Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Jeev Vichar Prakaran

Munishree Amolak · 2011/07

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(२) समान अने सकल पापने दूर करनारा एवा (4 के०) श्रीमहावीरस्वामीने (नमिण के) न स्कार करीने (जह के०) जेम (पुबसूरीहिं के मुधर्मस्वाभ्यादिक पूर्वमूरिजए (जाणिय के०) पोता नां यागममांप्रगट कर्यु के तेम हुँ पण (अबुढ्योर के) तत्त्व विचारने विपे यानी जीवोने योग घवाने यर्थ (किंचिति के०) लेशमान (जीवसरु के०) जीवन वरूप (नणामि के०) कढुंतुं ॥१॥ इवे जीवना भेद कही यताये :- जीवा मुत्ता संसा,-रिणी अंतस याव- ग असंसारी ॥ पुढवि जल जमण याम, वाणस्सई थावरा नया ॥२॥ गाधा जीना वृदा शदना श्यर्थ. पुषि-praru, शुभा मुष्टि पामंधा, मुग. माहित जी. माया. यादा माणकाम. मा म ( हान) पानिप. माया ( निाम). मंधा-श. -मा गया था.

अर्थः-(जीवा के) जीव ते एक मुक्तिना तथा वीजा संसारी, ए वे प्रकारना ठे. तेमांना (मुत्ता के) जे सकल कर्मरूप पटलोनो क्षय करीने मुक्तिपदने पाम्या तेई सिक जीयो कहेवाय वे; (अ के०) तथा (संसारिणो के०) जेमा संस्मृतिने पमाय ते ते संसार कहेवाय ठे, एवा संसारनी नर- कादि चार गतिमा जे भ्रमण करे वे ते संसारी जीवो कहेवाय ते. ते ( संसारी के०) संसारी जीवना एक (तस के ) त्रस (य के०) वली वीजा ( थावरा के०) स्थावर, ए वे प्रकार ;ते. मांना स्थावर जीवोना पांच प्रकार ते या प्रमाणे:- एक (पुढधि के०) पृथ्वीकाय. बीजा (जल के०)पाणी ते यकाय, त्रीजा (जसण के०) ज्वलन ते यनि- काय, चोथा (वाक के०) वायुकाय, पांचमा (वण- स्सई केव) वनस्पतिकाय, एवीरीतेप (धावरा के०) स्थावर जीवो पांच प्रकारना (नेया के०)जाणवा ॥२॥ इवे प स्थावर जीवोना जेदमा अनुक्रमे प्राप्त चयेला पृथ्वीकाय जीवोना नेद कहे :- फलिह मणि रयण विद्दुम, हिंगुल हरि- - (४) याल मणसित रसिंदा ॥ कणगाइ धान सेढी, वन्नि अ अरणेट्टय पलेवा ॥३॥ अनय तूरी कसं, मट्टी पा- हाण जाल णेगा॥ सोधीरंजण खू- णा,-३ पुढविजेआइ श्चाई ॥४॥ गाथा ३ जीना लूटा शब्दना अर्थ. फखिद-रफटिक रल. कणगाइकनकादि ( मोन मणि-चंद्रकांतादिक मणि. विगरे). रयारल. धा-धातु. विहुम परवाला सेढी समी माटी, चाफ. यनि-पास रंगनी माटी, हिंगुख-हिंगतो. हरमजी. दरिया-हमतास. भरणेहय-चापागना पाटकानी মাযির-নাসির, गाथे मलेसी घोसी माटी. रमिंदा-पारो. বন্যা আমিনী বাবা, गाया ४ पीना छूटा शब्दना यथ. थपथपरम (पांच वर्णनो). पेगास्थना. ती एक आनिनी माटी. गोयीस्व-गुरमो. समसारी. सुशार निभय सिंगरे. मही-माटी. पुषि-रवी साप पाहा, पयर. शारदी. चादित्यादि . (५) यर्थः-(फासिद के०) स्फटिक प्रसिक ठे, (मणि के० ) मणि ते चंकांतादिक श्रथवा जे समुञ्जमा उत्पन्न घाय ते, तथा ( रयण केर) रमते यज कतनादिक अथवा खाणमा उत्पर चाय लेते, (पिदुम ० ) पग्यासां श्रथवा विम, (हिंगुल ०) हिंगलो. (दरियास के०) हगतास. (मणसिस फे०) मणसित, (रसिंदा .०) पागे यथया सेंड, (परण- गाधान ०) कनकादि धातु सात :-मोनू, रु, प्रां, कथीर, जसत, सीमुं तथा सोटुंए घपियो- गना अनाये पृथ्वीकाय वन अतिसंयोग उपाय ते, (सेही फ) ग्पनी माटी पथपा पार करें। पाय रे ते, (वरिप०) दरमजी अथवा सासरंगनी माटी चाय ने, (धरहय बन याटकानी गाये मलेली धोसी माटी थाय से तपा ( पसेया )एर जातिनो पाषाण ॥३॥ (प्रश्रय .) पांच पानो प्रयाग, से सोनी खोकोने गानु नपापपाना उपयोगमा प्राय प. घया । लोको नाम विर परीने बाक्षिमा पापरवाने कामे सगाटे, (सरी पं०) एस. जा. तिमी मारी, कापने पारा देशना कामना पापाना (६) यावे वे, (जसं के०) एपण एक जातिनी माटीज के, पण दार चूमिमा उत्पन्न वाथी कार अथवा खारो ए नामे जलखाय . एवीरीते (मट्टी के) माटी अने (पाहाण के०) पाषाण, ए ये पदार्थानी काली, नीली, राती, पीली अने धोली एबी(जाय उणेगा के०) अनेक जाति ठे ते वधी लेवी तथा (सोवीरंजण के०) ए सुरमो एवे नामे उलखाय ठे ते यांखमां अंजाय ते. (खूणा के) सिंधव, साजी, विमलवण, काचलवण तथा समुजलवण, (श्चाई के) इत्यादि, (पुढविनेया के०) पृथिवी- काय संसारी जीयोना नेद कहेवाय ॥४॥ हवे चादर अप्काय जीवोनुं वर्णन करे :- नोमंतरिरकमुदगं, जैसा दिम करग दरितणू मदिना ॥ हुंति घणोददि- माई, नेत्राणेगा य आनस्स ॥५॥ गाथा ५ मीना छूटा शब्दना अर्थ, जोमनामिन. हिम-हिम, वरफ. यंतरिकंन्याकारान. उदगं पाणी. हरिता पाम ममुपसीनीय- ठेमा मर्नु पापी, कामगरसतिना अन जाग उपरना पाणीनां विंड करग-करा.

३ महिआयरसादनी फरफर, था लेदो. धुमरीनुं पाणी. ऐगास्थनेक. हुँति श्राय . यावरस थप्कायना. पोदहिमाई-घनोदधि श्रादि. अर्थः-(नोमं के) कूपादिनुं पृथ्वीमा रहेढुं तथा शिरोपानीय, एवधुंनूमिजस कहेवाय , (अंत- रिफमुदगं के०) सरोवरादिकने विपे जे मेघन पाणी जराय रे ते यंतरिक्ष उदक कहेवाय ठे, (सा के) उसनुं पाणी ए तुपार अथवा फाकल पण कहेवाय , (हिम के०) हिम पड्याथी जे बंधार जाय रे ते पाणी, (करग के ) वर्षास्तुमा मेघ पमतां वायुना योगे पाणी बंधाश् कविन थश्ने धोला पापाएना कटका जेवा पृथ्वी उपर पडे ते ते करा यथवा करक कदेवाय वे, (हरितणू के० ) उगेला घास प्रमुख वनस्पतिना मोर यथवा माल प्रमुखनां पांदमांने ठेडे जे पाणीनां विंध थाय ते ते हरितनु कहेवाय , (महिया के) याकाशने विपे को समये वादखां थ यावे ठे तेना योगे यति सूक्ष्म जीणी जीणी पाणीनी बूंदो पडे ठे ते महिका यथवा. धुमरीनुं पाणी कदेवाय ते, एवी रीते (अप (७) के) अप्कायना (घणोदहिमाई के०) जेने आधा पृथ्वी रही ते ते घणोदधि आदि दश्ने वीजा पर (जेया णेगा के ) अनेक नेदो (इंति के०) थार दे. ए अप्काय जीयोना नेद कहा ॥५॥ हवे तेलकाय जीवोना भेद कहे :- इंगाल जाल मुम्मुर, उकासणि कण- ग विडमाईआ ॥ अगणिजिआणं नेत्रा, नायद्या निजणबुझिए ॥ ६ ॥ गाथा ६ हीना छूटा शब्दना यर्थ. गाव-भंगारानो थपि. विका-पिजली. जापानी यति श्वाश्था यादि. मुगुर धामदि, नागे अगणि अशिफाय. शक्षा-सहकारानो शनि. जिल्याणजीयोना. श्रमति ननो मार मारतानमा दो. पाली अनि नायरा- माया योग्य. ग लीथानीयनि- নিল নি, थ:-(गाय केय) ज्यामा निनानो स्थगि, काट प्रमुर वस्तुनुं गत्व ग्यारे पक्षी जायो सारे थगिती स्वासानी नाम पर जाय, प्रान सरानी पहें पकिन ककमा या देने यंगार फवाय , ठे, (जाल के) ज्वालानो अग्नि, ( मुम्मुर के०) अग्निनी ज्वालामांधीजे सूक्ष्म कण नीकले तेनासद्धि अथवा नागे कहेवाय , (उका के) कोश्क कालने विपे याकाशमांथी अमिनी पृष्टि थाय ठे ते उल्कापातनो अग्नि कहेवाय , (असणि के०) वजनो मार मारतां तेमांयी थनिपडे ठे ते अशनि कदेवाय , (कणग के) कोइक कालने विपे याकाशमां यग्निना तणखा उमता देखाय ते कनक एटले कणीयानो अग्नि कहेवाय ने, (विज्जु- माश्या के) विजली यादिक ते वास्तु प्रमुख कोइ पण शतुमां ज्यारे मावतुं थाय ते त्यारे को वखते याकाशथी बिजली पृथिवी उपर पड़े ते ते विद्युत्पात कहेवाय ठे, इत्यादि (यगणिजियाणं के०) थनिकाय संसारी जीयोना (नेया के०) नेदो ते (निजणबुझिए के) निपुण एटसे सूक्ष्म बुझिए करी (नायबा के0) जाणवा योग्य ते ॥६॥ हवे वायुकाय जीवोना नेद कदे :- जनामग जकलिया, मंडली मद सुक्ष + , पशु-निथे. (१०) गुंजवाया य ॥ घणतणुवायाश्या, नेया खलु वानकायस्स ॥७॥ गाथा मीना लूटा शब्दना यर्थ. सामग-नामक एटसे गुंजवाया-गुंजारव करतोवायु. नमा तेत्रो यायु. घणनणुवाया-धनवायु अने पासियागकसिक एटो तनुवायु. नीचो परतो यायु. थाईया-धादिक. पसीटीसी, मंसिक नया-दी. महागयु १२गुयायु. ध्यायः-(अपामग के०) चंगो थाकाराने विजे आयु रागादिकमायेमाने नमाये वे ने गामक पायरी हवाय, ( कातिया के0 ) जे वायु नीनो पमतो हाय ते नरकनिक यायु कडेवाय , (गंगली ) टिानी ययया मंगलिक यागु कदेवाय रे, (मह Ea) को बार मोटो वायगे थाय ने महापायु, (गुरु ने दानः नः वाय ने शुरूवायु, (गुंजयाया य०) गुंजाव करे ने गुंजयाय काय , यने (पणत. बाया के) जये थायुन थाधार नरक देपसोकादि हरडा के नएज धनमाय लयात्रीको ननुवा कलाप यानकायम्ग-पातकायना.

, से. (याईया के०) इत्यादिक (खयु के) निश्चेकरी (वाउकायम्स के०) वायुकाय संसारी जीयोना (नेया के०) नेदो जाणवा. ए प्रमाणे ठ गाथाए करी पृथिवी, अप, तेज तथा वायुकायना नेद कथा ।। ७ ।। दवे वनस्पत्तिकायना नेद कहे :- सादारण पत्तेआ, चणस्सइ जीवा इदा मुए जणि ॥ जेसिमणंताएं तणु, एगा सादारणा नेक ॥७॥ गाथा ७ मीना छूटा शब्दना अर्थ. जमि जमर्नु. पत्तेयाम्पत्येक. यताएं-थनंत जीवोर्नु. पणस्सर वनस्पतिकाय. तणु-शरीर. जीया-जीयो. पगाएक. उदा-धे प्रकारना. साहारा-साधारण मुए-सिक्षांतने विप. तेज-तने. पिथा-कहेसा . व्यर्थः-(वएस्स जीया के०) वनस्पतिकाय जीवो ते एक (साहारण के०) साधारण यने वीजा (पत्तेया के०) प्रत्येक, ए (उदा फै०) ये प्रकारना (सुए के) सिकांतने विपे (जणिया के)कहेलावे... साहारपसाधारण (१२) तेजमा (जेसिमपंताणं के) जे अनंत जीवोन (ह. एगा के०)एक शरीरदोय (सेकेण) तेने (साहारण के) साधारण बनस्पतिकाय जीवो जाणवा ॥5 हवे वे गाथाए करी ए साधारण वनस्पतिकाय जीवोना नेद कहे :- कंदा अंकुर किसलय, पणगा सेवाल लूमिफोमा अ॥ अक्षयत्तिय मार मो,- चतुला थेग पल्लंका ॥ ए॥ कोमल फलं च सछ, गूढसिराइ सिणा- पत्ताई ॥ थोदर कुंवारि गुग्गुलि, गलोयपमुदाइ विनरुक्षा ॥ १० ॥ गाथा ए मीना छूटा शब्दना यर्थ. कंदा-कंद. श्रा, सीती इसदर थंकुर-थंपुर, फएगा. श्रने खीसो कचूरो). किसक्षय युपतो. पणगा-यांच वर्णनी फुगी. मोग-मोय. मेयासम्मेवास, सीत. यमुलाए नामे शाक विशेष. भूमिफामा-पिजामीना रोप. गधामुरा, धेगी. थायतिय-याकविक (खी पथका-ए नाम शाक विशेष गार-गाजर.

-मर्य.
गृ गनी.
श्राश्-थादि.
(१३)
गाचा १० मीना छूटा शब्दना यर्थ.
फोमर कोमल, जमां पीजन घोदरम्पर्य जाननो छोर.
श्रयां होय ते. कुंयारि-मुंगार.
प.सं--पास.
गुग्गुखि-गुगस.
गलोय-गतो, गमु.
पमुद्दा प्रमुख
मिरा-पाएससा थादि.
বিবি हिमरदायां धकांयाग्याथी
पगार-पांदगां.
परी उगे ते.
थर्थः-(कंदा के०) सूरणादि सर्व जातनां कंद,
(थंकुर के०) यहार नीकलेसा थंकुर, (किससय
वे.) सर्व जातिनां कुंपलना नवा टसा फूटे ते पातरां
जाण्यां.(पणगा के०)पांच वर्णनी फुगी, (सेवास के)
जे पाणीनी उपर रंग रंगनी लीख थाय लेते, (नूमि-
फोमा के०) वकासमा उत्रने याकारे पृथ्वीमाथी
नीकले ते.ते पिलामीना टोप एवेनामे उसखाय छे.
(थ के) वली (यज्ञयतिय के) यार्डकत्रिक
एटसे सीयुं याड, सीसी सदर तथा सीखो
कचूरो, (गार के ) गाजर, (मोठ के) मोथ,
(घसा के०) वथुलो नाम शाक विशेप, (थेग के)
धामुरा, येगी,(पलंका के) ए नामनु शाक विशेष

(१४) एने लोको पालघू कहे ते ॥ ए॥ (च केव) वर (कोमल फलं सर्व के) सर्व कोमल फल पटले जे वीज थयां न होय श्यने (गूढसिरा के०)जेनो कर सलोअथवा पोखवानोहोय, एटले जेना कण पाध देखाता न होय, तथा जेनी नसो अथवा सांधस्प देखाती न होय त्यांसुधी ते व्यनंतकाय जाणवां, (सिणापत्ताइ के०) शणादिकनां पातरां आदि श करीजारनां पातरां पण लेघां.(योहरि के)योहरन सर्वजाति,एमां कांटालो तथा खुरसाणी पण जाणवे (कुंयारि के०) कुंवार थाय ते ते सोकमां प्रसिः ,पने घरमां उंची टांगी होय नोपण सूकाती नर्थ किंतु एना नवा मोर नीकलता जाय ठे. (गुग्गुलि के गुगल प्रसिक वे. (गलोयपमुद्दा के०) वती गपुर प्रमुख पने गमुया कहे ठे, ए. यहीने थाकारे या ते,प.स्वरादिक मटाट्यानी योपधि विशेष. (याः के.)प थादेदश्ने वीजा पण सर्वे जे (चिन्नरुदा के यां थकां पण याव्याथी फरीने जगे ते सर्व साधा रण वनस्पति यथवा अनंतकाय कहीप ॥ १० ॥ चाणी अगोगे, वंति नेया अणंत- एयं-आ. (१५) कायाणं॥ तसिं परिजाणण, लकण- मेयं सुए जणियं ॥११॥ गाथा ११ मीना बुटा शब्दना अर्थ. चाणो-इत्यादिक. परि सारी रीते. ममस्त प्रकारे. थणेग-अनेक. । जापण-जाणवाने अर्थे. दवंति-होय . सरकाएं-सक्षण. नेया-दो. थएंतकायाएंथनंतकायना. मुए-सूत्रने विपे. तसिस्तेमने. जपियं-कहेलु के. अर्थः-(श्चाणो के) इत्यादिक (यतका याणं के)यनंतकाय जीयोना पिंग, कचूर तथा गि- रिकर्णिकादिक (आगेगे के०) थनेक (नेया के०) नेदो (हवंति के) होय ठे, (तेसिं के०) ते अनं- तकाय जीवोने (परिजाणण; के०)सारीरीते जाण- । वाने थयें (एयं के०) या वक्ष्यमाण एटले जे आगल कदेशे ते (सरकणं के०) सक्षण (सुए के) सूत्रने विपे (जणियं के० ) कहेडं है ॥ ॥ दवे श्यनंतकाय वनस्पतिजीवोनुं सक्षण कही वतावे वे. गृढ सिर संधि पचं, समन्नंगमही-

रीने लगते
(१६)
रुगं च विनरुहं । सादारणं सरीरं,
तविवरीअं च पत्तेयं ।। २२ ॥
गाथा १२ मीना लूटा शब्दना अर्थ.
गूढ-वानां.
अहीरुग-तांतणा विनानु.
सिर-कणसला.
विन्नई-वेदीने चाव्याथी फ
संधि-सांधा.
पयं-गांगा.
तविपरीश्रन्ते श्रकी विपरी
समनंग-नांग्याची जेनांसरखां
सक्षणवाडी
वे फामीयां यह शकतां होय. पत्तेयं प्रत्येक वनस्पतिकाय.
अर्थः-(सिर के) कणसला प्रमुख शिर, (स
के) सांधाउँ अथवा नसो, (पवं केर) पर्व अथव
गांग; एवणे जे कामना (गूढ के०) गुप्त ठाना हो
पटले दीवामांन थावतां होय यने (समजंग के
नांग्याथी जेनां सरस्वां चे फामीयां यश् शकतां दोय
(यहीरुगं के०)तंतु रहित जेमां तांतणा होय नहीं, (.
क०) पुनः एटसे वसी(विन्नई के०)जे वेदीने फर
यावीप तो उगे, ए सर्व प्रकारनां गृक्षोने (सादारणं
सरीरं के०) साधारण वनस्पतिकायनां शरीर कहीम,
थने एज थनंतकाय पण कदेवाय . (तनियरीर्थ
।
.

। पायं ० ) प्रत्येक पनम्पनिकाय कदीप ॥ १२ ॥ एग सरीर एगी. जीया जेसिं तु ने व पनेया ।। फस फूल गति कहा, मृलग पत्नाणि बीयाणि ॥ १३ ॥ गाधा १३ मीना हटा शब्दना थर्य. पार पार. रीमान वि. पर कृत. एगो एप. वाय. जापानीय. कचा काष्ठ, साकमु. साम-(यनरपनि न. मृग मूड. पत्नाणि पांदमां. मन. पीयालि-बीज. परया प्रत्येक (यनरपतिकाय.) थर्थः-(एग सरीर के०) एक शरीरने विपे (पगो जीरो फ0) एक जीव (जेसिं के०)जे वनस्पतिने विपदोय (तु ते य पत्तेया के०)तेनेज प्रत्येक वनस्पति- काय कहीए. ए.प्रत्येक वनस्पतिकायना सात प्रकार ते या प्रमाणे:-(फस के०) सर्व प्रकारनां फस, (छत के०) सर्व प्रकारनां फूलो, (नति के०) • + (१०) HT (nam) murti raam (गुपE. • ) मालितो. (नी • Prim Pr : CTET Preity.mart "ti hd ए मा पEिr HTTER HIT ॥१॥ kat IITamily. . HT गाना, " . 4.n: 44:11. ki ! पा s: m.REAM THE न

(१७)
स्पतिकाय मूकीने (पंचवि पुढवाश्णो के) पांचे पृथि-
व्यादिक (सयल लोए के०) सकल चोद राजलोकने
विपे(सुहुमा के) सूक्ष्म (हवंति के०)होय ठे,(नियमा
के०) निश्चये करी.एने पांच स्थावर कहीए.ते (यंतमु..
हुत्तान के०) अंतर्मुहूर्त्तना यायुप्यवाला होय ठे
ने (यहिस्सा के०) अदृश्य होय ते, एटले चर्मदृष्टिए
देखाय नहीं. तेथीज ए सूदम कहेवाय ते ॥ १४ ॥
ए पांच स्थावर सूक्ष्म अने पांच वादर मलीने दश
नेद थया, अने प्रत्येक वनस्पतिकाय ते यादरज होय
ठे,पण सूक्ष्म होय नहीं.तेथी प्रत्येक वनस्पतिकायनो
एक जूदोज नेद होवाथी सर्व अगीयार नेद थाय .
ते अगीयार पर्याप्ता तथा यगीयार यपर्याप्ता मलीने
वावीश नेद स्थावर संसारी जीवना कयाठे थने
बीजासंसारी त्रस कहेवाय ,तेना मूल चार नेद लेते
याः प्रिय, तेइजिय, चोरिंजिय तथा पंचेंजिय.
तेर्डमांना प्रथम वेजिय प्रस जीवना नेद कहे :-
संख कवड्डय गंडल, जलोय चंदणग
अलस लगाई । मेहरि किमि पृन-
रगा, वेदिय माश्वाहाई ॥ १५ ॥

(२०)
गाथा १५ मीना छूटा शब्दना अर्थ.
संख-शंख.
अलस-थलसीयां.
कवडय-कोमी. खहगाई-सालीया जीव.
गंमुख गंमोला.
मेहरि-मेर (लाफमामांथता
जलोय-जलो.
किमि-कृमि.
चंदणग-चंदनक, अरिया,
पूअरगा-पूरा.
अक्ष. | माश्वाहाई-चूमेल आदि.
अर्थः-(संख केरा) दक्षिणावर्त्त प्रमुख मोटा तथ
नाना शंख होय ते ते, ( कवड्डय के) कपर्दय
अथवा कोमी अने कोमा थाय येते, (गंगुल के
गंगोलाएने गगुता कहे , ए उदरमा मोटा कृमिय
उत्पन्न थाय ते जाणवां, (जलोय के०) जलो
शरीरनी उपर फोमा वगेरे याव्या होय त्यारे तेनीउ
पर मूक्याथी ते जग्यानुं रक्त शोपण करी लीए ते
(चंदणग के) एने सिळांतोमा थक्ष एवानामर्थ
प्रतिपादन कयुं , एनेश्वरिया पण कहे , ते साधु
स्थापनामा राखे ठे. (यलस के०) वर्षाकाखमां पृष्टि
याय ते वखते पृथिवीमांथी सपना याकारे खास
रंगवाला जे यति पातसा जीयो उत्पन्न थाय , ते
ज्यांमुधी बरसाद यतो होय त्यांमुधी ज्यां त्यां घणा

.
(१)
फरता दीवामां आवे ठे, ज्यारे वरसाद रही जाय ठे
ने तमको पडे ते त्यारे तेमांनो एक पण दीवामां
यावतो नथी.एने जूनाग यथवा अससीयां पण कहे
वे. (लहगाई के ) रोटली प्रमुख पकावेद्यं अन्न
वासी रही गयाधी केटलाएक काले तेमां जे जीव
पडे ठे तेने खालीया कहे ठे, (मेहरि के०) काष्टमा
जे कीमा थाय ते, (किमि के०)ए पण एक जातना
कीमा होय ते ते उदरमा उत्पन्न थाय ठे, थथवा
गुदप्रदेशने विपे हरस थाय ठे तथा गुबमां वगेरेना
क्षतने विपे जे कीमा थाय ते तेने कृमि कहे . (पूय-
रगा के०)ए जीव पाणीमा उत्पन्न थाय ने, ए जीवोनो
वर्ण रातो होय ठे अने मुख कार्यु होय . एने
कष्ठी नापामां पूरा कहे ते थने (माश्वाहाई के)
मातृवाहादिक एने चूडेस पण कहे , मूल गाथामां
आदि शब्द येतेयादि शब्दथी मनुप्यना थंगमांजे
वाला थाय वे तेपण देवा, इत्यादिक (वेदिय के०)
वेजिय जीव जाणी सेवा. ए जलमां तथा स्थलमा
उत्पन्न थाय ठे. ते अनेक प्रकारनावे. एऊने स्पर्शनें-
जय तथा रस प्रिय ए ये इंजियो दोय वे ॥१५॥

मामाको रोजिम जीना दो गामी मंश जणा, पिपीलि उदहिया पमानवाशिम यामिनी, सावर गोजीमागदग गोपीना, मंसीमा मातीमाग। हुंग गुणा- PERATIसिकन्दगाना॥१॥ HTTAR मीना या शमना धर्म । आनिशा. Ragnा गा. AtInfirk. ...retat. MER , , (२३) घणा होय ठे, ने ए कानमा पेसी जश्ने माणसने घणी जा करे , एम कहेवाय वे, (मंकण के०) माण- सना सुवाना विगनामां अथवा खाटला प्रमुखनी नवारमांजे जीवो उत्पन्न थाय तेने मांकन कदे ठे, (जूया के०)यूका. एजीवोमाणसनामाथाना वालमां उत्पन्न थाय ठे. अथवा माणसनां कपमांमां उत्पन्न थाय ठे, एटसे एमाणसना शरीरनामेलमांथी उत्पन्न चाय ठे, एने कछी तथा गुजराती नापामां सीखं कहे ते, तेसंस्कृत विद शब्दनो अपवंश ठे.(पिपीलि के) एने पिपीलिका अथवा कीमी कहे , एनी राती अने कासी एवी घणी जाति होय ठे,ते लोकमांप्रसिद्ध के. (उद्देहिया के०) उद्देहिका,एने वाल्मिक जीव पण कहे . ए जीवो वृक्षमा, काष्ठमां यथवा रहमा ज्यां ज्यां प्रवेश करे ठे त्यां त्यां पोतानुं शरीर रहेवा पूतुं घर वनावीने तेमांयी ते वृदादिकने खाती खातीचाली जाय ते. (य के०) वली (मकोमा के०) मरकोटिका अथवा मंकोमा,ए जीव घणुं करीने यावक्षना कामना थममा उत्पन्न थाय , ,ययवा गोस प्रमुख मिष्ट पदार्थ ज्यां होय त्यां थाय ठे. (शलिय के०)इलिका, एजीय (२२) हवे वे गाया बडे तेत्रपिय जीवनानंद कंद के गौमी मंकण जूआ, पिपीलि नदेदिया य मक्कोडा॥इल्लिय घयमिल्ली,सावय गोकोमजाईज॥१६॥गददय चोरकीमा, गोमयकीमा य धन्नकीमा य॥कुंथु गुवा- लिय लिया, तेदिय इंदगोवाई॥२॥ गाथा १६ मीना तूटा शब्दना अर्थ. गोमी कानखजूरा. ऽद्विय-इल. मंकण-मांकम. घयमिहीनधीमत. जूया-यूका. पिपीलि-कीमी. गोकीम-गीगोमा. उद्देहिया-उद्देहिका, उधर जाईन-जातियो. मकोमा-मंकोमा. गाथा १७ मीना वूटा शब्दना अर्थ. गदहय-चत्तिंगा, गया. कुंथु-कुंयुया. चोरकीमा-विष्टाना कीमा. गुवाक्षियोपातिक. गोमयकीमा-गणना कीमा. इलिया-इखिका. धनकीमा-धान्यना कीमा. दिय इंडिया यम्सी. इंदगोवाई-इंजगोपादि. थर्थः-(गोमी के०) कानखजूरीया, एना पग मावय-सावा.

E (२३) घणा दोय , ने ए कानमां पेसीजश्ने माणसने घणी इजा करे ते, एम कहेवाय वे, (मंकण के) माण- सना सुवाना विगनामां अथवा खाटमा प्रमुखनी नवारमा जे जीवो उत्पन्न थाय ने तेने मांकन कहे , . (जूया के०) यूका. एजीयोमाणसनामाथानाधासमां उत्पन्न याय ठे, अथवा माणसनां कपमांमां उत्पन्न । धाय ठे, एटसे एमाणसना शरीरनामेलमाथी उत्पन्न थाय ते, एने फछी तथा गुजराती जापामां लीख कदे ठे, ते संस्कृत विक्ष शब्दनो अपनश .(पिपीलि कै०) एने पिपीलिका अथवा कीमी कदे ठे, एनी राती यने काली एवी घणी जाति होय ते,ते लोकमां प्रसिद्ध है. (उद्देहिया के०) उद्देहिका,एने वाल्मिक जीव पण कद ठे. ए जीवो वृक्षमा, काठमां अथवा गृहमांज्यां ज्यां प्रवेश करे ते त्या त्यां पोतानुं शरीर रदेवा पूतुं घर वनावीने तेमांयी तेवृक्षादिकनेखाती खाती चाली जाय . (य के०) वली (मकोमा के) मरती टिका श्यथवा मंकोमा,ए जीव घणुं करीने वावखना कामना थममा उत्पन्न थाय ,यथागोस प्रमुख मिट पदार्थ ज्यां दोय त्यां थाय . (इल्लिय के०) इविका/एजीय म

(२६)
नमरिया जमरी.
मसगा-मडर.
तिड्डा-तीम.
कसारीकसारी.
मचिय-माखी.
कवित-करोसीया.
मंसा-मांस.
मोबाई-समांकमी.
अर्थः-(चरिदिया के).चौरिजिय र्ज
श्रा :-( विलू के०) विशु ए जातना फेरी र्ज
थाय ठे, तेना पूंठमामां एक कांटो होय , ते
मारथी माणसने विष चढे ठे, ते विठी एवेन
लोकमां प्रसिहले. (ढिंकुण के) ए जीवो कां
मक्षिकाने मखता होय , ते घोमाना तवेला प्र
खने काणे उत्पन्न थाय वे, तेने लोकमां वर
कहे ते. (जमरा के) ए जीवो काला वर्णना
के, अने ते घणुं करीने ज्यां सुगंधी पुष्पोनां यू.
होय ते त्यां रहे , ए जीवोने पुष्पोनो सुगंध घणं
प्रिय होय , ए चमर एवे नामे खोकमांप्रसिद्ध
(जमरिया के) चमरिका, ए जीवो पीतादिद
घणा रंगवाला होय ते, तेमज विविध याकारवाल
होय . (तिष्ठा के०) ए जीयो वशतुना श्रव
सानमा जे यखते धान्यनां वृक्ष पाकी रहेसा होर

(२७) ते ते वखते याकाशमार्गे अगणित संख्याबंध उमतां को धान्यनां क्षेत्र वगेरे उपर आचीने पडे ते, ते जेटली जम्यामां यावी पडे ठे तेटली जग्यानां काम पान वगेरे सर्व खाश्ने खाली करी नाखे ठे, ते तीम एवे नामे सोकमां प्रसिक. (मछिय के) मक्षिका, ए जीवो लोकमां अति प्रसिक, ए माखी एवे नामे उसखाय ठे, उपलक्षणथी मधु- मक्षिका पण जाणी लेवी. ( डंसा के) मांस, ए जीवो सिंधु देशमा प्रसिद्ध वे. ए घणुं करीने वर्षा- कासमां चीकणी जमीनमां उत्पन्न थाय . (मसगा के) मसक, ए जीवो लोकमां मछर एवे नामे 'उसखाय ते, ए लोकमां प्रसिक ठे. (कंसारी के०) ए जीयो घणुं करीने उजम घर प्रमुखमां उत्पन्न थाय ते, ते लोकमां प्रसिझ ठे. (कवित के) करोलीया थने (मोसाई के०) खममांकमी, थादि शब्द यकी पतंग प्रमुख वीजा जे चोरिजिय जीवो होय ते सर्व जाणी सेवा. ए जीवने स्पर्शनेंप्रिय, रसनेंजिय, प्राणेजिय तथा नेजिय ए चार इंडियो होय वे ॥२७॥ -- , (२०) दवे पंचंद्रिय जीवोना नेद कड़े :- पंचिंदिया व चहा, नारय तिरिया मणुस्स देवा य॥ नेरझ्या सत्तविदा, नायधा पुढविन्नेएणं ॥१५॥ गाथा रए मीना छूटा शब्दना अर्थ. पचिंदिया-पंचेंजिय. नेरड्या नारकीना जीव. चउहा-चार प्रकारना. सत्तविहा-सात प्रकारना. नारय-नारकी. नायवाजावा. तिरिया-तिर्यंच. पुढविएणं-( रक्षानादि मणुसम्मनुष्य. पृथ्वीना दे करी देवा-देवता. अर्थः-(पंचिंदिया के) जेने स्पर्शनंझिय,र जिय, प्राणेडिय, चक्षुरि जिय तथा श्रोत्रंसिर पांच इंजियो होय ते पंचेंप्रिय जीव कहेवाय शहां "च" समुच्चयार्थमा . ते जीव (चहा चार प्रकारना है. एक (नारय के०) नारकी, ( तिरिया के ) तिर्यंच, जीजा (मणुस्स के मनुष्य, चोथा ( देवा के) देवता. तेउँमा प्र ' (नेरश्या के) नारकीना जीवते (पुद विनेएणं वे रक्षप्रनादि पृथ्वीना नेदे करी ( सत्तविहा. के .

:-धमा, (ए) सात प्रकारना . ते सात पृथ्वीनां नाम कहे चंशा, सेला, अंजणा, रिहा, मघा तथा 'माघवती, ए सात ठेकाणे उत्पन्न थयेला जीवोने नारकी कहीए. तथा तेमनां गोत्रनां नाम कहे . रत्नप्रजा, शर्करामना, वालुकाप्रजा, पंकप्रना, धूम- प्रना, तमःमना तथा तमस्तमःप्रना, ए सात प्रका- रने पर्याप्ताना तथा अपर्याप्ताना नेदे गणतां चौद नेद नारकी जीयोना थाय ते ॥ १५ ॥ हवे पंचंजिय तिर्यचना जेद कहे :- जलयर यलयर खयरा, तिविहा पंचें- दिया तिरिरका य ॥ सुमुमार मठ क- व, गाहा मगराइ जलचारी ॥२०॥ गाथा २० मीना वूटा शब्दना यर्थ. जसयर-जसपर. मुमुमार-सुसुमार. थक्षयर-थलघर. म-मारखो. सयरा-संघर. काय-काचयो. तिबिहा-त्रण प्रकारना. गाहा हुंग. - पंचेंदिया-पंचेंशिय. मगराइ-मगर विगैरे. तिरिका तिर्यच. | जसचारी जखचर जी ..

ܕ܂ --
(३०)
अर्थः-(तिरिका पंचेंदिया तिविहा के०) ति
र्यच पंचेंद्रिय प्रणप्रकारना ,ते याः--एक (जल
यर के०) जलचर एटले जे जीवो पाणीमांजर
थाय, पाणीमां रहे तथा पाणीमांज नाश पामे
जलचर जीव जाणवा. वीजा (थलयर के०) स्थ:
चर एटले जे जीवोनी जत्पत्ति, स्थिति तथा नाशनं
संजय जलचरोनी पेठे पृथ्वी उपर होय ते, तप
श्रीजा (खयरा के०) खेचर एटले जे जीवोन
चालयानी स्थिति याकाशने विपे होय ते जाएग
तेमा प्रथम जसचर जीवना मुख्य पांच नेद।
ते या प्रमाणे:-क (सुसुमार के०) पामान
जेवा मल्य होय वे, ते घj करी मीठा पाणीन
नसार प्रमुपा दीवामां थावे ठे, वीजो (मध के
नाना प्रकारनां जे बीजां माउसा दीगमा थाये।
ते, जातिना जीयो घाणं करी खारा समुअग
विशेष दीनामा यावे , पीजो (कछत्र फे०)
हा, एजीयो पा करी भीग पाणीना तक्षाय अपर
मांदेक्षा याना पाणीमां दीवामां थाये थे, पन
स्वचा धणी कविन होय रे थने तमांची दास ।

नामनां हथियार देहरक्षणार्थं लोक करे ने, ए जीवने लोकमां काचवाना नामे सखे ठे, चोथो (गाहा के०) ए जीवो समुअमां तेमज मीग पाणीना तलाव प्रमुखमां पण थाय ठे. ए जीव तंतु याकारे होय ते, ने अति बलवान् होय , पाणीमा पर्नु एटर्बु जोर होय रे के ते हाथीने पण घसमी जाय , एने लोकमां ऊम एवे नामे उलखे ठे, पांचमो (मगर के०) मगर, ए जीव समुत्रमा होय ठे, एनुं शरीर यति विशाल होय ठे, ए खो- कमां मगरमत्स्य एवे नामे उसखाय ठे, ए (याइ के) यादि शब्दे करी बीजा पण (जलचारी के) जलचर जीव घणा प्रकारना दे. ए जलचर पंचडिय तिर्यच जीवना नेद कहा ॥२०॥ हवे स्थलचर जीवोना नेद कहे :- चनपय जरपरिसप्पा, जुयपरिसप्पा य थवयरा तिविदा ॥गो सप्प नजल- पमुदा, बोधवा ते समासेणं ॥३१॥ गाथा २१ मीना लूटा शब्दना अर्थ. घउपय-चार पगवासां. । घरपरिसप्पारम्परिसर्प. --

(३२)
नुयारिमप्पा-नुजपरिमपं. नव-नाक्षिया.
अक्षयरा-स्थलचर.जीय.
। पमुहाप्रमुख.
तिथिहाप्राण प्रकारना.
योधया-जाण्या.
गो-गाय.
ममासणं-मपत्री.
सप्प-सर्प.
अर्थः-( अक्षयरा निविदा के०) स्थखवर जी
त्रण प्रकारना , ते याः-एक (चउपय के०) व
प्पद एटले चार पगवाला सर्व प्रकारनां पशु जाए
लेबां, वीजा (उरपरिसप्पा के) जर परिसर्प :
जीवो उदरथी चाले वे. एनी नाग प्रमुख घर
जाति होय वे, एमां केटलाएक जीवो विपरहिः
होय . अने केदलाएक विष सहित होय ते.
लोकमां प्रसिद्ध वे. (य के० ) वली त्रीजा (जुय
परिसप्पा के०) जुजपरिसर्प ए जीवो जुजा बडे चा
वे. ते नोलिया प्रमुख जाणी लेवा. ए उपर कह्या
त्रण प्रकारना स्थलचर जीवो ते अनुक्रमे (
के०) गाय प्रमुख ते चतुष्पद, (.सप्प केस
प्रमुख ते उर परिसर्प तथा (नवलपमुहा के०
नोलिया प्रमुख ते तुजपरिसर्प, ए (समासेणं के
। संक्षेपमात्रे करी (बोधवा के) जाणी लेवा. ।
स्थलचर जीयोना नेद कह्या ॥१॥

। (३३) हवे खेचर जीवोना नेद कहे :- खयरा रोमयपरकी, चम्मयपकी य पायमा चेव ॥ नरसोगार्ज वादि, समुग्गपरकी विययपरकी ॥२२॥ गाथा २२ मीना छूटा शब्दना थर्थ. खयराखेचर जीय. चेव निश्चे. रोमय रुवाटांनी पांखवालां. नरखोगा मनुष्यखोकनी. परकी पही. | वाहि-पहार. चम्मय-धाममानी पांखवासां. ' समुग्ग-संकोचेली पांखयाखां. चियय-विस्तारखी पखवायां. यर्थः-(खयरा के०) खेचर जीवो ते थाकाशने विपे विचरनारां जे पक्षी ते वे प्रकारनां वेः-एक (रोमयपरकी के०) रोमज पक्षी, एटखे जेऊनी पांखो रोमसंयुक्त होय ठे,जेवां के, शुक, हंस तथा सारसा- दिक पक्षी तेमज पारेवां, कागमा, चकलां, पोपट प्रमुख एनी पांख मोवासानी होय ते, ते (य के०)बीजां चम्मयपरकी के०) चर्मज पक्षीनो (पायमा के०) गट यर्थ वे. एटले जेनी पांखो चाममाना जेवी होय ने तेने चर्मज पक्षी कहीए. जेवां के, चामाची. पायमा-प्रगट. v

(३४)
मियां अथवा चर्मचीटिका, तथा वमबागुल यथः
वल्गुली प्रमुख ए (चेव के) निश्चे खोकमा प्रति
के, यने ( नरखोगा बाहिं केस ) मनुष्यलोक
वहार ( समुग्गपरकी के समुपक्षी, तर
(विययपरकी के ) वितत पक्षी होय ते. तेम
प्यलोकनुं प्रमाण शास्त्रोमां आवी रीते कडुं के
जंबुदीप, धातकी खंग तथा पुष्करवर छीपना
जाग सुधी मनुष्योनी वस्ती वे एटले एथ
बीपमा मनुष्यो ते. ते थढी द्वीपमांना प्रथम
छीपने चौफेर खानी पेठे खयण समुह की
रयो ? तथा वीजा धातकी खंगने कासोदधि की
रह्यो थने थढी छीपनी चोफेर वर्णमय मा
प्योचर पर्वत किवानी पेठे वेष्टित थर रहेको
ए. नरसोकदेवतुं प्रमाण एकंदर पीस्तासीश सा
योजन- कई . शहाज मनुष्योनां जन्म तथा
गनो संनय होगायी ग मनुष्यलोक कद्देवाय रे, ते
पदार उपर कदेतां ये जातिनां पक्षी होय वे, ते
गमुन्यत् गमुन पक्षीनी पांच सती यखते संप
चन पाने, थने वितत पक्षीनी पाय सर्वदा।
नाराज झोपते. सर्व सेवर जीओ जाणार

- -- . . जस-जसचर. थस-स्थलचर. (३५) हवे उपर त्रण प्रकारना जे तिर्यच जीवो कहा ते एकेकना वली वेवे नेद बीजी रीते कहे :- सचे जल थल खयरा, समुचिमा गन्न- या उदा हुँति ॥ कम्माकम्मग नूमि, अंतरदीवा मणुस्सा य ॥१३॥ गाथा २३ मीना छूटा शब्दना अर्थ. सधे सर्व प्रकारना. मुहाचे प्रकारना. हुँति-वे. कम्माकम्मग नमि-कर्मचूमि खयरा-खेचर. थने अकर्मचूमिना. समुछिमा-संमूठिम. अंतरदीवा-यंतरीपना. गप्रया गर्नज. मणुरसा-मनुप्य. अर्थः-ए उपर कहेला (सबे के०) सर्व प्रका- रना ( जल थल खयरा के०) जलचर, स्थलचर तथा खेचर जीवो ते एक (समुष्ठिमा के०) संमू- ठिम यने वीजा (गणया के०) गर्जज ए (उदा के ) द्विधा एटले वे प्रकारना (हुंति के०) ठे. एम प्रत्येकना पव्वे प्रकार होवाथी उनेद थया. तेमां जे जीवो माता पितानी थपेक्षा विना उत्पन्न थाय ते संमूर्छिम कहेवाय ते अने जे जीवो गर्नमां उत्पन्न

थाय ते गर्भज कद्देवाय वे. तिहां एप्रिय, हीं:
त्रींघिय तथा चतुरिंजिय ए सर्व जीव संमूर्ति
होय . ए तिर्यंचना सर्व मलीथमतालीश
ठे तेावी रीते-प्रथम एकेंड्रिय जीव वधा ।
कहेवाय वे. तेना वावीश नेद बागक्ष चौ.
गाथाना अर्थमां दर्शाव्या , अने वीजा:
जीवना इंजिय, तेजिय, चोरितिय थने पं.
ए चार नेद मूल के तेमां वेजिय, तेइंघिय त
चोरिंजियएत्रण विकलेंडियने पर्याप्ता तथाथपर्य
गणता र नेद बाय ते पूर्वोक्त थावीश साथे मेलब
यव्यावीश नेद थया.
हवे पंजिय तियंचनावीश नेद तेते देखा
जसचर, थलचर, खेचर, जर परिसर्प यने मुजारः
सर्प, ए मूस पांच नेद संमूर्णिमना थने पांच गर्न
जना मती दश नेद थाय. ते दश पर्याप्ता यने दश
थपर्याता मती शीश भेद थया, तेने पूर्वोक्त यक्या
वीश साथे मेजवतां थमतासीश द तिपंचना
याय.परीते गायाना पूर्वार्धमां पंजिय तिर्यंच
वर्णन कम्युं. हवे गायाना उत्तरार्धमां पंचप्रिय
'मनुश्यना नेद कहे :-
.

. (३७) (कम्माकम्मग भूमि के० ) कर्मनूमिमां उत्पन्न येला, अकर्मनूमिमां उत्पन्न थयेला तथा (यंत- तीवा मणुस्सा य के०) अंतरछीपमा उत्पन्न थयेसा प्रण प्रकारना मनुष्य होय ते. तेमां कृपिवाणिज्या- (क कर्मप्रधान भूमि ते कर्मनूमि कहीए. तेनूमिने पे जे मनुष्य उत्पन्न याय ते ते कर्मनूमिज कहेवाय ते कर्मनूमि अढी छीपमां पंदर ने यने जेमां पि वाणिज्यादि कर्म नथी एवी अकर्मनूमिर्न श, तथा यंतरछीप ठप्पन वे ते या प्रमाणेः- जंबुटीपना मध्यजागे मेरु पर्वत के तेमेरुथी दक्षिण शे सवण समुपने लगतुं लवण समुअनी उत्तर दिशे रत देन ते कर्मभूमिज वे तथा ते जरत क्षेत्रने तर दिशिने वेडे हेमवंत पर्वत ठे, ते पर्वत मूकी नी उत्तर दिशिमां हिमवंत नामे युगलिया क्षेत्र यने वली मेरुथी उत्तर दिशेखवण समुभने लगतुं मुखनी दक्षिण दिशे ऐरवत क्षेत्र ते कर्मनूमिज ते ऐरवतनी दक्षिण दिशिने वेडे शिखरी नामे वत , ते पर्वत मूकीने तेनी दक्षिण दिशे एक हरण्यवंत नामे युगलियान क्षेत्र के एटसे पूर्व देखा एक हिमवंत थने चीजें हिरण्यवंत ए ये--

...
(३०)
अकर्मभूमि क्षेत्र के एने विपे युगलिया मनुष्य रहे
तेनुंसदाकाले एक गाउ देहमान अने एक पक्ष
पमर्नु थायु वे. त्यां सदाकाल चीजोथारो व के.
तथा वली ते पूर्वोक्त हिमवंत नामे युगा
याना देनथी उत्तर दिशे एक महाहिम
पर्वत वे, ते पर्वतनी उत्तर दिशे हरिवर्प ना
युगलियार्नु क्षेत्र के तथा पूर्वोक्त हिरवं
नामे युगलियाना देवथी दक्षिण दिशे एक
नामे पर्वत ठे, ते पर्वतनी दक्षिण दिशे एक रम्य
नामे युगलियान क्षेत्र के. ए रीते एक हरिवर्ष
वीजु रम्यक एवे अकर्मनूमि क्षेत्रमा युगलिया।
ठे, तेनुं सदाकाले वे गाउ देहभान अने ये पट्यो
पमनुं वायु . त्यां सदाकाल वीजो भारी वर्ने ।
तथा बली हरिवर्प नामे युगलियाना क्षेत्र
उत्तर दिशे मेरुनी तरफ लाल हिंगला जेवा बई
निषध नामे पर्वत , तेनी पासे एक देवक
नामे युगलियार्नु क्षेत्र तथा वली मेरु थर्क
उत्तर दिशे जे रम्यक नामे युगलियान क्षेत्र
तेनाथी दक्षिण दिशे नील वर्षे एक नीसवं
नामे पर्यंत , ते पर्वत यकी दक्षिण दिशे मेरुन
,

(३ए)
से एक उत्तरकुरु गामे युगलियार्नु क्षेत्र ते. एटले
क देवकुरु यने वीजें उत्तरकुरु ए ये अकर्मन्नूमि
त्र, तेने विपे युगलिया मनुष्य रहे ते. तेनुं सदा
सि त्रण गाउनु देहमान वे अने त्रण पल्योपमर्नु
यु वे. तिहां सदाकाल पहेलो थारो वर्ते ठे.
तथा निपध अने नीलवंत ए वे पर्वतो कह्यातेनी
चाले मेरु पर्वत ठे, ते मेरुनी चारे दिशि मांदेथी
4 दिशे पूर्व महाविदेहनी सोल विजय वे अने
श्चिम दिशे पश्चिम महाविदेहनी सोल विजय वे.
: येहु मली बत्रीश विजयर्नु एक महाविदेह नामे
मिनूमि देन .
ए रीते प्रथम जंबुद्धीपने विपे एक हेमवंत यने
हरण्यवंत, वीजु हरिवर्प ने रम्यक, त्रीजुं देवकुरु ने
त्तरकुरु, ए त्रण जोमले मली क्षेत्र युगलिया
नुष्यनां ते ते थकर्मभूमिज कहीए, कारण के ए
जत्रमा जे मनुप्य रहे ठे तेने प्रायः कर्म थोमां
गे ठे, केमके यसि, मसि ने कृपि ए प्रण वस्तु
मवंधनुं कारण ते ते वस्तु ए क्षेत्रोमां नथी, थने
एक जरत, एक ऐरवत तथा एक महाविदेद मसी
वण क्षेत्र कर्मचूमिज .

,
(10)
ए रीते चीजो धातकीखंगडीप थने पुस्करः
रनो थर्धए दोढीपमा प्रत्येक प्रत्येक एक
दिशिए थने घीजो पश्चिम विशिए मनी येथे
पर्वत , यने ज्यां एक मेरु होय त्यां एक जरत,
ऐरवत तथा एक महाविदेह, पत्रण कमर
क्षेत्र होय थने पूर्वोक्त जंबुद्धीपनी पेठे युग
थानां क्षेत्र होय ते बारे ये जरत, ये ऐवत, ये मह
विदेह, ए व क्षेत्र कर्मभूमिनां थने वे हेमवंत,
हिरण्यवंत, वे हरिवर्ष, ये रम्यक, ये देवकुरु अने।
उत्तरकुरु, एसर्व मली वार युगलियानां क्षेत्र धातकी
नामे वीजा छीपमां ने अने तेटलांज वली पुष्करा
नामे त्रीजा अर्धा बीपमा पण ठे, केमके ए वेद
सीपमा प्रत्येके वे वे मेरु ठे.
ए रीते ए अढी छीपनां क्षेत्रने एकां करीए ते
वारे त्रीश क्षेत्र अकर्मनूमिनां अने पंदर क्षेत्र कमजू-
मिनां थाय, सरवाले पीस्तालीश क्षेत्र मनुष्यनां धयां-
हवे वली उप्पन भेद वीजा देखाडे . जंबुद्धी
ला. जरत क्षेत्रना उत्तरने वेडे हेमवंत नामे
वे. ते पूर्व दिशे अने पश्चिम-नियो सवण सम
पंयंत सांवो . ते पर्वतनी पूर्ण
श्चिम .

(४१)
देशे लवण समुअ मध्ये ये वे दाढा नीकली ठे
। वारे वे दिशिनी चार दाढा यश, तेवीज रीते
परवत क्षेत्रने दक्षिणने वेडे शिखरी नामे पर्वत
ते पण पूर्व पश्चिम हेमवंतनी परे सांचो के. तेमांथी
प हेमवंतनी रीते ये दिशिए मसी चार दाढा
नमुअमां नीकली . ए ये पर्वतनी या दाढाउँ
हेसी एकेकी दाढाने विपे सात सात यंतरहीप
i, ते वारे या दाढाउने विपे ठप्पन यंतरहीपथया
ने विपे पण युगलिया रहे ठे, तेने आंतरछीपनां
रनुप्य कहीए. ते मनुष्य एकांतरे थाहार लीए ने,
था तेमनां शरीरनी उंचाइ यासो धनुप्यनी, थने
स्योपमना असंख्यातमा जाग जेटयुं तेमनुं थायुठे.
प्रमाणे मनुप्यना पीस्तालीश नेद पूर्वे कहा तेनी
साथे ए थंतरछीपना उप्पन नेद मेसवतां १०१ नेद
य, तेने पर्याप्ता यने थपर्याप्ताए प्रकारे गुणीए
। वारे २०२ नेद थाय तथा वली पहीज गर्नज मनु-
यनां मल, मूत्र, रसेप्म प्रमुख चौद स्थानकने
घेपे जे उपजे तेने संमूर्णिम मनुप्प काहीए. तेसंमू.
ईम मनुप्य सर्व थधुरी पर्याप्तिएज मरण पामे ने,
पटे ए अपर्याप्ताज होय, तेथीएना १०१ नेद पूर्वोक

(४२) २०२ नी सापे मेसपता ३०३ नेद चाय ते ॥ दवे-चार निकायना देयोनानेद कहे :- दसहा नवणादिवई, अहविदा वाण- चंतरा हुँति ॥ जोशसिया पंचविहा, इविदा वैमाणिया देवा ॥२॥ गाधा २४ मीना बूटा शब्दना अर्थ. दाहा-दरा मकारणा. जोइमिया-ज्योतिषी. माहिम जानाधिपति, पंचविहा-मांच प्रकारना. (सपनपति) विहाचे प्रकारना. मनिहा-धार कारना. येमालियावैमानिक. Hulaमामंतर देवो. देवा-देवो.

, (४३) , तेमां तेर पाथमा वे, ते तेर पाथमाना पार मांतरावे, तेमांथी पहेलो थने तेरो यांतरो दुकीने पाकीना दश यांतरा वचावे रया, ते माहे केके यांतरे एकेका जवनपति देवोनी निकाय वे, दशे निकायमांप्रत्येके एक दक्षिणे अने एक उत्तरे नली वे ये ठे, ते वारे दश निकायना वीश इंश .एप्रथम नवनपति देवोने रहेवा, स्थानक क. हवे ए वीजा व्यंतर निकायना देवो कहे ते. (यविदा वाणवंतरा हुँति के) थाउ प्रकारना वाणव्यंतर देवो , तेमा व्यंतर देवोना या नेद ठे, ते याः-पिशाच, भूत, यदा, राक्षस, किन्नर, किंपुरुष, महोरग यने गंधर्व, तथा वीजा अपपन्नी, पणपन्नी, शपिवादी, नूतवादी, कंदित, महाकंदित, कोहंग यने पतंग, ए थाठ नेद जे ते ते वाण- व्यंतर देवोना जाणवा. मेरु पर्वतना मूलमां सरखी पृथिवी ते. त्यांची मांमी नीचे जश्पते वारे (१७००००) योजन रत्नप्रना पृथिवीना तलीया सगण थाय, तेमांथी एक हजार योजन उपर थने एक हजार योजन नीचे मूकीए, वाकी (29600)योजनमां पूर्वोक्त तेरपाथमा , तेम (४२) २०२ नी साथे मेलवतां ३०३ जेद थाय ॥ हवे.चार निकायना देवोना नेद कहे :- दसंहा नवणादिवई, अमविदा वाण- वंतरा हुँति ॥ जोइसिया पंचविहा, सुविदा वैमाणिया देवा ॥२४॥ गाथा २४ मीना लूटा शब्दना अर्थ. दसहा दश प्रकारना. जोऽसिया ज्योतिषी. जवणाहिवई-जवनाधिपति, | पंचविहा-पांच प्रकारना. (जवनपति) सुविहाब्वे प्रकारना. थाविहा-आठ प्रकारना. माणिया वैमानिक. वाणवंतरायाणव्यंतर देवो. देवान्देवो. हुँतिम्चे. अर्थः- नवनपति, व्यंतर, ज्योतिप्क तथा निक, ए चार प्रकारना जे देव ते तेमांना (६.. नवणा हिवई के०) जवनाधिपति देवोना दश ठे, ते याः-असुरकुमार, नागकुमार, सुव । विद्युत्कुमार, अग्निकुमार, छीपकुमार, उदाय ) दिशिकुमार, वायुकुमार तथा स्तनितकुमार, ए नेद करा. हवे एर्नु रहेबानुं स्थान कहे ः नामे प्रथम नरकनुं दल जामपणे १७०००० पो. M .

(४३) म तेमां तेर पाथमा , ते तेर पाथमाना वार नांतरा , तेमाथी पहेलो थने तेलो यांतरो कीने याकीना दश यांतरा बचाये रह्या, ते माहे केके यांतरे एकेका नवनपति देवोनी निकाय ने, दशे निकायमांप्रत्येके एक दक्षिणे अने एक उत्तरे ली ये ये इंसते, ते वारे दश निकायना वीश इंड जे.एप्रथम जवनपति देवोने रहेवानुं स्थानक कह्यु. हवे ए वीजा व्यंतर निकायना देवो कहे . (यविदा वाणवंतरा हुँति के) थाठ प्रकारना वाणव्यंतर देवो ठे, तेमां व्यंतर देवोना यान नेद ठे, ते था:-पिशाच, नूत, यक्ष, राक्षस, किन्नर, किंपुरुष, मदोरग यने गंधर्व, तथा वीजा थणपन्नी, पणपन्नी, शपिपादी, नूतवादी, कंदित, महाकदित, कोहंमथने पतंग, ए या नेद जे ठे ते वाण- व्यंतर देवोना जाणवा. मेरु पर्वतना मूलमां सरखी पृथिवी ठे. त्यांथी मांमी नीचे जश्ए ते वारे (१७०an) योजन रलाना पृथिवीना तलीया सगण थाय, तेमांथी एक हजार योजन उपर अने एक हजार योजन नीचे मूकीए, वाकी (२IGun)योजनमांपूर्वोक्त तेरपाथमाते, तेमा. . -

.
(४)
दश जननपतिना देवो रहे ,यने -:मा एक ६.
योजन मुक्या वे तेमांथी चली सोयोजन देवन
सो योजन उपर मूकी वाकी यावसो योजन
तेमां या व्यंतरनी निकाय छे. ए यार
पण दक्षिण यने उत्तर दिशिमली एकेकी
ये ये इंजने, ते बारे सोल इंध्यंतर देवोना
यसी उपरखाजे एकसो योजन मूक्या वे तेमांथी .
दश योजन उपर तथा दश योजन नीचे "
याकी एंशी योजन रहे तेमा थार प्रकारना पार
ध्यंतर देयो रद्द . एमां पण पूर्वोक्त रीते एक
निकायने विपे ये गणतां सोस इंजयाणन
तर देयोना . सर्व मली वे प्रकाना व्यंतर देयोन
यीश ई. तेनी साये पूर्वोक्त जयनपति देशों
धीशमलयीर ते वारे यायन व थाय.
दये जीना पोतिषी दयोनी निकायना दे
कई . (गोमिया पंचयिदा ) ज्योतिर
देवांना पांच नंद, तथा:-55, मूर्प, मद, नद
तथा नाग.ते फरीय समारना -एमा गर
पीमा यिा. नमां ने गनुमने विप ज्योति
a ৰ খ গ প্রশিকার সা

- (४५) ने जे मनुष्यदेवथी बहार येते स्थिर ठे, केमके मनां विमान फरतां नथी.जे ज्यां रे ते त्यां स्थिर या ठे. एना पांच जेदमांथी एक चंजमा थने जो सूर्य, ए ने इंअपदवी के घीजाने इंज- दवी नथी. मेरुने मूसे संनूतला पृथ्वी थकी पातसें नेवू योजन ऊंचा जाए तिहां तारानां विमान , तिहाथी दश योजने सूर्यनुं विमान , तिहांधी 'शी योजने चंडमानुं विमान ठे, तिहाथी चार जिन उंचा नक्षत्रनां विमान ठे, तेथी उंचा सोस गेजनमा पती जूदा जूदा प्रहनां विमान . ए रीते पर्य मसी सातसें नेवु योजनधी उपरे एकसो दश पोजनमां ज्योतिषी देव रहे है. दवे चोथा धैमानिक देवोनी निकायना देवो कहे २. (सुपिदा वेमाणिया देया केए) पैमानिक देयोना ये नेद , ते कदे ते. एक तो जे श्रोती. थंकरादिकना पांच करप एटसे थाचार जाणया, माटे एने कल्पोपपा देवो कहीए. ते देवता सोधर्म, ईशानादिपार देवलोकना नेदे फरी पार प्रकारे वे. ते पार देवलोकमां पसी श्राप देयसोरु पयंत तो प्रत्येके एकेको छ, थने नग्मा तथा दामा

(४६)
ए वे देवलोके एक इंच , अने अगीयारमा
चारमा ए वे देवलोके पण एक इंच है. ए री
वार देवलोकना मली दश इंस, अने पूर्वे जवन
पतिनावीश तथा व्यंतरना पत्रीश अने ज्योतिपी:
वे मसी चोपन इंश कह्या तेनी साये ए दशई
मेसवीए ते वारे सर्व मली चोस इंड थाय.
सर्व कल्पोपपन्न देवता कहेवाय.
दवे वीजा जे कल्प एटले याव्या गयानो याचा
तणे करी रहित रे तेने कल्पातीत देवो कही
तेना वली ये नेद ठे. एक तो नव प्रवेयकना देव
थने वीजा पांच यनुत्तर विमानना देवो जाणवा.
दवे ए कल्पोपपन्न तथा कल्पातीत देवोन
स्थानक कहे . चौद राजसोक ते तेमा सात राज
नीचे साते नारकीए करी पूखो ते थने सात राउ
उंचो . ए चीद राजसोक पुरुपने याकारे , तेम
मानिने स्थानके मनुष्यलोक यने मेरुने मूसे संन्
तमा पृथिवी ,त्यांयी सातसें नेचु योजनथी मांगीने
नवमें योजन पर्यंत उंचा ज्योतिषी देवो रहे , तेगार
पनी एक राजन थाशरे उंचा जप तिहां ददिष
दिशे सौधर्मदेवसोकथने उत्तर दिशे ईशान देवसोर

(13) ए रीते वे देवलोक जोमाजोडे ठे. तेवारे वली चीजो सनत्कुमार दक्षिण दिशिए अने चोथो माहें उत्तर दिशे,ए रीते वे देवलोक जोमाजोडे ते. तेवार पठी वली पांचमो ब्रह्म देवलोक, हो सांतक, सातमो शुक्र, आठमो सहस्रार, ए चार देवलोक अनुक्रमे एक एकनी उपर केटले केटले यांतरे एकला एक- साज . तेवार पठी वली केटसाएक उंचा जश्ए त्यां नवमो यानत यने दशमो प्राणत ए वे देव- सोक दक्षिण अने उत्तरे जोमाजोडे ठे. तेवार पठी वली पण केटसाएक उंचा जश्ए तेबारे अगीया. रमो धारण अने वारमो अच्युत ए वे देवलोक दक्षिण यने उत्तर दिशे जोमाजोडे वे. तेवार पठी वली केटलाएक उंचा जश्ए तेवारे चोद राजसोक- रूप पुरुपना गलाने स्थानके नव ग्रैवेयक . तेवार पठी वली केटलेक उंचे पांच अनुत्तर विमान वे. तेवार पठी चोद राजलोकरूप पुरुपना खलाटने ठेकाणे सिकशिखा , ते स्फटिक रत्ननी परे निर्मल , तिहां सिखना जीवो रडा ठे. एम ए देवताने रहेवानां स्थानक कयां. हवे यहां वली त्रण प्रकारना किस्विपिया देवो तथा नव प्रकारना .

(1)
सोकांतिक देयो तेने रवानां स्याना ..
पताये . त्यां प्रयम किब्यिपिया देवोना स्वा.
कड़े हैं. एक तो पहेला थने वीजा देवलोकन
नीचे प्रण पस्योपमना थायुवासा रामा श.
धीजा बली प्रीज्ञा तया घोया देवलोकनी नी
प्रण सागरोपमना थायुवासा रमा , तथा श्रीज
वली पांचमा देवसोकनी नीचे तर सागरोपमन
यायुवाला रखा ते. ए प्राण प्रकारना कित्रिपिय
देवो चमालप्रायः जाणवा तथा बली पांचमा देव
लोकने ठेडे उत्तर यने पूर्वनी यन्यंतर कृष्णरा
जीमां नव प्रकारना लोकांतिक देवो रहे , एवं
या सागरोपमर्नु यायु .
ए सर्व देवोना वधा मली एकसो ने अहाणु नेट
शास्त्रोमां कह्या ठे, ते या प्रमाणे:-जबनपतिन
शनेद, चर ज्योतिपीना पांच नेद, स्थिर ज्योति
hना पांच नेद, बेताट्यने विपे रहेनारा तिर्यगजें
नक देवोना दश नेद, नारकी जीवोन
नारा परमाधामीना पंदर नेद, व्यंतरना या नेद
वाणव्यंतरना आउनेद, किटिव पियाना त्रण जेद
लोकांतिकना नव जेद, वार देवलोकना वार जेद
छःख आप
--

(४) नव वेयकना नव नेद, पांच अनुत्तर विमानोना पांच नेद, ए सर्व मली नवाणुं नेद थया. एने पर्याप्ता तथा अपर्याप्ता ए वे नेदे गुणतां एकसो ने व्यहाणु नेद थाय ठे॥२४॥ गरीते पूर्वोक्त तियंचना यमतालीश, नारकीना चोद,मनुप्यना प्रणसें ने त्रण तथा देवताना एकसो ने यहाणुं मली जीवोना ५६३ नेदो थया. एम चोद राजलोकमां जीवादिक व अव्य ठे, तेमां एक जीव अव्यना एक संसारी यने वीजा सिफ ए ये नेद पूर्वे कहा हता, तेमांयी संसारी जीवोना पांचसें बेस नेद संक्षेपे कही देखाड्या, ए संसारी जीवोनो विचार करो. हवे वीजा सिद्ध जीवोना नेद कहे :- सिझा पनरस या, तिच अतिवाइ सिझनेएणं ॥ एए संखेवणं, जीववि. गप्पा समरकाया ॥३५॥ गाथा २५ मीना छूटा शब्दना थर्थ. सिधा-सिम्म या-दो. पनरस-पंदर. तितीर्थकर. श्री.

।
(५०)
श्रतिभाइ अतीर्थकरादित जीपविगप्पाजीपना विक
मिक्षनेएवं सिखना नेदे करी..
एए-ए.
समरकाया-कहा.
संखयेणं संझपयी.
व्यर्थः-(सिक्षा के सिक ते सर्व कर्म
मुक्त ययेला जीयो, तेना (तिम यतिवार के
तीर्थकर तथा अतीर्थकरादि (सिद्धजेएणं के
सिद्धना दे करी (पनरस नेया के०) पंदर
थाय ठे. ते पंदर नेदनां नाम नव तत्त्वना वाला
वोध थकी जाणवां. (एए संखेवेणं के०) ए पूर्वों
सर्व संदेपे करीने (जीव विगप्पा के) जीव
विकल्प एटले नेद ते ( समकाया के)
प्रकारे कह्या ठे ॥ २५ ॥
हवे जे पागल कहेवा योग्य ते ते मूल
ग्रंथकर्ता पोतेज गाथा वडे कहे ते.
एएसिं जीवाणं, सरीरमाऊ गिइसका-
यंमि ॥ पाणा जोणिपमाणं, जेसिं जं
अवि तं नणिमो ॥२६॥

(५१)
गाथा २६ मीना बूटा शब्दना अर्थ.
RE: दय
।
गोकार, राजपुताना
एएसि जीवाणं-ए जीवोन. जोणि योनि.
सरीरं-शरीर.
पमाएं-प्रमाए.
थाजस्थायुप्य.
जेसिं जेमन.
लिई-स्थिति
जं-जेटसुं.
सकार्यमि-पोतानी कायने विप. थथिचे.
पाणा-माए.
तं नणिमो-तटसुं कहीगुं.
यर्थः-(एपसिं के) ए पूर्वोक्त एकेडियादिक
(जीवाणं के ) जीवोना एक ( सरीरं के)
शरीरनुं प्रमाण, वीजुं (थाज के०) जघन्यथी
तथा उत्कृष्टथी यायुप्यतुं प्रमाण, श्रीजु (दिई
सकायंमि के०) एजियादिक जीवो मरण पामीने
फरी त्यांज उत्पन्न धाय एवी जे खकाय स्थिति तेनुं
प्रमाण, चोथु ( पाणा के) इंजियादिक दश
प्राणोनुं प्रमाण, पांचमुं ( जोणिपमाणं के०)
चोराशी लक्ष योनि मांहेली कया क्या जीवोमां
केटली केटली योनि होय तेनुं प्रमाण, ते (जेर्सि
जयधि के) जे जे जीयोनुं जेटलुंके (तं जणिमो
के.) ते जीयोनुं तेटडं थमे कहीशुं ॥ २६ ॥

(५२) त्यां प्रथम शरीरना प्रमाणनो प्रकार कहे है:- अंगुल असंख नागो, सरीरमगि- दियाण सोसि ॥ जोयण सहस्स- मदिय, नवरं पत्तेय रुकाणं ॥ ॥ गाथा २७ मीना छूटा शब्दना अर्थ. अंगुख-शंगुसना. सहस्सं-हजार. असंख-संख्यातमा. अदियं-अधिक. नागोजाग जेटलु. नवरं-विशेष. ससि एगिदियाण-सर्वे एक- पत्तेय रुरका प्रत्येक वनर घिय जीयोना. जोपए-योजन. थर्यः- (सोसि एगिदियाण सरीर के) सूक्ष्म तया चादर पृथ्वीकाय प्रमुख एकेंक्रिय जीवो शरीरोनुं प्रमाण (यंगुख यसंख जागो के) अंगुख थसंख्यातमा नाग जेटलुं होय ठे, (नवरं के० पण एटली विशेषताले जे (पत्तेय रुकाणं के०)प्रत्ये बनस्पतिना शरीरर्नु प्रमाण (जोयण सदस्समादि के) एक हजार योजनथी कांश यधिक है . ते समुशादिकने विपे उरसेधांगुप्त प्रमाण दन योजनना उंगा पापीमां पद्मनास दोय रे तथा 2 (५३) अढी छीपथी यहार एवी सता पण होय . अहीं यद्यपि सामान्यपणे पृथ्वीकायादिक एके जिय जीवोनां शरीरोनुं प्रमाण थंगुलनो यसंख्या- तमो नाग मात्र कहुं ते, तथापि संग्रहिण्यादिकने विपे विशेपे करी जाणवामां यावे ते के यंगुसना यसंख्यातमा जागना पण असंख्य नेद वे एवी रीते ते एकेजियना शरीरनुं प्रमाण कमु. दवे छौंजियादिक विकलेंजिय जीवोनां शरीरोनुं प्रमाण कहे :- वारस जोयण तिन्ने,-4 गाना जो- यणं च अणुकमसो ॥ वेदिय तेइ- दिय, चारिदिय देहमुचत्तं ॥२०॥. गाथा २७ मीना लूटा शब्दना थर्थ. जोयर्ष एक योजन. जोयएयोजन. थणुकमसोन्धनुक्रमे. तिसेय-प्रा. देई-भारीर. गायथानगाठ. | उपस-उंचपाएं. चप्पक्षवनी यहार रहेला (वेदिय के) जीवनां शरीरनी ऊंचाई (पारस धारस-पार.

RA (५५) त्यां प्रथम शरीरना प्रमाणनो प्रकार कहे :- अंगुल असंख नागो, सरीरमेगि- दियाण सवेसि ॥ जोयण सहस्स- मदियं, नवरं पत्तेय रुकाणं ॥ २७॥ गाथा व मीना लूटा शब्दना अर्थ. अंगुत-अंगुखना. सहस्सं-हजार. असंख-असंख्यातमा. अहियं-अधिक. जागो-जाग जेटटुं. नवरं-विशेष. सधेसि एगिदियाए-सर्वे एक- पत्तेय रुकाएं प्रत्येक वनस्प- जिय जीयोनां. तिना. जोयण-योजन. अर्थः- (ससि एगिदियाण सरीरं के) सर्वे सूक्ष्म तथा वादर पृथ्वीकाय प्रमुख एकैप्रिय जीवोनां शरीरोनुं प्रमाण (अंगुल असंख नागो के०) अंगुलना असंख्यातमा नाग जेटयूँ होय ठे, (नवरं के) पण एटली विशेषता ठेजे (पत्तेय रुरकाणं के०) प्रत्येक वनस्पतिना शरीरर्नु प्रमाण (जोयण सहस्समहियं के०) एक हजार योजनथी कांक अधिक होय के. ते समुपादिकने विपे नरसेधांगुल प्रमाण हजार योजनना उंमा पाणीमां पद्मनास होय रे तथा आ शंखादिक -- , , (५४) जोयण के)वार योजननी होय ,यदीछीपनी यहा रहेला (तेइदिय केप)कर्णशृंगासादिक तेइजिय वोनां शरीरनी ऊंचाई (तिन्नेव गाउया के०) त्रा गाजनी होय के, (च के) तथा बढी छीपनी वहा रदेला (चरिदिय के) चमरादिक चोरिति जीवोनां (देहमुञ्चत्तं के०) शरीरनुं ऊंचपणुं (जोया के) एक योजन- होय . (अणुकमसो के गाथाना पदना अनुक्रमे एटले वेडियने चार योजन वगेरे कहेवा ॥ २०॥ ए विकलेंघिय जीवोनां शरी रतुं प्रमाण कमु. दवे नारकी यादिक पंचडिय जीवोनां शरीरोनुं प्रमाण कहेतो थको प्रथम नारकी जीवोनां शरीरनुं प्रमाण कहे ते. धणुसयपंच पमाणा, नेरश्या सत्तमा पुढवीए॥ तत्तो अचूणा, नेया रय- एप्पदा जाव।एए॥ गाया ए मीना वूटा शब्दना यर्थ. धातु-धनुष्य. सयपंच-पांचसें. नेरश्या नारकी. पमापाममाए.

(५५)
इ-सातमी धादि. नेया-जाण'.
स्पृष्टीने विपे.
रयपप्पहारक्षमना.
तेथी.
जाय-यांसुधी.
-थर्धा थर्धा उंग.
पर्यः-(सत्तमाय पुढवीए के) तमस्तमःप्रना
की सातमी थादि नरकपृथ्वीमा रहेनारा
श्या के) नारकीनां शरीरोनुं प्रमाण था।
वे:-(धणुसयपंच पमाणा के० ) सातमी
ना नारकीनां शरीरोनुं प्रमाण पांचसे धनुप्य
ती उंचानु दे. एम अनुक्रमे (तत्तो यकूणा
) तेथी थर्ध थर्ध संख्या जणी करवी,
। यढीसे धनुष्य जेटता प्रमाणनुं शरीर की
ना नारकीर्डनां शरीरो, होय ते. सवासो
य उंचालुं प्रमाण पांचमी पृथ्वीना नारकी.
शरीरोनुं होय . सामा बासठ धनुष्य उंचा.
प्रमाण चोथी पृथ्वीना नारकीउँनां शरीरोनुं
वे. सवा एकत्रीश धनुष्य उंचानुं प्रमाण
पृथ्वीना नारकीनां शरीरोनुं दोय . सामा
। धनुष्य थने पार अंगुख उंचानुं प्रमाण
पृथ्वीना नारकीनां शरीरो, होय

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(५७)
सुति ने.
परिकसु-पदीन.
धावधनुष्य.
मुयचारी-मुजपरिसर्प.
पुदुस-पृथक्त्य,येथीनव मुधी.! गावगाय.
गाथा ३१ मीना छूटा शब्दना थर्थ.
सयरा-संघर.
समुष्ठिमा संमूर्छिम.
नुयगा-जुजपरिसर्प. पप्पया-चार पगवाखा.
मित्ता प्रमाणपासा.
निषिया-कहा .
गाथा ३२ मी पूर्वार्धना चूटा शब्दना यर्थः
उधेय-निधे उ.
गनयामाज.
गाउचाईगार. गणेयपा-माणपा.
यर्थः-तिर्यच जीवो गर्नज थने संमूर्छिम ए बे
प्रकारना होय ठे,तेमांगर्नजना शरीरनुप्रमाण थावी
रीतेः-(मछा उरगा य सदस्स
जोयण
माषा पेप)
मत्स्य थने उर परिसर्पना शरीरनुं प्रमाण एक
हजार योजन- होय वे. एयां मोटा मत्स्यो
सयंजूरमण समुजमा होय ते. थने पया उरःपरि-
सपों श्रढी द्वीपची पदार होय . ( पखिम
घणुथ पुरतं फे० ) पदोउनां शरीरनु प्रमाण
धनुष्य पृथप पटसे पे धनुप्यपी सश्ने नय धनुप्प

(५०) पट्टन मिना के०) चतुष्पद पटसे चार पगवा सुधी होय , यने (जुयचारी गाउय पुद्धत्तं का) गोधादिक नुजपरिसर्पना शरीरनुं प्रमाण गव्यूक्ति पृथक्त्व एटले वे गाउथी मांगी नव गाउ सुधी होय. एचधा जीयो (गसया हुँति के०) गर्जज ॥ ३ ॥ हवे संमूर्छिमनां शरीरनुं प्रमाण यावी रीते: (गयरा जयगा धणुथ पुहुनं के) खेचर पटो पक्षी थने भुजग एटले नुजपरिसर्पना शरीरो प्रमाण धनुन्य पथरत्व पटले ये धनुष्यथी मामीने न धनुन्य मुधी दोय , तया (उरगा य जोयण पडुन ये) उरग पटसे उरःपरिसर्पना शरीरनु प्रभार पोजन पृथक्त्व पटो ये योजनथी मांगीने ना पोजन गुधी दोय है, यने (चठप्पया गाव मोनो शरीग्नु प्रमाण गान एयरय एटसे गाव मांगीन नए गान सुधी होय दे, रीने (समुचिमा नगिया के) समलिंग नियं जवानां गरीनुं प्रमाण कयु. पेंटसांगक पु. कोमा "नयगा ठग्गा य जोयण पुदत" ". पान, पप्रमाणे ययं करतां नुनपरिगना गर्नु ममा योजन याव थाय ने - - . 1 १.मा.

(पए) ची, केमके प्रशापना तथा संमहिण्यादि सूत्रोधी विरु॥३१॥थने (चनप्पया गया उच्चेर गाथा केप) गर्नज चतुप्पद जीयोनां शरीरोनुं प्रमाण उत्कृष्टथी व गाजनुंज (मुणेयमा के०)मनाय ने. एवां मोटो शरीरना इस्ती देवकुर्यादिक युग- अयानां नोमा दोय छे. हवे पंचजिय मनुप्यनां शरीरचं प्रमाण गाथाना उत्तरार्थ बडे कहे - कोस तिगं च माणुस्सा, नकोस सरीर माणेएं ।।३।। गाथा ३२ मी उत्तरार्धना चूदा शब्दना थर्थ. कोसाठ. उकोस-उत्कृष्ट বিলায়, माएं प्रमाण. माणुस्सा-मनुष्य थर्थ:-( माणुस्सा उकोस सरीर माणेणं के) उत्कृष्टथी मनुष्यनां शरीर प्रमाण (कोस तिगं के) प्रण कोश- होय ते. ते देवकुर्यादिक क्षेत्रोना युगलिया जाणया ॥ ३२ ॥ मनुष्यनां देहमान कहां.

चन-चार. हवे देवोनां खानाविक शरीरोनुं प्रमाण कहे - ईसाणंत सुराणं, रयणी सत्त हुंति उच्चत्तं जुग जुग जुग चन गेवि,- अणुत्तरे शकिक परिदाणी ॥ ३३ ॥ गाथा ३३ मीना छूटा शब्दना अर्थ. ईसाएंत-(वीजा) शान देव- उच्चत्त-उंचा. खोकना थंत सुधीना जुगवे. मुराएं-देवताउँनां. गेविका (नव) मैयक. अणुचरे-(पांच) अनुत्तरमा ऐति होय वे. इफिफा-एक एफ. परिहाणी-वं कर. थर्थः-(ईसाणंत मुराणं के०) वीजा ईशान देव *पोकना यंत मुधी जे नवनपति, व्यंतर तथः ज्योतिष्क देव तेनां शरीरोनी (उचत्तं के उंचार (सन रयणी दुति 20) सात हायर्न होय छे. त्यारपत्री "उग उग उग घर गैरिज गुत्तरे इकिक परिदाणी" थनुक्रमे एफेक हा रयणीने हाय. सत्त-सात.

(६१) टामतां ज; जेमके सनत्कुमार थने माहें ए ग के ) हिक एटसे चने देवसोकमाना वोना शरीरोनी जंचानुं प्रमाण व हायर्नु होय । मा थने सांतक ए (युग के०) चे देव. कमां पांच दाप दोय ते, श्रने सदलार ए पुग ) वे देवलोकमां चार दाथ होय ठे, ए पहिक कही थने थानत, प्राणत, थारण तथा (च्युत ए (चन के०) चार देवलोकमां प्रण हाथ रेय , (गेविज के) नव वेयकमां ये हाय रेय , थने (श्यणुतरे के०) पांच अनुत्तरवासी पसोकमांना देवोनां शरीरोनुं प्रमाण एक हापर्नु होय . ए रीते (शिया परिदाणी के ) एकेक मायनी हाणी करतां जq ते चारे पूर्वोक्त मान थाय. सर्य जीवोनां शरीरोनुं प्रमाण उरसेधांगुबनी रीते ..॥३३॥ हवे जीवोना थाउखानु वीचं हार कहे . वावीसा पुढवीए, सत्तय श्रावस्स ति- नि वानस्स ।। वास सहस्सा दस तरु,. गणाण तेन तिरत्ताक ।। ३४॥

T स उन अरावन अर्थ:-(सायंत सुराके)बीवासान देव- खोकना छत सुधी जे अवनति, व्यंतर तथा ज्योतिष्क देव हे तेनां शारीरोनी उंचार (सत्त ९५० होय . त्यारपत्री गाचरे इक्षिक N -

-~-
-
(६१)
घटामतां ज; जेमके सनत्कुमार अने माहेंड ए
मुग के ) हिक एटसे पन्ने देवलोकमांना
देवोनों शरीरोनी उंचानुं प्रमाण व हायर्नु होय
है, ब्रह्म अने सांतक ए (जुग के)चे देव.
सोकमां पांच हाथ होय , शुक्र अने सहस्रार ए
(ग के) देवखोकमां चार दाथ होय , ए
त्रण हिक कही थने थानत, प्राणत, थारण तथा
चच्युत ए (चन के) चार देवलोकमांत्रण हाथ
होय ठे, (गेविड के०) नव वेयकमां वे हाथ
होय , थने (अणुत्तरे के०) पांच थनुत्तरवासी
देवलोकमांना देवोनां शरीरोनुं प्रमाण एक हाथर्नु
"होय . ए रीते (इफिक परिहाणी के) एकेक
हाथनी हाणी करतां जq ते वारे पूर्वोक्त मान थाय.
ए सर्व जीवोनां शरीरोनुं प्रमाण उत्सेधांगुलनी रीते
जाणवू ॥ ३३ ॥
दवे जीवोना घाउखानुं बीजुं हार कहे ते.
1 वावीसा पुढवीए, सत्तय आउस्स ति-
नि चाउस्स ॥ वास सदस्सा दस तरु-
गएण
तेन तिरत्ताक ॥३४॥

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रस-बार. (६३) इंदियाणं तु ॥ अनणापन्न दिणाई, चरिंदीणं तु वम्मासं ॥ ३५ ॥ गाथा ३५ मीना लूटा शब्दना यर्थ. साणियर्प. सु-तो. थापन-गएपचास. जधायुप्य. दिणाइ-दिवस. दियाएं बेडिय जीयोन. चारदीर्ण-चतुरिप्रियजीयोन. इंदियाएं तेऽयि जीयोन. उम्माम-3 महीना. अर्थः-(विदियाणं वारसाऊ बासाणि के०) इंजिय जीवोनुं उत्कृष्टथी वार वपर्नु यायुप्य होय के, (तिदियाणं तु के०) तेजिय जीयोनुं यायुप्य (अबणापन्न दिणा के०) गणपचास दिवस, होय वेश्यने (चरिंदीणं तु के०) चतुरिंजिय जीयोनुं यायुप्य (उम्मासं के०) महीनानुं दोय ते. तेमज ए सर्व जीवोनु जघन्यथी पूर्ववत् थंतर्मुहुर्तर्नु थायुप्य होय हे ॥ ३५ ॥ ए विकलेंजियनुं थायुप्य कयुं. हवे पंचंत्रिय जीवोनुं उत्कृष्टथी यायुःप्रमाण कहे वे:- सुर नेरझ्याण विई, नकोसासागराणि तित्तीसं॥चनपय तिरिय मणुस्सा,तिन्नि- दस-दश. सत्तय-सात. म (६२) गाथा ३४ मीना लूटा शब्दना यर्थ. वावीमायावीश. सहमा हजार. पुढवीए-पृथ्वीकाय. तम्-प्रत्येक वनस्पति. याटस्म-श्रप्काय. गणाण-ममूह. तिनि-त्रण. तेज-तेनकाय. वानरस-चायुकाय. निरित्तात्रण अहोरात्र. वासवर्ष. थाऊ-आयुष्य. अर्थः-(पुढवीए बाबीसा के०) पृथ्वीकाय जीव आयु उत्कृष्टथी वावीश हजार वर्षेनुं होय ठे, (सर थाउस्स के ) अप्काय जीवोनुं यायु सात हज वपर्नु, ( वाउस्स तिन्नि के० ) वायुकाय जीव आयु व्रण हजार वर्षy, (तरुगणाण के) प्रत्ये वनस्पतिसमूहनुं आयुष्य ( दस सहस्सा वा के०) दश हजार वपर्नु होय अने ( तेल ति ताऊ के) तेजस्काय जीवोनी उत्कृष्ट आयुःस्थिा त्रण अहोराननी होय वे अने ए बधा जीवो जघन्यथा अंतर्मुहूर्त घायुष्य होय ॥ ३४ ॥ दचे विकलेंजिय जीयोk आयु कहे वे. चासाणि घोरसाक, विदियाणं ति- रसञ्चार (६३) इंदियाणं तु ॥ अउणापन्न दिणाई, चरिंदीणं तु उम्मासं ॥ ३५ ॥ गाथा ३५ मीना तूटा शब्दना अर्थ. साणिवपं. तु-तो. थनाणापन्न-बंगपचास. कथायुप्य. दिणाई-दिवस. इंदियाणं-जिय जीयोन. पठरिंदीपं चतुरित्रिपजीयोन. इंदियाएं-तेऽधिय जीवोनू. उम्माम-7 महीना. अर्थः-(विदियाणं धारसाऊ बासाणि केव) इंडिय जीवोर्नु उत्कृष्टयी चार वर्षर्नु यायुप्य होय है, (तिदियाणं तु के) तेइजिय जीवोनुं यायुप्य (घडणापन्न दिणाई के०)गणपचास दिवसर्नु होय ठे थने (चरिंदीणं तु के) चतुरिंजिय जीवोनुं थायुप्प (सम्मासं के०) महीना- होय . तेमज प.सर्व जीवोर्नु जघन्पथी पूर्ववत् यंतर्मुहूर्तर्नु थायुप्य होय ते ॥ ३५ ॥ ए विकलेंजियतुं यायुप्य कडं. हवे पंजियजीवोनुं उत्कृष्टथीथायुःप्रमाण कद्दे :- सुर नेरझ्याण विई, नकोसा सागराणि तित्तीसाचनपय तिरिय मणुस्सा,तिन्नि- - (६२) गाथा ३५ मीना छूटा शब्दना बावीसा-माधीश- सहस्साहन पुढवीए-पृथ्वीकाय. सत्तय-सात. तर प्रत्येक याउस्म-यप्काय. गणाए-मम् तिनित्रण. तेल-तनका वानरसन्यायुकाय. तिरित्तान यासवर्ष. याऊ-या अर्थः-(पुढवीए बावीसा के०) पृर आयु उत्कृष्टत्री बावीश हजार वर्षमुंह यास्स के) अप्काय जीवोनुं यायु वपर्नु, ( वास्स तिनि के) वायुका यायु त्रण हजार वर्पनु, (तरुगणाण के वनस्पतिसमूहनुं वायुप्य ( दस सहस्स के०) दश हजार वर्षेनुं होय ते अने (ते. ताऊ के) तेजस्काय जीवोनी उत्कृष्ट यार व्रण अहोराननी होय ते यने ए बधा जघन्यथी अंतर्मुहूर्त श्रायुप्य होय ते ॥ ३६ हवे विकलेंडिय जीवोनु थायु कहे के वासाणि वारसाक, बिंदियाएं ।

(६५) संस्कृष्टची (तित्तीसं सागराणि के ) तेत्रीशसाग. शेपमनी होय ते. एटलुं यायुप्य पांच अनुत्तर विमा. सोना देवोनुं तथा सातमी नरकना जीवोनुं उत्कृ. 'यी जाणी लेवु यने ( चउपय के०) चतुष्पद स्टले चार पगवासा ( तिरिय के) तियंच नीबोनुं तथा ( मणुस्सा के ) सर्व प्रकारना माणसोनुं उत्कृष्टथी ( तिनिय पसिउवमा फे) प्रण पस्योपमनुं थायुप्य (झुंति के०) होय . एवा थायुप्यवासा जीवो देवकुर्यादिक क्षेत्रोमां होप है. यहीं पस्योपम तथा सागरोपमने विपे सूक्ष्म- ताथी थथया विशेषण विशिष्टर्नु प्रदण करवायी देव तथा नारकीउनु जघन्यची थायुप्य दश हजार चर्पन दोय , यने मनुप्य तथा तिर्यच जीवोनुं जघन्यपी पूर्पनी पेठे थंतर्मुहूर्त्तनुं थायुप्प होप ॥३६॥ गज थने संमूर्णिम ए ये प्रकारना (जलपर फे०) जे जसपर जीयो , (उर फे०) उदरपी पास. नारा जेसों, (मुपगाणं .०) गुजापी चाल. नाराजे नोसिया प्रमुख जी ने, रोठेर्नु (परमान पे०) उसएपी चायुप्य (पुरषोगी प.) पूर्व (६६) कोमीन (दोई के०) होय . सित्तेर लाख थ उप्पन हजार कोटि वनो एक पूर्व थाय । एवा एक कोटि पूर्वनुं यायुप्य जाण. (परकी के०) पहीन (पुण के०) तेवी रीतेज (पति यस्स असंखनागो य के ) पक्ष्योपमना असंख्य तमा नाग जेटलुं यायुप्य (नणिर्ड के० ) कहे ठे. या गर्नज नियंचवें यायुष्य जाणवु, थापा रणमा संमूर्णिम स्थलचर तथा खेचरादिपंछियो उत्कृष्टथी यायु कयुं नथी, पण वीजा ग्रंथोम कहेडं थे, ते या प्रमाण:- समुधि पर्षिदि थसपर ग्ययर उरग 'नुयय जिह विप कमसो; वास सह सानुसमी, विसत्तरी निपन्न बायाला ॥२॥इति ॥ वे सूक्ष्मादि जीयोगा यायुप्यनुं प्रमाण कहे - सधे मुहुमा सादा, राणा य समुचि- मा मागुस्मा य ॥ उकोस जहन्नेण, अंतमुहुर्त चिय जियंति ॥ ३ ॥ गाया ३० मीना वृदा शब्दना थर्य. मादारणामाधारए. गनिमामिंग , (६७) -मनुष्य. चिय-मात्र. गं-जयन्यथी. जियंति-जीये के. - दुस-यंतर्मुहूर्त “प्रर्थः-(सधे के ) पृथ्वीकाय, अप्काय, तेज- , वायुकाय तथा वनस्पतिकाय, ए सर्वे हुमा साहारणा य के० ) सूक्ष्म तथा बीजा पारण एटले चादर निगोदरूप जे अनंतकाय तो वे ते थने (समुछिमा भणुस्सा य के०) ठिम मनुष्यो जे एकसो ने एक क्षेत्रोने विपे पन्न ययेला गर्नज मनुष्योनांज मल मूत्र तथा जादिकने विपे उत्पन्न थाय ते वधा (उकोस 1) उत्कृष्टथी तथा ( जहन्नेणं केए) जघन्यथी यंतमुदुत्तं चिय के०) एक अंतर्मुहूर्त मात्रज जियंति के०) जीवे ते ॥३७ ।। उपक्षां वे छारमा जे कषु ते गाथा घडे सूचवे जंगाहणान माणं, एवं संखेवळ सम- : कायं ॥ जे पुण श्च विसेसा, विसेस सुत्तान ते नेया॥३ए॥

पुणयली.
(६७)
गाथा ३ए मीना तूटा शब्दना अर्थ.
उगाहणा-अवगाहना.
जे-जे.
श्राम=धायुष्य.
माएं-प्रमाण.
श्व-अही.
एवंएवी रीते.
विसेसा-विशेप.
मंसेवन संक्षेपे करी.
सुत्तान-सूत्रोथी.
ममरफाय-कडं.
ते-ते.
नेया-जाप सेवा.
थर्थः-(गादणात माणं के ) जेने ।
जीपनी स्थिति होय ठे, जेमां जीव रहे ले ते
यवगाहना कहीए, ए, जे प्रत्येक जीवन शर्र
तेना थायुप्यनुं प्रमाण ( एवं के) एवी री
(संखप के) संक्षेप करी( समरकायं के
समाम्यानं पटसे कछु, परंतु (जे पुण श्च के
थो बली जे काई देवलोकादिकने विपे प्रतरा
याश्रित (पिससा के०) विशेप यवगाहना
यायुना नेद ठे (ते विरोस मुत्ताल के)
विदोष मून जे मंग्रहिणी तथा प्रज्ञापनादिक म
देते यकी (नेया के०) जाणी सेवा॥३एाएर
थवगादना नया यायुःस्थिति मलीचे कार

(६ए) हवे त्रीजु खकाय स्थिति द्वार कहे :- एगिदिया य सचे, असंख जस्सप्पिणी सकायंमिजववति चयंतिअ,अणं- तकाया अणंता॥४०॥ गाथा ४० मीना लूटा शब्दना अर्थ. उस्सप्पिणी-उत्सपिणी. चयंति-व्यये . कार्यमि-पोतानी कायाने रिपे. अपंता-यनंत उत्सर्पिणी उयपति-उपजे वे. थने अवमर्पिणी मुधी. यर्थः-(सवे एगिदिया य के०) पृथ्वीकाय, अ. काय, तेउकाय, वायुकाय यने वनस्पतिकाय, एजे गंच स्थावर एकेंजिय ते सर्व (असंख उस्मप्पिणी के ) असंख्य उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी सुधी ( सकायंमि के० ) तेज पोतानी कायने विपे (उववति के) उत्पन्न थाय , यने (चयंति य के०)मरणने पामे ठे. यर्थात् तेज कायमां उत्पन्न थश्ने फरी त्यांज नाश पामे , तथा (यणंतकाया के) अनंतकाय बनस्पति जीयो जेठे ते (थर्णता के)यनंत उत्सर्पिणी यने थवसर्पिणी सुधी यावत् खकायमा उत्पन्न घश्ने तेज कायमां नाश पामे ते ॥धा एवी रीते एकेजिय जीवोनी काय स्थिति जयानक. (30) हवे छीडियादि विकलेंडियनी काय स्थिति कहे संखिज समा विगला, सत्तठ नवा पणिंदि तिरि मणुया ॥ जववङति स. काए, नारय देवा अनो चेव ॥४॥ गाथा र मीना लूटा शब्दना अर्थ. संखिञ्जसमा संख्यातां वर्ष सुधी माणुयामनुप्य. विगता-विकलेंघिय जीयो. सकाए-पोतानी कायाने वि रारामात ययया था. नारय नारकीना जीवो. देवा-देवो. पतिपिनिय. नोन्नहिनश्री. तिरि-तिर्यच. चय-निये. यर्थः-( विगला संखिजा समा के०) वेतिर तेइजिप नया चारित्रिय पजे विकलेजिय जी ते ते संख्यानां वर्ष मुधी (उययति सकाप के उपपयंनि बकाये पटले सकायने विपे उत्पन्न या यने व्यब नया (पणिदि तिरि माया के० पंचप्रिय तियंच यने मनुष्य प ये जातिना जी ते नेवाजवणे गावे (सतह नया के मान यया याव नर करे . साते नव । उत्कृष्ट गन्यातां वर्ष मुधीमां यश् शक भी उत्कृष्ट असंख्यातां वर्ष सुधीमां आठ नव यश् शके के. एटले आउ नवमां पूर्व कोटी पृथक्त्व अने मण पख्योपम अधिक काल जापी लेवो अने जघ. न्यथी सर्वत्र कायस्थिति अंतर्मुहूर्त्तनी जाणी खेची. तथा (नारय देवा य नो चेव के०) नारकी जीवो अने देवो मरण पामीने फरी तेज गतिमा उत्पन्न यता नथी एटले नारकी मरी फरी नार- कीमां न उपजे यने देवता मरी फरी देवतामां न उपजे. यवश्य एक वे जय वीजी गतिमां करीने पठी ते गतिमां उपजे, तेम वली देवता मरी नरकमां पण न जाय अने नारकी मरी देवतामां पण न जाय, ए त्रीजु खकायस्थिति द्वार कहुं ॥ १ ॥ दवे चोथु प्राण द्वार कहे :- दसदा जियाण पाणा, इंदि उसासान जोगवसरूवा ॥ एगिदिएसु चनरो, विगलेसु । सत्त अहेव ॥ ४२ ॥ असन्नि सन्नि पंचिं,-दिएसु नव दस कमेण वोधधा ।। तेर्दैि सद विप्पांगो, जीवाणं जगए मरणं ॥४३॥ ।

सत्तमात अथवा था. जया-नव. (उ०) दवे छोडियादि विकलेंडियनी कायस्थिति कहे :- संखिज समा विगला, सत्तह जवा पर्णिदि तिरि मणुया ॥ नववर्जति स- काए, नारय देवा अनो चेव ॥४१॥ गाथा ४१ मीना वूटा शब्दना अर्थ, संखिशासमा संख्यातां वर्ष मुधी भणुया-मनुप्य. विगता-विकडिय जीयो. सकाए-पोतानी कायाने वि. नारय-नारकीना जीयो. देवान्देवो. पणिनि-पंचेनिय. नो-नहि नथी. तिरितियच. चिय-निश्चे. यर्थः-(विगला संखिज समा के ) वेजिय तेजजिय तथा चोरिंजिय एजे विकलंपिय जी ठे ते संन्यातां वर्ष सुधी (ज्ययऊंति सकाए के उपपयंति काये पटसे सकायने विपे उत्पन्न था अने च्यवे ते तया (पणिदि तिरि मणुया के पंजिय तियंच यने मनुष्य प ये जातिना जीव त तंबाज नवपणे केमावेहे (सतह जया के सान ययवा यार जब करे ले. साते लव १ उत्कृष्ट संग्यातां यर्प मुधीमां यश् शके वे अ

(२)
कृष्ट यसरन्यातां वर्ष सुधीमां थाउ जय पश्शक
• एटले थात नयमां पूर्व कोटी पृथक्त्व यने
ए पलयोपम यधिक काख जाणी लेवो थने जघ.
पथी सर्वत्र फायस्थिति थंतर्मुहर्तनी जापी
-ची. नथा (नारय देवा य नो चेव के०) नारकी
यो थने देवो मरण पामीने फी तेज गतिमा
उत्पन्न यता नथी एटसे नारकी मरी फरी नार-
मां न उपजे यने देवता मरी फरी देवतामां न
उपजे, अवश्य एक ये नय पीजी गतिमां करीने पठी
। गतिमां उपजे, तेम पली देवता मरी नरकमां
रए न जाय यने नारकी मरी देवतामां पण न
जाय. ए त्रीजु खकायस्थिति हार कां ॥१॥
हचे चोधुं प्राण धार फहे -
दसदा जियाण पाणा, इंदि उसासान
जोगवसरूवा ॥ एगिदिएमु चनरो,
विगले व सत्त अहेव ॥ ४२ ॥
असन्नि सन्नि पंचिं,-दिएमु नव दस
कमेण वोधद्या ॥ तेहिं सह विप्पळगी,
जीवाणं लाए मरणं ॥४३॥

(३२) गाथा ४२ मीना छूटा शदना अर्थ. दमहान्दरा प्रकारना. घनस्या-घवरूप. जियाणजीयना. गिदिएमएफैडियन वि. पाएमाण घरो-चार. इंदि-इंडियो. विगसु-विमोडियने वि. उसास-श्वासोथाम. सत्त-मात. थान-थायुष्य. अध्यम्याउ. जोग-योग. गाथा ४३ मीना तूटा शब्दना अर्थ. असलि-असंझी. तेहि-तेनी. सन्नि-संझी. सह-साये. पंचिंदिएसु-पंचेंजियने विपे. विपयोगी-वियोग. नवन्नर. जीवाएंजीयन. दस-दश. नामएकवाय . कमेणक्रमे करी. | मरणं-मरण. घोषधा-जाणवा. अर्थः (दसहा जियाण पाणा कै) जीवोना दश प्रकारना प्राण होय , ते कहे , (इदि के)इप्रियो (उसास के ) श्वासोवास, (आज के) आयु तथा ( जोगवलरूवा के०) योगनां वलरूप जाणवा. एटले स्पर्शनादि पांच इंजियो, वो उचास निःश्वास, TR रोका रना। सातमुं यायु तथा मन, वचन, काय, ए प्रण पोगनांधण यस मली दशप्राण वे.तेमां (एगिदिगसु के) यें जिय जीयोने स्पर्शनेंजिय, यासोटास, यायु तथा काययस, ए (चउरो के) चार प्राण होय ते, थने (विगसेसु के) विकलेंडिस एटसे दोषिय जीयोने स्पर्शनेंजिय, रसनेंजिय, श्वासोवास, यायु, फायबस तथा वचनपस, ए (के) व प्राण दोय.त्रीजिय जीयोने स्पर्शनेंजिय,रसनेप्रिय,माणे- जिय, श्वासोलास, थायु, काययक्ष तथा पचनवस, ए (सत्त के) सात पाप होय . चतुरिप्रिय जीवोने स्पर्शनेजिय रसनेडिय, प्राणे जिय, चा- रिजिय, श्वासोवास,थायु, काययल तथा वचनवल, ए (यच के0) यात प्राण दोय ॥ ४२ ॥ (थसन्नि सन्नि पंचिंदिरासु के०) थसंझी पंचें- जिय तथा संझी पंचेंजिय जीयोने (नव दस के०) नव यने दश ( कमेण के०) कमे करी बोधवा के०) जाणया. एटसे थसंझी पंजिय जीयोने एक मनोवस होतुं नथी, याकीना नवे प्राणो दोष तेथने संझी पंचेंशिय जीवोने दशे प्राणो होय . ए प्राण जेने जेटखा कसा ठे ते जीवने (:

चारो-चार.
(१२)
गाथा ४२ मीना बूटा शब्दना यर्थ.
दमहा-दश प्रकारना. यसरुवा-यखरूप.
जियाए-जीयना. एगिदिएम-एप्रियने विपे.
पागामारा.
दि-इंडियो.
विगसेसु-विकभियने वि.
एमाग-यामोशाम. सरा-सात.
धान यायुष्य.
गांग
गाथा ४३ मीना बूटा शब्दना थर्थ.
शिश्री.
सेहि-तेनी.
अंच्य-या.
गह-माये.
पाला पिा वि.
विपयोगी वियोग.
जीव-जीवने.
नगाण कयाय.
मरणं-गरण.
अदमहा जियाण पाणा के0 ) जीयोनाद
ना पाहायवे, ने कहे ,(दि.०)दिर
121) यागावाग, (था के०) था
... 45 ) योगनां धसम्पमाण
दिगांन घ्या, को गाय नि:शा

arri, ITTER (३) तमुं थायु तथा मन, वचन, फाप, पण गिनांप्रण यस मसी दशप्राण .तेमा (पगिदिएम 0) एप्रिय जीवोने स्पर्शनेजिय, श्वासोवास, रायु तथा फाययस, ए (चरो फे०) चार प्राण होय ठे, थने ( विगसेमु फे०) विकलेंजिय पटसे जियजीयोने म्पर्शनंजिय, रसनेंशिय, स्वासोसास, यायु, फाययस नया वचनयत, ए (के) प्राण होय ते.त्रीजिय जीयोने म्पर्शनंभिय,रसनेजिय,माणे- जिय, श्वासोमास. थायु, काययक्ष तथा वचनवस, प(सत्त के० ) सात प्राण होय . चतुरिप्रिय जीवोंने स्पर्शनंधिय रसनेजिय, माऐंजिय, घg- रिप्रिय, वासोवास,यायु, काययस तथा वचनयस, ए (यठेव के०) या प्राण होय ते ॥ ४२ ॥ (यसन्नि सन्नि पंचिदिएसु केर) थसंझी पंचें- जिय तथा संझी पंजिय जीयोने (नव दस के०) नव यने दश ( कमेण के०) फ्रमे करी बोधवा के) जाणवा. एटखे यसंझी पंचंडिय जीवोने एक मनोपल होतुं नयी, याकीना नवे प्राणो होय वे यने संझी पंचेंजिय जीवोने दशे प्राणो होय , ए प्राण जेने जेटसा कहा ठे ते जीवने (तेहि (२) गाथा ४२ मीना छूटा शब्दना अर्थ. दमहा-दश प्रकारना. वसरुवाम्बलरूप. जियाण-जीवना. एगिदिएसु-एकजियने पाणा-प्राए. चउरो-चार. इंदि-इंडियो. विगलमु-विकवेजियने। उमास श्वासोवास. सत्त-सात. श्रावस्यायुष्य. अध्य-श्राम. जोग-योग. गाथा ४३ मीना लूटा शब्दना यर्थ. श्रमनि श्रमंझी. तेहिं तेनी. सग्नि-मझी. सहसाये. पंचिदिएम-पंचेंशियने विप. विपयोगो बियोग. नयन्नर. जीवाणं-जीवन. जाए-कदेवाय वे. कर्मए-नमे करी. पापया-जाएवा. थः (दसदा जियाण पाणा के) जीयोना दश प्रकारना प्राण दोय , ते कहे , (३दि के०)डियो (उसास के०) श्वासोतास, (था के०) थायु तया (जोगयतम्या के) योगनां घसम्प जाणवा. एटर म्पर्शनादिपांच नियो, हो ग्यास निःश्वास, मर-मरए.

(२५) जीमंमिन्मदा जयंकर. जीमेदिनीपोने. पसोप्राप्त पाय . थपस नहीं पामेखा. थएंत-धनंती. पम्महिं-धर्मने. मुत्तो-यार. थर्थः-(अपत्तधम्मदिं के ) जेउँने धर्मनी प्राप्ति यश् नथी एवा (जीवेटिं के0 ) जीयोने (एवं के०) पूर्वे कही याव्या तेमया (यणोरपारे .0) पारावार रहित एटले जेनी यादि पण नयी यने थंत पण नथी एया (नीमंमि के०) महा जयंकर (संसारे सायरंमि के) संसाररूप समु- अने विपे (यणंत खुत्तो के०)यनंती वार प्राणवि. योगरूप मरण (पत्तो के०) प्राप्त थाय वे ॥४॥ ए चोथु प्राण हार कां. एटले जे जीव धर्म नथी पाम्या ते जीव एकेकी योनिने विपे यनंतीयनंती वार मरण जीवन प्रत्ये करे . योनि एटले जे स्थानमा घणा जीवोनो एक वर्ण, एक गंध, एक रस, एक स्पर्श, एटलांवानां सरखां बरोबर होय ते सर्व जीवनी एक योनि कही- ए. ते योनि केटली ते सर्व जातिना जीयोनी जूदी नदी संख्याए श्रागसी गाथाए कहे ते. " (४) सह विपळगो के) ते प्राणोनो जे वियोग थार वे ते (जीवाणं मरणं जमए के) जीवने मरण कहेवाय ते. बली ज्यां उपजे त्यां एक थायु तो पूर्वला जवर्नु बांधेलु होय, वाकी चीजा सर्व नवा प्राण अने नत्री पर्याप्ति उपजती वेलाए वांधे. हा देव, नारकी, गज तिथंच तथा मनुष्य ए जीवो संझी पंचेंद्रिय कहेवाय अने संमूर्णिम तिर्थर तथा संमूर्डिम मनुष्य असंही पंजिय कहेवाय रे. तेमा संमूर्धिम मनुष्यो तो नापारूप वाग्यसादिक करी रहित होवार्थी ते सात तथा या प्राण चाला कहा ॥ ४३॥ यहीं एवीयाशंका उत्पन्न थायवे के जीरने प्रार वियोगरूप जे मरण कधु ते केटला काल सुधी थया करे ठे? एना निरासार्थ उत्तर कहे :- एवं अपोरपारे, संसारे सायरंमि नीमंमि ।। पत्ती आत बुत्तो, जीवेदि अपत्तधम्मेहिं ॥४॥ गाया व मीना छूटा शब्दना थर्थ. मंगारंगंगामा. अपारपार पारागार दिन. गायनि-मो. पए प्रकार.

मिलता जयंफर. नोमात पाय . अनन्थनंती. सुसो पार. नास्त्रिीयोने. अपनही पामेला. धम्मदि-धर्मने. । थर्थः-(थपत्तधम्मेहिं के ) जेऊने धर्मनी प्राप्ति यश नथी एवा (जीवेदि के ) जीवोने (एवं के०) पूर्व पाही याव्या तेमथा (यणोरपारे क) पारावार रहित पटले जेनी थादि पण नथी थने थंत पण नथी एचा (नीमंमि के०) महा जयंकर (संसारे सायरंमि के) संसाररूप समु- ने विपे (यणंत खुत्तो के)थनंती वार प्राणवि- योगरूप मरण (पत्तो के) प्राप्त थाय ते ॥४॥ ए चोथु प्राण कार कटुं. एटले जे जीव धर्म नथी पाम्या ते जीव एकेकी योनिने विपे थनंतीयनंती वार मरण जीवन प्रत्ये करे . योनि एटले जे स्थानमां घणा जीवोनो एक वर्ण, एक गंध, एक रस, एक स्पर्श, एटलां वानां सरखां बरोबर होय ते सर्व जीवनी एक योनि कही. ए. ते योनि केटली ठे ते सर्व जातिना जीवोनी जूदी जूदी संख्याए थागती गाथाए कहे ते.

(७६) हवे पांच, योनि हार कहे :- तह चनरासीलका, संखा जोणीण हो. जीवाणं ॥ पुढवाईण चनादं, पत्तेयं सत्त सत्तेव ॥४॥दस पत्तेय तरूणं, चनदस लरका दवंति श्यरेसु॥ विगले. दिएमु दो दो, चनरो पंचिंदि तिरियाएं ॥४६॥ चनरो चनरो नारय, सुरेसुमागु- आग चनदम दवंति ॥ संपिमिया य संधे, चुलसी सरफान जोगीणं ॥४॥ गाथा ४५ मीना यूटा शब्दना थर्य. जीयाणं - जीयोनी. पगमी धोगती. गुडगाण-प्रख्यारिफनी. नई-नारनी. नभयं प्रगंकनी जीनिनी गग गर्भप गागान. मर-अपा. TET अम in: मंगया. गाया मीना बुदा शदना अर्थ. BHAmr. नाना amet.

। पर. पापाप. - (23) im-em (rerritten Nameer- विनिरिति-किय Aftere तिनी. লাখ ৪৩ না হয় না , विमा पानी नारीही. tantl. पुषी पागली. imgxण मनुष्यनी. पादप चाद. गाली-योनिट. शार्पः-(नद ई०) नथा (जीया ) जीयोनी (जोगीण पे.० ) योनिनी ( मंग्या फे०) संग्या (पउगमी सखा फे०) पोगशी सभा (दोश फै०) है. जीयोनुं जे उत्पनिम्यानक ते योनि कहेवाय ठे. तळमां (पुढयाण पठण्डं फे०) पृष्ट्यादिक चार एटसे पृथ्वीकाय, थप्पाय, तेउकाय तथा याउकाय, ए चार प्रयाग्ना जीयोनी (पत्तेयं के०)प्रत्येकनी (सन सत्तेव 4.०) सात मात लाग्य योनि जाणवी. सर्व मसी थव्यावीश सक्षा योनि थ॥४५॥ (पत्तेय नाणं के०) प्रत्येक वनस्पतिकाय जीयोनी (दस के०) दश सदा योनि . (श्यरे के०) इतरेषु एटसे एमचारेनी . (36) एथी इतर जे साधारण वनस्पतिकाय जीवो के तेनी ( चउदस लस्का के) चोद खद योनि (हवंति के०) वे.(विगलेंदिएसु दो दो के) विक संप्रिय एटले वेजिय जीवोनी वे लाख, तेइजिय जीवोनी बे लाख तथा चोरिनिय जीवोनी वे खास योनि जाणवी; अने ( पंचिंदि तिरियाणं के पंचेंजिय तिर्यक् जीवोनी (चडरो के०) चार बद योनि वे ॥४६॥ (चजरो नारय के) नारई जीवोनी चार लदा योनि वे, (सुरेसु चनर के०) देवोनी पण चार लक्ष योनि , ( मण आण के) मनुष्य प्राणीनी ( चउदस हा के) चोद लाख योनि ठे. एवी रीते (संपिमिया के) वधीने एकठी करतां सरवाले (सवे के सर्व ( चुलसी के ) चोराशी (लकाज के लाख (जोणीणं के०) योनि थाय ॥४॥ एवी रीते संसारी जीयो विषयक शरीरनुमान याजखानी स्थिति, काय स्थिति, प्राण थने योनि ए पांच बार कयां. हवे सिक जीयो विषयक कहे :- सिहाण नचि देहो, न उ कम्म ।

पर घायु
(7)
न पाण जोगीमारप्रगना नेमि,
विजिदान नगिया ।। 8G ||
माया #y मा घटानाप्रपं.
ne Trti
| ART Exn.
Marke.
नदी.
Far.
गि मलीन
गिने विष.
जलियापारी.
योनि.
श: (सिसाण देदो नधि पं.०) सिम पर.
मारमान शरीर नपी, गाटे (न थाउ पम्मं पे.)
। थायु यने कर्म पण नषी; थने ज्यां थायु न होय
त्यं (पाए जाणी न .0) प्राण यने योनि पण
नी. प. मनो थनाय दोवाथी फायस्थित्यादि-
पानी पाण थनाय दशाव्यो. एम सर्प कोपाधि-
विमुगः थने जे सोकना थम नागने पिप स्थित
(तसिं ० ) ते सिद्ध जीवोनी ( साक्ष थकता
वि.) सादि थनंत स्थिनि, ते (जिणंदाऽऽगमे
गए मा.

(७०) के०) जिनें प्रणीत सिद्धांतोने विपे (जणि कै)कहीवे. एटले जे दिवसे यहींथी सिझमांगर थाय ते दिवसे सिझने सादिपणुं कयुं , यने प त्यांची च्यवननो यनाव होबाथी अनंतपणुंठे ॥४ हवे फरी संसारी जीव विपे कहे ः- काले अणानिदणे, जोणी गदणंमि जीसणे श्च ॥ नमिया नमिदंति चिरं, जीया जिणवयणमखदंता ॥४॥ गाया था मीना रटा शब्दना यर्य. कर-कासने वि. श्रदीया,थागंमारने यसानिए थानादिनिधन नगिया नकसा . (धादिधने थंत रहित). जमिहनि-गरी. जोगी-योनि. चिखाया कार गुधी. मामि गदन ऋण देनाग, मिरयाण-भिवानने. श्रीमजयनं नारी. थवना-नदी पाता. ययः-यादि पटले प्रारंन, निधन एटो नारा योगदोविजनिदिनाना होगाची गायन पिन पद "यादिनिधन एम धाय वेग पदनों थदं पृनिकार धाम कर :-जना प्रामाश दीनामां शारीनची नेने अनादिनिधन की.

जिनवचनने जे जीवो पाम्या नथी ते (जोणी के०) नयने देनारो (श्व के) हां वर्णव्यो एवो जे या (१) (घशाइनिहणे काले के) अनादि अनंत कालने विपे (जिण्ययणमलहंता जीया के ) हिनोपदेशरुप शेराशी साख संग्ल्यावाली जे योनि तेणे करी(गहणं- सिके) मदा गहनख देना तथा जामणे केल) तार तेने विप (नमिया के ) व्यतीन कालने विपे नटकेसाठे,अने फरी (नमिदं नि चिरं के०) यागस यागामिक कालमां पण घणु ब्रमण करशे ।। ४ ।। हवे ग्रंथकार पोताना नामनी सूचना करता उता धर्मोपदेश कहे -- ता संप संपत्ते, मणुअत्ते उल्लदे वि सम्मत्ते ॥ सिरि संति सूरि सिके, करेद नो उकामं धम्मे ॥ ५० ॥ गाथा ५० मीना छूटा शब्दना थर्थ. ते कारण माटे. सम्मत-मम्यपरप. पश्-सांमत का. सिरिभी, ज्ञानादि पदवी. परी-माप्त था. रांति-भांति, रागादिकनो গমনুষেখা हे दुनि सूरि-पूरि, पूनायोग्य. पए.. विशिष्ट, यपदा करो अपराम.

(०२)
करद-करो.
उजाम-उद्यम.
जो-हे नव्यजीयो. धम्मे धर्मन वि.
यर्थः-(ता के०) ते पूर्वोक्त कारण माटे (
के) हे नव्यजीवो!(संप के०) सांप्रत या.
यने विपे दश दृष्टांते करी ( उस के)
एवं जे या (मणुयत्ते के० ) मनुष्यपणुं ते (
के०)प्राप्त ययुं उतां यने (वि सम्मत्ते के)
पण कुर्सज जिनोक्त तत्वत्रयरुचिरूप
प्राप्त थयुवतां (सिरि संति सूरि सिके के०)
झानादि लक्ष्मी, शांति एटले रागादिकनो
एनए करी जे सूरि एटले पूज्य एवा श्री
तथा गणधर ते शिष्टे करेला देश
उजामं करेह के०) धर्मने विपे जद्यम कर
आ पद्यमां कविए पोतानुं नाम सूचव्यु
रीते:-श्री शांति सूरि उपदेश करे ने के।
उत्तम पुरुषोए आवरण करेला धर्मने विपे
एवो अन्वय करवो. अथवा श्री शांति सूरि
नगवछचनानुसारे धर्मोपदेशनो उद्यम
या ग्रंथ सिझांतमाथी कदाडेलो वे
एसो

। णणा दे । संखित्तो नभरि, रुहार्ड मुयसमुद्दा ॥ ५५ ॥३ति ॥ गाथा ५१ मीना तूटा शब्दना यर्थ. एमोए. मंखितोगक्षपथी. जीवधियारो-जीवविचार. उधरियझार कयों . मंपरईए-गदपरचियंतने. रहायतिशय विस्तारवासा. जाएगा देउजाएयाने थथे. । मुयममुहाई-श्रुतममुभथी. थर्थः-(एसो के० ) गजे (जीववियारो के०) जीव विचार कहो ते ( संखेवरुक्षण के०) संदेपरुचि एटले खप मतिवाला जीवोने (जाणणा हे के०) जाणयाने थर्थे ( रुदा के )जेना विस्तारनुं ग्रहण यशके नहीं एवा (सुयसमुदाउँ के) श्रुतसमुख थकी ( सं खित्तो उहरि के०) संदेपथी उभार करीने या निबंध कस्यो है. एयी या सर्व जे कांश कडं ते पोतार्नु मनःकल्पित कयुं नयी; परंतु सिद्धां- तोमाथी उकार करीने कयुने,एवी सूचना करी॥५१॥ व्याख्यासहितं संपूर्णम् ॥ जाऊन (२) करेह-करो. नाम-नद्यम. नो हे नव्यजीयो. यर्थः-(ता के० ) ते पूर्वोक्त कारण माटे (जो के०) हे जव्यजीवो !( संप के०) सांप्रतासम- यने विप दश दृष्टांते करी (उबहे केस) सुर्खन ए, जे या (मणुअत्ते के०) मनुप्यपणुं ते (संपत्ते के) प्राप्त ययुं वतां अने (वि सम्मत्ते के)तेमां पण उर्लन जिनोक्त तत्वत्रयरुचिरूप सम्यक्त्व प्राप्त थयुंठतां (सिरि संति सूरि सिहे के०) श्री एटो झानादि लक्ष्मी, शांति एटले रागादिकनो उपशम, एनए करी जे सूरि एटले पूज्य एवा श्री तीर्थकर तथा गणधर ते शिष्टे करेला उपदेशरूप (धम्मे उजामं करेह के) धर्मने विपे उद्यम करो ॥५०॥ था पद्यमा कविए पोतार्नु नाम सूचव्यु वेते यावी रीतेः-श्री शांति सूरि उपदेश करे के शिष्टे एटले उत्तम पुरुपोए आचरण करेलाधर्मनेविपेजद्यम करो. एवो यन्वय करवो. अथवा श्री शांति सूरिए करेला जगवचनानुसारे धर्मोपदेशनो उद्यम करो. हवे या ग्रंथ सिमांतमांधी कहाडेतो एम कहे :- एसो जीवधियारो, संखेवरुईण जा- (३) गाणा ।। संस्थित्ती उमरिख, सहार्ड मुघसमुदाउँ ।। इति ।। गापा ५१ मीना छूटा शब्दना थपं. विनोदपपी. सीपियागे जापविचार. परिवार कानावे. परपिपंतन. पदार-अतिशयविशारयावा. wer जापाने अथें. गुपगमुन्शुतगमुची. या-(एमा पं० ) गजे (जीववियारो के) जीयविचार की ते (संखवरण के०) संदेपरचि एटस पाप मतिवाला जीयोन (जाणणा देउ फे०) जाणयाने थर्षे ( गहा के० )जेना विस्तारनुं ग्रहण थइश नदी एवा (सुयसमुदाउँ के०) श्रुनसमुज घवी (संरित्तो उरि पं०) संदेपयी उद्धार करीने या नियंध कग्यो ठे. गथी था सर्व जे कां य ते पोतानुं मनःकल्पित फयु नयी; परंतु सिन नामांधी उभार करीने कांगे,एची सूचना करी॥५१॥ इति श्रीजीय विचारप्रकरणं प्रात- व्याख्यासहितं संपूर्णम् ॥ vastu .

(४)
॥जीव विचारनुं स्वरूप लिख्यते॥
॥ जीवना वे नेद ॥
३ चोरिदिय जी
१ संसारी जीव.
४ पंचंडिय जीव
२ सिकना जीव.
॥ स्थावरना यांच नेद
॥ संसारीना वे नेद ॥
१ पृथ्वीकाय जीव.
१स जीव.
२ अप्काय जीव.
२ स्थावर जीव. ३ तेजकाय जीव.
॥सना चार नेद ॥
४ वाजकाय जीव.
१ वेजिय जीव. ५ वनस्पतिकायजी
२ तेंघिय जीव.
१॥ पृथ्वीकायनानेद कहे ठे॥
स्फटिक रन, मणि, रत्न, परवालां, हींगलो, हर
ताल, मणसिल, पारो, सोनुं यादि देश सात धार
ते सोनुं, रू', बांबू, सीसु, जसत, कथीर तथा लोड़
3, खमीमाटी, हरमजी, पापाणना कटकानी सार
मखेली धोली माटी, पलेवो पापाण, अवरख, तुर्र
,

,
।
(ए)
माटी, सारो, माटीनी जात, पापाणनी जान प्रादि
देवीफायना नेद जाणा, '
२॥ अफायना नंद फाई॥
भूमिर्नु पाणी, परमादर्नु पाणी मारने पाहिगर्नु
पाणी, पराठे पाणी, सीसी रिफाप पानी की
दधिनुं पाणी यादि देश अपायना द IIIT:
३ ॥ जवायना पद परे ।
अंगारामोधषियासोप्रति जागानोmr,
जापाननो प्रति, पजनी प्रतिदिनतीन
पादिदेश लेउवायना जेद जाणा,
४॥ याउपायना द पार ॥
मामक पायरी, Aar. पापणे, मंग
पापरो, गोटो पापरी शुरू दापरी, राजार
শী, বন, নুয়ান প্লাহি হ হল
द जापा. ४
५॥ पनरपतिकापना पद पर।
१ साधारण नरपति
प्राचार
१॥ साधारण परनिनाद
गजाननाला in.
म

(७६)
कुंपस, पांच जातनी फुगी, सेवास, नूमिफोमा, ली
आऊ , लीली हलदर ने लीलो कचुरो, गाजर, मोय
वथुलानी बाजी, थेग, सर्व जातना पाला,
कोमल
फल, सर्वे गुप्त वे सिरा, सांध, पर्व जेनां एत्रां, युहर
कुंवार, गुगल,
गलो
प्रमुख
वेद्या थकी नगे तेन
साधारण वनस्पति कहीए.
२॥ प्रत्येक वनस्पतिना नेद कहे ।।
एक शरीरमा एक जीव होय जेने विपे तेने प्रत्येव
वनस्पति कहीए. ते फल, फूल, ठाल, काष्ठ, मूल
पान ने वीज ए सात स्थानके एक एक जीव होय ते
प्रत्येक वनस्पति कहीए. एपांच स्थावरना नेद कह्या.
॥ वेजियना नेद कहे ॥
शंख, कोमी, गंडोला, जलो, चंदनक एटले
स्थापनाचार्य, अलसीथा,लालीया,लाकमाना कीमा:
कीरमीया, पूरा ए थादिदेश्वप्रिय जीव जाणवा.
।। तेजियना नेद कहे ॥
कानखजुरा, मांकण, जु, कीमी, उदेश मंकोमा,
२८, घीमेल, सावा,गींगोमा,गधश्या,गणना कीमा,
विष्टाना कीमा, धनेरीया, कुंयुया, गोपालीक, मेहना
मामा यादि देश तेइजियना नेद जाणवा.
.
---

,
.
(1)
॥ चोरिजियना नेद कहे ते ॥
वितु, टिंकुण, जमरा, जमरी, तिम,माखी, मांस,
मछर, कंसारी, करोलीया यादि देश चोरिजियना
नेद जाणवा.
॥ पंचंजियना चार नेद कहे ॥
१ नारकी. २ तिर्यच. ३ मनुष्य. ४ देवता.
॥ नारकीना सात नेद ॥
गोगनां नाम.
नारकीनां नाम.
रलप्रना.
घमा.
शर्करामना. बंसा.
वासुकापना. सेला.
पंकप्रना. यंजणा.
धूमप्रना.
रिहा.
तमःप्रजा.
तमस्तमःप्रना. माघवती.
॥तियंचना प्रण नेद ॥
१जसचर. २ स्थसचर.
इखेचर.
१॥ जलपरना पांच नेद कहे ते॥
१ सुसुमार. २ मछ. ३ काचया. ५ जखत
५ मगरमच्छ

() २॥ स्थलचरना ऋण जेद ।। उरःपरिसर्प. सर्पनी जाति. सुजपरिसर्प. नोलिया, अंदर प्रमुख चतुष्पद. गाय, नंस प्रमुख. ३॥ खेचरना वे नेद ॥ रोमज पंखी, चर्मज पंखी, मनुप्यतोकथी बहार समुज पंखी ने वितत पंखी. मनुप्यनी मुख्य प्रण जाति . तेनी उत्तर जाति १०१ मनुप्यदेव जाणवां. १५ पंदर कर्मभूमि. ३० नीश अकर्मनूमि. ५६ ठप्पन अंतरछीप. ॥ हवे पंदर कर्मभूमि कहे ॥ पांच जरत. पांच ऐरवत. पांच महाविदेह. ॥ हवे त्रीश अकर्मनूमि कहे ॥ १ पांच हेमवंत क्षेत्र. २ पांच हिरण्यवंत क्षेत्र, ३ पांच हरिवर्प क्षेत्र. ४ पांच रम्यक क्षेत्र, ५ पांच देवकुरु देत्र. ६ पांच उत्तरकुरु क्षेत्र, ॥ हवे ठप्पन अंतरछीप कहे ते ॥ चुलहेमवंत पर्वत यने शिखरी पर्वत, ए वे पर्व- -

(ए)
तनी पूर्व ने पश्चिमे सपण समुभमां ये वे दाढाउँ
नीकाली ये एटले पंने पर्यंतनी पंने दिशिनी थान
दाढा य. ते एक एक दादा उपरे सात सान
बीपचे एटले च्याउ दाला उपर उप्पन थंतरहीप घया.
पप्रमाणे मनुप्यना १०१ नेद जाणया.
॥ देवताना चार द फहे ॥
१ दश जयनपत्ति. २ शाव यंतर तपा पाणय.
तर.३ पांच ज्योतिपी. ४ थे पैमानिया.
॥ दश नयनपनिनां गाम पाई।
१ असुरकुमार. २ नागकुमार गुपणारागार.
४ विद्युत्मार.५ अपितुमार.लीपकुमार, पि.
मुमार. दिशिकुमार पायुपगार. १०रत नितकुमार,
॥थाउ प्यंतर तपा पाणयंतग्ना मंद पाहे ॥
१ पिशाप. १ मृत.३ पद. ५ राहाल.५ निर
६ किंपुरुष. मदोरग. गंधर्व,
पापती.पी.सीपादी. नदी.
५ दिन. ६ महादित. पोहंग. पतंग.
॥ योनिपीना पांप पेट पाहे रे ।।
१. सूर्य. ३ भद. ४ मदन ए मार.
A

।
(ए)
॥ वैमानिकना वे नेद कहे ते ॥
रकल्प ते वार देवलोक. २ कल्पातीत ते नव
ग्रेवेयक ने पांच अनुत्तर विमान.
॥ कल्प ते वार देवलोकनां नाम कहे ते ॥
१ सोधर्म. ५ शान. ३ सनत्कुमार. ४ माहेंज.
५ ब्रह्म. ६ लांतक. शुक्र. ७ सहस्रार. ए यानत.
१० प्राणत. ११ आरण, २२ अच्युत.
॥कल्पातीत ते नव वेयक ने पांच अनुत्तर विमान ।
॥ नव वेयकनां नाम कहे ठे।
सुदर्शन.२ सुप्रतिबंध.३मनोरम. सर्वतोजन
५ विशाल. ६ सुमनस. ७ सौमनस. प्रीतिकर.
ए यादित्य.
॥ पांच अनुत्तर विमाननां नाम कहे ते ॥
१ विजय. २ वेजयंत. ३ जयंत. ४ अपराजित.
५ सर्वार्थसिक.
॥ ए संसारी जीवोना नेद कह्या ।
॥ हवे सिद्धना पंदर नेद कहे ॥
तीर्थसिक, यतीर्थसिक यादि देश सिद्धना
पंदर नेद जाणवा.
ए जीवन स्वरूप कडं.

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(ए)
॥ संमूर्छिमनुं शरीरमान कहे ॥
खेचर पंखीनु तथा नुजपरिसपर्नु धनुष्य पृथक्त्व
शरीर जाणवू.
जरःपरिसर्पन योजन पृथक्त्व शरीर जाणवं.
संमूर्विम चतुष्पदनुं गान पृथक्त्व शरीरमान जाणवू.
॥गर्नज ॥
चतुप्पदनुं व गाउनुं शरीर होय.
मनुप्यतुं त्रण गाउनुं शरीर होय.
जवनपति, व्यंतर, ज्योतिषी, वैमानिकमांसोधर्म
ने शान ए वे देवलोक सुधीना देवतार्नु सात
दाथर्नु शरीर जाणयु.
श्रीजे चोये व दायतुं शरीर.
पांचमे के पांच हायर्नु शरीर.
सातमे याठमे चार हाथ; नवमे, दशमे, अग्या
रमे, वारमै ए चार देवलोक श्रण हायर्नु शरीर,
नव वेयफ ये हायर्नु शरीर. पांच थनुत्तर विमाने
का दायर्नु.प.शरीरनुं मान जाणवू.
२॥थानखानुं मान कहे ॥
पृथीकायर्नु यावीश हजार वर्ष, थकायतुं सात
,

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(ए)
॥ संमूर्छिमनु शरीरमान कहे ॥
खेचर पंखी तथा जुजपरिसर्पy धनुप्य पृथक
शरीर जाणवु.
जर परिसपर्नु योजन पृथक्त्व शरीर जापवं
संमूर्छिम चतुष्पदनुं गाल पृथक्त्व शरीरमान जाणई
॥ गर्नज ॥
चतुष्पदन व गाउनु शरीर होय.
मनुष्यनुं त्रण गाउनु शरीर होय.
नधनपति, व्यंतर, ज्योतिषी, वैमानिकमा सोधर्म
ने ईशान ए वे देवलोक सुधीना देवतार्नु सात
हाथर्नु शरीर जायचं.
श्रीजे चौथे हाथर्नु शरीर.
पांचमे के पांच हायतुं शरीर.
सातमे याठमे चार हाथ; नवमे, दशम, यग्या
रमे, पारमे ए चार देवसोकै त्रण दाथर्नु शरीर,
नव प्रवेयके वे हाथ, शरीर. पांच यनुत्तर विमाने
एक हायर्नु. एशरीरनु मान जाणयु.
२॥ याउखानुं मान कहे ते ॥
पृथ्वीकायर्नु यावीश हजार वर्ष, थकापर्नु सान

(ए)
एजियने चार प्राण.
वेजियने ठ प्राण.
तेजियने सात प्राण.
चारिजियने या प्राण.
असंही पंचेंजियने नव प्राण.
संझी पंचेंजियने दश प्राण.
५॥ दवे योनिनुं छार कहे ते ।।
सात लाख पृथ्वीकाय.
सात साखयप्काय.
सात साख तेलकाय.
सात लाख वानकाय.
दश साख प्रत्येक वनस्पतिकाय.
चोद साख साधारण वनस्पतिकाय.
ये साख वेजिय.
ये साख तेइंजिय.
वे साख चोरिजिय.
चार साख देवता.
चार लाख नारकी.

जुजपरिसपर्नु तालीश हजार वर्षेनुं आयुष्य. एवी रीते श्रायुप्यनुं मान जाणवू. ३॥ हवे कायनी स्थितिनुं छार कहे ॥ एकेंघिय असंख्याती उत्सर्पिणी अवसर्पिणी सुधी पोतानी कायमा रहे. अनंतकाय अनंती उत्सर्पिणी अवसर्पिणी सुधी पोतानी कायम रहे. वेजिय, तेइडिय तथा चोरि हिय एत्रणे विक- लैंक्रिय संख्यातां वर्ष सुधी रहे. मनुप्य तथा तिथंच सात बाउ जव सुधी रहे. नारकी मरी नारकी न थाय. देवता मरी देवता न थाय. ४॥ हवे दश प्राणर्नु छार कहे ॥ १ स्पर्शनेजिय. ६ श्वासोवास. २ रसनेजिय. याउखुं. ३ धाणे जिय. तमनवल. ४ चरिंजिय. ए वचनवल. ५ श्रोत्रंछिय. १० कायपल. एदश प्राण जापवा.

(एए)
एजियने चार प्राण.
वेजियने ठ प्राण.
तेजियने सात प्राण.
चोरिजियने या प्राण.
यसंझी पंचेंजियने नव प्राण.
संझी पंजियने दश प्राण.
५॥ दवे योनिनुं धार कहे ते॥
सात साख पृथ्वीकाय.
सात साख थप्काय.
सात साख तेउकाय.
सात साख बालकाय.
दश साख प्रत्येक वनस्पतिकाय.
चोद लाख साधारण वनस्पतिकाय.
ये साख वेजिय.
ये लाख तेइजिय.
ये साख चोरिजिय.
चार साख देवता.
चार लाख नारकी.

चार लाख तियंच पंचेंजिय.
चोद लाख मनुप्यना नेद.
ए सर्व मली सर्व जीवोनी चोराशी लाख जीवा-
योनि थाय.
सिहना जीवोने देह नथी, यायु नथी, कर्म
नथी, प्राण नथी, योनि नथी.
प सिझना जीयोनी सादियनंत स्थिति जाणवी.
,
Archant.alAM.NPOnt.AAMRATAPrastachake
इति जीय विचार प्रकरणना
छूटा योसो समाप्त.
...... Hurimatertyresenternea..
Prialty Peartenir Y#4 Shelton at the Vias
M. l'rt, J, Kollut Lane, Dusatay.
P-Li... by Ell nye fx flou Haret,
1110tantritihistoy.

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Jeev Vichar Prakaran

Author
Munishree Amolak
Title
Jeev Vichar Prakaran
File name
Jeev Vichar Prakaran
Text
OCR done
Citation
1952
Published
2011/07
Publisher
Hadrabad.sharda Press
Language
Sanskrit
Pages
114
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
311006
Barcode
99999990310900.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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nvGWYux8NBR
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