतना की प्रथा आम ६२ ]
सुक्ष्म अवयवों में हारमोन' अपना महत्वपूर्ण यान नपरे ।
उनकी गयिता, निधियना का मार्ग मारीति और मानविन
ग्धिति पर भारी प्रभाव पड़ता है।
शरीर में दो प्रकार की प्रन्धिर्या है। एक प्रकार की प्राधियों
पसीना आदि मलों के विसर्जन की प्रक्रिया सम्पन्न करती है।
गरी प्रकार की एक रन विशेप का मात्र कारली राम
मिलकर समरल गरीर को प्रभावित करता का विपी
हारमीन है।
पनीर की आवालि मंगी हो गया। प्रति निर्माण
में हारमोन रंगों का भारी जा सका। कई बार मात्र
मन.रियम, स्वभाव, गति को भी आश्चर्यजनक गति प्रमाका
करते हैं । स्वगंचालिल गाली नपान की गतिमीलना गरी
रिपनि मारण भारी हर पर उत्पन्न होते हैं। नगीन
को जीवन रग का जाय तो अत्युनिगगी ।
हारमोन प्रवाहित करने वाली प्रतियोजिमनापर
उनमें पांच मुरय है। यभा-
(१) परापट (ब्लिका)-- प्रधि गले की पाल
तिका पजन आधी भी कम का
मिलने पालिका का पताना पानी :
मायतीन कता. सतिपिकाकोन ::
नाजिनादि भी।
निका विकागचपन रीमा
मा पति बिकान माता, मगर
को जोरपति र जाती र
माया र म :
।
-
तनाम पर समस
--
शन द्वारा देने पर इसका अभाव दूर हो जाता है भेटगोमर
खलाने पर तो शरीर तेजी से बढ़ने लगता है।
इसी ग्रन्थि पर मनुप्य की कार्यक्षमता निर्भर करती।
यदि यह ग्रन्थि तेजी से काम करने लगे तो कार्यक्षमता में अधि:
वृद्धि हो जाती है। इतना ही नहीं तेजी, क्रोध, विनिताल
जल्दबाजी, भागदौड़ की वृत्ति अधिक बढ़ जाती है। यदि यह को
अधिक कार्य करें तो मानसिक और शारीरिकन्याय के लिए उसम
है। इससे गम्भीरता, मस्ती, कार्य-शीलता, प्रसन्नता प्रात होगी।
(२) पिच्यूटरी-यह प्रमुख ग्रन्थि है जो अन्य सभी प्रति
पर शासन करती है । यह अंगूर की शाल की मलित के नीचे
नली से लटकी रहती है। इसकी स्वस्थता पर ही अस्बिागर की
वृद्धि, शरीर का विकास निर्भर करता है। इसकी विकृति मे नीम,
समय के पूर्व बुढ़ापा, अस्थिपंजर की कमजोरी आदि कार का
हो जाते हैं ।
(३) पीनियल-यह मस्तिष्क के पित्री भाग में
किसी
। इसकी तेजी पर अवस्था से पहले कामवासना और
असाधारण प्रतिभा का होना निर्भर करता है।
(४) अनिल्स-गुनों के जानी मि पर को Eि
होती हैं । इनसे कार्टन नाम का रस निगृा होता मगर
नष्ट हो जाने पर मृत्यु हो जाती है । इन गलियों की यायप्रति
क्रिया के फलस्वरूप पुरुषत्व की वृद्धि होती है। आलम र
भय, प्रोध, चिन्ता आदि का सम्बन्ध मी निशान
ग्रन्थियों पर प्रतिक्रिया होने से रक्तचार वाला है। नारी
में तेजी आ जाती है। भय, क्रोध, उजना की में
से अधिक काम कर बैठना, अग में पाद जाना, पामा
देवा, तेजी से दौड़ना की प्रतिमा के पर संवा ।
१४ ]
[ धामाका र ?
। इनका रा एड्रीनलीन इन्जेक्शन से देने पर उत्तेजना पैदा हो. जाती है। (५) गोनेड-~~-यह लिन सम्बन्धी प्रमुख ग्रन्थि है । इसके बार लिन सम्बन्धी विकास निर्भर करता है । यदि विपरीत लिङ्गी. र दिया जाय तो वैसी ही प्रतिक्रिया होने लगती है। वैज्ञानिकों ने परीक्षण के तौर पर मुर्गे की गोनेड ग्रन्थि का रस एक मुर्गी के. भरीर में छोड़ा । कुछ ही समय बाद मुर्गी ने अण्डे देना बन्द कर दिया । औरे मुर्गे की तरह बांग देना शुरू कर दिया । लिङ्ग परिवर्तन यो मूल कारण में इस ग्रन्थि का परिवर्तन भी मुख्य होता है । जिन स्त्रियों में यह ग्रन्थि अधिक विकसित होने लगती है उनमें पुरुपत्व के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इस तरह की गरीर में अनेकों ग्रन्धियाँ होती हैं । किन्तु प्रमुग ग्रन्थियाँ ये ही हैं जिनके आधार पर शरीर को स्थिति निर्भर पारती है। हारमोन स्रावों के सम्बन्ध में विशेष अनुसंधानकर्ता डा०. माया गेंग ने इन्हें जादुई रेन्ड कहा है और बताया है कि बाहर की गारीरिक बनावट या स्थिति कैसी ही क्यों न प्रतीत हो, उनकी पास्तविक स्थिति जाननी हो तो इन सावों के सन्तुलन और ..क्रिया.. नाम का परीक्षण करके हो यह जाना जा सकेगा कि मनुष्य का भारत पियः स्तर और व्यक्तित्व क्या है ? हारमोन न केवल अङ्ग- प्रत्यक्षों को समर्थता असमर्थता के आधार हेतु हैं वरन् व्यक्तित्व के निर्माण में भी उनका गहरा हाथ है। मनः शास्त्री एडलर ने काम प्रवृत्ति की शोध करते हुए बड़े दिलण सप्य प्राप्त किये । बाहर से अत्यधिक सुन्दर, आकर्षक और रामनीपता की मूर्ति दीयते हुए भी कई महिलाओं को उन्होंने काम पति से सर्वमा रहित पापा । न उनमें रमणी प्रवृत्ति थी न नारी पला उमंग । उन्हें दाम्पत्य सोल जैसे दुर्वल काय खिलाड़ी, ग्लामे- . जनाको प्रचन्ड़ क्षमता एक दर्शन ] [ ६५ LI विजउड जैसी बोनी नर्तकी की इन विशेषताओं के रहस्य बार उनके हारमोन रसों में सन्निहित पाया गया। कितने ही आहार मिलने पर भी स्थूल काय देखे जाते हैं और कितनी २ मक्खन, मलाई का बाहुल्य रहने पर भी देह पतली ही बनी रहा है। कुछ लोग रोगों के दवाव को इतना सह लेते हैं कि जितने में गाnt न्यतः मृत्यु हो ही जानी चाहिए । इसके विपरीत कु, भी खोखलेपन के कारण जरा-सी अस्वस्थता में ही बोल जाते। बौनापन अथना लम्बा होना इन हारमोन रसों पर निर्भर रहता है। 1 . मनुष्यों की शारीरिक और मानसिक स्थिति में जो सारा पाताल जैसा अन्तर पाया जाता है, उसका कारण उनका आर विहार, संस्कार वातावरण, शिक्षण, सङ्कल्प भी हो सकता है । अनजाने और अनचाहे प्रवाह में मनुष्य को पहीं से बात कर जाने और कुछ से कुछ बना देने का श्रेय इस जीवन मी ग उमा थी न क्षमता । इसी प्रकार उन्होंने कितने ही युवकों को , जिनकी शारीरिक स्थिति मर्दानगी और वैवाहिक जीवन की आर. श्यकता प्रतिपादित करती थी पर वे वस्तुतः नपुसक थे । न उ मत में उमंग थी न जननेन्द्रिय में उत्तेजना । इसका कारण मा करने पर काम तत्व को प्रभावित करने वाले हारमोन म । अभाव पाया गया। इसके विपरीत उन्हें ऐसे नर-नारी भी मिले अल्प वयस्क एवं वयोवृद्ध होते हुए भी काम पोडिरा रहा थे । से रुग्ण रहने पर भी कितने ही व्यक्ति ऐगे पाये गये जो और कामसेवन में प्रवृत्त थे । इसके विना उन्हें अगत्य, बैचेनी अर होती थी। इस विचित्र असन्तुलन का कारण उन्हें हारमोन पाने - सोनाव में अवांछनीय हेर-फेर होना ही प्रतीत हुआ। वीथोवन जमे बहरे प्रसार मङ्गीतज्ञ, श्रीमाम्य नीर, लाने वाले धुरन्धर वक्ता, डेनियल बोन जी मन्द [पेतना की प्रन मे विप रस साय की मात्रा पर ही निर्भर हैं। नर से नारी और नारी से नर बनने के जो कितने ही उदाहरण सामने आये हैं, इन लिम परिवर्तन की स्थिति हारमोन को गतिशीलता में मोड़ आ जाने को कारण ही, बनी बताई गई है। स्वसंचालित नाही संस्थान की सक्रियता मनुष्य के नियन्त्रण वाहर बताई जाती है । अचेतन मस्तिष्क के क्रिया-कलापों को. जीवन बोपों के परम्परागत विकास क्रम से संचालित बताया जाता । यह भी मानवी प्रयत्नों से अप्रभावित संस्थान समझा जाता है । हारमोन रसों के बारे में भी ऐसी ही मान्यता है कि उनकी न्यूना- धिकता को घटाया बढ़ाया जाना कठिन है । प्राणिज हारमोन निकाल पर उनके विशनो द्वारा उस कमीवंशी को संतुलित करने का प्रयत्न किया जा रहा है पर वह उधार का अनुदान क्षणिक लाभ देकर समाप्त हो जाता है। अपने निज के हारमोन वाव उत्तेजित या मिथिल करने में स्थायी प्रभाव उत्पन्न करने वाले उपचारों में अभी चिकित्सा विज्ञान को यत्विाचित ही सफलता मिली है। हारमोन सायं इतने महत्त्वपूर्ण किन्तु इतने अनियन्त्रित होने के कारण मनुष्य पोलिए अभी भी एक पहेली बने हुए हैं । सूक्ष्म विज्ञान यहाँ से आरम्भ होता है, जहां स्थूल की समाप्ति होगी । भोतिक प्रपल जहाँ तक काम दे सके उसी को भौतिक शेष माना जाता है। इससे आगे की परिधि को समाप्त समझ लेना जति नहीं। आधि भौतिक से आगे भी दो विशाल काय क्षेत्र आमात्मिक और आधि दविक। इन क्षेत्रों में संव्याप्त विधान-आधि भौतिक क्षेत्र में उपलब्ध सामर्थ्य एवं सफलता से मिनी भी प्रकार कम नही है। हारमोन याय मदधा स्वेच्छाचारी हैं, उन पर मानव चेतना या मोई अधिकारी.पा. मान बंटना ठीक नहीं । आपधि विद्या और Refeी सम्भव है यज्ञ लग पहुँच नहीं, पर यह समजा मायाको प्रचार समता पर दान ।
- जाना चाहिए कि शरीर के क्षेत्र में चल रही गतिविधियों पर भी गत आत्मा का कोई नियन्त्रण हस्तक्षेप नहीं। आमिर शरित का कर हृदय जैसे यन्त्र को रोक देना और फिर इन्छानुसार मंग कर देना योग विद्या द्वारा सम्भव हो गया है। इसे वंशानिः पर क्षणों में प्रमाणित किया जा चुका है। स्वसनालित नाही गंम्मान को मन्द, बन्द या तीव्र करने में प्राचीन काल के योगामामोतो! थे ही अव भी सिद्धान्त प्रतिपादन की दृष्टि से जो प्रमाणित किया जा चुका है। हर हारमोन रसों में ही दया अनोगान जो आत्मवल के प्रहार से उन्हें घटाया बढ़ाया जाना सम्भार हो सके । शरीर पर सर्वतोभावेन नियंत्रण शासन संचालन करने क्षमता जव मनुष्य योगाभ्यास द्वारा प्राप्त कर लेगा तब हारमोग जैसे अद्भुत लावों का सदुपयोग करके व्यत्तिय गो पामगार ढालना, बदलना, सुधारना सम्भव हो जायगा । योग और . विद्या के माध्यम से व्यक्तित्व में इन्ही बीजों का आरोपण free जाता है। आत्म साधना का विज्ञान व्यत्तित्व के विकास में या पहुंचाने वाले कारणों, पाय-कलापों और पिछले जन्मों को दूर कर व्यक्तित्व को विकास को दिशा में असमर का। इसके लिए अपने पिछले कर्मो का दंड भुगतने और प्रागविरा fa से गुजरने के लिए हर घड़ी हर पल तैयार रहना चाहिए। { चेतना की सद्गुरु हमारे ही काय-कलेवर में राजा ग्रहाध को एक बार शरीर को अनित्यता का मान होने पर वैराग्य हो गया। आत्म-राक्षालार के लिये उनक, अन्नकरण व्याकुलता उत्पन्न हो उठी। पूछने पर गुग ने पमनाया, तान ! भारम-साक्षात्कार के लिये तपश्चर्या आरण्यक है, पर तप का भी एक विज्ञान है और जो जो जानता है, उसी के मान- मन व संभ में किया हुआ तप ही मादक होता है। चाहे जब, पाई जो, शिरा सप नही कहलाती या एका कामक साधना पटति द्वारा जाना के पर घर मे मनापरण यो परिमानित पन्ना पगा। साप आत्म-देना मा पनि काम पाग जाने की सापको सम-शान को दीक्षा देने में समर्थ ।। मी माना पाकार- भगवन ! "माओबाममानो.. जापा, मोर मानकापमा - . .
-- - कोई शारीरिक सुख का वरदान मांग तो। मैं तुम्हें हर देने में भी समर्थ हूँ। सुखों को इच्छा त्याग कर नादिनार जीवन मत जियो? ब्रहद्रय ने जो उत्तर दिया है उसका स्वर भिन्न वही है जो अब वैज्ञानिक बताते हैं। उन्होंने कहा- भगवन्तस्थ चर्मस्नायुमज्जामांस शुक्र शोणि लोमा दूपिकाविण्मूत्र वात-पित्त कफ संघाते दुर्गन्धे निःसारेमिन शरीरे की कामोपभोगैः ।। -~-मयावनिरः । हे भगवन ! यह शरीर हड्डी, चमड़ा, नाग. मांस, मो. रक्त आँसू, विष्ठा, मूत्र, वायु, पित्त कफ, आदि से युक्त, दुर्ग में निस्सार है, फिर मैं विषय भोग लेकर क्या करूंगा?" गुमेको शाश्वत एवं सनातन आत्मा के ही दर्शन कराने का नाम करें। महाराज की निष्ठा अडिग है, यह जान लेने पर म शाकायन्य ने उन्हें योग दीक्षा दी। जिससे वहद्रा का : भी धन्य हो गया। उपर्युक्त आस्यान पढ़कर क्या सचमुनही या मा जाये कि मनुष्य शरीर बहुत दुर्गन्धित और पुणित है तो उसका मूल्य और महत्व दर असल उपर बहे जमा हो । यदि जान की दृष्टि से उसके आध्यात्मिक गुल्प और गरम चिन्तन किया जाये तो पता चलेगा कि ईश्वर ने पीर किन्तु सर्व समर्थ मशीन बनाई है कि उनका मुल्य ? मापा ही नहीं जा सकता। टूटे-फूटे छपर, और गटोपली दार वाले घर साधारण लोगों के होते हैं । असाधारण और मग के मकान साज, मज्जा और कलाकारिता ही नहीं नोट : और उसमें पायी जाने वाली गुग-सुविधाओं को मागमा र १०० ] [ पेतनामी प्रपाट ।
होते हैं । मनुष्य शरीर जैसे यन्त्र पर अन्य दृष्टि से विचार करते हैं, गोगना चलता है कि सम्पन्न व्यक्ति के भव्य-भवन के समान मनुष्य को भी यह, परमात्मा की असाधारण देन और वरदान है, यदि उगना गच्चा उपयोग किया जा सके तो मनुष्य इसी शरीर मे देवता और भगवान हो गकता है। अन्यथा चौगुना मूल्य बढ़ जाने पर भी रासायनिक दृष्टि से मनुष्य के शरीर का मूल्य अव तक २७ रुपये हो पाया है। नार्थ घेण्टर्न गरिनल स्कूल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा० डो नाल्ड 'फारमन ने १८ सितम्बर १९६६ को अपने एक बयान में बताया कि जब वस्तुओं को मंहगाई बढ़ी नहीं थी तव मनुष्य शरीर में पाये जाने वाले सभी तत्वों का कुल मूल्य केवल ७ रुपये ३५ पैसे था, पर अव कि महगाई बढ़ गई है इसलिए उसमें पाये जाने वाले तत्वों अर्थात् परीर का रागायनिक मूल्य २७ २० हो गया है । जिन रासायनिया तत्वों से शरीर बना है, उनमें से सबसे मा भाग आवनीजन का है आनसोजन शरीर में ६५ प्रतिशत होता या बन और वायु से मिलता है। "गरमन्स के मिस्ट्री आफ भाटिनियनर पुल में मेष सत्यों को जो तालिका उसमें मामा नि आवमोजन के अतिरिक्त शरीर में १८ प्रतिशत कार्वन १० प्रतिपात हारट्रोजन, ३ प्रतिशत नाइट्रोजन, २ प्रतिशत कैलशियम, १ प्रतिमत पारफोरग, ३५ प्रतिशत पोटैशियम, २५ प्रतिशत सल्फर, .१५ प्रतिमत सोडियम, १५ प्रतिशत क्लोरीन, ०५० प्रतिशत मंगालिया, ०.०४ प्रतिशत लोहा और मेष '०४६ प्रतिशत भाग में जापान, पदोनोल तपा सिलियम पाया जाता है। जीपटा और गोदन यी पिजियोलाजी पुस्तक में वल्क- संगिग ने उपरांत रासायनियर मात्रा को और भी छोटे से में मीमित गार दिया है। उनके अनुसार शरीर में १४ प्रतिशत जल, १६ जिल, प्रोटीन, १४ प्रतिशत ची ५ प्रतिशत, लवण और दी है, ताको प्रमा? मता-एक शगंग ] [ १०१ - १ प्रतिशत कार्वोहाइड्रोट होता है। इन सबका मुख्य आर मॅहगाई वाले युग में जवकि टेरेलीन और टेरेकोट जैसे अपर "शूट" का मूल्य ही १०० तक जा पहुँचता है मनुष्य शरीर पहने जाने वाले कपड़ों से भी बदतर होना, यह बताता है । और रासायनिक दृष्टि से शरीर का सचमुच कोई भी मुन महत्व नहीं है। भारतीय तत्ववेत्ताओं ने विषयासक्त लोगों को मार बार चेतावनी दी है कि, हे मनुष्यों ! इस स्यूल शरीरका नहीं है इसी के सुखों में आसक्त मत रहो । इसमें संन्यास भारत की भी शोध और उपलब्धि करो। तभी दुःों से निवृतिको औषधि, भापा, कोई मनुच्य साधारण खाने-पीने और इन्द्रिय गुगों में रहकर रोग शोक का जीवन जीने तक ही इस शरीर का मनमः तो उसके इस आराम को क्या कहा जा सकता है अन्ना जर एक एक पुर्जा बताता कि मनुप्य सामान्य और साधारण बुद्धि, विवेक और अनुभूति की दृष्टि से साकार ग्रहा है। लिपि, ईजीनिपीग आदि के क्षेत्र में संगणन ( कम्पूटर ) बने हैं जो एक क्षण में ही यहाँ गे तर बुध शुक्र दर्शल प्लुटो नेन्यून तक की दिशा 'दूरी', गति आदि । ०००००००१ तक सही और प्रामाणिक जगार देने, " जैसी भूत और भविष्य की बातों का शान साने वाली गाम, संगणक आज तक नहीं बन पाया भारतवर्ष की शगुन्तला जोरदा बात, कजेरा कोलावन उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। बताया साल का था तनी उगने लन्दन में २६८, ३३६ ओर १२५... ' गुणनफल १ सेकण्ड से भी कम समय में बना दिगे । सागर १११५.६० में ? फोटो ले सकता है। नी ती गोप है कि फोटो भी परदे में नाचने वादने और मुझमग मा पदशित करने लगती है। मुखी कमरे में min . १०२ [ लेतनामी
।
हद में गेही दृश्य जा सकता है। लेन्म के पीछे लगी "फोटो मेनिटिव
ट में पढ़ने से रासायनिक क्रिया द्वारा वस्तु का प्रतिविम्ब मनक
जागा यदि
मनुष्य
की आयु ५० वर्ष मानी जाये और यह माना
जाये कि यह मूवी कमान को गति से हो कुल दिन रे, वान्ह पन्टे
बंगला, तो भी उनके मालिका में २॥ नन्टीमीटर लम्बी पिन की
2.1२४१५६४६०४६०४१२४२६५ ११३५०:०४६८६६
econo मेन्टी मीटर लम्पो मिला होना ही चाहिए। उगमा यमा
मूल्य तो निकाल सकना गनुप्य रे लिये पाटिन ही नही गाय
मा लगता है।
ऋण शनि केवल मनुष्य शरीर के लिये ही गाभव, यदि
सका भी गशीनी उपयोग होगका हातानो पर नी--
शरीर मा खन धर्म साधनम् !
"पुण्य परमार्थ के लिये शरीर की सबमें पहला माधन, मा
मागगार भरीर मा गायोग करना चाहिये। आईशी गुता पर
प्रशिक्षण में जो हजार पाया पन्ना पता है या न मारना
चोगियों में मिलावी मरीर में माहिती
माय ग पनकी लम्बाई मार पीट।। गोमाने (
नयंग) मादेन र आन (लेट गन )मो गोमालीरपा गिरे
पनीर १० हजार पुरतो मेवान नपा जाल cिe
पिकामाधारणहार पनि तामा
जोवन विजनी मा करनी
गीता नेपाल (मादा पार
मां मरमसी
शरीर अरवों अरब रुपयों का बैठेगा । पर उसमय :
महत्व तभी है जब मनुष्य उन क्षमताओं का यर्थाथ योग
परमात्मा से इतना मूल्य और महत्व का शरीर पर भी
मनुष्य मानवता को लजाने वाले घृणित गर्म या स्थान लोभमा
इन्द्रिया शक्ति में डूबे हुए कर्म करके अपनी बात्मा को पार
है तो उसका मूल्य २७ रुपये ही मानना पड़ेगा। यह मनु
वश की बात है कि वह सत्ताईस रुपये वाला बेकार काजी
या अरवों रुपयों मूल्य वाला ऋषि-मनोपियों और मा.
भव्य जीवन जीना जीकर ईश्वरीय देन को सार्थक पारे।
• क्या मनुष्य खिलौना मात्र है
मनुष्य के वर्तमान स्वरूप, स्तर और स्थिति के लिए
की पीढ़ी को जिम्मेदार ठहराने वाले आनुवांशिकी विज्ञान मारा
दिनों यह सिद्ध किया जाता रहा है कि प्राणी अपने पूर्वजो की
कृति मात्र होते हैं माता-पिता के जिम्ब-कीट और गुमानी :
कर भ्रूण-कालल में परिणत होते हैं और शरीर बाना ना
जाता है । उस शरीर में जो मनःचेतना रहती है,
उसी
पूर्वजों की मनः स्थिति की भांति ही उत्तराधिकार में ।
शरीर की संरचना और मानसिक बनावट के लिए :
पूर्वजों के उन जीवाणुओं को ही टहराया गया है, जो
रूप में वंशधरो में उतरते चले जाते हैं।
इस प्रतिपादन से यह निष्कर्ष निकलता नि
आप में कुछ बहुत अधिक महत्वपूर्ण नहीं है । पंजों के शो में :
हुआ एक गिलाना मात्र है। यदि सम्मान को मुयोम मा
बनाना हो तो यह कार्य गोलियों पहले आरम्भ किया जाना ।
भन्यथा मचि में टले हम इस खिलौनो में गुध माला
हो गरेगा।
१०४ ]
[ नारी पक्ष
। भानुवंगिकी का यह प्रतिपादन जहाँ तक मानव-प्राणी का सम्बन्ध ६.बाही धपूर्ण और अवास्तविक है । पशु-पक्षियों में एक हद तक यह बात नही भी हो सकती, पर मनुष्य के लिए यह कहना अनुचित है कि वह पूर्वजों के गांचे में ढला हुआ एक उपकरण मात्र है । यह मानवी पच्छा-शत्ति, विवेक-बुद्धि, स्वतन्त्र-चेतना और आत्म-निर्भरता को अटलाना है । समाज-शास्त्री, अर्थ-शास्त्री और मनोविज्ञान-वेत्ता बागावरण एवं परिस्थिति कयों उत्थान पतन का कारण बताते रहे हैं। धारमा-घेताओं ने एक स्वर से सदा यहो कहा है-मनुष्य को अन्तः गतमा स्वनिर्मित है । वह वंश परम्परा से नहीं, संचित संस्कारों और प्रा प्रयत्नों के आधार पर विकसित होती है । इच्छा-गक्ति और मल्प-शक्ति के आधार पर अपने मानसिक ढांचे में कोई चाहे तो मामूलचूल परिवर्तन कर सकता है । आनुवंगिकी की मान्यताएं एक हद तक ही सही ठहराई जा गानी ।।। चमड़ी का रज चेहरा, आकृति, अवयव आदि पूर्वजों की बनावट के अनुरूप हो सकते है । पर गुण, कर्म, स्वभाव भी पूर्वजों जगह-यह आवश्यक नहीं। यदि ऐसा हो रहा होता तो किसी पुन मंगभी अगले और किसी गुल में सभी बुरे उत्पन्न होते । रुग्णता र पर मा, द्धिमत्ता, मूर्षता, सज्जनता, दुष्टना, कुशलता, अस्तव्यस्तता भी परपरागत होनी नो प्रगति गोल वर्ग के परिवार के सभी सदस्य मुकिति होले धौर पिछड़े लोगों का लर सदा के लिए गया-गुजरा ही बना कता व उत्पान-पतन के लिए पिये गये प्रयलों को भी गर, गायता न होती। वातावरण का भी कोई प्रभाव न पड़ता, पर inी मितिनी। पूर्वजों की स्थिति ने गधा भिन्न स्तर की मी अगणित उदाहरण पग-पग पर गर्वन विवरे हुए देने जा मान गर ी सतत पाना और इच्छा-मक्ति की मनाया पर पगेनामन जाता है। म मनुष्यो की मनान या जग-जात रूप से उस लत पना मन [ १०५ -- Srus- से ग्रसित होती है ? इस खोज-वीन में पाया गया निधी नहीं है, वरन् उल्टा यह हुआ कि बच्चों ने वाप बोमा अपनी वर्वादी करते देखा तो वे उसके विरुद्ध होगने और केवल मद्यपान से अपने को अछूता रखा, परन् सुमारों में अपनाने से रोका। मनुष्यों के गुण सूत्रों के हेर-फेर से जो परिणाम मा हैं, उनसे स्पप्ट है कि बिगाड़ने में अधिक और बनाने में बम मिली है। विकलाङ्ग और पैतिक रोगों से ग्रसित समान १ में आशाजनक सफलता मिली है। क्योंकि विपास का रसायन सदा अपना त्वरित परिणाम दिखाते हैं। या fr:- सोन्मुख प्रयत्नों की नहीं होती। नीलामोथा गाने मे sign: सकती है, पर पाचन-शक्ति सुधार देने के प्रयोग को होते । देव से असुर की शक्ति को अधिक मानने का : मनुष्यों में मनचाही सन्तान उत्पन्न करने का प्रयोग : में कुछ अधिक सफल हुआ है कि रङ्ग-रूण और मन जनक-जननी का सादृश्य दृष्टिगोचर हो सके । काया । दृढ़ता, बौद्धिक तीक्ष्णता एवं भावनात्मक उत्कृष्टता के वैज्ञानिक प्रयोगों का उत्साह-बधंक परिणाम नहीं मिला। गुण सूत्रोंको बदलने में इन दिनों विद्यतु-कहां पर हेर-फेर के साधन जुटाये जा रहे हैं, पर वे यह नमा वाहरी थोप-याप स्थिर न रह सकेंगी-उसने क्षणिक पा? देखा जा सके । शरीर के प्रत्येक अवयव की महिमा : और मस्तिष्क का सूत्रसंचालन इच्छा-शक्ति । मस्तु शारीरिक, मानसिक समस्त परिवर्तनों का नाम: इच्छा-शक्ति को ही मनाना पड़ेगा । गुण-मुत्रों पर भी हो प्रभाव पड़ता है और इसी माध्यम से कार परिमार्जन र ? " : जो मन-नाही पीलियां उत्पन्न करने के लिए शाम में १०६ ] [ नाम::::::
अभीष्ट स्तर की पीढ़ियाँ क्या रासानिक हेर-फेर अथवा विद्युतीय प्रयोग उपकरणों द्वारा प्रयोगशालाओं में विनिर्मित हो सकती है? यह एक जटिल प्रश्न है। यदि ऐसा हो सका तो यह मानना पढ़ेगा कि मनुष्य इच्छा-शक्ति का धनी नहीं; वरन् रासायनिक पदार्थों की परावलम्ली प्रतिक्रया मात्र है । यदि यह सिद्ध हो सका तो इसे मनोवल और आत्मवल की गरिमा समाप्त कर देने वाली दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही काहा जायगा, पर ऐसा हो सकना सम्भव दिखाई नहीं पड़ता-भले ही उसके लिए ऐड़ी-चोटी प्रयत्न कितने ही किये जाते रहें। शरीर के विभिन्न अलों पर दबाव डाले जाते रहे हैं, पर प्राणी की मूल इच्छा ने उस दबाव को आवश्यक नहीं समझा तो उग तरह के परिवर्तन नहीं हो सके । चीन में शताब्दियों तक स्त्रियों पर छोटे होना-सोन्दर्य का चिन्ह माना गया, इसके लिए उन्हें गाहे जूते पहनाये जाते थे । उससे पर छोटे बनाने में सफलता मिली । पर यश-परम्परा की दृष्टि से वैसा कुछ भी नहीं हुआ। हर नई नकी पर पूरे अनुपात से ही होते थे। प्राणियों में प्रमिक-विकास में इच्छा-शक्ति का ही प्रधान स्थान ना है । गनुप्य तो मनोबल का धनी है, उसकी बात जाने भी और अन्य प्राणधारियों पर दृष्टिपात करें तो प्रतीत होगा कि उनकी मंश-परम्परा में बहुमुखी परिवर्तन होता रहा है । इसका कारण नामधिक परिस्थितियों का चेतना पर पड़ने वाला दबाव ही प्रधान गारपता है । अनुविधाओं को हटाने और सुविधा बढ़ाने की आन्तरिक आकांक्षा ने प्राणियों को शारीरिक स्थिति ओर आकृति मीनी भात में भी भारी हेरेफेरे प्रस्तुत किया है । जीव-विज्ञानी मरायगे पानी-मांति परिचित है। आदि पूर्वजों के गुण लेगार ही नन्ताने उत्सन्न होने वाली वात मोनही माना जान को जीवों की भापति प्रकृति में परिवर्तन को मारमा उमारपनि में तो पोषिलों का सार एही प्रकार का । । मकवान] [ १०७
चलता रहना चाहिए था।
लेमार्क ने प्राणियों का स्तर बदलने में वातावक
स्थितियों को श्रेय दिया है । वे कहते हैं-इच्छा शक्ति की।
के कारण उभरती, उतरती है । मुविधा सम्पन्न परिमिति
किसी प्रकार का दवाव नहीं रहता। अतएव उनकारीको
बुद्धिकौशल भी ठप्प पड़ता जाता है। अमीरो के मन में पत;
लोग अक्सर छुईमुई बने रह जाते है जोर उनका नाम
के लिए एक छोटा-सा आघात ही पर्याप्त होता है।
लमार्क ने नये किस्म के अनेक जीवधारियों की जान
लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हुए कहा है कि बाहर से मौलि को दी
पर भी वस्तुतः किसी ऐसे पूर्व प्राणी के ही वंशज होते है. मिल पाः
स्थितियों के दवाव से अपने परम्परागत ढांचे में आमुनमा परि
करना पड़ा।
जीवों के विकास-इतिहास के पन्ने-पन्ने पर यह प्रमाण भरे
हैं कि प्राणियों के अङ्ग प्रत्येक निष्क्रियता के आधार पर का
हैं और सक्रियता ने उन्हें विकसित किया है। प्रवृति, प्रयोजन
चेप्टाओं का मूल इच्छा-शक्ति ही है। असल में यह एक गह।
प्राणिसत्ता में विकास, अवसाद उत्पन्न करती है। रासायनित
और गुण-सूत्रो की वंश-परम्परा विज्ञान में नायिनः ममा को
अंश तक प्रभावित करने वाला आधार पर माना जागा at:
माधुनिक विज्ञान-वेत्ता मोनिक-भूल यह कर रहे है कि मान;
उन्होंने रासायनित प्रतिक्रिया मात्र समझा है और Hr:
करने के लिए जन-जननी बनके जनन-रमों को अपन'
दे रहें है. । इस एकाही आधार को लेकर मागाही आया।
पीलिया ये कदानित ही पैदा कर सके।
पेनानिक चीजगन ने चूहों और हि यो नमार की
पीड़ियां नमः माटी और देगा कि क्या ना for
१०८ ]
। नाना की
घाने पर गंदा किये जा सकते हैं ? उन्हें अपने प्रयोग में सर्वथा असपल होना पड़ा । विना पूछ के मां-बाप भी पूछ वाले बच्चे ही जनते चले गर्ग । यह निप्याप निकला शि मात्र शारीरिक हेरफेर से वंशानु काग नहीं बदला जा सकता। इसके लिए प्राणी की अपनी रुचि एवं इच्छा ना गमावण होना नितान्त आवश्यक है। हवंट स्पेन्सर ने अपनी खोजों में ऐसे कितने ही प्राणियों के, उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, जिन्होंने शरीर के किसी अवयव को निष्क्रिय या तो यह क्षीण होता चला गया और लुप्त भी होगया । इसके विपरीत से उदारण भी कम नहीं हैं, जिनमें 'आवश्यकता ही आधि- कार की जननी है" वाले सिद्धान्त को सही सिद्ध करते हुए अपने गरीर में कई तरह के पुर्जे विविसित किये और पुरानों को आश्चर्य- जनयः स्तर तक पारित किया । ममुद्र-तल की गहराई में रहने वाली मछलियों को प्रमाण से पंचित रहना पड़ता है । अतएव उनके आँखों का चिन्ह रहते हुए भी उनमें गोपनी नहीं होती है। आंख वाले अन्धों में उनकी गणना की जा मगाती है । अधेरी गुफाओं में जन्मने और पलने वाले थलचरों का भी यही हाल होता है । उनकी आँखे ऐसी होती हैं, जो अन्धेरे में ही मुछ काम कर सकें । प्रकाश में तो वे वेतरह चौधिया जाती है और निकम्मी मावित होती है। गमगा नुनाव माव शारीरिक बलिप्ठता पर निर नहीं पर गप पूछा जाय तो उनगी मनःस्थिति कोही परम इन मोटी परती । पशुवर्ग और नृप वर्ग के विशाल काय प्राणी माहिम-गान में थे। उनकी गरीरगत क्षमता अन्नत थी, फिर भी ये गर- अमिता, जालसगी वामियों के कारण दुर्दल संज्ञा भाले नि सार अपना अस्तित्व दो बेटे । जब कि उसी समय मायामाले पाणी अपने मनोवल के कारण न पंदन अपनी मत्ता नमामो को परम मममः विशामोन्मुख भी होते चले गये। हीदों में विकासमा महत्वपूर्ण आधार यह है कि पे पार दाग ] , 3-y उन्हें परिस्थतियों से जूझना पड़ा-अवरोध के सामने लिए अपने शरीर में तथा स्वभाव में अन्तर कला पज वर्तन किसी रासायनिक हेर फेर के कारण नहीं, विगुल शक्ति की प्रवाह-धारा वदल जाने से ही सम्भव हुआ है। में जूझने की पुरुषार्थ-परायणता का उपहार ही जलाया और महाप्राण स्तर का बन सकने के रूप में मिला है । जिन्होंने क.. लड़ने की हिम्मत छोड़ दी और हताश होकर पर ना प्रकृति ने कूड़े कचरे की तरह बुहार कर पूरे पर पटक नि::::' और माली भी तो अपने खेत-बाग में अनुपयोगी सरकार को ही उखाड़-पछाड़ करते रहते हैं । विकास की उपलब्धि पूर्ण संग्राम में विजय प्राप्त करने के फलस्वरूप ही मिला संघर्षशीलता का पूरा आधार साहसी एवं पुरयार्थी मनोभूमि में " जुड़ता रहता है। आनुवंशिकी-विज्ञान की अन्यान्य शोधैं कितनी क्यों न हों पर यह प्रतिपादन स्वीकार नहीं हो सकता किनेर विशेपतया मनुष्यों का स्तर पूर्वजों के परम्परागत गुण गुओं पर है । इच्छा-शक्ति की प्रचण्ड समर्थता के आधार पर शारीनिर .. सिक और सामाजिक परिवर्तनों की सम्भावना को माना उपरान्त ही वंशगत विशेषताओं की चर्चा की जान, नये मनुप्य का निर्माण समय जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है और पनि सुतगति से बदल रही है उसे देखते हुए यह प्रश्न मार पर भागे आ सकता है कि विकट भविष्य से जमाने यामा समस्याओं को गुनमा सकने वाला मनुला उत्पन होता ! बंगानिक इसका समाधान प्रजनन तत्व में भारी ! हड़ रहे हैं जिन रामायनिक पदयों में जीवन : एवं कम बदल देने में-~iमान जोरोगों की -1 7 ११० ] [ चेकनाको प्रमा - मन से वर्तमान जीव कोपों की शल्य क्रिया कर देने से ऐसा सम्भव हो माता है। वे सोचते हैं इन सुधरे हुए जीव- कोपों को माता 4; गर्भ की अपेक्षा किसी स्वतन्त्र परख नली में पकाया जाय सायिः माता के रक्त-मांस से होने वाला भ्रूण पोपण कहीं उस पष्ट गाध्य सुधार प्रक्रिया को वेकार न करदे । डा० रोस्टाण्ड इस निवार्य पर पहुंचे हैं कि सुविकसित स्तर के गनुष्यों की टू-वह वैसी ही 'ब्लू प्रिन्ट' कापियाँ बनाकर तैयार की जा सकेंगी। तब गांधी और जवाहरलाल के न रहने से किसी क्षति की आशंका न रहेगी क्योंकि उनके जीवन काल में ही अथवा गरने के बाद ह-यह वैसे ही व्यक्ति सैकड़ों हजारों की संख्या में प्रयोग- शालाएं उत्पन्न करके रख दिया करेंगे । इन डा० रोस्टाण्ड ने टिश्यू पालगर अर्थात् योशाओं की सेती की अगले दिनों सामान्य वागवानी गी तरह प्रयुक्त होने की भविष्य वाणी की है। कार्नेल विश्व विद्यालय टा. प्रोटिक सी० स्टीयर्ड द्वारा गाजर की एक कोशिका को पूरी गागर में विकसित करने में सफलता प्राप्त करने के बाद अवजानिक गनुप फे बारे में भी यह सोचने लगे हैं कि रजवीर्य को अनावश्यक मात्य देने की जरूरत नहीं है। हर कोणिका में इतनी सम्भावना विद्यमान है कि पर अपने आपको एक स्वतन्त्र मनुष्य के रूप में विपमित कर सके। रतिप्रिया का विकल्प प्रयोगशालाएं बन सकती और प्रजनन के लिए माता-पिता का नगप्य सा सहयोग पाकर सपना सादन जारी रामपाती हैं। दिली के डा० निपल पंगुचि ने भालोनो की अपनी प्रयो- पणाला म एपिग मनुष्य सण उत्पन्न किये थे। उन्होंने एक पारदर्शी गर्भाशय बनाया था। उन पर रजयोग और एका सुयोग का समाग गया या देरमापन पर दिये जिनमें धूप पलता है। मापिता और उनी तर बढ़ने लगा अंसा कि माता में पापालाम २९ दिन और गा५६ दिन गाही प्रमद शमना-पान न ] [ १११ तक उन्होंने पाला । इस उपलब्धि ने संसार में सहता और यह संभावना सष्ट करदी कि मनुष्यों का कृषि में एक सुनिश्चित तश्य है । डा० पैयुत्रि से पहले भी पा ::: बहुत कुछ प्रशस्त हो चुकी थी। डा० शटल्स, मन इस प्रयोग परीक्षण की सफल शुरूआत बहुत पहले की आप दी थी। विचारक मांलकम मगरिज का कथन है कि मुष्टि : से लेकर अब तक प्रकृति के जितने रहस्य जानने में मनु ।' सफलता मिली थी; उसकी तुलना में कहीं अधिक महार: मा: स्योद्घाटन इस शताब्दी में हुआ है । यह क्रम आगे और गति से चलेगा । इन उपलब्धियों में एक सबसे बड़ी को अभीष्ट स्तर के मनुष्यों के उत्पादन की । अगले दिनों बाद में दृष्टि से असह्य समझी जाने वाली परिस्थितियों में मनुष्य उत्पन्न किये जा सकेंगे और विद्वान, दान, १.१. योद्धा, राजनीतिज्ञ, वैज्ञानिक, व्यापारी, श्रमिक मादिगा : योग्यता के आवश्यकतानुसार उत्पन्न किये जा रहेंगे। सर्व शक्तिमान न सही असीम शक्ति सम्पन्न अवस: । सकेगा। भारत पंशी अमेरिकी वैज्ञानिक डा० हारमोदिन पर यंग तत्वों के रहस्यों का उद्घाटन करके नोबेल पुरस्कार प्रा है। नोयो न्यूक्लिक एसिड क्षमता है यह बहत पहले जान लिया गया था। मोनी गिलमा एमिट (श्री० एन० ए०) का जीवन संचार है यह विश्लेषण अब बहुत आगे बढ़ गये हैं। सी० प्रोटीनों के गुम का किम प्रारजीका दर कामो हैं यह जीवविज्ञान के नामों को विति। नावित मोटार गो चार रसायनों की भूमि :: . - म (आर० एन० ए.) में जीरो ;
का गुसी । सन् १९६५ मे दम विधान में सानियाने या
जगत की।
নিল্যানি সি ৰিাণৰ পৰিাণৰ পৰা ও
शिः जीवन के पंगानुगत घटका-यंग गल-'जीन'-का गमन सामानक
मंन्पण करने में ये नपान की गये है। कंगनयना नपान, भि-
पर्यन, प्रत्यारसंग एवं प्रत्यायतंग गार गाने की विधाजन उन्य
हो गई है।
गली पोनिया एन्टीट्यूट आफ टंरनोलोजी के वा विनियम
जबर ने भविष्यवाणी की है कि एमे गिनोधक तत्वों का में
प्ररण पाया जा सकेगा जो पर दोनों का उलन करना
धापना के लिए राममा माफ कर ग ।परनी निवारणी
गया गया पक्षमापनामा है। जिस प्रकार शिनीमा
में पानृगार वीग योगार समोर प.मन जगा जगमगीनी
प्रकार पापागा अपराधी कोटागन की गमलना रे नाम
नया अध्याय और गुम गाता चंग गाय मागार -
पास बीग मो. जर गोंगे अगली पीड़ितों को गाना
किया जा जमाया गया था।
aanी माणगंगागिर
की क बायोमोजिम
गामा मेनानानना या
Ja
गया।
५. है
सीमन भीमा
.
.
मोन ढूंढ़ निकाले हैं जो नारी शरीर में प्रवेश कराने
एक साथ कई बच्चे उत्पन्न कर सकने में समयं पनाम:
फोलीकल स्टीम्युलेटिंग हारमोन की चर्चा विशेष
न्यूजीलैन्ड के आफन्ड नगर में शने पान सामन मा ""
महिला ने एक साथ चार लड़कियों और एक नाम:
प्रकार स्वीडन के फालुन नगर में एक महिला मरीन और
एक साथ पाँच बच्चे जने । यह चमत्कार नव नि
प्रयोग का था । जिनके गर्भाशय में पहले एक भी कि
उनमें एक साथ पाँच अण्डों का उत्पन्न कर देना जीर-fa
विशिष्ट चमत्कार है।
यह उपलब्धियाँ सम्भावना का द्वार पोलतो
का पालन किसी उपयुक्त प्रकृति की पशु माया के पेट
लिया जाय इससे उस बच्चे में मनुष्य
और पशु के fine::
विकसित हो जायेंगे । इन प्रयोगों से बारम्भ में गोडसे या
में ही अधिक परिबन पड़ेगा। पीछे तो कृत्रिम गर्भ :
थोड़े ही बच्चे तरुण होगर सहमों बच्चे पैदा कर ले।
सांड के द्वारा जीवन भर का संनित शुक्र ५० हजार वर्ष
कर सकता है। विशेष रासायनिक प्रयोगों में उi
द्वारा एक साथ पांच दर सन्ताने पल बाराई मा गाली
मनुष्य जाति को जल्दी बढ़ाने के लिए पंग होगी या
जायेंगे साथ ही पुरानी पीढ़ी को समाप्त भरते. इन र?
कारण किया जायगा । अन्यया दोनोंतर कोमलाने .'
फिर उनमा करत्व होने लगेगा और वार'
गई समस्या उत्पन्न पारगे?
गई पीढ़ी के सामन कोगों के साल आधार :
कोनही रहेंगे, पर के गाव महाविम जीया या
दिया जाना जो अभी : '
..
। •- " मगि नाम जीवाणु बना मकने में सफलता प्राप्त करली गई पर ये सभी हग स्थिति में नहीं है कि पूर्ण प्राणी का स्थान ले र लिए उन्हें गुविकमित जीवन तत्त्व के साथ मिला देने से ही माग पलेगा । पुरानन और नवीन की कलम लगा कर ऐसे जीव कोप पाये जाने की सम्भावना व्यक्त की गई है जो इच्छित स्तर के मार घिमिन होगा। किया किया जाना है कि, इन प्रत्यनों के पल-स्वरुप अवकी पर भरिसर में अमीष्ट परिष्कृत स्तरका मानवी उत्पादन गया का महंगा । जीत, उष्ण, पहाटी, रेतीले प्रदेशों में रह सकने गोर स्थिति के जिग देश को जद जितने मनुप्यों की आवश्यकता पड़ा पोरगी सर या जगने बच्चे उस प्रकार से पैदा कर लिए जाया पर लग ही नहीं मावस्यकतानुसार स मानसिक स्तर को मनाने की पंदा बारली जाया करेंगी जिनकी कि उन दिनों आवश्य- फला पहेगी। ग.वि, साहित्यकार, गायक, शिल्पी, योद्धा, अमिक, गणित, धर्माचार्य, दानिकों को जब जहां जितनी आवश्यकता पढ़े तब मावि मनोरापा करेंगे और सामाजिक सन्तुलन बनाये रखा सकेगा। अभिनय मनुष्य को निर्माण में, विज्ञान अपने दङ्ग से सोच और दार रहा । उददेश्य और पुरषार्थ दोनों ही टि से इन प्रयत्नों की माना की जानी चाहिए पर साथ ही यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि मनुष्य पूर्णतया भीतिक तत्वों से विनिर्मित नहीं है जिसे बाद भावनों, रस और रासायनिक प्रयोगों से मात्र प्रयोगशालाओं सारसारणों के माध्यम में प्रदला या बनाया जा सके। उनमें एक काराना का भी अस्तित्व है। उन तप्प को भुला नहीं देना १४ सेट परीरों में उतना नहीं जितना उन चेतना में धुत पढ़ी भाभा पा । मूलतः दे आत्माए हो गहरा कर शारीरिक,मान- मा ६ प्राधमता-एए. दापन } [११५
ar
सिक विकृतियाँ उत्पन्न करती हैं। यह विकृतियो नि
होती हैं न कि विद्युत आवेशों और रासायनिक पदार
बढ़ से ! मनुष्य की वर्तमान दुर्गति का कारण कर किन
ही है जिसने मनुय्य को दुर्भावग्रस्त और दुष्प्रवृत्ति जनमा
का नर-पशु बनाकर रख दिया है।
सुधार इस चिन्तन स्तर का भी होना चाहिए ।
पराम्परा के खोट हटा देने अथया रक्त-मांस कार का
अधिक से अधिक इतना ही हो सकेगा कि शारीलिए मौका
से नई पीढ़ी समय की परिस्थिति के अनुरूप ढल जाल ।
उत्कृष्टता के विना मनुष्य 'यन्त्र मानव ' भर ममगा।
महामानवों का गौरवास्पद स्तर बनाये रहने की और संचार
वनाओं का स्वर्गीय वातावरण बनाने की क्षमता
और इसके विना वह क्रिया शील किन्तु भाव राहिली
दिव्य सोन्दयं, संरक्षण, अभिवर्धन कसे कर सकेगी? ::
विश्व मात्र हलचलों का केन्द्र ही बन कर रह जायगा ।
अभिनव मनुष्य के निर्माण में आध्यात्मिा का भी
योगदान रहना चाहिए। जन्म और जननी मामा
व्यक्तित्व विनमित किया जाय । गर्भ काल से लेकर
तक परिप्कृत परिस्थितियों में विकसित होने का .
जवसर दिया जाय तभी उसकी आत्माओं में उकामा .
होगा । भौतिक दृष्टि से नई पीवी को सगुना मा.
दृष्टि से उसे समुन्नत बनाने के लिए अध्यात्म विमान कर
दोनों के समन्वित प्रयल ही उस स्थान को मार
समुना तट के मनुष्य के निर्माण को माना ।
कायकलेवर में विद्यमान शिक्षक
अलग जीवन की विनिता दनी'
[मेहना श्रीप्रक......
पमान में बुध कागती है । इसमें जो कुछ देखना ना चाहें, सब
पुछ मिल जायगा।
अपा मगर में एगे सन्त और भूपि भी विद्यमान हैं जो
एक प्रकार ने अपना गयंद समर्पण करके ही इस काया को इस
योग्य बनाय र न हैं कि यह जीवित और समर्थ कही जा सके ।
पर बदले में कुछ भी लेने की न उनकी इच्छा होती है न लेते
उन पापियों का नाम-रसायन शास्त्रियों की परिभाषा के
अनुमार नाम है। यों मोटेतोर ने समझा यह जाता है कि
य, 'तुम, आमामय, मस्तिष्य, वृक, यत आदि अवययों के
क्रिया-पानाप पर जीवन निर्भर है । महत्व और श्रेय इन्हें ही मिलता
और दलको चुरायः जुटाने के लिए अन्न, जल, श्वास, निश्वास,
पाटादन भादि कालाधन जुटाने पड़ते हैं। यह साधन न मिलें तो
पारिश्रमिया न मिलने पर नौकरी छोड़ देने वाले मजदूरों की तरह
पीलाल पार नपते है और जिन्दगी का सरंजाम देखते-देखते
विरागता है।
भूगरी ओर ये 'ऐजारम' घटक है जो कभी किसी प्रकार की
गरायः माण नहीं करते । दूसरों पर तनिक भी निर्भर नहीं हैं,
बारमल की अपनी सत्ता टिकाये हुए हैं। इनकी जानकारी भी
मोटगार पर सब शरीर रचना जानने वालों को नहीं होती । यश
और घर की न उन्, आमांशा है और न मिलता ही है। मात्र
परालय मानने सब कुछ है । परने की आवश्यकता ही
का नीती। जयपि जीवाण, कोशिकाएं, उतक निरन्तर
मरत न तद वा मृत्युजवी देवताओं की तन्ह अपने स्वल्प
में भा र पार बिना परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव किये
किन निभान ने अपने पसंद की द.पशिखा यथावत् संजोये
काकीचा समा-एक दगंन ]
भौति विज्ञान की परिभाषा के अनुसार जीवन और का शरीर की भोतरी रासायनिक प्रक्रियाओं का रोमा के भीतर मुंह, आमाशय, आंतें, हृदय, फुकुम, घर, या अवयव ही मोटेतोर पर काम करते दिखाई देते है । र, श्वास, प्रश्वास, आकुचन, प्रकुचन-रान्तु चेतना जैसे नाम फलापों को भी देवा समझा जाता है। विभिन्न अया होने वाले पाचक रस, हारमोन प्रन्थियों से टपाने पाने मार के सम्मिश्रित जीवाणु ऊतक कोशिकायें, आदि भी mr- कार्य करके जीवन की स्थिरता में सहायता पहुँनाते है र किया-कलाप को शक्ति देने वाले एक और प्रकार ने बार मा हैं जिनके सम्बन्ध में अभी बहुत कम जानकारी जलया इन घटकों का नाम है-ऐजाम । सूक्ष्म-दर्शक यन्त्र से ही दीख पड़ने वाले जीवाणु रिया-भी इन एन्जाइमों ही जीमित घटकों के अतिरिक्त शरीर का हर पदार्थ पटना-~~ पर यह अपनी स्थिन्ता अग ही बनाये रहते है । कोरिया में आक्सिजन न मिले तो वे जीवित नहीं रह सकती। मंत ऐजाम हैं निः निरन्तर सेवा संलग्न रहते भी : दूर स काप-लेवर में सांस नका एक कण भी करते । यह माई गाति के होते हैं। हर जातिभानीला पद्धति में ही गं उग्न रहती है । कोई वर्ग किमी र म ।' हाथ नहीं पाता । वर्ण धर्म की तरह आगानिairat ही निव है जहां अन्य जीवाणुओं में परिवर्तन ? हमा कहाँ गली मीमा मर्यादा में कनीना शीर के बलबूते जो भोजन पं: में जाना है ओ पनीर !! या रे जाम हो जाती है। यदि कम होने लगी और [ चानाको
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Ava + sea गक तरह नहीं कर पाते और माता पार इनकी कमी मांस-पेगियों में मी ऐन मानो कोई इलाज नहीं निकल मना। इन घटकों के नहायक सेक्रेटरी भी ....... यागिक' कहते हैं। विटामिनों को भी वर्ग में यस्त और मौलिन्द्रीनम का सहारा मिल जाये । हो जाते हैं और पारा माइनारहु जैसे विषा मन: :: : हैं। इनकी अनुपस्थिति में जीवन आको नाम : मकती । मानव-जीवन जैसे अद्भुत मंस्थान उससे भी अधिक इन ऐ जाम पटनों की है या ये प्रभावी जीवन संचार कर सकने में नम है। शिक्षा, उपदेश, मार्गदर्शन, करने for ar जरूरत नहीं । मदगुर कितने ही हा में हमारे का जमान हैं और अपना प्रशिक्षण निरनार जारी " और अनुचित का भेद करने वाला पामर्श अपन! ' न्तर देता रहता है । मत्कर्म करने हग आमनमोल हुए आत्म धिक्कार की जो भावना उटतीली :: क्षण-अन्तरात्मा का उपदेश कहा जागा..!! मीगने को ग्रहण करने अपनाने की जिनिगर जीवन न जीते नब महानतामागगतिविधिमा यो और नर-नारायणगी गिति मेगा । परमात्मा ने मनुष्य मोरोनमा गाय और ...' afrar न केवल आम निर्भर रम गरी '.., ir पर भी समाधान माना। होने वाली विटानिया या मोगल पां: विद्यामान चजना स्वयंराना :: मेला उद्यानाना। । - T
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अध्यात्म का विज्ञान को पृष्ठभूमि पर iament ,
धिक कठिन कार्य है। पिछले युग में पता को माया
है। अब उसका स्थान तर्क ने ले लिया। आधार पर
सारा ढांचा ही नये सिरे से या करने को
गई । बुद्धिवाद के समाधान के लिए उपयोगिता का ?
के समाधान के लिये प्रमाणों का प्रस्तुती र पार
होगा।
इन दोनों ही आधारों को सही रीति से कम
के लिए ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान (शानिशा हमें
सन्धान की संग प्रक्रिया आरम्भ की गई।
गया है ताकि प्रस्तुत अनास्थाबाद के गहन को र ?'
कर आक्रमण करने वाली प्रतिक्रिया न माना fr:
सके । दुर्बल आधार तो प्रत्यदानाय के गहनी गा!
में ठहर भी न सकेंगे।
ब्रह्मवर्चम् लोध संस्थान के दो भाग है....
अनुसन्धान, दुसरा प्रयोगात्मक प्रलाप :-
अधि हुए अध्यात्म के दानित प्रतिपादनों हा
अध्यात्म के उस स्वरूप का निर्धारण करेगा की
सर्वजनीन, नमुलभ और गायोगी मिली.
गतन भी है। श्रद्धा नवी रा.
पान करणेही. आप्तजननों और EYE::::
मेख हो मगनी है । अनुमा दा है।
सके फलस्वमा पतिसरया arfat.
जाता है जिनके समर्थन के लिए प्रकार
बद्धो गरे ।
ग प्रयोजन में किरा
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पगारनिविदारकनिकी ६. जिल्लामाभीifier लमान या अभिनिगान पनि कामिन श्रीनि: नम्र प्रस्तुत ना मानव गया। 15 पान का पक्ष प्रयोगाला। गाधनाभि पक्षों के माध्यम सेना की गति तथा लय नि-मिटा मार में होने वाले परिवर्तनों को न करने or "लगदी" "एल "माटोरिकार तित • माना कि "नर गंग एमालार" फरमान की जान निवाबटनी पाप" सीनका साधना दारा गरी मनाभिर प्रतिक्रियानों मालि यो लोपोर मागीय, आपटालेर, चोयल, बिजु- मलकामा नानि गुगलिक र नये 4 बाना दान प्रमोटी कमाधानारदम कोपा Eि को माधिः देवनीय कदम माना काकीपनग धमिमागिता तिमी F .. : १ -- १rmit reme 1 -- है " . . -- .