Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Kalika Puran Vol-2

Gouttam,chamanlal · 2012/08

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दो शब्द कालिका पुराण के द्वितीय खण्ड पर दृष्टिपात करने से विदित होता है कि यह एक विशेष योजना के अनुमार लिखा गया है। इसके सभो अध्याय काफी बड़े हैं और उनमें बो वर्णन किये हैं उनको सर्वाङ्ग पूर्ण और विशद बनाने की चेष्टा को गई हैं । शिव-पार्वती का उपास्यान जा अनेक पुगणों और रामायण आदि में विस्तारपूर्वक दिया गया है, वह इम पुराण में काफी परिवर्तित रूप में दिया गया है। इतना ही क्यो वही "कालिकापुराण" का मुख्य बाधार है। पानी ही "काली" कहलाती है और उसी को केन्द्र स्वरूप बनाकर इस खण्ड का अधिकाश कथानक पूरा किया गया है। यद्यपि पावती जन्म, ताम्या और भगवान शिव के साथ उसके विवाह का दणन इस पुराण में भी पाया जाता है, पर उममे स्थान- स्थान पर कितनी ही भिन्नताएं भी हैं। इमम भी तारकामुर के वध के निमित्त शिव-पार्वती के विवाह और उनमे स्कन्द की उत्पत्ति की चर्चा है, पर साथ ही यह भी लिम दिया गया है कि इन दोनो के विवाह का निश्चय पहले ही हो चुका था और पावतो वहन पहले से ही शिव जी को सवा किया करती थी। जब कामदेव ने शिवजी पर आक्रमण किया तो उस समय भी पार्वती वहाँ उपस्थित थी और उसी को देखकर शिवजी को काम-वेग उत्सन हुआ था । इमी प्रकार यह भी कहा गया है कि जिस ममय पार्वती तपस्या कर रही थी उस समय शिवजी ने स्वय वेष बदल कर उसकी परीक्षा ली थी, और उसके आन्तरिक प्रेम का परिचय पाकर प्रणय को भिक्षा मांगी थी। पार्वती ने कहा "मैं को आपरो पति बना हो चुकी हूँ, पर आप मेरे पिता हिमवान के हाथों से मुझे कन्यादान के रूप में ग्रहण करें, जिससे X X लौकिक रीति की भी पूर्ति हो जाय ।" ये सब बातें रामायण में वणित शिव-पार्वती विवाह में नहीं मिलती हैं। "शिव पुराण" में पाती की परीक्षा के लिए ब्रह्मचारी के वेप मे शिवजी का आना लिखा है, पर उनमे प्रकट रूप से विवाह की कोई बात नहीं हुई। इस प्रकार इस पुराण मे वणित शिव-पार्वती चरित्र अन्य पुराणो की तुलना में बहुत कुछ मौलिक जान पडता है और उसमे हमको स्वा- भिकता अधिक जान पड़ती है । X इस पुराण के "राजधर्म" वर्णन मे कूटनीति तथा गुप्तचर विभाग का वर्णन अपने ढग का निराला ही है । राजा को सभी जिम्मेदार अधिकारियो और परिजनो की जांच जिस प्रकार करने को लिखा है, वैसा शायद ही और किसी धर्म ग्रन्थ में हो । राजा अपने मत्रियो की प्रामाणिकता की जॉच किस प्रकार कर इस सम्बन्ध मे एक उदाहरण इस प्रकार है- "दासिया, शिल्पिनी, वृद्धा, मेधा और धूति वाली स्त्रियाँ, जो गजमहल के भीतर और बाहर आती जाती रहती है और राज मत्रियो से भी परिचित हैं, उनके साथ गुप्त रूप से मत्रणा करके राज्याधि- कारियो तथा परिजनो को परोक्षा ली जाय । वे स्त्रियों अधिकारियो में से जिय दूपित समझें उसके पास जाकर कहे कि राजा की प्रमुख रानी आपको चाहती है, यदि आपकी इच्छा हो तो में मिलन की व्यवस्था कर दूं। इसी प्रकार महलों में रहने वाली रानियो, राज पुत्र बभू, पुत्र, पुत्री, पौत्र आदि के परित्र को भी जांच करनी चाहिए । वे जासूम स्त्रियां महल की स्त्रियो से गुप्त रूप से चर्चा करें कि अमुक राज्य-मत्रो आपको चाहता है और वास्तव में आपक योग्य भी है। माप वाह तो मैं मेल करा सकती है। इस प्रकार की जांच में जो व्यक्ति दोषी सिन हो उनको मरया डालना चाहिए । स्त्रियो को भी दण्ड दिया बाय और यदि ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण हो तो तो उसे देश निकाला दिया बाप" ऐसी ही परीक्षा अर्थ (धन) और धर्म (रज्ञ तथा कर्मकाण्ड) आदि के विषय मे भी की जानी आवश्यक है और जो व्यक्ति किसी दृष्टि से राजा से प्रतियोगिता का भाव रखता हो अथवा उसको हटाकर स्वय शासक बन बैठने की अमिलापा रखता हो उन सबको कटक स्वरूप समझ कर, दूर हटा देना ही बुद्धिमत्ता है। इम अध्याय के अन्त में यह भी प्रकट कर दिया गया है कि राजनीति की ये चालें वृहस्पति और शुक्र के राजनीति सम्बन्धी ग्रन्थो के आधार पर सगह की गई हैं। यद्यपि वर्तमान समय मे एकतंत्र शासको (राजाओ) का अन्त हो जाने से, बातें निरर्थक जान पडती हैं, जिम समय राज्य की बागडोर केवल एक दो व्यक्तियो के हाथ में ही रहती थी और अन्य लोग उनको मारकर स्वय उस पद पो ग्रहण करने के लिये सदैव पडयर रचते रहते थे उस समय निस्सन्देह इस प्रकार की जानकारी बडी महत्वपूर्ण थी। x X यद्यपि यह एक पौराणिक रचना है, जिसमे कालिका (महाशक्ति) की पूजा, उपामना, जप, ध्यान आदि का ही विशेप वर्णन किया गया हैं और देवी की विभिन्न शक्तियो-दुर्गा, चण्डी, ताग, कौमारी, छिन्नमस्ता धूमावती आदि की विभिन साधना विधियों पर विस्तार के साथ प्रकाश डाला गया है । हम जानते है कि आधुनिक विद्वान् इम प्रकार के पूजा-पाठ को निरर्थक और काल्पनिक बतलाते हैं और प्राचीन ज्ञान मार्ग वालों ने भी उसे बहुत नीचे दर्जे की उपासना माना है, क्योकि उनके मतानुसार सबसे उच्च कोटि की उपामना अपनी आत्मा की है। जब मनुष्य अपनी आत्मा को परमात्मा का य श मानकर उसका ही ध्यान करन लगता है तभी वह ब्रह्मज्ञान का अधिकारी बनता है । पाठको को यह देखकर कुछ आश्चर्य होगा कि दृढ साम्प्रदायिक होते हुए भी कालिका-पुराण के रचयिता ने इस तथ्य को सर्वथा मुला नहीं दिया है । उन्होने गन्ध, पुष्प, अक्षत, नैवेद्य आदि से देवी की पोडशा- चार पूजा करने का विधान बतलाते हुए भी यह सकेत कर दिया है कि साधक को देवी उपासना करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ये सब पदार्थ परमात्मा के अश है और हम भी इसी मे से निकले अह देवोऽथ नैवेद्य पुष्पगन्धादिक श यत् । पूजोपकरणार्थ च देवत्वमिह जायते ॥ देवाधारोह्यह देवो देव देवाय योजयेत् । सर्वेपा देवतासृपया जायते शुद्धतापि च ।। अर्थात्- 'मैं देव (ईश्वर) हूँ--जब यह भवना दृढ हो जाती है, तो पुष्प, गन्ध, नैवेद्य आदि पूजा के सभी उपकरण देव-स्वरूप मालूम पडने लगते हैं। ईश्वर ही सबका मूल है इसलिये मैं भी ईश्वर हूं अतएव ईश्वर ही ईश्वर की पूजा कर रहा है, और सब कुछ ईश्वरमय है तो किसी वस्तु मे अशुद्धता का प्रश्न ही कैसे उठ सकता है अर्थात् सभी पूजा सामग्री शुद्ध है और हम भी शुद्ध हैं।" यह वेदान्त-शास्त्र का सर्वोच्च सिद्धान्त है और आधुनिक विज्ञान इसका खण्डन नहीं कर सका है । हम जानते है कि अनेक पाखडी और बातूनी भी स्वार्थसिद्धि के लिये ब्रह्मज्ञान और "एकोऽहम्, द्वितीयो- नास्ति" का ढिंढोरा पीटा करते हैं, पर हम यहाँ वास्तविक वेदान्त सिद्धान्त और उम पर आन्तरिक विश्वास रखने वालो को चर्चा कर रहे हैं। इस दृष्टि मे 'कालिका पुराण' एक उपपुराण होते हुए भी पोधिक हरि से अनेक ऐसी ही अन्य रचनाओ से उत्तम हैं। x जमा हमारा नियम है हमने इस पुराण के उतने ही भाग को अपने प्रप मे प्रहण लिया है, जिससे पाठा युछ मशिक्षाए प्राप्त कर सकते है। जो वान गभी पुगणो मे बार-बार दुहराई जा चुकी हैं उनको छोड दिया है। २.४-१६७३ -प्रकाशक

विषय सूची
५२
६७
१०१
१२२
१. मोबासुर की तपस्या
२. नरकासुर-उपान्यान
३. नारदा-आगमन वर्णन
४. भगवान शिव का हिमयान में निवास
५. गोरी परीक्षा वर्णन
६. कालीहर समागम वर्णन
७. गौरी शिव विहार वर्णन
८. वेताल भैरव उत्पति
६. महामाया कल्पे अष्टादश पटल
१०. महामाया कल-वर्णन (१)
११. महामाया कल्प-वर्णन (२)
१२. महामाया कल्प-वर्णन (३)
१३. महामाया मन्त्र का कवच
१४. मात्र साधना के अङ्ग
१५. देवी-मन्त्र कथन
१४८
१८०
१८५
૧૧
१९६
२११
२२७
२५८

२७०
२८५
१६ चडिया मात्र वर्णन
१७ महिषासुरोपाग्यान
१८ कामारया माहात्म्य
१६ नृपधर्म कथन
२०
सदाचार कथन
३८६
३६८
२१ राज्याभिषेक वर्णन
२२ शक्र-ध्वजोत्सव वर्णन
२३ राजा के पालनीय नियमादि
२४ सदाचार वर्णन
२५ षोडशोपचार वर्णन
४३७
२६ देवाराधन के अन्य उपचार
२७ पोडशोपचार निर्णय
२८ कामारया कवच माहात्म्य वर्णन
२६ मातृका ग्यास वर्णन
३० मार्कण्डेय कथन
४१
४६२
४६८

कालिका पुराण
[द्वितीय खण्ड]
॥ भौमासुर की तपस्या ॥
स राजा नरक श्रीमारिचरञ्जीवी महाभुज !
मानुपेणंव भावेन चिर राज्यमथाकरात् ॥१
प्रेताया च व्यतीताया द्वापरस्य तु शेपत ।
अभवच्छोणितपुर वाणो नाम महासुर ॥२
तस्याग्निदुर्ग नगर स च शम्भुमखा वली।
सहस्रवाहुर्दुध प्रिय. पुन स वै वल ॥३
नरवेण सम तम्य महामंत्री व्यजायत ।
गमनागमनानित्यम यान्यानुग्रहैस्तथा ।
नयोरभूद् महायोति पवनानलयोर्यथा ॥४
स च वाण समाराध्य महादेव जगत्प्रभुम् ।
आसुरेणाय भावेन व्यचरचाकुचोभय ॥५
तत्ससर्गान् स नरको दृष्टवा तस्यादभुता कृतिम् ।
तेनैव सह भावेन विहाँ मुपचक्मे ॥६
न ब्राह्मणान् पूजयति यथा पूर्व तथा द्विजा ।
न च यज्ञेषु दाने पूर्ववन्मुदित स च ॥७
माकण्डेय महर्षि ने कहा-वह श्रीमान् राजा नरप जो
चिरजीवी दौर महान मुजाना वाला था । मानुप भाव से हो चिरकार

१० { पति पुन पर्यन्त उगन राज्य किया था ॥१॥ोना गुग पे प्यतीत हो जाम पर द्वापर ये शेप में शोणितपुर म वाण नाम दासा महान सगुर हया पा ॥२॥ उसया अग्नि दुगं नगर पा और यह बलवान् गामा ममा था। उसके एव सह्य बाहुऐं थी और यह बहुत दुधपं पा तथा राणा बलि का प्रिय पुत्र पा ॥३॥ उरावी राजा नरक व साथ यही भारी मित्रता हा गयी थी। नित्य ही गमन और आगमन में सपा परस्थर म अनुग्रह से उन दोनो म पवन और अनल वो ही भाति महतो प्रीति हो गई थी ॥ ४॥ उस वाण ने जगत् वे प्रभु भगवान् शम्भ की समारा- धना की थी और वह बिना भय वाला होकर अमुर भाव से विवरण किया करता था ॥५॥ उसी वे ममर्ग मे वह नरव भी उसरी इस अत्युद्भुत दृति को देखकर उसी के साथ उसी भाव से विहार करने का उसने आरम्भ कर दिया था !! ६ ॥ ह द्विजो । यह फिर ब्राह्मणो का पूजन नहीं करता था जैसे रि पहिले किया करता था और वह यज्ञो में और दान देने में भी पूर्व को भांति प्रसन्न नहीं होता था॥७॥ न तथा विष्णुमभ्येति पृथिवी वापि नाच्चंति । कामाख्याया तथा भक्तिस्तदा तस्याथ नाभवत् ।।८ एतस्मिन्नन्तरे धातुम्तनयो मुनिसत्तम । वसिष्ठो नाम कामाख्या द्रष्टु प्रागज्योतिप गत ॥६ ता दुर्गाभ्यन्तरे नीलकूटदेवो व्यवस्थिताम् । द्रप्ट गन्तु वसिष्ठस्य न द्वार नरको ह्यदात् ॥१० ततो वसिष्ठ कुपितो वचन परुप मुनि । जगाद नरक बोर गर्हयन्मुनिमत्तम ।।११ कथ पृथिव्यास्तनयो वराहस्य सुतोऽञ्जसा । देवी द्रष्टु ब्राह्मणस्य न ददासि तथागत ॥१२ कि ते कुलोचित कर्म त्व करोपि धरात्मज । देवी प्रागम्योतिष गत्वा पूजयिष्ये जगन्मयीम् ।।१३ भौमासुर की तपस्या ] ૧૧ तत स नरको राजा प्राप्तकाल क्षिते सुत । परुपेणाथ वाक्येन तमाक्षिप्य निरस्तवान् ।। ततो मुनि स कुपित शशाप नरक नृपम् ।।१४ पूर्व की तरह वह भगवान विष्णु के समीप में गमन नही किया करता था और वह पृथिवी का भी अर्चन नही करता था। उम अव- सर पर कामाख्या मे उम भांति को भक्ति उमकी नहीं हुई थी ।। इसी बीच में विधाता का पुत्र मुनियो म परम 28 वसिष्ठ नाम वाले कामाख्ना का दर्शन करने के लिए प्राग्ज्योतिप पुर म गये थे ॥६॥ दुर्ग के अन्दर व्यवस्थित उम नील कूट देवी का दर्शन करने के लिये जाने को वसिष्ठ मुनि को नरक ने द्वार नहीं दिया था । १०। इसके अनन्तर मुनि श्रेष्ठ बहुत कुपित होकर वीर नरत की निन्दा करते हुए कठोर वचन बोते थे ।११। वसिष्ठ मुनि ने कहा-कैसे पृथिवी का पुत्र और वराह का सुत अचानक ही ब्राह्मण को देवी के दर्शन करने के लिये स्वागत नहीं करता है । १२ । हे रजरा के पुन ! तेरे कुल मे उचित कम क्या है ? जिसको कि तू कर रहा है। प्राग्ज्योतिप पुर म जाकर मैं देवी का पूजन करूंगा । १३ । माकण्डेय मुनि ने कहा- इसके अनन्तर यह राजा नरव जो पृथ्वी का पुत्र था काल प्राप्त होकर कठोर वाक्य के द्वारा उस मुनि पर आक्षेप करके उसने उनको निरस्त कर दिया था। इसके उपरान्त उस मुनि ने कुपित होकर राजा नरक को शाप दे दिया था । १४ । नचिराद् येन जातोऽसि तेन मानुपरूपिणा । मरण भविता पाप वराहकुलपासन ।।१५ मृते त्वयि महादेवी कामाख्या जगता प्रभुम् । पूजयिष्याम्यह पाप तिष्ठ यास्ये स्वमालयम् ॥१६ व यावज्जीविता पाप कामाख्यापि जगत्प्रभु । सर्व परिक्र सार्धमन्तर्धानाय गच्छतु ।।१७ १२ [पालिका पुगण इत्युक्त्वा ब्रह्मपुत्र स स्वस्थान गतवान् मुनि । वसिष्ठस्तेन भौमेन निरस्त कुपितो भशम् ॥१८ गते वसिष्ठे नरम शीघ्र विस्मयमयुन । जगाम देवीभवन नीलकट महागिरिम् ॥१६ तन गत्वा न चापश्यत कामाख्या कामरूपिणीम् । न योनिमण्डल तस्या सर्वान परिक्रास्तथा ॥२० तत स विमना भूत्वा क्षिति सम्मार मातरम् । पितर च जगन्नाथ नरक प्रभूमव्ययम् ॥२१ वसिष्ठ मुनि ने कहा है वगह के कुल को क्लङ्कित करने वाले । हे पापी जिमसे अभी रपन हआ है उमी मानप रूप में मरण को प्राप्त होगा। १५ । तेरे मृत हो जाने पर जगतो की प्रभु महादेवी कामाख्या को मैं पजित करूंगा। है पापी । तुम यहां स्थित रहो मैं तो अपने निवास स्थान को चला जाऊंगा ।१६॥ है पापी । जब तक तू जीवित रहेगा तब तक जगत को स्वामिनी यह कामाख्या देवी भी सय परिफरो के साथ अतर्धान को प्राप्त हो जावे। १७ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-वह ब्रह्माजी के पुत्र मुनि इतना कहकर अपने स्थान को चले गये थे। उस भमि के पुत्र के द्वारा निरस्त किये हुए मुनि मिष्ठ बहुत ही अधिव कृपित हो गये थे ॥११८ ।। वसिष्ठ मूनि के चले जाने पर नरक शीघ्र ही विस्मय मे मयुत होकर नील कूट महान गिरि पर देवी के भवन में चला गया था।१६। वहां पर जाकर उमने कामरूप वालो कामाख्या देवी को नहीं देखा था। उसके योनिमण्डल को और सब परिवरों को भी नही देखा था ।२०। इसके उपरा त वह बहुत ही उदाम हो गया था और माता पृथिवी का उसने स्मरण किया था । भरम ने अविनाशी जगत के नाथ प्रभु 'पिता का भी स्मरण दिया था॥२१॥ न तावपि तदा यातौ यस्य प्रत्यक्षता द्विजा । व्युत्क्रान्तसमयस्येति नीतिहीनस्य शम्भवे ॥२२ भौमानुर की तपस्या ] चिर प्रतीक्ष्य तो तय भोमो वज्रध्वजस्तदा। अप्राप्तक्षितिविष्णु म सशोक स्वं निवेशनम् ।।२३ स गच्छन स्वग्रह भौम पुरी स्वा दृष्टवास्तु म । पूर्वधिया परित्यक्ता मलिनां वनितामिव ॥२४ देव्यामन्त हिताया तु वेदवादविवजितम् । पुण्यम्वल्पदारजन तन पुर समपद्यत ||२५ न देवास्तत्र गच्छन्ति न विपा न महर्पय । वभूव नगरं तस्य म्वल्पयनियोत्मत्रम् ।।२६ ईतयो वहवो जाता मृताश्च बहवो जना । लौहित्यनदराजोऽपि हीननीयस्तदाऽभवत् ।।२७ वहनि विपरीतानि दृप्टवा स नरकस्तदा । मेने मरणमासन्नमात्मनो ब्रह्मशापत ॥२८ है द्विजो । उम ममय में वे दोनो ही उसके मामने प्रत्यक्ष रूप में प्रकट नही हुए थे क्योकि वह ममय का व्युत्क्रमण करने वाला और शम्भु के लिये नीति मे विहीन हो गया था । २२ । उम भूमि के पुत्र ने वहां पर चिर काल तर उन दोनो की प्रतीक्षा की थी। उम समय में वजध्वज वह विष्णु भगवान और शिनि को न प्राप्त करने वाला होकर शोक में युक्त हो अपने घर में चला गण था । २३ । अपने घर को जाने हुए उम भूमि के पुत्र ने अपनी पुरी को देखा था जो अपनी पूर्व की श्री मे परिव्यक्त थी और मलिन वनिता की हो ममान हो रही थी । २४ । उम देवी के अन्तर्धान हो जाने पर उन पुर को उसने वेद वाद से रहित और पविन दाराजनी के स्वल्प रह जाने वाला हो पाया था । २५ । वहां पर न तो देव गण जाते हैं और न विप्र तया महर्षिगण ही जाया करते हैं। उमका नगर वहुन ही क्म यज्ञो की क्रिया तथा उत्मवो वाला हो गया था ।२६ । वहुत मी ईतियां उस समय मे हो गई थी (विनाश करने वाली ६ प्रकार की ईतियां होती हैं) और बहुत मे बन भामासुर की तपस्या १५ अचल मति थी। उसन वाण के नगर की ओर दीप्त हूत को प्रेपित किया था ॥३२॥ वह शीघ्र गमन करन वाले रथ के द्वारा शोणित पुर को जा कर फिर उसने भूमि के पुत्र नरक का वृत्ता त शीघ्र ही वाण के लिये निवेदन कर दिया था ॥३३॥ जिम प्रकार से वसिष्ठ मुनि ने शाप दिया था और जैसे अम्वका अन्तर्धान हो गई थी और जैस प्राग्ज्योतिप नाम वाले पुर मे विघ्न उत्पन्न हो गया था ॥३४॥ भूमि और माधव का समय जिस तरह से व्यात क्रात हुआ था अर्थात् समय का अतिक्रमण किया गया था---यह सव भूम पुन के उस हूत ने वलि के पुन वाण से कह दिया था ॥३॥ स समाकारमितस्य सम्यग दवपराभवम् । स्वय जगाम नरक सभाजयितुमीश्वर ॥३६ स काचनविचित्राग युक्तमश्वशर्तस्त्रिभि । लोहचक्र च वयाघ्र मयूरध्वजभूषितम् ॥३७ हेमदण्डसितच्छ्वच्छादित किंकिणीगण । नानारत्नौघरचितमारुरोह महारथम् ॥३८ स सहस्रभुत श्रीमाश्चतुर गवलयु न । प्राग्ज्योतिष भौमपुरमचिरादाजगाम है ॥३६ तमासाद्य महावाहुर्वाण प्राग्ज्योतिपश्वरम् । हीन पूर्वश्रिया मित्रमपश्यनगर च तत् ॥४० स तेच पुजितो वाणो यथायोग्य सुतेन को । पप्रच्छ कि निमित्त ते हीन श्रीकमभूत् पुरम् ॥४१ शरीर च यथापूव तथा न तव राजते। मनश्च ते नाति हृप्ट तत्र हेतु वदस्व मे ॥४२ उसने समान आकार वाले मिन का यह पराभव जो देव के ही द्वारा हुया था भनी भांति जानकर वह ईश्वर नरक को समयान अर्थात सात्वना देने के लिये वहाँ स्वय ही गया था ॥३६॥ वइ सुदण स रचित | कालिका पुराण विचित्र अङ्गो बाले-तीन सौ अश्वों से युक्त-लोहे के पहियों वाले-- वैयाघ-मयूर ध्वज से भूषित-सुवर्ण के दण्ड वाले सितछर से समा. छादित-किङ्किणी गणो से समन्वित ~अनेक रत्नो से समूह से निर्मित महान रय पर वह समारूद्ध हुआ था ।।३७॥३८॥ वह एक सहर भुजाओ वाला~श्रीमान चतुर्राङ्गी सेनाओ मे युक्त होकर भीम (मरस) के पुर प्राग्ज्योनिप मैं शीघ्र ही समागत हो गया था ॥३६ उमके समीप पहेच कर महा वाह वाण ने प्राग्ज्योतिय नगर के स्वामी वो पूर्व थी से हीन मित्र को और उस नगर को देखा था ॥४०॥ वह वही पर पृथिवी के सुन उसके द्वारा यथा उचित रीति से वह पूजित किया गया था अर्थात् उमया समुचित सत्कार दिया था। और उसने पूछा था कि frस कारण मे तुम्हारा यह पुर श्री से होन हो गया था। १४१॥ ३॥ण ने पहा-~आपका यह शरीर भी जसा पहिले था वैमा शोभित नहीं हो रहा है । आपका मन भी पाहिले के समान प्रसन्न पही है-इगमे या कारण है यही मुझे नृपाकर मतलाइये ॥१२॥ एवमादीनि पृष्टः स नरक क्षितिनन्दनः । पथा यमिप्ठशापोभूत् तत् सर्व तस्य पाद्रवीत् ११४३ यन्ध तं भौमवदनात्तदूतावेस्तिं पुरा। भारवा तपास प्रोवाच पाणी वध्वज पुनः ॥१४ नाहि मन्यारवया पार्य: मुरो दुःये शगेरिणाम् । पावत् परियतते ननाम्या पोऽपि होयते ॥४॥ पर हस प्रतीमार. कापों धीरविभूतये। भवागपि प्रतीवार रतुं महंति सम्पत्ति ॥४६ ५ एप मागुपः पृथ्यागमाधारणभूतिभि । वर्धत दानवो वापि देवो वाप्यथयागुर ॥४७ सा पिपरी वापि नाम्नान् गहा नहि। पौरिग्मं देवगण गाधं पुस्तिस्मन । पामा प्रसारण प्राय यस मिस भौमासुर की तपस्या ] १० तम्य चेष्टनमो देवो विष्णुनित्यं सनातनः । स न शक्तत्य कुरुते मनोऽनिप्ट मनागपि ॥ मार्कण्डेय मुनि ने पहा-इस प्रकार से बहुत से प्रश्न पूछे गये भूमि के पुत्र उम नरक ने जिस तरह से पशिष्ठ मुनि का दिया हुआ शाप हुआ था वह सभी उसको कह दिया था ॥४३॥ भूमि के पुन से जो भी सुना था वह पहिले ही दून के द्वारा आवेदित था। उस मांति स जान करके वाण उस वज़ घ्वज से पुन बोला मा ॥४४॥ वाण ने कहा-यापरो क्रोध नहीं करना चाहिए । शरीर धारियों को मुख और दुख चक्र की ही भांति परिवर्तित होत रहा करत हैं अर्थात् सुख के वाद दुख और दुःख के पश्चात् मुख लौट फेर कर आया करत हैं । इन सुख दुख से कोई भी होन नही हुआ करता है ।।४।। परन्तु धीर पुरषो को विभूति के लिये उसमे प्रतीकार करना ही चाहिए। आप भी अव उमका प्रतीकार करने के योग्य होने है । अर्थात् आपको भी प्रतीकार करना ही चाहिए ।। ४६ । पृथिवी म यह मनुष्य असाधारण विभूतियो से वधित होता है। ऐसा सभी को होता है चाहे कोई दानव हो-दैत्य हो अथवा अमुर हो ॥४७॥ राक्षम हो अथवा किन्नर हो- इन्द्र उनको सहन नहीं दिया करता है। वह इन्द्र देवगणो के साथ इधर-उधर कुटिलता रिया करता है। और जिस-किसी भी प्रकार से उसकी श्री को भ्रष्ठ करके उसे विनष्ट कर दिया करता है ॥४८॥ उस का परम इष्टतम दव नित्य ही सनातन विष्णु भगवान् हैं । ये इन्द्र का थोडा सा भी अनिष्ठ कभी नहीं किया करते हैं १४६॥ य समाराधयेद् विष्णु शत्रस्यानिष्टकारक. । तस्मं वर तु सच्छिद्र दत्त्वा त शातयत्वित ॥५० चिरमाराधितो विष्णु रिप्टान् कामान् प्रयच्छति । महता कायदुखेन पूजित सम्प्रसीदति ॥५१ विनेष्टदेवतापूजा विभूतिमतुला पुमान् ।

[ शालिवा पुराण क, प्राप्नोनि श्रुत पूर्व न वा पूर्वतर: पयचित् ॥१२ त्वया नाराधित पूर्व ब्रह्मा वा विष्णुरीश्वरः । तेन तेऽद्य महाविघ्ना उत्पमा विपये तब ३५३ यो वा विष्णु, पालकस्ते न निसर्गानुकापफ. । किन्तु ते स क्षितेर्वाक्यात्तया चाराधितो मुहुः ॥५४ दत्त छिद्र च ते विष्णु पराध्यास्त्वया द्विजाः । इतोऽन्यथा त्व भविता हश्रीरिति नः श्रुतम् ॥५५ अपराध्यस्त्वया भूप वसिष्ठः परमो मुनिः । तेन स्मरणमात्रेण नायातौ क्षितिमाधवी ॥५६ इन्द्र के अनिष्ठ करने वाला जो भो कोई भगवान् विष्णु की ममाराधना किया परता है उसको मच्छिद्र वरदार देकर उसका शातन करते है ॥५०॥ चिरकाल पर्यन्त आराधना किये हुए भगवान विष्णु अभीष्ट कामो का प्रदान किया करते हैं और महान् शरीर के दुख से वे परम प्रसन्न हो पाया करते हैं ॥५१॥ इष्ट देवता की पूजा के बिना कोन पुरुप अतुल विभूति को प्रास किया करता है अर्थात् कोई भी नहीं पाता है। पूर्व में होने वाली वे भी ऐसा कही भी कोई पुरप पूर्व में नहीं सुभा गया है ।।२२।। तुमने पूर्व में ब्रह्माजी की अथवा ईश्वर भगवान विष्णु की आराधना नहीं की है। इसी कारण से तुमको आज हो विघ्न समुत्पन्न हुए है जो तुम्हारे विषय मे ही हैं ॥५३।. जो भगवान विष्णु है जो स्वभाव से ही अनुकम्पा करने वाले है तुम्हारे पालन करने वाले नहीं हो रहे हैं । विन्तु तुमने पृथिवी के वाक्य से पुन. उकी आराधना की थी ॥५४॥ विष्णु भगवान ने तुम को छिद्र दे दिया है । आपो द्विजो वा अपराध नहीं करना चाहिए । अन्यथा इससे आप हत श्री हो जायगे-ऐमा हमने सुना है ॥५५॥ आपने परम श्रेष्ठ धसिष्ठ मुनि का अपराध दिया है हे भूप ! इसीलिये उस स्मरण मात्र में पृथिवी और माधव नहीं समागत हुए है ॥५६|| पूजा दिये

भामासुर को तपम्या ।
१६
तस्मात्व मित्र युध्यस्व कोटिल्य हरिमेधस ।
नाधुना युज्यते भौम तवादासीनताकृति ॥५७
यत्ते मनसि तातोऽयमिति सम्प्रत्यय स ते ।
वराह एव ते तात स च लाकान्तर गत ॥५८
वराहोऽपि हरेर श इति यच्छ्यते त्वया ।
तस्याश इत्यनुक्रोश केन वा क्रियते बद ॥५६
तस्मात्त्व कुरु शम्भोर्वा ब्रह्मणो वाधुनाच्चनम् ।
स ते प्रसन्न परममिष्टकाम प्रदास्यति ॥६०
विघ्नो वा मुनिशापो वा महेनिर्वातिपीडक ।
विधी प्रसन्न शम्भो वा नचिरात्क्षयमप्यति । ६१
जातसम्प्रत्ययो भामो वाणस्य वचनात् तदा ।
सुप्रीत समुवाचेद धीरघधनि म्वन् ॥६२
है मित्र ! इस कारण से आप हार भगवान् की मधा की
कुटिलता को समझ लीजिए । हे भीम ! अथात् भाम के पुत्र नरक ।
इस ममय में आपकी उदासीन आकृति का हाना युक्त नहीं होता है ।
॥५७॥ जो तुम्हार मन म यह है कि यह मर तात है ,एसा विश्वास है
वह तो दूसरे लोक में चल गय है क्या वराह हा मापक पिता थे।
वह चले गये है ॥५६॥ वराह भी हरि भगवान् का हो अश है जिनका
आप सेवन किया करते हैं। उसका वश है-यह अनुकम्पा ही है ।
यह किसके द्वारा किया जाता है, बतलादए । ५६ इससे अव
तुम भगवान् शम्भू का ययवा ब्रह्माजी का अभ्यर्चन करिए।
वह प्रसन्न होकर बापका परम अभीष्ट काम प्रदान कर देगे
॥ ६॥ विघ्न अथवा मुनि का शाप या पीडा करन वाली महती
ईति विधाता अपवा शम्भु भगवान् के प्रसन्न हान पर ये सभी
शीन हो शय को प्राप्त हो जायेंगे । ६१ 1 मारण्डेय मुनि ने कहा --उरा
समय में वाग के वचन से भौम अर्पाद नरव को पूर्ण विश्वास समुत्पन्न

२० [ कालिका पुराण हो गया था। वह बहुत ही प्रसन्न होकर धीरता से घर्धर ध्वनि वाला यह वचन बोला ॥६॥ यत् त्वया गदित बाण हित मे मित्रवत्सल । तत् कार्यमचिरादेव तपश्चरणमुत्तमम् ॥६३ विष्ण राधनीयो मे तत्र हेतुस्त्वयोदितः । नैवाराध्यस्तथा शम्भुरन्तणुः स मे पुरे ॥६४ तस्माद् ब्रह्मा समाराध्यो वचनात् तव मित्रक । तत्पुत्रस्य महावाहो लौहित्यस्याम्बुसन्निधौ ॥६५ भवताध्यापितश्वाह शिप्योऽथ गुरुणा यथा । मित्र मित्र यथा धीर साम्ना परमवल्गुना ॥६६ इत्युक्त्वा स महावाहुर्वाण वज्रध्वजस्तदा। यथावत् पूजयामास तन्मित्र मित्रवत्सलः ॥६७ अर्चयित्वा यथायोग्य प्रस्थाप्य च वले सुतम् । ब्रह्माराधनमत्युग्र कर्तुमिच्छन् क्षितेः सुत. ॥६८ स तीरे नदराजस्य लौहित्त्यस्य महात्मन. । ब्रह्माचल समारुह्य तपस्तप्तुमुपस्थितः ।।६६ समानुपेण मानेन क्षितिपुत्र शत समा । जलाहारव्रतेनैव समानर्च पितामहम् ॥७० भौम मे पहा-हे मित्रों पर प्यार करने वाले ! जो भी भाग्ने कहा है यह मेरा हिल है अर्थात् भलाई करने वाला है। वह मैं गुरन्त ही उत्तम तपश्चर्या बरंगा ।। ६३ ।। मुझे भगवान विष्णु की धाराधना नही करनी चाहिये पयोधि उसमे हेतु यतला दिया है । उसी भानि शम्भु भगवान की भी आराधना नहीं करनी चाहिए क्योरि वे गरे पुर में अन्न[स है ॥६॥ इग बारण ब्रह्माजी की ही आराधना परली पाहिए ऐगा ही है मित्र I आपस भी नयन है। महावाहो ! र पुत्र मोहिया की गनिधि में आपरे द्वारा मैं अध्यापित

भीमामुर की तपस्या ]
२१
किया गया हूँ जिम तरह मे गुरु के द्वाग शिष्य को पढाया जाता है।
हे धीर ! जैसे मित्र को मित्र परम वल्गु माम में किया करता है।
॥६५॥६६॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इतना वाण मे पहार वह महा-
वाहु व ध्वज ने उस समय में यथावत् उम मित्र की पूजा की थी
क्योकि वह मित्रों पर प्यार करने वाया था ॥६॥ क्षिति के पुत्र
नरक ने यथोचित रूप मे अर्चन करने और बलि के पुत्र को प्रस्थापित
परके अर्थात् विदा करके उमने अत्यन्त उग्र ब्रह्माजी की आराधन करने
थी इच्छा की थी ।६८|| वह महात्मा लोहित्य के तट पर जो कि नदी
पा राजा था वन्याचल पर ममास्थित होकर तपश्चर्या करने के लिये
उपस्थित हो गया था ॥६॥ उम क्षिति के पुत्र ने मनुष्यो के मान से
मो वर्ष तक जल के आहार ये व्रत मे पितामह वी अर्चना की थी।७०।
सन्तुष्टः शतवन्तेि ब्रह्मा लोकपितामहः ।
प्रत्यक्षीय नरकस्याग्रतः ममुपस्थितः ॥७१
प्रीतोऽस्मि ते वर दास्ये वर वरय मुद्रत ।
इति चोवाच नरकं स तदा कमलामनः ।।७२
स दृष्ट्वा सर्वलोकेशं प्रत्यक्ष कमलामनम् ।
प्रणम्य प्रान्जलि.चे विनयानतकन्धरः ॥७३
देवासुरेन्यो रक्षोभ्य. मवेभ्यो देवयोनितः ।
अवध्यत्व मुरथेप्ठ वरमेकं प्रयच्छ मे ॥७४
अविच्छिन्ना सन्ततिमें यावच्चन्द्रो रविस्तपेत् ।
तावद्भवतु लोकेश द्वितीयोऽय वरो मम ।।७५
तिलोत्तमाद्या या देव्यः सद्रूपगुणसंयुताः ।
तास्ता मे दयिताः सन्तु सहस्राणि तु पोडश ७६
अजेयत्व सदा श्रीर्मा न जहातु कदाचन ।
इति पंच वरा मेऽद्य वृतास्त्वत्त. पितामह ।।७७
लोगों के पितामह मो वर्ष तक तप करने के अल मे परम
मन्तुष्ट हुए थे और प्रत्यक्ष में आरर नरस के सामने गमुपस्थित हो गये

२२ 1 शलिका पुराण यह उस थे।७१। हे सुव्रता में तुम पर बहुत प्रसन्न हो गया है । मैं तुमका वरदान दूगा । जो भी चाहो वर मांग लो। उन भगवान कमतास- अवमर पर नरक ने कहा था 1७२। उस नरव ने समस्त लोपोस्वामी कमलासन प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन करये उसने उनको प्रणाम दिया था और फिर दोनो को जोडकर विनय से अवनत कन्धग को करके बोला-हे मुरथ आप मुझे एक वरदान यह दीजिए कि मैं देवोमे--असुरो से- राक्षमों से और सभी देव योनियों में अवथा होऊ अर्याद वध होने के योग्य न रहूँ १७३१७४॥ मेरी सन्तति भी विच्छिन्न न होवे और वह जब तक रहे जब तक ये चन्द्र तथा दिवाकर रहें। है लोकेश्वर । तभी तक मेरी सन्तति "यम बनी रहे- यही मेरा दूसरा वरदान है ।।७५|| तिलोतमा आदि जो देवियां सुन्दर रूप और गुणो से समन्वित हैं वे-दे सव' मोलह महस्र मेरो दयिता हो जावें ।।७६। मुझे अजेयत्व की प्राप्ति होवे अर्थात में किसी में भी विजित न होऊ । और श्री मुझको कभी भी परित्याग न करे। हे पितामह । ये रे पांच वर हैं जो आपसे मैंने आज वरण करने की इच्छा प्रकट की है ॥७७॥ मायया मोहितो भौमो मुनिशाप विस्मृत्य च । अन्यद्वरान्तर वd मुनिशापस्तथा स्थित ॥७८ एवमस्त्विति तान् सर्वान् वरान् दत्त्वा पितामह । उवाचेद द्वापरान्ते सन्ध्याया मुरकन्यका ॥७६ तिलोत्तमाद्यास्ते जाया सम्भविष्यन्ति भूतले । न यावन्नारदो याति वचध्वज पुर तव । तावन्न मथुने योज्या भवता ता क्षिते सुत ।।६० इत्युक्त्वा मर्वलोकेश क्षणादन्तहितोऽभवत् । मुदमासाद्य परमा स्वस्थान नरकोऽभ्यगात् । नतो मुदितलोक त नगर श्रीनिपेवितम् । सदा सोत्साहसम्पूर्णमीतिविघ्नविवर्जितम् ।।२ अभवन् पशुसघंश्च वाजिवारणकुम्भवः ।

भोमामुर की तपस्या ] सम्पूर्ण देवराजस्य दयितेवामगवती ॥८३ उत्तीर्णतपस श्रुत्वा वाणो दत्तवर तथा । स्वय पूनरुपातिप्ठद् भौम वनध्वज तदा ॥८४ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-वह भौम नरक माया से मोहित हो गया था और मुनि के शाप को विस्मृत पर दिया था। मुनि का शाप उसी भांति स्थित था। उसन अन्य अन्य वरदानो की याचना की थी॥७॥ पितामह ने ऐमा ही होव-ऐसी रीति में उन मव वरी को देकर यह कहा था- द्वापर के अन्त मे सन्ध्या म तिलोत्तमा आदि सुर पन्याऐ भतल मे तेरी परित्या होगी। हे वज़ध्वज जब तक देवपि नारद तर पुर मे नहीं जाते हैं। हे क्षिति के पुन तब तक आपको उनके माथ मैथुन कर्म नही करना चाहिए ॥७६८०॥ इतना ही पदर सत्र लोको क ईश एक ही क्षण मे अतर्धान हो गये थे। नरको भी परम प्रसन्नता की प्रामि करके अपने स्थान को गमन पर गया था 11८११। इसके अन्तर वह उम प्रमन्न लोगो वाले नगर को चला गया था। वह नगर था से निपेवित घा और मदा ही उत्साह से परिपूर्ण या तथा ईतियो के विघ्ना मे रहित था ॥२॥ वह नगर देवराज की दयिना (धारी) अमरावती हो के समान पशुओ के ममुदायो मे और अश्व--गज कुम्भका मे परिपूर्ण हो गया था 1८३॥ वाण ने नरक को उत्तीर्ण तप वाला तथा दिये हुए वरो वाला श्रवण करके उस समय मे वह वज धज के समीप में पुन स्वय ममुपस्थित हो गया था ॥४॥ स गत्वा भौमनगर वाण प्राग्ज्योतिपाह्वयम् । पप्रच्छ नरक मित्र तपस सन्निवेशनम् ।।८५ कुन त्वया तपस्तप्त किं वा चीणं त्वया वतम् । कोदृशो वा वरो लब्धस्त्व ममास्यातुमर्हसि ।।८६ हप्ट तव पुर सर्व प्रहृष्टजनसकुलम् । वाजिवारणरत्नौर्घ पूरित मगलस्वनं ॥८७ दृश्यतेऽद्य त्वया पाल्य शस्यपूर्णमनामयम् ।

1 पालिका पुराण कथ्यतां वाक्य ब्रह्मा वर तुभ्य प्रदतवान् ।।८८ ब्रह्मा म्वय पर्वतरूपधारी कामेश्वरी धतुं मिहावतीण । तत्र स्वय सम्प्रति घस्रमेति पुरा न यावच्छपते वसिष्ठ ।।८६ सोज्य पुरे मे वलिपुन राजते देवोधमेव्योऽप्यमरोतमाश । तपाहमको वरतोयभोजनो वपाण्यकार्प च तप शनानि ED लोहित्यतीरे धनवायुसेविते मनोहरे प्राणभृता सुखप्रदे। तप प्रवृत्तस्य मुख समागम- च्छरद् यथैका शरदा शतानि मे ॥६१ उस वाण ने नरक के प्राग्ज्योषि नामक नगर में गमन करके फिर अपने मित्र नरव में तपश्चर्या का मुन्नि वेशन पूछा था ॥५॥ उसने पूछा कि आपर्ने तप कहा किया था अथवा आपने क्या व्रतों को चीर्ण किया था। आपने किस प्रकार का वर प्राप्त किया था यह सभी आप मुझसे कहने के योग्य है ।।८६॥ अब मैंने आपके पुरको सम्पूर्ण रूप से प्रसन्न जनो में सकुल देखा है । अश्व-गज और रलो के समूहों से तथा मङ्गल ध्वनियों से भरा-पूरा देखा है ।।८७॥ आज आपके द्वारा पालन के योग्य प्रजा एव भूमि शस्त्रों से परिपूर्ण और रोग रहित देखी जा रही है। आप बतलाइये ब्रह्माजी ने से आपको वरदान दिया या ८८|| नरप ने कहा-पर्वत के रूप को धारण करने वाले ब्रह्माजी स्वय कामैश्वरी को धारण करने के लिये यहा पर यवतीर्ण हुए थे वहा पर अब स्वयं यस गमन किया करता है जब तव पहिले वसिष्ठ मुनि भाप नहीं देते हैं | हे पनि पुत्र ! वह यह मेरे पुर

०५
भौमानुर की तपस्या 1
विराजित होते हैं जो देवो नमुदाय द्वारा मेव्य हैं और अमरो का उत्तम
बम हैं। वहीं पर मैं बोला जल के आहार करने वाला सौ वर्ष तक
तपस्या करने वाला रहा था 1800 लोहित्य कातर नन वायु मे मेविन
था वह परम मनोहर या और प्राणियो को मुख प्रदान करने वाला था।
वहीं पर तपस्या करने में प्रवृत्त हए मुझे मुख पूर्व मौ वप एक वर्ष की
ही भांति समागत हुए थे 1811
तत म तुष्टचतुराननोऽभवत
प्रत्यक्षतो मा न्यगदच्च मद्धितम् ।
तव प्रसन्नोम्मि वर ययेग्मित
दाम्ये गृहागेति पुगेश्य भूत्वा ।।२
अवध्यता में सुरयोनित सुरा-
दच्छिन्नसत्गनम्जेयता तथा।
सदा विभूतिनं जहातु मामिति
वराश्च नार्यों नवयौवनान्विता ॥३३
एते वरा पच मया ततो वृता
सोऽपि प्रतिश्रुत्य गतो निजाम्पदम् ।
ततोन्हयभ्येत्य पुर निज मुदा
मन्त्रिप्रवोर सहित पुनस्तान् ॥६४
पोरान् मवन्धून् सगणानमाश्यम्
दानेन मानेन च भोजनेन ।।३५
इनोरित तम्य वले सुतस्तदा
भोमस्य यत्वा मुमुदे न तत्क्षणात् ।
इद तदोचे वचन क्षिते मुत
तत्कायुक्न न च मूनतोद्भवम् ।।६६
न ते मुने शापमतीत्य गन्तु
भूना मतिमित्र तदा विधे पुर ।

[रिका पुगण
वथ तु भद्र भविता तवेह
भावीत्यवश्य क्षितिपुत्र नित्यम् ॥६७
कृतम्य करण नास्ति देवाधिष्ठितकर्मण ।
भावीत्यवश्य यद्भाव्य तत्र ब्रह्माप्यवाधक 116
इसके उपरान्त चतुरानन वे ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये थे और
प्रत्यक्ष मे ममागत होकर उन्होने मेरे हित के वचन कहे थे । उहोने मेरे
मामने होकर मुझ से कहा था-मैं तुझ पर प्रसन्न हो गया है और जो
भी तुझे अभीष्ट होगा बही वर तुझको दूगा--तुम मुझमे वर ग्रहण
भरलो ॥६२॥ मैंने उनसे पांच वरदानो की याचना पी थी--मुर योनि
से मुरमे मेरी अवध्याता होवे- मेरी सन्तति कभी भी छिन्न न होवे-
अजेयता मुये प्राप्त रहे -विभूति सदा ही बनी रहे और कभी भी मेरा
परित्याग न करे । और परम भ्रप नव यौवन म समन्वित मेरी नागियो
होवे-ये ही पांच वरदान मैंने मॉो थे। उनने भी सभी वरदानो को
प्रतिधत किया था और फिर वे अपने स्थान को चले गये थे। इसके
उपरान्त मैं प्रसन्नता से अपने नगर में प्राप्त हो गया था। फिर मैंने
मन्त्रियो में श्रेष्ठो के सहिता पुन उन नगर निवासियो को गणो के
महित दान मार और भोजन के द्वारा प्रसन्न किया था ॥६३६४१६५||
माकण्डेय मुनि ने कहा- इस तरहसे उसने कहेहुए वचनका श्रवण करके
वलि पुत्र उस क्षण में प्रसन्न नहीं हुआ था और उस समय मे उसने
भूमि के पुत्र मे यह वचन कहा था वह वचन उस दाल के युक्त था
और सूमृतोद्भव नहीं था। अर्थात् प्रिय लगने वाला नही था ॥६६।।
वाण न वहा-है मित्र | उस समय म विधाता के आगे आपकी बुद्धि
मुनि के शाप अतिक्रमण करने की नही हुई थी। यहाँ पर आपका
बल्याण कैस होगा । ह भूमि पुत्र । जो होनहार है वह नित्य ही अवश्य
ही होने वाली है ॥१७॥ किये हुए देव से अधिपित कर्म का करण नहीं
है । जो हानहार है वह अवश्य ही होगी ही उसमे ब्रह्मा भी वाधक नहीं
हा मपत हैं ॥१८॥

नरकासुर आख्यान ] २७ तस्मात् त्वं सुमहावीरानसरान पावकोपमान् । सन्ध्याय च पुरस्कृत्य साविव्ये विनियोजय INEE द्वारि सस्थाप्य वै वीरान् देवैरपि दुरासदान् । अतिकमस्व देवेश यदि लब्धवरो भवान् ॥१०० विधिना यो वरो दत्तो भवते तन-परोक्षयम् । कर्तुमर्हसि जायायामपुत्रो जनयात्मजम ॥१०१ इत्यक्त्वा प्रययौ वाणो ययावत् तेन पूजितः । नरको मित्रवचन कतुं समुपचक्रमे ॥१०२ इस कारण से आप बहुत महान वीर आसुरो को सन्धि करके उन्हे आगे करो और मस्त्रियो के पदो पर उनको नियुक्त करो ॥६॥ जो देवो को भी दुरासद हो ऐसे वीरो को द्वार पर संस्थापित करो। आप यदि वरदान प्राप्त दिये हुए हैं तो देवेश्वर का भी अति क्रमण करो ।१००। विधा ने जो वर दिया है आपके लिये वह परीक्षण है। असुत्र आ जाया मे आरमन को जन्म दो १०१॥ इतना कहकर वाण उसमे द्वारा पूजित होकर वहां से चला गया था। नरक ने भी अपन मित्र के द्वारा पहे हुये वचनो के अनुसार ही कार्य करने का आरम्भ क्यिा था ॥१०॥ ॥ नरकासुर उपास्यान ॥ ऋतुमत्या तु जायाया काले स नरकः क्रमात् । भगदत्त महाशीर्घ मदवन्त सुमालिनम् ॥१ चतुरो जनयामास पुत्रानेतान् क्षितेः सुतः । महासत्वान महावीर्यान् वोरैरन्यदुरासदान् ॥२ ततो वाणस्य वचनाद् हयग्रोवं तया मुरुम् ।

२८ [त्रिका पुगण पुत्र नरक ने स धायाथ समानीय सनापत्येऽन्यपचयत् ।।३ मुरु सन्निहित श्रुत्वा हयग्रीव भौमिना। ये ये क्षितौ तदा ह्यामन्नसुरास्तऽपि सगता ॥४ ह्यग्रोन मुरु श्रुत्वा नरकेण समागतम् । निसुन्दसुन्दनामारावसुरौ सैनिक सह ।।५ विरूपाक्षस्तदा दत्य सव तेन समागमन् । तत स पश्चिमद्वारि नरक सेनया सह ॥६ मुरु द्वाराधिप चा हयग्रीव तथोतर । पूर्वद्वारि निसुन्दन्तु विरूपाक्ष तु दक्षिणे ॥७ मााण्डेय महपि न कहा-कान के सम्प्राप्त होने पर भूमि के से ऋतुमती अपनी जाया मे भगदत्त-महा शीप- मदव त और सुमानी इन चार पुषो का समुत्पन किया था जो कि महान मत्व वाले--महान वीय-पराक्रम वाने और अन्य वीरो के द्वारा दुरासद थे ॥१॥२॥ इसके अनतर वाण वे वचन के अनुसार हयग्रीव तथा मुरु को बुला कर इनके साथ सधि करके अपने सेना के अधिपत्य पदो पर अभिषिक्त कर दिया था ॥३॥ भीमा के द्वारा नियुक्त किये हुए मुरु और हयग्रीव को सुनकर उस समय म जो जो भी भूमि पर असूर थे वे भी सत्र सङ्गत हो गये थे।४। नरक के द्वारा समा और हयग्रीव को सुनकर सेना के सहित निसुद और सुद नामा वाले तथा दैत्य विरुपाक्ष उस समय म ये सभी समागत हो गये थे। इसके अन तर उस नरक न सेना के साथ पश्चिम द्वार पर मुरु को द्वार का अधिष्ट बना दिया था तथा हयनोव का उत्तर द्वार पर नियुक्त किया था। पूध द्वार पर निसुद को और विरूपाक्ष को दक्षिण द्वार पर नियुक्त किया था ॥शा॥७॥ मध्ये पचजन सुन्द सैनापत्येऽभ्यपेचयत् । मुरु क्षरा तान् पाशाश्च पट्सहलाण्ययोजयत् ॥ गत मुरु

२६
नरखासुर उपास्यान ]
द्वारि तत् पुररक्षार्थ सत्कृत क्षितिसूनुना ।
एव पूर्वान् पूर्वतरानवमत्य सुमन्त्रिण |
असुर रेव सतत सोऽमुरो मुदितोऽभवत् ।
पूर्व गृहोत भाव स परित्यज्य क्षिते. सुत. ॥१०
आसुर भावमासाद्य वाघते निदिवौक्स ।
न देवान् न मुनीन् सर्वान् न च जानाति काश्चन ॥११
सुरेश्वर जिगायाशु हयग्रीवसहायवान् ।
एव स चासुर भाव तन्वानो विचरन् क्षितौ ॥१२
वाणस्य वचनाच्छक वाघयत्येव वै मुनीन् ।
देवेश्वर त्रिधा जित्वा ह्यग्रीवसहायवान् ।।१३
अदित्या कुण्डलयुग त्रिपु लोकेषु विश्रुतम् ।
सर्वरत्नामृतस्रावि दुखविघ्नहर परम् ।।१४
मध्य में पचजन सुन्द को सेनापति के आधिपत्य पद पर नियुक्त
किया था अथवा अभिपिक्त कर दिया था। मुरु को पुरान्त को और
पाशा को छ सहस्रो को योजित किया था |॥८॥ द्वार पर भूमि पुत्र के
द्वारा पुर को रक्षा के लिये इनका सत्कार किया गया था। इस प्रकार
से जो पूर्व मे थे तथा उसमे भी पहिले थे उन अच्छे मन्त्रियों को
हटा
दिया था l वह असुर निरन्तर अमुरा के ही साथ से परम प्रसन्न
हुआ था। उस भूमि के पुत्र नै पूर्व मे ग्रहण किये हुए भाव का परित्याग
पर दिया था ॥१०॥ वह आमुर भाव को प्राप्त करके देवो को वाधा
दिया करता था। वह न तो देवो को -~न मुनियों को और किन्ही
मी सरको सहीं जाना या अर्याद अन्य किसी का भी यादर नहीं किया
करता था ॥११॥ सुरेश्वर को शीघ्र ही उमने ह्यग्रीव की सहायता से
युक्त होकर जीत लिया था। इस प्रकार से वह यामुर भाव को बढाता
हुआ ही पृथ्वी पर विचरण किया करता था ॥१२॥ वाण के वचन मे
यह होर की सहायता से समन्वित होकर देवों के स्वामी इन्द्र को

[ कालिका पुराण बधा देता हैं और मुनियो को भी बाधा दिया करता है । देवश को तीन प्रकार से जीत कर अदिति के दो कुण्डलो को जो तीनो लोको मे प्रसिद्ध हैं जो सर्वरत्ना मृत का स्रवण करने वाले थे और दु ख तथा विघ्नो का हरण करने वाले परम श्रेष्ठ थे ॥१३॥१४॥ जहार नरको भौमो निर्भीतो मुनिशापत । एव देवान् वाधमानो मुनीन् विप्रान क्षिते सुत । पचवर्षसहस्राणि राज्य प्राग्ज्योतिपेऽकरोत् ।।१५ एतस्मिन्नन्तरे देवी महाभारादिता क्षिति । ब्रह्माविष्णुमुखान् देवान् रक्षार्थ शरण गता । इद चोवाच धातार प्रणम्योर्वो समाधवम् ।।१६ दानवा रानसा दैत्या हरिणा ये च सूदिता । ते राज्ञा मन्दिरे जाना अधुना वलगविता ॥१७ तेपा मारमह सोढु न शक्नोमि महत्तरम् । असख्याताश्च ते सर्व तान् सख्यातु ने चोत्सहे ।।१८ अप्टौ शतसहस्राणि तेपा मुख्या महावल । तेमप्यतिवलान् वोढु न ताञ्छक्नोमि चाधुना ॥१६ वाण वले सुत वीर कस धेनुकमेव च । अरिप्ट च प्रलम्ब च मुनामान मेरुशलम् ॥२० चारणमुप्टिको मल्लो जरासन्ध महावलम् । नरक च हयग्रीव निसुन्द सुन्दमेव च ।।२१, भूमि के पुत्र नरक ने मुनि क शाप से निर्भीत होकर उन कुण्डलो का हरण कर लिया था। इस तरह से देवो को-मुनियो को और विशे यो बाया करता हुए उस भूमि के पुत्र ने पांच सहस वर्ष तक प्राग्ज्योतिष में राज्य वा शासन किया था । १५ । इसी बीच में महान भार मे पीडित हुई पृथ्षी देवी ब्रह्मा-विष्णु प्रमुप देवो यो शरणा- गति में अपनी सा दे किये गयी थी। वही पृथ्वी ने ब्रह्माजी और माधम प्रभू को प्रणाम पर यह रहा था । १६ । पृथिवी ने कहा- नग्वागुर उगल्यान ] ३१ दानव-राक्षम और दैत्य जो हरि के द्वार। मूदित कर दिये गय ये व सब राजाओ मन्दिर म इस समय म वल से गवित होकर समुत्पन्न हो गये थे । १७। उनका इतना अधिक भार है कि उमको मह्न और वहन करने म ममर्य नही है। उनकी मस्या इतनी अधिक है कि मैं उन सब को मध्य यतलान म भी अममर्थ हूँ और मुझे उत्साह नही हाता है कि मैं बतलाऊँ ।१८। उनम मुख्य महान बल वाले आट मो सहर हैं। उनमे भी अत्यधिर वल वाले हैं । मैं इम ममय में उनका वह्न करने में असमर्थ हू ॥१क्षा उनके नामो को बताते हुए पृथ्वी कहा- वाण-वलि का पुत्र, बोर वम, धेनुक अरिष्ट-प्रलम्व, मुनामा, मुग, शल, मल्ल चारण और मुष्टिक, महान् वल शाली जरा सन्ध, नरक, हयग्रीव, निसुन्द और मुन्द हैं ॥ २० ॥२१॥ विस्पाक्ष पचजन हिडिम्व च वक वलम् । जटासुर च क्मिीरमनायुधमलम्बुपम् ।।२२ सौभाग्य च जरासन्ध द्विविद चापि वानरम् । श्रुतायुध महादैत्य शतायुधमयापरम् ॥२३ ऋप्यशृगसुत चैव मुवाहुमतिवाहुनम् । कालवस्तास्तथा दैत्यान् हिरण्यपुरवामिन ॥२४ एतेपा तु पदक्षोमविशीर्णाह दिने दिने । लोकान् वोटु न शक्नोमि ताग्निघ्नन्तु मुरोत्तमा १२५ नचेद्रक्षा प्रकुर्वन्ति भवन्त सुरमत्तमा । तदा विशीर्णा यास्यामि पातालमवशाधूना ॥२६ ततम्नरया यच त्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा । इत्यूचुन्ते परिप्यान क्षिते भारविमोक्षणम ॥२७ विसज्य पृथिवी देवी स देवा मनानम् । माधव तोपयामुभरावतरण प्रति ॥२८ निरूलास-पजन-हिरिम्व-वर-वल-जटामुर-

३२
[ वालिया पुराण
किर्भीर मनायुध- अलम्वुप---सोभाख्या-जरामन्ध-वानर द्विविद--
श्रुतायुध –महादैत्य शतायुध-प्य शृङ्ग सुत-सुवाहु-अति
वाहुक --कालकज्ज- हिरण्य पुरवासी दैत्य इन सबके पदो के क्षोभी
से मैं दिनो दिन विशीर्ण हो रही हूँ। हे सुरोत्तमो | मैं लोको का
वहन करने में असमर्थ हो रही है। आप इनका विहनन परिये ।
॥२२-२शा यदि सुर श्रेष्ठ मेरी रक्षा नहीं करेगे तो मैं परमाधिक
विशीर्ण होकर इस समय मे अवश होकर पाताल मे चली जाऊँगी।
। २६ । माकण्डेय महोप ने कहा-इसके अनन्तर ब्रह्मा-भगवान् विष्णु
और महेश्वर ने उसके वचन का श्रवण करके उन्होने यह कहा था कि
पृथ्वी के भार का विमोचन हम करेगे । २७ । पृथ्वी देवी को विदा
करके सभी देवगण सनातन माधव को भूमि के भार के उतारन में
विपय मे प्रसन्न करने लगे थ ॥ २८ ।।
स तु तुष्ट सुरान् सर्वान् स्वाशैरवरन्तु वै ।
क्षिती भारावतारायेत्युक्त्वा स्वयमिह प्रभु ॥२६
अवतीर्णोऽथ देवक्या गर्भे भारावतारण ।
विष्णु चावतरिष्यन्त ज्ञात्वा देवा सनातनम् ॥३०
रम्भातिलोत्तमाद्याश्च देव्यो रूपगुणान्विता ।
क्षिता उत्पादयामासु सहस्राणि तु पोडश ॥३१
ता सर्वां हिमवत्पृष्ठे कीडमाना वरस्त्रिय ।
अपश्यन्नरको भौमस्त्रा जहार तदा हठात् ।।३२
ते ता पिता देव्यो नीता प्राग्ज्योतिप प्रति ।
नरक प्रार्थयामासु समय मैथुन प्रति ॥३३
नारदो यावदायाति नगर प्रति भौम ते ।
अस्माक कुरु रक्षा च तावन्नो मुच मैथुने ॥३४
स समेप्यति वीर त्वा न चिरानो ह्यनुग्रहात् ।
तेन दृष्टा वय साधण्याम सगम त्वया ॥३५

नरवरमुर उपास्यान । वे परम प्रसन्न होकर समस्त सुगे में उन्होंने कहा था कि व सब भूमि में उमड़े भार को उबारने के लिये अपने-अपने शो में अवत रित होगे-इतना कहकर प्रभु स्त्रय भी यहां पर भार के अवतारण में देवकी के गर्भ में अवतीर्ण हुए थे। देवो ने स्वयं भगवान् विष्णु को अवतीर्ण होते हुए जान कर जो पि सनातन है। उन देवगमो ने रम्भा और तिलोत्तमा नादि देवियों को जो पलायच्य और गुणो मे समन्वित थी उन मोलह यहवा को उत्पादित कर दिया था ॥२६॥३०॥३१॥ वे गय परम श्रेष्ठ नारियाँ हिमालय के पृष्ठ भाग पर क्रीडा करने वाली थी। उनको भूमि के पुत्र नरक ने देखा था और उनको हठ में अर्यात चल पूर्वक उसने हरण कर लिया था। उम नरप ने उन मवको पपिन किया था और अपने प्राग्ज्योतिप नगर म उन मयको ले आया था। नरक ने मैमून के प्रति समय उम उन से प्रार्थना की थी। उन्होंने कहा हे भीम ! जब तक देवपि नारद तेरे नयर की ओर आते हैं तब तक आप हमारी रक्षा करे और मैसुन रे प्रति हमरो छोड दवें । ३२ । ३३ । १३४। वे शीघ्र ही हमारे प्रनि अनुग्रह करते है वीर ! आपके समीप में आय में। उनके द्वारा देखी गयी हम सर तुम्हारे माय सङ्गम करने के लिये आजायगी ॥३॥ इति सम्प्राथितस्ताभिर्नरको भूमिनन्दन. । ब्रह्मवाक्य तदा स्मृत्वा एवमस्तूचिवान् मुहु ॥३६ एतस्मिन्नन्तरे देवो भगवान् लोकभावन । देवक्या जठराग्जातो वृद्धो नन्दगृहेऽभवत् ।।३७ कसकेशिमलवादीन् हत्या दैत्याननेफश. । अकरोद द्वारकावास सागरे सलिलान्तरे ॥३८ तयाटी कन्यकास्तेन स्वयण च स्वीकृता । कालिन्दी मानुपोहपा रुक्मिणी रमणी तत. ॥३६ नग्नजित्तनया सत्या लक्ष्मणा चारहामिनी।

वारिका पुगत सुशीला शीलगम्पाना तथा जाम्बवती सीट एतामुखीषु च तना घारपाम्य नग्य व । पटविशद्वत्सरा जाI वनदयसहायिन ॥११ प्रद्युम्नसाम्रप्रमुखा पुत्रारतम्य महावना । जातास्तत्र द्विजश्रष्ठा शास्त्र शस्त्रे याविदा ॥४२ उनव द्वारा इस प्रयार ग प्राथना किया गया उस भूमि य पुत्र नरक न उस अवसर पर ब्रह्माजी के वाक्य पा स्मरण पर मा ही होवे -यह उमा कहा था । ३६ । इमी योच म लोमा की रक्षा परन वाने देव भगवान देवको वे गम से समुत्र न हुये थ । और नद व घर मे पालित होकर बडे हुए थे । २७। उन प्रभु ने गश पशी और प्रलम्ब आदि अनेक दैत्या यो मार पर जन अरमागर म वसी हुई द्वारसा पुरी म अपना निवाम दिया था । ३८ । यहा पर उहान अपने धम से आठ क्याओ को स्वीकार किया था। उनम मानवी के रूप वाली करिदी थी-रमणी-नग्नजित् की पुत्री-सत्या-चार हास वाली लक्ष्मण-परम सुशीन और शीन से सम्पन सती जाम्बवती णी । ३६ । ४० । वलदेव की सहायता बारे उगको इन मारिया में अनुगग करने वाले उनको छत्तीस वप व्यतीत होगय थ । ४१। हे द्विज थ छो । उसके महान वल वाले इस प्रकार से प्रद्युम्न--साम्ब जिनम प्रमुख थे ऐसे पुत्र समुत्प न हुये थे जो शास्त्र म और शस्त्र विद्या म परम पणित थे ॥ ४२ ॥ अनेके निहता दैत्या भारभूतास्तदा क्षिते । प्रहृष्ट बीडमानश्च द्वारकायामुवासस ॥४३ अथ शस्तदायातो नरकेणादितो भृशम् । द्वारका प्रति कृष्णस्य दशनाय गण सह ॥४४ तत्र गत्वा परिष्वज्य कृष्ण लोकनमस्कृतम् । पूजितस्तेन वहुश आसने काचने स्थित ॥४५ म नरकासुर उपारयान कथयामास हरये नरकस्य विचेष्टितम् । शको यथा पूर्ववृत्त यथा वा वर्ततेऽधुना ।।४६ शृण कृष्ण महावाहो यदर्थमहमागत । कथयिष्यामि तत् सवं तमशका न सकुरु ॥४७ भूमिपुत्रोऽसुरो नाम्ना नरक. सुरमर्दन । चिरजीवी पुरा विष्णुक्षितिभ्या परिपालितः ।।४८ अधुना स शिति विष्णुमवज्ञाय दुरासद. । वाणस्य वचनाद् भौमो ब्रह्माण पर्यतोपयत् ।।४६ उस समय में जो भूमि के भार स्वरूप थे ऐसे अनेक दैत्यो को निहत कर दिया था। फिर परम प्रसन्न होकर क्रीडा करते हुए उन्होंने दारका में निवास किया था । ४३ । इसके अनन्तर इन्द्रदेव अपने गणो के सहित नरक के द्वारा अत्यन्त उत्पीडित होकर वहाँ पर समागत हुआ और द्वारका में भगवान के दर्शन के लिये ही उपस्थित हुआ था ।४।। यहाँ पर गमन करके लोरों के द्वारा वन्दित प्रभु कृष्ण का परिप्वजन करके उनके द्वारा पूजित होते हुए वह सुवर्ण के आसन पर विराजमान हो गया था ॥ ४५ ॥ वहाँ पर उस इन्द्रदेव ने भगवान हरि के लिये नर का जो विचेष्टित था वह सर कह दिया था। जो पूर्व में हुमा था और इस समय म हो रहा है वह गमी इन्द्र ने निवेदन पर दिया था । ४६ । इन्द्र ने कहा-हे महावाहो । हे श्रीकृष्ण ! जिस प्रयोजन के लिये मैं यहाँ आया हूँ उसका आप श्रवण कीजिए। मैं वह सभी कुछ निवेदन रांगा । इसमे आप कुछ भी शङ्का न करिए । ४७। एक भूमि वा पुत्र नरव नाम वाला अमुर है जो मुरो या मर्दन करने वाला है। वह चिरजीवी है और पहिले भगवान् विष्णु और क्षिति के द्वारा पालित हुआ है 1 ४८। इस समय म वह दुरामद वह क्षिति और भगवान् विष्णु पी अवमा करवे वाण ये वचन से उगने तप के द्वारा ब्रह्माजी को परि- तुष्ट कर लिया है। ४६।

[ वालिदा पुराण
ब्रह्मत स वरान् लब्ध्वाह्यतीवाभून प्रदर्पित.।
माधव पृथिवी वापि सस्मार न कदाचन ॥५०
पूर्वमासीत् स धर्मात्मा ह्याराधितसुरो व्रती।
अधुना बाधते सर्वानासुर भावमाश्रितः ॥५१
अदिते कुण्डले मोहाजहारामृतसम्भवे ।
देवानृपीन् वाधमानो विप्राणामप्रिये रत. ॥५२
मा चापि वाधते नित्य कामगामी दुरासद ।
जेता तु सुरदैत्यानामवध्य सर्वदेहिनाम् ॥५३
तव चाप्यन्तरप्रेक्षी त पाप जहि भूतये ।
त्वदर्थ सर्वदेवर्या देवगन्धर्वकन्यका ॥५४
पुरा पर्वतमुख्ये तु हिमवत्यवतारिता ।
चतुर्दश सहस्राणि सहस्र द्वे शताधिके ।।५५
ता सर्वा कल्यका पाप. प्रमह्य वरदर्पित ।
जहार स दुराधर्षो हयग्रोवसहायवान ॥५६
ब्रह्माजी मे वरदानो को प्राप्त करके वह अश्यन्त ही
घमण्डी हो गया है। वह इस समय में एसा दपित हो गया हैं कि न तो
उसने माधव का और न पृथ्वी का कमी भी स्मरण किया है । ५० ।
पूर्व में वह धर्मात्मा था सुरो की आराधना की थी और वह व्रतधारी
था किन्तु इस समय मे वह आसुर भाव का आश्रय वाला होकर सबको
चाधा दिया करता है ।५१) अदिति के अमृत से समुद्भूत दोनो कुण्डलो
या मोह से उसने हरण कर लिया था और देवगणो को और ऋपियो
को वाधा देना हा वो के प्रिय कर्म मे वह रस रहता है । ५२ ।
कामगामी दुरासद वह मुझको भी नित्य वाधा देता है । वह सुरो का
और दैत्यो या जीतन वाला है नया समत देधारियो से बध करने के
अयोग्य है अर्थात कोई भी देहधारी उसका वध करने में समर्थ नहीं
है । ५३ । आपका भी वह अन्तर प्रेक्षी है । उग पापी को भुति के लिए

नरकासुर उपाय्यान } चध कीजिए। मव देवगणो न आपके लिये दवो और गन्धर्षों को कन्य- पाएं पहिल मुम्य पवन पर हिमालय म अवतारित की थी। वे सोलह सहस्र हैं । वरदान के घमण्ड मे भरे हुए पपी उनन वे मभी कन्याएँ चलपूर्वक हरण करली हैं। वह दुगधप हैं और हरग्रीव की महायना वाला है॥ ५४-५६॥ सागरे यानि रत्नानि पृथिम्या च त्रिविष्टपे । नानि सर्वाणि सहत्य प्रमथ्य सुरमानुपान् ॥५७ सीरे लौहित्यतीर्थस्य सोऽकरोन्मणिपवतम् । नम्मिन गिरी पुरी रम्या कारयित्वाऽलकाह्वयाम् ।।५८ ता सर्वा वासयामास देवगन्धर्वयोपित । एक्वेणीधर मर्वा मम्मागपरिवजिता ॥५६ स्वामेव ता ताक्षन्त सनाथा कुरु कृष्ण ता । यावदागच्छनि पुर भवतो नारदो मुनि ॥६० तावन्न मैथुन य न भौम व सकरिप्यसि । इति ता सनय चा नरम्य दुरात्मन ॥६१ नारदश्च तदायात प्राग्ज्यातिपपुर प्रति । यदा त्व नरक हन्तु गन्ता तत्पुरमुत्तमम् ॥६२ तन्मात् त्व पापकर्माण नरक नरकोपमम् । जहि देवमनुष्याणा कण्टक त दुरासदम् ॥६३ सामर म जो भी रत्न हैं-पृथिवी और स्वग म जा हैं उन सवको महत पर और सुरा तथा मनुष्या का प्रथा करके उमन लोहित्य तीय के तट पर मणि पवत बताया है। उस पवत म अलका नाम वाली रम्य पुरी की रवग बरावर देवा और गधों की नारियो का वहां पर ही उमने वमा दिया है। वे मन एक वेणी की धारण करने वाली हैं और सम्भोग से बजित हैं ।। ५७-५६॥ वे मव यापकी ही प्रतीक्षा कर रही हैं। हे मम | आप उन सपको सनाथ

[मारिका पुरण
करिए । जब तक आपदै पुर में नारद मुनि आगमन करे ह भौम | तव
तक उनके माथ मैंयन करने का तुम प्रयत्न ही करोगे। यही उ हाने
दुरात्मा नरम के साथ समय दिया था। जिस समय में नारद मुनि उस
प्राग्ज्योतिष
पुर के प्रति आयात होवे उसी समय में आप उसकै उत्तम
पुर मे नरक के हनन करने के लिये गमन करेगे ॥१०-६२ ।। इस
कारण से उस पाप कम करने वाले नरक के ही सदृश नरव को मार
दीजिए क्योकि वह बहुत दुरासद है और देवों तथा मनुष्यों का वण्रका
वधात् तस्य क्षिति दवी पुत्रशाक न चाप्स्यति ।
स्वयमेव वध तस्य देवेभ्यो यदयाचत ॥६४
तस्मान त जहिं पापिष्ठ नरक पापपूरुपम् ।
स्त्रीरत्नान्यपि रत्नानि त निहत्य समुद्धर ॥६५
इत्युक्तो जगता नाथ शक्रण सुमहात्मना ।
प्रतिजज्ञे क्षितिसुत ह तु प्रति तदैव हि ॥६६
पतिज्ञाय वध तस्य शाण सह के शव ।
तदैव यानामकरोत् प्राग्ज्योनिपपुर प्रति ।।६७
आरुह्य गरुड कृष्ण सत्यभामाद्वितीयक ।
प्राग्ज्योतिपमुखोऽगच्छद्वामवस्त्रिदिव ययौ ॥६८
दिवमाक्रम्य गच्छन्तौ कृष्णशको महाद्युती।
यादवा ददृशुस्तत्र सूर्याचन्द्रमसौ यथा ॥६६
सस्तूयमानो गन्धर्वैर्देवरप्सरसा गण ।
कृष्ण शा क्षणादेव गतौ से तावदृश्यताम् ।।७०
उमके वध कर देने से देवो पृथिवीं पुष शोक को नहीं प्राप्त
होगी क्योंदि उमन स्वय ही उसके वध करने के लिये देवताओं से प्राथना
की थी। ६४ । इस कारण म उस महान पापी पाप पुरष नरक का
वध करिय। उसका हनन करके स्त्री रमो को तथा अय रानी

नरकासुर उपास्यान ] उद्धार कीजिये अर्थात् इन सवको वहाँ से ले आइये । ६५ । महान् यात्मिा वाले इन्द्र के द्वारा इस प्रकार मे जगतो के नाथ से कहा गया तो उन्हान पृथ्वी के पुत्र नरक के हनन करने के लिये प्रतिज्ञा की थी और उमी समय में मार देने का वचन दिया था ! ६६१ इन्द्र के साथ भा- चान् केशव उसके वध करने की प्रतिज्ञा करके उन्होंने उसी समय म प्राग्ज्योतिप पुर की ओर यात्रा करदी थी । ६७ । भगवान कृष्ण ने गरुड पर ममारोहण किया था और उनके साथ दूमरी मत्यभामा भी थी वे प्राग्ज्योतिष की ओर मुख कर चले गये थ और इन्द्रदेव स्वर्ग म गमन कर गय थे । ६८ । दिवलोर का आक्रमण करने गमन करत हुये इन्द्र और श्री कृष्ण को जो महती युति मे सम्पन्न थे यादवी ने वहाँ पर सूर्य और चन्द्र के समान ही इन दोनो को देखा था । ६६: वे दोतो गन्धर्व-देव और अप्सराआ के गणो के द्वारा मस्तवन किये हुये थे। श्री कृष्म और इन्द्र क्षण भर म ही आम म अरश्य हो गय थे ॥७॥ तत क्षणेन गरडेनाससाद जगत्पति । पुर प्राग्ज्योतिप रम्य नरकेण वशीकृतम् ॥७१ स दुर्ग मौरवं पाशै पटाहस्र भयकर । क्षुरान्तर्वेष्टित पार्वे मृत्युपार्शरिवोच्छितम् ॥७२ निगच्छन्त पुरान् तस्मात् नारद च ददर्श स । स तु देवमुनि श्रीमान् यदागान्तरक प्रति |७३ तदा प्राग्ज्योतिप गत्वा सत्कृतस्तेन नारद । सगमे समय प्रोचे नरकाय स योपिताम् ।।७४ प्रवर्ततेऽद्य चैत्रस्य शुक्लपक्षस्य पचमी । नवन्या तु धरापुत्र प्राप्नोति महदापदम् १९७५ तदा यदि चतुदश्या सुस्नाता योपितस्त्विम । सुरतेपु त्वया तत्र प्रयाक्तच्या यथासुखम् ॥७६

। पालिया पुगण
नादरस्य वच श्रुत्वा नरको भयमोहित ।
आसार च प्रसार च नगरे सन्यवेदयत् ॥७७
फिर क्षण भर मे जगा के स्वामी गरड के द्वारा नरक से
वशीकृत परम रम्य प्राग्ज्योतिष पुर में प्राप्त हो गये थे अर्थात् वही पर
पहुँच गये थे । ७१ । वह दुग , सहस भयङ्कर मौरव पाशों से और
क्षुरान्तो से वेष्टित था और पावं मे मृत्यु पार्टी के ममान उच्छित था।
१७२। उन्होंने उम पुर से उमी ममय मे निकलते हुये नारद को देखा
था। वह देव मुनि श्रीमान जर नरम के प्रति गये थे । ७३ । उस
ममय म प्रागज्योतिष मे गमन करके वे नारद मुनि उसके द्वारा सत्कार
को प्राप्त हुये थे। उन्हाने नरक म यो गतो के माप सद्गम करने म
उस समय वह दिया । ७४ । आज चैत्र म स के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी
प्रवृत्त है। हे धरा पुन | नवमी तिथि मे तुम महात. आपदाओ को
प्राप्त करते हो । ७५ । उस समय मे चतुदशी में यदि ये योपिनें सुस्नात
हो उसी समय मे तुमको सुख पूर्वर सुरता में प्रयुक्त करनी चाहिय ।
१७६। देवर्षि नारदजी के इस वचन का श्रवण करवे नरक भय से
माहित हो गया था। उसने आसार और प्रसार नगर में निवेदित कर
दिया था ।।७७॥
रक्षिभी रक्षित राज्य रक्षित च समन्तत ।
भयहर्षयुतो भौम समय समक्षत ॥७८
तस्मिन्नवसरे प्राप कृष्ण प्राग्ज्योतिष पुरम् ।
प्रथम पश्चिम द्वारमासाद्य गरुडध्वज ७६
पाशाना पटसहस्राणि क्षुरान सञ्ज्यि नैधा।
जयान स मुरु दैत्य सानुग च सवान्धवम् ।।८०
पट्सहस्रा महावीरा दानवा द्वारि सस्थिता ।
हताश्च ण हरिणा तदेव गुरुणा सह ।।८१
मुर हत्वा सहमाणि पुत्रास्तस्यापराच पद ।

नरकासुर उपाग्यान ] ११ सुन नरक जघान चक्रेण तदा मुण्टशोऽन्याश्च दानवान् ।।२ ततोऽशिनासघानतिन्त्रम्य जनार्दन । संगण सानुग चैव निमुन्द समपोययन् ।।८३ एको यो योधयेदेवान महस पत्मरान, पुरा । शक च ममतिकम्य महावीरपरानम ॥८४ भौम (नरक) ने गक्षसी में सुरक्षिन नवार को ममी और मे राज्य को रक्षित कर दिया था। और भय नथा पं में ने ममय की प्रतीक्षा पी थी। उम अवगर म भगवान श्री कृष्ण प्राग्ज्योतिप नगर में पास हा यय थे। प्रथम गाद ध्वज भगवान पत्रिम द्वार पर प्राप्त हय ।। महन पामो व भुरी का जनक प्रकार म भनी भो त छदन कर उन्होंने गणों क माप गौर वान्धवो के मति मुर दैत्य का हनन कर दिया था । ८० । छ नहस महान, वीर दानव द्वार पर मस्थित थे भगवान हरि न उमो समय म मुर के माय ही चक्र मे निहत कर दिये थे । ८१ । मुन को मार कर दूमर जो पुत्र थे उस ममा उनको चक्र से मार गिराया था और अन्य दानदो को भी खण्ड मुण्ड कर दिया था ॥२॥ इमवे उपराल वहाँ पर अने जो शिलाआ के मघ थे उन मद का अतिक्रमण करके भगवान् जनार्दन ने गणों के महिट और अनुचरो स मयुत निमुन्द का मार गिराया था ८३। जिमने हो न पहिले सहन वर्ष तक देवा में युद्ध किया था और महान् पगम वाला वीर था उसने दन्द्र पर आर- मग क्यिा था || ८४॥ त जघान ह्यग्रीव ममतिकम्य पेशव । मध्ये लोहित्यसज्ञस्य भगवान देवकीसुत ॥८५ औदवाया विरूपाक्ष सुन्द हवा महावल । तन परजन वीर जघान परमेश्वर ॥९६ एनान, हत्वा महाकायान, महावीर्यान, दुरामदान । मर उसके

[ वाणिवा पुगण
आममाद जगन्नाथ पुर प्राग्ज्योतिपास्वयम् ।।६७
वियौवतं सर्वनारदेन महात्मना ।
जयशब्दै स्तूयमान प्रविवेश ययेश्वरः ॥८८
श्रिया युक्ता दीप्यमाना प्रकाशाट्टालभूषिताम् ।
म मेने नगरी विणुि विमिन्द्रस्थामरावती ||
तव युद्र महद्भत नानाप्रहरणोद्यनम् ।
भीम्णा पासजनन शूराणा हर्षवर्धनम् ।
यथा देवासर युद्र तथैव समपद्यत ।।६०
तत शाङ्गविनिमुन णिस्तान, दानवान बहून ।
निजघान महावाहुरडस्थो जनार्दन ॥६१
अष्टौ शतसहसाणि अप्टो शतशतानि च ।
हत्वासुरान महावाहुर्नरक त समासदन ॥६२
भगवान केशव ने आक्रमण क रपे उस हयग्रीव का हनन किया
था। महान वल्वान भगवान देवकी के पुत्र ने मध्य मे लौहित्य नामक
की औदका मे विरूपाक्ष और सुन्द का हनन किया था। इसके अनन्तर
फिर परमेश्वर ने वीर पञ्चजन को मारा था ॥८५-८६॥ इन महान्
शरीरो वाले तथा महान् वीर्य वाले दुरासदो का वध करके फिर जगत्
के नाथ प्राग्ज्योतिष मे प्राप्त हो गये थे ॥७॥ आकाश में स्थिन
देवो के द्वारा तथा महात्मा नारद के द्वारा जय-जयकार की ध्वनि से
मस्तवन किये गये ईश्वर ने प्रवेश किया था ।। ८८॥ उन भगवान्
विष्णु ने श्री से समन्वित–देदीप्यमान-प्रकाश अट्टालिकाओ से
विभूपित उस नगरी को ऐसा ही समझा था दि क्या यह इन्द्र को
अमरावती है ॥८६॥ वहाँ पर महान युद्ध हुआ था जिमम अनेक
पगार के शस्त्रास्त्र थे। वह युद्ध ऐसा भयङ्कर हुआ था जो डरपोको
को भय देने वाला था और शरो के हर्ष को बढ़ाने वाला था। जैसा
वि देवामुर युद्ध हुआ था ठीक उमी प्रकार का यह युद्ध भी हुआ था

नरवामुर उपान्यान ]
॥६०॥ फिर गरुड पर विराजमान महान् बाहुनी वाले जनार्दन प्रभु
ने अपने शाङ्ग नामक धनुप मे छोग वाणों के द्वारा उन बहुत-से
दानवो का हनन कर दिया था। ६१ । महान वाहुओ मे समन्वित प्रभु
आठ सौ सहल और आठमो अमुरो को मारवर नरक के समीप में पहुँच
गये थे। ३२।
तत श्रुत्वा स नरक पतितानमुरान् वहून् ।
हट्वा कृष्ण महावाहु गरुडस्य महावलम् ॥६३
वसिष्ठशाप सस्मार समय माधवस्य च ।
नारदम्य वचश्चापि वरच्छिद्र नया विधे ॥६४
स प्राप्तकालश्च तदा केशवेन ममागत.।
युद्धमेव पर मेने स्सग्न् वाणवचस्तदा ॥६५
सवाचन समारुह्य रय वज्रध्वज वरम् ।
लोहच काप्टसयुक्तं निनन्वमित रथम् ॥६६
युक्तमश्वयहस्रम्तु वज्रध्वजविराजितम् ।
नानाप्रहरणोपेत वहुतूणीरसयुतम् ।
अगच्छन् समारायाशु नरक पृथिवीमुत. ॥६७
स गच्छन् समारायाशु मानुपं भावचितम् ।
निन्द्य तथासुर मेने स्मरन् पूर्ववचो हरे ॥६८
दमके अनन्नर उस नरक ने बहुत से असुरो को मृत हुए मुनकर
गरुड पर स्थित महा बलवान् महावाहु भगवान् कृष्ण का दर्शन किया
पा। ६३ । उमने वसिष्ठ मुनि के शाप का तथा माधव के समय का
स्मरण किया था। उसने देवपि नारद जी के वचन और विधाता के
वर वे छेदन का भी स्मरण दिया था । १४। उस ममय मे काल के
प्राप्त हो जाने वाले ने भगवान के मामने समागमन किया था। उस
समय मे वागवे वचन का स्मरण करते हुए उसने युद्ध करना हो
परम क्त्तव्य मान लिया था ॥३५॥ वह सुवर्ण के रथ पर समाद

HEE
| कालिमा पुष
हुआ धा जा वर की ध्वजा यासा और था। वह रथ मोहे में
आठ चक्रो ( पहियो ) में युत्त था तथा निनाव प्रमित था। उग ग्य
एक हजार अश्व थे और वज़ पी जागे गुशोभिा या उग रप में
अनेक प्रकार ये शस्त्रास्त्र विद्यमान धे नया वन नगैर भी रवगे हुए
थे
। ऐसे रय में बैठार पृथिवी का पुत्र नगर गमरमर पे निजी
हा चला गया था ।।६६-६७। वह जर युद्ध के लिये जा रहा था तो
उमने शीन गे म नुर भाव तो चिर किया था और हरिवं पूर्व वचन
पा स्मरण करते हुए उसने अमुर भाय को मिला अर्थात् युरा मान
लिया था l
क्षणात् कृष्ण रा ददशं गरुडोपरि सस्थितम् ।
शखचक्र गदाशाङ्गवरामिधरमच्युतम
किरीटवुण्डलयुत श्रीवत्सवक्षस हरिम् ।
कौस्तुभोद्भामितोरस्य पीताम्बरधर परम् ।।१००
स तेन युयुधे वीरो विष्णुना प्रभविष्णुना ।
प्राग्ज्योतिषाधिपो भौमो नरक पृथिवीसुत ॥१०१
स युध्यत् कृष्णनिकटे कालिका कालिकोपमाम् ।
रक्तास्यनयना दीर्घा खड्गशक्तिधरा तदा ॥१०२
अपश्यज्जगता धात्री कामाख्यामपि मोहिनीम् ।।१०३
स विस्मितस्तदा भीतस्ता दृष्ट्वा जगता प्रसूम् ।
योद्धव्यमित्येव तदा युयुधे नरकोऽसुर ॥१०४
तेन सार्ध तदा कृष्ण कृत्वा सुमहदद्भुतम् ।
युद्ध यादृक् पुरा भूत न देवे न च मानुपे ।।१०५
क्षण भर में ही उसने भगवान कृष्ण का गरुड पर विराजमान
का दर्शन प्राम किया था। भगवान कृष्ण शख-चक्र-गदा-
शाई घनुप--वर और असि (खङ्ग) को धारण किये हुये थे । अच्युत
थे । ६६ वे विगेट और कुण्डलो को धारण करने वाले थे और उन
२ वक्ष स्थल में श्री वत्स का चिह्न था। कौस्तुभ मणि मे समुद्भासित

नरकासुर उपास्यान ] ४५ वक्ष स्थल में युत-पीताम्बर धार्ग परम हरि का उमने दर्शन किया था । १०० । उन प्रमा विष्णु भगवान् विष्णु के माय उस वीर ने युद्ध किया था। वह प्राग्ज्योनिय नगर का स्वामी पृथिवी का पत्र भौम नर था। उसने श्रीकृष्ण के निकट में युद्ध करने हवे बालिका के समान कालिका को देखा था जिसके नाल नेत्र और मुख या-विजाल काय यो-~-वर उम समय में खङ्ग और शक्ति को धारण किये हुए थी। 1१०१।१०२। उसने धात्री और मोहिनी कामाया का भी वहाँ दर्शन किया था । १०३। उस समय म जगत् को प्रसूत करने वाली उस देवी का दर्शन करके वह भय ने भीत होकर बट्टा ही दिन्मिन हो गया था । युद्ध तो करना ही है अतएव उस समर मे नरखा मुर ने युद्ध क्यिा या 1 १०१। उम अवमर पर भगवान कृष्ण ने उस माय मुमहान वझून युद्ध किया था। जमा युद्ध पहिल देदों में और मनुप्यो में कभी भी नहीं हुआ था ।। १०५॥ ततस्तेनाय नौमेन युद्धलि म मावय. । चिर कृत्वा जघानाय देवेन्द्र प्रतिहर्पयन् ॥१०६ सुदर्शनेन चक्रेण मध्यदेशे तदा हरि । द्विधा चिच्छेद नरकं खप्टिनोऽभ्यपतद् भुवि ॥१०७ विभक्ततच्छरोरं तु भूमो निपतितं तदा। विराजन्ते वभिन्नो यथा गरिकपर्वत. ॥१०८ पति ते तनये देवी पृथ्वी दृष्ट्वा शरीरकम् । शोकवेगं तदा सेहे ज्ञात्वा काल तदागतम् ॥१०॥ अदिते. कुण्डलयुग स्वयमादाय काश्यपी। उपातिष्ठत गोविन्दं वचन चेदमब्रवीत् ॥११० त्वया वराह-पेण यदाहं चोद्धृता दुरा। तदा त्वद्गान्नसंस्पर्शान् पुत्रो मे नरक. स्थितः । सोऽय त्वया पालित पातिताधुना सुत.॥१११ [ पालिया पुराण गृहाण कुण्डले चेमे अदिते मर्यकामदे । सन्तति चास्य गोविन्द प्रतिपाय नित्यदा ॥११२ इसके अनन्तर म भौम के साथ भगवान माधव ने युद्ध की क्रीडा को चिरकाल पयस्त करपे इसके उपरान्त देवेन्द्र को हर्पित करते हुए प्रभु ने उसका हनन कर दिया था । १०६ । उस समय में भगवान् हरि ने अपने सुदर्शन चक्र के द्वारा मध्य देश में दो भागो म छेद पर मार गिराया था। वह नरक पण्ड-खण्ड होकर भूमि पर गिर गया था। वह खण्ड ऐसे शोभित हो रहे थे जैसे वज़ मे भिन्न हुआ गरिय पर्वत होवे । १०८। तनय के गिर जाने पर देवी पृथिवी न उसो पतित शरीर का अवलोकन करके उस समय मे शोक क ग को सहन कर लिया था क्योकि उसने ममागत काल का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। । १०६। कापी अर्थात् पृथ्वी अदिति के दोनो कुण्डलो को लेकर स्वय उपस्थित हुई थी और भगवान गोविन्द से यह वचन कहा था- १११०। पृथिवी ने कहा-आपने वराह के रूप से पहिले मेरा उद्धार किया था। उसी समय में आपके गान के स्पर्श से यह नरक मेरा पुत्र गर्भ मे स्थित हुआ था। वह आपके ही द्वारा प्रतिपालित हुआ था और अब वह सुत आपने ही मार गिराया है । ११८। अब आप अदिति के इन दोनो कुण्डलो को ग्रहण कीजिए जो कि सब कामनाओ के प्रदान करने वाले है और अब आप इसकी सन्तति का हे गोविन्द । नित्य ही प्रतिपालन कीजिए । ११२। भारावतरण देवि नरकस्य वध पुरा । त्वयैव प्राथितो यस्मात् तेनासौ निहतो मया 11११३ पालयिप्येऽस्य सन्तान देवि त्वद्वचनादहम् । प्राग्ज्योतिपेऽभिपेक्ष्यामि नप्तार भगदत्तकम् ॥११४ एवमुक्त्वा महावाहुर्भगवान् मधुसूदन । अन्त पुर विवेशाथ नरकस्य धनालयम् ।।११५ नरकामुर उपाग्यान ] स तत्र ददृशे वीरो रत्नानि विविधानि च। राशीभूतानि शुद्धानि पर्वतानिव राजन ।।११६ मुक्तामणिप्रवालाना वैदूर्यस्य च पर्वतम् । तथा रजतकूटानि वज्रकूटानि माधव ।।११७ सुवर्णसचयान रुक्मदडान, रलमयध्वजान् । वाहनानि विचित्राणि यानानि शयनानि च ॥११८ खचितानि स्वर्णरत्नमहार्हाणि महान्ति च । यद् यद् दृष्ट च यावच्च धन रल मणिस्तथा ॥११॥ श्री भगवान न कहा-हे देवि । पहिले मार के अवतरण करने के लिये बापन ही नरक के वध की प्रायना की यो। इमीलिय मैंने इसका वध किया है ॥११३॥ हे देवि । आपके वचन में मैं इसकी सन्तान का प्रतिपालन वहंगा इसके नाती भगदत्तक का मैं प्राग्ज्योतिप म अभिषेक कर दूंगा ॥११४|| इस तरह से वहकर महावाह भगवान मधुसूदन प्रभु नै अन्त पुर में प्रवेश किया था जा कि नरक धन का मालय था ।।११।। वहाँ पर उन वीर ने अनेक प्रकार के रत्न देखें थे। वे सब शुद्ध रत्न समुदाय म एकत्रित हो रहे थे जमे कोई पवत शोभायमान होवे । ११६ । वहाँ पर मुक्तामणि और प्रधाला का तथा वैदुर्य मणिका एक पर्वत-सा ही लग रहा था तथा रत्नकूट और वन कूट भी माधव प्रभु ने देखे थे । ११७ ! सुवग के सञ्चित ढेरो को- स्वमदण्डो को और रत्ना से परिपूर्ण ध्वजा--विचित्र वाहना को-याना को और शयनो का देखा था ।११। ये सभी स्वर्ण और रत्नो स सचित थे-य महान मूल्य वाले और बहुत बड़े थे । जो-जो भी देखा और निनना घनरल और मणिया थी उस प्रकार की और उतनी नरक आलय के अतिरिक्त अन्य स्थान में कही भी नहीं देखें गये थे ॥११६॥ भुति हाक चनो दुधमन्या नरकालगाद ।

४६
[ वालिका पुराण
न कुवेरस्य नेन्द्रस्य न यमस्याप्यपा पतेः ॥१२०
तावन्ति थनरत्नान यावन्ति नरकालवे ।
केशवोऽप्यथ तत्रैव नारदेन च सङ्गत ॥१२१
अवेक्ष्यान्त पुरधन सार सातर तत ।
तेषां समाददे ग्राह्य प्रभूत परवीरहा ॥१२२
या दत्ता वंष्णवीशक्तिविष्णुना प्रभविष्णना।
हत्वा भौम तु ता शक्ति जगृहे देवकीसुत ॥१२३
पृथिव्या नारदेनैव सहित. केशवस्तदा ।
भगदत्त भौमसुत प्राग्ज्योतिपपुरोतमे ॥१२४
अभिपिच्य तदा भूत पुरमध्ये न्यवेशयत् ।
अभिषिक्त तु त दृष्ट वा भगदत्त तदा क्षिति ॥१२५
नप्तुरर्थेऽथ ता शक्ति केशव समयाचत ।
वे शवोऽपि क्षितेर्वाक्यान्नारदानुमतेन च ।
ता शक्यि भगदताय सुप्रीतमनसा ददौ ॥१२६
जितना धन और जितने रत्न नरक के आलय में थे वैसे और
उतने घुवेर-इन्द्र-यम और वरुण के यहाँ पर भी नहीं थे। भगवान
केशव वहाँ पर ही देवपि नारद के साथ सङ्गत हुये थे । उस अन्त. पुर
के धन वा अवेक्षण करके जो मार तथा सारतरथा पर वीरो के हनन
परने वाले ने ग्रहण करने के योग्य बहुत उनमे से ले लिया था । १२० ।
। १२१ । १२२ । प्रभु विष्णु भगवान विष्णु ने जो वैष्गवी शक्ति दी थी
उगको भौम पा हनन परके दववी सुन ने शक्ति को वापिस ग्रहण कर
लिया था। १२३ । पृथिवी देवी न देवर्षि नारद के महित उस अवसर
पर भगवान् से शव ने भगदत्त भौम फे सुन को प्राग्ज्योतिष उत्तम पुर
मे अभिषिक्त पणे उस पुर के मध्य में निवेशित कर दिया था। क्षिति
ने उग भगदान अभिपिकर frया हुआ देवार अपने नसा ( नाती)
के लिये भगवान शय गे उगी शक्ति पी पाचमा की थी।

नरवानर उपाप्यान ] भगवान् केशव ने भी नारदजी की अनुमति प्राप्त करके क्षिनि के कहने मे मुप्रसन्न मन मे उम गवित का भगदत्त के लिय २ दिया था ।।१२४-१२६॥ यच्छत्र वरुण जित्वा काचनस विराज्ञकम् । ममानयत् पुरा भोमस्तच्छा हरिराददे ।।१२७ अष्टभारसुवर्णाति यत्सम वति चान्वहम् । यत् क्रोशमानविस्तीर्णमधयोजनमुच्छ्रितम् ॥१२८ रत्नोत्तमानि सर्वाणि चतुर्दन्तास्तथा गजान् । चतुर्दशसहस,णि पूजिता प्रमदास्तथा ।।१२६ द्वारका प्रति दत्यौधर्वाहयामास केशव ॥१३० या देवकन्यका पूर्व नरकेण हृता वलात् । तासा कृत्वा हृषीकशो वेणीवन्धविमोक्षणम् ।।१३१ वामोभिभूषणदिव्यस्ता मत्तत्य मुहुर्मुह । आरोप्य च विमाने तु रक्षिभिनलिभिई ढ ॥१३२ नारदाधिष्ठिता मवा द्वारका प्रत्यवायत् । य कृत सुरक्न्यार्थे मामन मणिपयत ॥१३३ जिम छत्र वा वरण का पराजित करक भाम पाहल स आया पाजा वि काजन का लक्षण करन वाल नाम म सयुत था उस छय को भगवान हरि न ल लिया था ॥१२॥ जो आठ भार सुवण का प्रतिदिन सत्रवित किया करता था जो एक वास तक विस्तीर्ण और आधे योजन तक चा था ।। १२८॥ क्शव भगवान् ने समस्त उत्तम रत्ना का तथा चार दांता वाल गजा का-चादह हजार पूजिन प्रम- दाया का दैत्या क ममुदायो के द्वारा द्वारवा के प्रान भेज दिया था। ॥१२६-१३० ।। पूर्व म जा दव कन्याऐ नरक व द्वारा लायी गयी थी और बलपूर्वक उनका हरण किया गया था उन लिये हुपीकेश भगवान न वणोवन्ध विमोक्षण किया था। उनको अनव वस्त्र और

{ बालिका पुराण
दिध भूपगा ने मस्कृत किया था। उनको विमान में विटाकर सुदृढ
और वली रसको से रक्षित करके वे सब नारद मुनि से अधिहित होती
हुई दारवा वी बार भेजदी गयी थी। जो सुर कन्याओ के लिए भूमि
मुत न मणियों का पर्वन बनाया या ॥१३१-१३३॥
मणिरत्नौयसम्पूर्णी दिवाकरसमप्रभः।
उत्पाटय त जगन्न यस्ताक्षपृष्ठे न्यधापयत् ॥१३४
तथैव वारण छत्र गरुडोपरि माधवः ।
आरोप्य मत्यया साधंमासोन सुमना हरि ॥१३५
भगदत्त समाभाप्य पृथिवी च जगत्पति ।
प्रतम्ये द्वारका वागे वियन्मार्गेण व द्रुतम ।।१३६
मुपण काचनमाविच्छत्र ममणिपर्वतम् ।
देशव मत्यया माधं हेलया से वहन ययौ ।।१३७
क्षणेन द्वारका प्राप्य ये शव परवीरहा ।
मुद च लेभे सरलान्धर्वश्च तथा गण ।।१३८
वपन लिया और में परिपर्ण था और सर्म

नरकापुर साम्यात ]
५१
एवं काली महामाया कालिकाया जगन्मयो ।
विष्णु च जगता नाथ पगपर्गन हरिम् ।।१३६
जगत्कारणकार ज्ञानगम्य जगन्मयम् ।
सन्मोहयत्येव तथा मनुरागविरागवान् ।।११०
अनुगृह्णाति मित्राणि ह्यमिताण निहन्ति च ।
नारापु मूटा रमत द्वन्द्वेनापि च मुह्यते ॥१४१
इति व कथित विप्रा ययाभून्नरकोऽसुर ।
यथा च वरलाभोऽभूद यथा चाम्य विचेष्टितम् ॥१४२
आराधिता यथा ब्रह्मा वाण युद्धचाय भौमिना ।
किमन्यदुचित वास्नि तव वन्तु द्विजोत्तमा ॥१४३
इमी रीति य महामाया--जगन्मयो कालिका नाम वाली काली
जगता के नाथ-परावर क पति हरि भगवान् विष्णु का जा जगत क
कारणाव करन वास है-नान क ही द्वारा जानन के पाग्य है और
जगत से परिपूर्ण है उगी भाँति मम्माहिन किया करती है जा अनुराग
और विराग दाना ही म गमन्वित है ।। १३६-१४० ॥ जा मित्र है
उन पर अग्रह किया वग्न हैं और जा गनु है उनका हनन किया
परत है। व नारिया म गूद हार रमण रिया परा है । और द्वन्दा
म भी मोहित हान है ।। १४१॥ ह विप्रा । यह जापर मामन मैंन वह
दिया है जैम नरक अनुर शुआ था। और जिस तरह स वरदाना का
लाभ उमका हुआ था। आर जैसा भा चुछ उसका विचेष्टित अथात्
वृत्य था ।। १४२ ॥ कण की बुद्धि न भोमी ने जिस तरह से ब्रह्माजी
का आगधना की था। है विनानमा | अ अप वथन करने में
त्रिय क्या उचित है । हे द्विजातमा । 2- जाप लाग मुये वन
साय ॥१४॥

[ वालिया पुराण
॥ नारद-आगमन वर्णन ॥
कथ गिरिसुता काली वभूव जगता प्रसूः ।
दाक्षायणी त्यक्ततनु, कथमाप हर पतिम् ॥१
कथमवशरीर सा जहार च पिनादिन ।
एतन्न पृच्छता सम्यक् कथयस्व महामते १२
शृणुध्व मुनिशार्दूला यथा दाक्षायणी सती ।
भूता गिरिसुता पूर्व यथाधमहरत्तनुम् ॥३
यदाऽत्यजत्तनु देवी पूर्य दाक्षायणी सती ।
तदेव मनसागच्छन् मेनका हिमवगिरिम् ॥
यदा हरेण सहिता दक्षकन्या हिमाचले ।
चिनीड च तदा तस्या मेनकाऽभद् हितैपिणी ।।५
तस्या सुता म्यामिति च आधाय मनसि द्विजा. ।
त्यक्तप्राणा तदा देवी भूता हिमवत सुता ॥६
यदा दाक्षायणी प्राणान दक्षकोपाजही पुरा ।
तदेव मैनका देवी आरिराधयिप शिवाम् ।।
ऋपियो ने कहा--गिरि की पुत्री काली कसे जगतों को प्रसूत
करने वाली हुई थी। दाक्षायणी अर्याद दक्ष की पुषी ने तनु का त्याग
करके हर को फिर अपना पति किस प्रकार से प्राप्त कर लिया था ?
उमने पिनाकी प्रभु का आधा शरीर कैम हरण किया था-यह सब
हम पूछने वाले हैं । हे महामने । आप भली भांति यह मव वर्णन
पीजिए ॥ १-२॥ मार्कण्डेय मपि न कहा-हे मुनि शार्दू लो । आप
लोग अर अषण को 'जए कि जिस तरह स दाक्षायणी सती हुई और
फिर गिरि की पुत्री ने जैसे पूर्व में आधा शरीर हरण किया था ।। ३ ।।
पूर्व में दाक्षायणी गती ने शरीर का त्याग दिया था। उसी समय में
हिमवान् गिरि यो मेनका मन से गई थी ॥४॥ जिम समय में हिमाचल
परमवन्या हा के माय मनी थी उम समय में मेनका उमपी
।

नारद मागमन दर्शन हितपिणी हुई थी ॥५॥ है हिलो ! मैं उसकी मुता होऊ-यह मन में घरण परके उनी मनाप देवी ने प्राणयाग दिए थे और वह हिम- वान् की पुत्री हुई थी॥६॥ जिग ममय में पहिले दक्ष के कार क्रोध कर दागी ने प्राणों का त्याग किया था। उनो ममय म मेसा देवी शिस की आगर नो इच्छा दानी हुई थी। महामाया जगद्वात्री योगनिद्रा सनातनीम् । मोहिनी मवं भूनाना शरण मर्वनाकिनाम् ।। अप्टम्यामुपवाम तु कृत्वा मा नवमोतियों। मोदकंवलिभि पिष्ट पायमर्गन्धपुष्प १६ चंने मासि समारभ्य माप्तविंशनिवापरान। यावत् मभूजयामाम पनाविन्यन्वह शुचि. ॥१० गगायामोपधिप्रस्थे कृत्वा मूनि महीमयीम् । कदाचिन् मा निराहारा कदाचिन सा घृतव्रता ।।११ शिवाविन्यम्तमनमा मतविंशतिवन्मरान् । निनाय मनका देवो परमा भूतिमिच्छनी ॥१२ मप्तविंशतिवन्तेि जगन्माता जगन्मयो । मुप्रीताऽभवदत्ययं प्राह प्रत्यक्षता गता ॥१३ उमने महामाया--जगत् की धात्री-सनातनी योगनिद्रा- मोहिनी जो मय प्राणियों का मोदन करने वाली है और मब स्वर्ग- वामियों की रक्षिका है उमी शिवा का आराधन किया था ।। ८ ।। उमने अष्टमी में उपवाग करखे नवमी तिथि में मोदको मे-बलियो मै-पिष्टो में और पायमो मे तया गन्ध और पुपो में चैत्र मास मे आरम्भ करके सत्ताईम वर्ष तक प्रतिदिन शचि होकर पुत्र की इच्छा वालो ने भली भांति पूजा की थी॥९-१०॥ गङ्गा में औषधियों के अस्प में मृत्तिका मे परिपूर्ण मूत्ति का निर्माण करके पूजा करती थी। मिमी ममय तो विना ही आना के रह जाती थी और दिमी ममय में

[ वातिया पुराण
व्रत के धारण करने वाली होती थी।११। शिवा में अपने मन यो विल्यम्न
कर देने वाली उस मेनका देवी ने जो परमत की इच्छा रखन वाली
था मत्ताईम व पतीत दिये थे।॥ १२॥ मताईम वर्षों के अन्त में
जगत् की माता जगमयी परम प्रसन्न हो गई थी और प्रत्यक्ष में प्राप्त
हापर बोली।१३॥
यत् प्रार्थित त्वया देवि मत्तस्तन्प्रार्थयाधुना।
दास्ये तवाह तत्सर्व वाञ्छित यद् ह्दा भवेत् ||१४
तत मा मेनवा देवी प्रत्यक्ष कालिका गताम् ।
दृष्ट वैव प्रणनामाय वचन चेदमयवीत् ॥१५
देवी प्रत्यक्षतो रूप नव दृष्ट मयान्धुना।
त्वामहं स्तोतुमिच्छामि प्रमन्ना यदि मे शिवे ॥१६
नत मा मातरित्यक्त्वा कालिका मर्वमोहिनी।
बाहुभ्या चाम्वृत्ताभ्या मेनका परिपस्बजे ॥१७
नत मा मेनका देवी कालिका परमेश्वरीम् ।
तृष्टाव याग्भिरिष्ठाभि शिवा प्रत्यक्षन स्थिताम, ॥१८
ग्यन्नी जगद्राम चरिका लोकधारिणीम ।
प्रणमामि नगदात्री मयामार्यमाधिनीम् ||१६
नित्यानन्द मानमयी योगनिद्रा जगत्प्रमूम. ।
प्रणमागि शिया शुद्धा विधिशौरिशिवात्मिकाम, ॥२०
मायामयी महामाया भयाशोकविन शिनीम् ।
पागम्य वनिता भद्रा नमामि गा चिति शिवाम् ॥२१
है दाव आपन जा प्रार्थना की थी वह जय
मृम मारना हो। म मुभा गभी पृष्ठदेगी भाभी तुम्हारे हृदय
मेवाड मनांग्या ॥ १४॥ग अनन्नर मनमा देवी ने प्रत्या
में समागत सिमा बा दर्शन पर उसने देयो को प्रणाम दिया

५५ गारद-आगमन वर्गन ] था। इसके अनन्नर वह यह वचन बोली ॥ १५॥ देवी, मैंने इस समय मे आपा प्रत्यक्ष मे म्परूप का दर्शन प्रान दिया है । हे शिवे ! यदि भाप मुझ पर सुप्रमा है नो मैं आपकी स्तुति करना चाहती है ।।१६ ॥ इपके अनन्नर मवयो मोहित करने वाली कालिका मातयह कहकर फैली हुई पाहुनी गे मे का उगने नालिङ्गा दिया था ।१७। इसके उपरान उम मेमरा देवी न परमेश्वगे कालिका देवी का अभीष्ट वाणियो के द्वारा प्रत्यागम विराजमान शिरा स्तवन दिया था 11१८ 11 गेनका ने कहा-~-जगह वे धाम को प्रेरणा करने वालो- लोको पो धारण करने वाली चण्डिका जगत् की यात्री और सत्र कामो और अर्य को माधन करने वाली को मैं प्रणाम करती हूँ। १६॥ नित्य आनन्द वाली-ज्ञान मे परिपूर्णा-योग निद्रा-जगन को प्रसूत करने वाली-शुदा -शिवा-विधाता, गोरि और शिव के स्वरूप वाली को में प्रणाम करती है ॥ २०॥ मायामयी-महामाया-भक्तो के शोक का विनाश करने वाली काम की वनिता--चिनि शिवा आपको मैं नमस्कार करती हूँ ॥२१॥ मत्त्वोद्रकाद् या भवित्रीह नित्या चापि प्राणिना बुद्धिस्मा। मा त्व वन्धच्छेदहेतुर्यतीना कस्ते कधो मादृशीभि. प्रभावः ।।२२ ता त्व साम्ना मिदिमक्तिस्तथार्चा या वृत्तिर्या यजुषा दीर्घरूपा। हिंसा या वाऽयवेदस्य सा त्व नित्यं कामं त्वं ममेष्टं विधेहि ॥२३ नित्यानित्यर्भागहीने पुरस्थ - स्तन्मात्रैर्यत्यते भूतवर्ग. । तेषा शक्तिस्त्वं सदा नित्यरूपा का ते योपा योग्यं वक्नु ममर्था ।।२४

। वालिया पुराण
त्व
क्षितिधरित्री जगता त्वमेन
त्वमेव नित्या प्रकतिस्वरूपा।
यया वश क्रियते ब्रह्मम्प
मा व नित्या में प्रमोदाम्तु मात ॥२५
जातवेदोगतशक्तिस्पा
त्व दाहिका सूर्यक्रस्य शक्ति ।
आह्लादिका त्व वह चन्द्रिकाया-
म्ता तामह स्तौमि नमामि चाम्विकाम् ॥२६
योषा योपित्प्रियाणा त्व विद्या त्व चोवं रेतसाम् ।
वाञ्छा त्व सर्वजगता माया च त्व तथा हरे ॥२७
याऽनेकरूपाणि विधाय नित्य
सृष्टि थिति हानिमपीह पर्ती ।
ब्रह्माच्युतस्याणशरीरहेतु
मा त्व प्रसीदाद्य पुनर्नमस्तै ॥२८
मत्त्व के उद्देव मे मिथ्या जो यहां पर होने वाली हैं और जो
रित्या प्राणियो की बुद्धि के स्वरूप वाली हैं वही आप यतियो के बन्धन
बादन घरन का हेतु हैं रोमा कौन है जो तुझ जैमी के द्वारा आपका
प्रभाव कहने के योग्य होवे । अर्थात् आपके प्रभाव को कोई भी मुझ
सरी वा नहीं कह सकता ।२२। जो आप मामी की मिाद्ध की शत्ति
है तथा अर्था हैं जो आप यजुर्वेद की ऋचाओ की दीर्घ रूप वाली वृत्ति
है-जो आप अथव वेद यी हिंमा हैं वह आप नित्य याम है और मेर
इट या परे । २३ । नित्या नित्य-मागहीन-पुरस्थ जिन त मात्रामा
म भूतो या वग पतित हाता है उनकी मदा नित्य रूपा शक्ति आप ही
है। कौन गी म्बी हैं जा बापरे योग्य वैपन वरने से समर्थ हो । २४ ।
चगना वा धारण करने वाली सिति आप ही है-आप ही नित्या प्रकृति
* बाप वाली है जिना दाग द स्वरूप घामा वश किया जाता है

नारद-नागमन वर्णन ] ५७ वह आप नित्या है मुथ पर हे माता प्रसन्न होवें ! •५। आप जात वेद में रहने वाली शक्ति के बम्प वात्री हैं - मूर्य के किरणों को दाह करने वाली शदिन आप ही हैं-- के विग्मो की दाह करने वाली शाक्ति आप ही हैं-~-अप दिया का आह्लाद वरने वाली शक्ति हैं--- रन आपदा में नवन बग्नी है और उन अम्बिा को मैं प्रणाम करती हूँ । २६ ! यापन के विप्रो को आप योपा है-आप उध्वं रेताओ की आप ही विद्या है-आप ममस्त जगतों की वाञ्छा हैं और जाप ही भगवान् हरि की मावा३।७। जो नित्वही अनेक स्वरूपी को धारण वर के दृष्टि-स्थिति और हानि वो करने वाली हैं । आप ही ब्रह्मा-- अच्युत और शिव के शरीरो ने तु है । वह आप आज मुव पर प्रमन्न हो जाइए । मैं आपको पुन प्रणाम करती हूँ ॥२८॥ तत मा जगता माता कालिका पुनरेव हि । उवाच मनका देवी वाञ्छिन बरयेत्युत ॥२६ मत सा प्रथम पुत्रशत वन्ने यशस्विनी। वोर्यवच्चायमा युक्नमृद्धिसिद्धिसमन्वितम् ॥३० पश्चात् तथैका तनया मुम्पा गुणशालिनीम् । वुलद्वयानन्दकरी भुवनत्रयदुर्लभाम् ॥३१ ततो भगवनी प्राह मेनका मुनिमन्निभाम् । स्मितपूर्व नदा तम्या पूरयन्ती मनोरथम् ।।३२ शत पुत्रा मम्भवन्तु भवत्या वीयमयुता । तत्रको वलवान्मुख्य प्रथम मम्भविष्यति ॥३३ मुता च तव देवाना मानुपाणा च रक्षमाम् । हिताय सर्वजगता भविष्याम्यहमेव ते ॥३१ त्व सुखप्रमवा नित्य तथा नित्य पतिव्रता । अम्लाना स्पसम्पन्ना सुभगा च भविष्यसि ।।३५ मार्कण्डेय महपि ने वहा-इसके अन्तर वह जगतो को माता

m
नान्दा मन वर्णन ]
दसन्तम्मो देवी नवभ्यामृक्षयोगत (१४१
न्धंगतं ममुत्पन्ना गरेव शशिमण्डलान ।
सनम्नम्या नु जानाया धमन्ना अभवन् दिश ||४२
इम तिमसा न्हा जगन पी धात्री वही पर बनर्धान
हो गई थी। मेन्वा परम प्रमानना की प्राप्ति करक अपने म्यान म
प्रदेश पर गयी थी । ३६ । दसवे उपरान काल मन्त्राप्त होने पर
मेनका न अचलो म जानुत्तन मनाव परत को प्रन्त दिया था जो बाज
नर भी परो है महिल मागर के मध्य में निवास मिया करता है। ३७॥
मेनका ने म्पर्धामआगन देवेन्द्र का प्राव किया था। म मनी ने
अन्य एक रम मो पुत्री राम म ममुत्पन्न किया था ।८। य सभी
पुत्र महान वयं वाले–महान मत्त्व में ममन्दिन और मभी प्रकार में
गुण-गपो में मुसम्पन्न थे। इसके उपरान्त वह जगन्मयी योग निद्रा
कालिका देगे जिम्ने पूर्व में मती के रूप का त्याग कर दिया था जन्म
ग्रहण करने के लिये मेवा के समीप में गयी थी। भर के अनुसार
मेनका के उदर मे निया ने नमुभा हरिर नागर से लदमी की ही
भांति ममुनि ग्रहण की थी। वमन वे ममय में नक्षत्र के योग मे
नवमी तिथि में देवी साधी गति में गश के मण्डल में गङ्गा के ही
मसान ममत्पन्न हुई थी। नो अमूपन्न होने पर मी दिसाय प्रसन्न
ही गयी थी 12-1210
अनुकूलो वा वायुगम्भीगे गन्धवान शभ ।
वभूव पुष्पवृष्टि तोयवृष्टिस्तथापग ॥2
जज्वलश्चाग्नय शान्ता जगर्नु धनाधनम ।
तस्या तु जानमात्राया मर्व स्वास्थ्यमपद्यत ॥४४
ता तु दृष्ट्वा तया जाता नीलोत्पलदलानुगाम् ।
श्यामा सा मेनका देवो मुदमापातिर्पिना ॥४५
देवाश्च क्षमतुल प्रापुस्तक मुहमुंह।

६० [ वालिरा पुराण तुष्टुवश्चान्तरिक्षम्था गन्धर्वाप्सरमा गणा ॥१६ ना तु नीलोत्पलदलश्यामा हिनवत मुताम् । कालोति नाम्ना हिमवानाजुहाव कृतोदने ॥४७ वान्धवस्तु ममस्तैस्तन्नाम्ना सा पार्वतीनि च । कालीति च तथा नाम्ना कीर्तिता गिग्निन्दिनी ।।४८ तन सा ववृधे देवी गिरिराजगहे शुगा । गगेव वर्षासमये शरदीवाथ चन्द्रिका ॥४६ उम अवमर परम शुभ-- सुगन्धित और गम्भीर वायुवन करने लगा था। उस समय मे पथ्यो की वर्षा हुई थी और जल की वृष्टि भी हुई थी। जो अग्नियो शान्तथी वे प्रज्वलित होगई थी और धन गम्भीर गर्जन करने लगे थे । उस देवी के समुत्पन्न होनही मायने मबने स्वास्थ्य की प्रापिकी थी । ४३ । ४४ । नील कमलों के दलो के अनुगा समुत्पन्न हुई उसका दर्शन करके जो श्यामा थी, देवी मेनका अतीव हपित होकर परमाधिक आनन्द को प्राप्त हुई थी।४५। और देवों ने भी उम मपय मे बारम्बार अतुल हर्ष की प्राप्ति की थी। गन्धर्व और अप्सराओं के ममुदाय आकाश में मस्थित होकर स्तवन कर रहे थे । ४६ । हिमवान् ने उग नील उत्पल दन के समान श्यामा हिमवान की मुत। यो कृत दिन में हिम वान ने में 'काली' इस नाम से बुलाया गा । ४६ । ४७ । गमन वाधको के द्वारा उग नाम मे वह पार्वती-यही कही गयी थी। तथा वाली-इम नाम मे गिरिनन्दनी कत्तित यी गयी पो।१८। इस उपरान्त यह शुभा देवी गिरिराज हिमवान के घर मे घडी हो गई थी। जिस तरह से वर्षा के ममय में गङ्गा पढ़ जाया करती है तथा भरत्वाल मे चादनी यही हो जानी है ॥४६॥ एपमानानुदिवसं चावंगी पार दघे सानुदिन कालो चन्द्रवि मा वाल मायमापन्ना श्रीहन्त ३ नारद आगमन वर्णन ] १ सखोभि.प्राप विपला कालिन्दोत्र सरिद्मजं ॥५१ पड्गुणास्ता स्वय देवी पूर्वजन्मवशीकृताः। म्वयमीयुद्विजश्रेष्ठा प्रावृप कालिका यथा ।।५२ अतिचबाम स्वगुणं सा देवी देवकन्यका. । स्परमरम सर्वा गीतर्गन्धर्वकन्यका. ।।५३ मा वाल्य एव सतत बन्धवप्रिया शुभा । गुण स्ववन्दन् पितर मातरं चाप्यतोपयत् ।।५४ मातुः स्तुनिकरो नित्य पितृपूजनतत्परा । मर्वदा भ्रातृसहिता जगन्माताऽभवत्तदा ।।५५ सर्वदा सा जगन्माता कन्या सा समुपस्थिता । पितु. समीपे वसति कालिन्दीव विभावसो ॥५६ प्रतिदिन वृद्धि को पास हुई वह सुन्दर अङ्गों वाली अधिक सुन्दरता को बह वाली पेन्द्र विम्ब की कला हो की भांति ब्रह्म काली ने धारण ग थी। अर्याद वह दिनो दिन विशेष सुन्दरी होती चली गयी थी । ५० 1 वह कालिका वाल भाव कोकात हुई क्रीडा करती हुई सखियों के साथ परम प्रसन्नता को प्राप्त होती थी जिम प्रकार से सरिताओ के समुदायों से कालिन्दी विपुलता को प्राप्त किया करती है। १५२ । पड गुणो ने स्वर ही उम देवी के पूर्व जन्म के वशीकृतना को प्राप्त कर लिया था ; हे द्विज हो। वे पड्गुण वर्षा को कालिका के ही ममान स्वय ही उसके ममीप म आकर उपस्थित हो गये थे ॥५२॥ उस देवी ने अपने गुणो से देवी की कन्याओ का भी अतिक्रमण पर दिया या अर्याद देव कन्याआ मे भी अधिक गुणो वाली हो गयी थी। अपने स्प लावण्य मे मव अप्सराओ से भी आग वढो हुई थी और गीत। से वह गन्धर्व कन्याओं से भी अधिक गायन करने वाली थी। ५३। वह बाल्यकाल में ही निरन्तर वधु वर्ग को प्रिय और शुभ थी । उसने अपने सद्गुणों के द्वारा अपी बन्धुओ को-माना और पिना को भी सन्तुष्ट ६२ [ सानिया पुगण कर दिया था । ५४ । वह नित्य ही अपनी माता का नवन करने वाली थी और अपने पिता के यजन करने मे तत्पर रहा करती थी। उह सर्वदा अपन भाइयो के साथ मे रहने वाली जगन की माता हो गई थी। अर्थात् जगत् की माता सदा ही भाइयो के साथ रहा करती थी। ५५ । वह सम्पूर्ण जगनी को माता सर्वदा कन्या के स्वरूप म समुपस्थित हुई भी। जिस तरह से विभावमु के समीप मे कालिन्दी निबास किया करती है उसी भांति वह भी सदा अपने पिता के ममीप निवास किया परती है ॥५६॥ अर्थकदा ता निकट निधाय हिमवगिरिः । तनयं सह सगम्य स्थित परमकौतुकात् ।।५७ अथागतस्तत्र मुनि रदो देवताकत । हिमवन्त सुखासीन सुनै साधं ददर्श स १५८ अपश्यन्निकटे काली कालिकामिव सूयत । ज्योत्स्नामिव मुधाशास्तु सम्यग्वृद्धा शरन्निशि ।।५६ पूजितम्तेन गिरिणा कृतासन-परिग्रह ।

नारद आगमन वणन ] सानुकूल होती को देखा था । ५८ । उनके ही निष्ट में उन्होंने सूर्य मे वालिका के समान ही काली का भी अवलोकन किया था जैसे चन्द्रमा की चांदनी हो जो कि शरताल की गति मे भली भांति वढी हुई हुआ करती है । १५६ | उम गिरिराज के द्वारा उन नारद मुनि का अभ्यचंन किया गया था। और उनको आसन उपवित्र होन के लिये दिया गया था। उस आसन पर बैठे हुए देवनि नारदजी ने सबसे प्रथम उस पर्वत राज से कुशल प्रश्न पूछा था और वृत्तान्त भी पूछा था ।।६।। बोलने म महान कुशल देवर्षि नारदजी ने जब सम्पर्ण वृत्तान्त का ज्ञान प्रास पर लिया तो फिर वे बहुत ही हर्षित होते हुये मैनवा से वोले- यह आपकी पुत्री बहुत सुन्दर है और चन्द्रमा की याद्य कला के ही समान धित होगई है । हे शैलराज | यह आपकी कन्या समस्त मुलक्षणो से शोभायमान है ॥६१॥६२।। यह मदा हर हुई भगवान् शम्भु पी दायिता होने वाली है। यह तपस्विनी उनके चित्त को अपने वश में कर लंगी ॥६॥ स चाष्येनामृते जाया नान्यामुद्वाहयिष्यति । एतयोर्याहा प्रेमा व योश्चिन्नव ताश ॥६४ भूतो वा भविता वापि नापुना च द्रवर्तते । अनया सुरकार्याणि वर्तव्यापि वहूनि च ॥६५ अनयव गिरिर्थप्ठ अर्धनाराश्वरो हर । भविष्यति च सौहद ज्योत्स्नयवातमात्मन ॥६६ शरीराध हरस्यषा करिष्यति निजास्पदे । स्वर्णगौरी सुवर्णाभा तपसा तोपिते हरे ॥६७ विद्युदगौरो त्विय काली तव पुनो गविष्यति । गोरीति नाम्ना पश्चात्तु प्यातिमेषा गमिप्यति ॥६८ नान्यस्मै त्वमिमा दातु मन कर्तुमिहार्हसि । इद चोपाशु देवाना न प्रकाश करिष्यसि ।।६६ [ कामिका पुगण और व भगवान शम्भु भी इसके अतिारक्त अन्य विमा भा जाया के साथ विवाह नहीं करेगे। इन दाना वा जमा प्रम है वंसा काइ भी दूसरो का नही है ॥६॥ न ता ऐसा प्रेम कभी हुआ है और न इम समय मे है तया भविष्य म भी नहीं होगा। इसक द्वारा वहुत स सुरा के काय करन व योग्य होग ॥६५॥ ह गिरियो म परम श्रेष्ठ । इसी के द्वारा भगव न हर अध नारीश्वर है । और इसा को चन्द्रमा की प्योत्स्ना के ही तूल्य परम मौहनि होगा ॥६६॥ यह भगवान् शिव व आधे शरीर को आपन आस्पद मे करेगी। स्वण गौरी और सुवण व ममान आभा वाली तप के द्वारा भगवान् हर क प्रसन हान पर यह विद्य त के समान गौरी तुम्हारी पुना काली हा जायगी। इसक पाछ यह गौरी इस नाम स लोक मे ख्याति को प्राप्त करेगा ॥६॥६८।। शिव के अतिरिक्त अय किमी क भी लिय इसके प्रदान करन का जाप अपना मन कर क योग्य नहीं हारा है। और यह उपाशु दवा का प्रकाश नही कर गे ॥६६॥ इति तस्य वच तुत्वा देवपनारदस्य च । उवाच हिमवान वाक्य मुनि प्रति विशारद ॥७० थ यत त्यवतसग स महादेवा यतात्मवान । तपकीपाशु तपति दवानामप्यगोचर ॥७१ स क्थ ध्यानमागस्थ परब्रह्मापित मन । भ्रशयिष्यति दवप तन्न म सशया महान् ।।७२ अक्षर परम ब्रह्म प्रदीपकलिकोपमम् । सोऽन्त पश्यति सवत्र न तु वाह्य निराक्षत ।।७३ इति स्म श्रू पन नित्य फिनराणा मुखाद द्विज । स क्य तादृश स्वात शक्तो ध्र शयितु हर १७४ विशपत श्रूयते स्म दाक्षायण्या सम हर । ममय मातवान पूर्व त मे निगदत शृणु १७५ नारद-आगमन वर्णन ] ६५ लामृत या न वनिता दाक्षायणि सति प्रिये। भार्यार्थे सग्रहोप्यामि सस्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥७६ इति सत्या सग तेन पुरैव समय कृन । तस्या मृताया स कथ स्त्रियमन्या ग्रहीप्यति ॥८७ माकण्डेय महपि न कहा-दवपि नारदजी के इस वचन का श्रवण करके विशारद हिमवान् । मुान के प्रति यह वाक्य कहा था । १७०॥ व महादवजो सङ्ग को त्याग किय हुए हैं और चल आत्मा वाले हैं । व तो देवा के भागोचर उपाशु तप का समाचरण कर रह हैं ॥७१। ह दवपि । व ध्यान के माग में समास्थित है और उनम अपना मन परब्रह्म म अपित कर रखा है । वे उसस किस प्रकार भ्रष्ट हांगे--- इसम मुये बडा ारी सशय हो रहा है ।। ७२ ॥ वह परब्रह्म अक्षर हैं और प्रदीप की कलिका के ही समान है । वे सवय अदर ही देखा करत हैं और बाहिर के पदार्थों को कभी भी नहीं दखते हैं ।। ७३ ।। हे द्विज । यह वात नित्य ही कि नरा क मुख स सुनी जाती थी। जिनका अ त करण इस प्रकार का है वे हर कैस ध्यान से भ्रष्ट किय जा सक्त है ।।७४।। विशप रूप से यह सुना गया है कि भगवान् शम्भु न दाक्षा यणी क साथ समय पूर्व में ही ज्ञात किया था। उस मैं कहता हूँ मुयस भाप श्रवण कोनिए ॥७॥ शिव ने दाक्षायणी स कहा था--ह दाक्षा माण, ह प्रिये । सात । तुम्हारे विना मैं अन्य किसी भी वनिता का अपनी भार्या बनान क लिये ग्रहण नहीं करूंगा--यह सवथा सत्य है जिस में आपका वान रहा हू ।। ७६ ॥ यही सता के साथ उहान पहने ही ममय क्यिा है । अव उस सती के मृत हा जान पर व कैस अयम्ना का ग्रहण करग1७७॥ नान कार्या त्वया चिन्ता गिरिराज भवत्सुता। एपा सती समुत्पन्ना हरायव न सशय ॥७८ इत्युक्त्वा स तु देवपि रदस्तु यथा सती।

[वामिाा पुराण मेनकाया रामुत्पन्ना सर्व तत् प्रोक्तवान् गिरी ॥७६ तत्सर्व पूर्ववृत्तान्त नारदरय मुताद् गिरि । श्रुत्वा सपुनदारः स तदा निःसशयोऽभवत् ।।८० ततः काली कथा श्रु त्या नारदस्य मुखात् तदा । लज्जयाऽधोमुखी भूत्वा स्मितविस्तारितानता ।।८१ करेण तां तु सगृह्य प्रोन्नमय्य मुखं गिरिः । मूनि सम्यगुपानाय स्वासने सन्यवेशयत् ॥८२ ततस्ता पुनरेवाह नारद शैलपुत्रिकाम् । हपंयन् गिरिराज तु मेनका तनयः सह ।।८३ सिंहासनेन किं स्वस्या. शलराज भवेत् तव । शम्भोरूरु सदैवास्या जासन तु भविष्यति ।।८४ हरोरुमासन प्राप्य तनया तव सततम् । नान्यत्र कुत्रचित्तुष्टिमासने प्राप्यते गिरे ।।८५ इति वचनमुदार नारद शैलराज त्रिदिवमगमदुक्त्वा तत्क्षणाद् देवयानः । गिरिपतिरपि चिन्ताहर्पसन्मोहयुक्तः प्रविशदचलयासी स्वान्तर पद्मगर्भम् ।।८६ देवर्षि नारदजी ने कहा-हे गिरिराज ! इस विषय में आपको चिन्ता नही करनी चाहिए। यह आपकी पुत्री सती ही उत्पन्न हुई है और यह हर के ही लिये जन्म धारण करने वाली हुई है-इससे लेश मात्र भी संशय नहीं है ।। ७८ ॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इतना कहकर ही देवर्षि नारदजी ने गिरिराज से यह सभी कहकर सुना दिया था जिस तरह से सती मेनका के उदर से समुत्पन्न हुई थी ॥५६॥ गिरि- राज ने वह सब पूर्व मे घटित वृत्तान्त नारदजी के मुख से श्रवण किया तो वह अपने पुत्रो और दारा के सहित सशय से हीन हो गये थे ॥२०॥ उस अवसर पर काली ने नारदजी के मुख से यह सब कथा का श्रवण भगवान शिव का हिमवान म निवास ] किया था और वह मन्ता स नोचे की ओर मुख वाली हो गई थी और मन्द मुस्कान स विस्तृत मुख वाली हो गई थी ।।८१|| गिरि हिमवान न उस सती को हाथ से पकड कर और मुख को ऊपर की और उठा कर उसके मस्तक पर आघ्राण करके उसको अपने ही आसन पर बिठा लिया था ।।२।। इसके अनन्तर नारदजी न पुन शैलराज की पुत्री से कहा था जिससे गिरिराज और तनयो के सहित मेनका वडा हपं हो रहा था ॥ ८३ ॥ हे शैलराज | बापके इस सिंहासन से इसको क्या होगा। इसका आसन तो सदा ही भगवान् शम्भु के ऊरु होगा । अर्थात् आपके द्वारा दिया हुआ सिंहासन का आसन इसके लिये काई महत्त्व की वात नहीं है क्योकि यह तो शम्भु के ऊरुओ पर बैठने वाली होगा ।।८४ ॥ हे गिरे । आपकी यह पुत्रो हर के ऊरुआ का आसन प्राप्त करके इसे अन्य किसी भी लासन पर तुष्टि की प्राप्ति नही हा सक्ती है ।।१५॥ देवपि नारदजी ने यह परम उदार वधन शैलराज से कहा था और देवयाना के द्वारा व उसी क्षण म स्वर्ग को गमन कर गय थे। गिरिपति भी चिन्ताह और सम्मोह स सयुत होकर अपनी अचला भार्या के सहित अपन पद्म गभ अन्त पुर म प्रवश कर गये थे ॥८६॥ भगवान शिव का हिमवान मे निवास एतस्मिन्नतरे शम्भु क्षिप्र त्यक्त्वा तदा सर । गगावतारमगमद् हिमवत्-प्रस्थमुत्तमम् ॥१ यत्न गगा निपतिता पुरा ब्रह्मपुरात सूता । औपधीप्रस्थनगरस्यादूरे सानुरुत्तम ।।२ तत्र भर्ग स्वमात्मानमक्षर परमात्परम् ।

[ पालिका पुराण ६८ चेतो ज्ञानमय नित्यं ज्योतीम्पं निराकुलम् ॥३ जगन्मय प्रदीाभ द्वैतहीनाविशेषवम् । एकाग्र चिन्तयामास भगवान् वृपभध्वजः ॥४ हरे ध्यानपरे तस्मिन् प्रमथा ध्यानतत्परा. । अभवन् केचिदपरे नन्दिभृग्यादयो गणा.॥५ द्वा स्था भूता महाभागा ये पूर्वद्वारि योजिताः । तावन्तोऽपि गणास्तव नव किंचन कृजितम् ॥६ तेषा सश्रूयते सर्वे नि शब्दा' सस्थितास्ततः । अन्ये तु तत्र क्रीडन्ति गणा दूरान्तरस्थिया. ॥७ मार्कण्डेव महर्षि ने कहा- इसी बीच मे भगवान् शम्भु ने उस समय मे सरोवर का त्याग कर दिया था और वे हिमवान के उत्तम प्रस्थ गङ्गावतार से चले गये थे ॥१॥ जहाँ पर पहिले ब्रह्मपुर से सृत होकर गङ्गा निपनित हुई थी। योपधिप्रस्य नामक नगर के समीप मे ही एक उत्तम शिखर था ॥ २ ॥ वही पर भर्गदेव परम से भी पर अक्षर अपने आत्मा को तथा नित्य ही ज्ञानमय चित्त एव निरामय और निराकुल ज्योती रूप-प्रदीप की आभा वाले–जगन्मय-द्वैत से हीन विशेषको एकाग्र होकर वृषभध्वज भगवान चिन्तन करने लगे थे ।। ३-- ४॥ भगवान् हर के ध्यान में तत्पर होने पर प्रथम भी ध्यान में परायण हो गये थे। कुछ दूमरे नन्दी-भृङ्गी आदि जो गण थे वे महा- भाग द्वार पर स्थित थे जो पूर्व के द्वार पर नियोजित किये गये थे। वहाँ पर उतने गण थे किन्तु भी ध्वनि नहीं होती थी ॥५-६।। उनकी कोई भी ध्वनि नहीं सुनाई नही देती थी। सभी शब्दहीन होते हुए संस्थित थे । अन्य गण वहाँ से सुदूर अन्तर पर स्थित होकर क्रीडा कर रहे थे ॥७॥ कुसुमैश्च दलभक्तगिरिप्रस्रवणोदकः । रत्नानि च विचिन्वन्तो भूषिता गरिकस्तथा ॥८

भगवान शिव हिमवान म निवाम ]
सगण तु तथा दृष्ट्वा गिरिराजो गत हरम् ।
स्वस्थानमोपधिप्रस्थानि मृत्य महितो गण ॥६
पूजार्थमुपतस्थे स यथायोग्य तथा→यत् ।
स चापि शम्भुस्तस्याची परया श्रद्धया युत ।
प्रतिजग्राह कूटस्थो गगाशी यथा पुरा ।।१०
पूजितस्तेन सहसा गिरिराज वृपध्वज ।
उवाच ध्यानयोगस्थ म्मयन्निव जगत्पति ।।११
तव प्रस्थे तपस्तप्तु रहस्यमहमागत ।
न यथा कोऽपि निकट समायाति तथा कुरु ॥१२
त्व महात्मा जगद्धाम मुनीना च सदाथय ।
देवाना राक्षसाना च यक्षाणा किन्नरम्य च ॥१३
सदावासो द्विजातीना गगापूतश्च नित्यदा।
त्वत्पुरस्याम्य निकटे प्रस्थ गगावतारणम् ॥१४
कुसुमा से--दतों से-भक्तों में और गिरि प्रस्रवण के जती
से रत्नों को खोजते हुए गौरिको से भूपित वे गण थे 11८॥ गिरि-
राज ने गणो के महित गये हुए भगवान् हर का विलोपन करके गणो
के महित अपने स्थान औषधि प्रस्थ मे निर्गत होकर वे पूजा के लिये
उपस्थित हुए थे और उन्होंने यथोचित रूप से उनका अभ्यर्चन किया
था। व भगवान् शम्भु भी परा श्रद्धा से मयुत होकर उसकी अर्चा का
ग्रहण करने वाले हुए थे जिस तरह से पहिले गङ्गा शीपं म कूट पर
सस्थित थे ॥६-१०॥ सहसा उसके द्वारा पूजित हुए वृपध्वज ध्यान
योग मे स्थित होते हुए जगत्पति मुस्वरात हुए से उस गिरिराज से
बोले ॥ ११॥ ईश्वर ने कहा-मैं आपके इस प्रस्थ पर तप का समा-
चरण करने के लिये ही इम एकान्त स्थल में ममागत हुआ हूँ। मेरे
समीप म कोई भी न आये ऐसी व्यवस्था कर दीजिये ।। १२॥ आप
महान आत्मा वाले हैं--आप जगत के धाम है और मुनियो के सदाश्रय
हैं देवो के-राक्षमो के-यक्षा के और किन्नरो के तथा द्विजातीयो के

[ पालिक! पुराण
सद आवास है तथा नित्य ही गङ्गा मे पूत रहत हैं । थापये इम नगर में
निकट में एक गङ्गावतरण प्रस्थ है ।।१४॥
आश्रितोऽह गिरिश्रेष्ठ तद्योग्य कुरु साम्प्रतम् ।।१५
इत्युक्त्वा जगता नाथस्तूप्णीमास वृपध्वज ।
गिरिराजस्तदा शम्भु प्रणयादिदमब्रवीत् ।।१६
पूतोऽस्मि जगता नाथ त्वयाऽह परमेश्वर ।
आगतेनाद्य विषयमित कृत्य क्मिस्ति मे ।।१७
तपसा महता त्व हि देवयन्नपरस्थितं ।
न प्राप्यमे जगन्नाथ स त्व स्वयमुपस्थित ॥१८
मतो धन्यनरो नास्ति न मतोऽन्योऽस्ति पुण्यवान् ।
यद्भवान हिमवत्-प्रस्थे तपसे समुपस्थित ॥१६
देवेन्द्रादधिक मन्ये आत्मान परमेश्वर ।
सगणेन त्वया प्राप्तो यदाऽह कामचारत ।।२०
इत्युक्त्वा गिरिराजोऽथ स्ववेश्म पुनरागमत् ।
नियमाय परिवारान गणानप्यवदत् स्वकान् ॥२१
हे गिरि श्रेष्ठ | मैंने वहां पर आश्रम ग्रहण किया है सो अब
योग्य हो वह आप करिये ॥ १५ ॥ इतना ही कहकर जगतो के स्वामी
वृषभध्वज चुप हो गये थे। उसी समय मे गिरिराज ने भगवान् शम्भु
प्रणय की ही भांति यह कहा था ॥१६॥ हे परमेश्वर | आप तो जगतो
के स्वामी हैं । आपने मुझे पवित्र कर दिया है कि आपने इम मेरे दे।
मे समागमन किया है । इमसे आगे जो भी मेर। क्त्तव्य हो वह मुझे
उपदेश कीजिए कि क्या करना है ॥१७॥ आप तो महान् तप के
द्वारा यस्तो म परायण देवो के द्वारा भी प्राप्त नहीं हुआ करते हैं ।
हे जगन्नाथ । मेरा बडा सौभाग्य है कि आप स्वय ही यहां पर पदार्पण
पर उपस्थित हो गये हैं ।।१८।। मैं तो यही समझता हूँ कि महारो अधिक
धन्य कोई भी नहीं है । और मुझमे अधिक कोई पुण्यशाली ही है कि
से
-

भगवान शिव का हिमवान में निवास ] ७१ आप तपश्चर्या करने के लिये हिमवान के प्रस्थ पर स्वय ही समुपस्थित हो गये हैं ॥ १६ ॥ हे परमेश्वर । मैं तो अपने आपको देवेन्द्र से भी अधिक मानता हूँ कि गणो के सहित आपके द्वारा स्वेच्छा से ही जिस ममय मे मैं प्राप्त हो गया हूँ इतना कहकर गिरिराज पुन अपने घर में आ गये थे। और उनने नियम के लिय अपने परिवारो को तथा गणो को कह दिया था ॥२०॥२१॥ अद्य प्रति नो गन्ता कोऽपि गगावतारणम् । मच्छासन न हि विना यो गन्ता दण्डये ह्यहम् ।।२२ इति स्वान् स नियम्याशु तिलपुष्पकुशान् फलम् । समादायाश तनयासहितोऽगाद् हरान्तिकम् ।।२३ अथ गत्वा जगन्नाथ हर ध्यानपर तदा। नमयामास तनया काली सर्वगुणान्विताम् ॥२४ तिलपुष्पादिक यद् यत्तत्तदग्रे निधाय स । अग्रे कृत्वा सुता शम्भुमिदमाह स शैलराट् ।।२५ भगवस्तनयेयं मे त्वमाराधयितु प्रति । समादिष्टा समानीता त्वदाराधनकाक्षिणी ॥२६ सखिभ्या सह नित्य त्वा सेवतामीश शकर । अनुजानीहि सेवायं मयि ते यद्यनुग्रह ।।२७ अथ ता शकरोऽपश्यन् प्रथमारुढयौवनाम् । फुल्लेन्दीवरपत्रामा पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥२८ आज से आरम्भ करके कोई भी गङ्गावतरण पर नहीं जायेगा। मेरे गासन के बिना जो कोई भी वहां पर गमन करेगा उसको मैं दण्डित पलंगा । २२ । उस गिरिराज हिमवान् ने इस रीति से अपने लोगो को नियमिन करके वह तिल-पुष्प-कुशा और पल लेकर शीघ्र ही अपनी पुत्री के साथ भगवान् शम्भु के समीप मे गमन क्यिा था । २३ । इसके अनतर ध्यान में परायण जगन्नाथ शम्भू के समीप में उस समय

1
७२
[ दामिया पुराण
में गमन पखे गव गुणो से गमविता पानी आनी पुत्री का नमिन
पराया था अर्थात् उसमे प्रमाण परवाया था ।२४। जौ तिल पुष्प
आदि थे वह मभी उगर्न उनले आगे रख दिया था। पिर अपनी पुत्री
को आगे परखे उम शैला ये गजा ने भगवान् शम्भु गे यह यहा था।
। २५। हे भगवान् | यह मेरी पुत्री आपकी आराधना पग्ने पे लिये
ममादिष्ट की गयी है और आपको आराधना पी इच्छा वाली है यह यह
पर लाई गई है । २६। है ईश। शपूर यह अपनी मनियों में
साथ नित्य ही आपको मेवा बरती है। यदि आपका मेरे ऊपर अनुग्रह
है तो आप इसको मेवा करने के लिये अनुज्ञा प्रदान यीजिय । २७ ।
इसने अन तर भगवान् शहर ने उसका अवतोक्न किया था कि वह
प्रथम यौवन मे आरूढ थी और उसके विवाहित बमलो के दतो पे तुल्य
नेत्र थे तथा उसका चेहरा एवं खिले हुये कमल वे ही सदश था एव
उसका मुख पूर्ण चन्द्र के समान था । २८ ।
ममग्रनीचकेशोध-प्राप्तवेश-विजृम्भिवाम् ।
कम्युग्रीवा विशालाक्षी चारुकर्णयुगोज्ज्वलाम् ।।२६
मृणालायतपर्यन्त-वाहुयुग्ममनोरमाम् ।
राजीवकुण्डलप्ररय धनपीनोन्नतस्तनौ ॥३०
विभ्रनी क्षीणसन्मध्या रक्तपाणितलद्वयाम् ।
स्थलपद्मप्रतीकाश पादयुग्ममनोरमाम् ॥३१
मध्यक्षोणा महासत्वा वृत्तस्थूलधनोज्ज्वलाम् ।
मुजपा नागनासोरु निम्ननाभिविभूषिताम् ।।३२
सुवृत्तचारुजधाग्रा त्रिगम्भीरा पडुननाम् ।
सर्वलक्षणसम्पूर्णा निषु लोकेपु दुर्लभाम् ॥३३
ध्यानपजरनिर्बन्ध-मुनिमानसमप्यरम् ।
दशनाद् भ्रशिनु शक्ता योपिद गणशिरोमणिम् ॥३४
ना दृष्ट्वा तपसे नित्य ध्यानिना च मनोहराम् ।

- भगवान शिव का हिमवान में निवास ] ७३ विघ्नहेतु चानुरागधिनी कामरूपिणीम् ।।३५ अव शिवा के मुन्दर स्वरूप का वर्णन क्यिा जाता है वह समग्र पेशो के ममूट से वैग विजृम्भिका को प्राप्त हुई थी। उस की ग्रीवा कम्वु के ही ममान थी। उसके नेन दिशाल थे और उसके दोनो कानो का जोडा परम सुन्दर एव उज्ज्वल था । २६ । मृणाल के सदृश आयत एव पर्यन्न वाहुओ के युग्म से वह परम मनोहर थी। उसके कुण्डलो के स्थान में कमल थे तथा वह धन और पीन एव उन्नत स्तनों से शोभित थी। ३० 1 मुन्दर और क्षीण मध्य भाग के धारण करने वानी थी और उसके दोनों के करी के तल भाग रक्त वर्ण के थे। स्थन पद्म के सहा दोनो पादो मे वह परम मनोरम थी ।३११ मध्य भाग से क्षीण-महान मत्त्व वाली स्थूल और धन वृत्त मे उज्ज्वल थी। उमको ज घायें मुन्दर थी-नाग के समान उमकी नामिका थी तथा वह निम्न नाभि मे भूपित थी । ३२। उसकी जघाओ के अग्रभाग मुवृत्त और मुन्दर थे । तीन स्थानो म गम्भीर और छ स्थानो म समुन्नत थी। ममी मुलक्षणों से सम्पन्न थी तथा वह तीनो लोको मे दुर्लभ थे। । ३३ । ध्यान के पिंजर में बंधे हुये मुनियो के मन को भी दर्शन करने ही से भ्रष्ट करन म ममर्थ यह योपिलो के ममूह की शिरोमणि थी । ३४ । उस मनोहर को देखकर तहश्चर्या के लिये नित्य ध्यान करने वालो को विघ्नो का हेतु और अनुराग को बढ़ाने वाली तथा कामम्प वाली थी ॥३५ गिरिराजम्य वचनात्तनया तस्य शकर । पर्यपणार्य जगृहे गौरवादपि गोरथ ॥:६ उवाचेद तव सुता सखिभ्या सह शैलराट् । नित्य में मेवया यत्ता निर्भीता ह्यत्र तिष्ठतु ॥३७ एवमुक्त्वा तु ता देवी सेवाय जगृहे हर । इदमेव मह धेर्य यद् विघ्नो न हि विघ्नयेत् ।

[पालिका पुराण
निर्विघ्न स्थानमासाद्य यतप क्रियते द्विज ॥३८
सविघ्नो विघ्न हेतु य परिभूय प्रवर्तते ।
त्वन्महत्त्व च तपसा धीरता च तपस्विनाम् ॥३६
तत स्वपुरमायातो गिरिराट परिचारक ।
हरश्न ध्यानयोगेन पर चिन्तयितु स्थित ॥४०
काली सखिन्या महिता प्रत्यह चन्द्रशेखरम् ।
सेवमाना महादेव गमनागमन स्थिता ॥४१
कदाचित् सहिता काली सखिभ्या शकराग्रत ।
वितन्वती शुभ गीत पचमञ्चातनोत्तदा ।।४२
उन गिरिराज के वचन मे उमवी पुत्री को भगवान शङ्कर ने
जो गौरव से भी गौरव थे सेवा करने के लिये स्वीकार कर लिया था ।
1३६।। भगवान् शरभु ने कहा था कि हे शैलरान् । यह आपकी पुत्री
अपनी सखियो के साथ नित्य ही मेरी सेवा करने के लिये निभीत होकर
यहाँ पर स्थित रहे ॥३७॥ यह इस प्रकार से कहकर भगवान हर ने
उस देवी को मेवा के लिये ग्रहण कर लिया था। यह ही महान धैर्य है
कि विघ्न वाधा न डा। विघ्न रहित स्थान को प्राप्त करके जो तप
द्विजो के द्वारा किया जाता है |॥३८॥ विघ्नो के महित विघ्न के हेतु
को पराभूद करके जो द्रवृत्त होता है । वह तपो का महत्त्व है और
तपस्वियो की धीरता है ॥३६॥ इसके अनन्तर गिरि राजा अपने परि-
धारको के सहित अपने पुर में आ गया था और भगवान् शम्भु ध्यान
के योग से परेश का चिन्तन करने के लिये स्थित हो गये थे ॥४०॥
काली अपनी सखियो के साथ प्रति दिन महादेव चन्द्र शेखर की सेवा
परती हुई गमन और आगमनो के द्वारा स्थित हो गई थी ॥४१॥
किसी ममय मे वह वाली सखियो के सहित भगवान् शङ्कर के आगे
शुभगीत का विस्तार करती हुई पञ्चम स्वर का गान किया करती
पी ॥४२॥

भगवान शिव का हिमवान मे निवाम ) कदाचिन कुशपुप्पादिसमिद्वारि हगय सा। सखिभ्या स्नानसत्कार कुर्वन्ती न्यबसत्तदा ॥४३ कदाचिदग्रे नियता म्यिता चन्द्रमृतो मुखम । वीक्षन्ती चिन्तयामास सकामा चन्द्रशेखरम् ॥४४ यदा कार्यपु सा व्यग्रा तदा तवम चेष्टते । कृत्यहीना यदा सा तु तदैवाचिन्तयद्धरम् ॥४५ क्दा मामेष भूतेश क्र्ता पाणिगृहीतिकाम् । पदा मया मम ग्ना नानापदभावभावनै ॥४६ इति चिन्तापरा काली स्वप्नेऽपि परमेश्वरम । अर्चयत्येव परम सदाचिन्तनतत्परा ॥४७ अग्र गता यदा काली प्रध्यायनि महेश्वरम् । तदा तद् वेदभतेशस्ता निसर्गपरिस्थिताम् ॥४८ किन्तु गर्भगतर्वीज—तदेहेति ता तदा । नाग्रहीदिगरिश काली भायाणे ह्यधृतव्रताम, ॥१६ किसी समय ये वह भगवान हर के लिये कुश-पुष्प आदि- ममिधा और जल का मखियो के महित स्नान का मत्कार करती हुई उस ममय में वहाँ पर निवाम क्यिा करती थी ॥५३॥ किसी समय में नियत रूप मे शिव के मुख का वीक्षण करती हुई सकाम होकर चन्द्र शेखर के के विषय म चिन्तन क्यिा करती थी ॥४४॥ जिस समय में कार्यों में ध्यत्र होती हुई वह उम कर्म की चेष्टा किया करती थी जब वह कृत्य में रहित होती थी तब ही वह हर के मुख का चिन्तन किया करतो यो । ॥४५॥ विस समय मे यह भूतेश्वर मेरा पाणि ग्रहण करने वाले होंगे और अनेक सदभावो की भावनाओं से मेरे साथ रमण करेंगे ॥४६॥ इसी चिन्ता म परायण होती हुई काली स्वप्न में भी परमेश्वर का अर्चन करती हुई सदा उन्ही परम प्रभु की चिन्ता में तत्पर रहा करती थी। ॥४७॥ आगे गमन को हुई काली जब महेश्वर का ध्यान करती थी तब [ कानिका पुराण भगवान भूनेश ने उमयो स्वभाव मे परिस्थित हुयी जाना था !॥४८॥ किन्तु उस समय म गर्भगत वीजा मे धूत देह वाली है-इसमे उस समय में उसको गिरिश ने अधृत व्रत वाली को भार्या बनाने के लिये ग्रहण नहीं किया था ।।४।। महादेवोऽपि ता दृष्टवा तदैवेदमचिन्तयत् । कयमेषा तपश्चर्यावत कुर्याद् गिरे सुता ॥५० कृतव्रता ग्रहीप्यामि गर्भवीजविजिताम् । काली भार्या स्वदयिता योनिजामतिपिताम् ॥५१ व्रतेन चाथ सस्वारगर्भवीज विमुच्यते । तस्माद व्रत यथा काली कुर्यात् तद् युज्यते क्थम् ।।५२ इति सचिन्त्य भूतेशस्तदा ध्यानमना स्थित । ध्यानासक्तस्य नस्याथ नान्यचिन्ता व्यजायत ।।५३ काली त्वनुदिन शम्भु भक्त्या भृशमसेवत । विचिन्यन्ती सतत तस्य रूप महात्मन ||५४ हरो ध्यानपर काली नित्य प्रत्यक्षत स्थिताम् । विम्मृत्य पूर्ववृत्तान्त पश्यन्नपि न पश्यति ॥५५ एतस्मिन्नन्तरे देवास्तारको नाम दैत्यराट् । क्वाधे सर्वलोकाश्च ब्रह्मणो वरदर्पित ॥५६ महादेवजी ने भी उस समय मे उसको देख कर यही चि तन विया था कि यह गिरि की पुत्री विस प्रकार से तपश्चर्या के व्रत को परेगी ॥५०॥ किय हुये व्रत वाली और गम बीज से वजित काली को जो योनिजा और अति दूपिता है अपनी प्यारी भार्या पे रूप में प्रहण करूंगा व्रत से और मस्वारो मे गर्भ वीज वी विमुक्ति होती है । इम म जमे भी यह यात्री व्रत करे--यह वैसे युक्त होवे ।। ५१ ॥ ५२ ।। मावण्डेय महाप ने पहा--भूता प्रभु यह चिन्तन करते हुये उस समय

भगवान शिव का हिमवान म निवास ]
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ध्यान म मन लगान वाल होकर सथित हा गय थे । ध्यान म समापत्त
उनको अन्य कोई भी चिन्ता न हुई थी ॥५३।। काली प्रतिदिन
भक्ति भाव से शम्भु का अत्यधिक सेवा क्यिा करती थी उस महात्मा
के स्वरूप का निरन्तर चिन्तन किया करती थी ॥५४॥ ध्यान म परायण
हर नित्य ही प्रत्यक्ष म स्थित हुई कानी का भलकर पूर्व वृत्तान्त को
दखन हुए भी नहीं देखते थे। इसी बीच म तारक नाम वाला देत्यो का
राजा ब्रह्माजी के वरदान से बहुत हो घमण्डी होकर देवा को और सभी
लोको को बाधा द रहा था ॥५५॥५६ ।
वशाकृत्य स लोकाखीन स्वयमिन्द्रो बभूव ह ।
विद्राव्य सकलान् देवान् दत्यान स्वास्तत् पदेषु च ।
स्वय नियोजयामास देवयोनिपु चाप्यसो ॥५७
न यम स्वच्छया लोकास्तस्मिन् राज्ञि नियच्छति ।
न स्वच्छया तया सूया लाकास्तपति तद्भयात् ।।५८
चन्द्रस्तु नमसाचिव्य तस्य कुवन् स रश्मिभि ।
वायुना सह सगम्य तत् सेवा विदधेऽनिशम् ॥५६
सदा मोग-व्यगाम्माय श यस्निग्धत्वमयुन ।
न बोजयन् ववो वायु शासनानस्य भूभृत ॥६०
धनदाऽपि ययासार धनमादाय यत्नत ।
सावधानस्तम्य सेवामकरोत्तारकच्छया ॥६१
अग्निस्तस्याभवत् सूद शासनात्तारक्स्य तु ।
व्यजनान्यथ भोज्यानि चक्रे तस्येच्छया तदा ॥६२
नितिस्तस्य सतत सहित सर्वराक्षस ।
अश्वान गजान वाहनानि कारयामाम साध्वसात् ।।६३
उसने तीनो लोको को अपने वश म करके वह स्वय ही इन्द्र वन
गया था। उसने सब देवो को भगा कर उनके पदा पर अपने दैत्या का
स्वय नियोजन कर दिया था और वह देव मुनिया ने भी नियुक्ति

७८ [ रातिया पुराण वरन वाला बन गया था ॥५७॥ उराये राज्य मयम अपनी इच्छास लोको का नियोजन ही किया करता। उसने भय से गूयं भी लोर को ताप नही दिया करता था ॥५८।। चन्द्रदेव तो अपनी किरणा में द्वारा उसके गम का मचिष्य दिया करता था अर्या। उमरे विहार की लीला मे सहायता करता था । वायु के साथ सङ्गत होकर वह रात दिन उसकी सेवा में ही निरत रहता था ॥५६॥ वायु सदा ही सुगन्ध- गम्भीरता और शीतलता से एव स्निग्धता स समन्वित होकर उस नृप के शासन से उसको वीजित करता हुआ ही वहन किया करता ॥६०॥ कुवेर भो तारकनी इच्छा से यथा सार धन यत्न पूर्वक लेकर सावधान होकर उसकी सेवा किया करता था ॥६१॥ तारव के शासन से अग्नि सूद हो गया था उस समय म उसकी इच्छा मे ही सदा भोज्य व्यञ्जनो को किया करता था ॥६२|| निति समस्त राक्षमो के सहित निरनर भय से अश्व-गज और वाहनो को कराता था ॥६३।। नृत्नदभिरप्सरोभिश्च स्तुवद्भि सूतमागधै । गांयसानश्च गन्धर्व सचितोड सुरान द्विपन ।।६४ एव स सर्वलोकास्तु त्रिध्वप्यथ विलोडयन् । लोवेषु सारान् साराश्च देवानामप्यथाग्रहीत् ॥६५ तेनाभिवाधिता सर्वे देवा शक्रपुरोगमा । ब्रह्माण शरण जग्मुरनाथा नाथमुत्तमम् ॥६६ ते प्रणम्य सुरा सर्वे पुरुहूतपुरोगमा । इदमूचुर्भहात्मान सर्वलोक पितामहम् ॥६७ लोकेश तारको दैत्यो वरेण तव दर्पित । निरस्यास्मान् हठादस्मद्विषयान् स्वयमग्रहीत् ॥६८ रात्रिदिव बाधतेऽस्मान् यत्र तन्न स्थिता वयम् । पलायिताश्व पश्याम सर्वकाष्ठासु तारकम् ॥६६ अग्निर्यमाथ वरुणो नि तिर्वायुरेव च ।

भगवान शिव का हिमवान में निवास ] तथा मनुष्यधर्मा च सर्वैः परिकर युतः ।।७० वहतारक सुरो मे दंप रखता था और नृत्य करती हुई अप्स- राओ के साथ-स्तवन करने वाले सूत और मागधो के साथ तथा गान करने वाले गन्धयों के साथ भली भांति क्रीडा किया करता था ॥६॥ इस रीति से वह तीनो लोको मे त्रिलोडन करता हुआ लोको मे देवो के जो भी सार-सार थे उनका सव का उसने ग्रहण कर लिया था ।।६।। उसने सभी देवो को जिनमे इन्द्र प्रमुख थे अभि वाधित कर दिया था। तब सब देवगण अगथ होते हुए उत्तम नाथ ब्रह्माजी की शरणा गति में माप्त हुए थे ॥६६॥ उन देवो ने प्रणाम करके जिन सबमे पुरहून अगुआ थे महान् आत्मा वाले सब लोको के पिता मद से यह वोले ॥६॥ देवो ने कहा-हे लोको के स्वामिन् ! दैत्य तारक आपके दिये हुए वरदान से बहुत ही दर्पित अर्थात् घमण्डी हो गया है । वल पूर्वक उस ने हम सबको निरस्त करके हमारे देशों को स्वय ही ग्रहण कर लिया है । ३८। हम लोग जहां तहां पर स्थित हैं वह हमको दिन-रात वाघा दिया करता है। हम लोग मागे हुए हैं और सभी दिशाओ मे तारक को ही देखा करते हैं । ६६। अग्नि-यम-वरुण-निऋति-वायु और मनुष्य धर्म वाला सव परिक्रो से युक्त है ॥७॥ एते तेनादिता ब्रह्मन् देवास्तस्य॑व शासनात् । अनिच्छाकार्यनिरताः सर्वे तस्यानुजीविनः ।।७१ या देववनिताः स्वर्ग ये चाप्यसरसा गणाः । तान् सर्वानग्रहीद् दैत्य सार लोकेपु यच्च यत् ।७२ न यज्ञा. सप्रवर्तन्ते न तपस्यन्ति तापसाः। दानधर्मादिक किंचिद् न लोकेषु प्रवर्तते ॥७३ तस्य सेनापतिः पापः क्रौची नामास्ति दानवः । स पातालतलं गत्वा वाधतेहनिश प्रजाः ॥७४ तस्मात् तु तारकेणेदं सकल भुवनत्रयम् ।

८० [ वालिया पुराण हत सर्व जगत् नाहि पापात्तस्मात् पितामह ।।७५ वय च यत्र स्थास्यामस्तत्स्यान विनिदेशय । स्वस्थानाच्च्यावितास्तेन लोकनाथ जगद्गुरो ॥७६ त्व नो गतिश्च शास्ता च त्व नस्याता पिता प्रसू ! त्वमेव भुवनाना च स्थापक पालक कृती ॥७७ तस्माद् यावत्तारकाख्ये वह्नौ दग्धा प्रजापते । न भवामस्तथा कतु भवता युज्यतेऽधुना ।।७ हे ब्रह्मन । ये सब दव गण उसक द्वारा आदित हैं और उसके ही शासन से उसके ही अनुजीवी होकर उस के कार्यों म इच्छा न हाने पर भी निरत रहा करते है । ७१। जो स्वर्ग में देवा की वनिताये है और जो अप्सराओ के समुदाय है तथा जो भी लोको म सार पदार्थ है इन सबका तारक दैत्य ने ग्रहण कर लिया है । ७२। इस समय में न तो यज्ञ ही प्रवृत्त हो रहे है और न तापसगण तपश्चर्या ही किया करते हैं। तथा दान धर्म आदि कुछ भी लोको म प्रवृत्त नहीं हो रहे हैं। 1७३ । उसका सेनापति पापी फौज नाम वाला दानव है। वह पाताल के तल में जाकर प्रजा का रात दिन वाधा दिया करता है। ।७४ । हे पितामह | उम तारक ने यह सम्पूर्ण त्रिभुवन को हृत पर किया है । वह सम्पूर्ण जगत् उसी है हरण किया हुआ है। इस पापी से आप हमारा परित्राण करिए । ७५। हम लोग जहाँ पर जाकर स्थित रहेंग उम स्थान वो बतलाइए । हे लोक नाथ । आप तो जगत धे गुरु हैं उसके द्वारा हम सब लोग च्यावित कर दिये गये है अर्थात् स्थान से प्रष्ट कर दिये गय है । ७६ । आप ही हम लोगो की गति है-- मास्ता --आपही हमारे रक्षर पिता और प्रमून करने वाले हैं । आप ही भुवनी के स्थापन हैं-पालन करने वाले हैं और वृती हैं ।७७ । हे प्रजापते ! जब तक हम लोग तारण नाम वाली अग्नि में भस्म होकर दग्य न होवें अब आपको ऐसा ही करना समुचिय है । अर्थात् पैसा ही परने के लिए आप योग्य हैं ॥७८ ।

भगवान शिव का हिमवान में निवास ]
८१
सुगणा वचन श्रत्वा ब्रह्मलोके पितामह ।
प्रत्युवाच सुरान् मस्तित्वालमदृश वच Net
ममव वरदानेन तारवाथ्य समेधित ।
न मतस्तस्य मरण युज्यते विदिवोक्त ॥८०
युप्माकन्च प्रतीकार पर्तव्य प्रतिक्मणि ।
किन्तु मम्यक न शक्नोमि प्रतिक्तुं प्रचोदित ॥८१
तन्माद यथा तारकाख्य स्वयमेष्यति सक्षयम् ।
तथा यूय सविदध्वमुपदेशकरस्त्वहम् ॥८२
न मया तारको ध्यान तथा वनमालिना।
न हरेण तथा वध्यो नान्यरपि सुरंनरंः ॥८३
एप एव वरो दत्तो मया तस्मै तपस्यते ।
उपायश्चिन्तितश्चास्ति तत्तुर्वन्तु सुरोत्तमाः॥८४
मार्कण्डेय महपिन कहा-ब्रह्मलोक म पितामह ने सुरा के
इस वचन का श्रवण से उमी समय म उन समस्त मुरा से उस बाल
के ममान ही वचन उत्तर मे बोला था।।७६ ॥ ब्रह्माजी ने कहा-मेर
ही वरदान मे तारक नाम वाला समृद्ध हुआ है। हे देवगणो । अब
उसका मरण मुजस होना युक्त नहीं होता है । ८० आपका भी प्रती-
कार करना ही चाहिए क्योकि उसमा कम जैसा है वैसा ही प्रतीकार
होना भी चाहिए किन्तु मैं आपन द्वारा प्रेरित होकर मी भली भांति
पुछ भी प्रतिकार कर नही सकता हूँ ॥८१ ।। इस कारण से जैसे भी
तारक नामधारी स्वय ही मरेप को प्राप्त हो जायेगा वैमा साप लोग
मुहम समझ लेद में ता उपदश ही कर दन दाता हूँ ।।१२।। मेर द्वारा
तारक वध नहीं होगा अथात मुझस उमका वध नहीं होगा और वन.
माली प्रभु के द्वारा भी वह वध के योग्य नहीं होगा। न हर के द्वारा
तथा अन्य मुरी और मनुप्या के द्वारा वह मारा जा सकता है ।।३।।
उसका तपश्चर्या करते हुए यह ही दरदान मैन दे दिया था। है

. ८२ [ कालिया पुरण सुरोत्तमो ' इसका एक उपाय सोच लिया गया है उसे ही आप करिए ॥४॥ सती दाक्षायणी पूर्व त्यक्तदेहा स्वजन्मने । अगच्छन्मेनका देवी शैलराजस्य योपितम् ॥८५ ता समुत्पादयामास मेनकाजठरे गिरि । लक्ष्मीमिव पुरा ख्याता भृगु स्वतनयो मम ॥८६ तामवश्य महादेव कुर्यात् पाणिगृहीतिकाम् । यथा स नचिरातस्यामनुरक्तो भवेत् सुरा ८७ तथा विदध्व सुतरा तत्तेज प्रतिकर्तृ व तमूर्व रेतस शम्भु सैव प्रच्युतरेतसम् ॥८८ कर्तुं समर्था नान्यास्ति काचिदप्यवतापरा। तस्य तेजश्च्युत गच्च तस्माद् यो जायते सुत ॥८६ स एव तारकास्यस्य हन्ता नान्यस्तु विद्यते । सा सुता गिरिराजस्य साम्प्रत रूढयौवना ।।६० तपस्यन्त गिरिप्रस्थे नित्य पर्येपते हरम् । वाक्याद हिमवत सा तु काली नाम्ना निपेवते । सखिभ्या सह सर्वज्ञ ध्यानस्थ परमेश्वम् ॥६१ पूर्व सम्य म सनी दाक्षायणी ने देह का त्याग कर दिया था और अपने जन्म धारण करने के लिय शैराज को योपित मेनका देवी के यही गयी थी। ८५१ गिरिराग ने उसको मेनया उदर म समुत्पादित किया था। वह पहिले साक्षात् लक्ष्मी की ही भौति प्रसिद्ध हुई थी- भूगु मेरा ही अपना पुरा था।८६ । महादेव अवश्य ही उगवा पाणिग्रहण घर से गे। हे गुगे । जिस प्रकार में वह शीघ्र ही उसमे अनुराग परने वाले हा जावें।७। उसी भौति आप परे । उनवा तेज ही पाप गदा प्रतीवार परन वाला है। वे शम्भ भगवान उध्वं रेता हैं उनके बोयं मी प्रत वही वरन वाली है। उसी की ऐगी सामर्थ्य है भनशन निव का हिमवान निवाम ] हुमरी कोई भी अन्य अवला ऐमी शक्ति मालिनी नहीं है। उमका च्युन हुमा को तेज है उमने जो भी पुत्र उत्पन्न होगा RIVEN बह ही इस तारक नामक का हनन करने वाला है अन्य कोई भी नहीं है। वह गिरिराज को पुत्री इस समय मे ममारूद बौवन बाली अांत पूर्व युवती है।६०: मिरि के प्रस्य पर तपश्चर्या नित्य ही करने वाले उन भगवान् शम्भु की वह सेवा कर रही है। काली नाम वाली वह हिम- चान के वाश्य में ही अपनी सखियो के माय ध्यान में स्थित परमेश्वर मन की वह सेवा कर रही है ।।६१॥ तामग्रतो वर्तमाना निलोकवरणिनोम् । ध्यानासक्तो महादेवो मनसापि न चेच्छति ॥६२ यया ममीहते भार्या काली च चन्द्रशेखरः । तथा कुरुध्वं विदशा नचिरादेव यत्नत. १३ स्वस्थान भवता स्वर्गस्तस्मात् तारकमप्यहम् । निवर्तयिप्ये सगम्य गच्छध्व विगतज्वराः ॥६४ इत्युक्त्वा सवंलोरेशस्तारकाख्यमुपस्थितः । उपमगम्य वचन ममामाप्येदमब्रवीत् ॥६५ भो भो तारक मा स्वराज्य त्वं परिशाधि भोः । तदयं न तपन्तप्त ममये भवता पुरा १६ वरी नापि मया दत्तो न मया स्वर्गगजता। तस्मात म्वर्ग परित्यज्य क्षिती राज्य समाचर 18 देवभोग्यानि नव मम्मनिप्यन्ति तेऽमुर । इत्युक्त्वा मवलोशनवान्तरधीयत ॥३८ अपने आगे विद्यमान रहने वाली तीनो लोको में घर बपिनी सध्यान में ममामक्त महादेव मन में भी नहीं चाहते हैं ॥३२॥ चन्द्र- मेयर जिम रोनि में भी उग वाली वो बानी मायां बनाना चाहे हे देरमा ! आर लोग वैमा ही पलपूर्वक मोनही करें॥३३॥ आप ८४ | कालिका पुराण लोगो का स्वर्ग अपना स्थान है। उससे मैं तारक को भी निवृत्त कर दूंगा। मैं उसके साथ सङ्गत होऊँगा । आप लोगदुखा से रहित होकर ही यहां से गमन कीजिए 11 ६४ ॥ इतना कहकर सब लोको के स्वामी तारक नामक दैत्य के पास उपस्थित हुए थे। उसके समीप में जाकर यह वचन का सम्भाषण करके उन्होने कहा था '६५।। हे तारक ! आप स्वर्ग के राज्य का शासन न करें। उसके लिये आपने पहिले तपस्या नहीं की थी 1 ६६॥ मैंने भी ऐसा वरदान नहीं दिया था कि मेरे द्वारा आप स्वर्ग के राजा होवें । इस कारण से स्वर्ग का परित्याग करके भूमि पर ही राज्य के शासन को करे ॥ ६७ ।। हे अमुर ! देवो के योग्य भोगो का उपभोग करने के लिये आपको वही पर भूमि में सब पदार्थ प्राप्त होगे। इतना कहकर सब लोको के स्वामी ब्रह्माजी वही पर अन्तर्धान हा गये थे ॥६८॥ स तारक परित्यज्य स्वर्ग क्षितिमथाभ्ययात् । तत्रैव सस्थितो देवान् वाधते स्म स नित्यशः। इन्द्र करप्रद चक्रे निदेशरय महावलम् ॥६६ तमिन्द्र. सतत देवभोग्यानि वितरन् मुह । सेवमान. क्षमो नाभूत् सन्तोपयितुमीश्वरम् ।।१०० एव तेनादिता देवा मन्यना परिपीडिता. । विधातुरुपदेशन यत्न चक हरान्वये ।।१०१ तत इन्द्रोन्य गुरुणा सगम्य कृतनिश्चय. । पुसुमे समाहूय वचन चेदमग्रवीत् ॥१०२ त्वयद पाल्यते विश्व त्वया विश्व प्रमूयते । त्य ग्रह्मविष्णुराणा प्रीतिहेतु पुरा भव. ॥१०३ ग्रह्मा प्रीत्या यथा पूर्वमगणाच्चरितग्रताम् । सावित्री माधवो लक्ष्मी मती दाक्षायणी हर. 11१०४ भगवान शिव का निमवान में निवास । ८५ ता प्रीतये पुरा तेपा देवेशाना यथा कृता। तथैव कुरु मे प्रीति काम प्राणभृता सदा ॥१०५ वह तारद भी स्वर्ग का परित्याग करके इमरे उपरान्त भूमि पर ममागत हो गया था। वहां पर ही मस्थित होकर वह नित्य ही देवों को वाधित क्या करता था। उसने इन्द्र को कर देने वाला बना दिया था और उम महान वनवान् को अपने निदेश में स्थित पर दिया था ॥६६॥ इन्द्रदेव यको निरन्तर देवो के भोगने योग्य पदार्थों को मपित करते हुए भी मेवा करके उम ईश्वर को सन्तुष्ट करने में ममय नहीं हुआ था । १०० ॥ इम रीति मे उम द्वारा उत्पीडित हुए और क्रोध मे परिपीडिन होते हुए देवो ने विधाता उपदेश से भगवान शम्भ के वश मे यत्न किया था। अशम्भु को मुनोत्पत्ति हो जावे- इस कार्य के सम्पादन करने में प्रयनशील देवगण हो गये थे ।। १०१॥ इसके अनन्तर इन्द्रदेव गुरुदेव के माय मगन होकर ऐमा निश्चय कर लिया था कि शम्भु को सुतोत्पत्ति के लिये उद्यत निया जावे । इन्द्र ने कामदेव को बुला पर उममे यह वचन कहा था ॥१०२॥ इन्द्र देव न कहा-आपके द्वारा इस विश्व की प्रमूति की जाती है और आपत्रे हा द्वारा विश्व का पालन किया जाता है। पहिले आपही ब्रह्मा-विष्णु और न्द्र को प्रीति का हेतु हुए थे । १०३ । ब्रह्मानी ने पहिले समय म प्रीति में जिस प्रकार में चरित व्रत वाली मावित्री का ग्रहण पर लिया था। भगवान माधव ने लक्ष्मी का ग्रहण दिया था और भगवान हर ने दाक्षायणी या ग्रहण कर लिया था ॥१०॥ पहिले समय मे देवेशो की प्रीति पे लिये जमे उनको कर दिया या उमी भांति मेरी भी प्रीति अब करिए। आप तो सदा ही प्राण धारियों की प्रीति में करने वाले रहे हैं ॥१०॥ न त्व न कास्यचित् स्वर्ग पाताले वाथ भूतले । प्रिय प्राणमत्ता पान मतन जपता मन ॥१०६ [ कालिया पुराण देवदानवयक्षाणा रक्षमा मानुषस्य च । त्व पालकाश्च कर्ता च हृदये च प्रवर्तसे ॥१०७ तस्मात् त्व सर्वजगता हिताय बुर चेप्ठितम् । देवदानवयक्षाणा मानुपाणा महात्मनाम् ॥१०८ एतच्छ् त्वा वचस्तस्य शदस्य मकरध्वज । देवराजमुवाचेद सुप्रीतस्तद्वचोऽमृत ॥१०६ यत्राहमोशिता चन तत्कर्म विदित त्वया । तस्मान्ममोचित शक्य करिप्ये तन्निदेशय ॥११० पचैव वाणा मृदवस्ते च पुप्पमया मम । चापस्तथा पुष्पमय शिजिमी भ्रमरात्मिका ॥१११ रतिमें दयिता जाया वसन्त सचिवो मम । यता मलयजो वायुमित्र मम मुधानिधि ॥११२ हे काम । आप स्वर्ग-पाताल और भू मण्डल में किमके प्रिय नही है । आप जगन के प्राण धारियो का सभी का अभिमत हैं ॥१०॥ देव-दानव---यक्ष-राक्षम और मनुष्यो वे आप पालक तथा कर्ता हैं और आप सभी के हृदय में प्रवृत्त रहा करते है ।।१०७।। इसी कारण मे आप अव सम्पूर्ण जगतो के हित के सम्पादन करने के लिये विशेष चेष्टित कीजिये । इममे देव-दानव-यक्ष और महात्मा तथा मनुष्यो का हित हो वही करिए ॥१०८।। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-मवर ध्वज ने यह इन्द्र का वचन श्रवण करके उसके वचन रूपी अमृतो से पहुत ही प्रसन्न होकर देव राज मे यह वचन कहा था ॥१०६। जहाँ मेरी ईश्ता है । हे शक्र | वह कर्म आपको ज्ञात ही है इस कारण से मेरे लायर किये जाने के योग्य जो मैं कर सकता हू उसे मैं करूंगा। आप इसका निदेश कीजिये 1१००। मेरे पांच ही वाण है जो बहुत ही योमर पुष्पमय हैं । मेरा चाप भी पुप्पो मे ही पूरिपूर्ण है और उस पाप की डोरी भ्रमरा के सप वाली ही है ॥१११॥ रति मेरी प्यारी

भगवान शिव का हिमवार में निवास 1
८७
जाया है । वम त मेरा सचिव है । मनय से मम्भूत वायु मन्ता है और
मेरा मित्र सुधानिधि चन्द्रमा है ११२॥
सेनाधिपो मे शृगारो हावा भावाश्च सैनिका ।
सर्वे मे मृदवो रा अह चापि नथाविध ॥११३
यद् येन यज्यते कार्य धीमास्तत्तेन योजयेत् ।
मम योग्य तु यत् कर्म तस्मातस्मिन नियोजय ॥११४
यन कारयितुमिच्छामि भवता तन्मनोभव ।
तत्ते समुचित कर्म तस्मिन् परिवृतो भवान् ।।११५
कृतकर्मापि तव व कृती चापि मनोभव ।
त्वदन्यै किन्तु दु साध्य तत्त्वा तन्न नितोजये ॥११६
थू यते हि तपस्यन्त ध्यानस्थ वृपभध्वजम् ।
गिरेहिमव प्रस्थे निराकाक्ष वधूकृती ।।११६
त पितुर्वचनात् काली तपस्यन्त निपेवते ।
सखिम्या सहिता नित्य हरस्यानुमतेऽधुना ॥११७
आस्ढयौवना ता तु स्त्रीरत्नमपि सुन्दरीम् ।
ध्यानासक्तो महादेवो नेहते मनसापि च ॥११८
सानुरागो यथा तस्या जायते वृपभध्वज ।
तथा विधत्स्व देवाना हिताय जगतामपि ॥११६
मेरो सेना का अधिप शृङ्गार है और हाव तथा भाव मेरे सैनिक
हैं। ये सभी मेरे सहयोगी क्रूरता से रहित और कोमल हैं और मैं भी
वैग ही मृदु हूँ । ११३। जिसके द्वारा जो भी कार्य युक्त होता है आप
तो धीमान हैं उमी यो उसमे योजित कर दीजिये। मेरे करने का जो
भी ममुचित कार्य हो उमका भी नियोजन कीजिय ॥११॥ इन्द्र देव
न महा-जिम कराने को मैं इच्छा कर रहा हूँ है मनोभव । आपमे
ना भी मराना चाहता है । यह आपका समुचित मं है । उसम आप
परिवृत है ।।११५॥ आप उमम त सा है अर्थात आपको उस

[ पालिका पुराण
का अनुभव है। हे मनोभव आप कृती हैं। आपको छोड़ कर अन्यो से
वह कर्म दुस्साध्य है। इसी से मैं आपका नियोजन करता हू । ११६ |
सह सुना जा रहा है कि हिमालय के प्रस्थ मे वृषभध्वज तपश्चर्या करने
बाले-ध्यान मे स्थित हैं और यधू के लिये वे काङ्क्षा मे रहित हैं ।
। ११७ । उन शम्भु को पिता के बचन से काली सखियों के सहित
वे
नित्य ही हर की अनुमति मे होरर अब सेवा किया करती है ।
शम्भु तपश्चर्या कर रहे हैं 1११७। यद्यपि वह समारूढ यौवन वाली
युवती है-स्त्रियो मे रत्न के समान परम दिव्य है और अत्यधिक सुन्दरी
भी है किन्तु महादेव ध्यान में ऐसे आसक्त हैं कि उमको मन में भी
नहीं चाहते हैं । ११८ । जिस रीति से भी भगवान् वृपध्वज उसमे
अनुगग करने वाले हो जावे गैसा ही आप कार्य करिये। इसमे
देवो का और जगतो का परम हित है यही जान कर आप ऐमा
सह सत्या यथा रेमे सानुरागो वपध्वज ।
तथतया गिरिजया रमता तत्कृतेन वै ।।१२०
तम्या कृते तु यत्तेज प्रच्युत यद् हरस्य वै ।
ततो यो जायते सोऽस्मारस्तारकादुद्धरिष्यति ॥१२१
तत स देवराज्स्य वच श्रुत्वा मनोभव ।
प्राप्तकाल च मस्मार शाप ब्रह्मकृत पुरा ॥१२२
सन्ध्या प्रतिविधातार यदा शस्त्र परीक्षितम् ।
कामोऽहनन पुष्पणस्तदा तमशपद्विधि ॥१२३
शम्भुनेवाग्निदग्धस्त्व भविष्यसि द्विजोत्तमा ।
यदा पुर्याद् गिरिसुता हर पारिणगृहोतिकाम् ॥१२४
तदा भवान् शरीरेणागमिप्यति समग्रताम् ।
इति स्मृत्वा विधे शाप भीतोऽपि मकरध्वज ॥१२५
अगीच गावाक्यान कात्या योजयितु हरम् ।
इद च वचन प्रोचे तत्वालसदृश पुन ।।१२६
बरे ॥११॥1

भगवान शिव का हिमवान मे निवास ] ८६ वृषभ ध्वज सती के साथ जिस प्रकार से भी उस सती के माथ अनुराम बाले होकर रमण परे । उनके करने मे इस गिरिजा के साथ रमण में तत्पर होवें वैसा ही करे । १२०१ उमके रमण करने पर हर का जो तेज प्रच्युत होगा और उसमे जो भी पुत्र समुत्पन्न होगा वही हमारा इस तारक से उद्धार करेगा । १२१। मार्कण्डेय मुनि ने कहा- इसके अनन्तर कामदेव ने देव राज के वचन का श्रवण करके पहिले ब्रह्माजी के दिये हुए शाप का काल प्राप्त हो गया है-यह स्मरण पिया था । १२२। मध्या करने वाले विधाता पर जिम समय में अपने शस्त्र की परीक्षा की थी उम ममय मे कामदेव ने पुष्प के वाणो मे प्रहार किया था और उमी अवसर पर विधाता ने उसको शाप दे दिया था ॥२३॥ हे द्विजोत्तो विफाता ने कहा कि तू शम्भु के नेत्र की अग्नि से विदग्ध हो जायगा । जिस समय मे भगवान हर गिरि की पुत्री को पाणि प्रणीता भार्या करेगे उमी ममय में आप शरीर के द्वारा मम्पूर्णता को प्राप्त कर ले गे। इस विधाता के शाप का स्मरण करके भयभीत भी वामदेव ने शक के वचन मे हर को काली के साथ योजित कर देने के कार्य को स्वीकार पर लिया था। और फिर उस कार के महश कायदेव ने यह वचन कहा था ॥१२६॥ करिप्ये तद्वच शक हर सगमयाम्यहम् । काल्या गिरिजया साध दाक्षायण्या यथा पुरा ।।१२७ किन्त्वेक मम साहाय्य कर्ता त्व हरमोहने । यदा सन्मोहनेनाह हर सन्मोहयामि च ।।१२८ तदा कुरु सहाय त्व स्वस्थमायाययस्व माम् । प्रविश्याह सुरभिणा न चिराच्छवराथमम् ॥१२६ विधाय पूर्व मनमो विचार हपंगेन तु । समोहनेन सुदेढ मोहयिप्ये वृपध्वजम् ।।१३० म्मरिप्यसि त्व मम्प्राप्ते काले मा मम पालने ।

[पालिषा पुराण अह गच्छामि सहित तत्वतुं बलमूदन ।।१३१ इत्युक्त्वा स जगामाथ मदन शंकराथमम् । शकोऽपि निदशान् सर्वानिदमाह वचस्तदा ।।१३२ यूय कुरध्व साहाय्य यत्र याति मनोभव । तत्र तत्रानुगम्यव समये मा च बोधत ।।१३३ मदन ने कहा-हे इन्द्र देव । मैं आपके वचन यो पर्ण वर गा और गिरिजा वाली के साथ भगवान् शन्भु यो मङ्गन पर दूंगा जमा कि पहिले दाक्षायणी के साथ किया था ।।१३७।। किन्तु इम शम्भु के मोहन करने मे आप मेरी एक सहायता करने वाले होगे । जिस समय मे मैं सम्मोहन के द्वारा हर का सम्मोहन कर उस अवमर पर आप मेरी सहायता करे और स्वस्थ मुझयो जाप्यायित करें। मैं सुरभि के द्वारा प्रवेश करके अर्थात् शङ्कर के आश्रम म शीघ्र ही प्रविष्ट होकर सर्व प्रथम दर्पण के द्वारा मन में विकार समुत्पन्न करके फिर मम्मोहन वे द्वारा दृढना से बृपध्वज को मोहित कर दूंगा ॥१२-१३०॥ आप काल के प्राप्त होने पर मेरा स्मरण करो और मेरा पालनका ध्यान रक्खोगे। हे वल सूदन | वह कार्य करने के लिये मैं सहित जाता है ॥१३१॥ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- इतना कहकर वह कामदेव शङ्कर के आश्रम मे गमन कर गया था। इन्द्र ने भी उस अवसर पर सब देवो से यह कहा था कि जहाँ पर वाम देव जाता है वहाँ पर आप लोग इसकी सहायता करे । वहाँ-वहाँ पर अनुगमन करके समय पर मुझको बनायोग ।।१३३॥ यदा समोहनेनाय समोहयति शकरम् । तदामपि यास्यामि तत्र वोधत मा सुरा ॥१३४ इत्युक्तास्तेन शरण देवा जग्मुमनोभवम् । सोऽपि गत्वा यत्र हरो गगावतरणे गिरे । हिमभाऽरभृत सानो सुरनि च न्ययोजयत् ।।१३५ भगवान शिव का हिमवान में निवाम ] ६१ ततस्तत्र गते सम्यकसुरभो तस्य लक्षणम् । अभवनचिरादेव तस्नुल्मलतासु च ।।१३६ पुप्पिना किंशुकास्तत्र मजुला देतास्तथा । सरासि च पद्मानि मविकाराच जन्तव. ॥१३७ ववौ वायुश्च गम्भीरो गधिल पुप्परेणुभिः । शनं शनं मुखकर कर्पयन स हि मानसम् ॥१३८ पक्षिणश्च मृगाश्चैव ये चान्ये प्राणधारिण । सिद्धाश्च किन्नराश्चंव द्वन्द्वभाव वितेनिरे ॥१३६ चूता कुनुमिता-नत्र नवस्तवकभूपिता । अशोका पाटलाश्चैव नागकेशरकारुणा ॥१४० जिम समय म मम्मोहन के द्वारा यह कामदेव भगवान् शकर का मम्मोदन करता है । हे मुरगणो । उस समय में मैं भी वहां पर जाऊंगा-ऐमा मुझको जान लो ॥१३४॥ इस प्रकार से इन्द्रदेव के द्वारा कहे गये देवगण मनोभुव अर्थात् कामदेव के पास चले गये थे। वह कामदेव भी गमन कर गया था जहां पर गम्म गिरि के गङ्गावतरण स्थल मे हिमालय के शिखर पर थे उसने मुर्गम को नियोजित पर दिया था ।। १३५ ।। इसके अनन्नर सुरभि वे वहां पर पहुंचने पर जिसका कि यह लक्षण था कि शीघ्र ही भली भानि तम्-लता और गुल्मो मे पुष्प खिल गये थे। वहां पर विशु विवामित थे और मन्जुन तक भी पुष्पित हो गये थे। सभी मरोवर खिले हुए पद्मो से शोभाय- मान हो गये थे तथा सभी जन्तुआ को विकार हो गया था । १३६-~- १३७ ।। उस समय म मुगन्धित वायु वहन करने लगी थी जिसमें पुप्पा के रेणु सम्मिलित थे। जो धीर धीर मुखकर होकर मन को वर्पित कर रहा था ॥१३॥ ममी पक्षी गण-मृगवगं बौर जो भी प्राण धारी जीव थे और मिद्ध एव किन्नरगण ने द्वन्द्व भाव दो विस्तृत किया था अर्याद मभी प्राणी अपनी प्रियाओं के साथ रहने लगे ६२ [ कालिका पुराण ॥१३६॥ आम्रो म वौर आगये थे और वे नूतन वौरी के स्तवको (गुच्छो) से भूपित हो गये थे। अशोक पाटल और नाग केशर कारुण सभी विकार से समन्वित थे ॥१४॥ सविकारा गणाश्चामन् शकरस्य तदा द्विजा । प्रत्यक्षतो ययुस्तेऽपि विकार शम्भुसाध्वसात् ॥१४१ भ्रमन्ति स्म तदा तत्र भ्रमरा कुसुमोद्भवम् । पिवन्तो वहुशश्च्युत गुञ्जन सह जायया ॥१४२ एव प्रवृत्ते सुरभी शृंगारोऽपि गणे सह । हावभावयुतस्तत्र प्रविवेश हरान्तिकम् ॥१४३ मदन सगरणस्तन निवसचिरमेव हि । न दृष्टवास्तदा शम्भोश्छिद्र येन प्रवेक्ष्यति ।।१४४ यदा च प्राप्तविवरस्तदा भयविमोहित । नाग्रेसरोऽभवत् तस्य मदनो रतिवारित ।।१४५ एव यातस्तस्य काल प्रभृतो द्विजसत्तमा । निम्पयन न वा चाप छिद्र तस्य यतेस्तदा ।।१४६ ज्वलत्कालाग्निसकाश भानुलक्षममप्रभम् । ध्यानस्थ शकर को वा समासादयितु क्षम ॥१४७ है दिजो । भगवान शम्भु के गण भी विचार युक्त होकर प्रत्यक्ष में ये भी विचार व से हो गय थे विन्तु शम्भु के भय मे इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे । उम अवगर वहाँ पर भ्रमर कुमुमो से उद्भून रग या पाल बने हुए जो अत्यधिर च्युत हो रहा था अपनी जाया के माथ गुजार वरन गरे | ।।१४१।१४२॥ इस प्रकार से गुरभि प प्रवृत्त जान पर शृङ्गा भी अपने गणो ये माय हाव-भायो में रायुन छोपर उगने भी हर गमोप म प्रवेश दिया था ॥१४३॥ यहाँ पर पामदेव तो अपा गणा में महित चिपवार निवास परने याला हो गया था। उस समय म उगने कोई भी गारि गम्भु में नहीं देगा

भगवान शिव का हिमवान म निवास ]
था जिसके द्वारा वह प्रवेश वर जावे ॥१४४|| जिस समय में उसने
छिद्र प्राप्त किया था उस समय में वह भय से विमोहित हा गया था
मदन आगे गमन करने वाला नहीं हुआ था क्योकि उस पत्नी रति क
द्वारा वह वारित कर दिया गया था ॥१४॥ हे द्विज सत्तमो । इस
प्रकार से उसको बहुत-सा समय व्यतीत हो गया था। उस समय में
उन मति शम्भु का छिद्र का देखते हुए भी उसने कोई भी छिद्र नहीं
प्राप्त किया था ॥१४६॥ प्रज्वलित कालाग्नि सदृश और लापा सूर्यो
के समान प्रभा वाले ध्यान में स्थित भगवान् शङ्कर के पास पहुचन
के लिय कोन समय था। अर्थात् किसी की भी ऐसी शक्ति नहीं
थी ।।१४७॥
अर्थकदा गिरिसुता काली नस्याभवत्पुर ।
कृत्वा परीष्टि कर्ता सखिभ्या प्रणता स्थिता ।।१४८
शकरोऽपि तदा ध्यान त्यक्त्वा तत् क्षणमास्थित ।
योजयन् स्वगणान् कृत्ये ज्यातिश्चिन्तारिजित ॥१४६
तच्छिद्र प्राप्य मदन प्रथम हपर्णन तु।
वाणेन हपयामास पार्श्वस्थ चन्द्रशेखरम् ।।१५०
शृङ्गारश्च तदा भावविश्च सहितो हरम् ।
जगाम कामसाहाय्य कुर्वन् सुरभिणा सह ।।१५१
हर्षणेनातिहपिन शृङ्गाराधनिपेवित ।
शकरो वदन काल्या साकूत सव्यलोकयत् ॥१५२
तत् प्राप्य विवर काम पुष्प चापे न्ययोजयत् ।
समोहन पुप्पवृत पुप्पमालाविवपितम् ॥१५३
तदाभूद् दक्षिणे पार्वे रति प्रीतिस्तु वामत ।
पृष्ठे वसन्ततूणीर पौप्पमादाय सुन्दर ॥१५४
इसके अनन्तर एक बार गिरि की पुत्री काली उनके सामने हुई
थी जो करने के योग्य मेवा थी उस करके वह सखियो के साथ प्रणत

[ बालिका पुगण होर स्थित हो गई थी ॥१४८॥ भगवान् शङ्कर भी उस अवसर पर अपने ध्यान का त्याग करके उसी क्षण में समास्थित हुए थे। इत्य म अपने गणों को योजित करते हुए वे ज्यातिस्वरूप चिन्ता से रहित थ ॥१४६ कामदेव ने वही छिद्र प्राप्त करके सबसे प्रथम हर्षण वाण के द्वारा पार्श्व में स्थित शम्भु को हर्पित किया था ||१५०॥ और शृङ्गार भी हाव-भावो के सहित होकर वह शङ्कर के समीप गया था । वह शृङ्गार सुरभि के साथ मे कामदेव की सहायता कर रहा था ॥१५१॥ हाण वाण के द्वारा वे अति हपित होते हुए शृङ्गार आदि के द्वारा निपवित हुए थे भगवान् शङ्कर ने विशेष अभिप्राय के सहित कालो के मुख को अच्छी तरह से अवलोक्ति किया था ॥ १५२ ।। कामदेव उसी छिद्र को प्राप्त करके पुष्प को चाप म नियोजित किया था। पुष्प से वृत तथा पुष्प माला से रहित सम्मोहन को छोडा या ११५३ 1 उम समय म उसके दक्षिण पार्श्व में रति थी और वाम म प्रीति थी। पीछे की ओर सुन्दर वमन्त तूणीर और पौप्य का रामादान करके स्पिन था ॥१५४॥ आरणपूरित पुष्प चापमाकृप्य सयत । यदा मनोभयो वायुस्तदा त समुपेयिवान् ॥१५५ सहिते पुप्पयाण तु गिरिजा चन्द्रशेखर । जातेन्द्रियविकार सन् जिघृक्षु सगमेऽभवत् ॥१५६ 4मरा शत्साहितास्तदा सर्वे वियद्गवता । मभ्य मनोभव मेने मुरपृत्ने रियशितम् ॥१५७ अथ मस्मृत्य सयम्य निगृह्य विकृति तदा। इन्द्रियस्य महादेव सहरोद व्यचिन्तयत् ॥१५८ योनिजा गिरिजा वाली तपोग्रतविवजिताम् । पथ गगमयामोह धतुमिच्छामि हठार ॥१५६ तपोवनपदिवागी तपश्चरणसत्यताम् । म्वयमेर ग्रहीप्यामि गरी दाक्षायणीमिय ॥१६० भगवान शिव का ह्मिवान मे निवारा ] कथ विकृतकामोऽहमनिच्छन्निव साम्प्रतम् । केनापि चाकृष्ट इव चिकीर्ष सगमोद्भवम् ।।१६१ जिम ममय में कामदेव ने मयत होकर पुन चाप को कानो नव खींच कर प्रस्नु तथा उमी समय मे उसके ममीप म वायु ममुपस्थित हो गया था। पुष्य वाण के महित होने पर चन्द्र शेखर प्रभु ने गिरिजा का अवलोकन किया था और इन्द्रिय के विकार समुत्पन्न होने वाले होकर सगम के लिये प्रण करन की इच्छा वाल वे हो गये थे । १५६ ॥ इन्द्र के सहित सब देवगण उस अवसर पर आकाश में स्थित थे। उन्होंने कामदेव का परम सम्य माना था क्योकि वह देवो के कृत्य म निशित हो रहा था । १५७। इसके मनन्तर महादेव जी ने सस्मरण करके और उस यवमर पर मानसिक विकार को रोस्कर जो दि इन्द्रिय का हुमा था उन्होन तुरन्त ही यह चिन्तन दिया था । १५८ । गिरिजा यह काली योनिजा है और तपोवन से रहित मैं वल पूर्वक इसको पकडने को कैसे इच्छा कर रहा हूँ और क्यो मगम की कामना वाला होगया हूँ 1 १५६ । तप के व्रत में पवित्र जगी वाली और तप के समाचरण से मंस्कृत सती को दाक्षायणी की ही भाति मैं स्वय ही प्रण कर लूगा । । १६० । मैं इस समय म इच्छा न रखने हुए भी विकार में वासना वाला हो गया है। मैं विमी के द्वाग मगमोद्भव की करन को इच्छा वाले स समाकृष्ट सा हा गया हूँ॥१६१॥ एव विकारहेतु स निश्चिन्वन्निन्द्रियस्य तु । पुरोवलोक्यामास सहितेषु मनोभवम् ।।१६२ एतस्मिन्नन्नरे ब्रह्मा विज्ञानसमय मुरान् । दृष्ट्वा स्थानादाजगाम तत्समाजमनुग्रहात् ।।१६३ तत स कुपितो दृष्ट्वा सन्धितेषु मनोभवम् । जज्वाल ज्वलनप्रख्यम्त दिधक्षु प्रसह्य तु ।।१६४ कामोन्य समय ज्ञात्वा मा मोहयितुमिच्छति । युक्त वाम [ वालिका पुराण मनो मे रववश क्तुं तनयामि यमक्षयम् ॥१६५ एव विचिन्तमानस्य नेत्रोद्भाविततेजसा । वर्धतो ज्वलनो भूत्वा शोध नेत्रान् समज ह ।।१६६ त क्रोधान्नि सरिप्यन्त जातवेद स्वरूपिणम् । जात्वा कामस्य तान् वाणान् पोप्पचापनिपण्णयान ।।१६७ शक्ति प्राणास्तथात्मानमाकृप्यापालयविधि । उत्सारयामास तदा वसन्त स पितामह ॥१६८ इस प्रकार मे इन्द्रिय के विकार क हतु की खोज करत हुए हुए उन्होने अपने सामन वाण वो सहित विये हए वामदेव को देखा था ।। १६२ ॥ इसी बीच म ब्रह्माजी समय को विज्ञात करके सुरो को देखार अनुग्रह से अपने स्थान से उस समान में ममागत हो गय थ ॥१६३।। इसके अनन्तर कण का स धान किये हुए कामदेव को देखकर चे शम्भु अधिक कुपित हो गये थे। वे अग्नि के समाज ही प्रज्वलित हो गरे थे और उसको बल पूवर दग्ध कर दने की इच्छा वाले हो गये थे ।।१६४१ यह काम ममय का ज्ञान भरने मुझको मोहित करने की इच्छा करता है-मेरे मनको अपने वश में करना चाहता है इसलिय इसको यम भय को पहुंचाता हूँ ।। १६५ ।। इस प्रकार से चिन्तन करत हुए भगवान् शम्भु के नेत्र स उद्भावित तेज से जो कि बढ रहा था अग्नि होकर नेत्र से क्रोध की उत्पत्ति की थी ॥ १६६ ।। क्रोध स निक्लने वाली जात वेदा के स्वरूप वाली का ज्ञान प्राप्त करके कामदेव पुरुषो के भाव को निष्गण कामदेव के वाणो को जान करके शक्ति का, प्राणा को तथा आत्मा वा आकपण करके विधाता न पालन किया था और उस पित मइ ने उस समय मै बम न को उत्साहित किया था ।।१६८॥ निजशक्त्या तदा शम्भुनोधाद्रक्षन्मनोभवम् । अथाकाशगता देया बुद्ध दृष्टवा महेश्वरम् ॥१६६

भगवान शिव का हिमवार म निवास ]
प्रसीद जगता नाथ कामे क्रोध परित्यज।
स्दया पुरा सृष्ट शम्भुरूपण कमया ॥१७०
यन चायोजित कम तत्करोति मनोभव ।
तस्मात् त्व मदन शम्मो प्रोधाग्निमुपसहर ॥१७१
प्रसीद सवभूतेश भक्त्या त्वा प्रणा वयम् ।
इति स्म वदता तेपाममराणा तदानल ॥१७२
लालटचक्षु सम्भूता भस्माकामिनोभवम् ।
दग्ध्वा काम तदा वहिलालामालातिदीपित ॥१७३
सस्तम्भितोऽथ विधिना हर गन्तु शशाक न ।
महादेवाऽपि तदभस्म मनोभवशरीरजम ॥१७४
आदाय सवगानपु भूतिलप तदाकरोत् ।
लेपशेषाणि भस्मानि समादाय तदा हर ॥१७५
उस समय म अपनी शाक्त के द्वारा कामदव का शम्भु के क्रोध
स रक्षित करत हुए महश्वर का क्रोधित दखकर दवगण जो आवाश म
स्थित थे उन्होंन प्रायना को यी कि हे जगता के नाथ । प्रमन्न हाइए
और कामदेव पर काध का त्याग कर दीजिए। जिस प्रकार स पहिल
आपन शम्मु रूप कम क द्वारा स्तन किया था और जिसन कम का
मायाजत किया था उसी को कामदव कर रहा है । इस कारण सह
शम्भो । कामदेव पर जा आपका क्राधााग्न है उसका उपसहार करिए
॥१६६-१७१॥ ह रामस्त भूतो क स्वामिन ' आप पसन्न हा जाइय ।
हम लाग व हा भक्ति के भाव स आपक चरणाम प्रगत हुए हैं। इस
भांति वै दवगण कह रह थे कि उना कहत हुबो क सामन ही शम्भु क
ललाट की चक्षु स समुद्भूत बनल न कामदेव को भस्म कर दिया था।
॥१७२॥ ज्वालाआ मालाआ स अत्यन्त दीप्त उस वह्नि न काम
देव को दग्ध कर दिया था और वह फिर हर के समीप नहीं जा सका
या। महादेव जी ने भी कामदेव के शरीर से समुत्पन उस भस्म को
लकर अपन समस्त अङ्गा में उसी ममय म भूति का लेप कर लिया था ।

६८
[ वानिका पुराण
11१७३॥१७॥ जो लेपन करने स बची हुइ भस्म थी उसका हर न
आदान कर लिया था ।१७५॥
सगणोऽन्तदधे काली विहाय विधिसम्मते ।
ब्रह्मा क्रोधानल शम्भोदहन्त सकलान् सुरान् ॥१७६
वडवारूपिण चक्र देवाना पुरतस्यदा।
वडवा ता तदा देवा सौम्या ज्वालामुखी शुभाम् ॥१७७
दृष्ट्वा निर्विघ्न मनसो वभूवु पूर्वपीडिता ।
वडवा ता समादाय तदा ज्वालामुखी विधि ॥१७८
सागर प्रययौ लोक हिताय जगतापति ।
गत्वाथ सागर ब्रह्मा प्रोवाच परिपूजित ॥१७६
यथावत्तेन विप्रेन्द्रा समय च निवेदयन् ।
अय क्रोधो महेशस्य वडवारूपधृक त्वया ॥१८०
ज्वालामुख सदा धार्यो यावन्न विनयाम्यहम ।
यदा त्वामहमागम्य वदामि सरिता पते ॥१८१
तदा त्वया परित्याज्य क्रोधोऽय वडवामुख ।
भोजन भवतस्तोयमेतस्य तु भविष्यति ॥१८२
विधाता के द्वारा सम्मत होने पर शम्भु काली को त्याग कर
गणो के सहित अतर्धान हो गये थे और ब्रह्माजी ने समस्त देवो को
दहन करने वाली शम्भु को क्रोध की अग्नि को बडवा का रूप वाली
देवों के आगे हो उग समय मे कर दिया था। उस अवसर पर देवी ने
सौम्य-गुम ज्वालामुखी बडवा को देखकर पूर्व पीडित देवगण निविघ्न
मन वाल हो गय थे । उसी समय में विधाना ने उस ज्वालामुखी बडवा
यो ग्रहण करखे जगता के स्वामी लोको के हित के लिये सागर में चले
गय थे। ब्रह्माजी सागर पर गमन करके वहाँ परिपूजित हाते हुए बोले
५।१७६-१७६॥ हे विप्रैटो ! पथा रीति उन्होंने समय का निवेदन
परत ए नि मह महश का प्रोध वादा का स्वरूप धारण करने वाला

भगवान शिव का हिमवान में निवास ]
होवे और तुमको जब तर मैं विनय न कहं तव तक ज्वालामुख होकर
मदा कार्य करना चाहिए । हे सरिताओ के स्वामिन् । जिस समय में
मैं समागत होकर कहूँ उस ममय मे इस बड़वा मुख क्रोध का आपको
परित्याग करना चाहिए । आपका जल ही इसका भोजन होगा अर्थात
यह आपके जल को ही अपना आहार करेगा ।। १८०-१८२॥
यत्नादेवं विधार्योऽय यथा नो याति चान्तरम् ।
इत्युक्तो ब्रह्मणा सिन्धुरङ्गीचक्रे तदा क्रुधम ॥१८३
ग्रहीनु वडवावक्त्रं शम्भोश्चाशक्यमप्यरम् ।
ततः प्रविप्टो जलधौ पावको वडवामुखः ॥१८४
वार्योधान्निदहन सम्यग् ज्वालामालातिदोपितः ।
यदाभवच्छम्भुनेवाद् ददाह मदनं तदा ।।१८५
अभवत् सुमहाशब्दो येनाकाशः प्रपूरितः ।
तेन शब्देन महता कामदाहे क्षणेन च ॥१८६
सखीभ्यां सह भीताभूत् काली शोकयुता तदा।
तेन शब्देन हिमवांश्चकितो विस्मितस्तदा ॥१८७
सुतामेव जगामाशु गता काली हराश्रमम ।
ता तत्र काली तनया भयशोकाकुला शुभाम् ।
रुदन्ती शम्भुविरहादाससादाचलश्वरः ।।१८८
ब्रह्माजी ने कहा था कि इसको यत्नपूर्वक आपके द्वारा धारण
करना चाहिए कि यह किसी अन्तर को प्राप्त न होवे । इस तरह से
ब्रह्मा के द्वारा कहे हुए सिन्धु ने उस समय में उस क्रोध को अङ्गीकार
कर लिया था ॥ १८३ ॥ भगवान् शम्भु का अशक्य भी क्रोध को बडवा
मुख
मे ग्रहण करने के लिये वडवा का मुख पात्रक जलधि म प्रविष्ट
हो गया था ॥१८४॥ ज्वाला की मालाओ से अत्यन्त दीपित उस अग्नि
ने जल के ममूहो का भली भांति दाह करते हुए जिस समय में, वह
शम्भु के नेत्र से उद्भूत हुआ था उसी समय में उसने कामदेव

१००
[ कालिका पुराण
कर दिया था ।। १८५॥ उस महान शब्द से काम के दाह क्षण भर में
करने वाले से समस्त आकाश पूरित हो गया था। वह ऐसा ही महान
शब्द उस समय मे हुआ था ।। १८६ ॥ उस समय म काली अपनी
सखियो के सहित शोक से सयुत होकर बहुत ही अधिक भय से भीन
हो गई थी। उस शब्द से हिमवान भी अतीब विस्मित और चक्ति हो
गया था ॥ १८७ ।। वह हिमवान् शीघ्र ही भगवान् राम्मु के आश्रम
मे गई हुई अपनी पुत्री काली के समीप म गया था। वहाँ पर पुत्री
कानी को भय और शोक से व्याकुल-रुदन करती हुई काली को
अचलराज ने देखा था जो शुभा शम्मु के विरह से बहुत ही आकुल हो
रही थी॥१८८
आसाद्य पाणिना तस्या मान्नयनद्वयम ।
या भैषीः कालि मा रोदीरित्वा ता तदाग्रहीत् ।।१८६
क्रोडीकृत्य सुता ता तु हिमवानचलेश्वर ।
स्वमालयमथानिन्ये सान्त्वयामास चादिताम् ।।१६०
अन्तहिते हरे काला विरहात् तस्य सततम् ।
निवसन्ती पितुर्गेहे शुशोच च मुमोह च ।।१६१
शेलाधिराजोऽप्य गेनकापि मैनाकमुख्यापि सखीद्वय च ।
ता सान्त्वयाचक रदीनसत्त्वा हर विसस्मार तथापि नोमा ॥१६२
उस शोकाकुल दशा मे अपनी पुत्री के समीप में पहुँच कर
हिमाचल ने अपने हाथ से उसके दोनो नेत्रो का मान करते हुए कहा
पा-हे पालि ! डरो मत और रुदन भी मत करो-पह कहकर उसका
ग्रहण कर लिया था ॥ १८६ ।। अवलो के राजा हिमवान् ने उस अपनी
पुत्री को अपनी गोद में बिठाकर अपने आलप मे उसको ले आये थे
और उस पीडित हुई को मान्त्वना दी थी ।। १६० ।। भगवान् शम्भु के
अन्तर्धान हो जाने पर उनके विरह से युक्त होती हुई निरन्तर पिता में
पर में निवास करती हुई भी बहुत चिन्तित हुई और मोह को प्राप्त हो

गोगे परीक्षा वर्णन ] १०१ गई थी 1 ११॥ शंतो के राजा ने मेनका ने-मनाक ने और दोनो सखियो ने उस यदीनसत्व वाली को सान्त्वना दी थी तो भी उम उमा ने भगवान् शम्भु का विस्मरण नहीं किया था ॥१२॥ । गौरी परीक्षा वर्णन ॥ अथ देवमुनियाँतो हिमवन्मन्दिर तदा । नियोजितो वलभिदा नारद कामग परम् ॥१ स गत पूजिभितम्तेन घरेशन महात्मना। त समुत्सृज्य रहसि पानी तामामसाट हर आसाद्य काली स मुनि सम्बोध्य नानशालिनीम् । उवाचेद वचस्तथ्य सर्वेपा जगता हितम ॥३ शृण कालि वचो मह्य सत्य तदवधारय । मेवित स महादेवस्त्वयेह तपसा विना ॥४ अनुरक्तोऽपि तेन त्वा महादेवो विपृष्टवान । त्वामृते शकरो नान्या द्वितीया सग्रहीप्यति ॥५ त्व चापि नान्य दयित ग्रहीप्यसि विनेश्वरम् । तस्मात् त्व तपसा युक्ता चिरमाराधयेश्वरम् ॥६ तपमा सस्कृता त्वा तु स द्वितीया करिप्यति । मन्त्रोऽय तम्य मुभगे शृणु त्व येन सोऽचिरात् ।।७ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्नर देवर्षि नारदजी जो अपनी इच्छा से ही परम गमन करने वाले थे इन्द्र के द्वारा नियोजित होने हुए उस अवसर पर हिमवान् के मन्दिर म समागत हुये थे ।।१।। वे वहाँ पर चतराज के द्वारा पूजित हुये थे जो हिमवान् महान् आत्मा वाले थे। उस हिमवान् को छोडकर वे देवपि एकान्त म उस काली के ममीप मे प्राम हो गये थे ॥२॥ उस मुनिवर ने काली के प्रमोद १०२ [ कालिया पुराण 1 पहुचकर उस ज्ञान शालिनी को सम्बोधित करते समस्त जगतो का हित करने वाला यह परम तथ्य वचन कहा था ॥३॥ देवपि ने कहा-हे कालि । मेरे इस वचन का श्रवण करो और उसको परम सत्य समझो। तुमने तपश्चर्या के विना ही उन भगवान् शम्भु की सेवा की है ।।४॥ वे महादेव उससे अनुराग करने वाले भी हैं किन्तु ने उन महादेव ने तुमको त्याग दिया था। तुम्हारे विना वे शिव दूसरी अन्य किसी को भी ग्रहण नहीं करेगे ॥५।। और तुम भी ईश्वर के बिना अ य किसी पति को ग्रहण नहीं करोगी। इस कारण मे आप तपश्चर्या से सयुत होकर चिर काल पर्यन्त महादेवजी की आराधना करो ॥ ६ ॥ जब तुम तप मे मस्कार वाली हो जाओगी तो वे तुमको अपनी पत्नी के रूप में ग्रहण करेगे। हे सुभगे । उसका यह मन्त्र है आप श्रवण करिये जिसके द्वारा वह शीघ्र ही प्राप्त होग ॥७॥ आराधितस्ते पत्यक्षो भविष्यति महेश्वर । ॐ नम शिवायेति च सर्वदा शकरप्रिय ॥ चिन्तयन्ती तु तद्रप नियमस्या पडक्षरम, । मन्त्र जप त्व गिरिजे तेन तुष्टो भवेद्धर ॥६ एवमुक्ता तदा काली नारदेन महात्मना । क्तव्यमनुमेने सा हित तथ्यञ्च तद्वच ।।१० अनुमान्य तवस्तम्तु तदा कालीच्च नारद । स्वर्ग जगाम तस्याश्च निश्चिताभून्मतियते ॥११ अथ याते देवमुनो वाली सामाद्य मेनवाम् । तप श्रद्धा समाचरये चात्मनो हरसगमे ॥१२ रापरतणु गमिष्यामि मात प्राप्तु महेश्वरम । अनुजानीहि मा गन्तु तपरोऽद्य तपोवनम, ।।१३ राप परणयत्न मे पितुरावेदय द्रुतम् । यावन दाये जननि भूतेशविरहाग्निना ।।१४ गोरी परीक्षा वर्णन ] इस प्रकार से आराधना दिये हुए वे महेश्वर आपको प्रत्यक्ष होकर दर्शन देगे। 'ओ नम शिवाय' यह मन्त्र सर्वदा भगवान् शकर का प्रिय है ॥८॥ आप उनके स्वरूप का चिन्तन करती हुई नियम में स्थित रहकर छ अक्षरो वाला मन्त्र का आप जप करिये । हे गिरिजे । इमसे शिव सन्तुष्ट हो जायेंगे । ६॥ महात्मा नारद जी के द्वारा इस रोति से कही गयी वाली उस समय म उसने अपना कर्तव्य मान लिया था क्योकि उनका वचन सर्वथा तथ्य और हितकर था ।।१०।। उस ममय में नारदजी काली को तपश्चर्या का तपन करने को समुद्यत हुई अनुमान करके वे स्वर्ग गमन कर गये थे। और उसकी बुद्धि व्रत करने मे निश्चित हो गई थी ॥११॥ इसके अनन्तर देवर्षि के गमन करने पर काली मेनका के समीप में पहुंची थी और अपना हर के सङ्गम प्राप्त करने के विषय में मेनका से तप करने करने की श्रद्धा को बतलाया था ॥ १२ ॥ काली ने कहा-हे माता | मैं महेश्वर प्रभु की प्राप्ति करने के लिये तपश्चर्या करने के लिये गमन करूंगी । आज तप करन के लिये तपोवन को गमन करने के लिये आप मुझे आज्ञा प्रदान गरिये । ॥१३॥ मेरे तप करने का यत्न है इसे आप पिताजी से शीघ्र ही निवदन कर दीजिये । हे जननि । जब तक मैं भूतेश्वर के विरह की अग्नि से दग्ध न हो इसके पूर्व ही मैं तप करना चाहती ह ॥१४॥ इति तस्या वच श्रुत्वा मेनका शोककर्शिता । आलिंग्य स्वसुताभूचे मा तप कुरु वल्लभे ॥१५ मृदुदेहामिपुत्रि त्व मा तपो याहि कर्कशम, । तप सोढु मुनेत्र शक्त ते न कलेवरम् ॥१६ वनवासश्च ते पुनि नेष्ट शत्रुगणैरपि। तस्मात् त्व सम्परित्यज्य वनवासोद्भव तप । आत्मनो ह्यनुरूपेण तपस्तत् कुरु यद्धितम् ॥१७ मातु सा वचन श्रुत्वा गिरिजा दीनमानसा ।

१०४ [ कालिका पुराण इत्यूके च तदा वाक्य तपोयत्नपरा प्रसूम् ॥१८ मा निषेधय मा यास्ये तपसेऽद्य तपोवनम् । प्रच्यन्नमपि यास्यामि नानुज्ञाताप्यह त्वया ॥१६ गृहेषु देवा सतत ब्रह्मविष्णशिवादय । तस्माद् गृहे पुत्रि देवानचंय त्व यथेप्सितान ॥२० स्त्रीणा तपोवनगतिनं धता स्वामिना विना । तस्मान्म युज्यते पत्रि नपोयात्रा वनं प्रति ॥२१ उस काली के इस वचन का श्रवण करके मेनका शौक मे कर्शित हो गई थी। उसने अपनी पुत्री का आलिङ्गन करके उससे कहा था-- हे वत्लभे । तपस्या मत परो॥१५॥ हे बेटी । तुम्हारा शरीर बहुत ही कोमल है तपश्चर्या जैसे कठोर वर्म करने के लिये गमन मत करो। तपम्या को महन करने के लिये मुनियो वा शरीर ही समर्थ होता है तुम्हाग गरीर उम क्लेश को सहन करने मे क्षमता नहीं रगता है ॥ १६ ।। है पुधि । निवाम करना तो नत्र गणो को भी भी अभीष्ट नही है । इगो पारण मे तुम वन घे निवास में होने वाले नप या विनार या परित्याग परदो। तुम्हारे अपरो शरीर जो अनुप हो यही तप पगे जो हित ये सम्पादन परो वानावे ॥१७॥ माण्डेय महति ने पता-उग गिरिजा ने माना ऐ वचत या श्रवण किया और या दोन गा यानी होगई थी और वर नगग्या ये मन में परायण होती हुई उग समय में उगो माता में पा पापापा १ मा निषेध मन परो। मैं आज तारे पिएनपोषन में गार पगी। यदि आपरे द्वारा मुो आशा नहीं दी गली नोकर पी जागी १६ मेनरा ने महाहै पनि ! 21 में प्रा-वि और शिव आदि देवगण निरन्तर हो निवाम दिया पर है। तुम को भी देव अभीष्ट हो पा पर हो आपला वन . - गोरी परीक्षा वर्णन ] १०५ अभ्यर्चन करो ॥२०॥ स्वामी के बिना अर्थात् अपने स्वामी से रहित होकर स्त्रियो की तपोवन मे गति का होना कभी भी नहीं सुना गया है। इस कारण से हे पुति । वन को ओर गमन करके तपश्चर्या की यात्रा करना उचित नही प्रतीत होता है ॥२२॥ यतो निरस्ता तपसे वन गन्तुच मेनया । उमेति तेन सोमेति नाम प्राप तदा सती ।।२२ अवज्ञाय तदा मातुर्वचन हिमवत्सुता । राखीध्यां ज्ञापयासाम पितरं तपसोद्यमम् ।।२३ स तु ज्ञात्वा गिरिपतिस्तपसे चरितोद्यमम् । दुहितुश्चानुमेने च नातिहष्टमना इव ॥२४ मानुज्ञाप्य तदा तातं यत्र दग्धो मनोभव । शम्भना प्रययो तत्र गगावतरणं प्रति १२५ गंगावतरणं नाम प्रस्थो हिमवतः स हरशन्योऽय ददृशे काल्या तच्चिन्तया तदा ॥२६ यत्र स्थित्वा पुरा शम्भुर्यानवानभवद् भृशम् । तत्र क्षण तु सा स्थित्वा बभूव विरहार्दिता ॥२७ हा हरेति क्षणं तव रोदमाना गिरे. सुता। विललापातिदु खार्ता चिन्ताशोकममन्विता ॥२८ क्योकि मेनका के द्वारा तपस्या के लिये वन में जाना निरस्त पर दिया था अर्थात् निषेध कर दिया गया था उम समय मे सती उमा ने सोमा-यह नाम प्राप्त कर लिया था ॥२२॥ उम अवसर पर हिमाचल की पुत्री ने माता के वचन की अवज्ञा करके सपियो के द्वारा तप करने के उद्यम की पिता को ज्ञापित किया था ॥२३॥ उम गिरियो के स्वामी ने तप के लिये समाचरित उद्यम का ज्ञान प्रास करसे अत्यन्त प्रसन्न मन वाला न होते हुए ही अपनी पुत्री को अनुमति दे दी थी। ॥२४॥ उसी समय में उम मरी ने पिता को अनुशापित करके जहा

[पालिका पुराण
पर वामदेव शम्भु के द्वारा दग्ध किया गया था यही पर गङ्गावरण
ओर वह चली गयी थी ॥२५॥ गङ्गावतरण नाम वाला एक हिमालय
या प्रस्थ है । उसको बाली ने भगवान् हर से रहित ही देखा था।
उम समय में उनकी चिन्ता से मयुत हो गई थी। २६ । पहिले जहाँ पर
स्थित होकर शम्भु बहुत ध्यान वाले हुए थे। उम क्षण में वह पाली
स्थित होकर वहाँ पर विरह से पीडित हो रही थी । २७ । गिरि वी
पुत्री वहाँ पर हाहर'-यह बहती हुई मदन करने वाली होती हुई
चिन्ता और शोक से समन्वित तथा अत्यन्त दुप से पीडित होनी हुई
विलाप करने लगी थी ॥२८॥
क्षण विलप्य सा काली स्मृत्वा पूर्वोद्भवं तदा।
हार्द हरस्य सा मोहमवाप कमलेक्षणा ॥२६
ततश्विरेण सा मोह धैर्यात सस्तभ्य भामिनी ।
नियमायाभवत्तत्र दीक्षिता हिमवत्-मुता ॥३०
प्रथम नियमम्तस्या बभूव फलभोजनम् ।
चर्या पचातपा चिन्ता शाम्भवी शाम्भवो जप ॥३१
यनिय रुभि शुष्कश्चतुर्दिक्षु चतुष्कृतम् ।
वह्निसस्थापन ग्रोप्मे तीव्राशुस्ता पचम ॥३२
हस्तान्तरे चतुर्वह्नीन कृत्वा वैश्वानरेष्टिन' ।
तन्मध्यस्था सूर्यविम्ब वीक्षन्ती वल्कलाशुदा ।।३३
ग्रीष्म निन्ये वह्निमध्ये शिशिरे तोयवासिनी।
प्रथम फलभोगेन द्वितीय तोयभोजनम् ।।३४
तृतीय तु स्वयम्पाति-वृक्षपल्लव-भोजनम् ।
क्रमण तु तदा पूर्ण निरस्य हिमवत् सुता ।।३५
क्षण भर तक उस कालो ने विलाप किया था फिर उसी ममय
में उसको पूर्व उद्भव का स्मरण हो गया था। वह कमलो के समान
नेत्रा वाली उमने हरके हार्द को और मोह को प्राप्त किया था ॥२६॥

गौरी परीक्षा वर्णन ] १०७ इसके पश्चात् चिरकाल में उम भामिनी ने धीरता मे मोह का मंस्तम्भन किया था और वहीं पर नियम के लिये वह हो गई थी और हिमवान वो मुना नियम के लिये दीक्षित होगई थी । ३० 1 उमका प्रथम नियम फली का ही भोजन करके रहना था। पच्च अग्नियो की तपस्या ही उसकी चर्या थी शम्भवी अर्थात् शम्भु से मम्बन्ध रखने वाली चिन्ता पी तथा सम्बन्धित जप था 1३१। यज्ञिय अर्थात् यज्ञ में काम आने वाले मुझे हुए काष्ठो से चारो दिशाओ मे चार जगह वह्नि की मस्थापना ग्रीष्म में की थी और वहाँ पर पाचवा तीव्राशु सूर्य थे । ३२ । एक हाथ के अन्नर पर चारो वलियो का स्थापन करके जो कि वैश्वानर वीरष्टि के द्वारा की गयी थी। उनके मध्य में स्थित होती हुई वल्कलो के वस्त्रो वाली मूर्य के विश्व का वीक्षण वरती थी । ३३ । ग्रीष्म ऋतु को अग्नि के मध्य मे मस्थिन रह कर व्यतीत दिया था और मिशिर में वह जन में वास करने वाली हुई थी। प्रथम ममर फली के उपयोग के द्वारा और द्वितीय समय केवल जल के ही भोजन में टातीत किया था। तोगरा समय सुनरा गिरे हुए वृक्षो के पत्तो या भोजन करके व्यतीत दिया था। उस समय में हिमवान् की पुत्री ने क्रम मे पत्रों को भी निरम्न कर दिया था ।।३४॥३५॥ निराहारव्रता भूत्वा तपश्चरणखिन्निका । आहारे त्यक्तपर्णाभूधम्माधिवतः मुता॥३६ तेन देवरपर्णेति कथिता पृथिवीतने । पंचात पव्रतेनं तोयानाञ्च प्रवेशनः ।।३७ एकपादस्यिता सा तु वमन्ते हिमवत्सुता। पडक्षरं जपन्ती मा चिरं तेपे तपो महत् 11३८ चोरवल्पलमबीता जटासंघातधारिणी । वृशांगी चिन्तने शक्ता जिगाय तपसा मुनीन् ।।३६ ता तपश्चरणे शक्ता ररक्ष शंकरः स्वयम् ।

१०८ [पासमा पुराण आप्यायति स्म म नदा भयाद्रक्षति हपित ॥१० एव तस्यास्तपस्यन्त्याश्चिन्तयन्त्या महेश्वरम् । वीणि वर्षसहस्राणि गम्मु कात्यास्तपोवने ॥११ पत्रिवर्पसहस्राणि सस्कृता योक्षणात् स्वयम् । देवेन विधिना देवी हरयोग्या तथाभवत् ।।१२ बिना ही आहार ये प्रत वाली होकर वह तपधारण मे गन्न हो गई थी क्योवि हिमवान् की पुत्री ने आहार मे पर्णों वर भी रयाग पर कर दिया था । ३६ । इसी से देवो ने पृथिवी तल म उमको अपर्णा कहा था। पांच अग्नियो के ताप व्रत से और जल म प्रदेशो के द्वारा-उमने तप किया था । ३७ । वह हिमाचल की पुत्री वसन्त म एक ही पाद से स्थित हुई थी। छ अवरो वाले मन्त्र का जप परती हुई उसने चिरकाल पर्यन्त महान् तप के तपन का ममाचरण किया था । ३८। वह चीरो और वल्कलों में शरीर को ढांपने वाली थी। वह जटा जूटो के समूह रखने वाली थी। उसके सब अङ्ग वृश हो गये थे और वह चिन्तन करने मे शक्त थी उसने ऐसा तप किया था कि तप के द्वारा मुनियो को भी जीत लिया था । ३६ । उस तपस्या के समाचरण में उसकी रक्षा स्वय भगवान् शम्भु ने की यो। वे भगवान् शम्भु उसको मदा ही आप्यायित करते थे और हपित होकर उसकी मम से भी रक्षा किया करते थे । ४०1 इस प्रकार से काली को जो वह तपस्या कर रही थी और महेश्वर का चिन्तन कर रही थी तपोवन में तीन महस्र वर्ण व्यतीत होगये थे । ४१। तिरेषट सहस्र वष हुए तब वह स्वय वीक्षण से सस्कृत हो गई थी। देव विधि के द्वारा वह देवी हर के योग्य हो गई थी ॥४३॥ पटत्रिवर्षसहस्रान्ते यत्र तेपे तपो हर । तत्र क्षणमथोपित्वा चिन्तयामास मामिनो ॥४३ नियमस्था महादेव मा वि जानाति नाधुना । येनाह मुचिर तेन नानुज्ञाता नपोरता ॥४४

गौरी परीक्षा वर्णन ]
१०६
लोके नास्त्यत्र गिरिश कि तत्र मुनिभि. स्तुत.।
सर्वज्ञ. सर्वगो देवो हरो देवनिगद्यते ।।४५
स सर्वगस्तु सर्वज्ञ. सर्वात्मा सवहद्गतः ।
सर्वभूतिप्रदो देव. सर्वभावनभावन. ॥४६
सती च मेनका माता यदि चाह वृषध्वज ।
सानुरक्ता नचान्यस्मिन् स प्रसादतु शकरः ॥४७
यदि नारदवमोत्यो मन्त्राज्य स्यात्पडक्षर. ।
यदि भक्त्या मया जप्त हरस्तन प्रसोदतु ॥४८
सत्य यदि तपस्तप्त सत्य चाराधिता हर. ।
सत्य भवेद् यदि तपो हरस्तेन प्रसोदतु ॥४६
तिरेपठ सहस्र वर्षों के अन्त मे जहाँ पर भगवान् शम्भु ने तपस्या
की थी। वहां पर क्षण भर स्थित होकर भामिना न चिन्तन किया था
॥४३|| महादेव क्या इस समय मे नियमो म सास्थत हुई मुझसो नही
जानते हैं जिस कारण से बहुत अधिक काल पयन्त तप म रत हूई मुझ
अनुज्ञान नहीं किया है ॥ ४४।। क्या भुनिया क द्वारा स्तवन कय गय
रिश लोक म यहाँ पर नही है । दवा क द्वारा ता हर सब कुछ के
शान रखने वाले सर्वत्र गमन करन वाले दव रह जाया करत है ।
॥ ४५ ॥ वह सर्वत्र गामी-सवज्ञाता-सबकी आत्मा-सबक हृदय
म रहने वाल-सबम विभूति प्रदाता और सव भाववो के भी भावन दव
है-मैं सती और मेरी माता मेनका है यदि मैं वृषभध्वज में अनुराग
से युक्त हूँ और अन्त में मेरा अनुराग नहीं है ता वे शङ्कर मुझ पर
प्रसन्न हो जावें ॥ ४६-४७॥ यदि नारद के मुख से निकला हुआ छ
अक्षरो वाला मन्त्र है यदि भक्तिभाव से मैंने इसका जप किया है ता
इससे हर प्रमु मुझ पर प्रसन्न हो जावे ॥४८॥ यदि वास्तव में मैंन
सत्य तप क्यिा है और सत्यतापूर्वक मने हर को माराधना की है।
यदि तप सत्य है तो इससे भगवान हर मुझ पर प्रसन्न हो जावे ॥४६॥

११०
[ कालिक! पुराण
एव विचिन्तयन्ती सा यदातिप्ठद्धराश्रमे ।
अधोमुखी दीनवेशा जटावल्व लमण्डिता ॥५०
तदेव ब्राह्मण कश्चिद् ब्रह्मचारी धृतव्रत ।
कृष्णाजिनोत्तरीयेण
धृतदण्डकमण्डलु ।।५१
ब्राह्म या श्रिया दीप्यमान स्वगौश्च सुशोभन ।
जटाभि परिवीताभिरुद्रिक्तस्तनुदेह मृत् ॥५२
उपस्थितस्तदा काली शम्भुाह्मणरूपवृक् ।
आसाद्य प्रधम काली समाभाप्य तदा द्विज ॥५३
ज्ञातु प्रत्यक्षतो राग श्रोतुमिच्छश्च तद्वच ।
वाग्मी विणित्रवाक्तेन पप्रच्छ गिरिजा तदा ॥५४
का त्व कस्यासि कल्याणि किमर्थ विजने वने।
तपश्चरसि दुर्धर्ष मुनिभि प्रयतात्ममि ॥५५
न वाला व नापि वृद्धा तरुणी चाति शोभना ।
वय पति विनाभीक्ष्ण तपश्चरसि साम्प्रतम् ॥५६
माकण्डेव महपि ने कहा-वह कानी इस प्रकार से विशेष
चि-नन बरनी हुई जब भगवान के आश्रम मे सस्थित हुई थी जिसका मुख
नीच की ओर था-दोन वेश था और बह जटा तथा वल्कलो से
मण्डित थी।॥५०॥ उसी समय में व्रतधारी ब्रह्मचारी कोई ब्राह्मण कृष्ण
मृग की छाला का उत्तरोय से शोभित-कमण्डलु और दण्ड धारण
किये हुए जो ब्राह्मी श्री से देदीप्यमान था-वह स्वगी और परम शोभन
था । वह परिवीत जटाओ से उद्रिक्त तनु को धारण करने वाला था।
वह ब्राह्मण के स्वरूप को धारण करने वाले शम्भु उसी समय मे काली
के ममीप में उपस्थित हो गये थे । काली के पास पहुँच कर उस द्विज
ने उससे सम्भाषण किया था ॥ ५१-५२॥ उस समय मे प्रत्यक्ष रूप
गे अनुराग का ज्ञान प्राप्त करने के लिये और उसके मुख से बचन का
श्रवण करने के लिये इच्छा करत हुए उस वाग्मी ने विचित्र वाक्य के

गोरी परीक्षा वर्णन १११ द्वारा उस समय में गिरिजा से पूछा था ।। ५३-५४ ।। ब्राह्मण न पहा-है कल्याणि ! आप कौन हैं और किमकी पुत्री हैं ? इस विजन वन म किम लिपे प्रियतारमा मुनियो के साथ यह दुर्घ तप कर रही है? ॥५५॥ माप न तो वाला है और न आप वृद्धा ही हैं । आप तो अत्यन्न शोभन तरणी है। पिना पनि निरन्तर क्यों यह इस समय में तपस्या कर रही हैं ? ॥५६॥ विवा तपस्विनी भद्रे कस्यचित् सहचारिणी । तपस्विन म पुप्पादि समाहतुंगतोज्यतः ॥५७ एतन्मम समाचक्ष्व यदि गुह्य भवेन्न ते । यदि ते हृदये मन्युः कच्चिदसति सम्प्रति । तदाचक्ष्व समर्थोऽम्मि तमह चापि वारितुम् ॥५८ इत्युक्ता तेन विप्रेण गिरिजाय निजा सखीम् । तस्योत्तरप्रदानाय कटाक्षेण न्ययोजयत् 11५६ सा सखी विजया तम्या वचनाद् ब्राह्मण तदा । प्रोवाद यथातथ्य वीक्षन्ती गिरिजामुखम् ॥६० एतस्य गिरिराजस्य तनयेय द्विजोत्तम । प्याता च पावंतीनाम्ना बालोति च गुशी मना ।1:१ ऊचे यत व नापि शकर वृपमध्वजम् । वान्छन्ती दयित तोब तपश्चरति वं पतिन् । श्रीणि वर्षसहस्राणि तपग्नुपनि भामिनी। न शबरो गिरिगुवामाचारले ।

११२ [ पालिका पुराण लिये समथं हूँ ॥५७॥५६॥ उस विप्र के द्वारा दम रीति में वही हुई गिरिजा ने अपनी सषी को उमको उत्तर देने के लिए कटाक्ष दे द्वारा नियोजित कर दिया था ॥५६॥ उसकी विजया नाम वाली सपी उस समय मे उसके वचन मै गिरिजा के मुस को देखती हुई ने यथा तथ्य कहा था ॥६॥ हे द्विजोत्तम । यह इसी गिरिराज की पुत्री है और यह पार्वती-इस नाम से प्रख्यात है और सुशोभना काली के नाम से भी प्रसिद्ध है ॥६॥ यह किसी भी द्वारा वही नही गयी है । यह वृषभः ध्वज शङ्कर को अपना दयित पति चाहती हुई तीव्र तप का समाचरण कर रही है ॥६२॥ तीन सहस्र वर्ष हुए यह भामिनी तपस्या कर रही है किन्तु भगवान् शकर इस गिरिराज की पुत्री को प्राप्त नहीं हो रहे है ॥६३॥ शकरो गिरिशो देव सवंग परमेश्वर. । इति स्म गद्यते देवमुनिभिश्च तपोधनं. ॥६४ विमेना स न जानाति कि सानो नास्ति वा गिरे. । इति चिन्ताविपप्णेयमद्य नो लभते सुखम् ।।६५ अप्रार्थितस्त्वमनया दयसे यदि वा सुखम् । तदैना शकरेणाद्य त्व सगमय सुव्रत ॥६६ इति तस्या वच श्रुत्वा ब्रह्मचारी तदा द्विज । स्मयमान इद वाक्य हेलयोवाच पार्वतीम् ॥६७ अमोघदर्शनश्चास्मि हर चानयितु क्षमः । किन्त्वेक निगदाम्यद्य निश्चित ममन्त शृणु ॥६८ जानाम्यह महादेव त वदामि शृणुष्व मो वृषध्वजो महादेवो भूतिलपी जटाधर ॥६६ व्याघ्रचर्माशुवश्चकः सवीतो गजकृत्तिना। कपालधारी सपॉप सर्वगात्रेषु वेष्ठित. ॥७० भगवान् शवर गिरिश देव सर्वत्र गमन करने वाले परमेश्वर गौरी परीक्षा वर्णन ] ११३ यह देवो-मुनिगणो और तपस्वियो के द्वारा कहे जाया करते हैं ॥६॥ क्या वे इसको नही जानते हैं क्या वे पर्वत के शिखर पर विद्यमान नहीं हैं ? यह आज इसी चिन्ता दुःखित है और इसको सुख प्राप्त नहीं हो रहा है ॥६॥ इसमें आपसे प्रार्थना नहीं की है। यदि आप दया करते हैं अथवा इसको सुख देने की कृपा करते हैं हे सुव्रत ! आज भगवान् पाकर से इसका सङ्गम कर दीजिए ।। ६६ ॥ उस समय मे द्विज ब्रह्म- चारी ने उस समय में उसके इस वचन का श्रवण करके मुस्कराते हुए हो हेला से उस पार्वती को यह वचन बोला था ॥ ६७ ॥ ब्राह्मण ने कहा-मैं अमोघ दर्शन वाला हूँ और मैं भगवान् हर को लाने के लिये भी समर्थ हूँ। किन्तु मैं आज एक बात कहता हूं--मेरा निश्चित मत का श्रवण करिए ॥ ६८ ॥ मैं महादेवजी को जानता हूँ, मैं उनको बोल भी दूंगा किन्तु मुझमे सुनलो वृषध्वज महादेव विभूति के वेप वाले हैं और जटाधारी है ।। ६६॥ वे बाघम्बर के वस्त्र धारण करने वाले हैं वे एकाकी है और गज के चर्म से ढके हुए रहते हैं वे कपालो को धारण करने वाले हैं . तथा सों के ममुदायो से वेष्टित रहा करते हैं ॥७॥ विपदग्धगलस्त्र्यक्षो विस्पाक्षो विभीषणः। अव्यक्तजन्मा सत्तनं गृहभोग्यविजितः ॥७१ ज्ञातिभिर्वान्धवहींनो भक्ष्य भोज्यविवजितः । श्मशानवासी सततं तत्सगपरिवर्जितः ।।७२ गर्जभिर्भावकटस्तोदणभूतोषः परिवारितः। शृगाररसहीन भार्यापुत्रविवजितः ॥७३ केन वा कारगेन त्वं भर्तारं त समोहसे । पूर्व श्रुत मया चैव तस्यापरमिदं कृतम् १७४ शृणु ते निगदाम्यच यदि ते गृह्ण रोचते। दक्षस्य दुहिता साध्वी सती वृषभवाहनम् ।।७५ ११४ [सिला पुराण वयं पति पुरा दया सम्भोगपरियजितम् । कपालिजायेति मती दक्षेण परिवजिता 11७६ यज्ञमागप्रदानाय शम्नुश्चापि विजितः । साथ तेनापमानेन मश शोकायुला सती ||७७ उन शम्भु या गला विप से दग्ध हो रहा है उनमें तीन नेत्र हैं- निरुपाक्ष हैं और विभीषण है अर्थात् विशेष रूप से भयङ्कर हैं। उनका जन्म भी अव्यक्त है अर्थात् उनके जन्म के विषय में छ भी क्सिी को ज्ञान नहीं हैं व निरन्तर गृहस्थाश्रम के भोग्य से रहित हैं 1॥ ७१ । शङ्गर शानिजन तथा बन्धुजनो मे हीन हैं और भक्ष्य भोग्य से भी वजित हैं। शम्भु निरन्तर श्मशान म निवाम परने वाले हैं और सङ्ग से परिवजित रहा करते हैं ॥ ७२ ॥ गर्जन करने वाले-विकृत स्वरूपधारी और तीक्ष्ण भूत गणो से सदा घिरे हुए रहा करते हैं । शङ्कर शृङ्गार रस से रहित हैं तथा उनके न कोई भार्या है और न पुत्रादि ही हैं ।। ७३ ॥ अथवा विस कारण से आप उनको अपना भर्ता बनाना चाहती है । मैंने पूर्व म होने वाला भी उनका एक दूसरा कृत्य सुना है ।। ७४ ॥ आप उसका श्रवण करिय मैं आज आपको बतलाता हैं। यदि आपको अच्छा लगे तो ग्रहण कीजिए। प्रजापति दक्ष की पुत्री सती परम साध्वी थी उसने पहिले वृषभ वाहन को अपना पति वरण किया था। यह भाग्य की ही बात थी वह पति सम्भोग से रहित थे। यह तो कमाली की जाया है-इसी से वह सती दक्ष के द्वारा परिवजित करदी गयी थी ।। ७५-७६॥ यज्ञ म भाग के प्रदान करने के लिये शम्भु को भी वजित कर दिया गया था। उसी अपमान के होने से सती अत्यधिक शोक से आकुल हो गई थी ॥७॥ तत्याज स्वा प्रिया प्राणास्तया त्यक्तश्च शकर । त्व खीरत्न तव पिता राजा निखिलभूभृताम् ।।७८ तथाविध पति कस्मादुग्रेण तपसेहसे । - गौरी परीक्षा वर्णन ] ११५ देवेन्द्रो वा धनेशो वा पवनो वाप्यपापति ॥ अग्निजिन्य सुरो वापि स्वर्वद्यावश्विनावपि । विद्याधरो या वन्धर्वो नागो वा मानुपोऽथ वा ॥८० रूपयोवनसम्पत्र समस्तगुणसयुत । स ते योग्य पति श्रीमानुदारकुलसम्मव. ॥८१ येन त्व वहुरलीध-पूरितेऽनघं विस्तृते । माल्यप्रवरसयुक्ते धूपचूर्ण सुवासित ॥२ मृदास्तरणसयुक्ते विस्तृते सुमनोहरे । चारुप्रासादगभस्थे जाम्बूनदविचित्रिते ॥८३ शय्यानले समासाद्य स योग्यस्ते भवेत् पति । एव ज्ञात्वाऽद्य मुभगे यदि वाञ्छसि शकरम् । लिं ते तपाभि सुतरामह त योजय त्वया ८४ उम सती ने अपन परम प्रिय प्राणों का परित्याग कर दिया था। भगवान् शङ्कर भी त्याग कर दिय गय थ। आप तो स्त्रिया म रत्न व ही ममान अत्युत्तम है। आपका पिता हिमवान सभी पर्वता का राजा है ।। ७८ ! फिर किस कारण स उस प्रकार के पति क प्राप्त परन की इस उन तप व द्वारा इन्ठा कर रही है ? दवो वा स्वामी-- धनश-पवन-वरण-आग्न अथवा कोई अन्य दव अथवा स्ववैद्य आश्वनीकुमार-विद्याधर- गन्धव-नाग अथवा मानुप जो भी स्प और योदन स सुसम्पन्न हा और समस्त गुण गण में समन्वित हो ऐसा ही उदार बुल म समुत्पन्न हाने वाला थी सम्पन्न आपका पति याम्य है 11७६-८१॥ जिसक द्वारा आप बहुत रत्नो व समूहस पूरित- बहुमूल्यो म विस्तृत-माल्य प्रवरा स सयुत-घूप व चूनों स मुवा- गित-कोमल मास्तरण स मरित-मुमनहर सुविस्मृत-मुरम्प प्रामाद में मध्य म स्थिा-मुवर्ग द्वारा विशेष रूप स चित्रिन शय्या ५ बल म समासादन बरस सस्थिर रहने वाला आपका योग्य पति ११६ [ कालिया पुराण होगा। हे मुभगे । इस भौति ज्ञान प्राप्त करके भी यदि आप शङ्कर को ही अपना पति बनाना चाहती हैं तो फिर आपको इन तपस्याओ से क्या प्रयोजन है मैं अपने आप ही उनके साथ योजित किये देता हूँ १८२-८४॥ इति श्रुत्वा तदा काली ब्राह्मणस्योत्तर तदा । मित तथ्य जगादैन ब्रह्माण कोपसयुक्ता ॥८५ न जानासि हर देव त्व जानामीति भापसे । वहियंद दृश्यते तत्तै कथित द्विजनन्दन ।।८६ यस्थ भाव न जानन्ति सेन्द्रा ब्रह्मादत सुरा.। तस्थ त्व विप्रतनय शिशु स्यसि किं भवम् ।।८७ यच्छु त भवता नीचवदनाद् भापित लघु । इतस्ततस्तु श्रुत्वैव भाषसे त्व न दृष्टवान् ||६८ तस्मात् त्वतो वर नाह वाञ्छ्ये नापि वा पतिम् । अन्यद् वद न च त्वतो वाञ्छये हरसगमम् ॥८६ इत्युक्त्वा गिरिजा विप्रमवलोक्य सखीमुखम् । इदमाह तदा कालो सशयारूढचेतना ।।६० महता चिन्तनेनेह तपसाराधितो हर । तन्ममा विप्रसुतो निन्दितु वाक्यमुक्तवान् ॥६१ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-~उस अवसर यह सुनकर काली क्रोध से सयुक्त होती हुई इस ब्राह्मण को उसने उत्तर के रूप मे बहुत ही अल्प और तथ्य हा या ॥८५॥ वाली ने कहा -तुम देवेश्वर को नही जानते हो-~-व्यर्थ ही यह कहते हो कि मैं जानता हूँ । हे द्विज- नन्दन ! जो कुछ बाहिर दिखलाई देता है वही आपने कह डाला है। ॥८६-८७जिन प्रभु के शम्भु के भाव को इन्द्रादि और ब्रह्मा, प्रति मुर भी नही जानते हैं। उनके भाव को तुम शिशु होते हुए हे विप्रमुन ! क्या जान सकोगे ॥ ८॥ आपने जो भी नीचो के मुख से गौरी परीक्षा वर्णन ] ૧૧૭ भापित कुछ मुना है वह बहुत तुच्छ है । आप इधर-उधर से मुनकर ही ऐसा भाषण कर रहे हैं । आपने उनका कभी की दर्शन नहीं क्यिा है ॥ ८८ ।। इस कारण से मैं आपसे वरदान नहीं चाहती हूँ और पति के विषय में जानना चाहती हू अब आप अन्य कुछ भी नही बोलिए। मैं आपके द्वारा हर का सङ्गम प्राप्त करना नही चाहती हूँ| गिरिजा ने उस विप्र को इतना ही कहकर अपनी मखी का मुख देखकर उस अवसर पर संशय मे समारूढ होकर यह कहा था कि बहुत अधिक चिन्तन के द्वारा तपश्चर्या करके भगवान शम्भु की आराधना की है। यह विप्रसुत मेरे ही आगे उनकी निन्दा करने के लिये वाक्य बोला है ॥ ६०-६१ ।। तदहं चापनेप्यामि स्तुतिवाक्येन साम्प्रतम् । महात्मनां च यो निन्दा शृणोति कुरुतेऽथवा ३२ तयोराग.समं पूर्व मया तातमुखाच्छ तम् । तम्मात्तदपनेप्येऽहं तनिधय विप्रकम् ॥६३ इत्युक्त्वा सा सखो कालो शम्भुमंगतमानमा । आगःसमार्जनाशु हर स्तोतुमुपाक्रमत् ||३४ नमः शिवाय शान्ताय कारण प्रयहेतवे । निवेदयामि चात्मानं त्वं गतिः परमेश्वर ). विज्ञानसौभाग्यसुहृद्गताय ने प्रपञ्चहीनाय हिरण्यवाहवे। नमोऽस्तु नारायणपद्ममम्मत्र प्रधानबीजाय जगदिनाय ते ॥६६ इति स्तुवन्ती पुनरेव म द्विज- मदा वच. किंचिदुदोरितु पुनः । समोक्ष्य कालीमागेत मपन्न श्या समय भी शिगारे सुतार ११० [पापिना पुराण अय द्विज पिंचन वस्तुमिच्छ. त्युन हर चापि न मविदान । निन्दन्नहि प्राणहरी हरस्य निन्दामह श्रोतुमिह क्षमामि ॥६८ इसलिये में इस समय मै स्तुति वाक्य ये द्वारा उमका अनग करूंगी। जो भी कोई महान आत्मा वालो की निन्दा पा श्रवण धरता है अथवा वराई दिया करता है उन दोनो या अपराध ममान ही होता है-ऐमा मैंने अपने पिताजी के मुख से पूर्व मे श्रवण किया है। इसी कारण से मैं इमको दूर करूंगी सो इस विप्र वो निषेध पर दो अर्थात रोक दो ॥६॥६३॥ उस काली ने यह मपी से कहकर शम्भु में सङ्गन मन वाली ने अपराध के सम्मान करने के लिये भगवान् शम्भु या स्तवन करने का आरम्भ कर दिया था।६४॥ पाली ने कहा-परम शिव-शान्त और कारण अय के हेतु अर्थात सष्टि-स्थिति और महार इन तीनों के कारण स्वरूप के लिये नमस्कार है । हे परमेश्वर ! मैं अपने आपको निवेदन करती है और आप मेरी गति हैं ॥६५॥ विज्ञान-सौभाग्य और सुहृत मे गत--प्रपञ्च मे रहित-हिरण्य वाह–नारायण के नाभिस्थ पद्म से 'समुत्पन्न भी के प्रधान वीज--- जगत् के हित रूप आपके लिये नमस्कार होवे ॥६६॥ इम भौति स्तवन करती हुई उसको यह द्विज पुन उस ममय मे कुछ क्थन करने के लिये उद्यत होने वाला है-यह सभीक्षण करके काली वो सयत्न कर दिया था और गिरिराज की पुत्री ने समझ करके सखी से कहा था ।। २७॥ यह द्विज कुछ कहना चाहता है और उग्र हर को नहीं जानने वाला है। अतएव यह उनको निन्दा कर रहा है। किन्तु मैं प्राणो के हरण करने वाली शिव की निन्दा वा श्रवण करने के लिये समर्थ नही हू IIll यावद् भूरिवचोऽस्याह न शृणोम्यधुना सखि । गच्छामि तावद् दूराय समुत्तिप्ठामि मप्रिये ॥६६ गौरी परीधा वर्णन ११६ इत्युक्त्वा सा तया मख्या सहिता हिमवतमुता। प्रतस्येऽय समुत्याय तमुन्मृज्य द्विज हात् ॥१०० जय शम्मुनिज रूपमाम्याय हिमवत्नुताम् । त समुत्सज्य गच्छन्ती हर म्मेरमुखोज्न्वयात् ।।१०१ अहहरो महादेवो मा सम्लोपि न चाधुना । सम्मुखीभव है कालि ममावालय शाकरि॥१०२ इत्युक्त्रा म महादेवो गच्छन्ता पुरतो गत । प्रनायं हन्तौ काल्यान्तु गनि तन्या विरोधयन् ।।१०३ मा वीश्य शम्भुवदन ततक्षणादवदवान् । अधोमुखी तडिद्वातचक्तेिव गिरे नुता ।।१०४ मन्दाक्ष प्रीतिलज्जामि मा जडेव तदानवत् । वक्तु च नागर किचिद्विवक्षुरपि भामिनी ॥१०५ हे मखि । इम नमय में उव तर इनके बहुत वचनो का श्रवण नहीं वरूं तर तक में दूर देश को गमन करती हूँ हे मदिये ! वहीं पर दूर देश में समुपस्थित रहै ॥६६॥ इतना कहकर वह काली हिम- वान की पुत्री उसो मसी के महित प्रस्थान कर गयी थी और उन द्विज पो हटात् छोडकर उठकर चली गई यो ॥१००। इसमें अनन्तर शम्भु निज रूप में ममान्थित होकर हर मुम्बराह मे युक्त मुख वाले होरर टम द्विज रूपी का त्याग कर म्दन करती हुई हिमवान को मुता के पोछे गमन किया था ॥१०॥ गिव ने कहा-मैं ही महादेव हूँ और हर हूँ। अप आप मेरा स्तवन नहीं करती हैं । है कालि ! है शाङ्कर ! मेरे मम्मुख होकर मुझे समाश्वामित करो ॥१०२॥ इतना कहर वे महादेव प्रमु कारी के आगे गमन पर उपस्थित होगये थे। उन्होंने दोनों हाथों को पनावर उन गानों की गति का विरोध किया था। ॥१०३ वह गिरिराज को बंटी शम्भु के मुख का वीक्षण करने उमी क्षप में हटात यर्थात वरदन नीचे की ओर मुख वालो होगई थी जिम १२० बालिका पुराण तरह से वायु में चक्ति तडित् हो जाया परती है ॥१०॥ प्रीति वी लज्जा से मन्द नेत्रा वाली होते हुए उस समय में वह जड की ही भांति हो गयी थी। वह भामिनी वोरने की इच्छा घाली होती हुई भी कुछ भी बोलने म समर्थ न हो मी पी ॥१०॥ मनोरथाना सिद्धया तु सुधाभिरिव परितम् । शरीरमभवत्तस्या मुदा पूर्ण द्विजोत्तमा ||१०६ पटविवर्षसहस्रस्तु तप क्लेशमविन्दत । यत्त क्षणात् समुत्सज्य सम्मोदमुदिताभवत् ॥१०७ ना च वीक्ष्य तथाभूना प्रणयाद वृषभध्वज । यामेन भस्मरूपेण गावस्थेन च मोहित ॥१०८ अथ ता विरहोद्रिक्त समेत्य वृषभध्वज । सम्बोधयन्निद चाटवचन प्रोक्तवान मुदा ॥१०६ न तु सुन्दरि मा वक्तु किंचनापि त्वमोहसे । तप क्लेश स्मरयन्ती किं मह्य कुप्यसि साम्प्रतम् ।।११० अह च परितप्यामि त्वामृते सुभगे मम । समयाद यत् समारब्ध तपस्तप्तु त्वया समम् ॥१११ सानुरक्तोऽथ सस्कृत्य भविष्यामि त्वया प्रिये । अधुना समतीतो मे य कृत समयो मया ॥११२ हे द्विजोत्तमो । मनोरथो की सिद्धि हो जाने से उसका शरीर सुधा से पूरित के समान हो गया था और आनन्द से परिपूर्ण हो रहा था ।।१०६॥ नौ सहस्र वर्ष तक उस काली ने तपश्चर्या का क्लेश प्राप्त किया था। किन्तु उसी क्षण मे उस सम्पूर्ण क्लेश का त्याग करके वह आनन्द से मुदित अर्थात हपित हो गई थी ॥१०७॥ उम प्रकार से आस्थित उसको प्रणय वाली देख कर वृषभध्वज भस्मी भूत कामदेव वे द्वारा जो कि गात्र में विद्यमान था मोहित हो गये थे ॥१०८। इसके अनन्तर विरह से उद्विक्त होकर वृषभध्वज साथ मे आकर सम्बोधन

गौरी परीक्षा वर्णन ।
१२१
करते हुए मानन्द में यह चाटु वचन कहें तो घे ॥१०६॥ है मुन्दरि
क्या मुझसे कुछ भी कहना नहीं चाहती है ' तप का क्लेश का स्मरण
करती हुई क्या इस समय में मुव पर कुपित हो रही हैं ॥११०॥ है
मुभगे । तुम्हारे विना मैं परितत हो रहा हूँ। मेरे समय मे जो बापने
तपश्चर्या करने का ममारम्भ किया या ॥१११॥ है प्रिये । मैं अनुराग
से
युक्त हूँ। मैं मम्वार परवे तुम्हारे माय होऊँगा । मैंने जो ममय
क्यिा था अब व्यतीत हो गया है । ११२।।
तपसे भवती जापि तपसेव मुसस्कृता ।
मचिन्तनेन जप्येन तीव्रण तपमा तदा ।
मूल्येन महता क्रीतो दामोऽहमा नियोजय ।। ११३
त्वदगाना मस्करणे जटाना च प्रसाधने ।
प्रमुच्य वल्कल गावाच्चार्वशनिवेशने ॥११४
हारपुरये यूरवाच्यादिपरिधापने।
द्रत नियोजय शुभे यदि म्नेहोऽम्ति माशि ॥११५
निर्दग्धो यो मया कामो भन्मस्पेण मतनौ।
स्थितो मा प्रतिकृत्येव त्वदने दग्धुमिच्छति ।।११६
तम्मादुद्धर मा कामादग्नेरिव मनोहरे ।
स्वदङ्गामृतदानेन प्रसीद दयिते मम ॥११७
आप भी तप के लिये ममुद्यत हुई थी और उम तप मे हो आप
भनी भांति मम्मत हो गई है। यापने भली भांनि चिन्नन क्यिा-
तोव नप दिया योर सदा तप दिया या । आपने यह सब कर बड़ी
मारी कीमत के द्वारा मुझे सरीद लिया है। अब मैं आपका दाम हो
गया हूँ मुझे नियोजित कीजिए ॥११३॥ आप अपन अङ्गो सम्बार
परने मे-जटाओं के प्रमाधन में मेरा नियोजन करें। गर्गर में वल्वल
हटा कर मुन्दर वस्या का निदेशन करने में-हारानूपुर और याची
मादि के परिधापन करने म ह मुझे मोन ही नियोउन करिए यदि

१.२ [ कालिका पुराण मुझ जैमे म आपया स्नेह विद्यमान है ॥११|| मैंन जो वामदेव को दाध कर दिया था वह भस्म रूप से मेरे गरीर म धित है। मेरा प्रती- कार करणे ही मुझे तुम्हारे ही मामने दग्य कर देना वह चाहता है । ।। ११६ ॥ हे मनोहरे । अपने अङ्ग के अमृत के दान के द्वारा उस कामाग्नि से मेरा उद्धार परिये । हे दयिते । मेरे ऊपर प्रसन्न होइये ॥११॥ - ॥ काली हर समागम वर्णन ॥ अथ श्रुत्वा वच शम्भोगिरिजातीव हपिता। मेने प्राप्त तदा शम्भु मुन्दर दयित पतिम् ॥१ अय प्राह तदा कालो सखीवक्त्रेण शक्रम । यथा स शृणुते वाक्य श्रोतुमिच्छश्च शकर ॥२ न सन्धावतिभेदेन प्रवर्तन्तेऽत्र सज्जना । मर्यादया हस्त मे पाणि गृह्णातु शकर ॥३ पितृदत्ता भवेत् कन्या तपोदत्ता भवेन्नहि । तपसा चैत् प्रदत्ताह मा तातश्च प्रदास्यति ॥४ तस्मात् सम्प्रार्थ्य पितर हिमवन्त नगेश्वरम् । वैवाहिकेन विधिना पाणिं गृह्णातु मे हर ॥५ इत्युक्वा बिरगमाथ काली लज्जासमन्धिता । हरोऽपि तद्वच सत्व तथ्य योग्य तदाग्रहीत् ॥६ तत म सगण शम्भुस्तत्र वास तदाकरोत् । गङ्गावतरणे सानो यथापूर्व तथाधुना ॥७ मारण्डेय महर्षि ने कहा-इसरे अनन्तर भगवान् शम्भु के वचन वा थपण पर गिरिजा अत्यत इपित हो गई थी और उसने

काली हर ममानन वर्णन ]
१२३
उस समय में दधिर-मुन्दर जन्म को अपना पास हुआ पति मान
लिया था । १। इमरे अरान वानी ने रबी के मुद्ध ने भगवान् सत्र
मे रहा था जिम गति में जन्म नुन्ने की इच्छा मरले हर वामग
प्रवप कर रहे हैं। यहां पर नन्धि कवि भेद में सम्प्रन
नहीं होते हैं। मंर हर मर्यादा मेन पापिका हल करे ।
1३1 कन्या पिता के द्वारा दन ना ली है नर ने दत्त (दो हुदै)
नहीं होती है। मैं ददि तप ने दी हुई हूँ। और मुझको पिता प्रदान
करेंगे 12 ! ममें भगवर हिमवान् पिता की मनी भांति प्रार्पना
का भगदान हर नाहिर निधि ने ही मेरे पागि का ब्रह्म करे ।।
मादेर मपि ने कहा-इन अनन्नर पानी लजा ने समन्वित होती
हुई विराम को प्राप्त हो गई थी। उन अवसर पर भगवान भन्भु ने भी
उसके वचन को नवंपा मव और तम्य एवं मनुचित हो ब्रह्म किया
पा।६। इसके उपरान भगवान् सन्म ने अपने गणो में महिल ही
वहा निवाग करने लगे थे। जिस प्रकार से पहिते रहते थे उनी मौन
इम समय में मो उम गङ्गावतरण शिखर पर रहते थे।
काली पितुगंह याना सीनि परिवारिता ।
नालोरपली मा दोना गुरूणां वदनं सती ॥
एतम्मिन्नन्तरे मप्त मरोचिप्रमुखान् मुनीन् ।
चिन्तयामास शशिभूत काली प्राययितनदा ॥६
चिन्तिता सप्न मुनयन्तत्क्षणान्मदनारिणा ।
प्राप्टा इव देनापि तत्सकाशमुपागताः ॥१०
तान् मुनीन् दहशे गम्भः सप्ताग्नीनिव दोपितान् ।
अरन्धनी वमिप्ठन्य सवाशे दहशे मनीम् ।।११
अरुन्धती तनो दृष्ट्वा वसिष्ठस्य समीपन ।
मेने योपिग्रह धर्म मुनिभिश्चाप्यवजितम् ॥१२
तिम्ने मुसर समजर पदम,

१२४
[ कालिका पुराण
इदमूचु प्रहण स्मरणाकर्षिता प्रियम् ।।१३
वह काली अपनी सखियो के साथ परिवारित अर्थात् घिरी हुई
होकर अपने पिता के घर में चली गयी थी । वह सती हीन होती हुई
गुरुजनो के मुख का अवलोकन नही कर रही थी । ८। इसी बोच में
मात मरीचि जिनमे प्रधान थे उन मुनियो का चन्द्र शेखर प्रभु ने उन
ममय में काली की प्रार्थना करने के लिये चिन्तन किया था । ६। उसी
क्षण मे कामदेव वे अरि शम्भु के द्वारा चिन्तित किये हुए मृतिगण सातों
किसी के द्वारा आकृष्ट हुए की हो भौति उनके समीप मे समागत हो
गये थे । १० । भगवान् शम्भु ने उन मुनियो को दीपित सात अग्नियो
से ही समान देखा था और वसिष्ठ मुनि के समीप मे सतो अरुन्धती को
भी देखा था । ११। इसके उपरान्त वसिष्ठ मुनि के समीप मे अरुधती
मा विलोपन परखे शम्भ ने मुनियो के द्वारा भी न वजित दिया हुआ
योपित मा ग्रहण करना धर्म मान लिया था ।१२। फिर उन समस्त
मुनियो ने वृषम ध्वज वो भली भांति पूजा बरसे स्मरण से ममार्षित
हुए प्रदर्ण मे यह उन्होंने प्रिय बोला था । १३॥
यन् प्रत्यक्ष दृश्यते शुद्धम्प
चन्द्रप्रश्य चन्द्रपण्डोपशोभि।
अन्त मन भावित तन्मुनोना
भाग्य दृप्ट भागधेयेन मुवनं. ॥१४
प्रभातम ध्यानतन्त्र पुरस्ता.
नित्य ध्येय ध्यामिना स्यप्रकाणम् ।
पुजीभूत वायतत्त्वेन शधद्
योग्यप्राप्य धाम शम्भोरदारम् ॥१५
दृष्ट्या पायवाणभाग स नेत्र
प्राणाप म्याद दर्शन गूर्यत यम् ।
मस्थामेद स्पानपाय नित्य
भवयाग्नुप ग मग गम्भुदेवा ।।१६

काली हर समागम वर्णन ] १२५ प्रकाशते य प्रथमादिभागत स्थित स बामे य इहैव नेता। सोऽम्मात्मर प्रथम स्वसिद्धयं हरस्य शक्त्या विधृतो ललाटे ॥१७ य प्रधानात्मक सत्त्वरजोभ्या तमसान्वित । पुरुष सर्वजगता स हरो न प्रसीदतु ||१८ इति सस्तुत्य देवेश मुनयो विनयानता । ऊ किमर्थं भवता स्मृतास्तन्नो निगद्यताम् ।।१६ तेपा तद्वचन श्रुत्वा शकर प्रसन्निव । जगाद तान्मुनीन् सर्वानाभाप्य च पृथक् पृथक् ॥२० ऋषियो ने कहा-जो प्रत्यक्ष में शुद्ध रूप दिखलाई देता है वह चन्द्र से प्रसिद्ध और चन्द्र के खण्ड से उपशोभित है । अन्तर में प्रज्ञ मुनियों का वह भावित स्वरूप है । युक्तो के द्वारा भाग्य को उदय होने मे भाग्य देखा गया है । १४ । प्रज्ञा के अधीन आगे घ्यान तन्त्र- नित्य-ध्यान करने वालो का ध्यान करने के योग्य-नित्य और स्व- प्रकाश है अर्थात् अपने ही से प्रकाश वाला है। वाह्य तत्त्व स निरन्तर पुनीभूत और समुचित प्रास करने के योग्य भगवान् शम्भु का उदार धाम है 1१५नेप के सहित जिसके थप्रभाग को देख कर ही मूर्य के समान दर्शन ही परित्राण के लिये होता है। यह स्थान सर्व का नित्य थाम है । स्तुति करने के योग्य शम्भु के उस देह को भक्ति से नमस्कार है । १६ । जो प्रथम आदि भाग में प्रकाश करता है-जो वाम भाग स्थित है यह यहाँ पर ही नेता है भगवान हरके सलाट में विशेष रूप से शक्ति से धारण किया हुआ वह हमारी अपनी सिद्धि के लिये प्रथम होवे । १७॥ जो प्रधान के स्वरूप वाला सत्त्व-रज और तम से समन्वित है वह पुरुष समस्त जगतो का हर हमारे ऊपर प्रसन्न होवे । ११८॥ दम प्रकार से मुनिगण ने विनय म अवात होत हुए देवसर की । १२८ [ कालिका पुराण हर गृहीत्वा मनमा नान्य सापोह वाञ्छति । इत्युक्त्वा मेनया साधं सुता दातुच शम्भवे ॥३४ अगीकृत्य विसृष्टास्ते ह्यनुप्रापुर्महेश्वरम् । ते गत्वा मुनय सर्वे मरीचिप्रमुखा द्विजा ॥३५ तो हे गिरवर | उन शम्भु प्रभु के लिये अपनी पुत्री काली को दे दो उनके द्वारा इस भांति कहे हुए अचलराज अपने हृदय मे स्थित दुहिता के प्रिय को चिरकाल पर्यन्त समझ कर और सद्वचन से आनन्द प्राप्त करके फिर प्रकाश में यह कहा-समागत हुए आप लोगो ने जो मुनियो मे शार्दूल के ही समान है अर्थात् परमाधिक श्रेष्ठ हैं मुझे पवित्र कर दिया है और आपने मेरा मनोरथ भी परिपूर्ण कर दिया है । आप लोगो ने जब मुझे आदेश दिया है तो मैं अपनी पुत्री को भगवान् शम्भु के लिये आवश्य हो समपित कर दूंगा ।। २६-३१। इसके पूर्व ही तपस्या का समाचरण करके उसके द्वारा ईश्वर को अपना पति वाहा था। यह तो विधाता का ही नियोजन है। इसको अन्यथा अर्थात् विपरीत करने मे कौन समथ हो सकता है अर्थात् इसके विरुद्ध करने की शक्ति किसी से भी नहीं है ॥ ३२॥ विना प्रभु शम्भु के अन्य कौन है जो मेरी पुत्री की प्राथना करन म समथ होव । जिसका अब ग्रहण हर ने कर लिया है उसका ग्रहण करन का अन्य कौन उत्साह करेगा। अर्थात कोई भी उत्साहित नहीं होगा ॥ ३३॥ और वह काली भी अपने मन से मन्त्र को ग्रहण करक अन्य किसी की इच्छा ही नहीं कर रहा है । इतना कह कर मेनका क साथ शम्भु के लिये अपनी पुत्री को देने क लिये अङ्गीकार करके उनको विदा किया गया था और फिर वे महेश्वर प्रभु के समीप में प्राप्त हुये थे। उन मब मुनियो ने जिनमें मरीचि प्रधान थे हे द्विजो वहाँ से गमन किया था ॥३४॥३५।। शैलराजो यदाचष्ट तदूचुर्मदनारये । हिमवास्तनया दातु तुभ्यमुत्सहते हर ॥३६

- काली हर समागम वर्णन ]
१२६
यदिदानी त्वया क्तुं युज्यते नियता तु तत् ।
अस्माश्चाप्यनुजानीte हर गन्तु निजास्पदम् ॥३७
सिद्ध ज्ञात्वा हरः साध्य मुदिस्तान् विसृष्टवान् ।
यथायोग्य समाभाप्य प्रमादककशा मुनीन् ॥३८
कालीविवाहावसर यूयमायात मा प्रति ।
इति ते वे हरणाक्त प्रतियुत्यपंया ययु ॥३६
अथान्योन्यत्रिययया कृत्वा कृत्वा गतागतम् ।
समय कारयामास विवाहाय हरो गिरिम् ॥४०
माघवे मासि पचम्या सित पक्ष गुरादिने ।
चन्द्र चोत्तरफाल्गुन्या भरण्यादौ स्थिते रवी ॥४१
आगता मुनयस्यत्र मरोचिप्रमुखा मुहुः ।
हरेण चिन्तिता सव तथा ब्रह्मादय. सुरा ॥४२
जा कुछ भी शैलराज ने कहा था उन्होन भगवान् शङ्कर से
वह दिया था। है हर ! शैलराज तो अपनी कन्या को आपके लिये
प्रदान करन को समुत्साहित हो रहा है ॥३६॥ इस समय में जो कुछ
आप करना समुचित समझत हैं वही आपको करना चाहिए । हे हर !
अब म लोगो को वपन आश्रमो में गमन करने के लिये आज्ञा दीजिए।
१३७। भगवान हर न साधन करने के योग्य कार्य सिद्ध समझ करके
उन सब मुनियो का विदाई दे दी थी। एक-एक मुनि से यथोचित रूप
से सम्भाषण करके ही क्रम से विदा किया था । ३८ । काली के साथ
जब विवाह हो उस अवसर पर आप लोग मेरे समीप म आइये । इम
प्रकार से भगवान हर के कहे हुए वचन को प्रतिज्ञा करके ऋषिगण वहाँ
से अपने-अपने याप्रमो को चले गये थे । ३६। इसके अनन्तर परस्पर
म प्रेम के साथ गतागत र वर के यर्थात् आपस में गमन और आगमन
करके भगवान शम्भु न गिरिराज से विवाह के सम्पन्न होने के लिये
समय पिया या । १० । माघव मास में-शुक्ल पक्ष में-पञ्चमी तिथि

१३० । कालिका पुराण और गुरुवार के दिन मे-उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र म-भरणी आदिम रवि के स्थित होने पर वहा पर मुनिगण जिनमे मरीचि प्रधान थे वहाँ पर समागत हुए और ब्रह्मा आदि देवगण भी आगये थे ॥४१॥४२॥ तथा च सर्वे दिकपाला मुनयश्च तपोधना । शच्या सह तथा शको ब्रह्माण्याद्यास्तु मातर ।।४३ नारदश्व गतस्तत्र देवपित ह्मण सुत । एत परिचरै सार्ध गणराप्यायिन स्वकं ॥४४ ववाहिकेन विधिना गिरिपुत्री हरोऽग्रहीत् । विवाहे गिरिजा शम्भो सर्पा येऽष्टौ तनौ स्थिता ॥४५ ते जाम्बुनदसनद्धा मलकारास्तदाभवन् । द्विभुजोभून्महादेवो जटा केशत्वमागता ॥४६ शिरस्थितश्चन्द्रखण्ड सोऽचिपा ज्वलितोऽभवत् ।।४७ विचित्रवसन व्याघ्रकृत्तिरासीत्तदा द्विजा । विभतिलपो ह्यस्याभून् सुगन्धिमलयोद्भव ॥४८ गौरस्पो हरस्तन बभूवादभुयदशन । ततो दवा मगन्धवा सिद्ध विद्याधरारगा ॥४६ उसी भांति सब दिक्पाल-तप क ही धन वाले मुनिगण-शची क सहित इद्र देव--ब्रह्माणी आदि माता- ग्रह्माजी के पुत्र देवपि भारदजी भी वहाँ पर गये थे। इन परिचरों के साथ में और अपने गणाप दारा आप्यायित हुए भगवान शम्भु ने विवाह सम्बधी विधि क साथ गिरिवर वी पुत्रो को ग्रहण किया था। गिरिजा और शम्भु के विवाद म ना आठ सफ शम्भु य परीर म स्थित थे ये उस समय म गुवण म स नर असतार हा गय थे। महादव दो भुजाओ वाले हो गये प और जटाय गुदर बशा व स्वस्प महागपी थी ।।१३-४६|| शम्भ शिरम गस्थिय पदमा कायमओ पा यह भी किरणो स प्रज्वलित हा गया था । 1दित्रा । उस अवसर पर ध्यान पामा घम पा काली हर समागम वर्णन } --- वह भी विचित्र वस्न के रूप वाला हो गया था। इनका जो भस्म का विलेपन था वह उस समय मे परम सुगन्छित मलय चन्दन हो गया था । । ४८। उस समय में भगवान् शम्भु गौर स्वरूप से समन्वित होकर अद्भुत दर्शन वाले बन गये थे । इसके अनन्तर समस्य देवगण- गन्धर्व-सिद्ध-विद्याधर और उरग मण सभी आश्चर्य से रायुत हो गये थे ॥४॥ विस्मयं परमं जामुर्हरं दृष्टवा तथाविधम् । हिमवान् मुदितश्वासीत् सहपुत्रश्च मेनया ।।५० ज्ञातयश्चास्य मुमुहुर्हर दृष्ट्वा तथाविधम् । इदं ब्रह्मा तत्र जगौ हर दृष्ट्वा मनोहरम् ॥५.१ सर्व शिवकरं यस्मात् सुवेशमभवत्सुराः । तस्माच्छिवोऽय लोकेषु नाम्नाख्यातोऽधियाः शियः ॥१३ महेश्वरमुमायुक्तमीहश यः स्मरेदा। सततं तस्य कल्याण वाञ्छित च भविष्यात एवं काली महामाया योगनिद्रा जायगा। पूर्व दाक्षायणी भूत्वा पश्चाद् गिरिमा ५४ स्वयं समर्थापि सती काली सम्मानि । तथाप्युग्रं तपस्तेपे हिताय जग शिक्षा एवं सम्मोहयामास कालिया पy इत्येतन् कथितं सर्वं त्यक्तदहा मया !

१३२ [ कालिका पुराण हो मनोहर थे यही कहने लगे थे कि यह तो साक्षात् ब्रहााजी ही हैं । ॥५१॥ क्योकि सब ही वेश शिव अर्थात् कल्याण करने वाला मङ्गल मय है इसी कारण से यह लोको में यह अधिक शिव है इसलिये शिव- इस नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । ५२ ।। जो पुरुप महेश्वर को उमा से युक्त इस प्रकार वाले का हृदय से स्मरण किया मरता हैं उसका निरन्तर ही कल्याण होता है और जो भी कुछ मनोवाञ्छित होता है वह भी हो जायगा ।।५३।। इसी प्रकार से महामाया योग निद्रा जगत् को प्रसूत करने वालो काली पूर्व मे दाक्षायणी अर्थात् दक्ष प्रजापति की पुत्री होकर पीछे गिरिराज हिमवान् की मुता हुई थी ॥ ५५ ॥ सती काली स्वय हर को सम्मोहित करने में समर्थ होती हुई भी उसने तथापि जगतो के हित के लिये शिवा ने उग्र तपश्चर्या का समाचरण किया था। इमी रीति से कालिका ने चन्द्रशेखर प्रभु को सम्मोहित किया या ।।५।। यह सब कह दिया है जिस प्रकार से सती ने अपने देह का त्याग करके हिमवान् की पुत्री होकर पुन: महेश्वर प्रभु की प्राप्ति की पी।५६) । इद य: कीर्तयत् पुण्य कालिकाचरित द्विजा. । नाघयो व्याधयस्तस्य दीर्घायुः स च जायते ॥५७ इद पवित्र परममिद कल्याणवर्धनम् श्रुत्वापि सकृदेवेद शिवलोकाय गच्छति ॥५८ य. धाद्ध थावयद्विप्रान् कालिकाचारित महत् । पितरस्तस्य कंवल्यमाप्नुवन्ति न सशयः ॥५६ यःभावयेद् ग्राह्मणाना सन्निधो वा समागतः । तव स्वय हरो गत्वा शृणोति सह मायया ॥६० इति वः कथित पुण्य सवपापप्रणाशनम् । युप्मन्य रोचते चान्यछत्तत् पृच्छन्तु सत्तमाः ।।६१ है दिनो । जो कोई इग परम पुग्यमय पालिका देवी के परित

गोरी शिव विहार वर्णन
१३३
या कीर्तन किया करता है उसको आधियां (मानसिक चिन्ताएँ)
और व्याधियों नही होती है और वह दीर्घायु हो जाता है ।। ५७ ।।
यह परमाधिक पवित्र है और यह कल्याण का बढाने वाला है। इसका
एक बार भी श्रवण करके मनुष्य शिव लोक का गमन क्यिा करता
है ।।५८ ॥ जो श्राद्ध म आमन्त्रित विप्रो को इस महत कालिका चरित
का श्रवण कराता है उसके पितृगण पवल्य को प्राप्त किया करते हैं-
हमम तनिव' भी मशय नहीं है ।। ५६ ।। जो ब्राह्मणो की सन्निधि में
गमागत होपर इसका श्रवण कगता है वहां पर शकर माया के सहित
गमन करके इसका श्रवण किया करते हैं। अप लोगो के मामने यह
परम पुण्यमय और ममस्त पापो का विनाशक कह दिया है । हे सत्तमो।
अब आप लोगो को जो भी रचता हो जो भी कुछ अन्य हो उसका श्रवण
परिये ॥६०-६१॥
-
000
॥ गौरी शिव विहार वर्णन ॥
विचितिदमारयात ब्रह्मन् वालीहरागमम् ।
पुण्यं पापहर नित्य थ तिसौख्यप्रद वरम् ।।१
भूय क्थय शर्वस्य कालीतन्वधंमुत्तमम् ।
क्य जहार गौरी वा क्यम्भूताय कालिका ॥२
केन वा कारणेनाशु कृष्णा गोरीत्वमागता ।
तन्न कयय तत्त्वेन मनिप्ठ द्विजीत्तम ॥३
इद तु महदास्यान कथयिष्यामि योभुना ।
महपंयस्तच्छृण्वप्नु तत्त्वेन शुभद परम् ॥४
एतदौर्व पुरा राजा मगर पृष्टवान्मुनिम् ।
स त यथा समाचष्ट तद्वोऽय मिगदाम्यहम् ॥५

[पालिका पुगण पुराभूत सोमवशे च सगरो नाम पार्थिव । स श्रीमान् बलवान् दक्ष सर्वशास्त्रार्थपारग. ॥६ सोऽभूदेवरथेनैव जित्वा सर्वान् महीभुज. । सार्वभौमो नरपति मर्वराजगुयुत. 11७ ऋपियो ने कहा-है ब्रह्मन् । यह पाली और हरका ममागम अतीव विचित्र आपने वर्णन किया है जो परम पुण्यमय-पापी वा हरण करने याला-नित्य और अंछ तथा श्रवण करने में मुन प्रदान करने वाला है ।। १ ।। अब आप पुन शिव या उत्तम तनु का अधं भाग वाली अथवा गौरी ने कैसे हरण किया था। वह कालिका विम प्रकार की है ॥ २॥ है मुनियों में श्रेष्ठ । है द्विजो मे उत्तम । किम कारण से शीघ्र ही काली गौरीत्व को प्राप्त हो गई थी। हमको यह सब तात्त्विक रूप से कहिए ॥ ३ ॥ मार्कण्डे मुनि ने कहा-~-इस महान् आख्यान को इस समय मै मैं आपके सामने क्हूगा। हे महपि गणो | इस परम शुभ देने वाले का आप लोग मर श्रवण कीजिए ॥ ४॥ यही वात पहिले ममय म राजा सगर ने औचं मुनि से पूछी थी। उनने उममे जिस प्रकार मै कहा या वही मैं आप लोगों को बतलाता हू ॥ ५॥ प्राचीन समय मे सोमवश मे एक मगर नाम वाला राजा हुआ था। वह बलशाली- श्रीमान--दक्ष और समस्त शास्त्रो के अर्थो का पारागामी भी विद्वान था ॥ ६ ॥ वह राजा अपने ए ही रथ के द्वारा समस्त नृपो को जीतकर मब राजा के उस्थित गुणों से समन्वित नृपति सार्वभौम अर्थात् चक्रवर्ती हो गया था ॥७॥ त प्राप्त राज्य राजान नगर पार्थिवोत्तमम् । सभाजयितुमत्यर्थ मुनय समुपागता ॥८ प्राच्योदोच्या महात्मानो दाक्षिणात्यास्तथोत्तरा । मुनयो ब्राह्मणाश्चव नृप द्रप्टु समागमन् ।।६ प्रागतेप्वथ सर्वेषु महात्मा ज्वलनोपम ।

गौरी शिव विहार वर्णन } औो नाम मुनि श्रीमानागतो नन्दितु नृपम् ।।१० तमागतं मुनि दृष्ट्वा ज्वलन्तमिव पावकम् । सपर्यया महत्या नु मगरस्तमपूजयन् ।।११ पाद्यमाचमनायं च दत्त्ववाघंपुरोगमम् । निवेशयामाम च तं मुनिश्रेणं वरासने ॥१२ उवाच च महात्मानमौवं म सगरो नृपः । प्रणम्य च यथायोग्यं कुशलं त इति द्विजम् ॥१३ मच प्राह मुनिश्रेष्ठो नरराज सदा मम । मर्वत्र कुशलं त्वां तु द्रष्टुं कुशलमुत्महे ।।१४ उस राज्य प्राप्त करने वाले राजाओ में अत्युत्तम राजा मगर को अभिनन्दित करने के लिये मुनिगण ममागन हुए थे ॥ ८॥ पूर्व दिशा के रहने वाले उत्तर के निवासी-दक्षिण के वासी तथा उत्तर के मुनिगण और ब्राह्मण नप के दर्शन करने के लिये ममागत हुए धे मबरे ममागत होने पर इसके उपरान्त अग्नि के ममान महान आत्मा वाले और्व नाम वाले श्रीमान् और्व मुनि नृप का अभिनन्दन करने के लिये आये थे ॥१०॥ आगन उन मुनिवर का दर्शन करके जो जलते हुए अग्नि से मदृश पे राजा सगर ने महली पजा के द्वारा उनका अध्यन दिया था ।।११।। अर्धपूर्वक पाद्य और आचमनीय देकर उन मुनिश्रेष्ठ यो राजा ने छ आसन पर निदेशित किया था ॥ १२॥ फिर उम मगर राजा ने महात्मा औवं मे कहा था। उसने ममचित रीति मे प्रणाम पर द्विज मे पूछा था कि आपका बुगल तो है ॥१३॥ और मुनि घोष्ठ ने यहा पा लि है नरराज मेग मदा ही मर्वत्र दुगल है । मैं आपरा दर्शन करने के लिए कुशलता के माप उत्माह करता है ॥१४॥ त्वत कोऽन्योऽस्ति कुगली पृथिव्या सर्वराजमु । य एक. सजिगायाशु भवान् मफलपार्थिवान् ।।१५ युगलं वधंतां नित्यं तव राजवरोत्तम ।

[पालिका पुराण
यथा नीत्या सदाचार पथिवी शाधि भूपते ॥१६
तव वद्री जगदवद्रिर्वद्धी चेष्टा तत दुरु।
शुभ्राशवद्रौ सतत मागरस्येव वधनम, ॥१७
प्रथम सदगणरात्मा क्रियता नप योजनम् ।
तत स्वभार्या महिपी नियता तदगुणयुता ।।१८
निन्या सयोजिता चेत स्याद्रनिता स्वयमेव हि।
स्वगणेप प्रवेक्ष्यन्ती महत्यपि धृतवता ॥१६
थ यते हिमवत्पत्री शम्भसगतमानसा।
क्रियाभ्यपायैर्वहमि शम्भना मा प्रयोजिता ॥२०
ततोऽतिमहता प्रेम्णा शकरस्याथ पार्वती ।
शरीरमर्धमहरत्तस्यैवानुमते
सती ॥२१
आपमे अधिक पृथिवी मे समस्त राजाओं में कुशली है जिम
एक ने ही आपने वहत शीघ्र ही समान राजाओ को जीत लिया था
॥१५॥ है राज नरोत्तम । आपका कुशल नित्य ही बढे । हे भूपते
नीति के अनुसार सद् आचरणो के द्वारा पृथिवी का शासन करिये ।
।॥ १६ ॥ आपकी समृद्धि के होने पर जगत् की वृद्धि है अतएव उसी
भांति आप वृद्धि के लिये ही चेना करित । जैसे चन्द्र की वृद्धि होने
पर सागर का निरन्तर वृद्धि हुआ करती है । १७ । है
नप
| सबसे
प्रथम सद्गुणो से अपनी आत्मा को अर्था अपने आपनो योजित करिए।
इसके उपसन्त उसके गुणो मे समन्वित भार्या को महिषी बनाइये ।१८१
यदि वनिता को नित्य ही मयोजित किया जावे तो वह स्वयं ही अपने
गुणा के विषय में प्रवेक्षण करने वाली होती हुई महती और प्रतधारण
करने वाली हो जाती है ॥ १६ ॥ ऐसा सुना जाता है कि शम्भ
म सङ्गत मन वाली होती हुई हिमवान की पुत्री बहुत सी क्रिया
और अभ्युपायो के द्वारा वह शम्भृ के द्वारा प्रयोजित की गई थी
॥ २० ॥ इसके अनन्तर शम्भु के अत्यधिक प्रेम से सती पार्वती ने

गौरी शिव वहार वर्णन ]
उनकी ही अनुमति से उना आरे शरीर का हरण कर लिया
था ।२१॥
अर्धनारीश्वरस्तेन तदा प्रभृति शकर ।
अवभन नृपशार्दूल नान्या भार्या गृहीतवान् ॥२२
तम्मात स्वमपि राजेन्द्र म्वजायामात्मनोत्तरे।
गुणे सयोजय लघु सयोजय तत सुतम् ॥२३
इत्योवभाषित थ त्वा सगरोऽपि मुदान्वित ।
इद मुनिःपच्छन स नृपति स्मितसन्तत ॥२४
कय सा गिरिजा देवी कायामहरत सती।
शकरस्य द्विजश्रेष्ठ तदह श्रोतुमुत्सहे ॥२५
नीत्या यया वा योवतव्या स्यात्मा भार्या सुतोऽथवा ।
ता नीनि च मवाचारसहिता श्रोतमुाहे ।।२६
राजनीति सना नीतिमन्येपा च कृतात्मनाम, ।
पृथक् पथव श्रोतुमिच्छुरह त्वा नाथये द्विज ॥२७
यदि गय मिद ब्रह्मान्न तटा श्रोतमू सहे।
तथा नाजापगामि त्वा श्रोतमिच्छुश्च तत्समम ॥
कृपया क्यनीय चेत्तदा कथय तन्मुने ॥२८
तभी से लेकर भगवान् गहर उमी कारण मे अर्धनारीश्वर हो
गये थे। है प शार्दूल । उन्होन फिर अप भार्या का महण नहीं
किया था । २२। इस कारण मे हे राजेन्द्र । आप भी अपनी नापा को
उत्तर मे आत्मा से गुणो के द्वारा मगेजित बीजिये उसके उपरान्त मधु
मुन को मयोजित परे ।२३। माण्डेय महर्षि ने कहा-राजा मगर
भी इस ओर्व के द्वारा भाषित वा श्रवण पर दर्ज से सर्मा इस तो
गया था और मन्द मुमान स सपुत होर उगो मुनि मे पर ust
पा । २४ । गागर ने पहा---उस सनी गिरिजा देवीने गर भगता
परीर का आधा भाग हरण विया पाहे जिन।

१३८ । बालिका पुराण श्रवण करना चाहता हू । २५। इस नीति से अपनी आत्मा का अर्थात् अपने आपका भार्या का अथवा सुत का योजन करना चाहिए उस नीति का और सदाचार सहिता का भी श्रवण करना चाहता हूँ । २६ । हे द्विज । राजनीति-~सत्पुरुषो को नीति और अन्य कृतात्माओ की नीति का मैं पृथक्-पृथक श्रवण करने का इच्छा वाला हू मैं आपकी प्रार्थना करता है । २७ । हे ब्रह्मन् । यदि यह परम गोपनीय हो तो मैं नहीं सुनना चाहना है । मैं उम भानि मे आपको कोई आज्ञा नहीं दे रहा हूँ और उसके ही ममान मैं थवण करन का इच्छुक हूँ। कृपा करके आपको मुझे बतलाना चाहिए यदि यह बतलाने के योग्य हो तो है मुनिवर | आप करिये ॥२८॥ इत्येवं सगरेणोक्तमोऽपि द्विजसत्तम । प्रत्युवाच महात्मान कृपालुस्तत्र भूपतो ॥२६ शृणु राजन प्रवक्ष्यामि यद् यत् पष्टमिह त्वया । यथा हरस्य त वर्ध भूभत्पुत्री पुराहरत् ।।३० यथा नीतिस्त्वया कार्या यत्र यत्र नृपोत्तम । सर्वेपा च सदाचार क्रमाद वक्ष्यामि तच्छणु ॥३१ यदोढा हिमवत्पत्री शररेण महात्मना । कियन्त स तदा काल तत्र निन्ये सहोमया ॥३२ रममाणस्तया साध सानो कुञ्ज दरीषु च । विहार चिर तत्र पार्वती मोदयन् हर ॥३३ अथ काले तु सम्प्राप्ते शम्भ क्लासपर्वतम् । मगणो भायंया साधमगच्छस्त्रिदिवोपमम् ॥३४ स त्वया बीडमानश्च त्यवतध्यानात्मचिन्तन । तद्वक्त्रचन्द्रे नेत्राणि चकोरानिव चावरान् ॥३५ .

गौरी शिव विहार वर्णन ] हुये उस महान आत्मा वाले के प्रति कहा । २६१ औ ने कहा-हे राजन् । आप श्रवण कीजिए। आपने यहां पर जो-जो भी पूछा है उसे मैं आपको बतलाऊँगा। पहले पुराने समय मे हिमवान् की पुत्री ने जिस रीति से भगवान हर के शरीर का आधा भाग का हरण किया था । ३० । हे नृपोत्तम ! जहा-जहाँ पर आपको जैसी नीति करना चाहिये उसे और सबका सदाचार जो भी होना चाहिये इसे क्रम से ही मैं बतलाऊँगा-यह आप श्रवण कीजिए ।३१। जिस समय में महात्मा मकर ने हिमवान् की पुत्री के साथ विवाह किया था। वह उस समय मे कितने काल पर्यन्त वहा पर उमा के साथ रहे थे अर्यात कितना समय व्यतीत किया था । ६२ । भगवान् गम्भु शिखर पर-कुञ्ज मै और पर्वत की दरियो मे उसके साथ रमण करते हुये भगवान हर ने पार्वती को प्रसन्न करते हुये वहां पर चिरकाल तक विहार किया था (३३।। इसके अनन्तर काल के सम्प्राप्त होने पर भगवान् शम्भु अपने गणो के गरित और अपनी भार्या के साथ स्वर्ग के ममान कैलास पर्वत पर चले गये न । ३४ | ये उस उमा के माध क्रीडा करते हुये ध्यान और आत्मा का चिन्तन उन्होंने सब कुछ त्याग दिया था और उनने उस उमा के चन्द्र पर ही अपने नेत्रो को चकोर के ही भांति बना लिया था अर्थात वे मपंदा उसके ही मुषा का अवलोकन किया करते थे ॥३५॥ पुष्पाणि क्वचिदाहत्य गिरिजां प्रति शकर । सर्वाङ्गसङ्गिनी माला विदधेऽतिमनोहराम ॥३६ कदाचिदादर्शनले युगपञ्चात्मनो मुखम् । मुख तथैवापर्णाया वीक्षाके वृपध्वजः ॥३७ कदाचिन्मृगनामाना विलेपर्गन्धपत्रकम् । रास्या धनस्तनयुगे विलिलेख स्मरान्तकः ॥३८ गन्धसारविलेपेन तिलकान्यम्बिकातनो। ललाटे चाकरोच्चारु चन्द्रवदनसन्धिपु ॥३६ १४० [ पालिका पुराण उमानिससससक्तकेशपाशेपु चित्रकम । चन्दनागुरुकस्तृरीकु कुमस्य विलेपन. ॥४० चकार येन तस्यास्तु केशपाशो व्यराजत । नर्तनायावतीर्णस्य शिखितुच्छस्त साम्यधृक् ।।४१ जाम्बूनदमयाज, शद्धान् कुण्डलाद्यान मनोहरन् । अलकारानुमा देहे समानादि वृषध्वज ॥४२ क्सिी समय मे गिरिजा के लिये पुप्पो का समाहरण करके भगवान् शङ्कर अत्यन्त मुन्दर उसके लिये माला बनाया करते थे जो कि उसके मर्व अङ्गो मे नीचे तक लटकने वाली होवे । ३६ । किमी समय मे दर्पण में एक ही माथ अपना मुख और उमी भांति अपर्णा का अर्थात् उमा देवी का मुख वृषभ ध्वज देखा करते थे । ३७ । किसी अवसर पर वस्तूरिकाओ के द्वारा गन्धपनको के विलेयनो से उस उमा के धन दोनो स्तनो पर भगवान् शङ्कर निलेखन किया करते थे। ३८ । भगवान शम्भु अम्विका के शरीर पर धसार का विलेपन करते थे और ललाट पर लगाकर उसे सुन्दर पिया करते थे । चन्द्र के समान धनी मधियो वाले उमा देवी के निर्याम से संसक्त बेश याशो मे चित्रक लिखा करते थे। चन्दन-अगुरु (गूगल ) कस्तूरी और कुङ्कम के विलेपनो के द्वारा विचित्र कर दिया करते थे जिससे उम देवी का पेश पाश अर्थात् मस्तक के वेशो का जूट विशेष रूप से शोभायमान हो जाता था। जो वेशपाश नृत्य करने के लिये अवतीर्ण मयूर के पुच्छ यो समता का धारण करने वाला हो जाया करता था ॥३६-४१॥ वृषभ ध्वज मुवर्ण से परिपूर्ण-शुद्ध-मनोहर कुण्डल आदि अलङ्कारो को उमादेवी के देह में समावर्पित क्यिा करते थे ॥४२॥ तंर्जाम्बूनदसम्भूतयोजितगिरिजातनु । विभाति जलदापूर्ण कालिवेव तडिद्गण ॥४३ मवैदिव्यरलकार नारत्ने सदशुष ।

गोगे शिव विहार वर्णन ] १४१ सपूर्णमण्डिता कालो सादृश्य प्रकृतेर्दधौ ॥४४ एव सदा सानुरागस्तस्या शम्भुर्जगत्पति. । जगद्धिताय चिक्रीड काल्या दयितया सह ।।४५ काली च जगता माता महामाया जगन्मयो । योगनिद्रा जगद पुद्धिविद्याविद्यात्मिकाखिला ॥४६ प्रकृति. परमा मूलि सान्तस्थितिकारिणी। सम्मोह्य शकर यत्नाज्जगता च हित पिणी। रेमे तेन सम देवी चन्द्रिकेव सुधाशुना ॥४७ उन सुवर्ण से विनिर्मित योजित अलङ्कारी से गिरिजा देवी का शरीर जलदो से आपूर्ण मे तडित गणो स कालिका की ही भांति शोभित हो रहा था । ४३ । सम्पूर्ण दिव्य अलङ्कारी के द्वारा-अनेक प्रकार के रत्नो से तथा सुन्दर वस्त्रों से पूर्ण रूप से मण्डित हुई काली ने प्रवृति देवी को सदृशता को धारण किया था । ४४। इस प्रकार से जगत् के पति भगवान् गम्भु सर्वदा उम काली मे अनुदाग से युक्त होगये थे । उन्होंने जगत के हित के लिये दयिता काली के साथ क्रीडा की थी। १४५। जगतो की माता--महामाया-जगन्म यी काली योग निद्रा, जगत् की बुद्धि--विद्या और अखिला विद्या के स्वरूप वाली थी। वह परमा भूति--प्रकृति और सर्ग-स्थिति और सहार के बरने वाली यो । वह जगतो को हित की इच्छा करने वाली इसी कारण से भगवान शहर का सम्मोहन करके सुधागु के साथ चन्द्रिका ही हो मांति उनके साथ उम देवी ने रमण किया था । ४७।

१४२
[ वालिया पुगण
॥ वेताल भरव उत्पत्ति ॥
अथ कालकमेणव प्रवृद्धास्ते महावलाः।
शस्त्रास्त्रज्ञानकुशलाः शास्त्रार्थपरिनिप्ठिताः ॥१
सम्प्राप्तयोवना दीप्ता दुर्धाः परिपयिभिः ।
धर्मार्थज्ञानकुश ना ब्रह्मण्या. मत्यवादिनः ।।२
सदा सहचरी तन प्रीत्या वेनालभैरवी।
अलका दमनश्कव तथोपरिचरस्श्रयः ।
सदा सहचरा नित्यं भ्रातरश्चान्द्रशेखराः ॥३
निप्वात्मजेपु नृपते. सदोपरिचरादिपु ।
ममत्वमधिकं नित्य प्रीतिस्नेही तथाधिको ॥४
वेताले भरवे चापि चन्द्रशेखरभूभृत ।
नास्त्येव तादृशी प्रीतिर्याशी तेषु जायते ॥५
न तौ दृष्ट्वा स नृपति कदाचिच्चन्द्रशेखरः।
आत्याहादतेऽजस्र पुत्रबुद्धय प्यतेज्यवा ।।६
तौ वीरौ धर्मकुशली महावलपराक्रमौ ।
त्रैलोक्यविजये दक्षौ शस्त्रास्त्रग्रामपारगी ॥७
और्व मुनि ने कहा--इसके अनन्तर वे काल क्रम से ही वे
महान बल वाले प्रवृद्ध होगये थे। वे शास्त्रो और अस्त्रो के ज्ञान में
कुशल थे और शास्त्रो के अर्थो में परिणिष्ठित थे 1१। वे यौवन के
सम्प्राप्त करने वाले थे तथा परम दीप्त एव परि पन्थियो के द्वारा दुर्धर्ष
थे अर्थात् शत्रु गण उनके तेज को सहन नहीं कर सकते थे। वे धर्म
और अर्थ के ज्ञान मे परम प्रवीण थे नथा ब्रह्मण्य एवं सत्यवादी थे ।२।
वहां पर प्रीति से वेताल और भैरव सर्वदा सहचर थे । अलक---दमन
और उपरिचर ये तीन थे। चन्द्रशेखर भाई सदा नित्य साथ मे चरण
करने वाले थे । ३। राजा के तीन पुत्रों में जो उपचर प्रमृति थे उनमे
-

१४४ [ पलिया पुराण 1 दोनो पुत्री को भली भांति प्रगत भी देता वरता था ।६। गधे अनन्तर राजा ने उपरिचर को यौवराज्य पद पर अभिषिक्त पर दिया था। वह सबसे बडा और समस्त राजा के गुणो से सयुत औरस पुत्र था । १०१ जो पीछे नीतियों के द्वारा ममत्त राजाओ यो योजित करेगा। उपरिचर नाम वाला समस्त शास्त्रो के अर्थों में पारङ्गत था। 1 ११। राजा ने दमन के लिय तथा अलर्क के लिपे दाय दिया था जिसमे बहुत धर रत्न थे तथा अधिव आमन और रथ थे । १२ । माग के द्वारा उतन धन रल आदि दाय के वित्त उन दोनो के लिये नही दिये थे जो कि वेताल भैरव थे इसके अनन्तर उन दोनो में क्रोध ने प्रवेश कर लिया था। वे दोनो ही क्रोध से अभिपरीति हो गये थे और वे दोनो इधर-उघर विचरण करने लग गये थे। उन दोनो वीरों ने भोगो के उपयोग करने की इच्छा ही नहीं की थी और वे तपश्चर्या का समाचरण करने के लिये उद्यत हो गये थे। उन दोनो के किसी भार्या से विवाह नहीं किया था अर्थात् वे दोनो अविवाहित थे तथा निरन्तर सदा ही निर्जन वन में वास किया करते थे ॥१४॥ तथाभूती नदा पुत्रौ देवी वेनालभैरवो। बुबुधे चिन्तयामाता देवी तारावती तदा ॥१५ राजोपरिचराद् भीता पत्युश्च चन्द्रशेखरात् । नोवाच किंचित् सुदतीच्छन्न तो वोधयत्यपि ।।१६ एतस्मिन्नन्तरे विद्वान् कपोतो मुनिसत्तमः । चित्रागदासगभोगी सन्तुष्ट. सुरतोत्सवै. ॥१७ चित्रागदा परित्यज्य सपुत्रा सहचारिणीम् । इयेष गन्तु स प्रोचे तदा चित्रागदा वष. १८ चित्रागदे तपस्ततु गमिष्यामि तपोवनम् । किं ते प्रिय करोमीह त मे वद मनोहरे ।।१६ तुम्पुरुश्च सुवर्चाश्च तनयो तव सुव्रत ।

बेताल भैरव उत्पत्ति ]
१४५
एतयोस्त्व मुनिष्ठ प्रिय कुरु यथोचितम् ॥२०
मा चापि भगिनोगेहे सस्थाप्य द्विजसजम ।
तदा तपोवन गच्छ यदि ते रोचतेऽनय ॥२१
उस काल में देव वेताल और भैरव पुत्रा को उस प्रकार से
रहने वाले है-ऐसा ज्ञान किया तो उस समय में देवी तारावती चिन्ना
से समाक्रान्त हो गई थी अर्यात् उसे बहुत अधिक चिन्ता समुत्पन्न हो
गई थी ॥१५वह उपरिचर राजा से और अपने पति चन्द्रगबर से
भयभीत हो गई थी। वह मुन्दती गुप्त रूप से उन दोनों का ज्ञान रखती
हुई भी कुछ भी नहीं बोनी थी ॥१६।। इसी बीच में मुनियों में परम
श्रेष्ठ और विद्वान पोत चित्राङ्गदा के साथ सम्भोग करने वाला और
सुरवीन्सचो के द्वारा परम सन्तुष्ट होकर उस सहचारिणी एव पुत्रों से
युक्त चित्राङ्गदा का परित्याग परके उनने वहाँ से गमन करने की
इच्छा की थी और उस अवसर उसने चिनाइदा मे यह वचन बहा
या ॥१५-१८। मुनि ने कहा है वित्राङ्गद ! मैं तपस्था वा ममा-
चरण करने के निरे बद तपादन म गमन करूंगा। यहाँ पर में तैग
वया प्रिय कार्य करूं? हे मनोहर । टनो का मुनं तुम बत्रवादी 11
चित्राङ्गदा ने कहा-ह सुद्रत | तुन्वा बोर मुवर्चा में दो बारे पुत्र
हैं। हे मुनिय! बाप इन दानों का जो भी दानत यात्रिय
करो॥०॥ है द्विरष्ठ ! मुझको भी मेरी भगिनी घरमा
पित करने हे अनय यापकी यदि रचना है दो नमी बार में
गमन वरिए ।२१॥
इति श्रुत्वा वचस्वस्या कपांनी मुनिमनमा ।
हिरन्यायं समालोच मुबग्मदन यो
प्रायवित्वा कुदेर तु मुबांना नतानि पद ।
निष्कामा तु महतानि म मम मुनियनमः ॥२३
गत भागबनानामानीव मुठीवन।

१४६ [ पालिका पुराण पुत्राच्या प्रददौ विप्रो भापि च विशेपत ॥२४ ततस्ता सहपुत्राभ्या तधनररि भूरिभि । चित्रागदामतेनाथ पुप्रयोरपि सम्मते ॥२५ सुवर्चस तुम्बुरु च तथा चित्रागदामपि । आमन्त्र्य मुनिशार्दूल करवीर पुर ययो ।॥२६ तत्र गत्वा स कपोतो राजान चन्द्रशेखरम् । राजोपरिचर चैव वाक्यमेतदुवाच ह ।।२७ इय ककुत्स्थजा भूप तवैव विदिता पुरा। सद्योजाती तथवास्यामेती मे तनयो शुची ॥२८ मुनिश्रेष्ठ कपोत यह उसके वचन का श्रवण करचे भली भाति विचार करके हिरण्य ( सुवर्ग ) के लिये कुवेर के भवन मे गये थे ।२२) उसने कुवेर से छ सो सहस सुवर्ण के निया की प्रार्थना की थी और उसने प्राप्त कर लिया था ॥ २३ ॥ बीवियों के सहित सौभार रनो के लाकर विप्र ने पुत्रो को दे दिया था और विशेष रूप से भार्या को दिया था ।।२।। इसके उपरात पुत्रो के सहित तथा बहुत से धनो के भो माथ चित्राङ्गदा के तथा पुत्रो के भी मत से सुवर्चा और तुम्वरु तथा चित्राङ्गा को भी आमन्त्रित करके वह मुनि शार्दूल करवीरपुर में चला गया था ।२६।। वहाँ जाकर वह कपोत राजा च द्रशेखर से तथा राजा उपरिचर यह वाक्य बोला था ॥ २७ ॥ हे नृप । यह कारस्थ को पुत्री है और यह पहिले आपकी भी जानी हुई है। उसी भांति ये परम शुचि-सद्योजात ये दोनों इसके रुदर से समुद्भूत मेरे पुत्र है ॥२८॥ एभिर्वित्त सम पुत्रौ मम त्व प्रतिपालय । राजोपरिचरश्चापि पालयविह मे सुतौ ।।२६ अपुत्रस्य नृप पुत्री निर्धनस्य धन नृप । अमातुर्जननी राजा घतातस्य पिता नृप ।।३० अनाथरय नपो नाथो ह्यमतुं पार्थिव पति ।

वैताल भैरव उत्पत्ति ]
१४७
अमृत्यस्य नृपो भृत्यो नृप एव नृणा सखा ।
सर्वदेवमयो राजा तस्मात् त्वामर्थये नृप ।।३१
तत. स राजा प्राह मुनिमेव द्विजोत्तमम् ।
करिष्ये त्वद्वचश्चाह राजोपरिचरश्च स. ॥३२
अथ चित्रागदा राजा क्षग्राह मुनिसम्मते ।
सुतौ च तस्य सधनो ज्यायसे सूनवे ददौ ॥३३
स चोपरिचर प्रादाद्राज्यमघ सुवचसे ।
तथैव सचिवाघ्यक्षमकरोतुम्बुरु तदा ॥३४
कपोतश्चापि सुप्रोन पुत्राधं समवेक्ष्य च ।
जगामामन्त्र्य नृपति तपसे च तपोवनम् ॥३५
इन घना के साथ आप मेरे दानो पुत्रा का सतपालन करे।
राजो परिचर भी यहा पर मेरे पुत्रों का पारपालन करे ।२६। जी
पुत्र हीन होता है उसका पुत्र नृप ही होता है और जो धन हीन होता है
उसका धन भी नृप ही हुआ करता है । विना माता वाले की जननी
नृप है और तात से रहित का पिता भी नृप ही हुआ करता है । ३०॥
अनाथ का नृप नाथ है और विना भर्ता वाले का पति नृप है । जिससे
कोई मृत्यु न होवे वे उसका भृत्य राजा ही है और नृप ही मनुष्या
सखा है। रारा सभी देवो में परिपूर्ण हुआ करता है
इसीसिये हे नृप । में आपसे प्रार्थना परता हूँ . ३१ । और्ष ने
कहा-इसके बनन्तर उस राजा ने द्विजोत्तम उस मुनि से इस
प्रकार से कहा था--मैं आपका वचन पूर्ण वरंगा और राजो परिचर
भी वरेणा ॥ ३२ ॥ इसके उपरान्त उस राजा ने मुनि की सम्मति
से चित्राङ्गदा को ग्रहण कर लिया था। और उसन दोनो सुतो
को जो धन के सहित ये वडे पुत्र के लिये उसने दे दिया या । ३३ ।
उस उपरिचर ने सुवर्धा को राज्य का आधा भाग दे दिया था। और
उसी भांति उस अवसर पर तुम्बर को उसने सचिवो का अध्यक्ष बना
दिया था । ३४। और पोत भी पुत्र का यधं भाग देखकर परम
का

१४८ [ कालिका पुराण प्रसन्न हुया और राजा का आमन्त्रण करके वह तप के लिए तपोवन को चला गया था ॥३॥ पथि गच्छन् स कपोत. शम्भुपुत्री मनोहरौ। एकाकिनी चरतन्तौ तु सूर्याचन्द्रमसाविव ।।३६ तयोर्ददर्श च सदा वदने वानराकृती। स्मृत्वा पूर्वकया दृष्ट्वा तावपृच्छत् तपोधन. ॥३७ को युवा देवगर्भामो चरन्तो विजने पथि । एकाकिनी नरथेप्ठो तन्मे वदतमीरितम् ॥३% अथ तौ प्रणिपत्यैन सम्भाष्य च समञ्जसम् । कपोताख्य मुनिश्रेष्ठमचतुः शंकरात्मजौ ॥३६ चन्द्रशेखरपुत्रौ नौ तारावत्या समुद्गती। विद्धि त्व मुनिशार्दूल प्रणमावः पद तव ।।४० अवज्ञा वीक्ष्य नृपतेरवियोः सततं मुने। एकाकिनी निर्जनेषु भ्रभावो मन्युना सदा ॥४१ किमर्थमात्मजो पुत्री प्रणतो सतत नृपः । अवज्ञाय महाभाग दायमा न दित्सति ॥४२ मार्ग मे गमन करते हुए उस पोत ने अकेले विचरण करते हए-परम मनोहर और चन्द्र के ही समान हो भगवान शम्भु के पुत्री को देखा था। और उन दोनो के मुख में बन्दर की सी--आकृति देवी पी। पूर्व में घटित कथा का स्मरण परके और उन दोनो को देखकर उस तपोधन ने उन से पूछा था । ३६ । ३७ । भाप दोनो कौन हैं जो कि देव गर्भ के समान पामा वाले हैं और मार्ग मे उस वियधान में एकाको विचरण कर रहे हैं । हे नर थे छो! यह मेरे कषित या आप उत्तर यतलाइए । ३८ | इसरे अनन्तर उन दोनों इनको प्रणिपात पिया था और समञ्जम गम्भाषण किया था अर्थात् समुचित बातचीत की थी। उन शहर के दोनो पुत्रों ने पोत नाम वाले मुनि श्रे से पहा वेताल भैरव उत्पत्ति । १४६ था । ३६ । हे मुनि शार्दूल ! हम दोनो चन्द्र शेखर के पुत्र हैं और तारावती के उदर मे समुत्पन्न हुए है । आप हमको जान लीजिए। हम आपके पदो मे प्रणाम करते हैं । ४० । हम दोनो की राजा से निरन्तर अवज्ञा देखकर हे सुने ! क्रोध से संयुत होते हुए हम सदा ही अवेरो ही निर्जन वनो में भ्रमण किया करते हैं। ४१ । सर्वदा प्रणत रहने वाले आत्मज पुत्रों को अब ज्ञात करके नृप किस लिये हे महाभाग ! दान मात्र को भी देने की इच्छा नहीं करता है ॥४२॥ तस्मादायां तपस्तप्तुमिच्छावो द्विजसत्तम । उपदेशप्रदानेन चानुगृह्णाति चेद्भवान् ॥४३ ततस्तयोर्वचः श्रुत्वा प्रहस्य मुनिसत्तमः । भूतभव्यभवज्ञानस्ताविदं मुनिरववीत् ॥४४ न युवां तनयो तस्य चन्द्रशेखरभूपतेः । तारावत्यां समुत्पन्तो भवन्तौ शंकरात्मजौ ॥४५ सद्यो जातौ महावीयौं वेतालत्वे च सम्मतौ। भृङ्गिमहाकालसंज्ञौ शापाद् धरणिमागतौ ॥४६ युवयोरत्र तेनैव न दायं दित्सति प्रियम् । गच्छतं शरणं तातं शंकरं वृपभध्वजम् ।।४७ स एव युवयोः सर्व करिष्यति महेश्वरः । किं वात्यग्रेण तपमा चिरकालफलेन वै ॥४८ इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलः कपोतः परमात्मधृक् । भूतभव्यभवज्ञानन्ताभ्यां सर्वमथौचिवान् ॥४६ हे द्विज श्रेष्ठ! इसी कारण से हम दोनो तप का समाचरण करने के लिये इच्छा कर रहे हैं यदि शाप उपदेश के प्रदान के द्वारा हमारे ऊपर अनुग्रह करते हैं । ४३ । इसके अनन्तर उन दोनों के वचन का श्रवण करके मुनि श्रेष्ठ हंस कर उन दोनो से मुनि यह बोले थे जो कि भूत-भव्य और भवत् के ज्ञान से समन्वित थे । ४४ । मुनि ने

१५०
। बालिका पुराण
कहा-आप दोनो उस चन्द्रशेखर भूपति के पुत्र नहीं हैं । आप तो तारा
वती के उदर से समुत्पन्न हुए शङ्कर के ही पुत्र हैं । ४५ । आप दोनो
महावीर्य सद्योद्यात हैं और वेतालत्व मे सम्मत हैं। आप भृङ्गि और
महाकाल नाम वाले हैं। शाप के कारण से ही आप दोनो इस धरणी
तल मे समागत हुए हैं । ४६ । तुम दोनो को यहा पर उमी कारण से
वह प्रिय दाय नहीं देना चाहता है। आप अपने पिता वृषभध्वज
भगवान् शङ्कर की शरणा गति मे गमन कीजिए । ४७ । वे ही शम्भु
तुम दोनो का सभी कुछ कर देंगे। इस उन तप मे क्या लाभ है जिसका
फल बहुत ही लम्बे समय में प्राश होता है ।
८। परम आत्मा को
धारण करने वाले मुनि शाल पोत इतना कहकर जिनको अतीत
वर्तमान और भविष्य का पूर्ण ज्ञान था। उन दोनो से उन ने सब पहा
या 10
यया भगिमहावालौ शप्तावनिमागतो।
यथा हरश्च गौरी च पृथिवीमागतो नृप ॥५०
तारावती यथा शप्ता तेनव मुनिना पुरा ।
यथा ती च समुत्पन्नौ तारावत्युदरे पुरा ॥५१
यथा वा नारदेनैव सशयच्छेदन नृपे ।
तत्मवं कथयामास पुपान्या गिरिशस्य तु ।।५२
तच्छ वा तो महात्मानौ तदा वेतालभैरवी ।
मृदा परमया युवतो व मूवतुरनिन्दितौ ॥५३
गोदपूर्णी तदा भूत्वा सिक्ताविव सुधारसं ।
पुन पच्छ कपात तालो भैरवोऽपि च ॥५४
पितावयोमहादेवरत्वया मत्यमितीरितम् ।
सोचनीयो ययायाच्या सिद्धये मनिरात्तम ॥५५
आवाम्या प यथाराध्यो यत्र वाराधितोहर ।
प्रमारमेप्यत्पपिात् तन्नो वर महागौ ॥५६

देशात गैरव वाति ]
१५१
.
धन्यावनुगृहीती नौ यत् त्वया मुनिमतम।
विज्ञापित मिद सर्व इच्छय वादन च नो ॥५७
पुनरन्वायद त्वं कृपामय मुनीश्वर।
मायादोन चिराद मग यथा वद नव नौ ॥५८
जिम प्रकार में भूङ्गि और महाकाल को माप प्रात हुआ था
और वे धरती पर ममागट हए थे । हे ! र भगवान् शम्भू और
गौरी पृथियो पर वागत हुए ये 1५० । पहिले उमो मुनि के द्वारा तारा
वती को पाप दिया गया था। और पुराने समय म जिस तरह में व
दोनों तारावनी के उदर में समुत्सल हा
ये । ११ । अपवा जिन प्रकार
मे नारदजी के द्वारा प य काय का छदन हुआ था। यह सभी
गिरिग रे पुत्रों में वह दिया पा 1121 उम ममय म उन दोनों
महात्मा देवास योर भैरव ने यह पदणकर के परम हर्ष न मयुत हुए
पे १५३॥ स अवसर पर मोह में पूर्ण होकर मुधा रस मे सिक्त के
हो भौति दे हो गये थे। फिर बेनाल और भैरव ने कपोउ मुनि में
प्रधा या 1५४ हम दोनों के रिता महादेव है-यह माय ने सत्य हो
बहा है। हे मुनि श्रेष्ठ। वे जिस गति स हम दोनों के द्वारा आराधना
करने योग्य हो अथवा त्रिय स्थान पर उनकी वाराधना को पारे
जिममे हम दोनों को मिति हौदे । जिसरे द्वारा वे शोध हो प्रसन्नता
को प्राप्त हो जावे हे महामन ! यह हो हमका आप बनाने को पा
करे ॥५५॥५६॥ हम दोनों परम धन्य हैं कि आपने हम दोनों पर
परम अनुग्रह किया है । हे मुनि श्रेष्ठ | आपने यह मुद विज्ञापित कर
दिया है और हम दोनों में हृदय का गत्य आपने उन कर दिया है।
अपदि हमारे हृदय में गाय पी ही भांति जो दुध था वह दूर कर दिया
है १५७। हे सुनीयर । आप तो कृपा से परिपूर्ण हैं । पुनः हमारे
पर दया वोजिये। जिस गति से हम शोध ही भा को शामि वर
मेवे उसी मानि आप हमरो बालाइझे ॥५॥

१५२ [ पालिश पुराण शृणु त्व कथयाम्यद्य यत्र चाराधितो हर । नचिरादेव भवतोरायास्यति समक्षताम् ॥५६ नित्य यन महादेवो वमन् भवति तुष्टये । युवा तत सप्रवक्ष्यामि स्थानं गुह्य प्रकाशितम् ॥६० वाराणसी नाम परी गगातीरे मनोहरे । वरणायास्तथा चासेमंध्ये चापाकृति सदा ॥६१ स्वय वृपध्वजस्ता नित्य वसति योगिनाम् । सदा प्रोतिकरो योगो स्वय चाप्यात्मचिन्तकः ॥६२ विवस्था सा परी नित्यं भर्गयोगवलाद धृता। दिव्यज्ञान ददात्येपा तत्र यो म्रियते नर ॥६३ मुनि ने कहा--आप सुनिये, मैं आज बतलाता हूँ कि जहाँ पर आराधना किये हुए भगवान हर शीघ्र ही आपके समक्ष में ममागत हो जायगे । ५६ । जहाँ पर नित्य ही महादेव निवास करते हुये तुष्टि के लिये होते हैं आप दोनो को उस स्थान का बतला दूंगा। वह स्थान गोपनीय प्रकाशित है । ६० । वाराणसी नाम वागी पुरी है जो परम मुन्दर भागीरथी गङ्गा के तट पर बसी हुई है तथा वारणा के वाम में मध्य में मदा चाप की आकृति के समान आकृति वाली है । ६१ ॥ वहाँ पर ही वृष मध्वज स्वय नित्य ही निवास क्यिा करते हैं । वे योगी मदा ही योगियो की प्रीति के करने वाले हैं । ये स्वय योगी हैं और अध्यात्म चिन्तन करने वाले हैं । ६१ । वह पुरी आकाश में सस्थिना है और नित्य ही भगवान् भगं के योग वल से धारण की हुई है। वहाँ पर जो भी अपने प्राणो का त्याग कर मृत्यु को प्राप्त हुआ करता है तो यह पुरी उमको दिव्य ज्ञान का प्रदान किया करती है ॥६३॥ तस्मै स्वय महादेव मसार-ग्रन्थिमुक्तये । स भूत्वा परमो योगी मृतस्तत्र भवान्तरे ॥६४ मुलभेनव निर्वाणमप्नोति हरसम्मत । - देताल भैरव उत्पत्ति ] योगयफ्नो महादेवः पार्वत्या सहितः सदा ॥६५ देवगन्धर्वयक्षाणां मानुपाणां च नित्यशः । यो हरः प्रकाशश्व क्षेत्रं तच्च प्रकाशितम् ॥६६ न तत्र कामदो देवो नचिराच्च प्रसीदति । आराधितश्चिर प्रीत्या निर्वाणाय प्रसीदति ।।६७ गोर्या विवजिता सा तु परो तत्र न गच्छति । योगस्थान महाक्षेत्रं कदाचिदपि शांकरी ॥६८ आसन्नं युवयोः क्षेत्रमिदं वाराणसी तु यत् । कथितं नातिदूरे च वर्तते नरसत्तमौ ॥६६ अपरं तु प्रवक्ष्यामि गुह्य पीठं सदाचितम् । हरगौरीसमायुक्त परं धर्मार्थकामदम् ॥७० उस पुरप को जो भी वाराणसी पुरी में प्राण त्याग दिया करता है महादेव स्वय ही ससार के आवागमन की ग्रन्थि के बन्धन का छट- कारा पाने के लिये कुपा दिया करते हैं। वहां पर मृत होकर पुरुष दूसरे जन्म में उत्पन्न होकर परम योगी हो जाता है । ६४ । भगवान् हर के द्वारा मम्मत होता हुआ वह मुलभ उपाय के द्वारा ही वह पुरुप निर्वाण पद को प्राप्त हो जाता है अर्थात मुक्ति प्राप्त कर लेता है । योग युक्त महादेव सदा पार्वती के सहित निवास किया करते हैं । ६५ । देव-गन्धर्व-यक्षों को और मनुष्यो को नित्य ही हर जप (जानते के योग्य ) और प्रकाश हैं और वह क्षेत्र प्रकाशित है। ६६ । वहाँ पर देव कामनाओ का प्रदान करने वाले नहीं हैं और शीघ्र ही प्रसन्न नहीं होते हैं । चिरकाल पर्यन्त प्रीति मे आराधना किये हुए ही निर्वाण के लिये ही प्रसन्न हुआ करते हैं । ६७ । यह पुरी गौरी के द्वारा विजित है। वह योग का स्नान महाक्षेत्र हैं यहां किसी समय मे शादरी देवी गमन नही किया करती है । ६६ । जो यह वाराणमी है वह आप दोनो का आसन्न क्षेत्र है ऐसा कहा गया है और पाराणसी हे नर श्रेठो !

[ कालिका पुराण
समीप म ही विद्यमान है । ६६ । दूसरा गोपनीय और मदा ही अर्चित
पीठ को मैं बतलाऊँगा जो हर और गौरी मे समायुक्त है और
परम धर्म-अर्थ तथा काम के प्रदान करने वाला है ॥७०)
तपसा चाति तीण घिराद् भवति मोक्षदम् ।
नचिरात् कामदं पुण्य क्षेत्र पीठ निगद्यते ॥७१
चिरात् तु कामदो देवो न चिराद् यत्न ज्ञानद ।
तत्क्षेत्रमिति लोकेषु गद्यते पूर्ववन्दिभि. १७२
कामम्प महापीठ गुह्याद् गुह्मतम परम् ।
सदा सन्निहितस्तत्र पार्वत्या सह शकर ॥७३
न चिरात् पूजितो देवस्तस्मिन् पीठे प्रसीदति ।
पार्वती चानुगृह्णाति भर्गभक्त तु तत्र वै ॥७४
ददाति नचिरात् काम भक्ताय परमेश्वर ।
तर तु पीठ प्रवक्ष्यामि शृणुत साम्प्रत युवाम् ।।७५
करतोया नदी पूर्व यावद् दिक्करवासिनीम् ।
त्रिंशद् योजनविस्तीर्ण योजनैकशतायतम् ॥७६
त्रिकोण कृष्णवर्णं च प्रभूताचलपूरितम् ।
नदीशतसमायक्त कालप प्रकीतितम १७७

देताल भैरव उत्पत्ति १५५ करती है । ७१ । परमेश्वर अपने भक्त लिये शीघ्र ही कामना को दिया करते हैं उस पीठ के विषय में मैं बतलाऊँगा । अव आप दोनो यवण कीजिए । ७५ । पूर्व जहां ता दिक्कर नासिनी है वर तोया नहीं है। वह तीस योजन विस्तार वाली है और एक शतयोजन आयत है । 1 ७६ । वह त्रिकोण-कृष्ण वणं से युक्त तथा बहुत से पर्वतो से पूरित है । सो नदियो मे ममायुक्त है और काल रूप कीर्तित किया गया है ॥७॥ शम्भुनेत्राग्निनिर्दग्धः काम शम्भोरनुग्रहात् । तस्पं यत प्राप कामरूपं ततोऽभवन् ॥७८ तस्य पीठम्य वायव्यां नंत्यां मध्यभागतः। ऐशान्यां च तथाग्नेय्यां मध्ये पार्वे च शंकर. 115६ स्वमाश्रमपद कृत्वा पट्सु स्थानेषु शोभनम् । नित्य वसति तत्रापि पार्वत्या सह नर्ममि. ॥८० मध्ये देवीगृहं तत्र तदधीनं तु शकरः । नीलाख्ये पर्वनथप्ठे पार्वती तन तिष्ठति १ रेशान्या नाटके शैले शंकरस्य महाश्रमः। नित्य वसति तत्रशस्तदधीना च पार्वती ॥८२ अपरे चाश्रमाः मन्ति हरगोर्योः सदातनाः । नंतयोः सदृशः कोऽपि विद्यते शंकराथमः ।।८३ यताराध्यो महादेवो भवद्भयां नरसत्तमो। तत्स्थानं मनसादाय प्रसादय वृपध्वजम् ।।८४ भगवान् शम्भु के नेत्र से भस्मी भूत हुए काम देव ने भगवान शम्भु के अनुग्रह से वहां पर रूप को प्राप्त किया था इमी लिये तभी मे बह कामरूप हो गया था। उस पीठ के मध्य भाग से वायव्य मे-- नंत्य मे-ऐशानी में और आग्नेयी मे मध्य में और पार्श्व में शङ्कर हैं । ७६। इन के स्थानो में परम शोभन अपना आश्रम का स्थान बना १५६ [ पापिया पुराण पर 4 पर भी पार्वती माथ नपं पार्यो को पलं हा नित्य ti कर निवारा रिया परते हैं । ६० । मध्य में देवी का गृह है । वही पर उमी के अधीन कर हैं। वहां पर नीस नामद यह पर्वत में पार्वती विराजमान रहती हैं 11 ऐशानी दिशा में नाटर गैर पर भगवान् शङ्कर का महान आयम है। यहां पर निश्य हो ईश्वर निवास किया करते हैं और उनके अधीन पार्वती रहती हैं । ६२ । और दूसरे हर तथा गौरी ये सनातन आश्रम हैं विन्तु इन दोनों ये सण मोई भी शार वा आथम नहीं है । हे नरमे प्ठो ! जहाँ पर आप दोनो के द्वारा महादेव आराधना करने के योग्य है । उमी स्थान को मन से ग्रहण परवे वृषभध्वज को प्रसन्न करिए ॥५३॥४॥ कामरूप गमिप्यावो रहस्य नाटकाचलम् । गौरीहरौ स्थितौ यत्र नित्य सन्निहितो भुने १६५ आराधनीयो भूतेशो ह्यवश्यमिह चावयो । यथैवाराधयिप्यावस्तथाचक्ष्व द्विजोत्तम ॥८६ येन मन्त्रेण वा देवी नचिरात तु प्रसीदति । तत् त्व वद महाभागानुग्रहोऽस्त्यावयोर्यदि ॥८७ नाटक पर्वतश्रेष्ठ गच्छत नरसत्तमो। तन्न नित्य महादेवौ रमतेऽपर्णया सह ।।८८ सन्ध्याचले तत्र मुनिरागधयति शकरम् । वशिष्ठो ब्रह्मण पुत्रस्त युवामनुगच्छतम् 11८६ स च मन्त्र सतन्त्र च हराराधनकर्मणि । ज्ञापयिष्यति वा पृष्ट फिल वेतालभैरवी ।।६० तपसे गन्तुमिच्छामि नेदानी कालयापना । युज्यते मम तस्मान्मा त्यजत वीरसत्तमौ ॥६१ चेताल और भैरव ने कहा-हे मुनिवर । हम कामरूप को गमन रेगे जो रहस्य नाटक पर्वत है । जहा पर गौरी और हर नित्य ही

वैताल गैरव उत्पत्ति ]
१५६
सर्वे हरं चानुजामुरनुगच्छन्तमात्मजौ ।
यय तो तु नदी प्राप्य कुष्णाजिनधरौ तदा ॥१००
आदाय तापसं भावं गंगातुल्यां दृपद्धतीम् ।
तपस्विनौ तु देवेन त्र्यम्बकेणाय पालितो ॥१०१
देवः सह तदायाती कामरूपायाश्रमम् ।
आसाद्य कामरूपं तु करतोयानदीजले ॥१०२
उपस्पृश्य ततस्तौ तु नन्दिकुण्ड नृपोत्तम ।
तन्न स्नात्वाप्गुपस्पृश्य नदी गत्वा जठोद्भवाम् ॥१०३
उपस्पृश्य च तो तत्र नन्दिनं तपसा धृतम् ।
प्रणम्य जल्पिशं देवं जग्मतुर्नाटकाचलम् ।।१०४
नाटकाचलमासाद्य प्रणभ्य वृपमध्वजम् ।
आराधनोपदेशाय कपोतकवच.स्मरी ।।१०५
इसके अनन्तर उन दोनो वैताल और भैरव ने जो उस समय मे
कृष्ण हिरन के चमं को धारण करने वाले थे। एक नदी को प्राप्त
किया था अर्यात उनको आगे एक नदी मिली थी ।।१०।। वे दोनो ही
तापस के भाव को प्राप्त हुए
थे 1 वह नदी पद्धती थी जो कि गङ्गा
के ही समान परम पावन पी। भगवान् ध्यम्बक देव के द्वारा वे दोनो
तपस्वी पासिता हुए थे ॥ १०१॥ उस समय में देवगणो के सहित वे
दोनो कामरूप नाम वाले आश्रम में समापति हुए ये । कामरूप में
पहुंच कर कर तोया नदी का जल मिला था ॥ १०२ ॥ हे पातम !
उन दोनो ने नदी के जल में आचमन किया। फिर नन्दिकुण्ड पर पहुंचे
थे। वहाँ पर याचमन तथा स्नपन करके फिर जठोदभवा नदी पर
गमन विया या ॥१०॥ वहाँ पर दोनो ने उपस्पर्शन किया था और
वहाँ पर तप के द्वारा घृत नन्दि कुण्ड को प्रणाम किया तथा गलिश
देव को प्रणिपात किया था और फिर नाटक नामक पर्वत पर गमन
किया था 11१०१॥ नाटक नामर पर्वत पर पहुँच कर वृपमध्वज को

१५८ [बालिका पुराण । माता पिता से तपसा तु तयो पायो भाव त्यत्क्वा तु मानुषम् ।।६७ यथाप्नुत सौरभाव विधास्यामि यह तथा । इत्युक्त्वा वामदेवोऽपि पावत्या सह पुत्रको । गच्छन्तौ वियता स्नेहात् पश्चादनुययो शिव ||६८ शकाद्यास्त्रिशा सर्वे दिक्पालाश्च तथापरे ॥६६ इतना इस प्रकार से कहकर वह मुनि थेट कपोत धन में चला गया था। उन दोनो ने उस मुनि को प्रणाम किया था और फिर व दोनो अपने भवन को चले गये थे ।।१२।। इसके अनन्तर उस समय म वे दोनो समय करके तपश्चर्या के लिये दीक्षिन हुए अनुज्ञा प्रास करके भाइयो को और अन्य वान्धवो को भी ज्ञापित करके उन दोनो महा मति वालो ने कामरूप के लिय प्रस्थान कर गये थे। ॥६३ ॥ उमा देवी के सहित भगवान् शङ्कर भी उन दोनो को गमन किये हुये जानकर इन्द्र के सहित समस्त देवो को सान्त्वता देते हुए की भौति यह बोले थे ॥६४॥ ईश्वर ने कहा-हे सुरेश्वरो । मेरे पुत्र दोना तप करने के लिए गये हैं। वे दोनो मेरी आराधन म चित्त वाले हैं । हे सुर थेठो । उन पर दया करो॥६५ ।। इन दोनो पुत्रो का जो कि वे ताल और भैरव नाम वाले है तपस्या से सस्कार करके मैं इनको गाणपत्य मे नियोजित करूगा । हे निजरो | आप लोग उन दोनो का सस्कार कर दो।। ६६॥ तप से उन दोनों के शरीर मानुष भाव को त्याग करके वे दोनो इसी शरीर से गणेशत्व को प्राप्त हो जायगे ॥६७ ॥ जिस रीति से दोनो सौर भाव को प्राप्त हो जावें मैं वैसा ही करूंगा। इतना कहकर वामदेव भी पार्वती के साथ ही आकाश माग से गमन करते हुए पुत्रो के पीछे स्नेह से शिव भी गये थे ॥६॥ अपने पुत्रो के पीछे अनुगमन करते हुए भगवान हर पीछे पीछे इद्र आदि सब देवगण-दिक्पाल और दूसरे लोग सब पीछे पीछे अनुगमन करने लग गय थे ॥६

वेताल भैरव उत्पत्ति ]
१५६
सर्वे हरं चानुजग्मुरनुगच्छन्तमात्मजो।
अथ तो तु नदी प्राप्य कृष्णाजिनधरी तदा ॥१००
आदाय तापसं भावं गंगातुल्यां दृपद्वतीम् ।
तपस्विनौ तु देवेन त्र्यम्बकेणाथ पालितो ॥१०१
देवैः सह तदायातो कामरूपायाश्रमम् ।
आसाद्य कामरूपं तु करतोयानदीजले ॥१०२
उपस्पृश्य ततस्तौ तु नन्दिकुण्डं नृपोत्तम ।
तन्त्र स्नात्वाप्गुपस्पृश्य नदी गत्वा जठोद्भवाम् ।।१०३
उपस्पृश्य च तो तत्र नन्दिनं तपसा धृतम् ।
प्रणम्य जल्पिशं देवं जग्मतुर्लाटकाचलम् ||१०४
नाटकाचलमासाद्य प्रणम्य वृपभध्वजम् ।
आराधनोपदेशाय कपोतकवच स्मरो॥१०५
इसके अनन्तर उन दोनो बेताल और भैरव ने जो उस समय में
कृष्ण हिरन के चर्म को धारण करने वाले थे। एक नदी को प्रास
किया या अर्यात् उनको आगे एक नसी मिली थी ॥१००। वे दोनो ही
तापस के भाव को प्राप्त हुए थे। वह नदी पद्धती यो जो कि गङ्गा
के ही समान परम पावन यी । भगवान् श्यम्बक देव के द्वारा वे दोनो
तपस्वी पालिता हुए थे ॥१०१॥ उस समय में देवगणो के सहित वे
दोनों कामरूप नाम वाले माश्म में समापति हुए थे। फामरूप में
पहुँच कर कर तोया नदी का जल मिला था ॥ १०२॥ हे नृपोत्तम !
उन दोनो ने नदी के जल में आचमन दिया। फिर नन्दिकुण्ड पर पहुंचे
पे। वहाँ पर आचमन तथा स्नपन करके फिर जठोद्भवा नदी पर
गमन किया था ॥१०३॥ वहाँ पर दोनो ने उपस्पर्शन किया था और
यहाँ पर तप के द्वारा पृत नन्दि कुण्ड को प्रणाम किया तथा उल्पिग
देव को प्रणिपात दिया था और फिर नाटक नामक पर्वत पर गमन
पिया या ॥ १.४॥ नाटक नामर पर्वत पर पहुंच कर वृपमध्वज नौ

१६० रालिका पुराण प्रणाम दिया और आराधन के उपदेश के लिये पपीत वचन या स्मरण दिया था॥१०॥ जग्मतुदक्षिणा काप्टा पत्र सन्ध्याचल स्थितः। कान्ता नाम नदी तय वशिष्ठेनादतारिता ॥१०६ तस्यास्तीरे महाशल. स्निग्धच्छायलतातरुः । सन्ध्या वशिष्ठः कृतवास्तत्र यस्माद् विधेः सुत ।।१०७ अत सन्ध्याचल नाम तस्य गायन्ति देवताः। तपासाद्य वशिष्ठ तु साक्षादिव हुताशनम् ।।१०८ आराधयन्त गिरिश ध्यानसयुतमानसम् । तप श्रिया दीप्यमान द्वितीयमिव भास्करम् ।।१०६ प्रणम्य पुरतस्तस्य तदा वेतालभैरवी। प्राजली तस्यतुभूप विनयानतकन्धरौ ॥११० इद चाप्यूचतुस्तौ तु प्रणमन्तो विधे. सुतम् । तारावत्या समुत्पन्नौ चन्द्रशेखरभूभृत ॥१११ क्षेत्रे भर्गस्य तनयावावा जानीहि मानुपौ। आराधयितुमिच्छावो हर कार्यस्य सिद्धये ॥११२ फिर दोनो दक्षिण दिशा की ओर गमन कर गये थे जहाँ पर सन्ध्याचल सस्थित था। वहां पर कान्ता नाम की नदी थी जो वसिष्ठ मुनि ने अवतारित की थी॥१०६॥ उस नदी के तट पर एक महान शैल था जिस पर धनी छाया वाले वृक्ष और लताएं थीं। क्योकि ब्रह्माजी के पुत्र वसिष्ठ जी ने वहाँ पर मध्या वन्दना की थी ॥१०७।। इसीलिये देवगण उस पवत का नाम सन्ध्याचल गाया करते हैं। वहाँ पर पहुंच कर वसिष्ठ मुनि का दर्शन किया था जो साक्षात् अग्नि के ही तुल्य ॥१०६॥ वे वसिष्ठ मुनि भगवान् गिरिश को आराधना कर रहे थे और उनका मन ध्यान में संयुक्त था। वे तपस्या को श्री से दीप्यमान थे और दूमरे मूर्य के ही समान प्रतीत हो रहे थे । १०६ ।

वैताल भैरव उत्पत्ति ] १६१ . . उस अवसर पर उनके आगे देताल और भैरव ने प्रणाम किया था । हे भूप! वे दोनो विनय से अवनत होते हुए हाथो को जोडे हुए स्थित हो गये थे । ११०। उन दोनो यह प्रणाम करते हुए विधाता के पुत्र से कहा था कि चन्द्र शेखर भूभत् मे हम दोनो तारावती से उत्पन्न हुए है ।।१११॥ इस क्षेत्र मे भर्ग के पुत्र हम दोनो को मनुष्य ही जानिए ! हम कार्य की सिद्धि को लिये भगवान् शम्भु की आराधना करने की इच्छा रखते है ॥११२॥ वाञ्छितस्य यदि त्व नावनुगृह्णासि सुव्रत । तयोस्तद् वचन श्रुत्वा वशिष्ठो मुनिसत्तमः ।।११३ उवाचेति युवा ज्ञातो मया सत्य हरात्मजो। हरस्याराधन कार्य युवयोनरसत्तमौ ॥११४ नमास्ति मम कृत्य कि तद्भापतमनिन्दितौ । पृपध्वजाराधनाय युवयोस्तु प्रयोजनम् । विद्यते तन्निमित्तं यत् तत् सिद्धमिति चिन्त्यत्यताम् ।।११५ येन मन्त्रेण नचिरात् सस्म्यगाराधितो हर. । प्रसादमेप्यत्यवनौ तन्नो वद महामुने ॥११६ यथा चाराधयिष्यावस्तन्त्र यद् यादृश. म.। तत्सर्व मुनिशार्दूल वक्तुमर्हसि चोत्तरम् ॥११७ यया त्वदुपदेशेन प्राप्स्यावो नचिराद् हरम् । यथा वाचा मुनिश्रेष्ठ ह्यनुशाधि न तो त्वयि ॥११८ है सुबत ! यदि आप हम दोनो के अभीष्ट के विषय में अनुग्रह करते हैं। उन दोनो को उस वचन का मुनियो मे देह वसिष्ठजी ने श्रवण पिया और उन्होंने कहा था कि मैंने आप दोनो का ज्ञान प्राप्त कर लिया है और सत्य में आप दोनो हो भगवान् शम्भु के आत्मज है। है नरये ठो! आप दोनो को भगवान् शम्भु की आराधना करनी चाहिए ॥११३-११४॥ परम श्रेष्ठ आप दोनो वहाँ पर मेरा क्या १६२ [ यारिया पुरण कृत्य है यह योलिय । वृषभध्वज की आराधना के लिय आप दातो वा प्रयोजन है । जो उसका निमित्त है वह सिम हा गया है यही चिन्तन कीजिय ।। ११५॥ वेताल और भैरव ने यहा-जिस मन्त्र के द्वारा अविलम्व ही भली भांति भगवान् शम्भु की आराधना की गई है । है महामुने । वह हमारे ऊपर अवनी (पृथ्वी ) म प्रसनता को प्राप्त होगे-यही हमको आप यतलाइए ॥ ११६ ॥ हे मुनि शार्दूल जिम रीति से हम आराधना करें-जो तन्य है और जैसा भी कम है-वह सभी आप उत्तर रूप मे बताने के लिये योग्य होते हैं ॥ ११७ ॥ जिस रीति से आपके उपदेश से शीघ्र ही हर को प्राप्त कर लेवे । हे मुनिष | आप अनुशासन कीजिए । हम दोनो आपके प्रति प्रणन है ॥११॥ प्रसन्न एव भवतो पकेतु सहोमया । नचिरात् स्वयमेवान प्रसाद च समेष्यति ।।११६ सर्देवगण साधं सभार्यो वृषभध्वज । आकाशमार्गेणायात पालयन स्वसुती गृहात् । १२° किन्तु मानुपदेहो वामधिवास्य तपोव्रतं । स्वयन्नेष्यति कलास गाणपत्ये नियोज्य वाम् ॥१२१ अह चाप्युपदेक्ष्यामि यथा भगं युवा द्रुतम् । प्राप्स्यय पार्वतीपुत्रावेकान शृणुत तु तत् ॥१२२ चिरात् प्रसीदति ध्यानन्नचिराद् ध्यानापूजनात् । तस्माद् ध्यान पूजन च कथयाम्यद्य तत्त्वत ॥१२३ तेजोमय सदा शुद्धो ज्ञानामृतविवर्धित । जगन्मयश्चिदानन्द शौरिब्रह्मस्वरूपधृक ।।१२४ महादेवो महामूतिर्महायोगयुत सदा । जगन्ति तस्य रूपाणि तानि को गदितु क्षम ।।१२५ विन्तु पैरिह रूपस्तु विचरत्येष शकर ।

ma वेताल भेद स्त्पत्ति ] तेपा यन्मे ज्ञानगम्य तयेप्ट निगदामि वाम् ॥१२६ दसिष्ठजी ने कहा-आप दोनो के पर भगवान वृषकेतु उमा- देवी के सहित प्रसन्न ही हैं। यहां पर स्वयं ही शीघ्र ही प्रसाद को प्राप्त हो जायगे ॥११३ समस्त देवगणो के साथ अपनी भार्या के साथ वृपध्वज गृह से अपने पुत्रों का पालन करते हुए आकाश के मार्ग के द्वारा समाक्षस है ॥१२०॥ किन्तु सापके मनुष्य के दह पा अधिवामन वरके अर्थात् तपो प्रतो से सस्कार करके स्वय ही बलास पर ले जायगे। और गाणपत्य पराम्द्राय दोनो का नियोजन करेंगे ।। १२१॥ और मैं भी उपदेश कर दूंगा । जिससे आप दोनो हो शीन हो भर्ग को प्राप्त कर लेंगे। हे पार्वती पुनो ! उसे एकाग्र मन से श्रवण कीजिए ॥१२२॥ ध्यान से चिरकाल में प्रसन्न होत है और शी। ध्यान पूजन से प्रसन्न होते हैं । इस कारण से आज तात्त्विक रूप से ध्यान और पूजन बतलाता हूँ ।। १२३ ।। वे सेज से परिपूर्ण हैं--- शुद्ध स्वरूप हैं-ज्ञानामृत से विधित है-जगत से परिपूर्ण हैं-चिन् (ज्ञान ) और आनन्द रूप हैं-शौरि और ब्रह्मा के स्वरूप को धारण करने वाले हैं ।। १२४ ॥ महादेव-~-महामूत्ति और सदा महान योग से संयुत हैं-ये सम्पूर्ण जगत उनके ही स्वरूप हैं उनका कथन करने में कोन समर्थ है ।।१२५॥ विन्तु जिन रूपो से य भगवान शहर विचरण किया करते हैं उनप से जो मेरे ज्ञान के द्वारा गम्य है उसमें जो भी अभीष्ट है आप दोनो को मैं कहता है ।।१२।। प्रथम शृणुत मन्त्र ततोऽनुध्यानगोचरम् । तत म तु पूजाया क्रमाद् वृत्त नरर्पभो ।।१२७ समस्ताना स्वराणा तु दीर्घा शेपा. सविन्दुकाः । अलशून्या सार्धचन्द्रा उपान्तेनाभिसहिता ॥१२८ एभि पचाक्षरमन्त्र पचवक्त्रस्य कोर्तितम् । क्रमात सम्मदसन्दोह-नादगौरव-सज्ञका. ॥१२६

१६४
से
[ शासिका पुराण
प्रासादस्तु भवेच्छेपः पंचमन्या. प्रवीतिताः ।
एककेन तथैकंकं वक्त्त देवं प्रपूजयेत् ।।१३०
एक समुदितं कृत्वा पचभिर्वा प्रपूजयेत् ।
प्रसादेनाथ वा पंचवक्त्रं देवं प्रपूजयेत् ।।१३१
सम्मदादिपु मन्त्रेषु प्रासादस्तु प्रशस्यते ।
शम्भो. प्रसादनेनैप यस्माद् वृत्तस्तु मन्त्रक. ।।१३२
तेन प्रासादसज्ञोऽयं कथ्यते मुनिसत्तम. ।
तस्मात् सर्वेषु मन्येषु प्रासादः प्रीतिद. पर ।।१३३
हे नरथ प्ठो । सबसे प्रथम मन्त्र का श्रवण करो उसके पश्चात
अनुध्यान से साक्षात्कार को सुनिए। इसके पश्चात पूजा का क्रम सुना-
इये—क्रम से वृत्त को सुनिये ।।१२७॥ समस्त स्वरो मे दीर्घ शेष बिन्दु
युक्त होवे । ऋतु से शून्य हो तथा अर्ध चन्द्र से सयुत होवे । जमान्त
से अभिसहित होवें ॥१२८॥ इन पांच अक्षरो के द्वारा पञ्च वक्त्र का
मन्त्र कहा गया है । क्रम से सम्मद-सन्दोह नाद-गौरव सज्ञा पाले
हैं। प्रासाद शेष होता है-इस रीति से पांच मात्र कात्तित किये गये
हैं। एक-एक से वहां पर एक-एक वक्त्र को देव का पूजन करना
चाहिए ॥ १२६-१३० ॥ अथवा एक को समुदित करके पांचों से
पूजन करे । इसके अनन्तर प्रसाद के द्वारा पञ्च 'वक्त्र देव का यजन
करना चाहिये । १३१ । सम्पद प्रभृति मन्त्रो में प्रसाद परम प्रशस्त
कहा गया है। क्योकि शम्भु के प्रसादन से ही वृत्त मन्त्र होता है
। १३२ । इसी कारण मे मुनियो मे थेष्ठो के द्वारा यह प्रासाद सज्ञा
वाला कहा जाया करता है। इस कारण से समस्त मन्त्रो मे प्रासाद परम
प्रीति के प्रदान करने वाला है ।१३३।
आमोदकारक शम्भोमन्त्र. सम्मद उच्यते ।
मन प्रपूरणाच्चापि सन्दोह. परिकीर्तितः ॥१३४
आकर्षको भवेनादो गुरुत्वाद् गौरवावयः ।

घेताल भैरव उत्पत्ति १६५ एलव्यस्त समस्त च मन्त्र शम्भो प्रकोर्तितम् ॥१३५ पचाक्षर तु यन्मन्त्र पचक्यस्य कौनितम् । युवा तेनंव मन्त्रण आराधयतमीश्वरम् ॥१३६ ध्यान वक्ष्यामि शृणुत सम्यग वेतालभरवौ। पचवक्त्र महाकाय जटाजूटविभूषितम् ।।१३७ चारचन्द्रकलायुक्न मूनि वालोधभूपितम् । वाहुभिर्दशभियुक्त व्याघ्रचर्मामराम्वरम् ॥१३८ कालकूटधर कप्ठे नागहारोपशोभितम् । किरोटवन्धन वाहुभूपण च भुजगमान् ।।१३६ विभ्रत सर्वगात्रेषु ज्योत्स्नापितसुरोचिपम् । भूतिसलिप्तसर्वागमेकका निभिस्लिभि ॥१४० नेस्तु पचदशभिज्योतिष्मद्भिविराजितम । वृषभोपरि सस्य तु गजकृत्तिपरिच्छदम् ॥१४१ मम्मद मन्त्र भगवान शम्भु के आमोद के करने वाला कहा जाता है । मन को प्रति करने ही गे सन्दोह कहा गया है ।। १३४ ॥ नाद नार्पण करने वाला नाद होता है । गुस्त्व होन से गौरव नाम वाला है। यह व्यस्त और समस्त अर्थात् बलग-अलग और सव पिताकर भगवान् शम्भु के मन्त्र कौतित किये गये हैं ५१३५ ॥ पञ्चाक्षर मात्र पांच अक्षरों वाला नो मन्त्र है वह पन्च वर का कहा गया है । आप दोना उस ही मन्त्र के द्वारा ईश्वर का ममाराधन करिए । १३६ । हे वेताल भरद 1 में उनका ध्यान बत- लाऊंगा उमका भली भांति आप श्रवण करिए । नव शम्भु के स्वरूप का ध्यान बठलाया जाता है--शम्भु के पांच मुख हैं--महान् उनका गरीर है-वे जटा जूटो से समतकृत हैं । १३७ । सुन्दर चन्द्रमा की कला से समन्विन है-मस्तक म वाली के समूह मे विभूषित हैं-दश शम्भु को वाहुएँ हैं और व्याघ्र चर्म ही उनका दस्त है । १३८ । कण्ठ में भगवान शम्भ ने हालाहन कालकूट विष को धारण किये हुए हैं

[ कालिका
पुराण
तथा नागो के हार से उनका वक्षस्थल विभूपित है। भुजङ्ग ही उनके
किरीट का वन्धन है तथा नाग ही वाहुओ के भूषण बने हुए हैं ।१३६॥
सम्पूर्ण अङ्गो मे चांदनी से अपित सुन्दर कान्ति के धारण करने वाले
हैं । भस्म से सम्पूर्ण अङ्ग सलित हैं। एक एक मुख मे तीन तीन नेत्र
हैं । इस प्रकार से पन्द्रह ज्योतियों वाले नेत्रो से ममुपशोभित हैं।
वृपम के ऊपर विराजमान हैं और हाथी के चर्म के परिच्छद वाले हैं।
॥१४०-१४१॥
सद्योजात वामदेवमघोर च तन परम ।
तत् पुरुष दथेशान पचवक्त्र प्रकीर्तितम, १४२
सद्योजात भवेच्छुक्ल शुद्धस्फटिक्सम्भिमः ।
पीतवर्ण तथा सौम्य वामदेव मनोहरम ॥१४३
नीलवर्णमघोर तु दप्ट्रा भीतिविवर्धनम् ।
रक्त तत्पुरुष देव दिव्यमूर्ति मनोहरम ॥१४४
श्यामल च तयेशान सर्वदेव शिवात्मकम् ।
चिन्तयेत् पश्चिमे वाद्य द्वितीय तु तथोत्तरे ॥१४५
अघोर दक्षिगे देव पूर्वे तत्पुरुष नथा।
ईशान मध्यतो ज्ञेय चिन्तयेद् भक्तितत्पर ॥१४६
शक्तित्रिशूलखटवागवरदाभयद शिवम, ।
दक्षिणेप्वय हस्तेषु वामप्वपि तत शुभम, ॥१४७
अक्षमूत्र वीजपूर भुजग डमरूत्पलम, ।
अप्टेश्वर्यसमायुक्न ध्यायेत् तु हृदगत शिवम, ॥१४८
अय शम्भू पांचो मृषा ये नाम बतलाये जाते हैं. सद्यो जात •
वामदेव- अपार-ताप-ईशान य पार मुप यीत्तित किये गये हैं ।
॥१२॥ मुद्यो जान का पण शुक्र है और वह स्वच्छ स्फटिक ये तुरय
है। पामदय पीत वर्ण वाला-मौम्य एवं मनोहर है ॥१४३|| अघोर
मी वर्ण वम पाणा है, और उगम दाद मामय वे घड़ाने वाला है।

वेताल भैरव उत्पत्ति ] १६७ तत्पुरष देव रक्त वर्ण से युक्त है जिसको मूर्ति परम दिव्य है और मनोहर हैं ।।१४४|| ईशान चामल हैं बौर सर्वदा ही शिव स्वरूप हैं। आद्य स्वरूप का पश्चिम दिशा म चिन्तन करना चाहिये। उत्तर दिशा म द्वितीय स्वरूप का चिन्तन करे ।।१४।। अघोर देव का दक्षिण मे तथा पूर्व दिशा में ततुरुप का चिन्तन करना चाहिए। मध्यभाग म ईशान का भक्ति भाव म तत्पर होर पितन करना चाहिए ।।१४६।। दक्षिण भाग के हाथो म शक्ति--त्रिशूल-खट्वाङ्ग-घरदान---अभय दान के दाता शिव का चिन्तन करना चाहिए उसी भांति वाम भाग के हस्तो ग अक्ष सूत्र-वीजपर--मुजङ्ग - डमरू और शुभ उत्पल का ध्यान करे। बार ऐश्वर्यो से समायुक्त हृदय में विराजमान शिव का ध्यान करना चाहिए ॥१८॥ एव विचिन्तयेद् ध्याने महादेव जगत्पतिम । चिन्तयित्वा द्वारपालान् गणेशादीन प्रपूजयेत् ॥१४६ विशुद्धि पचभूताना चिन्तयित्वा ततो मुहु । अष्टमूर्तीतस्तत पश्चात् पूजयेदष्टनपभि ॥१५० आसनानि च तस्याय पूजयेत सकलानि तु । भावादीन्यष्टपुष्पाणि हृदेव विनियोजयेत् ।।१५१ नाराचमद्रया तस्य ताडन परिकोनितम् । विमर्जन धेनुमुद्रा दर्शयित्वा विधारत ॥१५२ निर्माल्यधारण कुर्यात् सदा चण्डेश्वर धिया । प्रत्येक पचभिर्मन्नरङ्गादीनि प्रमार्जयेत् ।।१५३ सम्मदादिभिरतस्य पूर्वोक्त रसत्तमौ। वाला ज्येष्ठा तथा रोद्री कालो च तदनन्तरम् ।।१५४ कलवितरिणी देवी वलप्रमथिनी तथा । दमनी सर्वभूताना मनोन्मथिनी तथैव च ॥१५५ इस प्रकार ने ध्यान म जगत करवामा महादेवजी का विचिन्तन

१६८
| कालिका पुराण
करना चाहिए। और द्वारपाली का चिन्तन करके गणेश आदि का
पूजन करे ।।१४। इसके अनन्तर पुनः पांचो भूतो की विशुद्धि का
चिन्तन करे। इसके उपरान्त आठ नामों के द्वारा आठ भूत्तियो का
अभ्यर्चन करे ।।१५०॥ भावाद आठ पुष्पो का हृदय के द्वारा ही विनि-
योजन करना चाहिए और जो ममस्त आसन्न हो उनका भी
करे।
'पूजन
॥१५१॥ नाराच मुद्रा से उसका ताडन परिकीर्तित पिया गया है ।
और धेनु मुद्रा दिखलाकर विधान से विसर्जन करे ॥१५२॥ सदा ही
वृद्धि से चण्डेश्वर प्रभु को निर्माल्य धारण करना चाहिए। प्रत्येक का
पांच मन्त्रो के द्वारा अङ्गादि का प्रमार्जन करे ।।१५३॥ हे नर श्रेष्ठो।
इन पूर्व में वर्णित सम्मद आदि के द्वारा इसका प्रमर्जन करना चाहिए।
फिर आठ देवियो का पूजन करे। उनके नाम हैं -बाला-ज्येष्ठा--
रौद्री-काली-क्लविकरणी-देवी-वल प्रमथिनी-सव भतो की
दमनी-मनोन्मथिनी ॥१५४१.१५||
अप्टौ ता. पूजयेद् देवी. क्रमाच्छम्भोश्च प्रीतये ।
एव शिव पूजयित्वा ध्यानतत्परमानसः ।।१५६
जपेन्माला समादाय मन्नं घ्यात्वा तथा गरुम् ।
एक पचाक्षर मन्त्रमेक प्रामादमेव वा ॥१५७
तत्सक्तमनसो जप्त्वा शीघ्र सिद्धिमवाप्स्यथ ।
इति वां यथित मन्त्रं ध्यानपजामं तथा ।
गच्छतं नाटक शलं तत्राराधयतं हरम् ।।१५८
पंचाक्षरस्तु मन्त्रोऽय धृतस्त्वत्मम्मते मुने ।
अनेनंव हरं देव पूगयिप्यावहे मुदा ॥१५६
इत्युक्त्वा तनमम्वृत्य तदा वेतातभैरवी ।
जम्मुतुर्नाटक शंल वशिष्ठानुमते नृप ॥१६०
तवाम्ति सरमी रम्या सुराम्पूर्णमनोहरा ।
मयंदा ग्वच्छमलिला प्रफुल्लकमलोत्पला ।।१६१

वैताल भैरव उत्सति ] इन आठ देवियो का यजन कम से भगवान् शम्भू की प्रीति के लिये करना चाहिए। इस रीति मे शम्भु का पूजन कारकै ध्यान मे परायण मन वाला हो जावे ॥१५६॥ फिर अपने श्री गुरुदेव का और मन्य का ध्यान करके माला का आदान कर जप करना चाहिए । एक ही पांच अक्षरो वाला मन्त्र अथवा एक प्रमाद होवे ॥१५७) उसी में समासक्त मन वाले होते हुये जप करके शीघ्र ही मिद्धि की प्राप्ति कर लोगे। यह आप दोनो को मन्त्र बतला दिया है तथा इनका ध्यान और पूजा का क्रम भी कह दिया गया है। अब आप लोग नाटक पर्वत पर जाइये और वहां पर भगवान् हर को आराधना करिए ॥१५६।। ताल और भैरव इन दोनो ने कहा-हे मुनिवर । यह पांच अक्षरो वाला मन्त्र आपकी सम्मति से धारण कर लिया है और इसी मन्त्र के द्वारा देवश्वर शम्भु का आनन्द के साथ हम यजन बरे में ॥१५६ । हे नृप । इतना ही यह कहार तथा वेताल और मैग्व दोनो ने प्रणाम किया था और फिर वसिष्ठ मुनि की अनुमति से नाटक पर्वत पर वे दोनो चले गये थे ।।१६०॥ वहाँ पर एक परम सुन्दर सरोवर यो जो पूर्ण सुन्दरता से बहुत ही मनको हरण करने वाली पी। उममे सर्वदा बहुत ही स्वच्छ जल रहा करता था और सदा विकसित कमल रहते थे ॥१६॥ तस्यास्तीरे तु विपुल सुमनोज्ञो हराश्रम । सर्वदा दानवदेव किन्नर प्रमथस्तथा ॥१६२ रक्ष्यते नृपशार्दूल नृत्यवादनतत्परं । यस्मन्नट ति तत्रेशो नित्य कौतुकयत्पर ॥१६३ तस्मान्ताटकनाम्नासौ शलराज प्रगीयते । छत्राकार तु त शैल मनोज्ञ शकरप्रियम् ॥१६४ आसाद्य यत्र सरसी तत्र गत्वा तु ती तदा। न वापश्यना तत्र हराश्रममनुत्तमम् ॥१६५ गन्तु वाथमस्यान तो नेवाशक्ता नृप ।

१७० [मालिका पुराण तनो हर प्रणम्याशु तस्यव सरसस्तटे ॥१६६ निर्माय स्थण्डिल चारु वशिष्ठोक्तन मेण तु । हरमाराद्धमारेभे वेतालो भैरवोऽपि च ॥१६७ आराधयन्तो भूतेश तो तदा शकरामत्नौ । दृष्ट्वा हरो देवगण साधं तस्मिस्तु पर्वते । अधित्यकाया व्यवसत् स्वाथमेऽपर्णया सह ॥१६८ उसी सरोवर के तट पर परम विशाल और अत्यधिक सुदर भगवान् शम्भु का आश्रम था। वह आश्रम सर्वदा दानवो-देवो- विन्नरो तथा प्रमथो के द्वारा हे नृप शाहूल ! रक्षा किया जाता है वे रक्षा करने वाले सदा ही नृत्य और वादन में परायण रहा करते हैं । जिस कारण से वहां पर ईश कौतुक म नत्पर होकर नित्य नटित हुआ करते हैं ॥१६२॥१६३॥ इसी कारण से यह पवंत नाटक-इस नाम से प्रगीत किया जाता है । वह शैल छत्र के आकार के तुल्य आकार वाला था-परम मनोज्ञ था और भगवान् शङ्कर का अतीव प्रिय था ॥१६॥ जहाँ पर सरोवर की प्राप्ति की थी। उस समय में उन दोनो ने वही पर गमन किया था और उन्होंने परमोत्तम भगवान हर का आश्रम नही देवा पा ॥१६५॥ हे नृप । वे दोनो आश्रम रे स्थान पर गमन करने में असमर्थ हो गये थे। इस अनन्तर उन्होंने भगवान शम्भु को प्रणाम विया पा और उसी मरोवर के तट पर स्थित होगये थे ।।१६६।। वहीं पर यमिष्ट मुनि के द्वारा कपित क्रम मे एक सुन्दर स्पण्डिल या निर्माण परवे वेताल और गैरव दोना ने भगवान हर पी आगधना करना आरम्भ पर दिया या ॥५६॥ उस ममय में गदर में आरमज के दोनों या जो कि भूतेश्वर की आराधना कर रहे थे भगवान् शङ्कर ने उस पर्वत पर देवगणो माप देवार उम पर्वन की अधित्यका मे अपने ही माप में अपने पायम में निवास किया था । पर्वत में नीचे पी भूमि को अधिया कहा जाता है। उगी अधिरपरा में भगवान निकम वरना गुरु पर दिया ॥१६॥ - बेताल भैरव उत्पत्ति ] १७१ अधोभागे सरस्तीरे तपस्यन्तो हरात्मजौ। स्थितो दृष्ट्वा देवगणे सहितः शंकर. स्थितः ॥१६६ नृत्यमर्दलान्दो यो हरस्य सतत भवेत् । शृणुतस्तौ तदा शब्दं गन्तु द्रष्टुं न लभ्यते ।।१७० हरेणाधिष्ठित. शलः सर्वदेवगण. सह। राजते स्म तदा भुप सुधर्मा वारायी यथा ।।१७१ ध्यायतोस्तु तदा तत्र भगवान् वृषभध्वज । नचिरादेव तस्याभूद ध्यानमा निश्चल. ॥१७२ तो पूजयन्ती गच्छन्ती स्थिती वा चन्द्रशेखरम् । नैव तत्यजतुश्चितः कदाचिदपि भूमिप ॥१७३ पवाक्षरेण मन्त्रंण पूजयन्तौ वषध्वजम् । व्यतिचक्रमतुस्तो त सहस्र परिवत्सरान् ॥१७४ निराहारी यताहारी हरससक्तमानसौ । तपसा निन्यनुवर्षान सहस्र लोकवर्षवत् ॥१७५ सरोवर के तट पर नीचे के भाग मे शङ्कर के पुष वे दोनो तपश्चर्या कर रहे थे। वहा पर उन दोनो को स्थित हुए देखकर देवगणो के महित भगवान् शङ्कर भी वही पर मंस्थित हो गये थे ॥१६६॥ बहा पर निरन्तर भगवान् हर का जो नृत्य और मदेल का शब्द हुआ करता था। वे दोनों उस समय में उनका श्रवण किया करते हैं किन्तु वहां पर गमन करना और देखना प्राप्त नहीं होता था ॥१७०।। हे भूप ! वह पर्वत देवगणो के सहित भगवान् हर के द्वारा अधिष्ठित था। उस समय मे वे वासवी सुधर्मा की भांति शोभित हो रहे थे ॥ १७१।। उस ममय मे वहाँ पर भगवान् वृषभ ध्वज ध्यान करने वाले उनके ध्यान मार्गों में अविलम्ब ही निश्रल हो गये थे ।।१७२।। हे भूमिप ! वे दोनो ही पूजा करते हुए-गमन करते हुए अथवा स्थित होते हुए भगवान शम्भु का ही ध्यान दिया करते थे और विसी समय में भी चित्ता से १७२ । पालिका पुराण भगवान् चन्द्र शेपर सत्याग नहीं दिया था ॥१७३३ पाच अक्षरों वाले मन्त्र के द्वारा वृषभध्वज का पूजन परते हुए उन दोनों ने सहन पों का व्यतिक्रम वर दिया था ॥१४॥ बिना थाहार वाले-सयत आहार वाले और भगवान हर में ससक्त मन वाले उन दोनो ने तपश्चर्या के द्वारा महस्र वर्षों को एक ही वर्ष यो भौति विताया था ॥१५॥ गते वर्षसहस्रं तु स्वमेव वृषध्वज । प्रमगस्तु तयोर्भूत्वा प्रत्यक्षत्वमुपागत ।१७६ । लतु प्रत्यक्षतो दृष्टवा तदा वेतालभैरवो । वृषध्वज तुष्टुवतुर्यानगम्य पुर स्थितम् ।।१७७ हररूप यथाध्यात हृदगत तेजसोज्ज्वलम् । तथा दृष्टवा ततस्ताभ्या वशिष्ठस्यानुमानत ।।१७८ पचवक्त्र महाकाय सर्वज्ञानमय परम् । ससारसागरत्राण प्रणमावो वृषध्वजम् ॥१७६ न्व पर परमात्मा च परेश पुरुषोतम । त्व कूटस्थो जगदध्यापी प्रधान परमेश्वर !!१८० स्पात्मा त्व महातत्त्व तत्त्वज्ञानालय प्रभु। साख्ययोगालय शुद्धो गुणत्रयविभागवित ॥१८१ स्व नित्यस्त्वमनित्यश्च जगत्कर्ता लय स्मृत । एकोऽनेकस्वरूपश्च शान्तंचेष्टो जगत्मय ११८२ एक सहस्र धर्षों के व्यतीत हो जाने पर वृषभध्वज स्वय हो उन दोनो के प्रमझम होकर प्रत्यक्ष रूप मे उपागत हो गये थे ॥१७६।। उस अवसर पर वेताल और गैरव दोनों ने भगवान शम्भु पो प्रत्यक्ष में समागत हुए देखार जो ध्यान से जानने के योग्य थे उनका समक्ष में विराजमान हए पारर उन्होने वृषभध्वज या स्तवन किया था ॥१७॥ जिम प्रकार शहाये स्वरूप का ध्यान दिया था और जो तेज चे द्वारा उगवन हृदय म स्थित पिर उन दोनो ने उसो भाति वसिष्ठ भनि में वेताल भैरव उत्पत्ति ] १७३ - अनुमान से उनका दर्शन किया था ॥१७॥ वेताल और भैरव ने कहा- पांच मुखों वाले-महान् विशाल शरीर से समन्वित-सम्पूर्ण ज्ञान से परिपूर्ण-परम-संसार रूपी सागर से परित्राण करने वाले भगवान् वृषभध्वज को हम दोनो प्रणाम करते हैं ॥१७६] आप पर परमात्मा हैं और आप परेश पुरषोत्तम हैं -आप कूटस्थ-~जगत् में व्याप्त रहने वाले प्रधान परमेश्वर हैं ॥१८०|| आप स्पारमा है-आप महातत्त्व हैं-तत्व ज्ञान के आलप हैं प्रभु है-आप सांस्य योग के आलय हैं- शुद्ध और तीन गुणो (सत्व-रज-तम) के विभाग के ज्ञाता हैं ॥१८१॥ याप नित्य और अनित्य हैं-आप जगत् के कर्ता और लय कहे गये हैं। आप एक और अनेक रूप वाले हैं-शान्त चेष्टा से सयुत और जगन्मय हैं ॥१८२॥ निविकारो निराधारो नित्यानन्द. सनातन । त्व विष्णुम्त्व महेन्द्रस्त्व ब्रह्मा त्व जगता पति ।।१८३ यो स्परूपेश्वररत्नमाल सम्भूतिभृतो निरवग्रहश्च । कामयावतीणविगतप्रमाथी योगेश्वरो ज्ञानगतिस्वगम्यः ।।१८४ प्रमेयस्पात्मधराधराभो भोगीन्द्रवद्धामृतभोगतन्त्र.। मूदमाक्षरस्तत्त्वविदप्रमाथी त्वं देवदेव. शरण सुराणाम् ।।१८५ विकल्पमानापरिहोनदेह शुद्धान्तधामानुगतंक विद्य । वधिष्णुरुय. पुरुप परात्मा स्वमिन्द्रियोषस्य विचारपुद्धि ॥१८६ त्व नाथनाथ प्रभवः परेपा गतिमुनीना परयोगिगम्य ।

१७४
[ कालिका पुराण
स्व भूधरो भागधरो पनत्तो
विश्वात्मनस्ते वहव प्रपन्चा ॥१८७
शानामृतस्यन्दकपूर्णचन्द्रो
मोहान्धकारस्य पर प्रदीप ।
भक्तात्मजाना परम पिता त्व
कामे च पचाननरूपधरी ॥१५८
शास्ताखिलाना प्रथमो विवस्वा-
स्तनूनपान व तनुपे गुणोधान् ।
त्व ब्रह्मरूपेण करोपि सृष्टि
विष्णुभ्वरूपं सतत स्थिति च ॥१८९
आप विचारों से रहित-निराधार- नित्य हो आनन्द स्वरूप
हैं तथा सनातन हैं । आप विष्णु है-आप महेन्द्र हैं और आप सहा
तथा जगत् के स्वामी है ।।१८३॥ जो रूप और रूपेश्वर रनो की माता
है--सम्भूति से भूत और निरवग्रह है जो कायावतीणं अवगत प्रमा
भी हैं-योगेश्वर-ज्ञान को गति वाले और अगम्य अर्थात् न जानने के
योग्य हैं ॥१८४६ आप प्रमेय रूप आत्मा के धराधराम है - आप
भोगीन्द्रा से बद्ध अमृत भोग तन्त्र वाले है । आप सूक्ष्म और अक्षर हैं।
तत्त्वी के येत्ता और अमुभाषी हैं । आप देवो ये भो देव और सुरगणो
ने रक्षक हैं ॥१८आप विवरुप और मान से परिहीन देह धाले
हैं-आप शुद्ध अन्तधाम और अनुगतो की एक विधा रूप हैं। आप
वधिष्ण, उप पुरुष और परात्मा है.--आप इन्द्रियो के समूह को दिवार
बुद्धि हैं ॥१९६॥ आप नाथो से भी नाप है-परों के प्रभव अर्थात
उत्पत्ति स्थान है ~याप मुनिगणो की गति है तथा पर योगियो के द्वारा
जानने के योग्य है । आप भूघर है, भागधर और अनन्त हैं । विश्वामा
थापन- प्रपन्य है ॥१८॥ आप शान रूपी अमृत रे स्पन्दन
परन हार पण पदमा हैं और मोह पो अधिवार के परम प्रदीप है।

वेताल भैरव उत्पत्ति }
१७५
आप भत्तो के पुत्रो के लिये परम पिता हैं और काम मे पञ्चानन के
रूप को धारण करने वाले हैं ॥१८८॥ आप समस्ती के शास्ता हैं-
आप प्रथम विश्वान है ---आप तनूनपात् है-आप गुणो के समुदायो
का विस्तार किया करते है । बाप ब्रह्म के रूप से सृष्टि किया करते
हैं । और आप हो भगवान् विष्णु के रूप के द्वारा स्थिति अर्थात् परि-
पालन निरन्तर किया करते हैं ॥१८६।।
त्व रुद्ररूपी कुरुपे तथान्त
त्वत्तो न चान्याज्जगतीह वस्तु ।
त्व गविनाथो दिवसेश्वरश्च
त्वमग्निराप पवनो धरिती ।।१६०
नभस्तथा त्व ऋतुतन्त्रहोता
त्वमष्टमूर्तिर्भवतो न चान्यत् ।
अनन्तमूर्तिस्म्विह मुख्यभावा-
निगद्यते चाप्टामयी त्रिमूर्ति ॥१६१
अनन्तमूर्ते कथमन्यथा ते
संख्यास्ति रूपस्य यदष्टमूर्ति ।
त्वं त्र्यम्बकस्त्व त्रिपुरान्तकश्च
त्व शम्भुरीश शमनो विधाता ॥१६२
सहस्रवाहुश्च हिरण्यवाहु
सहस्रमूर्तिस्त्विह पचवक्त्र ।
प्रभूतनेनस्तु पडर्धनेत्र
प्रभूतवाहुदंशवाहुरीश. १६३
प्रभूतभोगी मितभोगयुपतो
भोग्यानुसारो निरवग्रहश्च ॥१६४
नित्यानित्यस्वरूपाय नित्यधामस्वरूपिणे ।
परतत्त्वस्वरूपाय नमस्तुभ्य शिवात्मने ॥१३५

१७६ [ पालिया पुराण नान्त लिंगस्य यस्याप्तं विष्णुना ब्रह्मणा तव । तस्यावा कि विधास्यावः स्तुतिवाक्यं वृपध्वज ।।१६६ भाप ही रद्रदेव के रूप से इस जगत का अन्त दिया करते है । इस जगत में आपसे अन्य कुछ भी वस्तु नहीं हैं । आप राविनाथ अर्थात् चन्द्रमा है और आप ही दिनमेश्वर हैं अर्थात् सूर्य हैं । आप ही अग्नि हैं-जल हैं, पवन हैं और आप ही धरित्री हैं 11१६०॥ आप ही नभ है और आप ही क्रतुके तन्त्र होता है । आप ही अष्ट मूर्ति हैं और आपसे अन्य नही हैं । यहाँ पर मुख्यभाव से अनन्त मूत्ति हैं और अष्ट- मूत्ति के हो जाया करते हैं ॥ ११६॥ हे अनन्त मूर्तियो वाले । आपके रूप की अन्य प्रकार से संख्या कैसे हो सकती है क्योकि आप अष्ट मूर्ति है। आप यम्बर है और आप त्रिपुर के यन्त करने वाले हैं। आप शम्भु हैं, ईश हैं, शमन है और विधाता है ॥१६२।। आप सहस्रवाह हैं--- हिरण्य वाहु है - आप सहस मूर्ति है और यह पञ्च वक्त्र अर्थात् पांच मुखो वाले है । आप बहुत नेत्रो वाले है और तीन नेत्रो से सयुत है। आप प्रभूत (बहन) बाहुओ से युक्त है और ईश दश बाहुओ वाले है । ।। १६३ ॥ आप बहुत अधिक भोगो के उपभोग करने वाले हैं और सीमित भोगो वाले है । भोग्यो के अनुसार है और अवग्रह से रहित हैं ॥१६४ ॥ नित्य और अनित्य स्वरूपो वाले के लिये-नित्य धाम स्वरूपी के लिये-परतत्त्व स्वरूपो वाले शिवात्मा आपके लिये नमस्कार है ॥ १६५ ।। जिन आपके लिङ्ग का अन्त ब्रह्मा और विष्णु ने भी प्रास नहीं किया था। हे वृषध्वज उन आपका हम दोनो क्या स्तुति वाक्य करेगे ॥१६॥ स्वरूप यस्य जानन्ति न देवा नापि दानवा । वालावावा कथन्तु त्वा स्तोप्याव. परमेश्वर ॥१६७ भक्तिमात्रेण देवेश तवावा वृषभध्वज । पुर्व प्रणाम गौरीश भूयस्तुभ्य नमो नमः ११६८

वैताल भैरव उत्पत्ति ]
१७७
इति स्तुतो महादेवो वेतालेन महात्मना ।
भैरवेणापि राजेन्द्र प्रसन्न. प्राह तो तदा 11१६६
तुष्टोऽस्मि युवयोः पुत्री वृणुत वाञ्छित वरम् ।
दास्यामि यवयोरिप्ट प्रसन्नोह तपोव्रत ॥२००
स्तुतिभिस्तु दमश्चापि तथकान्तानुचिलनः ।
मुहुमुहुः सुप्रसन्न इप्ट दास्यामि वा सुतौ ॥२०१
तुप्टोऽसि यदि सत्य नौ सत्यमावां सुतौ यदि ।
वृपध्वज तवैवेह तदेष्ट देहि नौ वरम् ॥२०२
सुतभावेन पितर भवन्त जगतां पतिम् ।
नित्य यथावगच्छावस्तथा देहि वर तु नो ॥२०३
जिनके स्वरूप को देवगण और दानवगण भो नहीं जानते हैं ।
हे परमेश्वर ! हम दोनो बालक किस प्रकार से आपका स्तवन करेगे।
॥१६७॥ हे वृषभध्वज ! हे देवेश ! हम दोनो केवल भक्ति से ही हे
गौरीण ! प्रणाम करते हैं। पुन, भापको बारम्बार नमस्कार है ।।१६।।
और्व ने कहा है-इस प्रकार से महान् आत्मा वाले देताल के द्वारा
महादेवजी की स्तुति की गयी थी। हे राजेन्द्र ! भैरव ने भीस्त वन
किया था। उस समय में वे प्रसन्त होकर उन दोनों से बोले ॥१६६।।
भगवान ने कहा-हे पुत्रौ ! मैं आप दोनो पर परम प्रसन्न हूँ अब
अपना वाछिन वरदान मागिये मैं तपोव्रतो से परम प्रसन्न हूँ तुम
दोनो का अभीप्ट दे दूंगा ॥१०॥ है मुनो ! आपकी स्तुतियों से--
मदो से तथा एकान्त चिन्तमो से वार २ जो दिये गए ये मैं बहुत
हो प्रसन्न हो गया हू-बाप दोनो का जो भी अभीट होगा
उसे में दे दूंगा ॥२०१।। वेताल-भैरव-दोनी ने कहा- यदि
सचमुच ही आप हम दोनो के ऊपर प्रसन्न है यदि हम दोनो
सचमुच ही आपके सुत हैं । हे दृषध्वज ! यहाँ पर आपका ही जो
इष्ट हो वही हम दोनो को वरदान देने की वृपा बरो॥२०२॥ मुनभाव
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१७८ [पालिका पुराण से जगतो ये पति पिता आपको नित्य ही जैसे हम अवगत वर जैसा ही वरदान हम दोनो को प्रदान कीजिए ॥२०३॥ न राज्यमभिकाक्षावो न धन नान्यदेव वा। स्वद्भक्त्या सेवन कर्तुं तवेच्छावो वृषध्वज ॥२०४ त्वत्पादपकजद्वन्द्वे नित्य मधुकरात्मताम् । त्वयि प्रसन्ने नेत्राणा युगले प्राप्नुता सदा ॥२०५ इतोऽन्यथा त्वचिन्ताभिस्त्वद्धयानस्त्वत्प्रपूजनं । कल्पकोटिसहस्राणि यान्तु सम्यक्तथावयो ॥२०६ ततस्तद् वचन श्रुत्वा महादेवो हसन्निव । सर्देवगणं साधं देवत्वमकरोत्तयो ।।२०७ देवेन्द्रसम्मतेनंव सुधामानीय नाकत । वेतालभैरवो तान्तु पाययामास शकर ॥२०८ पीतेऽमृते ततस्तो तु मत्यता नरसत्तमौ । अमत्यता परियज्य प्रापतु शिवशक्तित ॥२०६ तस्मिन्काले स्वपन्तौ तु दिव्यज्ञानवलान्विती। दिव्यरूपोपसम्पन्नौ बभूवतुररिन्दमौ ॥२१० हम लोग राज्य की इच्छा नहीं रखते है --न धन ही चाहते है और अन्य भी कुछ की इच्छा है । हे वृपध्वज | आपकी भक्ति की भावना से अपनी भावना से आपको सेवा करना चाहते है ॥२०॥ आपरे चरण कमल के युग्म म नित्य ही मधुकर को स्वरूपता को प्राप्त होवें। आपके प्रसन्न होने पर नेत्रो का जोडा सदा ही सफलता को प्राप्त होगा ॥१०॥ यहाँ से आगे अन्य प्रकार से आपके चिन्तनो से-- आप घ्यानों से और आपके पूजनो से हम दोनो पे करोडों सहत पल्प भली भांति व्यतीत होवें ॥१०६। इसके अनन्तर महादेवजी ने हंसते हुए की भांति ही सब देवगणो के माय उन दोनो पो देवत्व कर दिया था ॥२०७।। भगवान शकर ने देवेन्द्र की मम्मति से ही स्वर्ग से

वेताल भैरव उत्पत्ति ]
अमृत को लाकर उसको वेताल और गैरव को मिला दिया था ।।२०८।।
है नरयष्ठो! भगवान शिव की शक्ति से अमृत के पी लेने पर उन
दोनों ने भत्यंभाव का परित्याग करके अर्थात् मृत्यु के मुह में जाने के
भाव का त्याग करके वे दोनो ही अमत्यंता को प्राम हो गये थे ||१०६॥
उस अवसर में स्वपन करते हुये वे दोनो दिव्य ज्ञान और वल से सम-
वित हो गये थे। वे दिव्य रूप से सम्पन्न अरियो के दमन करने वाले
हो गय ।।२१०॥
अभिन्नेनैव देहेन देवत्व गतयोस्तयो ।
माह शम्भुस्तदा तो तु सुतो परमहर्षितौ ।।२११
अह तुष्टस्तु युवयो पार्वती दयिता मम ।
मद्दत्त काममिच्छन्तादाराधयतमीश्वरीम् ॥२१२
तामृते तु न शक्नोमि दातुमिप्ट सनातनम् ।
सेवितु च सुतौ नित्य शरण व्रजत शिवाम् ॥२१३
अचिराद् येन भावेन प्रीति देवी गमिष्यति ।
अन्न वा तन्न वा गत्वा तेन भावेन चार्य्यताम् ।।२१४
इसी अभिन्न देह के द्वारा देवत्व को प्राप्त हुये उन दोनों स
भगवान शम्भु वोले। उस समय म वे दोनो सुत परम हर्णित हुए थे।
॥२११॥ भगवान ने कहा- मैं तो आप दानो पर परम प्रसन्न हूँ।
मेरे दिये हुए काम की इच्छा करते हुए आप दोनो मेरी दयिता पार्वती
ईश्वरी की समाराधना करो ॥२१२॥ उनके विना में सनातन अभीष्ट
नहीं दे सकता हूँ। उनकी नित्य ही सेवा करने के लिये शिवा पार्वती
देवी की भरणागति में गमन कीजिए। जिस भाव से शीघ्र ही वह देवी
प्रीति को प्राप्त हो जाये वहां पर अथवा यहाँ पर गमन करके उसी भाव
से उन का समचंन करिये ॥२१॥

१८०
[ पालिका पुराण
॥ महामाया कल्पे अष्टादश पटल ।।
एव वदति भूतेशे तदा तालभैरवौ ।
पाहतुर्योमकेश तौ हर्षोफूल्लविलोचनौ ॥१
पार्वत्या न हि जानीवो ध्यान मन्त्र विधि तथा ।
कथमाराधयिष्यो भगवन् सम्यगुच्यताम् ।।२
महामायाविधि मन्त्र कल्प च भवतो सुतौ ।
उपदेक्ष्यामि तत्त्वेन येन सर्व भविष्यति ॥३
इत्युक्त्वा स महामायाध्यान मन्त्र विधि तथा ।
कथयामास गिरिशस्तयो सम्यड, नृपोत्तम ॥४
यदष्टादशभि पश्चात्पटलैश्च स भैरव ।
स निर्णयविधि कल्प निववन्ध शिवामृते ।।५
कोहड, मन्न पुरा शम्भुरवोचदुभयोस्तयो ।
येनाराध्य महामाया तो गणेशत्वमातु ॥६
सकल्प सरहस्य च साङ्ग तच्छोतुमुत्सहे ।
दशाप्ठपटलयत् तु निववन्ध सभैरव ॥७
और्व मुनि ने कहा-इस प्रकार से भूतेश्वर प्रभु के कथन करने
पर उस समय म वेताल-भैरव दोनो ही वे हप से उत्फुल्ल लोचनो
वाले व्योम केश भगवान से बोले ॥१॥ वेताल-भैरव दोनो ने कहा-
हे भगवन्
हम दोनो देवी पावती का ध्यान-मत्र और विधि नहीं
जानते है । हम उनको किस प्रकार से आराधना करे गे-यह आप
भली भांति हमको वतलाइए ॥२॥ श्री भगवान ने कहा-हे सुतो'
मैं महा माया का मन्त्र-और क्ल्प आप दोनो के उद्वेश करूंगा और
तात्त्विक रुप से बतला दूगा जिस से यह सब हो जायगा ॥३॥ और
ने पहा-हे नृपोत्तम ! उन देवेश्वर ने इस प्रकार से वहकर फिर माया
माया या ध्यान- मन्त्र और विधि गिरिश प्रभु ने उन दोनो को भली

१८२ [ कालिया पुराण को सुनिये ॥६॥ श्री भगवान ने वहा~-माप धवण कीलिए मैं गुह्म में भी परम गोपनोप को बतलाऊंगा। वणवी का महामाया महोत्सव आप अक्षरो वाला है ॥१०|| इस श्री वैष्णवी के मन्त्र का नारद ऋषि हैं और शम्भु देवता है । इममा अनुप छन्द हैं और इसका सब अथ के शट धन मे विनियोग होता है ॥११॥ हान्तान्त पूर्व और रान्त उसी भांति नान्न और शान्त है । एका दशाएक आदि वास छटवा णान्त है जिसमे विष्णु आगे हैं ॥१२॥ इन आठ अक्षरो से मन होता है जो शोण पत्र की प्रभा के समान होता है । ॐकार पूर्व में लगाकर समस्त माधना करने वालो के द्वारा जप करना चाहिए ॥१३। यह महा मत्र परम गोपनीय है और प्णयो मन्त्र की मज्ञा वाला है । मन्त्र वाले वर गत है इसी कारण से अङ्ग कोनित किया गया है ॥१४॥ महादेवस्योर्ध्वमुख वीजमेतत् प्रकीतितम् । *धाराक्षरवीज च यकार शक्तिरुच्यते ॥१५ सवीज कथित मन्त्र कल्प च शृणु भैरव । तीर्थ नद्या देवखाते गतप्रसवणादिके ॥१६ परवीयेतरे तोये स्नान पूर्व समाचरेत् । आचान्त शुचिता प्राप्त कृतासनपरिग्रह ॥१७ उत्तराभिमुखो भूत्वा स्थण्डिल मार्जयेत् तत । परेणानेन मन्त्रेण य स क्षित्या इति स्वयम् ।।१८ ॐ ह्री स इति मन्त्रेण आशापूरणनेन च । तोयैरन्युक्षयेत् स्थान भूतानामपसारणे ॥१६ तत सव्येन हस्तेन गृहीत्वा स्थण्डिल शुचि । मन्य लिमेत् गुवर्णन याशिवेन कुशेन वा ॥२० ॐ वैष्णव्यै नम इति मन्यराजमथापि वा। ततस्त्रिमण्डल पुर्यात् तेनैव समरेखया 11२१ महादेवजी वा वं मुग है। यह बीज बहा गया है। मार

महामायाबल्ये
अष्टादश पटल ]
1
11
अक्षर बीज है और यकार शक्ति कही जाती है ! १५ । हे भैरव ! दोज़
के महित मन्त्र कह दिया गया है और बल का यवण करो। किमी
तीर्य मे-दो म-देवबात में-गत प्रसवय आदि मे~-परकीय से
इतर जल में पूर्व में स्नान करे । आचमन पर शुचिता को प्राप्त हुआ
होकर आसव का परिग्रह परे ॥१६-१७॥ उत्तर दिशा को और
अभिमुख होकर फिर स्थपिद्धल का मार्जन करना चाहिए। जिसको वह
स्वय क्षति से इम मन्त्र द्वारा कर में परे1951 "होस" इस
मन्त्र के द्वारा धौर अशा पुरस मे जलो के द्वारा भूनों के अपमारण करने
मे अभ्युक्षण बरे १६ रि मय्य हाथ से भूचि हॉरर स्पण्डिल का
ग्रहण करके सुवर्ण की लेधनी में अथवा याज्ञिक दुशा मे मन्त्र को
लिखना चाहिए ॥२०॥ अथवा "ॐ वन्यै नम इम यमराज वो
लिखे फिर उसी में समरेखा में त्रिमण्डल करे।२१।
नित्यासु न हि पूजानु रजोभिर्मण्डल लियेत् ।
पुरश्चरणकार्येषु तत्वाम्येषु प्रयोजयेत् ।।२२
रेखामुदीच्या प्रथम पश्चिमे तदनन्तरम् ।
दक्षिते तु तत पश्चात् पूर्वभागे तु शेपत ॥२३
वर्णाना च सहद्वारं रेवमेव क्रमो भवेत् ।
*ही श्री स इति मन्त्रेण मण्डल पूजयेत् तत ॥२४
हस्तेन मण्डल कृत्वा पुर्याद् दिग्दन्धन तत ।
आशावन्धनमन्त्रण पूर्वोक्तैन ययानमम् ॥२५
फडन्तेनात्मनाप्त करेणंव निवन्धयेत् ।
यवाना मण्डलरेय मडगुल चाष्टमिभवेत् ॥२६
अदीर्घयोजितहस्तश्चतुर्विशतिरड गुलं ।
तत्प्रमाणेन हस्तेन हस्तक तस्य मण्डलम् ॥२७
पदम वितस्लिमात्र म्यात कणिकार तदर्धकम् ।
दलान्यन्योन्यसतानि हायतानि नियोजयेत् ॥२

१८४ [ वालिका पुराण न न्यूनाधिक मागानि सवहिर्वेष्टितानि च । मध्यभागे न्यसेद् द्वारन न्यने नाधिके तथा । मुबद्धं मण्डल तच्च रक्तवर्ण विचिन्तयेत् ॥२६ इतोऽन्यथा मण्डलमुग्रमस्याः करोति यो लक्षणभागहीनम् । फल न चाप्नोति न काममिष्टं तस्मादिद मण्डलमत्र लेख्यम् ॥३० नित्य होने वाली पूजाओं मे रज से मण्डल को नही लिखना चाहिए । पुरश्चरण कार्यों मे और काम्पो में और इसके अनन्तर पश्चिम मे फिर इसके पीछे दक्षिण में पीछे शेप मे पूभाग मे करे । २३ । इसी प्रकार से वर्षों के द्वारो के द्वारो के महित कम होता है "ॐ ह्रीं स" इस मन्त्र के द्वारा फिर मण्डल का पूजन करना चाहिए । २४ । हाथ मे मण्डल बनाकर फिर दिग्बन्धन बरे। यथा क्रम से पूर्व में कथित आशावन्धन मे ही रे ॥ २५॥ यहां पर भी फट् जिसके अन्त में है अपने करने ही निबन्धन करे। यवो के मण्डलो से और आठो मे एक अगुल होवे । २६ । अदीर्घ योजित हाथो से चौबीस अगुलों से उस भ्रमण वाले हाथ से एक हाथ उसका मण्डल होता है । २७ । एक वितास ( वालिन ) मात्र पद्म होता है और उससे आधा वर्णिकार है। उसके दल परस्पर मे सक्त होते हैं और आयत हो--ऐसे ही नियोजित करे । २८ । न्यूनाधिर भाग बाले न हो और बाहिर वेष्टित ये महित है । टोर मध्य भागम द्वार वा न्यास मरे न्यून तथा अधिन मे न करे । और सुवर मण्डल रत्त वर्ण वाला विचिन्तन परे । २६ । इसगे अन्यथा इसका उग्र मण्डल जो लक्षण और भाग रहित विया करता है उमया वर पर नहीं प्राम किया करता है और न अभीष्ट काम हो होता है। इसगे यह मारा यहाँ पर लिपना चाहिए।३०॥

महामाया कल्प वर्णन(१) ] १९५ ॥ महामाया कल्प वर्णन ॥१) ततो लमिति मन्त्रेण अर्घपानस्य मण्डलम् । चतुष्कोण विधायाश द्वारपद्मविवजितम् ।।१ ओह्री श्रीमिनिमन्त्रण अघंपाय तु मण्डले । विन्यमेत् प्रथम तत्र पूजयित्वा ममिध्यति ॥२ ओ ह्री ह्रौमितिमन्त्रेण गन्धपुप्पे तथा जलम् । अघपा क्षिपेत् तन मण्डल विन्यमत् तत ॥३ पूर्ववन्मण्डल कृत्वा अर्धपात्रे ततो जले। विभाग पूरयेन् पान पुष्प तत्र विनि क्षिपेत् ॥४ ततो ह्रीमिति मन्त्रेण आसन पूजपेत स्वकम् । तत क्षौमिनिमन्त्रेण आत्मान पूजयेद बुध ॥५ गन्ध पुष्पं शिरोदेशे तत पूजा समाचरेत् । ओ हो स इति मन्त्रेण पुष्प हस्ततलस्थितम् ॥६ समृज्य सव्यहम्तन धात्वा वामरेण तु । ऐशान्या निक्षिपेदेनन् पूर्वमन्त्रेण कोविद ॥७ श्री भगवान न कहा-इसके उपरान्त लम्' इस मन्त्र से वर्ष- पार का चतुष्कोण मण्डल शीघ्र ही वनार को रि द्वार पदग में वजित हावे ॥१॥ फिर “ॐ ह्री श्री" इस मल में मण्डल म पर पान का विन्याम करना चाहिए । प्रथम वहाँ पूजा करक ममिध्य करे ।२। दही, हों' इस मन्त्र मै गन्य और पुप्प तथा जल बघ पत्र में लिप्त करे फिर वहां पर मण्डल का विन्यास करना चाहिए ।३। पूर्व की ही भांति मण्डल करके अर्घ पत्र तीन भागों वाले जलों में पाष को पूरित कर और उमम पुण्य का निषेप वर । ४ । फिर 'ही' इस मत्र में बामन का जो कि अपना हो यजन कर। रि दुध को चाहिए कि " दम मन्त्र में आत्मा का पूजन -

१८६
[ कालिका पुराण
गन्ध-पुप्पो से शिरो देश में पूजा का समाचरण करना चाहिए।
"ॐ ह्री स"-इम मन्त्र के द्वारा हस्त तल में स्थित पुष्प का समान
बरके मध्य वर से आघ्राण करके वाम करके द्वारा कोविद पुरप
रो
ऐशानी दिशा में इसका पूर्व मन्त्र से ही विनिक्षेप करना चाहिये।
॥४-७॥
रक्तं पुष्पं गृहीत्वा तु कराभ्यां पाणिकच्छकम् ।
वद्ध्वा कुर्यात् ततः पश्चाद् दहनप्लवनादिकम् ॥८
वामहस्तस्प तर्जन्या दक्षिणस्य कनिष्ठिकाम् ।
तथा दक्षिणतजन्यां वामाड गुप्ठ नियोजयेत् ।।६
उन्नत दक्षिणाङळं वामस्य मध्यमादिकाः ।
अड गुलोर्योजदेत् पृष्ठे दक्षिणस्य करस्य च ॥१०
वामस्य पितृतीर्थेन मध्यमानामिके तथा।
अधोमुखे तु ते कुर्याद् दक्षिणस्य करस्य च ॥११
कूर्मपृष्ठसम पृष्ठ कुदि दक्षिणहस्तत. ।
एव वद्ध सर्वसिद्धि ददाति पाशिकच्छपः ॥१२
कुर्यात् तवृदयासन्न निमोल्य नयनद्वयम् ।
ममं कायशिरोग्रीव कृत्वा स्थिरमना बुध. १३
ध्यान ममारभेद् देव्या दाहप्लवतपूर्वकम् ।
अग्नि वायो विनिक्षिप्य वायु तोये जलं हृदि ॥१४
रन वर्ण के पुष्प का ग्रहण करके दोनो हाथो से पाणि पर
यापर गये पीछे दहन प्लवन आदि परे॥८॥ बांये हाप
पानिष्ठिायो तथा दक्षिण हाथ को तनी मे पाम अंगुष्ठ को नियोजित
परे ।। दाहिने उन्नत अगुष्ठ गो वाम पर वी मध्यमादिक अगुलियों
गो पृष्ठ में योरित करे जो कि दक्षिण परके पृष्ठ में करना चाहिए
। १० । वाम या पिश नो गे मध्यमा और अनामिनापो अधोमुग

] महामाया करप वर्णन 1१) १८७ करे और दाहिने र को दक्षिण हस्त मे वूमं के पृष्ठ के ममान करे। इस प्रकार से बंधा हुआ पाणि कच्छप मभी मिद्धियों को दे दिया करता है ॥ ११-१२॥ स्थिर मन वाले दुध पुरप का चाहिए कि उसको अपने के ममीप में करे और दोनों नेत्रों को मंद लेवे। अपनी काया-गिर और ग्रीवा को ममान रक्ने ॥ १३ ॥ फिर दाह प्लवन पूर्वक देवो के ध्यान का ममारम्भ करना चाहिये । अग्नि को वायु में निक्षिप्त करके वायु को जल म और जल को हृदय म निक्षिप्त ॥१४॥ हृदयं निश्चले दत्त्वा आकाशे निक्षिपेत्स्वनम् । ॐ हैं फाडिति मन्त्रेण भित्त्वा रन्ध्र तु मस्तके ॥१५ शब्देन सहित जीवमाकाशे म्यापयेत् तत । वाय्वग्नियमशाणा वीजेन वरुणस्य च ।।१६ परास्यानपराश्चतं साधचन्द्र सविन्दुक । शोप दाह तयोच्छाद पोयूपासेवन परम् ॥१७ ययाक्रयेण कर्तव्य चिंतामात्र विशुद्धये। ततस्तु देवीवीजन अणु जावूनदाकृतिम् ।।१८ तत्रासाद्य द्विधा कुर्यात् इम ह्रीं श्रौमित्ति मन्त्रका । तदूर्ध्व मागेपु हदलोव स्वर्गा च ख तथा ॥१६ निप्पाद्य पभागेन भुव पातालवारिणि । चिन्तयेत्तत्र सर्वाणि सप्तद्वीपा च मेदिनीम ॥२० तत्तेपु सागरास्तास्तु वर्णद्वीप विचिन्तयेन् । तन्मध्ये रत्नयर्यक रत्नमण्डपसस्थितम ॥२१ हृदय को निश्चल आवशम देकर स्वना निक्षेप करे। "ॐ हूँ फट'-इस मन्त्र क द्वारा मस्ता म र भेदन करके शब्द के सहित जीव को आवागम स्थापित करे। वायु--अग्नि-यम इंद्रों का और वाणा वीज के द्वारा शोपादि करे ॥ १५-१६ ॥

महामाया कल्प वर्णन (१) ] १६ विभ्रती वामहस्ताभ्यामभोति वरदायिनीम् ॥२६ निम्ननाभिकमायातां क्षीणमध्यां मनोहराम् । आनमन्नागपाशोर गुप्तगुल्फां सुपार्णिकाम् ॥३० वद्धपर्यसंकल्पा निवीरासनराजिताम् । गात्रेण रत्नसंस्तम्भ मभ्यगालम्व्य संस्थिताम् ।।३१ आकाश गङ्गा के जल की राशि से सदा ही सेवित वह शभ है । उस पर्यत पर रक्त पद्म है जो प्रसन्न और सदा शिव है ॥२२॥ उसका ऐसा चिन्तन करें कि वह स्वर्ण मानाङ्क है-सप्त पाताली का नाल वाला है ब्रह्म लोक से लेकर भुवन का म्पर्श करने वाला है तथा मुवर्णाचल के कणिका वाला है ॥२३॥ वहां पर स्थित महामाया का एकाय मन वाला होकर ध्यान करे। वह महामाया शोण पद्म के सदृश है और उसके केश खुले हुये रहकर लटके हुए हैं ॥२४॥ वह चलकांजमा पर समारूढ है तथा उज्ज्वल कुण्डलो की शोभा वाली है। सुवर्ण और रत्नो मे मम्पन्न दो किरीटो के धारण करने वाली हैं। ॥२५॥ शुक्ल-कृष्ण और अरण वर्णों वाले तीन नेत्रों के द्वारा बहुत हो मुन्दर विभूषित है । सन्ध्या कालीन चन्द्र के तुल्य कपोलो से सयुत हैं और उन के लोचन चचल है ॥२६॥ पड्कर हित दाहिम के बीजो के समान दातो के रखने वालो-मुन्दर मोहो मे योग से उज्ज्वल- वन्यूक दन्त के वसनो वाली-शिरोप को प्रभा से युक्त नासिका से सयुन- कम्बू के सदृश ग्रीवा वाली-विशाल नेत्री से युक्त-करोडो मूर्यों की प्रभा मे समन्वित-चार भुजाओ वाली-विवसना और वीन तथा उन्नत पयोघरो से शोभित-निस्त्रिशत्पर कर्व दक्षिण कर के द्वारा सिद्ध मूत्र को धारण करने वाली और वाम हाथो से अभयदान तथा वरदान को धारण करने वाली निम्न मर्याद गम्भीर नाभि क्रम से आयात-क्षीण मध्यभाग वाली-मनोहर-आनमित नाग पाशो के सदृश करूओ से युक्न- गुप्त गुल्फो वाली-सुन्दर पार्णियो से संयुत-बद्ध पर्यङ्क सङ्कल्प

१८९
[ माविका पुराण
ये परा स्थान पर हैं विन्दु और अर्ध चन्द्र के सहित इनसे शेप-दाह
तथा उच्छद-पर पीयूष का आसेवन यथाक्रम से करना चाहिये ।
विशुद्धि के लिये चिन्तन मात्र ही है । इसके अनन्तर देवी के बीज के
द्वारा जाम्वनद की आकृति वाले अण्ड का परे ॥१७॥१८॥ वहाँ पर
पहुँचकर ॐ ह्री थी मन्त्रो से द्विधा वरना चाहिये । उनके ऊर्ध्व भागो
मे
'हद्-लोक स्वर्ग को भूमि तथा आकाश का निष्पादन करके शेष
भाग से भू को पाताल के जल म चिन्तन बरे । वहाँ पर सबका चितन
करना चाहिए । सातो द्वीपो का और मेदिनी का चिन्तन परे। उनमे
उन सागरो का और रवर्ण द्वीप का चिन्तन करना चाहिए। उसके
मध्य मे रत्नो से निमित मण्डप में सस्थित रत्न पर्यत का चिन्तन
परे ।।१६-२१॥
आकाशगङ्गालोयोधै सदैव सेवित शुभम् ।
तत्पर्यके रक्तपदम प्रसन्न सर्वदाशिवम ॥२२
चिन्तयेत स्वर्णमानाक सप्तपातालनालकम् ।
याब्रह्मभुवनस्पर्शि सुवर्णाचतवणिकम् ॥२३
तपस्थिता महामाया ध्यायेदेकारमानस ।
शोणपद्यप्रतीकाशा मुक्तमूर्धजलम्विनी ॥२४
चलत्वाञ्चनामरुह्य कुण्डलोज्ज्वलशालिनीम।
मुवर्णरत्नसम्पन्न किरीटद्वयधारिणीम ॥२५
शुक्लकृष्णारुणस्त्रिभिश्चारुविभूपिताम् ।
मन्ध्याचन्द्रसमप्रख्य-पोला लोललोचनाम् ।।२६
विपद्धदाडिमोवीजदान्तात् सुभ्रूयोगोज्ज्वलाम् ।
बन्यूक्दन्तवसना शिरीषभनासिकाम् ॥२७
पघुग्रोवा विशालाक्षी सूर्यकोटिसमप्रभाम् ।
पनुभुंजा विवनना पोनोग्नपयोधराम् ॥२८
दक्षिणोध्न निस्त्रिशत्सरेण सिद्धमूवम् ।

महामाया कल्प वर्णन (१) ) १EE विभ्रती वामहस्ताभ्यामभीति वरदायिनीम् ।।२६ निम्ननाभिक्रमायातां क्षीणमध्यां मनोहराम् । आनमन्नागपाशोरू- गुप्तगुल्फा सुपाणिकाम् ॥३० वद्धपर्यसंकल्पा निवोरासनराजिताम् । गात्रेण रत्नसस्तम्भं सम्यगालम्व्य संस्थिताम् ॥३१ आकाश गङ्गा के जल की राशि मे सदा ही सेवित वह शम है । उस पर्यङ्क पर रक्त पद्म है जो प्रसन्न और सर्वदा शिव है ॥२२॥ उसका ऐमा चिन्तन करे कि वह स्वर्ण मानाङ्क है--सप्त पाताली का नाल वाला है ब्रह्म लोक से लेकर भुवन का म्पर्श करने वाला है तथा सुवर्णाचल के कणिका वाला है ॥२३॥ वहां पर स्थित महामाया का एकाग्र मन वाला होकर ध्यान करे । वह महामाया शोण पद्म के सदृश है और उसके केश खुले हुये रहकर लटके हुए हैं ॥२४॥ वह चलत्काजमा पर समारूढ है तथा उज्ज्वल कुण्डलो की शोभा वाली है । सुवर्ण और रत्नों से सम्पन्न दो किरीटो के धारण करने वाली हैं। ॥२॥ शुक्ल-कृष्ण और अरुण वर्णों वाले तीन नेत्रों के द्वारा बहुत ही सुन्दर विभूषित है । सन्ध्या कालीन चन्द्र के तुल्य पोलो से सयुत हैं और उन के लोचन चचत हैं ॥२६॥ पदर हित दाडिम के बीजो के समान दातो के रखने वाली सुन्दर भौंहो मे योग से उज्ज्वल- वन्धूक दन्त के वसनो वाली-शिरीप को प्रभा से युक्त नासिका से सयुत- कम्बू के सदृश ग्रीवा वाली-विशाल नेत्रो से युक्त-करोडो सूर्यो की प्रभा से समन्वित चार भुजाओ वाली-दिवसना और वीन तथा उन्नत पयोघरो से शोभित-निस्त्रिशत्पर ऊध्वं दक्षिण कर के द्वार सिद्ध मूत्र को धारण करने वाली और वाम हाथो से अभयदान तथा वरदान को धारण करने वाली निम्न मर्याद गम्भीर नाभि क्रम से आयात-क्षीण मध्यभाग वाली~-मनोहर-आनमित नाग पाशो के सदृश करओ से युक्त-गुप्त गुल्फो वाली सुन्दर पार्णियो से संयुत-बद्ध पर्यङ्क सङ्कल्प

१८८
[वालिया पुराण
ये परा स्थान पर हैं विन्दु और अर्ध चन्द्र के महित इनसे शेप-दाह
तथा उच्छद-पर पीयूप का आसेवन यथाक्रम से परना चाहिये ।
विशुद्धि के लिये चिन्तन मात्र ही है । इसके अनन्तर देवी के वीज के
द्वारा जाम्बूनद की आकृति वाले अण्ड का करे ॥१७॥१८॥ वहाँ पर
पहुँचकर ॐ ह्री श्री मन्त्री से द्विधा करना चाहिये । उनके ऊर्व भागी
मे हृद्-लोक स्वर्ग को भूमि तथा आकाश का निष्पादन करके शेष
भाग से भू को पाताल के जल मे चिन्तन करे। वहाँ पर सबका चिन्तन
करना चाहिए । सातो द्वीपों का और मेदिनी का चिन्तन परे। उनमें
उन सागरो का और स्वर्ण द्वीप का चिन्तन करना चाहिए। उसके
मध्य मे रत्नो से निर्मित मण्डप मे सस्थित रत्न पर्यत का चिन्तन
करे ॥१६--२१॥
आकाशगङ्गानीयोघे सदैव सेवित शुभम् ।
तत्पर्यके रक्तपद्म प्रसन्नं सर्वदाशिवम् ॥२२
चिन्तयेत् स्वर्णमानाकं सप्तपातालनालकम् ।
साब्रह्म भुवनस्पशि सुवर्णाचतवणिकम् ।।२३
तत्रस्थिता महामाया घ्यायेदेकाग्रमानस ।
शोणपद्मप्रतीकाशा मुक्तमूर्धजलम्विनी ।।२४
चलत्काञ्चनामरुह्य कुण्डलोज्ज्वलशालिनीम ।
सुवर्णरत्नसम्पन्न किरीटद्वयधारिणीम् ।।२५
शुक्लकृष्णारुगर्नेत्रस्त्रिभिश्चारुविभूषिताम् ।
मन्ध्याचन्द्रसमप्रख्य-कपोला लोललोचनाम् ।।२६
विपकदाडिमोवीजदान्तात् सुभूयोगोज्ज्वलाम् ।
वन्धूकदन्तवसना शिरीपप्रभनासिकाम् ।।२७
कम्बुग्रोवा विशालाक्षी सूर्यकोटिसमप्रभाम् ।
चतुर्भुजां विवसना पोनोनसपयोधराम् ॥२८
दक्षिणोन निस्त्रिशत्परेण सिद्धसूत्रकम् ।

महामाया कल्प वर्णन (१) ) १८६ विभ्रती वामहस्ताभ्यामभीति वरदायिनीम् ॥२६ निम्ननाभिक्रमायातां क्षीणमध्यां मनोहराम् । आनमन्नागपाशोरू-गुप्तगुल्फा सुपाणिकाम् ।।३० वद्धपर्यसंकल्पा निवौरासनराजिताम् । गात्रेण रत्नसंस्तम्भं सम्यगालम्व्य संस्थिताम् ॥३१ आकाश गङ्गा के जल को राशि से सदा ही सेवित वह शभ है । उस पयंत्र पर रक्त पदम है जो प्रसन्न और सर्वदा शिव है ॥२२॥ उसका ऐसा चिन्तन करे कि वह स्वर्ण मानाङ्क है-~सत पातालो का नाल वाला है---ब्रह्म लोक से लेकर भुवन का म्पर्श करने वाला है तथा सुवर्णावल के कणिका वाला है ॥२३॥ वहां पर स्थित महामाया का एकाप मन वाला होकर ध्यान करे। वह महामाया शोण पद्म के सदृश है और उसके केश खुले हुये रहकर लटके हुए हैं ॥२४॥ वह चलत्कांजमा पर समारूढ है तथा उजावल कुण्डलो की शोभा वाली है। सुवर्ण और रलो से सम्पन्न दो किरीटो के धारण करने वाली हैं। ॥२५॥ शुक्ल-कृष्ण और अरुण वर्णों वाले तीन नेत्रो के द्वारा बहुत हो सुन्दर विभूपिन है । सन्ध्या कालोन चन्द्र के तुल्य कपोलो से सयुत हैं और उन के लोचन चचल हैं ॥२६॥ पङ्कर हित दाडिम के वीजी के समान दातो के रखने वाली-सुन्दर भौंहो से योग से उज्ज्वल- वन्धूक दन्त के वसनों वाली-शिरीप की प्रभा से युक्त नासिका से सयुत- कम्बू के सदृश ग्रीवा वाली-विशाल नेत्रो से युक्त-करोडो मूों की प्रमा से समन्वित-चार भुजाओ वाली-विवसना और चीन तथा उन्नत पयोधरो से शोभितनिस्त्रिशत्पर अवं दक्षिण कर के द्वार, सिद्ध मूत्र को धारण करने वाली और वाम हाथो से अभयदान तथा वरदान को धारण करने वाली निम्न अर्थात् गम्भीर नाभि क्रम से आयात-क्षीण मध्यभाग वाली-मनोहर-आनमित नाग पाशो के सदृश करुयों से युक्त-गुप्त गुल्फो वाली-सुन्दर पाणियों से संयुत-बद्ध पर्पङ्क सङ्कल्प

शिलिस पुराण
वाली-नीवीरासन से राजित-गात्र से रत्न सस्तम्म यो मली मोति
आलम्बन करके मस्थिता ॥२७-३१॥
किमिच्छसीति वचनं व्याहरन्ती मुहुर्मुहुः ।
पञ्चाननां पुर.संस्थं निरीक्षन्ती सुवाहनाम्॥३२
मुक्तावली स्वर्णरत्नहारकङ्कणादिभिः ।
सर्वरलङ्कारगणरुज्ज्वला सस्मिताननाम् ॥३३
सूर्यकोटिप्रतीकाशा सर्वलक्षणसंयुताम् ।
नवयौवनसम्पन्नां तथा सर्वाङ्गमुन्दरीम् ।।३४
ईदृशीमम्बिका ध्यात्वा नमः फडिति मस्तके।
स्वकीये प्रथमं दद्यात् सोऽहमेव विचिन्त्य च ॥३५
बारम्वार क्या चाहते हो -इस तरह से वोलती हुई-पांच
आननो वाली-पुरः स्थित का निरीक्षण करती हुई~~सुन्दर वाहन
वाली-मुक्ता वली, स्वर्ण, रत्न हार और किङ्किणी आदि से समस्त
आभूषणो के समूहो से उज्ज्वल-स्मित सहित मुख वाली-करोडो
सूर्यों के सहश-समस्त सुलक्षणो से समन्वित-नूतन यौवन से सम्पन्न--
तथा सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गो से सुन्दरी-ऐसी अम्विका देवी का ध्यान
करके "नम फट"-इस मन्त्र से स्वकीय मस्तक में मैं वही हूँ-ऐसा
चिन्तन करके प्रथम देवे ॥३२-३५||
अङ्गन्यासकन्यासी ततः कुर्यात् क्रमेण च ।
एभिर्मन्त्र: स्वर. सह सुमीसूमै क्रमान्वित. ॥३६
ओम् क्षौम् चंते सप्रशवा रक्तवर्णा मनोहराम् ।
अड गुष्ठादिकनिष्ठान्तमग्नसवेष्टन फट् ॥३७
प्रान्तेन कुर्याद् विन्यासं पूर्व करतलद्वये ।
हृच्छिर.शिखाकवचनेत्रेषु क्रमतो न्यसेत् ।।३८
ततस्तु मूलमन्त्रस्य वक्त्रे पृष्ठे तथोदरे।
वाह्वोर्गुह्ये पादयोश्च जंघयोजघने क्रमात् ॥३६

महामाया कल्प वर्णन (२)] १८१ घिन्यसेदक्षराण्यप्टौ ओकारं च तथा स्मरन् । एभिः प्रकाररतिशुद्धदेहः पूजा सदैवाहंति नान्यथा हि। शरीरशुद्धि मनसो निवेश भूतप्रसारं कुरुते नृणा तत् ॥४० इसके अनन्तर अगों का न्यास और करो का ग्यास कम से करना चाहिए। और वह मूमी मूम क्रियान्विनो के स्वरो के सहित इन मन्त्रो से करना चाहिये । ओम् क्षौम् ये मन्त्र हैं। प्रणव के सहित- रक्स वर्ण से सयुत-मनोहर को अगुष्ठ से आदि लेकर कनिष्ठिका के अन्त तक मन्त्र सवैप्टन फट् प्रान्त से पूर्व मे दोनो करतलो में विन्यास करना चाहिये । फिर हृदय-शिर-शिखा--कवच-नेत्र-इनमे क्रम से न्यास करे ।।३६-३८।। इसके अनन्तर मूल मन्त्र का मुख मे- पृष्ठ मे~-उदर मे-दोनो वाहुओ मे-गुह्य मे-दोनो पादो मे- दोनो जांघो में क्रम से आठ अक्षरो का विन्यास करे । तथा मोकार का स्मरण करता रहे। इन्ही पुकारों से अत्यन्त शुद्ध देह वाला होकर पूजा सदा ही उचित होती है। अन्य प्रकार से उचित नहीं होती है। यह शरीर की शुद्धि-मनका निवेश-भूतो का प्रसार मनुष्यों का किया करती हैं ॥३६॥४०॥ ॥ महामाया कल्प वर्णन(२)। ततोऽपा तन्मत्रमप्टधाकृत्य सजपेत् । तेन तोयानि पुष्पाणि स्वं मंडलमथासनम् ॥१ आशोधयेत् ततः पश्चात् पूजोपकरण समम् । ॐ ऐं ह्री हौमिति मन्त्रेण शब्दप्रांशुविवर्जितम् ।।२ द्वारपालं ततो देव्या आसनानि च पूजयेत् । नन्दिभृङ्गिमहाकालगणेशा द्वारपालकाः ।

१६२ [ कालिका पुराण - उत्तरादिक्रमात् पूज्या आसनानि च मध्यतः ॥३ आधारशक्तिप्रभृयि हेमान्तान् प्रपूजयेत् । प्रसिद्धान सर्वतन्त्रेषु पूजाकल्पेषु भैरव ॥४ दशदिक्पालसहितानृ धर्माधर्मादिकांस्तथा । मण्डलाग्न्यादिकोणेषु पूजयेत् पार्श्व देशतः ।।५ सूर्याग्निसोममरुता मण्डलानि च पद्मकम् । रजस्तथा तमः सत्तः सत्त्वं योगपीठ गुरो. परम् ।।६ सारादीन् भद्रपीठान्तान् सांगोपांगान् प्रपूजयेत् । । ब्रह्माण्ड स्वर्णडिम्ब च ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् ॥७ भगवान् ने कहा--इसके उपरान्न अर्धपात्र मे उस मन्त्र को आठ भागो में विभक्त करके भली भांति जप करे। उससे जलको- पुष्पो को-अपने मण्डल को-आमन को आशोधित करे इसके पीछे पूजा के उपकरणो का सम करें। ओ ऐं ह्री होम्-इस मन्त्र के द्वारा शन्द प्राशु विवर्जित द्वारपाल दो और फिर देवी के आसनो का पूजन करना चाहिये । नन्दि-भृङ्गि- -मद्य काल गणेश-द्वारपाल का उत्तर आदि क्रम से पूजन करने के योग्य है और मध्य मे आसक्त प्रपू के योग्य हैं ॥ १-३॥ आधार शक्ति आदि हे भैरव ! पूजा कल्पो में समस्त तन्त्रो मे प्रसिद्ध हेमाद्र यत्रो का पूजन करे ॥४॥ दश दिक्पालो के सहित घर्मा धर्मादिको को मण्डल के अग्नि आदि कोणो मे पार्वदेश से यजन करना चाहिए ।। ५।। सूर्य--अग्नि -सोम --मरुत्-इनके मण्डलो को-पद्मक को-रज-सत्व--तम को-योग पीठ को- गुरुदेव के परण को नार से आदि लेकर भद पीठ के अन्त तक साङ्गो. पागों को पूजित करे-ब्रह्माण्ड-स्वर्ण डिम्ब और ब्रह्मा, विष्णु, महे- भरों का पूजन करे।६-७। संसागरान सप्तद्वोपान् स्वर्णद्वीपं समण्डपम् । रत्नपद्म सपर्या रत्नस्तम्भं तथैव च ८ ।

महामाया कल्प वर्णन (२) ]
१६३
पचानन मण्डलस्य मध्येऽवश्य प्रपूजयेत् ।
ह्री मन्त्रेण तत कूर्मपृष्ठ पाण्योनिवध्य च ॥
ध्यायेच्च पूर्ववद् देवीमासाद्यासनमुत्तमम् ।
हत्यध्ये चिन्तयेत् स्वर्णद्वीपं पर्यवसभृतम् ॥१०
पश्यन्निव ततो देवीमेकाग्रमनसा स्मरेत् ।
प्रत्यक्षीकृत्य हदये मानसैरुपचारकै ॥११
पोडशाना प्रकारस्तु हदिस्था पूजयेच्छिवाम् ।
तनस्तु वायुवीजन दक्षिणे च पुटेन च ॥१२
नासिकाया विनि सार्य श्री मन्त्रेण च भैरव ।
स्थापयेत् पद्ममध्ये तु तद्धस्त न वियोजयेत् ॥१३
कृते वियोगे हस्तस्य पुप्पात् तस्साच्च भैरव ।
गन्धर्व, पूज्यते देवी पूजकं प्यते फलम् ॥१४
सागरो के सहित सातो द्वीपो का--मण्डल के सहित स्वर्ग द्वीप
का-रत्नमय-पर्यत के सहित रल स्तम्भ मण्डप के पञ्चानन का
मध्य में अबश्य पूजन करे। "हो" मन्द स पाणियो को निवद करके
कूर्मपृष्ठ का यनन करे और पूर्व की ही भाति उत्तम आसन को प्राप्त
करके देवी का ध्यान करना चाहिए। हृदय के मध्य म पयङ्क से समत
स्वर्ण द्वीप का चिन्तन करे ॥८-१०॥ इसक अनन्तर देखते हुए दी
भौति एकान मन से देवी का स्मरण करे । हृदय में प्रत्यक्ष करके मानस
उपचारो से अर्थात् मन मे कल्पित उपचारो के द्वारा सोलह प्रकारो से
हृदय में विराजमान देवी शिवा का यजन करना चाहिए। इसके अन.
न्तर हे भैरव । वायु वीज के द्वारा दक्षिण पुट से क्ली मन्त्र के द्वारा
नासिका से विनि सारण करके पद्म के मध्य म स्थापित करे और हाथ
को नियोजित न करे ।। ११-१३ ॥ हे भर ! हाथ के वियोग करने
पर उस पुष्प से गन्धवों के द्वारा देवी का पूजन किया जाता है और
पूजको के द्वारा फल की प्राप्ति नहीं की जाती है ।।१४॥

। कालिका पुराण आवाहन ततः कुर्याद् गायत्र्या शिरसा सह । महामायायै विद्महे त्वा चण्डिकाख्या धीमहि ।।१५ एतदुक्त्वा ततः पश्चाद् धियो यो न. प्रचोदयात् । स्नानीय देवि ते तुभ्य ॐ ह्री श्री नम इत्यत ।।१६ स्नानीय च ततो देव्यं दद्यादल्लक्षणलक्षितम् । ततस्तु मूलमन्त्रेण गन्धपुष्प सदीपकम् ॥१७ धूपादिक प्रदद्यातु मोदक पायस तथा। सिता गुइ दधि-क्षीर सपिर्नानाविधं ॥१८ रक्तपुष्ण पुप्पमाला सुवर्णरजादिकम् । नंवेद्यमुत्तम देव्या लागल मोदक सिताम् ॥१६ शाण्डिल्यकरताम्राख्य-कूप्माण्डाना फलानि च । हरीतकीफल चापि नागरङ्गकमेलकाम ।।२० वाल प्रिय च यद् द्रव्य कसेरुकविसादिकम् । तोय च नारिकेलस्य देव्यं देय प्रयत्नत ॥२१ इगवे उपरान्त शिर के माथ गायत्री मन्त्र के द्वारा आवाहन परना चाहिए। हम महामाया का ज्ञान रखते हैं और चण्डिरा नाम वासी का ध्यान करते हैं ।। १५ ।। इतना पहार फिर जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे। हे देवि ! आपरे लिये " *ही श्री नमः से देवी बेलि मे स्नानीय पा समर्पण परे जो लक्षण लक्षित होवे । इराके अनन्तर मूल मन्त्र में दीपद के महित गन्ध-पुष्प-धूप आदि पो अर्पण करे तथा मादव तथा पायरा देवे । मिश्री-भुज- दधि-धीर पृत योर अनेर फलों में यजन करना पाहिए । अर्थात इनको अपित घरमा पाहिए ॥ १६-१६॥ रक्त पुण- पुप्पी पी माला-गुवर्ण और रजत (पादी) आदिक--उत्तम नेप-देश का पाङ्गन-मोदन-गिता (मिधी) मारिय कर ताप्रमामय औरमाण पम-सीता पस-मारली-एममा " महामाया पल्प वर्णन(२) ] ( इलायची ) और जो द्रव्य वाल प्रिय हासेरू कविसादिक- नारियल फल का जल-~य सब देवी के लिए प्रयत्नपूर्वक समपित कर ॥१६-२१॥ रक्न कौशेयवस्त्र च देय नील कदापि न । देव्या प्रियाणि पुष्पाणि वकुला केशर तथा ॥२२ माध्य कलारववाणि करवीरकुरुष्टकान । अपुष्प शाल्मलक दूर्वाड कुर सुकोमलम् ॥२३ कुशञ्जरिका दर्भा वन्धूक्कमले तथा । मालूरपत्र पुष्प च त्रिसन्ध्यारक्तपर्णके ।।२४ सुमनासि प्रियाण्येतान्यम्विकयाश्च भैरव । वन्धूक वकुन माध्य विल्वपत्राणि सन्ध्यकम् ।।२५ उत्तम सदपुप्पेषु द्रव्य पायसमोदको । माल्य वन्धकपुप्पस्य शिवायं वकुलम्य वा ॥२६ करवीरस्य माध्यस्य सहस्राणा ददाति य । स कामान् प्राप्य चाभीप्टान् मम लोके प्रमोदते ॥२७ चन्दन शीतल चंव कालीयकसमन्वितम् । अनुलेपनमुख्य तु देव्यै दद्यान् प्रयत्नत ॥२८ लाल वण का कौशेय वस्त्र अर्यात रेशमी वस्त्र समपित करे और नीला वस्त्र कभी भी नहीं दव । देवी के परम प्रिय पुष्प देव । जैस वकुल पुष्प और फशर देव । माध्य-कल्हार--- वजू- करवीर-कुटङ्क-आक के पुष्प-शाल्मलक-सुकोमल दूर्वा के अकुर कुश मञ्जरिका-दर्भ---वन्धूक-कमल-मालूद पन और पुष्प-त्रिमन्ध्या-रक्त पणक हे भैरव । अम्बिका देवी के ये पुष्य परम प्रिय होत हैं । वधूक-बकुल-माध्य-विल्व पत्र और सनव्यक य सभी पुष्पा में उत्तम हैं और पायस तथा मोदक द्रव्य हैं। वधूक के पुष्पा को अथवा वकुल के पुष्पा की माला-करवीर १६६ [ कालिका पुराण और माध्य पुष्पा की एक महत्र संख्या जो देवी को अर्पित रिया करता है। देवी का रथन है कि वह अपने अभीष्ट वामनाओ की प्राप्ति कर मेरे लोक में आनन्द प्राप्त किया करता है ॥२२-२७॥ शीतल चन्दन जो कालीयक से सयुत होवे मुख्य अनुलेपन प्रयत्नपूर्वक देवी के लिये देना चाहिए ।। २८॥ कपूर कुङ्कम कूर्च मृगनाभि सुगन्धिकम् । कालीयक सुगन्धेषु देव्या प्रीतिकर परम् ।।२६ यक्षधृप प्रतीवाह पिण्डधूप सगोलक । अगुरु सिन्धुवारश्च धृपा प्रीतिकरा मता ॥३० अगरागेषु सिन्दूर देव्या प्रोतिकर परम् । सुगन्धि शालिर्ज चान्न मधुमाससमन्वितम् ॥३१ अपुप पायस क्षीरमन्न देव्या प्रशस्यते । रत्नोदक मक' र पिण्डीतककुमारको ।।३२ रोचन पुष्पक देव्या स्नानीय परिकीर्तितम् । घृतप्रदीपो दीपेषु प्रशस्त परिकीर्तित ॥३३ पुष्पाञ्जलिनय दद्याद मूलमन्त्रैण शोभनम् । दत्त्वोपचारानखिलान्जध्ये चैता प्रपूजयेत् ॥३४ कामेश्वरी गुप्तदुर्गा विन्ध्यकन्दरवामिनीम् । कोटेश्चरी दीघियाय्या प्रकटी भुवनेश्वरीम् ॥३५ कपूर-युम---मृगनाभि अर्थात् वस्तूरी- सुगन्धिक पालीयक म सुगन्धों मे देषो को परम प्रीति के करने वाले होते हैं । 1२६ । यक्षधूप-प्रतीवाह-पिण्डधूप-सगोलक-अगरु--और सिन्धु- वार में धप देवी की प्रीति करने वाले माने गये हैं। ३० । अजराग जितने भी हैं उनमे देवी या परमाधिव प्रीति करने वाला सिन्दूर है । मधु और मास से मंयुन गुणन्धित शाली में समुत्पन्न अन्न-अधूप- पामरा~ीर ये पदार्थ देवी के लिये प्रशस्त हुआ करते हैं। मपूर ने महामाया कल्प वर्णन (२) ] १६७ सहिन रत्नोदक–पिण्डीतर-कुमारक रोचन-पुष्पक-ये ही देवी के स्नानीय कहे गये हैं । दीपो म घृत का दीपक प्रशस्त कहा गया है ॥३१-३३॥ मूल मन्त्र के द्वारा तीन पुष्पाञ्जलि देनी चाहिए- यही प्रोमन है। मव उपचारो को देवर मध्य म इनका पूजन करना चाहिए ।३४। अब उन देविया के नाम बतलाये जाते हैं --कामेश्वरी- गुप्त दुर्गा-विन्ध्याचल की कन्दरा म निवाम करने वाली–कोटेश्वरी दीपिका नाम वाली-प्रक्टी-भुवनेश्वरी ।३५॥ आकाशगगा कामाख्या यदा दिक्करवासिनीम् । मातङ्गी ललिता दुर्गा भैरवी सिद्धिदा तथा ॥३६ वलप्रमथिनी चण्डी चण्डोना चण्डनायिकाम् । भीमा शिवा शान्ता जयन्ती कालिका तथा ॥३७ मङ्गला भद्रकाली च शिवा धात्री कपालिनीम् । स्वाहा स्वधामपर्णा च पचपुष्करिणी तथा ॥३८ दमनी सर्वभूताना मन प्रोत्साहकारिणीम् । दमनी सर्वभूताना चतु पष्टिं च योगिनी ॥३६ एता सम्पूज्य मध्ये तु मन्त्रणागानि पूजयेत् । हृच्छिरस्तु शिखावर्मनेत्रबाहुपदानि च ॥४० मूलमन्त्राद्यक्षरंस्तु विभिरायगपूजनम् । एकक वर्द्धयेत् पश्चान्मन्त्राण्यगौघपूजने ॥४१ आकाश गङ्गा–वामाख्या-दिक्कदवासिनी मातङ्गी- ललिता दुर्गा-भैरवी-सिद्धिदा-वल प्रमथनी-चण्डी–चण्डोग्रा-मण्डना- भिका -उना--भीमा-शिवा--शान्ता–जयन्ती–कालिका-मङ्गला- भद्रकाली-शिवा-धात्री--कपालिनी-स्वाहा- -स्वधामपर्णा–पञ्च- पुष्करिणी-सक भूतो की दमनी-मन के प्रोत्साह के करने वाली- मर्वभूताना दमभी--ये चौसठ योगिनी हैं ।। ३६~~३६ ॥ इन सवका १६८ [ कालिका पुराण मध्य मे भली भांति अभ्यचंन करके मन के द्वारा अङ्गो वा यजन करना चाहिए । हृदय-शिर-शिखा-यम-नेत्र-वाहु-पद-इन अगो का यजन करे । तीन मूल मन्त्र के अक्षरो से आदि अग का पूजन करे। पीछ एक-एक का वर्धन करना चाहिए। अगो के समूह के पूजन मे मत्रो का प्रयोग करे ॥४०.४१॥ सिद्धसूत्र च खड्ग च खड्गमन्त्रेण पूजयेत् । ततोऽप्टपत्रमध्ये तु पूजयेदष्टयोगिनी ॥४२ शैलपुत्री चण्डघण्टा स्कन्दमातरमेव च । कालरात्रि च पूर्वादिचतुर्दिदक्षु प्रपूजयेत् ॥४३ चण्डिकामथ कृष्माण्डी तथा कात्यायनी शुभाम् । महागौरी चाग्निकोणे नैऋत्योदिपु पूजयेत् ॥४४ महामाया क्षमस्वेति मूलमन्त्रेण चाष्टधा। पूजयेत् पद्ममध्ये तु वलिदान तत परम् ।।४५ एव यदा कल्पविधानमाने सम्पूज्यते भैरव कामदेवी। तदा स्वय मण्डलमेत्य देय गृह्णाति काम च ददाति सम्यक ॥४६ सिद्ध मत्र और पङ्ग वा मूल मन्य के दाग यजन करे। इसके अनन्तर अष्ट पत्र के मध्य में आठ योगिनियो का पूजन करना चाहिए ।। ४२ । पूर्व आदि चारो दिशाओ मे शैल पुमो-चन्द्र घण्टा-वन्द माता ओर काल रात्रि का पूजन करना चाहिए ॥४२-४३॥ चाडिका- पष्माण्डी-पात्यायनी-शुभा-महागौरी इनवा अग्निकोण में और नेत्यादिर में पूजन परे ॥४४॥ महामाया-क्षमस्व-इस मूल मन्न मे आठ प्रकार मे पदम पे मध्य में पूजन परे । उगये आगे बलिदान परना चाहिए ॥४५॥ है भैरव । इग प्रबार मे जब करप मे विधान मानो गे कामदेवी पी पूजा की गाती है उग समय में रवय मल

महामाया कल्प वर्णन (३) ]
१EE
में ममागमन करके जो भी कुछ देय होता है उमका ग्रहण किया करती
है और कामना को भली भाति प्रदत्त क्यिा करती है ॥४६।।
॥ महामाया कल्प वर्णन ॥(३)
जप समारभेत् पश्चात् पर्ववद्ध्यानमास्थितः ।
हस्तेन स्रजमादाय चिन्तयन्मनमा शिवाम् ।
चिन्तयित्वा गुरु मूनि यथा वर्णादिकं भवेत् ।।१
मन्त्र च कण्ठतो ध्यात्वा सितवर्ण हिरण्मयम् ।
महामाया च हृदये आत्मान गुरुपादयो. ॥२
आचक्षेत ततः पश्चाद् गुरोमन्त्रम्य चात्मनः ।
देव्याश्चाप्येक्ता ध्यात्वा मुषुम्नावमना तत ॥३
तत्त्वस्वस्पमेकं तु पट्चक प्रति लम्वयेत् ।
पट्चक्रेऽपि महामाया क्षण ध्यात्वा प्रयत्नन ॥४
लम्बयेन्मूलमात्रण वादिपोडशचक्रकम् ।
आदिपोडशचनस्यां माधकानन्दकारिणीम् ॥५
चिन्तयन् साधको देवी जपकर्म समारभेत् ।
ध्रुवोस्परि नाडोना त्रयाणा प्रान्त उच्यते १६
इसके अनन्तर पूर्व की ही भांति ध्यान मे ममास्थित होकर जप
का ममारम्भ करना चाहिए । हाथ से माला का ग्रहण करके मन के
द्वारा शिवा का चिन्तन करे। गुरुदेव का चिन्तन करके मूर्धा मे जैसा
भी वर्ण आदि होवे मन्त्र को कण्ठ से ध्यान करके जो सित वर्ण
हिरण्मय है। और हृदय मे महामाया को और आत्मा को गुरुदेव के
परणो में देखें। इसके अनन्तर गुरु के मन्त्र का आत्मा का और देवी
की एकता का ध्यान करना चाहिये। फिर सुषुम्ना के मार्ग के द्वारा

२००
[ कालिका पुराण
एक तत्त्व स्वरूप को पट् चक्र की और लम्बित करे । उस पट्चक्न में
भी एक क्षण के लिये प्रयत्न पूर्वक महामाया का ध्यान करे ॥१-४॥
आदि मौलह चक्रो में स्थित-साधकों के आनन्द को करने वाली देवी
का चिन्तन करता हुआ साधन अपने कर्म का आरम्भ कर । भौहो के
ऊपर तीनो नाडियो का प्रान्त कहा जाता है ॥५-६॥
तत्प्रान्त विपथस्थान पटकोण चतुरड लम् ।
रक्तवर्ण
तु
योगज्ञराज्ञाचक्रमितीर्यते ॥७
कण्ठे त्रयाणा नाडोना वेष्टन विद्यते नृणान् ।
मुपुम्नेडापिगाना पटकोण तत्पडड्लम
तत् पट्चन मिति प्रोक्त शुक्ल कण्ठस्य मध्यगम ।
नयाणामथ नाडीना हृदय चकता भवेत् । ६
तत्स्थान पोडशार स्यात् सप्तागुलप्रमाणत ।
तत्प्रयुक्त तु योगरादिपोडशचन कम ॥१०
ध्यानानामथ मन्त्राणा चिन्तनस्य जपस्य च ।
यस्मादाद्य तु हृदय तस्मादादीति गद्यते ।।११
जपादौ पजयेन्माला तोयरभ्युयय यत्नत ।
निधाय मण्डलस्यान्त सव्यहस्तगता च वा ।।१२
ॐ माले माले महामाये सर्वशक्तिम्वरूपिणि ।।१३
चतुवर्गस्त्वयि न्यस्तम्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥१४
वर प्रान्त विषय का स्थान है वह पद पोण और चार अगुन
प्रमाग वाला है। उसका वण रया है और योग के शाताओ के द्वारा
पर आमा पक्र-इस नाम म कहा जाता है ॥७॥ मनुप्यो ये कण्ट म
तीन गाड़ियों का घेटन विद्यमान हुआ परता है। मुगुम्ना--हा और
पिगयाओपा परयोग है वह छ अङ्गना का होता है ||८|| यह कण्ठ
मध्य म स्थित शुफ्ष वर्ण वाला पद पर नाम गे यताया गया
है। मीना नाटियो पोदय म एप हा जाती है ॥६॥ यही स्थान

महामाया करप वर्णन (३) J २०१ - 1 सोलह आरो वाला होता है जिसका प्रमाण सात अगुल है। उसको योग के जानन वालो के द्वारा आदि पोडश-चक्र के नाम से प्रयोग किया गया है ॥१०॥ मन्त्रो के ध्यानो का चिन्तन का और जप का क्योकि आद्य हृदय होता है इसी कारण से वह आदि इस नाम से कहा जाता है ।।११। जप के आदि म यत्न म जल से अभ्युमण करके माला का पूजन करना चाहिए मण्डन के अन्दर रखकर अथवा सव्य हम्त म रखकर करे ।।१२।। ओ माल हमाल आप महामाया है और सव शक्तियो के स्वरूप वाली हैं। धर्मार्थ काम मोक्ष य चारो का वर्ग आप म ही न्यस्त रहता है । इस कारण से मेरी सिद्धि को प्रदान करन वाली हो जाभा ॥१३-१४॥ पजयित्वा ततो माला गृह्णीयाद् दक्षिणे करे । मध्यमाया मध्यभागे वर्जयित्वाय तर्जनीम ।।१५ अनामिकानिष्टाम्या युताया नम्रभागत । स्थापयित्वा तत्र मालामगुष्ठाग्रेण तद्गतम् ।।१६ प्रत्येक वीजमादाय जप्यादधन भैरव । प्रतिवार पठेन्मन्त्र शनरोप्ठ च चालयेत् ।।१७ मालादीज तु जप्तव्य स्पन्नहि परम्परम, । पूर्वजापप्रयुक्तेन नवागुप्ठेन भैरव ॥१८ पूर्ववीज जपन् यस्तु परवीज च सस्पृशेत् । अगुप्ठन भवेत् तस्य निष्फलस्नस्य तज्जप ।।१६ माला स्वहदयासन्ने धृत्वा दक्षिणपाणिना । देवी विचिन्तयन् जप्य कुर्याद् वामेन न स्पृशेत ॥२० म्पटिकेन्द्राक्षरुद्राक्ष पुत्रजीवसमुद्व । मुवर्णमणिभि सम्यक् प्रवालरथवाजज ॥२१ अक्षमाला तु पर्तव्या देवीप्रीतिकरी परा। जपेदुपाशु सतत कुशमन्थ्याथ पाणिना ॥२२ २०२ [ पालिया पुराण इसके अनन्तर माला वा अभ्यर्चन करके अपने दाहिने हाथ में उसका ग्रहण करना चाहिए। मध्यमा म गुलि के मध्य भाग म उसको रक्खे और तजनी अगुलि को वर्जित कर देना चाहिय । जप काल में तजनी अ गुलि को मर्वया दूर ही रक्ख्ने । अनामिका और पनिष्ठिका अ गुलियो से युत के अग्र भाग से वहाँ पर स्थापित करके अगुष्ठ के अग्र भाग के द्वारा माला को रक्खे और उममे स्थित प्रत्येक बीज (मनिया) को लेकर हे भैरव । अर्थ से जप करना चाहिए। प्रत्येक वार मे मन्त्र को पढे और धीरे २ आष्ठ को चालित करे ॥१५-१७॥ मानी के धीज (मनिया) पर जप करना चाहिए। ये मनिया परस्पर में स्पर्श नही करे --- ऐसा ध्यान रखे । हे भैरव । पूर्व के जाप में प्रयुक्त अ गुष्ठ से स्पण नहीं होना चाहिए ॥१८॥ जो पूर्व पीज का जप करता हुआ पर वीज का सम्पर्श करना है और अगुष्ठ से उसका स्पर्श होता है उसका वह जप सवथा निष्फल हो जाया करता है ॥१३॥ दाहिने हाथ से माला को धारण करके अपने हृदय के समीप में रक्खे । देवी का चिलन करते हुए ही जप करना चाहिय और वाये हाथ से उसका कभी भी स्पर्श नहीं करे ॥२०॥ माना की रचना स्फटिक इन्द्राक्ष- रद्राक्ष पुषज्जीव से समुत्पन्न सुवण और माणया के तथा प्रयाल के अथवा कमल गहो के द्वारा भली भांति अक्षा की माला की रचना करे। यह देवी की परम प्रीति की करने वाली हुआ करती है । कुश ग्रन्धि से हाथ के द्वारा निरन्तर उपाशु जाप करना चाहिए ॥२१-२२॥ मालावीजेषु सर्वेषु रद्राक्षो मत्प्रियाप्रिय । ग्द्रप्रीतिकरी यम्मात् तेन रद्राक्षरोचनी ।।२३ प्रवालरथवा कुर्यादष्टाविंशतिवीगर्व । पचपचाशता वापि न न्यूनरधिकंश्च वा । २४ रुद्राक्षयदि जप्येत इन्द्राक्ष स्फटियाथा। नान्य मध्ये प्रयोक्तव्य पुतन्जीवादिर च यत् ।।२५ महामाया कल्प वर्णन (३)] २०३ यद्यन्यत् तु प्रयुज्येत मालाया जपमणि । तस्य काम च मोक्ष च ददानि न प्रियत्नरा २६ मिथीभाव ततो याति चाण्डाल पापकर्मभि । जन्मान्तरे जायते स वेदवेदाङ्गपारग ।।२७ एको मेरुस्तन देय सर्वेभ्य स्थलसम्मव । आद्य स्यूल ततस्तस्माद न्यून न्यूनतर तथा ॥२८ माला के ममस्त वीजो मे रुद्राक्ष मेरी प्रिया का अप्रिय क्योकि यह ग्द्र देव की प्रीति के करने वाली है इसी में रुद्राक्ष रोचनी है ।२३। अथवा प्रवाती मे माता की रचना करे जिमम यट्ठाईम मनिया हावें । अथवा पांच पांच मो मे करे । पयवा इमसे न्यून हो अथवा अधिक हो ऐमा नहीं परे ॥२४॥ यदि द्राक्षो के द्वार--इन्द्राक्षो से तया म्पटिको मे जाप करे किन्तु मध्य म पुत्र जीव यादि अन्य का प्रयोग नही करना चाहिए ॥२५॥ यदि जप के कर्म मे माला में अन्य का प्रयोग परे उमको काम और मोक्ष को प्रियङ्कारो नही दिया करती है ॥२॥ फिर पाप कर्मों के करने वाले भाण्डालो मे मित्री भाव कोप्राप्त हो जाया करती है। वह वेदो और वेदो के अङ्ग शास्त्री का पारगामी अन्य जन्म म होता है ।।२७।। मव मनियो रे म्यूल बना हुआ एर मेर माला में देना चाहिए। सबमे आदि महोन वाला मनिया स्यू न होना चाहिए और क्रम से न्यून तथा उममे भी न्यून होना चाहिए ॥२८॥ विन्यमेत मनस्नम्मात मारा हि मा यत । ब्रह्मपन्यियुत कुर्यात प्रतिबीज यथास्थितम् ॥२६ अथवा अन्यिरहित दृढर गुगमन्वितम् । द्विरावृत्याय मध्यन चाधंवृन्यानदेशत 1120 अन्य प्रदक्षिणावतं म ब्रह्मग्रन्धिमनय । आत्मना योजयेन्माना नामन्यो योजनेवर ॥३१ २०२ [ कालिका पुराण अ इसके अनन्तर माला का अभ्यर्षन पर अपने दाहिने हाथ म उसवा ग्रहण करना चाहिए। मध्यमा अगुलि के मध्य भाग में उसको रक्खे और तर्जनी अगुल वो वजित कर देना चाहिये । जप काल में तर्जनी अगुलि को सवया दूर ही रक्खे । अनामिका और पनिष्ठिका अ गुलियो से युत के अग्र भाग से वहां पर स्थापित करणे अ गुठ के अग्रे भाग के द्वारा गला को रक्खे और उसमे स्थित प्रत्येक वीज (मनिया) को लेकर हे भैरव । अर्थ से जप करना चाहिए । प्रत्येक वार म मात्र को पढे और धीरे २ ओष्ठ को चालित करे ॥१५-१७॥ माली के धीज (मनिया) पर जप करना चाहिए । ये मनिया परस्पर मे स्पर्श नहीं करे-ऐमा ध्यान रखे । हे भैरव । पूर्व के जाप में प्रयुक्त गुष्ठ से स्पश नही होना चाहिए ॥१८॥ जो पूर्व पीन का जप करता हुआ पर वीज का मस्पर्श करता है और अगुप्ठ मे उसका स्पर्श होता है उसका वह जप सवथा निष्फल हो जाया करता है ॥१६॥ दाहिने हाय से माला रा धारण कर अपन हृदय के समीप म रक्षे । देवी या चिलन परत हुए ही जप करना चाहिय और वाये हाथ स उसका पभो भी स्पश नही कर ॥२०॥ माना की रचना स्फटिक इन्द्राक्ष ग्द्राक्ष-पुप्रज्जीव से समुत्पन्न सुवण और माणया वे तथा प्रवाल के अयया यमस गहा के द्वारा भलो भाति अक्षा की माला की रचना करे। यह दवो को परम प्रीति की वरन वाली हुआ करती है । कुश पन्धि स हाप प द्वारा निरन्तर उपाशु जाप करना चाहिए ॥२१-२२॥ मालावीजपु सर्वप रद्राक्षो मत्प्रियाप्रिय । ग्दप्रीतिपरी यम्मात् तेन रद्राक्षरोचनी ॥२३ प्रवालग्यवा कुर्यादष्टाविंशतियोग। पचपचामना वापि न न्यूनरधिवश्व वा । २४ महाभयदि जयेन्द्राक्ष म्फटिकसाया। मान्य मध्ये प्रयोक्तव्यं गाजीवादिक प यन् ॥२५ महामाया पल्प वर्णन (6) ] २०३ यद्यन्यन् तु प्रयुज्येन मालाया जपकर्मणि । तस्य काम च मोक्ष च दहानि न प्रियनर ॥२६ मिधीनाव ततो यानि चाण्डाल पापकर्मभि । जन्मान्नरे जायते स वेदवेदाङ्गपारग ॥२७ एको मेरुस्तन देय सर्वेभ्य न्यूलसम्भव । आद्य म्यूल ततस्तस्माद न्यून न्यूनतर तथा ॥२८ माला के ममस्त वीना म रुद्राक्ष मेरी प्रिया का अप्रिय क्योंकि वह द्र देव की प्रीति के करन वाली है इमी म रुद्राक्ष रोचनी है ।२३। जयदा प्रवाती में माना की रचना करें निमम बटाईम मनिया हा। अपदा पांच पांच मो मे करे। अयवा इमने न्यून हो अथवा अधिक गेमा नहीं करे ॥२५॥ यदि द्राक्षों के द्वार--इन्द्राक्षों मे तया पत्रिका म जाप करे किन्तु मध्य म पुन जीव आदि अन्य का प्रयास नहीं करना चाहिए ॥२५॥ यदि जप के कर्म म माला में अन्य का प्रयोग करे उनको काम और मोक्ष को प्रियङ्कारो नहीं दिया करती है ॥२६॥ फिर पाप कर्मों के करन वाले चाण्डालों मे मियी भाव प्रात हो जाया करती है। वह वेदा और वदो के बङ्ग शास्त्री का पारगामी वन्य जन्म म होता है ॥२७॥ मव मनियों के स्यून बना हुआ एक मे माता म देना चाहिए। सबसे बादि महान वाला मनिया स्यूल होना चाहिए और क्रम स न्यून तथा उमन भी न्यून हाना चाहिए ॥२८॥ विन्यमेन मनस्लम्मात् नारा हि मा यत । ब्रह्मग्रन्यियुत कुर्यात प्रतिबीज यथास्थितम् ॥२६ अथवा ग्रन्यिरहित दृढरज्ममन्वितम् । द्विरावृत्याय मध्येन चार्घवृयान्नदेशत ३० ग्रन्यि प्रदक्षिणावर्त स ब्रह्मपन्विमनन । आत्मना योजयेन्माला नामन्त्रो योजनेतर ॥३१

२०४
[ कालिका पुराण
दृढ सूत्र नियुजीत जपे त्रुटयति नो यथा ।
यथा हस्तान्न च्यवेत जपत. स्रक् तमाचरेत् ॥३२
हस्तच्युताया विघ्न स्याच्छिन्नाया भरण भवेत् ।
एव य कुरुते माला जप च जपकोविद ॥३३
म त्राप्नोतीप्सित काम हीने स्यात् तु विपर्यय ।
अन्यत्रापि जपेन्माला जप्य देवमनोहरम् ॥३४
तादृश साधक कुर्यान्नान्यथा तु कदाचन ।
यथाशक्ति जप कुर्यात् सख्ययंव प्रयत्नत ॥३५
कम से विन्यास करे इसमे वह सर्प के आकार वाली हो जावे ।
प्रत्येय वीज अथवा मनिया को ब्रह्म ग्रन्यि से युक्त करे और यथा स्थित
रपये ॥२६॥ अथवा मान्य से रहित रवखे और दृढ द्वारे से समन्वित
यनावं । मध्य स दो आवृत्तियो के द्वारा और अन्य देश से अर्ध वृत्ति से
करे ॥३०॥ प्रदक्षिणा वर्त प्रन्यि होवे। वह ब्रह्म प्रन्थि की मशा
पाना हुआ परता है। आत्मा मे माला को योजित करना चाहिए ।
मनुष्य को बिना मन्त्र के पभी योजित नही करना चाहिए ॥३१॥ मूत
मजबूत ही लगाये जिसमे जप करने में श्रुटित न हो जाये । हाथ से जिस
तरह वह गिर न जावे अर्थात् छूट न जावे जाप करने म माला को उसी
भानि रपना चाहिए ॥३२॥ जप थे परने पे समय में माला के हाथ
मे गिर जाने या छूट जाने पर महान विघ्न हुआ करता है और उसमें
टूट जाने पर नो मरण ही हो जाता है। इस प्रकार से जो जप बरन
पा पण्डित जाप दिया परना है ॥३॥ यह जाप का अपनी अभी
पामना की प्राप्ति पिपा रता है और हीर होने पर इगया उलटा ही
होता है। देव का माहरण करने वाला प अन्यत्र भी माला था जप
परे ॥३॥ गाहीमाधना करने वाला बरे अन्यथा भी भी नहीं
पाना पाहिए। अपनी गतिरेही अनुगार जप बरे और प्राये
माप गरश में
करना चाहिए था
-

महामाया क्ल्प वर्णन (२) ]
२०५
असख्यात च यज्जप्त तस्य तन्निष्फल भवेत् ।
जप्त्वा माला शिरोदेशे प्राणुस्यानेज्य वा न्यसेत् ॥३६
स्तुतिपाठ तत कुर्यादिप्ट काम निवेद्य च ।
स्तुतिश्चापि महामन्त्र साधन सर्वकर्मणाम् ॥३७
वक्ष्ये युवा महाभागी सर्वसिद्धिप्रदायकम् ।
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।।३८
शरण्ये त्र्यम्वक गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ।
सप्तधावर्तन कृत्वा स्तुतिमेना च साधक ॥३६
पञ्चप्रणामान कृत्वाथ ऐं ह्री श्रीमितिमन्तक ।
अन्येपा पुरतञ्चव अधिक वा वयेच्छया ॥४०
योनिमुद्रा तत पश्चाद दर्शयित्वा विसर्जयेत् ।
द्वौ पाणी प्रसृतीकृत्य कृत्वा चोत्तानमञ्जलिम् ॥४१
अगुष्ठानद्वय न्यस्य कनिष्ठाग्रहमास्तत ।
अनामिकाया वामस्य तत्वनिष्ठा पुरो न्यसेत् ॥४२
बिना सख्या सना भी जप किया जाता है उसका वह दिया
हुआ जप निष्फल ही होता है । माला स जप करक फिर उस माला का
शिरोदेश म अर्थात् मस्त म अथवा प्राशु स्थान म वियस्त करना
चाहिए ॥३६।। इसके अनन्तर स्तुति का पाठ कर और जो भी कामना
हो उसका निवदन करे । स्तुति भी एक महा मन की ही भाति है जो
कि समस्त कर्मों का साधन होता है ॥३७॥ ह महाभागे | आप दोना
को मैं बतलाऊंगा जो कि सय सिद्धियों का प्रदायक होता है। समस्त
मङ्गला की मङ्गन करने वाली या मङ्गल स्वल्पा है। ह शिवे । आप
'भो अर्थों की साधिका है । हे शरण्ये । अर्थात् शरणागति में आ
जाने वाले को रक्षा करने वाली 1 ह जामके । हे गौरि । सापकी
सेवा मे नमस्कार है । सात वार आवृत्ति करके साथ इस स्तुनि को
'ॐ ह्री श्रीम् ' इस मन्त्र के द्वारा पांच प्रणाम करे। बया
कर।

२०६
[बालित पुराण
अन्यो के आगे अधिष यार भी अपनी या आगार पर ।
इसके पीछे योनि मुद्रा को दिया पर विसर्जन करना चाहिए। दो
हाथो को प्रस्त परये अर्थात् फंसाकर और उत्तान अजसिपस
दोनो अगुष्ठो ये अग्रभाग पो दोनो बनिप्टिकाओं में अप्रभाग
यो दोनो वनिष्ठिाओ ये अप्रमाग को वाम हाथ पी अनामिया
में उसकी मष्ठवा या न्यास आगे परे ॥३८-४२॥
दक्षिणस्यानामिकाया कनिष्ठा दक्षिणस्य च ।
अनामिकाया पृष्ठे तु मध्यमे द्वे निवेशयेत् ॥४३
द्वे तर्जन्यो यानिष्ठाग्रेतदमेणव योजयेत् ।
योनिमुद्रा समाय्याता देव्या प्रीतिकरी मता ॥४४
श्रिवार दर्शयेन ता तु मूलमन्त्रेण साधक ।
ता मुद्रा शिरसि न्यम्य मण्डल विन्यसेत् तत. ॥४५
ऐशान्यामग्रहस्तेन द्वारपद्मविवजितम् ।
तत्र नत्वा रक्तचण्डा ह्री श्री मन्त्रण साधर ॥४६
रक्तचण्डाय नम इति निर्माल्य तत्र निक्षिपेत् ।
उदके तरुमूले वा विर्माल्य नत्र सत्यगेत् ।।४७
एव त पूजयेद् देवी निधानेन शिवा नर ।
सोऽचिरेण लभेत्कामान् सर्वानेव मनोगतान् ।।४८
अर्धलक्षजप जप्त्वा प्रथम चैव साधक ।
पुरश्चरेद् विशेषेण नानानंवेद्यवेदन ॥४६
दाहिने हाथ की अनामिका मे दक्षिण कर कनिष्ठिका लो और अना•
मिका के पृष्ठ भाग मे दोनो मध्यमाओ का निवेश करना चाहिए ॥४३}]
दोनो तर्जनियो को कनिष्ठा के अग्र भाग मे उसके अग्रभाग से ही योजित
करना चाहिये । यह योनि मुद्रा कही गयी है जो कि देवी की प्रीति के
करने वाली मानी गयी है ॥४४॥ साधक को तीन बार उस मुद्रा
को
दिखाना चाहिये और मूल मन्त्र को पढकर ही दिखावे । उस मुद्रा का

महामाया वल्प वर्णन (३) ] २०७ शिर में न्यास करके फिर मण्डल मे विन्यास करना चाहिए ॥४॥ ऐशानी दिशा में अप्रहस्त से जो द्वार पदम मे निवजित होवे । वहाँ पर साधक को ही श्रीम'इस मन्त्र से रक्त चहा को नमस्कार करना चाहिए। ॥४६॥ "रक्त चण्डा ये नमः" इस मन्त्र से वहा पर निर्माल्य का क्षेपण करे। जल मे अथवा किसी वृक्ष के मूल में निर्माल्य का भली भांति त्याग करना चाहिए ॥४७॥ इस रीति से विधान के साथ जो मनुष्य शिवा देवी का अभ्यर्चन किया करता है वह अविलम्ब ही अपनी काम- नाओ की प्राप्ति कर लिया करता है जो भी कुछ सव उसके मन मे विद्यमान होवें ॥४८॥ सवमे प्रथम साधक साधा लाख जप करके विशेष रूप से पुरश्ररण करे जिसमे अनेक प्रकार के नैवेद्य आदि होवें ॥४६ कुण्ड मण्डलवत् कृत्वा चाष्टम्यां समुपोपितः । नवम्या शुक्लपक्षस्य रजोभिः पञ्चभिर्नरः ॥५० पूर्ववन्मण्डल कृत्वा गुरुपिनोश्व सन्निधौ । अनेनैव विधानेन पूजयित्वा तु चण्डिकाम् ॥५१ सहितविल्वपत्रैश्च अष्टोत्तरशतत्रयम् । तिलोम चरेत् तस्या सहस्रत्रितयं जपेत् ॥५२ नैवेद्यं गन्धपुप्पे च वस्त्रं दद्याच्च यत्यियम् । पूर्वोक्तं चान्यदप्यस्यै प्रदद्यात् पायस तथा ॥५३ पूजावसाने देय स्यात् तज्जातीय वलित्रयम् । सिन्दूर स्वर्णरत्नानि यद्यन् वीणा विभूपणम् ।।५४ निवेदयेद् यथाशक्त्या पुप्पमाल्य च भूरिश.। महाशक्तुं मशाल्यन्न गव्यव्यञ्जनसयुतम् ।।५५ देव्यं नवभ्या सम्पूर्ण वलि दद्याद् घृतादिभिः । दक्षिणा गुरवे दद्यात् सुवर्ण गा तथा तिलम् ॥५६ एक कुण्ड की मण्डल की भांति ही रचना करे और अष्टमी तिथि मै उपवास करना चाहिए । नवमी तिथि मे जो कि शुक्ल पक्ष की होवे

२०८
( वालिया पुराण
मनुष्य पाँच रजो के द्वारा गुरु और पिता की सनिधि मे पूर्व की ही मडल
की रचना करे। इसी विधान से चण्डिका देवी का मजन करना चाहिए ।
तीन सौ आठ वेत पत्रो के सहित तिलो से उसमे होम का समाचरण करे
और तीन सहस्र जप करे ।५०-५२। नैवेद्य-पुष्प-गन्ध-वस्त अर्पित करे जो
भी उनको प्रिय होवें। पूर्व में वजित तथा अन्य भी पायस आदि इसको
समर्पित करे ।।५३॥ पूजा के अन्त मे उसके जातीय तीन बलि देनी
चाहिए। सिन्दूर स्वर्ण-रत्न और जो-जो स्त्रियो के भूपण होवे अपनी
शक्ति के अनुसार निवेदन करे और पुष्प तथा मालायें अधिक निवेदित
करना चाहिये। महा शक्तु शाली के अन्न के सहित और गाय
व्यजनो से समन्वित धृतादि के द्वारा नवमी तिथि में देवो के लिये
सम्पूर्ण बलि देनी चाहिए। गुरुदेव को दक्षिणा देवे उसमे स्वर्ण-गो
और तिल देवे ॥५४-५६॥
अभिशप्तमपुत्र च सावध कितव तथा।
क्रियाहोनमकल्पज वामन गुरुनिन्दकम् ॥५७
सदा मत्सरसयुक्त गुरु मन्त्रेषु वर्जयेत् ।
गुरुमन्त्रस्य मूल स्यान्मूलशुद्धौ तदुद्गतम् 11५८
सफां जायते यस्मान्मन्त्र यत्नात्परीक्षयेत् ।
शाठयात् बोधात्तु मोहाद्वा नासन्मत्या गुरो, खात् ।।५६
कल्पेषु दृष्ट्वा वा मन्त्र गृहणीयाच्छद्मनाऽथ वा।
स मन्त्रस्तेय पापेन तामिस्र नरके नर ॥६०
मन्वन्तरप्रय स्थित्वा पापयोनिषु जायते ।
शठे रे च मूर्खे च छद्मकारिण्यभक्तिको ।।६१
मन्त्र न दूपिते दद्यात् सुवीज विपिने तथा।
लक्षेण साधयेत् कामं पुरश्चरणपूर्वकम् ॥६२
पापरायो भवेद्द यरमात पुरश्चरणकर्मणा ।
लक्षद्वयेन मन्त्रस्य जपेन नरसतमौ ॥६३

महामाया कल्प वर्णन (३) ] २०६ अभिशाप प्राप्त किये हुए-पुत्र रहित-अवद्य मे युवत--क्तिन-- क्रिया से होन-अक्ल्पज्ञ--धामन (वीना)-गुरुनि दक्-सदा मन्सरता में मयुत-ऐसे गुरु का मन्त्रो मे वजित कर देना चाहिए । गुर ही मन्त्र का मूल है और मूल के शुद्ध होने पर ही उससे जो भी उद्भूत है वह सफल होता है। इसी कारण से मन्त्र को यत्न पूर्वक परीक्षा करनी चाहिए। शठता से क्रोध से-मोह से-बसन्मति से के मुख से अथवा क्ल्पो मे मन्त्र को देखकर अप छल से मन्त्र का ग्रहण करे वह मनुष्य मन्त्र की चोरी के पाप से तामिस्र नामक नरक मे जाया करता है ॥५७-६०॥ तीन मन्वन्तर तक वह नरक में रहकर फिर पाप योनियों में समुत्पन्न हुआ करता है। शठ-कर-मूर्ख-दम (छल) करने वाले और भक्ति से होन मे तथा दोषो से युक्त पुरप को कभी भी मन्त्र नहीं देना चाहिए जैसे सुन्दर बीज को जङ्गल में डाल दिया जाता है वैसा ही उपर्युक्त मनुष्यो को मन्त्र देना भी निष्फल ही होता है। एक लाख में पुरश्चरण पूर्वक कामना की साधना करनी चाहिए ॥६१-६२॥ क्योकि पुरश्चरण के कर्म के द्वारा पापो का क्षय हुआ करता है । हे श्रेठ नरो ! दो लास मन्त्र जप के द्वारा करे ॥६६॥ त्रिसन्ध्यासु प्रतिदिनं वजसंघातकेन च । कविर्वाग्मी पण्डिश्च यशस्वी च प्रजायते ॥६४ साधकः साधक श्रेष्ठ पूजास्था न ततः शृणु। यत्र यत्र नर पूजां निर्जने कुरुते च यः ॥६५ नभ्यादत्ते स्वयं देवी पत्र पुष्पं फलं जलम् । शिला प्रशस्ता पूजायां स्थण्डिल निर्जन तथा ॥६६ जपश्चौपाशु सर्वेपामुत्तमः परिकीर्तित.। अशुचिनं महामाया पूजयेत् तु कदाचन ॥६७ अवश्य तु स्मरेन्मन्त्र योऽतिभक्तियुतो नर.।

२१० [ कालिका पुराण दन्तरक्ते समुत्पन्ने स्मरणचन विधते ॥६८ सर्वपामेव मन्त्राणा स्मरणान्नग्क व्रजेत् । जाना क्षतजे जाते नित्य कर्म न चाचरेत् ॥६६ नैमित्तिक च तदध स्रवद्रक्तो न चाचरेत् । सूतके च समुत्पन्ने क्षरकर्मणि मैथुने ॥७० धूमोद्गारे तथा वान्त नित्यकर्माणि सत्यजेत् । द्रव्ये भुक्ते त्वजीर्णे च न वै भुक्त्वा च किञ्चन ॥७१ कर्म कुन्निरो नित्य सूतके मृतफे तथा। पत्र पुष्ण च ताम्बूल भेपजत्वेन कल्पितम, ॥७२ प्रतिदिन तीनों सन्ध्याओ मे और वीज सघात के द्वारा करने से साधक मनुष्य कवि-वाग्मी--पण्डित--और यशस्वी हो जाया करता है ॥६ ॥ हे साधको मे श्रेष्ठ । इसके उपरात पूजा के स्थान का श्रवण करो। जहाँ-जहाँ पर भी निर्जन मे जो मनुष्य पूजा किया करता है । उसको देवी स्वय ही पत्र-पुष्प और फल का तथा जल का आदान किया करती है । पूजा मे शिला प्रशस्त होती है तथा स्थण्डिल और निर्जन होना चाहिए ॥६५-६६ उपांशु जप सभी जपो मे उत्तम कहा गया है। अशुचि की दशा में कभी भी महा- माया का पूजन नहीं करना चाहिए । ६७॥ जो अत्यन्त भक्ति से युक्त नर हो उमे मन्त्र का स्मरण अवश्य ही करना चाहिये । दांतो मे रक्त किसी भी कारण से समुत्पन्न हो जाने पर स्मरण भी नही कहा जाता है ॥६॥ मन्त्रो के स्मरण से मनुष्य नरक मे गमन किया करता है। जानु के ऊम्वं भाग मे सतज उत्पन्न हो जाने पर नित्य कर्म का भी समाचरण नहीं करना चाहिये ॥६६॥ उसके नीचे के भाग में यदि रक्त का स्नान हो जावे तो नैमितिक धर्म न करे। गूतष मे समु. स्पन्न होने पर-धुर धर्म मे-मैथुन मे-धूमोद्गार में-वान्ति हो जाने पर मिरय कमो का त्याग कर देना चाहिए । द्रव्य के मुक्त होने महामापा पल्प वर्णन (३) ] २११ में पर-अजीणं में और कुछ भी न खाकर मनुष्य मूनक तथा मृतक में नित्य रम करें। पत्र-पुष्प-फल और बल-ताम्बूल भोजन के ही रूप में माना गया है ।।७०-७२॥ कणादिपिप्पल्यन्तं च फलं भुक्त्वा न चाचरेत् । जलस्यापि नरथेप्ठ भोजनाद् भेपजाहते ॥७३ नित्यक्रिया निवर्तेत सह नैमित्तिकः सदा । जलौकां गूडपाद च कृमिगण्डूपदादिकम् ।।७४ कामाद्धस्तेन संस्पृश्य नित्यकर्माणि संत्यजेत् । विशेषतः शिवापूजां प्रमोतपितृको नरः ।।७५ यावद् वत्सरपर्यन्तं मनसापि न चाचरेत् । महागुरुनिपाते तु काम्यं किञ्चिन्न चाचरेत् ।।७६ आत्विज्यं ब्रह्मयज्ञ च श्राद्ध देवयज च यत् । गुरुमाक्षिप्य विप्रं च ब्रहृत्यैव च पाणिना १७७ न कुर्यान्नित्यकर्माणि रेत.पाते च भैरव । आसन चायपात्र च भग्नमासादयेन्नतु ॥७८ कप में आदि लेकर पिप्यतो के अन्त पर्यन्त हे नर श्रेष्ठ ! भेषन के बिना जल के भी भोजन से और फलक खाकर नहीं समाचरण परे। 1७३॥ सदा नमित्तिक कर्मों के साथ नित्य क्रिया को निवत्तित परे । जलो का--गूढ पाद-कृमि-मण्ड के पदादिक यो काम से हाथ के द्वारा सस्पर्श करके नित्य कर्मों का त्याग कर देना चाहिए । विशेष कर के प्रमीत पितृक मनुष्य को शिवा की पूजा का त्याग कर देना चाहिए। १७४-७५।। जब तक एक वर्ष हो उसके अन्त तक मन से भी आच- रण न करे। महा गुरु के निपात हो जाने पर कुछ भी काम्य कर्म का समाचरण नहीं करना चाहिए ।।७६॥ आविंग्य-ब्रह्म यज्ञ-थाद्ध- देव यज्ञ गुरु का और विप्र का आक्षेप करके और हाथ से प्रहृत करके हे भैरव ! रेत के पात हो जाने पर नित्य कर्मों को नहीं करना

२१२
[ कालिका पुराण
चाहिए । आसन और अध्यं पात्र को भग्न हो जाने पर आसादित नहीं
करना चाहिए ॥७७-७८॥
अपरे कृमिसयुक्ते स्थाने मृप्टेपि नार्चयेत् ।
नीचरासनमासाद्य शुचि प्रयतमानस. ॥७६
अर्चयेच्चण्डिका देवी देवमन्य च भैरव ।
दिग्विभागे तु कौवेरीदि छिवा प्रीतिदायिनी ॥८०
तस्मात् तन्मुख आसीन. पूजयेच्चण्डिका सदा ।
पुष्प च कृमिसमिश्र विशीण भग्नमृद्गते ॥८१
सकेश मूषिकोख़्त यत्नेन परिवर्जयेत् ।
याचित परकीय च तथा पर्युषित च यत् ।
अन्त्यसृष्टं पदा स्पृष्ट यत्नेन परिवर्जयेत् ॥८२
इद शिवाया. परम मनोहर
करोति योऽनेन तदीयपूजनम् ।
स वाञ्छितार्थ समवाप्य चण्डिका-
गृह प्रयाता नचिरेण भैरव ॥८३
ऊपर में कृमियो से सयुक्त होने पर उसको भ्रष्ट करके भी वहाँ
पर अचंन नहीं करना चाहिए। नीचे स्थान पर आसन को समासाहित
फरके शुचि और प्रपत मान वाला होकर ही हे भैरव ! चण्डिका देवी
का तथा अन्य देव का अर्चन करना चाहिए । दिशाओ के विभाग में
यौवेरी दिशा शिवा की प्रीति के देने वाली हुआ करती है ।। ७६-
८० ॥ इस कारण से उस देवी के सन्मुख में ही स्थित होकर सदा ही
चण्डिका का अभ्यचंन करना चाहिए । पुष्प भी ऐसा होना चाहिए जो
कृमियो से संमिश्रित न होवे-विशीर्ण, भग्न और मिट्टी में पड़ा हुआ
नहीं होवे । जो पुष्प चूहो से उद्भूत हो और केशो से युक्त हो उसका
परिवर्तन यत्न पूर्वक कर देना चाहिए। पापना दिया हमा-दूसरे का
तपा प{पित (बासी) अन्त्य मृष्ट-पैर से स्पर्श किया हुआ हो ऐसे

महामाया मंत्र का ववच ] २१३ पुष्प को वर्जित कर देना चाहिए। बर्यात पूजा के क्रम मे कभी ग्रहण नहीं करे ॥८१-८२॥ यह शिवा का परमाधिक मनोहर विधान है। इमको जो भी साधक उसके पूजन में किया करता है वह अपना अभीष्ट प्रास करके है भैरव । शीघ्र ही चण्डिा देवी के गृह में प्रपाप करने वाला होता है ॥३॥ - । महामाया मंत्र का कवच ॥ अम्य मन्नन्य कवच शृणु वैतालभैरव । वैष्णवोतन्त्रसंशस्य वणव्याश्च विशेषत ॥१ तत्र मन्त्राद्यक्षरं तु वासुदेवम्बम्पवृक् । वर्णो द्वितीयो ब्रह्म व तृतीयश्चन्द्रशेखरः ॥२ चतुर्थो गजवक्त्रश्न पञ्चमन्नु दिवाकरः। शक्ति. स्वयं पकारश्च महामाया जगन्मयो ।।३ यकारस्तु महालक्ष्मीः शेपवर्णः सरस्वती। योगिनीपूर्ववर्णस्य शैलपुनी प्रकोतिता ॥४ द्वितीयम्य तु वर्णम्य चण्डिका योगिनी मता । चन्द्रघण्टा तृतीयम्य कुप्माण्डी तत् परस्य च ॥५ स्कन्दमाता तकारस्य पश्य कात्यायनी स्वयम् । कालरात्रि. सप्तमम्य महादेवीति सस्थिता ॥६ प्रथमं वर्णकवचं योगिनीकवचं तथा । देवोपकवचं पश्चाद् देवादिकवचं तया ॥७ श्री भगवान ने कहा-है वेताल भैरव ! अब इस मन्त्र का यवच का श्रवण करो बोबिष्णवी तन्त्र समा वाले का हैं और विशेष र मे चैनवी देवी का है ॥१॥ वहां पर मन्त्रादि अक्षर वासुदेव के स्वरूप रा धारण करने वाला है। दूसरा वर्ण ब्रह्म ही है-तीसरा २१४ [पालिषा पुराण -स्वय चन्द्र शेपर है ॥२॥ चतुर्थ गजन वक्त्र है-पाचा दिवापर है-- शक्ति और पकार है जो जगन्मयी महा माया है ॥३॥ ययार महालक्ष्मी है और शेप वर्ण मरस्वती है। पूर्व वर्ण की योगिनी शेल पुत्री कही गयो है ॥१॥ द्वितीय वर्ण की योगिनी चण्डिया मानी गयो है। तोमरे को चन्द्र घण्टा है और चौये की कूष्माण्डी मानी गयी है । ॥ तकार को स्कन्द माता है । देखो पात्यायनी स्वय है। मप्तम यो काल रात्रि है जो महा देवी -यह मस्थिता है ॥ ६॥ प्रथम वर्ग कवच है तथा योगिनी कवच है। पीछे देवोद्य कवच है तथा देवी दिक् कवर है ॥७॥ ततस्तु पावकवच द्वितीयान्ताव्ययस्य च । कवच तु तत पश्चात् पडवर्ण कवच तथा ॥८ अभेद्यस्वच चेति सर्वत्राणपरायणम् । इमानि कवचान्यष्टौ यो जानाति नरोत्तम ॥ मोऽहमेव महादेवी देवीरूपश्च शक्तिमान् । अस्य वैष्णवीतन्त्रकवचस्य नारदऋपिरनुष्टुप्छन्द १० कात्यायनी देवता सर्वकामार्यसाधने विनियोग । अ पातु पूर्वकाप्ठायामाग्नेय्या पातु क सदा ॥११ पातु चो यमकाप्ठाया दो नैऋत्या च सर्वदा। मा पातु तोऽसौ पाश्चात्ये शक्तिर्वायव्यदिग्गता ॥१२ य पातु मा चोत्तरस्यामंशान्या यस्तथावतु । मूनि रक्षतु मा सोऽसौ वाही मा दक्षिणे तु क ॥१३ मा वामवाही च पातु हृदि टो मा सदावतु । त पातु कण्ठदे माशे कटयो शक्तिस्तथावतु ॥१४ इसके अनन्तर पाच कवच है और द्वितीयान्ता व्यय का कवच है । इसके पश्चात् पड़ वर्ण क्वय है ||८॥ अमेद्य कवच है जो सर्वत्राण परायण हैं। ये आठ कवच हैं इनको जो नरो मे उत्तम है जानता है ।

महामाया मंत्र का कवच ] २१५ ॥६॥ वह मैं ही महादेवी हूँ और शक्तिमान् देवी के रूप वाला है। इस वैष्णवी तन्त्र कवच का नापद ऋषि हैं और अनुष्टुप छन्द है । 11१०1। कात्यायनी इसका देवता है। इसका सव कामो के अर्थों के साधन मे विनियोग होता है । 'अ' पूर्व दिशा में रक्षा करे और 'का सदा आग्नेयी में रक्षा करे ।।११। 'य' यम दिशा में रक्षा करे-और 'द' नति दिशा में सर्वदा मेरी रक्षा करे। पाश्चात्य दिशा में 'त' रक्षा करे तथा वायव्य दिशा मे शक्ति रक्षा करे ॥१२॥ 'य' मुझको उसर दिशा मे रक्षित करे तथा "य" ऐशानी दिशा मे रक्षा करे । 'स' मेरी मस्तक मे रक्षा करे और 'क' मेरी दाहिने बाहु मे रक्षा करे । ।।१३।। 'च' मेरी बाई बाहु मे रक्षा करे और 'ट' सदा मेरे हृदय मे रक्षा करे। कठ देश में तो रक्षा करे और मेरी करि मे शक्ति रक्षा करे ॥१४॥ य पातु दक्षिणे पादे पो मां वामपादे तथा । शैलपुत्री तु पूर्वस्यामाग्नेय्यां पातु चण्डिका ॥१५ चन्द्रघण्टा पातु याम्यां यमभीतिविवधिनी । नत्ये त्वय कूष्माण्डी पातु मा जगता प्रसूः ॥१६ स्कन्दमाता पश्चिमायां मां रक्षतु सदैव हि । कात्यायनी मां वायव्ये पातु लोकेश्वरी सदा ॥१७ कालरात्री तु कौवेर्यां सदा रक्षतु मा स्वयम् । महागौरी तर्थशान्या सततं पातु पावनी ।।१८ नेनयोर्वासुदेवो मा पातु नित्यं सनातनः । ब्रह्मा मा पातु वदने पायोनिरयोनिजः ॥१६ नासाभागे रक्षतु मां सर्वदा चन्द्रशेखरः। गजवक्त्रः स्तनयुग्मे पातु नित्यं हरात्मजः ॥२० वामदक्षिणपाप्योर्मा नित्य पातु दिवाकरः । महामाया स्वय नाभी मां पातु परमेश्वरी ॥२१ [ कालिका पुराण "य" दाहिने पाद मे रक्षा करे तथा 'प' धाम पाद मे रक्षा परे । शैल पुत्री पूर्व मे और चडिका आग्नेयी दिशा में मेरी रक्षा करे ॥१५॥ याम्य चन्द्र घटा रक्षा करे जो भय की भीति की विधिनी है । जगतो की जननी कूष्माण्डी मेरे नैऋत्य में रक्षाकरे ।१६। पश्चिम दिशा मे स्कन्द माता मेरी मदा ही रक्षा करें। वायव्यदिशा में मेरी कात्यायनी रक्षा करे जो सदा लोकेश्वगे है ।१७१ काल रात्रि कोबेरी दिशामे स्वय सदा मेरी रक्षा करे। तथा ऐशानी दिशा में निरन्तर पावनी मेरी रक्षा करे ।१८। मेरे दोनो नेत्रो को भगवान वासुदेव रक्षा करें जो नित्य ही सनातन प्रभु हैं । वदन मे मेरी ब्रह्मा रक्षा करें पद्म योनि और अयोनिज हैं अर्थात् विसी योनि सैस मुत्पन्न नहीं होकर केवल पद्म से ही समुत्पन्न हुए हैं ॥१६॥ मेरे नासिका के भाग मे मेरी सर्वदा चन्द्र शेखर प्रभु रक्षा करें। भगवान शम्भु के पुत्र गज ववय (गणेश) मेरे दोनो स्तनो को नित्य रक्षा करें ॥२०॥ मेरे बाये और दाहिने हाथो की नित्य ही दिवाकर रक्षा करें। परमेश्वरी माहामाया स्वय मेरी नाभि में रक्षा करे ॥२१॥ महालक्ष्मीः पातु गृा जानुनोश्च सरस्वती। महामाया पर्वमागे नित्यं रक्षत मां शुभा ॥२२ अग्निज्वाला तथाग्नेय्यां पायान्नित्यं वरासिनी। रुद्राणी पातु मां याम्यों नेत्यां चन्डनायिका ।।२३ उग्रचण्डा पश्चिमायां पातु नित्यं महेश्वरी। प्रचण्डा पातु वायव्ये कौवेया घोररूपिणी ॥२४ ईश्वरी च तर्थशान्यां पातु नित्य सनातनी। अध्वं पातु महामाया पात्ययः परमेश्वरी ॥२५ अग्रतः पातु मामुग्रा पृष्ठतो वैष्णवी तथा। प्रह्माणो दक्षिगे पायें नित्यं रक्षतु शोभना ।।२६ माहेश्वरी याममा नित्यं पाया वृपध्यगा ।

महामाया मत्रा ददन] २१७ कौमारी पर्वते पातु वाराही सलिले च माम् ।।२७ नारसिंही दष्ट्रिभये पातु मा विपिनेषु च । ऐन्द्री मा पातु चाकाशे तया सवंजले स्थले ।।२८ महा लक्ष्मी गुहय की रक्षा करे-जानुओ की रक्षा सरस्वती करे। शुमा महामाया पूर्व भाग में मेरी नित्य ही रक्षा करें ॥२२॥ वरामिनी अग्नि ज्वाला आग्नेयो दिशा में नित्य ही रक्षा करे। मद्राणी मेरी याम्य दिशा में रक्षा करे और चण्ड मायिका नैऋत्य में रक्षा करे। ॥२३॥ महेश्वरी उग्र चण्डा पश्चिम में नित्य ही रक्षा करें। वायव्य में प्रचण्टा और कौवेरी दिशा में घोर स्पणी रक्षा करे ॥२४॥ ऐशानी दिशा मे ईश्वरी सनातनी नित्य ही मेरी रक्षा करे । महामाया ऊपर की ओर और नीचे की ओर परमश्वरी रक्षा करे ॥२५॥ उमा मुझको आगे को और रक्षा की तथा पृष्ठ भाग में वैष्णवी रक्षा करे । दक्षिण पावं मे ब्रह्माणी शोभना नित्य मेरी रक्षा करे। दृषध्वजा माहेश्वरी वाम पावं मे नित्य रक्षा करे। पर्वत में कौमारी और जल में वाराही मेरी रक्षा करे ॥२६॥ दाद वालो के भय मे नारमिही रक्षा करे जो कि विपिनो में किया करे । आकाश मे ऐन्द्री तथा सर्वत्र जल मे और स्थल मे मेरी रक्षा करे ॥२८॥ सेतुः सर्वांगुली पातु देवादि पानु कर्णयो । देवान्तश्चिबुके पातु पाश्ययो शक्तिपञ्चम ॥२६ हा पातु मा तथवोर्वोर्माया रक्षतु जघयो । सर्वेन्द्रियाणि य. पातु रोमकूपेषु सर्वदा ॥३० त्वचि मा वै सदा पातु मा शम्भु पातु सर्वदा । नखदन्तकरोप्ठादौ राँ मा पातु सदैव हि ।।३१ देवादि पातु मा यस्तो देवान्त स्तनकक्षयो । एतदादौ तु य सेतुर्वाह्य मा पातु देहत ॥३२ आनाचक्रे सुपुम्नाया पट्चक्रे हृदि सन्धिषु ।

२१८ [पालिका पुराण आदिपोडशचने च ललाटापाश एव च ॥३३ वैष्णवी तन्त्रमन्त्री मा नित्य रक्षाश्च तिष्ठतु । कणनाडीषु सर्वासु पाश्वपक्षशिखासु च ॥३४ रुधिरस्नायुमज्जासु मस्तिप्वेषु च पर्वसु । द्वितीयाप्टाक्षरो मन्त्र क्वच पातु सर्वत ॥३५ समस्त अ गुलियों की रक्षा सेतु को तथा देवादि वर्णो की रक्षा करे । देवान्त चिबुक में रक्षा करे और दोनों पाश्चों में शक्ति पञ्चग रक्षा करे ॥२६। उसी भांति ही मेरे कामो को रक्षा बरे और माया मेरी दोनो जांघो की रक्षा करे 'य' सर्वदा समस्त इन्द्रियो की और रोमो के कूपो मे रक्षा करे ॥३०॥ मेरी त्वचा मे मुझको सर्वदा भग- वान् शम्भु रक्षा करे । नाखून-दांत-कर-और ओष्ठ आदि में सदैव ही 'रो" मेरी रक्षा करे ॥ ३१॥ मेरी बस्ती में देवादि रक्षा करे और स्तनो तथा कक्षों में देवा.त रक्षा करे। 'य' हेतु एतदादि में और देह के वाहा भाग में मेरी रक्षा करे ॥३२॥ आज्ञा चक्र में-सुषुम्ना मे—पट् चक्र में हृदय मे सन्धियों में और भाद पोडश चक्र मे तथा ललाटा कारा मे वैष्णवी तन्त्र-मन्त्र मेरी निय ही रक्षा करती हुई स्थित रहे । समस्त कानो की नाडियो मे और पाव कक्ष शिखाओ मे---रुधिर, स्नायु, मज्जाओ मे-मस्तिष्को में और पाँ में द्वितीयाष्टाक्षर मन्त्र कवच मभी ओर रक्षा करे ॥३४॥३५।। रेतो वायो नाभिरन्ध्र पृष्ठसन्धिषु सर्वत । पडक्षरस्तृतीयोऽय मन्त्रो मा पातु सर्वदा ।।३६ नासारन्ध्रे महामाया कण्ठरन्धे तु वैष्णवी । सर्वसन्धिप पातु दुर्गा दुर्गातिहारिणी ।।३७ श्रोत्रयोहूँ फडित्येव नित्य रक्षतु कालिका। नेत्रवोजत्रय नेत्रे सदा तिष्ठत्रु रक्षितुम् ॥३८ ॐ ऐ ही हो नासिकाया रक्षन्ती चास्तु चण्डिका ।

२१६ महामाया मे मत्र का क्वत्र ] ॐ ह्री हूँ मां सदा नारा जिह्वामूले त तिष्ठतु ॥३६ हृदि तिष्ठतु मे सेतुआन रक्षितुमुत्तमम् । ॐ क्षौ फट् च महामाया पातु मां सर्वत: मदा ॥४० ॐ युस. प्राणान् कोशिको मा प्राणान् रक्षतु रक्षिका । ह्री हूँ सौं भर्गदयिता देहशून्येषु पातु माम् ॥४१ ॐ नमः मदा शैलपुत्री वर्सान रोगान् प्रमृज्यताम् । ॐ ह्री स. स्फे क्षः फ्डस्त्राय सिंहव्याघ्रभयाद्रणान् ॥४२ शिवदूती पातु नित्यं ही सर्वास्त्रेषु तिष्ठतु । ॐ हां ही सचण्डघण्टा कर्णच्छिद्रेषु पानु माम् ॥४३ रेत (वीर्य)-वायु में-नाभि के रन्ध्र भे-पृष्ठ मन्धियो में मभी और पडक्षर यह तीमग मन्त्र सर्वदा मेरी रक्षा करे ॥३६॥ नासा के रन्ध्र में महामाया और कठ के ग्ध्र मे वैष्णवी रक्षा करे तथा समस्त मन्धियो में दुर्गाति हारिणी दुर्गा मेरी रक्षा करे ॥३७॥ श्रोत्री मे हूँ फट् यह बालिका नित्य रक्षा करे । नेन मे नेत्र अय बीज रक्षा करने के लिये सदा स्थित रहे ॥३८॥ ॐ ऐं ह्री हैं नासिका में रक्षा करती हुई चण्डिका रहे । ॐ ह्रीं हूँ तारा सदा मेरे जिह्वा मूल में स्थित रहे ॥३६॥ मेरे हृदय मे उत्तम ज्ञान की रक्षा करने के लिये सेतु स्थित रहे ॐ क्षीं फट् महामाया सभी और मेरी रक्षा करें ॥४॥ ॐ मुम. प्रोगान् कोशिको मेरे प्राणो को रक्षिका रक्षा करें । ह्रीं ह्रौं मों भर्ग की दयिता देह शृन्यो में मेरी रक्षा गरे । ॥४१ॐ नमः शैल पुत्री सदा सब रोगो का प्रमार्जन करे ही मः स्फै सः अस्त्राय फट् शिव दूती सिंह-व्याघ्र के भय से और रण से नित्य रक्षा करे ह्रीं सब अस्त्रो से स्थित रहे । ॐ ह्रीं ह्री स: चन्द्र घण्टा कों के छिद्रो में मेरी रक्षा करें ॥४२-४३॥ ॐ श्री स. कमेश्वरी कामानभितिष्ठतु रक्षतु । ॐ आं हूँ फडग्रचण्डा रिपून विघ्नान् विमर्दताम् ।।४४ ॐ अं पातु नित्यं वैष्ण शूलात्वी जगदीश्वरी ।

२२० [ कालिका पुराण ॐ क ब्रह्माणी पातु चक्रात च रुद्राणी तु शक्तित १४५ ॐ ट कोमारी पातु वज्रान त वाराही तु पाण्डत । ॐ प नारसिही मायादेभ्यस्तथास्वत ॥४६ शस्त्रास्त्रेभ्य समस्तेभ्यो यन्त्रेभ्योऽनिष्टमन्त्रत । चण्डिका मा सदा पातु य स देव्यं नमो नम । विश्वासघातकेभ्यो मामैन्द्री रक्षतु मन्मन ॥४७ ॐ नमो महामायाय ओ वैष्णव्यै नमो नम । रक्ष मा सर्वभूतेभ्य सर्वत्र परमेश्वरि ॥४८ आधारे वायुमार्ग हृदि कमलदले चन्द्रवत स्मेरसूर्य, वस्तो दह्नौ समिद्ध विशतु वरदया मन्त्रमष्टाक्षरन्तत् । यद्ब्रह्मा मूनि धत्ते हरिरवति गले चन्द्रचूडो हृदिस्य, त मा पातु प्रधान निखिलमतिशय पगार्भामवीजम् ||४६ ॐको स कामेश्वरी कामो में अभिस्थित होवें और रक्षा करे। ॐ आ हूँ पट् प्रचण्डा शत्रुओ को और विघ्नो को निमदित करे ॥४४॥ ॐ अ शूल से वैष्णवी जगदीश्वरी नित्य ही रक्षा परे। ॐ ब्रह्माणी चक्र मे रक्षा करे और रदाणी शक्ति से रक्षा करे ॥४५॥ ॐ कौमारी वज़ से रक्षा को और त वाराही काण्ड मे रक्षा करे । ॐ म नारसिंही कव्यादो से और अस्त्र में मेरी रक्षा करें ॥ १६ ॥ शस्त्री से समस्त अस्त्रो से-मन्त्रो से और अनिष्ट मन्त्र से घण्डिका मेरी रक्षा गरे । पं म देवी के लिये वारम्बार नमस्कार है । ऐन्द्री विश्वास या पात परने वालो मे मेरे मन की रक्षा करे ॥४७॥ ॐ महामाया मे लिये नमस्कार है * गयो के लिये बारम्बार नमस्कार है । हे परमेश्वरि! समस्त भूतो मे सर्वत्र मेरी रखा रो॥४८॥ आधार मे~वायु मार्ग मे-हदय मे-कमल दस मे-पन्द्र बो भाति स्मेर मूमं म-वरती में-ममिद वहिन म परदारे द्वारा यह आठ अक्षरों वाला मन्त्र प्रवेश परे । जो ब्रह्मा मस्ता में धारण रते हैं गले में हरि रक्षा करते है-- महामाया मन का क्वच ] २२१ हृदय म स्थित को चन्द्र बेड रक्षा करते हैं पद्मगर्भाय वीज निखिल निरतिशय प्रधान व मेरी रक्षा करे ॥४६॥ आद्या शेपा स्वरोधर्ममयवलवररस्वरेणापि युक्तं. सानुस्वाराविसगैर्हरिहरविदित यत्सहस्र च साष्टम् । मन्त्राणा सेतुबन्ध निवसति सतत वैष्णवीतन्त्रमन्त्र तन्मा पायात्पवित्र परमपरमज भूतलव्योमभागे ॥५० अङ्गान्यष्टौ तथाष्टी वसव इह तथैवाष्टमूर्तिदलानि प्रोक्तान्यष्टौ तथाष्टौ मधुमतिरचिता. सिद्धयोऽष्टौ तथव । अष्टावष्टाष्टसख्या जगति रतिकला क्षिप्रकाप्ठागयोगा मय्यष्टावक्षराणि क्षरतु न हि गणो यढ्दो यस्त्वमूपाम्।।५१ इयि तत्कवत्र प्रोक्त धर्मकामार्थसाधनम् । इद रहस्य परममिद सर्वार्थसाधकम् ॥५२ य सकृच्छृणुयादेतत् कवच मयवोदितम् । स सर्वाल्लभते कामान् परत्न शिवरूपताम् ॥५३ मकृद् यस्तु पठेदेतत् कवच मयकोदितम् । स सर्वयज्ञस्य फल लभते नान सशय ॥५४ सग्रामेषु जयेच्छत्रु मातङ्गानिव केशरी। दहेत् तृण यथा वह्निस्तथा शत्रु दहेतु सदा ॥५५ नास्त्राणि तस्य शस्त्राणि शरीरे प्रविशन्ति । न तस्य जायते व्याधिनं च दुख कदाचन ॥५६ आद्य शेष स्वरो के समुदायो से मम पवतवरो से बिना स्वर से भी युक्ता से–अनुस्वार के सहित विना विसर्गों वालो से हरि हर विदित जा एक सहस्र आठ हैं। वैष्णवी तन्त्र मन्नो का सेतुबन्ध निर- न्तर निवास करना है वही परम पवित्र पर और अपरज भूतल और व्योम के भाग में मेरी रक्षा करे ॥५०॥ आठ अङ्ग तथा आठ वसुगण तथा अष्टमूत्ति दल यहां पर कह गये हैं तथा आठ मधुमती रचित तथा २२२ [बालिका पुराण आठ सिद्धियां आठ आठ को सख्या जगत् मे रतिवला और क्षिप्रपाला योग मुझमें आठ अक्षार धारण करें-और इनका जो यह पद गण है वह नहीं करे।।'५१॥ यह उसका क्वच बतला दिया गया है जो कि धर्म-अथं और काम का साधन करने वाला है। यह परम रहस्य है और सभी अर्थो का साधक है ।। ५२ ।। मेरे द्वारा कपित इस कवच को जो कोई भी एक वार भी धवण कर लेता है वह सभी कामनाओ की प्राप्ति कर लिया करता है और परलोक भो शिव के स्वरूप का लाभ किया करता है ।। ५३ ॥ मेरे द्वारा कथित इस कवच को जो एक बार भी पढता है वह मभी यज्ञो के फलो का लाभ किया करता है-इसमे कुछ भी संशय नहीं है ।। ५४ ॥ जैसे सिंह हाथियो को परास्त कर देता है उसी भौति वह सग्रामो मो शत्रुओ पर विजयी हो जाता है। जैसे अग्नि तृण को दग्ध कर देता है वैसे ही वह पुरुष सदा ही शत्रु का दाह कर देता हैं ।। ५५।। उसके शरीर म शस्त्र और अस्त्र प्रवेश नहीं किया करते हैं । उसको न कभी रोग होता है और न कभी दुख ही होता है ॥५६॥ गुटिकाञ्जनपातालपादलेपरजनम् । उच्चाटनाद्यास्ता सर्वा प्रसीदन्ति च सिद्ध य ॥५७ वायोरिव मतिस्तस्य भवेदन्यरवारिता । दीर्घायु कामभोगी च धनवानभिजायते ॥५८ अष्टम्या सयतो भृत्वा नवम्या विधिवच्छिवाम् । पूजयित्वा विधानेन विचिन्त्य मनसा शिवाम् ॥५६ यो न्यसेत् कवच देहे तस्य पुण्यफल शृणु। जितव्याधि शतायुश्च रूपवान गुणवान् सदा ॥६० धनरत्नोपसम्पूर्णी विद्यावान स च जायते । नाग्निदहति तत्काय नाप सक्लेदयन्ति च ॥६१ न शोषयति त वायु अव्यात् त न हिनस्ति च ।

२२४ [ कालिका पुराग धर्मार्थकाममोक्षाश्च तस्य नित्यं करे स्थिताः ।।६५ अन्यस्य वरदः सोऽर्थनित्यं भवति पण्डितः । कवित्व सत्यवादित्वं सततं तस्य जायते ॥६६ वदेच्छलोकसहस्राणि भवेच्छ तिघरस्तथा । लिखित यस्य गेहे तु कवचं भैरव स्थितम् ॥६७ न तस्य दुर्गति. कापि जायते तस्य दूषणम् । ग्रहाश्च सर्वे तुष्यति वश गच्छन्ति भूमिपाः ।।६८ यदाज्ये कवचज्ञोऽस्ति जायन्ते तत्र नेतयः । सेतुर्देवः शाक्तिवीज पचमोहाय ते नमः ५६६ वायुर्बलेन चैतायं द्वितीयाष्टाक्षर विदम् । सेतुर्देवोऽय वैष्णव्यै पडक्षरमिदं स्मृतम् ।।७० चारी प्रकार के भूतो के समूह सभी उसके वश में हो जाया करते हैं। जो मनुष्य नित्य ही भक्ति की भावना से भगवान हर का बनाया हुआ कवच का पाठ किया करता है ॥६॥ वह मैं ही महादेव हूँ और मातृका महामाया हूँ। उस पुरुष के धर्म --अर्थ-काम और मोक्ष उसके कर मे ही नित्य स्थित रहा करते हैं ।६५। वह अर्थों के द्वारा अन्य के लिये वरदान वाला होता है । तथा बड़ा पण्डित हो जाता है । कविता करने की शक्ति और सत्य भाषण करना उसको निरन्तर हो जाया करता है ॥६६॥ वह सहस्रो श्लोको को बोला करता है । और वह श्रति घर हो जाता है। हे भैरवो जिसके घर मे यह कवच लिखा हुआ स्थित रहा करता है ॥६७॥ उसको कही पर भी दुर्गति नही के हुआ करती है और उसको कोई भी दोष नहीं लगता है। उस पुरुष सभी ग्रह सन्तुष्ट हो जाया करते हैं और उसके वश मे राजा हो जाते है ।।६८॥ जिस रामा के राज्य में इस कवच का ज्ञाता रहता है वहीं पर ईतियां कभी नहीं हुआ करती है। टिण्डी आदि की वृद्धि वाली छ इतिय होती है । सेतु देव है--शक्ति धीज है-पञ्चमोह तुम्हारे लिये महामाया मत्र का क्वच ] २२५ नमस्कार है ॥६६॥ वायु वल से इस के लिये वह द्वितीय अष्टाक्षर है सेतुदेव है वैष्णवी के लिए यह पडझार है ऐसा कहा गया है ||७०॥ एतद् द्वयं तु जिह्वा ग्रेसतत यस्य वर्तते । तस्य देवी महामाया काये तिष्ठति वै सदा ॥७१ मन्त्राणां प्रणवः मेतुस्तत्सेतः प्रणवः स्मृतः । क्षरत्यनो कृतः पूर्व परस्ताच्च विशीर्यते ॥७२ नमस्कारो महामन्त्री देव इत्युच्यते सुरं. । द्विजातीनामयं मन्त्र. शूद्राणां सर्वकर्मणि ॥७३ अकार चाप्युकारच मकारच प्रजापतिः। वेदत्रायालमुद्धृत्य प्रणव निर्ममे पुरा ॥७४ स उदात्तो द्विजातीनां राज्ञां स्यादनुदात्तक.। प्रचितश्चोरुजानां मनमापि तथा स्मरेत् ॥७५ चतुर्दशस्वरो योऽसौ शेप औकारसज्ञकः । स चानुस्वारचन्द्राभ्या शूद्राणां सेतुरुच्यते ॥७६ नि सेतु च यथा तोय क्षणानिम्न प्रसर्पति । मन्त्रस्तथैव नि.सेतुः क्षणात् क्षरति यज्वनाम् ।।७७ ये दोनो जिस पुस्प की जिह्वा के अग्रभाग में होते हैं उसके शरीर में महामावा देवी निश्वय हो सदा स्थित रहा करती हैं ॥७१॥ मन्त्रो का प्रणव सेतु होता है और उसका मेतु प्रणव कहा गया है । पूर्व मे अनोङ्कत क्षरित होता है और परस्ताद विशीण हो जाया करता है ॥७२॥ नमस्कार महामन्त्र देव हैं--यह सुरो के द्वारा कहा जाता है। द्विजातियो का यही मन्त्र है और शूद्रों के सव कम्म में होता है । ७३ । बकार-उकार और मकार को प्रजापति ने 'तीनो वेदो से उद्धृत करके पहिले प्रणव का निर्माण किया था ।७४ । वह द्विजा तियो का उदात्त है और रजाओ का अनुदात्त है । करजातो का वैश्यो का प्रचित है । इसका मन से भी स्मरण नहीं करना चाहिए । ७५॥ जो यह चौदह स्वरो वाला है शेष मौकार सज्ञा वाला है। और वह २२६ [ पालिका पुराण अनुस्वार-चन्द्रो से शद्रो का सेतु कहा जाता है । ७६ ! जिस तरह से बिना सेतु वाला जल क्षण भर मे ही निम्न स्पस मे प्रसर्पित हो जाया करता है ठीक उसी भांति बिना सेतु वाला मन्त्र यज्वामओ का क्षरित हो जाया करता है ॥७७।। तस्मात् सर्वत्र मन्त्रेषु चतुर्वर्णा द्विजातयः । पार्श्वयोः सेतुमादाय जपकर्मसमारभेत् ॥७८ शूद्राणामादिसेतुर्वा द्वि सेतुर्वा यथेच्छतः। द्वि सेतव. समाख्याता सर्वदेव द्विजातयः ॥७६ एतत् ते सर्वमाख्यात कवच त्र्यम्बकोदितम् । अभेद्य कवच तत् तु कवचाष्टकमुत्तमम् ॥८० महामायामन्त्रकल्प कवच मन्त्रसयुतम् । पडक्षरसमायुक्त निपु लोकेपु दुर्लभम् ॥८१ एतत् त्व नपशार्दूल नित्यभक्तियुत पठन् । जपन् मन्त्र च वैष्णव्याः सर्वसिद्धिमवाप्स्यसि ।।२ इस कारण से सर्वत्र मन्त्रों में द्विजातिगण घार वर्णों वाले होते है। दोनों पावों मे सेतु का आदान करके जप के कर्म मा रामारम्भ करे 1७८ । शूद्रो का आदि सेतु अपवा दिसेतु पपेच्छा से दो सेतु समारयात हैं द्विजाति सवंदा ही हैं । ७६ । औषं ने कहा- यह आपको मैंने श्यम्दक के द्वारा कहा हा कवच सब कह दिया है। यह कवष अभेप है चोर पर धो के अष्टम मे अत्युत्तम है 100। महामाया मन्त्र पल्प रवध मन्त्र से सयुन है । यह पडसर रामायुक्त है और तीनो लोगों में महान दुर्लभ है । ८१ । हे नृपशार्दूल ! इसको आप नित्य ही भक्ति से युक्त होकर पढ़ते हुए और वैष्णवी के मन्त्र का जप करते हुए सभी प्रसार पीसिडियोमरी प्राप्ति पर पेता है ॥२॥ -

मन्त्र साधना के अङ्ग]
२२७
॥ मंत्र-साधना के अन॥
व त्वेम सगरो राजा सवाद भैरवेण वै ।
वेतालेनापि भर्गस्य पुनरोद्धमपृच्छत ॥१
मन्त्र कलेवरगत साग प्रोक्त त्वया द्विज ।
अङ्गमन्त्राणि मे देव्या क्थ्यन्ता भो द्विजोत्तम ॥२
तथा मत्राणि सर्वाणि पूजास्थानानि सर्वश ।
तथैवोत्तरमन्त्राणि कवचानि पृथक् पृथक् ॥३
कामाख्यायाश्च माहात्म्य सरहस्य समन्त्रकम् ।
यथा शशस भगवान् महादेव उमापति ॥४
वेतालभैरवान्या तत् समाचक्ष्व सविस्तरात् ।
शृण्वतो न हि मे तृप्तिर्जायते महदद्भुतम् ॥५
भवता क्थ्यमान हि पर कौतूहल मम ।
शृणु त्व राजशार्दूल यत्पुत्राभ्यामुमापति ॥६
उवाच महदाख्यान तन्मे निगदतोऽधुना।
एतद्रहस्य परम पवित्र पापनाशनम् ।।७
माकण्डेय महर्षि ने कहा-भैरव के द्वारा इस सम्वाद को राजा
सगर ने श्रवण करके और भग का वताल के द्वारा भी सुनकर पुन
और्व से पूछा था। १ । सगर न कहा-हे द्विज ! आपने क्लेवर गत
मन्त्र अङ्गो के सहित वतला दिया हैं । हे द्विजोत्तम । अब देवी के अङ्ग
मन्न मुझमे कहिए । २ । तथा समस्त मत्र और सभी ओर पूजा के
स्थान है । ठीक उसी भांति उत्तर मन्त्र और पृथक् २ कवचो को और
कामाख्या के
माहात्म्य को जो रहस्य और मन्त्री के सहित होवे । जैसा
भगवान उमापति महादेव ने कहा था और वैताल-भैरव दोनो को
बतलाया था उसे विस्तार के सहित आप कहने की कृपा करे । यह
महान् अद्भुत है इसका श्रवण करते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती है ।

२२८ [ कालिका पुराण जबकि आपको इसे कहते हुए मैं देखता हूँ तो मुझे बहुत ही अधिक कौतूहल होता है । ३-५। औवं ने कहा-हे राज शार्दूल | जो भी उमापति ने अपने पुत्रो से कहा था और जो एक महान आख्यान है मैं अव आपको कहता हूँ मुझसे आप श्रवण कीजिए। यह परमाधिक रहस्य है -बहुत ही पवित्र है और पापो के नाश करने वाला है ॥६॥७॥ पर स्वस्त्ययन पुसा गर्भ पुसवन स्मृतम् । कल्याणकारक भद्र चतुर्वर्गफलप्रदम् ।।८ शठाय चलचिताय नास्तिकाय जितात्मने। देवद्विजगुरूणा च मिथ्यानिव-धकारिणे ॥६ न पापायाभिशस्ताय खजकाणादिरोगिणे। न कथ्य न च वा देय श्रद्धाविरहिताय च ॥१० महामायामन्प्रकल्प प्रोक्त्वा ताम्यामुमापति । वैतालभैरवाध्या तु पुनरेवाभ्यभाषत ॥११ अङ्गमन्त्र प्रवक्ष्यामि प्रोक्तवांस्तन्त्रमुत्तमम् । तदेव प्रथम विद्धि सर्वपूनासु सङ्गतम् ॥१२ याचान्त शुचिता प्राप्त सुस्नातो देवपूजने । पूजावेद्या यहि स्थित्वा चतुर्हस्तालरे धिया ॥१३ गृहे या द्वारदेशस्थ प्रणम्य शिरसा गुरुम् । प्रणमेदिष्टदेव स्व दिक्पालानपि चेतसा ॥१४ यह पुरषो मा परम स्वस्त्ययन अर्थात पल्याण मा आसय है और राको गर्म मे पुसवन बहा गया है- यह यस्याण परने पासा--परम भद्र और पारो वर्गों से सपा प्रशान करने वाला है। इसको ऐस म्यक्ति को कभी भी भूलकर भी नहीं देना चाहिए जो शठ होवे-पल चित्त बासा होना मारिदव हो. जो अजित आत्मा वासा हो-जो देव, त्रि और गुरवर्ग का मिथ्या नियं ध पारी होवे ॥६॥ो पापी हो तपा भपिशात हो-पत्र हो-नागा हो भौर रोगी हो एस पुष्प से यह मात्र माधना अङ्ग] २२६ नहीं कहना चाहिए और न देना भी चाहिए। जिसमें श्रद्धा का अभाव हो उसे भी यह न देवे । १० । उमा के पति ने उन दोनो वेनाल-- भैरवों से कहकर अर्थात् इम महामाया के मन्त्र कल्प का उपदेश देकर चे पुन यह बोले थे । ११ । भगवान ने कहा-उत्तम तन्त्र तो मैंने कह दिया है किन्तु अब मूल मन्त्र को बतलाऊँया वह ही सर्व प्रथम जान लो। यह मव पूजाओ मे सङ्गत है । १२। आचान्त होकर बर्याद आचमन करके-शुचिता को प्राप्त हुआ-सुन्दर रीति से स्नान किया हुआ देव पूजन में स्थित होवे । पूजा की वेदी स वाहिर स्थित होकर बुद्धि से चार हाथो के अन्तर म स्थित रहे । घर म अथवा द्वार देश में स्थित होता हुआ शिर से गुरु को प्रणाम करे। अपन इष्टदेव को इसी भौति प्रणाम करना चाहिए तथा चित्त के ही दाग दिवाली को प्रणाम वरना चाहिए ॥१३॥१॥ यत् पूर्वमजित पाप तदिनेऽन्यदिनेऽपि वा। प्रायश्चित्त पनुन्न तच्च पाप स्मरेद्धिया ।।१५ तत्पापस्यापनोदाय मन्त्रद्वयमुदीरयेत् । देवि त्व प्राकृत चित्त पापाबानमभूमिम ।।१६ तनि सारय चित्तान्मे पाप हूँ फट च ते नम । सूर्य सोमो यम कालो महाभूतानि पच्च वै ।।१७ एते शुभाशुभम्येह कर्मणो नय साक्षिण- तत पुनहूँ फडिति पाश्वमूर्ध्वमधस्तथा ॥१८ आत्मान कोषहष्टयाय निरीक्ष्य सुमना भवेत् । एव कृते प्रयमत पापोत्सारणमणि ॥१६ यत् म्याद् दृढतर पाप नद् दूरे चावतिष्ठते । अतीते पूजवे स्थान स्व प्रयाति पुनश्च यन् ॥२० यत् स्यादल्पतर पाप तन्नाशमुपगच्छति । ॐ अ फडितिमन्त्रेण पूजावेदी ततो विशेत् ॥२१ २३० | कालिका पुराण जो पाप पूर्व जन्म में अथवा पूर्व वान में अजित किया है उस दिन में अथवा अन्य किसी दिन में प्रायश्चितो के द्वारा अपनुन्न नहीं किया गया है उस पापका बुद्धि के द्वारा स्मरण करना चाहिए । १५। उस पाप के अपनोदन करने के लिये दो मन्त्री का उच्चारण करे--हे देवि । जो कि एक प्राकृत चित है पाप से आक्राल हो गया था आप मेरे चित्त से उमको उस पाप को निकाल दो-हू पट् आपके लिये नमः स्कार है । पाप-पुण्य के कुछ देव प्रत्यक्ष देखने वाले हैं उनमे सूर्य- सोम-यम-काल और पांच महा भूत ये नौ हैं ॥१६॥१७॥ ये शुभ और সপ্তম कर्म के नौ देव साक्षी होते हैं। इसके अनन्तर 'हूं फट्'- इसके पाव पे-~-उध्व मे और अधो भाग में आत्मा को क्रोध की दृष्टि से निरीक्षण करके सुनना हो जाना चाहिए। ऐसा करने पर प्रथम से पापो के उत्सारण वर्म के दिये जाने पर जो भी दृड तर पाप होना है वह दूर म ही अवस्थित रहा करता है। पूजन के अतीत होने पर जो अपने स्थान को पुन प्रमाण करता है। जो भी अल्प तर पाप हो वह नाश को प्राप्त हो जाया करता है । ॐ अ फट्-इस मन्त्र के द्वारा पजा को बेदी से वह प्रवेश करे ॥१८-२१॥ पूजने त्यक्तपापस्य कामविप्ट क्षणाद् भवेत् । नाराचमुद्रया दृष्टवा समया स प्रलोक्येत् ॥२२ पुष्पनवेद्यगन्धादि ह्रो हूँ फडिति मन्त्रक । वदात्मनानवज्ञात सम्यम् पुष्पादिदूषणम् ॥२३ अस्पृश्यस्पशन वापि वदन्यायाजित च वा। तथा निर्माल्यससृप्ट कीटाधारोहण च यत् ॥२४ तत्सर्वं नाशमायाति नैवेद्यायवलोकनात् । ततो रमितिमन्त्रेण शिखा दीपस्य सस्पृशेत् ॥२५ स तम्य सुमगो दीपो भवेत् म्यनमात्रन. । पतङ्गकोटवे शादि-दाहात प्रव्यादसहत ॥२६ मन्य-माधना के अङ्ग] ૨૧ " वसामज्जास्थिसम्पूनियनादावुपयोजनम् । यज्ञातस्पं तत्सर्वं दोप म्पर्शाद् विनाशयेत् ।।२७ नारसिंहन मन्त्रेण देवतीर्थन मस्पृशेत् । पानीयं घटमध्यम्य वीक्षन्नम्युक्ष्य याजक ॥२८ पूजन में पापो के त्याग कर देने वाले का वो यभीष्ट कामना है वह सण भर में ही हो जाया करता है । नाराच की मुद्रा से देखकर वह ममीप में ही प्रलोकन करे ।। २२ ।। पुष्प-नवेद्य [-गन्ध प्रति मन्त्र से जो अपने द्वारा अवज्ञान न हो। भली भांति से पुष्प आदि का दूपग-पर्ग न करने के योग्य का स्पर्शन- जो अन्याय से अजित होर नथा निर्मात्य में समय जो कीट आदि का भारोहण हो वह ममी नाश की प्राम हो जाता है नैवेद्य आदि के अदलोरन से फिर 'रम्'-इम मन्त्र ने दीप को शिक्षा का सस्पगं करना चाहिए ।। २३-२५॥ उमा वह दीप म्पर्शन मात्र में ही मुमग हो जाता है । पना-कोट-वेग आदि दाह मे-पन्याद मे महत- वमा-मजा-अम्यि सम्पति जो यमादि में उपयोजन है ऐमे यज्ञात प वाला मभी दोप स्पर्म में ही विनाश को प्राप्त हो जाया करता है ॥२६-०७॥ नारसिंह मन्त्र के द्वारा देवतीयं मे सम्पर्श बरे। मानव पो चाहिए कि पट मय म स्थित जन को देखते हुए अम्युगम बरे ॥२८॥ बामेन पापिना धृत्वा वामपावें स्थित तदा । पावमाधारमन्त्रण मम्वुर्वन् मस्पगेज्जलम् ।।२६ यजदानादपेयादि संमृष्टिग्हि मङ्गना । यदन्यद् दूषण पात्रे तोये वा नानदी भवन ॥३० जलाप गदम्पर्शाग्जल म्नानाच्च मननम् । दूषणानि विनश्यन्ति तानि वं देवपूजने ॥३१ २३२ | कालिका पुराण प्रजापतिसुतो हान्तप्रान्त. स्वरसमन्वित । चन्द्रार्धविन्दुसहितो मन्त्रीज्य नारसिंहक ॥३२ स्वसज्ञाद्यक्षर बिन्दुचन्द्रार्घपरियोजितम् । आधारमन्त्र जानीयात् साधक कायसिद्धये ॥३३ तत आधारमन्त्रैण पाणिभ्यामासन स्वकम् । आदाय विनिधायाशु पुन सस्पृश्य पाणिना ॥३४ आत्ममन्त्रेणोपविशेत् तदा तस्मिन् वरासने । दु शिरिपरचितत्वादि यदवान्यासनभूपणम् ।।३५ बांये हाथ से पक्ड कर उस समय वाम पार्व मे स्थित पात्र को आधार मन्त्र के द्वारा सस्कार करता हुआ जल का सस्पर्श करना चाहिए ॥२६।। यहां पर यज्ञ दान से अपेय आदि की ससृष्टि सङ्गता है। जो भी अन्य दूपण पात्र म अथवा जल म ज्ञान पूर्वक हो । शव वे स्पर्श से जलाशय और स्नान से सङ्गत जल से दूषण सब देवपूजन में विनाट हो जाया करते हैं ॥३०-३१॥ हान्त प्रान्त प्रजापति मुन जो म्वर से समन्वित होवे-चन्द्राध विन्दु मे सहित यह नारमिहक मन्त्र है ।। ३२ ।। अपनी सनादि का अक्षर जो विन्दु और चन्द्राधं से परियोजित होवे । इमको कार्य की सिद्धि के लिये आधार मन्त्र साधन जान लेवे ॥३३॥ फिर आधार मन्त्र के द्वारा अपने आसन को हाथो से सार और रघबर शीघ्र ही पाणि में सस्पर्श करे। उम समय में उस अप्ठ आमन पर यात्म मन्त्र के द्वारा उपवेशन बरे। बुरे शिल्पी के द्वारा निर्मित आदि का जो अन्य आसन रेषण होते हैं । वे चिना जाने हुए हो विमय को प्राप्त हो जाता है मन्त्र के सहित उपवेशन से ही विलीन होते हैं ॥३४॥३॥ अमात विलय याति उपवेशात् समन्यवान् । आह्य स्वादार पूर्व सोमसामिमन्वितम् ।।३६ सविन्दुप विजानीयादारममन्त्र तु साधक ।

मन्त्र माघना अङ्ग] ततस्तु मातृकान्यास नादविन्दुसमन्वितम् ॥३७ कुर्यात तु मातृकान्मत्र: स्वशरीरे विचक्षण । कल्पेषु च यदनान मन्त्रोन्चारणकर्मणि ||३८ यद् दुष्ट वा तथा स्पृष्ट मात्राभ्रष्टादिदूषणम् तन्न्यम्ना मातृकामन्या नाशयति सदैव हि ॥६ व्यञ्जनानि च सर्वाणि तथा विष्ण्वादय स्वरा । मवे ते मातृकामन्त्राश्चन्द्रविन्दुविभूपणा ॥४० म युगान्तवन्येपु न्यस्तेषु न्यूनपूरणम् । मन्त्र क्ल्पे च कुर्वन्ति विन्यस्ता मातृका स्वयम् ॥४१ एकमात्रो भवेद्ध्वो द्विमानो दोघं उच्यते । प्लुतम्बिमानो विनयो वर्णा एते व्यवस्थिताः ।।४२ पूर्व में मोम मामि में ममन्वित म्वाक्षर के ममात करके साधन को विन्दु के महित आत्य मन्त्र जानना चाहिए। इस अनन्तर नाद विन्दु मे समन्वित मातृका न्यास र । विवाण पुरुष को अपन गरीर मातृका के मन्त्रों के द्वारा न्याम करना चाहिए । मन्त्रों के उच्चारण क्म में वल्पों में जो अनान होवे । जो भी :प्ट हो नया स्पृष्ट हो और मात्रामओ के प्रष्ट आदि का दाप होवे न्याम रिस हुए मातृका मदा ही उनका नाम कर दिया करते हैं ॥३६-३६।। ममस्त व्यञ्जन नया विष्णु आदि म्यर वे ममी मातृमा यन्त्र हैं जो कि चन्द्र विन्दु रे विपन दाले हैं । १०। मद युगान्न बन्धों के न्यम्न होने पर न्यूनठा की पूप्ति है। विन्याम की हुई मारका स्वय ही मन्त्र में और पल्प में न्यूनता की पूनि कर देती है ।११। निममें एक मात्रा हो वह हम्ब होता है मात्रा ग अयं कम से कम समय होता है। दो मात्रामा वामा म्वर दी रहा जाता है। तीन मावाबों वाला पा दा में अधिर मात्राओं वागा स्वर नुन जानना चाहिए वर्ग इसी प्रकार में मवस्थित होते हैं ॥१२॥ में

२३४
[ पालिका पुराण
सर्वेषामेव वर्णाना मात्रादेव्यस्तु मातृका ।
शिवदतीप्रभृतयस्तन्न्यासास्तत्तनुस्थिता ॥४३
पूरयन्ति च तान् न्यूनाश्चतुर्वर्ग तथाचिरात् ।
ददत्येव सदा रक्षा कुर्वन्ति सुरपूजने ॥४४
चतुर्वर्गप्रदश्चाय सवकामफलप्रद ।
सर्वदामातृकान्यासस्तप्टिपुष्टिप्रदायक ॥४५
य कुर्याद् मातृवान्यास विनापि सुरपूजनात् ।
तस्माद् विभेति सतत भूतग्रामश्चतुर्विध ॥४६
तं द्रप्टुमपि देवाश्च स्पृहयन्ति महौजसम् ।
म सर्वच वश कुर्याद् न च याति पराभवम् ।।४७
सभी वर्गों को मात्रा देवियां ही मातृा है। वे शिवदर्ता प्रभु
तियां हैं। उनर तनु म स्थित उसके पास हैं । ४३ । ये उन न्यूनताओ
की पर्ति किया ररत हैं तथा शीघ्र ही चतुवग को देती हैं और सुरों में
पूजन मे सदा ही रक्षा किया परती हैं । ४४ । सवदा मातृभा का
न्यास वरना धर्मावाम मोक्ष पार कणों का प्रदान करने वाला होता
है और ममी वामनाओ को देने वाला है। तथा यह तुष्टि और पुष्टि का
भो दन वाना होता है । ४५। जो मनुष्य मुरो ये पूजन के बिना भी
मातृया पाण्याम दिया करता है। उसस चारो प्रकार या भूतों पर
गमूह निरलर भयभीत रहा करता है । ४६ । उम महान् ओज वाले
पुष्प रे दर्शन करन के लिये देवगण भी स्पृहा विया परते हैं। उममें
मी विसधाण शक्ति ममुहान हो जाती है कि कह गयको अपने वश
में पर सिया परता है और स्वयं अभी भी पराभव को प्राप्त नहीं होता
है।11
युमुम विष्णुम पण अंगुरपग्रेण माधव ।
यिमदंशा गरणीयान् परशोधनयमणि ॥
उपान्न गामि पन्द्रेण र जित न्यगयुत ।
।

मन्त्र-माधना के बन]
२३५
रुद्रान्तोपरिसंसृप्टो मन्त्रीज्यं वैग्मवो मतः ॥४६
प्रासादेन तु मन्त्रण बंगुल्यग्रेण साधकः ।
गृहीत्वा च ततः कुर्यात कराम्यां पुष्पमर्दनम् ।।५०
निमयेत् कामवीजेन जिद्मद् ब्राह्मण तत् पुनः ।
प्रासादेन परित्यागो दिश्यशान्यां विशेषतः ॥५१
एव कृते तु करयोविशुद्धिरतुला भवेत् ।
जलोकागूढपादादिस्पर्शाच्द्धिविगोधनात् ॥५२
दुर्गन्ध्युच्छिष्टसंम्पर्शाद दूषणं करयोस्तु यन् ।
अज्ञानस्पं तत्मवं नाशयेत् मुविधानतः ॥५३
अंगुल्यग्राणि शुद्धानि पुप्पाणां ग्रहणाद् भवेत् ।
तलद्वयं मर्दनात तु विशुद्धमभिगायते ।।५४
निमंन्धनान् पाणिपृष्ठ प्राणान्नामाग्रमुत्तमम् ।
नार्यानि च ममायान्ति नासिकाया करं प्रति ।।५५
तस्माद यत्नेन कार्याणि कर्माण्येतानि भैरव ।
पान्नादिवासुदेवेन वर्णनापि च हितः ।।५६

करों के [ कालिका पुराण एवं उच्छिष्ट के संस्पर्श मे दूषण होता है। वह सब अज्ञात रूप वाता है उसका सुन्दर विधान से विनाश कर देता है । ५३ । पुष्पों के ग्रहण करने से अगुलियो के वन भाग शुद्ध हो जाते है और करो के दोनो तले पुप्पो के मर्दन से विशुद्धि को प्राप्त होते हैं । ५४ निर्मञ्छन करने से पृष्ठ भाग और धाण करने में नासिका का अग्र भाग उत्तम होता है। सभी तीर्घ नासिका मे और करके प्रति समापात होते हैं । । ५५ । हे भैरव ! इस कारण से ये कार्य यलो के साथ करने चाहिए। प्रान्तादि वासुदेव के द्वारा और वर्ण से भी संहित होवे ॥५६॥ शम्भुचूडाविन्दुयुक्तः प्रासादश्च स उच्यते । कामवीज तु विज्ञेयं वासुदेवेन्दुविन्दुभिः ॥५७ व्यम्जन चाचदन्तं च नान्तदन्त्या तु पूर्वकम् । आद्यदन्त्यद्वयं पश्चाद् व्यञ्जनं प्रणवात्तरम् ।।५८ ग्रहह्मवीजमिदं प्रोक्त सर्वपापप्रणाशनम् । प्रगावं दीर्घमुच्चार्य प्रथम मुखशुद्धये ॥५६ पामुदेवस्य योजेन प्राणायाम समाचरेत् । यस्प देवस्य यद्रूप तथा भूषणवाहनम् ॥६० तदेव पूजने तस्य चिन्तयेत् पूरकादिभिः । यंष्णवीतस्त्रमन्त्रस्य कण्ठाय परपुर सरम् ॥६१ तद्बीज वासुदेवस्य पूर्णचन्द्रनिभ सदा । गहावतारवीजन प्रथमं धेनुमुद्रया ॥६२ अमृतीकरणं पुर्यास्पंपात्राहिते जसे । गमिषल्यतः कष्टपः पञ्चमीवलपीजकः ॥६३ माया और पितु गोमुतोमा परमाद हाजा हैं। वासुदेव हिन्दुओ से कई यो जानना चाहिए । ५७ जन राय और भार सय र तपापी माया मम रोचे गिरे ना में प्रश- पत्र मा सय मन्त्र-साधना के अङ्ग ] २३७ पापो का विनाश करने वाला है। मुख की शुद्धि के लिये प्रथम दीर्घ प्रणव का उच्चारण करे । वासुदेव के बीज के द्वारा प्राणायाम का समाचरण करे। जिस देव का जो भी रूप हो वैसा ही भूषण और वाहन होना चाहिए ।। ५५-६० ॥ उसके पूजन में वह ही पूरक आदि के द्वारा चिन्तन करना चाहिए । वैष्णवी तन्त्र मन्त्र का वायु पुरःसर कण्ठाद्य वह वासुदेव का वीज है जो सदा पूर्ण चन्द्र के सदृश है। प्रथम गङ्गावतार वीज से धेनु मुद्रा के द्वारा अर्घपात्र के अहित जल में अमृती- करण करना चाहिए । चन्द्र के खण्ड से युत कण्ठय पञ्चमी वल वीजक है ॥६१-६॥ गङ्गावतारमन्त्रोऽयं सर्वपापप्रणाशकः। मात्राद्वययुतो विष्णुर्बलवीजमुदाहृतम् ॥६४ अमृतीकरणे वृत्ते तोयं यद् दीयतेऽमृतम् । भूत्वा प्रयाति देवस्य पीतये सुरपूजने ॥६५ गङ्गापि स्वयमायाति पूजापानजलं प्रति । अमृतीकरणं कुर्याद् धर्मकामार्थमिद्धये ॥६६ स्वस्तिकं गोमुखं पद्मर्धस्वस्तिकमेव च । पर्यङ्कमासन शस्तमभीप्टसुरपूजने ॥६७ पादयन्त्रमिदं प्रोक्तं सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमम् । तद् गृह्णीयाद् वराहस्य वीजेन प्रथम घुधः ॥६८ मायादिरग्निवीजस्य चतुर्थः समव्याप्तिक. । पप्ठस्वरोपरिचरो वाराह वीजमुच्यते ॥६६ वाराहवीजसंथुद्ध मन्त्रपादद्वये कृतम् । पश्यन्न भीष्टदेवं तु पाददोपं न पश्यति ।।७० यह गङ्गावतार बीज है जो सब पापो के प्रणाश करने वाला है। दो माताओ से युत विष्णु बल वीज उदाहृत किया गया है ॥६॥ ममृतीकरण के होने पर जो जल दिया जाता है-यह अमृत होकर सुगे २३० [ कासिता पुराण घे पूजन म देवता की प्रीति के लिय जाया करता है । ६५। पूजा के मात्र के जल को और गङ्गा मी स्वय आ जाया करती है। धर्म- काम और अर्थ की सिद्धि के लिये अमृतीवरण करना चाहिए ।। ६६ ॥ अभीष्ट सुर पूजन में स्वस्तिक-गोमुख-~-पद्म---अर्धस्वस्तिक- पर्य- आसन प्रशस्त होते हैं । ६७ । यह पाद यन्त्र कहा गया है जो सब मन्त्री से स्वत्युत्तम है । दुध पुरुष को उसे प्रथम वराह के वीज के साथ प्रथम अहण करना चाहिए। ६८ । अग्नि वीज काया यादि समस्याप्तिक चतुर्थ छठवें स्वरोपरिचर वराह वाज कहा जाता है । ६६ । मन्त्र के दो पादो मैं विया हुआ वाराह बीज संशुद्ध है। अभीष्ट देव का दर्शन करत हुए पाद रोप को नहीं देखा करता है । ७० । न युक्यमन्यथा पाददर्शन सुरपूजने । मन्त्रेण लभतेऽभीष्टास्तस्मान्मन्नपरो भवेत् ॥७१ पाणिकच्छपिका कुर्यात् कर्ममन्त्रेण साधक ।, तत्र सस्कृतपुष्पेण पूजयेदात्मनो वपु ॥७२ पूजिते तेन पुष्पेण देवत्व स्वस्य जायते । द्वितीय वैष्णवीतन्त्र वीज विन्द्विन्दुसयुतम् ।।७३ पष्ठस्वरोपरिचर कूमवीज प्रकीर्तितम् । दहनप्लवनस्यादौ रन्ध्रस्य दशमस्य तु ।।७४ भेदन साधक कुर्यान्मत्रेण प्रणधेन तु । वीजेन वासेदेवस्य आकाशे विनिधापयेत् ॥७५ प्राणेन सहित वीज ततपूर्व प्रतिपादितम् । अज्ञाता प्रयताना तु मण्डलस्थानमार्जनात् ।।७६ द्रव्याणा विप्रकार स्यात् ससर्गाणा तथंव च । मधुकैटभयोमॅद सघात ढता गता ।।७७ अन्य प्रकार से सुरो के पूजन मे पाद दर्शन युक्त नहीं होता है । मन्त्र के द्वारा ही अभीष्टो का लाभ दिया करता है। इस कारण से मन्त्र r -

मन्त्र-साधना के बङ्ग]
में ही नहार होना चाहिए 1311 साधना ऋग्ले दान पृप को कर्म
मन्त्र के द्वारा कर की बतिया दनादं । वहाँ पर मम्बार विह
पुष में पनं मरीर का पूजन करे । उस पृष के द्वारा पूरित
होने पर करने वाली देवव हो जादा है। दूरय ६वी नन्त्र दोष है
जो दिन्दु-इन्दु में मयुट है । ७१ परम्पर के द्वारिचर कुन दौत्र
कोन्टि किया गया है। दहन गौर. पदन के यादि में दम रन्थ का
भेदन माघ को प्रगद मन्त्र के द्वारा भेदन करना चाहिए। वासुदेव में
दौत्र के द्वारा माकाय में विनिधारित कर 101121 प्रसव के सहित
वीर है वह मद प्रदिशदिल कर दिया है। प्रयतों का बहाना मटन
के स्थान के मान में द्रों का दया मंगों का विकार होता है।
मधु कंगम का भेद मकानों को प्राप्त हुई IITRI
मेदिनी सर्वदा मुद्धा मुरपूजामु मवंतः ।
अद्यापि न विदना न स्पन्ति पदा क्षितिम् ॥
न च वीयतनुन्टायां योजन्ति च भूतले ।
तस्य दीपस्य मोक्षार्ग मन्त्रराजंलिन् क्षिती ITE
प्रोमजा वीक्षवाद वापि गुदा भवनि मेदिन ।
वीस धर्मबीजेन स्पष्टिलल्य समाचरेत् ।।८०
दान्ती बलेन सयुक्तम्चदाविन्दुनमन्दिनः ।
घमंबोजमिति प्रोक्न धर्मकामार्गमाधनम् ।।८१
दादानं धारण चैव तया मुस्थानबूजने।
पूरनं मलिलेनव निक्षेपो गन्धपुष्पयोः ॥८२
मन्टलम्याय विन्यामः पुनः पूष्मत्य मुश्रयः ।
ममृतीकरण मात्रातिपनिरियं नः ।।
आनिम्न चादाय वन्त्रमन्न धारणम् ।
पात्रे तु मन्दसन्यासं वाग्दोजाग्रेन पोरबंद ॥४
मृगेगी दालों में सर पर मदा मंदिनी गुदा होती है।

[ कालिका पुराण के पूजन में देवता की प्रीति के लिये जाया करता है । ६५ । पूजा व मात्र के जल की ओर गङ्गा भी स्वय आ जाया करती है। धर्म- काम और अर्थ की सिद्धि के लिये अमृतीकरण करना चाहिए ।। ६६ ॥ अभीष्ट सुर पूजन मे स्वस्तिक-गोमुख-पद्म---अर्धस्वस्तिक-पर्य-- आसन प्रशस्त होते हैं । ६७ । यह पाद यन्त्र कहा गया है जो सब मन्त्री से स्वत्युत्तम है । दुध पुरुष को उसे प्रथम वराह के बीज के साथ प्रथम प्रहण करना चाहिए । ६५ । अग्नि बीज काया यादि समव्याप्तिक चतुर्थ छठवें स्वरोपरिचर व राह वाज कहा जाता है । ६६ । मन्य के दो पादो मैं क्यिा हुआ वाराह बीज संशुद्ध है। अभीष्ट देव का दर्शन करत हुए पाद रोप को नहीं देखा करता है । ७० । न युक्यमन्यथा पाददर्शन सुरपूजने । मन्त्रेण लभतेऽभीष्टास्तस्मान्मन्त्रपरो भवेत् ॥७१ पाणिकच्छमिका कुर्यात् कूर्ममन्त्रेण साधक ।। तत्र सस्कृतपुष्पेण पूजयेदात्मनो वपु ॥७२ पूजिते तेन पुष्पेण देवत्व स्वस्य जायते । द्वितीय वैष्णवीतन्त्र वीज विन्द्विन्दुसयुतम् ॥७३ पष्ठम्वरोपरिचर कूमवीज प्रकीर्तितम् । दहनप्लवनस्यादौ रन्ध्रस्य दशमस्य तु ।।७४ भेदन साधक कुर्यान्मनेण प्रणधेन तु । बीजेन वासेदेवस्य आकाशे विनिधापयेत् ।।७५ प्राणेन सहित वीज ततपूर्व प्रतिपादितम् । अज्ञाता प्रयताना तु मण्डलस्थानमार्जनात् ॥७६ द्रव्याणा विप्रवार स्यान ससर्गाणा तथैव च । मधुकैटभयोगेंद सघात ढता अन्य प्रकार से सुरो थे पूजन में पाद दर्शन युक्त नहीं होता है। मन्न रे द्वारा ही अभीष्टी का लाभ किया करता है । इस कारण से मन्त्र . गता ॥७७

मन्य-साधना के अङ्ग
२३६
मेही तत्पर होना चाहिए । ७१। साधना करने वाले पुरुष को कर्म
मन्त्र के द्वारा कर की कच्छपिका वनावे । वहाँ पर सस्कार किये हुए
पुष्प मे अपने शरीर का पूजन करे । ७२ । उस पुष्प के द्वारा पूजित
होने पर अपने आपको देवत्व हो जाता है। दूसरा वैष्णवी तन्त्र बीज है
जो बिन्दु-इन्दु से सयुत है १७३ । पष्ठ स्वर के उपरिचर कूर्म वीज
कीर्तित किया गया है । दहन और प्लवन के आदि मे दशम राधू का
भेदन साधक को प्रणव मन्त्र के द्वारा भेदन करना चाहिए। वासुदेव के
वीज के द्वारा आकाश मे विनिधापित करे । ७४१ ७५ । प्रणव के सहित
वीज है वह सब प्रतिपादित कर दिया है । प्रयतो का अज्ञाता मण्डल
के स्थान के मार्जन से द्रव्यो का तथा, ससर्गों का विप्रकार होता है।
मधु कैरभ को भेद सघातो को प्राप्त हुई ॥१७६१७७।।
मेदिनी सर्वदा शुद्धा सुरपूजासु सर्वतः ।
अद्यापि सर्वे त्रिदशा न स्पृशन्ति पदा क्षितिम् ॥७८
न च स्वीयतनुच्छायां योजयन्ति च भूतले ।
तस्य दोपस्य मोक्षार्थ मन्त्रराजं लिखेत् क्षितौ ॥७६
प्रोक्षणाद् वीक्षणाद् वापि शुद्धा भवति मेदिन ।
वीक्षणं धर्मबीजेन स्थण्डिलस्य समाचरेत् ।।८०
दान्तो वलेन संयुक्तश्चडाबिन्दुसमन्वितः।
धर्मवीजमिति प्रोक्तं धर्मकामार्थसाधनम् ।।८१
आदानं धारणं चैव तथा सस्थानपूजने।
पूरणं सलिलेनव नि.क्षेपो गन्धपुप्पयोः ॥८२
मण्डलस्याथ विन्यासः पुनः पूप्पस्य सश्रयः ।
अमृतीकरणं मात्रप्रतिपत्तिरियं नरः ॥८३
आनिरुद्ध न चादाय अस्त्रमन्त्रेण धारणम् ।
पाने तु मण्डलन्यासं वाग्बीजाग्रेण योजयेत् ॥८४
सुरो की पूजाओ मे सब ओर सर्वदा भेदिनी शुद्धा होती है ।
.

२४० [ कालिका पुराण आज भी समस्त देवगण क्षिति को पद से स्पर्श नही दिया करते हैं । 1७८ । और अपने शरीर की छाया को भूतल मे योजित नहीं किया करते हैं । उस दोष के मोक्ष के लिये क्षिति पर मन्त्र राज को लिखना चाहिए । ७६ । प्रोक्षण करने से अथवा वीक्षण से भी भेदिनी-शुदा हो जाया करती है। स्थण्डिल का घोक्षण धर्म बीज के द्वारा समाचरण करना चाहिए ।।दान्त बल से सयुक्त और चूड़ा विन्दु से समन्वित धर्म यीज कहा गया है जो धर्म-काम और अर्थ का साधन होता है। 1८१ आदान-धारण तथा सस्थान-पूजन सलिल से ही पूर्ण-गन्ध और पुष्प का नि.कोप-भल का विन्यास और पुनः पुष्प का संथय- अमृतीकरण यह पात्र प्रति पत्ति है। मनुष्य आति रुद्ध के द्वारा आदान करके अस्त्र मन्त्र से धारण करें और पा में वाग्वीजान से मंडल न्यास योजित करे ॥८२-८४॥ आनिरुद्ध भवेद्वीजमाद्य विन्दुद्वयोत्तरम् ।' फडन्तेनानिरुद्धं तु अस्त्रमन्त्रं प्रकोर्तितम् ॥८५ शम्भुराधवलः प्रान्तः सम्पूर्णा सहिता इमे। परतः परतः पूर्व समाप्त्यन्ताः सविन्दुकाः॥४६ तृतीयं वाग्भवं योज सकलं निष्कलाह्वयम् । स्वरश्चतुर्थः सकलः संसृष्टी विन्दुनेन्दुना १८७ वर्गाद्यादिद्वितीयं तु वाग्भवं वीजमुच्यते । कामराजाहवयं चैतद् धर्मकामार्थसाधनम् ।।८८ मनोभवस्य चीजे तु कुण्डलोशक्तिसंयुतम् । वासुदेवेन सम्पृक्नमाद्यं वाग्भवमुच्यते ।।८६ इदं सारस्वतं नाम यदाचं वाग्भवं स्मृतम् । एक कामवीजादि त्रिभिस्तु त्रिपुरामहः ।।६० आवं तृतीयं सामीन्दुविन्दुम्य. समलकृतम् । मदनस्य तु मन्त्रोऽय कामभोगफलप्रद. १ मत्र-साधना के अग ] २४१ आद्य विन्दु दो के उत्तर अनिरुद्ध वीज होता है । वह आनिस्द जब फ्ट अन्त में होना है तो अस्त्र मन्त्र कहा गया है ।८५। शम्भु आद्यवल प्रान्त. सपूर्व ये सहिता है । पर से पर मे पूर्व समाप्ति के अन्त वाले विनु के सहित तीसरा वाग्भव वीज है यह सक्ल निष्कल नाम वाला है। चतुर्थ स्वर सकल्प ससृष्टि मे विन्दु से और इन्दु से वर्गादि का शादि द्वितीय तो वाग्भव वीज वहा जाता है। और यह कामराज नाम वाला है जो धर्म--आ और काम का साधन होता है ॥८६॥ 11८७||८|| मनाभव का चीज कुण्डली शक्ति से सयुत होता है । वह वासुदेव से सम्पृक्त होता है। बाद्य बाग्मव कहा जाया करता है । यह सारस्वत नाम का है जो आद्य वाग्भव कहा गया है । एक एक काम वीज आदि तीनो स ता त्रिपुरामद है । आद्य-तृतीय सामीन्दु विन्दुओ से समलकृत है-यह मदन का मन्त्र है जो काम के भोग का फल प्रदान करने वाला है 1800१॥ बौदेतोरूपविन्यस्त यन्त्र भास्करसन्निभम् । तद् वक्ष्ये कुण्डलीशक्तिमभेदात् तु निगद्यते ॥६२ भूतापसारण कुर्यान्मन्त्रेणानेन याजक | यस्मिन् कृते स्यानभूता दूर यान्ति सुराने ॥६३ स्थितेषु तव भूतेपु नवेद्यमण्डल तथा । विलुम्पन्ति सदा लुब्धा न गृह्णन्ति च देवता ॥६४ तस्माद् यत्नेन कतव्य भूतानामपसारणम् । अस्त्रमन्त्रेण सहित तस्य मन्त्रमिद स्मृतम् ।।६५ अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमिपालका । भूतानामविरोधेन पूजाकर्म करोम्यहम् ॥६६ अनेन स्थण्डिलाद् भूतानपसार्याथ साधक. । ततो दिग्वन्धन कृत्वा दिग्म्यस्तानपसारयेत् ॥६७ विष्णुवीज फडन्त तु मन्त्र दिग्वन्धने स्थितम् ।

२४२ [ पालिका पुराण करेण छोटिकापूर्व वष्टन बन्धन टिश ६८ ओत्--ऐत के स्पस विन्यस्त य. भास्कार के सदृश है । उसको मैं बतलाऊँगा जो कि कुण्डली की शक्ति है । अभेद से वही जाती है ॥६॥ माजक इम म.प्र के द्वारा भूतो का अपमारण करे । इसके करने पर स्थान भूत जो हैं वे सुगर्चन के समय में दूर चले जापा करते हैं । ६३ । भूनी के वहाँ पर स्थित रहने पर सदा ही वे लुब्धक नैवेद्य मण्डल को विशेष रूप से लुप्त कर दिया करते हैं और देवता उस का ग्रहण नहीं किया करते हैं । ६४। इस कारण से यत्न पूर्वक भूतों का अपसारण करना ही चाहिये । वह अपसारण अस्त्र मन्त्र के सहित ही करे। उसका मन्त्र यह कहा गया है ॥६॥ वे भूत इस भूमि के पालक होवे । मैं भूतो वे अविरोध के द्वारा ही पूजा कर्म कर रहा हूँ । । ६६ । साधक इसके द्वारा स्थण्डिल से भूता को अपसारित करके इसके पश्चात दिग्बन्धन करके उनको दिशाओ भी अवसारित कर देवे । ।६५। जिसके अन्त मे फट् हो ऐसा विष्णु वीज दिग्व-धन मे मन्त्र स्थित होता है। करके द्वारा स्फोटिका युक्त ही है ॥३॥ आत्मन पूजमेनाथ कारम्भाधिकारिता। पूजित चासन योगपीठस्य सदृश भवेत् ॥६६ स्वभावत सदा शुद्ध पञ्चभूतात्मक वपु । मलपूतिसमायुक्त श्लेष्मविण्मूपिच्छिलम् ॥१० रेतोनिष्ठीवलालाभि स्रवद्भिरपरिप्कृतम्। वीजभूतानि चैतस्य महाभूतानि पञ्च वै ॥१०१ तेपा तु सर्वभूताना वीजाना देहसङ्गिनाम् । वायुतेज पृथिव्यम्भोवियता शुद्धये कमात् ॥१०२ शोषण दहन भस्मप्रोत्सादोऽमृतवर्पणम् । आप्लावन च कर्तव्य चिन्तामानविशुद्धये ।।१०३ अण्डस्य चिन्तनाद् भेदात्तन्मध्ये देवचिन्तनात् ।

मन्त्र-माधना के अङ्ग] २४३ - स्वकीयस्येप्टदेवस्य चिन्ता सर्वात्मना भवेत् ।।१०४ सोऽहमित्यस्य मनत चिन्तनाद् देवरूपता । आत्मनो जायते सम्यक् सस्कृति पुप्पदानत ॥१०५ अपनी आत्मा के पूजन के द्वारा ही कर्म के आरम्भ करने को अधिकारिता प्राप्त हुआ करती है। और पूजित मासन योग पीठ के सदृश हो जाया करता है । ६६ । यह पांचो भूतो के स्वरूप वाल वपु स्वाभाविक वाल पपु स्वाभाविक रूप से सदा ही अशुद्ध होता है। यह मल की पूर्ति से समायुक्त है और श्लेप्मा-विट् -मूत्र- -इनमे पिच्छल राहा करता है । १००। वीर्य-धूक-लार जो स्राव करतो रहा करती है यह शरीर अपरिष्कृत रहा करता है। इस शरीर के वोज भूत ये पांच महा भूत होते हैं । १०१। उन समस्त मूतो का जो देह की सङ्गी हैं और बीज है । जो वायु-तेज-पृथ्वी-जल और आवारा है इनकी शुद्धि के लिय क्रम से शोषण- दहन-भस्म-प्रोत्साद- अमृत वर्षण और आप्लवन करना चाहिए जो कि चि ता मोन की विशुद्धि के लिये है । १०२।१०३ । अण्ड के चिन्तन स-भेद स उसके मध्य में देव वा चिन्तन से–स्वकीय इष्टदेव को चिन्ता सर्वात्म रूप से होती है । १०४ । मैं वही हूँ-इसका निरन्तर चितन करने से दव स्पता होती है। जो कि आत्मा को हा जाती है । भली भांति पुष्पा से सस्कृति होती है ॥१०॥ अह देवोऽय नैवेद्य पुप्पगन्धादिक च यत् । पूजोपकरणार्थं च देवत्वमिह जायते ।।१०६ देवाधारो ह्यह देवो देव देवाय योजयेत् । सर्वेपा देवतासृष्टया जायते शुद्धतापि च ।।१०७ मनोजीवात्मनो शुद्धि प्राणायामेन जायते । अन्तर्गत यच्च मल तच्च शुद्ध प्रजायते ॥१०८ गृहे चेन पूजयेद् देव तदा तस्य विलोकनम् । के दान २४४ [ पालिका पुराण . कुर्यादादित्यवीजेन चतु पाश्यप्वपि क्रमात् ॥१०६ हान्त समाप्तिसहितो वह्निवीन सहित.। उपान्त सचतुर्थस्तु स तथा सकलोऽग्रत ॥११० आदित्यवीज कथित सर्वरोगविनाशनम् । धर्मार्थकाममोक्षाणा वारण तोपदायकम् ।।१११ अशुद्धपक्षिसयोग-पक्षिविप्ठानसेचने । मूषिकाणा तथा स्पर्श कृमिकोटादिसगम ||११२ एवमादीनि नश्यन्ति लोकनाद् गृहदूषणम् । ततस्तु योगपीठस्य ध्यान प्रथमतश्वरत् ॥११३ मैं देव हूँ-ऐसा सस्कार हो जाता है। इसके अनन्तर जो नैवेद्य और पुष्प गन्ध आदिक हैं और जो भी पूजा के उपकरण के लिये हैं यहाँ पर देवत्व हो जाता है । १०६ । देव आधार है मैं देव हूँ। देव देव के लिये योजित करे। सवको देवता की सृष्टि से शुद्धता त्पन्न हो जाया करती है । १०७। मन और जीवात्मा की शुद्धि प्राणा- हुआ करती है। अन्तगत जो भी मल है वह भी शुद्ध हो जाता है । १०८ । गृह मे य द देव का यजन करे तो उस समय में उसका बिलोकन करना चाहिये । और आदित्य वीज के द्वारा क्रम से चारो पाश्चों में करे । १०६ । हान्त समाप्ति से सहित और वह्निवीज से सहित होवे । चतुर्थ के सहित उपान्त वह सकल आगे हो-यही आदित्य वीज कहा गया है जो कि समस्त रोगो का विनाश करने वाला है। धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष का कारण है और सन्तोप देने वाला है ॥११०॥१११॥ किसी अशुद्ध पक्षी का सयोग-पक्षी की निष्ठा का प्रसेचन तथा मूमकाओ का पश एव कुभि और कीट आदि का सङ्गम एवमादि दोप नष्ट हो जाया करते हैं लोवन करने मात्र से ही इनका विनाश होता है और यह दूषण नष्ट हो जाया करता है । इसके अनन्तर प्रथम योग पीठ मा ध्यान का समाचरण करना चाहिए ॥११॥११३।। भी समु. याम से

मन्त्र-साधना के अङ्ग]
२४५
ध्यानमात्र योगपीठ प्रविशत्येव मण्डलम् ।
योगपीठे स्मृते मर्व योगपीठमय समम् ॥११४
न योगपीठादधिक विद्यते परमासनम् ।
यस्य ध्यानाज्जगद् व्याप्त सचराचरमानुपम् ॥११५
तचिन्तनस्य माहात्म्य को वा वक्तु समुत्सहेत् ।
चिन्तामानेण मानुप्य पश्य शोकविनाशनम् ॥११६
धारणाद् योगपीठ तु चतुर्वर्गफलप्रदम् ।
शुद्धस्फटिकसकाश चतुष्कोण चतुर्वृतिम् ।।११७
आधारशक्त्या विहित प्रग्रह सूर्यसन्निभम् ।
आग्नेयादिपु कोणेषु चतुर्यु नमत स्थितम् ॥११८
धर्मो ज्ञान तथैश्वर्य वैराग्य मत सदा।
पूर्वादिदिक्षु चंतानि स्थितानि मतो यथा ॥११६
योग पीठ का ध्यान मात्र ही पर्याप्त है। इसी से योग पीठ
मण्डल में प्रवेश किया करता है। योगपीठ के स्मरण करने पर सव
योग पीठ मे परिपूर्ण सम हो जाता है ॥११४॥ योग पीठ से
परमोत्तम अन्य कोई भी आसन नहीं हुआ करता है। जिसके ध्यान से
यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है जिसमे जर चेतन मनुष्य सभी हैं । उसके
चिन्तन का वडा भारी माहात्म्य है जिसके वहने का उत्साह कौन कर
मकता है। उसके चिन्तन भर से ही देखो मनुष्यो के शोक विनाश हो
जाया करता है । ११६ । योग पीठ में धारण करने से तो चतुंवर्ग के
पन का वह प्रदायक होता है । अव उमके ध्यान एव रिनन का प्रकार
बतलाया जाता है-वह विशुद्ध स्फटिक मणि के सदृश है-चतुष्कोण है
और चार वृत्तियो वाला है । आधार शक्ति से विदित प्रग्रह वाला है
तथा सूर्य के समान है । आग्नेय आदि चारों कोनो मे क्रम से सदा ही
धर्म-ज्ञान-ऐश्वर्य और वैराग्य स्थित रहा करते हैं। पूर्व आदि दिशाओ
में ये निम्नलिखित क्रम से स्थित रहा करते हैं ॥ ११७-११६ ।।

२४६
[पासिरा पुराण
अधर्मश्च तथाजानमनश्वर्य तत परम् ।
अवराग्य पर तम्मादारणार्थ व्यवस्थितम् ।।१२०
तस्योपरि जलीघस्तु तस्मिन ब्रह्माण्डमास्थितम् ।
ब्रह्माण्ड भ्यन्तरे तोय मस्तस्योपरि स्थित ॥१२१
कूर्मोपरि तथानन्न पृथ्वी तस्योपरि स्थिता ।
अनन्तगावसयुक्त नाल पातालगोचरम् ॥१२२
पृथ्वीमध्ये स्थित पद्ग दिवपन गिरि शरम ।
रास्याष्टदिक्षु दिक्पाला स्वर्गो मध्य व्यवस्थित ॥१२३
रणिकाया ब्रह्मला महर्लोकादयो ह्यध ।
स्वर्गे ज्योतीपि देवाश्च चतुर्वेदास्तदन्तरे ॥१२४
सत्त्व रजस्तम इति गुणा प्रतिसम्भवा ।
सदा स्थिता पद्ममध्ये पर तत्त्व तथैव च ।।१२५
आत्मतत्त्व तत्र सस्थमूघ्वच्छदनमूधत ।
अधोऽधश्छदन तत्र केशराग्रे स्थित पुन ॥१२६
अधर्म-अज्ञान-अनश्वर्य-अवराग्य हैं इससे धारणार्थ व्यव•
स्थित हैं ।। १२० ॥ उसके ऊपर जल का समुदाय है । उमम ब्रह्माण्ड
जास्थित है उस ब्रह्माण्ड के भीतर जल है। उसके ऊपर वूम स्थित है
॥१२१॥ उस कूम ऊपर अनन्त है और उसके ऊपर यह पृथ्वी
स्थित है। अनन्त के शरीर से संयुक्त एक नाल है। जो पाताल तक
गोचर होता है ॥ १२२ ॥ पृथ्वी के मध्य मे एक पद्म स्थित है जिसके
दल दिशाएं हैं और गिरि उसका केशर है। उसके आठ दिशाआ म
दिनमाल हैं और मध्यभाग मे स्वग अवस्थित है ।। १२३ ।। उस पद्म
की कणिका मे ब्रह्मलोक है। उसके नीचे भाग में महर्लोक आदि है।
स्वर्ग मे ज्योतिर्गण हैं और देवगण हैं। उनके अन्तर म चारो वेद हैं
।। १२४ ।। रज-मत्व-तम ये तीन गुण है जो प्रकृति से समुद्गत हैं ।
ये मदा ही पद्म के मध्य में स्थित हैं और तथा परतत्व है ॥ १२५॥

मन्त्र-माधना के अङ्ग ]
वहाँ पर आत्म तत्व हैं मम्यिा है जो कछदन है जो ऊपर की ओर
है । अघ छदन है जो नीचे की ओर है वहां पर केशर के अग्र भाग में
पुनः स्थित है ।।१२६॥
मूर्याग्निचन्द्रमरुता मण्डलानि क्रमात् ततः ।
शावासन योगपीठे सुखासनमतः परे ॥१२७
आराध्यासनमस्माच्च ततश्च विमलासनम् ।
मध्ये विचिन्तयेत मर्व जग मचराचरम् ॥१२८
ब्रह्मविष्णुशिवारचंव भागत्रयविनिश्चितान् ।
आत्मान चिन्तयेत् तत्र पूजने समुपस्थितम् ।।१२६
मण्डलं योगपीठं तु पद्म पद्म तु चिन्तयेत् ।
शावादीन्यामनानीह चत्वार्यपि विचिन्तयेत् ।।१३०
योगपीठ पृथग्ध्यात्वा मण्टलेन सहेकताम् ।
पुनत्विा ततः पश्चात् पूजयेदासन ततः ।।१३१
घ्यानेन योगपीठस्य यथा यद्दीयते जलम् ।
नैवेद्यपुष्पधूपादि तत् स्वय चोपतिप्टते ।।१३२
मर्वे देवाः सगन्धर्वा सचराचरगृह्यका ।
चिन्तिता. पूजिताश्च स्युर्योगपीठम्य पूजने ।।१३३
इमके अनन्तर मूर्य- अग्नि-चन्द और मम्त के मण्डल क्रम
मे हैं । योग पीठ म शव का आमन है और इसके या मे मुखासन है
फिर आराध्य आमन है और इससे पर मे विमलामन है। मध्य में
मम्पूर्ण इस चराचर जगद का विशेष चिन्तन करना चाहिए ।। १२७-
१२८ ।। वहां पर तीन भागों में विनिश्चित हुए ब्रह्मा-विष्णु और
शिव या चिन्तन करना । वहाँ पर अभ्यर्चन करने मे ममुपस्थित
अपने आपका चिन्तन करे ।। १२६।। मण्डल-योमीठ और पद्म का
चिन्तन करना चाहिए । जव आदि के चारों आसनों का भी यहां पर
चिन्नन करे।। १३०। इसके उपरान्त योग पीठ राधान करके मण्डल

२४० [ वालिया पुराण के माध एकता का पुन घ्यान बरे। इसके पीछ आसन का यजन वर ॥ १३९ ॥ योगपीठ के ध्यान के द्वारा जो जिम प्रभार म जन दिया जाता है और नैवेद्य-पुष्प-धूप आदि स्वय हो वहाँ पर उपस्थित हो जाया करते हैं ।। १३२ ॥ योग पीठ के पूजन म गन्धर्वो वे सहित मद देवगण और चर-अचर--गुह्यक मभी चिन्तित और पूजित हो जाया वरते है ।। १३३ ।। अभीष्टदेवतापूजा विना यस्य विचिन्ननात् । लभते व चतुर्वर्ग तुष्टि पुष्टिश्च जायते ।।१३४ आवाहनानन्तरत पाणिभ्यामवतारयेत् । नागुत्तानी करौ कृत्वा ऊर्ध्वमुक्षिप्य सान्तरो ॥१३५ निरन्तरावध कुन्निामयन् पूजकस्तथा। हेरम्वस्य तु वीजेन तस्मादवतरेति च ॥१३६ आनंडितेन चाभीष्टदेवाना लम्वनाय वै । नासिकावायु नि साराद्वियत्स्था देवता भवेत् ।।१३७ एव कृते मण्डले तु स्थितिस्तस्य प्रजायते । म्वान्त शुद्धाशुविन्दुभ्या हैरम्ब वीजमुच्यते ।।१३८ नाशन विघ्नवोजाना धर्मकामार्थसाधनम् । गन्धपुष्पे तथा धूपदीपौ नैवेद्यमेव च ।।१३६ यदन्यद दीयते वस्त्रमलकारादिक च यत् । तेपा देवतमुच्चार्य कृत्वा प्रोक्षणपूजने ।।१४० अपने अभीष्ट देवता के पूजन के बिना जिसके विचितन से चतुर्वर्ग का लाभ उपासक क्यिा करता है और उसी तुष्टि एव पुष्टि हो जाती है । १३४ ! आवाहन के अनन्तर ही दोनो करी के द्वारा अव- तारित करना चाहिए । पहिले दोनों करो को ऊँच करे और ऊपर की ओर उत्क्षिप्त करके अन्तर सहित निरन्तर नीचे की ओर नामित रिते हुए पूजर को करना चाहिए । है रम्ब ये चीज से उससे अवतरित

मन्य-माधना रे अग]
२४
-
होमो-यह पहे ॥१३५–१३६ ।। अभीष्ट देवों में लम्बन के लिये
आग्रेरिन द्वारा परे अर्यात दो बार उच्चारण पूर्वर परे । नामिका
पी वायु के नि मारण से देवता आयाम में म्पित हो जाते हैं ॥१३॥
इस प्रकार से करने पर उमरी स्थिति मण्डल में हो जाया करती है।
स्वान्त गुड़ अंशु और विन्दु मे है रम्य चीन कहा जाया करता है।१३८।
यह विप्नों रे बीजों का विनाश करने वाला है और धर्म-अर्थ-राम
या गाधने वाना है। गन्ध-पुष्प-धूप-दीप-नवेद्य और जो भी
अन्य वस्तु दी जाती है तथा वस्त्र और अनवार आदि उनका देवन
उचारण पये प्रोक्षण तथा पूजन करे ।। १३६-१४० ॥
उत्सज्य मूलमन्त्रेण प्रतिनाम्ना निवेदयेत् ।
वरणम्य तु वोजेन तेषां प्रोक्षणमाचरेत् ।।१४१
इप्टेन मूलमन्त्रण तथोत्मगंनिवेदने।
लपरश्चन्द्रविन
वन्दुभ्या वीज वारणमुच्यते ॥१४२
विलोपन पूजन च तथा दान पृयफ प.थक !
जपरमंणि मालाया. प्रतिपत्तिरित वयम ।।१४३
दष्टमन्त्रेण मालगयाः प्रोक्षण परिकोतिनम् ।
वीज गाणपत पर्वमुच्चार्य तदनन्तरम् ।।१४४
अविन गुरु माले स्व गृहणीयादित्यनेन च ।
जपान्ते गिरमि न्यासो मालाया. परिकीर्तितः॥१५५
यजमााय पापियां श्रीवीजेन तयायेत् ।
अनपदन्यान्नमात्रामा पादियगंतृतीयप ॥१४६
परत: परत पूर्व धोवीज विन्दुनेन्दुना ।
मामाया मयतारस्तु गिरम. नियने यदा ॥१४॥

२५० [ बालिका पुराण वारुण वीज कहा जाता है । १४२॥ विलोपन-पूरब तथा पृथर २ दान-जप कर्म माला की प्रति पत्ति यह तीन हैं । १४३ । अपने इष्ट मन्त्र के द्वारा माला का या प्रोक्षण पत्तित किया गया है। पहिले- गाठा पत वीज का उच्चारण करके इस अनन्तर ही करना चाहिए । । १४४। हे माला ! आप अविघ्न को-इमी मन्त्र के द्वारा माला वा ग्रहण करे। जप के अन्त मे माला का न्याम शिर पर करे-ऐसा पहा गया है । १४५। हाथो से माला लेकर श्री वीज के द्वारा उमी भांनि अर्चन करना चाहिए। अन्त्य दन्त्यान्त मात्राओ आदि वर्ग और नृतीय पर से पर के पूर्व मे श्री वीज विन्दु से इन्दु से माला का अवतार शिर से सदा किया जाता ॥१६-१४७ । ता समादाय पाणिभ्या कुर्यान् सारस्वतेन वै । श्रीबीजानामाद्यमाद्यविन्दुचन्द्रार्धसयुतम् ।।१४८ एतच्चतुष्टय वीज सारस्वतमुदीरितम् । पौराणिकर्वेदिकश्च मूलमन्त्रेण चंव हि ॥१४६ प्रदक्षिणा प्रणाम च कुर्याद्धर्मार्थसाधकम् । भूमि वीक्ष्य तथाभ्युक्ष्य क्षितिवीजन पूर्वत. ॥१५० स्पृशस्ता शिरसा भूमि प्रणमेदिष्टदेवता. । समाप्तिहीन वाराह वीज विन्द्विन्दुसयुतम् ॥१५१ क्षितिवीज विजानीयाच्चतुर्वर्गप्रदायकम् । दर्पण व्यजन घण्टा चामर प्रोक्षयेत् पुन. ॥१५२ नंवेद्यालोकमन्त्रेण पूर्वप्रोक्तेन भैरव । नामाक्षराणि चाद्यानि चंतेपा विन्दुनेन्दुना ॥१५३ तस्मै नम इति प्रान्ते ग्रहणे मन्त्र उच्यते । निवेदनमर्थतेषामिष्टमन्त्रेण चाचरेत् ।।१५४ उसो हाथो से जादान करके मारस्वन से श्री वीजो का आध- आय विन्दु चन्द्राधं से रायुन-यह चार वीज सारस्वन कहे जाते हैं ।

[ कालिका पुराण हे भैरव | वाग्भव के द्वितीय काम वीज से मुद्रा का व धन करना चाहिये । और मूल मन्त्र से दर्शन करे । १५५ । मुद्रा का परि. त्याग तारा वीज के द्वारा समाचरण करे । चद्रविन्दुओ से प्रान्तादि षष्ठ स्वर से सयुत जो है वह तारा बीज कहा गया है जो धर्म- अर्थ और काम का साधन होता है । क्योंकि यह मुद अर्थात् आनन्द को दिया करती है इसी लिये यह मुद्रा-इस नाम से कीर्तित की गयी है । । १५६॥ १५७ । मुद्रा के दशित क्येि जाने पर पूजा का समापन हुआ करता है । यह स्वय काम-मोक्ष-धर्म-अर्थ और मोद से समन्वित होती है । १५८ ! गमन करने के लिये समुत्सुक देवता साधक के लिये शीघ्र ही देता है। मुद्रा के अन्त मे इन छ महा मन्त्रों का उच्चारण परना चाहिये । १५६। जो भक्ति मात्र के द्वारा पत्र-पुष्प- फल- जल दिया गया है और जो नैवेद्य आवेदित किया है उसे वृपा करके ग्रहण करिए । १६० । मैं आवाहन मे किया जाता है---यह नहीं जानता हूँ और मुझे विमजन करने का भी शान नहीं हैं। मैं यजन के भाव को भी नही समझता हूँ अतएव हे परमेश्वरि । मेरी आप ही गति हैं ॥१६१. कर्मणा मनसा वाचा त्वत्तो नान्य गतिर्मम । अन्तश्चरेण भूताना त्व गति परमेश्वरि ॥१६२ मातोनिसहस्रेषु येषु येषु प्रजाम्यहम् । तेषु तेप्वच्युता भक्तिरच्युतेऽस्तु सदा त्वयि ॥१६३ देवी दात्री च भोक्त्री च देवी सर्वमिद जगत् । देवी जयति सर्वत्र या देवी सोऽहमेव च ।।१६४ यदक्षरपरिग्रप्ट मात्राहीन च यद भवेत् । तत्मवं क्षम्यता देवि तस्य न स्खलित मन ॥१६५ मन्त्रेप पटितेप्वेष म्वयमेव प्रसीदति । दानु देवी चतुवंग न चिरादेव भैरय ॥१६६ मन्त्र साधना के अङ्ग ] २५३ ऐशान्या मण्डल कुर्याद, द्वारपद्यविवर्जितम् । विसर्जनार्थ निर्माल्यधारिण्या पूजनाय वै ॥१६७ पाद्यादिभि पूजयित्वा ध्यात्वा निर्माल्यधारिणीम् । नि क्षिप्य तस्मिन् निर्माल्य मन्त्रेण तु विसर्जयेत् ।।१६८ कर्म से-मन से और वचन से आपसे अन्य मेरी कोई भी गति नहीं है । हे परमेश्वरि । भूतो के अन्दर से सञ्चरण करने से आप ही गति हैं । १६२। है माता ! जिन जिन सहस्रा योनियो म मैं गमन वरूहे अच्युते । उन-उन ही योनियो मे सदा आपके प्रति मेरी भक्ति होवे जो कभी भी च्युत न होवे ॥१६३॥ देवी-दात्री-भोक्त्री यह सम्पूर्ण जगद देवी ही है। देवी सर्वत्र जप प्राप्त करती है। जो देवी है वह मैं ही हू । १६ । जो अक्षर परिभ्रष्ट हो और जो मात्रा से हीन हो, हे देवि । वह सभी आप क्षमा कर देवें । कौन ऐसा है जिसका मन सूवलित न होता हो । १६५ । हे भैरव । इन मन्त्रो के पढे जाने पर देवी स्वय ही प्रसन्न हो जाया करती है और रूह उह अविलम्व ही चतुर्वर्ग को प्रदान कर दिया करती है । १६६ । ऐगानी दिशा में मण्डल की रचना करे जो द्वार और पद्म से वजित होवे । विसर्जन के लिये निर्माल्य धारिणी के पूजन के लिये मण्डल रचना करे । १६७ । निर्मात्प धारिणी का ध्यान पाद्य आदि से पूजन करे। उसम निर्माल्प का निक्षेपण परके मन्त्र से विसर्जन करे ॥१६॥ गच्छ गच्छ पर स्थान स्वम्यान परमेश्वरि । यत्र ब्रह्मादयो देवा न विदु परम पदम् ।।१६६ विसज्य मन्प्रेणानेन तत पूरकवायुना। ता स्थापयेघृदि ॥१७० तिप्ठ देवि परे स्थाने स्वस्थाने परमेश्वरि । यत्र ब्रह्मादय सर्वे सुरास्तिष्ठन्ति मे हृदि ॥१७१ तत एक्जटावीरिष्टदेवी धिया स्मरन् । घ्यायस्तु मन्त्रेणानेन [ कालिया पुराण निर्माल्य मूर्टिन गृह्णीयाद, धर्मकामार्थसाधनम् ॥१७२ मण्डलप्रतिपत्ति तु तत कुर्याद विभूतये । सर्वागुलीनामग्रौष पद्ममष्टदलान्वितम् ॥१७३ निर्मन्येत् क्षिति वीजेन मण्डल चापि भैरव । ततस्तु मूलमन्त्रेण सववश्येन वा पुन ||१७४ अनामिकानामग्रेण ललाटमपि सस्पृशेत् । समाप्तिसहित प्रान्तस्तारावीज तत परम ।।१७५ समरवीज विसर्गेण परत परत परम् । भवेदेकजटावीज धमकामार्थसाधनम, ॥१७६ हे परमेश्वरि । अपने परम स्थान को गमन कीजिये जाइये । जहां पर ब्रह्मा आदि देवगण परम पद को नहीं जानते हैं । १६६ । इम मन्त्र के द्वारा विसर्जन करके इसके अनन्तर पूरक वायु के द्वारा ध्यान करते हुए इस मात्र से नमस्कार करके उमको हृदय मे स्थापित परे । । १७० । हे परमेश्वरि । हे देव । परमोत्तम स्थान पर अपने आसन पर विराजमान हाइए। जहां पर मेरे हृदय मे ब्रह्मादिक सय देवता स्थित होते हैं । १७१। इसके उपरान एक जटा धीजी से इष्ट देवी का बुद्धि से स्मरण करता हुआ निर्माल्य पो मूर्धा मे ग्रहण करे जो कि धर्म-वाम और अर्थ का साधन होता है । १७२। इसके अनन्तर विभूति के लिय मण्डल की प्रतिमन्नि वरे। समस्त अगुलियो के समूहो से आठ दलो से मयुत पदम को क्षिति बीज के द्वारा निमन्थन गरे । हे भैरव । मण्डल का भी निर्मन्यन करना चाहिए । इसके पश्चात मूल मन्त्र के द्वारा अथवा पुन गर्ववश्य द्वारा अनामिवाओ के अग्रभाग में ललाट का सस्पर्श परे । समाप्ति के सहित प्रान्त उमवे आगे ताराबीज-. हमर यो विमर्ग से गहिन पर गभी पद परम एप जरा बीज होता है जो धर्मपाम और अपं का साधन है ॥१७३-१७६|| ततो भारकरवीजन सहितेनारमना पुन । 1

मत्र-माधना के अङ्ग]
२५५
मन्त्रेण भास्करायाधमच्छिद्राचं निवेदयेत् ।।१७७
नमो विवस्वते ब्रह्मन् भास्वते विष्णुतेजसे ।
जगत्सवित्रे शुचये सवित्रे कर्मदायिने ।।१७८
ततः कृताञ्जलिर्भूत्वा पठित्वा मन्त्रमीरितम् ।
एकाग्रमनसा वाग्मिरच्छिद्रवमधायेत् ।।१७६
यज्ञच्छिद्रं तपश्छिद्रं यच्छिद्र पूजने मम ।
सवं तदच्छिद्रमस्तु भास्करस्य प्रसादतः ।।१८०
ततस्तु पुष्प नैवेद्य-तोयपासादिक च यत् ।
देवीवोजेन तत्सर्वं पुनरेन विलोकयेत् ।।१८१
हस्तेन चक्षुपा वापि यत्र यत्र कृतः पुरा ।
मन्यन्यासस्तन तत्र विसृष्टिरमुना भवेत् ॥१८२
इसमे अनन्तर पुन: आत्मा के सहित भास्कर वीज से मन्त्र के
द्वारा भास्कर के लिये अच्छिद्रापं अघं का निवेदन करना चाहिए 1१७७।
हे प्रदान ! भास्वान-विवस्वान्--विष्णु तेज वाले-जगत के सविता--
शुचि-सविता-पर्मदायी के लिये नमस्कार है । १७८ । इसके बाद
दोनों हाथो यो जोडे हुए होर यथित मन्त्र यो पढ़कर एकाग्र मन से
यागियो द्वारा मच्छिद्र वा अवधारण परे । १७६। यज्ञ वा छिद्र--
सपायर्या या छिद्र-जो छिद्र मेरे पूजन में हो वह मव आच्छिद्र हो
जा भास्कर भगवान के प्रसाद मे ही अच्छिद्रता हो जाये । १८० ॥
इसके पधात पुण-नवेद्य--जल पात्र आदि जो भी हैं उन सबको
देवी बीज के द्वारा पुन: विलोक्न करना चाहिये ।। १८१॥ हाथ से
अपवा पधु से जहाँ-जहाँ पहिले मन्त्र न्यास किया है वहा-वहाँ ही इससे
यिष्टि होती है ।१८२५
प्रान्तादिपञ्चमो यह्निवीजपप्ठस्वराहितः ।
तयोपान्त वाग्भवायं दुर्गायोगं प्रचक्षते ।।१८३
स्यन्डिले ज्यलदग्नी प तीये गूर्यमरीचिए ।

[ कालिका पुराण प्रतिमासु च शुद्धासु शालग्रामशिलासु च ॥१८४ शिलिगे शिलाया तु पूजा कार्या विभूतये । सर्वत्र मण्डलन्यासं कुर्यादेकान मानसः॥१८५ योगपीठस्य बीजेन स्थण्डिलादिषु साधकः । वासुदेवस्य रुद्रस्य ब्रह्मणो मिहिरस्य च ॥१८६ कुर्यात् सर्वत्र पूजासु प्रतिपतिमिमा बुधः । एव यः पूजयेद विष्णुममोभिः प्रतिपत्तिथिः ।।१८७ चतुर्वर्गप्रदस्तस्य न चिराज्जायते हरिः । शिवो वा मिहिरो वापि येऽन्ये लम्बोदरादयः ।।१८८ प्रसीदन्ति सुरा: सर्वे पूजाया विधिनामुना । विशेषतो महादेवी महामाया जगन्मयी ॥१८६ प्रान्तादि पञ्चम वह्नि वीज पष्ठि स्वर से आदित तथा उपातु वाग्भ वाद्य दुर्गा वीज कहा जाता है ।१८३॥ स्थाण्डिल मे-जलती हुई अग्नि में जल मे सूर्य की किरणो मे-और शुद्ध प्रतिमाओ मे तथा शाल ग्राम की शिलाओ मे--शिव लिङ्ग मे-शिला में विभूति के लिये पूजा करनी चाहिए । एकाग्र मन वाला होकर सभी जगह मण्डल का न्याम करे । १८५। योग पीठ के पीज से स्पण्डिल आदि मे साधक वासुदेव भगवान् को- रुद्र देव की--ब्रह्माजी की-सूर्य की पूजाओ में सर्वत्र वुध पुरष को यह प्रतिपत्ति करनी चाहिए। इस प्रकार से इन मुत्ति पत्तियो से जो विष्णु भगवान की पूजा करे तो उसको भगवान को पूजा करे तो उसको भगवान हरि अविलम्ब ही चार वर्गों के प्रदाता हो जाया करते हैं। शिव हो या मिहिर हो जो भी अन्य सम्बो- दर प्रभृति होवें सभी सुर गण इस विधि से प्रसन्न हो जाया करते हैं विशेष रूप से जगन्मयो महामाया महादेवी प्रसन्न होती हैं ॥१८६॥ ॥१७॥१८८॥१६॥ प्रतिपत्तिमिमां नित्यं रपयत्येव पूजने ।

मन्त्र-साधना के अङ्ग ]
एवं यः कुरुते पूजां सम्यक् स फलभाग्भवेत् ।।१६०
एतविहींना या पूजा ततोऽल्पाल्पं फलं भवेत् ।
संगहीनस्तु पुरुपो न सम्यग्याज्ञिको यथा ।।१६१
अंगहीना तथा पजा न सम्यक् फलभाग्भवेत् ।
इदं रहस्यं परममिदं स्वस्त्ययन परम् ।
मन्त्रवेदमयं शुद्ध सर्वपापप्रणाशनम् ॥१६२
यः थावयेद् ब्राह्मणसन्निधाने
श्राद्धषु यने सुरपूजनेषु ।
सम्यक् फल तस्य लभेत् स कर्मणो
पूविनापि जा तदनन्तमश्नुते ।।१३

२५८ । वालिया पुराण ॥ देवी तन्त्र कथन ॥ देव्यास्तन्य विशेषेण शृणुत साम्प्रतं युवाम् । येन चाराधिता देवी नचिराद्वरदा भवेत् ॥१ पूर्वतन्त्राद्विशेपेण तथा वै तन्त्रमुत्तरम् । विशेषेण च सामान्यात् कथित भवतो. पुरा ॥२ पुनर्देव्या विशेषेण पूजाया भक्तिकर्मणि । यानि तन्त्राणि शेपाणि तानि वक्ष्याम्यह पुनः ॥३ य कुर्यात् तु महामायाभक्तिमेका ग्रमानस । अङ्गिना वाङ्गिमन्त्रेण तेन क्यमिद शुभम् ।।४ फल पुष्प च ताम्बूलमन्नपानादिक च यत् । अदत्त्वा तु महादेव्यै न भोक्तव्य कदाचन ॥५ पथि वा पर्वताने वा सभायामपि साधकः । यथा तथा निवेद्यैव स्वमर्थमुपाल्पयेन् ।।६ दृष्ट्वव मदिराभाण्ड रक्तवर्णास्तथा स्निय.। सिंह शव रक्तपद्म व्याघ्रवारणसङ्गमम् ।।७ गुरु राजानमथवा महामाया ततो नमेत् । पतिव्रताया भार्याया सदैव ऋतुसगम. 1 श्री भगवान ने कहा-आप दोनो ही भली भांति देवी के तन्त्र का श्रवण अब करिए । जिस तन्त्र के द्वारा आराधना की हुई देवी से शीघ्र ही वरदा हो जाया करती है ॥१॥ पूर्व में दिये विशेष रूप से उसी भांति यह निश्चय ही उत्तम तय हैं विशेषता से सामान्यता से यह पहिले आपके आगे कहा गया है ॥२॥ फिर देवी की पूजा पे भक्ति धर्म में विशेष रूप से जो तन्त्र शेष हैं उनको मैं पुन. बतलाऊंगा ॥३॥ जो पुरप महामाया को भक्तिः को एवान मन वाला होवर क्यिा करता है । अङ्गो मे अथवा अङ्गी के मन्त्र के द्वारा करता है। इससे यह शुभ कार्य है ||४]] फस-पुष्प-ताम्बुल और जो हुए तन्त्र

देवी तन्त्र पयन ]
२५६
यन्न पान आदिक है वह स्तमहा देवी को समपित न करके कभी भी
नहीं खाना चाहिए ॥२॥ मागं मे अयवा पर्वत के शिखर पर और
सभा मे मायक जैने-तमे निवेदन करके ही अपने अयं को जप कल्पित
करना चाहिए ॥६॥ मदिरा के पास को-रक्त वर्ण वाली स्त्रियों
को-सिंह गो-शव को-रक्त पद्म को ज्याघ्र और वारण (गज)
के सगम को देखकर ही गुरु के लिये राजा के लिये और फिर महामाया क
के लिये नमन जान नमस्कार करे। जो भाया पतिव्रता हो उसके
साथ सदा ही ऋतुकाल में सङ्गम करना चाहिए 1000
क्रियते चण्डिका ध्यात्वा तदा कार्यों विभूतये ।
शान्तिक पौष्टिक वापि तयेप्टापूर्तकर्मणी ॥६
यदा कुर्यात् तदा नत्वा देवीयात्रा समाचरेत् ।
तोत्रिक यदा पश्येन् केवल गीतमेव वा ।।१०
तच्च देव्यं निवेद्यव कर्तव्य स्वोपयाजनम् ।
यदेव भूपण वासा मलयाद्भवमव वा ॥११
स्वकाये परियुजोत तत्र मन्त्र धिया न्यसत् ।
व्यायामे च विघाने च सभाया वा जल स्थल ॥१२
यत्र यत्र स्वय गच्छेत् तम देवी सदा स्मरेत् ।
यद् यत् कर्म तु पूजाग तत्तन्मन्त्रेण चाचरेत् ॥१३
मन्त्रहीन पूजनाङ्ग कम यत् तत्तु निष्फलम् ।
यस्मिन् कर्मणि योद्दिष्टो मन्त्रपूजामु भैरव ॥१४
नवेद्यालोकमन्त्रेण तत् तन कम समाचरेत् ।
देव्यास्तु मण्डलन्याममिष्टमण चाचरेत् ॥१५
पत्रिका देवो का ध्यान बरे जो किया जा है तब वह कार्य
विभूमि के लिये होता है । चाहे शानिक कर्म हो अपवा पौष्टिक पम्म
हो तथा स्टा पूर्ण वर्म हो जब भी बरे तप नमनार करके देयो मन्त्र
पा समाचरण करना चाहिए। जिम ममप मे तौर्यावर हत्यमान)अथवा

२६० [ पालिका पुराण केवल गीत को ही देये और वह देयो के लिये निवेदन करके ही अपना उपयोजन करना चाहिए। नो भी पोई भूपण हो अथवा वस्त्र हो या मलय से समुत्पन्न चन्दन हो ।६-११। अपने शरीर मे यदि उपभोगररे तो वहां पर धी अर्यात बुद्धि से मन्त्र या व्यास करना चाहिए। चाहे वह व्यायाम में हो और वह विधान में हो– सभा में हो-जल मे हो या स्थल में हो- यहीं पर भी हो मन्त्र या बुद्धि से न्यास करे । १२ । जहाँ-जहाँ पर भी स्वय गमन करे वहाँ पर ही सदा देवी का स्मरण करना चाहिए । जो जो भी कर्म पूजन का अङ्ग स्वरूप हो उमका समाचरण मन्त्र के द्वारा ही करना चाहिए। १३ । मन्त्र से होन पूजन का जो भी कोई अङ्ग होता है वह तो सब निष्फल होता है। जिस कर्म में जो भी उद्दिष्ट हो हे भैरव । जो मन्त्र पूजाओ मे होवे । वह-वह कर्म नैवेद्य के आलोक मन्त्र के द्वारा उस-उस कर्म को समाचरित करे। देवी का मण्डल न्यास इप्ट मन्त्र के द्वारा करना चाहिए ॥१४॥१५॥ पूजान्ते मण्डल लिप्वा तिलक तेन कारयेत् । सर्ववश्येन मन्त्रेण धर्मकामार्थदायिना ॥१६ वलिदाने वलि छित्वा खड्गस्थ रुधिरै. स्वकं. । सर्ववश्यन मन्त्रेण ललाटे तिलक न्यसेत् ।।१७ जगद्वशे भवेत् तस्य चतुर्थ. कस्य वह्निा । पष्ठस्वरेण सयुक्तः कलाविन्दुसमन्वितः॥१८ अयोपान्तस्थकारान्तः सपरोऽपि तया पुन । द्विर्मोहोति हकारास्य तुर्यों द्विस्वरसयुत ॥१६ तृतीयवर्ग-प्रान्तेन तृतीयस्वरसशिना। पूरितान्तो द्विधा वर्णस्तथा वादिचतुर्थक, ॥२० स्वरो द्वितीयश्च तथा क्षोभशब्द, पुर सर. । पुरेति सहित. मोऽपि मित्र शत्रुश्च राक्षस. ॥२१ देवी नन्य कयन ] २६१ पजा के अन्त में मण्डल को लीपकर उमरे द्वारा निरक कराना चाहिये । और उमको मवं वश्य मन्त्र के द्वारा लगाट में नितक का न्याम करे जो पि धर्म-काम और अयं वा प्रदान करने वाला है। 1१६-१७। उसके वश मे मम्पूर्ण जगद हो जाता है । वह्नि मायवसार पा चतुर्य घटा स्वर में मयुक्त और कला विन्दु मे सयुत हो । इसके अननर उपान में स्थित वागन्त तथा पुन' मपर भी-द्विर्मोही-इनि अर्थात दो वार मोही-यह-हवार वा-चौवा दो स्वरो में ममन्वित हो । तीमरे वर्ग प्राल गे-तृतीय स्वर मना वाला मे पूरित अन्न वाला दो प्रकार का वर्ण हो तथा यदि चतुयंक होवे। और द्वितीय स्वर तथा सोम शब्द आगे हो वह भी पुर-इसमे महित हो । वह भी मित्र- मा और राधाम होता है ॥१८-२१॥ दक्ष प्रजा नया राजा सर्वशास्त्र इति श्रु त । विनापि पूजन कुर्याद् यो रहस्तिलय नर ॥२२ मन्त्रणानेन सनत मयं तस्य व भवेत् । राजा वा राजपुरो वा स्त्रियो वा यक्षराक्षसा ॥२३ सर्वे तस्य वम यान्ति भूतग्रामाश्चतुर्विधा । प्रवासे पयि वा दुर्ग म्यानाप्राप्ती जनेपि वा ॥२४ पागगारे निवद्धो वा प्रायोवेशगतोपि वा। पुर्यात तत्र महामायापूजा वं मानमी बुध ॥२५ मनोनये ममुत्पन्ने मिहव्याघ्रममायुने। पग्चत्रागमे वापि कुन्मिानमपूजनम् ॥२६ मनसा हृदयस्पान्नध्यात्वा योगायपीटरम् । तव पृथिवीमध्ये पूजा तब ममाचरेत् ।।२७ मंत्र प्रसाधन म्नान दलघावनकर्म । यन्यन्न सर्व मनसा कृत्वा गुर्याज्य पूजनम् ॥२८ पक्ष पूरा तपा रारा ग मात्र है-परत है। पूजन रे २६२ [ पालिका पुराण 'स्थान के विना भी जो कोई नर रहस्तितका परे। इस मन्य के द्वारा निरन्तर परे उसके सब वश मे हो जाते हैं चाहे वह राजा हो -राजा का पुत्र हो-स्त्रियाँ हो अथवा यज्ञ तथा राक्षस हो । २२।२३। चारो प्रकार वे भूत ग्राम सब उसके वश में हो जाया करते हैं। प्रवास में अर्थात अपने घर से देश मे हो-अथवा मार्ग में हो~-दुर्ग में हो- न प्राम होने पर कही भी हो---अथवा जल में हो। अथवा कारागार में घिरा हुआ हो अथवा प्रायोम वेश में हो अर्थात् निरन्तर भूखा हो वहीं पर महामाया की पूजा करके जो यि बुध पुरप को मानसी हो करनी चाहिए । २५ । २५। मन में भय के समुत्पन्न हो जाने पर तथा मिह और व्याघ्र आदि के द्वारा समाकुल होने पर- -दूसरे के चक्र में समागम होने पर मानसिक पूजन ही इन स्थितियों में रहने पर करना चाहिए क्योकि ऐसी दशा में अन्य कोई भी चारा नही होता है । २६ । मन के द्वारा हृदय के अदर योग नामक पीठ का ध्यान करके वहीं पर पृथिवी के मध्य में पूजन का समाचरण करना चाहिए ।२७। मैन-प्रसाधन स्नान-दन्तघावन कर्म और न्य सभी मनके द्वारा ही करके पूजा करना चाहिए ॥२८॥ पश्चान पुप्पादिभि पूजा बहिर्देशे विधीयते । तथा हृद्यपि क्तव्या सर्वाश्च प्रतिपत्तय ॥२६ अष्टम्या सतत देवीयाजक स्यात सा व्रती। नवम्या तु तथा पूजा कर्तव्या निजशोणितं ॥३० लिंगस्था पूजयेद् देवीं पस्तकस्था तथैव च । स्थण्डिलस्था महामाया पादुकाप्रतिमासु च ॥३१ चिये च विशिषे खडग जलस्था वापि पूजयेत् । पञ्चाशदगुल खड्ग मिशिख च त्रिशलकम् ॥३२ शिलाया पर्वतस्याग्रे तया पर्वतगतरे। देवो सम्पूजयेन्नित्य भक्तिश्रद्धासमन्वित ।।३३ २६४ [ हालिया पुराण - तत्र सिद्धेश्वरीयोनौ ततोऽपि द्विगुणा स्मृता । ततश्चतुर्गुणा प्रोक्ता लोहित्यनदपाथसि ॥३६ तत्समा कामरूपे तु सर्वत्रैव जले स्थले । सर्वश्रेष्ठो यथा विष्णुलक्ष्मी सर्वोत्तमा यथा ॥४० देवीपूजा तथा शस्ता कामरूपे सुरालये । देवीक्षेत्र कामरूप विद्यतेऽन्यत्र तत्समम् ।।४१ अन्यत्र विरला देवी कामरूपे गृहे गृहे । तत शतगुणा प्रोक्ता नीलवूटस्य मस्तके ॥४२ विन्ध्याचल मे की हुई पूजा सौगुनी फ्ल दायिका होती है- ऐमा कहा गया है और गङ्गा में भी की गई पूजा उमी के समान होती है। आर्यावर्त में-मध्यदेश मे -ग्रह्मा वत्तं मे तथा पुष्कर मे करतोया नाम की नदी के जल में उससे भी चौगुनी फल देने वाली कही गयी है। । ३६ ॥ ३७॥ हे भैरव । उमसे भी चौगुने फल देने वाली पूजा नन्दि कुण्ड होती है । उममे भी चौगुनी जाल्मिपेश्वर की सन्निधि मे को हुई बतलायी गयी है । ३८। वहां पर सिद्धेश्वरी की योनि में की गयी पूजा उससे भी दुगुनी बतायी गयी है। उससे भी चौगुते फल की देने वाली लौहित्य नद के जल में कही गयी है । ३६। उसी के समान काम रूप देश मे सभी जगह जल और स्थल में मानी गयी है। जैसे सबसे श्रेठ भगवान विष्णु हैं तथा लक्ष्मी सबसे उत्तम है । ४०। काम रूप में मुरालय मे देवी की पूजा प्रशस्त होती है। देवी का क्षेत्र काम रूप देश है और अन्यत्र उसके समान है अन्य स्थल मे देवी विरला ही हुआ करती है और नाम रूप मे तो घर-घर में ही विद्यमान रहती हैं। इसमे भी सौ गुने महत्त्व वाली पूजा नील फूट पर्वत के शिखर पर होती है ॥१२॥ ततोऽपि द्विगुणा प्रोक्ता हेरुके शिवलिङ्गने । ततोऽपि द्विगुणा प्रोक्ता शैलपश्यादियोनिषु ॥४३

देवी तन्त्र पन ]
२६५
तत जनगुणा प्रोक्ता कामान्यायोनिमदो।
कामाख्याया महामायापूजा य नवान् सकृत् ।।४४
स चेह लनते कामान् परत शिवन्पदाम् ।
ननन्य महशोऽन्यो नि कृत्य तम्ब न विद्यते ।।४५
वान्लिार्गमवाप्येह
चिगयुभिजायते ।
वायोरिव गतिम्तम्त भवदन्यरवाधिता ॥४६
नत्रामे शास्त्रवादे वा दुर्जर न च जायते।
वैष्णवीतन्त्रमन्ग दामाच्यायोनिमडले।
मन तु पूजन कृत्वा फल मरगुण नभेत् ।।१७
मूलमूर्तिमहामाया योगनिद्रा जगन्मयी।
तम्यान्तु वणवीतन्त्र मन्त्र प्राक् प्रतिपादितम् ॥४
अन्या या मूर्तय प्रोका पुत्यादयोरा ।
तम्या एव विभागास्तानच्री-विनिगंता ||
उमने भी दुगुनी हंस जिलिङ्ग में की गः परा दायिनी
होती है । उनमे मो दुानी पदापिनो जल पुयादिन योनियों में कही
गई है।४। उसने भी मौनी व एक महत्त्व वाली पूना कामान्या-
देवा के योनि महल में दनाई गई है । मान्मा ने महामाया में
पूजा जो एक वार पर चुका है वह इन लो म गमनानों गे प्राप्त
करना है और परतोर ने मादान मिव को बन्ला ग नाम किया
करना है। टन पुग्प के समान अन्य कोई भी भाग्यशाली नहीं है और
फिर उनका कोई भी कृत्य प नहीं रह जाता है ।। १४.-१५॥ दह
पुरुष यपना मनोदान्छिन अर्थ इन लो में प्राम का चिरा होजाता
है। उसकी गति वायु के ही समान हो जाती है जो अन्यों के
कभी भी वाधिन नहीं हुवा करती है । ४६ ! वह पुस मसान ने अथवा
माम्बवाद में दुरंद हो जाता है । देवी तन्त्र मन्त्र के द्वारा मनाचा
के योनि माल में एक दार अपचन करके उनका सोगुना पन का

[ कालिका पुराण
लाभ किया करता है । ४७ । मूलमूर्ति महामाया योगनिद्रा जगन्मयी है
उसका वैष्णवी तन्त्र मन्त्र पहिले ही प्रतिपादित कर दिया गया है ।४८॥
आय जो मूर्तिण वही गई हैं जो शैल पुत्री आदि दूमरी है वे सब उसी
के विभाग हैं और उसके ही शरीर से निगंत हुई हैं । ४६ ।
नि मरन्ति यथा नित्य सूर्यविम्वान्मरीचय ।
देव्यास्तथोग्रचण्डाद्या महामायाशरीरतः ॥५०
तामामेवाङ्गपाणि वक्तव्यानि मया तव ।
एकैव नु महामाया कार्यार्थ भिन्नता गता ॥५१
कामाख्या तु महामाया मूलमूर्ति प्रगीयते ।
पीठभिनाह्वया सा तु महामाया प्रगीयते ॥५२
एक एव यथा विष्णुनित्यत्वाद् हि सनातन ।
जनानामर्दनात सोऽपि जनार्दन इति श्रुत ॥५३
तथैव सा महामाया कामार्थ सङ्गता गिरौ ।
कानाख्येति सदा देवगद्यते सतत नरै ॥५४
यथा हि पुरुप कोऽपि च्छत्री च्छत्रग्रहाद् भवेत् ।
स्नापक स्नानकाले 4 कामाख्यापि तथाह्वया ॥५५
महामायाशरीर तु कामार्थ समुपस्थितम् ।
लोहित कु कुमै पीत कामार्थ मुपयोजित ॥५६
खड्ग त्यक्त्वा कामकाले सा गृह्णाति स्रज स्वयम् ।
यदा तु त्यक्तकामा सा तदा स्यादसिधारिणी ॥५७
जिम रीति से नित्य ही मूर्य वे विम्ब मे किरणे नि सरण किया
वरती है ठीक उमी भांति देवी महामाया के शरीर से उग्र घण्डाद्य
निकला करती है ।५०। मेरे द्वारा आपको उन्ही के अगरूप कहने चाहिये ।
महामाया या स्वरप तो एक ही है और कार्यों के सम्पादन करने के
लिये यही भिन्नता को प्राम हुई है ।। ५१ ॥ पामाख्या तो महामाया
और मन पूत्ति गान को जाया करती है। वह पीठो वे द्वारा विभिन्न
है

देवी तात्र क्यन २६७ नामो वाली होरर महामाया गायी जाया करती है ।। ५२ ॥ जिस प्रकार से एक ही भगवान विष्णु नित्य होने मे सनातन हैं। जनो के पोहा का दूर करने में वहीं प्रनु जनार्दन–इस नाम से वह गवे हैं । ५३ । ठीक उसी भांति महामाया कामयं गिरि मे मङ्गत हुई यो उसी समय में यह सुदा देवों के द्वारा और नरो के द्वारा निरन्तर पामाख्या कही जाती है। ५४ । जैम कोई पुल्प उन के ग्रम करने में छत्री हो जाया करता है और स्नान काल मे म्नापर कहा जाता है ठीक उमी रीनि म नाम मे यह कामाम्या हो गई हैं। ५४ । महामाया वा गरीर काम के निचे ममुपस्थित हुआ था। लोहित-दु कुमों मे पोत जो कामायं उपयोजित क्येि गये । काम का7 मम्बा का परित्याग कर वह स्वय ही सर को ग्रहण किया करती है। जिम ममर म वह काम को त्याग कर दन वाली होती है उम नगर में वह अमिधारिणी होती है ।।५६-५७॥ वामगले शिवप्रेते न्यन्तलोहितपक्ज। रमते त्यक्तामा त सितप्रेतोपरि स्थिता ।।५८ नर्थवेतम्ततो गत्या सिंहस्या दमदा भवेन् । कदाचिन मा मिनप्रेने कदाचिद्रक्तपक्जे ॥५६ वदाचित केशरीपृष्फ रमते काममपिणी । यदा लोहितपद्मस्या नया पेशरी चर ॥६० यदा प्रेतगता देवी नदाग्रेन्य निरीक्षते । महामायाम्वरपेण तदा मा वरदा भवेत् ॥६१ पूजाकाले तदा प्रेतपदमिहोपरि स्थिना । रक्तपद्म यदा घ्यायेत् तदाग्रे चिन्तयेद्धरिम् ॥६२ यदा ध्यायेद्धरौ चान्यद्वयमग्रे विचिन्तयेत् । निपु ध्यातेपु युगपत् प्रेतपद्महरी मात् ॥६३ नोहित पङ्का का न्यम्त करन वाले शिव प्रेत काम काल में मित प्रेन के सर नम्पित काम का परित्यक्त कर दने वाली रमण

[ कालिका पुराण
करती है । ५८ । उमी भांति इधर उधर गमन करके सिंह के ऊपर
विराजमाना होती हुई कामदा हो जाती है । विसी समय में तो वह
मित प्रेत पर होती है और किसी ममय म रक्त पडूज पर स्थित होती
है। ५६ । विसी अवसर पर वह केशरी के पीठ पर सस्थित होती हुई
कामरूप वानी रमण किया करती है। जिस अवसर पर वह लोहित
पद्म पर मस्थित हुआ करती है तो उम समय में उसके आगे केशरी
चरण किया करता है । ६० 1 जिम ममय मे प्रेत पर स्थित देवी होती
है उस समय मे आग अय का निरीक्षण किया करती है। जिस समय
मे वह महामाया के स्वरूप से वह वरदा होती है । ६१ । उस समय में
पूजा के कात्र म प्रेस--पद्म और सिंह के ऊपर स्थित होती है। जिस
अवसर में रक्त पद्म मे ध्यान करे तब आगे हरि का चिन्तन करना
चाहिए । ६२। जब हरि म ध्यान करे तब अन्य दो का आगे चिन्तन
परे । एक ही साथ तीनो के ध्यान करने पर प्रेत पद्म हरि मे कम
से
परना च हिए । ६३ ।
स्थितेषु कामदा देवी तेषु ध्यायेत कामदाम् ।
एवं कम्मिन्नपि तथा यथावच्छिन्तयेच्छिवाम् ॥६४
एका समस्ता जगता प्रवृति सा यतस्तत ।
विष्णुब्रह्मशिवध्रियते स जगन्मयी ।।६५
सितप्रेता महादेवो ब्रह्मालोहितपक्जम् ।
हरिरिस्तु विशेयो वाहनानि महौजम ॥६६
स्वमूर्या वाह्मत्व तु तेपा यस्मान्न युज्यते।
तम्मान्मूय॑न्तर पृत्वा वाह्नत्व गतास्त्रय ॥६७
यस्मिन् यस्मिन् महामाया प्रीणाति सतत शिवा ।
तेन तेनैव रूपेण आसनान्य भवस्वय ॥६८
मिहोपरि स्थितं पदम रक्न तम्योग शिव ।
तस्योपरि महामाया वरदाभयदायिनी ॥६६

देवी तन्त्र क्यन ] २६६ एवं स्पेण यो ध्यात्वा पूजयेत् सततं शिवाम् । ब्रह्मविष्णुशिवान्तेन पजिता. स्युरसंशयम् ।।७० एवं सदा महामाया कामाख्या करूपिणी। ध्यानतो रूपतो भिन्ना तस्मात्ता तन्न पूजयेत् ॥७१ एव विशेषतन्त्राणि दुर्गायाः कथितानि वाम् । अङ्गमन्त्राणि तस्यास्तु श्रूयता नरमत्तमौ ॥७२ उन पर कामदा देवी के स्थित होने पर कामदा का ध्यान करना चाहिए। एक-एक पर भो जैसे भी हो उमी भांनि शिवा का चिन्तन करे । ६४ । वह एक समस्तो जगतो की प्रकृति जहाँ -तहा ब्रह्मा- विष्णु-शिव देवो के द्वारा वह जगन्मयी धारण की जाया करती है। । ६५ । सित प्रेत महादेव हैं-ब्रह्मा लोहित पन है-हार हरि है ऐसे ही महान ओज वाले के वाह्न जानने चाहिए । ६६ । क्योकि अपनी पूत्ति से उनका वाह्न होना युक्त नहीं होता है। इसी कारण मे अन्य मूर्ति करके तीनो वाहनता को प्राप्त हुए हैं । ६७। जिस-जिसमे महा- माया शिवा निरन्तर प्रसन्न होती है । उसी-उसी रूप से तीनो ही आसन हुए थे। ६८ । सिंह के ऊपर रक्त पद्म स्थित है। उमके कन्वं मे गत शिव हैं । उनके ऊपर वह देने वाली अभय दायिनी महामाया है । ६६ । इस प्रकार के म्बरूप से जो ध्यान करके निरन्तर शिवा का पूजन करना चाहिए। उसस ब्रह्मा-विष्णु और शिव बिना ही सशय क पूजित हो जाते हैं । ७० । इस प्रकार से सदा कामाख्या-एक रूप वाली महामाया ध्यान से और रूप स मिला है इससे वहाँ पर उसका पूजन करना चाहिए । ७१। इस प्रकार से दुर्गा के विशेष तन्त्रों को आप दोनो से दिये हैं। हे नरहो! अव उसके अङ्गमन्त्री का आप श्रवण करिये 1७२। कह -Cap.-

[ वालिका पुराण
॥ चण्डिका मन्त्र वर्णन ॥
अङ्गमन्त्राण्यह वक्ष्य चण्डिकाया विशपत ।
यं समाराधिता देवी चतुर्वर्गप्रदा भवेत् ॥१
तालव्यान्तो युत षष्ठस्वरविन्द्विन्दुवह्निभि ।
तथोपान्त स्वरस्त्वेते वाह्य वाग्भवमेव च ॥२
नेत्रवोज चण्डिकायास्त्रयमेतत् प्रकीर्तितम् ।
वामललाटदाक्षिण्यने नेषु रितय मात् ॥३
धर्मार्थकाममोक्षाणा सर्वदा कारण परम् ।
मन्त्रमेतन्महागुह्य दुर्गावोजमिति स्मृतम् ॥४
यदा कात्यायनमुनेराश्रमेषु दिवौकसाम् ।
तेजोभि तवायाभूद् देवी देवौघसस्तुता ॥५
तदा नेत्रत्रवाद् देव्या मूलमूतिविन सृता ।
तेजोमयी जगद्धात्री महिषासुरघातिनी ॥६
तेजोभि सर्वदेवाना मा धृत्वा वपुरत्तमम् ।
अस्त्राण्यनेकान्यादाय देवदत्तानि भागश ७
श्री भगवान ने कहा-~-विशेष रूप से चाण्डका के अङ्ग
मन्त्री
को मैं बतलाऊंगा। जिनक द्वारा समाराधन की गयी देवी पारो बों
ये पल को प्रदान करने वाली होती है ॥१॥ तातव्यन्त पष्ठ पर
विन्दु-इन्दु बहिन से युत तथा स्वरस्य ( स्वर का ) उपान्त ये बाह्य
वाग्भव ही ये तीनो चण्डिया के नत्र वीज वीर्तित किये गये हैं। गम
ललाट दक्षिण्य नेत्रों में क्रम से ये तोता है । २-३ । ये धर्म-अर्थ--
पाम और मोक्ष के मवंदा परम कारण हैं। यह मन्त्र दुर्गा का परम
गेयनीय है--यह कहा गया है ॥४॥ जिस समय में देखें ये बाधो म
सात्यायन मुनि ऐ जो गे देवा के समुदाय से सगुन देवी काया को
धारण करने वाली हुई पी ॥ ५ ॥ उगी गमय म तीनो नेत्रो से देवी
पी मून मूर्ति चिनि एन हुई थी । जो तेगो से परिपूर्ण पो और महिषा•

चण्डिका मन्त्र वर्णन ]
२७१
सुर के घात मग्न वाली जगत् के धात्री अर्थात् पालन करन वाली थी
1६ । समाज देवी के तजा से उसने अपना उत्तम शरीर धारण किया
था और भागा द्वारा दवा के दिए हुए अनक अस्या का समादान किया
था । ७1
सगण सानुवन्ध च सामात्यवलवाहनम् ।
ब्रह्माद्य सस्तुता देवी जघान महिपासुरम् ।।८
हते तु महिपे देवी पूजिता विदर्शन्तत ।
अनेनैव तु मन्त्रेण लोके ख्याति च मा गता ॥
तत प्रभृति सा मूर्ति मर्वे सर्वत्र पूज्यते ।
मलमृत्ति सुगुप्ताभूत स्वमूर्त्या स्यातिमागता ॥१०
देवाना वरदानेन ब्रह्माद्यरुपयोजनात् ।
यन्मूर्ति पूज्यते सर्वेस्ता मूर्ति शृणु भैरव ॥११
जटाजूटसमायुक्तामद्धेन्दुकृततशेखराम
लोचनत्रयसयुक्ता प्र्णेन्दुसदृशाननाम् ।।१२
तप्तवाचनवर्णाभा सुप्रनिष्ठा सुलोचनाम् ।
नवयोवनसम्पन्ना सर्वाभरणभूपिताम् ॥१३
सुचारुदशना तीक्ष्णा पीनोन्नतपयोधराम् ।
विभङ्गस्थानसस्थाना महिषासुरमदिनीम् ।।१४
वह गणो और अनुबन्ध के सहित तथा अमात्य वल और वाहनो
से सयुत वह देवी ब्रह्मा आदि देवो के द्वारा भली भांति सस्तवन की
हुई थी और फिर उस देवी न महिपासुर का वध किया था ।।
महिष असुर के निहत हो जाने पर देवी देवो के द्वारा पूजित हुई थी।
और इसी मात्र के द्वारा वह लोक में प्रसिद्धि को प्राप्त हुई थी।६।
तभी से लेकर वह मूत्ति मवके द्वारा सर्वत्र पूजी जाया करती है । मूल
मूत्ति तो सुगुप्त हो गई थी और अपनी मूत्ति स ही घ्याति को प्राप्त हो
गई थी। १०। दवा के वरदान से ब्रह्मा यादि व द्वारा उपयाजन स जा

२७२ [पालिका पुगण मस्थान वाली और मूत्ति सवये द्वारा पूजी जाती है है भैरव ! उगा अब तुम श्रवण करो ।१५। उगमूत्ति का बाप यर्णन किया जाता है-वाटा जूटो मे समायुक्त है और अधं चन्द्र उमके मस्तक में विराजमान है। तीन नेत्रो रो उपशोभित हैं और पूर्ण चन्द्र के समान उमका मुठ है । तपाये हुए सुवर्ण के समान वर्ण वी आभा वाली है - यह मुन्दर प्रतिष्ठा मे युक्त और परम मनोहर लोचनो वाली है। उसका क्या नतन यौवन से युक्त है तथा सभी प्रवार के आभूषणों मे वह विभूपित है। ।२२। उसकी परम सुन्दर दन्त पवित है-तीक्ष्ण और वह पीन तथा उन्नत स्तनो से समन्वित है । विभङ्ग स्यानो वह महिष अमुर के घात करने वाली है ॥१४॥ मृणालायतसस्पर्शदशवाहुसमन्विताम् । त्रिशूल दक्षिण देय खड्ग चक्र क्रमादधः ।।१५ तीक्ष्णवाण तथा र्शाक्त वाहुसधेपु सङ्गताम् । खेटक पूर्णचाप च पाशं चाकुशमूर्धतः ।।१६ घण्टा च परशु चापि वामेऽधः प्रतियोजयत् । अधस्तान्महिय तद्वद्विशिरस्क प्रदर्शयेत् ।।१७ शिरश्छेदोद्भव तद्वद्दानव खड्गपाणिनम् । हृदि शूलेन निभिन्न नियंदन्त्रविभूपितम् ।।१८ रक्तरक्तीकृताग च रक्तविस्फुरितेक्षणम् । वेष्टित नागपाशेन भृकुटीकुटिलाननम् ।।१६ सपाशवामहस्तेन धृतकश च दुर्गया। बमद्रुधिरक्त्र च देव्या. सिह प्रदशयेत् ।।२० देव्यास्तु दक्षिण पाद सम सिंहोपरि स्तितम् । किंचिदूवं तथा वाममगुष्ठ महिपोपरि ॥२१ मृगाल के सदश आयत और भले स्पर्श बाली दश वाहुओ से युक्त है । दाहिने हाथ में त्रिशूल-देव-खड्ग-चक्र क्रम से नीचे की चण्डिका मन्त्र वर्णन ] २०३ और हैं । १५॥ वाहुओ के सपो में तोहण वाण तथा शक्ति से है। ऊपर की ओर घटकपूर्ण चाप-पाश और अनुभ धारण किसे हुए हैं । १६ । घण्टा-परशु को नोचे बाम भोग में प्रतियोजित करना चाहिये। नीचे की ओर विना शिर वाले महिप असुर को प्रदशित बरना चाहिए । १७ । जिसका शिर छिन्न हो गया है और जो दानव अपने हाय म राग लिय हुए हैं । जो हृदय म वल स विद्ध हो रहा है और जिसकी अंतड़ियां वाहिर निकल रही है । १८ । समित होते हुए रक्त से जिसके अङ्ग घिर प्तापित हो रहे हैं और जो रक्त से विस्पुरित नेत्रो वाला हो रहा है। जो नाय पाश से वष्टित है और जो क्रोधावेश पे वारण पुटिल भौहो से समन्वित मुख वाला है । १६ । जो पाश में सहित योय हाथ से दुर्गा के द्वारा मस्तक से देश परदा हुआ है। जिसने मुष से रघिर प्रवाहित हो रहा है ऐमा देवी के मिह का भी प्रदर्शन परना राहिए । २० । देवी वा दाहिना धरण सिंह के ऊपर र स्थित है तथा कुछ ऊपर की योर बाम चरण वा अपृष्ठ महिला सुर के ऊपर स्पित है ॥२१॥ उपचण्डा प्रचण्डा प चण्डोगा पण्डनायिका। चण्डा चण्डवनी चंव चामुण्टा चण्डिका तथा ॥२२ आभि, शक्तिभिरप्टामि. सतत परिवेष्टिताम् । चिन्तयत् सतत देवी धर्मकामार्थमोक्षदाम् ॥२३ एतस्याश्चागमन्त्र तु दुर्गातन्त्रमिति श्रुतम् । भणप्वंकमना भूत्वा धर्मकामायंसाधनम् ॥२१ पनिभायाँ स्वर. पप्ठो हान्तः प्रान्तोऽग्निरेष च । दुर्गादिरिति सोझार दुगामन्त्र मिति श्रुतम् ।।२५ रवी मकरराशिस्थे या भवेन सितपचमी । सम्पामनेन मन्त्रेण मम्पूज्य विधिवच्चिाम् ॥२६ शुक्लाटण्या पनदेवो पूजयित्वा यथाविधि ।

२७४ [ कालिया पुगण नयम्या वलिदानानि प्रभूतानि समाचरेत् ॥२७ सन्ध्याया च वलिं कुर्यान्निजगापासृगुक्षितम् । एव कृते तु यल्याणयुक्तो नित्य प्रमोदते ॥२६ इस प्रकार ये ध्यान यो परते हुए पिर देवी का ध्यान करे को उग्र चण्डा-प्रचण्डा-चण्डोग्रा-चण्ड नायिका-चण्डा-चण्डवती- चामुण्डा-चण्डिया है। इन आठ शक्तिया से निरन्तर परिवेष्टित है। इसी रीति से धर्म-अथ-काम और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी का निरन्तर चिन्तन करना चाहिए । २२।२३। इसका एक मन होकर श्रवण करो। यह धर्म काम और अर्थ का साधन है । २३ वहित भार्या छटवा स्वर हान्त प्रान्त और अग्नि दूर्मादि इति सोदार दुर्गा मन्त्र-यह श्रृत है । इसका अङ्ग मात्र दुर्गा तन्त्र-यह श्रुत किया गया है । २४ । २५। सूर्य को मकर राशि पर स्थित होने पर जो शुक्ल पक्ष की पञ्चमी होती है । उसमे इस मन्त्र के द्वारा विधि विधान के साथ शिवा का भली भांति पूजन करके फिर शुक्ल पक्ष की अष्टमी मे यथा विधि देवी का पूजन करके नवमी तिथि मे बहत वलिदानो का समाचरण करना चाहिए । ०६।२७। और साध्या के समय मे अपने शरीर से उक्षित रुधिर की बलि करनी चाहिए। उस प्रकार करने पर कल्याणों से युक्त होता हुआ पुरुष नित्य ही प्रमुदित होता है ॥२८॥ पुत्रपौत्रसमृद्धस्तु धनधान्यसमृद्धिगि । दीर्धायु सर्वसुभगो लोकेऽस्मिन् स च जायते ।।२६ सिताष्टम्या तु चंत्रम्य पुस्तकालसम्भवै । अशोकरपि य कुर्यान्मन्त्रेणानेन पूजनम् ॥३० न तस्य जायते शोको रोमो वाप्यथ दुर्गति । ज्यप्ठे तु शुक्लपक्षस्य अष्टम्या समुपोषित ॥३१ नवम्या सतिलेरन्नविकरथ मोदकं । से

२७६
[ कालिका पुरा
वैष्णवीतन्मत्रत्रेण दुर्गावोजेन भैरव ।
वैष्णवीतन्त्रमन्त्रेण पवित्रारोपण चरेत ।
विशपाच्छावण प्राप्य देव्या कुर्यात् पवित्रकम ॥३७
सर्वेपामेव देवाना पवित्रारोपण चरेत् ।
आपाढे थावणे वापि सवत्सरफलप्रदम ॥३८
प्रतिपद्धनदस्योक्ता पवित्रारोपण तिथि ।
द्वितीया तु श्रियो देव्यास्तिथीनामुत्तमा स्मृता ॥३६
तृतीया भवभाविन्याश्चतुर्थो तत्सुतस्य च ।
पचमी सोमराजस्य पष्ठी प्रोक्ता गुहस्य च ॥४०
मप्तमीभास्करस्योक्ता दुर्गायाश्च तथाष्टमी ।
मातृणा नवमी प्रोक्ता वासुकेर्दशमी मता ॥४१
एकादशी ऋपीणा च द्वादशौ चापाणिन ।
प्रयोदशी त्वन गस्य मम चंव चतुर्दशी ॥४२
पवित्राओ का आरोयण देवी वा परमाधिक प्रीति करने वाला
होता है । हे भैरव । दुर्गा तत्र से मन्त्र रो-दुर्गा योज में द्वारा
पवित्रा रोपण पर । ३६ । वैष्णवी तन्त्र के मन्त्र के द्वारा और दुर्गा
योग से हे भैरव । पवित्रागेपण का समाचरण परे । विशेष रूप से
थापनको प्राप्त से देवी वा पवित्रारोपण करना चाहिए ।
गमस्त देवो का पवित्रारोपण करना चाहिए। पापा में अथवा धावण
में मम्वरगर के पम मा प्रदायक होता है । ३८1 धन की प्रतिपत् तिथि
परिवारोपण ग रहो गयी है। द्वितीया तो देवी के श्री की है जो अन्य
गय तिथियों म उत्तम है~ोगा पाहै।६। मृतीया तिथि पर
भाविनी की है और पर्यों उगा गत की है मो मोमराम को।
और पछी गुहबी बनायी गयी है ।। मामी तिथि भगवान पुन
भासर बीकी गयी है। गया अमोनिय गर्गा देवी की है। मार
गना की नवमी नि' ही था दममो मिमि बामुनि की होती है।

चण्डिका मन्न वर्णन ] २७० 1 ४१1 एकादशी ऋषियो की है और द्वादशी भगवान् चक्र पाणि की होती है । त्रयोदशी कामदेव की है और मेरी चतुर्दशी तिथि है ॥४१॥४२॥ ब्रह्मणो दिक्पतीना व पौर्णमासी तिथिर्मता । पवित्रारोपण यो वं देवाना न समाचरेत् ।।४३ तस्य सावत्सरीपूजाफल हरति केशव । तस्माद् यत्नेन कर्तव्य पवित्रारोपण परम् ।।४४ कृते वहुफलप्राप्तित्स्तपूजा सपला भवेत् । पवित्र येन सूत्रेण यथा कार्य विजानता ॥४५ तच्छणुप्व प्रमाण तु वचनान्मम भैरव । प्रथम दर्शसून च पद्मसूत्र ततः परम् ॥४६ तत क्षौम सुपुण्य स्यान् कार्पासकमत परम् । पट्टसूत्र तथान्येन पवित्राणि न कारयेत् ॥४७ विचित्राणि पवित्राणि क्तव्यानि तु यत्नत । गन्धमान्य सुरभिभि रचितानि यथोदितम् ॥४८ कन्या च क्र्तयेत् सूत्र प्रमदा च पतिव्रता । विधवा माधुशीला वा दु खशीला न क्र्तयेत् ॥४६ ब्रह्माजी की और दिवपाली की पौर्णमासी तिथि मानी गयी है। जो पुरप देवों को पवित्राओ का आरोपण नहीं करता हैं । उसको साम्व- स्मरी पूजा के पत्र को भगवान के शव हरण कर लिया करते हैं । इमी लिये प्रयत्न पूर्वक पवित्रारोपण अवश्य वरना पाहिए । ४३ ॥४१ । 'ऐमा करने पर बहुत पल की प्राप्ति होती है और पूजा से फल होती है। पवित्रा जिम मूत्र से और जैसे भी करना चाहिए उसका ज्ञान होना 'चाहिए तभी उसे पवित्रारोपण घरना चाहिए । १४ । हे भेरव । मेरे पवन से उसका प्रमाण आप अवघवण करिये । सर्व प्रथम तोदर्भ मूम है उगसे परपदम मूग होता है । ४५1 इसके पश्चात सौम मुपुग्य होता २७८ इस पवित्रा वी रचना मे ऐसे मूत्र का मन कर देवे जोई जिमका उपयोग किया गया हो-जो चूहो के द्वारा कुतरा हुआ हो- मद्य एव रक्त से दूषित हो-मलिन-नील रक्त हो-ऐसे मा [ कानिका पुराण है और इससे पर कपाम का सूत्र हुआ करता है पिर यह मूत्र है तथा अन्य के द्वारा पवित्रो वा कराये । ४६ । १७ । यत्न पूर्व वा पवित्रा विचित्र करने चाहिए । अर्थात् कई रङ्गो से समन्वित होने चाहिए। गन्धमान्य सुरभियो मे जैसा कहा गया है विरचित होने चाहिये । १८ उम सूत को क्या कर ले अथवा पति व्रता प्रमदा उसको करले। विधवा हो और माधु शीला हो वह उमको वरले किन्तु दु शील या दुःछ शील कभी भी इसकोन परे ॥४॥ यत्सूचिभिन्न दग्ध च भस्मधूमाभिगुण्ठितम् । तवर्जनीय यत्नेन सूनमस्मिन पवित्रके ॥५० उपयुक्त चाखुजग्ध मद्यरक्तादिदूषितम् । मलिन नीलरक्त च प्रयत्नेन विवर्जयेत् ।'५१ सूत्र पवित्र कुर्वीत कनिष्ठोत्तममध्यमम् । कनिष्ठ यन् पवित्र तु सप्तविंशतितन्तुभिः ॥५२ मर्त्यलोके यश पोति सुखसौभाग्यवर्धनम् । चतु पञ्चाशता प्रोक्त तन्तूना मध्यम परम् ॥५३ दिव्यभोगावह पुण्य स्वर्गमोक्षप्रदायकम् । उत्तम चैव तन्तूनामष्टोत्तरशतेन वै ॥५४ तद्दत्वा तु महादेव्यै शिवसायुज्यमाप्नुयात् । उत्तम वासुदेवाय दद्याद् यदि पवित्रकम ॥५५ तदा याति हरेर्लोक साधको नान मशय । अष्टोत्तरसहस्र तु रत्नमालेति गीयते ॥५६ से भिन्न हो-दाय हो-भस्म और घूम से अभिगुण्ठित हो । परमपूर्वर परिवर्जन पर देना चाहिए ॥ ११॥ सूत्रो से पनिा--

चण्डका मन्त्र वर्णन }
२७६
और उत्तम पवित्रा की रचना करे। कनिष्ठ जो पवित्रा है वह सत्ताईस
तन्तुओ से होता है । ५२ । यह पवित्रा मर्त्यलोक मे यश-कीति-
सुख और सौभाग्य का वढाने वाला होता है । चौअन त तुओ का पवित्रा
मध्यम कहा गया है । १३ । परम दिव्य भोगो आवहन करने वाला
पुण्य-स्वर्ग और मोक्ष का प्रगन करने वाला उत्तम होता है जो एक
सौ आठ तन्तुओ के द्वारा निर्मित होता है । १४ । उसको महादेवी के
निये अपित करके मनु य भगवान शिव की मामुज्यता को प्राप्ति किया
यरता है । यदि भगवान वासुदेव के लिये उत्तम पवित्रा को समर्पित
परे तो वेद पुरुष सीधा हरि के लार म गमन विया करता है-इसमे
सेश मात्र भी समय नहीं है । एक हजार आठ तो रत्नमाला गाई जाती
पवित्र तु महादेव्या भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ।
रत्नमाल्यां तु यो यच्छेन्महादेव्य पवित्रकम् ॥५७
कल्पवोटिसहस्राणि स्वर्ग स्थित्वा शिवो भवेत् ।
एतत् तु नागहाराश्य शकरम्य पवित्रम् ॥५८
अप्टोत्तरमस्रण तन्तुना सुमनोहरम् ।
य प्रयच्छति मह्य तु स यावास्तन्तुसचय ॥५६
सावत्यल्पसहस्राणि मम लोये प्रमोदते ।
अप्टोतरसहस्रण वनमाला हरे स्मृता ॥६०
तन्तुना तस्य दानन विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ।
यत् पनिष्ठ पविय तु नाभिमान भवेत् तु तत् ॥६१
द्वादशग्रन्धिसयुक्तमात्ममानेन
योजयत्।
म्याद् अन्योना तत्र योजयेत् ॥६२
चतुर्विशतिमप्यस्य मानमात्मन एव च ।
पवित्रमुत्तम प्रोक्न जानुमात्र च भैरव ॥६३
महा देवी को अपित पवित्रा तो मुक्ति और मुरित रे प्रदान
ण

२८० | कालिका पुराण करने वाला होता है। जो पुरुप रन माला में महादेवी को सेवा में पवित्रा का समर्पण किया करता है ।। ५७ ।। वह सहस करोड कल्पो तव स्वर्ग में निवास करके शिव ही हो जाया करता है। यह तो नाग- हार नाम वाला भगवान् शङ्कर का पवित्रा होता है । ५८ । एक सहल आठ तन्तुओ के द्वारा परम मनोहर पवित्रा बनाकर जो मेरे लिये अर्पित किया करता है वह उसमें जितने ही तन्तुओं का सञ्चय होता है उतने ही सहस्र कल्पों तक मेरे ही लोक में आनन्द का उपभोग किया करता है । एक हजार आठ से भगवान हरि की वनमाला कही गई है ।। ५६-६०॥ उसके तन्तुओ के रान मे भगवान् विष्णु के स्तयुज्य की प्राप्ति किया करता है। जो कनिष्ठ पवित्रा होता है वह नाभि पर्यन्त रहने वाला होता है । ६१। वारह थियो से समन्वित आत्ममान के द्वारा उमे योजित करे । अरुओं तक आने वाला मध्यम पवित्रा होता है । वहा पर प्रन्थियों को यौजित पर लेना चाहिए । ६२। मका चौवीस का मान आत्मा का है वह उत्तम नोटि मा पवित्रा होता है। हे भग्व' वह जानु पर्यन्त कहा गया है ।६३) पत्रिंशत्तनुग्रन्थोना योजयेदात्ममानत । शतमप्टोत्तर कार्य ग्रन्थीना सुविधानत ॥६४ नागहाराहवय तद्वदन्येषु च विधानत । पवित्र क्रियते येन सप्रेण ग्रन्यय पुन ॥६५ तदन्यवर्णसूत्रेण यतंच्या लक्षणान्विता। अन्यि तु सप्तभि पुर्याद् वेष्टनस्तु पनिहरे ॥६६ द्विगुणमध्यमे पुर्यास्त्रिगणरुत्तमे तथा । अधियारय पवित्राणि पूर्वस्मिन दियसे तत ॥६७ मन्त्रन्यास पवित्र तु कुर्यात् तत्रापरेऽहनि । दुर्गावोजेन मन्त्रण मन्त्रन्याम द्विजश्वरेत् ॥६८ वैष्णवीतन्त्रमन्त्रेण कुयु रम्य प रप ।

च पडका मन्त्र वर्णन ]
२८१
प्रतिग्रन्थि स्वय कुर्यान्मन्त्रन्यास विचक्षण ॥६६
अगुप्ठाग्रेण जपन मालायामिह भैरव ।
यावन्तो ग्रन्थयश्चात्र तावन्त्येव च सन्ययसेत् ॥७०
आत्मा के अर्थात् अपने मान से छत्तीस ग्रन्थियो का योजित
करे । एक सौ आठ ग्रन्थियो का सुविधान से करना चाहिए । ६४ ।
नागहार नामक जो है उसी के समान अन्यों में विधान से पविन किया
जाता है जिस सूत्र के द्वारा पुन ग्रन्थियां होती है ॥ ६५॥ उनमे
अन्य वर्ण वाले सूत्र से लक्षण से समन्वित पबित्रा की रचना करनी
चाहिए। कनिष्ठक मे सात वेटनो के द्वारा ग्रन्थि करे। मध्यम म
दुगुनी करे और उत्तम से तिगुनी करे । पूर्व दिन में पवित्राओ का अधि-
धासन करना चाहिए। फिर वहां दूसरे दिन मे पवित्रा मे मन्त्र न्यास
परे । ६६-६७ । दुर्गा वीज मन्त्र मे द्विज को मन्त्र का न्याम करना
चाहिए । ६८ । हे भैरव । अन्य लोग वैष्णवी तन्त्र के मन्त्र के द्वारा
करे। विचक्षण पुरुष को प्रत्येक ग्रन्थि मे स्त्रय मन्त्र का न्यास करना
चाहिए । ६६ । हे भैरव । यहाँ पर माला म अगुप्ठ के अग्र भाग से
जप है। यहाँ पर जितनी भी ग्रन्थियाँ हो उतनी ही भली भांति न्यास
करे।७०1
मन्त्राणि तस्य तेन स्यादेवांगोपनियोजनम् ।
दुर्गातन्त्रेण मन्त्रेण तत्त्वन्यास तु कारयेत् ॥७१
एकत्र न्यस्य सकल यजपाने पवित्राम।
तस्मिन् निधाय गन्धादि पुष्पाणि च सुशोभनम् ॥७२
तत्वन्यास तत कुर्यादगुल्यग्रेण भैरव ।
विष्णोस्तु मूलमन्त्रोण तत्वन्यास तु कारयेत् ॥७३
इद विष्णुरिति प्रोक्त मन्त्रन्यास द्विजस्य हि ।
शूद्राणा मन्यविन्यासे मन्यो वै द्वादशाक्षर ॥७४
प्रासादेन तु मोण तत्त्वन्यासो मम स्मृत ।
अनेन मन्यन्यास च दान चानेन कारयेत् ॥७५

२८० पालिमा पुराण "-यह कहा गया है। । इसके द्वारा मन्त्र न्याम यु युमोशौरमपूर श्चन्दनादिविलेपन । पवित्राणि विलिप्याथ तत्वन्यास तु योजयेत् ॥७६ सम्पूज्य मण्डले देवी विधिवत् प्रयतो नर । वैष्णवीतन्त्रमन्योण दुर्गातोण भैरव 11७७ उसा मन्त्र उरास अङ्गापयाजन हावें । दुर्गा तब वे मन्त्र के द्वारा तत्त्व न्य स बराना चाहिम ॥७१॥ एक स्थान म यश पात्र में म समस्त पवित्रामा पा रखका उतम गन्ध आदि और पुप्पो को रखकर परम शोमन ह भैरव । अगुली के अग्रभाग स फिर तत्त्व न्यास रना चाहिए। भगवान विष्णु के मूल मन्त्र के द्वारा तत्व न्यास करावे ॥७२-७३॥ द्विज का मन्य न्यास ' इद विष्णु शूद्रो के मन्त्र वि याम य मन्त्र यारह अक्षरो का होता है ॥ ७४ ॥ प्रासार मन्त्र से मेरा तत्त्व न्यास दहा गया और इसमे ही दान कराव । ७५। कु कुम-उशीर-कपूर और चदन आदि विलेपनो से पवित्राओं का विलपन वरक तत्त्व न्यास को योजित परना चाहिए । ७६ । प्रयत होते हुए मनुष्य को विधिपूर्वक मण्डल में देवी का भले प्रकार से अभ्यचन करके हे भैरव । जो वैष्णवी तन्त्र से मन्त्र के द्वारा दुर्गा ताठ मे करे । ७७ ! दुर्गाबीजेन दद्यात् तु देव्या मूनि पवित्रकम । यस्य देवस्य य प्रोक्तस्तस्य तेनैव मण्डलम् ।।७८ यस्य यस्य तु यो मन्गो यथा ध्यानादि पूजनम् । तत तत तेनंव मन्त्रोण पूजयित्वा प्रयत्नत ॥७६ तस्य॑व बीजमन्त्राप्या भनि दद्यात पवित्रकम् । पवित्रा मम यो दद्याद् देवेभ्यश्च पवित्रकम् ॥८० सर्वेषामेव देवाना सम्पूर्णार्थश्च भैरव । अग्नि झा भवानी च गजवक्त्रो महोरग ॥८१ स्वन्दो भानुर्मातृगणो दिक्पालाश्च नवग्रहा ।

चण्डिका मत्र वर्णन ] एतान् घटेपु प्रत्येक पूजयित्वा यथाविधि ॥२ पवित्र मूनि चकक दद्यादेभ्य समाहित । पचगव्यचरु कृत्वा देव्यं दत्त्वाहुतित्रयम् ॥८३ तेनैव विष्णवे दत्त्वा शम्भवे च यथाविधि । आज्यरष्टोत्तरशत तिलराज्यस्तथैव च ॥८४ दुर्गा वीज के द्वारा देवी के मस्तक म पवित्रा का समर्पण करना चाहिए। जिस देव का जो कहा गया है उमका उसी से ही मण्डल होता है । ७६ । जिम जिसका जो मन्त्र है, जैसा भी ध्यान आदि पूजन है वह-वह उसी मन्त्र से ही यत्नपूर्वक पूजन करके उसके ही वीज और मन्त्र से मस्तक मे पवना का अर्पण करे। जो भी मुझको पवित्रा का समर्पण करता है और देवो के लिये देता है ।। ७६-८० ।। हे भैरव । सभी देवो का सम्पूर्ण अर्थ होता है । अग्नि -ब्रह्मा-भवानी-गज- वक्त्र-महोरग-स्वन्द-भानु–मातृगण-दिक्पाल- नवग्रह-इन मवको घटो मे यथा विधि-प्रत्येक का पूजन करके परम सावधान होते हुए इनके लिये एक एक पवित्रा मस्तर में समर्पित करे पञ्चगव्य चरु को बना करके देवी के लिये तीन आहतियां देवे। उसी से भगवान विष्णु और शम्भु के लिय यया विधि देवे । आज्य (घृत) से तथा तिल संयुत घृत से अप्टोत्तर शत आहुतियां देनी चाहिये । ॥८१-८४॥ अष्टोत्तरशत दद्यान्महादेव्यं च साधक । एवमेव विधानेन विष्ण्वादीना च साधक ॥८५ पवित्रारोपण कुर्याद् धर्मकामार्थसिद्धये । नवेद्यविविध पेयवंटपिष्टकमादकं ॥८६ कूष्माण्डर्नारिकेलश्च खजुरे पनसंस्तथा । आम्रदाडिमक रुद्राक्षादिविविध फले ॥८७ भदय भोज्यादिभि सर्वमत्स्यसंस्तथौदनै ।

. [ पालिका पुराण । गन्धं पुष्पैस्तथा धूपःपैश्च सुमनोहरः 11८८ वासोभिभूषणैश्चय भवानीसाधको यजेत् । मटनर्तक्सघश्च वेश्याभिश्चंव भैरव ||८६ नृत्यगीते समुदितो जागर कारयेन्निशि । भोजयेद ब्राह्मणाश्चापि ज्ञातीनपि द्विजातिभि ६० पवित्रारोपणे वृत्ते दक्षिणामुपदापयेत् । हिरण्य गा तिलघृत वासो वा शाकमेव वा ॥६१ भाधना वग्न वाले को महादेवी के लिये एक सौ आठ आहु- तियां देनी चाहिए । इसी विधान से भगवान विष्णु आदि यो भी साधक द्वारा आहुतिग देनी चाहिए । ८५ । धर्म-छाम और अर्थ की सिद्धि के लिये पवित्रारोपण करना चाहिए। परमावश्यक कृत्य है । अनेर प्रकार के नैवेद्य-पेय-पिटक -मोदयों से-कूष्माण्ड-नारिकेल- खजुर-पनस-प्रान-दाडिम-रद्राक्ष-आदि विविध भांति के फलो के द्वारा समस्त भक्ष्य भोज्य आदि से-मत्स्य-मास ओदन मे --गन्ध --पुष्प-धूप-दीप-सुभ मोह वस्त्र-भूषण से भवानी वा साधक यजन करे । ह भैरव । नर और नर्नको के ममुदाय तथा वेश्याओ के द्वारा देवी का मनो विनोद बरे ॥ ८६-८६ । नृत्य और गीतो से समुदित होकर रात्रि म जागरण करे । द्विजातियों के साथ और ज्ञातियो को तथा ब्राह्मणो को भोजन कराव । पवित्रा रोपण के हो जाने पर दक्षिणा का उपदाय न करे । दक्षिणा मे सुवणं-गौ-~-तिल -घृत- वस्थ अधवा शाव ही दवे ॥६॥६१|| इम मन्त्र तत पश्चात् साधक समुदीरयेत् । मणिविद्रुममालाभिमन्दारकुसुमादिभि ॥६२ इय सावत्सरी पूजा तवास्तु परमेश्वरि । ततो विसर्जयेद् देवी पूजाभि प्रतिपत्तिभि ॥६३ एव ते पवित्राणा दाते देव्या यथाविधि।

महिषामुरो पाख्यान । २८५ संवत्सरस्य या पूजा सम्पूर्णा वत्सराद् भवेत् १६४ कल्पकोटिशत यावद् देवीगेहे वसेन्नरः । तत्रापि सुखसौभाग्यसमृद्धिरतुला भवेत् ।।६५ इम अनन्तर साधन इस मन्त्र का उच्चारण करे-हे परमे- श्वरि ! मणि-विद्रम की मालाओं मे और मन्धर के कुमुम आदि के द्वारा आपकी यह साम्वत्सरी पूजा मम्पन्न होवे । इसके उपरान्त पूजाओ से और प्रति पत्तियो के द्वारा देवी का दिमजन करना चाहिए ॥२॥ ॥३३॥ इस रीति मे देवी को यमा विधि पवित्राओ के दान के हो जाने पर मम्वत्मर की जो पूजा है वह वागर से सम्पूर्ण हो जाया करती है । ।६। वह मनुष्य मैक्डो करोड वल्पों ता देवी के ही घर में निवाम दिया करता है और वहां पर भी उसको मुख-सौभाग्य की अतुला समृद्धि होती है ॥६॥ ॥ महिषासुरो पाख्यान ॥ दुर्गातन्त्रेण मन्योण कुर्याद् दुर्गामहोत्सवम् । महानवम्या शरदि वलिदान नृपादयः॥१ आश्विनस्य तु शुक्लस्य भवेद् ता अष्टमी तिथिः। महाष्टमीति सा प्रोक्ता देव्याः प्रीतिकरी परा ॥२ ततोऽनु नवमी या स्यात् मा महानवमी स्मृता । सा तिथि. सर्वलोकानां पूजनीया शिवाप्रिया ॥३ अनयोवंत्स पूजायां विगेपं शृणु भैरव । सम्पूज्य मण्डले देवी विधिवत प्रयतो नर. ॥४ वैष्णवोतन्यामंगेण दुर्गातन्त्रोण भैरव । मूर्तिभेदे यथा देवी पूजा गृह्णाति भूतये ॥५ इन दोनोम उसका आपश्रवण २८६ [ कालिया पुगण वन्यासस्ने रवी वत्स शुक्लामारभ्य नन्दिकाम् । अयाचिताशी नक्ताशो एकाशी त्वथ चापद ॥६ प्रात स्नायो जितद्वन्द्वस्थिकाल शिवपूजक. । जपहोमसमायुक्तो भोजयेच्च कुमारिका ॥७ श्री भगवान ने कहा-दुर्गा सन्त्र मे मन्त्र के द्वारा दुर्गा का महोत्सव करना चाहिये । शरद् काल मे महा नवमी राजा आदि को वलिदान करना चाहिए । १ । आश्विन मास के शुक्ल पक्ष मे जो अष्टमी तिथि होती है । वह महाटमी कही गयी है जो देवी की परम प्रीति करने वाली हुआ करती है । २ । इसके पश्चात् जो नवमी तिथि होती है वह महा नवमी कही गयी है। वह तिथि समस्त लोको को पूजनीय और शिव की प्रिय होती है । ३ । हे भैरव । हे वत्स जो पूजा होती है उसमे जो भी कुछ विशेषता करिए । मण्डल में विधि के साथ देवी का प्रयत होकर मनुष्य भनी भाति पूजा करे । ।। हे भैरव | वैष्णवो तय से मन्त्र के द्वारा और दुर्गा के मन्त्र स मूत्ति भेद म जम देवी भूति के लिये पूजा का ग्रहण विया करती है । ५। कन्या राशि पर सूय के आ जाने पर हे वत्स शुक्ल पक्ष की नन्दिवा अर्थात प्रति पत् तिथि से आरम्भ करके रहे । अमाचिन का अगन करने वाला~रात्रि में एक बार भोजन पर वाला ~अमद रहने वाला-पान काल म स्नान करन वाला-शीतोष्ण आदि इत्यो का गहन करने वाला और दोनो वक्त में शिव का पूजन करन वाला-जप और होम ग रामायुक्त होता हुआ धुमारिकाओ को भोजन पराना चाहिए ॥ ६॥७॥ वोधयद विश्वशायागु पध्या देवीफलेप च । सप्तम्या विवशाखा नामाहत्य प्रतिपूजयेत् ।।८ पुन पूजा यथाष्टम्या यिशेर्पण समाचरन् । जागर य स्वय कुर्याद थलिदान महानिशि महिषासुरो पाख्यान ] २८७ विल्व वृक्ष प्रभूतलिदान तु नवम्या विधिवच्चरेत् । ध्यायेद् दशभुजा देवी दुर्गातन्त्रोण पूजयेत् ।।१० विसर्जन दशम्या तु कुर्याद् वै साधकोत्तम । कृत्वा विसजन तस्या तिथौ नक्त समाचरेत् ॥११ यदा तु पोडशभुजा महामाया प्रपूजयेन् । दुर्गातन्त्रोण मन्त्रण विशेष तत्र वै शृणु ॥१२ कन्याया कृष्णपक्षस्य एकादश्यामुपोपित । द्वादश्यामेकभक्त तु नक्त कुर्यान् परेऽहनि ॥१३ चतुर्दश्या महामाया वोधयित्वा विधानत । गीतवादित्रनि?पन् नानवेद्यवेदन ||१४ की शाखाओ मे वोध न करे और पही तिथि मे देवी फलो मे करे । सप्तमी तिथि मे उस विल्व की शाखा का आहरण करके प्रति पूजन करना चाहिए । ८। फिर अष्टमी मे विशेष रूप से पूजा का समाचरण करना चाहिए । स्वयं जागरण करे तथा महा निशा मे बलिदान करे।६। अ धक वलिदान तो विधि के सहित नवमी मे करना चाहिए । दश भुजाओ वाली देवी का ध्यान करे और दुर्गा तन्त्र से पूजा करनी चाहिए । १० । उत्तम साधक को दशमी तिथि मे विसर्जन करना चाहिए । उस तिथि मे रात्री मे विसजन करके समाचरण करे ।११। जिस समय मे सोलह भुजाओ वाली महामाया का पूजन करे। दुर्गा तन्त्र के मन्त्र से करे। उसकी विशेषता के विषय में अव श्रवण करो। कन्या की सक्रान्ति मे कृष्ण पक्ष की एकादशी मे उपवास विए हुए द्वादशा मे एक वार दूसरे दिन मे रात्री मे करे ।१३। चतुर्दशी मे विधान से महामाया का वोधन करे जो गीत वारिद्य और निर्घोष के द्वारा और अनेक नवेद्यो के वेदनो के द्वारा वोधन करना चाहिये ॥१४॥ अयाचित बुध. कुर्यादुपवास परेऽहनि । एवमेव व्रत कुर्याद् याव_ नवामी भवेत् ॥१५

२८८
[ कालिका पुराण
ज्येष्ठाया च समभ्ययं मूलेन प्रतिपूजयेत् ।
उत्तरेणार्चन कृत्वा श्रवणान्ते विसजयेत् ॥१६
यदा त्वष्टादशभुजा महामाया प्रपूजयेत् ।
दुर्गातलोण मन्त्रोण तथापि शृणु भैरव ॥१७
कन्याया कृष्णपक्षस्य पूजयित्वार्द्रभे दिवा ।
नवम्या वोधयेद् देवी गीतवादिशनिस्वनं ।।१८
शुक्लपक्षे चतुयां तु देवीकेशविमोचनम् ।
प्रातरेव तु पञ्चम्या स्नापयेत् तु शुभर्जलं. ॥१६
सप्तम्या पत्रिकापूजा अष्टम्या चाप्युपोपणम् ।
पूजाजागरण चंच नवम्या विधिवद्वलि २०
सम्प्रेषण दशम्या तु कीडाकौतुकमगले ।
नीराजन दशम्या तु वलवृद्धिकर महत् ॥२१
बुध पुरुप को दूसरे दिन म आय चित उपवास करे ।
सी प्रकार ही जब तक नवमी हो व्रत करे ॥ १५॥ ज्यप्ठा मे
ली भांति अभ्यर्चन करना चाहिय आर मूल में प्रतिपूजन करे ।
तरा से अर्चन करके श्रवण के अन्त मे विसजन करना चाहिए ।
१६ ॥ जिस समय मे अठारह भुजाओं वाली महामाया का पूजन
रे। हे भैरव । दुर्गा तन्त्र से मन्त्र के द्वारा वहाँ पर भी करे ।
भैरव । उसका आप श्रवण कीजिए ।। १७ ॥ कन्या मे कृष्ण
म की आर्द्रा नक्षत्र मे दिन मे पूजन करे । नवमी तिथि मे गीत वादित्र
पॉंपो के द्वारा देवी का बोधन करे । १८ । शुक्ल पक्ष में चतुर्थी तिथि
। देवी के के शो का विमोचन कर । पञ्चमी मे प्रात. काल ही मे शुभ
ल से स्नपन करावे । १६ । सप्तमी मे पत्रिका की पूजा करे और
टमी गे भी उपोपण करे। नवमी म विधि के साथ पूजा जागरण
और बलि परे । २० । दशमी म जीडा-कौतुा मङ्गलो के द्वारा
मम्प्रेषण परे । दशमी में नीराजन बरे जो महान् बल और वृद्धि का
परने वाला होता है ॥२१॥

महिषासुरो पास्यान ।
यदा वै वैष्णवो देवी महामायों जगन्मयोम् ।
पूजयेत् तत्र च यदा विशेष शृणु भैरव ।।२२
कन्यासंस्थे रवौ पूजा या शक्ला तिथिरष्टमी ।
तस्यों रान्नौ पूजितव्या महाविभवविस्तरेंः ।।२३
नवम्यां वलिदान तु कर्तव्य नै यथाविधि ।
जपं होमं च विधिवत् कुर्यात् तत विभूतये ॥२४
सम्पूजयेन्महादेवीमप्टपुष्पिपया नरः1
रामस्यानुग्रहाय रावणस्य वधाय च ॥२५
रानावेव महादेवी ब्रह्मणा वोधिता पुरा ।
ततस्तु व्यक्तनिद्रा सा नन्दायामाश्विने सिते ॥२६
जगाम नगरी लङ्का यत्रासीद्राघव पुरा।
तत्त गत्वा महादेवी तदा तो रामरावणौ ॥२७
युद्ध नियोजयामास स्वयमन्तहिताम्बिका ।
रक्षसां बानराणा च जग्ध्वा सा मासशोणिते ॥२८
जिस समय में जगन्मयी यप्णवी देवी महामाया का पूजन करे
यहाँ पर उस अवसर पर गे विशेपता है उसका हे मेरव ! अब आप
थवण करिए । २२। सूर्य के कन्या राशि पर सस्थित होने पर जो पूजा
है वह शुक्ल पक्ष की अष्टमी निधि है उस तिथि मे राषि में महान
चैभव के विस्तारो से पूजा करनी चाहिए । २३ । नवमी मे यथा विधि
बलिदान करना चाहिए। वहाँ पर विमेष भूति के लिए जप-होम
विधि के साय ही करना चाहिए । २४ । मनुष्य को महारेवी का अर
पुप्पिका से भली भांति करना चाहिए । पहिले समय मे श्री राम के
ऊपर अनुग्रह करने के लिये योर रावण के वध के लिये ब्रह्माजी के
द्वारा महादेवी रात्रि में ही बोधित की गयी थी। इसके अनन्तर वह
निद्रा का त्याग करके नन्दा मे आश्विन माम के शुक्ल पक्ष मे नन्दा
तिथि मे गमन करने वालो हुई थी । २५॥ २६ ॥ जहां पर पहिले की

महिषासुरो पाय्यान } देवी दशमी तिथि मे देवी सम्प्रोपित की गयी थी ।। ३२ ।। इन्द्रदेव ने । देव सेना का नीराजन किया था और वह नीरानन देव सेना । मे शान्ति के लिये और देवर के राज्य को वृद्धि के निमे हो किमा : था । ३३ । राम और रावण के धाण से जो युद्ध हुआ था वह पेखकर भय देने वाला हुआ था। तृतीया म लवा के पूर्वोत्तर दिशा मे स्थित स्वाती नक्षत्र से युक्त मे सुरो का बल बहुत अधिक भयभीत हो गया था । देवेन्द्र न हरि के वचन से शान्ति के लिय वारण किया था ॥३४॥३५॥ ततस्तु थवर्णनाथ दशम्यां चण्डिका शुभाम् । विसृज्य चक्रे शान्त्यर्थं वलनीराजन हरिः ।।३६ नीराजिवलः शक्रस्तत्र राम च राघवम् । सम्प्राप्य प्रययौ स्वर्ग सह देनैः शचीपतिः ।।३७ इतिवृत्त पुरावल्पे मनोः स्वायम्भुवेऽन्तरे । प्रादुर्भूता दशभुजा देवी देवहिताय गे ॥३८ नृणा त्रेतायुगस्यादी जगता हितकाम्यया । पुराकल्पे यथावृत्त प्रतिकल्प तथा तथा ॥३६ प्रवर्तते स्वयं देवी दैत्यानां नाशनाय वै । प्रतिकल्पं भवेद्रामो रावणश्चापि राक्षसः ॥४० तथंव जायते युद्ध तथा त्रिदशसगमः । एवं रामसहस्राणि रावणाना सहस्रशः ॥४१ भवितव्यानि भूतानि तथा देवी प्रवर्तते । पूजयन्ति सुराः सर्वे वल नीराजयन्त्यपि ॥४२ इसके अनन्तर श्रवण नक्षय से सयुत दशमी में शुभ चण्डिरा फो विदा करके हरिने शान्ति स्याय करने के लिये बल का नीराजन (आरती) विमा था। ३६। जिसके वल का नीराजन किया था वह इन्द्रदेव वहाँ पर धीराम और रावण को मस्थापित करके वह शची पर २६० [ वालिया पुराण राघवेन्द्र थे वहाँ लका में गये थे। वहाँ पर महादेवजी न गमन करके उस समय मे राम और रावण को युद्ध करने के लिये नियोजित वर दिया था और अम्विका देवी स्वय अन्तर्धान हो गई थी। वहा वानरा और राक्षसो के मांस और रुधिर वा भक्षण किया था ॥२७॥२८॥ रामरावणयोयुद्ध सप्ताह सा न्ययोजयत् । व्यतीते सप्तमे रानौ नवम्या रावण ततः ॥२६ रामेण घातयामास महामाया जगन्मयी। यावत्तयो स्वय देवी युद्धकेलिमुदैवत ॥३० तावत् तु सप्तरात्राणि सव देवै. सुपूजिता । निहते रावणे वीरे नवम्या सकलः सुरै ॥३१ विशेपपूजा दुर्गायाश्चके लोकपितामह । तत सम्प्रेषिता देवी दशम्या शार्वरोत्सौ ॥३२ क्रपोऽपि देवसेनाया नीराजनमथाकरोत् । शान्त्यर्थं सुरसैन्याना देवराज्यस्य वृद्धये ॥३३ रामरावणवाणेन युद्ध चावेक्ष्य भीतिदम् । तृतीया तु लकाया पूर्वोत्तरदिशि स्थितम् ॥३४ स्वाती नक्षमयुक्ताया भीत सुरवल महत् । शान्त्यर्थं वरयामास देवेन्द्रो वचनाद् हरे ॥३५ . महिषासुरो पाख्यान देवी दशमी तिथि में देवी सम्प्रोषित की गयी थी ॥ ३२ ॥ इन्द्रदेव ने देव सेना का नीराजन किया था। और वह नीराजन देव सेना मे शान्ति के लिये और देवरे के राज्य को धृद्धि के लिये हो किमा था । ३३ । राम और रावण के याण से बो युद्ध हुआ था यह देखकर भय देने वाला हुआ था। तृतीया मे सङ्का के पूर्वोत्तर दिशा में स्थित स्वाती नक्षत्र से युक्त मे सुरो का बल बहुत अधिक भयभीत हो गया था। देवेन्द्र न हार के वचन से शान्ति के लिये धारण किया था ॥३४॥३॥ ततस्तु श्रवनाथ दशम्या चण्डिका शुभाम् । विसृज्य चक्रे शान्त्यर्थ वलनीराजन हरि. ॥३६ नीराजिवल. शक्रस्तत्र राम च राघवम् । सम्प्राप्य प्रययौ स्वर्ग सह देशै. शचीपतिः ॥३७ इतिवृत्त पुरावल्पे मनोः स्वायम्भुवेऽन्तरे । प्रादुर्भूता दशभुजा देवी देवहिताय ) ॥३८ नृणा वेतायुगस्यादी जगता हितकाम्यया । पुराकल्पे ययावृत्त प्रतिकल्प तथा तथा ॥३६ प्रवर्तते स्वयं देवी दैत्याना नाशनाय वै । अतिकल्प भवेद्रामो रावणश्चापि राक्षस. ॥४० तथैव जायते युद्ध तथा विदशसगम । एवं रामसहस्राणि रावणाना सहस्रशः भवितव्यानि भूतानि तथा देवी प्रवर्तते । पूजयन्ति सुरा. सर्वे वल नीराजयन्त्यपि इसके अनन्तर थवण नक्षत्र से सयुत दशमी विदा करके हरिने शानि स्थाय करने के लिये (आरती) किया था। ३६। जिसके वल का 2. इन्द्रदेव वहाँ पर श्रीराम और रावण को .

२६० [ कालिका पुराण राघवेन्द्र थे वहाँ लका मे गये थे। वहाँ पर महादेवजी ने गमन करके उस समय मे राम और रावण को युद्ध करने के लिये नियोजित कर दिया था और अम्विका देवी स्वय अन्तर्धान हो गई थी। वहा वानरी और राक्षसो के मौस और रुधिर का भक्षण किया था ।॥२७॥२८॥ रामरावणयोयुद्ध सप्ताह सा न्ययोजयत् । व्यतीते सप्तमे रात्रौ नवम्या रावण तत ॥२६ रामेण घातयामास महामाया जगन्मयी। यावत्तयो. स्वय देवी युद्धकेलिमुदक्षत ॥३० तावत् तु सतरानाणि सव देव सुपूजिता । निहते रावणे वीरे नवम्या सकल सुरं ॥३१ विशेषपूजा दुर्गायाश्च के लोकपितामह । तत सम्प्रेषिता देवी दशम्या शार्वरोत्सगे ॥३२ क्रपोऽपि देवसेनाया नीराजनमयाकरोत् । शान्त्यर्थ मुरसौन्याना देवराज्यस्य वृद्धये ॥३३ रामरावणवाणेन युद्ध चावेक्ष्य भीतिदम् । तृतीया तु लकाया पूर्वोत्तरदिशि स्थितम् ॥३४ स्वातीनक्षत्रयुक्ताया भीत सुरवल महत् । शान्त्यर्थ वरयामास देवेन्द्रो वचनाद् हरे ॥३५ उस देवी ने श्रीराम और रावण का युद्ध एक सप्ताह तक नियो- जित क्यिा पा । मातवी रात्रि के समाप्त होने पर फिर नवमी मे रावण पो श्रीराम ने मार दिया था। यह जगन्मयी महामाया देवी ने उन दोनो की जब तक युद्ध को वेति हुई थी उसको स्वय देखा था ।२६। ।३०। तब तब मात रात्रिया म वह हो देवो ये द्वारा सुपूजित हुई थी। वीर रावण निहत हो जान पर नवमी तिथि में समस्त दवाणी के द्वारा पूजा की गयी थी । ३१ । लोका ये पितामह श्री ब्रह्माजी ने दुर्गा देवी पी वियप पूजा की थी। इसके अनन्तर गायरोत्सवों के द्वारा महिपासुरो पाख्यान देवी दशमी तिथि मे देवी सम्प्रोपित री गयो यो ॥३२॥ इन्द्रदेव ने देव सेना का नीराजन किया था। और वह नौगवन देव सेना मे शान्ति के लिये और देवा दे राज्य से वृद्धि के लिये हो किमा था । ३३ । राम और रावण फे पाण मे जो युद्ध हुआ था वह देखकर भर देने वाला हुआ था। तृतीया म सदा के पूर्वोत्तर दिशा में स्थित स्वाती नक्षर स युक्त में सुरो का पल बहुत अधिक भयभीत हो गा था। दवेन्द्र न हार के वचन से शान्ति के लिय वारप किया था ॥३४॥३५॥ ततस्तु श्रवनाथ दशम्या चण्टिका शुभाम् । विसृज्य चक्रे शान्त्यर्थं वलनीराजन हरि ॥३६ नीराजिवल. शक्रस्तत्र राम च राघवम् । सम्माप्य प्रययो स्वर्ग सह देने. शचीपतिः ।।३७ इतिवृत पुरावल्पे मनोः स्वायम्भुवेऽन्तरे । प्रादुर्भूता दशभुजा देवी देवहिताय गे ॥३८ नृणा त्रेतायुगस्यादी जगता हितकाम्यया । पुराकल्पे ययावृत्त प्रतिकल्प तथा तथा ॥३६ प्रवर्तते स्वय देवी दैत्याना नाशनाय । प्रतिकल्प भवेद्रामो रावणवापि राक्षस. ॥४० तथंव जायते यद्ध तथा विदशसगम । एव रामसहस्राणि रावणाना सहस्रश. ॥४१ भवितव्यानि भूतानि तथा देवी प्रवर्तते । पूजयन्ति सुरा. सर्व वल नोराजयन्त्यपि ॥४२ इसके यनन्तर श्रवण नक्षत्र से मयत दशमी म शुभ चण्डिका को विदा करके हरिने शान्ति स्थाय करने के लिय बल का नौराजन (बारती) किया था । ३६ । जिसके बल का नीराजन दिया था वह इन्द्रदेव वहाँ पर धीराम और रावण को स्थापित परसे वह ची पर

२६२
[ वालिका
पुराण
पति देवो के सहित अपने स्वर्ग लोक को चला गया था । ३७ । पहिले
क्ल्प मे यह इति वृत्त है जो कि स्वायम्भुव म वन्तर में था। उस
समय मे दश भुजाओ वाली देवी देवो के हित का सम्पादन करने के
लिये प्रादुर्भूत हुई थी ।३८ । त्रेता युग के आदि काल मे मनुष्यो के
जगतो की जनता के हित की कामना से पहिले काल में जो हुआ था
वैमा ही वैमा प्रत्येक कल्प में हुआ था । ३६ । दवी स्वय दैत्यो के
विनाश करने के लिये प्रवृत्त होती है। प्रत्येक कल्प मे श्रीराम होते हैं
और राक्षस राज रावण भी हुआ करता है । ४० । उसी प्रकार से युद्ध
होता है और उसी भांति देवो का सङ्गम भी होता है । इस प्रकार स
सहस्रा ही श्रीराम के अवतार हुआ करत है और गवण भी सहस्रो की
मख्या मे होत हैं । ४१ । प्राणी भी जो होने वाले हैं वे होते हैं और
वैसे ही देवी भी प्रवृत्त हुआ करती है। सभी सुरगण उसी देवी का
पूजन किया करते हैं तथा नीराजननी करते है । ४२ ।
तथैव च नरा सर्वे कुयु पूजा यथाविधि ।
घलनीराजन राजा कुर्याद् बलविवृद्धये ॥४३
दिव्यालङ्कारयुक्ताभिरुणीभि प्रवतनम् ।
क्तव्य नृत्यगीतानि पीडाकौतुकमगल ॥४४
मोदकै पिष्टवं पेयर्भक्ष्यभोज्यरनेवश ।
कूष्माण्ड रिवेलश्च खर्जु पनसंस्तथा ।।४५
द्राक्षामलकशाण्डिल्यं प्लीहैश्च करुणस्तथा ।
वशेरुकमुले सजम्यूतिन्दुवादिभि ।।४६
गव्यगुडस्तया मासमंद्यमधुभिरव च ।
यालप्रियंश्च नैवेद्यलांजाक्षतफ्लादिभि ॥४७
दक्षुदण्ई सितामिश्च सवलीनागरङ्ग ।
अजाभिमहिषमपरात्मशोणितसञ्चय ॥४८
पक्ष्यादिलिजातीयस्तया नानाविधंगे ।

महिषासुगे पाख्यान ] २६३ पूजयेच्च जगद्धात्री मांसशोणितकदम. ॥४६ उमी भाति जमा कि पूर्व कल्प मे करते थे सभी मनुष्य विधि विधान के साथ पूजा किया करते हैं । गजा वल का नीराजन वल की वृद्धि के लिये किया करता हैं । ४३। दिव्य अलङ्कारो से युक्त वारुणी मे प्रवत्तं न होता हैं । उम समय में क्रीडा कौतुक के द्वारा मङ्गलमय नृत्य और गीत करने चाहिए । ४४ । मोदको मे-पिष्टी से पेयो से और अनेक प्रकार के भक्ष्यो तथा भोज्यो मे--कूप्माण्ड - नारिकेल- खर-पनस-हाम-आंवला-शाडिल-प्लीह-करुण-शेर- क्रमुक-मूल- जम्बू-तिन्दुक तथा भव्य-गुड-माम-मद्य--मधु-- ताल प्रिय नैवेद्य लाजा (खोल)- अक्षत~दक्षु दण्ड-सिता (मिश्री) लवली नागरक-अजा [-महिप-मेप-अपने शोणित के सञ्चय- पक्षी आदि वलि के जाति वाले तथा अनेक प्रकार के पशुगण के द्वारा तथा माम और रुधिर के कईम के द्वारा जमल की धात्री का पूजन करना चाहिये ॥४५-४६० रात्री स्कन्दविशाखस्य कृत्वा विष्टकपुत्रिकाम् । पूजयेच्छत्रुनाशाय दुर्गायाः प्रोतये तथा ॥५० होमं च सतिलैराज्यौर्मासेरपि तथा चरेत् । उग्रचण्डादिकाः पूज्यास्तथाष्टौ योगिनीः शुभाः ।।५१ योगिन्यश्च चतु पष्टिस्तथा नै कोटियोगिनीः । नवदुर्गास्तथा पूज्या देव्या. सन्निहिता. शुभा. ॥५२ जयन्त्यादिर्गन्धपुप्पैस्ता देव्या मर्तयो यतः । देव्य. सर्वाणि चास्त्राणि भूषणानि तथैव च ॥५३ अङ्गप्रत्यङ्गयुक्तानि वाहन सिंहमेव च । महिषासुरमर्दिन्या पूजयेद् भूनये सदा ॥५४ पुराकल्पे महादेवी मनोः स्वायम्भुवेऽन्तरे । नृणां कृतयुगस्यादी सर्वदेवः स्तुता सदा ।।५५ २६४ [वालिया पुराण महिपामुरनाशाय जगतां हितकाम्यया। योगनिद्रा महामाया जगद्धात्री जगन्मयों ॥२६ गत्रि में स्कन्द विशाख वो पिष्ठ पुत्रिया बना कर शत्रुओं के विनाश के लिये दुर्गा की प्रीति के सम्पादन के वास्ते पूजन करे । २०॥ और तिलों के राहित घृत से तथा मास से भी होम करना चाहिए । उग्र चण्डादिक की पूजा करनी चाहिये तथा आठ शुभ योगिनियों की अर्चना करें। ५१ । योगिनियाँ पीसठ हैं तथा करोड योगिनियों हैं । देवी के सन्निहित परम शुभ नव दुर्गाओं का यजन करें । १२ । जयन्ती आदि का गन्ध पुष्पों से पूजन करें क्योंकि वे देवी की मूत्तियाँ हैं और देवियां हैं। देवी के समस्त अस्त तथा सव भूपण जो देवी के अङ्ग- प्रत्यङ्ग मे युक्त है और देवी का वाहन सिंह का पूजन करना चाहिए । महिषासुर के मर्दन करने वाली के सब वा सदा भूति-वभव के लिये यजन करे । ५३ । १४ । पहिले कल्प पे म्वायम्भुव मनु के अन्तर म मनुष्यों के कृतयुग के आदि काल मे महादेवी सदा देवगणो के द्वारा मस्तवन की गई थी । १५ । महिपामुर के विनाश के लिये तथा जगतो के हित की कामना से योगनिद्रा-जगद्धात्री जगन्मयो महामाझ प्रसिद्ध थी ॥५६॥ भुजै पोडशभियुक्ता भद्रकालीति विश्रुता। क्षीरोदस्योत्तरे तीरे विभ्रती विपुला तनुम् ॥५७ अतसीपुष्पवर्णाभा ज्वलत्काञ्चनकुण्डला । जटाजूटसखण्डेन्दुमुकुट ययभूपिता ॥५८ नागहारेण सहिता स्वर्णहारविभूषिता। शूल चत्र च खडग च शख वाण तथैव च ॥५६ शक्ति यच च दण्ड च नित्य दक्षिणबाहुभि । विभ्रती सतत देवी विवाशिदशनोज्ज्वला ॥६० खेटक चमं चाप च पाश घायुशमेव च ।

महिषासुरो पारयान ] २६५ घण्टा पशुंच मुपलं विभ्रती वामपाणिभिः॥६१ सिंहस्था नयने रक्तवर्ण स्त्रिभिरतिज्वला । शूलेन महिपं भित्त्वा तिष्ठन्ती परमेश्वरी ॥३२ वामपदेन चाक्रम्य तत्र देवी जगन्मयी। तां दृष्ट्वा सकला देवा-प्रणम्य परमेश्वरीम् ॥६३ नोचुः किञ्चन तं दृष्ट्वा निहतं महिपासुरम् । ततः प्रोवाच देवांस्तान् ब्रह्मादीन् परमेश्वरी ॥६४ वह महामाया सोलह भुजाओ से सयुत थी और भद्र काली- इम नाम से लोको मे विशुन थी। क्षीर सागर के उत्तर वर्ती तट पर अपने विपुल तनु का धारण करती हुई थी । ५७ । उनका वर्ण अलसी के पुष्प की आभा के ही समान था और उनके कुण्डल तपे हुए सुवर्ण के समान देदीप्यमान थे। खण्ड चन्द्र से युक्त उनके मस्तक पर जटाजूट थे तथा तीन मुकुटों से वह शोभायमान थी । ५८ । उनके कण्ठ मे नागो का हार विराजमान तथा सुवर्ण का भी हार पडा हुआ था जिससे वे विभूषित हो रही थी। दाहिनी ओर को बाहुओ के द्वारा वे शूल- चक्र-खङ्ग-शंख--वाण शक्ति-वज-दण्ड नित्य ही निरंतर धारण कर रही थी । देवो विकाश सयुत दशनो की पंक्तियो से परम समुज्ज्वल थी । ५६ । ६० । बाई ओर वाली वाहुओ के द्वारा वे खेटक-चर्म- चाप-पाश-संकुश-घण्टा--परशु--मुशल को धारण कर रही थी। । ६१। सिंह वाहन पर विराजमान थी और लाल वर्ण वाले तीन नेत्री मे अतीव उज्ज्वल थी। परमेश्वरो अपने शूल के द्वारा महिष असुर का भेदन करके सस्थित थी । ६२ । यहाँ पर अपने बांये चरण से आक्रमण करके जगन्मयी देवी विराजमान थी। उन देवी का दर्शन करके समस्त देवगण उनको प्रणाम कर रहे थे ॥ ६३ ॥ उस महिषासुर को निहत विलोकन करके वे देव कुछ भी नहीं बोले थे। इसके अनन्तर वह पर- मेश्वरी उन ब्रह्मादिक देवो से बोली (६४। .

। कालिका पुराण
स्मितभिन्नवदना विकाशिवदोज्ज्वला ।
गच्छन्तु भो सुरगणा जम्बुद्वीपान्नरं प्रति ॥६५
हिमवत् - पर्वतासन्ने वर कात्यायनाश्रमम् ।
तत्रैव भवतां साध्य भविष्यति न संशयः ॥६६
इत्युक्त्वा सा महादेवी नत्रवान्तरधीयत।
देवा अपि तदा जग्मु कात्यायनमुनेः पुरम् ।।६७
आश्रम प्रति ते गत्वा विस्मयाविष्टमानसा।
निहता महिपो देव्या दिष्टोऽस्माभियंदर्यदर्थतः ॥६८
स्तुता चैव महादेवी जगद्धात्री जगन्मयो ।
किमर्थमाह सा देवी गन्तुकान्यानाश्रमम् ॥६६
किमन्यद वाञ्छित कार्यमस्माकं वा भविष्यति ।
इति व वन्तस्ते सर्वे गच्छन्ति स्म परस्परम् ॥७०
देवी के मुन में मन्द हास था और परम प्रसन्न पी-उनकी
शुभदन्त पंक्ति से वे उज्जवल थी। उन्होंने दे'चो से कहा-हे सुरगगो
आप लोग अव अन्य जम्बूद्वीप की और गमन कर जाओ ।। हिमवाना
पवंत के समीप में परम श्रेष्ठ कात्यायन का आश्रम है । वहाँ पर ही
आपा माध्य होगा-इममें मणय नहीं है ।। ६६ ॥ इतना ही पहबर
वह महादयी वहाँ पर ही अन्तर्धान हो गई थी। उग अवसर मेंय.
गण भी पात्यायन मुनि ३ पुर को चले गये थे। ६७। आश्रम बी ओर
वै गमन पर विस्मय मे गमाविष्ट मन वाले हो गये थे। देवी के द्वारा
महिषासुर निहत हो गया था जो कि अप गे हम सबने देया या १६८१
और महा अगों की धात्री-जगतो मे परिपूर्ण देवी का म्तवन पिया
गया पा उम महादेवी ने मो या पात्यायन में पायम पे गमन
पारने पो गि प्रयोजन के लिये कहा है ।१६। पया कोई अन्य कार्य
हमारा मानिधन होगा? वेग यही परामर में दोगने हा पसे गरे

महिषासुरो पाख्यान
२६७
हितवत्-पर्वतासन्न मुनि-कात्यायनाश्रमम् ।
ततः सेन्द्राः सदिक्पाला ब्रह्मविष्णुशिवास्तथा ॥७१
निषेदु. सुचिरं प्रीता दुर्गादर्शनलालसाः ।
ततो रुद्रगणा सर्वे महिषासुरचेष्टितम् ॥७२
आगत्य कथयामासुर्देवलोकपराभवम् ।
ततस्तत्र महाकोपं ब्रह्मविष्णशिवादयः ॥७३
चक्र : कोऽन्योऽस्ति महिपो हतो देव्या स दानव. ।
पुनयनेह क्रियते जगदविध्वंसनं भृशम् {१७४
इति प्रकुप्यतां तेषां शरीरेभ्य पृथक् पृथक ।
निश्चकमुश्च तेजासि शक्तिरूपाणि तत्क्षणात ।।७५
तत्तेजोभिवृंतवपदेवी
कात्यायनेन ।
सन्धक्षिता पूजिता च तेन कात्यायनी स्मृता ।।७६
ततस्तेनैव मन्त्रेण दशवाहुयुतेन वै।
पश्चाज्जधान महिपं जगद्धात्री जगन्मयो ॥७७
हिमवान पति राज के समीप में ही कात्यायन मुनि का माधम
है। फिर इन्द्र के सहित तथा दिक्पालो के समेत ब्रह्मा-विष्णु-शिव
वहाँ गये थे ॥७१। वहाँ पर बहुत लम्बे समय तक वे बैठ गये थे और
मभी दुर्गा देवी के दर्शन को लालमा वाले हो रहे थे। इसके अनन्तर
समस्त रुद्रगणों ने महिषासुर के मेष्टित को आवर कहा था 1 ७२ ।
उन्होने देवलोर के पराभव का कथन वहाँ आकर लिया था। इसके
अनन्तर वहा पर ब्रह्मा-विष्णु-शिव प्रभृति ने महान कोप किया
था । ७३ । क्या कोई अन्य महिप है । वह महिषासुर तो देवो के द्वारा
हत कर दिया गया। वह कौन है जिसके द्वारा पुन. यहाँ पर जगतो का
अत्यन्त विध्वंम किया जा रहा है ।७४। इस प्रकार के प्रकोप करते
हुए उन देवी के शरीरो से पृथक-पृथक् तेज निर्वात हुए जो उसी क्षण
मे शक्ति के स्वरूप वाले थे ।७५। उन देवों के शरीगे से नि त तेजो

२६८ [पालिका पुराण मे देवी ने वपु धारण किया था और निश्चय ही कात्यायन के द्वारा सन्धुक्षित एव पूजित हुई थी। इसी से वह कात्यायनी-इस नाम से कही गयी है । ७६ । इसके अनन्तर उसी मन्त्र के द्वारा जो दश बाहुओ से समन्वित है उम जगतो की धारी और जगन्मयी देवी ने पश्चात महिषासुर का वध कर दिया था ॥७॥ यदा स्तुता महादेवी बोषिता चाश्विनस्य च । चतुर्दशी कृष्णपक्षे पादुर्भूता जगन्मयो ।।७८ देवाना तेजसा मूर्ति शुक्लपक्षे सुशोभने । सप्तम्या साऽकरोद् देवी अष्टन्या तरलड कृता ॥७६ नवम्यामुपहारस्तु पूजिता महिपासुरम् । निजधान दशम्या तु विसृष्टान्तहिता शिवा ।।८० श्रुत्वेमा सगरो राजा देव्या सङ्गतिमुत्तमाम् । सशयालुश्च तद्रूपे पुनरौद्धमपृच्छत् ।।८१ यदि पश्चान्महादेवी जघान महिषासुरम् । कथ पूर्व भद्रकाली-रूपाभन्महिषासुरम् ।।८२ नथाहि दर्शन तस्या पादाक्रान्तश्चकार च । हदि शूलेन निभिन्न ददृशु सक्ला सुरा । एव तु संशय छिन्धि मुनिश्रेष्ठ ममाधुना ||८३ जिस अवसर पर महादेवी का सरतवन किया गया था और बोधित की गई थी ता आश्विन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि में वह जगन्मयी प्रादुभूत हुई थी अर्थात प्रत्यक्ष रूप म प्रकट हुई थी। वह देवो के तेजो की मूर्ति परम शोभन शुक्लपक्ष में सप्तमी तिथि में उमन दिया था और वह देवी अहमी म उन्ही के द्वारा समलत हुई थो । ७.1 नवमी तिथि म वह उपहारो के द्वारा पूजित थी और उसने महिपासुर वा हनन दिया था। दशमी मे विदा की गई और वह शिव अन्तर्धान हो गई थी।८० । मावंण्डेय महर्षि ने कहा- राजा सगर ने इस परमोत्तम देवी की सङ्गति का श्रवण करपे वह

महिपामुगे पाख्यान ]
उमके स्वरूप में संशयालु होकर पुन उसने आँध से पूछा था । ८१ ॥
राजा सगर ने कहा- यदि महादेवो ने पीछे महिषासुर का हनन किया
था तो पूर्व में कैसे महिपासुर के लिये वह भद्रकाली रूप वालो हुई थी?
१२। उमी भांति उसरा दर्शन है कि वह उसके चरणो से समाकान्त
किया गया था। ममी मुग्गणो ने यह देखा था कि उस असुर के हृदय
में
शूल गहा हुआ है और हृदय निर्भिन हो रहा है। हे मुनिश्रेष्ठ ।
मुझे यह वडा सशय हो रहा है इसका छेदन वृपावर करिए।३।
शृणु त्व नृपशार्दूल भद्रकाली यथा पुरा ।
प्रादुर्भूता महामाया महिपेण सहैव तु ॥८४
महिपामुर एवामौ निद्राया निशि पर्वते ।
ग्वप्न प्रददृशे वोरो दारुण धोरदर्शनम् ॥८५
महामाया भद्रकाली छित्त्वा खड्गेन मे शिर ,
पपौ तम्य च रक्तानि च्यादितास्यातिभीपणा ।।८६
नत प्रातर्भयुत म दैत्यो महिपासुर ।
तामेव पूजयामास सुचिर मानुगस्तदा ॥८७
थागधिता तदा देवो महिपेणासुरेण वै ।
प्रादुर्भूता भद्रकाली भुज पोडशभियंता १८८
तत प्रणम्य महियो महामाया जगन्मयीम् ।
उवाचेद वचो नम्रमूर्तिमंदिनयतोऽमुर ६
देवि राडगेन सन्भिद्य शोणितानि शिरो मम।
त्वया भुक्तानि दृष्टानि मया स्वप्नेन निश्चितम् ॥६०
अयश्य तु त्वया कार्य मया भात प्रमाणुत ।
एतद्रधिरपान मे तत्रैक देहि मे वरम् 1३१
औचं मुनि ने कहा-है नप शार्दूल | आप श्रवण गरिए---
जिम तरह पहिले भद्रकाली प्रादुर्भूत हुई थी । वह महामाया महिपामुर
पे साथ ही पी। ८४ । यह महिषासुर हो है जो पर्वन म निद्रा में

[ পি
पुराण
मे देवी ने पपु धारण किया था और प्रियी पात्यापन के द्वारा
रान्धक्षित एवं पूजित हुई थी। इसी ग वह वारयायती-ग नाम से
पही गयी है । ७६ । इस अनार उमी मन्त्र द्वारा जो दश जना
से समन्वित है उग जगतो पी धात्री और जगन्मयी देवी ने पत्रात
महिपासुर का वध कर दिया था ||७७।।
यदा स्तुता महादेवी दोधिता चाश्विनस्य च ।
चतुर्दशो पृष्णपक्षे प्रादुर्भूता जगन्मयो 11७८
देवाना तेजमा मूर्ति शुक्लपक्षे सुशोभने ।
सप्तम्या साकरोद् देवी अपन्या तैरलर वृता ७६
नवम्यामुपहारस्तु पूजिता महिषासुरम् ।
निजघान दशम्या तु विसृष्टान्तहिता शिवा ॥८०
श्रुत्वेमा सगरो राजा देव्या सङ्गतिमुत्तमाम् ।
सशयालुश्च तद्रूपे पुनरोद्धमपृच्छत् ॥८१
यदि पश्चान्महादेवी जघान महिषासुरम् ।
कथ पूर्व भद्रकाली-रपाभून्महिषासुरम् ॥८२
नथाहि दर्शन तस्या पादानान्तश्चकार च ।
हदि शूलेन निभिन्न दहशु सक्ला सुरा ।
एव तु संशय छिन्धि मुनिश्रेष्ठ ममाधुना ।।८३
जिस अवसर पर महादेवी वा सरतवन किया गया था और
बोधित की गई थी तो आश्विन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि में
वह जगन्मयो प्रादुभूत हुई थी अर्थात् प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हुई थी।
वह देवो के तेजो की तिं परम शोभन शुक्लपक्ष मे सप्तमी तिथि में
उसने किया था और वह देवी अष्टमी म उन्ही के द्वारा समलकुत
हुई थी। ७६ । नवमी तिथि में वह उपहारो के द्वारा पूजित थी
और उसने महिपासुर का हनन किया था। दशमी मे विदा की गई
और शिव अन्तर्धान हो गई थी। ८० । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-
राजा सगर ने इस परमोत्तम देवी की सङ्गति का श्रवण परके वह
वह

महिषामुगे पाख्यान ]
२६६
चमके स्वरूप में मायालु होवर पुन उमने ओघं से पूछा था।८१ ।
राजा सगर ने कहा- यदि महादेवी ने पीछे महिपामुर का हनन किया
पा तो पूर्व में ये मे महिषासुर के लिये वर भद्रकाली रूम वाली हुई थी?
।२। उमी भांनि उमका दर्शन है कि वह उमरे चरणों में समाक्रान्त
दिया गया था। मभी मुग्गणों ने यह देखा था कि उम अमुर के हृदय
शूल गा हुआ है और हृदय मिभिन्न हो रहा है। हे मुनियठ !
मुझे यह वडा मंशय हो रहा है इसका छंदन कृपाकर करिए ।८३।
शृणु त्व नृपशार्दूल भद्रकालो यथा पुरा ।
प्रादुर्भूता महामाया महिपेण सहैव तु 11८४
महिपामुर एवासी निद्राया निशि पर्वते ।
स्वप्न प्रददृशे वीरो दारुण धोरदर्शनम् ॥८५
महामाया भद्रकाली छित्त्वा खड्गेन मे गिर ।
पपी तम्य च रक्तानि व्यादितास्यातिभीपणा ॥८६
रात प्रातभयत म दैत्यो महिषासुर ।
सामेव पूजयामास मुचिर मानुगन्तदा ॥८७
सागधिता तदा देवा महिपणासुरेण वै ।
प्रादुर्भूता भद्रकाली भुज पोडशभियंता ८८
सन प्रणम्य महिपो महामाया जगन्मयीम् ।
उचाचेद वचो नम्रमूर्तिमंक्तियतोसुर ॥८६
देवि राडगेन सन्मिद्य शोणितानि शिरो मम ।
स्वया भुक्तानि दृष्टानि मया स्वप्नन निश्चितम् ॥६०
अयश्य तु स्वया कार्य मया जात प्रमाणत ।
एतद्रुधिरपान मे तर देहि मे वरम् ।।६१
औचं मुनि ने कहा- प गादन ! आप श्रवण गरिए--
जिम तर पहिले महराती प्रादुर्भूत हुई थी। वह महामाया महिषासुर
रे गाय हो यो । ४ । यह महियागुर हो है जो पर्वत में निद्रा में

२८ [वानिया पुराण गेकी ने वपु धारण किया था और नियबापापन पे दाग गन्धाक्षत एवं पूजित थी। इसी गे वर वाचा-मनाम में पी गयी है । ७१ । गो मारी माग जो दावी गं गर्मावत है उग उगना की धात्री और गमयी देवी ने पभाव महिषासुर का वध कर दिया पा ॥3॥ यदा स्तुता महादेवी दोधिता पाश्विनम्य च । चतुदंशो कृष्णपक्षे प्रादुर्भूता जगन्मयो ।।७८ देवाना तेजमा मृति शुक्लपक्षे गुशोभने । सप्तम्या साकरोद् देवी अष्टन्या तरलर वृत्ता 1106 नवम्यामुपहारस्तु पूजिता महिषासुरम् । निजधान दशम्या तु विसप्टान्तहिता शिवा 1100 श्रुत्वेमा सगरो राजा देव्या सङ्गतिमुत्तमाय । सशयालुश्च तद्रूपं पुनरोचमछन् ।1८१ यदि पश्चान्महादेवी जघान महिषासुरम् । काथ पूर्व भद्रकाली-रूपाभून्महिषासुरम् ॥८२ नथाहि दर्शन तस्या. पादाक्रान्तश्चकार च । हदि शूलेन निभिन्न दहशु. सक्लाः सुराः एव तु संशय छिन्धि मुनि ममाधुना ।।८३ जिस अवसर पर महादेवी वा सरतदन किया गया था और वोधित की गई थी तो आश्विन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि में वह जगन्मयी प्रादुर्भूत हुई थी अर्थात् प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हुई पी 1७८t वह देवो के तेजो की मूर्ति परम शोभन शुक्लपक्ष में सप्तमी तिथि मै उसने किया था और वह देवी अष्टमी में उन्ही के द्वारा समलत हुई थी। ७६। नवमी तिथि में वह उपहारो के द्वारा पूजित थी और उसने महिषासुर का हनन किया था। दशमी मै विदा की गई और वह शिव अन्तर्धान हो गई थी। ०। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- राजा सगर ने इस परमोत्तम देवी को सङ्गति का श्रवण करके वह

महिपामुगे पास्यान ]
उमके स्वस्प में सशयालु होकर पुन उसने औघं से पूछा था 1८१ ॥
राजा मगर ने कहा- यदि महादेवी ने पीछे महिषासुर का हनन किया
था तो पूर्द म कमे महिषासुर के लिये वह भद्रकाली रूप वाली हुई थी?
१२ उमी भांति उमश दर्शन है दि वह उमवे चरणो से समाक्रान्त
किया गया था। मभी मुग्गणो ने यह देखा था कि उम बमुर के हृदय
में
शूल गहा हुआ है और हृदय विभिन्न हो रहा है। है मुनियछ।
मुझे यह बड़ा मशय हो रहा है इसका छेदन वृपावर करिए 1८३।
शृणु व नृपशार्दूल भद्रकाली यथा पुरा ।
प्रादुर्भूता महामाया महिषेण सहैव तु ।।८४
महिषासुर एवासी निद्राया निशि पर्वते ।
म्वप्न प्रददृशे वोरो दारुण धोरदर्शनम् ॥८५
महामाया भद्रकाली छित्त्वा सङ्गेन मे शिर ।
पपो तम्य च रक्तानि व्यादितास्यातिभीपणा 1८६
बत प्रातर्भयत म दैत्यो महिषासुर ।
तामेव पूजयामास सुचिर मानुगम्तदा ॥८७
आगधिता तदा देवी महिपेणासुरेण वै।
प्रादुर्भूता भद्रकाली भुज पोडशभियंता 11८८
तत प्रणम्य महिपो महामाया जगन्मयीम् ।
उवाचंद वचो नम्रमूर्तिभक्तियतोऽमुर 1८६
देवि राडगेन सस्मिद्य शोणितानि शिरो मम ।
स्वया भुक्तानि दृष्टानि मया स्वप्नेन निश्चितम् ॥६०
अयश्य तु त्वया कार्य मया जात प्रमाणुत ।
एतद्रुधिरपान मे तक देहि मे वरम् ॥६१
यांचं मुनि ने वहाहै नप शार्दूल । आप श्रवण करिए---
जिम तरह पहिले भद्रकाली प्रादुत हुई थी। वह महामामा महिपामुर
पे माप ही थी।४। यह महिपामुर ही है जो पर्वन म निद्रा में

[जाणिवा पुराण वर्तमान था। उस वीर ने एक महान दारण घार दशन वाला स्वप्न देखा था। ६५ । उमन यह स्वप देखा था रि' मुह पं नाय य अत्यन्त भीपण महामाया भद्रपाली न ग्रन स मर शिर या बदन पर उसये मधिर या पान पर रही थी। ८६ । इमर आन्तर प्रान पान में यह दैत्य महिषासुर भय म युक्त होकर उमी वा अपन अनुगामियो के साथ रहुत कान पर्यन्त पूजन किया परता था । ८७। उस समय म महिपा- मुर के द्वारा भली भौति आराधना की हुई देवी भद्र पानी सोलह- भुजाओ स युक्त होयर प्रादुभूत हुई थी अर्थात् प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हुई थी। ८८ । इसके अन तर महिषासुर ने जगन्मयी महामाया को प्रणाम किया और अत्य त विनम्र मूति वाला होकर भक्ति की भावना से परिपूर्ण होते हुए उग अमुर न यह वचन कहा ।। ८६ ॥ महिप बोला- हे देवि । आपने खङ्ग से मेरे मस्तर को काटकर मेरे रुधिर को आपने पीया था और मैंने यह देखा है। स्वप्न के द्वारा निश्चित रूप से मैंने अवलोकन किया है । ६० । आपके द्वारा यह अवश्य ही करना ही है- यह मैने प्रमाण मे ज्ञान प्राप्त कर लिया है यह मेरे रुधिर का पान आप अवश्य ही करेगी। अव उसमे मुझे एक वरदान दीजिए।६११ वध्यस्तवाह नानास्ति सशय परमेश्वरि । ममापि तत्र नो दुख नियति केन लध्यते ॥६२ किन्तु त्वयंव सहित शस्भुराराधित पुरा । मम पित्रा मदर्थेन जात पश्चादह तत ॥६३ मयाप्याराधित शम्भु प्राप्ताश्चेष्टास्तथाविधा । मन्वन्तरत्रय यावदासुर राज्यमुत्तमम् ॥६४ अकण्टक मया भुक्तमनुताषो न विद्यते । कात्यायनेन मुनिना शप्तोऽह शिष्यकारणात् 11६५ सीमन्तिनी विनाश ते करिप्यति न संशय । पुरा मुनि तपस्तस्त रौद्राश्व नाम सत्तमम् ।।६६ महिषासुगे पाग्यान ] 50628 ३०१ मुने कात्यायनाध्यस्य शिप्य हिमवदन्तिके । दिव्यत्रीरूपमतुलं कृत्वाह कौतुकात् तदा ॥६७ मया समोहितो विप्रोन्यजत् सद्यस्तदा नप.] नदूरात सस्थितेनाह मुनिना कात्यसूनुना १६८ हे परमेश्वरि । मैं तुम्हारे द्वारा ही वध्य करने के योग्य हूँ। इसमे कुछ भी गशय नहीं है । मुझे भी इस विषय में कोई भी दुख नहीं है क्योकि जो नियति है अर्थात् जो होने वाला नियत ही है वह विनी के भी द्वारा लधित नहीं हुआ करता है अर्थात् उमे कोई भी टाल नही सकता है । १२। किंतु पहिले ममय मे पापो ही गाय मैंने भगवान शम्भु की आराधना की थी। मदयं से हो मेरे पिता के द्वारा जन्म ग्रहण किया था उनके पश्चात मैं ममुत्पन्न हुआ पा । ६३ । मैंने भी शम्भु वा समागधन किया था और उसी भांति की चेष्टाएँ प्राप्त हुई थी। जब तक तीन मन्वन्तर है उत्तम असुर राज्य है ।। ६४ ।। मैंने उस राज्य को अरण्टा रूप से भोग किया है। मुझे इमका कुछ भी अनुताप नही है । शिप्य के कारण से यात्यायन मुनि के द्वारा मुझे शाप दिया गया था। ६५ । एष मोमान्निनी तेरा विनाश करेगी-इसम संशय नहीं है। पुराने समय मे तपश्चर्या करने हुए परम श्रेष्ठ रोद्राश्व नाम जो कात्यायन नाम वाले मुनि के शिष्य को हिमवान के समीप में एक अनुपम स्त्री यामधारण वरके मैंने कौतुर में उस समय में मेरे द्वारा मोहित रिया गपा था। विप्र ने उम अवसर म तप परने का त्याग पर दिया था। पाम मे ही सस्पित कात्यायन के पुत्र ने मुझे शाप दिया था ॥६६-६८॥ मात्वा माया तदा शप्त. शिप्या शोधलिना। यस्मान त्वया में शिप्योऽय मोहितस्तपसश्च्युतः ।।६६ हवरत्वया स्त्रीरूपेण तत् त्वा स्त्री निहनिष्यति । इति मा शनवान् पूर्व मुनिः सात्यापन. स्वयम् ॥१०० [ कालिया पुराण तस्य शापस्य पालाऽयमागत्य समुपस्थित । देवेन्द्रत्व मया प्राप्त भुक्त त्रिभुवन समम् ।।१०१ किञ्चिन्न धोच्य मेश्यास्ति वाञ्छनीय हि यन्मया। तस्मात् त्वा वै प्रपनोऽह प्राथ्यं शेष हि यन्मया । यद् देवि देवि दुर्गे व भूयस्तुभ्य नमो नम ॥१०२ प्राथनीयो वरा यस्ते त वृष्णप्य महासुर । दास्यामि ते वर प्राथ्य सशयो नाम विद्यते ॥१०३ यज्ञभागमह भोक्तुमिच्छामि त्वत् प्रसादत । यथा मखेषु सर्वेषु पूज्योऽह स्या तथा कुरु ॥१०४ त्वत् पादसेवा न त्यदये यावत्सूय प्रवतते । एव वरद्वय देहि यदि देयो वरो मम ॥१०५ उस समय में माया का ज्ञान प्राप्त करक शिष्य के लिये क्रोध की अग्नि के द्वारा मुझे शाप दिया गया था क्योकि तुमने यह मेरा शिप्य मोहित किया है जो तप से च्युत हो गया है ।६६ तूने स्त्री के स्वरूप के द्वारा ऐमा किया है इसमे तुझका स्त्री ही मारेगी। इस रीति से पूर्व में कात्य यना मुनि ने स्वय मुझको शाप दिया था। उस शाप का काल अव आकर उपस्थित हो गया है। मैंने देवी के इन्द्र का पद प्राप्त किया था और तीनो भुवनो का समान उपभोग क्यिा था ॥१००1१०१॥ मुझे कुछ भी सोचने अर्थात् शोव और 1च ता करने के योग्य नहीं है और न मुझ कुछ भी वाच्छनीय ही है । इस कारण से मैं आपकी शरणा- गति म प्राप्त हुआ हूँ। मुझ शेष जो भी प्राथना करने के योग्य है जो देवि । हे दुर्गे मुझ दीजिए । आपकी सवा म मरा बारम्बार नमस्कार है, 1१०२। देवी न कहा-हे महासुर । जो तुझ वरदान प्रार्थना करने के लायक है उसके विषय म तुम अब श्रवण करो। तुम्हारा प्राथनीय जो पर है जमको दे दंगी-इमम लश मान भी सशय नही है । १०३ ॥ महिशा वा-मैं आपकी प्रशन्नता से यज्ञ के भाग का उपभोग करना 1

३०४
[ वालिया पुराण
वर प्राप्त करके परम प्रसन्न हुआ और उसका मुख प्रसन्नता से सयुत हो
गया था । १०६ । उसने कहा-है उन चण्डे ! हे भद्र कालि ! ह
दुर्गे! हे देवि ! आपकी सेवा मे मेरा नमस्कार है । हे देवि ! आपको
बहुत सी मत्तियां है और आपके द्वारा समस्त परिपूर्ण हैं । हे परमे-
श्वरि ] मैं यज्ञ मे विन मूत्तियो के द्वारा पूज्य होऊँगा। यही आप मुझे
बतलाइये यदि आपके द्वारा मेरे ऊपर यहा पर कृपा की गई है ।
॥११०-१११॥
यानि नामानि प्रोक्तानि त्वयेह महिषासुर ।
तासु मूर्तिपु सपृष्ट पूज्यो लोके भविष्यसि ॥११२
उग्रचण्डेति या मूर्तिभद्रकाल. ह्यह पुन ।
यया मूर्त्या त्वा हनिष्ये सा दुर्गति प्रकीर्तिता ॥११३
एतामु मूर्तिपु सदा पादलग्नो नृणा भवान् ।
पूज्यो भविष्यति स्वर्ग देवानामपि रक्षसाम् ॥११४
आदिसृष्टात्रुग्रचण्डामूर्त्या त्व निहत पुरा ।
द्वितीयसृष्टौ तु भवान् भद्रकाल्या मया हत ॥११५
दुर्गारूपेणाधुना त्वा हनिष्यामि महानुगम् ।
किन्तु पूर्व न गृहीतस्त्व मया पादयोस्तले ॥११६
अधुना प्रार्थितवरो गृहीतः पूर्वकामयोः ।
ग्रहातव्यश्च पश्चात् त्व यज्ञभागोपभुक्तये ॥११७
इत्युक्त्वा सा महामाया उनवण्डाह्वया तनुम् ।
दर्शयामास च तदा महिपायासुराय वं ।।११८
या मूर्ति पोडशभुजा भद्रकालीति विश्रुता।
तथैव मूर्ति बाहुभ्यामपराभ्या तु विभ्रती १११६
देवी ने कहा-हे महिषासुर ! यहाँ पर आप ने जो भी नाम
पहे हैं उन मूत्तियो म सपृष्ट होता हुआ लोप में तुम पूज्य होओगे ।
1 ११२१ जो उन चण्डा मूत्ति है फिर मैं भद्रकाली हूँ। जिस मत्ति के

महिषासुरो पाख्यान } द्वारा मैं तेरा हनन रूगी वह दुर्गा कीर्तित की गयी है 1 ११३। इन मूत्तियो में सदा ही तुम मेरे चरणो मे सलग्न रहोगे और आप मनुष्यो के- स्वर्ग में देवो के भी और राक्षसो के पूज्य होआगे । ११५५ प्राचीन काल में जब सष्टि का आदि काल था उस समय म उग्र चण्टा मूत्ति के द्वारा तुम्हारा हनन किया गया था। दूसरी सृष्टि के समप में आपको भर काली मेरे द्वारा निहत दिया गया था । ११५। और इस समय में दुर्गा के स्वरूप के द्वारा तुमको तुम्हारे अनुगामियो के सहित हनन करूंगी रिन्तु पूर्व में मेरे द्वारा चरण के तल मे तुमको ग्रहण नहीं किया गया था ।११६। इस समय में तो तुम दरदान को ग्रहण करने वाले हो गये हो अतएव पूर्व कालो में ग्रहण किये गये हो। और पीछे भी यन्त्र भाग भी मुक्ति के लिये प्रहण करने के योग्य हो गये हो 1११५४ औवं मुनि ने कहा- इतना पहार उस महामाया ने उन घण्डा नाम वाले तनु को उस समय में महिपामुर को दिखला दिया था ।११८१ जो मूत्ति सोलह भुजाओ वाली थी और भद्र कालो-इस नाम से वियत यो उसी भांति मूर्ति को अमर बाहुओ से धारण करने वाली यो ॥११॥ दक्षिणाधो गदां वामपाणिना पानपात्रकम् । सुरापूर्ण च शिरसा मुण्डमाला विखेशयम् ॥१२० भिन्नाजनचयप्रख्या प्रचण्डा सिंहवाहिनी। रक्तनेत्रा महाकाया युक्ताऽप्टादशयाहुभि. ॥१२१ उग्रचण्डा भद्रकाली देव्या मूतिद्वय तथा। महिप: प्रणनामाशु दृष्ट्वा विस्मयमागत. ॥१२२ ततो यया पदाक्रम्य निहतो महिपासुरः । तयंव जगृहे पादतले देवोद्वय तु तम् ।।१२३ हृदि शूलेन निभिन्न माहिप विशिरस्ककम् । गृहीतकेशं देव्या तु निर्यदन्त्रविभूपितम् ॥१२४ वमद्रक्वं महाकाय दृष्ट्वा पूर्वतनु स्वकम् ।

[ कालिका पुराण . भय प्राप्यासुरः सोऽथ शुशोच च मुमोह च ।।१२५ ततस्तु क्षणमात्मानं सस्तभ्य स तु दानवः । प्रणम्य वचन देवीमिदमाह स गद्गदम् ।।१२६ दक्षिण की ओर नीचे गदा रक्खे हुए-बाँये हाथ से पान पात्र को रक्खे हुए थी जो सुरा से भरा हुआ था। शिर मे नर मुण्डो की माला धारण करने वाली थी। भिन्न हुए अजा के समान थी-प्रचण्ड स्वरूप वाली और सिंह के वाहन वाली थी। लाल वर्ण वाले नेत्र थे--- महती काया थी और अठारह बाहुओ से युक्त थी ।१२०.१२१। उ चण्डा और भद्रकाली ये दो मूर्ति या थी। ऐसे स्वरूप का दर्शन करके शीघ्र ही महिपासुर ने उनको प्रणिपात किया था और वह बहुत ही विस्मय को प्राप्त हो गया था ।१२२। इसके अनन्तर जिस रीति से आक्रान्त करके महिषासुर को निहत किया था ठीक उसी भांति दोनो देवियो ने उसको चरण के तल के नीचे ग्रहण कर लिया था ।१२३॥ उसका हृदय शूल मे विदीर्ण किया हुथा और महिषासुर बिना शिर वाला या। देवी के द्वारा उसके केश ग्रहण किये हुए थे और निक्लती अंत- डियो से भूपित हो रहा था । १२४। जिसके मुह से रधिर निकल रहा था--महान् जिमवा शरीर था ऐसे अपने पूर्व शरीर को उसने देखा था। वह अपुर भय को प्राप्त करके वहन चिन्ता एव शोक करने लगाया तथा मोह को प्राप्त हो गया था ॥१२५॥ इमफे अनन्तर एक ही क्षण में दानव ने अपने आपको सस्तम्भित किया था और उसने देवी यो प्रणाम दिया था तपा गद्गद होकर देवी से उममे यह वचन पहा-1१२६. यदि देवि प्रसन्नामि यज्ञभागान वस्पिता.। तदा ममान्यदा नाश एवमेतद् भवेन हि ।।१२७ ययाहं न सुरः माधं परिप्य बरमद्भुतम् । तथा मा वुर भो देवि ने जन्म प्रमों यथा ।।१२८ महिषासुगे पाख्यान } आराधिताह भवता वरो दत्तो मया तव । वध्यश्च त्वं ममवेह नात्र कार्या विचारणा ॥१२६ यत् त्वया प्रायितं चापि सर्वः सुरगणः सह । विरोधो मे सदा मा भूदिति चापि भविष्यति ।।१३० मत्पादतलसंस्पर्शाच्छरीरं तव दानव । यज्ञ भागोपभोगाय विशोणं न भविष्यति ।।१३१ तव जीवात्मभिः प्राणाः सर्व एव महासुर । हरस्य पादसंयोगाच्चिर स्थास्यति केवलम् ॥१३२ कल्पकोटिसहस्राणि त्रिंशत् त्वं महिपासुर । शतानि चाप्टावन्यानि जन्म ते न भविष्यति ।।१३३ महिप ने कहा-हे देवि ! यदि आप मुझ पर परम प्रसन्न हैं और आपने यज्ञ के भगो को मेरे लिये कल्पित किया है तब मेरा अन्य प्रकार मे नाश ही है-इस प्रकार से नहीं होना चाहिए । १२७ । जिस प्रकार से मैं देवगणो के साथ अद्भुत वैर न करूंगा हे देवि! मुझे आप ऐसा ही कर देखें जिससे मैं अन्य जन्म न प्राप्त करू।१२८ । देवी ने कहा-आपने मेरी आराधना की है अतएव मैंने आपको वर दे दिया है। यहां पर तुम मेरे ही द्वारा वध होगे इस विषय में कुछ भी विचार तुमको नही करना चाहिए । १२६ । जो भी तुमने प्रार्थना की है कि मेरा विरोध सुरो के साप न होवे-यह भी सब हो जायगा । १३० । हे दानद ! मेरे चरण के तल के सस्पर्श स तेरा शरीर यज्ञ भागो के उपभोग करने के लिये विशीर्ण नहीं हागा । १३१ । हे महासुर ! तेरे जीवात्माओ के साथ प्राण सब ही भगवान हर के पाद के संयोग से केवल चिरकाल पर्यन्त स्थित रहेंगे ।१३२॥ हे महिषासुर ! सहस्रो करोड़ फस्प तक और अन्य आठ तीस सौ तक चिरकाल पर्यन्त तेरे जन्म न होगे । १३३॥ इति देवी वरं दत्त्वा महिपायासुराय वं।

[पालिका पुराण
प्रणता तेन शिरसा तवान्तरधीयत ।।१३४
महिषोऽपि निजस्थान ययौ समोहित पुन ।
मायया चासुर भावमादाय नृप पूर्ववत् ॥१३५
अनेके निहता दैत्या मायया लोकभूतये ।
न ते पुन प्रगृहीतास्तेग्यो दत्त्वा वराज, शुभान् ।
केन वा कारणेनाय गृहीतो वरा कथम् ।
दत्तास्तस्मं समाचक्ष्व मम सम्यग् द्विजोत्तम ।।१३६
आराधितो महादवो रम्भेण सुरवैरिणा ।
चिरेण स च सुप्रीतस्तपसा तस्य शकर ॥१३७
अथ तुष्टो महादेव प्रत्यक्ष रम्भमूचिवान् ।
प्रोतोऽस्मि ते वर रम्भ वरयस्व यथेप्सितम् ॥१३८
एवमुक्त प्रत्युवाच रम्भस्त चन्द्रशेखरम् ।
अपुत्रोऽह महादव यदि ते मय्यनुग्रह ॥१३६
मम जन्मयये पुत्रो भवान् भवतु शकर ।
अवध्य सर्वभूताना जेता च त्रिदिवौकसाम् ॥१४०
इस प्रकार से यह वर देवी ने उस महिषासुर को देकर उस
असुर के द्वारा शिर से प्रणत होती हुई वहाँ पर ही अन्तर्धान हो गई
पी । १३४ । वह महिप भी हे नृप
पुन माया के द्वारा सम्मोहित
होता हुआ पूर्व की भाति आसुर भाव का आदान करके अपने स्थान को
चला गया था । १३५ । राजा सगर ने कहा-माया के द्वारा अनेर
देय निहत किये गये थे जिना विहनम लोको की विभूठि के ही लिये
ही हुआ था। उनको शुभ वरदान देवर वे पुन प्रगृहीत नहीं हुए थे।
यह विस कारण गे वर देवर क्स पुन प्रगृहीत हुआ था ? हे द्विजो-
सम | मुझे यह बतलान की कृपा कर । १३६ । ओठ मुनि ने कहा-
मुरीचे वैरी रम्भ के द्वारा महादेवजी की आराधना की गयी थी।
उमरे मिरखान पयन्त पिय हुए तप स वे भगवान् शङ्कर परम प्रसन्न

महिपामुगे पान्यान ]
हो गये थे । १३७ । इसके अग्लर परम प्रसन्न महादेवको प्रत्यक्ष रूप
में उपस्थित होकर उस रम्भ से वोले थे। मैं तुझ पर परम प्रसन्न हो
गया हूँ यव जो भी तेरा इन्छिन हो मुझवे वरदान का दरप करतो
११३८ । इस रीति में कहा हुआ रम्भ भगवान् चन्द्रकेवर से बोला
था। हे महादेवजी में बिना पुर वाला है। यदि आपका मुझ पर
अनुपह हो तो है शार ! मेरे तीन जन्मो मे बाप हो मेरे पुत्र होकर
जन्म ग्रहण करें। ऐमा ही पुन हो जो ममत प्राणियों के द्वारा अवघ्य
हो और देवगणों का नेता होवे ॥१३६-१४०।।
चिरायुश्च यशस्वी च लक्ष्मीवान् म च शंकर ।
एवमुक्तस्तु दैत्येन प्रत्युवाव वृषध्वजः ।।१४१
भवत्वेतद्वाग्निं ते भविष्यामि सुतस्तव ।
इत्युक्त्वा म महादेवस्तवान्तरधीयन ॥१४२
रम्मोपि यान म्वस्थानं होत्फुलविलोचन. ।
पथि गच्छन् स रम्भोऽय ददर्श महिपी शुभाम् ॥१४३
निहायणी चित्रवर्णा मुन्दरीमृतुशालिनीम् ।
म ता दृष्ट्वाय महिपों रन्म. कामेन मोहितः।।१४४
दोम्यो गृहीत्वा च तदा चकार सुरतोत्सवम् ।
तयोः प्रवृत्ते सुरते तदा सा तस्प तेजसा ।।१४५
दधार महिपी गर्भ तदाऽभून्महिषासुरः ।
तम्या स्वागेन गिरिशस्तत्पुत्रत्वमवाप्तवान् ॥१४६
ववृधे स तदा राम्भिः शुक्लपक्षशशांकवत् ।
त च नात्यायनमुनि. शतवान्महिषासुरम् ॥१४७
दुनय वीक्ष्य शिप्याथ शिप्यानुग्रहकारकः ।
पात्यायनेन शप्तं तं विज्ञाय महिमामुरम् ।
प्राह प्रणामपूवं तु चण्डिका चन्द्रशेखरः ।।१४८
हे गर ! वह मेरा पुत्र ऐगा हो जिसको आयु धिररान तक ...

३१० | कालिका पुराण की होवे-वह यशस्वी और लक्ष्मीमान् होवे। इस प्रकार से जब उस दैत्य के द्वारा प्रार्थना की गयी तो भगवान वृपभध्वज ने कहा-१४१॥ यह तेरा वाञ्छित हो जाये और मैं तेरा पुत्र हो जाऊंगा। इतना ही कहकर भगवान् वृषभध्यज वहाँ पर ही अन्तर्धान हो गये थे॥१२॥ रम्भ भी हर्ष से विकसित लोचनी वाला होता हुआ अपने निवास स्थान को चला गया था। मार्ग मे गमन करते हुए उस रम्भ ने शुभ महिषी को देखा था । १४३। वह महिषी निहायणी-चित्र वर्ण वाली-परम सुन्दरी और ऋतुशालिनी थी। उस रम्भ ने उस महिपी को देखा था और कामदेव से मोहित हो गया था अर्थात महिषी को देखकर ही उसके मे काम का विकार हो गया था ॥ १४४ ॥ उसी अवसर पर रम्भ ने अपने दोनों वाहुओं से उस महिषी को ग्रहण करके उसके साथ सुरतोत्सव दिया था। अर्थात् उससे सङ्गम किया। फिर रति क्रीडा के प्रवृत्त हो जाने पर उसी समय में वह महिपी उसके तेज से युक्त होकर वह गर्भवती हो गयी थी। १४५ । महिषी ने गर्भ धारण कर लिया था तभी उसके उदर से महिषासुर समुत्पन्न हुआ था। उस महिषी मे अपने ही अश से भगवान् शङ्कर ने उसके पुत्र हो जाने की प्राप्ति की थी । १४६ । वह रम्भ का पुत्र राम्भि शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की ही भाति बडा हो गया था। कात्यायन मुनि ने उस महिषासुर के लिये शाप दे दिया था । १४७ । शिय के अयं मे उसको दुनय अव- लोदन करके शिष्य पर अनुग्रह करने वाले चन्द्र शेषर ने कात्यायन के द्वारा शाप दिये हुए उस महिषासुर का ज्ञान प्राप्त करके चण्डिका से प्रणाम पूर्वक कहा-११५८1 देवी कात्यायनेनायं शप्तोऽद्य महिषासुरः । योपिद्विनाशकर्तीति भवितेति जगन्मये ॥१४६ निःसंशयमृषेर्वाक्य भविष्यति न संशयः । मदीयो माहिपः कायो देवि कार्यस्त्वया त्वयि ॥१५०

महिपागुगे पायान ]
हन्तव्यः सतत योगयुक्तः पूर्वं परेऽपि च ।
हरिहरिस्वरूपेण न त्वां वोढुक्षमोऽधुना ॥१५१
ममायं माहिपः कायस्तव वोढा भविष्यति ।
इति पूर्व महादेवो देवी प्रार्थितवान् पुरा ॥१५२
तेन देवी महादेवं जग्राह महिषासुरम् ।
त्रिपु जन्मसु पुत्रोऽशूद्रम्भस्य भगवान् हरः ।।१५३
सृप्टिवये स रम्भोऽपि रम्भ एव व्यजायत ।
आसुरं तादृश तेपे तपः परमदारुणम् ।।१५४
ईश्वर ने कहा--आज हे देवि ! यह महिषासुर कात्यायन के
द्वारा शाप दिया गया है। इसके विनाश करने वाली दोपित होगी।
इससे हे जगन्मये । पि या वार विना निसो सन्देह के ही पूर्ण
होगा-~-इसमे कुछ भी मशय नहीं है। यह महिप मेरा ही शरीर है ।
हे जगन्मयि ! यह तुम्हारे द्वारा वरना है और इसका हनन करना है।
पूर्व और पर मे भी निरलर योग से युक्त मैं हरि हरि के स्वरूप से
तुमको वहन करने में अब समय नहीं हूँ ॥१४६-१५१ ॥ मेरा यह
शरीर महिष तुम्हारा योहा होगा। यह महादेवजी ने पूर्व में पहिले
देवी से प्रार्थना को पी। १५२। इससे देवी ने महिपामुर महादेव का
ग्रहण किया था। तीनो कामों मे मगगन हर रम्भ के पुत्र हुए थे।
।। १५३ ॥ तीनों सृष्टियों में यह रम्भ भी रम्भ हो होकर समुत्पन्न
हुमा पा। उमने उगी प्ररार वा आमुर तप का तपन किया था जो
परम दारण था।१५॥
संयंवाराधितः शम्मुः पुत्रार्थं प्रददी वरम् ।
तथैव महिपी भेजे प्रथम सुरत सः ॥१५५
तस्यां तथाऽभवद्वीरो दानयो महिषासुरः ।
तोय शेपे भगवान् मुनिः कात्यायनस्तु तम् ।।१५६
इति प्रवृत्ते पूर्वेऽस्मिन् परस्मिन् स तु जन्मनि ।

३१२
[पालिका पुराण
महिष पूजयित्वाऽथ देवी वरमयाचत ।।१५७
तृतीये जन्मनि वर प्राप्य करपानशेपत ।
नेह मे जन्म भवितेत्येव वरमयाचत ।।१५८
तेन देवीपादले तिष्ठत्येषोऽसुरोऽधुना ।
नोत्पत्तिरपि तस्याथ सवन्तिादभून्नृप ॥१५६
उसी भांति भगवान शम्भु को आराधना की थी और पुत्राचं
वरदान प्रदान किया था। उसी रीति से उसने अपनी महिषी का सुरत
के लिये सेवन किया था । १५५ । उसमे उसी प्रकार से दानव महिषा-
सुर दानव वीर हुआ था। भगवान् कात्यायन ने भी उसी प्रकार से
उसको शाप दिया था ।१५६१ पूर्व जन्म में इस प्रकार से प्रवृत्त होने
पर उसने पर जन्म मे महिप ने देवी का पूजन करके वरकी याचना की
थी ।१५७। तीसरे जन्म मे वर प्राप्त करके अशेप कल्पो मे यही पर
मेरा जम न होवे-यह ही वरदान मागाथा । १८ । इस कारण से
देवी के चरणो के तल मे इस समय मे महिषासुर स्थित रहा करता है।
इसके अनन्त र सवत' के अन्त से उमको उत्पत्ति भी नहीं हुई
हे नृप
थी ।।१२६॥
एव देवीप्रसादेन महादेवाशसम्भव ।
परामवाप सतत प्रतिपत्ति महासुर ॥१६०
इति ते कथित राजन यथा स महिपासुर ।
देवीपादतल प्राप्य यथा सोऽद्यापि मोदते ।
प्रस्तुत शृण भो राजन् कथयामि नपोत्तम ॥१६१
इति व कथित राजा सगर सहितो यथा ।
और्वेण च सवाद देवीमहिपयोजने ॥१६२
पुनयंदाह भूयोऽपि सगराय महात्मने।
तच्छृण्वन्तु मुनिश्रेष्ठा गुह्याद् गुह्यतर परम् ॥१६३
एम प्रकार मे देवी के प्रसाद से महादेव जी के मा से उत्पन्न

कामाख्या माहात्म्य ] होने वाले महासुर ने निरन्तर पग पनि पत्ति का लाभ दिया था। 1१६० । वह आज भी देवी के चरणों के तेल की प्राप्ति का परम प्रसन्न होता है। ह राजन् । यह मापने ममक्ष में सव कबर मुना दिया है जिस तरह से महिषासुर था। है राजन श्व प्रस्तुत विषय का आप श्रवण कीजिए । है नृपोत्तम । मैं आपरे मामने रहता है। मार्कण्डेय महपि न रहा-जिस तरह म सहित गजा मागर था और देवी-महिप के पोजन म प्रोब्ध के माय सम्वाद दिया था- यह मभी मापको वनला दिया है । १६२। पुन महात्मा सगर के लिये जो वहा था है मुनि प्रेप्टो । उमा आर लोग अब श्रवण कीजिए। यह गोपनीय में भी परम गोपनीय है ॥१३॥ ॥ कामाख्या माहात्म्य ।। यथाह भगवान देवो भैरवाय महात्मने । वेतालाय नृपश्रेष्ठ तथा त्व प्रतुस्त शृणु ॥१ उग्रचण्डा च या मूतिरप्टादशभूजाऽभवत । सा नवम्यां पुरा कृष्णपक्षे कन्या गते रवी ॥२ प्रादुर्भूता महामाया योगिनीकोटिभिः सह । आपादम्य तु पूर्णया सत्र द्वादशवापिनम् ॥३ दक्ष क्समारेभे वता सर्व दिवोरम । ततोजन वृतस्तेन दक्षण मुमहात्मना । क्पालीति सती चापि तज्जायेति च नो वृता। ततो रोषममायुक्ता प्राणांस्तत्याज सा सती ।। त्यानदेहा मती चापि चण्टमूर्तिस्तदाउमवत् । रात प्रवृत्तं यने.पि तस्मिन् द्वादशवापि ॥६ ३१४ [ पालिका पुराण नवम्या कृष्णपक्षे तु कन्याया चण्डमूर्तिधृक् । योगनिद्रा महामाया योगिनीकोटिभि सह ।।७ औव मुन ने कहा-~-जिस रीति से भगवान देव ने महात्मा भैरव से कहा था वेताल के लिये कहा था हे नृप श्रेष्ठ | आप उसी भाँति प्रस्तुत को सुनो ॥१॥ श्री भगवान ने कहा--जो उग्र चण्डा मूर्ति है और जो अठारह भुजाओ वाली हुई थी वह पहिले कन्या राशिगत सूर्य के होने पर कृष्ण पक्ष मे नवमी म रोडो योगिनियों के सहित महामाया प्रादुर्भूत हुई थी। आपाढ मास की पूर्णिमा मै द्वादश वर्ष का होने वाला सत्र होता है । इस सत्र को करने के लिये प्रजापति दक्ष ने समारम्भ किया था और सभी देवो वा वरण किया गया था अर्थात आमन्त्रित थे। उसने मुझे वरण नहीं किया था । अर्थात महात्मा दक्ष ने मुझे आमन्त्रण नहीं दिया था ॥२॥३॥४॥ वे कपाली अर्थात् कपाल धारी है और सती उनकी पत्नी है-इसी लिये वरण नहीं किया था । इसके पश्चात् रोष मे समायुक्त होकर उस सती ने प्राणो का परित्याग कर दिया था ॥५॥ देह के त्याग करने वाली सती फिर उस समय मे चण्ड मूर्ति हो गई थी। फिर वारह वष मे पूर्ण होने वाले उस यज्ञ के प्रवृत्त होन पर कन्या के मूर्य म कृष्ण पक्ष मे नवमी तिथि के दिन चण्ड मूर्ति को धारण करने वाली योगनिद्रा महामाया ने करोडो योगिनियो के साथ पश का नाश किया था ॥६॥७॥ सतीस्प परित्यज्य यजभङ्गमथाक्रोत् । शवरस्य गणे सर्वे सहिता शकरेण च ।।८ स्वय व भञ्ज सा देवी महासन्न महात्मन । ततो देव्या महाबोधे व्यतीते त्रिदिवौरस LE पूजयाचरतुला देवी पूर्वोदितेन वै। पूर्वोदितविधानेन पूजामस्या दिवौक्स ॥१० पृत्वव परमामापुनिवृति दुखहानये ।

३१६ [ कालिका पुराण उपवासं महाप्टम्यां पुत्रवान न समाचरेत् ॥१६ यथा तथैव पूतात्मा व्रती देवी प्रपूजयेन् । पूजयित्वा महाष्टम्यां नवम्यां वलिभिस्तथा ॥१७ विसर्जयेद् दशम्यां तु श्रवगे शावरोत्सवः । अन्त्यपादो दिवाभागे श्रवणस्य यदा भवेत् ॥१८ तदा सम्प्रेषणं देव्या दशम्यां कारयेद् बुध । सुवासिनी - कुमारोभिवेश्याभिर्नर्तकस्तथा ॥१६ शख सूर्यनिनादश्च मृदङ्गः पटहैस्तथा । ध्वजवस्त्रवहुविधाजपुष्पन कीर्णकः ॥२० धूलिकदमविक्षेप श्रीडाकौतुकमङ्गलः। भगलिडाभिधानंश्च भगलिङ्गप्रगीतकं ॥२१ भगलिङ्गादिशब्दश्च नीडयेयुरल जनाः । परामिप्यते यस्तु यः परान्नाक्षिपेद् यदि ।।२२ कदा भगवती तस्य शाप दद्यात् सुदारुणम् । आदिपादो निशाभागे श्रवणस्य यदा भवेत् ॥२३ बहुन जाति वाले बलियो के द्वारा तथा भोजनो से-सिन्दूर-- वह वस्त्र---अनेक प्रकार के विलेपन----पुष्प जो नाना प्रकार के हो- बहुत तरह के फलों के द्वारा पूजन करना चाहिये । इस महाष्टमी मे जो पुष वाला हो उमे उपवाम नहीं करना चाहिये ॥१२॥१६॥ जिस- विमी प्रारमे पवित्र आत्मा वाला-धारी देवी का मजन करे । महाप्टमी में पूजा करणे नवमी तिपि में वलियो वा समपंण परफे विदा परे ॥१७॥ दशमी तिथि में श्रवण में शायरोत्मवों के द्वारा जिस समय में दिवा के भाग म यवतमा अन्तिम परण होवे उसी समय में देवी का दामी में बुध पुरुष को सम्प्रेषण नाना पाहिये । गुणागिनियों के द्वारा-पुमारियों के वेश्याप्रो - पियों के द्वारा-यो-तूपों पोपनियों मे-गान मोर पदही द्वारा-पत्र-परत प्रकार के बामाख्या माहात्म्य ] ३१७ वस्त्रों से-लाजा (बोल) और पुमो के प्रकीर्ण के द्वारा धूलि कर्दम विक्षेपों के द्वारा तया क्रीडा-कौतुक मङ्गलो से भगलिङ्ग विधानो से तया भग लिङ्ग गीतो मे-भगलिङ्ग आदि शब्दो के द्वारा मनुष्यो को पर्याप रूप से क्रीडा करनी चाहिये ॥१८॥१६॥२०॥२१॥ यदि परी के द्वारा बो आक्षिप्त न हो और जो परी का आक्षेप न करे तो भावती बहुत ऋद्र जाती हैं और परम दारण शाप दे देती हैं। थवा का यादि चरण जब निशा भाग में होवे ॥२२॥२३॥ तदा देव्याः समुत्थानं नवभ्यां न पुनर्दिवा । अन्त्यपादो निशाभागे श्रवणस्य यदा भवेत् ।।२४ तदा देव्याः समुत्यान नवम्यां दिनभागतः । विसर्जनमनेनैव मन्त्रेण वत्स भैरव ।।२५ कर्तव्यमाभास स्थाप्य विज्य च विभूतये । उत्तिष्ठ देवि चण्डेशे शुभां पूजां प्रगृह्य च ॥२६ कुरुष्व मम कल्याणमप्टभिः शक्तिभिः सह । गच्छ गच्छ परं स्थान स्वस्थान देवि चण्डिके ॥२७ यत् पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु मे। ब्रज व स्रोतसि जले तिष्ठ गेहे च भूतये ॥२८ उमो समय में नवमी में निशा के भाग में देवी का समुत्थान परे दिन में नहीं करे। निशा के भाग में जब अन्तिम चरण यवण का होवे ॥२४॥ उसी समय में देवो का समुत्यान नवमी में दिन के भाग में होता है । हे वत्स भैरव ! इसी मन्त्र के द्वारा विसर्जन होता है ।२५ वर्तव्य का जल में स्थापित करके विभूति के लिये विसर्जन करना चाहिए। हे देवि ! हे चण्डेशे ! बाप समुत्थान कीजिए और शुभा पूजा का ग्रहण करिये ॥२६॥ अपनी आठों शक्तियो के सहित मेरा कल्याण करिए । हे देवि ! हे चण्टिके ! अपने परम स्थान को गमन कीजिए प्रस्थान करिए । २७ । हे देवि ! मेरे द्वारा जो पूजन किया गया है वह ३१८ [ कालिका पुराण मुझे परिपूर्ण होवे । आपस्त्रोता के जल मे गमन करो और भूति के लिए गृह मे सस्थित होइए ॥२८॥ निमउज्याम्भसि सन्त्यज्य पत्रिकावजिते जले। पुनायुधनवृद्धयर्थं स्थापितासि जले मया ।।२६ इत्यनेन तु मन्त्रेण देवी सस्यापयेज्जले । सर्वलोक-हितार्थाय सवलोकविभूतये ॥३० दुर्गा तन्त्रेण मन्त्रेण पूजितव्ये उभे अपि । भद्रकालोमुग्रचण्डा महामाया महोत्सवे ॥३१ नेत्रवीज तु सर्वासा पूजने परिकीर्तितम् । योगिनीना तु सर्वासा मूलमृर्तेतथैव च ॥३२ मन्त्र तथोग्रचण्डाया पृथक् त्व शृणु भैरव । आद्यद्वय नेत्रवीज मन्त्रस्योपान्तमन्तरे ॥३३ वह्निाऽन्त स्वरेणेन्दुविदुभ्या तन्त्रमोग्रकम् । नेत्रबोज द्वितीय तु द्विधावर्तितमुच्यते ।।३४ भद्रयाल्यास्तु मन्त्रोऽय धमकामार्थसिद्धये । यदा तु वैष्णवी देवी महामाया जगन्मयी ॥३५ जल में निमज्जन करके पत्रिका यजित जल में भली भांति त्याग बरवे पुत्र-आयु और धन की वृद्धि के लिए मेरे द्वारा जल में भापमा स्थापित किया गया है ॥ २६॥ इसी मन्त्र के द्वारा देवी का जल में संस्थापन करना प हिये । यह सप लोक। ये हित के सम्पादन में लिये और सब लोगो को विभूति के लिये परे ॥ ३० ॥ मोमय म दुर्गा तन्त्र रे मन्त्र पे द्वारा भद्रकाली-गहामाया उग्र- पहा दोनों ही देखियो का पूजन करना चाहिए । ३१ राय देवियो में पूजन में नेत्र वीर परि कात्तित दिया गया है। राव योगिनियो का सपा गूम मूनि पा नया उप पण्डा वा मात्र हे भैरव ! आप पृषय पण पोजिए। अलर म मन्त्र का उपान्न आपाप नेन वीर है। अन्त.स्परहित गन्दु विदुओ में औरण सन्त्र है। दिलीप तो नेत्र

कामाख्या माहात्म्य ]
बोज द्विधा वत्तित कहा जाता है ।। ३२-३४॥ यह भद्रका का मन्त्र
है जो धर्म-काम और अर्थ की सिद्धि के लिए है । जिस समय मे
वैष्णवी देवी जगन्मयी महामाया है ।३५॥
पूज्यते वैष्णवी देवी तन्त्रोक्ता अप्टयोगिनी ।
ता प्रोक्ता शैलपुत्र्याश्च पूर्वकल्पे व भैरव ॥३६
उग्रचण्डादयश्वाप्टो दुर्गातन्त्रस्य कोर्तिता ।
भद्रकाल्यास्तु मन्त्रण भद्रकाली प्रपूजयेत् ॥३७
पूजयेद् भूतिवृद्धयर्थमेना एवाष्टयोगिनी ।
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनीम् ॥३८
दुर्गा शिला क्षमा धात्री दलेप्वष्टसु पूजयेत् ।
यदोग्रचण्डातन्त्रेण सा देवी तन्त्र पूज्येत् ।।३६
योगिन्यस्तत्र पूज्या स्युरष्टावन्याश्च भैरव ।
कोशिकी शिवदूती च उमा हैमवतीश्वरी ॥४०
शाकम्भरी च दुर्गा च सप्तमी च महोदरी ।
उमायाः सौम्यमूर्तस्तु तन्त्र त्व शृणु भैरव ॥४१
पादि समाप्तिसहित. फडन्तो नान्त एव च ।
एकाक्षरस्यक्षरश्च उमामन्य इति स्मृत ॥४२
आठ योगिनियों वाली तन्त्र म वर्णित वैष्णवी देवी का यजन
किया जाया करता है। हे भैरव पूर्व कल्प म वे शैल की पुत्री कही
गयो हैं ॥३६॥ उग्रघडा आदि बाट दुर्गा तन्त्र की कीर्तित की गयी
हैं । भद्रकाली के मन्त्र के द्वारा भद्र काली का पूजन करना चाहिये ।
॥३७॥ ये बाठों योगिनियों का भूति की वृद्धि के लिये अभ्यर्चन करना
पाहिए । अय उन आठो के नाम बतलाये जाते हैं-जयन्ती-मङ्गला..
पाली-भद्रकाली कपालिनी-दुर्गा-शिला-समा-धात्री इनका
आठ दलो मे पूजन कर । जिस ममय में उग्र चण्डा तात्र के द्वारा वहाँ
पर बह ६वी पूजी जाती है ॥३६॥ हे भैरव । वहाँ पर बाठ योगि-

३२० [ कालिका पुराण - नियाँ जो अन्य हैं पूजनी चाहिए अब इनके भी नाम बतलाये जाते है- कौशिकी-शिव दूती-उमा-. - हैमवतीश्वरी--शाकम्भरी---दुर्गा- सातवी महोदरी है । है भैरव ! सौम्य मूर्ति उमा का तन्त्र अब आप श्रवण कीजिए ॥१०॥४१॥ समाप्ति के सहित पादि १८ जिसके अन्त में होवे और अन्त ही न होवे । एक अक्षर वाला और तीन अक्षरो से सयुत उमा का मन्त्र कहा गया है ॥४२॥ सुवर्णसहशी गौरी भुजद्वयसमन्विताम् । नीलारविन्द वामेन पाणिना विभ्रती सदा ॥४३ शुक्लं तु चामर धृत्वा भर्गस्याङ्गऽथ दक्षिणे । विन्यस्य दक्षिण हस्त तिष्ठन्ती परिचिन्तयेत् ।।४४ विनापि शम्भु रुद्राणी भक्तस्तु परिचिन्तयेत् । द्विभुजा स्वर्णगौरागी पद्मचामरधारिणीम् ॥४५ व्याघ्रचर्मस्थिते पद्मे पद्मामनगता सदा । एतस्या पूजने प्रोक्ता अष्टौ वेतालभैरव ॥४६ योगिन्यो नायिकाश्चापि पृथक्त्वेन व्यवस्थिता. । जया च विजया चंद मातङ्गी ललिता तथा ।।४७ नारायण्यथ सावित्री स्वधा स्वाहा तथाऽष्टमी। पूर्वं शुम्भो निशुम्भश्च दानवी भ्रातरावुभो ॥४८ वभूवतुर्महासत्त्वो महाकायो महावलो। अन्धकस्य सुतो वो तो दन्तिनाविव दुर्मदो ॥४६ मया विनिहिते तस्मिन्नन्धकाख्ये महावले । ससन्यवाहनो तौ तु पातालतलमाश्रितो ।।५० अब ध्यान बतलाया जाता है-मुवर्ण के समान वर्ण वाली है- गौरी-दो भुजाओ से युक्त हैं—वाये हाथ से नील पमल को सदा धारण किये रहती हैं ॥४३॥ गुल्ल चामर को धारण करके भर्ग के दाहिने अङ्ग में दाहिने हाथ का विन्याम परके सस्थित हैं-ऐसा ही - कामाख्या माहात्म्य ३२१ परिचिन्तन करना चाहिए । ४४ । भक्त को शम्भु के बिना भी रुद्राणी का ध्यान करना चाहिए । जो दो भुजाओ वाली है-स्वर्ण के सदृश परम शुभ्र अङ्गो से समन्वित है-पद्म तथा चामरो को धारण करने वाली है। व्याघ्र के चर्म पर स्थित पद्म पर सदा पदमासन में सस्थित है । हे वैताल भैरव ! इसके पूजन में आठ योगिनियों बतायी गयी हैं ॥ ४५-४६ ॥ योगिनियो और नायिकाएं भी पृथक व्यवस्थित हैं--- अब उन आठो के नाम बताये जाते हैं-जया-विजया--मातङ्गी- ललिता-नारायणी--सावित्री-स्वधा-स्वाहा ये हैं । पहिले ममय में शुम्भ और निशुम्भ-ये दो भाई दानव थे।४७-४८॥ ये दोनों महान मत्व वाले थे। इनका विशाल शरीर था । ये महान बस याले थे बन्धक दानव के पुत्र थे और ये दोनो मतवाले दुर्मद गजो के ही समान थे । ४६। ये अन्धक नाम वाले महान बलवान मेरे द्वारा ही यिनिहन हुए थे । वे दोनो सेना के सहित रहने थे और उनरे वाहन भी थे। राताल तल में समाश्रित थे।५०१ ततस्तप्त्वा तपस्तीव ब्रह्माणन्ती महासुरी। सम्यक् तदाऽतोषयता स सुप्रीतो घरं ददौ १५१ तो ब्रह्मवरदृप्ती तु.समासाद्य जगत्त्रयम् । इन्द्रत्वमकरोच्छु भश्चन्द्रत्व च निगम सर्वपामेव देवाना यनमागानुराहट स्वयं शुम्मो निशुम्भन दिवपालन्यपधारी सर्वे सुरगणाः सेन्द्रास्तता गया दिमाग गंगावतारनिकट महामाया अनकेशः स्तुता देवी गदा : मानङ्गवनितामति MY युप्माभिरमारमग्नrks किमर्णमागता ययं मriy दमो सगल ? niyamirs -- ३२२ [ कालिका पुराण या तपन किया था और उस समय म तप के द्वारा उन्हान ब्रह्माजी को परम सन्तुष्ट कर लिया था । ब्रह्माजी ने बहुत ही प्रसन्न होकर उनको वरदान दिया था । ५१। वे दोनो ही ब्रह्माजी के द्वारा वर प्राप्त रक बहुत घमण्डी हो गये थे और उन्ही तीनो लोको को प्राप्त कर लिया था। शुम्भ ने इन्द्र के पद को प्राप्त करके इन्द्रत्व कर लिया था और निशुम्भ ने चन्द्रत्व प्राप्त कर लिया था। ५२। इन्होन समस्त देवगणो के जो यज्ञों में भाग थे उनका उपाहरण कर लिया था। स्वय शुम्भ और निशुम्भ ने दिक्पालो के पद को प्राप्त कर लिया था । ५३ । इन्द्र के सहित समस्त देवगण फिर हिमाचल पर गये थे और गङ्गावतरण के स्थल के समीप में उन्होन महामाया की स्तुति की थी । ५४ । नाना भांति स स्तवन की हुई देवी जो कि सभी देवो के समुदायो द्वारा स्तुत हुई थी मातङ्ग वनिता का स्वरूप धारण करके उस देवी ने देवगणो से पूछा था । ५। हे देवगणो । यहाँ पर आपके द्वारा कोन सी भामिनी का म्तवन किया जा रहा है और आप लोग यहां पर किस लिये समा. गत हुए हैं विम प्रयोजन की सिद्धि के लिये इस मातङ्ग के आश्रम की और आये हैं 1५६॥ एव अवन्त्या मातग्यास्तस्यास्तु कायकोपतः । समुद्भूताऽब्रवीद् देवो मा स्तुवन्ति सुग इति ॥५७ शुम्भो निशुम्भो ह्यसुरी वाधेते सकलान् सुरान् । तस्मात् तयोर्वधायाह स्तूये ते सवले. सुरं ॥५८ विनि सृताया देव्या तु मातग्या कायकोपत । भिन्नाजननिमा कृष्णा साऽभूद गौरी क्षणादपि ॥५६ कालिकास्याभवत् सापि हिमाचलताश्रया। तामुग्रतारामृपयो वदन्तीह मनीपिण.॥६० उग्रादपि भयात्वाति यस्माद् भक्नान् सदाम्विका । एतस्या प्रथम बीज कथित त्रयमेव च ॥६१

-
कामाख्या माहात्म्य
एपंवंकजटाश्या तु यस्मात्तम्माज्जटकिका।
शृणुतं चिन्तन चास्याः सम्यम्वेतालभैरवी ॥६२
यथा ध्यात्वा महादेवी भक्तः प्राप्नोत्यभीष्मितम् ।
चतुर्भुजां कृष्णवर्णा मुण्डमालाविभूपिताम् ।।६३
इस प्रकार से यह वोलती हुई उम मानली के काय काप से
समुद्भूत हुई देवी ने कहा- मुरगण मेरा ही स्तवन कर रहे हैं ।५॥
शुम्भ और निगुम्भ ये अमुर ममत्त देवो को वाधा दिया करत हैं।
इसी कारण से उन दोनो के वध करने के ही लिये इन मस्त सुरों के
द्वारा मेरा सावन किया जा रहा है ।। ५८ ॥ मातङ्गो के काम कोष मे
देवी के विनिमत होने पर वह गौरी पिसे हए अञ्जन के समान ही एक
ही क्षण में कृष्ण वर्ण की हो गयी थी। ५६ । वह भो कालिका नाम
वाली हो गई थी और वह हिमवान पांत में ममायय वाली पी।
ऋषिगण जो मनीयो है रमको यहां पर उस तारा नाम से रहा करते
हैं । ६० । यह अम्बिका देषी सदा अत्युन भय से भी परित्राण पिया
करती है। इसका प्रयम बीज तीनो ही बहे गये हैं। ६१ । यह ही
मी कारण मे एक जटा नाम वाली है क्योकि एक ही जटा वाली है।
है वेनाल भैरवो इमरा दिलन अयान धान किय कार में करना
पाहिए उमका यर याप लोग श्रवण करिए। ६२1 जिम प्रकार में
भक्त ध्मान कर अपना यीमित प्राम दिया करता है वह पार
मुजाओं से समन्वित हैं उनका वर्ण एकदम कृया है और यह नरमुग्डो
की माला में शोभायमान है । ६३ ।
घडग दक्षिणपाणिभ्या विभ्रती चामरत्वध ।
की च वपर चंद क्रमाद्वामेन विभ्रतीम् ॥६४
पा लिखन्ती जटामका विभ्रती शिरसा स्वयम् ।
मुण्डमालाघरा शो प्रोषायामपि मवंदा १६५
पक्षसा नागहारं तु विघ्रती रक्तलोचनाम् ।

[ कालिका पुराण कृष्णवस्त्रधरा कट्या व्याघ्राजिन-समन्विताम् ।।६६ वामपाद शवहृदि सस्थाप्य दक्षिणं पदम् । विन्यस्य सिंहपृष्ठे तु लेलिहाना शवं स्वयम् ॥६७ साट्टहामा महापोरां रावयुक्तातिभीपणाम् । चिन्त्याग्ने तारा सततं भक्तिमद्भि. सुखेप्सुभिः ।।६८ एतस्या सम्प्रवक्ष्यामि या अष्टौ योगिनीः स्मृता. । महकाल्यथ रुद्राणा उग्रा भीमा तथंव च ॥६६ घोरा च भ्रामरी चैय महारात्रिश्च सप्तमी । भैरवी चाष्टमी प्रोक्ता योगिनीस्ता प्रपूजयेत् ॥७० दाहिने हाथो से वह खड्ग को धारण किये हुए हैं और अधोभाग मे चमर कर रही हैं । क्रम मे वाये हाथ से खपर को धारण करने वाली हैं । ६४ । स्वय शिर के द्वारा एक जटा को धारण कर रही हैं । जो धोलोक को मानो जटा से लिख रही होवे । मस्तक में मुण्डो की माला पहिने हुए हैं और सर्वदा ग्रीवा मे भी मुण्डमाला धारण करती हैं । ६५ । उनके वक्ष. स्थल मे नागो का हार है और उनके नेत्र रक्त वर्ण के हैं। कटि में कृष्ण वर्ण के वस्त्र धारण करने वाली है तथा वाघम्बर से भी समन्वित रहती हैं ।। ६६ ।। उनका बाया चरण शव के हृदय पर है तथा दाहिना घरण सिंह की पीठ पर सस्थापित हो रहा है और स्वयं शव को अपनी लम्बी जिह्वा से चाट रही हैं । ६७ । अट्ट हास करती हुई महान घोर ध्वनि वाली अत्यन्त ही भीषण स्वरूप घाली हैं । निरन्तर सुख की इच्छा वाले भक्तियुक्त भक्तो के द्वारा मागे वह तारा देवी चिन्तन के योग्य हैं । ६८ । अब इस देवी की जो पाठ योगिनियों कही गयी हैं उनको मैं बतलाऊंगा। उनके अव नाम बतलाये जाते हैं-महाकाली-रदाणी-उग्रा-भीमा--घोरा--भ्रामरी--महा- रात्रि और आठवी भैरवी यतलायी गई है। उन योगनियो का यजन करना चाहिए ॥६६-७॥

कामाच्या माहाम्य
३२५
या कायकोपान्नि.मृता वालिकायास्तु भैरव ।
सा कौशिकीति विख्याता चाररूपा मनोहरा ॥७१
निःसता हृदयाद् देव्या रसनाग्रेण चण्डिका ।
नंतस्याः सदृशी मूा चारुपेण विद्यते ।।७२
निपु लोकेषु कान्त्या वा नास्यास्तुल्या भविष्यति ।
योगनिद्रा महामाया या मूलप्रकृतिर्मता ।।७३
तस्याः प्राणम्वरूपैयं देवी या कौशिकी स्मृता ।
नेत्रवीज तथतस्या वीज तु परिकीतितम् ॥७४
मन्यनस्याः प्रवक्ष्यामि मूर्तिरूपं च भैरव ।
ममाप्तिनान्त्यदन्त्यस्तु पड्वर्गादि-सविन्दुभिः ॥७५
पप्ठस्वरेण मंस्पृष्टो विन्दुना समलंकृतः ।
'कोशिकोमन्यतन्योज्य मकानार्यदायकः ॥७६
तस्यास्तु सम्प्रवक्ष्यामि या मूर्तिरिह भैरव ।
शृप्णुदक्रमना भूत्वा जगदालादकारकम् 183
हे भरत! जो पालिका के काम कोप में निवनी यी वह
कोशिको-इस शुभ नाम से विख्यात हुई थी। यह परम मुन्दर-स्वरूप
वानी और यत्यधिक मनोहर पी ॥७१॥ यह देवी के हृदय मे निःस्त
हुई थी रसमा के अग्रभाग मे चरिहरा निकली थी। यह इतनी अधिक
मुन्दर पी कि इनके ममान कोई भी अपनी मूर्ति को पारु रूपना से
युक्त नहीं थी ॥७२॥ तीनों शोरों में मान्ति मे इसके तुल्य कोई भी
है और न होगी। जो महामाया योग निद्रा भूम प्रानि मानी गयी है ।
कौशिकी देवो कही गयी है यह उमरी प्राण की स्वरूप
दासी है। तथा इममा नेत्र धोत्र वीज पहा गया है ॥७॥ हे भैरव !
इसरा मन्त्र और मूर्ति स्म को मैं रहूंगा। ममाप्ति नारय दन्त्य
पिन्दुओं के सहित पानादि को परस्पर में संस्पृष्ट हो योर बिन्दु से
समसंगल होदे यह कौगिको मन्त्र का तन्त्र है ममस्त काम और असं
॥७॥ जो

पामाया माहाल्य] 4 हैं और रन निर्मित केयूरो को पहिने हुये हैं। वह मृणान के मदश आयत एवं सुवृत्त तश कोमल और शुभ व हुओ मे समन्वित है 11511 जो वन्च को के समेत पौन एवं उन्नत पयोधरो वाली शोभायमान है। इनका मध्यभाग बहन क्षोण है-पोन वर्ग के बों वाली हैं और त्रिवली मे विभूषित है । वह देवी अपने दाहिने ओर के करो के बारा शूल-~-वज वाण-तुङ्ग और शक्ति को धारण करके विराजमान है। १८३|| यह देवी यपने बायें वर्ग मे जवादि म मे ही गदा-घटा- भाप- वर्म और शोधारण करने वाली है ॥४॥ मिहत्योपरि तिष्ठन्ती व्याघ्रचर्माणि कौशिकी। विनंती रूपमतुलं ससरामुरमोहनम् ॥८५ एतस्याः शृण वत्स त्वं या पूज्या अष्टयोगिनीः । नाः पृजिता पूर्वन्ति चतुर्वगं नृणां सदा ८६ ब्रह्माणी प्रथमा प्रोक्ना ततो माहेश्वरी मता। कौमारी चंव वाराही वैष्णवी पञ्चमी तथा १८७ नारसिंही तगैवन्द्री शिवदूती तथाष्टमी । एता: पूज्या महाभागा योगिन्यः कामदायिकाः ।। देव्या ललाटनिष्क्रान्ता या कालोति च विधु ता । नस्या मन्त्रं प्रवक्ष्यामि कामदं शृण भरव १६ समाप्तिसहितो दन्त्य प्रान्तस्तस्मात् पुरःसरः । पप्ठस्वराग्निविन्द्विन्दसहित: सादिरेव च in६० फालोमन्नमिति प्रोक्तं धर्मकामार्यदायकम् । एतन्मूर्ति प्रवक्ष्यामि वत्सैकाग्रमनाः शृण ।।११ वह कौशिकी देवी सिंह के उपर संस्थित है तथा स्यान के धर्म को भात पापम्बर को धारण किये हुए हैं। उनका स यतुम यदि अनुपम है--बी समो सुरों और मसुरों के मोदन करने वाला है। है परम ! इसको जो बाठ योगिनी पूग के योग्य है उनके विषय में

। बालिका पुराण
।
वा देन वाला है ॥७५७६।। है भैरव । उसी जो यहां पर मूर्ति है
उमको में बतलाऊंगा। आप एक मन वाले होकर उसका श्रवण करिये।
यह जगत के आह्लाद का करन वाला है १७७।।
धम्मिल्लसयतकचा विधोश्चाधोमुखी क्लाम् ।
केशान्ले तिलकम्यो दधती सुमनोहरा 1७८
मणिकुण्डलमघृष्टगण्डा
मुकुटमण्डिता।
मज्योनि कर्णपूराभ्या कर्णमापूर्य सगता IIVE
सुवणमणिमाणिक्यनागहारविराजिता
सदा सुगन्धिभि पद्मरम्लानरतिसुन्दरी ॥८०
माला विभति ग्रोवाया रत्नकेयूरधारिणी।
मृणालायतवस्तु वाहुभि कोमल शुभं ॥८१
गजन्ती
कञ्चुकोपेत पोनोगत पयोधरा।
क्षीणमध्या पोतवम्वा पिवलीप्रख्यभूषिता ।।२
शूल यच च वाण च खड्ग शक्ति तथैव च ।
दक्षिण पाणिभिर्देवो गृहीत्वा तु विराजिता ॥८३
गदा घण्टा च चाप च वर्म शख तथैव च ।
ऊवादिस्मतो देवी दधती वामपाणिभि ॥४
अब उमरे स्वरूप का वर्णन किया जाता है-धाम्मिल पुष्पों में
द्वारा बिमरे देश ममयम है-शो के अन्त में और सिमवये कार्य
भाग में पार की नीचे की नार मुख वामी रमा को धारण किये हुए है
और परम मनोहर है । मगियों से परिपूर्ण पुणनो से जिगरे गम स्थल
संस्पृष्ट हो रहे हैं तपा जिमरा मातम मुकुट से गिभूपित है। पूरी
ही समयोतिभानों पाति से मङ्गत हो है और वह
मृवर्ग--मणिपा मागियों ने माहित नागहार में विराजमान है। वह
सदा गुमन्ध पुम पदमों मे दो किमान मा हैं माय त गुग्दर स्वरुप
समी है - जो अपनी प्रीका में माता को धारण रियर

पामाख्या माहालय । १.3 है और रस्न निर्मित केयूरो को पहिले हुपे हैं। वह मृणाल के महम भायन एव सुवृत्त तथा कोमल और शुभ पहुओ से समन्वित है ।।११ जो को के समेत पोन एद उन्नत पयोधरी वाली शोभायमान है। इनका मध्यभाग बदन दोण है-पीत वर्ग के वस्त्रों वाली है और शिवनो से विभूषन है १८गा यह देवी अपने दाहिने ओर के करो मे बाग शून-यज बाग--बङ्ग और शक्ति को धारण करके विराजमान है। या यह देवी अपने यावर्ग मे उर्वादि कम मे हो गदा--घटा- दाप - वर्म और शम दोधारण परने वाली है ॥८॥ सिंहस्योपरि तिष्ठन्ती व्याघ्रचर्माणि कौशिकी । विभ्रती रूपमतुलं समरासुरमोहनम् १८५ एतम्याः शृण परम त्वं या पूज्या अष्टयोगिनी । नाः पूजिताच पूर्वन्ति चतुवंग नृणां सदा ।।८६ ग्रह्माणी प्रथमा प्रोक्ता ततो माहेश्वरी मता। कौमारी चैव वाराही वैपावो पञ्चमी तथा ८७ नारसिंही तणेवेन्द्री शिवदूतो तथाऽप्टमी। एनाः पूज्या महाभागा योगिन्मः कामदायिका 115 देव्या ललाटनियान्ता या कालोति च विश्रु ता । नस्या मन्त्र प्रवक्ष्यामि कामदं शृणु मैरव ॥ ममाप्तिसहितो दन्त्य प्रान्तस्तस्मात् पुर सरः । पप्ठस्वराग्निविन्द्विन्दुसहित सादिरेव Rize कानीमन्त्रमिति प्रोक्तं धर्मकामादायकम् । एतन्मूर्ति प्रवक्ष्यामि यत्रोकामनाः शृण १६१ वह कौगिरी देवी सिंह के उपर मस्थित है सपा ध्यान के धर्म को सात वापदा को धारण किये हुए हैं। उनका म अतुन अर्थात मनुपम है-बो सभी सुरों और असुरों के मोदन करने वाला है | हे परम ! इस शो माउ शेगिनी पूजारे योग्य है उनरे विषय में ३२८ | कालिका पुराण जाप श्रवण करिये । वे पूजित होती हुई मनुष्यो के चतुवंग को सदा विया करती हैं ॥८६॥ अब उन आठो के शुभ नाम बतलाये जाते हैं-सर्व प्रथम ब्रह्माणी कही गयी है-फिर माहेश्वरी-- कौमारी -वारा ही-- |--तथा पांचवी वैष्णवी है-नारमिही-ऐन्द्री-- तथा आठवी शिवहूती है। इन महामाया योगिनियो का अभ्यचन करना चाहिए। ये कामनाओं के प्रदान करने वाली है ।।८७||८॥ जो देवी के ललाट से विनिर्गत हुई थी वह काली- इस नाम से प्रसिद्ध है। हे भैरव । उम काली का मन्त्र में बतलाऊंगा-उसका आप श्रवण करिए । मन्त्र कामनाओ का प्रदान करने वाला है। समाप्ति क महित दन्त्य है और उसके आगे रहने वाला प्रान्त होता है। छटवें म्वर- अग्नि और बिन्दु के सहित होता है तथा धादि के भी सहित होता है ॥१०॥ यही काली का मन्त्र बनाया गया है। यह धर्म- काम और अर्थ का प्रदान करने वाला है। अब इसकी मूर्ति का वर्णन करूंगा । हे वत्म | तुम एकाग्र मन वाले होकर उसका श्रवण मारिए ।।१|| नीलोत्पलदलश्यामा चतुर्याहसमन्विता। खट्वाग चद्रहास च विभ्रती दक्षिणे करे ।।६२ वामे चर्म च पाशं च अधिोभागत पुन । दधती मुण्डमाला च व्याघ्रचर्मघरा वराम् ।।६३ कृशागी दीर्घदंष्ट्रा च अतिदीर्घातिभीपणा। लोलजिह्वा निम्नरपत-नयना नादभैरवा ॥६४ क्वन्धवाहनासीना विस्तार-श्रवणानना। एपा ताराह्यया देवी चामुण्डेति च गीयते ॥६५ एतस्या योगिनीश्चाप्टो पजयेच्चिन्तयेद् यदि । त्रिपुरा भीषणा चाड़ी की ही विधायिनी ॥३६ पराला शूलिनी चेति अष्टौ ता. परिकीर्तिता ।

कामाख्या माहात्म्य ] ३२६ एपाऽतिकामदा देवी जाट्यहानिकरी मदा ॥३७ एतम्या सदृशी काचिन कामा न हि विद्यते । कौशिक्या हृदयाद् देवी नि सृता घ्यायतो हरे ॥६८ म्वरूप का वर्णन अब छिया जाता है-वह नीन कमन के ममान श्याम वर्ण वाली हैं और भार वाहुओं मे समन्वित उनका वपु है। वह अपने दाहिने कर म खट्वाङ्ग और चन्द्र हाम को धारण करने वानी हैं ॥३२॥ वाम परमें पुन' ऊवं और अधो भाग मे धर्म और पाश को धारण पिये ये हैं। कण्ठ में नरमन्डों की माला पहिने हुये है और मान के च को धारण करने वाली परम यह हैं nean उनका अङ्ग का है और लम्बी दाहों वाली है तथा अत्यन्त दोघं अर्यात लम्बी एव अत्यन्त भीषण म्वरूप मे ममन्दिन है । उनको जिह्वा भनीव घञ्चल हैं-निम्न रम वर्ण वाले नेत्रों में मयुन है-उनका ममान भैरव अर्थात नाद है ॥६मृत मनुष्य के घड को वाहन बना कर उपवित्र हैं और उनके प्रवण तथा मुठ विनार वाले हैं। इस प्रकार के स्वरूप में सम्पन्न यह तारा देवी हैं और यह चामुण्डा-इम नाम मे गान को जाया करती हैं सा इस देवी की बाट योगिनिया हैं यदि उनका पजन एव ध्यान दिया जावे। उनके ये गुभ नाम हैं- विपुरा-मोषणा-चन्डी-वी-हो-विधायिनी ॥६६॥ राना और पूलिनी-ये थाट वे वीतित की गयी है । यह देवी अति काम को हानि करने वाली हैं। अदि जडता ये भाव का विनाश कर देने वाली है । ६॥ दन देवी के ममान कोई भी वामनावों देने वाली नहीं है । यह देवी कोशिश के हृदय में निकली हैं और ध्यान करने याने हरिकी यह प्रसिद्ध है l शिवदूनीति मा ख्याता या च देवशतवृता। मन्त्रमस्या प्रवक्ष्यामि धर्मकामार्थदायकम् ||६६ यच्छ त्वा साधकोयाति दुर्लभ शिवमन्दिरम् ।

सामान्या माहात्म्य ] -- मुन्ही की माला धारण किये हय रहनी हैं और मम्नक मे जटा-जूट तया अर्घ चन्द्र विराजमान रहा करता है। नागों के कुण्डलों तथा हार से गोभायमान हैं और उसके नम परम उज्ज्वल है ॥१०॥ व्याघ्रचर्म-परोधानं दक्षिणे शलवडगवृक् । वामे पाश तथा चम विभ्रदृवापरकमान ॥१०६. म्यूलवक्त्यं च पीनोप्ठं नुंगमति भयंकरम् । निक्षिप्य दक्षिणं पादं सन्तिप्छन कुणपोपरि ॥१०७ वामपादं गालम्य पृळे पेरुणतंतम् । ईशी शिवदत्यान्तु मूर्ति ध्यायेद विभूतये ।।१०८ ध्यानमायादयंतस्या नरः कल्याणमाप्नुयात् । पूजनादचिराद देवी मान कामान् ददाति च ॥१०॥ य: गियाविन थत्वा शिवदूतीं शमप्रदाम् । प्रणमैन साधको भवत्या तस्य कामा: करे स्थिताः ॥११० यदा जघान जगतां रक्तवीजं हिताय वें। महादेवी महामाया तदास्याः कायतः सृताः ॥१११ दूतं प्रस्थापयामास शिवं शम्भाप साम्विका । तेन सा शिवदूठीति देवः सर्व. प्रगीयते ।।११२ यह देवी वाघम्बर वा परिधान करती है। दक्षिण मुजाओं में घून-पङ्ग धारण दिया परती हैं नया बोर बरों में पान तथा धर्म जावं तया मधो भाग केम मे धारण करने वाली हैं ॥१०॥ इनका मुश स्यूलहै-पीन अर्याइ मोटे बोर है-इनकी मूर्ति बहुत ऊंची है और यह परमाधिक भपहार है-यह दाहिने घरण सो कुणपके कार निक्षिप्त करके मंस्पित रहती है। उनका दाया पण गणाम की पीठ पर रहता है जो भगान सैक्रों ही ऐस्त्रों मे घिरा हुआ होता है। इस प्रकार की शिव दती री प्रतिमा है। इसका ध्यान विभूति की वृद्धि के निपे करना [ना पुराण म यामाराव्य महादेवी शिवदूती शिवात्मिकाम् ।।१०० नचिराल्लभले यामान नर मजयी भवेत् । अन्त समाप्तिसहितो विन्द्विन्दुभ्यां दशावरः ॥१०१ म्वरेणोपान्तदन्त्येन मंस्पप्टोऽन्तेन पूर्वगः । एव विन्दुयुगलपवंस्थोपान्तपावकः ।।१०२ पष्ठम्वरकलाशन्यै महितः प्रथमस्थित. । मन्त्रोऽय शिवदूत्यास्तु शिवदूतीजयप्रदः ॥१०३ रूपमस्या प्रवक्ष्यामि शृण् वत्सौकसम्मत । चतुर्भज महाकायं मिन्दरमदृशद्यति ।।१०४ रक्तदन्न मुण्डमाला-गटाज़टार्धचन्द्रधक । नागकृण्डलहाराम्यां शोभित नखरोज्ज्वलम् ।।१०५ वह देवी शिवहूनी नाम मे प्रसिद्ध हैं और मैकडो देवो मे मवंदा समावृत रहा करती हैं। अब मैं इसका मन्य बतलाऊंगा की धर्म- काम और अयं का प्रदान करने वाला है || || जिमषा श्रवण करके माधना करने वाला व्यक्ति परम दुर्नभ भगवान शिव के मन्दिर में गमन किया करता है। जिग महा देवी की आराधना करके जो कि शिव दूती और शिव के ही स्वरूप वाली हैं मनुष्य अवि लम्ब ही समस्त कामनाओ की प्राप्ति कर लिया करता है और सब विजय प्राप्त कर लेने वाला हो जाता है। अन्त ममाप्ति के सहित है और बिन्दु तथा इन्दु से दशावर है ॥१०॥१०१॥ उपान्त दन्त्य स्वर मे अन्त में पूर्व से सस्पृष्ट होता है। वह ही दो विन्दु पूर्व में स्थित उपान्त पावक है ।।१०।। छटे स्वर कला से शून्यों के सहित प्रथम स्थित है। यह शिव हूती का मन्त्र हैं जो शिवदूती के जप को प्रदान करने वाला है।१०३३ हे वत्स ! अव मैं इसके स्वरूप का वर्णन करूंगा। याप एकाग्र चित्त होकर ही इसका थवण करिये। इसको घार तो भुजायें है-परम विशाल शरीर है और सिन्दूर के समान ही इसको भाकृति है 1१०१ रक्त वर्ण वाली इसको दन्त पवित है। कठ में नर कामाचा महाम! - मुन्डो की माला धारण किये हुये रहती है और मन्तक में जटा-जूट तया अर्घ चन्द्र विराजमान रहा करता है। नागों के कुण्डलो तथा हार से गोमायमान हैं और उसके नख परम उज्वल हैं ॥१०॥ व्याघ्रचर्म-परीधानं दक्षिणे शलखडगवृक् । वामे पाश तथा चम विप्रध्वांपरनमान ।।१०६. म्यूलवक्त्वं च पीनोळं न गमनि भयंकरम । निक्षिप्य दक्षिणं पादं सन्तिप्ठन कुणपोपरि १०७ . वामपादं शमालम्य १२ रुजतनम् । ईगों शिवदत्यान्तु मूर्ति व्यायेद विभूतये ।।१०८ ध्यानमायादर्थतम्या नरः कल्याणमाप्नुयात । पूजनादचिराद देवी मान कामान् ददाति च ॥१०॥ यः शिवाविरुन थत्वा शिवदूनी शुभप्रदाम् । प्रणमेन साधको भक्त्या तस्य कामाः करे स्थिताः ॥११० यदा जघान जगतां रक्तबीजं हिताय । महादेवी महामाया तदाम्याः कायतः सृताः ॥१११ दूतं प्रस्थापयामाम शिवं शम्भाय माम्बिका । वेन सा शिवदूतीति देवः सर्वेः प्रगीयते ।।११२ यह देवी वाघम्बर वा परिधान करती हैं। दक्षिण भुजाओं में शून-घन धारण किया करती है तथा या दरों में पाग तथा धर्म कावं तया बधो भाग के क्रम मे धारण करने वाली हैं ॥१०॥ इनका मुख म्यूनहे-पीन याद मोटे बोर है-इनकी मूर्ति बहुत रूची है और यह परमाधिक भपहर है---यह दाहिने घरण को कुणपके कार निक्षित करके मंम्पित रहती है। उनका बाया परण गाम की पीठ पर रहता है जो भगान का हो ऐम्बों से पिरा हुमा होता है। इस प्रकार की जिप दूतो रो प्रतिमा है। इसका ध्यान विभूति की वृद्धि के लिये करना

[ वालिका पुराण
चाहिए ।।१०७॥१०८॥ इस देवी के क्वल ध्यान ही रन स मनुप्प
परम कल्याण की प्राप्ति कर लिया करता है। और यदि इस देवी का
अचन दिया जाये तो यह समस्त कामनाओं को प्रदान कर दिया करती
है ॥९०६॥ जो कोई पुरुप शिवाओ की ध्वनि का श्रवण करके शुभों की
प्रदात्री शिवदूती को साधक प्रणाम किया करता है और भक्ति को
भावना से प्रतिपात करता है तो उसकी सभी कामनायें उसके हाथ ही
मे स्थित रहा करती हैं ॥११०॥ जिस अवसर पर समस्त जगतों की
भलाई करने के लिये इसने रक्त वीज का हनन पिया था तो उम ममय
में महामाया महादेवी इसके शरीर से विनि सूत हुई थी ॥१११।। उस
अम्बिका ने शुम्भ दैत्य के लिये शिव को ही अपना दूत बनाकर उसके
पाम प्रेषित किया था। उसी कारण से वह समस्त देवगणों के द्वारा
शिवदूती -इम शुभ नाम से गान को जाया करती है ।।९१२११
क्षेमकारी च शान्ता च वेदमाता महोदरी।
कराला कामदा देवी भगास्या भगमालिनी ॥११३
भगोदरी भगारोहा भगजिह्वा भगा तथा।
एता द्वादश योगिन्य' पजने परिकीतिता ||११४
एता द्वादश योगिन्य शिवदूत्या सदैव हि।
विचरन्ती स्वय देवी यत्र तत्रैव गच्छति ।।११५
योगिन्यो ह्यथ सख्य स्युर्यथान्यासा तथा पुन ।
चण्डिकायास्तु योगिन्न सख्योऽय च प्रकीर्तिता ॥११६
इति ते त्वङ्गमन्त्राणि कथितानि समासत ।
कामाख्यायाय माहात्म्य कल्पमात्र वदामि वाम् ॥११७
इसके पूजन में बारह योगिनियाँ कीतित की गयी है उनके
शुभ नाम ये है-क्षेमकारी-शान्ता- वेदमाता-महोदनी-कराला---
पामदा देवी-मगास्या--मग मालिनी-भगोदरी-भगारोहा-मग.
जिवा-गा-ये द्वादश योगिनियां हैं जिनका पूजन कहा गया है।

नृप गं क्यन ॥११३-११४ ॥ देवी स्वय ही विचरण करती हुई जहां-तहां पर गमन क्यिा करती है ।। ११ ।। जिन प्रकार से अन्यो की हुआ करती हैं वैसे ही पुन: ये योगिनियां सदियां होती हैं। चण्डिका की योगिनियां यहां पर सखियां दतायी गई हैं 1 ११६ । ये इस रीति में आपके मामन अङ्ग मन्म में क्षेम में वर्णित कर दिये गये हैं । अब आप दोनों के समक्ष में कामाख्या देवी का कल्पमात्र माहात्म्य वनलाता ॥११७॥ ॥ नृप धर्म कयन ॥ कथितो भवता सर्ग. संशयश्चापि शातिताः। त्वत्प्रसादान्महाभाग कृतकृत्या वयं गुरो।।१ भूयश्च श्रोतुमिच्छामो वयमेतद् द्विजोत्तम। कोऽन्यो भृङ्गी महाकालो जाती वेतालभैरवी ॥२ वेतालं च महाकाल भैरवं भृङ्गिप तथा । शृणुमो द्विजशार्दूल कयमेषा चतुष्टयम् ॥३ भुव गते महाकाले मानुप्रस्थे च भृङ्गिणि। वेतालभैरवास्ये च तयो ते द्विजोत्तमाः ॥४ वरलब्धे च बेताले भैरव तेन सङ्गते। अन्धक तपसा युक्त भृङ्गिण चाकरोद्धरः॥५ अन्धकम्तु हर पूर्व विरुध्यापदमागतः । पश्चाद्धरं समाराध्य पुत्रोऽभूत् तस्य सोमुरः॥६ भृङ्गिन्नेहाद् मुङ्गिणतं मंनया चाकरोदरः। स्नेहेन तु महाकाले वाणं बलिसुत हरः ७ विष्णुना हिन्नवाहतु महाकालमयाकरोद । एव मुनिवरस्तेपा सयतं च चतुष्टयम् ।

[पालिका पुराण - वेतालभैरवो भृङ्गिमहाकालौ ह्यनुक्रमात् ।।८ ऋपिया न पहा-आपन सगं का वा किया और जो भी कुछ सशय उसम हुए थे उनका भी आपने निवारण कर दिया है। हे गुरो | आपके प्रसाद से हे महाभाग ! हम कृत कृत्य हो गये हैं। हे द्विजोत्तमा फिर हम आपमे कुछ श्रवण करना चाहते हैं । यह अन्यभृङ्गी महाकाल कौन है और जो यह वेताल तथा भैरव समुत्पन्न हुए हैं । वैताल को महाकाल और मङ्गो भैरव को हम सुनते हैं । इनका चतु- राय कैसे हुआ अर्थात् चार कैसे हो गये थे ॥ १-३॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विजोत्तमो । महाकाल के भूमण्डल मे उत्पन्न होने पर और मनुष्यत्व में मुङ्गी के होने पर उन दोनो से ये वेताल और भैरव नामो वाले समुदभ्त हुए थे। वेताल को वरदान प्राप्त होने पर और उसके साथ भैरव के सङ्गत हो जाने पर भगवान हर ने तप मे युक्त अन्धक को भृङ्गी कर दिया था। ४-५ । अन्धक पहिले हर से विरुद्ध होकर आपदा मे पंस गया था। इससे उपने भगवान हर को समारा- धना की थी और वह असुर उनका पुत्र हुआ था। भगवान हरि ने भृङ्गि के स्नेह से उसका नाम भृङ्गी रख दिया था। भगवान हर ने स्नेह में जो महा काल में था उसको बलि का पुत्र घाण कर दिया। ॥६---७॥ भगवान् विष्णु के द्वारा कटे हुए बाहुओ वाले को महा- काल बना दिया था। इस प्रकार से हे मुनिवरो । उनका चार होना सयत होता है । अनुक्रम से वेताल-भैरव भृङ्गी और महाकाल हैं । ॥ यत् पृष्ट सगरेणव मुनिमौर्व महाधियम् । नीत्या योज्या यया भार्या सुत आत्माऽथवा गुरो | राजनीतो सता नीतो सदाचारे च ये स्थिता । विशेषास्तेन ये प्रोक्ता ओर्वेण सुमहात्मना ॥१० विशेषेण द्विजथेष्ठ श्रोतुं सम्यक तपोधन ।

नृप धम क्यन ]
इच्छामस्तान् महाभाग कवयत्त्व जगद्गुरो॥११
ये विशेषा. कथिता औवेंण सुमहात्मना ।
तद् वः सर्व प्रवक्ष्यामि शृण्वन्तु मुनिसत्तमा. ॥१२
श्रुत्वंव मगरो राजा मन्त्रकल्पाटिक पुनः ।
विशेष परिपप्रच्छ नीत्यादीना महामुनिम् ॥१३
यया नीत्या प्रयोक्तभ्यः सुत आत्मा प्रिया तथा ।
तेपा विशेपंः सहितं सदाचारं वदस्व मे ॥१४
ऋपियों ने कहा-जो राजा सगर ने महान् बुद्धिमान ओव्वं
मुनि मे पूटा था, हे गुरुवर ! नीति में जिस तरह से मार्या, सुत और
वोधित किये जाते हैं । राजनीति में सत्पुरुषों की नीति में और सदा-
चार में स्थित है। महात्मा औवं ने जो विप कहे हैं । हे तप ही के
धन वाले ! है दिनों में परम श्रेष्ठ! उमे हम विशेष रूप से या
करना मती भांति चाहने है । हे जगत् के गुवर ! माप तो महान
भाग वाले हैं उनको आप बनाइये ।।६-११॥ माकंन्डेय महर्षि में
कहा-महान मारमा वाले ओवं ने जो-जो विशेष बदलाये थे। हे
मुनियो म वरा ! वह मद म.पको बतलाऊंगा आप यवण करिये।
राजा सगर ने इस तरह स मन्त्र कल्पादिक को सुन कर उन महा मुनि
से
पुनः
नीत्यादिक की विशेषता पूछो थी। मगर ने कहा--जिस प्रकार
से नीति के द्वारा सुनके-यात्मा के और प्रिया के साथ नीति से प्रयोग
परला पा उनको विशेषता के सहित डो सदाचार है उसको आप मुझे
देवलाइए ॥१२-१४॥
क्रमेण शृणु राजेन्द्र यया नीत्या नियोजिता.1
आत्मा सुता वा भार्या वा तद्विशेष शृणुप्त में ॥१५
ज्ञानविद्यातपोवृद्धान् वयोवृद्धान् सुदक्षिणान् ।
सेवेत प्रथम विधानसूयापरिवजितान् ।।१६
तेभ्यश्च शृणुयान्नित्य वेदशास्त्रविनिश्चयम् ।

[ पालिका पुराण
यदूचुस्ते च तत् कार्य प्राज्ञ चव नृपश्चरेत् ।।१७
पञ्चेन्द्रियाणि पञ्चाश्वाः शरीर रय उच्यते ।
आत्मा रथी कशा ज्ञान सारथिर्मन उच्यते ॥१८
अश्वान सुदान्तान् कुर्वोत सारथि चात्मनो वशम् ।
कशा दृदा सदा कार्या शरीर स्थिरता तथा ॥१६
अदान्तास्तु समारुह्य सैन्धवान् स्पन्दनः यथा।
अश्वानामिच्छया गच्छन्नुत्पथ प्रतिपद्यते ॥२०
तत्रावश सारथिस्तु स्वेच्छया प्रेरयन् हयान् ।
नयेत् परवश सम्यग् ग्रथित वीरमप्युत ।।२१
पौर्व मुनि ने कहा-हे राजेन्द्र ! अब आप कम स ही श्रवण
पौजिये जिस प्रकार की नीति के द्वारा आत्मा-गुत और भार्या को
नियोजित किया जाता है उसकी विशेषता मुझसे सुनिये ॥१५॥ ज्ञान में
बडे--क्य मे बडे-विधा-तप मे बड़े मुदक्षिणो का सब से प्रथम
सेवन करे तथा निन्दा मे रहित विणे का सेवन करना चाहिये । और
उनसे नित्य ही वेदो और शास्त्री के विशेष निश्चय का यवण करना
चाहिए उन्होने जो भी कुछ कहा है वह करना चाहिए-जो पास नृप है
उसे उमका समाचरण करना चाहिए ॥१६॥१७॥ ये पांच इन्द्रियो पाँच
यश्व हैं और यह शरीर रय कहा जाता है । आत्मा रथी अर्थात् रथ का
स्वामी है अश्वों को हांकने के लिये ज्ञान कशा (चावुक) है इस रथ या
मारपि मन होता है । अश्वों को सुदान्त करे और साघि मन को
आत्मा के वश में करना चाहिये। कशा को सदा सुदृश करे तथा शरीर
को स्थिरता रखनी चाहिए ॥१५-१६॥ जिस तरह से अदान्त अश्वो
पर समारोहण करके रपी अश्वो की इच्छा के अनुसार गमन करता हुआ
को प्राप्त हो जाया करता है। अपनी ही इच्छा से अश्वो को
प्रेरित करता हुआ साधि यहाँ पर भवश होता है और वह परम
प्रपिन वीर को भी परवश पर देना है ॥२०॥२१॥

३३३
रूप धर्म क्यन ।
तथेन्द्रियाणि नृपतिविवयाणा परिग्रहे ।
स्ववश्यानि प्रकुर्वीत मनो जान नया ॥
जाने दृढे कशायां च दृटाया नृपसत्तम ।
सारथिः स्ववशो दान्तानीश. परयितु ह्यान् ॥२३
अतो नृपः स्वेन्द्रियाणि दशे कृत्वा मनस्तथा ।
ज्ञानमार्गमधिप्टाय प्रकुर्वीतात्मनो हितम् ॥२४
मोक्तव्यं स्वच्छया भूयो न कुल्लिोभमासवे ।
द्रष्टव्यमिति द्रष्टव्य न द्रष्टव्य च स्वेच्छया ॥२५
श्रोतव्यमिति थोतव्यं नाधिक धवणे चरेत ।
शास्त्रतत्वामृते धीर: श्रुतिश्यो भवेन्न हि ॥२६
एवं प्राणं त्वचं त्रापि वशीकृत्येच्या नृपः ।
स्वेच्छया नोपभुजोत नोद्दामं विपय व्रजेत् ॥२७
एवं यदि भवेद्राजा तदा त स्याज्जितेन्द्रियः ।।
जितेन्द्रियत्व हेतुश्च शास्ववृद्धोपनवनम् ॥२८
उमी भौति राराको विषयों के परिग्रहण करने में इन्द्रियो की
अपने ही वश्य करना चाहिए ना मन और नान को सुदृढ रखना
चाहिए ।। २२ ।। हे नृपछ ! ज्ञान के नुहट होने पर क्या की मुदृढना
में अपने वश में रहने वाला मारपि दात अश्वों को प्रेरित करने में समर्थ
होता है । इसीलिए नृप को चाहिए कि अपनी इन्द्रियों को तथा मन
को अपने वश में रखकर ज्ञान के माम में अधिष्ठित होकर आत्मा का
हित गम्पादित करे ।। २३-~-२४॥ फिर अपनी इच्छा से भोग करना
चाहिर और आसव में लोभ न करे देखना है-इसमे देखना माहिए
और अपनी इच्छा में नहीं देना चाहिए ।। २५ ॥ जो सुनने के योग्य
है उसे ही यवन करना चाहिए। श्रवण म अधिक का ममाचरण न
करे। शास्त्रो के तत्वामृत में घोर यति वश्य नही होता है ।। २६ ॥
मी रीति मे इच्छा में प्राप-त्वचा को गोश्त करके अपनी इस्ला

[ पालिका पुराण मे उपभोग न करे और उद्दाम विषय का गम न करना चाहिए ॥२७॥ यदि राजा इमी रीति से समाचरण करने वाला होवे तो उमी ममय म वह इन्द्रियों को जोत लेने वाला हो सकता है जिनन्द्रिय होने म शास्त्रो और वृद्धो या उपसेवन करना ही हेतु हुआ करता है 1 २८ । अवृद्धसेव्याशस्त्रज्ञो नृप शनुवशो भवेत् । तस्माच्छास्त्रमधिष्ठाय भवेद्राजा जितेन्द्रिय ॥२६ धृति प्रागलभ्यमुत्साहो वाक्पटुत्व विवेचनम् । दक्षत्व धारविष्णुत्व दानमंत्रीकृतज्ञता ॥३० दृढशासनतासत्यशोच मतिविनिश्चयम् । पराभिप्रायवेदित्व चरित्र धंर्यमापदि ॥३१ क्लेशधारणशक्तिश्च गुरुदेवद्विजार्चनम् । अनसूया स्यकोपित्व गुणानेतान्नृपोऽग्यसेत् । ३२ कार्याकार्यविभागश्च धर्मार्थे वाम एव च । मतत प्रति युध्येत कुर्यादवसरेऽपि तन ॥३३ सामदान च भेदश्च दण्डश्चेति चतुष्टयम् । ज्ञात्वोपायाम्त तत्साले तदुपायान् प्रयोजयेत् ॥३४ सामस्तु विषये भेदो मध्यम परिमोनित । दानस्य विषये साम योग्यमेवोपलक्ष्यते ॥३५ जो नप वृद्धो का ग्वन करने वाला नहीं है तथा शास्त्री का माता नहीं होता है वह शत्रुओ पे दशाभूत हो जाया करता है । इस कारण मे शास्त्रो म अहित होवर राजा को जितेन्द्रिय होना चाहिए । २६ । धुति-प्राग्लभ्य-उत्साह-वाक्पटुता--निवचन-दक्षता- धार विगुता-- r-दान -मैत्री-पृतज्ञता--दृढ़ शामनता--सत्य-शौच-- युद्धि का विशेष निश्चय -दूग। ये बाभप्राय का ज्ञान रा-चरित्र--- आपत्ति म धीरज -क्लेशो में धारण करने की शक्ति-गुरदव गौर हिजो या अर्चन-जिन्दा म यग्ना-प्रोधी न होना-~-इन गुणो या नृप धम यया । राजा को अभ्यास करता चाहिए ।। ३०-३२॥ धम म-अर्य में और काम म वार्य और अबाय का विभाग का निरलर प्रतिबाध करना चाहिए और अवसर हान पर उम करना चाहिए। ३३ । साम-दान- भेद और दण्ड यह चतुष्टय अर्थात पार बातें हैं उसक कालो म उपायो का ज्ञान करके उनके उपायो का प्रयोग करे। ३४। माम विषय म भेद मध्यम कहा गया है। दान के विषय म माम योग्य हो उपलक्षित हाता है। ३५ दानस्य विपये दण्डो ह्यधन परिकीतिन । दण्डस्य विषये दान तदप्यधमगुच्यते ॥३६ माम्नस्तु गोचरे दण्डो ह्यधमादधम स्मृत । सौजन्य सतत ज्ञेय भू मृतो भेददण्डयो ॥३७ साम्नो दानस्य च तथा सौजन्य याति गोचरे। काम ोधश्च लोभश्च हो मानो मदस्तथा ।।३८ एतानतिशयान राजा गनूनिव विशातयेत् । सेव्या काले सुयुक्तौ त लोभगवौं विवजयन् ॥३६ तेज एव नपाणा तु तीव्र सूर्यस्य वै यथा । तय ग रोगयुक्त वायवास्त तु सत्यजेत् ॥१. आखेटकाक्षी स्त्रीसेवा पान चवायदूषणम् । वाग्दण्डयोश्च पारुष्य सप्ततानि वियजयेत् ॥११ परस्त्रीपु विरक्तामु सेवामेयान्ततम्त्यजेत् । सतीपुन निजनारापु युक्त कुर्यान्नि वेशनम् ॥४२ दान क विषय म दण्ड अधम कहा गया है। दण्ड के विषय म दान जो हाना ह-६ मा आम ही कहा जाता है । ३६ । माम र पर अथाव प्रत्यक्ष होन पर जो दण्ड का प्रयाग है वह अधम म भी अधम रहा गया है। राजा र दण्ड और भद म निरन्तर सौजन्य जाना चाहिए ॥ ३७॥ साम और दान पी सुजनता गोचर म जाती है। पाम कोप-लोम-हप-मान-~मद-इनका अतिशय कम म ३४० [पालिका पुराण होने वाली का राजा को शत्रुओ की तरह विनष्ट कर देना चाहिए। स युक्न काल मे ही उनका सेवन करना चाहिए । लोभ और गां को विवजिन पर दवे ॥ ३८-३६॥ तृपो वा तेज से तीव्र होता है जिग तरह से मूर्य वा हुआ करता है। उनमे गर्व गैग मे युक्त होग है। वायवान को उमका त्याग कर देना चाहिए। ४० । आखेट---अक्ष- स्त्री मैवन-पान और अर्थ दूपण-वाणी और दण्ड में सटोरता इन सवका वर्जन कर देना चाहिए। विरक्त पराई स्त्रियो मे सेवन करना एकान रूप मे वजिन कर देवे । सती अपनी नारियो मे युक्त सेवन करना चाहिए ॥४१-४२॥ रतिपुत्रफला दारास्तास्तु नकान्ततस्त्यजेत् । तयो सिद्धयं स्त्रिय सेव्या वर्जयित्वातिसक्तताम् ॥४३ मृगया तु प्रमादाना स्थान नित्य विवर्जयेत् । अक्षास्तथा न कुर्वीत सत्कार्यासक्तिनाशनम् ॥४४ अन्य कृत कदाचिन् तु सेवेत नात्मनाचरेत् । जकार्यकरणे वीज कृत्याना च विवर्जने ॥४५ अकालमन्नभेदे च कलहे सत् कृतिक्षये । वजयेत् सतत पान शौचमागल्यनाशनम् ।।४६ अर्थक्षयकर नित्य त्यजेच्चवात्मदूषणम् । अभिशस्तेषु चोरेषु घातकप्वालतायिषु ।।४७ सतत पृथिवापालो दण्डपारुप्यमाचरेत् । नान्यत्र दण्डपारप्य कुन्निपतिसत्तम. ॥४८ वाक्पारुष्य च सर्वत्र नव कुर्यात् कदाचन । रक्षणीय सदा सत्य सत्यमेक परायणम् ।।४६ जो दाराऐ रति और पुत्र के फल वाली है उनका एकान्त रूप से त्याग नही करे । रति और पुत्र दोनो की सिद्धि के लिए स्त्रियो को सेवन करना चाहिए किन्तु उनमे अत्यन्त आसक्ति पा वर्जन पर देवे । - HAR नप धर्म वथन । ३४१ -- मृगया तो घयादो दा स्थान होता है इसका नित्य वर्णन कर देने । कदाचित् अन्यो के द्वारा न्यि हा का सेवन बरे किन्तु अपने द्वारा इसका सम चरण नदीवरे। अक्षो का भी मेवन न करे। ये सलार्य और शक्ति का विनाम करने वाले होते हैं। अकार्यों दे करने में और कृत्यों के वर्जन में यह बीज होता है ॥५३-१५ ॥ अकाल मन्त्र भेद में- कलह मे मकार क्षय में निरनर पान का वजा कर देवे । जो कि यह मदिरा पान सोच और मङ्गल्य का विनाश करने वाला होता है ॥४६॥ पह अर्थ के भय या करने वाला होता है। अतएव आत्मा के दूपण इसका त्याग कर देना चाहिए अभिशस्त-चोरघातक-आततायी में राजा को निरन्तर दण्डकी कठोरता चा समाचरण करना चाहिए । छनृप को अन्य म्गलो म दण्ड की कठोरता नहीं करनी चाहिए १४७॥ ॥४८॥ वाणी की पोरता को तो ममी जगह नामो भी नहीं करे। सदा मत्य की रक्षा करनी चाहिए । एक सत्य म ही परायण रह १४६) क्षमा तेजस्विता चैव प्रस्तावान्नुप बाचरेत् । यानासनाथयढंधसन्धयो विग्रहस्तथा ५० अन्यसेत् पड्गुणानेताम्तेपा स्थान च शाश्वतम् । य: प्रमाणं न जानाति स्याने वृद्वौ तथा क्षये ।।५१ को जनपदे दण्डेन म राज्येऽवतिष्ठते । कोषे जनपदे दण्डे जेवंकर प्रय त्रयम् ॥५२ प्रस्तावादिनियुजीत रक्षेन्नकास्ततस्विमान् । मित्रं शमादासोने प्रभाव विप्वपीरयेत् ॥५३ उत्माहो विजिगोपाय धर्गकृत्येऽटवर्गके । शरीरयानानिवहि कियेत सतत नृपः ॥५४ मन्त्रनिश्चयसम्भूता बुद्धि सर्वन योजयेत् । अमात्ये शात्रवे राज्ये पुरेप्वन्त पुरेषु च ॥५५' क्षमा और तेजस्थिता का प्रसाद से नृप को समाचरण करना

कालिका पुराण
चाहिए। यान, आसन, पाश्रय, वंध, मन्धि तथा विग्रह-इन छ गुणों
का नया इनके शाश्वत स्थान का नृप को अभ्यास करना चाहिए । जो
म्थान में वृद्धि में-क्षय में-कोप मे-जनपद मे और दण्ड मे जो
प्रमाण को नही जानता है वह राज्य पर अवस्थित नही रहा करता है।
यह एक-एक में तीन ती हैं। प्रस्ताव में विनियोग करना चाहिए ।
किमी एक की ही रक्षा न कर इन सबकी रक्षा करनी चाहिए। मित्र
में-श मे और उदामीन में तीनो मे ही याने प्रभाव कोई रित करना
चाहिए ।। ५० --५३ ।। नृपो को विजय की इच्छा में-धर्म कृत्य मे
अष्ट वर्ग में -शगेर यात्रा निटि में निरन्तर उत्साह करना चाहिए।
।।५४।। मन्त्र के निश्चय मे ममुत्पन्न वृद्धि को गर्वत्र योजित करे-
अमात्य मे-शात्रव मे-राज्य मे-पुत्रो मे और अन्तःपुर में बुद्धि का
योजन करना चाहिए ।५५|
कृपि दुर्ग च वाणिज्य खडगाना करसाधनम् ।
आदान सैन्यकरयोर्वन्धन गजवाजिनो. ।।५६
शून्ये सद्ममुग्वाना च योजन सतत जनः ।
त्रयाणा सारसेतूना बन्धन चेति चाष्टमम् ।।५७
एतदष्टसु वर्गपु चारान् सम्यक् प्रयोजयेत् ।
कार्याकार्यविभागाय चाप्टवर्गाधिकारिणाम् ॥५८
अष्टौ चारान्नियुजीयादष्टवर्गेषु पार्थिव ।
दश शून्येषु युन्जोत कमतः शृण तानि मे ॥५६
स्वामी सचिव-राष्ट्राणि मित्र कोशो वलं तथा।
दुर्गं तु सप्तम ज्ञेय राज्याङ्गगुरुभापितम् ॥६०
दुर्गयुक्त चाप्टवर्ग चारानात्मनि योजयेत् ।
तस्मादिमानि शेषाणि पच चारपदानि च ॥६१
शुद्धान्तेषु च पुत्रेषु स यूयादी महानसे ।
शगूदासीनयोश्चापि बलाबलविनिश्चये ॥६२

नृप धर्म क्यन
अष्टादगसुचनेपु चारान् राजा प्रयोजयेत् ।
न यनुप्रकाश जानीयात तन तच्चारनिरपयेत् ॥६३
कृपि-~-दुर्गवान्य-सगोलकर मारन-~मैन्य करों का
आदान -गो और अश्वी का वधन-मन मुद्दों के सूत्र में जनो के
द्वारा निरन्तर योजन और नीन बार मनुनो का बन्धन बाठा है। इन
गठ वर्गों में चारों में भरी मांनि प्रयोनिन करना चाहिए । कार्य
बोर काय दिमाग लि जावर्ग धिकारियों को योजित
करे । राजा माठ चागे वो लाइ वर्गों में नियोजिन परे । दश को
शूय में निधन परे । उनका क्म मे मुयने प्रवा वग्वेि ॥५६-५६।
मी-मचिद-राष्ट्र-मित्र-~ोग-बल-टर्ग मातम और गुरु
भापित राय बन है ॥६०॥ दुर्ग मे युक्त माने बट वर्ग में चारों
सो योडिन परे। इस कारण मे इन शेव पांच चार पदों को प्रदान्तों
में-पुत्रों में यूण द में-महानम में-न और उदामीनों मे-
चल-अचल के विप नित्रय में इन पठारहों में रारा चारों को
1 पतराता में इनको कोई भी न जान पवे उमी भांति चारों
वे द्वारा निरपत कर देना चाहिए ॥६१-६३11
निम्प्य तत-प्रतीशरमवश्य छिद्रतश्चरेन ।
यथानियोगमेतपा यो यो यत्रान्यचाचरेत् ।।६४
जात्वा तम नपञ्चार दण्डयेद् वा वियोजयेन् ।
चारास्नु मन्त्रिमा माघे रहस्ये मन्यितो नृप ॥६५
प्रदोपसमये पृच्टेन तदानीमेव साधयेन् ।
स्वसुन्ने चार मुद्धाले ये तु चारा महानने ॥६६
नियुक्तास्तान्मध्यरात्रे पच्छन् म्वेऽपि च मन्त्रिणि ।
एनाश्चागन् न्वय पश्येन्नपतिमन्त्रिमा विना ॥६७
चन्यास्तु मन्त्रिणा माधं नित्य प्रदिगेन फलम् ।
नक्वंशधरश्चारो नंको नोतमाहजित ॥६८

इसलिना पुराण मस्तुतो नहि मर्वय नानिदीपों न बामन । मतत न दिवाचारी न रोगी नाप्य गुद्धिमान ॥६६ न वित्तविभवहींनो न भार्यापुन वजित । कार्यश्चागे नृपनिना तत्त्वगुह्यविनिर्णये !1७० उममा प्रतीकार अवश्य ही निरूपण बरवै छिट में समाचरण करे। इनका जैसा निद्याग है और जा जो जहाँ पर अन्यथा घरण बरे! १॥६४।। वहाँ पर नृप को मात प्राप्त करद जो विचारों के द्वारा विया जावे दण्ड देवे या चागे को अलग कर देवे । मन्त्री के माय एकात म मस्थित रहे । राजा का चाहिये कि प्रदोष के समय में पूछे और उमी समय में माधन करे। अपन पुत्र के विषय म-शुद्धान्त पुर में और शा चार महानस (रसोई गृह) म नियुक्त होवे उनमे मध्य रात्रि में पूछना चाहिये । और जो अपने मन्त्री के विषय चार हो उन से राजा विना मन्त्री के स्वय ही पूष्ट ॥६५-६७॥ अन्य जो चार हो उनमे मन्त्री के साथ निरूपण करव फल का प्रदेशन करें। चार एक वश में धारण करने वाला म हावे-न एक ही होवे और म उत्साह से रहित होना चाहिए ॥६८॥ चार सर्वत्र सस्तुत नही हाना चाहिए। यह अत्यन्त लम्बा न होवे और न बौना ही होना चाहिये । निरन्तर दिन में चरण करने वाला चार होना चाहिये। और वह रोगी तथा बुद्धि रहित भी नहीं होय ॥६६॥ चार चित के वैभव से हीन भी न होवे और ऐमा भी नहीं होना चाहिए जिसके भार्या तथा पुन न होवे । ऐसा ही चार राजा को तत्त्व गुह्य के विशेष निर्णय मे नियुक्त करना पाहिये ॥७॥ अनेकवेशग्रहणक्षम भार्यासुतंयुतम् । यहुदेशवचोऽभिज्ञ पराभिप्रायवेदकम् ॥७१ हढभवत प्रवुर्वीत चार पक्तमसाध्वसम् । अभितिप्ठेत् स्वय राजा कृपिमात्ममस्तपा ॥७२

४६
[ पारित राज
बाम और मोगर पारिशोर दागा o Tere
पिया जागी यारण 47 उपचा बड़ी जाती है |
अयंगामोषधाम्या तु भार्यापारन शोधयंन् ।
धर्मोपधाभिविप्रान्त मर्वाभि गतिवान् पुन ||७८
एभियस्तथा दाग्दिन नपनि धेन ।
तम्माद भवान्तु गज्यार्थी धर्ममेर गमाचरेल ||
अनेनवाभिचारेण या पार्थिवो स्वयम्
प्रागस्त्यिजनि गजा व भविष्यमिन माय ।।८०
इनि धमों नपस्यंब अश्वमेधादिरश्न य ।
स्वय न पुरते भपम्नम्मान त्व पूरु मत्तम ।।८१
एवम मन्त्रयित्वा नप कार्यान्तिबाट द्विजान् ।
तेरज्ञानान म्वय ज्ञात्वा गहणीयान तम्य मन ॥२
यदि राज्याभिलाषेण मचियोऽधर्ममाचरेन ।
नृपती वाधिक कुर्याद् धर्म त होनता नर्थन ॥८३
आभिचारिकमत्यर्थ पुर्वाण तु विघातयेत् ।
प्रवासयेद् ब्राह्मण तु पार्थिवश्चाभिचारिकम् ।।८४
अर्थ-काम की उपधाओ से भार्या और पुत्रो मा परिशोधन
करे। धर्म की उपधाओ से विप्रो को और सब उपधाओ से सचिवी ला
शोधन करे ||७८॥ इनके द्वारा यज्ञो से और दानी के द्वारा यहाँ र
ही नृप होता है। इस कारण से आप राज्य के अर्थी है अतएव इसी
भांति धर्म का ही समाचरण करे ॥७६। इसी अभिवार से अथवा
यज्ञों से यह राजा प्राणा का त्याग करता है और तुम राजा हो जाओगे-
इसमे कुछ भी सशय नहीं है ।1०1। यही नृप का धर्म है और जो
अश्वमेध यादिक हैं राजा स्वय नहीं करता है इस कारण से हे थेष्ठतम
तुम करो ॥८॥ इस प्रकार से नृप कार्यान्तिक द्विज से मन्त्री के द्वारा
मन्त्रमा करके उनके द्वारा अज्ञातो को स्वप ज्ञान प्राप्त करके उनसे उस
-

नृप धम क्थन ] के मन का ग्रहण करे ॥२॥ यदि राज्य की अभिलापा मे सचिव यधमं का याचरण कर अथवा राजा + विपय में अधिक करे तो उस घम का हीन वना देव ।। अत्यात आर्भिको करन वाले का विघात कर दवे । राजा को चाहिए - अभिचारिक हह्मण हो तो उसको देश से बाहिर निकलवा दव ॥४॥ एपा धर्मोपधा ज्ञेया तरमात्यान सुगन जयेन् । एताहगी तचंवान्यामुपधा धर्मतश्चरेत् ।।८५ कोशाध्यक्षान, ममामन्त्र्य राजामात्यान प्रतारयेत् । पुत्रानन्यान् प्रति तथा मन्त्रमवरणाक्षमान ८६ अय हि प्रचुर कोपो मदायत्ता नरोत्तम । आन्ये तव समत्या तद् यदि त्व प्रती.सि ।।८७ तवार्थलग्नादस्माक जीवन च भविष्यति । त्व चापि प्रचुरै कोपं वि पि वा न परिप्यसि ।।१८ एवमन्यं कोपगरुपायर्नुपसतम । पुवामात्यादिकान् सर्वान, सतत परिशोधयेत् ।।८६ योपदोपकरान. हन्यात् कर्तुमिच्छून विवासयेत् । द्वधचित्तान विमन्येत कुर्याद् व कोशरक्षणम् ॥६० दासोश्च शिल्पिनीद्धा मेधाधृतिमनो लिय । अन्तर्वहिश्च या यान्ति विदिता सचिवादिमि ॥६१ यह धमोधा जाननी चाहिय । उनस अमात्यो को और मुतो को विजित बरे। इस प्रकार की उसो मानि अब उपधा वा धर्मस समा- पररा बरना चाहिये । ८५। कोपाध्यक्षो को समर्मान्यत पाये गजा अमात्यो वा पारित पर दव । तथा पुत्रो को व्यवायो को जो मन्त्र ये सवरण परने में असमर्थ हाय प्रतारित वर दना चाहिए ।०६। हे नरोत्तम । यह प्रचुर ( यहुत बडा ) कोप मेरे अधीन है यदि उसकी माप प्रतीक्षा करते है तो आपको सम्मति से 7 ले आरा ॥ ६७ ।।

३४८ [ मालिका पुराण आपके अर्थ के लग्न होन में हमाग जीवन होगा और आप भी इन प्रपुर कोपो के द्वारा क्या-क्या नही करोगे । ८८ ॥ इस प्रकार स अन्य पोप गत उपाया के नृप श्रेष्ठ पुत्र-अमात्य आ'दक भवका निरन्तर परिशोधन करे ।।। जो वोप में दोपो के करने वाले हैं उनका हमा कर देवे और जो बरने की इच्छा रखते हो उनको देश से बाहिर निकलवा देना चाहिये । जो वध चित्त वाल होवें उनको विमा- नित कर देवे विन्तु वोप की रक्षा हर प्रकार से करनी चाहिये ॥६॥ दामियां शिल्पिनी–वृद्धा-मेघा और धृति वाली स्त्रियाँ जो बाहिर और भीतर गमन किया करती हैं तथा सचिवो आ द के द्वारा विदित हैं ।।६१॥ ता राजा रहसि स्थित्वा भार्यादिभिग्लक्षित । अभिमन्याथ ममन्त्र्य प्रेषयेन मचिवान् प्रति ।।६२ ता गत्वा हृदय युद्धा स्त्रियो विज्ञानतत्परा । महिपीप्रमुखा राज्ञस्त्वा वै कामयते शुभा ॥६३ तबाह योजयिष्यामि यदि ते विद्यते पहा । सचिवस्त्वा कामयते त्वदयोग्यो बग्वणिनि ।।६४ त सगमयितु शक्ता यदि श्रद्धा तवास्त्यहम । इत्यनेन प्रकारेण नानोपायंस्तथोत्तर ॥६५ भार्या पुवाहिनीश्च स्नुषाश्च अनुस्पास्तथा । शोधयेत् मचिवान पुत्रान पौत्रादीन सेवास्तथा ॥६६ कामोपधाविशुद्धास्तु घातयेदविचारयन, । स्नियस्तु योज्या दण्डेन ब्राह्मणास्तु प्रवासयेत् ।।६७ मोक्षमार्गावसवन तु हिंसापंशुन्य वजितम् । क्षमंकसार नृपति मचिव परिवजयेत् ।।६८ राजा उनका भार्या आदि से अलक्षित हावर स्थित रह पर एकान्त म अभिमन्त्रणा बरके तथा इसक अनन्तर भली भांति म.पणा

नृप धर्म क्थन
-
करके सचिवो के पास प्रेपित कर देवे ।। ६२ ।। वे जाकर वहां हृदय का
ज्ञान प्राप्त करने विज्ञान में नत्पर राजा की महपी प्रमुख शुम तुमको
चाहती है यदि आपकी स्पृहा हो तो वहां पर मैं योजित कर दूंगी।
मचिव तुमको चाहता है हे वरणिनि! आपके योग्य भी है यदि आपकी
श्रद्धा हो तो में उमका मङ्गम कराने के लिये ममर्थ हू । इस रीति से
तथा अनेक उपायो से और उत्तरो के द्वारा भार्याओ-पुत्र दुहित्रियो -
स्नुपाओ तथा प्रस्नुपाओ - सचिवो-पुनो-पौना--सेवको आदि का
शोधन करना चाहिए ।। ६३-६६ ॥ काम की उपधाओ से अविशुद्ध
के बिना ही कुछ विचार किये हुए विघात कर देना चाहिए । स्त्रियो
को दण्ड के द्वारा योजित करे और ब्राह्मणो को प्रवासित कर देरे।
मोक्ष के मार्ग मे अवसक्न तथा हिंसा और पैशुन्य से रहित--क्षमा को
ही एक सार मानने वाले सचिव का राजा को परिवजन कर दना
चाहिए ॥६७-६८॥
मोक्षमार्गविपक्तास्तु दण्डयानपि न दण्डयेत् ।
सम बुद्धिस्तु सर्वन तस्मात् त परिवर्जयेत् ।।६६
इति सूत्र चोपधानामुपधा वहुधा पुन ।
विवेचिता चोशनसा तच्छास्ने तन बोधयत् ।।१००
विग्रह सतत राजा परेन सम्यगाचरेत् ।
भूवित्तमित्रलाभेषु निश्चित प्वेव विग्रहा ॥१०१
सप्नागपु प्रसादश्च सदा कार्यों न पोत्तमः।
कोपस्य सञ्चय रक्षा सतत सम्यगाचरेत् ।।१०२
मन्त्रिणस्तु न.प. कुर्याद् विप्रान, विद्याविशारदान ।
नयाज्ञान कुलीनाश्व धर्मार्णकुश लातृजन ॥१०३
मन्नयेत तः सम ज्ञान नात्यर्थ बहुमिश्वरत् ।
एकादेनेव वर्तव्य मन्त्रम्य च विनियम् ॥ १०४
ध्यस्त. समस्तश्चान्यस्य व्यपदेशः समन्ततः।

३५०
[ पालिका पुराण
सुसवृत मन्त्रगृह स्थल वारुह्य मन्त्रयेत् ।।१०५
जो मोक्ष मार्ग विशेष रूप से सक्त हो वे दण्ड के योग्य भी हो
तो भी उन्हे दण्ड नहीं देना चाहिये । वह सर्वत्र मम बुद्धि वाला है इसी
वारण से उसको परिवर्जित कर देवे N६६उपधाओ का यह मूल है ।
पुन उपधा का बहुत-मा विवेचन किया गया है। उशना ने इसका
अच्छा विवेचन किया हैं । वहाँ पर उसके शास्त्र मे इसका बोध करे।
॥१००॥ राजा को दूसरो के साथ निरन्तर विग्रह का भले प्रकार से
आचरण नहीं करना चाहिए। भूमि-वित्त-मित्र लाभो से जब ये
निश्चित हो जाये तो ही विग्रह होते हैं । उत्तम नृपो के द्वारा स्वत अङ्गो
में सदा प्रसाद ही करना चाहिये । कोप की रक्षा और निरन्तर सञ्चय
भली भांति करना चाहिए ॥१०१।१०२॥ राजा को अपने मात्रीगण
विद्या में विशारद विप्रो को ही करना चाहिये । जो विशेष रूप से
नमशास्त्र के ज्ञाना-कुनोन-धर्म और अर्थ म दुशल एव सरल
स्वभाव वाले होवें ।। ५०३ ।। उनके साथ ज्ञान की मात्रणा करे और
अत्यन्त अधिक बहुतो के माथ कभी भी समाचरण न करें। एक-एक
वे ही माय मात्र गा का विशेष निश्चय करे ।। १०४ ॥ व्यस्त-समस्त
सभी ओर से अन्य के व्यय देशो से सुसंवृत मन्त्रणा करन का गृह होबे
उसी स्थल में समारोहण करके मन्त्रणा रे ॥१०॥
अरण्ये नि शलाके वा न यामिन्या क्दाचन ।
शिशूञ्छाखामृगान पण्डाञ्छुकान व सारिकास्तथा ॥१०६
वजयेन्मन्त्रगेहे तु मनुप्यान, विकृतास्तथा ।
दूपण मन्यभेदेषु न पाणा यत् तु जायते ॥१०७
न तच्छश्य समाधातु दक्षन पशतरपि ।
दण्ड्यास्तु दण्डवैद् दण्डरदण्ड्यान् दण्डयेन्नहि ॥१०८
अदण्डयन् नृपो दण्ड्यान्नदण्ड्याश्चापि दण्डयन् ।
नृपतिर्वाच्यता प्राप्य चौरकिल्विपमाप्नुयात् ॥१०॥

नप म क्चन ] ३५१ दुर्गे तु समता कुर्यात् प्राकाराटटालतोरण । भूपितान्नगराद्राजा दूरे दुर्गाश्रय चगेन ।।११० दुर्ग वल नृपाणा तु नित्य दुर्ग प्रशस्यते । शतमेका योधयति दुर्गस्यो यो धनुर्द्धर ।।१११ शन दशसहस्राणि तस्माद् दुर्ग प्रशस्यते । जलदुर्ग भूमिदुर्ग वृक्षदुर्ग तयंव च ॥११२ अरण्य म अथवा निशिलोक म मन्त्रण कर किन्तु रानि म कभी भी मन्त्रणा नहीं करनी चाहिए। मन्त्रणा के गृह म छोटे बच्चो को- शाखा मृगो को ( बन्दरो)-पण्डा को शुवो को-सारिकाआ को तथा वित मनुन्या को वजिन कर देना चाहिए। नृपा के मन्त्र भेदो मे जो दूपण हो जाता है। वह परम दक्ष मैक्डा नृपा के द्वाग भी ममाधान नही दिया जा सकता है। जो दड के योग्य हैं उनको तो अवश्य दद देवे और नो अदडीर हा उनको नहीं देना चाहिए ॥ १०६-१०॥ तो दड के पाप हैं उनको दड न देते हुये और जा दड के योग्य नहीं है उनमा दड देत हुय रजा निन्दा का प्राम करक चोर क पाप का प्रात क्यिा करता हैं ॥१०६।। प्राचार- सट्ट लिया और तोरणो के द्वारा दुग म समता करनी चाहिए। राजा को चाहिय Fि भूपत नगर म दूर म दुर्गाश्रय कर ॥११०॥ राजाओ का वल दुर्ग है और नित्य ही दुर्ग की प्रशमा की जाती है। एक ही धनुर्धारी दुर्गम स्थित होकर मो भूरा से युद्ध किया करता है । और सौ घर दश म्हस्र पीरा के साथ युद्ध किया करता है। इसी कारण मे दुर्ग का प्रशस्त कहा जाया करता है। दुगं कई प्रकार व हात है-जल दुर्ग होता है-भूमि दुर्ग है-और वृभ दुग हाता है ।।१११||११२॥ अरण्यमरुदुर्ग च जलज परिखोद्भवम् । दुग्रं कार्य नृपतिना यथा दुर्ग म्वदेशत ॥११३ दुर्ग कुर्वन् पुर कुर्यान त्रिकोण धनुराकृति ।

३५२ ( कालिका पुराण वतुल च चतुष्कोण नान्यथा नगर चरेत् ।।११४ मृदङ्गाकृतिदुगं तु सतत कुलनाशनम् । यथा राक्षसराज्यस्य लड़ा दुर्गान्विता पुरा ।।११५ चले पुर शोणिताख्य तेजो दुर्गे प्रतिष्ठितम् । तद यस्माद् व्यञ्जनाकार मनोभ्रष्ट शिवावलि 11११६ सौभाग्य शारबराजस्य नगर पचकोणकम् । दिवि यद् वर्तते राज्य तच्च भ्रष्ट • विप्यात।।११७ यच्चायोध्याह्वय भूप पुरमिक्ष्वाकुभूभृताम् । धनुराकृति तच्चापि ततोऽभूद् विजयप्रदम ॥११८ दुगभूमों जयेद् दुर्गा दिक्पालाश्चंव द्वारत । पूजयित्वा विधानन जय भूप समाप्नुयात् ।।११६ अरप्य मरु दुर्ग-शैल से समुद्भूत दुर्ग और परिरथा से उद्भूत ग होता है । नृप को जैसा अपने देश से दुग हो दैमा ही दुर्ग करना चाहिये ॥११३॥ दुर्ग की रचना परते हुए त्रिकाण और धनुष की आकृति वाला पुर बनाना चाहिए। वत्त ल और चतुष्याण पुर की रचना करे अन्य प्रकार मे नगर नहीं करना चाहिए ॥११४।। मृदङ्ग की भाकृत वाला दुर्ग निरन्तर कुल के नाश यस वाला होता है। जिस प्रकार से पहिले राक्षमो के रामा रावण की लड़ा पुरी दुर्ग से युक्त थी ॥११॥ राजा बलि का शोपित नाम वाला पुर था और दुगों स में प्रतिष्ठित तेज पा। क्योकि वह व्यञ्जनाकार था और शिया बलि मनोपट थी ॥११६॥ शाल्वराज का सौभाग्य नगर पांच कोनो वाला था। जो राज्य दिव कोरम है यह प्रष्ट हो जायेगा ॥११७॥ और जो अयोध्या नाम इवानपों मा पुर था वह भी धनुप की आकृति वाला पा इसी से पह विजय प्रद हुमा पा ॥११७॥ दुर्ग सी भूमि म दुर्गा का रजनपरना पाहिए। और द्वार पर दिक्पालो मा यमन करे। विधान गे पूजन करणे नृप जप को पास पिया घरमा ॥११६५

नृप धर्म पर ]
अतो दुर्ग नृपः कुर्यात् सतत जयवृद्धये।
न ब्राह्मणान् सदा राजा केनाप्यवमनोकृतान् ॥१२०
अवमन्य तृपो विप्रान् प्रेत्येह दुःखभाग् भवेत् ।
न विरोधस्तु तं. कार्य. स्वानि तेपा न चाददेत् ।।१२१
कृत्यकालेषु सतत तानेव परिपूजयेत् ।
नेपां निन्दा प्रकुर्वीत नाम्यसूया तयाचरेत् ॥१२२
एवं नृपो तहाधुद्धिस्तत्त्वमण्डलसयुतः ।
अप्रभादी चारचक्षुगुणवान् सुप्रियवदः ।।१२३
प्रेत्येह महती सिद्धि प्राप्नोति सुखभोगवान् ।
यगुणोजित चात्मा तः पुत्रापि योजयेत् ।।१२४
नृपस्य च स्वतन्त्रत्व सतत स्वं विनाशयेत् ।
स्वतन्त्रो भूपतनयो विकार याति निश्चितम् ॥१२५
निविकाराय सलत वृद्धाश्न परियोजयेत् ।
भोजने शयने याने पुरुषाणा च वीक्षण ।।१२६
वियोजयेत् सदा दारान भूप. कामविचेष्टने ।
अस्वतन्त्राः स्त्रियः कार्या. सतत परथिवेन तु ।।१२७
इसीलिये राजा को अपना दुर्ग निरन्तर जप की वृद्धि के लिये
करना चाहिए । राजा ब्राह्मणो को सदा किसी से भी बवमनीकृत न
करे। राजा दिनों को अवमान करके यहाँ पर और मृत्युगत होकर भी
दुख का भागी होता है। उनके साथ कभी विरोध नही करे और
उनका धन ग्रहण नहीं करना चाहिए ११२०॥१२१॥ कृत्य के कालो
मे निरन्तर उनका ही परिपूजन करना चाहिए। इनकी निन्दा न करे
और न इनकी अन्य सूया करनी चाहिए ॥१२२।। इस प्रकार से महान्
बुद्धिमान तत्व मण्डल में मयुत नृप यप्रभादी-चार चक्षु-गुणवान्..
प्रिय बद होता है। यहां पर और मृत्युगत होकर महती सिद्धि को
प्राप्त होता है और मुखो के भरेप वाला हुआ करता है। जिन गुणो से

[ कालिका पुगण
अपने आपको योजित करे उन गुणो स पुत्री को भी याजिन करना
चाय ॥१२३।।१२।। नृप की निरन्तर स्वतन्नता अपने आपका
विनाश किया करती है। राजा का पुत्र स्वतन्य रहार निश्चित रूप स
विकार को प्राप्त हो जाता है ॥१२५।। निविकार + लिये निरन्तर
वृद्धो को पारियोजित वरे । भोजन मे --- शयन म-यान म और पुरुषा
के वीक्षण में सदा दाराओ को भय को काम विचटन म वियोजित
करना चाहिए। राजा के द्वारा स्त्रियाँ निरन्तर अम्वाधीन रखनी
चाहिए ।।१२६-१२७॥
ता स्वतन्ना स्त्रियो नित्य हानय सम्भवन्ति हि ।
तस्मात् कुमार महिषीमुपधाभिमनोहरै ॥१२८
शोधयित्वा नियुञ्जीत यौवराज्यावरोधयो ।
अन्त पुरप्रदेशे तु स्वतन्त्रत्व निषेधयेत् ।।१२६
भूपपुत्रस्य भार्याया वहि सारे तथैव च ।
अय विशेष क्षेपान्नुपधों मयोदित ॥१३०
पुत्राणा गुणविन्यासे भायांणामपि भूपते ।
उशना राजनीतीनां तन्त्राणि तु वृहस्पति ॥१३१
चकारान्यान विशेपास्तु तयोस्तन्त्रेषु वोधयेत ।
एव गजा महाभामो राजनीती विशेषनाम् ।
कुर्वन्न सीदति सदा भूयसी श्रियमश्नुते ।।१३२
व स्वतन्त्र रहने वाली स्त्रियाँ नित्य ही हानि के लिय हुआ
परती है । इस कारण से कुमार को और महिपी को मनोहर उपधाओ
स शोधन करते यौवराज्य और अवगेश मे नियोजित करे । अन्तपुर के
प्रवेश में स्वान्नता का निपध कर देना चाहिए ॥१२८।।१२६। राजा
के पुत्र का-भार्या का तथा वहि सार म यह विशेषता संक्षेप से नृप का
धर्म मैो बनला दिया है ॥१३०॥ पुप्रो क गुणा के विन्यास म और
राजा को भार्या भी विषय म उशना ने और वृहस्पति ने राजनी.

सदाचार कपन] तियो के तन्त्रा को किया है। अन्य विशेषताओ को उन दोनो के तन्त्रो मे समझना चाहिये । इस प्रकार मे महाभाय राजा राजनीति में विशे- पता को करता हुआ कभी भी दुखित नही होता है और सदा बहुन बड़ी श्री की प्राप्ति किया करता है ॥१३॥ ॥ सदाचार कथन ।। सदाचारेषु राजेन्द्र विशेषाञ शृणु सम्प्रति । यानवश्य नृप कुर्यात तान्मत्त सकलान, शृणु ॥१ साधव क्षीणदोपादच सच्छब्द साधुवाचफ । तेपामाचरण यत् तत सदाचार स उज्यते ॥२ आगनेषु पुराणेषु सहितासु यथोदितान् । समुद्दिष्टसदाचारान् गृहणीयात् तान् गृहस्यवत् ॥३ ऋपोन् यजेद् वेदपाठवान होम प्रपूजयेत् । थाढे पितृस्तर्पयेत् तु भूतानि वलिभिस्तथा ॥४ मैत्र प्रसाधन स्नान दन्तधावनमजनम् । सर्व गृहम्थवत् कुर्याग्निपेकाध विधि तथा १५ पट्कर्मसु नियुजीन राज विप्रान् समन्नत । तथैव क्षत्रियादोश्ज स्वे स्वे धम नियाजयेत ॥६ य स्वधर्म परित्यज्य परधर्म समाचरत् । त शतेन नृपो दण्ड पुनस्तमिन् नियोजयेत् ।।७ और ने वहा--अब हे राजेन्द्र ! सदा चारी मजा विशेषतायें है उनका या पीरिये । जिन्ह राजा को अवश्य ही करना चाहिये उन पबको माप मुझसे ही उन सबरा श्रवण कोरिये ॥११॥ साधुगम क्षीण दोपो वाले होते हैं वपोधि गद गद साधु वाचन हुमा करता है। उनमा [ वालिया पुगण जो भी आचरण है वहीं, सदाचार रहा जाया करता है ॥२॥ आगमों में--पुराणो में और सहिताओं में जिस प्रकार से कहे गये हैं उन समु. द्दिष्ट सदाचारो में गृहस्थ की भांति ग्रहण करना चाहिये ॥३।। वेदो के पाठा के द्वारा ऋषियो का यजन करे और होमो के द्वारा देवगणों का पूजन करे। श्राद्धो के द्वारा पितृगणो को तृप्त करे तथा बलियो के द्वारा भूतो को सतृप्त करना चाहिए ॥४॥ मंत्र-प्रसाधन-स्नान-दन्त धावन-अन्जन यह सब गृहस्थ को ही भांति करे तथा निकाद्य विधि को करना चाहिए ॥५१॥ राजा को चाहिए कि पट् कौ मे सभी ओर से विप्रो की नियुक्ति करे । उमी भॉति क्षत्रिय आदि को अपने- अपने धर्म में नियोजित कर ॥६॥ जा अपने शास्त्रात धर्म का परित्याग करके परायो के धर्म का समाचरण करे उसक राज एक मौका दण्ड देवे और फिर उसको उसी विहित धर्म में नियोजित करना चाहिए ॥७॥ सावत्सरेषु कृत्येषु विशिप्यतान समाचरेत् । अवश्य पार्थिवो राजन, तान, विशेपान, शृणुष्व मे ।।८ शरत्काते महाष्टम्या दुर्गाया परिपूजनम् । नोराजन दशम्या तु कुर्याद् वै वलवृद्धय ।। पापे मासि तृतीयाया कुर्यात् पुप्याभिपचनम् । पूजयित्वा श्रिय देवी पञ्चम्या नपतिश्चरेत् ॥१० थीयज्ञ धनधान्यस्य वृद्धये नपसत्तम । ज्यप्ठे दशहराया तु विष्णोरिष्टि तयाचरेत् ।।११ रवी हरिस्थे द्वादश्या शापूजा समाचरेत । विशिष्यतास्तु नपति कुर्याद यज्ञान बहुव्ययं ॥१२ एभि कृतयल राज्य कोपवापि विवर्धते । अमृतप्वेषु यज्ञेषु दुर्भिक्ष मरण तथा ॥१३ जायन्ते चेनय सर्वा विणिध्यतारततश्चरेत ।

मदाचार वथत ] २५७ शरतकाले महाष्टम्या दुर्गायाः पूजने विधिः ।।१४ एक सम्बत्मर मे होने वाले कृत्यों में विशेष रूप से इनरा गमाचरण करना चाहिये । हे राजन् ! राजा उन विशेषो का अवश्य ही ममाचरण करे-उनका श्रवण मुझने करलो ८॥ शरत्काल मे महा अष्टमी के दिन दुगां का परिपूजन करे । दशमी तिथि में वल की वृद्धि के लिये नीराजन करना चाहिए 10 पोप माय मे नृतीया में पुप्प का अभिषेक करे। नप पन्चमी में श्री दवी का पूजन करके चरण करे। ॥१०॥ हे नृप श्रेष! धन धान्य की वृद्धि के लिए श्री यज्ञ का समा- चरण करना चाहिए । ज्येष्ठ माम में दशहरा के दिन भगवान् विष्णु को इछि का ममा करे ॥ ११॥ द्वादशी में हरिस्य रवि के दिन में इन्द्रदेव को पूजा करनी चाहिए। गजा को इन यनों का विशेष रूप में बहुन व्यय के द्वारा करना चाहिए ॥१२॥ इनके किये जाने पर वन--राज्य--और कोष भी वृद्धि को प्राप्त होते हैं । इन यनों के न किए जाने पर देश में दुर्मिस (अबाल ) और मरण होता है ॥१३|| सब प्रकार की ईनियां होती हैं (टिड्डी आदि ईतियां हुमा करती हैं) अतएव इनसे विशेष रूप मे परना चाहिए। गत्काल में महाष्टमी तिथि मे दुर्गा के पूजन की विधि है ॥१४॥ पुरा प्रोक्तस्तु विधिना तेन कार्य तु पूजतम् । विधि नीराजनस्य त्व शृणु पार्थिवसत्तम ।।१५ कृतेन येन चाश्वाना गजानामपि वर्धनम् । आश्विने शुक्लपक्षे तु तृतीया स्वातीयोगिनी ।।१६ ऐशान्या स्वपुरस्यंव गृहणीयात् स्थानमुत्तमम् । नीरागनं ततः कुर्यान् मप्राप्ते दिवमेन्टमे ॥१७ नीराजनस्य कालस्तु पूर्वमुक्तो मया वव ! विधानमात्रं शृणु मे कृतत्यो भविष्यामि ||१% एकं हर महासत्त्व सुमनोहरमेव च।

[ कालिका पुराग
पूजयेत् सप्त दिवसान गन्धपुप्पाशुवादिभि ॥१६
तृतीयादी पजयित्वा नयेत यज्ञमण्डलम् ।
चेष्टा निरूपयस्तस्य जानीयात तु शुभशुमम् ॥२०
परराष्टावमद स्यादश्वो यदि पलायते ।
मियते राजपुत्रस्तु यदि चाधणि मुञ्चति ॥२१
यह विधि पहिल कदी गयी है उसी विधि म पूजन करना
चाहिए। हे पार्थिवा म परम थे। आप नीराजन की विधि का
श्रवण करिय । १५ । जिससे करन से अश्वा की और गजो की वृद्धि
हुआ करती है । आश्विन मास म शुक्ल पक्ष म तृतीया तिथि स्वाती
नक्षत्र की योग वाली हो ।। १६ ॥ जपन पुर की ही ऐशानी दिशा में
क्सिी उत्तम म्यान का ग्रहण करे। आठव दिन के सम्प्राप्त हो जाने
पर नीराजन करना चाम्यि । १७ । नीराजन (आरती) पावाल तो
आपको मैंने पहित ही बता दिया है । अब ता केवल मुझसे विधान
ही का श्रवण परिय। इसम आप कृतकृत्य हो जायग। १८ । हे महा
मत्व । एक अश्व जा बहुत ही मुदर होवे सात दिन तर गध पुष्प
वय आदि में उनकी पूजा करे। १६ । नृतीया के आदि म अचन करके
उम यम म ल प ले जावे । उसवी चटा का निरूपण परत हुए शुभ
और
अशुभ या नान प्राप्त करो। २०। यदि अश्व पायन करता है तो
पराये राष्ट्र या अवमद होता है। यदि यह अश्व अपने नेतो स अश्व ओ
का मोचन किया करता है ता राजा व पुष की मृयु हो आती
है । २१॥
नीयमानो न गच्छेत् तु महिपीमरण तत ।
तथंव मुखनामाक्षि शन्द पुर्याद्वया यदि ॥२२
य थाप्ठाभिमुग पुर्यात् सन् राप्ठाया जयेद्रिपून् ।
उतक्षिप्य दक्षिणाय तु पदमश्वा भवेत पुर ॥२३
तदा यहि ममस्नान नृपतिविजयेदिपून ।

सदाचार स्थन ।
प्रात/गजनं कुर्याद् तशम्यां नृपसत्तम ॥२४
तदप्राप्नो च द्वादश्या तस्यामेव समाचरेत् ।
कातिके पचदश्या वा तनाभावे तु पार्थिव ।।२५
ऐशान्यां स्वपरस्योच्चम्तमानेन पोडश ।
दशहस्तं तु विपुला कुर्याद वै तत्र तोरणम् ॥२६
द्वात्रिंशद्धस्तमात्र तु हन्तपोडशविस्तृतम् ।
यज्ञार्थं मण्डलं कुर्यान्मध्ये वेदि विनिदिशेत् ॥२७
वेद्याश्नोत्तरश्चाश्व-वेदि कुर्यादनुत्तमाम् ।
यत्र सस्थाप्य चाश्वश्च पूजितव्य पुरोहित ॥२८
ले जाया हुआ वह अश्व यदि गमन न करे तो महिपी का
मरण हो जाता है। यदि अश्व मुख-नासिका और नेत्री से शब्द
करे तो जिस दिशा की ओर मुख करके ध्वनि करता उस
दिशा मे शनुओ के आर जय प्राप्त कराता है। यदि अश्व दाहिने
पद के अग्र भाग को उक्षिप्त करके आगे होवे तो राजा सम्पूर्ण रिपुओ
पर विजय प्राप्त किया करता है । हे नृप थेठ । दशमी तिथि में प्रात.
फाल में ही नीराजन करना चाहिए । २२-~२४ । उसकी अप्राप्ति होने
पर उसी द्वादशी में समाचरण करना चाहिए। हे पार्थिव ! अथवा
वहाँ पर अभाव होने पर कार्तिक मास में पञ्चदशी में ऐशानी दिशा
में जो अपने पुर से होवे सोलह हाथो के मान से दश हाय विपुल वहाँ
पर तोरण करे ॥२४--२६ ॥ बत्तीस हाय प्रमाण से युक्त और सोलह
हाय विस्तार वाला यज्ञ के लिये मण्डल बनावे और मध्य मे वेदी का
विनिर्देश करना चाहिये । २७ । वेदी के उत्तर दिशा में बहुत श्रेष्ठ मश्व
घेदी की रचना परे । जहाँ पर सस्थापित करके पुरोहितो के द्वारा अश्व
का पूजन करना चाहिये । २८ ।
सोंदुम्बरशाखानामर्जुनस्याथवा नृप ।
मत्स्यशखास्तिश्चक र्वश्चाप्यभिभूपयेत् ॥२६
तोरण बनकरत्नस्तथा नानाविधं, फलं.।
।

३६०
। कनिका पुराण
भल्लातक शालिकुष्ठ मिद्धयर्थ संन्धदस्य तु ॥३०
कण्ठदेशे निवनीयात् पुष्टिशान्त्यर्थमेव च ।
वैष्णव मण्डल कृत्वा दिक्पालाश्च नवग्रहान् ॥३१
विश्वेदेवास्तु मन्त्रण विष्णुपुरयान् प्रपूजयेत् ।
आज्यस्तिलंश्च पुष्पंश्च मिश्रीकृत्य परोहित ॥२
रवेस्तु वरणम्यव प्रजेशस्य तथैव च ।
पुरुहूतस्य विष्णोश्च होम सप्ताहमाचरेत ॥३३
एक्स्य महल वा अप्टोत्तरणत च वा।
कुर्यात् तु प्रत्यह होम चतुर्वर्गम्य सिद्धये ॥३४
ममिधश्चापि होतव्या पालाशा खादिरास्तथा ।
औदुम्वर्यश्च काश्मर्या आश्ववत्थाश्च परोधमा ॥३५
ह नृप । मर्ज-उदुम्बर की शाणा) वा अथवा अर्जुन की
शाखा ये मत्स्य-शख में अदित चक्रो म और ध्वजो मे भूपित करना
चाहिये ।। २६।। मुवर्ण और रलो से तथा अनेव फ्लो पे द्वारा मैन्धव
की गिद्धि के लिये भव्हातर शानिएप्ठ तोरण कण्ठ देश मे पुष्टि और
शान्ति के लिये बाँधे । वैष्णव मण्डल की रचना परदे दिकपालो और
नवग्रहो पा नया विश्वेदेवाओं का और विष्णु युख्यो का पूजन करना
चारिये । पुरोहित तिलो मे मिश्रित घृन मे और पुप्पो मै रवि वा-
वाण पा -प्रजेश का-इन्द्र देव का भगवान विष्णु मा होम मात
दिन तक बरे ॥३०-३३॥ प-ए का एक महरा अयया अष्टोतर
शन जप को और चतुर्वर्ग को गिनिने लिये प्रति दिन होम बरना
पाहिये । ३१ । गमिधा भी हनन के लिये पलाश ( ढाका ) भपया
पदिर की होनी चाहिये । पुरोहित ने द्वारा रामिधाएँ उदुम्यर (गूलर)
पोहों या पामीर की होवें तथा पीपत पी होम में ग्रहण करनी
पाहिये।३५॥
मौवर्णान राजतान् यापि मातिकान वा ययेन्छया।
पुर्यात् तु लगानष्टौ फ्लानाम्वरयोगितान ।।३६

मदाचार वथन ] क्षिपेन तेषु घटेष्वेव समनहरितालकम् ! चन्दनं च कुष्ठं प्रियन, चमन शिलाम् ॥25 अञ्जन च हरिदां च श्वेता दन्ती तथैव च । भल्लातकं पूर्णकोश सहदेवी शतावरीम ॥३८ वचा मनागक्रममा सोमराजी मुगुप्तिकाम् । तुत्थ च करवीर च तुलमीदलमेव च ॥३६ एतानि निक्षिपेन्मध्ये कलशाना पुरोहितः । कानवरम् जयंजदाभि सकन वो तथा ॥४० कर्तव्ये शान्निकामेन नोगजनविधौ नृप । एवं सप्ताहपर्यन्त पूजाभिहवनम्तया ॥४१ पूर्वोक्तान पृजयित्वा तु नृपः सप्ताहमाचरेत् । यावनीगजन कर्यात् तावदाजा वमेद गृहे ।।४२ फलानाम्बर में योजित आठ लश रखो दे पानश चांदी- मुवर्ण अथवा इच्छानुसार मृत्तिका के ही होवें। उन फलशो में समङ्ग हरिताल-चन्दन-पृष्ठ-प्रिया-मैनसित-अजन- -हल्दी-दे- त दलो-भल्लातक-पूर्ण कोश-मादेवी-नावर-वच-मनगा- गुम-गोमराजो-सुमुशि पर-तुत्य-रऔर-तुलसीदस-इन सब को पुटिन रसगो के मध्य म निक्षिप्त पर देवे । है नृप । नीराजन विधि म शान्ति वी यामना में रनर-अम्बुज अथवा यन्त के पाष्ठी के द्वारा स और मव बनवाने चाहिये। इस प्रकार से एक ससा पर्यन्त पूजा करें॥३६-४१॥ इस प्रकार से पूजन कर नृप एव मप्साह तर ममाचरण करे। अवता नीराजन बरे तर तब राजाको सासरना चाहिए । गतो न यजममौ तु निसेच्छान्तिमिच्छुकः । नारोत्येत् तुरात गचं वा तत्र पार्थिवः ॥४३

[ कालिका पुराण
यावत् सप्ताहपर्यन्त यानेनान्येन वै व्रजेत् ।
भक्ष्य नाविधेश्चैव
मधुपायमयावकै ॥४४
मोदक वलि कुर्यादन्नव्यञ्जनशम्भव ।
पूर्वोक्ताना तु देवाना मप्ताह यावदुत्तमम् ॥४५
सप्तमेहिए तु रेभन्त पूजयत तोरणान्तरे।
सूर्यपुत्र महावाहु द्विभुज क्वचोज्ज्वलम् ॥४६
ज्वलन्त शुक्लवस्त्रण केशानुद्ग्रथ्य वापसा ।
कशा वामकरे विभ्रद दक्षिण तु कर पुन १४७
स खडग न्यस्य वामाया सितसंन्धवसस्थितम् ।
एवविध तु रेभन्त प्रतिमाया घटेऽपि वा ॥४८
सूर्यपूजाविधानेन पूजयेत् तोरणान्तरे ।
पूजयित्वा तु रेभन्त द्विरद तुरग तथा ।।४६
शाति की इच्छा रखने वाले नृप को रात्रि के समय मे यश
भूमि में निवास नहीं करना चाहिए। राजा उम अश्व पर अथवा हायो
पर आरोहण न करे। जब तक एक सप्ताह होवे राजा को दूसरे ही
मिमी यान के द्वारा गमन करना चाहिए। और अनेक प्रकार के अन
रेग्यजन मे सम्मून भक्ष्यो स-मधु-पापस-यावयो से अपना
मोक्षों के द्वारा वाल करे। मप्ताह तर पूर्व म पतलाय हुए देवताओं
की उत्तम बल पर ।।१३-४५ ॥ सातवें दिन म तोरण के अन्तर में
रेवन करत हुए का पूजन करना चाहिए। महा पाहुभा वाले दो-
मुगाओ मे युक्त अवम ग उभर जाग्वल्यमान सूर्य पुत्र का पूजन
परे। शुक्न वस्त्र म शो वा उद्गचित करने कशा को बायें हाथ में
लिए हाणि परवा पाप गति मित माधव पर मस्थित नामा
में म्यानरम प्रसरका प्रतिमा म अथवा पट मे तोरण
भर में गूपदवी पूजा में विधा पूजन कर । रवान भवको
भयमा गा मा पूषित मरना पाहिए ।। १३-1||

सदाचार कथन ]
१६३
अहताम्बरसत्रीत सक्वन्दनममन्वितम् ।
सुवर्णविद्धनिस्त्रिश विचित्र क्वचादिषि १५०
युक्त तु होमकुण्डस्य शान्यामश्ववेदिकाम् ।
पूर्व कृता नयेदश्वगजपालो पृथक पृथक् ।।५१
नीयमाने गजे चाश्वे पूर्वोक्त तु नितित्तकम् ।
पलाद् दीक्षेत तपति फल चैवावधारयेत् १५२
होमकुण्डस्योतरस्या वैयाघ्र चर्मणि स्थित ।
वेदविदा चाश्वविदा सहितो वोदय संन्धवम् ।।५३
नीताय तरगायाशु भक्तपिण्डी सुगन्धिनोम् ।
दद्यात् पुरोहितस्तव समन्व्य शान्तिमन्तक १५४
मक्षणाद यदि जित् सदश्नीयाद् वा हय स च ।
तदा स्यात् सवकल्याण विपरीतमतोऽन्यथा ॥५५
शाखामौदुम्बरीमानी सकुशां च पटोदके।
आप्लाव्याप्लाव्य तुरगान, गजान, भूप च सैनिकान, ६५६
रथाश्च सस्पृशन्मन्त्र शानिक पौष्ठिकस्तथा।
सेचयेत् महितविप्रेश्चतुरङ्ग पुरोहित ॥५७
महत अम्बर (वस्त्र में ) म सवीत--माला और चन्दन से
मयुत-- मुवण म विद्ध निस्निग वाला~-विचित्र--कवच आदि से युक्त--
ऐगानी दिशा म हे मकुण्ड की वदिका पर जो पूर्व में हुई है अश्व और
गज के पास पृथप-पृयर ले जावे ॥ ५०-५१॥ अश्च और गज क
ले जाया जाने पर राजा पूर्व म कथित निमित्त की यन माथ देखे और
पल का भी अवधारण करे ।। ५२ ॥ होम कुण्ड को उत्तर दिशा में
बाघम्बर चर्म पर स्थित होकर वेदी के शाता और अश्वो के ज्ञान रपन
गने में सहित ग-धद {मा) को देनर लाये हुए अश्व के लिए शीन
ही सुगन्धित पक्त (भात ) को पिण्डी देवे । पुरोहित वहाँ पर शान्ति
मन्त्रों के द्वारा अभिमन्त्रित पर ही उम देवे ।। ५३---५५॥ वह अय
-
1

। बालिका पुराण
यदि उमवा अवघ्राण बरे अथवा अशन करे तो उग अबमर पर गव
प्रवार का कल्याण होता है । और इसके विपरोन होवे को अन्यथा हुआ
करता है ॥ ५५ ॥ उदुम्बर पो माया-आन यी शाया घुशा के माथ
घट के जल म आप्तावित कर कर अश्वो मा-हाथियो वा-राजा
का और मैनिको का अथवा रथा मा स्पर्श परे । पुरोहित शान्तिर
और पौष्टिक मन्त्री के द्वारा विप्रो के महित चतुरन का मेचन करे ।
।।५६-५७ ॥
दिक्पालाना ग्रहाणा च मन्नश्च वैष्णवस्तथा ।
वहुधा चाभिपिच्याथ तत मौवर्ण दर्पणम् ।।५८
वीक्षयित्वा नृप चत्विक् ततो मन्त्रिणमेव च ।
राजपुत्र तथामात्यानन्यानपि च संनिकान. १५६
कम्पयन द्विजशार्दुल सर्वानेव तु दर्शयेत् ।
चतुरङ्गस्य स्वस्यापि कृत्वव शान्तिपौष्टिके ॥६०
मृन्मय शात्रव कृत्वा चाभिचारिकमन्न ।
हृदि शूलेन विध्वा त शिर खड्गेन छेदयेत् ॥६१
आचार्य कविका पश्चादभिमन्य हयाय वै ।
ऐन्द्रं प्राभाकरमन्नद्याद वक्त्रे स्वय पुन ॥६२
तमनेन तु मन्त्रेण समारुह्य न पस्तदा ।
गच्छेदुत्तरपूर्वा तु दिश सर्वलयुत ॥६३
दिक्पालो का और प्रहो का वैष्णव मानो के द्वारा बहुत प्रकार
से अभिषिञ्चन करके ऋत्विक सुवर्ण के दर्पण को नृप वो फिर मन्त्री
वो-गजपुत्र दो तथा अन्य मात्यो यो और सैनिको को दिखला
करके द्विज शार्दूल कम्पन करते हुए मवको ही दिखलाये। अपने भी
चतुरङ्गा शाल-पोष्टिक इस प्रकार से परे ॥५८-६० ॥ मिट्टी
से शन मे हृदय मे शूल मे वेध परे और शिर का बङ्ग से छेदन करना
पाहिए ॥ ६॥ आचार्या पीछे पिया को अभिमन्त्रित करके पिर

[ कालिका पुराण
से
-
दक्षिणा सुवर्ण-गो-तिल आदि शक्ति से दान देवे। इस प्रकार
वलो का और राजाओ का नीराजन करके इस लोक मे और मृत्युगत
होकर राजा सुस्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति किया करता है। हे अश्व !
आपका उद्भव मागर से हुआ है आप अश्वामृत मे सजात हैं। जिस
सत्त्व से इन्द्र का वहन किया करते है उसी मे मेरा वहन करें। जिस
सत्य से रेभन्त का--जिस सत्य से भास्कर का वहन करते हो उसी सत्य
में विजय प्राप्त करने के लिये मेरा वहन करो। इन भूप मन्त्रो के द्वारा
अश्व पर आरोहण का ममाचरण रिना चाहिए ॥६६-७१॥
आरुह्याने महिप्यास्तु शुद्धान्ते लम्बयेत ततः ।
महिषी च ततो भूप पर्यवोपरि सस्थितम् ।।७२
दूर्वाक्षतः ससिद्धार्थ नीभि. सह तमर्चयेत् ।
कृते तु भूमिग्रहणे तृतीयाया निराजने ॥७३
सूतक यदि जागेत तत्र दुष्यति केवलम् ।
सूतको मृतको वापि पार्थिवस्त यथा तथा ॥७४
वलनीराजन कुर्यात तन्मात्र च विशेषतः ।
मद्यः शौच भवेद्राशो व्यवहारविलोकने ।।७५
तयाधिवासने यज्ञे परराष्ट्रविमर्दमने।
अय ते कथितो राजन्नीराजन कमो मया ।
पुप्यस्नानविधान त पार्थिव शृणु साम्प्रतम् ॥७६
माहपी के आगे समारोहण करके फिर शुद्धान्त. पुर सन्वित
करे। फिर वह महिपी (पट्टाभिषिक्ता रानी ) को पराङ्ग पर सस्थित
राजा मा सिद्धार्थ के सहित दूर्वा क्षतो मे स्त्रियो के साथ अभ्यर्चन
करना चाहिये । यह मजन नृतीपा मे नीराजन में भूमि के ग्रहण करने
पर ही परे ॥७२॥७३॥ यदि मूतक उत्पन्न होते तो केवल दूषित होता
है। गूत की हो अथवा मृत को हो पार्थिव जसे-तैसे रामा वन का
मोराजन पो और विशेष रूप से उतना करे। व्यवहार के विलोपन में
राराम तुरन ही शोध हो जाता है । सपा अधिवासन में यज्ञ में और

राज्याभिषेर वर्णन ]
पर राष्ट्र के विमर्षन म भी शोच होता है। हे राजन् । यह मैन आपके
सामन नीराजन का क्रम तला दिया है । पर पुष्प के स्नान का विधान
आप मुयसे श्रवण कीजिए ॥७४-७६॥
॥राज्याभिषेक वर्णन ।।
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि पुष्यस्नानविधिक्रमम् ।
येन विज्ञानमात्रेण विघ्ना नश्यन्ति सन्ततम् ॥१
पोपे पुप्यक्षंगे चन्द्रे पुप्यस्नान न पश्चरत् ।
सौभाग्यरल्याणकर दूभिक्षमरणापहम् ॥२
विष्टवादिष्टकरणे व्यतीपात च वैधृतो ।
वचे शूले पणादी योगे तु लभ्यते ॥३
तृतीयायक्तपप्यक्ष
रविशौरिक्जेऽहनि ।
तमा समस्नदोपाणा तत स्नान हानिकारकम् ।।४
ग्रहदोपाश्च जायन्ते यदि राज्यषु चेतय ।
तदा पप्य तु नक्षत्रे र्यान्मासान्तरऽपि च ॥५
इय तु ब्रह्मणा शान्तिरुद्दिष्टा गुरवे पुरा ।
शक्रादिसवदेवाना शान्त्यर्थं च जगत् पति ॥६
तुपकेशास्थिवरमोक-कीटदेशादिवजिते
शराकृमिवप्माण्ड बहुक्प्ट विवर्जिते ७
जाने कहा-हे राजन् । अब में आपदा पुष्प-स्नान की
विधि के क्रम को बतलाऊँगा जिसके के विज्ञान में ही विघ्न निरन्तर
नाश को प्राप्त हो जाया करत हैं 11१॥ पाप माम मैं चन्द्र व पुष्प
नमा गत होने पर राजा का पप स्नान का ममाचरण करना चाहिए।
मह स्नान मौमाग्य और पत्यापर करन वाला हाता है और दुनिष्ट

[ पासिका पुराण तथा मरण व अपहरण करन वाला होता है ॥२॥ विष्टि (भद्रा) आदि दुष्ट करण म-व्यतीमात और पंधति म-बज--शूल- पण मादि म योग मे यदि इसका लाभ होता है ता तृतीया स युक्त पुप्प नक्षत्र रवि-शोरि और मङ्गल वार म तव यह ममस्त दापा की हानि करन वाला होता है ।॥३॥४॥ ग्रहदोष होत है और राज्या में इतियाँ हाती हैं तब पुष्प नक्षय मे और मामा तर म भी करना चाहिए ॥शा यह शान्ति पहले समय में ब्रह्माजी न गुरु र लिय बनाई थी और जगत्पत्ति ने शक्र आदि समस्त दवा का शातिक निय ही वहा था ।।६।। तुप केश-अस्थि-वल्मीक कीट देश आदि स वजित-शरा-मि- प्माण्ड-बहु कृष्ट से रहित ॥७॥ काकोलकश्च कईश्च काकोलध्रशोनक । वजिते कण्टकिवन विभातकविजिते । शिग्रुश्लेप्मानकान्या त जलीकाद्यविवजिते । स्वस्थाने चम्पकाशोक वक्लादिविराजते । हसकारण्डवासीर्ण सरस्तीरथवा शुचौ । पुष्यस्नानाय न पतिगृ णीयात स्थानमुत्तमम् ॥१० तत पराहितो राजा नाना वादिनि स्वने । प्रदोपसमय गच्छेत तत स्थान पूववासरे ॥११ नम्य स्थानरय कोयर्या दिशि स्थित्ना परोहित । सुगन्धचन्दनै पाने कपू राद्यधिवासित ॥१२ गोरोचनाभि सिद्धार्थंरक्षते सफलादिभि । गन्धद्वारत्यादिभि मन्त्र सर्वाधिसिक्तकं ॥१३ काक्-उप-रह-काकार-गृध-शौनया से रहित- घण्टक वाले वन म-विभीतक स वजित--शिशु पोष्मातको से रहित और जलो वा आदि से वजित-चम्पक अशोक-वन आदि से विराजिन अपने स्थान म-हस और रण्डवा ग ममाकीण म अधया राज्याभिषेक वणन ] - शुचि रार के तट पर युप्म म्नान के लिए राजा को उत्तम स्थान का ग्रहण करना चाहिए ।। ६-१०॥ इसके अनन्तर राजा और पुरोहित अनेक वाद्यो की ध्वनियों के माय प्रदीप के ममय म उस स्थान पर पूर्व दिन में गमन करें। उय स्थान की कौवेरी दिशा पुरोहित स्थित होकर सुगन्धित चन्दन-पान- पूर आदि से अधिवासित-गोरोच- नाओ से--सिद्धार्थों से--अक्षतो से जो फल आदि ने महिन होवें- " मन्ध द्वारा" इत्यादि मन्त्रो के द्वारा सबके अघिसिक्तो से उस स्थान को अधिवामित परके वहाँ पर देवगणों का पूजन करना चाहिए। ॥११-१३॥ अधिवास्य तु तत्स्थान पूजयेत् तन्न देवताः । गणेश के शव शन ब्रह्माण चापि शइरम् ॥१४ उमया सहित देव मर्वाश्च गणदेवताः । मातृश्च पूजयन तन्न नृपति. सपुरोहितः ॥१५ मगलान् फलशान कृत्वा नानानवेद्यसञ्चयान् । प्रदद्यान पायस स्वादुफल मोदकयावको ॥१६ अधिवास्य च तत् स्थान दूर्वासिद्धार्थकाक्षतः । ततस्यानाच्चापि भूतानि मारयेन्मन्मत्रमोरयन् ॥१७ अपतर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमिपालकाः । 'भूतानामविरोधेन स्नानकर्म करोम्यहम् ।।१८ ततः करी पुटोकृत्य मन्त्रणानेन पार्थिव । आवाहयेदिमान् देयान् पूज्यान पुष्याभिषेफतः ।।१६ श्रागच्छन्तु मुराः सर्वे येऽत्र पूजाभिलाषिणः । दिशो हि पालकाः सर्वे ये चान्येऽप्यंशभामिनः ।।२० ततः पुष्पाञ्जलि दत्त्वा पुनमन्त्र पठेदिमम् । अद्य तिष्ठन्तु विधाः स्थानमासाद्य मामकम् ।।२१ भगवान् गपेश-फेशव-इन्द्रदेव-ब्रह्मा-~देव शहर उमा के

३७.
{ লিঙ্গ ঢুকাল
सहित और मगस्त गण देवता और मातृगणों का पुरोहित के साथ राजा
अर्चन करे ॥ १४-१५।। मङ्गल क्सशो को स्थापित करे और अनेक
प्रकार के नैवेद्यो के समुदायो का-पायम-स्वाह फल और मोदक
तथा यावक देवे। उस स्थान को अधिवासित करके जो दूर्वा व सिद्धार्थ
और अक्षतो के द्वारा करना चाहिए। उस स्थान में भी भूतो को मन्त्र
का उच्चारण करते हुए अपसारित करना चाहिए ॥१६-१७॥ जो
भूत भूमि के पालक हैं वे यहाँ मे अपमरण कर जावें । भूतो का विरोध
न करते हुए मैं स्नान के कर्म करता हूँ ॥ १८॥ इसके अनन्तर दोनों
हाथो को पुटित करके राजा इस मन्त्र के द्वारा इन पूज्य देवो का पुष्प
के अभिषेक के लिये आवाहन करे ।।१६।। जो यहाँ पर पूजा के अभि-
लापी देव होवें वे सब सुरगण यहाँ पर आगमन करे । सब दिशाओ के
पालक होवें और जो भी अश भागी होवे वे आगमन करें। फिर पुष्पो
की अलि देकर पुन. इस मन्त्र का पाठ करे। मेरे इस स्थान को प्राप्त
करके आज यहाँ पर विबुध गण स्थित होवें ॥२०-२१।।
स्वपूजा प्राप्य पातारो दत्त्वा शान्ति महीभुजे ।
नतस्ता नृपती रात्रि नयत् तु सपुरोहित. ॥२२
स्वप्ने शुभाशुभ विद्यान्नपस्तु सपुरोहित.।
कृत्वा पूजा तु देवाना रात्री स्थाने नृप स्वपेत् ।।२३
शुभाशुभफल स्वप्ने ज्ञेय दोषज्ञसम्मते ।
दु स्वप्नदर्शन चेत् स्वात् तदा पुप्याभिपचने ।।२४
होम चतुगुण कुर्याद् दत्त्वा चापि गवा शतम् ।
गोवाजिकु जराणा तु प्रासादस्य गिरेस्तरो ।।२५
आरोहण शुभकर राज्यश्रावृद्धिकारकम् ।
दधिदेवसुवर्णाना ब्राह्मणस्य प्रदशनम् ॥२६
वीणादूर्वाक्षतफल पुष्पच्छत्रविलेपनम् ।
शाताशु चशणा पद्यस्य सुहृदस्तथा ॥२७

गग्याभिर वर्णन ] लामा क्षयरा शत्रो रत्नकारम्य भभूत दर्शन चोपरागम्य निगडेन च वन्धनम् ।।२८ मासस्य भोजन चैव पर्वतस्य विवर्ननाम् । नाभिमध्ये तरपत्तिर्मूत प्रत्यनुरोदनम् ॥२६ रक्षा करने वाले आप अपनी पूजा प्रात करपे और राजा को शान्ति प्रदान पर स्थित होवें। इसके उपरान्त गजा पुरोहित के साथ उस रात्रि को ब्यतीत कर ॥ २२ ॥ पुरोहित ये मलि राजा स्वप्न म गुभ और अशुभ का ज्ञान प्राम करे। दवो को पूना करके रात्रिम स्थान मे नृप का म्बयम वरना चाहिए ।। २३ ॥ दापी रे बाताओ द्वार सम्पत स्वप्न में शुभ-अशुभ क पर की जानना चाहिए। यदि दुरे दर्शन हो तो पुष के अभिषेचन म चौगुना हरन परता पाहिए और मौ गोओ रा दान भी देवे। पौ~घादा--हाथी- प्रासाद-पवंत-वृक्ष का आरोग शुभ करने वाला और राज्य श्री की वृद्धि का करन वाला हुआ धरता है । दधि-देव-सुवर्ष-ब्राह्मण का प्रदर्शन, ट्रा-वीपा-अक्षत-पल-पुष्प छप-- विलपन ---पीताशु (चन्द्र)-चक्र-शय का---पद्म का और सुहृद वा लाभ-रात्रि में क्षय करने वाले हैं। रनकार-भूभव और उपराम को देखना निगम के द्वारा बन्धन करन वाला होता है । मास का भोजन-पर्वत का विक्ष- तन-नाभि के मध्य म वृक्ष की उत्पत्ति और मृत पुरुष के पोछ रुदन स्वप्न अगम्यागमन कूप पड्गर्भावतीर्णता। पर्वतस्य तथा नया स्रोतसा लघन तथा ॥३० स्वपुत्रमरण चैव पार रुधिरमचयो । भोजन पायमस्यासि मनुप्यारोहण तथा ॥३१ पल्याणसुखसोभाग्य-राज्य-शत्रुक्षय तथा। एते स्वप्ना प्रकुर्वन्ति नपत्य नृपसत्तम ॥३२ ३७२ | कालिका पुराण 1 खरोष्ट्रमपिाणा च आरोहो राज्यनाशन । नत्य गीत तथा हास्य पाठश्चाप्यशुभप्रद ॥३३ रक्तवस्त्रपरिधान रक्तमालानुलेपनम् । रक्ता कृष्णा स्त्रिय चव कामयन, मृत्युमाप्नुयाम् । ३४ कूपान्तरे प्रवेश स्याद् दक्षिणाशागतिस्तथा । पड़ निमज्जन स्नान भार्यापुत्रविनाशनम् ।।३५ अगम्य स्त्री के साथ गमन-कूआ-कोच के मध्य मे उतरना-- पर्वत का-नदी का तथा स्रोत का लॉपना-अपने पुत्र का मरण- रुधिर और मदिरा का पान-पायस का भोजन तथा मनुष्य पर आगे- हण हे नृप श्रेष्ठ | ये स्वप्न राजा के कल्याण-सुख-सौभाग्य- राज्य और शत्रुओ का क्षय किया करते है ॥ ३०–३२॥ गध इंट और महिष का आरोहण राज्य के नाश करने वाला होता है । मृत्य--- गीत-हास्य और पाठ भी अशुभ के प्रदान करन वाल हैं ॥ ३३ ।। रक्त वस्त्र का परिधान--रक्तमाला और रक्त अनुलेपन-रक्त तथा पाली स्त्रा की कामना करता हुआ भी मृत्यु का प्राप्त किया करता है ।। ३४। वू अन्दर प्रवश तथा दाक्षण दिशा में गह-कीच म निमजा पा स्नान भाया और पुत्र का विनाश करन वाला होता है।॥ ३५॥ लाभस्तस्य भवेत् स्वप्नऽप्यरुत्पत्तिन पभ्य च । आदाय गभ नाडी तु सकुला यात खजनम् ॥३६ स तु राज्यान्तर प्राप्य महाकल्याणमाप्नुयान् । दीघ विशतिहस्स तु हस्तपाइविस्तृतम् ।।३७ युर्यात् तु लक्षणापत यज्ञमण्डलमुत्तमम् । सतोऽपराह्न पूर्वाह्न मातृणा पूजन चरेत् ॥३८ पुड्यलग्ना वसोधारा वृद्धिश्राद्ध तथव च । चन्दनागुरुषस्तूरोधमवपू रचूर्ण राज्याभिषेक वर्णन ] सम्पूज्य मण्डलस्थान तस्मिन् हौं शम्भवे नम । अम्त्राय है पडित्येव लिखेनगन्नद्वय बुध ॥४० उसका स्वप्न में लाभ होवे और नृप की अरुत्पत्ति हो वे गर्भ गर्भ नाडी का आदान करके कुल महित खञ्जन को जाता है ॥३६।। वह अन्य राज्य को प्रासि करके महान कल्याण को प्राप्त किया करता है। वीस हाथ दीर्घ और सोलह हाथ विस्तार मे युक्त मय लक्षणो से युक्त उतम यज्ञ मण्डल की रचना करनी चाहिये । इसके उपरन्त दूसरे दिन मे पूर्वाह्य में मातृगणो की पूजा करे ॥३७॥३८॥ भीत मे लगी हुई वमो धारा तथा वृद्धि श्राद अर्थात् नान्दी मुख नामक श्राद्ध करे । चन्दन-अगुरु-कस्तूरी प्रम कर्पर के चूर्ण मे मण्डल स्थान की भली भांति पूजा करके उमम "हों शम्भवे नमा", "अस्त्राय है फट्" इन दो मन्त्रो को वृध को लिखना चाहिए ॥३६॥४०॥ मन्त्रविन्मण्डलजश्च सूत्र कम्बलसम्भवै । कोणेय, स्वस्तिकाव्य प्रथम मण्डल लिखेत् ॥४१ चतहस्तप्रमाण तु मण्डल विलिवेत तत । हस्नत्रमाण पद्म त मण्डस्य प्रकीर्तितम् ।।४२ द्वाराणि सार्धस्तानि कणिकाकेशरोज्ज्वलम् । सित रक्त च पीत च कृष्ण हरितमेव च ।।४३ शालिचूर्णाश्च कौसुभारिद्रहदुरदभव । कुर्यात तथान्जनश्चूर्ण राजा मण्डलवृद्धये ॥४४ पद्मान्ततः समारभ्य ताल पश्चिमगामिनम् । पश्चिमद्वारमध्ये च शतहस्त विनिर्दिशेत् ॥४५ प्रत्येक द्वारमध्ये तु पद्म चैवाप्टपत्रकम् । युर्यामण्डलभागज्ञश्चर्णरेव पृयक् पृथक् ॥४६ चर्णस्तु मण्डल कृत्वा सूत्राण्युत्सारयेत् तत । उत्सायं सूत्र प्रथम मण्डल पूजयेत् तन. 1१७ | कालिका पुराण . भवनाय नम इति ततो हस्त वियोजयेत् । सव्यावलम्वहस्त त रज पात्र समाचरेत् ॥४८ मध्यमानातिकागुप्ठेरपरिप्टाद यथेच्छया । अधामुखागुली कृत्वा पातयच्च विचक्षण ॥४६ मन्त्र का ज्ञाता और मण्डल के ज्ञान रखन वाला पुरुष रम्बल से उपन्न भूतो से अथवा पोशेयों में प्रथम स्वस्तिका नामक मण्डल वा लेखन कर ॥४॥ फिर चार हाथा प्रमाण वाला मारल लिखना चाहिए। मण्डल का पद्म एक हाथ प्रमाण वाला कहा गया है ॥४२॥ डेढ हाथ के प्रमाण वाले द्वार होने चाहिये । वह पद्म कणिका के केमरों से समुज्ज्वल होवें । मफेद-लान-पीला-कृष्ण भौर हरा और शाली के चूर्ण म-कौमुम्भ से नया हरिदुद्भव हान्द्रि मे अजन रे घूर्ण में मण्डल की वृद्धि के लिय रचना करे ॥४३॥१४॥ पद्म ये अदर मे आरम्भ करके पश्चिमगामी ताल को और पश्चिम के द्वार व मध्य म मो हाथ विनिर्दिष्ट करना चाहिये ॥४५॥ द्वार के मध्य में प्रत्यय पद्म आठ पत्रो वाला होना चाहिये । मण्डल के भाग मे माता यो चूर्णो मे पृपा पृथर हो परना चाहिए ॥५६॥ चूर्णो ये दारा मण्डल मी रचना यसै फिर मूत्रो वो उत्मारित करे । मूत्र वा उत्सारण र प्रपम मण्डल का अचंन करना चाहिए । "मयनाय नम पिरहाय मे वियाजिन पर। ममावलम्ब हस्त जपान या समागरण परे ॥७॥४८॥ मध्यमा-नामिका और अ गुष्ठ मे इच्छानुसार ऊपर नीचे की आर मुख बालो अगुनियों का पर विपक्षण पुरुष पातन पर देवे ॥४ ममारेखा त पनपा दिन्छिया पुष्परजिता। अंगुष्टपर्व नैपुण्यात गमा यार्या विज्ञानता ॥५. ममतविपम म्यून विच्छिन्न पसरावतम् । पनमपित टम्यमामिया पदापन ॥५१ राज्याभिषेक वर्णन } मसक्ते कलह विद्यादुध्वं रेसे त विग्रहम् । अतिस्थूले भवेद् व्याधिनिन्य पोडाविमिथिते ॥५२ विन्दुभिर्भयमाप्नोति शत्रुपक्षान मशय । कृशाया चार्यहानि स्याच्छिनाया मरण ध्रुवम् ॥५३ वियोगो वा भवेत् तस्य इष्टद्रव्यमुनस्य वा । अरिदित्वा लिखे यस्तु मण्डल तु ययेच्छया ॥५४ सर्वदोपानवाप्नोति ये दोपा पूर्वमीरिता । सितसर्पपळया रेग्या कार्या विजानता ॥५५ विमल विजय भद्र विमान शुभद शिवम् । वर्धमान च देव च शनाक्ष कोमदायकम ।।५६ रुचिर म्वस्तिक चंव द्वादशैते तु मण्डला । यथास्थान यथायज्ञ योजनीया विचक्षण ॥५७ रखा समान बरनी चाहिए जो विच्छिन्न और पुप रजित हो । जाता पुरुष के द्वारा अगुष्ठ के पर्व की निपुणता म ममादी करनी चाहिए ॥२०॥ मात-विषम स्यूल-विच्छिन्न-इमराकृत-पर्यन अस्ति और हस्त्र कभी भी नही मिनी चाहिए ॥५१॥ रेषा यदि ममक्त हो तो उसमे क्लह जानना चाहिए और कार्य रेषा में विग्रह होता है । अत्यधिक स्थल हाने पर माधि होती है--विमिश्रित होने पर नित्य पीडा होती है। विन्दुओ स भय को प्राप्त हुआ करता है- जो कि पत्र यक्ष को और मे हुआ करता है इसमे कुछ भी मगर नहीं है । शा मे जयं भी हानि होती हैं और रेखा हिन्ना हो तो उमम निश्चय ही मरण हुमा करता है । ५२ ॥ ५३॥ अपवा अमीष्ट द्रव्य या मुत का वियोग उसका होता है। जो भी कोई न जानरर ही इन्ठा के हो अनुगार मण्डल का सेवन करे तो वह सभी दोषों को प्राप्त किया करता है जो भी दोप पूर्व में बनाये गये हैं। गान रखने वाले पुरुष के द्वारा सफेद सरसो और दूर्वा मे रेषा करनी पाहिये ॥१४॥५॥ मान बारह होने में उनके ताम-कम- ३७६ | कालिका पुराण विजय-भद्र-विमान- शुभद-शिव-वर्धमान । देव-शताक्ष- कामदायक–चिक- स्वस्तिक- य ही धार मडल हैं। विचक्षगा मैं द्वारा स्थान और यज्ञ के अनुसार ही योजित करने चाहिये ॥५६॥५७१ मागरे मध्यमाने तु पोयूपार्थ सुरोत्वरं । पीयूषधारणार्थाय निर्मिता विश्वकमण, ॥५८ कला कला तु देवानामसित्वा ते पृथक पृथक । यत कृतास्तु कलसास्ततस्ते परिकीर्तिता ॥५६ नवव कलसा प्रोक्ता नामतस्तान्निबोधत । गोह्योपगोह्यो मरुतो मयूखश्च तथापर ॥६० मनोहाचार्यभद्रश्च विजयस्तनु दूपक । इन्द्रियघ्नोऽथ विजयो नवम परिकोर्तित ॥६१ तेषामेव दमाद भूप नव नामानि यानि त । शृणु तान्यपराण्येव शान्तिदानि सदैव हि ॥६२ क्षितीन्द्र प्रथम प्रोक्तो द्वितीयो जनसम्भव । पवनाग्नी तनो द्वे तु यजमानस्तत पर ॥६३ कोषसम्भवनाभ्या तु पष्ठ स परिकीर्तित । सोमस्तु सप्तम प्रोक्न आदित्यस्तु तथाष्टम ॥६४ सुरो के ममूहो के द्वारा अमृत के लिय मागर के मन्थन किय जान पर पीयूप के धारण के लिये विश्व कर्मा के द्वारा निर्मित किय गय पे ॥५८॥ क्याकि देवो की क्ला-कला पृथक-पृथक् आसन करके में दिये गये हैं इसी से व कलम नाम स कीर्तित हुए है ॥५६॥ कलम नो ही बताये गये हैं । अव उनको नाम से समझ लो। गोह्योयगोर-- मरुत-मयूख-मनोहाचाय भद्र--विजय-तनुदूपर-इन्द्रियान- विनय ये नो रहे गये हैं ॥६॥६१॥ हे भूप । उनके ही जो दसरे नो नाम है उनरा श्रवण करो जो सदा ही शान्ति में प्रदान करन वाल है । दो ॥१२॥ प्रथम मितीन्द्र रहा गया है दूसरा जन सम्भव होता है ।

राज्याभिषेक वर्णन ] ३७७ दो पवन और अग्नि है--फिर यजमान है। कोष सम्भव नाभि मे छटवा कहा गया है । मोम सातवां कहा गया है और आदित्य आठवाँ है ॥६३॥६४॥ विजयो नाम वलसो योऽसौ नवम उच्यते । स तु पचमुख प्रोक्तो महादेवस्वरूपवृक् ॥६५ घटस्य पञ्चवक्त्रेषु पञ्चवक्त्र स्वय तथा । यथाकाष्ठा स्थित मम्यगवामदेवादिनामत ॥६६ मण्डलस्य त पद्मान्त पञ्चवक्त्र घट न्यसेत् । क्षितीन्द्र पूर्वतो न्यस्य पश्चिमे जलगम्भवम् ॥६७ वायव्ये वायव न्यस्य आग्नेये ह्यग्निसम्भवम् । नत्ये यजमान तु रोशान्या कोपमम्भवम् ॥६८ सोममुत्तरतो योज्य मार दक्षिणतो न्यमेन् । न्यम्यव क्लसाश्चय तेषु तान् विचिन्तयेत् ॥५६ कलसाना मुखे ब्रह्मा ग्रोवाया शङ्कर स्थित । मूले तु सस्थितो विष्णुमध्ये मातृगणा स्थिन ॥७० [ कालिका पुराण । ब्रह्मा है और उनकी ग्रीवा में शहर स्थित रहते हैं । भूत म भगवान विष्णु मस्थित हैं और मध्य में मातृगण विराजमान है ।।७।। दिक्पाला देवता सर्वा वेष्टयन्ति दिशा दश । कुक्षौ तु सागरा मप्न मप्तद्वीपाश्च सस्थिता ॥७१ नत्राणि ग्रहा सर्वे तथैव कुलपर्वता । गङ्गाद्या मरित सर्वा वेदाश्चत्वार एव च ॥७२ कलसे सस्थिता सर्वे तेषु तानि विचिन्तयेत् । रत्नानि सर्ववीजानि पुष्पाणि च फलानि च ॥७३ वचमौक्तिकवैदूर्यमहापदगेन्द्रस्फाटिक सर्वधाममय विल्व नागरोदुम्वर तथा ।।७४ बीजपूरकजम्बीरकाश्मीराघ्रातदाडिमम् यव शालिं च नीवार गोम सितमपपम ७५ कु कुमागुरुक' रमदन रोचन तथा। चन्दन च तथा मासीमेला कुष्ठ तथव च ॥७६ कस्तूरीपनच ण च जलनिर्यासकाम्बुदम् । शैलेय बदर जातोपत्रपुष्पे तथैव च ॥७७ दिवपाल सब देवता दशो दिशाओ को वेष्टित किया करते हैं । कुक्षि मे सात सागर हैं और मात द्वीप संस्थित हैं ॥७१॥ नक्षत्र-समस्त ग्रह तया कुन पर्वत गङ्गा आदि मव नदियो-चारो वेद कलस में मे ममी विर जमान रहते हैं उसमे उनका चिन्तन करना चाहिए । रत्न-- सबंधीज-पुष्प-फल-वज़ मोतिक-वैदूर्य-महापद्म- से युक्त सर्व घाम मय विञ्च-नागररोहुम्वर-वीज पूरक-जम्बीर- माश्मीर आम्रात-दादिम-यश-शानी-नीवार-गोधूम-मित मर्पय ॥७२-७५।। कु कुम-अगुर--कपूर-मदन-रोचन---चन्दन-- मामी-एला-कृष्ट-वस्तूरी पत्र वर्ण-जल तिर्मास नाम्बुद--शैलेप-- परर--जातीपत्र--पुष्प ॥७ म- इन्द्र--- फाटिक राज्याभिषेक वर्णन ] कालशाक तथा पृका देवीपर्णकमेव च । वचा धात्री समजिष्ठा तुरुष्क मङ्गलाष्टकम् ॥७८ दुर्वां मोहनिका भद्रा शतमली शतावरीम् । वर्णाना सरला क्षुद्रा सहदेवी गजाह्वयाम् ॥७६ पूर्णकोपा सिता पोठा गुजा शिरसिकानलौ । ध्यामक गजदन्त च शनपुण पुनर्नवाम ।।८० ब्राह्मी देवी शिवा रुद्रां सर्वसन्धानिका तथा । समाहृत्य शुभानेतान कलसेपु निधापर्यन् १८१ कलसम्य यथादेश विधि शम्भु गदाधरम् । यथाक्रम पूजयित्वा शम्भु मुख्यतया यजेत् ॥८२ प्रासादेन तु मन्त्रेण शम्भुतन्त्रेण शङ्करम् । प्रथम पजयेन्मध्ये नाना नैवेद्यवेदनः ॥८३ दिक्पालाना घटेप्वेव दिक्पालानपि पूजयेत् । पूर्व वहि. स्थापितेषु ग्रहाणा क्लसेषु च ॥८४ कान मार-मृदा-दकी पाक-वचा-घात्री मनिष्ठा-नुरुष-मङ्गला- प्टप-दूर्वा-मोहनिका-भद्रा-शनमूली-शतावरी वों को सरला-क्षद्रा-सह दवो-गजामा-पूर्ण वोरा-सिपा-पीडा-गु जा-शिर मा मनल-धामर- गजदल शन पुष्प-पुनर्नवा बाह्मो-देवो शिवा-ग्दा-सर्वसन्धानि का-इन सब का ममाहरण वरचे क्लमों में निधापित करना चाहिये ॥७९.८१।। बनम ने देश के अनुमार-ब्रह्मा-शम्भु-गदाघर का क्रम के अनुसार पूजन रखे मुख्यता में भगवान गम्भु का यजन करना चाहिए ।।२।। प्रासाद मन्त्र द्वारा शम्भु था और तन्त्र के द्वारा शङ्कर का प्रथम मध्य में जना प्रभार के नैवेद्यो से निवेदन द्वारा पूजन करना चाहिए ॥८६॥ दिवपाला रे पटों में ही दिक्पालों का अचंन करे। पूर्व में दाहिर स्पा. पिन मनमों में रहा का पूजन करना चाहिए । नवग्रहान् पजयेन न मातृपिटेप ।

[ कालिका पुराण सर्वे देवा घटे पूज्या घटाम्तेपा पृथक् पृथक् ।।८५ नवैव तत्र पर्वोक्ता स्मृता मुख्यतया नृप । भक्ष्यभॊज्यश्च पेयश्च पुप्पैनीनाविधं फलं ॥ यावकै पायसंश्चैव यथासम्भवयोजित । पुष्यस्नानाय नृपति पूजयेत सक्लान् मुरान् ।।८७ दक्षिणे मण्डलम्याथ कुण्ड निर्माय पायस।। समिदभि अलिसिद्धार्थंघृतंर्दू क्षितम्नथा ।।८८ केवलैश्च तथैवाज्य पजितान मकलान् मुरान् । होमेन तोषयेद् वृद्धयं नप सात्विक्परोहित II होमान्ते मण्डलोदीच्या वेदिकाया सपट्टकम् । रोचनाख्यमलकारास्तथा सर्वान नियोजयेत् ॥६० वृद्धावगुलमगुल्या पड्विंशागलिकावधि । वृत्त वा चतुरस्त्र वा पद्म त्रिकोणसशकम् ।।६१ नवग्रहो का और मातृपरो मे मातृकाओ का पूजन करना करना चाहिए । सभी देवो का घट में यजन करना चाहिए। उनके भर पृथक-पृथक होते हैं ॥८५शा हे नृप । पूर्व मे नौ ही कहे गये है जो मुख्य तथा वर्णित हैं । भक्ष्य-भोज्य-पैय-अनेक भौति के पुपि और फल- पात्रक-पायस जो भी सम्भव योजित हो। उनके द्वारा राजा साल सुरो का पुष्य स्नान के लिए पूजन करे ॥८६॥८॥ मडल के दक्षिण मे मुन्द का निर्माग करके पायस-समिधा शाली मिद्धार्थ-दूर्वा- केवल घृत मे पूजित मक्ल गुरो को ऋविर पुरोहित के सहित नृप वृद्धि के लिए होम के द्वारा सन्तुष्ट करे । होमके अन्त मे महल ने उत्तर मे वेदिका में पदक के सहत-रोचना नामक तथा भलद्वारी को सबको नियोजित करे ॥६॥ वृद्धि में अगुलि मे अगुल छन्वीस भगुलिका की अवधि पन्त वृत्त अथवा धौकोर वियोण सशा बासा गरम को In -अक्षत तपा

राज्याभिषेक वर्गन ]
३१
रत्लेशा पड्मध्ये तु गोमुष्टिकविनायकं ।
श्रीश्रीदृक्षवरारोहामुमादेवी शुभान्विताम् ॥६२
रलं सर्वेग्लङ्कार पट्ट कार्य द्विहस्तकम् ।
हस्तविस्तारमुच्छाय नवहस्त दशागुलम् ॥६३
स्नानाचं साधहस्त च पट्ट वृत्त गुणान्वितम् ।
शय्या चतुर्गणा दीर्घा धनुर्मान तु पीठकम् ॥६४
गजसिंहनाटोप हेमरत्नविभूपितम् ।
सिंहास्य साधविस्ताराद् दण्डासनमथापि वा १५
व्याघ्रचित्रकपट्टा उपधानानि कारयत् ।
अन्यवां निामता चममृदुतूलवपरिता ॥६६
शय्या दीर्थाविस्तीर्णा चतहस्ता सुलक्षणा।
वितस्त्यधिकमिच्छन्ति नृपस्या गविद्यया ।।६७
अपचन्द्रसम क्योदासन चतरम्नकम् ।
उपधानानि शय्याया कणादिमूलभेदत ६
पद्म क मध्य म गाष्टिक विनायक। स रत्नशो को-श्री श्री
वृक्षर वराराहा--भुभान्वित उमा दवी का सब रत्नों स और बलद्वारों
सदा हाथ का यह बनाना चाहिय । वह एक हाथ विस्तार वाला और
नी
हाय र अगुल वाला ऊँचा स्नान के लिय हेढ हाथ का वृत्त तथा
गुणा ग आग्वत यह करे। शय्या चौगुनी दीर्घ बनाये और धनुष के
मान वाला पीट कर ॥६२-६॥ गज और सिंह व द्वारा किये हुए
आरोप वाला और हम तथा रत्नो स विभापत सिंह नामक साधं दिरतार
से दण्डामन को अथवा व्याघ्र चित्रपदा के द्वारा उपधानों को करावे।
अपवा अन्यो के द्वारा निर्मित चमं मृदु तूल म पूरिन चार हाथ वाली
परिमाण म सुन्दर लक्षण से मुक्त दोधाय विस्तार से युक्त शय्या गुरु
विद्या मे नप को विस्ति स अघिन की इच्छा परत हैं । आधे चन्द्र के
समान चतुरस आसन करना चाहिए । गम्या के उपधान वर्णादि मूल
भेद सेयर ॥५-६॥

३८२ [ कालिका पुराण पोडशवात्र कार्याणि वर्णचित्रयुतानि च । यान सिंहासन पट्ट शय्योपकरणादिकम् ॥६६ राज्ञो नूतनयोग्य नद् वैद्या उत्तरतो न्यसेत् । तेषा त पश्चिमे स्वर्णरत्नौघखचिते बरे ।।१०० पर्य यज्ञदावोधनिर्मिते महदास्तरे। अच्छादनसयुक्ते चर्मावतचाटये ।।१०१ वृषभस्य तथोर्णाया सिंहशार्दूलयोरपि । पादपीठे रत्नयुते पादावारोप्य पार्थिवः ।।१०२ तस्मिन् पर्यङ्कपीठस्थे चमखड्गचतुष्टये । नानालगारभूपाढय न पति रत्नशालिनम् ॥१०३ स्नापर्यद् ब्राह्मण साधं राजन सुखसङ्गतम् । सीतकम्बल कृष्ण वहुवस्त्रैश्च शोभितम् ॥१०४ पलसंबंलिपुप्पाचं शालिचर्णेश्च स्नापयेत् । अप्टो पोडश विशाष्टशतमधिक च वा ॥१०५ घेवल सोलह ही वर्ण और चित्र से युक्त बरने चाहिए। यनि- गिहासन-पट्ट शय्या के उपकरण आदि राजा के नूतन योग्य हो वह वेदी के उत्तर पो और न्यस्त परे । उनके पश्चिम में सब प्रकार के रत्नो से के समुदाय से स्वतिर श्रेप्ट पपंड पर जो यज्ञ मे पाठ समूह निर्मित~-महान आस्तरण वाले-अपच्छादन मे सयुत हो तथा पारा पाव चतुष्टय पान-यूपम ये सपा मिह गाईलो ऊर्ण म बात- रस्नो मन्वित पाद पीट पर राजा अपन परणो यो समारोपित पर उप पांर पीठ पर स्थित पर्म पङ्ग पतुष्टप म रनो से शोभित भनेर प्रमाणे ग पुवा नृपति वा स्नपन परावे । बाह्माणी रे साथ गङ्गत राजाबो जी सम्बत काम्पस वाला कृष्ण और बहुत स बस्त्री रोगामित हा उसोपसयों द्वारा वलि पुष्पादिस और गालि मृगों में स्नान कराये। बार-सर-वीस सौ मार अपया पाएममो की सभा बनायी गयी है Ht-१.५॥ स ।

गग्म भिपन वणन ]
कलसाना समाख्याता अधिक्स्योत्तरोत्तरम ।
जयकल्याणदैमर्मङ्गलोत्यैश्च शाम्भवं ॥१०६
वैष्णवस्थ दिक्पालग्रहम वंश्च मातृकं ।
आज्य तेज समुहिप्टमाज्य पापहर परम् ।।१०७
आज्य सुराणामाहार आज्ये लोका प्रतिष्ठिना ।
भौतान्तरिक्ष दिव्य वा यत् ते क्ल्ममपमागतम् ॥१०८
सर्व तदाज्यसस्पर्शात् प्रणाशनुपगच्छन ।
ततोऽपनीयगानान् त कम्वल वस्त्रमेव च ॥१०६
क्लस म्नापयेद् भूप पप्पस्नानीयपूरितै ।
एभिमन्यनरश्रेष्ठ तनुतत्त्वार्थसाधक ॥११०
सुरास्त्वामभिषिञ्चन्त ये च सिद्धा परातना ।
ब्रह्मा विष्णश्च रुद्राश्च साध्ताश्च समरदगणा ॥१११
आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनी यो भिपग्वरी।
अदितिर्देवमाता च स्वाहा लक्ष्मी सरस्वतः ॥११२
उक्त मस्या म उत्तरात्तर अधिक भा होती है। जय और
कल्याण प्रद म त्रा व द्वारा मङ्गलात्यो स शाम्भवा म-वैष्णवो स-दिक्-
पाला स ग्रह मात्रा से और मातृका से आज्य को तज समुद्दष्ट दिया है।
आग्य पापा क हरण कर न वाला है । याज्य ही सुरगणा का आहार
और आज्य म ला प्रतिष्ठित है। भूमिगत-अन्तरिक्षस्य- अथया
दिध्य बर्याद दिवला गत जा भा आपका वल्मप आ गया है वह
सप याज्य व सस्पश स विनाश का प्राप्त हावें। इसक अनन्तर
शरीर स पम्पल और वस्त्र का अलग करक पप्पा और स्नानीयो म
पूरित क्लसो क द्वारा भूप का स्नान कराव । ह नरप्ट । शरीर
तत्वाथ साधन इन मन्त्रा स राजा का स्नान कराव जो निम्न स्थल
म बनाय जा रह है-मुरगण बापका आभपिञ्चन कर और जा सिद
एव पुरातन ह-ब्रह्मा, विष्णू-र-साध्य महदमण-आदित्य-वसुगण.

[ कालिका पुराण रुद्र-भिपरवर दोनो अश्विनी कुमार--देवमाता अदिति--स्वाहा-लक्ष्मी-- सरस्वती ॥१०६-११२।। कीर्तिर्लक्ष्मी ति श्रीश्च सिनीवाला कुहूस्तथा । दितिश्च सुरसा चव विनता कद्रूरेव च ॥११३ देवपन्नश्च या. प्रोक्ता देवमातर एव च । सर्वास्त्वामपिञ्चन्तु सिद्धाश्चाप्सरसा गणा ॥११४ नक्षत्राणि मुहर्ताश्चा पक्षाहोरात्रसन्धय । सवत्सरा निमेपाश्च काला. काप्ठा क्षणा लवा. ॥११५ सवें त्वामभिषिञ्चन्त कालस्यावयवस्तथा। वैमानिका सुरगणा मनव सागर. सह ।।११६ सरितश्च महानागा नागाः किंपुरुपास्तथा। वखानसा महाभागा द्विजा गैहायसाश्च ये ॥११७ मतपय सदाराश्च ध्रवस्थानानि यानि तु । मरीचिरोन पुलह पुलस्त्यः क्रतुरङ्गिराः ॥११८ भृगु सनत्कुमारश्य सनवश्य सनन्दन. । सनातनव दक्षश्व जंगीपव्योऽभिनन्दन.॥११६ पीति लक्ष्मी-ति-यो-सिनो पाली-मुहूदिति-- मुम्मा-विनता- -सा देव पत्नियां ही गयी है घे और देव माता-सिट और अमराओ के गण गद आपका अभिषिञ्चन परें ॥११३-११॥ नक्षत्र -मुहूत-पा-अहोरात्र- सन्धि --एम्पायर-निमेष-जला-ठा---सप य वासरे गय अवयव आपला मामपिश्चन परे । वैमानिए-अर्थात विमानो पर मम्पिन रहने पनि गुरो व गमुदाय-गागरों गति मनुगण- गरिमाएँ-महानाग-नाग-रिपुरप--वैपानस-महाभाग और कायम है-अपनी दारावीर साप सप्तपि गण-ओ पान वाले है-मराषि-त्रि--पाइपलाप -जिरा- राज्याभिषेप वपन ] ३५१ मगु-सनत्कुमार-सनक-मनन्दन-दक्ष-योगग्य भिनन्दन।११५ ११६।११७१११८१॥१६॥ एकतश्च द्वितश्चव वितो जावालिकाश्यपो। दुर्वासा दुविनीश्च कण्व पात्यातयनस्तथा ॥१२० मार्कण्डेयो दीघतमा शुन शेफो विदूरथ । और्व मवतंकश्चंव च्यवनोऽनि पराशर ॥१२१ द्वैपायनो यवनीतो देवरात सहात्मज । एते चान्ये च बहवो वेदवतपरायणा ॥१२२ सशिप्यास्तेऽभिषिञ्चन्तु सदाराश्च तपाधना । पर्वतास्तरवो नद्य पुण्यान्यायततनानि च ॥१२३ प्रजापति क्षितिश्चय गावो विश्वस्य मातर । वाहनानि च दिव्यानि सर्व लायाश्चराचरा ॥१२४ अग्नय पितरस्तारा जोमूता दिशा जलम् । एते चान्ये च बहव पुण्यसकीर्तना शुभा ॥१२५ तौयंस्त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वोत्पातनिवर्ण । इत्यव शुभदैरेतदिभ्यमन्त्रस्तथापरं ॥१२६ एक-दा और तीन-जावानिव श्यप-दुवामा--दुविनीत- कण्व-वास्यायन--माण्डेयदाघतमा---गुन गक- विदूरप-श्रीब्ब-- सवतर-यवन-अप्रि--परामर- पायन-यब कोत-देवरात-- सहात्मज-य और अयजा भी वर व्रत म पगयण हैं व अपन शिष्या के सहित और अपनी दारामार साथ तप ही धन वाल आपका अभिषिञ्चन करे । पवत-वृक्ष- नदियाँ योर परम पुण्य मायतन । प्रजापति-क्षिति-गौय-विश्व की मातायें-दिव्य वाहन-~सय लोर पर और अपर-अग्निया-पितर-तारा-जो भूत-आकाश-- दिशायें-जल-य और अन्य बहुत म पुण्य समीत्तन वाल तथा शुभ मय उसाती क नियहण परन धान जला के द्वारा यापका अभिषिञ्चन

[ कालिका पुराण
करे । इस प्रकार से इन शुभ प्रदाता दिव्य मन्त्री के द्वारा तथा दूसरो
के द्वाग अभिपेक करे ।।१२०-१२६॥
सोरेन राणं रौद्ब्रह्मशकसमुद्भवै ।
अपोहिष्ठा हिरण्येति सम्भवेति सुरेति च ।।१२७
मानस्तोकेति मन्त्रण गन्धद्वारेत्यनेन च ।
मर्वमगलमागल्ये श्रीश्च ते ग्रहयोगिभि. ॥१२८
इत्येव स्नानमासाद्य गात्रमावृत्य कम्वले ।
सर्वमगलमन्त्रेण वस्त्र कासिक ध्रियात् ।।१२६
आचम्य च ततो देवान् गुरु विप्राश्च पूजयेत् ।
ध्वजच्छन्न चामर च घण्टा चाश्वान् गजास्तथा ॥१३०
मन्त्र जप्त्वा धारयेत् तु ततो गच्छेधुताशनम् ।
तत्र गत्वा वहिनमध्ये वह्नः श्रीर्वीक्ष्य पार्थिवः ॥१३१
निमित्तान्यनिमित्तानि लक्षयेत् तत्र विन्दुभिः ।
देवज्ञवाञ्चुक्यमात्यवन्दिपौरजनंत ॥१३२
वादिप्रघोपंस्तुमलंस्तथा तौर्यविकं शुभैः ।
कृत्वा शेपे पुन. शान्तिमाशीर्वाच्य च वं द्विजान् ।।१३३
पूर्णां विधाय विधिवद दक्षिणा कनकान्विताम् ।
धान्यानि चाय वासामि दत्त्वा पुर्याद विसर्जनम् ।।१३४

राज्याभिषेक बपन ।
३९७
विप्रमणा का अभ्यचन करना चाहिए। फिर ध्वज~-चामा-
घाटा--अश्व-यज का मन्त्र का जप करके धारण कर और इसके
अनन्तर हुताशन क ममीप गमन करना चाहिए। वहां पर जा कर राजा
हित र मध्यम वहिन की थी का निरीक्षण कर।१३० -१३११ वहाँ पर
विदुआ के द्वारा निमित्ता कर और अनिमित्ता को लक्षित करना चाहिए
देवन (ज्यातिविद् ) कञ्चुकि -~-अमात्य-बन्दीजन-पुखासौजन में
आवृत्त होत हुए तुमुल वाद्या का ध्वनियास तथा शुभ तोयत्रिका र माथ
युक्त होकर शप म पुन भाति पर और आमी चित कर दिजा का
विधिपूर्वक मुवपम युक्तपूण दक्षिणा दव तथा धान्य और वस्त्र दकर उन
सबका विदा कर ॥१३२-१३४॥
तत शपजल मानमात्यादीन पुराह्नि ।
सेचयेच्चतुरङ्ग च वल चापि सराष्ट्रकम् ॥१३५
एव कृत्वा नप पश्चात् निरान सयता भवत् ।
मासमथुनहीनश्च कुयान्माङ्गल्यमवनम् ॥१३६
पुष्यनक्षवयक्ता तु तृतीया यदि लभ्यत ।
तस्या पूज्या मदा दवा चण्डिका शकरण ह ॥१३७
पञ्चालिकाविहाराध शिशूना कौतुकंस्तथा ।
बवाहिकन विधिना माहयेच्चण्डिका शिवाम् ॥१३८
चतुप्पथेषु मर्वेषु दवदवीगृहप च ।
पताकाभिरका कुर्यादव कुवन्न सीदति ॥१३६
एव कृत्वा शान्नियाग तथा पुप्याभिपचनम् ।
चतुरङ्ग सम राजा भायाभिस्तु नर सह ।।१४०
राज्यमण्डलसयुक्त परमेह न सीदति ।
नात परतरा यज्ञानात परतरोत्सव ॥१४१
दमर अनन्तर पुराहत मप जल म समस्त अमात्यादिका
मवन पर। तपा तुरङ्ग का-वल का-रादा मन परना

३८८ [ कातिका पुराण चाहिय । इस प्रकार से करके पीछे राजा तीन रात्रि पर्यन्त पूर्ण तया सयम से युक्त होकर रहे । मौस का अशन- -मैथुन से रहित रहे और मागल्यो का सेवन करे।।१३।।१३६।। यदि पुष्प नक्षत्र से युक्न तृतीया तिथि का लाभ होता है उममे सदा शङ्करके साथ चण्डिका देवीका अर्चन करना चाहिए।१३७। पान्चायिको विहार आदिके द्वारा तथा शिशुओ के कौतुको से-वैवाहिक विधि से शिवा चण्डिका का मोहन करना चाहिए ॥१३८।। समस्त चतुष्मथो (चौराहो) मे और देवो तथा देवियो के मन्दिरो मे पताकाओ को लगाकर उन्ह भूपित करे और ऐसा करता हुआ कभी भी दुख नहीं पाया करता है ॥१६॥ इस रीति से शान्ति यणा को सुसम्पन्न करके तथा पुष्प का अभिपेवन करके पतुरङ्गो के माप-भार्याओ और नरो के साथ राज्य ण्डल में समन्वित यहाँ पर और परला में कभी भी दुखित नही हुआ करता है और न इसस बडा और थे। काई भी यज्ञ हाना है और न इससे उत्तम कोई उत्सव ही हुआ करता है ॥१४०।१४१॥ नात परतरा शान्ति त. परतर शिवम् । अनेनव विधानन नृपतेरभिपेचनम् ।।१४२ युवराज्याभिषक च दुर्याद्राजपुरोहित । नपाभिपकरणमादौ यदि समाचरेत् ।।१४३ अनेनं विधानेन स्थिर स्यान्नुपतिस्तदा । अयं यज्ञ समुरिष्ट शकायं ब्रह्मणा पुरा । एव यश नप. पत्वा परत्रह न सोदति ॥१४४ इसम मारपाई भी शान्ति नहीं है और इससे अधिक कोई पस्याण एक मजर नहीं होता है। इस हो विधान से नृप का अभि- पेपन होता है । और रामपुरोहित को चाहिए कि इगो विधान में युध राम का अभिषापरे । यदि भादिपरा अभिपस रा रामापरण पाना हरामी को विधान में ए मा रिपर होता है। प्राचीनतम

शक वनो नव दर्शन ]
३२६
में ब्रह्माजी ने इद्रदेव मे यही यन इन्द्र के लिये हो रहा था । इमी
भांनि राजा इस यन को करके यहाँ पर और परलोर में कभी भी टच
नहीं पाया करता है ।।१४२-१४४॥
॥शक्र ध्वजोत्सव वर्णन ॥
अथात शृणु राजेन्द्र शमोत्यान ध्वजोत्मवम् ।
यत कत्वा नृपतिर्याति न कदाचित पराभवम् ।।१
रवी हरिस्थे द्वादश्या श्रवणेन विडोजसम् ।
आराधयेन्नृप मम्यक मर्वविघ्नोपशान्तये ॥२
गजोपरिचरो नाम यमुनामापरन्तु य ।
नृपस्तेनायमतुलो यज्ञ प्रावर्तित पुरा ॥३
प्रावृटकाले च नभमि द्वादश्याममितेतरे ।
पुरोहितो बहुविधिस्तूर्य समन्वित ॥४
प्रथम शक्कत्व वृक्षमामन्य वर्धयेत् ।
मवत्सरो वारिश्च कृतमङ्गलकोतु ॥५
उद्याने देवतागारे प्रमशाने मार्गमध्यत ।
ये जातास्तरवस्तास्तु वर्जयेद वासवध्वजे ॥६
बहुवल्लोयुन सुप्त वकण्टक्सयुतम् ।
चुन्न वृक्षादनीयुक्त लताच्छन्न्तर त्यजेत् ।।७
मौव्वं ने कहा-इम अन तर हे राजेन्द्र | अतएव आप को-
स्थान ध्वजोत्सव का यदा पीजिए जिमको सम्पादित करके राजा रिमी
ममर में भी पराभव की प्राप्ति नहीं रिया पता है ॥१॥ हरिस्य रवि.
बार में दिन में श्रवण स युक्त द्वादशी तिपि में राजा को इन्द्रदव का
समाराधन करना पाहिए । इमको भली भांनि भरने से मर प्रसार में

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| कालिका पुराण
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विघ्नो की उपशान्ति हुआ करती है ॥२॥ राजी परिचर भाम वाला
जिमका वसुनाम दूसरा है । नृप इसे परे। यह पहिले ममय मे अतुल
यज्ञ प्रवृत्त हुआ था ॥३॥ नभ मास मे वर्षा ऋतु मे द्वादशी तिथि म
शुक्ल पक्ष मे पुरोहित बहत प्रकार के वाद्यो और तूयों से ममन्वित
होवे ॥४॥ सबसे प्रथम इन्द्र के केतु के लिये वृक्ष का आमन्त्रित करके
उसको वर्धित करना चाहिए। सम्वत्मर और वाधकि मङ्गल कौतुक
किया हुआ होवे। उद्यान म-देवता के आगार म-श्मशान मे और
मार्ग के मध्य में जो भी तरुवर समुत्पन्न होवे उनका वासव ध्वज म
वर्जन कर देना चाहिए ॥५॥६॥ जो वहन वल्लियो मे सयत होवे-
शुष्क हो-बहुत से कांटो मे समन्वित हो--कुब्ज अर्थात् टेडा हो वृक्षा
दनीय युक्त हो तथा लताओ से छन्न तर हा उसका परित्याग कर देना
चाहिए ॥1
पक्षिवाससमाकीर्ण कोटरेवहुभिर्युतम् ।
पवनानलविध्वस्त तर यत्नेन वर्जयेत् ।।
नारीसज्ञाश्च ये वक्षा अनिलम्वा अतिक्शा ।
तान सदा वर्जयेद धीर सवंदा शकपूनने ॥
अर्जुनोप्यश्वकणश्च प्रियकोपक एव च ।
औदुम्वरश्च पचैते वैत्वथे हत्तमा स्मृता ।।१०
अन्ये च देवदार्वाद्या शालाद्यास्तरवस्तथा ।
प्रास्ताम्तु परिग्राह्या नाप्रशस्ता कदाचन ॥११
धृत्वा वृक्ष ततो रात्री स्पृष्टा मन्यामिम पठेन ।
यानि वृक्षेषु भूतानि तेन्य स्वम्ति नमोऽस्तु व ॥१२
उपहार गृहीत्वेम क्रियता वामवध्वजम् ।
पार्थिवस्त्या वरयते म्पस्ति तेऽस्तु नगोत्तम ॥१३
ध्वगायें देवराजम्य पृजेय प्रतिगृह्यताम् ।
सतोपरेहिल तं छित्त्वा मूलमप्टागुरा पुन !।१४

प जोन्मव वर्णन ] जो वृक्ष पक्षियों के निवान में ममापं हो अर्थात् जिस पर बहुत में पक्षियों के घोसले हो-जो बहुत मे कोटरो ने मन्दिन होवें--जो वायु और अग्नि में विश्वस्त हो गया हो ऐने तरु का यल- पूर्वक वर्जिन कर देवे। जिन वृक्षो का नाम नागे वाला हो-जो अत्यन्त छोटा हो---जो बहुत ही कृग होवे-मे इन सभी वृक्षों का धीर पुस्प इन्द्र के पूजन में सदा ही वर्णन कर देव । ६। बर्जुन-- अश्व-प्रिय कोषको दुम्बर-ये पांच वृक्ष केतु के लिये उत्तम बताये गरे ।॥ १०॥ और अन्य देवदार आदि तथा गाल आदि वृक्ष जो भी प्रशम्न हैं उनका परिग्रहण करना चाहिये और जो अप्रशन हैं उनको कभी भी पहप न करे ॥ ११॥ दृष्ट को पार करके गत्रि म म्पर्ग दक्ष इन निम्न कथित मन्त्र का पाठ करना चाहिए--जो प्राणी वृक्षों पर हैं उनके लिये कल्याण होवे और आपको नमार है। यह उपहार ग्रहण करके इन्द्र बी ध्वजा को करें। राजा आपका वरण करना है। हे नगोत्तम । आपका कल्याण होवे ।। १२-- १३ ।। देवराज इट की ध्वजा के लिए इस पूजा का परि ग्रहण करिए। इसके अनन्तर दूसरे दिन में उसका केंदन करके पिर आठ अल मत का प्रहण करे।१४। जले क्षिपेत् तथाग्रस्य ठित्वंव चतुरगुलम् । ततो नीत्वा पुरद्वार केतु निर्माय तत्र वं ॥१५ शुक्लाष्टम्या भाद्रपदे वेतु वेदो प्रवेशयेत् । द्वाविशद्धस्तमानस्तु अधम केतुरुच्यते ॥१६ द्वात्रिंशन तु ततो ज्यायान् द्वाचत्वारिंशदेव च । ततोऽधिक ममाख्यातो द्वापञ्चाशत् तयोत्तम-11१७ कुमायं पच्च वर्तव्या शतम्य नृपमत्तम । शालमय्यस्तु ता सर्वा अपरा मनमादृरा ॥१८ वेतो पादप्रमाणेन कार्या शकुमारिन । मातृवाधप्रमाणा तु मन्विहस्तन्य तथा ॥१६ बतीम हाथ शिलिया पुराण एव पुत्वा भुमारीश्च मातृया पेतुमेव च । एकादश्या सिते पक्षे यष्टिं तामधिवासयेत् ॥२० अधिवास्य ततो यष्टि गन्धद्वारादिमन्त्र । द्वादश्या मण्डरा कृत्वा वसाव विस्तृतात्मकम् ।।२१ तथा आग की आर म चार अगुपया एदन करके उम जल म प्रक्षिप्त कर देव । पिर पुर पे द्वार पर ल जाकर वहाँ पर तु का निर्माण परके भाद्रपद मास म शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि म केतुवा वेदी प्रवेश करना चाहिए। बाईम हाथ में मान वाला बेतु बधम कहा जाता है ॥१५-१६॥ वे मान वाला उससे ज्येष्ठ होता है। वथालीम हाथ के मान वाला भी होता है। इससे भी अधिक पावन हाथ के मान वाला उत्तम यहा गया है । १७ । हे नृपष्ठ । इन्द्र की पांच कुमारियां करनी चाहिए। वे सब शाल- मयी होवें और दूसरी शक्रमातृनाएं होनी चाहिए ॥ १८ ॥ केतु पाद के प्रमाण मे ही शक कुमारिकाएं करनी चाहिए। मातृषा के अर्घ प्रमाण वाला तथा मन्त्री के दो हाथ करे। इस रीति से कुमारियो की रचना करके और मातृका तथा केतु को करके एकादशी तिथि म शुक्लपक्ष में उम यष्टि को अधिवामित न करे ।।१६-२०॥ फिर यष्टि का अधि वासव करके जो गन्ध द्वारा' आदि मन्त्रो के द्वारा किया जाना चाहिए। द्वादशी तिथि में विस्तृतात्मक वासव मण्डल करे ।२१। अच्युत पजयित्वा त श पश्चात् प्रपूजयेत । शक्रम्य प्रतिमा कुर्यात काञ्चनी दारवी च वा ॥२२ अन्यतजससम्भूता सर्वाभावे तु मृन्मयीम् । ता मण्डलस्य मध्ये तु पूजयित्वा विशेषत ॥२३ तत शुभे मुहूर्ते तु केतुमुत्थापयेन्नृप । वधहस्त सुरारिघ्न घहुनेत्र पुरन्दर । क्षेमार्थं सर्वलोकाना पूजय प्रतिगृह्यताम् ॥२४ एहोहि सर्वामरसिद्धसंघरभिष्टतो वज्रधरामरेश ।

मक ध्वजोत्सव वर्णन ] समुत्थितस्त्व श्रवणायपादे गृहाण पूजा भगवन्नमस्ते ॥२५ एवमुत्तरतन्त्रोक्नदहनप्लवनादिभि इति मन्त्रेण तन्त्रेण नाना नैवेद्यवेदन ।।२६ अपूपं पायस पानर्गुडंर्धानाभिरेव च। भक्ष्य ज्यश्च दिविध पूजयेच्छीविवृद्धये ॥२७ भगवान अच्युन का अचंन करचे पीठ शक्रदेव का पूजन बग्ना चाहिए। इन्द्रदेव को प्रतिमा का निर्माण सुवर्ग के द्वारा अथवा काष्ठ के द्वारा करना चाहिए ।। २२ ।। अन्य क्सिी उत्तम धातु के द्वारा निर्माण करावे अथवा मवके अभाव में मृत्तिका मे परिपूर्ण करे। उस प्रतिमा को मण्डल के मध्य में स्थापित करके विशेष रूप से अर्चन करे ॥ २३ ॥ इमके अनन्नर क्मिी परम शुभ मुहूर्त में राजा पेतु को उत्था- पित करे। हे पुरन्दर' आपके हाथ में वन धारण किए हुए हैं आप असुरों के हनन करने वाले हैं-आपरे बहुत नेत्र है । ममस्त लोको के कल्याण करने के लिये यह पूजा ग्रहण कीजिए ॥ २४ ॥ हे अमरों के स्वामिन | आप वजू के धारण करन वाले हैं और सभी देवगणों के द्वारा अभिष्टुन है याप यहां पर आगमन कीजिए-यहां पदार्पण करिए। आप प्रवण के आद्य पार म ममुत्थित हुए हैं-आप इम पूजा का ग्रहण नीजिए। हे भगवन | आपकी सेवा में नमस्कार समर्पित है ।। २५ ।। इस रीति मे उत्तर तन्त्रो में वर्णित दहन और प्लवन आदि के द्वारा इम मन्त्र मे और तन्त्र में तथा अनेक नवेद्यो के निवेदनो से अपी मे-पायम मे-पान-गुट और अनेक तरह के भक्ष्यों से-भोग्यो में श्री की विशेष वृद्धि के लिए पूजा करनी चाहिए।॥२६~~२७।। घटे तु दशदिक्पालान ग्रहाच परिपूजयत् । साध्यादीन् सक्लान् देवान् मातृ सर्वा अनुक्रमात् ॥२८ तत शुभे मुहर्ते तु ज्ञानी वक्सियुत । केतूत्थापनभूमि तु यचवेद्यास्तु पश्चिमे ।।२६ 1

[ कालिका पुराण
विप्रै पुरोहित साधं गच्छेद्राजा सुमगर्ल ।
रज्जुभि पचभिर्वद्ध यन्त्रश्लिष्ट समातृकम् ॥३०
कुमारी भिस्तु सयुक्त दिकपालाना च पटटक ।
वृहदभिरतिकान्तश्च नानाद्रव्यै सुपरित ॥३१
यथावर्णर्यथादेशे योजितेर्वस्त्रवेष्टितं ।
युक्त त किङ्किणी गाव हदघण्टोधनामरं ॥३२
भपित मकररुज्चर्माल्यर्वहविधस्तथा ।
वहपुप्पै सुगन्धश्च भूपित रत्नमालया ॥३३
चित्रमाल्याम्बरश्चेव चतभिरपि तोरण ।
उत्थापयेन्महाकेतु राजकीय शनं शनं ॥३४
तमत्याय महाकेतु पूजित मण्डलान्तरे ।
प्रतिमा ता नयेन्मूल केतो शक विचिन्तयन ॥३५
घट मे दिवपालो और ग्रहो का अर्चन करे । अनुमम
से साध्य
आदि समस्त देवो वा और मव मातृकाओ का पूजन करना चाहिए ।
इसके अनन्तर किसी शुभ मुहूर्त मे वधंकि से समन्वित ज्ञानी यश वेदी
के पश्चिम म पेतूलायन की भूमि में विप्रो और पुरोहितो घे साथ राजा
गमन करे । सुमङ्गल पांच रज्जुओ से सुबुद्ध-मन्त्र मे शिलट-मातृ
पामोरे सहित-फुमारियो से मयुक्त और दिपाली घे पदकोसे युत--
वृहन् अतिमान्त मुपूरित अनपदयो से यथा वर्ण और यथा देश में
दम्य से वेष्टित पिये हए योजिती मे युक्त उसको जो विष्टिणी वे जलो
मे तपा पडे घण्टामा ग और पामरो म भूपित है--मुपुरी से उम्पः
माल्यों मे पहुन प्रकार से मुगन्धित बहुत ग पुप्पो से भूषित तथा रस्तो
को मामा से अमान अद्भुत-अभुन मास्यों और अन्यरो से तथा
पारी तोरणों में रागवायो दाग धीरे-धीरे महारे तु को उत्थापित
सो। मण्ड.तर म पूजित उग महादत को उठाकर इन्दप रा चितन
हए उग प्रतिमा को रतु र मूल में ले जादे ॥२८-१५॥

मानव दत यजेन न पूर्ववन नत्र गली माननिमेव च । जयन्त ननय तन्य वजनता त्या জ্ঞান বিলাল নামবার। अपपाई पूजयेत् नु वलिभि पापनादिभिः॥ पूजिताना व देवाना शवोम समाचरेत् । होमान्ते तु वलि दचाद् वानवार महात्मने ॥३० रितं पृत चाकन च पूष दूर्वा तवैव च। एतन्तु जुयाद देवानन्नन्नरोत्तम ॥३६ ननो होमावसाने तु भोजपेद् ब्राह्मपानपि । एव सम्पूजयेन्नित्य सप्रान दिने दिने ।।४० ब्राह्मणे. सहितो राजा वेदवेदारपारगें । मवंत प्रपूजानु यजेए परिकीर्तित ॥४१. वातारमिति मन्त्रोऽय दानवस्य प्रिय पर। एव कृत्वा दिवाभागे शक्रोत्यापनमादितः ॥४२ वहां पर पूर्व को ही भांनि उसका गबन करे तथा शची- मातलि~-उसके पुत्र जयन और ऐरावत का भी अर्चन करना चाहिए ॥ ३० ॥ ग्रहो का दिवालो वा-सपों वा-गणदेवी का अश्वो मे वलियों के द्वारा और पापत आदि से पूजन करना चाहिए ॥३७॥ अचन किये हुए देवो का निरन्तर होम का समाचरण करे। होम के अन्त मे दलि देवे जो महात्मा वासव के लिये देनी चाहिए ।। ३६ ।। है नरोतमा तिल-त-अक्षत-पुष्प-दूर्वा-इनके द्वारा अपने-अपने मन्त्री से देदो का बन करना चाहिए ॥ ३६॥ इसके उपरान्त होम के अन्त में वाहाणों को भोजन करावे। इसी रोति से सात रात्रि पर्यन्त दिन-दिन म नित्य भली भांति अर्चन करना चाहिए ॥१०॥ वेदो और वेदाङ्ग मास्त्रो के पारगामी विद्वान ब्राह्मणो के सहित राजा सर्वत्र इन्द्र की पूजा म कीर्तित किया गया है ॥ ११॥ त्रातारम्' [ कालिका पुराण इन्द्र का परम प्रिय है। इस प्रकार से करके दिया के भाग मे शक्र का उत्यापन करे ॥४२॥ श्रवणर्भयुताया तु द्वादश्यां पार्थिवः स्वयम् । अन्तपादे भरण्यां तु निशि शक्रं विसर्जयेत् ॥४३ सुप्तेषु सर्वलोकेषु यथा राजा न पश्यति । पामासान्मृत्युमाप्नोति राजा दृष्ट्वा विसर्जनम् ॥४४ शक्रस्य नृपशार्दूल तस्मान्नेक्षेत तन्नुपः । विसर्जनस्य मन्त्रोऽयं पुराविद्भिरुदीरितः ॥४५ साधं सुरासुरगणैः पुरन्दरः शतक्रतोः । उपहारं गृहीत्वेम महेन्द्रध्वज गम्यताम् ।४६ सूतके तु समुत्पन्ने वारे भौमस्य वा शनैः । भूमिकम्पादिकोत्पाते वासर्व न विसर्जयेत् ।।४७ उत्पाते सप्तरानं तु तथोपप्लवदर्शने । व्यतीत्य शनिभौमौ च ह्यन्यपि विसर्जयेत् ॥४८ मूतके त्वय संप्राप्ते व्यतीते सूतके पुनः । यस्मिन तस्मिन् दिने चैव मूतकान्ते विसर्जयेत् ॥४६ थवण नक्षत्र से युक्त द्वादशी तिथि में राजा स्वय भरणो के मन्तिम परण में राशि में गक्र का विसर्जन परमा पाहिए ॥ ४ ॥ ममस्त मोती के गुप्त हो जाने पर जमे रागा देयता है। रामा विगर्जन हो देवार छ माग में मृत्यु को प्राप्त जाता है। है नृप गाईम ! म मारण मृप गक मा विमजन नही देये। पुरावताभी के द्वारा पिरान मा मह मन्त्र कहा गया है ||४-१५॥ गुर-भगुर गणो रे माप पुण्दर मन तुराम उपहारमा पहन महावा ! गमन गोजिए ॥ ४६॥ गूतर उसान होने पर भीम अपवा मनिवार -भाग भादि उलात रेशाने पा वामदा विगन नहीं करता पाए ॥ ४५ || THE होने पर तथा उपप्प रे न होने पर

मक ध्वजोत्मव वर्णन ]
सात रात्रि को व्यतीत करके तथा शनिवार और मोमवार को छोड़कर
अन्य नक्षत्र में भी विसर्जन कर देना चाहिए । १८ ।। सूत के सम्प्राप्त
हो जाने पर मृतक के अन्त में जिस किमी भी दिन में विसर्जन कर
देवे ॥६
तथा केतु नृपो रक्षेत् पतन्ति शकुना यथा।
म केा नृपशार्दूल यावन्नहि विसर्जनम् ॥५०
शनैः शन. पातयत् तु यथोत्यापनमादितः ।
कृतं तथा यथा भग्ने केतो मृत्युमवाप्नुयात् ।।५१
विसृष्टं शक्रकेत तु सालङ्कार तवा निशि ।
क्षिपदनेन मन्त्रण त्वगाधे सलिले नृप ॥५२
तिष्क केतो महाभाग यावत् संवत्सर जले ।
भवाय सर्वलोकानामन्तराय विनाशक ॥५३
उत्यापयेत् तूयंरगैः सर्वलोकस्य वै पुरः ।
रहो विसर्जयेत् केतु विशेपो यः प्रपूजने ॥५४
एव य: कुरुत पूजा वासवस्य महात्मनः ।
स विरं पृथिवी मुक्त्वा वासर्व लोकमाप्नुयात् ।।५५
न तस्य राज्य दुभिक्ष नाघयो व्याधयः क्वचित् ।
स्थास्यन्ति मृत्यु काले जनाना तत्र जायते ॥५६
तत्तुल्यः कोऽपि नान्योऽस्ति प्रियः शक्रस्य पार्थिव ।
तस्य पूजा सवपूजा केशवाद्याश्च तत्रगाः ॥५७
सकलकलुपहारि व्याधिदुभिक्षनाशं
सकलभवनिवेश सवंसोभाग्यकारि।
सुरसतिगृहगाभिर्जिन शक्रकेतो:
प्रतिशरदमनेकः पूजयेच्छीविवृद्धयं ॥५८
राजा के द्वारा उसी भांति केतु की रक्षा करनी चाहिए जिससे
हे नृप शार्दूल ! केतु पर शकुन पतन न करें जब तक उसका विसर्जन

[ बालिका पुराण - न होवे ॥५०॥ जिस प्रकार से आदि से उत्थापन होवे धीरे-धीरे पातन करना चाहिये। केतु के भग्न होने पर मृत्यु की प्राप्ति होती है ॥५१॥ हे नृप ! अलङ्कारो के सहित विसर्जन किये हुए शक्र पेतु को रात्रि मे अगाध जल में निम्न वर्णित मन्त्र के द्वारा प्रक्षिप्त कर देवे ॥५२॥ हे महाभाग केतो! आप विघ्नो के विनाश करने वाले हैं। समस्त लोको के भव के लिये आप जब तक मम्वत्सर होवे जल में स्थित रहें ॥५३॥ समस्त लोको के आगे तूयं की ध्वनि के माथ उत्पादन करे और एकान्त में केतु का विमर्जन करना चाहिए। यही पूजन में विशेपता है ॥५४॥ इस रीति से महात्मा वासव की जो पूजा किया करता है वह बहुत समय तक पृथ्वी का उपयोग करके अन्त मे वासव (इन्द्र) के लोक की प्राप्ति किया करता है ॥५५॥ उसके राज्य मे कभी दुर्भिक्ष नहीं हुआ फरता है और कही पर भी व्याधियाँ तथा ऑधियों नहीं होती हैं तथा मनुष्यो की अकाल में कभी मृत्यु भी नही हुआ करती है ॥५६।। हे पार्थिव ! उसके समान अन्य कोई भी इन्द्रदेव का प्रिय नही होता है । उसको पूजा सब की ही पूजा है। भगवान् केशव आदि वहाँ पर ही सब विराजमान रहा करते हैं ॥५७॥ समस्त कलुषो का अपहरण करने वाला-व्याधि और दुर्मिक्ष का नाशक - सकल भको का निवेश-सब प्रकार के सौभाग्य का सम्पादन करने वाला--शक्र केतु का सुरपति के गृह की वाणियो से वाचन प्रयि शरवाल में अनेकोपचारो के द्वारा श्री वृद्धि के लिये पूजन करना चाहिए ॥५८|| ॥राजा के पालनीय नियमादि । ज्येष्ठ दशहराया तु विष्णोरिष्टि नप शृणु। येन वा विधिना कुर्यादिष्ट विष्णोपः सदाः ।।१ गजा के पालनीय नियमादि } प्रत्यब्दं पार्थिव कुर्यात् प्रतिमा काञ्चनी हरेः । अन्यतेजीमयी वापि दारवी वा शिलामयीम् ॥२ तां प्रतिष्ठाप्य विधिना मानोन्मानस्तु शिल्पिभिः ] प्रतिष्ठा विधिवत् तस्याः कुर्याद् विप्रः पुरोहितः ।।३ तां संस्थाप्य सुरागारे स्वयं वा यन्नतः कृते । वासुदेवस्य बीजेन पूर्वोक्तविधिना तथा ॥४ सर्वोपचारर्भक्त्या तु वासुदेवं प्रपूजयेत् । पूजान्ते संस्कृते वह्नौ कुण्डमध्ये स्थितो द्विज. ॥५ आज्यैः सहस्र जुहुयादाहुतीनां हरेः प्रियम् । सपुज्य वासुदेव तु होम कृत्वा ततो द्विजः ॥६ नृपस्यानुमते तां तु प्रतिमा मण्डल नयेत् । प्रतिमायाः कपोलो द्वौ स्पृष्ट्वा दक्षिणपाणिना ॥७ औवं ने कहा-हे नृप ! ज्येष्ठ मास के दशहरा मे भगवान् विष्णु की इप्टि के विषय मे यब आप श्रवण कीजिये जिस विधि से नृप को सदा भगवान् विपु की इप्टि करनी चाहिए ॥१॥ प्रतिवर्ष राजा को भगवान् हरि की मुवर्ग की प्रतिमा का निर्माण कराना चाहिए अयवा किमो अन्य उतम धातु के द्वारा वनवाने या काष्ठ की अथवा शिला मयी प्रतिमा की रचना करानी चाहिए ॥२॥ शिल्पियो के द्वारा उसका निर्माण कर वे और मानोमानो मे उसकी विधि के साथ प्रतिष्ठा करे । विप्रो और पुरोहितो के द्वारा विधि-विधान के साथ उनकी प्रतिष्ठा करनी चाहिए ।। ३ ॥ उसको मुस्थापना किसी देवालय मे करावे या स्वय द्वारा निर्मित देवालय मे करे। पूर्व में वर्णित विधि से वासुदेव के चीज से सभी उपचारो के द्वारा भक्ति के द्वारा भक्ति के साय वासुदेव भगवान् का अभ्यर्चन करे। पूजा के अन्त में सस्कार किये हुए अग्नि में जो कि कुण्ड के मध्य में स्थित होने फिर द्विज घृत से.हरि भगवान की प्रिय एक सहस्र आहुतियो से हवन करे। द्विज भली भांति ४०० [ कालिया पुराण वासुदेव का पूजन करके फिर होम करे ॥१॥५॥६॥ तृप की अनुमति से उस प्रतिमा को मण्डल में ले जावे । प्रतिमा के दोनो कपोलो का दाहिने हाथ से स्पर्श करना चाहिए ॥७॥ प्राणप्रतिष्ठा कुर्वीत तस्या देवस्य नै हरे । कृताया तु प्रतिष्ठाया प्राणाना न पसत्तम ।। विष्णुप्राणास्ता प्रतिमामायान्ति नियत स्वयम् । प्राणेप्वथागतेष्वस्या देवत्व नियत भवेत् ।।६ अकृताया प्रतिष्ठाया प्राणाना प्रतिमासु च । यथापूर्व तथाभाव स्वर्णादीना न विष्णुता ॥१० अन्येपामपि देवाना प्रतिमास्वपि पार्थिव । प्राणप्रतिष्ठा कर्तव्या तस्या देवत्वसिद्धये ॥११ सुवर्ण तु सुवर्ण स्याच्छिला दारु तथा शिला। अन्यच्च स्वस्वरूप स्यात् प्राणस्थानमृते सदा ॥१२ वासुदेवस्य वीजेन तद विष्णोरित्यनेन च । तथैवाङ्गाङ्गिमन्त्राभ्या प्रतिष्ठामाचरेद्धरे. ॥१३ तव हृदयेन्ड गुष्ठ दत्त्वा शश्वच्च मन्त्रवित् । एभिमन्य प्रतिष्ठाप्य हृदयऽपि समाचरेत् ॥१४ उम प्रतिमा मे हरिदेव का प्राण प्रतिष्ठा करे। हे नृपश्रेष्ठ । प्राणो की प्रतिष्ठा करने पर भगवान विष्णु के प्राण नियत स्प से उम प्रतिमा मे आ जाया परते हैं। प्राणों के समागत हो जाने पर इम प्रतिमा में नियत रूप स देवस्व हो जाया करता है ॥८-६॥ प्राणों को प्रतिष्ठा रे नपरने पर प्रतिमाओम जैसा पहिल भाव हाता है धेगा ही स्वर्ण आदि हो भाव बना रहता है और उनमे विष्णु का भाव नहीं होता है ॥ १०॥हे पाथिय । अग्प देगेगी भी प्रतिमामो में भी प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए तभी उसमें देवरवादी सिद्धि हुआ पाती है ।।११॥ प्राण स्थान के बिना सदा गुवर्ग मुवर्ण हो रहता रानाद पानीय नियमादि । है--शिला मिला है और बाष्ठ केवल वाष्ठ हो रहा करता है । सभी थपन ही स्वरूप म म्हन हैं।॥१२॥ वामुदद क बोज म-- तद्वितो' इयादि स तथा पग-अङ्गामार द्वारा भगवान हरि की प्रतिष्ठा का समाचरण करना चाहिए ।। १३ ।। उसी भांति मन्त्रा मान रखन वाला हृदय में निरन्तर अगुष्ठ का दकर इन म त्राव द्वारा प्रतिष्ठा करक हृदय में भी समाचरण ॥१॥ अस्मै माणा प्रतिप्ऽन्तु अस्म प्राणा क्षरन्तु पर । असौ दवत्वसम्यागे स्वाहेति य गुरुचरन् ।।१५ अङ्गमन्नरङ्गिमन्नदिवरित्यनन च। प्रारणाप्रतिष्ठा सवन प्रतिमामु समाचरत् ।।१६ प्रतिमापूजन कुर्यादात्मन्यपि च मन्त्रवित् । प्राणप्रतिष्ठा प्रथम पूजाभागविशुद्धये ।।१७ अस्मिन् प्राणप्रतिष्ठा तु प्रतिमापूजनाहत । न कश्चित् तु बुध कुयान त्या मृत्युमवाप्नुयात् ॥१८ विष्णारिष्टिमिमा करवा देशभ्या पायवात्तम । तस्यामव तु पर्णाया प्रतिमा स्थापयत् तत ।।१६ एव दशहराया तु कृत्वैप्टि पायिवा हर । रावान् कामानदानाति निर्विघ्नापि स जायत ।।२. श्रापचन्या श्रिय दवी कुन्द सपूजयत्मदा । वासव गजराजस्यमुपहारम्तयात्तम ॥२१ दमा निय प्राण प्रति हाव-इन लिय प्राण क्षरण करें- यह १५ को लक्ष्या के लिए स्वाहा-यह यजुका उच्चारणर-- ॥१५॥ देव मङ्गम का स और अङ्गा मन्त्रों म और इसर द्वारा सवत्र प्रतिमाआम पाणको प्रतिष्ठा का ममाचरण करना चाहिए ॥ १६ ॥ मात्रा मान रखन वा पुरुष को प्रतिमा के पूजन म भारमा म भी करना चाहिए। पूजा र भाग को वितदिन लिय प्रथम ४०२ [ मालिका पुराण पूजन करना प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए ॥ १७ ॥ इसमें प्राण प्रतिष्ठा को प्रतिमा के पूजन के बिना किसी भी बुध पुष्प को नहीं करा पाहिए। ऐसा करके मृत्यु को प्राप्त किया करता है ।। १८ ॥ नृप । दशमी में इस भगवान् विष्णु की दृष्टि को करके उसके पूर्ण हो जाने पर ही फिर उस प्रतिमा को स्थापित करे ।। १६॥ इस प्रकार से राजा दशहरा में हरि भगवान की इष्टि को करके सभी मनोरथो की प्राप्ति कर लिया करता है और वह विघ्ना से भी रहित होता है ॥२०॥ श्री पञ्चमी में श्री देवी का कुन्द के पुष्पो व द्वारा उस समय म प्रकृष्ट रूप से चाहिए। गजराज पर मस्थित वासव का उत्तम उपहारो के द्वारा अचन करे ॥२१॥ लक्ष्म्यास्तन्त्र महामन्त्र वासवस्य पुरोदितम् । अत्रापि पूजने ग्राह्य मण्डलादि यथाक्रमम् ॥२२ एव कृते पजने तु श्रीपचम्या विशेषत । श्रीयुतो नृपतिर्भू यान्न श्रीहानिमवाप्नुयात् ॥२३ सदाचारविशेषोऽय कथितस्तव पार्थिव । निषेधे तु विशेषाश्च शृणु यन श्रियेप्यते ।।२४ असपज्य तथा विष्ण शिवमग्नि परन्दरम् । अदत्त्वा च तथा दान च भुजीत नृप क्वचिन् ॥२५ हावयेदग्निहोत्र त नित्यमेव परोहितं । अकृत्वा चाग्निहोत्र त भजन्नरकमाप्नुयात् ।।२६ नारक्षिते गृहे राजा रत्नदीपविजिते । स्वपेत् तथा स्त्रिया साधं व कदाचन सविशेत् ॥२७ भुक्त्वान्न श्रीफल नाधात् तथा धात्रीपल नृप । बुद्धिक्षयकरा ह्यता माप आसवमृत्तिका ॥२८ यहां पर पूजन में भी वासव का पहिले कहे हुए लक्ष्मी के तत्र महातान का ग्रहण करना चाहिए और क्रम के अनुसार मष्टस आदि गजा क पासनीय नियमादि । का भी ग्रहण कर ॥२२॥ इस प्रकार स पूजन के करन पर और श्री पन्चमी म विशप रूप स विय जान पर नृप श्री से समन्वित हाता है और कभी भी थी की हानि का नहा प्राप्त किया करता है ।। २३ ।। है पार्थिव । यह सदाचार वियप मैंन आपक सामन वर्णित कर दिया है और निपघम विधपा का श्रवण कााजय जिसस था क द्वारा इट किया जाता है । २४ । भगवान् विष्णु का भला भाid पूजन न करक तपा शिव-अग्नि तया पुरन्दर का पूजन न करक तथा दान न दर राजा का कभी भी भाजन नहीं करना चाहिए । १५ । पुराहिता क द्वारा नित्य ही वग्न हात्र का हवन कराना चाहए। माग्न हात्र न करके भाजन करन वाला नरक का प्राप्ति दिया रता है ।। २६ ॥ रत्नदीप स राहत बक्षित गृह म राजा को स्त्री के साथ शयन नही करना चाहिए और वभा वहा दठना भा नहीं चाहिए ।। ५७ ॥ अन्न खाकर यो फल का मशन न कर तथा प धात्री फ्ल १ भी न खाये। माप-आसन योर मृत्तिका य सव बुद्धिक क्षय करन वाल हात है ॥२८॥ निम्बाटस्पच्युताश्च बुद्धिवृद्धिवरा मता । वृद्धिक्षयकरा नित्य त्यजद्राबा च भाजन ॥२६ भक्षयद वह बुद्धिवृदिहतु नृपात्तम । ने पयायविहीन तु प्राराहदासन नृप ॥३० न यान न गज नाश्वमाराहदीनमासन नवस्तु विचरद्राजा क्दाचिदपि निजने ॥३१ मदहतु न भुजीयात कदाचिदपि भोजन । कदाचिन्नापि सेवत ह्यष्टम्या मासमैयुन ॥३२ दशश्राद्ध गयाघ्राद तिलस्तर्पमव च । न जीवपितृका भूप कुर्यात् कृत्वघमाप्नुयात् ॥३३ न क्षेत्रबादीस्तनयान राज्य राजाभिषचन् । 1 १०४ [पालिका पुराण पितृणा शुद्वये निल्यमौरसे तनये मनये सति ॥३४ पोरस क्षेत्रजश्व दत्तः कृषिम एव च । गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च भागास्तिनया इमे ॥३५ निम्ब-अररूप च्युत बुद्धि की वृद्धि के वर याने हैं ---ऐसा माना गया है। जो वृद्धि के करने वाले हैं राजा यो उनका भेदन म त्याग कर देना चाहिए ॥२६॥ नृपो में उत्तम को प्रतिदिन बुद्धि के जो हेतु हो उन्ही का भक्षण करना चाहिए । राजा को पर्याय पर विहीन आसन पर प्रारोहण नहीं करना चाहिए ॥३०॥ जो आसनो मे हीन होवे ऐसे यान पर--अश्व और हाथी पर भी आरोहण नृप न करे । किमी भी समय मे राजा एक अकला निर्जन वन म विचरण न बरे ॥३१॥ राजा का चाहिए किसी भी समय मे भोजन म मद के कारण पदार्थ का छशन न करे । अष्टमी तिथि में कभी भी मास और मैथुन का सेवन न करे ॥३२ । दर्शश्राद्ध-गया श्राद्ध- तिलो स तर्पण वह राज' न करे जिसका पिता जीवित होवे । ऐमा करके पाप को प्राप्त दिया करता है ॥३३॥ राजा को राज्य पर क्षेत्रज तनयो का अभिषेक नहीं करना जबकि और मपुत्र होवे तो उसके होते हुय पितृगणो की शुद्धि के लिय और सपुन का ही अभिषेक करे ॥३४॥ और स-क्षेत्र अ- दत्तक--वृत्रिम-गूढोत्पन्न -अप विद्ध-य पुत्र भाग के योग्य हुआ करते हैं ॥३५॥ वानोनश्च महोढश्च कीत पोनर्भवस्तथा। स्वयदत्तश्च दासश्च पडते पुत्रपामुला ॥३६ अभावे पूर्वपूर्वेपा परान् ममभिपेचयेत् । पोनर्भव स्वयदत्त दास राज्ये न योजयेत् ॥३७ दत्ताद्याश्चापि तनया निजगोत्रेण सस्कृता । आयान्ति पुत्रता सम्यगन्यवीजसमुद्भवा ॥३८ पितुर्गोत्रेण य पुत्र सस्कृत पृथिवीपते. चाहिए ।

राजा के पालनीय नियमादि ।
आचूडान्त पुत्र म पुत्रता याति चान्यत ॥३६
चूडान्ता यदि सस्करा निजगोत्रेण सस्थिताः।
दत्ताद्या स्तवयाग्ते स्युरन्यथा दास उच्यते ॥४०
अवं तु पचमाद् वर्षाद् दताद्याश्च सुतान्नृप ।
गृहीत्वा पचवर्षीय पुष्टि प्रथम चरेत् ।।४१
पौन व
तु तनया जातमात्र ममानयेत ।
कृत्वा पौनर्भवप्टोम जातमाघस्य तम्य ॥४२
कानीन (कन्या में उत्पन्न)-महोह-कीत (धन देवर खरीदा
हमा)-पोनव-स्वय दत्त और दाम-~-ये छ पुन पासुन होते हैं ।
1॥३६॥ पूर्व-पूर्वो के अभाव में दूमरो का अभिषेक करे। जो पौनर्मच.
स्वय दत्त और दाम हा उसका कभी भी राज्य में भोजन नहीं करे ।
॥३७॥ दत्तव आदि पुत्र भी जो निज गोत्र के द्वारा मकार किये गये
होवें वे अन्य ये वीर्य मे समुत्पन्न हुए पुत्रना को प्रास हुआ परते हैं।
॥३८॥ पिता के गोब से राजा का जो पुत्र प्रसार किया हुया है वह
यमं पर्यत पुत्र नहीं होता है अन्य मे हो
पुत्रना को प्राप्त होता
है ॥३॥ यदि चूढान्त सस्सार निज गोन मे मंस्थित हो ये दत्तर
यादि
पुत्र होते हैं अन्यया दाम पहा जाया करता है ॥४०॥ हे नृप
पांचवें वर्ष से उपर दत्ता यादि पुत्री को ग्रहण परवे प्रपम पांच वर्षीय
पुत्रेष्टि या ममाचरण करना चाहिये ॥४१॥ पौनमय
पत्र
समुत्पन्न रोवे उसे ममानीत पर पीनमवप्टोम को जातमान उसमा
सर्वास्तु कुर्याद सस्कारान् जातकर्मादिकान्नर ।
ते पौनवप्टोमे सुत. पौन व स्मृत ॥४३
एयोदिप्ट पितु कुर्यात्न थाद्धं पावणादियम् ।
नीता या वनिता मूल्यै सा दामीति निगद्यते ॥४४
तस्या यो जायते पुमो दास. पुषस्तु सम्मृतः ।
1
को जैसे ही
करे ॥२॥

[ कालिया पराम
न रानो गज्यभाष म म्याद विप्राणां नापि यादवन॥४५
अधम मर्यपुत्रन्यन्त तम्मान परिवर्जयेत् ।
पुराण धमंगागाणि महिताश्च मुनीरितः ॥४६
नाध्यापयेन्नृप गदविहितानि यतृच्छया।
याय राज्य मदा द्रा पगण महितो तथा ॥४७
पठन्नि म्यान महीनाग राजा राष्ट्रण सारयः ।
मोहाद वा यामन पद परान महिता स्मृतिम् ॥४८
पटनाममाप्नोति पितृमि गह पापन।
पन्यो विहित यत त पन मात्र उताहतः ॥
सदवित्रयघनाद पाहा दय नगदेव हि।
नगोजगन्ना नट पकाने

या पानोर निनादि] करना चाहिये। राजागे व्यवहार के दर्शन में दोरोपित करे ॥५६-५०॥ नियोज्य तत्र तं भूपत्तामिन्ने तेन पच्ने । हीनायुश्च भवेन्लीको राजा वापि महायजः ॥५१ कापं व्यगमपुत्रं वा नाभिनजितेन्द्रियम् । न हल्व व्याधित वापि नृप. कुर्यात् पुरोहितम् ॥५२ कृपणन्य धन राजा न पोयान कदाचन । न द्विजाना तथा दद्याद् धनानि विपुलान्यपि ॥५३ नारोहे कामुकोन्तत्तगज राजा कदाचन । आरुह्य कामुकतं ते परत्रेह विचौदति ॥५४ अनायुप्पं न कुर्यात् तु कर्म भूप. कदाचन । सतत चायुषो वृद्धयं यतेत सवलंघनः ॥५५ न पवार नाप्टम्या न पटया च नृपोत्तमः । अञ्जनाम्यञ्जने कुर्यात् ताम्बूलस्थापि भोजनम् ॥५६ गजा उमा नियोजन करके उमसे तामिन नामर नरक मे पीडा पापा करता है। लोक और सहायब राजा भी दोनायु हो जाता है । ॥५१॥ राजा को चाहिए कि वह पाणाव्यङ्ग अर्थात विशेष अङ्ग वाला अथवा मगहीन-पुत्र रहित-बनभिन्न-अजितेन्दिप-बहुत छोटे बाद वाला-रोगी को कभी अपना पुरोहिन न बनावे ॥५२॥ राजा को पाहिये कि वह कमो कृपण के धन का ग्रहण न करे। द्विजो को बहन अधिक धन भी नहीं देो ॥५३॥ राजा कभी भी कामुक और उन्मत हाथी पर आरोहण न करे । उस कामुक पर समारोहन परके इस सोर मे और परलोक में विवाद को प्राप दिया करता है ॥५४॥ राजा को किसी भी समय में एमा कोई भी काम नहीं करना चाहिए ओबाम के सय करने वाला होवे । सम्पूर्ण धन के द्वारा राजा से अपनी आयु पुष्टि के लिए यन्न करना चाहिए ॥५५॥ रिसी भोकर वार दिन-

राजा वे पारतीय नियमादि ]
४०
वरक सदा वीर्य का वर्द्धन दर ॥६१ मध्य वीज के क्षय मरन
वाला होय उसको - भोज्य दो-पानक-- क्षार पाय आदि -बहुन
पट्टे और बहुत तिन (चरपरा) का वर्जन कर दना चाहिए ।।६।।
कामे के पात्र म और चांदी के पास स्थित तथा नदी का जल मत्र की
वृद्धि करन वाला है तथा बीयं वे क्षय करन वाला है इसका वर्जिन कर
देवे ॥६३
ताम्राय म्वर्णशीसाना पागम्य फ्लचमणो ।
शुक्रवद्धिकर तोय तदपामीत यत्नत ॥६१
सर्यमलेप कृत्यष सदाचारेप तिष्ठन ।
मुक्त्वेह विविधान भोगानेन्द्र म्यान ब्रजेत् परम् ।।६५
एवमर्वस्नु नगर शशास मुनिपुङ्गव ।
शास्त्राणि चंब सर्वाणि समाचाराश्च गृह्मान् ॥६६
वश स्थयामाम मगगय महात्मने ।
तन्नास्ति पत परीण कथित सगराय न ॥६७
राजनीति मता तोनियंच्चान्यच्चास्त्रसम्भवम् ।
सहिनामु पुराणेप यच्चागमये स्थितम् ॥६८
मई शुश्राव मगरो मुनादौम्य धीमत ।
नेपा तु बयित किंचिदधृत्य द्विजमतमा ॥६६
विप्माधर्मोत्तरे पूर्व मया रहमि भापितम् ।
गजनीति मटावार वेदवेदाङ्गसङ्गतम् ॥७०
रहस्य मतत विष्णोर्वी सम्व हिजमत्तमा ।
यच्चानुदितमन्यत्र गदित वा समभयम् ।।७१
गायच्छेदन तेप युप्मन्य पथित द्विना ।
जनस्तमगयच्छेदि पुराण यानिकाल्वयम् ।
योऽभ्यसेन मतत वित्र म दाना पन लभेत ३२
नाम-नारा-गर्म-गीता के पार में स्थिन तथा पर और

४१. [ कालिका पुराण चर्म में स्थिल जल वीर्य की वृद्धि करने वाला होता है ऐसे ही जल का यत्न पूर्वक सेवन करना चाहिए । ६४॥ सम्पूर्ण मूल कृयो म और सदा चारो मे स्थित रहने वाला इम लोक में अनेक भोगो का उपभोग करके परम इन्द्र के स्थान को प्राप्त किया करता है ॥६५|| मार्कण्डेय महर्षि ने पहा--मुनियो में परम श्रेष्ठ औ ने इस रीति से राजा सगर को शासित किया था। और उन्होने सब शास्त्रो को-गुह्यको को और सदाचारो को बहुत बार महात्मा सगर से कहा था। ऐसा कुछ भी नहीं था जो पहिले और्व ने सगर राजा को कह पर न सुना दिया होवे ॥६६।६७॥ राजनीति–सत्पुम्पो की नीति और जो भी कुछ शास्त्रो मे सम्भव है-महिताओ मे-पुराणो मे और जो आगमो के समुदाय मे है राजा सगर ने सभी कुछ धीमान औव्व के के मुख मे श्रवण किया था। हे द्विजय ठो । उनका कुछ उद्धृत करके कहा था ।। ६८-६६ ॥ मैंने पूर्व में विष्णु धर्मोत्तर में रह स्थल में कहा था। राजनीनि--सदाचार-वदो और वेदो के अङ्गशास्त्रो से मङ्गन विष्णु का रहस्य है है द्विज श्रेष्ठो उसका वीक्षण कर लो । अन्य स्थल में जो नही कहा है अथवा मशय के सहित कहा है । हे द्विजो । उनमे आप लोगो के लिये सम्पूर्ण सशयो का छेदन परके कह दिया है । जो नही कहा है उम मंशय वा छेदन करने वाला कालिका नामक पुराण है । जो विप्र इसका निरन्तर अभ्यास म्यिा करता है वह वेदो के पठन का फल प्राप्त क्यिा करता है ।।७१-७२॥ ॥ सदाचार वर्णन ॥ संक्षेपतः सदाचारो विशेपो राजनीतिषु । श्रुतस्त्वद्वचनादौर्व मगराय यथोक्तवान् ॥१

मा चार वर्णन ]
४११
विष्णुधर्मोतरे नये गहन्य सवंत पुन !
द्रष्टव्यन्नु मदाच रो द्रष्टव्याते प्रमादतः ॥२
भूयो न मंशयो योऽन्ति तदनुक्न त्वना पुरा ।
हिन्धि विप्रेन्द्र पन्छाम परं तरल हि न ॥३
अपुत्रन्य गतिर्नान्नि अयने पैदलोकयो ।
वैवानमंग्वौ यानो पुरा व तपने गिरिम् ॥४
पूवम्त्वकृतदारी नौ तयो पुत्रा न च धुता.
न जाना बयत्रा जाता यदि नाना द्विजोत्तम ।
तेषां तु नम्यगिच्छमि प्रोसन्धानमुत्तमम् ॥५
अपनन्य गतिनानि निश्चिन चेति मुत्तमा ।
नपभ्रातृपया पबवली हि स्वर्गता ॥६
जानापन्यो च नौ विप्रा घोगे वतासभरदो।
नयोवंशान प्रामामि शृण्वन्नु च महर्षय ॥3
पों ने दाम में महावार और गजनीतियों में विप
दो प्री ने गागर में जिस तरह का या वह आपने वचन ने
यकर दिया है। फिर मदने वाहत्य दि धनंतर तन्त्र के माचार
देखना चाहिए वह आपरे ही प्रसाद में देखने के योग हैं ॥१॥२॥ फिर
जो हमको मराय है जो पहिले आपने दाग नहीं वहा गया है। हे
विन्ट ! उनका इंदन कीजिए। हम आप मे पाते हैं। हमारे हृदय
दहन ही अधिक कोवाल है 12॥ वेदों और मौर में भी पर मुना
जाता है कि जो पुष गहत है उसकी गति नहीं होती है। प्राचीन माय
में देवाल और मरद तप रे लिए पर्वत पर गर पे ॥१॥ पूर्व में वे दोनों
हो दारावीन प्रदा करने वाले थे। उन दोनों के पुत्र नहीं मुने म
हैं। हे हिजोनन । यहाँ उत्पन्न नहीं है अपदा बना उत्पन्न हुए
। उनए उत्तम म्यान में भली प्रति में दवा करने की इच्छा
करता हूँ ॥५॥ मागर महरि नै रहा हे सत्तमो ! बिना पुत्र

४१२ [ पालिका पुराण वाले की गन नही होती है यह निश्चित ही है। अपने पुत्रों के द्वारा असा भाई के पुनो के द्वारा पुत्रों वाले स्वर्ग में गये हैं।६। है विप्रो ! वे दोनो उत्पन्न मन्तानो वाले थे धीर वेताल भैरव थे। अव में उन दोनो के वशो को बतलाऊंगा। हे महपि गणो ! आर श्रवण पीजिए ॥७॥ सम्यक सिद्विमवाप्यव यदा वेतालभैरवी । हरस्य मन्दिर प्राप्तौ कलासं प्रतिपिती ।। तदा हरम्य वजनान्नन्दी तो रहमि द्विजा । प्राहेद वचन तथ्य सान्त्वयन्निव वोधकृत ॥६ अपनी पुत्रजनने भवन्तौ शङ्करात्मजो। यतता जातपत्रस्य सर्वत्र मुलभा गति ॥१० पन्नाम नरवं पत्रविहीन परिपश्यति । न तपोभिर्न धर्मेण तन्मोचयितमीश्वर ॥११ केवनात पत्रजननात् तस्मात्मोअ प्रजायते । तदुत्पादयना पुत्र भवन्तो देवयोनिषु ।।१२ अमयंता तु युवयो. क्षीरपानादजायत । कात्यायन्यास्तत पुत्रानमा स्वस मा यत. ॥१३ तस्माद् यथा तथा पुत्रानुमत्पाद्य सुरयोनिष । प्रियो भवन्तो शिवयोवन न चिरादिति ।।१४ जिम समय मे देतात पोरभव दोनों भली भांति मिति से प्राप्त करके ही कैलाम के प्रति हर्षित होते हुए भगवान हर के मन्दिर में प्राप्त हुए थे ॥८॥ हे द्विजो । उम समय में भगवान् हर के यजन से नन्दी ने एकान्त मे उन दोनों से सान्त्वना देते हुए वोध करने वाला यह तप्य वचन वहा था ।।६। नन्दी ने कहा-आप दोनो पुन सहित भगवान गदर के आरमज हैं । पुत्र के जन्म लेने में परन बीजिए । समुत्पन्न पुन वाने की मयंत्र मुनम गनि हुआ परती है ।।१०॥ जो पुत्र से होन पुरुष होता है पर पुदाम याने नरम यो देवा करता है । उस रा मोपन

४१४
| कालिका पुराण
उधर गमन करते हुए अपने पुत्रो के समुत्पादन के लिये चेष्टा करने लग
॥१६।। इसके अनन्तर एक समय मे इस भैरव ने हिमवान् पर्वत के
प्रस्थ मे परम मुन्दरी और श्रेष्ठ उर्जशी अप्सरा को देखा था ।।१७।।
इसके उपरान्त परम कामुक होकर इसने उवशो से मुरतोत्सव की याचना
की थी। वेश्या के भाव से परम प्रसन्न होती हुई उसने उससे यथेन्छ
कहा था ॥१८॥ इसके अनन्तर भैरव ने उनके साथ सुरतोत्सव की
क्रीडा की थी। और वह प्रसन्न हुई उवशी मे सुरत कोलिया के द्वारा
परम प्रसन्न हुआ था |॥१६॥ सुप्रसन्न हुई उवशी मे भैरव के तेज स
वाल सूय के समान प्रभा वाला सद्योजात पुत्र ने जन्म ग्रहण किया
था ॥ २० ॥ उस पुत्र का परित्याग करके उवशी अपने स्थान को
चली गयी थी भैरव पुत्र को लेकर पोछ अपने स्थान को चला गया
था।।२१॥
सस्कृत्य तनय त तु भैरवो मोदसयुत ।
सुवेशमिति तन्नाम चकार सगणाधिप ।।२२
अथ त जातवयस शकसूर्यसमप्रभम् ।
विद्याधराधिपत्ये त सुवेशमभ्यपेच यत् ॥२३
म तु विद्याधराध्यक्षस्तनयामति सुन्दरीम् ।
येमे गन्धर्वराजम्य धृतराष्ट्रावयस्य च ।।२४
तस्या तस्य मुतो जज मान्नाम मनोहर ।
ररोस्तु तनयो वामनाक्यामभ्यजायत ।।२५
वाहोस्तु पुवाश्चत्वारस्तपनाऽङ्गद ईश्वर ।
पुमुदोऽभूत पनीयान्तु चार्वत्या तु मनोहर ॥२६
पुमदस्य सुतो जो देवसेनो महावल ।
स देवमेन पृथिवीमवतीयं मनोहर ॥२७
मान्धातुपोवानश्वम्य तनया वैशिनी मुहु ।
परयामास भार्याय मृदङ्गोमासर समाम् ॥२८

सदाचार वणन ] ४१५ भैरव न बहुत ही मानन्द स युक्त होकर उस पुत्र का सत्कार कर गणाधिया के महित उसका नाम उसन मुश-यह रक्खा या ॥२२॥ इमो अनन्नर उचित अवस्था के प्राप्त करन वाले और इन्द्र तथा सूर्य के तुल्य वालि से मयुत उस सुवेश को विद्याधरो के अधिपत्य म अभिषेक कर दिया था।२३। उसने विद्याधरो के अध्यक्ष की अत्यन्त सुन्दरी पुत्री के माय विवाह कर लिया थ, जो कि गन्धर्वो का राजा और धृतराष्ट्र नाम वाला था ॥२४॥ उसमे उसके परम मुन्दर रुरु नाम वाले पुत्र ने जन्म ग्रहण किया था । रु का पुत्र वाहु ने मैनाको में जन्म लिया था। ॥२५॥ वाहु के चार पुत्र उत्पन्न हुये थे जिनके नाम नपन-अङ्गद- ईश्वर और कुमुद थे । कुमुद सबसे छोटा था। कुमुद का पुत्र परम मु दर चार्वतो में उन्ले हुआ था जो महान बलवान दवसन नाम पाला था। यह परम मनोहर देवसेन पृथिवी पर अवतीर्ण हुआ था। उसन मान्धाता यौवनाश्च को देशिनो नाम वालो पुत्री का जो यहुत ही कोमल अङ्गो वाली अप्सरा के समान थी अपनी भार्या बनाने कलिय वरण किया था ॥२॥२॥२८॥ यौवनाश्वोऽपि मान्धाता शक्रस्य वचनाद् ददौ । केशिनी तनया स्वीया देवसेनाय वाञ्या २६ केशिनीमुपयम्याथ देवसेनस्तया वसह । वाराणस्या शम्भुपुर्या हरमाराधच्छिवम् ॥३० आराधितो हर प्रीतस्तस्येप्ट प्रददी रम् । सोऽप्याददे हराव तस्मादिष्टमेव वरत्रयम् ॥३१ यावच्च सूर्यो भविता तावत् स्थास्यति सतति । अस्यामेव नगर्या य मदशस्यापि राजता ॥३२ प्रसन्नो मम वशे त्व नित्यमेव भविष्यमि । इत्यादाय वर सोऽपि देवसेनो पहावृती ॥३३ शङ्करस्य प्रसादेन चिर ता भूजे पुरीम् ।

| कालिका पुराण वरदान उम देवसेनोऽथ केशिन्या जनयामास पत्रकान् ।।३४ यूय शृणुत सप्ततान्नामत कीर्तितास्तथा । सुमना वमुदानश्च ऋतुधृग् यवन कृतो ॥३५ यौवनाश्व मान्धाता न भी इन्द्र के वधन से अपनी पुत्री केशिनी को इच्छा मे ही देव सेन के लिये प्रदान कर दिया था ॥२६देवसेन ने गिनी के साथ विवाह करके उसी को माथ मे लेकर उसने शम्भु की पुरी वाराणसी म भगवान हर शिव की आराधना की श्री ॥३०॥ आरा- धना किये हुए भगवान् शिव परम प्रसन्न हो गये थे और उसका अभीर दिया था। उसने भी उन भगवान् शम्भु स अपने अभीष्ट तीन वरदान प्राप्त किये थ ।।३१॥ जब तक भगवान भास्कर रहें तभी तक मेरी सन्तात स्थित रहेगी-इसी नगरी म मेर ही वश की राजता रहे ॥ ३२॥ मेरे वश पर आम नित्य हो परम प्रसन्न रहेगे। इन वरी को प्राप्त करके महान् पृती वह दवमन ने भी भगवान् शङ्कर की प्रस. न्नता में उस पुरी का चिरकाल तक उपभोग किया था। देवसन ने मेशिनी 4 उदर स पुप्रा को जन्म ग्रहण कराया ।' ३३-३४ ॥ अब आप तोग उस माता व नामा या श्रवण कीजिए जो विपीर्तित पिये जा रहे हैं। मुमता-~वमुदान-ऋतुधक् -- यवन---कृती-नील- विवा-य सात पुत्र ५ जो समस्त मात्रा में विशारद । य सभी घश वरन याले परम श्रेष्ठ देव सभ्य के पुत्र ५ ॥३५-३६॥ नीलो विवी ह्येते व सवशास्त्रयिशारदा । गये वशवरा पुना देवमनस्य सत्तमा ॥३६ अथ पाने तु सप्राप्ते देवरीनाऽपि भायया । पुत्रेषु राज्य निक्षिप्य यातो विद्याधरक्षयम् ॥३७ गतस्त तस्य तनया यात्वा सुमगस नृपम् । यमुदानादय सर्वे नुभनुश्चात्तमा श्रियम् ।।३८ जाता मुनमम पुवारलप शूरा महायला.।

मदावार वर्णन ] ४१७ . . -- सुमतिश्च विरूपश्च मत्य शास्त्रार्थपारगा ॥३६ सुमतेरभवत् कन्या मुत. मत्यम्य हिण्डिम । विरूपस्याभवद् गाधिधेिमिनोभवन् मुत ॥४० तेपा कल्पोऽभवद्राजा फ्ल्पात तु विजयोऽभयन् । यो विनित्य क्षितिं मा पायिवान् भूरितेजम ॥४१ शस्यानुमते चन' खाण्डव शतयोजनम् । यन् सव्यसाची मदहन पाण्डपुन. प्रतापवान् । आवत परमां प्रीति ज्वरानम्य महात्मन ॥४२ इसके बनन्तर समय के सम्प्रास होन पर देवमेन भी भार्या के सहित अपने पुत्रो पर राज्य का भार डाल कर विद्याधर क्षय को चला गया था ।३७। इसके उपरान उसके पुत्रा न मुमनम को राजा बना कर वसुदाम आदि सबने उत्तम श्री का उपयोग किया था ।३। सुमनस के तीन शूर और महा वलदान पुन ममुत्पन्न हय थे। प सभी शास्त्री वे अर्थ के पारगामी विद्वान थे उनके नाम सुमति--विरुप और सत्य पे ।१६। सुमति की एक बन्या हुई और मत्य वा पुत्र दिण्डिम हुआ था। विरूपका गाधि हुआ और गाधि वा मुत मित्र नामक या था 1101 उनका राजा क्ल्प मे विजय हुआ था जिसने सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत कर बहुत तेज वाले गजाआ का शक्र को अनुमनि मे मो याजन का ग्राण्डव किया था जिमको सव्य साधी बर्जुन ने जो पाण्ड का प्रलाप वाला पुत्र पा दग्धार कर दिया था और महान आत्मा वाले जलन की परमाधिपः पोनि का वहन विया था । ४११४२। कथ स खाण्टव चक्र विजयः शतयोजनम् । तद् वय श्रोतुमिच्छाम क्ययस्व तपोधन ॥४३ सोमवशेऽभवद्राजा महावलपराक्रम । धीर. मुदर्शनो नाम चारम्प प्रतापवान् ॥४४ स व हिमवनो नातिदूरे गह क्त्वा महावनम् । सिंहान् व्याघ्रान् भमुत्सायं क्वचिच्चापि नपोधनान् ॥४५ 1

४१८
[ पालिका पुरान
खाण्डवी नाम नगरीमपरोत तत्र शोभनाम् ।
प्रिंशद्योजनविस्तीर्णामायता शतयोजनाम् ।।४६
उच्चप्राकारसयुक्ता साट्टालाम्पुदतोरणाम् ।
निम्नाभिरतिदोर्धाभि परिखाभि समावृताम् ॥४७
अधृप्यामपरोरेंनिगनासमावृताम्
दीपिकाभिश्चोपवनवहुभिश्चाप्स रोगणं
आयोर्णा च तथारामंस्तमैरपि मानवः ।
सोत्सवाः सतत यत्र जना देवान् दिवि स्थितान् ।।४६
स्पर्धन्ते स्म मुदा युक्ता आसा-भोगसमन्विताः ।
समदर्शनो राजा तवा भमि विदार्य च ॥५०
11४८

४२.
[ कालिका पुराण
खाण्डवो मे रोपित किया था ॥ ५४-५५ ॥ भगवान् विष्णु से भी
विष्णु ने उस नृप सुदर्शन को उपचार किया था और प्राय देवो का
तथा मनुष्यों का जयशाली वाराणसी के स्वामी विजय को कृत साचिव्य
को के लिये उसके वर मे योजित किया था॥५६---५७॥
विजयो विवर प्राप्य महावलपराक्रम ।
सुदर्शनस्य नृपतेरवस्कन्दमयाकरोत् ।।५८
असहन स ह्यवस्कन्ध विजयस्य सुदर्शन ।
चतुरङ्गवलेनाशु युद्धायाभिमुखोऽभवत् ।।५६
विजयो रथमारुह्य नियोज्य चतुरङ्गिणीम् ।
तत सुदर्शन योधु मम्मुखोऽभवदञ्जसा ॥६०
तदा महायुद्धमासोद्विजयेन महात्मना ।
सुदर्शनस्य नृपतेर्वृत्रवासवयोयया ॥६१
सुदर्शनस्य सेनानी रुमण्वान्नाम वोयवान् ।
वाचन रथमारुह्य विजय समुखोऽभ्ययात् ।।६२
अक्षौहिण्यस्तु सप्नास्य परिवार्य समन्तत ।
व्यप्रमता शत्रुमेना यावतीमुद्यतायुध ॥६३
महान् बल और पराक्रम वाले विजय न पियर की प्रामि
पर नृप मुदर्शन वा अब स्कन्दन किया था ।। ५८ ॥ उस मुदर्शन ने
विजय अब मधो गहन किया था और चतुरङ्गिणी गेना में
शीघ्री सुर परने लिये समुचत हो गया था ॥५६॥ विजय अपने
रथ पर गमारूद होकर चतुरङ्गिणी या नियोजित पर फिर सुदर्शन
के साथ मुर परन में लिए शीघ्र ही राम्मुख हुभा था ।। ६० ॥ फिर
महारमा विजय साय महान् मुट हुआ था। गुदर्शन राजा पा युर
मा हो पा जमे वृत्रासुर और इन्द्र का मुरहुआ था ॥६१॥ गुदर्शन
पागलानो जिममा नाम रमवान् पा रही अधिक वीर्यवान था।
दर मोने में रप पर मवार होपर विजय के सम्मुखमा पा ॥१२॥

मदाचार वर्गन ] ४२१ उधन आयुधो वाला होकर इमने उसकी मा अक्षौहिणी नेना को चारी ओर मे पैर कर जितनी भी शत्रत्री मेना थी उमको आक्रान्त का दिया या ॥६॥ विजयस्य च मेनानी मञ्जय स रिपुञ्जय । नागानीकेन जग्राह मण्वल ससैनिकम् ॥६४ तयोर्महदभूद युद्ध सेनान्यो:रयोमंहत । ववषं शरवण रुमण्वानय सजयम् ॥६५ कुर्वश्चापि महानाद गज दृष्टवैव केशरी। समपानय विशत्या वाणविद्ध्वाय सञ्जयम् ॥६६ क्षुरप्रेण धनुस्तस्य चिच्छेद पृतहम्नवत् । मोऽपि कामु कमादाय तदाऽन्यत् सजयस्तिमि ॥६७ वाणविव्याध भल्लेन धनुचिच्छेद तत्क्षणान् । शतान्यप्टी च नागाना सहस्राणि च पचपट् ॥६८ पत्तीना वाज्निा तोणि महराणि ममन्नत । मजयो निजंघानाशु वाणवर्ष मुदारुण ॥३६ अयान्यद् धनुगदाय मण्वान पिता भृशम् । भन्नेन सारथैग्स्य शिर वायादपाहरद ॥७० विजय मा जो मेनानी था उसका नाम मन्जय था और वह रिपुत्री का जीतने वाला था। मायो की सेना के द्वारा उगने सैनिकों ये महित मण्वान ये मायने ममुपस्थित को यो ।। ६१॥ उन दोनों वीर मैनानियो का यहत भारो युद्ध हुआ था। इमर बननर प्रमदान ने परी को वां से मन्जयो पैर लिया था ॥१॥ गज की देखरर गरी पो हो भौति बड़ी मारी गर्जना करते हुए ही रमाशन, ने बीम वापों के द्वारा मजय वो देघ दिया था ॥६६॥ वृत हस्त को दो हिन्नर दिया था। उस मम्चय ने भो उमो ममय में घनुप लेरर तीन रापों के द्वारा प्रहार पिया या द्वारा उम १२२ [ कालिका पुराग ॥६७ ॥ वाणो मे वैधन विपापा और भाले में उमी क्षण म धनुष का काट दिया था। आठ मो हाथियो पांच छ हजार पत्तियो को और तीन मत्य अश्वो का मजय ने अपन चारो ओर मुदारुण गाणो की वम नही मार गिराया था। ६५-६॥ इमरे अनन्नर दूमगे आर में घनुप पहण पर बहुत ही अधिर बुपित हो गया था और मालेवारा इमर मारपिया शिर गैर सपाटार अलग गिरा दिया पा॥७॥ हयारनाम्य चतुभिस्त यानिन्मे यमक्षयम् । पतुर पनिवपिंगपिघ्यच्चापि मन्जयम् ॥७१ माजयोऽप्यतिवेगेन गदामादाय तत् क्षणात । अवतीयं रथोपरयामप्यन्तमधामत ७२ म धावन्न गरजय त रमवान् द्रुतहस्तयत् । गग्यपंग माछाप वारयामास मजयम् ।।७३ माया भ्रामगनामो निवार्य भगवनम् । भागगाद मपन्न गरीष महागमम् ॥७४ भागाध मा गदा गुर्वोमाविष्यातीय गाय । एनव माण मय । पापा ७५ मन मापीर दिया गया हल । पराली पर सवनमध्यण ॥ रममन मिनिन दवा गा गुरगंग । गावि गया पताका मदाचार वर्णन रुमण्वास ने शरोमी वर्षा के द्वारा सच्छादित करके सञ्जय को वारित कर दिया था ।। ७३ ॥ इमने गदा दे फिराने से सिंह जैस महान गज हटा दिया करता है उमी भांति झगे की वर्षा करने वाले रुमण्वान को हटाकर उसके समीप में प्रास हो गया था॥ ७४ । सञ्जय ने उसके पास पहुँच कर उस बड़ी भागे गदा को अविद्ध करके अपने एक ही प्रहार के द्वारा रथ के महित उसको व्ययोषित कर दिया था ।। ७५ ॥ गदा मे हन होकर वह महान वीर पृथ्वी में गिर गया था। जैसे धन फ मध्य मस्थित शाल का फूला हुआ वृक्ष वज़ म हत होकर गिर जाया करता है ।। ७६ ॥ राजा मुदर्शन ने रुमण्वान को गिरा हुआ देखकर वह घूम के महित पावक की ही भांति शोर और कोप से समाविष्ट हो गपाथा॥७७॥ जज्वालाकुलदेह'ऽपि नोधैनातीव सयुत । आरुह्य जवन रश्वयुक्त वयाघ्रकृतिना (१७८ रथ काचन-चित्राग मिहध्वज-विभूषितम् । आमुक्तो धनुरादाय विस्फाय च पुन पुन ॥७६ मसैन्य मजय राजा ममाद्रवत वेगवान् । अथास्य निशिन शस्त्र सेनामग्रगता भृशम् ॥८० गहनत सकला राजा मृगानिव मृगाधिप । एकामक्षोहिणीमग्रगामिनी विपुलौजमाम ॥२१ मोशद्वयेन न्यनत् तमामोव दिवाकर । हत्वा चाक्षौहिणीमेकामासाद्य सजय नृप ॥२ वाणं. पप्ट्या तु विव्याध ध्वजमेन चिच्छिदे। मजयोऽप्यथ विशत्या हृदि विद्ध्वा सुदर्शनम् ।।८३ ललाटे वैचाणेन प्राविध्यत् कृतहस्तवत् । क्षरप्रेणास्य कोदण्ड टित्या राज्ञ प्रतापवान् ।।२४ यधिक क्रोध मे पुत्त होरर ममाल देह वाला मो वह ४२४ [ कातिया पुराण ग्वलित होगया था। वह वेगवान् अश्वों से युक्त और व्यान वे वर्म में समृत सुवर्ण के चित्रित अङ्गा वारे-मिह पी ध्वजा में भूपित रय पर आरूढ होकर आमुक्त म्वनुप को ग्रहण कर्म यारम्वार विम्पारित करता हुआ वेगवान् राजा ने सैनिकों के सहित मजय को ममावित किया था। इसके अनन्तर अपने पैने अस्वीरे द्वारा मेना के आगे बहुत ही अधिक सम्पूर्ण सेना का मिह हिरनी को जैसे निहत करता है ठीक उसी भांति हनन कर दिया था। बहुन योन वाल वोरो की अ गामिनी एक अक्षौहिणी सेना हनन कर दिया था ॥७-८१॥ जैस सूर्य अन्ध गारो को नष्ट कर दिया करता है उसी भौति दा कोश तक निह्नन किया था। राजा एक अक्षौहिणी सेना का हनन करके सञ्जय के समीप मे प्राप्त हो गया था ।२। राजा ने आठ वाणो से वैधन किया था। और एक वाग के द्वारा ध्वजा को छिन्न कर दिया था। इसके उपरान्त सञ्जय ने भी वीम वाणा स सुदर्शन के हृदय म वेधन किया था ।३। कृत हस्त को भारत एक वाण से ललाट में वेध किया था । भुरण के द्वारा प्रताप वाले ने राजा के दण्ड को छिन्न कर दिया मा ||४|| सारथि दशभिर्वाणं पुनर्विव्याध सञ्जय । कोदण्डमन्यमादाय नदा राजा सुदर्शन ॥५५ शरवण तोद्रण ववर्षातीव सञ्जयम् । तयोमहदभूद युद्ध मुनिविस्मयकारकम् ॥८६ शस्त्रस्त्रभृश तीक्ष्णलिवासवयोरिव । तत सुदर्शनो राजा भल्लेनास्य दृढ धनु ।।८७ चिच्छेद सारथि चास्य जधान निशितं शरे । स्वय सयम्य वाहान स सन्जय परवीरहा ॥ धनुरत्यत् समादाय परिवार्य सुदर्शनम् । विव्याध दशभिर्याणर्धनुरप्यच्छिन दृढम् ॥

मदाचार वर्णन
४२५
शरामनान्तरं राजा समादाय सुदर्शन ।
मजयम्य चतुर्वाहाम्छनिन्यै यमक्षयम् ॥६०
मुटौ धनुश्च विच्छेद त व विव्याध पभि ।
विरयश्छिन्नवाहश्च मजय गचमणी ।।६१
मन्जय ने फिर दश दाणो से मारथि का वेधन उसी समय में
पर दिया था। फिर राजा सुदर्शन ने अपना प्रनुप का आदान दिया।
। ८५1 अत्यधिक गरों को तीन दपा म मन्जय का निमग्न-मा कर दिया
था। उन दोनों का मनियो के विस्मय उत्पन्न करने वाला महान यद्ध
हुआ था।८६ । दान और वानव इन्द्र की ही तरह में वह पुद बहुत
ही तीक्ष्ण शस्त्रो मे तथा अस्त्री में हुआ था। फिर राजा सुदर्शन ने
अपने माले के द्वारा इसके घर धनुष को काट गिराया था 1८७. उपने
अपने पैो वाणो के द्वारा इस मारथि वा हनन पर दिया था। उम
मन्जय ने जो शत्र के वीरो का हनन करने वाला या म्य ही अपने
वाहनो को मर्यामत करके अन्य धनुप का बादान करके मुदर्शन को रेर
कर दश वाणी में वेतन दिया था और मई मुन घनुप का ऐदन कर
दिया था ICICI मुदर्शन न अाय धनुष का ग्रहण से मुजय के
घार वाही ना यमपुरी भेज दिया था 1801 मुट्टा म रहने बाले धनुप
मोधिन्न कर दिया था और पाच वाणी म उमका विद कर दिया था।
सञ्जय रथ मे हीन होकर जिम बाह छिन्न हो गये थे उसने पङ्ग
और ढाल को ग्रहण क्यिा पा ।६१।
आदाय सम्मुख राजेऽभ्यद्रवत् कुपितो भृशम् ।
तस्य चाप तत. खड्ग क्षुरप्रेण मुदर्शन. ॥४२
द्विधा विच्छेद भल्लेन चर्म चाम्यन्छिनत्तदा ।
अय द्रुन तदोपेत्य सन्जय. स्यन्दनोत्तमम् ॥३
मुदर्शनस्य सूत तु कराभ्या पातयन् क्षिती।
रपान्याशे गतम्याम्य सञ्जयस्य सुदशन. ॥६४

४२६
[ कालिका पुराण
शिरश्चिच्छेद खडगेन ततोऽसौ न्यपतद् मुवि ।
स पपात तदा तस्य रथाभ्याशे महावल ||६५
कृत्त परशुनाऽरध्ये पुष्पित शालवृक्षवत् ।
सञ्जय पतित दृष्टवा विजय बोधमूच्छित ॥६६
महता शखनादेन नादयस्तु नम स्थलम् ।
रथेन स्वर्णचित्रण व्याघ्रचर्मविराजिना ।।६७
केतुना वृषभेणाथ योजना|च्छ्रितेन च ।
नादयन ककुभ सर्वा रथोघपरिवेष्टित ॥६८
विमुञ्चञ्छपवर्षाणि समाद च सुदर्शनम् ।
आसाद्य त नृप भूपो विजय परवी रहा ।।
और ढल को लेकर अत्यधिक कुपित होते हुए राजा के
सम्मुख धावा किया था। फिर सुदर्शन ने शुरप्र के द्वारा उसके चाप
और खङ्ग के टुकडे कर दिये थे 1६1 उम अवसर मे भाले में ढाल के
दो टुकडे कर दिये थे। इसके उपरान्त शीघ्र ही समीप मे जाकर
मञ्जय उसके उत्तम रथ पर पहुंच गया था और सुदर्शन के सारथि को
उसने अपने हाथो से भूमि पर दिया था। रथ के ममीप मे गये हुए इस
सञ्जय का शिर खङ्ग से काट डाला था और फिर यह भूमि पर गिर
गया था। यह महान बलवान् उसके रथ के ही ममीप म उस समय मे
गिर गया था ॥६३-६५॥ धन म पुष्पो वाले शाल के वृक्ष की ही
भौति कटा हुआ और गिरे हुये मञय का अवलोकन करके विजय
क्रोध से मच्छित हो गया था । ८६ । वडे भारी शय की ध्वनि स नाद
करते हुए जिससे आकाश मे गूज हो उठी थी। व्याघ्र के चर्म से
विराजित-स्वणं से चित्रित-रथ के द्वारा जो वृषभ केतु स युक्त था
जो कि आधे योजन ऊंचा या- सभी दिशाआ म गूज करता हुआ
रयों के समुदाय से परिवेष्टित हावर शरी की वर्षा करते हुय सुदर्शन
पे समीप मे प्राप्त हुमाया। शन वे वीरो के हनन करने वाला रागा
विजय उम राजा के पास पहूँच गया था ६७-६६॥

पदाचार वर्णन ]
४२७
हदि विद्ध्वा त्रिभिर्वाण स्तिष्ठतिप्ठेति चाबवीत् ।
सुदर्शनोऽपि विजय नदन्त कु जरोपमम् ॥१००
दशभिनिशिताणविदध्वा चिच्छद तद् धनु ।
अर्थन छिन्नधन्वान जब देशे विभि शरं ॥१०१
निर्भिधाय महानाद ननाद स मुदशन 1
मोऽन्यधनु समादाय पत्रिाम शरै ॥१०२
विव्याध हृदय वीरो विजयोऽपि सुदर्शनम् ।
ततस्तन्नृपमुद्दिश्य महाशक्ति नुदापिताम् ।।१०३
नागकन्या कोपयुक्ता लेलिहानामिवातुलाम् ।
स्वर्णदण्डा सुतीक्ष्णाग्रा तंगधोता सुनिर्भलाम् ॥१०४
समुद्यभ्याचिक्षेप विजय शात्रव प्रति ।
सुदर्शनम्प हृदय मा शक्ति प्रविवेश है ॥१०५
उमन तीन वाणो में द्वारा हृदय में वरन से गडा र मुडा
रह-यह बोला था । मुदर्शन न भी हाथो में ममान गर्जन करत हुए
विजय को अपन दग वाणो के द्वारा वधन करके उसके धनुप को काट
गिराया था। मा अनलर कटे हुए धनुष वाल इसको तीन वाणी में
शाको विद्ध कर दिया था। और फिर मुदर्शन ने महान नाद
किया था उमन भी दूमर धनुष का आदान दिया था कर
पत्र वाले तीन घरों में दाग वोर विजय ने मुदर्शन के हृदय में
वेधन दिया था। इमचे उपरान्त नृप का उद्देश्य करके उमन मुदीपित
महा शनि का ग्रहण किया था 1१००-१०३॥ वह महा शक्ति पोष
जीभ को लप लपाती हुई अनुपम नाग कन्या के ही तुल्य गी।
उसमे मुवर्ण का दण्ड लगा हुआ था-~-उमा अग्रभाग बहुत हो तो
पा-वह तेल में धुली हुई सुनिर्मल यो । ऐयी महा शक्ति को लेकर
विजय न शत्रु को योर उमका प्रवेपण किया था। और वह भक्ति
मुदर्शन रे हृदय में प्रवेश कर गयी थी 1१०१-१०५।
में

४२०
[ पालिका पुराण
स विह्वलो रथोपस्थे ह्यधोवक्त्र उपाविशन् ।
तस्मिन् मोह-समापन्ने नृपती च सुदर्शने ।।१०६
तस्याग्रतस्तथा पाश्व ये स्थितास्तत्र सनिका ।
तान् सर्वानहनद्राजा क्षणमात्राद् द्विजोत्तमाः ।।१०७
रथान दशसहस्राणि सावन्त्येव च दन्तिनाम् ।
पचविंशसहस्राणि वाजिना च तरस्विनाम् ।।१०८
लक्षद्वय तु पत्तीना क्षणमात्रादपोथयत् ।
स तु लब्ध्वा तत सज्ञां धनुरादाय वै दृढम् ।।१०६
शरवण विजय ववर्ष म सदर्शन ।
निवार्य शरवण विजय तु सुदर्शन ।।११०
भल्लेन काम के सज्य तस्य चिच्छेद तत्क्षणात् ।
मारयेस्तु शिर कायाद् मल्लेनापाहरत तत. ॥१११
हयांच चतुरश्चास्य प्रेषयामाम मृत्यवे ।
अयंव विरथ भूप दशभि यद्धपत्रिभिः ॥११२
वह विह्वल होकर नीचे की ओर मुप वाला रथ के ही ममीप
में बंट गया था। उम नृप मुदर्शन ये मोह को प्रारा हो जाने पर उसके
भागे की ओर तथा पार्म में वहाँ पर जो गनिम स्थित थे दिजोत्तमो !
गरा ने एक ही क्षण भर म उन मय वो मार गिराया था ।१०६।१०७॥
दश हजार रपी को--और उतने ही हाथियों पा-यडे वेग पास अभी
पी वीग हमार महया और दो माग पहातियो यो क्षण भर में मार
निगमा पा । हमरे उपरान्त होगम आकर तथा मुक नुप लेकर
गुर्गन ने पिर पर रोकी वर्षा की पी १०८1१०६।११०॥
गरे गग्य पाप को मारे बारा उगी क्षण में हिनदिया
पा । और मारविरामिर रामगर र दिपा पा ।१११और
र पार भयो । मृत्यु मुह में भज दिया था। गा माता
बिना बाप पवादा पनी तारा-विर स्पिा
था ॥1

सदाचार वर्णन ]
૧૮
विव्याध हृदये भूयो ननाद च सुदर्शनः ।
सच्छिन्नधन्वा विरयो गदामादाय वेगवान् ॥११३
विजयो विजयाकाडक्षी सुदर्शनमधावत ।
आपतन्तं महावीर वाणवः सुदर्शन ॥११४
ववर्ष वर्षासु यथा दारिदः पृथिवीधरम् ।
विजय. दशरवृष्टि ता प्राच्छाद्य स्वशरेण वै ॥११५
गदया तं रथाइटमाससाद तु तत्क्षणात् ।
यासाद्य त महावीर्य विजयोऽय सुदर्शनम् ॥११६
शा प्रहृत्य गदया पातयामास भूतले ।
गिरेः शृङ्ग यथा तुङ्ग वयाशनिविदारितम् ॥११७
तथा सदर्शनो राजा दारितो गदयापतत् ।
तस्मिन्निपतिते वीरे सेनाभिस्तस्य सैनिका. ॥११८
भयात् सप्राद्रवंस्तस्माद् दिशश्च प्रदिशस्तथा।
नप्टेयु तस्य सैन्येषु विजय. खाण्डवी पुरीम् ॥११६
मुदर्शन नं फिर हृदय म वैधन करके फिर गजना की थी। वह
हुए धनुप बाला और बिना रप वाला होकर वेग से युक्त ने गदा ना
बादान किया था ॥ ११३ ॥ विजय की इच्छा वाले विजय ने मुदर्शन
पर धावा दिया था। सुदर्शन ने कार से पतन करने वाले महान् वीर
पर वागो को वर्षा की थी जमे वर्षा ऋतु में बादल पर्वत पर वषां किया
करता है । विजय ने उस वाणांश अपने गरो से प्रच्छादित परको गदा
मे उसी क्षण में रथ पर ममारूद हुए उसरे ममीर में समामादान किया
था। उस महान वीर्य वाले के पास पहुंच कर सुदर्शन के शिर में प्रहार
कर उनको भूमि पर गिग दिया था। जिस प्रकार से बजे
दिदी किया गया पर्वत का कैचा शिखर गिरा करता है ।। १११-
११७।। मुदर्शन गदा के प्रहार से विदारित होकर गिर गया था। उस
बोर के गिर जाने पर उसको मेना में मैनिक उस पुट म्पल से दर से
-
द्वारा

[ कालिका पुराण
भीत होते हुए दिशा-विदिशाओ मे भाग गये थे। उसकी सेना के
मैनिको के नष्ट होजाने पर विजय ने खाण्डवी नाम वाली नगरी में प्रवेश
क्यिा या ॥११८-११६॥
प्रविश्य ददृशे तत्र राशीभूतान् गिरीनिव ।
सुवर्णाना च रत्नाना सचयान् बहुश पुन ॥१२०
दृष्ट्वा सगसि तप प्रफुल्लकमलानि च ।
हसकारण्डवानादर्नादितानि ममन्तत. ॥१२१
राशीन् सुवर्णरत्नाना पर्वतानिव विस्तृतान् ।
पुष्पितान् देववृक्षाश्च भ्रमभ्रमरभूषितान् ॥१२२
प्रासादान् विपुलाञ्छुभ्रान् कलाससदृशान् गजान् ।
प्रस्फुटाश्च सुगन्धाढमान् प्रतिगेहे व्यवस्थितान, ॥१२३
उत्फुल्लनयनो राजा विजय परवीरहा ।
मेनेभरावती ता तु पुरीम् क्षितिगतामिव ।।१२४
त वीक्षन्त नरपति नगरी ता सुरेश्वर ।
ममेत्य विजय प्राह मान्त्वयन, श्लक्ष्णया गिरा ॥१२५
उगने नगरी में प्रवेश परपे वहाँ पर एकसित पर्वतो वो ही
भौति राशीभून मुणों को तण रत्नो ये तरीको बास तादात में देवा
पा।। १२० ॥ वह पर पिने इप बमली धाये गगवरी को देवा या
गहमो और वारण्या नाद ग गभी आरग निहित पा१२१। पर्वतो
रेही गमान गुर्ग और रामोनेरी दो या पा-मम हुए
भारो
में विभूपित और गत दस वृक्षाका देवा पा ।१२२। महत पुन
मामाकोशी नया साग गाम हापियो को देगा था जो प्राट
गुमर म गे पुल प्रया पाम पारिपत घे ॥१२३॥ गोपा
हनन ने वामी यि नरिमन गप में । उगन उग
समीराम पर गमागमापली ही मागापा ।१२ ग
रामपुर नारेल पाम गुरम प्रारम
Fitrarम उमामाखमा एमा 11२॥

सदाचार वर्णन }
राजन, महावनमिदमासीद् देवगणावृतम ।
न च गन्धवयक्षाणा मुनीना च मनोहरम् ॥१२६
सर्वानुत्सायं देवादीन् मम चाप्यप्रिये रत ।
भड क्त्वा वनमिद गुह्यमुत्साद्य च तपोधनम् ॥१२७
खाण्डवी नगरी चक्रे हताद्राजा सुदर्शन ।
तदिद पुनरेव व वन कुरु नरोत्तम ।।१२८
तनाह विहरिप्यामि तक्षकेण सम रह ।
मुनीना च तप स्थानमतुल ते प्रसादत ।
भविष्यति च यक्षाणा किन्नराणा च पार्थिव ॥१२६
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य शत्रस्य विजयस्तदा ।
वनमेवाकरोन तान्त खाण्डची शगौरवात् ।।१३०
गच्छन्तु भो यथास्थान प्रजा सर्वा यथेच्छया।
येषा वान्छास्ति लोकाना मद्राज्यगमने पुन ।।१३१
वाराणसी ते गच्छन्तु मयव प्रतिपालिताम् ।
ततस्तस्य वच श्रुत्वा जना चिन्निजास्पदम् ॥१३२
जग्मुराणसी केचिद् विजयेनाभिपालिताम् ।
तता धनाना तान राशीन, रत्नाना च पृथक् पृथक् ।।१३३
मणीना कनवाना च कुप्याना विजयस्तथा ।
विविधरियामास पुरी वाराणसी प्रति ॥१३४
इन्द्रदेव न यहा~हे राजन, यह महावन देवगणो स समावृत
था। यह गधर्व -यक्ष और मुनियों से समावृत और परम मनाहर
पा। राजा सुदर्शन ने दव आदि सबको यहाँ से उत्सारित करके मेरे
अप्रिय पार्य करने म रत होता हुआ उसन इस वन या भङ्ग बरवे गुह्य
तपाधन को उत्साहित करप राजा न ह स पाण्डवी नगरी की रचना
को पो। है रोत्तम माप पुन इसका उत्तम वन बना दीजिए १२६..
१२८ ।। वहाँ पर में तसर के साथ एकान्त म विहार पगा। यह

{ बालिश पुराण
-
आपके ही प्रसाद स मुनिगणो के तपश्चर्या करने का अनुपम पान
होगा । हे पाथिब । यह यक्षो या और किन्नरो का भी उत्तम स्थान
हा जायगा ।। १२६ || मार्कण्डेय महर्षि ने कहा--उस समय मे इन्द्रदय
के इस वचन का विजय ने श्रवण करके इन्द्रदेव के गौरव से उस खाण्डवी
नगरी को विस्तृत वन ही बना दिया था ॥ १३०॥ समस्त प्रजाजन की
इच्छा के अनुसार यथा स्थान पर गमन कर जाव । जिन लोगों की
पुन मेरे राज्य में गमन करने की इच्छा होवे व बाराणसी में गमन कर
जावे जो कि मेरे द्वारा ही प्रतिपालित पुरी है। इसके उपरान्त मनुष्या
ने उसके वचन का श्रवण 'कया और कुछ लोग अपने ही स्थान को गमन
कर गये थे ।। १३१ - १३२ ।। और कुछ लोग विजय नृप के द्वारा
अभिपालिता वाराणसी मे चले गये थे। इसके अनन्तर धनो को तथा
रत्नो को गशियो को अलग-अलग और मणिया-कनको और पुष्पो की
राशियों को विजय ने अनेक साधनो के द्वारा वाराणसी नगरी की ही
ओर वारित करा दिया था।१३३-१३४ ।।
गन्धर्वाणा च देवाना यदानीत हठात् पुरा ।
रत्नदादिक यत् तु विजय तत् प्रसाद्य च ॥१३५
तैस्तीत च खाण्डव्या स्वस्थान हनिहर्षित ।
निशद्योजनविस्तीर्णा शतयोजनमायताम् ॥१३६
ता पुरी विजयश्चा नचिरादेवे व वनम् ।
तस्मिञ्छकस्य सम्मत्या तक्षक सहितो गण ।।१३७
उवास सुचिर तत्र नतोऽभूनिर्जन वनम् ।
तत्र देवा सगन्धर्वा प्रीडन्तेऽप्सरसा गणा ॥१३८
आशसन्तश्च विजय रणेषु विजयावहम् ।
प्राप्तेऽप्टाविंशतितमे युगे द्वापरशेपत ॥१३६
पनि ह्मणरूपेण भिक्षा जिष्णुममावत ।
दातुमङ्गीकृते भिक्षा तदा पाण्डुसुतेन वै ।।१४०

मदाचार वर्णन } करके उन- के प्राप्त गन्धर्वो गे और देवों की जो पहिले हह में रल दारु जादि की राशिमा साई गयी थी और विजय के ममोप में घी--विजय से प्रसन्न उन्होंने प्रनिर्षित होकर माण्डवी में अपने स्थान को नीत किया था। विजय ने तुरन ही तीम योउन विस्तीर्ण मो योजन आयत उस पुरी को वन बना दिया था। उस वन में इन्द्रदेव की सम्नति में अपने गणों के साथ तक्षक ने निदास किया था ।१६५-१३४४ वहाँ पर तमक बहुत समय तक रहा था और फिर वह निजन वन बन गया था। वहाँ पर गन्धवों के माय दवगण और अप्सराओ के समुदाय आनन्द को कोटा किया करते हैं ।१३८१ वे मर पृद्धो में विजय प्रदान करने वाले विजय की चर्चा किया करते थे। अट्वाईमाँ युग होने पर द्वापर के शेष में वह्नि ने विष्णु म ब्राह्मण के रूप मे भिसा का याचना को यो । पाण्ड के मुत के द्वारा मिक्षा देने की स्वीकृति दे दी गई थी ॥१४॥ वह्नि स्वरुपमास्थाय जिष्णु वचनमब्रवीत् । अहमग्नि. पाण्डुपुत्र याभागाभिभोजनात् ।।१४१ व्याधितोऽह ततो व्याधि तम त्व नाशयाधुना । खाण्डव नाम विपिन मपनिमृगराक्षसम् ।।१४२ यदि त्व मा भोजयितु शक्रोपि श्वेतवाहन । तदा मम ह्यसो व्याधिरपयास्यति नो चिरान् ।।१४३ पुरा तु विजयो राजा पाण्डवी नाम ता पुरीम् । भर परवा वन पनचके तेन तत् सापडव वनम् ।।१४४ मदर्थ देवविहित वन तु श्वेतवाहन । विरोधात् तत् तु शरम्य न स्वय भोक्तुमुत्सहे ।।१४५ तस्मात् माहि महाभाग वने तम्मिन्नियोजय। पथाह सफल भोक्तु शक्नोमि तत्प्रसादतः ॥१४६ तस्य तद्वचन श्रुत्वा सव्यसाची महाबलः । दाहयामाम विपिन तत्सर्व प्राणिसयुतम् ॥१४७ [ वालिका पुराण वाह्न ने अपने स्वरूप में स्थित होकर विष्णु से यह वचन कहा या हे पाण्डु पुत्र मैं अग्नि हूँ--यज्ञ भागो के अभि भोजन में मैं व्यधित हो रहा है । अब आप ही मेरी इस व्याधि का विनाश कीजिए। खण्डव नाम वाला विपिन है जो पक्षी-मृग और राक्षसो मे समन्वित है ।।१४१-१४२॥ हे श्वत वाह्न । यदि आप मुझको भोजन कराने म ममर्य हैं तमी मेरी यह व्याधि शीघ्र ही नष्ट हो जायगी ।। १४३ ॥ पहिले ममय म विजय नाम वाले वे पाण्डवी नाम की उस पुरी को भङ्ग करके इस वन बना दिया था इसी कारण से यह खाण्डव बन है । हे श्वेत वाहा । यह दवो के द्वारा विहित वन मेरे ही लिए था। इन्द्रदेव रे विराध म मैं स्वय इसका भाग वरन का उत्साह नही परता हूँ॥१४४ ---१४५।। हे महाभाग । इसी कारण स आप परित्राण करिए और उस वन म नियाजन वोजिए। जिस रीति से मैं सम्पूर्णमा भोग करन लिए आप प्रसाद म पैं समय हो सकता महान बलवान् सध्यमाघी न उसमे इस वचन का श्रवण करके उग सम्पूर्ण वन या ओ विप्राणियों से समन्वित था दग्ध कर दिया था ॥१४॥ देवजीतनयेनामी वासुदेवेन पालित । याण्डव दाहयामाग ज्वलनरय हिते रत ॥१४८ गुप्रीन प्रददो राम्मादनाय महात्मने । घनिधनुश्न गाण्डीव वारुण दयनिमिराम् ।।१४६ अक्षम्प पेपुपी दिव्ये रूपाडवाश्चतुरो हयाग । एन मताधिरिन सु महान्त वानरराजम् ॥१५० पडा प त्रिगिय तोरण दन गप्पसापिगे। गोरोगशामवद निग्नपा जिष्णुप्रगादत. ।।१५१ मणिलेग पनुपा तर राहगंग पंगा। तस्यायनानि विजिग पारगुनो रिपन् ॥१५२ सदाचार वर्णन ४३ एवं भैरववंशेषु सजातो विजयो नृप । खाण्डव नाम विपिन चकार सुमहाकृती ॥१५३ विजयस्य सुता जातस्त्रयोदश महाबलाः । द्युतिमान् सौम्वदर्शी च भूरि, प्रद्युम्न एव च ॥१५४ ऋतुस्तुण्डो विरूपाक्षो विक्रान्तोऽय धनजपः । प्रहपं प्रवल. केतुस्तथोपरिचरोपरः ॥१५५ यह देवी के आत्मा भगवान् वासुदेव के द्वारा पालित है। अग्नि के हित करने में रति रखने वाले ने उम खाण्डव वन को जला दिया था ॥१४॥ परम प्रसन्न होकर बलि ने इसी कारण से महात्मा अर्जुन यो गाण्डीव धनुष जो देवों द्वारा निर्मित और वारुण या प्रदान किया था ॥ १४ ॥ और अक्षय-दिव्य औषधियां दी थी और सुरूप मे नयुत चार अबहनुमानजो में अधिष्ठित वानर ध्वजा वाला महान रम--सङ्ग-धीक्षण त्रिगिख बग्नि ने मध्य साची ( अर्जुन ) को दिये थे। तथा विष्णु के प्रमाद म बहिन रोग से रहित होगया था ॥१५०-~- १५१॥ फाल्गुन (अर्जुन ) ने उन वाणरे मे--उस धनुप मे बङ्ग मेवेतु से उन अश्वो वाले रथ में शत्रुओ पर विजय प्राप्त की थी 11१५२।। इस प्रकार से भैरव के शो में विजय नृप जो महा यावृति चाला था उसने खाण्डद की विपिन कर दिया था।॥ १५३॥ विजय राजा के महान बल बाने तेरह पुत्र हुए थे। उनके नाम छ तिमान- मौम्यदर्शी-भूरि-भय म-तु-तुण्ठ-विरूपास-विक्रान्त---धन- नय-प्रहर्ष-प्रवल-केतु और उपरिधर थे।। १५४-~-१५५ ।। एपा राजाऽभवद् वीरः शेपोपरिचरस्तु य.। वाराणस्या नगर्या यो यनलक्ष पुराऽकरोत् ।।१५६ लक्षयज्ञकरः कोऽपि नासीन्नापि भविष्यति । राजा क्षिती महाभागो यथोपरिचरस्तथा ।।१५७ एपां मूतिप्रसूतश्च व्याप्त सर्वमिद जगद ।

४३६ [पालिका पुगण चिरेण तान् क. सख्यातुशक्नोति भुपि मानुप. ॥१५८ क्रमाद् भैरवय शेन व्याप्त लोकप्रयं स्थिदम् । एतद् व. कथित विप्रा. सन्तान भैरवस्य तु ॥१५६ येषा थत्वा कथामात्र नापुत्रो जायते नरः । इद य कीर्तयेत् पुण्य चरित विजयस्य तु ॥१६० सतत विजयस्तस्य जायते न पराभव । एकाग्रमनसा यस्तु शृणुयादिदमुत्तमम् । तस्य वशस्य विच्छेदो न कदाचिद् भविष्यति ।।१६१ इन सबा राजा वीर हुआ था जो शेषोपरिचर या जिसने वाराणसी नगरी मे पहिले एक लाख यज्ञ किये थे ॥ १५६ ॥ एक लाख यज्ञों के करने वाला कोई भी नहीं हुआ था और न भविष्य में भी होगा। पृथ्वी मे महाभाग राजा था वह जैमा उपरिचर था वैसा ही था ।१५७॥ इनके पुत्र-पौत्र-प्रपौत्रो से ही यह सम्पूर्ण जगत् व्यास है । भूमण्डल मे ऐसा कौन-सा मनुष्य है जो बहुत लम्बे समय में भी उनकी गिनती कर सकता हो । अर्थात् ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं है ।।१५।। क्रम से भैरव के वंश से यह तीनो ही लोक व्याप्त हो रहे हैं । हे वित्रो । यह मैंने आपके समक्ष भैरव की सन्तति का वर्णन कर दिया है। इनकी केवल कथा ही का श्रवण करके जो पुत्र रहित होवे ऐसा वह कभी भी हो नहीं सकता है। विजय के इस परम पवित्र परित्र का कीर्तन किया भरता है उसका सदा ही विजय ही होता है और पराभव कभी भी नहीं हुआ करता है । जो एकाग्र मन मे इस उत्तम चरित्र का श्रवण करता है उसके वश का विच्छेद कभी भी नहीं हुआ करता है और न होगा ही ॥१५६--१६१॥

पोडशोपवार वर्णन ]
१३७
॥ षोडशोपचार वर्णन ॥
उपाचारान् प्रवक्ष्यामि शृणु पोडश भरव ।
ये. सम्यक तुप्यते देवी देवोऽप्यन्यो दि भक्तितः ॥१
आमनं प्रथम दद्यान पोप्प्यं दारवमेव वा ।
धान्य वा चामणं गौश मण्डलस्योत्तरे सृजेत् ।।२
पदव दीयते पदमे मण्डलस्य तदुत्सृजेत् ।
वाक्पुप्पतोच कुसुमं विना यच्छादक भवेत् ॥३
पद्यस्य तद्वहिर्देशे द्वारादो विनिवेदयेत ।
अध्यं पाय चाचमन म्नानीय नेत्ररञ्जनम् ॥४
मधुपर्क च गन्ध च पुष्प पद्म निवेदयेत् ।
प्रतिमामु च सयोग्य गात्रे दातु च तत् तनौ ॥५
दद्याद योग्य तु पुरतो नैवेद्य नोगनादिकम् ।
पोप्पामव यद् विहित यस्य तद् यदि गर्भकम् ॥६
निवेदपेन तदा पद्म विपुल द्वारि चोरमृजेन् ।
पोष्प पुनौघरचित कुशसूत्रादिसयुतम् ।।
अतिप्रीतिकर देव्या ममाप्यन्यस्य भैरव ।
यज्ञकाप्ठसमुद्भूतमासन मसूण शुभम् ।।
थो भगवान ने कहा है भैरव ! मैं बब मोलह वपचारोरा
वर्णन करता हूँ। उनका माप श्रवण कीजिए । प्रक्ति भाव से विच
जिनम देवी भली भांति में मन्तुष्ट हुभा करती है और अन्यदेव भी परम
प्रसन्न होते हैं । 1। म प्रथम प्रासन देना चाहिए। वह सामन
पौग्य हो अपना 45 का होवे । चाह वह वस्त्र का हा-~नम का हो
पा मोग हो । उम मण्डल में उतर की मार ही सुजन बरना चाहिए।
१२। बिम समय म यह पदम में दिया जाता है उमे मण्डल व उत्तर म
हो देवे । कुसुम के बिना वार पुष्प बोर जल म आ छादय हो । ३ ।
उम पदम रे बाहिर के भाग में दार भादि पर विशेष रूप में निवैदिव

४३८ [पालिका पुराण । करना चाहिए। अय-पाद्यमाचमन-स्नानीय-नेत्र रजन- मधुपर-गन्ध और पुष्प पम म निवेदित करे । और प्रतिमामा म और गात्र मे देन के लिये जो भी योग्य होवे वह तनु म दना चाहिए । और नैवेद्य भोजन आदि जो होवे वह आगे देना चाहिए । पोप्पा सब जो जिसको विहित किया गया है वह यदि गर्भव हो तो उस समय में पद्म मे निवेदन करना चाहिए और विपुल को द्वार में उत्सृजन करे । पोप्प जो होता है वह पुप्पो क समुदाय से रचित हुआ करता है और कुश तथा सूत्र आदि से सयुत होता है । हे भैरव । यह देवी का-मेरा और अन्य का भी अत्यधिक प्रिय करने वाला होता है। यज्ञ के काष्ठ से ममुद्भूत आसन ममण और शुभ हुआ करता है । ४-८ । नोच्छाय नाति विस्तीर्णमासन विनियोजयेत् । अन्यद दारुभव चापि दद्यादासनमुत्तमम् । ६ सकण्टक क्षीरयुत दारुसारविवर्जितम् । चैत्यश्मशानसम्भूत वर्जयित्वा विभीतकम् ॥१० वल्कल कोपज शाण वस्त्रमेतत् त्रय मतम् । रोमज कम्बल चैतदनेन तु चतुष्टतम् ।।११ अनेन रचित दद्यादासन चेष्टभूतय । सिंहव्याघ्रतरक्षणा छागम्य महिपस्य वा ॥१२ गजाना तुरगाणा च कृष्णसारस्य चमण । समरस्याथ रामम्य मृगाणा नवभेदिताम् ॥१३ धर्मभि सर्वदेवानामासन प्रीतिद श्रुतम् । वस्त्रेषु कम्बल शस्तमासन देवतुष्टये ॥१४ राहव चामण श्रेष्ठ दारव चन्दनोद्भवम् । पच्चासन पुशमय तदासनमनुत्तमम् ॥१५ सर्वेषामपि देवानामृपीणा च यतात्मनाम् । योगपीठस्य सदृशमासन स्थानमुच्यते ।।१६ पोडशोपचार वर्णन ] । आमन ऐसा हाना चाहिए जो बहुत ऊंचा न होवे और न बहुत विस्तृत होना चाहिए। ऐसे ही आमन को विनियाजित करे । अन्य लकड़ी से बनाया हुआ भी उत्तम दवे 1६। वह वामन दारु (काष्ठ) वे मार ते रहित तथा यांटा से युक्त एव क्षीर स मयुन-चत्य श्मशान म समुत्पन्न औवि भी तक का छोड़कर ही काठ का आसन बनाना चाहिए । १०. वस्त्र के आमन के लिये बल्बल (वृक्ष की छाल )- कापज नौर शाण अथात् सनकाय ही तीन यासन मान गय है । रोमन अर्थात रा स बनाया हुआ कम्बल-ये चार हात है । ११ । अपने इष्टदेव की भूनि क लिय इसक द्वारा विरचित आसन ही देना चाहिए । मिह--व्याघ्र-तरभु-छाग-महिप-गज-तुरग-~-कृष्ण स्तर पर-राम य मृगो के नौ भेद हैं । १३ । इनके वर्षों के द्वारा आमन बनाया जाया करता है जो सभी देवो के लिय प्रो त का देने वाला होना है-ऐमा मुना गया है । वस्त्रों के आसनो म पम्पल या आपन प्रगमन होता है और देवो को तुष्टि लिये हुआ करता है 1 ११४ । चर्म के आमन मे रद के धर्म का आसन श्रेष्ठ होता है तथा का ये आसनो म चन्दन का अंष्ठ माना गया है 1१५॥ सभी देवों का मपन मारमा वाले ऋपिया का योग पीठ के सण आसन तथा स्थान वहा जाता है ॥१६॥ मासनस्य प्रदानेन सौभाग्य मुक्तिमाप्नुयात् । शम्वरो रोहितो रामो न्यड पुरड शशा रुरु ।।१७ एणश्च हरिणश्चेति मृगा नवविधा मना। हरिणश्चापि विजेयो पञ्चभेदोऽव भैरव ।।१८ ऋप्य खड्यो सरश्चंव पृपतश्च मृगस्तथा । एते बलिप्रदानेषु चर्मदानेषु कीर्तिता ॥१६ सर्वेषा तंजसाना च आमन मुच्यते । आयस वर्जयित्वा तु फाम्य सीसवभेव वा २० [ कालिका पुराग शिलामय मणिमय तथा रत्नमय मतम् । आसन देवताभ्यस्तु मुक्त्यै भुक्त्य भमुत्सजेत् ॥२१ अग्रव साधकाना च आसन शृणु भैरव | यत्रासीन पूजयस्तु सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् ।।२२ ऐन्धन चार्मण वास्त्र तेजस च चतुष्टयम् । आसन माधकाना च सतत परिकीर्तितम् ॥२३ तत् मर्वमासन शस्त पूजामणि साधके । न यथेष्टासनो भूयात् पूजाकर्मणि साधव ॥२४ देवो क लिये आमा वे ममपण से परम सौभाग्य और मुक्ति की प्राप्ति की जाया करती है। मृग नौ प्रकार के माने गये है अर्थात निम्नाङ्किन इनके नौ भेद हात है -- शम्वर–रोहित--राम-ज्य - अनुशंशा-र-राण और हरिण-ये नो भेद हैं। हे भैरव । हरिण भी यहाँ पर पांच भेदों वाला समझना चाहिए 1१७११८। ऋष्य--खड्ग- ररू-पृपत–तथा मृग--ये वलि के प्रदान करने म तथा धर्म दान में कात्तित किये गये है 1१६! और सभी तैजसो के आसन परम |प्ठ कहे नाया करत हैं । धातु के आसनो म केवल लोह को छोडकर कोसा- मीसा-शिलामय-मणिमय-ये रत्नमय माने गये है। देवताओ के लिये आसन मुक्ति अर्थात् मासारिक मुखो के उपभोग और मुक्ति अति सासारिक बन्धनो म छुटकारा पाने के लिय ममुत्सजित करना चाहिए । १२.०२१। हे भैरव | और यहां पर ही साधना करने वालो के आसनो के विषय में भी बयण कर लीजिए। जिन पर बैठ पर अभ्यर्थन करता हुआ सब प्रकार की सिद्धियो को प्राप्त कर लिया परता है । २२ । माघरों के लिये चार प्रकार के आमन निरन्तर बताये गये है-धन (पाटा)- धार्मण (पमम)-यास्त्र (वस्त्रका)-और सेजन अर्थात धातु निर्मित ये चार हैं । १३ । माघर को पूमा के कर्मम वे सभी मामन प्रशस्त होने हैं ॥२४॥ ।

पोडशोपचार वर्णन]
काष्ठादिकासन कुर्यात सितमेव मा बुधः ।
चतुर्विशत्यङ्ग लेन दोघं काष्ठामन मतम् ।।२५
पोडशांगुलविस्तीर्णमुच्छाय चतुरगुलम् ।
पडङ गुलं वा कुर्यात् तु नोच्छ्रितञान आचरेत् ॥२६
पूर्वोक्तं वर्जयेद् वय॑मासन पूजनेष्वपि ।
वस्त्रं द्विहस्तान्नो दो साघंहस्तान्न विस्तृतम् ।।२७
न यड गुलान तथोच्छ्रायं पूजाकर्मणि सश्रयेन् ।
यथेप्ट चामंग कुर्यान पूर्वक्ति सिद्धिदायकम् ।।२८
पडङ गुलाधिकं कुर्यान्नोच्छित च कदाचन ।
काम्बलं चार्मणं शैलं महामायाप्रपूजने ॥२६
प्रशस्तमासन प्रोक्तं कामाख्यायास्तथैव च ।
त्रिपुरायाश्च सतत विष्णरेश्चापि कुशासनम् ॥३०
वहुदीर्घ वहूच्छ्रायं तथैव वहुविस्तृतम् ।
दारुभूमिसम प्रोक्तामरमापि सर्वकर्मणि ॥३१
पृथक पृथक कल्पयेत् तु वहिरि तथासनम् ।
न पत्रमासन कुर्यात् कदाचिदपि पूजने ॥३२
दूध पुरुष को चाहिए कि सवंदा काठ आदि या आसन सित
ही रक्खे । काठ का आमन चौवीम अंगुल प्रमाण वाला दीर्घ
होना चाहिए-यही शास्त्र मम्मत होता है ॥ २५॥ मोलह
अंगुल के विस्तार से युक्त और चार अंगुल ऊँचाई वाला
होना चाहिए। अथवा छ अगुल ऊँचा करे। इमसे ऊँचा कभी नहीं
करे ।२६॥ पूर्व में कहे हुए को वजित कर देवे । जो आसा वजित हैं
वह पूजन मे वर्जन के योग्य होता है । वस्त्र का आसन दो हाथ में
बहा नही होना चाहिए 1 और डेढ हाथ से अधिक विस्तृत नहीं होवे ।
। २७ । तीन अगुल मे ऊँचा प्रासन कभी भी पूजा के कर्म में सश्रित
नहीं करना चाहिए। चर्म का आसन जितना भी अभीए हो करे।

४४२ । [ कालिका पुराण पूर्व मे वणित आमन मिद्धि का प्रदान करने वाला हुआ करता है ।२८॥ छ अ गुल के ऊंचा कभी भी नहीं पारा चाहिये । कम्बल का आमन तथा चर्म का आमन और शैल अर्था: शिला का आसन महामाया के प्रकृष्ट पूजन मे परम प्रशस्त आसन कहा गया है तथा कामाख्या देवी के यजन मे इमी को थप्ठ बनाया गया है । मदा त्रिपुरा देवी के पूजन म और भगवान् विष्णु के अर्चन म भी कुशा का आसन प्रशस्त माना गया है ।२५।३०। बहुत दीर्घ-बहुत ऊँचा---और वहुत विस्तार वाला काष्ठ और भूमि के समान ही कहा गया है और पापाण का भी आसन सभी को म प्रशस्त होता है ।३१। द्वार म वाहिर आसन पृथक- पृथक् ही कल्पिा करे । पत्रो का आसन कभी पूजन में नही करना चाहिए ॥३१॥३२॥ न प्राण्या-समुद्भतमस्थिज द्विरदाहते । मातङ्गदन्तसन्जात कामिकेष्वामन चरेत् ॥३३ चामं पूर्वोदित ग्राह्य तथा गन्धमृगस्य च । सलिले यदि कुर्वीत देवताना प्रपूजनम् ॥३४ तत्राप्यासन आसीनो नोस्थितस्तु कदाचन । तोये शिलामय कुर्यादासन कौशमेव वा ॥३५ दारव तैजम वापि मान्यदामनमाचरेत् । आसनारोपमस्थान स्यानाभावे तु पूजक ॥३६ आसन कल्पयित्वा तु मनसा पूजयेज्जले । यद्यासित् न मस्थान विद्यते तोयमध्यत ॥३७ अन्यत्र वा तदा स्थित्वा देवपूजा समाचरेत् । इत्येतत् कथित पुत्र पूज्यपूजकस ङ्गतम् ॥३८ आमन पाद्यममुना शृण वेताल भरव । पादार्थमुदव पाद्य केवल तोयमेव तत् ॥३६ सन् तंजसेन पात्रेण शयेनापि प्रदापयेत् । धर्मार्थकाममोक्षाणा मस्थान पायमिष्यते ॥४० पोडगोपचार वर्णन गज को छोडवर किसी भी प्राणी के मन में निर्मित मानन तथा अस्थियों में रचित ग्रासन ग्रहण नहीं करे। मावन के दौती में निर्मित मानन पामित कर्मों में समाचारल करना चाहिए । ३३१ वर्ग का आमन नहीं ग्रहण करना चाहिए जो पूर्व में पड़ा गया है । तथा गन्ध मृग ने चर्म ना आमन लेये। यदि जनम देवताओ का पूजन करे । वहाँ पर भी वामन पर बेटे हा माधक को कभी भी उना नहीं चाहिए। जल में पितामय जमवा वृशा काही बामन परे ॥३४॥३५॥ वा का अयवा सेजन अर्थात् धातु निर्मित सामन का ग्रहण करे तथा अन्य सामन वो नही ममाचरत करे। म्यान के भाव मनी पूजा आसन । आरोप के मुस्थान को ही बामन वपिन पर मन में जल में पूजन परे । यदि जल के मय में वंटने का सम्मान नहीं होवे तो बन्य स्थान में ही बंटवर उम समय प देव की पूर ना समाचरण करना चाहिए २ पुत्र । यही आपको मैंने पूज्य और पुत्र का जो मङ्गल विपर है वह पह पर बना दिया है ३६७३ वेताल भैरव बामन बार इसमे पाय कायण कीजिय । चग्णां के प्रक्षालन लिए जो जल है वही पारा होता है अथवा देवन यह बन ही हाता है । ३६। वह पाच विमो ननम धातु में निर्मित पान के द्वारा और शंघ के मारा भी देना चाहिए। पाय धन-बाम और मोक्ष वा नम्यान होता है ।।४।। तदाममोत्तर दमामूलमाण मवंत । युशपुष्पाक्षश्चंव सिद्धार्थश्चन्दन लया ।।४१ तोयगन्धर्ययालयरध्यं दद्यात् तु सिद्धये । अध्यण लमते कामानध्येण लभते धनम् ।।४२ पुत्रायु.सुखौमाणि दानादध्यम्य व भेत् । न दद्याद भाम्फराराध्य शखनोविचक्षण ॥४३ नया न मुक्निपात्रेण विवेऽयं निवेदयन् । दवादारमनीयं तु मुगन्धिमलितं शुभंः ॥४४ (बालिका पुराण आचमनाय पूरवामितर्वापि कृपणागुरविपितः । यथा तथा सुगन्धैर्वा प्रसङ्ग फेनजितं ॥४५ तत तैजसेन पात्रेण शखेनापि प्रदापयेत् । उद दीयते यत् तु प्रसन्न फेनवजितम् ॥४६ देवेन्यस्तदावमनमुच्यते। केवल तोयमात्रेण तद् वा दद्यान्न मिश्रितम् ॥४७ वासित तु मुगन्धाद्य कर्तव्य यदि लभ्यते । आयुर्बल यशोदि प्रदायाचमनीयकम् ॥५८ उम समय में आसन के उत्तर में सभी ओर म पूल मन्त्र के द्वारा कुश-पुप्प-अक्षत-सिद्धार्थ-चादन तथा यथा लब्ध अर्थात जो भी प्रास हो सकें जलो से सिद्धि के लिय अध्यं देना चाहिए। अर्ध्य मे सामनाओ का लाभ होता है और अर्घ्य देने मे धन की प्रापि हा बरती है ।११। ।१२। अयं मे पुत्र-आयु सुख-मोक्ष की प्राप्ति हुआ करती है । विचक्षण पुरुप को कभी भी शख के द्वार। जल का अध्यं भास्कर के लिये नही देना चाहिए ।४३। सीप के पात्र से भगवान विष्णु के लिए ध्य निवेदित नहीं करे। सुग से युक्त जल मे ही जो परम शुभ होये आचमनीय समर्पित गरे ।४४) कपूर मे वासित और कृष्णा गुरु से धूपित जिस प्रकार से मुगन्धित होवें वैम ही प्रमङ्गो से और फेनो त रहित जल मे तैजम (धातु निर्मित ) पात्र के द्वारा और शस्त्र के द्वारा भी निवेदित करे । जो भी जल दिया जाता है वह स्वच्छ और फेनो मे रहित ही होना चाहिए । ४५५ ४६ । देवो के लिए जो आचमन करने को जल दिया जाता है वह ही आचमनीय कहा जाया करता है । अमत्रा केवल जल ही मे देवे और मिश्चित नहीं देवे । ४७ । सुगन्धित पदार्थों से उस जल को वासित करें। यदि इस प्रकार से प्राप्त होता है । आचमनीय का समर्पण करके माधन आयु-वल और यश नी वृद्धि प्राप्त किया करता है ।।

घोटगोपचार वन ] ४४५ लभते साधको नित्य कामाश्चंद यथोत्यिनान् । दधिसपिजेल क्षौद्र सिता ताभिश्च पन्चमि ॥४६ प्रोचते मधुपकंस्तु सर्वदेवोधतुष्टये । जल तु मर्वत म्वल्प मिताधित समम् ।।५० मर्वेभ्य श्चाधिक क्षौद्र मधुप प्रयोजयेत् । तद् दद्यान् कान्यपारण रोक्मश्वतमयेन वा ॥५१ ज्योतिप्टोमाश्वमेधादौ पूर्व चेप्टे च पूजने । मधुपर्क प्रदिप्टोन मर्वदेवौधनुप्टिद ॥५२ धर्मार्थकाममोक्षाणा माधव परिकीनिन । मधुपवं सौन्यभोग्य-तुष्टि-पुष्टि-प्रदायक ॥५३ पिष्टातकोऽय वस्तूरी रोचन कुडकुम तथा। गुड क्षौद्र पञ्चगव्य मर्वोपधिगणम्तया ॥५४ सिता निर्गेज्न तैल स्निग्धम्नेहेन ततिता । प्रान्ले तोयमिनि प्रोक्त म्नानोर कल्लकोविद ॥५५ स्वर्णरत्नोदक चंब पूरायधिवामितम् । नंजस कान्यपाना शखा तन्निवेदयेत् ॥५६ माय अपने हृदय म उठे हुए मनोरयो की मी प्राप्ति पिया करता है । सभी देवा को नुष्टि के लिये मधुपर दिवा करता है । दधि- धृत-जल-म-मिग्री इन्ही पांचों से मिथित करके मधुपर बनाया जाता है। इसन जल तो बहुत हो थोडा होना चाहिए और मिश्री-पृत और दधि समान परिमाग में होने चाहिए । इन सदमे बधिक मधु मधुपर्क में प्रयुक्त करे। यह मधुपर्क कान के पात्र के द्वारा-मुवयं अथवा चांदी पात्र म ही ममपित करे। ज्योतिलोम बौर अश्वमेध आदिम- में और इष्ट में पूजन में यह मधुप प्रविष्ट होता है जो सभी देवों के ममुदाय की सुष्टि के गिये हुआ परता है ॥४-०॥ यह मधुपर्क --काम और मोक्षामान पोतिन मियादा है। म - ४४६ [ कालिका पुराण पर्क सौख्य-भोग्य-तुष्टि-पुष्टि का प्रदान करने वाला हुआ करता है ॥५३॥ पिष्टातक-कस्तूरी-रोचन-कुकुम -गुड-मधु-पञ्च. गव्य-सर्वोपधियो का समुदाय-सिता ( मिश्री )-निर्णेजन --तैल-- स्निग्ध स्नेह मे तिल-प्रान्त मे जल-ये सभी पदार्थों को कव्य कोविदो के द्वारा स्तानीय अर्थान स्नान का जल कहा गया है ॥५४ -५५।। इस स्नानीय जल को स्वर्ण और रत्नो का जल जो कपूर आदि मुगन्धित पदार्थों से अधिवासित करे और उसको तेजम अर्थात् उत्तम धातु पात्री के द्वारा-कांसे के पात्रो से अयवा शखो के द्वारा निवेदित करना चाहिए ॥५६॥ मण्डले केशरे देयमादित्यप्रतिमासु च । शिवलिङ्ग तथा भोगे पीठे देवतानौ तथा ॥५७ सद्य स्निग्धे मृन्मये वा सपि सिन्दुरजे तथा । श्रीचन्दनप्रतिष्ठे वा तेपयेत् प्रतिमातनो ॥५८ स्वस्तिस्थापिते खडगे स्नापयेद् दर्पपोऽथ वा । एव दद्यात् तु स्नानीय महादेव्यं विशेषतः ॥५६ रवि विष्णुशिवेभ्यो वा यत्न तन्त्र प्रपूजने । पूजक. स्नानदानात् तु चिरायुरपजायते ।।६० सम्यक् स्नानप्रदानात् तु कल्पान्त स्वग भागभवेत् । यदेव दीयते पाद्यं गन्धपुप्पादिक तथा ॥६१ उपाचारास्तथा सर्वानयंपानाहितर्जलं.। अमृतीकरणास्तु सस्कृतस्त्वभिपिज्य तं. ॥६२ प्रदद्यादिष्टदेवेभ्यो गृह्णाति च ततः स्वयम् । अध्यंपाचाणि तस्तोयविना यविनिवेदनम् ।।६३ दीयते घेप्टदेवेभ्यः सर्व तग्निप्फल भवेत् । रागाल्लोमात् प्रमादाद् या ह्यध्यं पात्रामृतीकृतम् ॥६४ आनिस्य भी प्रतिमाओं में मण्डम में और अगर मे देना पाहिए।

पोडशोपचार वर्णन ] ४४७ शिवजी के लिङ्ग में तथा भोग मे-पीठ में तथा देवता के ततु म देना चाहिए। मद्य निग्न में-मृत्तिका में निर्मित मे-घृत और सिन्दूर से निर्मित मे अथवा श्री चन्दन प्रतिष्ठ मे प्रतिमा के तनु म लेपन करना चाहिए ।। ५८ ।। स्वास्तिक में स्थापित म-सङ्ग मे अथवा दर्पण में स्नपन कराना चाहिए । इसी प्रकार से और विशेष रूप में महादेवी के लिये स्मानीय को ममर्पित करना चाहिए ॥५६मूर्य-विणु-शिव के लिये जहां-तहां पर पूजन में पूजक स्नानीय के समर्पण करने से चिरायु को प्राप्त किया करता है ॥ ६० ॥ भली भांति स्नानीय के सम- पंण करने से पूजक कल्प के यन्त तर स्वर्ग के निवास का अधिकारी हो जाया करता है। जिस ममय में हो पाद्य तथा गन्ध और पुष्प प्रभृति दिये जाया करत है । तथा सभी उपचार समर्पित विय जात हैं। इन सबको अध्यं पात्र म अवदित जलो से अमृतीकरण बादि कर तथा मुपस्थत करे और फिर उनके द्वारा अभिपिच्चन करना चाहिए। इसके उपरान्त ही इस देवो वी मेवा में समर्पित करना चाहिए । उस समर्पित को देव स्वय ही ग्रहण किया करते हैं । अध्यं पात्रों को उस प्रकार के जलो के बिना जो निवेदन किया जाता है । ऐमा जो समर्पण है जो अपने इष्ट देवो के लिये किया जाता हैं वह सभी समर्पण निष्फल ही हमा करता है जो गग से प्रसाद मे अथवा लोम ने किया जाया मला है वह फल हो नहीं होता है । अध्यं पात्र में ममती कृत होना चाहिए॥६१-६॥ तोय नु त स्यान् पात्रान् पुन. कुर्यात् तदामृतम् । स्वल्पावशेषतोय तु पानस्थं समृतीकृते ॥६५ तन्नान्यदुदक दद्यात् तत्तनवामृत भवेत् । यहूनि यवि पुप्पाणि माला वा प्रचुरा यदि ।।६६ दीयन्ते चाध्यंपायस्थले. ससिच्य चौरसूजेन् । अन्यतोययंदुत्सृष्टमध्यपात्रस्थितेतरः ।।६७

४४८
[ बालिका पुराण
तन्न गृह्वातीप्टदेवो दत्तं विधिशतरपि।
सस्कृते त्वयंपात्रं तु नवभिः प्रतिपत्तिभिः ॥६८
तिष्ठन्ति सर्वतीर्थानि पीयूपाणि च सर्वत ।
तस्मात् तत्र स्थितस्तोयैरभ्युक्ष्योपचारानुत्सृजेत् ॥६६
न योग्यमयंपानेषु निधाय विनिवेदयेत् ।
इदं ते भैरव प्रोक्त पटक चंवासनादिकम् ।
वस्त्रादि दश वक्ष्यामि शृणु विज्ञानवृद्धये ॥७०
पात्र से जल स्रत होता है फिर उसको अमृत करना चाहिए ।
अमृतीकृत जल जब पात्र मे स्वल्प अवशेप रहे तो उस समय मे उसमे
अन्य जल दे देव । वह उससे ही अमृत हो जाया करता है। यदि वहुत
से पुष्प होवें और यदि प्रचुर मालाएँ होवें तो अर्घ्य पात्र मे स्थित
जलो से ससिञ्चन करके दी जाया करती हैं और उक्त जन करना
चाहिए। दूसरे जलो से जो अर्घ्य पात्र म स्थित से भिन्न होवें जो
उत्सुसन किया जाये तो सैकडो विधियो से भी समर्पित किये गये को
इटदेव ग्रहण नही किया करते है। नवीन प्रति पत्तियो के द्वारा संस्कृत
अर्थात् सस्तार किये हुए अर्घ्य पात्र पे जो स्थिन रहने हैं ॥६५-६८।।
वहां पर तो सभी तीथं और सभी ओर से पीयूप स्वरूप स्थित रहा
करते हैं। इस कारण से उसमे स्थित रहन वाल जल से ही अभ्युक्षण
करफ हो उपचारो का उत्सृजन करना चाहए ।। ६६॥ अर्ध्य पात्रो में
योग्य को निधान न करके जो विनिवेदन करे वह निवेदन करना उचित
नहीं होता है । हे भैरव ! आपके सामने यह आसन आदि का पयक
वर्णन करके बता दिया गया है। अब वस्त्रादि दश को यतलाऊंगा।
उसका आप श्रषण विज्ञान की वृद्धि के लिए परिये ॥७॥

देवाराधन में अन्य उपचार } ॥ देवाधरान के अन्य उपचार ॥ कापस कम्बल वाल्क फोशज वस्त्रमिप्यने । नत्पूर्व पूजयित्वैव मन्वंदेवाय चोत्सत्वेन ॥१ निदंश मलिन जीर्ण छिन्न गानालिङ्गितम् । परकीय ह्याखदष्ट सूचाविद्ध तथापितम् ॥२ उप्तलेश विधौत च इलेप्मसूत्रादिपितम् । प्रदाने देवताभ्यश्च देव पिन्ये च वर्मगि ३ वजयेन् स्वोपयोगेन यजादावुपयोजने । उत्तरीयोतरासङ्गनिचोलो मोदचेलक ॥४ परिधान च पञ्चतान्यस्यूनानि प्रयाजयत् । शाग वस्त्र निशार च तथवानपवारणम् ॥५ चण्डातक नया दृश्य पन्च म्यूतान्यदुष्टये। पताकाध्वजकुण्डादी स्यूत पस्न प्रयोजयन् ।।६ अन्यत्रावरणादौ च तद्विनाशस्य तेन तत् । रक्त पौशेयकम्प च महादेव्यं प्रशस्यते ।।७ पीत तयंव कांगेय वासुदेवाय नोत्सृजेत् । रक्त तु कम्बल ददाच्छिवाय परमात्मने । थी भगवान् न रहा--पामा बाद मूतो निमित-म्बत- पान अर्यात में रचित और परेशज दम हो अभीट हा परता है । उमवा ही पूर्व म मन्त्रों के द्वारा पूजन करक दवा कनिय उन्मृजित परना चाहिए । ११ निदा यान की न द्वारा पटा तमा कुतरा इमा-मला-जोप-ठिन्न भोर गात्र म अलिङ्गित पनि अङ्ग पर धारम निरा हया--पराया और यहोवारा वादा हुआ~सुई म विद्ध तपा उपिन गुम देन और विधौन एव ग्लेमात्र यादि म दूषित रंदनाओं में लिये प्रदान म और देर तपा पिच पर्म में वरिट पर देना चाहिये । अपने उपयोग म यज्ञादिक म उपयोजन म उत्तगयन्त्त [ कालिया पुराण रासङ्गनिचोल-मोद घोसक और परिधान- दन पौधों को बिना सिले हए ही प्रयुक्त करने चाहिए सन की वस्त्र-निशार तया यातय-वारण- घण्डा तक और दृश्य--इन पांचो को मिले हुए ही उत्सजित करे। पताका और ध्वजा तथा वुण्डादि में मिले हुए वस्त्र का प्रयोग करता चाहिए ॥१-६॥ और अन्यत्र आवरणादि में उससे उसके विनाश के होने से रक्त वस्त्र और कौशेय वस्त्र महादेवी के लिये प्रशस्त होता है । १७। पीन और कौशेय ( रेशमी ) वन भगवान् वासुदेव के लिए उत्सृजन करना चाहिए । परमात्मा शिव के लिए सात वर्ण का कम्बल समपित करे |॥७ विचित्र सर्वदेवेभ्यो देवीभ्योऽशु निवेदयेत् । कपास सर्वतोभद्र दद्यात् सर्वेभ्य एव च ।। नकान्तरक्त दद्यात् तु वासुदेवाय चलकम् । तथा नकान्तनोल तु शिवाय विनिवेदयेत् ॥१० नीलीरवत तु यद्वस्त्र तत् सर्वत्र विवजितम् । देवे पित्र्ये तूपयोगे वर्जयेत् तु विचक्षण ||११ नीलोरक्त प्रमादात्तु यो दद्याद् विष्णवे बुध । निप्फला तस्य तत्पूजा तदा भवति भैरव ॥१२ विचित्र वाससि पुनर्लग्न नोलोविरञ्जितम् । वस्त्र दद्यान्महादेव्यं नान्यस्मै तु कदाचन ।।१३ द्विपदा ब्राह्मणो यहवाना वासवो मथा। तथा भूषणवर्गपुव स्त्रमुत्तममुच्यते ॥१४ वस्त्रेण जीर्यते लज्जा वस्त्रेण हीयत त्वधम् । वस्त्रात् स्यात् सवत सिद्धिश्चतुवर्गप्रद च तत् ।।१५ वस्त्र ते कथित पुन सर्वप्रीतिप्रदायकम् । भोग्य भूषोत्तम नित्य भूषणानि शृणुष्व मे ||१६ समस्त देवो के लिये और देवियो के लिये विचित्र पस्न का देबागान अन्य सवार निवेदन करना चाहिए । काम काम तो पद सभी के लिये निति परे ।। एकान्तर रन अर्थात् बत ही नाल चना भयवान वासुदेव के लिए नहीं निवेदित न्दना चाहिए । उनी भन एर दम नीला बम्ब मिद के लिए समर्पित नहीं करना चाहिए । १० 1 नील योर रत, जो भी वस्त्र है वह सभी जरह पर विशेष रूपने वांद होता है । विपक्षण पुरुष वर्ग देव और पिम वसोय में उसका वरंन र देना चाहिए। जो वध पुरष प्रमाद से नील गल बस्त्र को भगवान् विप्न के लिए निवेदिन करता है है भैरव ! उसको वह डा निष्फल हो जाती है 1१२.1 विचित्र वस्त्र में वो बोई नौल वर्ग की विराजित हुई हो तो ऐने वार को महादेवी के लिए ही निवेदित परना चाहिए अन्य किसी देवता को कभी भी निवेदित न करे.१३। जिस सेरि में दो पदो वाली में बादाम और देवौ म इन्ददव होत है उनी मांति भूषण वर्गों में बम्ब उत्तम रहा बाबा परता है । १४ । दस्थ ने नग्दा जीर्ष होती है और वस्त्र के द्वारा अव होन अति न हो जाता है-दस्त से सभी प्रकार की मिद्धि होती है अत. वस्त्र चारो वर्षों प.पा का प्रदान परने वाला होता है ॥ १५॥ हे पुत्र ! आपके सामने यह पा सर श्रोति का देने वाला वह दिया गया है। यह भोगने के दौर उत्तम भूपा है जो निन्य ही होता है । अब भूपनो में विपक्ष में मुहले भवन रा॥१६॥ किरीटं च शिरोरल कुण्डल व ललाटिया । सालपत्रं च हराश्च वेयकमोमिका ।।१७ प्रालम्विकारत्नमूत्रमुत्त गोतक्षमालिका । पाश्बंधीतो नखद्योती ह्या गुलीच्छादकस्तथा । १८ जूटालक मानवको मधंताराखलन्तिा। अगदो बाहुवलय, शिखाभूपण इङ्गिया ।।१६ प्रागृदण्डवन्धमुदभासना भितरोऽय मालिका ।

४५२ [ पालिका पुराण सप्तको शृखला चव दन्तपन च कर्णक ॥२० ऊरसूत्र च नीवी च मुष्टिवन्ध प्रमोणकम् । पादाङ्गद हसकश्च नू पुर क्षुद्रघण्टिका ॥२१ सुखपट्टमिति प्रोक्ता अलङ्कारा सुशोभना । चत्वारिशदमी प्रोक्ता लोके वेदे तु सौख्यदा ॥२२ अलवारप्रदानेन चतुवगप्रसाधनम् । एतेपा पूजन कृत्वा प्रदद्यादिधसिद्धये ॥२३ तेपा दवतमुच्चाय पूजयेत् तु विचक्षण । शिरागतानि वा दद्यात् सौवर्णानि तु सवदा ॥२४ भूषण बताये जात है-रीट--शिरोरत्न--कुण्डुल-लला टिका-ताल पत्र-हार-वपक-अमिका-प्रालम्बिका-रत्न सूत्र- उत्त ङ्ग-तक्ष मारलका पापद्यात–नस द्यात-अगुलीच्छाद- अङ्गद- वाहुवलय-शिखा भूपण-इङ्गिका- प्राग्दण्डव-ध- उद्भासना- भिपूर-मालिका-सप्तमी-शृङ्गाल-दन्तमत्र कर्णक ऊरुमून नीवी-मुटिबन्ध- प्रकोण क-पादाङ्गद-हसक-भूपुर-क्षुद्रष्टिका मुख पट्ट-ये परम सुशाभन अलङ्कार कहे गए हैं। ये कुल चालीस हात हैं जा लाक और वेद म सौख्य क प्रदान करन वाल है ॥१७- २२।। अलकारा + प्रदान करन स चारो (धम अथ-काम-माक्ष ) वर्गों का प्रसाधन हाता है। इनका पूजन कर ही इप्ट की सिद्धि क लिए समपण करना चाहिए। । २३ । विचक्षण पुरुष का उनक देवत का उच्चारण कर ही पूजन परना चाहिए। अथवा शिरोगत सौवर्णो का सवदा समपित करना चाहिए ॥२४॥ चूडारत्नादिवानीह भूषणानि तु भैरव । प्रवयकादिहसान्त सोवण राजत च वा ॥२५ निवेदयत् तु दवेभ्या नान्यत् तंजससम्भयम् । रीतिरङ्गादि सजात पानोपकरणादिकम् ॥२६

देवाराधन के अन्य उपचार )
दद्यादायुसमज तु भूषणं न कदाचन ।
घटाचामरकुम्भादिपावोपकरणादिकम् ॥२७
तद्भपणान्तरे दद्यादस्मात तदुषभूपणम् ।
मवं ताम्रमयं दद्याद यत किंचिद भूपणादिकम् ॥२८
सर्वत्र स्वर्णवन ताम्रमयंपावे ततोऽधिकम् ।
पजाऱ्यापाननवेद्याधारपात्र च पानकम ॥२६
'प्रोदम्बरं सदा विष्णो: प्रीतिदं तोपदं तया ।
ताम्र देवाः प्रमोदन्ते नाने देवा स्थिता गदा ३०
मर्वप्रीतिकर ताम्र तस्मात तान' प्रयोजयेत ।
म्वोपयोगे नर कुर्याद् देवानामपि भैरव ।।३१
ग्रोवोर्ध्वदेश रोप्यं तन कदाचिच्च भपणम् ।
प्रावार पानपाव च गण्टको गहमेव च ॥३२
हे भैरव ! जडान आदि भूषण में वेयर मे आदि लेकर
हेम के अन्त तन मन मवर्ण में निर्मित होये अथवा रजत (चांदी ) मे
रचिन होने चाहिए । २५ । इन्ही को देवताओ के लिए मर्पित करना
चाहिए और अन्य तेजम अर्थात धातुओं मे विरचितो को निवेदित नहीं
करना चाहिए । रीति रङ्ग आदि में निर्मित पात्र और उपकरण आदि
ही होने चाहिए । २६ । आमसमज भूषण यामी भी निवेदित नहीं करे ।
घटा चामर कुम्भ आदि पाय लया उपकरण आदि होते हैं । २७ । इन
भूषणो वो बीच में इससे उपभूषण देवे । सब नाममय जो कुछ भी
भूषण आदि हैं निवेदित करे । २८ । सर्वत्र ताम्र स्वर्ण सरोकी
तरह
मे
देवे धौर अभ्यं पात्र में अधिक देना चाहिए । पूजा का अध्यं पात्र--
नवेच का आधार पाय--पालव है । २६ । भगवान विष्णु के लिए सदा
उदग्वर (गूलर वृक्ष) में निर्मिन प्रीति तथा मन्तोप देने वाले होते है।
नास पात्र में देवगण प्रगन्न दृझा करते हैं पयोगि ताम्र में देव सदा
स्पिन रहा करते हैं । ३० । तान सबके लिए प्रीति मा बरने वाला

४५४ [पालिसा पुराण हुआ करता है अतएव नाप्रपा प्रयोग करना चाहिए। भैरत अपने उपयोग म भी ताम्रया ही प्रयोग परे और देवगणों के भी उपयोग म इसका प्रयोग करना चाहिए ।३१। ग्रीया ये हार भाग में कमी भी रोप्य (चाँदी वा) भूपण का प्रयोग न यर । बव उपभूषण बताए जाते है-प्रावार-शान पान-गण्डक और गृह है ॥३२॥ पर्यड्डादि यदन्तच्च सर्व तदुपभूपणम् । अयोमयमृते कास्यमृते यद्भूषण भवेत् ॥३३ स्वर्णरोप्यस्य चाभावे त्वध काये नियोजयेत् । एतेषा भूपणादीना तद् दातु शक्यते नरं ॥३४ तत् तद् दद्यात सम्भवे तु सर्वमेव प्रदापयेत् । चतुर्वर्गप्रद त्वित्थ भूपण सर्वसौख्यदम् ।।३५ तुष्टिपुष्टिप्रीतिकर यथाशक्तीष्टये सृजेत् । इद वा भूपण प्रोक्त सवदेवस्य तुप्टिदम् ।।३६ गन्ध च सम्यक् शृणुत पुत्रौ वेतालभैरवौं । चूर्णीकृतो वा घृष्टो वा दाहाकर्पित एव वा ॥३७ रस सम्मदंगो वापि प्राण्यङ्गोद्भव एव वा। गन्ध पञ्चविध प्रोक्तो देवाना प्रीतिदायक ॥३८ गन्धचूर्ण गन्धपत्र चूर्ण सुमनसस्यथा । प्रशस्तगन्धयुक्ताना पत्रचूर्णानि यानि तु ॥३६ तानि गन्धवहानि स्यु सगन्ध प्रथम स्मृत । धृष्टो मलयजो गन्ध सचूर्णीकृतमेरुणा ॥४० पर्य आदि जो और दूमरे है वे सब उपभूषण हैं । जो अयो- भय अर्थात् लौह से पूरिपूर्ण के बिना और कांसे के बिना भूपण होता है वह सुवर्ण और गैण्य के अभाव में शरीर में नीचे नियोजित करना चाहिए । इन भ्पण आदि म जो भी करो के द्वारा दिया जा सकता है, वही वही मम्भव होने पर सब ही देना चाहिए। इस प्रकार से देवारान के अन्य उपचार ] भूषण चतुर्वर्ग का दाता और सब मौक्ष्य का प्रदान करने वाला हुआ करता है ॥३३-३५।। अपनी शक्ति दे ही अनुसार तुप्टि और पुष्टि के करने वाला यह इष्ट के लिए मजन करे। अयवा यह सभी देवो की सुपित का देने वाला भूपण कहा गया है । ३६ । हे पुयो । हे वेताल और भैरव र भत्री भौति गाय का श्रवण कीजिए। यह गन्ध पाँच प्रकार का होता है जो वेत्रो को प्रोनि यो प्रदान करने वाला है । चूर्णी मृत-पृष्ठ अर्यान् घिमा हमा--दाह को आरपिन करने वाला- मम्पदन मे समुत्पल रम अथा प्राणो वे अङ्ग में उद्भन ये ही पांच भेद हैं ।।३७॥३८1 गध का चूर्ण-गन्ध पत्र-पुप्पो का चूर्ण -प्रशम्न गन्ध मे युनो के पत्रो का पूर्ण जो है वे मव ग घ वह होत हैं । वह प्रथम गन्ध बहा गया है। पुष्ट माय म ममुगल ग प्र है जा मेरे द्वारा चूर्णीत है ॥४॥ गुरुप्रभृतिश्चापि यम्य पक्ष प्रदीयते । गन्धो दृष्टवामप्टोय द्वितीय परिकीनित ॥४१ देवदावंगुरूपद्मगन्धराशान्त चन्दना । प्रियादीना च यो दग्ध्वा गृहाते दाहगी रम ॥४२ मदाहा पितो गन्धस्तृतीय परिकीर्तित । मुगन्धकरवीवित्वगन्धोनि तिलय तया ॥४३ प्रमृतीना रमो योऽसौ निष्पीडय परिगृह्यते । सराम्मदर्दोद्भवो गन्ध मम्मदंज इतोप्यते ॥४१ मृगनाभिसमुद्भूतस्तत्फोपोद्भव एप वा। गन्ध प्राण्यनज प्रोक्तो मोदद स्वर्गवानिनाम् ॥४५ पगन्धमाराय क्षोदे घृप्टे च सस्थिता । चन्द्रभागादयत्रापि रसे परेच सङ्गता ॥४६ गन्धसार सवंग्स गन्धादौ च प्रयुज्यते । मुगनाभिवेद् पृष्टश्चर्णोऽप्यन्यस्य योगत ॥१७ 1 राखिरा पुराण एव सर्वं तु सर्वत्र गन्धो भवति पन्चधा। धृष्टादिमावादन्योन्य गन्ध प्रीतिवर पर ॥४८ अगुए प्रभृति भी गन्ध है जिमना पंव' प्रदान किया जाया करना है । घिम कर भी अघृष्ट गन्ध द्वितीय कहा गया है । ४१ । देव दार- अगुर--पम--ब्रह्म माल शारान्त चन्दन प्रमादिवा जो दग्ध करके ग्रहण किया जाता है वह दाह मे ममुत्पन्न रम है । ४२। दाह के साथ आकर्षित गन्ध नीमरा कहा गया है। मुगन्ध-परवी-विल्व गन्धी-, निलक प्रभृति का जो रस है वह निपीडन करके ही परिग्रहीत किया जाया करता है। वही मम्मदं मे उत्पन्न गन्ध सम्मदंज-दम नाम से अभीष्ट हुआ करता है ॥४३॥४४॥ मृग की नाभि से समुत्पन्न- उसके कोप उद्भूत गन्ध प्राणी के अङ्ग मे जायमान कहा गया है जो स्वर्ग के निवासियो का भी मौह देने वाला है । ४५ । वपूर गन्ध माराद्य क्षोद के धृष्टि होने पर मस्थित होते हैं । चन्द्र भाग आदि भी रस म और पक मे सङ्ग हैं । ४६ । गन्ध सार सर्व रस और गन्धादि में प्रयुक्त किया जाता है । मृग नाभि और धृष्ट चूर्ण भी अन्य के योग मे होता है । ४७ । इस रीति से सभी जगह पर गन्ध पाँच प्रकार का होता है। धृष्ट आदि भाव से परस्पर में पर गन्ध प्रीति के बरने वाला होता है ॥४॥ गन्धस्य विस्तरो भेद प्रोक्त कालीयकादय । सर्व पञ्चविधेप्वेव प्रविप्टो भवति क्षणात् ॥४६ गन्धो मलयजो यस्तु देवे पित्र्ये च सम्मत । तस्य पडो रसो वापि चूर्णो वा विष्णुतुप्टिद ॥५० सर्वेपु गन्धजातेपु प्रशस्तो मलयोद्भव । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन दद्यान्मलयज सदा ॥५१ कृष्णागुरु सकर्पूर सहितो मलयोछ । वणवीप्रीनिदो गन्ध कामाय्यायाश्च भैरव ।।५२ देवाराधन के अन्य उपचार ] ४५ जवा, तारिका, कुजक, नगर कणियार, रोचना, चमा, आम्रातर, वाण, वरामल्लिका-यशोक, लोध्र निता अटम्प, गिरीप, शमी, द्रोण, पद्म, उत्पन,कारण, प्रतारण गिमध्य पलाश बदर,वनमाला मेवन्ती, कुमुद, बदम्ब ५६१-६॥ चक्र कोकनद चंब तण्डिलो गिरिणिका । नागकेशरपन्नागो तक्यजलिया नथा ।।६५ दोहदा बीजपूरा नमे शाल एव च । अ पुपो चण्डविल्वश्च झिण्टो पचविधास्तथा ॥६६ एवमायुक्त मुमै पूजयेद, वरदा शिवाम् । अपामार्गस्य पत्र तु ततो भृङ्गारपरकम् ।।६७ ततोऽपि गम्धिनीपन वलाहबमन परम् । तस्मात् खदिरपत्र तु वन्जुलस्तबक नया ॥६८ आन तु वरगुच्छ तु जम्धुपम तत परम् । बीजप्रस्य पत्रं तु ततोऽपि कशपत्रकम् ॥६६ दूवार र तत प्रोक्त समीपत्रमा परम् । पत्रमामला तम्मादामन परापन्तत ॥७० मर्वतो बिल्वपत्र त देव्या प्रोतिर मतम् । पप्प कोक्नन्द पद्म जया बन्धुप एव च ।।७१ पप विल्यम्प मभ्यो दाणवीसटिद मतम् । मर्वेपा पुष्पजातीना रक्तपद्ममिहोत्तमम् ।।७१ चत्रा, मोकना, तण्डिा, गिरिनपिका, नाग नगर, पुन्नाग, नको, अञ्जनिया, दोहदा, बोजपूर-नमे, सार, पुषो चाहविन, पिटरी पाया प्रकार की एवमादि पिन पुप्पी र ारा वरदा गिया अन करना चाहिए। अपामार्ग में पत्र, भतार के पत्र, गधिनी १.पत्र, वनाहर इमरी भी पर है । उममे यादरका पत्र, बम्जुनान- वा, मान, यगुष्ठ, इमम भी पर जम्बु मा पत्र, वीजपूर का पत्र,

[ पालिका पुराण
इससे भी पर उग पत्र है ।। ६५-६६॥ इससे भी पर दूर्वा का अनुर
कहा गया है। इसस पर शमी का पत्र इससे पर आमलय पत्र और
उमन अ.न न आमान पर है। मवस अधिर प्रीति के करने वाला देवी
को विल्व पत्र हाना है। कानद पुष्प, पद्म, जवा, व.धुर-इन
मवम वित्व का पत्र वैष्णवी देवी की तुष्टि देने वाला माना गया
है। मय पुपा की ज.तिया म रम पम अती उत्तम होता है ।
रखनपद्मगहण यो माता सम्प्रयच्छति ।
भक्तियुक्तो महादेव्यं तम्य पण्यफल शृण ।।७३
यल्पयोटिमयाणि यापपोटिशतानि च ।
म्थिा मम परे श्रीमान्ततो गजा क्षिती भवेत् ।।७४
पोप विरयपत्र न देवीप्रीनियर गतम ।
ननमहयना माना पूर्ववन पसदा भवेत् ।।७५
नियात्र पहनोवोन गमान्येनेदमुच्यते ।
उपतानुपनम्नयापापंजलज म्यलगम्भव ॥७६
पर गयानाम मोपधिगणपि।
दन गणेशप परपि गिर्वा यजेत् ।
पजपेत् परमेशानी पुषागाय:पि पर ।
पत्रापागापमारे न मृगगुल्मोपधादिभि 15
औषधीनाममा न सम्पोरपि पूगंगा।
प्रार्या अनि मनावेस गरी ॥
गितमापापना तु मानगी पवित्रमापत्
-

देवाराधन के अन्य उपचार ] ५६१ सहन करोड और सौ करोड कल्पो तक वह मानव मेरे पुत्र में स्थित रहकर फिर वह श्रीमान् भू मण्डल मे राजा हुआ करता है । ७४ ।। सभी पनो मे विल्व पत्र देवी की परमाधिक प्रीति करने वाला माना गया है। उन विल्व पत्रो की एक सहन को बनाई हुई माला पूर्व की हो भांति फल देने वाली हुआ करती है ।।७५ ॥ इस विषय में बहुत अधिक कहने से क्या लाभ है। साधारण रूप से यही कहा जाता है कि यहे हुए तथा न कहे हुये पुप्पो मे स्थल में समुत्पन्न नतजा से तया सब पत्रो से जो भी जैसा लाभ होता है वह सोपधियो के समुदाय से भी होता है। सभी वन में समुत्पन्न पुप्पो स और पत्रो के द्वारा भी शिवा का यजन करना चाहिए ।। ७६-७७ ।। परमेशानी का पूजन पुष्पों के अभाव मे पत्रो क द्वारा भी अर्चन करना चाहिए। यदि पत्रों का भी अभाव हो तो उस अवसर में तृण गुल्म और औषध आदि के भी द्वारा यजत करे ॥ ७८ ।। औषधियो के भी अभाव में उनके फलो के द्वारा हो यजन करना चाहिए । अथवा अक्षतो से या जली के द्वारा यजत करे । इनका भी अभाव में सरसो से जो सित हो उनस पूजन करे। सित के भी न प्राप्त होन पर मानसी भक्ति का समाचरण करना चाहिए। वा|ज दन्तक पया स ओर पुप्पो की राशि क द्वारा पूजन कर ।।७६-50॥ तुलसी कुसुमं. पत्ररचयच्छा विवृद्धये। पुरश्चरणकार्यपु विल्वपत्नयुतस्तिल. ॥८१ साक्षत. सघृतवापि शिवामुद्दिश्य यत्नतः । गुहयादनल वृद्ध संस्कृत कामवृद्धये ॥२ सकल्पितः कामसिद्धयं सख्यया यः कृत्ती जपः । तदन्ते पूजन यत्तु विहित जियते द्विजः ।।६३ पुरश्चरणसज्ञ तु कौतित द्विजसत्तमः । तस्मिन् पुराणके पूर्व पूर्वोक्तविस्तरोदितः ।।८४ विधान. पूजयेद् देवी कामाख्या वैष्णवीमपि ।

[पालिका पुराण यथासम्भवमेवान दद्यात् पोडश साधकः ॥८५ उपारास्तथैवोक्तान् विधिकृत्यान्न लघयेत् । सम्पूर्ण पूजन कृत्वा कल्पोक्त शतधा जपेत् ।।८६ जपान्ते जुहुयादग्नि होमान्ते तु वलित्रयम् । विजातीय तु वितरेतौर्यत्रिकमत परम् ॥८७ पत्नी स्वय वा भ्राता वा गुरुर्वा विनियोजयेत् । नैवेद्यादीनि सर्वाणि स्वपुत्र शिप्य एव वा ८८ तुलमी के कुमुमो अर्थात् मारयो से और तुलसी दलो से श्री की वृद्धि के लिये अचन करे। पुरश्चरण के कार्यो म विल्व पत्रो से युक्त तिल-अक्षत अथवा घृत से शिवा का उद्देश्य लेकर यनपूर्वक काम की वृद्धि के लिए सस्कार की हुई वृद्ध अग्नि म हवन करना चाहिए । ॥८१-८२॥ कामना की वृद्धि के लिये सख्या से जो जप का सङ्कल्प किया गया है । उसके अन्त मे जो पूजन किया है वह द्विजो के द्वारा करना चाहिए ॥ ८३ ॥ श्रेष्ठ द्विजो ने जिसको पुरश्चरण के नाम से कीर्तित किया है उसमे पूर्व म पुराण मे पूर्वोक्त और विस्तार से वर्णित विधानो के द्वारा कामाख्या और वैष्णवी देवी का भी पूजन करे । जहाँ तक भी सम्भव हो साधक को यहाँ पर सोलह उपचार समर्पित करन ही चाहिए ।। ८४-८५।। उसी भारत पोडश पूर्वोक्त उपचारो का और विधान के कृत्यो का लंघन नही करना चाहिए । सम्पूर्ण पूजन करके कल्पोक्त का सौ बार जप करे ।। ८६ ॥ जाप के अन्त मे अग्नि म होम करे और होम के अन्त मे तीन बलि देवे । तीन जाति की बलियो का वितरण करे तथा इसके उपरान्त नृत्य गोत करना चाहिए ।८७१ पत्नी- स्वय अयवा भाई या गुरु-अपना पुत्र अथवा शिष्य सब नैवेद्य आदि का विनियोजन कराना पाहिए ।। ८८।। यज्ञावसाने दद्यात् तु गुरवे दक्षिणा शुभाम् । चामीकार तिलान् गान्च तदशक्तौ तु चेलकम् ।। ।

देवाराधन के अन्य उपचार ] अष्टम्या शुक्लपक्षस्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय । नवम्या वा चतुर्दश्या महादेव्या पुरश्चरेत् ६० आदद्याद गुरुवक्त्रात् तु विधिना विस्तरेण तु । कल्पोदितेन सम्पूज्य तिथिप्येनासु भैरव ॥६१ सम्पूर्णपूजा नो कृत्वा न दद्यान्मन्नमोप्सितम् । न पुरश्चरण वापि कुर्यात् कृत्वाऽवसीदति ।।६२ नित्यपूजा सा तु पुन सम्पूर्णा यदि शक्यते । कल्पोदित पूजयितु तदा कुर्यादतन्द्रित ।।६३ न चेद् विस्तरश कतुं देव्या पूजा तु भैरव । कल्पोक्ता वाऽन्यदेवस्य तवाय विधिरुच्यते ।।६४ मार्जनास्तु सस्कृत्य स्थण्डिल मण्डल लिपेत् । पातस्य प्रतिपत्ति तु कृत्वा दाह प्लव तथा १६५ ध्यायेदात्मानमय च सस्कृत्याङ्गस्वरूपत । अगुष्ठाद्यस्वपर्यन्त द्वादशाङ्गस्य शुद्धये ॥६६ पज्ञ मी समाप्ति हो जाने पर श्री गुरुदेव को शुभ दक्षिणा देनी पाहिए । सुवर्ण-तिल-गौएँ दक्षिणा म देव । और इन दन को शक्ति न होवे तो केवल नेलक ही निरित करे ॥६६॥ मास शुक्ल- पर को अटमी तिथि म बहावय रखन वाला तया इन्द्रियो वा जीत लेने वाला रहे और नवमी म अयवा चतुदशी म महादेवी वा पुरश्चरण करे ॥६॥ ह भैरव । श्री गुरुश्व क मुख में आदान करना चाहिए । जो भी विधि और विस्तार पल्प म कहा गया हो उससे इन उक्त विपियो में भली भौति पूजन करे । सम्पूर्ण पूजा को न करके ईप्सित मन्त्र को नहीं दना चाहिए। अयया पुरश्चरण भी नहीं करे। मदि ऐसा करता है तो बवाद प्राप्त किया करता है ।। ६१-६२॥ वह नित्य पूजा है यदि की जा सकती है ता सम्पूर्ण पूजा कर उस समय म अतन्द्रित होकर ही कल्प मे वर्जित पूजन करना चाहिए । ३३ । द मैरव । यदि विस्तार

[ कालिका पुराण
से देवी की पूजा करना न होवे तो कल्प मे कथित अन्य देव की पूजा
करे । वहाँ पर यह ही विधि कही जाती है ॥६४ ॥ मार्जन आदि के
द्वारा भूमिका सरसार करके स्थण्डित में मण्डल लिखना चाहिए। पात्र
की प्रतिपत्ति करके तथा दाह सब करे ।। ६५ ।। और इसके अनन्तर
आत्मा का ध्यान करे। अङ्ग के स्वरूप से सस्कार करके अगुष्ठ से आदि
लेकर अस्त्र पर्यन्त द्वादश अङ्गो की शुद्धि के लिये करे।६६॥
अयंपानेऽप्टधा जप्त्वा उपचारान् प्रसेचयेत् ।
आधारशवितप्रमुख भूलवर्णान् प्रयुज्य च ॥६७
हृदिस्था देवता ध्यात्वा वहिःकृत्य च वायुना ।
आरोप्य मण्डले दद्यादुपचारान् यथाविधि ॥६८
पूजयित्वा पडङ्गानि तथाष्टो दलदेवताः ।
पुप्पाजलिनय दत्त्वा जप्त्वा स्तुत्वा प्रणम्य च ॥६६
मुद्रामधे प्रदयाथ तत. पश्चाद् विसजयेत् ।
सर्वेपामेव देवानामेप एव विधिः स्मृतः ॥१००
सम्यक् कल्पोदिता पूजा यदि कर्तुं न शक्यते ।
उपचारास्तथा दातु पञ्चतान् पितरेत् तदा ।।१०१
गन्ध पुष्पं च धूप च दीप नैवेद्यमेव च ।
अभावे पुप्पतोयाम्या तदभावे तु भक्तित. ।।१०२
संक्षेपपूजा कयिता तथा वस्त्रादिक पुन ।
पुरश्चरणकृत्ये च प्रदीप शृणु भैरव ॥१०३
दोपेन लोकाजयति दीपस्तेजोमयः स्मृतः ।
चतुवंर्गप्रदो दोपस्तस्माद् दीपैयंजेच्छ्यिम् ।।१०४
अध्यं पान में आट पार जप पर उपपारी वा प्रधान
पला पाहिए। आधार शक्ति प्रमुण मूल वर्गों का प्रयोग करे
और हृदय में संस्थित देवता का ध्यान कसे और वायु के द्वारा
बाहिर करे मन में बारोग को विधि अनुगार उपधारो

देवारा २ क अय उपचार ]
४६५
को देना चाहिए ।। ६७-६८ ॥ छ अङ्गा का पूजन करक उमी भाति
दल देवताआ का यजन करे। फिर तीन पुष्पाञ्जनिया का देवर-जप
करके-स्तवा करके और प्रणाम करे ।। ६६ । देवता के सामन मुद्रा
को प्रदर्शित करव पीछे विसजन करना चाहिए । मभी देवताआ की
यह ही विधि कही गयी है ।।१०।। यदि कल्प म कही हुइ पूजा यदि
भली भांति नहीं की जा सकती है ता उपचारो का उस भाँति दन क
लिय उम समय म इन पाचा को सदा वितरित करे ॥१०१॥ ग घ---
पुष्प-धूप-दीप और नैवेद्य-ये पाच है । अभाव म पुप्प और ताप
के द्वारा करे और इनके भी अभाव म भक्ति की भावना स ही करना
चाहिए । यह सक्षेप पूजा कह दी गयी है तथा फिर वस्त्रादिक भी बता
दिये गये है । हे भैरव । पुरश्चरण क वृत्य मे प्रदीप के विषय म आप
श्रवण कीजिए । १०२-१०३ । दीप क द्वारा लोका + ऊपर जप प्रास
कर लेता है और यह द्वीप तेजोमय बताया गया है । यह दीप भारी वर्गों
के प्रदान करने वाला हुआ करना है इस कारण से दीपा के द्वारा श्री
के ऊपर जय प्राप्त करना चाहिए ।।१०४॥
सतत पुप्पदीपाभ्या पूजयेद यस्तु दवताम् ।
ताभ्यामेव चतुर्वग कथिता नात्र संशय ॥१०५
पुप्पैर्देवा प्रसीदन्ति पुप्पे देवाश्च मस्थिता ।
चराचराश्च सकला सदा पुष्परसा स्मृता ।।१०६
किंचाति बहुनोक्तेन पुप्पस्योक्तिमतल्लिका ।
पर ज्योति पप्पगत पुष्पर्णव प्रसीदति ।।१०७
त्रिवगसाधन पुष्प तुप्टिश्रीपुष्टिमोक्षदम् ।
पुष्पमूले वसेद ब्रह्मा पुप्पमध्ये तु केशव ॥१०८
पुप्पान तु महादेव सर्वे देवा स्थिता दले ।
तस्मात् पुष्पौर्यजद देवान्नित्य भवितयुतो नर ||१०६
उच्चारित नाममात्र जायते सर्वभूतय ।

[ वालिया पुराण घृतप्रदीप. प्रथमस्तिलतलोद्भवस्तत ॥११० सार्षपफलनिर्यासजातो वा राजिको मव । दधिजश्चान्नजश्चव दीपा सप्त प्रकीर्तिता ॥१११ पद्मसत्रभवा दभगर्भसूत्रभवाऽथवा। शणजा वादरी वापि फलकोषोद्भवा तथा ॥११२ जो पुरुष निरन्तर ही पुणो और दीगो के द्वारा देवना का अर्चन किया करता है। इन दोनो ही से चारो वर्गों की प्राप्ति कही गयी है-इससे नेश मात्र भी मशय नही है ॥ १०५॥ पुष्पो मे देवगण परम प्रसन्न हुआ करते हैं और पुष्पो मे देवगण मस्थित रहा करते है । चर और अचर समस्न मदा पुष्पो का ही रस कहे गये हैं ।। १.६ ॥ अत्यधिक कहने से क्या लाभ है । पुप्पो के विषय में क्यन मल्लिका है । पुप्पो मे रहने वाली परम ज्योति है अतएव पुप्प से ही प्रसन्न होती है । १०७॥ नीर वर्गों का अर्थात् धर्म-अर्थ और काम वा सा घन है। यह पुष्प तुष्टि---पुष्टि -श्री और मोक्ष के प्रदान करने वाला है । पुप्प के मूल में ब्रह्मागी रहा करते हैं और पुष्प के मध्य में केशव का निवास है । १०८ । पुप्प के अग्रभाग म महादेवजी विराजमान रहा करते हैं और सभी देवगग दल में मस्थित रहते है। इस कारण से पुप्पो के द्वारा देवो का यजन करा चाहिए और भक्ति की भावना से मयुत होकर नित्य ही अर्चा करे । १०६ । नाम मान का उच्चारण करना सब विभूनि लिये होता है। अद दीपक के भेदो के विषय में बतलाया जाता है-घृत का दीप, जो सवं प्रपम होता है-तिलो के मेल से बनाया हुआ-मरसों के तेल का दीपर-पत्तो के निर्यान से बनाया हुआ दीप-रानिय अर्थात् राई के तेल से तैयार किया हुआ दीपक-दधि से बनाया हुआ और अन्न में किया हुआ दीपर-ये सात प्रकार के दीप कहे गये हैं ॥११०-१११॥ दीप में वत्तिकारी पांच प्रकार की होती हैं--पद्म पे सूत्र से बनी हुई--दर्भ के मध्यस्थ मूत्र से

दवाराधन के अन्य उपचार
निर्माण की गयी--प्र में निर्मिन कदरी-~-फ्न कोष मे उगभूत हुई
बनिका ११२॥
वर्तिका दीपकृत्येषु मदा पञ्चविधा स्मृताः ।
तंजसं दारव लौह मात्तिक्य नारिखेलनम् ॥११३
तृणध्वजोद्भव वापि दीपपात्र प्रशम्यते ।
दीपवृक्षारच कर्तव्यास्नंजसाद्यन्नु नैरव ॥११४
वृक्षेषु दीपो दातन्यो न तु भूमो कदाचन ।
मर्वसहा वसुमती सहते न त्विद द्वयम् ।।११५
मकायपादघात च दीपताप तथैव च ।
तस्माद् यथा तु पृथिवी ताप नाप्नाति वै नया ।।११६
दीप दद्यान्महादेव्य अन्येभ्योऽपि च भैरव ।
कुवन्त पृथिवीताप यो दीपमुत्सृजेन्नर ॥११७
स ताम्रताप नरक प्राप्नोत्येव गत ममाः।
मुवृत्तवति मुम्नेह. पात्रमग्न मुदशन ॥११८
मूच्छाये बृक्षकोटी तु दीप दद्यात् प्रयलत.।
लभ्यते यस्य तापस्तु दीपस्य चतुरगुलात् ।।११६
न न दीप इति ख्यातो ह्योपवह्निस्तु म यतः ।
नेत्रालादकर स्वचिदंरतापविवर्जित ॥१२०
दीपक वे कृत्यो म दतिका सदा ही पांच नरह को बतायी गई
हैं। किमी धातु में निर्मिन जो भी उत्तम धातु होवे--काष्ठ म बना
हुआ-लोहे का-
-मृत्तिका मे निर्मिन-नारियल मे बनाया हुवा अथवा
तृण ध्वज मे उदभूत दीपक का पात्र प्रशस्त होता है। हे भैरव ! दोप
वृक्ष अर्थात् दीवट तैनस अर्यात उत्तम धातुत्रों का ही बनानी चाहिए।
॥११३-११४॥ वृक्षो पर ही बयान दीवट पर ही दीप रखना चाहिए
और भूमि पर दीपक कभी भी नहीं रखना चाहिए । यह भूमि सभी को
महन करने वाली होती है किन्तु दो बामा को यह सहन नहीं किया

[ मालिका पुराण करती है-एक ता विना ही किसी काय पादों का घात करना और दूसरा दीपक का ताप यह नहीं सहा मरती है। इस पारण स जिस तरह स भी यह पृथ्वी ताप प्राप्त न कर वैसे ही करना चाहिए यथात् दीपक को भूमि पर कभी नही रखना चाहिए । ११५–११६ ॥ हे भैरव । महादेवी क लिये तथा अन्य देवो के लिये भी दीप समपित पर जो मानव पृथिवी वो ताप दता हुआ दीपक का उत्सृजन किया करता है वह मनुष्य तम ताप नामक नरप को सो वप तक निश्चित रूप म प्राप्त किया करता ही है-इसम कुछ सशय नहीं है। सुवृत्त वत्ती वाला-सुन्दर स्नेह से युक्त अर्थात् धृतादि स सयुत-पात्र भग्न- देखने में भी अच्छा दीपक होना चाहिए ॥११७-- ११८॥ मुदर ऊचाई से युक्त वृक्ष की कोटि पर ही प्रयल पूवक दीपक रखना उचित है और उसका ही देवता के लिय उत्सृजन करे। चार अगुल से जिस दाप का ताप प्राप्त किया जाया करता है वह दीपक-इस नाम स ख्यात नहीं होता है । वह तो वाह्नका एक समूह ही है-ऐसा सुना गया है । दीपक नेना का आह्लाद करन वाला~मुदर लो वाला और दूरी म नाम स रहित ही होना चाहिए॥११६-१२०॥ सुशिख शब्दरहितो निधू मा नातिह्रस्वक । दक्षिणावतवतिस्तु प्रदीप श्रीविवृद्धय ।।१२१ दीपवृक्षस्थिते पात्र शुद्धस्नेहप्रपूरिते। दक्षिणावर्तवत्यां तु चारुदीप्त प्रदीपक ॥१२२ उत्तम प्रोच्यते पुत्र सर्वतुप्टिप्रदायक । वृक्षेण वजितो दीपो मध्यम परिवर्तित ॥१२३ विहीन पात्रतलाम्यामधम परिकीतित । शाण वा दारव वस्त्र जीर्ण मलिन मेव वा ॥१२४ उपयुक्त च नादद्याद पतिवार्थ तु साधक । उपदद्यान्नलमव मतत श्रीविवृदय ।।१२५ दवाराधन के अन्य उपचार ] कोपज रोमज वस्त्र वर्तिकाथं न चाददेत् । न मिश्रीकृत्य दद्यात तु दीपे स्नेहघृतादिकान् ।।१२६ कृत्वा मिधीकत स्नेह तामिस्र नरक ब्रजेत् । वसामज्जास्थिनिर्याम स्नेहै प्राण्यङ्गसम्भवै ॥१२७ प्रदीप नैव कुर्यात त करवा पड्डऽवसीदति । अस्थिपात्रेऽथ वा पच्येद दुर्गन्धास्थिपवासिनि ।।१२८ मुन्दर भिषा मे युक्त-शब्द मे रहित---बिना धूआ काला- अत्यधिक छोटा भी न होवे और जिसम वत्ती दक्षिणावत्तं वाली हो ऐसा प्रदीप ही श्री की वृद्धि के लिये हुआ करता हैं । १२१ । दीपक का पात्र दीप के वृक्ष पर अर्थात् दोवट पर स्थित होवे और शुद्ध घृतादि से भरा हुआ हो तथा जिसकी वत्तिका दक्षिण की ओर रहने वाली हो और सुन्दर दीसि म समन्वित हो ऐसा ही दीप होना चाहिए । १२२। हे पुन | रोमा ही दीपक उत्तम कहा जाया करता है जो मवको तुष्टि के देने वाला होवे। जो दीपक वृक्ष से अर्थात् दीवट से रहित होता है वह मध्यम कहा जाता है । १२३ । जो पात्र और तेल से रहित होता है वह दीपक अधम ही कहा गया है । गण अथवा काप्ठ निर्मित-जीर्ण तथा मलिन वस्त्र का साधा उपयुक्त ही देवे और और अनुप युक्त वत्ती के लिये कभी भी ग्रहण न करे । निरन्तर नूतन ही वत्ती के लिये ग्रहण करे। इसी से श्री की वृद्धि होती है ॥१२४॥१२५॥ कोष से उत्पन्न-- रोम मे उद्भत वस्त्र को वत्ती के लिये कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए और दीपक मे स्नेह घृतादि का मिश्रण करके कभी भी न दवे ।।१२६।। जो घृतादिक का दीपक मे मिश्रण करने रखता है वह तामिस नरक म जाता है। वसा-मन्ना-मस्थियो का निर्यास के स्नेहा (चिकनाई) से तथा किसी भी प्राणी के अङ्ग मे समुत्पन्न स्नेह से दीपक की रचना कमी भी नहीं करनी चाहिए। यदि ऐसा कोई भी मनुष्य करता है तो वह परम अवमाद प्रास किया करता है । दुर्गन्ध अस्थि पवासी अस्थियो के पात्र में कभी पचन नहीं करे ।।१२७॥१२॥ -

लिया पुराण
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नव दीप प्रतातव्यो वियुधं श्रीविवृद्धय ।
नव निर्वापयद् दीप कदाचिदपि यत्नत ॥१२६
सतत लक्षणोपेत देवार्थमुपकल्पितम् ।
न हरेज्ज्ञानतो दोप तथा लोभादिना नर ॥१३०
दीपहर्ता भवेदन्ध काणो निर्वापको भवेत् ।
उद्दीप्तदीप्तप्रतिम काष्ठकाण्डसमुदभव ॥१३१
चिल्वेध्मोदभवमेवाय दीपालाभे निवेदयेत् ।
उल्मुक नेव दीपार्थे कदाचिदपि चोत्सृजेत् ॥१३२
प्रसन्नार्थ तु त दद्यादुपचाराद् वहिष्कृतम् ।
एव वा कथितो दीपो धूप च शृणुत सुतौ ॥१३३
नासाक्षिरन्ध्रसुखद सुगन्धोऽतिमनोहर ।
दह्यमानस्य काप्ठस्य प्रयतस्येतरस्य च ॥१३४
परागस्याथवा धूमो निस्तापो यस्य जायते ।
स धप इति विज्ञयो देवाना तप्टिदायक ॥१३५
राशीकतर्न चकन तंद्रव्य परिधूपयेत् ।
तुपाग्निवतुला कृत्वा न तत् फलमवाप्नुयात् ।।१३६
ऐमा दीपक विवुध पुरुषो के द्वारा श्री की विशेष वृद्धि के लिये
कभी भी नहीं देना चाहिए। दीपक को यत्नपूर्वक कदाचित् भी निर्वापित
नहीं करे ।।१२६॥ निरन्तर ही देवों के लिये सुन्दर लक्षणो से युक्त ही
दीपक उप कल्पित करना चाहिए । ज्ञान पूर्वक तथा लोभ आदि मे
मनुष्य को दीपक का हरण नहीं करना चाहिए ॥१३०॥ जो दीपक का
हरण किया करता है वह अन्धा होना है और जो दीपक को बुझा दिया
करता है वह काना हुआ करता है उद्दीस दीप्ति की प्रतिमासे युक्त काष्ठ
के काण्ड से ममुद्भन अथवा विल्व के इधम से उत्पन्न का ही दीपक के
अभाव में निवेदित करना चाहिए । दीपक के लिये उल्मुक का कभी भी
उत्सृजन न करे ॥१३॥१३॥ प्रसन्नता के ही लिय उपचार से

देवाराधन व अन्य उपचार ] ४७१ दहिप्कृत उसको देव । हे पुत्री 1 टन प्रकार में दीपक के विपय में मव कुछ कह दिया गया है। अब आप लोग धूप के विषय मे थवा करिए । १३३ । धूप भी ऐनी ही होनी चाहिए जो नामिका के न्यो (छिद्रो) के लिये मुख प्रदान करने वाली होवे बोर मनका हरण करने दाला सुन्दर गन्धने मुक्तहोवे दाह न्येि गये काष्ठ का-प्रयत का अथवा अन्य का अथवा पराग का जिमका धूप ताप रहिन होवे वह धूप देवगणो की तुष्टि देने वाला होता है-ऐसा जान लेना चाहिए ॥ १३४---- १३५ ।। उन द्रव्यों को नवको एक ममूह में एकत्रित करके परिपूपित नहीं करे । नुपाग्नि मे दत्तल करके धूप न देवे । ऐसा करने में धूप देने का जो भी कुछ फल प्राप्त हुआ करता है वह कभी भी प्राप्त नी होना है। जब उसका कोई भी फल ही नही है तो वैमा नही परे ॥१३॥ श्रीचन्दन व सरल. शाल कृष्णागुरस्तथा । उदयः मुरयम्कन्दो रक्तविद्रम एव च ॥१३७ पोतशाल. परिमलो विर्मदी कागलस्तथा। नमेंरुर्देवदारश्च विन्दमागेज्य सादिर 11१३८ सन्तान: पारिजातश्च हरिचन्दनवल्लनौः । वृक्षेप धूपाः सर्वपा प्रीतिदा. परिकोर्तिताः ।।१३९ अगलः मह मूत्रेण श्रीवासः पट्टबासकः । कपूर- श्रीकरश्चंव परागः श्रीहामली ।।१४० सौंपधीव जातोव वराहचूर्ण उत्कलः । जातीकोपम्य चूर्ण च गन्धः कस्तरिका तथा ।।१४१ क्षोदे वृत्ते च गदिता घूपा एते उदाहृता । यक्षपो वृक्षधूपः श्रीपिप्टो गरु झझः ।।१४२ पन्निवाह. पिण्डधूपः मुगोलः कण्ठ एव च । अन्योन्ययोगा निर्यासा धूपा एते प्रमोतिता. ॥१४३ ४७२ [ कालिका पुराण एतर्विधूपयेद देवान धूमिभि कृष्णवर्मना । येषा धूपोदभवंणिन्तुष्टिं गच्छन्ति जन्तव ॥१४४ अब यह बताया जाता है किन किन वृक्षो को धूप के लिये ग्रहण करना चाहिए। श्री चन्दन -सरल शाल तथा कृष्णा गुरु-उदय- सुरथस्कन्द-~-पागल- नमैरु--देव दारु -विल्वमार-खादिर- दर-सन्तान-- पारिजात-हरिचन्दन-वरलभ-इन वृक्षो की धूप सभी देवो के लिये प्रीति देने वाली परिकीतित की गयी है ।।१३७ -१३६। सूत्र के साथ अराल - श्री वास- पट्ट वासक-पूर--श्रीकर-पराग-श्रीहर-- आमल-सा पधीव-जातीव वराह-चूर्ण-उत्तल-जाती कोप का चूर्ण-गन्ध---स्तूरिका-क्षोद वृत्त में कही हुई ये धूप उदाहृत है । यक्ष धूप-वृक्ष धूप-श्री पिष्ट-अगुरु-झर्झर-हनि वाहा-पिण्ड धूप-रुगाल-कण्ठ–अन्योन्य योग-निर्यास- ये धूप कीत्तित किय गये है ॥१४०-१४३॥ इन धूपो के द्वारा देवो को धूपित करना चाहिए । जो धूप वाला हावे और कृष्ण वम स धूपित करे। जिन की धूपा से उद्भूत प्राणो के द्वारा जन्तुगण तुष्टि का प्राप्त हुआ करत हैं ।।१४४॥ निर्यासश्च परागश्च काप्ठ गन्ध तथैव च । कृत्रिमश्चेति पञ्चैते धूपा प्रीतिकरा परा ॥१४५ न यक्षधूप वितरेन्माधवाय कदाचन । न रक्त विद्रम मह्य सुरथ कदिल तथा ।।१४६ पक्षधूप पुत्रिवाह पिण्डधूप सुगोलक । कृष्णागुरु मपूरो महामायाप्रिय स्मृत ॥१४७ वृकधूपेन वा देवी महामाया प्रपूजयेत् । भेदोमज्जासमायुक्तान न पाधून विनियोजयेत् ।।१४८ परकीयास्तथाघ्रातास्तपि कृत्याभिमर्दितान् । पृल्प धूप च गन्ध च उपचारास्तथापरान् ।।१४६ ।

[ कालिका पुराण
येन तुप्यति कामाख्या त्रिपुरा वैष्णवी तथा ॥१५४
सौवीर यानुन तुत्य मयूरयामुन तथा ।
दुर्विका मेघनीलश्च अञ्जनानि भवन्ति पट् ॥१५५
नवद्र्म च सौवीर यामुन प्रस्तर तथा ।
मयरग्रीवक रन मेघनीलस्तु तंजमम् ।।१५६
पृष्टानि ग्राह्य चनानि शिलाया तैजसेऽथ वा ।
प्रदद्यात सर्वदेवेभ्यो देवीभ्यश्चापि पुषक ॥१५७
घृतप्लादियोगेन नाम्रादौ दीपवह्निना।
यदजन जायते तु दविका परिकोर्निता ॥१५८
सर्वाभावे तु तद दद्याद् देवीभ्यो दाजाजनम् ।
महामाया जगदात्री कामाच्या विपुरा तथा ॥१५६
आप्नुवन्ति महातोप पडभिरेभि: मदाञ्जनः ।
विधवा नाजन कुर्यान्महामायार्यमुत्तमम् ॥१६०
हे पत्र । उमी भांति यह धूप त्रिपुण्या गो तथा नित्य ही मातृ-
साप्रो को और ममस्त पीठ देवो रो और रद्र आदि से भी प्रिय हुआ
परता है ॥१५॥ यह धूप हमने आप दोन को बतला दिया है। अब
नेत्री के रजन के विषय में पाप दोनो श्रवण परिये। जिगरे द्वारा
पामारा देवी, विपुग देवी तथा प्लयो देवी परम प्रसन्न हुमा करती
११५॥ अन्जन प्रारहमा करते हैं उनपे नाम ये हैं-मो
धोर, यामुन, तप, मपग्यामुन, इविशा मेघनीत, ये हो है ।
॥१५५।। सबरम, मो वीर, यामुन, प्रस्तर, मयूर ग्रोवर, रश्न,
मेप नीर, नरम ॥१५॥ घिरे हुए ग्रहण करने योग्य होग है ।
पाहे शिमा पपिम ए हो या मिगी उत्तम धातु पर पृष्ट दिए गये
हो। हे या मीनार रिमपिन परे और ममी देखियो
को भी गंवा मनिकिता पाए १७॥ पृत और मत मार
योगगनाप आरिसर निगो प्रयन बनाया

देवाधिन के अन्य उपचार - १७५ जाता है वही दविका, इस नाम से कहा गया है ॥१५८|| मरता यदि अभाव हो तो देवियो की मेवा मे हम दाह से समुत्पन्न अञ्जन को हो ममर्पित करना चाहिए। महामाया दवी-जगत् वी घानी कामाच्या देवी तया निपुरा देवी इन उपयुवा, प्रकार के अन्जनो से जब ये निवेदिन किये गये हो तो मदा हो महान तोप को प्राप्त हुआ करती हैं अर्थात् उनको परमाधिक प्रसन्नता इवो हुआ करती है। महामाया के लिये प्रस्तुत इस उत्तम अजन का विश्वा नागै यो कभी अपने उपयोग में नहीं लेना चाहिए। इसक' नात्पर्य यही है कि विधवा नारी के द्वारा यह अजन नही बना चाहिए ॥१६॥ नादत्ते त्वजन दवो वैष्णवी विधवाकृतम् । न मृतपाय योजयेत् तु माधो नेवरजनम् '११६१ न पूजाफलमाप्नोनि मृत्पात्रविहिताजनं । चतुर्वर्गप्रदो धूप कामद नेचरन्जनम् ॥१६२ नस्माद द्वयमिद दद्याद् देवेभ्यो भविततो नर । इति वा गदितो धूपस्तथोक्त नेतरजमम् । नैवेद्य तु महादेव्या शृण्वं कानमना पुन ।।१६३ वैवी देवी कभी भी विधवा नारी के द्वारा तयार दिय हुए अन्जन को स्वीकार नही किया करती है। माधना करने वाले को चाहिए कि मिट्टी के पात्र में नेत्र जन यो योजित न करे ॥१६१।। मिट्टी के पात्र में विहित अन्जन को निगदित करने मे पूजा के फल वी भो प्राप्ति कभी नहीं हुआ करती है । ऐमा अन्जन नहीं देना चाहिए मोकि जब इम अन्जन को देवी स्वीकार हो नहीं किया करती है तो यह पूना अधूरी होकर निप्पल हो जाया करती है। धूप चारों वर्गों का प्रदान करने वाला होता है और नम रजन कामनाओ के देने वाला हा वरना है ।।१६।। इस कारण म धूप और नेत्र रञ्जन इन दोनों रा हो देवगणों के लिए भी की भावना द्वारा मनुष्य को समाप

४७६
[ कालिका पुराण
करना चाहिए । इस प्रकार से हमने आप दोनो के समक्ष मे धूप और
नेत्र रजन इन दोनो को पतला दिया है । अव एकाग्र मन चाले होकर
महादेवी के लिए जो भी नैवेद्य समर्पित करना चाहिए उसके विषय म
श्रवण करिए ।।१६३॥
॥ षोडशोपचार निर्णय॥
प्रमार्य दक्षिण हस्त स्वय नम्रशिरा पुन ।
दक्षिण दशयन् पाश्वं मनसापि च दक्षिण ॥१
सकृत त्रिर्वा वेष्टयेयुद व्या प्रीति प्रजायते ।
स च प्रदक्षिणो ज्ञय सवदेवौघतुष्टिद ॥२
अष्टोत्तरशत यस्नु देव्या कुर्यात् प्रदक्षिणम् ।
स सर्वकाममासाद्य पश्चान्मोक्षमवाप्नुयात् ॥३
मनसापि च यो दद्याद् देव्यै भक्त्या प्रदक्षिणम् ।
प्रदक्षिणाद् यमगृहे नरवाणि न पश्यति ।।४
कायिको वाग्भवश्चैव मानसस्त्रिविध स्मृत ।
नमस्कार श्रतस्तज्ज्ञरुत्तमाधम मध्यम ॥५
प्रसार्य पादो हस्तौ च पतित्वा दण्डवत् क्षिती।
जानुभ्यामनिं गत्वा शिरसास्पृश्य मेदिनीम् ॥६
क्रियते यो नमस्कार उत्तम कायिकस्तु स ।
जानुभ्या न क्षिति स्पृष्टवा शिरसास्पृश्य मेदिनीम् ॥७
श्री भगवान ने कहा- दक्षिण हाथ को प्रसारित करके फिर
स्वय नग्न शिर वाला हाव और दाहिने पाश्र्व को दर्शित करता हुआ
मन स भी दक्षिण होवे ।। १ । एक बार अथवा तीन बार घेष्टित करें।
इसरे करने से देवी की प्रीति हुआ करती है। और उसको प्रदक्षिण

पोदशोपचार निर्णय ] ४७३ जानना चाहिए। यह सभी देवो को समष्टि के लिए तुष्टि देने वाला होता है ।। २ ।। और जा एक सौ आठ बार देवी की प्रदक्षिणा किया करता है वह पुग्प अपनी समस्त कामनाया मो प्राप्त करके पीछे अन्न ममय में मोक्ष की प्राप्ति का लाभ दिया करता है ॥ ३ ॥ जो मन से भी भक्ति की भावना से देवी के लिय प्रदक्षिणा (परिमा) दिया करता है वह इस प्रदक्षिणा के ही पुण्य-प्रभाव से ही यमराज के गृह मे अर्थाइ मयम की पुरी म जाकर नरको को कभी नहीं देखा परता है ॥ ४॥ नमम्बार भी काया म होन वाता-वाणी वे द्वारा ममुत्पन्न हुआ और मन मे किया हुआ तीन प्रकार का हुआ करता है जो उसके मान रखन वागो पे द्वारा उत्तम-मध्यम और अधम तीन प्रकार का सुना गया है ॥५॥ इम नमबार रन का भी उक्त तीनो योणियों में परत वा क्रम है । जो अपन दोनो हाथो का और पैरो को फैलावर भूमि म एक दण्ड की भांति गिरकर अपने घुटना में भूमि म जावर शिर से पिर भूमि में गमन करने अर्यात शिर से भूमि का स्पर्श करवे नमस्कार अपन माठो अगो के साहित किया जाता है यही उत्तम नमस्कार हाता है जा पाया के ही द्वारा किया जाया करता है । इमी का वायिक बहा गया है। जा अपन घुटनो में भूमि का स्पश करने और गिर स पृथ्वी का स्पर्श करत किया जाता है वह नमस्सार मध्यय श्रेणी का कायिक कहा गया जियते यो नमम्बारो मध्यम कायिय. म्मृत । गुटीत्य वरो शीपं दीयते यद, यथा तथा । अम्पृष्ट्वा जानुशोभ्यिा क्षिति मोऽयम उच्यते ॥८ या म्वय गद्यपद्यान्या घटिताध्या नमस्त्रति । कियते भक्तियुक्तेन वाचिकम्नत्तमस्तु स IIE पोराणिवदिषा मन्वा नियते नात । म मध्यमो नमम्बारो भवेद, वाचनिष सदा ॥१० [ कालिका पुराण यत् तु मानुष्यवाक्येन नमन क्रियते सदा । स वाचिकोऽधमो ज्ञेयो नमस्वारेषु पुत्रको ।।११ इष्टमध्यानिष्टगतर्मनोभिस्त्रिविध पन। नमन मानस प्रोक्तमुत्तमाधममध्यमम् ।।१२ विविधे च नमस्कारे कायिकश्चोत्तम स्मृत । कायिकंस्तु नमस्कार वास्तुप्यन्ति नित्यश ॥१३ अयमेव नमस्कारो दण्डादिप्रति नामभि । प्रणाम इति विज्ञय स पूर्व प्रतिपादित ।।१४ जो अपने दोनो करो को पुारत करके अर्थात् जोड कर जिम किसी प्रकार से अपने शिर मे लगाकर ही नमस्कार किया जाता है और जिसमे घुटनो और मस्तक को भूमि मे स्पश नहीं करक ही किया जाता है वह नमस्कार अधम कोटिका कहा जाया करता है ॥८॥ ये तीन मरह के नमस्कार काया से किये जाने वाले होते हैं । तथा जो नमस्कार गद्य तथा पद्य के द्वारा घटिन करके दिया जाता है और भक्ति की भावना से होता है वह वाचिक अर्थात् वाणी के द्वारा किय जाने वाला उत्तम श्रेणी का नमस्कार हाता है ॥६॥ जो पुराणा मे कहे हुए अथवा वेदो मे बहे हुए मन्त्रो के द्वारा नमस्कार दिया जाया करता है वह सदा ही वाणी द्वारा किया हुआ मध्यम कोटि का नमस्कार होता है ॥१०॥ और जो मनुष्य के वाक्य के ही द्वारा सदा नमम्बार किया जाता है, ह पुरो । बह वाणी मे ही किया हुभा अधम श्रेणी वाला नमस्कार समझना चाहिए जो सभी नमस्कारो म नोच कोटि का होता है ॥११॥ मन के द्वाग भी दिया हुमा नमस्कार उत्तम-मध्यम और बधम य तीन प्रकार का पहा गया है । जो मन को पूर्ण तया सलग्न करके विया जाने तथा आधे मन मे षेवल पाना पूरी ही की जाच अथवा मन को इप्टगत न परवे ही दिया जाया करता है ये तीन प्रकारो वाला अति उत्तम, मायम और अधम मानस नमस्यार होता है ॥१२॥ इन तीनो प्रकार पोडशोपचार निर्णय ] के नमस्कारो में कायिक अर्थात् शरीर के द्वारा किये जाने वाला नमस्कार ही उत्तम होता है । कायिक नमस्कारो मे ही देवगण नित्य परम प्रसन्न हुआ करते है ॥१३॥ यह ही नमस्कार जो दण्ड आदि के द्वारा प्रति नामो से पूर्व मे प्रतिपादित किया गया है उसी को प्रणाम जान लेना चाहिए ॥१४॥ नैवेद्येन भवेत् सर्वं नैवेद्येनामृत भवेत् । धर्मार्थकाममोक्षाश्च नैवेद्येयु प्रतिष्ठिता ॥१५ मर्वयज्ञमय नित्यं नैवेद्य सर्वतुप्टिदम् । ज्ञानद कामद पुण्य सर्वभोग्यमय तथा ॥१६ मनसापि महादेव्यं नैवेद्य दातुमिच्छति । यो नरो भक्तियुक्त. सन् स दीर्घायु सुखी भवेत् ।।१७ महामाया सदा देवीमर्चयिष्यामि भक्तित । नानाविधीस्तु नैवेद्यरिति चिन्ताकुलस्तु य. । स सर्वकामान् सम्प्राप्य मम लोके महीयते ॥१८ मनसापि च यो दद्याद् देव्यै भक्तया प्रदक्षिणम् । स दक्षिणे यमगृहे मरकाणि न पश्यति ।।१६ देवमानुपगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगा । नमस्कारेण तुप्यन्ति महात्मानः समन्तत. ॥२० नमस्कारेण लभते चतुर्वर्ग महामनि. । सर्वत्र सर्वसिद्धयर्थ नतिरेव प्रशस्यते ॥२१ नैवेद्य के द्वारा मभी कुछ होता है और नैवैद्य से अमृत होता है। धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष ये चारो परम पुरुषार्थ नैवेद्यो मे ही प्रतिष्ठिन रक्षा करते हैं । १५ । नैवेद्य नित्य ही समस्त यज्ञो से परिपूर्ण होता है और यह नैवेद्य सब देवो की तुष्टि के प्रदान करने वाला है। यह नैवेद्य ज्ञान के देने वाला काम अर्थात मन की कामनाओ का प्रदान । करने वाला तथा पुण्य को देने वाला एव सभी भोग्यो से परिपूर्ण ४८० [पपलिया पुगण हुआ घरता है । १६ । जा मनुष्य महादयी पेनिय मन के द्वारा भी नैवेद्य के समर्पित करने की इच्छा पिया करता है वह मानव भक्ति स युक्त होता हुआ दीप आयु वाला और सुखी हुआ करता है । १७। जा मनुष्य सदा ही महामाया देवी की भक्ति से अनेक प्रकार वे नवेद्या, द्वारा अर्चना करूगा---ऐमी चिन्ता स आकुलित रहा करता है वह सभी मन की कामनाओ की प्राप्ति परम अन्त म मरे ही लोग म प्रतिष्ठित हुआ करता है । १८1 जो पुरुष मन म भी दवो के लिय भक्ति भाव से प्रदक्षिणा देता है वह फिर दक्षिण यम राज को पुरी म नमी भी नरको को नही देखा करता है । १६ । नममार का बडा भारी महत्त्व होता है। देव-मनुष्य-गन्धर, यश, राक्षस पन्नग और महान आत्माओ वाले चारो ही ओर से नमस्कार करने से तुष्ट अर्थाद प्रसन्न हुआ करत हैं । । २० । महती मति वाला पुरुष नमस्कार के द्वारा चारी वर्गों का लाभ प्रास किया करता है। सभी जगह सवकी मिद्धि के लिय नमस्कार ही प्रशस्त माना जाया करता है। अर्थात् नमस्कार वा करना सवकी प्राप्ति के लिये परम उत्तम साधन माना गया है ॥२१॥ नत्या विजयते लोमान्नत्यायुरपि वधते। नमस्कारेण दीर्घायुरच्छिन्ना लभते प्रजा ॥२२ नमस्कुरु महादेव्यै प्रदक्षिणमथो कुर । नैवेद्य देदि नितरामिति यो भापते मुहु । सोऽपि कामानवाप्येह मम लोके प्रमोदते ॥२३ विदधाति च नैवेद्य महादेव्यै सुभक्तिमान् । दातु प्रति नर सोऽपि देवीलोकमवाप्नुयात् ।।२४ इति वा कथिता सम्यगुपचारास्तु पोडश । किमन्यद्रुचित वा तत् कथयिष्यामि पृच्छतो १२५ नमस्कार से लोको पर मानव विजय प्राप्त किया करता है और नमस्कार से आयु को भी वृद्धि होती है-नमन करने से मानव दीर्घ पामारया क्वच माहात्म्य वर्णन } आयु वाला होता है और नमस्कार से अधिन्टिन्न मन्नति का लाभ प्राप्त किया करता है जो कि सन्तनियो का क्रम कभी भी दटता नही है । २२ । अतएव महादेवी के लिये नमबार करो और प्रदक्षिण होकर ही नमस्कार कगे । तात्पर्य यह है वि देवी को दक्षिण भाग में स्थित परके ही नमस्कार करना चाहिये । जो निरन्तर 'नवेद्य दोजिए'---यह पहा करता है और बार-बार वोलता है वह मानव भी अपने समस्त मनोरथो की प्राप्ति करके मेरे ही लोक म यानन्द प्राप्त करता है । । २३ । जो गुन्दर भक्ति वाला पुरेप महा देवी के प्रति समर्पित करने के लिये नैवेद्य को किया करता है वह मनुष्य भी देवी के लोर की अन्त में प्राप्ति किया करता है ।२४। इस तरह से आप दोनो को मैंने पोडश (सोलह) उपचार जो अन्यचंन के हमा करत है वन ना दिय है। जो कि भली भांति के होते हैं । अब आप दोनों को या रुचिकर हैं अर्याद अन्य आप दोनों का पूछना पसन्द करते है उमी को बतला दूंगा ॥२५॥ ॥ कामाख्या कवच माहात्म्य वर्णन ॥ कामारयायाश्च माहात्म्य शृणुत च वदामि वाम् । साग तद् सरहस्यं च शृणु वेताल भैरय ॥१ एकदा गरुडेगाशु विष्णुविष्णुपरायणी। गच्छन् देवी तु कामाच्या नोलस्थामाससाद ह ।।२ आमाद्य त गिरियकमवज्ञाय भ केशवः । गच्छ गच्छेति गरड चोदयामास तं गती ॥३ तं च देवी महामाया कामाश्या जगता प्रसूः । गरदेन समं कृपण स्तम्मयामास रोदगी ॥४ स तु गन्तु महामाया-मायया परिमोहितः।

४८२ [ पालिका पुराण न गन्तुमथ वागन्तुमशकद् यद्धवत् स्थित ॥५ अशक्त गरुड दृष्ट्वा गमने गरुडध्वजः । क्रुद्धस्त पर्वतर्थष्ठमुत्मारयितु मुद्यत ॥६ तत कराभ्या त शैल जोडीकृत्य जगत्पति । अभूत् क्षमश्चालयितु मनागपि न केशव ७ श्री भगवान् ने कहा-आप दानो श्रवण कीजिए मैं कामाख्या देवी के माहात्म्य का वर्णन करूंगा। हे वताल । हे भैरव । अङ्गो के सहित उस रहस्य से युक्त को आप दोनो सुनिए । १६ एक समय में भगवान् विष्णु पदापन मे शीघ्र ही अपने वाहन गरुड के द्वारा गमन करते हुए नील पर्वत पर विराजमाना कामाख्या देवी के समीप मे प्राप्त हुए थे । २। उस परम श्रेठ पर्वत पर पहुँच कर उसका ज्ञान प्राप्त करके उन भगवान् के शव न गरुड को गमन करने की गति मे 'चलो- चलो' इस प्रकार से प्रेरित किया था । ३ । समस्त जगता को समुत्पन्न करन वाली महामाया कामाख्या देवी ने उन भगवान् श्रीकृष्ण को गरुड के साथ आते हुए जान कर आकाश मे ही स्तम्भित कर दिया था । ४ । व वहा पर गमन करने के लिये समुद्यत थे किन्तु महामाया की माया मे ऐम परिमोहित हो गये थ कि वे न तो आगे गमन करने मे और न वापिस आगमन करने में समथ हुए और वृद्ध की ही भांति वही पर स्थित रह गय थ । ५। भगवान् गरुडध्वज ने गहड को गमन करने में असमर्थ देखकर वे बहुत कुद्ध हुए थे और उम श्रेष्ठ पर्वत को उत्साहित करने के लिय समुद्यत हुए थे । ६ । इसके अनन्तर जगतो के स्वामी श्री कृष्ण ने भपन करी के द्वारा उस पवत को गोद में ले लिया था किन्तु वे केशव प्रभु उसको थोडा-सा भी चालित करने में समर्थन ही हुए थे अर्थात तनिक भी न हिला सके थे ॥७॥ त चिचालयिषु शैल कामाख्या ोधतत्परा । सिद्धसूत्रेण वैकुण्ठ ववन्ध गरुडेन हि ॥

सामाख्या कवच माहात्म्य वर्णन } ४८३ त वद्ध्वा सिद्धसूत्रेण ग्राहाने लवणार्णवे। चिक्षेप हेलया देवी सक्षेपात् प्रापतत् ततम् ॥६ त सागरतल प्राप्त पुनरेव स्वमायया । यन्त्रयित्वा समानम्य जग्राहाधितल स्थितम् ॥१० स प्रयत्नेन महता नोत्लुति कर्तु मिष्टवान् । महायत्न प्रकुर्वाण पुनरुन्मज्जने हरि ११ तस्यासार प्रसार च कामाख्या प्रनिषेधयेत् । ज्ञानोद्गमनमप्यस्य सा देवा प्रतिषेधयेत् ।।१२ नत प्रज्ञानरहित प्रसारासारजित । गरुडेन सम तोयतले शीर्णमभूच्चिरम् ॥१३ मार्गमाणस्तु त स्रष्टा सागरान्तरसस्थियम् । हरिमामादयामाम विशीर्ण प्राकृत यथा ॥१४ जिम समय ग उस पर्वत का पालित करने की इच्छा और प्रयत्न करते हुए देशव भगवान से देखा था तो महादेवी कामाख्या चहुन ही क्रोधित हुई यो और उम देवी ने सिद्ध सूत्र के द्वारा भगवान वकुण्ठनाथ को गरुड के साथ बांध दिया या । 5 । उनको सिद्ध मूत्र से बांध कर माहान क्षार ममुद्र म देवी ने हला ही से उनको प्रक्षिप्त कर दिया था और वे मक्षण करने से तल मे प्रपतित हो गये थे।६। सागर के तले में प्राप्त हुए उन भगवान कशव को फिर भी अपनी माया से मरित करके फिर वहाँ पर ममाक्रान्त हाकर सागर के तते म स्थिन हुए उनको ग्रहण कर लिया था । १० । उन केशव प्रभु ने बडा भारी प्रयत्न दिया था। मागर के तले से कार और महान प्रयत्न करते हुए भी रहे नि पुरा जन्मज्जित हा जावे। हरि न मव पुछ पत्न दिया था कि जनस मार और प्रसार का उसदव ने रोक दिया था। ११।१२। इमर अनन्नर ये प्रमान स रहिन हो गये पं तथा मसार- भमार म मर्याद हिलने जिन रा भो मय हो गय थे मोर गहर के ही ४०४ [ मालिका पुराण साथ चे चिरकाल तक मागर वे जल के तल म ही शोणं रहे थे । १३ । मृजन करने वाले ने उनकी जब बहुन खोज की तो उनका सागर के तल म समवस्थित हुए हरि को पाया था और वे ऐम विशीर्ण हा रह थ जैम कोई माधारण प्राणी होता है ॥१४॥ तमामाद्य सताश्य तुम्रप्टा लोय पितामह । हस्ताभ्या त समादाय वोत्प्लावयितुमिष्टवान् ।।१५ तमुत्प्नावयितु शक्तो नाभूल्लोकपितामह । स्वय च देवोमायाभिर्बद्ध सन् विस्मयन स्थिन ॥१६ मार्गमाणास्तु ते सर्व देवा शक्रपुरोगमा । चिरेण चाथ कालेन समासे दुजलान्तरे ॥१७ तावासाद्य तत सर्वे सुरा शपुरोगमा । समुत्प्लावयितु यत्न चानशिक्नुवश्च ते ॥१८ तत सर्वेऽपि ते देवा मोहिता मायया भृशम् । विधिविष्णू स्थितौ यदवत तदवत त तन्न सस्थिता ।।१६ मागमाणोऽथ तान् सर्वान देवान देवगस्त । बृहस्पतिर्महादेव हिमवत्-सानुसस्थितम् ।।२० समासाद्य स देवाना वृतान्त देवपूजित । पृष्टवान सादर सम्यक स्तुत्ना नत्वा यथाविधि ॥२१ सृजन करने वाले लोको के पितामह ब्रह्मानी न गट के महित उनको प्राप्त करके उन्होन अपन दोना कग क् द्वारा ऊपर लाने की भी इच्छा की थी ।१५। किन्तु लाका के पितामह भी उनको उत्प्लावित करन में समर्थ नहीं हुए थे । और स्वयं भी देवी की माया स बद्ध होकर विस्मय करते हुए ही स्थित रह गये थे । १६ । फिर समस्त देवगण जिनम इन्द्र मा नायक थे सवय गर पोज करते हुए बहुत अधिक समय में उन्होन मागर के दूपित जस ने मध्य म उन दोनो को प्राप्त किया था और फिर सब इन्द्र आदि दवो न उनको जल से ऊपर लाने ।

मामाच्या क्वच माहात्म्य वर्णन ]
१६५
का वडा भारी प्रयत्न दिया था किन्तु वे भी ऐसा न कर मक चे अर्थात्
पर उनके ले जाने में समर्थ नहीं हुए थे । १७११८ । इसके अनन्तर
वे मर देवगण भी देवी की माया में अत्यधिक मोहित होगए थे। जिस
रीति में ज7 तले म भगवान् विष्णु और ब्रह्माजी स्थित ये उमी
प्रकार मचे सर भी वही पर मम्यित रह गए थ ! १६। उम समय में
देव गुरु बृहस्पति ने उन ग्यो गान करत हुए पल थे और हिमालय
की शिउर पर विराजमान महादेवजी वं ममीप म पहुंच थे। देवी के
द्वारा पूजित महादेवजी ने देवा पा मम्पूर्ण वृत्तान्न उनने पूछा था तब
वटे बाद वे गाथ देव गुरु न उनका प्रणाम कसे तथा स्तवन
पया विधि कसे बदम्पतिजी ने महादेवजी म निवेदन दिया था।
।।२०-२१॥
महादेव जगदाम जगत्प्रशमकारण ।
जनादीन्मार्गमाणोन्ह देवास्त्वा ममुपस्थित ॥२२
ब्रह्मा विष्णुश्च न ब्रह्मसदने नापि नाक्त ।
सस्थिती नापि कुमापि ज्ञायते ह्यन्यदा यया ॥२३
तमिम समय देव चिन्धि त्व देवदेवना ।
पुत्र तिष्ठन्ति यम्माद वा तया भूत्वा ह्यवस्थिता ॥२४
अनुयाम्यामि तान् मर्वानुपदेशान् नव प्रभो ।
पा यिति त्व क्थय यदि ते यनंते दया ॥२५
तस्य तद् वचन श्रुत्वा तद्देशमह पुन ।
तत् मर्वमुक्तवान् यमं यया पदाच मायया ॥२६
अवनाता महादेवी महामाया जगन्मयो।
तेन तन्मायया पद्धो विष्णुस्तिप्ठति मागरे ॥२७
न मागमाणास्त्रिदशा ब्रह्माद्या मायया पुन ।
निवदा निबटे तम्य म्यिनादात्पर्यमयना ॥२८
देरगुर न पहा- महादेव । आप तो ममन जान

४६७ कामाख्या कवच माहात्म्य वर्णन ] गतागतविहीनाश्च जडवज्ञानवजिता। किमर्थमभवन् देवास्तन्मे भापन्तु सम्प्रति ॥३३ तस्य तद्वचन ध्रु त्वा महादेवस्य केशव । शनर्भगंमुवाचेद ब्रह्मादीनां पुरस्तदा ॥३४ यदि आप भी उनकी खोज करते हुए वहां पर जाते हैं और मेरे बिना अकेले ही वहां पर गमन करते हैं तो आप भी वहां पर उमी भांति बद्ध हो जायेंगे और फिर वहाँ मे आने में समर्थ नहीं हो सकेंगे ॥२६॥ इस कारण से मैं ही वहां पर जाना हू जहां पर गरडध्वज प्रभु स्थित हैं । मैं ही ब्रह्मा और इन्द्र आदि उन सवका क्रम से मोचन करा दूंगा ।। ३० ।। इस प्रकार मे देवगुर के माथ मिलकर वृषभध्वज ने कहा था और फिर जहाँ पर देवो के ममुदाय स्थित वही पर महेश्वर गये थे ।। ३१ ॥ वहाँ पर जाकर महादेवजी ने भगवान् विप्रा और ब्रह्माजी से तथा अन्य मव देवगणो मे बातचीत कर पूछा था कि आप सब यहाँ पर किम लिये स्थित हो रहे हैं ।। ३२॥ आप सब तो गमन और आगमन मे रहित हो रहे हैं तथा एक जड़ की भाति ज्ञान से वर्जित हो रहे हैं आप सब ऐमे विम लिए हो गय हैं है देवगणी ! यह अब मुझे बतलाइए ॥ ३३ ॥ उन महादेवजी के इस वचन का श्रवण करके के शव भगवान् ने धीरे से ब्रह्मा आरि देवो के आगे उस समय में महादेवजी से यह कहा था ॥३४॥ नीलकूटस्य शिखरादूर्ध्वमागेन गच्छता। वियता गरुडस्थेन मया नीलो महागिरि ॥३५ धृतः करेण चोदतुं गरुडागतिवारण । तव मां सा महामाया कामाख्या कामरूपिणी ॥३६ योगनिद्रा स्वय धृत्वा चिक्षेपाम्बुधिपुष्करे। ततोऽहं तलमासाद्य तोयराशेः सवाहनः ॥३७ पतितो निवसाम्यत्र चिरमन्धकसूदन । निघमामि चिर पाहमा सागरतीयके॥३८ [ कालिका पुराण हैं तथा जगत् के प्रणमन के वारण स्वरूप हैं। मैं इन्द्र धादि देवा की खोज करता हुआ ही इस समय में आपकी सेवा में उपस्थित हुआ है। । २२। इम समय में ब्रह्माजी और विष्णु भगवान न तो ब्रह्म सदन मे है और न स्वर्ग में ही हैं। वे कहीं पर भी समस्थित नही जाने जाते हैं। जैसे अन्य समय या म्यान में हो ऐसा भी नहीं जाना जा रहा है। हे देव । आप तो देवों के भी देव हैं। मेरे इम महान मशय का छेदन कीजिए। वे इस समय में कहां पर स्थित है, किम कारण से स्थित हो रहे है और ऐसे किस प्रकार से वे अवस्थित हो रहे है । २४ । हे प्रभो । मैं अब आपके ही उपदेश मे उन सबके पीछे अनुगमन करूंगा। यदि आपके हृदय मे दया हो तो अब उन सबकी स्थिति के विषय मे मुझे बतलाइए । २५ । महादेवजी ने देवगुरु के उन वचनो का श्रवण किया था और उनके उद्देश वा भी ज्ञान प्राप्त कर लिया था। फिर महादेवजी ने कहा था जो कि कर्म हुआ था और जिस प्रकार में वे सब माया से बद्ध हुये थे यह मभी कुछ बतला दिया था ॥२६॥ महामाया जगन्मयी महादेवी को भी अब सात करा दिया था। इसी कारण से उस देवी की माया से बद्ध हुए भगवान विष्णु मागर के जल में स्थित है ।२७। उनकी खोज करते हुए देवगण ब्रह्मा आदि मब फिर माया मे बद हुए उनके ही समीप में अत्यन्त संयत होते हुए स्थित रहते हैं ॥२८॥ तास्तु मार्गयितु यासि यदिह त्व मया विना। बद्धस्तथैव त्व चापि नायातु भविता प्रभुः ॥२६ तस्माद् गच्छाम्यह तत्र यत्रास्ते गरुडध्वज । ब्रह्मन्द्राद्यास्तथा गुप्तान्मोचयिप्ये च तान् क्रमात् ॥३० इत्युक्त्वा गुरुणा सार्घ सम्भूय स वृपध्वजः । देवीघा यत्र तिष्ठन्ति गतस्तन महेश्वरः ॥३१ तत्र गत्वा महादेवो विष्णुमाभाप्य वेधसम् । सर्यास्तान् परिपप्रच्छ किमर्थ सस्थितास्त्विह 11३२ कामाच्या कवच माहात्म्य वर्णन } महेश्वर गये गतागतविहीनाश्च जडवज्ज्ञानजिता। किमर्थमभवन देवास्तन्मे भाषन्तु सम्प्रति ।।३३ तस्य तद्वचन श्रुत्वा महादेवस्य केशव. । शनभंगमुवाचेदं ब्रह्मादीनां पुरस्तदा ॥३४ यदि आप भी उनको खोज करते हुए वहां पर जाते हैं और मेरे विना अकेले ही वहां पर गमन करते हैं तो आप भी वहां पर उमी भांति बद्ध हो जायगे थोर फिर यहाँ में आने में ममर्थ नहीं हो सकेंगे, || २६ । इस कारण से पें ही वहां पर जाना हूँ जहां पर गाडध्वजा प्रभुस्थित हैं । मैं ही ब्रह्मा और इन्द्र आदि उन मवका क्रम में मोचन क्रा दुगा ॥ ३० ॥ इस प्रकार से देवगुरु के माय मिलवर वृषभध्वज ने वहा था और फिर जहाँ पर देवो के ममुदाय स्थित थे वही पर वे ॥ ३१॥ वहीं पर जाकर महादेवजी ने भगवान विष्णु और अहाजी से तथा अन्य सब देवगणो से बातचीत करपे पूछा था कि बाप सब यहां पर पिम लिये स्थित हो रहे हैं ॥ ३२॥ आप सब तो गमन और आगमन में रहित हो रहे हैं तथा एक जड की भांति ज्ञान मे जित हो रहे है आप मर गगे दिम लिए हो गये हैं ? है देवगणो ! यह अब मुझे बतलाइए ॥ ३३ ॥ उन महादेवजी के इस । वचन का श्रवण करने देशव भगवान् ने धीरे से ब्रह्मा आदि देवो आगे उम ममय में महादेवजी से यह कहा था ॥३४॥ नीलकूटस्य शिखरावंभागेन गच्छता। वियता गरुडस्थेन मया नीलो महागिरिः ॥३५ घृत करेण चोदतुं गरुडागतिवारण। तन मां सा महामाया कामाख्या कामरूपिणी ॥३६ योगनिद्रा स्वयं धृत्वा चिक्षेपाम्बुधिपुष्करे । ततोऽहं तलमासाद्य तोयराशे. सवाहनः ।।३७ पतितो निवसाम्यत्र चिरमन्धकसूदन । निषमामि चिर चाहमा सागरतीयके ।।३८

१८८
[ पालिका पुराण
नाद्यापि सा महामाया नुदते मा महेश्वर ।
मदर्थमागता देवा ब्रह्मन्द्राद्या ममन्तत ॥३६
तेऽपि वा महादेव्या मायापाशेन वै हठात ।
तस्मान्नो धनगृह्णीव नयेदार्नी शिवालये ॥१०
ता च प्रमादयिप्याम मम्यगवन्धविहिंसया।
हरेस्तदवचन श्र त्वा यह च वरुणायुत ॥११
उवाच परमप्रीत्या दिधिविष्ण प्रति स्वयम् ।
ईश्वर्या वामपूर्वाया क्वच सुमनोहरम् ।।४२
श्री भगनान न वहानी क्ट के शिखर पर से ऊपर बी
ओर आकाश म गरड के द्वारा गमन करते हुए मैंन महान गिरि नील
को हाथ से पकड लिया था। और मैं उसको ऊपर उठाना चाहता था
क्योकि वह गरुड की गति का कारण करने वाला था। वहीं पर काम-
म्पो वाली उस महामाया कामाच्या जो योग निद्रा थी मुझका पकड
वर मुयको महासागर के जल मे पंक दिया था। फिर मैं तत म पहुँच
कर जो ममुद का था अपने वाहा के महित गिर गया था। हे अधिक
के मूदन करने वाले । मैं बहुत अधिक ममय से निवास कर रहा हूँ। मैं यहाँ
पर ही इस महा मागर के जल मे ही चिरकाल से ही रहता हूँ ॥३५-
३८॥ हे महेश्वर । वह महामाया मेरे ऊपर दया नही कर रही है और
अभी तक भी मैं वैसा ही हो रहा हूँ। मेरे ही लिये मभी ओर स ब्रह्मा
आदिव मव समागत हुए थे ॥३६॥ महा देवी ने हठ से उन सबका
भी माया के पाश स बद्ध कर दिया था। इस कारण से आप हमारे
उपर अनुग्रह कीजिए और अब आप मुझको शिवालय मे ही ले चलिए
॥ १०॥ और हम लोग इम व-धन की विशेष हिंसा से उस महादेवी
को प्रसन्न करेंग। भगवान हरि के उस वचन को सुनकर मैं करुणा से
युक्त हो गया था अर्थात मुझे दया आ गयी थी।। ४१ । फिर मैं परम
प्रीति मे स्वय ही ब्रह्माजी और भगवान् विष्णु म योला था। कामदूर्वा
ईपरी का एक गुमनोहर कवच है ॥४२॥

कामारया कवच माहात्म्य वर्णन ।
वद्ध्वा शरीरे चाप नाव्य पञ्चाद् गच्छन्तु ता प्रति ।
अह निवद्धकवचस्तेनाह मायया त्विह ।।४३
न वदो मम ससर्गान तथा चेह वृरस्पति ।
तम्माद् यय तु कवच शृणुध्व वचनान्मम ॥४४
येन सौप्यात समुत्प्लुत्य द्रक्ष्याम परमेश्वरीम् ।
ॐ कामाच्याक्वचस्य ऋपिवृहस्पति -मृत ॥४५
देवी कामेश्वरी तम्य जनुप्टुप्छन्द पते ।
विनियोग मर्वमिद्धौ त च शृण्वन्तु देवता ॥४६
शिर कामेश्वरी देवी कामाच्या वलुपी मम ।
साग्दा वर्णयुगल त्रिपुरावदन तथा ॥४७
कण्ठे पातु महामाया हृदि कामेश्वरी पुन ।
कामाच्या जठरे पातु शारदा मा तु नाभित ॥४८
निपुरा पाश्ययो पातु महामाया तु मेह्ने ।
गुदे कामेश्वरी पातु कामाख्योरद्धये तु माम् ॥४६
उम पवन को शरीर म बांधरा और आप्लावित होकर पीछे
मेरी ओर गमन करें । मैं भी क्वच बाँधे हुए हूँ इसी कारण स माया
के द्वारा यहाँ पर उमरे द्वारा मेरे ममगं मे ही वृहस्पति को निवद्ध नही
विपा गया है। हम वारण मे तुम लोग मेरे वचन मे उम क्वच का
श्रवण कर लीजिए 11 ४३-४५ । जिसके द्वारा मुसु के माथ मली
भांति उपप्लुत होकर परमेश्वरी का दर्शन करेंगे। ॐ कामा क्वच के
ऋपि वृहस्पति कहे गये हैं ॥४५॥ उमयी देवी कामेश्वरी देवी है तथा
छन्द अनुष्टुप होता है । उमरा विनियोग नवको मिदि मे होता है । हे
देवताओ। उममा जाप श्रवण कीजिए ॥४६॥ पिर तो कामेश्वरी देवी
हैं और कामाया मेरे नेत्र हैं । शारदा दोनो काा है तथा त्रिपुरोदेवी
मुच है ॥ ४७ ॥ कण्ठ म महामाया रक्षा करें फिर हृदय में कामेश्वरी
रखा परे । कामाख्या जटर में रक्षा करें और शारदा मुझको नाभि में

[ कालिश पुराण रक्षा रें। ४ । विग दोनों पायों में रक्षा परे। मेदन में महामाया रक्षा बरे। गुद म पामेश्वरी रक्षा करे और यामाग्या मुझको दोनो ऊरुओ में रक्षित वरे ।४६॥ जानुनो शारदा पात् त्रिपुरा पातु जड घयोः । महामाया पादयगे नित्य रक्षत कामदा ।।५० केशे कोटेश्वरी पातु नासाया पात दीपिका । भैरवी दन्तसघाते मातग्यवत चाङ्गयो ।५१ वाहुवोर्मां ललिता पात पाण्योग्त वनवामिनी । विन्ध्यवासिन्यड गलिपु श्रीकामा नखकोटिपु ॥५२ गेमपेप सर्वेपू गप्नकामा सदावत । पादागुलिपाणिभागे पात मा भवनेश्वरी ॥५३ जिह्वाया पात मा सेत क कण्ठाभ्यन्तरेऽवतु । ल पातु चान्तरे वक्ष इ पातु जठरान्तरे ॥५४ सामीन्दु पातु मा वस्ताविन्दुविन्द्वन्तरेऽवतु । तकारस्त्वचि मा पातु रवारोऽस्थिषु सर्वदा ॥५५ लकार मर्वनाडीषु ईकार सर्वमन्धिप । चन्द्र स्नायुपु मा पात विन्दुमज्जासु सन्ततम् ॥५६ दोनों घुटनो मे शारदा देवी रक्षा करे और त्रिपुरा देवी दोनो गांधो म रक्षा करे। दोनो पादो म महामाया रक्षा करे और कामदा नित्य ही रक्षा करें ।।५०11 केश मे कोटेश्वरी रक्षा करे भौर नामिका मे दीपिका रक्षा करे । दाँतो के समुदाय मे भैरवी रक्षा करे तथा दोनो भङ्गो मे मातङ्गी रक्षा करे ।। ५१ । ललिता मेरी बाहुओ मे रक्षा करे और दोनो पाणियों में वनवासिनी रक्षा करे। अगुलियो में विध्य- बासिनी देवी रक्षा करे और नखा की कोटियो में श्री कामा रक्षा करे । । ५२ 1 समस्त रोम कूपो मे सदा गुप्त कामा परित्राण करें। पैरो की मलयो म तया पाणिमान म मेरी भुवनेश्वरी रक्षा गरे । ५३ । ।

कामाख्या क्वच माहात्म्य वर्णन } ४६१ जिह्वा में मेरी सेतृ रक्षा करे तथा कण्ठ के भीतर के रक्षा करे । वक्ष म्यल के अनर मेल रक्षा करे और जठर के अतर मइया करे । 1 ५४ । वम्नी में मेरी मामीन्द्र रक्षा करे । विदु के अनर म इन्दु रक्षा करे। तपार मेरी त्वचा म रक्षा करे । रकार मवदा अस्थियाम रक्षा वरं । ५५ । सस्त माडियो में लकार रक्षा कर और इंकार ममी सन्धियो म मेरी रक्षा घरे। स्नायुभा म मरा परित्राण चन्द्र करे तथा निरन्तर वि.दु मज्जाओ मे मरी रक्षा करे ॥५६॥ पूर्वस्या दिणि चारनम्या दक्षि ग न मते तथा । वारुणे चव वायव्या कोबरे हरमन्दिर ॥५७ तानि प्रत्येकतो देवा आरुह्यारह तन्क्षणा । पपु सस्नु पूर्ववत् ते प्रीतिमापुस्तयातुलाम् ॥५८ निरामयाम्या जग्मुविम्मयाक्निष्टचतना । स्तुवन्त प्रस्तुवन्तश्च वामाथ्यायोनिमण्डलम् ॥५६ ततो देवगुरु नत्वा मा स्तुत्वा च मया पुन । विसप्टास्त्रिदिव याता हर्पोत्फुल्लविलाचना ||५० माहात्म्यमीद्दश दव्या कामाख्यायास्तु भैरव । स्वच चेदृश प्रोक्न नत्वमासाद्य पुत्रक ॥६१ यथेप्टविनियोगेन तामासाद्य मुखी भव । कामार यायश्च माहात्म्य विमन्यत् क्ययामि त ॥६२ यस्मा योनिशिलायोगात्लोहाद्या यान्ति स्वणताम् । यद्योनिमण्डले स्नात्वा सस्त पीत्वा व मानव । नेहोत्पत्तिमवाप्नोति पर निर्वाणमाप्नुयात् ॥६३ पूर्व दिशा म-आग्नयो म-दक्षिण म तया नंत म--वारण में वामन में -दोपर म-हर मन्दिर म प्रत्पर म उनका दवो वतत्क्षण म आरोहण परकर पातरिया था-स्नान दिया था और पूर्व की हो भौति उन्होन मनुन प्रीति को प्रापा किमा पा ॥५७-५८॥ र पर ४६२ [ वालिया पुराण नीरोग होबर अर्थात् परम स्वस्थ होते हुए वहाँ से गमन पर गये थ और परम विस्मय मे आकृष्ट चेतना वाले होगय थे। ये गभी स्तवन परते हुए तथा प्रस्तवन परत हुए गय थे जो वियामाग्या देवी के योनि मण्डल की स्तुति वग्ने हुए ही वहां ग प्रमाण वर गये थे । ५६ । मक अनन्तर देव गुरु को उन्होन प्रणाम किया था और मुझका भी अभि- वादन किया था और मेरी स्तुति की थी। फिर मैंन उनवी विदा किया था और 4 मव दवगण हप से विकसित गोवन वाले हान हुए स्वर्ग का चले गए थे । ६० । हे भैरव । कामाख्या देवी का मा ही माहात्म्य है और देवी का क्वय भी इसी तरह का है जो कहा गया है । अब है पुन | तत्त्व को प्रास बरके अपने अभीष्ट के अनुमार विनियोग कर उसके द्वारा उसकी प्राप्ति वरके सुखी होओ । यह वामाख्या का माहात्म्य है। अब अन्य मैं क्या तुमको वन नाऊ ।। ६१-६२ ।। जिमकी योनि के शिला वल स आयोग स लौह आदि धातुगें मुवर्ण हो जाया करती है। जो मानव इम क योनि मण्डन म स्नान करक और एक बार करना है और परम निर्माण को प्राप्त किया करता है। ॥ मातृका न्यास वर्णन ॥ मातृकान्यासमधुना शृण वेताल भैरव । तेन देवत्वमायाति नरोऽपि विहितेन वै ॥१ वाग ब्रह्माणीमुखा देव्यो मातृका परिकीर्तिता । तासा मन्त्राणि सर्वाणि व्यञ्जनानि स्वरास्तथा ॥२ चन्द्रविन्दुप्रयुक्तानि सर्वकाम प्रदानि च । ऋपिस्तु मातृमत्राणा ब्रह्म व परिकीर्तित ॥३ ४६३ न्यसेत् । मात्रका न्यास वर्णन ] प्रोक्तश्छन्दश्च गायत्री देवता च सरस्वती। शरीरशुद्धिमुन्ये तु सर्वकामार्थमाधने ॥४ विनियोग समुद्दिष्टो मन्त्राणा न्य्नपूरणे । अकारेण समकादिवंगों य प्रथम स्मृत ।।५ तेश्चन्द्रविन्दुमयुक्तस्त नस्थैरक्षरंबहि आकार च तथोच्चार्य अगुष्ठाभ्या नमम्तथा ॥६ प्रथम मातृकाम-त्रमगुष्ठद्वयतो परे वर्गा स्वर सार्ध य वान्य न्यासकमणि ।।७ श्री भगवान् न कहा-हे वताल भैरव | बब तुम मातृका न्याम सा श्रवण कग जिमके द्वारा मनुष्य भी किय जान से देवत्व का प्रास पर लिया करता है ।।१॥ वाग और ब्रह्माणी प्रमुख जिनम हैं एसी दवया मातृका पर कीतिर को गयी हैं उनक प्रयोग किय हुए मन्न और सब व्यन्जन तथा स्वरी को जो चन्द्र विन्दु स समन्वित हैं, सभी सामनाआ के प्रदान करन वाले हैं। मातृका मन्त्री का ऋपि ब्रह्मा ही रह गय हैं ।। २ ।। ३ ।। इनका छन्द गायत्री कहा गया है और इनका देवरा सरस्वती देवी है । शरीर शुद्धि मुख्य म और मब कामाथ साधन म विनियोग ममुद्दिष्ट किया गया है जा मन्ना की न्यूनता क पूरण करने म होता है । अकार क समकादि वग है जा प्रथम कहा गया है ॥४॥५॥ वहाँ पर स्थित चन्द्र विन्दु स मयुक्त उन अक्षरा स वाहिर आकार का उमी भांति उच्चारण करके तथा अगुष्ठा म नम -इमको वह करके सवम प्रथम हा अगुप्ठो से मातृका मन्त्र का न्याम करना च हिए । पर म स्वरो के साथ वग अथवा जो अन्य न्याम कर्म महावें ॥७॥ ते सर्वे चन्द्रविन्दुम्या युक्ता कार्यास्तु सर्वत । हम्वेकारश्च वर्गण दीर्घकारान्तवेन तु 15 तर्जन्योविन्यसेत् सम्यक स्वाहा-तेन तु पूर्ववत् । हम्बोकारष्टवर्गण दीघोरान्तकेन तु॥

। कालिका पुराण
मध्यमायुगले सम्यग्वपडन्तेन विन्यसेत् ।
एकारादिटवर्गन्तु ऐकारान्तेन चैव हुम् ।।१०
न्यसेदनामिकायुग्मे नियतं तत्र भैरव ।
ओकारादिपवर्ग तु औकारान्तमशेषत: ११
वौषडन्त कनिष्ठाया विन्यसेत् कायसिद्धये ।
अकारादियकारादिवर्गेण क्षान्तकेन तु ॥१२
अइत्यन्तेन वलयोविन्यसेत् पाणिपृष्ठयोः ।
वषट्कार शेषभागे अस्त्रन्यासे नियोजयेत् ॥१३
हृदयादिपडङ्गेषु पूर्ववत् क्रमतो न्यसेत् ।
अगुष्ठाद्युक्तवर्गस्तु क्रमात् पस्तिथाविधं ॥१४
वे सब चन्द्र विन्दुओ से युक्त सब ओर से ही करने चाहिये ।
हम्ब इकार से और दीर्घ ईकारान्त क वर्ग से पूर्व को ही भौति जिसमें
स्वाहा अन्त मे होवे भली भाँति तर्जनियों मे विन्यास करना चाहिए ।
एकार जिमके आदि मे होवे ऐसा वर्ग को और ऐकारान्त से हुम् को
अनामिकाओं के जोड़े में हे भैरव ! नियत रूप से वहां पर न्यास करे ।
भोकार जिसके आदि मे होवे ऐसे पवर्ग को और अशेष को औकार अन्त
वाला तथा वौषट् अन्त में लगाकर कार्य की सिद्धि के लिए कनिष्ठिका
मे न्यास करना चाहिए। अकार जिमके आदि में होवे ऐस यकारादि
वर्ग से और क्ष के अन्त वाले से तथा अ इ अन्त वाले वल को पाणियो
के पृष्ठो में न्यास करे। शेप भाग म वपटवार अस्त्र न्याम करना
चाहिए । हृदय आदि छ अङ्गी में पूर्व की ही भांति क्रम मे ग्यास बरे।
अगुष्ठ जिनके आदि में होवे ऐरो-उक्त वर्गों से कम से उसी प्रकार छ
ओसेकरे ॥८-१४॥
पुनस्तथा पादजानुमाथिह्येषु पाययोः ।
यरतौ च विन्यसेन्मन्त्रान् अमात् पूर्ववदारं ॥१५

मातृका न्यास वर्णन ]
वातो. पाण्योस्तथा कट्या नाभौ च जठरे तथा।
स्तनयोरपि विन्यास तथा पभिः समाचरेत् ।।१६
वक्त्रे च चिवुके गण्डे कर्णयोश्च ललाटके ।
अंसे कक्षे च षडवर्ग: पूर्ववन्न्यासमाचरेत् ॥१७
रोमकूपे ब्रह्मरन्ध्रे गुदे जघायुगे तथा ।
नखेषु पादपाष्ण्योश्च तथा पूर्ववदाचरेत् ॥१८
एव तु मातृकान्यास य. कुर्यान्तरसत्तम. ।
स सर्वयनपूजासु पूतो योग्यस्तु जायते ॥१६
नात. वरतर मन्त्र विद्यते क्वचिदेव हि ।
यत्सर्वकाद पुण्प चतुर्वर्गप्रद परम् ॥२०
वाग्देवता हृदि ध्यात्वा मूर्तिसर्वाक्षराणि च ।
विधा च मातृकामन्त्रः सक्रमश्च पिवेज्जलम् ॥२१
फिर उसी प्रकार से पाद-जानु-सक्थि-गुह्य-में और
दोनो पाश्चों में तथा वस्ता में पूर्व की ही भांति अक्षरो के द्वारा क्रम से
मन्त्री का न्यास करना चाहिए । १५। दोनो वाहुओ मे-दोनो हायो
म-करि मे-नाभि म-जठर मे दोनो स्तनो में उसी प्रकार छ ओ
के द्वारा विन्यास का समाचरण करे । १६ । मुप मे-चिबुक मे-~गण्ड
में-दोनो कानो मै--ललाट मे-दोनो असो मे-कक्ष मे पड वर्गों से
पूर्व का ही भांति न्यास करना चाहिए । १७ । रोम कूप मे-ब्रह्म रन्ध्र
मे-गुद में-दोना जघाओं में -नखी म-दोनो हाथो में और पादी
में उसी क्रम से पूर्व की ही भांति समाचरण करना चाहिए ।१८। इस
रोति स जा ४ मनुष्य मातृकाओ का न्यास किया करता है वह
समस्त यज्ञ पूजाओ म पूत (पवित्र) और योग्य हो जाया करता है ।
1१६। इसस परम श्रेष्ठ मन्त्र वही पर भी विद्यमान नहीं है । जो सब
वामनाओ का देने वाला-पुण्यमय-ओर परम चारो वर्गों का प्रदान
करने वाला है ।२०। कादेवता का हृदय में ध्यान करके और सब

[ कालिका पुराण अक्षरो की मूत्तियो का ध्यान करके तीन बार क्रम युक्त मान का मन्त्रा स अभिमन्त्रित कर जल का पान करे ॥२१॥ म वाग्मी पण्डितो धीमान् जायते च वर कवि । चन्द्रविन्दुममायक्तान् स्वरान् पूर्व पठेद् त्रुध ॥२२ व्यञ्जनानि तु मर्वाणि केवलानि पठेत् तत । अकारादिक्षकारान्तान्येव श्वासैश्च पूरकं ॥२३ जल करसले गृह्य पठित्वाक्षरसख्यकम् । अभिमन्य तु तत् तोय प्रथम पूरक पिवेत् ।।२४ कुम्भकेन द्वितीय त तृतीयन्त्वथ रेचक । एव सकृत त्रिवार त पीत्वा तोय विचक्षण १२५ दृढाङ्ग पण्डितो भूयात् पुत्रपौत्रसमन्वित । विसन्ध्यमथ प त्वंव मातृकामन्त्रमन्त्रितम् ॥२६ तोय कवित्वमाप्नोति सर्वान् कामास्तथैव च । सतत कुरुते यस्तु मातृकामन्त्रमन्वितम् ॥२७ तोयपान महाभाग पूरकुम्भकरचक । स सर्वकामान् सप्राप्य पुत्रपौत्रसमृद्धिमान ॥२८

मातृका न्यास वर्णन
वह कवित्व को प्राप्त हो जाता है तथा जो सभी कामो को मातृका
मन्त्रो मे मन्त्रित करके निरन्तर करता है । २७ । हे महाभाग ! पूरक.
कुम्भक-रेचका से जल का पान करता है वह सभी कामनाओं को
प्राप्त करके पुत्र पौत्र--समृद्धि वाला हो जाता है ॥२८॥
भूत्वा महाकविलॊके बलवान सत्यविक्रम. ।
सर्वत्र वल्लभो भूत्वा चान्ते मोक्षमवाप्नुयात् ॥२६
राजानमथवा राजपुत्र भार्यामथापि वा।
वशीकरोति नचिरान्मातृकामन्नपानत. ॥३०
न्यासक्रमे क्रम. प्रोक्तो वर्गक्रम इहैव तु ।
अक्षराणा क्रमेणाथ तोयपान समाचरत् ॥३१
ये ये मन्त्रा देवतानामृपीणामय रक्षसाम् ।
ते मन्त्रा मातृकामन्त्रं नित्यमेव प्रतिष्ठिता ॥३२
सर्वमन्त्रमयश्चाय सर्ववेदमयस्तथा ।
चतुर्वर्गप्रदश्चायं मातृकामन्त्र उच्यते ॥३३
इति ते कथित पत्र मातृकान्यासमद्भुतम् ।
विभागमथ मुद्रामा शृण वेताल भैरव ॥३४
वह लोक म महा कवि वनवान और मत्य विश्य वाला नया सर्वत्र
बल्लभ होकर अन्त में मोक्ष प्राप्त किया करता है ।। २६ 11 वह राजा--
राजपुत्र बोर भार्या को वश मे कर लेता है। वह शीघ्र ही मातृका
मन्त्र के पान से वश में कर लेता है ।। ३०॥ न्यास क्रम मे क्रम कहा
गया है। यहा पर ही वर्ग कम कहा गया है । अक्षरी के क्रम से जल
का पान करे ।३१। जो-जो मन्त्र देवो क ऋपियो के-राक्षमो के हैं वे
राव मत्र मातृका मन्त्रों में नित्य ही प्रतिष्ठिन हैं ॥ ३२ ॥ यह मातृका
मन्त्र सव मन्त्रो से तपा देवों में परिपूर्ण है । यह चतुर्वर्गप्रद यह मातृका
मार कहा जाता है। ३३१ हे पुत्र! यह अद्भुत मातका ग्यास तुमको वता
दिया है। यच हे वेताल भैरव ! मुद्राओं का विभाग सुनो ॥३॥

[लिका पुराण
11४
॥ मार्कण्डेय फयन ॥
दक्षग्य तनया चाभूत् मुरमिनाम नामत ।
गवा माता महाभागा मवंलोकोपकारिणी ॥१
तस्या तु तनया जज्ञे कश्यपात् तु प्रजापतेः ।
नाम्ना सा रोहिणी शुभ्रा सर्वयामदुधा नृणाम् ।।२
तस्या जज्ञे शुन शेफान्मुनेरतिनपोधनात् ।
कामधेनुरिति ख्याता सर्वलक्षणमयुता ॥३
सा सिताप्रतीकाशा चतुर्वेदचतुप्पदा ।
स्तनश्चतुभिधर्मार्थकामप्रसवकारिणी
सा सुवर्णशरीरा तु कालेन महता सती ।
निर्मल यौवन प्राप कामधेनुमनोहरम् ।।५
ता चरन्ती मेरुपृष्ठे चाररूपा सुलक्षणाम् ॥६
ददशं स तु वेताल कामुकश्चाभ्यपद्यन् ।।७
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा--प्रजापति दक्ष को पुत्री नाम से
सुरभि हुई थी। वह गौओ की माता थी और वह महाभागा सभी लोको
के उपकार करने वाली थी।१। प्रजापति कश्यप स उसके उदर से
एक तनया ने जन्म ग्रहण किया था। नाम स वह रोहिणी थी। वह
शुभ्रा और मनु यो क सम्पूर्ण कामनाओ का दोहन करन वाली थी।
१२। उसमे अतीव तपोधन शुन शेष मुनि स जिसने जन्म प्राप्त किया
था वह समस्त सुलक्षणों से युक्त कामनु--इस नाम स प्रख्यात हुई
थी । ३ । वह सित मेघ के सदृश थी और चारो वेदो के चरणो वाली
थी। वह अपने पारो स्तनो के द्वारा धर्म–अर्थ और कामो के प्रसव
करने वाली थी ।४। सुवर्ण के ममान शरीर वाली उस काम धेनु ने
जो सती थी-बहुत काल के होन पर निर्मल और परम मनोहर यौवन
को प्राप्त किया था । ५ । मेरु पर्वत के पृष्ठ भाग पर मञ्चरण करती

मार्कण्डेय वयन YEE हुई-चार स्वरूप वाली-मुन्दर लक्षणों न ममन्वित उमको वेताल ने देवा था और वह उमा मौन्दयं देखकर कामुक हो गया था अर्थान वैनाल के हृदय में काम वामना ममुत्पन्न हो गयो यो ॥६॥७॥ त कामुकं च वैताल विदित्वा कामधेनुका । पशुधति स्वय भेजे त पुत्र शशमृद्भुत ।। गोत्राय नस्या परममामोद शदूरात्मज. । मा चापि परमा तन्मिन् मुदमापातिहर्षिता ॥ तयोः प्रवृत्त मुरते तम्या गर्भोऽभवत् तदा । काले प्राप्त तु मुपवे कामधेनुमहावृपम् ।।१० मोऽचिरेणव कालन मुमहान वृपभोऽभवत् । महाकदमयुक्तश्चाङ्गसमन्वितः ॥११ उत्क्षिप्य विचलत-कर्णयुगलो दीर्घवालधि । कद्देन च शृङ्गाम्या कर्णाभ्या मससिताभ्रवत् ॥१२ विचलन् ददृशे देव शृङ्गरिव सिताचल । वेतालस्त्वकरीन तस्य नाम शृङ्ग इति द्विजा ॥१३ म तु शृङ्गां नानशाली ममाराघयदीश्वरम् । सोऽपि तुप्टो पर तस्मं ददाविष्ट हर प्रभुः ।।१४ उम कामधन ने उस वैतान को कामुक जान कर उमने पशु धर्म मे ग्वय ही उम चन्द्रशेयर के पुत्र का स्वय ही संवन विया पा 10 उग भगवान् शङ्कर पुत्र ने उम कामधेन मे परम आनन्द की प्राप्ति की थी और उसने भी उसमें मानन्द को प्राप्त पसे बहुत ही हर्पित हुई भी l उन दोनो मे सुरत क्रीडा में प्रवृत्त हो जाने पर उममें उन ममय में गर्भ स्पिन हो गया था। जद प्रसव पाल प्राप्त हुआ तो उम ममय में नमने महावृष यो प्रमून दिया था ।१०। वह पोडे ही समय में मुमहान् वृषभ हो गया था। उसके बहुत बडा खुद पा मोर मुन्दर मोगों में वह युक्त पा ॥११॥ उत्सएप ररफ विलित दोनों कानों । कालिया पुराण वाला था और बहुत लम्बी उमकी पूछ थी वह ककुद म-मांगो म और काना से सित अभ्र के ही ममान था ॥१२॥ विचलन करत हुने उमे शृङ्गो मे सिताचल की गे भाति देवा के द्वारा वह टया गया था। वेतात ने उसका नाम ह द्विजो । शृङ्ग-पही रखा था । १३ । वह श्रङ्ग बहुत ज्ञानवान् था और उसने ईश्वर की समाराधना की थी। वह भगवान् शम्भु भी उस पर परम तुष्ट हो गये थे और उसने उसको अभीष्ट वरदान दिया था ॥१४॥ तमेव वाहन च कृत्वा देवतनु वृषम् । मुचिरायुश्च बलवान पृथिवीधारण क्षम ॥१५ शृङ्गो नाम महातेजा केतु सोऽप्य भवन प्रभो । शृङ्गो भत्वा मतो यस्माच्छङ्करस्य महात्मन ॥१६ अत शृङ्ग इति ख्यातिमय पाह महेश्वर । स तु शृङ्गो महादेवे ध्यानामवते क्वचिन् क्वचित् ।।१७ वरुणस्य गृह गत्वा मुरभेस्तनयास्तु या । रुपयौवनसम्प ना भेजऽल मुरतेन ता ॥१८ वरणस्य गृहे गाव सवलक्षणसयता । तिष्ठन्ति सतत विप्रास्तासु तासु मुना पुन ।।१६ यवस्तु च समुत्पन्नास्तपा सूतिप्रसूतिभि । मर्व जगदिद व्याप्त तेभ्यो यज्ञ प्रवतते ॥२. आज्यन देवास्तुप्यति यज्ञा जाज्ये प्रतिष्ठिता । यजाधानमिद सर्व जगत स्थावरजङ्गमम् ।।२१ भगवान हर ने उग वृप को देव शरीर वाला बनाकर उसका ही अपना वाहन बना लिया था। वह बस वाला और चिराय था तथा पृथ्वी के धारण करन म समयं था ||१५||मङ्ग महान तेग वाला पा और वह प्रभ वा घेतु भी हो गया था। क्योकि हर वह महान भागमा वाले भगवान् शङ्करा प्यारा हा गया पा। अतएप ५०२ [ कालिया पुराण रहा करता है । २२। वे मब गौवं वेताल के वश में हो होने वाली हैं और सदा सवकी प्रिय होती हैं । जो महात्मा वेताल के इस चरित्र का नित्य श्रवण किया करता है और इनमें वशो स जन्म को मुनता है वह सर्व सुखी और वलवान हुआ करता है। उस पुरुप की न तो गोयें नष्ट होती है और न कभी विभव ही विनष्ट हुआ करते हैं । २३ । २४ । उम पुरुष को भूत-पिशाच आदि भी कभी नही देखा करते हैं। वेताल स्वय ही उनकी निरन्तर रक्षा के कर्म का समाचरण किया करता है ।२५। हे विप्रो | यह मैंने आपको बतला दिया है जिस तरह से वेताल और भैरव दोनो ने जन्म लिया था और पुत्रो को जन्म ग्रहण कराया था। अव तो आपके सभी मशय विच्छिन्न हो गये होगे । २६ । जिस तरह से कालिका देवी ने शकर मोहित किया था और जैसे शरीर के अधं में उत्पन्न हुई थी और भगवान शम्भू ने जमे-तैसे किया था—यह सब कह दिया है । २७ । जो मनुष्य कालिका लिये 'आपको नमस्कार है- ऐसा स्वय कहता है उस पुरुष के हाथ मे ही मुक्ति तो स्थित रहा करती है और तीनो का अर्थात् धर्म-अर्थ --काम का वर्ग मुक्ति के ही वश में रहने वाला इनका अनुगामी हुआ करता है । २८ । इति व कथित पुण्य पुराण कालिकाह्वयम् । मन्त्रयन्त्रमय शुद्ध ज्ञानद कामद परम् ।।२६ इति गुह्यतम लोपे वेदेषु च तथा द्विजा । देवगन्धर्वसिद्धाद्य स्पृहणीयमिद सदा ॥३० अधीत च श्रुत मत्तो वसिष्ठेन महात्मना । पुराणममृतं कालिकाह्वयमुत्तमम् ॥३१ तेन गुप्तमिद सर्व कामस्पे सुरालये । तमिदानी समाख्यात व्यक्नोवृत्य महर्षय ॥३२ युप्माभिरपि नो देय गोप्य लोकेषु सर्वदा । साय चलचित्ताय नास्तिकायाजितात्मने ॥३३

मावण्डेय वयन ]
भक्तिश्रद्धाविहीनाय न दातव्य कदाचन ।
इद सकृत् पठद् यस्तु पुराण कालिकाह्वयम् ॥३४
स कामानखिलान् प्राप्य शपऽमृतमवाप्नुयाद ।
मन्दिरे लिखित यस्य पुराणमिदमुत्तमम् ॥३५
सदा तिष्ठति ना तस्य विघ्न सजायते द्विगा ।
योऽधीतेऽहन्यहन्यतद गुह्य तन्त्रमिद परम् ।।३६
अघीता मकला वेदास्तनेह द्विगसत्तमा ।
तस्मान्नवाधिकोऽन्योऽस्ति कृतकृत्या विचक्षण ॥३७
यह इस रीति स परम पुण्यमय कालिका नाम वाला पुराण
आपको वणित करके सुना दिया है । जो म ना और यात्रा से परिपूर्ण
है--शुद्ध-ज्ञान का देन वाला-कामनाओ का दाता परम श्रेष्ठ है ।
1 २६ । हे द्विजाणो । यह लोक म और वेदो म भी परम गोपनीय है।
इसके लिय दव-ग घव और सिद्ध आदि सभी सदा स्पृहा किया करते
है । ३० । इस परमोत्तम कालिका नामक पुराणामृत को महात्मा वसिष्ठ
न मुयमे ही सुना था और अध्ययन किया था । ३१ । यह काम रुप
सुरालय म भी इसी कारण से गुप्त है। हे महापगणो । उसको इस
ममय में प्रकट करये हो भला भौति आख्यान किया है । ३२ । आप
लोग भी इसका नही देव । यह सवदा लोका म गोपन करन के याग्य
है। जो शठ हो-~चञ्चत चित वाला हो-नास्तिक हा-अविजित
आत्मा वाला हा-भक्ति और श्रद्धा से रहित हो। उसको इसे
कभी भी नहीं देना चाहिए । जो एक बार भी इस कालिया
नामक पुराण का पाठ करना है वह सभी कामनाओ को प्रास
परके शेप म अमृतत्व अर्थात दवत्व का प्रास किया करता है। जिसक
मदिर म यह लिखा हुआ उत्तम पुराण सदा स्थिा रहता है हे द्विजो'
उसका कभी विघ्न नही होता है। जो इसको प्रति दिन इसका
गोपनीय अध्ययन करता है जो कि यह परम त न है । हे द्विज हो
उसने यहां पर ही सम्पूर्ण वदा का अध्ययन कर लिया है। इस कारण
1

[पालिका पुराण से इसस अधिक अन्य कुछ भी नही है । विचक्षण पुरुष इस अध्ययन से वृत कृत्य हो जाता है ॥३३-३७।। स सुखी बल्लवारलोके दीर्घायुरपि जायते ॥३८ यो लाकमीश सतत विमति य पालयत्यन्तकरस्तथान्ते । इद समस्त भ्रममभ्रम वा मदीयरूप च नमाऽस्तु तस्म ॥३६ प्रधानपुरुषो यस्य प्रपन्चो यागिना हृदि । य पुराणाधिपो विष्णु प्रसीदतु स व शिव ॥४. यो हेनुरुप पुरुष पुराण सनातन शश्वत ईश्वर पर । पुराणकृद वेदपुराणवेच्च प्रस्तौमि तन्नौमि पुराणशेप ॥४१ इति सकतजगद् विभति यासा मधुरिपुमोहकरी रमास्वत्पा। रमयति च हर शिवास्वरूपा वितरतु वो विभव शुभानि माया ॥४२ इसके अध्ययन तथा श्रवण करन वाना पुरुष परम सुखी तथा लोक म बलवान् और दीघ आयु वाला भी हो जाता है । ३८१ जो निरन्तर लोक का विभरण क्यिा करता है। जा पालन करता है और अन में विनाश करने वाला है। यह सम्पूण भ्रम या अधम स युक्त है मेरा ही स्वरूप है अतएव उसके लिये नमस्कार है । ३६। योगयो के हृदय म जिसका प्रपञ्च प्रधान पुरुष है --जो पुराणा का अधिप भग. वान् विष्णु और वह भगवान् शिव आप सबसे ऊपर प्रसन्न होवें । ४०। जो उग्र हेतु है-पुराण पुरुप है-जो शश्वत तथा मनातन पर ईश्वर है-जो पुगणो का करन वाला और वेदो तथा पुराणा के द्वारा जानने के योग्य है उस पुराण शेप के लिय में प्रस्तवन करता है और अभिवादन करता हूँ ।११। जो इस प्रकार से समस्त जगत् का विशेष स्पस भरण दिया करती है -जा मधु रिपु को भी माह कर देने वाली है--जिसका स्वरूप रमा है और शिवा के स्वरूप से जो भगवान् शङ्कर या रमण कराया करती है वह माया आप क विभव को और शुभो को वितरित परे ॥४२॥ ॥ मालिका पुराण (द्वतीय खण्ड ) समाप्त ।।

Kalika Puran Vol-2

Author
Gouttam,chamanlal
Title
Kalika Puran Vol-2
File name
Kalika Puran Vol-2
Text
OCR done
Citation
1973
Published
2012/08
Publisher
Barely.,uttar Pradesh.,sanskriti Sansthan Vednagar
Language
Sanskrit
Pages
498
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313018
Barcode
99999990321748.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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