Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Rajvallabhnighantu

Sen,narayandas · 2012/08

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भूमिका. देखो, एक समय वह था कि ब्रह्मादिक देवता और ऋषिमुनियोंने संसारके उपकारार्थ आयुर्वेदके अनेक ग्रन्य रचे और औषधियोंका यहां- तक चमत्कार दिखाया कि ब्रह्माका कय हुगा शिर अश्विनीकुमारने जोड दिया, क्या इससे अधिक औपधियाँका कुछ और चमत्कार होगा? फिर एक समय वह था कि राजमुकुट दिवोदास, वीरविक्रमादित्य, भोजराज, मदनपाल और हादिक राजाओंने ब्राह्मणोंको द्रव्य दे देकर द्रव्यगुणके अनेक ग्रन्य वनवाकर प्रजाके उपकारके लिये संसारमें प्रचार किया और यहांतक हुआ कि रोगोंको रहना भारी पड़ गया,एक समय 'बह हुआ कि यवनोंने उन ग्रन्थोंका नाम निशानमी न रक्खा, कहीं पनीमें बहाये कहीं आगमैं जलाये और अपने बनाये अन्यौंका प्रचार 'या, जैसे कि तिव्ये अहमदी, तिव्ये अकबरी, इजालयमसीहा, मखजने- ग, कानूनशैख, इनहीकी चर्चा फेल उस समय भारतवासियोंका अत्यन्त खिन्न हुआ, कारवार छुट गया, आयुर्वेदका नाम संसारसे था, सबने अपने अपने धर्म कर्म छोड दिये, नोकरी चाकरी करके भर बालबच्चोंका प्रतिपाल करने लगे. और यवनोंसे वातवातमें डरने लगे, यहांतक हुआ कि सब देशमें फारसीहीका रिखान हो गया, और नागरीका तो नामभी लोगोंके मुखसे निकलना कठिन हो गया. अब एक समय यह आया कि जबसे जगतसुखदानी महारानी विकटोरियाका राज्य इस देशमें हुआ तबसे हरेक विद्याका प्रचार घरघर होने लगा, कविलोगभी अपने अपने शस्त्र सुधारने लगे, वैद्यलोग आयुर्वे दकी चर्चा में प्रवृत्त हुए, प्राचीन ग्रन्योंकी तलास होने लगी, नवीन नवीनं ग्रन्थ बनने लगे, परन्तु जितनी उन्नति इस शास्त्रकी होनी चाहिये अभतिक जननी उन्नति नहीं हुई, क्योंकि पूर्वकालमें जो सिकिसाफे। ग्रन्य प्रकाशित थे अब वह सर्व अन्य संस्कारके अभावसे और सम्प्रदायके दोपसे लुप्त हो गये, अब बड़े परिश्रमसे वैद्य लोगोंने खोजते खोजते चरक, मुश्रुत, माधवनिदान, वाग्भट, भावप्रकाशादिक प्रसिद्ध प्रसिद्ध ग्रन्योंके पते लगाये, परन्तु इनके अतिरिक्त अनेक ग्रन्थोंका अभीतक पता नहीं, कि कहां गये ?-- -- m 12] भूमिका. अब हमने बडे यल और परिश्रमके साथ आयुचंदीय शास्त्र अलभ्य रत्न महोपकारी राजबद्धभनिषण्टा साधारण मनुष्योंके उपकारार्थ तलास करके प्रकाश किया, इस अमूल्य ग्रन्थको प्राप्त करके पहिले जैसा आनन्द हुआ कुछ वर्णन नही कर सक्ता, परन्तु आन्तरिक दशा देखकर वैसाही चित्तको खेदगी हुआ, क्योंकि यह पुस्तक इतनी अशुद्ध यी कि वारम्वार पढने परभी कहाँ कहाँरा अर्थ समझमें नहीं आया, परन्तु दूसरे ग्रन्योंकी सहायतासे और सज्जनोंकी कृपासे जहांतक हो सका और अपनी बुद्धिसे जो कुछ समझमें आया, वहांतक शुद्ध किया, में साहस करके अपने आ- फको पुरा कृतकार्य हुआ नहीं समझता, इस भापानुवादमें इतना कहना य. वश्य है कि इस दुर्घट जटिल आयुर्वेदीयग्रन्थका अनुवाद करना सहज वात नहीं, वास्तवमें इस ग्रन्थकै पाठ करनेसे ग्रन्थकर्ताको साधारण बुद्धिमानी- का परिचय नहीं पाया जाता, महाबुद्धिवान महाराज श्रीमानराजवल्लभ न- न्य बनानेवाले और सर्वगुणपारायण वेद्यराज नारायणदास इसके प्रति- संस्कारक है, परन्तु ऐसे अनुपम अन्योंके प्रकाश करनेमें वैश्यवंशअवतंस. कल्याणनिवासी श्रीश्रेष्ठ गगाविष्णु श्रीकृष्णदासकी समान प्रकाश करने में दूसरा दृष्टि नहीं आता जिन्होने अत्यन्त साहस करके आयुर्वेदकी नौकाको आलस्यक समुद्र में डूबती हुई देख कटिबद्ध हो, केवट वन तन मन लगा उसको पार करनेका सहज उपाय कर दिया, कि देशदेशान्तरोंसे आयुध- दीय ग्रन्थ मगाय मगाय भापानुवाद कराय कराय उनको अत्यन्त सुगम कर अपने लक्ष्मीवकटेश्वर यवालयमें प्रकाशित कर नगरनगर ग्राम ग्राममें उनका प्रचार करने लगे, उनके उपफारकाभी वर्णन नहीं हो सक्ता, जय मने देखा कि ऐसे ऐसे परोपकारी संसारीमें आयुर्वेदको सहायतामें क- टिन है,जय उन लोकोंका इस प्रकार साहस देखा तो मैनेभी अपने मनमें विचार किया कि यद्यपि इसकी भाषा करनी कठिनभी है परन्तु (तामा राजरहका का करनेको प्रस्तुत हुआ, और टेकाका नाम द्र- व्यचन्द्रिका रखा और जहातक हो सका उसकी भाषा ऐसी सरल और साली बनाई जो कि एनबार पाठ करनेतही सर्व साधारणको समझमें भाजाय, और इस ग्रन्थको मंगानमें और शुद्ध करने जा जो कठिनता पट वह पारशी वर्णन कर चुका हू, अब सब पाठकगणों से मेरी यह प्रार्थना है कि जो इस ग्रन्थमें किसी प्रकारकी अशुद्धि हो तो पाठक भूमिका. [३] लोग क्षमा करें, और इस ग्रन्यके पाठ करनेसे पाठकोंका थोडासाभी उपकार हो तो में अपने यत्न और परिश्रमको सार्थक समझंगा. कार्तिकृष्णाष्टमी ८ विक्रम सवत् १९५२ आपका परममित्र- शालिग्रामवैश्य, दीन्दारपुरा, मुरादावाद सिटी. यह राजवल्लभग्रन्थ द्रव्यचन्द्रिकाटीकासहित सर्वविद्यासागर धझ्यवंशउजागर श्रीधेष्ट गंगाविष्णुश्रीकृष्णदासको समर्पण किया, शुभमस्तु. HI

दीपनपाचनादि पारिभाषिकशब्दोंका अर्थ.
भाषांतरमें कहीं २ जगह " दीपन, पाचन. अभिष्यंदी
इत्यादि शब्दोंकाही प्रायः उपयोग किया गया है सो झट इन
शब्दोंका अर्थ सर्व साधारण लोगोंकी समझमें आना कठिन है
इसीलिये इन दीपनपाचनादि पारिजापिक शब्दोंका अर्थ नीचे
लिखा है-
१ दीपन-जो आमको न पचाये सिर्फ अमिको बढावे.
जैसे-सोफ.
२ पाचन-जो आमको पचावे परंतु अनिको न बढावे.
जैसे-नागकेशर.
३ दीपनपाचन-जो आमको पचावे और अनिकोजी
बढाव. जैसे-चित्रक.
४संशमन-जो वातादि दोपोंको न बिगाडे न शोधे किंत
समान रखे. जैसे-गिलोय.
५ अनुलोमन-गो वातादि दोषोंको पचाके बंधे हुओंको
अलग २ करके गुदादारसे बाहर निकाल देवे. जैसे-हरड.
६सन-जो वातादि दरेप और मलमूत्रको जबरदस्तीरे
पाक होनेके पहिलेही गुदादारसे बाहर निकाले. जप्ते-किरवारे
की गिरी.
७ भेदन-जो वातादि दोषांसे बंधे हुए मलमृत्रको अल
२ करके मदादारसे बाहर निकाले. जैसे-कुटकी.

५ दीपनपाचनादि पारिभाषिकशन्दोंका अर्थ. ८ रेचन-जो पक्कापक्क अन्नादि और वातादि दोपोंको पतला करके गुदाद्वारसे बाहर निकाले. जैसे-निसोत. ९ वमन-जो विना पचे कफपित्तको मुखके द्वारा निकाले. जैसे-मैनफल. १० संशोधन-जो स्वस्थानमें स्थित वातादि दोप और मलको ऊपरके ओर खींचके मुखनासिकाके द्वारा बाहर निका- ले. जैसे-देवदाली. ११ छेदन-जो परस्पर मिले कफादि दोपको अपनी श- तिसे अलग २ कर देवे. जैसे-जवाखार. १२ लेखन-जो रसादि धातु और वातादि दोपोंको सुखा- यके बाहर निकाले. जैसे-सहत, १३ ग्राही-जो अमिको बढावे और आमको पचावे तथा स्वयं उप्णवीर्य होनेसे जलरूप कफादि दोप तथा धातुमलको शोपण करे. जैसे-सोंठ. १४ स्तंभन-जो स्वयं रूम, शीतल, कषेला और जल्दी पचनेवाला होनेसे वादीको उत्पन्न करे. जैसे-नागरमोथा. १५ रसायन-जो जरा और रोगोंको दूर करे. जैसे-नी- 'मगिलोय. १६ वाजीकरण-जो वीर्यको बढाके खीसे प्रीति करावे. से-कोंचके वीज. १७ धातुवक-जो वीर्यको बहावे. जैमे-असगंध. - न

दीपनपाचनादि पारिभापिकशब्दोंका अर्थ.
१८ धातुचेतन-जो वीर्यको चेतन तथा उत्पन्न करे.
जैसे-दूध.
-
१९ सूक्ष्म-जो रोमकूपोंके द्वारा शरीरमें प्रवेश करे.
जैसे-तेल.
२० व्यवायी-जो पचनेके पूर्वही सब देहमें व्याप्त होये.
जैसे-भांग.
२१ विकाशी-जो शरीरकी संधियोंके बंधन और धातुओं-
के ओजको शिथिल करे. जैसे-सुपारी.
२२ मादक-जो तमोगुणी होनेसे बुद्धिको लुप्त करे. जैसे-
दारू.
२३प्राणहारक-जो व्यवायी, विकाशी, सूक्ष्म, छेदन,
मादक और आगेय इन छः गुणोंसे युक्त होवे. जैसे-वत्सनाग.
२४ योगवाही-जो अलग २ अनुपानोंसे सब रोगांपर
दिया जावे. जसे-पीपल.
२५ प्रमाथी-जो अपनी शक्तिसे मुख, नासिका, कर्णादि-
कोंके छिद्रांमसे कफादि दोपोंको दूर करे. जैसे-मिर्च.
२६ अभिप्यंदी-जो स्वयं पिच्छिल और भारी होनेसे
रसवाहिनी नसोंको रोकके शरीरको जकडा देवे. जैसे-दहीः

॥ श्रीः॥ राजवल्लभनिघंटोः विषयानुक्रमणिका. " ८ 2 A... " " .... " .... " .... .... 8 " .... विषयः. पृष्ठम्. विषयः. पृष्ठम्. मंगलाचरणम् . १ द्वितीयपरिच्छेदः। ग्रंथकृन्नामोक्तिपूर्वकग्रंथप्रशंसा. छत्रादिपंचकम् ग्रंथस्थपरिच्छेदनामानि .... दृष्टिगुणाः प्रथमपरिच्छेदः। आतपगुणाः उत्थानकालनिर्णयादिः २ | छायागुणाः पादमलमार्गाणां शौचगुणाः.... यष्टिधारणगुणाः उपःपानगुणाः ३ व्यायामगुणाः १० दंतधावनविधिः अंगमर्दनगुणाः १२ मतांतरम्. शरीरधर्पणगुणाः निपिदम् ४ पथभ्रमणगुणाः जिव्हालेखनगुणाः 1 अतिभ्रमणगुणाः दंतधावने दिनिर्णयः "पादुकाधारणगुणाः दंतकाष्ठव्यवहारनिपिद्धजनाः. ५ पादुकाऽधारणदोपाः चक्षुर्धापनविधिः .... हस्त्यादिगमनगुणाः अंजनधारणगुणाः "विश्रामगुणाः कंकतीगुणाः ६ पादप्रक्षालनगुणाः उष्णीपधारणगुणाः प्राग्वातगुणाः श्मश्रुनसादिच्छेदनगुणाः. "दक्षिणमारुतगुणाः प्रभातद्रष्टव्यः "पश्चिनपवनगुणाः अमिसेवनगुणाः ७ उत्तरवायुगुणाः धूमहिमगुणाः नीहारादिसंयुक्तवायुगुणाः. १७ शिशिरगुणाः विश्वग्वायुगुणाः.... कुज्झटिगुणाः व्यजनानिलगुणाः अवस्थानगुणाः ८ तालतपवनगुणाः " " " .... " .... ... .... " .... .... " .... .... " ....

" .... ... .... .... .... .... ... .... 7 " .... .... .... ११ " २९ .... .... .... विषयानुक्रमणिका. घंशव्यजनपवनगुणाः १८ सर्वतुसंबंधिभाकाशजलगुणा.२७ वालव्यजनवायुगुणाः वार्षिकजलगुणाः मयूरपक्षादिव्यजनवायुगुणा:. " शारदीपजलगुणाः.... तेलगुणाः "हेमंतिकजलगुणाः तिलतेलगुणाः १९ शैशिरजलगुणाः सर्वपतेलगुणाः वासंतिकजलगुणाः एरंडतेलगुणाः " प्रेमिकलगुणाः अतसीतलगुणाः- ... २० तहागजलगुणाः कुसुभतेलगुणाः "वापीजलगुणाः करंजतेलगुणाः कूपजलगुणाः निवतेलगुणाः कुंडजलगुणाः मनुक्तफलोद्भवतैलगुणा..... २१ निरिजलगुणाः तिलतलस्य प्रधानत्वम् । सरोवरजलगुणाः स्थावरस्नेहस्य तैलत्वम् .. केदारजलगुणाः अभ्यंगगुणाः .. पल्बलजलगुणा..... पादाभ्यंगगुणाः २२ समुद्रजलगुणाः शिरसि तैलमदनगुणाः "नदीजलगुणाः कर्णतेलपूरणगुणाः २३ शीघ्रबहानदीजलगुणाः तैलद्रोणीअवस्थितिगुणाः.... मृदुवहापूर्वसमुद्रगानदीजलपु. उद्वर्तनगुणाः पापाणवालुकायुक्तनदीजलगु० जळगुणाः २४ गंगादिनदी नलगुणाः साधारणमेघजलगुणाः २५ पारिभद्रादिपर्वत नानदीजलगु.३१ सूर्पचंद्रकिरणसंयुक्तजलगुणा. चंद्रकिरणादियुक्तपर्वतवारिगु० | अनार्तवमेधजलगुणाः चंदकांतमणिसृष्टजलगुणाः वकालीयमेषजलपाननिपि बोद्भिदजलगुणाः.... मेघजलपानकालनिर्णय:... २६ तालफलोद्यजलगुणा: अनूपदेशनातजलगुणाः.... नारिकेलजलगुणाः जांगलजलगुणाः २७ शीतलजलगुणाः .... " " .... " .... .... " " .... " 1 .... ." " " .... " .... ....

.... .... .... .... .... .... .... " " .... .... .... .... .... " 1 .... .... .... .... विषयानुक्रमणिका. ३ धारापातजलगुणाः ३३ तेजपुत्रगुणाः गृतशीतजलगुणाः ककोलगुणाः उप्णोदकसाधारणगुणाः शटीगुणाः टप्णजललक्षणविशेषगुणाः शीरगुणाः ऋतुभेदे उप्णजलभेदाः ३४ रक्तचंदनगुणाः पर्युषितजलगुणाः श्रीवासादिगुणाः सुवासितजलगुणाः तृतीयपरिच्छेदः। जलस्य प्राधान्यम् ३५ धान्यभेदाः ४२ शरदि वसंते च जलपानविधिः" शालिघान्यगुणाः नानगुणाः ३६ रक्तशालिगुणाः उप्णांबुस्नानगुणाः "कलमधान्यगुणाः.... १३ द्रव्यविशेपस्नानगुणाः " दग्धभूमिजातशालिधान्यगुणाः ॥ नानस्य विशेषगुणाः ३७ छिन्नरूढशालिधान्यगुणा:. सानस्य निपिद्धता.... "प्मिकपष्टिधान्यगुणाः शरीरमार्जनगुणाः "शालिविशेषगुणाः वस्त्रादिधारणगुणाः। पाटलबीहिधान्यगुणाः १४ निर्मलवखधारणगुणाः " शरद्ग्रीप्योदवधान्यगुणाः. रत्नाभरणधारणगुणाः ३८ ऋतुसंधिभवधान्यगुणाः सूर्यादेर्चनगुणाः स्पलजधान्यगुणाः दर्पणगुणाः " बोरवत्रीहिधान्यगुणाः अनुलेपनगुणाः। वापितावापितधान्यगुणा:. १५ अनुलेपनसामान्यगुणाः रोप्यातिरोप्यधान्यगुणाः. चंदन गुणाः ३९ यवगुणाः.. অন্যথা: गोधूमगुणाः कुंकुमगुणाः तृणधान्यानांगुणाः कस्तूरीगुणाः मुहानां भेदाःसामान्यगुणाः-१६ लताकस्तूरीगुणाः मुद्गुणा:... -.. " .... .... " .... " " a.. 17 .... .... " .... .... " .... " .... .... ....

४ .... - .... " .... . .... 1 " .... .... " . .... " 1 .... .... 71 " .... .... मकुष्टगुणाः मापगुणाः राजमाषगुणाः मसूरगुणाः चणकगुणाः लगुणाः अतसीगुणाः कुलत्यगुणाः तुपरीगुणाः शिटगुणाः शिनिगुणाः शाकावर्गः। शाफमेदाः शाफसाधारणगुणाः वास्तुकशाकगुणाः नादीशाकगुणाः कंचटशाकगुणाः हिटमाचिकाशाफगुणाः करवीशाकगुणाः मारिपशाकगुणाः शाकल्यवहारविधिः बादशारगुणाः पारमाधीशाकगुणाः प्रतिमाशामुमा सपशारगुणाः मुनिराणामारगुणाः लिंगशारगुणाः विषयानुक्रमणिका. ४७ ग्रीष्मसुंदरशाकगुणाः "कासमर्दशाकगुणाः शतपुष्पशाकगुणाः १८ पुर्ननवाशाकगुणाः "मूलकशाकगुणाः. 1 तंडुलीयशाकगुणाः ५५ "कलायशाकगुणाः मंडूकपर्णीशाकगुणाः ४९ ब्राह्मीशाकगुणाः... "चांगरीशाकगुणाः पृकाशाकगुणाः लांगलीशाकगुणाः ५. चुककशाकगुणाः ५१ शुपणी-महाराष्ट्रीशाकगुणाः. ॥ जयंतीशाकगुणाः कदलीमोचकगुणाः ॥ गोक्षुरशाकगुणाः.... ५७ ५२ शाकसाधारणगुणाः पटोलशाकगुणाः "शाकभक्षणदोपा.... पुष्पशाकगुणाः। वरुणपुष्पगुणाः ५. यासकयंगसेनपुष्पगुणाः कोविदारादिपुपमा मकपुष्पगुणाः.... "करीरवंशपुष्पगुणाः niगुवाकादिक्षमस्तकगुणाः. H " .... .... " .... .... " " .... " .... " .... .... ... .... " .... m .... " .... .... ...- .... .... ६३ .... " ........ .... .... ........ त्र .... .... .... .... .... 17 .... " .... 2 विषयानुक्रमणिका. तालप्रलंवंगुणाः ५९ कचुगुणाः मुंजाकपुप्पगुणाः .... ६. कदलीमूलगुणाः फलशाकगुणाः। केबुकमूलगुणाः पार्ताकुफलगुणाः "मूलकगुणाः कोमल-पक्कवार्ताकुगुणाः " शुष्कमूलकगुणाः मध्यमवार्ताकुगुणाः मूलकपुप्पफलगुणाः- कंटकयुक्तवार्ताकुगुणाः ६१ खंडकर्णगुणाः अंगारपकवार्ताकुगुणाः "वाराहीकंदगुणाः || वृहतीकंटकारीफलगुणा:.... "विदारीकंदगुणाः कृप्मांडगुणाः ६२ वंशकरीरगुणाः अलावगुणाः "हस्तिकंदादिगुणाः झिंगाकगुणाः "पिंडालुकगुणाः त्रपुर्वारुगुणाः " | तरुतादिगुणाः कर्कटीफलगुणाः ६३ स्वेदजशाकगुणाः शीर्णतगुणाः "पलालजशाकगुणाः चेलानगुणाः " शुचिस्थलादिजातशाकगुणाः कारवेल्लगुणाः फलगुणाः। कर्कोटकफलगुणाः सवालमध्यमाम्रगुणाः दीर्घपटोलिकागुणाः "पकानफलगुणाः पटोलगुणाः ६४ आम्रपेपीगुणाः नाडीशाकगुणाः। दाडिमगुणाः मांडनाठीगुणाः " !दाडिमभेदेन गुणाः अलावुनाडीगुणाः मातलंगफलगुणाः वेत्ताग्रगुणाः "लिंपाकगुणाः मूलशाकगुणाः। जंवीरगुणाः शरणगुणाः ६५ : मधुकुक टिकागुणाः माणकगुणाः n नागरंगगुणाः .... .... 7 .... .... " .... ... . .... " .... -.. ...- .... ७. .... .... 17 ... .... ........ .... .... .... 11 .... ... .... ...

७७ .... " ........ .... .... .... .... .... " .... .... " .... ७९ .... .... .... " .... .... .... " .... विषयानुक्रमणिका. अपककर्कधुकोलबदराणांगु०७२ पककंटाफलगुणाः .... तेषां पक्गुणाः ........ अपककंटाफलतदस्थिगुणाः. तेषां शुष्कगुणाः " | तालफलगुणाः तेषां पुरातनगुणाः " ( तालशस्यगुणाः करमर्दगुणाः " तालास्थिमज्जागुणाः लिकुचफलगुणाः "सामान्यनारिकेलगुणाः आनातकफलगुणाः ७३ कोमलनारिकेलगुणाः कर्मरंगफलगुणाः "कदलीफलसाधारणगुणाः. प्राचीनामलकगुणाः "चंपककदलीगुणाः बहुवारफलगुणाः যুগাঃ लवनीफलगुणाः " | खर्जूरफलगुणाः जंबुफलगुणाः ७४ क्षीरवृक्षफलगुणाः भव्यफलगुणाः " गांभारीफलगुणाः अपकतिंदुकफलगुणाः " बालबिल्वगुणाः पकातदुकफलगुणाः " पक्वपित्वगुणाः अपकपरूपकफलगुणाः "बालविल्यस्य प्राधान्यम्.... पकपरूपकफलगुणाः ७५ पिल्वपषिकागुणाः अपककपित्थफलगुणाः बकुलफलगुणाः पक्ककपित्यफलगुणाः "प्रियालफलगुणाः अपक्काम्ळवेतसगुणाः " मधूकफलगुणाः पकाम्लवेतसगुणाः भ्रष्टनिष्पावफलगुणाः | महार्दकगुणाः ७६ | वेत्रफलगुणाः अपचतितिडीफलगुणाः .... फल्गुफलगुणाः पकांततिडीफळगुणाः "त्रिफलासाधारणगुणाः | करुणनियूकगुणाः हरीतकीनां भेदाः कोपाम्रफलगुणाः पां लक्षणम् चीरुकफलगुणाः "नेपां प्रयोगविधिः ८० .... .... " .... " .... .... " " .... .... .... " " .... .... .... " .... " .... ८२ " .... .... " .... ... " .... .... स .... ९० " " .... .... .... ग " .... १ " विषयानुक्रमणिका. हरीतकीशब्दस्य निरुक्तिकयनं ८३ शिलिंदमत्स्यगुणाः हरीतक्या उत्पत्तिकथनम् . "आडिमत्स्यगुणाः द्रव्यविशेषेण हरीतकीभक्षण भल्लकीमत्स्यगुणाः गुणा..... ८४ | चित्रफलमत्स्यगुणाः हरीतकीसाधारणगुणाः , गर्गरमत्स्यगुणाः .... आमलकीफलगुणाः 7 | नंदावर्तमत्स्पगुणाः विभीतकफलगुणाः.... ८५ कुलिशमत्स्यगुणाः पथ्यामज्जागुनाः "इलिशमत्स्यगुणाः विभीतकामलयोर्मजागुणा: वापुपमत्स्यगुणाः बदरफलमज्जागुणाः ८६ ) वृहच्छफरीमत्स्यगुणाः कूष्मांडफलमज्जागुणाः " महरमत्स्यगुणाः अनुक्तमज्जागुणा: शृंगीमत्स्यगुणाः मत्स्यवर्गः। शकुलमत्स्यगुणाः मत्स्यसामान्यगुणाः 7 वर्मपमत्स्यगुणाः वृहन्मत्तगुणाः ८७ वर्मिमत्स्यगुणाः क्षुद्रमत्स्यगुणाः 1. फलिमत्स्यगुणाः कृष्णवर्णमत्स्यगुणाः "चिडंगमत्स्यगुणाः | पांडमत्स्यगुणाः .. कवपीमत्स्यगुणाः लिनशुष्कमत्स्ययोर्गुणाः ८८ शकलीमत्स्यगुणाः लवणसंयुक्तमत्स्यगुणाः 1 ] गाडेशमत्स्यगुणाः सामुद्रिकमत्स्यगुणाः "चंद्रकमत्स्यगुणा:... नादेयमत्स्यगुणाः " (चंपकुंदमत्स्यगुणाः सरोवर-तडागसंभूतमत्स्यगुणाः दीडमत्स्यगुणाः हृदजातमत्स्यगुणाः ८९ त्रिकंटकमत्स्यगुणाः रोहितमत्स्यगुणाः "मलंगीमत्स्यगुणाः भाकुटमत्स्यगुणाः "सलिशमत्स्यगुणा: पाठीनमत्स्यगुणाः ९०चलदंगमत्स्यगुणाः .... " " .... ९३ " .... " .... .... " " " .... " .... 7 .... .... .... .... ....

८ " 1 .... " .... .... " .... " " .... 1 .... .... " " विषयानुक्रमणिका. गडकमत्स्यगुणाः ९५ गोमांसगुणाः .१०२ पर्वतमत्स्यगुणाः गोधिकामांसगुणाः वाचमत्स्पगुणाः ९६ कर्मासगुणाः एलंगमत्स्यगुणाः " मपिकमांसगुणाः वल्लीगडमत्स्यगुणाः "अश्वमांसगुणाः .१०३ चिलचिममत्स्यगुणाः , गवयमांसगुणाः गवाटीमत्स्यगुणाः कर्कटमांसगुणाः क्षुद्रशफरीमत्स्यगुणाः 1 तित्तिरिमांसगुणाः पोताधानमत्स्यगुणाः ९७ कपिंजलमांसगुणाः ....१०४ मत्स्यादिडियगुणाः "करचक्रोपचक्रिकानां मांस- मांसगुणाः गुणाः स्थानक्रियादिभेदे मांसानां चटकमांसगुणाः जातिभेदाः "पारावतमांसगुणाः नामभेदेन तेपां जातिभेदाः. ९८ कपोतमांसगुणाः १०५ प्रसहादिजलचरांतानां मांसा | हरितालमांसगुणाः नां सामान्यगुणाः ९९ कुछटमांसगुणाः विकिरादिजांगटांतानां मां बन्यकुफुटमांसगुणाः सानों सामान्यगुणाः कुछटांडगुणाः हरिणमांसगुणाः ..१०० समांसगुणाः ....१०६ कृष्णहरिणांसगुणाः सांडगुणाः कृष्णसारमांसगुणाः टारमांसगुणाः शाकमासगुणा: "यतिकामांसगुणा:.... पागमांसगुणाः .१०१ शुकमांसगुणाः भएमांसगुणाः ॥ अपरमांसगुणाः पराहमांसगुणाः " मयूरमांसभक्षणकालनिर्णयः माहिमगुणाः.... शरापादीनां मांसगुणाः दिमांसगुणाः मांसानां शिरसंधादीनां यथा- .... .... " .... .... .... 11 " .... .... " ... .... " .... .... " .... .... .... " . " ....

.... ---- .... .... .... " .... .... .... .... " " 1 " .... " .... 7 .... .... 77 ... " " .... .... .... विषयानुक्रमणिका. त्तरं गुरुत्वम् । .१०८ दालमधुगुणाः १२५ ग्राह्यमासकथनम् .... " उप्णमधुनः निपिद्धता त्याज्यमांसकथनम् .... अभिनवमधुगुणाः. मद्यवर्गः। पुरातनमधुगुणाः ..११६ मयसाधारणगुणाः .१०९ पक्कापकमधुगुणाः मुराप्रयोगविधिः मधुनातशर्करागुणाः श्वेतमद्यगुणाः क्षीरवर्गः। प्रसन्नागुणाः ११० | गोदुग्धगुणाः जगलमद्यगुणाः " छागदुग्धगुणाः ...११७ अभिनवमद्यगुणाः " मेपीक्षीरगुणाः कांजिकगुणाः .१११ महिपीदुग्धगुणाः सौवीरगुणाः उष्ट्रीक्षारगुणाः तुपोदकगुणाः " अश्वीटुग्धगुणाः ..११८ सिद्धार्यतेलभृष्टतुपोदकगुणाः. " | हस्तिनीक्षीरगुणाः मूत्रगुणा: .११२ मनुष्यदुग्धगुणा..... मधुवर्गः। गोदुग्धग्रहणकालनिर्णयः. मधुनः सामान्यगुणाः गोदुग्धप्रशस्ताप्रशस्तभेदः ११९ मधुनः जातिभेदाः.. पर्युषितक्षीरगुणाः मघूना उत्पत्तिकथनम् " | पक्कामदुग्धगुणाः मधूनां लक्षणम् ...११३ शृतशीतधारोष्णदुग्घयोर्गुणाः. पौत्तिकमधुगुणाः .११४ क्षीरसंतानिकागुणाः भ्रामरमधुगुणाः वर्जनीयदुग्धकथनम् बौद्रमधुगुणाः दधिवर्गः। मालिकमधुगुणा: "दघिसामान्यगुणाः छात्रमधुगुणाः गव्यदधिगुणाः आयमधुगुणाः ...११५ छागदधिगुणाः ....१२१ मौदालकमधुगुणाः मेपदधिगुणाः 17 " .... .... " .... 17 27 " " ....१२० 7 ... 1 .... .... .... ....

... .... .... । .... .... .... .... .... .... .... " " " .... 12 .... .... " .... " " " .... " विषयानुक्रमणिका. महिपदधिगुणाः .१२१ गव्यघृतगुणाः.. ....१२७ पोटकदधिगुणाः.... माहिपतगुणाः.. उदधिगुणाः आजघृतगुणाः हस्तिदधिगुणाः .१२२ मेपघृतगुणाः ..१२८ मनुप्यदधिगुणाः औघृतगुणाः स्वादुदधिगुणाः मानुप्यघृतगुणाः.... अम्लदधिगुणाः पुराणप्रपुराणघृतलक्षणगुणाः. " असारदधिगुणाः. इक्षुवर्गः। दधिसरगुणाः १२३ रोगविशेपे दनः प्रशस्तता. इक्षुसाधारणगुणाः .२२९ काठविशेषे दनोऽप्रशस्तता." कोपकारेक्षुगुणाः पोंडूकेक्षुगुणाः रोगविशेपे दनो निपिद्धता. भीरुकेक्षुगुणाः दधिभक्षणनिपिद्धता वंशकेक्षुगुणाः भक्रमदाधिभक्षणगुणाः ....१२४ दधिमस्तुगुणाः कांतरीक्षुगुणाः ....१३० दपिकर्चिकागुणाः | इक्षुमूलादिगुणाः..... दधिचिकाटक्षणम् | यंत्रनिप्पीडितेपुरसगुणा..... तक्रवर्गः। पोक्षुरसगुणाः येपु रोगेपु तर्क देयं तदाह.१२५ फाणितगुणाः तकस्याविषयमाह सामान्येचुरसगुणाः तररक्षणम्... " दंतनिप्पीडितेपुरसगुणाः तस्कृचिंकागुणा:... तस्कृधिकारक्षणम् पुराणगुडगुणाः नवनीतगुणाः। संडगुणा:.... सयोजातनपनीतगुणाः शरागुणाः दुग्धजावनवनीतगुणाः "तमराजगुणाः पृतयः। लसीकादीनां रचरोत्तरं निर्मल- पृनसाधारणगुणाः सादिना गुणवत्वमाह. " " " 17 .... " .... .... " .. ..१२६ । गुडगुणा..... .... .... .... " .... .... .... ....

.... " .... .... .... .... " .... " .... .... " " .... " .... " .... .... विषयानुक्रमाणका. हिग्वादीनां गुणाः। सांभारिलवणगुणाः हिंगुगुणाः १३३ सामुद्रलवणगुणाः जीरकगुणाः पांशुलवणगुणाः वाप्पीकागुणाः 7 प्रसिद्धलवणगुणाः आर्द्रधन्याकगुणाः "यवक्षारगुणाः शुष्कधन्याकगुणाः ....१३० सर्जिकाक्षारगुणाः ....१४० कासुंदीवटिकागुणाः टंकणक्षारगुणाः हरिद्रागुणाः "पलाशादिक्षारगुणाः शतपुप्पागुणाः अन्नवर्गः। मधुरीगुणाः " | उत्तमानकथनम् ..... | यवानीगुणाः ...२३५ अन्नसाधारणगुणाः १४१ शुफपिप्पलीगुणाः " नवानगुणाः आईपिप्पलीगुणाः "पुराणानगुणाः आर्द्रमारचगुणाः "अत्युप्णाद्यन्नगुणाः शुप्कमरिचगुणाः.... ....१३६ | क्लिन्नतंडुलसंयुक्तयोश्चान्नयो- शुंठीगुणाः गुणाः ...१४२ आर्द्रकगुणाः 7 | जलधीतसयोनगुणाः सर्पपसिद्धार्थयोर्गुणाः 7 जलसंयुक्तपर्युपितानगुणा:- राजिकगुणाः "भृष्टतंडुलानगुणाः रसोनगुणाः ....१३७ यवागूगुणाः पलांडगुणाः विलेपीगुणाः गुडत्वग्गुणाः "पेयागुणाः .११३ शुप्कतेजपत्रगुणाः " मंडगुणाः सेंधवगुणाः .१३८ भृष्टतडुलगुणाः सौवर्चलगुणाः चिपिटकगुणाः विडलवणगुणाः गलाजागुणाः .१४४ ओद्रिदलवणगुणाः लाजामंडगुणाः .... .... .... " " " " .... .... .... " .... .... .... .... .... .... " .... .... .... .... " .... ....

.... .... " .... .... " " .... " .... " .... " .... विषयानुक्रमणिका. १३ भोजनयोगिनः। चतुर्थपरिच्छेदः । भोजनादी लवणाकादिभक्षण-अध्ययनादिगुणाः .... ....१६७ गुणाः .१५९ बुद्धिगुणाः क्रमादीनां गुणाषिक्यम् .. " सद्योमांसादिगुणाः आहारगुणाः .१६० प्रतिमांसादिगुणाः... ..१६८ आहारदिनिर्णयः " देशभेदः भक्षणविषयेअन्नादीनांपरिमाणम् जांगलदेशगुणाः .... आचमनगुणाः .१६१ | आनूपदेशगुणाः भोजनांते कर्तव्यता " | साधारणदेशगुणाः भोजनांत उपवेशनादिगुणाः १६२ पसगुणाः। तांबूलभक्षणगुणाः मधुररसगुणाः .१६९ शुप्कपूगफलगुणाः ..१६३ अम्लरसगुणाः पक्कपूगफलगुणाः "लवणरसगुणाः अपकपूगफलगुणाः " | कटरसगुणाः .२७० तांबूलपत्रगुणाः तिक्तरसगुणाः पर्णमूलादिगुणाः "कपायरसगुणाः चूर्णगुणाः .१६१ स्वाद्वम्लरसादिना वातादीनां शंखचूर्णगुणाः विनाशकत्वम् खदिरगुणाः ॥ कम्लरसादिना वातादीनां म. कोपः १७१ एलागुणाः लवंगगुणाः रसादीनां विपाकः जातीफळगुणाः रसानां भाव: द्रव्याणां वीर्यकथनम् जातीपत्रीगुणाः ..१७३ कर्पूरगुणाः रसानां वीर्यभेदः.. पूगस्य वालमध्यादिभेदेन गुणा" उष्णशीतवीर्ययोर्गुणाः तांवलभक्षणनिषिद्धता पंचमपरिच्छेदः। तांदूलस्यानुपयोगगुणाः ....१६६ वयोभेदेन वालादिकथनम्. १७४ " .... .... .... 7 11 .... " .... " " .... .... .... " .... 7 .... 1 ....

.... 1 .... .... " .... .... " " .... " .... " .... " " विपयानुक्रमणिका. बालादिसंसर्गगुणाः........१७४ रात्रिजागरण-दिवास्वमगुणाः१८० वालादिभेदे मैथुनकाल- पष्टः परिच्छेदः। निर्णयः नानौपधिवर्गः। मैथुननिपिद्धता.... बिल्वमूलगुणाः ....१८१ मैथुनकालनिर्णयः..... | पाटलाश्योनाकयोग्णाः अतिमैथुनगुणाः .१७६ गांभारीमूलगुणाः संतानोत्पत्तिकथनम् गणिकारीगुणाः ....१८२ सुखशय्याशनगुणाः | एरंडमूलगुणाः भूमिशय्यागुणाः गोक्षुरगुणाः खट्वापटशय्पयोर्गुणाः ....१७७ कंटकारीगुणाः पुष्पम् । बृहत्तीगुणाः मालतीवृक्षपुप्पपत्राणां गुणा:. " शालिपर्णीपृश्निपोर्गुणाः.... मल्लिकापुप्पगुणाः बलागुणाः ....१८३ वंधूकादिपुप्पगुणाः नागवलागुणाः धातकीपुप्पगुणाः अश्वगंधागुणाः संगनपुप्पगुणाः .१७८ शतावरीगुणाः केतकीशिरीपपुप्पयोर्गुणा:.... ॥ हस्तिकर्णगुणाः रक्तपमगुणाः प्रसारणीगुणाः ....१८१ चकुलादिपुष्पगुणा: मापपर्णीमद्पणिकयोर्गुणाः ...." चंपकपुप्पगुणाः विशालागुणाः ज्योत्स्नागुणाः .१७९ श्यामलतागुणा:.. अंधकारगुणाः अनंतमूलगुणाः मयुनगुणाः गुंद्रागुणाः मतिमैथुनगुणाः लोध्रगुणाः मशुनारुरणगुणा:.... शपरलोध्रगुणाः परिमितमधुनगुणाः.... "मंजिष्ठागुणाः निद्रागुणाः ....१८० लाक्षागुणाः 1 " " " ... .... .... " M.. " .... .... .... .... " .." " .... " .... " 1 .... .... " .... .... " .... " .... .."

.... .... ...१९० .... .... ...१९१ .... 1 .... " .... .... 11 .... .... " .... .... " .... .... .... " विषयानुक्रमणिका. प्रपोंडरीकगुणाः ....१८५ | हरिद्रागुणाः जीवंतीगुणाः ....१८६ | दारुहरिद्रागुणाः अष्टवर्गगुणाः " अवल्गुजगुणाः मधुकगुणाः एडगजगुणा: अर्जुनवृक्षगुणाः .... "काजनिवफल योर्गुणाः अस्थिसंहारगुणाः 1 विडंगगुणाः श्रृंगराजगुणाः ..१८७ रेणुकागुणाः केशराजगुणाः भूर्जशिंशपयोर्गुणाः दंडोत्पलगुणाः आस्फोतागुणाः रुदंतीगुणाः " धातकीगुणाः तालमूलीगुणाः "शालगुणाः द्रोणपुष्पीगुणाः निववृक्षगुणाः गिरिकर्णिकागुणा:.... ....१८८ महानिवगुणाः वृश्चिकालीगुणाः भूनिवगुणाः अहिंस्रासुदर्शनयोर्गुणाः | पर्पटगुणाः भांगीगुणाः "पाठागुणाः सूर्यावर्तसेरिपयोगुणाः " | कुटजगुणाः कोकिलाक्षहनिलकयोर्गुणाः. | इंद्रयवगुणाः हलिनीकरवीरयोर्गुणा: ....१८९ | दीवरगुणाः कोपातकीगुणाः मुस्तकगुणाः ज्योतिष्मतीगुणाः..... " |अतिविपगुणाः ब्राह्मीगुणाः आर्द्रकगुणाः वचागुणाः " | कट्फलगुणाः विजयागुणाः " | कुष्टगुणाः .... शंखपुष्पीगुणाः .....१९० | शोभांजनगुणाः शिरीपवृक्षगुणाः "यापगुणाः | दूर्वागुणाः कटुकागुणाः .... " " .... .... " .... .. " " " .... " " " .... ....१९१ 60. " .... " " .... " .... .... .... .... .... .... " .... १९९ .... " ... " .... .... 7 17 ir. " " 11 ... 17 .... -- ... " 1 .... .१९७ सिंधुवारगुणाः .... विषयानुक्रमणिका. रास्नात्रायंतीकयोर्गुणाः .....१९५ रक्तत्रिवृतागुणाः वरुणवक्षगुणाः ॥ श्वेत्तनिवृतागुणाः पारिभद्रगुणाः राजवृक्षगुणाः वासकगुणाः .१९६ राजवृक्षफलगुणाः गुडूचीगुणाः रोहितवृक्षगुणाः पिप्पलीमूलगुणाः.... विकागजपिप्पलीगुणाः. वृद्धदारगुणाः | अपामार्गगुणाः चित्रकगुणाः दंतीगुणाः स्मुहीक्षारगुणा: .... तुलसीगुणाः अर्कवृक्षगुणाः मूर्वागुणाः अर्कक्षीरगुणाः वंशलोचनगुणाः जयपालगुणा: " स्वर्णकारीगुणाः ... पत्तगुणाः ....१९८ हेमंतशिशिरकृत्यम् भल्लातकरणाः "संतकृत्यम् गुग्गुलधाधारणगुणाः "श्रीप्मपत्यम् नूतनगुग्गुलगुणा: .१९९ वर्षाकृत्यम् पुराणगुग्गुलगुणाः "शरत्कृत्यम् इत्यनुक्रमणिका समामा. ...- .... २०१ ... 11 ... " .... .... " ... ... .... .... .... .....२०५ ....२०६ H.. .... .... पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना, कल्याण--मुंबई.

॥ त्रैलोक्यपतये नमः ॥ अथ द्रव्यचन्द्रिकाटीकासहितः राजवल्लभः। परमानन्दसन्दोहकन्दभद्रकरं सताम् । इन्दिरारमणं वन्दे गोविन्दं नन्दनन्दनम् ॥१॥ शालिग्रामेण वैश्येन नमस्कृत्य गजाननम् । राजवल्लभग्रन्थस्य भापाटीका विरच्यते ॥ अर्थ-परमानन्दसमूहके मूल और सत्पुरुषोंके कल्याण करनेवाले, ऐसे लक्ष्मीपति श्रीगोविंद आनन्दकन्द नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्दको प्रणाम करूं हूं ॥ १ ॥ राजवल्लभवैद्येन निर्मिती राजवल्लभः। द्रव्याणां गुणख्यातित्वाद्भिपजानां सुखावहः ॥२॥ अर्थ-श्रीमान् राजवल्लभ वैद्यराजका निर्माण किया हुवा यह राजवल्लभ निघण्ट वैद्योंको परम सुखदायक है ॥२॥ प्रभातमाहमध्याह्नापराहरजनीभवः । इति पञ्च परिच्छेदाः पप्टोप्यत्रौपधाश्रयः॥३॥ अर्थ-इस अन्थमें छै परिच्छेद हैं, पहिलेमें प्रभातकालके, दूसरेमें पौर्वाहिक (दुपहरसे पहिलेके ), तीसरेमें मध्याहिक (दुपहरके ), चौथेमें अपराह्निक (दुपहरसे पीछे सन्ध्यातकके),

राजवल्लभः।
[ परिच्छेदः
पांचवेमें रात्रिमें होनेवाले कार्य और छटेमें औषधिके गुण
कहे हैं ॥ ३ ॥
॥ प्रथमपरिच्छेदः ।।
ब्राझे मुहूर्त उत्तिष्ठेत्सुस्थो रक्षार्थमायुपः ।
शरीरचिन्तां निवृत्य मैत्रं कर्म समाचरेत् ॥ ४ ॥
अर्थ-स्वस्थ मनुष्य आयुकी रक्षाके लिये ब्राह्ममुहूर्तमें
उठकर शरीरकी चिन्ता (मलमूत्रादिक त्याग ) से निवृत्त हो
हितके करनेवाले कार्योंको विचारै ॥ ४॥
स्वभावतः प्रवृत्तानां मलादीनां जिजीविपुः।
नवेगान धारयेद्धारः कामादीनां तु धारयेत् ॥५॥
अर्थ-जीवनकी इच्छा करनेवाले पुरुपोंको स्वभावसे चाहि-
ये कि आये हुए मलमूत्रादिकके वेगको कभी न रोके, क्योंकि
इनके रोकनसे अनेक रोग उत्पन्न होते हैं,और जो रोके तो का-
मक्रोधादिकके वेगको रोकै जिससे संसारके रोगोंका नाश हो ॥५॥
पाद-मलमार्गाणां शौचगुणाः।
मेध्यं पवित्रमायुप्यमलक्ष्मीकविनाशनम् ।
पादयोर्मलमार्गाणां शोचाधानमभीक्ष्णशः ॥६॥
अर्थ-दोनों पांव और मलके मार्ग संदेय स्वच्छ रखने
चाहिय, क्योंकि, इनको स्वच्छ रखनमे मेधाकी वृद्धि होती है,
पवित्रता उत्पन्न होती है, आयु बढ़ती है और अलक्ष्मी (दरिद्र)-
का विनाश होता है ॥६॥

- 1 - " प्रथमः१] भापाटीकायुतः। ३ उपःपानगुणाः। कासश्वासातिसारवरवमथुकटीकोठकुष्टप्रकारान् । मूत्राघातोददर्शश्वयथुगलशिर कर्णनासाक्षिरोगान् ॥ ये चान्ये वातपित्तक्षयकफककृताव्याधयः सन्ति जन्तोः। तांस्तानभ्यासयोगादपनयति पयः पीतमन्ते निशायाः७ अर्थ-जो मनुप्य रात्रिके अन्तमें अर्थात सूर्यादयसे प- हिले प्रतिदिन जल पीते हैं, उनके खांसी, श्वास, अतीसार, ज्वर, वमन, कटिरोग, कोठरोग, अठारह प्रकारके कोट, मूत्राघात, उदररोग, मस्तकरोग, कर्णरोग, नासिकारोग, नेत्ररोग, वात, पित्त, कफ और क्षयरोगसे उत्पन्न हुए रोग सब दूर होते हैं॥७॥ दन्तधावनविधिः। प्रातर्भकत्वा च मृदयं कपायकडतिक्तकम् । भक्षयेदन्तपवनं दन्तमांसान्यवाधयन् ॥ ८॥ अर्थ-प्रातःकालमें कपैले, कटु और कडवे वृक्षके अगले भागकी नरम दतौन लावै, उसके द्वारा इस प्रकार दांतोंको मर्दन करे कि जिससे दांतांका मांस अर्थात् मसूढे न छिलजाय॥८॥ मतान्तरम् । केप्यत्र करवीरार्ककरञ्जवकुलासनान् । दन्तकाष्टार्थमन्ये तु सर्वान् कण्टकिनो विदुः ॥९॥ अर्थ-कोई कोई वैद्य कनेर, आक, करञ्ज, बकुल (मो- लश्री) और शालवृक्षकी दतौन करनी चाहिये ऐसा कहते हैं ।

राजवल्लभः। [परिच्छेदः और कोई कहते हैं कि सब प्रकारके कांटेवाले वृक्षोंकी दतौन करनी चाहिये, जैसे कीकर, सिहोड़ इत्यादि ॥ ९ ॥ निषिद्धं यथा । गुवाकतालहिन्तालखरैः केतकीमतैः । नारिकेलेन ताडया चन कुर्यादन्तधावनम् ॥१०॥ अर्थ-सुपारी, ताड, हिन्ताल, खजूर, केतकी, नारियल और ताडी ( पत्रवृक्ष) इन वृक्षांकी दतौन नहीं करनी चाहिये ॥ १०॥ जिहालेखनगुणाः। जिहानिर्लेखन रोप्य सौवर्ण ताम्रमायसम् । तन्मलापहरं शस्तं मृदुश्चक्ष्णदशाङ्गुलम् ॥११॥ निहन्ति वक्रवरस्य जिह्वादन्ताश्रितामयम् । आरोग्यं रुचिमाधत्ते सद्यो दन्तविशोधनम् ॥ १२॥ अर्थ-चांदी, सोना, तांबा, तथा लोहेकी नरम और नि- मल दशांगुलके प्रमाण सलाई बनावै उससे जिव्हाको घिस, इस उपाय करनसे मुखको विरसता, जिव्हा और दांताक आश्रय- बाल रोगकि समूहक समूह नाशको प्राप्त होते हैं। तथा रुचिकी वृद्धि और दन्तनी शुद्ध हो जाते हैं ।। ११ ॥ १२ ॥ दन्तधायने दिइनिर्णयः। मृत्युः स्यादक्षिणास्येन पश्चिमास्येन चामयः। पूर्यास्येनोत्तरास्यन सम्पदो दन्तधावनात् ॥ १३ ॥ अर्थ-दक्षिणकी औरको गम करके दनान करनेसे मृत्यु --

प्रथमः १] भापाटीकायुतः।
होती है, पश्चिमकी ओरको मुख करनेसे रोग उत्पन्न होते हैं,
पूर्व और उत्तरकी ओरको मुख करके दतौन करनेसे सम्पदा
घटती है ॥ १३॥
दन्तकाष्ठव्यवहारनिषिद्धजनाः।
अदितो कर्णशूली च दन्तरोगी नवज्वरी ।
शोपी कासी च मूर्छौ दन्तकाटं विवर्जयेत् ॥१४॥
अर्थ-अर्दित ( पक्षाघातविशेष ) रोगवाला, कर्णशूल
(कानका दर्द ) वाला, दन्तरोगवाला, नवीन ज्वरवाला, शोप-
युक्त, कासरोगवाला और मूर्छारोगवाले मनुष्यको दतौन नहीं
करनी चाहिये ॥ १४॥
चक्षुर्धावनविधिः ।
दन्तमूर्द्धमधो घृष्ट्वा प्रातः सिञ्चेच लोचने ।
तोयपूर्णमुखस्तेन दृष्टिराशु प्रसीदति ॥ १५॥
अर्थ-मनुष्यको चाहिये कि प्रातःकाल दांतोंके ऊर्द्ध
और अधोभाग घिसकर मुखमें जल जर लेबै, फिर उस जलसे
नेत्रोंको सींचे, इससे नेत्रोंमें प्रसन्नता प्रगट होती है, और ज्योति
बढती है ॥ १५ ॥
अञ्जनधारणगुणमाह ।
नेत्रमचनसंयोगाद्भवत्यमलतारकम् ।
दृष्टिनिराकुला भाति निर्मलश्चन्द्रमा यथा ॥१६॥
अर्थ-नेत्र अजनके संयोगस निर्मलनारका संयुक्त, स्थिर-
दृष्टियुक्त और चन्द्रमाकी ममान दीतिवान् होते हैं ॥ १६ ॥

राजवल्लभः।
[ परिच्छेदः
कङ्कतीगुणाः।
कती कान्तिजननी कण्डूनी मूर्द्धरोगजित् ।
केशप्रसादनी केश्या रजोजन्तुमलापहा ॥ १७॥
अर्थ-कंघी वा कंघा, कान्तिको प्रगट करनेवाली, मस्तक-
की खुजलीको हरनेवाली, शिरके रोगोंको मिटानेवाली, केशोंको
निर्मल करके बढानेवाली, जूओंकी शत्रु और बालोंके मलको
निकालनेवाली है ॥ १७ ॥
उष्णीप (पगडी) धारणगुणाः।
उप्णीपं शिरसा धाय्यै प्रभाते लघु नित्यशः।
केश्यं चक्षुष्यमायुप्यं रजःशीतोष्णवारणम् ॥१८॥
अर्थ-प्रतिदिन मनातके समय हलक वसकी पगडी शिरपर
धारण करे । यह केशांको हितकारी, नेत्रोंकी कटहारी,
आयुवर्द्धक तथा रज, शीत और धृपनिवारक है ॥ १८॥
दमनग्यादिच्छेदनगुणाः ।
पोष्टिकं कल्पमायुप्यं शौचरूपविराजनम् ।
केशश्मथुनसादीनां कृन्तनं सम्प्रसादनम् ॥ १९ ॥
अर्थ-केश, श्मभु (दाढी, मूछ ) और नसादिके छेदनस
शरीरकी कान्ति, पुष्टि, बल और आय वढती है । तथा मनुष्य
पवित्र और स्वरूपवान् होना है ।। ११ ॥
भभातद्रष्टव्यः।
पेद्यः पुरोहितो मंत्री देवज्ञोऽच चतुर्धकः।
प्रभातकाले द्रष्टव्यो नित्यं स्वश्रियमिच्छता ॥२०॥

७ " प्रथमः १] भापाटीकायुतः। अर्थ-ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाले मनुप्योंको प्रातःकालके समय वैद्य, पुरोहित, मंत्री और ज्योतिपियोंका दर्शन करना चाहिये ॥ २० ॥ अग्निसेवनगुणाः। अग्नितिकफस्तम्भशीतवेपथुनाशनः । आमाभिष्यन्दशमनो रक्तपित्तप्रकोपनः ॥ २१ ॥ अर्थ-अनिके सेवन करनेसे वात और कफकी स्तम्जता, शीत, कम्प, अपक्करस (आम) और शरीरका क्लेद (पसीना) नाश होता है, और रक्तपित्त प्रकुपित होता है ॥ २१ ॥ धूम-हिम-गुणाः। धूमः पित्तानिलो कुर्य्यावश्यायः कपानिलौ॥२२॥ अर्थ-धूम सेवन करनेसे पित्त तथा वातकी वृद्धि हाती है, और शीत (हिम ) का सेवन करनेसे कफ और वात बढती है ।। २२॥ शिशिरगुणाः। शिशिरं शीतलं रूक्षं वृष्यं वातप्रकोपनम् ॥२३॥ अर्थ-शिशिर शीतल, रूखा, वीर्यका बढानेवाला और वातप्रकोपक है ॥ २३ ॥ कुज्झटिगुणाः। रुक्षो तमोगुण प्रायो कुज्झटिः कफपित्तलः॥२४॥ अर्थ-कुज्झटि (कुहरा, कोल, कुहासा) रूखा, तमो- गुणसंयुक्त और कफ, पित्तका बढानेवाला है ॥ २४ ॥ - ८ राजवल्लभः। [परिच्छेदः अवस्थानगुणाः। आस्या मेदोद्युतिश्लेष्मसौकुमार्यकरीसुखा ॥२५॥ अर्थ-आस्या (अवस्थान, आसन ) मेद, कान्ति, तथा कोमलता और अत्यन्त सुखका देनेवाला है ॥ २५ ॥ इत्थं मैत्रक्रियादीनां संक्षेपेणातिगुम्फितः। प्राभातिकः परिच्छेदः समाप्तो राजवल्लभे ॥२६॥ अर्थ-इस राजवदनानिट में मंत्रादिक क्रियादिकोंका प्राभा- तिक संक्षेप और विस्तारको छोडकर मध्यम रीतिसे वर्णन क- रके समाप्त किया ॥ २६ ॥ इति श्रीराजवल्लनिवण्टे व्यगुणचन्दिकाटीकायां आयु- विदोद्धारकशालिग्रामवैश्यस्तायां प्रथमपरिच्छेदः समाप्तः ॥१॥ ॥द्वितीयपरिच्छेदः॥ अथ पौर्वाहिकं कृत्यं नानातंचानिरुच्यते ॥१॥ अर्थ-इसके उपरान्त अनेक प्रकारके तंत्रोंसे निरूपण की हुई पााहिक क्रियाओंको कहते हैं ॥ १॥ उघ्रादिपञ्चकम् । छत्रं वातपरजोवातावश्यायनाशनम् । वर्ण्य दृष्टिकरं वल्यं गुप्त्यावरणसंकरम् ॥२॥ अर्थ-उन (याता, छत्री) लगानसे वा, प, धूल, पायु और भीत दूर होता है। यह छाता वर्ण (रंग) और र- Fre द्वितीयः २] भापाटीकायुतः। टिकी शक्तिका बढानेवाला है, वलकारक और पिशाचवाधाका तो शत्रु समझना चाहिये ॥२॥ दृष्टिगुणमाह । दृष्टिनिष्पन्दिनी शीता निद्राश्लेप्मवलपदा। मलापहारिणी वायुदायिनी वह्निवारिणी ॥३॥ अर्थ-दृष्टि कफादिको टपकानेवाली, शीतल, निद्रा और श्लेष्मके बलकी बढानेवाली, मलनाशक, वायुजनक और मन्दाग्निकारक है ॥ ३॥ आतपगुणमाह । आतपः कटुको रूक्षः स्वेदमूर्छातृपापहः । दाहवैवर्ण्यजननो नेत्ररोगप्रकोपनः ॥४॥ अर्थ-सूर्यकी तपन कटु और रूखे गुणवाली है । तथा पसीना, मोह, तृपा, दाह, विवर्णता और नेत्ररोगको उत्पन्न क- रनेवाली है ॥ ४ ॥ छायागुणमाह । छाया दाहश्रमस्वेदहरा मधुरशीतला ॥५॥ अर्थ-छाया दाह, श्रम और पसीनेको दूर करनेवाली है। तथा मधुर और शीतलगुणयुक्त है ॥ ५ ॥ यष्टिधारणगुणमाह। स्खलतः संप्रतिष्ठानां शत्रूणां च विरोधनम् । अवष्टम्भनमायुप्यं भयनं दण्डधारणम्॥६॥ अर्थ-यष्टि (लकडी, लाठी ) का धारण स्वलिन पदको "

-
१०
राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
संचालनेवाला, शत्रुविरोधक, बल और आयुका बढानेवाला
और सब प्रकारके भयका नाशक है ॥ ६ ॥
अथ व्यायामगुणाः।
व्यायामो हि सदा पथ्यो बलिनां स्निग्धभोजिनाम् ।
सच शीत वसन्ते च तेषां पथ्यतमो मतः॥७॥
सर्वेप्वृतुपु सहि मत्यरात्महितार्थिभिः ।
शक्यन च कर्तव्योव्यायामो हन्त्यतोऽन्यथा॥८॥
अर्थ-चिकनी वस्तु सानेवाले और बलवान पुरुषोंके लिये
व्यायाम ( कशरत ) करना शीत और वसन्त ऋतुमें अत्यन्त
हितकारी है, परन्तु अपना हित चाहनेवाले पुरुष और सब
ऋतुओंमें आधी शक्तिके अनुसार कशरत करें, इससे अधिक
कसरतका करना मनुप्योंको नष्ट कर देता है ॥ ७॥८॥
कुशी ललाटे ग्रीवायां यदा धर्मः प्रवर्तते ।
शत्त्यद तं विजानीयाद् यावदुच्यासमेव च ॥९॥
अर्थ-जब कोस, माथा और कण्ठसे पसीना निकलने लगे,
वास शीमनाम आन लंगे इसकोही "आधीशक्तिः" कहते हैं॥९॥
राघवं कर्मसामय स्थैर्य केशसहिष्णुता।
दोपक्षयोऽभिवृदिश्च व्यायामादुपजायते ॥ १० ॥
अर्थ-कमरत करनेसे शरीरको लघुता,कममं चतुरता, स्थि-
रना और शमहिष्णुता (शका सह लेना ) उत्पन्न
होती है ॥ १॥

द्वितीयः २] भापारीकायुतः। व्यायाम कुर्वतो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम् । विदग्धमविदग्धं वा निर्देपं परिपच्यते ॥ ११॥ अर्थ-दोप (वात, पित्तादि) क्षय होते हैं और अग्नि बढती है, नित्यके कशरत करनेवाले मनुष्य विरुद्ध वस्तु, वि- दग्धाजीर्णकारी वस्तु, अथवा उत्तम वस्तु जो कुछनी वह खा लें वह सब दोपरहित हो पक जाती है ॥ ११ ॥ नच व्यायामसहशमन्यत्स्थौल्यापकर्पणम् । नच व्यायामिनं मर्त्यमर्दयन्त्यरयो बलात् ।। १२॥ अर्थ-स्थूलनाका नाश करनके लिये कशरतकी समान संसारमें और कोई दूसरी वस्तु नहीं है, क्योंकि कशरत करने- बाल पुरुपपर किसीका बलनी नहीं चल सक्ता और उसकी कोई पराजयनी नहीं कर सत्ता ॥ १२॥ न चनं सहसाक्रम्य जरा समधिगच्छति । व्यायामक्षुण्णगानस्य पद्यामुर्तितस्य च ॥१३॥ व्याधयो नोपसर्पन्ति वैनतेयमिवोरगाः। वयो वलं शरीरं च देशकालमथापि च ॥ १४॥ समीक्ष्य कुर्याध्यायाम युक्तया शक्तया चबुद्धिमान। रक्तपित्तीशयी शोपीकासीश्वासी क्षतातुरः ॥१५॥ अर्थ-और उम पुरुषको एकीएका बुढापानी नहीं आता, निम प्रकार सपाका समूह गरुडपर आक्रमण नहीं कर सना, बमही रोगोंका समूहनी उस पुरुपपर-निसने कसरत करके अ-

राजवल्लभः।
परिच्छेदः
पना शरीर सुखाया है-हमला नहीं कर सका। बुद्धिमान मनुप्पको
चाहिये कि आयु, बल, शरीर, देश, काल इन युक्ति और शक्ति-
योका नली भांति विचार करै । रक्तपित्त, क्षयी, शोप, खांसी,
वास,जिसके अंगमें घाव हो गया हो,ऐसे रोगी॥१३॥१४॥१५॥
भुक्तवान् स्त्रीषु च क्षीणो व्यायाम परिवर्जयेत् ।
वातपित्तामयीबालोवृद्धोऽजीर्णीच तं त्यजेत्॥१६॥
अर्थ-और भोग करने वा मैथुन करनेसे क्षीण हो रहा है
शरीर जिसका वह कभी कशरत न करे । वात-पित्तरोगी बालक
(सोलह वर्पतक बाल्यावस्था रहती है), बूढा (सत्तर वर्षके
उपरान्त वृद्धावस्था होती है) और अजीर्ण रोगबालेकोजी
कशरत करनी नहीं चाहिये ॥१६॥
अतिव्यायामतः कासो रक्तपित्तप्रतानकः ।
श्रमः कुमः क्षयस्तृष्णा ज्वरश्छादिश्च जायते॥१७॥
अर्थ-अत्यन्त कशरत करनेसे रक्त, पित्त, खांसी, श्रम
(थकावट ), क्षय, प्यास, ज्वर और छदि इत्यादि रोग उत्पन्न
होते हैं ॥ १७ ॥
अंगमईनगुणमाद।
संवाहनं श्रमहरं वृष्यं निद्रासुखप्रदम्।
मांसामुक्त्वक्प्रसन्नत्वं कुय्यांद्वातकफापहम् ॥१८॥
अर्थ-शरीरका मईन श्रमनाशक, वृष्य (शुक्रका बहाने-
याला ), निदाजनक, सुखदायक तथा मांस, रुधिर और त्व-
चाको निर्मल करनेवाला तथा वातकफको दूर करे है ॥ १८॥

- द्वितीयः २] भापाटीकायुतः। शरीरघर्पणगुणमाह । उद्घर्पणं दृष्टिकरं कण्डूकोप्टविनाशनम् । तेजनं त्वग्गतस्याग्नेः सिरासुखविरेचनम् ॥ १९ ॥ अर्थ-शरीरका घिसना दृष्टि, शक्तिको बढानेवाला, खुजली और कोट रोगका नाशक, चर्मस्थित अनिके तेजको प्रबल करनेवाला और शरीरकी सिराओंको सुखबईक है ॥ १९ ॥ पथभ्रमणगुणमा । अध्वा मेदःकफस्थौल्यसौकुमार्यविनाशनः ॥२०॥ अर्थ-मार्गका चलना मेद, कफ, शरीरकी स्थूलता और शरीरकी कोमलताको बिगाडे है ॥ २० ॥ अतिभ्रमणगुणाः। यत्तु चंक्रमणं नातिदेहपीडाकरं भवेत् । तदायुर्वलमेधानिप्रदमिन्द्रियबोधनम् ॥२१॥ अर्थ-अत्यन्त नमण शरीरमें क्लान्ति उत्पन्न करनेवाला है, इससे आयु, बल, मेधा और अमिकी वृद्धि होती है और ई- द्रियोंको प्रफुठित करे है ॥ २१ ॥ पादुकाधारणगुणाः । पानधारणं वृष्यमौजस्यं चक्षुपोर्हितम् । सुखप्रचारमायुप्यं बल्यं पादरुजापहम् ॥२२॥ अर्थ-पादुकाधारण वीर्य और ओजकी बहानेवाली, ने- वोंको हितकारी, चटनके समय सुखदायक, आयु और बल- वईक और पाओंकी पीडाको दूर करे है ॥ २२ ॥ - राजवल्लभः। [परिच्छेदः पादुकाभधारणदोपाः। पादाभ्यामनुपानद्यां नृणां चंक्रमणं सदा । अनारोग्यमनायुष्यमिद्रियन्नमदृष्टिकृत् ॥२३॥ अर्थ-विनापादुकाके सदैव श्रमण करना स्वस्थता, आयु, इन्द्रिय और दृष्टिकी शक्तिको कम करे है ॥ २३ ॥ हस्त्यादिगमनगुणाः। हस्त्यश्वरथदोलाचभ्रमणं वातकोपनम् । स्थिरीकरणमङ्गानां वल्यं वह्निविवर्द्धनम् ॥ २४॥ अर्थ-हाथी, घोडा, रथ और डोलादि ( पालकी) में बै- ठकर घमण करनेसे वात प्रकुपित होती है,सब अंग स्थिरताको धारण करते हैं, बल और जठरामिकी वृद्धि होती है ॥ २४ ॥ विश्रामगुणाः। विश्रामोवलकृत्स्वेदश्रमनुत्स्वास्थ्यदः शुभः॥२५॥ अर्थ-विश्राम बलकारक है, पसीनेको और श्रमको दूर करनेवाला है, चिनको स्वस्थता और अत्यन्त शुजदायक है॥२५ पादप्रक्षालनगुणाः। पादप्रक्षालनं पादमलरोगथमापहम् । हरिप्रसादनं वृप्यं रूक्षोनं प्रीतिवर्द्धनम् ।। २६ ॥ अर्थ-पाआंका प्रक्षालन अर्थात् धोना, पाका मैल और पाका रोग तथा श्रमको दूर कर है, दृष्टिकी शक्तिको तेज करे है, वीर्यको पाव है, शरीरके रूखापनका नाश कर है और प्रीतिका पदानवाला है ॥ २६ ॥ इति व्यायामगुणाः समामाः॥

, द्वितीयः २] भापाटीकायुतः। प्राग्वातगुणमाह । प्राग्यातो मधुरः क्षारो वह्निमान्यकरो गुरुः । वैरस्यगौरवोष्णानि करोत्यस्यौपधीषु च ॥२७॥ अर्थ-पूर्वदिशाकी पवन (पुरवाइ हवा)-मधुर, क्षार, म- न्दाग्निकारक, भारी, औपधी और जलमें विरसता, गुरुता और उष्णता करनेवाली है ॥ २७ ॥ भग्नेऽपीप्टः क्षतायेपु श्रावश्वयथुरोगकृत् । सन्निपातज्वरश्वासत्वग्दोपाशौविपकृमीन् ॥२८॥ अर्थ-जम और क्षतादि रोगोंमें प्रशंसनीय, तथा नासाभाव, सूजन, सन्निपातज्वर, वास, त्वग्दोप, बवासीर, विपकमि॥२८॥ कोपयेदामवातच वनसंघातकारकः ॥२९॥ अर्थ-और आमवातादि रोगोंको बढानेवाली है, तथा मेघको सञ्चय करनेवाली है ॥ २९ ॥ दक्षिणमारुतगुणाः । दक्षिणो मारुतो बल्यश्चाक्षुप्यः शस्यघातकः । मधुरश्च विदाही च कपायानरसो लघुः॥३०॥ अर्थ-दक्षिणदिशाकी वायु-बलकारक, नेत्रोंको हितकारी, शस्य (खेती) नाशक, मधुर, दाहजनक, अन्नको कपैला कर- नेवाली, लघु (हलकी) ॥३०॥ रक्तपित्तप्रशमनो नच मारुतकोपनः । गण्डूपदादिकीटानां जनकः प्राणकारकः॥३१॥ अर्थ-रक्तपिनविनाशक है,परन्तु वातको कुपित करनेवाली राजवल्लभः। [परिच्छेदः नहीं है । गण्डूपदा (केचुवा) इत्यादि कीडोंको उत्पन्न करनेवाली और प्राणियोंको प्राणदायक है ॥ ३१ ॥ पश्चिमपवनगुणाः। पश्चिमोऽग्निपूर्ववर्णवलारोग्यविवर्द्धनः। कपायः शोपणः स्वर्यों रोचनो विपदोलघुः॥३२॥ अर्थ-पश्चिमदिशाकी वायु-अमि, शरीर, वर्ण, बल और आरोग्यतावर्द्धक है । कपैली, शोपक, स्वर शुद्ध करनेवाली, रु- चिको उत्पन्न करनेवाली, निर्मल, हलकी ॥ ३२ ॥ अपां लघुत्ववेशद्यशैत्यवैमल्यकारकः। सर्वद्रव्येष्वभिव्यक्तप्रभावरसवीर्य्यकृत् ॥ ३३॥ अर्थ-तथा जलको लघुता, श्वेतवर्णता, शीतलता और स्वच्छता देनेवाली है । सब वस्तुओंमें प्रगटता, प्रभाव, रस, वीर्यको करनेवाली है ॥ ३३॥ व्रणरोपणस्त्वच्यो दाहशोथतृपापहः ॥३४॥ अर्थ-व्रणको भरनेवाली, त्वचाको उत्तम करनेवाली और दाह, सृजन, तृपाको हरनेवाली है ॥३४ ॥ उत्तरवायुगुणाः। औत्तरो मारुतः स्निग्धो मृदुमधुर एव च । कपापानरसः शीत्तः सर्वदोपप्रकोपनः ॥३५॥ अर्थ-उत्तरदिशाकी पवन-स्निग्ध, मृदु, मधुर, जल और अन्नको कपायरसान्वित करनेवाली है । शीतल, सब दोपोंको अपित करनेवाली है ॥ ३५॥ - -

द्वितीयः २] भाषाटीकायुतः।
क्षीणक्षतविषार्तानां हितो दातृपापहः ॥३६॥
अर्थ-क्षीण, क्षत और विपग्रसित रोगियोंको हितकारी
है, और दाह तृपाको दूर करनेवाली है ॥ ३६ ॥
नीहारादिसंयुक्तवायुगुणाः ।
शीताधिकः सनीहारः सविद्युत्स्तनयित्नुमान्॥३७॥
अर्थ-नीहार (बरफ )-विद्युत ,( विजली) और मेघसं-
मु. पवन अत्यन्त शीतल है ॥ ३७ ॥
विश्वग्यायुगुणाः।
विश्वग्वायुरनायुप्यः प्राणिनां नेकदोपकृत् ।
सर्वर्तुलिङ्गको हन्ता हृद्योत्पातः पुरःसरः ॥३८॥
अर्थ-घूमता हुवा पवन (बवूला)-प्राणियोंकी आयुका
नाशक, त्रिदोपको कुपित करनेवाला, सब ऋतुओंका लक्षण-
कारी, जीवननाशक और हृदयमें उद्वेग करनेवाला है ॥ ३८॥
व्यजनानिलगुणाः।
मूस्वेिदतृपादाश्रमन्नो व्यजनानिलः॥३९॥
अर्थ-पंखेकी पवन-मूर्छ, पसीना,तृपा, दाह और श्रमको
हरनेवाली है ॥ ३९॥
तालयन्तपवनगुणाः ।
तालवृन्तभवो वातत्रिदोपशमनो लघुः ॥ ४० ॥
अर्थ-ताडके पंखेकी पवन-पियोपनाशक और ह-
लकी है ॥४०॥

. राजवल्लभः। [ परिच्छेदः वंशव्यजनपयनगुणाः । वंशव्यजनजो वातो रूक्षोष्णवातपित्तदः॥४१॥ अर्थ-वांसके पंखेकी पवन-रूखी, गरम और वातपित्त- दायक है॥४१॥ वालव्यजनवायुगुणाः। वालव्यजनमौजस्यं मक्षिकादीन् व्यपोहति ॥४२॥ अर्थ-चमर अथवा चमरीकी वायु-तेजको बढानेवाली और मक्खी इत्यादिको उडानेवाली है ॥ ४२ ॥ मयूरपक्षादिनिम्मितव्यजनवायुगुणाः। मायूरा वस्त्रजा वैवा बालदोपत्रयापहाः ॥ १३॥ अर्थ-मोरकी पूछके, कपडेके और तके पंखेका पयन निदोपनाशक है ॥ ४३ ॥ इति वायुगुणाः समाप्ताः ॥ तेलगुणमाह । तैलं कपायमधुरं सूक्ष्ममुष्णं व्यवायि च । पित्तलं पविण्मूचं नच श्लेष्मातिवर्द्धनम् ॥ १४ ॥ वातनमुत्तमं त्वच्य मेधामिबलवर्द्धनम् । नास्ति तैलात्परं किञ्चिदौपधं मारुतापहम् ॥४६॥ तैलसंयोगसंस्कारात् सर्वरोगापहं स्मृतम् ॥ ४६॥ अर्थ-तेल-कपैला, मधुर, सूक्ष्म, गरम, व्यवापि (मैथुन- जनक द्रव्य), पित्तकारक, मलमूत्रका बांधनेवाला, किञ्चित्कफ- वर्द्धक है । वातविनाशक, त्वचामें कान्ति झलकानेवाला, मेधा, अमि और पलको बानेवाला, तेलकी समान वातनाशक और --

द्वितीयः २] भापाटीकायुतः।
दूसरी ओपधि नहीं है । और द्रव्योंके संयोगसे पक्का तेल सब
रोगोंको दूर करनेवाला है ॥४४॥४५॥४६॥
निलतैलगुणाः।
तिलतैलं वयःस्थैर्यकरं वातनमुत्तमम् ।
हितं वस्त्यभ्यङ्गपाने नस्ये कर्णाक्षिपूरणे ॥४७॥
अर्थ-तिलका तेल-अवस्थास्थापक, वातविनाशक, तथा
बस्तिकममें, मर्दन करनेमें, नास लेनेमें, कर्ण और आंखोंके
लगाने परम हितकारी है ॥ १७ ॥
सर्पपतैलगुणाः।
कटूप्णं सार्पपं तैलं रक्तपित्तप्रदूपणम् ।
कफशुक्रानिलहरं कण्डूकृमिविनाशनम् ॥१८॥
अर्थ-ससौका तेल-चरपरा, गरम, रक्तपित्तके कोपको बढा-
नेवाला, कफ, शुक्र, बात, खुजली और कीडोंका दूर करनेवाला
है ॥४८॥
एरण्डतैलगुणाः।
ऐरण्डतैलं मधुरं शुकश्लेष्माभिवर्द्धनम् ।
वातासृग्गुल्महृद्रोगजीर्णज्वरहरं परम् ॥ १९॥
अर्थ-अरण्डका तेल-मधुर, भारी, कफका बानेवाला
तथा वातरक्त, गुल्म, हृदयरोग और जीर्णज्वरनाशक है ॥४९॥
हृदस्तिपार्श्वनानूरुत्रिकपृष्टास्थिशूलिनाम् ।
आनाहाप्टीलवातासृक्प्लीहोदावर्तशूलिनाम् ॥५०॥
हितं वातामयश्वासग्रंथित्रनविकारिणाम् ॥५१॥

राजवल्लभः।
म
[ परिच्छेदः
अर्थ-तथा हृदयरोग, बस्तिकम,पार्ष,जानु,ऊरु, त्रिक,
पीठ और हड्डियोंके शूलवाले रोगियोंको तथा आनाह,अष्ठीला,
वातरक्त, पीहा, उदावर्त, शूल, वातरोग, श्वास, पन्थि और
नरोगवाले पुरुषोंको अत्यन्त हितकारी है ॥५०॥५१ ॥
अतसीतैलगुणाः।
स्वादम्लमतसीतेलं वीर्योष्णं कटुपाकि च ॥५२॥
अर्थ-अलसीका तेल-स्वादिष्ठ, अम्ल, उष्णवीर्य और
पचनेमें चरपरा है ॥ ५२॥
कुसुम्भतेलगुणाः।
कुसुम्भतैलं कटुके गुरूष्णञ्च विदोपदम् ।। ५३ ।।
अर्थ-कमुम्भ (कर्र ) का तेल-चरपरा, भारी, गरम और
त्रिदोषजनक है ॥५३॥
करंजलगुणाः।
करजतैलं किहिमकुष्टकण्डूनिवारणम् ।
तिक्तकृमिहरं तीक्ष्णं रक्तपित्तप्रदूपणम् ॥ ५॥
अर्थ-करञ्जका तेल-कडवा, कृमिनाशक, तीक्ष्ण, रक्तपि-
नप्रकोपक,किट्टिम, कोढ और कण्डूका दूर करनेवाला है॥५४॥
निम्पतेलगुणाः।
निम्पतैलन्तु कुष्ठनं तिक्तं कृमिहरं परम् ॥६५॥
अर्थ-नीमका तेल-कोढका हरनेवाला, कीडोंका दूर करने-
वाला और अत्यन्त कबुवा है ॥ ५५ ॥

द्वितीयः २] भाषाटीकायुतः।
अनुक्तफलोद्भवतेलगुणाः ।
फलोद्भवानि तैलानि यान्यनुक्तानि कानि च ।
गुणान् कर्म च विज्ञाय फलानि च विनिर्दिशेत्॥५६
। अर्थ-फलसे निकला हुआ जिन फलोंके तेलोंका तेल इस
पन्थमें नहीं कहा गया है, उन फलोंके गुण और कर्मको सम-
झकर उस तेलका गुण कहना चाहिये ॥ ५६ ॥
तिलतैलस्य प्रधानत्वमाह ।
सर्वेभ्यस्त्विह तैलेभ्यस्तिलतेलं प्रशस्यते ॥१७॥
अर्थ-सब स्थावर मेह द्रव्योंमें अर्थात् और तेलौकी
अपेक्षा तिलका तेल परमोत्तम है ॥ ५७ ॥
स्थावरस्नेहस्य सेलस्थमाह।
निष्पत्तेस्तद्गुणत्वाच तैलत्यमितरेप्वपि ॥१८॥
अर्थ-तिलका चूरा कर उसको यंत्र (कोल्हू ) इत्यारिमें
छेतकर तेल निकला जाता है । सरसों आदिका स्नेहली इसीप्र-
कारसे निकाला जाता है और वैसाही गुणवाला है। इससे सरसों-
के नेहादिकोनी तेलही कहते हैं ॥ ५८॥
अभ्यङ्गगुणाः।
। अभ्यङ्गो मार्दनकरः कफवातविनाशनः ।
धातूनां पुटिजननो बलवर्णप्रसादनः ।।६९ ॥
अर्थ-शरीरमें तेल मलनेसे अत्यन्त कोमलता आती है,
कफ और वातका नाश होता है, धातुकी वृद्धि होती है, बल
बटता है और रंग दमकने लगता है ॥ ५९ ॥

२२
राजवल्लभः ।
[परिच्छेदः
पादाभ्यंगगुणाः ।
पादाभ्यङ्गोऽथ निद्राकृच्चक्षुप्यः पादरोगहा।
.चक्षुपि प्रतिरन्धं द्वे,शिरे पादगते नृणाम् ॥६॥
• अतश्चक्षुःप्रासादार्थी पादाभ्यङ्गं समाचरेत् ॥६॥
अर्थ-पाओसे तेलका मलना-निद्राकारक, नेत्रोंको हितका-
री, पाओंके रोगोंको दूर करनेवाला, आखोंके छेदोंमें जो दो
शिरा (नसें ) हैं वह पाओंमें जाकर मिली हैं, इसलिये पाऑमें
तेल मलनेसे नेत्रोंका हित होता है । इसकारण आंखोंमें सुख
चाहनेवाले पुरुषोंको पाओंसे तेल मलना चाहिये ॥६०॥६१॥
स्नेहोऽवगाहने युक्तः शरीरे बलमाहरेत् ॥ १२॥
अर्थ-तेल मलकर जलमें स्नान करनेसे शरीरमें अधिक
बल बढता है ॥ ६२॥
शिरसि तैलमईनगुणाः।
नित्यं स्नेहाईशिरसः शिरःशूलो न जायते।
नखालित्यं न पालित्यं न केशा प्रपतंति च ॥६३
दृढमूलाश्च कृष्णाश्च भवन्ति च घनायताः।
इन्द्रियाणि प्रसीदन्ति सुदृग् भवति लोचनम् ॥६४॥
अर्थ-जो पुरुष प्रतिदिन शिरसे तेल मलते हैं, उनके शिर-
में शूल कमी नहीं होता, तथा केशोंकी अल्पता और प्रपकता
नहीं होती, और केश पतितभी नहीं होते, तथा उनके केश
दृढमूलयुक्त, कृष्णवर्ण और सधन होते हैं, और सदा इन्द्रियों में
प्रसन्नता तथा नेत्रोंमें सुदृश्यता उत्पन्न होती है ॥ ६३ ॥६४ ॥

२
द्वितीयः २] भाषाटीकायुतः।
कर्णलपूरणगुणाः।
कर्णप्रपूरणं नित्यं न मन्या न हनुग्रहाः।
नोच्चै श्रुतिर्न वाधियं न कर्णे वातजा रुजः॥६५॥
अर्थ-जो मनुष्य प्रतिदिन कानमें तेल डालते हैं उनको
मन्यास्तंभ, हनुग्रह, कमरका दर्द, बधिरता और कानकी यात-
जन्य पीडा इत्यादि रोग उत्पन्न नहीं होते ॥६५॥
तैलद्रोणीअवस्थितिगुणाः।
तैलद्रोणी प्रशस्ता विविधिगदमये वातरोगार्दितेषु ।
व्याकुल्ये पङ्गुभूते सविपमवधिरे मिन्मिने गद्गदे च॥६६॥
अर्थ-द्रोणी (काठका बर्तन ) का पक्का तेल अनेक प्रकारके
रोग तथा वात अर्दित, शरीरकी व्याकुलता, पंगु. विषम, ब-
धिर, मिन्मिनाहट, गदगद ॥ ६६ ॥
धन्वस्तब्धपृष्ठेप्रचलितपवने गात्रकस्येकपाट्यां।
ग्रीवाभङ्गेऽपतंत्रे क्षयरुधिरभवे मूत्रकृच्छ्रे च बस्तौ ॥६७
अर्थ-धनुस्तम्भ, स्तब्धपृष्ट, प्रचलितपवन, गात्रकम्प,
कपाटी, ग्रीवाभङ्ग, अपतंत्रक, रक्तक्षय, मूत्रकृच्छ्रादि रोगमें
और बस्तिक्रियाके विपय अत्यन्त प्रशंसाके योग्य है ॥६॥
उदर्तनगुणाः ।
उद्धर्तनं वातहरं कफमेदोनिलापहम् ।
स्थिरीकरणमङ्गानां त्वकूप्रसादकरं परम् ॥ ६८॥
अर्थ-उद्वर्तन ( उबटन) वातरोग, कफ, मेद और वात-
विनाशक है, शरीरको स्थिरता देनेवाला और चर्मका निर्मल
करनेवाला है ॥ ६८॥

राजवल्लभः। [परिच्छेदः उद्वर्तनं हरिद्रायः कण्डूवेवयंरोक्ष्यजित् । तिलेनोद्वर्त्तनं कण्डूरोक्ष्यत्वग्दोषनाशनम् ॥ ६९ ॥ अर्थ-हलदी इत्यादिका उवटन-कण्डू, विवर्णता और शरीरके रूखापनको दूर करे हे । तिलोंका उबटन खुजली, रुक्षता और चर्मदोपविनाशक है ॥ ६९ ॥ इति उद्वर्तनगुणाः ।। जलगुणमाह। ईपत्कपायमधुरं पानीयं क्लेदि शीतलम् । तृष्णानमव्यक्तरसं शरीरेन्द्रियतर्पणम् ॥ ७० ॥ अर्थ-सामान्य जल-किञ्चित्कपैला, मधुर, क्लेदकारका शीतल, अध्यक्त रसवाला जल. तृष्णानाशक, शरीर और इन्द्रि- योंको तृमि देनेवाला है ॥ ७० ॥ सुगन्धमस्पष्टरसं सुशीतं तर्पनाशनम् । स्वच्छं लघु च हृद्यं च तोयं गुणवदुच्यते ॥७१, अर्थ-सुगन्ध और अव्यक्त रसयुक्त जल शीतल और तृष्णा- नाशक है । निर्मल जल हलका, हृदयको हितकारी और दूधकी समान गुणवाला है ॥ ७१ ॥ पिच्छिलं कृमिलं किन्नं पर्णशैवालकाईमः । वैवर्ण विरसं सान्द्रं दुर्गन्धि न हितं जलम् ॥ ७२ ॥ अर्थ-पते, शिवार, कईमादिद्वारा पिच्छिल और क्लिन्न, गदला तथा कीटादियुक्त जल, और विवरण, विरस, घन और दुर्गन्धवाला जल अहितकारक है । ७२ ॥

२५ । द्वितीयः २] भाषाटीकायुतः। साधारणमेघजलगुणाः । गगनाम्बु त्रिदोपघ्नं गृहीतं यत्सुभाजने । वल्यं रसायनं मेध्यं पात्रापेक्षि च तत्परम् ॥ ७३ ॥ अर्थ-मेघका जल उत्तमपात्रमें ग्रहण किया हुवा-त्रिदोष- नाशक, बलकारक, रसायन, मेधाजनक और वह जैसे पात्रमें रक्खा होगा वैसाही उसका गुण होगा ॥ ७३ ॥ सूर्यचन्द्रकिरणसंयुक्तजलगुणाः। दिवार्ककिरणेपुष्टं स्पृष्टमिन्दुकरैनिशि । अरूक्षमनभिष्यन्दि तत्तुल्यं गगनाम्बुना ॥७॥ अर्थ-जिस जलपर रातमें चन्द्रमाकी किरण और दिनमें सूर्यको किरण पडती हों, ऐसा जल रूक्षताहीन और अक्लेदी है। उसमें आकाशके जलकी समान गुण हैं ॥ ७४ ॥ भनार्तवमेघजलगुणाः । अनार्तवं प्रयुजति वारिवारिधरास्तु यत् । तत्रिदोपाय सर्वेषां देहिनां परिपिक्तिनाम् ॥ ७९ ॥ अर्थ-वर्षाऋतुको छोडकर जो और ऋतुओंमें जल वर्पता है, वह जल सब प्राणियोंके ऊपर पडनेसे त्रिदोषको उत्पन्न करता है ॥ ७५॥ घकालीयमेघजलपाननिषिद्धता । वासु चरन्ति घनमहोरगा वियति कोटलूताश्च । तद्विपपुष्टमपेयं स्वजलमगस्त्योदयात्पूर्वम् ॥ ७६॥ अर्थ-वर्षाऋतुमें सांप, कीडे, मकडी इत्यादि विपधारी

राजवल्लभः। [ परिच्छेदः
जन्तु मेघके साथ आकाशमार्गमें भ्रमण करते हैं, और उन ज-
स्तुओंका विप मेपके जलके साथ पृथ्वीमें पतित होता है. इस
कारण अगस्त्योदयसे पहिले आकाशका पानी पीना नहीं
चाहिये ॥ ७६ ॥
मेघजलपानकालनिर्णयः।
शुक्लागस्त्यत्रयोदश्यां भाद्रस्यान्ते शरद्यपि ।
अयं दत्त्वा त्वगस्त्याय गृह्णीयाद्गनोदकम् ॥७७ ॥
हेमन्ते वापि गृह्णीयात् खजलं मृन्मये घटे।
हेमन्ते तत्प्रयोक्तव्यं नहि शझेदनातवम् ॥७८॥
कालेन पक्कं निर्दोपमगस्त्येनाविपीकृतम् ।
हंसोदकमिति ख्यातं शारदं विमलं जलम् ॥ ७९ ॥
अर्थ-भादो मासके व्यतीत होनेपर शरदऋतुकी शुक्ल अग-
स्त्यत्रयोदशीके दिन अगस्त्यको अर्घ देकर गगनोदक (आका.
शका जल) ग्रहण करे । अथवा हेमन्तऋतुमें मेघका जल
मट्टी घडेमें लेकर अनार्तवकी शंकाको त्यागकर काममें लाये।
उपयुक्त कालमें पका हुवा तथा अगस्त्योदयकरके विपरहित
किया हुवा शरदकतुका निर्मल जल हंसोदकनामसे विख्यात
है ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ ७९ ॥
अनूपदेवाजातजलगुणाः।
अनूपदेशे यद्वारि तत्सान्द्रगुरु पिच्छिलम् ।
मधुरं श्लेप्मजनन स्निग्धपावकनाशनम् ॥ ८० ॥
प्रमेहशीपदच्छदिंगलगण्डादिरोगकृत् ॥८॥

. द्वितीयः २] भाषाटीकायुतः। २७ अर्थ-अनूपदेश (जलाशयके निकटके स्थान) का जल- घन और भारी, पिच्छिल, मधुर, कफकारक, अमिनाशक तथा प्रमेह, श्वीपद, वमन और गलगण्डादि रोगोंका उत्पन्न करनेवा- ला है ॥ ८० ॥ ८ ॥ जागलजलगुणाः। जाङ्गलं त्वन्यथानूपात् पानीयं परिकीर्तितम्।।८२॥ अर्थ-जाङ्गलदेशका जल-अनृपदेशके जलसे विपरीत गुण- वाला है ॥ ८२॥ सर्वक्रतुसम्बन्धीयआकाशजलगुणाः। वारि साधारणं वृष्यं दीपनं मधुरं लघु ॥ ८३॥ अर्थ-सब ऋतुओंमें मेधका पानी वीर्य्यवर्द्धक, जठरामि- प्रदीपक, मधुर और हलका है ॥ ८३ ॥ वार्षिकजलगुणमाह । गुर्वभिष्यन्दि पानीयं वापिकं मधुरं सरम् ॥ ८४॥ अर्थ-वर्षाऋतुका पानी-भारी, क्लेदजनक, मधुर और कुछ कुछ दस्तावर है ॥ ८४॥ शारदीयजलगुणमाह । शारदं चानभिष्यन्दि लघु तत्परिकीर्तितम् ।।८५॥ अर्थ-शरदऋतुका पानी अनभिष्यन्दि (क्लेदरहित ) और हलका है ॥ ८५॥ हैमन्तिकजलगुणमाह । हैमन्तिकं जलं स्निग्धं वृष्यं वल्यं हितं गुरु।। ८६ ॥ -

२८
*राजवल्लभः। [परिच्छेदः
अर्थ-हेमन्त ऋतुका पानी-सिग्ध, वीर्यवर्धक, बलकारक,
हितकारी और भारी है ॥८६॥
शैशिरजलगुणमाइ।
शशिरं कफवातघ्नं किञ्चिद्वैमन्तिकालघु ॥८७॥
अर्थ-शिशिरऋतुका जल-कफ-वात-नाशक और हेमंतक-
तुके जलसे किञ्चित् हलका है ॥ ८७ ॥
थासन्तिकजलगुणमाह ।
कपायं मधुरं रूक्षं विद्यादासन्तिकं जलम् ॥ ८८॥
अर्थ-वसन्तऋतुका जल-कपैला,मधुर और रूखा है।८८॥
प्रैष्मिकजलगुणमाह)
ग्रेष्मिकञ्चानभिष्यन्दि जलमित्येप निश्चयः ।। ८९॥
मर्थ-ग्रीष्मऋतुका जल-अनभिष्यदी है ॥८९ ॥
तडागजलगुणमाह।
ताडागं वातलं स्वादु कपायं कटुपाकि च ॥९॥
अर्थ-तडागका जल-यातवर्द्धक, स्वादिष्ठ, कषैला और
पचने में कटु है ॥ ९ ॥
पापीजलगुणमाह।
वाप्यं गुरु कटु क्षारं पित्तलं कफवातजित ॥११॥
अर्थ-यावद्दीका जल-धारी, कटु, खारी, पिचकारक तथा
कफ और वातनाशक है ॥ ९१ ॥
कृपजलगुणमाह।
कॉर्प पातकफो हन्ति दीपनं लघु पित्तलम् ॥९२॥

कम्य
द्वितीयः २] भाषाटीकायुतः ।
अर्थ-कुवेका जल-वात और कफनाशक है। दीपन, हल-
का और पित्तकारक है ॥ ९२ ॥
'कुण्डजलगुणमाह।
कोण्डयममिकरं रूक्षं मधुरं कफकृद् गुरु ॥ ९३ ॥
अर्थ-कुण्डका जल-अनिकारक, सखा, मधुर, कफकारी
और भारी है ॥ १३ ॥
निरजलगुणमार।
नेझर लघु पथ्यञ्च दीपनं कफनाशनम् ॥ ९४॥
अर्थ-झरनेका जल-हलका, पथ्य, दीपन और कफना-
शक है ॥ ९४ ॥
सरोवरजलगुणमाह।
सारसं लघु तृष्णानं बल्यं स्वादु कपायवत् ॥ ९५॥
अर्थ-सरोवरका जल-हलका, तृपाहारक, बलकारक,
स्वादिष्ट और कषैला है ॥ ९५ ॥
केदारजलगुणमाह ।
केदारं मधुरंप्रोक्तं विपाके कद दोपणम् ॥ ९६ ॥
अर्थ-केदारजल-मधुर,गुरुपाकी और दोपजनक है ॥९६॥
पल्वलजलगुणमाह ।
पल्वलं गुर्वभिप्यन्दि विष्टम्मि दोपणं परम् ॥१७॥
अर्थ-पल्यल अर्थात् तलैयाका जल-अभिप्पन्दि, विष्ठ-
म्भकारक और दोषजनक है ॥९७॥
समुद्रजलगुणमाह।
सामुद्रमुदकं क्षारं सर्वदोपप्रकोपनम् ॥ ९८॥

३०
राजवल्लभः। [परिच्छेदः
अर्थ-समुद्रका जल-क्षार और सर्वदोपोंको कुपित करने-
वाला है ॥ ९८ ॥
नदीजलगुणमाह।
नादेयं वातलं रूक्षं सान्द्रं गुरु कफापहम् ।। ९९॥
अर्थ-नदीका जल-वादी, रूखा, घन, भारी और कफहारी
शीघवहानदीजलगुणमाह ।
नद्यः शीघ्रवहाः प्रायो लघ्व्यो याश्चामलोदकाः॥१००
अर्थ-शीघ्र वहनेवाली नदीयोंका जल-प्राय हलका और
निर्मल होता है ॥ १०॥
मृदुचहा-पूर्वसमुद्रगानदीजलगुणमाह ।
प्रायो मृदुवहा गुर्यो याश्चपूर्वसमुद्रगाः॥१०१॥
अर्थ-मन्द वहनेवाली तथा पूर्व समुदमें जानेवाली नदीयों-
का जल भारी है ॥ १० ॥
पापाणवालुकायुक्तमदीजलगुणमाह ।
नद्यः पापाणसिकतावाहिन्यो विमलोदकाः॥१०२॥
अर्थ-पापाण और वालुकायुक्त नदीका जल-अत्यन्त नि-
मल होता है ॥ १०२ ॥
गंगादिनदीजलगुणाः।
हिमवत्प्रभवा याश्च जलं तास्वमृतोपमम् ।। १०३॥
अर्थ-हिमालयपर्वतसे प्रगट होनेवाली गंगादि नदीयोंका
जल अमृतकी समान है ॥ १.३॥

द्वितीयः२] भाषाटीकायुतः ।
पारिभद्रादिपर्वतजानदीजलगुणाः ।
पारिभद्रभवायाश्च विन्ध्यसिन्धुभवाश्च याः ।
शिरोहद्रोगकुष्टानां ता हेतुःश्लीपदस्य च॥१०॥
अर्थ-पारिजद, विन्ध्याचल तथा सिन्धुपर्वतसे निकली हुई
नदीयोंका जल-शिरोरोग, हृदयरोग, कोढ और श्लीपदरोगोंका
कारण है ॥ १०४ ॥
चन्द्रकिरणादियुक्त-पर्वतवारिगुणाः।
चन्द्रार्ककरसंसृष्टं वायुना स्फालितं मुहुः।
पर्वतोपरि यद्वारि समं पौरन्दरेण तत् ॥ १०५॥
अर्थ-जिसपे चन्द्रमा और सूर्यकी किरणें पड़ती हो और
जो पवनकरके हलाया गया ऐसा पर्वतका जल-मेधके जलकी
समान गुणवाला है ॥ १०५॥
चन्द्रकान्तमणिसंसृष्टजलगुणमाह ।
चन्द्रकान्तोद्भवं रूक्षं शीतं दाहविनाशनम् ॥१०६॥
अर्थ-चन्द्रकान्तमणिसे उत्पन्न हुवा जल-शीतल और
दाहको दूर करनेवाला है ॥ १०६॥
औद्भिदजलगुणमाह ।
औद्भिदं मधुरं पित्तशमनं न विदाहि च ।। १०७॥
अर्थ-औद्भिदजल (वृक्षगुल्मादिके स्थानका)-मधुर, पित्त-
को शान्ति करनेवाला और अविदाही है ॥ १०७॥
तालफलोद्वजलगुणमाह ।
तालाम्बु पित्तजित् शुक्रस्तन्यवृद्धिकरं गुरु॥१०८॥

राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
अर्थ-ताडके फलका जल-पित्तनाशक शुक्र और स्तनम
दूध बढानेवाला है ॥ १०८॥
नारिफेलजलगुणमाह ।
नारिकेलाम्बु तरुणं तृष्णानं पित्तनाशनम् ।
बालस्य नारिकेलस्य जलं प्रायो विरेचनम् ॥१०९॥
शीतं वमथुमूर्जानं पित्तज्वरविनाशनम् ।
नारिकेलोदकं जीर्ण विष्टम्भि गुरु शीतलम्।।११०॥
अर्थ-तरुणनारियलका जल-तृष्णा और पित्तको दूर कर-
नेवाला है। बालनारियलका जल-दस्तावर, शीतल तथा वमन,
मर्जा और पित्तज्वर निवारक है । वृद्धनारियलका जल-विष्ट-
भजनक, भारी और शीतल है ॥ १०९ ॥ ११ ॥
शीतलजलगुणमाह।
शीताम्बु मदमूछीनं छबिपित्तज्वरापहम् ।
श्रमलमपादाइमदात्ययविपापहम् ॥११॥
अर्थ-शीतलजल-मद, मूर्छ, वमन, पित्तज्वर, श्रम, क्लम,
तृपा, दाह, मद्यपानजनक रोग और विपविनाशक है ॥११॥
अजीणे भेपजं वारि जीणे चारि बलप्रदम् ।
आयुराहारकाले चभुक्त्वा नोपरिनो निशि॥१२॥
अर्थ-अजीर्णजल औषधीके समान गुण करनेवाला है।
जीर्णमें जलका पीना वलको बढ़ाता है। आहारके समय जल-
का पीना आयुको बढाता है, परन्तु आहारके उपरान्त तथा
रात्रिमें जल पीना नहीं चाहिये ॥ ११२॥

द्वितीयः २] भाषाटीकायुतः।
धारापातजलगुणमाह ।
धारापातेन विष्टम्भि दुर्जरं पवनाहतम् ।। ११३॥
अर्थ-धारापातका जल-विष्टम्जी और पवनसे ताडितसे
जल दुर्जर अर्थात् देरमें पचता है ॥ ११३ ॥
शुतशीतजलगुणमाह ।।
शृतशीतं त्रिदोपघ्नं यदन्तर्वाप्पशीतलम् ॥ ११४॥
अर्थ-औटाकर ठंडा किया जल-त्रिदोपका नाश करे है,
जो अन्तर्वाप्पसे शीतल किया गया है ॥ ११४ ॥
उष्णोदकसाधारणगुणमा ।
उष्णोदकं सदा पथ्यं कासश्वासविबन्धनुत् ।
कफवातामदोपन्नं दीपनं वस्तिशोधनम् ॥ ११९॥
अर्थ-उष्णजल-निरन्तर पथ्य है । तथा खाँसी, श्वास,
विवन्ध, कफ, वात और आमदोपनाशक है । जठराग्निको
दीपन करनेवाला और बस्तिशोधक है ॥ ११५ ॥
उष्णजललक्षणं विशेषगुणश्चात् ।
काथमानन्तु यत्तोयं निप्फेनं निर्मलीकृतम् ।
भवत्यमशिष्टन्तु तदुष्णोदकमुच्यते ॥ ११६॥
अर्थ-काथमान (काडेकी समान औटाया हुवा) जल-
औटाते २ निर्मल,नागरहित और आधा रहे जाय उसको उष्ण
जल कहते हैं ॥ ११६ ॥
तत्पादहीनं वातनं अईहीनन्तु पित्तजित् ।
कफन्नं पादशेपन्तु पानीयं लघु दीपनम् ॥ ११७॥

राजबल्लभः। [परिच्छेदः अर्थ-इस जलका जब चतुर्थांश जल जाय तो यह जल वातनाशक होता है। और जब इसका अभाग जल शेपरह जाय तब यह जल पित्तनाशक होता है,और जो चतुर्थांश शेप रह जाय तो कफनाशक होता है । यह जल हलका और अग्निप्रदीपक है ॥ ऋतुभेदे उष्णजलभेदाः। हेमन्त शिशिरे पादहीनं पादस्थितं मधी। स्यात्पानीयं शरत्काले ग्रीष्मे चाविशेपितम् ।।११८॥ इच्छन्ति बहुदोपत्वात् प्रावृष्यष्टावशेपितम्।।११९॥ अर्थ-हेमन्तऋतुमें तथा शीतऋतुमें चतुर्थांश रहित, वस- तक्तुमें चतुर्थांश शेप, शरद और ग्रीष्मऋतु में अर्द्ध शेष रख- कर व्यवहार करे । परन्तु वक्रितु में जल अनेक दोपयुक्त होता है इसकारण वक्रितुमें अष्टमांश शेष रखकर व्यवहार करना चाहिये ॥ ११८ ॥ ११९ ॥ पर्युषितजलगुणमाह । दिया तञ्च यत्तोयं रात्रौ तत् गुरुतां व्रजेत् । रात्री शृतं दिवाचापि गुरुत्वमधिगच्छति ॥ १२०॥ अर्थ-जोजल दिनमें उष्ण कर रख दिया जावे उस जलमें राविको भारीपन आ जाता है, और जो रात्रिको उष्ण करके रख दिया जाये उस जलमें दिनमें भारीपन आ जाता है ॥१२० सुवासितजलगुणमाह । सुवासितं जलं पुप्पैः पूतं शुक्केन वाससा । नवमृद्भाजने न्यस्तं माङ्गल्यं रुचिकृत्परम् ।।१२१॥

द्वितीयः २] भापाटीकायुतः। अर्थ-पुष्पोंकरके सुवासित किया हुवा, श्वेत वनकरके छाना हुवा ऐसा जल नवीन मृत्तिकाके पात्रमें रस्सा हुवा मङ्ग- लकारक और रुचिदायक होता है ॥ १२१ ॥ जलस्य प्राधान्यमाह । पानीयं प्राणिनां प्राणास्तदायत्तं हि जीवनम् । तस्मात्सर्वास्ववस्थासु कैश्चिद्धारिन वार्य्यते॥१२२॥ अर्थ-पानी प्राणियोंको प्राणरूप है इसकारण जीवन जल- के आधीन है। अतएव प्राणियोंको जल किसी अवस्था त्या- ग नहीं करना चाहिये ॥ १२२ ॥ अन्नेनापि विना जन्तुःप्राणान् धारयते चिरम् । तोयाभावे पिपासातः क्षणात्प्राणैर्विमुच्यते॥१२३॥ अर्थ-अन्नके बिना जीव बहुत कालपर्य्यन्त जीते रहते हैं, किन्तु जलके विना अणमात्रमें मर जाते हैं ॥ १२३ ॥ तृपितो मोहमायाति मोहात्प्राणान विसुंचति । तस्मात्प्राणस्य रक्षाथै वारि देयं पिपासवे ।। १२४ ॥ अर्थ-तृपासे व्याकुल मनुष्योंके मोह उत्पन्न होता है, और मोहसे प्राण नष्ट हो जाते हैं । इसकारण प्रागोंकी रक्षाके लिये पियासे मनुष्यको जल देना चाहिये ॥ १२४ ॥ शरदि वसन्ने च जलपानविधिः। पानीयं पानीयं शरदि वसन्ते च पानीयम् । नादेयं नादेयं शरदि वसन्ते च नादेयम् ।। १२९॥ अर्थ-शरत् और वसन्तऋतु में जल पीना चाहिये । परन्तु .

राजवल्लभः। [ परिच्छेदः नदीका जल शरत् और वसन्त ऋतु पीना नहीं चाहिये १२५ स्नानगुणमाह । स्नानं पवित्रमायुप्यं श्रमस्वेदमलापहम् । शरीरवलसन्धानं केशमोजस्करं परम् ॥ १२६॥ अर्थ-स्नान शरीरको पवित्र करे तथा आयुवईक है, और श्रम, पसीना तथा मैलको दूर करे है, बलवर्द्धक है, केश और ओजकारक है ॥ १२६ ॥ उप्णाम्बुस्नानगुणमाह । उप्णाम्बुनाधःकायस्य परिपेकः सुखावहः । तेनैव तूत्तमाङ्गस्य बलग्नं केशचक्षुपोः ॥ १२॥ विनिहन्ति शिरःसान तृष्णाताल्वास्यशोपणम् । मलोप्णपिडिकाकण्ड्रशिरोरोगांश्च पित्तजान ।।१२८ अर्थ-जलके द्वारा आधे शरीरसे स्नान करनेसे सुखकी वृद्धि होती है और उसी जलके द्वारा शिरसे स्नान करनेसे केश और आँखोंका बल कम होता है । तथा तृपा,तालुशोप, मुख- शोप, मल, उप्णता, पिडिका, कण्ड, शिरोरोग और पित्तरोग नारा हात ह ।। १२७॥ १२८॥ द्रव्यविशेपस्नानगुणमाह । मधुकामलकैः सानं पित्तनं तिमिरापहम् । नानं बचापनरिएं श्लेप्मनं तिमिरापहम् । नानं कृष्णतिलेश्चापि चक्षुप्यमनिलापहम् ।।१२९।। अर्थ-मुलहटी और आमला मलकर स्नान करनेसे पित और तिमिररोग नाश होता है । वच और मोथा मलकर लान द्वितीयः २] भाषाटीकायुतः। करनेसे कफ और तिमिररोग नाश होता है । काले तिलोंको मलकर स्नान करनेसे नेत्रोंकी जोत बढनी है, तथा वातका नाश होता है ॥ १२९ ॥ स्नानस्य विशेषगुणमाह । अस्नातस्य शरीरस्य ऊष्मा सर्वाङ्गगोचरः । स्नानेनैकत्वमायाति तेन दीव्यति पावकः ।। १३०॥ अर्थ-विना लान किये शरीरमें जो गरमी सर्वांगमें स्थित हो जाती है, स्नानसे वह एक स्थानमें आ जाती है, उससे अग्नि प्रदीप्त होती है ॥ १३० ॥ स्नानस्य निषिद्धता। नानमर्दितनेत्रास्यकर्णरोगातिसारिषु । आध्मानपीनसाजीर्णभुक्तवत्सु च गर्हितम् ॥१३१॥ अर्थ-अर्दितरोगमें, नेत्ररोगमें, मुखरोगमें, कर्णरोगमें, अति- सारमें, आध्मानरोगमें, पीनसरोगमें और अजीर्णादि रोगोंमें तथा भोजनके अन्तमें स्नान नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥ शरीरमार्जनगुणाः। दौर्गन्ध्यं गौरवं कण्डूं कच्छूमलमरोचकम् । स्वेदेवीभत्सतां हन्ति शरीरपरिमार्जनम् ।। १३२ ॥ अर्थ-शरीरका मार्जन-दुर्गन्ध, भारीपन, कण्डू, कच्छू,मल, अरुचि,पसीना और घृणानाशक है ॥१३२॥ इति स्नानगुणाः॥ वस्त्रादिधारणगुणमाह। निर्मलवनधारणगुणाः। काम्यं यशस्यमायुष्यमलक्ष्मीनं प्रहर्षणम् ।

राजवल्लभः। . [परिच्छेदः
श्रीमत्पारिपदं शस्तं निर्मलाम्बरधारणम् ॥ १३३॥
अर्थ-शोभायमान परमेश्वरके चरणों में अर्पण किया निर्मल
वस्त्र उसको धारण करनेसे काम, आयुकी वृद्धि होती है तथा
अलक्ष्मीका नाश और हर्पकी वृद्धि होती है ॥ १३३ ॥
रत्नाभरणधारणगुणाः।
धन्यं मङ्गलमायुष्यं श्रीमद्व्यसनसूदनम् ।
हर्पणं काम्यमौजस्यं रत्नाभरणधारणम् ॥ १३४॥
अर्थ-रलाभरणका धारण-धन,मंगल, आयु, और लक्ष्मीब-
ईक है,व्यसननिवारक और हर्ष,काम तथा ओजवर्दक है १३४
सूर्यादरचनगुणाः।
स्वाय यशस्यमायुष्यमलक्ष्मीकविनाशनम् ।
धन्यं धान्यकरं नित्यं गुरुदेवद्विजार्चनम् ॥ १३५॥
अर्थ-गुरु और देवादिका पूजना-स्वर्ग. यरा और आयु-
दायक है।अलक्ष्मीनाशक तथा धन और धान्यवर्द्धक है।१३५॥
दर्पणगुणाः।
दर्पणं श्रीमदायुप्यं पापोपशमनं परम् ॥ १३६॥
अर्थ-दर्पणमें मुख देखनेसे लक्ष्मी और आयुकी वृद्धि होती
है,तथा पापका नाश होता है।।१३६।।इति वखादिधारणगुणाः ।।
अनुलेपनगुणमाह ।
अनुलेपनसामान्यगुणाः।
पीत्योजोवर्द्धनं वृष्यं स्वेददोर्गन्ध्यनाशनम् ।
तन्द्रातापोपशमनं अमनमनुलेपनम् ॥ १३७ ॥

द्वितीयः २] भाषाटीकायुतः।
अर्थ-अनुलेपन-हर्ष, ओज और वीर्यवर्धक है। तथा
पसीना, दुर्गन्ध, तन्द्रा, ताप और श्रमनाशक है ॥ १३७ ॥
चन्दनगुणाः।
चन्दनं शीतलं तिक्तं तृष्णादाहालपित्तजित् ॥१३८॥
अर्थ-चंदन-शीतल, कडवा, चरपरा तथा तृषा, दाह
और रक्तपित्तनाशक है ॥ १३८ ॥
अगुरुगुणाः।
अगुरु व्रणजित्तिक्तं कदूष्णं कफवातजित् ।। १३९॥
अर्थ-अगर-व्रणविनाशक, चरपरी, गरम तथा कफ-वात-
नाशक है ॥ १३९॥
कुंकुमगुणाः।
कुड्डमं भेदि वैवण्यै कण्डूवातकफापहम् ॥१४०॥
अर्थ-केशर-भेदक, तथा विवर्णता, खुजली, और वात-
कफ नाशक है ॥१४० ॥
कस्तृरीगुणाः।
कस्तूरी छर्दिदौर्गन्ध्यरक्तपित्तज्वरापहा ॥ १४१ ॥
अर्थ-कस्तूरी-वमन, दुर्गन्ध, रक्तपित्त और ज्वरको
हरनेवाली है ॥ १४१॥
लताकस्तूरीगुणाः।
लताकस्तूरिका हृद्या शीता तिक्तास्यरोगनुत्।।१४२॥
अर्थ-लताकस्तूरी-हृदयको हितकारी,शीतल, कडवी और
मुखरोगनाशक है ॥ १४२॥

.
राजवल्लभः। [ परिच्छेदः
तेजपत्रगुणाः।
पत्रकं कफवाताशोहल्लासारोचकापहम् ॥ १४३॥
अर्थ-तेजपात-कफ, वायु,बवासीर बवकाई और अरुचि-
को दूर करे है ॥ १४३ ॥
ककोलगुणाः।
ककोलः कटुको हृद्यः सुगन्धिकफवातजित्।।१४४॥
अर्थ-शीतलचीनी-चरपरी, हृदयको हितकारी, सुगन्ध
और कफवातनाशक है ॥ १४४ ॥
शटीगुणाः।
शटी वातकफश्वासकासज्वरविनाशिनी ॥ १४५॥
अर्थ-आमिया हलदी-वात, कफ, श्वास, खाँसी और ज्व-
रनाशक है ॥ १४५॥
उशीरगुणाः।
उशीर स्वेददार्गन्ध्यदाहपित्तास्ररोगजित् ॥१४६॥
अर्थ- खस-पसीना, दुर्गन्ध, दाह और रक्तपित्तका नाश
करे है ॥ १४६ ॥
रक्तचन्दनगुणाः।
रक्तपित्तहरं वल्यं चाक्षुप्यं रक्तचन्दनम् ॥ १४७॥
अर्थ-लालचंदन-रक्तपित्तनाशक, बलकारक और नेत्रों-
को हितकारी है ॥ ११७॥
श्रीयासादिगुणाः।
श्रीवासः सरलं पूतिः कुन्दुरुग्रन्थिपर्णकम् ।
सिद्धकः परमामांसी देवदारुमुरानखम् ॥ १४८॥

,
तृतीयः ३] भापाटीकायुतः ।
सर्वेमी परमालक्ष्मीरक्षोना ज्वरनाशनाः ॥१४९॥
अर्थ-श्रीवास (सरलका गोंद ), धूपसरल, पूति (गन्धमा-
जरिवीर्य्य ), कुन्दुरु, गठिबन, शिलारस, घालछड, देवदारु,
एकांगी और नसी-अलक्ष्मी, राक्षसबाधा और ज्वरनाशक
है ॥ १४८॥ १४९ ॥ ॥ इति अनुलेपनादिगुणाः ॥
छवादिपञ्चकं पूर्व ततो व्यायाममारुतौ ।
तैलमुद्वर्त्तनं तोयं स्नानं वस्त्रादिधारणम् ॥ १५ ॥
अनुलेपनमित्येतैर्नातिसंक्षेपविस्तरः ।
पौर्वाहिकः परिच्छेदः समाप्तो राजवल्लभे ॥ १५१॥
अर्थ-छत्रादिपंचक,व्यायाम (कसरत ),वायु, तेल, उद्वर्तन,
जल, स्नान तथा अनुलेपनादिद्वारा राजवहा ग्रन्थमें न अति-
संक्षेपसे और न अति विस्तारसे पौलिक परिच्छेद समाप्त
हुआ ॥ १५० ॥ १५१ ॥
इति श्रीराजवल्लननिघण्टे द्रव्यगुणचन्द्रिकाटीकायां आ-
युर्वेदोद्धारक शालिग्रामवैश्यकत्त-पौर्वाहिककर्म-
गुणद्वितीयपरिच्छेदः समातः ॥ २॥
॥ तृतीयपरिच्छेदः॥
अथ माध्याह्निकं कृत्यं नानातन्त्रान्निरुच्यते ॥१॥
अर्थ-अथानन्तर अनेक शास्त्रोंसे निरूपण की हुई मध्या-
ह्निक क्रियाओंको कहते हैं ॥ १॥

राजवल्लभः।
[ परिच्छेदः
धान्यभेदाः।
अथ धान्य विधा शालिपष्टिकाव्रीहिभेदतः ।
शालयो हैमनास्तत्र पष्टिका ग्रेष्मिका अपि ॥ २ ॥
वीहयस्त्वाशवख्याताःप्रावृटकालसमुद्भवाः ॥३॥
अर्थ-शालि, पटी और ब्रीहि इनमें दोसे धान तीन प्रका-
रके हैं ।तहां शालिधान हेमन्तऋतुमें, पष्टीधान ग्रीष्मऋतुमें और
बीहिधान वक्रितुमें उत्पन्न होते हैं । यह बीहिधान कहीं २ आ-
शवनामसे प्रसिद्ध है ॥ २॥३॥
शालिधान्यगुणाः।
शालयो मधुराः शीता लघुपाका वलावहाः ।
पित्तनाल्पानिलकफाः स्निग्धा बद्धाल्पवर्चसः ॥४॥
अर्थ-शालिधान-मधुर, शीतल, पचनेमें हलके, बलवर्धक,
पित्तनाशक, किञ्चित् वातकफकारक, स्निग्ध और अल्पमलव-
ईक है ॥४॥
रक्तशालिगुणाः।
रक्तशालिस्त्रिदोपघ्नश्चक्षुप्यः शुक्रमूत्रलः।
तृष्णानो वलकृत्स्वयों हृद्यस्तद्नु चापरे ॥६॥
शालयो रक्तशालीनां किञ्चिद्धीनगुणा गुणैः॥६॥
अर्थ-रक्तशालि-त्रिदोपनाशक, नेत्रोंको हितकारी, शुक-
जनक, मूत्रवर्दक, तृपानिवारक, बलकारक, स्वरको शुद्ध करने-
वाले और हृदयको हितकारी है । शालिधान इनसे हीनगुणवाले
है॥ ५ ॥ ६.॥

तृतीयः ३] भापारीकायुतः।
कलमधान्यगुणाः।
कलमोऽसृत्रिदोपनश्चक्षुप्यः सकपायवान् ॥७॥
अर्थ-कलमधान-रक्तविकार और त्रिदोषनाशक है। नेत्रों-
को हितकारी और कपायरसान्वित है ॥ ७ ॥
दग्धभूमिजातशालिधान्यगुणाः ।
दग्धायामवनौ जाताः शालयो लघुपाकिनः ।
कपायावद्धविण्मूत्रा रूक्षाः श्लेष्मापकर्पिणः॥८॥
अर्थ-दग्धामीमें उत्पन्न हुवे शालिधान-पचनेमें हलके,
कपेले, मलमूत्रको बांधनेवाले, रूखे और कफको हरनेवाले
छिन्नरूढशालिधान्यगुणाः।
शालयश्छिन्नरूढा ये रूक्षास्ते बद्धवर्चसः॥९॥
अर्थ-छिन्नरूढशालिधान-रूखे और मलको बांधने-
वाले हैं ॥९॥
ग्रैष्मिकपष्टिधान्यगुणाः।
पटिका ग्रैष्मिका ये स्युः पित्तलास्तेस्थिरात्मकाः॥१०
अर्थ-ग्रीष्मऋतुमें उत्पन्न होनेवाले पष्टीधान-पित्तजनक
और कालमें पचनेवाले हैं ॥१०॥
शालिविशेषगुणाः।
हैमनास्तु हिमा वृष्या मधुरा पद्धवर्चसः ॥११॥
अर्थ-हेमन्तकातुमें उत्पन्न होनेवाले शालिधान-शीतल
वीर्यवर्द्धक, मधुर और मलको बांधनेवाले हैं ॥ ११ ॥

राजवल्लभः। [परिच्छेदः पाटलाबीहिधान्यगुणाः । अत्युष्णो बद्धनिष्यन्दी पाटलस्तु विदोपकृत् ॥१२॥ अर्थ-पाटलनामवाले वीहिधान-अत्यन्त उष्णवीर्य तथा मलरोधक, केद और त्रिदोपकारक हैं ॥ १२ ॥ शरीष्मोद्भयधान्यगुणाः। धान्यं शरग्रीष्मभवं पाकेम्लं पित्तकृद्गुरु ॥ १३॥ अर्थ-शरद और ग्रीष्मऋतुमें उत्पन्न होनेवाले धान-पच- नेमें अम्ल, पिचकारक और भारी हैं ॥ १३ ॥ ऋतुसन्धिभवधान्यगुणाः । ऋतुसन्धिभवाश्चोष्मा पित्तला कफनाशनाः ॥१४॥ अर्थ-ऋतुसन्धिउद्भव धान-गरम, पिनकारक और कफ- नाशक हैं ॥ १४॥ स्थलजधान्यगुणाः। स्थलजाः कफपित्तघ्नाः कपायाः कटुपाकिनः । किञ्चित्सतिक्तमधुराः पवनानलवर्द्धनाः॥१५॥ अर्थ-स्थलमें उत्पन्न होनेवाले धान-कफपित्तनाशक, क- पेले, पचनमें चरपरे, किंचित् कडवे, मधुर तथा वात और अमिवर्द्धक हैं ॥ १५॥ थोरवत्रीहिधान्यगुणाः । बोरवस्तु बुधैः प्रोक्तनिदोपस्य प्रकोपनः। मधुरधाम्लपाकश्च वीदिः पित्तकरो गुरुः॥१६॥ अर्थ-धोरवनामवाल ब्रीहिधान-त्रिदोपको कुपित करने याल, मधुर, पचनमें अम्ल, पित्तकारक और भारी हैं ॥ १६॥ -4

"
तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः।
वापितावापितधान्यगुणाः।
. वापितं गुरु तद्धान्यं किश्चिद्धीनमवापितम् ॥ १७॥
अर्थ-बापितधान-भारी, अवापित धान-बापितसे किंचित्
हीनगुणवाले हैं ॥ १७॥
रोप्यातिरोप्यधान्यगुणाः।
रोप्यातिरोप्या लघवः शीघ्रपाका गुणोत्तराः।
अदाहिनो दोपहरा वल्या मृत्रविवर्द्धनाः ॥१८॥
अर्थ-रोप्यातिरोप्यधान-हलके, शीघ्रपाकी, गुणाव्य, अ-
विदाही, त्रिदोपनाशक, बलकारक और मूत्रवईक हैं ॥ १८॥
यवगुणाः।
यवः कपायो मधुरो वातरक्तहरो गुरुः ।
रूक्षः स्थैर्यकरः शीतो मूवमेदकफापहः ॥ १९ ॥
अर्थ-जौ-कपेले,मधुर, वातरक्तनाशक, भारी रूखे, स्थिर-
ताकारक, शीतल तथा मूत्ररोग, मेद और कफनाशक हैं ॥१९॥
गोधूमगुणाः।
गोधूमो वृंहणो बल्यो जीवनो वातपित्तहा।
वृप्यः स्निग्धो गुरुःशीतः सन्धाता स्थर्यकृत्सरः॥२०
अर्थ-गेहूं-पुष्टिकारक, बलरर्दक, अवस्थास्थापक, वात-
पित्तनाशक, शुक्रजनक, स्निग्ध, जारी, शीतल, टुटे हुवे स्थानको
जोडनेवाले और सारक हैं ॥ २० ॥
तृणधान्यानां गुणमाह ।
श्यामाकः शोपणो रुक्षो वातलः श्लेप्मपित्तहा ॥२१
अर्थ-श्यामक (समा.) धान-शोषक, रज, वातवर्द्धक,
और कफपित्तनाशक है ॥ २१ ॥

,
राजवल्लभः।
[ परिच्छेदः
जडिका कोद्रवश्चैव हस्तिश्यामाकचीनको ।
पीनसश्वासकासोरुस्तम्भकण्ठगदान जयेत् ।
कडकांश्चापि जानीयादेत्तान् श्यामाकवद्गुणैः ॥२२॥
अर्थ-उडि, कोदो, हस्तिश्यामाक और चीनियाधान-
पीनस, श्वास, खाँसी, ऊरुस्तम्न (गठिया ) और कण्ठरोगका
नाश करनेवाले हैं । कंगुनीके गुण समाकी समान हैं ॥२२॥
उडिका तत्र कथिता वलासस्य विवर्द्धनी ।
कोद्रवश्च परं ग्राही वातलः कफनाशनः ॥२३॥
अर्थ-उडिधान कफवर्द्धक है । कोदो-ग्राही, वात-बर्दक
और कफनाशक है ॥२३॥
कडका बृंहणी गुरू भन्मसन्धानकृन्मता॥२४॥
अर्थ-कंगूधान-पुष्टिकारक, भारी और भमसन्धानकारक
है ॥ २४ ॥
मुद्गानांभेदाःसामान्यगुणाश्च ।
कृष्णमुद्रा महामुद्गा गौरा हरितपीतकाः।
श्वेता रक्तास्तु निर्दिष्टा लघवः पूर्वपूर्वतः ॥२५॥
प्रधाना हरितास्तत्र वन्यमुद्गास्तु मुद्गवत् ॥२६॥
अर्थ-मूगकी अनेक जाती हैं । जैसे कालीमृग, बडीमग,
मग, गोरे रंगकी मूग, हरी मृग, पीली मूग, सफेद मूग और लाल
मृग। इनमें पूर्व मृगसे पूर्व हलकी है अर्थात् लाल मगसे सफेद
और सफेदसे पीली मूग हलकी है इत्यादि । वनमृगके गुण म-
गी समान हैं ॥ २५ ॥ २६ ॥

तृतीयः ३] भाषाटीशायुतः ।। मुद्रगुणाः। मुद्गः कपायमधुरः कफपित्तासजिल्लघुः । ग्राही शीतः कटुः पाके चक्षुष्यो नातिपातल ॥२७॥ अर्थ- मग-कपेली, मधुर, कफन, रक्तपित्तनाशक, हलकी, मलरोधक, शीतल, पचनमें कटु नेत्रोंको हितकारी और किञ्चित चातवर्द्धक है ॥ २७॥ मकष्टगुणाः। मकुष्टः शीतलो ग्राही कफपित्तक्षयापहः ॥२८॥ अर्थ-मोठ-शीतल, भलरोधक तथा कफ, पित्त और क्षय- रोगनाशक है ॥ २८॥ मापगुणाः। मापो बहुमलो वृप्यः स्निग्धोष्णो मधुरो गुरुः। वातनुत् बृंहणो बल्यो मेदोमांसकफप्रदः॥२९॥ अर्थ-उडद-बहुमलकारक, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, गरम, मधुर, भारी, वातनिवारक, पुष्टिकारक,बलबईक तथा मेद, मांस, और कफकारक है ॥ २९ ॥ राजमापगुणाः। राजमापः सरो रुच्यः कफशुक्राम्लपित्तदा । तत्स्वादुतिलो रुक्षः कपायो विपदो गुरुः ॥३०॥ अर्थ-लोविया-सारक, रुचिकारक तथा कफ, शुक्र और अम्लपिननाशक है। स्वादिष्ठ, वादी, रूखा, कपेला, विषद और भारी है ॥ ३०॥ " ४८ . राजवल्लभः। [ परिच्छेदः मसूरगुणाः। मसूरो मधुरः शीतः संग्राही कफपित्तहा ॥३१॥ अर्थ-मसूर-मधुर, शीतल, मलरोधक और कफपित्तना- शक है ॥ ३१ ॥ चणकगुणाः। चणकोवातलः शीतः कफासूकपित्तपुंस्त्वनुत्॥३२॥ अर्थ-चना-पातकारक, शीतल तथा कफ, रक्तपित्त और- पुरुपतानाशक है ॥ ३२॥ वर्तुलगुणाः। सतीला पातला रणपित्तमा बद्धवर्चसः॥३३॥ अर्थ-मदर-वादी, रक्तपित्तनाशक और मलको बाँध- नेवाली है ॥ ३३ ॥ अतसीगुणाः। अतस्युप्णा च तिक्ता च वातघ्नी श्लेष्मपित्तला॥३४॥ अर्थ-अलसी-गरम, कडवी, वातनाशक तथा कफ और पित्तकारक है ॥ ३४॥ कुलत्थगुणाः। कुलत्यः कफवातघ्नो ग्राह्युग्णो वृंहणः कटुः । गुल्मशुक्राश्मरीमेदःश्वासकासप्रमेहजित् ।। ३५॥ अर्थ-कुलथी-कफ-यातनाराक, ग्राही, गरम, पुष्टिकारक, चरपरी तथा गुल्म, शुक्र, पथरी, मेद, श्वास, खाँसी और प्रमहको दूर कर है ॥, ३५ ॥ - " - तृतीयः] भापाठीकायुतः। तुवरीगुणाः। तुवरी कफपित्तनी कपापा नातिवातला॥३६॥ अर्थ-अडहर-कफ तथा पित्तनाशक है, कपेली और कि- श्चित वातकारक है ॥ ३६॥ तिलगुणाः। तिलो विपाके मधुरो बलिष्टः खिग्धो व्रणालेपन एव पथ्यः । दन्त्योनिमेधाजननोल्पमूत्रस्त्वच्योथ केश्योनिलहा गुरुश्च ॥ ३७॥ अर्थ-तिल-पचनमें मधुर, बलकारक, सिन्ध, व्रणके लेपमें हितकारी, दन्तस्थिरताकारक, जठराग्निवर्द्धक, मेघाजनक, किश्चित् मूत्रकारक, त्वचाके रंगको उज्वलनादायक, केशोंको हितकारी, बातहारी और जारी है ॥ ३७॥ श्रेष्टः कृष्णतिलो मव्यः शुलो हीनतरोऽन्यथा ॥३८॥ अर्थ-तिलोंमें काले तिल उत्तम है, सफेद तिल मध्यम है और इनसे दुसरे अधम हैं ।। ३८ ॥ शिम्विगुणाः। शिम्बा तु विविधा रुक्षा वातला सादुशीतला। विष्टम्भिनी कपायाग्निविदशुक्रकफनाशिनी ॥३९॥ अर्थ-सर्वत्रकारके शिम्बिधान-रक्ष, वादी, स्वादिष्ट, शीतल, विष्टम्जननक, कपाप तथा मल, अभि, शुक्र और कफनाशक हैं । नूतनपुरातनादिदे शुक्रवान्यामीवान्यानांगणमाह । शुकधान्यं शमीधान्यं समातीतं प्रशस्यते । परतो वातदक्षं प्रायेणाभिनवं गुरु ॥१०॥ " द

.
राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
यवगोधूममापाश्च तिलाश्चापि नवा हिताः।
पुराणा विरसा रुक्षा न तथार्थकरा मताः॥११॥
अनातवं व्याधिहतमपर्यायगतं तथा ।
अभूमिजं नवं चापि न धान्यं गुणवत्स्मृतम् ॥ १२॥
अर्थ-शूकधान और शमीधान नवीन अवस्थामें भारी हैं
| यह धान एक वर्षके व्यतीत होनेपर व्यवहारमें लाने चाहिये,
पुराने धान-वातवर्द्धक और रुक्षगुणसंयुक्त हैं, इन सब धान्योंमें
जौ, गेहूं, उडद और तिल यह नूतन अवस्थामें हितकारक हैं
कारण यह है कि यह पुराने होनेपर रसहीन और रूक्ष हो
जाते हैं तथा नवीनकी समान गुण करनेवाले नहीं रहते । विना
ऋतुमें उत्पन्न हुए, व्याधिसे मारे हुए, भुरी भूमिमें उत्पन्न हुए,
कच्चे और नवीन धान गुणकारी नहीं होते ॥४०॥४१॥४२॥
इति धान्यवर्गः ॥
शाकवर्गः।
शाकभेदमाह।
पत्रं पुप्पं फलं नालं कन्दं संस्वेदजं तथा ।
शाकं पइविधमुद्दिष्टं गुरु विद्याद्यथोत्तरम् ।। ४३॥
अर्थ-शाक-पत्र, पुष्प, फल, नाल, कन्द और संस्वेदज इन
भेदोंसे के प्रकारका है। इनमें पत्रसे पुप्प, पुष्पसे फल, फलसे
नाल, नालसै कन्द और कन्दसै संस्वेदज शाक भारी है ॥४॥

तृतीयः ३] भापाटीकायुतः।
५१
शाकसाधारणगुणमाह ।
शाकानि प्रायशस्तावत् द्विष्टम्भीनि गुरूणि च ।
रूक्षाणि बहुवासि सृष्टविण्मारुतानि च ॥ ४४ ॥
अर्थ-सर्वशाक-त्रायः विष्टम्भी, भारी, रूखे, बहुमलयईक,
तथा मल और वायुकारक हैं ॥४४॥
वास्तृकशाकगुणाः।
कटुर्विपाके कृमिहा मेधानिवलवर्द्धनः ।
संस्कारे सर्वदापन्नो वास्तूको रोचनः सरः॥१५॥
अर्थ-वथुआ-पाकमें कटु, कृमिनाशक तथा मेधा, अनि
और बलबईक है, यह तेल घृतादिमें छौंका हुवा त्रिदोपना-
शक, रोचक और कुछ २ दस्तावर है ॥ ४५ ॥
नाडीशाकगुणाः ।
नाडी च शाकं द्विविधं तिक्तं मधुरमेव च ।
रक्तपित्तहरं तिक्तं कोप्टकृमिविनाशनम् ॥ ४६॥
मधुरं पिच्छिलं शीतं विष्टम्भि कफवातकृत् ।
तच्छुकं जलदोपघ्नं पित्तश्लेष्मामवातनुत् ॥४७॥
अर्थ-नाडीका शाक-तिक्त और मयुर इन भेदोंसे दो प्र-
कारका है । तहां तिक्त अर्थात् कडवा शाक-रक्तपित्त, कोठ
और कमिरोगनाशक है, । मधुरशाक-पिरिउल, शीतल, विष्ट-
भकारक और कफवातवईक है। वहीं नाडीका सूखा हुवा
शाक-जलयोप, पित्त, कफ और आमवातनाशक है ॥४६॥४७
कञ्चटशाकगुणाः।
कञ्चटं श्लेष्मलं ग्राहि हिमं पित्तासजिल्लघु ॥४८॥

राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
अर्थ-कञ्चट शाक-कफकारक, ग्राही, शीतल, रक्तपि-
तनाशक और हलका है ॥ ४८ ॥
हिलमोचिकाशाकगुणाः ।
हिलमोची सरा तिक्ता कुष्टनी कफपित्तजित् ॥४९॥
अर्थ-हुलहुलशाक-सारक, कडवा, कुठनाशक तथा
कफपित्तको जीते हैं ॥ ४९॥
कलम्बीशाकगुणाः।
कलम्बी स्तन्यदा प्रोक्ता मधुरा शुक्रकारिणी॥५०॥
अर्थ-कलमीशाक-स्तनोंमें दूध बढानेवाला, मधुर और
शुक्रजनक है ॥५०॥
मारिपशाकगुणाः।
मारिपो मधुरः शीतो विष्टम्भी पित्तजित् गुरुः।
रक्तनात्यादयश्चान्ये तज्जातीयाश्च तद्गुणाः ॥५१॥
अर्थ-मरपाशाक-मधुर, शीतल, विष्टम्नकारक, पित्तनाश-
क और भारी है । इस मारिपजातिके अन्यान्य रक्तवर्णके
नाडीके शाक-मारिपकी समान गुणवाले हैं ॥५१॥
शाफव्यवहारविधिः।
स्विनं निप्पीडितरसं हितं स्नेहादिसंस्कृतम् ॥५२॥
अर्थ-प्रथम शाककू एक जगह कूट लेवे, फिर उसका रस
फैला लेये, इसके उपरान्त शाककू घृतादि स्नेह वस्तुओं द्वारा
पचाकर भोजन करे ॥५२॥
कालशाकगुणाः।
कालशाकं तु कटुकं दीपनं गरशोथजित् ॥५३॥

तृतीयः ३] भाषार्टीकायुतः। अर्थ-कालशाक-चरपरा, अभिप्रदीपक और विषसे उत्प- न हुई सूजनको दूर करे है ॥ ५३ ॥ काकमाचीशाकगुणाः। त्रिदोपशमनी वृष्या काकमाची रसायनी ॥ ५४॥ अर्थ-मकायका शाक-त्रिदोषनाशक, वीर्यवर्द्धक और रसायन है ॥ ५४॥ पूतिकाशाकगुणाः। उपोदिका सरा स्निग्धा वल्या श्लेष्मकरी हिमा। स्वादुपाका रसा वृष्या वातपित्तमदापहा ॥५५॥ अर्थ-पोईका शाक-सारक, स्निग्ध, बलकारक, कफकार- क, शीतल, पचनेमें स्वादिष्ठ, वीर्यवर्धक तथा वात, पित्त और मदनाशक है ॥ ५५॥ सर्पपशाकगुणाः। सार्पपं कृमिलं स्वादु त्रिदोपरक्तपित्तकृत् ॥५६॥ अर्थ-सरसोंका शाक-कमिजनक, स्वादिष्ट, त्रिदोप और रक्तपित्तकारक है ॥ ५६ ॥ सुनिषण्णकशाकगुणाः। अविदाही त्रिदोपन्नः संग्राही सुनिपण्णकः ॥१७॥ अर्थ-शिरिआरीका शाक-अविदाही, त्रिदोपनाशक और ग्राही है ॥ ५७ ॥ शालिञ्चशाकगुणाः। शालिञ्चो दीपनस्तितः पीहार्श कफवातजित्॥१८॥ अर्थ-शान्तिशाक-दीपन, कडवा तथा पीहा, बवासीर और कफवातनाशक है ॥ ५८ ॥ "

--
५४
राजवल्लभः ।
[परिच्छेदः
ग्रीष्मसुन्दरशाकगुणाः।
ग्रीप्मसुन्दरकस्तितो रोचनः कफपित्तजित् ।। ५९।।
अर्थ-ग्रीष्मसुन्दरशाक-कडवा, रोचक, कफ और पित्त-
नाशक है ॥ ५९॥
कासमईशाकगुणाः।
कासमोऽग्निदः स्वर्यः स्वादुस्तिक्तस्त्रिदोपजित्॥६०
अर्थ-कसौदीका शाक-अनिकारक, स्वरको शुद्ध करने-
वाला, स्वादिष्ट, कडया और त्रिदोपनाशक है ॥ ६॥
शतपुप्पशाकगुणाः ।
शतपुप्पा तु मधुरा वातपित्तहरा गुरुः॥ ६१ ॥
अर्थ-सोयेका शाक-मधुर, वात और पित्तनाशक तथा
भारी है ॥ ६१॥
पुनर्नवाशाकगुणाः।
पुनर्नवा तु वीर्योष्णा भेदिनी च रसायनी ।
कफानिलामदुर्नामध्नशोथोदरापहा ॥ ६२॥
अर्थ-पुनर्नवेका शाक-उप्णवीर्य, दस्तावर, रसायन तथा
कफ, वात, आम, बवासीर, ब्रन, सूजन और .उदररोगनाशक
है ॥ ६२॥
मूल कशाकगुणाः।
वालमूलकपत्री तु रोचनी वह्निदीपनी ॥६३ ॥
अर्थ-कची मृलोक पोंका शाक-रुचिकारक और अ-
मिप्रदीपक है ॥ ६३ ॥

तृतीयः ३] भापाटीकायुत्तः ।
५५
तण्डुलीयगाकगुणाः।
तण्डुलीयमसृपित्तविपनुत् स्वादुपाकतः ॥६॥
अर्थ-चौलाईका शाक-रक्तपित्त और विषविनाशक है,
पचनेमें स्वादिष्ट है ॥६४॥
कलायशाकगुणाः ।
कलायशाकं मधुरं पित्तश्लेष्महरं परम् ।
कपायानुरसं रूक्षं विष्टम्भ्यनिलकोपनम् ॥६५॥
अर्थ-मटरका शाक-मधुर, पिननिवारक, श्लेष्मनाशक,
किश्चित् कपेला, रूखा, विष्टम्नी और चातको कुपित करनेवा-
ला है ॥६५ ॥
मण्दूकपर्णीशाकगुणाः ।
मण्डूकपर्णी कासनी स्वादुपाकरसायनी ॥६६॥
अर्थ-मण्डकपर्णीका शाक-कासनाशक, पाकमें स्वादिष्ठ,
रसमें स्वादिष्ट और शीतल है ॥ ६६ ॥
ब्रामीशाकगुणाः।
ब्राह्मी तु भेदिनी गुरू मेध्या पित्तकफापहा ॥६७ ॥
अर्थ-ब्रह्मीका शाक-दस्तावर, भारी, मेधाजनक तथा
पिन और कफनाशक है ॥ ६ ॥
चाङ्गेरीशाकगुणाः।
चाङ्गेरी कफवातघ्नी वह्निकृद् ग्रहणी हिता ॥६८॥
अर्थ-चांगेरीका शाक-कफवातनाशक, पह्निपईक और
संग्रहणी रोगमें हितकारी है ॥ ६८ ॥

राजवल्लभः।
[ परिच्छेदः
प्रहाशाकगुणाः ।
पृका तु मधुरा पाके हिता पित्तकफापहा ॥ ६९ ॥
अर्थ-असवरगका शाक-पचनेमें मधुर, हितकारी और
पित्तकफनाशक है ॥६९ ॥
लागलीशाकगुणाः।
लागली कफपित्तनी रूक्षा वातविवन्धनुत् ॥७॥
अर्थ-लांगलीका शाक-कफपित्तनाशक, रुखा तथा वात
और विबन्धनाशक है ॥ ७० ॥
चुक्रकशाकगुणाः ।
चुक्रकं दुर्जरं भेदी वातजित्पित्तलं गुरु ॥७१॥
अर्थ-चूकेका शाक-दुर्जर (देरमें पचनेवाला), दस्तावर,
वातनाशक, पित्तकारक और भारी है ॥ ७१ ॥
शुपणी-महाराष्ट्रीशाकगुणाः।
शुपणी कफवातनी महाराष्ट्री च ताशी ॥७२॥
अर्थ-शुपणी और जलपीपलका शाक-कफ और वात-
नाशक है ॥ ७२॥
जयन्तीशाकगुणाः।
जयन्ती गरदोपनी चक्षुप्या मधुरा हि सा ॥७३॥
अर्थ-जयन्तीका शाक-विपविकारविनाशक, नेत्रोंको
हितकारी और भारी है ॥७३॥
फदलीमोचकगुणाः।
कदलीमोचकं हृद्यं कफघ्नं कृमिनाशनम् ।
तृष्णाठीहज्वरं इन्ति दीपनं वस्तिशोधनम् ॥७॥

तृतीयः ३] भापाटीकायुक्तः। अर्थ-केलेका मोचा--हृदयको हितकारी तथा कफ, कमि, तृपा, पीहा और ज्वरको दूर करनेवाला है दीपन और बस्तिशोधक है। गोक्षुरगाकगुणाः। तिक्तं गोक्षुरकं शाकं वृष्यं स्रोतोषिशोधनम् ।।७५॥ अर्थ-गोखुरुयोंका शाक-कडवा, वीर्यवर्द्धक और स्रोतो- विशोधन है ॥ ७५॥ शाकसाधारणगुणा। सर्व शाकमचक्षुप्यमजङ्गेयममैथुनम् । ऋते पटोलवास्तूककाकमाचीपुनर्नवाः॥७६ ॥ अर्थ-पटोल (परवल ), वथुआ, मकोय और पुनर्नवेको छोडकर अन्यशाक-नेत्रोंको अहित करनेवाले, जंघाके बलको हरनेवाले और मैथुनशक्तिनाशक हैं ॥ ७६ ॥ पटोलशाकगुणाः। पटोलं कफपित्तास्त्रज्वरकुष्टत्रणापहम् ।। ७७ ।। अर्थ-पटोलशाक-कफ, रक्तपित्न, ज्वर, कुष्ठ और व्रण- विनाशक है ॥ ७७ ॥ शाकभक्षणदोषमाह । शाकं भिनत्ति वपुरस्थि निहन्ति नेत्रम् । वर्ण विनाशयति शुक्रमथासृजं च ॥ प्रज्ञाक्षयञ्च कुरुते पलितं च नूनम् । हन्ति स्मृतिं गतिमिति प्रवदन्ति तज्ज्ञाः॥७८॥ अर्थ-शाक भक्षण करनेसे शरीरकी हड्डी विनष्ट हो जाती । तथा वर्ण, शुक्र और रुधिरका नाश होता है । बुद्धि,स्मरण-

"
राजवल्लभः।
[ परिच्छेदः
शक्ति और गमनशक्ति नाशको प्राप्त होती है, तथा पिना
समयकेही बाल धवल हो जाते हैं ॥ ७८॥
शाकेषु सर्वे निवसन्ति रोगा रोगो हि देहस्य वि-
नाश हेतुः। तस्मात् बुधैः शाकविवर्जनञ्च कार्य
तथाम्लेषु त एव दोपाः ॥७९॥
अर्थ-सर्व प्रकारके शाकोंमें रोग रहते हैं, और रोगही
शरीरके नाश करनेकू हेतु है, इसलिये विद्वानांको शाक त्यागना
चाहिये । अम्लमंत्री शाकहीकी समान गुण है इस कारण
अम्लाकामी त्याग करना ॥ ७९ ॥ इति पत्रशाकगुणाः॥
पुप्पशाकगुणमाह।
वरुणपुष्पगुणमाह।
पुप्पं वरुण ग्राहि पित्तनमामवातजित् ॥ ८०॥
अर्थ-बरनाका फूल-ग्राही तथा पित्त और आमवात-
नाशक है ॥ ८०॥
वासक-वङ्गसेनपुष्पस्य च गुणमाह ।
वासकस्य च पुप्पाणि वङ्गसेनस्य चैव हि ।
कटुपाकानि तिक्तानि कासशयहराणि च ।। ८३॥
अर्थ-विसटिको फूल और अगस्तियांक फूल-पचनेमें चर-
परे, कडव तथा खांसी और क्षयरोगकृ हरनेवाले हैं ।। ८१ ॥
फोचिदारादिपुष्पगुणाः ।
कोविदारकबुंदारशणशाल्मलिपुप्पकम् ।
ग्रादि शाकं प्रशस्तं च रक्तपित्ते विशेपतः॥ ८२ ॥

तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। अर्थ-कोविदार (लाल कचनार),कर्बुदार(सफेद कचनार), सन और सेमलके फूलोंका शाक-मलरोधक और रक्तपिननि- वारक है ।। ८२॥ मधूकपुष्पगुणमाह। मधूकपुप्पं चाहृद्यं तर्पणं बृंहणं परम् ॥८३ ॥ अर्थ-महुबेका फूल-हृदयको हितकारी, तर्पण और पुष्टिकारक है ॥ ८३॥ करीरवंशपुष्पगुणाः। करीरो वंशजो रूक्षो वातपित्तकरः कटुः । सकपायो विदाही च श्लेष्मनः पाकतः कटुः॥८॥ अर्थ- करीलके और वाँसके फूल- रूखे, वातपित्तकारक, चरपरे, कपेले, दाहजनक, कफनाशक और पाकमें कटु हैं ।। ८४॥ गुवाकादिवृक्षमस्तकगुणाः । गुवाकतालखर्जूरनारिकेलशिरसि च । स्वादुतिक्तकपायाणि मूत्रातङ्कहराणि च ॥ ८५ ॥ वलप्राणकराण्याहुः शुक्रवृद्धिकराणि च ॥८६॥ अर्थ-सुपारी,ताड, खजूर और नारियलके वृक्षका मस्तक- स्वादिष्ट, कडवा, कपेला, मूत्ररोगनाशक तथा बल, आयु और शुक्रवर्द्धक है ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ तालप्रलम्बगुणाः। तथा तालप्रलम्वं च सूक्षक्षतरुजापहम् ॥ ८७॥ - राजवल्लभः । [ परिच्छेदः अर्थ-तालपलम्बकेभी गुण तालके मस्तककी समान हैं विशेषकरके सूखा और क्षतरोगनाशक हैं ।। ८७ ॥ सुनाकपुष्पगुणाः। मुनातकं परं स्वादु वृष्यं पित्तानिलापहम् ॥ ८८}} अर्थ-मुझातके फूल-स्वादिष्ठ, वीर्यवईक तथा पित्त और वातनाशक हैं ॥ ८८॥ इति पुप्पशाकगुणाः॥ अथ फ्लशाकगुणमाह। वातोकुफलापाः। - अमिप्रदा मारुतनाशिनी च शुक्रप्रपारा शोणितव- द्विनी च । हल्लासकासारुचिनाशिनी च वाता- रेपा गुणसप्तयुक्ता ।। ८९॥ अर्थ-बैंगन-जठरानिमदीपक, वातनाशक वीर्यजनक, र- कवर्द्धक तथा हल्लास (उपकाई ), खांसी और असचिनाशक है। यह सात गुण बैंगनमें स्वभावसही विद्यमान हैं ॥ ८९ ॥ कोमल-पक-वार्ताकुगुणाः। साबाला कफपित्तनी पक्का सक्षारपित्तला ॥९॥ अर्थ-कथा बैंगन-कफ और पित्तनाशक है । पका बैंगन क्षारयुक्त और पित्तवर्द्धक है ।। ९० ॥ मध्यमवार्ताकुगुणा सदाफला निदोपनी रक्तपित्तप्रसादनी । फण्डूकच्छ्रहरी चैव वा की गुणवत्तर। ॥ ९१ ॥ अर्थ-सदाफल अंगन-प्रिोपनाशक, रचपिनप्रसादक तथा , तृतीयः ३] भापाटीकायुतः । कण्डू और कच्छ्र रोगनाशक है । वार्नाकीके गुण इनसे अधिक हैं । ९१ ॥ कण्टकयुक्तवाकिगुणाः। कण्टकी कहतीक्ष्णोष्णा रक्तपित्तप्रकोपनी। कण्डूकच्छूहरी चैव वाताकी दोपला मता ॥ ९२ ।। अर्थ-कण्टकयुक्त बैंगन-कटु,तीक्ष्ण, उष्ण, रक्तपित्तपको- पक तथा कण्डू और कच्छूनाशक है । इसी प्रकारकी वार्ता- की दोपकारक है ॥ ९२ ॥ अङ्गारपकवार्ताकुगुणाः। अङ्गारपकवार्ताकुः किञ्चित् पित्तकरी मता! कफमेदोऽनिलहरा सरा लघुतरा परम् ॥ ९३ ॥ अतो गुरुतरा चैव सतललवणान्विता ॥ ९४॥ अर्थ-अंगारेपे पकाये हुवे बैंगन अर्थात् बैंगनका जुरता किश्चित् पित्तकारक तथा कफ, मेद और यातविनाशक है, सारक और हलका है । यही जुरता तेल और लवणके संयो- गसे जारी हो जाता है ।। ९३ ॥ ९४ ॥ वृहत्याः कण्टकाऱ्यांश्च फलगुणाः । बृहत्याः कण्टकार्याश्च फलं पित्तकफापहम् । कण्डूकुष्टकृमिन्नं च लघूष्णं कटुतिक्तकम् ।। ९५ ॥ अर्थ-बृहती और कटेराके फल-पित्त, कफ, कण्डू, कुष्ठ आर कृमिनाशक हैं । हलके, गरम. चरपर और कडये - राजवल्लभः। [परिच्छेदः कूष्माण्डगुणाः। कूष्माण्डकं पित्तहरं वालं मध्यं कफापहम् । पक्वं लघूष्णं सक्षारं दीपनं वस्तिशोधनम् ।। ९६॥ सर्वदोपहरं हृद्यं पथ्यं चेतोविकारिणम् ॥ ९७॥ अर्थ-कच्चा पेठा-पित्तनाशक । मध्यम पेठा-कफनाशक । पक्का पेठा-हलका, गरम क्षारयुक्त, जठराग्निप्रदीपक, बस्तिशो- धक, त्रिदोपनाशक, हृदयको हितकारी और हृदयरोगवालेको पथ्य है ।। ९६ ॥ ९७ ॥ अलावुगुणाः। अलावुभैदिनी गुर्वी पित्तनी कफला हिमा। पाण्डुवर्णः कृमिश्लेष्मपित्तजित्तिक्तको लघुः ॥९८॥ अर्थ-अलाबु (कडू, तोम्बी)-भेदक, भारी, पित्तनाशक, कफकारक और शीतल है । पाडूरंगका कह-कमि, कफ और पित्तनाशक है, कडवा और हलका है ॥ ९८॥ झिङ्गाकगुणाः। झिङ्गाकं तिक्तमधुरमामवातानिमान्यकृत् ॥९९ ।। अर्थ-झिमनी-कडवी, मधुर तथा आमवात और मन्दा- निकारक है ।। ९९ ॥ अपुपैरगुणाः। अपुर्वारुके स्वादुगुरुविएम्भिशीतले । मुसपियं च रूक्षं च मूत्रदं त्रपुपन्विति ॥ १०॥ एवारुकं च संपकं दातृष्णाकमातिनुत् ॥ १०१॥ अर्थ-वारा ओर फूट-स्वादिष्ठ, भारी, विष्टकारक,

तृतीयः ३] भापाटीकायुतः।
शीतल है । खोग-मुखप्रिय, रूखा और मूत्रवर्दक है । पक्की
फूट-दाह, तृषा और क्लान्निको दूर करे है ।।३०० ॥३१॥
कर्कटी
फलगुणाः।
कर्कट्यास्तु फलं पक्वं छर्दितृष्णालमार्तिनुत् ॥१०२॥
अर्थ-पकीहुई ककडी-चमन, तृपा और कान्तिनाशक है ३ ०२
शीर्णन्तगुणाः।
शीर्णवृन्तं कफकरं सक्षारं मधुरं लघु ॥ १०३॥
अर्थ-शीर्णवृन्त (एक प्रकारका तरबूज)-कफकारक,
क्षारयुक्त, मधुर और हटका है ॥ ३०३॥
चलानगुणाः।
चेलानं गुरु विष्टम्भि मधुरं वातपित्तनित् ॥१०॥
अर्थ-तरबूज-जारी, विष्टम्नकारी, मधुर और बातपिनना-
शक है ॥ १०॥
कारवेल्लगुणाः।
कारखेल्लमवृष्यं च रोचनं कफपित्तजित् ॥ १० ॥
अर्थ-करेला-अवृप्य, रोचक तथा कफ और पिचनाश-
क है ॥ १०५ ॥
कर्कोटकफलगुणाः।
कर्कोटकफलं ज्ञेयं कारखेल्लकवद्गुणेः ॥ १०६॥
अर्थ-ककोडेके गुण-करेलेकी समान जानने । १०६॥
दीर्घपटोलिकागुणाः।
दीर्घपटोलिका स्निग्धा कटु विष्टम्भि वातला।
भेदिनी मधुरा रुच्या शीतला श्लेप्मकोपना॥१०७॥

- राजवल्लभः। [परिच्छेदः अर्थ-दीर्घपटोलिका-(एकप्रकारकी तोरई) निन्ध, कटु, विष्टम्भकारक, वातवर्द्धक, भेदक, रुचिकारक, शीतल और कफको कुपित करनेवाली है ॥ १०७ ॥ पटोलगुणाः। पटोले कफपित्तास्रवणकुष्ठज्वरापहम् । विसर्पनयनव्याधित्रिदोपगरनाशनम् ॥ १०८॥ अर्थ-पटोल ( परवल )-कफ, रक्तपित्त, व्रण, कुछ,ज्वर, विसर्प, नेत्ररोग, त्रिदोप और विपको दूर करे है ॥ १०८ । पटोलपत्रं पित्तनं नाडी तस्य कफापहा । फलं तस्यास्त्रिोपगं मूळ तस्या लिस्वनम् ॥१०९।। अर्थ-पटोलपत्र-पित्तनाशक है। इसकी नाडी-कफनाशक है। इसका फल-प्रिदीपनाशक है।इसकी जड-दस्तावर है१०९ नाडीशाकगुणमाइ । कुष्मांडनाहीगुणाः। कृप्माण्डनाडिका गुर्वी शर्कराश्मरिनाशिनी।।११०॥ अर्थ-पेठेकी उंटी-भारी तथा शर्करा और पथरीनाशक है ॥ ११ ॥ अलावुनादीगुणाः । अलावुनाडिका गुर्वी मधुरा मलभेदिनी ॥ १११॥ अर्थ-कट्टकी टंडी-भारी, मधुर और मलादक है। १११॥ घेताग्रगुणाः। पंताय दीपनं सच्यं वातपित्तकफापदम् ।। ११२॥

तृतीयः ३] भाषाकायुत्तः। अर्थ-वेतका कोमल अग्रजाग-अग्निप्रदीपक, रुचिकारक और कफनाशक है ॥ ११२ ॥ इति नाडीशाकगुणाः ॥ मूलशाकगुणमाह। गरणगुणाः। शूरणो दीपनो रुच्यः कफनो विशदो लघुः । विशेपादर्शसां पथ्यो ग्राम्यः कन्दन्तु रोपलः||११३ अर्थ-जिमीकन्द-जठरामिप्रदीपक,रुचिकारक,कफनाशक, विशद, हलका और विशेषकरकै बवासीररोगमें हितकारी है। ग्राम्यजिमीकन्द दोपकारक है ॥ ११३ ॥ माणकगुणाः। माणकं स्वादु शीतं च गुरु शोधहरं कटु ॥ ११४॥ अर्थ-मानकन्द-स्वादिष्ठ, शीतल, भारी, शोथ (सूजन )- नाशक, और चरपरा है ॥ १३४॥ कचुगुणाः। कच्ची सरा कटुक्यामवातकृद्गुरुपिच्छला ॥११॥ अर्थ-कचुकन्द-सारक, कटुपाकी, आमवातकारक, भारी और पिच्छल है ॥ १५॥ कदलीमूलगुणाः। कदल्या वलकृन्मूलं वातपित्तहरं गुरु ॥ ११६॥ अर्थ-केलेकी जड-बलकारक, वातपित्तनिवारक और जारी है ॥ ११६ ॥ केबुकमूलगुणाः। केबुकं कफपित्तनं रोचनं वह्निदीपनम् ॥ ११७॥ . -

राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
अर्थ-केउँआकी जड-कफपित्तनाशक, रुचिकारक और
अमिदीपक है।११७॥
मूलकगुणाः।
मूलकं गुरु विटम्भि तीक्ष्णमामं त्रिदोपकृत् ।
तदेव स्नेहपकं चेत्कफकृद्धातपित्तजित् ॥ ११८॥
अर्थ-कच्चीमूली-भारी, विष्टम्भकारी, वीक्ष्ण तथा त्रिदोप-
कारक है। वही मुली घृतादि पचाई हुई-कफकारक और वात-
पिचहारक है ॥ ११८॥
शुष्कमूलकगुणाः।
शुष्कं त्रिदोपशमनं शोथप्नं गरजिल्लघु ॥ ११९ ।।
अर्थ-सूखी मूली-त्रिदोपकू शान्ति करनेवाली, सूजनको
दूर करनेवाली और विपको हरनेवाली है ॥ ११९ ॥
मूलकपुष्पफलगुणाः ।
तत्पुप्पं कफपित्तनं तत्फलं कफवातजित् ॥१२०॥
अर्थ--मूलीके फूल-कफ-पित्तनाशक हैं । मूलीकी फली-
कफवातनाशक है ॥ १२० ॥
खण्डकर्णगुणाः।
खण्डकर्णो कफोच्छेदी कटुपाकश्च पित्तजित् ॥१२१
अर्थ-खण्डकर्ण आलू-कफनाशक, पाकमें कटु और पि-
तनिवारक है ।। १२१ ॥
पाराहीकन्दगुणाः।
वाराहीकन्दः शेप्मनः पित्तकृद्धलवर्द्धनः ॥ १२२॥

तृतीयः ३] भापारीकायुतः। अर्थ-बाराहीकन्द-कफनाशक, पित्तकारक और बलबई- कहै ॥ १२२॥ विदारीकन्दगुणाः। विदारी वातपित्तनी वृष्या बल्या रसायनी ।। १२३॥ अर्थ-विदारीकन्द-बात और पित्तनाशक, वीर्यवर्द्धक और रसायन है ॥ १२३ ॥ वंशकरीरगुणाः। वंशकरीराः श्लेष्मन्नाः सकपायविदाहिनः ॥१२४॥ अर्थ-वंशकरीर ( बाँसका कल्ला)-कफनाशक, कपेला और दाहजनक है ॥ १२४ ॥ हस्तिकन्दादिगुणाः। हस्तिमध्वालुकादीनि रक्तपित्तहराणि च । गुरूणि स्वादुशीतानि स्तन्यशुक्रकराणि च॥१२५॥ अर्थ-हस्तिकन्द और मधु आलू-रक्तपित्तनाशक, भारी, स्वादिष्ठ, शीतल, स्तनोंमें दूध बढानेवाले और शुक्रको उत्पन्न करनेवाले हैं ॥ १२५ ॥ पिण्डालुकगुगाः। पिण्डालुकं कफकरं गुरु वातप्रकोपनम् ॥ १२६॥ अर्थ-पिण्डालू-कफकारी, भारी और पातक कुपित करे है ॥ १२६ ॥ तरुप्तादिगुणाः। तरुप्तविसशालूकं क्रौञ्चादनकशेरुकम् । शृङ्गाटकाङ्कलोड्यञ्च गुरु विष्टम्भि शीतलम् ॥१२७ राजवल्लभः। { परिच्छेदः अर्थ-तरुप्त ( नीलोत्पलकी जड)-बिस, शालूक( भसडिा), क्रोच्चादन (घघोल), कशेरु, सिंघाडा और अंकलोब्य-भारी, विष्टम्भकारी और शीतल है ॥ १२७॥ इति मूलकशाकगुणाः ॥ स्वेदजशाकगुणाः। छत्रिकास्तु पलालेाकरीपक्षितिरेणुजाः। सर्वाः संस्वेदजाःशीताः कपायाःस्वादुशीतलाः१२८ गुरवश्यतीसारज्वरश्येप्मामयप्रदाः॥ १२९॥ अर्थ-पलाल अर्थात् अन्नरहित अन्नकी नाल,इंस, सूखा भावर और रेणुमें उत्पन्न होनेवाला संस्वेदज शाक-शीतवीर्य, कपेला, स्वादिष्ट, शीतल, भारी तथा वमन,अतिसार, ज्वर और कफरोगको दूर करनेवाला है ॥ १२८ ॥ १२९ ॥ पलालजशाकगुणाः । स्वादुपाकरसा रूक्षा दोपलास्तु पलालजाः॥१३०॥ अर्थ-पलालज संस्वेदजात शाक-रूक्ष और त्रिदोषजनक है ॥ १३०॥ शुचिस्थलादिजातशाकागुणाः। श्वेताः शुचिस्थलीकाप्टवंशगोव्रजसम्भवाः । नातिदोपकरा ज्ञेयाः शेपास्त्वेभ्यो विगर्हिताः॥३१ अर्थ-शुचिस्थली (सफेद दृढभूमि), काठ, पाँस, गोवज (जिस स्थानमं गा विचरण करती हैं) इत्यादि संस्वेदजात शाक- किंचित् दोपकारक हैं । इनमें गोष्ठजात शाक अल्पगुणवाला है ॥ १३१ ॥ इति स्वेदजशासगुणाः ।।

तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। फलगुणमाह। बालमध्यमाम्रगुणाः । आम्रवालं रक्तपित्तकरं मध्यन्तु पित्तलम् ॥ १३२॥ अर्थ-कच्ची अमिया-रक्तपित्तकारक और तरुण आमपित्त- जनक है ॥ १३२॥ पकाम्रफलगुणमार। पक्कं वर्णकरं रुच्य मांसशुक्रवलप्रदम् । पित्तविरोधि वातघ्नं हृद्यं गुर्वनुलोमनम् ।। १३३॥ अर्थ-पक्का आम-शरीरके रंगको सुंदर करनेवाला, रुचि- कारक तथा मांस, शुक्र और बलबईक है, पित्तनिवारक, वा- तनाशक, हृदयको हितकारी, भारी और अनुलोमन है। १३३॥ मधुना तत्क्षयप्टीहवातश्लेप्महरं परम् । सघृतं वातपित्तघ्नं दीपनं बलवर्णकृत् ॥ १३॥ अर्थ-यह मधुके साथ-शय, पीहा और वातको दूर करे है। घृतके साथ-वातपित्तनाशक, जठरामि प्रदीपक तया बल और वर्णकारक है ॥ १३४ ॥ आम्रपेपीगुणाः। आम्रपेपी कपायाम्ला भेदिनी कफवातजित्।।१३६॥ अर्थ-आमपेपी अर्थात् अमचूर-कपेला, सट्टा, भेदक त- था कफ और वातनाशक है ॥ १३५ ॥ दाडिमगुणाः। दाडिमं हृद्यमम्लोणं वातघ्नं ग्राहि दीपनम् । कपायानुरसं प्रोक्तं कफपित्तविरोधि च ।। १३६॥ 1

राजवल्लभः।
{ परिच्छेदः
अर्थ-अनार--हृदयको हितकारी, खट्टा, गरम, वातविना-
शक, ग्राही, दपिन, किंचित्कपेला तथा कफ और पित्तनिवार-
-
दाडिमभेदेन गुणमाह ।
द्विविधं तत्तु विज्ञेयं मधुरं चाम्लमेव च ।
मधुरन्तु त्रिदोपनं आम्लं वातकफापहम् ॥ १३७॥
ज्वरनं दीपनं पथ्यं पाके लध्यग्निदीपनम् ॥ १३८॥
अर्थ-अनार-अम्ल और मधुर इन भेदोंसे दो प्रकारका
है। तहाँ मधुर अनार-त्रिदोपनाशक है । और अम्ल अर्थात्
खट्टा अनार-बात-कफनाशक है । ज्वरनिवारक, रुचिकारक,
पथ्य,लघुपाकी और जठराग्रिको दीपन करे है॥१३७॥१३८॥
मातुलङ्गफलगुणमाह ।
मातुलुङ्गफलं हृद्यमम्लं लध्वग्निदीपनम् ।
श्वासकासारुचिहरं तृष्णानं कण्टशोधनम् ॥ १३९॥
विवढे चैव हिकायां शूले छदयाञ्च शस्यते।।१४०॥
अर्थ-विजोरा नीबू-हृदयको हितकारी, खट्टा,हलका, अ-
मिप्रदीपक, तथा श्वास,खाँसी, अरुचि और तृष्णानिवारक है।
कण्ठशोधक, यह मूत्रमलकी विवन्धता, हिक्कारोगमें, शूलरोग-
में और वमन रोगमें हितकारी है ॥ १३९ ॥१४॥
लिम्पाकगुणाः।
लिम्पाकं सुरभि स्वादु नात्यम्लं भक्तरोचकम् ।
वातश्लेप्महरं हृद्यं छर्दिनं नातिपित्तकृत् ॥ १४१॥

- तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। अर्थ-लिम्पाक (एक प्रकारका जम्मानिीबू)--सुगन्धि,स्वा- दिष्ठ, किंचित् अम्ल, अन्नरोचक, वात-कफनाशक, हृदयको हितकारी, वमनको दूर करनेवाला और किंचित् पित्तकारक है ॥ १४१ ॥ जम्बीरगुणाः। जम्बीरं मधुरं किञ्चिदत्यम्लं पित्तकृत् गुरु । सुगन्धि दुर्जरं वह्निकफवातविवन्धनुत् ॥ १४२ ॥ अर्थ-जनौरीनीवू-किंचित् मधुर, अत्यन्त अम्ल, पित्त- कारक, भारी, सुगन्धि, दुर्जर तथा अमि, कफ, वात और विवन्धनाशक है ॥ १४२ ॥ मधुकछटिकागुणाः। मधुकुकृटिका शीता श्लेप्मास्यस्यप्रसादनी । रुच्या स्वादुर्गुरुः स्निग्धा वातपित्तविनाशिनी।।१४३ अर्थ-चकोतर-शीतल, कफकारक, मुखको निर्मल करने- बाला, रुचिको उत्पन्न करनेवाला, स्वादिष्ठ, भारी, स्निग्ध, वात और पित्तनाशक है ॥ १४३ ॥ नागरंगगुणाः। नागरंगन्तु सुरभि विपाके दुर्जरं गुरु । नात्यम्लमीपन्मधुरं वृष्यं वातविनाशनम् ॥१४॥ अर्थ-नारंगी-सुगन्धित, पाकमें दुर्जर, नारी, किश्चित अम्ल, ईपत् मधुर, वीर्यवर्द्धक और वातविनाशक है।।१४४॥

७२
राजवल्लभः।
[ परिच्छेदः
अपफकर्कन्धु-कोल-पदराणां गुणाः।
कर्कन्धुकोलबदरमाम पित्तकफावहम् ।। १४५ ।।
अर्थ-कर्कन्धु (छोटी जातिके बेर ), कोल ( साधारण
बेर ), बदर (बडी जातिके घेर ) यह सब कच्चे-पित्त और
कफवर्द्धक हैं ॥ १४५॥
तेपां पकगुणाः।
पकं पित्तानिलहरं स्निग्धं समधुरं सरम् ॥ १४६ ॥
अर्थ-वही पक्के बेर--पित्त और वातविनाशक है,तथा स्नि-
ग्ध, मधुर और सारक हैं ॥ १४६ ॥
तेषां शुष्कगुणाः।
तच्छुप्कं कफवातघ्नं नच पित्ते विरुध्यते ।।१४७ ।।
अर्थ-वहीं सूखे बेर-कफ और वातनाशक हैं, और पित्तव-
ईक नहीं हैं ॥ १४७ ॥
स्तेपा पुरातनगुणाः।
पुराणं तृट्रप्रशमनं श्रमघ्नं दीपनं लघु ॥ १४८॥
अर्थ-वही पुराने बेर-तृपाको शान्ति करनेवाले, श्रमनाश-
क, दीपन और हलके हैं ॥ १४८॥
करमईगुणाः।
करम पिपासानमम्लं रुच्यञ्च पित्तकृत् ॥ १४९॥
अर्थ-करोंदा-पियासको हरनेवाला,खट्टा, रुचिकारक और
पिनजनक है ॥ १४९ ॥
लियफलगुणाः।
लिकुचं गुरु विष्टम्भि त्रिदोपशुक्रदूपणम् ॥ १५ ॥

-
तृतीयः ३] भापाठीकायुतः।
अर्थ-बडहर-भारी, विष्टम्भकारक, त्रिदोपजनक और शु-
को दूपित करे है ॥ १५० ॥
आम्रातकफलगुणाः।
आम्रातं तर्पणंबल्यं गुरु विष्टम्भ्यजीर्णकृत् ॥ १५१॥
अर्थ-अम्बाडा-तृप्तिकारक, बलवर्द्धक, भारी और विष्ट-
म्न, अजीर्णकारक है ॥ १५१ ॥
कर्मरंगफलगुणाः।
कर्मरगन्तु तीक्ष्णोष्णं कटु पाकेऽम्लपित्तकृत् १५२
अर्थ-कमरख-तीक्ष्ण, गरम, पचनेमें चरपरी, खट्टी और
पित्तकारक है ॥ १५२॥
प्राचीनामलकगुणाः।
पानीयामलकं ग्राहि स्वादम्लं मुखशोधनम् ॥१५३॥
अर्थ-पानीआमला-ग्राही, स्वादिष्ठ, अम्ल और मुखशोध-
क है ॥ १५३॥
यदुवारफलगुणाः।
बहुवारं हिमं वृप्यं श्लेप्मलं मधुरं गुरु ॥ १५॥
अर्थ-बहुवार (लिसोडा)-शीतल, वीर्य्यवईक, कफकार-
क और भारी है ॥ १५४ ॥
लवनीफलगुणाः।
लवनीनां फलं हृद्यं सुगन्धं कफवातजित् ॥ १५५॥
अर्थ-हरफारेवडी-हृदयको हितकारी, सुगन्धि तथा कफ
और वातनाशक है ॥ १५५॥

७२ राजवल्लभः। परिच्छेदः अपफर्कन्धु-कोल-यदराणां गुणाः। कर्कन्धुकोलबदरमामं पित्तकफावहम् ॥ १४५॥ अर्थ-कर्कन्धु (छोटी जातिके घेर ), कोल (साधारण बेर ), बदर ( बडी जातिके बेर ) यह सब कच्चे-पित्त और कफवर्धक हैं ।। १४५॥ तेपां पकगुणाः। पक्कं पित्तानिलहरं स्निग्धं समधुरं सरम् ।। १४६ ॥ अर्थ-वहीं पक्के बेर--पित्त और वातविनाशक हैं,तथा स्नि- ग्ध, मधुर और सारक हैं ॥ १४६ ॥ तेषां शुष्कगुणाः। तच्छुप्कं कफवातघ्नं नच पित्ते विरुध्यते ॥१४७॥ अर्थ-वही सूखे बेर-कफ और वातनाशक हैं, और पित्तव- ईक नहीं हैं ॥ १४७ ॥ तेषां पुरातनगुणाः। पुराणं तृप्रशमनं श्रमन्नं दीपनं लघु ॥ १४८॥ अर्थ-वही पुराने बेर--तृपाको शान्ति करनेवाले, श्रमनाश- क, दीपन और हलके हैं ॥ १४८॥ करमईगुणाः। करमर्दै पिपासानमम्लं रुच्यञ्च पित्तकृत् ॥ १४९॥ अर्थ-करोंदा-पियासको हरनेवाला,खट्टा, रुचिकारक और पित्तजनक है ॥ १४९॥ लियफलगुणाः। लिकुचं गुरु विष्टम्भि विदोपशुक्रदूपणम् ।। १५० ॥

- - " तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। अर्थ-बडहर-भारी, विटम्नकारक, त्रिदोपजनक और शु- कको दूपित करे है ॥ १५०॥ आम्रातकफलगुणाः। आम्रातं तर्पणवल्यं गुरु विष्टम्भ्यजीर्णकृत् ।। १५१॥ अर्थ-अम्बाडा-तृतिकारक, बलवर्द्धक, भारी और विष्ट- म्ज, अजीर्णकारक है ॥ १५१ ॥ कर्मरंगफलगुणाः। कम्मरकन्तु तीक्ष्णोष्णं कटु पाकेऽम्लपित्तकृत् १५२ अर्थ-कमरख-तीक्ष्ण, गरम, पचनेमें चरपरी, खट्टी और पित्तकारक है ॥ १५२॥ प्राचीनामलकगुणाः। पानीयामलकं ग्राहि स्वादम्लं मुखशोधनम् ॥१५३॥ अर्थ-पानीआमला-ग्राही, स्वादिष्ठ, अम्ल और मुखशोध- क है ॥ १५३॥ बहुवारफलगुणाः। बहुवारं हिमं वृष्यं श्लेप्मलं मधुरं गुरु ॥ १५४॥ अर्थ-बहुवार (लिसोडा)-शीतल, वीर्य्यवईक, कफकार- क और भारी है ॥ १५४ ॥ लवनीफलगुणाः। लवनीनां फलं हृद्यं सुगन्धं कफवातजित् ॥ १५५॥ अर्थ-हरफारवडी-हृदयको हितकारी, सुगन्धि तथा कफ और वातनाशक है ।। १५५॥

राजवल्लभः। [ परिच्छेदः जम्घुफलगुणाः । जाम्बवं गुरु विष्टम्भि कपायं स्वादु शीतलम् । अग्निसन्दूपणं रूक्षं वातलं कफपित्तजित् ॥ १५६।। अर्थ-जामुन-भारी, विष्टम्भकारक, कपेली, स्वादिष्ट,शीत- ल, अग्निदूपक, रूखी, वातवर्द्धक तथा कफ और पित्तनाशक है ॥ १५६ ॥ भव्यफलगुणाः। भव्यं स्वादु कपायाम्लं हृद्यमास्यविशोधनम्॥१५७ अर्थ-भव्यफल-स्वादिष्ठ, कपेला, खट्टा, हृदयको हितका- री और मुखशोधक है ॥ १५७ ॥ अपकतिन्दुकफलगुणाः। तिन्दुकं वातकृच्चामं कपायं गुरु शीतलम् ।। १५८॥ अर्थ-कच्चा तेंदु-वातनाशक, कपेला, भारी और शीतल है ॥ १५८॥ पकतिन्दुकफलगुणाः। पकन्तु गुरु पाके तु मधुरं कफपित्तनुत् ॥ १५९ ॥ अर्थ-पक्का तेंदु-भारी, पचनेमजी भारी, मधुर तथा कफ और पित्तनाशक है ॥ १५९॥ अपकपरूपकफलगुणाः । परूपमामं वातघ्नं पित्तकारि च तत्स्मृतम् ॥१६०॥ अर्थ-कच्चा फालसा-यातविनाशक और पित्तकारक है ॥ १६०॥ +

तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः।
पक्परूपकफलगुणाः।
पक्कं स्वादुरसं पाके शीतलं वातपित्तनुत् ॥१६॥
अर्थ-पक्का फालसा-पाकमें और रसमें स्वादिष्ठ, शीतल
तथा वात और पित्तनाशक है ॥ १६ ॥
अपककपित्य-फलगुणाः।
कपित्थमामं कण्डूघ्नं विपघ्नं ग्राहि वातलम् ।
मधुराम्लकपायत्वात् सौगन्ध्याच रुचिप्रदम्॥१६२॥
अर्थ-कच्चा कैथ-कण्डूनाशक, विपविनाशक, मलरोधक,
वातवर्द्धक, यह मधुर, अम्ल और कपायरसयुक्त होनेसे तथा
सुगन्धिसहित होनेसे रुचिदायक है ॥ १६२ ॥
पक्ककपित्थफलगुणाः।
तदेव पक्कं दोपघ्नं गुरु ग्राहि विपापहम् ॥ १६३॥
अर्थ-पक्का कैथ-त्रिदोपनाशक, भारी, ग्राही और विपवि-
नाशक है ॥ १६३ ॥
अपक्काम्लवेतसगुणाः।
अम्लवेतसमत्यम्लमानाहकफवातजित् ॥ १६४॥
अर्थ-कचा अमलवेत-अत्यन्त खट्टा तथा आनाह, कफ
और वातनाशक है ॥ १६४ ॥
पक्काम्लवेतसगुणाः ।
तदेव सिद्धं दोपघ्नं श्रमन्नं ग्राहि गुर्वपि ॥ १६५॥
अर्थ-पका अमलवेत-त्रिदोपनाशक, श्रमहारी, ग्राही और
भारी है ॥ १६५ ॥

७६
राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
महार्दकगुणाः।
महार्द दीपनं ग्राहि रूक्षं वातकफापहम् ॥१६६॥
अर्थ-महाईक (वनअदरख )-दीपन, ग्राहि, सखा, वात
और कफनाशक है ॥ १६६ ॥
अपक्वतिन्तिडीफलगुणाः ।
अम्लिकायाः फलं बालं वातघ्नं कफपित्तकृत्॥१६७॥
अर्थ-कच्ची इमली-वातनिवारक, कफ और पित्तका-
रक है ॥ १६७ ॥
पकतिन्तिडीफलगुणाः।
तत्पदं दीपनं रुच्यमत्युषणं कफवातजित् ॥१६८॥
अर्थ-पक्की इमली-दीपन, रुचिकारक, अत्यन्त उष्ण, कफ
और वातविनाशक है ।। १६८ ॥
करुणनिम्बूकगुणाः।
करुणं कफवातास्रमेदोघ्नं पित्तकोपनम् ॥ १६९॥
अर्थ-फन्ना नीबू-कफ, वातरक्त और मेदोदोपनाशक है,
तथा पित्तप्रकोपक है ॥१६९॥
कोपाम्रफलगुणाः।
कोपानं कफवातघ्नं दीपनं ग्राहि तत्परम् ॥ १७०॥
अर्थ-कोशम-कफ-वातनाशक, जठरामिदीपक और माही
है ॥ १७० ॥
धीरफफलगुणाः।
चीरुकं रोचनं चाम्लं विदाहि कफपित्तकृत् ॥१७१॥

७७ तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। अर्थ-चीरुक-रुचिकारक, खट्टा, दाहजनक तथा कफ और पित्तकारक है ॥ १७१ ॥ पककण्टाफलगुणाः। कण्टाफलं सुमधुरं बृंहणं गुरु शीतलम् । दुर्जरं वातपित्तनं श्लेष्मशुक्रवलप्रदम् ॥ १७२॥ अर्थ-पक्का कटहर-मधुर, पुष्टिकारक, भारी, शीतल, दुर्जर, यात-पित्तनाशक तथा कफ, शुक्र और वलवईक है ॥ १७२॥ अपककण्टाफल-तदस्थिगुणाः । कण्टाफलमपक्वन्तु कपायं स्वादु शीतलम् । कफपित्तहरश्चैव तत्फलास्थ्यपि तद्गुणम् ॥१७३॥ अर्थ-कच्चा कठेल-कपेला, स्वादिष्ट, शीतल, कफ और पि- तनाशक है । इसकी गुठलीके गुणनी इसीके समान जानने १७३ तद्वीजं सर्पिपा युक्तं स्निग्धं हृद्यं वलपदम् ।।१७।। अर्थ-इसके बीज घृतयुक्त-स्निग्ध, हृदयको हितकारी और बलवर्धक हैं ॥ १७४॥ तालफलगुणाः। वातहा बृंहणो बल्यः कृमिहा कुष्ठनाशनः । रक्तपित्तहरः स्वादुस्तालः सप्तगुणान्वितः ॥ १७५॥ अर्थ-ताडका फल-वातविनाशक, पुष्टिकारक, कृमिना- शक, कुठनाशक, रक्तपित्तहारक और स्वादिष्ट है॥ १७५ ॥ तालशस्यगुणाः। तालशस्यन्तु मधुरं मूत्रलं वातपित्तजित् ।। १७६॥

७८
राजवल्लभः।
: [परिच्छेदः
अर्थ-तालशस्य-मधुर, मूत्रजनक, वात और पित्तनाश-
क है ॥ १७६ ॥
तालास्थिमज्जागुणाः।
तालास्थिमज्जा मधुरा मूत्रला शीतला गुरुः ।
कफकृमिहरा वृप्या वातला दुर्जरा मता ॥ १७७॥
अर्थ-ताडको गुठलीकी मीग--मधुर, मूत्रवर्द्धक, शीतल,
भारी, कफनाशक, कमिन्न, वातकारक और दुर्जर है॥१७७॥
सामान्यनारिकेलगुणाः।
नारिकेलं गुरु स्निग्धं पित्तनं स्वादु शीतलम् ।
बलमांसकर हृद्यं बृंहणं वस्तिशोधनम् ॥ १७८॥
अर्थ-नारियल-भारी, स्निग्ध, पित्तनाशक, स्वादिष्ट, शीतल,
बलवर्द्धक, मांसवर्द्धक, हृदयको हितकारी, पुष्टिकारी और
बस्तिशोधक है ।। १७८ ॥
कोमलनारिकेलगुणाः।
विशेषतः कोमलनारिकेलं निहन्ति पित्तज्वर-
मस्रदोपान् । तृछर्दिदाहामयमाशु हन्यात्
सरक्तपित्तप्रभवांश्च रोगान् ॥ १७९ ॥
अर्थ-कोमलनारियल-पित्तज्वर, रुधिरविकार, तृपा, वमन,
दाह और रक्तपित्तनिवारक है । १७९ ॥
कदलीफलसाधारणगुणाः।
कदलं मधुरं वृष्यं कपायं नातिशीतलम् ।
रक्तपित्तहरं हृद्यं रुच्यं श्लेष्मकरं गुरु ॥ १८ ॥

७२ - . , - तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः। अर्थ-केलेकी फली-मधुर, वीर्यवर्धक, कपेली, किञ्चित शीतल, रक्तपित्तनाशक, हृदयको हितकारी.रुचिकारी. कफकारी और भारी है ॥ १८० ॥ चम्पककदलीगुणाः। तदेव चम्पकाख्यन्तु वातपित्तहरं गुरु । वृष्यञ्चैवातिशीतञ्च मधुरं रसपाकयोः ॥१८१ ॥ अर्थ-पीले जातिके केलेकी फली-वात -पित्तनाशक, भारी वीर्यवर्द्धक, अत्यन्त शीतल, पाक और रसमें मधुर है॥१८१॥ द्राक्षागुणाः। द्राक्षा तु मधुरा स्निग्धा वृप्या शीतानुलोमनी । वल्या वृष्याक्षतक्षीणतृपावातास्रपित्तजित्॥१८२॥ अर्थ-दाख-मधुर, स्निग्ध, वीर्य्यवर्द्धक, शीतल, मलोदक तथा क्षीण, तृपा, वात और रक्तपित्तनाशक है ॥१८२ ॥ खजूरफलगुणाः । खरं मधुरं वृष्यं वृंहणं गुरु शीतलम् । क्षयभिषाते दाहे च वातपित्ते च तद्धितम् ॥१८३॥ अर्थ-खजूर-मधुर, वीर्यवर्द्धक, पुष्टिकारक,भारी, शीतला तथा क्षय, अभिघात, दाह और वातपिनरोगमें हितका- री है ॥ १८३॥ क्षीरवृक्षाणां फ्लगुणाः। क्षीरकायाः फलं विद्यात् गुरु विएम्भि शीतलम् । कपायमधुरं साम्लं नातिमारुतकोपनम् ॥ १८ ॥ '

८०
-
राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
अर्थ-दूधवाले वृक्षोंके फल-भारी, विष्टम्भजनक, शीतल,
करेले,मधुर, अम्ल और किञ्चित् वातको कुपित करे हैं ॥१८४॥
गाम्भारीफलगुणाः।
गाम्भारिकाफलं पाहि सतिक्तं मधुरं गुरु ।
केश्यं रसायनं मेध्यं शीतलं दाहपित्तजित् ॥१८॥
अर्थ-कुम्मेरका फल--मलरोधक, कडवा, मधुर, भारी, के-
शोंको हितकारी, रसायन, मेधाजनक, शीतल तथा दाह और
पित्तनाशक है ॥ १८५॥
बालविल्वगुणाः।
बिल्वं बालं कपायोप्णं पाचनं वह्निदीपनम् ।
संग्राहि तितकटुकं तीक्ष्णं वातकफापहम् ।। १८६ ।।
अर्थ-कच्चा बेल-कपेला, गरम, पाचक, अग्निप्रदीपक, ग्राही,
कडया, चरपरा, तीक्ष्ण, वात और कफनाशक है ॥ १८६ ॥
पक्वविल्वगुणाः।
पक्कं सुगन्धि मधुरं दुर्जर ग्राहि दोपलम् ॥ १८७ ॥
अर्थ-पक्का बेल-सुगन्धित, मधुर, दुर्जर,ग्राही और त्रिदो-
पकारक है ॥ १८७॥
पालयित्वस्य प्राधान्यमाह ।
फलेषु परिपक्केषु ये गुणाः समुदाहृताः।
बिल्वादन्यत्र विज्ञेया विल्वमामं गुणोत्तरम् ॥१८८॥
अर्थ-सर्वप्रकारके फल पके हुवेही गुणवाले होते हैं, किन्तु
पेल तो कचाही अधिक गुणवाला होता है ॥ १८८॥

तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। थिल्वपेपिकागुणाः। कफवातामशूलनी ग्राहिणी विल्वपेपिका ॥१८९॥ अर्थ-बेलका सूखा गूदा-कफ, वात, आम और शूलना- शक है, तथा ग्राही है ॥ १८९ ॥ बकुलफलगुणाः। पकुलं मधुरं ग्राहि दन्तस्थैर्यकरं परम् ।। १९० ॥ अर्थ-मौलसिरीके फल-मधुर, ग्राही और दातोंको स्थिर करनेवाले हैं ॥ १९० ॥ प्रियालफलगुणाः। पियालं मधुरं स्निग्धं वृंहणं वातपित्तजित् ।। १९१॥ अर्थ-चिरोंजी-मधुर. स्निग्ध, पुष्टिकारक तथा वात और पित्तनाशक है ॥ १९१॥ मधूकफलगुणाः। मधूकस्य फलं पक्वं वातपित्तप्रणाशनम् ॥ १९२॥ अर्थ-महुवेका पक्का फल-यात और पित्तनाशक है।। १९२॥ भ्रष्टनिष्पावफलगुणाः । निप्पावकफलं भ्रष्टं बद्धवर्चस्करं गुरु ॥ १९३॥ अर्थ-भुने हुवे अमके बीज-मलको बांधनेवाले और भारी हैं ॥ १९३॥ वेत्रफलगुणाः। फलं वेत्रस्य वातघ्नमम्लपित्तवलासकृत् ॥ १९४॥ अर्थ-वैतके फल-वातनाशक तथा अम्लपित्त और कफ- कारक हैं ॥१९॥ ६

८२
"
'
राजवल्लभः।
[ परिच्छेदः
फल्गुफलगुणाः।
फल्गोः फलं गुरु ग्राहि तर्पणं स्वादु शीतलम्॥१९५।।
अर्थ-कुठुमरके फल-भारी, ग्राही, तर्पण, स्वादिष्ट और
शीतल हैं ॥ १९५॥
त्रिफलासाधारणगुणाः।
त्रिफला तु त्रिदोषनी नात्युप्णा मलभेदिनी।।१९६॥
अर्थ-त्रिफला ( हड़, बहेडा, आमला )-त्रिदोषनाशक
किञ्चित् उप्ण और मलभेदक है ॥ १९६ ॥
हरीतकीनां भेदमाह।
जीवन्ती रोहिणी चैव विजया चाभयामृता।"
पूतना कालिका चेति पथ्या सप्तविधा मता॥१९७॥
अर्थ-हरड़-जीवन्ती, रोहिणी, विजया, अभया, अमृता,
पूतना और कालिका इन भेदोंसे सात प्रकारकी है ॥१९७॥
तेपां लक्षणमाह ।
सुवर्णवर्णा जीवन्ती रोहिणी कपिलद्युतिः ।
अलावृन्ता विजया पंचाशा चाभया स्मृता।।१९८॥
स्थूलमांसामृता ज्ञेया पूतनास्थिमती मता।
त्र्यंशा च कालिकेत्येवं सप्तजातिहरीतकी ॥१९९॥
अर्थ-जीवन्ति हरड-सुवर्णके वर्ण, रोहिणी पिंगलवर्ण, वि-
जया अलावु (कहू) की समान वृन्तयुक्त, अजया पांच रेखावा-
| ली,अमृता स्थूल मांसयुक्त अर्थात् मोटी, पृतना बडी गुठलीवाली
और कालिका हरट तीन रेसायाली होती है ॥१९८॥१९९॥

तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः। तेपां प्रयोगविधिः स्नेहपानेषु सर्वेषु जीवन्ती च प्रशस्यते । रोहिणी क्षयरोगेपु विजया सर्वकर्मसु ॥२०॥ पूतना लेपने ज्ञेया चामृता तु विरेचने । अभया नेत्ररोगेपु गन्धयुक्तेपु कालिका ॥२०१॥ अर्थ-तेल, घृतादि कार्यमें जीवन्ति, क्षयरोगमें रोहिणी, सर्वकार्योंमें विजया, व्रणादिके लेपमें पूतना, विरेचनकर्ममें अमृता, नेत्ररोगमें अभया और गन्धयोग कर्ममें कालिका हरड़ लेनी चाहिये ॥ २०० ॥ २०१॥ हरीतकी शब्दस्य निरुक्तिकथनम् । हरस्य भवने जाता हरिता च स्वभावतः । हरते सर्वरोगांश्च तेन नाम्ना हरीतकी ॥२०२॥ अर्थ-हरके जवनमें उत्पन्न हुई, स्वभावसे हरे रंगवाली तथा सर्वरोगोंको हरनेवाली इसकारण इसका नाम हरीतकी है ॥२०२॥ हरीतक्या उत्पत्तिकथनम् । पीयूपं पिवतास्त्रिविष्टपपतेय्य विन्दवो निर्गता। स्तेभ्योऽभूदभया दिवाकरकरश्रेणीव दोपापहा । कालिन्दीव बलप्रमोदजननी गौरीव शुलिप्रिया । वतेयोतकरी वृताहुतिरिव क्षोणीव नानारसा॥२०॥ अर्थ-इन्दने जब अमृत पिया था उम समय जो अमृ- तकी बूंदें पृथ्वीपर गिरी उन अमृतकी बंदासे हरडकी उत्सनि हुई, राजवल्लभः । [ परिच्छेदः जिसप्रकार सूर्यकी किरणें अन्धकारके समूहका नाश करती हैं, तथा यमुनानीके जलमें स्नान करनेसे जिस प्रकार बल और हपकी वृद्धि होती है, जैसे शंकरको पार्वती प्यारी है, घृताहुति जिसमकार अनिका उद्योत करती है और पृथ्वी जैसे अनेक रसयुक्त है, उसीप्रकार हरड़ त्रिदोपनाशक, बल और हर्पजनक, मनुष्योंको प्यारी, अग्निवर्द्धक और अनेकरसान्वित है ॥२०३॥ द्रव्यविशेषेण हरीतकीभक्षणगुणाः। वातनी लवणः पथ्या पित्तनी घृतसंयुता। नागरेण कफ हन्ति सर्वदोपान गुडान्विता ॥२०॥ अर्थ-हरड लवणके साथ-वातका, घृतके साथ-पित्तका, सोंठके साथ-कफका और गुडके साथ अक्षण करनेसे त्रिदोपका नाश करती है ॥२०४॥ हरीतकीसाधारणगुणाः। पथ्या पञ्चरसायुप्या चक्षुप्या लवणा सरा। मेध्योप्मा दीपनी शोथदोपकुष्टवणापहा ॥ २०५॥ अर्थ-हरट-पंचरसयुक्त, लवणरसरहित, अवस्थास्थापक, नेत्रोंको हितकारी, सारक, मेधाकारक, उप्णवीर्य, अमिदीपक, तथा सूजन, त्रिदोप, कोड और व्रणधिनाशक है ॥.२०५॥ आमलकीफलगुणाः। तहदानी विशेपेण वृप्या शीतव वीर्यतः। हन्ति वातं तदम्टत्वात पित्तं माधुर्यशैत्यतः॥२०६ -

८५
तृतीयः ३] भापाटीकायुतः।
कर्फ रूक्षकपायत्वात् फलेभ्योप्याधिकं हि तत् ।
आदावन्ते च मध्ये च भोजनस्य प्रशस्यते ॥२०७॥
निवत्ययं दोपहरं फले त्यामलकीफलम् ।।२०८॥
अर्थ-अमलेकेभी गुण हरडकी समान है। विशेप करके वि-
वर्द्धक और शीतवीर्य हैं । यह खट्टेपनसे वातका नाश करता
है। मधुरता और शीतलतासे पित्तका नाश करता है। रूखे और
कपेलेपनसे कफका नाश करता है । इसप्रकार आमला त्रिदो-
पनाशक है। यह और फलोंकी अपेक्षा अधिक गुणपाला है।
जोजनकी आदि अन्त और मध्यमें इसको भक्षण करना चाहिये।
फलोंमें उत्तम और दोपनाशक है ॥२०६॥ २०७॥ २०८ ॥
विभीतकफलगुणाः।
विभीतं भेदि तीक्ष्णोष्णं वैस्वयं कृमिनाशनम् ।
चक्षुप्यं स्वादुपाकि च कपाय कफपित्तनुत् ॥२०९
अर्थ-बहेडा-भेदक, तीक्ष्ण, उप्ण, स्वरनंगनाशक, कमिन्न,
नेत्रोंको हितकारी, स्वादुपाकी, कपेला तथा कफ और पित्त-
नाशक है ॥ २०९ ॥
पथ्यामनागुणाः।
पथ्यामजा तु चक्षुप्या वातपित्तहरा गुरुः॥२१०॥
अर्थ-हरडकी मीग-नेत्रोंको हितकारी, वात-पित्तनाशक
और भारी है ॥ २१० ॥
विभीतकामलयोर्मलागुणाः ।
विभीतमजा तृछर्दिकफवातहरा लघुः।
कपाया भेदकृच्चापि धात्रीमनापि तद्गुणा ॥२११॥

राजवल्लभः। [परिच्छेदः अर्थ-बहेडेकी मांग-तृपा, वमन,कफ और वातनाशक है। हलकी, कपेली, मेदवईक, आमलेको भीगके गुणभी इसीकी समान जानने ॥२११॥ बदरफलमनागुणाः। कोलमजा तु मधुरा पित्तच्छदितपापहा ॥ २१२ ॥ अर्थ-बेरकी मीग- मधुर तथा पित्त, वमन और तृपानि- वारक है ।। २१२॥ कृष्माण्डफलमनागुणाः। कूप्माण्डमज्जा वृप्या स्यात् पित्तनुद्वस्तिशोधना २१३ अर्थ-पेठेकी मीग- वीर्यवर्द्धक, पित्तनाशक और पस्तिशो- धक है ॥ २१३॥ अनुक्तमजागुणाः। यस्य यस्य फलस्यह वीर्यं भवति यादृशम् । तस्य तस्यैव वीर्येण मजानं हि विनिर्दिशेत्।।२१४॥ अर्थ-जिस जिस फलोंमें जैसा२ वीर्य है, वैसा वैसाही उस- की मन्नामें जान लेना ॥२१४॥ इति फलगुणाः ॥ अथ मत्स्यवर्गमाह। मत्स्यसामान्यगुणा:। मत्स्यास्तु बृंहणाः सर्वे गुरवः शुक्रबद्धनाः । पल्याः स्निग्धोप्णमधुराः कफपित्तकराः स्मृताः२१५ व्यायामाध्वरतानां च वातार्तानां च पूजितः। मत्स्याशिनो न वाधन्ते रोगा पातसमुद्भवाः।।२१६॥

८७ तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। अर्थ-सर्वप्रकारकी मछली-पुष्टिकारक, भारी, वीर्य्यवईक, बलकारक, स्निग्ध, गरम, मधुर, कफकारक, पित्तजनक, व्याया- म ( कसरत, दंड ) कारी, पथनमणकारक तथा वातरोगीकू हितकारी है, मछली खानेवाले प्राणीको वातसे उत्पन्न हुने रोग नहीं बाधा देते ॥ २१५ ॥ २१६ ॥ वृहन्मत्स्यगुणाः । महाप्रमाणा गुरवः शुक्रला वद्धवर्चसः ॥२१७॥ अर्थ-बडा मच्छ-भारी, वीर्य्यजनक और मलरोधक है ।। ॥ २१७ ॥ क्षुद्रमत्स्यगुणाः। क्षुद्रमत्स्यास्तु लघवो ग्राहिणो ग्रहिणीहिताः॥२१८॥ अर्थ-छोटी मछली-हलकी, ग्राही और संग्रहणीरोगमें हितकारी है ॥ २१८॥ कृष्णवर्णमत्स्यगुणाः। कृष्णमत्स्या लघुस्निग्धा वातना वह्निवर्द्धनाः॥२१९॥ अर्थ-काले रंगकी मछली-हलकी,स्निग्ध, वातनाशक और जठरामिवर्द्धक है ।। २१९ ॥ पाण्डमत्स्यगुणाः। पाण्डुरा दोपलाः स्निग्धा गुरखो भिन्नवर्चसः।।२२०॥ अर्थ-पाण्डवर्णकी मछली-त्रिदोपकारक, स्निग्ध, भारी और मलभेदक है ॥ २२० ॥ - ८८ राजवल्लभः। [परिच्छेदः क्लिनशुष्कमत्स्ययोर्गुणाः। कुथितादोपला मत्स्याः शुप्का विष्टम्भिदुर्जराः२२१ अर्थ-क्लिन्नमछली-त्रिदोपकारक और सूखी मछली-विष्ट- म्नकारक और दुर्जर है ।। २२१ ॥ लवणसंयुक्तमत्स्यगुणाः। लवणैस्ताडिता मत्स्याः कफपित्तकराः सराः॥२२२॥ अर्थ-लवणमिश्रित मछली-कफकारक, पित्तवईक और सारक है ॥ २२२॥ सामुद्रिकमत्स्यगुणाः। सामुद्रा गुरवो वृप्याः स्निग्धोप्या वातनाशनाः । पित्तलास्तु विशेपेण मांसाशित्वाद्वलावहाः॥२२३॥ अर्थ-समुद्रकी मटली-नारी, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, गरम, वातविनाशक, पित्तजनक, समुद्र में रहनेवाली सर्व प्रकारकी मछ. ली मांसका आहार करती है इसकारण समुद्रकी मछलीपोंको पक्षण करनेंस वलकी वृद्धि होती है ॥ २२३ ॥ नादेयमत्स्यगुणाः। नादेयाः इलेप्मला वृप्या मधुराः स्वल्पवर्चसः २२४ अर्थ-नदीकी मछली-कफकारक, वीर्यवर्द्धक, मधुर और मलका अल्प करनेवाली है ॥ २२४ ॥ सरोपर-तडागसम्भूतमत्स्यगुणाः। सरस्तडागसम्भूताः स्निग्धा स्वादुरसाः स्मृताः२२५ अर्थ-संगरर और तड़ागकी मरली-ग्निग्ध और स्वादिष्ठ है।

८९ 21 तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। हजातमत्स्यगुणाः । महादेपु वलिनः स्वल्पाऽम्भस्यवलाः स्मृताः। दुर्नामानिलदोपन्नाः कृमिदूपीविपापहाः ॥ २२६॥ चक्षुप्या मधुराः पाके स्वल्पमेधाग्निवर्द्धनाः॥२२७॥ अर्थ-बहुजलवाले ह्रद (एकप्रकारका जलाशय) की मछली-बलवर्द्धक है। और अल्पजलवाले ह्रदकी मछली-बल- | नाशक है, तथा बवासीर, वातविकार, कमि और दूपीविपहार- क है, नेत्रोंको हितकारी, पचनेमें मधुर, मेधा और अल्पअग्नि- की बढानेवाली है ॥ २२६ ॥ २२७ ॥ रोहितमत्स्यगुणाः। रोहितः सर्वमत्स्यानां वरोवृप्योऽर्दितार्तिजित् । कपायानुरसः स्वादुतिनो नातिपित्तलः ।।२२८ ।। अर्थ-रोहितमच्छली-सर्व मछलियोंकी अपेक्षा उत्तम है, वीर्य्यवर्द्धक, अदितरोगनाशक, किञ्चित्कपेली, स्वादिष्ट, वातवि- नाशक और अत्यन्त पित्तल नहीं है ।। २२८ ॥ भाकुटमत्स्यगुणाः। भाकुटो मधुरः शीतो वृप्यः श्वेप्मकरो गुरुः । आमवातकरो हृयो वातपित्तहरो मतः ॥२२९॥ अर्थ-जाकुटमछली-मधुर, शीतल, वीर्यवईक, कफका- रक, भारी, आमवातकारक, हृदयको हितकारी तथा वात और पित्तनाशक है ॥ २२९ ॥ .

९० राजवल्लभः। [परिच्छेदः पाठीनमत्स्यगुणाः। याठीनः श्लेप्महा स्निग्धोमधुरः सकपायवान् । वल्यो वृप्यः कटुः पाक्ते रोचनो वातपित्तजित्।।२३० अर्थ-पाठीनमछली-कफकारक, स्निग्ध, मधुर, कपेली, ब- लवर्द्धक, वीर्यवर्धक, पचनेमें चरपरी, रुचिकारी तथा वात और पित्तनाशक है ॥ २३० ।। शिलिन्भत्स्यगुणाः। शिलिन्दः श्लेष्मलो बल्यो विपाके मधुरो गुरुः । आमवातकरो यो वातपित्तहरोमतः ॥ २३१ ॥ अर्थ-शिलिन्दमछली--कफवर्धक, पचनेमें मधुर, भारी, आ- मवातकारक, हृदयको हितकारी तथा वातपित्तनाशक है।।२३१ आडिमत्स्यगुणाः। आडिमत्स्यो गुरुः स्निग्धो वातश्लेप्मप्रकोपनः॥२३२ अर्थ-आडीमछली-भारी, स्निग्ध, तथा वात और कफको कुपित करे है ॥ २३२॥ मल्लकीमत्स्यगुणाः। भल्लकी मधुरः शीतो वृप्या शेप्मकरो गुरुः॥२३३ अर्थ-महकी मछली-मधुर, शीतल, वीर्यवर्धक, कफकारी और भारी है ॥ २३३ ॥ चित्रफलमत्स्पगुणाः। चित्रफलां गुरुः स्वादुःस्निग्धो वृप्यो बलमदः॥२३४ अर्थ-चित्रफलमउली-गारी, स्वादिष्ठ, स्निग्ध, वीर्यवर्द्ध- प और वरदापक है ।। २३४ ॥

तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः।
गर्गरमत्स्यगुणाः।
गर्गरो मधुरः स्निग्धो गुरुवातविनाशनः ॥२३५।।
अर्थ-गर्गरमछली-मधुर, स्निग्ध, भारी और वातविनाशक
है ॥२३५ ॥
नन्दावर्त्तमत्स्यगुणाः।
नन्दावर्तस्तु संग्राही कफपित्तविनाशनः ॥२३६।।
अर्थ-नन्दावर्त्तमछली-ग्राही तथा कफ और पित्तनाशक
॥२३६॥
कुलिशमत्स्यगुणाः।
कुलिशो मधुरो हृद्यः कपायो दीपनो मतः ।
वल्यः स्निग्धो लघुाही हितो वाते च रोचकः॥२३७
अर्थ-कुलिशमछली-मधुर, हृदयको हितकारी, कपेली,
अभिदीपक, बलकारक, स्निग्ध, हलकी, मलरोधक, वातरोगमें
हितकारी और रुचिकारी है ॥२३७ ।।
इलिशमत्स्यगुणाः।
इलिशो मधुरो हृद्यः पित्तश्लेप्मामवर्द्धनः।
भृशं व्यवायनित्यानां हितःशीतोनिकृल्लघुः।।२३८॥
अर्थ-इलिशमछली-मधुर. हृदयको हितकारी तथा पित्त,
कफ और आमवईक है. अधिक मैथुन करनेवाले मनुष्योंको
हितकारी. शीतल. अमियर्द्धक और हलकी है ॥ २३८॥
वापुपमत्स्यगुणाः।
वापुपो मधुरो वृप्यो वृंहणो धातुवर्द्धनः ॥२३९ ॥

९२ राजवल्लभः। परिच्छेदः अर्थ-वापुपमछली-मधुर, वृप्य, पुष्टिकारक और धातुव- क वृहच्छफरीमत्स्यगुणाः। सिग्धास्यकण्ठरोगनी श्रेष्ठा प्रोष्ठी प्रकीर्तिता॥२४० अर्थ-बडी प्रौष्ठी मछली-स्निग्ध तथा मुखरोग और क- ण्ठरोगनाशक है ॥२४॥ मगुरमत्स्यगुणाः। मद्गुरो मधुरः स्निग्धः संग्राही शुक्रलो गुरुः॥२४॥ अर्थ-मद्गुर मछली-मधुर, स्निग्ध, ग्राही, शुक्रजनक और जारी है ॥२४१॥ शृङ्गीमत्स्यगुणाः। शृङ्गी स्वादुरसा स्निग्धा वृंहणी कफकोपिनी॥२४२॥ अर्थ-शृङ्गीमछली-स्वादिष्ठ, स्निग्ध, बृहण और कफको कुपित करे है ॥ २४२ ॥ शकुलमत्स्यगुणाः। शकुलो मधुरो ग्राही रूक्षः पित्तास्रजिद्गुरुः ॥२४॥ अर्थ-शकुलमछली-मधुर, मलरोधक, रूसी, रक्तपिनना- शक और भारी है ॥ २४३ ॥ पर्मुपमत्स्यगुणाः। यमुपो यातहा स्निग्धो ग्राही दोपविनाशनः ॥२४॥ अर्थ-धर्मपमछली-पातहारक, सिग्ध, मलरांधा और मि- रोपहारक है ॥ २४४॥ 1 १ तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः । वर्मिमत्स्यगुणाः। पर्मिमत्स्यो गुरुव॒ष्यः कपायो रक्तपित्तहा ॥२४॥ अर्थ-यम्मिमछली-भारी, वीर्यवर्धक, कपेली और रक्त- पित्तनाशक है ॥ २४५ ॥ फलिमत्स्यगुणाः। फलिः स्वादुर्गुरुः स्निग्धो वलकृच्छुक्रवर्द्धनः।।२४६।। अर्थ-फलिमछली-स्वादिष्ट, भारी, स्निग्ध, बलकारी और शुक्रवर्द्धक है ॥ २४६॥ चिडंगमत्स्यगुणाः। चिडङ्गस्तु गुरुग्राही मधुरो बलवर्द्धनः । मेदःपित्तास्रजिदृष्यो रोचनः कफवातलः ॥२४॥ अर्थ-चिडिंगमछली--भारी, ग्राही, मधुर, वलवर्द्धक, मेद- दोपनिवारक, रक्तपित्तनाशक, वीर्यवर्द्धक, रोचक तथा कफ और वातवर्द्धक है ॥ २४७ ॥ कधपीमत्स्यगुणाः। कवपी मधुरा स्निग्धा वल्या वातकफापहा ॥२८॥ अर्थ-कलपीमच्छली-मधुर, स्निग्ध, बलकारक तथा वात और कफनाशक है ॥ २४८॥ शकलीमत्स्यगुणाः। शकली रोहिताकारा भूमो प्रायश्वरत्यसो। गु: पाके च मधुरा भेदिनी दोपकोपनी॥२४९॥ अर्थ-शकलीमछली-राहिनमछलीकी समान आकारवाली ,

राजवल्लभः।
[ परिच्छेदः
होती है। यह मछली प्राय समिमें विचरती है । जारी, पचनेमें
मधुर, भेदक और त्रिदोपको कुपित करनेवाली है ॥२४९॥
गडिशमत्स्यगुणाः।
गडिशो मधुरो ग्राही बल्यो वह्निप्रदो गुरुः ॥२५॥
अर्थ-गडिशमछली-मधुर, मलरोधक, बलकारक, अनिदी-|
पक और भारी है ॥ २५० ॥
चन्द्रकमत्स्यगुणाः।
चन्द्रकस्त्वनभिष्यन्दी मधुरोपलवर्द्धनः॥२५१ ॥
अर्थ-चन्द्रकमछली-अनभिप्यन्दी, मधुर और बलवर्धक
है ॥ २५१॥
चम्पकन्दमत्स्यगुणाः।
चम्पकुन्दो गुरुव॒प्यो मधुरो वातपित्तजित् ।
शुकलो बलकृत्प्रोक्तः स्नेहनः श्लेष्मकोपनः ॥२५२॥
अर्थ-चप्पकुन्दमछली-भारी, वीर्यवर्दक, मधुर, वान-
पित्तनाशक, शुक्रजनक, वलकारक, स्नेहयुक्त और कफको कु-
पित करे है ॥ २५२॥
दण्डिमत्स्पगुणाः।
दण्टिकः कफजित्तिक्तो वातपित्तदरो लघुः॥२५३॥
अर्थ-ण्डिकमली-कफनाशक, पातनिवारक, पिनहारक
और हलकी है ॥२५३॥
धिफण्टवामत्स्यगुणाः।
विकण्टः पित्तदा रूक्षो दीपनः कफजिल्लघुः॥२५॥

९५ तृतीयः३] भापाटीकायुतः। अर्थ-निकण्टकमछली-पित्तनाशक, रूखी, दीपन, कफना- शक और हलकी है ॥ २५४ ॥ मलङ्गीमत्स्यगुणाः। मलङ्गी मधुरा हृद्या वातघ्नी श्लेष्मला गुरुः॥२५॥ अर्थ-मलंगी मछली-मधुर, हृदयको हितकारी,वातनाशक, कफकारक और भारी है ॥ २५५ ॥ खलिशमत्स्यगुणाः। खलिशः कथितो बल्यो वातपित्तकफापहा । रूक्षो लघुः शूलहरः किञ्चिदामविनाशनः ॥२५६॥ अर्थ-खलिशमछली-बलकारक,वात-पित्त-कफनाशक, रू- खी,हलकी,शूलनिवारक और किंचित् आमनाशक है ॥२५६॥ चलदङ्गमत्स्यगुणाः। चलदङ्गोनभिप्यन्दी हितो बातेपु रोचनः॥२५७॥ अर्थ-चलदङ्गमछली-अननिप्यन्दी, वातरोगमें हितकारी और रोचन है ॥ २५७ ॥ गडकमत्स्यगुणाः। गडको मधुरो रूक्षः कपायः शीतलो लघुः॥२५८॥ अर्थ-गडकमछली , कपेली,शीतल तथा हलकी है ॥ २५८ ॥ पर्वतमत्स्यगुणाः। पार्वतो वातहा स्निग्धः शुक्रलो वलवर्द्धनः ॥२५९ ॥ अर्थ-पर्वतीमछली-चातविनाशक, लिग्ध. शुक्रजनक और बलबर्द्धक है ॥ २५९ ॥ -मधुर,रूसी, राजवल्लभः। [ परिच्छेदः याचमत्स्यगुणाः। वाचः स्वादुर्गुरुः स्निग्धः श्लेष्मलो वातपित्तजित्॥२६० अर्थ-वाचमछली-स्वादिष्ठ, भारी, स्निग्ध, कफकारी, वातघ्न और पिनहारी है ॥ २६० ।। एलङ्गमत्स्यगुणाः। एलङ्गो मधुरो वृप्यः संग्राही कफवातजित्॥२६॥ अर्थ-एलंग मछली-मधुर, वीर्यवर्द्धक, मलरोधक, कफ और वातविनाशक है ।। २६१ ॥ वल्लीगडमत्स्यगुणाः। बल्लीगडोलघू रूक्षोऽनभिप्यन्दी मरुत्करः॥२६२॥ अर्थ-वल्लीगड मछली-हलकी, रूखी, अनभिप्यन्दी और चातकारक है ॥ २६२॥ चिलघिममत्स्यगुणाः। मत्स्यश्चिलचिमोग्राही कपायो वातकोपनः॥२६३॥ अर्थ-चिलचिम मछली-मलरोधक, कपेली और वातको कुपित करे है ॥ २६३॥ गवाटीमत्स्यगुणाः। गवायनीजननी गुरू श्लेष्मप्रकोपनी ॥२६४ ॥ अर्थ-गवाटी मछली-अजीर्णाजनक, भारी और कफ- फारी हैं ॥ २६४ ॥ क्षुद्रशफरीमत्स्यगुणाः। प्रोष्टी तिक्ता कटुःस्वादुः शुक्रला कफवातजित् २६५ ९७ , - तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। अर्थ-शुद्रशफरी-कडबी, चरपरी, स्वादिष्ठ, शुक्रजनक, त- था कफ और वातविनाशक है ॥ २६५॥ पोताधानमत्स्यगुणाः। पोताधानस्तु सर्वेपां सुस्निग्धो लघुरोचनः ॥२६६।। अर्थ-पोताधाननामक सर्वप्रकारको मछलियोंके गुण-स्निग्ध, लघु और रोचक हैं ॥ २६६ ॥ मत्स्यादिडिम्बगुणाः। मत्स्यकूर्मखगाण्डानि स्वादुवाजिकराणि च । कटुपाकानि रुच्यानि वातश्चेप्मकराणि च ॥२६॥ अर्थ-मछली, कछुए, पक्षी, इनके अंडे-स्वादिष्ट, अत्यन्त रतिशक्तिवर्धक, पाकमें चरपरे, रुचिकारक तथा वात और श्रेप्मकारक हैं ॥ २६७॥ इति मत्स्यगुणाः॥ मांसगुणमाह । मांसं वातहरं वृष्यं वृंहणं वलवर्द्धनम् । प्रीणनं गुरु हृद्यं च मधुरं रसपाकयोः॥२६८॥ अर्थ-मांस-बातविनाशक, वीर्यमईक, बलवर्धक,तृतिका- रक,मारी,दयको हितकारी और रस तथा पाकमें मधुर है॥२६८ स्थानक्रियादिभेदे मांसानां जातिभेदमाह । प्रसह्य भक्षयन्त्येते प्रसहास्तेन सङ्गिताः। भूशया पिलशायित्वादानूपोऽनूपसंश्रयात् ।।२६९॥ जले निवासाजलजा जलेचा जलेचराः । स्थलजा जाङ्गलाः प्रोक्ता मृगा जङ्गलचारिणः२७० ७ ९८ राजवल्लभः। [परिच्छेदः विकीर्यविष्किराश्चैव प्रतुद्यग्रतुदा मताः। योनिरष्टविधा तेपां मांसानां परिकीर्तिता ॥२७॥ अर्थ-जे पक्षी किञ्चित्मात्रभी समयका अतिकम नहीं करके भक्षण करते हैं, अथवा दूसरेसे छीनकर खाते हैं, वे पक्षी प्रसह जातीके हैं। जे पशु मृत्तिकामें गर्त होकर निवास करते हैं उनको अशय कहते हैं । जलाशयके निकट रहनेवाले पशुओंको आनूप कहते हैं । जे जन्तू जलमें निवास करते हैं उनको जलज कहते हैं । जे जलमें विचरण करते हैं उनको जलचर कहते हैं । स्थलमें रहनेवाले पशुओंको जांगल कहते हैं । जे पक्षी खानेकी वस्तुको चोंचसे वखर २ खाते हैं वे विप्किर जातिके हैं । जे आहारक पदार्थको चोंचके द्वारा तोड २ खाते हैं उनको प्रतुद कहते हैं । इसप्रकार प्रसहादिके भेदसे मांसकी आठ जाती हैं ॥ २६९ ॥ २७० ॥ २७१ ॥ मामभेदन तेपां जातिभेदः। तत्र प्रसहा कुररश्येनादयः भूशया नकुलगोधादयः। आनूपाः खङ्गिमहिपतराहादयः।जलजाः कुम्भीरशि- शुमारादयः॥२७२॥ जलेचरा मद्गुहंसप्रभृतयः । जाङ्गला हरिणच्छागादयः। विकिरास्तित्तिरिमयूरकुकुटादयः । प्रतुदाः कपो- तपारावतादयः ॥२७३ ॥ अर्थ-कुरर(कुंज), वाज इत्यादि पक्षी प्रसहजातीक है नकुल (नौला ), गोधा (गोय ) इत्यादिको राय कहते हैं ।

तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। गैंडा, जैस और शूकरादिको आनूप कहते हैं । नाका और घडियालादिककी जलज जाती है । मद्गु और हंसादिकी ज- लचर जाती है । हिरण और छागादिकी जांगल जाती है । तीतर, मोर और मुरगा इत्यादिकी विष्किर जाती है। कबूतर और पिडिकिया इत्यादिको प्रतुद कहते हैं । ७२॥ ७३ ॥ प्रसहादिजलचरान्तानां मांसानां सामान्यगुणाः । प्रसड़ा भूशयानूपवारिजा वारिचारिणः । गुरूप्णा मधुराः स्निग्धा वातनाः शुक्रवर्द्धनाः२७४ अर्थ-प्रसह, जूशय, आनूप, जलज और जलचरादिकोंका मांस-जारी, गरम, मधुर, स्निध, वातविनाशक और शुक्रवर्दक है ॥ ७४॥ विष्किरादिजागलान्तानां मांसानां सामान्यगुणाः । लावायो विप्किरो वर्गः प्रतुदा जाङ्गला मृगाः। लयवः शीतमधुराः सकपायाऽहिता नृणाम् ॥२७॥ अर्थ-लावादि विप्किरवर्ग, प्रतुद तथा जांगल जातीके पशुओका मांस-हलका, शीतल, मधुर, कपेला और मनुष्योंको अहितकारक है ।। २७५॥ सामान्येनोपदिष्टानां मांसानां स्वगुणेः पृथक् ! केपान्तु गुणवैशिष्टयात् विशेष उपदेक्ष्यते ॥२७॥ अर्थ-सर्वमांस साधारणसे एकही गुणवाले हैं और प्रत्येकके पृथक् २ गुण हैं । इसलिये पशु. पनी तथा जलचरादिकों में किसीर गुणविशेपमे मामके गुण पृथक् रूपमें कहे हैं।७६॥ - १०० राजवल्लभः। [परिच्छेदः- हरिणमांसगुणाः। हरिणः शीतलो बद्धविण्मूत्रो दीपनो लघुः । रसे पाके च मधुरः सुगन्धिः सन्निपातहा ॥२७७॥ अर्थ-हिरणका मांस-शीतल, मलमूत्ररोधक, अमिप्रदीपक, हलका,मधुर, पाकमेंनी मधुर, सुगन्धित और सन्निपातनाशक है ॥ २७७ ॥ कृष्णहरिणमांसगुणाः । एणः कपायो मधुरः पित्तासृक्कफनाशनः । संग्राही रोचनो हृद्यो बलकृत् ज्वरनाशनः॥ २७८॥ अर्थ-काले हिरणका मांस-कपेला, मधुर, रक्तपित्तनिवारक, कफनाशक, ग्राही, रुचिदायक, हृदयको हितकारी, बलकारक और ज्वरहारक है ॥ २७८॥ कृष्णसारमांसगुणाः। संग्राही रोचनो वल्यः कृष्णसारोज्वरापहः॥२७९॥ अर्थ-कृष्णसारमृगका मांस-संग्राही, रुचिकारक, बलब- ईक और ज्वरनाशक है ।। २७९ ॥ शशकमांसगुणाः । शशः स्वादुः कपायश्च वंदविद शीतलो लघुः । शोधातिसारपित्तासृईनाशनो रूक्ष एव च ।। २८०॥ अर्थ-सरगोसका मांस-पेला, स्वादिष्ठ, मलरोधक, शीत- ल, हलका तथा सूजन, अतिसार और रक्त-पित्तनाशक है । और एसा है ॥२८१ - 2001 तृतीयः३] भाषाटीकायुतः। छागमांसगुणाः। छागमांसं परं हृद्य बृंहणं बलवर्द्धनम् । स्निग्धं मृद्वनभिष्यन्दिनात्युप्णधातुसाम्यकृत् २८१ अर्थ-बकरेका मांस-हृदयको हितकारी, पुष्टिकारक, वल- वर्द्धक, स्निग्ध, मृदु(नरम), अनभिप्यन्दी, किञ्चित् उष्ण और" धातुसाम्यकारक है ॥ २८३ ॥ मेषमांसगुणाः। मेपस्य वृंहणं मांस पित्तश्लेष्मकरं गुरु ॥२८२ ॥ अर्थ-भेडका मांस--पुष्टिजनक, पिन और श्लेप्मकारक त- था भारी है ॥ २८२॥ वराहमांसगुणाः। वराहपिशितं वृष्यं वातघ्नं बलवर्द्धनम् ॥ २८३ ॥ अर्थ-सूअरका मांस-वीर्यवर्धक, वातविनाशक और बल- वर्द्धक है ॥ २८३॥ माहिपमांसगुणाः। माहिपं तर्पणं वल्यं त्रिग्घोष्णं मधुरं गुरु । निद्रापुंस्त्ववलस्तन्यवर्द्धनं मांसदायकृत् ॥२८॥ अर्थ-सका मांस-तृतिदायक, बलकारक, स्निग्ध, गरम, मधुर, भारी तथा निद्रा, पुरुपता, बल और स्तनोंमें दूध बढाने- वाला है । तथा शरीरके मांसको दृढ करनेवाला है ॥२८४ ॥ ग्बङ्गिमांसगुणाः। खङ्गिमांसं कफच्छेदि कपायमनिलापहम् । पत्र्यं पवित्रमायुष्यं बद्धमूत्रं विरुक्षणम् ॥ २८५॥ &0021 १०२ " - राजवल्लभः। [परिच्छेदः अर्थोडेका :मांस-कफनाशक, कला, वातविनाशक, पितरोंको प्रसन्न करनेवाला, पवित्र, अवस्थास्थापक, मूत्ररोधक, और रूखा है ॥२८५॥ गोमांसगुणाः। गव्यं पवित्रमायुष्यं अमनमनिलापहम् ।। २८६ ॥ अर्थ-गायका मांस-पवित्र, आयुवर्द्धक, श्रम और वात- विनाशक है ॥ २८६ ॥ गोधिकामांसगुणाः। गोधा विपाके मधुरा कपाया कटुका रसे । वातपित्तहरा वल्या बृंहणी बलवदिनी ॥ २८७॥ अर्थ-गोधका मांस-पचनेमें मधुर, कपेला, चरपरा, वात- पित्तनाशक, बलकारक, बाजीकरण और बलवर्धक है॥२८॥ कूर्ममांसगुणाः। कूर्मों वातहरो वृप्यश्चक्षुप्यो बलवर्द्धनः। मेधास्मृतिकरः पथ्यः शोथनो दोपनाशनः॥२८८॥ भूतिस्तेपातु पित्तनी पादस्तेषां कफापहः॥२८९॥ अर्थ-कटुवेका मांस-वातविनाशक, वीर्यवर्धक, नेत्रोंको हितकारी, बलवर्द्धक, मेधाकारक, स्मरणशक्तिवर्द्धक, पथ्य, शोथको दूर करनेवाला और त्रिदोपनाशक है। इसकी नाडी पित्तनाशक और इसके पांव कफन है ।। २८८ ॥ २८९ ॥ मपिफमांसगुणाः। मधुरो मूपिकः स्निग्धो व्यवायी शुक्रवईनः।।२९०॥ - तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः। १०३ अर्थ-मूसेका मांस--स्निग्ध, व्यवायी और शुक्रवर्द्धक अश्वनांसगुणाः । हयमांसं वलकरमुष्णं मारुतनाशनम् ॥ २९१ ॥ अर्थ-घोडेका मांस-बलकारक, गरम और वातविना- शक है ॥२९१॥ गवयमांसगुणाः । गवयस्यापि मांसं च स्निग्धं कासनिवर्हणम् । रसे पाके च मधुरं व्यवायि स्तन्यवर्द्धनम् ॥२९२॥ अर्थ-गवयका मांस-स्निग्ध, कासनाशक, मधुर, पाकमेंनी मधुर, व्यवायी और स्तनोंमें दूध बढानेवाला है ।। २९२ ॥ कर्कटमांसगुणाः। कर्कटः सृष्टविण्मूत्रः सन्धातानिलपित्तजित् । कृष्णकर्कटकस्तपांबल्यः कोप्णोनिलापहः।।२९३॥ अर्थ-केकडेका मांस-मल-मूत्रको निकालनेवाला, भमसं- धानकारक, वात और पित्तनाशक है । कालेरंगके केकडेका मांस-बलकारक, किञ्चित् उष्ण और वातनाशक है ॥२९३॥ तित्तिरिमांसगुणाः। तित्तिरिः सर्वदोपनो ग्राही वर्णप्रसादनः । मधुरो रोचनो वृष्यो मेघानिवलवर्द्धनः ॥ २९४॥ अर्थ-तीतरका मांस-त्रिदोषनाशक, मलरोधक, वर्णको प्रसन्नताजनक, मधुर, रुचिकारक, वीर्य्यवर्द्धक तथा मेधा और अमि, तथा बलवर्धक है ॥'२९४ ॥ - राजवल्लभः। [परिच्छेदः कपिञ्जलमांसगुणाः। कपिललो लघुः शीतः कफासृपित्तहानिदः।।२९५ अर्थ-कपिअलका मांस--हलका, शीतल, कफ और रक्त- पित्तनाशक और अमिवर्द्धक है ॥२९५ ॥ ऋकरचक्रोपचक्रिकानां मांसगुणाः । करा लघवो हृद्यास्तथा चक्रोपचक्रिकाः। वीय्योष्णाः कटुपाकाश्ववल्या दीप्तिकरा मताः२९६ अर्थ-क्रकरका मांस-हलका और हृदयको हितकारी है। चक्र ( चकवा) और उपचक्रके मांसके गुणनी ककरकी समान हैं। तथा उष्णवीर्य्य, पचनेमें चरपरा, बलकारक और अमिप्र- दीपक है ॥ २९६ ॥ चटकमांसगुणाः। कुलिङ्गो मधुरः स्निग्धो व्यवायी वलवर्द्धनः । सन्निपातहरो वेश्मकुलिङ्गस्त्वतिशुक्रलः ॥२९७॥ अर्थ-कुलिंग (चिडिया) पक्षीका मांस-मधुर, स्निग्ध, व्यवायी, वलवर्द्धक, सन्निपातनाशक और अत्यन्त शुक्रको उत्पन्न करे है ॥ २९७॥ पारावतमांसगुणाः। पारावतो रसे पाके स्वादुः शीतोऽस्रपित्तहा । गुरुः कृपायो विपदो वलोपचयकृत्परः ॥२९८॥ अर्थ-पारावतपक्षीका मांस-रसमें स्वादिष्ठ, पचनेमेंभी स्वादिष्ट, शीतल, रनपित्तनाशक, भारी. कपेला, विपद तथा वल और स्थटनावर्द्धक है ।।२९८॥

तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः।
१०५
कपोतमांसगुणाः।
कपोतो मधुरःशीतः कपायो वातपित्तजित् ॥ २९९ ॥
अर्थ-कबूतरका मांस-मधर, शीतल, कपेला और वात-
पित्तनाशक है ॥ २९९ ॥
हरितालमांसगुणाः ।
हरितालोऽल्पविदः स्यात्कपायो विपदो लघुः।
रक्तपित्तप्रशमनस्तृष्णानो वातकोपनः॥३०॥
अर्थ-हरिताल (परेवा) पक्षीका मांस--अल्प मलकारक,
कपेला, विपद, हलका, रक्तपित्तनाशक, तृपानिवारक और वा-
तको कुपित करे है ॥ ३०॥
कुण्टमांसगुणाः।
कुछटो मधुरो वृष्यः स्निग्धोप्णवलकृद्गुरुः ॥१॥
अर्थ-मुरगेका मांस-मधुर, वीर्यवर्धक, स्निग्ध गरम, बल-
कारी और भारी है ॥ १॥
वन्यकुछटमांसगुणाः।
कुकुटो वनजो रुक्षः कपायःस्वादुशीतलः ॥२॥
अर्थ-बनमुरगेका मांम-रूखा, कपेला, स्वादिष्ठ और शी-
तल है ॥२॥
कुछटाण्डगुणाः।
कुकटाण्डं तु मधुरं वलकृद्वह्निदीपनम् ॥ ३॥
अर्थ-मुरगेका अंडा-मधुर, बलबईक और जठराग्निप्रदीप-
क है ॥ ३ ॥

१०६ राजवल्लमः। [परिच्छेदः हंसमांसगुणाः। हंसो वातहरो वृष्यः स्वयों मांसवलपदः ॥४॥ अर्थ-हंसका मांस-वातविनाशक, वीर्यवर्द्धक, स्वरको शु- छ करनेवाला, तथा मांस और बलवर्धक है ।। ४ ।। हंसाण्डगुणाः। इंसवीजं परं वृष्यं बृंहणं वातकोपनम् । पाके लघुतरं प्रोक्तं सर्वामयविनाशनम् ॥५॥ अर्थ-हंसका अंडा--अत्यन्त वीर्य्यवर्द्धक, वाजीकरण, वा- तको कुपित करनेवाला, पचनेमें हलका और सर्वरोगनाश- क है ॥५॥ लावमांसगुणाः। लावो लघुः कट्टीही स्वादुः शीतस्त्रिदोपनुत् ॥६॥ अर्थ-लवापक्षीका मांस-हलका, चरपरा, मलरोधक, स्वा- दिष्ट, शीतल और निदोपनाशक है ॥६॥ वर्तिकामांसगुणाः। वर्तिका मधुरा रुक्षा कफमारुतनाशिनी ॥ ७॥ अर्थ-वर्तिका ( बत्तक) पक्षीका मांस-मधुर, रूखा और वातनाशक है ॥ ७॥ शुकमांसगुणा। शुकमांसं परं बल्यं विपाके गुरु शीतलम् । कासवासक्षयहरं संग्राहि लघु दीपनम् ॥८॥ अर्थ-तोतेका मांस-बलकारक, पचनमें भारी, शीतल,तथा -

१०७
-
तृतीयः३] भाषाटीकायुतः ।
खांसी, श्वास और क्षयरोगका क्षय करे है, मलरोधक, दीपन
और हलका है ॥ ८॥
मयूरमांसगुणाः।
मयूरः श्रोत्रनेवाग्निमेधावर्णस्वरायुपाम् ।
हितो बल्यो गुरुश्चोप्णो वातघ्नः शुक्रमांसदः॥९॥
अर्थ-मोरका मांस-कर्ण, नेत्र, अग्रि, मेधा,वर्ण, स्वर और
आयुको हितकारी है. बलबईक, भारी, गरम, वातविनाशक,
शुक्रजनक और मांसवईक है ॥ १॥
मयूरमांसभक्षणकालनिर्णयः।
हेमन्तकाले शिशिर वसन्ते सेव्यं हि मायूरमुशन्ति
मांसम् । उप्णो हि वहीं विपभोजनाच वर्षाशरद-
ग्रीप्ममुखेप्यपथ्यम् ॥३१०॥
अर्थ-हेमन्त, शीत और वसन्त ऋतुमें मयूरका मांस भक्ष-
ण करना चाहिये, शरद और ग्रीष्म ऋतु मयूर विपका भोज-
न करते हैं इसकारण उनका मांस शरद और मीप्म ऋतु अ-
त्यन्त उप्ण होता है, इसलिये उक्त ऋतुमें मोरका मांस भक्षण
करना अहितकारी कहा है ॥ ३१० ॥
शरार्यादीनां मांसगुणाः।
शरारिमद्गुकादम्बवलाकाः पवनापहाः ।
स्निग्धाः सृष्टमला वृप्या रक्तपित्तहरा हिमाः ।। ११॥
अर्थ-शरारी, मग, कादम्ब और बलाकादि पक्षियांका
मांस-वातनाशक, स्निग्ध, मटको निकालनेवाला, वीर्यवर्द्धक,
रक्तपिननाशक और शीतल है ॥ ११ ॥

१०८
राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
गुरुभक्ष्या बहुभुजो ये चोपचितमेदसः ।
एकदेहेपि पूर्वार्द्ध मृगाणां पक्षिणां परम् ॥ १२ ॥
अर्थ-भारी पदार्थोंको क्षण करनेवाले और बहुत भोजन
करनेवाले तथा संचित मेदयुक्त पशुपक्षियोंका पूर्वार्द्ध--श्रेष्ठगुण
विशिष्ट है ॥ १२॥
मांसानां शिरस्कन्धादीनां यथोत्तरं गुरुत्वमाह ।
सर्वेपां च शिरस्कन्धपोहचर्मयकृदन्तदम् ।
पादयुच्छान्नमस्तिष्कमुप्कक्रोडाः समेहनाः॥१३॥
धातवः शोणिताद्याश्च गुरवः स्युर्यथोत्तरम् ॥१४॥
अर्थ-सर्व प्रकारके पशु और पक्षीयोंका मस्तक, कन्धा,
पीहा, चर्म, यरुद्, पाँव, पूंछ, मस्तिष्क, अण्डकोप, कोड,
लिंग और रक्तादि यह सर्व एक २ से भारी हैं, अर्थात् मस्तकसे
कन्धा, कन्धेसे पीहा, पीहासे चर्म, चमसे यकद् और यरुद्-
से पाद भारी हैं इत्यादि ॥ १३ ॥ १४ ॥
ग्राधमांसाधनम् ।
वयस्थं निर्विपं सद्योहतं मांसं प्रशस्यते ॥ १५॥
अर्थ-तरुण, विपरहित तथा तत्कालके मारे हुवे पशु-प-
क्षीयोंका मांस प्रशंसायोग्य है, अर्थात् ऐसा मांस मांसाहारीयों-
के लिये नक्षण करना कहा है ॥ १५ ॥
त्पाज्यमांसकथनम् ।
मृतं च व्याधितं व्युष्टं वृद्धं बालं विपईतम् ।
अगोचरहतं व्याडं मृदितं मांसमुत्सृजेत् ॥ १६ ॥

१०९ तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। अर्थ-मृत, व्याधियुक्त, वृद्ध, बालक, विपसे मरा हुवा, अगोचर मरा हुवा, और व्याडादि जीवोंका मांस, तथा वासी और पेपित मांस, अक्षण नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥ अथ मद्यवर्गमाह। मद्यसाधारणगुणाः। प्रकृत्या मद्यमम्लोप्णमम्लं चोप्णं विपाकतः । सर्व सामान्यतस्तस्य विशेप उपदेक्ष्यते ॥ १७॥ अर्थ-सर्वप्रकारकी मदिरा-सामान्यपनेसे गरम और अ- म्लस्वजाववाली है, तथा अम्ल और उप्णपाकी है आगे विशेष गुण कहते हैं ॥ १७ ॥ सुराप्रयोगविधिः। कृशानां रक्तमूत्राणां ग्रहण्यशोविकारिणाम् । सुरा प्रशस्ता वातघ्नी स्तन्यरक्तक्षयेषु च ॥ १८ ॥ अर्थ-कश, रक्त, मूत्र, संग्रहणी और अर्श (बवासीर) रोगवालॉको सुरा-अत्यन्त उपकारी है । तथा वात, स्तन्य और रक्तक्षयरोगको हरनेवाली है ।। १८॥ श्वेतमद्यगुणमाह । कासाशीग्रहणीदोपप्रतिश्यायविनाशिनी। श्वेतमृत्रकरा स्तन्यरक्तमांसकरी सुरा॥ १९ ॥ छदयरोचकहत्कुक्षितोदशूलप्रमर्दिनी ।। ३२० ॥ अर्थ-वेनसुरा-सांसी, बवासीर, संग्रहणी और प्रतिश्याय- रोगनाशक है, मनको सफेद करनेवाली, सनोमें दूध घटानेवाली, " राजवल्लभः। [परिच्छेदः रक्तवईक, मांसवईक तथा वमन, अरुचि, हृदयरोग, काखकी पीडा और शूलको दूर करनेवाली है ॥ १९ ॥ ३२० ॥ प्रसन्नागुणमाह। प्रसन्ना गुल्मवाताशोंबिवन्धानाहनाशिनी । शूलं प्रवाहिकाटोपकफवात्तार्शसां हिता ॥ २१ ॥ अर्थ-प्रसन्ना--गुल्म, वात. बवासीर, विबन्ध, आनाह, शूल, प्रवाहिका, आदोप, कफ और वाताश(वादीको बवासीर) को दूर करनेवाली है ॥ २१ ॥ जगलमद्यगुणाः। जगलो गाहिरूक्षोणः शोपनो भक्तरोचनः । शोथा ग्रहणीदोपान हन्त्यरिष्टः कफामयान् ॥२२॥ अर्थ-जगलमदिरा-मलरोधक,रूखी,गरम,शोपनाशक,अन्नमें रुचि करनेवाली, तथा सूजन, बवासीर, संग्रहणी और कफरो- गको दूर करनेवाली है ॥ २२॥ अभिनयमद्यगुणाः। प्रायशोभिनवं मद्यं गुरु दोपलमीरितम् । स्रोतसां शोधनं जीण दीपनं लघु रोचनम् ॥२३॥ हर्पणं प्रीणनं बल्यं मद्यं शोकश्रमापहम् । प्रागल्भ्यप्रतिभाकान्तितुष्टिपुटिस्वरप्रदम् ॥२४॥ अर्थ-नवीन मदिरा-भारी, त्रिदोपवर्द्धक और शिराशोधक है। पुरानी मदिरा-दीपन, हलकी, रुचिकारक तथा हर्ष, तृमि और बलबईक है । शोक और श्रमनाशक है और प्रागलाय, प्रतिज्ञा, कान्ति, तुष्टि, पुष्टि और स्वरजनक है ॥२३॥२४॥ - तृतीयः ३] भापाटीकायुतः । १११ कालिकगुणाः। कालिकं भेदि तीक्ष्णोष्णं पित्तकृत्स्पर्शशीतलम् । श्रमकमहरं रुच्यं दीपनं वस्तिशोधनम् ॥ २५ ॥ दीपनं जरणीयं च हृत्पाण्डुकृमिरोगनुत् ॥२६॥ अर्थ-कांजी दस्तावर, तीक्ष्ण, गरम, पित्तकारक, स्पर्शमें शीतल, श्रमन्न, लमनाशक, रुचिकारक, अमिप्रदीपक, बस्ति- शोधक, जीर्णकारक तथा हृदयरोग, पाण्डु और कृमिरोग- नाशक है ॥ २५ ॥ २६॥ सौवीरगुणाः। ग्रहण्यशोविकारघ्नं सौवीरं मलभेदनम् ॥२७॥ अर्थ-सौवीर (कांजी)-संग्रहणी और अर्शनाशक है, तथा मलोदक है।॥ २७॥ तुपोदकगुणाः। शीतवातहरं युक्त्या प्रमेहन्नं तुपोदकम् ॥२८॥ अर्थ-तुपोदक-शीतल, वातनाशक और प्रमेहको हरने- वाली है ॥ २८ ॥ सिद्धार्थलभृष्टतुपोदकगुणाः। सिद्धार्थतैलसंभृएं दश रोगान् व्यपोहति । कासं श्वासातिसारं च पाण्डुरोगं सकामलम् ॥२९॥ आमं च गुल्मशूलं च पार्शशूलं सवेदनम् । अशीसि श्वयर्थं चैव भुक्ते पीते च शाम्यति॥३३०॥ अर्थ-सर्षपतैलष्ट तुषोदक-खांसी, वास, अतिसार, का- ११२ राजवल्लभः। [ परिच्छेदः मलायुक्त पाण्डुरोग, आम, गुल्म, शूल, वेदनायुक्त पार्श्वशूल, बवासीर और सूजन इन दश रोगोंका नाश करे है॥२९॥३३०॥ मूत्रगुणाः। मूत्रं तीक्ष्णोष्णलवणं पित्तकृत्कटुकं लघु । रूक्षं कृम्युदरानाहशोथाशविपकुष्ठनुत्॥३१॥ अर्थ-मूत्र-तीक्ष्ण, गरम, लवणरसयुक्त, पित्तजनक,चरपरा, हलका, रूखा तथा रुमि, उदररोग, आनाह, सूजन, बवासीर, विप और कुष्ठको नष्ट करे है।।३३॥ इति मद्यवर्गः॥ अथ मधुवर्गमाह। मधुनः सामान्यगुणाः। मधु शीतं मृदु स्वादु त्रिदोपन्नं व्रणापहम् । कपायानुरसं रूक्षं चक्षुष्यं वासकासनुत् ॥३२॥ अर्थ-मधु-शीतल, मृदु, स्वादिष्ठ, त्रिदोपनाशक, वणवि- | नाशक, किञ्चित् कपेला, रूखा, नेत्रोंको हितकारी तथा श्वास और सांसीको दूर करे है ॥ ३२ ॥ पोत्तिकं भ्रामरं सौद्रं माक्षिकं छात्रमेव च । अर्घ्यमोहालकं दालमित्यो मधुजातयः ॥३३॥ अर्थ-मधु-पीनिक, भामर, क्षीद, माक्षिक, छात्र, आय, औद्दालक और दाल इन दोंसे आठ प्रकारका है ॥ ३३ ॥ मधूनां उत्पतिकथनम् । पिङ्गला मक्षिका ज्ञेया महत्यल्पा च सा द्विधा। महती पूतिकानाम्नी स्वल्पा क्षुद्रेति कथ्यते ॥३॥ मधुनः जातिभेदः। .

तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः ।
अर्थ-पिंगलवर्ण मक्षिका-बृहत और क्षुद्र इन भदोंसे दो
| प्रकारकी है । तहां बृहत् मक्षिका पृतिका और क्षुद्र मक्षिका
क्षुद्रा नामसे कही जाती है ॥ ३४ ॥
मध्यमा मक्षिका नीला मक्षिकेत्यभिधीयते ।
पुत्तिका भ्रमरा क्षुद्रा मक्षिकासम्भवं मधु ॥ ३५ ॥
अर्थ-मध्यमारुति नीलवर्णमक्षिका-मक्षिका नामसे प्रसिद्ध
है । पुत्तिका, चमर, शुद्रा और मक्षिका इन चार प्रकारकी
मक्खीयोंसे चारप्रकारके मधुकी उत्पत्ति होती है, अर्थात् पुत्ति-
का नामवाली मक्खीसे पौत्तिक, चमरसे नामर, क्षुद्रासे क्षौद्र और
मक्षिकासे माक्षिक नामवाले मधुकी उत्पत्ति होती है ॥ ३५॥
पौत्तिकादुच्यते छात्रं वरटीछत्रसम्भवम् ।
तपोवने जरत्कारोराध्य मधु तरूद्भवम् ॥ ३६॥
अर्थ-वरटी छत्रोत्पन्न मधुको छात्र कहते हैं । जिस वनमें
जरत्कारमुनिने तप किया था उस वनमें जो महुवेके वृक्ष हैं उन
वृक्षोसे जो उत्पन्न हुवा मधु उसको आर्य कहते हैं ॥ ३६ ॥
औद्दालकं तु वल्मीककारिकीटविनिर्मितम् ।
दालमित्यभिनिदिएं वृक्षकोटरकीटजम् ॥ ३७॥
अर्थ-वल्मीककारी कीडोंसे बनाये हुवे मधुको औदालक
कहते हैं और वृक्षकी कोटरोंमें रहनेवाले कीडोंसे बनाये हुवे
मधुको दाल कहते हैं ॥ ३७ ॥
मधूनां लक्षणमाह ।
माक्षिक तैलवण स्यात् घृतवणे तु पोत्तिकम् ।
सोई कपिलवण स्यात् श्वेतं भ्रामरमुच्यते ॥३८॥

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राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
अर्थ-माक्षिक मधु-तेलके रंगका,पौत्तिक मधु धीके रंगका,
क्षोदमधु भूरे रंगका और नामर मधु सफेदरंगका होता है। ३८॥
पौत्तिकमधुगुणाः।
पौत्तिकं तेघु वीर्योणं कपायानुरसान्चयात् ।
वातासृपित्तकृनेदि मदकृन्मधुरं मधु ॥३९॥
अर्थ-पौतिक मधु-उष्णवीर्य, किञ्चित्कपेला, वातरक्तरो-
गकारक, पित्तजनक, भदकारक और मधुर है ।। ३९ ॥
भ्रामरमधुगुणाः।
पैच्छिल्यात्स्वादुभूयस्त्वात् भ्रामरं गुरु कीर्तितम्३४०
अर्थ धामर मधु-पिच्छल, स्वादु और भारी है ॥३४०॥
क्षौद्रमधुगुणाः।
क्षौद्रं विशेपतो ज्ञेयं शीतलं लघु लेखनम् ॥४१॥
अर्थ-क्षौद्र मधु-अत्यन्त शीतल, हलका और दस्तावर
है॥४१॥
माक्षिकमधुगुणाः।
तस्माल्लघुतरं रूक्षं माक्षिकं प्रवरं स्मृतम् ।
श्वासादिषु च रोगेषु प्रशस्तं तद्विशेषतः।। ४२॥
अर्थ-माक्षिक मधु-अत्यन्त हलका, रूखा, सर्वमधुओंमें
उत्तम और श्वासादि रोगोंको हरनेवाला है ॥ ४२ ॥
छात्रमधुगुणाः।
छात्र चित्रकृमिहरं रक्तपित्तहरं गुरु ॥१३॥
अर्थ-ठान मधु-वित्रकुछ, काम और रक्तपिनरोगनाशक
है नया भारी है ॥ १३ ॥

तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः। आय॑मधुगुणाः! आर्य चाक्षुप्यमायुष्यं कफपित्तामवातजित् ॥४॥ अर्थ-आर्य मधु-नेत्रोंको हितकारी, आयुवईक, तथा कफ, पित्त और आमवातनाशक है ॥ ४४ ॥ औद्दालकमधुगुणाः। ओदालकं कपायोप्णं कह कुष्टविपापहम् ॥ ४५ ॥ अर्थ-औद्दालक मधु-कपेला, गरम, चरपरा तथा कुष्ठ और विपविनाशक है ॥४५॥ दालमधुगुणाः। दालं कफहरं रूक्षं दीपनं छर्दिमेहनुत् ॥ ४६॥ अर्थ-दालमधु-कफनाशक, रूखा, दीपन तथा वमन और प्रमेहनाशक है ॥ ४६॥ उप्यामधुनः निषिद्धता। उष्णमुष्णातमुप्णेश्च हन्यान्मधुविषान्वयात् । मधुन्युप्णो विरुध्यन्ते वर्जयित्वार्यसम्भवम्॥ १७॥ अर्थ-मधुमक्खी सहतको खाते समप विषयुक्त मधुको खा लेनी हैं, इससे मधु उप्णगुणयुक्त होनेसे उप्णतासे पीडिन किये हुवे मनुष्योंका नाश करता है । अतएव उष्णकार्यमें मधुव्यवहार करना नहीं चाहिये । परन्तु आर्य मधु उष्णका- यमें व्यवहार करना चाहिये कारण यह है कि इसमें विप नहीं होता ॥ १७ ॥ अभिनवमघुगुणाः। बृंहणीयं मधु नवं वातइलेप्महरं परम् ।। १८ ॥

राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
अर्थ-नवीन मधु-बाजीकरण तथा वात और कफनाशक
है ॥४८॥
पुरातनमधुगुणाः।
पुराणं लघु संग्राहि निपिं स्थौल्यनाशनम् ॥१९॥
अर्थ-पुराना मधु-हलका, ग्राही निर्दोप और स्थूलताना-
शक है ॥ ४९ ॥
पकापकमधुगुणाः।
दोपत्रयहरं पक्वमाममम्लत्रिदोपकृत् ॥ ३५०
अर्थ-पक्का मधु-त्रिदोपनाशक है। कच्चा मधु-अम्ल और
त्रिदोपजनक है ॥ ३५० ॥
मधुजातशर्करागुणाः।
मधुजा शर्करा रूक्षा तृप्णायेतिसारजित्॥५१॥
अर्थ-सहतकी बनाई खांड-रूखी तथा तृपा, वमन
और अतिसारनाशक है ॥ ५१ ॥ ॥ इति मधुवर्गः॥
अथक्षीरवर्गमाह।
क्षीरं स्वादुरसं स्निग्धमोजस्य धातुवर्द्धनम् ।
वातपित्तहरं वृष्यं श्लेप्मलं शीतलं गुरु ।। ५२॥
अर्थ-दूध-स्वादिष्ठ, स्निग्ध,ओज और धातुवर्द्धक है, वात-
पित्तनाशक,
वावईक,कफकारक, शीतल और भारी है॥५२॥
गोदुग्धगुणाः।
गोक्षीरं जीवनं बल्यं रक्तपित्तानिलापहम् ।
आयुष्यं पुंस्त्वकृत्पथ्यं मध्यं वृष्यं रसायनम् ॥५३॥

तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः।
११७
अर्थ-गायका दूध-प्राणरक्षक, वलकारक, रक्तपित्तनिवा-
रक, पातबिनाशक, अवस्थास्थापकः पुरुपताकारक, पथ्य,
मेधाजनक, वीर्यवर्धक और रसायन है ॥ ५३॥
छागदुग्धगुणाः।
छागक्षीरं तु मधुरं शीतलं ग्राहि दीपनम् ।
रक्तपित्तविकारघ्नं कासश्वासनिबर्हणम् ॥५४॥
अर्थ-बकरीका दूध-मधुर, शीतल, मलरोधक, अमिप्रदीप-
क, रक्तपित्तनाशक तथा खाँसी और श्वासको हरनेवाला है५४
छागीनामल्पकायत्वाद्विविधौपधसेवनात् ।
नात्यम्बुपानाव्यायामात्सर्वदोपहरं पयः॥५५॥
अर्थ-बकरीयोंकी छोटी देह होती है और अनेक प्रकारकी
औषधी खाती हैं तथा अल्प जल पीती हैं और सर्वत्र विचरती
कूदती फिरती हैं। इससे बकरीयोंका दूध सर्वदोपनाशक है५५
मेपीक्षीरगुणाः।
मेपीक्षीरं गुरु स्वादु स्निग्धोणं कफपित्तजित् ॥१६॥
अर्थ-डका दूध-भारी, स्वादिष्ट, स्निग्ध, गरम तथा कफ
और पित्तनाशक है ॥ ५६ ॥
महिपीदुग्धगुणाः।
माहिपं स्निग्धमत्यर्थं निद्राकृदह्निनाशनम् ॥१७॥
अर्थ-सका दूध-स्निग्ध,अत्यन्त निद्राजनक और मन्दा-
निकारक है ॥ ५७ ॥
उष्ट्रीक्षारगुणाः।
टट्रीक्षारं तु रुक्षोणं शोथवातकफापहम् ॥ ५८॥

११८
राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
अर्थ- ऊँटनीका दूध-रूखा, गरम, तथा मूजन, वात और
कफनाशक है ॥ ५८॥
अश्वीदुग्धगुणाः।
अश्वीक्षीरं सलवणं मधुराम्लरसं गुरु ॥ ५९॥
अर्थ-घोडीका दूध-लवणरसयुक्त, मधुर, अम्ल और ह-
लका है ॥ ५९॥
हस्तिनीक्षीरगुणाः।
इस्तिन्या मधुरं वृष्यं कपायानुरसं गुरु ॥३६॥
अर्थ-हथिनीका दूध-मधुर, वीर्यवर्द्धक, किञ्चित्कपेला
और भारी है ॥ ३६०॥
मनुष्यदुग्धगुणाः।
मानुष्यं जीवनं सात्म बृंहणं स्नेहनं पयः॥ ६१ ॥
अर्थ--स्त्रीका दूध-पाणरक्षक, हितकारक, वाजीकरण और
स्निग्ध है ॥ ६१ ॥
गोदुग्धग्रहणकालनिर्णयः ।
गव्यं प्रत्युपसि क्षीरं गुरु विष्टम्भि दुर्जरम् ।
तस्मादम्युदिते सूर्ये याम यामाईमेव वा ॥ ६२॥
समुत्तार्य ततो ग्राह्यं तत्पथ्यं दीपनं लघु ॥ ६३।।
अर्थ-गायका दूध-प्रातःकालमें, भारी, विष्टम्नकारी,
भौर दुर्जर होता है । इसकारण सूर्योदयक पश्चात् एक
प्रहर अथवा अई प्रहर समय व्यतीत होनेपर ग्रहण करना
चाहिये । इसमकार करनेसे हितकारी, अग्निप्रदीपक और लघु
होता है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥

HORS तृतीयः३] भापाटीकायुतः। गोदुग्धानां प्रशस्ताप्रशस्तभेदः। निर्वत्सावालवत्सायाः पयो दोपलमीरितम् । शस्तं वत्तैकवर्णाया धवलीकृष्णयोरपि ॥ ६४॥ इत्यादा मापपर्य्यादा ऊईशृङ्गी च या भवेत् । तासां गवां हितं क्षीरं शृतं वाशृतमेव वा ।। ६५॥ अर्थ-बछडे करके रहित अथवा बाल बछडे सहित ऐसी गायोंका दूध-दोपवाला होता है। जिन गायोंका रंग बछडेके रंगसे मिलता हो उनका दूध तथा काले रंगकी अथवा गोरे रंग- की गायोंका दूध प्रशंसायोग्य अर्थात् निदपि है। जे गाय ईस अथवा मापपर्णी (मपवन) को खाती है तथा जिन गायोंके ऊपरको सांग उठे होय उनका दूध कच्चा अथवा पचाया हुवा हितकारी है ॥ ६४ ॥६५॥ पर्युपितक्षीरगुणाः। क्षीरं पर्युपितं सर्व गुरु विष्टम्भि दुर्जरम् ॥ ६६ ॥ अर्थ-सर्व प्रकारके वासी दूध-गारी, विष्टम्नकारी और कठिनतासे पचते हैं ।। ६६ ॥ पकामदुग्धगुणाः। पयोभिप्यन्दि गुर्वामं वृतोष्णं कफवातजित् ॥६॥ अर्थ-अपक्क दूध-केदकारक और जारी है। अग्रिसे उ- प्ण किया हुवा दूध कफ और वायुनाशक है ॥ ६७ ॥ शृनशीतधारोष्णदुग्धयोर्गुणाः । शृतशीतं तु पित्तनं धारोष्णममृतोपमम् ।। ६८॥

. - १२० राजवल्लभः। [परिच्छेदः अर्थ-जो गरम होकर शीतल हो जाय ऐसा दूध-पित्तनाश- क है। दूहनेके समय उष्णतायुक्त दूध-अमृतकी समान है।६८ क्षीरसन्तानिकागुणाः। क्षीरसन्तानिका वृप्या स्निग्धा पित्तानिलापहा।।६९॥ अर्थ-मलाई मावा इत्यादि-वीर्यवर्द्धक, स्निग्ध तथा पि- न और वातनाशक है ॥ ६९ ॥ वर्जनीयदुग्धकथनम् । वर्जयित्वा स्त्रियाः स्तन्यं सर्वमामं विवर्जयेत् । वज्य सलवण क्षारं यच्च विग्रथितं भवेत् ।।३७० ।। अर्थ-वीके दूधको छोडकर और सर्व दूध अपक ,अहि- तकारी होते हैं । अतएव अपक्क (कचा) दूध पीना नहीं चा- हिये । लपणयुक्त तथा विग्रथित (फटा हुवा) दूध त्यागने योग्य है ॥ ३७०॥ इति क्षीरवर्गः॥ अथ दधिवर्गमाह। दधिसामान्यगुणाः। दधि स्वादमिदं हृद्यं स्नेहनं रोचनं गुरु । पाकेम्टमुणं वातघ्नं माङ्गल्यं बृंहणं परम् ॥ ७१ ॥ अर्थ-दही-स्वादिष्ठ, अभिप्रदीपक, हृदयको हितकारी, स्ने- हयुक्त, रोचन, भारी, पचनम अम्ल, उप्णयार्य, पातविनाशक, मङ्गलकारक और पुष्टिकारक है ॥ ७१ ॥ गय्पदधिगुणा। गव्यं दपि तु वातनं मङ्गलं शुचि रोचनम् । निग्धं विपाके मधुरं दीपनं बटवर्धनम् ॥ ७२ ।।

"
तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः।
अर्थ-गायका दही-वातनाशक: मङ्गलजनक, शुचि, रोच-
न, स्निग्ध, पचनेमें मधुर, अग्निप्रदीपक और बलवर्धक है॥७२॥
छागदधिगुणाः।
छागं दघि लघु प्रोक्तं कफवातक्षयापहम् ।
दुर्नामश्वासकासेपु हितमग्नेश्व दीपनम् ॥ ७३ ॥
अर्थ-बकरीका दही-हलका,अग्निदीपक तथा कफ, वात,
क्षय, बवासीर, श्वास और साँसीको दूर करनेवाला है ॥ ७३॥
मेपदधिगुणाः।
आविकं दापि दुमिकफव्याधिप्रकोपकम् ।।७४ ।।
अर्थ-डका दही-बवासीर और कफरोगकू कुपित
करे है ॥ ७४ ॥
महिपदधिगुणाः।
माहिपं दध्यतिस्निग्धं रक्तपित्तप्रसादनम् ।
विपाके मधुरं वृप्यं गुरु श्लेष्मविवर्द्धनम् ।। ७५ ॥
अर्थ-पैसँका दही-अत्यन्तस्निग्ध, रक्तपित्तनाशक, पचन
मधुर, वीर्यवईक, भारी और कफकारी है ॥ ७५ ॥
घोटकदधिगुणाः।
वाडवं दधि वातनं दीपनं चक्षुपोर्हितम् ॥ ७॥
अर्थ-घोडीका दही-वातविनाशक, दीपन और नेत्रोंको
हितकारी है ॥ ७६ ॥
उष्टदधिगुणाः।
आटकं दधि सक्षारमत्यम्लं पाकतः कटु ॥ ७७ ॥

" " राजवल्लभः। [ परिच्छेदः अर्थ-ऊँठनीका दही-क्षारयुक्त,अत्यन्त खट्टा और पचनमें चरपरा है ॥७७ ॥ हस्तिदधिगुणाः। हस्तिन्या दधि वीयोष्णं कपायं कफवातनुत्।।७८॥ अर्थ-हथिनीका दही-उप्णवीर्य, कपेला, कफ और वा- तनाशक है ॥ ७८॥ मनुष्यधिगुणाः। मानुप्यं मधुरं बल्यं स्निग्धं सन्तर्पणं दधि ॥७९॥ अर्थ-स्त्रीका दही-मधुर, बलकारक, स्निग्ध और सन्तर्पण (तृनिकारक) है ॥ ७९ ॥ स्वादुधिगुणाः। दधि यत्स्वादु तन्मेदःकफाभिप्यंदकारकम् ॥३८०॥ अर्थ-वादु दही-मेद, कफ और क्लेदजनक है॥३८० ॥ अम्लदधिगुणाः। ध्यम्लमतियक्तदूपणं कफपित्तकृत् । विदाहि सृष्टविण्मूत्रं वह्निमान्यत्रिदोपकृत् ॥ ८१ ॥ अर्थ-खट्टा दही-रुधिरको इपित करनेवाला, कफकारक, पित्तजनक, दाहकारी, मलमूत्रको निकालनेवाला तथा मन्दामि और विटापकारक है ॥ ८१ ॥ असारदधिगुणाः। दधि त्वसारं रुक्षं च ग्रादि विष्टम्भि शीतलम्।।८२॥ अर्थ-अमार (पीरहित) दही-रुखा, ग्राही, विष्टम्मकारक और शीतल है ।। ८२॥

तृतीयः ३] भाषाटीकायुत्तः। १२३ दधिसरगुणाः। दनः सरो गुरुवृष्यः स्निग्धो मेदःकफप्रदः । बृंहणो मारुतनश्च बलोपचयकारकः ॥ ८३ ॥ अर्थ-दहीकी मलाई-भारी, वीर्यवर्द्धक, स्निग्ध, मेद और कफदायक, पुष्टिकारक, वातविनाशक तथा बल और स्थलता- कारक है ॥८॥ रोगविशेपे नः प्रशस्तता। पीनसे चातिसारे च शीतके विपमज्वरे । अरुचौ मूत्रकृच्छ्रे च कार्ये च दधि शस्यते ॥८४॥ अर्थ-पीनस, अतिसार, शीत, विषमज्वर, अरुचि और मुत्ररुच्छ्ररोगमें तथा शरीरकी कृशतामें दही विशेष हित- कारी है ॥ ८४ ॥ कालविशेपे दभोऽप्रशस्तता । शरग्रीष्मवसन्तपु प्रायशो दघि गर्हितम् ॥ ८५ ॥ अर्थ-शर्ट, ग्रीष्म और वर्षा ऋतुमें दही प्रायः अपकारी रोगविशेपे दभो निपिद्धता । रक्तपित्तविकारेषु कफोत्थेषु न तद्धितम् ॥ ८॥ अर्थ-रक्तपित्त और कफोत्पन्न रोगमें दही अहित- कारी है ॥ ८६॥ दधिभक्षणनिपिद्धता। न नक्तं दधि भुनीत न चाप्यघृतशर्करम् । नामुद्गयूपं नाक्षीद्रं नोष्णमामलकैर्विना ।। ८७ ॥

१२१ राजवल्लभः। परिच्छेदः अर्थ-दही रात्रिके समय भक्षण करना चाहिये तथा घृ- तरहित दधि, शर्करा और मगके यूपविना, मधु और आमला- हीन दधि तथा अत्यन्त शीतल नहीं खाना चाहिये ॥८७॥ अक्रमधिभक्षणगुणाः। ज्वरासृकूपित्तवीसर्पकुष्टपाण्ड्वामयान क्रमात् ।। प्राप्नुयात् कामलां चापि विधि हित्वा दधिप्रियः।।८८ अर्थ-विना नियमके दहि खानेसे-ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प, | कुष्ठ, पाण्डु,नम और कामलादि अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।८८॥ दधिमस्तुगुणाः। मस्तु श्लेप्मानिलहरं वृष्यं स्रोतोविशोधनम्।। ८९ ॥ अर्थ-दधिमस्तु-श्लेप्मवातनाशक, वृष्य और स्रोतविशो- धक है ।। ८९ ॥ दधिकर्चिकागुणाः। वातघ्नी ग्राहिणी रूक्षा दुर्जरा दधिकूर्चिका ॥३९०॥ अर्थ-दधिचिका-वातविनाशक, ग्राही, रूखी और क- ठिनतासे पचनेवाली है ॥ ३९० ॥ दधिचिकालक्षणम् । अोदके पयस्युंचे दध्यम्लं दधिकर्चिका ॥ ९॥ अर्थ-एकसेर उप्ण दूधमें आदसेर जल मिला लेवे उसमें खट्टा दही मिलाले, उसको दधिकृर्चिका कहते हैं ॥९१॥ इति दधिवर्गः ॥ तक्रवर्गमाह। तकं त्रिदोपशमनं स्वादु पाकरसं लघु। वीय्याणं मूत्रकृच्छ्रघ्नं कपायमम्लमग्निदम् ॥ ९२॥ - तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः । अर्थ-तक (मठा, छाछ )-त्रिदोपनाशक, पचनेमें स्वादि- घ, हलका, उष्णवीर्य्य, मूत्रकृच्छ्रनाशक, कपेला, सट्टा और जठरामिको दीपन करे है ।। ९२ ॥ येपु रोगेपु तक्रं देयं तदाह । शोथोदराशोंग्रहणीदोपमूत्रग्रहेऽरुचौ । स्नेहव्यापदि पाण्डुले तकं दद्यात् गरेषु च ॥१३॥ अर्थ-शोथ, उदर, अर्श, संग्रहणी, मूत्रविबद्ध, अरुचि, स्नेहव्यापद, पाण्डु और विपसे उत्पन्न हुवे रोगोंमें तक देना चाहिये ।। ९३॥ तक्रस्यायिपयमाह । नतु तक्र क्षते दद्यात् उष्णकाले न दुर्वले। न मूछभ्रिमदाहेपु न ज्वरे रक्तपित्तके ॥ ९४ ।। अर्थ-क्षतरोगमें, ग्रीष्मऋतुमें, दुर्वलमनुप्यको तथा मूर्छ, भम,दाह, ज्वर और रक्तपित्तरोगमें तक देना नहीं चाहिये॥१४॥ शीतकालेऽग्निमान्ये च कफोत्थेप्वामयेषु च । मार्गावराधे कुष्टे च वायो तक्र प्रशस्यते ।। ९५॥ अर्थ-शीतकालमें, मन्दादिमें कफरोगमें, मार्गके अवरोधमें कुष्ठरोगमें और वातरोगों तक हितकारी है ।। ९५ ॥ . तऋलक्षामार। तक्रमुद्धतसारं यद्दधिपादजलान्वितम् ॥ ९६ ॥ अर्थ-दहीममे घी निकाल लेने फिर उस माररहित दहीमें चौथा भाग जल मिला लेवे उसको तक कहते हैं ॥१६॥ , राजवल्लभः। [ परिच्छेदः तक्रकृचिकागुणाः। ग्राहिणी वातला रूक्षा दुर्जरा तक्रकूर्चिका ॥१७॥ अर्थ-तक्रकूचिका-ग्राही, वातकारक, रूक्ष और दु- जर है ॥ ९७॥ तक्रकूचिकालक्षणमाह। तप्ते पयसि तकेण संयोगात्तक्रकूचिका ॥ ९८ ।। अर्थ-उष्णदूध तक मिला लेवे उसको तकर्चिका कहते हैं ॥ ९८॥ इति तक्रवर्गः॥ अथ नवनीतगुणमाह । सद्योजातनवनीतगुणाः । नवनीतं नवं वृष्यं ग्राहि पाचनरोचनम् । क्षयारुतिप्पीहग्रहण्यशेविकारनुत् ॥ ९९ ॥ अर्थ-नवीन नवनीत ( मक्खन, नोनी )-वीर्यवर्द्धक, मलरोधक, पाचक, रोचक तथा क्षय, अरुचि, आदित, प्लीहा, संग्रहणी और बवासीरको दूर करनेवाली है ॥ ९९ ॥ दुग्धजातनवनीतगुणाः। चक्षुप्यं बृंहणं स्निग्धं वृप्यं जीवनकारकम् । क्षारोत्थितं हिमं ग्राहि रक्तपित्ताक्षिरोगनुत् ॥४००॥ अर्थ-दूधर्मसे निकाला हुवामरखन-नेत्रोंको हितकारी,बूं- हण (पुष्टिकारक), स्निग्ध, वीर्यवर्धक,आयुवईक,शीतल, माही त- थाग्नपिन और नेत्ररोगनाराक है।४००॥ इति नवनीतगुणाः।

तृतीयः ३] भापाटीकायुतः ।
अथ घृतवर्गमाह ।
घृतसाधारणगुणाः।
घृतं बुद्ध्यमिशुक्रोजोमेघास्मृतिकफावहम् ।
वातपित्तविपोन्मादशोथालक्ष्मीज्वरापहम् ।। १ ।।
स्नेहोत्तमं योगवाहि सर्वथा मधुरं हिमम् ॥२ ।।
अर्थ-धी-बुद्धि, अनि, शुक्र, ओज, मेघा, स्मरणशक्ति
और कफको बढावे है । तथा वात, पित्त, विष, उन्माद, शोथ;
अलक्ष्मी और ज्वरको हरे है। यह सर्वलेह पदार्थोंमें उत्तम है,
योगवाही, मधुर और शीतल है ॥ ३ ॥२॥
गव्यघृतगुणाः।
गव्यं तु वातपित्तघ्नं चक्षुप्यं बलवर्द्धनम् ।
सर्वस्नेहोत्तमं शीतं मधुरं रसपाकयोः ॥३॥
अर्थ-गायका पी-बात और पित्तनाशक है, नेत्रोंको हि-
तकारी, बलबईक, सर्व चिकनईयों में उत्तम, शीतल, मधुर और
पचनेमेनी मधुर है ॥ ३ ॥
माहिपतगुणाः।
माहिपं स्वादु शीतं च कफदं रक्तपित्तनुत् ॥ ४॥
अर्थ-सका घी-स्वादिष्ट, शीतल, कफकारक और रक्त-
पिचनाशक है ॥ ४ ॥
आजघृतगुणाः।
आज कासे क्षये पथ्यं चक्षुप्यं बलवर्द्धनम् ॥५॥
अर्थ-बकरीका धी-खांसी और क्षयरोगमें पय्य है, नेत्रा-
को हितकारी और बटबईक है ॥ ५ ॥

१२८ राजवल्लभः। [परिच्छेदः । मेपघृतगुणाः। आविकं पित्तलं योनिदोपे शोपे कफानिले ॥६॥ अर्थ-भेडका घी-पित्तजनक तथा योनिदोप, शोप, कफ और वातरोगमें हितकारी है ॥ ६॥ औधृतगुणाः। औष्टिकं कफवातघ्नं शोथकृम्युदरापहम् ॥७॥ अर्थ-ऊँटनीका घी-कफ, वात, सूजन, कमि और उदर- रोगको दूर करनेवाला है ॥७॥ मानुष्यवृतगुणाः। मानुष्यमतिचक्षुष्यं लघु पाके प्रमेहजित् । मूर्छाकुष्ठविपोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ८॥ अर्थ-स्त्रीका घी-तिमिररोग, प्रतिश्याय, आम, खांसी, मूर्छा, कोट, विप, उन्माद, राक्षसादि ग्रह और अपस्माररोगको हरनेवाला है ॥ ८॥ पुराणमपुराणधृतलक्षणगुणाश्च । उग्रगन्धं पुराणं स्याद्दशवपस्थितं घृतम् । लाक्षारसनिभं शीतं प्रपुराणमतःपरम् ॥९॥ यथा यथा भवजीर्ण गुणवत्स्यात्तथा परम्॥४१०॥ अर्थ-उपगन्धयुक्त, लाखके रंगकी समान रंगवाला ऐसे दश वर्षके रक्खे हुचे धीको पुराना घी कहते हैं, दश वर्षके अधिक व्यतीत हो जानेपर प्रपुराण घी कहा जाता है । पी जितना २ पुराना हो जाता है, उतना २ ही अधिकगुणवाला होता है । ॥ ५॥११० ॥ इति घृतगुणाः॥

,
'
--
तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः।
१२२
अथ इक्षुवर्गमाह।
इक्षुसाधारणगुणाः।
इक्षवो रक्तपित्तना वल्या वृप्याः कफप्रदाः।
विपाके मधुराः स्त्रिधा गुरखो मृत्रला हिमाः ॥११॥
अर्थ-ईख-रक्तपित्तनाशक, बलकारक, बीयंबईक, कफ-
कारक, पचनेमें मधुर, स्निग्ध, नारी, मूत्रजनक और शीतल
है ॥ ११॥
कोपकारागुणाः।
कोपकारो गुरुः शीतो रक्तपित्तक्षयापहः ॥ १२॥
अर्थ-कोपकार ईख-भारी, शीतल तथा रक्तपित्त और
क्षयरोगनाशक है ॥ १२॥
पौंकेक्षुगुणाः।
पोण्डकः शीतलो वृप्यः स्निग्धो मधुरबृंहणः ॥ १३॥
अर्थ-पौण्ड्रक ईख-शीतल, वृप्य, निग्ध, मधुर और बुंह-
ण है ॥ १३॥
भीमकक्षुगुणाः।
भीरुः इलेप्मकरः स्वादुरविदाही गुरुः परम् ॥१४॥
अर्थ-जीरुक ईस-कफकारक, स्वादिष्ठ, अविदाही और
भारी है ॥ १४ ॥
वंशके गुणाः।
वंशकस्त्वनभिप्यंदी लघुदोपत्रयापहः ॥ १५ ॥
अर्थ-वंशक ईख-अनभिप्यन्दी, लघु और त्रिदीपनाशक
है ॥ १५॥

।
राजवल्लभः।
[ परिच्छेदः
कान्तरीक्षुगुणाः।
कान्तारी मधुरा लध्वी सक्षारा कफवातला ॥ १६॥
अर्थ-कान्तरी ईख-मधुर, हलकी, क्षारयुक्त तथा कफ
और वातकारक है ॥ १६॥
इक्षुमूलादिगुणाः।
इक्षुमूलोतिमधुरो मध्ये मधुर एव च ।
ग्रन्थौ त्वच्यग्रभागे च विज्ञेयो लवणो रसः॥ १७॥
अर्थ-ईसकी जड़-अत्यन्त मधुर है । ईखका मध्यभाग-
भी मधुर है। ईखकी गॉठ, त्वचा और अग्रभाग लवणरस
(निमकीन) युक्त है ॥ १७॥
यन्त्रनिप्पीडितक्षुरसगुणाः।
वृप्यः शीतः सरः स्निग्धो यन्त्रकस्तु विदह्यति।
मूलाग्रजन्तु जग्धादिपीडनां मलसंस्करात् ॥ १८॥
किञ्चित्कालं निवृत्त्या च विकृतिं याति यान्त्रिकः १९
अर्थ-कोलूमें पेली हुई ईखका रस-शीतल, सर ( कुछ २
दस्तावर ), स्निग्ध और दाहकारक होता है । मूलके अम-
भागका कीडोंसे खाया हुवा उसको पेलनेसे मलके संस्कारसे
कुछेक समयपर्यन्त वह ठीक रहकर फिर विकारको प्राप्त हो
जाता है ।। १८ ॥१९॥
पफेक्षुरसगुणाः।
पक्को रसो गुरुः स्निग्धः सतीक्ष्णः कफवातनुत्४२०
अर्थ-ईखका पकाया हुया रस-भारी, स्निग्ध, तीक्ष्ण तथा
कफ और वातनाशक है ॥४२० ॥

-
तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः।
फाणितगुणाः।
फाणितं गुर्वमिष्यन्दि वृंहणं कफशुक्रलम् ॥ २१ ॥
अर्थ-फाणित-भारी, क्लेदजनक, बृंहण (पुष्टिकारक)तथा
कफ और शुक्रजनक है ॥ २१ ॥
सामान्यक्षुरसगुणा.।
इक्षुरसो हिमो वृष्यस्तर्पणो जीवनः परः ।
वातासृपित्तजित्स्वादुः स्निग्धः प्रीणनवृंहणः॥२२॥
अर्थ-ईसका रस-शीतल, वीर्यवर्धक, तृतिकारक आ-
युवर्द्धक, पातविनाशक, रक्तपित्तनाशक, स्वादिष्ठ, स्निग्ध, प्रीति-
जनक और पुष्टिकारक है ॥ २२ ॥
दन्तनिप्पीडितक्षुरसगुणाः ।
रक्तप्रसादनो वृष्यो दन्तनिष्पीडितो रसः ॥२३॥
अर्थ-दातोसे वसी हुई ईखका रस-वीर्य्यवर्दक और रक्त-
को विमल करे है ॥ २३ ॥
गुडगुणाः।
गुडो वृप्यो गुरुः स्निग्धो वातन्नो मूत्रशोधनः ।
नातिपित्तकरो मेदःकफकृमिवलप्रदः ॥२४॥
अर्थ-गुड-वीर्यवर्द्धक, भारी, स्निग्ध, वातविनाशक, मूत्र-
शोधक, किञ्चित् पिनजनक तथा मेद, कफ, कमि और ब-
लकारक है ॥ २४ ॥
पुराणगुडगुणाः।
गुडः पुराणोऽतिगुणो वातहासप्रसादनः ।
पित्तनो मधुरः स्निग्धो बल्यः पथ्यो विशेषतः॥२६॥

राजवल्लभः। [ परिच्छेदः अर्थ-पुराना गुड-अत्यन्त गुणवाला है, वातको हरनेवाला है, रक्तको निर्मल करनेवाला है, पित्तका नाश करनेवाला है, मधुर, स्निग्ध, बलकारक और विशेषकरके पथ्य है ॥ २५ ॥ खण्डगुणाः। खण्डं वृष्यतमं बल्यं चक्षुज्यं वातपित्तनुत् ॥२६॥ अर्थ-खांड-अधिकतर वीर्यको बढानेवाली, बलको उ- सन्न करनेवाली, नेत्रोंको हितकारी तथा वात और पित्तको हरनेवाली है ॥ २६ ॥ शर्करागुणाः। शर्करा ज्वरपित्तासक्रमूर्छादितपापहा ॥२७॥ अर्थ-चीनी-ज्वर, रक्तपित्त, मूळ, वमन और तृपानि- वारक है ॥२७॥ तमराजगुणाः। तृष्णानस्तमराजस्तु ज्वरदाहालपित्तनुत् ॥२८॥ अर्थ-तमराज-तृष्णा, ज्वर, दाह और रक्तपित्तनाशक है ॥ २८॥ लसीकादीनां उत्तरोत्तरं निर्मलत्वादिना गुणवत्वमाह। लसीका फाणितगुडं खण्डं मत्स्यण्डिका सिता। निर्मला लघवो ज्ञेयाः शीतवीया यथोत्तरम् ॥२९॥ यथा यथपां नर्मल्यं गुणवत्स्यात्तथा तथा ॥४३०॥ अर्थ-रसीका, फाणित, गुड, खण्ड, मत्स्पण्डिका और निता यह कमसे निर्मल, लघुयाकी और शीतवीर्य हैं अर्थात् लसीका (सीरा) से फाणित (राव), फाणितसे गुड, गुडसे सां- तृतीयः३] भाषाटीकायुतः । ड, खांडसे मत्स्याण्डिका (मिश्री) और मत्स्याण्डकासे सिता अर्थात् फूलचीनी-निर्मल, लघुपाकी और शीतवीर्य है । इन- में जो २ जितनी २ निर्मल हैं उसके उतने २ ही अधिक गुण हैं ॥ २९ ॥ ४३० ॥ इति इक्षुगुणाः॥ अथ हिंग्वादीनां गुणमाह । हिंगुगुणाः। हिंगु तीक्ष्णं कहरसं शूलाजीर्णविवन्धनुत् । लघूष्णं पाचनं स्निग्धं दीपनं कफवातजित् ॥३१॥ अर्थ-हींग-तीक्ष्ण, चरपरी, तथा शूल, अजीर्ण और वि- बन्धनाशक है ! हलकी, गरम, पाचक, स्निग्ध, अमिको दपिन करनेवाली और वातको दूर करनेवाली है ॥ ३१ ॥ जीरकगुणाः। जीरकं रुचिकृत्स्वादु गन्धान्यं कफवातजित् । पाके च कटु तीक्ष्णोष्णं लघु पित्ताग्निवर्द्धनम् ॥३२॥ अर्थ-जीरा-रुचिकारक, स्वादिष्ठ, गन्धाढ्य, कफ और वातनाशक है । पचनेमें चरपरा, ताक्ष्ण, गरम, हलका तथा पित्त और अमिवर्द्धक है ॥ ३२॥ वाप्पीकागुणाः। वाप्पीका कटुतीक्ष्णोप्णा कृमिशोथापहा मता॥३३॥ अर्थ-बाप्पीका (हिंगुपत्री)-चरपरी, तीक्ष्ण, गरम तथा कृमि और सूजनको दूर करे है ॥ ३३ ॥ आर्द्रधन्याकगुणाः। धन्याकमाई मधुरं सुगन्धि रुचिकारकम् ॥ ३४॥ , राजवल्लभः। [ परिच्छेदः अर्थ-कच्चा धनियां-मधुर, सुगन्धियुक्त और रुचिकारी शुष्कधन्याकगुणाः। शुप्कन्तु कफवातघ्नं दाहछर्दिवपापहम् ॥३५॥ अर्थ-सूखा धनियाँ-कफ, वात, दाह-वमन और तृष्णाको शान्ति करे है ।। ३५॥ कासुन्दीवटिकागुणाः। कासुन्दीवटिका हृद्या वातश्लेप्मरुजापहा । अग्निसंदीपनी रुच्या मलवातानुलोमनी ॥३६॥ अर्थ-कसौदीकी बटिका-हृदयको हितकारी, वात और कफरोगनाशक, अमिप्रदीपक, रुचिकारक तथा मल और बात अनुलोमक है ॥ ३६॥ हरिद्रागुणाः। हरिद्रा कफवातास्रशोथकण्डूरुजापहा ॥३७॥ अर्थ-हटदी-कफ, वातरक्त, सूजन और कण्डुरोगको दूर करनेवाली है ॥ ३७॥ शतपुप्पागुणाः। शताहानिलदाहामशूलतृछर्दिनाशिनी ॥ ३८ ॥ अर्थ-यन सौंफ-वात, दाह, आम, शूल, तृपा और यम- नको दूर करनेवाली है ॥ ३८ ॥ मधुरीगुणाः। मधुरी रोचनी वृप्या दादासपित्तनाशिनी ॥३९॥ - तृतीयः ३ भाषाटीकायुतः। अर्थ-सौंफ-रोचक,वीर्यवर्द्धक, तथा दाह और रक्त- पित्तनाशक है ॥ ३९ ॥ पवानीगुणाः। यवानी कोप्ठशूलनी हृद्या पित्ताग्निकारिणी। समीरणवलासनी कृमिणां चैव नाशिनी ।। ४४०॥ अर्थ-अजवायन-कोष्ठशूलनाशक, हृदयको हितकारी, पित्तकारक, जठरामिवईक, तथा वात, कफ और कमिको दूर करनेवाली है ॥ ४४०॥ शुष्कपिप्पलीगुणाः। पिप्पली मधुरा वृप्या कटुका दीपनी सरा । स्निग्धोष्णा मारुतश्लेष्मकासश्वासविनाशिनी॥४१॥ अर्थ-सूखी पीपल-मधुर, वीर्यवर्धक, चरपरी, अनिको दीपन करनेवाली, सारक (कुछ २ दस्तावर), स्निग्ध, गरम तथा वात, कफ, खाँसी और श्वासको हरनेवाली है ॥४१॥ आईपिप्पलीगुणाः। पिप्पल्या स्वादुगुर्वी शीता स्निग्धा कफापहा ४२॥ अर्थ-कची पीपल-स्वादिष्ट, भारी, शीतल, स्निग्ध और कफनाशक है ॥४२॥ आदमरिचगुणाः। मरिचं स्वादुपाक्याई गुरु श्लेष्मप्रसेकि च ॥४३॥ अर्थ-कच्ची काली मिरच-स्वादुपाकी, भारीऔर कफको निकालनेवाली है ॥ ४३॥ - .

" राजवल्लभः। [ परिच्छेदः शुष्कमरिचगुणाः। शुप्कं रुच्याग्निदं रूक्षं कदुष्णं लघु शुक्रनुत् ॥४४॥ अर्थ-सूखी काली मिरच-रुचिकारक, अमिजनक, रूखी, चरपरी, हलकी और शुक्रनाशक है ॥ ४४ ॥ शुण्ठीगुणाः। शुण्ठी तु कफवातनी सस्नेहा लघुदीपनी। विपाके मधुरा वृप्या हृद्योष्णा कटुरोचनी ॥ १५॥ अर्थ-सौंठ-कफन, वातनाशक, स्निग्ध, हलकी, दीपन, प- चनेमें मधुर, वीर्य्यवर्द्धक, हृदयको हितकारी, गरम, चरपरी और रुचिकारक है ॥ ४५ ॥ आकगुणाः। आईकं कफवातघ्नं विवन्धानाहशूलनुत् ॥४६॥ अर्थ-अदरख-कफ और वातनाशक तथा विवन्ध, आ- नाह और शूलको निर्मूल करे है ॥ ४६ ॥ सर्पपसिद्धार्थयोर्गुणाः। सर्पपः कफवातघ्नस्तीक्ष्णोष्णो रक्तपित्तकृत् । कटुकः कृमिकुष्टमः सिद्धार्थश्चापि तद्गुणः॥४७॥ अर्थ-सा-कफनाशक, वातविनाशक, तीक्ष्ण, गरम, रक्त- पित्तकारक, चरपरी, रुमिनाशक, कुटविनाशक और सिद्धार्थ (सफेद ससी) की इसीके समान गुण जानने ॥४७॥ राजिकगुणाः। राजिका कटुतीक्ष्णोप्णा कृमिशोथविनाशिनी ॥२८॥ - तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः। १३७ अर्थ-राई-चरपरी, तीक्ष्ण, गरम, तथा कमि और सृज- नको दूर करे है ॥४८॥ रसोनगुणाः। लशुनः क्षारमधुरः कण्ठ्यो वृप्यो गुरुः सरः । भग्नसन्धानकृद्धल्यो रक्तपित्तप्रदूपणः॥ ४९।। अर्थ-लशुन-क्षार, मधुर, कण्ठको हितकारी, वीर्य्यवर्द्धक, भारी, सारक, नमसन्धानकारक, बलकारक तथा रक्त और पित्तको दूपित करे है ॥ १९ ॥ पलाण्डगुणाः। पलाण्डुमधुरो वृष्यः कटुः स्निग्धोऽनिलापहः । वल्यः पित्ताविरोधी च कफनुत्तर्पणो गुरुः॥४५॥ अर्थ-प्याज-मधुर, वीर्यवर्द्धक, चरपरी, स्निग्ध, वातना- शक वलकारक, पित्तविनाशक, कफनाशक, तृतिकारक और जारी है ॥ ५० ॥ गुडत्वग्गुणाः। गुडत्वक कफशुक्रामवातघ्नं मधुरं कटु ।। ५१ ।। अर्थ-दालचीनी-कफ, शुक्र, आम और वातनाशक है, मधुर और चरपरी है ॥ ५१ ॥ शुप्कनेजपत्रगुणाः। शुप्कपत्रं ज्वरश्चेप्मपित्तनं वह्निवर्द्धनम्।। ५२॥ अर्थ-सृखा तेजपात-ज्वर, कफ और पित्तनाशक है और अग्निवर्द्धक है। ५२ ॥

१३८ राजवल्लभः। [परिच्छेदः सैन्धवगुणाः। सैन्धवं दोपजिदृष्यं चक्षुष्यमाविदाहि च । अग्निसंदीपनं स्निग्धं रोचनं मधुरं लघु ॥ ५३॥ अर्थ-सैंधा नोन-त्रिदोपनाशक, वीर्यवर्धक, नेत्रोंको हि- तकारी, अविदाही, अमिप्रदीपक, स्निग्ध, रुचिकारक, मधुर और हलका है ॥ ५३॥ सौवर्चलगुणाः। सौवर्चलं रुचिकर वीय्योणं विपदं कटु। . गुल्मशूलविवन्धनं किञ्चित्पित्तकरं लघु ॥५४॥ अर्थ-सौवर्चल (काला नोन )-रुचिकारक, उष्णवीर्य, विपद, कटु, तथा गुल्म,शूल और विवन्धका नाश करे है । किञ्चित्सित्तकारक और हलका है ॥५४॥ पिडलयणगुणाः। विडं लवणमुत्केदि वह्नेलविवन्धनुत् । मलवातामविष्टम्भशूलाटोपविबन्धनुत् ॥५५॥ अर्थ-बिडलयण (विरिया संचरनोन)-उलंदी, अमिका पल, विवन्ध, मल, पात, आम, विष्टम्भ, शूल और आटोपजन्य विपन्धनाशक है ॥५५॥ ऑद्विदलयणगुणाः। आदिदं ताल्णमुत्छेदि सक्षारं कट तिक्तकम् ॥५६॥ अर्थ-आदिदटवण-तीक्ष्ण, उदी, क्षारयुक्त, कटु और कड्या है ।। ५६॥

तृतीयः ३] भापाठीकायुतः। साम्मारिलवणगुणाः। विवन्धानाहशूलग्नं लोके साम्भारिसंज्ञकम् ।। ५७॥ अर्थ-सामरनोन-विवन्ध, आनाह और शूलको दूर करे है ॥ ५७॥ सामुद्रलवणगुणाः। सामुद्रं लवणं पाके नात्युप्णमविदाहि च । भेदकं मधुरं स्निग्धं शुलनं नातिपित्तलम् ।।५८॥ अर्थ-समुद्रलवण-पचनेमें लवण रसवाला, किञ्चित् गरम. अविवाही, दस्तावर, मधुर, स्निग्ध, शूलनाशक और अत्यन्त पित्तकारक नहीं है ॥ ५८ ॥ पांशुलवणगुणाः। पांशुज लवणं भेदि पाचन पित्तकारकम् । रोचनं दीपनं स्वादु रेचनं मारुतापहम् ॥१९॥ अर्थ-पांशुलवण-भेदक, पाचक, पित्तकारक, रोचक, दीपन. स्वादिष्ट, रेचक और वातविनाशक है ॥ २९ ॥ प्रसिद्धलवणगुणाः। लोकप्रसिद्धं लवणे पाचनं दीपनं सरम् । कफवातकृमिहरं लेखनं पित्तकोपनम् ॥ ४६० ॥ अर्थ-साधारण लवण--पाचक, दीपन, सारक, कफ, वात और कृमिनाशक है, लेखन और पित्तको कुपित करे है॥४६० यवक्षारगुणाः । यवक्षारो जयेदर्शःश्वासान् वातकफामयान् । गुल्महग्रहणीपाण्डुप्लीहानाहगलामयान् ॥ ६॥ " राजवल्लभः। [परिच्छेदः अर्थ-जवाखार-बवासीर, श्वास, वात, कफरोग, गुल्म ,हृदयरो- ग, संग्रहणी, पाण्डु, पीहा, आनाह और गलरोगको दूर करे है६१ स्वार्जकाक्षारगुणाः। तस्मादल्पान्तरगुणः सर्जिकाक्षार उच्यते ॥ ६२॥ अर्थ-सज्जी-जवाखारकी अपेक्षा किश्चित् हीनगुण- वाली है। ६२॥ टंकणक्षारगुणाः। श्लेप्मनटकणक्षारस्तीक्ष्णोष्णो वह्निवर्द्धनः । निरुक्षणोऽनिलकरो भेदनः पित्तवर्द्धनः ॥६३॥ अर्थ-सुहागा-तीक्ष्ण, गरम, अमिवर्द्धक, रूखा, वातवर्द्धक, भेदक और पिनवर्द्धक है ॥ ६३ ॥ पलाशादिक्षारगुणाः। पलाशधवपूतीककरनपाटलादिजाः। क्षारास्तु पाचनाः सर्वे रक्तपित्तहराः सराः॥६॥ गुल्मार्श कृमिपुंस्त्वनाः शर्कराश्मारनाशनाः ॥६५॥ अर्थ-टाक, धो, पृतिकरंज, करंज और पाटलादिकाका क्षार-पाचक, रक्तपित्तनाशक, सारक तथा गुल्म, बवासीर, रुमि, पुरुपता, शर्करा और पथरीरोगका नाश करे है ।। ६४ ॥ इति हिंग्यादिवर्गः ॥ अथ अन्नवर्गमाह। उत्तमासकथनम् । तण्डुलाः शालयोधाता वारिमध्ये निवासिताः । स्थाल्यो तप्तनले सिद्धं भक्तं भवति शोभनम्॥६६॥ -

तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः।
१४१
अर्थ-शालिवानके चावल पानीमें डालके अच्छे प्रकार
घोरे और एक हांडीमें जल जरकर टप्ण कर लेवे, फिर उष्ण-
जलमें धूले हुवे चावल छोडकर मन्द अमिसे पचावे । इस प्रकार
करनेसे उत्तम अन्न अर्थात् सात सिद्ध होता है ॥६६॥
अन्नसाधारणगुणाः।
अन्नं वृद्धिकरं वृष्यं प्रीणनं बृंहणं गुरु ।
धात्विद्रियकर वल्यं क्षुत्क्षामायासकार्यजित्॥६॥
अर्थ-अन्न-शरीरवर्द्धक, वीर्यवर्धक, तृतिदायक, पुष्टि-
कारक, भारी, धातु और इन्द्रियोंकी शक्तिको वढानेवाला, व-
लकारक तथा शुधा, दुर्वलता, परिश्रम और कशतानाशक
नवान्नगुणाः।
नवान्नं श्लेप्मल स्वादु सुस्निग्धं वृंहणं गुरु ॥३८॥
अर्थ-नवीन अन्न-कफकारक, स्वादिष्ठ, स्निग्ध, पुष्टिजनक,
और जारी है ॥ ६८ ॥
पुराणान्नगुणाः।
पुराणं विरसं सूक्षं पथ्यं वह्निप्रदीपनम् ॥६९॥
अर्थ-पुराना अन्न-विरस, रूखा, पथ्य और अमिप्रदीपक
अत्युप्णाद्यन्नगुणाः।
अत्युष्णान्नं बलं हन्ति शीतं शुकंच दुर्जरम्।।४७०॥
अर्थ-अत्यन्त उष्ण अन्न-बलनाशक है, शीतल अन्न
और शुष्क अन्न दुर्जर है ॥ ४७० ॥

राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
क्लिन्नतण्डुलसंयुक्तयोश्चानयोर्गुणाः ।
अतिक्विन्नं ग्लानिकर दुर्जरं तण्डुलान्वितम् ॥७॥
अर्थ-क्लिन्नान्न-ग्लानि करनेवाला और तण्डुलान्वित अन्न
दुर्जर है ॥ ७१ ॥
जलधौतसद्योन्नगुणाः ।
सद्योन्नं वारिणा धौतं शीघ्रपाकि हिमं लघु ॥७२॥
अर्थ-सद्यअन्न-जलसे धुला हुवा शीघ्रपाकी, शीतल और
हलका है ॥ ७२॥
जलसंयुक्तपऍपितानगुणाः।
त्रिदोपकोपनं रूक्षं वार्यन्नं निशि संस्थितम् ॥७३॥
अर्थ-जलयुक्त वासी अन्न-त्रिदोषवर्द्धक और रूखा है॥७३
भृष्टतण्डलान्नगुणाः।
भृष्टतण्डुलजं चान्नं लघु वह्निप्रदीपनम् ॥ ७४॥
अर्थ-भुने हुए चावलोंका भात-हलका और अमिप्रदीप-
क है ॥ ७४ ॥
यवागूगुणाः।
यवागूपरतृप्णानी लध्वी बस्तिविशोधिनी ।
अतिसारे ज्वरे दाहे हिता वह्निप्रदीपनी ॥ ७ ॥
अर्थ-यवागू-ज्वर और तृपानाशक है, हलकी, बस्तिशो-
धक, अभिप्रदीपक तथा ज्वर, अतिसार और दाह इत्यादि रोगों-
में हितकारी है ॥ ५५ ॥
विलेपीगुणाः।
विलेपी तर्पणी लघ्वी ग्राहिणी क्षुत्तृषापहा ॥७॥

- " तृतीयः ३] भाषारीकायुतः। अर्थ-विलेपी-तृप्तिकारक, हलकी, मलरोधक तथा क्षुधा और तृपानाशक है ॥ ७६ ॥ पेयागुणाः। पेया स्वेदानिजननी वातवीनुलोमनी । क्षुत्तृष्णाग्लानिदौर्बल्यकुक्षिरोगविनाशिनी ॥७७॥ अर्थ-पेया-पसीनेको उत्पन्न करनेवाली, अग्निजनक, वात और मल अनुलोमक, तथा क्षुधा, तृष्णा, ग्लानि, दुर्बलता और कुक्षिरोग नाशक है ॥ ७७ ॥ मण्डगुणाः। क्षुद्वोधनो वस्तिविशोधनश्चप्राणप्रदः शोणितवर्द्धनश्च । ज्वरापहारी कफपित्तहन्ता वायुं जयेदष्टगुणोहि मण्डः७८ अर्थ-मण्ड-क्षुधाजनक, बस्तिशोधक, आयुवर्द्धक, रक्तवर्द्ध- क, ज्वरनाशक, कफपित्तहारक और वातनिवारक है ॥ ७८॥ भृष्टतण्डलगुणाः। सुगन्धिः कफहा रूक्षः पित्तलो भृष्टतण्डुलः ॥७९॥ अर्थ-भुने हुवे चावल-सुगन्धित, कफनाशक, रूखे और पित्तकारक हैं ॥ ७९ ॥ चिपिटकगुणमाह । पृथुका गुरवः स्निग्धाः कफविष्टम्भकारकाः। बल्याः सक्षीरभावात्तु वातना भिन्नवर्चसः॥४८०॥ अर्थ-चौले-भारी, स्निग्ध, तथा कफ और विष्टम्भकारक हैं । दूधमें भीगे हुवे चौले-बलकारक, वातविनाशक और मल- मोदक है ॥४८॥ - राजवल्लभः। [ परिच्छेदः लाजागुणाः। लाजास्तृट्छयतीसारमेहमेदःकफच्छिदः। कासपित्तामशमना दीपना लघवो हिमाः ॥ ८॥ अर्थ-खीले-तृपा, वमन, अतिसार, प्रमेह, मेद, कफ, खां- सी, पिच और आमनाशक हैं, तथा अमिप्रदीपक, हलकी आर शीतल हैं ॥८॥ लाजामण्डगुणाः। लाजामण्डोऽग्निजननो दाहतृष्णानिवारणः। ज्वरातिसारशमनः श्लेप्मलः सामपाचनः ।।८२॥ मन्दाभिविपमानीनां बालस्थविरयोपिताम् । देयं च सुकुमाराणांलाजमण्डः सुसंस्कृतः ।।८३ ।। अर्थ-खीलोंका माड-अमिप्रदीपक, दाहनिवारक, तृष्णा- नाशक, ज्वरनाशक, अतिसारहारक, कफकारक, आमपाचक तथा मन्दाग्नि और विपमामियुक्त मनुष्योंको और बालक, वृद्ध, स्त्री तथा कोमल शरीरवाले मनुष्योंको खीलोंका माड देना चाहिये ।। ८२ ॥ ८३ ॥ लाजपेयागुणाः। लाजपेया श्रमन्त्री तु क्षामकण्ठस्य देहिनः । क्षुत्तृष्णाग्लानिदोर्षल्यकुक्षिरोगविनाशिनी ॥ ८४ ॥ अर्थ-खीलोकी पेया-क्षीण कण्ठवाल मनुप्यका अमना- शक तथा क्षुधा, तृपा, ग्लानि, दुर्बलता और कुशिरोगको दूर- करनेवाली है ॥ ८४॥ - - तृतीयः ३] भापाटीकायुतः ।. ११५ यवसक्तगुणाः। यवानां सक्तवो रुक्षा लेखना वह्निवर्द्धनाः ।। ८५ ॥ अर्थ-जोंके सत्तू-रूखे, लेखन और अमिवर्द्धक हैं ।।८५॥ मन्थगुणाः। मन्थः सद्यो बलकरः पिपासाश्रमनाशनः ॥८६॥ अर्थ-मन्थ-- तत्काल बलवर्धक तथा पियास और श्रमको दूर करे है ॥ ८६ ॥ मन्थलक्षणम् । सक्तवः सर्पिपा युक्ताः शीतया विपरिपुताः । नात्यच्छा नातिसान्द्राश्च मन्थ इत्यभिधीयते॥८७॥ अर्थ-सत्तुओंमें घी मिलाकर फिर उसमें इतना जल डाले कि जिससे न तो वह अत्यन्त पतले हो जाय और न अत्यन्त गाढे हो जाय उसको मन्य कहते हैं ॥८७ ॥ घानागुणाः। वातलाः कफरोगना वातवर्होनुलोमनाः। धानासंज्ञास्तु तेऽतीव दुर्जरा लेखनाः स्मृताः।।८८॥ अर्थ-धाना (बहुरी)-बातबईक, कफरोगनाशक, वात और मलअनुलोमक, अतिकठिनतासे पचनेवाली और लेख- न है ॥ ८८॥ सकुपिण्डी-सक्त्ववलेहिकयोर्गुणाः। गुर्वी पिण्डी खरात्यर्थ लवी सैव विपर्ययात् । • सक्तूनामाशु जीयेत मृदुत्वादवलेहिका ॥८९॥ - १०

राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
अर्थ-सनूओंका बनाया हुआ पिण्ड-अतिकठिनतासे पच-
नेवाला है । उसी पिंडको मलकर लिया जाये तो लघुपाकी
हो जाता है । शत्तुओंसे बनाई हुई अवलेहिका कोमलताके
कारण शीघ्र जीर्णताको प्राप्त होती है ॥ ८९॥
वाट्यमण्डगुणाः।
वाव्यमण्डो विबन्धनः शूलानाहविनाशनः ।
रोचनो दीपनो हृद्यः पित्तश्लेप्मानिलापहः॥४९॥
अर्थ-पाट्यमण्ड (भुने हुवे जौंका माँड)-विबन्ध, शूल,
आनाह, पिन, श्लेष्म और वातका नाश करे है। रोचक, दीपन
और हृदयको हितकारी है ॥४९॥
मुद्यूषगुणाः ।
मुद्यूपोऽग्निदो हृद्यः शुद्धानां व्रणिनामपि ।
पथ्यो बलासपित्तनो ज्वरहा च कृताकृतः॥९॥
अर्थ-रुत और अरुत इन दोनों प्रकारका भूगका यूप-
अमिप्रदीपक, हृदयको हितकारी, शुद्ध और व्रणवाले मनुष्योंके
लिये हितकारी,तथा कफ,पित्त और ज्वरको दूर करे है ॥११॥
अकृतलक्षणमाह ।
अस्रेहलवणं सर्वमकृतं कहावना ॥ ९२॥
अर्थ-नोन, घृत, तेलादि और मरीचादिकरके रहित मूगके
यूपको " अरुन " कहते हैं ॥ ९२ ॥
कृतलक्षणमाह।
विज्ञेयं लवणनेदकटकैः संस्कृतः कृतम् ॥ ९३ ॥

तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। १४७ अर्थ-नोन, घृत, तेलादि और मरीचादिक करके बनाये हुबे मुद्रयूपको " कृत " कहते हैं ॥ ९३॥ रागपाडवलक्षणमाह । सतु दाडिममृद्धीकायुक्तः स्याद्रागपाडवः ॥९॥ अर्थ-मृगके यूपमें दाख और अनारका रस मिला लेवे उसको "रागपाडव" कहते हैं ॥ ९४ ॥ तस्य गुणाः। रुचिकृल्लघुपाकश्च दोपाणामविरोधकृत् ॥९५ ॥ अर्थ-रागपाडव-रुचिकारक, हलका और वातादि दोपों- का अविरोधी है ॥ ९५ ॥ मसूरयूपगुणाः। मसुरयूपः संग्राही बृंहणश्च प्रमेहजित् । पित्तश्लेप्मज्वरहरस्तथातीसारनाशनः ॥ ९६॥ अर्थ-मसूरका यूप-ग्राही, बृहण तथा प्रमेह, पित्त, श्वेप्म, ज्वर और अतीसारको दूर करनेवाला है ॥ ९६ ॥ कुलस्वयूपगुणाः। कुलत्थयूपोऽनिलहा शर्कराइमरिनाशनः । तूणीप्रतूणीकासाझेगुल्ममेदःकफापहः ॥९७॥ अर्थ-कुलथीका यूप-वात, शर्करा, अश्मरी, तूणी, प्रतूणी, कास, अर्श, गुल्म, मेद और कफका नाश करनेवाला है ॥९॥ मापयूपगुणाः। मापयूपो गुरुभेदी वातन्नो दीपनो मतः ।। ९८॥

१४८ राजवल्लभः। । परिच्छेदः अर्थ-उडदका यूप-भारी, दस्तावर, वातविनाशक और अग्निप्रदीपक है ॥ ९८॥ अथ खडयूपलक्षणमाह । तकं कपित्थचांगेरीमरिचाजाजिचित्रकैः । सुपक्कखडयूपोयमयः काम्बिलकः परः ॥९९॥ अर्थ-तक (छाछ ), कपित्थ (कैथ), चाङ्गेरी (अम्बिलो- ना), मिरच, जीरा और चीताकरके पकाये हुवे यूपको खडयू- प कहते हैं ॥ ९९॥ अथ काम्बलिकयूपलक्षणमाह। दध्यम्ललवणनेहतिलमापविपाचितः ॥ ५० ॥ अर्थ-बट्टा दही, निमक, घृतादि, तिल तथा उडदोंके द्वारा पचाये हुवे यूपको काम्बलिक ग्रुप कहते हैं ॥ ५० ॥ खडकाम्बलिकयूपयोर्गुणाः। खडकाम्बलिको यूपी ग्राहिवातकफापही ॥ १ ॥ अर्थ-खडय़प और काम्बलिकयूप-ग्राही, तथा कफ और वातनाशक है ॥ १॥ ॥ इति अन्नवर्गः ॥ अब मत्स्यपाकविधिगुणाश्च । दग्धमत्स्यगुणाः। दग्धमत्स्यो गुरुव॒प्यो बूंदणः प्रापावर्दनः । क्षीणशुक्राश्च ये केचिद्मनजरिताश्च ये ॥२॥ नित्यं स्त्रीसेवका ये च क्षीणतेजस एव च। 'दग्धमत्स्यो हितस्तेषां सतेललवणान्वितः ।।३।।

तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः।
१९९
अर्थ-दग्धमत्स्य-भारी, वीर्यवर्धक, पष्टिकारक, प्राणवई-
क तेल और लवणसंयुक्त दग्धमत्स्य-शुक्रक्षीणवाले और
भमरोगसे पीडित ऐसे मनुष्योंको तथा नित्य स्त्रीके सेवनसे जि-
नका क्षय हो गया हो ऐसे मनुष्योंको हितकारी है ॥ २ ॥३॥
भृटमत्स्यगुणाः।
तस्मादीनगुणः किञ्चिदृष्टमत्स्य उदाहृतः।
कफन्नपित्तजननो रक्षःशोधन एव च ।।४।।
अर्थ-भुनी हुई मछली-दग्ध मछलीकी अपेक्षा किञ्चित्
हीनगुणवाली है, कफनाशक, पित्तवर्द्धक, रूखी और संशोध-
क है ॥४॥
जम्बीररसयुक्तदग्धमत्स्यगुणाः ।
दग्धमत्स्यस्तु जम्बीररसाक्तो वातनाशनः ।
मधुरो रोचनो हृयो बृंहणो बलवईनः ॥५॥
अर्थ-जम्बीररसयुक्त दग्धमत्स्य-वातनाशक, मधुर, रोचक,
हृदयको हितकारी, पुष्टिकारक और बलवर्द्धक है ॥५॥
मत्स्यपुटपाकविधिः।
पलालवोटितो मत्स्यः कईमेन विलेपितः ।
दग्धोऽङ्गारे सलवणो दग्धमत्स्यः प्रकीर्तितः ॥६॥
अर्थ-मछलीकू प्यालसै बाँधकर कीचका लेप करे
फिर अंगारोंमें जलाकर लवण मिला ले उसको दग्धमत्स्य
कहते हैं ॥ ६॥

१५० राजवल्लभः। [ परिच्छेदः सन्तोलितमत्स्यगुणाः। आईककटुतैलेन सम्यक् सन्तोलितो भवेत् । स स्वादुः कफवातघ्नः शुक्रलो बलवर्द्धनः ॥७॥ अर्थ-अदरख और कटु तेलके द्वारा सन्तोलित मत्स्य स्वादिष्ठ, कफनाशक, वातविनाशक, शुक्रजनक और बल- वर्द्धक है ॥ ७॥ मत्स्यव्यञ्जनगुणाः। व्यञ्जनं शाकमत्स्याख्यं हृद्यं वृष्यञ्च पुष्टिकृत् ॥८॥ अर्थ-मछलीका शाक वा तारी-हृदयको हितकारी, वी- यंवर्द्धक और पुष्टिकारी है ॥ ८ ॥ मत्स्यघण्टगुणाः । मत्स्यघण्टो बलकरोवातनो रोचनः परः ॥९॥ अर्थ-मस्पघण्ट-बलकारक, वातनाशक और रोचक है ९ मांसरसगुणाः। रसो मांसस्य चक्षुष्यो बृंहणः प्राणवर्द्धनः। वृप्यो वातविकारनः स्मृत्योजःस्वरवर्द्धनः ॥५१०॥ भग्नविश्लिप्टसन्धीनां कृशानां वणिनां हितः॥११॥ अर्थ-मांसरस (सोरुआ)-नेत्रोंको हितकारी, पुटिकार- क, प्राणवर्द्धक, वीर्यवर्द्धक, वातविकागविनासक, स्मरणशक्ति- वर्द्धक, आजवर्द्धक, स्वरशाधक तथा जम और विरिलष्ट सन्धियुक्त मनुप्यांकी तथा सरा और बणसंयुक्त रोगियोंको हितकारी ना २५१ तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। तैलसिद्धमांसगुणाः। मांसं यतैलसंसिद्धं वीर्योष्णं पित्तलं कटु । अग्निसंदीपनं हृद्यं दृष्टिनुत्पुष्टिकृत् गुरु ॥ १२ ॥ अर्थ-तेलमें सिद्ध किया हुआ मांस-उप्णवीर्य, पित्तज- नक, चरपरा, अग्निप्रदीपक,हृदयको हितकारी, दृष्टिशक्तिनाशक, पुष्टिकारक और भारी है ॥ १२ ॥ घृतसिडमांसगुणाः। मांसं तु घृतसंसिद्धं दृष्टिदं पुष्टिकृल्लघु । प्रीणनं सर्वधातूनां विशेपान्मुखशोपिणाम् ॥ १३ ॥ अर्थ-वृतमं सिद्ध किया हुआ मांस-दृष्टिशक्तिको बढाने- वाला, पुष्टिकारक, हलका, धातुपोपक और मुखशोपवाले मनु- प्योंको तृप्तिदायक है ॥ १३ ॥ परिशुष्कमांसलक्षणम् । मांसं बहुवृते पक्वं सिद्धं चोष्णाम्बुना मुहुः। जीरकाद्यैः समायुक्तं परिशुप्कं तदुच्यते ॥१४॥ अर्थ-मांसको अधिक धीमें भूनकर उष्ण जलसे सिद्ध करे उसमें जीरा इत्यादि मसाले मिला लेवे उसको परिशुष्क मांस कहते हैं ॥ १४ ॥ परिशुष्कमांसगुणाः । परिशुष्कं स्थिरं स्निग्धं हर्पणं प्रीणनं गुरु । पित्तनं बलमेधाग्निमांसौजःशुक्रवर्द्धनम् ।। १५ ।। अर्थ-परिशुष्कमांस-शरीरको स्थिर करनेवाला, स्निग्ध, .

१५२
-
राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
हर्पजनक, तृप्तिदायक, भारी, पित्तनाशक तथा बल, मेधा, अग्नि,
मांस, ओज और शुक्रवर्द्धक है ॥ १५ ॥
अथ प्रदिग्धलक्षणमाह ।
तदेव धनतकाव्यं प्रदिग्धं सत्रिजातकम् ॥१६॥
अर्थ-पूर्वोक्त परिशुष्क मांसमें नागरमोथा, तक, दालची-
नी, इलायची और तेजपात मिला ले उसको प्रदिग्ध मांस कहते
हैं ॥ १६ ॥
प्रदिग्धमांसगुणाः।
प्रदिग्धं बलमांसाग्निवर्द्धनं कफपित्तजित् ॥१७॥
अर्थ-प्रदिग्धमांस-बल, मांस और अमिवर्द्धक है, तथा
कफ और पित्तको जीते है ॥ १७ ॥
शूलिकामोतमांसगुणाः।
मांसं तु शूलिकाप्रोतमंगारेण विपाचितम् ।
ज्ञेयं गुरुतरं वृष्यं दीप्तानीनां सदा हितम् ॥१८॥
अर्थ-शूलिकामोतमांस ( कवाब)-भारी, वृष्य और दी-
पामियाले मनुष्योंका सदैव हितकारी है ॥ १८॥
अथ घेशचारलक्षणमाह ।
निरस्थिपिशितं पिष्टं स्निग्धं घृतगुडान्वितम् ।
कृष्णामरिचसंयुक्तं वेशवार इति स्मृतम् ।। १९ ॥
अर्थ-मांसको हड्डीयांसे अलग करके अच्छे प्रकार पीस
कर गुड और घृतद्वारा स्निग्ध करके पीपल और काली मिरच
मिटा लेवे इसको वशवार कहते हैं ॥ १९ ॥

तृतीयः ३] भापाटीकायुतः।
चेशवारगुणाः।
वेशवारो गुरुः स्निग्धो बलोपचयवर्द्धनः ॥ ५२० ॥
अर्थ-बेशवार-भारी, स्निग्ध, तथा बल और स्थूलता-
कारक है ।। ५२० ॥
अनुक्तव्यञ्जनगुणाः ।
द्रव्येण येन येनेह व्यञ्जनं मत्स्यमांसयोः ।
तस्य तस्य च तत्रोक्तैर्गुणदोपैर्विभावयेत् ॥२१॥
अर्थ-जिम जिस द्रव्यसे मत्स्य मांसका व्यंजन हो उसी
उसी के अनुसार उसके गुणदोप जानने॥२१॥ इति व्यअनगुणाः॥
पिष्टकसाधारणगुणाः ।
पिष्टं प्राणकरं रूक्षं विदाहि गुरु दुर्जरम् ॥ २२ ॥
अर्थ-पिष्टक (पिठी)-प्राणरक्षक, रूखी, विदाहकारक
और दुर्जर है ॥ २२ ॥
शालितण्डुलकृतपिष्टकगुणाः ।
शालिपिष्टमया भक्ष्याः कफपित्तविनाशनाः ॥२३॥
अर्थ-शालिधानके चावलोंकी पिठी-कफपित्तनाशक है॥२३॥
वैदलकृतपिष्टकगुणाः।
वैदला गुरखो भक्ष्या विएम्भिसृष्टमारुताः॥२४॥
अर्थ-मूग उडदादिकोंकी पिठी-भारी, विष्टम्भकारी और
वातअनुलोमक है ।। २४ ॥
गुडादिकृतपिष्टकगुणाः।
सगुडाः सतिलाश्चैव सक्षौद्रक्षीरशर्कराः।
भक्ष्या हृद्याश्च बल्याश्च गुरवो वृंहणाः पराः॥२५॥

१५४ राजवल्लभः। [परिच्छेदः अर्थ-गुड, तिल, मधु, दूध और चीनीसंयुक्त पिष्टक-ह- दयको हितकारी, बलकारी, भारी और पुष्टिकारी है ॥ २५ ॥ स्नेहसिद्धगोधूमकृतभक्ष्यगुणाः। सस्नेहाः स्नेहसिद्धाश्च भक्ष्या गोधूमसम्भवाः। गुरवस्तपणा हृद्या बलोपचयवर्द्धनाः ॥२६॥ अर्थ-स्नेहादियुक्त और स्नेहसे सिद्ध की हुई गैहूकी पिठी-भारी, तर्पण ( तृप्तिकारक), हृदयको हितकारी तथा बल और स्थूलतावर्द्धक है ॥ २६ ॥ घृतपूरलक्षणमाह। मर्दितां समितां क्षीरनारिकेलसितादिभिः । अवगाह्ये घृते पक्का घृतपूरोऽयमुच्यते ॥ २७॥ अर्थ-दूध, नारियल और चीनी आदिसे मर्दित गैहूके चूनको अधिक घृत पका ले इसको धृतपूर अर्थात् घेवर कहते हैं ।। २७ ॥ घृतपूरगुणाः। घृतपूरो गुरुव॒प्यः कफकृद्रतमांसदः । वातपित्तहरो हृद्यः स्वादुः प्राणकरोऽनिदः ॥२८॥ अर्थ-घृतपर (घेवर )-भारी, वीर्यवर्द्धक, कफकारक, रतवर्द्धक, मांसवईक, वातनाशक, पितन, हृदयको हितकारी, स्वादु तथा बल और अग्निवर्द्धक है ॥ २८॥ संपवलक्षणगुणाश्च । समितामम्बुदुग्धेन खण्डेलामरिचाईकः । घृतपक्का क्षिपेत् खण्डे संयवो बृंहणो गुरुः ॥ २९ ॥ - -

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तृतीयः ३] भापाटीकायुतः।
अर्थ-गेहूंके चूनमें दूध, चीनी, इलायची, काली मिरच
और अदरख मिला लेवे उसको धीम पकाकर खांडकी चासनी-
में छोड देवे, इसको संयव कहते हैं । यह पुष्टिकारक और
जारी है ॥ २९ ॥
मधुमस्तकलक्षणगुणाश्च ।
समिता वेटितामध्ये मधु दत्त्वा शृता घृते ।
मधुमस्तकमुद्दिष्टं तदृप्यं गुरु दुर्जरम् ॥ ५३०॥
अर्थ-गैहूँका चून माढ उसकी लोई कर ले फिर उन लोई-
याँको बेल लेवे उसमें मधु भरकर मुख बंधकर घीमें जन ले
और पका ले इसको मधुमस्तक कहते हैं । मधुमस्तक-धीर्य-
वर्द्धक,भारी और अत्यन्त कठिनतासे पचनेवाला है ।। ५३० ।।
चन्द्रप्रभापायसलक्षणगुणाश्च ।
आतप्ततण्डुला धौता परिभ्रष्टा घृतेन च ।
खण्डयुक्तेन दुग्धेन पाचिताः पायसो भवेत् ॥३१॥
भृटजीरचतुर्जातचन्द्रविन्दुसुरोचनः॥३२॥
अर्थ-उष्ण चावलोंको गले प्रकारसे धोयकर घृतम भून
लंब फिर दूध और चीनीके द्वारा पकाकर उसमें भुने हुवे जीरे-
का चूर्ण, दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर और कि-
श्चित्मात्र कपर डाल दे, इसका नाम चन्द्रप्रनापायस अर्थात्
खीर है । यह चन्द्रप्रतापायस-मुसरांचक है ॥३३ ॥३२॥
पर्पटशकुल्योर्गुणाः।
पर्पटा लघवो सुक्षाः शकुल्यः कफपित्तलाः॥३३॥

राजवल्लभा ।
[ परिच्छेदः
अर्थ-पापड़-हलके और रूखे हैं। शप्कुली-कफ और
पित्तजनक है ॥ ३३॥
फेनकगुणाः।
फेनका लघवो रूक्षा वृप्या पित्तानिलापहाः ॥३४॥
अर्थ-फेनी-हलकी. रुखी, वीर्यवर्द्धक तथा पिच और
वातनाशक है ॥ ३४ ॥
बटलडकयोर्गुणाः।
वटो विदाही तृष्णाकृहुको दुर्जरः परः ॥ ३५ ॥
अर्थ-बड़े-दाहकारक और तृपाकारक हैं । लड्डू-दु-
जर है ॥ ३५ ॥
उपयोगचितामाह।
शाकाम्लफलपिण्याककुलत्थलवणामिपैः।
करीरदधिमसिश्च प्रायःक्षीरं विरुभ्यते ॥ ३६॥
अर्थ-शाक, अम्लफल, तिलांकी खल, कुलथी, लवण,
मांस, करील, दधि और मांसके साथ दूधका भक्षण करना
निपिद है ॥ ३६॥
प्राणहारी च हारीतो हरिद्रालवणेः कृतः॥३७॥
अर्थ-हलदी और लवणके साथ हारतिपक्षीका मांस भक्ष-
ण करता प्राणांकी हर है ॥ ३७ ॥
रुखोस्तलेन संभृएं विपं मायूरमादिपम् ॥ ३८॥
अर्थ-अण्डीक तलम शूना हुभा मारका मांस और औस-
कामांम विपकी समान है ॥ ३८ ॥

१५७
तृतीयः ३] भापाटीकायुतः।
वराहवसया भृष्टा बलाका तुहरत्यसून् ।। ३९ ।।
अर्थ-सूअरकी चर्बीसे सुना हुआ बगुलेका मांस-शीघ
प्राणनाशक है ॥ ३९॥
संयुक्ता सैव वारुण्या कुल्मापैश्च विरुध्यते ॥५४०॥
अर्थ-बगुलेका मांस मबके साथ तथा कुल्मापके साथ
भक्षण करना नहीं चाहिये ।। ५४० ॥
अवि कुसुम्भशाकेन मत्स्यतैलेः कणां त्यजेत्॥४१॥
अर्थ-भेड़का मांस कसूमके शाकके साथ तथा मछलीके
तेलके साथ पीपलका साना निषेध है ॥ ११ ॥
मापरिक्षुविकारांश्च कानिकस्तिलशकुली ॥४२॥
अर्थ-उड़दोंके साथ इक्षुविकार (गुड़, खाँड, चीनी, फल-
चीनी, मिश्री इत्यादि) तथा कांजीके साथ तिलोंकी शप्कुली
खाना निषेध है ॥ ४२ ॥
कपोतः सापपे भृष्टो घृतं कांस्ये दशाहगम् ॥४३॥
अर्थ-साके तेलमें भुना हुआ कबूतरका मांस खाना नहीं
चाहिये । कांसीके बरतनमें दश दिनसे रख्खा हुआ घी खाना
निषेध है ॥४३॥
वियं घृतसमं क्षौद्रं मधुना गगनाम्बुना ॥४४॥
अर्थ-घरावर घी और मधु मिलाकर खाना तथा मधुके
साथ मेघजलका पीना विपके समान अपकारी है ॥४४॥
मूलकं मापयूपेण मधुना नच भक्षयेत् ॥४५॥

१५८
राजवल्लभः।
[ परिच्छेदः
अर्थ-उड़दोंके यूपके साथ अथवा मधुके साथ मूलीका
भक्षण करना निषेध है ॥ ४५ ॥
नारिकेलजलेनापि कपूरं नैव भक्षयेत् ॥ ४६॥
अर्थ-नारियलके जलके साथ कपूरका खाना अनु-
चित है ॥ ४६॥
एकत्र सर्वमांसानि विरुध्यन्ते परस्परम् ॥४७॥
अर्थ-सर्वमांसको एकत्र मिलाकर खाना तथा एक जी-
के मांसमें दूसरे जविका मांस मिलाकर खाना विरुद्ध है॥४७॥
विरुद्धभोजने ये रोगा जायन्ते तानाह।
नक्तान्धवीसपदकोदराणां विस्फोटकोन्माद-
भगन्दराणाम् । मूीमदाध्मानगलग्रहाणां
पाण्यामयस्यामविपस्य चैव ॥ १८॥
किलासकुष्टग्रहणीगदानां शोथातिसारज्य-
रपीनसानाम् । सन्तानदोपस्य तथैव मृत्यो-
बिरुद्धमन्नं प्रवदन्ति दे॒तुः ॥१९॥
अर्थ-विरुद्धभोजन-नकान्ध (रताधा), विसर्प, जलोदर,
विस्फोट, उन्माद, भगन्दर, मृी, मद, आध्मान, गल्वेदना, पा-
ण्डु, आम, विप, फिलास, कोट, संग्रहणी, शोथ, अतिसार, ज्वर,
पानमादिगेग, सन्तान दोप और मृत्युका कारण है ॥१८॥४९॥
बिगाहारजनितरोगाणां चिकित्सामार।
विरुद्धाहारजान रोगान विनिहन्ति विरेचनम्।
यमन शमनं वापि सर्व वा हितसवितम् ॥२५०॥

" तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः। अर्थ-विरुद्ध आहार करनेसे जो रोग उत्पन्न होते हैं, वह सर्व रोग, विरेचन अथवा वमन तथा शमन अथवा हितकारक जोजन करनेसे नाश हो जाते हैं। ५५०॥ इति विरुद्धमोजनम्॥ अथ भोजनयोगिनः। भोजनादी लवणाकादिभक्षणगुणाः । भोजनाग्रे सदा पथ्यं जिह्वाकण्टविशोधनम् । अग्निसंदीपनं हृद्यं लवणार्द्रकभक्षणम् ॥५१॥ अर्थ-भोजनकी आदिमें सेंधे नोनके साथ अदरखका भ- क्षण करना सदैव पथ्य है, जिह्वा और कण्ठशोधक है, अमिप्र- दीपक और हृदयको हितकारी है ॥५१॥ आयुर्घते गुडे रोगा मृत्यु-नो विदाहिषु । आरोग्यं कटुतिक्तेपु बलं मांसे पयःसु च ॥ १२ ॥ अर्थ-भोजनसे पूर्व घृत अक्षण करनेसे आयुकी वृद्धि होती है । गुड भक्षण करनेसे रोग उत्पन्न होते हैं। दाहकारक पदार्थ खानेसे मृत्यु निकट आती है । कुटु और तिक्तरसवाले पदार्थ खानेसे आरोग्यता होती है और मांस तथा दूधके खाने- से बलकी वृद्धि होती है ॥ ५२ ॥ क्रमादीनां गुणाधिक्यमाह । अन्नादप्टगुणं पिष्टं पिटादष्टगुणं पयः। पयसोऽष्टगुणं मांसं मांसादष्टगुणं घृतम् ॥ ५३॥ घृतादष्टगुणं तैलं मर्दनान्न तु भक्षणात् ॥५४॥ अर्थ-अन्नसे अधिक आठ गुण पिष्टकमें हैं, पिष्टकसे

१६०
राजवल्लभ.।
[परिच्छेदः
अधिक आठ गुण दूधमें हैं। दूधसे अधिक आठ गुण मांसमें
हैं। मांससे अधिक आठ गुण घृतमें हैं और घृतसे अधिक आठ
गुण तेलमें हैं। किन्तु यह गुण तेलके मलनेमें हैं और भक्षण
करनेमें नहीं हैं ।। ५३ ।। ५४ ॥
आहारगुणाः।
आहारः प्रीणनः सद्यो बलकृदेहधारकः ॥ ५५ ॥
अर्थ-आहार-तृप्तिकारक, तत्काल बलकारक और देह-
धारक है ॥५५॥
आहारदिनिर्णयः।
आयुष्यं प्राङ्मुखे भुते यशस्य दक्षिणामुखम् ।
श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्के झुदङ्मुखः।।५६॥
अर्थ-पूर्वकी ओर मुख करके आहार करनेसे आयु
बढता है, दक्षिणकी ओर मुख करके आहार करनेसे यशका
लान होता है, पश्चिमकी ओर मुख करके आहार करनेसे ल-
क्ष्मी बढती है और उत्तरकी ओर मुख करके आहार करनेसे
अहितकी वृद्धि होती है। इस कारण उत्तरकी ओर मुख करके
आहार नहीं करना चाहिये ॥५६॥
भक्षणविषये अन्नादीनां परिमाणमाह ।
कुक्षावन्नेन भागो दावेक पानेन पूरयेत् ।
वायोः सञ्चरणार्थञ्च चतुर्थमवशेपयेत् ॥१७॥
अर्थ-आहारके समय उदरको दो भाग अन्नसे एक भाग
पनिकी वस्तुओंमे जर ले, चतुर्थांश शेप वायुके फिरने लिये
रख लंबे ॥ ५७ ॥

तृतीयः ३] भापाटीकायुतः। आचमनगुणाः। दन्तान्तरगतं चान्नं शौचेनैवाहरेच्छनः । कुर्यादनिर्गतं तद्धि मुखस्यानिष्टगन्धताम् ।। ५८॥ अर्थ-आहार करनेके समय दांतोंमें जो अन्न प्रविष्ट हो जाता है उस अन्नको आचमनके द्वारा शनैः २ निकाल देवे और जो इस अन्नको नहीं निकालते हैं उनके मुखमें अधि- कतर दुगंध आने लगती है ॥ ५८ ॥ भोजनान्ते कर्त्तव्यता । भुक्त्वा पाणितलं घृष्ट्वा चक्षुपोर्यदि दीयते । अचिरेणैव तद्वारि तिमिराणि व्यपोहति ॥१९॥ अर्थ-भोजनके उपरान्त हाथमें हाथ घिसकर आँखोंमें लगानेसे नेत्र जल और तिमिर रोग शीघ्र नाश होता है।५९॥ भुक्त्वाचम्य कर वाम दत्त्वा कुक्षौ ततः पठेत् । मन्त्रः-भुक्तं माहेन्द्रहस्तेन वैश्वानरमुखेन च ॥ गण्डुरस्य च कण्ठेन समुद्रस्य च वह्निना । वातापिक्षितो येन पीतो येन महोदधिः ॥ यन्मया खादितं पीतं तदगस्त्यो जरिप्यति५६० अर्थ-जोजनके अन्तमें कुल्ला करके कोखमें वाम हाथ धरके पूर्वोक्त " शुक्तं० " इत्यादि मन्त्र पढ लेवे इस मंत्रके पढनेसे भोजन शीघ्र पच जाता है ॥५६०॥ सुखासीनः क्षणं तिष्ठेत् यावन्न लभते सुखम् ॥६॥ ११

। राजवल्लभः ।
[परिरछेदः
अर्थ-तदनन्तर कुछ कालपर्यन्त विश्राम करे । जबतक
भारीपन दूर हो ॥ ६१॥
भुक्त्वा पादशतं गत्वा वामपार्श्वेण संविशेत् ।
एवं चाधोगतं चानं सुखं तिष्ठति जीर्य्यति ॥ ६२॥
अर्थ-भोजनके अंतमें सौ कदम टहलकर बॉई करवटसे
शयन करे इस प्रकार करनेसे अन्न पाकस्थालीमें प्रविष्ट होकर
शीघ जीर्ण हो जाता है । ६२ ।।
भोजनान्ते उपवेशनादिगुणाः ।
भुक्त्वोपविशतस्तुन्दं शयानस्य वपुर्भवेत् ।
आयुश्चक्रममाणस्य मृत्युर्धावति धावतः॥६३॥
अर्थ-भोजनके अंतमें बैठनेसे थांद बढती है, शयन करनेसे
शरीर स्थूल होता है, और धीरे २ टहलनेसे आयु बढती है
तथा अधिक दौडनेसे मृत्यु निकट आती है ॥ ६३॥
इति भोजननियमः॥
ताम्बूलभक्षणगुणाः।
ताम्बूलं कहतिक्तमुप्णमधुरं क्षारं कपायान्वितम् ।
पातघ्नं कृमिनाशनं कमहरं दुःखस्य विच्छेदनम् ॥
स्त्रीसम्भापणभूपणं धृतिकरं कामाग्निसंदीपनम् ।
ताम्बूले निहितास्त्रयोदश गुणाः स्वर्गेपि ते दुर्लभाः ६४
अर्थ-पान-चरपरा, कडवा, गरम, मधुर, क्षार, कपेला,
तथा वात, कृमि, कफ और दुःखनाशक है, स्त्रीसंभापणके
विपयमें अलंकारकी समान है तथा धारणशक्ति और कामवईक
है । ताम्बूलमें यह १३ गुण हैं ॥ ६४ ॥

तृतीयः ३] भाषाटीकायुतः। शुष्कपूगफलगुणाः। शुष्कमग्निकरं पूगं कपायं मधुरं परम् ॥ १५ ॥ अर्थ-सूखी सुपारी-अनिप्रदीपक, कपेली और मधुर है ६५ पक्कपूगफलगुणाः। पक्कं तु वातलं रूक्षं भेदनं कफनाशनम् ॥ ६६॥ अर्थ-पक्की सुपारी-वातवर्द्धक, रूखी, दस्तावर और क- फनाशक है ॥ ६६ ॥ अपकपूगफलगुणाः। गुर्वभिष्यन्दि मधुरं तोयधृग्वह्निनाशनम् ॥ ६॥ अर्थ-कच्ची सुपारी-भारी, क्लेदकारक, मधुर और अमि- नाशक है ॥६॥ ताम्बूलपत्रगुणाः। ताम्बूलपत्रं तीक्ष्णोणं कटुवातकफापहम् । पितकृत्प्रेसनं वृष्यं वह्निकृद्वस्तिशोधनम् ॥ ६८॥ अर्थ-ताम्बूलपत्र-तक्षिण, गरम, चरपरा, वात और कफ- | नाशक, पित्तकारक, शरीरको शिथिल करनेवाला, वीर्यवर्धक, अग्निप्रदीपक और बस्तिशोधक है ॥ ६८॥ पर्णमूलादिगुणाः। पर्णमूले भवेद्व्याधिः पर्णाग्रे पापसम्भवः । जीर्णपणे हरेदायुः सिरा वह्निविनाशिनी ॥ ६९ ॥ अर्थ-पानकी जडको खानेसे अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न होते हैं, पानके अगले भागको खानेसे पाप उसन्न होता है, --

१६४
राजवल्लभ.।
[परिच्छेदः
पुराना पान आयुको हरता है और पानकी सिरा ( नसे)
मन्दानिकारक हैं ।। ६९।।
चूर्णगुणाः ।
चूर्ण समीरणश्लेष्ममेदोहरमुदाहृतम् ॥५७०॥
अर्थ-चूना-वात, कफ और मेदनाशक है॥ ५७० ॥
शंखचूर्णगुणाः।
शंखचूर्ण कटुक्षारमुप्णं कृमिहरं परम् ॥७१ ॥
अर्थ-शंखका चूना-चरपरा, क्षार, गरम और कमि-
नाशक है ॥ ७१ ॥
खदिरगुणाः।
खदिरः कुष्ठवीसर्पमेहपित्तकफापहः ॥७२॥
अर्थ-खैर वा कत्था-कोड, वीसर्प, प्रमेह पित्त और क-
फनाशक है ॥ ७२॥
एलागुणाः।
एला मूत्रविबन्धनी तृछर्दिकफवातजित् ॥७३॥
अर्थ-इलाची-मनविवन्ध, तृपा, वमन, कफ और वात-
को दूर करे है ॥ ७३॥
लवंगगुणाः।
आध्मानानाइशूलनं लवंग पाचनं लघु ॥७४॥
अर्थ-लोग-आध्मान, अनार और शृलनाशक हे तथा
पाचक और हलकी है ॥ ७४ ॥
जातीफलगुणाः।
जाताफलं तृपादिशुलनं वातपित्तजित् ॥ ७॥

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तृतीयः ३] भापाटीकायुतः।
अर्थ-जायफल-तृपा, वमन, शूल, वात और पित्त
नाशक है ॥ ७५ ॥
जातीपत्रीगुणाः।
जातीपत्री लघुस्तृष्णा तोदोर्गन्ध्यजिन्मता ॥७६।।
अर्थ-जावित्री-हलकी, तथा तृपा, पीडा और दुर्गधना-
शक है ॥ ७६ ॥
कर्पूरगुणाः।
कर्पूरं शीतलं पाके चक्षुष्यं कफनाशनम् ।
पक्वकर्पूरतः प्राहुरपक्कं गुणवत्तरम् ॥ ७७॥
अर्थ-कपूर-पचनेमें शीतल, नेत्रोंको हितकारी और क-
फनाशक है । पक्ककपरसे अपक्क करके अधिक गुण हैं।॥७७॥
पूगस्य वालमध्यादिभेदेन गुणमा ।
आदौ पूगं विपं घोरं द्वितीये भेदि दुर्जरम् ।
तृतीयादिषु पानव्यं सुधातुल्यं रसायनम् ।। ७८॥
अर्थ-सुपारीका कच्चा फल विषकी समान अहितकारी है।
मध्यम अवस्थाका फल भेदक और दुर्जर है, और तीसरी अव-
स्थाका अर्थात् पक्का फल हितकारी और रसायन है ॥ ७८ ॥
ताम्बूलभक्षणनिपिद्धता।
ताम्बूलमहितं प्रोक्तं शरीरे सूक्षदुर्बले ।
ज्वरास्यशोपे पित्तास्त्रमदमु क्षिरोगिपु॥७९॥
अर्थ-पान रूखे और दुर्वल शररिवाले मनुप्योंको तथा ज्वर,
मुखशोष, रक्तपित्त, मद, मूर्छ और नेत्ररोगवाले मनुष्योंको
नहीं खाना चाहिये ॥ ७९ ॥

* राजवल्लभः। [परिच्छेदः ताम्बूलस्यानुपयोगगुणाः। ताम्बूलानुपयोगात्स्यात् श्लेष्मपित्तानिलान्वितः। देहत्केशदन्ताग्निश्रोत्रवर्णवलक्षयः ॥५८०॥ अर्थ-पानके नहीं खानेसे-कफ, पित्त और वातका कोप उत्पन्न होता है। तथा शरीर, नेत्र, केश, दंत, जठरामि, कर्ण, वर्ण और बलका नाश होता है ॥ ५८० ॥ इति भोजनउपयोगः ।। वर्गा धान्यस्य शाकस्य फलस्य मत्स्यमांसयोः। दौ मद्यमधुनोर्वर्गो क्षीरेक्षुविकृतिष्वपि ॥ ८१ ॥ संस्कारकं च हिंग्वाद्यमन्नव्यञ्जनपिष्टकम् । संयोगकविरुद्धानि ये च भोजनयोगिकाः ॥ ८२॥ तैर्मध्याह्नपरिच्छेदः समाप्तो राजवल्लभे॥५८३ ॥ अर्थ-धान्यवर्ग, शाकवर्ग, फलवर्ग, मत्स्य और मांसवर्ग, मद्य और मधुवर्ग, क्षीर क्षीरविकृति और क्षीरसंस्कारवर्ग, इक्षु, इक्षुविरुति और इक्षुसंस्कारवर्ग, हिंग्यादिवर्ग, अन्नव्यंजन और पिटकादि वर्ग, संयोगविरुद्धवर्ग और भोजनोपयोगवाँकरके राजवटमयन्यमें माध्याहिक परिच्छेद समान हुवा ॥ ८१ ॥ ॥ ८२ ॥ ५८३ ॥ इति माध्याहिकपरिच्छेदः ॥ इति श्रीरानबहानिघण्टे द्रव्यगुणचन्दिकार्टीकायां आ- युर्वेदाधारकशालिग्रामवश्यरत तृतीयपरिच्छेदः समातः ॥ ३ ॥ - चतुर्थः] भाषाटीकायुतः । १६७ ॥ अथ चतुर्थपरिच्छेदः॥ अपराह्नपरिच्छेदे प्रकीर्णमभिधीयते ॥१॥ अर्थ-अथानन्तर अपराहिक परिच्छेदमें मिश्रितवर्ग कहा जाता है ॥ १ ॥ अध्ययनादिगुणाः। सतताध्ययन वादः परतन्त्रावलोकनम् । सद्विद्याचार्यसेवा च बुद्धिमेधाकरो गणः ॥२॥ अर्थ-सदैव शास्त्रका पढना, पंडितोंसे शास्त्रार्थ करना, उत्तम शानोंको अवलोकन करना, सद्विद्याको ग्रहण करना और गुरुकी सेवा करनी इस प्रकार करनेसे बुद्धि और मेधाकी वृद्धि होती है ॥२॥ वृद्धिगुणमाह। शुथूपा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा। ऊहापोहार्थविज्ञानं तत्वज्ञानं च धीगुणाः ॥३॥ अर्थ-गुरुकी शुश्रूषा, गुरुके वचनोंको श्रवण करना और धारण करना तथा शास्त्रार्थका मीमांसजनकज्ञान और ईश्वरवि- पयका ज्ञान यह छः बुद्धिके गुण हैं ॥ ३ ॥ सद्योमासादिगुणाः । सद्योमांसं नवान्नं च वाला स्त्री क्षीरभोजनम् । घृतमुष्णोदकं चैव सद्यः प्राणकराणि पट ॥४॥ अर्थ-तत्कालके मारे हुए पशुका मांस और नवीन अन्न- १६८ राजवल्लभः। [परिच्छेदः का भक्षण करना, वाला स्त्रीका सेवन तथा घृत, दूध और गरम जलका पीना यह कार्य तत्काल प्राणकारक हैं ॥ ४ ॥ पूतिमांसादिगुणाः। पूतिमांसं स्त्रियो वृद्धा वालार्कस्तरुणं दधि । प्रभाते मैथुनं निद्रा सद्यः प्राणहराणि पट् ॥५॥ अर्थ-दुगंधयुक्त मांसका भक्षण, वृद्धा स्त्री और भादो तथा आश्विन महीनेकी धूपका सेवन, तरुण (पांच दिनके ) दहीका भक्षण तथा प्रातःकालमें मैथुन और मिद्रा यह छः कार्य तत्काल प्राणनाशक हैं ॥५॥ देशभेदमाह। देशस्तु जाङ्गलोनूपः साधारण इति त्रिधा ॥६॥ अर्थ-जांगल, अनूप और साधारण इन भेदोंसे देश तीन प्रकारका है ॥६॥ जांगलदेशगुणाः। जाङ्गलः स्यान्मरुत्पित्तकदुष्णो रूक्ष एव च ॥७॥ अर्थ-जांगलदेश-वातपित्तवर्द्धक, उष्ण और रूक्ष है ॥७॥ आनूपदेशगुणाः। आनूपः शीतलः स्निग्धो वातश्लेप्मकरो गुरुः॥८॥ अर्थ-आनूपदेश-शीतल, स्निग्ध तथा वात और कफका- रक और भारी है ॥ ८॥ साधारणदेशगुणाः। साधारणः समगुणः सर्वदोपहरः स्मृतः ॥९॥ - - चतुर्थः ४] भापाटीकायुतः। १६९ अर्थ-साधारणदेश-जांगल और अनूपदेशकी समान गुण- वाला है और त्रिदोषनाशक है ॥ ९ ॥ इति देशगुणाः ॥ अथ पडूसगुणमाह । तत्र मधुररसगुणाः। मधुरः प्रीणनो बल्यो बृंहणोऽनिलपित्तजित् । रसायनो गुरुः स्निग्धश्चक्षुप्यस्तर्पणः सरः ॥ १० ॥ अर्थ-मधुररस-तृप्तिकारक, बलपईक, पुष्टिकारक, वात- विनाशक, पित्तनाशक, रसायन, भारी, स्निग्ध,नेत्रोंको हितकारी, मनके प्रफुल्लित करनेवाला और सारक है ॥ १० ॥ अम्लरसगुणाः। अम्लो रुचिकरो हृद्यः प्रीणनो वह्निवर्द्धनः । वातहा रसनोद्वेगी स्निग्धोष्णो रक्तमांसदः ।।११॥ अर्थ-अम्लरस-रुचिकारक, हृदयको हितकारी, तृप्तिका- रक, जठरामिवईक, वातविनाशक, जिह्वाको उद्वेगकारक,स्निग्ध, उष्ण तथा रक्त और मांसवर्द्धक है ॥ ११ ॥ लवणरसगुणाः। लवणः वेदनस्तीक्ष्णः पाचनो दीपनः सरः । स्निग्धो रुचिकरः स्यन्दी दृष्टिशुक्रहरो गुरुः ॥१२॥ अर्थ-लपणरस-केदकारक, तीक्ष्ण, पाचक, अमिप्रदीपक, सारक, स्निग्ध, रुचिकारक, सापक, दृष्टि और शुक्रनाशक तथा भारी है ॥१२॥ , , " " राजवल्लभः। [परिच्छेदः कटुरसगुणाः। कटुर्जिह्वास्यनासाक्षिरोगकृद्रोचनोनिदः । उष्णस्तीक्ष्णो लघुः कण्डूकृमिशुक्रकफापहः||१३॥ अर्थ-कटुरस-जिह्वा. मुख, नासिका और नेत्ररोगकारक है। रुचिदायक, अग्निप्रदीपक, गरम, तीक्ष्ण, हलका तथा क- ण्डु, कमि, शुक्र और कफनाशक है ॥ १३ ॥ तिक्तरसगुणाः। तिक्तः कफोत्केदविपकुष्ठपित्तज्वरापहः । दीपनः पाचनो रूक्षः कण्डूकृमिहरो लघुः॥१४॥ अर्थ-तिक्तरस-कफ, उल्लेद, विप, कुष्ठ और ज्वरका नाश करनेवाला है। अमिको दीपन करनेवाला, पाचक, रूखा तथा कण्ड और कृमिनाशक तथा हलका है ॥१४॥ कपायरसगुणाः। कपायः शोपणः स्तम्भी व्रणपाकार्तिनाशनः । कफशोणितपित्तनो रूक्षः शीतो गुरुस्तथा ॥१५॥ अर्थ-कपायरस-शोपक, स्तम्भकारक, पके हुवे व्रणकी पीडाको दूर करनेवाला, कफनाशक, रक्तनाशक, पित्तन, रूक्ष, शीतल और भारी है ॥ १५ ॥ स्वायम्लरसादिना यातादीनां विनाशकत्वमाह । स्वादम्टलवणा वातं कपायस्वादुतिक्तकाः । पित्तं कपायकटुकतिक्ता नन्ति कर्फ तथा ॥१६॥ अर्थ-मधुर, अम्ल और लवणरस पातका, कपाय, मधुर - १७१ , चतुर्थः ४] भाषाटीकायुतः। और तिक्तरस पित्तका, तथा कपाय, कटु और तिक्तरस कफ- का नाश करते हैं॥ १६॥ कटुम्लरसादिना वातादीनां प्रकोपमाह । कदम्ललवणाः पित्तं स्वादम्ललवणाः कफम् । कटतिक्तकपायाश्च कोपयन्ति समीरणम् ॥ १७ ॥ अर्थ-कटु, अम्ल और लवणरस पित्तको, मधुर, अम्ल और लवणरस कफको, कटु, तिक्त और कपायरस वातको कु- पित करते हैं ॥ १७॥ रसादीनां विपाकमाह । कढतिक्तकपायाणां विपाकः प्रायशः कटः । अम्लोम्लं पच्यते स्वादु मधुरं लवणं तथा ॥१८॥ अर्थ-कटु, तिक्त और कपाय रसवाले द्रव्य प्रायः कटु- पाकी होते हैं, अम्लरसवाले द्रव्य अम्लपाकी होते हैं और मधुर तथा लवणरसवाले द्रव्य मधुरपाकी होते हैं ॥ १८ ॥ रसानां भावमाह । मधुरो लवणाम्लौ च स्निग्धभावास्त्रयो रसाः । वातमूत्रपुरीपाणां प्रायो मोक्षे सुखा मताः ॥१९॥ कवतिक्तकपायास्तु रूक्षमावास्त्रयो रसाः । दुःखाविमोक्षे दृश्यन्ते वातविण्मूत्ररेतसाम् ॥२०॥ अथे-मधुर, लवण और अम्ल यह तीन रस स्निग्धजावयु- त हैं। यह वात, मूत्र और मलत्यागके विषयमें सुखदायक हैं। कटु, तिक्त और कपाय यह तीन रस रूक्षनावयुक्त हैं। यह वात, + राजवल्लभः। [ परिच्छेदः मल, मूत्र और शुक्र त्यागके विषय में दुःखदायक हैं॥१९॥२०॥ मधुरं श्लेष्मलं प्रायो जीर्णाच्छालियवाहते। मुद्गात् गोधूमतः क्षौद्रात सिताया जाङ्गलामिपाव२१ अर्थ-शालिधान, जौ, गैहूँ, मुंग, मधु, चीनी और जांगल- देशकी मछली, मांसको छोडकर और सर्व मधुररसवाले द्रव्य प्रायः कफकारक हैं ॥ २१ ॥ प्रायोऽम्लं पित्तजननं दाडिमामलकाहते॥२२॥ अर्थ-अनार और आमलेको छोड़कर प्रायः अम्लरसवा- ले द्रव्य पित्तजनक हैं ॥२२॥ अपथ्यं लवणं प्रायश्चक्षुष्योऽन्यत्र सैन्धवात् ॥२३॥ अर्थ-सैंधवलवणको छोड़कर और लवण नेत्रोंको अहित- कारी हैं ।। २३ ॥ तिक्तं कट च भूयिष्टं वृप्यं वातप्रकोपनम् । न पटोलकणाशुण्ठीवेतोगलशुनामृतम् ॥२४॥ अर्थ-परवल, पीपल, सोंठ, येताय ( चैतका अगला भाग), लहशन और गिलोयको छोड़कर और सर्व तिक्तः तथा कटुरस- वाले द्रव्य अवृप्य और वातको कुपित करे हैं ॥ २४ ॥ कपायःप्रायशः शीतःस्तम्भनश्चाभयं विना ॥२५॥ अर्थ-हरड़को छोड़कर और सर्व कपायरसवाले द्रव्य- शीतल और मटस्तम्भक है ॥ २५ ॥ ५ १७३ चतुर्थः १] भापाटीकायुतः। द्रव्याणां वीर्यकथनम् । मृदुतीक्ष्णगुरुस्निग्धलघुरूक्षोप्णशीतलम् । वीर्यमष्टविधं प्राहुः शीतोष्णं द्विविधं परे॥२६॥ अर्थ-वीर्य-मृदु, तीक्ष्ण, गुरु, स्निग्ध, लघु, रूक्ष, उप्ण और शीतल इन दोंसे आठ प्रकारका है और किसी २ के मतसे शीत और उप्ण इन भेदोंसे दो प्रकारका है ॥ २६ ॥ रसानां वीर्यभेदमाह । रसाः कटुम्ललवणा वीय्योष्णाश्च यथोत्तरम् । तिक्तकपायमधुराः शीतवीर्य्या यथोत्तरम् ।। २७॥ अर्थ-कटु, अम्ल और लवणरस यह एकसे एक अधिक उष्णवीर्य्य हैं अर्थात् कटुरससे अम्लरस और अम्लरससे ल- वणरस अधिक उप्णवीर्य्य है । तिक्त, कपाय और मधुररस यह एकसे एक अधिक शीतवीर्य हैं । अर्थात् तिक्तरससे कपा- यरस और कपायरससे मधुररस अधिक शीतवीर्य्य हैं ॥२७॥ उष्णशीतवीर्ययोर्गुणमाह । उष्णः पित्तकरो वल्यो वातश्लेप्महरो लघुः। शीतलः पित्तहा बल्यः कफवातकरो गुरुः॥२८॥ अर्थ-प्णवीर्य पदार्थ-पित्तवर्द्धक, वलकारक, वातक- फनाशक और लघुपाकी हैं। शीतवीर्य्य पदार्थ-पित्तनाशक, बलकारक, कफ वातकारक और भारी हैं ॥ २८ ॥ बुद्धिपटकद्वयं देशः पइसानां विरेचनम् । अपराह्ने परिच्छेदे निम्मितं राजवल्लभे ॥२९॥ - १७४ । राजवल्लभः। [ परिच्छेदः अर्थ-इस राजवल्लामन्थके अपराह्नपरिच्छेदमें बुद्धिकी उत्पत्ति और गुणपट्कद्वय, देशगुण तथा छः प्रकार रसका वि- वरण समान हुआ ॥ २९ ॥ ॥ इति श्रीराजवल्लभनिघण्टे द्रव्यगुणचन्द्रिकाटीकायां आ. युर्वेदोद्धारकशालियामवैश्यते चतुर्थपरिच्छेदः समानः ॥ ४ ॥ ॥अथ पञ्चमपरिच्छेदः॥ वयोभेदेन नारीणां वालादिकथनम् । बालेति गीयते नारी यावत् पोडशवत्सरम् । तस्मात्परन्तु तरुणी यावहात्रिंशतं भवेत् ॥१॥ तत ऊर्ध्वं भवेत् प्रौटा यावत् पञ्चाशतं पुनः । वृद्धा ततः परं ज्ञेया सुरतोत्सववर्जिता ॥२॥ अर्थ-सोलह (१६) वर्षकी स्त्रीको बाला कहते हैं, सोलह वपके पश्चात् ३२ वर्ष तककीको तरुणी कहते हैं, ३२ वर्पके पश्चात् पंचाश वर्ष तककीको प्रौढा कहते हैं, पंचाश वर्पके पश्चात् स्त्रीको वृद्धा कहते हैं, वृद्धा स्त्री रतिक्रिया में वर्जित पालादिसंसर्गगुणाः। वाला तु प्राणदा प्रोक्ता तरुणी प्राणधारिणी। प्रोढा करोति वृद्धत्वं वृद्धा मरणमादिशेत् ॥३॥ अर्थ-बाला खोके साथ मैथुन करनेसे बलकी वृद्धि होती है, तरणी स्त्रीके साथ मैथुन करनेस बलकी रक्षा होती है, प्रौढा

१७५
पञ्चमः ५] भापाटीकायुतः।
स्त्रीके साथ मैथुन करनेसे वृद्धता आती है और वृद्धा स्त्रीके साथ
मैथुन करनेसे मृत्यु होती है ॥ ३ ॥
बालादिभेदे मैथुनकालनिर्णयः ।
निदाघशरदोर्वाला प्रौढा वर्षावसन्तयोः ।
हेमन्ते शिशिरे योग्या न वृद्धा कापि शस्यते॥४॥
अर्थ-ग्रीष्म और शरद् ऋतुमें बाला स्त्रीके साथ, वर्षा
और वसन्त ऋतु में प्रौढा स्त्रीके साथ, हेमन्त और शीत ऋतुमें
तरुणी स्त्रीके साथ मैथुन करना चाहिये, और बृद्धा सीसे
किसी ऋतु में मैथुन करना नहीं चाहिये ॥ ४ ॥
मैथुननिषिद्धता।
न” च शोडशादात् सप्तत्याः परतो न च ।
आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति ॥५॥
अर्थ-आयुकी अभिलाषा करनेवाले मनुष्योंको सोलह
वर्षसे थोडी और सत्तर वर्षसे अधिक उमरवाली स्त्रीसे मैथुन
करना नहीं चाहिये ॥ ५॥
मैथुनकालनिर्णयः।
त्रिभिस्त्रिभिरहोभिश्च सेवेत प्रमदां नरः।
सर्वेवृतुपु ग्रीप्मेपु पक्षान्मासाद्ब्रजेडधः ॥६॥
अर्थ-बुद्धिवान मनुष्योंको-शरद् , हेमन्त, वसन्त और
शीतऋतुमें तीन २ दिन बाद तथा ग्रीष्म ऋतमें पंदरह दिनके
अथवा एक महिने बाद मैथुन करना चाहिये ॥६॥

१७६
राजबल्लभः।
[ परिच्छेदः
अतिमैथुनगुणाः।
ग्लानिकम्पोरुदौर्बल्यं धात्वेन्द्रियवलक्षयः ।
क्षयवृद्धयुपदंशाद्या जायन्तेऽतिव्यवायतः ॥७॥
अर्थ-अत्यन्त मैथुन करनेवाले मनुष्योंके ग्लानि, कम्प,
धुंटनोंमें दुर्बलता, धातु, इन्द्रिय और बलका नाश तथा क्षयरो-
ग, वृद्धि और उपदंशरोग उत्पन्न होता है ॥ ७ ॥
सन्तानोत्पत्तिकथनम् ।
पञ्चपञ्चाशतो नारी सप्तसप्ततितः पुमान् ।
द्वावेतौन प्रसूयेते प्रसूयेते व्यतिक्रमात् ।। ८ ।।
अर्थ-पचपन वर्षकी स्त्री और सत्तर वर्षका पुरुष सन्तान-
को उत्पन्न नहीं कर सक्ता, क्योंकि उस अवस्थामें स्त्रीका रज
और पुरुषका वीर्य बलहीन हो जाता है, उसमें शक्ति नहीं
रहती, परन्तु इससे न्यूनावस्थावाले पुरुप स्त्री सन्तानको उत्पा-
दन कर सक्ते हैं ॥८॥
इति स्त्रीनिर्णयः॥
सुखशय्याशनगुणाः।
सुखशय्याशनं सेव्यं निद्रापुष्टिधृतिप्रदम् ।
श्रमानिलहरं वृप्यं विपरीतमतोन्यथा ॥९॥
अर्थ-सुखकारक शय्या और उत्तम पदार्थोंका भोजन-
निद्रा, पुष्टि और धृतिवर्द्धक है श्रम और वातनाशक है और
वीर्यवर्द्धक है, इससे विपरीत शय्या और विपरीत भोजन
विपरीत गुणकारक है ॥१॥
भूमिशय्यागुणाः।
भूशय्याऽनिलपित्तनी बूंदणी शुक्रवर्दिनी ॥ १० ॥

पञ्चमः ५]] भापाटीकायुतः।
१७७
अर्थ-भूमिपे सोना-वात-पित्तनाशक, पुष्टिकारक और
शुक्रवर्द्धक है ॥ ३०॥
खटापटशय्ययोर्गुणाः।
खट्वा तु पातला प्रोक्ता पटोरुक्षोऽतिवातलः॥११॥
अर्थ-खाटपे सोना-वातकारक है । पटशय्यापे सोना-
रुक्ष और अत्यन्त वातवर्द्धक है ॥ १३ ॥ इति शय्यागुणाः ॥
अथ पुष्पम् ।
मालतीवृक्षपुष्पपत्राणां गुणाः।
मालती कफपित्तास्यरुग्वणकृमिकुप्ठजित् ।
चक्षुप्यं कुसुमं तस्याः पत्रं तत्कफपित्तजित् ॥१२॥
अर्थ-मालतीवृक्ष-कफ, पित्त, मुखरोग, व्रण, कमि और
कुष्टनाशक है । मालतीके फल-नेत्रोंको हितकारी हैं। माल-
तीके पत्ते-कफ और पित्तको जीते हैं ॥ १२॥
मल्लिकापुष्पगुणाः।
मल्लिका कफजित्तिक्ता ज्वरास्तम्भनरोपिणी॥१३॥
अर्थ-मोतियाके फूल-कफनाशक, कड़वे, ज्वरास्तम्भक
और व्रणको भरनेवाले हैं ॥ १३॥
यन्यूकादिपुष्पगुणाः।
वन्धूकं श्लेप्मलं याहि तदेव च यूथिका ॥ १४ ॥
अर्थ-दुपहरियाके फूल-कफकारक और ग्राही हैं । इसी-
की समान जुहीके गुण जानने ॥ १४ ॥
घातकीपुष्पगुणाः।
घातकीकुसुमं शीतं रक्तपित्तातिसारजित् ॥ १५॥

ܕܫܟ + । '१७८ राजवल्लभः। [परिच्छेदः अर्थ-धायके फूल-शीतल, तथा रक्तपित्त और अतिसार- नाशक हैं ॥ १५॥ रांगनपुष्पगुणाः। रांगनं रक्तपित्तनं मुचुकुन्दं शिरोतिजित् ॥१६॥ अर्थ-रांगनुपुष्प-रक्तपित्तनाशक हैं । मुचुकुन्दके फूल- शिरोरोगनाशक हैं ॥ १६ ॥ केतकोशिरीपपुष्पयोर्गुणाः। केतकं तितकटुकं शिरीपं गरहारि च ॥ १७ ॥ अर्थ-केतकीके फूल-कड़वे और चरपरे हैं। शिरसके फुल विपनाशक हैं ॥१७॥ रक्तपद्मगुणाः। पद्मं कपायमधुरं शीतं पित्तकफास्रजित् ॥ १८ ॥ अर्थ-लालकमल--कपेला, मधुर, शीतल तथा पित्त, कफ और रक्तदोपनाराक है ॥ १८॥ पकुलादिपुष्पगुणाः। तदद्वकुलपुन्नागकद्वारोत्पलपाटलम् ॥१९॥ अर्थ-मौलसिरीफे फूल, पुन्नागके फल, सफेद कुमुद, नील- कुमुद और पाटलके फुलाऊ गुण लाल कमलकी समान हैं॥१९॥ चम्पकपप्पगुणाः! चम्पकं तिक्तकटकं शीतं पित्तकफापहम् ॥ २० ॥ अर्थ-चम्पार फल-कडचे, चरपरे, शीतल, पिन और क- फनाशक है ॥ २० ॥ ।। इति पृष्पगुणाः ॥

" पञ्चमः ५] भापाटीकायुतः। १७९ ज्योत्स्नागुणाः। ज्योत्स्ना कपायमधुरा दाहासृपित्तनाशिनी॥२१॥ अर्थ-ज्योत्स्ना (चांदनी)-कपेली, मधुर तथा दाह और रक्तपित्तनाशक है ॥ २१ ॥ अन्धकारगुणाः। तमो भयावहं तिक्तं दृष्टितेजोऽवरोधनम् ॥२२॥ अर्थ-अन्धकार-जयकारक, कड़वा और दृष्टिके तेजको रोके है ॥२२॥ मैथुनगुणाः। व्यवायो धात्वपचयं कुरुते रत्यपत्यदः ॥२३॥ अर्थ-मैथुन-धातुनाशक तथा रति और सन्तानदायक है२३ अतिमैथुनगुणाः। अतिव्यवायाजायन्ते श्वासकासज्वरादयः॥२४॥ अर्थ-अधिकमैथुन-श्वास, खाँसी और ज्वरादि रोगोंको उत्पन्न करे है ॥ २४ ॥ मैथुनाकरणगुणाः। असेवनान्मेहमेदोग्रन्थिरग्नेश्व माईवम् ॥ २५ ॥ अर्थ-मैथुन नहीं करनेसे-प्रमेह, मेद, ग्रन्थि और मन्दा- मि उत्पन्न होती है ॥ २५ ॥ परिमितमैथुनगुणाः। स्मृतिमेघायुरारोग्यपुष्टीन्द्रिययशोवलैः । अधिकानन्दजरसो भवन्ति स्त्रीपु संयुताः॥२६॥ अर्थ-नियमके अनुसार मैथुन करनेसे-स्मरणशक्ति, अ-

१८०
राजवल्लमः।
[ परिच्छेदः
भ्यासशक्ति, आयु,आरोग्यता, पुष्टि, इन्द्रियोंकी शक्ति, यश और
बलकी वृद्धि होती है और शीघ्र वृद्धावस्था नहीं आती है ॥२६॥
निद्रागुणाः।
निद्रा तु सेविता काले धातुसाम्यमत्तन्द्रितान् ।
पुष्टिवर्णवलोत्साहानग्निदीप्तिं करोति च ॥२७॥
अर्थ-उपरोक्तसमयमें निद्रासेवनसे-धातुसाम्य, तन्द्राका ना-
| श, पुष्टि, वर्ण, बल, उत्साह और जठरामिदीपन होती है ।। २७॥
रात्रिजागरण-दिवास्वमयोर्गुणाः ।
रात्री जागरणं रूक्ष स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा ।
कफमेदोविपातनां रात्री जागरणं हितम् ॥२८॥
दिवा स्वमं च तृशूलहिकाजीर्णातिसारिणाम् ।।२९॥
अर्थ-रात्रिके जागनेसे रूक्षता बढती है और दिनमें सोनेसे
शरीरमें स्निग्धता बढती है,इस कारण रात्रिका जागना और दिन-
का सोना अयोग्य है परन्तु कफ, मेद और विपयस्त रोगि-
योंके लिये रात्रिका जागना हितकारक है तथा तृष्णा, शूल,
हिका, अजीर्ण और अतिसारवाले रोगियोंके लिये दिवास्वप्न
हितकारक है ।। २८ ॥२९॥
दिवा वा यदि वा रात्रौ निद्रा सात्मीकृता तु यैः ।
न तेपां स्वप्नतां दोपो जाग्रता वा विधीयते ॥३०॥
अर्थ-जिन मनुष्योंको दिनमें सोनेका और रात्रि जागने-
का अाधास पड जाता है उनको दिनमें सोना और रात्रि में जा-
गना उचित है ॥ ३०॥

षष्ठः ६]
भाषाटीकायुतः।
१८१
स्त्रीणां विनिर्णयः शय्या पुप्पं ज्योत्स्ना तमो रतम् ॥
निशाभवः परिच्छेदः समाप्तो राजवल्लभे ॥३१॥
अर्थ-स्त्रीका निर्णय, शय्या, पुष्प, ज्योत्स्ना, अन्धकार
और मैथुनादिगुणोंका वर्णन इनके द्वारा राजबल्लनग्रन्थमें नि-
शामव परिच्छेद समान हुआ ॥ ३३ ॥
इति श्रीराजवल्लभनिषण्टे व्यगुणचन्द्रिकाटीकायां शालि-
ग्रामवैश्यकते पञ्चमपरिच्छेदः समाप्तः ॥ ५ ॥
.
॥ षष्ठः परिच्छेदः॥
अथ नानोपधिवर्गः।
चिल्वमूलगुणाः।
विल्लमूलं मरुच्छेप्मछर्दिनं रक्तपित्तजित् ॥ १॥
अर्थ-बेलकी जड-वात, कफ, वमन और रक्तपित्तको दू-
र करे है ॥ १॥
पाटलाइयोनाकयोगुणाः।
पाटला कफवातघ्नी श्योनाको ग्राहिदीपनः ॥२॥
अर्थ-पाटल-कफ और वातविनाशक है। सोनापाठा-
माही और दीपन है ॥२॥
गाम्भारीमूलगुणाः।
गाम्भारीमूलमत्युप्णमहितं मानुपेषु तत् ।।३।।
अर्थ-कुम्नेस्की जड-अत्यन्त उष्ण और मनुष्योंको
अहितकारी है ॥ ३॥

१८२
राजवल्लभः। [ परिच्छेदः
गणिकारीगुणाः।
गणिकारी तु शोथनी हिता वातविकारिणाम् ॥४॥
अर्थ-अरणी-शोथनाशक और वानरोगवालाको हित-
कारी है ॥ ४॥
एरण्डमूलगुणाः।
एरण्डमूलं शूलनं वृप्यं वातकफापहम् ॥५॥
अर्थ-अंडकी जड-शूलनाशक, वृष्य, वात और कफनाश-
क है ॥५॥
गोक्षुरगुणाः।
गोक्षुरो मूत्रकृच्छ्नो बल्यो वृप्योनिलापहः॥६॥
अर्थ-गोखुरु-मूत्रकृच्छ्रनाशक, बलकारक, वृष्य और
वातनाशक है ॥६॥
कण्टकारीगुणाः।
उप्णवातकफश्वासकासघ्नी कण्टकारिका॥७॥
अर्थ-कटेरी-गरम, तथा कफ, श्वास और खांसीको दूर
करनेवाली है ॥ ७॥
वृहतीगुणाः।
बृहती पाचनी सोप्णा ग्राहिणी वातनाशिनी ॥८॥
अर्थ-कटाई-पाचक, गरम, मलरोधक और बातविनाशक
-
शालिपर्णीपृश्निपण्यागुणाः।
शालिपर्णी पृश्रिपर्णी ग्राहिणी कफपित्तजित् ॥९॥

षष्ठः६]
भाषाटीकायुतः ।
१८३
अर्थ-सरिवन और पिठवन-मलरोधक तथा कफ और
पित्तनाशक है ॥ ९॥
घलागुणाः।
स्निग्धा रुच्या बला वृष्या ग्राहिणी वातपित्तजित् १०
अर्थ-खिरैटी-स्निग्ध, रुचिकारक, बलकारी, वृष्य, ग्राही
तथा यात और पित्तनाशक है ॥ १० ॥
नागवलागुणा:।
तन्नागवलात्यर्थ कृच्छ्रे क्षीणे क्षते हिता॥११॥
अर्थ-नागवला (गंगेरन)-खिरैटीकी समान गुणवाली
है, तथा मूत्ररुच्छ्र, क्षन और क्षीणरोगमें हितकारी है ॥११॥
अश्वगन्धागुणाः।
अश्वगन्धा तु वातनी वल्या वृप्या रसायनी॥१२॥
अर्थ-असगंध-बातविनाशक, बलकारक, वीर्यवर्द्धक और
रसायन है ॥ १२॥
शतावरीगुणाः।
शतावरी वातपित्तमहरक्तहरा सरा ।। १३ ॥
अर्थ-सतावर-वात, पित्त, प्रमेह और रुधिरविकारनाश-
क है ॥ १३॥
हस्तिकर्णगुणाः।
हस्तिकर्णः पर वृष्यो मेधायुर्बलबईनः ॥ १४॥
अर्थ-हस्तिकर्ण-वीर्यवर्द्धक, मेवा, आयु और बलबई-
क है ॥१४॥

१८४
राजवल्लभः ।
परिच्छेदः
प्रसारणीगुणाः।
वातपित्तहरा सोप्णा वल्या वृप्या प्रसारणी ॥१५||
अर्थ-पसरन-वात-पित्तनाशक, गरम, बलकारक और
वीर्यवर्द्धक है ॥ १५॥
मापपर्णीमुनपणिकयोर्गुणाः।
मापपर्णी महावृष्या चक्षुप्या मुद्गपर्णिका ।। १६॥
अर्थ-मपवन-अत्यन्त वीर्य्यवर्द्धक है । मुवनन -नेत्रोंको
हितकारी है ॥ १६ ॥
विशालागुणाः।
विशाला कफवातनी चक्षुप्या मूत्रकृच्छजित्।। १७॥
अर्थ-इन्द्रायन-कफवातनाशक, नेत्रोंको हितकारी और
मूत्रकृच्छ्ररोगको दूर करे है ॥ १७॥
श्यामलतागुणाः।
शारिवा वातपित्तामुक्तृदछर्दिज्वरनाशिनी ॥ १८॥
अर्थ-करियावासाऊ-वात, पिन, रुधिरविकार, वमन,
और ज्वरको दूर करे है ॥ १८॥
अनन्तमूलगुणाः।
अनन्ता ग्राहिणी रक्तपित्तप्रशमनी हिमा ।। १९ ।।
अर्थ-गौरियावासाऊ-मलरोधक, रक्तपित्तको शान्ति कर-
नेवाली और शीतल है ॥ १९॥
गुन्द्रागुणाः।
गुन्द्रा पित्तास्रदानी चक्षुप्या मूत्रकृच्छजित्॥२०॥

१८५
षष्ठः ६]
भापार्टीकायुतः।
अर्थ-गुन्द्रा-रक्तपित्तनाशक, दाहनाशक, नेत्रोंको हितकारी
और मूत्रकृच्छ रोगको जीते है ॥ २० ॥
लोभ्रगुणाः।
लोधोऽसृक्कफपित्तनश्चक्षुष्यः शोथजित्सरः॥२१॥
अर्थ-लोध-रुधिरविकार, कफ और पित्तनाशक है। नेत्रों-
को हितकारी, सूजनको दूर करनेवाला और सारक है ।। २१ ।।
शयरलोध्रगुणाः।
तद्वच्छवरलोध्रोपि चक्षुप्यो मृदुरेचनः ॥ २२॥
अर्थ-पठानीलोध-नेत्रोंको हितकारी और मृदु रेचक है
और गुण लोधकी समान जानने ॥ २२॥
मनिष्ठागुणाः।
मंजिष्ठा कुष्ठवेस्वयंशोथप्नी मूत्रकृच्छजित् ॥२३॥
अर्थ-मजीठ-कोट, स्वरभंग,सूजन और मूत्ररुच्छ्र रोगको
दूर करे है ॥ २३ ॥
लाक्षागुणाः।
लाक्षा भग्नविसर्पघ्नी वल्या त्वग्दोपनाशिनी ॥२४॥
अर्थ-लाख-जन और विसर्गरोगनाशक है बलकारक
और त्वचाके विकारोंको दूर करनेवाली है ॥ २४ ॥
प्रपौण्डरीकगुणाः।
प्रपोण्डरीक चक्षुष्यं शिशिरं व्रणरोपणम् ॥२५॥
अर्थ-पुण्डेरिया-नेत्रोंको हितकारी, शीतल और व्रण-
शोषक है ॥२५॥

राजवल्लभः। [परिच्छेदः जीवन्तीगुणाः। जीवन्ती श्वासकासनी स्वर्या च क्षयनाशिनी॥२६॥ अर्थ-जीवन्ती-श्वास, साँसी और क्षयरोगको दूर करने- वाली है तथा स्वरशोधक है॥ २६ ॥ अष्टवर्गगुणाः। अष्टवर्गास्त्रापित्तनो व्रणहा वातपित्तनुत् ।। २७॥ अर्थ-अष्टवर्ग-(जीवक, ऋपाक, मेदा, महामेदा, ऋद्धि, वृद्धि, काकोली और क्षीरकाकोली)-रक्तपित्त, व्रण और वातपित्तनाशक है ॥ २७॥ मधुकगुणाः। मधुकं रक्तपित्तनं व्रणशोधनरोपणम् । गुरु स्वादु हिमं वृष्यं स्वरवर्णप्रसादनम् ॥२८॥ अर्थ-मुलैठी-रक्तपित्तनाशक, व्रणशोधक और शोषक है। भारी, खादु, शीतल, वीर्य्यवर्द्धक तथा स्वर और वर्णको प्रस- नताकारक है ॥२८॥ अर्जुनवृक्षगुणाः। पार्थः पथ्यः क्षते भने रक्तस्तम्भनकृच्छ्योः॥२९॥ अर्थ-अर्जुन (कोह)-अन, क्षत, रक्तस्तम्भ और मूत्र- रुष्ट्र रोगमें हितकारी है ॥ २९ ॥ अस्थिसंहारगुणाः। अस्थिभनेऽस्थिसंहारोहितोचल्योनिलापहः ॥३०॥ अर्थ-हंडसंघारी-अस्थिानमें हितकारी, बलकारी और वानहारी है ॥ ३० ॥ -

भाषाटीकायुतः ।
१८७
भृङ्गराजगुणाः।
भृङ्गराजस्तु चक्षुप्यः केश्यः पाण्डुकफापहः॥३१॥
अर्थ-आगरा-नेत्रोंको हितकारी, बालोंको उत्तम करने-
वाला तथा पाण्डुरोग और कफनाशक ॥ ३१ ॥
केशराजगुणाः ।
तद्गुणः केशराजोपि वह्निकृच्च रसायनः॥ ३२॥
अर्थ-कुकरजांगरा-भांगरेकी समान गुणवाला है विशेष-
करकै अनिकारक और रसायन है ॥ ३२ ॥
दण्डोत्पलगुणाः।
दण्डोत्पलद्वयं श्वासकासजिदह्निदीपनम् ॥३३॥
अर्थ-दोनों प्रकारके दंडोत्पल-खास और खाँसीको दूर
करनेवाले और जठरागिको दीपन करनेवाले हैं ॥ ३३ ॥
रुदन्तीगुणाः।
रुदन्ती वह्निदृप्या पित्तनी च रसायनी ॥३॥
अर्थ-रुदन्ती-अनिवईक, वीर्यजनक, पिननाशक और
रसायन है ॥ ३४ ॥
तालमूलीगुणाः ।
तालमूली हिता वाते ग्रहणी च रसायनी ॥ ३५॥
अर्थ-मुशली-वातरोगमें हितकारक, ग्राही और रमा-
यन है ॥ ३५ ॥
द्रोणपुप्पीगुणाः।
द्रोणपुप्पी कफाशीनी कामलाकृमिशोथजित् ॥३६॥
अर्थ-गमा-कफ, बवासीर. कामला, कृमि और सृजनको
दूर करे है ॥ ३६॥

J
१८८
। राजवल्लभः ।
। परिच्छेदः
गिरिकणिकागुणाः।
शोथनी कासहा कंच्या विपन्नी गिरिकर्णिका॥३७॥
अर्थ-कोयल--शोथ कास और विपनाशक तथा कण्ठको
हितकारी है ॥ ३७॥
वृश्चिकालीगुणाः।
वृश्चिकाली विपन्नी तुकासमारुतनाशिनी ॥३८॥
अर्थ-वृश्चिकाली-विपविकार, खाँसी और वातका नाश
करनेवाली है ॥ ३८॥
अहिंस्रासुदर्शनयोर्गुणाः।
अहिंस्रा विपशोथनी तद्गुणैव सुदर्शना ॥ ३९॥
अर्थ-मुदर्शन और अहिंसा-विष और शोथनाशक है ३९
भांर्गीगुणाः।
भार्गी तु श्वासकासनी गुन्ना कुष्ठव्रणापहा ॥४०॥
अर्थ-भारंगी-श्वास और खासीको दूर करनेवाली है ।
चोटॅली कुष्ट और वणनाशक है ॥ ४० ॥
सृर्यावर्तसरिपयोर्गुणाः।
सू-वत्तों विवन्धनः सेरिपः कफवातजित्॥४१॥
अर्थ-सूर्यापन-विपन्धनाशक और कटसरैय-कफवात-
नाशक है ॥४१॥
योकिलरक्षहनिलकयोर्गुणा।
आमवातानिलापनो कोकिलाक्षहलीनको ॥४२॥
अर्थ-तालमखाना और केतकी-आमयान और वातना-
शक है ॥ ४२॥

षष्ठः-६]
भाषाटीकायुतः।
हलिनीकरवीरयोर्गुणाः।
इलिनी करवीरश्च कुष्टदुष्टवणापही ॥४३॥
अर्थ-कलिहारी और कनेर-कुष्ठ और दुश्व्रणको नष्ट
करे है ॥४३॥
कोपातकीगुणाः।
कोपातकी कफाशीनी पक्कामाशयशोधिनी॥४॥
अर्थ-कोपातकी (तोरई)-कफ और बवासीर नाशक है।
तथा पकाशय और आमाशयशोधक है ॥ ४४ ॥
ज्योतिप्मतीगुणाः।
मेधाज्योतिष्मती तीक्ष्णा व्रणविस्फोटनाशिनी।।४५||
अर्थ-मालकांगनी-मेधाकारक, तीक्ष्ण, व्रण और विस्फो-
टनाशक है ॥४५॥
वालीगुणाः।
वयसः स्थापनी ब्राह्मी मेधायुर्वलवाहिनी ॥ ४६॥
अर्थ-ब्राह्मी-अवस्थास्थापक, मेधाजनक, आयु और बल-
वर्द्धक है ॥ ४६॥
बचागुणाः।
वचायुप्या कफवाततृष्णानी स्मृतिवाहिनी ॥४७॥
अर्थ-बच-आयु और स्मरणशक्तिवर्दक है । कफ, वान
और तृष्णानाशक है ॥४७॥
विजयागुणाः।
शकाशनं तु तीक्ष्णोणं मोहकृत् कुष्टनाशनम् ।
बलमेधाग्निकृच्लेप्मदोपहारि रसायनम् ॥१८॥

-
-
.
राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
अर्थ-मांग-तीक्ष्ण, गरम, मोहकारक, कुटनाशक, बलव-
ईक, मेधाजनक, अनिवर्द्धक, कफनाशक और रसायन है॥४८॥
शंखपुष्पीगुणाः।
शंखपुप्पी तु तीक्ष्णोष्णा मेध्या कृमिविपापहा॥४९॥
अर्थ-शंखाहुली-तीक्ष्ण, गरम, मेधाकारक, कमि और
विपनाशक है ॥४९॥
शिरीपवृक्षगुणाः।
शिरीपो विपवीसर्पस्वेदत्वग्दोपशोथजित् ॥५०॥
अर्थ-सिरस-विष, विसर्प, पसीना, त्वचाके विकार और
सूजनको दूर करे है ॥५०॥
गुणाः।
दूर्वा तु रक्तपित्तनी कण्डूत्वग्दोपनाशिनी ॥५१॥
अर्थ-दूब-रक्तपित्त, कण्डू और त्वचाके दोपको दूर
करे है ॥५१॥
हरिद्रागुणाः।
हरिद्रा कफपित्तनी कण्डूत्वग्दोपनाशिनी ।
पाण्डुशोथापची चैव मेहकुष्टनणापहा ॥ ५२।।
अर्थ-हलदी-कफ, पित्त, कण्ड, त्वचाके दोप, पाण्डुरोग,
सूजन, अपची, प्रमेह, कोढ और व्रणका नाश करनेवाली है५२
दाम्हरिद्रागुणाः।
नवदाी विशेषेण कफाभिप्यन्दनाशिनी ॥५३॥
अर्थ-दारहलदी-हलदीकी समान गुणवाली है विशेष क-
रंक कफ और वेदनाशक है ॥ ५३॥

पष्ठः ६]
भापाटीकायुतः।
अवल्गुजगुणाः।
अवल्गुजो वातकफपित्तत्वग्दोपनाशनः ॥५४॥
अर्थ-बापची-बात, कफ, पित्त और त्वचाके दोपोंको
दूर करे है ॥ ५४॥
पडगजगुणाः।
तद्वदेडगजो गुल्मोदरार्शःकुष्टजित्कटः ॥५५॥
अर्थ-पमार (चकवड़ )-गुल्म, उदररोग. बवासीर और
कुष्टनाशक है तथा चरपरा है ।। ५५ ॥
करजनिम्यफलयोर्गुणाः।
करञ्जनिम्बजफलं कृमिकुष्टप्रमेहजित् ॥५६॥
अर्थ-करंज भौर नीमके फल-कमि, कुष्ठ और प्रमेहको
दूर करे है ।। ५६ ॥
चिडंगगुणाः।
विडंगमीपत्तिक्तं तु कृमिघ्नं विपनाशनम् ॥२७॥
अर्थ-चायनिरंग-किञ्चित् कडवी, कमि और विपनाश-
क है ।। ५७॥
रेणुकागुणाः।
रेणुका कफवातनी दीपनी पित्तकृल्लघुः ॥५८॥
अर्थ-रेणुका-कफ और वातनाशक, दीपन, पित्तकारक
और हलकी है ॥५८॥
भर्जशिंगपयोगुणाः।
भूजों बल्यः कफास्रनः शिशपा वातनाशिनी ॥१९॥

राजवल्लभः। [परिच्छेदः अर्थ-भोजपत्र-बलकारक कफनाशक और रुधिरदोष- निवारक है । सीसम वातनाशक है ॥ ५९॥ आस्फोतागुणाः। आस्फोता विपकुष्ठन्नी तिनिशो दाहपित्तनुत् ॥६०॥ अर्थ-आस्फोता (एक प्रकारका बेला)-विप और कुठ- नाशक है। तिरिच्छ-दाह और पित्तनिवारक है । ६० ॥ धातकीगुणाः। धातकीकुसुमं शीतं रक्तपित्तातिसारनुत्॥६॥ अर्थ-धायके फूल-शीतल तथा रक्तपित्त और अतिसार- को हरनेवाले हैं ॥६॥ शालगुणाः। असनः कफपित्तनः कदरो दन्तदाळकृत् ॥ ६२॥ अर्थ-शालवृक्ष-कफ और पित्तनाशक है। सफेद खैर-दां- ताको दृढ करे है ॥ ६२॥ नियवृक्षगुणाः। निम्बःपित्तकफछर्दिव्रणहत् वातकुष्टनुत् ॥ ६३ ॥ अर्थ-नीम-पित्त, कफ, वमन, व्रण, वात और कुठको दूर करे है ।। ६३ ॥ महानिम्बगुणाः । महानिम्बः परं ग्राही कपायोम्लश्च शीतलः ॥६॥ अर्थ--बकायन-मलरोधक, कपेली, खट्टी और शीत- ल है ॥ ६४ ॥ - -- - षष्ठः ६] भाषाटीकायुतः। १९३ भूनिम्वगुणाः। भूनिम्बो वातलो रूक्षः कफपित्तज्वरापहः॥६५॥ अर्थ-चिरायता-वातकारक, रूखा, कफ, पित्त और ज्वर- नाशक है ॥६५॥ पर्पटगुणाः। पर्पटो पित्तहृद्दाहज्वरजित्कफशोपणः ।। ६६॥ अर्थ-पित्तपापडा (फा० शातरा )-पित्तहारक, दाहनिवा- रक, ज्वरनाशक और कफशोपक है ।। ६६ ।। पाठागुणाः। पाठातिसारशमनी लध्वी दोपत्रयापहा ॥ १७ ॥ अर्थ-पाढ-अतिसारनाशक, हलका और त्रिदोपनाश- क है ।। ६७ ॥ कुटजगुणाः। कुटजः कफपितास्त्रत्वग्दोपाशोऽतिसारजित् ॥ ६८॥ अर्थ-कुडा-कफ, रक्तपित्त, लचाके विकार, बवासीर और अतिसारको दूर करे है ॥ ६८॥ इन्द्रयवगुणाः। तदीजं ज्वरजित्तिक्तं रक्तपित्तातिसारजित् ।। ६९॥ अर्थ-इन्द्रजो-ज्वरनाशक, कडवे, रक्तपित्त और अतिसा- रको दूर करे है ॥ ६९॥ हीपरगुणाः। होवेर छर्दिहल्लासतृप्णातीसारनाशनम् ।। ७०॥ - १३ १९४ राजवल्लभः। [परिच्छेद: अर्थ-सुगंधवाला-वमन, उबकाई, तृपा और अतिसारका नाश करे है ॥ ७० ॥ मुस्तकगुणाः मुस्तकं तिक्तकटुकं वातघ्नं ग्रादि दीपनम् ॥७१॥ अर्थ-नागरमोथा-कडवा, चरपरा, वातनाशक, मलरोधक और दीपन है ॥ ७१ ॥ अतिविपगुणाः। पाचन्यतिपिपा तिक्ता ग्राहिणी दोपनाशिनी ॥७२॥ अर्थ-अत्तसि-पाचक, कडवा, मलरोधक और त्रिदोषना- शक है ॥ ७२ ॥ आर्द्रकगुणाः। शृङ्गवेरोऽनिलश्वासकासहिक्कावरापहः ॥७३॥ अर्थ-अदरख-वात, श्वास, खाँसी, हिचकी और ज्वरको नाश करे है ॥ ७३॥ कलगुणाः। करलं कफरोगघ्नं श्वासकासज्वरापहम् ॥७४ ॥ अर्थ-कायफल-फरोग, श्वास, खाँसी और ज्वरका नारा करे है ॥ ७४॥ कुष्टगुणाः। कुटं वातकफश्वासकामहिकावरापहम् ॥ ७ ॥ अर्थ-यूठ-वात, कफ, सास, साँसी, हिचकी और ज्वरको

"
पष्टः ६]
भापाटीकायुतः।
शोभालनगुणाः।
शोभाअनः कटुस्तिक्तः कफविद्रधिगुल्मनुत् ।।७६||
अर्थ-सैजिना-चरपरा, कडवा तथा कफ, विद्रधि और
गुल्मनाशक है ॥ ७६॥
यापगुणाः।
यापो सरो ज्वरच्छदिश्मप्मपित्तविसर्पमित् ॥७७||
अर्थ-जवासा-ज्वर, वमन, कफ, पित्त और विसर्परोगना-
शक है ॥ ७७॥
कटुकागुणाः।
कटुका तु सरा रूक्षा कफपित्तज्वरापहा ॥७८॥
अर्थ-कुटकी-सारक (कुछ २ दस्तावर), रूखी, तथा
कफ, पित्त और ज्वरनाशक है ॥ ७८॥
रास्नाचायन्तीकयोर्गुणाः ।
रास्ना शोथामवातनी त्रायन्ती कफवातनुत् ॥७९॥
अर्थ-रास्ना-शोथ और आमयातनाशक है । प्रायमान-
कफ और वातनाशक है ॥ ७९ ॥
वरुणवृक्षगुणाः।
वरुणोऽनिलझूलनो भेदी चोष्णाइमरीहरः ॥ ८० ॥
अर्थ-वरना-वात, शूल और पथरीको दूर करे है, दस्ता-
वर और गरम है ॥ ८॥
पारिभद्रगुणाः।
पारिभद्रोऽनिलइलेप्मशोथमेहकृमीन जयेत् ॥८॥

राजवल्लभः। [परिच्छेदः
अर्थ-फरहद-वात, कफ, सूजन और कमिरोगका नाश
करे है ।। ८१॥
वासकगुणाः।
वासकः कासवैस्वयंरक्तपित्तकफापहः ॥ ८२ ॥
अर्थ-बाँसा-अडूसा-विसौंटा-खाँसी, स्वरजंग, रक्तपित्त
और कफको हरनेवाला है ।। ८२॥
गुडूचीगुणाः।
गुडूची ग्राहिणी वल्या निदोपनी रसायनी ।
दीपनी ज्वरतृछदिकामलावातपित्तनुत् ॥ ८३॥
अर्थ-गिलोय-ग्राही, बलकारक, त्रिदोषनाशक, रसायन,
अभिको दीपन करनेवाली, तथा ज्वर, तृपा, वमन, कामला
और वातपित्तनाशक है ॥ ८३ ॥
पिप्पलीमूलगुणाः।
भेदनं पिप्पलीमूलं दीपनं कफनाशनम् ॥ ८४॥
अर्थ-पीपरामूल-दस्तावर,दीपन और कफनाशक है ८४॥
चविकागजपिप्पलीगुणाः।
चविकागजपिप्पल्या पिप्पलीमूलवत्स्मृते ॥८५॥
अर्थ-चव्य और गजपीपलके गुण-पीपरामूलकी समा-
न है ।। ८५॥
चिनकागुणाः।
चित्रकोऽग्निसमः पाके शोधास्कृमिकुष्टहा।।८।।
अर्थ-चीता-पचनम अनिकी समान है तथा शोथ, पयासीर,
शमि और कुटनायक है ॥ ८६ ॥

१९७ षष्ठः ६] भाषाटीकायुतः। दन्तीगुणाः। दन्ती साष्टीलिकाध्मानगुल्मोदरहरा सरा।। ८७ ।। अर्थ-दन्ती-अठीलिका, आध्मान, गुल्म और उदररोग- नाशक है ॥ ८७ ॥ स्नुहीक्षीरगुणाः। दूपीविपोदरप्लीहगुल्मकुष्टप्रमेहनुत् । वहुदोपे प्रयोक्तव्यं वह्नितुल्यं सुधापयः ॥ ८८॥ अर्थ-थूहरका दूध-दूपित विप, उदररोग, पीहा, गुल्म, कुष्ट और प्रमेह रोगका नाश करे है । बहुत दोपयुक्त रोगमें इस- का प्रयोग है और अग्निकी समान पाचक है ॥ ८८ ॥ अर्कवृक्षगुणाः। अर्कः कृमिहरस्तीक्ष्णः सरोकफदोपजित् ॥८९॥ अर्थ-आक-कृमिनाशक, तीक्ष्ण, सारक और कफनाश- क है ॥ ८९ ॥ अक्षीरगुणाः। तत्पयः कृमिदोपन्नं हितं कुष्टोदार्शजित् ॥१०॥ अर्थ-आकका दूध-कृमिदोपनाशक, तया कोट, उदररोग और अर्शरोगमें हितकारी है ॥ ९०॥ जयपालगुणाः। कानकं कफनुत्केदि तीक्ष्णमुणं विरेचनम् ॥११॥ अर्थ-जमालगोदा-कफनाशक, लेदकारक, तीक्ष्ण, गरम और विरेचक है ॥ ९१ राजवल्लभः। [परिच्छेदः 7 धतूरगुणाः। धत्तूरो मदमूळाकृत् कफनो बहिपित्तकृत् ॥ ९२।। अर्थ-धतूरा-मद और मूछाको उत्पन्न करे है, कफनाशक तथा अमि और पित्तकारक है ॥ ९२ ॥ भल्लातकगुणाः। भल्लातकं फलं स्निग्धं कृमिदुर्नामनाशनम् । दन्तस्थैर्यकरग्राहि कपायं मधुरं च तत्॥१३॥ अर्थ-भिलावा--स्निग्ध, कमिनाशक, अर्शन, दाँतोंको स्थि- र करनेवाला मलरोधक, कपेला और मधुर है ॥ ९३ ॥ भल्लातवृन्तं मधुरं कपायं वातकोपनम् । विएम्भि दुर्जर शीतं रक्तपित्तप्रदूपणम् ॥ ९४॥ अर्थ-भिलावेका डंठल-मधुर, कपेला, वातप्रकोपक, वि- दृम्भकारक, दुर्जर, शीतल और रक्तपित्तको दृषित करे है ९४ गुग्गुलुसाधारणगुणा:। गुग्गुलो दीपनस्तिक्तः सकपायो रसायनः। कटुमेंदोनिलश्लेप्मकुटनः संसनो लघुः ॥ ९५ ॥ सुस्वादः पीडकानश्च सोप्णश्च स्पर्शशीतलः। वर्यः स्वयः कटुः पाके रूक्षस्तीक्ष्णोग्निदीपनः९६ ॐदमहोपचीमन्पिशोधकृमिविनाशनः । स्निग्धः काञ्चनसङ्काशः परजम्बूफलोपमः ॥ ९७॥ अर्थ-गृगल-दीपन, कडबा, कपेला, रसायन, चरपरा तथा मेइराग, वात, कफ और कुटको नष्ट करे है, संसन (ऊर्द्धगत षष्ठः ६] भाषाटीकायुतः। दोषोंको गिरानेवाला), हलका, स्वादिष्ठ, पिडकानाशक, उष्णवी- ये, स्पर्शमें शीतल, वर्णको उज्ज्वल करनेवाला, स्वरशोधक, पच- नेमें चरपरा, रूखा, तीक्ष्ण, अमिप्रदीपक तथा क्लेद, अपची, प्रन्थि, शोथ और तिमिरोगनाशक है । स्निग्ध तथा सुवर्णकी समान वर्णवाला और पकी हुई जामुनकी सदृश होता है । ॥ ९५ ॥ ९६ ॥९७॥ नृतनगुग्गुलुगुणाः । नूतनोगुग्गुलुः प्रोक्तः सुगन्धिश्चापि पिच्छिलः॥९८॥ अर्थ-नवीन गूगल-सुगन्धित और पिच्छिल है ॥ ९८ ॥ पुराणगुग्गुलगुणाः। पुराणः शुष्को दुर्गन्धो मलानां नापकर्षकः॥९९॥ अर्थ-पुराना गूगल-सूखा, दुर्गंधयुक्त और मलको बांधने- वाला है ॥ ९९ ॥ रक्तत्रिवृतागुणाः। अरुणा त्रिवृता स्वादुः कपाया मृदुरेचनी। रूक्षा च कटुका चैव पाके तिक्ता कफापहा ॥१०॥ अर्थ-लाल निसोत-स्वादिष्ट, कपेला, मृदुरेची, रूखा, च- रपरा, पचनेमें कड़वा और कफनाशक है ।। १०० ॥ श्वेतत्रिवृतागुणाः। तस्याश्चाल्पान्तरगुणा विज्ञेया त्रिवृता सिता । ज्वरहृद्रोगवातासृगुदावतीदिरोगनुत् ॥३॥ अर्थ-सफेद निसोत-लाल निसोतकी अपेक्षा न्यून गुणवा-

२००
राजवल्लभः।
[ परिच्छेदः
ला है। तथा ज्वर, हृदयरोग, वातरक्त और उदावादि रोगको
दूर करे है ॥ ३॥
राजवृक्षगुणाः।
राजवृक्षोऽधिकः पथ्यो मृदुर्मधुरशीतलः ॥२॥
अर्थ-अमलतास-अधिकपथ्य, मृदु ( नरम ), मधुर और
शीतल है ॥२॥
राजवृक्षफलगुणाः।
तत्फलं मधुरं वृष्यं वातपित्तहरं सरम् ॥३॥
अर्थ-अमलतासकी फली-मधुर, वीर्यवईक, वातपित्त-
नाशक और सारक है ॥३॥
रोहितवृक्षगुणाः।
रोहीतको यकृत्प्लीहगुल्मोदरहरः सरः॥४॥
अर्थ-रोहितक ( रोहेड़ा )-पकत, पीहा, गुल्म और
उदररोगनाशक तथा सारक है ॥ ४ ॥
वृद्धदारगुणाः।
रसायनो वृद्धदारः शोथामवातरोगजित् ॥६॥
अर्थ-विधारा-रसायन, शोथ और आमवातनाशक है॥५॥
अपामार्गगुणाः।
अपामार्गोऽग्निवत्तीक्ष्णः केदनः उसनः परः॥६॥
अर्थ-अपामार्ग (चिरचिरा)-अमिकी समान तीक्ष्ण, के-
दक और संसन है ॥६॥
सिन्धुपारगुणाः।
सिन्धुवारो विपश्लेष्मकुष्टत्रणविपापहः ॥ ७॥

20027 २०१ -- " षष्ठः ६] भापाटीकायुतः। अर्थ-सलालू-विष, कफ, कोढ, व्रण और विपको दूर करे है ॥ ७॥ तुलसीगुणाः। तुलसी पित्तकृद्धातकृमिदोर्गन्ध्यनाशिनी । पाचशूलारतिश्वासकासहिकाविकारजित् ।। ८॥ अर्थ-तुलसी-पित्तकारक, तथा कमि, दुर्गध, पार्श्वशूल, अरति, श्वास, खाँसी और हिकारोगको दूर करे है ॥ ८॥ मूर्वागुणाः। मूर्वा तु वृंहणी वल्या कफवातामयान जयेत् ॥९॥ अर्थ-चुरनहार-चाजीकरण. बलकारक तथा कफ और वातको दूर करे है ॥ ९ ॥ वंशलोचनगुणाः। कपाया मधुरा रूक्षा वातघ्नी वंशलोचना ।। ११० ॥ अर्थ-वंशलोचन-कपेला, मधुर, रूखा और वातनाश- क है ॥ ११०॥ स्वर्णक्षीरीगुणाः। स्वर्णक्षीरी क्षयश्वासकासन्नी मधुरा हिमा॥११॥ अर्थ-सत्यानासी कटेरी-क्षय, श्वास और खाँसीको दूर करे है तथा मधुर और शीतल है ॥ ११॥ हेमन्तशिशिरकृत्यम्। शीते शीतानिलस्पर्शसंरुद्धो बलिनां वली । पक्ता भवति हेमन्ते मात्राद्रव्यगुरुक्षमः ।। १२॥

राजवल्लभः।
[परिच्छेदः
स यदा नेन्धनं युक्तं लभते देहजं तथा ।
रसं निहन्त्यतो वायुः शीतः शीते प्रकुप्यति ॥१३॥
तस्मात्तुपारसमये स्निग्धाम्ललवणान रसान् ।
औदकानूपमांसानां मेध्यानामुपयोजयेत् ॥ १४॥
बिलेशयानां मांसानि प्रहसानां भृतानि च ।
भक्षयेन्मदिरां सीधु मधु चापि पिवेन्नरः ॥१५॥
गोरसानिक्षुविकृतीर्वसां तैलं नवौदनम् ।
हेमन्तेऽभ्यस्यतस्तोयमुप्णञ्चायुन हीयते ॥ १६॥
अभ्यङ्गोत्सादनं मूनि तैलं जेन्ताकमोतपम् ।
भजेद्भुमिगृहं चोष्णमुष्णं गर्भगृहं तथा ॥१७॥
शीते सुसंवृतं सेव्यं यानं शयनमासनम् ।
प्रावाराजिनकौपेयप्रवेणीकुथकास्तृतम् ॥ १८॥
गुरूप्णवासा दिग्धाङ्गो गुरुणाऽगुरुणा सदा ।
शयने प्रमदां पीनां विशालोत्थितसुस्तनीम् ॥१९॥
आलिङ्गचागुरुदिग्धाङ्गी सुप्यात् समदमन्मथः ।
प्रकामं च निपेवेत मैथुनं शिशिरागमे ।। १२०॥
वर्जयेदन्नपानानि लघूनि शीतलानि च।
प्रयातं प्रमिताहारमुदमन्थं हिमागमे ॥२१॥
हेमन्ते शिशिरे तुल्ये शिशिरेऽल्पं विशेपणम् ।
रोक्ष्यमादानजंगीतं मेघमारुतवर्पजम् ॥२२॥
तस्मा मन्तिकः सर्वः शिशिरविधिरिप्यते ।
निवातमुष्णन्त्वधिक शिशिरे गृहमाश्रयेत् ॥२३॥

२०३ पष्ठः ६] भाषाटीकायुतः। कटुतितकपायाणि वातलानि लघूनि च । वर्जयेदनपानानि शिशिरे शीतलानि च ॥२४॥ अर्थ-हेमन्तकाल (अगहन, पूप) में शीतल पवन चलनेसे मनुष्योंके शरीरकी गर्मी बाहर नहीं निकलनी, इसीलिये हेमन्त- कालमें बलवान पुरुषोंकी पाचकामि प्रबल उत्पन्न होकर अ- धिक और भारी वस्तुओंके पचानेको सामर्थ्य होता है। ऐसे- ही जो प्रवल अग्नि उचित परिमाणसे पाक करनेकी वस्तु न पावै तो वह शरीरकी रसधातुका क्षय करना आरम्भ करता है। रसोंके क्षय होनेके लिये और शीतल पवनके कुपित होनेके कारण, इस ऋतुमें स्निग्ध द्रव्य, खट्टा, और लवण रसयुक्त द्रव्य, पवित्र जलीय (पवित्र जलके रहनेवाले जीव) और आ- नप (जलके समीप रहनेवाले स्थानोंमें जो पशु वास करते ) वा, जलीय (भट्टोके रहनेवाले ) पशुओका अथवा प्रसह (जो पक्षी भोजनकी सामग्री पातेही तत्काल उस भोजनको भक्षण कर लेते हैं ) ऐसे जीवोंका मांस भक्षण करें, और फिर सीधुनामक मद पीकर पीछे सहत पिये । इस ऋतुमे दूध, इक्षु- विकृति (गुडादिक ), वसा (ची ), तेल और नये चावल आदिक अन्न भोजन करना चाहिये । इस ऋतुमें गरम करके जल पीनेवाले मनुष्यकी आयु नष्ट नहीं होती। इस समयमें अ- क्यङ्ग (तेल आदिकका मलना ), उत्साहन (हलदी इत्यादिक शरीरमें मलना, उबटन) जेन्ताक ( स्वेदविशेष) आदिका २०४ - राजवल्लभः। [परिच्छेदः व्यवहार करै, ईंट अथवा मिट्टीके बने हुए गरम गृहमें, अथवा उष्णगृह (गृहमें ईंट और मिट्टीके बने हुए घरके बीचवाले कोठेको गर्भगृह कहते हैं) ऐसे स्थानमें वास करना चाहिये,और कम्बल, चर्म (पोस्तीन वगैरह ), रेशमीन प्रपेणी ( विचित्र कम्बल ) आदिसे मलीनांति ढकी हुई सवारी, पालकी, डोल इत्यादि, शय्या और आसवका व्यवहार कर, सदा मोटा और गरम वस्त्र पहिरै, घिसे हुए गाढे अगर चन्दनादिका लेप करे, शयनके समय पारुणी पीकर कामयुक्त चित्तसे नवयौवना, पी- नांगी, उठे हुए स्तन (छाती ) वाली, अगर आदि सुगन्धि ये जिसके शरीरमें लग रहीं, ऐसी सुन्दर रूपवाली स्वीके साथ शम्यापर शयन करके उसको आलिंगन करै, और इच्छानुसार मैथुन करके फिर सो रहै, और इस ऋतु के वात बढानेवाले भोजन, और पानीय अर्थात् पीनेके द्रव्य, प्रबल वायु, और थोडा आहार करना चाहिये, और उम्रन्थ ( पानीमें घोले हुए सत्तू) का त्याग कर दे,हेमन्त और शिशिरकाल दोनों लग- भग एकसेही हैं, केवल थोडासा भेद यही है, कि शिशिरकाल- में आदानजात ( इस समयमें सूर्यके द्वारा शरीरका चिकना पदार्थ ग्रहण किया जाता है ) रूखापन, मेघ, वायु और वासे उत्पन्न हुवा शीत अधिक होता है, इसलिये हेमन्तकालके आ- चार व्यवहार शिशिरकाल (माघ, फाल्गुन ) में आचरण करे, इस समयमें पवनहीन गरम गृहम रहना चाहिये, और चरपर, कईये, कपले रसयाले पदार्थ, वायुके बढानेवाले द्रव्य, हलकी - २०५ पष्टः ६] भाषाटीकायुतः । वस्तु और शीतल भोजन और पनीला आहार नहीं करना चाहिये ॥१२॥ १३॥ १४॥ १५॥ १६ ॥ १७ ॥१८॥ ॥ १९ ॥ १२० ॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥ २४ ॥ वसन्तकृत्यम् । हेमन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृद्भाभिरीरितः । कायानि वाधते रोगांस्ततः प्रकुरुते बहून् ॥ २५ ॥ तस्माद्वसन्ते काणि वमनादीनि कारयेत् । गुर्वम्लस्निग्धमधुरं दिवा स्वप्नं च वर्जयेत् ।। २६ ।। व्यायामोद्वर्तनं धूमं कवरग्रहमञ्जनम् । सुखाम्बुना शोचविधि शीलयेत्कुसुमागमे ॥ २७ ॥ चन्दनागुरुदिग्धाङ्गो यवगोधूमभोजनम् । शारभं शाशमैणेयं मांसं लावकपिञ्जलम् ॥२८॥ भक्षयेन्निगदं सीधुं पिबन्माध्वीकमेव वा। वसन्तेऽनुभवेत्स्त्रीणां काननानां च यौवनम् ॥२९॥ अर्थ-हेमन्तऋतुमें संचितश्लेष्मा, सूर्यकी तीक्ष्ण किरणोंसे चलायमान होकर शरीरकी अमिको हीन करता है, इस कारण वसन्तऋतु (चैत, वैशाख) में अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न होते हैं, इसलिये वसन्तकालमें कफके दमन करनेको वमनादि क्रिया करनेकी आवश्यकता है । इस ऋतुमें भारी, खट्टी, मधुररसवा- ली वस्तु और दिनका सोना छोड देना चाहिये, और दिनका व्यायाम (कशरत), उवटन, हुक्का पाना, कवडग्रहण (अदरख इत्यादिके रमसे कुल्ला करना), आखोंमें अञ्जन डालना, कुछेक २०६ " राजवल्लमः। [ परिच्छेद गरम जलसे शौचकिया करना, चन्दन और अगरको शरीरमें लगाना, यव, गेंहू, शरमका मांस, खरगोशका मांस, हरिणका मांस, लघेका मांस, और चातकका मांस भक्षण करना, और सीधु व माध्वीनामक मदका पीना बहुत अच्छा है । इस ऋतुमें वनोंके और खियोंके यौवनका अनुभव लेवे ॥ २५ ॥ ॥ २६ ॥ २७ ॥ २८ ॥ २९ ॥ ग्रीष्मकृत्यम् । मयूखैजगतः सारं ग्रीष्मे पेपीयते रविः। स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमनपानं तदा हितम् ।।१३०॥ शीतं सशर्करं मन्थं जाङ्गला मृगपक्षिणः । घृतं पयः सशाल्यन्नं भजन ग्रीप्मे न सीदति॥३१॥ मद्यमाज्यं न वा पेयमथवा सुबहूदकम् । लवणाम्लकटूप्णानि व्यायामं चात्र वर्जयेत् ॥३२॥ दिवा शीतगृहे निद्रा निशि चन्द्रांशुशीतले । भजेच्चन्दनदिग्धाङ्ग:प्रवाते हर्म्यमस्तके ॥३३॥ व्यजनैः पाणिसंस्पर्शेश्चन्दनोदकशीतलैः । सेव्यमानो भजेतास्तां मुक्तामणिविभूपितः ।।३४॥ काननानि च शीतानि जलानि कुसुमानि च । ग्रीष्मकाले निपेवेत मेथुनाद्विरतो नरः ॥३५॥ अर्थ-ग्रीष्मकाल (ज्येष्ठ, आपाढ) में सूर्यकी किरणांसे पीक चिकने पदार्थ सूख जाते हैं, इसलिये स्वादिष्ठ, शीतल द्रव्य और चिकनाईके गुणंस संयुक्त भोजन और पीने योग्य

२०७
षष्ठः ६]
भाषादीकायुतः।
वस्तुका व्यवहार करना चाहिये, इस कालमें मिश्रीका मिला
हुवा महा और जंगला पशु और वनके पक्षियोंका मांस, सहीके
चावलोंका भात खाय और दूध पिये, और जिनको मदिराके
पीनेका अभ्यास हो, वह थोडीसी मदिरा वा अधिक जल मिली
हुई मदिरा पियें, परन्तु जिनको मदिराके पीनेका अभ्यास नहीं
हो, उनको इस ऋतु में शराबका पीना अनुचित है । पीप्मका-
लमें लवण, खटाई, कडुवा रस, गरम पदार्थ, और कशरत कर-
नी छोड दे, शरीरमें चन्दन लगाय दिनके समय पवन आनेवाले
शीतल स्वच्छ मन्दिरमें और रात्रिके समय ठण्डी सुगन्धित पव-
न चन्द्रमाकी किरणोंसे युक्त मदनबाण और गन्धराजके हार
पहर कोटेकी छतपर शयन करै, जब दुपहरके प्रचण्ड सूर्यकी
गरमीसे शरीर तप्त हो जाय तो चन्दनके जलको पंखेपर छिडक
कर शीतल चयार और रासदासियोंका हाथ छूनेसे सावधान हो-
नेके उपरान्त मणि मुक्ता धारण कर आनन्द करना चाहिये,
फिर मैथुनसे निश्चित हो शीतल और सुगंधित पुष्पवाटिका, शी-
तल जल, और शीतल सुगन्धियुक्त फूलोंका व्यवहार करै ।।
॥ १३० ॥ ३१ ॥ ३२॥ ३३॥ ३४ ॥ ३५॥
वर्षाकृत्यम् ।
आदानदुर्वले देहे पक्ता भवति दुर्बलः ।
• स वास्वनिलादीनां दूपणैर्वाध्यते पुनः॥३६॥
भूवाप्पान्मेपनिप्यन्दात्पाकादम्लाजलस्य च ।
वर्षास्वग्निवले क्षीणे कुप्यन्ति पवनादयः॥३७॥

२०० राजवल्लभः। [ परिच्छेदः तस्मात्साधारणः सर्वो विधिर्वासु चेष्यते । उदमन्थं दिवा स्वप्नमवश्यायं नदीजलम् ॥३८॥ व्यायाममातपं चैव व्यवायं चात्र वद्धयेत् । पानभोजनसंस्कारात्प्रायः क्षौद्रान्वितान हितान३९ व्यक्ताम्ललवणस्नेहं वातवाकुलेऽहति । विशेपशीते भोक्तव्यं वास्वनिलशान्तये॥ १४० ॥ अग्निं संरक्षणवता यवगोधूमशालयः । पुराणजांगलैमासभॊज्या यूपैश्च संस्कृतैः॥४१॥ पिवेत् क्षौदान्वितं चाल्प माध्वीकारिएमम्बु वा । माहेन्द्रतप्तशीतं वा कोम सारसमेव वा ॥४२॥ प्रघपोंदर्तनसानगन्धमाल्यपरो भवेत् । लघुशुद्धाम्बरं स्थानं भजेदक्केदि वार्पिकम् ॥१३॥ अर्थ-आदानकाल (वकितु ) में देहकी दुर्बलताके हेतुसे अमिती दुर्घल हो जाती है, यह दुर्घलागि वक्तुमें वाता- दि दोप करके औरभी अधिक निर्बल हो जाती है, इस समयमें पृथ्वीमसे वाफ उडती है, मेघ गर्जता है, जलका अम्ल पक जा- ना है, और अमिका बल कम होनेसे वायु, पित्त, कफ कुपित होते है, इस कारण इस कालमें साधारण विधिका आचरण क- रना चाहिये, याकालमें जलका मिला महा पीना, दिनका सो- ना, हिम और नदी के जलका सेवन करना, कशरत करना, गर्यकी में बैठना, और मैथुन कर्म छोड देना चाहिये, इप्स

२०९
षष्ठः ६]
भाषाटीकायुक्तः ।
कालमें मधयुक्त पानी और बहुत हलके जोजनका व्यवहार
करना चाहिये, और दिनमें पानी वर्पता हो और शीतल पवन
चलती हो तो वायु दूर करनेके लिये खट्टा, लवणरस (नमकीन)
और स्नेह (तेल, घृतादि) युक्त पदार्थ भक्षण करना चाहिये,
अग्नि रक्षा करनेको पुराने यव, गेहूं, सहीके चावल और जां-
गलीदेशके पशुओंका मांस खाना, और शुद्ध करा हुवा यूप
(अठारह भाग पानी; एक भाग मुंग अनिमें औदावे जम चतुर्थ
भाग रह जाय उसको छान कर सेंधा नान शंठि, जीरा, मिरच्या-
दि डाले उसको यूप कहते हैं) मधुयुक्त थोडीसी माध्वीक मदि-
रा (शराब) या अरिष्ट पिये, मेघजल वा तप्त शीतल जल
(जो जल पहिले गरम करके शीतल कर लिया जाय) अथ-
वा कुएका जल, वा सरांवरका जल पिये, इस अनुमें शरीरका
विसना, शरीरसे हलदी आदिका लगाना, सान, गन्धमाला धा-
रण, हलका, शुद्ध बस पहिरना चाहिये, और क्लेदरहित उत्तम
स्थानमें निवास करे ॥ ३६ ।। ३७ ॥ ३८ ॥३९॥१४॥
॥४२॥ ४२ ॥४३॥
शरत्कृत्यम् ।
पाशीतोचिताङ्गानां सहसवाकरश्मिभिः ।
तप्तानामाचितं पित्तं प्रायः शरदि कुप्यति ॥ १४॥

राजवल्लभः। [ परिच्छेदः तत्रानपानं मधुरं लघु शीतं सतितकम् । पित्तप्रशमनं सेव्यं मात्रया सुप्रकाहितः ।।४५ ॥ लापान कपिजलानेणानुरभान शरभान शशान् । शालीन सयवगोधूमान सेव्यानाहुर्घनात्यये।।४६॥ तिक्तस्य सर्पिपः पानं विरेको रक्तमोक्षणम् । धाराधरात्यये कार्य्यमातपस्य च वर्जनम् ॥४७॥ वसा तैलमवश्यायमोदकानूपमामिपम् । क्षारं दधि दिवा स्वप्नं प्राग्वातं चात्र वर्जयेत् ॥४८॥ दिवा सूर्य्याशुसन्तप्तं निशि चन्द्रांशुशीतलम् । कालेन पर निर्दोषमगस्त्येन विपीकृतम् ॥४९॥ इंसोदकमिति ख्यातं शारदं विमलं जलम् । नानपानावगाहेषु शस्यते तद्यथामृतम् ॥ १५ ॥ शारदानि च माल्यानि वासांसि विमलानि च । शरत्काले प्रशस्यन्ते प्रदोपे चेन्दुरश्मयः ॥५१॥ अर्थ-वर्षाकालका शीत संचित हुवा पित्त, शरत्काल (कार, कार्तिक ) में सूर्यकी किरणोंसे सन्तपित होकर बहुधा कुपित हो जाता है, (अनुवन्धरूपसे पायु और पितमी कुपित हति हैं) इसलिये पित्तके दबानेके हेत (अनुबन्ध) कफको दबा- के अर्थमी क्षुधायुक्तः पुरुष मधुर, शीतल, हलका, चरपरा 1 षष्ठः ६] भापाटीकायुतः। अन्न और पानी योगमात्रासे सेवन करे, और लवा, कपिल (तीतर सफेद ),काला हरिण, मेंडा शरत और सरगोश आदि- का मांस, सहीके चावलोंका भात और यव, गेंहू खाय, पित्तको दयानेके अर्थ तिक्तरसयुक्त(घृत पंचतिक्तवृतादि) का पीना ठीक है, जो तिक्त घृतके पीनेसे पित्त न दवे तो विरेचन (जुलाबकी आदि) की औषधिका सेवन करके पित्तको दबावे, जो इससे- भी नहीं दबै तो रक्तमोक्षण (फस्त) कराना चाहिये, इस ऋतु- में शरीरको धूप न लगने दे, इस कारण दुपहरिमें फिरना वसा (चर्वी ), तेल, हिम, जल, आनूपमांस (अलके निकट स्था- नमें रहनेवाले पक्षियोंके मांसको आनूप कहते हैं)। सार (ज- वाखारादि) दही, दिनका सोना, और मपलवायुका सेवन छोड देना चाहिये, वाऋतु में मेघ वरसनेसे जल नवीन हो जाता है व इस जलमें विपेले पदार्थ मिल जाते हैं, और जलका अम्लपाक हो जाता है, जब शरदकालमें यह जल स्वनावसे पक जाय और अगस्तके उदयसे विपरहित हो जाय, तय उसके ग्रहण करके सारे दिन सूर्यकी धूप में और सारी रात चन्द्रमाकी उजि- यालीम रखकर शीतल कर, (इस प्रकारके जलको हंसोदक कहते हैं) शरत्कालमें लान, पान और कुल्ला करनेको हंसो- दकही बहुत श्रेष्ठ है, और अमृतको समान है, इस कालमें सु- गन्धित पुष्पोंकी माला व निर्मल वांका व्ययहार करना चाहिये R २१२ राजवल्लमः। [परिच्छेदः और प्रदोष (सन्ध्या) कालमें चन्द्रामाकी किरणोंका सेयन करना उचित है ॥४४॥ ४५ ॥४६ ॥ ४५ ॥४८॥ ॥ इति ऋतुकत्यं समातम् ॥ इति श्रीराजवल्लभानिघण्टे द्रव्यगुणचन्द्रिकाटीकायां आधु- वेदोद्धारकरामगङ्गातटे मुरादाबादनगरनिवासिमाथुरंवशीयशालि- ग्रामवैश्पकते पष्टः परिच्छेदः समानः ॥६॥ संवत् ३९५२ वि० श्रावणमासे शुक्लपक्षे नवम्याम् । 200 २१ इति राजवटममापार्टीका समाहा पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, 'लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना, कल्याण--मुंबई.

जाहिरात. नूतन पुस्तकें. - श्रीमवाल्मीकीयरामायण गोविंदराजीय भूपण ओर तनिश्लोकी, रामानुजी इन तीनों व्याख्या सहित छाके तैयार है. ग्राहकलोगोंको इसका मूल्य २५ रु० पडेगा.और भगव- गुणदर्पणास्य श्रीविष्णुसहस्रनाममाप्य १२००० ग्रन्थ भेटमें दिया जायगा. इसका डाकगहसूल अलग पडेगा. डाकमहसूल प्रथम आनेसे पुस्तक व्हाल्युपेर से भेजा जायगा. इसका कमिशन नहीं मिलेगा.. बालसंस्कृतप्रभाकर. संस्कृत और शुद्ध हिंदीभापामें अपूर्व ग्रंथ-संस्कन सीखनेवाले विद्यार्थिगणको अत्यंत उपकारक तथा चमत्कारक, जिसमें प्रथम संस्कृत वाक्य और उनके सामने शुद्ध हिंदीवाक्योंम अर्थ लिखा गया है और. अपूर्व २ संस्कन गंभरिशब्दोका संग्रह, व्याकर- णकी उपयुक्त सबही बाते उदाहरणसहित संक्षिततामे लिखी गई हैं, तथा धर्मशास ज्योतिप आदि प्राचीन वर्त- मानके सबही उपयुक्त विषय लिये गये हैं। जिसमे शि. द्यार्थिगण संस्कृत बोलनमें गापांतर करनेमें तथा सब प्रकारके अन्य विषयोंके बानमंती निपुण २ हो जायेगा, यह देसनेहीने मालूम होगा । ग्लेन कागज कीमत ८ आना । रफ कागज फी० ६ आना।

जाहिरात.
नवीन शुकसागर.
(श्रीयुत शालिग्रामजी वैश्यलत शुद्ध हिंदीभापामें)
परम माननीय भगवनक्तो ! सुज्ञरसिकवरो! आपकी आत्माको
| अनुपम आनंद देनेवाला यह अमृतरस भरा अपूर्व ग्रंथ जो एक
सुयोग्य प्रतिष्ठित लेखककी लेखनीका अद्भुत फल है । एक तो
इस यंथमें कर्णेद्रियको तृप्त करनेवाली श्रीभगवान्की ललित
कीतिका सुरस प्रवाह है। और दूसरे इसकी भापा और
लेखनणाली ऐसी विचित्र रसमयी एवं हृदयमाहिणी है कि
इसके पटनेका आरंभ कर अनेक आवश्यक कार्योको परित्याग
करेगाायथायोग्य स्थलीम अन्य पुराणों के प्रमाण और उदाहरण
तथा अनेक शंकाओका उत्तम रीतिसे समाधान एवं जहां तहां
दोहा छद कविनादि मन प्रसन्न करते हैं रोचक दृष्टांतभी जहां
तहाँ होनसे पढने समय मन विकमित होता है । ऐसा यह ग्रंथ
स्वच्छता के साथ घडे अक्षरोंमें चिकने और सुथरे कागजपर
छापा गया है । ग्लेन कागद की० १०२० । रफ कागज
की० ९३०॥
अनेकसंग्रह.
यह ग्रंथ तो सरकारको योले सार सार बातें निकालकर
अपूर्व मनोरजक बनाया है. इस मंथमें कोई बुरी बात नहीं है.
। राम, रुष्ण और खुदामा इपादत, संवटन्टग, प्रेमलच्छन,
जप, योग. पूना, ज्ञान, वराग्य जनि, ज्योतिष, सामुद्रिक,

३ जाहिरात. कालज्ञान, स्वरोदय, नीति वेद, शास्त्र, पुरान, वैद्यक, कर्म-धर्म-विचार, बड़े बड़े महात्माओंके बनाये हुए रागरागिनी, चेतावनी, लावनी, और सब मत, तथा अनेकप्रकारकी चुनी चुनी चीजें लिखी हैं. सज्जन लोग इस पुस्तकके देखनेसे कमी तृप्त नहीं होवेगे. इस ग्रंथमें जो मर जैसे पढनेका इरादा करेंगे चैसाही इसमें पायेंगे. क्योंकि, अंग्रेजी महराठी उरदू भाषाकीमी बहुत पद लिखी हैं. इस ग्रंथका सब ख्याल लिखनेके वारेमें बुद्धि नहीं पुर सकती, यह तो आदिसे अंततक देखनेसेही सज्जनोंको मालुम हवि. इसके प्रथमखंड (भाग १ कीमत ११ रु०, भाग २ कीमत १॥ रु० ) द्वितीयखंड (कीमत १ रु.) छपके तैयार हैं. अभिलाखसागर. (अपूर्व ग्रंथ) यह ग्रंथ भापामें अभिलाखदास स्वामीजीने बनाया है, इसमें तरंग ग्यारह हैं और प्रत्येक तरंगमें दो चार आठ कई लहरियांजी है। गुरुशिष्यसंवादसे ब्रह्म किसको कहते हैं यह इसमें व्यवहाररीतिसे प्रतिपादित है, एक शिप्यने बहुत गुरुओंके पास जा ब्रह्मका प्रभ किया है और सब गुरुगाने जिन्न २ मतोंसे ब्रह्म बताया है । इन सब मतोंका खंडन कर अंतमें ब्रह्मकी सिद्धि की है। इसमें एक बार थोडा भाग देखनेसे सब ग्रंथ पढनेकी उत्कंठा हो जाती है और पुनः पुनः पढनेसेनी तृप्ति नहीं होती, यह चमत्कार है। की० २२० ।

जाहिरात वैद्यकग्रन्थाः। बृहनिघण्टुरलाकर प्रथमपाग. की ० ० ३ वृहनिघण्टु रत्नाकर द्वितीय भाग. की० रु. ३ बृहनिघण्टुरत्नाकर तृतीय- भाग. की० रु. ३ आ० ८ बृहन्निघण्टुरत्नाकर चतुर्थभाग. की० रु० २ आ०८ बृहनिघण्टुरत्नाकर पंचम भाग छपता रसराजासुन्दर भापारीकासह की० रु. ३ आ०४ पथ्या- पव्यापाटीका. की आ१२.शाधर निदानसह भापाटी- का पं० दत्तराम चौबे कृत. की ३०३ अमृतसागर कोरास- हित हिन्दी भापामें नवीन छपके तैयार है. की०रु०.२ आ०८ तथा रफ की०२.४ आ. चिकित्साकमकल्पपल्ली संस्क- न काशिनाथसत. की. रु. २ आ० ८ माधवनिदान रफ.. की ० रु. २ वदारहस्य जापाटीकासह. की० रु. २ आ०४ लोलिम्बराज वैद्यनीयन संस्कृतीका और भापाटीका. की० रु. १ अनुपानदर्पण जापाटीका सहित. की. आ० १० समंजरी टिप्पणीसह. की आ०८ चिकित्साधातुसार मापा.- की आ० ६ रसराजमहादपि नापा यनानी हिकमत और युनानी दवा और फकीरोंकी जड़ी बूटी और सन्तोकी पुस्तक- की संग्रह है. की आ १२ वैद्यकल्पद्रुम भाटी० की००५ मदनपालनिघण्टुनापार्टीका. की ० २ आ०४ नमकसं- जीवनी. की. आ०६ पुस्तकं मिटनेका ठिकाना-महाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मविपाटेदयर" छापायाना कल्याण-मुंबई.

Rajvallabhnighantu

Author
Sen,narayandas
Title
Rajvallabhnighantu
File name
Rajvallabhnighantu
Text
OCR done
Citation
1952
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,kalyan Mudranalaya
Language
Sanskrit
Pages
239
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312673
Barcode
99999990321437.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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