Sanmati Library, Jaipur
Chausath Riddhi Pooja
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अनमः सिद्धेभ्यः।
यति श्रीस्वरूपचन्द्रजी विरचित
चौसठ ऋद्धि पूजा।
अर्थात्
हत् गुर्वावलि पूजा शांतिक विधान।
प्रकाशक
जैनसाहित्यप्रसारक कार्यालय,
हीराबाग, गिरगांव-चम्बई ।
प्रथम संस्करण।
कार्तिक सुदी पीर नि• स. २४४७ ।
मन्य नारद माने।
कासालास्कामाछा -
म
Nr
प्रकाशक- नदयलाल काशलीवाल , और बिहारीलाल कठनेरा, मालिक- ननसाहित्यमसारक कायालय, हीराबाग, गिरगाँव-बम्बई। मनंत बाळकृष्ण घगये, ' श्रीसरस्वती ' मुद्रणालय, बोरभाट लेन, पर न.16, गिरगांव, कांदेवारी, मंगाई।
. हमारे खुदके छपाये हुए जैन ग्रन्थ । त्रिलोकसार-स्वर्गीय पं. टोडरमाजीकृत भाषा-बचानका सहित । इस महान प्रन्थमें जैनधर्मके अनुसार त्रिलोकको रचनाका खुलासा वर्णन बड़े विस्तार के साथ किया गया है। मूल्य ५॥) २० पाण्डवपुराण-न्यायताथ पं० घनश्यामदासजीकृत नया अनुपाद । म्• ५॥). क्रियाकोष-स्वगीय पं० दौलतरामजीकृत । इसमें बतलाया है कि खान-पान कैसा होना चाहिए, भले या इरे सान-पानका मनपर क्या प्रभाव पड़ता है; भादि । मू. २॥) रु. रत्नकरंडावकाचार-स्व. पं० सदासुखजीकृत भाषाटीकासहित । श्रावकाचार-भी बहुत बड़ा अंथ है । मू. ६). पुण्यास्रव-इसमे धार्मिक भावोसे परिपूर्ण ५६ छोटी मोटी मनोरणक कथायें हैं । पृष्ठ संख्या ३४. के लगभग है । मूल्य ४ ) . भक्तामर कथा-(मत्र-यत्र-सहित) इसमे मत्र, ऋद्धि और उनकी साधनानीध तथा माताटीय यंत्र भी दिये गये हैं। मू. 1). कपड़ेकी जिल्वका im) चन्द्रमभचरित-इसमें आठप तीथकर श्रीचंद्रप्रभ भगवानका पवित्र चरित है। मूल्य कपड़ेकी मिल्दका 11) सादी जिन्दका 11). नागकमारचरित-पभाषाकविचावति मलिषेण सूरीके संस्कृत ग्रंयका भनुवाद । यह भन नहीं रहा।
नेमिपुराण-संस्कृत नेमिपुराणका हिंदी अनुवाद है । इसमें मावीसवें तीर्थकर नेमिनाथ भगवनाका
“परित है । मूल्य २॥) • कपड़ेकी जिल्द ३) ३०
सम्यक्त्वकौमुदी-इसमें सम्यक्त्वकी के
यह भव नहीं मिलती।
मदर्शनचरित-सुदर्शनको शीलधर्मसे गि
ल हुए; परतु वहशीलधर्म पर सुमेकमा अपल
बना रहा । मू.)
यशोधरचरित-इसमें यशोधरका सुदर
1)
पंचास्तिकाय-समयसार-स्व. पं. । दोहा, चौपाई, कवित्त, सवैया भादिमें
छन्दोबद टीका । मू. १) रु.
अकलंकचरित-मू०)
पवनदूत (काव्य)
-1)
श्रेणिकचरितसार - म०) चौवीसठाणा चर्चा-मू ॥9)
सुकुमाळचरितसार-खतम ।
हिन्दीभक्तामर-म० )
हिन्दी कल्याणमंदिर-मू.7 नियमपोथी-मू. )
कर्मदहन-विधान-मा)
छहढाला-मन)
वनवासिनी-मू० ।)
चौसठऋद्धि पूजा-मू.)
इनके सिवाय और सब जगहके छपे हुए सब तरहके जनपथ भी हमारे यहाँ मिलते हैं।
पता-जनसाहित्यप्रसारक कार्यालय, हीरानाग, गिरगाव-बम्बई ।
ॐनमः सिद्धेश्यः।
यति श्रीस्वरूपचन्द्रजी विरचित
चौसठ ऋद्धि पूजा
(बृहतगुर्वावली पूजा)
दोहा।
सारासार विचार कर, तज संसृतिको भार
घारा घर निज ध्यानकी, भए सिंधु भव पार ॥१॥
भूत भविष्यत कालके, वर्तमान ऋषिराज ।
तिनके पदको नमन कर, पूज रचूं शिव काज ॥२॥
- ए. ब प - स्तुति । --मदअवलिप्तकपोल छंद ।। यह संसार असार दुःखमय जान निरंतर, विषय-भोग धन धान्य त्याग सब भये दिगंबर । परपरणति परिहार लगे निजपरणति मांहीं, राग दोष मद मोह तणी त्यागी परछांहीं ॥ ३॥ जन्म जरा अरु प्ररण त्रिदोष जु या जग माहीं, सब जगवासी जीव भ्रमत कछु साता नहीं। इम विचार चितमांहिं धार संयम अविकारी, शुक्ल ध्यान घर धीरवरी अविचल शिवनारी॥४॥ षट्कायनि के जीवतणी करुणा प्रतिपाले, कर चोरी परिहार मृषा वच सवही यले । 1 - ब्रह्मचर्य व्रतधरयो परिग्रह द्विविध तज्यों जिन, पंच महाव्रत येह धार मुनि भये विवक्षन ॥५॥ चार हाथ भू निरख चलै हित मित वच भाखै, षट्चालीस जु दोषरहित हो अशन जु चाखै । भूमि शुद्ध प्रतिलेख वस्तु क्षेपे रु उठावै, भू निर्जतु मझारि मूत्र मल क्षपण करावै ॥६॥ स्पर्शनके हैं आठ पंच रस रसनाके रे, प्राणेंद्रियके दोय चक्षुके पांच गिने रे । कणद्रियके सप्त, वीस अरु सात विषय सब, इष्ट अनिष्ट जु मांहिं करै नहिं रागद्वेष कर ॥७॥ सामायिक अरु वंदन स्तुति प्रतिक्रमण भजै हैं प्रत्याख्यान व्युत्सर्ग दिवस तिरकाल सजे हैं। जब भूमिशयन अरु स्नानत्याग, नग्नत्व धरै हैं, कच लोंचें, दिन मांहिं एक वर अशन करै हैं ॥८॥ खडे होयकर हार करें सब दोष टाल मित, दंत-धवन तिन त्यज्यो देह जिय भिन्न लख्यो नित। अष्टाविंशति ये जु मूलगुण धरत निरंतर, उत्तरगुणलख च्यार असी घर बाह्य अभ्यंतर ॥९॥ दोहा। इत्यादिक बहु गुण सहित, अनागार ऋषिराज । नमू नमूतिन पद कमल, तारण तरण जिहाज ॥१०॥ इति पठित्वा पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।
अथ समुच्चयपूजा।
गीताछन्द।
-
संसार सकल असार जामें सारता कुछ है नहीं,
धन, धाम,धरणी और गृहिणी त्याग, लीनी वन मही।
ऐसे दिगंबर हो गये, अरु होयगे, वरतत सदा ।
इत थापि पूजू मन वचन करि देहु मंगल विधि तदा ॥१॥
ॐ हीं भूतभविष्यद्वर्तमानकालसम्बन्धिपंचप्रकारसवऋपीश्वरा अन अवतरत
अषतरत संवौपटू । आह्वाननं । अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः । स्थापनं । अत्र मम
सन्निहिता भवत भवत वषटू । सन्निधापनं ।
अष्टक।
चाल रेखता।
लाय शुभ गंगजल भरिकै, कनक शृंगार भरि करके।
जन्म जर मृत्युके हरनन, जजू मुनिराजके चरणन ॥१॥
ॐ ही, भूतभविष्यद्वर्तमानकालसंबंधिपुलाकवकुशकुशीलनिग्रंथस्नातकपंच- प्रकारसर्वमुनीश्वरेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । घसू काश्मीर संग चंदन, मिलाऊं केलिको नंदन । करत भवतापको हरनन, जजू मुनिराजके चरणन ॥२॥ चंदनं । अखित शुभचंद्रके करसे, धरूं कण थालमैं सरसे। अखय पद प्राप्तिके करणन, जजू मुनिराजके चरणन ॥३॥ अक्षतं । पुहुप ल्यो प्राणके रंजन, उड़त ता मांहिं मकरंदन। मनोभव बाणके मरणन, जजू मुनिराजके चरणन ॥ ४॥ पुष्पं ॥ लेय पक्वान्न बहुविधिके, भरूं शुभ थाल सुवरणके । असातावेदनी शुरणन, जजू मुनिराजके चरणन ॥ ५॥ नैवेद्यं ॥ जगमगे दीप ले करके, रकाबी स्वर्णमें धरके । मोहविध्वंसके करणन, जजू मुनिराजके चरणन ॥ ६॥ दीपं ।। है
अगर मलयागिरी चंदन, खेयकरि धूपके गंधन ।
होय कर्माष्टको जरनन, जजू मुनिरानके चरणन ॥७॥धूपं ।।
श्रीफलाम्रादि फल ल्याऊं, स्वर्णको थाल भरवाऊं ।
होय शुभ मुक्तिको मिलनन, जजू मुनिराजके चरणन ॥८॥ फलं ॥
जलादिक द्रव्य मिलवाए, विविध बादित्र बज़वाए।
अधिक उत्साह कर तनमें, चढाऊँ अर्घ चरणनमें ॥९॥ अर्घ ॥
जयमाला॥
सोरठा।
पद्धडि छंद।
तारण तरण जिहाज, भवसमुद्रके मांहिं जे।
ऐसे श्रीऋषिराज, सुमरि सुमरि विनती करूं ॥१॥
जय जय जय श्रीमुनि युगल पाय, मैं प्रणमूं मन वच शीश नाय ॥
जे सब असार संसार जान, सब त्याग कियो आतम कल्यान॥२॥
पू. ४ चौ. । क्षेत्र वास्तु अफ रत्न स्वर्ण, धन धान्य द्विपद अरु चतुकवरण। अरु कोप्य भांड दश बाह्य भेद, परिग्रह त्यागे नहिं रंच खेद ॥३॥ मिथ्यात्व तज्यो संसार मूल, पुनि हास्य अरति रति शोक शूल । है भय सप्त जुगुप्ता स्त्रीय वेद, फिर पुरुष वेद अरु क्लीव वेद ॥ ४॥ कोष मान माया र लोभ, ये अंतरंगमें करत क्षोभ । इम ग्रंथ सबै चौबीस येह, तज भए दिगंबर नग्न जेह ॥ ५॥ ६ गुण मूल धार तज राग दोष, तप द्वादश धर तन करत शोष । तुण कांचन महल मसान मित्त, अरु शत्रुनिमें समभाव चित्त ॥६॥ अरु माणि पाषाण समान जास, पर परणतिमें नहिं रंच वास । वह जीव देह लख भिन्न भिन्न, जे निज-स्वरूपमें भाव किन्न ॥७॥ पिम ऋतु पर्वत शिखर वास, वर्षा में तरुतल है निवास । जे शीतकालमें करत ध्यान, तटिनी तट चोहट शुद्ध थान ॥८॥ 20 हो करुणासागर गुण अगार, मुझ देहि अखय सुखको भंडार । मैं शरण गही मुझ तार तार, मो निजस्वरूप यो बार बार ॥९॥ घत्ता। , TRA यह मुनिगुणमाला परम रसाला जो भविजन कंठे धर ही। सब विघ्न विनाशै मंगल भासै मुक्ति रमावै वह नर ही ॥१०॥ 90 ही भूतभविष्यद्वर्तमानकालसंबंधिपुलाकवकुशकुशीलनिग्रंथस्नातकसर्व- मकारमुनीश्वरेभ्योऽनयंपदमाप्तये जयमालार्धे निर्वपामीति स्वाहा । दोहा। सर्व मुनिनकी पूज यह, करै भव्य चित लाय । ऋद्धि सर्व घरमें बसै, विघ्न स नश जाय ॥१॥ इत्याशीर्वादः।
चतुर्विंशतितीर्थकरसंबंधिगणधरमुनिवरपूजा। पू. लक्ष्म घछिन् । वृषभसेनादि अस्सी चउ गणधरा, वृषभके चउअसि सहस्र मुनिवरा । नीर गंधाक्षतं पुष्प चरु दीपकं, धूप फल अर्घ ले हम जजें महर्षिकं ? ॐ हीं श्री आदिनाथस्य वृषभसेनादिचतुरशीतिगणधरचतुरशीतिसहस्र- मुनिवरेभ्योऽध निवपामीति स्वाहा । सिंहसेनादि सर्व नवति गणधार हैं, आजित जिनराजके लक्ष अनगार । नीर गंधाक्षतं० ॥२॥ ॐ हीं अजितजिनस्य सिंहसेनादिनवतिगणधरैकलक्षसर्वमुनिभ्योऽर्घ हैं - निर्वपामीति स्वाहा । गणी चारुषेणादि शत एक अरु पांच हैं, लक्ष सब दोय संभवतणे सांच हैं। नीर गंधाक्षतं ॥३॥ ।
ॐ हीं संभवजिनस्य चारुषेणादिपंचोत्तरैकशतगणधरलक्षद्वयसर्वमुनिभ्योऽय निर्वपामीति स्वाहा । एकसौ तीन वजादि हैं गणधरा, सर्व अभिनंदनके तीन लक्ष मुनिवरा। नीर गंधाक्षतं०॥४॥ ॐ हीं अभिनंदनजिनेंद्रस्य वज्रादिव्युत्तरैकशतगणधरनक्षत्रयमुनिवरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । चमरादिका एकशत षोड़शा गणधरा, सुमतियति चौगुणा सहस अस्सीपरा।नीर गंधाक्षतं०॥५॥ ॐ हीं सुमतिजिनेंद्रस्य चमरादिपोडशोत्तरैक्शतगणधरविंशतिसहस्रोत्तर- लक्षत्रयसर्वमुनिवरेभ्योऽधै निर्वपामीति स्वाहा । वजादि शत एक दश पद्मके गणधरा, तीन लख तीस हज्जार सब मुनिवरा। नीर गंधाक्षतं०॥६॥ ॐ हीं पनप्रभजिनेंद्रस्य दशोत्तरैकशतगणधरत्रिंशत्सहस्रोशरलक्षत्रयसर्व- मुनिवरेभ्योऽधै निर्वपामीति स्वाहा । M चमरबल आदि पिच्याणवै गणधरा,सुपार्श्वके तीन लाख सर्व योगीश्वरा fally. नीर गंधाक्षत०॥७॥ ॐ हीं सुपार्श्वजिनेंद्रस्य चमरवलादिपंचोत्तरनपतिगणधरलक्षत्रयसर्व- मुनिवरेभ्योऽर्घ निर्वामीति स्वाहा । नवति अरु तीन दंतादि गणराज हैं, चंद्रजिनके मुनी साई द्वय लाख हैं। नीर गंधाक्षतं० ॥ ८॥ ॐ ही चंद्रप्रभाजनस्य त्र्युत्तरनवतिगणधरसार्द्धद्वयलक्षसर्वमुनीश्वरभ्योऽर्ध निर्वपामीति स्वाहा । विदर्भादिगणराज अस्सी रुशुभ आठ हैं, पुष्पदंत जिनतणे तीन लाख साधु हैं । नीर गंधाक्षतं० ॥९॥ * हीं पुष्पदंतजिनस्य विदर्भायशीतिगणधरलक्षत्रयसर्वमुनीश्वरभ्योऽध ६ निर्वपामीति स्वाहा ।
एक अस्सी गणधरा आदि अनगार हैं, एक लक्ष शीतलके और मुनिराज हैं । 'नीर गंधाक्षतं० ॥१०॥ ॐ ही शीतलनाथजिनस्यानगारायेकाशीतिगणधरैकलक्षसर्वमुनिवरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । कुंथादि गणराज सत्तर अरु सात हैं, चउआसि सहस्र श्रेयांसके साथ हैं। नीर गंधाक्षत० ॥ ११॥ ही श्रेयांसजिनस्य कुंथादिसप्तसप्ततिगणधरचतुरशीतिसहस्रसर्वमुनि- परेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । सुधर्मादि षषष्ठी वासुपूज्य गणधर सबै,सहस बहत्तरे अवर मुनीश्वर सब फबै । नीर गंधाक्षत०॥ १२ ॥ ॐ हीं वासुपूज्यजिनस्य सुधर्मादिपदपष्टिगणधरद्वासप्ततिसहस्रसवेमुनीश्चरे- भ्योऽय निर्वपामीति स्वाहा। SSC चौः पू. 4 ७ गणी नंदरार्यादि पंच पच्चास हैं, विमल-मुनिसर्व अडसठि हज्जार हैं। नीर गंधाक्षत० ॥१३॥ । ॐ ही विमलनाथाजनस्य नंदरायर्यादिपंचपंचाशद्गणधराष्ट्रपष्ठिसहस्रसर्व- मुनिवरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । गणधर जय आदि पंचास जिननंतके, अवर मुनि षष्ठिषद् सहस्र स- ब भंतके। नीर गंधाक्षतं०॥ १४॥ ॐ हीं अनंतनाथजिनस्य जयादिपंचाशद्गणधरपट्पष्ठिसहस्रसर्वसुनिवरे- भ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ अरिष्टादि चालीस त्रय सर्वगणधार हैं,धर्म जिनके यती चउसठ हज्जार हैं। नीर गंधाक्षतं०॥ १५॥ ॐ ही धर्मनाथजिनस्यारिष्टादित्रिचत्वारिंशद्गणधरचतुःपष्ठिसइससर्वमुनिश्वरे भ्योघे निवेपामीति स्वाहा । . ७ । षष्ठित्रय गणधार चक्रायुधादी महा, शांति जिनवर सहस बासठ लहा। नीर गंधाक्षतं०॥१६॥ ॐ ही शांतिनाथजिनस्य चक्रायुधादित्रिपष्ठिगणधरद्वापष्ठिसहस्रसर्वमुनी- श्वरेभ्योऽध निर्वपामीति रवाहा । स्वयंभ्वादि गणराज पैंतीस जिन कुंथके, साठ हज्जार मुनिराज सब संघके। नीर गंधाक्षतं० ॥ १७॥ ॐ हीं कुंथुनाथ जिनेंद्रस्य स्वयंभ्वादिपंचत्रिंशद्गणधरषष्ठिसहस्रमुनिवरभ्योऽ 4 निर्वपामीति स्वाहा । तसि गणधार कुंवादि अरनाथके,सहस्र पंचास मुनिराज सब साथके। नीर गंधाक्षतं० ॥१८॥ ॐ हीं अरनाथजिनस्य कुंथ्वादित्रिंशद्गणधरपश्चाशत्सहस्रसर्वमुनिवरेभ्योऽर्धे निर्वपामीति स्वाहा।
पू. विशाखादि गणराज सब बीस अरु आठ हैं, माल्लिजिनके मुनी सहस चालीस हैं। नीर गंधाक्षतं. ॥१९॥ ॐ हीं मल्लिनाथ जिनस्य विशाखाद्यष्टाविंशतिगणधरचत्वारिंशत्सहस्रसर्वमान- वरेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा । अष्टदश गणधरा मल्लि आदिक सदा, मुनिसुव्रत तीस हज्जार मुनिवर तदा । नीर गंधाक्षतं० ॥२०॥ ॐ ही मुनिसुव्रतजिनस्य मल्लयाधष्टादशगणधरत्रिंशत्सहस्रमुनिवरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । सोमादि गणधार दशसप्त नमिनाथके, बीस हज्जार सव अवर मुनि साथके। नीर गंधाक्षतं० ॥२१॥ ॐ ह्रीं नमिनायजिनस्य सोमादिसप्तदशगणधरविंशतिसहस्रसर्वमुनिभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा।
आदि वरदत्त गणधार एकादशा, नेमिके अवर मुनि सहस आध- दशा। नीर गंधाक्षतं०॥ २२॥ ॐ ही नेमिनाथाजिनेंद्रस्य वरदत्ताघेकादशगणधराष्टादशसहसमुनिभ्योऽर्थे निर्वपामीति स्वाहा। स्वयंभ्वादि गणधार दश अवर सब मुनिवरा, पार्श्व जिनराजके सहस षोड़श परा । नीर गंधाक्षतं० ॥ २३ ॥ ॐ हीं पार्वजिनेंद्रस्य स्वयंभ्वादिदशगणधरपोदशसहस्रमनिभ्योऽध निर्व- पामीति स्वाहा। गौतमादिक सबै एकदश गणधरा, वीरजिनके मुनि सहस चौदस वरा। नीर गंधाक्षतं० ॥२४॥ ॐ हीं महावीरजिनस्य गौतमायेकादशगणधरचतुर्दशसहस्रमनिवरेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा। छप्पय छ । तीर्थकर चौवीस सबनके गणधर सारे । २ पू. चौदासै पच्चास और त्रय सर्व निहारे । अवर मुनीश्वर सर्व संघके सप्त प्रकार जु। लख उनतीस रु अधिक अष्टचालीस हजार जु । इम तीर्थेश्वर सकलके, सर्व मुनीश मिलाय। अष्ट द्रव्य कण-थाल भरि पूजू शीस नवाय ॥२५॥ ही चतुर्विंशतितीर्थकराणां एकसहस्रपंचाशत्रयाधिकचतुःशतसहस्र- गणधरसप्तमकारीय एकोनत्रिंशल्लक्षाष्टचत्वारिंशत्सहस्रसमस्तमुनिवरेभ्यो जकाच निर्वपामीति स्वाहा । मंडलप्रथमकोष्ठस्थबुद्धिऋद्धिधारक मुनिपूजा। स्थापना। लक्ष्मीधरा छंद। बुद्धिऋदीश्वरा बुद्धिऋद्धीश्वरा, अत्र आगच्छ आगच्छ तिष्ठो वरा ।
मम निकट हो निकट हो निकट हो सर्वदा, तुमपूजिहूं पूजिहूं जोर कर । सर्वदा॥ - ॐ हीं अष्टादशबुद्धिऋद्धिधारकसर्वऋषीश्वरा अत्र अवतरत अवतरत संवौषट् । आह्वाननं । अत्र तिष्ठत' तिष्ठत ठः । स्थापनं । अत्र मम स- निहिता भवत भवत सन्निधापनं । अष्टका चाल धानतरायकृत अठाई पूजनकी । प्रासुक जल शुभ लेय, कंचन भंग भरूं। त्रय घार चरण ढिग देय, कर्म-कलंक हरूं। मैं बुद्धि ऋद्धि धर धीर, मुनिवर पूज करूं। यातें हो ज्ञान गहीर, भव-संताप हरूं। 5. ही अष्टादशबुद्धिऋद्धिधरसर्वऋषीश्वरेभ्यो जलं निर्वपामीसि स्वाहा । मलयागिरि चंदन लेय, कुंकुम संघ घसूं।
पू.
१०
अर्चा कर श्री ऋषिराज, भव-आताप नसूं ॥
मैं बुद्धिऋद्धि० ॥ चंदनं ॥
अखित अखंडित सार, मुनि-चित से उजरे।
ले चंद्रकिरण उनहार, चरणनि पुंज घरे ॥
में बुद्धिऋद्धि०॥ अक्षतान् ॥
सुमन सुमन मनहार, अधिक सुगंध भरे ।
मन्मथके नाशनकार, ऋषिवर पाद घरे॥
मैं बुनिऋद्धि०॥ पुष्पं ॥
नेवज विविध मनोज्ञ, मोदक थाल भरे ।
ऋषिवर चरण चढाय, रोग क्षुधादि हरे॥
मैं बुद्धिऋद्धि०॥ नैवेद्यं ॥
ध्वांत हरण शुभ ज्योति, दीपककी भारी ।
१०
ले ज्ञान उद्योतन कारणमय भर थारी॥
मैं बुद्धिऋद्धि०॥ दी
या धूप दशांग बनाय शाशनमें जारी।
भर स्वर्ण धुपायन मांहिं जरत सब कारी।
मैं बुद्धिऋद्भिः ॥ धूपं ॥
श्रीफल पूग विदाम, खारिक मनहारी।
मैं मुक्ति मिलनके काज, चढाहों भरि थारी ॥
मैं बुद्धिऋद्धि० ॥ फलं॥
सव द्रव्य अष्ट भार थार, बहुविध तुर बजे।
कार गीत नृत्य उत्साह, हर्षित अर्घ सजे ।।
श्रीऋषिवर चरण चढ़ाय फल यह मांगत हूं।
मो बुद्धिादि दो सार करजुग याचत हूँ॥
ॐ हीं अष्टादशबुद्धिऋद्धिधारकसर्वऋषीश्वरभ्योऽधै निवपामीति स्वाहा ।
प्रत्येक पूजा। - ११ दोहा। अष्टादश बुधिऋद्धिके, धारक जे ऋषिराज । तिन्हें अर्घ प्रत्येक कर, यजूं बुद्धिके काज ॥ ॐ हीं अष्टादशबुद्धिऋद्धिधारकसर्वऋपीश्वरेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा । चाल टप्पा सकल द्रव्य पर्याय गुणनि कार समय एक लखवाई। लोक अलोक चराचर जामें हस्तरेख समझाई॥ मुनीश्वर पूजो हो भाई, केवल बुधिऋधि धार- मुनीश्वर पूजो हो भाई॥ ॐ हीं केवलबुद्धिऋद्धिधारकसर्वऋषीश्वोभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । ढाइ द्वीपके सब जीवनकी मनकी बात लखाई। युगपत् एक कालमें जाने मनपर्यय ऋधि पाई॥ - मुनीश्वर पूजो हो भाई, मनपर्यय ऋधि धार- मुनीश्वर पूजो हो भाई ॥ ॐ हीं मनःपर्ययबुद्धिऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽधैं निर्वपामीति स्वाहा । अविभागी पुद्गल परमाणू सो प्रत्यक्ष लखाई । अवधि बुद्धि ऋधि धार मुनीश्वर चरण-कमल सिरनाई॥ मुनीश्वर पूजो अर्घ चढाई; अवधि बुद्धि ऋधि धार- मुनीश्वर पूजो हो भाई॥ ही अवधिबुद्धिद्धिधारकसर्वऋपीश्वरेभ्योऽध निर्षपामीति स्याए। कोष्ठ माहिं जो वस्तु भरी है मन वांछित कढवाई । प्रश्न करत शब्द-अर्थमय शास्त्र सर्व रचवाई ॥ मुनीश्वर पूजो हो भाई, कोष्ठबुद्धि ऋधि धार- मुनीश्वर पूजो हो भाई॥
१२ ॐ ही कोष्ठबुद्धिऋद्धिधारकसर्वऋषीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । बीज बोय जो भूमि मांहिं कृषि बहुत धान्य निपजाई। बीज एक ही धारि चित्त ऋषि सर्व ग्रंथ सुनवाई ॥ मुनीश्वर पूजो हो भाई, बीज बुद्धि ऋधि धार- मुनीश्वर पूजो हो भाई ॥ ॐ ही वीजवुद्धिधारकसर्वऋषीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वामीति स्वाहा । चक्रवर्तिकी सब सेनाके जीव अजीव रु ताई युगपत् शब्द सुणै जो श्रवणन सब धारण हो जाई ॥ मुनीश्वर पूजो हो भाई, संभिन्नश्रोत्र ऋधि धार- ऋषीश्वर पूजो हो! भाई॥ ॐ ही संभिन्नश्रोत्रद्धिधारकमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । सर्व ग्रंथको एक पाद लखि दे सव ग्रंथ सुनाई। पादानुसारिणी ऋद्धि यही है याहि घरें मुनिराई ॥ - मुनीश्वर पूजो हो भाई, पादानुसारिणी ऋधि धार- मुनीश्वर पूजो हो! भाई॥ ॐ हीं पादानुसारिणीऋद्विधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽध निर्वपामीति स्वादा। नव योजनतें बहुत अधिकको स्पर्शन बल अधिकाई । दूरस्पर्श ऋधि धार ऋषीश्वर चरणां चित लवलाई ॥ मुनीश्वर पूजो हो ! भाई, दूरस्पर्श ऋधि धार-- ऋषीश्वर पूजो हो भाई॥ ॐ ही दूरस्पर्शनादिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामोति स्वाहा। नव योजनतें अधिक स्वाद बल रसनेंद्रियमें थाई। दूरास्वादन गंध धार ऋषि चरणां सीस नमाई ॥ मुनीश्वर पूजो हो भाई, दूरास्वाद ऋधि धार- मुनीश्वर पूजो हो भाई ॥ ॐ ही दूरास्वादनर्दिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽय निर्वपामीति स्वाहा । जब 5 ला SODA नव योजनतें बहुत अधिककी गंध नासिका जाई। दूरगंध ऋधि धार मुनीश्वर चरणां शीस नमाई ॥ मुनीश्वर पूजो हो भाई, दूरगंध ऋधि धार- मुनीश्वर- पूजो हो! भाई॥ दूरगंधऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । सहस सताल ऋद्धि (द्वि) सत त्रैसठि योजना आधिकाई । च«द्रिय बल अधिक अनूपम दूरदृष्टि ऋधि पाई ॥ मुनीश्वर पूजो हो भाई! दूरावलोक ऋधि धार- मुनीश्वर पूजो हो! भाई ॥ ॐ ही दूरावलोकद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । नव योजनतें बहुत अधिकको शब्द श्रवण थल थाई । दूरश्रवण ऋधि धारक मुनिके चरण-कमल सिरनाई॥ १ किसी पुस्तकमे " बारह योजन" ऐसा भी पाठ है। 2005 १३ - मुनीश्वर पूजो हो ! भाई, दूरश्रवण ऋषि धार- ऋषीश्वर पूजो हो भाई॥ ॐ ही दुरश्रवणाधारकसर्वऋषीश्वरेभ्योऽधै निर्वामीति स्वाहा । दशम पूर्व हो सिद्ध तहां तब महाविद्या सब आई। आज्ञा मांगै कार्य करणकी मुनि तिनको नहिं चाई॥ मुनीश्वर पूजो हो भाई, दश पूरव ऋधि धार- मुनीश्वर पूजो हो ! भाई॥ ॐ ही दशपूर्वऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा । चौदह पूरव धारण होवें तप प्रभाव मुनिराई। चौदह पूरव धारण समरथ तिन मन वच सिरनाई॥ मुनीश्वरपूजो हो भाई, चौदह पूरव घार मुनीश्वर पूजो हो भाई॥ 30 ही चतुर्दशपूर्वधारकसर्वऋषीश्वरेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा. अंतरीक्ष अरु भौम अंग स्वर व्यंजन लक्षण ताई।
पू. छिन्न स्वप्न अष्टांग-निमित लाख होनहार बतलाई॥ मुनीश्वर पूजो हो भाई , अष्टांग-निमित ऋधि धार- ऋषीश्वर पूजो हो भाई॥ ॐनी अष्टांगनिमित्तबुद्धिऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽयं निर्चपामीति स्वाहा । बिना पढ़े ही जीवादिकके सकल भेद समझाई। चौदह पूरव ज्ञान धार सम भेद देय समझाई । मुनीश्वर पूजो हो भाई, प्रज्ञाश्रवण ऋधि धार- मुनीवर पूजो हो! भाई ॥ ॐ ही प्रज्ञाश्रवणद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽ निर्वपामीति स्वाहा । पर पदार्थतें आप भिन्न है जीव यहै लखवाई। यातें दिगंबर दृढ़ मुद्रा धरि परकी चाह मिटाई । मुनीश्वर पूजो हो भाई, प्रत्येकबुद्धिऋधि धार- मुनीश्वर पूजो हो ! भाई ॥ १४ N N ॐ ही प्रत्येकबुद्धिऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽधैं निर्वपामीति स्वाहा । परवादी जब वाद करनको ऋषिवर सन्मुख आई। स्यादवाद करि तिन वच खंडन विजय-ध्वजा फहराई ॥ मुनीश्वर पूजो हो भाई ,वादित्वऋद्धि धरसर्व- मुनीश्वर पूजो हो ! भाई॥ नीं वादित्वऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा । आदिल्ल। केवल ऋधिते आदि लेय बुधि ऋद्धि अष्टदश, धारक तिनके नन दिगंबर साधु सर्व दिश । समुचय अर्घ चढ़ाय पूज हूं सर्वदा, सर्व विघनिको नाश बुद्धि यो शर्मदा ॥ ॐनी केवलबुद्धधार्दिवादित्वचिंपर्यंताष्टादशवादऋद्धिपारकसर्वऋषी- घरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा। १ कल्याण देनेवाली।
चौ.
पू
.
१५
-
जयमाला।
दोहा ।
सर्व संघ मंगल करन, बुद्धिऋद्धि घर धीर ।
मुनी तास थुति करत ही, बुद्धि शुद्ध हो वीर ॥
घेसरी छंद।
प्रथम अंग आचार जु जानो, मुनि आचरण तासतें मानो।
सहस अगरा लख पद याके, परकू त्यागि आप रंग राचे ॥
सूत्रकृतांग अंग है दूजो, सूत्र अर्थ सामान्य जु दूजो।
पद छत्तीस हजार जु याके, पढ़ें मुनी सब अविचल याके॥
स्थान अंग तीजो है यामें, सब स्थाननकी संख्या जामें।
सहस बयाल पदनमें ये है, पढ़ें मुनी तिन नमन करें हैं।
समवाय अंग चौथों है याम, सदृश पदारथ वरण्या जाम।
पद इक लख चउसठि हज्जार, पढ़ें मुनी उतरें भव पारं ॥
१५
7
पंचम अंग व्याख्याप्रज्ञप्ती, जामें सप्तभंग विज्ञप्ती।
गणधर प्रश्न किये जो वरणन, पद लख दो अठवीस सहस्रन॥
ज्ञातकथा अंग षष्ठम जानो, त्रिषष्टि पुरुषको धर्म कथानो।
पांच लाख अरु छपन हजार, पद सब पढें मुनीश्वर सारं ॥
सप्तम अंग उपासकध्ययनं, श्रावक धर्म तणों सब अयनं ।
पद ग्यारह लख सतर हजारं, सो सब पढ़ें मुनी अविकारं ॥
अष्टम अंग अंतकृत दश है, तामें अंतकृत केवल जस है ।
तविस लख अठवीस हजारं, पाद पढ़ें मुनिवर भवतारं ॥
सह उपसर्ग अनुत्तर जननं, अनुतरपाददशांगं नवमं ।
बाण वलख चवचाल हजार, पाद पढ़ें मुनिवर सुखकारं ॥
दशम अंग प्रश्नव्याकरणं, होणहार सब सुख दुख निरणं।
लाख तरेणव सोल हजारं, पाद पढ़ें मुनिवर जगतारं ।
विपाकसूत्र एकादश अगं, कर्मविपाक रसादिक भंग।
पद इककोड़ चौरासी लक्षं, ताकू पढ़ि मुनि भये विचक्षं॥
अंग द्वादशम दृष्टीवाद, पंच भेद ताके सब पादं ।
शत अठ कोड़ि रु अडसठ लक्षं, छपन हजार पांच सब दक्षं ॥
प्रथम भेद परिकर्म जु नाम, पंच प्रज्ञप्ति ग्रंथ अभिरामं ।
चंद्र सूर्य जंबुद्वीप सुव्यक्ती, द्वीपसमुद्र व्याख्याप्रज्ञप्ती ॥
इनके पद इक कोड़ इक्यासी, लाख हजार पांच है खासी।
तिनमें सब इनको है रूपा, ये सब पढ़ें मुनीश्वर भूपा ॥
दूजो भेद सूत्र मरजादी, त्रिंशत वेसठ भेद कुवादी।
लाख तरेसठि पद है याके, पढ़े ताहि वंदूं पद जाके ॥
प्रथमानुयोग तीजो वर भेद, त्रिप्तठ शलाका पुरुष निवेदं ।
पांच सहस्र पद याके जानें, पाप पुण्य फल सर्व पिछाने॥
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१६
चौथो भेद पूर्वगत जामें, पूरव चौदह गर्मित तामें ।
कोडि पच्याणव लक्ष पचासं, अधिक पांच पद जाणो तास ॥
संपति सब इनके मांहीं, धारण कर सब श्रुत अवगाही।
मुनीश सब पूरव धारी, तिनकी महिमा अगम अपारी॥
पंच भेद चूलीका जासा, जल थल माया रूप अकासा ।
पद दशकोड़ि रु लख उणचासा, षट् चालीस सहस सब तासा॥
इकसौ बारा कोडि पचावन, लाख तियासी सहस अगवन ।
पांच अधिक सब पद अंगनिके, मुनिवर पढ़ें नमूं पद तिनके ॥
इकावन कोडि रु लाख आठ तिन,सहस चौरासी षट्शत परिमित।
साढा इकविस श्लोक अनुष्टं, एक जु पद कहिये स्पष्टं ॥
द्वादशांगमय रचना सारी, बुद्धि ऋद्धिमें गर्भित भारी।
तप प्रभाव ऐसी ऋधिधारी, तिन पद ढोक त्रिकाल हमारी॥
३
घत्ता।
चौ.
१७
यह जयमाला परम रसाला बुद्धिऋद्धि धर गुणमाला।
मुनि-गुणमाला हरि जंजाला बुद्धि विशाला करि भाला॥
ॐ हीं शुद्धबुद्धिऋद्धिदायकसर्वऋषीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
दोहा।
बुद्धिऋद्धि धर मुनि तणी, पूज कर जुसदीव।
बुद्धि प्रचुर ताके हृदय, प्रकटित होय अतीव ।।
इत्याशीर्वादः।
द्वितीयकोष्ठे चारणर्जिधारकमुनिवर पूजा।
स्थापना ।
अडिल्ल।
१७
क्रिया चारणी ऋदि भेद नव है सही।
तिनके धारक सर्व मुनीश्वर जे सही।
आह्वानन, स्थापन, मम संनिहित करूं।
मन, वच, तन कार शुद्ध भाव त्रय उच्चरूं।
ॐ हीं चारणार्द्धधारकसर्वऋषीश्वरसमूह अत्रावतरावतर संवौषट् । आह्वाननी
ॐ हीं चारणद्धिधारकसर्वऋषीश्वरसमूह अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । स्थापनं ।
ॐ हीं चारणीधारकसर्वऋषीश्वरसमूह अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट!
सनिधापनं ।
अष्टक।
चाल-गोलणी तथा मांग।
रतन जडित भंग भर गंग-जल लायो.(जी)
जन्म मरण मेटवेकू भावसों चढायो।
चारणऋद्धिके धारी मुनीश्वर पूज करूं जी॥
१८
ॐ हीं चारणदिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्यो जन्मजरामृत्युरोगविनाशाय जल
निर्वपामीति स्वाहा ।
चंद-गंधको घसाय कुंकुमा मिलाई ( जी)
मेवातापके नशावनको चरण चढाई ।
चारणऋद्धिके धारी मुनीश्वर पूज करूं जी॥
ॐ हीं चारणर्द्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्यो चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
चन्द्र-किरणके समान श्वेत तंदुलौघ (जी)
मुनींद्र अग्र पुंज करे हो सुख बोध ।
चारणऋद्धिके धारी मुनीश्वर पूज करूं जी॥
ॐ हीं चारणर्द्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
पुष्प गंधते मनोज्ञ प्राण चक्षु हारी (जी)
मुनींद्र-चंद्र-चरण पूजे होय मदन छारी।
चारणऋद्धिके धारी मुनीश्वर पूज करूं जी॥
१८
नही चारणदिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्यः पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
धेवरा सुफेणिका मोदकादि चंद्रिका (जी)
रोग क्षुधा नष्ट होय चहोड़े पद मुनींद्रका ।
चारणऋद्धिके धारी मुनीश्वर पूज करूं जी ॥
ॐ हीं चारणद्धिधारफसर्वमुनीश्वरेभ्या नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ।
दीपको उद्योत होत ध्वांत होय ना कदा (जी)
मुनींद्र-चंद्र-ज्योति किये मोह-ध्वांत हो विदा।
चारणऋद्धिके धारी मुनीश्वर पूज करूं जी॥
ॐ ही चारणद्धिारकर्सर्वमुनीश्वरभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
अगर तगर चंद-चूर गंधतें मिलाया (जी)
अग्नि संग खेय धूप कर्म सव जराया।
चारणऋदिकधारी मुनीश्वर पूज करूं जी॥
ॐ हीं चारद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
चो.
पू.
१९
सुष्ठु मिष्ट श्रीफलादि हिरण्य थालमें भलं (जी)
श्रीमुनींद्र-चरण चहोडि मुक्ति अंगना बरूं।
चारणऋद्धिके धारी मुनीश्वर पूज करूं जी॥
ॐ हीं चारणर्द्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्यो फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
जलादि द्रव्य लेय हेम थालमें भरें (जी)
मुनींद्र-चंद्र चहोडि सर्व ऐबको हरें।
चारणऋद्धिके धारी मुनीश्वर पूज करूं जी॥
ही चारणद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रत्येक पूजा।
सोरठा।
क्रियाचरण नव भेद, ऋद्धि धार जे हैं मुनी।।
जुदे जुदे निरखेद, पूजू अर्घ चढायके ।
ही नवभेदचारणद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा ।
।
१९
हैं
चाल छंद।
जल ऊपर थलवत् चाले, जल-जंतु एक नहिं हाले ।
जलचारण मुनिवर वे हैं, तिन पद पूजे शिव ले
- ही जलचारणद्धिधारकसवमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
धरतीसे अंगुल च्यारै, ऊंचो तिनको सुबिहारै
क्षणमें बहु योजन जैहैं, जंघाचारण पूजें हैं
ॐ हीं जंघाचारणर्डिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्थे निर्वपामीति स्वाहा।
मकडी-तंतूपर चालै, सो तंतु टूटै नहिं हाले।
ते तंतूचारण ऋधिधर, तिन पूजेते हो शिव-वर ॥
- ही तंतूचारण क्रियाऋद्धिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽधै निर्वपामीत स्वाहा ।
पुष्पनिपर गमन कराई, पुष्प-जीवसुं बाधा नाही।
मुनि चारण-पुष्प वही है, तिन पूजे मुक्ति लही है ।
ॐ हीं पुष्पचारणद्धिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽध निर्वपामीति
स्वाहा।
२०
पत्रनिपर गमन करता, पत्र-जीव बाध नहिं रंचा।
यह पत्रचारण मुनि पूजें, तिनतें सब पातक धूजे ॥
ॐ ही पत्रचारणद्धिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽधै निर्वपामीति स्वाहा ।
बीजनिपर मुनि विचराई, बीज-जीवसुं बाधा नाही।
जे चारण-बीज ऋषीश्वर, तिन पूजें हैं अवनीश्वरे ।।
ॐ हीं बीजचारणर्द्धिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपार्माति स्वाहा।
श्रेणीवत् गमन करता, सब जीवजाति रक्षता।
श्रेणीचारण ते कहिए, पूजे मनवांछित पइये ॥
ही श्रेणीचारणार्द्धमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा ।
जे अग्नि-शिखापर चालै, सो अग्नि शिखा नहिं हालै ।
ते अग्निचारण मुनि पूजें, तिनको शिव-मारग सूझे ॥
ॐ हीं अग्निचारणद्धिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
१ राजा।
पालै आज्ञा जिनशासन, कायोत्सर्गादिक ग्रासन-
धरि, गमन करें नम, मांहीं, नभचारण पूज कराई।
ॐ हीं नभश्चारणद्धिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्थे निर्वामीति स्वाहा ।
सोरठा।
जलचारणतें आदि, भेद क्रियाऋधिके सेकल ।
धारक तिन ऋषिपाद, मन वच तन पूजूं सदा ॥
ॐ हीं नवभेदक्रियाचारणार्द्धमाप्तमुनीश्वरेभ्योऽधैं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला।
अडिल्ला
चारण ऋषिके धार मुनीश भए तिन्हें ।
मन, वच, तन करि शुद्ध नमन
करिहूं जिन्हें ॥
जीव भद षट् काय अभय सबको दियो।
तिनके तनमें बिना यतन ही सिध भयो ॥१॥
चाल-पाणीहारी। २१ पृथ्वी अरु अप तेजकी सब जाणी हो, वायु कायकी जाति मुनिवरजी। नित्य रु इतर निगोदकी सब जाणी हो, सात सात लख जाति मुनिवरजी ॥२॥ वनस्पतीकी लाख दस सब जाणी हो, विकलत्रय दो दो लाख मुनिवरजी। पंचेंद्रिय तिर्यचकी सब जाणी हो, देव नरक चव चव लाख मुनिवरजी॥३॥ चौदह लाख मनुष्यकी सब जाणी हो, ये योनि चौरासी लाख मुनिवरजी। इकसौ साठ निन्याणवै सब जाणी हो, २१ - लाख कोडि कुल भाख मुनिवरजी॥४॥ इंद्रिय पंच जु च्यार गति सब जाणी हो, षद् काय पंद्रह योग मुनिवरजी। वेद तीन द्रव्य भावतें सब जाणी हो, कषाय पचीसको थोक मुनिवरजी ॥५॥ ज्ञान आठमें भेद दो वह जाणी हो, सम्यक् अरु कुज्ञान मुनिवरजी। संयम सात रु दर्श चव सब जाण्या हो, लेश्या षट् पहिचान मुनिवरजी॥६॥ भव्य दोय सम्यक्त्व छह जाणी हो, संज्ञी उभय बखान। अहारक युग सब जीवके सो जाण्या हो, S २२ मार्गण चौदह जान मुनिवरजी ॥७॥ गुणस्थान चउ दस सकल सब जाण्या हो, चौदह जीवसमास मुनिवरजी। पर्यापत षट् भेद युत सब जाण्या हो, प्राण जु दश है जास मुनिकरजी॥८॥ संज्ञा चार जु जीवकी सब जाण्या हो, बारह उपयोग मुनिवरजी। बीस प्ररूपणातें सकल श्रीऋषिवरजी, जाण्यो जीव प्रयोग मुनिवरजी॥९॥ इनतें जहँ तहँ जीव हैं श्रीमुनिवरजी, बस थावर दो भांति जाण्या हो। सूक्षम वादर भेद युत-सब जाणी हो, २२ । - - संसारीकी जाति मुनिवरजी॥१०॥ सर्व जानि आगम गमन सब करतबजी, संवर धर निज भाव मुनिवरजी । पालै करुणा सबनकी श्रीमुनिवरजी, जीव-जाति करि चाव मुनिवरजी ॥११॥ चारण ऋधिक होत ही करुणा प्रतिपाल, पृथ्वी परत न पांव मुनिवरजी। तातें जिनकी देहके श्रीमुनिवरके, रंच न हिंसाभाव मुनिवरजी॥१२॥ चारण ऋधिके गुणनिको धी तुछ धारी हो, कोलो करै कहान मुनिवरजी। सहस जीभते इंद्रजी श्रीमुनिवरके, २३ नहिं कर सकै बखान मुनिवरजी ॥ १३॥ अब मेरी यह वीनती श्रीमुनिवरजी, सुन लीज्यो ऋषिराज स्वामीजी। जोलों शिव पाऊं नहीं मुनिवरजी, तोलों दरश दिखाय यतिवरजी ॥१४॥ सोरठा। जो यह पढे त्रिकाल, गुणमाला ऋषिराजकी। होय भवोदधि पार, मुनिस्वरूपको ध्यान करि ॥१५॥ ॐ ही चारद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ जयमालार्घ निर्वपामीति स्वाहा । । छप्पय । २३ चारण मुनिकी पूज करे इह विधि भवि प्राणी। सकल विघनको नाश होय मंगल सुनिधानी ।
ऋद्धि बुद्धि बहु होय तासके घरके मांहीं।
पुत्र पौत्र सुख बढे और परियण सुखदाई ।
मन वचन काय पूजा करत, पाप सकलको नाश फिर ।
भरत पुण्य भंडारके, मुनिप्रसादतें तास घर।।
इत्याशीवादः।
-
तृतीयकोष्ठे विक्रियर्दिमुनि पूजा।
स्थापना।
चाल चौपाई रूपक।
सब जीवनको सुखके कंदा, विक्रियऋधिके धार मुनिंद।
थापों पूजन काज सदीवा, मन वांछित फल दाय अतीवा।।
ही विक्रियर्द्धिमाप्तसर्वमुनीश्वर अत्रावतरावतर संवौषट् । आह्वानम् ।
ॐ प्ही विक्रियर्दिमाप्त सर्व मुनीश्वर अत्र तिष्ठ तिष्ठ ः ठः। स्थापनम् ।
___
चौ.
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२४
ॐ ही विक्रियढिमाप्तसर्वमुनीश्वर अन मम सन्निहितो भव भव वषटू
सनिधापनम् ।
अटक।
चाल-भावत नीड़ो काल' इस रागमे ।
मुनीश्वर पूजत हूं मैं, विक्रियऋधिके धार मुनीश्वर पूजत हूं में।।टेर॥
कमल सुगंध सुवासित परिमल गंगादिक जल सार।
निर्गत रत्नग त्रय धारा जन्म जरा मृति हार ॥
मुनीश्वर पूजत हूं.॥
ॐ हीं विक्रियदि प्राप्त सर्व ऋपीश्वरेभ्यो जन्मजरामृत्युरोगविनाशनाय जलं
निर्वपामीति स्वाहा ।
मलयागिरि चंदन घसि केसर और मिला घनसार ।
भव-संताप हरणके कारण अरचूं बारंवार ॥
मुनीश्वर पूजत हूं ॥ चन्दनं ॥
H
२४
।
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कमल-शालिके आखित अखंडित मुक्ता सम अविकार ।
अखय अखंडित सुखकारण भरि कनक-रतनमय थार ॥
मुनीश्वर पूजत हूं०॥ अक्षतान्॥
अमर-तरू अरु कल्पबेलके पुष्प सुगंध अपार ।
मनमथभंजन कारन अरचूं भरि कणमय शुभ थार॥
सुनीवर पूजत हूं० ।। गुम्पं ॥
पिंड सुधामय मोदक उज्ज्वल दिव्य सुगंध रसाल ।
स्वर्णथाल भरि चरण चढाये होत क्षुधा निरवार ।।
मुनीश्वर पूजत हूं०॥ नैवेद्यं ॥
जगमग जगमग ज्योति करत है दीप-शिखा तमहार ।
मोह विध्वंसन ज्ञान उद्योतक आर्तिक चरण उतार॥
मुनीश्वर पूजत हूं ॥ दीपं ॥
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४
२५
कृष्णागर मलयागिरि चंदन-धूप अग्नि संग जार।
कर्म-धूम्र उड दस दिसि धावै भ्रमर करत गुंजार॥
मुनीश्वर पूजत हूं ॥धूपं ॥
श्रीफल लोंग बिदाम सुपारी एला-फल सहकार।
कणमय थाल भराय यजत ही होय मुक्ति-भार ॥
मुनीश्वर पूजत हूं० ॥ फलं॥
जल गंधाक्षत पुष्प जु नेवज दीप धूप फल सार।
स्वर्णथाल भरि अर्घ चढाऊं करि जय जय जय कार ॥
मुनीश्वर पूजत हूं० ॥ अर्घ ॥
प्रत्येक पूजा।
दोहा।
विक्रय ऋषिके एकदस, भेद धार ऋषिराज।
।
4.
भिन्न भिन्न तिन अर्घ दे, पूजू शिव हित काज ॥
* ही विकियदिधारकैकादशभेदसहितसर्वमुनीश्वरेभ्योऽध निर्वामीति स्वाहा।
चाल होली काफी।
मुनीश्वर पूजों अर्घ चढाई, जो विक्रियऋधि शुभ पाई ॥टेर ॥
कमल-तंतु पर जो जा निवसै निराबाध तिष्ठाई।
अणु समान काया हो जावै यह अणिमाऋधि पाई॥
मुनीश्वर पूजों अर्घ०॥
ॐ हीं अणिमाद्धिमाप्तसर्वमुनीचरेभ्योऽधै निर्मपामीति स्वाहा ।
चक्रवर्ति-संपद निपजावै, योजन लाख उंचाई ।
निज शरीरको क्षणमे करत हे यह महिमा ऋधि गाई ॥
मुनीश्वर पूर्जा अर्घ०॥
ॐ हीं महिमाकादिप्राप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्म निर्वामीति स्वाहा ।
चौ.
२६
काय बडी दीखत सब जनकू अर्कतूल हलकाई ।
ऐसी ऋषि उपजत मुनिवरको सो लघिमा जु कहाई ।।
मुनीवर पूजों अर्घ०॥
ॐ हीं लघिमाऋद्धिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
शरीर सूक्षम जनकू दीखे, इन्द्रादिक मिल आई।
जिनतें हलै चलै नहिं कबहूं यह गरिमाऋधि पाई ॥
मुनीश्वर पूजों अर्थ॥
ॐ ही परिमाऋद्धिप्राप्तसर्वपुनीश्वरेश्योऽय निर्वपामीति स्वाहा।
पृथ्वी पर तिझैं मुनिवर सेह-शीस स्पर्शाई।
चन्द्र सूर्य ग्रह अंगुली या प्राप्त ऋषि कर भाई ॥
मुनीश्वर पूजों अर्घ०॥
ॐ हीं विकिद्धिंगाप्तसबंधुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
२६
ॐ हीं तपोतिशयसहितरानीवर यो जलं निपामीति स्वाहा ।
मलय सुचंदन, कदली नंदन, भव-तप भंजनको लाया।
तुम चरण चढामी, शिवसुखगामी, गुणधामी पूजन आया ।
तपऋधिके स्वामी०॥
ॐ हीं तपोतिशयऋद्धिमाप्तसर्वमुनीश्वरेश्वदनं निर्वपापीति स्वाहा।
सित सालि अखंडित, सौरभ मंडित, चन्द्र-किरणसे अनियारी ।
भूपतिको मौसर, हम इह औसर, पुंज कर शिव-पदकारी।
तपाधिके स्वामी०॥
ॐ हीं तपोतिशयऋद्धिमाहराईगुनीश्वरेभ्योऽशतान् निपामोति स्वाहा ।
गुंजत बहु अँग; पुष्पसुगंध, कल्पवृक्ष के शुम ल्यायो।
हरि बाण मनोज, पद अंभोज, पूजन कारन मैं आयो।
तपऋपिके स्वामी॥
ॐ हीं तपोतिशयऋद्धिमाप्सर्षमुनीश्वरेभ्यः पुष्पं निर्वपापति स्वाहा ।
चौ.
पू.
पर्वत भेद निकस वे जावें छिद्र न हो ता मांहीं।
रुकें नहीं काहसे मुनिवर अप्रतिघातऋधि याही।
मुनीश्वर पूजों अर्घ० ॥
ॐ प्ही अप्रतिघातऋद्धिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
देखत सबके प्रछन्न हो काहुके दृष्टि न आई।
अन्तर्धानऋद्धि है ये ही तपबलमें प्रगटाई ॥
मुनीश्वर पूजों अर्घ०॥
ॐ हीं अन्तर्धानऋद्धिप्राप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्चपामीति स्वाहा ।
मनवांछित जो रूप बनावें सो होवे मनमाहीं ।
कामरूपिणीऋद्धि यही है तपबल यह उपजाई ।
मुनीश्वर पूजों अर्घ०॥
ॐ यहीं कामरूपिणीऋद्धिमाप्तसर्वमुनीश्नरेभ्योऽर्य नित्रपामीति स्वाहा ।
-
सोरठा।
तप महात्मतें येहु विक्रियऋधि उपजी जिन्हें ।
मन वांछित फल लेहु पूजें ध्यावें सो तिन्हें ।।
ॐ ही अणिमादिकामरूपिणीपर्यन्तविक पर्दिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽधं
निपामीति स्वाहा।
जयमाला।
' गीताछन्द
वजधर अरु चक्रधर अरु धरणिधर विद्याधरा।
तिरशूलधर अरु काम-हलधर सीस चरणनि तल घरा॥
ऐसे ऋषीश्वर ऋद्धि विक्रियधार तिनके पद-कमल ।
बंदू सदा मन वचन तन कार हरो मेरे कर्म-मल।
डाल त्रिभुवनगुरुकी।
संसार अपाराजी, मिथ्यात्व अंधाराजी।
चौ. २८ यामें दुख भारा, चतुर्गतिके विषंजी ॥२॥ नरकनिके मांहीजी, कहूं साता नांहीजी। सागरबहु ताई, दुख भुगत्या घणाजी ॥३॥ तिर्यग गति धारीजी, पशुकाया सारीजी। तामें दुख भारी, भूख तृषा तणोजी॥ ४॥ कोई लादै बांधजी, धरि जूडा कांधेजी। वह मारै अरु रांधे, निर्दय नर घणाजी ॥५॥ मानुष भव मांहींजी, सुख हैं छिन नांहीजी। सबळू दुखदाई, गर्भज वेदनाजी॥६॥ बालक वय माहीजी, कछु ज्ञानहु नाहीजी। पाई फिर तरुणाई, विषयचिंता घणीजी ॥७॥ बहु इष्टवियोगाजी, अरु अशुभ संयोगाजी। २८ तातें दुख भुगते, खिण समता नाहीजी ॥ ८॥ तीजो पन आयोजी, बहु रोग सतायोजी। इह विध दुख पायो, मानुषभवमें सहीजी॥९॥ सुरपदवी माहीजी, माला सुरझाईजी। चिन्ता दुखदाई भोगी मरणकीजी ॥१०॥ ई विध संसाराजी, ताको नहिं पाराजी। इह जाण असारा, त्यागि मुनी भएजी ॥ ११ ॥ गृह-भोग विनश्वरजी, जानें योगीश्वरजी। परत्यागी अवनीश्वर, लीनी वनमहीजी ॥ १२ ॥ तप बहुविध कीन्होजी, निज आतम चीन्होजी। सकलागमभीनो, मुनिपद जे धरेजी,॥१३॥ बहु ऋधिको धारेंजी, नहिं कारिज सारेंजी। MO Ram- -- ||३|| हा पू. २९ आतमगुण पालें, लगे निज काजकोजी ॥१४॥ विक्रियऋधिधारीजी मुनिवर अविकारीजी। तिनके गुण भारी, कहांलो गुण वरणऊं जी॥१५॥ ऐसे मुनिवरकोजी, कब हो हम औसरजी। पनि धनि वह औसर- मुनि मोकू मिलैजी॥१६॥ तिनके रजजी, धरि हैं शुभ शीर्षजजी। तबही इम कारज, बहुविध सरैजी ॥ १७ ॥ हम शरण तिहारीजी, भव भव सुखकारीजी। तातें हम धारी भक्ति हिरदा विषेजी ॥१८॥ दोहा। विक्रियऋधिधर मुनिनकी, कंठ धरे गुणमाल । मुनिस्वरूपको ध्यायकै, होवे बुद्धिविशाल ॥ १९॥ २९
।
65 विक्रियदिशातिसर्वमुनीश्वरेण्योऽध निर्वपापति स्वाहा
होरठा।
होय विधन सब नाश, संगल नितप्रति हो सदा ।
होए ऋद्धि परकास, पूजन जो या विष करै ।
इत्याशीर्वाद ।
तपोतिशयऋद्धिधारक मुनिपूजा !
अखिल्ल उंद।
तपोधिधर मुनी जहां तिष्ठै सही,
मरी आदि सब रोग तहां कुछ हो नहीं।
जातिविरोधी जीव वैर सवही.तजै,
चौ.
पू
.
३०
शांति होनके काज थापि हमहू थनें ॥
ॐ हीं तपोतिशयत्राद्धिसहितसर्वऋषीय समूह अनायतरावतरं सवीप।
ाक्षानम् ।
ॐ ही पतिशादिसहित सर्वानीश्वरसह अत्र तिष्ठ तिष्ठतः ।
स्थापनम् ।
ॐ हीं तपोतिशयऋद्धिसहितसर्वमुनी पर सम्ह अब पम सनिहितो भर
भव वपद् । सन्निधापनम् ।
अष्ट्रक।
त्रिमंगी छंद।
निर्मल शुभ नीरं, गंध गहीरं, प्रासुक सीरं ले आया।
भरि कंचनझारी, धार उतारी, जन्म मृत्यु हर पद ध्याया।
तपऋधि के स्वामी, शिवपद-गामी, शांति-करामी तुम व्यावें । "
करि विधन विशं मंगलभासं हरि भव त्रासं गुण गावें ॥
.
ॐ हीं तपोतिशयसहितरामुनीश्वरभ्यो जलं निपामीति स्वाहा ।
मलय सुचंदन, कदली नंदन, भव-तप भंजनको लाया।
तुम चरण चढामी, शिवसुखगामी, गुणधामी पूजन आया ।
तपनाधिके स्वामी ॥
% ही तपोतिशयऋद्धिमाप्तरावमुनीता रावदनं निर्वपापीलि स्वाहा।
सित सालि अखंडित, सौरभ मंडित, चन्द-किरणसे अनियारी।
भूपतिको मौसर, हम इह औतर, पुंज करूं शिव-पदकारी।
तपऋधिक स्वामी०॥
ॐ हीं तपोतिशयऋद्धिमालसर्पगुनी-धरेभ्योऽक्षतान् निपामोले स्वाहा ।
गुंजत बहु अंग, पुप्पसुगंध, कल्पवृक्ष के शुभ ल्यायो ।
हरि वाण मनोज, पद अंभोज, पूजन कारन मैं आयो।
तपत्राधिके स्वामी॥
ॐ ही तपोतिशयऋद्धिमायसनमुनीवरेभ्यः पुप्पं निर्वपागाति स्याहा ।
---
,
घेबर बाबर, फेणी मोदक, वैद्रक सुवरण थालभरे ।
रसनाके रंजन, रसके पूरे, पूजन रोग क्षुधादि हरे ।
तपऋषिके स्वामी॥
ॐ हीं तपोतिशरऋद्धिमाप्तसर्वचनीश्नरेभ्यो देश निर्वपापीति स्वाहा ।'
कनकरकापी मणिदीपक ललित ज्योति करि अति प्यारे!
मोह-तिमिर विध्वंसन कारन चरण-कमल पर हम वारे ।
तपऋषिके स्वामी०॥
ॐ हीं तपोक्शियास्मिान्वसनीपरेभ्यो दीपे निर्वपाणीति का
अगर तगर मलयागिरि चंदन, केलीनंदन धूप करी।
स्वर्ण थुपायन संग हुताशन खेवत भाजै कर्म-अरी।
तपऋधिक स्वामी.॥
ॐ न्हीं तपोतिशयऋछियाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्यो धूपं निर्वामीति स्वाहा ।
३१
-
J
सुष्टु मिष्ठ वादाम जायफल दाख पूग श्रीफल भारी।
एला आदि फलनितें पूजूं मुक्ति मिलावन भरि थारी।
तपऋधिक स्वामी०॥
ॐ ही तपोतिशयऋद्धिमाप्तसर्वमुनश्चिरेभ्यः फलं निर्वपामांति स्वाहा।
स्वच्छ नीर मालियागिरि चंदन अखित पुष्प नेवज भारी।
दीप धूप फल स्वर्णथाल भरि अर्घ चढाऊं सुखकारी।
तपऋषिके स्वामी०॥
ॐ ही तपोतिशयऋद्धिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽध निर्वपामीति म्वाहा ।
प्रत्येकपूजा
दोहा
तपतऋद्विधर तपत नित, टरत उपद्रव-वृन्द ।
पद ऋतु तरुवर फल फलत, अरचत सकल नरिन्द ॥
ॐ हीं तपोनिशयकन्डिसाहितेभ्यः सर्वमुनीवरेभ्योऽर्थ निनामीनि म्वाहा।
--
पू
.
३२
चाल-आखोजी भाओ सब सिल जिम बैत्यालय बालो ।
एक वास करि घटै नहीं फिर अधिक अधिक विस्तारै।
ए ये ही जी उग्रतपोनधि-धारक सुनी भव त्यारे।
राज आओजी आओ सब मिल मुनिवर पूजन चालां।
मुनिजीके दर्शन-जलते कर्म-कलंक पखालां । राज०॥
ॐ हीं उग्रतपोतिशयऋद्धिमाप्तसवमुनीश्वरेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा ।
बहुत वास कर खीण भयो तन अधिक दीप्तता धारै।
ये ही जी दीप्ततपोनधि सुख सुगंध विस्तारै । राज०॥
ॐ ही दीप्ततपोतिशयऋद्धिमाप्तसर्वमुनी परेभ्यो निर्वपाभीति स्वाहा।
हार करत नीहार होत नाहिं सौख्य भरा तनमांहीं ।
ये ही जी तप्ततपोनधि धारक झुनी अनचाही। राज०
ॐ हीं तप्ततपोतिषयझन्हिमाप्तमुनीचरेभ्योऽर्घ निर्मपामीति स्वाहा
मति श्रुत अवधि ज्ञान कर सूक्षम बसलाडीके मांही.
३२,
जानैं सबहु भाव जीवनके महातपोऋधि याही। राज०॥
8% ही महातपोतिशयऋसिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
रोग व्यथा उपजत मुनिजन तो उपवासादि कराई।
चिगैं नहीं तप ध्यान नियमतें धार तपोधि याही। राज०॥
* हीं घोरतपोतिशयतिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
घोरपराक्रमऋधिके धारक तिनको दुष्ट सतावै ।
ता कारणते सर्व देशमें मरी आदि भय आवै । राज०॥
ही घोरपराक्रमतपोतिशयत्राहिमामसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति
स्वाहा।
गुण अघोरब्रह्मचर्य-धार मुनि तिष्ठत जहॅ सुखदाई।
मरीआदि सब रोग मिटत तहाँ ऋद्धि वृद्धि अधिकाईराज०॥
ही घोरवापचयतपोतिशयतिमातसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीत
स्वाहा।
सोरठा। चौ. ३३ उग्रतपादिक ऋद्धि, ब्रह्मचर्यलों सात सब । धारक मुनी समृद्ध, पूजें अर्घ चढायकै ॥ ॐ हीं उग्रतपोतिशयादिघोरब्रह्मचर्यान्तसप्ततपोतिशयमिाप्तसर्वमुनीवरे- भ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा। जयमाला। दोहा। तपोबादि धारक मुनी भए सकल गुणपाल । तिनकी थुति मैं करत हूं, ग्रंथ गुणनिकी माल ॥ डाल आगमकी। तपऋधि धारक जे मुनी, बंदू तिन शीस नवाई जी॥टेर ॥ कर्म निर्जरा करन• संवर करि शिव-सुखदाई जी। बाह्य अभ्यंतर तप करै द्वादश विध वे हरषाई जी॥तप०॥१॥ ३३
षष्ठम अष्टम आदि दे उपवास करै षट् मासा जी।
अनशन तप इह विध धरै छोडे सब तनकी आसाजी॥ तप०॥
बत्तीस ग्रास भोजन-तणों तिनमें घट घट ले आहारो जी।
ऊनोदर तपको करे मम अशुभ कर्म निरवारो जी॥ तप० ॥
वृत्ति अटपटी धारिक भोजन कार हैं अविकारो जी।
व्रतपरिसंख्या तप तणी विध धार करे विस्तारोजी॥तप०॥
पटस-मय भोजन विर्षे रस त्याग लेत आहारो जी।
रस-परित्याग जु तप करे मोकू भव-सागरतें त्यारो जी ॥ तप०॥
ग्राम पशू जन नहिं तहां पर्वत वन नदी-किनारो जी।
शून्य गुफा जे रहे विविक्तशय्यासन धारो जी॥ तप०॥
ग्रीषमऋतु पर्वत-शिखरपे वर्षा में तरुतल ध्यानो जी।
शीत नदी-तट चोहटे तप कायक्लेश महानो जी॥ तप० ॥
.
पू.
बाहिज षट् बिध तप यही सब कर्म निर्जरा थानो जी।
आभ्यंतर तप भेदको धारत पद हो निरवाणो जी । तप०॥
प्रायश्चित दस भेदते सोधे संयमको अतिचारो जी।
रातदिवसमें दोष जे लागे तिनको निरवारो जी। तप० ॥
दर्शन ज्ञान चरित्रको अरु तपको विनय करावै जी।
इनके धारकको करै सो विनयाचार कहावै जी । तप०॥
दस प्रकारके मुनिनकी धरै भक्ति हृदयके मांही जी।
टहल करै मृति रोगमें वैयावृत तप सुखदाई जी । तप० ॥
वाचन.प्रच्छन चितवन अरु आज्ञासर्वज्ञ धार जी।
धर्मोपदेश विधि पंचमो तप स्वाध्याय संभालै जी। तप०॥
बाह्य अभ्यंतर उपधिकू त्याग करै समभावो जी।
०
तप व्युत्सर्ग महान यह तन ममत तज्यो कार चाहोजी।तप०॥
३४
आर्त रौद्र दुर्ध्यान हैं तिनको मन वच तन त्यागै जी।
धर्म शुकल शुभ ध्यान द्वय ध्यावै तिनकू अनुरागे जी । तप०॥
ऐसे द्वादस तप तपे तिनके हो केवलज्ञानो जी।
सकल कर्मको नाशिकै पावत है निर्वाणो जी । तप०॥
ऐसे मुनि तिष्ठत जहां तहां मरी आदि सब रोगा जी।
सर्प डाकिनी नरी साकिनी भूत प्रेत सव शोका जी।
ऐसे गुरु हमको मिलें तब होवे हम निस्तारो जी।
यातें मुनि-चरणन-विषे अन लाग्यो ध्यान हमारो जी। तप०॥
घोहा।
सुनो हमारी वीनती, हे ऋषिवर ! चित लाय।
निजस्वरूपमय मो करो, पूजूं मन वच काय ॥
ॐ हीं तपोतिशयहिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्यो जयपाला महाप निर्वपामीनि
स्वाहा।
पू.
दयामयी जिनधर्म यह, वृद्ध होउ सुखकार ।
सुखी होउ राजा प्रजा, मिटो सर्व दुखभार ॥
इत्याशीर्वादः।
३५
पंचम कोष्ठस्थ बलऋद्धिधारकमुनि-पूजा ।
स्थापना।
लक्ष्मीधरा छन्द ।
घरत सिर धरत सिर धरत सिर चरन तर ।
करत हम करत हम करत गुरु भक्तिवर।
थपत इत थपत इत थपत बल ऋषि-चरन ।
बलऋद्धि बलऋद्धि बलऋधि अर्चन करन ॥
ॐ पहीं वलऋद्विधारकसर्वमुनीश्वरसमूह अत्रावतरावतर संयौपटा आह्वानम् ।
३५
ॐ हीं बलऋम्हिधारकरार्वमुनीश्वरसमूह अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनमा
82 व्हीं बलत्राद्धिधारकसर्वमुनीश्वरसमूह अत्र मम सन्निहितो भव भव
वपट् । सन्निधापनम् ।
अटका
चाल जोगीरासा।
क्षीरोदधि पदमादि द्रहनिको गंगादिक जल लायो।
रतन जडित भंगार धार दे श्रीगुरु-चरन चढायो।
जन्म जरा मृति नाश होत पुनि कर्म-कलंक हराई ।
बलऋधि-धार मुनीश्वर पूजत बल अनंत हो जाई ।।
ॐ हीं लऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
मलयागिर चन्दनके माही केसर रंग मिलावें।
कर्पूरादि सुगंध द्रव्य ले तामें मेलि घसावें ।
मोह-आताप हरत भ्रम नाशत तम अज्ञान नशाई।
पू.
चौ..
.
३६
बलऋधि-धार मुनीश्वर० ॥ चंदनं० ॥
आखित अखंडित सौरभि मंडित चन्द्र-किरणसे श्वेतं ।
जलप्रक्षालित कनकथाल भरि पुंज करूं शुभ हेतं ।
परम अखंडित पद हो यातें अनुपम सुख अधिकाई ।
बलऋधि-धार मुनीश्वर० ॥ अक्षतान्॥
मेरु मंदार सुपारिजातके हरिचंदनके लावें।
चांदी सुवरण कमल मनोहर प्राण रु चक्षु सुहावें ।
कामवाण विध्वंसन कारन श्रीगुरु-चरन चढाई ।
बलऋधि-धार मुनीश्वर० ॥ पुष्पं ॥
रोग क्षुधा यह नितप्रति मोकू दुख देवै अति भारे।
ताके नाशन कारन नेवज फेणी मोदक तारे ।
चंद्रिक गुंजा घेवर वावर कनकथाल भरवाई।
३६
वलनधि-धार मुनीश्वर ० ॥ नैवेद्यं ॥
दीप रत्नमय कर्पूरादिक स्वर्ण-रकावी धारें।
जगमग जगमग ज्योति करत है श्रीमुनि-चरण उतारें।
मोह निविड विध्वंसन हो निज ज्ञान उद्योत कराई।
बलऋधि-धार मुनीश्वर० ॥ दीपं ।।
अगर तगर मलयागिर चंदन धूप दशांग बनावें ।
गुंजत भंग सुगंध मनोहर खेवत दस दिसि धावै ।
कर्म उ मानुं धूम्र मिसनितें आतम उज्ज्वल थाई ।
चलनधि-धार मुनीश्वर ० ॥ धूपं ॥
ज्ञानावरणी दर्शनावरणी मोहकर्म दुखदाई।
वेदन नाम र गोत अंतरा शिव-मग रोक कराई।
तिनकुं हरि कर शिव-फल पावन श्रीफल आदि चढाई ।
PA
पू.
चा.
३७
बलऋधि-धार मुनीश्वर ० ॥ फलं ॥
जल गंधाक्षत पुष्प जु नेवज दीप धूप फल भाई।
अष्ट द्रव्य ले कनक-थाल भर अर्घ करूं गुण गाई।
झं झं झं झं झांज बजावत द्रम द्रम द्रम मिरदंग धुनाई।
नृत्य करत नूपुर झंकारत मुनिपद अर्घ चढाई ।।
ॐ हीं पलऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्यः अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रत्येकपूजा।
दोहा।
बलऋधि-धार मुनिंदवर, भये कर्म-मल छेद ।
अर्थ प्रत्येक चढायके, पूजूं ऋधिके भेद ॥
ॐ हीं वलऋद्विधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
सवैया तेइसा तथा कुसुमलता छंद ।
एक घाट एकट्ठी परिमित श्रुतज्ञान अक्षर सब तिनको ।
३७
मन करकै सव अर्थ विचारै एक मुहूरत-मांहीं जिनको।
मनोवली यह ऋद्धि कहावत ताहि धरै तिन श्रीमुनिवरको ।
अष्ट द्रव्यमय अर्घ लेय करि निशि दिन पूजत चरण-कमलको।
ॐ ही मनोवलऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽधैं निपामीति स्वाहा ।
द्वादशांगमय श्रुतज्ञानको पाठ करें मुनिवर उच्चस्वर ।
एक मुहूरतमाही सवको स्वर व्यंजन मात्रादि शुद्धवर ।
तालव कंठ खेद नहिं होवे बचनवली है सो ही ऋषिवर ।
तिनके चरन-कमलको पूजू अष्टद्रव्यको धार अरघकर॥
* ही वचनवलद्धिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्योऽयं निवपामीति स्वाहा ।
एक वरस काउतसग धार अचल अंग चल आसन नाहीं।
नि लोक चट्टी अंगुलतें ऊंच नीच वलते जुकराई।
गर्भ करें नहिं ऐसे वलको वही मुनीश्वर शिवपद-दाई।
कायवली यह ऋद्भिधार ऋपि तिन्हें पूज हम सीस नवाई ॥
।
चौ. पू. ३८ ही कायवलर्दिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा । सोरठा। ऐसी वलऋधि-धार, जे मुनि ढाई द्वीपमें। तिनकी पूजन सार, करिहूं अर्घ चढायकें । जयमाला॥ सोरठा। गुणको नांहीं पार बलऋधि-धारी मुनिनको । पर्दू अबै जयमाल, भक्ति थकी बाचाल हो ॥१॥ दोहा। ढाल-हमारी करुणा ल्यो जिनराय । बलऋधि-धर मुनिराजके, चरण-कमल सुखदाय । बार वार बिनती करूं, मन बुच सीस नमाय |हमारी॥२॥ थावर जंगम जीवके, रक्षक हैं मुनिराय । मोहि कर्म दुख देत हैं, इनतें क्यों न छुडाय॥ हमारी०॥३॥ - ३८
राजऋद्धि तज बन गए, धरयो ध्यान चिद्रूप ।
ऋद्धि आय चरणां लगी, नमन करत सब भूप॥ हमारी॥४
तप-गज चढि रण-भूमिमें, क्षमा-खडग कर धार ।
कर्म-अरिनतें जय करी, शांति-ध्वजा करि लार हमारी॥५
निराभरण तन अति लसे, निरअंबर निरदोष ।
नगन दिगंवर रूप है, सकल गुणनिको कोप॥ हमारी॥३॥
क्रोध कपट मद लोभको, किंचित् नहिं लवलेश ।
मूरत शांति-दया-मयी, वंदत सकल सुरेश ॥ हमारी॥७॥
तुम ऋषि दीनदयाल हो, अशरणके आधार ।
बार बार विनती करूं, मोहि उतारो पार॥ हमारी॥८॥
जो त्रिभुवनके सब मिलें, दानव मानव इंद
हलै चलै नहिं सवनितें,वलऋषि-धार मुनिंद ॥हमारी०॥९॥
पू. ३९ मैं दुखिया संसारमें, तुम करुणानिधि देव । हरौ दुःख ये मों तणों, करिहूं तुम पद सेव ॥ हमारी॥१०॥ तुम समान संसारमें, तारणतरण जिहाज । हे मुनीश! कोऊ नहीं, यातें तुमको लाज। हमारी० ॥११॥ तुम पद मस्तक हम धरें, भरी भाक्त ठर मांहिं । निजस्वरूप-मयं कीजिए, भव-संतति मिट जाहिं॥हमारी॥ २ घत्ता। हे करुणानिधि सकल गुणाकर, भाक्त हृदय हम तुम धारी। इहभव दुखहरि अनुपम सुखकार ऋषिवर बलऋधिके धारी॥१३॥ ॐ हीं बलर्दिमाप्तसर्वमुनीश्वरेभ्यो जयमालार्घ निर्वपामीति स्वाहा । अविरल छंद। सात ईति भय मिटै देश सुखमय वसै। प्रजा-मांहिं धन धान्य महर्दिकता लसै । ३९ - राजा धार्मिक होय न्यायमगमें चले। या पूजन फल येह धर्म जिनवर सिलै ।। इत्याशीर्वादः। पष्ठ कोष्ठस्थ औषधऋद्धिधारकमुनीश्वर-पूजा। स्थापना । सनया सा। औषधऋधि-धार मुनी आविकार धरै तप भार महा अधिकाई। तिनके तनकी परछांहिं परै तहां रोग विषाद अनेक नसाई । ऐसे मुनिराज करें सव शांति हरें भव-भ्रांति जिनेशकी नाई। थापत है हम पूजन काज हरो मम विघ्न कल्याण कराई ॥ 22 यही क्षुद्रोपद्रवसर्वविघ्नविनाशकोपर्मिधारकसमुनीवनरसमूह अत्राव- तरापतर संवौषट् । आव्हानम् । IN
ॐ ही क्षुद्रोपद्रवसर्वविघ्नविनाशकौषधर्द्धिधारकसर्वमुनीश्वरसमूह अत्र विष्ठ चिष्ठ-पू.
ठः ठः । स्थापनम् ।
ॐ ही क्षुद्रोपद्रवसर्वविघ्नविनाशकौषधर्दिधारकसर्वमुनीश्वरसमूह अत्र मम
सन्निहितो भव भव वपट् । सनिधीकरणम् ।
अटका
चाळ-आशावरी तथा होली काकी।
रतन जडित भंगार मध्य शुभ भरकर प्रासुक जलकों।
धार देत ही नाश करत है सब कर्मादिक-मलकों।
यजू मुनि-चरण-कमलकों, औषधि ऋधि-धीश यतीश
यजूं मुनि-चरण कमलकों॥
ॐ हीं सर्वक्षुद्रोपद्रवसर्वविघ्नविनाशकेभ्यः सर्वरोगहरेभ्यः सर्वशांतिकरेभ्यः
औषधिऋद्विधारकम्मुनिश्चरेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
भव-आताप वढयो अति भारी शोपत मोय निवलकों।
४०
-
चन्दन केसर चरण चढाऊं पाऊं पद निर्मलकों।
यजूं मुनि-चरण-कमलकों॥ चन्दनं ॥
स्वर्णथाल भरि चंद-किरण-सम ल्यायो अखित उजलकों।
अक्षय पद पावन कारन पू श्रीगुरु पाद-कमलकों।
यजूं मुनि-चरण-कमलको० ॥ अक्षतान् ॥
काम-शत्रु मो अधिक सतावे आतम ल्याक्त मलकों।
याके नाश करनके कारन मुनिपद क्षेपि कमलकों।
यज़ मुनि-चरण-कमलको०॥ पुष्पं ॥
क्षुधावेदनी रोग महा दुठ जारत हृदय-कमलको
।
नाना विध नेवजतें पूजूं शांति-करन क्षय मलकों।
यजूं मुनि-चरण-कमलको० ॥ नैवेचं ॥
दीप रतनमय ज्योति मनोहर नाश करत तन-मलकों।
६
पू.
४१
ज्ञान उद्योतन कारन पूजू श्रीगुरु-पाद-कमलकों।
यजूं मुनि-चरण-कमलको० ॥ दीपं ॥
अगर तगर मलयागिर चंदन केलीनंद विमलकों।
खेवत धूप दशांग अग्नि सँग जारत है अघ-मलकों।
यजूं मुनि-चरण-कमलकों॥ धूपं ।।
विविध भांतिके स्वर्णथाल भरि ल्यायो मैं शुभ फलकों।
शुद्ध भाव करि नितप्रति पूजूं शिव-सुख पाउं विमलकों।
यजू मुनि-चरण-कमलको० ॥ फलं ।।
जल चंदन अक्षत अरु पुष्प जु नेवज दीप विमलको ।
धूप फलादिक अर्घ चढाये पावत पद निर्मलकों।
यजूं मुनि-चरण कमलकों, औषधऋधि-धीश यतीश
यजूं मुनि-चरण-कमलको० ॥ अर्थे ।
४१
am- उन्सब प्रत्येक पूजा। वाहा। ओषधऋधिके भेद वसु, ता धारक ऋषिराय । भिन्न भिन्न तिनके चरण, पूजू अर्घ चढाय । ॐ हीं अष्टभेदोपहिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अडिल्ल छन्द। अंग उपांग रु नख केशादिक सर्व ही। रज पद मुनिकी लगत हरत जू रुन मही। आमझेपधिऋद्धि याहि मुनिवर धरैं । ता ऋषिवरके पाद यजत शिव-तिय वरें। ही प्रामीपधिऋद्धिधारकसर्वमुनीवरेभ्योऽय निर्वपामीति स्वाहा । मुनि-मुखको खंखार थूकके लगत ही। सर्व रोग मिट जाय असाध्य जु तुरत ही।
वो
४२१
खेलौषधि ये ऋद्भिधार मुनिवर तण।
पाद-पद्म हम यजत व्याधि सब ही हर्णै ॥
ॐ ही खेलौषधिऋद्धिधार कसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
मुनिके अंगके स्वेदमाहि जो रज परे ।
सो लागत ततकाल व्याधि सब ही हरै।
यह जल्लोषधिद्धि-धारकू नित यजूं।
निसदिन तिनके चरण-कमलकुं मैं भजू ॥
ही जल्लोपधिऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽय निर्वामीति स्वाहा ।
दंत नासिका अंग मैल-मल सर्व ही।
व्याधि सर्वको नाश करत है लगत ही।
मल्लौषधिऋधि येह ताहि धारक मुनी।
पूजत मन वच काय अर्घ करके गुनी।
ॐ
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४२
।
* ही मल्लौपधिद्धिधारकसर्वमुनीश्चरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
विष्टा मूत्र जु वीर्य सर्व ऋषिराजके।
नाना व्याधि-हरंत लगत ही साधके ।
ऋद्धि विडापध-धार तास पायन पर ।
अष्ट द्रव्यकू मेल सदा पूजन करें।
ही विढीपरिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
जिनके तनसू पवन लागि जा तन लगै।
आधिव्याधि बहु रोग विषादिक सब भगे।
भूत प्रेत सर्पादि सिंहको भय मिटै।
सपिधिधि-धार पूजतें अब हटै॥
ही सर्वीपर्धा धार सर्वमुनीवरेभ्योऽर्थ निषेपामीनि स्वाहा ।
जिनके करमें अमृत होय विष सर्व ही।
मूर्छित निरविष होत बचन सुन तुरत ही।
- चौ . ४३ आस्यविौषधिऋद्धि-धार ऋषिवर तिन्हें । पूजू मन बच काय शुद्ध करिके जिन्हें ॥ ॐ हीं आस्यविौषधिऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामांति स्वाहा। थावर जंगम सर्प आदिको भय भरै। दृष्टि परत ततकाल सर्व छिनमें हरै॥ दृष्टिविौषधिऋद्धि-धार मुनिराजकू मन बच तन करि यजूं मिटन सब व्याधिकू॥ ॐ हीं दृष्टिविषौषधिऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा। सोरठा। सर्वोषधिऋधि-धार, सर्व मुनीश्वर हैं जिन्हें । बसु द्रवतें भरि थार, पूजू अर्घ चढायकैं। ॐ हीं आमौंपधिऋद्धिधारकादिदृष्टिविषौषधिऋद्धिधारकपर्यन्तसर्वमुनीश्व- रेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा। १३ जयमाला। दोहा। जिनके वंदत पूजते, सकल व्याधि मिट जाय । औषधऋधि-धर मुनिनकू, नमूं नमूं मनलाय ॥१॥ चाल वीजाकी। जय सर्वोषधिऋधिक धार मुनिराय, मन वच बंदूजी मैं सीस नवाय ऋषिवरजी। नग्न दिगंवर हो परम पवित्र है चित अति अमलान, करुणा-सागर हो दया-निधान ऋषिवरजी ॥२॥ दरस करत ही हो वात पित्त कफ खांस रु सांस, ज्वर शीतादिक हो दाह हुलास ऋषिवरजी। कुष्ट उदम्बर हो कालज्वर अरु सव सनिपात, चौ. पू. ४४ साध्य असाध्य जु हो सब रोग नसात ऋषिवरजी॥३॥ पंगु पुरुषकै जी चरण है गिरि शिखर चदंत, जन्मअंधकू जी सब सूझत ऋषिवरजी । गूंगा बोलत है हो बचन शुभ मुनिवर परताप, सब जीवके होवे जी सुंदर गात ऋषिवरजी ॥४॥ सिंह व्याघ्र उनमत्त गज सव भय मिट जाय, तुम पद ध्यावै जी जो लव ल्याय ऋषिवरजी। कृष्ण सर्प तुम नामतें लट्सम हो जाय, श्वान स्याल वृश्चिकको भय न रहाय ऋषिवरजी ॥५॥ डायनि सायनि योगिनी ये दूर भजाय, भूत प्रेत ग्रह दुष्ट जु हो ! तुरत नसाय ऋषिवरजी। तुम नाम-मंत्रते हो! अग्नि जलसम हो जाय, ४४ ATE सिंधु भयानक जीव थलसम थाय ऋषिवरजी ॥६॥ हृदय-कमलमें तुम नामको जो ध्यान कराय, नृप-भय ताके जी हो कछु नांय ऋषिवरजी। विघ्न अनेक जुजी नाश हो शुभ मंगल थाय, जो नर ध्यावै जी मन वच काय ऋपिवरजी॥७॥ सर्वोपधिऋषि-धार जी जहँ करत बिहार, दुरभिक्ष रहे नहीं जीता देश मंझार ऋषिवरजी । आधि व्याधि भय देशके सब मिट जाय, सब जीवां के जी अति सुख थाय ऋषिवरजी॥८॥ वह मुनि जा बनके विषे शुभ ध्यान करात, जाति-विरोधी हो! वैर नसात ऋषिवरजी। पदनातुके हो ! फूल फल सब वृक्ष फलंत, चौ. सूखे सरवर हो! तुरत भरंत ऋषिवरजी॥९॥ नाम तिहारो जो जपै मन बच तन तिरकाल, जो भवि गावै जी तुम गुणमाल ऋषिवरजी। भोग संपदा हो! वो नर पायकै फिर इंद्र पदाय, शिवसरूप मय होवै जी निज आस्वाद ऋषिवरजी ॥१०॥ औषधऋषि-धारी मुनि अविकारी भक्ति तिहारी हृदय धरी । करि पूजा सारी अष्टप्रकारी यह गुणमाला कंठ धरी ॥ ॐ हीं औपवित्राहिधारकसमुनीश्वरेभ्यो जयमालार्धं महाघे निवपामाीत ६.स घत्ता। स्वाहा। ५५ अडिल्ल छंद। आधि व्याधि कर नाश सर्व भयकू हरो । ऋद्धि वृद्धि घरमाहिं सकल संपति भरो । 7 , -
जिनधर्मी जनमाहिं सकल मंगल करो।
या पूजन परताप विध्न सव ही हरो॥
इत्याशीर्वादः।
सप्तमकोष्ठे रसऋद्धिधारकमुनि-पूजा।
कुंडलिया।
रसऋधि-धार मुनिंदके, चरण-कमल सिरनाय ।
वर्दू मन वच काय करि, भाव भगति चित लाय ।
भाव भगति चित लाय करूं मैं शुभ आह्वानन।
आप पधारो नाथ तिष्ठ इत यह संस्थापन ।
निकट होहु मम बार बार विनती यह मेरी।
पूज करत चित चाह हमारे ऋषिवर तुमरी॥
४६
ही समाधिपारकसवसनिसापूस पात्र अवतरायतर संधौपद्याननम् ।
रसऋषिधारकसर्वमुनिसमूह अत्र तिष्ठ तिष्ठ : 3:। स्थापनम् ॥
ही रसऋद्धिधारकसवमुनिसमूह अन्न सनिहितो भव भव वषट् । सन्नि-
धापनम् ॥
अष्टका
सुदरी छन्न ।
विमल केवल उज्ज्वल ल्यायकै, सुर नदी-जल मुंग भरायकै।
जनम मृत्यु जरा क्षयकारक, मुनि यजामि ऋधिरस धारकं ॥
ॐ ही रसऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्यो जलं निर्वामीति स्वाहा ।
सहज कर्म-कलंक बिनाशन, मलय उद्भव गंध सुगंधने ।
कदलि-नंदन कुंकुम वारिके, मुनि यजामि० ॥ चंदनं ॥
अखित उज्ज्वल दीर्घ अखंडकं, किरण चन्द्र समान मुद्योतक ।
अतुल सौख्य सथान सुदायक, मुनि यजामि० ॥ अक्षतान् ॥
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प्रचर गंध सुपुष्प सुमालया, भ्रमर गुंजत सौरभ धारिया।
निविड़ वाण मनोभव वारकं, मुनि यजामि०॥ पुष्पं ॥
सुरन पात्र भरे नैवेद्यके, घृत सुचारु रसादिक सन्यके।
प्रचुर रोग क्षुधादि निवारक, मुनि यजामि० ॥ नैवेद्यं ।।
रतन दीप मनोज्ञ उद्योतके, सुरन पान धरे शुभ ज्योतिके।
निरवधी स्वविकाश प्रकाशक, मुनि यजामि० ॥ दीपं ।।
अगर चन्दन धूप सुधूपने, अति-समूह भ्रमैति सुगंधने ।
कर्म-काठ-समूह सुजारकं, मुनि यजामि ॥ धूपं ।।
सुभग मिष्ट मनोज्ञ फलावली, हरत प्राण सुचक्षु सुखावली।
मुकति थान मनोहर दायक, मुनि यजामि० ॥ फलं ॥
जल सुगंध सुतंदुल पुष्पके, चरु सुदीप सुथप फलार्घके।
पद अन महाफल दायफ।मुनि यजामि ॥ अर्घ ॥
चौ.
प्रेक पूजा।
४७
सोरठा।
रसऋधि षट् परकार, तिनके धारक जे मुनी।
रोग क्षुधा निरवार, पूजू अर्ध चढायकै ।।
ॐ ही रसत्राद्विधारकपद्धकारमुनीश्चरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
चौपई।
ASE
कर्म-उदय कोउ पार न पाय, क्रोध थकी मर बच निकसाय।
सो प्राणी ततकाल मराय । ते आशीविष यजन कराय॥
ॐ ही आशीविपरसऋन्द्रिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्थे निर्वपामीति स्वाहा ।
क्रोध दृष्टि मुनिकी जू परै, परते ही ततकाल जु मरै।
दृष्टिविषारसनधि-धर मुनी । यजन करूं मैं तिनकुं गुनी।
ॐ ही दृष्टिविपरसद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽधैं नियंपामीति स्वाहा ।
४७
क्षीर रहित जहँ हार जु कोय, सो मुनि कर रस दुग्ध जु होय। वचन दुग्ध सम पुष्टि कराय । क्षीरस्रावि-धर अरचूं पाय ।। ॐ ही श्रीरताविरसत्राद्भिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्थे निर्वपामीति स्वाहा। मिष्ट रहित जो मुनि कर हार । होय मिष्टरस सहित जु सार । मुनि बच पुष्ट करत मधु समा। मधुस्रावीऋधि पूजत हमां ।। ही मधुनाविरसाद्विधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । घृत करि रहित हार कर मुनी, घृत-संयुक्त होय बहुगुनी । वव मुनिके घृतसम गुण करै, सर्पिनावि रस पूजन करें। ॐ हीं सपिंसाविरसत्रऽद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽधै निर्वपामीति स्वाहा । विष अमृत मुनि कर बै जाय, वच अमृतसम पुष्टि कराय। अमृतस्रावीरसऋधि यही, ता धर पूजे झै शिव-मही ॥ हीं अमृतसाविरसनादिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्थे निर्वपामीति स्वाहा। UR
२
पु
.
दोहा।
ये रसऋधिके भेद युत, सर्व ऋषीश्वर पाय ।
मन बच तन करि पूजिहूं, हरषित चित अधिकाय ॥
ही आशीविपरसऋद्धयादिअमृतस्राविऋडिपर्यंतधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ
निर्वपामीत स्वाहा।
ह
Car
जयमाला।
।
सवैया तेईसा।
रसपरित्याग धरयो मुनिराज, तिन्हें फल ये रसऋद्धि उपाई।
हार रसादिक त्याग करे, तिनके पद बंदन सास नवाई॥
सो ऋषिराज करो हम काज, हरो अघलाज जु पुण्य वधाई ।
मन-बच-काय त्रिकाल त्रिकाल, धरूं तिनपाद सदा उरमाहीं॥
४८
ढाल वीर जिनंदकी।
ऋषीश्वर वसो हृदयके माहि ॥ टेर॥
दुष्ट कहे मुनिराजकू, कर्कश वचन महान ।
अति कठोर कटु निंद्य सुन, क्रोध करै नहिं मान ॥२॥ ऋषी॥
कुल जात्यादिक बुद्धिको, तपको नहिं अभिमान ।
कोमल उर करुणामयी, मादेवधर्म महान ॥३॥ ऋषी०॥
कूट कपट सब त्यागियो, रंच न हिरदा माह।
आर्जव धर्म यही धरै, मन वच चंदूं ताहि ॥४॥ ऋषी०॥
हित मित सत्य जु वाक्यकू, बोलत वे मुनिराय ।
धर्मापदेशतें अन्य कछ, वोलत नाहिं सुभाय ॥ ऋषी० ॥ ५॥
लोभ सर्व जिनको गयो, धरि संतोष महान।
शीच धर्म यह धारिक, भए वित्त अमलान ॥ ऋषी० ॥ ६ ॥
चौ. पू. ४९ छहों कायके जीवकी, करुणा है अधिकाय । पांचों इंद्रिय बश करी, संयम घर चित लाय॥ ऋषी०॥७॥ द्वादश विध तपको तपैं, अंतर बाह्य महान । घ्यावें निज चिद्रूपकुं, ध्यान सुधारस पान ।। ऋषि० ॥ ८॥ सर्व परिग्रह त्यागकर, ज्ञानदान नित देय । जाति जीवकू अभय दे, त्यागधर्म धरि एव ॥ ऋषिः ॥९॥ बाह्य नंगनता अति लसे, अंतरंग अति शुद्र । ममत तज्यो निज देहसें, आकिंचन व्रत इछ ॥ ऋषि०॥१०॥ सहस अठारा शीलकू, पालन मन बच काय । ब्रह्मचर्य व्रत यह धरयो, आतममें रति थाय ॥ ऋषि० ॥११॥ या विधि दसैं प्रकारको, जिनभाषित जो धर्म । ताहि शुद्ध धारयो मुनी, मेटि पापके कर्म ॥ ऋषि० ॥१२॥ १९ ढाल वीर जिनंदकी। ऋषीश्वर बसो हृदयके माहिं ॥ टेर॥ दुष्ट कहै मुनिराजकू, कर्कश वचन महान । अति कठोर कटु निंद्य सुन, क्रोध करै नहिं मान ॥२॥ ऋषी०॥ कुल जात्यादिक बुद्धिको, तपको नहिं अभिमान । कोमल उर करुणामयी, मार्दवधर्म महान ॥३॥ ऋषी०॥ कूट कपट सब त्यागियो, रंच न हिरदा माह। आर्जव धर्म यही धरै, मन बच बंदूं ताहि ॥४॥ ऋषी०॥ हित मित सत्य जु वाक्यकू, बोलत वे मुनिराय । धर्मोपदेशतें अन्य कछु, बोलत नाहिं सुभाय ॥ ऋषी० ॥५॥ लोभ सर्व जिनको गयो, धरि संतोष महान । शौच धर्म यह धारिकै, भए चित्त अमलान ॥ ऋषी० ॥६
अष्टमकोष्ठेअक्षीणमहानसर्भिधारकमुनि-पूजा।
ची.
आडिल्ल छन्द ।
५०
अक्षयविधिके दायक घायक कर्मके।
अखीण महानसऋद्धि-धार मुनिवर्यके ।
आह्वानन संस्थापन मम सन्निहित करूं ।
संवौषट् ठः ठः रु वषट् त्रय उच्चरूं ॥
ॐ हीं अक्षीणमहानसऋद्धिधारकसर्वसुनीश्वरसमूह अत्रावतरावतर संवौषट् ।
आहानं ॥
ही अक्षीणमहानसऋद्धिधारकसर्वमुनीधरसमूह अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ।।
स्थापन ॥
ॐ हीं अक्षीणमहानसऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरसमूह अत्र मम सन्निहितो भव
भव वपद् । सनिधीकरणं॥
ॐॐ
५०
स
अष्टक ।
गीताठर।
हिमवन समुद्भव नीर सीतल रतन ग भरायही ।
जन्म जर अरु मृत्यु नासन क्षपक चरन चढायजी।
इन्द्र चन्द्र नरेन्द्र पूजित अखयनिधि दायक सदा ।
अक्षयमहानसऋद्धि-धर मुनि पूजिहूं में सर्वदा ॥
ही अक्षीणमहानमादिधारकसनमुनीचरेभ्यो जलं निर्यपामीति स्वाहा ।
काश्मीर चंदन केलिनंदन घसत परिमल दिग महै।
अलि गुंज करत दिगंतराले पूजते भव तप है।
इन्द्र चन्द्र नरेन्द्र पूजितः ॥ चन्दनं ॥
सित असित चंद्रमरीचिका सम अति सुगंधित पावनां।
भरि थाल कणमय अखयपद चरन-कमल चढ़ावनां ॥
.
पू.
चो.
५१
इन्द्र चंद्र नरेंद्र पूजित० ॥ अक्षतान् ॥
पंच वर्न प्रसून सुंदर गंधते मधुकर भ्रमें ।
सो लेय मुनिपदकू चहो. समरकू छिनमें दमें।
इन्द्र चन्द्र नरेंद्र पूजित० ॥ पुष्पं ॥
घेवर सुनाबर मोदकादिक कनकथाल भराइये ।
चरू सबतें मुनि-चरन पूजें सुधारोग नसाइये।
इन्द्र चन्द्र नरेंद्र० ॥ नैवेद्य ॥
दीप मणिमय ज्योति सुंदर धूम्रवर्जित सोहने ।
तम मोह पटल विध्वंस कारन चरन युग मुनि अरचने।
इन्द चन्द्र नरेन्द्र पूजित०॥ दीपं ।।
धूप दसविध अगनिके संग स्वर्ण धूपायन भरें।
धूम्र मिस बसु कर्म भाजै भविक जन जय जय करै ।
५१
-
1
इन्द्र चन्द्र नरेन्द्र पूजित०॥ धूपं ॥
• दाख श्रीफल चारु पुंगी सुरन थाल भराइये।
श्रीऋषीश्वर पूजते ही मुक्तिके फल पाइये।
इन्द्र चन्द्र नरेन्द्र पूजित० ॥ फलं॥
वीर गंध सुगंध तंदुल पुष्प चरु दीपक घरै ।
धूप फल ले सुरन भाजन अर्घ यजि शिवतिय वरै।
इन्द्र चन्द्र नरेन्द्र पूजितः ॥ अर्धं ॥
प्रत्येक पूजा।
सोरठा।
विविध प्रकार सुजानि, अखीणमहानसऋद्धि यह ।
होय पापकी हानि, ता धारक मुनिवर यजत ॥
ॐ हीं द्विविधमकाराक्षीणमहानसऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपा-
मीतिस्वाहा।
S
कुसुमलता छन्।
चौ.
५२
हार कर मुनिवर जाके घर ता दिन हार अट है जाई।
चक्रवर्ति-सेना सब जीमें तो भी वा दिन टूटत नाहीं।
वे अक्षीणमहानसऋधि-धर यतिवर बंदूं सीस नबाई ।
तिनके पद पूजत जो अहनिस नवनिधि हो जिनके घर माहीं॥
ॐ हीं अक्षीणमहानसऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
च्यार हाथ घर माहीं मुनिवर तिष्ठत सब जीवन सुखदाई।
ता थानक इंद्रादिक सब अरु चक्रवर्तिकी सैन्य समाई ।
भीर तहां नहिं होत सर्व जिय सुखमय तिष्ठत ता मधि भाई।
अक्षीणमहानसंऋद्धि-धार गुरु तिनकू पूजू मन बच काई ॥
ॐ हीं अक्षीणमहानसऋद्विधारकसमुनीश्वरेभ्योऽध निवेपामीति स्वाहा ।
दोहा।
जो ऐसी ऋधिकू धरै, श्रीऋषिराज महान ।
५२
तिनकू पूजू अर्घ दे, देहु यथारथ ज्ञान ॥ ॐ प्ही द्विविधाक्षीणमहद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽय निर्वपामीति स्वाहा। जयमाला। कडसा छ । अक्षीणमहानसऋद्धि भरा, तिनके पद वंदत सर्व नरा। मैं ध्यावत हूं गुण गावत हूं, मो दीजे ऋषिवर सिद्धिधरा॥ दोहा। ढाल-ते. गुरु मेरे उर वसो' की, 'संसार - असारियो'. 'दश भव'की, तथा गोपीचंदकी, इन चारों चालमें । वे गुरु मो हिरदे बसो, तारन तरन जिहाज ॥ टेर॥ पक्ष मासके पारणे, हार करणके काज । मुनिवर करत बिहार है, ईर्यापथकू साज॥ वे गुरु० ॥२॥ धनिक दरिद्री घर तगों, तिनके नाही भेद।
५. चांद्री चर्या धरत है, लाभ अलाभ न खेद ॥ वे गुरु० ॥३॥ अयाचीक जिन वृत्ति है, मुखतं नाहिं कहात । केवल देह दिखायके, खड़े रहत नहिं भात ॥ वे गुरु० ॥ ४॥ जो गृहस्थ शुभ भक्ति कर, प्रासुक जल भुंगार। जाहि दिखावे ताहि वह, खडे रहत तिह बार ॥ वे गुरु ॥ ५ ॥ प्रक्षालन मुनि चरनको, पूज करें हरखाय । मन-बच काया शुद्ध करि, नमन करत सिर नाय ॥व गुरु०॥६॥ तिष्ठ तिष्ठ मुनिराज इत, हार पान है शुद्ध । इह नवधा मुनि भक्ति लख, हार करत अविरुद्ध ॥ वे गुरु०॥७॥ श्रद्धा शक्ति रु भक्ति जुत, ईर्षा लोभ हरंत । दया क्षमा ये गुण घरे, ता घर हार करंत ॥ वे गुरु०॥८॥ पटू चालीस जु दोष तजि, अंतराय बत्तीस ! ५३ चौदह मल वर्जित सदा, हार करत गुरु ईस ॥वे गुरु०॥९॥ मुनि आहार प्रभावतें, गृहस्थ घरनिके माहिं देव करें नभतें तहां, रत्नवृष्टि सुखदायि ॥ वे गुरु० ॥१०॥ कल्पवृक्षके घुप्प अरु, जल सुगंध बरसाय । धन्य दान दातार पनि, पंचाश्चर्य कराय। वे गुरु०॥११॥ धन्य दिवस धनि वा घडी, पनि मेरो तव भाग। ऐसे मुनिवरके विष, करै दान अनुराग ॥ वे गुरु० ॥ १२ ॥ धन्य युगल पद होय तव, करो जाति ऋषिराज । धन्य हृदय हो ध्यानतें, ध्याऊं नित हित काज ।। वे गुरु०॥१३॥ दरस करत तुव चरनको, चक्षु धन्य जब थाय । सफल करणयुग होय तब, वचन सुनै ऋषिराज ॥वे गुरु०॥१४॥ पूज करूं तुव चरणकी, कर युग धनि जब थाय ।
चौ. पू. ५४ सीस धन्य तब ही हमैं, नमन चरन ऋषिराय ॥ वे गुरु०॥१५॥ मो किंकरकी वीनती, सुनिये श्रीऋषिराय । भव-दधि दुखमयतें मुझे, डूबत काढो आय ॥ वे गुरु० ॥ १६ ॥ बार बार बिनती करूं, मन बच सीस नमाय । परसरूपमैं हो रह्यो, मो निजरूप कराय ।। वे गुरु० ॥१७॥ SPE घना। उर निज ध्याऊं सीस नमाऊं गाऊं गुण है चेरा। पद अजरामरं सकल गुणाकर यो मुझ हर भव-फेरा॥ 3 ही अक्षीणमहानसऋद्धिधारकसर्वमुनीश्वरेभ्योऽध जयमाकार्घ महाघे निर्वषामीति स्वाहा । अडिल्ल छन्र । अक्षीणमहानसऋद्धि-धार जो ऋषि यजै। ताक घरते.दुःख भार आपद भजे। ५४ .
- - ऋदि वृद्धि है अखे सकल गुण सिनि । केवलज्ञान लहाय अचल सम सिद्ध है। इत्याशीर्वादः। पंचमकालकी आदिमें हुए मुनिराजोंको अर्घ । चौपरिपक। गौतमस्वामी सुधर्म जु स्वामी, जंबूस्वामी अति अभिरामी। वीर जिनेंद्र पछे त्रय नामी, वासठि वर्ष मध्य शिवगामी ॥१॥ पंचमकाल आदिके माही, केवलज्ञान लह्यो मुखदाई। तिनकू पुजु अर्घ नढाई, ता फल केवलज्ञान लहाई ॥२॥ ॐ नदी वदमाननिनेन्द्रपयान द्विपष्ठिवर्षमध्ये केवलबानधारक मुनीवरत्रया- निपामीनि साहा।
चौ ५५ विष्णूनान्द मित्र मुनिराई, अपराजित गोवर्धन भाई। भद्रबाहु ये पंच मुनिंदा, सब श्रुत धारक भए अनिंदा ॥१॥ शत संबतसरमें सुखदाई, तिनके चरन नमूं सुखदाई । बसु द्रव ले सब अर्ध चढाई, पूजत हूं मैं मन वच काई ॥२॥ ॐ ही केवलीत्रयपश्चात्शतवर्षमध्ये पंचभुतकेवलिभ्योऽय निर्वपामीति स्वाहा। विशाख पौष्ठि ल क्षत्रिय जया, चारिज नागसेन मुनि हुया। सिंद्धारथ धृतिषेण मुनीशा, विजय बुद्धिलिंग है जु यतीशा॥१॥ अंगदेव धरसेन मुनिंदा, ये दश पूरब धरै यतिंदा । इकसा त्यासी बरस मझारा, पूजू मैं उतरै भव पारा ॥२॥ ॐ ही विशाखाचार्यादिश्रुतकेवलिपश्चात् त्र्यशीत्युत्तरैकशतपमध्ये दषपू- पारकैकादशमनीभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा। .
नक्षत्रचरिज जयपाल मुनीसा, पांडव ध्रुवसेनादिक कंसा। चारिज पंच इकादश अंगा, बन्दन करत पाप हो भंगा ॥१॥ ये मुनि शत अरु वरस तेईसा, माहि भए गुणगणके ईसा। पूजू कर ले अर्घ मुनीसा, सकल दोष खयकार गणीसा ॥२॥ ॐ हीं दशपूर्वधारकमुनिपश्चात् त्रयोविंशत्युत्तरैकशतवर्षमध्ये एकादत्र अंगधारकमुनीश्वरेभ्योऽय निर्वपामीति स्वाहा । सुभद्र और यशोभद्र नामा, भद्रबाहु लोहार्य वखाना। चार घाट सत्याणव बरसा, माहि भए दस अंग घर परसा ॥ ॐ हीं एकादशांगधारकपश्चात् सप्तनवति (त्रिनवात )? वर्षमध्ये सुभद्रा- 'दिभ्यो दशांगथारकमुनिभ्योऽध निर्वामीति स्वाहा । ऐलाचार्य जु माघ जु नंदी, धरसेनाचारज गुणधुंदी। पुष्पदन्त भूतबलि नामा, प्रथम अंग धारी अभिरामा । सौ रु अगरा वर्ष च माही, विद्यागुण करि सब अधिकाई। Mail M
चौ
.
पू.
५६
अर्घ लेय पद पूज कराई, तातें मो सब पाप नसाई ॥
ही दशांगधारकमुनिपश्चात् अष्टादशोत्तरशतवर्पमध्ये एलाचार्याघेकांग
धारकमुनिवरेभ्योऽध निर्वपामति स्वाहा ।
जिनचंद्र कुंदकुंद मुनि इंदा, मुनिगणमें ज्यों उडगन चंदा ।
उमास्वामि सूत्रके कर्ता, समंतभद्र बहु दुखके हरता॥
शिवकोटी रु शिवायन स्वामी, पूज्यपाद बंदू गुणधामी ।
एलाचार्य वीरसेन जानों, जिनसेन नेमिचन्द्रनैं मानों॥
रामसेन तार्किक गुणधारी, अकलंकस्वामी वौध जितारी।
विद्यानंदी माणिकनंदी, प्रभाचन्द्र भव भय हर फन्दी ॥
रामचन्द्र वासवचंद स्वामी, गुणभद्राचारज है नामी।
वीरनंदि आदिक गुणस्वामी, सिद्धांत चक्रवर्ती गुणधामी ॥
नग्न दिगंबर विद्या ईप्ता, पंचमकाल आदि गुणधीसा ।
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५७ ५७ पंच महाव्रत धारत तिन पद सीस नायके मस्तक धारें ॥१॥ चाल-बाजा बजिवा। चरणां लागियो भला, मोहि त्यारोजी ऋषि दीनदयाल ॥ टेर॥ शील महा नग घर नमूं मुनी, पंचेन्द्रिय संयम योग संयुक्त। चरणां लागियो भला, मोहि त्यारोजी ऋषि दीनदयाल ॥ २ ॥ ग्यारह अंगधारक नमूं मुनी, फुनि चौदहजी पूरवके धार चरणां० कोष्ठऋद्धिधर नमूं मुनी, पादानुसार आकाश विहाराचरणा० ॥ जे मौन धारथित हारले मुनी,जाण्यां राज रंक गृह सब इकसार।च. जे पंच महाव्रत धर नमूं मुनी, जे समिति गुप्ति पालक वरवीर।च० ॥ जे देह मांहि विरक्त नमुंमुनी, ते रागरोष भय मोह हंत।च०॥७॥ लोभ रहित संवर धरै मुनी, दुखकारीजीनास्यो काम रु क्रोध ।च०॥ स्वेद मैलतें लिप्त हैं मुनी, आरंभ परिग्रहतें विरक्त । च० ॥९॥ IA ५७ पंच महाव्रत धारत तिन पद सीस नायके मस्तक घारें ॥१॥ चाल-चामा पजिया। चरणां लागियो भला, मोहि त्यारोजी ऋषि दीनदयाल ॥ टेर॥ शील महा नग घर नमूं मुनी, पंचेन्द्रिय संयम योग संयुक्त। चरणां लागियो भला, मोहि त्यारोजी ऋषि दीनदयाल ॥२॥ ग्यारह अंगधारक नमूं मुनी, फुनि चौदहजी पूरवके धार चरणां०॥ कोष्ठऋद्धि धर नमूं मुनी, पादानुसार आकाश विहारराचरणां०॥ जे मौन धारथित हारले मुनी,जाण्यां राज रंक गृह सब इकसार। च. जे पंच महाव्रतधर नमूं मुनी,जे समिति गुप्ति पालक वरवीर।च० ॥ जे देह मांहि विरक्त नमूं मुनी, ते राग रोष भय मोह इंत। च०॥७॥ लोभ रहित संवर धरै मुनी, दुखकारीजी नास्यो काम रु क्रोध ।च०॥ स्वेद मैलतें लिप्त हैं मुनी, आरंभ परिग्रहते विरक्त । च० ॥९॥ .
. -- ------ पद आवश्यक धर नमूं मुनी, द्वादशतपधरतन वे सोखत । च०॥ एक गास दोय लेत हे मुनी, वे नीरस भोजन करत अनिंद।च० ॥ थिति मसान करते नमूं मुनी,जो कर्म डहर सोखनकू दिनंद। च०॥ द्वादश संयम घर नमू मुनी, जो विकथा च्यार करी परिहार। च०॥ दो वीस परीषह सह नमूं मुनी, संसार महार्णवतें उतरत । च० ॥ जय धर्मबुद्धिथुति नृपकरे मुनी, जे काउसम्ग करि रात्रि गमंत।च०॥ सिजि-रमा-वर वे नमूं मुनी, जे पक्ष मास आहार करताच॥१६॥ गोदोहन वीरासन घरे नमुं.मुनी, सेज धनुष वजासन घार । १०॥ तप बल नभ विहरे नमू मुनी, वे गिरि गुहा कंदर करत निवास। .॥ सत्रुमित्र समचित घरें मुनी, में बंदू दिद चारितके धार । च०॥१९ धर्म शुक ध्यावे व्यानर्दू मुनी, में वंदूंयतिवर मोक्ष गमंत। १०॥२० --morronmame --mm-ee-me- M -NAMA चैविास परिग्रह च्युत नमूं मुनी,ध्याऊं मुनिवर जगत पवित्त । च०॥ रत्नत्रय करिशुद्ध हैं मुनी, तिनको मैं वंदू सुधकर चित्त । च०॥२२ मुनिगण पार न पाइयो सुरा,मैं तुच्छ बुद्धि किम कहूं जी बखान ।च. बार बार बिनती करूं तुम्हा, करुणानिधि मोकू करि निज दास । च. भविजन जो मुनि गुण धरै मनां, पद पूजत श्रीगुरु बारंबार । च० ॥ मुनिस्वरूपको ध्यायकै मनां, वह उतरैजी भव-दधि पार ।च० । २६ कबित छन् । जे तपसूरा संयम धीरा सिद्धिवधू अनुरागी, रत्नत्रय मंडित कर्म विहंडित ते ऋषिवर बड़भागी। सूरि उपाध्याय सर्वसाधु त्रय पद धारक सबत्यागी, पूज करत हूं भगति भावतें तुम स्वरूप लव लागी ॥२७॥ ॐ व्ही आचार्योपाध्याय सर्वसाधुत्रयपदधारकातीतानागतवर्तमानकालसबांध सनमुनश्चिरेभ्यः पुष्तुिष्टिशांतिकरेभ्योऽनेकरोगशोकाधिच्याधिहाकिनीभूतपेनयंत- गदिदुष्टप्रददुष्ट ग्रहगविनाविनाशके य. मुभिक्षत्रादिदिविभनानेकवितरणेभ्यः सर्व- गुनीश्वरेभ्योऽय निर्वपार्माति स्वाहा । जो या पूजा करे करावे सुर धरि गावे, अति उछाह कर जिनमंदिर में मंडल मंडावे। देखें अम अनुमोद करे जो भव्य निरंतर, तिनके घरते सर्व विघन भय नसे निरंतर ॥ इत्याशीवादः। दोहा। संवत शत उनवीस दश, श्रावण सप्तमि श्वेत । सरुगनंद मुनि भाक्तवश, रची स्वपर हित हेत ॥ नासा पजा भयान टम्म वालिपनाशानिनिधान गंपूणम् । + पूजा, विधान, माहात्म्य आदि । भाषा-पूजा-पाठ। माषा पूजासग्रह-इसमें अभिषेक पाठ, पचामृताभिषेक पाठ, देवशास्त्रगुरुको समुच्चयपूजा, विद्यमान विवाति तीर्थकर पूजा, देवपूजा, सरस्वतीपूजा, गुरुपूजा, तीनलोकसम्बन्धी अकृत्रिम चैत्यालयपूजा, सिद्धचक्रपूजा, पचमेरुसम्बन्धी जिन चैत्यालयपूजा, नन्दीश्वरद्वीप (अष्टालिक ) पूजा, सोलहकारण पूजा, दशलक्षण पूना, रत्नत्रय पूजा, निर्वाणक्षेत्रपूजा, समुच्चय चौवीमी पूजा, सप्तरपी पूजा, स्वयंभूस्तोत्र, शातिपाठ, विसर्जनपाठ, स्तुतिपाठ-ये सब भाषाके है । मूल्य 1) नित्यपूजा-इसमें लघुअभिषेक ( पचामृत प्रक्षालन ) संस्कृत, देवशास्त्र गुरुपूजा संस्कृत प्राकृत, देवशास्त्र गुरुपूजा भापा, वीसतीर्थकरपूना भाषा, कृत्रिम मात्रिम चैत्यालयाको अर्घ सस्कृन-प्राकृत, सिद्धपूजा संस्कृत, सिद्धपूजाका भावाटक सस्कृत, सोलहकारण दशलक्षण रत्नत्रय धोके भर्घ भाषा: पंचपरमेष्ठी जयमाला प्रारत, शान्तिपाठ संस्कृन, विसर्जन संस्कृत और स्तुतिपाठ भाषा है । मूल्य ।) पर्तमानचतुर्विंशतिजिनजा-कविवर यावनजीकृत । यह चोयीसी विधान है । मूल्य १०) कपड़े की पक्की जिल्वका 110) सत्यार्थ यश-कवि मनरगलालकृत धर्तमानननुशितिमिनपूजा विधान । पदलालित्य, अयफी गंभीरता, तत्वचर्चाका सार और भक्तिरसपूर्ण हदयरांचक कवितापर मुग्ध होफर याव अजितप्रशावजी वकीलने इसे गुटका आकारमे प्रकाशित किया है । मुन्दर कपकी निकासहितफा माया)
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तीसचीवासी पूजा-माई औपके दाक्षेत्र सम्बन्धी भूत भवि यत् आर मामान कानको ताग
नागाका कपिर लापनशामजीका पूजापान । मल्य २) कपडेको पक्की जिल्एका २)
चौसठ ऋद्धि पूजा अर्थात वृहद् गुनावली पूजा शांतिक विधान-यति श्रीस्वरूपनंदजी
निमित्त । मुल्य 10)
कर्मदहन मिधान-५० टेकचाजी कृत । मृत्य ।)
पञ्चकन्याणक पाठ- लापरणलजीत विधान । मूल्य ।)
पूजाविधान संसह-गग ला पनकल्याणक, लघु पनपरमेठी, लगुनीन, सम्मेशिकार
पूजा और समितीणक्षेत्र विका सपड है । मूल्य 1)
मीपमालिका विधान-शानी दिन नवीन यतियों के प्रारम्भ करनेकी निधिमाहित । मूल्य )
जिनेन्द्र पंचकल्याणक मगल-शनार्थ भागादि सहित । मुल्ग)
मिनन्न पञ्चकल्याण मंगल-भाषा अभिषेक पाठ और पञ्चामृताभिषेक पाठसहिन । मुल्य ७॥-I)
प. मगल-मत पाठामाय)
समय कल्यापाक पाठ-बार जगमोहननी पाग रनिन । माय)
संस्कृत पूजापाठ।
प्रतिमा सारोद्वार-I II मन और १० गनोदणीत सक्षिम भर्य। माप बछे
HEARTI को पसी.)
पचारमेली मोना जानाका । गग)
निर्मचल गया. मा. गाभन Eि और अगंगहि मुन्य )
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चौ. . पू० ५८ ५८ नित्यपूजाविधान-इसमे देवशास्त्र गुरुपूजा, विहरमानविशति तीर्थकरपूजा, कृत्रिम अकृत्रिम चैत्यालयसम्बन्धी अर्घ, सिद्धपूजा, सिद्धपूजाका भावाटक, सोलहकारण-दशलक्षण-रत्नत्रयके अर्घ, पंचपर- मेष्ठीके अर्घ, शातिपाठ और विसर्जनके संस्कृत प्राकृत पाठ है । मूल्य) भाषामाहात्म्य। श्रीवृहद्सम्मेदशिखरमाहात्म्य-श्रीलोहाचार्यविचित सस्कृत प्रन्थका ब्रह्मचारी मनसुखसागर- कृत भाषा छन्दानुवाद । मूल्य ११) श्रीसम्मेदाचलपूजा-प. जवाहरलालजीकृत पूजा और श्रीधर्मदास क्षुल्लककृत भाषा वचनिकाम माहात्म्य । मूल्य ।) श्रीसम्मेशिखरमाहात्म्य विधान-पं. जवाहरलालजीकृत चौबोला दादरा, इत्यादि गानेकी नाना तर्ज़ और चालोंमें । इसमे श्रीसम्मेदशिसरजीका फोटो भी लगा है । मूल्य २) श्रीसम्मेदशिखरमाहात्म्य-श्रीधर्मदासजी क्षुल्लककृत भापा वचनिकामें । मूल्य -) श्रीगिरनार माहात्म्य-कविवर हजारीमल्लजीकृत पूजाविधान । मूल्य ॥).
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सब जगहके छपे हुए सब तरहके
जैनग्रन्थोंके मिलनेका पता:-
जैनसाहित्यप्रसारक कार्यालय,
हीराबाग, गिरगॉन-लम्बई।
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