Sanmati Library, Jaipur
Atharved Bhashyam Shodash Kandam
Front matter
. से बड़े ॥ मो३म् ॥ त्य विद्याओं को पुस्तक है, वेद का पड़ना पड़ाना सुनना सुनाना सब आर्या का परम धर्म है।" प्रानन्दसमाचार थर्ववेदभाष्यम्-जिन वेदो को महिमा सब बड़े : ऋषि, मुनि और योगी गाते ...और विदेशी विद्वान् जिनका अर्थ खोजने में लग रहे हैं। ये अब तक' संस्कृत में होने के कारण बड़े कठिन थे। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का अर्थ तो भाषा में हो चुका है। परन्तु अंथर्ववेद का अर्थ अभी तक नागरी भाषा में नहीं था , इस महात्रुटि को पूरा करने लिये प्रयाग निवासी पं० क्षेमकरणदास' त्रिवेदी ने उत्साह किया है। वे भाष्य को नागरी (हिन्दी) और संस्कृत में वेद, निघण्टुं, निरुत, व्याकरणादि सत्य शास्त्रों के प्रमाण. परिश्रम के साथ बनाकर प्रकाशित कर रहे हैं। भाष्य का क्रम इस प्रकार है । १ -सूक्त के देवता, छन्द उपदेश, २-सस्वर मूल मन्त्र, ३-सस्वर पदपाठ, ४-मन्त्रों के शब्दों के कोष्ठ में देकर सौन्वय भाषार्थ,५-भावार्थ, ६-श्राव श्यक टिपणी, पाठान्तर, अनुरूप पागदि, ७-प्रत्येक पृष्ठ में लाइन देकर सन्देह निवृत्ति के लिये शब्दों और क्रियाओं की व्याकरण निरुक्तादि प्रमाणों से सिद्धि । इस वेद में २० छोटे बड़े काण्ड है, एक एक काण्ड का भावपूर्ण संक्षिप्त स्त्री पुरुषों के समझने योग्य अति सरल हिन्दी और संस्कृत भाष्य अल्प मूल्य में छपकर ग्राहको के पास पहुंचता है । वेदप्रेमी श्रीमान् राजे, महाराजे, लेठ, साहूकार, विद्वान और सर्व साधारण स्त्री पुरुष स्वाध्याय, पुस्तकालयों और पारितोषिको के लिये भाष्य मंगायें और जापिता परमात्मा के पारमार्थिक और सांसारिक उपदेश, ब्रह्मविद्या, वैद्यकविद्या, शिल्पविद्या, राजविद्यादि अनेक क्रियाओं का तत्त्व जानकर आनन्द भोगे. और धर्मात्मा पुरुषार्थी होकर कीर्ति पार्षे छपाई उत्तम और काग़ज़ बढ़िया रायत भठपेजी है। स्थायी ग्राहकों में नाम लिखाने वाले सज्जन २०) सैकड़ा छोड़कर पुस्तक वी० पी० वा नगद दाम पर पाते हैं । डाकव्यय ग्राहक देते हैं। १ भूमिका सहित है १) १-)|२||) २) १) ३) २) ३) २) २) २) २) |२||) 1.२). काण्ड १३ १४ १५ १६ १७ १८ १९ २० सूची पृष्ठ ३,६०० मूल्य २)TRE) २))..II-DIS): २६%) काण्ड-१ छप रहा है। कांड: शीघ्र प्रकाशित होगा। हवनमन्त्राः-धर्म शिक्षा का उपकारी पुस्तक चारों वेदों के संगृहीत मन्त्र ईश्वर स्तुति, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण, हवनमन्त्र, वामदेव्यगान सरल भाषा में शब्दार्थ सहित संशोधित बढ़िया रायल अठपेजी पृष्ठ ६०, मूल्य 1). रुद्राध्याय:-प्रसिद्ध यजुर्वेद अध्याय १६ ( नमस्ते रुद्र मन्यव उसो त इपये नमः) ब्रह्मनिरूपक अर्थ संस्कृत, भाषा और अंग्रेज़ी में बढ़िया रायल अठपेजो, पृष्ठ .१४८ मूल्य !). रुद्राध्यायः-मूलमा वढ़िया रायल अठपेजी, पृष्ठ १४ मूल्य )। वेदविद्यायें-वेदों में विमान, नौका अस्त्र शस्त्र निर्माण, व्यापार, गृहस्थ, अतिथि सभा, ब्रह्मचर्यादि का वर्णन मूल्य -)। पता-पं० क्षेमकरखदान निवेदी २५ दिसम्बर १९१८॥ ५२, लूकरगंज, प्रयाग । (Allahabad ) काण्ड १२ ३ ५ १२ लगभग १-सूक्त विवरण अंथर्ववेद, काण्ड १६ ॥ छन्द सूक्त के प्रथम पद अतिसृष्टो अपां वृषभो २ निर्दुरमण्य ऊर्जा ३ मूर्धाहं रयीणां ४ | नाभिरह रयीणा ५ विघ्न ते स्वम जनित्र ६ प्रजेप्माचा सनामाचा ७ तेने विध्याम्य जितमस्माफमुहिम है | जितमस्माकमुदभिन्न देवता उपदेश प्रजापति दुःख से निवृत्ति वाक् इन्द्रियों की उढ़ता मात्मा श्रायु की वृद्धि प्रात्मा आलस्यादि त्याग प्रजापति रोग माश प्रजापति प्रजापति । तथा प्रजापति | सुख प्राप्ति का आयु की वृद्धि सनी वृहतीश्रादि आसुर्यनुष्टुप् आदि आसुरी गायत्री आदि सामन्यनुष्टुप् प्रादि भुरिगार्ची गायत्री मादि प्राजापत्याऽनुष्टुप् मादि भाषौ पङ्क्ति आदि ब्राह्मयनुष्टुप आदि साम्नी त्रिष्टुप् आदि शत्रु का नाश २-अथर्ववेद, काण्ड १६ के मन्त्र अन्यवेदों में सम्पूर्ण वा कुछ भेद से। मन्त्र संख्या अथर्ववेद (काण्ड १६) सूक्त, मन्त्र ऋग्वेद, मण्डल सूक्त,मन्त्र, यजुर्वेद, सामवेद पूर्वा अध्याय, र्चिक, उत्तरा- मन्त्र, चिक इत्यादि अम्माचा सनामाचा ६।१,२ ।४७।१८
No text on this page.
सू०१.[ ५० ] षोडणं काण्डम् ॥ १६॥ (३,२४१) ॥ ओ३म् ॥ अथर्ववेदः। घोडशं काण्डम् । प्रथमोऽनुवाकः॥ सूक्तम् १ [ पर्यायसूक्तम् ॥ • १-१३ ॥ प्रजापतिर्देवता ॥ १, ३ सान्नी वृहती : २, १० यानुषी त्रिष्टुप : ४ आसुरी गायत्री; ५, साम्री पङ्क्तिः । ६ सामन्यनुष्टुप् ७. आर्ची गायत्री ; आसुरी पङ्क्तिः ; ११ सामन्युष्णिक , १२, १३ निचूदा. य॑नुष्टुप् ॥ . दुःषनिवृत्त्युपदेशः-दुःख से छुटने का उपदेश । अतिवृष्टो अपां वृषभोऽतिसृष्टा अग्नयो दिव्याः ॥ १ ॥ अति-सृष्टः । भूपाम् । वृषभः । भति-पृष्टाः । श्रुनयः । दिव्याः ।। भाषार्थ -(अपाम् ) प्रजाओं का (वृषभः) बड़ा ईश्वर [ परमात्मा ] (अतिसृष्टः) विमुक [छुटा धुआ] है , [जैसे ] (दिव्याः) व्यवहारों में वर्तमान (अग्नयः) अग्नियां.[ सूर्य, विजुली और प्रसिद्ध अनि ] (अतिसृष्टाः) विमुक्त हैं ॥१॥ १-(अतिसृष्टः ) स्वातन्त्र्येण विमुक्तः (अपाम्.) आपा प्राप्त प्रजा:- दयानन्दभाष्ये, यजु:०६। २७ । प्रजानाम् (वृषभः ) वृषु सेचने परमैश्वर्य च- अभच , कित् । परमेश्वरः । सर्वखामी (अतिसृष्टाः) विमुक्काः (अग्नयः) सूर्यविधुतपसिद्धानया (दिव्याः) व्यवहारेषु भवाः ॥ ।
(३,२४२) थर्ववेदभाप्ये सू०१ [ ५०३] भावार्य-वह परमात्मा सव सृष्टि में ऐसा खतन्त्र रम रहा है, जैसे सूर्य विजुली अग्नि वायु प्रादि संसार में निरन्तर सर्वोपकारी हैं, सब मनुष्य उस लागदीश्वर की उपासना करें ।। १ हुजन् यरिरुजन् मुणन् अमृणम् ॥ २ ॥ रुजन् । परि-रुजन् । सृणन् । प्र-मुणन् ॥ २ ॥ झोको मनोहा खुनो निह आत्मदूषिस्तनूदूषिः ॥ ३ ॥ लोकः ।मनः-हा। खुनः। निः-दाहः । अात्म-दूषिः तनू-दूर्षिः३ इदं तमति सृजामि तं माभ्यर्वनिक्षि ॥ ४ ॥ हुदम् । तस् । अति । सुजामि । तम् । मा। अभि-अर्थनिक्षि ॥४॥ भाषार्थ-(रुजन् ) तोड़ता हुना, ( परिरुजन् ) सब ओर ले तोड़ता धुश्रा, (मृणन ) मारता हुआ, (प्रमृर्णन ) कुचलता हुश्रा.॥२॥ (म्रोक) सताने वाला, (मनोहा) मन का नाश करने वाला, (खनः) खोद डालने घाला, (निहिः) जलन फरने वाला, (आत्मदूपिः) प्रात्मा को दूपित करने वाला, और (तनूदूपिः). शरीर को दूषित करने वाला [जो रोग है ]॥३॥ . (इदम् ) अव (तम् ) उस [रोग] को (अति सृजामि ) मैं नाश करता हूं, (तम् ) उस [रोग] को (मा अभ्यवनिक्षि) मैं कभी पुष्ट नहीं कर ॥४॥ भावार्थ-अनुष्यों को योग्य है कि जिन रोगों वा दोषों से मारमा और शरीर में विकार होवे, उनको. ज्ञानपूर्वक हटा और कभी न . बढ़ने दें ॥२-४॥ २-(जन् ) विदारयन् (परिरुजन् ) सर्वतो विदारयन् (मृणन ) मारयन् (प्रमृणन् ) प्रकण नाशयन् ॥ ३-(म्रोकः) दृचु गतौ वेदे तु हिंसने-घन , कुत्वम् । हिंसकः (मनोहा) मगोनाशकः (खनः ) बनु विदारणे-अच् । विदारकः । पीडका (निहः) निरन्तहकः (आत्मदूपिः) आत्मदूषको रोगः (तनूदूषिः) शरीरदूषकः । ४-(इदम् ) इदानीम् (तम् ) रोगम् (अतितृजामि ) अतिसर्जन बधे दाने च । विनाशयामि (तम्) रोगम् ( मा अभ्यवनिक्षि) णिजिर शौच- पोषणयोः-लुङ, अदभावः । नैव पुण्येयम् ॥ , । . .. सूण १ [ ५०] घोडशं काण्डम् ॥ १६ ॥ (5,२९. तेन तमभ्यति जामो यो ३ 'स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥५॥ तेन । तम् । अभि-प्रतिसृजामः । यः । अस्मान् । द्वोष्टि । यस् । वयम् । द्विष्मः ॥ ५ ॥ भाषार्थ-(तेल) उसी [ पूर्वोक्त कारण ] से (तम्.) उस [अशानी वैरी] को (अभ्यतिसृजामः ) हम सर्वथा नाश करते हैं, (यः) जो [अक्षानी] (अस्मान् ).हम ले (बेष्टि ),द्वेष करता है और (यम्) जिस से (वयम् ) हम (द्विष्मः) द्वेष करते हैं ॥५॥ भावार्थ-जो अधर्मी लोग धर्मात्माओं से अपनी दुष्टता के कारण वैर करें, अथवा धर्मात्मा लोग जिन्हें उनके दुष्ट व्यवहार के कारण पुरा जाने, विद्वान् लोग उन दुराचारियों को प्रयत्न पूर्वक नाश करें ।। ५ ॥ भूपामग्रमसि समुद्रं वोऽभ्यवसृजामि ॥ ६ ॥ श्रुपास् । अयम् । अति । समुद्रम् । वुः । भि-अषसृजामि भाषार्थ-[ हे मनुष्यो !] वह [ परमात्मा ] ( अपाम् ) प्रजाओं का (अग्रम् ) सहारा (अलि-अस्तिं ) है-(व:) तुमको ( समुद्रम् ) प्राणियों के यथावत् उदय करने वाले परमात्मा की ओर (अभ्यवसृजामि) मैं छोड़ता हूं ॥६॥ ५-(तेन ) पूर्वोक्तन कारणेन (तम् ) अज्ञानिनं शत्रुम् ( अभ्यतिसृ. जामः ) म० ४ । सर्वतो विनाशयामः ( यः) अज्ञानी (अस्मान् ) धार्मिकान् (द्वेष्टि) वाधते ( यम्) अशानिनम् (वयम्) धार्मिकाः (द्विष्मः ) वाधामहे ।। ६-(अपाम् ) म०१ । प्रजानाम् ( अग्रम् ) पालम्बनम् ( असि ) प्रथमपुरुषस्य मध्यमपुरुषः । अस्ति । वर्तते ( समुद्रम् ) अ १० । ५। २३ । सम् + उत् + गतौ-डप्रत्ययः । समुद्रः कस्मात्समुद्वन्त्यस्मादापः, सम- भिन्द्रवन्त्येनमापः, सम्मोदन्तेऽस्मिन् भूतानि समुद्कों भवति समुनातीति वा- निरु० २ । १०.। समुद्र आदित्यः, समुद्र आत्मा-निरु० १४.। १६ । समुद्रः समुद्भवन्ति भूतानि यस्मात्सः-दयानन्दभाष्ये, यजु०५ । ३३ सर्वे देवाः सम्यगुत्कर्षण द्रवन्ति यंत्रेति समुद्रः-महीधरभाष्ये, यजु० ५। ३३। भूतानां समुदयकारकं परमात्मानम् ( वा ) युप्मान ( अभ्यवसृजामि ) अभिलक्ष्य त्यजामि अनुज्ञापयामि ॥ ) .
(३,२४४) अथर्ष भाष्ये सू०१ [ ५०३ ] भावार्थ-विद्वान् लोग उपदेश करें कि मनुष्य परमात्मा का श्राश्रय लेकर अपने कर्तव्य में कुशल होवे ॥६॥ यो प्स्वर मिरति तं सृजामि मोकं खनि तनूदूर्षिस् ॥ ७ ॥ यः । अप्-सु । श्रुणिः । अति । तम् । सुजामि । मोकम् । खनिस् । तन-दूषिम् ॥ ७॥ भाषार्थ-(यः) जो [दोष ] (अप्सु ) प्राणियों के भीतर (अग्निः) अग्नि [ समान सन्तापक ] है, (तम् ) उस (म्रोकम् ) हिंसक, (खनिम् ) दुःखदायक और ( सनूपिम् ) शरीरदूपक [ रोग ] को (अति सृजामि ) मैं नाश करता हूं॥७॥ भावार्थ-विज्ञान पुरुप सन्तापकारी दोषों का विचार पूर्वक नाश करे ७ यो व आपोऽगिरीविवेश स एष यद् वा घोरं तदेतत् ॥ ८ ॥ यः । वः । भापः । अग्निः । भ्रा-विवेश । सः । एषः । यत् । वः । चोरस् । तत् । एतत् ॥८॥ इन्द्रस्य च इद्वियेणाभि पिञ्चेत् ॥८॥ इन्द्रस्य । वः । दुन्द्रियेण । अभि । सिञ्चेत् ॥६॥ भाषार्थ-(आपः) हे सब विद्याओं में व्यापक बुद्धिमानी ! ( यः) जिस (अग्निः) व्यापक परमात्मा ने (वा) तुम में ( आनिवेश) प्रवेश किया है, (सा) वह (एषः) यह [ परमात्मा है, और (यत् ) जो [शत्रुओं के लिये ] (वः) तुम्हारा (छोरम् ) भयानक रूप है, (तत्) वह (पतत्-एतस्मात् ) E-(यः) दोषः (अनु) स०१ । प्रजा (अग्निः) अग्निवत्सन्तापक: (अति सृजामि ) म०४ विनाशयामि (तम् ) दोषम् (म्रोकम् ) म०३ । हिंस- कम् (खनिम् ) विदारकम् । पीडकम् (तनूदूषिम् ) शरीरदूषकम् ॥ --(यः) (क) शुष्मान् (आपः) हे सर्व विद्याव्यापिनो विपश्चित:- दयानन्दभाप्ये, यजु०६।२७ । (अग्निः) व्यापकः परमेश्वरः (आविवेश) प्रविष्टवान् (सः) परमात्मा (एपः) अत्र व्यापकः ( यत्) (वः), युग्माकम्, (घोरम्) भयानक रूपम् (तत्) रूपम् (एतत् ) भव्ययम् । एतस्मात्परमेश्वरात -- सू० १ [ ५०३ ] षोडशं काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,२४५) इसी [परमात्मा से है ॥ ८॥ घंह-[परमात्मा] (व.) तुम को ( इन्द्रस्य ) घड़े ऐश्वर्यवान् पुरुष के [गोग्य] ( इन्द्रियेण ) बड़े ऐश्वर्य से (अभि पिञ्चेत् ) अभिषेक युक्त राज्य का अधिकारी] करे ॥४॥ भावार्थ-विद्वान् लोग उस जगदीश्वर को सर्वव्यापक और सर्वयल-- दायक समझ कर बड़े महात्माओं के समान अधिकारी बन कर संसार में बड़े बड़े काम करें ॥८॥ अरिमा भापी अपरिप्रमुस्मत् ॥ १० ॥ रिमाः । भापः । नपं । रिमम् । अस्मद ॥ १० ॥ प्रास्मदेनौ वहन्तु प्र दुवघ्न्यं वहन्तु ॥ ११ ॥ प्र । अस्मत् । एनः । वुहुन्तु । म । । म । दुः-स्वघ्न्यम् । वहुन्तु १९ भाषार्थ-(अरिप्राः) निर्दोष (आपः) विद्वान् लोग ( रिप्रम् ) पाप को (अस्मत् ) हंम से (अप) दूर [ पहुंचावें] ॥ १० ॥ ( अस्मत् ) हम. से (एनः) पाप को (प्र वहन्तु) बाहिर पहुंचावे और (दुःस्वप्न्यम् ) दुष्ट खम में उत्पन्न कुविचार को (प्र वहन्तु ) बाहिर पहुंचावें ॥ ११ ॥ भावार्थ-मनुष्य विद्वानों के सत्संग और शिक्षा से जागते सोते. कभी पाप कर्म का विचार न करें ॥१०, ११ ॥ यह दोनो मन्त्र कुछ भेद से आ चुके हैं-अ०१०।५।२४॥ शिवन मा चक्षुषा पश्यतापःशिवयो तुन्वीप स्पृशत त्वचै मे १२ शिवेन । मा। चक्षुषा । पुश्यत । श्रापः । शिवयो । तन्यो । 8-(इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवतःपुरुषस्य (वः) (युष्मान. .) (इन्द्रियेण-) परमैश्वर्येण (अभिषिञ्चेत् ) अभिषेकयुक्तान राज्याधिकारिणः कुर्यात् ।। १०-(अरिमाः ) निर्दोषाः (आपः) म० । विपश्चितः ( अप) दूरे (रिप्रम्) पापम् (अस्मत्).॥ ११-(अस्मत् ) (पतम् ) पापम् (प्र वहन्तु) बहिर्गमयन्तुः ( दुःख न्यम) दुष्टखने भवं कुविचारम् (प्र ब्रहन्तु) ।
(३,२४६ ) अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [ ५०४ उप । एपृशत । त्वचम् । से ॥ १२ ॥ भाषार्थ-(श्रापः) हे विद्वानो । ( शिवेन) सुखप्रद (चक्षुपा ) नेत्र से (मा) मुझे (पश्यत) तुम देखो, (शिवया) अपने सुखप्रद (तन्वा ) शरीर से (मे) मेरे ( त्वचम् ) शरीर को ( उप स्पृशत ) तुम सुख से छूमओ ॥ १२ ॥ भावार्थ-विद्वान् लोग कृपा दृष्टि से मनुष्यों को देख कर अपने समान स्वस्थ और उपकारी बनावें ॥ १२ ॥ यह मन्त्र श्रा. चुका है-अ०१।३३ ॥ ४॥ शिवाननीनप्सुघदौ हवामहे मयि क्षुत्रं वर्च ला धत्त देवीः १३ शिवान् । अनीन् । अण्सु-सदः । हुवामहे । मयि । क्षत्रम् । वर्चः । प्रा। धत्तु । देवीः ॥ १३ ॥. भाषार्थ-(अप्लुसदः ) प्रजाओं में बैठने वाले (शिवान ) आनन्दप्रद (अग्नीन् ) विद्वानों को (हवामहे) हम बुलाते हैं, (देवीः ) हे दिव्य गुण वाली प्रजोनो! (मयि) मुझ में (क्षत्रम् ) राज्य और (वर्चः) तेज ( आ ) आकर धत्त ) धारण करो ॥ १३ ॥ भावार्थ -शूर पराक्रमी मनुष्य विद्वान् प्रजागणों की सम्मति से राज्य पंद ग्रहण करके प्रतापी होवे ॥ १३ ॥ मूक्तम् २ [ पर्यायसूक्तम् ॥ १-६॥ वाग्देवता ॥ १ श्रासुर्यनुष्टुप् ; २, ३ आसुर्युष्णिक ; ४ सामी. हती;" प्राय॑नुष्टुप् । ६ श्रार्थी गायत्री, : इन्द्रियाणां दायोपदेशः इन्द्रियों की दृढ़ता का उपदेश । on १२-(शिवेन ) सुखप्रदेन (मा) माम् (चक्षुषा ) नेत्रेण ( पश्यतः) अवलोकयत (आपः) म० = । हे विद्वांसः (शिवया ) सुखप्रदेन ( तन्वा ) शरीरेण ( उप ) सुखेन (स्पृशत) ( त्वचम् )शरीरम् (मे) मम.॥ १३-(शिवान् ) मङ्गलप्रदान् (अग्नीन् ) अंग्नयः ज्ञानवन्तः-दयानन्द- भाष्ये, यजु०५।३४ । शानिनः पुरुषान् (अप्सुसदः) म०१ । प्रजासु सदनशीलान् (हवामहे ) आह्वयामः (मयि ) पराक्रमिणि पुरुषे (क्षत्रम् ) राज्यम् (वर्चः:). तेजः (आ) आगत्य (धत्त) धारयत (देवी) हे देव्यः प्रजाः॥
सू०२ [ ५०४] , . घोडश काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,२४७). निर्दुरर्म गयं जर्जा मधु भती वाक् ॥ १॥ निः । दुः-धर्म गयः । ऊर्जा । मधु -मती । वाक् ॥ १॥ भाषार्य-(ऊर्जा) शक्ति के साथ (मधुमती ) ज्ञानयुक्त (वाक् ) वाणी (दुरर्मण्यः) दुर्गति से (निः) पृथक [ होवे ] ॥१॥ भावार्थ-मनुष्यों को योग्य है कि वे समझ बूझ कर सदा सत्य वचन चोल कर ढ़ प्रतिक्षा वाले होवे, जिससे उनके जीवन में शक्ति बढ़े और कभी निन्दा न होवे ॥१॥ मधुमती स्थ मधुमती दार्चसुदेयम् ॥२॥ मधु-मतीः । स्थु । मधुमतीस् । वाचस् । उदे यम् ॥ २॥ भावार्थ-[ है प्रजात्रो !] तुम (मधुमतीः ) ज्ञान वाली (स्थ ) हो, (मधुमतीम् ) ज्ञानयुक्त (धाचम् ) वाणी ( उदेयम् ) मैं वोलू ॥ २॥ भावार्थ-मनुष्य विद्वानों के सत्संग से सुशिक्षित होकर सदा शानयुक्त चोलें ॥२॥ उपहूतो मे गोपा उपहूतो गोपीयः ॥३॥ उप-हूतः । मे । गोपा। उप-हूतः । गोपीयः ॥ ३ ॥ भाषार्थ-(गोपाः ) वाणी का रक्षक [प्राचार्य ] (में) मेरा (उपहतः) आदर से बुलाया हुआ है और (गोपीथः) भूमि कारक्षक [राजा ] (उपहूतः) आदर से बुलाया हुश्रा है ॥३॥ १-(निः) बहिर्भवतु ( दुरर्मण्यः) सर्वधातुभ्यो मनिन् । उ०४।१४५। दुः+ऋ गतिप्रापणयोः-मनिन् । ऋन्नेभ्यो ङीप् । पा० ४॥ १.१.५ । इति डीप, 'पञ्चमीरूपम् । दुरर्मण्याः। दुर्गतेः ( ऊर्जा ) अर्ज बलप्राणनयो:-फिए । शाक्या (मधुमती ) शॉनवती ( वाक्) वाणी ॥ २-(मधुमतीः ) ज्ञानवत्यः प्रजाः (स्थ) भवथ (मधुमतीम् ) शान- 'वतीम् (वाचम् ) वाणीम् (उदेयम् ) अ० ३ । २० । १० । उद्यासम् ॥ ३-( उपहृतः) भादरेणाऽऽवाहनीकृतः (मे ) मम (गोपाः) वाणीरक्षक प्राचार्यः ('उपहृतः) (गोपीथः) निशीथगोपीथावगथाः । उ०२ । । गो, पा रहाणे-थक, ईत्वम् । भूपालः । राजा । .... । ।
. - (३,२४८.) अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [ ५०४] भावार्थ-मनुष्य प्राचार्य की शिक्षा और राजा की व्यवस्था से सुशि- क्षित होकर स्वस्थ और प्रतिष्ठित रहे ॥३॥ सुश्रुतौ कणा भद्रुश्रुतौ की मुद्रं श्लोक श्रूयासम् ॥ ४ ॥ सु-श्रुतौ । काँ। भुद्र-श्रुतौ । कण । भद्रम् । श्लोकम् । श्रूयासम् ॥ ४॥ भाषार्थ-[ मेरे ] (कौँ ) दोनों कान (सुश्रुतौ ) शीघ्र सुनने वाले, (कौँ ) दोनों कान ( भद्रश्रुतौ ) मङ्गल सुनने वाले [हो], (भद्रम् ) मङ्गलमय (श्लोकम् ) यश (भूयासम् ) में सुना करू ॥ ४ ॥ भावार्थ-मनुष्य प्रयत्न करके अभ्यास करें कि वे कान आदि इन्द्रियों को सचेत रख कर श्रेष्ठ कमों के करने में शीघ्रता करते रहे ॥४॥ सुश्रुतिश्च मोपंश्रुतिश्च मा हासिष्टां सौपर्ण चक्षुरजसं ज्योतिः ॥५॥ सु-श्रुतिः । च । मा । उप-श्रुतिः । च । मा। हामिष्टाम् । सौपर्णम् । चक्षुः । अत्रम् । ज्योतिः ॥ ५ ॥ भाषार्थ-( सुश्रुतिः ) शीघ्र सुनना (चच) और (उपश्रुतिः) भङ्गीकार करना (मा) मुझे (मा हासिष्टाम् ) दोनों न छोड़ें, (सौपर्णम् ) समस्त पूर्ति वाली (चतुः) दृष्टि और (अजनम् ) अचूक (ज्योतिः) ज्योति [बनी रहे]॥५॥ ४-(सुश्रुती) श्रु-विप् । शीघ्रश्रोतारौ (कर्णी) श्रोत्रे (भद्रश्रुतौ) मङ्गलश्रोतारौं (भद्रम् ) मङ्गलमयम् (श्लोकम् ) यशः (भूयासम् ) आकर्णया. सम्॥ ५-(सुश्रुतिः) शीघ्रश्नवणम् (च) (मा) माम् (उपश्रुतिः) विष- याणामङ्गीकारः (च) ( मा हासिष्टाम् ) ो हाक् त्यागे-लुङ् । न त्यजताम् (सौपर्णम् ) थापृवस्यज्यतिभ्यो नः। उ०३।६ । लु+ पृ पालनपूरणयोः-न, सुपर्णम्-अण्। बहुपूर्तियुक्तम् (चक्षुः.) दृष्टिः ( अजनम् ) निरन्तरम् (ज्योतिः) तेजः॥
" F %3D . . सू० ३ [ ५०५ ] षोडश काण्डम् ॥ १६ भावार्थ-मनुष्य ब्रह्मचर्य आदि के सेवन से अपने श्रवण ! इन्द्रियों को विफल न होने दें और ऐसा स्प्रंस्थं रक्खे कि वे अपने विषयों पूर्ण रीति से शीघ्र अंगीकार कर लें ॥५॥ ऋषीणां प्रस्तुति नमोऽस्तु देवाय प्रस्तुराय ॥ ६ ॥ ऋषीणाम् । -भ-स्तुरः । अलि । नमः । अस्त । देवा भ्रस्तुराय ॥ ६ ॥ भाषार्थ-[हे परमेश्वर !] तू (ऋषीणाम्) इन्द्रियों का (प्रस्त फैलाने वाला (असि ) है, (देवाय) दिव्य गुण वाले (प्रस्तराय.) फैलाने [ तुझ ] को (नमः) नमस्कार [ संत्कार] (अस्तु ) होवेः॥ ६ ॥ भावार्य-मनुष्य उल परमात्मा को सदा धन्यवाद कि उसने उन वेदादि शास्त्र सुनने, विचारने और उपकार करने के लिये।अमूल्य श्रवण अ इन्द्रियां दी हैं ॥ ६ ॥ .. सूक्तस् ३ [ पर्यायसूक्तम् ॥] :: १-६॥ आत्मा देवता ॥ १ आसुरी गायत्री , २ निचुदाय॑नुष्टुप् माय॑नुष्टुप् ; ४ प्राजापत्या त्रिष्टुप् , ५ सामन्युष्णिक , ६ सान्नी त्रिष्टुप् ॥ आयुर्वृद्ध्यर्थमुपदेशः-आयु की वृद्धि के लिये उपदेश । मूर्धाहं रयीणां मूर्धा समानानां भूयासम् ॥ १॥ मूर्धा । मुहम् । रयीणाम् । मूर्धा । समानानाम् । भूयासस् 'भाषार्थ-(अहम् ) मैं ( रयीणाम् ) धनों का (सूर्धा) सिर । (समानानाम् ) लमान I तुल्य गुणी] पुरुषों का (मूर्धा ) सिर (भूयासम ((ऋषीणाम) सप्त ऋपया प्रतिहिताः शरीरे पडिन्द्रियाणि वि सप्तमी निरु० १२:। ३७.। इन्द्रियाणाम् ('प्रस्तरः) प्रस्तारका प्रसारक पर श्वरः (असि ) (.नमः ) सत्कार (अस्तु),(दैवाय.). दिव्यगुणवते:(प्रस्तरा प्रसारकाय.तुभ्यम् ॥ १--(मूर्धा:) शिरः। मस्तफवप्रधानः (अहम् ) ( रयीणाम् ) वित सुवर्णाधिनानाम् (मूर्धा) (समानानाम् ) सम्+आ+णीप्रापणे-४ - .:.::". २ ...... 1 -.-.. (३,२५०) अथर्ववेदभाष्ये सू०.३ ५०५ हो जाऊं.॥१॥ . भावार्थ-मनुष्य उद्योग करें कि विद्याधन और सुवर्ण, आदि धन से : गुणी मनुष्यों को पाकर संसार में शरीर में मस्तक के समान मुखिया होवें ॥२॥ कुनश्च मा के नश्चु मा हासिष्टां मूर्धा घे मा विधर्मा चु मा हारिष्टा ॥२॥ रुजः । च । मा। वेन: । च । मा। हामिष्टाम् । मूर्धा चु.। मा। वि-धर्मा । च । भा। हासिष्टाम् ॥ २ ॥ भाषार्थ-(रुजः) अन्धकारनाशक गुण :(...) और (धेनः). फसनीय गुण (मा.) मुझे (मा होसिष्टाम् ) दोनों न छोड़ें, (मूर्धा) मस्तक [ मस्तक पल ](च) और (विधर्मा) विविध प्रकार धारण करने वाला आत्मा [ शात्मवल ] (मा) मुझे (सा हासिष्टाम् ) दोनों कभी न छोड़ें ॥२॥ भावार्थ-मनुष्य अज्ञान के नाश से अपने मस्तक चल अर्थात् विचार सामर्थ्य और श्रात्मक्ल.को बढ़ाते रहें ॥२॥ उर्वश्च मा चम्मच मा हासिष्टां धुर्ता च माः धरुणश्च हासिष्टाम् ॥३॥ उर्वः ।.धु । मा । चुमु सः । च मा। हासिष्टाम् । धर्ता । च । मा । धुरुणः । ५।० ॥३॥ भाषार्थ:-( उर्वः) शत्रुनाशक गुण [ शूरपने. ]; ( च च ) और तुल्वगुणषताम् (भूयासम् ) । २-(रुजः). रुजो भङ्गे-क । अन्धकारनाशको गुण (च) (मा) माम् (वेनः) धापृवस्यज्यतिभ्यो नः । उ०३।६। अज गतिक्षेपणया:-न वीभावः, अथवा वी. कान्त्यादिषु-न । प्रापणीयः कमनीयों वा गुणः (च) (मा हासिष्टाम् ) न त्यजताम् (मूर्धा) मस्तकसामर्थ्यम् (चं) (मा) माम् (विधर्मा) विविधधारक.मात्मा (च) (मा.हासिटाम् ) ॥ ३-(.उर्वः) उर्ची हिंसायाम् भच् । उर्वति शरयति मारयति शनून ।
- . सू०६ [ ५०५ ] षोडश काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,२५१) (चमसः) भोजनपात्र [शरीर ] (मा) मुझे (मा हालिष्टाम् ) दोनों न छोड़े, (धर्ता) धारण करने वाला गुण (च-च) और (धरुणः) अवस्थान [दृढ़ रहने का.गुण ] (मा) मुझे (मा हासिष्टाम् ) दोनों न छोड़ें ॥३॥ भावार्थ-मनुष्य सझामरूप संसार में शूर रहकर शरीर रक्षा करते हुये शुभगुणों को धारण करें और स्थिर रक्खे ॥३॥ विमोकश्च माप विश्च मा होसिष्टामादानुश्च मा मात- বিলী चु मा हालिष्टाम् ॥ ४॥ वि-मोकः । चु । मा। भाई-पविः । च । भा।हासिष्टाम् । भाई-दानुः ।च । मा। मातरिश्वा । च । मा। हामिष्टाम । भाषार्थ-विमोकः ) विमुक्त करने वाला गुण (च) और (आई. पविः) गतिशोधक गुण (मा) मुझे (मा हासिष्टाम् ) दोनों न छोड़े, (श्रा- दानुः ) याचकों का पालने वाला गुण (च च) और (मातरिश्वा) ऐश्वर्य में बढ़ने वाला गुण (मा) मुझे (मा हासिष्टाम् ) दोनों न छोड़े ॥४॥ शूरत्वगुणः (च) (मा) माम् (चमलः) भोजनपात्र शरीरम् (च) (मा हासिष्टाम् ) न त्यजताम् (धर्ता ) धारको गुणः (धरुणः ) कृवृदारिभ्य उनन् । उ०३ । ५३ । धृङ्रस्थाने-उनन् । अवस्थानम् । दृढस्थितिगुणः। अन्यत् पूर्ववत् ॥ ४-(विमोकः ) मुचल मोचने-धम् कुत्वं च । दुःखविमोचको गुणः (च) (मा) माम् (आपविः) अर्दीर्घश्च । उ०२।१८। अर्द गती यांचने हिंसायां च-रक्+अच इः। उ० ४।१३६ । पूश् शोधने-इप्रत्ययः । गति- 'शोधको गुणः (च) (मा हासिष्टाम् ) न त्यजताम् (पादानुः) अर्द याचमे- रक्+दाभाभ्यां . नुः । उ०३। ३२ । देङ् पालने-नु । याचकपालको गुणः (मातरिश्वा) माता लक्ष्मीः, वैभवम् । श्वनुक्षन्पूषन् । उ०१ । १५ । मातरि +टु श्री शिव गतिवृद्ध यो:-कनिन् डित् । मातरि वैभवे ऐश्चर्ये प्रवर्धको गुणः । . अन्यत् पूर्ववत् ॥
(३,२५२) अथर्ववेदभाष्ये मू०३ [५०५ ] 1 .. भावार्थ-मनुष्य दुःखों से छूटकर उद्योग करें और अधिकारी याचकों का पालन करके वैभव बढ़ावें ॥४॥ बृहस्पतिर्म अात्मा नुमणा नाम हृद्यः ॥ ५॥ बृहस्पतिः । मे । अात्मा । नृ-मनोः । नाम । हृद्यः ॥ ५ ॥ भाषार्थ-(में) मेरा (आत्मा) आत्मा (बृहस्पतिः) बड़े गुणों का खामी, (नृमणाः) नेताओं के तुल्य मन वाला और (हृद्यः) हृदय का नियों (नाम)प्रसिद्ध [ हो] ॥५॥ भावार्थ-मनुष्य आत्मबल बढ़ाकर उत्तम गुण प्राप्त करें और वीर के समान पराक्रम करके सब के प्रिय हो ॥५॥ असं तापं में हृदयमुरू गध्यं तिः समुद्री अस्मि विधर्मणा असम्-तापम् । मे । हृदयम् । जुर्वी श्रुस्मि । वि-धर्मणा ॥ ६॥ भाषार्थ-[हे परमेश्वर !] (मे) मेरा (हृदयम्) हृदय (असन्तापम् ) सन्ताप रहित और (गव्यूतिः) विद्या मिलने का.मार्ग (उर्वी ) चौड़ा होवे ], मैं (विधर्मणा) विविध धारण लामर्थ्य से (समुद्रः) समुद्र [समुद्र समान गहरा] (अस्मि) ॥ ६ ॥ भावार्थ-मनुष्य विघ्नों में हृदय को शान्त रखकर वेद मार्ग की दृढ़ता और विस्तीर्णता फैलावे, क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्य को बड़ा सामर्थ्य दिया है ॥ ६॥ - गव्य तिः। । समुद्रः । ५-(बृहस्पतिः) महतां गुणानां पालक (मे) मम (आत्मा) (नृमणाः) नेतृतुल्यमनस्कः (नाम) प्रसिद्धौ (हृद्यः) हृदयप्रियः॥ ६-(असन्तापम् ) सन्तापरहितम् । शान्तम् (मे) मम (हृदयम् ) अन्तःकरणम् (उर्वी) विस्तीर्ण (गव्यूतिः) गो+यूतिः । विद्यामिश्रणमार्गः (समुद्रः) समुद्र इघ गम्भीरः (अस्मि) (विधर्मणा) विविधधारणसामर्थ्येन॥ .
. . ५०.४.[ ५०६ पीदर्थ काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,२५३) सूक्तम् ४ [ पर्यायसूक्तम् ॥ १-७ ॥ आत्मा देवता॥ १, ३ सामन्यनुष्टुप् ; २ प्राजापत्योष्णिक ; ५ आर्ची पंक्तिः आसुरी गायत्री, ६ सांस्नी. भिष्टुप् .७ भुरिगायुणिक्॥ आयुर्वृद्धयर्थमुपदेशः आयु की वृद्धि के लिये उपदेश । : नाभिर है रयीणां नाभिः भूयासम् ॥ १ ॥ नाभिः । मुहस् । रीवास्. । नाभिः । समानानाम् । समानानी भूयासम् ॥१॥ AR - . भाषार्थ-(अहम् ) मैं (रयीणाम् ) धनों की (नाभिः) नाभि [ मध्य- • स्थान ] और (समानानाम् ) समान [ तुल्य गुणी ] पुरुषों की (नाभिः) नामि (भूयालम् ) हो जाऊं ॥ भावार्थ-जो मनुष्य विद्याधन और सुवर्ण आदि धन के साथ गुणी मनुष्यों को प्राप्त होते हैं, वे संसार में प्रतिष्ठा पाते हैं ॥१॥ स्वासदसि सूषा अमृतो म] ष्वा ॥ २ ॥ सु-मासत् । असि ! सु-उपाः । अमृतः । मत्यैषु । भा ॥ २ ॥ भाषार्थ-[ हे आत्मा ! ] तू (-खासत्) सुन्दर सत्ता वाला, (सूषाः ), सुन्दर प्रभातो चाला [प्रभात के प्रकाश के समान बढ़ने वाला] (आ) और (मत्येषु ) मनुष्यों के भीतर (अमृतः) अमर (अलि ) है ॥ २ ॥ भावार्थ-जो मनुष्य यह विचारते हैं कि यह शान्मा जो बड़े पुण्यों के कारण इस मनुष्य शरीर में वर्तमान है, वह प्रभात के प्रकाश के समान उन्नति. । 4114i. १-(नाभिः ) मध्यस्थानम् (अहम् ) पुरुषः ( रयीणाम् ) विद्यासुवर्णा- दिधनानाम् ( नाभिः) (समानानाम् ) सू० ३ म०१ तुल्यगुणवताम् (भूया- सम्) भवेयम् ॥ २-(स्वासत्) सु+पास सतायाम्-शतः। शोभनसत्तावान् (असि) हंशात्मन् त्वं भवसि (सूपाः) उषः किच्छ । उ०४।२३४ । सु+उपादाहे-अंसि। शोभना उपलो यस्य सः। प्रभातवेलीप्रकांशतुल्यप्रवर्धमानः (अमृता) अमरः नित्या पुरुषार्थी ( मर्येषु) मनुष्येषु (आ.) समुच्चये ॥ .:::... } •- (३,२५४) अथर्ववेदभाष्ये इं० ४ [ ५०६ / शील और भी अमर अर्थात् नित्य और पुरुपार्थी है, वे संसार में चढ़ती करके घश पाते हैं ॥२॥ मा मां प्राणो हासोन्मो अंपानोऽवहाय - परी गात् ॥३॥ मा । मास् । माणः । हासीत् । म इति । अपाना अधु- हार्य । परी । गात् ॥ ३ ॥ भाषार्थ-[हे ईश्वर 1] (प्राणः) प्राण [श्वास] (माम् ) मुझे (मा हासीत् ) न छोड़े, (मो) और न (अपानः ) अपान [प्रश्वास ] (भव: हाय) छोड़कर (परा गाव ) दूर जावे ॥३॥ भावार्थ-मनुष्य शरीर को स्वस्थता के साथ प्रात्मवल बढ़ाते रहे ॥३॥ सूर्यो माह्नः पात्य॒ग्निः पृथिव्या वायुरुन्तरिक्षाद् युमो मनु- ष्येभ्यः सरस्वती पार्थिधेभ्यः ॥ ४ ॥ सूर्यः । मा । प्रह्नः । अग्निः । पृथिव्याः । वायुः । अन्तरिक्षात् । युमः। मनुष्येभ्यः । सरस्वती । पार्थिवेभ्यः॥४॥ भाषार्थ--( सूर्यः) सब का चलाने घाला परमात्मा (मा) मुझे (अहः) दिन [ के भय ] ले (पातु ) बंचावें, (अग्निः) ज्ञानस्वरूप जगदीश्वर (पृथिव्याः ) पृथिवी [ के भय] से, (वायुः सर्वव्यापक परमेश्वर (अन्त- रिक्षात् ) अन्तरिक्ष [के भय ] से, (यमः) न्यायकारी ईश्वर (मनुष्येभ्यः) मनुष्यो [ के भय ] से और (सरस्वती) सर्वविधानमय परमेश्वर (पार्थि- वेश्यः) पृथिवी के प्राणी आदियों [के भय से [वचावे]॥४॥ ३-(मा हासीत् ) मा त्यजेत् (माम् ) प्राणिनम् (प्राणः) श्वासः (मो) न च (अपानः) प्रश्वासः (अवहाय ) परित्यज्य (परा गात् ) दूरे गच्छतु ॥३॥ ४-(सूर्यः) सर्वप्रेरकः परमेश्वरः (मा) माम् (अहः) दिनभयात् (पातु) रक्षतु (अग्निः) अग गतौ-नि। ज्ञानस्वरुपो जगदीश्वर (वायुः) सर्वव्यापकः परमेश्वरः अन्तरिक्षात् ) अन्तरिक्षभयात् (यमः) न्यायकारी- श्वरः (मनुम्येभ्यः) मनुष्याणां भयात् (सरस्वतो) सरस्-मतुप्, जीप । सरांसि विज्ञानानि विद्यन्ते यस्यां सा चितिः । सर्वविज्ञानमयः परमेश्वर (पार्थिवेभ्यः ) पृथिवीभवांनां प्राएयादीनां भयात् । पातु । -- । .. सू०.४ [ ५०६ ] बोडर्श काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,२५५) भावार्थ-मनुष्य परमात्मा की उपासना करता हुंमा सदा उपाय फरे किं वह सब प्रकार के विनों से सुरक्षित होकर शुभ कर्मों को करता रहे ॥४॥ प्राणापानी मा मो हासिष्टं मा जने प्र मैषि ॥५॥ प्राणापानौ । मा। मा। हासुिष्टुम् । मा। जनं प्र । मे षि भाषार्थ-(प्राणापानौं ) हे प्राण और 'अपान ! तुम दोनों (मा) मुझे (मा हासिष्टम् ) मत छोड़ो, (जने.) मनुष्यों के बीच (मा प्र मेषि) कभी नष्ट न होऊ॥५॥ भावार्य-मनुष्य अपने शरीर और प्रात्मा से सावधान रहकर निर्भ- यता से कर्तव्य परायण हो॥५॥ स्वलत्य घोषसौ दोषरश्च सर्व भापुः सर्वगणो.अशीय ॥ ६ ॥ स्वस्ति। वृद्य । जुषसः । दोषसः । चुः । सर्वः। श्रापुः । सर्व-गणः । शीयु ॥ ६ ॥ भाषार्थ-(आपः ) हे प्राप्त विद्वानो ! (सर्वगणः) अपने सब गणों के सहित ( सर्वः) सम्पूर्ण मैं (खस्ति) कल्याण से (अध), अब ( उषसः) घेलाओं को (च) और (दोषसः) रात्रियों को (अशीय) पाता रहूं ॥ ६ ॥ भावार्थ--मनुष्य आप्त विद्वानों के सत्संग से प्रयत्न करें कि वे और उत के इष्ट मित्र प्रजागण आदि सदा राति दिन सुखी रहें:॥६॥.. प्रभात Y-(प्राणापानौ ) हे श्वासप्रश्वांसी ( मा ) माम् ( मा हासिष्टम् ) नैव त्यजतम् (जने.) मनुष्येषु:(प्र) प्रकर्षण ( मा भेषि ) मी हिंसायाम्- लुस् । नाश मा प्राप्नुयाम् ॥ ६-(स्वस्ति) कल्याणेन (अध) इदानीम् ( उषसः ) प्रभातवेला (दोपसः) दुष वैकत्ये-मुन् । रात्री: (च) (सर्वः) सम्पूर्णोऽहम् (आपः).हे साप्ता , विद्वांसः सर्वगणः) सर्वेष्टमित्रप्रजादिसहितः । अंशीय ) बहुलं छन्दसि पार।३।७३ मश्नुतेः शपो लुकि लिस्युत्मैकवचने ऊपम् । प्राप्नुयाम्॥
- उप (३,२५६) :, अथर्ववेदभाध्ये सू०५ [ ५०७ ] शक्करी स्थ पुशवो मापं स्थेषुर्मि बायणो ने प्राणापानाप- निर्म दक्ष दधातु ॥७॥ शकरीः। स्यु । पुशवः । सा 1.स्थे.षुः । भित्रावरुणौ। मे । माणापानौ । अग्निः । मे । दक्षस् । दुधातु ॥.. ॥ भाषार्थ:-हे प्रजाओ! तुम ('शकरीः ) यत्तवती ( स्थं ) हो, (पशवः) सब प्राणी (मा उप) मेरे-समीप (स्थेषुः ) ठहरें,.( अग्निः ) ज्ञान- स्वरूप जगदीश्वर ( मित्रावरुणो) दो, श्रेष्ठ मित्रः(मे) मेरे (प्राणापानौ) प्राण और अपान को और (मे ) मेरी ( दक्षम् ) चतुराई को ( दधातु ) स्थिर रपडे ॥७॥ M भावार्थ-जो मनुष्य विद्वानों के उपदेश और परमात्मा की उपासना में तत्पर रहते हैं, वे अपने शरीर और आत्मा से स्वस्थ रहकर फार्यकुशल होते हैं।॥ ७॥ इति प्रथमोऽनुषाकः॥ ! T . I. . " अथ द्वितीयोऽनुवाकः॥ सूक्तम् ५ [ पर्यायसूक्तम् ].॥ १-१०॥ स्वप्नो देवता ॥ १ भुरिगार्थी गायत्री; २, प्राजापत्या गायत्री; ३, १० साम्नी वृहती;.४-६ साम्नी पङ्क्तिः,७,आर्युष्णिक 5 साम्नी त्रिष्टुप् ॥ आलस्यादिदोषत्यागोपदेश:-श्रीलस्यादि दोष के त्याग के लिये उपदेश। . ७- शक्करीः ) स्नामृदिपद्यपिशकिभ्यो बनिए । उ० ४। ११३ । शक्कोतेपनिप, ङी फो। शक्तिमत्या प्रजाः- स्थ.), भवथ ( पशवः) प्राणिनः (मा) माम् ( उप ), उपेत्य (स्थेषुः) तिष्ठन्तु (मित्रावरुणौ ) मित्रवरौ ( में) मम (प्राणापानौ.) श्वासप्रश्वासौ (अग्निः) शानस्वरूपः परमेश्वरः (मे) (दक्षम् ) कार्यकुशलताम् (धातु) स्थापयतु ।। .
- झू०.५ [ ५०७ ] षोडशं काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,२५७) विद्म ते स्वप्न जुनिच ग्राह्याः पुत्रोऽसि यमस्य करणः ॥ १॥ विद्म । ते । स्वप्न । जुनित्रस् । ग्राह्याः। पुत्रः। शुसि । यमस्य । करणः ॥ १॥ मन्तकासि मृत्युरसि ॥२॥ अन्तकःभूमि ! मृत्यु। असि ॥२ तं त्वा स्वप्न तथा संवि स नः स्वप्तः दुष्वन्यात पाहि३ तस् । त्वा । स्वप्न । तयो । सस् । विझः । सः । नः । स्वप्नः। 'दुः-स्वन्यात् । पाहि ॥ ३ ॥ भाषार्थ-(स्वप्न) हे स्वम ! [ आलस्य ] (ते) तेरे (जनित्रम् ) जन्म- स्थान को (विश) हम जानते हैं, तू (प्रायाः) गठिया [ रोगविशेष.] का (पुत्रः) पुत्र और (यमस्य) मृत्यु को (करणः) करने वाला (असि) है ॥ १॥ तू (अन्तकः) अन्त करने वाला (असि ) है और तू ( मृत्युः ।) मृत्यु [ के समान दुःखदायी] (असि ) है ॥२॥ (स्वम ) हे स्वप्न ।। आलस्य ] (तम् ) उस (वा) तुझ को (तथा ) वैसा ही ( सम् ) अच्छे प्रकार (वि) हम जानते हैं, (सः) सोतू (स्वर) हे स्वप्न! [ आलस्य] (नः) हमें (दुःख- भूयात्) नुरी निद्रा में उठे कुविचार से (पादि) बचा ॥३॥', . . १-इदं सूक्तं किञ्चिद् भेदेन गत व्याख्यात च-अ० ६ ॥ ४६॥ २ (विन) जानीमः (ते) तव (स्वम) हे निद्रे। हे भालस्य ( जनित्रम् ) जन्मस्थानम् . (पाहाः ) ०२।६।१। सन्धीनां ग्रहणशीलपीडायाः (पुत्रः) पुत्र श्वोत्पा (यमस्य) मृत्योः (करण) करोतेल्यु। कर्ता । २-(अन्तकः ) अन्त, णिच् एवुल । अन्तयतीति अन्तकः । अन्तकर (असि)(मृत्युः) मृत्युरिव दुःखप्रदः (असि)... ५ (तम् ) ताशम् (त्या) त्वाम् ( स्व ) ( तथा ) तेन प्रकारेण (सम् ) सम्यम् (सः) स त्वम् (नः) अस्मान (दुःस्वप्न्याव) दुःस्वप्न-यत्। दुष्टश्यनेषु भयात् कुविचारात (पाहि) रक्ष । B . . .
(२,२५८) अथर्ववेदभाष्ये मू०५ [ ५०७ भावार्थ-हे मनुष्यो कुपथ्य आदि करने से गठिया आदि रोग होते हैं, गछिया आदि से मालस्य और उससे अनेक विपत्तियां मृत्यु आदि होती हैं । इससे सब लोग दुःचों के कारण अति निद्रा आदि को खोज कर निकालें और केवल परिश्रम की नियुत्ति के लिये ही उचित निद्रा का आश्रय लेकर सदा सचेते रहे ॥१-३॥ यह सूक्त कुछ भेद से भा चुका है-अथर्ष ६।४६॥२॥ विनते स्वप्न जनित्रं नि त्याःपुत्रोऽसि यमस्य करणः।०।०४। छ । जुनित्रम् । निः-ऋ'त्याः । पुत्रः । ॥ ४ ॥ 'भाषार्थ-(स्वप्न हे स्वप्न ! भालस्य ] ( ते ) तेरे ( जमित्रम् ) जन्मस्थान को ( विन) हम जानते हैं, तू (नित्याः.) निऋति [महामारी] का (पुत्रः) पुत्र और (यमस्य) मृत्यु का (करण) करने वाला (असि ) है ......[म० २,३]॥४॥ भावार्थ-मन्ना-३ के समान है॥४॥ विन ते स्वप्न जनित्रुम'त्याः पुत्रोऽसि । । ० ॥ ५ ॥ । जुनित्रम् । अभूत्याः । पुत्रः । ० ११ ॥ भाषार्थ-(स्वप्न ) हे स्वप्न ! [भालस्य ] ( है ) तेरे ( जनित्रम् ) जन्मस्थान को (विभा) हम जानते हैं, तू (मभूत्याः) अभूति [मसम्पत्ति का (पुत्रः) पुष और (यमस्य ) मृत्यु का (करण) करने वाला (अलि) है." [म.२.३] ॥५॥ भावार्थ-मन्त्र १-३ के समान है ॥ ५॥ विश ते स्वप्न जुनिचं निभूत्याः पुत्रोऽसि . । ॥६॥ । जनित्रम् । नि:-भूत्याः । पुत्रः। ॥ ६ ॥ - प ܕ ܢ ܀ ܟ ܝ . -(नित्याः) कृच्छापत्तः। अन्यत् पूर्वषत् । ५-(अभूत्याः) ममम्पत्याः । अन्यत पूर्ववत् ।
- भावार्थ- . भू०५ [.५०७ ] षोडशं काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,२५८) भाषार्थ-(खप्त ) हे स्वप्न ! [मालस्य ] (से) शेरे ('जमित्रम् ) जन्म स्थान को (विम) हम जानते हैं, तू ( निर्भूत्याः ) निभूति [शानि, नाश चा अभाव ] का (पुत्रः) पुत्र और (यमस्य) मृत्यु का ( करणः ). करने वाला (असि ) है......[म०२, ३] ॥६॥ -मन्त्र १-३ के समान है ॥६॥ विष्य ते स्वन जनि परीभूत्याः पुत्रोऽसि ।।०॥७॥ । जुनित्रम् । परी-भूल्याः । पुत्रः। ॥७॥ भाषा-(स्वप्न) हे खम ! [आलस्य ] (ते ) तेरे (जनित्रम् ) जम्म- स्थान को (वि)म.जानते हैं, तू (पराभूत्याः) पराभूति [पराभव, हार] का (पुत्रः) पुत्र और ( यमस्य) मृत्यु का (करणः) करने वाला (असि) है......[ म०-२, ३] ॥७॥ -मन्त्र १-३ के समान है ॥ ७ ॥ विद्म ते स्वप्न जनित्रै देषजामीनां पुत्रोऽसि यमस्य करणः।। विश्न । ते । स्वप्न । जनित्र'म् । देव-जातीनाम् । पुत्रः । अभि । यमस्य । करणः ॥८॥ अन्तकाऽसि मृत्युरसि ॥८॥ अन्तकः । श्रपि । मृत्युः । अपि तं त्वां स्वप्न तथा सं विद्म से नः स्वप्न दुष्यन्यात पाहि१०॥ तम् । त्वा । स्वण्न । तयो । सम् । विद्य । सः। नः। स्पन। दुः-स्वप्न्यात् । पाहि ॥ १० ॥ ६-(निर्भूत्याः) तित्याः नाशस्य । अभावस्य । अन्यत् पूर्ववत् ।। ७-(पराभूत्याः) पराजितः । पराभवस्य । भन्यत् पूर्ववत् ॥ भावार्थ-मन्त्र ---- ?". on an (३,२६०) : अथर्ववेदभाष्ये सू०६५०८] भाषार्थ-(स्वप्न ) हे स्वप्न [आलस्य ] ( ) तेरे (जनित्रम् ) जन्म- स्थान को (विन ) हम जानते हैं, तू ( देवजामीनाम् ) उन्मत्तों की गतियों का (पुत्रः) पुत्र और (यमस्य) मृत्यु का.(करणः ) करने वाला (प्रसि ) है || - तू (अन्तकः) अन्त करने वाला (अलि) है और तू (मृत्यु) मृत्यु के समान तुःखदायी.] (असि ) है ॥ ६॥ (स्वप्न) हे स्वप्न [आलस्य ] (तम् ) उस (त्वा) तुझ को (तथा ) वैसा ही (सम्) अच्छे प्रकार (विन) हम जानते हैं, (:सः):सो तू (वन) हे खम ! (ना.) हमें (दुःस्वप्न यात्) बुरी निद्रा में उठे कुविचार से (पाहि) बचा ॥ १० ॥ भावार्थ-मन्त्र १-३ के समान है ॥ ८-१० ॥ : सूक्तम् ६.[पर्यायसूक्तम् ॥ १-११॥ प्रजापतिर्देवता ॥ १-४ प्राजापत्याऽनुष्टुप् । ५सानी पङ्क्तिः ६ मिच्दार्ची बृहती; ७ सान्नी बृहती; आसुरी जगती । आसुरी वृहती १० आयुष्णिक , ११ आर्षी गायत्री ॥ रोगनाशनोपदेशः-रोग नाश करने का उपदेश । प्रजेष्माद्यांसनामाद्याभूमानागसो वयम् ॥ १॥ अजैष्म । अद्य । असनाम । अद्य । अभू'म । अनागमः । वयंम् ॥ १॥ भाषार्थ-(अध) अब [अनिष्ट को ] ( अजैष्म ) हम ने जीत लिया है, (अध) अव [ इष्ट को ] (असनाम:) हम ने पा. लिया है, (वयम् ) हम (अनागसः) निर्दोष (अभूम) हो गये हैं ॥१॥ :-(देजामीनाम् ) दिवु मदे-पचाद्यच् । नियों मिः । उ० ४।४।। या गतिप्रापण्यो:-मि, आदेर्जत्वम् । देवानामुन्मत्तपुरुषाणा.. जामीनां यामीनां गंतीनाम अन्यत् पूर्ववत् ।। १-(अजैष्मः.). वयं जितवन्तः ( अंध).इदानीम् -( असनाम ) षण संभक्तो लाङ। वयं लब्धवन्तः-(अध) (अभूम) (अनागसः) निर्दोषाः(वयम्). पुरुषार्थिनः॥ ::"श्री .. . .
. - सू०६ [ ५०८] षोडशं काण्डमा १६116. Wo.....२ भावार्थ-जो मनुष्य दोषों को छोड़ते अनिष्ट को जीत कर प्राप्त करते हैं ॥१॥ मन्त्र १ तथा २ कुछ भेद से अग्वेद में हैं-- 1४७ । १८ । उषो यस्माद् दुष्वप्न्यादर्भ ष्मापु तदुच्छतु ॥२॥ उषः। यस्मात् । दुः-स्वन्यात् । प्रभैष्म । अप। तत् । ii. उच्चतु ॥२॥ भाषार्थ-(उषः) हे उषा! [ प्रभात घेला] (यस्मात्) जिस ('दुःस्वप्न्यात् ) दुष्ट स्वम में उठे कुविचार से (अभैष्म) हम डरे हैं, (तत्) यह (अप)दूर (उच्छतु) चला जावे ॥२॥ भावार्थ-यदि किसी कुपथ्य पा रोग के कारण निद्राभंग होकर मस्तक में कुविचार घूमने लगे, मनुष्य उसका प्रतीकार प्रभात ही अर्थात् बहुत शीघ्र करें ॥२॥ द्विषते तत् पर वह शपते तत् परा वह ।३॥ द्विषते । तत् । परी । बहु । शपते । तत् । परी । वह ॥३॥ भाषार्थ-[हे उषा!] तू ( तत् ) वह [ कष्ट ] ( द्विषते ) [वैद्यों से ] धैर करने वाले के लिये (परा वह.) पहुंचा दे, (तत्) वह (शपते ). [ उन्हें ] कोसने वाले के खिये (परा वह ) पहुंचा दे ॥३॥ ड भावार्थ-जो मनुष वैद्यों के शासन पर नहीं चलते, घे शीघ्र दुःख भोगते हैं ॥३॥ यं हि मो यच्च नौ द्वष्टि तस्मा एनद् गमयामः ॥४॥ H २-(उषः) हे प्रभातवेलें ('यस्मात् ) (दुःस्वप्न्यात्') दुष्टस्वप्ने भवात् कुविचारात् (भभैष्म ) वयं भयं प्राप्तवन्तः (अप) दूरे (तत्) भयम् (उच्छतु) गच्छतु। ३-(द्विपते ) वैवेभ्यः कुप्रीतिकारिणे (तत्) कष्टम् (परा बह) दुरे गमत्य (शपते) शापं कुर्यते । अन्यत् पूर्ववत् ॥ .. - (र) अथर्ववेदभाष्ये पू०६ [ ५०८] यम् । द्विष्मः । यत् । च । नः । द्वष्टि । तस्मै । ए नत् । गमयामः ॥४॥ भाषार्थ-(यम् ) जिस [कुपथ्यकारी] से (द्विष्मः) हम [वैद्य लोग] वैर करते हैं, (च) और ( यत्-यः) जो. (नः) हम से (ष्टि ) वैर करता है, (तस्मै ) उसको (एनत्) यह [कष्ट]: (गंमयामः) हम जताते हैं॥४॥ भावार्थ-वैध लोग कह दें कि कुपथ्यकार मनुष्य अवश्य कष्ट भोगेगा ॥४॥ उषा देवी वाचा संविदाना वाग् देव्युषसां संविदाना १५६ . उषाः। देवी । वाचा । सम्-विदाना। वाक् । दे दी। उषसा । सुस्-विदाचा ॥५॥ भाषार्थ-(उषाः देवी.) उषा देवी [उत्तम गुण वाली प्रभात : वेला] (चाचा) वाणी से (संविदाना ) मिली हुयी और ( वाक् देवी ) वाक् देषी [श्रेष्ठ पाणी ] (उपसाः) प्रभात वेला से (संविदाना). मिली हुयी [होवे ॥५॥ भावार्थ-जो मनुष्य प्रभात वेला को सत्य वाणी के साथ और लत्य- पाणी को प्रभात वेला के साथ संयुक्त करते हैं, अर्थात् जो प्रभात से लेकर दूसरी प्रभाव तक सत्यवाणी से काम करते हैं, वे अवश्य सुखी रहते हैं ॥ ५ ॥ उषस्पतिर्वाचस्पतिना संविदानो वाचस्पतिरुषस्पतिना संवि- दानः ।। ६॥ 2.। 7. ४-(यम् ) कुपथ्यसेविनम् (विष्मः) धैरयामा, वयं वैद्याः (चत्) अव्य. यम् । यः (च.).(न:) अस्मान वैद्यान् (प्टि) वैरयतिः ( तस्मै ) कुपथ्यसे- दिने (एम) काटम् (समयामः) ज्ञापयामः ॥ ५-(उषाः) प्रभातवेला (देवी) दिव्यगुणवती (वाचा) वारया ‘सह (संविदाना ) संगच्छमाना(वा) (देवी) (उषसा) प्रभातवेलया सह (संवि- दाना ) संगच्छमाना।
. . सू०६ [-] षोडशं काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,२६३) 'उषः । पतिः । वाचः। पतिना। सुर-विदानः। वाचः । पतिः । उषः । पतिनत । सुम्-धिदानः ॥६॥ 'भाषार्थ-(उषा उषसः) संषा का (पतिः) पति [प्रभात उठने वाला मनुष्यः] (वाचा) वाणी के ( पतिना ) पति [ विद्याभ्यासी] के साथ (संविदानः ) सिता हुआ और (बारा)..वाणी का (पतिः) पति [विद्या. भ्याली पुरुष ] ( उषउपसा) उषा के (पतिना) पति [प्रभात उठने वाले के साथ (संविदानः) मिला हुआ [ होये ॥६॥ भावार्थ-मनुष्य प्रभात बेला में उठकर वेदादि शास्त्रों को विचारे और वेदादि शास्त्र विचारने वाले प्रभात घेला में उठे, जिससे उनकी खस्थता और स्मृति बढ़ती रहे ॥६॥ ते ३ मुष्मै परी वहन्यवरायांन दुर्णाम्नः सदान्याः ॥ ७ ॥ ते। भृशुष्मै । परा। वहुन्तु । अरायान् । गुर-नाम्नः । सुदानवाः ॥७॥ कुम्भीको दुषीकाः पर्यकान् ॥ ८॥ कुम्भीकाः । दूषीकाः । पीयकान् ॥८॥ जादुधान्यं स्वप्नेदुष्पगन्यम् ॥ ॥ जाग्रत्-दुस्वयम् । स्वप्ने दुस्वप्न्यम् ॥4॥: ............ भाषार्थ-(ते) वे ईश्वर नियमः] (अमुष्मै) उस [कुपथ्यकारी] के लिये (अरायाल)कशो, (हुर्णानः दुर्नामों [अर्थ आदि गोगों], (लदानवाः) ६-(उघः) विभकिलोप: उषसः प्रभातवेलायाः" ( पतिः) पालको पुरुषः (वाचा) वारयाः (पतिना) पलिकन पुरुषेणं (संविदानः ) संगच्छ- मानः (वाचस्पतिः) पिंद्याभ्याली पुरुषः ( उषस्पतिना) प्रभातंबोधनशीलेन (संविदानः)॥ ७-(ते.) ईश्वरनियमाः (.अमुष्मै ) कुश्यले विते. (परा वहन्तु) दूरे प्रापयन्तु (अरायान): श्रुतिस्पृहिगृहिमय आया। उ, ३.६६ मा हिंसायाम - (३,२६४) अथर्ववेदभाव्ये सू०.६ [ ५०८] सदा चिल्लाने वाली पीड़ाओं [रोग जिन में रोगी चिल्लाता है ] n७ (कुम्भोकाः ) कुम्भीकाओं [ रोग जिस में पेट घटलो ही सा बजता है ], (दूषीकाः) दूषींकाओं [ जिन रोगों में रोगी गिरता जाता है ], (पीयकान् ) अन्य दुःखदायी रोगों ॥ ८ ॥ (जाग्रदुखम्प्यम् ) जागते में बुरे स्वप्न' और (खप्नेदुखन्प्यम् ) सोते में बुरे स्वप्न को un (परा पहन्तु-म०७) दूर पहुंचावें ॥ भावार्थ-जो मनुष्य ईश्वर नियम को छोड़कर कुपथ्य करते, हैं वे भनेक महालिष्ट रोग भोगते हैं ॥ ७-६ ॥ अनागमिष्यतो वरानवित्तेः संकल्पानमु'च्या द्रुहः पार्थान् ।१० अनागमिष्यतः । वरान् । वित्तः । सुस्-कल्पान् । अमु'च्या। द्रुहः । पाान् ॥ १० ॥ तमुमो भग्ने देवाः परी वहन्तु बधिर्यथासद् वियु रो न साधुः ॥ ११ ॥ तत् । अमुष्मै । अग्ने । देवाः । परी । घुहुन्छ । वधिः । यो । असत् । वियु रः । न । माधुः ॥ ११ ॥ भाषार्थ-(अनागमिण्यतः ) न आने वाले (वरान् ) वरदानों [श्रेष्ठ कर्मफरतो ] को, (अवित्त) निर्धनता के (संकल्पान् ) विचारों को और . । ma -आय्य, यलोपः निशान दुर्णाम्नः) ०।६।१।अर्शमादिरोगान् (सदा. वा:) ०२।१४।१। सदानोनुवाः । सर्वदा नोनूयमानाः शब्दायमानाः पीडाः॥ (-(कुम्भीका कुम्भी+कै शब्द-क । कुम्भी उखेव कायन्ति शब्दायन्ते या ताः पीडाः (पीयकान् ) पीयतिहिंसाकर्मा-निघ०४।२५ । कुन्। शिल्पिसंचयोरपूर्वस्यापि । उ० २ । ३२ । पीयति-कुन् 1.हिंसकान् रोगान् ॥ 8-(जाप्रदुस्वपन्यम्) जाप्रदक्षस्थायां दुष्टस्वमम् (खमेहस्वपून्यम्) स्वप्नावस्थायां दुष्टस्वप्नम् ॥. १०-(भनागमिष्यतः) अनागमनमिच्छतः (वरान् ) श्रेष्ठफलान (भक्त्तिः) दरिद्रताया (संकल्पान ) विचारान् (अमुच्याः) मुच्ल मोचने- .. . 20. an ० ७ [ ५०८] षोडश काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,२६५) (अमुच्या) न छोड़ने वाले (हुहः ) द्रोह [अनिष्ट.चिन्ता] के (पाशान् ) फन्दों को ॥१०॥ (तत्) इस [ सब,दुःख ] को (अमुष्मै) उसः [कुपथ्यसेवीं] के लिये, (अम्ने ) हे ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ! ( देवाः)[.तेरे] दिव्य नियम (परावहन्तु ) पहुंचावें, ( यथा) जिस से (न लाधुः) बाई असाधु पुरुष (धध्रिा) निर्वीर्य और (विथुर: ) व्याकुल. (असत्) हो जावे ॥ ११ ॥ : भावार्थ-जो मनुष्य कुपथ्यलेवी होवे, यह ईश्वर नियम के अनुसार दुष्ट कर्मों की अधिकता,ले श्रेष्ठ फल कभी न पावे, किन्तु दरिद्रता शादि- महा- सशों में पड़कर घोर नरक भोगे॥१०, ११ ॥ सूक्तम् [पर्यायसूक्तम् ॥ ?..... १-१३ ॥ प्रजापतिर्देवता ॥ १ भार्षी पक्तिः । २ लम्न्यिनुष्टुप् । श्रासुर्यष्णिक ; ४ प्राजापत्या. गायत्री ५ प्राध्युषिणम् । ६६, ११ सान्नी घृहती .७.यानुषी गायत्री, १० साम्नी गायत्री, १२ भुरिफ प्राजापत्याऽनुष्टुपु. २३ आसुरी त्रिष्टुप् ॥ शत्रुनाशनोपदेशः-शत्रु के नाश करने का उपदेश ॥'. तेनैनंविध्याम्यभूत्यैनं विध्यामि निभूत्यैन विध्यामि परी- भूत्यैनं विध्यामि ग्रानं विध्यालि तमसन विध्यामि ॥ १ ॥ तेन । र नुम् । विध्यामि । अभू'त्या । र नुम् । विध्यामि । निः-भूत्या । एन । विध्यामि । परी-भूत्या। एनम् । विध्यामि ग्राह्या। एनम् । विध्यामि । तमसा एनम् । विध्यामि ॥१॥ . क, डीप । अमोचनशीलायाः (द्रुहः ) अनिष्टचिन्तायाः (पाशानं ) बन्धान् । ११- (तत्) पूर्वोक्तं दुःखम् (अमुष्मै ) तस्मै कुपथ्यसेविने ('अग्ने) हे ज्ञानवरूप परमेश्वर (देवाः ) दिव्यनियमाः (परां वहन्तुं) प्रापयन्तु (बंधिः) निर्वीर्यः (यथा) येन प्रकारेण (अलस्) भूयात् (विथुरः) व्यथे सम्प्रसारण धः 'किच्च। उ०१ १ ३६ व्यथ भयसंचलनयो:-उरघु, किती व्याकुलः..(न लाधु:) असाधुः। दुष्टजनः। (3) .
अथर्ववेदभाष्य सू०.७ [ ५०८] भाषार्थ-(तेन) उस [ईश्वर नियम] से (पनम् ) इस.[कुमार्गी ] को (अभूत्या ) अभूति [असम्पचि] से (विभ्यामि ) में छेदता हूँ, (पनम् ) इस को (निभूत्या) निभूति [ हानि या नाश ] से (विध्यामि) छेदता है, रएनम् ) इस फो (पराभूत्या) पराभूति [ पराभव, हार] से (विध्यामि) छेदता हूं, (एनम् ) इस को (प्राह्या) गठिया रोग से (विध्यामि) छेदताई, (पनंम् ) इस को (तमसा) अन्धकार [महारश] से (विध्यामि) छेदता 'है. (एनम् ) इस कुमार्गी ] को [अन्य विपत्तियों से]:(विष्यामि ) मैं छेदता हूँ॥१॥ भावार्थ-हमागी दुराचारी लोग ईश्वर नियम से नाना विपत्तियां झेलते हैं ॥१॥ देषानामेनं घोरः क्रूरैः मैं और मेष्यामि ॥ २ ॥ देवानाम् । एनम् । घोरैः । क्रूरैः । म-र षैः। अभि-प्रेष्यामि २ भाषार्थ-(एनम् ) इस कुमार्गी ] (देवानाम्) परमात्मा के ] उत्तम नियमों के (घोरैः) घोर [ भयानक ] और (करैः) दूर [निर्दय] (प्रेयः) शासनों से (भभिप्रेष्यामि ) मैं सामने से प्राप्त होता हूं ॥२॥ । भावार्थ-दुराचारी लोग परमात्मा के नियमों से घोर फर क्रशों में पड़ते हैं ॥२॥ वैश्वानरस्यैनं दंण्ट योरपि दधामि ॥३॥ वैश्वानरस्य । ऐनम् । दंष्ट्र यो । अपि । दधामि ॥३॥ . .. " - " . १-तेन)ईश्वरनियमेन ( एनम् ) कुमार्गिणम् (विध्यामि) विदार- यामिन पीडयामि.(प्रभूत्या) असम्पत्त्या (निभूत्या) हान्या (पराभूत्या) पराजित्या पराभवेन (प्राह्या) सन्धीनां रोगविशेषेण (तमसा) अन्धकारेणं । मराज शेन । अन्यत् पूर्ववत् ॥ २-: देवानाम्) ईश्वरस्य दिव्यनियमावाम् (एनम् ) कुमार्गिणम् (घोरीः) भयानक (रैः) दयारहितैः (प्रेषैः) प्र+ष पाच्छायां गतौ च- घम्। शाखनैः (अभिप्रेन्यामि) भाभिमुख्येन मामोमि । .
. भावार्थ:- सू० [५०८ ] षोडशं कापडम ॥१६॥ २१७) भाषार्थ-(एनम् ) इस [कुमार्गी ] को (वैश्वानरस्य) सब नरों के हितकारी पुरुष के (दंष्ट्रयोः) दोनों डाढ़ों के बीच [ जैसे अन्न को 1(मपि) अधश्प (दधामि) धरता हूं ॥३॥ भावार्थ-प्रजागण कुकर्मी जन को पकड़कर सब के हित लिये राजा को देखें, यह उसे ऐसा नष्ट करे जैसे अन्न.को डाढ़ी से कुचलते हैं ॥३॥ यह मन्त्रं कुछ भेद ले आ चुका है- ४.३६ ९.... रवाने पाषु सा गरत् ॥ ४ ॥ एव । अनैव । श्रयं । सा: गरत् ॥४॥::. :: ..........::: भाषार्थ (एव) इस प्रकार से [अथवा] (मनेव) अन्य प्रकार से (सा) वह [न्याय व्यवस्था ] [ कुमार्गी को] (अवं गर) निगल लाया राजा अपनी अनेक न्याय, व्यवस्थाधों से दुष्टों का नाश करता रहे ॥४॥ यो'स्मान् द्वेष्टि तमात्मा द्वेष्टु यं वयं द्विष्मः .मात्मान द्वष्टु ॥ यः । अस्मान् । द्वेष्टि । तम् । आत्मा। वेष्टु । यस यम् । द्विष्मः । सः । मात्मानम् प्रात्मानम् । ष्टु भाषार्थ-(प.) नो [फुमार्गी ] (अस्मान् ) हम से (बेटि) धेर करता है, (तम् ) उस से [इस का] (आत्मा) आत्मा (द्वेष्टु) चैर करे, (यम् ) 'जिस [ कुमार्गीले (घयम् ) हम (विष्मः) बैर करते हैं, (स.) यह (आत्मा. ३ वैश्वानरस्य ) सर्वनरहितस्य पुरुषस्य ( एनम् ) कुमार्गिणम् (दंष्ट्रयो) दन्तपङ्क्तिविशेषयामध्ये (अपिः भवश्यम् । दधामि) धरोमि ॥ ४-(एव) एवम् अिनेन प्रकारेण ('अने) भनेयम् । अन्य प्रकारेण (सा) न्यायव्यवस्था (अव गरत्) विनाशयेत् ॥ (2) Y-(पः) कुमार्गी (अस्मान् ) धार्मिकान (वेष्टि) वैरयति (तम्.) दृष्टम् (आत्मा) तस्यात्मा (टु) वैरयत, (यम्) (अयम् ) धार्मिकी HAI. !::-- सू०७ [ ५०६] • . । (३,२६) अथर्ववेदभाध्ये नर अपने] आत्मा से (देष्टु) धैर-फरे ॥५॥ भावार्थ-हे मनुष्यो । कुमार्गी पुरुष : धर्मात्माओं का मार्ग छोड़ने से आप ही अपना बैरी बन जाता है ॥ ५ ॥ निषिन्त धिो निः पृथिव्या निरन्तरिक्षाट् भजाम ॥६॥ निः। द्विषन्तम् । दिवः । निः। पृथिव्याः । निः । अन्त- रिक्षात् । भंजाम ॥ ६ ॥ भाषार्थ-(द्विषन्तम् ) वैर फरने वाले [ कुमागी ] को(दिवः) आकाश से: (निः) पृथक् , (पृथिव्या.) पृथिवी ले (निः) पृथक और ( अन्त- रिक्षात्-) मध्यलोक से: (निः भजाम ) हम:भाग रहित करें ।। ६ : ...:: : ... भावार्थ-शूर धर्मात्मा लोग दुराचारियों को श्राकाश मार्ग, पृथिवी- मार्ग और अन्य मार्ग से सर्वथा निकाल दे ॥६॥. सुयोर्मश्चाक्षुष ॥ ७ ॥ सु-योमन् ॥ चाक्षुष ॥ ७ ॥ इंदमुहमामुष्यायणे ३' मुष्योः पुत्रे दुष्वप्न्यै मृजे इदम् । अहम् । श्रामुष्यायणे । प्रमुष्योः । पुर्व पन्यम् । मुजे ॥ भाषाय (सुयामन ) हे सुमार्गी ! (चाक्ष ष) हे नेस वाले ! [विद्वान् ] ७॥ (इदम् ) मन्त्र (अहम्.) मैं (आमुध्यायणे.) असुफ पुरुष के सन्तान, . 2 -स्व- M (द्विष्मः ) वैरयामः (लः) दुराचारी (शात्मानम् ) खकीयमात्मानम् (द्वेष्टु) । (निः) पृथक् (द्वियन्तम् ) वैरयन्तम् ( दिवः) आकाशात् (निः) (पृथिव्याः) भूलोकात (अन्तरिक्षात्.) मध्यलोकात् (निर्भजाम ) भागरहितं कुर्याम ॥ - सुयामन् ) या गौ-मनिन् । हे सुमागिन् (चाक्षुष) हे नेत्रवन् । दूरदर्शिन् । (इदम् ) इदानीम् (अहम् ) धर्मात्मा' (भामुष्णायणे') अमुष्य पुरु- : H .
-- . ॥ सू०० [ ५०८] पोडशं काण्डम् ।। १६ ॥ (३,२६) (भमुष्याः) अमुक स्त्री के (पुत्र) [कुमागौं ] पुत्र पर (दुःस्वप्न्यम्) दुष्ट स्वम [मालस्य आदि ] में उठे कुविचार को (मृजे) शोधता ई॥॥ भावार्थ-धर्मात्मा दूरदर्शी लोग सुमार्गी जन के कुल, माता पिता आदि का पता लगाकर यथोचित दण्ड देवें ॥७॥ यदोअंदी शुभ्यगच्छन् यद् दोषा यत् पूर्वा राभिम् ॥६॥ यत् । अदा-अंदः । अभि-अगष्यन् । यत् । दोषी । यत्। पूर्वाम् । राधिम् ॥६॥ .. यज्जायुद् यत् सुप्तो यद् दिवा यन्नक्तम् ॥ १०॥ यत् । जाग्रत् । यत् । 'सुप्तः । यत् । दिया। यत्, नक्तम् २० यदहरहरभिगच्छामि तस्मादेनुमव दये ॥ ११॥ यत् । प्रहः-सहः । अभि-गामि । तस्मात् । एनम् । अब । दुये ॥ ११॥ भाषार्थ-(यत्) जैसे ( अदोभदः ) उस उस समय पर (पत्) जो [कट ] ( दोपा) रात्रि में, (पत् ) जो [कष्ट ] (पूर्वा रात्रिम्) रात्रि के पूर्व भाग में (अभ्यगच्छन् ) उन [पूर्वज लोगों ने सामने से पाया है। [वैसे ही ] ( यत्) जो [कष्ट ] (जात्) जागंता हुभा, ( यत् ) जो [कप] (मुप्तः) सोता हुआ मैं (यत् ) जो [कष्ट] (दिवा) दिन में, (यत्) जी - 44 पस्य सन्ताने (अमुष्याः ) अमुकस्नियाः (पुत्रे) मार्गिणि सन्ताने (दुःखप्न्यम्) दुष्टस्वप्ने भषं रूविचारम् (मृजे) शोधयामि ॥ . . 8-(यत्) यथा (भदोमदः) तस्मिंस्तस्मिन् समये अभ्यगच्छन् ) से पूर्व जामाभिमुल्येन प्राम घन् , यत्) कष्टम् ( दोषा) रात्रौ (यत्) (पूर्वान) पूर्व भागभवायाम् (रात्रिम्) । 1 ) ! (१०-(पत्),कप्टम् (जामंत्) जागरणयुक्तः .सन् :(:सुप्ता):मिन्द्रानुः सन् (दिवा) दिने (मकम् ) रात्रौ। मस्यत् पूर्ववत् ॥ ..........). RMA . . (10) अथर्ववेदभाउने सू० [१०] (नकम् ) रात्रि में, ॥ १०॥ (यू) जो (अहरहः) दिन दिन (मभिगच्छामि) सामने से पाता हूं; ( तस्मात् ) उसी कारण से ( एनम् ) इस [रुमार्गी ] को . (भूव ।)मार गिराता ई॥ ११ ॥ भावार्थ-जैसे पूर्वज विद्वान् लोग रहे पड़े कष्ट सहकर दुराचारी मसुरों को हराते आये हैं, वैसे ही मनुष्य नशे सहकर दुष्टों को हराकर शिष्टों का पालन करते रहें। तं हि तेन मन्दस्यु तस्य पृष्टीरपि शृणीहि ॥ १२ ॥. तम् । जहि । तेन । मुन्दुस्तु । तस्य । पृष्टी। मर्पि । गृणीहि १२ भाषार्थ (तम् ) उस [कुमार्गी]. को (ज) नाश करदे (तस्य) उसकी (पृष्टी), पसलियां (अपि) सर्वथा (शृणीहि ) तोड शत, (तेन) उस शूर कर्स] से (मन्दस्व ) तू चल ॥ २॥ भावार्य बुद्धिमान् शूर लोग टुष्टों को नाश करके सदा आगे बढ़ते रहें ॥१२॥ म मा सीवीत् तं प्राणो जहातु ॥ ३ ।। सः । मा । जीवीत् । तम् । प्राणः । जहंातु ॥ १३ ॥ भाषार्य-(स.) वह [कुमार्गी] (माजीवीत् ) न लौता रहे, (तम्) दसकों (प्राणः) प्राण (नहातु) छोड़ देवे ॥ १३ ॥ भावार्थ-प्रतापी राजा दुराचारियों को सर्वथा नाश करके प्रजा पालन करे। १३.- M ... --- • ARE ..... ग N ११-(यत्) कष्टम् (अहरहा) प्रतिदिनम् (अनिंगच्झमि) अहमा- 'सिमुल्यन प्राप्नोमि (तस्मात् ) कारणात् ( एनम् ) दुष्टम् (मव दरे) विनाशयामि॥ - १२-रतम् कुमार्गणम् हि ) चौशयर तैम शूरकर्मणा (मन्दस्व) मंदि स्तुतिपत्यादिषु । गच्छ (तस्य दुष्टस्य ( पृष्टी) पश्चिस्थिीनि (मपि) सर्वथा (ऋणीहि) विदारय । . संदुष्टरमा जीबीद) नेव-प्रांयान धारयेत् (चम् दुष्टम् (भाषा) जीवनम् (जहांतु) त्यजतः .. .. - .
• . -- सू० । [ ५१6] षोडश काण्डम् ।। १६ ॥ (३,२७१) सूक्तम् - [पर्यायसूक्तम् ] ॥ १-३३ ॥ प्रजापतिर्देवता ॥ जितमित्यादि १,५-३० ग्राम यनुष्टुप् २ ५-२४, ३१ विराडा गायत्री , ३ प्राजापन्या गायत्री : तस्येत्यादि ।-२६३३ प्राजापत्या त्रिष्टुप् स इत्यापि, ६, ७, १२, १४, १६, २०, २२, २७ आसुरी जंगती ; स इत्यादि ८, १०, १३, २१, २३, २४, २५ आसुरी त्रिष्टुम् । स इत्यादि ६, १५, १७, १८, १९, २६, ३२'आसुरी पङ्क्तिः ; २८, २६ पानुषी जगती ॥ शत्रुनाशनोपदेश-शत्रु के नाश करने का उपदेश । जितमुस्माकमुनिसुस्माकमुतमुस्माकं तेजोऽस्माकं प्रमा स्मा स्वरस्माकं योर स्माकं पषोऽस्माकै मजा अस्माक चीरा अस्माकम् ॥ २॥ जितम् । अस्माकम् । उत्-भिन्नम्। अस्माकम् । तर भुस्माकम् । तेजः। अस्माकम् । ब्रह्म । अस्माकम् । स्वः । अस्माकम् । यज्ञः। अस्माकं पुशवः । मुस्माकम् । प्र-नाः । अस्माकम् । वीराः । अस्माकम् ॥ १ ॥ तस्मादमुनिर्भजामोऽमुमामुयायणममुष्याः पुत्रमुसौ यः ॥३॥ तस्मात् । प्रमुस् । निः । भजामः । अमुम् । भामष्यायणम् । 7)- मुण्योः । पुत्रम् । असौ । यः ॥ २॥ स ग्राह्याः पाशान्मा मौचि ॥३॥..?.. सः । ग्रायाः । पाशात् । मा । मोचि ॥३॥ तस्येदं वर्चस्तेजः माणमायुर्नि वैष्टयामीदमेनमधुसञ्च पादयामि ॥ ४ ॥ तस्य । दुदम् । वर्चः । तेजः। माणस् । नायु नि । थे.ष्ट- यामि । हुदम् । एनम् । श्रुधराञ्चस्, पादयामि ॥४॥ (17 1... 3 . " . .
(३,२७२) अथर्ववेदभाध्ये सू०८ [ ५१०] भाषार्थ-(जितम्) जय किया हुआ बस्तु -( अस्माकम् ) हमारा, (उद्भिन्नम् ) निकासी किया हुमा.धन (भस्माकम् ) हमारा, (भूतम्) वेद- ज्ञान ( अस्माकम् ) हमारा, ( तेजः) तेज (भस्माकम् ) हमारा, (ग्रह ) त्रा (अस्माकम् ) हमारा, (स्वः) सुख (अस्माकम् ) हमारा, (यक्षः ) यश [ देष. पूजा, संगतिकरण और दान] (भस्माकम् ) हमारा, (पशवः) सय पशु [गी घोड़ा आदि ] (अस्माकम् )हमारे, ( प्रजाः ) मागण (अस्माकम् ) हमारे और ( धीराः ) धीर लोग (अस्माकम् ) इमारे [.होवें] ॥ १ ॥ ( तस्मात् ) उस [ पद] से (भमुम् ) अमुक, (अमुम् अमुक पुरुष, (आमुष्यायणम् ) 'अमुक पुरुष के सन्तान, ( अमुग्योः ) अमुक स्त्री के पुत्रम् ) पुत्र को ( नि: भजामः,) हम भागरहित करते हैं, (असौ यः) वह जो [कुंमार्गी ] है ॥२॥ (सा ) यह [कुमार्गी ] (प्रायाः) गठिया रोग के (पाशात्) बन्धन से ( मा मोचि ) न छूटे ॥३॥ (तस्य) उस [कुमार्गी ] के (इदम् ) अब (वर्च:.). प्रताप, ( तेजः ) तेज,.( प्राणम् ) प्राण और (मायुः) जीवन को (निष्पामि) में लपेटे लेता हूं, (इदम् ) प्रय.( एनम् ) ॥ । । .... १ (जितम् ) जयेन प्राप्तं वस्तु (अस्माकम् ) धर्मात्मनाम् (उद्भि- नम् ) उद्भेदनं स्फुरणाम् । भायधनम् (ऋतम् ) वेदशानम् (तेजा) (ब्रह्म) अन्नम्-निघ० २ १७.(स्वः) सुखम् (यशः) देवपूजासंगतिकरणदान व्यवहारः (पशवा) गधाश्यादयः (प्रजाः ) प्रजागणाः (पीराः) धीरपुरुषाः ( भस्माकम् ) भवन्तु इति शेषः। भन्यत्- पूर्ववत् ॥:- २-(तस्मात् ) प्रसिद्धात्, पदात् (अमुम्) अमुकपुरुषम् ; ( अमुम् ) अमुफपुरुषम् (निर्भजामः ) भागरहितं कुर्मः (आनुष्यायणम् ) अमुक पुरुषस्य सन्तानम् (अमुष्याः) अमुकस्त्रियाः (पुत्रम् ) सुतम् ( अखौ) (यः) कुमार्गी पुरुषः॥ ३-(स.) कुमार्गी, (प्रायाः) माहीरोगस्य (प्राथात् ) बन्धनात् (मा भोषि) न मुक्तो भवतु ॥ ४-(तस्य ). कुमार्गिणः पुरुषस्य (इदम्) इदानीम् (घर्चः) प्रतापम् (तेज) प्रकाशम् (प्राणम् ) श्वासव्यापारम् (आयुः) जीवनम् (नि)नितराम (वेष्टयामि) आच्छादयामि (इदम्) इदानीम् (एनम् ) कुमार्गिणम् (अधराधाम्) .. +4 . . शू०५१०- घोडधं कारडम् ॥ १६ ॥ (३,२७३) इस [कुमार्गी ] को (अधराञ्चम् ) नीचे (पाश्यागि) लतियाता हूं ॥४॥ भावार्थ-विद्वान् धर्मवीर राजा सुवर्ण आदि धन और सब सम्पत्ति फा सुन्दर प्रयोग करें और अपने प्रजागण और पीरों को सदा प्रलश रख कर कुमानियों को काट देकर नाश फरे ॥ १-४॥ १-धागे के सपा मम्मों का भावार्थ इल भाषाथ के समान है। २-मन्त्र १, २, ४ कुछ भेद से आ चुके हैं-५०१०। ५। ३६ ॥ जितम् ।।।श निर्भया पानान्मा मौचि । ॥५॥ १ः । नि:-त्याः । पाशात् ॥ ५ ॥ भाषार्थ-(जिनम् ) जय किया शुभा......[म० १, २] । (सः) षह [कुमार्गी] (नित्याः ) निति [ महामारी] फे (पाशात् ) वन्धन से (मा मोचि ) न छूटे ।......[म०४ ] ॥५॥ जितम् । ० सोऽभूत्याः पाणान्मा मौषि । ॥ . . । सः । अत्याः । पाशात् । ॥६॥ .भाषार्थ-(जितम् ) जय किया धुश्रा......[म० १, २] । (सा) वह .[कुमार्गी ] (शभूत्याः) भभूति [असम्पत्ति] के (पाशात् ) यन्धन से (मा मोचि)न छूटे ।......[म०४] ॥ ६॥ जितम् । ०। स निळू त्याः पाशान्मा मौचि । ॥ ७ ॥ ।स। नि:-त्याः । पाशात् । ० ॥ ७ ॥ भावार्थ-( जितम् ) जय किया हुशा......[म० १, २] 1 (स.) . [कुमार्गी ] (. निर्भूत्याः ) निर्भूति [ हानि ] के (पाशात् ) बन्धन ले ( मा मोचि) न छूटे।......[म० ४]॥७॥ "अधोगतम् ( पादयामि ) पादन प्रहरामि ॥ y-(नित्याः) कच्छापत्तेः । महामारीरोगस्य । अन्यत् पूर्ववत् ।। ६-(अभूत्याः ) असम्पत्तेः । अन्यत् पूर्ववत् ॥ (निभूत्याः ) हानेः । अन्यत् पूर्ववत् । 1 ५ -- .
(३,२७४) अथर्धवेदभाष्ये ०८[५१०] जितम् ।। स परीभूत्याः पान्मा मौचि । ॥८॥ । सः । परी-भूत्याः । पाशात् । ० ॥८॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुआ......[म० १,२]। (स.) यह [कुमार्गी ] (पराभूत्याः) पराभूति [हार] के (पाशात् ) बन्धन से (मा मोचि)न छूटे ।......[म०४] ॥॥ जितम् ०। । स देवजामीनां पाशान्मा मौधि । ॥८॥ । सः । देव-जामीनाम् । पाशात् । ॥६॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुमा......[म० १,२](मः) वर [कुमार्गी ] ( देवजामीनाम् ) उन्मों की गतियों के (पाशात् ) बम्धन से (मा मोचि)न छूटे ।......[म०४]॥8॥ जितम् ० १ ० । स बृहस्पते : पाशान्मा मौचि । ० ॥ १० ॥ । सः । बृहस्पतैः । पार्शात् । ० ॥ १० ॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुआ......[म० १,२] (सः) वह [कुमार्गी ] (वृहस्पतेः) वृहस्पति [ पड़ी विद्याभों के रक्षक सेनाम्यत] के (पाशात् ) बन्धन से (मा मोचि) न छूटे ।......[म०४] ॥ १० ॥ जितस् । ० स प्रजापते : पाशान्मा मौचि । ॥ ११ ॥ । सः । मुजा-पतेः । पार्यात् । ० ॥ ११ ॥ भाषार्थ--(जितम् ) जय किया हुश्मा......[म० १,२] 1 (सः) वह [मार्गी] (प्रजापतेः) प्रजापति [प्रजापालक सेनापति के (पायात्) वन्धन से (मा मोचि) न छूटे।......[ म०४] ॥ १९ ॥ । -(पराभूत्याः) परामितेः । पराभवस्य । मन्पत् पूर्ववत् ॥ ४-विवजामीनाम्) सू०५। म०। उन्मत्पुरुषार्ण गतीनाम् । भन्यत्पूर्ववत् । १०-(वृहस्पतेः) बहतीनां विद्यानां पालकस्य सेनाध्यक्षस्य । भम्पत् पूर्ववतु। ११-(प्रजापतेः) प्रजापालकस्य सेनापतेः । अन्यत् पूर्ववत् । ..
०८ [ १९०] षोडश काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,२०५) जितम् । ० । स ऋषीणां पान्मा मौषि । ० ॥ १२ ॥ । सः । ऋषीणाम् । पाशात् । ० ॥ १२ ॥ भाषार्थ (जितम् ) जय किया हुभा"""[ म० १,२] ! ( सः) वह [ कुमार्गी ] (.ऋषीणाम् ) ऋषिपो [ सन्मार्ग दर्शक महात्मामों ] के (पाशात् ) बन्धन से (मा मोचि ).न छूटे ।..." [म०४] ॥ १२ ॥ जितम् । ० । स प्रर्षियाणां पाशान्मा मौघि । ० ॥ १३ ॥ । सः । श्रार्षे याणाम् । पाशात् । ० ॥ १३ ॥ भाषार्थ-( जितम् ) जय किया हुआ......[ म०१, २ ] (सः) षह [ कुमार्गी ] (मायाणाम् ) माय शाओं [ऋषिप्रणीत धर्मशाओं के (पाशात् ) बन्धन से (मा मोचि ) न छूटे ।"""[म.४] ॥ १३ ॥ जितम् । ० सोऽङ्गिरसां पाशान्मा मौघि । ॥ १४ ॥ । सः । अङ्गिरसाम् । पाशात् । ० ॥ १४ ॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुआ... [म०.१, २] 1 (सः) वह मार्गी ] (अडिरसाम्) अशिराओं [महाशानी युद्धकुशलों ] के (पाशात्) बन्धन से (मा मोचि) न छूटे |..."[म. ४] ॥१४॥ जितम् । ०। स प्राङ्गिरसानां पाशान्मा मेचि । । ॥ १५ ॥ ० । सः । भाङ्गिरसानाम् । पार्शात् । ० ॥ १५ ॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुआ..."[म० १,२] । (स.) वह [कुमार्गी ] (माङ्गिरसानाम् ) अङ्गिरामों [ महाशानियों ] के शिक्षित योद्धामों ." १२-(ऋषीणाम् ) सन्मार्गदर्शकमहात्मनाम् । अन्यत् पूर्ववत् ॥ १३-(भायाणाम् ) ऋपिप्रणीतानां धर्मशालाणाम् । अन्यत् पूर्ववत् ॥ १५-(अशिरसाम्) म०२।१२। ४ ।मतेरसिरिरुडागमश्च । उ०.४। २१६ । भगि गती-मसि, इस्ट् । महाशानिनां युद्धकुशलानाम् । अन्यत् पूर्ववतु ॥ १५-(भाङ्गिरसानाम् ) .अशिरस्-अण् । महाबानिमिः शिक्षितयोद्- r .
(३,२७६) प्रथधेदभाष्ये 1. { ५०] के (पाशात् ) दन्धन ले (मा सोचि न छूट!...० ४] ॥२५॥ जितस् ०१ ० दोश्चर्षणां पाशाल्ला मोचि । ॥ १६ ॥ । सः । अयणास् । पात् । ०॥ १६ ॥ भाषार्य-जितम् ) जय किया दुमा"..[म० १, २] । (लः) छह [कुमार्गी ] (अथर्षणाम् ) अथर्वानों [ निचलखमाव यारो लेना नाययों ] के (पानात् ) बन्धन ले (मा मोचिनकूटे।... [२०४] १६ ॥ जितम् ।। स आयर्व जान पाशान्मा नौचि 1 0 ॥३॥ । सः । भ्राथर्व गानाम् । पाशात् । ० ॥ १७ ॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुमा..... [१, २] । (सः) वह [कुमार्गी] (भाथर्वणानाम् ) भथर्षाओं के लेना दलों के (पासाद) यन्धन से (मा मोचि) न छूटे।""[भ०४] ॥ १७ ॥ जितम् ० १ ० १ स वनस्पतीनां पाशुन्मा सौचि ० ॥ १८ ॥ संः । वनस्पतीनाम् । पाशात् । ० ॥ १८ ॥ भाषार्थ--(जितम् ) जय किरा हुआ...[० १.२] 1 (स) यह [सुमार्गी ] (बनस्पतीनाम् ) वनस्पतियों [वृक्षों ] के (पाग । चन्धन से ('मा मोचि ) न छूटे !..."[म०४] ॥ १८ - धृषाम् । अन्यत् पूर्ववत् ॥ १६-(अथर्वणाम् ) २०४।१।। अथर्वाणोऽधनवन्तस्थतिधरति कर्मा तत्प्रतिषेधः-निर० ११ । १८ । नामदिपद्यपिराफिभ्यो पनि ।उ०४॥ ११३ । अथर्व चरणे गतौ-वनिप् । बसोपो विकल्पैन । निश्चलखमावानां सेना- नायकानाम् ॥ १७--(मायणानाम् ) १०४१३ मिथर्वन्-लए । अन् । पा०६! ४। १६७ । अनः प्रकृतिभावः। अथर्व निश्चलस्सभारलेनानायकानां गणानाम् । भन्यत् पूर्ववत् ॥ १८;-( वनस्पतीनाम् ) वृक्षाणाम् । अन्य पूर्ववत् ॥
.. - - . सू०८ [ ५१०] षोडश काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,२७७) जितम् । ०। र यौनस्पत्यानां पाशान्माणि । ०॥ १८ ॥ .0 । सः । पानुरूपत्यानाम् । पाशात् । ० ॥ १८ ॥ भाषार्थ-- (जितम् ) जय किया दुधा..."[ म० १,२] । (स) पह[कुमार्गी ] (वानस्पत्यानाम् ) घनस्पतियों से उत्पन्न [काठ, पुष्प, फत आदिकों ] के (पाशात् ) पन्धन से (मा मोचि ) ग छूटे।"[म०४] ॥१६॥ गितम् ० । ० । स ऋतूनां पानान्मा मेचि । ० ॥ २० ० । सः । तूनाम् । पाशात् । ० ॥ २० ॥ भाषार्थ-(जिसम् ) जय किया हुआ..."[म० १, २] (सः) यह [फुमार्गी ] (ऋतूनाम् ) ऋतुओं [वसन्त आदिको ] के (पाशात् ) बन्धन से (मा मोधि) न छूटे। [म०४ ] ॥ २० ॥ जितम् ।। स मा वान पाान्मा मेोधि । ० ॥ २१ ॥ । सः। भात वानाम् । पाशात् । ० ॥ २१ ॥ भाषार्थ-( जितम् ) जय किया हुआ"""[म० १,२] । (सः) यह [ कुमार्गी ] ( आर्तवानाम् ) तुओं में उत्पन्न, [ शीत, उण, पुष्प फल, श्रादिको ] के ( पाशात् ) बन्धन से ( मा मोचि ) न छूटे । [म०४]॥२१॥ जित्तस् ०। । स मासानां पाशान्मा मेचि । ० ॥२२॥ । सः । मासानाम् । पाशात् । ० ॥ २२ ॥ भावार्थ-(जितम् ) जय किया हुआ..."[म० १, २]। (सः) वह १६--(वानस्पत्यानाम् ) षोभ्य उत्पसकाठपुष्पफलादिकानाम् । भन्यत पूर्ववत् ॥ २०--(ऋतूनाम् ) वसन्तादिकालानाम् । अन्यत् पूर्ववत् । २१-(आर्तवानाम् ) ऋतुषत्पन्नानां शीतोष्णपुष्पफलादीनाम् । अन्यत् पूर्ववत् ॥.. २२-(मासानाम् ) वर्षावयवानाम् । भन्यत् पूर्ववत् ॥ 4 . .
0 (३,३७०) अथर्ववेदभाष्ये भू०८ [५१० [कुमार्गी] (मासानाम् ) महीनों के (पाशात् ) बन्धन से (मा मोचिन छूटे।""[म०४] ॥२२॥ जितम् । ० मेोऽर्धमारानां पाशान्मा मेचि । ०। २३ ।। । सः । अधु-मासानाम् । पात् । ० ॥ २३ ॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया दुधा"." [म० १, २] । (सः ) यह [कुमार्गी] (अर्धमासानाम् ) भाधे महीनों के (पाशात् ) बन्धन से (मामोचि) न छूटे। ..."[म०४]॥ २३ ॥ जितम् ०। । सेोऽहोरामयोः पाशान्मा मेचि । ० ॥ २४ ॥ । सः । अहोरावयाः । पाशात् । ० ॥ २४ ॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुआ"""[म० १,२] (मः) यह [कुमार्गी] (अहोरात्रयोः) दिन और रात्रि के (पाशात् ) बन्धन से (मा मोचि) न छूटे।""[म०४] ॥ २४ ॥ जितम् । ०। सेोऽहनाः संयु तोः पाशान्मा मेचि । ० ॥२५॥ । सः । भनौः । सुम्-यतोः । पात् । ० ॥ २५ ॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुमा"""[ म० १,२]। (सः) वह [कुमार्गी] (संयतोः) मिले हुये (अहोः) दो दिन [दो समय के संयोग] के (पाशाद) बन्धन से (मा मोचि ) न छूटे।""[म०४] ॥२५॥ जितम् ।। स द्यावापृयिव्योः पाशाम्मा भौचि । ॥२६॥ 01 सः। द्यावापृथिव्याः । पाशात् । ० ॥ २६ ॥ २३-(अधमासानाम् ) मासावयवानाम् । अन्यत् पूर्ववत् ॥ २४- अहोरात्रयोः) रात्रिदिवसयोः। अन्यत् पूर्ववत् ॥ २५-(महोः ) दिनयो। कालयोः (संयतोः ) यमे कि । संयुक्तयोः । भन्यत् पूर्ववत् ॥
०८ [ ५१०] षोडशं काण्डम् ॥ १६ ॥ (३,२०८) भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुआ...." [म०१, २] । (सः) वह [कुमार्गी ] (धावापृथिव्योः) सूर्य और पृथिवी के ( पाशात् ) बन्धन से (मा मांचि ) न छूटे।"""[म०४] ॥२६॥ जितम् । स ईन्द्राग्न्याः पाशान्मा मेचि । ० ॥ २७ ॥ । सः । इन्द्राग्न्योः । पाशात् । ० ॥ २७ ॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुआ..."[म० १,२]। (सा) वह [कुमार्गी ] ( इन्द्राग्न्योः) बिजुली और भौतिक अग्नि के (पाशात् ) बन्धन से (मा मोचि ) न छूटे।..."[ म०४] ॥ २७॥ नितम् । स मित्रावरुणयोः पाशान्मा मेचि । ० ॥ २८ ॥ । सः । मित्रावरुणयोः । पाशात् । ० ॥२८॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुआ "[म० १,२] 1 (सः) षह [कुमार्गी] (मितावरणयोः) प्राण और अपान [ श्वास प्रश्वास के कट] के (पाशात) बन्धन से (मा मोचि न छूटे।""""[म०४] ॥ २८ ॥.. जितम् ।। स राखो वरुणस्य पाशान्मा मौधि । ॥२८॥ । सः । रा। धरणस्य । पाशात् । ० ॥२६॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुआ..."[म० १,२] 1 (सः) यह [कुमार्गी ] (वरुणस्य) श्रेष्ठ (राज्ञः) राजा के (पाशात्) बन्धन से (मा मोचि)न छूटे।""""[ म०४] ॥२६॥ जितमस्माकुमुद्भि'नमस्माकमुतमस्मा तेजोऽस्माकं प्रमा- स्माकं स्वरस्माकं यजोस्माकं पुशवोऽस्माकं मुजा अस्माकं . २६-(चावापृथिव्योः) सूर्यपृथिव्योः । अन्यत् पूर्ववत् ॥ २७-(इन्द्राग्न्याः) विद्युद्ग्न्योः । अन्यत् पूर्ववत् ॥ २-(मित्रावरुणयो) प्राणापानयोः । अन्यत् पूर्ववत् ॥ २६-(राबः) भूपतेः (वरुणस्प) भेष्ठस्य । अन्यत् पूर्ववत् ॥' 1 . - (३,२८०) अथर्वषेदभाष्ये मूलः ५१०]. धीरा अस्माकम् ॥ ३० ॥ । सुस्माकम् । ऋ तस् । अस्माकम् । तेजः। अस्माकम् जाय। शुस्माकम् । स्वः । अस्माकम् । यज्ञः । अत्याकम् । पेशवः । अस्माकम् । प्र-जाः । सुस्माकम् । पीराः । नुस्माकम् ॥ ३०॥ तस्मादमु निजामोऽगुमासुष्यायणममुष्याः पुत्रमुसौ यो।३१ तस्मात् । अमुम् । निः । भुज़ामः । अमुम् । नामप्याणम् अमुष्याः । पुधम् । असौ । यः ॥ ३१.।। मृत्योः पड्वौशात् पाशान्मा मेचि ।। ३२ ॥ सः । मृत्योः । पड्वाधात् । पाशात् । मा । मौद्धि ॥ ३२॥ तस्ये दं वर्च स्तेजः माणमानि “वैष्टयामीदमेनमधरामच पादयामि ॥३॥ - नि । केष्टु- तस्य । इदम् । घर्चः । तेजः माणस् । आयु: । नि । यामि । हुदम् । एनुम् । अधुराञ्चम् ।। पादयामि ३.३३. ॥ भाषार्थ-(जितम् ) जय किया हुश्री वस्तु (अस्माकम् ) हमारा, भिन्नम् ) निकासी किया."हुआ धन (अस्माकम् ) हमारा; (ऋतम् ) वेदज्ञान. (अस्माकम् ) हमारा, (तेजः) तेज (अस्माकम् ): हमास, क्षा) अन्न (अस्माकम् ) हमारा, (स्वः) सुख (अस्माकम् ) हमारा, (यशः) यश [देवपूजा, सगतिकरण ..और दान-] (अस्माकम् )..हमारा,. (पशवः ) सब पशु [ गौ, घोड़ा आदि ] (अल्माकम् ) हमारे,(प्रजा) प्रजागण (अस्माकम् ) हमारे और (वीराः) पीर लोग (अस्माकम् हमारे [होवे ] [ में०१ ॥३०॥ (तस्मात् ) उस पद ] ले (अमुम्) अमुक (अमुम् ) प्रमुफ पुरुष,(प्रामुष्या- यणम् ): अमुर्क, पुरुष के सन्तान, (अमुष्याः.) अमुक स्त्री के (पुत्रम् ) पुत्र - पोजशंकाएउम् ॥ १६ ॥ . ०६[५११] (३,२८९) को (निः भजामः) हम भाग रहित करते हैं, (अलौ यः) वह जो [कुमार्गी ] है-[म०२॥३१॥ (सः) वह [कुमार्गी ] (मृत्योः ) मृत्यु की(पञ्वीश्चात् ) बेड़ी के प्रवेश वाले (पाशात् ) बन्धन से (मा मोचि) न छूटे ॥३२॥ (तस्य) उस [कुमार्गी ] के (इदम्) अप (पर्ची) प्रताप, (तेजः) तेज, (प्राणम् ) प्राण और (आयुः) जीवन को (नि वेष्टयामि ) मैं लपेटे लेता हूं, (इदम् ) अव (एनम् ) इस [कुमार्गी ] को (अधराश्चम् ) नीचे (पादयामि ) लतियाता -[म०४J॥३३॥ भावार्थ-म०१-४ के समान ॥ ३०-३३ ॥ वृत्तास् [पर्यायसूक्तम् ] १-४॥ प्रजापतिर्देवता ॥ १ सान्नी त्रिष्टुप् , २ श्रायुप्णिक , ३ लानी गायत्री ; ४ आर्युष्णिक्॥ सुखप्राप्त्युपदेशः-सुख की प्राप्ति का उपदेश | जितभुस्माकमुद्भि'नमस्माकमुभ्यां विश्वाः पृतना भरोती. जितम् । मुस्माकम् । उत्-भिजस् । सुस्माकम् । अभि । मुत्थाम् । विश्वा: । पृतनाः । सुरांतीः ॥ १ ॥ भोपार्थ-(जितम् ) जय किया दुधा वस्तु (अस्माकम् ) हमारा और (उभिधम् ) निकासी किया हुआ धन (अस्माकम् ) हमारा हो], (विश्वाः) [शत्रुधों की ] सप (पृतनाः ) सेनाओं और (भरातीः) कंजूलियों को (अभि यस्थाम् ) मैं ने रोक दिया है॥१॥ भावार्थ-पराक्रमी धीर पुरुप शत्रुओं को जीतकर और उन से कर लेकर अपने वश में रखे ॥१॥ यह मन्म भाचुका है-अ० १०। ५ । ३६ ॥ तदुनिराहु तदु सोम माह पूषा मा धात माधात् सुकृतस्य लोके ॥२॥ तत् । अधिः । वाहु । तत् । ऊ इति । सोमः । श्राहु । ३२-(मृत्योः) मरणस्य (पड्चीशात् ) १०६ । ६६ । २ । सररिः। उ०११ १३४ । पश वन्धने-अदि, डित्+विश प्रवेशे-क, दीर्घः। पाशप्रवेशयु- कात् । अन्यत् पूर्ववत्-म०१-४॥ १-(जिसम् ) जयेन प्राप्तम् (अस्माकम् ) धर्मात्मनाम् ( उद्भिशम् ). उद्भेदन फरणम् । श्रायधनम् (अस्माकम् ) (अभि अस्थाम) अभिभूतधार्मिक (विश्या: ) सर्वाः (पृतनाः) शत्रुसेनाः (भरातीः) भदानशीलता ६ 1.
', : (३,२८२). अथर्ववेदभाष्ये सू०६ [५११] पूषा । मा । धात् । सु-कृतस्य । लोके ॥ २॥ भाषा-(तत्) यह (निः) ज्ञानवरूप परमेश्वर (पाह) कहता है, (तत् उ ). यही ( सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा. (आह) कहता है, (पूपा) पोषण करने वाला जगदीश्वर (मा) सुके (स्कृतस्य) पुण्य फर्म के (लोके), लोक [ समाज में (धात् ) रक्खे ॥२॥ भावार्थ-परमात्मा निरन्तर प्राज्ञा देता है कि मनुष्य सदा धर्मात्माओं के समाज में रहं फर उन्नत्तिःकरे ॥२॥ इस मन्म का कुछ भाग पा चुका है-अ०- 1.५ ॥ ५॥ अगन्स स्वर : स्वरगन्स वं सूर्यस्य ज्योतिषागन्म ॥३॥ अन्य । स्वः । स्वः । मुगुन्म । सन् । सूर्यस्य । ज्योतिषां । गन्म ॥ ३ ॥ भाषा-(स्व:) सुख [ संत्त्वज्ञान का श्रानन्द ] (गन्म ) हम पावे और (खः ) सुख [ मोक्ष प्रानन्द ] ( अगन्म) हम पावें और (सूर्यस्य) सर्व- प्रेरक परमात्मा की (ज्योतिषा).ज्योति से (सम् अगेन्म ) हम मिल जाधे ३॥ . भावार्थ--मनुष्य पुरुषार्थ के साथ तत्त्वज्ञानी होकर मोक्ष सुख पावें और परमात्मा के दर्शन के भागी होवें ॥ ३ ॥ वस्योभूयाय धनुमान युको बधु पंशिषीय : वर्ड मान भूयार वसु मयि धेहि ॥ ४ ॥ वस्यः-भूयाय । बलु भान् । युजः । वहुं । छ Yिषीय । वसु- मान् । भूयासम् । बसे । मर्यिः । ॐ हि ॥ ४ ॥ २-(तत्) इदम् ( अग्निः) ज्ञानखरूपपरमेश्वरः (प्राह ) ब्रवीति । उपदिशति (तस्) (उ) एवं ( सोमः ) सर्वोत्पादकः परमात्मा (श्राद) (:पूषा ) सर्वपोषकजगदीश्वरः (मा.) माम् (क्षो) दध्यात् (सुकृतस्य ). पण्यकर्मणा (लोके ) समाजे.॥ ३-(अगन्म) छन्दसि लुलल्लिटः। पा० ३।४।६। लिङथै लुङ, गच्छेम । प्राप्नुयाम. (एवं ). तत्त्वज्ञानसुखम् (खः) मोक्षसुखम् (गन्म) प्राप्नुयाम (सम् ) संगत्य (सूर्यस्य.) सर्वप्रेरकस्य परमात्मनः (ज्योतिषा:) तेजसा (अगन्म) प्राप्नुयाम ॥
सू०८ [ ५११] षोडशं काण्डस् ॥ १६ ॥ (३,२८३) भाषार्थ-(पस्योभूयाय ) अधिक घेष्ठ पद पाने के लिये [हमारा ] ( यशः) या [देवपूजा, संगतिकरण और दानव्यवहार ] (वसुमान ) श्रेष्ठ गुण वाला [हो], (घ) श्रेष्ठ पद (शिपीय) मैं मांगू, (धसुमान् ) श्रेष्ठ पद घाला (भूयासम् ) मैं हो जाऊं, [हे परमात्मन् ! ] (वयु) श्रेष्ठ पद (मयि ) सुभ में (धेहि ) धारण कर ॥ ४॥ भावार्थ-मनुष्य परमात्मा में विश्वास कर के यह प्रयत्न करे कि व परोपकार द्वारा संसार के भीतर श्रेष्ठ से श्रेष्ठ पद पावे ॥१॥ इति द्वितीयोऽनुवाफः॥ इति षोडश काण्डम् ॥ इति श्रीमद्राजाधिराजप्रथितमहागुणमहिम श्री सयाजी राव गायक- चाडाधिष्ठित बड़ोदे पुरीगतश्रावणमासदक्षिणापरीक्षायाम् ऋक्सामाथर्ववेदभाष्येपु लब्धदक्षिणेन श्री पण्डित क्षेमकरणदास विवेदिना छते अथर्ववेदभाप्ये पोडशं काण्डं समाप्तम् ।। इदं कारडं प्रयागनगरे मार्गशीर्षकृष्णद्वितीयायां तिथौ १९७५ [ पञ्चसप्तत्युत्तर एकोनविंशतिशतके ] विक्रमी संवत्सरे धीर-धीर-चिरप्रतापि-महायशस्थि श्रीराजराजेश्वर पञ्चमजार्ज महोदयस्य सुसाम्राज्ये मुसमाप्तिमगात् ॥ : मुद्रितम्-मार्गशीर्षशुक्ला ११ संवत् १९७५ ता० १४ दिसम्बर १३१८ ॥ ४-(घस्योभूयाय.) वसु-ईयसुन्, ईलोपः भू सत्तायां प्राप्तौ च-क्यप् श्रेष्ठतरपदप्राप्तये (वसुमान ) श्रेष्ठगुणवान् ( यज्ञः) देवपूजासंगतिकरणान- व्यवहारः (धनु) श्रेष्ठपदम् (वंशिषीय ) ०६।१।१४ । धनु याचने-श्राशी- लिडिछान्दसं रूपम्। अहं पनिषीय । याचिषीय ( वसुमान ) श्रेष्ठपदयुक्तः (वर) श्रेष्ठपदम् (मयि) पुरुषार्थिनि (धेहि ) धारय ।
No text on this page.
JA अथर्ववंदभाज्य सम्मतियां ॥ श्रीमती प्रार्य गतिनिधिसभा, पंजाब, गुरुदत्त भवन लाहौर अन्तरंग सभा के प्रस्ताव संख्या ३ तिथि ६-१२-११ की प्रति । ला० दीवान चन्द्र प्रतिनिधि आर्य समाज वटाला का प्रस्ताव, कि पं० क्षेम- करणदास को अथर्ववेद भाष्य के लिये ४०) मासिक की सहायता दी जावे, उपस्थित हुआ । निश्चय हुआ कि २५) मासिक की सहायता एक वर्ष के लिये दी जावे और उसके परिवर्तन में उतने मूल्य की पुस्तकें उनसे स्वीकार की जाय । श्रीमती मार्य प्रतिनिधि सभा संयुक्त प्रदेश भागरा और अवध, स्थान बुलन्दशहर. अन्तरंग सभा ता०४ जून १९१६ ई० के निश्चय संख्या १३ ( अ ) और ( ब ) की लिपि.। (अ) समाजों में गश्नी चिट्ठी भेजी जावं कि वे इस भाष्य के ग्राहक वने तथा अन्यों को बनायें। (घ) सभा सम्प्रति १ वर्ष पर्यन्त १५) मासिक एक क्लर्क के लिये पं० क्षेमकरणदास जी का देवे, जिसका विस्त उक्त पंडित जी कार्यालय सभा में सेजते रहे। इस धन के बदले में पंडित जी उतने धन की पुस्तके सभा को देंगे। लिपि गश्ती चिट्ठी श्रीमती प्रार्यप्रतिनिधि सभा जो पूर्वोक निश्चय के अनुहार समाजों को भेजी गयी (संख्या ५८७६ प्राप्त २० जूलाई १८१६ ई० ) ॥ ओ३म् ॥ मान्यवर, नमस्ते! आप को शात नोगा कि धार्यसमाज के अनुभवी वयोवृद्ध विद्वान् श्री पं० क्षेमकरणदास त्रिवेदी गत कई वर्षों से बड़ी योग्यता पूर्वक अथर्ववेद का भाष्य कर रहे हैं। श्राप ने महर्षि दयानन्द के अनुसार ही इस भाग्य का करने. का प्रयत किया है। भाप्य साण्डी में निकलता है अथ तक ६ कांड निकल चुके हैं। आर्यसमाज के वैदिक लादित्य सम्बन्ध में वस्तुतः यह बड़ा महत्त्वपूर्णकार्य हो रहा है। निवेदी महाशय के भाष्य की जानकारों ने खवं प्रशंसा की है। परन्तु खेद है कि अभी प्रार्थनमाज में उच्च कोटि के साहित्य को पढ़ने की और लोगों की बहुत कम रुचि है। जिसके कारण त्रिवेदी जी अर्थ हानि उठा रह हैं । भाष्य के ग्राहका बहुत कम है। स्वागत तक वसूल नहीं होती । घेदों का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना पार्यमान का प्रधान कर्तव्य है। अतएवं सविनय निवेदन है कि वैदिक धर्मामान श्री त्रिवेदी को उनके महत्वपूर्ण गुरुतर कार्य में साहस दान करें । स्वयम् ग्रहक बने और दूसरों को बनावें। ऐसा करने से भाष्यकार महाशय उसे छापने की अर्थ सम्बन्धिनी चिन्ताओं से मुक्त होकर भाष्य को और भी अधिक उत्तमता से सम्पादन करने की योर प्रवृत्त होंगे। आशा है कि वेदों के प्रेमी उक्त प्रार्थना पर ध्यान दे इस ओर अपना कुछ कर्तव्य समभंगे। प्रत्येक शार्य के घर में वेदों के भाष्य होने चाहिये । समाजक पुस्तकालयों में तो उनका रचना बहुत ही जरूरी है । भाष्य के प्रत्येक कांड का मूल्य त्रिवेदी जी ने बहुत ही थोड़ा रक्खा हैं। प्रिवेदी जी ले पन ध्यवहार ५२ लूकर गंज, प्रयाग के पते पर कीजिये। जल्दी से भाष्य मंगाइये। भवदीय- नन्दलाल सिंह, BSo. : LL.B. उपमन्त्री। । - (४) । चिट्ठी संख्या ६७० तिथि १०-१२-१५१४ । कार्यालय श्रीमती आर्य- प्रतिनिधि सभा, संयुक्तप्रान्त नागरा व नवध, बुलन्दशहर । आपका पत्र संख्या:१०१ तथा अथर्ववेद भाष्य का तृतीय कांड मिला। इस : कृपा के लिये अनेक धन्यवाद है। वास्तव में आप आर्यसमाज के साहित्य को समृद्धि शाली बनाने में बड़ा कार्य कर रहे हैं, आपकी विद्वत्ता और कृपा के लिये आर्य संसार ही नहीं, प्रत्युत प्रत्येक शिखा सूत्र धारी को. आभारी होना चाहिये । ईश्वर श्राप को उत्तरोत्तर उस महत्त्व पूर्ण कार्य के सम्पादन आर समाप्त करने के लिये शक्ति प्रदान करें, ऐसे उपयोगी 'ग्रन्थ प्रकाशन को. आप सदैव जारी रक्खें यही प्रार्थना है। भवदीय मदनमोहन सेठ (एम० ए०, एल० एल० बी०) मन्त्री सभा। .. - श्रीमान् पण्डितं तुलसीराम स्वामी-प्रधान आर्य प्रतिनिधि सभा संयुक्तप्रान्त, सामवेद भाष्यकार, सम्पादक वेदप्रकाश, मेरठ-१६१३ । ऋग्यजुर्वेद का भाष्य श्रीस्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने संस्कृत और भाषा में किया है, सामवेद का श्री पं०.तुलसीराम स्वामी ने किया है, अथर्ववेदं के भाष्य की बड़ी आवश्यकता थी । पं० क्षम मकरण दास जी.प्रयाग निवासी ने इस प्रभाष को दूर करना श्रारम्भ कर दिया है। भाष्य का क्रम उच्छा है। यदि. इसी प्रकार समस्त भाष्य बन गया, जो हमारी समझ में कठिन है, तो चारो वेदों के भाषा भाष्य मिलने लगेंगे, आर्यों का उपकार होगा। .. . . श्रीयुत महाशय नारायणप्रसाद जी-मुख्याधिष्ठाता गुरुकुल वृन्दावन मथुरा-उपप्रधान आर्य प्रतिनिधि सभा, संयुक्त प्रान्त । श्रार्थमित्र मागस, २४ जनवरी १९१३॥ श्री पं० क्षमकरणदास त्रिवेदी प्रयाग निवासी, ऋक्, साम तथा अथर्ववेद सम्बन्धी परीक्षोत्तीर्ण अथर्ववेद का भाषा भाष्य करते हैं, मैं ने सम्पूर्ण[प्रथम] कांड का पाठ किया।त्रिवेदी जी का भाष्य ऋषि दयानन्द जी को शैली के अनु- सार भावपूर्ण संक्षिप्त और स्पष्टतया प्रकट करने वाला है कि मन्त्र के किस शब्द के स्थान में भाषा का कौनसा शब्द आया, फिर नोटों में व्याकरण तथा निरुक्त के प्रमाण, प्रारम्भ में एक उपयोगी भूमिका दे देने से भाष्य की. उप- "योगिता और भी बढ़ गई है, निदान भाष्य अत्युत्तम, आर्यसमाजका पक्षपोषक और इस योग्य है कि प्रत्येक प्रार्यसमाज उसकी एक २.पोथी (कापी) अपने . पुस्तकालय में रक्खें। : त्रिवेदी जी ने इस भाष्य का प्रारम्भ करके एकबड़ी कमी.के पूर्ण करने का . ..
145 उद्योग किया है। ईश्वर उनको बल तथा वेद प्रेमी आवश्यक सहायता प्रदान करें निर्विघ्नता के साथ वह शुभ कार्य पूरा हो...छपाई और काग़ज़ भी अच्छा है। ' श्रीयुत महाशय मुन्शीराम जी-जिज्ञासु मुख्याधिष्ठाता गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार-पत्र संख्या ६४ तिथि २७-१०-१६६६ । अथर्ववेद भाष्यं श्राप का दिया व किया हुश्री अवकोशानुसार तीसरे हिस्से के लगभग देख चुका हूं आप का परिश्रम सराहनीय है। तथा- पत्र संख्या ११४ तिथि २२-१२-१९६६ । अवलोकन करने से भाष्य उत्तम प्रतीत हुआ। श्रीयुत पं० शिवशंकर शर्मा-फाव्यतीर्थ-छान्दोग्योपनिषद्भाष्यकार, घेदतस्वादि ग्रंथकर्ता वेदाध्यापक कांगड़ी गुरुकुल महाविद्यालय, आदि आदि, सम्पादक आर्यमित्र- फरवरी १९१३।। अथर्ववेद भाष्य । श्री पं० क्षेमकरण दास त्रिवेदी जी का यह परिश्रम प्रशंसनीय है।... . आप बहुत दिनों तक सरकारी नौकरी कर, और अब वहाँ से पेन्शन पाके अपना सम्पूर्ण समय संस्कृत पढ़ने में लगाने लगे। अन्ततः आपने वेदों में विशेष परिश्रम कर बड़ौदा राजधानी में वेदों की परीक्षा दी और उनमें उत्तीर्ण हो त्रिवेदी बने हैं। श्रीप परिश्रमी और अनुभवी वृद्ध पुरुष हैं। आप का अथर्ववेदीय भाष्य पढ़ने योग्य है। श्रीयुत पंडित भीमसेन शर्मा इटावा-उपनिषद् गीतादि भाष्यकर्ता वेदव्याख्याता कलकत्ता यूनीवर्सिटी, सम्पादक ब्राह्मण सर्वख इटावा, फरवरी १६१३॥ अथर्ववेद भाष्य-इसे प्रयाग के पण्डित क्षेमकरण दास त्रिवेदी ने प्रकाशित किया है। इसका क्रम ऐसा रक्खा गया है कि प्रथम तो प्रत्येक सूक्त के प्रारम्भ में..." अभिप्राय यह है कि भाष्य का ढंग अच्छा है भाग्यकर्ता के.मानसिक विचारों का मुकाव आर्यसामाजिक सिद्धान्तो की तरफ़ है, अतएव भाग्य भी आर्य सामाजिक शैली का हुआ है। तव भी कई अंशों में स्वामी दयानन्द भाष्य से अच्छा है। और यह प्रणाली तो बहुत ठीक है। । श्रीमती पंडिता शिवप्यारी देवी जी, १३७ हकीम देवी प्रसाद जी अतरसुइया, प्रयाग, पत्र ता० २१-१०-१९१५ ॥ श्रीयुत पण्डित जी नमस्ते, महेवा के पते से आप का मेजा हुआ पत्र और अथर्ववेद भाष्य चौथा कांड मिला, मैंने चारों कांड पढ़े, पढ़कर अत्यन्त.अानन्द प्राप्त हुआ। आप ने इम सभों पर अत्यन्त कृपा की है माप को अनेको धन्यवाद हैं। आशा है कि पाँचवाँ कांड भी शीत्र तैयार होकर पी० पी० द्वारा मुझे मिलेगा। : , . .
- दो पुस्तक हवनमन्त्राः की जिसका मूल्य || है, कृपाकर भेज़ दीजिये मेरी एक वहिनको आवश्यकता है। श्रीयुत पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी कानपुर, सम्पादक सर. स्वती प्रयाग, फ़रवरी १६१३ 1. अथर्ववेद भाष्य-श्रीयुत क्षेमकरण दास . त्रिवेदी जी के वेदार्थज्ञान और श्रम का यह फल है, कि आप ने अथर्ववेद का भाष्य लिखना और कम क्रम से. प्रकाशित करना प्रारम्भ किया है...बड़ी विधि से प्रापं भाग्य की रचना कर रहे हैं। स्वर सहित मूल मन्त्र, पंद पाठ, हिन्दी में सॉन्वय अर्थ, भावार्थ, पाठान्तर, टिप्पणी आदि से आप ने अपने भाष्य को अलंकृत किया है:..आप की राय है कि "वेदों में सार्वभौम विज्ञान का उपदेश है।। आप का भान्य खामी दयानन्द सरस्वती के वेदभाष्य के ढंग का है श्रीयुत पण्डित गणेश प्रसाद शर्मा-संपादक भारतसुदशाप्रवर्तक फतहगढ़, ता० १२ अप्रैल १९१३ हर्ष की बात है कि जिस वेद भाष्य की बड़ी आवश्यकता थी, उसकी पूर्ति का आरम्भ होगया। बंद भाष्य बड़ी उत्तम शैली लें निकलता है । प्रथम मन्त्र पुनः पदार्थयुक्त भाषार्थ, उपरात्त भावार्थ, और नोट में लन्देह निवृत्ति के लिये धात्वर्थ भी व्याकरण व निरुक्त के आधार पर किया गया है, वैदिक धर्म के प्रेसियों को कम से कम यह समझ कर भी ग्राहक होना चाहिये कि उनके मान्य प्रन्थ का अनुवाद है और काम पड़े पर उससे कार्य लिया जा सकता है। to- वा कालिकाप्रसाद जी लिल्क मर्चेन्ट कमनगढ़ा, बनारस सिटी संख्या ३-४ ता०२७-३-१३॥ आप का भेजा अथर्ववेद भाष्य का वी० पी० मिला, मैं आप का भाष्य देख कर वहुत प्रसन्न हुन्ना, परमेश्वर सहाय करें कि आप इसे इसी प्रकार पूर्ण करें। आप बहुत काम एक साथ न छेड़कर इसी की तरफ़ समाधि लगाकर पूर्ण करेंगे । मेरा नाम ग्राहकों में लिख लीजिये, जब २ अङ्क छपें मेरे पास भेज देना। श्रीयुत महाशय रावत हरप्रसाद सिंहजी वर्मा,मु० एकंडला पोस्ट किशुनपुर, जिला फतेहपुर हसवा, पत्र ६ दिसम्बर १९१३ , वास्तव में पाए का किया हुआ "अथर्ववेद भायण निष्पक्षता का प्राश्रय लिया चाहता है। आपने यह.साहस दिखाकर साहित्य भएडार की एक..वड़ी. भारी न्यूनता को पूर्ण कर दिया है। ईश्वर प्रांप को वेद भण्डारे के प्रावश्य- कीय कार्यों के सम्पादन करने का बल प्रदान करें। .. भीयुत महाशय पंडित श्रीधर पाठक. जी, ( सभापति हिन्दी साहित्य सम्मेलन लखनऊः)मनोविनोद आदि अनेक ग्रन्थों के-कर्ता, सुपरिन्टेन्डेन्ट गवर्नमेंट सेग्रेटरियट, पी० डब्ल्यू० डी० श्री प्रयागराज, पत्र, ता०१७-६-१३॥
मापका अधद भाष्य अवलोकन करचित अत्यन्त सन्तुष्ट हुा । श्राप जी यह पाण्डित्य-पूर्ण कृति घेदार्थ जिज्ञासुओं को बहुत हितकारिणी होगी । आप का व्याल्याकम परम मनोरम तथा प्रांजल है, और अन्य सर्वथा उपादेय है। प्रकाश लाहौर १२ पापाढ़ संवत् १८७३ ( २५ जून १८१६ लेखक श्रीयुत पं० श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जी) हम पण्डित क्षेमफरणदास जी का धन्यवाद करने से नहीं रह सकते- स्वामी ( दयानन्द ) जी ने लिखा है-फि वेद का पढ़ना पढाना आर्यों का परम धर्म है-इसके अनुकूल श्री पंडित जी अपना समय वेद अध्ययन में लगाते है-और पायों के लिये परम उपयोगी पुस्तक प्रकाशित करने में पुरुषार्थ करते रहते हैं-पंडित जी ने इस समय तक हवन मन्त्रों तथा रुद्राध्याय का भाषा में भर्थ प्रसिद्ध किया है जो कि मार्यों के लिये पठन पाठन में उपयोगी हैं। इस सम्बन्ध में यह अथर्ववेद के पांच कांड छपवा फर निःसन्देह वड़ा लाभ पहुंचाया है। आर्यों की जो शिक्षा प्रणाली थी उसको टूटे' आज पांच हजार वर्ष हो चुके हैं। पंसे अंधेरे के समय में स्वामी जी ने वेद के ऊपर सोगों के भीतर धद विश्वास उत्पन्न करके एक धर्म का दीपक प्रकाशित फिया । परन्तु हमें शोक यह है वेद के पढ़ने पढ़ाने में प्रार्य लोग इतना समय नहीं लगाते जितना घे प्रयन्ध सम्बन्धी भगढ़ी की बातों में लगाते हैं। हमारा विश्वास है कि जब तक पं० क्षेमकरणदास जी जैसे चेदाभ्यासी परुषार्थी लोग अपना समय घेदों के ग्बोज में न लगायेंगे तब तक आर्य समाज का कोई गौरव नहीं पढ़ सकता । अथर्ववेद में अर्थ खोजन में घड़ी कठिनता है । इसके ऊपर सायण भाष्य उपलब्ध नहीं होता, जो इस समय तक छपा हुआ है वह बड़ अधूरी दशा में है, सूक्त के सूक्त ऐसे हैं कि जिनके ऊपर अब तक कोई टीका नहीं हुई।..... ..... इस समय जो पांच कांडों का भाष्य पंडित जी ने प्रका- शित किया है उसके लिखने का ढंग बड़ा अच्छा और सुगम है। प्रथम उन्होंने सूफ के तथा मन्त्रों के देवता दिये हैं-पश्चात् छन्द...विद्वानों का यही काम है कि वह जैसे जैसे साधन उनके पास हो पैसा वैसा सोच कर वेद मन्त्रों का अर्थ प्रकाशित करें। ऐसे सैकड़ों प्रयत्न जय होंगे, तब सच्चे अर्थ खोज करना आगामी विद्वानों को सरल होगा। परन्तु इस समय बड़ी भारी कठि. नाई यह है कि प्रकाशित पुस्तकों के लिये पर्याप्त संख्या में ग्राहक नहीं मिलते है और विद्वानों के पास सम्पत्ति का अभाव होने के कारण हानि के डर से पुस्तकों का प्रकाशित करना बन्द होता है । इसलिये सब आर्यों को परम उचित है कि पंडित क्षेमकरणदास जी जैसे विद्वान् पुरुषार्थी के अन्ध मोल लेकर उनको अन्य अन्य प्रकाशित करने की प्राशा देते रहे। त्रिवेदी जो कोई धनाढ्य पुरुष नहीं हैं, उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति जो कुछ बनके पास है लगा दी है..." .."त्रिवेदी जी ने जो कुछ किया है वह वैदिक धर्म के प्रेम से प्रवृत्त होकर-इस लिये न केवल सव आर्य पुरुषों का यह कर्तव्य है कि इस भाष्य को मोल लेकर त्रिवेदी जी को उत्साहित करें किन्तु धनाड्य आर्य पुरुषों का यह भी कर्तव्य है कि उनकी आर्थिक सहायता करें। .
مسبا [. The VIDY ADHIKARI (Minister of Education), Buruda State; letter No 624.dated 6th February 1913. ...It has been decided to purchase 20 copies of your book entitled yaad jour. It has been sanctioned for use of the library and the prize distribution.. Please send them ..also add on the address lable : For. Encouragement Fund. RAI THAKUR DATTA RETIRED DISTRICT JUDGE, Derą, Ismail Khan Letter dated: March 25th, 1914. The Atharva Veda Bhashya:--it' is a gigantic - task and speaks :-volumes for your energies. and perseverance that you should have · undertaken at an advanced age I wish I had a portion of your will.- power. Letter dated zoth April 19.14. I very much admire your labour'uf. lore and hope..the venture will not fail, for want of pecuniary support 1 THE MAGISTRATE OF ALLAHAABD. Letter No: 912 dated 21st May 1915. Hąs the honour to request' him to be so good aš to send a copy each of the 1st and 3rd Kandas of Atharva Veda Bhashya to this office for transmission to the India Office, London: THB ARYA PATRIKA, LAHORA? APRIL' 18:1914. THE IE Atharva Veda Bhashya or commentary on the Atharva Veda, which is being published in' parts by Pandit Khem Karan Das Triredi; does great credit to his energy. perseverance and scholarship. The first part contains the Introduction and the first: Kandà or Book. There is a learned disquisition on the origin of the Vedas and the preeminent position in Sanskrit literature .... The arrangement is good, the original dantra is followed by a literal translation and their bhavarth or purport, in Arya Bhasha. The 'footnotes are copious ; they give the derivation and meaning in Sanskrit of the various words quoting the authority of Ashtadhyayi. of. Panini, Unadikosha of Dayananda, Nirukia of Yaska, Yoga Darshana of Patanjali and other standard ancient works... .. The Pandit; appears to have laboured very hard and the Book. before us does credit to his erudition ; scholars inay, not agree with certain of his renderings, but like a true Arya, who.venerates the Vedas, he has made an honest attempt to find in the Vedic verses something which will elevate and ennoble mankind.. Cross references to verses where the word has already occurred in this: Veda'are also given to enable the reader to compare notes: "There can be no finality in Vedic, interpretation, but honest attempts like these which shall render' the task easy to others are commendable. We are glad to call public attention to this scholarly work; and hope that Pandit. Khem Karn Das Trivedi 'will get the 'encourågement which he. so richly deserves... ... Our carnest request is that the revered Pandit. will go on with this noble work and try to fish tusyhole before he is called to etdrnal.resti.., V.B --Tuo priating and paper aro lyrice iş modcrater Spirit
No text on this page.