Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Veerstuti
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PREFAOL. करके निर्माण की है। इस परिस्थिति में मेरे अन्तेवासी सुमित भिक्खु ने यथा सभव इस पुस्खकके मुफ देखकर महायता की है अतः इसका नाम लिखते समय मुझे प्रसन्नता होती है इस पुस्तकमे अज्ञताके कारण यदि कहीं भूल होगई है तथा सूत्रसिद्धा- तसे विरुद्ध कुछसे कुछ लिख गया हूं तो उसका निखालिस हृदयसे "मिथ्या दुष्कृतम्" बोरस्तुतिके अभ्यासिओ! इस भावशुद्धि पूर्वक पढिये, पठन और मनन के द्वारा ज्ञातपुत्र महावीर प्रभुके समान बनिये, एवं अपने हृदयसे पुरानी रूढियें एवं पक्षवादटोलाबाद-सम्प्रदायवाद-गच्छवाद-पाटीबाजी और मतभेदका कालापाप निकाल डालिये, और समदृष्टि बनकर भारतके दासत्वको दूर कीजिये जगतको भूखेमरने से बचाइये, अपने धर्मगुरुओंको राग-द्वेपईया एवं मत्सरताके कीचडसे निकालिये, समाजमें सच्चरित्रता और पारस्परिक सहानुभूति पैदा करनेका प्राण सथार कीजिये, मेरी अन्तिम भावना यही है।
प्रस्तावना काव्यं तदमूल्यमण्यनुपर्म शम्दाधरनाकर, श्रीवीरस्तुतिनगमतोऽवि. प्रथितं पुच्छिस्सुणस्याऽपि न । श्रीमत्सूत्रकृताङ्गसूत्रकरसाध्यायस्थसारात्मक, यनित्यं प्रपठन्ति श्रावकगणाः साधूतमाः सादरम् ॥ कण्ठेनव मुमुक्षुवश्च पठनं कुर्वन्ति यस्यानिशं, एवं जनसमाजकेऽपि निरताः स्वाध्यायमस्य प्रियम् । पाठं चास्य महत्प्रियात्प्रियतरं कुर्वन्ति प्रेमान्विता, जातं संस्करण पवित्रजननं यस्या:- प्यने मुहुः। यत्राऽनन्तदयाकरस्य निखिलं सामर्थ्यसंवर्णनं, तचाल्पज्ञमनुष्य- जस्य नितरां शकेथ वायं भवेत् । आचार्येण मुधर्मणा विरचितं यद्वै कृते योगिनां, योग्यं प्रोचमिदं विधार्थ सुपिया मोदप्रमोदाधिनाम् ॥ काम्पेऽस्मिन्पुनरफिरखि मुनिभिर्नोदावनीया कचिदृश्याऽध्येतृगणस्यपाठकरणाच्छब्दार्थसगौरवात् । धीम- देवगणस्य वाक्यतुलना तादात्म्यदृष्ट्यात्मकारसत्यासत्यविचारचारुनयनात्सम्पूर्णतत्वं महत् । सर्वाङ्गस्य रहस्यबोधजनने स्पष्टं भवेद्बोधनं, श्रीमद्धर्ममयस्य धीगण- घराचार्यस्य कश्वाशयः। प्रत्येकार्थगत कियत्कविविधं भिनं तथा प्रस्फुटं, सर्व काव्यगतं समस्तविषयो विज्ञानरूयात्मकम् ॥ आचार्येण मुधर्मणा रसयुते काव्येऽत्र शिघ्याय च, स्वान्त स्थाय च जम्युदेवमुनये यद्दर्शितं प्रेमतः । ज्ञानं शासनना- यकलमखिल तीर्थरत्वं तथा, अन्त्यं घेतमत्वमेव जगतासुद्धारकत्वं पुनः॥ श्रीयोगीन्द्रशिखामणेभगवतो वीरस्य ज्ञान तथा, चारित्रं खलु दर्शनं च बहुधा खाध्यायज्ञानं मुहुः । सुस्पष्टं च निदर्शितं प्रविततं केन प्रकारेण च, तद्वत्तद्गुण- साम्यमेवमसिलब्रह्माण्डमाण्डोदरे । खाध्यायं प्रतिप्रेमिणा च महतां सम्भावु- कानां पुरः, श्रीमोगणदेवनायकवराणां मुन्दरं चोत्तमम् । सनित्यं हितकारका- शययुतं तेनैव साकं तथा, अध्यात्म्याख्यरसान्वितागतमहाचार्यामराणामलम् ॥ एवं कोविदकाव्यकौशलयुजां सट्टा सर्वाशय, टीकायां मुसमन्वित प्रविततं कृत्वाऽत्र सन्दर्शितम् । जैनानां च नृणां तदन्यविदुषां स्थान प्रदत्तं पुनः, शास्त्राणां निखिलं समन्वयमदोऽभेदेन शश्वत्कृतम् । अयं निर्विवादः स्वयं सिद्ध- रूपः, समस्खस्य काव्यस्य मूलं शिखेति । द्वयं सिकमध्यात्मतत्वाम्भसा च, कुतो प्रायवे पाणपत्यापदेन ॥ महा सुप्रभावस्य तेजोमयस्य, मुधर्माध्यदेवस्य चेह- विधानरो जीवने स्वस्य चात्मोपरिष्ठात्प्रभावम्य संस्थापनार्थ प्रयासार। तथा:- ध्यात्मतत्वोत्तम पाठमेवं, सदा सम्प्रय तथाऽभ्यासकार्थम् । अझ तस्य तत्वार्थ- 9 मावार्थकस्य, प्रबोधार्थमसन्तमावश्यकलम् । अतोऽप्यस्य मूलशयं सम्प्रचार्य, गृहस्तसमेतत्तथाऽध्यात्मपूर्णम् । शुभाऽध्यायजस्य यथा बुद्धिशकिः, समसं यथार्यानुभावं च ज्ञात्वा । सुसंस्कारशब्देन वा भाश्या च, समृद्धं कृतं वस्य मुख्यो- ऽखि हेतुः । तथा मातृभाषानिबद्धं प्रसिद्ध, जनानामनेकार्थतत्वप्रदीपम् । तथा ज्ञापनार्थ च भावस्य तस्य, ऋजुर्वा मृदुर्वाऽस्य भाषानुवादः। तदाऽवश्यकत्वं च तस्यैव भावं, मृदुत्वं प्रगृह्य स्फुटं भासते च ॥ गुर्जरे चानुवादोऽस्य कालीय- कत्तानिशमेन क्षेमेन्दुनाऽस्य प्रकाशः। कृतः श्रावकेसाथ तस्यैव तलं, तथा सुप्रसिद्धोऽनुवादः खतन्त्रः॥ कदाचिबनानां निपुटदलवन्दे च जनता, प्रसता नामेवं यदि सदुपयोगय भवति । सदेतद्भावेन विबुधजनसेवामु निरतः, प्रकाशं सर्वत्राऽखिलविशदबोधाय कृतवान् ॥ पवित्रोऽयं पाठो बहुरुचिकरो मेऽखि मनसा, करोमि स्वाध्यायं मननपरिपूर्णेन मुखतः। महानन्दवादो भवति कर- णाचास्य सततं, मुलब्धं सौभाग्य प्रतिदिन वितृष्णो विरमति ॥ मुमुक्षूणां चिते सुखरसमुशान्ति वितनुते, मुहुर्जिज्ञासा नो बहुविधमलं चास्य वितिः । तदा जाता भावाखिलमतिसुपूर्तिनिगदिता, सदैव ज्ञातव्यं यतिमुनिगणैर्मुकिनिलयैः ॥ यदा- वश्यकत्वेन यस्याऽस्ति पूर्तिः, प्रजाता च संस्कारतोऽनेकवारम् । समर्थध सर्वातो लब्धमेतत्तदाऽस्योत्तर पत्रमेतद्ददातु ॥ अथो पाठकानां जनानां च म्य, तथा वाचकोपर्य्यतो मुझमेतत् । ममाऽस्य प्रलेखेन वा ज्ञापनेन, न वाऽवश्यकत्वं न वा कारणत्वम् ॥ यदा पीयते चामृतं खादवद्भिखदानोच्य- तेऽमर्मता मेऽस्ति कीदृक् । सुमिष्टं च तिक्तं मदीयं कियदा, प्रसिदं हि लोके रसास्वादुकत्वम् ।। मुदा वर्णनं तस्य जिला करोति, खयं वर्णनस्यादिसेतुं विधत्ते। मया न्यायमार्गानुरोधेन चैव, खकीयायसी लेखनी स्थाप्यतेऽत्र ॥ भावार्थ-यह काव्य श्रीमत्सूत्रकृतामसूत्रके छठवें अध्यायकी अनुपम और मौलिक वस्तु है. और 'धीरस्तुति' या 'पुच्छिस्सुणं के नामसे अतिप्रख्यात है। बहुतसे जैनबन्धुओंको तो यह मुखस्थ होती है, अनेक जिज्ञासु महानुमान इसका प्रातःसायं व्यवधान रहित नित्य पाठ करते हैं, और जैन समाजमें यह पवित्र पाठ इतना अधिक प्रिय है कि इसके कई संस्करण प्रकाशित हो चुके है। प्रभुके अनन्तसामर्थ्यका वर्णन करना तो मानो उमस्थ मानुशी शक्षिके बाहर है, और इस विषयके वर्णनकरनेमें श्रीमान् सुधर्माचार्य जैसे महान् ज्योतिर्धर और परम योगीको ही योग्य भधिनरी समय गया है। .
८ . अपलक दृष्टिसे खाध्यायकरनेपर पाठकोको इस काव्यमें कई स्थलोंपर कुछ पुनरुक्किएँ भी प्रतीत होंगी, परन्तु प्रत्येक शब्द, और.शब्द-खामी गणधर- देवके वाक्यका तुलनात्मकदृष्टिसे मनन करनेपर तलका सम्पूर्ण और सर्वात रहस इस प्रकार सरलतासे समझमें आता है कि गणधरभगवान्का मुख्यः आशय प्रत्येक शब्द और अर्थमें कितना भिन्न और स्पष्ट है। 1 इस काव्यमें भगवान् मुधर्माचार्य अपने अन्तवासी शिष्य जम्बूको यह बताते हैं कि शासननायक-चरमतीर्थकर-जगदुद्धारक-श्रीमहावीरयोगीन्द्रचूडामणिके ज्ञान-दर्शन और चरित्र आदि गुण किस प्रकारके थे, उन गुणों की तुलना जगत् भरकी सर्वोत्तम धारभूत वस्तुओंके साथ करके प्रभुका महत्व बताया गया है। खाध्यायप्रेमी महानुभावोंके सन्मुस धीमद्गणधरोंके परममुन्दर और हितरूप आशयके साथ मिलते जुलते भाव तथा अन्यान्य अध्यात्मरसिक आचार्य और कविको विदोके आशयोंका भी इस विवृतिमें समन्वय किया है और जिसमें जैन तथा जैनेतर अन्योंको स्थान देते समय किसी प्रकारका भेद नहीं रक्खा है। यह निर्षिवाद और अपने आप सिद्ध है कि इस काव्यका मूल और शिखा दोनों ही अध्यात्मरसमें परिसिञ्चित हैं क्योंकि गणधरपदविराजित महा- प्रभावशाली श्रीसुधर्माचार्य भगवानकी तो यह कृति है, और मनुष्यमा- नको अपने जीवन में अपने आत्माके ऊपर अध्यात्मविषयक प्रभाव डालनेके लिये इस प्रकारके उत्तमोत्तम पाठों को सदैव बोलवे रहनेका अभ्यास रसनेकी तथा उसके तत्वमयभावार्थको समझनेकी भी अत्यन्त आवश्यकता है, अतः इसी मूल आशयको लेकर इस महान् एवं स्तुत्य अध्यायको यथामति यथाशक्ति ' एवं यथानुभव संस्कृतविकृति तथा भाषानुवादसे समृद्ध किया है। इसका एक मुख्यकारण यह भी है कि हमें भगवान महावीर प्रभुकी देन है और उसे उनके तत्वको संसारके कोने कोने तक पहुंचाकर ही पूरा किया जा सकता है। और,मातृभाषामें सर्वसाधारण जनताको तत्ववोध और उसका अन्तर्भाव समर झानेकेलिये उसके सरलातिसरल भाषान्तरकी भी बड़ी आवश्यकता है। इन्हीं भावोंको लेकर इसका गुर्जर-अनुवाद भी कलकत्ता निवासी श्रीक्षेमचंदनादकसे कराया है, और उन्होंने भी इसका गुर्जरगिरा, खतन्त्र अनुवाद किया है। यदि कदानित, यह त्रिपुटी जनसमाज तथा प्राणीमात्र के लिए उपयोगी के सके इस भावसे प्रेरित होकर इसका प्रकाशन किया है। मुझे तो इसके प्रति- समयके खाध्याय और पाठसे भरपूर शांतिमुधाधाराका अन्यवच्छिन्नरूपये आखादन करनेका पूर्ण सौभाग्य मिल रहा है। अतः मुझे पूर्ण आशा है कि अन्यान्य मुमुक्षुमहानुभावोंको भी इसके निरन्तर पाठ तथा मननात्मक स्वाध्यायसे अवश्य शान्तरसकी प्राप्ति होगी। यद्यपि इसकी कई आत्तिए निक- लकर प्रकाशित हो चुकी हैं परन्तु यह संस्करण जिस आवश्यकताकी पूर्तिम सर्वाङ्ग सफल हुआ है इसका उत्तर पाठकगणोंके ऊपर ही छोड दिया जाता है, कहने सुनने और लिखनेकी आवश्यकता नहीं है। कारण यह है कि जिस समय अमृतका पान किया जाता है उस समय वह जनताको यह नहीं कहता है कि मेरा स्वाद कैसा है? उसका वर्णनतो जिह्वा खयं करने लगती है तथा उसकी प्रशंसाके पुल बांध देती है। अतः इम न्यायको लक्ष्यमें रसकर इस रोहलेखनीको विराम देता हूं। लघुतम- 'पुष्फ भिक्खु.
सहायक धीरस्तुतिकी विकृतिके अर्थ बिन जिन पुस्तकों का अवलोकन करके अपने अनु नकानुसार जिन जिनके प्रमाण अधित किये हैं उनका नामोठेख इस प्रकार है। म्यास्यामप्ति-आचारा:-विशेषावश्यकभाष्य-धन्यकुमारचरित-समकापासूत्राविति. सूयगडांगमुच शम्मार्थचिननामणि-अमरकोष कुलार्णमेदिनी-धनधयनाममाला-धनधय. कोश शम्दस्तोममहानिधि-वर्ण निर्णय-वर्णसारममुच्चय उत्तराध्ययनव-दश्वकातिकमूत्र. मारण्डेयपुराण-सुपारितरलसमोह-नत्वार्थाधिगम-मनुस्मृति-नारम्यसंमर-परमात्मान कारयावस्त्रयस्मृति-स्पानासूत्र भनितगतिमावकाचार समयसार भवचनसार-नियम- सार-योगशाख-पतलियोगदर्शन-महारानित्यपाठ-सागारधर्मामृत-पषमयपाश्वनाथचरित्र- मभिधानपदीपिका-महाभारत-हानार्णव-भावश्यकचूर्णि-जैनप्रकाशकाउत्थानअंक-परिशिष्ट- पर्व चात्स्यायनसूत्र युद्धचर्या मसिमनिकाय पुरुषासिराय रखकरण्डप्रावकाचार-भव- लसिद्धान्तमूलाचार आवश्यकभाष्य-पशापनासूत्र-प्रवचनसारोदार-भगवदी आराधना सार स्तोत्रसमुच्चय-स्तोवरसाकर-काम्यमाला. इन सब पुस्तकोंके मुलेखक एव भनुवादकों का एक साथीदारों के नाठेसे इनके साथको में कभी नहीं भूल सकता। तदुपरान्त प्रत्यक्ष या परोक्षमें जिन जिन मानुभा. पौने प्रोत्साहन प्रेरित किया है उन मरका ठेस करना भला में क्योंकर विस्मृत करसई' विवृतिकारः । निदर्शन उपासकके अन्तरमें भकिभावका भोष उछलने लगता है तब स्तोत्र या स्वतिका साहित्य-सर्जन होता है, इस प्रकारकी भारतीमें कई बार अमूल्य रन चहकर निकल आते हैं । विवेचक इन रनोंका मूल्य आंकने एवं समझनकेलिये लम्बे चौडे भाष्य और टीकाएँ बनाते हैं। जैन साहित्यमें तीर्थकर भगवान्की स्तुतिओंका साहित्य पुष्कळ प्रमाणमें पाया जाता है। यहां तक तो है, कि अन्य कोई दर्शन उसकी बराबरी नहीं करसकता, यह कहदें तो कोई अत्युक्ति न होगी। समर्थ नैयायिक और वैयाकरणी भी काव्यसाहित्यमें जो कुछ अपनी प्रतिभा उंडेलनेको उद्यत हुये हैं तो वह भी स्तुतिसाहित्यका ही प्रताप है। आमका वृक्ष फलोंसे लदा हो, मजरी महकती हो और वसन्तका वायु चलता हो तो कोयल परवरा होकर भला पंचमखर निकाले विना क्योंकर रह सकेगी? इसी प्रकार न्याय-दर्शन-व्याकरण या अन्यान्य कठिनसे कठिन शास्त्रों में पारे- गत समझे जानेवाले पुरुषोंके अन्तरमें किसी समर्थपुरुपके प्रति भक्तिभाव जागृति हो तो वे स्तुति के साहित्यकी उपेक्षा कभी न कर सकेंगे। चन्द्रदर्शनसे उभरकर बढनेवाले महासागरकी भांति अन्तर भी भकिसे संक्षुब्ध बन जाता है। परन्तु परमपुरुषकी स्खतिओंमें केवल काव्य अथवा साहित्यका ही अश हो यह मान्यता युफिसंगत नहीं है। स्तुतिका रचयिता उस समय जब कि कविका आसन स्वीकार करता है परन्तु अपनी विशिष्टताको नहीं छोडता। इसीलिये कि स्तुतिओंके साहित्यम तत्वज्ञान अध्यात्म झलक और बुद्धिचातुर्यके अत्यदुत अंश उसे उस समय भी प्राप्त होते हैं। समय आगम-समहके उपोद्धातके समान गिने जानेवाले नन्दीसूत्र में श्रीदेव चाचक समाधमणने मालाचरणके रूपमें जो गाथायें ग्रंथन की हैं उसमें मूलमें तो श्रमण भगवान महावीर प्रभुकी स्तुतिका ही प्राधान्य है परन्तु उसमें इतना अधिक गम्भीर अर्थ है कि आचार्यमलयागिरि रचित संस्कृत टीकारूप तालिकाको समझे विना उस स्तुतिके गंभीर अर्थकी कल्पना शायद ही किसीकी समझमें आयगी। श्रीमलयगिरिने स्तुतिके श्लोकोंकी व्याख्या करते समय आप्तवाद-स्यादाद- आत्मवाद-प्रमाणवाद जैसे तत्वज्ञान सम्बन्धी अनेक सिदान्तोंको स्पष्ट कर दिखाया है।
१२ . . इसी प्रकार महाकवि पनपालो भो महावीर स्तुति संस्कृतमें रची है। परन्तु उसमें विरोधाभासके अलंकारोंका ऐसा संग्रह किया है कि कोई भी रसिक पात्मा उसके रसाखादनसे पुलकित हुये विना न रहसकेगा। आचय यह है कि स्तोत्रके या सपनके साहिलमें फविश्व के उपरान्त भलं. कार और तत्वज्ञानके असंख्य विषयोंके समाविट करनेका एक कालमें रिवाज था। और जो श्रीसूचकृतागसूत्रके छठवें अध्यायमें समाई हुई वीरस्तुतिको विचारपूर्वक पढंगा, अवधारण करेगा उसे उसमें से उपासनाके रस-आनन्दके उपरांत प्रभु महावीरके यथार्थवरूपका भी विचार सहजमें आ सकेगा। । प्रकृति के इस प्रवाहरूप शिष्टाचारात्मक नियमानुसार मुनिधीने भी यथा- सम्भव शुद्धतापूर्वक संरहतयाणीमे सीकर रचकर इस स्तुतिके मूलके खास प्रस्ट किया है, और जैन साहिलकी, जनउपासकों की अवधिक सेवा की है। जनोंका अधिकांश भाग वीरसतिको प्रेमसे कण्ठस्थ करता है तथा आन- न्दके साय भावुकता पूर्वक पढनेका गौरव प्राप्त करता है। अन्यान्य खोब- खवन और स्तुतिओंकी अपेक्षा इसमें एक प्रसारकी विशेषता है जिसके कारण यह स्तुति कण्ठस्थ रहकर इतनी स्वीकृति और आदरको प्राप्त है। यह इसमें एक विशेषता है, परन्तु वह विशेषता यया है? महावीरस्वामीके एक समर्थ गणधर श्रीमुधर्मस्वामी स्वयं अपने अन्वेवासी जम्बूके सन्मुस भफिपूर्वक गदगद होकर वीरप्रभुका प्रताप, प्रभाव और माहा. म्यग्र वर्णन करते हैं। श्रीमुधर्मास्वामीने मरने जीवन की धन्य पडियों में जो कुछ देसा मुना एवं अनुभव किया है उसी का वर्णन अपने शिष्पके सामने किया है। स्तुतिको पढते या गुनदे समय हमें भी यही प्रतीत होता है कि मुधम्माखामी महावीर परमात्माकी महिमा वर्णन करते समय गुप्त रिसे मानो यही कह रहे हैं कि "अभी बहुत कुछ शेष है, अभी ओर पहुतसा अनिर्वचनीय है" वे प्रभु सतच भान कराने के लिये जगदी उत्तमो. तम सामनाओं के साथ उनकी तुलना करते हैं। मेरु पर्वत, नन्दनान, चंद्रमा, सयम्भूरमण समुद्र इनमेसे सभी कुछ, यानी किसी भी गुन्दर वस्तुको नहीं मूळे हैं। तथापि अन्तम नेति नेति कहकर मानो विराम पा रहे हैं। प्रमुळे गुम अपार होनेछे उनम अन्त ही न भायगा ऐसी पूचना करने भामाय भी इसमें मिल रहा है।
३ - जिस वीरपरमात्माका शब्दचित्र इतना भव्य है तब उनके साक्षात् परि- चयमें आनेवाले श्रीसुधर्माखानीके अन्तरमे इस स्तुतिकान्यकी स्फुरणा हुई होगी तब उन्होंने कैसी रमणीय भन्यमनस्कताका अनुभव किया होगा। दीन- लोककी उत्तमोत्तम रससामग्री भी भगवान के सत्य खरूपके सन्मुस उनको तुच्छ लगती होंगी। इतनेपर भी भगवानको पहिचान करानेके लिये वे प्रयत्न करते हैं और एक अमर स्तुतिकाव्य रचकर जगत्को सौंप देते हैं महावीरके भकोंके मनको महावीर भगवान्के यथार्थ खरूपकी मुन्दर और गहरी झांकी हो उसकी अपेक्षा मूल्यवान् उपादेय वस्तु और क्या हो सकती है। जनसंघ इस स्तुतिके पठन पाठन और चिन्तनके प्रतापसे उनके सिद्धा- न्तोंका अनुसरण करनेके लिये भाग्यशाली हो! इतनी ही प्रार्थना करना बस है। ज्ञातसेवक ॥अभिप्रायाः॥ ज्ञातृपुत्रमहावीरः, सर्वज्ञस्तु जगद्गुरुः । तस्य स्तुतेमनोरम्या, सा टीका कस्स न मिया ।। निखिलागमविज्ञेन, सिन्धवाविहारिणा । निम्भिता पुप्पचन्द्रेण, सा टीका कस्स न प्रिया ।। गीर्वाणी हेन्दवीभाषा, गुर्जरीया तथैव च । त्रिभाषासनमो यत्र, सा टीका कस्स न प्रिया ।। भवबन्धापही च, सूत्रयोपस दीपिका । शरण्या सर्वजीवानां, सा टीका फस्स न प्रिया ।। वाच्यवाचकभावस्तु, स्फुटो यत्र विधीयते । लालित्यादिगुणेरामा, सा टीका कस न मिया ।। विबुधेन्द्रमुनीन्दाणां, चरतां शासवर्मसु । कंठाभूपणकं भाति, सा टीका कस्य न पिया ।। विद्यापीठे तु संस्थाप्य, टीझां पाट्यविधायकाः । धम्र्मोनतिश्च कर्तव्या, हि पुष्करगुनेर्मतम् ।। व्याकरण-काव्य-न्यायतीर्थः पुष्करो मुनि:- संसारार्णवस्तुतामुपगता सिद्धान्तचिन्तापरा, फल्याणापनदर्शिकास्त्यविरतं सत्माणिनां संयंतः। हिन्दी-संस्कृत-गुजरी प्रभृतिभिभाषाभिराभूषिता, भीपुष्पेन्दुगुनीरिता विजयते पीरस्ततेवितिः॥१॥ ठा-1-1-18 विद्यामन्दिर पाण्डेय देवेन्द्रनाथ शासी मुणि सिरि उवज्झाय आयारामस्स सम्मइ मए वीरत्थुर नामा लहुवी पोस्थियं अवलोइया, सा थुइ पोत्थिया भत्ति भावेण अलंकिया, पोत्थिया भत्तिभावेण विन्नस्सा, अम्भुअरसस्स प्पयाण कत्ता- बहावि कइ वाहं विसएमु मयमेयोऽस्थि किन्तु कत्तुणा भतिभावं अशुवर्म देसिता। मम मणो अईव प्पसमभूओ, कत्तुणो पुणो पुणो धनवायं देमि । जेण अहपरीसमेण भत्तिवसेण अईव संग्गह कटु, जणयाए भत्तिमग्गं पदंसिया । सत्येवि उत्त, अरिहंताइणो भत्तिभावेणं जीवो तित्ययर नामगोयं कम्मं निबंधह। इयं रयणा संदराऽत्यि, भन्वजणाणं अवस्समेव भणणिज्जो, कत्तुणा जहाठाणे अईवउवओगी उद्धरणाणं पसेसणिजो संग्गह कर्ड, तहा उत्तरज्झयणस तव- मग्गोऽवि उत्त, 'गुरुभत्तिभावमुस्सूसा, विणओ एस वियाहिओ एवं वीरभत्ति वा वीरत्युइ वि विणयरूवोऽत्यि, तहा उत्तराज्झयणस्स एगूणतीसाए अज्झयणं थूइस्स एवं फलं पण्णिा जहा-"धय थुइमंगलेणं भंते जीवे कि जणयह? ५. नाणदंसणचरितकोहिलाभं जमयइ। नाणदंसणचरितवोहिलाभसंपन्ने य शं जीवे अन्तकिरियं कप्पविमाणोववत्तिगं आराहणं आराहेइ ॥ १४ ॥ अमओ वीरधुइ अवस्स भणणिजो। १९९६ सावणसुवा एगादसी, सुष,वारे, आयारामो लहियाणा णयरे, उपज्झाय जइणमुणि देहली शहर महावीर जैनभवन ता०२७ अगस्त १९३९ ई० शान्तखभावी, वैराग्यमूर्ति, विद्वान् श्रीमबैनाचार्य पूज्यश्री खूप चन्दजी म० साहयकी सम्मतिः- "वीरस्तुतिः" नामक पुस्तक भाई पंचमलालजी द्वारा पठनार्धं मिली, पुस्तक सरसरी नजरसे देखी, अहिंसाके अवतार भगवान महावीर प्रभुकी स्तुति मूल गाथाओंके साथ हिन्दीभाषामें अच्छे ढंगसे लिखी है। वर्तमान समय में ऐसे २ शुद्ध हिन्दीभाषायुक्त धार्मिक साहिलकी विशेप आवश्यकता है। जैनधर्मोपदेया विद्वान् मुनिश्री फूलचन्द्रजी ने धीरस्तुति लिखनेका स्तुत्य कार्य किया है। आशा है खाध्यायप्रेमी महानुभाव इस वीरखवि पुस्तक के खाध्यायसे आत्मकल्याणका लाभ अवश्य उययंगे। अस्तु । हस्ताक्षर-आर्य जैन सुखमुनि द्वितीय श्रावण २० १३, रविवार, सं० १९९६ 40 पुस्तक दर्शनीय है, मूलगत ,भावोंडो काफी सरलताके सारा सनमानेकी चेष्टा की गई है। यथा प्रसंग अन्य ग्रन्थों के उद्धरण सोने में मुगन्धिका काम करते हैं यह अतिशयोकि न होगी। यदि में कहूं कि वीरस्तुतिका इतना दोक- प्रिय संस्करण अभी तक कहींसे भी प्रकाशित नहीं हुआ।.......... कुछ स्थान ऐसे भी है जहां लेराक खतन्त्र होकर चल पड़ा है, अस्तु तत्तत् स्थलोंपर लेसकसे हमारा 'मत' मेद है । परन्तु ये सब बातें "एको हि दोपो गुणसंनिपाते, निमन्जवीन्दोः किरणेविवादः" की सदुफिके अनुसार अन्य भेटताओंमें छुप जाती है। स्थानकवासी (जैन) समाजकी ओरसे एसी मुन्दर कृति उपस्थित करने के उपलक्ष्यमें श्रीयुत पुष्पभिक्षु वास्तवमें पधाई के पात्र है। जैनाचार्य-पूज्यश्री पृथ्वीचन्द्रजी महाराज ता.२५ अगस्त, सन् १९३९ पुस्तक काफी मुन्दर लिखी गई है, बहुत से स्थलोंपर तो घ्याल्या कापी प्रभावोत्पादक हो गई है। संस्कृत हिन्दी और गुर्जर तीनों भाषाओंमें व्याख्या को दालकर लेसकने क्या विद्वान् क्या सर्वसाधारण सभीके लिये अध्ययनका मार्ग प्रशस्त कर दिया है। श्रीयुत पुष्पभिक्षुने अन्य भी उपयोगी पुस्तकें लिखी है, परन्तु प्रभु मदा- पोरके चरणों में उनकी यह अवालि तो अतीच उत्कृष्ट थेणीपर पहुंच गई है। में आगा करूंगा कि समाज उफ कृतिको मधिसे अधिक अपनायेगा और अंनु वीरके गुणगान द्वारा लेखक श्रमको सफल करता हुआ अपने जीवनको भी सफल बनायेगा। व्याख्यान वाचस्पति पंडितश्री मदनलालजी म०, ता. २५ भगख, सन् १९२९ मन्य परमोपयोगी है, इसमें कुछ सन्देश नहीं कि मुगिजीने हर एक विषयको परी गम्भीरता और साथ ही सरलतासे मुसवित किया है। आशा है कि ईपर खवन प्रेमी संसार इस प्रथमे महान् लभ उदायेगा।मुनिजी परिश्रम और मिसानवोध इस प्रन्य के भवरोगन करनेसे यतिमयंसनीय प्रतीत होता है। सम्मति प्रदाता- "मुनि बालभिक्षु प्रेमेन्दु - वीरस्वति नामकी पुस्तक देखी, लेखक मुनिश्रीने अत्यन्त परिधमसे तैयार कर जन समाजपर उपकार किया है। तीर्थकरोंकी स्तुति करना आत्माको पवित्र बनाना है। दीर्थकरोंकी स्तुतिकरते हुवे उच्चकोटिकीभावना आजाय तो तीर्थ- कर जैसी आत्मा बनजाती है। अतः जन समाजको सम्मति देता हूं कि वीर- प्रभुकी स्तुति हमेशा पढा करें। जैनाचार्य पूज्यधी - खूबचन्दजी महाराजका सम्प्रदायानुयायी---आर्य जैन मुनि हीरालाल २६-८-३९,अंबाला शहर साहित्याकाशभ्रमणभानु पुप्फभिक्सु.रचित संस्कृत और हिन्दी भाषामें वीरस्ततिका दर्शन किया। आपने इस उन्नतिके युगमें इस प्रकार लेखनी उठा- कर जैन संसार पर ही क्या बल्के भव्यसाक्षरसृष्टिका कल्याण कार्य किया है। यह रचना रोचक और हृदयङ्गम है, मानवके आन्तरिक विचार इसका खाध्याय करते करते भक्तिसागरमें लहरायमान होने लगते हैं। वीरस्तुतिके विषयमें मेरा इतना ही कहना वस है कि इसका सम्पादन विज्ञान के युगमें वैज्ञानिक दंगसे किया गया है, अतः स्थानकवासी जनसमाजके लिये यह बडे गौरवकी वस्तु है। जैन समाजके मुनि धार्मिक प्रन्थ शास्त्र अथवा अन्यान्य प्रन्योंपर टीका रचना कुछ भूलसे गये थे। लोकाशाहके अनन्तर खतन्त्र साहित्य विकासका उत्सर्जन कसा गया था परन्तु युप्फ मिक्खुने वीरस्तुतिके प्रभावसे उस कमीकी पूर्ति कर दी। हे पुप्फभिक्खु ! साधुवाद! शासन प्रेमी-धनचन्द्र भिक्खु ता० २४-०-३९, इंदौर (मध्यभारत) मयि, असीमशेमुषिमुपितदोशः अर्जित विद्याकोषाः । धियाधीताध्याताशेष- जैनमुनिप्रवरा: ! विदितमस्त पत्र भवतां श्रीमता, यन्मुनि पुजवेन श्रीफूल. चन्द्रेण रचितं ममा फन्दनकं काव्यं मया सम्यक्समवल्यकि, यनिश्चित खस्वान्ते यदेतत्काव्यं शिक्षयति जैनमुनीन् यदीदृशेन गुरुणा भाष्यं तथेदृक्षेण च शिष्येण । ये हि मुनयः पूर्वमपरीक्ष्यैव शिष्यान्दीक्षयन्ति वेऽचिरादेव विकृति प्रयान्ति । तान् एषा मुनीन्द्ररचिता कृतिः सम्यगवबोधयति, ये च जिनधर्माचारप्रचरणे परित्य- फनिजप्रयोजनाः सन्ति, तथा परस्परामोहनिया निद्रिता वर्तन्वे वेषु मातेव जागृतभावमुत्पादयतीति, नाद्यावधि केनापि जैनमुनिना खसंप्रदायपोपकमीक्षं सस्कृतकाव्य विरचितं दृष्टिपथमवतरति । एतद्धि न्यूनतापूरकमिति मे मतिः । अहो एतत्काव्यसुधारस खादं सन्नुभ्यमाणो मेऽन्तरात्मा नान्तर्माति, नूनं हि एतस कवित्वतत्वमनुकरोति कालीदासादीनो कविपुजवानां कविताम् । मस्मिन्स- भ्यगवबोधिता जैनसम्प्रदायानुसारं गुरुशिष्यव्यवस्था, तस्यामपि कविरवसाठवेन हेनि सौरभसन्दोह उत्पादितः । नूनमेपा कृतिर्जनसम्प्रदायानुयायिभिर्मुनिभिः समादरणीया तेषु बहुपकरिष्यतीति मनुते- पण्डित-इंसराजशास्त्री, व्याकरणरत्नः, साहित्याचार्यश्च, प्रधानाध्यापकः, संस्कृत विद्यालय मलेरकोटलायज्ये (पाचाल:) . क भाकथन श्रीमत्सूत्रकृतास्त्र के पंचम अध्यायमें 'गरफयिभकि' का अधिकार प्रदिपादन किया गया है और वह शातपत्र महावीर भगवान्ने स्वयं कहा है। इसके मनन्तर उनका ही चरित्र इस गुणतन विभूविरूप पठवें अध्यायमै वर्णन किया है। शास्त्रोपदेशकके महत्वसे शानन महत्व है इस सम्बन्पसे इस अभ्या- सके उपयमादि चार अनुयोग होते हैं। उसमें भी उपभमके भन्तर्गत जो अर्धाधिकार है वह महावीर प्रभुके गुणसमूहका उत्कीर्तनरूप है। अनुयोगका दूसरा भेद निक्षेप है, जिसके दो प्रकार हैं। ओघनिष्पा और मामनिष्प भोपनिष्पन निक्षेपक रूपमें यह अभ्याय और नामनिपपने रूपमें महावीर स्वाति । उसमें 'महत्' 'वीर' और 'स्तय' के निक्षेप उदेखनीय हैं। 'जैसा उद्देश पैसा निर्देश' इव न्यायफे अनुसार प्रथम 'महत्' शब्दका निर्णय किया जाता है। यह 'महत्' भन्द बहुरूप है। जैसे कि 'महाजन' घडा आदमी है। 'महाघोप' बतिरूप है। मदामय-प्राधान्य रूप है। महापुरुष सबसे बड़ा पुरुष है। ये चार अर्थ 'महत्' पद के प्राधान्य अर्थमें ग्राम हैं। यथा- पाहन्ने महासहो, वे खेसे य फाले भायेय । धीररस उणिपखेयो, चउकाओ होणायव्यो। महावीर सर 'महद' धन्द प्रापान्य अर्थ में है, और पह माम. स्थापना-म्य-क्षेत्र काल और मार इन मेदो प्रकारका है। इस प्राधान्यमें नाम और स्थापनाके मेद तो मुगम ही हैं। द्रग्य प्राधान्य शरीर-मष्य शरीर और ज्ञ भव्य व्यतिरिक ये वीन नेद है । भन्य व्यतिरिफ सवित- अचित और मिय ये वीन प्रकार हैं। उनमें सचित्त भी द्विपद चतुष्पद और अपदके भेदसे दीन वरहका है। तया द्विपद वीयर-वफाती आदि, घनु ध्यादमें हाथी घोडा आदि और अपने पास अपय प्रयक्ष रूपमा भोर स्पर्शमें उस्कृष्ट गुणारीफ कमान्यति पार्यों का प्राधान्य है। अपित्त, वैदूर्य भाव विविध प्रभावयुष मपिरोकर भापाय है। मित्रमें विभूपित तीयवाद विषयानुक्रमणिका। पृष्ठ ... ... विषय १. ब्राह्मणके १० प्रकार, देव, द्विज, मुनि, नृप। | वैश्य, शुद्र, बिलाव, म्लेच्छ, चांडाल, सर, अयोग्य ब्राह्मण, ब्राह्मण परम्परा। भब्राह्मण, ब्राह्मणोचित यज्ञ, ब्राह्मणोचित तीर्थस्नान, गुजराती अनुवाद। द्वितीय गाथा टीका २४ २५ ... १८ ... भाषा टीका AdWN ... ... ... ... विषय प्रथम गाथा-मंगलाचरण संस्कृतीका दानधर्मकी विशेषता, शीलमें दानधर्मका समावेश, तपमें दानधर्मका अन्तभाव। भावधर्म दान ही है, क्या साधु भी दान देता है? धर्म- रन, कर्मनाश करने की कसोटी। वीरप्रभुकी स्तुति, उनकी अनेक स्तुविएँ और मेरा असामर्थ्य। वीरप्रभुका गुणगान करते समय गुरुशिष्यकी याते, आचार्य और उसकी पह- चान। आचार्यके ३६ गुण, आचा. र्यको चतुरम्बालेकी उपमा, उन्हें..नमस्कार करनेका प्रयोजन, आचार्यकी विशे- पता। जम्बू अन्तेवासीका मुधर्मा- चार्यसे प्रश्न, ब्राह्मण, बाह्मणलक्षण। ... ... ... ... . ... ज्ञान दर्शन चरित्र, ज्ञातपुत्र गुजराती अनुवाद ... तृतीय गाथा- ... सं. टीका, भापा टीका, ३४ अतिशय, ३५ वाणी गुण, २१/ खेदज्ञ-क्षेत्रज्ञ-कुशल-भाशुप्रज्ञ- महर्षि, धर्म, गुजराती अनुवाद, २२" चतुर्थ गाथा-सं० टीका- ... ... ... ४८ ...
विषय ... ... - ... A " ... 7- ८८ ... ८९ ... ... ... ... ... विषय श्रीसुधर्माचार्य वीरप्रभुके गुणों को प्रकट करते हैं, उपयोगमय, भगत, कर्ता, सदेह परिमाण भोका, संसारस्थ, सिद्ध, ऊर्ध्वगामी, प्रस, स्थाबर, द्रव्यप्राण, गुजराती अनुवाद, पृथ्वी काय, अपकाय, वेजस्काय, यायुकाय, धन. ' स्पतिकाय, ... पञ्चम गाथा- सं-टीका, भापाटीका, गुजराती अनुवाद, छठवीं गाधा- से- टीका, भाषाटीका, सातवीं गाधा-... साठवीं गाथा-... नयीं गाधा- मेरकी उपमा, दशवी गाथा-... मेरू पर्वतका वर्णन ग्यारहवीं गाथा- मुमेरु पर्वत तीनों लोभेम म्यात है, पृष्ठ पृष्ठ वारहवीं गाधा-... तेरहवीं गाथा- चौदहवीं गाथा-- ५६ उपमेयका वर्णन, ५५ पन्द्रहयीं गाथा'.... ५८ निषध पर्वत और रुचपर्वतकी उपमा ... ५५ सोलहवीं गाथा- ६२ वैश्याओंका वर्णन, कृष्णलेश्या-नीललेश्या-कापीती- टेश्या, क्षेजोलेश्या, पनलेश्या-श सैश्या, उनपर उदाहरण, " सतरदवीं गाथा- जिविवर्णन अठारहवीं गाथा- १९ शाल्मली पक्ष और नन्दन- वनकी उपमारा वर्णन, १.१ उन्नीसी गाधा- १.0 ७५ मेघगर्जना-चन्द और चन्द- मग्री उपमान वर्णन,. धीस: गाथा-... v८ महावीर प्रभुमै सयंभरमम रामुइ, धरणे, इधरमरो भी अधिक महता, 201मोसी गाया- ... ... ... ... ... ... ... ... ... ...
२५ ... है 7 ... ... मौनसे कल्याण, १०८ तपोंमें ब्रह्मचर्यकी उत्तमता, ... ... ... ... ; विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ ऐरावत हाथी, सिंह, गंगा गृहस्थ के लिये त्याज्य असत्य और वेणुदेवकी उपमा- क्या है? सेभी बढकर उपमेयकी असत्यका बुरा परिणाम, १४१ । विशेपता, १४३ वाईसवीं गाथा- । कृष्ण-कमल-चक्रवतीकी उप- कुशीलताके दोप, १४४ माका वर्णन, ११० कदाचारका परिणाम, वात्स्या- तेईसी गाथा-... ११० यनका मत, मैथुन सेवनसे दानका लक्षण, १३१ कामज्वर नहीं घटता, १४७ दानके प्रकार, अभयदान ब्रह्मचर्यसे ही पूजा, ब्रह्म- सबसे घटा दान है, १३१ चर्यका फल, महावीरप्रभु- याज्ञवल्क्यका मत, यजुर्वेद, के नाम, ज्ञातपुत्र शब्दकी मनुका मत, दशधर्म, १३३ उत्पत्ति, १४८ नियमसारकामत, समन्तभद्रा- चौवीसवीं गाथा-लवस- चार्यकामत, लोकोंका त्तमदेव, सुधर्मसभा, सर्व मन्तव्य, १३४ धर्म की उपमाका वर्णन, १८२ राज्यसे भी अधिक प्राण प्रिय पच्चीसवीं गाथा- है-पीडा-मतलयकी हिंसा छब्बीसवीं गाथा- भी हानिकर, १३५, कषाय वर्णन, कषायसे हानि, अहिंसाका माहात्म्य, अहिं. इनके हटानेके साधन, साका फल, लोकमत, कपाय त्यागका फल, वीत- परिणाम, रागताद्वारा अलग २ कया- अभयदानपर उदाहरण, १३७ यके जीतने का फल, १९२ सबसे बड़ी सत्य भाषा, कपायकी आगको बुझाओ, १९३ मनुका अभिप्राय, अस- सताइसवी गाथा- खका गुलामा, सलामा, १३८ मतोंका वर्णन, ... ... ... ... ... ... ... - ...
२ ... ... ... .. ..- ... ... ... विषय विषय पृष्ठ अठ्ठाइसची गाथा १९८ बढवाणवा श्रीजीवराज खीसंसर्गके दोषः २०९ सुखलाल कृत, महावीर रात्रिभोजनके दोष, २१. थुइनो गुजराती काम्यान पुरुषों के प्रकार, २१५ रात्रिमोजन खाग, २१२ प्राकृतस्तोत्र विभाग, बुद्धोंके बाठ उपदेशों में रात्रि संस्कृत स्तोत्र विभाग, भोजन वजित, २१३ हिन्दी कविता विभाग रात्रिभोजनके प्रत्यक्ष दोप, शान्तरस पूर्ण शान्तिप्रयश२९० २१४ वीरस्तु भगवान् स्वयम्.. आयुर्वेदमें रात्रिभोजन त्याग्य है,२१५ वीरयोगतरमा, रात्रिभोजन त्यागनेवालोंके गुण, २१० आलोचना पुष्पावलिः उनतीसयी गाथा- भगवान् महावीरकी वैराग्य प्रशस्तिः, २१७ भावना, परिशिष्ट भाग-देवचंद्रजी मायचरणम्, फूत महावीर भगवानकी ममान्दनथम्यम् २१ स्तुति, ममाकन्दनरम्यस्योत्तरार्दम् ३९१ आनन्दपनकृत वीरस्तुति, २५. मातपुत्र महावीरके सिधान्त " इंभट विनयकृत वीरस्तुति, २५० शुद्धिपत्रम् .... २२७ ... ... ... ... २४३ ...
८ नमोत्थुणं समणस्स भगवओ णायपुत्त महावीरस्स वीरस्तुतिः। हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसमुल्लसितया संस्कृतटीकया सनाथीकृता पुच्छिस्सु णं समणा माहणा य, आगारिणो या परतिथिआ य । से केइ गंतहियं धम्ममाहु, अणेलिसं साहुसमिक्खयाए ॥१॥ सस्कृतच्छाया- अप्राक्षु श्रमणा ब्राह्मणाश्च, अगारिणश्च परतीथिकाश्च । से क इत्येकान्तहित धर्ममाह, अनीदृश साधुसमीक्षया ॥ १ ॥ अथ ज्ञातृपुनमहावीरजैनसधीया-सस्कृतटीकाकर्तुमंगलाचरणम् । ध्यायं ध्यायमशेपशक्रममुखाऽमत्यार्चिताद्विद्वयं, मोक्षश्रीपरिणीतिसम्भवमहानन्दोल्लसन्मानसम् । श्रीवीरमभुमीश्वरं तदनु च ज्ञानप्रदं श्रीगुरुं, नाम नाममशेषभव्यमुहितं श्रीफूलचन्द्रो मुनिः। .
२ वीरस्तुतिः। श्रीमत्सूनकृताङ्गमध्यविलसत्सुश्लोकवीरस्तुते- भव्यानां भवयन्धभेदमनसामानन्दसंवर्द्धिनीम् । कुर्वेऽहं विति तदर्थगतिकृद्धापान्तरोझासिता, तेन श्रीत्रिशलात्मजाऽन्तिमजिनाप्रीयात्समाराधितः टीका-इहापारावारसंसाराटव्यां परिभ्रमणं कुर्वतां प्राणिनां चुछुकादिदशभिहीतैरतिदुर्लभं मानुष्यं, तत्राप्यायंदेश-कुलाऽऽयु-रारो- म्य-समन्द्रियानुकूलसामग्रीसंयोगो दुर्लभतरः, तत्राप्यतिदुर्लभतमा श्रीजिनधर्मप्रवृत्तिः । तत्रेह जगतीदृशः श्रीसर्वज्ञोक्तधर्मः परममशाला समखशारीरमानसादिदुःखोच्छेदकधाप्यस्ति । धर्मधासौ चनुर्धा वान- शीलतपोभावभेदाः, तत्र चतुणी धर्मभेदानां मध्ये सर्वज्येष्ठो धर्मो दान- धर्मः, सबैप्वपि धर्मभेदेप्यन्तश्चारित्वात् । तथाहि-लौकिके लोकोचरे च सर्वत्र दानप्रवृत्तिज्येष्ठतरा, श्रीमन्तस्तीर्थकरा अपि प्रथमं वयदानं दत्वा पश्चादिक्षुवतं गृहन्ति; पुनश्च शीलधर्मेऽपि दानधर्मोऽविच्छिन्न एव, यवो ब्रह्मचर्यग्रतग्रहणेऽसंख्यद्वीन्द्रियाणामसंख्यसम्मूछिमपये. न्द्रियाणां नपलक्षगभिजपचेन्द्रियाणां च कृते प्रतिदिनं मझमतिना भयदान दचम् , सजीवस्याऽप्यभयदानमा तेन गर्मादिदुःखनाशक- त्याचेति, व्यवच्छिन्नतया हि मालेप्वपि दानस्स मुख्यता । तथैव तपो- धर्मप्वपि दानमन्तर्भवति, यतो पड्जीवनिकायविराधनया च आहारो निप्पावते, परन्तूपवासादितपसि कृते तु तेभ्योऽभयदान प्रदत्तं तसा- पपस्सपि दानमन्तभूतम् । भावधम् तु सुतरामेव, यतः 'परमकर- णया जीवाजीवाऽहिंसनपरिणतिभावः वयाऽप्यभयपदानद्वारा दानमेव पर्यवस्पति, जैनमुनयोऽपि प्रतिदिनं देशनादानं ज्ञानशिक्षादानं च ददति, मतो दानस त्रिवप्यन्तभावान्मुस्सवया प्रथमं दानसोपादानं संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता कृतम् । परं तद्भावपूर्वकं हि सफलतामेति । दानादिरूपं हि धर्मरलं प्राप्य सुकुलोत्पत्तिसमस्तेन्द्रियसामग्र्याापेतेनाऽनेकान्तवादरूपमाईतद्- र्शनपरिज्ञाय चाशेपकम्मोच्छित्तयेऽवश्यं प्रयतितव्यं भव्येनेति । परन्तु कर्मोच्छेदश्चापि सम्यविवेकसव्यपेक्षोऽसावपि खातोपदेशमन्तरेण न सुलभः, आप्तश्चात्यन्तिकाद्दोपक्षयात् , स चाहन्नेव, स हि श्रीज्ञातूपुत्र- महावीरचरमतीर्थकरस्तस्य स्तुतौ कृतयनोऽसीति, कोविदमुख्यैरिह जगति तस्य गुणवर्णनं बहुधा कृतं परन्त्वमपि तद्गुणवर्णनोत्कटेच्छया तरलीकृतः सम्यग्दर्शनबलेन क्षयोपशमवलेन च किञ्चिद्विवरीतुं यतिष्ये। किमनन्तमाकाशे पक्षिराजगतं सम्यगवगम्य तेनैव पथा शलभो गन्तुं न वाञ्छति? वाञ्छत्येवैवमनया रीत्याऽहमप्यत्पज्ञप्रायः परं किश्चिद्धि श्रीसूत्रकृतागसूत्रे यज्ज्ञातृपुत्रमहावीरस्तुतिनामाध्यायस्य व्याख्या वितनोमि, तद्वीरकृपयैव, न ममाल्पज्ञस्य माहास्येनेति । अथ श्रीम- न्महावीरस्य प्रभोर्गुणा निगद्यन्तेऽतोऽत्र जम्बूनामधेयोऽन्तेवासी सुध- र्माणं धर्माचार्य आ=मर्यादया तद्विषयविनयरूपया चय्यते सेव्यन्ते जिनशासनोन्नत्यर्थोपदेशकतया तदाकांक्षिमिरित्याचार्यास्तमाचार्यम् । उक्तंच- सुत्तत्थविऊ लक्खणजुत्तो, गच्छस्स मेदिभूओ य, गणतत्तिविष्पमुको अत्थं वाएइ आयरिया ॥१॥ संस्कृतच्छाया- सूत्रार्थविलक्षणयुक्तो, गच्छस्यालम्बनभूतश्च । गणतसिविप्रमुकः सन्नथै पाचयंत्याचार्या इति॥ अथवा आचारो ज्ञानाचारादिः पंचधा, आ मर्यादया वा चारो विहार आचारस्तत्र साधवः खयं करणालभाषणात्मदर्शनाचेत्याचार्याः । आह च- - वीरस्तुतिः। - पंचविहं आयारं, आयरमाणा तहा पयासंता,. आयारं दंसंता, आयरिया तेण धुचंति ।।१।। संस्कृतच्छाया- पंचविधमाचारमाचरमाणास्तथा प्रकाशमानाः । आचारं दर्शयन्त आचार्यात्तेनोच्यन्त इति ।। इति च विशेपावश्यके- अथवा आईपत् अपरिपूर्णा इत्यर्थः, चारा हेरिका ये ते आचाराः, चारकल्पा इत्यर्थः, युक्तायुक्तविभागनिरूपणनिपुणा विनेया अतस्तेषु साधवो यथावच्छास्त्रार्थोपदेशकतया इत्याचार्याः । एपामा- चारोपदेशकतयोपकारित्यात्, तमाचार्यम् । *द्वादशानशास्त्राध्याप- यितारमित्यर्थः । "मन्याख्याकृदाचार्य इत्यमरः" । मोक्षशा- सोपदेएरि, श्रीधर्मगुरौ, "इति शब्दार्थचिन्तामणिः" । अथवा * समवायांगसूचगतो द्वादशामयाः परिचयः संक्षिप्यान उक्तः स चैवम् । आचाराला-आयारेणं समणाणं निग्गंधाणं भायार-गोयर-विणय- वेणा-याण-गमण-चंक्रमण-पमाण-जोग-झुंजण-भासा-समिति-सिनो चाहि-भत्त-पाण-उम्गम-उपाय-एभणा-विसोहि-मुसामुदग्गहण-य-नियम- तबो-यहाणमुपसत्पमाहिबा xxxx पढमे अगे दो मुझस्था, पण. बीसे अजायणा, पंचासी उद्देसणकाला, पंचासी समुद्रमणकाला, अटारमपय- यहरसाई। भावार्थ:-मवायांगसूधगत दादागी वाणीमा संक्षेपसे हरा प्रकार परिचय उस्त किया जाता है। माचारंगर-आवारांग सूपमें इस प्रयर के विषयों का वर्णन किया गया है यथा-श्रमण नियों का मुप्रास्त्र भाचार, गोचर (भिशाविषि), विनय, बनयिक, कायोत्सर्गादि मुन्दर और एकान्त स्थान, विहारभूम्यादि गमन, यंद मंग बर्बाद रहलना, मा शारीरिसं थम र करने के लिए उपाययम बनो बखि में गमन, विधान, आहारादि सर पेय पदार्थों का माप, साध्यायादि संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरंभापान्तरसहिता खियमाचरते शिप्यानाचारे स्थापयत्यपि । आचिनोति हि शास्त्रार्थ- माचार्यस्तेन कथ्यते' 1“इति कुलार्णवः । “आम्नायतत्वविज्ञाना- चिराचरसमानतः । यमादियोगसिद्धत्वादाचार्य इति कथ्यते ॥१॥ इति शांकरे ।। अतोऽत्र जिनधर्म एवं मन्त्रस्तस्य व्याख्याकृत् , श्रीमान् सुधर्माचार्य इति भावः । तं सुधर्माचार्य प्रति श्रीमन्महावीरचंरमतीर्थ- कृद्गुणान् पृष्टवान्, विनयेनेति शेषः “सन्मतिर्महतिवीरो, महावीरों- नियम, नियोग, भाषा समिति, गुप्ति, शय्या, उपथि, भक्त, पान, उद्गमादि (उद्गम, उत्पाद, एषणा) दोषोंकी विशुद्धि, शुद्धाशुद्धग्रहण, व्रत, नियम, 'तप और उपधान । प्रथम सूत्र आचारांग में दो श्रुतस्कन्ध, ४५ उद्देशनकाल, ८५' समु- द्देशनकाल, तथा १८००० पद संख्या है। सूत्रतः-सूअगडे पं ससमया सूइजति, परसमया सूइवन्ति, स-- परसमया सूइबंति, जीवा सूइबंति' अजीवा सहबंति, जीवाजीचा सूहजति, लोगे सूदबंति, अलोगे सूइजेति, लोगालोगे सूइबंति, सूअगदेणे जीवाजीवे पुण्णपावा सबसंबरनिज्जरणाबंधमुक्खावयाणा पयत्था सूइबंति xxxxx असी- इस्स किरियावाइयसयस्स, चउरासीए अकिरियवाईणं, सत्तठ्ठीए अण्णाप्णिय- वाईणं, बत्तीसाए वेणइअवाईणं, तेतीसं उद्देसणकाला, तेतीस समुइसणकाला, छत्तीसं पदसहस्साई। सूत्रकृतः-सूअगडांग (सूत्रकृताग) में प्ररूपित विषय इस प्रकार हैं । खसिद्धान्त, परसिद्धान्त, स्व-परसिद्धान्त, जीव, अजीव, जीवाजीव, लोक, अलोक, लोकालोक, जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आम्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष तकके सब पदार्थ, इतर दर्शन मोहित नवीन संदिग्ध दीक्षितरी बुद्धिको शुद्ध करने के लिए १८० क्रियावादी के मत ८४ अक्रिया वादीके मत, ३२ विषयवारीके मत, अज्ञानवादीके ६५ मत, सब मिलकर ३६३ अन्यदृष्टिके मतोंध्र परिक्षेप करके खसमय स्थापन, सूत्रकृतांग सूत्र में दो श्रुत-कंध हैं, २३ अध्याय हैं, ३३ उद्देशन काल हैं, ३३ समुद्देशन काल हैं । ३६... पद संख्या है। k वीरस्तुतिः। न्तकाश्यपः । नाथान्वयो वर्षमानो, यत्तीर्थमिह साम्प्रतम् ।" इति धनंजयनाममाला । अथाऽसावपि भगवान् सुधर्माखाम्येवं गुणविशिष्ट ज्ञिातपुत्रो महावीर इति' कथितवांश्च मां प्रतीति शेषः । एवं चासो चर्धमानोऽईन् “सर्वज्ञो वीतरागोऽईन, केवली धर्मचक्रभृत्" "इति धनञ्जयः । विष्टपस संसारस सांसारिकविषयस्येत्यर्थः सचन्दनव- स्थानांम:-ठाणेणं ससमया ठाविवति, परसमया यविवंति, सयम- यपरसमया यविजंति, जीवा ठाविजंति, अजीवा ठापिबंति, जीवाजीया यकि- अंति, लोगा, अलोगा, लोगालोगा आविर्वति, x x x x x तहए अगे पणमुअक्वंपा दस अग्क्षयणा, एकवीसं उद्देसणकाला, एकवीस समुसण. फाला, वावत्तरि पदसहस्साई। स्थानांग:--स्थानांग सूत्र में निरूपण किए हुए ये विषय है । समय, परसमय, स-परसमय, जीव, अजीव, जीवाजीव, सोक, अलोक, लोकालोक का स्थापन, तीसरे (स्थानांग) अंग में पांच सुतस्कन्ध, दश अध्याय, २१ उदेश- नकाल, २१ समुरेशनकाल, और ४२... पद संख्या है। समवायांग:--रामवाएणं ससमया सूइजति परसमया सहबंति, सरा- मयपरसममा माति, समवाएणं एकाहयाणं एगटाणं एप्रतयं, परियुहिए, दुवालसंगस य गमिपिडगस्स पावग्गे समगारमा, xxxxx चउत्थे भगे, एगे अक्षयगे, एगे मुयपराधेि, एगे सपनाले, एगे समुरेसगकाले एगे चउमाले पदसहस्से। समयायान:-समवायांगम खसिद्धान्त, परविदान्त, स-परविशन्त, और एक संख्यासे लगा कर अधिकसंख्यातक पदापाय परिगणन एकतरिक, परियमिपूर्वक प्रतिपादन है, अर्थात् प्रपम एकसएपक पदार्थाका निरूपण करके फिर दिसंख्यक पदार्थो न ताव है। इस कनसे प्रतिपादन करने के पाद दादांग गनिपिटको पर्योग्र प्रतिपादन किया गया है। चतुर्थ समवाय (ग) में एक बप्याय, एकभुत सम्प, एक उऐचन घल, एक समरंधन काल, और एक लाख सवानियहजार पद संप्सा है।
संस्कनटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता नितादेरिति यावजयं तिरस्कियां चकार । "विष्टपं भुवनं लोको जगदिति कोपः" । "परिभवः पराभवखिरस्क्रियेति कोपः। अतो व्याख्याप्रशतिः-(भगवती) विआहेणं ससमया विआहिजेति, परस- मया विआहिति, ससमय-परसमया विआहिजेति, जीवा विआहिद्धति, अजी. वा विआहिजंति, जीवाजीवा विभाहिबंति, लोगे विआहिजंति, अलोगे विआहि; बंति, लोगालोगे विआहिबंति, विआहे गं नाणाविहमुरनरिंदरायरिसिविविहसं- सइअ पुच्छिआणं, जिणेणं विस्यरे ण, भासिआणं, दवगुण-खित्त-काल- पनव-पदेस-परिणाम-जहत्यि अभाव अणुगम-निक्खेव-णय-प्पमाण मुनि:- पोवकम विविहप्पकारपगडपयासिआगं. संसारसमुद्दईदउत्तरणसमस्याणं, मुरवइ- सैपूजिआणं, भवियजणपयहिअयाभिनंदिआणं, तमरयविद्धंसणाणं, मुदिदीव भूअईहामतिबुद्धिवक्ष्माणार्ग उत्तीससहस्समणणया णं वागराणाणं दसणाओ, मुअत्यवहुविहप्पगारा, सीसहिअत्या xxxxx पंचमे अंगे एगे सुम- क्संथे, एगे साइरेगे अज्झयणसये, दसउद्देसगसहस्साई, दसरामु सगसहस्साई, छतीसं वागरणसहस्साई, चउरासीई पयसहस्साई। व्याख्याप्राप्ति:-(भगवती) सूत्र में खसमय, परसमय, जीव, अजीव, जीवाजीव, लोक, अलोक, लोकालोक, इत्यादि कथनके अतिरिक्त, भिमभिम प्रकारसे देव, राजा, राजर्षि, और अनेक प्रकारके सन्दिग्ध पुष्पोंके पूछे हुए प्रश्नों का जिनेन्द्रदेवने विस्तारपूर्वक जो उत्तर दिए हैं। और वे उत्तर द्रव्य, गुण, क्षेत्र, काल, पर्यव, प्रदेश और परिणाम के अनुगम, निक्षेप, नय, प्रमाण और विविध तथा मुनिपुण उपक्रम पूर्वक यथास्तिभावके प्रतिपादक हैं। जिससे लोक और अलोक दोनों प्रकाशित है। जो विशाल संसार समुद्रसे पार कर देनेमें समर्थ हैं । इन्द्रों द्वारा पूजित है, भव्य लोकोंके हृदयके अभिनन्दक है, अन्धकार रूप मैलके नाशक हैं। मुन्दर और दर्शनीय है, दीपक की तरह वस्तुका तथ्य निर्णय देने वाले हैं। ईहा, मति, और बुद्धिके बढानेवाले हैं, जिनकी संख्या ३६००० में पूर्ण होती हैं, और जो उत्तरोंके उपनिबन्धसे बहुत प्रकारके श्रुतायोंके समुदायरूप शिष्योंके हितार्थ गुणहस्वरूप है । पंचम अंग (भगवती) सूत्रमें एक श्रुतस्कन्ध, साधिक अति उत्तम सौ १०० अध्याय हैं। दशहजार उद्देशक, १०००० समुद्देशक, ३६००० घन और ८४०.. पद संख्या है। । ।
वीरस्तुतिः। चीरः संसारं यथा जितवान्, वयमपि तथैव तज्जयाय प्रयसं कुर्मः। भगवन् ! बहुविधां नरकविभक्ति च श्रुत्वा संसारादुद्धिममनसः कैनेयं नरकविभक्तिः प्रतिपादितः' इति माममाधुरिति, पुनश्चैवं भूतो धर्मः झाता-धर्मकथांग:---णाया-धम्म-कहामुणं णायाणं नगराई, उजाणाई, घणसण्डा, रायाणो, अम्मापियरो, समोसरणाई, धम्मायरिमा, धम्मकहानी, इहलोइअ-परलोइअ-इविविसेसा, भोग परिचाया, पवचाओ, मुस्परिग्गहा, तोवहाणाई, परियागा, रोटेहणाओ, भत्तपथस्सामाई. पाओरगमगाई, देरलो. गामणाई, मुकुलपचाया, पुण योहिलाभो, अंतफिरिआओ, अ आधनियंति, xxxxx छठे अगे दो मुअपराधा, एगणतीसं अज्मयणा, वे समारो दुविद्दा, पनत्ता, तंजहा, चरित्ता अ, कप्पिआ थ, दश धम्म कहाणं पग्गा, तत्यणं एगमेगाए धम्म कहाए पंच पंर, अपसाश्यायया. एगोगाद भासार- आए पंच पंच उपक्साइआसयाई, एगमेगाए उपराइआए पंच पंच अपसा- इअ, उवासाइभसमाई, एपामेव सपुष्यावरणं अनुहाए भासाइभकोरिओ, भवंतीति मसायामओ, एगणवीस उरणकाता, एगणदीसं समरसमसाल्या, याबाई पयसहस्साई साताधर्मकथा-इस सूसमें उदाहरणभूत पुररों के नगर, उद्यान, यनराः, राजा, माता पिता, समवसरण, धम्माचार्य, धर्मकथा, ऐहिक और पार ऋदिविशेष, भोगपरित्याग, प्राण्या, भुत परिप्रह, तप, उपधान, पर्याय, सुलेराना, भक्तप्रत्याख्यान, पादपोपगमन, दालोरगमन, फिर उत्तम कुल में अवतार, पुनर्जन्म, योपियम और अन्तक्रिया दलादि अनेक विषयों या पश्न विचारगे किसमया है। माता धम्मस्यांगने को शुरभदे, जिनमें २९ समार है, घे अभ्याय परिन और स्पिक मेरो दो बारे सताए हैं। धर्मस्या के 1. सर्ग है। जिसकी ए-एक धर्म कथाने ५... ५.. भास्यानिए, एक एवं भारतामियने ५..-५.. पासनि- घएँ है, एकाएक उपादसापिसाने ५..-५.. आध्यापिरोपकापिन हैं, और फिर सी प्रसर से सांपर (समिलर)मारे दोन कोटयाला- रिमाएँ हो बादी है। इसमें २१ गंगनमन, या २१ सरंचनासन, और ज्यादा पर है, पानी ५ सरासर पर है।
। संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता संसारोतारणसमर्थः केन प्रतिपादितः । इत्येतद्ववो मामिति भावः। ते के इत्याकांक्षायामाह श्रमणाः साधवो 'निर्ग्रन्यादयः । "तपखी उपासकदशांग:-उवासगदसामु गं उवासगाणं नगराई, उन्नागाई, पणखंदा, रायाणो, सम्मापियरो, समोसरणाई, धम्मायरियाई, धम्मकहाओ, इहलोभ, परलोइअइदिविसेसा, उवासयाणं, सीलव्यय वेरमणगुणपञ्चरखाण, पोसहोववासपडिजिआओ, मुअपरिग्गहा, तवोवहाणाई, पडिमाओ, उवसग्गा, सलेहणा, भत्तपश्चक्खाणाई, पाओवगमणाई, देवलोगगमणाई, मुकुलपचाया, पुणो बोहिलाभो, अंतकिरिआओ, आपविजंति, xxxxx सत्तमें अगे एगे मुअमरंधे, दशभज्झयणा, दशउद्देशणकाला, दश समुद्देशणकाला, सखेमाई यसहस्साई। उपसकदशांग:-इसमें उसों (भारकों के) नार, उद्दार, चनसंड, राजा, मातापिता, समवसरण, धर्माचार्य, इसलोक और परलोककी ऋद्धिविशेषका तथा श्रावकों का शीलवत, विरमण, गुणवत, प्रत्याख्यान, पोप- धोपवास, श्रुतपरिग्रह, तप, उपधान, प्रतिमा, उपसर्ग, संलेखना, भक्तप्रत्या- ख्यान, पादपोपगमन, देवलोकगमन, श्रेष्टकुलजन्म, योधिलाभ और अन्त- कियातका वर्णन है x x सातवे उपासकदशांगमे एक श्रुतस्कन्ध, दश अध्ययन, दश उद्देशनकात, दश समुद्देशनकाल, और सख्यातलासपद अर्थात् ११५२००० पदोकी संख्या है अन्तरदशांग:-अंतगडदसामु गं अंतगडा ण नगराई, उजाण, यणसंड, राया, अम्मापिय, समोसरण, धम्मायरिय, धम्मकहा, इहलोहअ, परलोइआ, इट्टिविसेसा, भोगपरिचाया, पध्वजाओ, मुअपरिगहा, तवोवहा- गाई, पडिमाओ, यहुविहाओ, समा, भबवं, महवं, सोअंच सच्चसहि, सत्तरस्सविडोसजमो, उत्तमं च बंभ, अकिंचणया, तपो, किरियाओ, समिइगु- तिओ चव, तह अप्पमायजोगो, सज्झाय ज्झापण य, उत्तमाण दोण्हंपि, लक्स- प्राई, पत्ताशय संजम, जिअपरिसहाणं, चउबिहकम्मक्ववियम्मि, जह केवलस्स लभो, परियाओ जत्तिओ य जह पालिओ मुगिहिं, पावोवगओ जहिं, जतियाणि भत्ताणि, छेअहत्ता, अंतगडो मुणिवरो, तमरयोपविमुक्को, मुक्खमुहह्मणतर, च पत्ता ए ए अनेय एवमाइत्थ वित्थरेण परवेइ.xxxxx अमे अगे .
वीरस्तुतिः। वीरः संसारं यथा जितवान्, ययमपि तथैव तज्जयाय प्रयत्न कुमः । भगवन् ! बहुविधां नरकविभकिं च श्रुत्वा संसारादुद्विममनसः 'कनेयं नरकविभक्तिः प्रतिपादितः' इति मामपाक्षुरिति, पुनश्चैवं भूतो धर्मः साता-धर्मकथांग:--णाया-धम्म-कहामु णं पायाणं नगराई, उजाणाई, वणराण्डा, रायाणो, अम्मापियरो, समोसरणाई, थम्मायरिआ, धम्मकहाओ, इहलोइअ-परलोइअ-इष्टिविसेसा, भोग परिचाया, पवनाओ, मुयपरिरगहा, तवोवहागाई, परियागा, सलेहणाओ, भत्तपश्चरखामाई, पाओवगमणाई, देवलो- गगमणाई, मुकुलपचाया, पुण वोहिलाभो, अंतकिरिआओ, अ माधपिबंति, xxxxx छ8 अगे दो मुअक्यंधा, एगणवीसं अजमायणा, वे समासमो दुविहा, पनत्ता, तंजहा, चरिता अ, कम्पिआ अ, दश धम्न कदाणं वग्गा, तत्पणं एगमेगाए धम्म यहाए पंच पंच, असाध्यासयाई, एगरेगार भस्वाह- आए पंच पंच उपसाइआधयाई, एगमेगाए उक्त्याइआए पर पंच यसर- इभ, उपस्पाइअमयाई, एकामेव सपुवावरणं अबुटाए भक्याइअकोडिओ, भवतीति अरसायाओ, एगूणवीसं उसणकाला, एगणीस राममणकाला, सबसेबाई पयसहस्साई। शाताधर्मकथा-इस सूत्रने उदाहरणभूत पुरुषों के नगर, उद्यान, यनराण्ड, राजा, माता पिता, समवसरण, धर्माचार्य, धर्मकथा, ऐहिक और पारलौकिक ऋदिविशेप, भोगपरिलाग, प्रमण्या, भुव परिग्रह, तप, उपधान, पर्याय, सलेखना, भक्तालाख्यान, पादपोपगमन, देवलोकगमन, फिर उत्तम कुल में अवतार, पुनर्जन्म, योपियम और अन्तक्रिया इत्यादि अनेक विषयों- या कथन विस्तारसे कियागया है। छठवें मादा धम्मंगयोग दो तारन्ध है, जिनमें २९ अध्याय है, वे अम्पाय परिन और कल्पिक मेदसे दो तरह के बताए है । धर्मकपाले १० वर्ग है। जिसकी एक-एक धर्म कया ५..- ५.. भारुयायिकाए हैं, एक एक भास्यापियने ५..-५.. उपाख्यायि- फाएं हैं, एकाएक उपाध्यापिगमें ५...-५.. आश्यायिकोपाख्यायिका ६, और फिर इसी प्रमर से ग्रासपर (सबमिलकर) साडे तीन को आस्था- विमएं हो जाती हैं। इसमें १९ गगनसाल, तथा ३९ समुचनमल. और सच्यात लाख पद है, यानी ५सरा ६ हजार पद है।।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता संसारोचारणसमर्थः केन प्रतिपादितः । इत्येतहहयो मामिति भावः। ते के इत्याकांक्षायामाह श्रमणाः साधवो 'निर्ग्रन्थादयः। "तपस्वी उपासकदशांग:--उवासगदसासु णं उवासगाणं नगराई, उजाणाई, घणखंडा, रायाणो, अम्मापियरो, समोसरणाई, धम्मायरियाई, धमकहाओ, इहलोष, परलोइअइदिविसेसा, उवासयाणं, सीलच्वय वेरमणगुणपञ्चक्खाण, पोसहोववासपडिजिआओ, मुअपरिग्गहा, तबोवहाणाई, पडिमाओ, उवसग्गा, सलेहणा, भत्तपञ्चक्खाणाई, पाओवगमणाइ, देवलोगगमणाई, सुकुलपञ्चाया, पुणो बोहिलाभो, अंतकिरिआओ, आघविनंति, xxxxx सत्तमें अगे एगे मुअक्संधे, दशअज्झयणा, दशउद्देशणकाला, दश समुद्देशणकाला, संखेजाई पंयसहस्साई। उपासकदशांगः-इसम उपासकोंके ( श्रावकोंके ) नगर, उद्यान, वनखंड, राजा, मातापिता, समवसरण, धर्माचार्य, इसलोक और परलोककी ऋद्धिविशेषका तथा धावकोंका शीलवत, विरभण, गुणवत, प्रत्याख्यान, धोपवास, श्रुतपरिग्रह, तप, उपधान, प्रतिमा, उपसर्ग, सलेखना, भक्तप्रत्या- ख्यान, पादपोपगमन, देवलोकगमन, अष्टकुलजन्म, धोधिलाम और अन्त- कियातकका वर्णन है xx सातवें उपासकदशंगमें एक श्रुतस्कन्ध, दश अध्ययन, दश उद्देशनकाल, दश समुद्देशनकाल, और संख्यातलाखपद अर्थात् ११५२००० पदोकी संख्या है। अन्तरुद्दयांग:-अतगददसासु पं अतगडा ण नगराई, उजाण, चणखंड, राया, अम्मापिय, समोसरण, धम्मायरिय, धम्मकहा, इहलोइअ, परलोइआ, इडिविसैसा, भोगपरिचाया, पध्वजाओ, सुअपरिग्गहा, तवोवहा- णाई, पडिमाओ, बहुविहाओ, समा, अनवं, महवं, सोअंच सच्चसहि, सत्तरस्सविहोसजमो, उत्तमं च बंभ, अकिचणया, तवो, किरियाओ, समिइगु- त्तिओ चेव, वह अपमायजोगो, सज्झाय ज्झाणेण य, उत्तमाण दोन्हंपि, लक्ख- गाई, पत्तापय संजमं, जिअपरिसहाणं, चउबिहकम्मक्खनियम्मि, जह केवलस्स लभो, परियाओ जत्तिओ य जह पालिओ मुणिहि, पावोवगओ जहिं, जतियापि भत्ताणि, छेअइत्ता, अतगडो मुमिवरो, तमरयोपविमुको, मुक्खमुहह्मणेतर, च पत्ता ए ए अन्नेय एवमाइत्थ विस्थरेण परवेइ, xxx.४४ अठभे अंगे पोप- १० वीरस्तुतिः। संयमी वर्णी, योगी साधुश्च तापसः । ऋपियतिनिर्भिः संयतः श्रमणो व्रतीति" धनंजयः । “यतिमेदे, साधुभेदे वा, भिक्षाजीविनि, शरीरभेदे वेति शब्दस्तोममहानिधिः" "तपखिनि, श्रमणः परिवाद, संन्यासीति पूज्यपादाः" । जैनभिक्षुके, निर्मन्थे चापि, 'थाम्यतीति एगे मुभसंधे, दस अज्जयणा, सप्तपग्गा, दस उद्देसणकाला, दर समरेसणः काला, संखेबाई पयसहस्साई, अन्तरदशांग:-अन्तगडदशांग सूपमें अन्तकृत (सीकादि) पुरुषोंके नगर, उद्यान, वनसंड, राजा, मातापिता, समवसरण, पर्माचार्य, धर्मकथा, ऐहिक और पारलौकिक ऋषि,भोगपरिलाय,प्रयज्याप्रहण, श्रुतपरिग्रह, तप, उपधान, बहुविधप्रतिशाराधन, समा, आर्जव, मार्दव, सल सहित शोर, सतरह प्रकारका संयम, उत्तम ब्रह्मर्य, अकिंचनता, तप, क्रिया, समिति, गुप्ति, अप्रमादयोग, उत्तमसाध्याय, ध्यान और कायोत्सर्ग का खरूप, उत्तम संयम प्राति और परिषह जीतनेवाले पुरुओंका चारप्रसारके पातिक कर्म सय होने से केवलज्ञानका प्राक्ष करना, (अनन्त चतुष्टयकी प्राप्ति ) मुनि पायके पालन करने की अवधि, पादपोपगत पवित्र मुनिवर जितने भकों (भोजन धमयों) को विताकर जहां अन्तकृत् हुए वह विवरण और भी मुनिराज कि जो मुकिके अचल मुसाको प्राप्त हुए, इत्यादि सब वर्णन आठवें (अंतगा) अंगमें एक श्रुतस्कन्ध के ही अन्दर है, इसके । अध्ययन हैं, सात वर्ग हैं, इस उपचन काल है, दश समरेशन काल हैं, और संख्यात सारा पद, अर्याप २३.४... पद संख्या है। मनुचरोपपातिकदशांगा-अगुत्तरोवबाइल दसाय में प्रयुतरोर. बापमाणं नगर, उजाणाई, वणया रायाणो, अम्मापियणे, समोसराई, धम्मायरिया, पम्मरहाओ, होग-परलोगस्य इसिविखेसा, भोगपरिपाया, पमवाओ, मुअपरिग्गहाओ, तोवहागाई, परिवायो, पडिमाओ, पटेदणामो, भतपाण-पपरयाणा, पावोवगमगाई, अत्तरोक्वाद ओ, पुरुष पपया, पुषोरोहिलाभो, भंतकिरियाओ, पापविनंति, + ++ + + नब अगे एगे अमरधे, दस मजायणा, विणि पग्गा, दस उदगणमला दय रामरेषण सत्य, नायगाई पमराहगार,.
. संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता .११ श्रमणः । इति "शब्दार्थचिन्तामणिः” श्राम्यति परदुःखं जाना- तीत्यपि ।' च पुनर्ताक्षणाः ब्रह्मचर्याउनुष्ठाननिरताः | "द्विजात्य- मजन्म, भूदेववाडवाः । विप्रश्च ब्राह्मण" इत्यमरः । ब्रह्म परमात्मानं अनुत्तरोपपातिकः-इस सूत्रमें अनुत्तरोपपातिकोंके नगर, उद्यान, वनखंड, राजा, मातापिता, समवसरण, धर्माचार्य, धर्मकथा, इत्यादिकका वर्णन है, और ऐहिक तथा पारलौकिक ऋद्धि विशेष, भोगपरित्याग, प्रव्रज्या- प्रहण, श्रुतपरिग्रह, तप, उपधान, पर्याय, प्रतिज्ञा, संलेखना, भकपान- प्रत्याख्यान, पादपोपगमन, श्रेष्टकुलमें पुनर्जन्म, बोधिलाभ, अन्तक्रिया, इत्यादि विषयोंका वर्णन है।xx नवम (अनुत्तरोपपातिक) अंगमें एक श्रुतस्कन्ध, दश-अध्याय, तीन वर्ग, दश उद्देशनकाल, दशसमुद्देशनकाल, संख्यातलाख पद-अर्थात् ४६०८००० पद हैं। प्रश्नव्याकरण-पण्हवागरणेमु अगुत्तर अपसिणसर्य, अछुत्तर पति- णापसिणसर्य, विजाइसया, नागसुवणे हिं सद्धिं दिव्या सवाया आधविबंति, विम्हयकराण अइसयमइ अकालदमसमविस्थकरुत्तमस्म ठिइकरणकारणार्ण, दुर- हिंगमदुरवगाहस्स, सव्वसवणुसम्मअस्स, अबुहजणबोहकरस्स, पचरखपछ- यकराणं, पाहाणं, विविहगुणमहत्या, जिणवरप्पणीआ आपविजेति, + + + + दसमे अगे एगे मुअक्खंधे, पणयालीस उद्देमणकाला, पणयालीस समुद्देसण- काला, संक्खेजाणि पयसहस्साणि । प्रश्नव्याकरण-इस सूत्रमें एकसो आठ प्रश्न, १०८ अप्रश्न, 106 प्रश्नान, विद्याओं का अविशय, और नागकुमार तथा सुवर्णकुमारके साथ होने वाठे दिव्य संवाद का वर्णन है।xxx दशम (प्रश्नव्याकरण) अंगों, एक श्रुतस्कन्ध, ४५ उद्देशनकाल, ४५ समुद्देशनकाल, और संख्यात लाख पद अर्थात् १११६... पद संख्या है। विपाकश्रुत-विवागमुए गं मुका-दुकडा में कम्मार्ण फलविवागे आपविजेति, से समासओ, दुविहे पनवे तंजहा; दुहविवागे सुहविवागे चेव, तस्यणं दस दुहृविवागाणि, दस मुहविवागाणि से किं तं दुइविवागाणि ! दुइकि- वागे मु णं दुहविवागाणं नगराई, उज्बाणाई, वणखंडा, रायाणो, अम्मापियरो, समोसरणाई, धम्मायरिया, धम्मकहाओ, नगरगमणाई, संसारपबंधे दुइपरंप १० वीरस्तुतिः। संयमी वर्णी, योगी साधुश्च तापसः । ऋपियति निर्भिक्षुः संयतः श्रमणो प्रतीति" धनंजयः। “यतिमेदे, साधुभेदे चा, भिक्षाजीविनि, शरीरभेदे वेति शब्दस्तोममहानिधिः" । "तपखिनि, श्रमणः परियाद, संन्यासीति पूज्यपादाः" । जैन भिक्षुके, निर्मन्थे चापि, 'श्राम्यतीति एले सुअसंघे, दस अज्झयणा, सत्तबग्गा, दस उदयणमाला, दस समरेखणः काला, संखेनाई पयसहस्साई, अन्तरदशांग:-अन्तगडदशांग सूपमें अन्तरव (दीर्घकादि) पुरुषोंके नगर, उद्यान, वनसंद, राजा, मातापिता, समवसरण, पर्माचार्य, धर्मकथा, ऐहिक और पारलौकिक अदि,भोगपरित्याग, प्रमज्याप्रहण, युतपरिग्रह, वप, उपधान, बहुविधप्रतिभागधन, क्षमा, आर्जव, मार्दव, सल सहित शौच, सतरह मकारा संयम, उत्तम ब्रह्मचर्य, अकिंचनता, तप, किया, समिति, गति, अप्रमादयोग, उत्तमसाभ्याय, ध्यान और पायोत्सर्ग का खरूप, उत्तम संयम- प्राति और परिषद जीतनेवाले पुरुषका चारप्रकारके पाविक कर्म क्षय होने से केवलसानका प्राप्त करना, (अनन्त चतुष्टयकी प्राप्ति ) मुनि पर्यायके पालन करने की अवधि, पादपोपगत पवित्र मुनिवर जितने भजों (भोजन पमयों) को विताकर जहां अन्तकृत हुए वह विवरण और भी मुनिराज कि जो मुक्केि अचल मुसों को प्राप्त हुए, इलादि गर वर्णन भाठ (अंतगः) अंगमें एक श्रुतस्कन्ध के ही अन्दर है, इसके दस अध्ययन है, सात वर्ग दें, दश रेशन साल है, दर समुरेशन काल है, और मेस्मात त्यख पर है, र्यार २३.४... पद संख्या है। मनुत्तरोपपातिकदशांगा-अनुत्तरोवाइस दमासु अशुतरोद. पाइमाणं नमराई, उजाणाई, वणयंग रामाणो, अम्मापिरणे, समोसरणाई, भम्मायरिया, पम्मम्हाओ, लोग-परलोगस्य शीरिसेग्रा, भोगपरिपाया, पम्पबाओ, समपरिग्गहामो, ठयोवहागाई, परिमागो, परिमाओ, हमाभो, मतपास-पस्यामाई, पावोरगमगाई, मतपवार ओ, मा पचया, पुषोकोहिलाभो, अंदकिरियामओ,भापपिति, ++ ++ + नरमे अगे एगे शुभक्पधे, दरा अग्धपणा, निगि वग्गा, दस रेसमग्रला दय समरेपण. अत्य, पबई एयसहस्साई संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिवा श्रमणः । इति "शब्दार्थचिन्तामणिः" श्राम्यति परदुःख जाना तीत्यपि ।' च पुनर्ब्राह्मणाः ब्रह्मचर्याउनुष्ठाननिरताः । “द्विजात्य- अजन्म, भूदेववाडवाः । विश्व ब्राह्मण" इत्यमरः । ब्रह्म परमात्मानं अनुत्तरोपपातिकः--इस सूत्रमें अनुत्तरोपपातिकोंके नगर, उद्यान, वनखंड, राजा, मातापिता, समवसरण, धर्माचार्य, धर्मकया, इत्यादिकका वर्णन है, और ऐहिक तथा पारलौकिक ऋद्धिविशेष, भोगपरित्याग, प्रव्रज्या- प्रहण, शुनपरिग्रह, तप, उपशान, पर्याय, प्रतिज्ञा, संलेखना, भकपान- प्रत्याख्यान, पादपोपगमन, श्रेष्ठकुलमें पुनर्जन्म, बोधिलाभ, अन्तकिया, इत्यादि विषयोका वर्णन है।xx नवम (अनुत्तरोपपातिक) अंगमें एक- श्रुतस्कन्ध, दश-अध्याय, दीन वर्ग, दश उद्देशनकाल, दशसमुद्देशनकाल, संख्यातलाख पद-अर्थात् ४६०८००० पद है। प्रश्नव्याकरण-पण्हवागरणेमु अठुत्तर अपसिणसयं, अछुतर पसि- णापसिणसयं, विजाइसया, नागमुक्ण्णे हिं सद्धिं दिव्या सवाया आपविजेति, विम्हयकराणं अइसयमइ अकालदमसमविस्यकरत्तमस्त ठिइकरणकारणाण, दुर- हिगमदुरवगाहस्स, सम्बसवणुसम्मअस्स, अबुइजणबोहकरस्म, पञ्चक्सपर- यकराणं, पाहाणं, विविगुणमहत्या, जिणवरप्पणीआ आधविनंति, + + + + दसमे अगे एगे मुभक्खंधे, पणयालीसं उद्देसणकाला, पणयालीस समुदेखण- काला, सक्खेज्माणि पयसहस्साणि । मनव्याकरण-इस सूत्रमें एकसो आठ प्रश्न, १०८ अप्रन, १०५ प्रमाप्रश्न, विद्याओं का अतिशय, और नागकुमार तथा सुवर्णकुमारके साथ होने वाले दिव्य संवाद का वर्णन है।xxx दशम (प्रश्नव्याकरण) अंगमें, एक श्रुतस्कन्ध, ४५ उद्देशनकाल, ४५ समुद्देशनकाल, और संख्यात लाख पद अर्थात् ९२१६... पद संख्या है। विपाकश्रुत-विवागमुए मुका-दुकडा में कम्मापं फलविवागे आपविजेति, से समासओ, दुविहे पनवे तंजहा; दुहविवागे मुहविवागे चेव, तत्यणं दस दुहविवागाणि, दस मुहविवागाणि से किं तं दुहविवागाणि ? दुहकि- वागे मुणं दुहविवागाणं नगराई, उजाणाई, वणखंडा, गयाणो, अम्मापियरो, समरेसरमाई, धम्मायरिया, धम्मकहाओ, नगरगमगाई, संसारपबंधे दुहपरंप- १२ वीरस्तुतिः। . - । सिद्धं जानातीति ब्राह्मणः । परब्रह्मज्ञे ब्राह्मण इति शब्दस्तोममहा- निधिः । ब्राह्मणलक्षणानीत्थं त्रुवन्ति वृद्धाः । यथा- 'क्षमा, तपो, दया, दान, सत्यं, शौचं, हणुवतम् । विद्याविनयसम्पन्नं प्रथमं ब्रह्मलक्षणम् ॥ १॥ शान्तो दान्तः सुशीलच, सर्वभूतहिते रतः । क्रोधावेशं न जानाति, द्वितीयं ब्रह्मलक्षणम् ।। २ ।। निर्लोभो निरहंकारः पापत्यागं करोति यः । रागद्वेपविनिर्मुक्तस्तृतीयं ब्रह्मलक्षणम् ॥ ३॥ परद्रव्यं यथा दृष्ट्वा, पथि गेहेऽथवा वने । अदत्तं नैव गृह्णाति, चतुर्थ ब्रह्मलक्षणम् ॥ ४॥ मद्यमांसमधुत्यागी-त्यक्तोदुंबरपञ्चकः । भुनक्ति न निशाहारं, पञ्चमं ब्रह्मलक्षणम् ॥ ५॥ राओ, य आयविवति, से तं दुहविवागाणि; से कि तं मुहविवागाणि ? मुहविवा- 'गेमुणं मुहविवागाण नगराई, उजाणाई, वणसंडा, रायाणो, अम्मापियरो, समोसरणाई, धम्मायरिया, धम्मकहाओ, इहलोअ-परलोय इहिबिसेमा, भोग- परिचाआ, पन्चजाओ, मुअपरिग्गहा, तवोवहाणाई, परियागा, पडिमाओ, संले- हगाओ, भत्तपाणपञ्चक्खाणाई, पावोवगमणाई, देवलोगगमगाई, मुकुल पञ्चाया, 'पुणवोहिलाहो, अतकिरियाओ, आपविजति, x x x x ४ एकारसमे अगे वीसं अज्मयणा, वीस उद्देसणकाला, वीस समुसणकाला, संखेनाई पयसय- सहस्साई. विपाकश्रुत-इसमें मुस्तकम्मोका और दुष्कृत कम्मोका फलविपाक- 'परिणाम बताया गया है । वह फलविपार संक्षेपसे दो प्रकारका है। यथा दुःसविपाक और भुराविषाक। जिनके १.-१० भेद हैं। दुःखविपाकमें 'दुःखविपाकवालोंके नगर, उद्यान, वनसंड, राजा, मातापिता, समवसरण, धर्माचार्य, धर्मस्था, नगरगमन, ससार प्रबन्ध, दुःखपरम्पराका ब्यौरे चार वर्णन है।
i संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता 'कैचित्तु प्राह्मणा दशधा प्रोक्तास्त एवम् . यथा-देवो द्विजो मुनी राजा, वैश्यः शूद्रो बिडालकः । ; • खरो म्लेच्छश्च चाण्डालो, विप्रास्तु दशधा मताः ॥ १ देवा-एकाहारेण सन्तुष्टो, मद्यमांसविवर्जितः । पारीणस्तत्त्वविज्ञाने, स विप्रो देव उच्यते ।। १ ।। . द्विजो न्यामिको नियमी चैव, संयमी संयतेन्दियः। . समो दमक्षमायुक्तो द्विजो विप्रः स उच्यते ॥ १॥...' मुनि:-रुक्षाऽऽहारी दिवाहारी, वनवासे रतः सदा । कुरुतेऽहर्निशं ध्यान. स विप्रो मुनिरुच्यते ॥१॥ नृपः- अधादिवाहनेच्छुयों विग्रहे चातिवर्तते । आरंभः शासकः शूरः, स विग्रो हि नृपः स्मृतः ॥१॥ वैश्यः--कृपिवाणिज्यगोरक्षा, न्यायं सेवां करोति यः । धातूनां संमही नित्यं, स विप्रो वैश्य उच्यते ॥ १ ॥ मुसविपाकमें मुखविपाकवालोके नगर, उद्यान, वनखंड, राजा, माता- पिता, समवसरण, धर्माचार्य, धर्मस्था, इसलोक परलोक सम्बन्धी ऋद्धि विशेष, भोगपरित्याग, प्रत्रज्याप्रहण, भुतपरिग्रह, तप, उपधान, पर्याय, प्रतिता, सलेखना, आहारपानीका लाग, पादपोपगमनसंखारक, देवलोक- गमन, मुकुलावतार, योधिलाभ और अन्तक्रिया तकमा अनुकमसे वर्णन है।। इसमें २० अध्याय हैं। २० उद्देशनकाल है, २० समुद्देशनकाल हैं। और संख्यात लाख अर्थात् 1, ४, ३२१०० पद संख्या है। दृष्टियादः-दिद्विवाएणं, सम्वभावपस्नणया, आपविजांति से समासओ पंच विहे पण्पते, तं जहा परिकम्म, मुक्ताई, पुण्यगर्य, अपुरोगो, चूलिया, ।', 1. टिवाद-इसमें सर पदायों की प्ररूपणा है, और वृह दृष्टिवाद परिकर्म स्प. पूर्वगत, (पूर्व) अनुयोग और चूछिन्नमा इन मेदोंने ५ प्रसारच कहा है। -- वीरस्तुतिः।..". शूद्रः लाक्षातैलक्यं चैव, विक्रयं व्याजभक्षकः । विक्रेता मद्यमांसानां, स विप्रः शूद्र उच्यते ॥१॥ विडाल:--भक्ष्याभक्ष्यं न जानाति, नाट्यं वायं करोति यः। परस्त्रीगमनं कर्ता, विडालः स हि प्रोच्यते ॥१॥ म्लेच्छ:--वापीकूपतडागानामपूतजलसंग्रहः । परदुःखं न जानाति, विप्रो म्लेच्छः स कथ्यते ॥१॥ चाण्डाल:-~-अहिंसां नैव जानाति, सर्वदा प्राणिघातकः। वनं दग्ध्वा कृर्षि कुर्यात् , विप्रचाण्डाल उच्यते ॥ १ ॥ खर-शास्त्राध्ययनजाप्यादिकर्मपटू विवर्जितः। जातमृत्युगृहे भोजी, खरो विप्रः स उच्यते ॥१॥ वर्यःनाच्छादयति परदोष, कुर्यात्स्वपापगोपनम् । शुनः पुच्छमिव व्यर्थ, ब्रामधर्मविवर्जितः ॥१॥ जन्मकाले भवेच्छूद्रो, वृद्धिकाले भवेद्विजः । शास्त्राभ्यासे भवेद्विप्रो, ब्रह्मविद्रासणः स्मृतः ॥१॥ स तत्राऽब्राह्मणो यथा- कोहो य माणो य वहो य जेसि, मोसं अदत्तं च परिग्गहं च। ते माहणा जाइविवाविहणा, ताई तु खेत्ताई सुपावयाई ॥१४॥ (संस्कृतच्छाया) क्रोधश्च मानश्च पधश्च येषां, भूपाऽदत्तं च परिमई च। ते बाह्मणा जातिविद्याविहीना-स्तानि तु क्षेत्राणि सुपापकानि ॥१॥ उत्तराध्ययन अ.१२ संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता [ब्राह्मणोचितथेष्टयः] सुसंवुडा पंचर्हि संवरे हिं, जीवियं अणवस्खमाणा। वोसट्टकाया सुइचत्तदेहा, महाजयं जयइ जन्नसेटं ।। ४२ ।। सुसंवृताः पंचभिः संवरैः, रिह जीवितमनवकांक्षमाणाः। व्युत्पएकायाः शुचिस्यकदेहाः, महाजयं यजन्ते थेष्ठयश्चम् ॥१२॥ उत्तराध्ययन भ०१२ 1 [ब्राह्मणोचितमानतीर्थम्] धम्मे हरए यम्भे संति तित्थे, अणाविले अत्तपसन्नलेसे। जहिं सिणाओ विमलो विसुद्धो, सुसीइभूओ पजहामि दोसं ॥ ४६॥ एयं सिणाणं कुसले हि दिलं, महासिणाणं इसिणं पसत्थं । जहिं सिणाया विमला विसुद्धा, महारिसि उत्तम ठाणं पत्ते ॥४७॥ संस्कृतच्छाया धर्मो हृदो ब्राह्म शान्तितीर्थ, अनाविल आत्मप्रसन्नलेश्ये। यस्मिन् स्नातो विमलो विशुद्धःसुशीतीभूतः प्रजहामि दोपम् ॥४॥ एतत्यानं कुशलैई, महास्नानमृषीणां प्रशस्तम् । यसिन् साता विमला विशुद्धा, महर्षय उत्तम स्थान प्राप्ताः । तथाऽगारिणो-गृहवासिनः 'सदनं सन भवनं विष्ण्यं वेश्माऽथ मन्दिरमा गेहं निकेतनागारमिति' धनंजयः। आ-ग, कर्मणि १ वीरस्तुतिः। घ, आगमृच्छत्तीति, प्राप्नोति वेति, आग, आ-र गतावण वेति आगारं,गृहमस्यास्तीत्यागारी, ते। आगारिणः, क्षत्रियादयश्चेति भावः । परतीर्थिकाः परमतावलम्विनः शाफ्यादयश्चेति वा ते सर्वेऽपि, किं तदिति दर्शयति, स को योऽसावेनं धर्मम् । आगा. रानागारविच्छिन्नमाहोकवान् । धृ धारणे धातौ मन्, “स्थाद्ध- ममस्त्रियां पुण्यथेयसी सुकृतं वृप" इत्यमरः । चत्युसहावो धम्मो 'यतोऽभ्युदयो निःश्रेयसी स धर्मः,'दुर्गतौ प्रपततांप्राणिनां धारणाधम रक्षकमेकान्तहितमाहोक्तवानिति । किंभूतं धर्ममनी- इंशमतुलम् । कयोकवान् ? साधुसमीक्षया समतयेति भावः॥१॥ अन्वयार्थ-(समणा) भिक्षु (माहणा) ब्राह्मण (य) और (अगा- रिणो) श्रद्धाल गृहस्थ (य) तथा (परतित्थिया) और और जैनतरमतावलम्बी (पुच्छिरमु) पूरेंगे कि जिन्होंने (साहुस मिस्खयाए) अच्छी तरह स्वाभाविक ज्ञानद्वारा (णेगंतहियं) सब प्रकारसे कल्याण और उद्धार करनेवाला (अणेलिस) उपमा रहित (धर्म) आत्म-धर्म (आहु.) कहा है (से) ३ (केइ) कौन थे?॥१॥ भावार्थ-आर्य सुधर्माचार्य भगवान् से उनके सदैव समीपमें रहनेवाले आयुष्मान जंबू शिष्यने पूछा कि-हे आर्य्य! संसारसमुदसे पार करनेवाला, एकान्त हितकारी एवं अनुपम श्रात्म-धर्म किसने प्रतिपादन किया है ? मुझसे इस प्रकार अनेक भिक्षु-गृहस्थ एवं अन्यान्य-मतवालोंने प्रश्न किया है ॥१॥ भापाटीका-इस संसाररूपी गहन घनमें घूमते फिरते प्राणिओंके लिए दश दृष्टान्तोंसे मनुष्यजन्मका मिलना अत्यन्त कठिन है, इसके अतिरिका आर्यदेश [आर्य भोजन, आर्य वृत्ति, आर्य वेशभूषा, आर्य पडौस, आर्य सह- वास, आर्य भाषा,] उत्तम कुल, लम्बा आयु, आरोग्य शरीर, समस्त इन्द्रियोंकी इच्छानुकूल सामग्रियोंका संयोग मिलना तो और भी कठिन है, परन्तु श्रीवी तराग भगवान्के धर्ममें प्रवृत्त होना सबसे अधिक मुश्किल है, और जगत्के जीवोंको सर्वज्ञोक धर्म ही कल्याण और मंगलका करने वाला है। इसी भाव औषधके अनुपानसे शरीर और मन सम्बन्धी कर्म रोग नाश होते हैं। और वह धर्म शातपुत्रमहावीर: प्रभुने; चार प्रकारका प्रतिपादन किया है। जोकि द्रान, शील; तप और भावसे पहबाना जाता है। .....
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता दान धर्म की विशेषता- दानको सबसे प्रथम इसलिए कहा है कि यह दान धर्म पिछले तीन भेदोंमें भी समाया हुआ है, लोकोंमें इसलोक, तथा परलोककी अपेक्षासे दान देनेकी प्रणाली सबसे पुरानी है, श्रीमान् तीर्थकर भगवान् सबसे पहले एक वर्ष दान देकर फिर दीक्षा लेते हैं। शीलमें भी दान धर्मका समावेश- शील धर्ममें भी दानधर्म ज्योंका यो समाया हुआ है, क्योकि ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण करनेपर असहय द्वीन्द्रिय, और असंख्य सममूच्छिम पंचेन्द्रिय जीवीको तथा नवलाख गर्भजपंचेन्द्रिय जीवोंको ब्रह्मचर्य पालन करनेसे प्रतिवार अभयदान मिलता है। इतर शानकारों ने भी इसका बडा माहात्म्य लिखा है।* शील व्रतको स्वीकार करके वीर्य (आत्मशकि) का रक्षण करता हुआ गर्भादिके जन्ममरण संबंधी कष्टोंसे मुक्त होजाता है, और मानो वह अपने को भी अभयदान देता है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि शीलमें भी दान ही गर्भित है तपमें भी दानधर्मका अन्तर्भाध- शीलकी तरह तपश्चरण करने में भी दानधर्मकी आराधना छुपी हुई है। यह सब जानते है कि-द: कायकी विराधना (हिंसा या आरभ) के विना भोजनका बनना असंभव है। परन्तु साधक उपवासादि ठप करनेपर इच्छाओंको रोकतेहुए छःकायका आरंभ रोककर उस दिन अनन्त जीवोंको अभय दान देता है, अतः तप करनेसे भी दान धर्मग अनायासही पालन हो जाता है। , .. एकरात्रोपितस्यापि, या गतिवझचारिणः। न सा ऋतुसहस्रेण, प्राप्तुं शक्या युधिष्ठिर! । .(मार्कग्ड, ऋषिः) भावार्थ-एक रात भर ब्रह्मचर्य पालन करने से भी जो उत्तम गति तथा बेष्ठ फल उस ब्रह्मचारी को मिलता है वह हे युधिष्ठिर ! हजार यज्ञोंसे भी अप्राप्य है। दीर.३ ...वीरस्तुतिः । भावधर्म तो दान धर्म है ही- भाव प्रकृतिको रोक कर करुणा पैदा करने का नाम है। तथा जीव और अजीवकी अप्रमत्तयोगसे रक्षाकरना भाव है, वहां भी सवको भावकी दृष्टिसे अभयदान ही मिलता है । अतः प्राणीरक्षाका नाम ही भाव या भावशुद्धि है। क्या साधु मी दान देता है, जैन मुनि भी प्रतिदिन उपदेशदान, ज्ञानदान, शिक्षादान, रूढिच्छेदक शिक्षा दान देकर मानव समाजपर महान् उपचार करते हैं । इसपर लोक कभी यह भी कह देते हैं कि साधुको अधदाता न कहकर दानी या राजाको ही अगदातर कहना चाहिए। साधु क्या कभी किसीको रोटी पानी दे सकता है? मगर इतना तो अवश्य समझ लेना चाहिए कि क्या भोजन अन ही हो सकता है और कोई वस्तु नहीं, क्या अससे ही तृप्ति होती है ? यदि सच पूछा जाय तो आत्माकी पुराक अन्न पानी नहीं है । यह तो परवस्तु तथा शरीरको पोषण करनेवाली पौगलिकवस्तु है । और आत्माकी निजी पुराक तो उसका ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप, सम, संवेद, निर्वेद, अनुकम्पा आस्तिस्य ही है । इस वास्तविक सुराकको प्राप्त करनेपर आत्माकी सदाके लिए तृप्ति हो जाती है। अतः पूज्य मुनिवर्थ्य ज्ञान, दर्शन चरित्रकी आत्मीय खुराक देनेके नाते अगदाता भी हो सकते हैं। और इस दानके मुन्दर कार्य भारके संचालक मुनि ही होते हैं जोकि दोनों प्रकारसे निईन्द्र हैं। धील, वप और भाव गुप्त रीबिसे दानमें ही छुपे हुए हैं । अत एव चारों धर्मोमें पहले दानको प्रमुखस्थान प्राप्त है । परन्तु दान, शील, तप भी भावके सद्भावसे अर्थात् पवित्रभावरूपी सुन्दरलहरके आनेपर सफल हो सकते हैं अन्यथा नहीं। धर्मरत- चतुर्विध अमूल्य धर्मरत्न पाकर श्रेष्ठकुलकी प्राप्ति, समस्त इन्द्रियादिक की अनुकूल सामग्री युक्त मानवका कर्तव्य है कि-वह अनेकान्तवादकी शैलीको समझकर जिनेन्द्रके, धर्मतत्वका आश्रय पाकर आठकर्मरूप पदोंको तोड़नेका प्रयन करे। कर्म नाश करनेकी कसौरी- कर्मोका नाश लाग, वैराग्य, संयम, नियम, तपकी अमिमें आत्मासे इस .
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिवा १९ प्रकार होता है जैसे अमिमें मुवर्णका मल नाश होता है अतःउपरोक साध. नोंको साधकका कर्तव्य है कि उन्हें समझनेकेलिए सर्वज्ञपभुध उपदेश सुनना चाहिए। और आप्तका रहस्य जानना चाहिए । यह निस्संदेह है कि आप्त अठारह दोषों से रहित होते हैं। वे चार घनधाविक कर्म क्षय करके अनन्त चतुष्टय अर्थात् अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तसुख और वह अनन्तसुख देहावस्थामें भी प्राप्त कर सकते हैं। वे साथ, साध्वी, धावक, श्राविकारूप भार धर्मतीर्थ स्थापन करनेके नाते तीर्थकर कहलाते हैं। और धर्मका आय प्रयम करनेसे तथा अनन्त विभूति प्राप्त करनेपर वे असंख्य देव और इन्द्रकी सेवा के योग्य होते हैं अतः अर्हन भी हैं। और इस वर्तमान अवसर्पिणी- कालके चतुर्थ-मारकमें हमारे इस भारत वर्षमें २४ अर्हन हो गए हैं जिनमें अन्तिम अर्हन् महावीर प्रभु हुए हैं। चीर प्रभुकी स्तुति- शातपुत्र महावीर प्रभुका हमपर पूर्ण उपकार है । उनके उपकारों का भूलजाना फूतानता है। उन्हें निर्वाण हुए यद्यपि २४६५ वर्ष होगए हैं तथापि उनका अनुकरण करनेके लिए उनके गुणों का स्मरण करना, तथा उनकी स्तुति करना हमारा परम कर्तव्य है, अतः आन उनकी स्तुतिरूप व्याख्या करनेकेलिए प्रयत्नशील हुआ हूं। उनकी अनेक स्तुति और मेरा असामर्थ्य- तत्वके अध्येताओंमें मुख्य विद्वानोंने उनके अनन्तगुणोंका अनेक उत्सम छन्दोंमें वर्णन किया है, परन्तु में भी अपने सम्यग्दर्शनके बलसे छ स्तुति करूं मुझे ऐसी सूझ पैदा हुई है । यद्यपि मुझमें उन विद्वानों जैसी विभा तो नहीं, मगर मेरा उत्साह और भक्तिकी निर्भरता मुझसे बलात्कार रेरणा कर रही है। कारण जिस रास्लेसे गरुड अपनी चण्डगविसे उडकर नेकल गया हो क्या उसके पीछे एक छोटीसी तितली जाने इच्छा नहीं होती ! भवश्य होती है। इसी प्रकार अल्पसमायः मैं भी मानसोरमुकता से भरपूर होकर शातपुष महावीर खानीकी स्तुति 'वीरस्तावि' स्वकृतांग नामा सूपके छठे अभ्यायी पाल्पाके बहाने अवश्य करसकता हूं। मुझे भाया है कि उसने मुझे सफलता . २० वीरस्तुतिः। अवश्य प्राप्त होगी। क्योंकि मणिमें डोरा पिरोने की अपेक्षा उसका बेध करना कठिन होता है । अतः उनकी स्तुति रूप कृति तो पहलेसे ही विराजमान है किन्तु मैं तो उनकी स्तुविरूप मणिको अपनी अननुभूत टूटी फूटी लोक भापाके डोरेमें ही पिरोनेका सतत प्रयत्न करूंगा। और यह मेरी अनल्पीयसी भक्तिके कारण अधिक, कठिन नहीं है । परन्तु यह सब प्रभुकी कृपा ही है। मेरी इसमे कुछ विशेषता नहीं है । क्योंकि उन्होंने २५०० वर्ष पहले आत्म- ज्ञानका मार्ग भन्यात्माओंकेलिए परिमार्जित कर दिया है। इसमें मुझ सम अल्पमतिकी मजाल नहीं कि कुछ विशेषता पैदा कर सकू, यह सब प्रक्रिया उनकी ही बताई हुई तो है। वीर प्रभु का गुण गान करते समय- आरंभमें गुरु और शिप्यकी वाते। अन्तिम तीर्थकर ज्ञातनन्दन-महावीर प्रभुके गुणों को जाननेकेलिए जिज्ञासु जम्बू ने जोकि एक सुमुक्षु अन्वेवासी शिष्य थे, वे वस्तुका निश्चय करनेमें सदैव सचेष्ट रहते थे, वे तत्वको पाकर असीम श्रद्धा और प्रतीति के साथ मनन करनेवाले महापुरुषों में से एक थे; आचार्य और उसकी पहिचान वे भगवान् मुधर्माचार्यकी सेवा में सदाकाल तत्पर रहते थे। मुध एक विशेष आचार्य तथा समझदार जैनसमाजके सच्चे नेता थे । वे चतुर समाजको हमेशा संगठन और सचरित्रो रहनेका पूर्णतया प्रभावोत्पादक उपदेश कियाकरते थे। वे स्वयं भी विनयशील और आचारयुक्त थे। क्योकि जो खयं परिशुद्ध और गुणसमन्वित होता है वही चरित्राकांक्षीकी अध्यात्म मनोरथ माला को गूंथ सकता है अतः वही आचार्य होनेका सर्वाधिकारी है। कहा भी है कि-"जो सूत्र और अर्थका जाननेवाला है, आत्माके ज्ञानलक्षणको मांजकर जिसने चमकीला कर दिया है। चारोंसंधकेलिए जो (पृथ्वी की भान्ति) अवलम्बनभूत है, संघकी अशान्तिका नाश करदेता है, आत्म-तत्व का उपदेशक है, वही आचार्य होता है", वह पांच प्रकारके आचारोंका स्तः पालन करता है। आपकी देखा देखी संघ भी सदाचारका अनुकरण करता है। इस प्रकारसे आचारका गाथातथ्य उपदेश आचार्य के द्वारा ही मिलता है। क्योंकि- संस्कृतीका-हिन्दी-गुजरंभापान्तरसहिता २१ "जो पांच प्रकारके आचारोंका स्वयं समाचरण करता है, अध्यात्म- ज्ञानका प्रकाशक है, चरित्रको प्रगढमें पवित्र दृष्टिसे भावके रूपमें भर देता है, वही आचार्य होता है।" आचार्य के छत्तीस गुण- पांच इन्द्रियों को वश करते हैं, नववाडविशुद्ध ब्रह्मवर्यका पालन करते हैं, क्रोध, मान, माया, लोभको दूर करते हैं, पांच महाव्रतों का पालन करते हैं, 'पाच आचारोंका समाचरण करते हैं, पाच समिति, तीनगुप्ति इन आठ प्रवचनोंको धारण करते हैं, ये छत्तिस-गुण उत्पन्न होनेपर आचार्यकी योग्यता आ सकती है अन्यथा नहीं। आचार्य को चतुर गोपाल की उपमा- चतुर ग्वाल सब पशुओंको अपनी विचारदृष्टिमें रखता है । उन्हें किसीके खेतमें नहीं घुसने देता। इसीप्रकार आचार्यभी अपने संघको अशान्ति, कुसम्प, कपाय, रूढिवाद और वैषम्यकी ओर नहीं जाने देता, समाजमें क्लेश होते ही आचार्य तुरन्त मिटा देते हैं । या भव्यात्माओं के जन्म जन्मान्तरों के प्लेश मिटा देते हैं। उन्हें सन्मार्ग-मम्यग्दर्शनका राह मुझा देते हैं, युक्त, अयुक्त, संसार-मोक्ष, हित-अहित, धर्म-अधर्मका रहस्य भिन्न भिन्न करके समझा देनेका उपकार प्रस्तुत करते हैं। उन्हें नमस्कार करने का प्रयोजन- आचार विषयक उपद्रेश उन्हीं से प्राप्त होता है, इसलिए तीसरे पदमें उनकोभी नमस्कार किया है, क्योंकि उन्होंने चरित्रोपदेशकताद्वारा हम पर खूब प्रभाव डाला है, हम उन्हें उपकारकी दृष्टि से निरहंकार होकर नमस्कार करते हैं और द्वादशांगी-शान वाणीके पूर्णपाठी तथा औरोंको पढानेका कार्य भी इन्हींके हाथ है। आचार्य की विशेषता: दर्शन, चरित्र, तप रूप गुप्त मन्त्रकी उत्तम चैली से ये ही - व्याख्या करते हैं।
२२ वीरस्तुतिः। 1 "ये मोक्ष शाखके उपदेशक हैं।" "शियोंको सदाचारमें स्थापन करते हैं।" , "शिक्षा पूर्ण-खामी होते हैं।" "आत्मयोग-सिद्धिका मार्ग इन्हीं से मिलता है।" श्रीमान सुधर्म-आचार्य-आचार्य के समस्ख गुणों से मण्डित हैं। जम्बू मन्तवासी का सुधम्माचार्य से प्रश्न। 'अगाध गुणसमुदा मुधर्माचार्यसे जिज्ञामु शिष्य जम्बूने अंतिम- तीर्थकर भगवान् ज्ञातपुत्र-महावीरखामीके गुणोंका परिचय प्राप्त करनेके लिए यह पूछा कि वे प्रभु कैसे थे। धर्म-वर-चक्रसे संसारमें रुलानेवाले कर्मोंका अन्त उन्होंने किस प्रकार किया। जिसमार्गका अनुसरण उन्होंने किया था यदि हम भी उसी मार्गका आश्रय ले तो हमारा प्रभुके साथ कैसे साम्य हो सकता है ! नरकके दुःखोंको मुनकर जिनका मन अत्यन्त उदास हो गया है, त्याग और वैराग्यसे जो समलंकृत होना चाहते हैं, वे भ्रमणादि मुझसे पूछते हैं कि ससारसे पार करनेवाला धर्म किसने प्रतिपादन किया है ? संसारमें विचरण करते समय बहुतसे थमण भी यही प्रश्न करेंगे। वे भमण-साधु होते हैं । परिमह प्रन्थीके काटनेवाले हैं । निष्काम तप करते हैं। वे दूसरेके दुःख सुखको अपनी तरह समझने के कारण खेदज्ञ भी होते हैं। ब्राह्मण- इसके अतिरिक्त मुझसे कई ब्राह्मण भी यही पूढेंगे। और वे ब्रह्मचर्य पालन करने से, सिद्ध-परमात्माका शान-मार्ग मुननेसे, परका आत्मा अपने सदृश जाननेसे, ब्रह्मके नामसे प्रसिद्ध हैं। -वृद्ध पुरुषों के यताए ब्राह्मण लक्षण- जिसमें सहनशीलता, निरीहता, अहिंसकता, उदारता, सल, शौच, पांच अणुव्रत, विद्या, विनय सम्पन्नता है उस पुरुषमें ब्राह्मणका पहला लक्षण है। जो शान्त है, इन्द्रियों को अपने वश करता है, पवित्र और दृढ़ ब्रह्मचारी है। सब प्राणियों के हित और कल्याणमें सदैव लगा रहता है। को कभी भी क्रोधके आवेशमें नहीं आता। यह वाक्षणका दूसरा लक्षण है। - संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरापान्तरसहिता २३ जो निर्लोभी है, अभिमानसे रहित है, सर्वथा पापको साग चुका है, राग, द्वेष और मोहसे युक्त है, यह तीसरा लक्षण है। मार्गमें, जंगलमें, या किसीके घर पर वस्तुको देख कर जिसका चोरी करनेको जी नहीं चाहता, चोरी करके परवस्तु नहीं लेता है वह ब्राह्मणका चतुर्य लक्षण हैं। जो मांस, मदिरा, मधुका कभी सेवन नहीं करता है; गूलर, अंजीर भादि गले सडे कोडोंवाले फल नहीं खाता है, तथा रातको भोजन नहीं करता है, यह पांचवां लक्षण है। किसीने ब्राह्मण के १० प्रकार भी कहे हैं। देव, द्विज, मुनि, राजा, वैश्य, शूद, बिलाव, गधा, म्लेच्छ, चाण्डाल, इन भेदोंसे ब्राह्मण १० प्रकार के होते हैं। देव- जो एक वक भोजन करता है, मांस, मदिरा नहीं खाता पीता, तत्व ज्ञानके पारको पहुँच गया है, वह देव ब्राह्मण है। द्विज- महानती नियमयुक्त-संयम पालक इन्द्रियविजेता-समतोलन वृत्ति वाला, आत्मा और मनका विजेता-क्षमा और सहिष्णु ब्राह्मण द्विज कहलाता है। मुनि- जो रूखा, सूखा साफर सन्तोप कर लेता है, दिन में भोजन करता है, सदैव वनमें रहता है, दिन, रात आत्म-ध्यान में लगा रहता है। योगाभ्यासके साधनमें संलम है, वह मुनि ब्राह्मण है। नृप- जो हाथी घोडोंपर चदनेकी इच्छा रखता है, समर भून में जाकर युद्ध करता है, अपने देशये दासत्व की श्रृंखला से मुरू करके सतन्त्रता दिलाता है । जिसे अन्यायका नाश करते दया न आदी हो, न्यायसे शासन चलाता हो, साम्यवादकी स्थितिपारकतामें शूर वीर हो, जिसमें कायरता का नाम तक नहीं है। वह मासण राजाके समान होता है। ।
वीरस्तुतिः। .. वैश्य- . जो खेती करता है, न्याय नीति- व्यापार करता है, पशु पालन करता है, सदैव न्यायका पक्ष लेता है, जन समाज की सेवा में तत्पर है, जो दानके अर्थ सब प्रकारके धातुओं का अनुक्ल-आर्य वृत्ति से संग्रह करना जानता है, वह ब्राह्मण वैश्यके समान है। जो लाख और तैलका क्रय, विक्रय करता है, व्याज खाता है। मांस, मदिरा देवता है, वह शब्द ब्राह्मण है, बिलाव- जिसे भक्ष्याभक्ष्यका ज्ञान नहीं है, जो गाने बजाने का काम करता है, परी गामी है, यह ब्राह्मण बिलाव प्रकृति का है। म्लेच्छ- बाचढी, कुवा, तालापसे जो अनछना पानीका व्यवहार करता हो, परके आत्मसंबन्धी दुःसको न जानता हो, वह म्लेच्छ ब्राह्मण है। चाण्डाल- जो जंगल में आग लगा कर खेदी करता है, जो हरेक जीवको मार डालता है, अहिंसा धर्म से अनभिज्ञ है, वह विन चाण्डाल है। खर- शास्त्र अध्ययन और जप तप आदि अध्यात्मीय पद् कर्म करना नहीं जानता है, मृतक के घर आहार करता है, उसे खर-ब्राह्मण समझना चाहिए। अयोग्य ब्राह्मण- जो अन्यके दोपोंको प्रगट करता है, और अपने पापको छुपा देता है, वह ब्राह्मण धर्मके अयोग्य है, उसका जीवन फुपे की पूंछ की तरह व्यर्थ है। घाह्मण-परम्परा- जन्म कालमें वह शुद्ध रहता है, गुण वृद्धि पाकर द्विज होता है, शाला भ्यास करनेसे विष है, और यह अध्यात्मयोग तथा ब्रह्मज्ञान पाकर ब्राह्मण हो जाता है।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २५ : अब्राह्मण-.. जो क्रोध और मान तथा प्राणि-हिसा करता है, असत्य-बोलता है, चोरी करता है, परिग्रह-तृष्णा युक्त है। वह ब्राह्मण जाति. और विद्यासे हीन तया पतित है, वही अब्राह्मण और पाप क्षेत्र कहलाता है। ब्राह्मणोचित सर्वश्रेष्ठ यश- जो पांच संवर भावोंसे आस्रवद्वारा आनेवाले पापको रोकता है, जिसे जीवित रहनेकी आकांक्षा नहीं होती; जो कायोत्सर्ग द्वारा आत्म-चिंतनमें लगा रहता है, मन, वाणी तथा कायके पापविकारोंसे अलग हटकर जो सम्बया पवित्र हो गया है। जिसने देहका मोह त्याग दिया है, वह महाजय पानेका उत्तम अधिकारी है, यही श्रेष्ठ यज्ञ करता है। ब्राह्मणोचित तीर्थस्नान- धर्मरूपी द्रह है, ब्रह्मचर्य शान्तितीर्थ है, आत्माका प्रसन्न लेश्या रूप पवित्र जल है, इसी में स्नान करनेसे कमरहित और निर्मल होकर जन्म मरणसे मुक्त होता है। उसमें सदाके लिए अपुनरारविरूप पवित्रता आ जाती है। अध्यात्म दोषोंका सर्वथा अभाव तब ही होता है । ४६ ॥ यह मान आत्मज्ञानके मर्मज्ञोंने देखा है, ऋपियोंका श्रेष्ठतम और महास्नान (महायत) ही है। जिसमें मान करनेवाले, पवित्र और कर्मरहित, होनेवाले महपिंगण उतम मोक्ष स्थानको प्राप्त करते हैं। इस प्रकार उपरोक लक्षणवाळे ब्राह्मणों की तरह गृहवासी, क्षत्रियादिक तथा परमतावलम्बी भी यही पूरेंगे कि साधु और गृहस्थके मेदसे जो धर्म दो प्रकार का है वह किसने बताया है। उसका प्रणेता कौन है ? जो धर्मः दुर्गतिमें, पडनेसे धारण करके आरमाको उचानेवाला है, समदृष्टिये एकान्त कल्याण और हित करनेवाला है। जिसकी महिमा अतुल और अपार है । उसे किस प्रणेताने समतापूर्वक कहा है ! जिसमें विषमता और पूर्वापर विरोधकां. नाम तक भी नहीं है ॥१॥ गुजराती अनुवाद-आ संसाररूपी गहन वनमा भ्रमण करता प्रमिओने माटे दद्य ध्यन्ते दुर्लभ एका मनुष्य जन्मनी प्राप्ति थवी अति कठया छ, तदुपरान्त भार्यदेश, [आर्यभोजन, आर्य प्रति, आर्यवेश, आर्यसहवास , २४ वीरस्तुतिः। वैश्य- जो खेती करता है, न्याय नीतिसें व्यापार करता है, पशु पालन करता है, सदैव न्यायका पक्ष लेता है, जन समाज की सेवा में अत्पर है, जो दानके अर्थ सब प्रकारके धातुओंका अनुकूल-आर्य धृत्ति से संग्रह करना जानता है, वह ब्राह्मण वैश्यके समान है। शूद्र- जो लाख और तेलका क्रय, विक्रय करता है, व्याज खाता है। मांस, मदिरा बेचता है, वह शब्द ब्राह्मण है, विलाध- जिसे भक्ष्याभक्ष्यका ज्ञान नहीं है, जो गाने बजानेका काम करता है, परस्त्री गामी है, वह ब्राह्मण बिलाव प्रकृति का है। बावडी, कुँवा, तालायसे जो अनछना पानीका व्यवहार करता हो, परके भामसंन्धी दु.खो न जानता हो, वह म्लेच्छ ब्राह्मण है चाण्डाल- जो जंगलमें आग लगा कर खेती करता है, जो हरेक जीवको मार डालता है, अहिंसा धर्म से अनभिज्ञ है, वह विप्र चाण्डाल है। शास्त्र अध्ययन और जप तप आदि अध्यात्मीय पद् कर्म फेरना नहीं जानता है, मृतक के घर आहार करता है, उसे खर-ब्राह्मण समझना चाहिए। अयोग्य ब्राह्मण- जो अन्यके दोषोंको प्रगट करता है, और अपने पापको छुपा देना है, वह ब्राह्मण धर्मके अयोग्य है, उसका जीवन कुत्ते की पूंछ की तरह व्यर्थ है। प्राह्मण-परम्परा- जन्म कालमें यह भद रहता है, गुण वृद्धि पाकर द्विज होता है, शास्त्रार भ्यास करनेसे वित्र है, और वह अध्यात्मयोग तथा प्राज्ञान पाकर बाझग हो जाता है। M संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता २५ 5 : अब्राहाण- जो क्रोध और मान तथा प्राणि-हिंसा करता है, असब बोलता है, चोरी करता है, परिग्रह-तृष्णा युग है । वह ब्राह्मण जाति और विद्यासे हीन तथा पतित है, वही अब्राह्मण और पाप क्षेत्र कहलाता है। ब्राह्मणोचित-सर्वश्रेष्ठ यश- जो पांच संवर भावोंसे भानवद्वारा आनेवाले पापको रोकता है, जिसे जीवित रहनेकी आकांक्षा नहीं होती; जो कायोत्सर्ग द्वारा आत्म-चिंतनमें लगा रहता है, मन, वाणी तथा कायके पापविकारोंसे अलग हटकर जो सर्वथा पवित्र हो गया है। जिसने देहका मोह त्याग दिया है, वह महाजय पानेका उत्तम अधिकारी है, यही श्रेष्ठ यज्ञ करता है। ब्राह्मणोचित तीर्थस्नान- धर्मरूपी द्रह है, ब्रह्मचर्य शान्तितीर्थ है, पास्माका प्रसन्न लेश्या रूप पवित्र जल है, इसी में मान करलेसे कर्मरहित और निर्मल होकर जन्म मरणसे मुक्त होता है। उसमें सदाके लिए अपुनरावृतिरूप पवित्रता आ जाती है। अध्यात्म दोपोंका सर्वथा अभाव तव ही होता है ॥ ४६॥ यह मान आत्मज्ञानके मर्मज्ञोंने देखा है, ऋपियोंका श्रेष्ठतम और महास्नान (महानत ) ही है। जिसमें स्नान करनेवाले, पवित्र और कमरहित, होनेवाले महपिंगण उतम मोक्ष स्थानको प्राप्त करते हैं। इस प्रकार उपरोक लक्षणवाले ब्राह्मणोंकी तरह गृहवासी, क्षत्रियादिक तथा परमतावलम्बी भी यही पूडेंगे कि साधु और गृहस्थके मेदसे जो धर्म दो प्रकार का है वह किमने बताया है ? उसका प्रणेता कौन है ? जो धर्म दुर्गतिमे, पडनेसे धारण करके आत्माको बचानेवाला है, समदृष्टिसे एकान्त कल्याण और हित करनेवाला है । जिसकी महिमा अतुल और अपार है । उसे किम प्रणेताने समतापूर्वक कहा है ? जिसमें विपमता और पूर्वापर विरोधका, नाम तक भी नहीं है। १॥ गुजराती अनुवाद आ संसाररूपी गहन वनमा भ्रमण करता प्राणिओने माटे दश दृष्टान्ते दुर्लभ एवा मनुष्य जन्मनी प्राप्ति थवी अति कठण छ, तदुपरान्त आर्यदेश, [आर्यभोजन, आर्यवृत्ति, आर्यवेश, आर्यसहवास .
- वीरस्तुतिः। आर्यभाषा, आर्यजीवन, उत्तम कुल, दीर्घ आयुष्य, आरोग्य शरीर, समस्त इन्द्रियोने इच्छानुकूल सामग्रीनो संयोग अने अभ्यात्मिकजीवन गाळनार साधुपुरुषोनो सत्संग ए तेनामी वधु कठण छ। पण वीतराग प्रणीव धर्ममो प्रयत्नशील बनवं, ए सोधी वधु कठण छ । जगत्ना जीवोने कल्याणकर सर्वज्ञ कथित धर्मज छे, आ भाव औषधिना सेवनधी शारीरिक वेमज मानसिक सर्व रोगो नाच पामे छे, वे धर्म शातपुत्र श्रीमहावीर प्रभुए दान- शील-तप-भाव ए चार प्रकारे बतायेलो छे. दान धर्मनी विशेषता-दानने सौथी प्रथम एटला माटे कहेवामा आवेल छ के दान धर्मनो पालना प्रणे प्रकारोमां पण समावेश यएला छ, जगतमा आ लोक तथा परलोकनी सावर दान देवानी प्रणाली सीधी पुराणी छ। श्रीतीर्थकर भगवान् सौथी पहेलां वरसीदान आपीने पछी दीक्षा अंगीकार करे छ। शीलमा दान धर्मनो समावेश-शील धर्भमां पण दानधर्मनो समावेश थाय छे, ब्रह्मचर्य पालनथी दरेक वसते असंख्य बेइन्द्रिय असंख्य सम्मूर्छिमपंचेन्द्रिय तथा नव लाख गर्भज पवेन्द्रिय जीवोने अभयदान मळे छ । अन्य शास्त्रकारोए पण आ व बहुज माहात्म्य दविल छे। एकरात्रोपितस्यापि, या गतिम्रह्मचारिणः । न सा ऋतुसहस्रेण प्राप्तुं शक्या युधिष्ठिर। [मार्कण्ड ऋपि] भावार्थ-एक रात्रिना पण ब्रह्मचर्य पालनथी जे उत्तम गति तथा श्रेष्ठ फल ब्रह्मचारीने मळे छे, ते हे युधिष्ठिर ! हजार यज्ञोथी पण मळतो नथी । शीलनतर्नु पालन करीने वीर्य (आत्मशक्ति) नुं रक्षण करनार गर्भ, जन्म मरणादि दुःसोथी मुक याय छे। एटले के वे पोताने पण अभयदान थापे छ । माथी शीलमा पण दान गर्भित होवार्नु स्पष्ट जणाय छे। उपमां पण दानधर्मनो अन्वर्भाव-भीलनी माफक तपचर्यामां पण दानधर्मनी आराधना छुपायेली छ। आ वात सर्व कोई जाणे के छमायनी विराधना [ हिंसा या आरम्भ] वर भोजन तैयार यई एकतुं नथी। परन्तु संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता इच्छानिरोधरूप उपवासादि तप करवायी छकायनो आरम्भ बंध थतो ते दिवसे अनन्त जीवोने अभयदान मले छे, तेथी तप करवाथी पण दानधर्मर्नु अनायासे पालन थई जाय । भाव धर्म तो दानधर्म छेज- प्रत्तिने रोकी करुणा राखवी तथा अप्रमत्तयोगधी जीव तथा अजीवनी रक्षा करवी, तेनुं नाम भाव छ, सा पण भावनी टिए बधाने अभयदान मळे छ, तेथी प्राणीरक्षानुं नामज भाव अथवा भावशुद्धि छ । शुं साधु पण दान दे ? हा, जैन मुनि पण हमेशा उपदेशदान, ज्ञानदान, शिक्षादान, रूढि- च्छेदक दान दे छे, अने तेथी मानवसमाजपर महान् उपकार करे छ, कोई नसते लोको एमपण कहे छ, के साधुने नहि पण दानी अथर राजानेज अनदाता कहेवा जोइए, साधु शुं कोईने भोजन पाणी थापी शके छे? पण एटलं तो जरूर समजी ठेवू जोइए के शुं अनाज मात्र भोजन कहेवाय छे ? बीजी कोई वस्तु नहि, तृप्ति शुं मात्र अनाजधीज थाय छे? खरी री आत्मानो सोराक अन्न पण नथी, ए तो पर वस्तु तथा मात्र देहमुंज पोषण करनारी पौलिक वस्त छे. पण आत्मानो पोतानो खोराकतो ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, शम, सवेद, निर्वेद, अनुकंपा, आस्तिक्य छ । वे वास्तविक सोराकनी प्राप्तिथी भारमानी हमेशने माटे तृप्तिज थई जाय छ। तेथी पूज्य मुनिवर शान, दर्शन चरित्ररूपी आत्मीय सोराक भापता होवाथी तेओने अन्नदाता पण कही शकाय, भने आ दानरूपी मुन्दर कार्यना संचालक मुनिज होय छे, के जे बने प्रकारे निन्द होय छे। खील तप वेमज भाव गुप्तरीते दानमा समायेय छे तेथी चारे धर्ममा दानने प्रथम स्थान मापवामां भावेल छ, परन्तु दान, शील, तप पण भावन सद्भावधी एटले के पवित्र भावरूपी मुंदर लहर आववाथी सफल बनी शके छ, बीजी रीठे नहि। धर्मरन- चतुर्विध अमूल्य धर्मरन मेळवीने श्रेष्ठकुल तेमज इन्द्रियादिकनी अनुकूल सामग्री प्राप्त भयैल, मनुष्यतुं कर्तव्य है के अनेकान्तवादनी शैलीने समजीने २८ वीरंस्तुतिः। जिनेन्द्र कथित धर्मतत्वनो पाश्रय लइने आठकमरूपी जालने तोडवानो देणे अवश्य प्रयत्न करवो जोइए। कर्मनाशनो उपाय- जेची रीते भनिथी सुवर्णनो भेल नाश पामे छे तेपीज रोवे लाग, वैराग्य, संयम, नियम, तपरूपी अमिथी कर्मोनो नाश घई जाय छे । साधकर्नु ए कर्तव्य है के उपरोक्त साधनोने समजवाने माटे वेणे सर्वज्ञ प्रभुनी वाणीरूप उपदेश सांभळवो जोइए अने आप्त [सर्वज्ञ] कोने कहेवाय ते समजवु जोहए। आप्त अढार दोप रहित छे, चार घनघावी कर्मनो क्षय करी अनन्त चतुष्टय [ अनन्तज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त भुख, अनन्त शकि] ने वरेला छे साधु, साध्वी, श्रावक श्राविका ए चार तीर्थना स्थापक होवाथी तीर्थंकर कहेवाय छ । धर्मनी आदि करवाथी वेमज अनन्त विभूतिमय होवाथी तेओ असंख्य देव तेमज इन्द्रोधी सेवधा योग्य छ । तेथी अईत्-पण कहेवाय छ। वर्तमान अवसर्पिणी कालना चोथा आरामां आ भारतवर्षमा २४ तीर्थकर, एटले आप्त पुरुषो थई गएला छे । जेमांना अन्तिम तीर्थंकर ज्ञातृपुत्र महावीर प्रभु छ । वीरप्रभुनी स्तुति- ज्ञातृपुर महावीर प्रभुनो आफ्णापर अत्यन्त उपकार छे । तेमना उपका- रोने भूली जवामां कृतघ्नता छ, तेथी जोके तेमनुं निर्वाण थया २४६५ वर्ष थई गया छतां तेमना गुणोनुं सरण कर तथा तेमनी स्तुति करवी, ए आपणु परम कर्तव्य छ, तेथी आजे हुं तेमनी स्तुतिरूप व्याख्या करवा प्रयत्नशील बन्यो छु। तेमनी अनेक स्तुति अने मारु असामय- तत्वज्ञोमा मुख्य विद्वानोए अनेक गुणोनुं अनेक उत्तम शब्दोमां वर्णन करेल छे, परन्तु हुं पण पोताना सम्यग्दर्शनना बलथी काइक स्तुति कर्स, एवी उच्च अने पवित्र अभिलाषा प्रगट थई। जो के मारामां ते विद्वानो जेवी प्रतिभा नथी, छता मास उत्साह अने भक्ति मने वळात्कारे प्रेरणा करी रहेल छ, कारण के जे रस्ते गड पोतानी प्रचंड गतिथी उहीने पसार थई गयेल होय छे, वे रस्ते तेनी पाछल एक नाना पीने जवानी इच्छा शं नथी यन्त्री ? जरूर थाय छ। ' संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २९ एरीते अल्पज्ञ प्राय हुं पण मानवोचित उत्सुकताथी भरपूर बनीने 'वीरस्तुति' नामे श्रीमूत्र कृतागना पष्ठम अध्यायनी व्याख्यारूपे ज्ञातपुत्र श्रीमहावीर प्रभुनी स्तुति करूं छु मने आशा छ के तेमा भारी प्रसन्न भक्तिरूप सफलता जरूर थशे। मणिमा दोरो परोक्या करता तेने वींधq चधु कठश छे, तेमनी स्तुतिरूप कृति तो प्रथमथी ज छ पण हु तो तेमनी स्तुतिरूप मणिमां मारी बीनअनुभवी तूटीफूटी बालभापारूपी दोरो परोक्वानो सतत प्रयत्न करीश, अने ते मारी अत्यल्प भक्तिना कारणे अधिक मुश्केल नथी। पण ते वधी प्रभुनी कृपाज छ । तेमा मारी कशी विशेषता नथी । कारण के तेओश्रीए २५०० वर्ष पहेला भव्या. त्माओ माटे आत्मज्ञाननो मार्ग सरल करी दीधेलो छ तेमा विशेपता उत्पन्न कर- वानी मारी अल्पजनी कशी शक्ति नथी। आ सर्व प्रक्रिया तेमनीज बतावेली छे । वीरप्रभुना गुणगान करतीवखते प्रारंभमा गुरुशिष्य संवाद- जिज्ञासु जंयुखामी मुमुक्षु तेमज मुख्य अन्तेवासी शिष्य हता, तेओ वस्तुनो निर्णय करयामा सदा तत्पर रहेता हता। तेओ तत्वने प्राप्त करीने असीम श्रद्धा तेमज प्रतीति साथ मनन करवावाळा महापुरुषोमाना एक हता, वेओ भगवान् मुधर्माऽऽचार्यनी सेवामा सदा तत्पर रहेता हता। आचार्यनी ओळख- ते वखते सुधर्मा एक विशेष आचार्य तेमज समजदार जैनसमाजना माचा नेता हता. तेओ चतुरसमाजने संगठित तथा सच्चरित्रवान् बनाववानो पूर्ण प्रभा- वशाळी उपदेश आप्या करता हता। तेओ पोते पण विनयशील अने आचारयुक्त- हता, कारण के जे पोते विशुद्ध तेमज गुणी होय छे तेज वीजाओ माटे चारित्रा. कांक्षीनी अध्यात्म मनोरथमाला गुंगी शके छ, तेथी आचार्यप्रणामाटे पूर्ण अधिकारी छ। कयुं पण छे के "जे सूत्र तेमज अर्थना जाणकार छ, आत्माना ज्ञानलक्षणने निर्मल बनावीने जेमणे प्रकाशित करेल छे, चारे प्रकारना संघने जेभो पृथ्वीनी पेठे आधारभूत छ । सघनी अशान्तिनो नाश करे , आत्मतत्वनुं उपदेष्टा छे, ते आचार्य होई शके"। तेओ पात्र प्रारना आचारोन पोते पालन करे छ, तेमनी देसादेखीयो संघ पण सदाचारनु अनुसरण करे छे, आ रीवे आचारनो यथातथ्य उपदेश आचार्य द्वाराज मळी शके छे । कारण तेओ अभ्यामनना प्रकाशक छ ।
३० वीरस्तुतिः। आचार्यना छधीश गुण- पांच इन्द्रियोने वश करे छ, नव वाड विशुद्ध ब्रह्मचर्य, पालन करे छ। क्रोध-मान-माया-लोभ दूर करे छे। पांच महाव्रतोतुं पालन करे छ, पांच आचा- रोनुं समाचरण करे छ, पांच समिति-धणगुप्ति ए आठ दया माताना प्रवचनने धारण करे छ। ए छत्रीस गुणवाला आचार्य कही शकाय, वीजा नहीं। आचार्यने चतुर गोपालनी उपमा- चतुर गोपाल यथा पशुओ पर पोतानी दृष्टि राखे छे, तेमने कोईनाखेतरा दाखल यवा देतो नथी, तेवीज रीदे आचार्यदेव पण पोताना संपने अशान्ति- कुसम्प-कपाय-रूढिवाद-विषमता-तरफ इवा देता नथी, क्लेश यतां वेतज आचार्य तरल तेने धमावी देछे, भव्यात्माओना जन्म जन्मान्तरोना क्लेशने मटारी दे छ, तेमने सन्मार्ग-सम्यग्दर्शननो सरल रस्तो बतावे छ। योग्य-अयोग्य, संसार- मोक्ष, हित-अहित, धर्म-अधर्म-विगेरेनी समजण आपे छ । एवा आचार्यप्रभु वादवा योग्य छ। आचार्यने नमस्कार करवानुं प्रयोजन- आचार सम्बन्धी उपदेश वेओनी पासेशी मळे छे, देशी वेमने वीजा पदमा नमन करेलो छ, कारणके चरित्रोपदेशनो आपणा पर तेओ प्रभाव पाडे छ, आपणे तेमने उपकारनी दृष्टिथी निरभिमानी बनीने नमस्कार कारए छीए। द्वादशांगी- [शास्त्र-] वाणीना तेओ पूर्णपाठी छ, तेमज मीजाओने भगाववाचें कार्य पण तेमने हाथ छे। आचार्यनी विशेषता- सान-दर्शन-चरित्र-तप रूप गुप्त मंगनी उत्तम शैली थी वेभो व्याख्या करेछे, तेओ मोक्ष मानना उपदेशक छे, शिप्योने सदाचारमा स्थिर करे छ, शिक्षाना पूर्ण खामी छ, आन्म-योग-सिद्धिनो मार्ग तेमनी पासेभी प्राप्त थाय छ, श्रीमान् मुधर्माचार्य आचार्यना रथा गुणोथी विराजमान हला । अन्तेवासी जंवूनो सुधर्माचार्यने प्रश्न- अगाध गुण समुद्ररूप मुधमाचार्यने जिज्ञासु जंवूए अन्तिम तीर्थकर भगवान् ज्ञानपुत्र महावीर सानीना गुशोनो परिचय प्राप्त करवाने माटे प्रभ कयों के "तओ केवा हता? एधर्मवर- मयखाए पोताना धर्मचथी संसारमा रखडा.
थ . 4 संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता वनारा कर्मोनो अन्त तेओए कह रोते कयों ? जे मार्गर्नु अनुसरण वेओए कर्यु, ते मार्गनो आश्रय जो अमे लइए तो प्रभु साथे अमारूं साम्य केवी रीवे थई शके ? नरकना दु:खो सांभळीने जेमनुं मन अत्यन्त उदास थई गर्यु छे, त्याग भने वैराग्यथी जेओ अलंकृत बनवा इच्छे छे, ते श्रमणादि मने पूछे छ के "संसार रूप समुद्री पार उतारनार धर्मनुं प्रतिपादन कोणे करेलु छ ?" संसा- रमां विचरता घणा श्रमणो आ प्रश्न पूछशे, ने भ्रमण-साधु छे, परिग्रह ग्रन्थीने कापनारा छे, निष्काम तप करे छ, तेओ पोतानी माफक बीजाओनां मुख दुःख समजे छ, तेथी ते खेदज्ञ पण होय छे। ब्राह्मण- तदुपरांत मने कोई ब्राह्मणो पण पूछशे, ब्रह्मचर्य, पालन करता होवाथी, सिद्ध-परमात्माना ज्ञान-मार्गनुं श्रवण करता होवाथी, अन्य-आत्माओने पोताना समान जाणता होवाथी, ते ब्राह्मण नामथी प्रसिद्ध छ । वृद्ध पुरुषोए वतावेला ब्राह्मणना लक्षणो- जेनामा सहनशीलता, निरासक्ति, अहिंसकता, उदारता, सत्य,शीच, पांच अणुव्रत, सात शिक्षावत, विद्या विनयसम्पन्नता होय छे, वेमा प्राह्मण- पहेलु लक्षण छ। जे शान्त होय छ, इन्द्रियोनुं दमन करे छ, पवित्र अने दृढ ब्रह्म- चारी छ, बधा प्राणिओना कल्याण-कार्योमा जे हमेशा तत्पर रहे छे, जे क्रोध फरता नथी, ते ब्राह्मण- बीजं लक्षण छ। जे निर्लेभी छे, निरभिमानी छ, सर्वथा पापना त्यागी छे, गग-द्वेष अने मोहजाळधी मुक्त छ, ते त्रीजु लक्षण छ। मार्गमा, जंगलमां, अथवा कोईना घरमा पर वस्तुने जोईने चोरी करवानी इच्छा सरखी जेमने नथी थती, तेमज चोरी करीने पर वस्तुनुं ग्रहण जेओ करता नथी, ते ब्राह्मणर्नु चोधु लक्षण छ। जे मास, मदिरा, मधुनु क्यारे पण सेवन करता नथी, गुलर-अजीर विगेरे अभक्ष्यफळ तथा गळेला-सळेलां फळ साता नथी, तथा रात्रिभोजनना त्यागी होय छे, ते पाच लक्षण छ । कोईए १० प्रकारना ब्राह्मण कहेला छे- देव, द्विज, मुनि, राजा, पश्य, शूद्र, बिलाव, गधा, म्लेच्छ, चाण्डाल ए नेदोधी ब्रामण दर प्रकारना होई शके छे. देव ब्राह्मण-जे एक पसत भोजन करे छे; मास, मदिरा सेवन करता नथी, तत्वज्ञानना पारने पहोंची गया थे, ते देव ब्राह्मण छ । - - ३ बामण छ। वीरस्तुतिः। द्विज ब्राह्मण महाप्रती, नियमयुक्त, संयमपालक, इन्द्रियविजेता, सम- तोलन तिवात्म, आत्मा अने मनना विजेता, क्षमावान्, अने सहिष्णु के वे द्विज मुनिग्राह्मणले सो मुको आहार लईने पण सन्तोष माने छ, मात्र दिवसेन. भोजन करे छे, हमेशां वनमा वसे छ, दिनरात आत्मध्यानमा भम रहे हैं, योगाभ्यासनी साधना करे छे, ते मुनिब्राह्मण छ। नृपयाह्मण- जे हाथी, घोडा पर वारी करवानी इच्छा गखे छै, रण भूमिमां जई युन करे छ, स्वदेशने गुलामीनी जंजीरथी मुक्त करी वेने स्वतंत्र पनाचे छ, अन्यायनो नाश करवाने के प्रयत्नशील छ, न्यायथी शासन चलावे छ, साम्यवादनी स्थिति- पालकतामां शूरवीर छे, कायरतानो अंशमात्र जेनामां नथी, ते नृपब्राह्मण होय छ। वैश्य ब्राह्मण-से खेती करे छे, न्यायनीतिथी वेपार करे ?, पशुनु पालन करे छ, हमेशा न्यायनो पक्ष त्ये छे, जनसमाजनी सेवामा तत्पर रहेछ, जे दान देवा अर्थे सर्व प्रकार नी धानुओनो आर्यवृत्तिथी संग्रह करवा जाणे छ, ते वैश्य माना। शुद्ध ब्राह्मण- लारा, तेमज तेलनो वेपार करे छे, व्याज साय छे, मांस मदिरा वेचे छे, ते शूद्र बामण छ । बिलाव ब्राह्मण-जने भक्ष्याभक्ष्यनुं ज्ञान नधी, जे गावा वजापान कार्य करे छ, परस्त्रीगामी छे, ते माया बिलाव प्रतिनो छ। म्लेच्छ ग्राह्मण-वाव-कुवा-तळावमाधी जे अणगल पाणीनो उपयोग करे छे, परना दुखोनो जे विचार करतो नधी, ते म्लेच्छ ब्राह्मण छ। चाण्डाल ब्राह्मण-जे जंगलमा आग लगाडीने खेती करे छ, जे दरेक जीवने भारी नाखे छ, अहिंसा धर्मथी अज्ञात छे, ते चांडाल ब्राह्मण छ। खर ब्राह्मण-शान नुं अध्ययन करतां छत्ता अध्यात्म-पट्कर्म करवान जे जागता नथी, तभोजन करे वे सर ब्राह्मण छ। अयोग्य ब्राह्मण-जे अन्यना दोषो प्रगट करे छ, अने पोतानां पापोने छुपावे छे, दे ब्राह्मण धर्म माटे अयोग्य छ, तेनुं जीवन कुतरानी पूछडी माफक गर्थ छे। . H संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता ३ ब्राह्मण परम्परा- । जन्मकालमा ते शुद्ध होय है, गुण वृद्धि पामीने द्विज बने हैं, शास्त्राभ्याम करवाथी विप्र थाय छ, अने अध्यात्मयोग तेमज ब्रह्मज्ञान प्राप्त करीने ते ब्राह्मण थाय छ। अब्राह्मण-जे क्रोध-मान-प्राणी हिंसा-करे छे, असल बोले छे. चोरी करे • छ, परिग्रह राखे छ, तृष्णा युक्त छ, ते ब्राह्मण जाति अने विद्याथी हीन तथा । पतित छ । अने ते पापक्षेत्र कहेवाय छ। ब्राह्मणोचित श्रेष्ठ यज्ञ-पाच इन्द्रियोनुं नियमन करनारा, जीवितव्यनी पण परवा नहि करनारा, कायोत्सर्ग द्वारा आत्मचिन्तवन करनारा; मन, वाणी, तथा कायना पाप विकारोथी दूर रहेनारा, अने कायनी आसकिथी रहिन, एवा महापुरुषो वहारनी शुद्धिनी दरकार न करता उत्तम अने महाविजयी भावयज्ञने ज आदरे छ। ब्राह्मणोचित तीर्थस्नान-धर्मरूपी कुंड छे, ब्रह्मचर्यरूपी पुण्यतीर्थ छ, आत्मानी प्रसन्मलेल्यारूप पवित्र जळ छे, तेमा स्नान करवार्थी कमरहित अने जन्ममरणथी मुक्त थाय छे, हमेशने माटे अपुनरावृत्तिरूप पवित्रता आवी जाय छ, दोपोनो सर्वथा अभाव त्यारेज थाय छ । एवं स्नान आत्म कुशल पुरुषोए कर्यु छ, अने ऋषिओए तेज महास्त्रानने वखाण्यु छ, जेमा स्नानकरेला पवित्र महर्पिओ निर्मल थईने [मरहित यईने] उत्तमस्थान (मुक्कि) ने पाम्या छे। उपरोक्त लक्षणवाला ब्राह्मणोनी पेठे गृहस्थो,त्रियो, अने परधर्मिओ पग मने पूछे छे के एकात हितकारी अने अनन्य धर्म यथास्थित कोणे कयो छेते धर्म दुर्गतिमा पस्ता जीवोने धरी राखे छे, बधार्नु एकान्त कल्याण करे छे, ते अपार महिमामय छे॥१॥ कहं च गाणं कहं दंसणं से, सीलं कहं णायसुयस्स आसी? जाणासि णं भिक्खु ! जहातहेणं, अहासुयं हि जहा णिसंतं ॥२॥ वीर.३ वीरस्तुतिः। संस्कृतच्छाया कथञ्च भानं कथं दर्शनं तस्य, शीलं कथं ज्ञातसुतस्याऽऽसीत् ? जानीपे भिक्षो! याथातथ्येन, यथाश्रुतं भूहि यथानिशान्तम् ॥२॥ सं० टीका तथैव तस्य भगवतो ज्ञातृसुतस्य महावीरस्यान्तिम- तीर्थकृतः सम्यग्ज्ञानादिगुणावातये प्रभयन्नाह कयं केन प्रकारेण स वीरो "वि-विशिष्टां, ई-लक्ष्मी, रातिददातीति सः । अथवा विशेषण ईते सकलान् पदार्थान् जानातीति वीरः, यद्वा वि-विशिष्टा इरा वागदिव्यध्वनिरूपा, इरा=पृथ्वी-ईपत्याग्भारा खरूपाऽस्ति यस्यासौ वीरः, अथवा वीरयति, वीर इवाचरतीति वा धीरः । वीरर- सपूर्णतामासाद्य कामराज-यमराज-मोहराजान् निराकरोतीति वीरः । यद्धा वि-विशिष्टा इरा गगनगमर्न अपुनरावृत्तिरूपं यस्यासौ वीरः।" तस्य भगवतो, ज्ञान “हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थ हि प्रमाणं ततो ज्ञानमेव तत्" "तन्निश्चयात्मकं समारोपविरुद्धत्वादनुमानवत्" अथवा- - "त्रिकालगोचरानन्त-गुणपर्य्यायसंयुताः, यत्र भावाः स्फुरन्त्युचैतज्ज्ञानं ज्ञानिनां मतम् । भौव्यादिकलित निर्भर कलितं जगत्, चिन्तितं युगपद्यत्र, तज्ज्ञानं योगिलोचनम् ॥" पुनश्च- "अनेकप-यगुणैरुपेतं, विलोक्यते येन समस्ततत्वम् । तदिन्द्रियानिन्द्रियमेदभिन्नं, ज्ञानी जिनेन्दैर्गदितं हिताय । रत्नत्रयी रक्षति येन जीवो, विरज्यतेऽत्यन्तशरीरसौख्यात्, रुणद्धि पापं कुरुते विशुद्धि, ज्ञान तदिष्टं सकलार्थवद्भिः ।। - संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता क्रोधं धुनीते, विदधाति शान्ति, तनोति मैत्री, विहिनस्ति मोहम् । पुनाति चित्रं, मदनं लुनीते, येनेह बोधं तमुशन्ति सन्तः ॥" तथाच- "आत्मानमात्मसंभूतं, रागादिमलवर्जितम् । जानाति भवेतस्य, ज्ञानं निश्चयहेतुजम् ।।" अथवा ज्ञायते सदसदनेनेति ज्ञानम् । "मोक्षे धीनिमित्यमरः" । अवाप्तवान् , किंभूतं भगवतो ज्ञानम् । विशेषावबोधकम् , लोका- लोकावयोधकं-सर्वभावग्राहकं लोकालोकविषयं, नातः परं ज्ञानमस्ति । न च केवलज्ञानविषयात्परं किंचिदन्यज्ञेयमस्ति । तत्केवलज्ञानं, केवलं परिपूर्ण समग्रमसाधारणं निरपेक्षं विशुद्धं सर्वभावज्ञापकं लोका- लोकविषयमनन्तपर्यायमित्यर्थः । शुद्धात्मोत्थसहजपरमानन्दरूपमती- न्द्रियसुखं च केवलज्ञानादेवावाप्नोति । अनेन केवलज्ञानचेतनामयत्वेन केवलं ज्ञातृत्वादन्येषां कर्मवन्धं वाथवा कर्मफलं च शुभाशुभं केवल- ज्ञानेनैव ज्ञायते, सूक्ष्मवादरं चराचरं वा पूर्णसर्वज्ञत्वमिति भावः। किंभूतं तस्य दर्शनं, सामान्यार्थपरिच्छेदकं दर्शनावरणरहितं चेति । "निर्वर्णनं तु निध्यान, दर्शनालोकनेक्षणमित्यमरः ।" अथवा दृशेर- व्यभिचारिणी सर्वेन्द्रियानिन्द्रियार्थप्राप्तिस्तत्सम्यग्दर्शनमिति । प्रशस्त दर्शनं सम्यग्दर्शनम् । संगतं वा दर्शनं सम्यग्दर्शनम् । वाथवा जीवादीनि तत्वानि त एवार्थास्तेषां श्रद्धानं तेषु प्रत्यवधारणं, तदेवं प्रशमसंवेद- निर्वेदानुकम्पास्तिक्याभिव्यक्तिलक्षणं सम्यग्दर्शनम् । यस्य मोहनीय- सप्तकक्षयेन दर्शनं विशुद्धं तदेव सावरणं केवलं दर्शनं भवसम्भूत- क्लेशमाग्भारभेषजमनेन चरणज्ञानयोजि महारतविशुद्धभावजीवितं भवति । एतत्सद्दर्शनरनं मुक्तिदं विश्वलोकैकभूषामणिसदृशं । एवमेव वीरस्तुतिः। तच्छीलं चरित्रं यमनियमरूपं "शुचौतु चरिते शीलमित्यमरः"। अतस्तत् खात्मभावेऽपि, यदाह मेदनी कोपे,--शीलं समावे सढचे योगान्तरे सिते” इति। "शोले खभावे सद्वृत्त" इत्यमरोऽपि । तत्कीहक् । ज्ञाताः क्षत्रियातेपी पुत्रो ज्ञातपुत्रः । “राजन्यः क्षत्रियो ज्ञात इति कोषः"। "णायपुत्ते विसोगे" "गच्छति णायपुत्ते असणाए" "इत्याचारागसूत्रे नवमाध्याये" । ज्ञानुपुत्रो भगवान् महावीरप्रभुरिति । तस्यासीदिति । यदेतन्मया पृष्टं तच हे भिक्षो ! "भिक्षुः परिवाद कर्मन्दीत्यमरः"। सुधर्मखामिन् ! याथातथ्येन सम्यक्प्रकारेण जाना- स्वगच्छसि । तत्कृत्वं त्वया यथा श्रुतं कर्णगोचरी [ यथा भवति तथा] कृतं, यधा निशान्तं नितरामतिशयेन शान्तं ह्याचक्ष्वेति भावः । "निशान्तमित्यवधारितं यथा दृष्टं तथेति केचित् ।" अन्वयार्थ-(से) रस (गायमुयस्स ) ज्ञातृपुन महावीर भगवान् (गाणं) ज्ञान ( कहं ) कैसा था, (दसणं) दर्शन (कह) कैसा था, और (सील) चरित्र (कई) कया था, [मिसु ! ] हे मुधर्मस्वामिन् ! आप (जहातहेण] अच्छे प्रकार [जाणाति ] जानते हो अन एव [अहामुयं ] आपने जैसा सुना है एवं जहाणिसंत ] जैसा निर्धारण किया है उसी प्रकार हि ] फर्मादए । भावार्थ-आर्य जम्बू नामक जिज्ञामु-शिष्यने निवेदन किया कि है सुधर्मस्वामिन् ! गुरुवर्य ! आप सब कुछ अच्छीतरह जानते हैं अत एव ऋण करिए और यह फर्माइए कि भगवान् ज्ञातृपुन महावीरका शान कैसा था? उन्होंने उस सम्यग्जानको किस प्रसर प्राप्त किया? और उनग दर्शन सामान्य प्रतिभाग तथा यम-नियम और संयमादि शील चरित्र किसभान्तिके थे॥2 भापाटीका-मोक्ष लक्ष्मीके प्रदाता, सर्वपदाकि जाता, जिसकी वाणी विलक्षण और अमोघ है, जो अटम पृथ्वी (मोक्ष को प्राप्त कर चुसदे, वीर रस पूर्ण है, वीरता पूर्वक जिसने कामराज, मृत्युराज और मोहराजको पीत लिया है, जिसका अविरल ज्ञानमें विशेर गमन अर्थान् प्रदेश है, वह बीर ૨૮ वीरस्तुतिः। रूपसे मैत्री भाव पैदा करनेका खभाव होजाता है। इसके अनन्तर मोह, अवि- वेक, चित विकारके पर्दे तोड डालता है। मोहका सर्वथा नाश होनेपर चित निर्मल और पवित्र हो कर स्थिर होता है, पवित्र चित्तवाला कामदेवका नाश करता है। जिसके ज्ञान-आल्लाका उदय होगया हो उसमें इतनी क्रियाओ- का भी मननात्मक उदय हो जाता है, इससे ज्ञानी अटल मुखके पदको पानेका पूर्ण साधक बन जाता है।" 'जो आत्माको राग द्वेपसे निकालकर निश्चय हेतु बन जाता है बुद्धि- मानोने उसे भी ज्ञान कहा है।' 'जिससे सत् अर्थात् उत्पाद, व्यय, धौम्य और असता विवेक हो "उठता है, उसे भी ज्ञान ही कहा है।' ज्ञान विशेष वस्तुका बोध कराता है, लोक और अलोकके परदे खुल जावे है। हथेली पर रक्खे हुए आमलेकी भाति ससारका सब स्वरूप और घटनात्मक भाव जानने लगता है । वह संपूर्ण ज्ञान केवलज्ञान या ब्रह्मशान है। इससे बढकर ज्ञानकी और कोई भूमिका नहीं है। केवल नाम भी पूर्णताका है, वह ज्ञान असाधारण है, निरपेक्ष और परमाद है, सब पर्यायो और भावोश ज्ञापक है। इससे लोक और परलोक अवगम्य हैं । ज्ञानसे महज और उत्कृष्ट अनन्त आनन्द मिलता है। यही ज्ञान प्राणिभोक वर्मरन्धस समय, तथा उनके शुभाशुभ फलक्स बोध कराता है। तथा सूक्ष्म-बादर, चर-अचरकी पूरी खबर रखने वाला सर्वज्ञ कहलाता है। दर्शन- जिसमें किसी प्रकारका व्यभिचार नहीं पाया जाता; संशय, विपर्यय, मिथ्यात्व-या अनध्यवसाय आदि दोषों से रहित हो, इन्द्रिय और मनके विषय भूत समस्त पदार्थोकी दृष्टि श्रदारूप प्राप्तिको, अथवा संगत युक्तिसे सिद्ध दर्शनको सम्यग्दर्शन कहते हैं। तथा जीव आदि नव पदाथोंके भावों पर श्रद्धान पूर्वक यभानुरूप धारण करना; जिरासे कि-रामता भाव, अस्थिर वसुओझे विरक्ति दिलानेवाला वैराग्य, कर्म बन्धसे मुक्त होने की निरन्तर अभिलापा, शत्रु मित्रके जटिल प्रश्नको उहाकर अभेद रूप अनुकम्पा और आत्मीय कर्मोगा उदय होने पर ही मुस दु.स होता है इस रीविका आलिक्यादे लक्षणोंका मनुदय संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३९ होता है । त्याग, वैराग्य तथा विवेक शुद्ध होनेसे वही मुक्तिका अंग है। संसा. रके क्लेशरूपी रोगोंके भारको मिटानेने औषध रूप सम्यग्दर्शन ही है। जोकि ज्ञान और चरित्रका बीज रूप है। इसीसे महानताको पालन करते २ परम आत्मामें स्थिर रहनेकी भावना जागृत होती है। ज्ञानात्माओंका विश्व में सवापार भूषण रूप है। इस श्रेष्ठ सम्यग्दर्शनसे नि.संशय मोक्ष पाता है जिसके निशंकसे लगाकर प्रभावना तक आठ अग है। चरित्र- उत्तराध्ययन सूत्रके २८ वें अध्यायमें वीरप्रभुने स्वयं प्रतिपादन किया है कि मिथ्यात्व, अव्रत, कपाय, प्रमाद और मन वचन कायके अशुद्ध विचारोसे जो पाप कर्म बांधे गए हैं, जिनका कि शुभाशुभ फल परिवर्तन करना अपने अधि- कारमें अब न रह गया है उन कर्मोको जिस पुरुषार्थ-बलसे नष्टकरके आत्माको कपायात्मा, योगात्मासे रिक्त करदेना चरित्र कहलाता है, चरित्रसे भविष्यके लिए प्रवृति मार्गका अवरोध करके तपसे उसे अनिमे सुवर्णकी भाति मल शोधन करता है । जिससे जन्मान्तरके काँका क्षय होनेसे सर्व दुःखासे रहित हो जाता है। और यह चरित्र अणुवत और महाव्रतके भेदसे दो प्रकारका है। जिससे अपने भावोको कपाय रहित करनेपर मूलगुण और उत्तरगुणरूप चरित्र एक देश या सर्वथा संयम गुण प्राप्त करता है। अत. भगवान् ज्ञातनन्दन महावीरका चरित्र कैसा था? झातपुत्र- वे ज्ञात-वंशके क्षत्रियोंके कुलमें उत्पन्न होनेसे ज्ञातपुत्र कहलाते थे। मुनि बनकर ज्ञातपुत्र कभी किसी वस्तु की वियोग दशामें शोक प्रगट न करते। ज्ञातपुत्र किसीके. शरण नहीं जाते, तया सदैव खावलम्वी रहते थे। उनकी भावना राग और द्वेषसे रहित-मध्यस्थ थी । वे अनुकूल, प्रतिकूल प्रसंगो पर लक्ष्य न देकर सयम मार्ग में स्थिर थुद्धिसे अपनी धर्मप्रतिमाओंमें सदा प्रवृत्त एवं दृढ रहते थे। अतः गुरो ? मैंने उनके ज्ञान, दर्शन और चरित्रके विषयमें जो कुछ पूड़ा है। उसका आपने यथानुरूप अनुभव कर लिया है, अतः जो कुछ मुना देखा है, वह शान्त चित्त होकर मुझसे कहिएगा?
-- वीरस्तुतिः। गुजराती अनुवाद-वीरभगवाननां रत्नत्रय सम्बन्धी प्रश्नो- मोक्षलक्ष्मीना दाता, मचे पदार्थोना ज्ञाता, जेमनी वाणी अमोघ अने दिल- क्षमा छ, जे अष्टन पृथ्वी मोक्षने प्राप्त करीचुत्या छ, वीर रस भरपूर छे,वीरताथी जेमणे कामराज मृत्युराज अने मोहराजने जीती लीधेल छे, ते वीर कहेवाय छ, महावीर प्रभु महावीरज हता, वेमनामा आ यधी वातो हती। धान- तेननं ज्ञान केबुं हतुं ? कारणके प्रमाणज हिननी प्राप्ति अने अहितनो साग करवामां मम छ, तेथी ज्ञानज प्रमाण होई शके छ । वळी ज्ञानज यस्तु नत्वनो निर्णय करावे छ, मेथी ज्ञानज परम उपकारी छ। पुनः वायुं छे के-जेमा प्रणे काल गोचर अनन्तगुण पर्याय सयुक्त पदार्थ अतिशय साथ प्रतिभासे छे, वेने नानीजनो ए जान कहेलं छे, आ सामान्यपणे पूर्ण ज्ञानतुं खरूप छे, आयशद्रव्य अनन्तप्रदेशी छे तेना मध्यमा असंख्यात प्रदेखी लोकाकाश छे, तेमां जीव-अजीव-पुद्गल-धर्मासिराय-अधान्तिकाय अने पाल ए अनन्तव्य छ । सेना प्रण काल सम्बन्धी भिननिन अनन्त पर्याय में, वे यभाने युगपन् [एक समयमा] जाणवानो पूर्णज्ञान आत्मानो निश्चय सभाव छ। उत्पाद-व्यय-धीच खभाववाला पदार्थाथी आ जगत् अतिशय भयु पर्छ छे. जे शानमा आबधुं एकदम प्रतिविम्बित थाय छे, ते ज्ञान परम योगीश्वरीने माटे तो नेत्र समान छ। तदुपरान्त पण कणुछ के--"जेनी द्वारा या तत्वोने विचार विधी आला पट स्पे जुए छे, जे नत्वा अनन्त पर्याय-गुगनी मत्ता छ, तेने सम्बन् प्रयरे जाणशने माटे सानज हितकर अने प्रथम साधन छ, वेनाथी आन्मा जा- संसारी अलग थर के छे।" आत्मानो कल्याण करवायाळानो माटे शान- आगन साथी प्रथन एट- लामाटे इट के तेनायी जीव पालिक वेमन शारीरिक मुरथी विरक बनी जायछे । पोताना आरमीय गुणरजनी रक्षा तंनी छत्र छायामां धई शके । बटी सेनामी प्रति पापद्वार ने रोनने आमशोधनां लागी जाय छे। माननी पूर्व मानाना प्रभावभीष शान्त था जाप छ । तनाथी भानामो अर्व समभावनी मांगे पाय । शान्तिना घरपे सर्वप्रानिभाना अभेदरूपे .
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ४१ मैत्रीभाव पैदा करवानो खभाव थई जाय छे । मोह अविवेक अने चित्त विकारनो पडदो लूटी जाय छे। मोहनो सर्वथा नाश थई जवाथी चित्त निर्मल अने पवित्र बनीने स्थिरता प्राप्त करे छे । पवित्र चित्तवाळो कामदेवनो नाश करे छे। जेनामां ज्ञानात्मानो उदय थएलो छे, तेनामां आटली कियाओनो उदय थई जाय छे, तेनाथी अटल मुखना पदने प्राप्त कराववानुं ते साधन बनी जाय छ। जे आत्माने राग-द्वेप अने मोहमांथी वहार काढवामा निश्चय हेतुरूप छे तेने पण बुद्धिमानोए ज्ञान कहेलु छ । ज्ञान विशेष वस्तुर्नु बोधक छे, लोकालोकनुं प्रगट खरूप समजाय छे हस्तामलकवत् संसारना सर्व स्वरूपर्नु तथा घटनात्मक भावन जाणपणुं थाय छ। ते सम्पूर्ण ज्ञान केवलज्ञान अथवा ब्रह्मज्ञान छ । तेनाथी अधिक ज्ञाननी पीजी कोई भूमिका नथी । केवल एटले पूर्णता, ते ज्ञान असाधारण, निरपेक्ष अने परम शुद्ध छे, सर्व पर्याय तेमज भावोनुं ज्ञायक छ । तेनाथी लोकालोकनुं ज्ञान थाय छे। तेनाथी सहज तेमज उत्कृष्ट अनन्त आनन्द मळे छे। ते ज्ञान प्राणिओना कर्मबन्धनो समय तथा तेना शुभाशुभ परिणामोनो बोध करावे छ । सूक्ष्म-वादर- चराचरनुं पूर्णज्ञान सर्वज्ञने होय छ । दर्शन- जेमा कोई प्रारनो व्यभिचार नथी होतो; सशय, विपर्यय, मिथ्यान्व अथवा अनध्यवसाय आदि दोपोथी जे रहित छे, इन्द्रिय अने मनना विषयभून सर्व पदार्थोनी दृष्टि श्रद्धारूप प्राप्तिने सम्यग्दर्शन कहे छ, जीवादि नवतत्वना भावोपर श्रद्धानपूर्वक तेनुं यथानुरूप धारण करवं, जेनाथी समता भाव अस्थिर वस्तुओनी विरक्ति रूप वैराग्य, कर्म बंधथी मुक्त होवानी निरन्तर अभिलापा, शत्रु मित्र पर अभेदरूपे अनुकम्पा, आत्मीय कर्मोनो उदय थवाथीज मुख दुःख थाय छे, ते जातना आस्तिक्यादि लक्षणोनो उदय थाय छ, लाग-वैराग्य तथा विवेक शुद्ध थवाथी जे मुकिनु अग छ, ससारना क्लेश रूपी रोगोना समूहने मटाडवामा जे औषधरूप छे, वे सम्यग्दर्शन छे, ज्ञान अने चरित्रना बीजरूप छे, वेनाथी महाव्रतोतुं पालन करता करता स्थिरतानी भावना जागृत थाय छे, ज्ञानीओर्नु विश्वमा वे सर्वोपरि भूपण छे, ते श्रेष्ठ सम्यग्दर्शनधी निःशंसय मोक्षनी प्राप्ति थाय छे, तेना निदशंकथी माीने प्रभावना मुधीना आठ अग छे।
४२ वीरस्तुतिः। चरिध- उत्तराध्ययनना २८ मां अध्यायमा श्रीवीरप्रभुए स्वयं प्रतिपादन करेल छ के मिथ्यात्व, अवत, कमाय, प्रमाद अने मन-वचन-कायना अशुद्ध योगथी जे पापकर्म बंधाएम छे के जेनां गुभाशुभ फलमो परिवर्तन करवानी सत्ता आपणा हाथमा नथी रही, ते कोनो पुरुषार्थवळथी नाश करीने आत्माने कपायात्मा अने योगात्माथी अलग करी देवो, तेनुं नाम चरित्र छे, चरित्रथी भविष्यनी प्रवृत्तिमानो अवरोध करीने जेम अमिथी सुवर्णनो मेल दूर थाय छे, तेम तपथी जन्मान्तरना कर्मोनो नाश करीने आत्मा सर्व दुःखोथी रहित थाय छे। आ चरित्रना अणुरत तथा महारत एम बे भेद छे, पोताना भावोने कपा- यरहित करवाथी मूल गुण तथा उत्तरगुण रूप चरित्र एक देश अथवा सर्वया संयम गुण प्राप्त करे छ। जम्मुनि मुधर्माचार्य ने पूछे छे के भगवान् ज्ञातृपुत्र महावीरनं रत्नत्रय केयु हतुं शाहूपुत्र- देओ ज्ञात वंशना क्षत्रिय कुलमा जन्म्या होवाथी ज्ञातृपन कहेवाता हता, मुनि वनीने भातृपुत्र कोई वस्तुनी वियोग दगामा शोक नहोता करता, ज्ञातृपुत्र कोईने वश न थता, पण सदव स्वावलंबी रहेला, नेमनी भावना रागद्वेष रहित मध्यस्थ हती। वेओ अनुहल प्रतिकूल प्रसगो पर ध्यान आप्या वगर संयम मार्गमा स्थिर रहीने पोतानी धर्मप्रतिज्ञाओमा हमेशा प्रत्त रहेना हता। तेथी हे आचार्य भगवन् ! में देमनां शान-दर्शन अने चरित्र सम्बन्धी जे प्रश्न कयों छे, तेनो आपे यथानुरूा अनुभव प्राप्त कयों दे ते जेम तम सांभळ्यु होय अने धायुं होय ते शान्त चित्त मने यहो । खेयन्नए से कुसले महेसी, अणंतनाणीय अणंतदंसी। जसंसिणो चक्खुपहे टियस्स, जाणाहि धम्मं च धिइं च पेहि ॥३॥.
20 ३ संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता संस्कृतच्छाया खेदज्ञः [क्षेत्रः] स कुशलो महर्पिः, अनन्तज्ञानी च अनन्तदी। यशखिनः चक्षुम्पथे स्थितस्य, जानीहि धर्म च धृति च प्रेक्षस्य ॥ ३॥ सं० टीका-स ज्ञातनन्दन-महावीरो भगवान् चतुस्त्रिंशदतिशय- समेतः, पंचत्रिंशद्वाणीगुणोपपेतः “उप अप इतः 'शकन्ध्वादिषु पर- रूपं वाच्यमिति वार्तिकेन' पररूपत्वे उपपेत इति" । खेदं संसारान्त- वर्तिजीवानां कृतकम्मविपाकजं शारीरिकं मानसिकं च दुःखं क्लेशं, आत्मीयज्ञानेन जानातीति खेदज्ञः-सदयः । "खेदज्ञः सदयो वीर इति कोपः" । तं परकीयात्मदुःखं विज्ञाय समस्तप्राण-भूत-जीव- सत्वानां दुःखापनोदनसमर्थोपदेशदानादियुक्त इति । अथवा 'खेयन्नए' इत्यस्य क्षेत्रन' इतिच्छाया तत्रायमर्थः क्षेत्रमाकाशं तल्लक्षणया तन्म- ध्यवर्ती धर्माधर्मात्मकालपुद्गलसमूहस्तजनातीति क्षेत्रज्ञः । लोकालोक- खरूपपरित्रातृत्वादिति। पुनश्च वा यथाऽवस्थितात्मखरूपपरिज्ञानादनुभ- वनादात्मज्ञ इत्यपि साधुरेव । अथवा क्षेत्रं शरीरं तदसारतया जाना- तीति (दर्शयतीति) वा, क्षेत्रं स्त्रीविपयदोपं तद्रमणानुरक्त तज्जाना- तीति क्षेत्रज्ञः। "क्षेत्रं नारीशरीरयो" रित्यमरः । कुशलो=निपुणः, सदसज्ज्ञानप्ररूपकत्वात् । “प्रवीणे निपुणाभिज्ञविज्ञनिष्णातशिक्षितः । वैज्ञानिकः कृतमुखः कृती कुशल" इत्यमरः । अथवा तानष्टकर्मकुशान् लुनातीति कुशलः । प्राणिनां कर्मोच्छित्तये निर्जरार्थाय निपुणः समर्थः । "पर्याप्तिक्षेमपुण्येषु कुशलं शिक्षिते त्रिप्वित्यमरः" । अथवा प्राणिनां भावुको भद्रकारको मङ्गलपदः । "धः श्रेयस शिवं भद्रं कल्याण मंगलं शुभम् । भावुकं भविकं भव्यं कुशलं" इत्यमरः । 'आमुफ्ते.
वीरस्तुतिः। इति पाठान्तरं तस्याऽयमर्थः । आसुपने आशु शीघ्रं प्रज्ञा यस्यासावा- शुप्रज्ञः, सर्वत्र सदोपयोगत्वात् न तु छद्मस्थः शाट्योऽल्पज्ञ इव विचिन्त्य जानातीति भावः । छानि शाठ्येऽल्पनत्वे तिष्ठतीति छद्मस्यः । "कपटोऽस्त्रीव्याजदम्भोपधयश्छमकैतवे, कुसूतिनिकृतिः शाट्यमित्यमरः ।" छाद्यते खरूपमनेनेति छम, कपटे, छले, व्याने, अपदेशे, स्वरूपाच्छादने, रजते, नवनीते, शुद्ध, क्षिरोगभेदे च,] महर्पिः-महाश्वासावृपिश्चेति महर्षिरित्यत्यन्तोग्रतपश्चरणानुष्टायित्वादनु- कूलपतिकूलपरिपहोपसर्गादिमहातितिक्षासहनाचेति वा, याथातथ्येन तत्वाना प्रकाशकत्वात्सत्यवाक्त्वान्महर्पिः । "ऋपयः सत्यवचस इत्य- मरः" । अनन्तज्ञानी अनन्तमवसानरहितमविनाश्यनन्तपदार्थपरिच्छे- दकं वा विशेपार्थग्राहकं ज्ञानमस्यास्तीति अनन्तज्ञानी । एवं सामान्या- परिच्छेदकत्वादनन्तदत्यिथवा विशेपार्थज्ञानमनन्तमनवधिकमपरि- च्छिन्नमित्यर्थः सर्वज्ञतेति भावः । सामान्यार्थग्राहकदर्शन ते द्वे अपि यस्यानन्ते। "अनन्तोऽनवधावित्यमरः" तदेवं भूतस्य युकस्य, अनन्त- गुणसहितस्य भगवतो यशःसुरासुरनरातिशाय्यतुलं प्रमाणरहितं चास्ति यस्य स यशखी-तस्य यशखिनो, लोकस्य-जगतश्चक्षुःपथे जयनमार्गे 'भवनस्य केवलावस्थायां विद्यमानस्य लोकाः सूक्ष्मव्यवहितपदा विभ- बनेन च हग्भूतस्य सितस्य जानीरवगच्छ। धर्म संसारोद्धरणखमा- वत्वावच्छिन्नं श्रुतचारित्ररूपं । समतातपस्तुप्टियमावोतमक्षमादिवि- हितात्मपुरुषार्थ वा । "धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीविद्या सत्यमक्रोधं दशकं धर्मलक्षणमिति" स्मृतिः । तथा च-- धारणाद्धर्ममित्याह, धर्मो धारयते प्रजाः, धर्म एवं हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः ॥
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता देशकालवयोवस्थावुद्धिशस्यनुरूपतः धर्मोपदेशभैषज्यं, वक्तव्यं धर्मपारगैः॥ इति वृद्धाः। निष्प्रकम्पां चारित्राचलनखभावं धृति संयमे धैर्य, अथ वा प्रति- ज्ञायाः पालने दृढत्वं धेय्यम् । "धृतिर्धारण-धैर्यायोरित्यमरः।" संयमे धृति रतिमेतीति, तत्प्रणीता प्रेक्षख सम्यगववुध्य पालोचयेति भावः। यदि श्रमणैस्तैः सुधर्मखामिमिः कथितस्तत्त्वं भगवतो यशखि- नचक्षुःपथे स्थितस्य धर्म धृति चावबुध्यसे तथैव रीत्यास्माकं कथयेति संगतिः॥३॥ अन्वयार्थ से] भगवान् महावीर [खेयने] खेद अथवा क्षेत्र- आत्माके जानने वालोमे [युमले] प्रवीण [महेसी ] मर्पि [ अणंतनाणी ] अनन्त-ज्ञानयुक्त [अणंतदंसी ] अनन्त-दर्शनसमन्वित [य] और ! जसंमिणो ] यशखी थे, अत: अर्हन्दशा ही भगवान्को [चक्युपहे ] आखोंके विपयरूपसे [ठिबस्स ] स्थित [जाणाहि ] जान 1 (च) और (धम्म) भगवान के प्रतिपा- दित धर्मको (च) और (धिई) संयमकी दृढनाको देव ! भावार्थ-आर्य-मुधर्माने आय॑जम्बूसे प्रभुके ज्ञान-दर्शन-चरित्रके तथा यशः कीर्ति के सम्बन्धमें यह वर्णन किया कि-वीरप्रभु जगत्के दुःखौको कमाके फलसे पैदा होना मानते थे, क्योंकि उनको आत्मासे अलग करनेका उप- देश करते थे। आत्माके सत्-चित्-मुसात्मक स्वरूपके ज्ञाता थे। कर्मरूपी कुशाको उत्सादनेमें उद्यमशील थे, महान् ऋषि थे, अनन्त-पदार्थोंको एक सम- यमें जाननेके कारण अनन्तज्ञानी थे, अनन्तदर्शन-केवलदर्शनसमन्वित थे, तथा अखंडकीर्तियुक्त थे, इसलिए भगवान्को अर्हन्दशा मे आखोके समान सूक्ष्म- पदार्थ दीसते थे, अतः उनके कहे हुए धर्मको तथा चरित्र सम्बन्धी स्थिरताका प्रद्धायुक्त दृढविचार करो।॥३॥ भापाटीका-शातनन्दन महावीर प्रभु शासनके प्रति ३४ अतिशय युक्त और ३५ वाणीके गुणोसे अलंकृत एवं शोभित थे। । - 20 ६ वीरस्तुतिः। ३४ अतिशय- (1) केश तथा दाढी मूछ के बाल बढते नहीं, या अमुन्दर रीति से नहीं बढते । (२) शरीर नीरोग रहता है। (३) उनके शरीरका रुविर तथा मांस दुग्धकी तरह मुन्दर और खच्छ होता है, आदेय होता है, घिनौना नहीं लगता। (४) मुखमें कमलकी सी सुगंधि रहती है, असल अथवा दुर्गंध नहीं होती। (५) आहार और नीहारको चर्मचक्षुवाले नहीं देखते, क्योंकि ये कियाएं गुप्त की जाती हैं। (६) आकाश गत छत्र रहता है, अर्थात् सिद्धों का स्मरण अभेद रूपसे करते रहते हैं। (७) आकाश गत चमर युग्म श्रुत, चरित्र रूप धर्म ऊंचा रहता है। (८) आकाश गव स्फटिकमय सिंहासन, उनका १३ वां गुणस्थान शोभित है। (९) पादपीठिका सहित ध्वजरूप तीर्थकर नाम कर्मकी कीर्ति आकाशमै गूंजती रहती है। (१०) प्रभु अशोकमय छाया में रहते हैं, वहा जानेसे औरोंका शोक निवारण करते हैं । (११) मार्गमें चलते समय कांटेकी तरह तीक्ष्ण और पैने हठवादी विनीत हो जाते हैं। (१२) अनु अर्थात् समय अनुकूल तथा धर्मकाल हो जाता है। (१३) १२ योजन तक शान्तिका वायु चलता है। (१४) ज्ञान धारा प्रवाहित होनेसे कर्म रजकर अभाव हो जाता है। (१५) भगवान के समवसरणमें समभावका साम्राज्य छा जाता है। (१६) शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्शमें अनुकूलता और प्रतिकूलता रूप प्रति विकृति भाव जाता रहता है। (१७) निधय और व्यवहार नय रूपी चवँर दुलते रहते हैं। (१८) प्रभा या अनन्तज्ञानप्रतिभारूप भामंडल पीठ आसन या आत्माकी शोभा युक्त हैं। (१९) उनकी मधुर भाषा एक योजन तक सुनाई पडती है । (२०) स्त्री, पुरुष, पशु, पक्षी उनकी सांकेतिक अर्ध मागधी भापाको अपनी भाषामें समझते हैं। (२१) गर्व लेकर आनेवाले लोक प्रभुकी वाणीसे न्याय लेकर निरहंकार होजाते हैं । (२२) प्रभु जहाँ विचरते हैं वहासे १२५ योजन चारों ओर सात ईतियोमेंसे कोई भी इति (भय) नहीं होती। (२३) मनुष्य और तिर्यच आपसका जातीय द्विष भाव तथा वैर विरोध छोड देते हैं । (२४) जनता में किसी प्रकार का भय नहीं होता । (२५) मारि आदिक रोग नहीं होते। (३६) अतिवृष्टि नहीं होती । (२७) अनावृष्टि नहीं होती । (३८) दुर्भिक्ष नहीं होने पाता । (२९) खचक्र-अपने राजा या अशुभ कमौका उपद्रव नहीं होता। (३०) पर चक्र-पर राजा या पुदल प्रपंचका - । संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिवा विमहादि उपद्रव नहीं उठता । (३१) पहलेका फैला हुआ व्याधि रोगादिक नष्ट होजाता है। (३१) बलवान् दुर्बलको नहीं सताता । (३३) पुराण रोगकी उपशान्त होजादी है। (३४) नवीन रोगका संवरण होजाता है। ३५ चाणी गुण- (१) सुन्दर संस्कारित भाषा होती है। (२) खर उच्च होता है। (३) भाषा प्रामीण और सादी होती है। (४) स्वर और भापोच्चारणमें गंभीरता होती है। (५) बोलते समय ध्वनि निकलती है। () वाणी सरम होती है। (७) राग युक्त भापा होती है। (८) मूत्र थोडा और अर्थ अधिक होता है। (९) वाणीमें पूर्वापर विरोध नहीं होता। (१०) सन्देह रहित भिन्न २ अर्थ प्रकाशन होता है । (११) निशंकित गुण दाता हैं । (१२) याणी अकाट्य युक्ति युक्त होती है । (१३) चित्त अन्यथा न होकर स्थिर होजाता है, अत-वाणी आकर्षक होती है। (१४) वाणी देश और कालसे उचित संबंध रसती है । (१५) अधिक विस्तृत होकर भी अनमेल या अरुचिकर नहीं होती। (१६) जीवादि वस्तु विचारका ज्ञान कराने वाली भापा होती है। (१५) उपदेश करते समय किसीका मर्म प्रकाश नहीं करते। (१८) भाषा पूर्वापर मापेक्ष होती है। (१९) आख्यायिकाकी तरह वाणी मनको प्रेमास्पद बना देती है। (२०) भास मधुर और अनादिकालकी भूख मिटाने वाली होती है । (२१) उनकी श्रद्धेय भापा स्वयं सिद्ध होती है। (२२) वस्तुका वास्तविक ज्ञान प्रकट कराती है। (२३) परनिन्दा रूप और अपनी प्रंशसा रूप भाषा नहीं होती। (२३) प्रशंसनीय भाषा होती है । (२५) बोलते समय अधिक कालक्षेप नहीं करते। (२६) चित्तको सन्तोप होता है। (२७) व्याख्यान मध्यम गतिमा होता है। (२८) श्रोता कर्म रोगसे मुक्त हो जाता है परन्तु मनन करने पर । (२९) पाणी अनादि कालकी भ्रमणा मिटाती है । (३०) जिसका वर्णन करते हैं उसका संक्रमण उसी विशेष रूपसे करते हैं। (३१) उनकी भाषा वचनान्तर नहीं होती। (३२) पद, अर्थ अलग १ करके बोलते हैं । (३३) सत्व और साहस श्रोताओका बढ़ जाता है। (३४) धर्मश्रवण करते हुए लोक अघाते नहीं । (३५) बीादिक की अविच्छिन्न प्ररूपणा करते है। । । ।
वीरस्तुतिः। खेदन- संसारके प्राणियों द्वारा अर्जन किए हुए मार्मिक दु खविधाकको जानते हैं। कर्म विपाकमे उत्पन शारीरिक मानसिक क्लेशोंको प्रभु सदय होकर जानते तथा देखते हैं । उनको दु:खोका ज्ञान करानेके अनन्तर प्राण, भूत, जीव और सत्वकी अशान्ति दूर करनेके लिए अहिंसा, सत्य,निस्तृष्ण आदिका उपदेश करके समारमें शान्तिकी स्थिति-स्थापना करते है। अत: खेदन है। क्षेत्रश- आकागके अनन्त प्रदेशोंमें धर्म, अधर्म, जीव, काल और पुद्गलके अनन्त समूहको जाननेके कारण प्रभु क्षेत्रज्ञ भी हैं। क्योंकि लोक और अलोकके गुप्त और प्रगट सब भावों और विषयोके शाता हैं। यथातथ्य ख-स्वरूप और परखरूप जाननेसे आत्मस हैं। तथा इम नखर शरीर क्षेत्र में आत्मा या धर्म रूप सार जाननेसे, तथा स्त्रोके विषय दोष और उसके रमण और अनुरक्त रहने में जो दोप हैं उसे जाननेके कारण क्षेत्रज्ञ हैं। हर और अमानको अलग काले बना देते हैं, आठ प्रकार के कर्मरूपी तीक्ष्ण कुशको काटनेमे कुशल है। निर्जराका पय बतानेमें समर्थ है, धर्मोपदेश देने में मंगलप्रद है अत. बुशल भी है। आशुप्रज्ञ- आपका उपयोग अनन्त होनेते आशुप्रज्ञ हैं, परन्तु वह उपयोग ध्यस्थी- कासा नहीं है। वहतो कुछ देर सोच विचार करनेके पश्चात् जानता है, कार्माण वर्गणाओंद्वारा आत्म-स्वरूप पर पर्दा पड जाने के कारण उस कर्म सहित संसारी आत्मा की उमस्थ सज्ञा है। परन्तु भगवान तो "वियह घउमाणं' इस दोपसे निवृत्त है] महर्षिः- अत्यन्त उग्र तपरूपी अनुष्ठान करनेसे, अनुकूल प्रतिकूल परिपह और उपसर्ग सहन करनेसे, नाना तितिक्षाओं को सहनसे, तत्व वस्तुका वास्तविक रूसमें प्रकाश करनेसे, सत्ल पाणीका उच्चारण करनेसे महर्षि थे। अतीत, अनागत, वर्तमानका अनन्त स्वरूप जाननेकी दृष्टेिसे अनन्तज्ञानी; तथा सामान्य अर्थका मिन्न करण करनेसे अनन्तदशी थे।
संस्कृतीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता ४९ - उनके अक्षय और अतुल यश का गायन मनुष्य असुर और देव सब मिल कर करते थे। संसारकी दो आंखों द्वारा प्रत्यक्षतया सूक्ष्म और बादर पदा- थोंका ज्ञान भलिभांति करा देनेसे उनके प्रतिपादित धर्मको तथा उनकी धीरताको देख। धर्म- संसारके प्राणिओंका दुःखोंसे उद्धार करना उसका स्वभाव है अतः वह धर्म है तथा ज्ञान और क्रियाके भेदसे धर्म दो तरहका है। "समता, तप, सन्तोप, सरलता, उत्तम क्षमा, आदिक विहित पुरुषार्थको भी धर्म कहा है।" "मनुने धैर्य रखना, शान्ति करना, अकिंचनवृत्ति रखना, इन्द्रिय दमन करना, आत्माको बुरे विचारोंसे हटा कर पवित्र करना, आत्मदोपका निप्रह करना, बुद्धि द्वारा सत् , असत् युक्त अयुक्तका निर्णय करना, निष्पाप तथा निस्पृह सल बोलना, आए हुए क्रोधको निष्फल करना, यह १० प्रकारका धर्म बताया है।" धर्मके पारको पानेवाले पुरुषोंने देश काल, अवस्था, बुद्धि, शक्ति, आदि के अनुरूपसे धर्मोपदेशको ही औपच रूप कहा है। इसके अतिरिक्त उनकी चरित्र निचलता धीरता देख! क्योंकि वे अपनी प्रतिज्ञामें सदैव दृढ रहते थे। संयम के अतिरिक वे किसीमें अनुरक्त नथे ॥३॥ गुजराती अनुवाद-शातनन्दन शासनपति महावीर प्रभु ३४ अतिशय तया ३५ प्रकारना वाणी गुणे करी अलंकृत हता। ३४ अतिशय-(१) माथाना केश-दाढीमूछ तथा शरीरना वाळ अने नख मर्यादित होय । (२) नीरोगी अने मेल, रज आदिथी निर्लेप शरीर होय। ३) मास अने लोही गायना दूध जेवा उज्वल अने मीठा होय । (४) श्वासो- स्वास कमल जेवा मुगन्धित होय। (५) प्रभुना आहार अने निहार चर्म- ओथी अदृश्य होय, कारणके ते क्रियाओ गुप्त करवामां आवे छे । (1) आध- शमा धर्म चक्र चाले । (५) आयशा छप रहे । (0) आवशन देवर चामरो विझायः ।() आकाशर्मा अत्यन्त खच्छ स्फटिक सिंहासन पादपीड सहित थ आये।(1) आयरामा लधुरदायओपी पारनंडित रसन हन्द वीर.४ वीरस्तुति: 12 थ्वज प्रभुनी आगल चाले। (११) अशोकक्ष थई आवे, त्यां जयाशी वीजा. ओना शोकर्नु निवारण थाय । (१२) जरा पाछलना भागमा मस्तक प्रदेशे तेजोमंडल थई आवे, ते दो दिशाओना अंधकारने दूर करे। (१३) पृथ्वी बहु सपाद अने रमणीय बनी जाय । (१४) कांटा ऊंचा' यई जाय, देनी माफक बहु हठवादी विनीत थई जाय, (१५) विपरीत ऋतु मुसुस्पर्श थई जाय, समय अनुकूल तथा धर्म माटे योग्य थई जाय । (१६) सीनल-मुखकर- मुगन्धयुक्तवायु एक योजन क्षेत्रमा रहे । अने सर्व प्रकारनी अशुचि दूर करे। (१५) मुगन्धि वृष्टि थाय तेथी आकाशनी रज अने भूमि ऊपरनी रेणु दंकाई जाय, ज्ञानधारा वरसवाथी कर्म रज दूर थई जाय । (१८) रमपीय पंचवर्ण फूल प्रगटे । (१९) अमनोज्ञ (अशुभ) शब्द-स्पर्श-रस-रूप-गन्ध उपशमे अर्थात् नाश पामे। (२०) मनोज्ञ शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध उत्पन्न थाय । (२१) चारे बाजुए बेठेली परिषद भगवान्नो योजनातिकमी वर बराबर श्रवण करी शके अने ते शब्दो श्रोताओने प्रिय लागे । (२२) प्रभु अर्धमागधी भाषामा धर्मदेशना आपे । (२३) आर्य अनार्य देशना मनुष्यो-पशुओ-पक्षीओ विगरेने आ भाषा पोतानी भाषामा परिणमे, ते हितकर-मुखकर-आनन्दकर अने मोक्षदायी लागे । (२४) जन्मवेर, जातिवेर, शान्त थायः। (२५) भगवान्ने देखता अन्य दर्शन-मताभिमानी हठ छोरी नम्र पने छ। (२६) प्रतिवादी निरुत्तर बने । (२७) प्रभु विचरे छे त्यांथी २५ योजन चारे दिशामा दुष्कास- उंदर-तीड विगेरेनो उपद्रव रहे नहि । (२८) महामारी मरकी प्लेग न होय । (२९) वचकनो मय नहीं थाय । (३०) पर लश्करनो भय न होय । (३१) अति सृष्टि न थाय । (३२) अनावृष्टि न थाय । (३३) दुकाल न पडे । (३४) उत्पातो अने व्याधिओ तुरत शमी जाय । सत्यवाणीना ३५ गुण- (१) भगवानूनी वाणी संस्कार लक्षण युक होय। (१) बुलंद आगज वाली वाणी । (३) सादी । (४) गंभीर । (५) पडदा युक्त । (६) सरल 1() उपनीत रागत्व-श्रोताओ धारे के भगवान् मने उद्देशीनेज उपदेश आपे छ।(6) महार्य-सूत्र थोडो अर्थ घणो। (१) पूर्वापर वाक्यनी , अविरोधी। (१०) शिष्ट (११) असंदिग्ध, (१२) वाणीर्मा-अर्थमा दूषण रहित । (१३) हृद्यप्राही, (१४) देश कालने अनुकूल । (१५) तत्वनी. ।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरंभापान्तरसहिता ५१ थार्थ स्वरूप दर्शक। (१६) ने सम्बन्ध चालतो होय देनी विद्धि पुरनुज कहेवू ते। (१७) पद वास्यन परस्पर सापेक्ष पणुं । (१८) इष्ट रीतिएं तत्वचें कहेवू । (१९) अत्यन्त मधुर-मुखकर । (२०) परना रहस्य विगेरेने प्रकट नहि करनारी । (२१) वस्तुना अर्थ तथा धर्म सहित । (२२) अर्थनो अलकाट उठे एवां पदो सहित । (२३) पर निन्दा अने आत्मप्रशंसा रहित । (२४) कहेला गुणोना योगथी प्रशंसा करवा लायक । (२५) व्याकरणना दोष रहित । (२६) श्रोताओने पोताना विषयनो जवाब मळवाथी आश्चर्य अने वैराग्य उत्पन्न करनारी। (२५) अद्भुत। (२८) अत्यन्त विलम्ब रहित । (२९) मननी भ्रान्ति तथा वाक्य बोलवानी अशक्ति विगेरे दोष रहित। (३०) सर्व मुर-असुर-नर-अने तिर्यच पोतानी भाषामा समजे तेवी । (३१) वीजा पुरुषोनी अपेक्षाए शिष्योने विपे विशेष बुद्धिने पेदा करनारी। (३२) पदो, वाक्यों स्पष्ट रीते समजाय तेवी चौक्खी। (३३) पराक्रमवाळी अनायासे वाणी प्रकाये जाय । (३५) हेवा धारेला अर्थोनी सारी रीवे सिद्धि थाय यां मुधी अविरिछन्न बाम्धाराए बोल्या जवाय तेवी। खेदश- संसारना प्राणिओए सचय करेला मार्मिक कर्मना दु सविपाकने वेओ जाणे छै। कर्मना परिणामे उत्पन्न शारीरिक तथा मानसिक क्लेशोने प्रभु दयार्द बनीने जाणे छे तेमज देखे छे। तेमनां दु सोनुं ज्ञान कराववाने तथा प्राण-भूत-जीव. सत्वनी अशान्ति दूर करवाने तेओ अहिंसा-सत्य-निस्तृष्ण विगेरेनो उपदेशकरीने संमारमा शान्तिनी स्थापना करे छे। तेथी भगवान् खेदज्ञ छ। क्षेत्रज्ञ- आकाशना अनन्त प्रदेशोमां धर्म-अधर्म-जीवकाल अने पुद्गलना अनन्त समूहने तेओ जाणे छ । तेथी क्षेत्रज्ञ पण छे । अथवा लोक-अलोकना गुप्त अने प्रगट सर्व भाव अने विषयना ज्ञाता छे । यथातथ्य खखरूप तथा परखरूपना ज्ञाता होवाथी आत्मज्ञ छ। आ नश्वर शरीर क्षेत्रां मना आत्माना अथवा धर्मरूप सारना जाणकार होवाथी, तैमज नीना विषय दोप अने मां रमण करवायी जे दोपो उत्पन्न थाय छे, तेना पण जाणकार होवाथी तेओ क्षेत्रज्ञ छ। कुशल- सन्-असत्ने भिन्न भिक्ष करीने बतावे छ । आठ प्रकारना कर्मरूपी दीक्षा - ५२ वीरस्तुतिः। कुशने कापवामा कुशल छ। निर्जरानो मार्ग बताववामा समर्थ छ, धर्मोपदेश देवामां मंगलप्रद छ। आशुपक्ष- देओनो उपयोग अनन्त होवाभी आशुम छ । परन्तु ते उपयोग उप- स्थोना जेवो होतो नथी । [छमस्थ तो थोडो समय विचारणा कर्या बार जापे । कार्मण वर्गणाओ द्वारा आत्म खरूप पर पडदो पडतां कर्म सहित संसारी आत्माने उसस्य कई छ । परन्तु भगवान् तो "वियह उउमाण" ए दोप भी मुक छ । महर्पि- अत्यन्त उप तपश्चर्या करवायी अनुक्ल प्रतिकूल परिपह तथा उपसर्ग सहन करवाथी नाना प्रकारना दु.सो सहवाथी तत्वानुन वास्तविक रूप प्रगट करवाशी, सत्यवाणी बोलता होनाभी, वेओ महर्षि हता। भूत-भविष्य अने बर्वमानना अनन्त स्वरूप जाणवानी अपेक्षाए तेओ अनन्तज्ञानी तथा सामान्य अर्थ निभकरण करवामी अनन्तदर्थी हना। मना अक्षय अने अनुल यानुं गान मनुष्य-मुर-अमुर विगेरे सर्वे मळीने करता हता। लोकने चक्षुभूत एका श्रीमहावीरदेवना पहला धर्मने तथा मनी धीर- जने जाण अने देख। धर्म- ससारना प्रामिओने दु.समाधी उद्धार करवानो तेनो सभाप छ । ज्ञान अने किया ए वे प्रकारको धर्म छ । समता-तप-सन्तोष-सरळता-उत्तम क्षमा विगेरेने पण धर्म कहेवामां आवे छ । धीरज राखवी-शान्तिधारण करवी-कि- चनत्ति,भजवी-इंदिय दमन-आत्माने सराव विचारोधी हटाकीने पवित्ररनावको आत्मदोपनिषइ-बुद्धि द्वारा मन्-अगत्-युक-अयुकनो निर्णय, निपाप-निस्पृह-सत्र, रोध निष्फल करवो-एम दश प्रयरनो धर्म मनुए पण यतारेलो छ। धर्म पारंगत पुरुषोए देश-काल अपस्था युदिशक्नेि अनुरूप धर्मोपदेश आप्यो छ। महावीरमभुनी चारित्रनो निथलटर, धीरता एटठे वो पोतानी विशनो दनेश डे रहता हता, रदद संचमांज देओ मम रहता । । । .
संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता उहूं अहेयं तिरियं दिसासु, तसा यजेथावर जेय पाणा। से णिचणिहि समिक्ख पन्ने, दीवेव धम्मं समियं उदाहु ॥४॥ संस्कृतरछाया ऊयमस्तिर्यक्षु दिक्षु, त्रसाश्च ये स्थापरा ये च प्राणिनः। स नित्यानित्याभ्यां समीक्ष्य पाशः दीप[द्वीप] इय धर्म समितमुदाह ॥४॥ सं० टीका-अधुना सुधर्माचार्यस्तद्गुणान् स्फुटं प्रकटनचिकी- पुराह-ऊर्ध्वमस्तिर्या दिश्वथवा चतुर्दशरज्वात्मके लोके ये जीवाः "शुद्धनिश्चयनयेनादिमध्यावसानवर्जितवपरप्रकाशकाविनश्वरनिरुपाधि- शुद्धचैतन्यलक्षणनिश्चयप्राणेन यद्यपि जीवन्ति, तथाप्यशुद्धनिश्चय- नयेनानादिकर्मबन्धवशादशुद्धद्रव्यभावप्राणैर्जीवन्तीति जीवाः । 'उप- योगमयाः' शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन यद्यपि सकलविमलकेवलज्ञानदर्श- नोपयोगमयास्तथाप्यशुद्धनयेन क्षायोपशमिकज्ञानदर्शननिवृत्त्वाज्ञा- नदर्शनोपयोगमया भवंति । “अमूर्तयः" यद्यपि व्यवहारेण मूर्त- काधीनत्वेन स्पर्शरसगन्धवर्णवत्या मूर्त्या सहितत्यान्मूर्तास्तथापि परमार्थेनामूर्तातीन्द्रियशुद्धवुद्धकसभावत्वादमूर्ताः । “कर्तारः" यद्यपि भूतार्थनयेन निष्क्रियरंकोत्कीर्णज्ञायकैकखभावोऽयं तथाऽप्यभूतार्थ- नयेन मनोवचनकायव्यापारोत्पादककर्मवीजसहितत्वेन शुभाशुभकर्म- कर्तृत्वात् कर्तारः । “सदेहपरिमाणा" यद्यपि निश्चयनयेन सहजशुद्ध- लोकाकाशप्रमितासंख्येयप्रदेशास्तथापि व्यवहारेणानादिकर्मवन्धाधीन- वीरस्तुतिः त्वेन शरीरनामकम्मोदयजनितोपसंहारविस्ताराधीनत्वात् घटादिभाजन- स्थप्रदीपवत् सदेहपरिमाणा: “मोचारः" यद्यपि शुद्धद्रव्यार्थि- फनयेन रागादिविकल्पोपाधिरहितसात्मोत्यमुखामृतमोक्कारस्तथाऽप्य- शुद्धनयेन तथाविधसुखामृताभावाच्छुभाशुभकर्मजनितमुखदुःखभोक्त- स्वाद्भोक्तारः । “संसारस्थाः" यद्यपि शुद्धनिश्चयनयेन निस्संसारनि- त्यानन्दैकखभावास्तथाप्यशुद्धनयेन द्रव्यक्षेत्रकालभावभक्पश्चप्रकारसं- सारे तिष्ठन्तीति संसारस्थाः । "सिद्धा" व्यवहारेण खात्मोपलब्धि- लक्षणसिद्धत्वप्रतिपक्षभूतकर्मोदयेन यद्यप्यसिद्धास्तथापि निश्चयनयेना- नन्तज्ञानानन्तगुणस्वभावत्वात् सिद्धाः । त एवंगुणविशिष्टा जीवाः । "विस्रसो गतिकाः।" यद्यपि व्यवहारेण चतुर्गतिजनककर्मोदय- वशेनोधिस्तिर्यग्गतिखभावास्तथापि निश्चयेन केवलज्ञानाधनन्तगु- णावाप्तिलक्षणमोक्षगमनकाले विस्रसा स्वभावेनोर्द्धगतिकाश्चेति । अत्र शुद्धाशुद्धनयद्वयविभागेन नयार्था अप्युक्ताः । आगमार्थः पुनः "अस्त्यात्माऽनादिरद्धः" इत्यादिप्रसिद्ध एवं शुद्धनयाश्रितं जीवख- रूपमुपादेयं शेपं च हेयम् । एवंविधा जीवास्त्रस्यन्त्युद्वेगं भयं प्रामु. वन्ति यद्वा नरन्ति चेतस्ततो गच्छन्तीति साः । “चरिष्णु जंगम- चरं त्रसमिंग चराचरमित्यमरः ।" ते प्रसास्तु द्वित्रिचतुःपञ्चेन्द्रिय- भेदाचतुर्धा । तथा ये च स्थावराः पृथित्र्यम्बुतेजोवायुवनस्पतिभेदा- संचधा । तिष्ठन्तीति सावरा भूताः सत्वाश्चापि, यथा च- "प्राणा द्वित्रिचतुःप्रोतका भूतास्तु तरवः स्मृताः । जीवाः पंचेंन्द्रियाः प्रोक्ताः शेपाः सत्वा उदीरिताः।" "सावरो जंगमेतर इत्यमरः ।" एते प्राणानां धारकत्वात्प्राणिनो भवन्ति ।। प्राणास्तु दशधा यथा-"पंचेन्द्रियाणि त्रिविधं बलं संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरओपान्तरसहिता च, झुच्छ्वासनिःश्वासमधान्यदायुः,, प्राणा दर्शते भगवद्भिरतास्तेषां वियोगीकरण हि हिंसा ।” एते विद्यन्ते यस्स ते प्राणिनो, जीवस्या- धुना तु बाह्यप्राणधनपराक्रमत्वात् "शक्तिः प्राणः पराक्रम इत्यमरः।" चार्वाकशास्यादिमतनिराकरणेन पृथ्ख्यायेकेन्द्रियाणामपि जीवत्वमित्या, वेदितम् । तान् जीवानित्यानित्याभ्यां ध्रुवव्ययाभ्यां समीक्ष्य-ज्ञात्वा केवलज्ञानित्वात्प्रकर्पण जानातीति प्राज्ञः। द्रव्यार्थिक-पर्यायार्थिकन-' याश्रयणादावेद्येति भावः । स ज्ञातृपुत्रो महावीरो भगवान् तत्व-पदार्थ- खरूपाणां ज्ञापकतया दीपवद्दीपः प्रकाशकत्वात् यथार्थधर्ममाह-उक्त- वान् । सम्यक्तया समतया श्रुतचरित्रात्मकं धर्म वीतरागभावेन राग- द्वेपरहितत्वेन सदनुष्ठानितया चेति । परमकारुणिको हि भगवान् लोकाननुग्रहीतुमेव ,धर्ममावेदितवान्नतु निजोत्कर्पप्रकाशनार्थमपीति सहृदयै यम् ॥ ४ ॥ अन्वयार्थ-[से] उस [पन्ने] आत्मप्रज्ञ केवलज्ञानी प्रभुने [ उद्दे] ऊपर [अहेयं ] नीचे और [ तिरियं] तिरही [ दिसासु] दिशाओंमें [जे] जो [तसा] प्रस-हिलने सरकनेवाले (य) और [थावर ] स्थावर [ पाणा] प्राणी है, उनको चिणिञ्चेहि ] निल और अनिसदृष्टि से [ समिक्स ] जान कर {दीचे व दीयेकी सदृश अथवा विश्वसागरमें डूबवे जीवोकेलिए टापूकी तरह (धम्म) धर्मको [ समियं] समानभावसे [उदाहु ] बताया ॥ ४ ॥ भावार्थ-आर्य्य मुधर्म फिरयों योले कि-भगवान् महावीर उस और स्थावर जीवोंको जोकि ऊपर-नीचे और इधर उधर भरे पड़े हैं, सब जगह विद्यमान है, और जीवोंको उन्होंने पर्यायकी दृष्टिसे अनिल और द्रव्यकी दृटिम निस बताया है। और उनके उत्तम धर्मका उपदेश जगत्-सागरमे डूबते हुए प्राणिओंको टापूके समान सहारा देते है, और अज्ञानताके अधेरेको मिटाने के लिए दीवेके समान है। इस प्रवचनसे अनात्मवादका. खण्डन हो जाता है वीरस्तुतिः । एवं वृक्ष-वायु-पृथ्वी आदिमें जीय है यह सिद्ध किया है, और जैनदर्शनके प्रापभूत स्याद्वाद-सिद्धान्तका सम्यक् दिग्दर्शन कर दिखाया है॥४॥ श्रीसुधर्माचार्य वीर प्रभुके गुणों को प्रकट करते हैं! भाषा-टीका-सर्यश-वीर भगवान्ने ऊपलोक, मानवलोक, अधो-लोक के सब जीवोंक्य सरूप इस भान्ति वर्णन करके बताया है कि-"जी" यद्यपि जीवसमूह शुद्ध निययनयसे आदि, मध्य और अन्त से रहित, अपने और परके गुणों का प्रकाशक, उपाधिरहित और शुद्ध चैतन्य (ज्ञान) रूप निधय प्राणसे ही जीवित है, तथापि अशुद्ध- निक्षयनयसे अनादि कर्मबन्ध के शिसे जो अशुद्ध द्रव्यप्राण और भाव प्राण है जनसे जीवित रहने के कारण- यह जीव है। उपयोगमय- यद्यपि शुद्रव्यार्थिकनयसे परिपूर्ण तथा निर्मल ज्ञान और दर्शन ही उपयोग हैं इसी से जीवसंशश है, तो भी अशुद्ध-नयसे क्षायोपशमिकज्ञान और दर्शनसे बना हुआ है, इस लिए शानदर्शनोपयोगमय है। अमूर्त- यद्यपि म्यवहारनयसे यह जीव मूर्त कमों के अधीन होने से स्पर्श, रस, गन्ध, वर्णवाली मूर्तिके द्वारा रचित रहने के कारण मूर्त है तथापि निधय नयसे अमूर्त, इन्द्रियोंसे अगोचर, शुद्धरूप खभाव धारक होने से अमूर्त है। कर्ता- यद्यपि जीव निश्चयनयको रटिसे क्रिया रहित, उपाविरहित जाननेके खभावन धारक है । तथापि व्यवहारनयसे मन, वचन तथा कायके व्यापारको उत्पन करनेवाले कर्मोसे युक्त होनेके कारण शुभ और अशुभ कर्मोंका करनेवाला है, अतः कर्ता है। सदेह परिमाण- यद्यपि जीव निश्चयनयपूर्वक स्वभावसे उत्पन्न शुद्धलोकामाशके समान है और असंख्य प्रदेशों धारक है, तथापि शरीर नाम वर्मके उदयसे उत्सन- संकोच तथा विस्तारके अधीन होने से घड़े आदि पात्रोंमें रहे हुए दीपककी सदृश अपने देहके परिमाण जितना है।
संस्कृलटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता मोक्ता- यद्यपि जीव शुन्यायिक नयसे रागादिविक्त्यरूप उपाधियोंसे शून्य है, और अपने आत्मासे उत्पन्न हुए अमृतको भोगनेवाला है, तथापि अशुद्ध- नयसे उस सुखरूप अमृतपदार्थके अभावसे शुभ कर्मसे उत्पन्न मुख और अनुभ धर्मसे उत्पन्न दुःखौंको भोगता है अतः भोक्ता भी है। संसारस्थ- ससारमें स्थित रह कर अनेक पर्याय बदलता रहने के कारण संसारी है। यद्यपि जीव शुद्ध निश्चयनयसे संसार रहित है और नित्य आनन्दघन रूप एक खभावका धारक है तथापि अशुद्ध निश्चय नयसे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, भव इन भेदोंसे पांच प्रकारके संसारमें रहता है अतः यह आत्मा-जीब संसारस्थ भी है। यह आत्मा सिद्ध भी है। यथाह प्रज्ञापनायाम्-सितं वद्ध- अष्टप्रकार कर्मेन्धनम् , ध्मातं दग्धं जाज्वल्यमानशुल्लध्यानानलेन यैस्ते निरुक्तविधिना सिद्धाः । अथवा 'पिधु गतौ' इति वचनात् सेवन्ति स अपुनरावृत्त्या निवृतिपुरीमगच्छन्, अथवा 'पिधु सराद्धौ' इति वचनात् सिद्ध्यन्ति स्म निष्ठितार्था भवन्ति स । अथवा "पिधून शास्त्रे मांगल्ये च" इति वचनात् सेघन्ति स शास्तारोऽभूवन् , मांगल्य- रूपतां चानुभवन्ति स्मेति सिद्धाः । अथवा सिद्धा नित्या अपर्यवसान- सितिकत्वात् , प्रख्याता वा भव्यरुपलब्धगुणसन्दोहत्वात्, आह च, "मातं सितं येन पुराणकर्म, यो वा गतो निर्वतिसौधमूर्ध्नि; ख्यातोशामा परिनिहितार्थो, यः सोऽस्तु सिद्धः कृतमंगलो मे" अतः स सिद्धो नमस्करणीयक्षेपामविप्रणाशिज्ञान-दर्शन-मुख- शक्यादिगुणयुक्ततया खविपयप्रमोदप्रकर्पोत्पादनेन भन्यानामतीवो- पकारहेतुत्वादिति ।
वीरस्तुतिः। भावार्थ-"आठ प्रकारके कर्मरूपईन्धनको शुमध्यानकी आगसे जिसने जला दिया हो वह सिद्ध होता है, अथवा गत्सर्थक 'पिधु' धानुसे सिद्ध अर्थात् अपुनरावृत्ति की अपेक्षा जो निवृत्तिपुरीमें पहुंच गए हैं वह सिद्ध है; अथवा निप्पलर्थक विधु' धातु द्वारा लिद्ध' यानी जिसने अपने अर्थको निष्पन्न. किया है, और जो कृतल होगया हो, वह सिद्ध है; अथवा शास्त्रार्धक और मागल्यार्थक 'पिधून्' धातुसे 'सिद्ध' यानी जो शासनकर्ता हो, अथवा जो मंगलत्यके स्वरूपका अनुभव कर्ता हो, या जो खयं मंगलरूप हो वह निद्ध' है; अथवा निल कारण जिनकी स्थिति अविनाशी है, अथवा भव्य जीवोको जिनके गुणसमूह उपलब्ध होने से प्रसिद्धि प्राप्त है, या जिन्होने बाधा हुआ पुराना कर्म जला दिया है, जो नियुत्तिरूप महलके शिसरके ऊपर जा पहुंचा है, जो प्रसिद्ध है, अनुशासन करनेवाला है, शनार्थ है, यह सिद्ध प्रभु हमारे लिए कृत मंगल है नमस्सर करने योग्य है, इसीलिए कि-ये अविनाशी-ज्ञान, दर्शन, सुख, शकि, आदिकसे युक्त हैं और सविषय आनन्दोत्कर्ष के उत्पादक होनेसे भव्य जीवोंके ऊपर अप्रतिम उपकार करने से ये नमन करने योग्य हैं।" यद्यपि जीव व्यवहार नयके कारण अपनी आत्मारी प्राप्ति रूप उपरोक्त सिद्धत्व युक्त है, और उसके प्रतिपक्षी कोंके उदयसे असिद्ध है, तथापि निश्चय नयसे अनन्तज्ञान और अनन्तगुण स्वभावका धारक होनेसे सिद्ध है; अर्द्धगामी- इन कहे हुए गुणोंच धारक जीव सभावसे ऊर्ध्वगमनकरनेवाला है, यानी व्यवहारसे चार गतियोंको पैदा करनेवाले कमों के उदयसे ऊंचा, नीचा, तथा तिळ गमन करनेवाला है, तथापि निचयनयसे केवलज्ञान, आदि अनन्त. गुणोंकी प्राप्ति स्वरूप मोक्षमें चला जानेके कारण स्वभावसे ऊर्ध्वगमन करने वाला है, इस प्रकार जीवा सरूप शुद्ध और अशुद्ध नयरी दृष्टिले गमझाया गया। और अनादि कालसे कम्मोदारा आत्मा वयं बंचार संसारमें रख रहा है इत्यादि आगमन अर्थ तो प्रसिद्ध ही है । और शुद्ध नय के आश्रित जीवन म्वरूप उपादेय यानी ग्रहण करने योग्य है और यी सर हंब है तथा उनके त्रस और स्थावर ये दो नेद हैं। घस- प्रय प्राणी वे हैं जो किसी के द्वारा भय, पारा, और उदम प्राकर, या , संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता सताया जाकर अपने वचनेके लिए जो इधर उधर भाग फिर सकते हैं, जिनके दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय, पांच इन्द्रिय, ये चार प्रकार हैं। स्थावर- पृथिवी, पानी, आग, हवा, वनस्पविके भेदसे पांच स्थावर हैं। ये अपने पर आए हुए संकट से बचने के लिए उद्यम करनेमें सर्वथा अशक्त है, बहुत थोडी समझ है, और जन्म मरण भी अधिक करते रहते हैं, पृथ्वी, पानी, अमि, वायु के जीव ४८ मिनिट में १२८२४ वार मर कर जन्म लेते हैं, वन- स्पतिमे निगोदजीवकी अपेक्षा ६५५३६ बार जन्मते मरते हैं। हमारा एक धाग मुससे आता है और चे १७ कार जन्म कर मरते हैं। अतः ये सब स्थावर कहलाते हैं। इन्हीं में भूत सत्व भी हैं यथा- २-३-४ इन्द्रियवालोको प्राणी संज्ञक जानना चाहिए । वनस्पतिकी भूत संज्ञा है। पांच इन्द्रिय वालोंको जीव संज्ञक माना है। पृथ्वी, पानी, आग, हवाको सत्व संज्ञासे पहचानते हैं। इन सब जीवोंमें १० द्रव्य प्राण होते हैं। जिनकी गणना इस भाति है। १० द्रव्य प्राण-श्रोत्रेन्द्रिय, चक्षुरिन्द्रिय, प्राणेन्द्रिय, रसेंद्रिय, स्परों- न्दिय, मन, वचन, काय, आयुके प्रमाणु, श्वास उच्छ्वासका लेना छोडना, इलादि १. प्राण हैं। यह प्राण धन सब जीवोंको अत्यन्त प्रिय है। जब इन पर मुखीवतका कुन्हाडा बजता है तब उस धनसे मोह एक दम हटा देता है। स्थावरोंम जीव सिद्धि होनेसे चार्वाकादि का खण्डन हो जाता है। भग- वान्ने इन सब जीवोंको दव्यकी दृष्टिसे निल और पर्याय की दृष्टिसे अनिल फर्माया है। इसे द्रव्याथिक और पर्यायाथिक नयके आश्रयसे भी समझाया है। प्रभु खयं यापू की तरह डूबते हुए ससारी जीवोंको सहायक भूत है, और उनका ज्ञान तत्व-पदार्थ का पृथर ज्ञान करानेके कारण दीपकके समान है। दीपककी तरह स्व-पर रूपका ज्ञान प्रकट हो जाता है । यही भगवान्का धर्म है; जिसे उन्होंने और तीर्थकरोंकी भाति समता अर्थात् नुलनात्मक दृष्टिसे कहा है। इनमा धर्मोपदेश करनेका आशय लोकोंको समभाव-उपरानभाव-अहिंम्पमात्र तथा सलप सरूप समझाकर ससारमें परोपचारता फैलाना था कुछ जाद उलय प्रकट करनेन उद्देश नहीं ॥४॥ गुजराती अनुवाद-सुधर्माचार्य वीरप्रभुन्य गुणोनुं वर्णन करे । ।
६० वीरस्तुतिः। सर्वज्ञ प्रभु श्रीवीरभगवाने उर्वलोक अधोलोक अने विद्यालोकना समस्त जीवोर्नु स्वरूप आ रीते वर्णवेल छ। जीव- जो के जीव समूह शुद्ध निश्चय नयथी आदि-मध्य अने अन्त रहित, ख तथा पर गुण प्रकाशक, उपाधि रहित, अने शुद्ध चैतन्य (ज्ञान) रूप निश्चय प्राणथी जीवित छ। तो पण अशुद्ध निश्चय नये अनादि कर्म बंधना कारणे जे अशुद्ध द्रव्य प्राण अने भाव प्राण छे तेनाथी जीवित रहेवाने कारणे जीव छ। उपयोगमय- जो के शुद्ध द्रव्यार्थिक नये जीव परिपूर्ण तथा निर्मल ज्ञान दर्शन मय छ, तो पण अशुद्ध नये क्षायोपरामिक ज्ञान दर्शन युक्त छे, तेथी जीव ज्ञानदर्शनोप- योगमयी छ। अमूर्त- व्यवहारनयथी आ जीव मूर्व कमने वश होया थी स्पर्श-रस-गंध-वर्ण चाळी मूर्तिथी रचित होवाना कारणे मूर्त छे। पण निश्चय नये अमूर्त, इन्द्रियोथी अगोचर शुद्धरूप खभावनो धारक होवाथी अमूर्त छ। कर्ता- जीव निश्चयनये क्रिया रहित, उपाधिरहित, जाणवानो खभावनो धारक छ पण व्यवहार नये मन-वचन-कायना व्यापारने उत्पन्न करपावाळा यर्मोभी सहित होवाना कारणे शुभाशुभ कर्मनो कर्ता छ । सदेह परिमाण-जीव निधय पूर्वक खभावथी उत्पन शुद्ध लोसराश समान छे, तेमज असंख्य प्रदेशोनो धारक छ, पण शरीर नामकर्मना उदये पहा विगेरे पाना रहेला दीवानी माफर संप्रेच विमोचमय होवाना कारणे देहप्रमाण रहे छ। भोका-शुद्ध द्रव्याधिरु नये जीव रागादि विकल्परूप उपाधिधी रहित छे, तेमज निजामथी उत्पन्न अमृतनो भोला छे, पण अशुदनये वे मुसरूप अमृत पदार्थोना अभावे शुभमर्मथी उत्पन्न मुस अने अशुभ कर्मथी उत्पन्न दु.रानो भोसा छ।
संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता संसारस्थ-संसारमा रहीने पर्याय बदला रहेवाने कारणे संसारी छ, जो के शुद्ध निश्चय दृष्टिए जीव संसार रहित छे, तेमज नित्य आनंदघनरूप सभावनो धारक छे, तो पण अशुद्ध निश्चय नये द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव-भव ए पांच प्रकारे संसारमा रहे छे, तेथी आत्मा-जीव संसारस्थ पण छे। सिद्ध-आठ प्रकारना कर्मरूप ईधणने शसध्याननी आग वडे जेणे बाळी दीधा होय, ते सिद्ध छ; अथवा गत्यर्थक “पिध्" धातु थी सिद्ध अर्थात् अपुनरा. वृत्तिनी अपेक्षा जे निवृत्ति पुरीमा पहोंची गया है, वे सिद्ध छ, अथवा निष्पत्य. र्थक "पिधु" धातु थी सिद्ध एटले जेणे पोताना अर्थ निप्पन कर्या छ, अने जे कृतकृत्य थई गया छे, ते सिद्ध छ, अथवा शास्त्रार्थक तेमज मांगल्यार्थक 'पिधुन्' धातुथी सिद्ध अर्थात् जे शासन कर्ता छ, अथवा जे मंगलस्वना खरूपना अनुभव कर्ता छे, अथवा जे खयं मंगलरूप छै, ते सिद्ध छ; अथवा नित्य होवाना कारणे जेनी स्थिति अविनाशी छे, अथवा भव्य जीवोमा जे गुणसमूह उपलब्ध होवाना कारणे प्रसिद्धि पामेला छे, अथवा जेणे पूर्व बाधेला जुना कर्मा यादी नाख्या छ, जे निवृत्ति महेलना भिखर पर विराजे छ, जे प्रसिद्ध छे, शासन कर्ता छे, कृतार्थ छे, ते सिद्ध प्रभु उदासीन रूपेण आपणा मंगलना करनार छै, नमस्कार करवा योग्य छ, एटला माटे के तैओ अविनाशी ज्ञान, दर्शन, मुख, शक्ति आदि थी युक्त छे, अने खविषय आनन्दोत्कर्ष उत्पादक होवाथी भव्य जीवो पर अप्रतिम उपकार करवाने लीथे नमन करवा योग्य छ, जो के जीव व्यवहार नर पोताना आत्मानी प्राप्तिरूप उपरोक्त सिद्धत्व गुणवालो छ, ने तेना प्रतिपक्षी कर्मोना उदये असिद्ध छे, तो पण निश्चय नये अनन्तज्ञान अने अनन्तगुण स्वभावनो धारक होवाथी ते सिद्ध छे। ऊर्ध्वगामी-उपरोक्त गुणो धारण करनार जीव स्वभावथी उर्ध्वगमन करवा वाळो छे, अने व्यवहारे चतुर्गतिमा रखडावनार कर्मोना उदयथी ऊंची, नीची तथा तिरछी दिशामां गमन करवाबाळो छे, तो पण निश्चय नये केवलज्ञा- नादि अनन्त गुणोनी प्राप्ति खरूप मोक्षमा जवाना कारणे खभावी ऊर्ध्वगमन करवावाळो छे, आ रीते शुद्ध अने अशुद्ध नये जीवनुं स्वरूप समजावेलु छे, अना. दिकालथी कर्मबंधी बंधाएलो आत्मा ससारमा रखडीज़ रह्यो छे, इत्यादि आगमथी प्रसिद्ध छे, शुद्ध नये जीवन खरूप उपादेय अर्थात् ग्रहण करवा योग्य छे, अने बाकी बीजु वधू हेय छे, तेना बस अने स्थावर एका वे भेदछ।
वीरस्तुतिः। प्रसं-कोई भी भय, त्रास, उद्वेग पानीने अथवा सतामणी पामतो पोताना बचाव अर्थ जे अहीं नहीं हरी फरी के भागी शके छे, ठेस छे, वेना दिय, तेन्द्रिय, चौरिदिय अने पंचेंद्रिय एंवा चार भेद छे स्थापर-पृथ्वी-पाणी-अगि-वायु अने वनसति ए पांच स्थावरमा भेद छ । तेओ पोतानां पर आवी पडेला संकटोमाथी यवानो प्रयत्न करवामां सर्वथा अशक छे, धणीज़ ओडी सेमजवाला छे, जन्म-मरण घणां करे छे; पृथ्वी-पाणी-अमि अने वायुना जीवो ८ मिनिटमा १२८२४ चार जन्मे छ ने मरे छे, वनस्पतिमा निगोदना जीवो ६५५३६ वार जन्मे भरे छे, एक श्वासोश्वासमा ते एटला भव करे छे, आधी आ बधा स्थावर कहेवाय छे। आ दरेकमा जीव छ, अने ते केवा खरूपे छे ते नीचेनी हकीकत समजाशे ते तमामने शरीर थे, अने ना शरीरने मनुष्यना शरीर साथे जुड़ी जुदी रीते सरसाववामां आवे छे। पृथ्वीकाय--जेम मनुप्यने काइ वागेलं होय अने घा पडेल होय, वे रुझाता धीमे धीमे भराइ जाय छे, तेम खोदेली साणो पण स्वयं भराह जाय छे, जेम उघाडापगे याललार मनुष्यना पगर्नु तळिऊ घसाय छे वेम वचतु जाय छ, ठेवीज रीते माणसो-पशुपक्षी तथा वाहनोनी आवजाव थवाथी पृथ्वी पर्य रोज घमाय छे, ने रोज यथवा पामे छे, जेम बालक वधे छ तेम पर्वत पण धीमे धीमे निल वधे छे, माणसने लोढुं पकडq होयतो माणसने लोडा पासे जयुं पडे थे, सारे लोह मुंबक नामनो पन्धर पोताने स्थाने रहीने पोलानी चैतन्य शकिधी लोदाने पोतानी पासे संची छे छे, माणसना पेटमा पथरीनो रोग थाय रे ते सचेत पत्थर होवाथी निल वधे छे, माछलीना पेटमा रहेल मोती पण एक जातनो पत्थर छ, अने ते पण निल यधे छे, जेन माणसना शरीरमांना हार. कामो जीव होय छे, वेम पत्थरमा पण जीव होय छ । अपकाय-जैन पक्षीना इंडामा रहेल प्रवाही पदार्थ पंचेन्द्रिय पसीना पिंड वरूपे छे, वेन पाणीना जीवो पण ते एकेन्द्रिय जीवोना पिंड रूपेणे, मनुष्य तथा विर्यच गर्भ अवस्थामा शरूआतना प्रवाही पाणी रूपे होय, तेम पाणीमां पण जीव समजवा, जेन शियाळामा मनुष्यना मुम्मांधी वळ नोरले गे, तेन स्वाना पाणीमाधी पण वराळ नोकळे ऐ, जैन शियाळानो मनुष्य शरीर गरम होय छे, म चियाळान उवा राणी पर गरम होष छ, जेम गरमीर्मा मनुष्य शरीर शीतळ होय है, लेम उनादानां स्यानु पाणी पुण शीतल होप छ, A संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता जेम मनुष्यनी प्रतिमां पण शरदी तथा गरनी होय छे, तेम पाणी नी प्रकृतिमा .पण शरदी तथा गरमी होय छे, जेम मनुष्य शरीर शियाळामा अकडाइ जाय छ, तेम शियाळामा तळावन पाणी पण अकडाई जइने बरफ बने छे, जेम मनुष्य बाल्यावस्था, युवावस्थाने वृद्धावस्था सेवा नवा रूप धारण करे छे, तेम पाणी पण वराळ-परफ ने बरसाद आदि रूप धारण करे छे, जेम मनुष्यनो देह माताना गर्भमा पाके छ, तेम पाणी पण छ मास वादळामां गर्भ रूपे पाकीने वर्षान रूप धारण करें छे, जेम मनुष्यनो काचो गर्भ कोईक बार गळी जाय छे, तेम पापीनो पण काचो गर्भ गळी जाय छे, जेने करा पन्या कहेवाय छे, तेजस्काय-जेम मनुष्य इवासोश्वास सिवाय जीवी न शके, तेम अग्नि पण श्वासोश्वास सिवाय जीवी शक्तो नथी, जेम तावमा मनुष्यनुं शरीर गरम रहे छे, तेम अमिना जीवो पण गरम होय छे, मरण पामवाथी मनुष्यनुं शरीर टंड पड़ी जाय छे, तेम अग्मिना जीवो पण मरी जवा थी ठंडा पही जाय छ, जेम आगीयाना शरीरमा प्रकाश होय है, तेम अग्मिना जीवोमां पण प्रकाश होय छे, जेम माणस चाले छे, तेम अनि पण चाले छे, एटले अनि फेलाइने ते आगळ बधतो जाय छे, जेम मनुष्य ऑक्सीजन [प्राणवायु ] हवा ले छे, ने कार्बन [विपवायु] वहार काढे छे, वेम अग्नि पण ऑकसीजन हवा लइने कार्बन हवा बहार काढे छे। वायुकाय--हया हजारो गाऊ मुधी खतन्त्र रीते चाली गके छे, हवा पोताना चतन्य बळथी मोदा विशाळ वृक्ष तथा मोटा महेलोने पाढी नाखे छे, हवा पोतार्नु शरीर नानामांधी मोठं बनावे छे, वर्तमानकाळमां विज्ञानिओए शोध करी छ, के हवामां थेकसस नामनां सूक्ष्म जंतुओ उडे छ ने ते एटला सूक्ष्म छे के, सोयनी अणी जेटला भागमा एक लाख जंतुओ मुखथी आराम पूर्वक बेसी शके छे । वनस्पति काय-मनुष्यनो जन्म माताना गर्भमा रहया पछी थाय छे, तेम वनस्पतिना जीवो पण पृथ्वीमाताना गर्भमां अमुक समय रहया पछी बहार नीक छे, जेम मनुष्य शरीर नित्य वधे छ, वेम वनस्पठितुं शरीर पण नित्य वधे छ, जेम मनुष्य बालावस्था-युवावस्था ने वृद्धावस्था भोगवे छे, तेम त्रणे अवस्था वनस्पति पण भोगवे के, जेम मनुष्यना शरीरले कापवाथी लोही नोकळे छे, तेम वनस्पतिना शरीरने,कापवाथी तेमांधी प्रबाही पदार्थ विविध रगना नोकळे छे,
वीरस्तुतिः।
जेम सोराक मळवाथी मनुष्यनुं गरीर पुट थाय छे, अने न मळवायी मुकाई जाय
छे, तेम वनस्पति पण खातर तथा पाणीनो खोराक मळवाथी ते विकास पामे छ,
अने तेना अभावे ते मुकाई जाय छे, जेम मनुष्य शास ले छे, तेम वनस्पति पण
श्वास ले छे, दिवसे कार्बन हवा लईने रात्रे वनस्पति ऑक्सीजन हवा बाहर
काढे छ, जेम केटलाक मनुप्यो मासाहारी होय छे, तेम वनस्पति पण माखी-
पतंग आदि नाना जीवोना सत्वने पोताना पांदडा पती चुसी ले छे, या खातर
अने हवा द्वारा मांसाहार करे छ, चन्द्रमुखी पुष्प चन्द्रमानी सामे ने सूर्यमुखी
पुष्प सूर्यनी सामे खोले छे, अने तेमना अस्त थवाथी बीडाई जाय छे।
तेमां भूत-सत्व पण छ, जेमके बे-प्रण-बार इन्द्रियवाळा जीवो प्राणी कहे-
वाय छ, वनस्पतिने भूत, पांच इंद्रियवालाने 'जीव, अने पृथ्वी-पाणी-अमि-वायुने
'सत्व' कहे छे, ए वधा जीवोमा १० द्रव्य प्राण होय छे, जेनी गणतरी नीचे
मुजब
नी छे।
पांच इन्द्रिय, मन, वचन, काय, आयुष्य, श्वासोश्वास, ए दश प्राण छ,
आ प्राणधन सर्व जीवोने अत्यन्त प्रिय छ।
स्थावरोमा जीव होवार्नु सावित थवाना पुष्ट कारणे चाक-नास्तिक आदिन
संडन थई जाय छ, आ सर्व जीवो द्रव्य दृष्टिए निल अने पर्याय दृष्टिए अनित्य
छे, एम महावीर भगवाने फरमावेलं छ, प्रभु पोते बेट समान इवता संसारी
जीवोने सहायक छ, तेमज मन शान तत्वनो निर्णय कराववाने कारणे दीपक
समान छे, दीपक समान स्वरूप-पररूपy शान प्रगर थरे जाय छे, आ भगवान्नो
धर्म छ, के जे तेओए तुलनात्मक दृष्टि यी कहेलो छ। धर्मोपदेश करवानो तेमनो
उपेच लोकोने समभाव-शान्ति-अर्हिमा-गुत्लन स्वरूप समजावीने परोपवर कर-
वानो हतो, पण पोतानो उत्कर्ष प्रगद करवानो न हतो॥ ४ ॥
से सबदंसी अभिभूय नाणी,
णिरामगंधे घिइमं ठियप्पा;
अणुत्तरे सघजगंसि विचं,
गंधा अतीते अभए अणाऊ ॥५॥
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता संस्कृतच्छाया स सर्वदर्शी अमिभूय ज्ञानी, निरामगन्धो धृतिमान स्थितात्मा। अनुत्तरः सर्वजगति विद्वान्, ग्रन्थादतीतोऽभयोऽनायुः ॥५॥ सं० टीका-स ज्ञातृपुत्रमहावीरो भगवान् सर्वदर्शी समासीत्। कृत्वा, अभिभूय यावद्वाविंशतिपरिपहान् तिरस्कृत्य पराजय कृत्वेति । पुनः केवलाख्यं ज्ञानमस्यास्तीति सः । "अत इनिठनौ ।" परतीर्थाधिपाधिकत्वमावेदितमित्यनेन ॥ अथ ज्ञानक्रियाभ्यां मोक्ष इति तस्स भगवतो ज्ञान प्रदर्श्य क्रियां दर्शयितुमाह ॥ निर्गतोऽपगत आमो. विशोधिकोटिरूपो गन्धो यस्मात् सोऽस्ति निरामगन्धो मूलोचरगुणस- मन्वितां चरित्रक्रियां कृतवान् इति । धृतिमान् स्थैर्यसम्पन्नो निश्चलतया चरित्राराधकः । स्थितात्मा निर्मलात्मा शुक्लध्यानीति, यावदथवा स्थित्यात्मा मर्यादान्वितात्मा, यथा "संस्थातुं मर्यादा धारणा स्थिति- रित्यमरः।" अशेपकर्मविगमात्स्थितो व्यवस्थित आत्मा यस्य स खितात्मा । परिणामद्वारेण विशेषणं ज्ञानक्रिययोरेतच्चति भावः । , अनुचर उत्कृष्टः श्रेष्ठो नास्मादुतरं प्रधान सर्वस्मिन्नपि जगति विद्यते सोऽनुत्तरः । “अनुत्तर एषां विपर्यये श्रेष्ठ इत्यमरः" । विद्वान सर्वहेयोपादेयज्ञेयपदार्थवेत्ता, सकलद्रव्याणां करतलामलकवत्प्रत्यक्षद- ीति भावः । “विद्वान् विपश्चिद्दोपज्ञः सन्मुधीः कोविदो बुधः, धीरो मनीपी ज्ञः माज्ञ, इत्यमरः" । ग्रन्थादतीतोऽन्तर्बाद्यपरिग्रहग्रंथा- दतीतो रहितः, अथवा कर्मरूपाइन्थादतिक्रान्तो रहितो निम्रन्थ इत्यर्थः । प्रवृत्तिभावेऽथवा कर्मपर्वणोऽतीत इत्याशयः । "प्रन्थिनी पर्वपरुपी इत्यमरः" | अभयः सप्त प्रकारकं भयं न विद्यते यस्या. सावभयो मीतिरहितः । "दरतासो भीतिभॊः साध्वसं भयमित्यमरः । अनायुः नारकतिर्यमुरापुरहितत्वात् । दग्धकर्मवीजत्वेन पुनरु- बीर. ५ ६ वीरस्तुतिः। त्पादस्याभावाचेत्यर्थः । "दग्धे वीजे यथात्यन्तं प्रादुर्भवति नांकुरः । कर्मवीजे तथा दग्धे, नारोहति भवांकुर इति" ॥५॥ अन्वयार्थ से] वह [मन्वदंसी] सब कुछ देखनेवाले भगवान् [अभिभूय ] क्षायोपशमिक ज्ञानोंको जीतकर [नाणी] केवलज्ञान संयुक्त, [णिरामगंधे ] निदोष चारेन पालनेवाले [धिइमं] धीरता समन्वित [टिनप्पा] • अपने आत्म-खरूपमे स्थिर-लय [सबजगति ] अखिल विश्वमै [अशुत्तरे ] सबसे उत्कृष्ट [ विज] पदाथोंके जाननेवाले सर्वज्ञ-सर्व विषयज्ञ [गंधा ] परिग्रह अन्थीसे [अतीते ] रहित [अभए] सात भयोंसे रहित [अगाउ] और आयु रहित थे ॥५॥ भावार्थ-भगवान् महावीर स्वामी सामान्यरूपसे पदार्थोके जाननेवाले तथा मति-श्रुति-अवधि और मन.पर्यच इन चार धयोपशमजन्य सानोको लांच- कर केवलज्ञानसमुत्पन्न थे और उन्होंने यह भी बताया कि सान और चरित्रसे ही मोक्ष होताहै अत. प्रभुके ज्ञानका वर्णन करके चरित्रका वर्णन करते हैं। भग- वान्ने मूलगुण और उत्तरगुणोंका पूर्णतासे पालन किया तथा अनेक विन यापा और परिपह पडनेपर भी खचरित्रमें निथल रहे । भगवान् तीनों लोकमे सबसे श्रेष्ठ विद्वान् परिग्रह रहित निर्मन्य और सातभयसे रहित वथा सब काँसे मुक्त ये॥५॥ भापा-टीका-प्रभु २२ परिपह और शारीरिक मानसिक कट तया रागा- विक एवं ज्ञानावरणीयादिक मान्तरिक शत्रुओंको जीत कर केवल ज्ञानी होगए। आपने ज्ञानको प्रमुख पद देकर संसारको क्रियाका भी भान कराया। और यह सिद्ध कर दिखाया कि शान और किया इन दोनोंका आश्रय टेनेसे मोक्ष है। अतः वे खयं आमगन्ध-मूल गुण और उत्तर गुणरूपी दोपोंसे रहित थे।आपने धीरतासे चरित्रमा पालन किया, आत्माको शसध्यान में स्थिर किया। याँका सर्वथा नाश करने के लिए नित्तात्मा होकर स्थित रहे, स्थिरता उनरा प्रधान गुणथा। और ब्रह्मज्ञान-पाकर हाथ पर घरे भामटेकी तरह सर घरा- चरको जान लिया । क्योंकि अन्तर और यान परिमहसे रहित होकर कर्म प्रन्धिका सर्थया भेदनकर चुके थे अतःआप निम्न्य थे। यही कारण है कि बौदादिक आपको अब तक भी निम्माठ के नामसे स्मरणमें रखते हैं। आप सयं अभय रहकर औरों को निर्भय बनाने अर्थ उपदेश देते और लोगों में,
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संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता
सक्षा वीर रस पैदा करते। देव, मनुष्य, पशु और नरकके आयुके लम्बे
वारोंको तोडफोड कर नष्ट कर दिया । क्योंकि जब बीजको सक भून
दिया जाता है तब उसे बोया भी जाय तब भी वह अंकुर नहीं देता अर्थात्
उसकी सृष्टि अगाडी नहीं वदती, इसी प्रकार कर्मवीज नष्ट होने पर संसारका
अंकुर अर्थात् जन्म और मरण नष्ट हो जाता है ॥५॥.
गुजराती अनुवाद-२२ परिपह, शारीरिक तथा मानसिक कष्ट,
रागादिक तथा ज्ञानावरणीयादिक आन्तरिक शबुओने जीतीने प्रभु केवलज्ञानी
थया, ,अने ज्ञानने प्रमुख पद आपीने ससारने क्रियान पण भान कराव्यु, अने सिद्ध
करी वताव्युं के ज्ञान अने क्रियाथी मोक्ष छे, मूल तथा उत्तरगुणे दोप रहित
संयमना पाळनारा, धैर्यवान् , सर्व कर्म नाश थवाथी स्थित आत्मवान्, सर्व
जगत्ने विषे प्रधान ज्ञानवान् , बाह्य भने अभ्यन्तर परिमह रहित तेमज कर्म-
अन्थीनो पर्वथा नाश करवाथी निर्ग्रन्य थया आ कारणे बौद्धादिक आपर्नु 'निग्ग-
ण्ठ' (निर्गन्य ) एवा नामधी स्सरण करे छे, आप सात भय रहित थया, अने
वीजाओने निर्भय बनाववाने माटे उपदेश देता, अने लोकोमो साचो वीर रस
पेदा करता, चार गविना आयुष्य रहित शातपुत्र श्रीमहावीर देव हता, कार-
के ज्यारे वीजने शेकी नापवामां आवे त्यारे तेने वाववामां आवे तो पण ते
उगर्नु नथी, आ रीते कर्मबीजनो नाश थई जवाथी संसारना अंकुर जन्म-मरण
नाश पामी जाय ।
से भूइपन्ने अणिए अयारी,
ओहंतरे धीरे अणंतचक्खु ।
अणुत्तरे तप्पइ सुरिए वा,
वइरोइणिदे व तमं पगासे ॥६॥
संस्कृतच्छाया
स भूतिप्रशोऽनियतचारी, ओधंतरो धीरोऽनन्तचक्षुः।
अनुत्तरं तपति सूर्य इव, वैरोचनेन्द्र इव तमः प्रकाशः ॥ ६॥
वीरस्तुतिः। सं० टीका-से इति' । भूति शब्दो. वृद्धौ, सम्पदि, ऐश्वर्य, भसनि वर्तते, भूतिप्रज्ञस्तत्र प्रवृद्धज्ञानोऽनन्तज्ञानवानिति, तथा च भूती भस्मनि कर्मणां भस्मसात्करण इत्यर्थः कर्मक्षय इति यावत् प्रज्ञा यस्य स भूतिप्रज्ञः, तथा समग्रात्मैश्वर्योदययान् च । “भूतिभ. लनि सम्पदि, इत्यमरः" । पुनस्तथा भूतिप्रज्ञो जगदक्षाविपयको भूतिप्रज्ञः । सर्वमंगलभूतिमन इत्यपि । अनियतचारी-अप्रतिवन्ध- विहरमाणत्वात् , वायुरिवेतिभावः । ओघं संसार तरीतुं शीलमस्येति ओपतरः । उत्पादव्यययोः ओघं परम्परां तरतीति स: 1 "ओघो वेगे जलस्य च । वृन्दे परम्परायां च, द्रुतनृत्योपदेशयोरिति" मेदिनी । अथवा कर्मणामोघः समूहस्तं तरतीति सः । “ओपो वृन्देऽम्भसा स्य इत्यमरः" । घीवुद्धिस्तया राजत इति धीरः,-परिपहोपसर्गेऽक्षोम्यो दृढो वेति धीरः । "धीरोमनीपी ज्ञः प्राज्ञ इत्यमरः ।" अनन्तत्वा. चक्षुर्ज्ञाने तत्केवलज्ञानमेव तदेव चक्षुर्भूतः सोऽनन्तचक्षुरिति । यथाः सूर्योऽनुत्तरमुत्कृष्टं सर्वतोऽधिकं तपति न तस्मादधिकतापे कच- नास्ति, तथैव भगवानपि ज्ञानेन सर्वोत्कृष्टः । पुनः कथंभूतो हि सूर्यो, विशेषेण रोचनो दीप्तिमान्, प्रकाशकाधिकत्वात् , इन्द्रोऽसौ यथा तमोऽपनीय-दूरीकृत्य प्रकाशयति, एवमसावपि भगवानज्ञानत- मोऽपहत्य यथावस्थितपदार्थान्प्रकाशयतीत्यर्थः । 'विरोचन इत्यत्र साथै- ऽणि, पैरोचनः सूर्योऽधवामिरिय कर्मेन्धनं सालयित्ता अकर्मकः परिशुद्धो जात इत्यपि । "विरोचनः प्रल्हादरस तनयेऽऽग्निचन्द्र- योरिति मेदिनी।" विरोचनो रविरेवेति बहुमतम्, यथा-"तरणि खपनो भानुभः पार्दामा रविः, तिग्मः पतंगो गुमणिर्तिण्डोऽकों महाधिपः इनः सूर्यसमोनांतबिमिरारिविरोचनः । इति धनायना- संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ममालायाम्" । "शुमणिस्तरणिमित्रश्चित्रभानुविरोचन इत्यमरः" विरो- चन एव वैरोचनः सूर्यः। स इव प्रकाशोऽतिमसिद्धो, जगद्विख्यातो ज्ञातपुत्र-महावीरप्रभुरित्यर्थः ) "प्रकाशोऽतिप्रसिद्ध पीत्यमरः । अथवा सः प्रभुर्ज्ञानातपने महान् इति । "प्रकाशोद्योत आतप इत्यमरः।"॥६॥ अन्वयार्थ-[से ] वे भगवान् [भूइपणे ] अलन्त बुद्धिमान [अगिए अचारी ] विचरते समय प्रतिबन्ध रहित [ ओहंतरे ] संसार समुद्रसे पार होने- वाले [धीरे] धैर्यवान् अणंतचक्षु] अनन्तज्ञानवान् [ अशुगरं] सबसे अधिक पवित्र श्रेष्ठ [तप्पति ] तपश्चरण करनेवाले [ मूरिए वा] सूर्यके समान तथा वइरोयगिंदे व वैरोचन नामक अग्नि के सहश [तम ] अज्ञानान्धकारको नष्ट करके ( पगासे ] ज्ञानद्वारा तत्वोंको प्रकाशित करते थे।॥६॥ भावार्थ-भगवान् महावीरकी प्रज्ञा संसारका मंगल कल्याण एवं रक्षा करनेवाली थी, उनका भ्रमण अप्रतिबद्ध था, क्योंकि वे सर्वथा परिभहसे रहित थे, उनका चरित्र संसार समुद्रसे पार करनेवाला था, परिपह-शत्रुओंका आक्रमण समान भावसे सहन करते थे, इसीसे धीर एवं धी-बुद्धिसे गजित-शोभित थे, अनन्त ज्ञेय पदार्थों के ज्ञाता थे, इसीचरण अनन्त ज्ञान सहित थे, विश्वमें सबसे अधिक तप करते थे, और जिसप्रकार सूर्य अन्धकारको नष्ट करता है अथवा पैरोचन नामक अभिके जलनेसे अन्धकार या काष्टका नाश होता है उसी प्रक्चर महावीर भगवान् भी अज्ञान अन्धक्यर या कर्माचके नाशक ये ॥६॥ भापा-टीका-वीर भगवान्का ज्ञान चौथी भूमिकासे बढकर अनन्त- वृद्धिको प्राप्त होगया। यह अनन्तज्ञानमय ऐचर्य सर्वथा धाविया कम्म क्षयकरनेपर ही मिला। तब संसारके लिए आप मंगलभूत और रक्षक बने तथा आपका वायुकी समान अप्रतिबद्ध विचरणया। आपने संसारकै समुदको पार किया। उपदेश दान देकर औरोंको भी जन्म मरणसे मुझ कर दिया, जिससे कहा जा सकता है कि कर्मके समोथसे भाप पार हुए। परिषद और उपसर्ग सहते समय किसी प्रकारका क्षोभ न होनेसे आप धीर ये। इसीके बाद आप अनन्त बधुवा कहल्मए। जिस तरह सूर्य उत्कृष्ट वापसे तपता है वीरस्तुतिः । उसी तरह महावीर भगवान्भी ज्ञानको अनन्तताठी अपेक्षा सर्वोत्कृष्ट पे। उप ज्ञानसे भगवान् जनताके अज्ञानधिकारको अपहरण करके यथार्थ रीडिसे ज्ञानका आविर्भाव-प्रकट करनेवालोंमेंसे थे । प्रभुने अमिकी तरह कर्म रूप इंधनको भी जलाकर अनन्त संसारकी अज्ञान आत्माओं को प्रस्ट रीतिर्ने परिशुद्ध किया । और सूर्यकी सहरा भगवान् महावीर प्रभु अखिल विश्व अद्वितीय प्रविधि प्राप्त महापुरुप थे। अधिकतर ससारमें उन दिनों प्रभुरी शान-- क्रान्ति ही सब ओर चमक रही थी॥६॥ गुजराती अनुवाद-~वीर परमात्मानं शान चोधी भूमिकाधी वधीने अनन्तताने प्राप्त धयु, कर्मोनो क्षय थवाथी भगवान् अनन्तमानकाळा यया, सारे संसारना मंगळ समान वेमज रक्षक तेओ ध्या, वायु रामान अप्रतिबंध विहारी, ससार समुत्रने तारनार भगवान् हता, बीजाओने उरदेश दान करने जन्म मरणथी मुक करावनार हता, परिपह तेमज उपसर्ग राहती खते आपने कोई पण प्रकारको क्षोभ न यवाना कारणे धीरजयान्, धनन्तशानरूप चवाळा, 'तथा सूर्य जेम सर्वधी अधिक तपे छे, तेन प्रभुनाने करी सॉसम छ, विरोचन अनि जेम मळगवाथी प्रकाश करे तथा इन्दनी पेठे अन्धकारने दूर करी प्रयास करे छ, म श्रीमहावीर देव पण अशानरूप अन्धकार दूर करी प्रकार करे छे, अमिनी माफर कमरूप इंधपने पाळी अनन्त संगारना अशान आरमाशोने प्रगट रीते परिशुद्ध कर्या, अने सूर्यनी पेठे प्रभु असिन विधा अदितीय प्रसिद्धिने पामेल महापुरुष हता, ते दिवसोमा प्रभुनी शान-शान्ति अधिकतर प्रकाशती हती॥६॥ अणुत्तरं धम्ममिणं जिणाणं, णेया मुणी कासव आसुपपणे; इंदेव देवाण महाणुभावे, सहस्सणेता दिवि णं विसि॥७॥ संस्कृतच्छाया अनुचरं धम्ममिमं जिनाना, नेता मुनिः काश्यप भाशुमार। इन्द्रस्य देवानां महानुभायः सहस्रनेता दिपि विविएःn७॥
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता
सं० टीका-अनुत्तरं० इति-अनुत्तरमुत्कृष्ट प्रधान धर्म
नानामृपभादितीर्थकृतां सम्बन्ध्ययं 'मुनिः, 'मनेरुचेत्युणादिसूत्रेणे
त्यये कृते चोपधोत्वे जाते 'मुनि रिति सिद्धं, परंन्वत्र लघूपधगुणा-
शः प्राप्तस्तथापि तपरोच्चारणासामर्थ्यात् किदित्यनुवर्तनाच न भव-
ति भावः' । "वाचं यमो मुनिरित्यमरः" । "मुनिभिक्षुश्च संयमीति,
औषः" । श्रीज्ञातृपुत्रमहावीराख्यः सुमुनिः, काश्यपो गोत्रेण, आशु-
ज्ञा केवलज्ञानी उत्पन्नदिव्यज्ञान इत्यर्थः । नेता,-प्रणेता चतुर्विधस्य
घिस्स धर्मप्रणेता, चतुप्प्रकारधर्मोपदेष्टा दानशीलतपोभावभेदाद्वा ।
पथवा साधुसाध्वीश्राद्धश्राविकारूपचतुर्विधसंघस्य प्रभुत्वादपि नेता
श्यकः । ताच्छीलिकस्तृन् । “अधिभूनीयको नेता प्रभुः परिवृढोड-
पः" इत्यमरः । धर्ममित्यत्र कर्मणि द्विर्तायैव । ताच्छीलिकस्तृन्
द्योगे 'न लोकाव्ययनिष्ठेत्यादिना पष्ठीप्रतिषेधात् । यथेन्द्रो दिवि देव-
के खर्गे महानुभावो महाप्रभावः । एवमेव याथातथ्येन सम्यक्प्रकारेण
नखिलद्रव्यपदार्थनिश्चयकर्ता महावीर इति । "अनुभावः प्रभावे च
तां च मतिनिश्चय इत्यमरः" । प्राकृतशैल्या णमिति वाक्यालंकारार्थे ।
हसनेत्रो-विलक्षणसहस्रनयनयुक्तोऽसाविन्द्रः। विशिष्टो रूपबलव-
गादिकैविशिष्टो युक्तो हि प्रधानस्तथैव भगवानपि सर्वेभ्योऽपि विशिष्टः
राणायको महानुभावश्चेति सर्व पूर्ववृत्तान्तं संयोज्यमिति भावः ॥ ७ ॥
अन्वयार्थ-[जिणाणं] जिन भगवानके ( इ] इस [अणुत्तरं]
उर्वश्रेष्ठ [धम्म] धर्मके [णेया] नेता [मुगि] मुनि [ कासव ] काश्यप-.
गोत्रीय [महाणुभावे] महाप्रभावशाली भगवान् महावीर [दिवि] वर्ग में
सहस्स ] हजारों [ देवाण ] देव समूहके [इदै २] इन्द्र के समान [विvिठे]
प और गुण आदिमें सबसे उत्तम और प्रधान [गेता] नेता अर्थात् संपूर्ण
पनयुक्त ईश्वर ये॥७॥
- संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता आरमाने माटे उसव मार्ग बतावनार हता, ते धर्म ऋषभादि २३ तीर्थकरोए यतावेल धर्मधी भिक्ष न हतो, देश कालने अनुमार संशोधन अवश्य करेलं हवं, पण तेओ जैनधर्मना आदि प्रवर्तक न हता, ते प्रभु काश्यप गोत्रीय क्षत्रियोमानी विमल रिभूति हता, दिव्य शान प्राप्त करीने चतुर्विध सपने धर्म पय यतावनार होवाथी तेओ नेता पण हता, कारणके सपने तेश्रोएज मान- दर्शन-चरित्र-अहिंसा-सत्य-तप-त्याग-सयमादिमा प्रवृत्त कर्यो हतो, ससारला कल्याणार्थे वेओए सपने दान-शील-तप-भाव एम धर्मना चार भेद बताव्या, साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविकारूप संपनी स्थापना करीने तेओए तेमने संगठननी परम चिर्नु तत्व बतायुं हतुं, देवलोकने विषे इन्द्र जेम देवोमा महाप्रभावान्, हजारो देवोनो नायक अने सर्वोत्तम छ, तेम पदार्थ विज्ञाननो नियय प्रगट करवावाळा तत्ववेत्ताओमां महावीरप्रभु ऐधर्यशाळी हता, संसार थने मोक्ष वेमज सारभूत तत्वोने प्रगट करयामा प्रसर प्रकाशक हता। सात तत्व-जय पदार्थ आदि महान् तेमज गंभीर पदार्थोनो सरळ आशय निपुणताथी जनतामा वेओए प्रगट को हतो। जे तरफ इन्दनी दृष्टि रहे थे, वेज तरफ देना ५.. प्रधानोनी नजर पण रहेछ, वेज वे अनेकान्त पर तेओनी दृटि हत्ती। तेज मार्गर्नु संसारे पण अनुसरण कयु । जेथी तेओ पण सहस्रनेत्र गणाया । रूप- बल-वर्ण-वीर्य विगेरेमा वेओ सर्वोत्तम हता। मुनिगणरूपी ताराओमा देओ मुनिचन्द्ररूप ईश्वर हता ॥ ७ ॥ से पन्नया अक्खयसागरे या, महोदही वा वि अणंतपारे । अणाइले या अकसायी मुक्के, सफेव देवाहिबई जुईमं ॥८॥ संस्कृतच्छाया स प्रयाऽक्षयसागरोया, महोदधिरिव अनन्तपारः। अनाविलो वा अकपायी मुक्काशफ इव देवाधिपतियुतिमान् ॥८॥ सं० टीका-स इति, पुनरसौ भगवान् प्रजयाऽक्षयोऽक्षीणज्ञानः, प्रज्ञायत अनयेति प्रज्ञा तयाऽक्षयो, ज्ञातन्येऽर्थे तस्य चुद्धिन प्रक्षीयते ७४ वीरस्तुतिः। न प्रतिहन्यते चेति, "बुद्धिर्मनीपा धिपणा धीः प्रज्ञेत्यमरः" । अधवा तस्य बुद्धि केवलज्ञानाख्या सा साधनन्ता-साद्यपर्यवसाना कालतो, द्रव्यक्षेत्रभावापेक्षयाऽप्यनन्ता तयाऽक्षयः, यथा सागरो महोदधिः खयंभूरमणः समुद्रः स इवानन्तपारः । यथासौ विस्तीर्णा गंमीरजा लोऽक्षोभ्यस्तथैव तस्य भगवतो विस्तीर्णा प्रज्ञाऽनन्तप्रज्ञा, स्वयंभूरमण- समुद्रादनन्तगुणितो गंभीरोऽक्षोभ्यश्च, अनाविलोऽकलुपजल:, “फलु. पोऽनच्छ आविल इत्यमरः" । नाविलोऽनाविलो निर्मलस्तथैव कर्म. लेशामावादकलुपज्ञानो निर्मलज्ञान इति । न कपायी-अकषायी ज्ञानावरणीयादिकर्मवन्धनवियुक्तत्वात् । मुकाकर्मरहितोऽपुनरावृत्ति प्राप्तः । सर्वलोके पूज्यत्वेऽपि, निश्शेषान्तरायक्षयेऽपि निरवद्यभिक्षा- मात्रोपर्जीवित्वाद्भिक्षुः । पुनश्च स ज्ञातृपुत्रीयो महावीरो भगवान् दीप्तिमान् , शक्र इव देवाधिपतिरिव कान्तिमानिति, "शक इन्द्रः सुना- सीरः शतक्रतुरिति धनञ्जयः" "जिष्णुलेखर्पभः शक्र इत्यमरः"॥८॥ अन्वयार्थ-[से] वे भगवान महावीर [पनया] वुद्धिकी अपेक्षा अनन्तपारवाले तथा [अणाइले] पवित्र जलसे भरपूर [महोदहीवादि] खय. म्भूरमण समुद्रकी तरह [अक्सयसायरे ] अक्षीण समुद्र थे तथा {अकसाइ] चार कपायसे रहित मुके] आठ कर्मोंसे रहित [देवाहिवर] असंख्य देवोके अधिपति [ सक्केव ] इन्दकी तरह [जुईमं] दीसिमान्-चमकीले घे ॥ ८॥ भावार्थ-भगवानको किसी अन्य पदार्थसे उपमा न दी जा सकनेके कारण समुद्रसे हि एक देशीय उपमा दी गई है। अर्थात् जिसप्रकार स्वयंभूर- मपसमुद्र अनन्तपार युक्त है उसी प्रकार भगवान् भी द्रव्य क्षेत्र काल और मावकी अपेक्षा अनन्त ज्ञानवान् थे, समुद्र के निर्मल जलके समान बनका ज्ञान भी स्पष्ट और आवरण रहित या, इसी प्रकार कयायसे रहित तथा आठ क्रमांक बंघसे मुफ थे,, जैसे इन्दका प्रभाव देवापर होताहै उसी प्रकार प्रभुका प्रभाव भी प्राणीमात्र पर था ।। ८॥
संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता
भापा-टीका-प्रभुका ज्ञान कोप अक्षय था, क्योंकि उनकी बुद्धि भी
केवलज्ञानरूपा थी। जो कि आदि-अनन्त थी। जिसमें दव्य, क्षेत्र, काल,
भावकी पूर्ण अनन्तता थी। विस्तीर्ण और खच्छ तथा गंभीर स्वयम्भूरमण
समुद्र की सदृश प्रभु गंभीर तथा अक्षोभ्य और पवित्र गुणों में उससे भी अन-
न्तगुण अधिक थे। आपका अनुभव, विचार तथा ज्ञान जल अनाविल-यानी
बालभ्यता-पूर्वापर विरोधरहित था, जिसमें कर्म मलका लेश कोई खोजेसे भी
नपा सके। ज्ञानावरणीयादिक आठ कर्म-बन्धनसे रहित होने के कारण
आपमें कपाय कहां हो। इसीसे आप जीवन मुक्त थे। आप तीनो लोकोके
पूज्य होने पर भी निरवद्य भिक्षा लेते। आप शूरवीर शकेंद्रकी तरह द्युतिमान
और प्रतापी-महापुरुष थे। और यह बात विश्व विख्यात थी॥८॥
गुजराती अनुवाद-प्रभुनो ज्ञान भण्डार अष्ट हतो, कारणके तेमनी
बुद्धि पण केवलज्ञान रूपे हती, जे सादि-अनन्त हती । जैम खयंभूरमण नाम
मोटो समुद्र अनन्त-अपार भने निर्मल जलदाळो छे, तेमज प्रभु गंभीर-
अक्षोभ्य-अने पवित्र गुणोमां तेनाथी पण अनन्तगणा अधिक हता। वेओ
अनुभव-विचार तथा ज्ञान जल अत्यन्त निर्मल हतुं । शोधया छतो पण कर्म-
रूप मेल तेमा मळी शके नहि । ज्ञानावरणीयादिक कर्मबन्धनथी रहित थवाने
कारणे वेओ अकपायी कपाय रहित हता। तेथी आप जीवन्मुक्त हना, त्रिलोक
पूज्य होवा छतां आप निरवध भिक्षाए आजीविका करनार हता । देवोना स्वामी
शकेन्द्रनी पेठे तेओ तेजस्वी तथा अनन्त प्रतापी अने महापुरुप हता ॥८॥
से वीरिएणं पडिपुण्णवीरिए,
सुदंसणे चा णगसबसे।
सुरालएवासि मुदागरे से,
विरायए णेगगुणोववेए ॥९॥
संस्कृतच्छाया
स वीर्येण प्रतिपूर्णवीर्यः, सुदर्शन इच नगसर्वश्रेष्ठः ।
सुरालयवासिमुदाकरास, विराजतेऽनेकगुणोपपेतः ॥९॥
वीरस्तुतिः। सं० टीका-स इति, वीर्यान्तरायस्य निःशेषतः क्षीणत्वात् स भगवान् वीरो वीर्येणौरसेन धृतसंहननादिवलेन प्रतिपूर्णवीर्यः, अनन्तशक्तिमानित्यर्थः । अथवोत्कर्षवत्तया प्रतिपूर्णप्रभाववान् अथवा सर्वशक्तिमान् । “सवीर्यमतिशक्तिभाक्" इति । "वीर्य चले प्रभावे चेत्यमरः" । नगानां पर्वतानां मध्ये यथा, "शेलवृक्षौ नगावगावित्य- मर" "नगः शिलोञ्चयोऽद्रिश्च शिखरीति धनंजयः" । सुदर्शनो मेरुः केवलकल्प्यजम्बूद्वीपमध्ये श्रेष्ठस्तथैव गुणैर्भगवान् श्रेष्ठः । यथा सुरा- लयः खर्गस्तन्निवासिनां देवानां मुदाकरो हर्पकर आनन्दजनको मनो- ऽनोकूलवर्णगंधरसस्पर्शप्रभावादिगुणे राजते । एवं भगवानप्यनन्त- गुणैः शोभते, विराजतेऽनेकैर्गुणैरुपेतो भगवान् वीर इति ॥ ९ ॥ अन्वयार्थ-[से ] वे भगवान् [वीरिएण] वर-वीर्यसे {पडिपुण्णवी- रिए] प्रतिपूर्ण शक्तिवाले थे, तथा [वा] जिसप्रकार [सुदंसणे] सुमेरु पर्वत [णगसब्बसे] सब पहाडोंमें अवलोकनीय और महान् एवं श्रेष्ठ है, उसी प्रकार महावीर प्रभु भी सर्वश्रेष्ठ थे, और सुमेरु पर्वत जिसप्रकार [भुरालए- चासिमुदागरे] देयोंको प्रसन्नता उत्पादक होता है उसी प्रकार भगवान राब प्राणीवर्गकेलिए हर्षदायक थे, वथा जैसे सुमेरु णेगगुणोववेए] अनेक गुणोंसे शोभित है वैसेही भगवान् भी अनन्त उत्तमोत्तम गुणोंसे समलथत थे।॥९॥ भावार्थ-भगवानका वीर्यान्वण्य कर्म शिल्कुल नष्ट हो गया था, मत- एव उनमें अनन्तवीर्य-अनन्त पलका प्रादुर्भाव हो गया था, जैसे मुमेरु पर्वत सब पहाडोंमें श्रेष्ठ है उच्च है उसी प्रकार भगवान भी शक्ति आदि गुणोंमें उच्च और सर्वश्रेष्ठ थे। तथा जिस प्रकार स्वर्ग देवों के लिए हर्षोत्पादक है उसी प्रकार मुमेह भी इर्ष जनक है वैसे ही भगवान् भी प्राणीमानकेलिए हर्षको उत्पन करनेवाले थे। सुमेरु जैसे अनेक गुणोंसे-पुनहरी रंग और चन्दनादि गन्ध तथा उत्तम फलोंसे शोभित होता है, भगवान् भी ज्ञान-शक्ति-मुसादि गुमसे विराजमान थे ॥९॥ भापा-टीका-वीर्यान्तरायका सर्वथा क्षय होनेसे भगवान् अनन्त शक्तिमान् और धर्म्य, शौर्म्य, सहिष्णुतान्दे बारीरिक बलये बलिए थे, संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता प्रतिष्ठाशालेओं में भगवान् अद्वितीय प्रभाववाले थे। जहां जीवोंको केवलज्ञान प्राप्त होता है उस जम्बूद्वीपके मध्यमें जिस प्रकार सुमेरु पर्वत दृढ, अचल, और श्रेष्ठ है इसी प्रकार प्रभुकी वाणी भी अनेकान्त रूप सकल श्रेष्ठ है तथा वे स्वयं भी पर्वतकी तरह दृढ थे । मुमेरुपर्वत स्वर्गवासिओंको बडा मुहावना लगता है और हर्ष पैदा करता है इसी भान्ति प्रभु भी ज्ञान, दर्शन, मुस और दाक्ति आदिक अनन्त गुणोंसे युक्त और भव्य आत्माओंके लिए अनुपम आनन्ददायक ये ॥९॥ गुजराती अनुवाद-वीर्यान्तरायनो सर्वथा नारा थवाथी भगवान् अनन्त-शक्तिमान् हता, लेमज धैर्य-शौर्य-सहिष्णुतादि शारीरिक बले करी प्रतिपूर्ण बलवान हता। प्रतिष्ठा शालिओमां भगवान् अद्वितीय प्रभाव वाळा हता, ज्या जीवोने केवलज्ञान प्राप्त थाय छ वे जंबूद्वीपमा मेरु पर्वत जेम दृढ- अचल-अने श्रेष्ठ थे, वेम भगवान् पण वीर्यादिक गुणे करी श्रेष्ठ तथा दृढ हता। मेरु पर्वत जेम स्वर्गवासी देवोने हर्प उत्पन्न करे छे तथा अनेक गुणोए करी शोभित छ, तेमज प्रभु पण ज्ञान-दर्शन -युख अने शक्ति आदिक अनन्त गुणोए करी शोने छ, तेमज भव्यात्माओने आनन्द प्रद छ ।॥ ९॥ सयं सहस्साण उ जोयणाणं, तिकंडगे पंडगवेजयंते। से जोयणे णवणपति सहस्से, उद्भुस्सितो हेह सहस्समेगं ॥१०॥ संस्कृतच्छाया शतं सहस्राणां तु योजनानाम्, विकण्डका पण्डकवैजयन्तः । स योजने नयनवतिसहने ऊचाच्छ्रितोऽधः सहस्रमेकम् ॥१०॥ सं० टीका-पुनश्चापि मेरुवर्णनायाह, 'मयं इति,' स सुमेयों- जनसहसाणां शतमुच्छितोऽस्ति "मेरुः सुमेरहमाद्रिः रनसानुः सुराल्यः इत्यमरः ।" तथा त्रीणि कण्डकानि यस स विकण्डकः । भीम- वीरस्तुतिः। जाम्बूनदं-वैदूर्य चेति भेदात् । स किं भूतः, पण्डकवैजयन्तः, पण्ड- कवनं शिरसि व्यवस्थितं, वैजयन्तीकल्प पत्ताकाभूतं यस्य स तथोक्तः। "पताका वैजयन्ती स्यात्केतनं ध्वजमस्त्रियामित्यमरः" । असौ मेरुन- वनवतिसहसे योजने ऊोच्छूितः भूतलादुपरि प्रवृद्ध उन्नतो वा "उच्चप्रांशून्नतोदमोच्छूितास्तुङ्ग' " इति, “जातोन्नद्ध प्रवृद्धाः स्युरू- च्छ्रिता इति चामरः" । अधः :-भूमेरधस्ताद्देशे एक सहस्रं योजन- मवगाढ इत्यर्थः । एकसहस्रोनलक्षयोजनं पृथिवीत ऊर्ध्व, सहस्रमेकं च योजनं भूमाविति भावः ॥१०॥ अन्वयार्थ-[से ] वह सुमेरु पर्वत [सर्य सहस्साण ] एक लाख [जोयणाणं ] योजनका है, [तिकंडगे] उसके तीन भाग हैं, [पंडगवेजयंते ] पाण्डक वन जिसकी ध्वजाके समान है, तथा [णवणवते ] ७९ निनानवे [सहस्से ] हजार [जोयणे ] योजन [उद्धस्सिते ] ऊंचा है, और [एगं] एक [ सहस्स] हजार योजन [ हे धुनियादमें नीचा है ॥१०॥ भावार्थ-इस गाथा भगवानकी उपमा भूत सुमेरगिरिका वर्णन किया है, मुमेरु एक लाख योजन ऊंचा है, निनानवे हजार योजन जमीनसे ऊपर तथा एक हजार योजन जमीनमें है, इसके तीन कंडक-भाग हैं, उन तीन ऋण्डिकाओमें सबसे ऊपरफी कण्डिका पर पाण्डुक वन है। और मानो वह ध्वजाकी तरह जान पड़ता है, जिसप्रकार यह सुमेरु पर्वत तीनों लोकोमें व्याप्त है उसी भांति भगवानके भी शान-दर्शन-चरित्रादि गुण समस्त लोकमें व्याप्त है॥१०॥ भापा-टीका-वह मुमेरु पर्वत ऊचाईमें एक लास योजन है, जिसके तीन काण्ड-भाग हैं। जिनके कमसे भीम-जाम्बूनद-वैदूर्य नाम हैं। उस पर पण्डकवन उंचाईमें सबसे अधिक होनेके कारण सुन्दर धजाकी तरह उसकी मुशोभाको और भी बढाकर मानो चार चांद लगा रहा है । जिस मेहमी जड जमीनमें १००० योजन तक पाई जाती है। और यह ९९.०० योजन पृथ्वी के ऊपरी भाग आकाशकी चोटी तरह शोभित है। उसके तीनों भाग तीनों लोकों में अवकाश पाए हुए हैं। इसी तरह प्रभुके कथन किए हुए दीनों रन संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिवा सुमेरु की भांति विशाल और महान हैं, तथा दीनों लोकके भव्यप्राणिओंके, मन-वचन-काय योगमें समाविष्ट-ओत-प्रोत हैं.॥ १० ॥ गुजराती अनुवाद-ते मेरु पर्वत उंचाइमा एक लाख योजननो छ, तेना एक भूमिमय, बीजो मुवर्ण मय भने त्रीजो वैडूर्य रन मय एवा त्रण कांड (भाग) छ, तथा ते मेरू पर्वतनी टोच पर पंडग वन ध्वजानी माफक शोभी रह्यं छे। वे मेरु पर्वत नवार्थ हजार योजन ऊंचो भने एक हजार योजन नीचे जमीनमा छ। तेना प्रणे भाग प्रणे लोकमां अवकाश प्राप्त छ। वेवीज रीते प्रभुना बतावेला ज्ञान-दर्शन-चरित्र रूपो घणे रन मुमेरुनी पेठे विशाल छे, अने अणे लोकना भन्योना मन-वचन-काय मा सम्पूर्ण रीतिथी समाविष्ट छ ॥१०॥ ... पुढे णभे चिठ्ठइ भूमिवहिए, जं सूरिया अणुपरिवयति । से हेमवन्ने पहुनंदणे य, जंसि रइं वेदयती महिंदा ॥११॥ संस्कृतच्छाया स्पृष्ठो नभसि तिष्ठति भूम्यवस्थितः, यं सूर्याः अनुपरिवर्तयन्ति । स हेमवर्णो यहुनन्दनच, यस्मिन् रतिं वेदयन्ति महेन्द्राः ॥ ११ ॥ सं० टीका-स्पृष्टः संलग्रो नभस्याकाशेऽथवा नभो व्याप्य तिष्ठति स मेरुः, "स्पृष्टिः पृक्तावित्यमरः" । तथैव भूमि पृथिवीं चाव-- गाय खितः । ऊयाधस्तिर्यक् संस्पर्शीति भावः । यथा च यं मेलं सूर्यादयो ज्योतिप्का 'अंगारकादिग्रहा थप्यनुवर्तयन्ति यस्य पार्थतः परिभ्रमन्तीत्यर्थः । हेमवर्णों वा कनकामो निष्टप्तकाश्चनसदृशस्तथा बहूनि चत्वारि नन्दनवनानि यस्य स बहुनन्दनवनः । भूमौ तु भद्र- शालवनं ततः पञ्चयोजनशतान्यारुह्यातिक्रम्योल्लंध्य मेखलायां शैल- वीरस्तुतिः। नितम्बदेशे मध्यभाग इत्यर्थः । "मेखला सशबन्धे स्यात्कायी सेल- नितम्बयोरिति मेदिनीकोशः"! नन्दनवनमायाति । तथा द्विपष्टि. योजनसहसाण्यधिकान्यतिक्रम्य सौमनसवनम् । ततः पद त्रिंशत्सह- साम्यारुखोलंध्य शिखरे पण्डकवनमिति मेरोश्चत्वारि वनानि । यलिन् मेरौ महेन्द्रा त्रिदशालयात् वर्गात्समागत्य रमणीयतमशब्दादिगुगेन रति रमणक्रीडां वेदयन्त्यनुभवन्ति । अतश्चतुर्नन्दनवनाथुपेतो विचि- कीडासलसमन्वितः स मेरुः ॥ ११ ॥ अन्वयार्थ-से] वह सुमेरु [णमे] आकार को [पुढे छूकर [चिठ्ठ ] ठहरा हुआ है, तथा [ भूमिवठिए] भूमिको कर स्थित है, ] जिसकी [ सूरिया] स्यं [अणुपरिवहति ] प्रदक्षिणा कर है, और जो [हेम- वो ] सोने के गमान परम याग्नि युक्त है, जिसमें [बदु ! दुत अर्थात् भार [नंदणे ] नन्दनादि वन हैं [जैसी] तथा जिसमें [महिंदा ] महेन्द्र आकर [रति] मुखमा वेदयती ] अनुभव करते हैं 100 भावार्ध-वह मुमेर पर्वन कारके भागमें आपको पास करके तया नीचे भूमिगे स्पधं करके स्थित है, इसलिए वह ऊत्येक-अधोलोक और तिर्यक लोको स करता है। ज्योतिष्फ विमान उमय प्रदक्षिणा करते है। उगम रंग गुवर्णकी तरह पीला है। उसके पार गर वन है; समान भूमिमें भशात वन है, उसके पांचसो योजन ऊपर नन्दन पन दे, उग पागट हजार योजन आर मॉमनम पन है, उसगे सत्तिम हार योजन आर पाण्डस वन है, इस प्रकार यह अनेक क्रीमस्थलोसे गुरु है, और उपमें देश का देवेन्द्र आर रवि-कोगय अनुभा करते हैं।" भाषा-टीका-उस मुमेरु पचने कप लोर-सपोर और मनुक बेइस प्रकार तीनों लोपा आयो छ ठिा है। जिसमें दो जगह पूर्व कार तथा प्रहगण भारों और परिम्ना देते रहते हैं। बस हादरे हुए मोनेकी वरर पपरमार करने लगता है। उसो कारों और गानो बनाने पार गुरुत गुन्दर यन है और प्रथम यमवस भूमि पर भागात घन है। उस जगदी ५.. योनंब आर जाने मानो उगी ।
संस्कृनटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता जगह नन्दन वन आता है। उससे ६२००० योजन ऊपर सौमनस वन है। उससे ३६००० योजन अपर सिरके पास पंडकवन है। ये सुमेरुके चार सपन वन हैं। यहां पर बडे २ महेन्द्र और देव गण आकर मनोहर खेल करते हैं । उसका सौन्दर्य निहारनेके लिए स्वर्गसे चल कर आते हैं। इसी मादि भगवान् भी सुवर्णके रंग जैसे मुन्दर हैं। इनके पास ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप तथा तत्व, पदार्थ, नय, निक्षेपादि चार मुन्दर विचार स्थल हैं, जिनमें आत्माका अनुपम आनन्द आता है । और इस क्रीडास्थली पर भव्य जन खावलम्बी होकर सहजानन्द लूटते हैं ॥११॥ गुजराती अनुवाद-ते मेरु पर्वत ऊर्ध्व दिशामा आकाशने स्पर्शी रखो छ, एटले ऊर्ध्वलोक-अधोलोक अने मनुष्यलोकने स्पर्शी रह्यो छे, जे मेरु पर्वतनी आसपास सूर्यप्रमुख ज्योतिषी-देवो प्रदक्षिणा करी रखा छ । ते मेछ. पर्वत सुवर्णना जेवी कान्तिवाळो छे। वेनी चारे बाजुए घणा बनोमां चार मुख्य सुंदर वन छ । समवल भूमिपर भदशाल वन छे, सांधी ५.० योजन ऊपर जवा नन्दनवन आवे छे, त्यांथी ६२००० योजन ऊंचे सोमनस बन छ। खांथी ३६००० योजन ऊंचे शिखरनी पासे पंडकवन छ। मेरु पर्बतना आ चार नन्दनवनमा मोटा इन्द्रो पण आवीने इच्छानुसार मनोहर क्रीडा करे छ। सेन मनोमोहक सौन्दर्य जोवाने खर्गमा यी आवे छे । ते रीवे भगवान महावीर प्रभु पण सुवर्ण समान सुंदर छ । देमनी पासे ज्ञान-दर्शन-चरित्र तथा तप तेमज तत्व-पदार्थ-नय-निक्षेपादि चार सुन्दर विचार स्थल छ । जेमा आत्माने आनन्द आवे छे। मज ते क्रीडा स्थल पर भव्य जनो स्वावलम्बी बनीने सहजानन्द लूटे छे॥ ११॥ । । से पधए सहमहप्पगासे, विरायई कंचणमठ्ठवन्ने। अणुत्तरे गिरिसु य पचदुग्गे, गिरिवरे से जलिएष भोमे ॥ १२ ॥ वीर.६ . ८२ वीरस्तुतिः। संस्कृतच्छाया स पर्वतः शन्दमहाप्रकाशो, विराजते कञ्चनमृष्टवर्णः । अनुत्तरो गिरिपुचपघेदुगों,गिरियरः सज्वलित इव भीमः ॥१२॥ सं० टीकास मेरुनामापर्वतः सुदर्शनः शोभनदर्शनः सुगिरि- मन्दरो हेमाद्रिरित्यादिभिःशब्दैःपर्यायवाचकैर्महान् प्रकाशः प्रसिद्धि- मानीतः । "प्रकाशोऽतिप्रसिद्धेऽपीत्यमरः" । यः, स शब्दमहा- प्रकाशो विराजते शोभते, या सुरासुरकिनरादिगन्धर्वगायनशब्द- महाप्रकाशो दीप्यमानः । काञ्चनस्येव मृष्टः शुद्धो, "निर्णिकं शोधितं मृष्टं निश्शोध्यमनवस्करमित्यमरः" । वर्णो यस्य स काश्चनमृष्टवर्णः । अनुचरः प्रधानस्तथा गिरिपु पर्वतेषु मध्ये पर्वभिर्मेखलादिभिः सन्धि- भिर्वा "पर्व क्लीवं महे अन्थौ, प्रस्तावे लक्षणान्तरे, दर्शः प्रतिपदोः सन्धाविति मेदिनी कोषः" । अथवा च दंष्ट्रापर्वतैर्वा दुर्गो दुर्गमः, "दुर्गा मानिल्योः खी दुर्गमे त्रिप्विति मेदिनी" 1 सामान्यप्राणिनां दुरारोहो गिरिरिति भावः । स गिरिवरः पर्वतप्रधानो मणिभिरौपधिभिध ज्वलितो दीप्यमानो भौम इव मंगलमह इवाथवा भूदेश इवेति भावः । भीमः कुजे च नरके पुंसि भूमिभवे त्रिप्विति मेदिनी" ॥१२॥ अन्वयार्थ[से] वह [पव्वए] सुमेरु पर्वत [ सहमहप्पगासे ] अनेक सुशन्दोंसे गूंजता है, तथा [कंचणमवणे] सोनेकी तरह पीले वर्णसे [विरा- यई] शोमा प्राप्त है, गिरिम] सर पर्वतोंमें यह [ अणुत्तरे] सर्वश्रेष्ठ है, [एव्वदुग्गे ] वह पर्वत मेखला आदिके कारण दुर्गम है, और [से वह [गिरे वरे] सबमें प्रधान सुमेरु भोमे व] मंगल ग्रह तथा पृप्वीठी तरह जलिए] कान्तियुक है ॥ १२॥ भावार्थ-न्दा खभाव गूजनैकाहै, छोटे पर्वत और गुंबदोंमें श्रावाज करनेपर उसमें प्रतिध्वनि हो उठती है और वह पहली आवाजसे भी संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता 1 अधिक गंभीर होती है, इसीप्रधर मुमेरु पर्वत देवोंका क्रीडास्थल है और वह भी , उनकी प्रतिध्वनिओंसे गूंज उठता है तथा यह गूंज सबसे प्रबल है; इसी प्रकार महावीर-परमात्माकी दिव्यध्वनि सबसे प्रबल और जोरदार है, यही कारण है कि--भगवान् के सदुपदेशका प्रभाव अमिट और शीघ्र होता है । पर्वतके सुनहरी रंगके समान प्रभुक्स पीतवर्ग युक शरीर दर्शनीय और मनोहर था । जिस- प्रकार मुमेरुपर चढना कठिन है उसीप्रकार भगवान्की सर्वज्ञताको जीतना भी दुष्कर है॥२॥ भाषा-टीका वह सुमेरु पर्वत अधिराज है, दर्शनमें सौन्दर्ग्यशाली है। बुद्धिमान् अच्छी २ शन्दोपमाएँ देकर प्रख्यात कर चुके हैं। जिसपर गान्ध- वाका मनोमोहक गायन होता है, सोनेसे लीप पोत कर मानो अभी शुद्ध किया गया है इसीसे पर्व पर्वतों में उसे प्रधानता दी गई है, उसकी उंचाई और अधिक सन्धियोंके कारण उसपर मनुष्यों को पैरों चढना सांस तोड़ने जैसा अितः सामान्य प्राणी उसे चढ कर पार नहीं पासकते। इसी लिए उसे प्रधा- नता दी गई है । उस पर मणिमाणिक्य जैसे बहुमूल्य रन और कई अलौकिक जड़ी बूटियां मंगलग्रह की तरह चमकती है। इसी भांति वीर, भगवानका दर्शन भनेकान्त है, परम मुन्दर है। जिसकी अकाट्य तर्कमया प्रसिद्ध है। जिसकी गौतम जैसे दार्शनिकोंने प्रशंसा की है। उस दर्शनका सुन्दर वर्ण अर्थात् शब्दों में निर्माण हुआ है। तथा वह सब दर्शनोंमें प्रधान है । साधारण तथा अनुभव शून्य भानवोंके लिए अगम्य और दुरारोद है। जिनकी २८ लधिरूप औषधिओंकी चमक विलक्षण है। जो धर्मकी प्रभावनारूप आरो- भयता प्रदानकरनेके अर्थ काममें लाई जाती हैं। इसीसे दुराप्रहरूसी रोम शान्त होते है ॥१२॥ गुजराती अनुवाद-वळी ते मेरु पर्वत मंदर १, मेरु २, मनोरम ३; सुदर्शन ४, खर्यप्रभ ५, गिरिराज ६, रमोश्चय दिलकोपम लो 'मध्य २, लोकनालि १०, रान ११, सूर्यावर्त १२, सूर्यवरण १३, उत्तम १४, दिशादि १५ और अवतंस १६, ए सोळ नामे करी महा प्रकाश (प्रसिद्ध) वान थई शोभे छ । जेना पर गान्धर्वाना मनोमोहक गायनो थाय छे । सुवर्णनी पेठे शुद्ध वर्णवाळो सर्व पर्वतोमा प्रधान छ । तेनी उंचाई अने अधिक संधिोने लीधे मनुष्योने माटे तेना पर चढवू पण अशक्य छे । वळी ते गिरिराज माणे - 1 . वीरस्तुतिः। अने औषधिओए करी देदीप्यमान पर गते वीर भगवानन भनेननस दर्शन परम मुंदर भने मनोहर । जेनी अप्रय वनसता परिद जेनी ग्यतन जेवा दार्थनिए पप प्रशंसा करेली। ते दर्शननुं गुन्दर वर्ण अर्याद ग्रन्दोमा निर्माण थएवं रेतया ते सर्व दर्शनोमा प्रधान बने सर्वोत्तम छ। माधारण तथा अनुभव शून्य मनुष्योने माटे अगम्य तथा बाधि डरारोह छ । बेनी ३० सपा आपपियोनी पमा गहुसी मिलन के धर्मनी प्रभावना करवाना उपयोगमा न्यश्वामा आवेतनावी दुरापर रोग मुझमी न माने शान्त पई आपसे ॥१२॥ , महीइ मज्झमि ठिते णगिंदे, पन्नायते सूरियसुद्धटेस्से; एवं सिरीए उस भूरियपणे, मणोरमे जोपइ अपिमाली ॥ १३ ॥ संस्कतन्छापा मखां मध्ये स्थितो नगेन्द्रः, प्रमायते सूर्यपम्जुरलेएमः। एवं धिया नु स भूरिया, मनोरमो ग्रोवपत्यार्चिमाटी ॥१३॥ सं० टीका-मया मध्यदेशेऽन्तांगे यो चम्मूदीपस्तस्यापि यह मध्यप्रदेश स नगेन्द्रः सितः । पुनम सौमनस, बिगुल्लम, गन्धमा- दन, माल्पवंतदंष्ट्रापर्यंतचतुष्टयोपशोभितः समभूभागे दशसहसयोजन- पित्तीर्णः, चिरसि सहसमेकमधलादरि दरासहागि नवति योजनानि मोजनदेशभागैर्दशभिभांगरपिकानि विस्तीर्णधल्गारिशपोजनाति वटोपशोभिवा नगेन्द्रः पपंतप्रधानो मेरः । प्राभावगति पूर्य- पदलेसी निर्मलकान्तिः सूर्यसमप्रभ इति । मनन्तरोनाभिया नशब्दानिशिस्तरमा प्रान्ता समेहरिवो नोकरंगापुतः संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ८५ "वर्णो द्विजादौ शुक्लादावित्यमरः" वीरपक्षे भूरि-अभूतं बहुलं “प्रचुर प्रभूतं प्राज्यं मदनं बहुलं बहु, पुरुहूः पुरुभूयिष्टं, स्कारं भूयश्च भूरि चेत्यमरः" । वर्णः परित्रोमो यस स भूरिवर्णः, दीर्घसिंहासनस्य प्रवेणीति । "प्रवेण्यास्तरणं वर्णः परिस्तोमः कुथो द्वयोरित्यमरः" । अथवा भूरिः वर्ण काञ्चनं तस्सेव वर्णो (कान्तिः) यस स तथा। "वर्णेऽपि भूरीत्यमरः । अथवा भूरियहुलो, वर्णःस्तुतिर्यस्य स तथा । "स्तुतिर्वर्ण तु वाऽक्षर इत्यमरः" । "वर्णः स्तुतौ ना इति मेदिनी"। अथ किं भूतः स मेरुमनोरमश्वारुशोभनः, "सुन्दरं रुचिरं चारु, सुपर्म साधुशोभनम् : कान्तं मनोरममित्यमरः" । एवमेव वीरोऽप्येवं विधो जगति मनोरमः । पुनश्च अर्चि:किरणस्तस्य माला विद्यते यस्य सोऽचिमाली सूर्य इव द्योतयति दिश इति शेषः । “दीधितिर्भानुरुखों- ऽशुर्गभस्तिः किरणः करः । पादो रुचिमरीचिर्मा तेजोचिरिति धनं- जयः" ॥१३॥ अन्वयार्थ-[महीइ ] पृथ्वीके [मज्झम्मि] बीचमें [टिये ] स्थित [णगिदे] पर्वतोमें प्रधान सुमेरु [पन्नायते ] लोक, उत्कृष्ट रूपसे जाना जाता तथा [ सूरियमुद्धलेसे ] सूर्यके सदृश शुद्ध तेजवाला [एवं ] इसी भांतिकी [खिरीए] लक्ष्मीसे [उ] अधिकाधिक ( रिवन्ने] विचित्र रमोसे शोभित रह- नेके कारण नानावर्ण युक्त और [मणोरमे] मनको मोहित करने वाले [ अधि- माली ] सूर्यकी तरह [जोयइ] दशों दिशाओंको प्रकाशित करता है ॥१३॥ भावार्थ-रनप्रभा पृथ्वीके मध्यभागमें जम्बू द्वीप है, और इसके बीच में सब पर्वतोंमें प्रधान मुमेरु पर्वत है, यद्यपि मुमेरु पर्वत दोनों धातृ संड और दोनों पुष्कराई द्वीपमें भी हैं, किन्तु उनकी उंचाई ८५ हजार योजन ही है, और जम्बूद्वीपके मध्यभागस्य युमेरु एक लाख योजन ऊंचा है, अतः यह सबमें प्रधान गिनाजाता है। इसी प्रकार ऋषि-मुनि और महात्माओंमें महावीर प्रधान थे, सुमेरु पर सूर्यको कान्ति पड़ने पर जैसे वह चमकने लगता है वैसे ही ८६. वीरस्तुतिः । । भगवानका शरीर भी प्रभाशाली था, वे अज्ञानान्धकारके नाशक ये, भगवान्का शरीर ख्यं प्रकाशित था, तया औरोंको ज्ञान का प्रकाश भी देता था ॥ १३॥ भाषा-टीका-पृथ्वीके विचले प्रदेशमें जम्बूद्वीपके मध्यस्थलमें यह मेर पर्चत अमख पहाडोंके राजाकी तरह स्थित है। सौमनस, विद्युत्प्रभ, गन्य- मादन, माल्यवन्त इन चार दाढापर्वतोंसे वह बडा मनोहर लगता है, वह पृथ्वीके सम भाग में दशहजार योजन विस्तीर्ण है, ग्यारह २ हजार योजन पर एक २ हजार योजन घट कर शिखर पर एक हजार योजन रह जाता है। वह जगहमें सूर्यकी तरह शुद्ध कान्ति और निर्मल आकृति युक्त है। और जिसमें अनेक बहु मूल्य धातु और उत्तमरत्न पाए जाते हैं। वीर पक्षमें-सोनेकी तरह जिनके शरीरकी चमक दम है जिनके गुण चान्दकी तरह खरछ हैं। जिनकी स्तुतिएँ महती है । जिन्हें अपुनराति रूप भक्षर-मोक्ष प्राप्त है। जिनका सत्संग अनन्त सुख दाता है। मुमेरुकी तरह मनोरम है, जो सूर्यको किरणों की तरह वेजती हैं ॥१३॥ गुजराती अनुवाद-पृथ्वीना मध्य भागमा सर्व पर्वतोनो इन्द मेरु पर्वत सूर्यनी पेठे शुद्ध कान्ति भने निर्मल आकृतिवाळो छ। सौमनस, विद्यु- प्रभ, गन्धमादन, माल्यवान, ए चार दादाओथी पर्वत बहु सुन्दर देशाय छ । ते पृथ्वीना समभागमा १०.०० योजन पहोळो छ। अग्यार अग्यार हजार योजन पर एक एक हजार योजन घटवां विसर पर एक हजार योजन पहोव्ये छ । तेमा अनेक बहुमूल्य धातुओ एवं रनो मळी आवे छ। धीरपक्षे-- सुवर्णसमान जेना शरीरनी शोभा छ,जेना गुणो चन्द्रमानी पेठे सछ। जेणे अपुनरावृत्तिरूप अक्षर-मोक्ष प्राप्त करेल छे, जेमनो सत्संग अनन्त मुस दाता । मुमेरु नी पेठे जे मनोहर छ, ने सूर्यना किरण रामान वेजती छे ॥१३॥ - . सुदंसणस्सेय जसो गिरिस्स, पञ्चई महतो पछ्यस्स। एतोवमे समणे नायपुत्ते, जाईजसोदसणनाणसीले ॥ १४ ।।
१ ८७. संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता संस्कृतच्छाया मुदर्शनस्पेव यशो गिरे, मोच्यते महतः पर्वतस्य। पतदुपमा धमणो शातपुत्रो, जातियशोदर्शनशानशीलः ॥१४॥ सं०. टीका--भगवतो वीरस्यैतद्यशः कीर्तनं महतः पर्वतस्य सुदर्शनस्य मेरोगिरवि प्रोच्यते, महतः पर्चतस्यैतदुपम एततुल्यः । साम्प्रतमेतदेव भगवति दार्शन्तिके योज्यते । एपः अनन्तरोकमेरु- गिरिरित्यर्थः, उपमा उपमानं सादृश्यप्रतियोगी यस्य स एतदुपमः। कः। श्राम्यति-तपस्यतीति श्रमणः। तपोनिष्टप्तदेहो ज्ञातपुत्रः श्रीम- हावीरमभुर्जात्या="जातिर्जातं च सामान्यमित्यमरः ।" यशसा- कीयां "यशः कीर्तिः समज्ञाचेत्यमरः ।" सकलदर्शनज्ञानचरित्रवतां- मध्ये श्रेष्ठः प्रधानः । जात्यादीनां कृतद्वन्द्वानामतिशायने 'अर्श आदि- वादच्' प्रत्ययविधानेनाक्षरपटना विधेयेति भावः ॥ १४ ॥ अन्वयार्थ-[महतो महान् [पचयस्म ] पर्वत ( मुदंगणस्सेव] मुद. र्शन [गिरिस्स ] मेरु पर्वतका [जसो ] यशः कीर्ति जैसे प्रतिपादित है उसीप्रकार [पयुचद] भगवान्की कीर्ति करते हैं [एतोवमे] पूर्वकथित उपमासे अलंकृत (समणे] श्रमण [नायपुत्ते] ज्ञातपुत्र-महावीर भगवान् इजाइजसोदसणनाण- सी जाति, यश, दर्शन, ज्ञान और शीलमें मर्वश्रेष्ठ थे ॥१४॥ भावार्थ-भगवान्की एक देशीय उपमा तो मुमेरु पर्वतसे दीगई, और इसी प्रसगको लेकर मुमेरका यशोगायन कियाहै, और अब फिर उपमेयका- भगवान महावीरका वर्णन करते हैं। वे ज्ञात वंशके क्षत्रिय कुलमें उत्पन्न भगवान् समस्त जातिवालोंमें और अखिल यशखियोमें, समस्त ज्ञानियों में तथा दर्शनवालोंमें और सब चरित्रनिष्ठोंमें श्रेष्ठ थे ॥ १४ ॥ भाषा:टीका-भगवान् वीरका यश मुमेहकी सदृश महान् था, यह उपमा उनके ही ऊपर भलि भाति घटती है। वे भ्रमण थे, तपसे शरीरको सोनेकी तरह तपा डाला था, ज्ञात वंशके क्षत्रिय पुत्र थे। जिनकी जाति--यशः कीर्ति- समस्त शान, दर्शन और चरित्र समन्वित है। श्रेष्ठतर तथा प्रधाननर है l वीरस्तुतिः। गुजराती अनुवाद- भगवान् ज्ञातनन्दन वीरप्रभुनो अनुपम यश मुमेरु पर्वत समान महान् छे। ए पूर्वोक्त उपमाए अमंण भगवान महावीरदेव जातिए-यशे-दर्शने-शाने अने आचारे सातम छ। गिरिवरे वा निसहाययाणं, रुयए व सेठे वलयायताणं । तओषमे से जगभूइपन्ने, मुणीण मज्झे तमुदाहु पपणे ।। १५ ।। संस्कृतच्छाया गिरियरो वा निषध आयतानां, रुचको वा श्रेष्ठो बलयायवानाम्। वदुपमा स जगभूतिपक्षा, मुनीनां मध्ये तमुदाहुः प्रसाः ॥१५॥ सं० टीका-दृष्टान्तद्वारेण पुनरप्याह, निषधः-तन्नामा पर्वतो यथा गिरिवराणामायतानां दीर्घाणां, "दीर्घमायतमित्यमरः" । मध्ये, जद्वीपेऽन्येषु वा द्वीपेप्वपेक्षया दैव्येण श्रेष्ठ उचमः । पुनश्च वलया- यताना कटकायतानां मध्ये “आचापकः पारिहार्यः कटको वलयोs- सियाम्" इत्यमरः । रुचकः पर्वतः श्रेष्ठोऽन्येभ्यो वलयाकारत्वेनेति भावः।हि रुचको द्वीपान्ततिमानुपोचरगिरिखि पचायतो पर्नुलायतः, "चतुलं निस्तलं वृत्तमित्यमरः" । असंख्येययोजनपरिक्षेपण परिधि- नेति । तथा स पीरोऽपि तदुपमः । यथा चायपत्तताभ्यां प्रधानधति। तथैव भगवानपि जगति संसारे भूतिप्रज्ञः प्रभूतनावपरिक्षया श्रेष्ठ इत्यर्थः । परमुनीनामपेक्षया प्रण जानातीति प्रजः सर्ववति । तदेवं सरूपविद-आहुः, उदाहृतवन्तः कथितवन्तः ॥ १५॥ अन्ययार्थ-[] छे [निसह] निषध पर्वत आपरा] पर्वतोंमें [गिरवरे घेष्ठ परत है, तथा [4] असे [ए] मा पर्वत [मायारा] गोलायर पर्वनिम्] श्रेष्ठ है, वरना इन पर ।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता [] भगवान महावीर भी [जगभूईपन्ने] संसारमें प्रभूतप्रज्ञा-अनन्त ज्ञान- युक हैं । अतः [पन्ने] प्रकृष्ट ज्ञानवालोंने [तं] उन्हें मुणीण] सब मुनिराजोंके [मज्झे] बीचमें [ उदाहु ] उत्कृष्ट कहा है ॥ १५ ॥ भावार्थ- हरिवर्ष क्षेत्रके पर्वतका नाम निषध पर्वत है, वह लम्बाई में सबसे बड़ा है, तथा रुचक नामय पर्वत गोलाईमें अद्वितीय है जिसके समान अन्य दूसरा नहीं है। उसी प्रकार भगवान् महावीर भी ज्ञानमें अद्वितीय थे, उनके समान पूर्णज्ञानी उस समय कोई और नहीं था, अत एव बुद्धिमान् अन्य दार्शनिकोने उनको उत्कृष्ट कहा है ॥ १५ ॥ भाषा-टीका-निषध पर्वत सब लम्बे पहाडोंमें श्रेष्ठ है, चूडीकी तरह गोल पहाडोंमें रुचक पर्वत सर्वाधिक मुन्दर है, इसी तरह वीरप्रभु भी जगत्में भूतिप्रज्ञ-अध्यात्म विद्या अद्वितीय है । और वह अन्य मुनिओंकी अपेक्षासे । उनके स्वरूपको जाननेवालोंने यथार्थतया कहा है कि वह सर्वज्ञ हैं ॥१५॥ गुजराती अनुवाद-लांबा पर्वतोमा निषध नामक पर्वत मोटो छ । गोलाकार पर्वतोमा रुचक पर्वत श्रेष्ठ छ । ते उपमाए श्रीमहावीर शासनदेव जगत्मा प्रज्ञाए करी श्रेष्ठ कह्या छ, अध्यात्म विद्यामा अद्वितीय अने सर्वमान्य छे। तया सर्व मुनिओने विषे प्रज्ञावन्त कह्या छ । तेमना खरूपने जाणवाचाळा- ओए यथार्थज कमु छ के तेओ सर्वज्ञ छे ॥ १५॥ - अणुत्तरं धम्ममुईरइत्ता, अणुत्तरं ज्झाणवरं झियाई । सुसुक्कसुकं अपगंडसुकं, संखिंदुएगंतवदातसुकं ॥ १६ ॥ संस्कृतच्छाया अनुत्तरं धर्ममुदीर्य, अनुत्तरं ध्यानपरं ध्यायति । सुशुलशुक्लमपगण्डशुद्धं, शंखेन्द्वेकान्तावदातशुक्लम् ॥ १६ ॥ : सं० टीका-अनुतरं प्रधानमुत्कृष्टं धर्ममुत्प्राबल्येनेरयित्वा= कथयित्वा प्रकाश्य च, "प्रोके प्रेरिते, क्षिप्त इति शब्दार्थचिन्ता- संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिवा ९१ वा *गंडमुदकफेनं बुदुदं तद्वनिर्मलं चेति, निर्दोपार्जुनसुवर्णक च्छुल्लम् , तथा च शंखेन्दुवदेकान्तावदातं शुभ्रं शुलं शुक्लध्यानोचर भेदद्वयं ध्यायतीति भावः । गण्डः कपोले, पिटके, दोपजनके, जल- चुदुदे, इति शब्दार्थचिन्तामणिः ॥ १६ ॥ अन्वयार्थ-[अगुत्तरं] सबसे उत्तम [धम्मं] धर्मको [उईरहता] कदकर भगवान् [अणुत्तरं] प्रधान [प्राणवर ] व्युपरत-किया-नित्ति नामक ध्यानको [झियाइ] चिन्तवन करते हैं, अर्धात् [मुमुरमुकं] उत्तम वेतवर्णक तरह शुमनामक श्रेष्ठ और पवित्र ध्यान जोकि-[अपगंडमु] अर्जुन संसक मुपर्णकी तरह अथवा जलके फेनकी तरह या [ संसिंदु एर्गतऽवदातमुकं] शंस और चन्द्रमाकी तरह एकान्त सफेद है उस भगवान्ने ध्यान किया ॥१६॥ भावार्थ-भगवान महावीरने ऐसे धर्मा पूर्ण उपदेश किया है, जोकि रामस्त धमोमें प्रधान हे तथा शुरुभ्यानको धारण किया, वह उमभ्यान अर्जुन नामक मुवर्णके समान और जलके फेनी तरह नया शंखमी तरह और चन्द्रमाके समान खरछ है। भगवान् सक्ष्मकाययोगका निरोध करते हुए शुमध्यानके तीसरा नेद-सूक्ष्मकियाप्रतिपाति नामक ध्यानका विषय चिन्तवन करते हैं, तथा फिर जब योगका निरोध करते हैं तर प्युपरतक्रियानिति नामक चतुर्थ शसध्यानके विष- यको धारण करते हैं॥१६॥ अमोदाहरणं यथा- वरिप्रामविपाताय, केपि पट्पुरुषाः पुरा । चलिताः समुरायेन, तेप्वेक इदम- प्रवीत् ॥1॥राज़ हन्तव्यमेवान, विपदं या चतुष्पदम् ॥ अन्यः प्राह मनुष्याप्पं धोऽस्तु पशुमिः किमु:-॥२॥ तृतीयः प्राह हन्तव्या नरा एवं नहि नियः तूप्यंणाभानि हन्यता, पुरुषेप्यपि सायुधाः ॥३॥ परमोऽप्याद ये प्रन्ति ते वध्याः मायुधेष्यपि, पस्त्वाह विना शत्रून्, पातः कार्यो न कस्यचित् ॥४॥ इति निर्ष मनापानभूदेश्याविशेषतः । ताः कृष्णनीलमपोत, तेजः पयसिताभिधाः ॥५॥ तदेवं तारतम्येन, विशुपरिणामतः । येन सन्चे रिएभ्योऽन्ये, रशिताः | हि सत्तमः ॥६॥ • गंगे पोटे कोलमि' इलनिपानप्पी पिया।
वीरस्तुतिः। भापा-टीका-जिसमें राग, द्वेषा त्याग हो और शान पूर्वक लाग, वैराग्य, संयम, स्वाभिमान, सहानुभूति आदि गुण पाए जायें तथा मानव जीवनको उन्नत बनाने के लिए और संसार में उत्कृष्ट धर्मको प्रकट करने के लिए प्रभुने उपदेश किया, जो कि अभेद रूपमें था, और वह धर्म पाणी मात्रके लिए कहा था। इसकी खयमेव सिद्धिकेलिए उत्कृष्ट ध्यानका आश्रय लिया; उस ध्यानके प्रबल प्रतापसे उस पावन पुरुषको फल स्वरूप केवल ज्ञान उत्पन्न हुआ। इसके अनन्तर भी मन, 'मचन, कायके योगोंका निरोधन करनेके कालमें सूक्ष्मकाययोगको रोककर शुमध्यानके तीसरे पदको प्राप्त करना आरम्भ किया; जिस स्थिति, मन और पचनके व्यापारको रोक दिया जाता है तथा काययोगश्च भी आधा भाग एक ध्यता है। यह शुक्लध्यानस्य वीसरा चरण तेरहवें गुणस्थानपर वर्तमान सूक्ष्म किया रूप होजाता है। और जिस स्थितिमें मन, वचन, कायरी अप्रतिपाति रूप नित्ति होती यह शुक्रध्यानका चौथा पाद है । अर्थात् कर्मरहिन केवलज्ञानरूपी सूर्यसे पदार्थाका प्रकाश करनेवाले सर्वज्ञ भगवान् जब अन्तरमुहूर्व प्रमाण आयु घाकी रह जाता है तब सूक्ष्मक्रिया अप्रतिपाति नामक शुमध्यानके योग्य बन पाते हैं, उस समयकी चेष्टा अचिन्य होती है, बादरकाययोगमें स्थिति करके बादरवचनयोग और बादरमनोयोगको वे सूक्ष्मतम करते हैं, पुनः भगवान् काय. योगके अतिरिक वचनयोग मनोयोगकी स्थिति करके बादरपाययोगसूक्ष्म करते हैं, तत्पश्चात् सूक्ष्मकाययोगमें स्थिति करके क्षणमात्रमें उसी समय वचनयोग और मनोयोग इन दोनोंका सम्यक् प्रकारसे निग्रह करते हैं, तब यह सूक्ष्म किया ध्यानको साक्षात् ध्यानके करने योग्य पना लेती हैं, और वे वहा एक सूक्ष्म काययोगमें स्थित होकर उसका ध्यान करते हैं । इस तरह प्रभुका यह सूक्ष्मक्रिया अप्रतिपाति ध्यान है। और अयोग गुणस्थानके उपान्य अर्थात् अंत समयके प्रथम समयमें देवा- 'धिदेवके मुफिरूपी लक्ष्मीको प्रतिबन्धक कम्माँगे प्रकृतिएं शीघ्रमेव नष्ट होजाती है। भगवान् अयोगी परमेष्ठीको उसी अयोगगुणस्थानके उपान्य समयमें साक्षात् 'रूप और निम्मेल "समुच्छिन छिया" नामक चौधा शुल ध्यान प्रस्ट हो जाता है। भगवान्का यह प्रशस्त्र और से भी अधिक शुमध्यान है। श्याची दृष्टिसे महान् शुक्लेश्य है। "टेश्या आत्मामें पुष अपने मित करके जब अपने । संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ९३. जैसा रनालेती है अतः उसे लेश्या कहते है," यह दो तरहकी है। प्रत्ति और यौगिकी ये दो भेद है । प्रवृत्ति कमायके रंगमें रंग लेती है । भाषसे असत् परिणति या परपरिणति रूपा है। योग, अविरति, मिथ्यात्व, कपाय, जन्म, कर्म संस्कारोसे भाक्लेश्या होती है। जोकि पाप और आसवका कारण हैं।" कापोती तीन भाव है, नीला तीव्रतर और कृष्णा तोत्तम भाव है, यई अशुद्ध विचारोंका कम है। पीता उस पापकी मन्दताका नाम है, पद्मा मन्दतर है, शुक्ला मन्दतमको कहते हैं; अशुभ भावलेझ्या निर्मलताका नाश करती है, शुभभावलेश्या कर्म कालिमाको प्रध्वंस कर देती है। अन्तिम लेश्या सहजानन्द निलेश्य पद देने में निमित्त भूत है। कृष्णलेश्या- आत्मा इस दुर्भावके फंदमें पड कर राग, देषके ग्रहसे प्रसा जाता है, परपरिणाव और जड पूजाका दुराग्रह इसीसे आता है, मन दुष्ट और म्लान रहता है, अनन्तानु बन्धीके तीन क्रोध, मान, माया, लोभ कषायसे ग्रसित होता है, सदैव भावोंमें निर्दयता बनी रहती है निकल नहीं जाती,यह पापा समाचरण करके उसका कभी पछतावा नहीं करता, यह मास मदिराका लम्पट होता है, कुत्सित कर्ममें आसचि बनी रहती है। इन लक्षणोंसे समन्वित मनुष्य कृष्णलेश्यायुक्त समझना चाहिए ! नीललेल्या- जिसमें कोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, मोह, शोक हो । नृशंसता, क्रूरता, हिंसकता रहती हो, चाण्डाल वृत्ति हो; चोर, मूर्ख, स्तब्ध, औरोंका तिर- स्कार करता हो, जीन्दकी अधिकता, कामुकता, मन्दबुद्धि, जडता तथा सत्- असत्में अविवेकी हो, महा आरम्भ, महामू -मोह हो तो समझो कि इसमें नीललेदया है। फापोतीलेश्या- शोक, भय, ईर्षा, मत्सरभाव, औरोंकी निन्दा, अपनी प्रशंसा करना, कोई अपनी स्तुति करे तो प्रसन्न होना, हानिलाभो न जानना ख और परमें विपर्यय विवेचना हो, अहंकार-ग्रह प्रस्त हो; अच्छी, पुरी सब प्रकारकी क्रियाएँ कर डालता हो, अपनी प्रशंसा मुनकर अन्यचे.सीख तक अर्पण कर डालता हो, लडाइमें मरने की इच्छा रखता हो, अन्युकी यशः कीर्तिच नाश कर डालता हो, इन लक्षणोंसे सपोतीलेल्या समझनी चाहिए।
वीरस्तुतिः । तेजोलेश्या- यह पुरुष समदृष्टि होता है, अधिकमात्रामें द्वेष नहीं रखता, औरोंके कल्याण और अहिनको सोचता है, अपने बुद्धि दलसे युक और अयुकका मान कर लेता है, किसी अन्यकी शोचनीय दश पर उसे दया आजाती है, चातुर्म्यता पूर्ण और बनिन्ध व्यवहार है, ये फीतश्याके लक्षण है। पालेश्या कर्मकी निर्जरा करके पवित्र होने की प्रबल इच्छा हो, सुपात्रों में सात्विक दान वितरण करके सहजानन्द लूटता हो, जिसका अन्तर और बाह्य असन्त मृद्ध और सरल हो, आत्मामें सदैव विनय और 'नम्रता रहती हो, शत्रुओंका प्रेमसे आदर करता हो, आत्म ज्ञानको उदयमें लाना ही जिसका ध्येयहो, सच्चरित्र पालक राध हो तो समझो कि इसमे, नीति युक्त किया है, यह पालेझ्याका लक्षण है। शुक्ललेश्या अभिमानका लेश तक न हो, अपने चरित्रका फल मांगनेकी अमिलापासे निदान न करता हो, पक्षपानका अत्यन्त अभाव हो, सम्यरज्ञानकी पूर्णता हो. रागद्वेषका अत्यन्ताभाव हो, समाधि और अध्यात्मिकतामें स्थायी भाव हो, आति- क्यता हो, ये लक्षण शुललेश्याके हैं। तेजोलेश्या, पद्मा और शुक्ला ये तीन प्रशस्त लेट्या है, ममसे संवेगको उत्तम रीतिसे बढानेमे सहायिका है, इन्हैं उदाहरणसे समझाते हैं, चोरोंका एक समुदाय किसी प्रामको सूट कर भाग गया, तर उस बस्ती येकभी उनसे बदला लेनेकी इच्छासे अपने समुदायको संगटित बनाकर चले जा रहे थे उनमें छः आदमी अलग १ छ: प्रकृतिके थे। रस्में चलते २,पहले ने यह कहा कि- [१] हम सब यहां जाकर मारे प्रामके जीवोंको मार देंगे, उनकी पली हुई विडिया तने भी न छोड़ेंगे। [२] दूसरेने कहा हम उनके पशु पक्षियोंने कुछ न कहगे। [३, उनकी स्त्रियोंको कुछभी काट न देंगे। क्योंकि औरोंकी पहु दिए अपने जैसी ही होती है। - ५ संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ९५ - [४] पुरुषोंमें भी उनको मारना चाहिए जिनके हाथों में शस्त्रहों, निश्शन शत्रुका मारना नीतिविरुद्ध है। [५] उसी शस्त्र-धारीको मारा जायगा जो हम पर आक्रमण करेगा, []शत्रुको छोडकर भूलकर भी किसी निरपराधके ऊपर हाथ न डाला जाय। इस प्रकार मिन्न २ विचार मिन्न र लेश्याओंके द्वारा होते हैं, अनुक्रमसे पवित्र विचारों द्वारा जो कर्मरूपी शत्रुके अतिरिक्त अन्य सबकी रक्षाकरता हो वही नरपुंगव सबमें प्रधान और उत्तम है। इसी प्रकार भगवान् वीर प्रभुका भी शुक्ललेश्या युक्त ध्यान है, जिसमें निर्दोष आत्म द्रव्य अर्थात् आत्माका अन्तरग भाव खच्छ है। जिनका पवित्रध्यान चन्द्रमा और शंखकी तरह उज्वलवर्ग है, इस प्रकारके शुक्लध्यानका उपदेश संसारकी आत्माओंके हितार्थ प्रभुने खयं किया है ॥ १६॥ गुजराती अनुवाद-जेमां राग द्वेपनो त्याग होय, एवा ज्ञानपूर्वक त्याग, वैराग्य, संयम, खामिमान, सहानुभूति विगेरे गुणो होय, एवो धर्म मानव जीवनने उन्नत बनाववा माटे संसारमा सर्वोत्कृष्ट गणाय छे ते धर्मने प्रगट करवाने माटे प्रभुए उपदेदा आप्यो के जे अभेद स्पे हतो। वळी ते धर्म प्राणिमानने माटे कहेलो हतो। तेनी सिद्धिने माटे तेओए उत्कृष्ट ध्याननो आश्रय लीधो । तेना फल खरूपे तेमने केवलज्ञान प्राप्त थयुं । ते पछी पण मन, वचन, कायना योगोनुं निरुधन करवाना समये सूक्ष्म काय योगने रोकीने शुक्ध्याननो पीजो पायो प्राप्त करवानो आरम्भ कर्यो, जे स्थितिमा मन-वचनना व्यापारोने रोकी देवामां आवेछे, तया काय योगनो पण अर्थो भाग रोकाई जाय छ । आ शुक्लध्याननो श्रीजो पायो बेरमे गुणस्थाने वर्तता जीवोने होय छे। अने जे स्थितिमा मन वचन कायनी अप्रतिपातिरूप निवृत्तिथई जाय छे ते शुक्रध्याननो चोयो पायो छ। कर्मरहित केवलज्ञानरूपी सूर्यथी पदार्थोनो प्रकाश करवावाला सर्वज्ञमग- वानखें ज्यारे अन्तर्मुहूर्त प्रमाण आयुष्य बाकी रही जाय छे, त्यारे सूक्ष्मक्रिया अप्रतिपाति नामे शुस भ्यानने तेओ योग्य बनी जाय छे ते समयनी स्थिति अचिन्त्य होय छे। बादरकाय योगमा स्थिति करीने चादर वचनयोग अने बादर मनोयोगने ते सूक्ष्मतम करे छ । वढी भगवान् काययोग सिवाय वचनयोग, मनोयोगनी स्थिति सूक्ष्म करीने बादर काययोग पण सूक्ष्म करे छ। हे पछी सूक्ष्मयययोगमा स्थिति करीने क्षणमात्रमा तेज समये वचनयोग अने मनोयोग वीरस्तुतिः । ए बनेनो सम्यक् प्रकारे निग्रह को छे। त्यारे वे सूक्ष्म किया ध्यानने साक्षात् ध्यान करवा योग्य बनावी ले छै। अने ते त्यां एक सूक्ष्म काययोगमा स्थिति करीने तेनुं ध्यान करे छे। आ रीते प्रभुनें आ "सूक्ष्मक्रियाअप्रतिपाति" ध्यान छे। अयोग गुणस्थानना उपान्य अर्थात् अन्तसमयना प्रथम समये देवाधिदेवनी मुकिरूपी लक्ष्मीने प्रतिवन्धक कोनी प्रकृतिओ शीन नाच पामी जाय छे भग वान अयोगी परमेशीने ते अयोग नामा गुणस्थानना उपान्य समये साक्षात रूप अने निर्मळ "समुच्छिन्नक्रिया" नामे शुरुभ्याननो चोथो पायो प्रगट थाय छ । ते भगवान् प्रधान धर्म प्रकाशीने प्रधान-उज्वळमा उज्वळ, दोष रहित, उज्वळ शंख अने चन्द्रमानी पेठे एकान्त निर्मल सर्वभ्यानमा सर्वोत्तम एषु धरु: ध्यान ध्याय छ। लेमानी घटिए पण तेमनी महान अमलेश्या छे। आत्मामां पुण्य पापने लिप्त करीने पोताना जेर्वा बनावी-ल्ये, वेने लेश्या कहे छे, ते ने जातनी होय छे । ते प्रवृत्ति अने यौगिकी होय छे । प्रवृत्ति कपायना रंगा रंगी ल्ये छे। भावथी असत् परिणति तथा पर परिणतिरूप छे। योग-अवि: रवि-मिथ्यात्व-कषाय-प्रमादजन्य कर्मसंस्कारोथी भाषलेश्या होय छे । के जे पाप अने आसवन कारण छ। कापोती तीन भाव छ, नीला तीव्रतर अने कृष्णा तीव्रतम भाव छ । आ अशुद्ध विचारोनो क्रम छ । पीटा पापनी मन्दतानुं नाम छे, पद्मा मन्दतर अने Pारा मन्दतमने कहे छे । अशुभ भाव लेझ्या आत्मानी निर्मलतानो नाश करे छे, शुभ भावलेल्या कर्ममेलनो नाश करे के, अन्तिम छेश्या सहजानन्द-निलेशीपद अपाववामां निमित्तभूत छे। कृष्णलेश्या: आ दुर्भावनाना फंदमा पाडीने जीवने राग-द्वेषना महथी प्रसाय छे, पर, परिणति अने पुलपूजा-जडपूजानो दुरामह वेना थी आवे छे, मन दुष्ट अने म्बान रहे छे, अनन्तानुबन्धीना तीन क्रोध-मान-माया-लोभभी पेरायेलो होय छे, भावोमा भी निर्दयता पती नथी, पाप कार्य करीने वेनो कदी पखावो तो नभी ! मांस मदिरानो भोगी होय छे, कुकर्ममा आसक होय छे। आ लक्षणो वाळो मनुष्य कृष्णलेश्या' वाव्ये जाणवो। । । , संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता . नीललेश्या- जेनामा क्रोध-मान-माया-लोभ-राग-देप-मोह-शोक-भय-जुगुप्सा होय, नृशं. सता क्रूरता-हिसकता होय, चाण्डालवृत्ति होय, चोर-मूर्ख-सन्ध होय, बीजाओनो तिरस्कार करतो होय, निदानी अधिस्ता-कामासक्ति-मंद बुद्धि-जडता होय, सत् असत्मा अविवेकी होय, महाआरम्भ-महामूळ-मोह होय, आ लक्षणो वाळो जीव नीललेल्या वाळो जाणवो। कापोती लेश्या- शोक-भय-ई-मत्सर-अन्यनी निन्दा, पोतानी प्रशंसा तथा पोतानी कोई प्रशंसा करे तो प्रसन्न थएँ, आत्माना हानि लाभने न समजे, स्व. परमां विपर्यय युद्धि होय, अहंकारप्रल-सारी नरसी सर्व प्रकारनी क्रियाओ करी बेसे, पोतानी स्तुति सांभळीने सर्वख पण आपी दे, लडाईमां मरवानी इच्छा राखे। आ लक्षणों बाळो जीव कापोती लेश्या वाळो समजवो। तेजोलेश्या- आ लेश्यावाळो समदृष्टि होय छे, अधिक मात्रामा द्वेष नथी करतो, अन्यना कल्याण अकल्याणनो विचार करे छे । पोताना बुद्धिबलथी युक्त अयुक्तर्नु शान विचारे छ। कोई अन्यनी शोचनीय दशा पर तेने दया आवे छ । चातुर्य- तापूर्ण तेमज अनिंद्य व्यापार होय छै । आ पीतलेश्याना लक्षण छ। पद्मलेश्या- वर्मनी निर्जरा करीने पवित्र तथा कर्मरहित बनबानी इच्छा होय। मुपाने दान दईने सहजानन्द लूटे। आन्तर तेमन बाह्य व्यवहार जेनो अत्यन्त मृदु अने सरल होय । आत्मामां हमेशां विनय अने नम्रता होय । शत्रुपर पण प्रेम राखे। आत्मज्ञान प्राप्तिनो जेनो ध्येय होय ! सचरित्र पालक साधक होय, नीति युक्त क्रियावन्त होय । आ पद्मलेल्या बाळानां लक्षणो छ । शुक्ललेण्या- अमिमान लेशमात्र पण न होय, पोताना चरित्रनुं फळ मागवानी अमिला. पारूप निदान न करे, निष्पक्षपाती होय, सम्यक् ज्ञाननी पूर्णता होय, राग द्वेपनो अत्यन्त अभाव होय, ममाधि वेमज अध्यात्मिकतामा स्थिर होय, आस्तिक्य होय, आ लक्षणो शुमलेश्याना जाणवा । वीर.७ -
।
वीरस्तुतिः।
तेजो, पद्मा अने शुद्धा ए प्रण प्रशस्त लेश्या है, क्रमे करीने संवेगने उत्त-
मरीते वधारवामां सहायरूप छ ।
लेश्याओने उदाहरणधी समजावे छे-
चोरोनो एक समुदाय कोई गामने इंटीचे शल्यो भयो सारे के सामना
लोको तेनो बदलो देवानी इच्छाए संगठित बनीने चाल्या जाय छे। ते मा छ
माणसो जुदी जुदी छ प्रकृति ना हता, रस्तामा चालता चालता पहेलाए कह्यु के-
(१) आपणे बघा त्या जईने आखा गामना जीवोनो नाश करी नाखी',
तेमना पाळेलां पशिओने पण नहि छोडीशं
(२) योजाए कार्युके आपणे तेमना पशु पक्षिओने कई इजा नहि करिए।
(३) नीजाए कामु के आपणे तेमनी स्त्रीओने कोई पण जातवें कष्ट नदि
आपिए । कारणके अन्यनी बहु दीकरीओ आपणी वहु दीकरीओ लेवी छ ।
(४) चोधाए कमु के पुरुषोमां पण जैना हाथमा शन्न होय तेनेज मारवा
जोहए, निश्शस्त्र शत्रुने मारवा नीति विरुद्ध छ ।
(५) पांचमाए फयुं के शस्त्रधारिओमर पण वेओ आपणा पर आक्रमण
करे तेनेज मारवा ।
(६) छठाए रयुके शत्रु सिवाय भूलधी पण कोई निरपराधीने न मराय।
आ रीते जुदा जुदा विचारो जुदी जुदी लेश्याओ द्वारा थाय छ । अनुक्रने
पवित्र विचारो द्वारा जे कर्मरूपी शत्रु सिवाय वीजा यधानी रक्षा करे ते नरपुं
गव सर्वमा प्रधान भने उत्तम छ।
आ रीते भगवान् वीरप्रभु पण शुक्ललेश्या युक्त ध्यान छे । जेमा आत्माना
अन्तरग भाव स्वच्छ होय छे, तेमर्नु पवित्र ध्यान शंखनी पेठे उज्वळ वर्णनु छ।
आ रीते जगन् जीवोना हितार्थे शुमध्याननो उपदेश पण वीर प्रभुश्रीए करेल छै १६
अणुत्तरग्गं परमं महेसी,
असेसकम्मं स विसोहइत्ता।
सिद्धिं गते साइमणंतपत्ते,
नाणेण सीलेण य दंसणेण ॥ १७ ॥
1 संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता .९९ (संस्कृवच्छाग) अनुत्तराभ्यां परमां महर्षिः, अशेपकर्म स विशोध्य । सिद्धिं गतः साधनन्तप्राप्ता, ज्ञानेन शीलेन च दर्शनेन ॥१७॥ सं० टीका-तथा चासौ भगवान् शैलेश्यवस्थाऽऽपादितशुक्ल- ध्यानस्य चतुर्थभेदानन्तरं साद्यपर्यवसानां सिद्धि मोक्षं । "योम्यमे- देऽन्तर्घाने मोक्ष इति शब्दस्तोममहानिधिः" । "मोक्खो, निरोधो, निधाणं, दीयो, तण्हक्खयो, परं, । ताणं, लेणं, अरूवं च, सन्तं, सञ्चं, अनालयं । असंखतं, सिवं, अमतं, सुदुद्दस्सं, परायणं, सरणं, अनी- तिकं, तथा । अनासवं, धुवं, अनिदस्सना, कत्ता, अपलोकितं, निपुणं, अनन्तं, अक्खरं, दुक्खक्खयो अव्यापज्झं च, विव, खेम, केवलं, । अपवग्गो, विरागो, च, पणीतं, अचुतं, पदं । योगक्षेमो, पारं पि, मुत्ति, सन्ति, विसुद्धि, यो । विमुत्य, संखताधातु, सुद्धि, निब्बुतियो (सियु)" इत्यभिधानम्पदीपिका । "मोक्षस्तु मुक्तियाटलिमोचने" इति मेदिनी" | गतिं मोक्षगति या पञ्चमी तां प्राप्तः । सिद्धिगति- मेव विशिनष्टि, अनुत्तरा चासौ सर्वोत्तमत्वात् , अग्र्या च लोकाम- भागे व्यवस्थितत्वादनुत्तराऽध्या तां परमां प्रधानां गतिं चेति । महर्पि-रसावत्यन्तोपतपो विशेषो वा सर्वज्ञः । "महर्षिः सर्वज्ञेषु, विद्यासम्प्रदायप्रवर्तकेषु चेति, शब्दार्थचिन्तामणिः" । "महेसी, च विनायको, समन्तचक्खु, सवन्नु, इत्यभिधानप्पदीपिका" । निष्टप्तदेह- त्वादशेष कर्म ज्ञानावरणादिकं विशोध्यापनीय दूरीकृत्य च विशिष्टेन ज्ञानेन दर्शनेन शीलेन क्षायिकेण तां सिद्धिं गतिं प्राप्त इति, ॥ १७ ॥ अन्वयार्थ[स] ने [महेसी] महर्षि भगवान् [ असेसम्म ] सप कमाको [ स्विसोहइत्ता] भलिभांति क्षय करके [ अणुत्तरगं] सब प्रकारसे प्रधान १०० ... वीरस्तुतिः। लोकके अग्रभागमें [ग] जा विराजे, [साइमणंत ] और आदि-अनन्त, तथा [परमं] उत्कृष्ट [सिद्धि ] मोक्षको नाणेग ] ज्ञान [ सीलेग] चरित्र[य] और दिसणे ] दर्शनके द्वारा प्राप्त हुए ॥ १७ ॥ भावार्थ-भगवान्ने क्षायिकज्ञान, क्षायिकदर्शन और क्षायिकचरित्र द्वारा सर्वोत्तम लोकाप्रभागमें धारण करनेवाली मुफिको सफल काँका अन्त करके उसे पाया, वह मुकि सादि अनन्त है, कई लोक मोक्षसे वापिस आना मानने हैं; किन्तु, वह युक्ति संगत नहीं है, क्योंकि संसारमें रुलानेवाले राग-द्वेष-कोध-मान-मायादि विकार हैं, जहांतक ये विकार हैं वहातक मोक्ष नहीं, और मुक्नात्मामें कोई विकार नहीं है । अतः विकार रहित आत्मा संसारमें क्योकर' पुनरावर्तन कर सकता है ? यदि उसमें रागादिका सद्भाव मानाजाय तो वह मोक्ष नहीं, यदि मोक्ष होनेपर पुनः अवतरित होते हों तो वहभी ठीक नहीं,क्योंकि विकारोंको विकारही पैदा कर सकते है, जब मुतात्मा निर्विकार है तो विकारकी उत्पत्ति क्योकर हो सकती है ॥१४॥ भाषा-टीका-भगवान् शैलेशी अवस्थासे शुक्लध्यानके चतुर्थ भेदको पाने के अनन्तर आदि अनन्त मोक्षरूप अपुनरावृत्ति धाममें जा विराजे । लोककै अग्रभा- गमें व्यवस्थित होनेसे वह परमप्रधान है, उसे उस सर्वज्ञ-महर्षि ने देहको तपसे तपा कर ज्ञानावरणीयादि आठ कम्मोका विशोधन करके (वह भी अपने निजी पुरुषार्थ से,) फिर ज्ञान, दर्शन गरित्र के द्वारा सिद्धि गति-मोक्षयो पाया। आकाश सबमें अनन्त है, उम पूर्ण लोकालोकाराशमें सिद्ध परमात्माका ज्ञान घनीभूत होकर भरा पड़ा है। उस सिद्धावस्थाके होने पर ये निद्रा, तन्द्रा, भय, श्रान्ति, राग, द्वेष, पीडा, संशयसे रहित हो जाते हैं। तथा शोर, मोह, जरा, जन्म, भरण, आदि भी नहीं रहते है। धुधा, तृपा, सेद, मद, उन्माद, मूर्छा, मत्सर का भी अत्यन्ताभाव है। इनकि आत्मामें अब घटावदी भी नहीं है, इनका आत्म वैभव कल्पनातीत है । सिद्ध भगवान् शरीर रहित हैं, इन्द्रिय रहित हैं, विकल्प, संकल्प नहीं हैं, अनन्तवीर्यव प्राप्त हैं, अपने सभादसे कभी स्वलित नहीं होते। सहब और नित्य आनन्दते आनन्द रूप हैं। जिनके मुख में कमी विच्छेद नहीं होता है। परमपद में विराजित हैं, ज्ञानके प्रकाशसे प्रशित हैं। परिपूर्ण, सनातन, संसारकी सटपटसे रहित हैं एवं जिनको अब कुछ भी करना धरना नहीं है, अचला स्थिति है, आत्म प्रदेशों की क्रियासे रहित है । सन्तृप्त हैं, आकारा संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता १०१ सध्या रहित हैं, मदा तीन लोकके शिखर पर विराजित हैं। अनुपमेय है, और काल कि तरह प्रभु अनन्त है, और वचन अगोचर हैं ॥ १५ ॥ गुजराती अनुवाद भगवान् शैलेशी अवस्थाथी शुक्लध्यानना चोथा भेदने प्राप्त का पछी आदि अनन्त मोक्षरूप अपुनरावृत्ति स्थानमा जइ विराज्या, वे मोटा ऋषीवर [महावीर देव] समस्त कर्म सपावीने पोतानाज पुरुषार्थी सान, दर्शन, चरित्रे करी, सर्वोत्तम लोकने अग्र भागे उत्कृष्ट सिद्धगतिने पाम्या । आकाश अनन्त छ, ते पूर्ण लोकालोक-आकाशमां सिद्ध-परमात्मा ज्ञान भर्यु पञ्धुं छे, ते सिद्धावस्थामां निदा, तन्द्रा, भय, भ्रान्ति, राग, द्वेष, पीडा, संशय नथी, शोक-मोह-जन्म-जरा-मरणादि पण नथी; धुवा-तृपा-खेद-मद-उन्माद- भूछी मत्सरनो अलन्त अभाव छ तेमनो आत्मा अगुरु लघुत्व गुणने प्राप्त थयोछे, तेमनो आमवैभव कल्पनातीत छ, सिद्ध भगवान् शरीर-इन्द्रिय सकल्प-विक- ल्पधी रहित छ, अनन्त वीर्यवान् छे, ख-खभावी कदी पण स्खलित थता नथी, सहजानन्द प्राप्त छे, निराबाद मुखवाळा छे, परम पदमा विराजमान थे, शान- •प्रकाराची प्रकाशित छ, मदेव नित्य-परिपूर्ण छ, सनातन छे, समारना प्रपंचोथी रहित छ, कृतकृय छे, अचल छ, अरुज छे, अक्षय छे, आत्मप्रदेशोनी क्रियाशी रहित छे, सन्तृप्त छे, सृष्णा रहितछे, प्रणलोकना अग्रभागे विराजे छ, अनुपमेय छे, आकास अने कालनी पेठे प्रभु अनन्त छे, तेमज वचनातीत छे ॥ १७ ॥ मूल रुक्खेसु णाते जह सामली वा, जस्सि रइं वेययंती सुवण्णा । वणेसु वा णंदणमाहु सेठं, नाणेण सीलेण य भूतिपन्ने ॥ १८॥ संस्कृतच्छाया वृक्षेपु शातो या शामली या, यस्मिन् रति वेदयन्ति सुपा। चनेपुवा नन्दनमाहुः श्रेष्ठं, शानेन शोलेन च भूतिप्रज्ञः ॥१८॥ सं० टीका पुनरपि वीरस्य स्तुति दृष्टान्तद्वारेणाह, वृक्षेषु मध्ये यथा ज्ञातः प्रसिद्धो देवकुरुव्यवस्थितः यात्मलीवृक्षः, सच भुवन-
१०२
वीरस्तुतिः।
पतिदेवानां क्रीडास्थानम् , "शाल्मले शाल्मलीवृक्ष इति हैम"!
यसिन् वृक्षे व्यवस्थिता अन्यतश्चागत्य सुपर्णा-मुवनपतिविशेपा देवा
रति रममाणा रति रमणं क्रीडां वेदयन्त्यनुभवन्तीति । वनेषु मध्ये
नन्दनं देवानां क्रीडास्थानं श्रेष्ठम् प्रधानं "नन्दनं, मिस्सकं, चित्तलता,
फारसकं, वना इत्यभिधानप्पदीपिका" । एवं भगवान् वीरोऽपि केव-
लाख्येन ज्ञानेन समस्तपदार्थाविर्भावकेन शीलेन-चारित्रेण यथाख्यातेन
खभावेन सहजधर्मविशेषेण सद्वृत्तेन साधुचरित्रेण प्रधानस्तथा भूति-
प्रज्ञा प्रवृद्धज्ञानोऽनन्तज्ञानो भगवान् इति भावः ॥ १८॥
अन्वयार्थ-जह से [रुक्षेनु यक्षोंमें [ सामली ] शाल्मली वृक्ष
[वा तथा [वणेसु) व में निंदणं ] नन्दनवन (सेहूं] श्रेष्ठ ( पाए] समझा
जाता है जिस्सिं ] जिसमें कि मुवन्ना] सुपर्ण-जुमार नामक भुवनवासी देव
[ति ] आराम श्रीडाका [वेदयती ] अनुभव करते हैं उसी प्रकार भगवान
(नाणेण] जानसे [य] और [ सीलेण] चरित्रसे ग्रेड तथा भूइपक्षे] प्रभूत
ज्ञानसाली [आहु] कहलाते थे॥१८॥
भावार्थ-वृक्षोंमें सेमलवृक्ष मुंदर सघन छाया युक होता है, यह वृक्ष
पृथ्वीकायिक और नित्य है। तथा संसारके समस्त पोंमें नन्दनवन खूबसूरत है,
क्योंकि कथित दोनों स्थानोमें रहनेवाले तथा बाहरसे आनेवाले सुपर्णकुमार
जातिके भुवनवासी देव, आनन्दमें आमोदप्रमोदसे अनेकप्रकारका विलास करते हैं,
उसीप्रकार भगवान् महावीर प्रभु भी सबमें उत्तम ये, कारण उस समय प्रभुके
मुकाबलेमें उनके ज्ञान और चरित्रकी बराबरी करनेवाला कोई भी व्यक्ति न था,
इसीलिए सेमल और नन्दनवनकी उपमा देकर भगवानकि स्तुति की गई है ॥१८॥
भाषा-टोका-शाल्मली वृक्षकी शीतल छाया होनेसे वह सब वृक्षोंमें
श्रेष्ठ है, और वह भुवनवासी देवाका क्रीडा स्थल है, । बोंमें जिसप्रकार
नन्दनवन उराम वन है, इसी प्रकार भगवान महावीर प्रभु भी फेलशानके
कारण श्रेष्ठ हैं, जिससे सर्वपदार्थोका उन्हें प्रत्यक्ष आविर्भाव है । शामके साथ
साथ उनमें यमाल्यात चरित्र में भी पूर्णश्रेष्ठता प्राप्त है। जोकि आलाका सहज
सभा समन्वित गुण है ॥१॥
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता १०३ गुजराती अनुवाद--शीतल छाया होवाने लीधे शाल्मली वृक्ष सर्व वृक्षोथी श्रेष्ठ छे, वे भुवनवासी देवोनुं कीदा स्थान छे, वनोमा जेम नन्दनवन श्रेष्ठ छे, तेमज भगवान महावीर पण केवलज्ञाने करी सर्वोत्तम छे, जेनाथी सर्व पदार्थोनो प्रत्यक्ष आविभाव तेमने थाय छे, ज्ञाननी साथे यथाख्यात चरित्रमा पण वेओ श्रेष्ठ छ के जे आत्मानो सहज खभाव छे ॥ १८॥ धणियं च सदाण अणुत्तरे उ, चंदो व ताराण महाणुभावे। गंधेसु वा चंदणमाहु सेहूं, एवं मुणीणं अपडिन्नमाहु ॥१९॥ संस्कृतच्छाया स्तनितं वा शब्दानामनुत्तरं तु, चन्द्रो वा ताराणां महानुभावः। गन्धेपु वा चन्दनमाहुर श्रेष्ठम्, एवं मुनीनामप्रतिशमाहुः ॥ १९ ॥ सं० टीका-यथा च शब्दानां मध्ये स्तनितं मेघगर्जितं "स्वनि गर्जितं मेघनिघोंपो रसितादि चेत्यमरः" । तदनुतरं प्रधान तुशब्दो विशेषणार्थः, आह.च, "समुच्चयेऽवधारणे, नियोगे, प्रशं- सायां, उक्तशंकानिवृत्तौ, पादपूरणे, विशेषणार्थे चेति कोपः" । तथा च तारकाणां नक्षत्रगणानां मध्ये चन्द्रो महानुभावः, "नक्खतं, जोति, भं, चारा, ( अपुमे) तारको इत्यभिधानप्पदीपिका" । सकलरजो- निवृत्तिकारिण्या कान्त्या मनोरमः श्रेष्ठः । गन्धेषु चेति गुणगुणिनोरमे- दान्मतुल्लोपाद्वा, गन्धवत्सु मध्ये यथा चंदनं मलयजं गोशीर्षकाख्यं "चन्नं (निस्थिय ) गंधसारो मलयजो (प्यथ)" "गोसीसं तलप्प- णिक, (पुमे वा) हरिचंदनं" "इत्यभिधानप्यदीपिका"। मलयज मलयपर्वतादौ-जायते तद् या तज्ञाः श्रेष्ठमाहुः । एवं मुनीनां महर्षीणां च मध्ये भगवन्तं । पुनश्च नास्स प्रतिज्ञा इहलोकपरलोकानां शंसिनी ।
- वीरस्तुतिः। विद्यत इत्यप्रतिज्ञः, इहलोकपरलोकाशंसारहितप्रतिज्ञस्तमेवंभूतं महा- चीरम् श्रेष्ठमाहुरिति ॥ १९॥ अन्वयार्थ-[व] जैसे [थणिय ] मेपकी गर्जना [ सद्दाण] सबशब्दोम अणुत्तर उ] प्रधान है-सबसे बढकर है, और [व] जैसे [चंदो] चन्द्रमा [ताराण] सब तारोंमें [महाणुभावे] उज्वल और मनोहर है, [पा] इसीप्रकार [गधेमु] सब मुगन्धित पदामि [चंदर्ग] चन्दनको [ सेठं] अच्छा [ आहु] कहा है [एवं ] इसी प्रकार भगवान भी । मुणी ] मब मुनिओमें अपडिण्णं ] इस लोक और परलोककी प्रविज्ञा-कामनासे विरक्त [आहु] कहा है ॥ १९ ॥ भावार्थ-जैसे सब शब्दोंमें मेघकी गर्जनाका शब्द बडा प्रबल होता है, सबके सब शब्द उससे नीची कक्षा में है, तथा सब नक्षत्र मण्डलमें चांद सबमें उज्वल और मुन्दर है, और समस्त मुगन्धित पदार्थों में मलयज चन्दन मुरभि और उत्तम है, उसी प्रकार समस्त मुनिओमें भगवान् महावीर उम समय सबमें प्रधान थे, क्योकि उनमें आत्मासे भिन्न इसलोक और परलोक संबंधी किसी भी विषयकी कामना न थी॥१९॥ भाषा-दीका-शब्दोंमें मेघकी गर्जनाका शब्द सबसे बड़ा होता है, असंख्य तारो और नक्षत्रोंमें चंद्रमा तेजस्वी शीतल और महानुभाव है, मुगन्ध वस्तुओमें मलयवनका गोशीर्ष चन्दन श्रेष्ठ होता है। इसी प्रकार मुनि महर्षि- गगामें भगवान् सन्दमें विलक्षण घेष्टतापूर्ण थे। उनकी सब प्रतिज्ञाएँ इस लोक और परलोक सम्बन्धी विषयाकांक्षाओंसे रहित थीं ॥ १९ ॥ गुजराती अनुवाद-शब्दोमां जेम मेपनी गर्जनानो शन्द, ताराओने विषे जेम चन्द्रमा अने मुगंधीओमा जेम गोशीयं चन्दन श्रेष्ठ छ, तैम मुनि महर्पिगणोमा भगवान् श्रीमहावीर श्रेष्ठ छे, तेमनी सर्व प्रतिनाओ आ लोक अने परलोक सम्बन्धीनी वांछना रहित छ ॥१९॥ जहा सयंभू उदहीण सेठे, नागेसु वा धरणिंदमाहु सेतु। खोओदए वा रसं. चेजयंते, तवोयहाणे मुणि वेजयंते ।।.२० ।।.
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता संस्कृतच्छाया यथा स्वयम्भूरुद्धीनां श्रेष्ठः, नागेपु वा धरणेन्द्रमाहु श्रेष्ठम् । क्षोदोदकं या रसं वैजयन्तः, तप उपधानेन मुनिर्वैजयन्तः ॥ २० ॥ सं० टीका-यथा स्वयं भवंतीति स्वयंभुवो देवास्तत्रागत्य रमन्त इति, स्वयंभूरमणस्तदेवोदधिः समुद्राणां मध्ये यथा स्वयंभूरमणः समुद्रः समस्तद्वीपसागरपय॑न्तवर्ती श्रेष्ठः प्रधानो महत्चरः। नागेषु च भुवन- पतिविशेषेपु मध्ये धरणेन्द्रं नागानामिन्द्रं यथा श्रेष्ठमाहुः । तथेचरस इवोदकं जलं यस्य सः इक्षुरसोदकः, स यथा रसमाश्रित्येति वृद्धाः, वेजयन्तःप्रधानः । सगुणैः समुन्द्राणां पताकेवोपरि स्वयंभूधरणेन्द्रो रसश्च प्रधानः समन्वितस्तथैव तप उपधानेन विशिष्टतपोविशेषेण मनुते जगतत्रिकालावस्थामिति मुनिर्भगवान् वैजयन्तः प्रधानः समस्तलोकस्य महातपसा वैजयन्तीव सर्वोपरिव्यवस्थितः ॥ २०॥ अन्वयार्थ-[जहा ] जैसे [ सयंभू स्वयंभूरमण समुद्र [ उदहीण] सब समुदोमें [ सेठे] श्रेष्ठ है [वा तथा [धरगिदं] धरणेन्द्र [ नागेम) नागकुमार जाति के भवनवासी देवोंमें [ सेठ ] अच्छे हैं [वा ] और [सो ओदए] इक्षुररा [ररावेजयते ] सब रसोंमें मुरव्य है, उसी प्रकार [ तवोवहाणे ] उत्तम तपके तपने- वालोंमें । मनि ] भगवान्को वेजयंते ] उत्तम [आहु] कहते हैं ॥२०॥ भावार्थ-सब समुद्रों में खयंभूरमण प्रशन है, क्योंकि वहाँ अनेक प्रका- रके देव आकर फ्रीडा करते हैं, तथा अपने चित्तरे प्रमन करते हैं, उसी प्रकार सर ऋषि-मुनिओंमें भगवान् सर्वोत्तम ये, क्योंकि वे अज्ञात विषयोंय बिशेष सान कराकर लोगोंश चित सन्नुष्ट करते थे। तथा नागरमार-भुवनपतिओंमें धरणेन्द्र प्रधान है अथवा समस्त रमोंमें छरय अच्छा है उसी प्रकार भगवान् की रायमें अच्छे थे ॥ २० ॥ .भाषा-रीका-सार भरके समुशेमें खयम्भरमण समुद्र . प्रधान है, जिउके तटपर देवगण वायुसेवन करने आते हैं । भुनपति देश, धरपेन्द्र देवराज प्रधान,है। मीदे और सरम पायाम ईवय रस सरमें वीरस्तुतिः। . शान्तिकर और स्वादिष्ट वस्तु है, इसी प्रकार विशेष तपसे जगत्की तीनों काली अवस्थाओंको नित्य और परिवर्तन शील माननेवालोंमें मुनि-भगवान महावीर प्रभु श्रीधजाकी तरह समस्ख लोकमै महान् तपसे तप कर निकले हुए कुंदनी तरह मुशोभित थे ॥२०॥ गुजराती अनुवाद--सर्व समुद्रोमा खयंभूरमण समुद्र मोटो के, वेन कांठा पर देवताओ वायुसेवन करवाने आवे छे, भुवनपति देवोमां धरणेन्द्र देवराज प्रधान छे, मीठा अने सरस पदार्थोमा शेरीना रस शान्तिकर तेमज मीट तथा खाविष्ट छे, तेवीज रीदे तप उपधानी जगवनी ऋणे कालनी अवस्थाओने निल तेमज परिवर्तनशील माननाराओमा मुनीर श्री भगवान् महावीर प्रभु समस्त लोकमां शुद्ध कुन्दननी माफक मुशोभित छे॥२०॥ हत्थीसु एरावणमाहु णाए, सीहो मिगाणं सलिलाण गंगा। पक्खीसु वा गरुले वेणुदेवो, जिवाणवादीणिह णायपुत्ते ॥ २१ ॥ (संस्कृतच्छाया) हस्तिप्रावणमादुर्वातं, सिंहो मृगाणां सलिलानां गंगा । पक्षिपुवा गरुत्मान् वेणुदेवो, निर्वाणवादिनामिदसातपुषः ॥२१॥ सं० टीका-हस्तिपु-करिवरेषु मध्ये, यथैरावतंकवाहनं शतं प्रसिद्ध "ऐरावतोऽनमातंगरावणाप्रमुवल्लभाः इत्यमरः" । "कुंजरो, वारणो हत्यीत्यभिधानप्पदीपिका" । दृष्टान्तभूतं वा प्रधानमा तन्नाः, अथवा हवं रसं रतनयं तदस्मास्त्रीति हस्ती तेषु हति', "हत्यो पाणिन्हि, रतने, गणे, सोण्डाय, भन्तरेः इति अभिधानप्पदीपिका" । ऐरावतो नागरंगतद्वच्छोमनीयः । अथवा हस्नो नागखोयदखन्मध्य ऐरावत इचेति । अधवा पृतवस्तुहस्तिपु हि ऐरावतो नारंगो नारंगसहसः संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता १०७ मुगन्धितरससमन्वितत्वात् । "ऐरावतो नागरंगो नादेयी भूमिजम्धुका इत्यमरः" । तथा मृगाणां हरिणादिवन्यजन्तूनां मध्ये यथा सिंहः केसरी, तथा भरतापेक्षया। सलिलानां नदीनां यथा गंगाजलं प्रधानभाव- मनुभवति नैर्मल्यत्वात् । पक्षिपु-पतत्रिषु यथा गरुत्मान् वेणुदेवाऽपर- नामाप्राधान्येन व्यवस्थितः कथितः । एवं निर्वाणं सिद्धक्षेत्राख्यं कर्म. णामत्यन्ताभावलक्षणं या स्वरूपतस्तदुपायप्राप्तिहेतुतो वा धादितुं शीलं येषां ते तथा, तेषां मध्ये ज्ञाताः क्षत्रियास्तत्पुत्रोऽपत्यं ज्ञातपुत्रः श्रीम- न्महावीरप्रमुरेव प्रधान इति, यथावस्थितनिर्वाणत्वादिति भावः ॥२१॥ अन्ययार्थ-जैसे [हत्थीमु] सब हाथिओमें [एरावर्ण] ऐरावत हाथी [ णायं ] प्रधान है [ मिगाणं] पशुओंमें [ सीहो ] सिह जैसे प्रधान है, [सलिलाण ] पानीकी जातिमें [गंगा] महागंगाका पानी निर्मलतामें प्रधान है [वा] और [पाखीमु] उड़नेपाले पक्षिओमें [वेणुदेवे] वेणुदेव नामक गिरले ] गरुड पक्षी प्रधान है, उसी प्रकार [इह] समस्त संसारमें [ निवा-- जवादीण मोक्षके माननेवालोंके अन्तर्गत [णायपुत्ते शातपुत्रमहावीरस्यामीको प्रधान ! आहु] कहते थे ॥११॥ भावार्थ-ऐरावत हाथी सब हाथियों में प्रधान है, उसका मुन्दर श्वेतरंग श्रीवृद्धि करता है, जब भगवान् गर्भमें आये थे तबसे ही महाराजा सिद्धार्थके घर श्रीवृद्धि हुई थी जिससे प्रभुका नाम वर्धमान रक्खा गया था, अतः सब हाथियोमै एरावत हाथीके समान, पशुओं में सिंहके सदृश, जलोंमें महागंगाके पानीकी तरह और पक्षिओंमें गरुड पक्षीकी भांति भगवान् समस्त मोक्षवादिओमें प्रमुख थे, क्योंकि भगवान्ने ही मोक्षका ययार्थ खरूप और उसका उपाय तथा मार्ग बताया था ॥२१॥ भाषा-टीका-जसे ऊंचे तथा मुन्दर हाथियोंमें ऐरावत हाथी निष्कलंक और अच्छा होता है, और वह इन्द्रकी सवारीके काम आनेवाली सुन्दर वस्तु है। इसी प्रकार प्रभु भी ज्ञान दर्शन, चरित्ररूप जो तीन रत्न हैं उनमें हाथीकी तरह ऊंचे हैं। या वे तीनो रन आत्माको नरंगीकी सरह मनोहर और उपादेय है, अथवा हस्ती नाम वादळका भी है, अथवा जिनकी अमोघ वाणीकी वर्ष,
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वीरस्तुतिः।
ऐरावतकी तरह उच्च कोटिकी है। अथवा हाथमें जिस प्रकार नारगी मुन्दर लगती
है उसी तरह प्रभु भी जगती-तल पर नारंगीकी तरह भव्य प्रापिओके हृदयोंमें
लगते हैं। हरिणादिक जंगली जीवॉमें मिह बलिष्ट होता है, इसी तरह
भरत क्षेत्रकी अपेक्षा मानवधिमें वीर प्रभु सिंहकी तरह आत्म-बल बलवान्
थे, जैसे सब प्रकारके जलोंमे गंगाजल अनेक औपधियोंसे मिश्रित होनेके कारण
निम्मल है, ऐसे ही प्रभु भी कम्मेन्छेपसे अलिप्त होनेसे असन्त सच हैं।
और पक्षिओमे गरुड नामक वेणुदेव प्रधान है, इसी प्रकार निर्वाण अर्थान् जो
सिद्धक्षेत्र है जहां कर्म-मलका असन्त अभाव है, उसका स्वरूप बतानेमें
तथा उसके पानेके उपाय बतानेमें ज्ञातपुत्र महावीर प्रभु सर्वोपरि है। उनका
निर्वाण सबमें उजरोटिका और अकाय है ॥२१॥
गुजराती अनुवाद-जेम ऊंचा तथा सुन्दर हाथिओमा ऐरावत हाथी
निष्कलंक अने उत्तम छ, केमके तेनापर इन्द्र सवारी करे छ, अथवा ज्ञान-दन-
चरित्ररूप जे प्रग रनो छ, तेमां प्रभु पण हाथीनी पेठे जे ऊंचा छ, अथवा ते रनत्रय
मनोहर तेमज उपादेय छ, अथवा हस्तिनो अर्थ वादळ पण थाय छे, जेमनी याणी
अमोघ वाणी छे, अने ऐरावत हाथीनी पेठे उच्च कोटिनी छ, अथवा जेम नारंगी
छापमा सुंदर लागे छे सेम प्रभु पण भूतल पर नारंगीनी जेम भव्य प्राणीओना
खच्छ हृदयने मुंदर लागे छे, मृगादिक जनावरोमां सिंह वलिछ होय छ, तेम
मरनक्षेत्रनी अपेक्षाए मानव मुष्टिमां श्रीवीरप्रभु कर्मरूप मृगोने जीतवा सारु
सिंह समान आत्मवलमां बलवान छे, अनेक प्रकारनी पधि-युक होवाने लीधे
गंगाजल सर्व जलमा निर्मल छ, तेमज प्रभु पण कर्म लेपभी अलिम होवाने लीधे
अत्यन्त विशुद्ध छ, पशिओने पिणे गरुड इवेणुदेव ] प्रधान के, तेवीज गते
निर्वाण (सिद्ध) क्षेत्र के ज्या कर्ममळनो असन्त अभाव छ, तेनु खरूप बतावकार्मा
तथा तेनी प्राप्तिनो उपाय बतावबामा शातपुर महावीर प्रभु सर्वोपरि छे ॥२१॥
मूल
जोहेसु णाए जह चीससेणे,
पुप्फेसु वा जह अरविंदमाहु।
खत्तीणसे? ज़ह दंतवके,
इसीण सेहे तह पदमाणे ॥ २२ ॥
वीरस्तुतिः।
भावार्थ-कृष्ण-चामुदेवसे बढकर अन्य कोई योद्धा नहीं है, गन्धयुक्त
फूलों में कमल अच्छा होता है, समस्त भूमिके क्षत्रियोंमें चकवतो मुख्य कहलाता है,
उसी भांति भगवान महावीर उस समय के सब ऋषि-मुनिओमें सर्वश्रेष्ठ थे ॥२२॥
भाषा-टीका-लडाके वीरोंमें पुष्कल हाथी, घोडे रथ पैदल आदि चनु.
रनीकका आधिपत्य भोपा अर्धचक्री वासुदेव कृष्ण प्रधान होता है। फूलोंमें हजार
पंडियोंवाला अरविंद नामक कमल श्रेष्ठ है। सताए गए वे मनुष्य जिसके
कि-आधुओंने हृदयके सैंकडों टुकडे कर डाले हैं। तथा उन (कर्म रूपी)
शशुओंसे जो मुरक्षित रखनेवाला हो वही क्षत्रिय होता है। उन्हींको डीप्तिमान
राजा कहा जाता है। उनमें उपशान्त गुण प्रधान होता है जिसके कथन
मात्रसे शत्रु शिथिल पड जाते हैं वही चक्रवर्ती भी होना है अत एव वह सबमें
मुख्य है। इसी प्रकार इन मुन्दर दृष्टान्तों को जिनपर अनायासमें ही घटाया
जाता हो एसे थे हमारे परम पविन वर्धमानसामी अन्तिम जिन-भगशन्
सब नपिमहर्पियोंमें श्रेष्ठ थे ॥ २२ ॥
गुजराती अनुवाद योद्धाओमा गज-अश्व-रथ-पायदल, ए चतुरंगी
-सेनानो अधिपति अर्ध चक्रवर्ती वासुदेवकृप्ग सर्वोत्तम छे, फूलोमा हजार पांखमी
बाळु अरविंद कमल श्रेष्ठ छ, शत्रु (कर्मरूपी शत्रु) थी रक्षा करनार क्षत्रिय
पद्धेवाय छे, तेने दीप्तिमान राजा कहे छ, तेनामा उपशान्त रस प्रधान होय छे,
जेना कथन मान थी शत्रु शिथिल थई जाय छे, ते चक्रवर्तीज होय रे, वे
सर्वोत्तम छे, वेवीज रीते आवा सुन्दर दृष्टान्तो जेना पर घटी शके ते अमारा
परम पवित्र, पतित पावन, जगदुद्धारक वर्धमान भगवान् अन्तिम दिन सर्व
ऋपिओमां श्रेष्ठ छे ।। २२॥
दाणाण सेठं अभयप्पयाणं,
सचेसु वा अणवलं वयंति।
तवेसु वा उत्तमभचेरं,
लोगुत्तमे समणे णायपुत्ते ॥ २३ ॥
संस्कृतच्छाया
दानानां श्रेष्ठं अभयमदान, सत्येषु पाउनवा पदन्ति ।
वपस्सुवोत्तम ब्रह्मचर्य, लोकोचमः श्रमणो शातपुनः ॥ २३ ॥
* संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता सं० टीका-तथा च खपरानुमहाधमर्थिने दीयत इति दानं, अथवा स्व-सत्वनिवृत्तिपूर्वक परखत्वोपादानं दानं, यद्वा श्रद्धा भक्तिस्तया परिग्रहममत्वत्यागभावेन कर्मनिर्जराऽर्थ चानुकम्पया यहीयते तद्दान; तचतुर्धा वाऽनेकथा, परन्तु तेषां दानानां मध्ये प्राणिनां जीवानां तुरिश्रद्धाविनयभजना लुब्धता शान्तिसत्वप्राणवाणच्यवसितगुणज्ञान- फालज्ञताब्यः । दानाशकिर्जननमृतिमिश्थातिको मत्सरेप्यो, दक्षात्मा यो भवति स नरो दातृमुख्यो जिनोकः ॥ कालेऽनस्य धुधमवहितो दित्समानो विभत्स, नो भोकव्यं प्रथममतिर्यस्सदा विष्टतीति । तस्यामासावपि गतमलं पुष्पराशि भयन्तं,तं दातार जिनपतिमवे मुश्यमार्जिनेन्द्राः ॥ साभीष्टा वुधजननुता धर्मकामार्थमोक्षाः, सत्संख्यानां वितरणारा दुःराविधंसदक्षाः । लमु शम्या जगति नयतो जीवितव्यं धिनेव, तहानेन ध्रुवममुभूतां कि न दतं ततोऽत्र ॥ कृत्लाकृत्ये कलयति यतः कामकोपो लुनीते, धर्मे श्रद्धा रचयति परो पापबुदि धुनीते। अक्षार्थेभ्यो विरमति रजो हन्ति चितं पुनीते । तदातम्यं भवति विदुषा शालमत्र प्रतिभ्यः ॥ भाया- भ्रातृखजनतनयान्यनिमित्तं त्यजन्ति, प्रशासत्वातसमितयो यद्विना यान्ति नाशम् । सुडुपेन म्लपितवपुपो भुंजते च त्वभक्षं, तद्दातव्यं भवति विदुपा संयतायान- शुद्धम् ।। सम्यग् विद्यारामदमतपोध्यानमौनग्रताध्य, प्रेयोहेतुर्गतरुजि तनी जायते येन सर्वम् । तत्साधूनां व्यथितवपुप तीनरोगप्रपधैस्तदक्षार्थ वितरत जना. प्राशु- कान्योषधानि ॥ सावद्यत्वान्महदपि फलं नो विधातुं समर्थ, कन्यावद्विपहयध- रागोमहिप्यादिदानम् । सवा दद्याजिनमतदयामेपजाहारदानं, भूत्वाऽप्यपं विपुलफलदं दोपमुकं वियुक्तम् ॥ नीतिश्रीतिश्रुतिमविप्रतिज्योतिभक्तिप्रतीति, प्रीति- शातिस्मृतिरतियतिख्यातिकिप्रगीति.। यस्साहेही जगति लभते नो विना भोजनेन तस्मादान स्युरिह ददता ताः समस्ताः प्रशस्ताः ॥ दो कव्यसनमथनकोधयुद्ध- प्रवाधा पापारम्भक्षितिहतथियां जायते तनिमित्तम् । यत्संगृह्य प्रयति विषयान् दु.सित यस्खयं स्यापहःखायं प्रभवति न तच्छ्वाप्यतेऽत्र प्रदेयम् ॥ साधू रात्रि- तयनिरतो जायवे निर्जिताशो, धर्म दत्ते व्यपगतमलं सर्वकल्याणमूलम् । राग- द्वेषप्रतिमथनं यद्गृहीत्वा विधत्ते, तहातव्यं भवति विदुषां देवमिष्टं तदेव ॥ मर्मव्यानव्रतममितिमासंयतचारु पात्रं, व्यावृतात्मात्रसहननतः श्रावको मध्यम तु। मम्यग्दृभिंतविरहितः श्रावकः स्थानघत्यमेव धा जिनपतिमते पानमाहुः वीरस्तुतिः "सबै जीवा वि इच्छन्ति जीविऊ न मरीजिऊ" वा जीवो जीवितु- मिच्छतीत्युक्तत्वाज्जीवितार्थिनां वाऽभयदानं त्राणकारित्वाच श्रेष्ठं । - श्रुतज्ञाः ॥ यो जीवानां जनकसदृशः सत्सवाग्दत्तभोजी, सप्रेमवीनयनविशिखाभिज्ञ चित्तः स्थिरात्मा, द्वेधा अन्धादुपरममना सर्वथा निर्जिताक्षो, दातुं पात्रं व्रतपति- ममुं वर्यमाहुर्जिनेन्द्राः ॥ यद्वत्तोयं निपतवि धनादेफरूप रसेन, प्राप्याधार सगुण- मगुणं याति नानाविधित्वम् । तदद्दानं सफलमफलं प्राप्यमप्यति गत्वा, देखें दानं समयमभूता संपताना यतीनाम् ॥ यद्वक्षिप्तं गलति सरलं विद्युक्के घटेऽम्भस्ति- कालावूनिहितमहितं जायते दुग्धमयम् । आमामो रचयति मिदो तस्य नाशं च याति, तद्वदल विगनतपसे केवलं ध्वसमेति ॥ शवच्छोलपतविरहिताः क्रोधलोमा- दिवन्तो, नानारम्भप्रहितमनसो ये मदमन्थशताः । ते दातारं कथमसुखतो रक्षितुं सन्ति शक्ता, नावा लोहं न हि जलनिस्तार्यते लोहमया ॥ क्षेनद्रव्यप्रभृतिसः मयान वीक्ष्य बीज यथोप्तं, दत्ते सस्सं विपुलममलं चारुसंस्कारयोगात् । दत्तं पाने गुणपति तथा दानमुई फलाय, सामग्रीतो भवति हि जने सर्वकार्यप्रविधिः । नानादुःखव्यसननिपुणानाशिनोऽतृमिहेतुः, कारादिश्चयनपरास्तत्वतो वेलभो- गान् । मुक्त्वाकाक्षा विषयविषयां कम्मीने शनेच्छो, दद्यादानं प्रगुणमनसा सँग- तायापि विद्वान् । यसै गत्वा विषयमपर दीयते पुण्यवद्भिः, पाने तस्मिन् गृह- मुपगते सयमाधारभूते ॥ नो यो मूढो वितरति धने विद्यमानेऽप्यनल्पे, तेनात्मात्र चयमपधिया वनितो मानवेन ॥ दीर्घायुष्कः शशिसितयशोव्यानदिक्चकवाला, सद्विद्याश्रीकुलबलधनप्रीतिकीर्तिप्रतापः । शूरो धीरः स्थिरतरमना निर्भयथाररूप स्त्यागी भोगी भवति भविना देखभीतिप्रदायी। फरिण्यं दहति विसिवन्मान- वत्पाविदुःसात्सम्यनीति वदति गुरुकत्सामिवतिभर्ति । तत्वातत्वप्रकटनपटुसष्ट- मामोति पूर्त; तत्सज्ञान विगलितमलं ज्ञानदानेन मर्त्यः ॥ दाता भोक्ता बहुधनयुनः सर्वसत्वानुस्म्पी, सत्सौभाग्यो मधुरबचनः कामरूपातिशायी; शवदत्या बुधन- नशते. सेचनीयाङ्गियुग्मो; मर्सः प्राज्ञो व्यपगतमदो जायतेऽन्नस्य दानाद ।। रोगैति- प्रतिजनिती इभिवाम्बुमनः सर्वाङ्गीणव्यथनपटुमि धितुं नोस शायः । आज- न्मान्तः परमखिना जायते चौपधाना, दाता यो निर्भरफुलवयु.स्थानकान्तिप्रतापः ।। दत्वा दानं जिनमतरुचिः कर्मनि शनाय, भुक्त्वा भोगनिदशवराती दिल्यनारीमनाथः मावाटे वरकुलवपुनधर्म विधाय, हत्या कर्म स्थिरतगी मुक्किसौख्यं प्रयाति ।
- संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिवा यतः "यथा मम मियाः प्राणास्तथाऽन्यस्यापि देहिनः । इति मत्वा न कर्तव्यो, घोरमाणिवधो बुधैः ॥" अन्यच्च- "अहिंसा परमो धर्मो, हिंसा सर्वत्र निन्दिला" इति श्लोकमर्धमभ्यस्स खमनसि सदैव दयैव धारणीया, यदि कोऽपि लोभावेशेन रसनातृप्तये धनार्जनाशया विजयाभिलाषेण च आमोदप्रमोदार्थ जन्तून्निहन्याचदा तेषां नरकपतनमवश्यं भावि । पातञ्जलयोगदर्शनादावपि चाहिंसायामेव प्रमुखत्वम्, यथाह- "अहिंसासत्यास्त्रेयब्रह्मचापरिग्रहा यमा" अहिंसा-सत्यमित्यादियमास्तेषां मध्येऽहिंसैव प्राथमिकी पुनश्च- "वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्" वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदु- मध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् । तथा चान्यदपि- "अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्सन्निधाने वैरत्यागः ।" तद्विपक्षिणी हिंसा तस्य लक्षणं यथा- "प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा" प्रमत्तो यः कायवाड्यनोयोगेः प्राणव्यपरोपणं करोति सा हिंसा । हिंसा, मारणं, प्राणातिपाता, प्राणवघो, देहान्तरसंक्रामणं, प्राणव्यपरोप- पणमित्यनन्तरम् । न हिंसाऽहिंसा । इति तत्वार्थसूत्रम्, तथा व योगसूत्रस्य व्यासकृतभाष्येऽपि तत्राऽहिंसा सर्वथा सर्वदा सर्वभूता- नामभिदोहः। वीर.. - । 1 वीरस्तुतिः। - तथैव याज्ञवल्यसहितायाम्- "कर्मणा मनसा वाचा, सर्वभूतेषु सर्वदा, अक्षेशजनन प्रोतमहिंसत्वेन योगिभि ।" तखा स्मृतावाचाराध्याये- "अहिंसा सत्यमस्वेय शौचमिन्द्रियनिग्रह 1- दान दया दम शान्ति , सर्वेषा धर्मसाधनम् ।। "मा हिंसी पुरुष जगदिति" यजुर्वेदसहिताया पोडशोऽध्याय- स्तृतीयमत्रः। मा हिंस्यात् सर्वभूतानीति 'शवपथे। तथा च मनुः--पंचमाध्याये "योऽहिंसकानि भूतानि, हिनस्त्यात्महितेच्छया, सजीवश्च मृतश्चैव, न कचित्सुखमेधते" ॥ ४५ ॥ पुनश्च मनु:- "धृति क्षमा दमोऽस्तेय शौचमिन्द्रियनिग्रह । अहिंसा सत्यमक्रोधो, दशक धर्मलक्षणम् ॥" तथा च महाभारते- "अहिंसा परमो धर्मो हिंसाऽधर्मस्तथाविध । सत्य तेऽह प्रवक्ष्यामि, यो भर्म सत्यवादिनाम् ।।" । धार्मिजनानामुत्कृष्टं प्राथमिक पर्मन्वहिसैवेति यथा- "अहिंसा परमो धर्मस्वथाऽहिंसा परो दम । अहिंसा परम दानमहिंसा परम तप ।" "अहिंसा परमो यज्ञस्तथाऽहिंसा परं फलम् । अहिंसा परम मित्रमहिंसा परम मुखम् ॥" ' - ।
संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता "सर्वयज्ञेषु वा दानं, सर्वतीर्थेषु वा स्तुतम् । सर्वदानफलं वापि, नैव तुल्यमहिंसया ॥ तथाहि नियमसारे- कुलजोणिजीवमग्गण-ठाणाइसु जाणऊण जीवाणं । तस्सारंभनियत्तणपरिणामो होइ पढमवदं ॥ ५६ ॥ कुलयोनिजीवमार्गणास्थानेषु ज्ञात्वा जीवानाम् । तस्यारंभनिवृत्तिपरिणामो भवति प्रथमवतम् ॥ ५६ ॥ कुलविकलो योनिविकल्पश्च जीवमार्गणस्थानविकल्पाश्च प्रागेव प्रतिपादितास्तत्रैव तेपा भेदान् बुध्वा तदक्षापरिणतिरेव भवत्यहिसा । तेषां मृतिर्भवतु वा न वा, प्रयत्नपरिणाममन्तरेण सावद्यपरिहारो नास्ति । अतः प्रयत्नपरेऽहिंसावतं भवतीति । तथा चोक्तं श्रीसमन्तभद्रस्वामिना- "अहिंसा भूतानां जगति विदितं नम परमं, न सा तत्रारम्भोऽस्त्यणुरपि च यत्राश्रमविधौ । ततस्तत्सियर्थ परमकरुणो ग्रन्थमुभय, भवानेवात्याक्षीन्न हि विकृतिवेपोपधिरतः ।।" मुनीनामहिंसा सर्वथा पालनीया-हिंसायाः फलं दुष्परि- मामात्मकं परिजानीहि यथा- "पगुकुष्ठिकुणित्वादि, दृष्ट्वा हिंसाफलं सुधीः । निरागस्त्रसजन्तूना, हिंसा सकल्पतस्त्यजेत् ॥" "आत्मवत्सर्वभूतेषु, सुखदुःखे प्रियाप्रिये, चिन्तयन्नात्मनोऽनिष्टां, हिंसामन्यस्य नाचरेत् ।"
वीरस्तुतिः।
यदाहुलौकिका अपि।
"श्रूयतां धर्मसर्वस्वं, श्रुत्वा चैवावधार्य्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत् ।"
राज्यादधिकं प्राणा: प्रियाः। यथा-
"प्राणी प्राणितलोभेन, यो राज्यमपि मुश्चति ।
तद्वधोत्थमधं सर्वोदिानेऽपि न शाम्यति ॥"
"मार्यमाणस्य हेमाद्रि, राज्यं वाऽथ प्रयच्छतु ।
तदनिष्टं परित्यज्य, जीवो जीवितुमिच्छति ॥"
"दीर्यमाणः कुशेनापि, यः सांगे हन्त दूयते ।
निमन्तून् स कथं जन्तुनन्तयेनिशितायुधैः ॥"
तथोकं-
"रसातलं यातु यत्र पौरुपं, क नीतिरेपाऽशरणो बदोषवान ;
निहन्यते यहलिनातिदुर्बलो, हहा महाकष्टमराजकं जगत् ॥"
पुनश्च-"मियखेत्युच्यमानोऽपि, देही भवति दुःखितः ।
मार्यमाणः प्रहरणैरुणैः स कथं भवेत् !"
पुनरपि हिंसफान्निन्दति-
"कुणिर्वरं वरं पंगुरशरीरी वरं पुमान् ।
अपि सम्पूर्णसांगो, न तु हिंसा परायणः ॥"
खार्थिकी हिंसाऽपि हानीया, यथा-
"हिंसा विनाय जायेत, विप्रशान्त्यै कृतापि हि
कुलाचारधियाऽप्येषा, कृता कुलविनाशिनी ॥"
"अपि वंशक्रमायाता, यस्तु हिंसां परित्यजेत् ।
सश्रेष्ठः मुलस इव, कालसौकरिकात्मत्रः ॥".
-
--
.
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता
।। हिंसां कुर्वन विशोधयति. निजात्मानम् ॥'
"दमो देवगुरूपास्तिनमध्ययनं तपः।
सर्वमप्येतदफलं, हिंसां चेन्न परित्यजेत् ॥"
॥ शास्त्रे सूक्ष्महिंसां धर्मार्थ प्ररूपकोऽपि कुशासः॥
"विश्वस्तो मुग्धघीलोंकः, पात्यते नरकावनौ ।
अहो नृशंसैलेभान्धैर्हिसाशास्त्रोपदेशकैः ॥"
अहिंसामाहात्म्यम्-
"मातेव सर्वभूतानामहिंसा हितकारिणीः ।
अहिंसैव हि संसारमरावमृतसारिणिः ॥"
"अहिंसा दुःखदावामिप्रावृपेण्यघनावली ।
भवनमिरुगार्तानामहिंसा परमौषधिः॥"
अस्याः फलम्
"दीर्घमायुः परं रूपमारोग्यं श्लाघनीयता ।
अहिंसायाः फलं सर्व, किमन्यत्कामदैव सा"
अत्रान्तरे-
हेमादिः पर्वतानां हरिरमृतमुजां चक्रवर्ती नराणां,
शीतांशुज्योतिषां खस्तरुरवनिरूहां चण्डरोचिहाणाम् ॥
सिन्धुस्खोयाशयानां बिनपविरसुरामयमाधिपानां,
यद्वन्द्वद्रतानामधिपतिपदवीं यात्यहिंसा किमन्यत् ।।
अत एव प्राणवियोगानुकूलो व्यापारो हिंसा सर्वशास्ले नितिर
व । जनैरपि प्राणिनामविपातो दुःखं प्राणातिपातो विरतिरूपः सर्वत
म्बधूनां, देशतः श्रावकाणां चेति भावः । जीवानां जीवनवालमत्वा
यथाह---
।
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। J ११८ वीरस्तुतिः। "दीयते म्रियमाणस्स, कोटिर्जीवितमेव वा, धनकोटि परित्यज्य, जीवो जीवितुमिच्छति ॥ अत्राभयदानप्रदानप्राधान्यख्यापनार्थमुदाहरणं चेदम् । वसन्तपुरेऽरिदमननामा राजाऽऽसीत् स कदाचित्प्रासादसो हि चतुर्वधूसमेतब्ध क्रीडति स । ताभिरपि खसकलाभिर्मही प्रमोदयित्वा वरो लब्धः । पुनश्च राशीभी राज्ञि स वरो न्यासीकृतः । एकदा कश्चिचोरो रक्तश्यामकरवीरकृतमुण्डमालो रक्तपरिधान; महत- वध्यडिण्डिमो राजमार्गेण नीयमानः राजपत्नीभिदृष्टो नृपेण सह दृष्ट्या च पूर्व, 'किमनेनाकारी'ति तदैकेन राजपुरुषेणादेदितं, यथानेन परद्र- व्याद्यपहारेण राजविरुद्धं धर्मविरुद्धं च कर्म कृतं तस्य परिणामखरूपो राज्ञा प्राणदण्डो दत्तश्चास्ते, ततस्तन्मध्य एकया महत्या राज्या नृप- पार्थे पूर्वदत्तो वरो याचित एकदिनं चोरोऽयं मोच्यो, यथाऽहमुप- करोमीति । वरं प्राप्य च भोजनादिना खागतं कृत्वा स्वर्णखण्डसहस्र- दानस्तुष्टीकृतः सः । द्वितीयदिने द्वितीयया लक्षधनैः सत्कृतः । तृती- यया कोटिमितैः खागतीकृतः । चतुझं तु राजानुमत्याऽऽमरणाद्र- क्षितः। अभयवचनं दापितमभयदानेन ततस्त्रास्तामुपहस्यादुः । त्वयास किं दतम् । तयोक्तं मया यद्दत्तं तत्काभिरपि न दत्त । एवं तासां पारस्परिकेऽधिकोपकारविपये विवादे न्यायार्थ राजाऽऽकारितखतो राज्ञोपगम्य !! कलहकारणं पृष्टं, तदा ताभिरावेदितं, अस्माकं मध्ये केनाधिकमुपकृतम् । राजा स एव चोर आहूतः पृष्टश्चेति यथा लया- कसा उपकारोऽमानितः । तेनाऽभाणि, 'चतुर्थी मात्राऽभयं दापयित्वा निर्भयः कृतः। अतस्तस्या बहुपकारं मन्ये, सर्वदानानां मध्येऽमय- दानस्यप्रधानत्वात्।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता ११९ तथा च सत्येषु वाक्येषु यदनवा पापरहितं परपीडाऽनुत्पादक वचनं तच्छेष्ठ वदन्ति । यथाह दशवैकालिके- "तहेब काणं काणेति, पंडगं पंडगं ति वा वाहियं वावि रोगित्ति; तेण चोरेति नो-वए ।"- तथा च मनुः। "सत्यं ब्रूयाप्रियं ब्रूयान्न घूयात्सत्यमप्रियम् । --- प्रियं तन्नानृतं घूयादिति". एवमेव तत्वार्थसूत्रे- असदभिधानमनृतम् ॥ ९॥ ७ ॥ असदिति सद्भावप्रतिषेधोऽर्थान्तरं गर्दा च। तत्र सद्भावप्रति- पेपो नाम , सद्भूतनिन्हवोऽभूतोद्भावनं च । तद्यथा नास्त्यात्मा, नास्त्रिपरलोकः, इत्यादि भूतनिन्हवः । श्यामाकतण्डुलमानोऽयमात्मा अंगुष्ठपर्घमात्रोऽयमात्मा, आदित्यवर्णो, निष्क्रिय इत्येवमाद्यमभूतो- दावनम् । अर्थान्तरं यो गां ब्रवीत्यश्चमश्वं च गामिति । गति हिंसा- पारुप्यपैशुन्यादियुक्तं वचः सत्यमपि गर्हितमनृतमेवास्तीति भावः । एतन्मध्य एतत्प्रमाणानि-यथा- "क्रोधलोभमदद्वेपरागमोहादि कारणैः, असत्यस्य परित्यागः सत्याणुनतमुच्यते।" "हासकर्कशपैशुन्यनिष्ठुरादिवचो मुचः। द्विती- याणवतं पूतं, लमंते देहिनः स्थितिम् ॥" "यद्वदन्ति शठा धर्म, यन्म्लेच्छेप्वपि निन्दितम् । वर्जनीयं त्रिधा वाक्यमसत्यं तद्धितोद्यौः ॥" पुनर्यासत्यप्रसंगः समजनि कत्र मौनं कार्य परमसत्वं न वायं, यथा हि सागारधर्मामृते- . - १२० वीरस्तुतिः। "आवश्यके मलक्षेपे, पापकायें च वान्तिवत् , मौनं कुति शश्वद्वा, भूयो वाग्दोपविच्छिदे ।" मौनमाहात्म्यं यथा- "सन्तोष भाव्यते तेन, राम्यं तेन दश्यते । संयमः योप्यते तेन, मौनं येन विधीयते ॥" "लौल्यत्यागासपोद्धिरभिमानस्य रक्षणम् । ततश्च समवानोति, मनः सिद्धि जगत्रये ॥" "वाणी मनोरमा तस्य, शास्त्रसन्दर्भगर्भिता । आदेया जायते सेन, क्रियते मौनमुज्वलन् ।" "पदानि यानि विद्यन्ते, वन्दनीयानि कोविदः । सर्वाणि तानि लभ्यन्ते, माणिना मौनकारिमा " "न सार्थकालिके मौने, निर्वाहव्यतिरेकतः। उद्योतनं परं प्राः, किंचनापि विधीयते ॥" सत्याशुव्रतरक्षणार्थमाह- "कन्यागोमालीफकूटसाक्ष्यन्यासापलापवत् । स्यात्सत्याणुमती सत्यमपि सान्यापदे त्यजन् ॥", नियमसारेऽप्येवम्- "रागेण या दोसेण वा मोहेण या मोसमासपरिणाम । जो पजहहि साहु सया विदियवयं होद तम्सेव" ।। ५७ ।। रागेण या द्वेषेण वा मृपाभाषा परिणाम । यः मजहाति साधुः सदा द्वितीयप्रतं भवति वस्व जब मृपापरिणामः सत्यप्रतिपक्षा, स.च रागेण या देपेण वा १ - - संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिवा १२१ मोहन वा जायते तदा यः साधुः आसन्नमव्यजीवस्त्रं परिणाम परि- त्यजति तस्यैव द्वितीयं व्रतं भवतीति । "व्यक्तिव्यकं सत्यमुचपन् यः । वर्गस्त्रीणां भूरिभोगेकभाक स्यात् ।। मसिन् पूज्यः सर्वदा सर्वसद्भिः, सत्यात्सत्यं चान्यदस्ति व्रतं किम् ॥" अलीकफलमुपदर्शयति यथा- "मन्मनत्त्वं काहलत्वं, मूकत्वं मुखरोगिताम् । वीक्ष्यासत्यफलं कन्यालीकायसत्यमुत्रनेत् ॥" "मूकाजडाश्च विकला, वाग्धीना वाम्जुगुप्सिताः । पूतिगन्धमुखाश्चैव, जायन्तेऽनृतभापिणः ॥" पुनश्च प्रविपेधमाह- "सर्वलोकविरुद्ध यद्यद्विश्वसितपातकम् । यद्विपक्षश्च पुण्यस्य, न वदेवदसूनृतम् ।" - "असत्यतो लघीयस्त्वमसत्याद्वचनीयता । अधोगतिरसत्याच, तदसत्यं परित्यजेत् ।।" "असत्यवचनं प्राज्ञः, प्रमादेनापि नो वदेत् । श्रेयांसि येन भज्यन्ते, चात्ययेव महाद्रुमाः ॥" ॥ यदाहुमहर्पयः सय्यम्भवाः, दशवकालिके ।। "अइअम्मि य काउम्मि, पचुप्पण्णमणागए, ., जमई तु न जाणेजा, एवमेअंति णो वए।" , (अतीते च काले, प्रत्युत्पन्नमनागते, यमर्थ तु न जानीयात्, 'एवमेवत्' इति नो वदेत् ।
} १२२ वीरस्तुतिः। मी "अइअम्मि य कालम्भि, प्पचुप्पण्णमणागए। जत्थ संका भवे तं तु, एवमेअंति णो वए।" "अतीने च काले, प्रत्युत्पन्नमनागते, ॥ यत्र शका भवेत्तु, 'एवमेतत्' इति नो वदेत् ।।" अइमम्मि य कालम्मि, प्पमुप्पन्नमणागए (निस्संकिअं भवे जंतु, एवमेअंतु निहिसे । "अतीते च काले, प्रत्युत्पन्नमनागते ॥ निश्शंकितं भवेयत्तु, 'एवमेतत् तु निर्दिशेत् ।।" पुनरप्पैहिकान दोपानाह- "असत्याचनाद्वैरविपादाप्रत्ययादयः । प्रादुःपन्ति न के दोपाः, कुपथ्यायाधयो यथा । निगोदेवाप तिय्यक्षु, तथा नरकवासिषु । उत्पद्यन्ते मृपावादप्रसादेन शरीरिणः ॥" "अल्पादपि मृपावादाद्रौरवादिषु संभवः । अन्यथा वदतां जैनी, वाचं वहह का गतिः ॥" "शानचारित्रयोर्मूलं, सत्यमेव वदन्ति ये। धात्री पवित्री क्रियते, तेषां चरणरेणुमिः ।" "अलीकं ये न भाषन्ते, सत्यनतमहाधनाः । नापरासलं तेभ्यो, मूतमेवोरगादयः ।" "शिखी मुण्डी जटी नमधीवरी यस्तपस्यति । सोऽपि मिध्या यदि ग्रूते, निन्धः स्यादन्त्यजादपि ॥" "एकनासत्यजं पापं, पापं निश्शेपमन्यतः । द्वयोस्तुलाविभूतयोरापनेवातिरिच्यते ।"
. . --- 4 संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता १२३ "पारदारिकदस्यूनामस्ति काचित्प्रतिक्रिया.। असत्यवादिनः पुंसः, प्रतीकारो न विद्यते ॥" "कुर्वन्ति देवा अपि पक्षपातं, नरेश्वराः शासनमुदहन्ति । शीती भवन्ति ज्वलनादयो यत्तत् सत्यवाचां फलमामनन्ति ।।" तथा च ज्ञानार्णवेऽप्याह- "य. संयमधुरां धत्ते, धैर्यमालम्व्य संयमी, स पालयति यत्नेन, वाग्वने सत्यपादपम् ।" "अहिंसावतरक्षार्थ, यमजातं जिनैर्मतम् । नारोहति परां कोटिं, तदेवासत्यदूपितम् ॥" "असत्यमपि तत्सत्यं, यत्सत्वाशंसकं वचः। सावा यञ्च पुष्णाति, तत्सत्यमपि निन्दितम् ॥" "अनेकंजन्मक्लेशानां, शुद्ध्यर्थ यस्तपस्यति । सर्व सत्वहितं शश्वत्स ब्रूते सूनृतं वचः ॥" "सूनृतं करुणाक्रान्तमविरुद्धमनाकुलम् । अग्राम्यं गौरवाश्लिष्टं, वचः शास्त्रे प्रशस्यते ।।" "मौनमेव हितं पुंसां, शधत्सर्वार्थसिद्धये । वचो वाचि प्रियं तथ्यं, सर्वसत्वोपकारि यत् ॥" "असद्वदनवल्मीके, विशाला विषसर्पिणी, उद्वेजयति वागेव, जगदन्तर्विपोल्यणा ॥" "पृष्टैरपि न वक्तव्यं, न श्रोतन्यं कथंचन । वचः शंकाकुलं पापं, दोपाट्यं चामिसूयकम् ॥" "मर्मच्छेदि मनःशल्यं, च्युतर्य विरोधकम् । निर्दयं च वचस्त्याज्यं, प्राणैः कण्ठगतैरपि ।" .
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१२४
वीरस्तुतिः ।
"धर्मनाशे क्रियाध्वंसे, सुसिद्धान्ताविष्ठवे ।
अष्टेरपि वक्तव्यं, तत्स्वरूपप्रकाशने ॥"
"या मुहुर्मोहयत्येव, विश्रान्ता कर्णयोर्जनम् ।
विषमं विषमुत्सृज्य, साऽवश्यं पन्नी न गीः ॥"
"न तथा चन्दनं चन्द्रो, मगयो मालतीलजः।
कुर्वन्ति निति पुंसां, यथा वाणी श्रुतिप्रिया ॥"
"अपि दावानलमुष्टं, शालं जायते कनम् ।
न लोकः सुचिरेणापि, जिह्वानलकदर्धितः ।"
"सता विज्ञाततत्वानां, सत्यशीलावलम्बिनाम् ।
चरणस्पर्शमात्रेण, विशुपति धरातलम् ॥"
"नृजन्मन्यपि यः सत्यप्रतिज्ञापच्युतोऽधमः ।
स केन कर्मणा पश्चाजन्मपशाचरिष्यति ॥"
"खण्डितानां विरूपाणां, दुर्विधानां च रोगिणाम् ।
कुलजात्यादिहीनानां, सत्यमेकं विभूपणम् ॥".
"न हि समेऽपि संसर्गमसत्यमलिनः सह ।
कश्चित्करोति पुण्यात्मा, दुरितोल्मुकशेच्या "
"मुतखजनदारादिविच्वन्धुकृतेऽथवा ।
आत्मार्थे न वचोऽसत्यं, याच्यं प्राणात्ययेऽपि च ॥"
इत्यादिप्रमाणः सत्यमनवयं पापरहिवमेव श्रेष्ठम् ॥
(अध ब्रह्मचर्यमाह-)..
वपस्सु चेच्छाया निरोधव्यापारेषु द्वादशप्रकारेषु मध्ये यथैवोचमं
नवविधवनचर्यगुप्त्युपेतं ब्रह्मचर्य प्रधानं भवति । कमनीयामिनी-
मनोहरात्रनिरीक्षणद्वारेण समुपजनितकोतूहलचितवान्टापरित्यागेनाथवा
संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता १२५ खवेदोदयाभिधाननोकपायतीनोदयेन संजातमैथुनसंज्ञापरित्यागलक्षण- शुभपरिणामेन च ब्रह्मचर्य श्रेष्ठं भवति सर्वेषु तपस्विति भावः । आह च- "भवति तनुविभूतिः कामिनीनां विभूति, सरसि मनसि कामिस्त्वं तदा मद्वचः किम् ; सहजपरमतत्वं खखरूपं विहाय ब्रजसि विपुलमोहं हेतुना केन चिचम् ।" ॥अब्रह्म दोया यथा-॥ "सन्तापरूपो मोहांगसादतृष्णानुबन्धकृत् । स्त्रीसम्भोगस्तथाप्येप, सुखं चेत्का ज्वरेऽक्षमा " ॥ परदाररतौ सुखामावः, अनायुष्यकारित्वं च ॥ यथा-- "न हीदृशमनायुप्यं, लोके किश्चन विद्यते । यादृशं पुरुपस्पेह, परदाराभिमर्शनम् ।।" अथ ब्रह्मचर्यमाहात्म्यमाह- "खस्त्रीमात्रेऽपि सन्तुष्टो, नेच्छेद्योऽन्याः स्त्रियः सदा । सोऽप्यद्भुतप्रभावः स्यात्कि वर्ण्य वर्णिनः पुनः ॥" ॥ ब्रह्मचारिणी सती दृष्टान्तेन स्पष्टयति-॥ "रूपैश्वर्यकलावर्यमपि सीतेव रावणम् । परपूरुषमुन्झन्ती, स्त्री सुरैरपि पूज्यते ॥" अन्यच्च तत्वार्थसूत्र-- ' स्त्रीमैथुनमब्रह्म-॥११-७ स्त्रीपुंसयोमिथुनमावो मिथुनकर्म वा मैथुनं, . तदब्रह्म- -
१२६
चीरस्तुतिः।
-
अन्यचापि--
"मातृससमुतातुल्या, निरीक्ष्य परपोपितः।
खकलत्रेण यस्तोषश्चतुर्थ तद्णुव्रतम् ॥"
"दुःखानां निधिरन्यस्त्री, सुखानां प्रलयानलः ।
व्याधिवदुःखक्त्याज्या, दूरतः सा नरोनमः ॥"
"स्वभारं परित्यज्य, या परं याति निरूपा ।
विश्वासं श्रयते तस्यां कथमन्यः स्खयोपिति ।"
"किं सुखं लभते मत्यः सेवमानः परखियम् ।
केवलं कर्म वनाति, वनभूम्यादिकारणम् ॥"
यतः-
"विन्दन्ति परमं ब्रह्म, यत्समालम्ब्य योगिनः ।
तद्रतं ब्रह्मचर्य स्याद्रीरधौरेयगोचरम् ।।"
"एकमेव मतं स्नध्यं, ब्रमचयं जगत्रये ।
यद्विशुद्धि समापन्नाः पूज्यन्ते पूजितैरपि ॥"
तन्मते दशधा मैधुनम् --
"आचं शरीरसंस्कारो, द्वितीयं कृप्यसेवनम् ,
तौर्यत्रिकं तृतीय स्वात् , ससर्गस्तुयेमिप्यते ।
योपिद्विपपसंफलस, पशमं परिकीर्तितम् ।
दंगवीक्षणं ठं, संस्कारः सपमं मतम् ॥"
"पूर्वानुभोगसम्भोगसरणं सातदष्टमम् ।
नवमं भाविनीचिन्ता, दशमं वस्तिमोक्षणम् ॥"
"फिम्पाकफलसमोगसनिभं तद्रि मेधुनम् ।
आपातमात्ररम्पं स्थाद्विपाकेऽत्यन्तीतिदम् ।।"
.
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता १२५
"विरज्य कामभोगेपु, ये ब्रह्म समुपासते।
एते दश महा दोषास्वैस्त्याज्या भावशुद्धये ॥
"सिक्तोऽप्यम्बुधरवातैः, प्लावितोऽप्यम्बुराशिभिः ।
न हि त्यजति सन्तापं, कामवहिप्रदीपितः ॥".
"मूले ज्येष्ठस्य मध्याहे, व्यने नमसि भास्करः ।।
न प्लोपति तथा लोकं, यथा दीप्तः सरानलः ।।
! "हृदि ज्वलति कामामिः; पूर्वमेव शरीरिणाम् ।
भरमसात्कुरुते पश्चादंगोपाङ्गानि निर्दयः ॥"
भोगिदंष्टस्य जायन्ते, वेगाः ससैर देहिनः
स्मरभोगीन्द्रदष्टानो दश स्युस्त भयानकाः ॥",
इमे ते दश-यथा-
"प्रथमे जायते चिन्ता, द्वितीये द्रष्टुमिच्छति ।
तृतीये दीर्घनिश्वासाश्चतुर्थे भजते ज्वरम् ॥"
"पंचमे दधते गात्रं, षष्ठे भक्तं न रोचते।
सप्तमे स्यान्महामूर्छा, उन्मत्त्वमथाष्टमे ॥",
"नवमे प्राणसन्देहो, दशमे मुच्यतेऽमुभिः ।
एतेर्वर्गः समाक्रान्तो, जीवस्तत्वं न पश्यति ।।"
"नासने शयने याने, खजने भोजने स्थितिम् ।
क्षणमात्रमपि प्राणी, प्राप्नोति सरशल्यतः॥"
"दक्षो मूहः क्षमी क्षुद्रः, शूरो मारलघुगुरुः ।
तीक्ष्णः कुष्ठो वशी भ्रष्टो, जनः स्यात्लरवंचितः॥"
"यदि प्राप्ठं त्वया मूद !, नृत्वं जन्मोप्रसंफ्रमात् ।।
तदा वत्कुरु येनेयं, लरज्वाला विलीयते ॥":
-
१२८ . वीरस्तुतिः । . इदानीमामुमिकमैहिकं चाब्रह्मफलमुपदर्य गृहस्सोचितं पुनरपि ब्रह्मचर्य्यवतमाह- "पढ़त्वमिन्द्रियच्छेदं, वीक्ष्याऽनसफलं सुधीः । भवेत्खदारसन्तुष्टोऽन्यदारान् वा विवर्जयेत् ॥" "रम्यमापातमात्रे यत्परिणामेऽतिदारुणम् । किम्माफफलसंकाशं, तत्कः सेवेत मैथुनम् ॥"; ; "यद्यपि निषेव्यमाणा, मनसः परितुष्टिकारका विषयाः ! किम्पाकफलादनवद्भवन्ति पश्चादतिदुरन्ताः ॥" "कम्पः खेदः श्रमो मूर्छा, अमिळनिर्वलक्षयः ।। राजयक्ष्मादिरोगाश्च, भवेयुर्मेधुनोत्थिताः ॥" “योनियनसमुत्पन्नाः, सुसूक्ष्मा जन्तुराशयः। पीव्यमाना विपद्यन्ते, यत्र तन्नैथुनं त्यजेत् ।।" योनी जन्तुसद्धावं यात्स्यायनः कामशास्त्र कारोऽप्याह । वात्सायनश्लोको यथा- "रकजाः कृमयः सूक्ष्मा, मृदुमध्याधिशकयः । जन्मवर्मसु काति, जनयन्ति तथाविधाम् ॥" .' कामज्वरचिकित्सार्धमौषधमिप मैधुनसेवनमिति यो मन्येत तं प्रत्याह- "स्वीसम्भोगेन यः कामज्वर प्रविचिकीर्षति । स हुताशं घृताहुत्या, विध्यापयितुमिच्छति ।" - "न जातु कामः कामानामुपभोगेन चाम्यति । दविधा कृष्णवर्नेव, मय एवामिवर्धते ।।"
संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता १२९ ॥ स्त्रियापि परपुरुषो भुजग इव त्याज्यः॥ "ऐश्वये राजराजोऽपि रूपे मीनध्वजोऽपि यः । सीतया रावण इव, त्याज्यो नार्या नरः परः ॥" पुनश्व-"प्राणभूतं चरित्रस्य, परब्रह्मैककारणम् । समाचरन् ब्रह्मचर्य, पूजितैरपि पूज्यते ॥" यतः-"चिरायुषः सुसस्थाना, दृढसंहनना नराः। तेजखिनो महावीर्य्या, भवेयुर्ब्रह्मचर्य्यतः ॥" एतैर्ज्ञायते ब्रह्मचर्यमाहात्म्यम् ॥ तथैव सर्वलोकोत्तमरूपसम्पदा सर्वातिशायिन्या क्षायकज्ञानदर्शन- शीर्जातपुत्रो ज्ञातनन्दनोऽन्तिमजिनः श्रमणः प्रधानः ॥ यतो भगवतो महावीरस्य बहूनि नामानि सन्ति । यथा- "समणे भगवं महावीरे नाते, नातपुत्ते, नातकुलनिवत्ते, विदेहदिन्ने, विदेहजचे, समणे भगवं महावीरे, कासवगोते, अम्मा. पियुसंतिए वड्डमाणे, सह सम्मुदिए समणे, भीमभयमेवं ओरालं अचेलयं परिसहं सहइत्तिकटु देवेहिं से नाम कयं समणे भगवं महावीरे ॥ श्रीआचारानसूत्रम्-११, १५, १६-१७ "एवं से उदाहु अणुत्तरनाणी, अणुत्तरदसी अणुवरणाणदंसणधरे अरहा णायपुत्ते भगवं, वेसालिए वियाहिए"। (श्री सूयगडांगसूत्रम् १-२) भगवतो महावीरस्य ज्ञातवंशो यथाऽऽह सिद्धान्ते । "छबिहा कुलारिया मणुस्सा प० तं० उम्गा, भोगा, राइण्णा, इक्खागा, गाता, कोरबा". (श्री टाणांग सूत्रम् ४९७), वीर.
- 1 २३० .वीरंतुर्विः। "जात्याय्या, इश्वाकयो, विदेहा, हरयोऽवाष्टा, जान्यः कुरवो, बुंयुनाला, उमा, भोगा, राजन्या इत्येवमादयः क्षत्रिया आर्यकुलोद्भवाः॥ (तत्वार्थस्त्रम् ३-१५) ज्ञातखण्डोद्यानोऽपि ज्ञातवंशस परिचयमादले, यथा-- "पहिया य गायसंडे' आपुच्छिताण गायर सरे । दिवसे मुहुतसेसे कमाणामं समणुपचो ॥१ (आवश्यकचूर्णि पृ०२६७) पुनश्च- "उत्तरसत्तियकुण्डपुरसंनिवेसस्स मग्मेणं निगच्छचि र ता बेगेव "कायसंडे' उजाणे तेणे व उपागच्छइ............महावीरे लोग फरेइ ।" (श्री आचारांगास २-१५-८) श्रीहेमचन्दाचार्योऽपि परिशिष्टपणि ज्ञातनन्दनमिति शब्दप्रयोग कृत्वा प्रणमस्करोति, यथा--- कल्यापपादपाराम, श्रुवगंगादिमाचलम् , विश्वाम्भोजरवि देवं, वन्दे श्रीवातनन्दम् ।। इत्यादिप्रमाणे गवान् महागीरो ज्ञातयंशमलंगतवान् । अन्ययाधं-से [दामा ] दान-धर्म [भनयमपानं अभयदान [मेठं] धेठ, [41] और [प] मसोम भा] पा रहिन-दगी पीनन देनेशान्य मर-बयन [ओर[स) मग तपा[भ] प्रम[उत्तम ] बम[कहा है, उसी प्रभा गन्दा- प्रम [जायात सापुत्र-महावीर मोपतये ॥ २१॥ भावार्य-- लिए सीपमनिमम मरंग करता दान दे, दाल मने प्रारमनपर भी बयान पर दानों ने उन . संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता इसी प्रकार सत्य भी अनेक प्रकारका है, तथापि दूसरेको जिस सत्यसे पीटा न हो ऐसा सल-प्रियसख उस सत्यसे अच्छा है जिससे दूसरोंको पीडा हो, और सप तपोंमें ब्रह्मचर्य तप सर्वोत्कृष्ट है, उसी प्रकार भगवान् महावीर भी लोकमें सर्वोत्तम थे।॥ २३ ॥ भाषा-टीका-अपनी और आरोकी उनति तथा भलाईके लिए जो परोपकारकी दृष्टिसे दिया जाय उसे दान कहते हैं। या अपने अधिकारको वस्तु- मेंसे हटा कर जिस वस्तु पर किसी अन्यको अधिकार देदेना भी दान कहा जा सकता है। परन्तु यहां तो श्रद्धा और प्रतीति के साथ भक्ति भाव पूर्वक, परि- ग्रहका ममत्व भाव छोडकर कर्मों की निर्जराके लिए अनुकम्पासे तथा मन, वचन कायकी शुद्धिसे फलकी इच्छा न रख कर दाता जिस पात्रमें कुछ पवित्र वस्तु देता है उसीका नाम दान है। और वह अनदान, औपधदान, ज्ञानदान, अभयदानके भेदसे चार प्रकारका है। परन्तु उन सबमें प्राणियोंका भय हटा कर उन्हें सर्वथा निर्भय करदेना ही सर्वोत्तम दान अभयदान माना गया है। क्योंकि आत्मामें दश आण होने से प्राणी कहलाता है। जीवित रहनेकी इच्छा या जीवित रहना ही इसका स्वभाव रहनेसे इसकी 'जीव संज्ञा' है। दशप्राण 'द्रव्य प्राण' है और 'भाव प्राण' अनन्त चतुथ्य कहलाते हैं, वास्तवमै यह जीव तीनों कालमें इन्हीं प्राणोसे जीवित रहता है। अतः सब जीव जीवित रहनेकी इच्छा रखते हैं मरना कोई नहीं चाहता, किसीको मरना अभीष्ट नहीं है। अत. जीवित रहनेके अभिलापुओंको 'अभय दान देकर उनका सब प्रकारसे रक्षण करना मनुष्यका श्रेष्टतम कर्तव्य है। कहा भी है कि-"जिस प्रकार मुझे अपने प्राण प्रिय हैं उसी प्रकार अन्य देह धारियोंको भी अपना जीवन प्रिय है। स्वर्गका निवासी इन्द और विष्ठका कीडा, महतमें रहने वाला राजा और झोपडीमें रहने वाला गरीब लकडहारा समान जीवन चाहते हैं। यह समझ कर किसी भी प्राणीके 'मन' नामक प्रागको भी कट न देना चाहिए।" "क्योकि अहिंमा परम धर्म है, हिंमा सब जगह पर निन्दित की गई है, यह वयंको प्रिय न होने के कारण औरों को भी अप्रिय है। क्योंकि अपनी और औरों की मनोदशामें कोई अन्तर नहीं है। अतः चनुर मनुष्य अपने मनमें । .
.. वीरस्तुतिः। नियमसार-"कुलस्थान, योनिस्थान, जीवसमासस्थान, मार्गणा स्थान इत्यादि भेदोंको भलि भान्ति जान कर जीव रक्षा करनेके भावको 'अहिंसा' कहते है । जीवोंकी मृत्यु होती है या नहीं इस प्रकारके विचारमें लगे हुए परिणामके मुधारके विना पाप हिंसा रूप क्रियावा लाग होना कठिन है, अत: इस रक्षाके प्रयत्नमें लगना 'अहिंसा' है।" समन्तभद्राचार्य कहते हैं कि-"जगत् में इसे सब जानते है कि- अहिंसा परब्रह्म स्वरूप है, अर्थात् आत्माकी वीतरागता ही अहिंसा है, जहा वीत- रागता है, वहीं आत्मा का शुद्ध खरूप है, जिस आश्रमके चरित्रमै अणुमान भी आरंभ नहीं है यहीं यह पूर्ण अहिंसा प्राप्त होती है। आशय यह है कि आदर्श. पुरुषोका सच्चरित्र रूप आचरण ही अर्हिमा है,, अतः अहिंसाकी सिद्धि के लिए ही परम दयाल प्रभुने आरंभ. और परिग्रहको त्याग दिया। प्रभु विकार शील वेश और परिप्रहमें अनुरक्त नहीं थे। क्योंकि जहां परिमहकी आसक्ति नहीं है. वहां ही ऊंचे दर्जेका अहिंसा धर्म है। जिनधर्म की जय' इसी लिए वोलते हैं कि-इसमें पूर्ण 'अहिंसा का पालन किया जाता है। यहीं भरा जीवन घात करनेवाले विचारोंको जड मूलसे हटानेका कारण है। तथा 'पंच काय' का इकेन्द्रिय स्थावर जीवोंके नाना प्रकारके होनेवाले वधसे यह बिलकुल दूर है: और यह मुन्दर मुखसे भरपूर समुद्र के समान अगाध है।" "मुनिओकर कतव्य है कि वे सर्वथा अहिंसाका पालन करें, क्योंकि हिंसाका परिणाम दुःसजनक है, जिसे महापुरषोंने महान् अनुभवसे बताया है। जिनके ये वचनामृत हैं।" "पैरसे लाचार है, गरीरकी चमीको फोड कर कोड बाहर टपम्ने लगा है, हाथ कटे हुए हैं, और भी अनेक रोगोंसे ग्रस्त है। उसे देस कर समझ लेना चाहिए कि उन्हें यह दारुण दुर अन्य प्राणियोंकी हिंसा करनेसे भुगतना पहा है अतः चनुर पुरुषका यह कर्तव्य है कि-निरपराधजीवी संकल्पमाप्रसे कमी 'हिंसा न करे।" , "मुखदुःसमें, अच्छे युरेमें, युक्त अयुक्त, अपनी आत्माये तरह अन्य आत्माओंको समझ कर कभी किसी हिंमा रूप अनिष्ट नको।" लोकोंका यह मन्तव्य है कि-"धर्मका सम्पूर्ण अंग सुन कर तयाँ मनमें विवेक रख कर उसका निर्णय पूर्वक यह सार है कि जब मुझे .अपने .
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता १३९ प्रतिकूल कुछ अच्छा नहीं प्रतीत होता है, तेव औरों को उनके प्रतिकूल आचरण कर इष्ट है।" "सरको अपने प्राण ही प्रिय हैं, राज्य नहीं"-"प्राणी अपने प्राणोंकी रक्षाके लोभमें राज्य को भी, तृणकी तरह छोड़ देता है। अत एव, किसीके प्राणोंका नाश करनेसे जो पाप होता है वह समस्त पृथ्वी दान कर देनेसे भी दूर नहीं होता।" "मरनेवालेको चाहे राज्य भी प्रदान करो, या मुवर्ण का पहाड अर्पण करदो, परन्तु जीवनके सन्मुख वे वस्तुएँ उसे कुछ भी अच्छी नहीं लगती, इसी लिए वह उन सब को छोड कर जीवित रहनेकी अपील करता है।" पीडा-"जरासा का पैर में लग जाता है, मगर वह सारे अगो में भारी पीडा उत्पन्न कर देता है, परन्तु जो निरपराध जीवोको तीक्ष्ण शस्त्रसे भौतके घाट उतार देता है, उस मरनेवालेके दुःखका क्या ठिकाना है । उसे तो अवश्य अनिर्वचनीय वेदना होती है।" "यह कहां की नाति है जो अशरण, निरपराध, दुर्बल प्राणी बलवान् के द्वारा मारा जाता है, हाय ! हमें तो कष्ट के साथ कहना पड़ता है कि जगत् में अराजकता छा गई है, अब यहा न्यायको कहां स्थान रह गया है।" "यदि कोई किसीके कानोको यह मुनादे कि तू मरजा! तव सुननेवाला यह सुनते ही काप उठता है, शरीर भयभीत और दुःखी हो जाता है । जो पैने और कठोर शस्त्रसे किसीको मारने लगता है तब उसकी क्या दशा होनी होगी। उसके दु सका अनुभव सिवाय उसके भला और कौन कर सकता है।" "हाथका कट जाना अच्छा है; विना पैर रहना भी कुछ बुरा नहीं, मगर सम्पूर्ण शरीरके अगोंको पाकर हिंसा करनेवाला पुरुष सर्वया निकम्मा है, अर्थात् वह किसी कामका नहीं है।" . मतलय साधने की हिंसा भी हानिकर है-"विनकी शान्तिके लिए की गई हिंसा भी विघ्नके लिए ही होगी। बहुतसे यह कह डालते हैं कि- हमारे कुलका यही 'आचार' चला आता है, मगर वह चुछ फुलकी भलाईके लिए नहीं है, वह तो कुल नाश के लिए ही होगा, शान्ति के लिए नहीं। अपने वंशम, चली आनेवाली कुलकमागत. हिंसाको जो भी प्राभो छोड कर शुद्ध-हो .
, वीरस्तुतिः। जाता है, वह काल सूर कसाईके पुत्र 'मुलस' की तरह सब मनुष्योंमें पवित्र और श्रेष्ठ गिना जाता है।" , "जो इन्द्रियों को तो वश रखना चाहता है,तथा देव और गुरु की आत्मीय सेवा करता है, यथा शक्य दान भी देता है, तत्वको पढ़ कर पाता भी है, तप भी करता है, परन्तु जरासी भी हिंसाको यदि धर्म मान्यतासे कर देता है तब तो उपरोक सबकी सब क्रियाएँ निष्फल है, अतः सिद्ध हुआकि धर्मके नाम पर की गई हिंसा भयंकर पापकारिणी है।' "जिस शास्त्र में धर्मका नाम लेकर हिंसा करनेका उपदेश किया हो वह शान होकर कुशास्त्र समझा जाना चाहिए अर्थात् वह शस्त्र है शाब नहीं।" "यह कितना आश्चर्य है कि मनुष्य तक को मार देनेवाले, लोभान्ध होकर पथ भ्रष्ट होजाने वाले, हिंसा विधायक शास्त्र बनाफर, तथा पाप करनेका उपदेश देकर, लोकों को मूर्ख बना रहे हैं, अन्ध विधासी बनाकर मानो नरकके कुंडेमें डाल रहे हैं।" अहिंसाका माहात्म्य-"अहिंसा माता की तरह सवकी पालिका और हितकारिणी है। अहिंसा ही शत्रुओके मनमें अमृतका संचार करनेवाली है। अहिंसा दुःखरूपी दवानलको बुझानेमें अमोघ और प्रधान मेघ है, संसार भ्रमणा यानी जन्म मरणके रोगसे पीडितोंके लिए तो आरोग्यता देने में समर्थ 'औषधि है।" अहिंसाका फल-"लम्बी आयु, खच्छ और सुन्दर रूप, नीरोगता, संसारमें निर्मल यशः कीर्ति, इत्यादि सामप्रिएँ अहिंसा पालन करनेके उपलक्षमें ही तो मिली हैं। अधिक क्या कहा जाय अहिंसा सब मनोरथ पूर्ण करनेपाली है।" किसीने ठीक ही कहा है कि-"पहाडोमें मुमेरु, अमृत पीने वालोंमें देवता, मनुष्योमें चक्रवती, ज्योतिष् चक्रमे चाद, टंढी छाया देनेवालों में फलदार वृक्ष, ग्रहों में सूर्य, जलाशयों में समुद्र, मुर-असुर-मनुष्य तथा चक्रवर्तियों में वीत- राग के पदकी तरह सब व्रतोंमें 'अहिंसा' को सबम बड़प्पन तथा प्रधानता प्राप्त है। अर्थात् इससे बढ कर और बडा व्रत क्या हो सकता है।" निष्कर्प-इन सब शाब्रोंका मीलान करनेसे यह सयं सिद्ध हो जाता है कि-हिंसा सब शानोमे वर्जित है। जननि दो इसका नाम प्राणाविपश्त कहा है, - संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता १३७ जिस का आशय यह होता है कि किसी के एक प्राणको भी निरर्थक न दुखाना चाहिए। साधु मुनिराज इसका सम्पूर्ण अंग पालन करते है। और गृहस्थ जन इसका एक भाग ही निभा सकते हैं क्योंकि सबको अपना जीवन सब वस्तुओं से अधिक प्रिय है। जैसे कहा है कि-"यदि मरनेवालेको यह कहा जाय कि-तुम सोनेके "एक क्रोड सिक्के लेकर हमें अपनी जान मारनेकेलिए कहदो, तब वह धनके ढेरको छोडकर जीवित रहने की आशा प्रगट करेगा। क्योंकि जान देदेनेपर उसकेलिए धन किस कामका है। अतः सबको अपना जीवन प्रिय है। इस लिए सब दानोंमें अभय दान श्रेष्ठ है।" अभयदान पर उदाहरण-"अरिदमन वसन्तपुरका राजा है, वह अपनी चार रानियोसे निल रंग रलियां करता है। एक दिन उन रानिओंने गाना, बज्ञाना, नाचना आरंभ किया; राजा उनकी गान्धर्व विद्या पर लहू होण्या और बोला कि आज तुम जो कुछ मांगोगी वही दूंगा। रानिओने कहा कि इस समय तो हम किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है, कालान्तरमें मांग लेंगी, अब हमारा वर अपने पास जमा कर लीजिए राजाने कहा अच्छा।" एक बार रानियोने एक चोरको देखा कि जिसे लाल कपडे, और जूतोंका हार पहिना कर यध्य भूमि ले जाया जा रहा है। रानियोंके साथ राजा भी महल पर टहल रहा था, देखकर उन्होंने पूछा कि प्राणनाय! इसने क्या अपराध किया है। राजाने उसी समय एक सिपाहीको बुलाकर पुछवाया, उसने कहा कि पृथ्वीनाथ ! इसने चोरी जैसा अकार्य करके राज और धर्मके विरुद्ध कार्य किया है, अतः आपनेही तो इसको 'प्राणदंड' पानेकी आज्ञा दी है। यह मुनकर उनमें से एक रानी ने कहा कि प्राणवल्लभ! आप मेरा 'वर' यह दें कि इसे एक दिनके लिये न मारें जिससे में इस पर कुछ उपकार कर सकू। राजाने कहा "तथास्तु" रानीने उसे महलमें लिवा कर कहा तुझे आजके लिए बचा दिया है, अतः आज सापी और मौज कर। यह कह उसका खूब अन्न और वनसे खागत किया, सवेरा होने पर उसे एक हजार दीनार देकर अपने महलसे विदाकर दिया। इसी प्रकार दूमरी और तीसरी रानीने भी एक एक दिन रक्सा और क्रमसे एक लास और एक कोड सोनेके सिचोंका पारितोषिक दिया। A १३८ वीरस्तुतिः। . मगर चौथी रानीने उसे कुछ भी न देकर उसका वह प्राणदंड का अपराध राजासे कह कर क्षमा करा दिया । तब यह सुन उन दीनोंने कहा कि 'इस तूने क्या दिया है! चौथी रानी ने कहा कि मैंने इसे वह वस्तु दी है, जिसे तुम सब मिल कर सनमें भी नहीं दे सकी । यह सुनकर वे सब क्रुद्ध होकर उसके गले पड गई और बोली कि हमने तो उसे क्रोडपति बनादिया है और तुम कहती हो कि हमने इसपर तुनके जितना उपकार भी नहीं किया । चौथीने कहा कि धनसे भी अधिक सबको अपने प्राण प्यारे होते हैं। मैंने इसे प्राणदान दिल मकर सझके लिए सुखी बना दिया है। अब इसे मरनेका भय नहीं है जिससे मैंने सबसे बड़ा उपकारका कार्य किया है। यदि मेरे कहेका विश्वास न हो तो राजासे इसका न्याय कराना चाहिए। इतना कहने के बाद राजाको तुरन्त महलमें बुलवाया गया, और रानियोंय वह मुकदमा मुन कर राजाने चोरको बुलाया और पूछा कि भाई। सत्य कह तू किस रानीका अधिक उपकार मानता है। उसने नपतासे सिर झुका कर कहा कि यो तो सपने मुझ पर भारी उपकार किया है, मगर चौथी रानोका सबसे अधिक उपकार मानता हूं, क्योंकि उसने अभयदान दिलवाया है। तीनो रानियोंने कोडौँका धन भी दिया और एक एक दिन मरनेसे भी बचाया मगर मुझे तो सदैव यही भय बना रहता र कि धनका क्या करूंगा जब कि कल मर जाना है । मगर चौथी रानीने मुझे उसी मौतके सकटसे उबारा है । अनमें यावजीपन पर्यन्त के लिए निर्भय हूं। अतः इस उपकारको अपने तनका पुरस्कार देकर भी नहीं चुकाया जा सकता। क्योंकि राव दानोंमें अभयदान प्रधानतम है। सर्वोच्च भाषा सत्य है-इसी प्रकार सत्य वचनामें निरवद्य, पापरहित, दूसरेकी पीडाको हटानेवारी भाषा सर्वोत्तम हैं। क्योंकि काना, नपुंसक, रोगी, चीरादिके नामसे पुकारनेपर भी उसके मनको आघात पहुंचता है। :: मनुका मत-"सत्य, प्रिय, और अन्यके मनके अनुकूल वचन बोलो, असत्य और अप्रिय सत्य कभी मत बोलो।" असत्य-असत् शब्दके तीन अर्थ हैं, सद्भावस्य प्रतिषेध, और अर्थान्तर ना गहानिन्दा । वस्तुळे स्वरूपका अपलाप करनेको सदाधका प्रतिषेध कहते हैं। यह दो प्रकारका है। रात पदार्थ निषेध-तथा असद्भूत पदार्थका १ संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता १३९ । निरूपण जसे "नास्ति आत्मा" आत्मा कोई खतन्त्र पदार्थ नहीं है, .अथवा "नास्ति परलोकः", परलोक मरणके बाद जीवका अन्य भव धारण करना। वास्तविक नहीं है। इत्यादिक भूतनिन्हव है। क्योंकि इससे सद्भूत पदार्धका अपलाप होता है। आत्माका परलोक भवान्तर धारण करना वास्तविक सिद्ध पदार्थ है। युधियुक्त और अनुभवगम्य है । इसका निषेध करना ,सद्भूतका अपलापनामक मिथ्या पचन है। आत्माको श्यामाकतण्डुल-सामफके चावल की तरह छोटे प्रमाणमें बताना, अथवा अंगूठेके पोरवे के बराबर समझना, या यह कहना कि-आदित्य वर्ण है, निष्किय है, इलादि सय वचन अभूतोद्भावन नामक असत्य वचन हैं। क्योंकि इस तरहके वचनों द्वारा आत्माका जो वास्तविक खरूप नहीं है, उसका उल्लेस किया जाता है। अर्थान्तर शब्दका अर्थ है मिन्न अर्थको सूचित करना, जो पदार्थ है उसको दूमरा पदार्थ ही बताना वास्तविक न कहना अर्थान्तर है। जैसे कोई, गाँको कहे कि यह घोडा है, अथवा घोडेको कहे कि यह गौ है, इस तरह के. वचनको अर्थान्तर नामक असत्य कहते हैं। गर्दा नाम निन्दा करनेका है, अत. जितने भी निन्य वचन है वे सब गहित नामके असल वचन समझने चाहिए। जैसे कि-'इमको मार डालो' या 'मरजा' इसे कमाईको देदो,' इत्यादि हिंमा विधायक वचन बोलना, तथा मर्म- मेदी-मन दुखानेवाले अपशब्द कहना, गाली देना, कठोर वचन कहना, परुप- रूक्ष शन्दोंका प्रयोग करना, एवं पैशून्य किसी की चुगली करना, आदि गर्हित वचन कहलाते हैं। यदि वे गर्हित वाक्य कदापि सत्य भी हो तथापि अमला, माने जाते हैं। क्योंकि वे निन्ा है। तया प्रमादयुक्त जीवके वचन भी असल समझे जाते हैं । प्रमाद पूर्वक कहे जाने वाले वचन असत्य होते हैं। और प्रमाद, को छोडकर रहे गए असत्य वचन भी सल हो सकते हैं, जैसे किसी रोगी बालकको पताशमें दवा रस कर देते हैं और कहते हैं कि-ले यह पताशा है। सत् शब्दके दो अर्थ होते हैं, विद्यमान और प्रशंसा । अत एव असत शब्दसे. अविद्यमान और अप्रशस्तता ये दोनों ही अर्थ लेने चाहिए। सद्भूत निन्हव असद्भूतोद्भावन और अर्थान्तर, ये अविद्यमान अर्थो सूचित करनेवा होनेसे असल हैं। और जो गहित वचन हैं वे अप्रशस्त होनेसे असल्प तथा प्रमादका सम्बन्ध भी दोनों ही स्थानों पर पाया जाता है। - वीरस्तुतिः । इसके अतिरिक्त असत्य को विवक्षा होने पर कपाय असत्य निमित बन चाता है, कपायका उदय आनेपर असलय प्रयोग अपत्य किया जाता है। अतः ध-लोभ-मान-राग-द्वेष-मोहादिके करणछे असल बोलनेकर त्याग करना ससाणमत कहलाता है। हंसीमें, कौर शब्द का प्रयोग करते समय, चुगली करते समय, अप्र- शम्म बचन कहते समय, मठा वाक्य रहना अनिवार्य हो जाता है, और देह- धारीले आत्म स्थिति उस समय प्राप्त होती है जब दूसरा अणुनत वीयर कर लिया जा सके। कीसी ने कहा है कि-जिसे मूदता के कारण धर्म के नाम पुका- रता है, और जो म्लेच्छोंमें भी निन्य समझा जाता है, उस असल को मन, चपन-कायसे त्याग देना ही उचित है, यदि हितको अपनाने की अभितारा है तो अमल न कह कर मानको स्वीकार करले। क्योंकि इतने स्थानों पर सर मौन भाव भजते है, जैसे-"प्रतिक्रमण करते समय, मलमूय लागते रक, पापके कार्यो छोडते समय, निरन्तर मौन रख देवे, क्योंकि मान कर लेनेसे यापी दोपोंश नाश हो जाता है।" 'मोनसे प्लेद्य नष्ट होता है, सन्तोष भार जागन हो जाता वैराग्या प्रदर्शन होता है, संयम पुष्टि हो जाती है।' 'जिहाके साद छोडनेसे ही तपकी शदि होती है। अमिमानी रक्षा होजाती है, रामना आनेसे मनकी लिपि हो जाती है। वाणी मनोरमा पनजाती है, आवेय होकर प्रशंसा पान बन जाता है, मीन रखने वाले के चरणगुगल पन्दनीप होते हैं। परन्तु मौन देश और मलने विचार कर करना चाहिए। यदि कहीं बोलनेसे संसारको मद्रोध और चरिणय लाभ होनो बहो धुप न रहना चाहिए। मगर वाणी सदा सत्यवधी होनी चाहिए।' गृहस्थके लिए त्याज्य असत्य पया है! "हस्य ये का, पर, पृथ्वी, के सम्बन्ध असल पुल भी न पहना चाहिए, न ही उसे भी हटी गवाही देनी चाहिए, कनी किसी की थापन-यानी पोहर मार र उसे मेरा जवार न देना चाहिए, इन पांच बातोपानमें रमने बाध सला मदी है। यदि अपने सा अन्य पर सत प्रदे मापत मा समयी हो जय रामय यलन करवर मानकर या रक्षित :
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता १४१ "और जो साधु-सजन पुरुष राग, द्वेष और मोहसे असल बोलने परिणामको जर छोड़ता है, तब ही दूसरा सराणुव्रत होता है, क्योंकि असर बोलनेका भाव सत्य भावसे विपरित होता है, और यह असत्य भाव राग भावसे, द्वेष भावसे और मोह भावसे जीवमें पैदा होता है, अर्थात् यह मनुष्य इष्ट पदामि व विषयोमें राग द्वारा उनकी प्राप्ति और रक्षाके लिए असल कहता है, वह अनिष्ट पदार्थो वा विपयों में द्वेषपूर्वक उनके दूर होनेके लिए या उनका सम्बन्ध न पाने के लिए असल कहता है, अथवा मिथ्या बुद्धिसे संसार में मोहके कारण उस मिथ्या भावकी रक्षाके अर्थ असल बोलता है, जो कोई निकट भव्य जीव साधु पुरुष इस प्रकारके असत्य बोलनेके परिणामोंको त्याग देता है उसी में. सल व्रतकी योग्यत्व आवी है।" "जो सत्यभावके रंगमें रंग कर प्रगट में सत्यका व्यवहार करता है वह सज्जनोंद्वारा आदरणीय होता है, यह बात इस लिए सर्वथा सत्य है कि सत्य से बढ कर अन्य दूसरा कोई मत नहीं।" असत्य बोलने का निकृष्ट परिणाम-"झूठ बोलनेवाला गंगा बनता है, या उसे मूकगति का जीव बनना पड़ता है। वह सष्ट नहीं बोल सकता। किसीको उसकी सुन्दर सम्मति भी प्रिय नहीं लगती। मुसरोगसे पीडित रहता है। ये मर झूठ बोलनेके दुष्परिणाम जान कर कन्यादिके विषयम असल्य कमी न बोलना चाहिए।" "झूठ बोलने वाले, मूर्ख, विकलांग, वाणीहीन रह जाते हैं। उनकी बातें सुन कर लोकों को पृणा हो उठती है। और उनके मुखसे दुर्गध आया करती है।" "जो सर्वलोक से विरुद्ध है, जिस वाणीसे विश्वासघात हो जाता है, जो पुण्यका प्रतिपक्षी है वह ऐसा वाक्य कमी न कहे।" "जो झूठ बोलता है उसमें तुच्छता आजाती है, अपने आपको ठग लेता है, अधोगविगामी होता है, अतः झूठ वर्जनीय है।" "इड प्रमादसे भी न बोलना चाहिए, क्योंकि कल्याणकार्यरूपी पक्ष असत्यकी आंधीसे गिर जाते हैं।" "भूत, भविष्यत् , वर्तमानकी बातोंको यदि पूर्णतया न जानता हो तो न कहे, कि इस तरह होगा।" "तीनों कालकी बातोमें शंका हो तो उसे न कहे।" "यदि तीनों अलकी बातें बिलकुल निशंक हैं तब उन्हें लोकोमें उपदेशके रूपमें सुना सकता है।" "असल बोलनेसे वैर विरोध बढ जाते हैं, पोल खुल जाने पर पछतावा होता है, + ३ वीरस्तुतिः ।। कोई उस पर विश्वास नहीं करता, यदनाम सुफ्तमें हो जाता है। कुपथ्य करनेकी तरह न जाने क्या २ दुःख-दोष रठे मनुष्य बढ जाते है। "झूठ बोलने वाला नरक, निगोद, और पञ्च योनिमें जन्म लेकर मरता रहता है।" "थोडा सा असत्यका प्रयोग करनेवाला भी नरकमें उत्पन होता है।" “शानिओंने ज्ञान और चरित्रका मूल तो सल ही बताया है, सत्यवादी के पैरोंकी धूलिसे पृथ्वी पवित्र हो जाती है।" "जो सदा सल बोलते हैं उनका भूत, प्रेत, सर्प, सिंह आदि कुछ भी नहीं विगाइ सकते, ""सिर मुंडा कर, जरा रखा कर, नम रह कर, कपडे पहिन कर या तपको तप कर भी जो असल घोलता है तब तो उसे अछूतसे भी बढ कर निन्य समझना चाहिए।" "एक तरफ तो असत्यका पाप है, दूसरी ओर ससारके सब पाप हैं, यदि इन दोनों पापोंको तोला भी जाय तो असत्यमा पाप बढ निकलेगा।" "डाकुओं और व्यभिचारिओंके पापका प्रायश्चित हो सकता है, परन्तु असत्यवादीका प्रतिकार नहीं।" "सत्यवादीका देवोंको भी पक्ष होता है, राजा भो उस पर शासन नहीं चला सकता, उन पर अमिका उपद्रव नहीं होने पाना, क्यों कि सत्यकी महिमा अपार है।" "सत्यका संसार भरके योगियोंने पूर्व ही गायन किया है, जिसमें शुभचन्दाचार्यके कुछ वचनामृत आपके पठनार्थ सामने रखते हैं। उन्होंने कहा दै कि-"जो सयमी मुनि धीरज रस कर संयमकी रक्षा या गुनि दीक्षाको धुराको धारण करता है, वह मुनि बचनके जंगलमें सत्य रूपी वृक्षका आरोप करता है।" "यमनियमादिनतों का समूह एक मात्र हिंसानी रक्षाके लिए कहा है, अहिंसा मत यदि असत्यसे दूपित होतो वह ऊंचे पदको कभी भी नहीं पासकता । असत्य वचनके होनेसे अहिंसाका प्रतिपालन अशयय है।" "जो बचन जीवोंका इष्ट हित करनेवाला हो तो वह असत्य भी मल है। और जो वचन पाप सहित हिंसारूप कार्यको पुष्ट करता है वह सल भी असत्य है और निन्य भी है।" "जो मुनि अनेक जन्मके उत्पक्ष दुखोंकी शान्तिके लिए उपयरण, करता है वह निरन्तर सलही बोलता है, क्योंकि असत्यवचन बोलनेसे मनिवस्य होना असम्भव है। "जो बचन राल हो, करणाने भरपूर हो, किसीके विरुद्ध न हो, आउलता रहित हो, अपस्यमा संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता १४३ . 4 गारू भाषामें न हो तथा प्राम्य नाम इन्द्रियों का भी होता है यानी इन्द्रियोंकि 'विकारोंको पुष्टकर वचन न हो, गौरवका बढानेवाला हो; जिसमें किसीका हलकापन न यताया गया हो, वही वचन शास्त्रमें प्रशंसनीय है।" निरन्तर-मौन करना भी पुरुषों के कल्याण के लिए है- "यदि बोलनेका काम पडे तो सत्य और प्रिय तथा सब जीवों के कल्याण के लिए बोलना चाहिए।" "मगर दुष्ट चरित्रीके मुखकी बांबी वढी भारी अमल- 'वाणीकी सांपनी रहती है, जो जगत् भरको दुःखी कर देती है।" "जिस वातके सत्य होने में सन्देह है, पर पाप रूप भी 'अवश्य है, और दोपोंसे युक्त है, एवं ईर्ष्याको बढानेवाली है, वह अन्यके पूछने पर भी न कहे।" "किसीका मर्म दु:खानेवाला, मनमें घाव करनेवाला, स्थिरताका नाश करने- वाला, विरोध खडा करनेवाला, तथा दया रहित वचन कण्ठमें प्राण आनेपर भी न कहे।" "जहा धर्मका नाश होता हो, चरित्रको धक्का पहुँचता हो, देशकी खतन्त्रता नष्ट होती हो, समीचीन सिद्धान्तका लोप होता हो, उस जगह देश, धर्म और जाति के उत्थानके लिए विना पूछे भी विद्वानोको अवश्य खोलना चाहिए। उस समय चुप, चाप खडे २ तमाशा देखना. सत्पुरुषोंका कार्य नहीं है।" "जो वाणी लोकोके कानोंमें पुनः पुनः पड कर जहर उगलती है, जीवोंको मोहरूप कर डालती है। सन्मार्गको भुला देती है, वह वाणी,न होकर एक सापनी जैसी है, जिसके सुनते ही प्राणी उत्तम मार्गको छोडकर कुमार्गमें पड़ जाते हैं।" "कानों को जितना सुख मनोहर वाणी देती है, उतना सुख चन्दन, चन्द्रमा, चन्द्रमणि, मोती, मालती, आदि शीतल पदार्थ नहीं दे सकते।" "अमिसे जला हुआ वन तो किसी समय हरा भरा हो जाता है, परन्तु जिव्हारूपी आगसे पीडित होकर लोक कभी नहीं पनपता।" "जो सच बोलते हैं, तत्वके असली स्वरूपको समझ सके हैं, जिनको सत्य और शीलका ही अवलम्बन है, उनके पैरों से पृथ्वी पवित्र हो जाती है और वही लोक उत्तम है। जो असत्य बोलते हैं वे ही नीच होते हैं ।" "जो नीच पुरुष मनुष्यजन्म पाकर भी सत्यकी प्रतिज्ञासे रहित है,. वह संसार रूपी कीचद्रसे और क्या करनेसे पार हो सकेगा?" "जिनके हाथ नाक कान कटे हों, रूप रंग नामको वीरस्तुतिः। भी न हो, दरिद्री और रोगी हो, कुल, जाति, वर्णसे हीन हो, तब क्या हुभा उनका भूषण सल है, सलवे पवित्र और सुखी हैं। उनकी शोभा सबसे है।" “जो पुरुष असत्यसे मलिन हैं, उनके साथ पाप रूपो कालिमाके भयसे कोई भी धर्मज्ञ पुरुप सपने में भी उसका साक्षात्कार नहीं करता।" "झूठेपी संगतिसे सच्चको भी कलंक लेना पडता है।" "पुन, खजन, स्रो, धन और मित्रों के जाने या विमुख होने पर अथवा प्राण जाने पर भी झूठ नहीं बोलना चाहिए।" इत्यादि वचनामृतोंको पीकर जो पाप रहित और श्रेष्ठ सल बोलता है, वही जगत्में प्रधानपुरुष है। सत्यकी तरह सब प्रकारके वोंमें अर्थात् जिन तपोंमें इच्छाओं रोकना अनिवार्य है वे तप १२ प्रकारके कहलाते हैं, उनमें उत्तम और नव विध प्रह गुप्सेि गुप्त किया गया यह्मवर्य नामक तप उसम है। सुन्दर नियोंके मनोहर अंगोंको देख कर उनसे क्रीडा करने जिपके चित्तमें इच्छा सटी होती है उसको त्याग देनेसे अथवा वेद नामक नोकपारके तीन उदयसे मैथुन सेवनकी इच्का लागना ब्रह्मवर्यत्रत है, उसे सर करने के लिए सत्पुरुष कहते हैं कि हे कमी पुरुष, अनुपम सहज, परम तत्वरूप, निजस्वरूपको छोड कर अति सुन्दर नियोंकी शरीर आदि विभूतिको मनमें क्यों याद करता है, और उनके मोहमें किस लिए फंसा पडता है। अब्रह्मचर्य फे दोप-सी सम्भोगसे सन्ताप पैदा होता है, पित्तको पढाता है, अम जर फैन जाता है, हिताहितको नशाकर मोहको पाता है। शरीर निःसल होता है। तृष्णा में जाना जाता है, अतः कामेच्छा और मरमें कुछ भी अन्तर नहीं रह जाता। और इन दोषोंको जान कर भी यदि कोई सर्वया नीलका पालन न कर सके तो गृहस्थय कम्य है कि विवाहित पनि असर पन्तोष पैदा करे। क्योकि इस प्रविज्ञामें भी अनेक तरह की हरसा- ओंका मर्दन कर देता है। फहामी कि-अपनी सी मात्र सन्तोष करनेके भनन्तर जो अन्य स्त्री मात्रकी कमी इरा तक मी नहीं करता है, उसमें भी पुन शेठ की तरह अदुत प्रमार पेक्ष हो जाता है, वर मचाके प्रभारी प्रगंगा क्यों कर श्री बासस्ती है, क्योंकि वह तो अवघ्प है।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता इसी भांति स्त्रीका भी परमधर्म है कि-पर पुरुष चाहे रूपमें, ऐश्वर्यमें, कलामें कितना भी बढ़ा चढा क्यों न हो, उसे जहरका पुतला समझ कर त्याग देना चाहिए जिस प्रकार सीताने रावणको छोड दिया था । वही स्त्री देवोंसे पूजित होती है जिसने मैथुनके विकार को जीता है। मैथुन नाम जोडे का है, प्रकृतिमें स्त्री पुरुषका ही जोडा समझा जाता है, दोनोंका परस्पर संयोग या सभोगके लिए जो भावविशेष उत्पन्न होता है अथवा दोनों मिलकर जो सभोग क्रिया करते हैं उसको मैथुन कहते हैं, और उस मैथुनको 'अब्रह्म' कहते हैं। इसमें भी प्रमत्तयोगका सम्बन्ध है, क्योंकि उस अभिप्रायसे जो भी क्रिया की जायगी, फिर चाहे वह परस्पर दो पुरुष या दोस्लो ही मिल कर क्यों न करें, अथवा अनंग कीडा आदि ही क्यों न हो वह सब भब्रह्म है, और जो प्रमादको छोडकर किया करते हैं उसको मधुन नहीं कहते। जैसे कि पिता भाई आदि पुत्री भभि आदिको जब गोदमे लेकर प्यार करते हैं तब वह अब्रह्म नहीं कहला सकता, क्योकि उनमे 'प्रमत्त- योग नहीं है। इस प्रमत्तयोगकी यदि एक अरामें निवृत्ति की जाय तो यह ब्रह्मचर्याणुव्रत कहलाता है। जैसे कहा है- "माता बहन बेटीकी तरह परस्त्रीको जानता हुआ जो अपनी विवाहिता स्त्रीमें ही सन्तोप करता है, वह चौथा अणुव्रत कहलाता है।" "उत्तम पुरुष परस्त्रीको व्याधि और दुखके समान समझ कर दूरसे ही छोड देते हैं, क्योंकि परस्त्री सदैव दुःखोंका घर है, और मुखोका नाश करनेके लिए प्रलयकी आग जैसी सिद्ध हुई है।" "जो स्त्री अपने पतिको छोड कर परपुरुषमे रमण करने चली जाती है, उसे परले सिरेकी निर्लज समझना चाहिए। जब इस आचरणसे अपनी स्त्रीका भी विश्वास नहीं है तंत्र परस्त्रीका किस बात पर विश्वाम किया जा सकता है।" "परस्त्रीका सेवन करके पुरुष क्या मुस पाता है। केवल नरक निगोदमे रुलनेके अतिरिक्त और कुछ नहीं । अतः मनुष्योको 'ब्रह्मचर्य प्रतका पालन करना चाहिए।" "इस व्रतका आश्रय-लेकर योगीजन परब्रह्म परमात्माका और अपना खरूप अभेदरूपसे जान लेते है । उसीको अनुभव करते हैं, और इसे धीर वीर पुरुप ही धारण करने में समर्थ हैं। अल्पसत्ववाले, शीलरहित, इन्द्रियोंके दास, दुर्बल पुरुषतो इसका खममे भी समाचरण नहीं करसकते, क्योकि यह ब्रह्मचर्य अविधारा महानत है। वीर.१. ।
- वीरस्तुतिः। "इन तीनों भुवनों में ब्रह्मचर्य नामक प्रत ही प्रशंसनीय है, जो इसे निर्मलभावोंसे पालते हैं वे पूज्य पुरुषों द्वारा भी पूजित होते हैं।" "जो ब्रह्मचर्य पालनमें अनुरक रहते हैं वे दश प्रारके मैथुनों सर्वथा त्याग कर देते हैं। जैसे- (१) शरीरका संस्कार-शंगारादिकरना । (२) पुष्ट रसका सेवन करना। (३) गाना-बजाना-देखना-सुनना । (४) खोका सगर्ग करना। (५) बीमें रिसी प्रसारका संकल्प-विचार करना । (६) बीके अंग उपांगों को देखना । (७) उसे देखनेका संस्कार बनाए रखना । () पूर्व मृत भोगोंका पुनः सरण करना (5) अगाके लिए भोगनेकी चिन्तवना करनी । (10) शुक्र (वीर्य)का क्षरण कर देना। ये दश भेद मैथुनके हैं, ब्रह्मचारी के लिए ये सभ्यथा लाग्य है। "जिस प्रकार किम्पाकफल (इन्द्रायण फल) देखने संघनेमें रमणीय है परन्तु विपाक होनेछे तो हलाहल विषमा प्राम का गलना है। इसी भान्ति यह मेथुन भी कुछ काल पर्यन्त रमणीय और सुन्दर सपा मुरादायक प्रतीत होते है, परन्तु विपाक समय यानी अन्त समयमें बहुत ही भयप्रद प्रतीत होते हैं।" "जो पुरुप काम और भोगोंमें विरफ होकर सदा ब्रह्मय- र्यका सेवन करते हैं उनको भावशुदेिके लिए दश प्रसारका मेथुन साग देना चाहिए। क्योंकी इन दोषों के त्यागे विना भावोंमें निर्मलता नहीं आदी । उत्तम भार-ही कामरे वेगको रोक सकता है।" कहा भी है कि-"सर्पसे इसे गए प्राणी के सात येग होते है, परन्तु कामरूपी सर्प के द्वारा इसे गए जीवोंके दा भयानक और बरे वेग होते हैं, कामके उद्दीपनसे पहले पहल चिन्तामें घिर जाता है कि कामय सम्पर्क क्योंकर हो, दूसरे वेपमें उसे देखने इच्छा हो जाती है, दीप निवास लेकर छोडता है, और कहता है कि हाय उसे देय भी न राघ, ४ पर हो आता है, ताप मान पट जाता है,५पिना ही बागके शरीर जलने लगता है. भोजन नहीं रचता, महा मूर्य हो जावो है, कुछ भी पर नहीं प पाता। ८ उन्मत्त यानी पागल सा बन जाता है,वाय याय पाने लगता है, ९ प्राणों घरपना दूभर हो जाता है दया उसे यह संदेश हो जाता है कि में भर जीवित नहीं रहूंगा । मोर दार्ग वेग ऐसा माता है जिससे ।
संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता १४७ वह मर भी जाता है, इनमें व्याप्त होकर यह जीव यथार्थ तत्व अर्थात् वस्तु खरूप को नहीं देखता। जब लोकव्यवहार ही का ज्ञान विदा हो जाता है तव परमार्थका ज्ञान क्यों कर हो सकता है। क्योंकि सब बातोंमें वह बिलकुल अस्थिर बन जाता है "जिसको कामरूपी कांटा चुभता है वह प्राणी बैठने, सोने, चलने, फिरने, भोजन करनेमें तथा खजन पुरुषोंमें क्षण भर भी स्थिरताको प्राप्त नहीं होता । अर्थात् सब अवस्थाओं में डिगमिगाया रहता है।" "कामसे ठगा जाकर मनुष्य चतुर होकर भी मूर्ख बन जाता है, क्षमाशील-क्रोधी हो जाता है, शूर वीर कायर बन जाता है, वडप्पनसे गिर कर छोटा रह जाता है, उद्यमी पुरुष आलसी बन जाता है। और जितेन्द्रिय भ्रष्ट हो जाता है। अतः मूर्खता न करके मनुष्यको मनुष्य जन्म सार्थक बनानेके लिए ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए। क्योंकि तपोंमें उत्तम ब्रह्मचर्य ही तप है।" कदाचारका परिणाम-बैलके नपुंसक बनानेकी क्रिया देसकर, लंपटका राजा द्वारा इन्द्रिय छेदन देख कर, सुधीको कुशील त्याग कर खदार सन्तोष व्रत लेकर परदारका त्याग कर देना योग्य है।" "मैथुनका सेवन किंपाकफलकी तरह आरंभमें अच्छा लगता है परन्तु परिणाममें दारुण कष्ट होता है।" "शरीरमै कम्प, पसीना, थकान या शिथिलता, चक्कर आना, घृणा होना, पौरपेयका क्षय, तपदिक क्षय-आदि रोग मैथुन सेवन से होजावे हैं ।" "योनि-यन्त्रमें असख्य जीवराशीकी उत्पत्ति हो जाती है, और मैथुन करते समय वे जीवित नहीं रह सकते।" वात्स्यायनका मत है कि-"रकम कीडे हो जाते हैं, वे जीव सूक्ष्म होते हैं. और सम्पर्कके समय मर जाते हैं।" मैथुन सेवनसे काम ज्यर घट नहीं सकता-“अनिमें घी डाल- कर अमिको बुझानेकी थाकी चेष्टाकी तरह स्त्रीसंयोगसे काम ज्वर कभी शान्त नहीं हो सकता। अतः निएं भी पर पुरुषको सर्पके समान समझकर उन्हें त्याग दें।" क्यों कि- "ऐश्वर्यमें चाहे इन्द्रके समान हो और मुन्दरतामें कामदेवका अवतार हो तब भी सवारियोंकी दृष्टि में सीताने रावण का जिस प्रकार त्यागकिया इसी प्रकार पर पुरुष त्याज्य हैं।"
. संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता भगवान महावीर का 'श्री आचारांग' और 'कल्पसूत्र' आदि सूत्रोंमें उनके जीवन चरितके अनुसार उनका जन्म क्षत्रियकुण्ड ग्राममें 'ज्ञातवंशीय' और 'काश्यपगोत्रीय सिद्धार्थ क्षत्रिय राजाके घर त्रिशला क्षत्रियाणीकी कुक्षिसे हुआ था। यह ज्ञातृवंश उस समयके प्रसिद्ध ईश्वाकु, आदि क्षत्रियोंके विशाल कुलोंकी तरह प्रसिद्ध 'वंश' समझा जाता था। इस ज्ञातृवंशके क्षत्रिय प्रायः 'ज्ञातृक' के नामसे पहचाने जाते थे। और उनके इस 'शा' कुलके सम्बन्ध से उनके नगरों के बाहर बनाए हुए खड-उद्यानों के नाम भी 'ज्ञातृखंड' के नामसे प्रसिद्ध थे । भगवान् महावीर प्रभुने 'कुण्डग्राम के समीपवती ज्ञातृखंड' नामक वागमे दीक्षा ली थी। शास्त्र वचन तो इसकी खूब ही पुटि करता जिनागममें 'ज्ञातृपुत्र' का प्रतिशब्द 'नायपुत्त' या 'नातपुत्त' के रूपमें और बुद्धागममें 'नायपुत' या 'नादपुत' के रूपमें जिस शब्दप्रयोगका उल्लेख देखेनमें आता है, वह भगवान महावीर के 'ज्ञातृवंश' का ही अर्थसूचक नाम है, इसे मान लेने में हमको ऊपरोक्त कारण मिलते हैं, 'नायपुत्त' या 'नात. पुत्त' में दोनो नाम संस्कृत मे 'शापुत्र' शब्दके ही प्राकृत रूप हैं, और 'नाथपुत्त' या 'नाटपुत्त' ये दोनों नाम भी इसी शब्दके 'पाली' रूप हैं। प्राकृत में 'त' को 'य' और पाली में 'त' को 'थ' और 'थ' को 'ट' मी साधारणतया हो जाता है । दिगम्बर सूत्रोंमें 'ज्ञातपुत्र' का 'नाथपुत्त' इस शब्दको व्यवहत होता देखा जाता है । इस प्रकार भाषा और भावकी दृष्टिसे देखते हुए भी ये सब अलग २ नाम मूल 'शाहपुत्र' शब्दमें मिल जाते हैं । ये सब नाम 'ज्ञातपुत्र' शब्दसे बनाए गए हैं । इसमे शंका करने के लिए जरासा भी स्थान नहीं है। प्राचीन कालमें वंशके नामसे परिचय करानेकी प्रथा होनेसे भगवान् महावीर प्रभुके जीवनविषयक परिचय श्रीजि- नागमोमें और यौद्धागोंमें 'नातपुत्र' या 'नाथपुच' शब्दसे और भगवान् 'महाकोरके शिष्यों का परिचय 'नातपुतीय' या 'नाथपुचीय' शब्दसे विशेषतः दिया गया है।. श्रीजिनागमके १२ अंगोंमें छठवां अग “गायधम्मकहाओ" है, उसमें उपर्युक्त आया हुआ 'गाय' शन्द भी भगवान् महावीरका वंशवाचक "नाय- पुत्त" के साथ गहरा सम्बन्ध रखता है । प्राकृतमें 'न' को 'ण' हो जाना वो १५० वीरस्तुतिः। एक साधारण नियम है। इस अंग का गुजराती अनुवाद भी भगवान महा. 'वीरनी धर्मकथाओ, यह करने में आया है, इस अंगका परिचय धीय- नवायांगसूत्र में किया गया है, उसमें बताया है कि-"इस अंगमें साताओं के नगरोंका, उद्यानोंच, मातापिता का, “इत्यादि परिचय दिया जायगा' यह लिखा है, टीकाकारने ज्ञाताओंका उदाहरणभूत अर्य किया है, परन्तु "ज्ञाता" अर्थात् 'मातृवंशी क्षत्रिय ही भर्थ पूर्वापर विचार करते हुए भपिक निधय होता है। भगवान महावीरकर परिरय श्रीजिनागमोंमें 'नायपुत्त'-'सातपुर' के अतिरिक और नामोंसे भी दिया गया है, सपापि यहाँ पर 'नायपुत' चन्द की ही विशेष प्रधानता रही है। पहुत से प्राचीनतम सूत्रों भगवान महावीर प्रभुन गुण गायान सजन विशेषतः 'नायपु' गन्दछे ही किया गया है- यथा- "न ते सन्निहिमिच्छन्ति, नायपुत्तयोरया" १८ " सो परिम्गहो चुचो, नायपुरेण ताइणा मुच्या परिग्गहो चुत्तो इह युवं मसिगो" २१ "एयं च दोसं दहणं, नायपुत्रेण भासिय सयाहारं न भुंगति, निगंथा राइभोयणं" "एयं च दोस दखूणं नायपुत्रेण भासियं, अणुमायं पि मेहानी, मायामोसं विपत्रए" १९ "एवं से उदाहु अणुचरनाणी, अणुपदंनी जणुज्रनाणदसणधरे, अरदा नायपुचे भगवं वेसालिए विवाहिए" भावार्य-"जो भगवान् 'प्रतपुर अस्पनों पर पूर्ण रायम हैं वे किसी वस्तुसंग्रह नहीं रखते। १८॥ प्रानाश करनेगडे 'सानपुत्र मार भुने रसपान में पहन पटायर मुल्य पानो नमल भारभे ही परिरमाद,सर मर्पिओने काम (a.."
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता १५१ 'ज्ञातपुत्र महावीर प्रभुने कहा है कि मर्यादामें रहनेवाले साधु इस दोषको भलिभान्ति देखकर थोडासा भी कपट पूर्वक झूठ न बोलें ॥ ४ ॥ इस दोपको देखकर निर्घन्य रात्रि भोजन छोडदे, क्योंकि 'ज्ञातपुत्र' ने इसके दोष प्रत्यक्षमें बताए हैं। "इस प्रकार अनुत्तरज्ञानी अनुत्तरदर्शन युक्त अर्हन् प्रभु 'ज्ञातपुत्र' महावीर विशाला नगरमें इस प्रकार व्याख्यान करते थे ॥ १८॥" इन प्रमाणों के अतिरिफ इस अध्यायमें तो २-१४-२१-२३-२४ की गाथाओंमें प्रभुकी स्तुति 'ज्ञातपुत्र' शब्दका ही संकेत रखकर की गई है। इस तरह श्रीजिनागमके प्रमाणभूत ग्रन्थोंमें 'नायपुत्त' या 'नातपुत्त' को भगवान महावीरके वंशवाची नामका उपयोग अनेक स्थलो पर पुष्कल रूपमें किया है, इन सब शब्दप्रयोगोंके उद्धरण करने की यहां जरासी आवश्यकता भी प्रतीत नहीं होती । मात्र हेमाचार्य ने परिशिष्टपर्वमें जो 'शातनन्दन' भगवान् महावीरको वंदन किया है उसीका यहां उद्धरण देकर अगाडी बढ़ चलेंगे। उन्होंने मंगलाचरणमें कहा है कि-"जो कल्याण वृक्षोंका बगीचा है, श्रुतिरूप गंगाका हिमालय है, विश्वकमलके लिए सूर्यकी भाति है उस ज्ञातनन्दन महावीरको में नमस्कार करता हूं।" बौद्धपिटकोंमें भगवान महावीर का अपना उनके शिष्योंको और उनके सिद्धान्तों का परिचय उनके वंशवाची 'नाथपुच' या 'नाटपुत्त' के शब्द- व्यवहारसे ही दियागया है। उनके भ्रमण निर्ग्रन्थोंके लिए 'नाथपुत्तीय' शब्द का उपयोग किया गया है । इस नामके अतिरिक भगवान् महावीरके जीवन सम्बन्धी परिचयके लिए अन्य किसी शब्दका प्रयोग किया हो यह देखने में नहीं आया, सिर्फ 'नाथपुत्त' के साथ 'निरगंठ' शब्द का प्रयोग हुआ है । मगर वह शन्दतो उनकी साधु अवस्थाका सूचक है। और.वह 'नाथपुत्त' शन्दका विशेष्य न हो कर एक विशेषण है।
१५२ वीरस्तुतिः। - इससे प्राचीन कालमें 'वंशवाचक नामसे परिचय देनेकी प्रथा स्पष्ट जानी जा सकती है। महात्मा बुद्ध भी उनके मूल नाम "सिद्धार्थ" की अपेक्षा उनके 'गोत्रसूचक' नाम "गीतम" के नाम से और 'वंशसूचक' "शाश्यपुत्र" के नागसे अधिक प्रसिद्ध थे। । भगवान महावीरका वंच 'ज्ञातृवंश' था और इस ज्ञातृवंशसे उनका 'पंशसूचक' नाम 'नायपुत्त प्रसिद्ध हो गया, जिसे हम ऊपर देस गए हैं। मगर इस वंशका अगाडी चलकर कितना विस्तार और कितना विनाश हुआ इसका इतिहास प्रायः लुप्त है । इस लुप्तप्रायः इतिहास का शोध करना 'अत्या- वश्यक' है । इस इतिहास को वलाश करने के लिए हमारे पास बौद्ध साहित्य एक अनन्य साधन है। भगवान महावीर' और 'महात्मा बुद्ध' ये दोनों एक समयके समकालीन धर्मक्रान्तिकारी महापुरुप होगए हैं। तदुपरान्त वे दोनों एक ही देशके निकटस्थ प्रान्तके निवासी राजवंशी पुरुष थे इन कारणोको लेकर महात्मा बुद्धको एक प्रान्तसे दूसरे प्रान्तमै विहार करते हुए भगयान महावीरकी जन्म भूमिमें जानेका और वहां भगवान महावीर के वंश-सम्बन्धी लोगोंके साथ वार्तालाप करनेका प्रसंग प्राप्त होना यह एक स्वाभाविक बात है। "बुद्धपिटक' के 'महावग्ग' नामक सूत्र में म• बुद्ध भगवान महावीरकी जन्मभूमि कुण्डग्राममें और उसके पासमै 'ज्ञातकों के प्रामोंमें एवं वैशालि नगर जानेका और वहा 'निर्भय थावक' 'सिंह' सेनापति के साथ यातचीत करनेका उल्लेख मिलता है। इस उल्लेखके आधार पर भगवान् महा- वीर का 'ज्ञातृवंश' और उनको जन्मभूमिके विपयमें हमको बहुत कुछ परि- चय मिलेगा। इसी धारणासे ये उस उतारने उचित प्रतीत हुए। *अथ भगवान् जहाँ कोटिप्राम या वहां गए, वहां भगवान कोटि- माम में विहार करने थे, r * देखो, विनयपिटक महावग्ग पृ. २४१-'कोटिप्राम, संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता अम्बापाली गणिकाने मुना कि भगवान् कोटिग्राममें आगए । अम्या. पाली गणिका मुन्दर-मुन्दर (भद्र) यानोंको जुड़वा कर, मुन्दर यान पर चढ़ कर, सुन्दरयानों के साथ वैशालिसे निकली। और जहां वह कोटिग्राम था वहां चली तब वह लिच्छवी' जहां कोटिग्राम था वहां गए । “एक समय भगवान् बुद्ध नादिक (ज्ञातिका) के गिजिकावसथमे विहार करते थे" मज्झिमनिकाय पृष्ट १२७ चुल्ल-गोसिंग-सुत्तन्त वैशाली कोटिग्राममे इच्छानुसार विहार कर जहां पर वैशाली का महावन है वहां गए, वहां भगवान् बुद्ध वैशाली महावन की कूटागार शाला में विहार करते थे। उस समय बहुतसे प्रतिष्ठित 'लिच्छवि' संस्थागार-(प्रजातन्त्रसभागृह ) में बैठे थे । वे सब मिलकर बुद्ध का गुण बखानते थे। धर्म का, संघ का, गुण बखानवे थे, उस समय निग्गंठों का श्रावक (जैनों का श्रावक) सिंह सेनापति उस सभामे बैठा था ।........... ......तय सिंह सेनापति जहां 'निग्गंठ नाथपुत्त' थे वहां गया, जाकर 'निग्गंठ नाथपुत्त' से बोला कि भंते में....... सिंह ? तुम्हारा घर दीर्घकाल से निगंडों के लिए प्याऊ की तरह रहा ...." ...... .......... उस समय बहुतते निगंठ (जैन साधु) वैशाली में एक ............. चिरचलते यह आयुष्मान् (निगठ) बुद्ध.......... • "विनय पिटक' 'महावग्ग' तथा 'मज्झिम निकाय ने आए हुए इव उल्लेखोंसे हमें साफ २ मालूम हो जाता है कि 'महात्मा बुद्ध महारसा ......
-- १५४ वीरस्तुतिः। की जन्मभूमि "कुण्डमाम'-पाली भाषामें 'कोटिप्राम' में गए थे। और कुण्ड- प्रामके पासपी बसनेवाली वैशाली नगरीमेसे वहां महात्मा-बुद्धको अम्या- पाली नामक वेश्या और लिच्छवीक्षत्रिय मिलने आए थे। कोटिप्राम से म० बुद्ध जहां 'भातिका' 'ज्ञातृक' रहते थे वहा गए थे। और वहां 'जातिको शातकोंके "गिजिकावसथ'-इंटोंके घरमें ठहरे थे। इस स्थानके पास ही एक अम्बापालीवन नामक उद्यान भी रहा है जिसे अम्बापाठीने युद्ध और उनके संघको समर्पण कर दिया था। वहा से म० युद्ध वैशाली गए और वहां सिंह नामक सेनापति जो कि निम्रन्थोंका भावक था, उसे अपना अनुयायी बनाया, सिंह सेनापति महारमा बुद्धको मिलने जाने से पहले निर्ग्रन्थ शातपुर महा- वीर प्रभुके पास अनुज्ञा लेने आया या। तब भगवान महावीरने सिंह सेनापति को "तू क्रियावादी हो कर अक्रियावादी यमण गौतमके पास उसे मिलने क्यों जाता है ! यह कह कर न जानेकी सम्मति दी थी" । परन्तु वह अपनी इच्छानुसार श्रमण गौतमके पास गया और वह वही थम गौतम बुद्धका अनुयायी होगया । उपरोफ उल्लेखसे हमारे विषयको पुष्ट करने वाली चार पातें जानने को विशेष तया मिलती हैं। (१) बौद्धोंका कोटिप्राम* ही जैनोंका कुंड प्राम मालूम होता है, इन दोनों नामोंमें शान्दिक सारश्यके अतिरिक्त उस प्राम के पास 'शातृक-शा शके क्षत्रियोंका निवास स्थान और वैशाली नगरीकी निकटता होनेके कारण ये दोनों वस्तुएं "कुण्डमाम' और वही 'कोटिप्राम' होने की मान्यता पुष्ट हो जाती है। (२) कोटिप्रामके पास ज्ञातृकों का निवासस्थान, भगवान महावीरका चंच 'शातृवंश' था यह और भी पुष्ट कर देता है, और साथ २ कुण्डमारके, आस पास 'शातृक-शानृवंच के क्षत्रियोंके संड-'उद्यान' थे, और यहां * बौद्धमन्याम कुंडग्रामका नाम कोटिगाम और म. म. को शाति- पुनके स्थान पर नातिपुत्र लिखा है। देखो "भारतका प्राचीनराजवंश" पृष्ठ ४.विश्वेश्वरनाथ राय ॥
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता 'ज्ञातृवंशी क्षत्रिय रहते थे। यह इस विचारको और भी बढ़ कर देता है । यह "ज्ञातृक" का उल्लेख और ये 'ज्ञातृक' म. महावीरकी जन्म जातिवाले 'ज्ञात' क्षत्रिय ही होंगे यह कल्पना की और निर्देश करता है (३) 'ज्ञात' जाति लिच्छविओंकी एक शाखा थी* इस बातकी पुष्टिके लिए भी 'वैशाली के लिच्छवी क्षत्रिय महात्मा बुद्धको मिलने आए थे। इस उल्ले. ससे पता चल जाता है कि भगवान महावीर की माता भी लिच्छवि वंशकी ही थी और "सिंह सेनापति' जोकि-भगवान् महावीर का श्रावक था वह भी लिच्छवि वंशका ही था। ये दोनों बाते ज्ञात जातिको लिच्छविओंकी शाखा का होना ही पुष्ट करती है। (४) कुण्डप्रामके पास विदेहकी राजधानी वैशाली नगरी थी । इस नगरी का कुण्डपाम एक शासापुरके ममान था। भ० महावीर प्रभुका "वैशा- लिक" नाम भी इस नगरके नाम से ही प्रसिद्ध था, विशाला नगरी में सिंह सेनापति नामका जो निमन्थ श्रावक लिच्छवी रहता था वह भगवान् महावीर की सलाहको न मानकर महात्मा बुद्धके पास गया था। इससे भी महात्मा बुद्ध वैशाली नगरमें आया था तब भगवान महावीर प्रभु भी उसी नगरमे थे, यह स्पष्ट जान पड़ता है। ऊपरके उल्लेख में जो 'आतिका' शब्द लिखा गया है, उस शब्दका मूल बहुतोंने 'नादिका' भी निकाला है, और उसका अर्थ 'इस नामके जलाशयके तट पर बसा हुआ एक ग्राम किया जाता है । मगर यह भ्रमपूर्ण है। इस प्रकार हर्मन जेकोबी उसका मूल शब्द जातिका ही बताता है। और वह शब्द 'ज्ञातृवंश' के क्षत्रियों का वाचक है यह कह कर समर्थन करता है। । * प्रसिद्ध जैन तीर्थंकर महावीरकी माता भी लिच्छवी वंश की ही थीं। देखो 'भारतका प्राचीन राजवंश पृ. ३७८ लेखक विश्वेश्वरनाथ राय । + हर्मन जेकोबी की 'Sacred Books of The East' नामक अन्यमालासें प्रकाशित 'आचारांग और कल्पसूत्र' नामक जैनसूत्रों के अनुवादको प्रस्तावना, पृष्ट १०.
चीरस्तुतिः।
इस जातिका शन्द पर त्रिपिटनाचार्य योयुत राहुललापन ने इस
पर विशेष प्रकाश डालाई । उसने अपनी 'युश्च नामक हिन्दी पुखरने
'नादिका' का मूल ग्रन्द "नाटिय"-शातरम, पताया है। और शाना'
शब्द सावंाके क्षत्रियोंग सूचक है यह सप्रमाण पताया है। वे भगारी
परकर यह भी पता है कि-सानु जाति लिपियोंकी पायौ । और वैशाली
नगरीके पार पाच ही रहने वालीथी। यह मान जाठि भान भी शालीनगरी
(जिला मुजफ्फरपुर के अन्तर्गन है, रसाइके पास) फेनास पासपपरिया नामक
जातिसे पहचाना जाता है, यह जरिया बन्द भापारी दान भी 'मनु'
पारके साथ गहरा सबंध रखता है।
जपरिया पन्द 'शाद' चन्दा अपभ्रंश धन्द प्रतीत होता है।''
सदले जथारा अन्दा अपवरण सि प्रसर होगा इसके विरमें
राहुलजीने भाषा से निप्र प्रमाणसे विरार किया है । शानु मावि, -
सातर-जावर-जतरिया-जपरिया-उपरिकार गांवमें नारिका-शा-ति-
राधिका-रतिस-रवी जिसके नानछे पर्वमान मी पर्गना (जि० गुफरपुर)
है । पुरचा २५ पृ.।
হন্ত থাকাে’র ‘sঝ খায়ই দেয় বন বা
भासमूल नाम अपने उपरोक उसमें आए हुए 'नादिफा ३.६ मे गति
पनाते हैं।
*उघ समर पमै भारी निगोड़ी पर (न पrysiaमाव) के
साप निगंड नोटपुत्त (महागीर) मालदा हा निकाम पर थे।
(.)नारपुत'-'पुर विधियों या कीबोयाबी
के भाग पा रददीभी। सासे ही रवमान यात्रामा
और जरिमानोन गोष । बार भी पायाभूना माग
संस्सा है। उन दिसाय तो वनामो रनधीनी-
रामसमे
11 नियंठ पुराय भी उaanti.नि. ४.1016
से स्वपि
। 1 संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता १५७ इस प्रकार 'जथारया' और उसका वर्तमान निवास 'रती ये दोनों शब्द 'ज्ञात' शब्दके साथ घनिष्ट संबन्ध रखते हैं और इस सबन्धसे 'जथरिया' 'मातृक'-ज्ञानृवंशी ही हैं, और उनका प्राचीन निवास स्थान जोकि 'नादिका' या 'नाटिका' के नामसे पहचाना जाता था वही वर्तमान रती परगना है यह राहुलजीका दृढ मन्तव्य है । इनके इस दृद्ध और पुष्ट मन्तव्यमें दूसरी यह भी युति है कि-इन 'जथरियोंका' मूल गोत्र काश्यप है। वही काश्यपगोत्र भगवान महावीर और उनके ज्ञातृवंशी क्षत्रियोंका भी था। इन जथरिया-शातृवंशी क्षत्रियोंके विषयमें सूचना करते श्री लजी बताते हैं कि ये 'जथरिया' लोक वर्तमान समयमें अपनेको ब्राह्मण बताते है। ये दान नहीं लेते। पंजाब प्रान्तमभी जमना नदी के किनारे बसने वाली एक जाती रहती है । वे भी दान नहीं लेते। उस देशमें उनको तगा कहते है। शायद यह त्यागीका अपभ्रष्ट होगया हो। हां तो इन 'जयरिया जाति के लोकों को भूमिहार ब्राह्मण कहा जाता है । मगर और लोक इनको ब्राह्मण नहीं मानते। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि वास्तवमै ये लोक क्षत्रिय ही हैं। इसका दूसरा कारण यह भी है कि-ये 'जधरिया' नाम सिंहान्त चाले हैं। जो क्षत्रियों के नामके साथ आजम्ल पीछेसे लगाया जाताहै और इनके नामके पीछे ठाकुर शब्द भी जोडा जाता है। यह भी क्षत्रिय सूचक ही है। इस वंश आजकल भी बहुतसे जमीन- दार और राजा भी हैं। दर्भगा नरेश इसी जातिसे अलंकृत मुने जाते हैं। बौद्धसाहिलके उल्लेखोंसे तथा राहुलजीके कथनसे इतना अवश्य माना जा सकता है कि भगवान् महावीरका वंश 'शातृवंश' था। और वे ज्ञातृवंशीय क्षत्रिय कुण्डमामके पास रहते थे। और इन ज्ञातृवंशीय क्षत्रियोंके प्राममे महात्मा युद्ध आए थे। वर्तमान समय में ये ज्ञातृवंशीय क्षत्रिय 'अथरिया' के नामते प्रसिद्ध है । और ये प्रायः विहारप्रान्त के मुजफ्फरपुर जिलेके रत्ती नामक पर्गनेमें रहते हैं। और ये 'जयरिया' अपने नामके पीछे सिंह और ठाकुर शम्दवा उपयोग भी करते है। और काश्यप गोन होनेते भातृवंशीय क्षत्रिय हो सकते हैं । मगर वे लोक आइफल अपनेको भूमिहार ब्राह्मण कहते हैं। वस्तुतः इसके पीछे सल सरूप कहाँ एक छुपा हुआ है इसे शोध करके प्रकट करनेकी यी ही आवश्यकता है, इस सत्य शोधसे भगवान् महावीर प्रभुके - वीरस्तुतिः। , झा-बस और उनके जीवन के सम्पयश पहुतसा अज्ञानान्धर जोश भरने आसपास फैल गया है यह अन्धयर दूर हो जायगा। गुजराती अनुवाद-पोतानी तेमन श्रन्यनी पूर्ण उचति व्या भसाईने माटे जे परोपकार दृष्टियी भारयमा भावे देने 'दान' कहे , अथवा वस्तुपरथी पोतानो अधिकार छोडी दईने मीना कोईने अधिकार भापको वे पण 'दान' कहेवाय , परन्तु अहीं तो पसा बने प्रवीतिनी साये मकि-भाव पूर्व परिरह परनो ममत्व-भार छोगेने कर्मोनी निर्जरा सरासर अनुरम्पाभी तथा मन-वाणी-कायनी शुद्धि सहित फलनी इच्य वगर दाता जे प्राशुरु अने पपिन पतु आपके देने 'दान' कहे छ। ते दानना चार प्रकार-अपदान-औषधदान-अभयदान भने शान- दान, ए दानोमा माणिोनो भय दूर करी ने गश निर्भर करमा सर्वोत्तम दान मनाय । बने आ मानवदेहमा दश प्राण छे, वेभी 'पाणी' कहेवाय छ, जीमित रहेबानी इच्छा अथका जीवित रहेकानो वेनी सभार सेवाथी तेनु नाम 'जीव' पण छ, भने ए दस प्राण दम्य प्राण हे, असे ज्ञान-दर्शन-गुव-शक्ति रूप अनन्त-मनुष्टय भार प्राण गे, वासविक ये प्रो कालमा आप्राणोथी सदाभा जीव जीवित गे, सर्व जीवो जीयरानी इच्छा रासे छ, मखं कोई इचाको नमी, ठेगी जारित रहेपानी इदाराळाने अभय दान दईने तेनुं सर्वप्रपरे रक्षण कर थेट छ। कोने साया दिलथी अभयदान पण आयुं होत तो आ जीयनी मोक्ष पर जात, परन्तु आत्माने शानदान न मळाची पोताने जीववा- सायं रामपीरा जीवोने पर जीच पिएभान भुलायी लाइए का पर- "ते मने मा जीवन प्रिय छ, म अन्य जीवोने पण पोटात जीवन प्रिय छ, सर्गमा रहेनार इन्द्र मज विधानोगे, महलमा बसनार भूपति गज इंगमैनो रहनार गरीर स्टोआरो, एक जीवा, वेन राम ने कोई पण प्राणीमा मन नामा प्रायने पप निरनोर"। मदिसा परम धर्म डे-अहिया-परम धर्म ,ईना सर्व कामाए निदार, पीताने पर पारे अप्रिय ,वो बीमाभाने पण अस धनिय छ, कारण के पोटानी टेमर परनी मनोदशामा अन्दर नमी, देवी पर मनुप्पोनी पदामा भाषना रहे ऐसे कोई पर प्रघरे जगाहा मोरयान संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता कर । भलाई करूं, परोपकारमा हुँ पोवे लाग्यो वळग्यो रहुं ने वीजामोने लगा- डवानो प्रयत्न करूं । मारामां लेशमान पण दोष न रहेवा दऊ ने बीजाओने निर्दोष बनाववानो पण सतत प्रयत्न करूं। आत्माना अनन्त सुखथी सुखी बनी थीबाओने मुखना स्थान पर लई जाऊं। जो कोई प्राणी भा भावोथी विपरीत चालीने, लोभना दास बनीने, जीभनी लालच जाळमा फसीने, द्रव्योपार्जननी इच्छाधी, लडाईमा विजय मेळ- ववानी इच्छा थी, पोताना मनने न्हे कारवाना हेतुए, निरपराध दीन-प्राणिओनी "हिंसा' करे के सारे तेनाथी उपार्जन करेला पापधी दूषित थईने, ते खार्थीने नरकमा अवश्य जवू पडे छ, आ सिद्धान्त सर्व महापुरुषोंने मान्य छ, बधाए तेने उच्चकोटिए पहोंचाडवानो प्रचार का छे, महर्षि पतंजलिए' तो तेने सर्वथी मोठं स्थान आप्यु छे, पाच यमोमां सौथी प्रथम 'यम' जीवरक्षा छै; "क्रोध-लोभ-मोहने लीधे हिंसा करवी, कराववी, अने अनुमोदवी तेने वितर्क कहे छ, भने ते पापर्नु परिणाम वेमना मते अनन्त दु.ख बतायवामा भाब्यु छ।" कोई जग्याए तो अहिंसानी प्रशंसा एटले सुधी करवामां भावी छे के प्रापिओनी साये वैर भाव पण त्यागी देवो जोइए । लारेज साधक अहिंसा साधी शके छे। श्रीमद् उमास्वामीए-तत्त्वार्थस्यमो कंधु छे के "जे कोई जीव प्रमाद अर्थात् असावधानता युक्त थईने मनो योग-वचन योग अने काययोग द्वारा प्राणोनो अतिपात' वा 'व्यपरोपण' करे छे तेने हिंसा कर कहे छ। हिंसा करवी-मार-प्राणोनोअतिपात त्याग अथवा वियोग करवो, प्राणोनो वध करवो, जीवने कायथी अलग करखो, भवान्तर अथवा गलन्तरमा पहों. चाही देवो, अगर प्राणोन व्यपरोपण करवं, ए बधा शन्दो एकार्थवाची छ । जो कोई जीव प्रमारी अर्थात् मद विषय-कपाय निद्रा भने विश्थाने पर थईने एवं कार्य करे, पोताना वा परना प्राणोना व्यपरोपणमा प्रात्त बने, लरे ते हिंसक हिंसाना दोपनो भागी कद्देवाय रे, प्रमादनो लाग करीने प्रवृत्ति कर- बावालना शरीरादिकना निमित्तथी को कोई जीवनो वध पई जाय तो ते दोनो भागी कहेवावो नथी । एटले 'अप्रमत्त' अवस्थातुं बीजं नान 'अहिंसा' ।
वीरस्तुतिः। . तदुपरान्त 'योगशास्त्र ना न्यासन भाष्यमा अहिंसानी म्यारया आ प्रमाणे करवामा आवी छे। के "सर्वदा सर्वप्रपरना जीवोनी गाथे कड़ी पण द्रोह न करवो ठे अहिंसा छे। यासयत्स्य-स्मृतिमा कपुंछ के मन, वचन, कायधी कोईने पपलेश न पहोंचाडवो तेज 'अहिंसा'छे। अहिंसा-सत्व-भासा विना पर पछ न ठेवी, सामाने पपिन रारको; इन्द्रियो, दमन कर, दया पाळची, मनोविकारना प्रवाहने रोकयो, शान्तिमय जीवन जीवयु, ए चधाने धर्मसाधन वताववामा भाम्यु छ । यजुर्वेद-वेमो पण उपदेश भारपामो भायो छ. के-हे पुरुष! तूं जगन्ना कोई पण प्राणीनी हिंमा करीश महि। "मित्रा चापा सर्ग भूलानि समीझे" 14-1, पोतानी आंसोधी सर्वने मित्र रहिए जोरा जोदए । अनु जेवी दष्टि कोईना पर पण न करवी । मनुनो पांचमो अभ्याय-"वे मनुष्य पोताना कल्याणनी तो इछा प्रगटकरे छ, परन्तु माश-भूत जीवोनी हिंसा करे . ते जीव आलोकमो, भने मरीने परलोकमा क्यारे पण गुष भेळची शाशे महि । दशधर्म-"धैर्य धारण कखं, शान्ति पसबी, आत्माने पापो विरक बनायको, चोरी न करवी, भान्तरिक पवित्रता परामी, इन्द्रियोने पत्र करवी, सल पोलयु, कोष न परवो, अहिंसा पालन खं, भारभ भने परिमाने मुकला ए प्रयरे धर्मना दश लक्षण बतायेा छ।" महाभारत-" हुं सस पहुं हुं के पलवादियोनो धर्म अहिंसा के. अने ते प्रधान है, अने हिंसा करवी, ए अधर्म छ, पाप। अहिंसापचनामृत-अहिंसा परम धर्म , मईया उत्तर दमन छ, थाहिंमा उत्कर दान , अर्हिसा प्रधान तप छे, महिंसा परन यश, बगा परम पळणे, माहिया परन मिर, दिसा उपट गुग छ अहिंसा एक उत्तम जीमना "सर्व प्रमरना याना अनेक प्रसवं दान करसं, पर दीना पने सातिओ गायी, सूर्य दानानं फार अदमा करटो साई नदी, पटके में भाई सानी साधे परापरी करीनी।"
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता १६१ नियमसार-कुलस्थान, योनिस्थान, जीवसमासस्थान, मार्गणास्थान, इत्यादि भेदोने सारी रीते जाणीने जीवरक्षा करवाना भावने 'अहिंसा' कहे छ, जीवोनें मृत्यु थाय छे के नहि, ए प्रकारना विचारमा लागेला परिणाम वगर पाप-हिंसारूप क्रियानो त्याग यवो कठिन छे, तेथी दे रक्षाना प्रयत्नमा लागवू, 'अहिंसा' छ। समन्तभद्राचार्यजीन कथन छ के-जगत्मा भा सर्व नाणे छे के 'अहिंसा परब्रह्म स्वरूप छ, अर्थात् आत्मानी पूर्ण वीतरागताज 'अहिंगा' छ । ज्यां वीतरागता ठे त्यो आत्मानुं शुद्ध-सरूप छे, जे आश्रमना चरित्रमा अणुमात्र पण आरभ नथी, त्यां आ 'अहिंसा' प्राप्त थाय छे। भाशय ए छ के आदर्श पुरुपोर्नु मुन्दर वेमज सचरित्र का आचरण 'अहिंसा' छ। तेथी अहि- सानी सिद्धिने माटेज परम दयालु प्रभुए आरम्भ परिग्रहनो त्याग को छ । प्रभु विकारशील देश तेमज परिग्रहमा अनुरक्त नथी । कारण ज्यां परिग्रहनी आसक्ति नथी त्यांज ऊंचा प्रकारनी अहिंसा-धर्म छ जैन धर्मनी जय' ते माटे बोलवामां आवे छ के केमा पूर्ण अहिंसानुं पालन करवामां आवे छे, ते त्रस जीवोनी घात करवावाळा विचारोने जडमूलधी नाश करवानुं कारण छ । तेमज पंचकायरूप एकेन्द्रिय जीवोनी घातथी पण तद्दन पर छे । अहिंसा प्रणे लोकना जीव समूहने मुख देनारी छ । तथा सुन्दर बने अक्षय सुखथी भरपूर समुद्र समान अगाव छ। सर्वथा अहिंसानू पालन करयु, ए मुनिओनो धर्म छ, कारणके हिंसा- परिणाम दुःख जनक छ, एम महापुरुपोए महान् अनुभवथी बतान्यु छ । “पगे लंगडोछे, शरीरमाथी रक्त पित्त वहे छ, हाथ कपायेला छ, तेमज अन्य अनेक रोगथी भरपूर छ, तेने जोईने समजी लेबु जोइए के आधुं दारुण दुःख अन्य प्राणिओनी हिंसा करवाथी तेने भोगव पड़े छे। आधी निरपराध जीवोनी संकल्पमात्रथी पण हिंसा न करवी । ए चनुर पुरुषोनु कर्तव्य छे।" सुख दुःखमा, भला बुरामां, युक्त भयुक्तमा, पोताना जेवा अन्य मामा- । ओने समजीने क्यारे पण कोईनु "हिंसारूप' अनिष्ट न करj । लोकोर्नु मन्तव्य-लोकोनुं आ मन्तव्य छ के-धर्मना संपूर्ण अंगो सांभळीने, मनमां विवेक राखीने तेनो निर्णय पूर्वक श्रा सार छे के ज्यारे मने बीर.११ १ . . वीरस्तुतिः । माराधी प्रतिकूळ सारं नधी लगवं सारे पीजाओने तेमने प्रतिकूछ क्याथी सारु लागे? "वधाने पोतानो प्राण प्रिय छे राज्य नहि"-पोताना प्राण अचादवानी तर इट मित्र अने राज्यने पण तृणनी समान धोम देछ, तेथीज कोईना प्राणनो नाश करवाथी जे पाप धाय . वे समस्त पृथ्वीनुं दान करवा छतो दूर भई शयातुं नथी । मरनारने भले राज्य आपो के मुवर्णना पहार अर्पण करों परन्तु जीय- तरनी पासे ते वस्तुओनो कंह हिसाप नथी। तेथी ते सर्वने छोरीने जीयता रहेबानी अपील करे छ। "जरा काटो पगमा लागे छ तोते माया शरीरमा भारे पीस करे तो जे निरपराध नीकोने मोनने भारे पहोंचाही देणे, ते मरनारना योनी वेदना अनियंचनीया" "अचरण, निरपराध, दुलपाणी पलवानना हाये मराय छ, वे यांनी नीति ? हाय ! काटनी साधे अमारे कहे पर छे के जगत्मा अराजकता व्यापी गई, त्या न्यायने स्थान क्योधी मळे, जो कोई कोने रोभळावे "तुं मरी जा एम सांभळनार पण भा सांभळनाज कंपो उठेछ, शरीर भय- भीत बने दुःखी थई जाय छ। तो जे पीजाने कठोरता पूर्वक पालथी मारे त्यारे वेनी शी दशा धनी हो! देना दुःसना अनुभव घगर तेर्नु वर्णन फोण करी घो?" "हायचं कपायुं सार ऐ, पग वगरना रदेवानां पण सरायी नमी, पण घरीरना सम्पूर्ण अंगोने प्राप्त करवा तो हिमपुरुष', को कामनी नथी।" स्वार्थ साधयानी हिंसा पण हानिकारक रे-"रिमनी शान्तिने माटे करेली हिंया पण रिमने माटे पाप । पणाओ एम कहो - बमार पुलमो ा रिवाज चान्यो आछे । परन्तु ते मुलनुं जगर मई परी शरतो नथी। ते युरना ना माटेज माय शान्तिने मारे महि । पोताना शमा परम्परागत वाली आवेली हिंसाने से प्राणी , अने शुख दिपक बने , ते 'अनसूर कसाई ना पुन 'मुलपानी ऐ3 मयं मनुप्पोमा पवित्र भने धेठ बने ।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता "जे इन्द्रियोने तो वशमा राखे छे, देव-गुरुनी सेवा पण करे छे, यथा शक्ति दान पण आपे छ, तत्व भणे भगावे छे, तप पण करे छे, पर्ण धर्म थुद्धिए जरा पण हिंसा की वेसे छे त्यारे तो तेनी उपरोक्त सर्व कियाओ निष्फल छे, तेथी साबित थयुं के धर्मना नामे करवामां आवेली हिंसा वज्रलेप समान भयंकर पापकारिणी छे।" "अने जे शास्त्रमा धर्मना नामे हिंसानो उपदेश करवामां आव्यो होय ते शास्त्र नयी पण शन्न समान छ।" "ए केर्बु आश्चर्य छ जे मनुष्य मुद्धाने मारधानो उपदेश देवावाळा, लोभान्ध बनी पथ भ्रष्ट बनवावाळा, हिंसा विधायकशास्त्र वनावीने तथा पाप करवानो उपदेश आपीने लोकोने मूर्स वनावी रह्या छ, अन्यश्रद्धालु बनावीने मानो नरकना कुंडमा नाखी रह्या छे!" अहिंसानु माहात्म्य-"अहिंसा मातानी जेम सर्वतुं पालन करनारी अने हितकारिणी छ । अहिंसाज शत्रुओना मनमा अमृत संचार करावनारी छ । अहिंसा दु.ख रूपी दावानलने वुझाववामां अमोल अने प्रधान वर्षा छ । संसार भ्रमण अर्थात् जन्म मरणना रोगधी पीडित जीवोने आरोग्यता अपनारी समर्थ ओपधि छे।" अहिंसान फल-"दीर्घायुष्य-पवित्र अने सुन्दर रूप-नीरोगता-संसा. रमा निर्मल यशः कीर्ति इत्यादि सामग्रीओ अहिंसा पालनथी ज मळे छे, अधिक कहे,, अहिंमा सर्व मनोरथ पूर्ण करवावाळी आदि शक्कि छ।" कोईए ठीकज कहुं छे के-"पर्वतोमा सुमेरु-अमृत पीनारामां देवता, मनुयोमा चक्रवती, ज्योतिप चक्रमां चन्द्र, वृक्षोमां ठंडी छाया आफ्नार फळदार अशोकक्ष, ग्रहोमा सूर्य, जळाशयोमा समुद्र, सुर असुर मनुष्य तथा चक्रवतिओमा वीतरागनी समान सर्व व्रतोमा पण अहिंसा व्रत सर्वोत्तम छ । ते व्रत अनुपम छ।" निष्कर्प-आ सर्व शाम्रोनो विचार करतां ए खयमेव सिद्ध थाय छे. के हिंसा सर्व शालोमा वर्ण्य वतावी छे । जैनोए तो, तेनुं नाम 'प्राणातिपात' का छ। नो भाशय ए छे के कोईना एक प्राणने प्रण निरर्थक दुःख न; देखु जोइए। साधु मुनिराज तो तेनुं सर्वाशे पालन करे छ। भने गृहस्थ तेनुं अमुक अशे पालन करी शके छ । .
वीरस्तुतिः। "पोतार्नु जीवन सर्व कोईने यी वस्तुओ करता अधिक प्रिय छे, जैन कयुं छै के-"जो मरनारने एम कहेवामा आवे के तुं एक करोड सोनामहोर लईने तारो जीव दई दे । सारे ते धनना ढगलाने छोटीने जीवानी आशा प्रगट फरशे । कारपके जीव गया पछी देने माटे धन शा कामर्नु ! सर्वने जीवयुं वहालं लाने छ । तेथी सर्व दानोमा अभयदान श्रेष्ठ है। अभयदान पर उदाहरण-वसन्तपुरमा अरिदमन नामे राजा राज करतो हतो, ते पोतानी चार रानिओ माघे आनंद भोगवतो। एक दिन ते राणिओए गायें, वजाव नाचवू शरु कयु । राजा वेमनी गांधर्व विद्या ऊपर प्रसन्न यई गयो भने बोल्यो के "आजे तमे जे कई मागशो वे हुँ आपोश।" राणिोए जवाब आप्पोके अलारे तो अमने कोई पण वस्तुनी आवश्यकता नथी, पण यथा समय कार मागी लदरा, अमने आपेल बरदान हमणो आप जमा राखो, राजाए कम्यु "बहु सा" एक बार राणीओए एक चोरने चोयो के जेने लाल कपड़ों तथा जोडानो हार पहेरावीने वध्यभूमि तरफ सई जयामो आयवो हतो । राणीओनी साथे राजा पण महेल पर टेलतो हतो। चोरने जोईने राणीयोए राजाने पूछयु के प्रजानाय ! "वाणे सो अपराध कर्यो ?" रागाए एक विराईने बोलावीने पूछ्युं । तेना जरापमा देणे कायु के-पृथ्वीनाय ! वेगे चोरी जे राज्य वेमज धर्मविरुद्ध अमर्य कयु छ, तभी आपेज ठेने प्राणदंडनी शिक्षा फर्मावी छ। ते सांभळीने तेमांनी एक राणीए क के न्यायवरम ! बाप मने मार्क वरदान आपो के तेने एक दिवसने माटे जीवनदान आपवामा भाये, के जैथी हुँ देना पर कडक उपकार करी कुं" राजाए मयु "तथास्तु" राणीए ने महेलमा बोलावी कपुं के "तने भानने माटे याची दीको ॐ माटे सा पी ने मोजकर" एन कहीने मम वनधी ते सागत परवामी आम्युं । रबार या ठेने 1... दीनार भापीने विदाय करवामी श्राम्यो । एरीते पीजी अने प्रीबी राणीए पम एक एक दिवगर्नु गीवित दान दईने अनुक्रमे एक स्परा भने एक करोड मोनामहोरदं दान भाएं। पण चोथी राणीए तेने पन आन्या कर देने मा दंग्नी ममा राजानी पाले क्षमा करावी दीयी। लारे संगीने ते प्रगए कर "एवं ।
। - संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता आप्यु ?" चोथी राणीए का के "मैं तेने ए वस्तु आपी छे के जे तमे बधी मळीने स्वप्नमां पण न आपी शको" ते सांभळीने वे बधी कोष करीने वेने गळे पढीने बोली के “अमे तेने क्रोडपति बनावी दीधो अने तुं कहे छ के अमे एना पर तारा जेटलो उपकार पण नथी को 1" चोथीए कह्यु के “धन थी पण अधिक प्रिय सीने पोताना प्राण होय छे।" में तेने प्राण दान अपावीने हमेशने माटे मुखी यनावी दीघो छ । हवे तेने मरवानो भय नथी रह्यो। जेथी में मीथी मोटुं कार्य कर्यु छ । जो मारी आ वात पर तमने विश्वास न होय तो राजानी पासे आनो न्याय कराववो जोइए" एटली वात थया पछी राजाने महेलमा बोलाववामां आव्यो । राणीओनो मुकद्दमो सांभळीने राजाए चोरने बोलान्यो अने पूछ्यु "तु सार्नु कहे के कई राणीनो तु अधिक उपकार माने छे ?" तेणे विनय पूर्वक शिर झुकावीने कयु के-एम तो बधीए मारा पर भारे उपकार कर्यो छे, कारण के तेणे मने अभयदान अपाव्यु छ। प्रणे राणीओए कोडोर्नु धन आप्युं अने एक एक दिवस मरतां वचाव्यो पण ए भय माथे रह्योज हतो के काले तो मरी जवानुं छे, तो आ धनने शुकलं? पण चोथी राणीए मने सकटमाथी बचावी दीयो छे। जेथी हुँ जावजीव सुधी निर्भय बनी गयो, तेथी आ उपमारनो बदलो मारो देह अपने पण नहि चुकावी शकुं। “कारणके सर्व- दानोमा अभयदान श्रेष्ट छ।" एज प्रकारे सलवचनो निरवद्य-पापरहित-अन्यनी पीडा दूर करवावाळी भापा सर्वोत्तम छ, कारण के काणा-नपुंसर रोगी-चोरादिने तेना नामे वोलाववाथी पण तेना मनने आघात पहोंचे छ । मनुनो मत-"सत्य-प्रिय-तेमज मनने अनुकूळ बोलो, असत्य तेमज अप्रिय सत्य पण न बोलो। आ प्रसंग मा असत् दन्दना जैनसिद्धान्तमा त्रण अर्थ छ । सद्भावनो प्रतिषेध, तेमज अर्थान्तर तथा गहा-निन्दा । वस्तुना स्वरूपना अपलापने सद्भावनो प्रतिषेध कहे छे। ते वे प्रकारे छ। सद्भूत पदार्थनो निषेध तेमज अमद्भूत्त पदार्थनु निरूपण । जेमके "नास्ति आत्मा" अर्थात् आत्मा कोई स्वतन्त्र पदार्थ नधी, अथवा "नास्ति परलोकः” परलोक अर्थात् मरण पछी जीवने अन्य भव धारण करको पडे, ए वास्तविक नथी, ए वगेरे भूत निन्व छे। कारण के तेथी मद्भूत पदार्थनो अपलाप थाय छे। आत्मा तेमज परलोक जीवनु भवान्तर धारण कर वास्तविक रीते सिद्ध पदार्थ छ, युक्तियुक्त तेमज वीरतुतिः। अनुभवगम्य छ, तेनो निषेध करवो ते सतनं अपाप नामे मध्यापचन के, आत्माने श्यामाक तंडुल-सामाना चावलनी जेम नाना प्रमाणवाले यताको अथवा अगुठाना टेरवा बराबर समजवो अथवा एम बहेबु के तं रक्त वर्णन छ। निष्क्रिय हे, वगेरे सर्व वचन अभूतोदावन नामे असलवचन छे, कारण आ जातना वचनो द्वारा आत्मानुं जे वास्तविक खरूप नयी वेनो उदेख करवामां आये के । अर्थान्तर-एटले भिन्न अर्थ, एक पदार्थने अन्य रूपे पतावो, वास्तविक ने बहेको, ते अर्थान्तर छ । जेन कोई गायने पोझे पहे, अने पोदाने गाय बहे; जबने ईश्वर कहे भने रेश्वरने गुल्यम रहे। -अर्थान्तर नामे असल रहेगा। गद्दी-एटठे निन्दा करदी, तेथी जेटला निंद्य वचनो छेतेने यधाने गाईत नामे असत्य वचन समजबो जोइए, जेमफे "भाने मारी नासो !" "मरी जा" "भाने कसाईनै सौंपी दो” विगैरे हिवामय वचन बोलो तेमज मर्म भेटी- मनने दुःस थाय वेया अपशब्द कहवा, गाळो देवी, कटोर पचन कदेवां, शब्दो वापरा, पैशून्य कोईनी चुगली करवी, वगेरे गहित पचन कहेवाय । सो ते गर्दित वाक्य कदाच सल पण होय, उतो ते असल मनायो। कारण के निन्ध छ। प्रमाद सहित जीवना धवनो पण असल मनाय, प्रमाद युक्त कहेला वचन असल होय छ, भने प्रमाद रहित कहेवामा आवेल सख पचन पण सर हो सकेणे, जेवी रीते कोई रोगीवाने पागमो दवा राखीने आपता कहे छेके आ पतामु छ। सत् दाम्दना वे अर्थ धाय छ, विद्यमान वेमज प्रशंगा-तधीर अगत् शब्दमा अरिदमान अने अपरान ए रे अर्थ या जोरए । मल-निन्दर-मगार- तोद्रावन तमज अर्थान्तर अपियमान अर्थ दर्शवनार होपाथी अरात । गईन वचन अप्रास होराथी असलरे तेमज प्रमादनों संपन्यपणनेनी माये, तेवाय काय असल निर्मित बने छे। कमायनो उदय पता अपनी प्रयोग अवश्य करपामा आवे छे । तपी क्रोध-मान-माता-भ-गग-द्वेष महादिने हा असर चोटयानो साग परयो, उने गर अगुमन रहे । मररीमा-फयेर शद वापरता-गुगली करता-प्रशस्तवचन कहर-अगर उन पोलमा अनिवार्य पर जाय। उमारे पी व सोयरायो देहभारिभाने आत्मस्थिरत्व प्राप्त भार ।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता . . कोईए कह्यु छे के जेने मूढताने कारणे धर्म एयुं नाम आपयामां आव्यु छे, बळी जेने म्लेच्छो पण निन्य समजे छे, ते असत्यनो मन-वचन-कायथी त्याग करको एज योग्य छे, जो हितनी वाञ्छा होय तो असत्य न बोलता मौननो खीकार करवो जोइए । कारण के नीचेनी बाबतोमा सो मौन राखे छे; जेवां के अतिक्रमण करती वखते, मलमूत्र लागती वसते, पाप कार्य छोडती वखते निरन्तर मौन सेवq, कारण के मौनना सेवनधी वाणीना दोपो लागता नथी मौनधी कलेशनो नाश थाय छ, सन्तोष भाव आवे छे, वैराग्य आवे छे, ने सल अने संयमनी पुष्टि थाय छ; जीभनो खाद खजवाथी तपनी वृद्धि थाय छ, अभिमानथी बची जवाय छे, ने सल-समता आवे छे । वाणी मनोरमा बनी जाय छ, वचनो प्रशंसा पार थई जाय छे, मौन सेवनार पूज्य बने छ, परन्नु देश कालनो विचार करीने मौनगें सेवन करवु जोइए। जो क्याय बोलवाथी संसारने पद्धोध तेमज चरित्रनो लाभ थतो होय तो त्या मौन न रहेवु जोइए, वाणी हमेशा सत्य होवी जोइए । गृहस्थने माटे त्याज्य असत्य-गृहस्थे कन्या-पशु-भूमि सम्बन्धी जुळु न बोलवू जोइए, खोटी साक्षी पण न देवी जोइए, तेमज कोईनी यापण ओळववी न जोइए, आ पाच वातोने ध्यानमा रासनार सत्याशुवती छे, जो सत्य बोलबाथी पोता- पर अथवा वीजा पर आपत्ति आवी पडे तेम होय तो त्यां मान राखg योग्य छे। अने साधु ज्यारे राग-द्वेप अगर मोहधी असत्य बोलवाना परिगामने छोडे छे, सारे वीजु सत्य व्रत कहेवाय छ। कारणके असत्य बोलवानो भाव सल भावथी विपरीत होय छे । अने आ असल भाव, राग-द्वैप के मोह भावी जीवमा उत्पन्न थाय छे । यानी मनुष्य इष्ट पदार्थ अथवा विषयोनी प्राप्ति अथवा रक्षानी खातर राग द्वारा असत्य बोले छे, अनिष्ट पदार्थ अथवा विपयोने दूर करवाने माटे अथवा तनो सयोग न थाय ते माटे द्वेषयुक्त असत्य बोले छे। अथवा मिथ्या बुद्धिथी ससारमा मोहने लीधे ते मिथ्याभावनी रक्षाने माटे असत्य बोले छ, जे कोई निकट भवी जीव आ प्रभारना असत्य बोलवाना परिणामने त्यागी दे छे, तेनामा सत्य व्रतनी योग्यता आवे छे । जे सत्य भावना रगथी रंगाइने प्रगट रीते सत्य व्यवहार करे छे, ते सज्जनोनो पण पूज्य बने है, देथी आ वात तद्दन साची छे के सत्य भी वधारे महान् बीजें कोई प्रत नथी। .
१६८ वीरस्तुतिः। असत्य बोलयानुं निकृष्ट परिणाम-जुहूं बोलनार मरीने भूगो ने छ, अथवा तेने मूक गतिवाळो जीव बनवू पडे छ, देसए भोली सपनो नधी। कोईने तेनी सम्मति पण प्रिय लागती नथी । भुस रोगभी पीगप रे, आ धुं शुद्धं गोलपार्नु दुष्ट परिणाम जाणीने यन्यारि सम्बन्धी अगल करी पणन बोलघु जोइए । अमल बोलनार मूर्ग-विकल्नंग-बाणी हीन भाय । देनी यानो मांभळतो रोमेने तिरसपर थाय । अने तेना मुरामांची दुर्गन्ध नीकले। जे लोक विरुद्ध छे, जेथी विश्वासघात थाय छ। जे पुरपर्नु प्रतिपक्षी तेषु वचन क्यारेय पण न गेलघु जोइए। जे जूठ बोले रे नामां नुच्छता आये थे, ते पोताने ऐतरे में, अधोगति (नरक) मां जाय , वेषी जूर मदा यर्जनीय छ। जूठ प्रमादथी पण न बोरघु जोइए, पारण के हितपाइपी कसम अमत्यरूपी आंधी थी पदी जाय छ। भूत-भविष्या-वर्तमाननी बानीनु नपणे मान न होय तो ते आम दरों' एन न कहे, जे बानमो समय होय ते न कहेवी, जो प्रणे कालनी यातोमा सान निरक पशु होय तो पहेगी। अगल बोलवाथी र विरोध क्य, पोल खुली जबाथी पतासे थायण, कोई नना पर विश्वास करलु नभी, बदनामी धाय , सपना सेवननी पेठे अनेक.गो जूठ बोलपाथी था। जूठोलनार नरर-निगोर-अने पशु योनिनो जन्म भरण करे । थोर अगल बोलनार पर नरक निगोदना जाय । शानिओए शान अने चरियनु मूल सलन बतायँ छ, सुसारिओनी चरण रजनी थ्वी पवित्र धार । ईमेश सर बोले छेतेने भून जरा-UिE-A परी परता नभी। माय मुहावीने, जय राने, नमारसा धारण रीने, गावेग पदरीने, अपवा तपथयां करीनं जे आर काले, ने अहन करना पण पर निन्य गमजयो। एक तरफ अगलनु पार बने पीजी बनु आगगा गंगारनी गरे पापो रासकामो आरनी भानु पार पी पार। दयय रोमन मिचारी. ओना पापनु प्राथपित होय छ पण अगलयाने माटेगसना परेको पर ऊना रहे , राजा पर सेना पर पानी गत्ता की नसावी समान मि उमर फग प्रमती नदी, अन मरनी महिमा गर। गमग बांग- मोय गल्यकी गुरज क्षमा, जमाधी समस्यायन र सो आना अप्सरमा नुन धीरज पूरगलनी रक्षा करे, या अनिशाने पुराने धारण करे, परनम्पी नंगरमा गरी रो।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता "यम-नियमादि व्रतोनो समूह एक मात्र अहिंसानी रक्षाने माटेज बह्यो छे; अहिंसा व्रत जो असलथी दूपित होय तो ते उच्चपद कदी पण प्राप्त न करी शके, असत्य वचन साथे अहिंसानुं पालन अशक्य छे।” “जे वचन जीवोनुं हित करनारु होय ते असत्य छता सत्य छे। अने जे वचन पाप सहित हिंसा रूप कार्यनी पुष्टि करे छे, ते सत्य छतां असत्य छ निन्ध छ ।” “जे साधक अनेक जन्मोनां दुःखोनी शान्ति अर्थे तप करे छे, ते निरन्तर सत्यज बोले छे, कारणके अगल बोलनारने साधकपणु सभवतुं नथी।" "जे वचन सत्य होय छे, करणाथी भरपूर होय छे, अविरुद्ध होय छे, आकुलता रहित होय छे, असभ्य न होय, इन्द्रिय विकारोने पुष्ट करनार न होय, गौरव वधारनार होय, कोईने हलका पाडनार न होय, तेज वचन शास्त्रमा प्रशंसनीय गण्यु छ ।” “निरन्तर माननु सेवन कल्याणकारी थाय छ, जो बोलवानी जरूर पडे तो सत्य-प्रिय-तेमज हितकर योलg जोइए।" "पण दुष्ट चरित्रीना मुखमा वाणी क्रूर असत्य वागी रूपी नागण रहे छे, के जे आखा जगत्ने दुःखी करे छे।” “जे वात सदेह युक्त होय, पापरूप होय, दोप सहित होय, ईपीने वधारनारी होय, ते बीजा ना पूछवा छता पण न कहेवी।" "मर्मभेदी, मनने पीडा उपजावनार, स्थिरता नाशक, विरोध करावनार, तेमज दया रहित वचनो प्राण जाता पण न बोलवां ।" "ज्या धर्मनो नाश थई रह्यो होय, चारित्रने नुकसान पहोचनु होय, देशनी खतन्त्रता नाश पामती होय, समीचीन सिद्धान्तनो लोप थतो होय, त्या देश- धर्म-तेमज जातिनी उन्नति खावर वगर पूछये पण विद्वानोए बोलवू जोइए, ने समये मौन धारण कर योग्य न कहेवाय ।” “जे वाणीना श्रवणथी जीवो मोह मुग्ध वनी जाय, सन्मार्ग भूली जाय, साम्प्रदायिकता अने पक्ष-पात आवी जाय, वाडाबंदीमा फसावनारी ते वाणी नथी, पण सापणी छे, कारण के तेना श्रवण मात्रथीज प्राणी उत्तम मार्गने छोदी -कुमार्गे जाय छ।" “मनोहर वाणी जेटलं मुख आपे छे तेटल मुख चदन-चन्द्रमा-चन्दमणी-मोती- मालती बगेरे शीतल पदार्थो आपी शमता नथी।" "अग्निथी दग्ध वन क्यारेक पग लीलं बनी शके छै, पण वाणीरूपी आगथी पीडित मनुष्य कदी पण प्रफुाङ बनी शकतो नथी।" "जे सत्य-वका छ, तत्त्वना स्वरूपने समजे छे, मदाचारी छ, तेना चरण स्पर्शधी पृथ्वी पवित्र बने छ, ते लो रोज उनम के अने जे असल वचन बोले छे ते नीच अने शुद्ध छे ।” “जे नीच पुरुष मनुष्य- १७० वीरस्तुतिः । , जन्न प्राप्त करीन पण असल गोले छे, ते संसार रूपी सागरनो पार केवी रीते पामी शके ?" “जेनां नाम्कान-नाथ कपायेला होय, रूप गर्नु नाम पर न होय, दरिदी तेमज रोगी होय, युग्ल-जाति अने पर्न थी हीन होय, तो शु धयु ! तेनु तो भूपण सल छे, सत्यभी पवित्र तेमन मुखी रनी शो, वेनी शोभा मत्लथी छे।" "जे पुरुष अमल-कालिमाथी मलिन छे, तेनो साथ पाए. रूपी-काळाशना भययी कोई पण धर्मश पुरुष स्वममा पग करनी नदी।" "जठानी संगनिधी साचो पग कलंकित धाय छे, जैन मेला लगानी संगतिथी सच्छ अने निर्मळ गगाजलने पर दनु प्रहार सहयं पडे।" "पुष-खबर-खी- धन तमज मियो विमुरा बने, वा चाल्यां जाय, उमज प्रागनास थाय तो अमल न बोलयु जोइए । इत्यादि वचनामृतीनुपान करी जे कोई पाप रदिन नज बेष्ठ गत्य बोले छ, वे जगत् प्रधान पुरुष है।" तपमा भ्रष्ठ तप फयो? मलनी पेठे गर्व प्रकारना इच्छा निरोध तपमा नव विधि प्रम-गुप्लिए गुप्त एवो ब्रह्मचर्य पेट । सुन्दर प्रोओना मनोहर अंगोने बाईने तेनी सापे रमण करवानी जे इच्छा विमो सम भापछे, रोने लागी देवी, असा ये नामे नो-म्यायना तीन उदय भी मधुन सेग्ननी जे दार उत्पन्न भाय छे तनो नाश हरयो ए मनपर मन । बेने करा माटे मगुरुयो कहे छे के है कानी गुरूर ! अनुगम-महज-परमतय रूप निज खकरने खोटीने अति सुन्दर खोस्नीना शरीर आदिना मान मनमो न माटे याद करे छ, अथवा तना मोहना शामाटे फगाय। अब्रह्मचर्यना दोप-प्रो सभोगधी गन्ना धाय , ति ब. सन ग्वर उत्सम भईने शरीनं नाश करे , हिनाहिनने भुन्नवी ६०, सर नि.गर बनी बाब छ । मृगना बना पगाईप, यी अमेरमा अने स्वरमा जरा पर अन्नर नयी। दो मामी को सभापील मान्य समय न लागे ती माय पोतानी विवाहित पनि गोर रायो, फरक आ प्रतिमा की पग अनेक प्रसरनी हरया- मन पाय , - सानिमा गपुर रहेनार, अन्य दो मापनी मारय पनपान लामा पर मुनसंटनी पें अनुन भार उम मा . मी पण महार पाळनार प्रद्रपारीना प्रभावनी तो बतर ही! पटवनी प्रभार भर अने सम्बनीच ! पर पुरस नई कार्ग, एसी, पटना, मरगळ - संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता वधेलो होय, पण तेने झेरनु पुतळू समजीने लीए जेम सीताजीए रावणने लागी दीयो हतो, तेम देने सागी देवो जोइए, जे स्त्रीए मैथुन विकारने जीती लीधा होय ते देवोने पण पूज्य छे अने इच्छनीय छ। मैथुन एटले गुं? मैथुन एटले जोई, प्रकृतिमा श्री-पुरुपनु जोई समजबुं, बनेनो परस्परनो संयोग, अथवा संभोगने माटे जे भाव विशेष थाय छ, अथवा बने मळीने जे संभोग क्रिया करे छे, तेने मैथुन कहे छे अने तेनेज अब्रह्म कहे छे, वेमा पण प्रमत्तयोगनो संबंध छ। कारणके तेने लीधे जे कई किया करवामां आवे, पछी भले ते परस्पर बे पुरुप अथवा बे स्त्रीओ मळीने करती होय, अथवा अनश क्रीडा आदि को न होय, ते सर्व अब्रह्म छे । जे प्रमत्त दगाने छोडीने किया करे छे, देने मैथुन कहेवातु नथी, जेमके पिता-भाई विगेरे पुनी-अथवा व्हेन आदिने गोदमां लईने प्यार करे छे, ते अब्रह्म कहेवातुं नथी, कारण के तमां प्रमत्त-योग नथी । आ प्रमत्तयोगनी ओछा वत्ता अशे पण निवृत्ति करवामां आवे तो ते ब्रह्मचर्याणुव्रत कहेवाय छ । जेमके कत्यु छ के-'माता- व्हेन-पुत्री समान परलोने जाणे, ने पोतानी विवाहिता स्त्रीमा सन्तोष माने, ते चोथु अणुव्रत कहेवाय छे ।" "उत्तम पुरुष परस्त्रीने व्याधि समान समजी ने दूरधीज त्यजी दे छे, कारणके परस्त्री तो सदैव दुःसोनुं घर छे, अने मुखाने नाग करनार प्रलय काळनी आग समान छ।" "जे स्त्री पोताना पतिने छोडीने परपुरुष साथे रमण करेछे, तेने प्रथम पतिनी निर्लज समजवी जोइए, ज्यारे आ प्रकारना आचरण थी पोतानी स्त्री पर पण विश्वास न रहे तो परबीनो विश्वास केम राखी शकाय?" "परस्त्रीनु सेवन करनार पुरुषने नरक निगोद मा रसइवानुं रहे छे, तेमा कर मुख तो नथी ज, तेथी मनुष्योए ब्रह्मचर्य रननु पालन करयु जोईग।" "आ व्रतनुं पाळन करनार योगीओ परब्रह्म परमात्मानु ज्ञान पामे तेमज स-खरूपने अभेद रूपे जाणी शके छे, तेनो अनुभव करी शके छे। तेने धीरवीर पुरुषोन धारण करी शके छ । अल्पसत्ववाळा-शीकर- हित-इन्द्रियोना दास-दुर्बळ पुरुषो तो खप्नमा पण आनुं समाचरण करी शफता नथी, कारणके ब्रह्मचर्य पण महावत छ ।” "त्रणे जगतमां ब्रह्मचर्य त प्रशंसनीय छे, जे तेनु निर्मल भाव पूर्वक पालन करे छे, वे पूज्यना पण पूज्य छ। जे ब्रह्मचर्य पालनमा अनुरक्त के वे दश प्रकारना मैथुननो सर्वथा त्याग करे छ। . ।
१७२ चीरस्तुतिः। (१) जेमके शरीर शणगार, (२) पुष्ट पदार्थनु सेवन करर्ष, (३) गावं, बना, जोवं, सांभळ, (४) बी ससर्ग करवो, (५) स्त्री संबंधी संकल्प विकल्प करवा, (६) बीना अग उपांग जोवा, (७) तेने जोबाना विचारो करवा, (८) पूर्वकृत भोगोनु स्मरण करतूं, (९) भविष्यमा भोगोनी चिन्तवणा करवी, (१०) वीर्य स्खलन कर, आ दश भेद मैथुनना छे, ब्रह्मचारीने माटे ते सर्वथा त्याज्य छ। "जेवी रीते किंपाक फळ देखवा-मुंघवा मां रमणीय छ, पण परिणामे हालाहल झेर समान छे, तेवीज रीते मैथुन पण थोडा वसत माटे रमणीय-सुंदर अने मुग्नदायक मालुम पडे छे, परन्नु परिणामे अत्यन्त भयप्रद नीवडे छे।" "जे पुरुष कामभोगोथी विरक्त बनीने सदा ब्रह्मचर्य पाले छे, सेणे भावशुद्धि माटे दश प्रारना मैथुननो लाग करवो जोइए, केम के आ दोपोना खाग का वगर भावशुद्धि-निर्मलता थती नथी, भावज कामना वेगने रोकी शके छ, यद्यं पण छ के- "सर्प करडेल माणसने सात वेग होय छे, परन्तु काम रूपी सर्पथी डसायेल जीयने दश महा भयानक वेग होय छे, ते नीचे मुजय छ । (१) कामना उद्दीपनथी चिंता उत्पन थाय छे, के काम भोगनी क्यारे प्राप्ति थो, (२) जोवानी इच्छा उत्पन थाय छे, अने निःवाग मूके छे (३) अफसोस करे छे, के स्त्रीने जोई पण न शकाइ । (४) ज्वर आवे छे, तापमान चधे छ, (५) शरीर वळवा लागे छे, दाह उपजे छ (6) भोज- ननी रचि नथी रहेती, (५) महा मूऱ्या उत्पन्न थाय छे, जरा पण चेन रहेतुं नधी, (८) उन्मत्त बनो जाय छ, जेम नेम ववाद करे छ । (९) प्राण चाल्या जवानी शंका रहे छ। (१०) मृत्यु पण थई आय छ । थाम वासनाथी घेरायेलो जीव यथार्थ तत्व वस्तु स्वरूप समजी शस्तो नधी, ज्यारे लोक व्यवहारनु ज्ञान पण नाश पामे छ सारे परमार्थनु ज्ञान तो क्याथी थाय? बधी वातोमा तेर्नु मन अस्थिर बनी जाय छ । "जेने काम रूपी कटक वागे छ, ते सदामा, मवामा,चालवामा, फरकामा, भोजन करवामा अस्थिर बनी जाय छे।" "याम पासनापालो पुरस पर होगा छतां मूर्व बनी जाय थे, क्षमाशील हनां क्रोधी बने छ, शूरवीर कायर बने छ, महान् हलको बने थे, उद्यमी आम्मु यने छ, अने जितेन्द्रिय घर बने।"
. संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता "वेधी मूर्तता कर्यावगर मनुष्यजन्म सार्थक बनावयाने मनुष्ये ब्रह्मचर्य- पालन करवू जोइए। कदाचारनुं परिणाम-"बेलने नपुसक बनाववानी क्रिया, लंपटोने थती सजा वगेरे जोइने बुद्धिमाने कुशीलनो त्याग करीने खदारसन्तोपरत अंगीकार करीने परस्त्रीनो लाग करयो जोइए, मैथुन सेवन किंपाक फळनी पेठे आरम्भमां साई लागे छे, पण परिणामे दारुण कष्ट आपे छ।" "मैथुन सेवनधी शरीर कम्प, परसेवो, थाक, शिथिलता, चकर आववा, तिरस्कार थवो, बलनो क्षय, ज्वरादि रोगो थाय छे।" "योनिमा असंख्य जीव राशीनी उत्पत्ति थाय छे, अने मैथुन सेवन वखते तेनो नाश थाय छे । वात्स्यायननो मत छ के रकमा सूक्ष्म जीवो पेदा धइ जाय छ, ने संयोग वसते ते मरी जाय छ। मैथुन सेवनधी काम ज्वरनी शान्ति नथी थती- अमिमां घी होमवाथी जेम ते शान्त थतो नथी, तेमज स्त्री सम्बन्धी वैप- यिक संयोगथी काम ज्वर शान्त थतो नथी, पण वधे छे। स्त्रीए पण पर पुरुपने नाग समान समजीने लेओनो लाग करवो जोदए) कारणके ऐश्वर्यमा भले इन्द्र समान होय, सौन्दर्यमां कामदेवनो अवतार होय तो पण जेम सीताए रावणनो याग को तेम सन्नारीओए पर-पुरूषनो त्याग करवो जोदए । ब्रह्मचर्यतुं फळ-ब्रह्मचर्य सच्चरित्रनुं मूळ छे, परब्रह्म प्राप्तिनु निमित्त छ, जे ब्रह्मचर्य- पालन करे छ ते पूज्यना पण पूज्य छ । दीर्घ आयुष्य, मुन्दर शरीर, गरीर रचनामां दृढता, शरीर पर विलक्षण तेज, महान् शक्ति, याः कीर्ति, संसारमा मान, प्रतिष्ठा, ए सघर्छ ब्रह्मचर्यथी प्राप्त थाय छ। आ रीते सर्वलोकनी उत्तम-रूपसम्पदा वगेरे मेळवीने तेमज क्षाया इस दर्शन-शीलसमन्वित पुरुपोमां ज्ञातवशीय अन्तिम जिनवरेंद्र थम-सस महावीर प्रधानलम हता। काश्यप-गोत्रीय-श्रमण भगवान महावीर प्रभुनां वर्धमान, विदेहर, पुत्र, काश्यप, वैशालिक, महावीर, सन्मति, वीर, श्रमण मार इस अनेक नाम हृतां, ते बधा नामो तेनी अमुक अवस्थामा सूज कमी भगवान् महावीर सामीनुं जीवन सांसारिक चेमज साधक का खंड हतुं । वर्धमान, विदेहदिन (महावीर प्रभुनी माना नाम 'मदेहद पस छ, १७४ वीरस्तुतिः। त्रिगला माता विदेह कुलमा जन्म्या हतां,वेधी तेमनु नाम विदेहदिमा पमु हतुं, माताना आ नामथी महावीर प्रभुनु मातृपक्षन नाम पण 'विदेहदिन पी गयु हतुं) ज्ञातृपुत्र, काश्यप, अने वैशालिक ए नामो तेमनी सासरिक अवस्था ना सूचक छे, महावीर, सन्मति अने भ्रमण भगवान् आ प्रण नामो तेमणे माधक अवस्थामा पोताना आत्म-वीर्यादि गुणोथी प्राप्त कर्या हता, वर्धमान पितृपक्षन नाम, अने विदेहदिन मातृपक्षनु नाम हतुं । 'ज्ञातृपुर' एवंश परथी नाम पम्। 'काश्यप-गोपथी नाम पहुं हतु । 'शालिक जन्मस्थानना सम्बन्धन सूचक छ। 'महावीर आत्म-वीर्यसूचक, 'मन्मति' आत्मज्ञान सूचक अने 'श्रमण-भगवान्' श्रमण सम्कृतिना तात्कालिक अप्रेमर अर्थमूचक छ । शातपुत्र- उपरोक्त सर्व नामोमाथी भगवान महावीरना 'शातपुत्र' अथवा "शातएन' नामना सम्बन्धमा आपणे विचार करवानोगे आ शातपुत्र नाम वेमना बार्नु सूचक छ। ए वात जैनागम तेमज रोखागममा अनेक जण्याए कहेली छ । श्रीआचारांग तेमज कल्पसूत्र आदिक सूतोमा तेमना जीवनचरिण अनुसार भगवान् महावीरनो जन्म 'क्षत्रिय कुंड' गाममा शातवंशीय अने 'काश्यपगोत्रीय' सिद्धार्थ राजाने या त्रिशला क्षत्रियाणीथी थयो हतो। आ शायरा ते समये प्रसिद्ध ईश्वाकु उप आदि क्षत्रियोना कुळनी पेठे प्रसिद्ध वंश पण हतो। आज्ञातृवंदाना क्षनियो प्राय. 'ज्ञातृक' नामधी ओळसाता, अने मना आ 'शान' पुलने लंधे तेमना नगरोनी वाहर बनावेला रोड-उद्यानोनो नाम पण 'ज्ञातृसंद्ध पडेला हता, भगवान महावीरे कुंरप्रामनी नजीक शातृसंह' नामक यागमां दीक्षा अगायर करी हती, शास्त्र-वचनो तो आ वायतनी पर पुष्टि करे छ। जिनागमा 'शातून' ने बदले 'नायपुत्त' अश्रा "नातपुत" मज वुशागममा "नाथपुत्त" अथवा "नाटपुत्र" शब्द प्रयोग करवामां आम्यो । हे भगवान महावीरना ज्ञातृवशनुज अर्थ सूचक नाम छ। मानवामा अपगने उपरोक कारण छे । “णायपुत" अथवा "मात्पुप्त" ए बने नामो संरएन भापाना "एन' शब्दना पाहत रूप छे । अने "नाथपुग" अश्या "नाटपुत" ए बने नामो पाली रूप है। प्राहलमा 'त' को ' अने पारी भागमा 'a' नो थ' अने '4' नो 'ट' पण सधारणरीदे थाव छ। दिगम्बर सूत्रोमो शानुपुत्रानो संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिवा १७५ । "नाथपुत्त" शब्द प्रयोग जोवामां आवे छे, आ रीते भापा अने भावनी दृष्टिए जोता पण आ बधा अलग अलग नामो मूळ 'ज्ञातृपुत्र' शब्दमा मळी जाय छ। आ बधा नामो “मातृपुत्र" शब्दधी वनेला छे ते निःशंक छ । प्राचीन काळमा वंशना नामथी परिचय आपवानी प्रथा होवाने लीधे भगवान् महावीरनो जीवन विषयक परिचय श्रीजिनागमोमा तेमज बौद्धागमोमा 'नातपुत्त' अथवा 'नाथपुत्त" शब्दथी आपवामां आव्यो छे। तेमज भगवान् महावीरना शिष्योनो पण परिचय "नातपुत्तीय" अथवा "नाथपुत्तीय"ए शब्दथी विशेष करीने आपयामां आव्यो छे, श्रीजिनागमना १२ अगोमा पर्छ अग "गयधम्मकहाभो" छे। तेमा आवेल "णाय" शब्द पण भगवान् महावीरना वंशवाचक 'नायपुत्त' नी साथे गाढ संबन्ध राखे छ। प्राकृतमा 'न' नो 'ण' थाय छे। आ अगनो गुजरातो अनुवाद "भगवान् महावीरनी धर्मकथाओ" एम करवामा आव्यो छे । आ अंगनो परिचय श्रीसमवायागसूत्रमा आपेल छे। तेमां बतायु छ के "आ अगमा ज्ञाता- ओना नगर-उद्यान-माता पिता वगेरेनो परिचय आपवामा आबशे।" टीकाकारे ज्ञाताओनो उदाहरणभूत अर्थ को छे। परन्तु ज्ञाता एटले 'ज्ञातृवंशीय क्षत्रिय ए अर्थ पूर्वापर विचारतो निश्चित थाय छ । भगवान् महावीरनो परिचय श्रीजिनागमोमा 'नायपुत्त' ज्ञातपुत्र सिवायनां घणां नामोथी आपवामां आव्यो छे, तो पण त्यां 'नायपुत्त' शब्दनी विशेष प्रधानताछे। घणां प्राचीन सूत्रोमा भगवान् महावीर प्रभुना गुणग्राम 'नायपुन' शब्दशी करवामा आध्या छ जेमके:- "जे भगवान "ज्ञातृपुत्रना" वचनो पर पूर्ण विश्वास राखे छे, ते कोई वस्तुनुं समह करता नथी" १८ “प्राणीमात्रनी रक्षा करवावाळा "ज्ञातपुत्र" महावीर प्रभुए वस्त्र पानने परिग्रह नधी क्ह्यो, पण मूळ या ममत्वभावने ज परिग्रह वह्यो छे, एम महर्षि ओए कमु छ । २१ [दशवकालिक-अ०६] "ज्ञातपुत्र" महावीर प्रभुए कामु छ के-मर्यादामा रहेनार माधु आ दोपने सारी रीते जोई ने जरा पण कपट पूर्वक जुठ न बोले " "आ दोपने जोइने निग्रन्थ रात्रि भोजननो त्याग करे, कारणके "ज्ञात. पुत्रे" आना प्रत्यक्ष दोष यताब्या छे।" (दशवकालिक० अ०६) अनुत्तर ज्ञानी अने अनुत्तर दर्शन युक्त अर्हन् प्रभु 'ज्ञातपुत्र' महावीर प्रभु विशाला नगरीमा आ रीते व्याख्यान करता हता।
वीरस्तुतिः। - आ प्रमाणो उपरान्त आ अध्यायमा २-१४-२१-२३-२४ मी गाथाओना प्रभुनो स्तुति "ज्ञातपुत्र" शन्दथी करवामां आवी छे। आ रीते श्रीजिनागमना प्रमाणभूत प्रन्थोमा 'नाथपुत्त' अथवा 'नातपुत्त' शब्दनो प्रयोग भगवान् महावी- रना वंशवाची नाम तरीके अनेक स्थळे करवामा आव्यो छ, अने ए बधानो उदेस करवानी अहीं जरा पण जरूर नथी, हेमाचार्ये परिशिष्टपर्चमा जे 'ज्ञातनन्दन" भगवान् महावीरप्रभुने वंदन करेल छे तेनोपण उल्लेख करीशु, तेमणे मंगला: चरणमा क्युं छे के:-- "जे कल्याण क्षना याग छ, श्रुतिरूप गंगाना हिमालय छ, विश्वकमलने सूर्यरूप छ, ते भगवान् “ज्ञातनन्दन” महावीरने हुं नमस्कार करूं छु ।” बाद पिटकोमा भगवान महावीरनो तेमना शिष्योनो तेमज तेमना सिद्धा. सोनो परिचय तेमना वंशवाची 'नाथपुत्त' अथवा 'भारपुत्त' शब्दधी आपामां आव्यो छे, तेमना श्रमण निमन्यो मादे 'नाथपुत्तीय' शब्दनो उपयोग करवामां आव्यो छे, आ नाम सिवाय भगवान् महावीर प्रभुनो जीवन परिचय आपता बीजा कोई शब्दनो प्रयोग करेलो जोवामां आवतो नथी, मात्र 'नाथपुत्त' नी साथै 'निग्गठ' शब्दनो प्रयोग करेलो होय छे, पण ते शन्दतो देनी साधु अवस्थानो सूचक छ। ते 'नाथपुन' शब्दनुं विशेषण छ । आधी प्राचीन कालमा वंशवाचक नामथी परिचय आपवानी प्रथा होवानु स्पष्ट जणाय छे, महात्मा बुद्ध पण तेमनां मूल नाम सिद्धार्थ करता तेमना गोत्र सूचक नाम 'गोलम' अने वश सूचक नाम 'शाक्यपुत्र'-थी अधिक प्रसिद्ध छ । भगवान महावीर प्रभुनो 'ज्ञानृवश' हतो, अने ए "शादृवंश' थी तमने वशसूचक नाम 'नायपुत्त' प्रसिद्ध छे, जे आपणे ऊपर जोई गया । परन्तु आगळ चालतो तेनो केटलो विस्तार तेमज विनाश थयो, तेनो इतिहास जाणवामां आवतो नथी। एइतिहासनी शोध अत्यन्त आवश्यक छ। वे इतिहास नी शोध मारे आपणी पासे बौद्ध साहिल एक अनन्य माधन रूप छे। भगवान महावीर तेमज महात्मा बुद्ध ए बने समकालीन-धर्मनयन्तियरी घई गया, वळी तेओ बंने एकज देशना नजिक नजिक आवेला प्रान्तमा रहेनारा राजवशी पुरुष हता, आ वाचतो विचारतां महात्मा बुद्धने एक प्रान्तथी बीजा प्रान्तमा विहार करतां भगवान महावीरना वंश सम्बन्धी लोकोनी साथे वार्तालाप करवानो प्रसग पास थयो होय ए तन साभाविक छ।
. संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता बुद्धपिटकना 'महावग्ग' नामे मूत्रमा महात्मा-बुद्ध, भगवान् महावीरनी जन्मभूमि "कुंड प्राम" मां तेमज तेनी नजीक 'ज्ञातृओ' ना गामोमां अने वैशाली नगरीमा जवानो तेमज त्यां निग्रन्थ श्रावक सिंह सेनापतिनी साथे वातचीत कर- बानो उल्लेख आवे छ, ते उल्लेख ना आधारे भगवान् महावीर प्रभुना 'ज्ञातृवंश' अने तेमनी जन्मभूमि सम्बन्धी आपणने घj जाणवानुं मळे छे, ते कारणथी ते उल्लेख आ नीचे उतारवामां आन्यो छे । ज्या कोटिग्राम [देखो विनयपिटक महावाग पार्नु २४१ कोटिमाम ] हर्नु त्यां भगवान् गया, कोटिप्राममा भगवान बुद्ध विहार करता हता, अम्बापाली गणि- काए साभल्यु के भगवान् अहीं आवी गया छ, तेथी देणे मुन्दर रथ जोडाव्यो, ने तेमां बेसीने सुन्दर रथोनी साथे वैशालीथी नीरळीने 'कोटिग्राम' तरफ चाली। त्यारे ते लिच्छवी ज्यां कोटिग्राम तुं त्यां गया। कोटिग्राममा इच्छानुसार विहार करी ज्यां वैशालीन महावन हतुं त्यां गया, सां भगवान् बुद्ध वैशाली महावननी 'कूटागार शाला' मा विहार करता हता। वे वखते घणा प्रतिष्टित लिच्छवि 'संस्थागार' [प्रजातन्त्र-सभागृह ] मां बेया हता, तेओबधा चुदनी प्रशंसा करता हता, धर्म अने सघना गुणोनुं वर्णन करता हता, ते बखदे निप्रन्थोना श्रावक (जैन-श्रावक) सिंह सेनापति ते सभामां ने हता त्यारे सिंह सेनापति ज्यां निग्रन्थ (निग्गंठ-नाथ पुन) जातपुत्र हता त्या गया, जइने 'निग्गंठनाथपुत' ने कम्युं के हे पूज्य । हू.... ........सिंह ! तारं घर लांबा समयभी निप्रन्यो माटे विस्मारूप छ,...... .........ते समये घणा "निग्गंथ जैन साधु] वैशालीमा एक.........लावा कालथी आ आयुष्मान् (निग्गंठ) बुद्ध....................... "एक समये भगवान् बुद्ध नादिवाना "गिजकावसथ' मा विहार करता हता [मज्झिमनियय पार्नु १२५] "विनयपिटक' 'महावाग तथा मज्झिमनिया आवेला आ उसोधी आपणने साफ साफ मालुम पडे छे के महात्मा बुद्ध-महावीर खामीनी जन्मभूमि कुंडप्राम (पाली भाषामां कोटिप्राम) गया हता, अने कुंडप्रामनी पासेनी वैश्यली - ......... वीर.१२ वीरस्तुतिः। . नगरीमा थी त्या महात्मा बुद्धने अवापाली नामे वेश्या अने लिच्छवि क्षत्रिय मळवा आन्या हता, कोटिग्रामथी महात्मा बुद्ध ज्या 'मांतिका ज्ञातृक लोक रहेना इता, त्यां गया हता,,अने सां 'यातिका' (ज्ञातृका) लोकोना इंटोना घरमा हता। ते स्थाननी पासेज 'अम्यापाली' वन नामे उद्यान हतु जे अम्बापालीए बुद्ध अने नेमना सपने समर्पण करेल तुं । साथी महात्मा बुद्ध वैशाली गया अने त्यां सिंह नामे सेनापति के जे निप्रन्योनो श्रावक हतो, तेने पोतानो अनुश्यी बनान्यो । सिह सेनापति महात्मा बुद्धने मळवा जतां पहेला "निप्रन्थ' ज्ञातृपुत्र महावीर प्रभुनी पासे अनुज्ञा लेवा आव्यो हतो । त्यारे भगवान् महावीरे सिंह सेनापतिने "तु क्रियावादी होवा छता अक्रियावादी भ्रमण गौतमने मळवा 'शा माटे जाय छे ?" एम कहीने न जवान क्युं हतुं । पण ते पोतानी इच्छानुसार श्रमण गौतमनी पासे गयो अने त्या ते भ्रमण गौतम बुद्धनो अनुयायी बन्यो । ऊपरना उल्लेखधी आपणा विषयने पुष्ट करनारी चार वात विशेष प्रकारे जाणवानी मळे छे। (१) बौद्धोन 'कोटिप्रामज' [बौद्ध अन्थोमां 'कुंडप्राम' नु नाम 'कोटि- ग्गाम' अने भगवान् महावीरना 'ज्ञातिपुत्र ने बदले नातिपुत्त' लखेल छ । जुओ "भारतका प्राचीन राजवंश" पार्नु ४० लेखक विश्वेश्वरनाथ राय ) जैनोन 'कुड प्राम' जणाय छ, आ बने नामोमा शाब्दिक सरखापणु छ । ते उपरात ते गामनी नजीक शातृक-शातृवशना क्षत्रियोर्नु निवासस्थान अने वैशाली नगरीनु नजिकपणुं होवाने लीधे "कुंडग्राम अने 'कोटिग्राम"बने एकज होवार्नु निश्चित थाय छ । (२) कोटिग्गामनी पासे ज्ञातृओनुं निवासस्थान, भगवान महावीरनो वंश ज्ञातृवंश हतो, ते वळी वधु पुष्टि करे छ। तेमज कुंडग्रामनी आसपास ज्ञातृक ज्ञातृवंशना क्षत्रियोना खंड-उद्यान हता। अने त्यां ज्ञातृवंशी क्षत्रियो रहेता हता, ते आ वायतने वधु दृढ करे छे।' आ 'ज्ञातक' नो उल्लेख ए विचारनो निर्देश करे छे के आ ज्ञातृक भगवान् महावीरनी जन्म-जातिवाळा ज्ञातृक्षत्रिय हशे । (३) 'ज्ञात' जाति 'लिच्छवि' ओनी एक शाखा हती [ प्रसिद्ध जैन वीर्थ- कर महावीरनी माता पण 'लिच्छवि' वंशनीज हठी, जुओ 'भारतका प्राचीन राजवंश' पार्नु २७८ ] आ वातनी पुष्टि 'वैशालीना लिच्छवि क्षत्रिय महात्मा बुद्धने मळवा आन्या हता' ते उल्लेपथी मळे छे। भगवान महावीरनी माता पण लिच्छवि वंशनी हवी, अने, सिंह सेनापति के जे भगवान् महावीरलो भावुक .
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता इतो, ते पण लिच्छवि वंशनोज हतो, आ बने वातो ज्ञातृजाति लिच्छविओनी एक शाखा हती, एम साबित करे छ। (४) कुडग्रामनी पासे विदेहनी राजधानी वैशाली नगरी हती, कुंडप्राम आ नगरीना एक परा जेवी हती । भगवान् महावीरनुं 'वैशालिक' नाम पण आ नगरीना नामधी पड्यु हतुं, विशाला नगरीमा सिंह सेनापति नामे जे निप्रन्थ धावक लिच्छवि रहतो हतो, वे भगवान् महावीरनी सलाह न मानीने महात्मा सुद्धनी पासे गयो हतो, पाथी स्पष्ट जणाय छे के महात्मा बुद्ध अने भगवान् महावीर बने एकी वखते वैशालीमा हता। ऊपरना उल्लेखमा जे 'नातिका' शब्द लखेलो छे, वे शब्द मूल घणां- ओए 'नादिका' कहेलं छे, अने तेनो अर्थ 'ते नामना जलाशयपर वसेलं एक गाम एवो करे छ, पण तेमां तथ्य नथी, हर्मन जेकोबी [जुओ हर्मन जेकोबी कृत Sacred Books The East नामे ग्रन्थमाळामा प्रकाशित 'भाचाराग भने कल्पसूत्र' नामे जैन सूत्रोना अनुवादनी प्रस्तावना, पार्नु १०] मूल शब्द जातिका' ज छे, अने ते इातृवंशना क्षत्रियोनो वाचक छ तेम समर्थन करे छ । आ 'पातिका' शब्द पर त्रिपिटकाचार्य श्रीयुत राहुल सांकृत्यायने विशेष प्रकाश पाड्यो छे, वेमणे पोताना 'बुद्धचर्या* नामे हिन्दी पुस्तकमा 'नादिका'- नो मूल शब्द 'नाटिका=ज्ञातृका' यताल छे, अने "ज्ञातृका' शब्द ज्ञातूवंशना * ते वखते घणी मोटी निन्य परिषद् (जैन साधुओनी सभा) साथे निप्रन्थ 'नाटपुत' (महावीर) नालंदामां निवास करता हता। १ नाटपुत्त-ज्ञातपुत्र, ज्ञाह लिच्छविओनी एक शाखा इती, के जे वैशालीनी आसपास रहेती हती, ज्ञातृमाधीज वर्तमान 'नथरिया' शब्द् बन्यो छे, महावीर तेमन जरिया ए बनेन गोत्र काश्यप छ, आजे पण जथरिय, भूमिहार ब्राह्मण आ प्रदेशमा मोटी संख्यामां छे, तेमनुं निवास रत्ती परगना, पण ज्ञातृ-नत्ती-लत्तो-रत्ती थी ज बनेलं छे। १११ में पाने निप्रन्थ सूत्रनो पण उल्लेख कयों छे के जे संनि ४० १-१८ थी उद्धृत करवामां आव्यो छे। . 7 १८० वीरस्तुतिः। क्षत्रियोनो सूचक छे, एम सप्रमाण बताव्यु छ, आगळ ऊपर वळी तेओ एम पण बतावे ? के 'ज्ञातृजाति' लिच्छविओनी शाखा हती। अने वैशालीनी आजु- बाजुमा रहेती हती, मा शारजाति आजे पण वैशाली नगरी [जिला मुजफ्फर- पुरनी अंदर वसाडनी पासे छे] नी आसपास जथरिया नामे जाति वसे छ, आ जथरिया शन्द भाषा दृष्टिए पण ज्ञातृशन्दनी साथे गाढ संबन्ध धरावे छे। जथरिया शब्द 'ज्ञातृ' शन्दनो अपभ्रंश जणाय छ, भातृमांधी 'जयरिया' शब्द केवी रीते बनवा पायो ते संबंधमां भाषा दृष्टिए उक राहुलजीए नीचे मुजब विचार को छ। ज्ञातृजाति, ज्ञातृ-शातर-जातर-जतरिया-जभरिया जैवरियाना गाममा 'नादिका ज्ञातृका-नत्तिका-लत्तिका रत्तिका-रत्ती जे नामथी वर्तमान रती पर- गणा [ जि• मुजम्पारपुर] । बुद्धचर्या पार्नु ५२८ ॥ मा रीते 'जयरिया' शब्द 'शा नो अपभ्रंश छे। राहुलजी आ रत्ती परगणानुं मूल नाम पोताना उपरोक उखमां आवेला "नादिका' शब्दयी उत्पन ययेलं बतावे छ। आप्रकारे 'जथरिया अने तेमन स्थान रत्ती ए बने शब्द ज्ञात शन्दनी साथे गाढ संबंध धरावे छे, अने आ संबंधी जरिया ज्ञातृक-ज्ञातवंशीज छ, अने तेमन प्राचीन निवासस्थान के जे नादिका अथवा नाटिका नामथी ओळ- खाय छे वे वर्तमान रत्ती परगनुं छे, एवो राहुलजीनो दृढ अभिप्राय छ । वळी वैमना आ अभिप्रायमां बीजीवात ए पण छे के आ जरिमानु' मूळ गोय काश्यप छै, ते काश्यप गोत्र भगवान् महावीर अने मना ज्ञातृवंशी क्षत्रियोर्नु पण हतुं। मा जथरिया-शातृ वंशी क्षत्रियोना संबंधमां श्रीराहुलजी बताये छे के था 'जरिया' लोको वर्तमानमा पोताने ब्राह्मण कहेवडावे छे, वेओ दान लेता नमी, [पंजावमा जमना किनारे वसनारी एक जाति रहे छे ते पण दान नथी ती ते देशमा तेमने 'दगा' कहे छ, संभव छे के ते शन्द त्यागीनी अपभ्रंश होय, पण तेवोना गोत्रो गोड ब्राह्मणोधी मळी आवे छ ] अहीं तो जपरिया जातिना लोकोने भूमिहार ब्राह्मण कहेवामो आवे छ। परन्तु बीमा लोको तेमने ब्राह्मण मानता नथी। देवी सर मालुम पढे छ के वासयमा वेओ इत्रिभोज
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता १८१
छ । आनुं बीजु कारण ए पण छै के मा 'जथरिया' नाम 'सिंहान्त' बाळा छ,
के जे क्षत्रियोना नामनी माये आज काल पाछळ लगाडवामां आवे छ, बळी
तेमना नामने छडे ठाकोर शब्द पण जोडवामां आवे छे, ए पण क्षत्रिय सूचक
ज छ, आ वंशमा हालमां पण घणा जमीनदार तथा राजाओ छ, दरभंगा
नरेश आ जातिना छ, कोई दरभंगाना प्रथम राजा रघुनन्दनने आ वंशमांज
समाविष्ट करे छ अने वर्तमान दर्भगा नरेशने श्रोत्रीय ब्राह्मण माने छ ।
बौद्ध साहित्यना उल्लेखथी तेमज राहुलजीना कथनथी आटलं अवश्य
मानवू जोइए के भगवान् महावीरनो वंश ज्ञातृवंश हतो, अने ते ज्ञातृवंशीय
क्षत्रिय 'कुंडग्राम' नी नजीक रहेता हता, वळी आ ज्ञातृवंशीय क्षत्रियोना गामा-
महात्मा बुद्ध आध्या हता, वर्तमानमा आ ज्ञातृवंशीय क्षत्रिय जथरियाना नामथी
प्रसिद्ध छे, अने ते घणे भागे विहार प्रान्तना मुजफ्फरपुर जिल्लाना रत्ती नामे
परगणामां रहे छ। वळी ते जरिया पोताना नामने छेडे सिंह तेमज ठाकोर
शब्दनो उपयोग पण करे छे । अने काश्यप गोत्र होवाने लीधे ज्ञातवंशीय क्षत्रिय
होवाने सभव छै, पण आजकल ए लोको पोताने भूमिहार ब्राह्मण कहे छ।
आमां केटले अशे तथ्य छ, तेनी शोध करवानी अत्यन्त आवश्यकता छे, आ
सत्यशोधथी भगवान महावीर प्रभुना ज्ञातृवंश तेमज मना जीवन सम्बन्धमा
अज्ञानान्धाकार जे आपणी आजु बाजु फेलाई गयो छ, ते दूर थई जसे।
ठिईण सेठा लवसत्तमा वा,
सभा सुहम्मार सभाण सेठ्ठा ।
निधाण सेठ्ठा जह सबधम्मा,
ण णायपुत्ता परमत्थि नाणी ।। २४॥
संस्कृतच्छाया
स्थितीनां (स्थितिमतां) श्रेष्ठा लवसचमा पा,
समा सुधर्मा वा समानां श्रेष्ठा।
निर्वाणश्रेष्ठा यथा साधा,
न ज्ञातपुत्रात्परमस्ति झानी ॥ २४ ॥
.
१८२
वीरस्तुतिः।
सं० टीका-स्थितिमतां सुखोपभोक्तृणां वा जीवानां चोर्डानां
देवानामिति, तन्मध्ये यथा लवसत्तमा पञ्चानुत्तरजास्तदुत्पन्ना देवा
सर्वोत्कृष्टस्थितिवर्तिनः प्रधानाः, यदि वा तेषां सप्तलवायुप्कमभविष्य-
तदा सिद्धिगमनमभविष्यदिति चापि । अतस्तेऽभिधीयन्ते कथ्यन्ते
लवसत्तमाः श्रेष्ठतमाः । समानां परिपदां मध्ये यथा सौधर्मा "स्यात्सु-
धर्मा देवसभेत्यमरः" परिपच्छेठा "सुधम्मा तु सभा मता इत्यभि-
धानप्पदीपिका ।" बहुभिः क्रीडास्थानः सभ्यजनगोष्ठीभिरुपैतत्वात्तथा ।
यथा सर्वेऽपि धर्मा निर्वागफलं दर्शयन्ति वा सर्वेभ्यो हितं सार्चम:
हैदर्शनं सर्वेषां जीवानां हितकर्ता उत नाहितकारकोऽतः सोर्हत्प्रणीत-
धर्मो निर्माणप्रदाने श्रेष्ठ इति भावः । यत एवं ज्ञातृपुत्रात्सर्वज्ञा-
च्छीमहावीरात्सप्रकाशात् परं प्रधानमन्यच्च विज्ञानं नास्त्येव सर्वथा
भगवानपरज्ञानिभ्योऽधिको ज्ञानीति भावः ॥ २४ ॥
अन्ययार्थ-[जह] जैसे [ठिईण ] आयुष्मानोमे [लवसत्तमा ] पांच
अनुत्तर विमानों में निवास करनेवाले देव [ सेठा] श्रेष्ठ होते हैं, [सभाण ] सव
सभाओमे [ मुहम्मा ] सौधर्म-इन्द्रकी [ राभा] सभा [ सेठा] श्रेष्ठ है, [ सम्व-
धम्मा ] संसारके सब धर्नामें [निब्याणसेठा ] मोक्ष धर्म प्रधान है, किन्तु
[णायपुत्ता] सात-पुत्र-महावीरसे [परमं] बढकर [ गाणी ] ज्ञानी कोई भी
[न] नहीं [अत्यि] है ॥२४॥
भावार्थ-उलष्ट स्थिति में सर्वार्थ सिद्धिके देव प्रधान हैं, क्योंकि मुख-
पूर्वक रहते हुए इतना पडा आयु पांचवें अनुत्तर विमानके देवोंके अतिरिक्त
अन्य किसीकी नहीं है, उनके वरावर सुख भी किसी दूसरेको नहीं है, तथा
जिस प्रकार मोधर्म-इन्दकी सभा अन्य सभाओसे मुन्दर है, और सब आस्तिक
परलोक-स्वर्ग-नरक-आत्मा आदि पदार्थों को माननेवाला में धर्मका फल एक मुक्ति
ही है, क्योंकि मिथ्यामार्गकी पुष्टि करनेवाले भी मोक्षको स्वयं प्रधान मानते हैं,
उसी भांति भगवान् भी समस्त शानिओंमें परमोत्कृष्ट शानी थे, ॥ २४ ॥
। संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता १८३ भाषा-टीका-अधिक आयुवाले मुखी जीवोंमें लवसत्तम अर्थात् पाच अनुत्तर विमानमें उत्पन्न देवोंका आयु सबसे अधिक श्रेष्ठ और मुखी है। इन्हें लवसत्तम इस लिए कहते है कि यदि इनका आयु सात लव अधिक होता तो इन्हें मोक्ष हो जाता। सभाओमें मुधर्मा अर्थात् शकेन्द्रकी सभा सर्व श्रेष्ट है, क्योंकि वहा सभ्यपुरुषोकी गोष्टी अधिक पाई जाती है। सारे धर्मोका निचोड सवने मोक्ष बताया है। अर्थात् धर्मका अन्तिम परिणाम श्रेष्ठ निर्माण माना है। या जो सबके लिए हितकर हो उसको सार्व कहते हैं। वह अर्हन होता है। उसका कहा हुआ धर्म श्रेष्ठ और निर्धाण प्रद है। इसी तरह ज्ञातृपुत्र महावीर प्रभुसे बदकर सर्वज्ञ ज्ञानी कोई नहीं है ॥ २४ ॥ गुजराती अनुवाद-अधिक आयुष्यवाळा मुखी जीवोमा लवसत्तम अर्थात् पाच अनुत्तर विमानवासी देवोतुं आयुष्य सर्वथी अधिक श्रेष्ठ अने मुखी छे, [तेमनुं आयुष्य जो सात लव वधारे होत नो तेओ मोक्षे जात, ते कारण तेमने लवसत्तम कहे छे ] सभामा मुधर्मा शकेन्द्रनी सभा सर्व श्रेष्ठ छ । कारण के ला सभ्यपुरुषोनी गोष्टी अधिक प्रमाणमां थाय छे। बधा धर्मोनो सार मोक्ष छ, अर्थान् धर्मर्नु अन्तिम परिणाम श्रेष्ठ निर्वाण मनाय छे, जे वधाने माटे हित कर होय तेने सार्च कहे छे, ते 'अर्हत्' होय छे। तेमणे कहेलो धर्म श्रेष्ठ निर्वाण पद छे । आ प्रकारे 'ज्ञानूपुत्र' महावीर प्रभुथी अधिक गर्वन कोई नथी ॥२४॥ मूल पुढोवमे धुणइ विगयगेही, न सण्णिहिं कुबइ आसुपन्ने । तरिऊं समुदं च महाभवोघं, अभयं करे वीर अणंतचक्खू ॥ २५ ॥ संस्कृतच्छाया पृथ्व्युपमो धुनोति विगतगृद्धिर्न सग्निधिं करोति मागुनमः। तरित्या समुद्रमिव महाभचौधमभयंफरो पीरोऽनन्तचक्षुः ॥२५॥ सं० टीका-पुनश्च स भगवान् यथा पृथ्वी सकलाधारा वर्तते सर्शन त्रससावरान् धारयति सा, तथैव सर्वसत्त्वानामभयपदानतः ।
- १८४ वीरस्तुतिः। सदुपदेशदानाद्वा महावीरः सत्त्वाधार इति, अथवा पृथ्वी सर्वसहा, एवं भगवानपि परियहोपसर्गान् सम्यक् सहते, कर्मरजांसि धुनोति दूरीकरो- तीति भावः, अप्टविधं कर्मापनयति वेति शेषः । तथा विगता प्रणष्टा सबाह्याभ्यन्तरेषु वस्तुपु गृद्धिलिप्सा वा गाय, तृष्णा भरमभिलाषो यस्या स विगतगृद्धिः । तथा सन्निधानं सन्निधिः स च द्रव्यसन्निधिः संचयः ।। धनधान्यद्विपदचतुष्पदरूपो द्रव्यसन्निधिः, भावसन्निधिस्तु कपायविष- यादयो वा, सामान्येन कपायास्तमुभयरूपमपि सन्निधिमथवेन्द्रियजन्य विषयं तन्न करोतीति भावः । “संनिधाने, अन्तिके, इन्द्रियगोचरे, सन्निधिरिति शब्दार्थचिन्तामणिः । “सन्निधिः संनिधानेऽपि पुमानि- न्द्रियगोचर इति मेदिनी"। "पच्चक्खे सन्निधाने च, सन्निधि परिकि- चितो, इत्यभिधानप्पदीपिका" । भगवान्न करोतीन्द्रियगोचरं विपयं प्रगट प्रत्युत नाशयतीति भावः । वीरस्तथैवाशुप्रज्ञः सर्वत्र सदोपयोगान्न छद्मस्थवन्मनसा प-लोच्य पदार्थपरिच्छित्ति विधत्ते करोति । छाद्यते खात्मरूपमनेनेति छम, तन्मध्ये तिष्ठतीति छनस्थो हि स केवलज्ञानर- हितो भवति । परन्तु भगवान् सर्वज्ञः । स एवंभूतः समुद्रपारमिव महाभवौघं संसारसमुद्रं समुत्तीर्य तीर्खा, बहुदुःखाकुलं चातुरगतिक संसारसागरं तीर्णः सर्वोत्तमं निर्वाणमासादितवान् । अभयं प्राणिनां प्राणरक्षानुकूलं व्यापार खतः परतश्च सदुपदेशदानात्करोतीत्यभयं- करश्च, भयोपपदात्करोतेः मेघर्तिभयेषु कृत्र' इति 'ख' प्रत्यये रिव- त्वात् 'अरुर्द्विपदजन्तस्य चेति मुमागमः।' तथाऽटविधकर्मविशेषेणेर- यति, प्रेरयति, कम्पयति, दूरीकरोतीति वीरः । तथा अनन्तमपर्यव- सान-नित्यं ध्रुवं ज्ञेयानन्तत्वात् वाऽनन्तं चक्षुरिव चक्षुः केवलज्ञानं यस्य स तथेति ॥ २५ ॥ .
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता अन्वयार्थ-[वीर ] भगवान् महावीर [पुढोवमे] पृथ्वीकी तरह सबके आधारभूत अथवा पृथिवीकी सदृश पारेपह-उपसर्ग आदि सहनेवाले [धुणति ] आठ कोंकी मूल प्रकृतिको और उत्तर प्रकृतिओंको नष्ट करते हैं, [विगय- गेहि ] अभिलाषा रहित तथा जो [ सगिहिं] द्रव्य आदिका संचय [न] नहीं [ कुन्वति ] करते, [आमुपन्ने] और जिनका ज्ञान सदा शीघ्र उपयोगयुक्त है, [समुदं ] समुद्रकी [व] भांति [महाभवोधं] पर्यायोके समूहरूप अनन्त संसारको [तरिउं] पार होकर [ अभयंकरे ] अपने और औरोंके द्वारा जीवोकी रक्षा कर- नेवाले और अणन्तचक्खु] अनन्त-ज्ञानयुक्त थे ॥२५॥ भावार्थ-संसारके प्राणी पृथ्वीपर सब प्रकारके कार्य करते हैं, किन्तु धृथ्वी किसीपर अप्रसन्न नहीं होती, प्रत्युत सब कुछ सहती है, इसी प्रकार भग- चान् महावीर भी परिषह और उपमर्ग आदि सब कुछ सहते थे, न किसी पर प्रसन्न होते थे न अप्रसन्न, जिम तरह पृथ्वी सबके लिए आधार रूप है, भग- वान् भी दयाल होनेसे आधारभूत थे, महावीर प्रभु आठ काँसे रहित और बाह्य-वस्तुके ममत्वसे दूर थे, तथा छअस्थकी तरह जानने के लिए उन्हें वस्तुके सोचने या विचारनेकी आवश्यकता न थी, क्योकि भगवान् प्रतिसमय उपयोगात्मक ज्ञानसे युक्त थे, तथा अनेक दु खोसे भरपूर संसार समुद्रसे पार होकर मुक्त होने वाले, खयं जीवरक्षा करनेवाले और उपदेशद्वारा औरोंकी रक्षा करानेवाले, तथा अनन्त-पदार्थोके ज्ञाता-इटा थे ।। २५॥ भापाटीका-पृथ्वी की सदृश सब प्रकारके प्रखर परिषद और उपसर्ग प्रभुने सेंही-वृत्तिसे सहन किए। तथा आठ कर्मरूपी रज मलको नष्ट करके निर्लेप हुए। फिर उनकी बाहर और भीतरकी सब सृष्णा और आशाएं नष्ट होगई। अतः अव उन्हें किसी भी पदार्थमें अनुरक्ति नहीं है। अब वे द्रव्य सन्निधि संसारोपयोगी वस्तुएँ, भावन्निधि इन्द्रियों के विषय और कपाय का मग्रह न करेंगे। या वे इन्द्रियों के विकारोको प्रगट न होने देकर उनका सर्वथा नारा कर चुके हैं। उन्हें अब सर्वज्ञोपयोगी होनेसे छद्मस्थकी तरह सोच विचार कर बातें कहनेकी आवश्यकता नहीं । क्योंकि सर्वज्ञ हथेली पर धरे हुए आमलेकी तरह सब चराचर का अनन्त ज्ञान पाए हुए हैं । और फिर संसारसमुद्रको पार करने के अनन्तर मुंदर निर्वाण को पाया है जह से कभी पुनरावृत्ति न होगी। क्योंकि वीरतासे आठ कमाकी अनन्त कर्मण वर्गणाओंका अलन्त अभाव कर . १८६ वीरस्तुतिः। दिया है। और अब केवल ज्ञानरूप अनन्तचक्षुयुक्त हैं। और वह चक्षु सादि अनन्तरूप है। प्रभुकी अनन्त ज्ञानरूपा लक्ष्मी इसीसे अपार है ॥ २५ ॥ गुजराती अनुवाद-ते भगवान महावीर प्रभु पृथ्वीनी पेठे सर्वशणि ओने आधारभूत छे, अने पोताना पवित्र उपदेशथी सर्वनो भय दूर करनार छ, अथवा पृथ्वीनी जेम सर्व प्रकारना प्रखर परियह तेमज उपसर्ग सिहसमान वृत्तिथी सहन करनार छे, आठ कर्मरूपी रज मेलनो नाश करीने निर्लेप थया छे। वळी बाह्य तेमज आन्तरिक सर्व तृष्णा अने आशानो नेमणे नाश कयों छे, तेथी कोई पण पदार्थमा तेमने आयक्ति रही नथी, हवे तेओ द्रव्यथी संसारोपयोगी वस्तुओं अने भावधी इन्द्रिय विपयो तेमज कपायनो सप्रद करशे नहि, तओए इन्द्रिय विकारोनो सर्वथा नाश कर्यो छे, तओ सर्वज्ञ होवाधी छद्मस्थनी पेठे विचार करीने बोलवानी तेमने आवश्यकता नथी, कारण तेमने हस्तामलम्वन् त्रिलोक्नु अन. न्तज्ञान प्राप्त थयु छ, तेमज वळी संसारसमुद्नो पार पाभी मुन्दर निर्वाण प्राप्त कर्यु छे, के ज्यांथी पुनरारत्ति करवी नहि पडे । वीरता पूर्वक अपकर्मरूपी अनन्त कार्मणवर्गणाओनो असन्त अभाव को छे, केवलज्ञानयुक्त छे, ते सादि अनन्तरूप छ । प्रभुनी अनन्तज्ञानरूपी लक्ष्मी अपार छ ॥ १५॥ कोहं च माणं च तहेव मायं, लोभं चउत्थं अज्झत्थदोसा। एआणि वंता अरहा महेसी, ण कुघा पाव ण कारवेइ ॥२६॥ (संस्कृतच्छाया) क्रोधं च मानं च तथैव मायां, लोभ चतुर्थमभ्यात्मदोपान् । एतान् वान्त्वाऽहन्महर्पिन करोति पापं न कारयति ॥२६॥ सं० टीका-क्रोधं कयायरूपमात्मेतरगुणं द्वेषोपयोगं "दोसो कोधे गुणोतरे इत्यभिधानप्पदीपिका" । "दोसो च पटिषं च वा, कोधाऽधाता कोप रोसा इत्यभिधा०" | मानमहंकारं च, "मानो विधा चचारि एए कसिणा कसाया, सिंचति मूरारं पुणभवत्स" ||४|| संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता १८७ च उष्णति" "गव्योऽभिमानोऽहंकारो" इत्यभिधानप्पदीपिका" मायां छद्मत्वं कपटं, "माया तु संवरीत्यभिधानप्पदीपिका" । लोभं पुद्गलव- स्तुसंचयन्यापारं "अभिज्झा वनथों वानं, लोभो रागो इत्यभिधानप्पर दीपिका" । वान्त्वा त्यक्त्वा वा एतान् दोपान् कपायानध्यात्मदोपान् परिहायाऽसौ भगवान् महर्जाितस्तथा खयं पापमासवं, "पापं, च किब्रिसं, वेराऽघं दुचरितं, दुक्कतं, अपुञाऽकुसलं, कण्हं, कुलसं, दुरिताऽगु च" । अथवा पापमपराधं "पापापराधेसु" अथवा पापं कर्मपंक "पापे च कद्दमे" । अथवा पापं युद्धं चापि, “पापे युद्धे रखे" अथवा पापं कलिः कलहं "पापे कलि"वा पापं वैरं ह्यपि "पापे च. पटिघे वेरं" "इत्यादीन्यभिधानप्पदीपिका"। न करोत्यन्यैनं कारय- तीत्येते कपायदोपास्त्वपि हितमिच्छंस्त्याज्या एव, यथाह सिद्धान्ते- "कोहं माणं च मायं च, लोहं च पाववढणं, बमे चचारि दोसे उ, इच्छंतो हिअमप्पणो" ॥ ३ ॥ इमे चत्वारः कपायाश्चतुरो दोपान् समुत्पादयन्ति, यथा- "कोहो पीई पणासेइ, माणो विणयनासणो, माया मिचाणि नासेइ, लोहो सबविणासणो" ॥ ३८ ॥ एतानात्मदोपानेः प्रयत्तरपनयेत् ।। "उवसमेण हणे कोहं, मागं मद्दवया जिणे, मायमञवभावेण, लोहं सतोसओ जिणे" ॥ ३९ ॥ नो चेत्संसारे परिभ्रमणं, यथा- "कोहोअ माणो अ अणिग्गहीआ, माया अ लोहो अ पवनामा । . (द ००८).
वीरस्तुतिः। : अथ कपायप्रत्याख्यानस्य फलमाह-कसायपञ्चक्खाणे णं मंते जीवे किं जणयइ ! कसायपच्चक्खाणे णं वीयरागं भावं जणयइ, मीयरागभावे पडिवन्ने वि य णं जीवे समसुहदुक्खे भवइ ॥३६ ॥ (उ० अ० २९॥) वीतरागताफलमाह-वीयरागयाणं भंते जीवे किं जणयइ ! वी० नेहाणुबंधणाणि तण्हाणुवंधणाणि य वोछिदइ, मणुन्ना मणुन्नेसु सफरिसरूवरसगंधेसु चेव विरज्जइ ॥ ४५ ॥ कपायविजयस्य पृथक्त्वफलं दर्शयति-कोहविजएणं भंते जीवे किं जणयइ ? को० खंति जणयइ, कोहवेयणिनं कम्म न बंधइ, पुवबद्धं च निजरेइ । खतिए णं भंते जीवे कि जणयइ ? ख. परीसहे जणयइ ॥ माणविजएणं भंते जीवे किं जणयइ ! मा० मद्दवं जणयइ, माणवेयणिज्ज कम्मं न बंधइ, पुबबद्धं च निजरेह; मद्दवयाएणं भंते जीवे किं जणयइ ? म० अणुस्सियत्वं जणयइ, • अणुस्सियतेणं ( अनुत्सुकत्वेन.) जीवे मिउमद्दवसंपन्ने (मृदुमार्दवसम्पन्नो) अठ्ठ मयाणाई निहावेइ (क्षपयति) | माया- विजएणं भंते जीवे किं जयणइ ? मा० अजवं जणयइ । मायावेय- णिज्नं कम्मं न बंधइ, पुषबद्धं च निजरेइ । अजवयाएणं भंते जीवे किं जणयइ ? अ० काउजुययं, भावुजुययं, भाउजुययं अवि- संचायण जणयइ, अविसंवायण (यथार्थ) सपन्नयाए णं जीवे धम्मस्स आराहए भवइ ।। लोहविजएणं भंते जीवे कि जणयइ ? लो० संतोस जणयइ, लोहवेयणिनं कम्मं न बंधइ, पुचवद्धं च निजरेइ ।। ७० ॥ मुत्तिएणं भंते जीवे किं जणयह ? मु० अकिंचणं जणयह, अकिंचणेय जीये अत्थलोलाणं पुरिसाणं अपत्थणिनो भवद ।। ४७ ॥ .
संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता कपाया अग्नय उक्ता अत एनान् शमयन्तु यथा- "संपजलिया घोरा, अम्गि चिट्टइ गोयमा, जे डहंति सरीरत्थे, कहं विज्झाविया तुमे" ॥५०॥ सम्प्रचलिता घोरा, अमयस्तिष्ठन्ति गौचम !, ये दहन्ति शरीरस्थाः कथं विध्यापितास्त्वया "महामहम्पसूयाओ गिज्झ-वारि जलुत्तम, सिंचामि सययं देहं, सिचा नो डहन्ति मे" ॥५१॥ महामेघप्रसूतात् गृहीत्वा वारि जलोत्तमम् । सिंचामि सततं देहं, सिक्का नो दहन्ति माम् ॥ "अग्गीय इ इ के चुचा, केसी गोयममवत्री, केसीमेवं बुवंतं तु गोयमो इणमवी" ॥ ५२ ॥ "कसाया अग्गिणो वुत्ता, सुयसीलतवो जलं, मुयधाराभिहया सन्ता भिन्ना हुन डहन्ति माम् ॥" कपाया अनय उकाः श्रुतशीलतपोजलम् । श्रुतधाराभिहताः सन्तः, मिन्ना खलु न दहंति माम् ॥ (उतराध्यन सूत्र, अ० २३) अथैतेपां वृद्धव्याख्यामाह- क्रोधः परापकाराय कुत्सितचित्तवृत्तिभेदः, परानिष्टामिलाप इत्यथवाऽनिष्टविषयद्वेषहेतुक इत्यर्थः । आत्मन्युत्काभिमानात्मकं मान- मिति । कापट्यभावं छद्म मिथ्याबुद्धिहेत्वज्ञानभेदो दम्भश्चेत्यर्थः । परद्रव्येष्वतिशयामिलापो लोभः, । परानिष्ठाभिलाषः क्रोधः, क्षमैव क्रोधविजये समर्थः, क्रोधावेशेन सर्वस्यान्धत्वमधैर्यत्वं हृदयशून्यता { अपारा आता उसकता, विनीतत्तजनन्दहत माम् ॥
वीरस्तुतिः। च भवति । अतः क्षान्त्यैव नश्यति । मत्समो नान्योऽस्तीति मननं मानं । अथवाऽऽत्मन्यविद्यमानगुणारोपणोत्कर्मरूपा युद्धिर्मानो महति धनाये सत्यपि बनुक्षणं वर्धमाने तदभिलापो लोभोऽथवा परवित्तादिकं दृष्ट्वा नेतुं (ग्रहीतुं) यो हृदि जायतेऽभिलपो लोभश्च सः । इतरेऽप्याहुर्यथा- "लोम एव मनुष्याणां, देहसंस्थो महान् रिपुः । सर्वदुः- खाकरः प्रोक्तो, दुःखदः प्राणनाशकः ।" "सर्वपापस मूलं हि, सर्वदा तृप्णयान्वितः, विरोधकृत् त्रिवर्णानां, सतिः कारणं तथा ।" "लोभात्त्यजन्ति धर्म च, मर्यादां वै तथैव च, मातरं प्रातरं हन्ति, पितरं बान्धवं तथा ।" "गुरुं मित्रं तथा तातं, पुत्रं च भगिनीं तथा, लोभाविष्टो न किं कुर्यादकृत्यं पापमोहितः" ॥ २६ ॥ अन्वयार्थ-भगवान् महावीर (कोह) क्रोधको (च) और (माणं) मानको (न) और (मायं) मायाको (नहेव) इसीप्रसर (चात्य) चौथे (लोभ) लोभको अर्थात् (एआदि) इन सब (अग्झत्यदोसा) अध्यात्मिा- आत्मसंबन्धी दोपोंको (वंता) त्यागकर (अरहा) अर्हन, तथा (महेसी) महर्षि हुए; और (पार्व) पाप (ण) न (फुबइ) खयं करते हैं (ण) न (कारवेइ) औरोंसे प्रेरणा कराते हैं ।। २६ ॥ भावार्थ-कारण नाश होनेपर कार्यका भी नाशहोजाता है संसारके बढने कारणभूत कोध-मान-माया और लोभ हैं, अतः इनके नाश होनेपर संमार-कर्मवर्गणासनी नाश हो जाता है, इसलिए भगवान् क्रोधादिय नारा करके अहंन अवस्था एवं महर्षिपदो प्राप्त हुए, क्योंकि वास्तव कायम नारा किए बिना कोई भी महर्षि नहीं बन सकता, और भगवान् न म्पयं पाप करते हैं न औरोंये पापमें प्रेरित करते हैं ॥ २६॥ भाषा-टीका-ध कारन पहला भेद है, इसके आवेगमें आयर नीव देपा उपयोग करने लगता है, इसमे औरॉय अनिष्ट नाभी कर मारना है,चित गति गर्म और सरार होनादी है, अनिष्ट करते समय प्रेषयी संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता उपयोग होता है। मान दूसरा कपाय है, इसकी मात्रा का कोई प्रमाण नहीं है, इसे अहंकार भी कहते हैं, इसके कारण 'वाहरे में यही कहता रहता है, इसके आवेशमै मात्र अपनीही बढती चाहता है। माया नाम कपट करने का है, इससे दंभ किया करता है, सरलता का नाश कर डालता है, अपनी चिद्वृत्ति का मालिक नहीं रह पाता । पराये धनमें अतिशय अभिलापा रसना लोभ है, जिससे किसी दूमरेका अहित करना वायें हाथका खेल समझता है । क्रोध शान्तिमे जीता जा सकता है, शांन्तिके विना कोधके आवेशमें अन्धा हो जाता है । इमसे अधीरता, अस्थिरता और हृदयशून्यता आ जाती । अतः क्रोधको गमभावसे नष्ट करना चाहिए। मुझसे बढकर अन्य कोई नहीं, इस मान्यताके आने पर मानसे घिर जाता है, और अपने में अविद्यमानगुणको उत्सन्न करनेकी युद्धि पैदा करता है, इससे अन्य सबको छोटी दृष्टिमे देखता है। स्पष्ट वात न कहना माया है। अधिक धनकी आय होने पर भी प्रतिपल जिसकी अभिलापा बढ़ती रहे उस अवस्थाका नाम लोभ है, या पराए धनको देख कर उसके स्वीकार करने की इच्छाको हृद- यमें उत्पन्न करना लोभ है, यह लोभ मनुष्योंके शरीरमें सबसे बड़ा शत्रु है, यह भब दु.पोंकी खान और प्राणनाशक है, सब पापोंका मूल है, तीनों वर्गों के लोक इसके कारण विरोध सहा कर रहे हैं, सबके दुःसोका कारण यही सिद्ध हुआ है। लोभसे प्रेरित होकर माता, पिता, भाई, बंधु और धर्म की मर्यादा तकको नष्ट कर डालता है। गुरु, मित्र, पिता, पुत्र, भगिनी आदिको लोभसे मार कर नाश करता है, तथा वह कौनमा अपत्य है जिसे लोभ वश न करसकता हो। परन्तु भगवान्ने इन चारोका वमन कर दिया, इनको त्याग दिया, ये चारों दोष कोई साधारण दोष नहीं है, बल्कि ये अध्यात्म दोष है, इनसे अध्यात्मिकता नष्ट होती है । इनसे अनन्त संसारमें हलना पडता है । भगवान् महावीर इन पायों को नष्ट करके महर्षि यने थे। तब फिर उनमेसे स्वयं पाप या आसन करने का विभाव मी जाता रहा । अब ये किसी आराधको नहीं करते, कर्म कीचसे सर्वथा अलिप्त हैं। जन्म-जरामरणरूपी ससारके युद्धसे मुक्त हैं। कल- इका इनके आत्मामें अत्यन्ताभाव है । ये प्रभु निर्वैर हैं, आशय यह है कि प्रभु खयं पाप नहीं करते, न किसी अन्यको पाप या आसवका उपदेश ही करते हैं, न कराते हैं। क्योंकि पाप करना, कराना कपाय और अशुभयोगसे होता है। । ।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता १९३ । हे पूज्यनीय ! मानके विजयसे क्या लाभ होता है ? मानके विजयसे निरभिमानिता या मार्दवताका अद्वितीयगुण पैदा होताहै। मान-जन्य कर्मका प्रतिबंध न करके पहलेके बांधे हुए कर्मकी निर्जरा करता है । मार्दवतासे क्या लाभ होता है। इससे अभिमान रहित होजाता है । वह किसी भी पदार्थमें उत्सुक नहीं होता । कठिन स्वभावको न रख कर वह फिर कोमल और मृदुताका सम्पादन करके जाति, कुल, बल, रूप, तप, ज्ञान, लाभ और ऐश्वर्य इन आठ- मदोका सहार करता है जोकि आत्मशत्रु रूप हैं। मायाका विजय करनेसे जीव क्या पाता है। इससे प्रकृति सरल हो जाती है। कपटसे भोगेजानेवाले कर्म नहीं बाधता । और पहले प्रतिबंधको तोड- देता है। निष्कपटतासे जीवको क्या प्राप्त होता है ? निष्कपटतासे काय, मन और भाषासे सरल होकर यथार्थ भाव पैदा करता है, किसीको ठगता नहीं, ऐमा जीव धर्मका सम्यक् आराधक बन जाता है। लोभको जीतनेसे क्या लाभ होता है। इसे जीतनेसे संतोषरूपी अमृतको पाता है। और तजन्य कर्मका बंध नहीं डालता। और पहले बांधे हुए कर्मको बखेर देताहै। निर्लोभतासे जीवको क्या लाभ होता है ? इससे अकिंचन भाव यानी निस्पृहताका गुण मिल जाता है। क्योंकि निष्कामजीवीको धनके लोभी कमी नहीं चिपटते। कपाय भी एक आग है इसे वुझाओ! जैसे कहा भी है कि- चारों ओर आग मुलग रही है, वह सबको जला रही है, किसी भी शरीर धारी प्राणीको इसने नहीं छोडा, सब जीव इसमें निरन्तर जल रहे है। हे गौतम ! आपने उसे किस प्रकार बुझाया। केमिन् ! महामेधसे एक उत्तम जल पैदा हुआ है, उसी पानी को लेकर अपनी देहको निरन्तर सींचता रहता हूं जिससे वह आग मुझे नहीं जलासकता। गौतम ! वह कौनसा अमिहै, ? गौतम बोले, केशिमुने । कपाय ही सबसे भयंकर अमिहै । उसे ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तपके जलसे सींचकर ठंडा कर दियाहै । यह जल जिनवाणीरूप मेघधारा में पाया है । उसीसे उसे बुझाया है। अतः वह आग अब मुझे नहीं जला सकती ॥२६॥ चीर.१३ - ५ । 3 वीरस्तुतिः। गुजराती अनुवाद-कपायनो पहेलो मेद, क्रोध छे, आवेशमा आवी जीव द्वेष करे छे, वेशी बीजा अनिष्ट पण करी बेसे छे, चित्तति गरम तथा खराब बनी जाय छे । अनिष्ट करवी वखवे क्रोधनोज उपयोग थाय छ, कषायनो पीजो भेद मान थे। वेनी मामार्नु कशुं प्रमाण नथी, वेने अहंकार पण कहे छे, देना आवेशमा मात्र पोतानीज चढवा इच्छे छे । माया नाम कपटर्नु छ, तेनाथी दम्भ करे छ, सरळतानो नाश धाय छ, चित्तरत्ति कब्जे रहेती नथी। परधनमा अतिशय अभिलाया ए लोभ छ, तेनाथी अन्यन अहित करी वेसा वार सागवी नथी। कपाय निग्रहनो उपाय-कोष शान्तिथी जीति साकाय छे, शान्ति वगर क्रोपना आवेगमा अन्ध बने छ। अधीरता-अस्थिरता-वेमन हृदयशून्यता- आवे छे तेथी क्रोधनो सम्भावथी नाश करयो जोइए। माराथी मोई कोई नथी, ए मान्यता मानधी आवे छ, अथवा पोतानामा न होय तेवा गुणो पोतानामा है, एवी बुद्धि यई जाय छे, तेथी वधाने हलका माने छ, स्पट वात न कहेवी ते माया पुष्कळ धन होवा छतां हरेक धणे यधुनी अनिलापा रासवी ते टोभ छ, अथवा परधन जोइने वे लई लेवानी हृदयमा इच्छा उत्तम यवी ते पण लोभ छे, लोभ मनुप्यनो मोटामा मोटो शत्रु छे, सर्वना विरोधनु ए कारण छ। भशी प्रेरित बनीने माता पिता-भाई-बन्धु-अने धर्मनी मर्यादा पा रहेती नथी । गुरु- मित्र पुत्र-भगिनी वगेरेनो नाश योभधी को छे। भयी सबै प्रारना अल परन्तु भगवाने आ चारे कपायोनो नाश करी दीयो छ, आधारे दोपो कोई साधारण दोष नथी, वे तो अभ्याम दोर छे। वेनामी अम्बानिस्तानो नारा धाय छ, तेनाधीन अनन्त संसारमा रमायुं पड़े छे, भगरान् महावीर प्रभु वे सारोनो नान करी महर्षि यन्या, हो वेभो पार-आसर करता नसी, कर्म मळयी तेओ अलित, जन्म-जरामरपथी मुह, करहनो असन्तप्रभाव थई गयो छे. प्रभु निरगे, भाशय ए छे के शभु पोवे पार करता नमी, कोई बीजाने पर या आसवनो उपदेश पन करदा नदी, करावना नदी, कारण पार करई, करावयु, ते काय अने भयोगो की-पाय छ, प्रभुनो नो असन्त अभार - संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्वरसहिता १९५ छे, तेथी प्रभुना अनुयायिओर्नु पण ए' कर्तव्य ? के तेओ पण कपायने मूके; दशवकालिकमा कयु छ के-"कोध-मान-माया-लोभ पार वृद्धि करनार छ, जो हित चाहता हो-तो चारे कपायोनो त्याग करो।" आ चारे कपायो अनन्तदोष वधारनार छे, तो पण तेनामा एक एक मुख्य दोष छ, जेमके-क्रोध प्रीतिनो, मान विनयनो, माया-कपट मित्रतानो अने लोभ प्रेम-विनय अने मित्रतानो नाश करे छ। तेने दूर करवाना उपाय-क्रोधने शान्ति थी, मानने नम्रता राख- पाथी,मायाने उदार सरळताथी, अने लोभ सन्तोपथी दूर कर नहि तो संसारमा अनन्तकाल परिभ्रमण कर पडशे। क्रोध-माननो निग्रह न कों होय, माया अने लोभमा वृद्धि करी होय तो मा चारे कपायो तारा माटे संसार जाळनी अनन्त वृद्धि करशे कपायत्यागर्नु फल-उत्तराध्ययनना २९ मा अध्ययनमा गौतम- खामी प्रश्न पूछे छ के हे भगवन् ! कपायना त्यागथी जीव शुं पामे छ ! गीतम! कपाय त्यागी वीतराग भाव उत्पन थाय छे अने वीतराग- भावने पामेला जीव ने मुखदुःख समान बने छ । वीतरागतार्नु फल-वीतरागपणाधी शु पामे छे ? गौत्तम! निरासतिथी मेह बंधन तथा तृष्णा बंधनने ते जीव छेदी नाखे छ, तथा मनोज्ञ अने अमनोज्ञ शब्दरूप-रस-गन्ध-स्पर्श इत्यादि विषयोमा वैराग्य-विरक्ति-त्यागभावने पामे छ। अलग २ फपाय जयतुं फल-हे पूज्य! क्रोधना विजयथी आ जीव मुंपामे छे? गौतम! क्रोध विजयथी जीवक्षमाना गुगने प्रगटावेछे, क्रोधधी उत्पन्न थतां कर्मोंने गांधतो नथी। अने पहेला बांध्यां होय तेने सपावे छे, शान्तिधी परिपह जीतवानो अभ्यास तथा सहिष्णुना विगेरे विगेरे गुणो उत्पन्न याय छ। हे पूज्य ! मानना विजयथी जीव शुं पामे ठे? मानना विजयपी निरभि- मानता या मृदुताना अपूर्वगुणने प्रगटावे छ, अने मानजन्य धर्मने बाधनो नथी, भने पहेला जे संधायुं छे तेनी निर्जरा करे छ, मृदुताधी जीव शुं पामे छ ! तेनायी जीव अभिमान रहित थाय छ, अने कोमल भूदुनाने प्राप्त करी जाति-उल-बल-रूप-तप-ज्ञान-लाभ-अने ऐश्वर्य ए आठ प्रारना मद रूप शत्रुनो संहार करे छे,
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वीरस्तुतिः।
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मायाना विजयी जीव शुं पामे छे! मायाना विजयथी सरलभावपणं पाने
छ, भने मायाथी दयां पड़ता को बंधातो नी, अने पूर्व बंधायाँ होय तो
तेने दूर करे छ।
... निष्कपटताथी जीव पामे ? निष्परतापी मन-वनन अने कायधी
सरलता अने सुंदरता प्राप्त करे छ, भने कोहेनी साये ते उगाई करतो नधी,
बेवो जीवात्मा धर्मनो सम्यक् आराधक बने छे,
हे पूज्य ! लोभना विजयथी जीव शु पामे छे? लोभनां विजयथी सन्तोष
रूप भटतने मेटने है, लोन जन्य मर्म मांधत नधी, अने पूर्व संशयेलो छे तेने
विखरे छ।
नि भताथी जीव पामे छे! तेनायी जीव अपरिग्रही बने छ, अने
धनलोलपी पुरुषोना कटो, पराधीनताओथी बची जाय छ, अने राष्ट्रनी दासत्व
अंसलाओने निळेभी पइने तोडे छे अने देशने खतव मनापी सके छे.
कपाय पण एफ आग छे, तेने शान्त करो-जेमके-वारे तरफ
आग राळगी रही, वे बधारे एकदम बाळी रही डे, शरीरधारी प्राणीने पण
तेणे छोडेल नथी, वे अमिने हे गौतम । तमे सीरीने बुझाची नाडी,!
हे केसी ? महा मेरमाथी उत्पन थयेला पाणीना प्रवाहमांधी ते उत्तन
पाणी लई सतत हुँदे अमिने ठारी नामु चं, अने तेथी वे ठरेली अमि मने
लेशमात्र वादी शक्ती नथी।
गौतम! ते अमिकई! गौतमे जवाब आप्यो केशी मुने ! कपायोज भयं-
कर अमि छे, शान-दर्शन चरित्र-तप रूपी जलनी धाराओ वीर्थरस्पी महामेश्यी
परसली, सत्याननी धाराओथी, हणाचेठी ते कापायो रूपी अनि साद टरी
चार छ, तेथी आप मने रेशमान पण बानी पारती नयी ॥२५॥
मूल
किरियाकिरियं वेणइयाणुवायं,
अण्णाणियाणं पडियच ठाणं ।
से सबवायं इति वेयइत्ता,
उपहिए संजम दीहरायं ॥२७॥
संस्कृतदीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता १९७ संस्कृतच्छाया कियाक्रियं वैनायकानुवाद, अझानिकानां प्रतीत्य स्थानम् । स सर्धवादमिति वेदयित्वा, उपस्थितः संयमदीर्घरात्रम् ॥ २७ ॥ सं० टीका-क्रियावादिनामीतिर्शत भेदाः । अक्रियावादिनां चतुरशीतिभेदाः । विनयवादिनां द्वात्रिंशत् , अज्ञानवादिनां ससँपष्टीति त्रिपटिशतमेदाः पापण्डिनां सर्वलिशिनां "पापण्डाः सर्पलिंगिन इत्यमरः ।" "[कुटीसकादिकातुत्तिस द्वसिठिदिढिओ इति छन् बुती एते ] पासण्डा सम्पकासिता इत्यभिधानप्पदीपिका ।" वा मनोनीतधर्मिणां स्थानं पदं वा सादृश्यं स्थितिमवस्थामात्मनो ज्ञात्वा, "स्थानं सादृश्येऽवकाशे स्थितौ वृद्धिक्षयेतर इति मेदिनी।" सर्वधर्मा- णामन्तभेद रहस्सं ज्ञात्वेति भावः । वा स्थिति तेषां स्थान निकटं त्यक्त्वेत्याशयः। "अवकाशे स्थितौ स्थानमित्यमरः।" पक्षमित्यपि सम्यक् प्रतीत्य परिच्छिद्य ज्ञात्वा च स भगवान् सर्ववादं सर्वमन्तव्यं कथयित्वा सर्वेषामेकान्तवादिनां खरूपं कथनं भावं च परिज्ञाय दीर्घ- कालं यावज्जीवपर्यन्तं संयमे धर्मे सम्यगुपस्थितः स्थितवान् ॥२७॥ अन्वयार्थ-से] वह भगवान महावीर [किरियाकिरियं ] क्रिया- बाद और अक्रियावादके तथा [वेणइयाणवायं] विनयवादी और [अण्णाणि- याणं ] अज्ञानवादियोंके (ठाणं ] पक्षको [पडियच्च] जानकर तथा [ सम्बवायं] और सब वादोंके-पक्षको (इति) सम्यक् प्रवरसे (धेयहत्ता) समझाकर [सजमीहरायं ] यावनीव सयममें [उठिए] उपस्थित रहे ॥ २७ ॥ भावार्थ-संसार में अनेक मतों प्रचार है, कोई कियासे मोह मानता है, कोहे माडिया की है वे मात्र जानछे मुक्ति होना मानते हैं, छोई विनय करतेने मोक्ष मानते हैं और कोई मानसे। और भी इनके बनेर निसन्त है, . वीरस्तुतिः। उन सबको प्रभु अच्छे प्रकारसे.जानकर तथा औरोको इसका तथ्य समझा कर संयममें तत्पर होगये थे. अर्थात् जैसा उपदेश करते थे वैसा आचरणमें भी लाते थे।॥ २७॥ ,. भाणटीका:-क्रियावादियोंके १८० मत, अक्रियावादियोंके ८४ मत, विनयवादियोंके ३२ मत, और अज्ञानवादियोंके ६. इस प्रकार पापंडियोके ३६३. मेद सर्वधम्मलिंगिओंके होते हैं । बौद्धोंने ९६ पाषंड माने हैं। मनो- नीत धर्मका नाम पापण्ड है। या सर्वधर्मका नाम पापंड है। प्रभुने उनकी तुलना स्याद्वादसे. कर दिखाई। जिस अग्नि परीक्षा में कोई पापंड न डट सका। परन्तु प्रभुने इनसे सर्वधर्म समभाव रखना बताया। उनमें युक्तायुक्तविभाग करके असत्य का त्यागना सर्वश्रेष्ठ मानी । इस प्रकार खसमय परसमय का मन्तव्य समझाकर यावजीवतक संयमधर्ममें एकरस होकर तत्पर (स्थिर) रहे थे॥२७॥ गुजराती अनुवाद-क्रियावादीना १८० मत, अक्रियावादीना ८४, विनयवादीना ३२. अने अज्ञानवादीना ६७ ए सर्व ३६३ पाखण्डिओना भेद जाणवा, बोद्धोए ९६ मेद मान्या छे, मनोनीत धर्म पाखण्ड कहेवाय छे, तेनी तुलना स्यादादी करी बतावी, ते अग्निपरीक्षामां कोई पासण्डी टकी न शक्यो। प्रभुए सर्व धर्म समभाव राखवान पण बताव्यु, तेमा योग्यायोग्यनुं जाणपणं पण बतावीने असत्यनो त्याग सर्व श्रेष्ठ,मान्यो। थारीवे खसमय, पर-समयनुं मन्तव्य समगीने उत्तम दशविध सयममा (धर्ममा) जावजीप सुधी सावधान पणे रहा।। २७॥ से वारिया इत्थी सराइभत्तं, उवहाणवं दुक्खखयठ्याए । लोगं विदित्ता आरं परं च, 'सबं प्पभू वारिय सहवारं ॥२८॥ संस्कृतच्छाया • स वारयित्वा खियं सरात्रिभक, उपधानवान् दुःखक्षयार्थम् । लोकं विदित्वाऽऽरंपारंच, सर्व प्रमुरितवान् सर्चवारम् २८ .
संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता सं० टीका–स वीरभगवान् स्त्रियं स्त्रीसम्पर्क सम्भोगं च मैथुन स्त्रीवेदपुरुपवेदोदय, रात्रिभोजनसहितं निरन्तरं वारयित्वा परित्यज्य, उपलक्षणादन्यान्यपि प्राणातिपातादीनि ग्राद्याणि । परन्तु रात्रिभोजने तु सुतरां त्रसानामपि हिंसाऽनिवार्यसंयोगेन भवत्यवेत्यनेन रात्रिभोजनं त्याज्यमेवेति भावः । यथाह- पुरुषार्थसिद्धयुपाये- "रात्रौ भुंजानानां यस्मादनिवारिता भवति हिंसा, हिंसाविरतैस्तस्मात्त्यक्तव्या रात्रिभुक्तिरपि" ॥१२९ ।। "रागाद्युदयपरत्वादनिवृत्ति तिवर्तते हिंसा । रात्रिंदिवमाहरतः कथं हि हिंसा न सम्भवति" ॥ १३०॥ "यद्येवं तर्हि दिवा कर्तव्यो भोजनस्य परिहारः। भोक्तव्यं तु निशायां नेत्थं नित्यं भवति हिंसा" ॥१३१॥ नैवं वासरभुक्तेर्भवति हि रागाधिको रजनिभुक्तौ । अन्नकवलस्यभुक्तर्भुक्ताविव मांसकवलस्य ॥ १३२ ॥ अकाले भुञ्जानः परिहरेत् कथं हिंसाम् । अपि बोषितः प्रदीपो भोज्यजुषां सूक्ष्मजीवानाम् ॥१३३।। किं वा बहुमलपितैरिति सिद्धं यो मनोवचनकायैः । परिहरति रात्रिभुक्ति सततमहिंसां स पालयति ॥ १३४ ।। अहिंसाणुव्रतपालको नरो रात्रिभोजनं वर्जयतीति दर्शय- नाह; सागारधर्मामृते-- 'अहिंसावतरक्षार्थ, मूलवत्तविशुद्धये । नक्तं भुक्ति चतुर्घाऽपि सदा. धीरस्त्रिधा त्यजेत् ॥ २४ ॥ , .
वीरस्तुतिः । जलोदरादिकृयूकार्यक्रमप्रेक्ष्यजन्तुकम् । प्रेताद्युच्छिपमुत्सृष्टमप्यतन्निश्यहो सुखी ॥ २५ ॥ अथवा वनमालादृष्टान्तेन रात्रिभोजनदोपस्य पातकं वर्शयति- "त्वां यद्युपैमि न पुनः सुनिवेश्य रामं, लिप्ये पधादिकृदधैस्तदिति श्रितोऽपि । सौमित्रिरन्यशपथान्वनमालयेकं, दोपाशिदोपशपथं किल कारितोऽसिन्" ।। २६॥ लौकिकसंवाददर्शनेनापि रात्रिभोजनप्रतिपेधमाह । यत्र सत्पात्रदानादिकिश्चित्सत्कर्म नेप्यते । - कोऽद्यात्तत्रात्ययमये, खहितैपी दिनात्यये ।। २७ ॥ भुञ्जतेऽन्हः सकृद्धा द्विर्मध्याः पशुवत्परे । राज्यहस्तगतगुणान् , ब्रह्मोद्यान्नावगामुकाः ॥ २८ ॥ योऽचि त्यजन् दिनाद्यन्तर्मुहुर्ती रात्रिवत्सदा । स वयेतोपवासेन खजन्माई नयन कियत् ॥ २९ ॥ तथा च-श्रावकस्सैकादशप्रतिमासु पठ्या प्रतिमायां श्रावको रात्रिभुक्तित्यागी भवति । यथाह- समन्तभद्रस्वामी श्रावकाचारे- अन्नं पानं खाद्य लेयं, नानाति यो विभाथ्योम् । स च रात्रिभुक्तिपिरतः, सत्वेष्वनुकम्पमानमनाः ।। १४२ ।। पुनथ-मुनिस्तु महानतं समेत्य रात्रिभोजनात्सर्वथा विरमति यथाह दशवकालिकेतस्य पपुव्रतं कृतम्- अहावरे छठे भते । वए राइभोयणाओ वेरमणं, सब भते.! राइ- भोयणं पचक्खामि, से असणं या, पाणं वा खाइमं का साइमं वा, - - . ग संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता २०१ नेव सर्व राइं मुंजेजा नेवऽनेहिं राई मुंजाविना राई भुंजतेऽपि अन्नेन समणुजागेजा जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मगेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । छठे भंते ! पए उवठिओमि सधाओ राइभोयगाओ रमणं । "अहावरे" इत्यादि । अथापरस्मिन् पष्ठे भदन्त ! मते रात्रिभोज- नाद्विरमणं, सर्व भदन्त ! रात्रिभोजनं प्रत्याख्यामीति पूर्ववत् । तद्यथा- अशनं, या पानं या खायं वा स्वायं वेति, 'अश्यत इत्यशनम्,'-ओदनादि, 'पीयत इति पानं'-मृद्वीकापानादि, 'खाद्यत इति खाय' खजूरादि, 'खाद्यत इति खायं' ताम्बूलादि, 'नैव खयं रात्री भुंजे, नैवान्ये रात्री भोजयामि, रात्रौ भुंजानानप्यन्यान्नैव समनुजानामि इत्येतवावज्जीवमि. त्यादि च भावार्थमधिकृतपूर्वविधम् । विशेषस्त्वयम्-रात्रिभोजन चतु- विधम् । तद्यथा द्रव्यतः क्षेत्रतः फालतो भावतश्च । द्रव्यतस्त्वशनादौ, क्षेत्रतोऽर्धतृतीयेषु द्वीपसमुद्रेषु, कालतो रात्र्यादौ, भावतो रागद्वेपाभ्या- मिति।सरूपतोऽप्यस्य चानुर्विध्यम्, तपथा-रात्रौ गृहाति रात्रौ भुक्ते, १ रात्री गृहाति दिवा भुक्के २, दिवा गृहाति रात्रौ भुके ३, दिवा गृण्हाति दिवा भुके ॥ ॥ सनिधिपरिभोगे द्रव्यादिचतुर्भगी पुनरि- यम्-द्रव्यतो नामको रात्री मुंक्त नो भावतः १, भावतो नामको नो दन्यतः २, एको दन्यतोऽपि भावतोऽपि ३, एको नो दन्यतो नो भावतः ।। ४ ॥ तत्रानुगते सूटचे उद्त इत्यस्तमिते याननमित इत्यरक्तद्विष्टस्य फारमतो या रात्रौ मुखानल द्रव्यतो रात्रिभोजन नो भावतः । रात्रौ भुज इति मर्पितल तदसम्पनी भावतो नो द्रव्यतः । एवमेव सम्पचौ द्रव्यतोऽपि, भारतोऽपि चतुर्यो भंगः पुनः - २०२ वीरस्तुतिः। शून्यः । एतच रात्रिभोजनं प्रथमचरमतीर्थकरतीर्थयोः ऋजुडवक- जडपुरुषापेक्षया मूलगुणत्वल्यापनार्थ महानतोपरि पठितं मध्यमतीर्थ- करतीर्थेषु पुनः ऋजुपज्ञपुरुषापेक्षयोत्तरगुणवर्ग इति ॥ तथा च योगशास्रजप- अन्नं प्रेतपिशाचायैः, संचरद्भिनिरंकुरीः । उच्छिएं क्रियते यत्र, तत्र नाद्यादिनात्यये ।। तथा-- पोरान्धकाररुद्धाः, पतन्तो यत्र जन्तवः । नेव भोग्ये निरीक्ष्यन्ते, नत्र भुजीत को निशि ? रात्रिभोजने दृष्टान् दोपानाह- "मेघा पिपलिका हन्ति, यूका कुर्वावलोदरम् । कुरुते मक्षिका पान्ति, कुष्ठरोगं च कोलिकः ॥" "कष्टको दारुस्सण्डं च, पितनोति गलव्यधाम् । व्यसनान्तर्णिपतितस्तान विध्यति ब्धिकः ।।" "विलमध गले पालः, सरभंगाय जायते । इत्यादयो रएदोपाः, सर्वेषां निशि भोग्ने।" यदाहुः- *मेहं पिपीलियाभो, हगंति पमणं च मच्च्यिा कुगर, ज्या- • मेरी पिपीडिय मन्ति, यमनं च ममग्र करो, यूपरलोदरत्वं, कोय। बालः सरसभंग, स्टोनमी गोदार, टाउनरिभावियरनमध्ये मुम्पादन गोगानो कुम्माना, मारना। एनादिनीमोरोपार, परि ju संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता जलोयरतं, कोलियओ कोटरोगं च ।। बालो सरस्स भंग, कंटो लम्गइ गलम्मि दारु च । तालम्मि विधइ अली, वंजणमज्झम्मि भुंजतो ।। जीवाण कुंथामाईण घायणं भायणधोयणाईसु । एमाइरयणिभोयणदोसे, को साहिऊ तर, नाप्रेक्ष्यसूक्ष्मजन्तून् , निश्यद्यात्प्राशुकान्यपि, अप्युद्यत्केवलज्ञानैर्नादृतं यन्निशासनम् ॥ *जइवि हु फासुगदवं कुंथूपणगावि तहवि दुप्पस्सा, पञ्चक्खनाणिणो वि, हु राइभत्तं परिहरति । जइवि हु पिवीलगाई, दीसंति पइवमाईउज्जोए, तहवि खल अण्णाइन्नं, मूलवयविराहणा जेण ॥ लौकिकसंवाददर्शनेनापि रात्रि भोजनं प्रतिपेधति यथा- "धर्मविन्नैव भुंजीत, कदाचन दिनात्यये, वाह्या अपि निशाभोज्यं यदभोज्यं प्रचक्षते ।" तच्छास्त्रमेव कथयति- "त्रयीतेजोमयोभानुरिति वेदविदो विदुः । तत्करैः पूतमखिलं, शुभं कर्म समाचरेत् ॥" पुनश्चतदेवाह- नैवाहुतिर्न च खानं, न श्राद्धं देवतार्चनम् । दानं वा विहितं रात्रौ, भोजनं तु विशेषतः ॥" * यद्यपि खल प्रामुकदव्यं, कुन्थुपनका भपि तथापि दुष्पेक्ष्याः । प्रत्यक्षशानिनोऽपि खलु रात्रिभकं परिहरन्ति । यद्यपि खल पिपीलिकादयो दृश्यन्ते प्रदीपायुद्योते। तथापि सल्बनाची, मूलनवविराधना येन ॥
* - २०४ वीरस्तुतिः पुनश्च-"दिवसस्याप्टमे भागे, मन्दीभते दिवाकरे । नकं तु तद्विजानीयान नतं निशि भोजनम् ।। "देवैतु मुक्तं पूर्वान्हे, मध्यान्हे ऋषिभिस्तथा । अपराण्हे च पितृभिः, सायान्हे दैत्यदानवैः ।। "सन्ध्यायां यक्षरक्षोमिः, सदा भुक्तं कुलोद्रह । सर्ववेलां व्यतिक्रम्य, रात्रौ भुक्तमभोजनम् ॥" आयुर्वेदेऽप्युक्तम्- "हृन्नाभिपद्मसंकोचश्चण्डरोचिरपायतः । अतो नक्तं न भोक्तव्यं, सूक्ष्मजीवादनादपि ।।" परपक्षसंवादमभिधाय स्वपक्षं समर्थयते- "संसर्जीवसंघातं, भुञ्जाना निशि भोजनम् । राक्षसेभ्यो विशिप्यन्ते, मूढात्मानः कथं नु ते?" एतदेवाह- "वासरे च रजन्यां च, यः खादन्नेव तिष्ठति । शृंगपुच्छपरिभ्रष्टः, स्पष्टं स पशुरेव हि ॥" रात्रिभोजनविरतानां सविशेषपुण्यवत्वं दर्शयति- "अन्हो मुखेऽवसाने च, यो वे द्वे पदिके त्यजन् । निशाभोजनदोषज्ञोऽश्नात्यसौ पुण्यभाजनम् ॥" ननु यो दिवैव भुंक्त तस्स रात्रिभोजनप्रत्याख्याने फलं नास्ति ? फलविशेषो वा कविदुच्यवामित्याह- "अकृत्वा नियमं दोपाभोजनादिनभोज्यपि । फलं फलेन निर्व्याज, न वृद्धि पितं विना ॥" - -
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता
पूर्वोक्तख विपर्ययमाह-
. "ये वासरं परित्यज्य, रजन्यामेव मुंजते ।
परित्यज्य माणिक्य, काचमाददते जडाः।"
ननु यदि नियमः सर्वत्र फलवान् ततो यस्य "राबादेव
मया भोक्तव्यं न दिवसे" इति नियमस्तस्य का गति? रित्याह
"वासरे सति ये श्रेयस्काम्यया निशि भुंजते ।
ते वपन्त्यूपरक्षेत्रे, शालीन् सत्यपि पल्वले ॥"
रात्रिभोजनस्स दुर्विपाकफलमाह-
"उलूककाकमार्जारगृध्रशम्बरशूकराः ।
अहिवृश्चिकगोधाश्च, जायन्ते रात्रिभोजनात् ॥"
वनमालोदाहरणेनायमपि रात्रिभोजनदोपस्य त्यागमहत्तां
दर्शयति यथा-
"श्रूयते धन्यशपथाननादृत्यैव लक्ष्मणः ।
निशाभोजनशपथ, कारितो वनमालया ॥"
शास्त्रं निदर्शनं च विना सकलजनानुभवसिद्धं-रात्रि-
भोजनत्यागफलमाह-
"करोति विरति धन्यो, यः सदा निशि भोजनात् ।
सोऽर्द्ध पुरुषायुषस्य, स्यादवश्यमुपोपितः ॥"
तदेवं रात्रिभोजनस भूयांसो दोपास्तत्परिवर्जने तु ये गुणा-
स्तान वक्तुमसाकमशक्तिरेवेत्याह-
"रजनीभोजनत्यागे, ये गुणाः परितोऽपि तान् ।
न सर्वज्ञाहते कश्चिदपरो वक्तुमीश्वरः ॥ ७० ॥
२०६
वीरस्तुतिः।
अमितगतिश्रावकाचारेऽपि रात्रिभोजनस निषेधः कृतः ।
यत्र राक्षसपिशाचसंचरो, यत्र जन्तुनिवहो न दृश्यते ।
यत्र मुक्तमपि वस्तु भक्ष्यते, यत्र घोरतिमिरं विनृम्भते ॥
यत्र नास्ति यतिवर्गसङ्गमो, यत्र नास्ति गुरुराजदर्शनम् ।
यत्र संयमविनाशि भोजन, यत्र संसजति जीवभक्षणम् ॥
यत्र सर्वशुभकर्मवर्जन, यत्र नास्ति गमनागमक्रिया;
तत्र दोपनिलये दिनात्यये, धर्मध्यानकुशला न भुंजते ।।
मुंजते निशि दुराशयाय के, गृद्धिदोपवशवर्तिनो जनाः ।
भूतराक्षसपिशाचशाकिनी, सगतिः कथममीभिरस्य च ।।
यस्मते दिननिशीथयोः सदा, यो निरस्तयमसंयमक्रियः ।
शृंगपुच्छशफसंगवर्जितो, भण्यते पशुरयं मनीषिभिः ।
आमनन्ति दिवसेपु भोजनं, यामिनीपु शयनं मनीषिणः ।,
ज्ञानिनामवसरेषु जल्पन, दशान्तये गुरुपु सेवनं कृतम् ।।..
भुज्यते गुणवतैकदा सदा, मध्यमेन दिवसे द्विरुग्वले;
येन रात्रिदिवयोरनारतं, मुज्यते स कपितो नराधमः ।।
ये विषय वदनायसानयोर्वासरस्य घटिकाद्वयं सदा ।
मुंजते जितक्षीकवाजिनस्ते भवंति भवभारवर्जिताः ।।
ये व्यवस्थितमहः मुसर्वदा, शरीषु रचयन्ति भोजनम् ।
निग्नगामिसलिलं निसर्गतने नवन्ति शिसरेषु शाखिनम् ।।
: सूचयन्ति मुरादायि येऽगिना, रात्रिभोजनमपाखचेतनाः ।
पावकोद्धचशिखाकरालितं; ते पदन्ति फलदाविकाननम् ।।
ये झुपन्ति दिनरात्रिभोगयोस्तुल्यता रचितपुण्यपापयोः ।
ते प्रकाशतमसोः समानता, दर्शयन्ति सुखदुःखकारिभोः ॥
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संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २०७
रात्रिभोजनमधिश्रयन्ति ये, धर्मबुद्धिमधिकृत्य दुर्धियः ।
ते क्षिपन्ति, पविवन्हिमण्डलं, वृक्षपद्धतिविवृद्धये ध्रुवम् ।।
ये विधृत्य सकलं दिनं क्षुधा, मुंजते सुकृतकांक्षया निशि ।
ते विवृध्य फलंशालिनी लता, भस्मयन्ति फलकांक्षया पुनः॥
ये सदापि घटिकाद्वयं विधा, कुर्वते दिनमुखान्तयोर्बुधाः ।
भोजनस्य नियमो विधीयते, मासि तैः स्फुटमुपोषितद्वयम् ।।
रोगशोककलिराटिकारिणी, राक्षसीव भयदायिनी प्रिया ।
कन्यका दुरितपाकसंभवा, रोगिता इव निरन्तरापदाः ।।
देहजा व्यसनकर्मपंडिताः, पन्नगा इव वितीर्णमीतयः ।
निर्धनत्वमनपायि सर्वदा, पात्रदानमिव दत्तवृद्धिकम् ।।
संकटं सतिमिरं कुटीरकं, नीचवित्तमिव रंध्रसंकुलम् ।
नीचजातिकुलकर्मसंगमः शीलशौचशमधर्मनिर्गमः ॥
व्याधयो विविधदुःखदायिनो, दुर्जना इव परापकारिणः ।
सर्वदोषगणपीड्यमानता, रात्रिभोजनपरस्य जायते ॥
पद्मपत्रनयनाः प्रियंवदाः, श्रीसमाः प्रियतमा मनोरमाः ।
सुन्दरा दुहितरः कलालयाः, पुण्यपंक्तय इवात्तविग्रहाः॥
भ्रंशितव्यसनवृत्तयोऽमलाः, पावना हिमकरा इवागंजाः ।
शक्रमन्दिरमिवास्ततामसं, मन्दिरं प्रचुररत्नराजितम् ॥
लब्धचिन्तितपदार्थमुज्वलं, भूरिपुण्यमिव वैभवं स्थिरम् ।
सर्वरोगगणमुक्तदेहता, सर्वशर्मनिवहाधिवासिता ।।
ज्ञानदर्शनचरित्रभूतयः, सर्वयाचितविधानपण्डिताः ।
सर्वलोकपतिपूजनीयता, रात्रिभुक्तिविमुखस्य जायते
॥
वीरस्तुतिः। . . . शूकरी शंवरी वानरी धीवरी, रोहिणी मंडली शोकिनी क्लेशिनी । दुर्भगा निस्सुता निर्धवा निर्धना, शबरीभोजिनी जायते भामिनी ।। बान्धवैरंचिता देहन्दिता, भूषणैपिता व्याधिभिर्वर्जिता । थीमती हीमती धीमती धर्मिणी, वासरे जायते भुक्तितः शर्मणी ॥ रात्रिभोजनविमोचिनो गुणा, ये भवन्ति भवभागिनां परे । १. तानपास्य जितनाथमीशते, वक्तुमत्र न परे जगत्रये ॥ इत्यनेकशास्त्रसम्मतरात्रिभोजनं परिहेयमिति भावः । उपधानं तपः, प्रणयं च प्रकर्षण नयं न्यायं "उपधानं विरे गण्डौ प्रणयेऽपि नपुंस- कमिति मेदिनी' । तद्विद्यतेऽस्यासावुपधानवान् , तपोनिष्टतदेहो नय- वानपि,, दुःखक्षयार्थ दुःखपणाशनार्थमारं प्रान्वभागं, पारं परं लोकं "पारं परतटे प्रान्ते इति मेदिनी"। "पारं मुत्ति इत्यभिधानप्पदीपिका बौद्धकोषः" । ऐलोकं पारलोकं, अथवाऽऽरं मनुष्यलोकं पारं दूर- वर्षि तीरं पारं परम्हि, तीरम्हि' इति अभिधानप्प० । अथवा नर- कादिकं खरूपतस्तत्प्रापणहेतुं ततश्च ज्ञात्वा सर्वमेव तत् , प्रभुभगवान् सधवारं बहुशो निवारितवान् त्यक्तवान् एतदुक्तं कथितं प्राणातिपा- तादिकं निषेधादिकं खतोऽनुपाय परांश्च-स्थापितवान् , नहि सतोs- स्थितः परांश्च स्थापयितुमलमित्यर्थः खयमधर्मे स्थितः पराञ्जनान्धर्मे , स्थापयितुमसमर्थः । स्तुतिकृतोतमिति । "ब्रुवाणोऽपि न्याय खवचन- विरुद्धं व्यवहरन्, परं नालं कश्चिद्दमयितुमदान्तं खयमिति । भवा- निश्चित्यैवं मनसि जगदाधाय सकलं, समात्मानं तावद्दमयितुमदान्तं व्यवसितः" ॥ २८॥ अन्वयार्थ-[2] उस [उपहागवं] तपस्वी [प्रभु भगवान महा. वीरने [दुक्पक्खयट्ठयाए आठ प्रकारके फर्मरूपी दुःखोंको दर फरनेकेलिए संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २०९ {सराइभतं] रात्रि भोजन सहित [इत्थी] नो-संभोगादि पायोंको [वारिया ] छोडकर [ सव् ] तथा समस्त [आरं] इस [लोगं ] लोकको (च) और [परं] परलोकको [विदित्ता] जानकर [सव्ववारं] अधिकाधिक प्रमाण, समस्त परभावका [वारिया ] निवारण किया ॥२८॥ भावार्थ-जो वका जिस प्रवृत्तिका उपदेश करता है वह वैसा ही वर्तन भी करता है, तब ही उसके उपदेशका प्रभाव पड़ता है। महावीरप्रभुने मोक्ष- पानेका जो उपदेश किया उसमें वे खयं भी संलग्न रहे हैं । इसीसे कहा गया है कि-भगवान्ने आठ कर्मरूपी दुःखों का नाश करनेके लिए स्त्री-संसर्ग तथा रात्रिभोजन और १८ पापोंका खयं त्याग किया था। इसके अतिरिक्त घोर तप करते हुए इसलोक-परलोक अथवा मनुष्यलोक नरकलोकादिका रहस्य जानकर उन सबका त्याग किया ॥२८॥ भाषा-टीका-भगवान् स्त्रीसंसर्ग और स्त्रीके पडौसमें रहने तकके कहर त्यागी थे। उन्होंने ब्रह्मचर्य पालन करनेके लिए नव वाड विशुद्ध' शील पालन करना बताया है । यहा तक तो कहा है कि जिस स्थान पर स्त्री बैठकर गई है, ब्रह्मचारी उस स्थान पर एक घंटा तक बिल्कुल न बैठे । क्योकि उसके अशुद्ध और गर्म परमाणुओं का प्रभाव सुशीलके लिए हानिकर है। यही ब्रह्म- चारिणीके लिए भी समझना चाहिए । इसके अतिरिक आप रात्रिभोजनके भी प्रत्यक्ष विरोध थे, क्योंकि रात्रिमें भोजन करनेसे त्रस जीवोंकी हिंसाका होना अनिवार्य संयोग है। इसी कारणसे रात्रिभोजन करना मना किया है। रात्रिभोजन इस लिए वर्जित है कि रात्रि भोजन करनेवालों के लिए हिंसाका निवारण करना अशक्य है। अतः हिंसाका त्यागी रातमें भोजन न करे। मगर जो जीव तीव्र राग भाव रखते हैं उनसे इसका त्याग नहीं हो सकता। क्योंकि जिसे भोजनसे अत्यधिक अनुराग होगा वह ही प्राणी रात दिन साता पीता रहेगा । और जहा राग बन्धन होता है वहां प्रमत्तयोग व्यापार अवश्य रहता है । और प्रमत्त प्राणी हिसा अवश्य करेगा। बहुतसे यह भी कहते हैं कि यदि सदाकाल भोजन करनेमें हिंसा होती है तो दिनमे भोजन न करके रातको ही खाना चाहिए? क्योंकि इस प्रकार करनेसे सदैव तो हिंसा न होगी । मगर यह बात नहीं है, यद्यपि उदरके । . वीर. १४ . । - -- २१० वीरस्तुतिः। भरने की अपेक्षा सब प्रकारके भोजन समान हैं। परंतु मनके भोजनमें जितना साधारण राग भाव है, उतना मांस भोजनमें नहीं । मांस भोजन में विशेष राग भाव है। जितना पास खानेवाली गायको चारा मिलने पर खावे समय सामान्य रागभाव है, उतना थोडा रागभाव चूहे मारनेवाली बिलीको नहीं । बिल्लीको मांस भोजनमें विशेष रागभाव है । क्योंकि अन्नका भोजन सह- जमें मिल जाता है और मांसका भोजन अतिशय कामादिककी अपेक्षा अथवा शरीरादिकके मोहकी अपेक्षा विशेष प्रयत्नसे तैयार किया जाता है। इसी तरह दिनका भोजन सब मनुष्योंको सहज ही प्राप्त होजाता है। इसीलिए उसमें साधारण रागभाव पाया जाता है, परन्तु रात्रि भोजनमें तो शरीरादिक व कामादिक पोषण करनेकी अपेक्षा विशेप रागभाव आता है। अत एव रात्रि- भोजन सर्वथा साज्य ही है। इसके अतिरिक दीपकके प्रकाशमें वारीक जीव आखोंसे ठीक २ नहीं दीयते, तथा रात्रिमें दीपकके प्रकाशसे नाना प्रकारके ऐसे छोटे बडे जीप घूमने लगजाते हैं, जो दिनमै कभी दिखलाई नहीं पडते । अत एव रात्रि भोजनमें तो प्रत्यक्ष हिंसा है, और रात्रि में भोजन करनेवाला हिंमासे कभी बच नहीं सकता। अतः जिस महाभाग्यशालीने रात में बाहार करना सर्वथा छोड- दिया है वही सच्चा अहिंसक है । रात्रि भोजनके छोडे विना अहिंसावतकी सिद्धि नहीं हो सकती । अत एव कोई २ आरार्य इसे अणुवतमें भी गर्भित करते है। सागरधर्मामृतमें कहा है कि-अहिंसावतका साधक रामि भोजनका साग भवश्य करता है। क्योंकि मूल प्रत की शुद्धि के लिए तथा अहिंसावतकी रक्षाके निमित्त रात में चार प्रकार का आहारकरना वीनयोगसे धमी जीवों के लिए वर्जित है। पुराने विचारके मनुष्यों का यह भी मत है कि गत होनेपर भूत प्रेत आकर आहारको झूठा करदेते हैं। और बहुतसे जीव ऐसे भी हैं जिनको रात्रिमें देखना कठिन है। यदि जू आदि जीव भोजन में खाया जाय तो जलो- दर जैसे राजरोगोंका हो जाना कुछ असंभव नहीं। अतः रात्रि भोजनका लागी ही उपरोक आपत्तियों से मुल्होकर इन्दिय विलासके जालसे एट सहता है। चनमालाने रात्रिभोजनके दोप की शपथ दिलवाई थी।
संस्कृनटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता जैन रामायणमें कहा है कि रामजी लक्ष्मण और सीताके साथ दक्षिणा- पयमें घूमते २ कूर्चनगरमें आ निकले। वहां महीधरराजाने अपनी वनमाला नामक पुत्रीका विवाह लक्ष्मणसे करदिया। कुछदिन रहकर वहाँसे जब तीनों विदा होनेलगे तब वनमाला भी लक्ष्मणके साथ चलनेलगी। परन्तु लक्ष्मणने उसे साथमें न चलनेकी सम्मति दी। यह सुन खामीके विरहमें कांतरभाव होकर बोली कि नाय! आप मुझे वापस कबतक आकर ले जाओगे? यह विश्वास न होनेसे साथ ही रहूंगी । लक्ष्मणने उसे विश्वास दिलानेके लिए प्राणातिपात जैसे अनेक पापकी फटी शपथ ली। तब उसने उन शपथोंपर असन्तोप प्रकट किया और रात्रिभोजनके पापी शपथ दिलाई। लक्ष्मण वह शपथ लेकर रामके साथमें जामिला । उस समय रात्रि भोजनका पाप चार प्रकारकी हत्याओंसे मी अधिक समझा जाता था। किसीने कहा है कि-मुपात्र-पुरुष दिनमें आते हैं वे रातको नहीं आ पाते, अतः दिन अस होनेपर उनको आहार देनेसे वंचित रह जाता है। अतः दानी और कल्याणकी कामना रखनेवालापुरुष रातमें भोजन करना त्याग देता है। पुरोके तीन प्रकार-उत्तम पुरुष मध्यान्ह समय भोजन करते हैं, मध्यम पुरुष दोवार खाते हैं, परन्तु जो सर्वशके कहे हुए धर्मसे अनभिज्ञ हैं, वे पशुकी तरह दिनरात चरते रहते हैं। दो पदी दिन चढनेतक रात्रि निकट रहती है, दो घड़ी दिन बाकी रहने पर रात्रि समीप में आ जाती है, अतः सवेरे का दुपडिया धर्माराधन और स्वाध्यायके लिए है । तथा सांझके दुपडियेमें प्रतिक्रमणका आरंभ होनाता है। अतः उन दो दो घड़ियोंको छोड कर जो आहार करते हैं वे प्रशंसनीय पुरुष हैं। क्योंकि उनका आधा जन्म-समय तो उपवास करने में ही व्यतीत हो गया है। श्रावककी ११ प्रतिज्ञा (प्रतिमा) ओमें छठवीं प्रतिज्ञा रात्रिभोजनके छोडने की होती है, जिसमें अच, पानी, सानेकी वस्तु मिवई आदि, और पान सुपारी आदि खादकी वस्तुएँ तथा चाटनेकी वस्तुएँ आदि जो रातमें नहीं भोगता वह सब प्रसप्राणी जीवोंकी अनुकम्मा करनेवाला सच्चा गृहस्थ है।
२१२ वीरस्तुविः। छठा व्रत मुनिओंका रात्रि भोजन त्याग है-मुनिवर्ग तो महावतों को लेकर रात्रिभोजनसे सर्वया विरश हो जाता है। दसवैकालिकों उसका छटवां ब्रत इस प्रकार किया गया है। और यह गुरुके सन्मुरायों प्रविशा लेता है कि- भगवन् ! में रात्रिभोजन करनेका स्वाग करता हूं। और अन, पानी, खाय खाद्यादि पदायाँका राव के समय न भोजन करूंगा, न कराऊंगा, न करने बाळेकी अनुमोदनामी करुंगा। सारी उमरभरकेलिए तीनकरण योर दीन योगोंसे अर्थात् मन-वचन-कायासे रातमें, आहार न करूंगा न कराऊंगा, तथा भनुमोदन भी न करूंगा । हे भगवन् ! उस रात्रिभोजनके पापहा दंडसे में पीछे हटता है, उसका प्रतिक्रमण करता हूं, अपने मात्माकी शाशीसे रे निंद्य समझता हूं, गुरुती सास उसको घृणित समझता हूं, और आत्माले उस पाप का त्याग करता हूं। हि सा महानतकी रक्षाकेलिए रात्रिभोजनका लाग किया गया है- और वह भी इस जन्मफे अन्तिम शाम तक छोड़ा गया है। उसे महामव न कह कर मत इमलिए कहा है कि नहायतों की तरह गदा पालन करना अधिक कठिन नहीं है। इसी कारणसे इसे मूलगुवमें न रख कर उत्तरगुणमें लिया है। और इसे महारतोंके पीछे इस लिए पता है पर और अन्तिन तीर्थकरके समर मनुष्य समुदायका सभाय ऋजुना और वाना होता है। और मपके ठीयारोंके समय मनुष्योंकी युद्धि ऋजुमन होने से इस पाठ मुगमतया रामराने के लिए महानतके पछि जोड दिश है। इससे यह भी लिर है कि मदामों भाति ही इस व्रत शासन नी किया जा करे । इस्य-क्षेत्र- एल-भाव तथा निधनामिण रिसे इयक अनेक प्रचर है-द्रम्पसे अचनाहि, क्षेत्रने गई दोरमें, अलस के मर और भावसे परहिन रोर इमम पालन करना आवाया है। इसके भनिरिक और प्रमर भी पाए जात₹। लेकि-भागार रातमें पहल करना और प्रतने साना, गन प्रहन करना और हनने गाना, दिन मड्भ करना और उनमें ना, लि, मदन करना और लिने माना।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २१३ इन चारों भंगोंमें पहलेके तीनभंग साधुके लिए अशुद्ध अर्थात् ग्राह्य नहीं हैं, और अन्तिम शुद्ध भंग ग्राह्य है। द्रव्य और भावकी अपेक्षासे भी रात्रिभोजनके चार भंग बन जाते हैं। जैसे-केवल द्रव्यसे, केवल भावसे, द्रव्य और भाव दोनोसे, तथा द्रव्य और भावसे रहित। सूर्योदय या सूर्यके अस्तका सन्देह होनेपर भी भोजन किया जाता है, यह केवल द्रव्यसे रात्रि भोजन है भावसे नहीं है। "मैं रातमें भोजन कर" ऐमा विचार हो जाय और खाया पिया कुछ नहीं है तब वह केवल भावसे रात्रि भोजन है, द्रव्यसे नहीं। बुद्धि काम करते हुए भी रात्रि में आहार कर लेना, यह द्रव्य और भाव दोनोंसे है और न रात्रिमें भोजन करना न करने की अभिलापा ही खरी करना यह दव्य और भावसे रहित भंग है। बुद्धोंके आठ उपदेशोंमें भी रात्रिभोजन वर्जित है, जैसे- १ 'पाणातिपाता' वेरमणि सिक्खापदं 'समा दियामि' । २ 'अदिनादाना' वेरमणि सिक्सापदं समा 'दियामि' । ३ 'अब्रह्मचारिया' वेरमणि सिक्खापदं समादियामि। ४ 'मुपावादा' वेरमणि सिक्खापदं समादियामि । ५ 'मुरामेरय-मश-पमादठाना' मेरमणि सिक्खापदं समादियामि। ६ "विकालभोजना' वेरमणि सिक्खापदं समादियामि । ७ 'नच्चगोतवादित विमुकदरसन माला गन्धविलेपनधारण, मंण्डन भूषणठाना' वेरमणि सिक्खापदं समादियामि । ८ 'उचाशयन, महाशयना, वेरमणि सिक्सापदं समादियामि । भावार्थ में किसी प्रणधारी जीवका प्राण लेनेसे विरक्त होता हूं। २ किसी दूसरेकी वस्तु विना दिए न लेनेकी प्रतिज्ञा करता हूं। ३ सब प्रकारके स्त्रीसमागम से वंचित होने की प्रतिज्ञा करता हूं। ४ सब प्रकारके झूठ बोलने की प्रतिज्ञा लेकर विरक्त होता हूं। ५ किसी प्रकारका मादक द्रव्य या गंजा-भाग-मदिरादिक सेवन करनेसे विरक्त होता हूं। ६ असमय अर्थात् दोपहरके बाद भोजन करनेसे बाज़ आकर विरक्त होता हूं [चौद्ध लोक दोपहर बाद कुछ नहीं सावे और रातमें भी नहीं खाते २१४ वीरस्तुतिः। . - नाचने, गाने, ढोल बजाने आदि अनेक प्रकार के तमाशे देखने तथा फूल माला, गन्ध, लेपनादिक लगाने तथा आभूषण शृंगार करनेसे विरफ होता हूं। ८ ऊंचे और बड़े आराम देनेवाले आसनों और बढी शय्याओमें शयन कर- नेका त्याग करता हूं। इलादि-उठवें नियममें रात्रि भोजन इनके यहां भी वर्ग- नीय है। घोर अन्धकारमें आंखों से कुछ नहीं दीसता, उस समय रातमें उडने- याले जीवोंका भोजनमें परजाना भी संभव है अतः रातमें कान सा-पी सकता है? रात्रि भोजनके प्रत्यक्ष दोप- "भोजनमें कीये साई जाने पर नुद्धिका नाश करती है, यूका साई जाय तो जलोदर हो जाता है, मक्खीसे वमन हो जाता है, पेटमें मकडी जानेसे कोढ हो जाता है। काटा या लकडी का टुकडा मलेमें पीडा कर देता है। शाक भाजीमें बिच्छु आजाय तो वह हलक को डंक मारकर वेध देता है। गलेमें यदि बाल अटक जाय तो सरका भंग हो जाता है, रातमें खानेसे ये दोप प्रत्यक्ष हो जाये हैं।" "गवर्मे बरतन मल कर साफ करते समय कुंथुवा आदि बहुतसे जीव मसले जाते हैं।" “रातमें आशुक वस्तुएं भी न खानी चाहिए क्योंकि मोदक फलादिकों के जीव रातमें दिख नहीं सकते।" “सूर्यके तेजमें ऋग् यजुः साम, इस तरह तीनों वेदोस तेज है यह वेदोंका कहना है, और इसी- लिए सूर्या नाम त्रयीतनु पडा है, उसके किरणोसे सब कुछ पवित्र हो जाता है, और समस्त शुभकम्म उसके प्रकाशमें हों, उसके अभावमै शुभकर्म जो भोजन पानादिक हैं वे न करने चाहिए।" "वेदन कहते हैं कि आहुति, सान, श्राद्ध और देवार्चन दान आदि रात्रिम विधान करने योग्य नहीं हैं। परन्तु रात्रिभोजनतो बिल्कुल लाज्य है। "दिनके आठवें भागमै सूर्यक्ष प्रकाश मन्द हो जाता है, अतः बुद्धिमानाने उसे भी रानि समझा है । और उस समय भी भोजन वर्जनीय है।" "देवता पहले पहरमै जीम लेते हैं, ऋपि मध्यान्हमें भोजन करते हैं, तीमरे पहरमें पितृलोकोंकी भोजन-निवृत्ति होती है, चौथे पहरमें देख और दानव भोजनसे निबटते हैं । सन्ध्यामें यक्ष राक्षस खाते हैं, अतः हे युधिष्ठिर ! सब देवताओकी बेलामा अविक्रम होनेवे रात्रि भोजन अभोजन है। " संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २१५ आयुर्वेदमें रात में खाना पीना मना है- "सूर्यके अस्त हो जाने पर हृदयकमल और नाभिकमल अतिशय संकु- चित हो जाते है, अतः रातमें भोजन न करना चाहिए, क्योकि अनेक सूक्ष्म जीव खाए जाते हैं, और रातमें साया गया भोजन स्वास्थ्यकर नहीं होता, और भलि भान्ति जाठरीमें जाकर उसका पाक-भी नहीं बनता।" "जो दिनरात के समय साने पीनेमे ही मस्त रहता है वह बिना सींग पूंछ का पशु समान है। अतः मनुष्यको दिनमें भी नियमित भोजी-भोजन संयमी होना चाहिए।" दो घडी दिन चढे तक तथा दो घढी दिन रहने पर जो भोजन पान त्याग देता है, वह रात्रिभोजनके दोषोंको जाननेवाला पुण्यका भागी होता है।" "जिसने दिनमें भोजन करनेका अभ्यास या रिवाज तो डाल लिया है, मगर प्रतिज्ञा नहीं ली है तो क्या उसे निवृत्ति रूप पुण्य नहीं मिलता ? इसका उत्तर यह है कि-किसीने रकम तो कर्जमें देदी है मगर व्याज नहीं खोला है, अतः वह वसूल करते समय व्याज लेनेका हकदार नहीं होता क्योकि दुनियादारोंमें बोलीका मूल्य है।" "जो दिनमें भोजन करना त्याग कर रातमे ही खाना पसंद करता है, वह मानो माणिक्यको छोडकर कांचके टुकडेको पसंद करनेवाला जड बुद्धि है।" "दिनके होते हुए भी जो कल्याणकी इच्छासे रात्रिमें भोजन करते हैं वे मुन्दर और कमाए हुए 'खेत' को छोड कर मानो सारीली-नमकीन रेहीदार भूमिमें धान्य बोना चाहते हैं।" "रात्रिमें खाने से उल्लु-काक-बिलाव-गिद्ध-राक्षस-सांप-विच्छ्-गोइ-चमगीदइ- बागुल आदि अनेक बुरी योनिएँ पाते हैं। "जो पुरुप रात्रि-भोजन त्याग देता है वह धन्यवादका पात्र है, क्योंकि वह अपनी आधी आयु उपवासमें बिता रहा है।" “रात्रि-भोजनके त्यागमें जो जो गुण हैं, उनके विषयमें अधिक क्श कहा आय उसके सब प्रकारके लाभ सर्वज्ञ ही जानते हैं।"
वीरस्तुतिः। मिलती है, जिसका खभाव धर्मात्मा और सचरित्रानुगामी होता है, ये सब सुख दिनमें यमपूर्वक भोजन करनेवाले सत्यवादीको मिलते हैं।" इत्यादि अनेक शास्त्र संमत होनेसे रात्रिभोजनको अप्राकृतिक और दूषित समझकर छोड़ देना चाहिए। प्रभु महावीर रात्रिभोजनके खयं त्यागी ये, और औरोंको भी लाग करनेका उपदेश करते थे, तथा सदैव तपवरण किया करते थे, अपार नम्रता थी, उनकी बाशी अनन्तनयोंसे शुद्ध थी। उन्होंने संसार और मोक्षका सरूप बताया था, सब प्रकारके आप्तयोंसे भाप रहिद थे, औरोंको भी भारतबके पापजामसे सदा रोकते थे, क्योंकि भो वयं अधर्मी और अनीतिमान हो वह औरोंको धर्म और नीतिमें क्यों कर स्थापन कर सकता है। जो खयं धनिजन नैतिक जीवन व्यतीत करनेवाला हो वही औरोंको पाप- कर्मके गदेखे निकाल सकता है । किसीने कहा भी है कि "जो स्वयं तो न्याय की बात कहता हो, परन्तु न्यायके विरुद्ध भाचरण करता हो तो वह औरोंपर अपना कुछ भी प्रभाव नहीं डाल सकता, क्योंकि 'मदान्त' कभी इन्द्रिय निमह नहीं कर सकता।" और प्रभुने इस लोक और परटोक को भारकर पोंसे धर्वथा निरति प्राप्त की थी॥ २८॥ गुजराती अनुवाद-भगवान महावीर प्रमुखीससर्ग भने स्त्रीनी नीक रदेवानर पण कर लागी हता, तेमणे नववाइविशुद्ध ब्रह्मचर्यन पालन कर. वार्नु कडूंछ, जे स्थान पर ली बैठी होय वा ब्रह्मचारी एक कलाक मुधिमा मज बेसे, कारण के तेना अशुद्ध परमाणुओ मुशील पुरुपने हानिकर छ। एज ब्रह्मचारिणी माटे समजी लेबु ।। रात्रिभोजन त्यागी- वे उपरान्त तेओ रात्रिभोजमना पण पलक्ष विरोधी हता, कारण के पत्रिभोजनथी प्रस जीवोगी हिमा पाय छ, तेथी रात्रिमा भोजन करवानी मना करवामां आवी छे, हिमा लागी रात्रिभोजन न करे, जे जीव तीन रार भार सहित होय छे, ते तेनो साग करी शकतो नथी, कारण जे जीवने भोजन पर अधिक प्रीति होय , ते रात्र के दिवशे सातो पीलो जरहेमो, ज्या राग साधन होय छे या प्रमत्तभाव जहर रहे थे, अने प्रमत्तभावयुक्त प्राणी हिंसा अवश्य करे है..
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २१९ घणांओ एम पण कही दे छ के जो भोजन करवामां सदा काळ हिंसा थई जाय छे, तो दिवसे भोजन न करतां रात्रेज खावु जोइए, कारण के तेम करवाथी सदा काळनी हिंसा थती नथी, परन्तु ते वात ठीक नथी, जो के उदर भरणनी अपेक्षाए सर्व प्रकारना भोजन समान छ, पण शाकाहारी भोजनमा जेटलो साधारण अने सात्विक भाव छे, तेटलो मांस भोजनमा साविक-भाव नथी, मांस भोजनमा विशेष रागभाव छ, घास खानारी गायने घास खाती वसते जेटलो सामान्य रागभाव छ, तेटलो दर मारनारी हिंसक विलाीमा नथी, विलागने मांस भक्षणमा विशेष राग भाव छ । 'अन्न भोजन' सहजमा उत्पन थाय छे अने मळे पण छ, अने मास भोजन अतिशय कामा- दिकनी खातर अथवा शरीरादिकना मोहनी सातर विशेष प्रयत्ने करवामां आवे छे, ए रीते दिवसर्नु भोजन सर्व मनुष्योने सहजज प्राप्त थाय छे, वेथी वेमां साधारण रागभाव थाय छ, परन्तु रात्रिभोजनमा तो शरीरादिक तथा कामा- दिकना पोपणनी खातर विशेष राग भाव आवे छे, तेथी पण रात्रिभोजन त्याज ज छ। दीपकदोप-वळी दीवाना प्रकाशमां झीणा जन्तुओ आंखथी वराबर देखाता नथी, तेमज रात्रे दीवाना प्रकाशथी जुद्दी जुदी जातना एवां नाना मोटां जन्तुओ फरवा लागे छे, के जे दिवसे क्यारेय पण देखाता नथी, वेथी रात्रिभोजनमा प्रत्यक्ष हिंसा छ, ने रात्रिभोजन करनारा हिंसाथी पण क्यारेच बची शकता नथी,। तेथी जे भाग्यशाली रात्रि भोजननो सर्वथा त्याग करे छे, ते साचो भहिंसक छे, रात्रिभोजनना त्याग वगर अहिंसा तनी सिद्धि नथी थई शकती। तेथी कोई कोई आचार्य तेनो प्रथम अणुव्रतमा समावेश करे छे। सागारधर्मामृतमां कडं छे के अहिंसामतनो साधक रात्रिभोजननो अवश्य त्याग करे छे, कारण के मूलव्रतनी शुद्धिने माटे तेमज अहिंसा प्रतनी रक्षा सातर रात्रे चार प्रकारनो आहार त्रियोगे करी धर्मा आत्माओ माटे वर्जित छ । जुना विचारोन मनुष्योनो ए पण मत छे के रात्रि धतां भूत प्रेत आवीने आहारने अभावी देछे, वळी घणा जीवो एवा है, के रात्रे ते जोवा बहु मुरकेला संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २२१ भावकनी ११ प्रतिशा (पडिमा) मां छठी रात्रि भोजन त्यागनी छ । जे अन्न-पान-सादिम-खादिमनी वस्तुओनो उपयोग रात्रे करतो नथी, वे सर्व जीवोनी अनुकम्पा करवापाको साचो गृहस्थ छे. मुनिओन छटुं प्रत-रात्रिभोजन त्याग छ, मुनिभो तो रात्रिभोजननो सर्चया त्याग करे छे, दशवकालिकम्पमा रात्रिभोजनलागरूप छठु मत मा प्रमाणे फयुं छे, शिष्य गुरुनी समीपे प्रतिज्ञा करे छे-के हे भगवान् ! हुँ रात्रिभोजननो जीवन पर्यन्त सर्वथा त्याग करूं , हुं जीवन पर्यंत प्रण करण अने प्रण योगे करी भर्यात मन-वचन अने काय द्वारा अन्न-पाणी-साय-खाय (मेवा विगेरे सोराक भने मुखवासादि) एम चारे प्रकारना आहार रात्रे करीश नहि, करावीश नहि, भने करनारने अनुमोदन पण आपीश नदि, पूर्व जे रात्रि भोजन सम्बन्धी पाप कयु होय वेनाथी हुँ निवृत्त थाऊं छु, आत्म साक्षीए ते पापने निहुँ छु, मापनी पासे ते पापने अवगपुंछ, भने हवेथी ते पापकारी कर्मधी मारा आत्माने सर्वधा अलग करूं छु, इत्यादि। अहिंसा महाव्रतनी रक्षाने माटे रात्रिभोजननो लाग करवामां आवे छे, अने ते पण यावज्जीव मुधी त्याग करेलो छे, तेने महायत न कहतां प्रत तरीकेज गणाव्युं छे, तेने कारण ए छे के महाप्रतोनी पेठे तेनु पालन बहु कठिन नधी, ते खातर देने मूल गुणमा न गणता उत्तर गुणमां गणाव्युं छे,। वळी महानतोनी पाछळ तेने एटला माटे गणाव्यु के-प्रथम भने अन्तिम तीर्थकरना समयना मनुष्योनो स्वभाव ऋजु जड वक जड अनुक्रमे होय छे, तेनो पाठ सुगम रीवे समजाववाने मारे महायत साथे वेने जोडी देवामां आव्यु छ, तेथी ए साबित थाय छे के महानतोनी पेढे आ यतन पण पालन करवानुं छे। द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावनी देमज मिश्रामिश्र द्रष्टिए वेना अनेक प्रकारो छ, जेमके द्रव्यधी असनादि, क्षेत्रथी अढी द्वीपमा, कालयी रा भावधी देष रहित थईने वेनुं पालन करवु आवश्यक छे. - २२२ वीरस्तुतिः । ते उपरान्त पीजा पण प्रगारो छ, जैम के आहारादि रात्र महण करवाने रात्रै सापा, राने ग्रहण करवा ने दिवसे सावा, दिवसे प्रहम करवाने राने सारा, दिवसे ग्रहण करवां ने दिवसे सावो, आचार प्रकारमानां पहला प्रण साधुने माटे अशुद्ध अर्थात् भप्राय थे, ने छेवटनो प्रकार शुद्ध अने प्राध । व्य भने भावनी अपेक्षाए पन रात्रिभोजनना चार भागा याय रे, जेमके केवळ दम्पथी, फेवळ भावधी, प्रभ्य अने भाव बनेधी, द्रव्य भने भावी रहित, 1 सूर्योदय भयवा सूर्यास्खनो सन्देह पहला सतां पण भोजन करवामां आवे छे, ते केवळ द्रव्यची रात्रिभोजन, भावी नहि, । "हुराने भोजन करी" एको विचार पाय, वे केरळ भावधी रात्रिभोजन के, भले पठी साद साधु पीई न होय, जागवा छा पण रात्रे भोजन करयं, सेमन्म अने भाष बनेधी ठे, अने राने भोजन न कर मन इच्या पणन करवी, ठेप्रम्प भाव पंथी रहित प्रकार छ। धौद्ध मता रात्रिभोजन पर्जित- बुदना आठ उपदेशोमा रात्रिभोजन पर्य गघ्यु , जेमके- (1) कोई प्राणधारीनो प्राण ना ठेवानी हु प्रतिभा कईई.. (२) अदनादान (रोरी)को त्याग कर . (३) सर्व प्रधरना श्रीसमागमना स्यागनी प्रतिभा . (v) भरारना असल रचनयी विरसं ए. (५) कोई पण प्रसारमा मादक दम्प गांवो, भोग, मरियदिकना सेवननी प्रतिस्य कई ई. (6) असमय अर्थात् पोर पी भोजन हराधी विसं . (पोले पोर पठी मज यशएशनी माता नमी.) (1) नाप-गान-वाउ भादि भने प्रधाना घमासा जोगनी व्यिापी टमा फूलमाला-ध पिटेपन आदि नगराधी मत अमगार परवाही रिये। (6) देम मोटा बाराम देनारा आफ्नो वैमर मोरी सयामी पर गुगनोसाम, कोरे ।
संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २२३ आमाना छहा नियममा रात्रिभोजननो पण त्याग आवी जाय छे। अने अंधारामां आँखोथी कंद देसातुं नधी ते वखते रात्रे उडनारा जीवडाओन भोजनमा पडवार्नु संभावित छे, तेथी रात्रे कोण खाय पीए ! रात्रिभोजनना प्रत्यक्ष दोप- "भोजनमा कोठी खवाई जाय तो बुद्धिनो नाश थाय छे, जू सवाई जाय तो जळोदर यई जाय छे, माखीथी वमन घई जाय छे, करोळिओ आवी जाय तो कोड थाय छ। कांटो तेमज लाकडानो टुकडो भावी जाय तो गळामा पीडा करे छ, शाक भाजीमा वीछो आवी जायतो वेना डंखथी बहु पीडा थाय छे, गळामां वाळ अटकी जाय तो खर भंग थई जाय छे, रात्रि भोजनधी आवा अनेक प्रत्यक्ष दोपो थाय छ," । "राने वासणो साफ करती वखते कुंथुवा भादि घणा जीवडाओनो नाश थई जाय छे।" "राने प्राशुक वस्तुओ पण न खावी जोइए, कारणके मोदक, फळादिना जीवो रात्रे देखी शकाता नथी।" वेदमां "वेदज्ञो कहे छे के सूर्यना तेजमा ऋग-यजुः तथा साम एम प्रणे प्रकारना वेदोनुं तेज छे। अने वेथी सूर्य- नाम प्रयीतन पन्युं छे, वेना किरणो थी वस्तु पवित्र वनी जाय छे, एटले समस्त शुभ कर्म वेना प्रकाशमा करवां जोइए, ठेना अभावमा नहि।" "वेदज्ञ कहे छे के आहूति-मान-श्राद्ध-देवार्चन दानादि रात्रिमा करवा योग्य नथी, रात्रिभोजन तो बिल्कुल त्याज्य छे," "दिवसना आठमा भागा सूर्यनो प्रकाश मन्द थई जाय छे, तेथी बुद्धिमानो तेने पण रात्रि गणे छे, अने ते समये पण भोजन वर्ण्य छ।" "देवता पहले पहरे जमी ले छे ऋषि मध्यान्ह समये जमे छे, त्रीजा प्रहरे पितृलोको भोजन पानथी निवतें छे, चौथा प्रहरमा देल दानव जमी ल्ये छे, संध्यामां यक्षराक्षस खाय छे, हे युधिष्ठिर। सर्वदेवताओनो समय अविक्रमी जवाथी रात्रिभोजन अभोजन है,। आयुर्वेदमा रात्रे खावा पीवानी मनाई छे- "सूर्यास्त यतां हृदय कमल तेमज नाभि कमल अतिशय संकोचाई जाय छे, वेथी रात्रे भोजन न करतूं जोइए, अने रात्रिर्मा सूक्ष्म जीव खवाइ जाय छे रात्रे साधेलं भोजन तन्दुरुस्तीने नुकसान करे छे, तेमज तेनु पावर घरापर थई शक्तुं नथी ।" "जे दिवसे ने राने असमये सावा पीवामा मस्व रहे छे, ते शीग-पूछ वगरना पशु समान छे, वेथी मनुन्योए दिवसे संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २२५ रात्रि भोजन करीले छे तेओ भूतप्रेतनी संगतिने छोडी शकता नथी।" "जेमणे यम नियम सेयमनी क्रियाओनो त्याग करी दीपो छे अने रात दिवस खावा पीवामांज मस्त रहे छे, तेमने बुद्धिमानो शीगडा के पूछ वगरना जनावर तेमज खरी वगरना पशुओनी उपमा अप छे।" "संस्कारी विद्वानो मुख मेळववा माटे दिवसे भोजन करे छे, रात्रे मुरे जाय छे, ज्ञानी पुरुष समय विचारी बोले छ, तेमज आरमानी भान्ति माटे गुरुजननी सत्सगति- सशास्त्र श्रवण-मनन-निदिध्यासन विगेरे समाचरीने सेवा चाकरी करे छे।" "गुणवान् तेमज उत्तम पुरुप हमेशां दिवसमा एकज पार भोजन करे छे, मध्यम पुरुष धोळा दिवसमा वे वखत आहार करे छे, अने जे दिवस अने रात हमेशा भोजन कर्या करे छे ते नराधम छे।" "जे पुरुष दिवसनी पहेली तमज छोडी घडी छोडी वयेना दिवसना भागमा भोजन करे छे ते इन्द्रियोना घोडाने जीती संसार ना भारथी हलको थई जाय छ।" "जे पुरुष पोतानी पासे दीवो राखीने रात्रे भोजन करे छे, ते पुरुष कुदरती रीते नीचाण तरफ बहेनारी नदी ना नीरने जाणे वृक्षना शिखर सुधी पहोचाडवा चाहनो होयनी ? (अर्थात् नदीनुं पाणी वहेतुं वहेतुं कदी पण वृक्षना शिसरे पहोंची शकतुं नथी तेम तेवा पुरुषनो आत्मा अधोगति सिवाय उच्चगतिने प्राप्त करी शकतो नथी)"। जे रात्रि भोजनने मुसदायक जीवन माने है, ते आगथी बळेल वनने फळदायक माने छे, परन्तु तेम वनवु असभवित छ।" "जे दिवस तेमज रात्रिना भोजनने समान गणे छे, नेओ सुस तेमज दु.खना देनार प्रकाश तेमज अन्धकारने समान गणे छे।" "जेओ रात्रिभोजनमांज धर्म माने छे तेओ खरेखर वृक्षोनी हारमाळा वधारवा माटे वन तेमज आग फेकी रह्या छे, (वृक्षोनी हारमाळा वधारवा माटे जळ सिंचननी जरूर छे तेने बदले वन प्रहार या अग्नि कोई फेके दे वृक्ष वधवाने बदले जेम नाश पाये छे, तेमज रात्रि भोजनथी धर्म वधवाने वदले नारा पामे ) “जेओ पुण्यनी अभिलाषाथी आखो दिवस भूख्या रहे थे, अने रात्रे सावामाज मच्या रहे छे तेओ फळेला वृक्षोने तेमज लताओने कापी नासी फरीधी फळवानी बांछन्। करे छ एम समजबुं । जे मनुष्यो वे घटी दिवस चध्या मुधी नवनरसी तप करे छे, अने बे घही दिवस बाकी होय सारे चौविहार करे छे तेओ मासमां वीर.१५ २२६ वीरस्तुतिः। वे उपवास फळ प्राप्त करे थे, एम रामनवू । “रात्रिभोजन करनारने नीचे उख्या मुजव सामग्री प्राप्त पाय छ, रोग शोक अने कलह करनारी, राक्षसी माफक भय उपजावे देवी स्त्री मळे छै, वेमज महापापथी ऐदा थयेल अन्त- ग्य दुःख देनारी कन्या प्राप्त याय छ, व्यसनी तेमन काळा बापनी माफक रिहामणा पुत्र थाय छ, परमां दरिदता तो सदा रयाज करे छ।" नीर जातिमा जन्म धरी नीच कमों कारवां पड़े छे, शील-निळभपशु-समभाव-आदि गुणो नो अभाव रहे छ, बीजार्नु अनिष्ट करनार दुर्जननी माफक ते केटीए जातनी ब्याधिथी घेराएलो रहे छ, सर्व दोपोना समूहभी पीटायेलो आप्रमाणे अनेक दोपोनी उत्पत्ति यई जाय है। रात्रि भोजननो लाग करनारने नीचे मुजय पढनी पासि थाय छे; फमळपत्रसमान आंखोचाळी, प्रियवरन योलमारी, लक्ष्मीसमान सुन्दर स्वी प्राप्त थाय, वेमज विद्या कलामा निपुण पुण्यनी पंक्ति माफक मुन्दर शरीर अने निर्मळ चरिघवाली देने कन्या प्राप्त थाय छ।" कोई पण जावना भ्मग्रनधी रहित वेमज चन्द्रमाना जेा परिन म वाळा पुत्र मळेछ, इन्द्रना भवननी माफ: उजासवाळु मणिरत्रोधी भरपूर सुशोभित मकान प्राप्त थाय छ, । स्थायी वैभव प्राप्त धाय , मनोवारित फळ मके, नीरोगी मुन्दर शरीरनी प्राप्ति थाय छे, ए प्रकारे चधी नयी सुख प्रात यामछ।" "टे उपरान्त ज्ञान-दर्शन-परिमन पण सम्पत्तिने पामे छ, आया वियो पूजनीय पति बने है, रात्रिभोजनथी दूर रहेनार तेमज त्यागीओने आ समृद्धि प्राप्त पाय छ।" अने-"ने भाक्षर करवायी भूबनी-भीली-वादरी- माउली-गळामां रसोरी गिड)वाली-रोदिणी सुस्तरी-शोर-शयाना देनज रोड सागवाना पुर जयनारी स्थिका धनहीना एली एकी अनेक स्टकर योनि प्राप्त थाय छै।" "वेओ (रानि भोजननो त्याग करनारा) यन्धुगणमा पूजनीय मनाय छे. पुनो टेमनी ऐश करे छे, लत्रा भने सेयमरूपी माभूषणधी सुक रहे, परीरे नोरोगी होय थे, लक्ष्मी जैवी थने युदिमती तथा परमाळ खौ म छ, त्मनो समाव पर धर्मात्मा नामक होय छ, दिपने भोजन र. नारने भाया मुरानी गति थाप ठे।"
संस्कृत्टीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २२७ आवां अनेक शास्त्रोना प्रमाण सांभव्येने रात्रिभोजननो त्याग करवो जोइए । प्रभुए पण रात्रिभोजननो लाग को हतो। तपथरण नद्रता अने विनय साचवता हता, मो नम्रता तो अपार हती, तेमनी वाणी अनन्त नय तेमज शुद्ध हती, ते वाणी यो संसार भने मोक्षने खरूप समजाव्यु हतुं, बधा आसयोधी पण रहित हता, बीजाओने पण आसव अने पापथी रोकता, केनके जे पोते अधों अने अनीति बाटो होय तो ते वीजाओने धर्म अने नीतिमा केम स्थापन करी धके, अने जो पोठे धार्मिक भने नैतिक जीवन व्यतीत करनार होय तेज भीजाने पापथो के आसवरूप साडाथी रहार काढी शके छे, कारण के कोइए कार्वा पण छे के जे स्वयं तो न्यायनी वात करतो होय भने न्यायथी विरुद्ध आचरण करतो होय तो ते बीजाओ ऊपर पोतानी काई पण छाप पाटी शकतो नथी, जे पोठे अ-दान्त होय ते क्यारे इन्द्रिय निग्रह करी शके ? परन्तु प्रभुतो पोते दान्त हता, उपधानवान हता, तप बडे शरीर शुद्ध हवं, प्रभु आ लोक वेमज परलोकनुं ज्ञान मेळवी पापमय प्रतियी सदाने माटे दूर रखा हता। मूल- सोचाय धम्म अरिहंतभासियं, समाहियं अठ्ठपदोविसुद्धं । तं सद्दहाणाय जिणा अणाऊ, इंदा व देवाहिवा आगमिस्संति; त्ति बेमि ॥२९॥ संस्कृतच्छाया- श्रुत्या च धर्ममहनापित, समाहितमर्थपदोपशुद्धम् । तंबद्दधाना जनाअनायुप, इन्द्रावादेवाधिपा आगमिष्यन्ति ॥२९॥ (इति प्रवीमि) २२८ वीरस्तुतिः। सं० टीका-अधुना श्रीसुधर्मखामी तीर्थकरगुणान् प्रख्याय जम्बू- सामिनमाह, श्रुत्वा च, दुर्गतिधारणाद्धर्म, श्रुतचारित्ररूपमहद्भापितम- हकथितं, सम्यगाख्यानं-मुष्टुप्रणिगदित, चार्धपदैः, अर्थः प्रयोजनैः कारणैरभिधेयै "अर्थो विषयार्धनयोधनकारणवस्तुपु, अभिधेये च शब्दानां निवृत्तौ च प्रयोजन इतिमेदिनी।" अथवा, "अत्यो पयो- जने सद्दाभिधेय्ये चुद्धिय्यं धने, इत्यभिधानप्पदीपिका ।" पदैर्वाचकैः शब्दैः, "पदं शब्दे च वाक्ये च व्यवसायप्रदर्शयोरिति । मेदिनी।" निर्वाणैर्या, "अप्पवग्गो-विरागो च पणीतं अचुतं पदं इत्यभिधानप्प- दीपिका ।" अथवा निमित्तेः, "निमित्त कारणं टाणं पदं, इत्यभि- धानप्पदीपिका ।" वा परित्राणैः संसारादपकर्मणो या, "पदं ठाने परिचाणे निवाणम्हि च कारण इत्यभिधानप्पदीपिका ।" वैश्चिन्हे स्थानरुद्यमैः बाणैर्वाणसदृशैः शब्दैः सुप्तिइन्तरूपैः प्रदेशः श्लोकपा- देर्वाः “पदो चरण च वा इत्यभिधानपदीपिका ।" उपशुद्धं चोपसा- मीप्येन शुद्ध सितं वा पूतं निर्मलं, "मुद्धो केवलपूतेषु" "मुनि शुद्ध सिते पूते इत्यभिधानप्पदीपिका ।" वा प्रयोजनैरान्तराशयर्विव- निभिर्वा हेतुभिरभिलापैः शुद्धं दोपराहित्यमित्यर्थः । धर्म श्रद्दधाना जनास्तथाऽनुतिष्ठन्तो नरा अनायुपोऽपगतायुकर्मता युक्ता इति शेषाः कर्मरहिताः सन्तः सिद्धा मोक्षगता भवेयुरिति भावः । सायुपश्येन्द्रा अहमिन्द्रा देवाधिपा आगमिप्यन्ति-तं पदं प्राप्यतीति भावः। इति शब्दो ब्रवीमीति ॥ २९॥ माना निवन्धेभ्यःसारमुद्धृत्य श्रीमत्सूत्रतासूत्रगतीस्तुति-- नामाषष्टाध्यायसातिविस्तृतगभीरदुरूहतत्वपदार्थभक्तिभावावलेसाधति- 1 संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २२९ सरलतया बुबोधसिपाधयिपया ज्ञातूपुत्रमहावीरजैनसङ्घीया नानी संस्कृ- तटीका हैन्दवीटीका-गुर्जरभापाटीका यथाशक्ति-मतिरचिताऽत्र प्रमादा- दिनाऽथवाऽल्पधिया च भाविनी मदीयां स्खलनां संशोधयन्तस्तत्त्व- पदार्थनयनिक्षेपसम्बन्धिभावं प्रदर्शयन्तो धीरा मो चेदनुग्रहणीयुस्तहि बहुलजनोपकारोयोगसन्तुष्टेन श्रीज्ञानृपुत्र-महावीरप्रभुशासनसझेनानुन हतोऽहमिति सम्भावयेयमिति प्रार्थयते श्रीज्ञातृपुत्रमहावीरजैनसङ्घानु- यायिनां लघुतमः पुष्पभिक्षुः॥ इति श्रीज्ञातृपुत्रमहावीरजेनसङ्घा- न्तर्गतमुनिफकीरचन्द्रशिष्येण पुप्पभिक्षुणा विरचिता वीरस्तुत्याः संस्कृत-भापाटीका च समाप्तेति शम् ॥ अन्वयार्थ-[समाहितं] सम्यक् प्रकारसे कहे हुए [य] और [अह- पदोवमुद्ध] अर्थ और पदोंसे निर्दोष [अरिहंतभासियं] अर्हन् प्रभुद्वारा उप- दिष्ट [तं] उस [ धम्मं] धर्मको [सोचा] सुनकर [मद्दहाणा] श्रद्धा प्रतीति करनेवाले [जणा ] मनुष्य [देवाहिव] देवोंके खामी [इदा ] इन्द्र [4] और [अणाऊ आयुरहित सिद्ध परमात्माके पदको [आगमिस्सति ] प्राप्त होगे ॥२६॥ भावार्थ-श्रीसुधर्माचार्य अपने अन्तेवासी शिष्यके प्रश्नोंका इसप्रकार उत्तर देते हुए यो उपसहार करते हैं कि अर्हन् भगवान द्वारा कहे गए धर्मका जो पूर्ण श्रद्धान करते हैं वे या तो आयुरहित और कर्म रहित होकर मुक्तिको प्राप्त करते हैं या इन्द्रादि पदको पाते हैं या पाएँगे ॥ २८॥ भाषाटीका-मुधर्माचार्य श्रीतीर्थकर प्रभुके गुणोका वर्णन करते अपने जम्बूनामक अन्वेवासी शिष्यसे कहते हैं कि-जो भव्य दुर्गति में पडनेसे बचानेवाले ज्ञान और चरित्ररूप धर्मको अईन भगवान से भाव पूर्ण तथा परि- णामयुक्त अभिप्रायको मुनकर निर्धारण करते हैं, वे आयुष्यादि सब कर्म वन्ध. नोंसे मुक्त होकर या तो अपुनरावृत्ति-निर्वाणधाम (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं या आयुवाले स्थानमे अनुकूल सुख भोगनेवाले 'अहमिन्द्र होते हैं, अंधवा २३० वीरस्तुतिः। असंख्य मुसुरोंका भाधिपत्य भोगनेके लिए इन्वपदको प्राप्त करते हैं, यह मैंने बहन भगवानसे जैसा सुना है, वैसा तुझे कहकर मुनाया है। . *इस गाया 'भारत' यह प्राकृत भाशका शब्द है जिसका संस्कृत अनुवाद 'अईद' होता है, कोई २ 'अरहोन्तर' 'अरभान्त' पद भी बताते है। रहा इन सबके अथापर यदि विचार किया जाय तो आशय वही निक- लता है जो अर्थ 'अहं' पदका होता है। (1)'अई धातुका अर्थ पूजा या योग्य अर्थ होता है, इस अके अनुसार अतिशय वन्दनीय-सेवनीय-स्मरणीय होने के कारण वे 'अर्हन' (अरहंत) कहलाते हैं। क्योंकि इनके पांचों कल्याणकामें अनेक देवों और इन्दोबारा अनेक विलक्षण सेवा सम्बन्धी घटनाएं होती है, और वे मनुष्योंकी अपेक्षा अतिशययुक्त महापुष्प होते हैं, और अतिशायक होनेके कारण उनका यह 'अरहंत' नाम सार्थक तथा यथार्थ है। जैसा कि 'धवल' अन्धमें भी गदादे कि- अतिशयभावपूजाईत्वादहन्तः, खर्गावतरणजन्माभिषेकपरिनिष्क- मणकेवलज्ञानोत्पचिपरिनिर्वाणेषु देवकतानां पूजानां देवामुरमानवप्राप्त- पूजाभ्योऽधिकत्वादतिशयादहत्वाद्योन्यवादहन्तः । (धवलसिद्धान्त) अरिहंति वंदणनमंसणाणि अरिहंति पूयसमारं, अरिहंति सिदिगमणं 'अरहंता' तेण उचंति । (मूलाचार) भावार्थ-जो भाव पूनाके योग्य तथा मनुकरणीय महाभारत हो उन भईन्' कहते हैं। जिनके जीवन में अनेक दिम घटनाएँ तिम रूपसे परिपाटव होती है, असेटि-सर्गसे भरदरण, सामोरमय, परिनिरमा (डा प्रहण), पिलमान की उत्पति, मोशारोहण भादि पटनाओं से समर देव-भार मानव इलारिक द्वारा मान उत्सरय मनाना, या मनुष्यासे बना अनुसरण करते हुए उनके ममान माना एवं प्रवरा, दि महानवाने मोम ने बहन हैं। A संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २३१ जो वन्दना और नमस्कारके योग्य हैं, पूजा और सत्कारके योग्य हैं, सिद्धि (मोक्ष) गमनके योग्य हैं, अत एव वे 'अरहंत' कहे जाते हैं। (२) 'रहम्' का अर्ध एकान्त होता है, यानी समस्त पदार्थोको निकट- वी-दूरवती-सूक्ष्म तथा स्थूल पदायोंके अनन्त समूहको प्रत्यक्षमें हथेलीपर रसखे हुए आमलेकी तरह जो स्पष्ट जानते और देखते हैं। अर्थात् जिसे गुप्त या प्रगट एकान्त कुछ भी अप्रगट नहीं है। इसलिए 'भरहोऽन्तर' नाम यथार्थ है। जैसे कहा मी है कि- "न विद्यते रह एकान्तो गोप्यमस्य, सकलसन्निहितव्यवहितस्थूल- सूक्ष्मपदार्थसार्थसाक्षात्कारित्वादित्यरहोऽन्तरः ।" (स्थानागसूत्रम्) भावार्थ-जिसके लिए एकान्त-गोपनीय पदार्थ कुछ भी न हो, संसा- रभरके छोटे बड़े सब पदायाँका जो साक्षात्कार करनेवाला हो वह 'अरहोऽन्तर' कहलाता है। "अथवा 'अविद्यमानं' रह एकान्तरूपो देशोऽन्तश्च मध्यं गिरि- गुहादीनां सर्ववेदितया समस्तवस्तुस्तोमगतप्रच्छन्नत्वस्याभावेन येपां तेऽरहोन्तरः" (भगवतीसूत्र) भावार्थ-जिसे सर्वज्ञताके कारण सर्ववस्तु समूह गत सर्व प्रकारके पदार्थों का एक बहुत बड़ा समूहगत प्रच्छन्नताका अभाव हो, इस प्रकारका रहः (एकान्तरूप प्रदेश) नहीं है, अर्थात् उनके अनन्तज्ञानके सन्मुख कोई ऐसा प्रदेश और वस्तु समूह नहीं है, जिसके वे ज्ञाता और दृष्टा न हों, वे तो अनन्त ज्ञान और अनन्त दर्शनके द्वारा संसारके पूर्ण रहस्य को जानते हैं, इसीसे पहाडोंकी गुफा आदिका अन्तर (मध्यभाग) तकका सम्यक् ज्ञान अपने मर्वज्ञत्व द्वारा जान लेते हैं, बारीकसे बारीक तथा एकान्त और मध्यप्रदेशके जाननेवाले हैं, अतः 'अरहोऽन्तर' नाम सार्थक ही है। (३) 'अरयान्त' ऐसी संस्कृतच्छायाके अनुसार यह अर्थ निकलता है कि-जिसके पास समस्त परिग्रहका अभाव है, और बुटापा आदि उपलक्षण वाला अन्त-विनाश नहीं है वह 'अरथान्त' है और वे वीतराग सर्वज्ञ देव होते हैं। जैसे- -- २३२ वीरस्तुतिः। "अविद्यमानो रथः स्पन्दनः सकल्परिग्रहोपलक्षणभूतः, अन्तब्ध विनाशो जरायुपलक्षणभूतो येषां ते 'अरधान्ताः। (भगवतीसूत्र) भावार्थ-जिनका आत्मारूपी रथ' अप्रतिहत शफियालय होनेसे कहीं हक नहीं सकता, अर्थात् तीनलोक और अलोकधे भी जानता है, अत: उसी 'रक्षान्त संशा इसी कारण सार्थक मानी गई है। (४)"अरहन्त" शन्दा यह अभी निकलता-"गदपक कारणभूत-निलोडरता अनन्त पदार्थोके शाता-दश होनेपर भी जो रिसी पदाधम आराकि नहीं रखता, वीतराग सभावशील दे, इससे 'अरहात' "कचिदप्यासक्तिमगच्छत्स वीतरागत्वात् प्रकृष्ट रागादिहेतुभूतमनो- ज्ञेतरविपयसम्पर्केऽपि वीतरागत्यादिकं स-सभावमत्यजन्तोऽईन्तः ।" (भगवतीसूत्रम् ) इसके अतिरिक, “अरिहंत" पाठ भी प्रचलित है जिसके अनुगार ar अर्थ होता है कि अरि-मंशनुमा नाश करनेसे रिइंस यह जावे है, जम "अरिहननादरिहन्त (a:) नरकतिर्यम्मानुपप्रेतायासगताशेपदम्य- प्रातिनिमिचल्यादरिमोहनत्यारेहननादरिहन्तः ।" (पवरसिद्धान्त) "मोहरन-अंतराय-हणण गुणादो व पाम अरिहंटो" (मूलाचार) । संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्वरसहिता "मोह रज और अन्तराय कर्मका हनन करनेसे 'अरिहंत' नाम सार्थक है।" राग दोस कसाये य, इंदियाणि य पंच य । परिसहे उपसग्गे, णासयंतो णमोरिहा । (मूलाचार) भावार्थ-रागन्देष और चारों कपाय तथा पांच इन्द्रियों के २३ विषयोच और २१ परिपह एवं उपसर्गके विनाश करनेसे भी अरिहंत' कहे जाते हैं राग दोस कसाए य, इंदियाणि य पंच वि परिसहे। उपसग्गे नासयंता, नमोरिहा तेण बुधति ॥ ९९८ ।। (विशेपावश्यक भाप्य) इंदिय-चिसय-कसाए-परिसहे चेयणा-उपसग्गे । ए ए अरिणो हंता, अरिहंता तेण बुचंति ।। ९९९ ।। अहविहंपि य कामं, अरिभूयं होइ सञ्च जीयागं । तं कम्ममरि हंता, अरिहंता तेण बुचति ॥ ९२० ॥ (आवश्यकभाप्य) "रज या आवरणका नारा करने से भी 'अरिहंत' कहलाते हैं। क्योंकि शानायरप, दर्शनावरण कर्म रजा ममान पास और अन्तरंग घिसाल के ममम्म परभूत अनन्त अर्याय और मंजन-पाययुछ वसुओं मे विपप-टरने. वाले सान और दर्शनम मात करनेसे 'रब' कहते हैं, इसी प्रार नोह भी रजदे, म ने भूलो भरे हुर मुराराले लोगोंमें पध मन्दना देखी जानी है, उसी प्रकार मोहने बिना कामा मात्र है, उनमें भी सामोरो- गमंदता सा युटिलता पाई जाती है। इसलिए रसाप हानाहरणादि न अभारले भरित' कमाते हैं। क्या- "रको हननादा अरिहन्तः, ज्ञानागापरणानि स्वांसीव पहिरंगा- न्तरभारशेपत्रिकालगोचरान्तरार्थव्यंजनरिणामालम्वनुविषययोधानु- २३४ वीरस्तुतिः। भवप्रतिबन्धकत्वाद्रजांसि, पुनर्मोहोऽपि रजः । भस्सरजसाऽऽरिता- ननानामिव भूयो मोहावरुद्वात्मना जबभावोपलंभत्वात् । (धवलसिद्धान्त) अथवा 'रहस्य' अन्तराय कर्मका नाम भी है, जिसके क्षय करनेसे भी "आरेइंत' कहे जाते हैं, अन्तराय कर्मका नाश तीन घातिया कमीक नाशके साथही नियमसे होता है। अतः अविनाभावी सम्बन्धले यह अर्थ निकलता है कि-जिसने चारों घातिया काँका नाश करके अपातिया काँको भी निश्यक बनादिया हो वे 'अरिहंत कहल्यवे है। यथा- "रहसमन्तरायस्तख शेषपातित्रितयविनाशाविनामाविनो हि प्रण- ट-वीजवनिःशक्तीकृताधातिकर्मणो-हननादरिहन्तः ।" 'धवलसिद्धान्त) (५) एक पाठ 'अमहंत' भी बनता है, क्योंकि यह धानुका अर्थ 'अंकुर उगना है, अर्थात् जिसका भवरूप अंकुर नट होगया है ये 'अहंत' कहलाते हैं, यानी कर्मरूपी बीजके जल जाने पर पुनः संसाररूप भकरकी उत्पति नहीं होगी। क्योंकि- "न रोहति भूयः संसारे न समुत्पयत इत्यरहः, संसारकारणानां कर्मणां निमूलकत्वात् । भगवती-प्रवचनसारोद्धार- तथा च प्रज्ञापनासूत्रस्य कारिकायामप्येवं, पुनः "दग्धे पोज ययात्यन्तं प्रादुर्भवति नादुरः । कर्मवाजे तथा दग्धे, न रोहति भवांकुरः ।।" इति भापार्टीका समासा ।। गुजराती अनुवाद-मधमाचार्यनी धीतीर प्रभुना गुशोना वर्णन करता पोताना जायूनामा (गमोपमा रहेनार) शिष्यने यही राजे मम्य प्राणी आत्माने दुर्गतिमा यदा पाववराय शन में परियमधर्म, 'भान्' भगवान पासपी भावपूर्ण मित्र परिशम युछ आगर प्रम मे संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्वरसहिता २३५ भक्तिपूर्वक चरित्रवान् थईने श्रवण करे छे, अने लार पछी तेनुं मनन करी निदिध्यासन करे छे, ते आयुष्यादि सर्व कर्म बंधनोथी मुक्त यई अपुनरावृत्ति याने निर्वाण पद प्राप्त करे छे, अथवा दीर्घायुष्य वाळा स्थानमा अनुकूल सुख भोगवनार 'अहमिन्द्र' बने छ, अथवा देव दानवोना अधिपति एवा इन्द्रपदने पामे छे, आ में 'अर्हन्' भगवान् ज्ञातपुत्र-महावीर प्रभु पासेथी जेवी रीते सांभळ्यु छे तेज प्रमाणे तने कही संभळावू छु । * 'अरहंत' आ प्राकृत भाषानुं शब्द छे, जेनी सस्कृतच्छाया 'अईन' थाय छे, कोई कोई एना अरहोन्तर-अरथान्त-अमहन्त-वाचक शब्दो थाय छे, एम वेओर्नु मन्तव्य छ, अहीं आ चारे अर्थ ऊपर आ प्रमाणे विचार करी शकाय। (१) 'अहं' धातुनो अर्थ भाव पूजा एवो थाय है, ते अर्थ अनुसार अतिशय वन्दनीय, सेवनीय होवाथी 'अर्हन्' (अरहत) कहेवाय छे, केमके तेमना पाचे कल्याणकोमा देवो तेमज चौसठ इन्द्रो द्वारा अनेक जातनी सेवा सम्बन्धी केटलीए विलक्षण घटनाओ बनी छे, तेमज मनो आत्मा मनुष्योनी अपेक्षाथी पर छे, जेथी तेमनामा विशेषपणु होवाधी 'अरहंत' नाम यथार्थ छ, 'धवल' ग्रंथमा पण कयुं छे के- "जे वंदन तेमज नमस्कारने योग्य छे, सेवा अने सत्कारने योग्य हे, सिद्धि गमनने माटे उपयुक्त छे, माटे 'भरहत' कहेवाय छे।" (२) "रहस्नो अर्थ एकान्त थाय छे, एटले जे समस्त पदार्थोनो निक- टना चाहे दूरना, स्थूल चाहे सूक्ष्म पदार्थोना समूहने हथेली पर राखेल आम- ळानी माफक देखी रह्या छे, जेमने माटे गुप्त के एकान्त एवी कोई वस्तु या स्थान नथी।" (३) "अरथान्त-" ए संस्कृतम्याया-अनुसार एवो अर्थ नीकळे के रथ अर्थात् यहिर तेमज अन्तर दृष्टिए समस्त परिग्रहनो जेनी पासे अभाव छ एवा वीतराग सर्वज्ञ देवने 'अरयान्त' रहे हैं।" "अयवा जेनो आत्मा रूपी रथ अप्रतिहत राजिवालो होदायी क्यांय पण रोगाई शकतो नयी, अद गे लोक तेमन अलोक मुधी पण पहोंची वळे थे, याने जाणी शके है, जेभी 'अरथान्त' आ नाम पण सार्थक मानेल ठे।"
१९५२ संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २३७ प्रशस्तिः। महावीरो देवो विदितभवकीर्तिजिनवरः, सदा भन्याऽऽधारो निजशरणगैर्वन्धचरणः । मुदाऽन्त्यो यस्तीर्थकर इति पदादयोऽस्ति नितरां वचस्तत्वे तस्य प्रतिदिवसमेवार्पितमनाः ॥ १॥ फकीरेन्दुर्भिक्षुर्गु- रुरिति तमःस्तोमतरणिः, सुपुप्पस्तच्छिप्यो विनययुतभिक्षुर्विधिरभूत्। द्विपञ्चाङ्कन्द्वन्दे जननमभवद्यस्य कुतले, गृहीता सद्दीक्षा भवभयहरा- ऽस्मिंश्च बतितः ॥ २॥ रसाप्टाकेन्द्वन्दे सकलमुनिवृन्देऽतिविशदा, स चेदानीं नाना कुसुममुनिदासो शिवरुचिः । 'हिमागारे देशे' गिरिषु बहुशीतेषु विहरन् , गतो यो यत्रास्ते विविधतरुवृन्दोऽस्ति विमलः ॥ ३ ॥ प्रसिद्ध राज्ये च जिनमतधराव्येन सहिते, समेतो 'नादोने' गुरुभिरतिपूते निवसता । कृतं चातुर्मास्य कलिकलुपतापौघ- शमनं, समाचीणं यत्राऽखिलजिनपथाऽऽराधनपरम् ॥ ४ ॥ 'सुमित्र'- स्यादौ हि हितकरसुदीक्षाऽपि नितरां, सदैवं पुष्पेन्दुर्विचरति सुमित्रेण सहितः । जिनानासंसक्तः परहितकरः साधुनिरतः॥ स एवाऽयं भिक्षुः *सकलदलदोपन रहितः ॥ ५॥ हिमाच्छादिते सुप्रदेशे च भ्राम्यन् , शिमाला (शिमला) कुलुकादिदेशान्तरस्थः । दृगाकानवचन्द्रकान्दे प्रकाशः । मुहुर्दृष्टवान् भूरिशोभा नगस्थाम् ॥ ६॥ सहस्रक्रोशान्तं पदगमनशीलो मुनिवरः, सुपुप्पेन्दुर्भिक्षुः प्रथमगमनं यत्र कृतवान् । सुमित्रेण खेन गुरुचरणभृङ्गेन सहितः, सुशिष्येणागम्यं नगरमभिगम्य प्रविततम् ॥ ७ ॥ 'कराची' सुस्थानं निखिलपशुरक्षां च विदधन्; दयागारं कृत्वा सकलजनश्राद्धैः सह मुदा । निहालेन्दुर्यत्राधिपतिरपि सम्प्रदाय-पक्षवादादिना रहितः। 1 उल्लु इति भापायाम्- २३८ वीरस्तुतिः। जातोऽत्र विषये, भुवि ख्याते सिन्धोविषमविषये कोऽपि न मुनिः ॥ ८॥ जिनाज्ञासकानामपि च न गतः कोऽपि *सुमुनिः, सहस्रा- ब्देनापि विहरणमभूधव न यतेः । मुनेः पुष्पेन्दोश्च गमनमभवद्यत्र प्रथम, ततः पूर्वनीला दिशमपि सुडोल्यां च गुरुणा ॥ ९ ॥ विहारप्रदेशेऽपि गत्वा च पूर्व, कृता धर्मशिक्षा विशेपेण तत्र । अयं चातिरम्यो विहारप्रदेशो, महावीरदेवस्य जन्मास्ति यत्र ॥१०॥ अयं सुप्रदेशोऽधुना हासयुक्तः, सदा राक्षसप्रायजातथ यस्मात् । महाकालिकामंदिरे यत्र हिंसा, सदा जायते प्राणिनां कोटिशश्च ॥११॥ शराकांकचन्दे मिते वत्सरेऽसिन्महावीरतीर्थकरस्य जयन्त्याम् । नदीदीर्घदामोदराख्या सदेच, समागत्य पुष्पेन्दुसंज्ञो हि भिक्षुः ॥१२॥ अहिंसोपदेशं चिलाकारिग्रामे, प्रदत्या पशूनां त्रयं यूपमुअम्, वसानमुत्पाव्य यः क्षिप्तवांध, सदा या प्रचारः प्रशस्योऽखि यस्य सदैवं बहून्यन्यकार्य विधाय, प्रदेशं भ्रमन्नन्ततो याति नूनम् ॥१३॥ यश्चात्र प्रथमं सुरेतरमये देशे शुभ वत्सरे, वन्यकांकविधी मिते च झरियामामे कृतं भिक्षुणा । चातुरमास्यकृतं वतच प्रथम 'गे' गुरोः सेवकः, वेदांकांकविधौ समे च गुरुणा साकं गतः पुष्पकः ॥१४॥ सर्वानन्दमये शुभे च नगरे 'कालीयकत्ता'ऽभिधे, याष्टादशसख्य काध शतका ना मताः श्रावकाः । चातुरमास्यवं महन्थ सुखतो श्रादा मुनेः सेवकाः, यत्रात कलिकचपत्तनवरा वीथी सु पोलोक' की ॥ १५॥ सन्ति स्थानकवासिनश्च बहवः श्वेताम्बराः थावकार, ये कुर्वति समाजकार्यमधवा यत्साधिपाः प्रेमिणः । संत मुनिनेत्र- १९९३ Pr । शिक्षा गर्नुमिति शेषः। 'चलकरी' इति भाषा।
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संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २३९
संमिततरं श्रेष्ठा महान्तो मुहुर्केनाराध्यमुनिप्वपि व्रतधरेप्वेवं गुणाः
सन्ति च ॥ १६ ॥ जैनाः संघसुकार्यकारिणी सभा यत्रास्ति नित्यं
मुहुः । सभ्याःश्रावककेऽपि सन्ति सततं नेत्रेन्दुसख्या गुणाः ॥ अत्रैवं
मुनयः त्रयो नव मिते मासे निवासोऽभवत् । एवं चेन्मनुजो नवैव
वितते गर्भ मुहुर्जायते ॥ १७ ॥ सम्प्रदायस्य वादस्य पक्षपातस्य
बन्धनम् । बोटयित्वा स्वयं जातः, खतन्त्रश्च सदा मुनिः ॥ १८ ॥
ज्ञातपुत्रमहावीरजैनसंघे व्यवस्थितः । नीरक्षीरविभागार्हः, खयं तन्म-
यतां ययौ ॥ १९॥ महावीरस्य च प्रभोः, स्तुतेप्टीका कृता वरा ।
दिवसे दीपमालायां, याता पूर्णा च सवति ॥ २० ॥ कलिकाताख्य-
नगरे, वेदांकनवचैन्द्रके। श्रीपुप्पचन्द्रमुनिना, शिवाक्षिरसांर्गुष्ठतः
॥२१ ।। मुनिभिः प्रार्थ्यते शश्वन्महावीरस्य शासने । खयं तन्मुनि-
चर्यायां, मौनमाश्रित्य तिष्ठति । भवान् परिग्रहत्यागी, यद्यस्ति कथमी-
दृशः ॥ २२॥ सम्प्रदायप्रवादस्य, परिग्रहरतः कथम् । सम्प्रदायप्र-
वादस्य, पलं कृत्वा पुनः पुनः ॥ २३ ॥ भवन्तः ससमाजेन सह
यान्ति रसातलम् । भवन्तोऽनन्तससारपापसृष्टि कृता कथम् ? वर्ध-
यित्वा च स्वस्यैव पतनं कथमिच्छतः ॥ २४ ॥
भुजङ्गप्रयातच्छन्दः।
यदा जीवहिंसापरित्यागिनश्चेद्भवन्तस्तदा सम्प्रदायस्य जाले ।
जनान् सर्वतश्चात्र घोरे निवध्य, कथं कुर्वते ज्ञानचारित्रनाशम् ॥२५॥
अनेनाथ देहेप्वनन्तानुवन्धि-कपायस्य बन्धं कृतं तत्र नूनम् ।
दृढं शृंखलाबद्धजीवा भवन्तः, पतिप्यन्ति चैवं दुवं शर्करादी ॥२६॥
विपक्षानुरोधे महामोह एव, समानः स्त्रिया सर्वथा त्यागयोग्यः ।
सदा सेवनेनास्य नाशं ब्रजन्ति, भवनचर्यादिकं शश्वदन ॥ २७ ॥
२४० वीरस्तुतिः। विपक्षाख्यवेश्याऽनुरागोऽपहेयः, सदा ब्रह्मचर्यानुरक्तैर्भवद्भिः । महावीरदेवस्य नाना सकीयं, मुदा जैनसंघ सृजन्त्वत्र जैनाः ॥२८॥ यतो बन्धनान्मुक्तभावं बजन्तु, भवाहुस्तराजन्मतो वापि दुःखात् । यदास्य प्रसगं भवन्तश्च जैना, न जातु त्यजन्ति युवन्ति भवस्थाः ॥२९॥ जनो ब्रह्मचारी न कोऽप्यस्ति लोके, नितान्तं व्यभिचारवन्तं न रम्यं । महावीरतत्वोपदेशस्य सारमनेकान्तवादं वुधाश्चानमन्ति ॥ ३० ॥ भवन्तः सदैकान्तवादे प्रवृत्ताः, खतश्चेतरेषां न द्वात्रिंशदाख्यम् । वकं सम्प्रदाय विशुद्धंगदन्ति, तथाऽन्यं च निंदां हि कुर्वन्ति नित्यम् ।। यतो वर्धमानस्य वाचो भवन्तो, विलुपन्ति मिथ्यैव कि सत्यमेतत् ।। तदेवं भवन्तं हि जानन्ति सिद्धा, महाऽसत्यपापानुरागेऽनुरक्तम् ॥३२॥ ब्रुवन्तीह पक्षानुरागं विशेपमहं चामुके सम्प्रदाये प्रवृत्तम् । सदा चेदृशं भाररोग त्यजन्तु,न हि स्याच कल्याणभावं कदापि ॥३३॥ परित्यज्य भेदात्मकी बुद्धिमुना, तदा वर्धमानस्य सिद्धान्तमानम् । विजानन्तु श्राद्धाश्च वीरं भजन्तु, सदाक्षेपवन्तो भवन्तो भवन्तु ॥३४॥ गुरुवों दीक्षायां ग्रहणसमये सेवकरणं, परित्याज्यं चेत्थं कथ- यति भवत्क्षेममनिशम् । परिशश्वद्यूयं प्रतिपदविवादं च कुरुथ, तदेवास्तेयाख्यं नतमपि प्रणष्टं प्रतिदिनम् ॥ ३५॥ ततो धर्मे नाशं ब्रजति भवतां वृत्तिरखिला, अतस्त्वपश्चौरो न हि सुभुवि कश्चिन्मु- निवर ! अतोऽनित्यं साधो ! परिहर मतालम्बनमहो! न हि सात्क- ल्याणं कचिदपि विशेपं व्रतधर ! ॥ ३६ ॥ राग-द्वेषवियुक्तानां, समताभावमागताः । वीतरागाः प्रवर्तन्ते, साधवो न हि चेतरे ॥३०॥ त्वय्यस्ति यदि रागश्च, द्वेषभावस्तथापरः । देहभावोऽप्यहंभावो- मोहभावस्तथैव च ॥ ३८ ॥ नो गतो यदि वो देहान्मुधैव वेषधा- संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २४१ रणम् । तथोज्वलतरो वेपो, धूर्तत्वं प्रतिभावयेत् ॥ ३९॥ कैतवं समनुप्राप्य, पापकृन्मुनिराडयम् । वीतरागा न केऽपीह, प्रवदन्तीति योगिनः॥ ४०॥ अद्यप्रभृतिमुनिभिहीयतां पदवी मुहुः । माना- पमानयोवुद्धिस्तुल्यैव परिधार्यताम् ॥ ४१ ॥ सर्वदा भिक्षुवयंश्थ, समदर्शिभिरेव च । शासनं जिनराजस्य, वर्धनीयं विशेषतः ॥ १२ ॥ ज्ञातव्यं मुनिभिस्तत्वं, मानवधर्ममाचर ! वीरशासनसेवायां, प्रवृत्ता- चेतसा यदि ॥ ४३ ॥ पदवीधारणं मिथ्या, प्रवृत्तिस्तत्र निष्फला । नाग्रहस्तत्र कर्तव्य, इति चिचे समाश्रय ॥ ४४ ॥ जगति *बहुले- शस्य, मान्यता च सनातने (धर्मे) । तथैव जैनधर्मेपु, (मुनिवर्येषु) बह्वाचार्यस्य मान्यता । इति रोगसमृद्धिः स्याद्विपरीतं कथं भवेत् ॥ ४५ ॥ स्वयं वैद्यश्च रोगार्ता, नान्येषां दुःखहो भवेत् । आचा- ाणां बहुत्वस्य, प्रथा हेया मनीपिभिः ॥ ४६ ॥ अखिलजैनसंघस्य ह्येकचाचार्य एव च । कर्तव्यः सर्वथा विद्वन् ! न पुनस्तं विलोपयेत् ।। ४७ ॥ समाज कुठवन्नित्यं, क्लिधतीति विभावय । कथनेन च किं तद्वच्छ्वणेन च किं बहु ॥ ४८॥ समाजोऽद्य प्रयागस्य तीर्थ- वत्त्रियतां मुदा । धारात्रयं मिलित्वैव खच्छा स्याद्वादरूपिणी ॥१९॥ गंगेवेयं च ज्ञातव्यं, मुनिभिः सुधिभिः सदा । इत्येवं प्रार्थना शश्व- पुप्पेन्दोर्भिक्षुकस्य च ॥ ५० ॥ enes समाप्तोऽयं ग्रन्थः। SAN , बहुलाः ईशस्येति पदच्छेदः । वीर.१६ . २४२ वीरस्तुतिः। परिशिष्ट नं० १ वीरस्तुति-गुर्जरगायन कंडखाकी-चाल तार हो तार प्रभु मुझ सेवक भणी, जगत्मां एदलु सुजश लीजे । दास अवगुण भर्यो जाणी पोता तणो, दयानिधि. दीनपर दया कीजे ॥ १॥ भावार्थ-किसी समय श्रीजिनागमके अभ्यास द्वारा संसार भ्रमण करते हुए,ज्ञानावरणादि आवरणोंसे ढंके जानेपर भी अपनी अनन्त शक्तिको जान कर अनादि परभावानुषंगताके दोपसे उद्विम आत्मा अपनी साधक शक्तिको न देखकर परम निर्यामकके समान २४वें तीर्थकर श्रीज्ञातृपुत्र-महावीर भगवान्के नामका शरण निर्धारित करता है, और श्रीवीरपरमात्माको अन्तरमें अनुभूत करके प्रार्थना सहित विनति करता है और अपनेको प्रभुका दास निश्चित रूपमें समझकर मानो पुकार पुकार कर कहता है कि हे नाथ! हे दीनदयालो! हे प्रभो। मुझसा निर्बल तत्वसाधक भापकी आज्ञाओंके पालन करनेमें कहां समर्थ है, मुझे तो मात्र नामका सेवक समझ कर तार ? तार ? इस गुण- रोधकरूप दुःखसे निस्तार! ओह प्रभो! तुझ से प्रभुको छोडकर और किसे कहूं? यह इतनासा सुयश आपही लीजिए और मुझे भवजलधिसे पार कीजिए! भग- वन् । मुझे यह भी ज्ञात है कि-प्रभुको तो मुयशकी कुछ भी अभिलापा नहीं है। परन्तु उपचारसे भलिवश आपके नाममें आतुर होकर यह सब कुछ कहकर में ही अपनी अयनताका परिचय दे रहा हूँ, यद्यपि में अपनेको आपका दास समझता हूं; मगर यह दास तो रागद्वेष-असयम-अनुष्ठानाशंसादि दोप-एकान्ततादोप-अनादर आदि दोपरूप अवगुणसे भरा हुआ है। तो भी में वेरा ही कहलाता हूं। अत एव हे दयानिधे 1 भावकरुणासमुद्र में दीन-रेक- अशरण-दु:खित-तत्वशून्य-सम्यग्ज्ञानादिसे शून्य भावदरिद्र, तत्वमाम विरा- घक-असंयमचारी महाविकारशील-आपठी भाज्ञासे विमुख-अनादिकालका उद्धत, मादि २ अनेक दुर्गुणों से पूर्ण हूं। इसी लिए मुझ दीन-हीन पर दया कीजिए। तेरी कृपा ही त्राण-शरणके योग्य हो जायगी। यद्यपि 'भईन् प्रभु सदा कृपावान संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्वरसहिता २४३ ही होते हैं तब उन्हें और नवीन कृपा क्या करनी है ? तथापि अयाँको घर- गांठका विचार नहीं होता, इसलिए यह वचन मुझसे 'अर्थी' का ही है, और जो दयावान् होता है उसकी विशेषता इसी प्रकार वर्णन की जाती है। अतः देव! तुम कृपाके भंडार हो, तुम्हारा भवलम्बन लेकर ही पार हो सकूँगा, यह सत्य और निस्सदेह है। राग-द्वेपे भर्यो मोह-वैरी नड्यो, लोकनी रीतमां घणुंए रातो। क्रोध वश धमधम्यो, शुद्धगुण नवि रम्यो, भम्यो भवमाहे हुं विषय मातो ॥२॥ भावार्थ-हां तो भगवन् ! यह दास कैसा है। मुनिए, यह राग-द्वेपके कीचडमें फंसा हुआ है, जगत्-सागरमें डूबा पडा है, गुणी जनोंसे ईर्ष्या करता है, मोहके नशेमें बेसुध है, तत्वकी बातोमें बिल्कुल अज्ञात है, विपर्यासका ऊन ठिकाना ही नहीं है। मोह वैरीने भारी झपट मारी है जिसके कारण अपने उस मोहभावसे खयं उसके नीचे दब गया है। तथा लोककी रीतिभांति, चाल-ढाल, अन्धश्रद्धा, उलटी टेढी रूढी आदिमें खूब ही मस्त है, लोकोंकी गतानुगतिकता भेडचालमें ही सदा मम है, अपनी गांठकी अकलसे कुछ भी नहीं विचारता, लोकोंको प्रसन्न करनेकी बढी चाह लगी रहती है । लोकोंसे डरता भी खूब है इसी कारण गुप्त अनाचार सेवन करता है, तब लोकोंने भी बुगला-भककी ही उपाधि दी है। कोधसे पारा गर्म हो जाता है, चंडपरिणाममें धमधमाय- मान है। जिस प्रकार धौंकनीकी प्रेरणासे अग्नि तप उठता है इसी तरह क्या बल्के इससे भी अधिक क्रोधके द्वारा तप जाता हूं।शुद्ध गुण जो सम्यग्दर्शन- सम्यग्ज्ञान-परमशुद्ध चरित्र-क्षमा-मार्दव-आर्जव आदि आत्मगुण हैं, उनमें कभी रमण नहीं करता, न कभी में उनमें तन्मय ही होता हूं, अपने खरूपका ग्रहण भी कभी नहीं किया, सदैव तुसके समान निस्सार परभाव या विभावको ही खीकार किया है, नरक-वियच-मनुष्य-देव आदि चार गति रूप संसारचक्रमें इसी कारण मारा मारा फिरता हूं। तथा दन्य, क्षेत्र, काल, मावरूप संमृतिमें, पांच इन्द्रियोंके विषय-खादमें उन्मत्त और उन्मान हो रहा हूं। विषयग्रस्त हो कर इस भांति विश्वचकका कडुवा अनुभव ले रहा हूं, में वही अघमदास हूं, २४४ वीरस्तुतिः। अतः मुझे तार, तार! हे नाथ! दीनवन्धो। निष्कारण द्यालो ! मुझे तार भव दुससे बचा, बचा ॥२॥ आदर्यो आचरण लोक उपचारथी, शास्त्र अभ्यास पण कोई कीघो। शुद्ध श्रद्धान वळी आत्म-अवलम्ब विन, तेहवो कार्य तेणे को न सीधो ॥३॥ भावार्थ-शायद कभी कोई यह कहे कि-आवश्यक करणादि आचरण बहुतवार स्वीकार किया है, मगर उस चारनको तो लोकोपचारसे ही किया था जिससे फिर वह आत्माम विष तथा गरलके समान परिणत हुआ,क्योंकि अन्यान्य अनुष्ठानरो क्या हो सकता है, यदि भावधर्म नहीं रो तो उसके विना सब कुछ वृया है, और उसे उपचार-गतानुगतिकतासे अगीकृत किया समझा जाता है। इसके उपरान्त कोई यह भी कहेगा कि-उच्चगोत्र-यशोनामकर्म आदिके विपा. कसे ज्ञानावरणीयके क्षयोपशमके योगसे शास्त्रोका पूर्ण अभ्यास भी तो किया है, शास्त्रोंका पठन-पाठन किया है, शास्त्र के गर्भमसे यथार्थ अर्थको निकाल कर जगत्म उसका दिव्य प्रसार किया है । तथा अध्यात्मभावनासे स्पर्शज्ञानानुभावके बिना उस श्रुतवा अभ्यास किया गया परन्तु शुद्ध और यथार्थ स्याद्वादउपेत- भावधर्मके विना शेष भावधर्मकी रुचिसे दान दयादिक जो पुरुषार्थ किया गया है उन सबको कारण समझना चाहिए परन्तु मूल धर्म नहीं । धर्म तो वस्तुको सत्ता है, और वह आमाके अन्तर्गत-खरूपतासे पारिणामिकताकी दशाम स्थित । उसमें से जो धर्म प्रकट होता है, वह शुद्ध-श्रद्धान, शुद्धप्रतीति,तथा पुनः आत्माके स्वरूपको प्रकट करानेवाली रुचि तथा आत्माके स्वगुण-सम्बन्धी अक्लम्बनके विना पो आवरण किया जाता है तथा ज्ञानाम्याससे यदि वह कार्य किया जाता है, जिस कार्य से आत्माका सम्यक् साधन होता है, उसे किसीने निर्मित नहीं किया प्रगट नहीं किया। जिसके कारण जो आरमगुण प्रकट हो सकता था वह नहीं हुआ। अत हे परमेश्वर । इस अधमाधम दासको तेरी ही कृपा पार कर सकती है इसलिए वार, तार, दास समझार तार, अपना दास समाकर तार॥३॥ -
N
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संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २४५
खामी दर्शन समो निमित लही निर्मलो,
जो उपादान ए शुचि न धासे ।
दोपको वस्तुनो अहवा उद्यम तणो,
खामी सेवा सही निकट लाशे ॥४॥
भावार्थ-खामी श्रीवीतराग हैं, जो अन्यके कार्यके अकर्ता है, पर-
भावादिके अभोचा हैं, इच्छा लीला चपलता कौतुहल आदिसे सर्वथा रहित
हैं, क्योंकि इच्छा तो ऊनतावान अर्थात् न्यूनतावालेमें होती है, और परमे.
श्वरतो पूर्ण आनन्दी सहजानन्दी है, इसीलिए खामी इच्छा रहित हैं, और
लीला भी मुखकी लालसावालेको ही होती है, और लालचीपना मुखकी ऊन-
तासे होता है, इसी कारण प्रभुमें लालचीपना भी नहीं है । ऐसे निजानन्द-
विहारी स्वामीके दर्शनके समान निर्मल निमित्तको प्राप्त करके, आत्माका उपा.
दान-मूलपरिणति यदि शुद्ध न होगी तो जानना चाहिए कि यातो वस्तुका
दोप (जीव अवगुणावृत) है, या शायद जीवका दल ही अयोग्य है,
कहना न होगा कि इस जीवकी सत्ता किस ढंगकी है? अथवा क्या अपने
उद्यममें कुछ कमी है ? क्योकि कठोर प्रयत्न और सतत उद्यम करनेपर तो
आत्माका मुधार अवश्य होना ही चाहिए था मगर अबतक कुछ न हुआ।
इससे स्पष्टसिद्ध है कि-यह जीव अपनी ऊनताके कारण अपने आत्मीय गुणों का
स्मरण नहीं करता, इसलिए अब क्या करना चाहिए? और कोई उपाय भी
तो नहीं सूझता । यही समझ कर श्रीअर्हन् भगवान् महावीर प्रभुकी सेवाको
ही मैंने आत्म स्मरणके लिए अमोघ शस्त्र (सावन) समझा है । प्रभुसेवा
ही प्रभुकी समीपताको दिलायगी ! क्योंकि बहिरात्मभाव तो इस अवस्थाम
अत्यन्त दुष्ट है। परन्तु जिनराजकी सेवनासे यह दुष्टता छूटजायगी ॥ ४ ॥
स्वामी गुण ओळखी खामीने जे भजे,
दर्शन शुद्धता तेह पामे।
ज्ञान चारित्र तप वीर्य उल्लासथी,
कर्म जीपी वसे मुक्ति धामे ॥५॥
वीरस्तुतिः। a भावार्थ-खामी अर्थाद शासनपति, भईन् प्रमु, श्रीमहावीर भगवान्के गुणोंको पहचान कर जो प्राणी अरिहंतको भजता है उनकी सेवा करता है, वह दर्शन अर्यात सावरण केवलज्ञान सम्यक्त्व स्वखरूपकी झांकी अवश्य प्राप्त करता है। उसे दर्शनकी निर्मलता होती है, यथार्थ आरम ज्ञान भासता' है, चरित्र खखरूपमें रमण करता है, तप तस्वकी एकाप्रताको प्राप्त करता है, वीर्य आत्मसामर्थ्यका उद्भव करता है, उसके उल्लाससे ज्ञानावरणादि कर्मोको जीत (क्षय कर ) ता हुआ मोक्ष-निरावरण रूप सम्पूर्णसिद्धतारूप अपुनरावृत्ति धाममें जाकर निवास करता है ॥ ५॥ जगद् वत्सल महावीर जिनवर सुणी, चित्त प्रमु चरणने शरण वास्यो। तारजो बापजी ! विरुद निज राखवा, दासनी सेवना रखे जोशो ॥६॥ भावार्थ-जगत् त्रय वत्सल (हितकारी.) चौवीसवें महावीर जिन- घरके गुणों को सुनकर मेरा मन प्रभुके चरण (चरित्र) रूपी शरण (मनन) में बस गया है, अतः हे प्रभो। मो परमेश्वर ! मेरा आत्मा पलटा खाकर आत्मका समस्तसाधन करे, ऐसी शक्तिका उद्भव तो मुझमें नहीं दीख पडता, इसीलिए सरल भतिका माश्रय लेकर कहता है कि बापू ! मुझ दासको भाप ही पारकरना, और आप अपनी तारकताका विरुद सुरक्षित रखने के लिए इस दासको सेवना (भक्ति) के सामने मत देखना, जो आपकी आज्ञानुसार भक्ति करता है वह निस्सन्देह पार होता है, परन्तु अगत्तारक 1, मेरे लिए यह सब कुछ होना दुर्लभ है, लेकिन जिसप्रकार काठकी सातिसे लोह और पत्थरमी पार हो जाते हैं इसी प्रकार आपके संयोगसे पार हो पाऊंगा, और मुझे अब नियमरूपसे यही एक अन्तिम आधार प्रगटरूपमें दीख रहा है ॥६॥ विनति मानजो शक्ति ए आपजो, भाव स्याद्वादता शुद्ध भासे। साधि साधकदशा सिद्धता अनुभवी, "देवचन्द्र" विमल मभुता प्रकाशे ॥७॥ .
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २४७
भावार्थ-प्रमो! मेरी इतनी विनय तो अवश्य मानठेना, और मेरा यह
वचन भी सरल भक्तिकी प्रेरणासे निकला है। हां वह बात मानना कि मुझे
एक वार आत्मसामर्थ्य अर्पण करना, और ऐसा भाव भी प्रदान करना कि-
जिसभावसे वस्तुधर्म यानी स्याद्वादकी कसौटीसे नित्य-एक-अनेक-अस्ति-नास्ति-
भेद-अभेदद्वारा छहों द्रव्योंके अनन्तशुद्ध धर्म, शंकादि दूषण रहित भासने
लगें । साधकदशाकी साधना करके वे मेदरनत्रयी, सिद्धता, निष्पक्षता, वात्र-
विकताका अनुभव करके उसे भोगने लगे । समख देवोंमें चन्द्रमा के समान
सिद्ध भगवान्की विमल-निर्मल प्रभुताको प्रगट करे, अर्थात् स्यादाद ज्ञानके
द्वारा साधकता प्रगट होती है, और उस साधतासे सिद्धता प्रगट होती है,
यही एक विलक्षण सार पद्धति है ॥७॥
गुजराती भावार्थ-कोइक अवसरे श्रीजिनागमना अभ्यासे करीने
संसार भ्रमण निमित्त जे ज्ञानावरणादि आवरणे आवृत पोतानी अनन्त आत्म
शक्ति जाणीने अनादि परभावानुषंगता दोषने दुःखे उद्विग्न आत्मा ते पोतानी
साधकता शशि अणदेरातो परमनिर्यामक समान चौवीशमा श्रीवीरभगवान्नां
चरण शरण निर्धारीने, श्रीमहावीरप्रभुनी आगल प्रार्थना सहित विनति करे के
जे-हे नाथ । हे दीनदयाळ ! हे प्रभुजी! मुझ सरीखो जे तत्वसाधक तथा
आज्ञानिर्वाह मां असमर्थ, वेने मात्र नामथी सेवक जाणी तार, तार । ए गुण-
रोधक रूप दुःखथी निस्तार, तुज सरीखा प्रभु विना बीजा कोने कहुं ? जगत्मा
एटलं मुजश लीजे, यद्यपि प्रभु तो सुजशना कामी नथी, परन्तु उपचारे भक्ति
मातुरताए कहे छे जे मुज सरीखो दास ते यद्यपि राग द्वेष असंयम अनु.
छानाशंसादिदोष, एकतादोष अनादरादिदोपरूप अवगुणे करी भर्यो छे, तो
पण ताहरो कहेवाय छे । ते माटे हे दयानिधि! भाव करुणाना निधान !
दीन जे हुँ रंक, अशरण दुःखित-तत्वशून्य-ज्ञानादिसम्पदारहित-भावदरिद्री-
मार्गनो विराधक-असंयमसंचारी-महाविकारी-तमारी आज्ञाथी विमुस-अनादिनो
उद्धत एहवा मुझ ऊपर कृपा करीजे, ताहरी कृपा तेहीज त्राण (शरण) थशे।
यद्यपि अरिहंत तो कृपावंतज छे तो नवी. कृपा भी करवी छे, तो पण अर्यो
विचारे नहीं, माटे अधीन ए वचन छे, जे दयावंतनेज एम कहेवाय छे, जे.
हे देव ! तमे याना भंडार से, तमनेज अवलंबे वरीय । ए सत्य ज छे ॥१॥
. २४८ वीरस्तुतिः । · दास केहवो छे, राग द्वेषे भयो, जगत्मा पढ्यो, गुणथी ईर्ष्या करे छ, मोह जे मुंजितपशुं तत्वनी अजाणता-विपर्यासता, हेतुयें मोहवेरी नड्यो, तेथी दवाणो छ, तथा लोकनी जे रीत केतां चाल ते मांहे घणोज मातो छ, लोकनी चाल (गतानुगतिकता) माहे मम छ, लोकरंजननो अर्थी छे, क्रोध जे साता चण्डपरिणाम तेहने विषे,धमधमी रह्यो छे, जेम धमण धमत्ता अमि तपे, तेम तपी रह्यो छे, शुद्धगुण जे सम्यग्दर्शन-सम्यक्ज्ञान-शुचरित्र-क्षमा- दया-माईव आर्यवादि आत्मगुण, तेने विपे रम्यो नहीं, तन्मयो न थयो । ते रूप न मां, वळी भन्यो-चतुर्गतिरूपं भवचक्रमांहे द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावरूप संसार तेने विष हुं विषय जे पांच इन्द्रियना खाद, ते माहे मातो-केतां मम थयो थको एम ससारचक्र अनुभन्यु ते हवे प्रभु मुझने तार, तार, हे नाथ ! दीनबन्धु निष्कारण दयाल | मुजने तार, भव दुःसथी उगार ॥२॥ { . कदाचित कोई कहेशे जे. आवश्यककरणादिक आचरण आदर्यु-अंगी- कार कयु, परन्तु ते सर्व लोकोपचारथी एटले विप तथा गरल तथा अन्यान्या- नुष्टानथी भावना धर्म विना उपचारे अंगीकार कयु, तथा कोई कहेशे के उच्च- गोत्र यशोनाम कर्मादिकना विपाक ज्ञानावरणीय क्षयोपशमना योगे शास्त्राभ्यास पण कीधो, शास्त्र भण्या, शास्त्रना.यथार्थ अर्थ पण, जाण्या, तथा अध्यात्मनी भावनाए ,स्पर्शज्ञानानुभावविना 1.श्रुताभ्यास क्रीधो, परन्तु शुद्ध अने.यथार्थ स्माद्वादोपेत भावधर्म, विना शेष भावधर्मनी सचिये जे दान-दयादिक प्रवर्तन करे छे ते सर्व कारण, समजवां, परन्तु मूलधर्म नथी, धर्म ते वस्तुनी सत्ता, आत्माने विधे ख-खरूपपणे परिणामकताए रह्यो छे। ते मांहे जे. प्रगट्यो ते धर्म, एहयुं शुद्ध श्रद्धान-शुद्धप्रतीति-तथा वळी आत्मानी खरूप प्रगट करारूप रचि तथा आत्माना वगुणने आलंबन विना जे आचरण देणे आचरणे तथा श्रुताभ्यासे तेहई कार्य-जे कार्ययी आत्मानं साधन थाय, ते कोई नीपन्यु नहि, जे थकी आत्मगुण कोई प्रगटे ते थयुं नहि, ते माटे अहो परमेश्वर ! ताहरीज कृपा पार उतारशे, निस्तारशे, ते माटे तार तार ॥३॥ स्वामी श्रीवीतराम जे परकार्यना अकर्ता, परभावादिना अभोका, इच्छा. लीला चपलता रहित, एटले जे इच्छा होय छे ते तो ऊपतावंतने छे, ते माटे त छे, बळी लीला पण सुखनं लालच करनारने होय छे, 'अने लालची- खनी ऊनवाए थाय छे । ते माटे प्रभुमा लालचीपणु नश्री, एह्वा दर्शन (मत) समान निर्मल निति लहीने जो ए आमाई उपा- T संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २४९ दान-मूल परिणति पवित्र नहि थशे तो जाणवू जोईये जे वस्तु-जीवनो ज दोष अवगुण छे, एटले रखे ए जीवनो दल अयोग्य होय! ए जीवनी सत्ता केवी रीतनी छे? अथवा पोताना उद्यमनी खामी छे? केमके आकरे प्रयत्न उद्यम करीने तो आत्माने समरदो जोइये, तो ए जीव पोतानी ऊणाशने लीधे आत्मा समरतो नथी । ते माटे हवे शुं क ? जे बीजो उपाय कोई नथी, तो श्रीअरिहंतनी सेवा तेहीज निधे निकट केतां नजीकता लाशे, केतां पमाडशे, एटले आ आत्मा तो. हवे दुष्ट जेवो थइ रह्यो छे, परन्तु श्रीजिनराजनी सेव- नाथी दुष्टता तजी देशे ॥ ४॥ । । खामी जे श्रीअरिहंत तेहना गुणने ओळखीने जे प्राणी श्रीअरिहंतने भजे सेवे छे, वे दर्शन-सम्यक्त्वरूप गुणने पामे छे, दर्शननी निर्मलता पाम्या पछी, ज्ञान-यथार्थ भासन, चरित्र-ख-खरूपमा रमण तप-तत्वमा एकाग्रता- वीर्य-आत्म-सामर्थ्य, तेहना उल्लासथी ज्ञानावरणादि कर्मोने जीपीने मुक्ति-निरा- वरणरूप सम्पूर्ण सिद्धतारूप धाम-स्थानकमा जइने ते वसे छे ॥ ५॥ जगत्रयवत्सलत्रण जगत्ना हितकारी, एहवा महावीर भगवान् चोवी- शमा जिनवर, तेहना गुण सांभळीने मारो मन प्रभुने चरणने शरणे वसाव्यो छ। ते माटे हे प्रभो! परमेवर! माहरो आत्मा तो पलटीने सर्वसाधन करे, एहवी शक्ति देखाती नथी, माटे भद्रक भक्तिए कहुं छु जे हे तात! हे दीन- बन्धो! मुज दासने तमे तारजो, तमारुं तारकतार्नु विरुद राखवा माटे दामनी सेवना भकि सामु जोशो मा, जे ए आज्ञा प्रमाणे भक्ति करे तो तरे, ए वात तो स्वामिन् ! माहरामा थवी दुर्लभ छे, पण तमारे संयोगे तरीये, एहीज नियमा आधार छे ॥ ६॥" "माहरी एटली विनति मानजो, ए पण भद्रिकपणाथी भक्तिनुं वचन छे, जे शति एवी मामर्थ्य आपजो, ते कहे छे, जे भाव-वस्तुधर्म, ते स्याद्वादरीते नित्य-एक-अनेक-अस्ति-नास्ति-मेद-अमेदपणे छ द्रव्यना अनंताधर्म शुद्ध, शंकादि दूषणरहित भासे, जाणपणार्मा आवे, ते साधि-निपजावीने साधकदशा ठे मेद रत्नत्रयी-सिद्धता-निष्पक्षता-अनुभवे भोगवे, सर्वदेवमाहे चन्द्रमा समान, सिद्धभगवान् तेहनी विमल निर्मळ जे प्रभुता,ते प्रकाशे-प्रगट करे, एटलेस्याद्वाद शाने साधकता प्रगटे, साधकताथी सिद्धता प्रगटे छे, एडीज सार पद्धति छे ॥७॥ देवचन्द्र- . + + न . ३५० वीरस्तुतिः। वीरस्तुति- वीर जिनेवर चरणे लागुं, वीरपणुं ते मागुं रे। मिथ्यामोह तिमिर भय भागु, जीत नगारुं वायु रे ॥१॥. शब्दार्थ-वीर जिनेवर चौबीसवें वीर प्रभुको, चरणे लागुं नमस्कार करताहूं, (और) वीरपणुं ने उनके समान, वीरपणु-शूरवीर भाष, मागं रे में उनके पाससे यांचा द्वारा मांग लेता हूं (उनका वीरत्व ऐसाहै कि-जिसके सन्मुख) मिथ्यामोह मिथ्याव मोहनीय रूप, तिमिर भय-अन्धकारका भय, भागु-दूर भाग खडा हुआ है, और-जीत नगारं,-जयकर नगारा, वायु रे-धज रहा है। भावार्थ--में चौवीसवें जिनेवर धीमहावीरखामीकी भाव वन्दना करता हूं, और कर्मरूप शत्रुओको जीतनेके लिए उनमें जो योज्ञापन अथवा जैसा श्रीवीर भगवानमें वीरत्व है, में भी अपनेलिए वैसाही चाहता है, और जिनमें मिथ्यात्व मोहनीय कर्मरूप अंधकारका भय नष्ट होगयाहै, और फिर जीतका डंका बजगया है। परमार्थ में श्रीधीरभगवानकी भावोसे वन्दना करके अपने लिए वीरत्व पानेकी मांग पेश करता हूं, श्रीवीरभगवान् कैसे हैं, जिनका कि-पिण्यावादि मोह दूर होगया है, तथा कर्मरूपी शत्रुओंको पराजय करनेसे जिनका जयपदह बजने लगा है, ऐसे श्रीभगवानको नमस्कार करके में वीरता मागता हूं ॥१॥ छउमत्य वीरज लेश्या संगे, अभिसंधिज मति अगे रे, सूक्ष्म थूल क्रियाने रंगे, योगी थयो उमंगे रे, ची० ॥२॥ शब्दार्थ-उमाथ-छमस अवस्थाकी, वीरज लेझ्या=क्षायोपशमक वीर्यवाली, लेश्या-आत्म परिगामकी एक दशा, ( उसके) सगे संयोगके द्वारा (वा) अभिसंधिन-अभिसंधि जनित-योगाभिसन्धिजनित-योगको प्रहण- करने की अपने आप ही होनेवाली इच्छासे उत्पन-मति-बुद्धि, (उसके) भगेरे-उसकी छांयाके कारण (तया) सूक्ष्म आत्मिक, (और) थूल-च्याव- हारिक, क्रियाने रगे-क्रियाका समाचरण करनेके उत्साहसे (वीरभगवान्) योगी थयो-योगी उमंगरे-उमंगके साथ न कि जबरदखीसे, संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २५१ भावार्थ-स्थ अवस्था झायोपयमिक वीर्यवाली आत्मपरिण. वि योगसे, और योग प्रहम करने अपनी निजी इच्छासे उत्सम होने. राठी मुभिसे, मालिक और व्यावहारिक क्रिया करनेके उत्साह द्वारा श्रीवीर भगवान् की भारी उर्ममके साप योगी हुए हैं। परमार्थ-इस गाया भावार्य भलि प्रपर समझमें नहीं आता, अतः गुरुगम्यतासे इसन बर्ष समझना चाहिए । तथापि यथा मति लिसा गया है, प्रस्थ अवस्था आत्माको क्षायोपामिक वीर्यन उगम जय प्राप्त होता है और उस समय उसके साप पैसी ही शुभ लेश्या मिलजावीदे, अतः फिर धन्वयरूप वीर्यद्वारा कर्मप्रहण सता है, इस कर्मप्रहण करने की दवाये अभिभित्र कहते हैं, और तब फिर मति उपर्युक वीर्यको महण करती है। देवसम्पनरूप सूक्ष्म-किया, और शरीरसंचनरूप, एवं उसय प्रसरण करणरूप, प्रसारणकी क्रियाको स्थूल क्रिया कहते हैं, इस प्रकार स्यूल और सूक्ष्म क्रियाके रंगझे सर आमा नही उमंगसे योगी होते हैं । अर्थात् रे मनन्यचन-और यमके योग प्राप्त होते है॥२॥ असंख्य प्रदेशे वीर्य असंखो, योग असंखित कंखेरे, पुद्गल गण तेणे लेशु विशेपे, यथाशक्ति मति लेखेरे ॥३॥ शब्दार्थ-असंख्य प्रदेशे आत्माके असंख्य प्रदेश हैं, (अतः उन उन प्रदेशोंका वीर्य एका करने पर) वीर्य असतो असंख्य-जो गिना न जाय इतना भारम-बल है, (इपीसे भात्मा) योग अमंसित असंख्य योग-मन- वचन-काय के व्यापार, (उनकी) कोरे-अमिलपित अर्थको पूर्ण करने में समर्थ होता है, [भोर ] पुदल गण-पुद्गलकी विविध वर्गणाओंको, वेणे-इसी कारण, देशु विशेष लेश्या विषेशसे-भिन्न भिन्न टेश्याओंसे, यथाशति शक्केि अनुसार, मवि-युधि, अनुभवांकित रहती है, एकके पधार एक को ग्रहण करके माप करती रहती है। परमार्थ-आत्माके असंख्य प्रदेश है, और उन एक एक प्रदेशमै असंख्य वीर्य-शकि है, इससे असंख्य योगी आकांक्षा उत्पन्न होती है, और योग सामर्थ्यके अनुसार आत्मा कर्म-वर्गणाके मुगलोंको यथाशकि प्रहण करता है । ३॥
२५२ वीरस्तुतिः। 4 उत्कृप्टे वीरजने वैसे, योग क्रिया नवी पेसे रे, योग तणी भुवताने लेसे, आतमशक्ति न खेसे रे ॥ ४ ॥ शब्दार्थ-( लेकिन ) उत्कृष्ट वीरगने वेसे उत्कृष्ट, कार्यके आवेशमें- जब कि सबसे अधिक वीर्य-उल्लास होता है तब, योगकिया:-मन-वचन- कायरूपी योगका व्यापार, नवी पेसेरे प्रवेश ही नहीं करता, होता ही नहीं, (क्योंकि उस समय) योगतगी-योगकी, ध्रुवताको अचलताको, लेशे- लवलेशमात्र भी, आत्मशकि-आरमवल, न खेमेरे डिगाता नहीं, योग स्थिर हो जानेके कारण। भावार्थ-जब आत्मामें सबसे अधिक वीर्य प्रगट होता है तब मन-वचन और कायका कर्म बंधनरूप कार्य प्रदेश ही नहीं करता, कारण यह है कि उस समय आत्मकल है, बस योगके अचलत्यको लवलेश मात्र भी डिगा नहीं सकता, ॥५॥ परमार्थ--उपरोक्त कथनानुसार आत्मा योगकी शक्ति के अनुसार कर्म पुगलको ग्रहण करता है, परन्तु यदि आत्मामे उत्तूर वीर्य प्रगट होगया हो तो फिर मन चंचन-कायके योग लगभग बंद हो जाते हैं, और कर्मवन्धन- रूप किया फिर आत्मामे कम-बंध नहीं होता। योगकी धुवताका लेश सब आत्माओंमें होता है, और उस लेशमात्र भी आत्माके पार चक प्रदेश कर्मबन्धसे विरक्त (भा) रहते हैं। यह दृष्टान्त है । अत एव ज्यों ज्यों आत्मामें उत्कृष्ट वीर्य प्रगट होता रहता है, यो त्यों कर्मबन्ध भी कम हो जाते हैं, और अन्त सम्पूर्ण वीर्यस्व प्रगट होने पर वीरभगवानकी तरह समस्त कर्मबंधका नाश हो जाता है और युद्ध चैतन्यत्व प्राप्त होता है, अतः हे भगवान् ! मुझे वीरता अर्पण करो ॥४॥ काम वीर्य वशे जेम भोगी, तेम आत्मा थयो भोगीरे, सूरपणे आतम उपयोगी, थाय तेह अयोगी रे ॥ ५॥ .. " शब्दार्थ-कामवीर्य वशे श्री कंगकी इच्छा होने पर, वीर्य बलसे, चम-जिस प्रकार भोगी-भोग कर्ता होता है, तेम-इसी तरह, भातम धयो भोगीरे-आत्मा, (अपने वीर्योल्लास हारा भरने गुणोंश) भोगी यनता है, संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २५३ (और) शूर पणे शौर्य गुणके बलसे, आतम - उपयोगी अपने भावमें उपयोगवान् रहकर, थाय तेह अयोगीरे-वह आत्मा उसी समय अयोगी गुणस्थान पर आरुढ होता है। भावार्थ-बीसंगकी इच्छा होने पर वीर्य अर्थात् धानुके उल्लाससे जिस प्रकार जीव भोगकर्ता सिद्ध होता है, इसीप्रकार आत्मा अपने वीर्य उल्लाससे अपने गुणोंका भोगी बनता है, और शौर्यगुणके वलसे निजभाव, उपयोगवान् रहकर वह आत्मा तुरत अयोगी-गुणस्थानारूढ होता है। परमार्थ-जिसप्रकार कामी पुरुपमै वीर्यकी अधिकता होनेके कारण उसे प्रबल कामेच्छा होती है, इसीकारण पुरुष स्त्री की, और स्त्री पुरुष की इच्छा करती है, अथवा काम अर्थात्' इच्छा, वह द्रव्यादिककी इच्छावाला जिस प्रकार द्रध्यकी इच्छा करता है, और पर-भावकी वाञ्छा करता है, इसी तरह आत्मा भी ख-खरूपको न जाननेके कारण पर-पौद्गलादिक भोगोंकी धान्छा करता है। परन्तु जब आत्मामें शूरवीरताका संचार होनेपर वीरभाव प्रगट होता है, तब कर्मोका क्षय होने पर अपने खरूपको जानता है । इससे उसे पर वस्तुओंपर अभाव-(अप्रीति ) होता है, भात्मा निजगुणमें रमण करता है, मन-वचन और कायके योगको स्थिर करता हुआ नवीन कर्मीको नहीं बांधता । और अन्तमे अयोगी हो जाता है । इस लिए वीरत्व प्राप्त होने पर आत्माका कार्य सिद्ध होने वाला समझ कर भगवान्के पास वीरता ही मांगी है ॥५॥ वीरपणुं ते आतम ठाणे, जाण्यु तुमची वाणे रे, ध्यान विनाणे शक्ति प्रमाणे, निज ध्रुव पद पहिचाणे रे, वी० ॥६॥ शब्दार्थ-वीरपणुं शूरवीरता, ( उसे, ) वे आतम ठागे वह आत्मगुणस्थानपर चढता हुआ, [परिपूर्ण होना चाहिए इस प्रकार ] जाण्यु में जान मकाहूं, [ किसके द्वारा जान सकाहूं !] तुमची आपी, वाणे रेवाणी द्वारा-आपके प्रतिपादन किए हुए आगम द्वारा, (तथा) ध्यान विनाणे शक्ति
.
२५४
वीरस्तुतिः।
प्रमाणे अपनी शक्ति प्रमापसे ध्यान और विज्ञान , निज अपना, ध्रुवपद-
(परिणामकी स्थिरताको पाकर) शांतिरूप अचल पद, पहिचाणे-पहचानने से।
भावार्थ-आरमगुणस्थानपर चढवेसमय परिपूर्ण शूरवीरता होनी
चाहिए जिसे में अब जान सका हूं, किसलिए ! आपकी वाणी द्वारा, अर्थात
आपके उपदेशसे, पुनः मेरी निजी शक्ति के अनुसार ध्यान और विज्ञानके
साहाय्यसे भी कुछ जाना है, यानी प्यान और विज्ञानका जितना बल होता
है, उतना ही, अथवा उसी प्रमाणमें अपनी वीरताका स्थिरपद जीव इन
निमित्तोंसे पहचान लेता है।
परमार्थ-भगवान्के पाससे वीरताकी यांचा का विचार करते समय
भगवान के प्रतिपादन किए हुए उपदेशका सरण हुआ, इस खयं ही प्रसन्न
होकर कहता है कि प्रभो ! मेरी जो जो भूल हुई हैं उनका मुझे भान हुआ,
अब तक में आपसे यही विनति करता रहा था कि-मुझे वीरता अर्पण करें,
परन्तु मांगसे पहिले आपने फर्माया है कि समस्तआत्माएं मेरे समान हैं।
भतः जो वीरतामें पहले आपसे मांग रहा था, वही वीरता मुझमें भी है।
परन्तु खेद है कि इस बातकी मुझे जरासी भी खबर न थी, परन्तु आपकी
वाणीसे-आपके तत्वपूर्ण उपदेशसे मुझे विश्वास हुआ है कि यह वीरता
मुझमें भी पर्याप्त और भयंड है।
तब यह प्रश्न होता है कि जब आपके समान धीरता अपने में भी है
तब तुम उसे क्यों नहीं जानते थे? और भगवान्ने कहा है कि इसके अतिरिक्त
चीरता अपने भात्मामें है, इसका प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है, इसी प्रकार
गुरु परम्परासे यदि विशेष ज्ञान प्राप्त हुआ हो तो उससे भी अनुभव हो
सकता है, जिस प्रकार ध्यान और ज्ञानकी विशेषता है, इसी प्रकार
मात्मानुभवकी भी विशेषता जाननी चाहिए। मुमुक्षुओंको ज्ञान और ध्यान को
गुरुगमतासे जान कर आत्मानुभव करनेमें प्रवृत्ति करनी चाहिए, क्योंकि इस
स्तवनका नाशय यही है, और हमारी धारणा भी यही है ॥६॥
आलम्बन साधन जे त्यागे, पर परिणतिने भागे रे,
अक्षय दर्शन ज्ञान वैरागे, 'आनन्दघन' प्रभु जागे रे, ॥ ७ ॥
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २५५
शब्दार्थपूर्ण वीर्योल्लाससे शूरवीर बन कर ] आलंबन असमर्थ
दशामें लियाहुआ आश्रय, (तया) साधन-समस्त साधन-उपकारण, (उनको)
जो-जो महात्मा, त्यागे छोड़ देते हैं, पर परिणति आत्मासे अन्य-पुद्ग-
लादिका स्वभाव ( उससे), भागेरे दूर होजाता है, (वह) अक्षय-जिसका
सय न हो, ऐसे शाश्वत, दर्शनज्ञान वैरागे=ज्ञान-दर्शन और चरित्रके द्वारा,
आनन्दघन आनन्दसे भरपूर, प्रभु-परम समर्थ-परमात्मा-ईश्वर, (होकर )
जागेरे (सदैव) ज्ञानसे जागृत रहता है ।
भावार्थ-सम्पूर्ण वीर्योल्लाससे शर वीर होकर जो पुरुप असमर्थ
दशामें पहले लिए हुए आलंबनों को और समस्त (अत्यावश्यक) उपकरणोंको
भी छोड देताहै, उस आरमासे पर जो पुद्गलादिका विभाव है वह दूर होजाता
है, पुनः वह महात्मा पुरुष जिसका कभी क्षय न होने पावे, ऐसे शाश्वत
शान-दर्शन और चरित्रसे, आनन्दपदसे भरपूर परमात्मारूप होकर सदैव
ज्ञानपूर्वक जागता रहता है, अथवा 'आनन्दघन' कवि कहते हैं, कि-प्रभु-
मात्मा जाग जाता है, यानी अनादिकी ऊंचमेसे आत्मा जागृत हो जाता
अर्थात् विभावदशाको त्याग कर खयं परमानन्दरूपमें मग्न हो जाता है।
परमार्थ-आत्मा अनादिकालके पुद्गल सम्बन्धी आधारसे अपना
कार्यकरना यागदेता है, तब आत्माका अखंड-शुद्ध-चैतन्यत्व सम्यग् ज्ञान-
दर्शन और चरित्रद्वारा प्राप्त करता है। और अनादि कालसे आत्मा जिस
पुद्गलके संगमें पडा ऊंघ रहा है, उसीसमय जग कर खयं अपने खरूपको
प्राप्त करता है अथवा 'आनन्दघन' कवि कहते हैं कि यह आत्मा पर वस्तुका
संग छोडदे और अपना निजी अवलम्ब रक्खे, तथा परानुयायीपन छोडदे तो
उस रखनय के आराधनसे यह आत्मा तुरन्त मोक्षको प्राप्त होता है,॥७॥
गुजराती भावार्थ-चोवीसमां जिनेश्वर श्री महावीर खानीना चर.
णोमा हुं वन्दन करुं हुं अने कर्मरूपी शत्रुओने इणवामा जे योद्धापणं, अथवा
जेवू धीवीर भगवान्न वीरपणुं छे, वेबु वीरपणुं हुं मागं छु, वव्ये जे प्रभुनो
मोहनीय कर्मली अन्धार-भय नष्ट ययो छे, अने कर्मरूप शत्रुओनो परा-
जय करवायी जेमनो जयपटह वाग्यो छे, एवा श्रीवीरभगवान्ने पगे लागीने हुँ
चीरपणुं मागुंएं, ॥१॥
- २५६ वीरस्तुतिः। आ गाथानो भावार्थ मने बराबर समजायो नथी, माटे गुरुगमथी धारवो, तो फ्ण यथामति लख्यो छे, छद्मस्थावस्थामा आत्मानुं क्षायोपशमि- क वीर्य होय छे, अने तेनी साथे तेवीज लेश्या मळे छे, एटले जोडायेलां वीर्ये कर्म-ग्रहण करे छे, कर्म प्रहण करवानी दशाने अभिसधिन कहे छ, अने मति उपर्युक वीर्यने ग्रहण करे छ । देहकम्पनरूप सूक्ष्म क्रिया भने शरीर सकोचवा रूप हेमज वेनो प्रसार करयारूप प्रसारणनी क्रियाने स्थूल क्रिया कहे छे, एटळे ते मन-वचन अने कायना योगने पामे छे।॥२॥ जेनी संख्या न आवे ते असख्य कहेवाय. आत्माना अथवा बीजा व्योना सूक्ष्ममा सूक्ष्म आकाशना विभागमा रहेलो जे भाग ते प्रदेश कहेवाय है। आत्माना आवा असख्य प्रदेशो छे, अने ते एके एक प्रदेशमा असख्य वीर्य छ, तेथीज भात्मा मन-वचन-अने कायना असंख्य योगनी काक्षा-अभि- लापा थाय छे, अर्थात् ते योगो साध्य-प्रगट करवाने समर्थ छे, अने ते हेतुथी पुद्गलनी जुदी जुदी वर्गणाओने विविध प्रकारनी लेश्याओथी शफिमुजब बुद्धि- लेखी रहे छे, अर्थात् एक पछी एक प्रहण करीने मापती रहे छे ॥३॥ आत्मा योगनी शक्किने अनुसारे कर्मपुद्गल ग्रहण करे छे। पण जो आत्मामा उत्कृष्ट वीर्य प्रगट थयुं होय तो पछी मन-वचन-कायना योग लग भग बंध थाय छे, अने कर्मबांधवा रूप क्रिया थी आत्मामां कर्मबंधतो नथी। योगनी भुवतानो लेश बधा आत्मामां होय छ, भने ते लेशमात्रथी पण आत्माना आठ रुचक प्रदेश कर्म बंधथी पिरक रहे छे, ए दृयन्त छ। माटे जेम जेम आत्मामा उत्कृष्ट वीर्य प्रगट याय, टेमतेम कर्मबंध कमवी थाय, अने ठेवटे सम्पूर्ण वीर्यपणुं प्रगट था वीर भगवान्नी पेठे समस्त कर्म- बन्धनो नाश याय, अने शुद्ध चैतन्यप प्रगट थाय तेयुं छे। माटे हे भगवान् । मने वीरपणुं आपो! ॥४॥ जेम कामी पुरुपमा वीर्यनो वधारो धता वेने प्रयल कामेच्छा थाय के, देवी पुरुष बीनी अने नो पुरुपनी इच्छा करे छ। अथवा काम एटले इच्छा, ते व्यादिकनी इच्छावालो जेम इम्पनी इच्छा करे में, अने परभायने वांछे .
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २५७ छे, म आत्मा पण ख-खरूपना अजाणपणाथी पर जे पुगलादिक देना भोगनी वाम्छा करे छे। पण ज्यारे आरमामां शूरापणुं अभवा वीरपणुं प्रगट पाय छे, लारे कमोनो क्षय यता ते पोतार्नु वरूप जाणे छे, तेथी पर वस्तुपरथी नेने अभाव थाय छे, आत्मा पोतामा रमण करे छे, मन वचन अने कायना योगने स्थिर करी नवां को बांधतो नथी, अने छेवटे अयोगी पण थाय छे। तेथी वीर्यपणं प्राप्त पता आत्मान कार्य थवानुं जाणी प्रभु पासे वीरपणु माग्युं छे। ॥ ५ ॥ भगवान् पासे वीरपणु मागवान विचार करता भगवाने करेला उपदेशन स्सरण थयुं । तेथी पोतेज सुशीथईने कहे छे के हे प्रभो 1 मारी जे भूल छे, वे मने जणाई,अत्यार मुधी में आपने विनंति करी के मने वीरपणुं आपो, पण मारी मागणी पहला आपे कहेलं छे के नमाम आत्मा मारा जेवा छे, एटले जे धीर- पर्ण हुँ. आपनी पासे मागु हुं, ते वीरपणुं मारामांज छ, पण ते वातनी मने सवर न होती, परन्तु आपनी वाणी थी एटले आपना उपदेशथी मारी रात्री यहछे के वे वीरपणुं मारामां छे। स्वारे प्रश्न माय छे के ग्यारे वीरपणुं तमारामां छे तो तमे केम न होता जाणता ? अने भगवाने कझुंडे के ते शिवाय वीरपणुं पोताना आम्मामा छ। ते जाणवाने शीर्जु साधन छे के केन ! तेनो उत्तर कहे छ के ध्यान करवाधी वीरपणं पोसामो उद्भव धाय छे, अने तेनो प्रत्यक्ष अनुभव थई शकेले वमज गुरुपरम्परायी विशेष ज्ञान प्राप्त पयुं होय तो वेथी पण अनुभव थई शके छे, शान अने ध्याननी जेम विशेषता याय छे म आरम अनुभवनी पण विशेषता जाणवी, मुमुक्षुओए शान अने प्यानने गुरुगनयी जाणी आलअनुभव करवानां प्राति करवी ए आ सपननु रहस्य छे एम हुँ धाएं। आत्मा पुरळना आधारयी पोतानुं कार्य करतान लागे, अने पुद्गलन भालम्बन जो छोरी दे तो अखंड गुर चैतन्यपपुं सम्यग्नान-दर्शन अने चारैपरडे प्राप्त करे, अने अनादिकाळयी आत्मा जे पुगतना संगमा ऊंपलेतो पडेलो, ते जागीने पोतार्नु सरूप प्राप्त करे है, अथवा आनन्दधन कवि कहे छे के आरमा पर-वस्तुनो संग झेडे, पोतार्नु अवलम्बनं रखे, अने परानु- पानी पतजे तो रमयीना आराधनश्री मोक्ष पाने। [मानन्दपन] 7 - २५८ वीरस्तुतिः। । धीरस्तुति- धन धनंजनक 'सिद्धारथ राजा, धन त्रिशला देवी मात रे प्राणी। ज्यां सुत जायो गोद खिलायो, वर्धमान विख्यात रे प्राणी, , श्रीमहावीर नमो 'वर गाणी, शासन जेहनो जाण रे प्राणी, प्रवचन सार विचार हिए में, कीजे अर्थ प्रमाण रे प्राणी, २ सूत्र-विनय-आचार-तपस्या-चार प्रकार समाधि रे प्राणी, ते करिये भवसागर परिये, आतम भाव आराधि रे प्राणी, ३ ज्यों कंचन तिहुं काल कहीजे, भूषण नाम अनेक रे प्राणी, त्यों जगजीव चराचर योनि, हे चेतन गुण एक रे प्राणी, ४ अपणो आप विषे थिर आतम, सोऽहं हंस कहाय रे प्राणी, केवल ब्रह्म पदारय परिचय, पुद्गल भरम मिटाय रे प्राणी, ५ शब्द-रूप-रस गंध-न जामे, नहीं स्पर्श-तप-छांह रे प्राणी, "तिमिर-उद्योत-प्रभा-कछु नाही, आतम अनुभव मांहि रे प्राणी, ६ सुख-दुःख जीवन मरण अवस्था, ए दशमाण संगात रे प्राणी, इणी भिन्न विनयचंद रहिये, ज्यों जलमें जलजात रे प्राणी, ७ भावार्थ-सिद्धार्थ राजा और विशल्य' देवी राणीको धन्यवाद है, जहाँ 'वर्धमान जैसे पुत्र उत्पन हुए, उन्होंने अपने अंकमें उसको खिला रमा कर अपनी होस पूरी की, और वर्धमान नामले तो वीनों लोकमे विख्यात हुए, अपर नाम महावीर भगवन् । जो श्रेष्ठ और निर्मल फेवलज्ञान युक हैं, जिनका इस समय शासन काल प्रचलित हो रहा है, और भावी साल में भी १०५.. वर्ष तक चलेगा, उन्हें मेरा योग और करणी शुदिसे नमस्कार है, जिनके प्रवचन सार आत्मभान और परमात्म विचार है। यदि उसय मनन और निदिध्यासन किया जाय तो यह आरमा मोक्षकी पूर्ति टीम ही कर सकता है। शाव-नन्दन महावीरप्रभुने 'सूत्र' 'विनय' 'आचर' और 'तपस्य' ये चार प्रकारको समापि भव्य प्रानिओं के कल्याण अयं प्रतिपाइन भी है, संस्कृतटीफा-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २५९ जो जितेन्द्रिय संयमी सदैव अपने आरमाका विनयसमाधि-श्रुतसमाधि-तपः समाधि और आचारसमाधिमें रमण करते हैं वास्तव में वे सच्चे पण्डित होते हैं. विनय समाधिके चार प्रकार-विनय समाधिके चार मेद इस प्रकार हैं जिस गुरुके पाससे शिक्षण प्राप्त किया है, उस गुरुको महा उपकारी समझकर उसकी सेवा करे, उसके समीपमें रहकर विनयका समाचरण करे। गुरुके वचनका यथार्थ रूपमें पालन करे । और विनयी होनेपर अहंकारी नं बने । मोक्षार्थी साधक सदा हितशिक्षाकी इच्छा रखता है, उपकारी गुरुकी सेवा करता है, गुरुके समीपमें रह कर उनके वचनका पालन करता है, और अभिमानसे मदसे गर्विष्ठ नहीं बनता। वही विनय समाधिका माराधक समझा जाता है। श्रुत समाधिके चार प्रकार-"अभ्यास करनेसे मुझे सूत्र सिद्धा. न्तका परिपक ज्ञान होगा" यह समझ कर अभ्यास करता है, "अभ्यास करनेसे मेरे मनकी एकाग्रता होगी" यह जानकर श्रुतका अभ्यास करता है। "अपने आत्माको उत्तम और सद्धर्ममें परिपूर्णतया स्थिर करूंगा" यह मान कर अभ्यास करता है, यदि में समता पूर्वक धर्ममें स्थिर रहूंगा तो औरोंको भी धर्ममें स्थापन करसकूँगा। श्रुतसमाधिमें अनुरक्त रहनेवाला साधु सूत्रोंको पढकर शानकी, एकाम चित्तकी, धर्मस्थिरताकी तथा औरोंकोधर्ममें स्थिर करनेकी शक्तिका सम्पादन करता है, अतः साधकक्ने श्रुतसमाधिमें तहीन रहना चाहिए। तपः समाधिके चार प्रकार-सच्चा साधक इस लोकके स्वार्थ- सुखके लिए तप नहीं करता, परलोक खर्ग मुखके लिए तप नहीं करता; फीति, वर्णन (स्था) के लिए भी तप नहीं करता, और पाप कर्मको बखेरने- वाली निर्जराके अतिरिक्त किसी भी अन्यकारणसे तप नहीं करता, वही तपस- माधिके योग्य होता है । तपसमाधिर्म सदैव लगारहनेवाला साधक भिष- भिष प्रकारके सद्गुणोंके भण्डाररूप तपमें सदैव तन्मय होता है। किसी भी प्रकारकी आणा रक्खे बिना कर्मशीम करानेवाली निर्जरा भावनाके लिए प्रयत्न करे तो तपक्रेद्वारा वह पुराने पापकमाको दूर कर सकता है। आचार समाधिके चार प्रकार-कोई भी साधक इस लोकके खार्थकी पूर्तिके अर्थ श्रमणके सदाचारोंका सेवन नहीं करता, पारलौकिक वीरस्तुतिः। खार्थके लिए भी सदाचारों का सेवन नहीं करता। कीर्ति-वर्ण-शब्दके लिए भी साधुके आचारोंका पालन नहीं करता । (अर्थात् ) अर्हन्देवके फर्मानके मुजव निर्जराके हेतुको छोड़ कर किसी भी वार्धके लिए आचारका पालन न करके मात्र निर्जराथ ही आचार पालन करता है । जो साधक दमितेन्द्रिय है, सच्चन रित्रसे आत्मसमाधिका अनुभव करता है, महावीरके वचनोमें अपनेको अर्पण कर चुका है, वाद-विवादसे विरत और सम्पूर्ण क्षायिकभावको पाकर जिसका श्रात्मा मुक्तिके निकट हो जाता है। वह साधक इन चार समाधिओंसें आत्माका आराधक होकर-मुविशुद्ध होकर चित्तकी मुसमाधिको साधमें लगकर परम हितकारी और अपना, एकान्त, मुबारक कल्याणस्थान खुद ही प्राप्त करता है । समाधिसे जन्म और मरणके चक्रसे मुक्त होकर शाश्वत विद्ध होता, है। यदि थोड़े बहुत कर्म बाकी रहगए हों तो महान ऋद्धियुक्त उच्च और . सर्वोत्तम् कोटिका 'देव' होता है। ॥ आत्मा सुवर्णकी तरह है, आभूषणोंकी तरह वह पर्यायी है, चराचर जगत् और चौरासीलाख जीवयोनि चारगति इसके पर्याय हैं । परन्तु चेतना गुण सबका एक है, समान है, किसीय किसीप्रकारसे अन्तर नहीं है।" 'अपने भात्माको निजखभावमें स्थापन कर, तर सोहं का भास होगा, इस अनुभवके पश्चात् (हंसः )परमात्मरूप (खच्छ) हो जायगा, परभावको छुडाने वाला केवळ-ब्रह्मपदार्थका परिचय पुद्गलपरिणतिका भरम मिटा देगा। इसीका अभ्यास चरित्र-आत्म रमणता है, जो कर्मरजको छानकर आत्मद्रव्यको पृथक् प्रगट करदेता है।" . . "इस आत्मामें शब्द-रूप-रस-गंध-स्पर्श-आतप-छाया-अन्धकार-उद्योत- प्रभा-आदि कुछ भी नहीं है, और आत्म-अनुभव होनेपर वाह्य पदार्थीका मोह और ये दश जड वस्तुएँ आरमाके पास कभी फटक ही नहीं सकती।" "तथा मुख-दुःस जीवन-मरण-सम्बन्धी अवस्थाएँ इन १. बाह्य प्राणों के साथ हैं, इनका पवित्र और स्वारी-प्राणों के साथ कोई संबन्ध नहीं, विनयधर्मकी साधनामें चन्द्रमाके समान उच और पवित्र महावीर प्रभु उनसे इस प्रकार मित्र है जिस प्रकार प्रखर कीचड़ और गंभीर जलसे उत्पन्न होस कमलदल पानी और कीवडसे अलग रहता है। विनयवंद (कुंभट) . . .
२ २६१ १ संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता महावीर थुई नो गुजराती काव्यानुवादः आज सुधर्मा कहेता प्यारा जंबुने,' वीरप्रभुना पंचम गणधर धीरज़ो, संयमसागर शिप्य बडा ते जंबुजी, पूछे गुरुने भ्रम 'भांगो गंभीर जो। कहो गुरु आ भवसिंधु उतारवा, कोणे आप्यो उत्तम अमने धर्म जो, साधु संघने अन्य पंथना सज्जनो, पूछे आवी धर्म तणो सौ मर्म जो। अनन्य मंगल धर्म दीधो जे व्यक्तिए, ते समजावो टळवा सौ अनर्थजो, गुरु ज्ञानी छो आप महा आ विश्वमां, तेथी पूर्छ प्रश्न तणो हुं अर्थ जो १ फहो खामी ते ज्ञान धरे कइ जातना, कइ पंक्तिना तेना दर्शन शील जो, श्रवण कयु के जोयुंजे आपे प्रभु, बोलो! खोली दिलना द्वार अखिल जो २ मधुर वाणी आ सुणी सुधर्मा बोलीया, जाणे चाली सुधा शब्दनी धारजो, विश्वसकळनो दुःख जाणतो नाथ जे, वीरप्रमु ते आव्या आ संसार जो। कमरिपु संहार करी ते पामीआ, अनन्त दर्शन-ज्ञान तणो भंडार जो, सूक्ष्म विषये दृष्टि तेनी स्थिर छे, कुशल प्रभु ते दीप्या जग मोझार जो ३ सर्व दिशामा वसताजे त्रस स्थावरो, मान्या तेने 'नित्य' अने अनित्य जो द्रव्य थकी तो मानी तेनी नित्यता, पर्याये तो मान्या छे अनित्य जो। घोर तिमिर जे विश्व मही व्यापी रघु, अनन्य दीपक तेहना छे भगवान् जो सर्व जीवोपर राखीने समभावने, अर्पण कर्ता धर्म तणुं तो पान जो ४ सर्वदर्शी सर्व विषयने जाणता, जीत्या चारे मति-श्रुत आदि ज्ञान जो, केवळज्ञानी निज आत्मामां स्थिरते,शुद्धचरितनां गातांजन गुणगान जो सर्वपुरुषमा पुरुषोत्तम ते ज्ञानी छे, परिग्रह केरो संग नहीं तलभार जो, लोक तणा तो भय तेने नहि पामता, जन्ममर्णनो स्पर्श नहीं लगार जो ५ प्रज्ञा तो वहु तीन हती भगवान्नी, वन्धन विण ते करता सदा विहार जो, भवसिन्धुनी पार गया छे खामी ते, पाम्या ते श्री अनन्त ज्ञान मंडार जो ।
वीरस्तुतिः। वृक्ष महिं तो शाल्मलीने जाणवू, काननमा नहिं नन्दनवननी जोडज़ो, शाल्मलीने नन्दनवनना आशरे, सुपर्ण सरखा देव करे :प्रमोद जो शाल्मलीने नन्दनवन तो क्या मळे, अद्वितीय स्थानो लोक महिं पंकायजो, शाल्मलीने नंदनजेवा जंबूजी, वीर बुद्धिने ज्ञान चरित अंकाय जो १८ शब्दमहीं तो मेघशब्द क्याथी मळे मेघतणुं तो गंमीरगर्जन होय जो, ग्रहोमहीं तो.चंद्र सम छे ग्रह नहि, मनहर जेनी शीतलता प्रसराय जो; सुगन्धिओमां मयजसम छ वासक्या? लोकमहीं ए चंदन श्रेष्ठ गणायजो, मेघ चंद्रने मलयज जेवा जाणवा, मुनिवर्गमा वीरना विरक्त भाव जो १९ सिंधु महीं तो खयंभू रमण जाणवो, क्रीडा करता देवो ज्यां सहर्ष जो, भवनवासीमां भव्य नागकुमार छ, भव्यरूपथी मनपामे उत्कर्ष जो; सर्व रसोमां ईक्षुरसने जाणवो, मधुरतायी मनई शीतल थाय जो, ईक्षु-स्वयंभू-देवनाग सम वीरला, वीरप्रभुना प्रधान तप जप होय जो २० हस्ती महिं ऐरावत सम छे हस्ती नहि, यशुमहीं तो सिंहकेसरी एक जो, निर्मळ जळमां गंगाजळने जाणवू, विहंगोमां गरुड एक निशंक जो ऐरावत मनगमतीलक्ष्मी लावतो, लाव्या लक्ष्मी त्रिशला पर वीर जोध जो, गरुड-गंगा-ऐरावतने हस्ती सम, मोक्षवादीमा वीरना मुक्तिबोध जो २१ योद्धाओमां वासुदेव मशहुर छे, प्रिय पुप्पमा पंकज सम नव कोय जो, क्षत्रीओमां चक्रवर्ती प्रधान छे, विरल गुणना विरलां सानो होय जो; वासु तणुं वळ अष्टापद वीशलखनु, पंकजने छ नवली मीटी वास जो वासु-कमळने चक्रवर्ती सम जाणवा, ऋपिवर्गमां वीर महर्षिखास जो २२ दान नहीं तो अभयदानने जाणवू, सत्य महीं तो 'निर्वद्य' निश्चित जो, सर्व तपो मां ब्रह्मचर्य विशिष्ट छ, आत्मकळनी जागे तेथी ज्योत जो, अभयदानी दूर बती हिंसा सहु, निरवद्ययी परपीडा नवी थाय जो, संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिवा २६५ ब्रह्मचर्यथी उत्तमवळ तो आवतुं, लोक महीएम उत्तम वीरं मनाय जो २३ सुरपदोमां सर्वार्थसिद्धि श्रेष्ठ छे, सुधर्म केरी सभा अनुपम थाय जो, सर्वधर्म तो श्रेष्ठ मुक्तिने मानता, जीव मात्रनो परम हेतु ते होय जो सर्वार्थसिद्धिना सुखनी तो वातशी, सौधर्म केरी सभा अनेरी होय जो, रतिमुक्तिनी वाणी तो नहिं कहीशके,प्रभुसमा उत्तमज्ञानी नवकोयजो२४ परिपहो तो धरे पृथ्वी संम नाथ ते, पृथ्वीवत् ते सौनो छे आधार जो, अष्ट कर्मने नष्ट कर्या ते खामी ए, कर्यो गृद्धीने अभिलाप संहार जो पाम्या छे ते ज्ञान महा उपयोगनु, प्रयास विण ते जाणे वस्तु रूप जो, अनन्तभवने तरी गया छ वीर ते, अनन्तचक्षु नित्य अभयखरूप जो २५ महारिपुजे आत्मदोप संसारना, क्रोध मानने मोह लोभ पर्याय जो, दूर करीने अर्हत् पदने पामीआ, करे करावे पाप नहीं ऋपिराय जो २६ विध विध पंथो लोक महीं चाली रहा, क्रियावादीके अक्रियवादी कोय जो रमे कोई अज्ञानवाद के विनय मां सर्व पंथना ज्ञान वीरने होय जो; क्रियावादीनी मुक्ति क्रिया मां रही, अक्रियवादी समजे मुक्ति ज्ञान जो विनयवादितो विनय एज मुक्ति गणे, अज्ञानी तो मुक्ति गणे अज्ञान जो; सर्व पंथने समजीने आखामीए, विकसाव्यो छे लोक महीं जैन धर्म जो, ज्ञानक्रियामां मोक्ष मानता वीर ते, लीधोसंयम समजावया सहुमर्म जो २७ मोक्ष तणो मार्ग कयो आरीति थी, करी वताव्यो जगने देवा बोध जो, सकल पापने.भस्म करीने खामीए, रोक्यो वहेतो कर्मरिपुनो धोध जो; मनुष्य केरा के नरकादिक लोकनां, वीरप्रभुए जाण्या पूर्ण वरूप जो, खरूपजाणी लोक अने परलोकनां सर्वलोकने छोड्या छे तद्रुप जो २८ धर्म परूप्यो अर्हते आ प्रेमथी, अर्थ पदोमां केवळ जे निर्दोष जो, सुणीतत्व आश्रद्धाथी जन पामता,इन्द्र सुखके मोक्ष लक्ष्मी सतोष जो२९ →ok-
वीरस्तुविः ।
परिशिष्ट नं० २-प्राकृतस्तोत्रविभागे
(पइभाषामयं वीरस्तोत्रम्)
विद्यानां जन्मकन्दस्त्रिभुवनभवनालोकनप्रत्यलोऽपि,
प्राप्तो दाक्षिप्यसिन्धुः पितृवचनवशात्मोत्सवं लेखशालाम् ।
जैनेन्द्रीं शब्दविद्यां पुरत उपदिशन् स्वामिनो देवतानां,
शब्दब्रह्मण्यमोघं स दिशतु भगवान् कौशलं वैशलेयः॥१॥ (संस्कृतम्)
जो जोईसरपुंगवेहि हियर निचंपि ज्झाइजए,
जो सबसु पुराणवेयपभिग्गंथेसु गीइज्जए ।
जो हत्थठियआमलं व सयलं लोकचयं जाणए,
तं वंदे तिजयग्गुरुं जिणवरं सिद्धत्यरायंगयं ॥ २ ॥ (माकृतम् )
देविंदाणवि वंदणिजचलणा सवेवि सवन्नुणो,
संजादा किर गोतमा अवि तया जस्सप्पसादा दुते ।
सो सिद्धत्यभिहाणन्वदिसदो जोगिदन्डामणी,
भवाणं भवदुक्खलक्खदलणो दिज्जा मुहं सासदं ॥३॥ (शौरसेनी)
दुस्टे संगमके शुले भयकले घोलोवसम्पावलिं,
कुछतेवि न लोशपोशकलुमं येणं कदं माणसं
इंदे भरिपले ण गेहू बहुलं योगीशलम्गामणी,
शे वीले पलमेशले दिशतु मे नेडन्तपुन्नतणं ॥ १॥ (मागधी)
कंपंतक्खितिमंडलं खडड्डप्फुट्टतयंभंडयं,
उच्छीतमहन्नवं कडयडतुतसैलगयं ।
पातग्गेन मुमेरुकंपनकरं वालचलीलावलं,
चीरस्स पहुणो जिनान जयतु क्खोनीतले पापड ॥५॥ (पैशाची)
NA
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २६७
इंहो वेदणरेसि जासु महया हल्लोहलेणागओ,
जज्झाई मुणिहंसओ हियडए अक्खे निरंभेविणु,
साहु ब्रोप्पिणु जासु कोइ महिमा नो तीरए माणवो,
पाए वीरजिणेसरस्सु नमहुं सीसल्लडे अम्हहे ॥६॥ (अपभ्रंशः)
आसाढे धवलाइ छठि चवणं चित्तस्स तेरस्सिए,
सुद्धाए जणणं सुकिण्हदशमी दिक्खायमग्गरस्सिरे ।
जस्सासी वइसाहसुद्धदसमी नाणं जणाणंदणं,
मुक्खो कति अमावसाइ तमहं बंदामि वीरं जिणं ॥
कणयसमसरीरं मोहमल्लेगवीरं, दुरियरयसमीरं पावदावग्गिनीर;
सुगहियभवतीरं लोअलंकारहीरं, पणमह सिरिवीरं, मेरुसेलेसधीरं ।।
जय जय जय जणवच्छल ! नवजलहरपवणवणयसमणयण नय-
णमणपमयवद्धण ! धणकणयलक्खणयसमण ! ॥१॥ समणमणभ-
सलजलसय ! सयत्थसत्थत्थपयडणसमत्थ ! मत्थयनमंतनर वर ! वर-
वरयवरंग गयसंग! ॥ २ ॥ संगरगररससयगय! गयमच्छर ! रयण-
मयणदढजलण जलणजलसप्पभयहर! हरहसधवलयरजसपसर ! ॥३॥
सरणपवण्णसरन्नय नयसयगमरम्मसम्ममयसमय ! मयमयगलनहप-
हरण ! रणरणयभयभमसवच । ॥ ४॥ वत्तसयवत्तगहवर ! वरक-
लसलसंतसंखचक्क ! कंकफलसरलनयण! नयपमय असत्तअपमत्त !
॥५॥ मत्तगयगमण! गयमण मणगयसंसयसहस्सतमतवण तवण-
यप्पहपयर! हयतमपरमपयनयरस्स ॥६॥ इय पढमसरनिवद्धं घण-
क्खरं गहिय मुक्क्यपयतुं भनीए संथवणं रइयं मुणिचंदमुणिणा ॥७॥
'वीरस्तुतिः। (वीरस्य चतुस्त्रिंशदतिशयस्तयनम्) थोस्सामि जिणवरिंदे, अमुअभूएहि अइसंयगुणेहि, ते तिविहा साहाविय, कम्मक्खइआ सुरकया य॥१॥ देहे विमलसुगंधं, आम- सपासेहिं वजिअं अरअं, रुहिरं गोरखीराभ, निधिस पंडुरं मंसं ॥२॥ आहारा नीहारा, अद्दिस्सा मंसचखुणो, सययं नीसासो अ सुगंधो, जम्मप्पभिई गुणा एए ॥ ३ ॥ सित जोयगमित्ते, जे जिय- कोडीसहस्साओ माणं, सबसमासाणुगयं, वयणं धम्मावबोहकरं ।। ४ ।। पुत्रुप्पन्ना रोगा, पसमंती ईयवयरमारीओ, अइबुद्दी-अणावुट्टी, न होह दुभिक्खडमरं वा ॥ ५ ॥ देहाणुनग्गलगं दीसइ, भामंडलं दिणय- राभ, पए कम्मक्खइया, सुरभत्तिकया हमे अन्ने ॥ ६॥ चनं छत्तं रयणज्झओ अ, सेयवरचामरा पडमा, चउमुहपायारतियं सीहासण दुंदुही असोगो॥७!! कंटय हिट्ठा हुत्ता, ठायंति अवढियं च नहरोमं, पंचेव इंदियत्था, मणोरमा हुति छप्पिरिऊ ॥ ८॥ गंधोदगं च वासं, चासं कुमुमाण पंचवण्णाणं, सउणा पयाहिणगई, पवणणुक्लो नमंति दुमा ॥ ९॥ भवणवद-वाणमंतर-जोइसवासी-विमाणवासी-अ, चिट्ठति समोसरणे, जहण्गय कोडिमित्तं तु ॥१०॥ इंतेहिं जंतेहिं, चोहिनि- मित्र संसयत्थीहि, अविरहियं देवेहि निणययमूलं सयाकालं ॥११॥ चहा जम्मप्पभिइ, इकारस कम्मसंखए जाए, नव दस य देव जणिए चउतिसं अइएस वंदे ॥ १२॥ घउतीसजिणाइसया एए मे वपिणा समासेणं, दितु मम जिणवसमा सुअनाणं बोहिलामं च ॥ १३ ॥ पत्रिशजिनवाणीगुणस्तवनम् ) जोअणगमद्धमागह सबमासाणुवाइणि वाणिं, पणतीसपवरगुणकि- चणेण धुणिमो जिगंदाणं ॥ १॥ मेहमणोहरसुगुहिरनिम्धोसं १ वंस-
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २६९
धंससोहिल्लं, २ मुहुमुहुरमालओसियपमुहरायरायं भवविरायं ३ ॥२॥
सक्यपमुह्सलक्खण, सकारजुअप्युडक्खरपयाई, गामाण......चउ-
वचारपरं ४ उदातसरं ५ ॥ ३ ॥ पडिरवपूरिअगयणंइ ६ सरलणु-
कूलत्तओ सुदक्खिवणं ७ इअ सत्त सद्दअइसय........सामि जिण-
वयणं ॥ ४ ॥ तह अत्थासय अडवीसअइसयं अप्पगंथसुमहत्थं १
अबाहयाभिधेयं पुवावरचक्क अविरोहा ॥ ५॥ सिद्धत्थसूइसिद्ध सिह
व............उत्तमाविक्खं ३ परदूसणाविसयओ अवहरिनुचराइसया
४॥६॥ संसय असंभवेणा संदिद्धं ५ सोअजणमणाइहरं ६ देस-
द्धाइ पत्थावुचिरं ७ उदिअत्थतत्परं ८ ॥ ७ ॥ अविकिण्णपसरि-
अंमसंदिद्ध धिकारातिवित्थरविओगा वरसबंधपसरणा ९ मिहपइवकाइ
सकंखं १०॥ ८॥ अइमिद्धमहुरिमगुणं सुहियं सबेसि
घयगुडाइब
११ नियविसए कयसोआरलोअवित्थिण्णअच्छरिअं ॥ ९ ॥ जमगा-
इगुणविसेसो अतुच्छ अभिधेअओ बुदारत्थं अप्पयपरभूमि अणुसार
देसणाइहिं अभिजायं ॥ १०॥ तिहुअणपरसंसणिज्जं परममावेहयं च
अविलंब, १७ सथुइपरनिंदरहिअं १८ धम्मस्थभासपडिबद्धं ॥११॥
लिंगवयणकालतिए परुक्खपच्चक्खवकारगाज्झत्थो, उवणयवयणचउक्के
अविपरीअत्थं अतुरिअं च ॥१२॥ पत्थिअवस्थिसरूवा वण्णणाणेगजाइ
मुविचितं २२ चत्तपयवण्णवकं २३ वयणंतरओ विसेसजुआं ॥१३॥
अभिधेएमणभंती अविन्भमोणादरो अविक्खेवो, किलिकिंचिय मिच्छा-
भय रोसायसुजुगवमसइकरणं च ॥ १४ ॥ इअ विभामाइमण-
दोसविरहिअं सत्साहसोवेअं आ अत्थसिद्धिमच्छिन्नहेउमायासरहिअं
२६ च ।। १५ ॥ इअ सवयणपणतीसइसयसाहिअवओ जियो
थुणिओ, सद्धम्मकित्तिविजागंदयरं..
हेडगिरं ॥ १६॥
२७० वीरस्तुतिः। जियमोहमहावीरो चरमो 'तित्थंकरो' 'महावीरो' । असमसमो असमसमो निरंतरं कुणउ कल्लाणं ॥१॥ श्रीवीरसप्तविंशतिभवस्तोत्रम् तिसलासिद्धत्थसुअंसीहक सत्तहत्य कणयनिह, भवसत्तावीसकह- णेणं, बद्धमाणं भुणामि जिणं || नयसारो सुग्गामे पढमे १ वीए भवे पहु ! सुहम्मे २ । तइए मरिइ तिवंडी ३, विणिआइ चउत्थए भे ४॥ कुल्लागि कोसिअदिओ, पंचमि ५ संसारचउरछभवें ६ । थूणाइ पूसमिचो सचमि ७ सोम्मि अठ्ठमए ८॥ नवमे अगिजोओ, बेइअगामम्मि ९ दसमि ईसाणे १० । इगदसमि अग्गिभूइ, मंदिरि ११ बारसमि सणकुमारो १२ ।। तेरसमे १३ सेअविआ, भारदाओ महिंद चउदसमे १४ ॥ रायगिहि थावरदिओ, पनरसमे १५, सोलसे बंभे १६॥रायगिहि विस्समूई, सतरसि १७ अटारसे महासुको १८ १गुण- 'वीसे पोअणपुरि, तिविट्ठ १९ वीसे तमतमाए २० ॥ यहु । इगवीसे सीहो, २१ पंकाइ दुवोसमम्मि २२ तेवीसे । मुआपुरि पिअमिलो चकी २३, सोहम्मि चउवीसे २१॥ पणवीसे छत्तग्गाह, नंदणो २५ पाणयग्मि छबीसे २६ । खत्रियकुंडग्गामे, सचावीसे महावीरो २७ ॥ मगसिरवइदसमि वयं कचिभमापसि सि सिआसाढे, छडि चुइ विसाहदसमी नाणु भको चिततेरसिए । इअसिरिवीरजिणंदो थुणिओ भनिन्भरनामिरदेविंदो, वरधम्मकितिविद्धिं विजाणं देउ मह सिद्धि ।। थीमहावीरस्तोत्रम् जहन्जा समणो भयवं, महावीरे जिणुतमे । लोगनाथे सयंबुद्ध, लोगंतिअविवाहिए ॥१॥ वच्छर दिण्णदाणोहे संपूरियजिणासए । नाणत्यसमाउत्ते, पुत्ते सिद्धत्यराइणो ॥ २॥ विचा रजं च रहूंच, -- संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २७१ पुरं अंतेउरं तहा । निक्खमित्ता अगाराओ, पवइए अणगारियं ॥३॥ परीसहाण नो मीए, मेरवाण समासमे। पंचहा समिए गुत्ते, बंभयारी अकिंचणे ॥ ४॥ निम्ममे निरहंकारे, अकोहे माणवजिए । अमाए लोभनिम्मुक्को, पसंते छिन्नबंधणे ॥ ५ ॥ पुक्खरं व अलेवे अ, संखो इव निरंजणे । जीवे वा अप्पडिग्घाए, गयणं व निरासए ॥ ६॥ वाएवा अपडिबद्धे, कुम्मो वा गुचईदिए । विप्पमुको विहंगुष, खग्गिसिंगवएगगे ॥ ७ ॥ भारंडे वाऽपमते य, वसहेवा जायथामए । कुंजरो इव सोंडीरे, सिंहो वा दुरिस्सए ॥ ८॥ सागरो इव गंभीरे, चंदो वा सोमलेसए । सूरो वा दित्ततेउल्ले, हेमं वा जायरूवए ॥९॥ सबंसहे धरित्ति घ, सायरिंदुध सच्छहे । सुगु हुअहुआसब, जलमाणे य तेयसा ॥ १० ॥ वासी चंदणकप्पे य, समाणे लेटुकंचणे । समे पूयावमाणेसु, समे मुक्खे भवे तहा ॥ ११ ॥ नाणेणं दसणेणं च, चरिणयणुत्तरे । आलएणं विहारेणं, मद्दवेणज्जवेण य ॥ १२ ॥ लाघवेणं च खंतीए, गुत्तीमुत्ती अणुत्तरे । संजमेण तवेणं च, संवरेण मणुतरे ॥ १३ ॥ अणेगगुणमयाइण्णे, धम्मसुक्काण झायए । घाइ- क्खएण संजाए, अणंतवरकेवली ॥ १४ ॥ वीयराएय निगंथे, सबन्नू सबसणे । देविंददाणविंदेहि, निधनियमहामहे ॥ १५ ॥ सबभा- साणुगाए य, भासाए सघसंसए। जुगवं सबजीवाणं, छिदिङ भिंचगोयरे ॥१६॥ हिए सुहे अ निस्सेसकारए पाबपामिणं । महत्वयाणि पंचेव, पण्णविता सभावणे ॥ १७ ॥ संसारसायरे बुडतुसंताणतारए । जाणध देसियं तित्थं, संपत्ते पंचमि गई ॥ १८॥ सेसिवे आलये निचे, अरुये अयरामरे । कम्मप्पवंचनिम्मुक्के, जए.वीरे जए जिणे ॥ १९ ॥ से जिणे वद्धमाणे य, महावीरे महायसे । असंखदुक्ख• ।
२७२ वीरस्तुतिः । खिण्णाणं, अम्हाणं देउ निबुई ॥ २० ॥ इअ परमपमोआ संधुओ 'वीरनाहो,, प्रमपसमदाणा देउ तुलत्तणं मे । असममुहदुहेसुं सम्ग- सिद्धिमवेडं, कणयकयवरेसुं सत्तमित्सु वा वि ॥ २१ ॥". .. पयडीव सइ पहाण, सीसेहिं जिणेसराण सुगुरूर्ण । वीरजिणथुयं एवं, पढउ कयं अभयसूरीहिं ॥ २२ ॥ परिशिष्ट नं० ३-धीरस्तुति:-संस्कृतस्तोत्रविभागे नमदमरशिरोरुहस्रतसामोदनिर्निद्रमन्दारमालारजोरञ्जिताहे धरित्री- कृतावन वरतम संगमो दारतारोदितानानाविलीलापदेहेक्षितामोहि- ताक्षो भवान् । मम वितरतु वीर निर्वाणशर्माणि जातावतारो धरा- धीशसिद्धार्थधाम्नि क्षमालंकृता, वनवरतमसङ्गमोदारतारोदितानङ्गना- ाव लीलापदे हे क्षितामो हिताक्षो भवान् ॥१॥ समवसरणमत्र यस्याः स्फुरत्केतुचक्रानकानेकपनेन्दुरुस्चामरोत्सर्पिसालत्रयी, सदवनमदशोक- पृथ्वीक्षणप्रायशोभातपत्रप्रभागुवराराट् परेताहितारोचितम् । भवितरतु समीहितं सार्हता संहतिर्भक्तिभाजां भवाम्भोधिसम्भ्रान्तभव्यावली सेवि- ता-सदवनमदशोकपृथ्वीक्षणमा यशोभातपत्रप्रभागुबराराट्परेताहितारो- चितम् ॥२॥ परमततिमिरोग्रभानुपभा भूरिभंगेर्गभीरा भृशं विश्ववये निकारये विती-तरा, महति मतिमते हि ते शस्यमानस्य वासं सदा तन्वतीतापदानन्दधानस्य सामानिनः । जननमृतितरङ्गनिप्पारसंसारनी. राकरान्तर्निमञजनोचारनौ रतीतीर्थकृत, . महति मतिमतेहितेशस्य मानस्य वा संसदातन्वती तापदानं दधानस्य सा मानि नः ॥ ३॥ संरभसनतनाकिनारीजनोरोजपीठीलठत्चारहारस्फुरदश्मिसारक्रमाम्भोत्रह, परमवसुतरङ्गजा . रावसन्नाशिताराति. भाराजिते भासिनी हारतारा .
सस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २७३ बलक्षेमदा । क्षणरुचिरुचिरोरुचश्चत्सटासकटोत्कृष्टकण्ठोद्भटे सस्थिते भव्यरोक लमम्बाम्बिके, परमव सुतरा गजारावसन्ना शितारातिमा राजिते भासिनीहारतारावलक्षेऽमदा ॥ ४ ॥ धीरस्तव त्रिजगदीक्षण ! केसरिलक्षण ! क्षणमपि प्रभुवीर ! मनोगिरौ । गुणगणान्मम मास विरज्यतामुदयिता दयितादयि तावकात् ॥१॥ भृशमदम्रमदभ्रमदभ्रमप्रथमन सुमन सुमन स्तुत , असुमत सुमत सुमतोऽवदातपरम परमश्चरमो जिन चलनकोटिविघट्टनचञ्चलीकृतसुराचल ! वीर | जगद्गुरो! त्रिभुवनाशिवनाशविधौ जिनप्रभवते भवते भगवन् ! नम ॥१॥ जयति य सुरसङ्गममानहृत् , जगति वीरजिनो जगतीसुहृत् । भवतु भीतिहरो मम सर्वदा, स शरण शरण गुणसम्पदाम् ॥१॥ महानन्दशुद्धाश्रित देवदेव, महीनाथसिद्धार्थपुत्र पवित्रम् । यथाकामित दत्तवार्षिक्यदान, त्रिकाल स्तुवे श्रीजिन वर्धमानम् ।। चतुष्पष्ठीदेवेन्द्रयोगीन्द्रवन्ध, सुधाशालिसशुद्धवाक्य वरेण्यम् । दयासागर शुद्धसन्मार्गयान, त्रिकाल स्तुवे श्रीजिन वर्धमानम् ॥ अनन्तोचरज्ञानचारित्रलीन, जरारोगसम्मोहसन्तापहीनम् । । क्षणोद्भूतनिर्मूलमायावितान, त्रिकाल स्तुवे श्रीजिन वर्धमानम् ।। शमसादपाथोधिससर्गसक, सदा कर्ममर्मप्रपञ्चप्रमुक्तम् । प्रचण्डप्रतापेन भावत्समान, त्रिकाल स्तुवे श्रीजिन वर्धमानम् ॥ मनोहारिकल्याणवर्ण विशाल, विदीर्णान्तरारिप्रणालिं कृपालम् । । गमीर विशालैर्गुणैर्वर्धमान, त्रिकाल स्तुवे श्रीजिन वर्धमानम् ॥ वीर १८ २७४ वीरस्तुतिः।' : जगजीवसन्दोहजीवादिभूतं, भवभ्रान्तिरिक्तं नमत्राकिमूतम् ।' लसत्वर्गिनिर्धाणलक्ष्नीनिदान, त्रिकालं स्तुवे श्रीजिनं वर्धमानन् । इत्यं भक्तिवशेन मुग्धमतिना श्रीवर्धमानः स्तुतः, पोयदेहपति- प्रकान्त्रिकलितः श्रीज्ञातपुत्रो जिनः । याचे नैव कलत्रपुत्रविभवं नो काममोगनियं, किन्वेकं परमोत्तमं शिवपदं श्रीबालचन्द्रार्चितम् ।। (धीरजिनस्तवनम्) विश्वनीद्ध ! रजश्विदे गरिमदत्यादर्पनाशे क्षम, सद्वाचं स्तुवयाथवं परिहरन् मासूर्य ! दु खक्षमाम् । निस्सन्दं तपनद्वमुं दुरितसूदारिखथ । वीर । स्थिर, रम्यत्रीविरसोऽसकामनिकृति मद्राव्यं शकरम् ॥ १ ॥ [चतुर्गनमारलं चक्रम् ] तनुते यन्नांत जम्भाजिंद्रार्जा मादिता दुतम् तं स्तुवे वीतचन्द्राजिभयं भावेन भास्वता ॥२॥ [मुशलम् ) वतयास्तनणां मुक्त्यै, या नीरुतनवे नता । तारमामार तपास स पाताक्षर रक्ष ताः॥३॥ [शूलम् ] ततकष्ट्रावलीलाइलीलाय श्रीवा रताः । | ताररावनुतौ वीर खीद्धाम सुरास्तव ॥ ४ ॥ [शङ्खः तज्ञासदमलेक्ष्वाकुविंशजेयुः शर्मिलव । वरेण्यानन विश्वेश, शरणं शुशुखेच्छवः ॥५॥ [श्रीकरी] तशमीश विशस्त्वालमवदन्त घनारख । वधवट्या वन्हिवद्यो, परिवसि चशी वर. ॥ ६॥ [चामरम् ] तरणे निररूटामचमात्य वरणीदरः । रसिकस्तव भूयार्स, सेक्नेऽनल्पमानमः ॥ ७॥' हलम् ] 1. 1
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता
तत्यजेऽत्र तकाश्चण्डपायमिन्द्रस्तुताहस ।
सर्वदोपैतत्क्षयाशां, शान्ताघ ददतो विशाम् ॥ ८॥ [भल्लम् ]
तरीवाचरसि ज्ञानोदारनिःशेषभूस्पृशाम् ।
शान्तितुष्टिकरापारभवाब्धौ विश्ववन्दित ॥ ९॥ धनुः]
तम्यतिक्रम्यतेऽत्यन्तमोहदुःखमयीशितः ।
तवेन सेवयाऽवश्यं, भवैः स्थिरशिवस्थितः ॥१०॥ [शम्यां खन्नः]
तमहं विनमामीतवन्द्र वीर सतां मत ।
तपो यस्त्वं व्यधा विश्ववित्तं वीतरिपोऽतमः ॥ ११॥ [शक्तिः]
तपः शमरमारामतर शगुणसत्तम ।
मम गुप्तश्रिताधीश! मरणक्लेशहृदिश ॥ १२ ॥ [छत्रम् ]
तविपे लसत्यमोहाशय चारुरुचायशः।
शक्राली वन्नतेर्ज्ञानभासुराऽपपरा सुमी. ॥ १३ ॥ [स्थपदम् ]
तवीत्यवीतसाराज्ञा प्राणिना प्रास्तमीः शुभा ।
भाराशेऽशेषभावारीन् शिवदा तव रंहसा ॥ १४॥ पूर्णकलशा ]
तत्वसार तरसा ना त्वयि राज्य दधीरसा।
साराद्भुतेऽमोहधीरा रुज्यते वीर मोदतः ॥ १५॥ [अर्धभ्रमः ]
तरसाऽस्त्रमोहत्वेत तत्वेह प्रशमान्वित ।
तन्विमान्यवनीतात ततानीटाच्यसारत ॥ १६॥ [कमलम् ]
तवाही वन्दते साऽनुकम्प यः साऽय भावतः ।
तस्य नानागुणस्याऽन्यो, नम्यो नोदितैनसः ॥ १७ ॥ [शर.]
तत्परः सतत शिश्रीयामि त्वां दारितांहसम् ।
। सम्पदादाऽपसंसार, रसाऽसन्तमसं मत ॥ १८॥ [निचलम् ]
वीरस्तुतिः। नमाऽनाश्रितशर्मासु, नेहमन्ददयान्वित । तथा खत्तः सुरेश त्वं, केतुबोधिधियं हितः ॥ १९ ॥ वज्रम्] योऽष्टादशचित्रचकविमलं वीर ! खवं सश्रियं, भक्त्यैवं कुलमण्डनोऽतत महाज्ञानातनुश्रीशुभ ! मुक्तश्रीयुत्तचन्द्रशेखरगुरुमाज्यप्रसादादगु, वं वातात वरः स शान्ततम श भासा ततः सन्ततम् ॥२०॥ [परिधिकाव्यम् चक्राऽयोमुखशूलशंखसहिते सुश्रीकरीचामरे, सौर भल्लशरासने असिलता शत्स्यातपत्रे रथः । कुम्भार्थअनपङ्कजानि च शरस्तस्मात् त्रिशूलाशनी, चित्ररेभिरभिष्टुतः शुभधियों वीर । त्वमेधि थिये ॥ २१ ॥ इति वीरस्तवः (अथ वीरस्तवनम्) चित्रैः स्तोप्ये जिनं वीरं, चित्रकृत् चरितं मुदा । प्रतिलोमानुलोमाद्यैः, खन्नाद्यैश्वातिचारुभि ॥१॥ वन्देऽमन्ददमं देवं, यः शमाय यमाशय. ! नायेनप धना येनापाकृता ममताकृपा ॥ २ ॥ [प्रतिलोमानुलोमपाद.] दासता तव मागारा, न यायमवामस । समतामययावेन रागाभावतता सदा ॥ ३॥ [अनुलोममतिलोम.] वरदानवरादिन्द न्वदिरावनदारख । याज्यदेव भयान्यास सन्याया मवदेज्यया अर्धप्रतिलोमानुलोमः] - संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २७ श्रीद वीर विरेभ त्वं दमिताक्ष गताऽशुभ । चीभाक्षमारम्भितारे रक्ष मां सदरं गवि ॥५॥ [अर्धनमः] गीरता जनता रन्हे ! धीरतास्थिरतारसा । सारतारश्रुताऽवन्ध्या, सुरताजनतावकी ॥ ६॥ [मुरजबन्धः ] ये पश्यन्ति तवेहास्यारविन्दं भक्तिबन्धुराः । न पतंति भवे शस्यास्ते विदो भगवानराः ॥ ७॥ गोमूत्रिका] नमासाररसामान मारिताक्षक्षतारिना। सातामयायामतासारक्षया में महाक्षरः ॥८॥ [ सर्वतोभद्रः] तिर्यगूनरसुराकीर्णा भासतेननते समा। त्वन्माहास्यात्कृताश्चर्य या श्रिता ततता श्रिया ॥९॥ [ पदम् ] रेगौराकोरुगीगङ्गगौरीगुरुररोगरुक् । गोरंगागाररागारिरैरीरोरै गुरुं गिरिम् ॥ १० ॥ [ यक्षरः] लाललालोललीलालं ततता ततिता तते । ममाममामममुमाऽननानेनोननानन ॥ ११ ॥ [एकाक्षरपादः ] कककिकाकर्फकोकः केकाकोकककेकिकम् । कककाकुककोकैकककुः कौकककांककाम् ॥ १२ ॥ [ एकाक्षरः] मरुभूमौ तप ऋताविव चारुसरोवरम् ।। कुतः सुकृतहीनानां सुलभं तव शासनम् ॥१३॥ युग्मं [असयोगाक्षरः] सारणिः पुण्यवन्याया ज्यायमौक्तिकक्तिक (1) कामधेनुनयविदां, वोघोल्लासनसालसा ॥ १४ ॥ सारं साद्वादमुद्रायास्त्रिपदी भवतोऽजसा । सा मे सुहृदि कान्तैकाखिलेन रहितैनसा ॥ १५॥ द्विाभ्यां खगः] वीरस्तुतिः। . श्रीसिद्धार्थकुलव्योमदिवाकर ! निरञ्जन ! • न के इतकान्तवादिमतं तीर्थ तव श्रिताः ॥ १६ ॥ { मुशलम् ] का या त्वयि भव्याली धन्या पत्तेस चेतसा। मवा तामरसाकाममकासा गङ्गासागरम् ॥ १७॥ [त्रिशूलम् ] त्रिशलाकुक्षिपाथोजराजहंस ! जगद्विभो ! भोगास्तृणमिव त्यक्तास्त्वया मोक्षदिदृक्षया ॥ १८॥ [हलम् ] मुरासुरनरस्तुभ्यं, नमस्यन्ति जिनोत्तम ! मनःप्रसादसन्दर्भ (1) दलिताऽशुभवासनाः ॥ १९ ॥ (धनुः) कथं कर्तुं जनो मोहव्यपोहमहह क्षमः । मनसा सादरं यस्त्वां, न स्वौति तिमिरापहम् ॥ २० ॥ (शरः) बाल्ये मेशिरः कम्पसम्पत्प्रथितविक्रमः। मनोजाऽनोकडव्याल! मम खामी भवाऽऽभवम् ॥२१॥ (शक्ति) मानितायक्रमामार रमामाकन्दमाधव ! वधमार्गे ममाकास सकामा धीः प्रतानिमा ||२२॥ अष्टदलकमलम् ) वन्ययान । धनखान ! ध्यानमौनकनद्धन! ज्ञानस्थान! जिन ! श्रीन! धनमेन.'खनस'नः ॥ २३ ॥ [पोडशदलकमलम् । जय हेमवपुः श्रीक ! जगन्मोहापहारक ! जराहिवानसिंहा! जन्मनीरधिनाविक ॥२४॥ [स्तुत्यनामगर्म वीजपूरम् ] तुभ्यं नमोऽजुलनयमितिकाय भीतिवन्यामु पाव! सुरस्तुत ! चोर! नेतः । विशलवाविपुलमण्डप! हेमरूप! कल्याणधीकरणदक्ष नतेदमीन ॥ २५॥ [हारवन्धः] - - संस्कृनटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता २७९ :, भमाकृत्यपथो जिनेश्वरवरो भव्यान्जमित्रः क्रिया-..; दिष्टं तत्वविगानदोषरहितैः सूक्तैः श्रेवतर्पणः ।.. जन्माचिन्त्यसुखप्रदः सुरचितारिष्टक्षयो वः सदा, दाता शोभनवादिधीः कजदलायामेक्षणः संविदा ॥२६॥ [कविनामगुप्तः । श्रीमद्धामसमप्रविग्रह मया चित्रस्तवेनाऽमुना, नूतस्त्वं पुरुहूतपूजित ! विमो! सद्य प्रसधैधि माम् । ख्यातज्ञातकुलावतंस ! सकलत्रैलोक्यकतान्तर- स्फारक्रूरतरज्वरस्मरतरत्संरब्धरक्षारतः ॥ २७ ॥ वीरस्तवः मुक्तोमन्दोदयो/ शमद कलकलाऽऽसातमोहारिदोऽश्री- मुक्तोमन्दोदयोईशि मदकलकलासाऽतमो हारिदोधीः। नीरागो वर्षमानाऽयमहजयभयासामहीनः सुधीरा- नीरागो वर्धमानाऽयमहजयभया साम हीनः सुधीरा ॥ प्रवरकुण्डनराधिपनन्दनं, वरमहावतपञ्चविकाशकम् । कृतसुराधिपमोक्षमहोत्सवं, चरमतीर्थपति सुतरां स्तुवे ॥ १॥ कणयसमसरीरं मोहमल्लेगवीरं, दुरियरयसमीरं पावदावग्गिनीरम् । मुगहियभवतीरं लोअलंकारहीरं, पणमह सिरिवीरं मेरुसेलेसधीरम् ।। त्रिदशविहतमानं सप्तहस्तांगमानं, दलितमदनमान सद्गुणैवर्धमानम् । अनवरतममानं क्रोधमत्यस्यमानं, जिनवरमसमानं संस्तुवे.वर्धमानम् ॥ , - २८० वीरस्तुतिः। भक्तितो मतिजुषो भजन्ति यं, वर्धमानमहमानमामि तम् । जन्तुजाततमसो निशातनं, वर्धमानमहमानमामितम् ॥ श्रीवर्धमान नतमानमशोध यन्ति, खैरं यशासि भुवन तव शोधयन्ति । बुद्ध्या चकोरनिकरा शतशो धयन्ति, चन्द्र द्युतामपरदेवयशोधयन्ति । मोहादतीतस्य तवेश! वीर! सुधीर! सौभाग्यमुदप्रमायात् । मुत्यंगनालोमन ! यः स्तुते स, सुधीरसौ भाग्यमुदममायात् ॥१॥ (धीरस्य सप्तविंशतिभवोत्कीर्तनस्तवतम् ) पूर्व त्वं नयसारभूपति १ र सौधर्मवृन्दारक २ व्युत्वा नाम मरीचि ३ स्त्र सुमनाः खेपञ्चमे ४ कौशिकः । ५ देवः प्राग्दिवि ६ पुष्पमित्र ७ इति यः सौधर्मकल्पे सुरो ८ ऽमियोत ९ सिदशो द्वितीयतमिपे १० विप्रोऽमिभूत्याव्हयः ।।११ गीर्वाणतु सन्तुमारव- विपे १२ विधामणी मतो, भारद्वाजगृही १३ चतुर्धतविगे लेखो १४ द्विज.स्थावरः। १५ नाकी पचमके मुरालयवरे १६ श्रीविश्व- भूतिपः, १७ शुक्रे निर्जरकुंजरो १८ न भरते विष्णुखिपृष्ठोऽ- भवः १९॥ सप्तम्या भुवि नारको २० मृगपति २१ स्तुर्यावनौ नारकी, २२ चक्री च प्रियमित्रक २३ सुरवर. शुक्र २४ नृपो नन्दनः २५/ श्रीपुप्पोत्तरके विमानकवरे श्रीमाणततर्गगेनाकी २६ कीर्तितसप्तविंश- तिभयो भूयाः स वीरः ! श्रिये ॥ (मिभिर्विशेषकम्) (शासनाधीशवर्द्धमानजिनस्तवनम् ) श्रीत्रशल्य शिवशुद्धबापकलो भवन्तं जिन ! यो जनाए । महा- मतिरोपितसर्वपापलतो न वकोऽपि नरः शशाप ॥१॥ विलासयस संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता २८१ मनस्यपापजनिर्भवान् स्वीयवचांस्युवाप । यतिप्रियः क्षितविश्वतापशिलं वचः शीततमं ललाप ॥ २ ॥ शुभा भवदृष्टिरितानुतापहेला जनं भगवन्नवाप ।. मत्ताशयः कोऽपि न हि प्रलापविपचिपचिस्तमरिस्तताप ॥ ३॥ जज्ञे भवान् वीर ! लसत्कलाप ! यस्याशये प्रीणितसत्कलाप । कृत्येप्वनैपद्भिवदीयलापतिग्मद्युतिस्तं प्रणताचलाप! ॥ ४ ॥ इति मुदितमनस्को मूर्धगाचार्यनामाऽक्षरकमलनिवन्धैर्वन्धुरैः संस्तुतो यः। कमलविजयसङ्ख्यावद्विनेयाणुरेणी, स भवतु मयि देवो दचदृष्टिः सतुष्टिः ।। ५॥ इति पोडशदलकमलवन्धवन्धुरं श्रीशासनाधी- शवर्धमानजिनस्तवनम् ॥ . ' अनवरतममरनरवरशतनतपदकमलयमल ! मलदलन ! अनपशद- चरणचयमय ! ततरभरधरणधवल ! जय ॥१॥ जयसरसवचनवश- जन ! समधन ! सदवयवसरलकरचरण! जलजदलनयन ! गतमल! शशधरवरवदन! गजगमन ॥२॥ जय सदय ! सनय ! भवदवकवलन शिमन ] नवजलदसमयसम ! अचलबल ! सकलभयहर! शमदमल: यभवन! जगदवन ! ॥ ३॥ अदमतमकरणगजगणखरतरखरनखर- नखरभवधरण! अवतमसमसममधमयमपहर मम समयतपनपद ! ॥४॥ हवसततभवजगमचर मत कर लसदभय दहन कमनग! अपनय मम भवरसमरमशरणजनशरण ! गतमरण! ॥ ५॥ असदय- वशभवदवकरगतरसदलपटलहरणखरपवन ! मम वचन्मनसमहमह- खतर कनकनगवदतरल ॥ ६ ॥ जनमथनमदनधनमदफणधरगरल- दरदमनपतगवर । हतशकलमव मम जननजलगवलवणकगवदमलय पानमदमलनयनकजवनदशशतकरपहलगहनभवदहन ! अकरणगम-
२८२
(-
वीरस्तुति
परवलरणजयभट! जय परमपदसदन ! ॥८॥ इति भक्तिरचित-विमला-
क्षरमालया महावीर ! शुभभावदेवरिस्तुत ! केवलमक्षरं देहि ॥९॥
लया जितान्यदेवर्द्धिर्वर्धमानप्रेभावतः । खयि देवाधिदेवत्वं वर्द्ध-
मान! प्रमावतः ॥ १॥ जातलक्ष्मी नमो हत, वर्द्धमान ! प्रभो!
दयाम् । देहिमद्य' विधेहि वं पर्द्धमानप्रमोदयाम् ॥२॥ वीरो
जिनपतिः पातु, तन्वानः काञ्चनश्रियम् । विभत्तनेषु निस्सीर्मा तन्वा न:
काश्चन श्रियम् ॥ ३॥ वरिषस्थति यः श्रीमन्महावीरं महोदयम् ।
सोऽभुते जितसम्मोहमहावीरं महोदयम् ॥ ४ ॥
-
धीवीरजिनस्तवनम्
जय श्रीसर्वसिद्धार्थ ! श्रीवीर शावनन्दन! मुमेरुधीर । गम्भीर !
महावीर ! जिनेश्वरः। ॥१॥ योऽप्रमेयप्रमाणोऽपि, सप्तहलप्रमोपित',
पूर्णेन्दुवर्ण्यवर्णोऽपि स्वर्णपर्णसवर्णकः। ॥ २ ॥ सदृशं कौशिक शके,
स च क्रमसंस्कृशि ! पीयूपवृष्टिसया यं, दृष्टा दिया विदुधाः
॥ ३॥ विष्टपत्रितयोत्सगरजदुत्तु कीर्तिना, सनाथ येन नाथेन, विश्वं
विश्वम्भरातलम् ॥ ४ ॥ यसै चके नमः सेवाहवामोत्सुकमानसः ।
धीराय गतवैराय, मामासुरेश्वरैः ।। ५ ।। यमाहेषादयो दोपाः,
क्षिप्रं क्षीणाः क्षमासनेः। दोषा पूपमयूखेभ्य, इव हर्यक्षलक्षमात्
॥६॥ यदेहातिसन्दोहसन्देहितवपुर्दधौ, रविः खयोतपोतयुत्याडम्बर-
बिडम्बनाम् ॥ ७॥ भविनां यत्र विचथे, स्यु(द्धिसिद्धपः 1 वर्ध-
मानमानौमि, वर्धमानमुभाषन. ॥ ८॥ इति पते वास्तवं पठति वीर!
जिनचन्द्र जातोमा: यात्यपवर्ग स द्रुतमससंगरियाजयी ॥९॥
संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरंभापान्तरसहिता २८३ सकलकमलंदलकरपदनयन ! प्रहतमदनमद ! भवभयहरण ! सत- तममरनरनतपदकमल ! जय जय गतमद ! मदकूलगमन! ॥ १ अमलकनकनगवर ! गतरमण ! क्षतजननमरण ! शमरससदन! श्रमण: कमलवनतपन ! गतभव ! भवभयमपहर मम जनमहन ॥२॥अभ. यद ! भवदरजलघरपवन ! सबलमदनवनदहनजलधर ! व्यपगतमद ! शशधरवर वदन ! जगदघहर ! जय ततनयसमय ! ॥३॥ तरलकरण- हयवरदमनकर! कनककजनवकगमन! वरवचः ! प्रथमपरमपदमप- दर धवलध्वज! घनघनवररव ! जनशरण! ॥ ४ ॥ परमपद- रमण! कमनकजरद! शशधरकरहरनगधवलयशः परमतकजगज! सकलजनमनः फलकरलसदमरनग! रचय शम् ॥ ५॥ 'सिरिवद्धमाण सिरिवद्धमाण सिरिवद्धमाण जिणचंद। परमाणव पर- माणव परमाणवर्णसि वेदिज्जा ॥ १ ॥ सुहसायर सुहसायर सुहसायर भवसमूहनिम्महण! जयणायग जयणायग जयनायगई निवारिज्जा ॥२॥ रयणायर रयणायर रयणायर नाणदंसणसिरीणं, सुरमोहण सुरमोहण सुरमोहणयं पयं कुज्जा, ॥ ३ ॥ सरणागय सरणागय सराणागय वज- पंजरपइ, कमलासण कमलासण कमलासण सरिसमहहुन्जा ॥ ४ ॥ सबविजय सबविजय सबविजय थुणियगरिठ्ठपहो, महसययं महसययं महसययं सिवपयं नयसु ॥ ५॥ , 'परिशिष्ट नं०४-हिन्दी कविता विभाग (महावीर प्रभाती) श्रीमहावीरजी कृपा करो अब, में भाधीन तुम्हारा टेका। सिद्धार्थराजा के नन्दन, त्रिशला अगज प्याय! कंचनवरणी क्यया सोहे, रहे जगत से न्यारा t संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २८५ आयंबिल उनतीस उदार ॥६॥ नित भोजन वीरजीए नहीं कयो, न लियो चौथो आहार। थोडो तप वेलो कियो, सगलो तप चौविहार ॥ ७॥ मनुष्य पशु देवे जे दिया,. सद्या परिषद ते आप, दोय पी ,उपरांत नींद नवी . लही, पट् दोय वेरे पास ॥ ८॥ वीरजी कीधा तीनसे पारणा, अने वली उनपंचास, इण .बले स्वामी केवल पामियो, विचसा देश मंझार ॥९॥ बारा परिषद नर नारी सोभले, वीर तणो समास, शूरवीरोए तप कियो, पद् ऋतु मन हुलास ॥१०॥ गणधर ग्यारा- जाणिए, चवदा सहस्र अणगार, सहस्र छतीस वीरजी रे साध्वियां, ते प्रणमूं मुखकार: ॥११॥ लाख श्रावक पडिमाधरें, ऊपर उनसठ हजार, तीन लाख तेहनी श्राविका, अपुनी सहस अठार ॥ १२॥ धन्य त्रिशलादेवी मातने, धन्य सिद्धार्थ राय, हातनन्दन धन्य जन्मियां, नाम लिया जाय पाप ॥१३॥ गौतम आदिक सातसो केवली, अजियां चउदासौ सार, निजकर दीक्षित एटला पहुचां मुकि मंशार ॥ ४॥ (कलश) इम वीर जिनवर सकल मुखकर, एका दुकर तपकरी। संयम पाली कर्म गाली खामी शिवरमणी वरी। सेवक यूं जपे वीर जिनवर। चरण सेऊ तुम तणां । संसार सागर पडत राखो, टालो खामिन् ! दुसमनां ॥ १५॥ (दीवाली) पूर्व दिशामे हुई पावापुरी, धन्य धान्य ऋद्धि समृद्धिमुं भरी, हस्ती- पाल बसे विहां भूपाली, वीर मुक्ति विराजे दिन दिवाली ॥ गौतमने सेवाकी मन- मानी, एक रातमें हुए केवल ज्ञानी, चौदाण्जु रह्या भाली ॥,वीर॥१॥ अठारह राय हुआ भक्ता, दोय दोय पोसा कीना लगता । वीर सन्मुख, रया निहाली ॥ वीर० ॥ २ ॥ दिन दोयरो संथारो सीझो, सोला पहर लगे उपदेश सीधो । प्रभु मुक्कि गया कर्मने बाली । वीर० ॥३॥ सातसे चेला ने चवदासो. चली, जाने मुक्ति महलमें दिया.मेली, ज्यारा कोरा बीज दिया वाली, वीर० ॥४॥ प्रभु तीसवर्षवये संयम लीधो, निज.आत्म कार्यने सिद्धकीयो, वर्ष बयालिस दीक्षा पाली, वीर० ॥५॥ एक राणी वरी हुई एक बेटी, जिके मुक्तिगया दुख दिया,मेटी, जामाता हुओ ज्यारो जमाली, वीर० ॥u. प्रभुने एक बहन भने एक भाई, जिके खर्गे गया समकित पाई। श्रावकना २८६ वीरस्तुतिः। मत शुद्ध पाठी, वीर०॥४॥ षमदतने देवानन्दा माता, नयां निरखी पावे साता, दोऊ मुक्तिगए दुःख दिया टाली, वीर० ॥ ८॥ सिदाराज निशला राणी, साथे संथारो कियो समता आणी, १२ वें देवलोके उपज्या चाली, वीर०॥९॥ जिण रातमें वीरे मुसि पामी, केवलज्ञान लियो गोतमखामी, ज्यारों जापडपो नवकरवाली, वीर• ॥ १०॥ मुधर्मा.खामी हुआ पाट धणी, जांरी यशकीर्तिने महिमा धणी, जिनमार्ग दियो उजवाली, वीर.॥1॥ज्यारे पाटे जंबू वैरागी, आठराणी परणीने प्रभाते त्यागी। सोटा वर्षामें काटी कर्म जाली, धीर०॥ १२ ॥ आठौं भामिनी वैयगे भीनी, प्रातः पियासाथै दीक्षालीनी, माता पिताने संयम पण लियो झाली, वीर ३॥ प्रभव पण राजानो बेटो, जिणरो जंबू कवर से हुओ मेटो, पांचसे सुवराग्य पाया तत्काली, वीर॥१४॥ दी। जिन सम्मेदशिखर सीक्षा, अयपद गिरनार दोय सीमा, वायुएस्य सीझा चम्पा चाली, वीर. ०१५॥ महावीर गए मुक्ति पावापुरी, कार्तिक रही अमावस्याने मुक्तिवरी, सुनता भणतां मंगन माली, धीर•॥ १६॥ दिन दिवाली रोपायो टाणो, रात्रि भोजन पण नहीं खाणो, ज्यारो जापजपोशीलगतपाली, वीर•॥१७॥ गुरुचेलारी जोटी सूर्यशशी, ऋषि रायचंद्र कहै मारे मनमेंबसी, मुखिसे जोर जोडी टंकसाली, वीर•॥१८॥ (दिवालीका दिन बडा) दोहा-भजन करो भगवान् का, गणधर गोतम सामी, जप प्रगटे तारन तरन, नित उठ करो प्रणानि ॥ १॥ दीवाली दिन भाबियो, रासो धर्ममें धीर, गोतम केवल पामियो, मुझि गये महावीर ॥२॥ पाली का दिन रहा, मत कर मोटे पाप, निन्दा विकया परहो, करो बिनजीरो बाप ॥३॥ रीवाली दिन आवियो टेक॥ सामायिक पाषष करो, पहिकमणो दोकाल, हम आतम उजालजो, एटा मत करो ख्याल ॥४॥ नर मनीने नस्लग्छी, देश याराना राय, वीर समीपे आविने, दीया पौषध यय ॥५॥ अतिक चरी अमावस्या, टाल्सा आवम दोष, भव जीवाने लारने, वीर पहुंवा मोक्ष देवदेवी पणा आविया, स्यगी जगमग ज्योति अचरज एक ययो बिहा, रमो तो उदोष ॥ मोह कर्मने व्यग्ने, मासे समन भ्यान । अनिल संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिवा २८७ पणो भायो इस्यो, पाम्यो केवल ज्ञान ॥ ८॥ मोक्ष नगर का दायका, भगवान श्रीमहावीर, वेहना मुस आगल हुआ, गौतम स्वामी वजीर ॥९॥ मोटा जिन शासन धनी, पहोंचा शिवपुर यम । गौतम लन्धि तणा धणी, जगमें प्रन्यो नाम दिन कारण मंगलीक दिन, नाम जपो मनवीर । आरंभ समारंभ डोडिने, निर्मल पाली शील ॥ ११॥ वार २ मानुष देही, पामबी नही रे गवार, ओरा द्रांडा राखडी, मंत्र यंत्र निवार ॥ १२ ॥ झाडा झपटा मत करो, मत करो पर काय घात, चार जाप जपो भला, मोटी दिवाली की गत ॥१३॥ काया रूपी देहरो, शान रूप जिन देव, तस सज्झाय शंखधरी, कर सेवा नितमेव ॥ १४॥ दया रूपी दिवलो करो, संवर रूपी वात, समकित ज्योति उजाली ने, ज्यों मिथ्या तम नश जात ॥ १५॥ संवर रूप करो डांकणो, ज्ञान रूपी करो तेल, पाठ कर्म प्रज्वलित करो, घोर अंधेरो ठेल ॥१६॥ काया हाट तेल जालणो, शान वस्तु महिं सार, स्मरण करो जिनराजनो बाणिज्य परउपकार ॥१७॥ धीरज मन घर धूपणो, तप कर भगरज खेय, गरपाधूप शान जल थकी, इम सेवा निजदेव ॥ १८ ॥ श्रीमंघर मादि देइने, जधन्य जिनेश्वर वीश, अढाई द्वीपमें परगट्या, उत्कृष्ट एकसो सिवेर ॥७॥ भजन करो भगवान को, ज्यू थारो सुधरे काज, काल अनन्त गयो वृथा, अवसर लाध्यो हाय ॥ २०॥ हिंसा से देव राजी हुए, भोला। यह मत भूल, सांचोमन नवकारनो, एम चढायो फूल ॥ २१॥ दुःख कोईने देणो नहीं, प्रवचन सामो निहार, जिनवरना गुण गूथिने, ऐसी चढाओ माल ॥ २२॥ दानशील तप भावना, मनवय काय मुध्याय, ज्ञान दर्शन चरित्रना, यह तू बक्षत चदाय ॥ २३ ॥ करण करावण अनुमोदना, हणवो जीव न कोय, नव सत्व धारो निर्मला, एहयो नैवेद्य होय ॥ २४ ॥ अवली गत संसारनी, धन लक्ष्मी के काज टिचकारा करतो थकां, धीठा कूटे छाज ॥ २५ ॥ टिचकारा करता यका, दाव पाछा धीरे जाय, लक्ष्मी इम करता यका, किम पैसे घर मांय॥ २६ ॥ लीपणो ढोलणी मांडणो, करो जीवारो जतन, भव भव माहि दोहिलो, मानव भव रतन ॥ २७ ॥ वाणी श्री जिन देवकी, मुख उपाडे मत गाय, यमा करजो जुगत स्युं, ज्यों शिव मंगल थाय ॥ २८ ॥ भाख्यो दिवाली दिन मोटको, राधे पापना पूर । इन करतां रे प्राणियो, भिवपुर करे दूर ॥२९॥ ज्ञान रूपी दिवलो करो, तपसा कर उजाल, नियम व्रत कर - 1 ' २८८ वीरस्तुतिः। ... मंडा, विनय विवेक घी घाल ॥ ३० ॥ क्षमारूपी खाजला करो, वैराग्य घृत भरपूर, उपशम मौण घालने, 'शुद्धमन मोतीचूर ॥२१॥ भार दिवाली इम करो, उतरो भवजल पार, जप तप सेवा भावमुं, लाहो ल्यो मलार ॥ ३२ ॥ दीवाली दिन जाणिने, धन्य निजघर माही, धर्मभ्यान मनआदरो, अजर अमर पद पाही.॥ ३३॥ पूजे दिवाली ने दिने, यही लेखनी ममीरात, एम ज्ञानने पिण पूजजो, वाधे पुण्यना ठ ।। ३४ ॥ पर्व दिवाली जाणिने, उजलावे पर हाट, इम तुम व्रत, उज्वाललो, दीपे अधिकी बात ॥ ३५॥ घर कुटुंब धन बालस, जिम वाल्हा लागे तोय, तेसो नेह करो धर्म, ज्यों मुक्ति मुख होय ॥ ३६॥ जाग्या था खुटका करे, तो बोलो मतिरात, जो असंयति जागसी, करसी छ कायानीघात ॥ ३५॥ ध्यान खाध्याय भली करो, गुणो बोलने चाल, आजनो, दिनछे मोटको, दीवालो मत घाल ॥ ३८॥:पर्व दिवाली जाणने, सार पाशा मत कूट, धर्मप्यान ध्याओ सदा, नफो धर्म नो लूट ॥३९॥चैत्र मुदी.तेरस दिने, जनम्या श्री वर्धमान, कार्तिक वदी अमावस्या, पाम्या मोक्ष निदान ॥४०॥ मनुष्य जन्म छे दोहिलो, पान्यो आरज, खेत जोग मिल्यो.साधा तणो, चेत सके तो.चेत ॥ ४२ ॥ सेवाकरो मुगुरु तमी, गाओ ज्ञान घन घेर, दोय घडी शुद्ध भावसुं, नवकरवाली फेर ॥ ४२॥ अंग' उपांगने छदमें, जीव दया व्रत पाल । तातें ऋषि जयमल कहे, इसी दिवालीने मान । ४३॥ (महावीर स्तवन) 1 , 'वीर जिनेन्द्र शासन धणी, जिन त्रिभुवनखामी । ज्यारे चरण कमल चित.नित धरूं, प्रण सिरनामी। मुर स्थिति नगरी पिता मात चिन्ह अब- • गाहना, वर्ण आयु पुनी कुमर पद तपका परमाना । चरित्र यल प्रभु गुण पणा है छतमस्य केवल ज्ञान, तीर्थ गणधर केवली जिन सासन परमाण ॥1॥ देवलोक दशवें वीस सागर पूर्णस्थिति पाए, कुन्डनपुर नगरी में चवी श्री जिनवर आए।.पिता सिद्धार्थ पुत्र, मात त्रिशलादेवी नन्दा, जननी- पुझिम अवतरे श्रीवीर जिनन्दा। ज्यारे चरण लक्षण सिंहनोए अवगाहना कर सात, सन कंचन करी शोमता, ते प्रण अपनाथ, ॥ २॥ बहुवेर वर्णनो भाऊपो पार्यों मुखकारी, तीसवर्षकेवलपदे रया अभिमह धारी। उपसर्ग परिषद पहन करत .पुनी शमरस भीनो, अनन्तवली भगवन्त जार वीर नाम जहीनो, . - . . 2 संस्कृसटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २८९ ज्यांग मातपिता स्वर्गति लह्याए, पुनी लियो संयम, भार पसा कीधी आकरी, सादा बारह वर्ष महार, ॥ ३ ॥ नव चौमासी तप कियो, इक कियो उमासी । पांच दिन ऊणां अभिग्रह । पद मास विमासी । एक एक मासी तप कियो, प्रभु द्वादश बिरियां बहत्तर पक्ष दोय २ मास छविरिया करियां । दोय अढाई दिन दोय ए वली डोढमासी दोय । भद्र-महाभद्र शिवभद्र तप करी, इम सोलह दिन होय,॥४॥ मिक्खुनी पडिमा अष्ट भकिनी द्वादश कीनी । दोयसे ने गुणतीस छठम तप गिनती लीनी । ग्यारह वर्ष उमास पचिस दिन तपसा केरा । ग्यारह मास उगणीस दिवस पारणा भरा। इन विधि खामी तप कियोए पछी उपज्यो केवलज्ञान । तीस वर्ष ऊणां विचरिया, ते प्रण वर्धमान, ॥ ५॥ प्रथम 'अस्थि' पीजो 'चम्पा' दो कहिए, 'वैशाला' ने 'वाणिज' दो मिल । द्वादश लहिए । चतुर्दश 'नालंदे' पाडे "मिथिला' छभणिया, 'भद्दलपुरमें दोय, सबे मिल अडलिस गिणिया । एक 'आलंभिका' एक 'सावत्थी', एक अनार्य में जाण, चरमचौमासो 'पावापुरी जहा पहुंचे निर्वाण ॥६॥ मुनिवर चवदे सहस, सहस्र छतोस आर्यिका, इकलख गुगसठ सहनश्रावक, तीनलाखभाविका, अधिक अठारह सहस ग्यारह गणधर की माला, गोतमखानी शिष्य बड़ा, सती चन्दनवाला। ज्यारे केवलज्ञानी सातसी, प्रभु पहोंचे निर्वाण । शासन वर्ते सामीनो, अन्द इकिस सहल प्रमाण ॥७॥ पूर्वी वीनसो धार, तेरासो अवधि ज्ञानी, मन पर्यय पांचसे जान, मातसौ केवलज्ञानी ॥ विक्रिया लन्धिरा जान, सातसो मुनिवर कहिए। वारी चारसी बडे, मिष भिन चरचा लहिए ॥ एकाकी चारित्र लियो, एकाकी निर्वाण । चौसठ वर्ष तक चालियो, दर्शन-केवल शान ॥५॥ बारह नरयल पभ, पभ दश ज्यों ए हय वा, बारह हय एक महिष, महिप पांचसौ मुं गयवर। पांचवें गज हरि एक, सहस हरि इक अथपद, दश लस अथापद एक राम, दोय राम एक वासुदेव । दोय वासुदेव एकचकी, कोड चको इक मुर लियो, कोरी मुर्य इक इंद अनन्तामुं नहीं नमे, चिट्टी अगुली मप्र जिनेंद्र ॥९॥ भाप तणां प्रभु गुण अनन्त, कोई पार न पावे, लन्धि प्रभाव कोडि, याय कोटी सीस बनाये। सिर २ कोडा ओटी वदन, कोड कोड जिभ्यानी, जिन्या २ मुंकोट २ गुग करे मुरधनी । कोडा कोडी सागर लगेए, करे शान गुण गार । आपत प्रभु गुण अनन्त, कोई कहत न आवे जी पार ॥१०॥ वीर.१९ वीरस्तुतिः। चवदे राज लोक भरे वादा कनियो, सर्व जीवनी रोमरार नही गये शिनिया। एक पाङ तप करे, गुण गण करे असन्त, पूज्य प्रसाद अपि वालचंद कहे नदी भारे अन्त । रोबर १८६२ एमास I मृगसिर चंद। स्पमापुरे गुणगारिया, धन ३ वीर निणंद ॥११॥ वीरस्तुति-परिशिष्ट नं०५ शान्तरसपूर्ण शान्तिप्रकाश । प्रार्थनातम्- प्रेमसहित वन्दो प्रथम, जिनपद कमल अनूप । ताके सुमरत अघमनर, होवत शांत सरूप ॥१॥ पूर्व नमामि सनई, जिनाहिकमलं शुभम् । यस स्मृला नरा नीचा, जायन्ते शान्तिरूपनः॥१॥ तुम शरणे आयो प्रभु, राख लेऊ निज टेक। निर्विकल्प मम सिद्धजी, देवो विमल विवेक ॥२॥ शरणं ते प्रभो । प्रातः, सरक्ष्यो निजमायुकः । कत्सनाटीतनिदेशबोध चितर निम्मरम् ॥ २॥ फर यंदना भावयुत, विविध योग घिर धार। रतना रतन सम देय मुस, शान जवाहर सार॥३॥ धृत्वा स्थैर्य नियोगेष, सभा प्रणमाम्यहम् । देहि मे रम विज्ञान, रमतुल्यं शुभं परम् ॥३॥ उपाध्याय आपयन श्रुति, निशिदिन करत अभ्यास ! दीनयन्तु मुद्य दीजिप, शम दम मानविलास ॥ ध्रुवाप्ययनसनिशा, निलमपबिसरताः । उपाध्यायाः पदमा का शान्ति दमं परम् ॥४ सो साधु बाधा हरो, कर्मा रणजीत । निपुण जौहरी ज्यी लस्यो, आतम रतन पुनीत ॥५॥ मेग्युरणे नित, सानिध्यप्रनु। भात्मरमं शुभं यस्त, शिवं भानरपा । साधकः उपमाहाराममा गयो रन्नु
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता
२९१
अधिक प्रिय नव रसनमें, है रस शान्ति विशेष ।
स्थायी भाव निर्वेदसे, मेटो सकल कलेश ॥६॥
नवखपि रसेष्वत्र, प्रेष्ठः शान्तो विशेषतः।
निर्वदात्स्थैर्यमायातः, कृत्वं क्लेशं हरत्वयम् ॥ ६॥
विकलमति अभिलाप अति, कपटक्रिया गुणचोर ।
में चाहत कछु शान्त रस, तुमसे करी निहोर ॥ ७ ॥
महेच्छुर्विमतिः स्वामिन् । निर्गुणो दम्भसंयुतः ।
त्वां प्रणिपत्य याचेऽहं, किश्चिछान्तं रसं प्रियम् ॥ ७॥
कापे जाचु जायकर, तुम सम नहीं दातार ।
करुणानिधि करुणा करी, दीजे शान्त विचार ॥८॥
गत्वाऽहमत्र कं याचे, स्वत्समो नहि दायक।
दयानिधे । दयां कृत्वा, शान्ति मे यच्छ सस्थिराम् ॥ ८॥
में गुलाम हो रावरो, मेरो विगरत काज ।
ताहि सुधारे पनि रहे, मेरी तेरी लाज ॥९॥
दासोऽसि ते प्रभोऽहं वै, कृसं नश्यति मेऽधुना ।
साफल्ये तस्य मे ते वै, लज्जा स्थास्यत्यसंशयम् ॥९॥
शान्ति छवि निरखत रहूं, जाचूं नहीं कछु और ।
अरजी हुकम चढाय द्यो, पखो रहूं तुम पोर ॥ १०॥
नान्यत्किमप्यह याचे, याचेऽह केवलं विभो।
लोकेऽस्मिन्वीक्षणं धुत्साः, शान्तेरस्तु सदा मम ।।
आवेदने मयाऽऽदेशस्त्वया देयः प्रभो। ह्ययम् ।
भूत्वा
चैवं कृतार्थोऽई, द्वारे तिष्ठामि ते सदा ॥ १०॥
जिहिं गुणतें खुश होहु तुम, सो गुण नहिं लवलेश।
तुम चर्णन आथित रहूं, सो बुध देहु जिनेश ॥११॥
प्रसादखे गुणेन स्यायेन खल्योऽपि मे सन।
मविर्जिनेश! सा देया, यया स्या चरणाश्रितः॥११॥
तडफत दुःखिया में अति, पलक परत नहि चैन ।
अव सुदृष्टि करि निरखिए, दीले रहे यने न ॥ १२॥
. . ', . २९२ वीरस्तुतिः। । विकलोऽतीव दुःखेन, सुख प्राप्नोमि न क्षणम् । अधुनेक्ष्यः सुदृध्याऽह, सिद्धिर्नोऽपि क्षणे कृतेः॥ १२॥ . यह सम्बन्ध भलो बन्यो, हम तुमसौं सर्वश! त्यागे ताहि न संग रखे, पिता पुत्र लखि अश॥ १३ ॥ मया त्वया च सर्वज्ञ जातः सङ्गः मुशोभनः । नो साज्यश्च सदा रक्ष्यः, पिवाऽज्ञोऽमि पुत्रकः ॥ ११ ॥ मेटहु कठिन कलेश तुम, परमातम परमेश। दीन जानिकर यकसिये, दिन दिन शान विशेष ॥ १४ ॥ परमात्मन् ! परेश! त्वं, क्लिट क्लेशं विनाशय । दीनं ज्ञात्वा च देहि त्वं, नित्यं ज्ञानं शुभं मम ॥१४॥ कृपा करो निर्बुद्धि पै, लघं जु अनुभव रीतिः । अशुभ और शुभ देखके, करूं न कबहुं प्रीति ।। १५ ।। कुरु कृपां च निर्बुद्धी, येनेक्षेऽनुभयक्रमम् । वीक्ष्याऽभं शुभं चैव, कुा नो तत्र संरठिम् ॥१५॥ सय प्रकार धनवन्त हो, सुनहु गरीव नियाज । आरत-रुद कुध्यानते, वकसि बकसि महाराज ॥ १६ ॥ । शृण त्वं दीनबन्धोऽति, सयैश्वर्यसंयुतः। आर्ताद्रौद्रात्कुष्यानाच, सद्यो वारय मां प्रभो । ॥ १६॥ धर्म मुल्ल ध्यायत रहूं, दोय ध्यान सुखकार । या जग ममता उदधि ते, दीजे पार उतार ॥ १७॥ ध्यायामि मुखद ध्यान, धार्म शुलं च नित्यशः । निस्तारय विभो ! मां तु, लोकसम्मोहसागरात ॥१७॥ करुणा करिके मेटिये, विपय वासना रोग। ... में कुपथी वेदन प्रवल, लखि मत जोग अजोग॥१८॥ दयां विधाय देवाल, विषयेच्छाभयं हर। ममोन्मार्गस सम्बापो, योग्यायोग्यं न पश्य भो॥14॥ में गरजी अरजी कीं, सुनिहो जग प्रतिपाल। .चाह सतावे दास को, यह दुःख दीजे टाल ॥ १९ ॥ .
संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरंभापान्तरसहिता २९३ , निवेदयाम्यहं ह्ययों, शृणु त्वं लोकपालक ।। तपस्नु बाधते दास, दुःखमेतद्विनाशय ॥ १९॥ प्रभु.तव सन्मुख हो रहूं, जगकू देऊ पूठ । कृपादृष्टि अस करहु तुम, ज्यु भव जावे छूट ॥२०॥ लोकं तु पृष्ठतः कृत्वा, त्वत्समक्षः प्रभो वहम् । स्यामेवं तु कृपादृष्टिः, कर्तव्या भवमोचनात् ॥ २०॥ । मैंने जे कुकरम किये, दीखत हैं सब तोय । महर करो ज्यू दीन पे, फेर न दुःख दें मोय ॥ २१ ॥ मया कृतानि पापानि, सर्वाणि देव पश्यसि । तथा दीने कृपा कार्या, वाधन्तां नो यथा पुनः ॥ २१ ॥ विपति रही मो घेरके, सुनी न अजहु पुकार । मेरी विरियां नाथ तुम, कहां लगाई यार ॥२२॥ नाधुनाप्यशृणोलापं, विपन्मां परितः स्थिता । मम वारे त्वया नाथ ! विलम्वं क्रियते कथम् ॥ २२॥ पेसी विरियां में किधों, टरि गये दीनदयाल । विना कहां कैसे रहूं, अव तो करि प्रतिपाल ॥ २३ ॥ ईदृश्या किल वेलायो, दीनवन्धो । कुतस्त्वगाः। उक्त्या विना कयं स्थयामधुना रक्ष मां विभो ।। २३ ॥ :जो कहलाऊं और पे, न मिटे मम उर झार। मेरी तेरे सामने, मिटसी मनकी रार ॥ २४ ॥ अन्येनोवो न शान्तः स्वाचितोदेगः कथंचन । समक्ष एव चातस्ते, मनोवादो* विनयति ॥ २४ ॥ दुष्ट अनेक उधार के, थकि रहे किधी दयाल । धीरे धीरे तारिये, मेरो भी लखि हाल ॥२५॥ गतिं ममापि संवीक्ष्य, शनैः सन्तारय प्रभो। उद्धार्याऽनेकदुष्टान्वा, जातः श्रान्तो दयानिधे! ॥ २५ ॥ ॥ इति प्रार्थनाङ्गम् ॥ मनका झगडा।
२९४ वीरस्तुतिः। ॥ अथ रागनिवारणाङ्गम् ॥ अरेजीच भव वन विपे,तेरा कवण सहाय ! जाके कारण पचि रह्यो, ते सब तेरे नाय ॥ २६ ॥ भवारण्येऽत्र रे जिव सहायः कोऽस्ति ते बद । यदर्थ सिद्यसे निलं, लव ते सन्ति नो भुवि ॥ २६॥ संसारी को देखले, सुखी न एक लिंगार। अब तो पीछा छोडदे, मद धर सिर पर भार ॥२७॥ पश्य संसारिणं जीव, न कोऽपि सुखमारभुवि । अनुसति बजेदानी, शीर्षे मा घर भारकम् ॥ २७॥ झूठे जगके कारणे, तू मत कर्म बंधाय । तू तो रीता ही रहे, धन पेला ही खाय ॥२८॥ मध्यासारमुहिश्य, कर्मबन्धं तु मा कुरु । रिको यास्यसि जीव विं, भोक्ष्यन्ते हीतरे धनम् ॥ २०॥ तन धन संपत् पायके, मगन न हो मन मांय । कैसे मुखिया होयगा, सोक्त *लाय लगाय ॥२९॥ तर्नु वित्त विभूति च, सन्ध्या हटस्तु मा भव । वन्हि प्रग्याल्य शेषे कि, स्थास्यसि त्वं कयं सुखी ॥ २७॥ टाट देख भूले मति, यह पुद्गल पर्याय । देखत देखत वाहरे, जासी घिर न रहाय ॥ ३०॥ भूति हा प्रमाय सं, मेयं जाता तु पुरलेः । नक्ष्यति पश्यतस्ते वा, न स्थिरेयं कदापि च ॥३॥ लूटेंगे सानादि धन, उगसम यह संसार। मीठे वचन उचारिक मोह फांसी गल द्वार ॥ ३१॥ प्रियं प्रोच्य गले मोहपाशं शिवा लिमे जनाः । शानादिपनहार ठे, करिष्यन्ति प्रवच्चाः ॥३॥ किधों भूत तोकी लग्यो, करे न तनक विचार । ना माने तो परखले, मतलवको संसार ॥ ३२ ॥ 4 *तो गमनम्। आग।
- 1 . ..वीरस्तुतिः। कैसे गाफिल हो रहा, नेडा ओत करार। निपजी खेती देय क्यों, यारी सटे गवाँर ॥ ३९ ॥ प्रमत्तोऽसि कथं भ्रातरायात्वाश्रुतमन्तिकम् । प्रतियच्छसि रॊव्यर्थ *कथं सजातशस्यकम् ॥ ३९ ॥ धर्मविहार कियो नहीं, कीन्हो विषय विहार। गांट खाय रीते चले, आके जग हटवार ॥४०॥ धर्माचारः कृतो नाऽत्र, विहारो विषये कृतः । ।, लोकापणे समागल्य, मूलाची रिक्तको गतः ॥ ४० ॥ काज करत पर.घरनके, अपनो काज विगार। सीत निवारे जगत्का, अपनी झोंपरी यार ॥ ४१ ।। विनाश्य त्वं खकं कार्य, फुरुषे परकृत्यकम् । कुटी निजा तु सश्वाल्य, लोकसीतं व्यपोहसि ॥४१॥ ' नर्हि विचार तैने किया, करना था क्या काज । उदय होयगा कर्मफल, तव उपजेगी लाज ॥४२॥ आसील्कि तय कर्तव्यं, कृवा नाऽस्य विचारणा । कर्मविपाककाळे च, ब्रीडा यास्यपि वे सखे ! ॥ ४२ ॥ झूठी संसारीनकी, छूटेगी जब लाज । तब मुखिया तू होयगा, इनवे अलगा भाज॥ ४३ ॥ असत्संसारिभोगानां, यदा नश्यत्ति नै रविः। एतेभ्यस्तु पृथग्भूत्वा, तदा सौख्यमवाप्स्यति ॥ ४३ ॥ अपनी पूंजी सौ करो, निश्चल कार विद्वार। यांध्या सोही भोगले,मत कर और उधार ॥ १४ ॥ आत्मीयेनैव वित्तेन, कार्यमाचर निश्चलम् । वमेव हि मुंशस्त्र, ऋणमन्यत्तु मा कुरु ॥ ४ ॥ नया कर्म ऋण काढके, करसी कार विहार। देणा पडसी पारका, किम होसी छुटकार ॥ ४५ ॥ कर्मण नूतनं कृत्वा, यदि कार्य विघास्यसि । उद्धारस्त कथं भावी, दातम्यं स्यात्परस्य यत् ॥ ४५ ॥ करपत्किार्थमिति भावः! मूलद्रव्यं भुस्वा। - - संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता विषय भोग किम्पाक सेम, लखि दुःस्न फल परिणाम । • जब विरक्त तू होयगा, तब सुधरेगा काम ॥ ४६॥ भोगः किम्पाकतुल्योऽस्ति, तदन्ते वीक्ष्य सङ्कटम् । विरक्तस्तु यदा भावी, तदा कायं तु सेत्स्यति ॥ ४६॥ एरे! मन मेरे पथिक, तू न जाव वहँ दोर । यटमारा पांचों जहां, करें साहकों चोर ॥१७॥ मम पाथ मनस्त्वं रे! गच्छ मा तत्र कहिंचित् ।। दस्यवो यत्र पदापि, साधु चौर प्रकुर्वते ॥ ४ ॥ आरम्भ विषय कपायकों, कीनी बहुतिक वार । कारज कछु सरिया नहीं, उलटा हवा रधार ॥४८॥ भोगारम्भकपायास्तु, बहुशो विहितास्त्वया । कार्यसिद्धिस्तु नो जाता, जातः प्रत्युत लजितः ॥४८॥ चारों संशामें सदा, सुते निपुण चित्त लाग । गुरु समझाचे कठिनों, उपजे तउ न विराग ॥ ४९ ॥ प्रबोधयति सज्ञाभिमुहश्चतसृभिर्भुवम् । ज्ञानाय चित्तवैराग्यं, जायते ते तथापि नो॥४९॥ खैर हुआ जो कुछ हुआ, अव करनो नहिं जोग । विना विचारे तें किया, ताका ही फल भोग ॥५०॥ अस्तु जातं तु यजातं, प्रमादं नाधुना कुरु । असमीक्ष्य कृतं यत्तु, भुंश्व तस्य फलं ध्रुवम् ॥५०॥ इति रागनिवारणाङ्कम् अथ द्वेपनिवारणानं कथ्यते बुरोकहे कोऊ तो भनी, तो तू भला जु मान । बूरा मीठा होतहै, सब वनिहै पकवान ॥ ५१॥ अप्रियं *वक्ति यस्तुभ्यं, त्वं तु जानीहि तत्प्रियम् । बूरा मिठं भवत्यत्र, पक्वान्नं तेन जायते ॥५१॥ * "बुरा' इति भाषायाम् । 'भला इति भाषायाम् । 'पुरा' । इति न्दिस्स दीर्घाकारत्वेन प्रयोगस्तदा भाषाया शर्करापर्यायः। .
२९८
वीरस्तुतिः।
कटु तीक्षण अति विषमरी, गाली शख समान ।
अशुभकर्म गुम्मड भिद्यो, यो जिय सुलटी जान ॥५२॥
कटुस्तीक्ष्णा विषोपेता, शस्त्रतुल्या हि गालिका ।
शुवेवि हा विजानीहि, स्फोटो भिन्नः कुर्मजः ॥ ५२ ।।
कटुक वचन कोऊ कह दिया, लगेजु दिलमें तीर।
समष्टि यो समझले, मोय जान्यो अतिवीर ॥ ५३॥
कतिः परसम्प्रोका, वाणवद्भिनत्ति सा ।
समदृथिविजानीयाज्ज्ञातोऽहं वीरसुख्यकः ॥ ५३॥
चैरी होता तो करहु, नहीं कहता कटु यात।
सजन दीसत माहरो, रुज लखि कटुक खवात ॥ ५४॥
अभविष्यदयं शत्रुनावदिष्यत्तदा कटुः ।
सबनो दृश्यते मेऽयं, कटाशयति रोगहरु ॥ ५४॥
अवगुण सुनिके आपणां, रे मन! सुलटी धार।
मो गरीवकों जानिक, लीना योझ उतार ॥५५॥
मात्मनो दोषमाकर्य, सखं धारय हे मनः।
ज्ञात्वाऽनेन तु मां दीनं, शीर्षाद्वारोऽवतारितः ॥ ५५ ॥
में भूल्यो शुभ राहकों, इननै दई घताय ।
दुर्जन जानि पेरे नहीं, सज्जन सो दर्शाय ॥५६॥
सुमार्गो विस्मृती नूनं, मया चायं न्यबोधयत् ।
ज्ञायते दुर्जनो नायं, सबननु विलक्ष्यते ॥ ५६ ॥
शान अस्त सूरज हुआ, में भूल्यो निजलाद !
निन्दा रूप मसालले, इने दिखाइराद । ५७॥
अखं गते हि बोधा, जातोऽहं विस्मृताधकः।
निन्दाप्रदीपमादाय, जातोऽयं मार्गदर्शकः॥ ५५ ॥
सुनि निन्दकके वचनकों, चित मति करे उचाट ।
यह दुर्गन्धित पवन अति, बहती • मति डाट ॥५॥
निन्दकोकिं समाकर्ण्य, ग्लानि मा कुरु मानसे।
रुन्धि मा.वं सखे पूतिगन्ध वा समीरपम् ॥ ५॥
4
संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता २९९
कुपचन शर क्या कर सके, तू होजा पापाण।
तेरा कुछ विगरे नहीं, चाका ही अपमान ॥ ५९॥
सखे। पापाणवद्याः कृतिषुः किं करिष्यति ।
न स्यात्ते कापि वा हानिर्दापमानस्तु तस्य च ॥ ५९॥
कुवचन गोलीके लगे, जो ले मनको मार।
आपही ठंडी होयगी, होजा शीतल गार ॥६॥
कूक्तिगोलीसमाघाते, मनः शान्तं करोति यः।
भविता सा स्वयं शीता, शान्तस्त्वं भव हे सखे ॥६॥
तेंने ऊपरसों कही, मैंने समझी ठेठ ।
खटका सपही मिटगया, एक रह गयो पेट ॥६१ ॥
उपरियात्त्वया प्रोक, तत्त्वं युद्धं मया किल ।
चिन्ता कृत्या विनष्टा मेऽवशिष्टा समता खल ॥ ६१॥
रे चेतन सुलटी समझ, तेरा सुधरा काज ।
कुवचन घर घर ताहरी, इणने सौंपी आज ॥१२॥
सम्यक् चेतन ! बुध्यख, सिद्धं कार्य तवाद्य वै।
तावकः कृक्तिनिक्षेपोऽनेनेदानी समर्पितः ॥ ६२॥
होगी सोई नीसरे, वस्तु भरी जिहि माहि ।
याका गाहक मत बने, तेरे लायक नाहिं ॥ ३ ॥
यस्मिन् वस्तु यदेवास्ति, निस्सरिष्यति तस्किल ।
नोचितं वे समस्त्वदाहकस्त्वस्य मा भव ॥ ६३ ॥
अपणा अवगुण सुणकरी, मत माने जिय रीस ।
मनमें तू यों समझले, मुझको देत असीस ॥ ६४ ॥
आत्मदोर्ष समाकर्ण्य, चित्ते खेदं तु मा कृथाः ।
आशिष मे ददायेप, कार्या वैषा विचारणा ॥ ६४ ॥
शोध अगन दिल मत लगा, सुनि अयथारथ बोल ।
क्षमारूप जल छिडकिए, नेक न लागे मोल॥६५॥
असदुक्तं वचः श्रुत्वा, क्रोधामी शिप मा मनः।
सिञ्च वारि क्षमारूपं, भवेत्तापो न कश्चन ॥६५॥
.
.वीरस्तुतिः ।
दुर्जन चुप हो है नहीं, तू तो छिन चुप साथ।
तृण विन.परिहे अगनि कई, आपहि होय समाध ॥६॥
न तूष्णीं दुर्जनः स्थाता, त्वं तु तूष्णीं भव क्षणम् ।'
निस्तृणे पतितो वन्हिः खयमेवोपशाम्याते ॥६६॥
तू तृण सम कटु वचन सुन, फ्रोध अगन मत दाइ।
उपल नीर सम करहु मन, तव मिलिहै शिवराज ॥६॥
श्रुत्वा तृणनिभां कूक्ति, कुदग्निं मा प्रदीपय ।
कुरु नीरसमं स्वान्तं, मुक्तिराज्यं तदैष्यसि ॥ १७॥
आई गई कर गालिफों, क्रोश चंडाल समान ।
न तर पिछानि चंडालिनी, पल्लो पकरे आन ॥ ६८ ॥
उपेक्षाख सखे ! गालिं, त्यज कोपं श्वपाकवद ।
श्वपाक्यनुगता नोचेगहीता वनसन्दशाः ॥ ६८ ॥
प्रभु सहाय नहीं होयँगे, रे जिय सांची जान ।
क्रोध करी ज्यु होगयो, साधु रजक समान ॥ ६९ ॥
ईशोऽपि नो सहायः स्यात्सत्यं मन्यख चित्त! ह।
पश्य कोपं विधायैवं, साधू रजकतां गतः ॥६॥
आत्म वस्त्र मेला लखी, इणने दीना धोय।
कटुक वचन सावुन करी, निवल जानिके मोय ॥७॥
निर्बलं वीक्ष्य मामेप, आत्मवस्त्रं मलीमसम् ।
कक्तिसाधनेनाऽऽशु, तदधावयादकः ॥ ७० ॥
जौहरी व्हेके मति करे, कुंजडी के संग रार।
• रतन विखरसी ताहरा, भाजी सटे गवाँर ॥ ७ ॥
विवादं माकविकेश्या, रानिकस्त्वं हि मा चर।
भविता रमविक्षेपो, शाकायं मूद। यत्वरम् ॥१॥
सालाकी गाली दई, यह विचार चित ठार।
भगिनी सम इनकी प्रिया, मोय समझ्यो प्रतधार ॥७२॥
श्रुत्वा बाल्यकगालि तु,
पित चिन्तय तत्क्षणम् ।
भार्थ्याखसरदस्पति, सभ्यग्बुचं प्रतं मम ॥५१॥
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता “किरतघनी बननो न ह्याँ, दह गारि इण मोहि, अस आतम शीतल करौं, मम उधार तय होहि ॥ ७ ॥ दत्ता मम गालिरेन, कृतनो भवितास्मिनो। एवं कुर्या यदा शीतं *खं तदोद्धारमाप्नुयाम् ॥ ७३ ॥ गाली एक ही होत है, बोलत होत अनेक । रे जिय! तू बोले नहीं, तो यही एक की एक ॥ ७४ ॥ गालिरेका प्रतीवादेऽनैका सैव विजायते । विचाय्यैवं तु मा नूहि, सा स्यादेकव चित्त! ह ॥ ४ ॥ अनन्तकाल पहले प्रभु, देख रखे यह भाव । परिह कटु वच श्रवणमें, ते किम टाल्यो जाच ॥ ७५ ॥ प्रागेवानन्तकालाई, जिनो भावं निरक्षत । कतिपतनं श्रोत्रे, शक्यं वारयितुं क्यम् ॥ ४५ ॥ इति देपनिवारणानम् अथ धैर्यधारणाङ्कम् अय दिल चाहे परमपद, उर धीरज गुण धार । निन्दा स्तुति रिपु प्रिय, एक हि दृष्टि निहार ॥ ७६ ॥ निच्छिामनले चेत्तदा धैर्य गुणं धर। निन्दास्तुति रिपुप्रीती, समदृष्ट्या विलोकय ॥६॥ धीरज धर भ्रमको तजो, एह पुद्गलको ख्याल । पर परछांही पर रही, तू तो चेवन लाल ॥७७॥ धैर्य धृत्वा त्यज भ्रान्तिमेतत्पुद्गलनाव्यकम् । चेतनोऽसि प्रिय ! लं तु, त्वयि बिम्बं परं गतम् ।। ७७ ॥ चञ्चलताको छोडिदे, धीरजकी कर हाट । कर विहार गुण माल को, ज्यू होवे बहु ठाट ।। ७८ ॥ त्यक्त्वा स्थैर्य विधेहि वं, धैर्यहद सखे! मम । आद्रियख गुणप्राम, येन सर्व सुखं भवेत् ॥ ८ ॥ आत्मानम्।
संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता
चाह किए कछु ना मिले, कारके जहँ तह देख ।
चाह छांडि धीरज धरहु, पद पद मिलत विशेप ।। ८६ ॥
इच्छयाऽऽमोति नो किश्चित्पश्य कृत्वा तु मानव !
विहायेच्छां कृते धैर्य, विशेषाप्तिः पदे पदे ॥८६॥
सुनि उझले मति रे जिया! कर विचार चुप साध ।
यही अमोलिक औषधि, मेटे भव दुःख व्याध ॥ ८७ ॥
श्रुत्वोत्पत मनो मा त्वं, मौन धृत्वा विचारय ।
अमूल्यमौषधं खेतद्भवतापाऽऽमयाऽपहम् ॥ ८ ॥
रे चेतन! संसार लखि, दृढ कर नेक विचार ।
जैसी दे तैसी मिले, कूपकी गुंजार ॥ ८८॥
चेतन ! वीक्ष्य संसार, कुरु धृत्या विचारणाम् ।
लभ्यतेऽत्र यथादत्तं, पप्रतिध्वनियंदा ॥ ८८॥
चञ्चलताको छांडीकै, काट मोह गल फांश ।
'सम दम यम दृढता किये, निज गुण होय प्रकाश ॥८९॥
त्यक्त्वा चापल्यमाच्छिन्धि, गलपाशं च मोहजम् ।
शमे दमे यमे दाय, कृते खगुणमासनम् ॥ ८९॥
अभिलापाको स्यागिके, मनकौं रख मजबूत ।
तव कुछ सूझे अगमकी, यह सांची करतूत ॥ ९०॥
अभिलाषं परित्यज्य, मानस कुरु निश्चलम् ।
तदायत्सामुकर्तव्यं, द्रश्यते च यथार्थत. ॥९॥
वो तो ह्यां ही वस्तु है, जाकी तेरे चाय ।
क्षण इक धीरज धारले, सहजे ही मिलजाय ॥ ९१॥
अभिलापोऽस्ति ते यस्य, तद्वस्त्वत्रैव विद्यते ।
क्षणं धैर्य कुरु वान्ते, बिनाऽऽयासेन लप्स्यते ॥११॥
मतकर परगुणमें रमण,
ज्यों न लगे गल तोप।
निश्चल रह निज गुणनमें, आपही होगी मोक्ष ॥ ९२ ॥
रमखाऽन्यगुणे मा त्वं, येन दोषो भवेन्नहि ।
निश्चलः खगुणे भूयाः, खतो निर्वाणमेष्यसि ॥ १२ ॥
वीरस्तुतिः। निश्चलतासु होयगा, रेजिय ! ब्रह्म समानः। तृण का ही घृत होत है, गाय चरे पय पान ॥ ९३ ॥ स्थैर्येण भविता जीव! ब्रह्मनुझ्यो ह्यसंशयम् । सर्पिखेन तृणं स्थायीचरति जलेन च ॥ १३ ॥ जो तू चाहे अमर पद, करि दृढता अखत्यार। वाल न वांका होयगा, जीवत ही मनमार ॥१४॥ यद्यमरपदेच्छा ते, धर्म्यमगीकुरुष्व वै। जहि मनस्तु जीवदा, नैवं केशस पकता ॥ ९४ ।। धीरज गुण धारण किये, सब ही दुःख कट जाय। जैसे ठंडे लोहसे, तत्ता लोह कटाय ॥ ९५ ॥ धृतधैर्य्यगुणे सर्व, दुःख नश्यति सत्वरम् । यथा शीतेन लोहेन, तप्ताऽऽयश्छिद्यते ध्रुवम् ॥ ९५॥ अल जिम निर्मल मधुर मृदु, करत तप्तको अन्त । इम धीरज गुण चार लखि, करो ग्रहण बुधवन्त ॥२६॥ निर्मलं मधुरं वारि, मृदुस्तापविनाशनम् । एवं चतुर्गुणं धम्र्य, वीक्ष्य गृहीत वै बुधाः ॥ १६ ॥ कला घटत अरु वढत है, नहीं शशिमण्डल जान । जन्म मरण गति देहकी, यो लखि धीरज ठान। ९७॥ हानि गद्धी कलायाश्च, नहीन्दुमण्डलस्य वा। देहस्यैवं गति जन्म, मृत्युं वीक्ष्य धृति धर ॥ ९ ॥ सुखदुःख दोनों एकसे, है समझणको फेर। एक शब्द दो अर्थ ज्यों; लाख टकेको सेर ॥ ९८॥ सुखदुःसे समे वे तु, बोधभेदस्तु लक्ष्यते । लोके *लाख टकाकी सेरेदं द्वयर्थकवाक्यकम् ॥ १८ ॥ "लाख टका की सेर" इई वाक्यं लोके द्वयधकमसि, तराया-पण- ययेन लाक्षा प्रस्थमिवा मिलतीति प्रथमोऽर्थः । लक्षसंख्याकपणयुग्मैः विधि- ज्ज्ञानवस्तुप्रस्थपरिमितं मिलति, इति २ द्वितीयोऽर्थः। .
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ३०५ सुखदुःख दोऊ वेदे मति, वेदे तो सम भाव । जैसे मकरी जालकों, पूरै अरु खा जाय ॥ ९९ ॥ सुखदुःखानुभूतिं मा, कुरु नो चेत्समानतः । ताजालं यथा पूर्ण, कुरुतेऽधासि तत्र वा ॥ ९९ ॥ समताको धारण किये, क्यों न डटे मन लहर। भरणी सुण-२ कर मिटे, स्यांपा हंदा जहर ॥ १० ॥ समताधारणे किं वा, मानसोर्मिन शाम्यति । पश्य सर्पविष श्रुस्वा, गारुडी नश्यति ध्रुवम् ॥ १० ॥ इति धैर्यानम् अथानुभवविचारशानानम् कूकस विषय विकार सम, मति भखि मूढ गवाँर । अनुभवरस तू चाखिले, गुरु मुख कर निर्धार ॥ १०१॥ मूढ ! ग्रामीण ! मा भुल भोगान्कूर्चकसन्निभान् । गुरोर्मुखानु सम्प्राप्य, अनुभूतिरसं पिय ॥ १.१॥ किये पाठ अनुभव विना, न मिटे भीतर पाप । वाहर शीशी धोयके, करी चहै तू साफ ॥ १०२॥ अनुभूत्या विना पाठापापं नश्यति नान्तरम् । काची बहिर्धावानिर्मलां कर्तुमिच्छसि ।। १०२ ॥ अलामार पापाणको, जिमलागत जल माहि । तिमि अनुभव विच कर्मको, यहुबन्धन है नाहिं ॥१०॥ अल्प एवाश्मनो भारो, यथा तोये प्रतीयते । अनुभूत्या तथा कर्मबन्धो भूरिन जायते ॥ १०३ ॥ मन वच-तन धिरते भयो, जो सुख अनुभवमाहि । इन्द नरिन्द फनीन्दके, ता समान सुख नाहिं ।। १०४॥ स्थैर्य देहमनोवाचामनुभवे तु यत्मुखम् । ताद मुखं न शकस्य, मानवेन्दफणीन्द्रयोः॥ १.४॥ अनुभवसी प्रभु मिलतहै, अनुभव सुखको मूल । अनुभव चिन्तामणि जि, मति भटके कहुँ भूल १०५ वीर.२० वीरस्तुतिः। . - अनुभूयाः प्रभोः प्राप्तिः, सेव मूलं सुखस्य च । सक्वा चिन्तामणि मूढाऽनुभूति क्वापि मा भ्रम ॥१.५॥ अति अगाध संसार नद, विषय नीर गम्भीर। अनुभव विन पार न लहत, कोटि करहु तदवीर ॥१०॥ भवो नदोऽस्त्यगाधोत्र, विपया बहु वारिवत् । कोट्युपायेऽपि पारं नो, यात्मनुभूतिमन्तरा ॥ १०६ ॥ जिहिं विचारते पाय है, मनकों थिर सुखटौर । ताको अनुभव जानिये, अनुभव नहिं कुछ और ॥१०७॥ मन स्थैर्ये सुखस्थानं, येनाऽऽनोति विचारतः । बुध्यखानुभवं तं च, परन्त्वनुभवो न हि ॥ १०॥ विना विचारे शानके, तू जङ्गलको रोझ। मिथ्या यों ही पचत है, क्यों न करे अव खोज ॥ १०८ ॥ विना ज्ञान विचारेण, आरण्यगवयो ननु । : व्यर्थ खेदमवाप्रोयि, कुरुषे कि न विचारणाम् ॥ १.८॥ मन मतङ्ग वश करनको, सानाङ्कुश चित धार । क्षमार्थभसे बांधकर, लजा शृंखल डार ॥ १०९ ॥ भनो गजं वयं कर्तु, चित्त नानशूणि धर । क्षमा खम्मेन पध्वा च, क्षिप लजां मुशृङ्खलाम् ॥१०॥ भ्रमतो मन रवि अटिले, ज्ञान मुकुरके म्यान । विंदु सुभ उपयोगसे, कर्म तूलकी हान ॥ १० ॥ भ्रमन्मनो रवि रुन्धि, ज्ञानदर्पणके सखे। विन्दुना सूपयोगेन, कर्मतूलविनाशनम् ॥ ११ ॥ सीसा सम संसार है, गुरु कृपा आदित्य । ज्ञान क्षेत्र विन किम लखे, आपनपो सुपवित्र ॥ २९१ ।। संसारो दर्पणमस्तु, भारझरोऽखि गुरोः कृपा। विधुतात्मत्वबोधस्तु, दाननेत्रं विना न हि ॥ ११ ॥ विषय-वासना करत जो, आवे ज्ञान जंगीश। वेशदका उन समयमें, छिनमें होय छत्तीस ॥ ११२ ।। .
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३०७ भोगानां वासनायां चेज्ञानमुद्दयोतते सखे । सधिपष्टिसायायाः, पत्रिंशमायते ध्रुवम् ॥ १११ ॥ जो तू चाहे शान सुख, तो विपियन मनफेर। और ठौर भटके मती, अपने ही में हेर ॥ ११३ ॥ व्यावर्तय मनो भोगाद्बोधसौख्यं यदीच्छसि । रे रे। त्वं भ्राम्य माऽन्यत्र, तदाऽऽत्मनि च मार्गय ॥ ११ ॥ झानरूप दीपक कने, न बचे कर्म पतन। जो रहे तो दोनोनमें, झूठो एक प्रसङ्ग ॥ ११४ ॥ अन्तिके शानदीपस्य, नो कम्मंशलभः स्थिरः। तिष्ठतो यदि तो दो वा, मृपैकस्तु प्रसाकः ॥ ११४ ।। शान सञ्चरे जिहि समें, न रहे कर्म समाज । और न पंछी डट सके, जहां बसेरा वाज ॥ ११५॥ यदा सधरति ज्ञानं, कर्मजालं तु नो तदा । श्पेनवासो भवेद्यत्र, तत्र तिष्ठन्ति नो सगाः ॥ ११५ ॥ घर नहिं छुट्यो एकसा, छुट्यो कर्म कुढंग। सान तणे सत्सङ्गथी, देखो ठाणायंग ॥ ११६ ॥ गृह त्वकं न वक्रेन, लकं कर्म तु कुत्मितम् । सरसोत्पन्नवोधेन, पश्य स्थानाप्रसूत्रकम् ॥ ११६॥ क्षण इक शान विचारले, विएय दृष्टि की फेर। मेरी मेरी त्यागदे, यो होवे सुरझेर ॥ ११७॥ भोगादृष्टिं पराहत्य, क्षणं चिन्तय बोधकम् । लज सद्यो ममत्वं च, सर्व सम्यम्भविष्यति ॥ ११ ॥ आठ पहर टिंग राखले, शान सरूपी ढाल। मोह परीके विषय शर, लगे न ताकी भाल । ११८ ॥ संरक्षाामु यामेपु. सानरूपं तु चर्मकम् । विपयेपुर्न-मोहारेमस्तके न लमिष्यति ॥ ११८॥ माया मोह निवारके, विपयनसों मनसींच जो सुख चाहे आपणा, दोरहो मानके वीच ॥ ११९ ॥ .
वीरस्तुतिः।
मायामोह निवाध्यैवं विषयेभ्यो मनो हर।
वाम्छस्यामसुखं चेद्धि, ज्ञाने विहर मे सखे।॥ ११९ ॥
मेद लहे विन ज्ञानके, मत मूंसे जिम खान ।
लोग गडरिया चाल तज, आफ्नपो पहिवान ॥ १२०॥
मा कुरु भपणं श्वेव, ज्ञानदाप्तिमन्तरा।
१६ लोकमेपीगति त्यक्त्वा, खात्मानं परिवोधय ॥ १२०॥
कामधेनु अरु कल्पतरु, इण भव सुख दातार ।
हणमव परमव दुहुनमें, मान करत निस्तार ॥ १२१ ॥
कल्पद्रुः कामधेनुथ, लोकेऽत्रैव सुखप्रदौ।
निस्वारयति बोधस्तु, बगसत्र परत्र च ॥ १२१॥
जगत् मोह फांसी प्रवल, कटै न और उपाय ।
सत्सङ्गति कर शानकी, सहज मुक्ति हो जाय ॥ १२२ ।।
मोहपाशो दृढो लोके, च्छिद्यते नान्ययत्नतः।
बोधस्य सत्म, मुक्तिः स्यात्खयमेव हि ॥ २२ ॥
विच पारस अरु शानके अन्तर जान महन्त ।
यह लोहा, कञ्चन करत, वह गुण देय अनन्त ।। १२३ ॥
पारसाश्मनि बोधेच, जानीहि महदन्तरम् ।
लोहं स्वर्ण करोत्सव, स त्वनन्तगुणप्रदः ।। १२३ ॥
प्रथम भान पीछे दया, यह जिनमतको सार ।
ज्ञान सहित किरिया करूं, तव उतरं भव पार ॥ १२४ ॥
जैनसिद्धान्तसारोऽयं, पूर्व ज्ञानं ततो दया ।
सज्ञाना चेकियां कुर्या, तदा स्यां भवपारगः ।। १२४ ।।
अयोपसंहारः
अति आलस परमादियो, मजुलाल मुझ नाम ।
शानोद्यम कछु ना यने, किम सुधरे मुझ काम || १२५ ॥
अहं च भमुलालाख्यः, प्रमत्तय सुसायकः।
'ज्ञानोद्यमोन मे कश्चित्कथं कार्य तु सेत्स्यति ॥ १५॥
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता ३०९ दर्शन पुनि निश्चल नहीं, नहिं निश्चल चरित्र । मन भ्रमतो निशिदिन रहे, नहिं ठहरे एकत्र ॥ १२६ ॥ सम्यक्त्वं निखल मे नो, चारित्रमपि नैव च । निलं भ्राम्यति चित्तं तु, तदेकर न तिष्ठति ॥ १२६ ॥ ऐसी करी विचारणा, रे जिय! अयतो चेत। चार वरण गुरु 'रतनजी', ऐसो करि सङ्केत ॥ १२७ ॥ एवं जाते विचारे तु, चेत जीव ! किलाधुना। चतुर्वर्णगुरु 'रतनजी', सङ्केतं कृतवानिमम् ॥ १२ ॥ चार वर्ण गुरु रतनजी', तास भेद चौवीस। तामें भेद जु तेरवें, करी शान वकसीस ॥ १२८॥ चातुर्वर्ण्यगुरू 'रतनजी', तद्भदा युगविंशतिः । त्रयोदशे तु भेदे च, ज्ञानदानं व्यधादसौ ॥ १२८ ॥ शान पाय हुलसी मती, शुक्ला छठ मधुमास । संवत् रस अग्नि के भू, रच्यो शान्ति परकाश ॥ १२९ ॥ ज्ञानं प्राप्य मतिर्दृष्टा, रमाऽम्यहेन्दुरन्दके । विते पयो मधौ "शान्तिप्रकाशो" रचितो मया ॥ १२ ॥ आशिर्वचनम् अरिहंत-सिद्ध-गण-शजी, उपाध्याय सय साध। पंच परमगुरु दीजिये, निर्मल शान समाध ॥ १३० ॥ मईन्सिद्धोऽथवाऽऽचार्य, उपाध्यायो मुनिस्तथा। पञ्चैते गुरवो दधुः, शुद्धबोधसमाधिकौ ॥ १३०॥ इति थीमनाचार्यभजुलालकृवशान्तिप्रकाशः समातः॥ "सुसंस्कृतानुवादस्तु, कृतः पुष्पेन्दुभिक्षुणा शान्ते वीररसं प्राप्य, मोक्षः सञ्जायते ध्रुवम्" वीरस्तुतिः। ܚܚܬܐ चीरस्तुति-परिशिष्ट नं०६ वीरस्तु भगवान्वयम् जैनेश निसिलाऽमराऽऽनुतपदं सर्वान्तरायापह, हार्दध्वान्तरविं च योग- सदनं श्राद्धगम्यं परम् । संसारार्णवपोतमत्र निखिलाऽऽनन्दालयं तापहं, ध्यायेऽहं मनसा धिया च सततं श्रीवर्धमानं जिनम् ॥ १॥ महावीरनमस्कृत, स्थाद्वादगी:पतिं जिनम् । निगदे तजन्मवृत्तं, भव्यानां हितहेतवे ॥१॥ भवार्णवोद्धारकरः, श्रीवीरभगवान् प्रभुः । पवित्रं शासनं यस्य, तत्याने मनोऽ- र्पय ॥२॥ अतथ शासनोत्थाने, भवन्तः पक्षपातिनः । सम्बन्धादिति विलेयाश्चोत्थानस्तयके मुदा ॥ ३॥ सजितं भाविस्वोत्थानकुममं स्ववशं नय । सम्भवेऽखि त्रिरत्नादिजलसेचनकैरपि ॥४॥ खत्पत्यादुपचारस्य, चास्मिनुत्या- नरूपके । सौरभाभावहेतोश्व, मनो' मधुकरो न हि ! ॥५॥ भवलोभगतं चेदं, निशामय ततः परम् । स्वयकस्य प्रभावेण, हठात्खवशमानयेत् ॥६॥ कृपाकटाक्षं जानीत, भगवतत्त्वचिन्तकाः । अस्वेतावन चैतस्य, खल्पत्वं किश्चिदखि हि ॥ ७॥ अस विधासमात्रेण, प्रयने करणे पुनः । साहयत्वं न सातमस्मिन्नवसरेऽपि . नः ॥ ८॥ शासनोत्थानपुष्पान्तर्गतो निरविशा- यकः । मकरन्दः कियानस्ति, प्रोत्यानरूपपुष्पके ॥९॥ 'वीरस्तु भगवान् खयमिति खादे रसस्प हि । अभिलापो यदोत्पनखदा पाठकसङ्घका ॥ १०॥ किचिद्धारय धैर्य नु, मत्तः सर्व प्रयासतः । निबन्धस्यास्य सम्बन्धे, कथनीयं कियामया ॥ ११॥ प्रथमं प्रतिपाद्यस्य, विषयस्येदमस्ति हि । सिद्धिः प्रमाणतो ज्ञेया, सिद्धान्तस्यैति सम्मतम् ॥ १२ ॥ सौत्र सिद्धान्त-शास्त्रस प्राचीनेयं मुपद्धतिः । जनशास्त्रेषु सूत्रेषु, मुख्यत्वेन सुचर्णितम् ॥ १३ ॥ 'सम्यग्ज्ञानं प्रमाण' च, प्रलक्षेतरभेदतः। द्विविधं शास्त्रतो ज्ञेयं, श्रुतिज्ञानादि भावय! ॥१४॥ अवधिमनःपर्यायावेकदेशप्रत्यक्षको । केवलं सम्प्रत्यक्ष, परोक्षे मतिश्रुतेऽपिच ॥ १५॥ इति नीत्या मुवितेयं, प्रमाणद्वयसम्मतम् । प्रत्यक्षं च परोक्षं का, नान्यदस्ति पृथक् पुनः ॥ १६ ॥ एतअयप्रमाणे वे, अन्तर्भावोऽन्यकस्य हि । अतक्षेत यस्यैव, निबन्धेऽस्मिन्नियोजनम् ॥१७॥ हि केयोचिन्मवे न स्यादेतयोरन्तरं पुनः । मान्यतयाऽनयाभावे, वार्ता के बहुलेखतः ॥ १८॥ मुसकेतोपलब्धियां, शंका विषयमा पुनः । निवा- .
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता : रणीया यत्नेन, नात्र कार्या विचारणा ॥ १९ ॥ वार्ताऽन्याप्यस्ति चात्रैव, लेखपृद्धिः प्रजायते । वास्तवज्ञानशून्यं स्यात्काठिन्यं विदुपां भवेत् ॥ २०॥ इति शंका भिया नैव, प्रलेकविषयस्य हि । प्रमाण स्पष्टरूपेण, न निर्दिष्टमिह स्फुटम् ॥२१॥ जिज्ञासूनां विजिज्ञासा, दृढाय यनुरूपतः। तदा तेषां विनिर्देशोऽवश्यं स्यात्प्रकटं पुनः ॥ २२ ॥ हेतुस्तृतीयो ज्ञातव्यो, विवेचनमवा- प्स्यति । प्रस्तुतविपयस्यापि, *सम्प्रदायानुसारतः ॥ २३ ॥ लक्ष्ये विशेष संस्थाप्य, सूक्ष्ममात्रैकदृष्टितः । प्रत्येकस्यात्र लेखस्याऽनुभवाच्छास्त्रतस्तथा ॥ २४ ॥ सर्वसिद्धान्ततः सार्वभौमस्य व्याप्तिरूपतः । अस्ति सम्भावना चास्य, ज्ञानं सम्यक्त्वपूर्वकम् ॥ २५ ॥ कस्यचिद्धेतुतश्चित्ते, शङ्कोत्पत्तिर्भवेन हि । विचारानन्तरं तेषां, शङ्का स्थानिर्मूलिका ॥ २६ ॥ सर्वत्र मेऽस्ति विश्वासो, नैवं शंका कदापि हि । चतुर्थी च मुवातयं, कस्याऽपि विपयस्य च ॥ २५ ॥ प्रतिपादयितुं शश्वत्कयापि भाषया भवेत् । चतुर्विधत्वं सामन्या, अपेक्षा जायते भुवम् ॥ २८॥ विज्ञेया सा च सामग्री, निम्नलेखक्रमेण च । निर्णयस्वत्वसंघानां, प्रथमानुयोगरूपतः ॥ २९ ॥ विचारार्थ च वस्तूनां, साक्षाद्विषयवर्णनम् । कथनोपकथनाचेति, नान्यो हेतुर्मनागपि ॥ ३० ॥ शाख्ने पूर्वानुयोगं च, धर्मकथानुयोगकम् । कथ्यतेऽत्र विचारेण, तत्वज्ञानाथिभिर्मुदा ॥ ३१ ॥ “धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशममन्वितम् । पूर्ववृत्तकथोपेतमितिहास प्रचक्षते" ॥ ३२ ॥ दृष्टयेतयेतिहासोऽपि, चेतमा कथ्यतेऽधुना । स्थानानेऽपि कथा सेयं, चतुर्धाऽभिनिगद्यते ॥ ३३ ॥ मुख्यं फलं कथायाश्च, तत्वनिर्ण- यमेव हि । यः शब्दो यत्परथास्ते, तदर्थोऽपि स एव हि ॥ ३४ ॥ लक्ष्ये धृन्वा पदार्थ यं, शब्दस्य कस्य चैव हि । प्रयोग यदि कुर्वात, स शब्दक्षार्थवान् भवेत् ॥ ३५॥ सर्वेषा सम्मतं चेदं, सिद्धान्तं संस्फुटं सदा । तदा सम्पद्यते भावः, मर्वत्रैवं विचारय ॥ ३६ ॥ वका बोधयितुं यं हि, वान्टयोचार्यतेऽ. सकृत् । श्रोत्राऽपि शब्दः स एव, ज्ञायतेऽर्थसमन्वितः ॥ ३७॥ ततोऽन्याय- प्रतीतेश्य, श्रोतुर्भवति विभ्रमः । भोजनावसरे यद्वत्सैन्धवेवि पदात्ततः ॥ ३८ ॥ जन्यते लवणाऽऽबोधो न चान्योऽर्थोऽप्रतीयते । प्रस्थाने हयबोधश्च, तद्वलक्ष्म- मधास्य ॥ ३९ ॥ श्रोत्रैवं मुविचाऱ्यार्थो, नान्योऽर्थः प्रतिपद्यते । अबोधार्थ- झापकत्वे, सति शानप्रमाणकम् ॥ ४० ॥ प्रमाणं तु तदेतत्स्या प्रमाण- गुरुप्रदत्तज्ञानानुभवानुसारत इत्याशयः।
३१२ वीरस्तुतिः। . विपयस्य च । वास्तविकं च सलं थे, येन ज्ञान प्रजायते । बात्मा- मन्दे पर योऽरं रमतेऽहनिशं पुमान् । वत्पदाम्भोजयुग्मेऽस्त त्रिकाले मम वन्दना ॥ ४१ ॥ अस्गलौशिकविक्षस्य, दृष्टंमदृश्यमुत्तमम् । स्फुटं विशारते विश्व, विधमानन्दपूरितम् ॥ ४२ ॥ आनन्दापेक्षया विधे, विश्वासनस्ताऽस्ति च। जगतो हि जगद्धर्मो भिन्नभावं गतोऽस्ति न ॥४३॥ एकैकाणी विध- स्थाऽस्त्यानन्दमय एव हि । अस्लानन्द पियस्वेपामतस्वत्तृषितस्वया ॥४॥ अधिगन्तुं तमानन्दं विश्वधर्मा हि साधनम् । तान् धर्मान् प्राणिनो गान- न्दाययोदपीपदन ॥ ४५ ॥ भानन्दापेक्षया सन्ति, प्राणिनः सदृशाः प्रमे म्यजित्यापेक्षया किन्तु, नरा उत्कृष्टप्राणिनः ॥४६॥ आनन्दस्याभियर्थ, मानवा मुमनोहरान् । पारपंचानुपायांयाऽनेशान रिचयन्ति ते ॥७॥ आत्मानन्दर्युपायेपु, मनुष्यरचिवेषु च । सर्वोकृष्ट उपायस्तु, धर्म एवास्त्रि केवलम् ॥ ४८ ) भानन्दस्य सरू हि, तुल्यं प्रत्येकवामिनाम् । सामर्थ्य- मारमनमुल्यमस्ति प्रलेकदेहिनाम् ॥ ४॥ तुभ्यं वास्तविक रूपमलि प्रलेकदे. हिनाम् । भवेत्साधनधर्मस्य, सले तुल्यतोचिता । समानमेव सम्पूर्णमस्ले. तदनुमारतः ॥ ५० ॥ मनुष्यस्वादशः प्राणी, प्रवीणकरणोऽस्ति यत् । मात्मानन्दाभिद्धि स, कर्तुं दानोति निधितम् ॥५१॥ एतावदेव न परमन्य- रघृणुत सङ्घनाः । अनन्तानुभवं प्रा, आरमानन्दस्य ये नराः। वे सपा थाद्धविप्यन्ता, नरजातेः कृते राछ । प्रामसापनाधर्म, स्मल परषा दिवं गताः ॥५२॥ तेन धर्मस्वरूपेण, साधनेनेतरा नराः। श्रात्मनो लौकिकानन्द- मवाप्तुं शनुवन्ति च ॥ ५३॥ लोकेऽन्यप्रामिनयास्य, प्रत्यक्षजगतः राछ । अलौकिम्भापुजैर्भवत्यानन्दन्दिलाः ॥ ५४ ॥ परन्त्यिह मनुष्याख्यदेहिनत खयं किल । निजानन्दमया भूत्वा, तमंजानन्दसम्पदा ॥ राममविश्वाप्रतिमाss. नन्दान्दाभिवर्धनम् । उपादेयं मुरम्यं च, विधान पारयन्ति च ॥५५॥ यो धर्मोऽस्ति नृणां सवालोकिकानन्दसम्पदा । अभिररिहादरूपोऽसीति विभाम्यताम् ॥५६॥ इयं मुष्टिरनायनन्तश्चातातदनुबन्धिनी । अनन्ततत्व- रूपेषु, स्थापत्यप्रवर्तते ॥ ५५ ॥ आत्मीयानन्ततस्येषु, सा बिरूपतः । अकिरस्यरूपे धानन्ततश्वखरूपतः । अनन्तमपर्यन्तं सत्शायारूपतः । अब गलस हार्दम्- 1 संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता अलौकिकानन्दरूपे, नित्याऽवस्थाऽस्य वे स्थिरा ॥५०॥ विचित्ररूपेयं सृष्टिरस्त्यलौकिकवस्तु च । स्थिरा नित्या च साऽस्तीति, सृष्टिमीमासका जगुः ॥५८ ॥ अस्त्यालौकिकसामर्थ्यभृतालंकरणेषु च । सर्गस्य धर्म एवैकं, सर्वो- स्कृट विभूषणम् ॥ ६॥ धर्मभीमांसका लोकेऽनेके समभवनिह । ते लौकिक- परिष्काररूपेण हितकाक्षिणः ॥ नैजधर्मविचारात्मकप्रसादेन मनुना । एतन्म- हीतलं चालं, चक्रिरेऽलं कृपालवः ॥ ६१॥ इदानी समये चपामलौकिकप्रसा- दिनाम् । निम्रनिर्दिष्टनामानो, भवन्तीक्षणगोचराः ॥ ६२॥ वेदान्तः सांख्य- योगी च मीमांसा द्वितयी पुनः । न्यायो वैशेषिको शैवो, वैष्णवस्तात्रिकासधा। खामीनारायणो जैनो, बौद्धो मोहम्मदः पुनः । ईशायी पारसीयथ, यहूदी. यादयः परे ॥ ६३ ॥ एषां तदितरेपाच, भिन्नभिषमताधिताम् । धर्मालधार- भूतानामुद्देश्यं त्वस्ति केवलम् । आत्मानन्दाधिगमनमित्थं तत्वविदो विदुः ॥ ६४ ॥ उद्देश्ये सर्वधर्माणामेकीभावमुपागवे । तत्साधनानि साणि, भजन्तीहैकरूपताम् ॥६५॥ पृथक् धक् देशकालावाधारीकृत्य वे ननु । अन्योऽन्यभिन्नरूपैच, सम्प्रवृत्ता भवन्ति च ॥ ६६ ॥ तत्रार्हतानां तद्देश्य, शानं केवलमात्मनः । किं च तस्य हि कैवत्यप्रापणं केवलोदयात् ॥ ६॥ एतदेवा- भिमन्यन्ते, योग-वेदान्ति-वैष्णवाः । खामिनारायणश्चापि, जैनेनेथमिहोच्यते ॥ ६८ ॥ “जे एग जाणइ से सम्वं जागई" एक जानाति यो नाम, सर्लान् सानाति स ध्रुवम् ॥ ६९ ॥ वेदान्तीया भगवती, श्रुतिरप्याह तद्यथा । "आत्मनि विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति" शाते सत्यात्मनं ज्ञातं, भवतीदम- शेषतः ॥७॥ "अप्पा सो परमप्पे"ति, जैना अभिदधत्यय । घेदान्त- कान्तसिद्धान्तभारतीत्यमुदीर्यते ॥ "अहं ब्रह्मास्मि" "तत्वमसि" "प्रज्ञानं ब्रह्म" "अयमात्मा ब्रह्म" ॥ १॥ अहं प्रक्षाऽस्म्यसि त्वं तत्, प्रज्ञानं ब्रह्म कीर्त्यते। अयमात्माऽपि तद्ब्रह्म, सच्चिदानन्दरूप यत् ॥ ४२ ॥ सन्ति पेदस्य चत्वारो, भागास्तेषु चतुर्पु च । अस्त्येकैकं महावाक्यं, दश्यते तद्यथाक्रमम् ॥ ३ ॥ “अहं ब्रह्मासि 'यजुष' सानस्तत्वमसीति च । "प्रशानं ब्रह्म', ऋग्वेद' "स्सायमात्मेलपर्णदः ॥ ७४ ॥ चतुर्येतेषु वाक्येषु, वाक्य सत्वमसीति ई 1 उपयोगितरं शवन्मननीय च विद्यते ॥ ५॥ जनाने ग्रन्तसिदान्तनियमक्षायमखि च । "नाणे पुण नियमा आया"शानेत
वीरस्तुतिः।
10 आहेतैरुच्यते जन्ममृत्युरूपा तु संस्मृतिः । कम्मंद्वारा प्रचलति, वध
कम्मं जई स्मृतम् ॥ ७७ ॥ कर्मणोऽस्य नियन्तात्माऽस्तीले सर्वसम्मतम् ।
अधिष्ठान कर्मजन्यं, स्टेरात्माऽयमस्ति च ॥५८ ॥ वेदान्वेनोच्यते माया
द्वारं जन्मादिसम्मतम् । आत्मरूपेवरदास्यानियामकमुदीर्यते ॥ ७९ ॥ स्याद्वा-
दिनो पदन्त्येवं, कर्मोपाधौ लयं गते । आत्माऽयं जन्ममरणवन्धनान्मुच्यते.
तराम् ॥ ८॥ वेदान्तकान्तसिद्धान्तवागत्रेय प्रवर्तते । मायोपाधा. लयं
प्राप्ते, भवादात्मा विमुच्यते ॥ ८१॥ जैनेनाऽ'पुणरावित्ती'त्युक्त्यमभिधीयते ।
भक्त्यपुनरागृत्तिर्भवे मुझस्य चात्मनः ॥ वेदान्तोऽभिदधात्यात्मा, पुनरावर्तते न
हि। गीताया कृष्णचन्द्रेण, प्रोक्त मित्यं महात्मना । "यद्वत्वा न निवर्तन्ते,
तद्धाम परमं मम" ॥ ८२॥ "एगे माये" ति वास्येन, जैनस्वित्वं प्रभापते।
"एकोऽस्त्यात्मा' गुण-दव्य-पर्यायापेक्षया पळ ॥ "एकोऽहमिति" वेदान्तोs-
प्याथै कृतसम्मतिः ॥ ८३ ॥ जैनाना च मते *तों, नात्मानं वेति
तत्त्वतः । तथा धीवात्मरूपं हि, नातुं शमोति वास्तवम् ॥ ८ ॥ यतो निव-
तते वाणी, सहेव ननसा मुहुः । जना पदन्ति चासण्डं, परिपूर्णतम परम्
॥४५॥ जानयन्ति ये च द्विवन्यं प्राप्नुवन्ति । वेदन्तिनोऽपिले
चास्मिन्भवे ब्रह्म सनातनम् ॥ ८६ ॥ व्यापक सच्चिदानन्दवरूपं वर्णयन्ति
च। शाकंडरछेद्यनमेवं च, तथाऽदायमशोध्यकम् ॥ ८७ ॥ अवध्यनस्मिगति,
नात्मा नैव प्राश्यते । कदाचिभर्मचक्षुभ्यां, मृन्युजन्म विवर्जितः ॥८॥
सचिदानन्दरूपच, जीवात्मा हि खभावतः । शिखायामसभूवेमु, नक्ष
प्वपि सर्यतः ॥ ८९ ॥ परिपूर्णतमसद्धेतन्यगुणसंयुनः । जीवात्मा चेतनारूप-
सचिदानन्दविग्रहः ।। ९० ॥ न तदिकं रिधिदपि, स्थानं चाम्धि भवे कचित ।
नेतन्याधयजीवस्य, रटय, सर्व चिदात्मकम् ॥19॥ सयमारमा र सम्मंग,
इति वेदान्तिनोऽभुवन् । तथा ना वहन्तीत्यमात्माऽनन्तय ज्ञानयुस् ॥ ९ ॥
सनातनं व्यापकं च, ब्रह्मवेशान्तिनो विदुः । वयं शुओं विशुदय, निजात्मा-
नन्दरूपभार ॥ ९३ ॥ सर्वशः सर्पदशैति, बनावं वदन्लदः । विभा-
"तका बयप पिजइ, मातत्यप गादिता।" | "यतो बाचो. तिर
तन्ते, मप्राप्य मनसा सह" 11 "कैवल्यपदमनु"1"निदोषपूर्णगुणविमल
आत्मतो, नियतनामसारीयगय हीनः । आनन्दमात्र मानुषीदार,
सर्वत्रच विविधनेदविवर्जितात्मा ॥१॥
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता चार्यसिद्धान्ते, स्थिविरेपा सनातनी ॥ ९४ ॥ निर्दोपः पूर्णगुणवानात्मानन्द- गुणाधितः । खतन्त्रः सर्ववित्साक्षी, शरीरगुणवर्जितः ॥ ९५ ॥ तथात्मा करपादादिमुसादीन्द्रियवर्जितः । स चावयवादिभेदेन, कल्पनाकरणेऽपि च ॥९६॥ सदानन्दमयो निलो, वासनारहितो विभुः । लोकोकात्मतत्वस्य, कल्पनावयवस्य च ॥ ९७ ॥ केवलानन्दरूपश्च, नास्त्यत्र च विकल्पनम् । जन्म- मृत्युजरादिभ्यो, व्यतिरिक्तश्च सर्वदा ॥९८॥ जन्मोत्पत्तिप्रभङ्गादिमेदशुन्योs- स्ति निर्मलः। जन्मादित्रिविधो भेदखद्भिन्नं चात्मरूपकम् ॥ ७९ ॥ वल्लभा- चार्यस्य मवे, ज्ञेयं तत्तत्वदार्शभिः। सज्जैनमतसिद्धान्वे, नाल्मा कति निश्चयः (निश्चयनयेनेत्याशयः) ॥ १० ॥ सायशास्त्रविदश्वाह, *कर्ताऽहकार एव च । न कर्तृत्वं चात्मनश्च, निर्लेपत्वादविक्रियात् ॥ १.१॥ किन्तु पुरुषोऽकर्तव, प्रवदन्ति मनीषिणः । ईश्वरः सर्वविनियो, रागपादिवर्जितः ॥ १०२॥ ज्ञानविज्ञानसम्पन्न, इत्येवं वर्णयन्ति च । नाश्वत्थ योगशालं, लेिशकर्म- विपाकतः ॥ १.३॥ आशयेनापरामृष्टश्वेश्वरः पुरुषोत्तमः । रागद्वेपादयो भावा, न स्पृशन्ति सदीश्वरम् ॥१०४॥ सर्वज्ञत्वमीश्वरे चाति, आत्मा चैतन्यरूपवान् । एवं निगद्यते शास्त्रे, चानन्तो निष्कलोऽव्ययः ॥ १०५ ॥ निर्विवादः सदात्मास्ति, चैतन्यगुणः संयुतः । निस्कियो निष्कलस्तद्वया- प्रको गुणतः पृथक् ॥१०६ ॥ तन्माया जगता कत्रों, चिच्छक्तिर्गुण- विप्रहा । सत्यज्ञानमनन्तश्च, ब्रह्मेति श्रुतिसम्मतम् ॥ १०॥ ब्रह्म- खरूपे पापपुण्ये, न तो दुःखमुखे तथा । नास्ति किश्विजगत्सस्मिन्व्यापकत्वं विना स्थितम् ॥ १०८ ॥ सचिदानन्दरूपेण, शिवोऽहं नेतरः क्वचित् । केवलज्ञानसम्पन्नोऽत्रैव मोक्षानुभावकः ॥ १.९॥ इति जैनमतं शश्वजागति प्रभुरीश्वरः । इदमेव मतं ज्ञेयं, सहजानन्दस्वामिनः॥ ११० ॥ अक्षर- स्थानमात्मैव, खयं चाक्षयरूपवान् । आत्मानं च विजानीयादक्षरं परम परम् ॥ १११॥ तज्ज्ञानं सत्यमित्युक्तं, तदन्यत्सकलं मुधा । * "महारः कर्ता न पुरुष इति साख्यः" । "क्लेशकर्मविपाकाशयरपरा; मृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः।" "त्र सर्वज्ञवीजम् ।" सलं ज्ञानमनन्तं बर। इन पापं न पुण्यं न दुःख सुखं न, चिदानन्दरूपं शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
- वीरस्तुतिः। आकाशादिस्थले यच, ज्ञान मिध्यामय च तत् ।। १३२॥ प्रणाममार्ग- विमो, देवचन्द्रादयो मुहुः । साम्प्रदायके नियं, निजानन्दमतं जगुः ॥११३॥ दृष्ट्याऽनया दर्शनेन, भारतेन मुधर्मिणाम् । जनानामात्मवत्वस्थ, सिद्धान्तप्राप्तये मुदा ॥ ११४ ॥ माहम्मदोऽपि वदति, भवेऽसिन्याप्रतीयते । चैतन्यमेव तत्सव, नान्यत्किचिद्विभाव्यते ॥ ११५॥ सुदा निरअनः साक्षी, निराकारोऽति शधिमान् । तेजोमयो हनन्तश्व, सर्वज इति निययः । १९९॥ मोमिनाख्यश्च सततं, कृपालु खसमीपगम् । पश्यलेवं खुदाऽहं च, खुदा- हार्यो निजात्मनः ॥ ११७॥ जिसिसक्राइष्टमवं, चतुर्थाकाशकपरि। विराजते सहि, भवात्मा परिकीर्तितः ॥ ११८ ॥ भक्षाय तं प्रपश्यन्ति, तथा भूमण्डलेऽसिले । विख्यातकीर्तिवुद्धोऽपि, स्पष्ट समुक्तवानिति ॥ १९॥ "प्रमैवात्मा" जगत्यस्मिन, प्रत्येक प्रापिनो गुदे । स्थापनीयं च प्रेमवाभेदभाव- समाश्रयैः ॥ १२०॥ तत्वज्ञानस दृष्ट्या तु, दर्शनेन प्रतीयते। जैनो चेदान्त- योगी च, सांख्यबौद्धी तथा पुनः ॥ १२१ । अनुभवं चकतायाः, कुच. न्तीति विभावय । नेतुं वै चैकतायातु, तथानन्दविशद्धये ॥ १२९ ॥ भिन्नं च माधनं कर्नु, मिनधर्मस्वथा पुनः । भिन्नो देश तथा कालो, विभिधा पद्धतिः पुनः ॥ १२३ ॥ मीमांसकैर्विनिर्दिष्टा, विभिन्नं सर्वसाधनम् । मत एव बहिष्टपा, ज्ञायते मतकर्मणाम् ॥ १२४ ॥ भेदाभेदक्रिया सर्वा, तथापि तरिम्यान्चयम् । कुर्यात्वमेदभाव च, भजते प्रेमभावतः ।। १२५ ॥ जनाबा. हुमहामतं, बौद्धासत्पधशीलकम् । , योगे पशामक प्राइ, यमं शमदमादिकम् ॥ १२॥ वेदान्ते प्रवर्तनीयो, नियमाऽपि महात्मभिः। प्रत्येक धर्मनीतिईि; दयापरोपकारिता १२७॥ नादिसामान्यमिवि, सर्वसामान्यनिर्गये । नियमोऽपि गृहस्थानां, तथा धर्मे सुमानता ॥ १२८३ उपयोगितोपभोगब, कुर्वन्तीति निसाम्यताम् । वैराग्यलक्षणं तद्वत्समय तुल्यमेव क ॥ १२९ ॥ सर्व प्राप्य चैकमेवमिति सन्थार्यतां मुहुः । ज्ञानिनां वर्तने दृश्या, जैनानां वर्तनं तथा ॥ १३॥ सर्वामिभिरिलेवं, सम भाव. समानता । स्थापनीया न न्यूनाधिभवितव्या नियमस्तथा ॥ १३१ ॥ प्रवीति * "शमोपरतितितिक्षाप्रदादयः समाधानाः।" "मितिले सम्ब. भूएम"!"बामपसर्वभूतेषु" मिप्रसाई क्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे । यजुर्वेद १८-३ - संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ३१७ नियम चैव, ज्ञायतामिलतः पुनः । सर्व मित्रयदापश्येदात्मवत्सर्व. प्राणिपु॥ १३२ ॥ ज्ञानी जनो निजात्मानं, जीवात्मान तथैव च । एकी- मावेन सम्पश्यैदिति प्राह श्रुतिर्मुहुः ॥ १३ ॥ देहमीमांसकानां च, अने- कान्तिकदृष्टितः । औदारिकं तेजसं च, कार्मणं यञ्च कथ्यते ॥ १३४ ॥ शरीर चैव वेदान्तमवालम्बनतत्पराः। स्थूलं सूक्ष्मं कारणं च, विविधं वर्णयन्ति च ॥ १३५ ॥ सानविज्ञानयोर्यच, कारणं प्रोच्यते युधः । जैना यजामतं स्वप्नं, तुरीयं प्रवदन्ति च ॥ १३६ ॥ वेदान्तेऽपि तथैवास्ति, त्रिधाऽवस्था खरू- पतः । तथा संसृतिमीमांसाहानशाः प्रवदन्ति च ॥ १३॥ मनस: परिणामेन, यन्धो मोक्षो हि जायते । सृष्टिः सङ्कल्पतो शेया, वेदान्तम- तशालिनः ॥ १३८ ॥ मानसिक तु जैनानां, *परिणाममथाऽपि वा। अध्य- वसायं च वेदान्वे, संकल्यं चैकमेव हि ॥ १३९ ॥ प्रत्यक्षं दृश्यते चैकः, साधनाभेदभावतः । साध्यश्चात्मा हि प्रत्यक्षं, ज्ञायतेऽमेद एव हि ॥ १४० ।। अनुभवेऽप्येवमेवं, प्रत्येकं च मुमुक्षुभिः । जीवात्मनि प्रेमभावः, स्थापनीय सदैव हि ॥ १४१ ॥ सर्वावस्थासु सर्वत्र, ममैवास्ति खरूपकम् । पठित्वेदममे- देन, प्रेमैव स्थाप्यता सदा ॥ १४२ ॥ एतत्प्रमाणतश्चात्मानन्दाः साधनानि च । कुर्वन्समन्वयं सर्वाभेदभावेन सर्वदा ॥ १४३ ॥ चलँस्तिष्ठन्नुपविशन्पियन्खा- दन्वसन्खपन् । सर्वक्रियासु सर्वत्र, शुद्धश्चैतन्यरूपवान् ॥ १४४ ॥ अह- मात्मा चेदृशी वै, भावना स्थाप्यता मुहुः । न चेतावद्धि विज्ञानं, भूतमात्र मदीयकम् ॥ १४५ ॥ खरूप प्रत्युतैवं च, ज्ञातव्यं च विशेषतः । ज्ञातव्य प्रतितान्भस्या, प्रेमभावप्रवर्षणम् ॥. १४६ ॥ कर्तव्यमित्थं ये चैव, पुरुषा जगतीतले । स्थापयन्यभेदभावं, वीतरागास्त एव हि ॥ १४७ ॥ पूर्णाश्च कृतकृत्याच, ते सन्ति भुवि चोत्तमाः । वीतरागो देवदेवो, महावीरः प्रताप. वान् ॥ १४८ ॥ धन्योऽस्त्रि योहि निष्पक्षपातेन सुन्दरो मुहुः । मार्गोऽभेदा. स्मको भावो, दर्शितो जनतामुदे ॥ १४९ ॥ विनि.स्वार्थतया यो हि, प्रकटं कृतवान्मुहुः। सत्यखरूप एवास्ति, स एव परतः परः। खतन्त्रत्वस्य यश्वास्ति, द्वारमेतत्प्रधार्य्यताम् ॥ १५० ॥ भावार्थ:-जो पुरुष केवल आत्मा, नन्दमें ही अहर्निश रमण करते हैं, उनको त्रिकाल वन्दना है। इस *परिणामे बंधो, परिणामे मोक्खो।
वीरस्तुतिः।", :.:. अलौकिक विवके मुरम्य और सौन्दर्यपूर्ण दृश्यकी ओर दृष्टि फैलनेपर सष्टतया नजर आता है कि अखिल विश्व आनन्दसे परिपूर्ण है । अर्थात् अखिल विश्व, आनन्दकी अपेक्षासे एकता है। जगदसे उसके धर्म मिन नहीं है, विश्के प्रत्येक प्राणी आनन्दमय है, उन्हें आनन्द ही प्रिय अतः उसीकी इच्छा तन्मय हैं। उस आनन्दको प्राप्त करनेके लिये साधन रूप ही विश्व के धर्म है, और उन धर्नाको प्राणियोंने अपने 'आनन्द के लिये ही उत्पन्न किये हैं, और आनन्दकी अपेक्षा जगतके सब प्राणी समान हैं। तथापि व्यक्तिकी अपेक्षासे यदि देखा जाय तो मनुष्य एक उत्कृष्ट प्राणी है, और वह आनन्दकी अभिवृद्धिके लिये अनेक आकर्षण एवं मुरम्य उपायोंकी रचना करता रहता है। मनुष्यके रचे हुए आत्मानन्दकी अभिवृद्धिके उपायोंमें धर्म ही एक सर्वोत्कृष्ट उपाय है। प्रत्येक प्राणीके अन्तर्गत आनन्दका खरूप समान है। प्रलेक प्राणीके आत्माका सामर्थ्य समान है। प्रत्येक प्राणीका वास्तविक खरूप भी समान है। तब तो इस अपेक्षा साधन रूप धमाका होना भी समान ही ठीक है, और उसके भनु- सार सम्पूर्ण समान ही है। मनुष्य कुछ ऐसा प्राणी है कि वह आत्मा- नन्दकी अभिवृद्धि बहुत जल्दी कर सकता है। इतना ही नहीं बल्कि जो जो मनुष्य आत्मानन्दका अनन्त अनुभव प्राप्त कर चुके हैं वे मनुष्य अपने पीछेसी अर्थात् भविष्यकी मनुष्य जातिके लिये पाया हुआ आत्मा साधन रूप धर्म भूतलवासी मनुष्य जाति के लिये स्मारक रूपसे छोड गये हैं। उस धर्म रूपी उपकरण या सापन द्वारा इतर मनुष्य आत्मानन्दके अलौकिक भानन्दत्वको प्राप्त कर सकते हैं। जगत्के अन्य प्राणी इस प्रत्यक्ष विश्वकी अलौकिक प्रभासे आनन्दित होते हैं। परन्तु मनुष्य संशका प्राणी तो खय निजानन्दमय बन कर उस अपने आनन्द द्वारा अखिल विश्वके अप्रतिभ आनन्दमें मुरम्य तथा उपादेयकी अभिवृद्धि कर सकता है। मनु. प्योंका जो धर्म है वही अलौकिक आनन्दको अभिादि बानगी रूप है। यह सटि अनन्त कालसे अनन्ततत्वके रूपमें क्योंकी यों चली आ रही है, और भुव रूपसे अनन्त तत्वमें अनन्त तत्व रूपसे अलौकिक खरूपमें अनन्त काल तक शाखत सरूपमें ही-सत्य खरूपमें ही अलौकिक आनन्द रूपसे स्थिर और नित्य रहेगी। सृष्टि मीमांस शास्त्री नी यही कथन करने । - संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३१९ है कि यह सृष्टि अलौकिक वस्तु है, और यह नित्य तथा शाश्वत है। इस सृष्टिके अलौकिक सामोसे भरपूर अलंकारोंमें धर्म ही एक सर्वोत्कृष्ट अलंकार है। जगत्में अनेक धर्ममीमासक हो गये हैं, और वे अलौकिक अलंकार रूपसे अपने धर्मविचाररूप प्रसादीसे इस भूतलको अलंकृत कर गये हैं। इन अलौकिक प्रसादियों में इस समय वेदान्त, जैन, बौद्ध, सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा, शैव, वैष्णव, खामी- नारायण, मुस्लिम, इसाई, यहूदी, पारसी आदि मुख्यतासे दृष्टिगोचर होते हैं। इनका तथा इनके अतिरिक्त और और अनेक धर्मालंकारों का हेतु केवल आत्मानन्दको ही प्राप्त करनेका है। सबै धर्मका हेतु एक होकर उनके साधन भी एक ही हो जाते हैं, और वे अलग अलग देश कालपर आधार रखकर अलग अलग रूपोंमें प्रवृत्त हो रहे हैं। जैनका हेतु केवल आत्माका पहचानना और उसे मोक्ष तक ले जाना ही है। वेदान्तिक, वैष्णव, स्वामीनारायण, तथा योगीजन भी यही कहते हैं। जिनमें जैन कहते हैं कि-'एग जाणइ से सम्बं जाणइ' जो एकको जानता है वह सवको जानता है। वेदान्तकी भगवती श्रुति भी कहती है-'आत्मनि विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ।' एक रमाके जाननेसे यह सब कुछ जाना जा सकता है। जैन कहते हैं कि-"अप्पा सो परमप्पा" आत्मा ही पर- मात्मा है । तब वेदान्त कहता है कि-'अहं ब्रह्मास्मि, तत्वमसि, प्रज्ञानं ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म।" 'मैं ब्रह्म अर्थात् परमात्मा हूं' 'तू भी वही है' प्रकर्ष तया सम्यग्ज्ञान ही ब्रह्म है' 'यह आत्मा ब्रह्म है। वेदके चार खंड हैं, इन चारों खंडोंमें एक एक महावाक्य है। 'प्रज्ञानं ब्रह्म' यह कग्वेदका, 'अहं ब्रह्मास्मि' यह यजुर्वेदका, 'अयमात्मा ब्रह्म' यह अथर्ववेदका- और 'तत्त्वमसि' यह सामवेदके यादग्योपनिषद्का महावाक्य है। जैन सिद्धान्तका नियम है कि-"नाणे पुण नियमा आया।" 'ज्ञानमे नियमसे आत्मा है' वेदान्त भी यही कहता है कि-"प्रज्ञानं ब्रह्म' 'प्रज्ञान ही आत्मा है' जैन कहते हैं कि-जन्ममृत्यु रूपक समृति कर्मके द्वारा चलती है, और वे कर्म जड हैं। इन कर्मोका नियामक आत्मा है। यानी आत्मा कर्मजन्य सटिका अधिष्ठान है । वेदान्त कहता है कि--मायाके द्वारा ये जन्मादि हैं और इसका नियामक आत्मारूप ईश्वर है। जैन कहते हैं कि कर्मो- - ।
वीरस्तुतिः। पाधिका प्रलय होनेपर आत्माका मोक्ष होता है। वेदान्त कहता है कि मायो- पाधिका प्रलय होनेपर आत्माका मोक्ष है। जैन कहते हैं कि-आत्मार मोक्ष होनेपर "अपुणरावित्ति' संसारमें पुनरागमन नहीं होता अर्थात् आत्माको फिरसे जन्म मरणके चकमें नहीं आना पडता । वेदांत कहता कि-"न पुनरावर्तते" आत्माकी पुनरावृत्ति नहीं होती। गीवाजीमें भी कृष्णचन्द्रजीने कहा है कि-"यद्गत्वा न निवर्तन्ते, तद्धाम परमं मम" "जहां गये बाद फिर आना नहीं पड़ता' वही मेरा परमधाम है। अर्थात् पर- मात्माके धामको परमधाम कहते हैं या मोक्ष कहते हैं। वहां जानेपर फिर वापस नहीं आना होता । जैन कहते हैं कि-'एगे आया' आत्मा द्रव्य गुण पर्यायकी दृष्टिसे एक है। वेदान्त कहता है कि "एकोऽहम्" मैं एक हूं। जैन कहते हैं कि-"तका जत्य ण विजइ, मइ तत्थ ण गाहिता' तर्क आत्माके खरूप तक नहीं पहुंच सकता, और मति उस आत्माके खरूपको ग्रहण नहीं कर सकती । वेदान्त कहता है कि-"यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" जहाँसे वाणी यापस फिर जाती है वह आरम-खरूप मन द्वारा अप्राप्य है। भावार्थ यह है कि मन और वाणी उस आत्मा का वर्णन नहीं कर सकते। जैन कहते हैं कि-आत्माको सम्पूर्ण या अखंड रूपमें जानने वाले मनुष्य कैवल्य ज्ञानको पाते हैं। वेदान्त कहता है कि-"कैवल्यपदमस्तुते" आत्मा कैवल्य पदका अनुभव करता है। वेदान्त कहता है कि-अखिल विश्व में सचिदानन्द परब्रह्म सर्घश्यापक है। जैन कहते हैं कि-अखिल विश्व में मारने मरता नहीं, जलानेसे जलता नहीं, काटनेसे कटता नहीं, भेदन करनेसे भेदित नहीं होता, और चर्म- चक्षु द्वारा दीस नहीं सकता, ऐसा सचिदानन्द सरूप जीव साभाविकतासे सघन रूपमें भरे पड़े हैं। आकाश, पर्वत, पृथ्वी, नक्षत्र आदि कोई भी स्थान जीवसे साली नहीं है। अर्थात् चैतन्यलक्षणयुक्त जीवकी दृपिये देखनेपर चैतन्यदेव समस्त लोकमें भरपूर है । वेदान्त कहता है कि आत्मा स्वयं सर्वश है, जैन भी यही कहते हैं कि आत्मा अनन्त ज्ञानमय है। वेदान्त कहता है कि ब्रह्म सनातन है। जैन कहते है कि आत्मा स्वयं शुद्ध-बुद्ध आनन्द स्वरूप है और सर्वज्ञ तथा सर्वदशा है। वेदान्त और सांख्यादि भी यही कहते है । वल्लभाचार्य मतप्रवतक कहते हैं कि-निर्दोष. -- - संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता पूर्णगुणविग्रह आत्मतन्त्रो, निश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च हीनः आन- न्दमात्रकरपादमुखोदरादिः सयंघ च विविधमेदविवर्जितात्मा । आत्मतन्त्र अर्थात् मात्र आत्म-स्वरूप निर्दोष है। पूर्णगुण विग्रह है । पुनः जडात्मक शरीर और गुणसे भिन्न है। इस आत्म सरूपके हाथ, पैर, नुस, उदर इत्यादि अवयवोंकी कल्पना करने पर मात्र आनन्द ही है अर्थात् सम्पूर्ण आनन्दमय भेद भाव रहित है। आत्म-तत्वके अवयवोंसे लोकमें की गई कल्प- नामें केवल आनन्द ही इसके अवयव हैं। यह स्पष्टतासे समझमें आ जाता है इस आत्म-स्वरूप में जन्म, जरा और मृत्यु रूपी भेद नहीं है। उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय रूप त्रिविध भेदसे यह आत्म-स्वरूप भिन्न है। जैन कहता है कि-निश्चय नयसे तो आत्मा अकर्ता ही है । सांख्य शास्त्र कहता है कि- "अहंकारः कर्ता न पुरुपः ।" कर्ता, धर्ता अहंकार है पुरुष नहीं, अर्थात् आत्मा कुछ नहीं कर्ता, प्रत्युत अकर्ता है। जैन कहता है कि-"ईश्वर सर्वज्ञ होता है, तथा उसमें राग द्वेष आदि कुछ भी नहीं हैं। योग शास्त्र कहता है कि-"क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुपविशेप ईश्वरः।" क्लेश, कर्म, विपाकके आशयोंके साथ असंस्पृष्ट-अलिप्त है, वही पुरुष विशेष पुरुषोत्तम और ईश्वर है यानी ईश्वरको राग द्वेष क्लेश कर्मविपाक नहीं छू सकते। "तत्र सर्पशवीजं" उस ईश्वरमें सर्वज्ञत्व होता है। आत्मा अनन्त तत्व रूप है। वेदान्त कहता है कि-"सत्यं ज्ञान- मनन्तं ब्रह्म।" ब्रह्म स्वरूप में पाप, पुण्य, सुख या दुख नहीं है । पुनः वेदान्त कहता है कि-"न पापं न पुण्यं न दुःखं सुखं न । चिदान- न्दरूपं शिवोऽहं शिवोऽहं ॥ "मेरा आत्म-स्वरूप शिव है, और उस शिवस्वरूप आत्मामें पाप, पुण्य, सुख दु.स नहीं है, क्योंकि वह सच्चिदानन्द रूप है। जैन कहते हैं कि केवलज्ञानी यहां ही मोक्षका अनुभव करते हैं । इसीसे मिलता जुलता स्वामीनारायण मत प्रवर्तक श्री सहजानन्द खामीका भी यही मत है कि-'अक्षर धाम यहीं है, आत्मा खयं अक्षर वरूप है । जो आत्माको यहाँके लिये भी अक्षरधाम समझता है उसीकी समझ मची है, और जो अक्षरधामको किसी अन्य स्थल आकाशादिने समझते हैं उनकी समझ मिथ्या है। प्रणामीपंथ अर्थात् सीजडापंथ प्रवर्तक महेरात ठाकुर तथा श्री देवचन्द्रजी वीर. २१ .. ३२२ वीरस्तुतिः। अपनी सम्प्रदायको निजानन्द सम्प्रदाय कहते हैं। इस दृष्टिये देखनेपर पता चलता है कि भारतके धर्मात्मा पुरुषोंका सिद्धान्त बात्मानन्दके पानेका ही है । मुहम्मद साहय भी यही कहते हैं कि जगत्मे जो भी कुछ चैतन्य प्रतीत होता है वह खुदाकी रवानी है, गुदा निरंजन, निरा- पार, तेजोमय और सर्वशकिमान तथा सर्वज्ञ है। मोमिन तो कृपाल सुदाको अपने पास ही देखते हैं। खुदाका अर्थ भी खुद ही होता है। जिसिसकाइस्टका भी यही उपदेश है कि चौधे आसमानपर प्रभु विराजमान हैं। वह प्रभु भोंका आत्मा है, और, परम भक उस प्रभुको प्राप्त करते हैं । अखिल भूमण्डलमें सर्वोत्कृष्ट कीर्तिको पानेवाले वुद्धदेव भी स्पष्ट कह गये हैं कि प्रेम ही आत्मा है। भवः जगतके प्रत्येक प्राणीमें अमेद प्रेम रक्सो । तत्त्वज्ञानको रष्टिसे देखा जाय तो जैन, वेदान्त योग, सांख्य, यौद्ध आदि सब एकतावा ही अनुभव करते हैं। एकता पानेके लिये अर्थात् आत्मानन्दमें अभिवृद्धि करनेके लिये साधनोंको भिन्न मिल धर्म भीमांसकोंने भिन्न-भिन्न देश कालमें भिन्न-भिन्न पद्धतिसे समझाया है । अतएर पहिटिसे देखा जानेपर उन मतोकी क्रियाओमें भेद जान पड़ता है । तथापि उन क्रियाओंका समन्वय किया जाय तो वे भेद भी अभेद भाव भने लगते है। जैन जिसे पांच महावत कहते है, बौद्ध उन्हें पाच शील कहते हैं, और योगी उन्हें पांच यम कहते हैं। वेदान्तके शम, दम, उपरति, वितिक्षा, श्रद्धा और समान भी ऐसे ही हैं। परमदंसोंके वर्तन करने योग्य नियम भी अन्तम एक ही हैं। प्रलेक धर्मके नीति, दया, परोपकार, प्रेम आदिके सामान्य और सर्वमान्य नियम भी गृहस्थ धर्ममें समानता तथा उपयोगिताका उपभोग करते हैं। समतादि वैराग्यके लक्षण भी सबमें समान रूपसे ही पाये जाते है। ज्ञानी पुरपोंके वर्तावकी ओर दृष्टि डालते हुए जैनोंका बर्ताव "मित्ति मे सन्य भूयेसु" सब प्राणिओंके याय मित्रा अर्थात् समान भाव रखना चाहिये न्यूनाधिक न होना चाहिये । वेद भी कहता है कि- "मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।” 'सरको मित्रकी दृष्टिसे देखना चाहिये। 'आत्मयत्सर्वभूतेषु' ज्ञानी पुरुष अपनी आत्माके समान सब जीवोंको देखते हैं। देह मीमासकोंकी तरफ दृष्टि डालनेपर जैन मुख्य- संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ३२३ तासे, औदारिक, तेजस, कामेण शरीर कहते हैं। इसी प्रकार वेदान्ती भी उन ही शरीरोको स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर कहते हैं । जैन जिसे जाग्रत, वन, मुपुप्ति और उजागर या तूर्यावस्था मानते हैं, उन अवस्थाओंका वर्णन वेदान्ती भी उसी प्रकार करते हुए सन्तोष प्रगट करते हैं। संसृति मीमांसकोंके कथनको देखते हुए जैन यह कहते हैं कि-"परिणामो वन्धो परिणामे मोक्खो ।" "मनके परिणामसे ही बन्ध और मोक्ष है।" वेदान्ती संकल्पसे सृष्टि मानते हैं। जैनोंका मानसिक अध्यवसाय और परि. णाम तथा वेदान्तका संकल्प एक ही बात है। इन प्रमाणोंसे आत्मानन्दकी अभिवृद्धिके साधनों का यानी धर्मोका समन्वय करते हुए वे सब अभेद भावमें प्रत्यक्ष समाये हुये दीखते हैं। साधन अभेद होनेसे साध्य आत्मा भी प्रत्यक्षमें अभेद ही समझा जाता है, और अनुभवमें भी यही आता है। अतः प्रत्येक मुमुक्षु जीवको प्रत्येक जीवमें प्रेम भाव रखना चाहिये, और सब जगहोंमें ही सर्वत्र मेरा ही खरूप है, यही पाठ पढकर अभेद प्रेम रसना चाहिये । हलते, चलते, उठठे, धैठते, खाते, पीते इत्यादि सब क्रियाओमें शुद्ध चैतन्य आत्म-स्वरूप हूं यही भावना रखनी चाहिये । इतना ही नहीं, बल्कि-जगत्के सब भूत भी मेरे ही स्वरूप हैं। यह जानकर उनके प्रति अभेद प्रेमकी वर्षा करनी चाहिये। इस प्रकार जो पुरुप सब जगत्पर अभेद भाव रखते हैं, वे ही वीतराग हैं, पूर्ण हैं, और कृतकृत्य हैं। धन्य उम चीतराग देवको है कि जिसने निष्पक्षपातसे ऐसा सुन्दर अभेद मार्ग जगत्फे कल्याणके लिये निस्वार्थभावसे प्रगट किया है। सातार्थस्य पदार्थस्य, ज्ञान प्रबोधनाद्भवेत् ॥ १५१ ॥ तदनुवादरूपं हि, विज्ञेयं न प्रमाणता । प्रबन्धस्याथ शास्त्रस्य, निणेनुं यस्य कस्यचित् ॥ १५२ ॥ मचारोऽत्र प्रकर्तव्यो, नान्यथा सिद्धिरत्यते । यथोपक्रमप्रारम्भावुपसंहार- समाप्तिको ॥ १५३ ॥ अभ्यासः स हि विज्ञेयो, यद्विचारं समभ्यसेत् । अपूर्व नूतनं फिधियान्यो विनिरूपितम् ॥ १५४ ॥ फलं मुपरिणाम चाप्यर्थवा- दखयेव च। प्रारयत्नकवास्यं च, सोपपत्त्युपपादनम् ।। १५५ । सम्प्रधा- तिवाक्यं च, प्रतमकरन्दकम् । तदसास्वादनं सम्यक, कर्तव्यं रसतत्त्ववत् ॥ १५६ । कुतरसमखीवास्तु, भव्यमुख्यरसस हि। आसादनार्थमेवान, प्रत्ताध तृयार्दिताः ॥ १५७ ॥ मुवावं द्वितीयाऽस्ति, तश्चेष्टा करणेऽपि च ।
वीरस्तुतिः। प्राप्यते नाऽपि गाणेन, लभ्यते स्वादनं ततः ॥ १५८ ॥ तदेदमपि ज्ञातव्यं, गौणतोपाधिकारणम् । पुदलदैव सम्बन्धाञ्चायते न च वस्तुतः ॥ १५९ ॥ सञ्चित्सुखे तु गौणत्वमेतदर्थमवेश्यते । यदानादिखभावेन, बहिरङ्गत्वमेव हि अन्तरङ्गत्वदृष्ट्या तु, केवलानन्दरूपः ॥ १६० ॥ आत्मानन्तकार्मणवर्गमा सन्धितो भवेत् । 'गुमविकाराः पर्यायाः' पर्यायेण समन्वितः ॥ १६१ ॥ कार्मणवस्तु सर्वन, सर्वदा परिवर्तते । परिवर्तन परं साक्षान्नानुकूलमिदं भत् ॥ १६२॥ तत्रेधाऽनिष्टयोोगश्चान्योऽन्य मिश्रितः स्थितः । प्रत्तरात्मन्यतः संविभावादेव दुःखकः ।। १६३ ॥ सम्बन्धवश्वकाभावानिवृत्तिः स्वस्थ भावना । कार्य करोति सर्वत्र, हेयं सर्व विचारतः ॥ १६४ ॥ सचिदानन्दकन्दरस, सत्तापाथेति बोधनम् । सुगमत्वेन संसिदेद्विपयेऽखिलनान्तिता ॥ १६५॥ अनुमानापमानस्य, करणं जायते ततः। परिणामस्य यस्यास्ति, निमहत्वं ततः स्फुटम् ॥ १६६ । अतो यसिँध कार्मणवर्गणानामवाधतः । अत्यन्ताभाव एव स्थाद्विशुद्ध भगवत्पदम् ॥ १६७ ॥ लभ्यते तद्धि परम, नान्यथा कोटियनतः । परं यत्र देहेन, सहितो भगवत्यपि ॥ १६॥ चतुथ्यमनन्तं च, भाति तद्भगवत्पदम् । अर्थान्सर्वानवीतान्,ि शातव्योऽवश्यमेव च ॥ १६९॥ यस्मिनैश्वर्यवीय च, यशो धर्मच ज्ञानकम् । श्रीवैराग्य तथा मोक्ष, इमे पदसंख्यका गुणाः ॥१७० ॥ समुदायस्य शास्त्रेषु, 'भगसंज्ञा' प्रकीर्तिता। भगवच्छन्दकस्याऽस्य, लक्षणं समुदाइतम् ॥ ११॥ कुण्डिनेशनरेशस्य, सिद्धार्थनन्दनेन च त्रिशलाजवीरेण, त्रिजगहुरुणा मुहुः॥१७२॥ सम्पूर्णरीत्या विज्ञातस्तेन तत्राखि लक्षणम् । इति विवेचनेनैव “वीरस्तु भगवान् स्वयम्" ॥ १५३ ॥ इत्यस्याक्षरशथार्थो, भविष्यति समर्धनम् । निरूपण तथा वस्य, रामेष्यवि विचारतः ॥१४॥ "ऐश्वर्यस्य समग्रमा" इत्यस्यार्थोऽनुकू- लतः। भगवद्धीरदेवस्थ, जन्मकाव्यत्ततो मुहुः । १५५॥ निळणपदप्राध्यन्तं, जन्मकालादनुस्मात् । निखिलस्येतिहासस्य, प्रत्येकं लयुभावतः ।। १५६॥ सिद्धोऽस्वीति महावीरो, भगवानादिपुरुषः । सम्भाप्य पूर्णरूपेण, चतुष्टयम- नन्तकम् ॥ १७७ ॥ अनन्तशक्तियोगेन, सर्वेश्वप्यं तथाप्तवान् । अनन्तवेजा खच, प्रथमयाऽवस्थया मुदा ॥ १७ ॥ सकलैवर्यसत्वेन, युतश्वासीनि. शामय । खजातकपर्यायपूर्ति कृत्वाय नास्तः ॥ १९॥ सोपूर्णथ देवायुः, शरीर वैक्रियं तथा । एवमाहारसम्पूर्ण, कृत्वा रास्याः, मुकुक्षितः संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ॥ १८० ॥ त्रिशलायाः समुद्भय, चतुर्दशक्धिं पुनः । महाखमं प्रदृष्टं च, स्वर्गवृष्टिरसंख्यका ॥१८१॥ जन्मोत्सवं मुराणां चै, शक्रस्यागमनं तथा । विधानुमुत्सवं सर्वे, सुरेन्द्रसेवनं पुनः ॥ १८२ ॥ प्रतिक्षणसपर्यायाः, सामन्या च मुहुर्मुहुः । नेयमल्पस्य वीर्यस्य, वार्तास्ति सुप्रबुध्यताम् ॥ १८३ ॥ खसयमस्य वेलायां, तेनानन्तसवीर्यतः। ऐश्वर्यस्यानुकूलत्वप्रतिकूलत्वयातना ॥ १८४ ॥ इति परिपहं जिवा, सम्प्राप्य विजयं तथा। जिनवं तेन लब्धं, तदाऽसंख्यमुरामुरैः ॥ १८५ । नरैर्नरेन्द्रदेवेन्द्रः, समुत्कृष्टक्षयोपशमात् । एत- आरैव सद्भावाऽनुभवश्च कृतो महान् ॥ १८६ ॥ "वयन्तु भगवान् वीर" इति निश्चित्य मानसे । रागाद्यान्तरिका-शत्रून् , विनिर्जिल विभुर्जिनः ॥ १८ ॥ अतश्चानन्तरूपेण, प्राप्त्यनन्तरमेव हि। भगवद्वौरदेवस्य, समप्रैश्चर्यरूपकम् ॥ १८८ ॥ सुस्पस्टं लक्षणं चास्ति, विवरणत्वं तदाधिकम् । निरूपणत्वमेवं च, नावश्यं तस्य वर्णनम् ॥ १८९ ॥ "समग्रस्य च धर्मस्य", लक्षणं संनि- रूप्यते। तथा साधनसामग्या, धर्मो नाम्नोच्यते बुद्धः ॥ १९ ॥ दुर्गती पतमानं यो, जीवं धारयते मुहुः। स एव धर्मो विज्ञेयो, यतोऽनन्तसुखोद्भवः ॥ १९१ ॥ दुर्गती पवितं तद्वदुदन्तं जीवमिलपि। संरक्षत्युनतिपथि, तिरो भावं करोति न ॥ १९२ ॥ “स चात्मपुरुषार्थस्य, धर्म इत्युच्यते बुधैः।" तदाऽऽत्मपुरुषार्धस्य, धर्मसज्ञा युवन्ति च । एतदृष्ट्या तु भगवान्, सदा वीरो हितावहः ॥ १९३ ॥ धर्ममूर्तिस्तथा साक्षादभूदिति निशामय । “परमेष्ठी परज्योतिर्विरागो विमलः कृती । सर्वज्ञोऽनादिमध्यान्तः सार्वः शास्तो- पलाल्यते ॥” इत्युक्त्यनुरोधेन, भूत्वा सर्वोपदेशकः ॥ १९४ ॥ सच्छात्र- द्वादशाशस्य, गिरा प्रख्यानकं पुनः। विधाय शास्त्ररूपे च, कृतवान् परिणतं मुदा ॥ १९५ ॥ "आप्तोपज्ञमनुहद्धयमदृष्टेष्टविरोधकम् । तत्वोपदेशकृत्सावं, शानं कापयघटनम् ॥" शास्त्रमित्थं च निरवयं, प्रदाय भगवान् जिनः। खीयामृतमयं रूपं, तथेठं सकलं पुनः॥ १९६ ॥ अनेकान्त समात्रिय, अटो- पदेशकैरपि । तथाऽऽदर्शमयाऽनन्तं, चरित्रं नः प्रदर्य च ॥ १९७ ॥ एवं चानुपमं दिव्यं, श्रावकश्रवणाईकम् । गृहिधर्ममनागार, साधुधर्मरहस्यकम, ॥ १९८ ॥ कृतकृत्यं भव्यसृष्टेः, कृतवान् यः समासतः। विनिर्वाणपथादों, भूत्वा भव्यात्मना मुहुः ॥ १९९ ॥ कार्मणवर्गणानां ब, भारमुत्तार्य यनतः। लघूस्वान् कृतवान् सर्वान, वर्धमानो नयान्वितः ॥ २०॥ त्रयात्मकं ययो ३२६ वीरस्तुतिः। द्दिष्टं, रवं नयप्रमाणकम् । तत्वनिक्षेप संज्ञं चे, गभीरत्त्वं महत्वकम् ।। २०१॥ परिपूर्ण तदाऽप्यासीवालधुत्वमहत्वयोः । चतुरसेश वै तवयाल्याने देखने तथा । २०२॥ वर्णनं क्वचिदस्तीह, ज्ञेयमन्यद्विचारणात् । स्थालीपुलाकन्या- येन, प्रत्येकं लघुभावतः ।। २०३॥ किचिन्मुख्यत्वभावेन, दिग्दर्शनमतोऽ- करोत् । निगद्यते पुनः स्पष्टं, भगवद्वीरखामिनः ॥ २०४॥ निर्वाण परमार्थेन, सह व्यवहारिकी दशा) कियदुन्नतिरूपेण, तथा पुष्कलभावतः ॥ २०५ ॥ आसीयतः सहस्रपु, जगत्सम्बन्धमानतः । गार्हस्थ्यजीवनं तेषां, समुज्वल तयाऽस्ति चेत् ॥ २०६ ॥ तत्प्रमागाह भूतं हि, उपासकदशाङ्गके। सूनेऽपि विद्यते तावद्धीमता तत्र दृश्यताम् ॥ २०७ ।। गृहाश्रमे बहुविधे, कार्यादर्शक- रूपिणि । कुर्यन् परिणतं त्वासीत्खयं तच निशामय ॥ २०८ ॥ (१) 'धीरस्तु भगवान् प्रभुः', पितरावभितः प्रति । पूर्व गर्भाशये मातुर्जनकस च सेवनम् ॥ वृत्वाऽथ दर्शनायैवं, सानानुभवतस्तथा ॥ १०९ ॥ सयं प्रतिशो कृतवान् , यावन्ने जननी पिता। जीवतस्ताबदलन्तमर्हहीक्षां मुसंयमम् । योगाभ्यामं न चाहं चे, खोकरोमि कदापि हि ॥ २१०॥ यतो मे जनको माता, मोहदृष्टया- नुरागवान् । न तु समतया रया, इति चिन्तापरोऽभवत् ॥ यतोऽहमनयो. 'रमत्वे, संन्यासं संयम प्रतम् ॥ २१॥ चरिष्यामि प्रसगेऽपि न देयोऽप्य- नयोर्नयः । हृदये पुनराघातः, स्यान्महानिति मे मतिः ॥ २१२ ॥ दुःसाध्य च भवेतस्मात्सर्ने चेतसा कुतः । जीवनस्याऽनया रीया, ससारसार्वदेशिकी ॥२१३॥ घटनयाऽनया शिक्षा लभ्यते नो निशामय । पित्रोराज्ञां विना तवदीदासीन्यं न कहिचित् ॥ २४॥ कोऽपि लावा गृहारम्भ, मुनिचर्या न धारयेत् । घटनयाऽनया वेषां, यदाज्ञापालनं तयोः ॥ २१५॥ विताया- वश्यकत्वेन, सेवायाश्च कियत्फलम् । संसाध्य दर्शनं तस्य, मौलिक च विभावयेत् ॥ २१६ ॥ तीर्थकरोऽपि भगवान् , प्रथमें जीवनेऽपि यत् । सेवाधर्मस्थापन चे, कुल्वे विश्वभावनः ॥ २१७ ॥ कया कि च वीरस, स्वामिनवेदमद्धतम् । आदर्शरूपं सेवायाः, पितृणा किमनल्पकम् ॥ २१८॥ महत्वं विषयवास्ति, • सूक्ष्मदृष्ट्याऽवलोक्यताम् । प्रतिज्येष्ठं प्रातरं च, अत्युमोदारशीलता ॥ ३१९ ॥ नन्दीवर्धननामानं, भ्रातरं भगवान रहः । एकस्मिन् दिवसेऽवोचन, मदीयोऽ. 'मिमहोऽधन्य । समाप्तोऽभूयत वाय, भवदाज्ञां प्रगृह्य च ॥ २२०॥ दीक्षितेक्षा करोम्या, वदा ज्येष्ठोऽब्रवीद्वनः । निर्मोहे व प्रभु शत्या, खयं तु मोहमीडितः संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ।। २२१ ॥ भवन्तं ज्ञायते शुद्धं, वर्गारोहणयोगतः। पितुर्मानुः स्फोटकोय, लवणक्षेपणैः समः ॥ २२२ ॥ भविष्यति न सन्देह, इति कृत्वा दयां भवान् । मदीयकवनेनैव, समुपित्वा गृहे पुनः ॥ २२३ ॥ अब्दद्वयसुपर्यन्तं, दर्शनार्ध- मुदारताम् । दर्शयेचन्महान् देवानुग्रहः स्यान्मयि प्रभो । ॥ १२४ ॥ तथैव भगवान् वीरः, कृतवान्नान्यथा क्वचित् । भ्रातुः पूज्यतमस्थापि, चेच्छया वापि मम्मतः ॥ २२५ ॥ त्यागोऽनुकूलगमनं, नोचितोऽथ निवृत्तितः । तथापि भगवान् वीरः, स्वयं च जगदीश्वरः ॥ २२६ ॥ ज्येष्टो भ्राता दर्शनेन, विनयेन च तोपितः। तद्वच मुखिनः कृत्वा, ज्येष्ठधातुः मुसेवनः ॥ २२७ ॥पाठोऽपि पाठितस्तेन, वर्पद्वयमभूद्गही । भ्रानुराज्ञानुरोधेन, दीक्षाऽपि नैव धारिता ॥ २२८ ॥ एवं संयमसंकल्पं, हित्वा निर्वाणदं ध्रुवम् । प्राशुकमोजी भूत्वा च, गृहमेवाश्रयत्पुनः ॥ २२९ ॥ धन्योऽसि ! भगवस्त्वं हि, नाऽप्रसन्नः कृतोऽ- नुजः। अतः पाठमिमं लोक, खयमाप विना श्रमम् ॥ २३०॥ भगवद्वी- रवत्खस्य, भ्राता पितृसमः स्मृतः। इति ज्ञात्वा सेवया च, सुखिनं तं विधाय च ॥ २३१ ॥ सन्तुष्टत्वेन संस्थाप्यस्तथा मान्योऽनुजो मुहु.। वेऽपि रक्ष्याः प्रयनेन, धर्मोऽयं व्यावहारिकः ॥ २३२ ॥ तहाईस्थ्ये च वैराग्यमष्याविंशति- सख्यक । वयस्यैव मुसम्पन्ने, पित्रोः खर्गतयोस्तदा ॥ २३३ ॥ तदा वर्पदयं स्थित्वा, गृहेऽध्यात्मस्वरूपके। चिन्तनं योगिचर्यायाः, समारम्भोऽप्यकारि च ॥ २३४ ॥ वेनास्माद्योगतः सम्यग्बोधिता दीक्षणेप्सव. । दीक्षाधारणतः पूर्व, गृहिधर्मे समभ्यसेत् ॥ २३५॥ विशेपतो योगचयां, यया विशदया सदा। चर्यया च सुभाविन्या, स्यानिवृत्तियथाकमम् ॥ २३६ ॥ इत्यं तस्याः स्वयं शानं, जायेत तदनन्तरम् । सहिष्णुतायास्त्यागस्य, भवेज्ञान तथा पुनः ॥ २३७ ॥ अद्यावधिकियजातमुदारोत्तीर्णता यदि । अभिप्रायोऽस्ति मे चाय, सच्चर्यायां विपाकतः ॥ २३८ ॥ भूत्वा दृढस्वतः पादौ, धर्तव्यस्साधुसाधने । न तु पूर्व ततश्चैदे, विज्ञानां गतिरीहशी ॥ २३९ ॥ (३) राजनैतिक- शिक्षायाः, शिक्षको यत्र कालके। अमालनृपतीनां च, पुत्राणां भूभुजा पुनः ॥ २४०॥ यदाऽभूज्ज्ञानमेत्तद्धि, नरजसिद्धार्थयत् । महिष्या त्रिश; लयाऽदर्शि, सप्रश्वतुर्दशविधः ॥ २४१ ॥ यौवने सार्वभौमश्थ, चक्रवर्ती भाव- प्यति । एतदृत्तान्तश्रवणाच्छ्रेणिकेन्दुप्रद्योतनौ ॥ २४२ ॥ दविवाहनप्रभृतिराज- पुत्राः समागताः । भगवद्वीरसेवायां, सलमाश्च मुहुर्मुहुः ॥.२४३ ॥. क्षत्रिया- ३२८ धीरस्तुतिः। होचिता सेवा, ततोऽतिरिके शिक्षणे । प्रत्ता भावुकत्वात्ते, सुश्राद्धोषित- कम्मणि ॥ २४४ ॥ तेभ्योपि भगवान् वीरो, गृहस्थक्षात्रोरपि । बोधयित्वा च सद्धर्म, सदैवान् सम्प्रयुज्य च ॥ २४५ ॥ व्यवहारेऽथ न्याये च, निपुणत्वं सधर्मणि । नियुक्ता राजपुत्रास्ते, चान्तरणखभावतः ॥ २४६ ॥ जाताव- बोधखेनायं, धर्मधीचतुरन्तकः ।। चक्रवती तथाऽयं हि, भविष्यति न संशयः ॥ २४॥ तनिरीहविचारोप्रात्तान्प्रतिवर्णवद्गतः । प्रभावस्तेन ते सर्वे, सराज्ये सुफलप्रकम् । परिग्रहे च सन्तोपं, प्राण्याऽऽगता यथायहम् ॥ २४८॥ राज्यशासनकर्मादौ, दक्षं प्रसासको हाभूत् । प्रजारक्षणनिष्ठावान्, भूत्वा तद- वनं कृतम् ॥ २४९ ॥ "दमनं तु शठाना चावनमराठानां तथा । समाश्रितानां भरणं, राज्यचिदमिति स्मृतम् ॥ २५० ॥ चरितार्थमेतदुक्तेः, करणे जातं निरन्तरम् । अथातः सम्प्रपश्यामि, वार्षिरुदानमुत्तमम् ॥ २५१ ।। अथ सांवत्सरिकदानम्-दीक्षाधारणतः पूर्वमेकवर्पप्रमाणतः। त्रिंशद्वर्ष- समारम्ने, जिताचारमुभावतः ॥ २५२ ॥ निरीहत्वेन यहानं, दीयतेऽनुपकारिणे। इत्यादिदानधर्मस्य, प्रारम्भं कृतवान् मुदा ॥ २५३ ॥ वर्षावधि मुभव्येभ्यो, मानवेभ्यः प्रदत्तवान् । पुलावेन दानं यत्सर्वे तेनाऽनृणाः कृताः ॥ २५४ ॥ केऽपि कस्यापि न जाता, ऋणिन इति मुप्रथा। तथा पुरलवर्गे च, ममत्वं तु पाकृतम् ।। २५५ ।। रीसाऽनया पुनस्तेषां, न मोहस्मृतिविभ्रमः । न जातं च ततश्चेयं, शिक्षा नः स्थापिता पुरा ॥ २५६ ॥ नीत्वा संन्यासमैश्वर्य, भौतिकाच तथैयती । समुत्तीर्य पदार्थात्तु, यतो भाविनिकम्मणि ॥ २५७ ॥ नात्मावरोधो जायेत, तथारम्भपरिग्रहात् । निवृतोऽप्रतिवद्धश्च, भूत्वाऽध्यात्मन्य- मायया। ततो विलीनो भावाञ्च, भवेदन न संशयः ॥ २५८ ॥ अथ शैशवे निर्भयक्रीडनम् । वस्तुतोऽन्तकपर्यन्तं, निर्भयत्वेन संस्थितः । पर भयं म बाल्येऽपि, कृतवान् स कदापि हि ॥ २५९ ॥ विपान्वितोरगं रजमिवो- त्याप्य प्रक्षिप्यते । श्वापदाजीवरघांच, सदासज्ञान्खतेजसा ॥ १६० ॥ करोति स्म भवन्तं च, दृष्ट्वैव दूरभावजन् । महतो भयङ्करान्देवानमुरान राक्षसाखथा ॥२६१॥ बलिनो विद्विषखड्दनायासेन लीलया । विजिल जयमामोति, संशयं नान कर्हि चित् ॥ २६२ ॥ अथावोधाभीरकप्रकरणम्-अयोधा भीखन्यानां, गोमहिष्यादिचारिणाम् । कस्सिन्देशे च तेषां वे, संज्ञा पाली' ति कथ्यते ॥ २६ ॥ बसद्भिर्मनुजैः साकं, मुधैव बहुधर्षणम् । अज्ञान संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ३२९ क्रोधकरणं, क्षेत्रविध्वंसनं तथा ॥ २६४ ॥ प्रतिद्वन्दिनामिदं कर्म, वेषां मुगम- मस्ति हि । ध्यानममो बने संस्था, कायोत्सर्गे व्यवस्थितः ॥ २६५ ॥ तत्क्षणेऽ- शानावस्थाथ, रजुभिस्ताडयन्ति च। निर्माय तस्य पार्वे तु, चुरिहको पायसं यदा ॥ २६६ ॥ पाचयन्ति क्षणे तस्मिन् , तापयन्सग्नितस्तथा। म च वीरतया सर्व, सोढवान' च दु.सभाग् ॥ २६७ ॥ एकमेव कोप्यबोधो, विनोदेन शला- कया। वंशस्य तीक्ष्णया कर्णे, भेदितो रसधारया; आठतथ ततः काये, दुर्वलत्वमजायत । तथाऽप्यनुप्रहस्तस्सै, कृतसेन महात्मना ॥२६८ ॥ नानिटं प्रोतवाँस्वस्म, फिश्चिदपि च दु.सतः । दृष्ट्या समानया तद्वत्समभावनया तथा ॥ २६९ ॥ यातना सहनशीलोऽप्यभूदादित एव सः । ध्यानावस्था रखा जाता, मानसीत्तिरीदनी ॥२७॥ मेस्वत्तस्य साता, ध्यान रत्तिः मुनिश्चला । सागरवच गम्भीरा, सूर्यवत्सा प्रकाशिका ॥२१॥ सहिष्णुता समुत्पन्ना खर्गेऽपि तत्पशंसनम् । सभायां शक इन्द्रोऽपि, प्रशंसां कृतवान्मुहु- ॥ २२ ॥ दुर्विदग्धाः सभायां ये, शानशून्याः मुराखथा । विश्वास नैव कुर्वन्ति, दर्शनां- शेन वर्जिता ॥ २३ ॥ देवानासहस्राणि, गृहीत्वैकः समाययो। परीक्षार्थ भगवतः, संगमथाब्रवीत्सुरः ॥२४॥ "ध्यानव्याजेलादि" चेति, वाक्य तद्विबुधाधमः । ध्यानं तु केवलं देव । व्याजमानं प्रदर्श्यते ॥ २५ ॥ नेने सम्मील्य भगवन् ! प्रिया कामपि ध्यायसे । देव! त्वदमे कामोऽपि, हावभावमु. विभ्रमः ॥ नियः कटाक्षपातं हि, कुम्वन्ति स ननोहरम् ॥ २५६ ॥ किचिदु- न्नील्य नेनेच, दृश्यतो नो जगत्प्रभो! कामयाणार्दिताम्तास्तु, सम्पीय हृदयं मुहुः । स्थिताः क्षिप्रं गृहीत्वैव, बाहुं खवशमानय ॥ २७७ ॥ भवान् दयालुः पदकायरक्षणे सम्प्रवर्तते। पर नो मन्मयो देव ! सन्तापं कुरते रहा। तत्प्रवीकारहेनुथ, भवानेव हि दश्यते ॥ भवो वयं भगवतः, शरणं च ममा- गताः ॥ २८ ॥ वचनार्थमतः खामिन् । तवा पविता वयम् । देहि नो स्थान भगवन् । शारवा त्वां दिकृपानिधिम् ॥ २७९ ॥ शरणागता इति ज्ञात्वा, दीनानां त्राहि मारतः । महान् खेदस्य पिपयो, यम या रक्षतीवर! ॥२८॥ न किषिच्यतेऽस्माकं, न चोत्साई प्रीयते । पाता भूत्वा न कुरुते, रक्षामपि दयापरः ॥ २१॥ मुस्सष्टं सायवेऽनेन, सिध्याननिये भवान् । वर्षवखे वयं कुर्मः, सेवा न त्वं प्रसीदति ॥ २८२ ॥ कन्टे ते न यूयऽपि, चलते किमतः परम् वयं पराजयं मत्वा, सातवन्तसतोऽपिम् ॥ २८३॥ नान्यो- वीरस्तुतिः। तिनिपुणवरो, कटोरहृदयोऽपि च । त्वत्समो नास्ति संमारे, परिपको दया. निधे ॥ २४ ॥ एवमुक्त्वा चालयन्तो, म्यानादुद्धिनमानसाः । समाश्रित्य स्खमार्ग ता, गता ससदन प्रति ॥ २८५॥ अतोऽस्माकमियं शिक्षा, सामा- यिके च संवरे । प्रापधे प्रतिक्रमणे, समाराधनके क्षणे ॥ १८६॥ रचनीये दशी चर्या, यतः स्यादचलाऽनपा । भूत्वा विपयतस्तद्विजयःस्वादनुक्रमात ॥ २८७ ॥ इत्युपदेया सजातो, शायतां मनसा हृदा । अथ शरणागतान् रक्षणम्-अथार्ताभ्छरणापन्नान्प्रति बीरस्य सद्गुरोः। छावस्था त्यागपरं, निष्कामजीवनं ततः ॥ निर्वाह्यति ससारे, तपश्चर्यानतेन च ॥ २८८ ॥ आताः सन्तापित्ताश्चान्यैर्यदा तरछरणागताः । वेषामाव्हानमादी हि, रणोति च यथा. थतः ॥ २८९॥ तस्का ध्यानं तपश्चर्या, ठेपो रक्षा कृताऽनिशम् । महतोऽ- साध्यकष्टाच, मुरक्षयति तान् श्रमात् ॥२९० ॥ स बर्मेन्दो हि शक्रस्य, पपमानं विधाय वै । पलायतोऽशनिपाताधनाथं च तस्य हि ॥ २९१ ॥ शरणं पादपद्मस्य, समागल खनीवनम् । शक्नोम्यहं न जेतुं तं, टेनेत्युक्तं यदा प्रभुः । ततो रक्षितवाँस्वं च, वीरः सदयवान् जिनः ।। २९२ ॥ एकदा मगधे देशे, मस्करीस गोद्यालकः । यदा तत्पृष्टगो जातो, वीक्ष्यमेकं तपस्विनम् ५२९३ ॥ परस्तु वृक्षशाखा, लम्बमानमधः शिः 1 फरवोर्ध्वपादं यशोय, तप- स्वपति नित्यशः ॥ २९४ ॥ तजटाजूटतो यूका, निस्सृत्य पतिता भुवि । तदा ता दयया युक्तः, पुनः खकचमण्डले । स्थापयति च तं दृष्ट्वा, गौशालय प्रहस्य वै ॥२९५५ उवाच नेहशो दृष्टो, यूकाशय्यातरस्वथा । इति दुष्ट- खभावेन, अवज्ञा कृतवान्पुनः ।। २९६ ।। गरुं प्रति च शायं वे, कुर्यादिति विचार्य च। कोपावेशसमाविष्टस्तपखी खतपोवलात् ॥ २९॥ नेत्रद्वारेव प्रति तं, तेजोमातीक्ष्णरश्मयः। पातिता येन तडितो, यातनेवाविदुःसहम् ॥ २९८ ॥ प्राप्य दुःखं ददाहायो, खरमन्देन पाह च । शरणागतं च मो नाहीयेवं वाचं जगद सः ॥ २९९ ॥ तदा पितामहश्चैव, दयां कृत्वा खत्रतः। हिमवच्छीतम टेश्या, तस्योपरिप्रक्षिप्तवान् ॥३०॥ तमनाथ मृत्युपाशान्मुक्तवान् कृपया मुहुः । विभो। त्वं हि धन्यतरस्त्वदीयेयं कृपा मयि ॥३.१ ॥ न कृत्रिमा वास्तविकी, स्फुटं मे सुप्रतीयते । श्रीमद्भगवतश्चैदं, चोत्रं शिक्षणप्रदम् ॥ ३०॥ प्रविष्टमिति तचित्ते, पदकायप्रतिपालकम् । संकटान्मोचनीयं च, प्रथमं चोपदेशनम् ॥३०३ ॥ कृतवाश्च स्वयं साक्षा- - संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता मृदये चावधार्य्यताम् । अपुनरास भावस्य, पन्था तेनैव दर्शितः ॥ ३०४ ॥ अथ मनुप्ययन्मूकपशुरक्षणम्-मनुष्यवन्मूकपशूनरक्षयत्वयं जिनः । यदा हि वाममार्गाणां, प्रसारमधिकं ह्यभूत् ।, तदा वे दयया हीना, न्याजाद्यज्ञाच कोटिशः। पशवो बहवस्तैश्च, हता मूका निरागसाः ॥ ३०५॥ तस्मिन्काले च शमिना, घातकास्ते तपोबलात् । अवरुद्धाय वीर्येणानन्तशक्या तथा पुनः ॥ ३०६ ॥ न हन्तव्या न हन्तव्या, घोपणेयं मुहुः कृता। अवरुध्य भीपणं काण्डं, ससारस्थितप्राणिनाम् ॥ ३० ॥ रक्षिताथानन्तजीवास्तथाऽसिधात- नादपि । तस्यायमुपकारस्तु, धर्मोऽयं च पुरातनः ॥ ३०८ ॥ मुद्राङ्किताः कृता- स्तेन, तत्स्मृतिवर्ततेऽधुना । महोदयो बालगङ्गाधरतिलकसंशकः॥३०९॥ नेता श्रीभारतस्यासीद्धन्यवादं प्रदत्तवान् । जनसमाजवृन्देभ्यो, नैतचा- ल्पमहत्वकम् ॥ ३१ ॥ अपकर्तृपशूद्धारो, मनुष्य इव सत्कृत । हिंसकादेरप- कर्तुः, पशोरप्यपकारणम् ॥ ३११॥ सदोपेक्षव सद्भावा, कृता तेतिति संस्फुटम् । हिंसात्तिरतानां तु, पशूनां वृत्तिपाशवीम् ॥ मोचयित्वा समाधेश्व, दत्वा चोधमनामयम् ॥ ३१२ ॥ सदाचाराधिकार च, ददाति म न संशयः। यथा चण्डकौशिकेन, विपाकान्तमहोरगे ॥ ३१३ ॥ वेदना दंशजा शश्वच्छान्त्या सर्व विशोढवान् । कृपया तं च सन्मार्ग, सदाचारे तथा पुनः ॥ ३१४ ॥ स्थापयित्वा प्रबोधेन, श्रीमुखेन च भाषितम् । चण्डकौशिक ! धुध्यख, शान्तियुको निशामय ॥ ३१५ ॥ शब्दा एवं प्रकयिता, नरकायेन रक्षितः। पतनतोऽवनं जातो, जगद्गुरुप्रसादतः ॥ ३१६ ॥ शान्त्यैवं मुवोधितोऽपि, मुप्तावस्थां गतोऽप्यसौ । क्षिप्त जागरितो बुद्धो, विवेकसमशक्तितः ॥ ३१७ ॥ साधयति स्म कार्य च, कि मया भूयतेऽधुना ॥ एवं विचारितस्तेन, कि शब्दोऽयं कृपामयः ॥ ३१०॥ पूर्णा दया च तस्याऽस्ति, न वा चेति विचार्य्यते । एतद्वाक्यकदम्बानां, न जाने खाशर्य पृथक् । एतद्रुधिरपानेन, सितां च शर्करा- मपि ।, तिरस्करोति स्वादेन, नो लब्धा चेदृशी मया ॥, ज्ञाते मयाद संचारः, शान्तेरस्य च नाडियु ॥ ३१९ ॥ आगा नामापि नास्त्यत्र, मृत्युभयस्य का कथा। परमस्ति क्षमायास्तु, पराकाष्ठेति धारय ॥ ३२० ॥ अपकारकारि. यपि, क्षमा साभाविकी कृता । आवश्यकाधिकानन्ता, शान्याख्यकवचोपरि ॥ ३२१॥ सन्मार्ग मा च ह्यानेतुं, कियच्छाप्यो महानपि । समालोचनपूर्व हि, तस्सै खदर्शनं वभौ ॥ ३२२ ॥ जातिस्मृतिकं सजातं, ज्ञानं गतजन्मस्मार- T ३३२ वीरस्तुतिः। कम् । कोदोऽयं चातिपापात्मा, सच्चारधाच नां पुनः ॥ ३२३ ॥ पावितवाना योनी, निकृष्टययामिति स्थितिः । जन्मत्रयेणात्र बद्धो, विभो । वन्दिगृहाच माम् ॥ ३२४ ॥ भीपणायंत्रणाच्छौधं, मोचय मामिवि प्रार्थना । प्राप्य चैवं विसंवाद, विवेकपद्धतिं गतः ॥ ३२५ ॥ सम-संवेद-निर्वेद, यलाध्यात्मकं रसम् । पियनाते मुखेनैव, आयुरन्तिमकान्तकम् ॥ ३९६ ॥ वासोट्या- सकार्यन्तं, परमुत्कष्टसमाविना । सल्लेखनायाः प्रारम्भ, कृतवान् शान्ति- तत्परः ॥ ३२७ ॥ अभ्यस्खपारीणमहानागः पञ्चमके दिने । मृत्वाऽटम सहसा- रखातिधिरजायत ॥ ३२८ ॥ धन्योऽस्ति भगवस्त्वं हि, पशूनपि मनुष्यवत् । श्राद्धधर्माविकार च, दत्वा वेभ्योऽपि तान्पुनः ॥ ३२९ ॥ मध्यात्मस्तथा चके, भाबुकानथ भावतः । घटनयाऽनया सर्ट, सिद्धं जातं पुरातनम् ॥ ३३० ॥ यथा मम प्रियाः प्राणास्तथाऽन्येपो हि देहिनाम् । इत्युकेन प्रका- रेणाऽहिंसाणुवतधारणे ॥ ३३१ ॥ "क्रोधाद्वन्धच्छविच्छेदोऽधिकभाराधिरोप. णम् । महारान्नादिरोधश्चा, हिंसायाः परिकीर्तिता" । जीवानस्थापितवाटोके, तेभ्यश्चात्मतपोबलात् । शिक्षामप्यालयोगस्य, दत्ताभ्याययोगतः ॥ ३३२॥ यहस्से भवतो मुक्ता, पशूनामिति शयताम् ॥ अधास्पृश्यानामुद्धारम्- पतितोऽस्पृश्यकोद्धार, इति सिद्धान्तभावनाम् । संस्थाप्य सर्वजातीना, मनु- ध्येपु स्वयं प्रभुः ॥ ३३३ ॥ नुल्यधर्माधिकारय, सुप्रदत्तो विधानतः। "दो भवति धर्मात्मा, शश्वच्छान्ति नियच्छति" इति कृत्वाऽनुपादं च, उच्चावव- विभागशः ॥ ३३४ ॥ स्पृश्याऽस्पृश्यविचारस्य, संसारात्स्थानमुद्रतम् । स च निर्मलसङ्घ खे, 'हरिकेशबलो' यथा ॥ ३३५ ॥ जाला चाण्डालयोनिस्यो, मुनिसने स्थानमातवान् । ऐतिहासिकदृष्ट्या तु, शासनेऽयापि तस्य हि ॥ ३३६ ।। उत्तराध्ययनसूत्रेपु, सुवास्यारवेण च । दृश्यते भूयवे चापि, तन हेतुर्य पुनः ॥३३७ ॥ यथा 'वेन्दुई देवोऽपि, तदपारां भकिमकृत । तस्सेदमेव मन्तव्यं, गुणस्थानप्रतिक्षणम् ॥ ३८॥ यथ कथ समारूढो, न शेषं तस्स पातकम् । यद्गुणस्थानसंधिस्तरोतरभावतः ॥ ३३९ ॥ मह वावच निर्वा- यांपुनरावृत्तिसनिधिम् । गतोजो धार्मिके तद्द्यावहारिको पुनः ॥ ३४०॥ नो विचारोऽस्ति जालादेः, कहिचित्सन्धिनाऽनया । शासनस्य ध्वजावया, सौकरः पशुपातकः ॥ ३४ ॥ जातीयस्थाप्यभेदेन, विधामो मिलितखतः । भारोऽयं वस्य विज्ञेयः, शुश्यावश्यस बन्धनम् ॥ ३४२ ॥ शिथिल प्रदायैर्व, - . F संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ३३३ समूलं तद्विनाशितम् । प्राचीनव्यवहारस्य, सन्मतेन स्थिर पुरा ॥ ३४३ ॥ विश्वाखिलावतारस्तरेवं निर्वहणं कृतम् । यथा शासनपतेवीरभगवतः शास- नादनु ॥ ३४४ ॥ अयं सारतरश्वत्थं, विचारस्य हृदा पुनः । अथ शभ्रूणामुप स्वपि-परोपकारिता-शत्रु प्रत्युपकारस्य, करणे रक्तास्वयं प्रभुः। सनमः शूलपाणिय, व्यन्तरीकटपूतना । दानवैः पशुभिश्चैवोपसर्ग च महत्कृतम् ॥ ३४५ ॥ इति शत्रुगणैर्दत्तां, यन्त्रणां दारणा तथा । सहित्वा साम्यभावेन, कृतं परिपहे जयम् ॥ ३४६ ॥ पण्मासान्तं च सततं, ददन्फष्टं महाऽमुरः । तदाऽवस्थगितो भूरवा, हारितः स गतस्तथा ॥ ३४७ ॥ तदा तजयनाम्भोजा- दश्रुविन्दुद्वयं त्रिकम् । पतितं च यथा न्याये, इत्यवेहि च मानसे ।। ३४८ ॥ "कृतापराधेपि जने" इत्याद्युक्तं पुरैव च । अभिप्रायोस्ति तस्यायमपराधगुरुस्तथा ॥३४९ ॥ पात्रोऽयं सच्चितस्यास्य, कुत्सितस्य च कर्मणः । भावि तत्परिणाम हि, कथं सश्यति कुत्र वा ॥ ३५० ॥ दुस्सहं यद्भवेचैतदेतदर्थं निशामय । अहो विज्ञायते चाद्य, शत्रूपरिशिवस्पृहाम् ॥ ३५१ ॥ कृतमाध्यस्थभावेनौदार्य- गाम्भीर्य्यशौर्य्यकम् । इति गुणसमूहानी, वैलक्षण्यं क्षमा वरा ॥ ३५२ ॥ महिमा चेति नान्यस्मिन्वीरागिने प्रदृश्यते। अनार्यदेशेऽपि तथा, विहारो भ्रमणं तथा ॥ ३५३ ॥ निरन्तर नावरुद्ध, धर्मात्मसदृशं मुहुः । दर्शनम- नार्यस्पेभ्यो, धर्मकोटिनयाय च ॥ ३५४॥ म्लेच्छदेशेऽपि तस्यासीदनि- वायंभ्रमणं मुहुः । तमाऽपि च भवन्तं हि, कश्चिजानाति दूरग ॥ ३५५ ॥ देशान्तरस्थं कश्चिन्च, भेदकं तस्करे तथा । ज्ञात्वा नन्ति च वघ्नन्ति, कूपाधी लम्बयन्ति च ॥ ३५६ ॥ केचित्तच्छरीरे च, मृगयारसिका मुहुः । सारमेया- नवोधाश्थ, लगयन्ति च ते पुनः॥ ३५७ ॥ खतीदणनखाघातदन्तश्च तच्छ- रीरके । क्षतं कुर्वच जाताते, सशश स्थगिता रहः ॥ ३५८ ॥ परं स्वयं स गिरिवदचलोऽभूवनीतले। तथाऽधमा नराश्चदं, दृष्ट्वा धैर्य सहिष्णुताम् ॥ ३५९ ॥ प्रभावाद्भाविता भूत्वाऽऽथर्ययुक्ताश्च तेऽभवन् । ततः पराजिता जाताः, पतितास्तत्पदाम्बुजे ॥ ३६० ॥ ततच श्रद्धया जैने, भूत्वा श्रद्धालवी मते। महावताऽणुव्रतयोलीनाः संसाधने मुदा ॥३६१ ॥ अनन्ता यातना भुस्त्वा, मिथ्यावादिष्वनायकेष्वनिवार्यजनेष्वत्र, जैनधर्मस्य चोत्तमाः ॥ संस्कारः स्थापितस्तेन, सत्यं सलामहात्मनाम् । कठोरहृदयानां च, लन्धवान् विजयं तथा ॥ ३६२ ॥ चर्ययाऽनया नश्च, शिक्षा सजायते परा। भगवतो वीर- वीरस्तुतिः। देवस, सुपुत्रो निभयो भवेत् ॥ ३६३ ॥ अनार्यमविना सबलोकानां वीर- सामिनः। धर्मेऽप्यनादिसद्धेऽपि, गत्वा च प्रसरेदिति ॥ ३६४ ॥ तमायोध- नरास्तद्वद्धम्मसत्कर्मवचिता । प्राणिनो चे च तत्रापि, धर्मोऽनकान्तिकस हि ।। ३६५ ॥ संस्थापितो मूलतराव धोवीरस्वामिनः । मुधर्मस्याप्यनुगामिनः, कृतवान्स दयापरः ॥ ३६६ ॥ हयादिदमहं पश्ये, मदीया मुनिनातरः! न दत्तं ध्यानमत्रापि, कदापि न हि सम्मतम् ॥ ३६५ ॥ भूत्वा प्रत्युतदेशस, प्रामस्य नगरस च। पिण्डोलको मोहरशे, ममतार्या प्रमादके ॥ २६॥ कृत्या कलङ्कितं खं च, नोचितं म्हाना गतम् । तत्रैतत्कारणं देयं, शर्थनाथ मुनेरिदम् ॥ ३६९ ॥ वाराणसीवि पार्श्वस्य, क्षेनं भगवतः परम् । चीरस्य कुण्डिनपुरी विख्यातं मगधे पुनः ॥ ३७० ॥ विहारशरीफनानप, मण्डले वर्तते च या । पुस्मरत्वेन नायातं, मुनिभ्रमणमित्यपि ॥ ३७१ ॥ धर्मप्रचारः श्रवणे, नायातच यदानये । भगवतो वीरदेवस्थ, चकहितकाम् ॥३२॥ शासनस्य प्रचारः स्यात्तदा किं कारणं बद । तच्छासनसयसर्थ, नाग्नि तसच पूज्यवान् । प्रमचा ये जनाधारॉलजन्मभुपि मानवाः ॥३१॥ तेषु धर्मरसमेऽपि, न भवेरिति चिन्तने । सोचनीया मुशय, समय- भ्रातरः । एतदुमतियालेऽपि, भवन्तक्षेन्मः परम् । अनं तस नोदना, यद्यस्ति परिचयो महान् ॥ ३४॥ सातम्यं भवतां नाम, संनश्यति गजेन्द्रवद । अतो हि विदुषां तदस्कियाऽऽपसमुनीनपि ॥ ३५ ॥ युधरम- प्रतिक्षाना, वक्तृणां सर्वसम्मते। व्याख्यानवाचस्पतीनां', संन्यारापारिणा तथा ॥ ३६॥ चिन्तयामि सदा सम्यक्सप्रचारस क्षेत्रम्म् । भगवटा नारदेवेन, समं पुरु विशालकम् ॥ ३७७ ॥ जैनधन तथा प्रविश्यम्मा तथा कुछ। भवन्तो वेऽपि चास्येव, रोगस परिमार्जशः॥३७॥ सन्तोष- धिराधान, नया चेत विचार्यताम् । थप भतागृहस्थान्प्रति रामन्यू- दस्थाप्रति जीर्षक तीकरियादिकम् ॥ ३१ ॥ पूगीयेवि सथ य, सी वितृष्णकः । सरल तथा चासीत्तप्रशंसा र पर्गिता ॥ ३८ ॥जीस भक्षि- भावना, पूयस सानायिम् । पुर्षिक: पूनिति, सदाधि जापिस पुनः ॥ ३८१॥ पानार्षिक पवित्र च, सरिकताऽप्यपुत्रतम् । जन संसारमन, नदि दमित्सरिम्पति १८१॥ इतोपतरि उमावि, मागमनसुनना ।
- संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता यदा भन्यानुभावेभ्यो, भने यथापि जायते ॥ ३८३ ॥ नगराच बहिर्देवी, निर्जने कानने खयम् । वीरथ भगवान्खामी, समायातोऽतिपुण्यतः ॥ ३८४ ॥ राकादिदेवैः सर्वथ, समवसरणनिर्मितम् । महान् कलरवो जातो, नगरेऽपरिमिता जनाः ॥ ३८५॥ धर्मानुरकाः श्रोतारो, जिशासव इतीतरे । तेभ्योऽति- रिक्तपवादिचापदाः पक्षिणखया ॥३८६ ॥ आयान्ति समिती ते तु, रचिते समवसरणके। महत्सम्मेलनं जातं, तदा वे जातिभावनाम् । साभाविकं पाश- विकं, सपा हि वैरभावनाम् । शान्तिच्छटा नीतवन्तो, जातास्ते धर्मतत्परा: ॥ ३८७ ॥ उपदेशानन्तरं भूपाः, सार्वभौमास्वथाऽपरे। राज्यसत्ता परित्यज्य, गृहीतमुनिमुतताः ॥ ३८८ ॥ गृहिणोऽपि गृहे स्थित्वा, पञ्चाणुनततत्पराः । तृष्णाभारे समुत्तार्य, सम्यक्त्वभावमागताः । जीवनं सफलं जाता, कुर्वन्तस्तै पद परम् । औदासिन्य रूरभावं, भोग्यं कर्मोपभुज्य च ॥ ३८५ ॥ अन्ते नित्ति- मार्ग च, लब्ध्वाऽशयमुखं पुनः । अनेकानि प्रमाणानि, लभ्यतेऽनेकशस्तया ॥३९॥ यथ शास्त्रार्थप्रकरणम्-अथ शास्त्रार्धतीनां, यादिना प्रतिवादि- नाम् । ऋजुवालगनद्याथ, तटे श्यामाकक्षेत्रगे ॥ चतुष्टयानन्तमापना, सद्धर्म- प्रतिपत्तये ॥ ३९१ ॥ गोरसमण्डले ग्रामे, 'पडरोणेति' विश्रुते । पावापुर्या चोपपने, आज म जगत्प्रभुः ॥ स्माद्वादमहागधा, महानादेन शब्दिताः ॥ ३९२ ।। दिशाः कुर्ववदा काले, कस्यचिद्राह्मणस्य हि। महावरोत्सवो जातस्तत्र कादर पण्डिताः ॥ ३९३ ॥ आहूतास्तेनेन्द्रभूतिमहामान्यश्च वेदगः । आसीत्तस्याभव- यात्राथत्वारिंशच्छतसहस्रगाः ॥ ३९४ ॥ वेदाध्ययनसम्पन्ना, विद्यार्थिन इति स्फुटाः । भगपिताना व देवानामायव्ययाद्धि गौत्तमः ॥ ३९५ ॥ ज्ञानं जातं तथैवामाऽनेकान्तवादवित्तथा । समायातो जिनेन्द्रव, सर्वज्ञो विश्वरक्षक: ॥३९६ ॥ शास्त्रार्थ तेन सा वै, शर्मा समवसरणकम् । गच्छति स तदा- ऽयान्तं, दृष्ट्वा तं जगतः प्रभुः ॥ ३९५ ॥ भागन्नुकस्य सशियाचार शिक्षणाम च। सभाविगणधरस्व, स्वागतं चेन्द्रभूतये ॥ ३९८ ॥ तत्कमानसिकं भावं, तस्य सशपतिनम् । तनिवृत्तिः कृता तेन, तथा स्वेदिनी मुहः ।। ३९९ ॥ शिक्षा दाता प्रभावोत्या, चाईती रोपकारेणी। तदिन्द्रभूतये तद्वेदवेद- म्ताय च ॥४..॥ महानुभावयेठेभ्यः मुपदसा गरीयसी। हेयं ज्ञेयमुपादे- चमिति च विपरी मता ॥ ४.१ ॥ ज्ञानोत्पादयित्री मा, सोलादल्ययाव्यकम् । पदमन्यात्नई येथ, दादगिगिरा सह ॥ ४०२ ॥ चतुर्दशन पूर्व, यदुकं चीरस्तुतिः। तद्विशालके । ज्ञाने परिणतं कृत्वा, स्थविरान् रुदसंख्यकान् ।। ४०३ ॥ गणघर- पदे सम्यक्स्थापिताः सर्वसंयतेः। प्रथमं चेत्थमनिशं, खकीवानन्तज्ञानके ॥ ४०४ ॥ लाभमुत्साद्य तेभ्यश्च, खसदिद्गिम् ४४०० द्विजातये। दला निर्माण मार्ग च, तत्पपि पथिकाः कूता ॥ ४२५॥ अथानाथवालिकोद्धरणम्-अथा- नायबालिकाया, उद्धरणं कृतं स्यम् । सार्धद्वादशवर्षाणां, तथा पञ्चदशे दिने ॥ ४०६ ॥ [छमावधौ दुष्कर च, तपः कुर्बश्च विश्वक] तदैकस्मिस्तु काळेऽय, नयोदशविधात्मकः । कृतो भीष्माभिग्रहश्च, कृतवान् पणधारणम् ॥ पण्मासान्तं न यत्पूर्ण, न शक्यं भवितुं पुनः ॥ ४० ॥ परन्त्वयं त्वचलितस्वस्मात्पणमया. प्रभुः । प्रयागमण्डलतद्वत्कौशाम्बी नगरी तत्तः । भ्रमन्सँधन्दनाख्याया, चालायाः कर्तुमुत्सुकः । सूद्धारं धनवाहस्य, प्रेष्ठिनश्च गृहासणे ॥ ४०८ ॥ समा• गल स्थिरथाभूद्गहस्यास्स मुकोष्ठके । द्वाराग्रे च सती बाला, चन्दनाऽतीव- भक्तिः ॥ ४०९ श्लानिगडेर्वदा, विष्ठनीति विलोक्य च । अन्वेपते तथा मार्ग, भगवतो धर्मतत्परा ॥ ४१०॥ मनाया यन्दिनी वीरं, भगवन्तं निरीक्ष्य च। मुहर्ष प्रकटं कृत्वा, कुर्वती भाववन्दनाम् ॥४११॥ प्राह जगहुरो ! देष ! सूर्ये लोहमये पुनः । मापालवाली चास्ति, तद्गृहीत्वा च मा पुनः ॥ २ ॥ कृतकृत्यां द्वतं कुर्या, इति मे प्रार्थना गुण। समयेऽलन तस्याश्थ, प्रफुद्धितमुसा भ्युजम् ॥ ४१३ ॥ परं भगवतश्यास्था, खल्पमस्मिन्नभिप्रहे । तथाऽम्यश्रुपयाहस्य, न्यूनत्वं चात्यवतेत ॥ ४१४ ॥ खयं स च पराल, चलवानीपद्दतिस्ततः । चन्द्रनाऽपि तदाऽपश्यद्भाग्यहीना गृहं मयि ॥४१५॥ स्त्रयं देववरो भानुः, समागलालयं मम। खप्रकाशं समाहल, पश्यन्त्या मे गतोऽवयम् ॥ ४१६ ॥ अम्पा दशायां दीनायाश्चायलायाः प्ररोदनम् । विनान्यद्दर्शनं तस्यै, नास्ति कस्य प्रयोजनम् ॥ ४१७ ॥ चक्षुभ्यो यमुनागनाप्रवाहो वहति द्विधा । महादयादवीरस्या- भिपई पूर्णतां गतम् । स्वाभिग्रहस दृष्ट्वा नु, खादूप्या भक्वित्परा । सदा सकानुरकायाः [करान् ] मापधान्यस्य वाक्लाम् । गृहीत्वा दानाविशयाई चाय पन्धनात् । केवलशानभवनात्पश्चादायत्वमाययदि ॥१८॥ दला खतन्त्रता तस्यै, जीवन्मुक्तवयोगतः । कवितश्चातिकोन, वक्षा तकायमुत्तमम् ॥ ४३०॥ शेपमायुं प्रभुत्वा च, निर्वाणादमागतम् । पीरपैवि प्रभावशा, कन्याममात्म * अमिपकाक्षतधान्यस्य पारपसंदेति भाषायाम् ।
३३८ ? वीरस्तुतिः। यातनातो धर्मकाण्डाचलितान्किचिनिगयवे। कस्मिंश्चित्समये । राजयहाधीशः सुश्रेणिकः ॥ ४४४ ॥ तनयस्वस्य चैकोऽस्ति, मेघमारनामकः । श्रुत्वोपदेशं वीरस्य, संवेगात्प्रतिजगृहे ॥ ४४५ ॥ दीक्षोत्तमा तदा, तस्य, दीक्षितस्य नवस्य च । सर्वमुनीनां पश्चातु, तदाऽऽसनमवेशयत् ॥ ४४६॥ परन्त्यावश्यकं कार्य, चर्तुमा- यान्ति .यान्ति च । मुनयोऽनुपयोगत्वानिशायाः समयस्वथा ॥ ४४७ ॥ वेपासी- र्याभावशात्पादस्पशों मुहुर्मुहुः ।। जातस्ततः पराभूय, व्याफुलोऽभून्महामनाः ॥ ४४८ ॥ निद्राऽभावसमापनो, विचारे तत्परोऽभवत् । किं मेघायुर्मदीयं च, पादप्रहरणागतम् ॥ ४४९ ॥ प्रसहयवं व्यतीतं स्यानह्येतस्मै मुनिर्वतः । पातरेव हि दत्वेदं, धम्मोपकरणं मुदा । गत्वा च जननी खां च, मिलिप्याने अप्रेमतः ॥ ४५० ॥ साधुरद्यैव सम्भूय, रलितः पादलमतः। नेत्यं विनिर्वहे चाय, प्रदृष्टुं पूर्वमेव वत् ॥५१॥ सदा चायाति भक्त्यैव, तदाऽप्यादरतोऽवदत् । अब भूत्वा मुख्यमबान जानन्ति कथंचन ।। ४५२ [ न जानन्ति कथं चाय, किमाश्चर्यमतः परम् ] निदानन्त्वत्र प्रातर्हि, मुनिर्मघकुमारकः। वीरस्य घरणाम्भोज-' वन्दनार्थ समागतः ॥ ४५३ ॥ गुरोः प्रष्टुं समुत्पन्ना, लना तस्य मुनेरदः । मतं शिरथकाराश, कुमारः भत्रियस्य च ॥ ४५४॥ स त्वन्तेवासी भूत्वा च वस्य च सर्लाश्रयः। संसारतारको वीरो, निशारत्तं च ज्ञातवान् ॥ ४५५ ॥ सर्ववृतं निशाजन्य, निगद्य पुनरुतवान् । रात्रौं वत्स 1 • मुनीनां च, पादप्रहार तस्त्वया ॥ ४५६ ॥ लब्धा निद्रा न खान्तवें, तेनातध्यानमागतम् ।, अतो निदा मुविच्छिन्ना, निशाऽधीताऽतिकायदा ॥ ४५ ॥ पर विवेकपन्यानं, मार्गयस समागतः। तदा स्यात्पूर्वकं ज्ञानं, जन्म पाशविक तव ॥४५॥ तत्र करें महत्किं वा, निशापादप्रहारकम् । एतावन्तं प्रतिथुल, मेघनाम्रो भुनेईतम् ४५९ । जातित्सरोऽभवत्पूर्वजन्मद्वयगतस्य च । विर्यम्भावगला वार्ता; समारूढा स्मृतेः पथम् ॥ ४६.५ पूर्वसंवेदिनी तशा जातेथमद्भुता । तदा योगी पुनर्जातो, दीक्षादानविधानतः ॥ ४६१ ॥ तथकमासपर्यन्तं; कृत्वा स सना गुरोः। अन्ते द्वाविंशतिखर्गस्याहमिन्द्रोऽभवत्ततः ॥ ४६२ ॥ कम्पमाननगं चेम, मुस्थिर कृत- वान्पुनः। भगवान्वीरदेवच, ज्ञातव्यमुत्तमं तपः ॥ ४६३ ॥ प्राणमृतामसख्या- नामित्वं भ्रमरजालके । ममा नौरद्धता वीरदेवेन भवचक्रतः ॥ ४६॥ भवा- म्भोधेवारकत्वात्तारकः परिगीयते । निपुणः शक्तिमत्वाध, कत्लपि च कम्यवे ॥४६५ ॥ अथ सद्दरं प्रति-यदानन्दसमदेवादिषानो गृहमेधिनाम् । यहिणः वीरस्तुतिः। गायन्ति च उगुणान् । बुद्धकल्पा जनाश्चापि, बहवः खमुखेन वै ।। ४८९॥ ज्ञातपुत्रमहावीरसदनन्तचरित्रम् । मुक्तकण्ठेन तस्यामि, सर्वसत्वं प्रशंसिरे ॥९. आध्यात्मिकस्य तत्वस्य, पदाथै तत्त्वचिन्तकाः ।ये ये प्रतिमा लोकेड मिन्महानुभावभाविवाः ॥४९१ ॥ यान् यान्साहित्यविषये, अन्यान्प्रति मुधी- मतः) भगकमहावीरस्यादर्शजीवनरूपम् ॥ ४९९ ॥ चरितोपदेशानां यः, प्रभावः पवितो भुषि) सूचीपत्रविनिर्मातुं, सर्वथा तदसम्भवः ॥४९॥ एतावदेव सझेपालयितं च महोदयः । एतारशो जनः घटतथा साहिलतत्वविद् mmsrn संसारे विरलथालि, सात्वाऽसात्या विशेषतः। भगवन्वहावीरस्य, जिनस्य प्रविवासरम् ॥ १५ ॥ अनेसन्तवादतरवस्य, सेविदासोपदेशः । लाभो नोत्या- पितो लोकेर्शयता परमार्थतः ॥१६॥ या श्रीवर्धमानस्य, जिनस नहि श्यते। चिन्ह किधिन्मत्खलं, सर्ववं विचारय ।। ४९७ ॥ साधारणात्मव्यधीना, महत्वं न वचस्सपि। पर भारतवर्षस्य, यावन्ततिहासके ॥ ४९८॥ महान्दो मनुजा जातास्तेऽवश्यं वीरवामिनम् । येन केन प्रकारेण, स्मृतवन्तो मुहहः ॥४९॥ इति पााविरिकं च, सिद्धं जातमिति स्फुटम् । विद्धासः पूर्वमा लीना, वर्धमानजिनस्य च ॥५०॥ चरिते स्वाहादकस्य, सिद्धान्तस्य प्रययनम् । पतितं परमाधिक्य, नानाख्यानान्वितं पुनः ॥५.१॥ पटनायस्य शाताणे, हास्य-दीति विशेषतः । पाशानिसिलीकर्नामेशुसखस्स गृह्यते ॥ ५.२ ॥ तथापि महावीरस्य, चरित्रे जीवनस्य हि । तथा सदुपदेशन, शिधरेगे ला. मुंगम् ॥ ५०३ ॥ तदा किमियमा वै, न वंधते मग पाचालभाविनि भवे, वीरस्य विश्वभ्यापिनः ॥ ५४॥ प्रभावोऽयतनामुल्या, मानरूपाय या मदा। प्रत्युतानन्तप्रख्यातपरत्वेन संस्फुटम् ॥ ५.५॥ मुपायाखजनविये, वर्गित मुजरतः। भगन्तं खेटतम, मन्यन्वं सानुभाषतः ॥५.६।। मनात्पर्य मिदं तस्य, समप्रयासः परम् ।, लक्षणं च महावीरे, परिपूर्णसनः न्वयः ॥ ५.७॥ थिय:समाया:-धीमांध मण्यावीये, जन्मजन्मान्तय. नुगः । स्वीयः गगधरक्षेन्द्रभाविससे दिनाय च ॥५.८॥ विvera कविझाने, दत्पेसं दादरम् । चतुर्दशनं, उम्मे धीमेतमाय ॥५.९९ पूर्वधरधुतेपारपारीगं मुविधाय तम् । गणधर मनिपुर, लान्यायालयः ॥५१. ॥ यस्यनन्तशानलयम्या, ने बच रोहरः। गोयादिमाख्यान, भगवला परमाके ॥५111 प्रवाशदिशेन, सात सयको । । संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता उन्मुक्तावसङ्ख्यानां, प्राणिनां प्रेपके पतौ ॥ ५१२ ॥ मुक्ती श्रियः समग्राया, लक्ष- गति समन्वये। निरूपणे तथाऽवश्यं, यनः कार्यों विशेपतः॥५१३ ॥ यथ सहपतेश्चापि, वसुसम्पत्तितो औरहः । सम्पत्तिमन्तं कृतवानिति जानीत ज्ञानतः ॥५१४॥ वैराग्यस्य समग्रस्य-चतुष्टयाऽनन्तसम्पत्प्रातिहाधिनेकधा। धर्म- सम्पत्सइसम्पत्कीर्तिसम्पत्तथाऽपरा ॥ ५१५ ॥ अष्टैव प्रातिहार्याख्यामुरवैभव- सम्पदः । एतावत्यो यत्र सन्ति, भगवत्सखिलेश्वरे ॥ ५१६ ॥ गार्हस्थ्योऽपि वैराग्यसम्पत्तिरुपवृहिता । तथाऽनासक्तिसम्पत्तिर्वरीवति स तत्र वै॥५१॥ [तदद्भुतं चमत्कारं, को वा वर्णयितुं क्षमः॥] पुष्कळं भोगमासाद्य, तत्रोत्पय खयं प्रभुः । पङ्कजं पहजमिव, पृथगेव विभाव्यते ॥५१८0 सेयं तत्त्यागवैराग्यसम्पत्तिः सिद्धिदायिनी। विद्योतते भगवति, वैराग्यस्येति लक्षणम् ॥ ५१९ ॥ मोक्षस्याथ समप्रस्थापुनरावृत्तिरूपकः । समन्वयो यथार्ह वै, जायते तनिशम्यताम् ॥५२०॥ आचारा तथा व्याख्यासुप्रनाट्यादिरूपका । आधारभूतेतिहासाच, सिद्ध तनिर्विवादतः ॥५२१॥ महावीरभगवान् दीक्षादशातः पूर्वतोऽपि वा । पुद्गल- स्यमयन्धेषु, पदार्थ बन्धने पुनः ॥५२२॥ भावसंयतयुचोऽभूनापेक्षा विद्यते विभोः । सर्वथा ते च मुक्त्यर्थ, सचेष्टाः सन्ति भावतः ॥ ५२३ ॥ सम्बन्धे चात्र चैता- वत्कथनं जातमलं तथा। अनन्तचतुष्टयमाप्य, जातः सिद्धः सकायिकः ॥५२४ ।। जीवन्मुक्तोऽभवतत्र, विज्ञेयं तच्चरित्रकम् । प्राणिनस्तस्य शरणं, समायाताश्च येड- निशम् ॥ ५२५ ॥ खयं वेभ्यः मुमोक्षस्य, सम्प्रदायरहस्यकम् । खसमाने कृता- तेन, तत्सहाशु निसेवनम् ॥ ५२६ ॥ मुफिमूलं पर स्थानं, तदस्तीति विभावय। तत्र मोक्षसमग्रस्य, समन्वयप्रसक्तितः ॥ कथं प्रश्नावकाशः स्यादित्थं च बुध्यता चिया ॥५२७॥ अतो भगवते मोक्षसमग्रस्य समन्वयः । षष्ठमलक्षणस्याऽयं, समन्वय इति स्फुटम् ॥ ५२८ ॥ अथोपसंहारः-एवमुक्तपडाख्यानाऽऽलक्ष. गानां समन्वयात् । सिझो जातस्तु जगति, "वीरस्तु भगवान् खयम्" ॥५२९॥ अस्ति सर्च इत्यं यः, समदी च वीर्यवान् । हितैषी सर्वजीवाना, तथातोऽ. नन्तशक्तिमान् ॥ ५३० ॥ शास्ता सार्वः स एव स्याबगद्गुरुरिहातिहः । अतस्त- लक्षणं प्रोक्तं, निमगं तधिबोधतः ॥ ५३१ ॥ “गुयारस्त्वन्धकारस्तु, रुकारस्व. निरोधकः । अन्धकारविनाशेन, गुरुरित्यभिधीय" ।। अज्ञानं च गुशब्दस्य, - - आचार्याणामष्ट सम्पदिति भावः ॥
" - . ३४२ वीरस्तुतिः। शब्दखनिवर्तकः । मिलित्वा च द्वयोरों, गुपरित्युच्यते बुधः ।। ५१२ ॥ अज्ञाननाशनाजातो, जगद्गुरुस्योच्यते । सर्वशथापि सोऽत्रैव, "वीरस्तु भग वान्खयम् ॥ ५३३ ॥ यतोऽन्यदशाननाश, कृत्वा च स स्वयं प्रभुः । "जिमाण" मित्याद्यखिलो, न्यायस्वत्र सुश्ख्यते ॥ ५३४ ॥ रमत्रयस्वरूपस्य, “वीरतु भग- वास्खयम् ।।" कारयित्वा ज्ञानमदो," देवगुर्वो रहस्यकम् ॥ ४३५ ॥ तथा धम्म- रहस्यं च, सम्प्रकाश्य वयं प्रभुः। सर्वसारमुक्तव, मार्ग संवरनिजेरे ५३६ शापितोऽप्यस्ति यस्येत्यं, करणादनुभवस्य हि । मननध्यानमोक्षस्य, साधना- सक्तचेतसः॥ ५३॥ जना हि निसिलाः सन्तः, शीघ्रं प्रापुर्महात्मनः । अतो हि भगवान्वीरो, भवस्यास्यासिलस च ।। ५३८ । काटेऽवसीर्पिणीसरे, नु. विंशतिसयकः । तीर्थ पुरोऽन्तिमोऽप्यस्ति, गुरुर्वन्द्योऽसिलैनरः ॥ ५३९ ॥ तदर्शितोऽस्ति दशधा, व्याप्तो धम्मो दिगन्तरे। जैनधर्मः स एवान, राम्रा नाऽपरः, क्वचित् ॥ ५४०॥ इत्यं भगवतो महावीरदेवोपदेशतः। गुदभावन परमस्तलनिक्षेपहेतुकः ॥ ५४१॥ पदार्थ खात्मनीलेवं, फवा सन्धानमेव च। नदागमस्य सिद्धान्तमार्गस्य मननं तथा ॥ ५४२ ॥ उर्वननुभव वहाभाधि- वेशनम् । गद्गदान्वितकण्टेन, गावगुणविग्रहम् ॥ ५४३ ॥ समय मा प्रमादी- थेवि. चर्यासमाहितः। अमूल्यममयं, स्वस्थ,..यापयन्तु मुध्याननः ॥५४॥ धन्यः स एव लोकेऽस्मिन्कीर्निमाध. नुधीगुणी । कुतः स एष संस्बरे, स्याहादा- लकृतो नरः ॥ ५४५॥ तदन्तगतं सर्वमहिकं शान्तिमपुनः। जीवनोत्थं मोक्ष- रूपमपुनरीतिसंचरम् ॥ ५४६ ॥ समुत्थानमयं लोके, चाक्षयं मन्धवर्जितम् । कुतिया सेव विझेया, अध्यायाधस्य धामनि ॥ ५४७॥ पवानिव वर्षे, रिकमा- कस्य संचति । मधुमासेऽध धवले, पझे दशमीगतिथौ ॥ ५४८ ॥ निबन्धोऽ समाप्तथ, श्रीपुष्प-भिक्षुणा स्तः। श्रीमत्फकीरचन्द्रस्य, मुने। सिप्येग धीमता ) शातपुत्रमदापीरजैनसहानुयापिना ॥ ५४९ ॥ मङ्गलं भगवान्नीरो, मङ्गलं गौचमः प्रभुः। मङ्गलं स्थूलभद्राया, जैनधर्मस्तु मगलम् ॥ शिवमस्तु सजगतः, परहितनिरता भवन्तु भूतगणाः । ......दोपाः प्रयान्नु नाणं, सयंत्र मुसितोमपन्न टोकाः ॥ १॥ . .
संस्कृतटीफा-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३४३ -- वीरस्तुति-परिशिष्ट नं०७२ ॥ अथ वीरयोगतरङ्गः॥ ॥ मङ्गलाचरणम्॥ योगाजानाति स्वात्मानं, योगः शान्ति प्रयच्छति । योगान्मो क्षोऽभिसंयाति, योगाद्देशसमुन्नतिः ॥ योगाग्निवरतामेति, समाधिरचला भवेत् । योगेन समताऽऽयाति, तस्माद्योगात्मने नमः ॥ १॥ योगिनां सर्वतो मैत्री, योगी सम्मुदितां गतः। करु. णान्वितो भवेद्योगी, योगे माध्यास्थ्यभावना ॥२॥ योगशास्त्रे तथा- ऽन्यत्र, योगस्य प्रतिग्राहिता । तेन योगतरतस्य व्याख्या पद्येन गीयते ॥३॥ योगेन भित्वा पट् चक्रं, वायु सस्थाप्य मूर्द्धनि । ब्रह्मरंध्रस्थकमले, सहस्रदलसं. वृते ॥ ४॥ खान्तमाकृष्य विषयाजलयुद्बुदसन्निभात् । संस्थाप्य ज्ञानतो बवा, ध्रुवं ब्रह्माणि निष्कले ॥ ५ ॥ द्विविधं कर्म संन्यस्य, योगी यात्यपुनर्भवम् । तस्माच योगमाहात्म्यं, वर्तते सर्वतोऽयिकम् ॥६॥ अतश्च योगशास्त्रस्य, महत्वं वर्णितं बुधः । तश्याख्यानं मयेदानी, गीयतेऽभीष्टसिद्धये ॥७॥ योगो निर्मलचे- तसां वितनुतेऽप्यष्टासिद्धि पुनर्योगाङ्केन मनो नियम्य यतयो याताः पदं निर्भ- यम् । योगोऽज्ञानमयान्धकारतरणिर्योगान्न चान्योऽपरस्तस्माद्योगमुपाश्रयन्त्वनु- दिनं यो योगिनामिष्टद. ॥८॥ संसारेऽत्र मुखं ग्राह्य, हेयं दुःसमिति स्थितिः । इत्यनुसूल वान्छन्ति, मुखं प्रत्येकपाणिनः ॥९॥ दुःखं तत्कारणं ति, ते नेच्छन्ति कदाचन । तस्मात्मुसाप्तये योगः, सेवनीयः मुसार्थिभिः ॥१०॥न ातावद्धि मात्रेण, प्रत्युतव मुखर्द्धये। निसं कुर्वन्त्युपायं ते, शतशो यत्नतो मुदा ११॥ तैरुपायैर्यदायन्तं, जायते सफला- क्रियाः। तदानन्तमुसावाप्ति, लब्ध्वा यान्ति कृतार्थताम् ॥ १२ ॥ इत्यं मत्वा सुखाप्त्यर्थ, सर्वसाधकसाधने । मुख्यो धर्मो न चान्योति, तस्माधर्ममुपाश्रयेत् ॥ १३ ॥ स च योगात्परो नान्यो, ज्ञातव्यो योगसाधकैः । एवं धर्मो धारणीयः, सत्मुसाप्तिकरो यतः ॥ १४ ॥ योगतो लभ्यते स्वर्गोऽपवर्गश्च महात्मभिः। कायस्य चैधते कान्तिरज्वलात्मसु- खोदया ॥ १५॥ वर्तमाने युगे चास्मिन्ननेकमतवम॑नि । पार्टिबाजी सम्प्रदान- सद्धाडागच्छटोलकाः ॥१६॥ वर्तन्ते ये च धर्मस्य, नामोपरिचलन्ति ते। तेऽमरगहीदका भूत्वा विहरन्ति यथेच्छया ॥ १७ ॥ योगसाधनतस्ते च, विमुसा निजशिष्यके । सुखसाधनदानार्थमसमर्थाः भवन्ति वे ॥१८॥खसम्प्रदायसघस्या
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३४४
वीरस्तुतिः।
निर्वाहार्य बहुकियाः । परम्परया विज्ञानं, बोधयन्ति सदार्थिनः ॥ १९ ॥ तथा
परम्पराचकानुसारेणेव शिष्यकाः । कुर्वन्ति ताः क्रियाः शश्वचर्तन नर्मुदा ॥२०॥
अस्यां दशायां केचित्त, कदाचित्सुखवाञ्छया। प्राणिनश्चदृशाः सन्ति, येषां
चित्तं न सुस्थिरम् ॥ २१॥ सन्तोषः मुखसिद्ध्यर्थमसन्तोपाद्दशेद्दशी । भद्रा-
रिणामवन्तो, जीवाः मुखविवृद्धये ॥ २२॥ रकं खेदं च कुर्वन्ति, सदैकीभाष.
मास्थिताः । रजः प्रक्षेपणेऽप्येवं, न पृथग्भावमभुते ॥ २३ ॥ मुखं तत्साधनं
तद्वत्सम ये चानुवन्ति । नान्यथाऽभ्यन्तरोपायर्दश्यतामिह चार्थिभिः ॥ २४ ॥
एवं प्रवर्तितं चक्र, तदने सफंठीभवेत् । सत्यात्मकस्य सर्वस्य, मुखस्य साधनं
बहु ॥ २५ ॥ समये प्राप्नुवन्त्येवं, न वाचेति सनातनम् । इत्यं दयामयीं तेषा,
स्थितिं प्रतिमुशक्यते ॥२६॥ सष्टं ज्ञातुं स्थायिनं च, मुरं वास्तविकं पुनः ।
सत्यसाधनसधार, कर्तुमघात्यवश्यकम् ॥ २७ ॥ सत्यसाधनयोगो हि, सर्वोपरि
विराजने । तथाऽद्वितीयं संमान्यं, चमत्कारकर पुनः ॥ २८ ॥ अति साधनक
पुण्य, प्राप्यते तद्गुरोर्मुसात् । उपयोगे प्रकुर्वन्तः, खल्पकालेन तत्सम् ॥ २९ ॥
अवश्यमेव लब्धव्यमखण्डमव्ययं ध्रुवम् । योगथैतादृशं वस्तु, न खयं शायदे
क्वचित् ॥ ३०॥ योगयुक्तादात्मविदः, कस्मादपि महात्मनः । ज्ञातव्यो विषया.
सकानाप्यते स हि योगिनः ॥३१॥ यथोदरभरो योगी, संसारासकचेतनः ।
बाह्यतः साधुववृत्तिस्वस्सै योगोऽस्ति दुर्लभः ॥ ३२ ॥ एवं भूतायोगिनथ, नाप्यते
योगसाधनम् । तस्माच्छास्त्रपरोद्योगः, शिक्षणीयो महात्मनः ॥ ३३ ॥ योगिनोऽद्य
न लभ्यन्ते, भारवे शेगधारकाः । परं प्रयासकरणाझेधया योगिनोऽधुना
॥३४॥ मुयोगाभ्यासतो निलं, समाधानेन चेतसा । अथवा दूरतः स्थेयं,
केचिद्योगविदं जनम् ॥ ३५ ॥ समाश्रयन्तु येन स्यात्साध्यसाधनमुत्तमम् । पर.
न्त्वियं कर्तव्यं, सरणं साधनं विना ।। ३६॥ नाप्यते सत्सुख कैधिदिवि
जानन्नु साधकाः । परन्तु खसमीपेऽखि, उत्सुखं खात्मनि स्थितम् ।। ३७ ॥
अन्तष्टितोऽभ्यासालापयन्ति मुखं परम् । येषां सनातनवं, मुहानीयोपलन्धये
॥३८॥ योगसाधनवान्छा चेद्योजनीयं मनो मुहुः। योगस योगिनां चात्र,
महत्वं परमोधकः ॥ ३९ ॥ गीताया तच्च कृष्णेन, सर्वमुछ महात्मना । तपखि-
भ्योऽधिको योगी, इति लोकेन वर्णितम् ॥४॥ अनेकथोपकासादितपो
दीर्घातिदीर्घकम् । वाऽपि च न लभ्येत, योगी चिन्महोदयः ॥४१॥ अतो
योगी महानति, सर्वतो भारदे कलौ । नयनिक्षेपदेवादेरायुध्यमकं तया ॥२॥
संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता जीवादिसंख्यां संख्यानुमुत्युका ज्ञानिनां वराः। तेभ्योऽप्यखि महान् योगी, तथा कर्मकरादपि ॥४३॥ अतोऽर्जुन ! भव त्वं हि, योगी योगात्परो न हि । योगयुक्तो विशुद्धात्मेत्यादिश्लोकेन वर्णितम् ॥४४॥ श्रीमत्कृष्णेन महता, चार्जुनाय विदे मुहुः । तदाशयश्चेत्थमस्ति, ज्ञातव्यो योगवित्तमैः ॥ ४५ ॥ आत्मजेतेन्द्रियाहर्ता, तथा भूतेषु भावना । स्थापनीया समा शश्वदिति शास्त्रमतं सदा ॥ ४६॥ योगी जनः कर्म कुर्वन्निष्कमैव स जायते। अर्थात् कर्मलेपनाच, न कदापि स लिप्यते ॥४॥ यथाऽम्भसि गतं पद्म, न स्पृशेत्तबलं वचित् । तथैव योगसम्पन्ना, न लिम्पन्ति च कर्मभिः ॥४८॥ एवमेव च सम्प्रोकं, जैनशानेऽपि न्यायतः। [अग्मं च मूलं ] चे त्यादिशेयं स्याद्वदकं पुनः ॥४९॥ मूलमर्माऽप्रकर्मणो, भेदं ज्ञात्वा विवे- कतः । एवं ज्ञात्वा मुकर्माऽपि, निष्कर्मा साधको भवेत् ॥ ५० ॥ निष्कर्भकारिणां चेत्थे, न भवेच्च कदाचन । उपाध्युत्पातकं चेति, लौकिकं सर्वकर्म च ॥५१॥ केवलं दर्शनार्थाय, दृश्यते चेदृशं क्वचित् । योगयुक्तात्मनः कार्य, योगक्षेत्रस्य वाहकम् ॥ ५२ ॥ भवेदयं च योगो हि, चिरकालात्समागतः । प्रवर्तकश्चास्य योगस्यानादेः ऋपभो जिनः ॥५३॥ दीर्थकृतामादिभूत., श्रीमानृषभदेवकः । जिनराजोऽभवद्योगी योगिनां प्रवरो मुनिः ॥ ५४॥ मनोनिग्रहणाऽऽदेशो, निर्दिष्टः पूर्वमेव च। तेनाशा च प्रदत्तात्र, सर्वाधिक्येन ज्ञानतः ॥ ५५ ॥ बहुजीवनिकायानां, सन्मुख जगतः परम् । दृष्टिमात्रेण यत्क्षोभ, मनः प्राप्तं च यन्मुहुः ॥५६॥ भूत्वाऽशुन्धं पुनश्चात्मसंमुखं यत्प्रवर्तितम् । पुनस्तदेवानन्तं च, लब्ध्या प्रत्यक्षमेव वा ॥ ५५ ॥ करोत्सनुभवं तस्य, मनसोऽतो निरोधनम् । कर्तव्य हि तदेवास्त्रि, योगो योगविदा मते ॥ ५० ॥ इदमेव हि योगस्य, लक्षणं प्रोफवानिति । पतंजलिमुनिथापि, योगसूत्रेण ज्ञायताम् ॥ ५९ ॥ चित्तवृत्ति- निरोधाख्यो, योगयोक्तः पुरातनः । अत्युत्तमस्य योगस्य, पात्रं हि स्त्रीनरादयः ॥ ६॥ चतुर्वर्गाश्रमाणां च, लोकानामन चाति वै । अधिकारश्च योगस्य, साधनेनास्ति निर्णयः ॥६१ ॥ योगेनैव यशस्वेजो, वर्धते योगिनां मुहुः । योग- तश्वकप च, मिलोई याति साधकः ॥ ६॥ निर्वागपदमागल, जरामरणव- जिंतः । अतोऽत्र निर्णयो नास्ति, योगे जातिमिदो मुधा ॥६३॥ जातिभेदात्मको भेदो, नावश्या प्रविचारण । चाण्डालजातिसम्पन्चो, जनोऽपि योगवित्तमः ॥६॥ भवितुं शक्यते योगी, महात्माऽपि स्वतन्त्रतः । पञ्चविंशतिशतात्पूर्व, हरिकेशी मुनीश्वरः ॥६५॥ स च चाण्डालनादीयो, जातश्चेति तथाऽपि च । योगटो - संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३४७ योगाभ्याससंसिद्धित्तत्रैव सलु जायते। यत्सुखं वीतरागस, मुनेरेकान्तवासिनः । तत्सुसं.देवराजस्य, चक्रिणो न कदाचन ॥९॥ नासनेन विना सिद्धिर्जायते न रजोते । रहास्थाने चेदासनस्य, ज्ञेयमावश्यकं मुहुः॥ ९२ ॥ दर्भासन प्रशस्त स्याद्योगिनां च मुदे पुनः । कम्बलेन तदाच्छाद्यं, सर्वथा योगधारकैः । एतादृशे साधकानामासने शफिरुज्वला । जायते ननु कायस्य, विद्युत्कोटिसमप्रभा ॥ ९३ ॥ बुद्धिरत्युत्तमा वेति, नो विशेत्सूत्रकासने । तत्रासने सघनत्वे, योगो निष्फलता प्रजेत् ॥ ९४ ॥ भगवत्यादिसूत्रेषु, प्रोकं दर्भासनं शुभम् । 'दभ संधारग' चेति, सूत्रार्थेनोपवर्णितम् ॥ ९५ ॥ गणधरस्य मुनेथ, गौतमस्य तथा पुनः। केशिस्वामीत्यादिना च, खागतार्थ समाहितम् ॥ ९६ ॥ आगन्तुकेभ्यो नितरां, मुदर्भासनमेव हि। प्रदत्तं चोपवेशार्थमित्येवं च तदासनम् ॥ ९॥ प्रशस्त सर्वासनेभ्यो, सुदर्भासनमुच्चकैः । जनानां च तथा रीतिरेषा दर्भासनार्पणे ॥९८॥ तदभावे प्रशस्त स्यात्कम्बलासनमेव च । दर्भासनोपरिष्ठात्तु, कम्बलामनमिप्यते ॥ ९९ ॥ ततः पद्मासनं बवा, मनसोऽप्यनुकूलतः । पुनरासनेहशे च, साधनं समुपविश्य च ॥ १०॥ साधयेच्छुद्धमनसा, योगं योगस्य सिद्धये। दिशि पूर्व चोत्तरे च, मुसं कृत्वा समभ्यसेत् ॥ १०१ ॥ तदेवोक्तं 'पुरत्थाभिमुहे' 'सपलियंकनिसपणया' इत्येवं कथितं सर्वमासनं क्रमतो जिनैः ॥ १०२॥ कमलाख्ये वा पर्यके, स्थित्वा चाप्युनमामने । मुखं पूर्वदिशि कृत्वा, वामहले च दक्षिणम् ॥१०३॥ कर धृत्वा कटिं तद्वत्कण्ठे चैवं च मस्तकम् । सदैकपक्तौ संस्थाप्य, साधयेदप्रमादतः ॥ १०४ ॥ स्थाप्यं श्मश्रुविभागेऽधो, हनौ खन्तर्गवे पुनः । इंगासनमारूढो, योगी याति परं शमम् ॥ १०५॥ प्रातर्दिनान्ते च पुनर्निशायां, पूर्वे परे याममये च काले । मध्याहवेलामुसमाहितः सन् , योगी सदाऽनेन सदास- नेन. ॥ १०६ ॥ करोतु योगस्य सुसाधनं वै, योकयामरन्तमुखेन योगी । भून्बा स्थिरो जातु सदा, मुशक्यस्तदा च ज्ञेया विजयोपलब्धिः ॥ १०७॥ जातासने चासनसिद्धिरुपा, विनासनाधि विजयो न योगः । सिद्धयेत्पथो प्राणशरीरत्तौ, तदा मुदृष्टी विजयोऽपि लभ्यः ॥१०८॥ प्राणेन्द्रिये वापि तनौ मुदृष्टी, प्राप्नोति योगी, विजयं समन्तात् । सदेत्यमेवं च विना न योगमात्मोपलब्धिर्भवतीति ज्ञेयम् ॥ १.९॥ अतो नितान्तं श्रमतो गुरोथ, युक्तविशेषेण च नापणीयः । जयोऽप्यजलं खलु खासनस्य, जानन्नु सर्वे मुनयो नितान्तम् ॥ ११०॥ जितास- लानन्तरमेव शवयमादिनियमादिजयोऽपि लभ्यः ।-जितासनानन्तरसाधकेन, संलग संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ३४९ ॥ १२८ ॥ अयच प्रयासो यदा वृद्धिमेति, प्रकृतिप्रत्येक पदार्थान्तरेऽपि, । तदा प्रेमवृद्धिः प्रयात्येव नूनं, तथा सृष्टिप्रत्येकमंशेऽपि ज्ञेया ॥ १२९ ॥ मुदा वीत- रागत्वमुत्कृष्टतायाः, प्रभावस्य स्याद्वर्तनं योगसिद्धौ। प्रयत्नोऽपि स्यादुत्कटत्वेन शवनदानी मुहूर्तान्तमुत्थापनीयः ॥ १३० ॥ ततः सृष्टिभागेऽपि स्याचेसुदृष्टिः- मुसं खापयित्वा च तत्रैव सृष्टिः। स्थिरीभावमागत्य कायस्य खस्य, खपिण्डाद्विनिः, सृत्य दुःख पुनश्च ॥ १३१ ॥ मुहुः प्लायवे तादृशावस्थया, मुखं साधके नाप्यवे शीघ्रतः। प्रभुनानो मुहुर्भावनानामकं, जसं प्रेमतो योगजन्यं पुनः ॥ १३२ ॥ तदा प्रारमेवेच्छया शब्दकोचारणं ॐ नमो जापमेवं जपेत् । अनेनार्हदेवं भजे- प्रेमतः, सर्वकाले तदा ॐ पदं लुप्यते; पुनः शब्ददेव खयं नामतः ॥ १३३ ।। ततश्चात्मनि प्रेमतश्चाईति, प्रभावकाकारासुवृत्तिस्ततः । खयं सक्षणं जायते प्रेमतो, यथा चावकाशं पर तत्वतः ॥ १३४ ॥ चलंयोपशान्या भ्रमन्वा विशन्सदोत्तिष्ठ- मानः शयानोऽपि च । तथा जाप्रतो भुजमानश्च तम ध्यान कदाचित्सरेत्कायतः ॥ १३५॥ निशान्ते दिनान्ते च मध्यान्हके, निशायां सुयोगः क्रियामारभेत । सदाऽजापजापं जपेत्सस्मरनेकतो योगद्वारैव सद्भावना, दृढत्वं भवेद्योगतो नान्यतः ॥ १३६ ॥ आपमेवं जपेत्प्रेमभावेन च, तथा हि द्वयं साधनं सर्वतो। मिलित्या मनः शान्तभावं अजेन्मनोऽधो भयंकारको दुःसदः ॥१३॥ तथा साहसाधाररूपं भवेन्मनो रूपयवस्तथा चेन्द्रियं, घोटकोऽस्ति बलिष्ठ इति ज्ञायतां, पर चेदृशेन प्रयासेन च ॥ १३८॥ ततो मत्तता याति तेषां पहिः। ततस्ते भवेयुः प्रशान्ताः पुनः ॥ ततश्चेदृशेन प्रवरेण च, भवेत्साधकानां विवेकान्विता ॥ १३९ ॥ तथैवं च दृष्टिय सूक्ष्मा मुहुः, महेवानयेदात्मिकानन्दकम् । इदं साधनं स्याच सन्तोपनहेतुस्तदा साधकाः खस्य च, प्रतिं नित्तिं च सपश्यत ॥ १४०॥ आत्मानं सारथिं विद्धि, शरीरं रथमेव तु । इन्द्रियाणि हयानाहुमनः प्रग्रहमेव च॥ १४१ ॥ पराल पत्राटकं वाह्य त्य, कृतं तच कुर्वन्नु वाऽभ्यन्तरीया। शुभं घाटकं दृष्टितो योगनिय, भवेद्योगिनो साधने सम्पत्तिः ॥ १४२ ॥ वासोट्वासकयोईष्टिः, पूर्व स्याप्या प्रयत्नतः। पहिर्याति यदा श्वासस्तदा 'सो' शब्द इय॑वे ।। १४३ ॥ जाते चाभ्यन्तरे शश्वदई शन्दः सभावतः। जायते च द्वयो- योगे, 'सोह' मित्युपयुज्यते ॥ १४ ॥ आप विनव संनियेदजपाजापमुनमम् । देनवायापवर्गस, प्राप्तिर्भवति योगिनाम् ॥ १५ ॥ ध्यानेन वन सम्पश्येद्यदा वासोऽभिजन्यते । यत्र लीनो भवेच्छामस्खा वृत्तिप्रयासतः ॥ १४६ ॥ स्थापये.
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता मुदे ॥ १६५॥ अन्ते च विन्दावतिलीनभावं, ब्रजेच.सिद्ध प्रतिभाति योगी। शान्तौ च नादानुभवं च याति,, विन्दोरपेक्षा तु विशेषनादे ॥ १६६॥ श्रीविन्दो. क्लोकलेऽनुदिवस जाते ततवैधते, शक्तिोगधियां ततध श्रवणं नादस्य जय- स्यते। पश्चादात्ममुखं खयं विलसति श्रीसाधकानों ततो, धैवं शून्यगुहां निवद्धन मनसां मुक्तिः, कराब्जे . स्थिता ॥ १६७ ॥ नादोऽनेकविधोऽस्ति..शास्त्रविहितः संभ्रूयते योगिभिर्घण्टानादसमस्तथास्ति निनदः शसस्य वीणारवः । येणूतालरवचः चक्रसदृशं शार्यादि शब्दस्वभा, एवं विन्द्ववलोकनादनुमुहुर्नादः समुत्पद्यते ॥१६॥ योगामृतस्य पानेन, नादस्य श्रवणायुनः ।। विन्दुदर्शनतो योगी, जरामरणवर्जितः ॥ १६९ ॥ नादानन्दे समुत्पने, विन्दुर्गीणतमो भवेत् । नादस्य चाविशेपेण, आयते श्रवणं मुहुः ॥ १५० ॥ घनगर्जनतोऽन्यूनं, श्रूयते गर्जनं बहु । दिव्यनादप्रभावे गाऽप्यन्ते योगी प्रलीयते ॥ ११ ॥ नादे ध्वन्यनुभवस्य, सर्वाधिययन वर्धनम् । तदा स्यात्साधकजनो, भ्रमणे चरम्ने तथा ॥ १७२ ॥ उपविश्याराने , स्थितः' सर्वक्रियामु च । नादानुभवमेवास्ति, नान्यो भाति विशेषतः ॥ १३॥ नादान- भवतो लोके, सहीतस्य प्रचारकः । योगिभिव मनोऽजलं, यथा नाद: विकार ॥ १४ ॥ मुवन्ति रोदनं वालाः, कोथं मुधन्ति पग्नगाः । मृगाः प्राणान् विगु- चन्ति, नास्ति नादसमो रसः ॥ १५५॥ माधकानां तया कोकी, गीत- प्रियंकरः। अतः सहीतगानेन, मनोवृत्या संदेकताम् । साधकः, प्रजयाप्र; शनैनूनं प्रयासतः ॥ १६॥ वस्तुतो नादो वायोऽभूत्मगीतस्य प्रसाधने । याय- नादस्य' द्वारेणाऽभ्यन्तरी नादमेलनान् ॥ प्राप्तुं च पास्यते योगी, मात्र पर्य विचारणम् । यदा साधकजनो नादरद्धिमेति तयाप्रतः ॥ १७८ ॥ तदा सम्य प ययाऽभूमादोऽनुभवमेव हि । तदा भ्रमरगुहायां नु, शलाकारः प्रतीयते ॥१९॥ तदूर्ध्व प्रेमभावेन, चकः शुद्धः प्राइसवे । तस्य शिसरमध्ये तु, महानेको विरा- जते ॥ १८० ॥ ततश्वोन्द्रं पश्येद्रमरमुगृहां यत्र रवित्तः, शशायदोर्याऽस्यधि- बहुतेजोऽस्ति विततम् । तदा विन्दो दश्रवणविलयं यात्वनुदिनं, सदा योगी लीनो भवति नितरां यत्र मुखतः ।। १८१॥ तस्य ,चानुभवं निलं, कुर्याद्योगी विशेषतः । प्रकाशकपदार्थोऽयं, वर्नुलाकार इप्यते ॥ १८२ ॥ अधो मुसातपत्रेण, । समं सम्भ्राजन्, मतः । एत्रामरमिदं तद्वत्सहस्रदलसंवृतम् ॥ १८३॥ सिद्धि- । शिलारूपके नाऽजरामरणचके । शिरोऽग्रभागलोकस्य, याप्रभागोपरिस्थितम् ॥ १८४ ॥ अजरामरचकेत्र, वृत्तिलीनादनन्तरम् ।, साधकानामसाई. चार- संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३५३ स्वयं स्वस्मिन्प्रजायते ॥ २०७॥ भावनोदयवे शयत्सिदेपु प्रेमवर्धिनी । यदा यदा प्रयासच, वर्धते च तदा तदा। आभ्यन्तरे विशेषेणानन्दस्य जागृतिर्भवेत् ॥ २०८॥ मूलाधार समुदाय्य, चळं चान्तरं नयेत् । नाभ्यां वक्षःस्थले कण्ठे, त्रिकुट्यामलिगहरे ॥ २०९॥ शिसरस्थगुहान्ते च, ब्रह्मरन्ध्र मेलयेत् । भित्वैवं ब्रह्मरन्धं च, योगी निर्वाणतां प्रजेत् ॥ २१०॥ न ह्येतावन्मानं हि, प्रत्युतं वाह्यतोपि वा । आनन्दस्यैवानुभवो, जायते नु क्षणं पुनः ॥ २११ ॥ पूर्णानन्दमयश्चान्ते, भूत्वा सर्वत्र भावना । ईश्वरे स्थापयेनित्यं, भूत्वा प्रेमप्रयोगतः ॥ २१२॥ पश्येदहानश निलं, महानन्दो विकासने । वीतराग- खतो याति, विज्ञेयं योगवित्तनः ॥ २१३ ॥ पूर्वोक्तप्रकारेण, प्रमाणमनुसारतः। साधका स्वल्पमयी, प्रक्रिया कविताधिभिः ॥२१४ ॥ एवं विचारकरणा- तथोकस्य प्रसरतः । भवेदलभ्यलाभथ, मननात्स्मरणादपि ॥ २१५ ॥ तथा- परिमितं चेत्थं, सामयं लभते मुहुः । अत्यन्तो योगविषयो, विशालो गहनस्तथा ॥ २१६ ॥ विना गुरुपदध्यानान्न कश्चिद्योगसाधकः । योग शिक्ष- यितुं योगी, न भवद्योगवित्तमम् ॥ २१७ ॥ योगश्चतुर्विधः प्रोको, मुनिभिस्वत्व- दर्शिभिः । हठयोगो मन्त्रयोगो, लययोगलथैव च ॥ राजयोग इति ख्यात- धनुर्धा योगसाधने ॥ २१॥ यमो नियमश्वासन, प्राणायामस्तपा पुनः । प्रत्याहारो धारणा च, ध्यानं चव समाधिकः ॥ २१९ ॥ स चेत्सप्टागयोगोऽस्ति, विज्ञेयो मुनिभिर्मुदा। तत्रास्त्यपेक्षा कस्य, उत्तरोनरतः पृथक् ॥ २२० । प्राणायामो बहुविधो, दृश्यते योगशास्त्र के । तदवान्तरभेदश्च, कथ्यते शास्त्रसम्मतः ॥ २१ ॥ परन्नु तन मुख्योऽस्ति, पूरकः कुम्भस्तथा। रेचको भलिकाद्यस्ति, प्राणायामोपयोगकम् ॥ २११ ॥ प्राणायामसहायार्थ, नेतिधौतिश्च नौलिका । वस्तिः कपालभातिथ, गजकणीत्यादिरस्ति च ॥ २२३ ॥ प्रक्रिया हठयोगस्य, बन्धः सन्ति पृथक् पृथक् । नासिकारन्ध्रतः सूत्र, प्रवेशान्तर्वहिः पुनः ॥२२४॥ मुसान्नि सारयेद्वायं, नेविः सा कीलते बुधैः । वस्त्रमुत्तार्य जठरे, मलं निस्सार- येद्वहिः ।। २२५ ॥ धौतिः क्रिया च कथिता, योगे साहाय्यकारिणी। भ्रामागित्वा नलं योगी, नियंप्रति मुहुर्मुहुः॥ नोलिकियेयं सम्प्रोक्ता, योगाभ्यासविशारदैः ॥ २२६ ॥ गुदास्थानगतं तद्वन्मलं सम्मार्जयेद्वहिः । वस्तीक्रियेति विज्ञेया, योग. सिद्धिकरी मता ॥ २२७ ॥ कपालभातिर्षिहेया, गजकणी तथैव च । हठयोगे क्रियाश्वेता, योगविद्भिर्निदर्शिता ॥ २२८ ॥ खेचर्येका महामुदा, सर्वमुदोत्तमा वीर. २३ -- ३५२ वीरस्तुतिः। लांकिकानन्दमेव च ॥ १८५॥ योगिनोऽनुभवन्तीत्यं, वर्द्धते तदहर्निशम् । यत्र योगात्मनो टोना, भवन्त्यधिकतो मुहुः ॥ १८६ ॥ अपूर्वाऽऽनन्दसन्दोहाऽनुभवो वईवे खयम् । - आशरीरे (अखिले) लयं तस्य, प्रसारो जायतेऽसकृत ॥ १८ ॥ अर्थादानन्दसन्दोहः, खयं सर्वाङ्गके सकृत् । अलौकिकाऽऽनन्दरूपं, खयं स्फूर्जा विभाव्यते ॥ १८८ ॥ अवस्थयाऽनया यो हि, रूपं साधकसंज्ञकम् । विहाय योगी सिद्धय, विदेहोऽपि तथा पुनः॥ १८९] महात्मा जीवनमुक्ता, कथ्यते योगवित्तमः । महात्मनश्चेदशस्य, देहादृष्टिर्यदा स्थले ॥ १९ ॥ यत्र यन प्रसरति, तत्र तत्राऽप्यलौकिकम् । 'दिव्यानन्दानुभवनं, करोति साधकोतमः ॥ १९ ॥ जनपदे जले स्थले, तथा वमुमतां स्थले। राजस्थले पशुमये, गग- नादिसुसस्थवे ॥ १९२ ॥ एतत्स्थानेषु साधूनां, दृष्टिाति महात्मनाम् । तन वत्र स्थले नित्यमानन्दानुभवात्मकम् ॥ १९३॥ सर्वत्राऽमेदवण्या च, तथाs- नुभवतः सदा । द्वैतभावस्य प्रान्तेय, जावेऽभावे स कथ्यते ॥ १९४ ॥ तादृशो वीतरागध, योगी भवति निश्चलः । कृतकृत्योऽपि विदश्च, जायत आत्मवत्सलः- U१९५॥ योगिनामीदृशानां च, दर्शनं लोकपावनम् । कुरते सततं योगादरे चैव निशभ्यताम् ॥ १९६ ॥ यथाऽभ्यन्तरवृत्तीना, द्वारेणापि प्रयोगके । सम्बन्ये श्यते तद्वद्ष्ट्या स बाह्यभागतः ॥ १९७ ॥ नामेरुपरिभागे च, स्थापनीयो विशे- पतः । यदा तत्र प्रयासे तु, चक्षुषो नाभिमध्यगे ॥ १९८ ॥ अत्युज्वलतम.वेजो, दृश्यते चानुरूपतः। तदा नाभिगतां दृष्टिं, विहाय वक्षसोर्मुहुः । स्थापनीया प्रयनेन, मध्यभागे सुभावतः ॥ १९९ ॥ तत्तेजो नासिकारन्ध्र, स्थापनीयं च ध्यानतः। नासिकारात्रिकुट्यो तु, ततो भ्रमरगहरे ॥ २०॥ अजरामरचकस्य, सिद्धाः सिशिलामु च। ततोऽप्यनुभवे गच्छेतन्मार्गे च प्रवर्तते ॥२०१॥भके रेवं महत्वं च, साधनं जन्यते परम् । भक्या चोत्पयवे प्रेम, वेनैवात्मा प्रदृश्यते ॥ २०२॥ कस्यचिच्यानतत्वपश्योकोपरि विचारणम् । कुर्वन्फुर्वध गम्भीराशय चोत्तीर्यवे पुनः ॥ २०२ ॥ तद्धाराप्रतश्चापीद वर्धते तनिशामय । एकाति रीति- रीहशी, यत्र पद्मासने स्थितः॥२.३॥ विचारयति यत्किबितटे स्थित्वा अप- श्यतु । परन्तु नावरोधन्यो, विचारो योगसाधने ॥ १०४॥ अभ्यासबलमासाथ, खयं शान्तिर्भवेएनः । विचारधारा चाल्न्तमेम्दैव प्रशाम्यति ॥ १.५॥ विचारशान्तिवः पश्चात्साधकानामलंकिकम् । आनन्दानुभवो याति, ततोऽसिल. भवोपरि ॥२०६॥ प्रेमधिर्विसाला स्थाद्भाव सर्वत्र सहशम् । सापयलेवयोगात्मा । संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३५३ स्वयं स्वस्सिन्यजायते ॥ २०७॥ भावनोदयवे शवसिद्धेमु प्रेमवधिनी । यदा यदा प्रयासश्च, वर्धते च तदा तदा। आभ्यन्तरे विशेषेणानन्दस्य जागृतिर्भवेत् ॥२०८ ॥ मूलाधारं समुद्घाट्य, चक्रं चक्रान्तरं नयेत् । नाभ्यां वक्षःस्थले कण्ठे, त्रिकुट्यामलिगहरे ॥२०९॥ शिखरस्थगुहान्ते च, ब्रह्मरन्ध्र मेलयेत् । भित्वैवं ब्रह्मरन्ध्र च, योगी निर्वाणतां व्रजेत् ॥ २१० ॥ न खेतावन्मानं हि, प्रत्युतं यान्यतोपि वा । आनन्दस्यैवानुभवो, जायते नु क्षणं पुनः ॥ २११॥ पूर्णानन्दमयश्चान्ते, भूत्वा सर्वत्र भावना । ईश्वरे स्थापयेन्नित्यं, भूत्वा प्रेमप्रयोगतः ॥ २१२ ॥ पश्येदहार्निश निलं, महानन्दो विकासने । वीतराग- स्ततो याति, विज्ञेयं योगवित्तमैः ॥ २१३ ॥ पूर्वोक्तप्रकारेण, प्रमाणमनुमारतः । साधकार्य स्वल्पमयी, प्रक्रिया कविताधिभिः ॥ २९ ॥ एवं विचारकरणा- तथोकस्य प्रकारतः । भवेदलभ्यलाभश्च, मननात्स्मरणादपि ॥ २१५ ॥ तथा- अपरिमितं चेत्यं, सामर्थ्य लभते मुहुः । अत्यन्तो योगविषयो, विशालो गहनस्तथा ॥ २१६ ॥ विना गुरूपदध्यानान कश्चिद्योगसाधकः । योग शिक्ष- यितुं योगी, न भवद्योगवित्तमम् ॥ २१७ ॥ योगश्चतुर्विध. प्रोको, मुनिभिस्तत्त्व- दर्शिभिः। हठयोगो मन्त्रयोगो, लययोगस्तथैव च ॥ राजयोग इति ख्यात- थतुर्धा योगसाधने ॥२१८ ॥ यमो नियमश्वासन, प्राणायामस्तवा पुनः । प्रत्याहारो धारणा च, ध्यानं चैव समाविकः ॥ २१९ ॥ स चेत्यष्टानयोगोऽस्ति, विज्ञेयो मुनिभिर्मुदा। तत्रास्त्यपेक्षा चैकस्य, उत्तरोत्तरत. पृथक् ॥ २२ ॥ प्राणायामो वहुविधो, दृश्यते योगशास्त्रके । तदवान्तरभेदश्व, कथ्यते शास्त्रसम्मतः ॥ २२९ ॥ परन्तु तत्र मुख्योऽस्ति, पूरकः कुम्भस्तथा। रेचको भनिकायस्ति, प्राणायामोपयोगमम् ॥ २२२ ॥ प्राणायामसहायार्थ, नेतिधौतिश्च नौलिका । वस्तिः कपालभातिश्च, गजकर्णीयादिरस्ति च ॥ २२३ ॥ प्रक्रिया हठयोगस्य, बव्यः सन्ति पृथक् पृथक् । नासिकारन्ध्रतः सूत्रं, प्रवेशान्तर्बहिः पुनः ॥२४॥ मुखानिःसारयेद्वाह्य, नेतिः सा कीर्यते धुधैः । वस्त्रमुत्तार्य जठरे, मलं निस्सार- येद्वहिः ॥ २२५ ॥ धौतिः क्रिया च कथिता, योगे साहाय्यकारिणी। भ्राममित्या नलं योगी, नियंप्रति मुहुर्मुहुः ॥ नोलिकियेय सम्प्रोक्ता, योगाभ्यासविशारदः ॥ २२६ ॥ गुदास्थानगतं तद्वन्मलं सम्मायेदहिः । वस्वीक्रियति विज्ञेया, योग सिद्धिकरी मता ॥ १२५ ॥ कपालभातिर्विज्ञेया, गजकर्णी तथैव च । हठयोगे कियाश्वेता, योगविद्विर्निदर्शिता ॥ २२८ ॥ खेचर्येका महामुद्रा, सर्वमुदोत्तमा वीर, २३ ।
वीरस्तुतिः। मता। तथा बन्धनयं प्रोक्त, योगसाधनकम्मणि ॥ २९ ॥ खेचरीति महामुदा, महाबन्धकरी तथा । वज्रमुद्देति तिवश्व, मुद्राः प्रोकाः सुसाधः ॥ २३०॥ ताच मुद्रा महायोगी, गुरुदेवप्रसादतः । सार्नु शलोति योगातो, नान्यथा सिद्धति स्फुटम् ॥ २३१ ॥ प्राणायामविचारोऽपि, वर्ण्यवेऽनुभवान्मुदा । वस्तुनीमानि योगेऽस्मिन् , हातव्यानि विशेषतः ॥ २३२ । अतो महात्मनामन्ते, स्थित्वा शिक्षादिकाः क्रियाः। संसारे योगतो नान्यः, पंथा मोक्षाय विद्यते ॥ २३३ ॥ यो योगं कुरुते नित्यं, स याति परमास्पदम् । निर्भये कर्मवन्धाश मुच्यते नात्र संशयः ॥ २३४ ॥ इत्युपदेशानुसारेण, शातव्यं मोक्षकांक्षिभिः । अनानेके जनाः काले, बहूपायझरा भवे ॥ ३३५ ॥ दृश्यन्ते च तथाऽन्तेऽपि, क्यं तेषां सुखोदयः । सुपुण्यरूपं तैरतं, पीजं पूर्व ततथ ह ॥ २३६ ॥ उसा- त्मकं फलं शयर्द्धजन्वे वेन ज्ञायताम् । परन्वा च जीवेभ्यो, दत्वा दुःख निर- न्तरम् ॥ २३७ ॥ वस्ति दुःसपीज ठे, भविष्यन्ति सुखेतराः। फलं दुःर- मयं तेपामन्ते स्थानात्र संशयः ॥ २८ ॥ इत्थं यश्च मुखी भूत्वा, पापिष्ठोऽपि भवे भवात् । पापानुबन्धिपुण्यात्मा, शायतां जगतीतले ।। २३९ ॥ तदन वर्तते हेतुः, पूर्वपुष्यप्रसातः । जायन्ते मुखिनः पद्याहुःसिनोऽपि भवन्त्यदः ॥ २४० ॥ वर्तमाने पापयोगात्पापिनोऽपि ततः परम् । दश्यन्ते मुखिनोऽप्येवं, झातन्यं तत्व- निधयः ॥ २४१ ॥ धर्मागानो जनाः केचित्सन्ति लोके मुखार्थिनः । यिन्लो दुःसभोकारः, पापपुशप्रभावतः ॥ १४२ ॥ कियन्तश्च मुखापाराः, पुण्योदययभा- वतः । एवं दुःखसमाप्त च, मुखोदकः प्रजायते ॥ सुखभोगरामाप्ती , दु.खो- दर्कः प्रपद्यते ॥२४३ । अतस्ते सुखिनश्चाने, भविष्यन्ति नराखतः । ईशान्म- नजान शाख्ने, पुण्यानुबन्धिपापिनः ॥ २४४ ।। कथयन्ति जगत्यसिम्पूर्वपापप्रभा- रतः । मुंजन्ति तेऽय पामोघं, वर्तमाने तथा पुनः ॥ २५ ॥ पुण्योदयवशाते च, भविष्ये मुसभोगिनः । शातन्यं दुःसमोत्कृणों, तथा मुखभुजो मुवि ॥२४६॥ ततः कि कपयन्वय, वर्तनाने च पापिनः । भविष्येऽपि तथा सन्ति, नियमोड- प्यति किमीशः ॥ नियमोऽप्येताहशथापि, जनाय बो भुवि । पुर्वपापबल्य- दन, सिता जीपदुःसदाः ॥ २४॥ ॥ वेऽप्यग्रस्मन्यन्ते च दु:खिनो मनुजाः पुनः । तथेदशजनानान्तु, का संज्ञेति वदन्तु नः ॥ २४८ ॥ पापानुबन्धि- पापिनो, शातक शास्त्रमानतः । पूर्वजन्मार्जिताना च, दुःपाली भोगिनोड धुना ।। २४९ ॥ इदानी कुरते पाप, तद्भोक्ताऽये भविष्यति । किंवैतादशो नियमः, शास्त्रेभ्यखि प्रमाणतः । सर्वमाने मुखं भुंके, भविष्येऽपि पुनः मुखम् - । संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ॥ २५० ॥ योगोऽनधो महत्तत्वप्रापकोऽस्त्यमरहमः। तस्य सेवनमात्रेण, यानि योगी परम्पदम् ॥ २५१ ॥ भवितुं शक्यते चेत्थं, भूतकाले च ये नराः। प्राणिनां सुखदातारो, बन्धयित्वाऽतिपुण्यकम् ॥ २५२ ॥ वेनात्र मुखसम्पन्नाः, पुण्यमेवाश्रयन्ति ते। भविष्येऽपि पुनस्वद्वत्पुण्यस्यैवानुवन्धनम् ॥ २५३ ॥ एता- दृशजनस्यात्र, शास्त्रे पुण्यानुबन्धात् । पुण्यवान्कथ्यते लोके, पूर्वपुण्यप्रभावतः ॥ २५४ ॥ मुखी भूत्वा स चेदानी, पर्तमाने करोति चेत् । पुण्यं भविष्यकालेऽपि, पश्चादपि मुखी भवेत् ॥ २५५ ॥ कर्मणां चतुष्टयं चेत्थमनुबन्धं भवत्यदः । विज्ञे- यश्चानुबन्धाों, बन्धनं शास्त्रसम्मतम् ॥२५६ ॥ भुंक्त च तत्फलमने, शुभाशुभानु- बन्धनैः । अस्त्येवं च मुखीदानीमशुभेन च दु.खभाक् ॥ २५७ ॥ पापानु- चन्धिपापश्च, पापानुवन्धिपुण्यकृत् । पुण्यानुवन्धिपापश्च, पुण्यानु- चन्धिपुण्यवान् ॥ २५८ ॥ चतुर्विधं मुविज्ञेयमनुबन्धस्य साधकैः । समय- व सुसं पश्चादोऽपि सुखप्रापणम् ॥ २५९ ॥ इत्थं कर्मफलं दुःसमथवा सुखसं- भवः। परन्त्वव्याधिमोक्षस्य, सुखस्यापि कदाचन ॥ २६० ॥ समाप्तिन भवेश्चैव- मध्यात्मिकमुखाप्तये । कायिके सुखभोगश्च, हेयं सर्वत्र सर्वदा ॥ २६१॥ अर्थाचपुण्यपापानां, क्षय नीत्वाऽऽत्मरूपके । स्थातव्यो मनसा च, कीदृशोs- प्यनुबन्धनम् [ न वन्धनीयो हेयश्च, नयविद्भिरिहोच्यते ] ॥ २६२ ॥ यत्तालुमूलासक्तेऽमृतं हि, योगी जनस्तत्पिबति प्रध्यानात् । तेनैव तृप्तिध तथा विमुक्तिः, सभायते योगिजनस्य नित्यम् ।। २६३ ॥ वन्धव्योऽस्त्यनुवन्धर श्वेत्पुण्यस्यैवानुवन्धनम् । पापानुवन्धं नो कुर्याद्धेय पवास्ति सर्वदा ॥ २६४ ॥ कुतः पुण्यानुबन्धस्य, बलादेवं फलं भवेत् । यतः स्यात्कर्मनिर्जरा, न पुनः कर्मसम्भवः ॥ २६५ ॥ स्वतन्त्रतायाश्चैतद्धि, द्वितीयं द्वारमिप्यते । ज्ञात्वैवं च विवेकेन, साध्यो योगश्च साधकः ॥ २६६ ॥ योगानास्त्यपरः कश्चिन्मुक्तिसिद्धिकरोऽधुना। तलाद्योगमुपाश्रित्य, याति योगी परम्पदम् ॥ २६७ ॥ योगः कल्पतरुर्विपत्तितरणिरज्ञाननाशोधतो, येन स्थान जराऽपमृत्युहरणं योगार्थिनां दु.सहा । वृत्तिः स्यादवलाऽऽत्मनि प्रवितवे यसा- स्परा निर्मला, योगे निर्मलचेतसां हृदि मुहुर्मुकिश्च वा श्राजवे ॥ २६८ ॥ योगो हि निर्मलादर्शी, यन्त्रात्मा च प्रदृश्यते। लोकमान्तर्गतं यस्तु, निशामय गुरोर्मुखात् ॥ ॥ २६९ ॥ इति वीरयोगतरङ्गः समाप्तः॥
वीरस्तुतिः । भावार्थ:--प्रत्येक प्राणी मुखकी इच्छा प्रकट करता है, इतना ही नहीं बरिक सुखकी प्राप्ति के लिये अनेक उपाय करता है। उन उपायों से जब वह सफलीभूत होता है और अनन्त सुखको पाता है तब वह सर्वथा कृतकस हुआ समझा जाता है । सुखको पाने के लिये अनेक साधनोंमें धर्म सर्वतो मुख्य साधन है। वर्तमान समयमै अनेक मत, पंथ, वाडावरी सम्प्रदाय, संघाड़ा, गच्छ, टोला, पार्टीबाजी आदि जो धर्मके नामपर चलकर अमर शहीद बनने जा रही है, वे सब मुखके साधनसे विमुख घनकर अपने मिप्योंको मुखमा साधन प्राप्त कराने में असमर्थसे ही हैं। मान अपनी सम्प्रदाय भोर टोले को निभानेके लिये अमुक अमुक क्रियाएँ रच डाली हैं। उहींको पर- म्पराके अनुसार अपने शिष्यों को भी बताते रहते हैं, और वे शिष्य भी उस परम्पराके अरपट्ट चकके अनुसार उन क्रियाओंको उनके इशारेपर नाच- नाचकर करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में जो क्वचित कचित् मुखकी इच्छावाले प्राणी हैं उनको सन्तोष नहीं होता। सन्तोष न होने ऐसे भापरिणामवाले जीवोंको मुखकै साधनके लिये सून पतीना एक करना पड़ता है। बहुत कुछ धूल साक उड़ानेपर भी मुखके सखे साधन समयपर मिलते हैं और नहीं भी मिलते। इस प्रकार उनकी दयनीय स्थितिपर स्पष्ट समझा जा सकता है कि स्थायी मुसके वास्तविक और सधे साधनोंके. प्रचार करने की जगत्के लिये पूरी आवश्यकता है। सुखके साधनों में योग सबसे भारी और अद्वितीय चमत्कारिक तथा सर्वमान्य साधन है। यदि इन सापनीका गुरुगम द्वारा उपयोग किया जाय तो अवश्यमेव अल्प समयमें सनातन संड मुराकी प्राप्ति हो सकती है। योग एक ऐसी वस्तु है कि वह अपने आप नहीं सीखा जा सकता, अतः किसी महात्मा, योगनिठ, सात्मविद पुरुपके द्वारा उसे सीखना चाहिये । अाजकल योगी पुरुष इस भारतमें सब जगह नहीं मिलते अवः सतत प्रयास द्वारा योगि. योंकी शोध करनी पडेगी, परन्तु नकली योगिओंसे तो सावधान ही नहीं बल्कि दूर रहना चाहिये और किसी सञ्चे योगीको सोजकर साध्यकी साधना करनी चाहिये। एवं इतना स्मरण रहे कि योगकी साधना के बिना सत्व मुखको कोई भी नहीं मान कर सकता, परन्तु यह सत्य मुख अपने पास और अपनी आत्मा ही है, और योग अन्तरिक अभ्याध द्वारा उसे पता अफम्मस्स यवहारोण विजह। कम्मुणा उयादि जाय। प्रयरकिक रीपटाप और दिवाव बनार भी नहीं होता। सय चरीर संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ३५७ सकता है। जिस मनुष्यको सनातन मुरा अभीष्ट हो उसे योगकी साधनामें लगना चाहिये । योग और योगीकी महत्ता यही ही ऊंची है। श्री गीता भगवतीमें श्रीकृष्णचन्दने कहा है कि- तपस्विभ्योऽधिको योगी, शानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। फर्मिभ्यश्चाधिको योगी, तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ (अध्याय ६, श्लोक ४७) भावार्थ-उपवासादिक अनेक प्रकारके लम्बे-लम्बे तप करनेवालोंसे योगी बड़ा है। नय, निक्षेप, देवादिकी आयुष्यके भंग (भांगे) तथा जीवादिकी सख्याकी गणना करनेवाले वाचाल शानियोंसे भी योगी बहा है, आवश्यकादि कार्य करनेवालेसे भी योगी बहुत बड़ा है। अतः हे अर्जुन । तू योगी बन। योगयुक्तो विशुद्धात्मा, विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्पभूतात्मभूतात्मा, कुपनपि न लिप्यते । (गीता अध्याय ५, श्लोक ५) भावार्थ-आत्म-विजेता, इन्द्रियजित् और सब भूतोंपर समभाव रसनेवाला योगी पुरुष कर्म करनेपर भी निष्कर्म समझा जाता है। अर्थात् कर्म लेपसे लिप्त नहीं होता। इसी प्रकार जैन-दर्शनमें भी कहा है कि- "अग्गं च मूलं विलंच विगिं च धीरे । पलिच्छिन्दियाणं णिकम्मदंसी ॥" (आचारांग) अप्रकर्म और मूलम्मके नेदको समाप्त कर विवेक द्वारा कर्म कर। इस प्रकार कर्म करनेपर यह साधा निर्मा कहलाता है। भायाध-निष्कमले जीवन में उपाधि या उत्पाद नहीं होता। इसी भान योग क्षेत्रय याहन होता है, इल्लादि। - . (आगरांग ३.१.३) ३५८ वीरस्तुतिः। - यह योग अनादि कालसे चत्य आ रहा है, और इसके आदि प्रदतंक मादिनाथ अर्यात आदि तीर्घकर धीरुपमदेवजी जिनराज हो गये है। उन्होंने मनो निग्रहका आदेश सर्व प्रथम देकर यह फर्माया है कि अधिकतर बहुतसे जीवोका जगत्के सन्मुरा दृष्टि द्वारा क्षोभ प्राप्त मन असुब्ध होकर आत्माके सम्मुरा प्रवर्तित होता है, और वह फिर अनन्त मुसका माक्षात्कार पाकर उसका अनुभव करता है अतः मना निरोध करना ही योग है। भगवान् पतंजलिने भी योग यही लक्षण बताया है। "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।" 'वित्तत्तिय निरोप करना योग है।' इस अत्युत्तम योगके पात्र स्त्री पुरुष या चारों वर्णके लोक हैं। योग साधनामें जाति भेदकी कोई आवश्यकता नहीं है। चाण्डाल जाति भी योगी महात्मा हो सकता है। २५०० वर्ष पूर्व हरिकेशी मुनि जातिके चागल पे तथापि योग द्वारा महात्मा पदको पा गये। यथा- सोयागकुलसंभूओ, गुणुत्तरघरो मुणिः। (उत्तराध्ययन ) भावार्थ-चाण्डाल कुलमें जन्म देनेपर मी हरिकेशी मुनि उप गुपके धारणकरनेयाले मुनि धे, पुनया सफ्वं खुदीसह तयोविसेसो, न दीसई जाई विसेसु कोई। सोयागपुतं हरिपससाई, जस्सेरिसा इति महाणुभागा। (१५, उहण्प्ययन ) "योगा महात्म्य आय आने प्रलसमें पा रहा है जिसमें जातिकी कोई आवश्यमता विशेष नहीं है। हरिरेशयोगी भण्डार जाति। परन्तु इराके योग ऋद्धिके सामने सपी बोर चौरिया गई है।" परन्तु वामय तिरासे योग सापना नहीं हो सकती। अतः योग विद्या निश्पसुओंको पो, दुष, खेल, प्रादुर भोजन आदि याति माह- रका उपयोग करना चाहिये। यथा- आयुःसत्वक्लारोग्यसुखशीतिविवर्धनाः, रस्याः निग्धाः स्थिरा या यादाराः सात्विक प्रियाः। (गीता भोट १५, अमाय) रसपुत, विना, स्थिर, एप बादार सात्थिर नोच बिच पोनि भानुष, बुद्धि, बल, भारोग्य, मुरास प्रशिकी दिद्योगी है।
आदानप्रदानके प्रसङ्गमें पहले सर्वत्र दर्भासनका ही रिवाज था। इसीसी पुरिके लिये उत्तराभ्ययनमें केशी मुनि और गौतम गणपर जहाँ मिलते यहां वे भागन्तुक मुनिच खागत "कुरा तणाणिय" दर्भाके भासनसे करते हैं। इससे सर सिर है कि-जैन जातिमें मी संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता परन्तु अधिक मिरचं, अति तेल, भवि खटाई आदि तामसी पदार्थोस उपयोग कभी भी न करना चाहिये। इसके उपरान्त आवश्यकतासे अधिक न वोलकर अधिकांश मौन रहना चाहिये। निकम्मा वाग्व्यय करनेसे योगर्ने विकार आ जाता है। योग साधना करनेवाले महात्मा पुरुपके पाससे योगकी तालिका सीखकर उसकी साधना करने के लिये एकान्त तथा पवित्र विजन प्रदेशमें जाना चाहिये । पहाड, पर्वत आदि एकान्तप्रदेशके अतिरिक्त अन्य किसी स्थान में जैक्षी चाहिये वैसी अच्छो रीतिसे योगकी साधना नहीं कर सकता। इसीलिये प्राचीन कालके पुरुष अनेक पहाडोंमें जहां नाना सात्विक वनस्पति होनेसे तथा वहा अनेक महात्माओंके शुद्ध रजःकण होनेकी स्मृति रहनेसे, पातावरण भी एकान्त और पवित्र रहनेसे उस स्थलपर एकदम शान्त भोर अचपल मन हो जाता है। अतः वह स्थान उनका मनपसंद है। बडे राजमहल या धर्म स्थान में जिस आनन्दका खममे भी अनुभव न हुआ हो उस आनन्दका अनुभव कुल्लु और शिमले तथा हंस तीर्थ के योनी पहाडमें जानेये होता है। अतः मोगीको किसी ऐसे ही प्रकारका स्थान पसन्द करना चाहिये। यदि कारणवश इन स्थानोंपर न जा सके तो जहां तक अपनी ही बस्तीमें रहता हो उसके आसपास किती रमणीक वनस्पतियाले उपवनको चुनना चाहिये, और वहीं योगाभ्यास करना चाहिये। धूलपर पेठकर योगी साधना नहीं की जा सकती बल्कि बैठने के लिये आसनकी भी आवश्यकता है। योगिओंके लिये दर्भासन अत्युत्तम है, और दर्भासनपर कम्बल्यसन विद्याना चाहिये। दासन त्या कम्बलासनमें साधरके शरीरकी विद्युत् - शाकिको टिकाये रसनेकी सकि रमे ही उत्तम है। इसीलिये सूतके कपर योगी अपने योगाभ्यायकी साधना न करे। भगवती आदि सूत्रोंमें भी कई स्थानोंपर दर्भासनका पाठ ही दिया गया है। यथा- "दम्मसंथारगं संथरहता।"
वीरस्तुतिः। दर्भासन के अभापमें कंपलसन बिछाना चाहिये । दामनके ऊपर कंयसासन बिछाकर उसपर पद्मासनसे मन पसंद आसन लगा कर क्या स्थिर होकर पूर्व या उत्तरमें मुरा करके नैठना चाहिये। एमोमें पचासन लगाकर पूर्व मुरा करना बताया है। "पुरत्वाभिमुहे सपलियंकनिसणे" पप्यासन या पयायनसे बैठकर पूर्व मुघ सधे । पभायन लगाकर चार्य बाधकी हथेलीपर दाहिना हाथ सीधा रसकर, कमर, गर्दन, मसको एक पचिने रसकर घेठना चाहिये, और दाडोको हंसलीसे चार तमुझे अन्तरपर रहने दे। इस आसनसे सवेरे, सांज या मध्याहमें तथा राषिके पहले और, पिछले पहरमें सतत अभ्यास करना चाहिये। एक पहर याराम पर होकर 23 सके तब समझो कि भारनपा विजय प्राप्त की गई है। भागनपर विजय पानेके याद प्राण और शरीर तथापि बिजय पाना चाहिये। परन्तु भारानपर मिजर पारी विनय योग पिर नही हो पता। इसके बिना आत्म रक्षात्कार अर्थात् सभ्यस्वी प्राप्ति नहीं हो राम्टी । अतः सतत प्रयास द्वारा गुरुगमले पाई हुई युधि अनुगार आगनपर जमा लेना चाहिये । आसनके जयने रन और निरमपर जीत प्राश बरनी चाहिये। धारानको जीवनके पधात सापकजन अनेक प्रारी कियाएं सीप सकता है। परन्तु आसनको जीतकर दारेचे जीतनेरी पूर्ण आयस्ता है। दारि गया पहला लक्षण आंसुधन माचना है। अगसे मेवोन्मेष राशि हो पाती है। योग परिभाषामें इसे प्राटक कहा जाता है। सूत्रोंम भी मेपो न्मेप रहित होने के कई जगह प्रमाण मिलते हैं। दाय जीतने लिये या प्रामुखको शिकारने दिये गयी और सोममें साधकको चपेर आमनपर कर अपने से यमाहारी अन्तर पर मी गोली चनाहर रख देना चाहिए और उग्र बने जितनी गोर र जमा हो। अगर समय अनन्तर भीख में पानी मारण। भारेम भए आनेपर भाटस रोक देना चाहिये। सरस मार दिन aatyals पोचव रहना चाहिये, मर र भ.रम एणना चाहिये । म एगा आना पातिय बिग पर सन्द न हो , भी दया शाल मंच रमना बाहये। रपये मारा नेता संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता कई नवीन बातोंके अचरज साधकपुरुप स्वयं देखने लगेगा, और ज्यों ज्यों इससे भी अगाडी वढ़ेगा सों त्यों उस साधकको अलौकिक आनन्दकी अंश अंशमें प्राप्ति होगी। ज्यों ज्यों दृष्टिको जीतता जायगा त्सों त्यों उसका मन शांत होता जायगा और दृष्टिके जयमें मनका भी जय होता है। अधिकतर आंखकी भवॉपर दृष्टि रसना इसीलिये सूत्रोंमें भी बताया है। "एग पोगलनिविदिहि" "एक पुद्गलपर दृष्टिकी स्थापना करे।" इस प्रकार ध्यानकी प्रक्रियाएँ महात्मा पुरुषोंके पास सीखनी चाहिये । जब एक घंटा तक दृष्टिविजयका अभ्यास हो जाय तदनन्तर साधकको चाहिये कि दिनके पहले भागमें किसी सुन्दर पहाडके शिखरपर या वृक्षकी चोटीपर दृष्टि जमाना चाहिये। रात्रिमें चान्द या शुक्र तथा मंगल तारेपर नजरको जमाना चाहिये । यह प्रयास ज्यों ज्यों बढेगा यों त्यों प्रकृति के प्रत्येक पदार्थकी ओर पवित्र प्रेम उत्पन्न होगा, और सृष्टिके प्रत्येक अशमें वीतरागताका प्रकटी- • करण होगा। परन्तु यह प्रयास भी एक घंटा तक रखना चाहिये इसके अनन्तर सृष्टिके चाहे जिस भागपर दृष्टि डालोगे तब एकदम वह वहीं स्थिर हो जायगी, और शरीरके कोथळेमेंसे दुःख निकल कर भागेगा, इस कक्षापर पहुंचनेपर साधकको तुरन्त प्रभु नामका भावना नामक जाप परम प्रेम पूर्वक शुरू कर देना चाहिये । जाप, इच्छानुसार शब्दोच्चार या 'नमो अरिहताणं' जपना चाहिये । परन्तु कुछ समयके पश्चात् नमो पद आपसे आप उड जायगा, और आत्मा अर्हन् प्रभुमें एकाकार हो जायगा। प्रति समय यथावसर पाकर हिलते, चलते, उठवे, वैठते, सोते, जागते वह ध्यान दिमागसे न निकल सकेगा । साझ, सवेरे, मध्यान्ह और रात्रि में योगकी क्रियाका आरम्भ रखकर जाप जपठे रहना आवश्यक है । एक ओरसे योग क्रिया द्वारा सद्भावनारी दृढता और दूसरी ओरसे जाप, इन दो साधनोंके मिलनेसे मन एकदम शान्त हो जायगा। क्योंकि-"मणो साहसिओ भीमो, दुहस्सो।" मनरूपी घोडा साहसिक और भयंकर दुष्ट है । "इन्दिय चवल तुरंगो" इन्द्रियोंके घोडे अधिक बलवान होते है, परन्तु इस प्रयाससे उनकी मस्ती निकल जाती है, और वे शान्तिमय हो जाते हैं । इस प्रकारके संयोगों में साधककी विवेक दृष्टिमें अत्यन्त सूक्ष्मदृष्टि हो जायगी तया साथ-साथ आन- न्दकी वृद्धि भी। यह साधना सन्तोष जनक होनेपर साधकको अपने योगी संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ३६३ मृत्युका भय नहीं हो सकता, और साधकके संशय शल्योंका नाश हो जाता है। इसीको समझनेके लिये कहा जाता है कि शंकरका तीसरा नेत्र उघड आता है। तब संशय शल्यरूप विश्वका प्रलय हो जाता है। त्रिकुटीमें पिन्दु दर्शन होनेपर साधक ज्यों-ज्यों विशेष प्रयास करता है खो-खों वह विन्दु विशेष प्रकाशित होने लगता है, और अन्तम साधक उस विन्दुमें इतना विलीन हो जाता है कि उस शान्तिमें उसे नादका अनुभव • होने लगता है। तय विन्दुकी अपेक्षा नादमें विशेष आनन्द मानेसे बिन्दु गीण होने लगजाता है, और नाद विशेषातिविशेष श्रवणगोचर होता है। नाद भी अनेक तरहका सुनाई पड़ने लगता है, और वह चकी, सितार, सरंगी और नीयतखाने से भी अधिक और उत्कृष्ट होता है। मेघकी गर्जनासे भी अधिक गर्जना सुनाई देने लगती है। अन्तमें दिव्य नादका अनुभव होनेपर साधक उस नादमें अत्यधिक लीन हो जाता है। इस ध्वनिका अनुभव इतना अधिक बढ़ जाता है कि साधककी हिलने, चलने, उठने, बैठने आदिकी किया- ओंमें भी नादका अनुसन्धान रहा करता है । नादके अनुभवसे ही जग- में संगीतका प्रचार योगी लोकोंने किया है। जिस प्रकार नाद साधकको प्रिय है उसी भाति जगत्कोभी संगीत प्रिय है। अतः सगीत (गुणगान) द्वारा मनको एकाप्र बनाकर साधकजन आगे बढ सकते हैं। वास्तव में संगीत बाह्य नाद हो गया है, और इस बाह्य नाद द्वारा अभ्यन्तर नादको मिलाकर पाया जा सकता है। साधक जब नादमें और भी आगे बढता है, तब उसको नादका अनुभव जहां होता है वह भ्रमर गुफाके ऊपर शंकुके आकारकी एक पोली प्रतीत होगी, और उस पोलके शिखरपर एक महान् प्रकाशवाले पदार्थका अनुभव होगा। यह प्रसाशमान पदार्थ गोलाकार और उलटे छत्रके आकारकी तरहका जान पडेगा। यह छत्राकार सहस्र दल - वीरस्तुतिः । - । लगता है। इस अवस्थामें वह साधक रूपसे मिटकर सिद्ध, योगी, विदेही, महात्मा जीवन्मुक कहलाता है । उस योगीकी दृष्टि देइसे अन्य स्थलपर जहां जहां जाती है यहां या वह अलौकिक दिग्च आनन्दरा अनुभव करता है। जलस्थान, स्थलस्थान, राजस्थान, धनिकस्थान, पशुस्थान, आकाय स्थान आदि जिन जिन स्थानोंपर उस महात्माकी दृष्टि होती है वहां वहा यह आनन्दका ही अनुभव करता है। सुर जगह अभेद रूपसे अली किक अनुभव करनेते दैव भाषकी भ्रांच न रहनेछे वह वीतराग कहलाता है। ऐसा योगी पुरस ही कृतकृल और सिद्ध है। ऐसे योगीके दर्शन भी जगत्को पावन करते हैं। जिस प्रकार अभ्यन्तररति द्वारा हम योगके सम्बन्धी समझ सके हैं। उसी रिसे बाहरके भागमें नाभिके ऊपर स्थापन करनेमें थाता है, और जर उस प्रयासमै नामि और चाके पीच में एक चमकनेवाटी तेजस्वी लकीर भर- रूपसे दीखने लगे तर नाभिसे घटि हटाकर अती के मध्य भागने स्थापन करनी चाहिये, और वहां भी जब इसी भांति तेजसी लगीर भासने यो तर नासिकाके अपने स्थापन करे। नासामसे त्रिकुटीमें, वहासे भ्रमर गुफामें होते हुए अजरामर चक्ररूप विशिला और वहाँले स्वात्म-अनुभवमें पहुंचा जाता है। इस अनुभव मार्ग, भफि है, वह एक महान् साधन है, भपिसे प्रेम प्रकट होता है, और प्रम द्वारा भी आत्मा साक्षात्पर दो सकता है। किती शास्त्र के लोकपर विचार करते-करते गंभीर तहमें उतर जाता है, और उसके द्वारा भी आगे बढ़ सकता है। एक ऐसी भी रीति है जिसमें पानसे बेठकर जो विचार आ उनको सटस्थ रेठकर देण करे, परन्तु विचारों को अपने नहे। अभ्यासक प्रल प्रयनसे विचारधारा सय टी पग्ने लग जाती है, और अन्दमें एम्दम ग्रान्त हो जाती है। विचारों के प्रान्त होनेर हाम्ने अरवि मानन्द होने लगता है। तब अशिल विर विशाल और उरनी हो जाही है। गमान भार तो परने रसने लगता है। अपने आम्मै ईशा भाग्य उदय होने लगता है। ज्यों-ज्यों यह प्रयास करना है, सौन्लो अन्तरले मानन्द विशेष जागल हो जायगी। छना ही नदी, मस्त मादर भी मन जगह पानन्दन ही अनुभव होने लगेगा । और भन्दने यह पूर्व भानरमाय ।
संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता बन जायगा। राप जगह ईश्वरभारको स्थापन करता हुआ अति प्रेममय बनकर, प्रेम रिसे विधम दिन गत मालोकन करनेसे सहजानन्द प्रगट होता है, और यह वीतराग हो जाता है। पहले कहे गये प्रमाणानुसार सपनों के लिये भोगी सी प्रक्रियाएँ संक्षेपमें बताई गई है। इन्हें विचारकर तथा उसी प्रसार मनन करनेसे अपस अलभ्य लाभ होगा। तथा अपरिमित सामल पा गुरगा। योगय विषय असन्त विद्याल और गहन है, और इसे गुरुगमकी गाशी बिना सीस भी नहीं रास्ता। ठयोग, मंत्रयोग, लययोग और राजयोग इस भांति योग चार प्रमरोंमें विगफ है। यम, नियम, भासन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये योगके आठ अग है, और इनमें प्रलेसको उत्तरोतर एकसे एककी अपेक्षा है। प्राणायाम कई प्रकारोंसे हो सकता है, परन्तु उनमें पूरक, कुंभक और रेचक मुख्य है, भसिसा आदि प्राणायाम भी उपयोगी है। प्राणायामको सहा. यता देने के लिये नेति अर्थात् नाक से डोरा पिरोकर मुरादारणे निकालना; तथा पोती अर्थात् परको पेटमें उतारकर मलका निकालना; नीली अर्थात् नलोंको घुमाकर फिराना, वसि यानी गुदासे मल माफ करना, तथा कपाल- भावि गजकरणी आदि हठयोगी अनेक क्रियाएं होती हैं। इसी प्रकार ऐचरी- मुद्रा, महाबन्धमुना, यमुन इत्यादि मुद्राएं गुरुगमके पिना न कर सम्नेके कारण प्राणायाम आदि की पाते फिर बताई जायेंगी, क्योंकि ये वस्तुएं भी विशेष क्षेयरूप हैं । अतः उनको महात्मा पुरुषों की समतिमें रहकर सीखना चाहिये । योगरो पढकर समारमें कोई अन्य विद्या उत्तम नहीं है । जो पुरुष योगकी साधना करेंगे अन्तमें वे परमपदको पायेंगे, और कर्मोंसे मुफ होगे। अतः उनको कर्मबंधके चार प्रकार समझना चाहिये जिनके ये प्रभेद है। फर्मयन्धके ४ प्रकार और दुःय सुप दस समय भनेक मनुष्य नाना पाप करते देखे जाते हैं तथापि वे मुखी क्यों हैं। उन्होंने पुण्यरूपी पीज योये थे, इसीलिये आज वे उनके मुरारूप फलोको सा रहे है, परन्तु इस समय अन्य जीवोंको दु.स देकर पापके पीज योते हैं, इससे भविष्य में इसके अनन्तर उनके फल उन्हें दुःसरूप होंगे। इस प्रकार जो मनुष्य मुखी होकर भी पापिष्ठ होता है वह मनुष्य •. - वीरस्तुतिः । "पायानुबंधी पुण्यवान" समझा जाता है। इसीलिये कि इस समस पूर्वपुण्यके कारण मुखी है और वर्तमान पाप के कारण भविष्यमै दुशी होगा। कितनेक मनुष्य धी होते हैं, अच्छे कार्य करते है, पुण्य भी करते है, तथापि दुःसित क्यों है? इसका कारण यह है कि पहले उन जीवोंने पाप किये थे, अतः पते. मानमें दु.ख भोगते हैं, इतनेपर भी शुभ कार्य करते हुए इस रामन पुण्य चौध रहे है । अतः वे आगे मुखी होंगे। ऐसे मनुष्योंको शासमें 'पुण्यानु- धंधी पापी' कहा है। इसीलिये कि भूतबलक पापरे गरम दुःख भोग रहे हैं, परन्तु वे वर्तमानके पुण्य कार्यके द्वारा भविष्य मुख मोगरे । तव क्या वर्वमान कानमें कोई मनुप्प दुःखको भोगता हो और उसे भविष्य में भी दु.प भोगना पटे षया ऐया भी कोई नियम है! दां हां परों नही, मनसे मनुष्य पूरे पापक भरण इस समय पुगोको भोगते हैं इतने पर भी इस समय अन्य जीवोंको हसदेवे । सो से अगले पन्नोंने भी दु:खी ही होगे। ऐसे मनुष्योंकी शान में क्या संशा पताई है। 'पापानुबंधी पापी' अपांव पूर्वजन्ममें पार किया था उसमा फल तो भोग रहे है, और इस मनय पार करते है भणी उरायला पल भी भोगगे। तर पसा यद भी होयतादेशि मर गुखी हो और आगे भी मुखी ही रदे! हो यह भी हो सकता है, भूतग्रल, सबने अन्य प्रानिक गुण देकर पुष्प पा है, ये भर गुखी है, और अब गुन्य या भारी भी गुसराही उपभोग करेंगे। एमे पुपये शाम का या! इस 'पुण्यानुपंधी पुण्यवान्' कहा है, क्यों पहने र परसे अब मुखी है, और यमान गुम्प प्रमाविम भागे भी गया दीपारगा। सार-यो मारवार प्रसार मनुशहा, अनुसंध भई सयदेसिन मागे मोगा art। यमा अनुसनेर संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३६७ अगादी मुखौंका उपभोग करेगा। अशुभ अनुबंध हो तो भगा दुःस भोगना पडेगा। (१)'पापानुवंधी पाप' इस समय दुःस और पीछे भी दुःरा । (२) 'पापानुबंधी पुण्य' इस समय भुरा और पीछे दुः । (३)'पुण्यानुषंधी पाप' इस समय दु.स और फिर मुख । (४) 'पुण्यानुयंधी पुण्य' इस समय मुरा और फिर भी मुस। इस प्रकारके कमासे या तो दुःस मिलता है या मुरा मिलता है, परन्तु मोक्षके अन्यावाध मुरा जो कि फनी समाप्त नहीं होते, ऐसा थात्मिक मुख पाने के अर्थ शारीरिक मुखोंका भोग छोड़ना चाहिये । अर्थात् पाप पुण्यका क्षय करके आरमसरूपमें रहना सीखिये, और किसी भी प्रकारका अनुबंध न वाधना चाहिये। यदि अनुबंध डालना हो तो पुण्यका ही यांधना चाहिये। पापमा अनुबंध तो बिल्कुल ही न डालना चाहिये क्योकि पुण्य के अनुबंधसे कुछ ऐया बल प्राप्त करता है कि जिससे काका भय भी कर सकता है। ॥ अधाऽऽलोचनापुष्पाञ्जली योगस्य पुष्टये ।। वीतरागोऽसि विज्ञानमयो गुस्वरोऽसि त्वम् । गुणागारोऽसि देवेश। सदा भव्यावने रतः ॥१॥ इत्यं ते स्मरणानियं, नरा यान्ति भवाम्बुधेः । पार मुसेन श्रीवीर ! नान्योपायोऽस्ति भूतले ॥ २ ॥ शुभाऽऽनन्दस्य केलिस्त्वं, गुणोत्तमगृह जिन! मुरासुरनरैस्त्वं हि, सेव्योऽस्यवनिमण्डले ॥३॥ त्वदीये चरणाम्भोजे, मतिमें स्वादकामतः । सर्वोचकोऽसि सर्वशो, रक्ष संसार. सप्तः ॥४॥ महोदधिः कलायुदेरादर्शस्त्वं शुभस्य च । आचारस्याऽनव. यस्य, संग्रते?.खभअकः ॥ ५ ॥ वेद्यो लोकत्रयस्यैव, रत्नाकर । जयोऽस्तु ते। श्रीशो जिनवरोऽसि लं, कृपाकर। दयानिधे। ॥६॥ कर्ममो जातसर्वर । विज्ञप्तिम स्वयि प्रभो। वीतरागमयोऽसि त्वं, दुवुद्धर्मे निशामय! ॥७॥ विज्ञोऽसि हे प्रभो ! देहि, वर चाभयदं शुभम् । पित्रोरप्रे शिशुः स्पर्ट, नोचा- रयति कि ? पुनः ॥ ८॥ मोदाय तस्य किं लीला, न भवेत्त्वं विचारय। हे मनः। खमुरतंच, रीति चैव स्वकीयकीम् ॥ ९॥ नम्रो भूखा वयं प्रीति, विभो कुरु मुदाऽनिशम् । भवेऽसिग्नई शुद्धन, मनसा दत्तवानु किम् ॥ १० ॥ दानं किश्चित्सदाचारो, ज्ञानं नैव तपश्च मे। पवित्रं नो मनो मेऽलं, कयमारा- धये विभुम् ॥ ११॥ अद्यापि वासनाहानिर्न जाता पुद्गलेषु च भ्रमाम्मे .
वीरस्तुतिः। भ्रमणं मिया; संसारान्धौ दयानिधे 11 ११॥ कोध्यमिना प्रदायोऽहं, दिरा- रानि शुमागुमे। लोभोरगेन सन्दष्टये, देहि मे शानमेषजम् ॥ १३ ॥ अभि- मानग्रहग्रस्तश्चाज्ञानवशतो वहम् । पायते न गुरो! ज्ञानं, कपटायत्ततमः ॥ १४ जगलत्र मया किचिन्न, कृतं परहितं विभो! शोकसागरमामय, सुखं मे स्यात्वधं किल ॥ १५॥ मादशस नरस्यान, जातं जन्म मुव च। मन्यतां पूनये. शवचिनदेव ! भवस्य च ॥ १९ ॥ दर्शनं च त्वया दस, खमुखस्यैव निर्मलम् । मुस्थिरो भवताविते, मदीये जायते फलम् ॥ १५ ॥ आनन्दरससमप्ने, न भवेत्सत्यवर्तनम् । ममाति हृदयं बनसमें जानीहि सत्मिय 1 ॥ १८॥ दुर्लभं च मया प्राप्त, ज्ञानरत्नं दयाकर! भ्रमणे बहुदिना. बाते, न निरतो भवो मम ॥ १९॥ नटं मे ज्ञानरलंच, सदाऽऽलस्वप्रभा- पतः । कस्यान्तिकमुपागम्य, गटीम मुहुर्मुहुः ॥ १०॥ जगतो वचनायेव, राग्य विधूतं मया। हास्यमर्थे भवे जात, धर्मलेशं न लब्धवान् ॥ २१॥ मदीये रसनाच, विद्या वसति निर्मला । तथापि कलहो निलं, धनादिगुण- नाशकः ॥ २२ ॥ तथापि निगृहीनथ, जातोऽहं देन मे रतिः । हासे प्रज. लिवे चैव, जायते च महान्प्रभो ! ॥२३॥ भ्रमणगोपवेऽप्यस्मिन्, सगरजीवो हि नित्यशः। अतोऽदं चाधमो लोके, मुखं त्यकं विचारय ।। २४ ॥ सदाऽ- म्यान्दूपयित्वाऽई, मन्ये खमुखनिर्मलम् । परदारान्विलोक्यवं, जाते नये च वेगळे ॥ २५ ॥ परनिन्दारतत्पेन, ति मे मछिनं गुरो ! कसादितं भवेन्मेऽय, न जातं विमलं मनः ॥ २६ ॥ गुमा वै डाकिनी चेका, तथैये रविशेऽर्दकः। मत्यविशा तदायता, कदापि न च विष्ठति ॥ ३७॥ करोमि प्रगट तुन्यं, लजो स्त्रीयां गुरोऽधुना। त्वया तु ज्ञायतां सर्व, जगत्तम दयानिधे ॥२८॥ गुरोर्वचनमबन्द, मया खलं च हे प्रभो! तशा सच्छास्त्रवचनं, निम्मा युम्या हिवं परम् ॥ १७ ॥ दुर्मनिरतो निलं, दुस्सी च तथैव हि । मिथ्यान्वपर संलिप्तमधर्म विद्धि मां गुरो! ॥३॥ मते भ्रमो न मे नष्ट इति वेद पिया गुरो| बलवा च त्वां देव । निखिलं भवस्टकम् ॥३१अमान च मे पापं, रष्वासानवशादहो! हाहायरवदा जातोऽनेनेति मयि नो मुगम् ॥३२॥ मबासी चहन्दे मे, समं चतुरहानशम् । पथा प्यातं तपा सम्भ, न जाता श्रीजिनपरः ॥ ३३ ॥ अन्ताननं मनोहार, त्याऽसिमगमेधते। इति त्वपि परे लनं, मनो मा पपिट मे ॥१॥ सध्यानसर निसन्तनिधि संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता श्रुत्वापि नो भयम् । संसारतारकं श्रुत्वा, शातं नो कारणं मया ॥ ३५॥ खास मयि नो भासो, जातेध मुमनोरमः । गुणीच मयि सामिन् ! विमला नो रते. कन्या ।। ३६ ॥ प्रभुत्वं न च मे जातं, समेऽपि दृश्यतां प्रभो । तथापि गवसवे. शाकरिप्येऽहं कथं दिवम् ॥ ३०॥ प्रतिक्षणमायुर्हसते, मनस्तापो न यात्यसो । दुःसदा च जराऽवस्था, सम्पमा विपयादरात् ॥ ३८॥ निवर्तते न चायापि, तस्मास्वच्छरणागतः । मेषजेच्छा मदीयाऽस्ति, धर्मवृत्ती न मे मतिः ॥ ३९ ॥ मोहरूपप्रहाविटो, न शिटः कोऽपि चाधुना । चैतन्येन समाविष्टो, लभते पद. मन्ययम् ॥ ४०॥ इत्यायमन्यमानोऽहं, गरो! रक्षा मयि कुरु । सन्मुसे वं मदीये हि, स्थितो देन्यविमोचकः ॥ ४१ । तथापि दीनवाक्यानि, भणोमि तब सनिधी । धिकार मे दयागार ! मुधा मे जननं भवे ॥४२॥ जिनसेवा कृता नैव, सविधिगृहसेवनम् । तथा कर्म कृतं धर्मपालनं न फचित्कृतम् ॥४१॥ दत्तं नो दानमत्युमं, न चित्ते स्मरणं तम। केवलं त्वयि संलमो, यथायोग्य निशामय ॥४४॥ तृदेहं दुर्लभं प्राप्य, तमाशय मया कृतः। यथेकाकी नरोऽरण्ये, रोरवीति मुधा तथा ॥ ४५ ॥ प्रत्यक्षफलदातृत्वाधर्म जैनं शुभं मतम् । तर जाता च नो प्रीतिर्मदीया दुःखनाशिनी ॥४६॥ महामौख्यं च मे , यतो जातं भयं मुहुः । कल्पक्षं तथा कामदुधा प्राप्य द्वयं मया ॥४७॥ सहसा दुरासमूह च, सहमानेन नाशितम् । दुर्लभं जन्म प्राप्याशु, न मया साधितं तपः ॥ ४८॥ रोगदुःखे निरुद्ध नो, दृटौ च मुसभोगको । इति मे ह्यपराधं च, क्षमख कृपया गुरो! ॥ ४६॥ अपमृत्युभयापतिनाशार्थ न कृतं क्वचित् । कान्ताजनसमासको, धनादेः सङ्ग्रहः कृतः ॥ ५० ॥ कारागृहममा नारी, नरकागारसलपहा । तत्रासकमनाश्चाई, न जिनं ध्यातवान् पुनः ॥५१॥ नो साधितं च साधुत्वं, सद्वृत्तिनों धृता मया । अतुला नार्जिता कीर्तिर्न परेषु दया कृता ॥ ५२ ॥ परदुःखं प्रहाणेच्छा, तथा दीनजने दया। खप्नेऽपि नोप- कारव, कृतं न गुरुसेवनम् ।। ५३ ॥ रनकल्पं नृजन्मादिग्रामीणजनसेवया । मष्टं जातं मुधा विद्वन् ! तद्रक्षसाधुना गुरो ! ॥ ५४॥ वैराग्ये च समागते, शास्त्रज्ञानं न जायते। कोपाविष्टं दुर्जनस्य, वाक्यं मा सोढुमर्हसि ॥ ५५ ॥ आध्यात्मिकी च विद्या नो, नास्त्युत्तमकलाऽपि च। कथं भवाब्धेः पारं च, गमिष्यामि मुबोधय ॥ ५ ॥ भवान्तरे चोत्तम कर्म, न कृतं किश्चिदुत्तमम् । जन्मान्तरे करिष्यामि, नात्याशा मे गुरो। किल ॥ ५५॥ जिनदेनेशं चाहे, वीर. २४ ।
३७० वीरस्तुतिः । कटं न सात्कयं नहि। चोतमो यो भवार ये, मशः सोऽपि प्रगारद ॥१८॥ चरित्रं चानेकविध, कय क्षेत्र मपाऽनप मीयमपम पृत, नवे महा- प्रभो ॥५९ ॥ जगत्रयखरूपलं, प्रमानावि प्रभो! भुवम् । मार्गदरित्न संहि, मनोऽभिप्रायवित्तया । ६. स्वरसमो नाखि हे नाथ परो दुस- प्रणायकः । दुरावस्थामहं प्राप्य, नो सारेऽन्यभूमारि बन्योषार लकेशन, गारे लतो भवापहम् । शिवदो गवानी प्रार्थना प्राय ॥ १२ ॥ सर्वदुःसन्तरापंच, हर! शानं प्रीयताम् । फलिपिने नित, समुत्पन्न दुपये ॥२॥ कलकत्ताभिषे रम्ये, मतिमें मुबमा मोर। यतो जगवलाम्भोधे, पारे यासानि यसता (समिती पबनाना , चित्ता प्रमोदतः। प्रन्टं करोमि सर्वज्ञ। पेनाप्यालोचना भव॥५॥ रथा विराप्रसादास्पातया कुरु महामदे शन्दनन मेनारिख, सपा वि. ज्दराम् ॥६सल्यो नरो यय, पटेरितसम्पया । वेदपारगमा आरसे, यत्सरे निर्मिता विपम् ( धीरटरमायस, सीमा निशुमा । रचिता चयममन्य, पीरपास दुष्टये ॥१॥ गुरमंदीयोऽस्ति फकीरचन्द्रो, मानं मया लम्पमिदं यतश्च । योधं च लाया सुकियां करोमि, ततोऽ'मरत्वं च भवेत्रसुदं मे ॥ ६ ॥ इति श्रीमज्जातपुरमहावीरजेनसाहीयमुनियोफकीर. चन्द्रजिटिव्यपुष्पमिसुविरचिताऽयूवेशान्तिवा- ऽऽलोचना पुपानठी समाता। भगवान महावीरकी वैराग्य भावना. सेपिज़र आत्र मापीर महार, हरप हो नगे पर पेशा मावीर। मालन जिया की नगर महापौर, पर एक उसमीर मा। मालमके लिए मर गुरदेवदारत, दुनियादेशिए मतलए इसपरे हमेवर मीर उर्ग पर भगर मारा, उप धिए स्टाग्राम पाया। हर भोपाभासे अपाया, गंगे अमी सधी से पुगया। या नामपा xिy नाम मोधमिलाप ।
संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता फुदरतकी झलक थी, क्या ज़ाद थी जिस जातमें फ़ितरतकी चमक थी ॥२॥ महसूस हुआ जब इसे दरपेश सफ़र है, मंज़िल है कड़ी राइमें गुमराही का का डर है। दुनिया जिसे कहते हैं वह इक खानए शर है, आराम कहाँ दर्दोमुसीबतका यह घर है। सोचा के यह क्या है के हूँ खुद में भी इसी में, नाफहमी से माखूज़ हूं राहते तल्बी में ॥ ३ ॥ जय गौर किया हस्तीए अशिया नज़र आई, दर मसल अजव सैर सरापा नज़र आई। बधोंका घरोंदा सा यह दुनिया नज़र आई, मिट मिटके भी होती हुई पैदा नज़र आई। जौहरके अरज़का नहीं कुछ ठीक ठिकाना, गिरगदकी तरह रंग बदलता है ज़माना ॥ ४॥ बेसवाती (अनित्यता) हर रंगेजहां अस्ल में बिजलीकी चमक है, जो शक्ल हवेदा है वह शोलेकी लपक है। गुंचोंकी चटक है न पद फूलोकी महक है, इक हस्बीएमोहूमकी यों ही सी झलक है। पल भरमें न वह शक न वह शान न सूरत, था वहमे नज़र आंखने देखी थी जो ॥५॥ हर चीज़ के जिस चीज़पै होनेका गुमा हो, चेहरकतो बेजान हो या साहिबेजा हो । इक शक्ल हो तखीर हो हस्पीकर निश हो, कमजोर हो शहज़ोर हो बाताबोतवां हो । वक्त आए तो फिर ज़ोर किसीका नहीं चलता, वह हुक्मेक़ज़ा है के जो टाले नहीं टलता ॥ ६ ॥ कहते हैं जवानी जिसे बचपनकी फ़ना है, पीरी जिसे कहते हैं जवानीकी कज़ा है। हर अहदमें इक लुत्फ़ है हर लुत्फ़ जुदा है, इक छत्फमें सौ दर्द हैं हरदर्द सिवा हैं। फिर दर्द के राहत कोई कायम भी कहीं है, क्या है जिसे "हे" कहिए के है भी तो नहीं है ॥ ७॥ येपनाही (मशरणता) मादर पिदर व दुल्तरो फर्ज़िन्दो विरदार, याराने वफादार रफ़ीकान दिलावर । ओरग कुलाहे मही सदाने जवाहर, इन्सानोंकी फौजें हों के देवोंका हो लकर । होनी कभी टलती नहीं आपहुंचे जब इंजाम, हर सुबहके दामनसे है वावस्या यहां शाम ॥ ८॥ कमज़ोर हो मजबूत हो दाशनो अमर हो, मुफलिस हो गदा हो कोई या साहिबेजर हो । मुंगी हो फिरंगी हो कोई रस्के कुमर हो, हो खारेनज़र सबा के मंजूर नज़र हो । वछ आया तो फिर नोए दिगर हो नहीं सकता, यमराजके पंजेसे मफ़र हो नहीं सकता ॥ ९॥ मरता है पिसर वापसे रोका नहीं आता, मां रोती है दम चेटेन पामा नहीं जाता। मुंह तकते हैं सब याससे बोला नहीं जाता, भाईसे मी भाईको बचाया नहीं .
वीरस्तुतिः।। जाता। तदवीर किसी तरह किसीकी नहीं चलती, मौत ऐसी बला है के जो टाले नहीं दसती ॥ १०॥ सदका कोई देता है के कुछ रहेवला हो, पड़ता है अमल कोई के ताबीर दुवा हो। कहता है तबीचोंसे के कुछ ऐसी दवा हो, झूटा किसी सूरतसे कहीं हुक्मकजा हो । होनी की मगर कोई दुआ है न दवा है, जो होना है आखिरको वही होके रहा है॥ ११ ॥ फितरतका तकाजा है के होकर ही रहेगा, जो जिसने किया है उसे भोगेगा रहेगा। कुछ डर नहीं काफिर जो मुझ कोई कहेगा, जिस रुपये पहा जाता है दरिया वह बहेग। हामी कोई बंदा है किसीका न खुदा है, सम- रह है उसी फेलका जो जिसने किया है ॥ १२॥ अजतराबे दुनिया (संसारता) इस पर भी. तो दिल वक्फे तमना व तलब है, राहत जिसे कहते हैं मयस्सर ही वह कब है। इक आरजू सौ रंजो मुसीबतका सबब है, और हसरतें लाखों हैं फिर एक एक गुज़र है। यह कौन है ? जो शौक का शेदा नहीं होता, किस दिलमें यहां सूनेवमाता नहीं होता ॥ १३॥ मुग्लिसको अगर गम है के रोटी नहीं परमें, जरदार है. मुतर हदिसे दौलतो जरमें। इक दर्दकी तखोर है इक जीके दिगरमें, राहत न इसे हैन उसे आठ पहरमें। इक आंख तो फर्जुन्दके परमानमें नम है, अलग- दकी कसरतसे कहीं नाकमें दम है ,१४ ॥ आराम समझता है कोई मालको जरको, कन्भे लिए फिरता है कोई दुस्लोपिसर को। रोता है कोई फरकृते मंजूरनजरको, तामीर कराता है कोई गुम्यदोदरको। यह मेरा है में इसका हूं यह मान रहा है, दुख दर्द के सामानको मुख जान रहा है ।। १५॥ दिल शौकसे रंजूर है और शौक फिल है, आर्यो, जो नम है किसी अरमान है। राहत जिसे कहते हैं वह इक सत्रोमकू है, हाल थापना मगर फरवतमाला से गईं है। इछ भारत पूरी दुई चौ करमई पैदरा, आराम किसी शमसे मिलने नहीं पाता ॥ १६॥ दुनिया और वहम हमदर्दी (अन्यत्वता) हर आत्मा दुनिया में अकेली है अजलसे,। पाबंद तनामुख है मगर बंद अमलसे । मर मरके कहीं-कुटती है यह कैद हमलसे, इक कुदतीसी लडती हुई थाती है अजलसे । बीमारीमें आजिज़ रही दरमा तलयी, जब मरती है तो पाती है दुसगो रलवी ५ १५॥ घर झूटे तालुक है गलत दावए उतकहनेकी मुहब्बत है दिखाकी रिफाकृत। यीमारी होश फिलामें, रोके रविशेइल्मको सुद उसकी ज़ियामें ॥ २५ ॥ ज़राते अमः लका इख़राज[निर्जरा] काफूर शबे कुम हो मेटजाए जहालत, ताबा संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता मौत हो या दौरे मुसीवत, मुमकिन ही नहीं उसमें किसी गैर की शरकत मुंह तकते हैं हैरतसे मदद कर नहीं सकते, मां बाप भी बेटेके लिए मर नहीं सकते ॥१८॥ अलेहदगी बेइलायकी और तनहाई (एकत्वता) ये महलोमको हमने जो तामीर किए हैं, यह ऐशका सामान के दम जिसपे दिए हैं। यह लालो गुहर औरोंसे जो छीन लिए हैं, औलाद के जिसके लिए मर-मरके जिए हैं। हम जायेंगे ये साथ न जायेंगे हमारे, ये हमसे जुदा है यहीं रह जायेंगे सारे ॥१९॥ यह रूप यह रंग और यह नकशा ये खत व खाल, है नुरके सांचेमें ढला आइने तमसाल । गो रूहसे मखलूत नज़र आता है फिल- झाल, लेकिन है जुदा जानसे यह जानका जंजाल । यो आत्मा इस पैकरे- खाकी में बसा है, है पाइनेमे अक्स मगर उससे जुदा है ॥२०॥ नापाकी और गिलाजत [अशुचिता] यह पैकरेखाकी के हर इक जिसपे फिदा है, हर शख्सको मंजूर नज़र जां से सिवा है। कुछ गोश्त है कुछ खून है बलगमसे भरा है, इक ज़रफ़े गिलाजत है जो झिल्लीसे ढका है । बोल और निजासतके सिवा खाक नहीं है, नापाक है इतना के कमी पाक नहीं है ॥२॥ मशहूरे ज़माना हो जो हुस्ने नमकी से, दिल छीन लिया करता है जो शले- इसी से। उसके हो कोई ज़ख्म कटे जिस कहीं से, फ़बारह छुटे पीपका और खूका वहीं से । देखे न नज़र चाहनेवालोकी पलटके, मक्सीके सिवा गर कोई पास न फटके ॥ २२ ॥ आमद-ज़रीने अमल [आस्रवता] कर देते हैं जर्रावे अमल रूहको नाचार, फल देके ही टलते हैं ये अगयार सितमगर । गो कर्म हैं दो किसके बदकारो निकोकार, होना ही मगर इनका है सद बाइसे आज़ार । इक इक नुक्कए रूहपे बैठे हैं हज़ारों, उठता है अगर एक तो आजाते हैं लाखों ॥ २३ ॥ जो टलता है वह खूब झलक अपनी दिखाके, गेज़ो गज़बो किबसे दीवाना बनाके । जज़बो कशिशे जंगे अमल हदसे वढाके, खुद छोडता है लासके फंदोंमें फँसाके। वंधती है योही रूह इस आमदसे अमलकी, गर्दिश नहीं मिटती के यह है रोज़ अजलकी ॥२४॥ सद्देवाव [स्वरता] अब जन कमी इस मोहका कुछ ज़ोर घटा हो, सुश वालईसे दुश्मनेजां जर हुआ हो। उस वक्त कोई रहबरे हक रहनुमा हो, तब रूहका कुछ होश ठिकाने हो बजा हो । जाने ही न दे भ्यानको गैरोंकी ३७४ वीरस्तुतिः। हो यूरेइल्म बढ़े रेसदाका । काबू हो हदासोपे हो दिल महदेरियाज़त, मुक्ति सुमति शील हो सन्तोष हो आदत। यह बाइसे सरगरतगी फिर आप ही रक- जाएँ, जर्राते अमल कहके जुपोंसे निकलजाएँ।। २६ ॥ थामद भी रुके मंदे अमल छूटने लग जाए, फंदेसे खुले दाम कुहन टूटने लगगाए। ये मोह की मदिराका घझा फूटने लगनाए, सुद आत्मा अपने ही मजे लूटने लगजाए। फिर अपना तमाशा हो और अपनी ही नज़र हो, अगियारसे अगियारकी सोह- बतसे हजर हो ॥ २७ ॥ आलिमे असयाय [संसार] यह जहां पानी "जिसे सब कहते हैं ससार, सव्य इकठे हैं यह इक जावसद इसरार । फाइल कोई इनका न कोई मालिको सर्दार, पैदा कमी होते हैं न मिटते हैं ये ज़िन. हार । छःसे कमी कम और सिवा हो नहीं सकते, बनते हैं विगडते हैं फना हो नहीं सकते ॥२८॥ पार इनमें हैं बेहोश तो इक साहिने अदराक, पांच इनमें मकी एक मको साली कावाक। चार इनमें जदा रहते हैं बेलीस सदा पाक, दो मिलते हैं आपसमें तो हो जाये है नाशक) इ. मादह इस हजर हो जाते हैं मखदून, खोलो न सुळे ऐशी गिरह लगती है मजबूत ॥ २७ ॥ पांच ऐसे के जिनकी कोई रंगद है न सूरत, एक ऐसा के हर हिसको है वह बाइसे लज़द । कहते हैं उसे मादह सब पहले सीरत, जब सहसे मिलता है तो यह होती है हालत। जरूह तो वह जिस है धौर बंद अमल है, जो साइरे जां के लिए सम्याद जल है ३०॥ वह आप गुलापीसी वह अवरूजी सनी है, वह शोख नज़र जो सरे नाविक फिगनी है। मंजूर गाज सबको जो नामबदनी है, हर सूरतेदिश इन्हों दोनोंसे पनी है। महज्य है इल्मो नजरे सह मजलसे, यहफी दुई फिरती है गीय आने अमलते ॥३॥ इन्सान भी हैवान नी और हूरो परी भी, यह नज्म यह अलाफ यह पुश्की भी सरी भी। गुलबार पे और मोहमें हर साजरी भी, जो घरदै सामने सोरी मी सरी मी, बेजान भी जीता मी अच्छे के बुरे हैं, शल्ये इन्हीं दो के है के आंखों में दुबे हैं ॥ ३२ ॥ यह असल है इनिरा की यह आलमध्ये होकत, कावास्में है मेष अवाहरकी गालत, हा बहुत इसम बहुत इराकी है बुसमत, रहोंके लिए सही मैदान अजोयत। वे इत्मे सही मारमा निरनजी, भावारहर सरयता है गर मेसरी से ॥ ३॥ इसले इत्म सही की दुश्यारी योधि दुर्लभ ] ld की बीच दिलान नहीं जाता, क्या बाप कि हिसझे बताया नहीं आता।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिवा बैरालको अशकालमें लाया नहीं जाता, शुज करफज़मीरी उसे पाया नहीं जाता। इन्कार मगर सहकी हस्तीसे ख़ता है, हर शैको फकत इल्मने मालूम किया है ॥ ३४ ॥ होशो खिरदो इस्म फकृत रूह की है जात, जुन रूह किसी और को हासिल नहीं ये यात। लिपटी है अजलसे जो उसे बंदकी आफात, इनके ही सबब बहकी हुई फिरती है दिन रात। फिर भी सिफ्ते जात कमी जा नहीं सकती, ये होशको होश और खिरद आ नहीं असकती ॥ ३५ ॥ सब जड़ हैं मगर आत्मा है ज्ञानका भंडार, जो ज्ञान है और इल्म है चेतनका चमत्कार । खुद इल्म भीमालूम का बाहोशो खुबरदार, उस ज़ातमें मुमकिन ही नहीं शर- कते अगियार । पुद्गलने मगर ज्ञानको आवरण किया है, खुद भूलसे अपनी ये गिरफ्तारे बला है ॥ ३६॥ इक बार अगर भूल कोई इसकी मिटादे, शक्ल आइने में इसकी कोई उसको दिखादे। खुद जातका इसकी इसे दीदार करादे, यह बंद अमल काटसे फिर दममें उडादे। जायिदनो मुरदनकी बला इक आनमें टलजाए, आज़ाद हो जू इत्मकी बंदिशसे निकल जाए ॥ ३७॥ दुनिया है अजब चश्म फरेब आइना खाना, सौ बार यहां मिलके छुटा ऐशो खजाना। यार ऐसे वफादार के बेमिस्लो यगाना, वह हुनके जिस हुनका मुश्ताक ज़माना। मिल जायें यह आसान है दुश्वार नहीं है, मुश्कल तो फकत जातका अपनी ही यकी है ॥ ३८ ॥ रूहानियत या सिफ्ते जाति [धर्म ] कहते हैं जिसे धर्म वह कुछ और नहीं है, वस जातका अपनी ही कफ़त इल्मोयकी है। लारेव है इसमें न चुना और चुनी है, सच ऐसा के रोशन सिस्ते मेहरेमवीं है। भटकी है जो आपेसे वही रूह है नाशाद, और मुहयते यकजाईसे है गैरकी वरवाद ॥ ३९ ॥ परिणाम यह राजकी सूरत थी जो पाबन्द हया थी, अब उठ गया पर्दा तो वही जल्बहनुमां थी। गो इल्म सरीहीकी अभी जून ज़िया थी, लेकिन वरके दहरकी तफ- सीर तो था थी। देखा तो इन ओण्फ पै यह साफ लिखा है, भूला है जो आपको वह कर्मोसे बंधा है ॥ ४० ॥ भगवान् विचार-भगवान महावीर थे दर असल महावीर, मति-श्रुति-अवधिज्ञानकी थी रूहमें तनवीर । पढते ही यह समझे परके दहरकी तहरीर, है भूल खुद अपनी सबब जिह्मतो तह वर। सोचा के अब इस मोहको निर्मूल करूंगा, फिर बन्न न हो जिसे वह चारित्र धरूप ॥४१॥ हूं भान फक्त ज्ञानी ज यन के रहूंगा, में होश हूं बेहोश का पारंद न हूंगा। आजाद है फ़ितरत मेरी आङ्गद बनूंगा, ३७६ वीरलुतिः। हूँ पाक तो अब गैरकी शरकतसे वचूंगा। वह जात हूं रहता हूं में जो अपनी सफा में, है अक्सफिगन चीज़ हर इक मेरी जिया में ॥ ४२ ॥ यह है सिपते ज्ञात मिटाई नहीं जावी, पुद्गलसे किसी तरह दपाई नहीं जाती। सौ जंग लगे फिर भी सफाई नहीं जाती, यह शान यह एजाज़नुमाई नहीं जाती। इस पर मिरी हस्तीमें है इक उत्क इक आनन्द, और ऐसा के जिबका कोई हमसर है न मानन्द ॥४३॥ श्री भूल के था महये तमाशाए जहाँ में, फिरता था तलाशो हविस कामो जवा में। नादान था जो कैद था इस वंदेगिरां में, गफलत वी ममप्यत्र ही न पा सूदो जियां । भाया है जो अब होश तो बेहोश न हूंगा, चिद्रूप हूं विप ही में मगन रहूंगा ।। ४४ ॥ असबाबो ताछुक जो बजाहिर थे किए दूर। दिल शर्मसे मजबूर न जज़वातसे मामूर। था जामए उरियां ही लिबासे तने पुरनूर, जो रूप यथाजात या बस था यही मंजूर । कहने को तराचुर था अहिंसा थी दया थी, फिलअस्ल वह इक रूह थी और उसमे सिफा थी ॥४५॥ वह जोर जो था यादे मुसाठिका रुका था, तूफान जो उठा था अजल से वो थमा था। लहरोंमें जो था शोर वह सामोश हुआ था, उस ज्ञानके सागरमें करार आया हुआ था। सादिन जो हुआ आप तो आप लागई ऐसी, साफ़ उसमें झलकने लगी जो चीज थी जैसी ॥४॥ यह इल्म सरीही था बस इक शान था केवल, सूरजसा निकल आया धुरा कर्मका बादल । हर सूक्ष्म-स्थूल हर इक आय वयस्कूल, से उसमें अयोधीन था पदी कोई हायल । सर्वज्ञ इमादा हुए क्या उनसे छुपा था, जो पाठिमे अस्वाच में था जान लिया या ॥१७॥गुश लहजा रादा एक तने पाकसे निकली, श्री रूहकी भाबाज़ मगर साकसे निकली। वह पाक भी बेहतर कही अफलाको निरली, माजूद जोहर साहिबे मदरासे निकली। निजदह उसे इन्सान भी करते थे मुल्क नी, फितरतको जिया भी पह होकनकी झलक थी. ४00 होचा थर पुण्य वचनम पाउपर जोश,सिरनेलगी जब वर्गना युननेने सर पोसार राज अर होगा माने हमा सन्तोष, सिजदे के जिनो यशर दोन सरे दोध। हा मेरे महावीर इस आवाजक सदये. इस घटय मायलई इस अंदाज़के सदके ॥४९॥ (फकीर मायल).
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता
मङ्गलाचरणम् ।
सर्व एव हि जैनानां, प्रमाणं लौकिको विधिः ।
यत्र सम्यक्त्वहानिन, यत्र न व्रतपणम् ॥१॥
रत्नत्रयपुरस्काराः, पश्चापि परमेष्टिनः ।
भव्यरत्नाकरानन्दं, कुर्वन्तु भुवनेन्दवः ॥२॥
[अर्हन् परमेष्ठी] ॐ निखिलभुवनपतिविहितनिरतिशयसप-
यापरम्परस्य, परानपेक्ष्यापर्य्यायप्रवृत्तसमस्तार्थावलोकलोचनकेवलज्ञान-
साम्राज्यलाञ्छनपञ्चमहाकल्याणाष्टकमहापातिहार्यचतुस्त्रिंशदतिशय-
विराजितस्य, पोडशाधलक्षणसहस्रांकितदिव्यदेहमाहात्म्यस्य, द्वादश-
गुणप्रमुखमहामुनिमनःप्रणिधानसंनिधीयमानपरमेश्वरपरमसर्वज्ञादिनाम-
सहस्रस्य, विरहितारिरजोरहःकुहकभावस्य, समवसरणसरोऽवतीर्णजग-
जयपुण्डरीकखण्डमार्तण्डमण्डलस्य, दुप्पाराजवंजवीभावजलनिमजज.
न्तुजातहस्तावलम्बपरमागमस्य,
भक्तिभरविनतविष्टपत्रयीपालमौलिमणि-
प्रभाभोगनभोविजृम्भमाणचरणनक्षत्रनिकुरुम्बस्य, सरस्वतीवरप्रसादचि-
न्तामणेर्लक्ष्मीलतानिकेतकल्पानोकहस्य, कीर्तिपोतिकाप्रवर्धनिकामध्ये
नीरवीचिपरिचयखलीकारकारणाभिधानपात्रमन्त्रप्रभावस्य, सौभाग्यसौर-
भसंपादनपारिजातप्रसवस्तबकस्य, सौरूप्योत्पत्तिमणिमकरिकाघटनवि-
कटाकारस्य, रत्नत्रयपुरःसरस्य, भगवतोऽर्हत्परमेष्ठिनो भूयो भूयः
स्मृति करोमीति स्वाहा । अपि च-
नरोरगसुराम्भोजविरोचनरुचिश्रियम् ।
आरोग्याय जिनाधीशं, करोम्यर्चनगोचरम् ॥१॥
वीरस्तुतिः। [सिद्धपरमेष्ठी] ॐ सहचरसमीचीनचात्रियविचारगोचरोचित- हिताहितप्रविभागस्य, अत एव परनिरपेक्षतया स्वयंभुवः सलिलान्मु- ताफलमिव उपलादिव च कीचनमदेवात्मनः कारणविशेपोपसर्पण- वशादाविभूवमखिलंबलविलयलब्धात्मसभावमसमसहायकममवर्धारिता- भ्यसनिधिव्यवधानमनवधिमयनसाध्यमवसितातिशयसीमानमात्मत्यरूपे- कनियन्धनमन्तःप्रकाशमध्यासितवन्तमनन्तदर्शनवैशविशेषसाक्षात्क- तसकलवस्तुसर्वस्वमनवसानसुखस्रोतसमर्पयन्तवीर्यमचाक्षुषसूक्ष्मायभास. मसदृशाभिनिवेशावगाहमलपुव्यपदेशमपगतवायापराकारसंक्रमगतिवि- शुद्धस्वभावतमा, निवृत्ताशेषशारीरद्वारतया च, मनामुक्तपूर्वावसान्त- रमरूपरसान्धशब्दस्पर्शमशेपभुवमाशिरःशेखरायमाणपदविधमरमप• शान्तसकलसंसारदोषपसर, परमात्मानमुपेयुषो गुरुणापि प्रतिपनगुरु- भावस्स रनत्रयपुरःसरस्य भगवतः सिद्धपरमेष्ठिनो म्यो भूयः स्मृति करोमीति खाहा, अपि च- प्रक्षकर्मविनिर्मुक्कानूनकर्मविवर्जितान् । यत्नतः संस्तुवे सिद्धान, रसत्रयमहीयसः ॥ २ ॥ '[आचार्यपरमेष्ठी] *. पूज्यतमस उदिगेतोतादिकुलीलगुरु- परम्परोपाचसमतिमरहस्ससारस, अध्ययनाध्यायविनियोगविनयनि- यमोपनयनादिक्रियाकाण्डनिष्णातचिवस्य चानुर्वसंपप्रवर्धनाधुरंधरस्य, द्विविधात्मधर्माचमोधनविभूतहिकत्यपेक्षासम्बन्धस, सफलपर्णाश्रमसम- यसमाचारविचारोचितपचनप्रपधमरीचिविदलितनिखिलजनतारविन्द- नीमिथ्यात्यमोहान्यकारपटलस मानतपःरभारमकाशितनिनशामन्स शिप्यसम्पदामोपभित्र भुगनमुदमुपतत्स भगवतो समयस पुरःसर. स्पाचार्यपरमेष्ठिनो भूयो भूयः स्मृति कोमीति स्वाहा । अनि च- संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिवा ३७९ विचार्य सर्वमतिसमाचार्यकमुपेयुपः। आचार्यय-नामि, सश्चार्य हृदयाम्युने ॥१॥ [उपाध्यायपरमेष्टी] ॐ श्रीमद्भगवदईद्वदनारविन्दविनिर्गत- द्वादशांगचतुर्दशपूर्वपकीर्णविस्तीर्णधुतपारावारपारनमस, अपारसम्प. रायारण्यविनिर्गमानुपसर्गमार्गणनिरतविनेयजनशरप्यस्य दुरन्तैकान्त- पादमदमपीमलिनपरवादिकरिकण्टीरवोकण्ठकण्टारवायमाणप्रमाणनय- निक्षेपानुयोगवाव्यतिकरस्स, श्रवणप्रणावगाहनावधारणप्रयोगवान्मि- त्वकवित्वगमिकश किविलापितविततनरनिलिम्पाम्बरचरचक्रवर्तिसीम- न्तमीतपयंस्तोतंससक्सौरमाधिवासितपादपीटोपकप्टस्य मतविधानव- पहृदयस्य भगवतो रसत्रयपुरःसरस्स उपाध्यायपरमेष्ठिनो भूयो भूयः स्मृति करोगीति स्वाहा । अपि च- अपास्सैकान्तवादीन्द्रानपरागमपारगान् । उपाध्यायानुपासेहमुपायाय श्रुताप्तये ॥१॥ [सर्वसाधुपरमेष्ठी] ॐ विदितवेदितव्यस्स बायाभ्यन्तराचरण- करणत्रयविशुद्धित्रिपथगापगाप्रवाहनिर्मूलितमनोजकुजकुटुम्बाडम्बरस्य अमराम्बरचरनितम्धिनीकदम्पनदमादुर्भूतमदनमदमकरन्ददुर्दिनविनो- दारविन्दचन्द्रायमाणोदितोदितव्रतमातापहसितार्याचीयकामनचरित्रच्यु- तविरश्चिविरोचनादिवैखानसरसस्स, अनेकशस्त्रिभुवनक्षोभविधायिमिर्म- नोगोचरातिचरैराश्चर्यप्रभावम्मिभिरनयधारितविधानसेमलोचरगुण- मामीभिस्तपःभारम्भैः सकलैहिके मुखसाम्राज्यवरप्रदानावहितायाताव. धारितविस्मितोपनतवनदेवतालकालिकुलविलुप्यमानचरणसरसिरहपरा- गस्य निर्वाणपथनिष्ठितात्मनो रसत्रयस्य पुरःसरस्य भगवतो लोके सर्व साधुपरमेष्ठिनो भूयो भूयः स्मृति करोमीति साहा । थपि च- वीरस्तुतिः। चोधापगाप्रवाहेण, विध्यातानगवदयः। विध्याराध्याघ्रयः सन्तु, साध्यबोधाय साधवः ॥१॥ [सम्यग्दर्शनम् ] ॐ जिनजिनागमजिनधर्मजिनोक्तजीवादित- त्वावधारणद्वयविजृम्भितनिरतिशयाभिनिवेशाधिष्ठानामु, प्रकाशितशं- काप्राकाम्यावहादनकुमतातिशल्योद्धारासु, प्रशमसंवेगानुकम्पाऽऽस्ति- क्यस्तंभसंभृतासु, स्थितिकरणोपगृहनवात्सल्यप्रभावनोपचरितोत्सवस- मासु, अनेकत्रिदशविशेपनि पितभूमिकाम, सुकृतचेतःप्रासादपर- म्परासु कृतक्रीडाविहारमपि च, यनिसर्गान्महामुनिमनःपयोधिपरिचि- तमशेषभरतैराक्तविदेहवर्पपरचक्रवर्तिचूडामणिकुलदैवतं, अमरेवर- मतिदेवतावतंसकल्पवल्लीपल्लवं, अम्बरचरलोकद्ददयेकमण्डनं, अपवर्ग. पुरप्रवेशागण्यपण्यात्मसात्करणसत्यंकार, अनुलायदुर्घनपटादुर्दिने- प्वरि जन्तुपु, ज्योतिर्लोकादिगतिगर्तशतनमकाण्डभेदनमामनन्दि मनीपिणस्तस्य संसारपादपोच्छेदप्रथमकारणस्य सकलमंगलविधायिनः मश्चपरमेष्ठिपुरःसरस्य भगवतः सम्यग्दर्शनरतस्य पुनः पुनः शुदि करोमीति साहा । अपि च- मुक्तिलक्ष्मीलतामूलं, युक्तिश्रीवल्लरीवनम् । भक्तितोऽहमि सम्यक्त्वं, भुक्तिचिन्तामणिप्रदम् ॥११॥ [सम्यग्ज्ञानरतम्] ॐ यनिखिलभुवनतायिलोचनं, आत्महि- ताहितविवेकयाथाम्यावबोधसमासादितसमीचीनभावं, अधिगमसम्य- यत्वरनोत्पचिस्तान, अखिलासपि दशासु क्षेत्रज्ञसभावसामाज्यपरम- लान्छनं, अपि च यस्मिन्निदानीमपि नदीखातचेतोभिः सम्यगुपाहिती पयोगसमाईने घुमणिमणिदर्पण इव साक्षाद्भवन्ति ते ते भावेकसम्म त्ययाः सभावक्षेत्रसमयविनकर्षिणोऽपि भावालस्यात्मलाभनिवन्धमय- :
न्दुर्निशान्धापहस्तं वन्दे मनसा गिरा च शिरसा जैनेड्यमीशं जिनम् संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ३८१ हेतुविहितविचित्रपरिणतिभिः, मतिश्रुतावधिमनःपर्यायकेवलैः पञ्च- वयीमवस्थामवगाहमानस्य सकलमङ्गलविधायिनः पञ्चपरमेष्ठिपुरसरस्य भगवतः सम्यग्ज्ञानरलस्य पौनःपुन्येनादरणं करोमीति साहा। अपि च- नेत्रं हिताहितालोके, सूत्रं धीसौधसाधने । पात्रं पूजाविधेः कुर्वे, क्षेत्रं लक्ष्म्याः समागमे ॥१॥ [सम्यक्चरित्रम् ] ॐ यत्सकललोकालोकावलोकनप्रतिबन्ध- कान्धकारविध्वंसनं, अनवद्यविद्यामन्दाकिनीधरं, अशेपसत्योत्सवानन्द- चन्द्रोदय, अखिलबतगुप्तिसमितिलतारामपुप्पाकरसमयं, अनल्पफल- प्रदायितरुःकल्पद्रुमप्रसवभूमिमस्मयोपशमसौमनस्यवृत्तिधैर्यप्रधानेरनु- ठीयमानमुशन्ति सद्धीमनाः परमपदमाप्तेः प्रथममिव सोपानं, तस्य पश्चतयात्मनः सर्वक्रियोपशमानिशपावनस्य, सकलमङ्गलविधायिनः पञ्चपरमेष्ठिपुरःसरस्य भगवतः सम्यक्चरित्ररत्नस्य सम्यगवधारणं करो- मीति स्वाहा । अपि च- धर्मयोगिनरेन्द्रस्य, कर्मवैरिजयार्जने । शर्मकृत्सर्वतत्वानां, धर्मधीवृत्तमाश्रये ॥१॥ जिनसिद्धसरिदेशकसाधुश्रद्धानवोधरनानाम् । कृत्वाटतवीं स्मृति विदधामि ततः स्तवं युक्त्या ॥२॥ अथ ममाक्रन्दनकाव्यम् । • श्रीमद्वन्द्यपदारविन्दयुगलो ध्यानकवेद्योऽस्ति यो, व्याप्तं येन चरा- चरात्मकमिदं क्षीरं यथा सर्पिपा । यद्भासा तरणिविभाति दहनथे- वीरस्तुतिः। ॥१॥ संसारोगवैनतेयसहशो विज्ञानकोशालयः, कल्पद्रुजिनाट- श्व हुतभुम् ज्वालाजटालावृतः । वीवं धर्मतरोश्च विवडलधौ पोतो- ऽस्ति यस्सेविना, ध्येयवं मुनयो भजन्तु नितरामानन्दकन्दालयम् ॥२॥ पञ्चक्लेशनिरासवासरमणिविज्ञानवाराम्बुधिर्भव्याभीएशतप्रपूरण- विधौ चैतन्यचिन्तामणिः । सबैनेप्सितसाधुभचिनलिनीन्याशशहेतू- यः, सोऽस्माकं कुरुतात्कपायशमनं श्रीमाझिनेन्द्रः प्रभुः ॥ ३ ।। जैना भिक्षुवराः ! पिताऽस्ति परमोऽलाकं हि वीरो बिनो, यो दीयो- सवसंज्ञके शुभदिने निर्वाणतामानवान् । योऽन्ते नो निगमागमादि- जनितज्ञानात्मके चक्षुषी, प्रादासंयमिनो विधाय सुखदं ध्यायन्व- वस्त्रं विभुम् ॥ १॥ धर्मवानचरित्रसंयमतपोयोगाझगापानदाद, यो नो जैनमतावरोधनकरमध्वंसना विभुः। हित्वा वोध रयं भवाब्धि- पतिताः किश्चिन्न कर्तुं क्षमाखमादुविधा समाहितधियो यन्नं च कुर्मो मुहुः ॥ ५॥ मायाजालमपास्य चात्मनि मनसंघीयते योगिभि- योगाभ्यासतपोऽपरिग्रहवलात्सत्सत्तेः संघरात । ते विना जिनपाद- पारजसः सेवानुरकस्य च, तस्मातान् परिहत्य चक्यकरणे चेतस्स- मापीयताम् ।। ६ ।। चके द्वादशमा उपोपलमदो दत्ता तपस्यान्वि- वान्, द्वारा गुप्तपिया विवेकपटयो जाता विरक्ता यतः । शीलादे- निलयाश्च चेतनगुणैरात्मीयभावाध्यास्तसादात्मविचारण मुनिवरा सटामसिद्धिमदम् ॥ ७ ॥ सादादो विदुषां दिनाप गदितोऽनेकान्त- वादनथा, सिद्धान्तप्रतिपादनं मतभिदा नाशय जायते । सर्व तय निहाय मोहबलधौ मामा वयं दुखरे, रागद्वेपणाकुले च मुनयो मव्यं कुत्तो नो भवेत् ॥ ८॥ मायानिमितमोकासारविषये वैराग्यमेवाम, मम्माप्रतम्मायमराभयोगमवादमा।.
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३८३ दत्वा नश्च महाव्रतादिनियमानष्टप्रवाक्याँस्तथा । संसारे जिनदेवधर्म- वरणिं मादादथो संयमान्, तं साधु सुखसागरं प्रतिपदं ध्यायन्त्वतिप्रे- मतः ॥ ९॥ अहिंसा तथा सत्यमस्तेयमाहुमहद्ब्रह्मचर्य सुनिर्वाणहे. तुम् । यतस्तत्ववोधस्समुत्पद्यते च, यतो रक्षणीयाश्च ते भिक्षु- चयः ॥१०॥ यस्यामोपात्मशक्तिं प्रबलगुणगणैर्नो प्रवक्तुं समर्था, नास्माकं साधुवोधस्तदनु च कथने तत्स्वरूपस्य तत्वम् । तस्य ज्योतिःप्रवाहं प्रचलगुणकरं वक्ठमीशाः कथंचिन्नो वा घाता- ख्यशक्तौ मतिरपि सुतरां नेहशी तादृशी च ॥ ११ ॥ श्राम- प्यप्रतिपालनाय सुधिया जातावतारा वयं, कामक्रोधविमोहलोभमम- तामानावरोधाशयाः । चेतः संघपदारविन्दयुगले जित्वेन्द्रियमा- मकं, संसारानृतभोगरोगशमने विद्यामये धार्य्यताम् ॥ १२ ॥ कामक्रोधविमर्दनेन च पुनर्लोभः समुत्पद्यते, तस्मान्मोहसमुद्भवः स्मृति- हरो विज्ञाननाशस्ततः । पश्चाद्धर्मविपर्ययोऽनृतमयी मोगैपणा जायत, इत्यं दुःखमये विचित्रविपये जीवोऽनिशं वध्यते ॥ १३ ॥ आदाविन्द्रियनिग्रहे च विपया नश्यन्त्यनायासतः, काये चारुपरिग्रहादि- शमने ज्ञानोदयो भासते । पश्चात्कर्मसमुच्चयप्रणशनं धर्मे प्रवृत्तिः स्थिरा, तसादिन्द्रियसंयमे हि मुनिभिश्चतः प्रदेयं सदा ॥ १४ ॥ तच्छतेरात्मयोगात्सकलगुणमयः स्यात्प्रतापोदयश्च, तस्साये चोत्थि- तायाः प्रचलति नितरां वर्द्धमानाः समस्ताः । जाते शीले महत्वे सकल लगुणविधेः सुप्रवाहं नियुज्य, वीर्य चान्तेऽवरोधं कृतमतिविमलं नो मनः शान्तिमत्वम् ॥ १५ ॥ चित्रं मे विमलायतं जिनवरे लमं गुरोभीवनात् , सेवाभाववठं च संयमयलं प्रोकृष्टमोऽकरोत् । रक्ष्यं १ समितिगुप्तिरूपान् । २ साधुसाग्दीधायकभाविद्यमयः सपः । । श्रुवनये।
३८४ वीरस्तुतिः। संघवलं प्रतापसहितं कार्य सुवाक्यार्चनमी शून्यवलं विघातकवलं. तत्वात्मकं धार्यताम् ॥ १६॥ धैर्येण क्षमया विभान्ति मुनयः कड़े- यथाम्ब्वाशयाः, सत्यासत्यविमर्शनेन विषयासक्तं मनः ,शाम्यति । तच्छान्तेः सकलेन्द्रियाणि विपमाच्छाम्यन्त्यसद्भावनाद , साक्षात्कारतरं भवेबृदि पुना रूपं परस्यात्मनः ॥ १७ ॥ श्यादृश्यभिदापवारणकरे लोलायुपश्चेतसा, सौत्राः सच्चरितामृतादिविलसच्छावाश्रये स्वीयताम् । चावीचारविचारसारपटखो येनाखिलाऽभीष्टदा, तस्मिन् ज्ञानमये जगत्य- नुदिनं सत्संयमरन्विताः ॥ १८ ॥ रुद्धं सर्वमनर्थकं भगवता हिंसावलं नर्कद, साधूनां प्रबलारिनाशनकर साध्वीगणानां तथा । तीव्र भावक- पायकादिशमनं तत्वानुरूपं महत्तीर्थ स्थापितवान् खनामविजितं सार्थ- क्यमेवं कृतम् ॥ १९ ॥ तत्कालीनगुणानुरूपमभिधां बोधात्मिकीं नूतना, संघे सस्थितिमेकतां सुमधुरां कृत्वा खधार्थिने । योग्यत्वं समये विधाय हृदये जाता यतो योगिनः,' सूत्रोक्त वचने कुरुध्यम- निशं विश्वासमेवं मुहुः ॥ २०॥ येनोद्धातलं च हिंसकवलं पूर्णा- मना सम्मुखो, भूत्वा नष्टतरं कृतं सुमनसा रुद्धं च मिथ्यावलम् । शुद्धश्रावक श्राविकागणमयं संस्थाप्य तीर्थ. शुभ, श्रीतीर्थकरनाम खं सुललितं, सार्थक्यमेवाकरोत् ॥ २१ ॥ तत्काले जनता वधर्मनिरता सहे सदा सम्मता, भावैक्यस्य रसस्य पानमसकृयत्पायितं प्रेमतः । आज्ञा विश्वहिता सुबोधजननी संस्थापिताऽमानदा, धैव्यं शौर्यमया- बलम्ब्य सुखदं प्रद्योतितं नो मुदे ॥ २२॥ धैय्यदिवलधारणं च विषयासकेन्द्रियाणां गणं, रुदा योगतपोऽसिना न जगतो जन्यं महा- नर्थदम् । दुःखापायकरे तमोऽपहरणे ज्ञाने मनो दीयता, स्याचित्र १ विगतं यातं यसात् । २ स्मस्य भावाः सोनाः । ...
चना ॥: अद्याऽनद्यमयेक्षते च महती हानिः समाजस्य.च, भाग्यान्म- न्दमयादुतावरयुगाद्यच्छासनाख्यं, बलम् । क्षीणत्वं प्रतिपद्यतेऽनुदिवस संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता ३८५ सकलेन्द्रियैः सह ततः शान्तं प्रयासं विना ॥ २३ ॥ पश्चाच्छान्ति- गतं मनो न. विषये लमं कदाचिद्भवेत्पूर्वीचार्य्यवरैः सुसंयमरतैरित्येव- मुकं पुरा । साधूनां जगदन्तरायशमने मोक्षाप्तये साधनं, हित्वाऽशा: न्तिकरान् समस्तविषयांश्चेतो गिरौ स्थाप्यताम् ॥ २४ ॥ कामिन्याः कनकात्कपायविपयाचे साधवो विभ्यति, जीवात्राणकरादसत्यवचना- दज्ञानकृष्णोरगात् । खाद्वन्नाशनतः परिग्रहरताचे भव्यभावाशया, लोके भव्यजनानवन्ति सततं सद्बोधतत्वामृतैः ॥ २५ ॥ तेज़स्तस्य प्रकाशतां गतमदो भन्याशयानां हृदि, काण्डं भीपणवत्त्वमत्र गहनं संस्थापितं संयमे । जैनाचार्य्यवरैः परस्परमथो संस्थाप्य चैक्यं वलं, संयुक्ताखिल- शक्यमोघसहिता संघादिविद्युत्प्रभा ॥ २६ ॥ विद्युच्छतिरिवारविन्द- हृदये प्रोद्भासिता, येन नः, सद्धे शक्तिमदोच्चयोऽतिकृपया जाता यत- कता । तां विस्मृत्य च मोहमानममताक्रान्ता वयं दुःखिनस्तामुद्भा- वयितुं मुहुर्यतिवरा यत्ने मनो धीयताम् ॥ २७ ॥ पूर्वाचार्यगणैः पर- स्परमदश्चैक्यं सुसंस्थापितं, शक्त्यानन्तप्रवाहसङ्घतडितः शक्तिः समु- त्पादिता । वीरं शासनमेव निम्नपतित येनोद्धृतं शान्तित, एतावन्नहि किन्तु शासनवरं संवर्द्धितं न्यायतः ॥ २८ ॥ योगासक्तधियों जिने. न्द्रमूदुलाम्भोजांनिसेवारता, मिथ्यात्वादिनिरस्तसर्वविपयाः कारुण्यवन्तो दयाम् । धृत्वा चेतसि वो निधाय च गुरोनिद्वपादाम्बुजं, व्याख्या, नाय निबन्धरूपममलं ह्याक्रन्दनाख्यं जुवे ॥२९॥ ॥ इति प्रस्ता न ज्ञायते कारणं, द्वन्द्वारम्भत्रिधौ च . कटमधिकं संवर्धते हानिकृत् ॥ ३० ॥ ईर्पाकारणतो न कोऽपि ,कमपि-बूते न सम्मन्यते, दृष्ट्वं वीर. २५ वीरस्तुतिः । मतभेदकारकमिदं चेतस्ततो धावति । विद्याऽपि हसते तथाप्यनयतो धों विलुप्तो भवेच्यायान्यायविचारदुर्वलतरो जातोऽधुना बुध्यताम् ॥ ३१ ॥ जातोऽयं मतभेदभेदकवशादाचारभेदोऽपि च, संख्या त्रिंशतितोऽपि जातमधिकं किं वर्णयामो वयम् । साम्प्रादायिकमेद- वेशकरणादाचारभेदोऽपि च, ज्ञात्वैवं शमसाधनेऽनुदिवस धर्ने प्रवृ- चिर्दमे ॥ ३२ ॥ दृष्ट्म विषयं च कस्य न मनस्त्रोदं हितेच्छापता, प्रामोत्यन्तमनन्तशासतवतां केषां मनस्तोकताम् । यात्याधीरतया च हेति सुमहच्छन्दः समुत्पद्यते, जाते सत्यपि साधुचेतसि पुननोत्पद्यते भावना ।। ३३ ।। तद्दौर्बल्यमहत्तरं न कुरुते प्रत्येकमत्रान्तरे, सर्वेषा मनसा विचारकरणे नो भेदभावोऽधुना । वास नो कुरुते परस्परमहो सम्मेलनं नैकता, नान्येपा, हितमोहते शुभधिया कश्चिन्नरः प्रेमतः दृष्ट्या चोन्नतक पदं परजनस्याता भवेयुर्जनाः ॥ ३४ ॥ केषां सानोपलब्धिन, भवति सुतरां नास्ति शिक्षोपलब्धिस्त्यक्ता सेवार्षि नित्या निजमुनिचरणाम्भोजयोः साधुवयः। सेवाधर्मापलापोऽजनि जनहृदयासमतुल्यो नराणा, कोधाविटेश्च छिन्नं प्रतिदिनमखिलं सभ्यमूलं विहिरीः ।। ३५ ॥ योऽन्येषां धर्मलोपे प्रचलपलमयो धार- यिला प्रवृतः, प्राप्तुं शिक्षाविभागे, प्रचुरसमवळं संविमर्तु समर्थः । सोऽनर्थ स्फोटयित्वा रिपुदलगहनं दग्धुममिखरूपः,' कार्य तस्यापि नित्यं वितरति समये नाभिमानप्रयोगः ॥ ३६॥ सम्मेले विलयं गते च कियती सम्भावना दुर्दशा, जातोऽहं पतितो मवे च कियती चाघातसंवेदना । यक्ष्मा मे महती तृतीयजवनी कान्तातिदुःखादरा हा किञ्चिन्नहि मेखि तद्विगणना कार्ये प्रसिद्ध सति ॥ ३७॥ मान. क्रोधपरिमहोदयवशाधर्मक्षयो जायते, तरक्षीणे चिनदेवशासमवले दासः , निपतिताः कश्चिवत्प्रवन्धो न हि सर्वाधारजिनेश्वरोपकरणे नो विस्मृति- संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरमापान्तरसहिता ३८७ समुत्पद्यते । तद्धासे च कलक्षितं जिनमतं निष्ठा ततो भावना, तस्माद्दोप- समुच्चयापनयने चितं समाधीयताम् ॥ ३८॥ अस्माकं यदि बोधमस्त्य- वनतेर्मानापमानस्य च, पातस्यैव च वाऽवहेलनजनेर्जावा पराकाष्ठता । लब्धज्ञानबलेऽपि कुम्भयवसो निद्रालयाः शेरते, विद्युतेजसममिजं किमु पुनर्भानूदये तिष्ठति ॥ ३९ ॥ अत्याचारसमुद्भवे च निखिलं नष्टं च भत्र्यात्मना, सर्वापारमयी क्रियापि विपुला नष्टा तथा भावना । शास्त्राणां पठनं प्रणष्टमधिकं जैनावतारे मुनौ, किं कर्तव्यमतः परं मुनिवराः सञ्चिन्तयध्वं हृदा ॥ ४०॥ शिक्षार्थ बहुशो जनविरचिताः पाठालयाः कालया, नो वा साधुगणैश्च विश्वविदितं संस्थापितं वा कचित् । विद्यापीठमनल्पकं यतिवराश्यानाः पठेयुर्मुदा, ज्ञानाभ्यासकरा नयन्ति सकलं धर्मादिकं श्रेयसे ॥४१॥ धर्मे नाभिरुचिर्गुरौ न नियतिर्विद्या- श्रमे नो मतिः, तत्सूत्रे पठनादरो न हि रतिः सङ्घ मुनीनां तथा । न्यायान्यायविचारणे न च गतियोगाश्रमे नादरः, श्रेयो नश्च कथं भवे- दनुदिनं चेतः परं क्षुभ्यति ॥ ४२ ॥ मोहेनाधिकतृप्णया च महति सञ्जायते नः क्षतिः, वर्द्धन्ते ममतादयोऽहितकरा ज्ञानं ततः क्षीयते । तत्क्षीणे जिनधर्मशर्म विलयं यास्यत्यथो भावना, निष्ठा सूत्रसमुद्भवा सुरगुरौ लोके कथं स्यास्थितिः ।। ४३ ॥ रागद्वेषविवर्धनेन च मनो न स्यात् स्थिरं चञ्चलं, नद्रोधानयनं विना न विषयाः शाम्यन्ति योगा श्रयाः । यावत्कर्मनिरोधनं न हि भवेचावत्कथं भावुकं, ज्ञात्वैवं परि. हत्य रागविषयं सांघं बलं सेव्यताम् ॥ १४ ॥ गर्तेऽशान्तिमये वयं योग्यता। दरं तेन ततोऽखिलं च विषयं संलब्धवन्तो मुद्दा, वत्सर्व कथमन्यथापहरणं कुर्वन्ति चान्ये नराः ॥ ४५ ॥ सामाजस्य सुरक्षणं ३८८ वीरस्तुतिः। च भवतामाधीनतामागमदेवं चाभ्युदयोऽपि भिक्षुकवरा ज्ञात्वा द्वयो रक्षणम् । संयुक्तेष्टवलं विना न हि भवेत् तदक्षणं नालसात्, संयुक्ता. भ्युदयप्रतापजनना चैक्यादिकं प्रामुयात् ॥ ४६॥ पूर्व देशमवेक्ष्यतां हि कियतीमत्युत्नति प्राप्तवान् , तद्देशेऽप्यधिवासिनो हि नितरां खार्था; भिमाने रताः । तत्रैक्येन बलेन सज्जनजनाः कुर्वन्ति निष्कण्टफं, राज्य छन्नधराश्च भोगनिरताश्चैकाधिपत्ये , स्थिताः ॥ १७ ॥..देशेऽस्मिन् दुरवस्थता प्रतिदिनं वृद्धिंगता पश्यत, अत्रत्या विषयोपभोगनिस्ता जाताः पराधीनताम् । ऐक्याभावपरा न संयमकरा नो दूरदर्शप्सयो, रागेाशयसंयुताश्च सुतरां विज्ञानशून्याशयाः ॥ ४८ ॥ दारिद्रेण सुखेतरा जनपदा साहाय्यमाप्यान्यतः, दवं चान्यजनेन वस्त्रमनिरां सन्धार्यते दुःखतः । पश्यामोऽधमदुर्दशां च महती भुंज्मः पराधीनता, बद्धाः शृंखलया वयं परवशाः स्वातत्र्यहीनास्तथा ॥ १९॥ पूर्वस्था मनुजाः खतघ्रनिरता राज्यं वहन्त्याहिताः, प्रत्यक्षात्मकमुख्यकेन नियताः सत्यप्रमाणेन च । ऐक्यं.चाधिगताः स्वधर्मविलया विख्यात- सेवाः पराः, ज्ञात्वैवं समयादिकं न हि भवेत्त्याज्यं कदाचिनहि ॥५०॥ जाते वस्तुनि रोदनादिकरणं मिथ्येव होच्चारणं, पश्चातापनिवेशने न हि पुनर्नेत्राश्रुपातं शुभम् । झुगारादिविकत्थनं किल मुधा सर्व न्यलीके त्यजेच्छ्रीमद्वीरजिनानुशासनवरं चोत्थाप्यतां श्रीध्वजः ॥ ५१ ॥ चीर- खाम्यनुशासनानुसरणं संपैक्यता सेवनं, सूत्रागाधमहोदधेश्च तरणं ज्ञानक्रियाराधनम् । कापायाद्यपवारणं जिनमुनौ सेवार्पणं प्रेमतः, सन्त्येतानि शुभार्थिनामनुदिनं श्रेयःकराण्यग्रतः ।। ५२ ॥ मृत्युपाय- गतस्य चेक्यमुबलस्योत्थापन कार्यतां, यकेन समाजकेन समये साम यभाजा न हि । धीरत्वेन च यत्नरत्नकरणे चेतः समाधीयतां दाय मुख भक्त्यनुदिनं तां पद्धर्ति गच्छत, श्राद्धानां भवनं त्यजन्तु मुन- न्वितदेशमार्गपथिको भूत्वा महावेदना.। सोढव्या चे महोणदेशज- संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३८९ निश्चयमाविधाय मनसः शुद्धिर्विधेया पुनः ॥ ५३ ॥ रागेश्यापि परि- अहेरनुदिनं मुक्त्वा भवन्त्वादरात्, सर्वानिष्टकरैर्ममत्वयलिभिः : सङ्गः परित्यज्यताम् । खश्लाघाकरणे ममत्वकरणे दोपो महाजायते, सर्व माद्विपयान्मनोपहरणं श्रेयस्करं स्यात्ततः ॥ ५४ ॥ शास्त्रे. वस्त्रे शिप्य- वर्गे शरीरे, ग्रामे देशे श्रावके चान्यकार्ये । शोकं मोहं सम्परित्यज्य नेज, वायत्तायां नैव माद्यं कदाचित् ॥ ५५ ॥ बोधार्थ जनताहिताय सकलो ग्रन्थो मुदा घर्म्यतां, न स्थाप्यो निकटे कदापि मनसो भारा- दयं नित्यशः । त्यज्यन्तां प्रियवस्तुनोऽपि नितरां नो कार्यतां सञ्चयो, नित्यैकं वसनं निधाय सुखदं खे जीवने रक्षणम् ॥ ५६ ।। गावं मृण्मयमेव भाजनमथो नोऽनल्पमूल्यात्मकं, चै चाम्बरमेव धारणवरं नान्यन्महर्ष कचित् । धार्यो नान्यपरिग्रहश्च शयनं भूमिस्खले शोभनं, नो वाच्यं परुपाक्षरं कचिदथो जातापमानैरपि ॥ ५७ ।। नो भोक्त- व्यमनुत्तमं रसरसैर्युक्तं सदन्नं कचित् , गार्हस्थ्यैर्मनुजैर्न सङ्गतिरदः कार्या शुभाकादिभिः । स्थातव्यं शुभशासनैः शमदमक्षान्त्यादिभिः संयुतैरेवं जैनमुनि समुन्नतपदारूढं भवेन्नान्यथा ॥ ५८ ॥ सातव्यं समवाप्य चात्मनिहिता शक्तिः समाश्रीयतां, चारित्रं च निरीहता सर- लता सत्यं निवासं बने । एवं संयमता क्षमत्वमनिशं सत्याग्रहत्वं तथा; इत्यादेईलमुद्विभाव्य सकलं खातन्त्र्यसञ्चिन्तनम् ॥ ५९ ॥ यत्रानन्त- योऽरण्यं गुहां चेच्छत । स्थित्वा तत्र सुसंयमं प्रकुरुतः नान्योऽस्ति पन्थाऽपरः, सर्वस्मिन् विपये भवन्तु निपुणाः पारंगताः स्युः पुनः ॥६० ॥ भगवद्वीरजिनस्य जन्मभवनं नित्यं भ्रमन्त्वाहिताः, शीताद्य- - ३९० वीरस्तुतिः। नितं चोष्णादिकं वा, तथा सेव्यं साधुजनस्य सङ्गमखिलं हेयं गृहिस्त्रीं जने ॥ ६१ ॥ साध्वीस्त्रीगणसंगते न च पुनों दर्शयेचाननं, संघस्यो. नतिके मनो मुहुरथो सन्दीयता प्रेमतः। तच्चाप्युन्नतशेखरे स्थिरयितुं यलेन संस्थीयता, सन्तोः भिक्षुवराः, समाजविपये , सगौखं धार्यताम् ॥ ६२ ॥ खच्छं जैनमतं तदुक्तविधिना स्याद्वादचित्तार्पणं, तत्सूत्रोक्त- विमर्शतत्वमननं शश्वद्धिताऽऽधायकम् । कर्तव्यं प्रतिवासरं सुमुनयो हित्वा कषायादिकं, शास्त्रेऽन्यत्रमते ( परसमये ) सुवोधकरणे कल्पन्तु सद्भुद्धिभिः ॥ ६३ ॥ शास्त्रोद्धारकृतेनुरक्तमनसः अत्यन्तदेशंपति, मा गन्तव्यमसत्कराँग्ध विपयानो चिन्तयध्यं हदि । सचिरैर्विलसद्गृह तु, निनां हेयं सदा दूरतो,' दध्याज्येन समन्वितं च पयसा त्याज्यं, सदन्नाशनम् ॥ ६४ ॥ शीतोष्णादिकजन्यतापसहनं मौनं मिताभाषणं, येन स्याजनतोपकारमुखदं वाक्यं च धाय हृदि । गन्तव्यं गहनं गिरी न पिहित सत्कन्दरामन्दिरं, भोक्तव्यं विरसादिकं च. शरानं धृत्वा प्रशान्ति मुदा ॥६५॥ योगाभ्यासपरायणो गुरुपदाम्भोजार्चनासक्तपीः, सूत्रा- भ्यासरतो दमादिसहितः सद्भावनासंयुतः । ध्वस्तारोपकपायको जित- महापड्वर्गशत्रुर्गुरुः, सद्गच्या परिपूर्णशान्तहृदयो योगाश्रमे दत्तीः ॥६६॥ नो वै वेपविधानमात्रकरणाच्छिप्यो भवेत्कर्हि चिच्छान्तं धर्मरतं गुणान्वितजनं संशिक्षयेद्दीक्षया । नानाशास्त्रविचारणोत्सुकमनास्त्यतैयगो दुःखहर, एताहगुणवतरो बतिप्रियः शिप्योषधेयो मुहुः ।। ६७ ॥ हे भिक्षुप्रवरा मयाऽध समये सन्दश्यते संस्थितिः, ये केचिद् गृहिमो गृहादिरहिताश्यायान्ति नष्टे धने । दुःखातश्च बुभुक्षवो हि भवता- मारात् पिपासाकुला, नो कृत्वा च परीक्षणं पुनरथो दीक्षां ददत्याद- रात् ।। ६८॥ तेभ्योऽयोम्यतरेभ्य दीक्षणमहो सन्दीपते वा हटा- संस्कृवटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३९१ हीक्षामात्रविधानकेन नियता मनं प्रदत्वा मुदा । किञ्चिद्भा- पणयुक्तिशक्तिसहिता भापात्मिका दीयते, दशवकालिकनन्दिसूत्रवि- पय उत्तीर्णता चेद्भवेत् ॥ ६९ ॥ नो वैराग्यरतो विचारकर- णेऽदक्षो न विद्यान्वितः, क्षिप्रं श्राद्धजनाय मोहकरणेऽविद्यावशः सत्कथाम् । नो वा जैनमतानुसारचलनो भक्त्या विरक्त्या युतः, (नैवं शिष्यगणोऽतिदीक्षणपरो नो भावशुद्धौ रतिः) अन्येभ्यो हठवञ्चनाय नितरां शिष्योऽप्यनिष्टः स्मृतः ॥ ७० ॥ न्यायप्राकृतजन्यकाव्यविषयं सच्छाब्दिकं या पुनर्दद्याज्ज्ञानमनन्तरं सुमुनये शिप्याय दीक्षामपि । येन स्यात्समिती सुयोम्यगणना लब्धप्रतिष्ठो भवेन्नो चेत्कर्मविगर्हितं च भवतां निन्दालयो जायते ॥ ७१ ॥ दृष्ट्वेमां घटनां बुधो हदि महत्कष्टं मनस्वोददं, हास्सं वा विदधाति रोदनमथो वाह्यार्थमेपो जनः । हीनं योग्यतया जनो न मनुते सत्कारमातन्यते, जन्मान्धस्य दिवाकरः प्रकथनं नामात्यनर्थप्रदम् ॥ ७२ ॥ ज्ञानं नैव विभाति यस्य हृदयेऽज्ञानान्धकारापहं, नो शिक्षा विशदा सतां न मुखरो भूत्वाऽ- न्यथा वञ्चनम् । लोकान् वश्चयितुं करोति विविधां धृत्वा मुखे वत्रिका, जैनानां मतदूपणं प्रकुरुते न स्थापनीयो जनः ॥ ७३ ॥ साझोपातया च सूत्रविपये स्याद्वादज्ञाने तथा, छन्दःशास्त्रसमन्वि- तेऽन्यविपये ज्ञानं प्रदायाथवा । साधुभ्यश्च परीक्षणं सुनियतं संस्कार- यित्वा पुनः, पश्चाद्वीरपदानुसारवशतो दीक्षा प्रदेयाऽन्यथा ॥ ७४ ॥ व्याख्यानप्रतिभाप्रवन्धरचना शिक्षाप्रणाली ततो, धर्माख्यानपरं च भाषणमयी सद्भावना जायते । ज्ञानं न्यायकरं समस्तजनताकल्याण- कुद्भाव्यत, एवं रीतिमुपाश्रयेद्यदि मुनिर्धर्मप्रवाहोदयः ॥ ७५ ॥ अर्ह- द्वीरनिमित्तधर्मसरणीमाश्रित्य देशान्तरं, प्रान्त्वा विश्वहिताय धर्मत- ३९२ वीरस्तुतिः । रणी हिंसायभावात्मिकाम् ।दत्याऽनेकविवादवादनपरं निध्य योधाश्रये, तिष्ठताखिललेशनाशनपरा ज्ञाने परे निष्ठया ५.७६ ॥ देकं च वयं. मुसंयमरताः संसेवयामो मुदा, तागाचूडमयाण्डपत्यतिदिनं संसा. रखाद्वनकन् । भूत्वा च श्रमणं तु निष्फलमहो कुम्मों चिरामः सदा, तैयाँ चर्णपरा मतानुकरणे जाताः प्रवृता रहः ।। ७७ ॥ विसं देश- वलोक्यतां च गृहिणो विश्वासमासाद्य च, युप्माकं मना धिया च सुतरां तिष्ठन्ति सेवाश्रये । ध्यात्वैवं च तथाविधाँजनपोधोत्थापयध्यं भुवं, नोवेनिमतलं पतन्ति बहुधा कृच्दात्यदादुन्नतेः ॥ ७८ ॥ भारत्या भवने च पुस्तकरय संसाम्य साधूनमासद्रक्षाकरणे प्रवर- शतर्फ सञ्चद्विधेयं तथा । यहाभूपगयोयतरजनाः कर्यन्ति सद्रक्षणं, सूत्राणां चयनं सदा च मुनिभिः कर्तव्यमत्रालये ।। ७९ ॥ अहंदी- रसुधर्मरोधकरणं यत्पुलकं वर्तते, नो तापमसत्कर र मुनिना सभे. यसे सर्वदा । यत्र सीरतिवर्णनादिविषयं तदूरवस्त्यग्यता, सादादा- दिकशास्त्रमेव हितशत् प्राचं शुभाकानिभिः ॥ ८०॥ येन ज्ञानवि- वर्धनं च भवतां सजायते मोदतखघोम्यं च हिताय योऽनुदिवस माझं बुधैः सत्यतः । प्तादेरनुवर्णनं च कथनं भावोऽसि . यत्रापि वा, हिंसाभायपरिप्रप्रमथनं हेयं सदा साधुभिः ।। ८१॥ बचान- करं सुसंयमहरं शान्त्यादिविशेपदं, न आएं मनोदशं च पतिभियोगे र विपदम् । मैनाध्यापनधग्मंशमविलसत्सोधसूर्योदय प्रापं च पलादपि प्रयततां योगार्थिनां भय ।। ८२ ॥ युप्मा परिणा- टिफेयमपरा यच्छामयादिक, नोहादिवसापतेऽपिरतरं ना जनहत्यते । नगदमुनिपातनं च निवरा गुन्ति है मिशः पात्र वाऽप्यथशायरे च ममता सदस्यतेऽन्येनेवलादपति.पा संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता दिविषये मोहं समुज्जृम्भते ॥८३ ॥ तल्लिं.हीन हि.जायते भगवतां दीक्षार्थिनां लोकतो, लोकानां चः धनार्जनं परजनश्रेयस्कर ज्ञायताम् । युप्माकं परिरक्षितं गतपटं न श्रेयसे पुस्तकं, ज्ञात्वैवं ममता जहत्व- नुदिनं भव्यं भवेद्येन च.॥ ८४ ॥ विद्याऽध्यापनकार्यलुप्तमधिकं तत्रापि पाट्यक्रमो, हा वो हानिकरी विभाति कियती संख्या विरामस्य च । नोऽवस्था सुव्रतग्रहस्य नियता नो वा बतादेस्तथा, न खस्यापि गुरो- विचारमननं कुर्वन्ति काऽन्यत्कथा ।। ८५ ॥ यच्छास्त्राणि च पुस्त- कानि पठने चोपक्रमात्पाठने, तानीपीममतावशाहिगृहे ग्रंथिं विधा- याग्रतः । नष्टप्रायगतानि विश्वजलधौ नोद्घाटयन्त्यालसात् , शिष्येण प्रतिवासरं च गुरवोऽन्योन्य प्रयुध्यन्त्यतः ॥ ८६ ॥ वैरं भावगताः परस्परमहो प्रेमोचकाधःपतन्, लोकान्तानि निजानि संकलुपयन् यान्त्या विनायासतः । ज्ञात्वेमां च दशां मदीयमनसि स्याहुःखसङ्गं पुनर्जनाचारसुशास्त्रतत्वमननात्वाध्यायवृद्धिर्भवेत् ।। ८७ ॥ नीतिन्या- यप्रमाणतत्वनिखिलात् सर्व विरुद्धं मतं, कोऽपि प्रीतिपुरःसरं न कुरुते कर्माखिलं सज्जनः । तेनाधःपतनं मतादिविहितं धर्माच्च यायान्मुहु- खेनाऽहं च करोमि चिन्तनमहो धर्मस्य वृद्धिः कथम् ॥ ८८ ॥ शवालयगतौ यद्वत्सारमेयौ • परस्परम् । युध्यन्तः साधवस्तद्वत्, युध्यन्ति प्रीतिमन्तरा ॥ ८९॥ अतोऽस्माकं च साधुत्वं, गतं नास्त्यत्र भावना । दुर्दशा कीदृशी जाता, खधर्मो निधनं गतः ॥ ८९ ॥ येनासाक वर्धते ज्ञानशक्तिर्यस्याधारान्नीतितत्वावबोधः । खाध्यायस्या- मूल्यरन वदन्ति, शान्तिर्दान्तिनिरूपे परेशे ॥ ९ ॥ तच्चेदानीं नाशभावं प्रयाति, नो वा शुद्धिः संयमादेश्य प्राप्तिः । तद्वारा वा नैव बोधो न भावतस्माच्छास्त्रं साधवोऽप्यात्मपार्थे ॥ ९१.॥ तद्वद्वन्थाँलो.
वीरस्तुतिः। । ककल्याणतोर्लोके धर्मप्राप्तये वै वहन्तु । येन सानो रक्षणं संय- मादेन स्याद्धानिः कार्यसिद्धौ मुनीशाः ॥ ९२ ॥ तस्मात्सर्वान् भारती- गेहमध्ये, सन्तो अन्यान् स्थापयन्तु प्रयत्नात् । येन स्यादै सर्वलोको- पकारो, ज्ञात्वैवं वै नो विलम्ब हि कार्यम् ॥ ९३ ।। शुद्धस्ताटिक- वत्सरोजह्दयो विद्याकलावारिधि व्यस्तापत्रयापहो गुणनिधिः शिष्ये- प्टकामप्रदः । यद्येतादृशमावधारणकरः,स्याचेद्गुरुः क्षिप्रतः, शिप्या- रिटनिनाशनं च भवतान्नास्त्यत्र सन्देहकः ॥ ९४ ।। एवं भिक्षुवराध शिप्यरचने क्केशप्रदा वः प्रथा, यः कश्चिद्भवति प्रदीक्षणपरः स्वारस्य दीक्षेच्छया । कायात्सारदवद्वहि पसरते वार्ता सुटान्नित्यशः, श्रुत्वा- ऽनेकवरिछसाधुचतुराः सास्यात्क्षरन्त्यम्बु च ॥ ९५॥ यत्नेनायमत. द्विदो यदि भवेन्मे स्याद्वरः शिष्यकस्वस्यापि प्रभवेत्सुजीवनवरं लोके च धन्यो जनः । अन्ते सिद्धिकृतेऽन्तरसपटको दुर्वासना पद्धयेत्, नासाथ समये सुसंयमयमानित्यं यवन्ते मुहुः ॥ ९६ ॥ संग्रहः पुस्त- कानां यो, दोषो वर्वति तद्विदाम् । शिष्याणां करणे वरन्महान् दोपो हि जायते ॥ ९७ ॥ मातापित्रोविनाज्ञां च, व्ययं दीक्षोत्सवे बहु । अपव्ययमपि कतुं, प्रेरयन्ति मुहुर्मुहुः ॥ ९८ ॥ भिक्षकः शिम्य- तृष्णातो, नश्यन्ति धर्मकर्मतः। खगौरवं नवं वापि, नाशयन्ति मुधा खतः ॥ ९९ ॥ रोगसास्येयमस्तीह, शान्तिः श्रीलामिनो वरा । महावीरस्य संघस्स, सेवा सर्वार्थसाधिनी ।। १०० ॥ सम्प्रदायानुरो- धेन, संयमादेव सेवनम् । गच्छयादं गुरोदर्शद, शिम्यवादं विपर्व- येत् ॥ १०१॥ भारतस्यासिलसकमुख्याचार्यो भवेद्भुवम् । भूत्वा तस्यैव शिप्याज, तदानां पालयन्तु च ॥ १०२ ॥ यः कधिहीक्षणं , सार्वजनिलयर। -- भिक्षुणामभिमानभावमधिकं कापायसंसेविनामेतस्यापणमार्गभागविषये जातं महर्ष ध्रुवम् । योभ्यायोग्यविचारणापि विलयं यात्रा समावस्य कि, तेनैवाति समाजकोऽपि नितरां पिटखतो घुण्णवत् ॥ ११२ ॥ संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३९५ प्राप्तुं, समीहेत मुदान्वितः । स्वदेशे संयमं दीक्षा, निदेन च धार- येत् ॥ १०३ ॥ तदा व्यवस्था सन्मार्ग, गत्वोन्नतपदं ततः । गच्छेच्च शिवसम्प्राप्तिः, सर्वेषां नो भविष्यति ॥ १०४ ।। सङ्घ चैकः स्थाप- नीयो गणेशः, सर्वानर्थान् वेदितुं यः समर्थः । येन स्यान्नः सम्प्रदा- यानुरोधाद्धम्र्मे वृद्धिश्चिन्त्यतां मिक्षुवयः ॥ १०५॥ कश्चित्समाजस्य महत्पदास्पदं, बिभर्तुमिच्छेत् किल तस्य वागुराम् । कर्तुं करे खस्य सदेषणास्ति वा, प्रगृह्यतां चेद्वरिवर्ति शक्तिः ॥ १०६॥ कश्चित्स्वयं सर्वसमाजकार्यकर्ता तथा धारयिता वुभूपुः । तथा व्यवस्थापि समाज- शक्ती, स्वशक्तिमास्थापयितुं प्रवृत्तः ॥ १०७॥ कस्यापि चेच्छास्ति समाजनेता, सदा भवेयं च मुशासकोऽपि । एतद्धितेच्छा च प्रवर्ध- तेऽनिशं, सर्वखमेवास्तु मयि प्रपन्ने, ॥ १०८ ॥ यदीदृशीच्छा परि- वर्तते तदा, समाजलोपोऽपि भवेद्धि शीघ्रम् । इत्थं समाजस्य च दुर्दशा भवेद्विचिन्त्यतां जैनमुनिप्रवीणैः ॥ १०९॥ कृच्छ्ादाप्तपदो- नताद्धि पतनं निम्नं समाजस्य च, एवं गौरवनाशतां परिप्रजेत् सर्वे भवेयुस्त्वरम् । दुःखार्ता जिनदेवभक्तिनिरता धर्मोऽपि नाशं ब्रजेत् , ज्ञात्वैवं जिनशासनोऽनुदिवसं तदक्षणे स्वीयताम् ॥ ११० ॥ रोगो- ऽनेन समाजभोगविपये वृद्धिंगतो नित्यशः, साधनामहमात्मिकाविक- तितो नष्टाऽधुना सभ्यता । सर्वेषां हि महत्वतत्वविपये जातेपणा सर्वतो, मानं चातपधावने निपतितं मिथ्यापलापो मियः ॥ १११ ॥ १ संघस प्रधानाचार्यः.
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता '३९७ भिरुचिं विदध्युः ।' लोकान्तरप्राप्तिनिमित्तभूतसज्ज्ञानकर्मादिकरा भवन्तु ॥ ७ ॥ अत्रान्तरे मानवलं त्यजेयुः, सत्साधुसेवा नितरां विशेषा.) सत्वात्मिकां वृत्तिमनूपसृत्य, मनश्च खाध्यायवले नियुज्य ॥८॥ खजीवनेनाद्यसमाजसेवा, रश्मि गृहित्वा परिरक्षणीया । निश्चित्य चित्तेन समाजवृन्दे, साहाय्यदानं करणीयमाशु ॥ ९॥ अथाभ्या- ख्यानग्रहरणम्॥ सन्दृश्यते भिक्षुवरा ? मयाद्य, किश्चिद्विकारान्वित- साधुभावाः । तेषां च जाते परिवर्तनादिकं, कुत्सान्वितं तेन विचार- णीयम् ॥ १० ॥ दुष्टखभावान् कथयन्ति चान्यान् , कुर्वन्ति खस्यैव प्रशंसनं च । विद्वत्सु दोपं परिभावयन्ति, मुणं पिधायाथ गुणं सकी- यम् ॥११॥ प्रकाशयन्ते च स्वकीयदोपं, पिधाय ते संयमिनः वरिष्ठाः। निन्दन्ति ते दुप्कृतिनोऽभिमानात्समाजभाजः प्रवदन्त्य- सिद्धान् ॥ १२ ॥ यदापहर्तुं वरिवर्ति शक्तिस्तदेतरस्थान् गुणदिव्य- संघान् । आच्छिद्य सिद्धप्रवरा भवेम, इति प्रजल्पन्ति विचारशून्याः ॥ १३ ॥ मदीयेत्र काये यदि शक्तिरुया, जगन्मात्रजातान् गुणा- माविच्छिद्य । स्वकीये तनौ स्थापयित्वा वरिष्ठो, भवेयं तदा सर्वतो माननीयः ॥ १४ ॥ परन्त्वस्ति भव्यं न चेदृग् वलं वा, न विज्ञान- शक्तिर्विधातुं कुतः स्यात् । परेपां च निन्दाभिधानं मुखेन, परं मन्यते शाकपत्रादिकल्पम् ॥ १५ ॥ अयेऽन्यत्र निन्दे ! न लब्धं पदं ते, विहाय स्थलं साधुसघे प्रवेशः। कृतस्ते न जाने सदा दूरतस्त्वां, त्यजेयुर्जना मानवन्तो मनस्तः ॥ १६ ॥ अये पापिनि त्वत्कृते धर्म- नाशे, भवेनिम्नपातश्च नो धारयत्वम् । अतस्तैर्मुखं नीलवर्णं च.नाशः, समाजाहिस्त्वं गता चेद्वरेण्यम् ॥ १७ ॥ अयेऽनिष्टभावे ! पिशाच खभावे। मुनीनां समाजात्त्वमन्यन्त्र गच्छ । न भव्यं भवेतत्र संमे- वीरस्तुतिः। लने च, सुजाते सुरम्ये कुतखन वासः ॥ १८ ॥ सदा सर्यतामय ते न प्रवेशो, वयं वञ्चिता ज्ञानिनोऽजातसंगाः । मुसं पश्यतेऽसे च संमेलनं नो, भविष्यत्यनायासतम्याजमेरे ॥ १९॥ न याचेतिरिक समानान्मुनीना, मनो मे प्रसकं समाजप्रसझे । अतो धारणीयं मन- स्वस सिद्धौ, यतो नो भवेद्धग्मलाभो मुनीशाः ॥ २०॥ वयं चाय (स) भोगान्मुदोद्धाटयिप्यामहे द्वादशास्मान् सदा मेमभावात् । अरप्से निवासाय यस विधाय, वनायकवख मुहुर्धारणीयम् ॥ २१॥ मृदा निर्मितं पात्रमेकं सदैव, भुवं धारणीयं गृहसैः समं नो । कदानिधि- धेया शुभा सप्रतिध, दलं प्रेपणं वर्जनीयं तथैव ॥ २२ ॥ मुखावा- धितोश्च कर्तव्यमेवं, मिताहारमेकत्र काले वरीयः । मिलित्या च सांवत्सरं परचेकं, वयं चाखिलाः साधयो यत्नतश्च ॥ २३ ॥ सदाऽऽ. चार्यवयोऽखिलानां मुनीनां, बुधैको भवेच्छिप्यदिशक्षाप्रदायी । त्यने युर्विचारे च यं भेदनाद, करिप्यामहे ज्ञानविज्ञानवादम् ॥ २१ ।। अहो ज्ञानरूपेऽय गमावाहे, सदुरसाइकिं च कुर्मोतिहात् । समाजेऽत्र सर्वे मिलित्या वदीयं, बहिष्कारमेवं करिप्यामहेच ॥२५॥ पदा ते भवेन्मूलभमोऽध निन्दे! कर्य व समाजे व तिष्ठेदेनः। यदा ते च्युतिस्त्राधिकाराद्भवोद्, तदा ते क यानं मवेहि शिनम् ॥ २६ ॥ सुसम्मेलनस पसने चलेन, पहिष्कारभावोन नाव: कदाचित् । सर ! वं मुखं नापलीफे लदीप, सकी तमा नेर सन्द. संयानि ॥ २७ ॥ तथा नव नामि साउं वदामि, वदा मौनमाधाप तिष्ठानि सधन । गत मनसं शरीराय नेश्य, वरि निन्दनीये गते चैनसपात् ॥ २८ ॥ यदा बोहयुदिना ते निवासोन्या संप्रया दीति संपान्मुनीनान् । पारिवं नो विविधस निन्दे । निक संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता ३९९ तख तूर्ण वनें पर्वते वा ॥ २९॥ इतः पेपणं. ते करिष्यन्ति लोका, अतोऽन्यत्र गन्तव्यमेवं विचार्य । न वा भद्रमत्राधि- वासे बलिष्ठे, जगते करिप्यत्यहोऽनादरं हि ॥ ३० ॥ भवद्भिः मुंखात्स्वाच त्याज्या वरिष्ठैस्तपस्यावलं संयमादेर्बलं च । तथा संघसेवा वलं चात्मनोऽपि, भवेन्नप्टमेवं हि सर्वखनाशः ॥ ३१ ॥ मया निश्चयं दीयतेऽद्य भवद्भिः, परित्यज्य निन्दा सकर्तव्यतां हि । तथेामयं क्रोधमात्सर्य्यमेवं, समाहृत्य धर्म चरेयुर्विरक्तिम् ॥३२॥ [अथाऽपलापविपये] यदा कश्चिदायाति पार्थे खकीये, तमुत्थाप्य हस्तेन चोर्द्ध (हयं) नयन्ति । तथैकान्तगेहे च तेनैव वार्वाऽपलापं प्रकुर्वन्ति मोदैः प्रमोदैः ॥ ३३ ॥ विनाज्ञानसम्पन्नमेकं खशिप्यं, विधायाथवा द्वारपालं खकीयम् । विनोदेन कुर्वन्ति कार्य विगर्हमहो वर्तते कीदृशी साधुवृत्तिः ॥३४॥ मुखे चानने चक्षुषा चक्षुरेवं, तथा कर्णके कर्णवृत्ति निधाय । करोत्याहितः किञ्चिदात्मानुकूलामनिष्टप्रदा सर्वनाशाय वार्ताम् ॥ ३५॥ निन्दा यस्य मुखेऽस्ति तापसजनाः सत्कर्मतो धर्मतो, अश्यत्यत्र च तस्य नश्यति तपो ज्ञानं पुनः संयमः । तस्साचां परिहृत्य संयमपरेश्चित्तं समाजे मुहुः । संस्थाप्योच- मकर्मसेवनपरैजैने मते दीयताम् ॥ ३६ ॥ यदेकसिन् स्थाने निव- सति मुनिखत्र न परान् । समाजस्थान् साधून न हि हितकरानाहित- धियः ॥ निवासार्हान् रागान्निजनिकटतो दूरयति च । तथा वार्तालापं तैः सह हृदा नैव कुरुते ॥ ३७ ॥ समानीतं तैश्च मधुरजलमन्नं न मनुते । न वाऽऽतिथ्यं तेषां न च किमपि सत्कारकरणम् ॥ परं चैवं ज्ञात्वा परमतरताछून्यहृदयः। अहं वै पश्यामि व्रतमपि च तेषा मतिहरन् ॥ ३८ ॥ यथा श्वाऽन्यवानं परमनिजकोपेन निकटं ।
४०० वीरस्तुतिः। ममायं भक्ष्यांशं किमपि न हि चातुं प्रभवतु ॥ विचार्यत्वं शब्दैवि- कलमनसा दूरयति च । मुनीना: संघेऽयं भवति कलहो द्वेषमनसा ॥.३९ ॥, प्रसन्नोऽयं दृष्ट्वा नहि भवति कश्चिन्मुनिवरस्तयाऽन्योन्य द्वेपं विपममतिनोत्पाद्य कुरुते ॥ पराव्येयं नीतिन हि नहि न जाने कथमगात् । इतः श्रेष्ठश्छागः कपिरपि कपोताध मुधियः ॥ १०॥ मिलित्वमेऽन्योन्य समयमनसा रक्षणमहो। सदा कुर्वन्त्यन्ये विषय सुखभोगेऽपि नितराम् ॥ सहाया जायन्ते इति मनसि निश्चित्य भवत्तो, (परं द्वेषा युक्ताः सुखदगुणवन्तो मुनिजनाः ) विलम्पन्त्यां शक्या विषयगुणभोगेकनिपुणाः ॥११॥ [अथ.शान्तिकराष्टकम् ] नवा.साधुवृचिन पा. कोपशान्तिन वा संयमादौ प्रवृत्तिर्मनीनाम् । न हि ज्ञानसिद्धिर्न विज्ञानवृद्धिः, कथं जनसंघे विनिर्जनानाम् ॥४२॥ गता संघभक्तिर्गतश्चिचरोधो, गतं चात्मतत्वं गतं शुमध्यानम् । इदा- नीतनाना मुनीनां प्रवृत्तिः, मुखे शायके चाशने शिष्यवर्ग ॥ १३॥ गताऽऽध्यात्मविद्या गताऽऽनन्दवृनिर्गता भावभत्तिर्गता संघनिता। गता भिक्षुसेवा गता धर्मदिर्गता शान्तवा नितिः शुमान ॥४॥ गतं बानगम्यं परं धैर्यरूपं, यतो नसतोऽतो भवेदमहानिः । कथं सागवाम्भोधिपारं मुनीया, विना सकियां चिन्तयध्वं मनचः ॥४५|| सदा शिप्पलोभाथये नः प्रचिर्न वा चिन्तनं कोचिदानां च सन। अनेरान्तसिद्धान्तसाध्यायहीना, मनोरोधने नो गतिर्वा कथं साद 1॥४६॥ गता नराधाइया साधुभावाददो न्यायसिद्धान्तान्यो विचारः। सुसम्यक्त्वमानन्दकन्दालयं नो, घृतं , नैव विच कदानिमुनीन्द्र 1] १७ || साध्यायतोऽज्ञानाद्विपसनातं ध्येयक सुगम्यगन्ध वत्तम् । सदा चिन्त्यते केन न भवेन्नया सेग्मी, सदा प.
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभाषान्तरसहिता साम्यम् ॥ १८ ॥ न वाऽरण्यवासो न वा त्यागशक्तिर्न वा चावनं धर्मतत्वस्य शश्वत् । वरीवर्ति चिन्तोदरार्थ सदैव, अतोऽहं तपाम्यात्त: भावं यतीशाः! ॥४९॥ भजन्त्वाहिता देवदेवं जिनेशं, यतो जायते दुःखमूलस्य भंगः । तथा संवृतौ प्रेमभावो निवृचिर्भवांभोधितो ज्ञायतां साधुवृन्दैः ॥ ५० ॥गता मोक्षप्राप्तिर्गता लब्धिशक्तिर्गता रे गता रे जिनेशस्य भक्तिः । मुनीनामिदानींतनानां प्रवृत्तिः, मुखे शायके चाशने शिष्यलोभे ॥ ५१ ॥ गतं वस्तपो योगचर्यापि नास्ति, गतो ध्यानखाध्याययोगोऽपि दूरम् । गतः सूत्रपाठो गतं न्याय- सूत्रं, न स्याद्वादयादे रुचिर्वा कदाचित् ।। ५२ ॥ गतोऽध्यात्मवादोऽ- ल्पितो जैनसंघो, गतं रे! गतं रे! गतं प्राकृतत्वम् । इदानींतनानां मुनीनां प्रवृत्तिः, सुखे शायके चाशने शिष्यलोभे ॥ ५३॥ [अथापाय- निवृत्तेरुपाय:] रे चित्त! चिन्तय जिनाम्बुजपादरेणुं, पारं गमिष्यसि मुखेन यतो भवाब्धेः । शिप्यादयोऽन्यजनता न हि ते सहायाः, सर्व विलोकय मुने ? मृगतृपिणकाभम् ॥ ५४॥ संसारसागर- मगाधमगम्यपारं, श्रीमजिनेन्द्रचरणाम्बुजश्रद्धया वा। उल्लद्धयिष्यति सुखेन च ते प्रयासस्तस्मात्कुरुप्प मुनिभकिमघौघहीम् ॥ ५५ ॥ सुखे दुःखे किञ्चिन्न भवति समाजान्तरमुनेः, सहायो रागान्धो निज- हठधरो द्वेपनिरतः । तथा विद्याभ्यासं प्रतिपदवमन् द्वेपमनिशं, घृणां तल्लोके निजमतिविरोधेन तनुते ॥ ५६ ॥ जना उच्चैहीसे विदधति घृणापात्रमिति वो, न वा संघप्रीतिर्न च सहनिवास प्रकुरुते । अतो , मोहस्सर्बेनिखिलमतके नैव भवतां, मुजावं वन्धत्वं दृढतरसुरज्या मुनिवराः ॥ ५७ ॥ यदा वृद्धिर्मोहातिरमि कथं शान्तिरधुना, न वा जाताशा नः पुनरपि सहावासकरणे । निवृत्ते- वीर, २६ बीरस्तुतिः मोहस्य कथमखिललोकानुसरणे, विचार्येवं सन्तः कुरुत मुनयो मोह- शमनम् ॥ ५८ ॥ कुरीतीनां नाशो भवति हि च रूटेरपि तथा; सहावासः पश्चादनुभवजविज्ञानमभवत् । तदा प्रेम्णाऽऽमोदः सह दमशमादेः सुकरणं, जनाधारे जैने निवसति सदा चित्तमंचलम् ||५|| स साम्योत्कर्षे वा भवति सहवासस्य जनकं, परं च ज्ञानस्योत्कटकमापि तस्वास्ति फलदम् । यदाऽभ्यासासकं मुनिमपि बदन्त्याहितजनाः, समें केन स्पर्धा निगमसकलाऽध्यात्मविदुपा ॥ ६० ॥ मुविद्या- वर्थ यदि मनसि,चिन्ताऽप्युदयते । तदा सद्धीवृद्धिनिखिलमुनिसंघे विलसति । तदा विद्यालामो भवति मुनिवृन्दैरधिगता ।भषे विख्यातिः स्यानिजनिजमताचारवशतः ॥ ६१॥ विना पद्धों नापि प्रसरति समुत्साहविषयः । सहावासे. चैवं न लगति मनश्चंचलतया । विनान्त: खाध्याये नवसति पियो वृत्तिरचला । ततो विद्यालामो भवति विना- मोदसहितः ।। ६२ ॥ सहाध्यायिनं या सहावासिनं वा, विनाधीता विद्याविनोदप्रचारः । सहाचारिणं चान्तरा नो विचारी, ततो.नो भवे. च्छात्रतत्त्वावयोधः ॥ १३ ॥ तथा. नावलोको भवेच्छारूचर्या, विना तत्कृते नैव पुष्टिं प्रयाति । न काठिन्यकं स्थायिभावं तथैव, चिरं चितभित्ती मुहुश्चिन्तयध्वम् ।। ६४ ॥ तथाऽव्ययनतोऽध्यापनाद्वा विचा- रात्समुत्पद्यतेऽपूर्वशक्तिप्रवाहः । यदैत्रयासो मिलित्वाऽसिहानां, वदा यत्र येपा प्रवेशोऽधिकोऽस्ति ।। ६५ ।। प्रवीणोऽथवा वै विशेषावित कारी, सदाचारिणे चा सहाध्यापिने च। सहावासिने या प्रवीणं फरोति, भवेतस्य सौख्यं निवान्तं मुनीनाम् ॥ ६६ ॥सकीयेन तुल्यं च योनं विधाय, समाने समुचेजनां करोति । अतो नेदभार परित्यज्य . शकि, सकीयों तथा योग्यता सन्तनोतु ॥ ६७ ।। 1 शिक्षयितुं सुवेशरचना यस्यास्ति तसै नमः । ७१ ॥ उपयुक्तमर्थ हृदा दामास्येऽनिशं पट्टिकां, काये चोल्लपटं विलंचितशिखः कक्षे सिवां मार्जनीम् । विद्याशून्यमुखारविन्दहृदयः श्राद्धादिकैर्गीयते, लोकान् संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिवा ४०३ चरित्रं मुविधां परले ददातु, सुवक्तृत्ववोधोऽस्ति केपा विशेषः । तदा तकला चापि देया परसाययं नो विचारो हृदा धारणीयः ॥६८॥ सविद्या मया दीयते चेत्परसै, तदा तस्स लोके प्रतिष्ठाऽधिका स्यात् । तथा योग्यता वृद्धिरेवं प्रयाति, विचारं व ने कदाचिकरोतु ॥ (पठित्वा च विद्या प्रदानेऽधिका स्वाद)॥६९॥ तदा ज्ञानदृद्धिश्चरि- त्रप्रवृचिगरिष्ठो जनेऽयो, भवेस्त्वं विचार्य । परसै कुरुप्पार्पणं सं गुणानां, समाजे प्रवृत्तिर्विधेया सुखेन । (तथाऽनन्यभावेन प्रीति विधाय) ॥ ७० ॥ यथा यश्च यसै विधत्ते च भावं, तथैवेतरोऽपि करोत्यात्मभावम् । पिया प्रेमभावो विचाव कार्यो, यतोऽन्योन्यसंमे- लनं स्यात्सुसौम्यम् ॥ ७१॥ न याचे गुरोः पादसेवातिरिक्तं, विरक्तिं तु वाऽऽध्यात्मविद्यापशक्तिम् । परं प्रेमतः साधुभारं प्रयाचे, समाजो- नतिर्येन मे तद्विधेहि ॥ ७२ ॥ त्रिधा तापतप्तोऽहमसिन् भवाब्धी, कथं मे निवृत्तिर्भवेदुःखराशेः । अतो मेऽभिलापामिमां पूरयस्ख, गुरो ? खां दयां मे विधायाथ भावात् ॥ ७३ ॥ जीवत्राणकरी निधाय विश- ।
वीरस्तुतिः। सात् ।। ७७ ॥ भवेत्काचिदित्यं जने योग्यता च, तथा शक्तिमा- मोऽखि यसिन् विशेषः । प्रदेयखदान्ये नरे भक्तितश्च, सुविज्ञान- वृद्धिस्तथा शक्तिवृद्धिः ॥ ७८॥ खशस्तथा योग्यतायां च विद्रो- पयोगस्य वृद्धौ च संयुक्तवीर्ये । ध्रुवं योजनीय धुवं योजनीयं, खचि. चस्य शंकां निराहत्य लोके ॥ ७९ ॥ [अथ परोपकतिः] शिक्षा- प्रेमघराः पवित्रहृदया भिक्षार्थिनो ध्यानतो, ज्ञायन्तां प्रतिजीदकार्य- समये लक्ष्यात्मविन्दं मुहुः । मत्वानन्तपरोपकारकरणे शूरा भवन्त्या. हिता, लक्ष्यं नैव कदापि विस्मृतिपथं कर्तव्यमेव विदुः ॥ ८० ॥ धर्मे नोन्नतिकार्यगौरवशानान्यत्ररोधे फरः, येन सादुपकारकेऽनु- दिवस लोकोपकारी भवेत् । न सानं च कचित्तदेयमधुना भेवत्स भावस्य च, सामाजे वितरन्तु कार्यपरतां ध्यात्वा हदा भिक्षुकाः ॥८१ साहाय्यं च भवेज्जनान्तरमुदेऽन्योन्यं विचारेण च, शकौ स्यादृढता- बलं विवरणादेकं विचारस्प वा । तन्माहात्म्यवलं भविष्यति पुनः सादुलतत्वेन हि, संयुक्तरस वलस्य पद्धनमयो स्यानोऽप्यनायासतः ।। ८२ ॥ एकस्यान्यसहायकोऽनुदिवस भूत्वा सहायं कुरु, स्वान्ते वासकराय देयमखिलं नो वा विचारो मुने! विद्येवं च समाजके प्रसरति लोकोपकारस्ततो, ज्ञात्वा सर्वमिदं विचारनिरताः श्रेयस्करा बुध्यताम् ॥ ३ ॥ [ अधाधुनिका सम्यक्त्वादानरूढिः] अद्यानयभवे च भिक्षुकवरेप्वाधीनजनेषु च, सम्यक्त्वं प्रविधाय योग- मिपतः शिप्यं वकीयं तथा । भकं पक्षधरं विनेतुमसवां रूनिर्विचिग गता । मीत्या सामियं प्रवृद्धिरतुला वात्या तरूपेण च ॥ ८४ ॥ मुकम्पोऽयमितीव शेषविषयाम्झयो मुनीन्द्ररतो । वृक्षाणामिय सहतेध नितां सायेन नाशो मुहुः ॥ सम्यक्त्वस तथान्धसंपविटस * संस्कवटीका-हिन्दी-गुर्जरमापावरसहिता परिष्ठाः॥१०२ ॥ ते चाभिमाने तपस्याविनाशः, समाजोनती जायते विासंघः । अतश्चाभिमानं न वै धारणीयं, न वै धारणीयं न वै धारणीयन् ॥ १०३ ॥ . महापक्षपाताभिमानाभिभूताचरन्त्यात्मनः कुमयां लोकगाम् । समुत्पद्यते योगिनी मोहमाया, ततो बध्यते बस्ते भोगजाले ।। १०४ ॥ मुनिजनहदि भानुनिरूपी यदति । सफरदुरितनायो जायते चापयासात् ।। विकसति यदि पन ज्ञान: चारित्ररूपं । भवति मनसि शान्तिोगसिद्धिततः सात् ।। १०५ ॥ गृहसा न चालिन्महामोहजाले, निरखं त्वदीये समर्था भवन्ति । महावीरसपे मिलित्वा च सर्वे, भवेयुश्च अदालयो जनवादाः ॥१०६॥ सदा संघसम्बन्धमात्रेण सर्व, खकीयं विदित्वा कुरुप्वात्मरूपम् । [अथ शरीरसाहाय्यदानम् ] यदा रोगयुक्तो भवेत्कोऽपि साधुः, फाचित्कश्चिदेवं च देशान्तरसः ॥१०७॥ न धानुकूल्यं जलं वायु- खं, न तेषां मुसाधायको देश एव । चिकित्सालयं नास्ति तदेशमध्ये, नया साधनं किचिदन्यं विदित्वा । तदा तत्र देशे विहारे प्रवृत्दिा साधुवश्च ही दोलिकायाम् ||१०८ ॥ समारोप्य वा स्कन्धमारोप- यित्वा, समानीयतामन्यदेशेऽनुकूले । यदा सम्प्रदायस्य भेदो. हि छिनस्तदेवं भवेन्नान्यथा ये शुम स्यात् ।। १०९॥ केचित्तवार्थपरा- यणाश्च मुनयः केचित्वकुक्षिभराः, सन्त्यन्ये श्रुतसमयेऽपि निरताः केचित्तधर्मच्युताः ॥, विद्यारलमुवश्चिताल्पमतयो मुदाय केचिद्भुवं, केचित्साधनसारशून्यहृदयाने वै कथं पारगाः १. ११० ॥ मुनिः सेवः नाये .निजे धर्मयुद्धेर्मुहुधान्तरात्मातिपूतो: विभाव्य । सुशय्यभवः सरिभिर्वणितं च, महत्वं भवे भव्यभावेन सिद्धः ॥ ११॥ तत्रस सम्बन्धमायो: महान् हि, यतस्तेन सेवाख्यधर्मप्रचारः) मनाङ् नाम ..., वीरस्तुतिः... पुनस्थो तेभ्यश्च देयं .कचित् ॥ ९२ । नेदं सर्वमपस्मृति कुरु न चेत्स्वर्गेऽपि न सागतिधर्म मोक्षपथं च नाकमथवा. खस्सैव. पाणौ सितम्। जानन्त्येवनहं शुभोऽसि निखिलादन्येऽवराः सन्ति च, श्रद्धेयं परिज्ञायतामविरतं स्यादन्धकारावृताः ॥ ९३: ।। अस्त्यन्योऽपि महानु- भावविषयः सन्धार्यतां चिततः, सम्यग्दृष्टपदचमन्यमुनिभिस्त्यक्त्वा च तत्वं पुनः सम्यक्त्वं च प्रदाय व कुरुते सर्वोत्पथं मानतः, केचि- खस्य.समीपके चारहसि संलेखयित्वा मुदा ।। ९४ ॥ संस्थाप्योचम- ग्राहकेण सदृशो नामादितं पुस्तकं । तीर्थस्वाश्च खकीयपत्रनिचये संलिख्यते नाम 1 यात्रा च जनाः प्रयान्ति नितरां तेषां यथा यत्रतसवेनमतावलम्बनपराः कुर्वन्ति कुत्सान्विताः ॥९५॥ कटोरा- मिकायाश्च निन्दास्पदीयाः, प्रवृत्तेश्य सायते कुमहत्वम् । ममत्वान्ध- फारेण संछादनं सारथा रागद्वेषादिकसानमेतत् ॥ ९६.॥ सम्यक्त्व- संयुकवले च सम्यड् मन्दत्वमायातमितो विनित्यम् । मदीयसम्यक्त्वय- लस्य मूलं, संछिद्युते कुत्सित्या चरीत्या ॥ ९७ ॥ अतोऽस रोगत्य चिकित्सकलं, कर्तव्यमेवं कुप्रथापणाशः। तदैकदेशस्य मलं विधाय, धर्म भयकारि च राजयक्ष्मा ॥ ९८. रोगो यथोत्पन्नतया :करोति, विकारतामात्मतृतीयकेऽन्तः.1.महाननों भवतीति शेयं, गृहस्सरांगा- त्मकदृष्टिभावः ॥ ९९.1 विधाय दोपं परितः फरोति, तथाऽनिशं मुतालिकेव दृष्टया । सवर्तयन्यत्र दिवदनं च, चैपायभावस निशम्य योगिन्! ॥ १०० ॥ सकीयजाटस महाधिकार, सघोटयचैव सयं च सम्यक् 1. वदीयजालेनं विशन्ति लोकारउत्तध लोक प्रविवेक- बुद्ध्या.॥.१०१.! जानन्ति, सर्वे च परावरं वा विचारमारत करोति :मावम् । धावन्ति ते चायपरम्परातो, दूर..परं शोभित ४१० .......... पीरस्तुतिः । समाः, वन्तु व्याख्यानमनन्यभावात् ॥ १३५ ॥ पधावन्तोऽपि सुशासन बरं, तन्वन्तुं सलाम घोपदेशम् । कुर्वन्तु वृद्धि च.प्रशास- नस्य, सुखागतं चापि वयैव सुज्ञाः ॥ १३६ ॥ साध्यं युधममेकमेव मुनयः सर्वे मिलित्वा हवा । साचार्य परिकल्पयन्तु मुधियं विधाच. रित्रात्मकम् ) ,येन साध समाजकोगतिदशा शिक्षाविभागस च । जो चेदमविपर्ययस्य समयो जातोऽवयाप्यं बुधः ॥ १३६ ॥ संसाप्या किल भारतस्य जनता पोते र संघात्मके...सिद्धाख्यं नगर सुदारचरिता संस्थापयन्त्याहिताः। एतावत्करमेन याति भरतो पार• त्रिकं चैहिकं । सर्व कार्यमदअमेव विषयासक मनोहीयताम् ।।१३।। खादर्श च जगद्भवन्तमधुना जानानु चात्मा पुनके नाम भवेतोऽ. नुविततं सामानुसन्धानतः । एवं धर्मपरायणो यदि भयो साथ कीर्तिः परा। तलासंपविवर्धनाय भवतां लायेत्मविएना ॥१३८|| [अथ धमाऽस्पर्थना] भवान् वीरपुत्रोऽखि शान्तरसमूर्तिरहिंसा तपस्यान्वितः सत्यपाही । तथा चात्मनोऽत्यन्तरदारफोति, पुनर्व- तरागानुसारं करोति ॥ १३९॥ नपनेन्दुसंख्योपरफे शतस, दिना. पपित्तं कुरुते नपसार । अवनपसिमपरोऽसि लोके, रोपाधि. धार्यद्धि विचारणीयम् ॥ १५० ॥ खपृष्ठतो विश्वमिदं प टममदं सलममति मेऽसि । सालानुभावोऽपि न साक्षरोह, व्यापार दानेषि.न.पतिः शतिः ॥ १५१.६ मसिसकारि र पानि विमान्, स्त्यिस्युदिन्नर बाटोहम् । सात विधानि सेवां, यालि रोपटराभिलाषी ॥ १२ ॥ रागादिवशी. पामि नन्द, मणे यदि उसपासमानस !. गवं उस विस्मृतिग. पराभवमा दि गुगन्धरम्पारनाका !!१२३ मा विपाविना शुद्धिपत्रम् कृतेऽपि भूयसि संशोधनप्रयासे काचिदशुद्धयोऽवशिष्टा एवेति ताः कृपया अधोनिर्दिष्टसकतानुसार संशोध्यैव पठन्तु पाठयन्तुभव्यजनाः श्रावका मुनयति सविनयमभ्यर्थयतेऽयं लघुतमः पुष्पभिक्षुः॥ पृष्ठाड़ा पट्टया अशुद्धम् जैनतरमतावलम्बी ११ १५ २१ २८ ४ शुद्धम् जैनेतरमतावलम्बी अनन्तशक्ति सम्यग्दर्शनकी मेल भावना निःशंकसे नश्वर कार्मण बुद्धिशक्तिने ते कल्मपासवकारणम् पुरुषेष्वपि ११ २१ २५ " सम्यग्दर्शनका मेल भावन निशंकसे नखर कार्माण बुद्धिप्शक्तिने तेओ कल्मापासवकारणम् पुरुषेष्वयि वहभी इन कि कि इत्यभिधानम्यदीपिका सबशदोंम. १६ ११ २२ वह भी इनकी १०० २२ २ १०१ की इत्यभिधानप्पदीपिका सब शन्दोंमें २३. ३ २५ ५ तेन धुनीका मताः । तेने धुलिकाः ४१२ वीरस्तुतिः। . 1 (३) उष कर्ममलके कारण इस जीवको नाना योनिमें अनेक पाट लोगने पड़ते हैं और उसीके नष्ट हो जानेपर यह जीव अनन्तान-अनन्त- दर्शन-अनन्तमुख और अनन्तशफि आदिको जो कि इसकी निजी सम्पत्ति है और जिसे मुकि कहते हैं वह प्राप्त करता है। (४) निराकुलवा लक्षणयुक्त मोर मुसय प्राप्ति इस पीपके अपने निजी पुरुषार्यके अधिकारमें है किसी के पास मांगने नहीं मिलता। (५) पदायोंके सरूपका यह राय पदान [Right beliol] ल. शान [ Right knowledge] और सल आचरण [Right con. duct] ही यधाम मोशा साधन है। (6) वस्तुयें अनन्त धर्मालम्हें, स्पाबाद ही उनके प्रत्येक धर्म सलतासे प्रतिपादन करता है। (७) रास आचरणमें निम्नलिखित मा गर्भित है, यया- (क) जीव मात्र पर दया करना, यमी किसी नवरसे कान देना, पवन धरान फहना, और मनसे पुरान मिवारना । [य] क्रोध-मान-माय-लोम और मरवरादि कायमाद मारमा मउिन न होने देना, उछे इनके प्रतिपशी गुणोते सदा पवित्र रमना । ग] इन्द्रियों और मनने पर करना एवं पान संसारमें लिप्त न होना। [प] उत्तम क्षमा-निलाम-सरलता-मृदुलता-रमपद-चौर-पम-राम-माय- शान यप्रवर्गादि मरणामक धर्मग्रे धारप करना। [] -चोरी ऊपीत भादि निन्य समोठे पनि करना। (6) या संसार समिर अपार मनादि मनन्त है, इमा हवी कोई नहीं है। (1) resoul) भोर परमामा (God) में मार भी स्वभावमा बिशेष है। जो भामा रागदेपर ममा छोरज खमारकर हो जाता है उसे दो परमात्मा है। (10) अरनीनव-मस्या पिमर मनुष्य मित्रपकिरा मा मगर से मनुप्रमाने शक मेरे ७ भी नारी है।
संस्कृतटीका-हिन्दी-गुर्जरभापान्तरसहिता पृष्ठाडा: पडया 2: २१ २४० २९४ १२. नक्ष्यति -- " २०. ४ २४ ३१४ ३१७ मनुते १८ २२ " ३२९ अशुद्धम्. "शुद्धम् हि धर्म::: धर्म जिव! जीव1 निजा: निजां नक्ष्यत्ति समस्लेवा समस्त्येतद्धा अनाति जाति दश्यते दर्यते। चेतना चेतना खेसन् श्वसन् मस्तुते ऐसा ऐसे दीनाना दीनाथ चलते चलति घेदं शंकटान् संकटान् तेविति वेनेति प्रयागमण्डल प्रयागमण्डले निसेवनम् निवेशनम् मादिनियमादि यमादिकानां वि. जनोप्यू जनरू न भवद्योगवित्तमम् न भवेद्योगवित्तमः तदक्षसाधुनागुरो! रक्षमामधुना गुरो। जयजयम्भोधे जगबलाम्भोधेः पुष्पाधली पुष्पालिक विरदार विरादर २८. - ३३१ १२ . . . ३४८ . २८ ३७० " ३१.
४१६ वीरस्तुतिः। " पृष्ठाङ्काः पतयः अशुद्धम् शुद्ध ३७२ २२ आपना अपना २५ अन्यत्वता अन्यत्व ३ एकत्वता । ३०१ १ ३८४ बोधात्मिकी बोपात्मिको ३८७ २१ कवित्प्रवन्धो कधिप्रबन्धो दीयतेऽय गच्छतः स्खलन छापि, भवत्येव प्रमादतः। इसन्ति दुर्जनास्तत्र, समादधति सजनाः ॥ विवृतिकारः दीयते यद् दानी पुरुपौकी नामावली. १००) शै० जगजीवन महता, मु• झरिया, १००) शेठ मानरुपन्द महावीरप्रसाद, मुपुत्र शेठ ज्वालाप्रसादजी राजा बहादुर कलकत्ता, १00) शे.शिवलाल पोपट संघवी, झरिया, २००) ० मनोहरलाल जैन, कान- पुर, २०J• अमरचंद नाहर, कलकचा, २०) दो• मुजानमल पनालाल फलकचा, २) शे० गोपीचंद हीरावत फलफचा, शे. चांदमल मूसल कलकत्ता, ३) शे. मुंदरलाल सारड कटकचा रो. रवन- लालजी पदलिया फलकचा, ७) शे• मांगीलाल वोरडिया सरपाड. पुस्तके मिलनेका पता-- मश्री-ज्ञातपुत्र महावीर जैनसंघ, म., पो., पाटोदी, [स्टेट] वि. गुडगौर, (पंजाय) :