Sanmati Library, Jaipur

Ath Panchmahayagyavidhi

2009/09

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. xc.CSCO900 Paaryoge9090929LORIES animmmmmmmmmmmmmm * ओरम् * अथ पञ्चमहायज्ञविधिः Icx intintiMEnilivinititions: ॥ छन्दः शिखरिणी दयाया आनन्दो विलसति परः वामविदितः सरस्वत्यस्याने निवसति मुदा सत्या यनिला इयं ख्यातिर्यस्य प्रकटमुगुणा स्त्यननायं प्रन्यो रचित इहि बोद्धव्यमलया श्रीमदयानन्दसरस्वतीम्वामिनिर्मित येदमन्त्राणां संस्कृतमारतभापार्थसहितः सन्ध्योपासनाग्निहोत्रपितृसेवावलिवैश्वदेवा- तिथिपूजानित्यकर्मानुष्ठानाय संशोध्य यन्त्रयितः Febassad 3e9e929 अस्य ग्रन्यस्याधिकार, सर्वथा स्वाधीन एव रक्षितः 12.- अजमेरनगरे वैदिक-यन्त्रालये मुद्रितः द्वादशवार: संवत् १९८३ वि० मूल्यम् १०,००० सन् १९२६ ई. ॥ Maitrinthitimminintiurinthinniniy 920x - XXXD5G NXGXSEX

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SXSWEROCOCK:KISOK ICICKICHCOCICK: ANMOMMUNIVMAMIUMMANAVAILER SHRI SA 51 212 अथ पञ्चमहायावीधर tri AR.k.xixixixi Pristindridr: itititititiuithilititititil ॥ छन्दः शिवहिणी दयाया आनन्दो विलननि पैर वो विदित सरस्वत्यन्याने नियमति मुदाः सत्यानलया इयं च्यातियम्य प्रकटमुगुणा वदशग्णा, त्यननायं मन्यो चिन धनि बोदव्यमनघाः ॥ श्रीमदयानन्द सरस्वतीग्वाभिनिर्मित: यंदमन्त्रागा संस्कृतप्राशनार्थसहितः सन्ध्योपासनाग्निहोत्रपितसंशवलिवैश्वदेवा- तिथिपूजानित्यसमानुष्ठानाय संशाध्य यन्त्रयिनः . tituttitititiiiiiimithilithitis NARENCERHITRANSCOLLARDA ILOCORCELeeree 2:30 " अस्य अन्धस्याविनार नया स्वाधीन एव रक्षितः - अजमेरनगर बैदिक-यन्त्रालये मुद्रितः हादराचारः संवत् ६-३ वि० मूल्यम् १०,००० गन् १६२६ ई० htntivititititerinarithentinnitiSIS कर } who ------- 5260530 पञ्चमहायज्ञविधिस्थविषयसूची ॥ विषय. पृष्ठ से पृष्ठ तक ५ ... ६-११ ... आचमन इन्द्रियस्पर्श मार्जन प्राणायाम अघमर्षण मनसापरिक्रमण उपस्थान गुरुमंत्र समर्पण सन्ध्याग्निहोत्र के प्र० देवयज्ञ पितुयह बलिवैश्वदेव अतिथिपूजा २०-२४ ... २४-२५ २५-२७ २८-३२ ३२-४१ ४१-४७ ... ... ...

... सर्वमव्यापक ... पीक उद् ॥ अथ सन्ध्याशब्दानामर्थनिर्देशः ॥ अमिएये श्रानन्द के लिये मादित्य सूर्यकिरण पनि ...सय नरफ से प्रामा सब तरफ समासाद "सब तरफ से से साधारण करनेवाला प्रकाशित आत्मा सध्यजायत पैदा हुआ उपयः बाग यज्ञायत पैदा हुया इन्द्रः ..ऐश्वर्यवाला वर्गवः जलयाला उदीची उत्तर पछि । उत्तरं पीछे. पक्षा दिन | उत्तम अच्छा अवरपयद निश्चय अयो श्रच्छा अन्तरिक्ष याच प्रकाश में उदगात् अच्छा प्रकाशक गन घाल लांग उधरत विज्ञानस्वरूप अग्नि ...प्रकाशस्वरूप | ऊड़वा ऊपर अधिपति स्वामी ऋतं चेद मस्तु हो एभ्यो इनके लिये यमितः नियंन्धन | आम् हमा पाएठः गला अनन् पृथिव्यादि | फर हाथ. अगनि बिजली काठे प्रगन्म प्राप्त हॉकरमाप चित्र अनी किरण अन्नः प्रकाशक | मम्-आकाश की तरह व्यापक भदीनाः स्वाधीन ग्रीवा गरदन: ध्याएकाच रक्षा करनेवालाः ... गले में बल केतवः ...

और ध्मः अमृत देव स्वप्रकाश शे अच्छे गुणवाला ... (२) धारण करें चन्द्रमा चांद | दक्षिणा दाहिनी चित्रं दिव्यरूप ज्योतिः देखने को जीवेम जीवं देवानां विद्वानों के जातवेदसं जिससे चंद देवत्रा पैदा हुए | द्यावा सूर्यलोक जगतः चर संसार का देवस्य ' प्रकाशक को जनः पैदा करने वाला धीमहि ...ध्यान करते हैं। जम्भे वश में धियः वुद्धियों को त्यं उसको | धाता धारणकर्ता तस्थुषः स्थावर को | शुचा नीचली तत् हमको तपः ज्ञानरूप नाभिः टुंडी तपसः सामर्थ्य ले | नेत्रयोः नेत्रों को ततः फिर | नाभ्यां नाभि में तेभ्यो उनके लिये | नमः नमना तं उसको नः हम पर तिरश्चि कीड़े विच्छू वगैरह | प्राणः प्राणवायु तमसः '... अन्धकार ले पुरस्तात् ...सृष्टि से पहिले तला| पश्येम देखें देवी प्रकाशक प्रनवास उपदेश करें दिवं अग्नि का | प्रचोदयात् । प्रेरणा करे दिशा पीतये -पूर्णानन्द के लिये हेष्टि द्वेष करता है | पृष्ठे पीठ में देष क्षरते हैं। पादयोः पैरों में वह | नो दिए N कीति जो जिसको रक्षा करने वाला पंक्ति श्रेष्ठकर्मकर्ता ... ग्रहण के योग्य वाणी रचता हुआ ... पुनातु पुनः पूर्व पृथिवी प्राची प्रतीची पितरः पृदाकू पश्यन्तः परि वलम् प्रम बाहुभ्यां वृहस्पतिः भवन्तु भूः भुवः भूयः भों मित्रस्य मयाभवाय मयस्कराय जगत् के से (३) पवित्र करे| यशः फिर यः पहिले यं ज़मीन रात्रि पूर्व | रक्षिता पश्चिम | राजी शानी लोग | वरुणस्य सांप | वरेण्यं देखते हुए | वाक् जुदा | विधत् बल | विश्वस्य वड़ा वशी हाथों से वः बड़ों का स्वामी | वरुणः हो | वहन्ति प्राणदाता | विप्पुः दुःखहर्ता वीरुध फिर | वर्ष विज्ञानरूप | वयं मित्र के | शं सुखदाता के | शंयोः सुख करने | शिरः वाले के लिये श्रोत्रं वड़ा | शिरसि स्वभाव से श्वित्र वश में रखने वाला उनके श्रेष्ठस्वामी प्रकाश करते हैं व्यापक वृक्ष वर्षा ... हम कल्याण सुख की ... ... सिर कान सिर में ज्ञानमय महः मिषतः पथा जैसे । शुक्रर . सो समुद्रात् समुद्र से साल वगैरह सूरज-सव ... ... ... शरदः वर्षों के सर्वन सब जगह शतम् ... शङ्करायच ..कल्याणकर्ता संवत्सर के लिये सूर्य शृणुयाम सुनें जगत्.का प्रकाशक शतात् सौ से लोम पैदा करने वाला शम्भवाय सुखकारी के लिये स्वजः जन्मरहित शिवाय सुखस्वरूप के लिये | सूर्य व्यापक शिवतराय अत्यन्त सुख- स्याम हों रूप के लिये | स्वाहा प्यारा वचन बोलना वन्त ... वर्षा करे | सवितुः पैदा करनेवाले के मध्यस्थलोक हितम् भला चाहनेवाला सुखस्वरूप हृदयम् हिरदा सत्यं अविनाशी हृदये हिरदे में ... . . ॥ इति ॥

अथ सन्ध्योपासनादिपक्रानिलिव , यह पुस्तक नित्यकर्मविधि को है इसमें पचासका विधान है जिनके ये नाम है कि प्रझयज्ञ, देवयज्ञ, विपक्ष भूतयन और यज्ञ । ग्न के मंत्र, मंत्रों के अर्थ और जो जो करने का विधान लिखा है सो सो ययावत करना चाहिये । एकान्त देश में अपने प्रात्मा, मन और शरीर को और शान्त करके उस उस कर्म में चित्त लगा के तत्पर होना चाहिये, इन नित्यकमा के फल ये हैं कि ज्ञानप्राप्ति से प्रारमा की उन्नति और गरोग्यता होने से शरीर के सुख से व्यवहार और परमार्थ कार्यो की सिरि होना उससे धर्म, अर्थ, काम.और मोत ये सिद्ध होते हैं । इन को प्रशस हो कर मनुष्यों को सुखी होना उचित है ॥ अथ तपां प्रकारः । तत्रादौ ब्रह्मयशान्तर्गतसन्ध्याविधान प्रोच्यते ॥ तत्र सन्च्याशब्दार्थः । सन्ध्यायन्ति सन्यायते वा पर- प्राय यस्यां सा सन्ध्या ॥ तत्र रानिन्दित्रयोः सन्त्रियेलायामुभ- योस्सन्ध्ययोः सर्वैमनुष्यैरवश्यं परमेश्वरस्यैव स्तुतिप्रार्थनोपा- सनाः काव्ः ॥ भादौ शरीरशुद्धिः कन्या । सा चाहा जलादिना! प्राभ्यन्तरारागदपासत्यादित्यागेन || अन प्रमाणम्-अग्निगात्रा- लि गुप्यन्ति, मनः सत्येन शुष्यत्ति । विद्यातपोभ्यां भूतात्मा, बुद्धिानेन शुध्य- वि ॥ इत्याह मनुः य०५ श्लो० १०६ ॥ शरीरशुद्धस्सकाशादा स्मान्तःकरणाशुद्धिरवश्यं सर्वैस्सम्पादनीया । तस्यास्सर्वोत्कृष्टः स्वात्पबह्मप्राप्त्येकसाधनत्वाच्च ॥ ततो मार्जनं कुर्य्यात् ॥ नैवेश्व- रम्यानादावालस्यं भवेदेतदर्थ शिरोनेत्राापरिजलप्रक्षेपणं कर्त ... व्यम् । नोचेन्न। अब सन्योपासनादि पांच महायज्ञों की विधि लिखी जाती है और जसमें के मन्यों का अर्थ भी दिखा जाता है । पहिले संध्या शब्द का पश्चमहायज्ञविधिः॥ अर्थ यह है कि ( संध्यायति) मलीभांति ध्यान करते हैं वा ध्यान किया जाय परमेश्वर की जिसमें वह संध्या, सो रात और दिन के संयोग समय दोनों संध्याओं में सव मनुष्यों को परमेश्वर को स्तुति प्रार्थना और उपासना करनी चाहिये । पहिले वाह्य जलादि से शरीर को शुद्धि और राग द्वेष धादि के त्याग से भीतर की शुद्धि करनी चाहिये क्योंकि मनुजी ने ५ अध्याय के १०६ श्लोक (अद्भिर्गात्राणि इत्यादि) में यह लिखा है कि शरीर जल सं, मन सत्य से, जीवात्मा विद्या और तप से और घुदि ज्ञान से शुन्द्र होती है, परन्तु शरीरशुद्धि की अपेक्षा अन्तःकरण को शुद्धि सब को अवश्य करनी चाहिये, क्योंकि वही सर्वोत्तम और परमेश्वरप्राप्ति का एक साधन है तब कुशा वा हाथ से मार्जन करे अर्थात परमेश्वर का ध्यान अादि करने के समय किसी प्रकार का पालस्य न आवे इसलिये शिर और नेन आदि पर जल प्रक्षेप करे, यदि बालस्य न हो तो न करना । पुनयूनान्न्यूनांस्त्रीन् प्राणायामान् कुर्यात् ।। आभ्यंतरस्थं वायु नासिकापुटाभ्यां वलेन बहिनिस्सायं यः थाशक्ति बहिरेव स्तम्भयेत् पुनः शनैश्शनगृहीत्वा किंचित्तमय- रुध्य पुनस्तथैव बहिनिस्सारयेदवरोधयेच्चै त्रिवारं न्यूनात- न्यूनं कुर्यादनेनात्ममनसोः स्थिति सम्पादयेत् ॥ ततो गायत्री- मन्त्रेण शिखां वद्ध्वा रक्षाञ्च कुर्यात् ॥ इतस्ततः ऋशा न पतेयुरेतदर्थं शिखावन्धनम् ॥ प्रार्थितस्सन्नीश्वरस्सत्कर्मसु स- चैत्र सर्वदा रक्षेन्नः । एतदर्थं रक्षाकरणम् ॥ ॥ भाषार्थ ॥ फिर कम से कम तीन प्राणायाम करे अर्थात् भीतर के वायु को बल से निकाल कर यथाशक्ति बाहर ही रोक दे फिर शनः २ ग्रहण करके कुछ चिर भीतर ही रोक के बाहर निकाल दे और वहां भी कुछ रोके इस प्रकार कम से कम तीन बार करे । इससे आत्मा और मन की स्थिति सम्पादन - सन्ध्योपालनम् ॥ ३ करे इसके अनन्तर गायत्री मंत्र से शिक्षा को बांध के रक्षा करे इसका प्रयोजन यह है कि स्थर उधर कंश न गिरें सो यदि केशादि पतन न हो तो न करे और रश करने का प्रयोजन यह है कि परमेश्वर प्रार्थित होकर सप भले कामों में सना सब जगह में हमारी रक्षा करें । ॥ प्रधाचमनमन्त्रः ॥ ओं शन्नौदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । शंयोरभि- संवन्तु नः ॥ यजु० अ० ३६ । मं० १२ ॥ ॥ भाप्यम् ॥ याप्नु व्यात. अस्मद्धातोरप्शन्दासध्यति। दिवु क्रीडाद्यर्थः। अप्पदा नियतमीलिंगा बहुवचनान्तश्च (शनादे०) देव्य आपः सर्वप्रकाशरास्नानन्दप्रदरलर्वव्यापक ईश्वरः (अभिष्टये) इष्टा- नन्दप्रानय (पनिये ) पूर्णानन्दभांगन तनये (नः ) अस्मभ्यं (0) कल्याण (भवन्तु ) अर्थात् भावय तु प्रयच्छतु । ता आपो देश्यः स एवेश्वरः (न:) अस्मभ्यं (शयोः ) शम् अभिनवन्तु अर्थात् सुखस्वामितः सर्वतो वृष्टिं करोतु । अप्शन्देनेश्वरस्य ग्रहणमत्र प्रमाणम् ॥ या लोकांश्च कोशांचापो बनजना विदुः । असच्च यत्र सच्चान्तस्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्त्रिदेवसः ॥ अथ० कां० १० । अनु० ४ । २० २२ । मं० १० ॥ अनेन बंदमन्त्रप्रमाणनाशब्देन परमात्मनोत्र ग्रहणं क्रियते । एवमनन मन्त्रणश्वरं प्रार्थयित्वा विराचामेत् ॥ जलाभावश्चेन्नैव कुर्यात् । प्राचमनमप्यालस्यस्य कण्ठस्थकफस्य निवारणार्थम् ॥ ॥ भापार्थ ।। अब आचमन करने का मन्त्र लिखते हैं ( श्री शन्नोदेवी इत्यादि) पन्चमहायज्ञविधिः ॥ इस का अर्थ यह है कि प्राप्ल च्याप्ती, इस धातु से अंप शन्द सिड. होता है वह सदा स्त्रीलिङ्ग और बहुवचनान्त है । दिवु धातु अर्थात् जिसके बड़ा प्रादि अंर्थ है उससे देवी शब्द सिद्ध होता है (देव्य आपः) सब का प्रकाशक सव को आनन्द देने वाला आरे सर्वव्यापक ईश्वर (अभिष्टये) म- मोवान्छित मानन्द के लिये और (पीतये) पूर्णानन्द की प्राप्ति के लिये (न:) एमको (२) कल्याणकारी (भदन्तु) हो अर्थात् हमारा. कल्याण करे (ताः पापों देन्या) वही परमेश्वर (न:) हम पर (शंयोः) सुख की (अभिसंवन्तु) “वर्षवा वृष्टि करे । इस प्रकार इस मन्त्रं से परमेश्वर की प्रार्थना करके तीन पाचमन करे यदि जन्म न हो.तो न करे । आचमन से गले के कफादि की निवृत्ति होना प्रयोजन है । यहां अप् शब्द से ईश्वर के ग्रहण करने में यमाण-यन्न लोकांब) जिसमें सब लोक लोकान्तर (कोप) अर्थात् सब जगत् का कारणरूप खजाना जिसमें असत् अदृश्यरूप आकाशादि और.' सत् स्थूल प्रकृत्यादि सब पदार्थ स्थित हैं उसी का नाम अप् है और वह माम ब्रह्म का है तथा उसी को स्कंभ कहते हैं वह कौनसा देव और कहां है इसका यह उत्तर है कि (अन्तः) सब के भीतर ज्यापक हो के परिपूर्ण शे रहा है उसी को तुम उपास्य, पूज्य और इष्टदेव जानो, इस वेदमंत्र के ममाण से अप नाम ब्रह्म का है। n अयेन्द्रियस्पर्शः ॥ नों वाक्वाक् । ओं प्राण प्राणः । ओं चनुः चतु। ओं श्रोत्रम् श्रोत्रम् । ओं नाभिः ।ओं हृदयम् । ओं कण्ठ। श्रो शिरओं बाहुभ्यां यशोवलम् । ओं करतलकरपृष्ठे ॥ ॥ माष्यम् ॥ एमिः सर्वत्रेश्वरप्रार्थनया स्पर्शः कार्य्यः । सर्वदेश्वरकृपये: न्द्रियाणि बलवन्ति तिष्ठन्त्वित्यभिप्राय: ॥ म A

सन्म्योपालनम् ॥
॥ अथेश्वरप्रार्थनापूर्वकमार्जनमन्धाः ॥
ओं भृः पुनातु शिरसि । ओं भुवः पुनातु नेत्रयो।
भो.स्वः पुनातु कण्ठे | ओं महः पुनातु हृदये। ओ जना
पुनातु नाभ्याम् । ओं तपः पुनातु पादयोः । ओ सत्सं
पुनातु पुनरिशरसि । ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वन ॥
॥ भाष्यम् ॥
ओमित्यस्य भूर्भुवः स्यरित्येताला चार्था गायत्रीमन्नार्थे
च्याः । महरात् सर्वेभ्यो महान् सर्वैः पूज्यश्च । सर्वेषां जन
कत्वाइजनः परमेश्वरः । दुशानां संतापकारकत्वात्स्वयं शानस्व
रुपत्यात् (यस्य शानमयं तपः) इति वचनस्य प्रामाण्यात् तप
ईश्वरः । यदविनाशि यस्य कदाचिद्विनाशो न भवेत् तत्सत
प्रशव्यापकमिति बोध्यम् । इतीश्वरनामभिमार्जनं कुर्यात् ॥
॥ अथ प्राणायाममन्त्राः॥
ओं भूः । ओं भुवः । ओं स्वः। ओं महः । ओं
. जनः । ओं तपः। श्री सत्यम् ॥ तैत्ति० प्रपा० १०॥ अनु०
७१ । इति प्राणायाममन्त्राः ॥
॥ भाग्यम् ॥
पतेपामुञ्चारणार्थविचारपुरस्सरं पूर्वोक्तप्रकारेण प्रापाया
मान् कुर्यात् ॥
॥ मापार्थ ॥
धन्द्रियस्पर्श: (ओं वाक् पागित्यादि ) इस प्रकार से ईश्वर की
प्रार्थनापूर्वक इन्द्रियों का स्पर्श करे । इसका भाभिप्राय यह है कि ईश्वर
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६ पञ्चमहायज्ञविधिः॥ प्रार्थना से सब इन्द्रिय वलवान् रहें । अव ईश्वर की प्रार्थनापूर्वक मार्जन के मन्त्र लिखे जाते हैं (ओं भूः पुनातु शिरसीत्यादि) ओंकार भूः भुवः और स्वः इनके अर्थ गायत्री मंत्र के अर्थ में देख लेना (महः ) सब से . बढ़ा और सब का पूज्य होने से परमेश्वर को मह कहते हैं (जनः ) सब जगत् के उत्पादक होने से परमेश्वर का जन नाम है (तपः) दुष्टों को संतापकारी और ज्ञानस्वरूप होने से ईश्वर को तप कहते हैं, क्योंकि (य. स्येत्यादि) उपनिपद् का वाक्य इस में प्रमाण है, (सत्यं ) अविनाशी होने से परमेश्वर का सत्य नाम है और व्यापक होने से 'ब्रा' नाम परमेश्वर का है । अर्थात् पूर्व मंत्रोल सब नाम परमेश्वर ही के हैं इस प्रकार ईश्वर के नामों के अर्थों का स्मरण करते हुए मार्जन करें । भव प्राणायाम के मंत्र लिखते हैं ( श्री भूरित्यादि ) इनके उच्चारण और अर्थ विचारपूर्वक उस प्रकार के अनुसार प्राणायामों को करे ॥ अथेश्वरस्य जगदुत्पादनद्वारा स्तुत्याऽधमर्पणमन्ना अर्थात पापदूरीकरणार्थाः ॥ ओ३म् ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोध्यजायत । ततो राज्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः ॥ १ ॥ समुद्रादर्णवादर्षि संवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिपतोवशी ॥२॥ सूर्याचन्द्रमसौं धाता यथा पूर्वमैकल्पयत् । दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः ॥ ३ ॥ ऋ० अ० ८ । अ. व०४८॥ || भाष्यम् ॥ (धाता) दधाति सकलं जगत् पोपयति वा स धातेश्वरः (वशी) वशं कर्तु शीलमस्य सः (यथापूर्वम् ) यथा तस्य सर्वझे विज्ञाने जगद्रचनज्ञानमासीत् पूर्वकल्पसृष्टौ यथा रचनं कृतमा .

सन्ध्योपासनम् ॥ सीत्तथैव जीवानां पुण्यपापानुसारतः प्राणिदेहानकल्पयत् (सू- चन्द्रमसौ ) यो प्रत्यक्षविषयौ सूर्यचन्द्रलोकी (दिवम् ) स- वोत्तमं स्वप्रकाशमग्न्याख्यम् (पृथिवीं) प्रत्यक्षविषयों ( अन्त- रिक्षम् ) अर्थाद्वयोर्लोकयोमध्यमाकाशं तत्रस्थाल्लोकांश्च (स्वः) मध्यस्थं लोकम् (अकल्पयत् ) यथापूर्व रचितवान् । ईश्वरज्ञानस्यापरिणामित्वात् पूर्णत्वादनन्त्वात्सर्वदेकरसत्वाच नैव तस्य वृद्धिक्षयव्यभिचाराश्च कदाचिद् भवन्ति । अतएव यथा पूर्वमकल्पयदित्युक्तम् स एव वशीश्वरः (विश्वस्य भिपतः ) सहजस्वभावन (अहोरात्राणि ) रात्रेर्दिवसस्य च विभागं यथा- पूर्व (विदधत् ) विधानं कृतवान् तस्य धातुर्वशिनः परमेश्वर- स्यैव (अभीद्धात्) अभितः सर्वत इद्धात् दीसात् ज्ञानमयात् (तपसः ) अर्थादनन्तसामर्थ्यात् (ऋतं ) यथार्थ सर्वविधि- करणं वेदशास्त्रं सत्यं त्रिगुणमयं प्रकृत्यात्मकमव्यक्तं स्थूलस्य सूः क्ष्मस्य जगतः कारणं चाध्यजायत यथापूर्वमुत्पन्नम् (ततो रात्री) या तस्मादेव सामर्थ्यात्प्रलयानन्तरं भवति सा रात्रिरजायत यथा पूर्वमुत्पन्नासीत् ॥ तम आसीत्तममा गूढमग्नै ॥ ऋ० अ०८ । अ०७ । व० १७ । सं. ३॥ अग्रे सृष्टेः प्राक्तमोन्धकार एवासीत् तेन तमसा सकलं जगदिदमुत्पत्तेः प्राग्गूढं गुप्तमर्थादृश्यमासीत् । (ततः समु०) तस्मादेव सामर्थ्यात्पृथिवीस्थोन्तरिक्षस्थश्च महान् (समुद्रः) अजायत यथापूर्वमुत्पन्न श्रासीत् ( समुद्रावर्णवात् ) पश्चात् संवत्सरः क्षणादिलक्षणः कालोध्यजायत । यावज्जगत्तावत्सर्व परमेश्वरस्य सामर्थ्यादेवोत्पन्नमित्यवधार्यम् । एवमुक्तगुणं पर- मेश्वर संस्मृत्य पापादीत्वा ततो दूरे सर्वैर्जनैः स्थातव्यम् ।

. पञ्चमहायज्ञविधिः ॥ नैव कदाचित्केनचित्स्वल्पमपि पापं कर्तव्यमितीश्वराशास्तीति निश्चेतव्यम् । अनेनाघमर्षणं कुर्य्यादर्थात्पापानुष्ठानं सर्वथा परित्यजेत् ॥ ॥ भाषार्थ ।। अव अघमर्षण अर्थात् हे ईश्वर ! तू जगदुत्पादक है इत्यादि स्तुति फरके पाप से दूर रहने के उपदेश का मंत्र लिखते हैं । (ओं तम्ब सत्यमित्यादि) इसका अर्थ यह है कि (धाता) सब जगत् का धारण और पोषण करने वाला और ( वशी) सव का वश करने वाला परमेश्वर (यथापूर्वम् ) जैसा कि उस के सर्वज्ञ विज्ञान में जगत् के रचने का ज्ञान था और जिस प्रकार पूर्वकल्प की सृष्टि में जगत् की रचना थी और जैसे जीवों के पुण्य पाप थे उनके अनुसार से ईश्वर ने मनुष्यादि प्राणियों के ऐह बनाये हैं (सूर्याचन्द्रमसा) जैसे पूर्व कल्प में सूर्य चन्द्र लोक रचे थे वैसे ही इस कल्प में भी रचे हैं। (दिवं) जैसा पूर्व सृष्टि में सूर्यादि लोकों का प्रकाश रचा था वैसा ही इस कल्प में भी रचा है तथा ( एपि. पी) जैसी प्रत्यक्ष दीखती है ( अन्तरिक्षं) जैसा पृथिवी और सूर्यलोक के बीच में पीलापन है (स्वः) जितने श्राकाश के बीच में लोक हैं उनको ( प्रकल्पयत् ) ईश्वर ने रचा है जैसे अनादिकाल से लोक लोकान्तर को नगदीश्वर बनाया करता है वैसे ही अव भी बनाये हैं और श्रागे भी वना. पेगा क्योंकि ईश्वर का ज्ञान विपरीत कभी नहीं होता, किन्तु पूर्ण और अनन्त होने से सर्वदा एकरस ही रहता है । उस में वृद्धि, तय और इलटापन कभी नहीं होता इसी कारण से (यथापूर्वमकल्पयत् ) इस पद फा ग्रहण किया है (विश्वस्य मिषतः ) उसी ईश्वर ने सहजस्वभाव से जगत् के रात्रि, दिवस, घटिका, पल, और क्षण आदि को जैसे पूर्व से पैसे ही (व्यदधत् ) रचे हैं इसमें कोई ऐसी शंका करे कि ईश्वर ने किस पस्तु से जगत् को रचा है उसका उत्तर यह है कि (अभीद्धातपसः) ईश्वर सन्म्योपासनम् ॥ ने अपने शनन्त सामय से सब जगत् को रचा है। जो कि ईश्वर के प्रकाश से जगत् का कारण प्रकाशित और सब जगत् के बनाने की सामग्री इंधर के श्राधीन है (प्रातं ) उसी अनन्त ज्ञानमय सामर्थ्य से सब विद्या का राजाना वेदशान को प्रकाशित किया जैसा कि पूर्व सृष्टि में प्रकाशित था और धागे के कल्पों में भी इसी प्रकार से वेदों का प्रकाश करेगा (स) जो त्रिगुणात्मक अर्थात् सत्व रजो और तमोगुण से युक्त है जिसके नाम अव्या अन्यात सत् प्रधान प्रकृति है जो स्थूल और सूक्ष्म जगत् का कारण है सो भी ( अध्यजायत) अर्थात् कार्यरूप होके पूर्व कल्प के समान उत्पन्न हुआ है (ततो रान्यजायत ) उसी ईश्वर के साम- ये से जो प्रलय के पीछे हज़ार चतुर्युगी के प्रमाण से रात्रि कहाती है सो भी पूर्व प्रलय के तुल्य ही होती है इसमें ऋग्वेद का प्रमाण है कि जब जब विद्यमान सृष्टि होती है उसके पूर्व सव आकाश अन्धकाररूप रहता है और टसी अन्धकार में सब जगत् के पदार्थ और सब जीव ढके हुए रहते हैं टसी का नाम महारात्रि है (ततः समुद्रोऽर्णवः) तदनन्तर उसी सामर्थ्य से पृथिवी और मेघमण्डल में जो महासमुद्र है सो भी पूर्व सृष्टि के सख री उत्पन्न हुश्रा है (समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत) उसी समुद्र सत्पत्ति के पश्चात् संवत्सर थयात् पण, मुहूर्त, प्रहर श्रादि काल भी पूर्व सृष्टि के समान उत्पन्न हुथा है चंद से लेके पृथिवी पर्यन्त जो यह जगत है सो सब ईश्वर के नित्य सामर्थ्य से ही प्रकाशित हुआ है और ईश्वर सब को उत्पन्न करके सब में व्यापक होके अन्तर्यामीरूप से सब के पाप परयों को देखता हुश्रा पक्षपात होट के सत्य न्याय से सब को यथावत् कर दे रहा है ऐसा निश्चित जान के ईश्वर से भय करके सब मनुष्यों को रचित है कि मन कर्म और वचन से पापकों को कभी न करें। इसी का नाम अघमर्पण है अर्थात् ईश्वर सय के अन्तःकरण के कम्मों को देख रहा है इससे पापफम्मा का आचरण मनुष्य लोग सर्वथा छोड़ देखें।

पञ्चमहायशाविधिः॥ शन्नोदेवीरिति पुनराचामेत् । ततो गायव्यादि मन्त्रार्थान् मनसा विचारयेत् । पुनः परमेश्वरंगव सूर्यादिकं सकलं जगद्र- चितमिति परमार्थस्वरूपं ग्राम चिन्तयित्वा परं ब्रह्म प्रार्थयेत् ॥ (शनोदेवारित ) इस मन्त्र से तीन श्राचमन करे । तदनन्तर गाय- त्र्यादि मन्त्रों के अर्थ विचारपूर्वक परमेश्वर की स्तुनि अयान् परमेश्वर के गुण और उपकार का ध्यान कर पश्चात् प्रार्थना कर प्रशान् सब उत्तम कामों में ईश्वर का सहाय चाहें और सदा पश्चात्ताप करें फि मनु शरीर धारण करके हम लोगों से जगत् का उपकार कुछ भी नहीं बनता । जैसा कि ईश्वर ने सब पदार्थों की उत्पत्ति करके सब जगत् का उपकार किया है वैसे हम लोग भी सब का उपकार करें, इस काम में परमेश्वर हम को सहाय करे कि जिससे हम लोग सब को सदा नुख देते र तदनन्तर ईश्वर की उपासना करें, सो दो प्रकार की है. एक सगुण और दूसरी निर्गुण जैसे ईश्वर सर्वशक्तिमान्, दयालु, न्यायकारी, चेतन, व्यापक, अन्तर्यामी, सब का उत्पादक, धारण करनेहारा, मालमय, शुद्ध, सनातन, ज्ञान और आनन्दस्वरूप है धर्म, अर्थ, काम और मोड पदार्थों का देनेवाला, सब का पिता, माता, बन्धु, मित्र, राजा और न्यायाधीश है इत्यादि इयर के गुण विचारपूर्वक उपासना करने का नाम सगुणोपासना है तथा निर्गुणोपासना इस प्रकार से करनी चाहिये कि ईश्वर थनादि अनन्त है जिसका आदि और अन्त नहीं, अजन्मा, अमृत्युजिसका जन्म और मरण नहीं, निराकार, निर्वि. कार, जिसका आकार और जिसमें कोई विकार नहीं जिसमें रूप. रस, गंध, स्पर्श, शब्द, अन्याय, अधर्म, रोग, दोप, शज्ञान और मलीनता नहीं है जिसका परिमाण, छेदन, बंधन, इन्द्रियों से दर्शन, ग्रहण और कम्पन नहीं होता, जो हस्व, दीर्घ और शोकातुर कभी नहीं होता जिसको भूख, प्यास, शी. तोष्ण, हर्प और शोक कभी नहीं होते। जो उलटा काम कभी नहीं करता इत्यादि जो जगत् के गुण से ईश्वर को अलग जान के ध्यान करना वह सन्ध्योपासनम् ॥ ११ निर्गुणोपासना कहाती है । इस प्रकार प्राणायाम करके अर्थात् भीतर के वायु को वल से नासिका के द्वारा वाहर फेंक के यथाशक्ति बाहर ही रोक के पुनः धीरे.धीरे भीतर लेके पुनः बल से बाहर फेंक के रोकने से मन और आत्मा को स्थिर करके श्रात्मा के बीच में जो अन्तय रूप से ज्ञान और श्रानन्दस्वरूप व्यापक परमेश्वर है उसमें अपने आप को मग्न करके अत्यन्त आनन्दित होना चाहिये जैसा गोताखोर जल में डुबकी मारके शुद्ध होके बाहर आता है वैसे ही सव जीव लोग अपने प्रात्मानों को शुद्ध ज्ञान आनन्दस्वरूप व्यापक परमेश्वर में मग्न करके नित्य शुद्ध करें। ॥ अथ मनसा परिक्रमामन्त्राः ॥ प्राची दिग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षिनभ्यो नम इपुभ्यो नम एभ्यो अस्तु । योस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं बो जम्मै दध्मः॥१॥ दक्षिणादिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजीराक्षता पितर इपवः । तेभ्यो नसोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितभ्यो नम इघुभ्यो नम एभ्यो अस्तु । यो स्मान् द्वेष्टि यं व्यं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ॥ २॥ प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपतिः पदा- कूरजितान्नमिपवः तेभ्यो नमोधिपतिभ्यो नमो रचितम्यो नम इपुभ्यो नम एभ्या अस्तु । यो स्मान् देष्टि यं वयं द्विष्मस्तं को जम्भे दध्मः ॥३॥ उदीचीदिक् सोमोधिपतिः स्वजोरञ्जिताशनिरिपवः । तेभ्यो नमो धिपतिभ्यो नौ र- चितृभ्यो नम इपुभ्यो नम एभ्यो अस्तु । यो स्मान् द्वेष्टि यं व्यं द्विष्मस्तं बो जम्मै दध्मः ।। ४ ।। ध्रुवादिग्विष्णरधिपतिः .

.. . १२ पंञ्चमहायज्ञविधिः ॥ कल्माग्रीवो रक्षिता बीरुध इषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितभ्यो नम इपुभ्यो नम एम्यो अस्तु । यो समान द्वेष्टि यं व्यं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ॥ ५ ॥ ऊर्धा दिग् 'बृहस्पतिराधिपतिः चित्रोरनिता वर्पमिषवः । तेभ्यो नमोऽ- 'धिपतिभ्यो नमो रक्षितभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तुं । यो स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्मै दध्मः ॥६॥ अथर्व० का ३ । अ० ६ । ५० २७ । मं० १।२। ३.१४।५।६॥ : ॥भाष्यम् ॥ (प्राची दि०) सर्वातु दिनु व्यापकमीश्वरं संध्यायामग्न्या- दिभिर्नामभिः प्रार्थयेत् । यत्र स्वस्य मुखं सा प्राची दिक् । तथा यस्यां सूर्य उदेति सापि प्रांची दिगस्ति । तस्या अधिपतिरंग्निर- र्थात् ज्ञानस्वरूपः परमेश्वरः (असितः) वन्धनरहितोऽस्माकं 'सदा रक्षिता भवतु । यस्यादित्याः प्राणाः किरणाश्चेपवस्तैः सर्व जगद्रक्षति तेभ्य इन्द्रियाधिपतिभ्यश्शरीररक्षितृभ्य इपुरूपेभ्यः प्राणेभ्यो वारंवारं नमोस्तु । कस्मै प्रयोजनाय यः कश्चिदस्मान वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तं वः तेषां प्राणानां जम्भे अर्थद्वशे दध्मः । पतस्सोनान्निवर्त्य स्वमित्रो भवेत् वयं च तस्य मित्राणि भवेम ॥१॥ (दक्षिणा) दक्षिणस्या दिश इन्द्रः परमैश्वर्ययुक्तः "परमेश्वरोधिपतिरस्ति स एव कृपयास्मान् रक्षिता भवतु । अने पूर्ववदन्वयः कर्त्तव्यः ॥ २॥ तथा (प्रतीची दिग्०) अस्या वरुणः सर्वोत्तमोधिपति परमेश्वरोस्माकं रक्षिता भवेदितिं पूर्ववत् ॥३॥ उदीची०) सोमः सर्वजगदुत्पादकोधिपतिरीश्वरोऽस्माकं रक्षिता सन्ध्योपासनम् ॥ स्यादिति ॥ ४॥ (धुवादिङ०) श्रादघोदिक अस्या- यापक ईश्वरोधिपतिः सोस्यामस्मान रक्षेत्० अन्यत्पूर्ववत् ॥५us (ऊर्ध्वादिक्०) अस्या बृहस्पतिरोबृहत्या वाचो बृहतो वेदशाः अस्य वृहतामांकांशांदीनां च पतिवृहस्पतियः सर्वजगतोधिए- ति स सर्वतोमान रनेल । अंग्रे पूर्ववद्योजनीयम् ॥ सर्वे मनुः प्याः सर्वशक्तिमन्तं सर्वगुरु न्यायकारिणं दयालु-पितृवत्पालक, सर्वासु दिनु सर्वत्र रक्षक परमेश्वरमेव मन्येन्नित्यमिमायः ॥ । मापाः ।। (प्राचीदिगग्निराधिपतिः ) जो प्राची दिक् अर्थात् जिंस और अपना हो उस भोर भग्नि जो ज्ञानस्वरूप अधिपतिःजो सब जगत् का स्वामी) (भसितः ) बन्धनरहिव ( रविता ).सब प्रकार से रक्षा करने, वाला.. (मादित्या इपवः ) जिस के वाण भादित्य की किरण हैं। उन सब गुणों के अधिपति ईश्वर के गुणों को हम लोग बारम्बार नमस्कार करते हैं। रक्षितभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु ) लो ईश्वर के गुण और ईश्वर' के रचे पदार्थ जगत् की रक्षा करने वाले हैं और पापियों को वाणों के समान पीढ़ा देने वाले हैं इनको हमारा नमस्कार हो इसलिये कि जो प्राणी मज्ञान से हमारा द्वेष करता है और जिस प्रज्ञान,से..धार्मिक. पुरुष का तया पापी पुरुष का हम लोग द्वेष करते हैं। इन, सबकी बुराई को. उन; वापरूप किरण मुखरूप के बीच में दग्ध कर देते हैं कि जिससे किसी से इम लोग वर न करें और कोई भी प्राणी हम से देर न करे, किन्तु हम सब लोग परस्पर मित्रभाव से बचें ॥१॥ (दक्षिणादिगिन्द्रोधिपतिः) को हमारे दाहिनी ओर-दपिय दिशा है उसका अधिपति-इन्द्र अर्थात् को पूर्ण ऐश्वर्य वाला है। (तिरश्चिाजीरक्षिता ) जो पदार्थ कीट पतंग, वृश्चिक -प्रावि तिर्यक् कहाते हैं उनकी राजी जो पति है उनसे रक्षा करने भाषा एक परमेश्वर है। (पितर इषवः ) जिसकी, सृष्टि में ज्ञानी लोग १४ पञ्चमहायशाविधिः॥ पाण के समान हैं (तेभ्यो नमो०) आगे का अर्थ पूर्व के समान जान लेना ॥२॥ (प्रतीचीदिग् वरुणोधिपतिः) जो पश्चिम दिशा अर्थात् अपने पृष्ट आग में है उसमें वरुण जो सब से उत्तम सव का राजा परमेश्वर है (पृदाकूरक्षितान्नमिपवः ) जो बढ़े बड़े अजगर सादि विपधारी प्राणियों से रक्षा करने वाला है जिसके अन्न अर्थात् पृथिव्यादि पदार्थ वाणों के समान हैं श्रेष्ठों की रक्षा और दुष्टों की तादना के निमित्त हैं (तभ्यो नमो०) इसका अर्थ पूर्व मन्त्र के समान जान लेना ॥ ३ ॥ ( उदीचीदिक सोमो- धिपतिः ) जो अपनी बाई और उत्तर दिशा है उसमें सोम नाम से अर्थात् शान्त्यादि गुणों से भानन्द करने वाले जगदीश्वर का ध्यान करना चाहिये (स्वजोरक्षिता शनिरिपवः ) जो अच्छी प्रकार अजन्मा और रक्षा करने वाला है जिसके वाण विद्युत् हैं ( तेभ्यो नमो०) आगे पूर्ववत् जान लेना ॥३॥ (ध्रुवादिग्विष्णुरधिपतिः) ध्रुवदिशा अर्थात् जो अपने नीचे की ओर है उसमें विष्णु अर्थात् व्यापक नाम से परमात्मा का ध्यान करना ( कल्मा- पग्रीवो रक्षिता वीरुध इपवः ) जिसके हरित रंगवाले वृक्षादि ग्रीवा के स- मान हैं जिसके वाण के समान सब वृक्ष हैं उनसे अधोदिशा में हमारी रक्षा करे (तेभ्यो नमो०) श्रागे पूर्ववत् जान लेना ॥५॥ ( उ.दिग्वृहस्प- तिरधिपतिः ) जो अपने ऊपर दिशा है उसमें बृहस्पति जो कि वाणी का स्वामी परमेश्वर है उसको अपना रक्षक जानें जिस के बाण के समान चो के विन्दु हैं उनसे हमारी रक्षा करे (तेभ्यो०) आगे पूर्ववत् जान लेना ॥६॥ इति मनसा परिक्रमामन्त्राः॥ ॥ अथोपस्थानमन्त्राः ॥ ओं उद्वयन्तमसस्परिस्वः पश्यन्त उत्तरम् । देवं देवत्रा सूर्य्यमगन्मज्योतिरुत्तमम् ॥ १॥ य० अ० ३५ । मं० १४ ॥ ॥ भाष्यम् ॥ हे परमात्मन् ! (सूर्य) चराचरात्मानं त्वां (पश्यन्तः) प्रे- सन्ध्योपासनम् ॥ क्षमाणास्सन्तो वयम् (उदगन्म) अर्थात् उत्कृष्टश्रद्धावन्तो भूत्वा वयं भवन्तं प्राप्नुयाम कथंभूतं त्वां (ज्योतिः ) स्वप्रकाशं ( उत्त- मम् ) सर्वोत्कृष्टम् ( देवत्रा) सर्वेषु दिव्यगुणवत्तु पदार्थषु ह्य- नन्तादिव्यगुणैर्युक्तं ( देवं ) धर्मात्मनां मुमुचूणां युक्तानां च सर्वानन्दस्य दातारं मोदयितारं च (उत्तरं ) जगत्पलयानन्तरं नित्यस्वरूपत्वाद्विराजमानम् (स्वः ) सर्यानन्दस्वरूपं (तमस- स्परि) अशानान्धकारात्पृथग्भूतं भवन्तं प्राप्तुं वयं नित्यं प्रार्थ- यामहे । भवान् स्वकृपया सद्यः प्राप्नोतु न इति ॥१॥ ॥ भापार्थ ॥ अब उपस्थान के मन्त्रों का अर्थ करते हैं जिनसे परमेश्वर की स्तुति और प्रार्थना की जाती है, हे परमेश्वर ! (तमसस्परिस्वः ) सव अन्धकार से अलग प्रकाशस्वरूप ( उत्तरं) प्रलय के पछि सदा वर्तमान ( देवं देवना) देवों में भी देव अर्थात् प्रकाश करनेवालों में प्रकाशक (सूर्य) चराचर के शात्मा (ज्योतिरुत्तमं) जो ज्ञानस्वरूप और सब से उत्तम श्राप को जान के (वयमुद्गन्म ) हम लोग सत्य से प्राप्त हुए हैं. हमारी रक्षा करनी श्रापके हाथ है क्योंकि हम लोग श्राप के शरण हैं ॥ १ ॥ उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विधाय सूर्यम् ॥ २ ॥ यजु० अ० ३३ । मं० ३१ ।। माण्यम् ॥ (केतवः) किरणा विविधजंगतः पृथक् पृथग्नचनादिनिया- मका ज्ञापकाः प्रकाशका ईश्वरस्य गुणाः (दृशे विश्वाय') विश्वं द्रष्टुं (त्यं) तं पूर्वोक्तं (देवं ) (सूर्य) चराचरात्मानं परमेश्वर (उद्वहन्ति ) उत्कृष्टतया प्रापयन्ति क्षापयन्ति प्रकाशयन्ति वै। (उ) इति वितर्के नैव पृथक पृथग विविधनियमान् दृष्टा ................. - १ . पञ्चमहायज्ञविधिः ॥ मास्तिका अपीश्वरं त्यतुं समर्था भवन्तीत्यभिप्रायः । कथंभूतं देवं (जातवेदसं) जाता ऋग्वेदादयश्चत्वारों वेदाः सर्वज्ञानप्रदाः यस्मात्तथा जातानि प्रकृत्यादीनि भूतान्यसंख्यातानि विन्दति । यद्वा जातं सकलं जगद्वोत्ति जानाति, यः स जातवेदास्त जातवेदसं सर्वे मनुष्यास्तमेवैकं प्राप्तुमुपासितुमिच्छन्त्वित्य. भिप्रायः ॥२॥ || भापार्थ ॥ (उदुत्यं जातवेदसं०) जिससे ऋग्वेदादि चार वेद प्रसिद्ध हुए है और जो प्रकृयादि सब भूतों में व्याप्त हो, रहा है । जो सय जगत् का उत्पादक है सो परमेश्वर जातवेदा नाम से प्रसिद्ध है (देवं ) जो सब 'देवों का देव और (सूयें ) सब जावादि जगत् का प्रकाशक है (त्यं) 'उस परमात्मा को (हरो विश्वाय० ) विश्वविद्या की प्राप्ति के लिये हम लागे उपासना करते हैं ( उद्वहन्ति केतवः ) जिस को केतवः अर्थात् वेद शी, श्रुति और जगत् के पृथक् रचनादि नियामक गुण उसी परमेश्वर को 'जानते और प्राप्त करते हैं उस विश्व के श्रात्मा अन्तर्यामी परमेश्वर ही की हम उपासना सदा करें अन्य किसी की नहीं ॥२॥ * चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्नः। आमाद्यावापृथिवी अन्तरित सूर्य आत्मा जगतस्तस्युपश्च स्वाहा ॥ ३॥ १०७। मं० ४२ ॥ ॥भाष्यम् ॥ चित्र०.) स एव देवः ( सूर्य:') ( जगतः.) जङ्गमस्य (तस्थुषः.).स्थावरस्य च (आत्मा) अंतति नैरंतर्येण सर्वत्र प्यामातीत्यात्मा तथा (आप्रा० ) द्यौः पृथिवी अन्तरिक्षं चैत हादिसर्वं जगद्रचयित्वा आसमन्ताद्धारयन्सन् रक्षति । (चनुः) . -- सन्ध्योपासनम् ॥ एष एवैतेषां प्रकाशकत्वाद्वाह्याभ्यन्तरयोश्चक्षुःप्रकाशको विज्ञा- नमयो विज्ञापकश्चास्ति । अतएव (मित्रस्य ) सर्वेषु द्रोहरहि- तस्य मनुष्यस्य सूर्यलोकस्य प्राणस्य वा (वरुणस्य) वरेषु थेप्ठेषु कर्मसु गुणेषु वर्तमानस्य च (अग्नेः) शिल्पविद्याहेतो रूपगुणदाहप्रकाशकस्य विद्युतो भ्राजमानस्यापि चतुः सर्वसत्यो- पदेष्टा प्रकाशकश्च (देवानाम् ) स दिव्यगुणवतां विदुषामेव हृदये (उद्गात् ) उत्कृष्टतया प्राप्तोस्ति प्रकाशको वा तदेव ब्रह्म (चित्रं ) अद्भुतस्वरूपम् ॥ अत्र प्रमाणम् आश्चर्यो वक्ता कुश. लोऽस्य लब्धाऽश्चयी ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ कठोरनि० घल्ली २ । आश्चर्यस्वरूपत्वाद्ब्रह्मणस्तदेव ब्रह्म सर्वेषां चास्माकं ( अनीकं ) सर्वदुःखनाशार्थ कामक्रोधादिशत्रुविनाशार्थं वल- मस्ति तद्विहाय मनुष्याणां सर्वसुखकरं शरणमन्यन्नास्त्येवेति वेद्यम् । (स्वाहा) अथान स्वाहाशब्दार्थ प्रमाणं निरुक्तकारा आहुः । स्वाहा कृतयः स्वाहेत्येतत्सु आहेति वा स्वा वागाहेति स्वं प्राहेति वा स्वाहृतं हविर्जुहोतीति चा तासामेवा भवति । निरु० अ०८। खं० २० । स्वाहाशब्दस्यायमर्थः (सु आहति वा) (सु) सुष्टु कोमलं मधुरं कल्याणकरं प्रियं वचन समनुष्यैः सदा वक्तव्यम् (स्वावागाहेति वा ) या स्वकीया वाग् ज्ञानमध्ये वर्तते सा यदाह तदेव वागिन्द्रियेण सर्वदा वाच्यम् । (स्वं माहेति वा) स्वं स्वकीयपदार्थ प्रत्येव स्वत्वं वाच्यम् । न पर- पदार्थ प्रति चेति (स्वाहुतं ह०) सुष्टुरीत्या संस्कृत्य संस्कृत्य हविः सदा होतव्यमिति स्वाहाशब्दपर्यायार्थाः स्वमेव पदार्थ प्रत्याह वयं सर्वदा सत्यं वदाम इति न कदाचित्परपदार्थ प्रति मिथ्या वदेमेति ॥३॥ ॥ भाषार्थ ॥ (चित्रं देवाना० ) (सूर्य श्रात्मा ) प्राणी और जड़ जगत् का जो २ पञ्चमहायज्ञविधिः॥ धारमा है उसको सूर्य कहते हैं (आपाया. ) जो सूर्य और अन्य सब लोकों को बनाके धारण और रक्षण करने वाला है (चक्षुर्मिनस्य०) जो मित्र अर्थात् राग द्वेप रहित मनुष्य तथा सूर्यलोक और प्राण का चक्षु प्रकाश करने वाला है (वरुणस्या० । सव उत्तम कामों में जो वर्तमान मनुष्य प्राण अपान और अग्नि का प्रकाश करने वाला है (चित्रं देवाना०) जो अद्भुतस्वरूप विद्वानों के हृदय में सदा प्रकाशित रहता है (अनीक) जो सकल मनुस्यों के सब दुःख नाश करने के लिये परम उत्तम यल है वह परमेश्वर (उद्गात् ) हमारे हृदयों में यथावत् प्रकाशित रहे ।। ३॥ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरन् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत शृणुयाम शरदः शतं प्र वाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ॥४॥ य० अ० ३६ । मं० २४ ॥ ॥ भाष्यम् ॥ (तञ्चतुः ) यत्सर्वदृक् (देवहितं) देवभ्या हितं दिव्यगुण- वत धर्मात्मनां विदुपां स्वसेवकानां च हितकारि वर्तते यत् (पुरस्तात् ) पूर्वसृष्टेः प्राक् (शुक्र) सर्वजगत्वात शुद्धमासी- दिदानीमपि तादृशमेव चास्ति । तदेव ( उच्चरत्) अर्थात् उत्क- ष्टतया सर्वत्र व्या विज्ञानस्वरूपं ( उद् ) प्रलयादूर्वं सर्व- सामर्थ्य स्थास्यति (तत् ) ब्रह्म (पश्येम शरदः शतं ) वयं शतं वर्षाणि तस्यैव प्रेक्षणं कुर्महे । तत्कृपया (जीवेग शरदः शतं) शतं वर्षाणि प्राणान् धारयेमहि (शृणुयाम शरदः शतं) तस्य गुणेपु श्रद्धाविश्वासवन्तो वयं तमेव शृणुयाम तथा च तद् ब्रह्म तद्गुणांश्च (प्रव्रवाम ० ) अन्येभ्यो मनुष्यभ्यो नित्यमुपदिशे- म ( अदीनाः स्याम श०) एवं च तदुपासनेन तद्विश्वासन त.

लन्ध्योपासनम् ॥ १६ कृपया च शतवर्षपर्यन्तमदीनाः स्याम भवेम मा कदाचित्कस्या- पि समीपे दीनता कर्तव्या भवनो दारिदयं च सर्वदा सर्वथा - मकृपया स्वतंत्रा वयं भवेम तथा (भूयश्च श०) वयं तस्यैवा- नुग्रहेण भूयः शताच्छरदः शताद्वर्षेभ्योप्यधिकं पश्येम, जीवेम, शृणुयाम, प्रव्रवाम, अदीनाः स्याम, चेत्यन्वयः । अथान्नैव मनु- प्यास्तमतिकृपालुं परमेश्वरं त्यक्त्वान्यमुपासीरन् याचेरनित्य- भिप्रायः ॥ योन्यां देवतामुपास्ते पशुरेव स देवानाम् । श० का० १४ । अ०४। सर्वे मनुष्याः परमेश्वरमेवोपासीरन् यस्त- स्मादन्यस्योपासनां करोति स इन्द्रियारामो गईभवत्सर्वैश्शिष्टै- विज्ञेय इति निश्चयः ॥ ४ ॥ कृतांजलिरत्यन्तश्रद्धालुभूत्वैतैर्मन् स्तुवन् सर्वकालसिध्यर्थं परमेश्वरं प्रार्थयेत् ॥ ४ ॥ ॥ भाषार्थ ॥ (तचतुर्दैवहितं० ) जो ब्रह्म सब का द्रष्टा . धार्मिक विद्वानों का परम हितकारक तथा ( पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् ) सृष्टि के पूर्व, पश्चात् और मध्य में सत्य स्वरूप से वर्तमान रहता और सब जगत् का करने वाला है ( पश्यम शरदः शतम् ) उसी ब्रह्म को हम लोग सौ वर्ष पर्यन्त देखें (जीवम शरदः शतम् ) जीवे (शृणुयाम शरदः शतम् ) सुने (प्रबवाम श०) उसी ब्रह्म का उपदेश करें (अदीनाः स्याम०) और उस की कृपा से किसी के श्राधीन न रहें (भूयश्च शरदः शतात्) उसी परमेश्वर की आज्ञा पालन और कृपा से सौ वर्षों से उपरान्त भी हम लोग देखें, जीवें, सुनें, सुनाव और स्वतन्त्र रहे अर्थात् पाराग्य शरीर, दृढ़ इन्द्रिय, शुद्धमन और श्रानन्द सहित हमारा थात्मा सदा रहे । यही एक परमेश्वर सब मनुष्यों का उपास्यदेव है जो मनुष्य इसको छोड़ के दूसरे की उपासना करता है वह पशु के समान होके सब दिन दुःख भोगता रहता है इसलिये प्रेम में अत्यन्त मग्न होके अपने प्रात्मा और मन को परमेश्वर में जोड़ के इन .

२० पञ्चमहायज्ञविधिः॥ मन्त्रों से स्तुति और प्रार्थना सदा करते रहें ॥ ४ ॥ ॥अथ गुरुमन्त्रः ॥ ओ३म् । यजु० अ० ४० । मं० १७ । भूर्भुवः स्वः । तत्सवितुरेण्यम्भर्गो देवस्य धीमहि ॥ धियो यो नः प्रचो- दयात् ॥ य० अ० ३६ । मं० ३॥ ऋ० मंड० ३ । सू० ६२ । मं० १० । एवं चतुर्पु वेदेषु समानो मन्त्रः॥१॥ ॥ भाप्यम् ॥ अस्य सवोत्कृष्टस्य गायत्रीमन्नस्य संक्षेपेणार्थ उच्यते श्र उम् एतत्वयं मिलित्वा ओम् इत्यक्षरं भवति ॥ यथाह मनुः अकारं चाप्युकारं च, मकारं च प्रजापतिः । वेदत्रयानिरह- भुव: स्वरितीति च ॥ म० अ०२॥ एतञ्च सर्वोत्तमं प्रसिद्धतमं परब्रह्मणो नामास्ति । एतेनैकनेव नाम्ना परमेश्वरस्यानेकानि ना- मान्यागच्छन्तीति वेद्यम् । तद्यथा-श्रकारेण विराडग्निविश्वादी- नि । (विराट् ) विविध चराचरं जगद्राजयते प्रकाशयते स वि- राट् सर्वात्मेश्वरः । (अग्निः) अच्यते प्राप्यते सत्क्रियते वा घेदादिभिः शास्त्रविद्वद्भिश्चेत्यग्निः परमेश्वरः । (विश्वः ) वि- धानि सर्वाण्याकाशादीनि भूतानि यस्मिन्स विश्वः । यद्वा विष्टो- स्ति प्रकृत्यादिपु यः सं विश्वः एतदाद्यर्था अकारेण विशेयाः । उकारेण हिरण्यगर्भवायुतैजसादीनि । तद्यथा-(हिरण्यगर्भः) हिरण्यानि सूर्यादीनि तेजांसि गर्भ यस्य तथा सूर्यादीनां तेज-' सां यो गर्भोधिष्ठानं स हिरण्यगर्भः । अत्र प्रमाणम् । ज्योति हिरण्यं ज्योतिरेपोऽमृत, हिरण्यम् । श० का०६।०७।यशो पे हिरण्यम् । ऐ० पं० ७ । अ०३ । (वायुः ) यो वाति जानाति धारयत्यनन्तवलत्वात्सर्वं जगत्स घायुः सचेश्वर एव भवितुम- - . सन्ध्योपासनम् ॥ हति नान्यः । (तद्वायुरिति) मन्त्रवर्णार्थाब्रह्मणो वायुसंज्ञास्ति (तैजसः) सूर्य्यादीनां प्रकाशकत्वात्स्वयं प्रकाशत्वाचैजस ईश्व- । एतदाद्यर्था उकाराद्विज्ञातव्याः । मकारेणेश्वरादित्वप्राज्ञादी- नि नामानि वोध्यानि । तद्यथा-(ईश्वरः) ईऐऽसौ सर्वशक्ति मान्न्यायकारीश्वरः । (आदित्यः ) अविनाशित्वादादित्यः परमा- त्मा। (प्राज्ञः) प्रजानाति सकलं जगदिति प्रज्ञा प्रशएवं प्राक्षश्च परमात्मैवेति । एतदाद्यर्थी मकारेण निश्चेतव्या ध्येयाश्चेति ॥ ॥ अथ महाव्याहृत्यर्थाः संक्षेपतः ॥ भूरिति वै प्राणः । भुवरित्यपानः । स्वरिति व्यानः । इति - त्तिरीयोपनिषद्वचनम् । प्रपा० ७।अनु०६।(भूः) प्राण्यतिजी वयति सर्वान् प्राणिनः स प्राणः प्राणादपि प्रियस्वरूपोवासचेश्वर एवायमों भूशब्दस्य शेयः (भुवः) यो मुमुक्षूणां मुक्तानां स्व सेवकानां धर्मात्मनां सर्व दुःखमपानयति दूरीकरोति सोपानो दयालुरीश्वरोऽस्त्ययं भुवः शब्दार्थोऽस्तीति बोध्यम् (स्वः) य- दभिव्याप्य व्यावयति चेष्टयति प्राणादि सकलं जगत्स व्यानः सर्वाधिष्ठानं वृहदब्रह्मति खल्वयं स्वःशब्दार्थोस्तीति मन्तव्यम् । पतदाद्यर्था महाव्याहतीला ज्ञातव्याः ॥ (सविता) सुनोति सूयते सुवति वोत्पादयति सूजति सकलं जगत्स सर्वपिता सर्वेश्वर सविता परमात्मा, सवितुः प्रसव इति मन्त्रपदार्थादुत्पत्तेः कर्ता योऽर्थोस्ति स सवितेत्युच्यत इति मन्तव्यम् ॥ (वरेण्यं ) यद्वरं वर्तुमर्हमतिश्रेष्ठं तद्वरेण्यम् (भर्गः) यनिरुपद्रवं निष्पाप निर्गुण शुजं सकलदोपरहितं पक्वं परमार्थविज्ञानस्वरूपं तद्भर्गः। (दे- वस्य ) दीव्यति यः प्रकाशयति खल्वानन्दयति सर्व विश्व स देवः । तस्य ( देवस्य) (धीमहि ) तमेव परमात्मानं वयं नित्य- मुपासीमहि । कस्मै प्रयोजनाय तस्य धारणेन विज्ञानादिबलेनैव पञ्चमहायविधिः ॥ वयं पुष्टां दृढ़ा सुखिनश्च भवेमेत्यस्मै प्रयोजनाय तथाच (थियो) धारणवत्यो वुद्धयः (यः) परमेश्वरः (नः) अस्माकं (प्रचोद यात्)प्रेरयेत्।हे सच्चिदानन्दानन्तस्वरूप, हे नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्व. भाव, हे अज, हे निराकार, सर्वशक्तिमन् , न्यायकारिन्, है क- रुणामृतवारिधे ! (सवितुर्देवस्य) तव यद्वरेण्यं भर्गस्तद्वयं धीमहि कस्मै प्रयोजनाय (यः) सविता देवः परमेश्वरः स नोज- स्माकं धियो बुद्धीः प्रचोदयात्। यो हि सम्यग्ध्यातः प्रार्थितः सर्वे- टदेवः परमेश्वरः स्वकृपाकटाक्षेण स्वशक्तया च ब्रह्मचर्यविद्यावि- धानसद्धर्मजितेन्द्रियत्वपरब्रह्मानन्दप्राप्तिमतीरस्माकंधियः कुर्य्या- दस्मै प्रयोजनाय । तत्परमात्मखरूपं वयं धीमहीति संक्षेपतो गायत्र्यों विज्ञेयः । एवं प्रातः सायं द्वयोः सन्ध्योरेकान्तदेशं गत्वा शान्तो भूत्वा यतात्मा सन् परमेश्वरं प्रतिदिनं ध्यायेत् ।। ॥ भाषार्थ ॥ ॥अथगुरुमन्त्रः ॥ (भोम् भूर्भुवः स्वः ) जो अकार उकार और मकार के योग से (मोम्) यह भवर सिद्ध है सो यह परमेश्वर के सब नामों में उत्तम नाम है जिसमें अब नामों के अर्थ आ जाते हैं जैसा पिता पुत्र का प्रेम सम्बन्ध है वैसे ही मोकार के साथ परमात्मा का सम्बन्ध है, इस एक नाम से ईश्वर के सब नामों का बोध होता है जैसे प्रकार से (विराट् ) जो विविध जगत् का काश करनेवाला है। (अग्निः ) जो ज्ञानस्वरूप और सर्वत्र प्राप्त हो रहा है। (विश्वः) जिसमें सब जगत् प्रवेश कर रहा है और जो सर्वत्र प्रविष्ट है । इत्यादि नामार्थ प्रकार से जानना चाहिये । उकार से (हिर- गर्भः) जिसके गर्भ में प्रकाश करनेवाले सूर्यादि लोक हैं और जो काय करनेहारे सूर्यादि लोकों का उत्पन्न करनेवाला है। इससे ईश्वर को हिरण्यगर्भ कहते हैं, ज्योति के नाम हिरण्य अमृत और कति हैं।

५ . में -- 7 सन्ध्योपासनम् ॥ २३ (पायुः ) जो अनन्त बलवाला और सय जगत् का धारण करनेहारा है (तेजसः) जो प्रकाशस्वल्प और सय जगत् का प्रकाशक है इत्यादि अर्थ कारमात्र से जानना चाहिये । तथा मकार से ( ईश्वरः ) जो सव जगत् म उत्पादक सर्वशक्तिमान् स्वामी और न्यायफारी है (आदित्यः ) जो माशरहित है (प्राज्ञः ) जो ज्ञानस्वरूप और सर्वज्ञ है इत्यादि अर्थ मकार से समझ लेना, यह संप से प्रकार का अर्थ किया गया। अब संक्षेप से महान्याहतियों का अर्थ लिखते हैं-(भूरिति वै प्राणः ) जो सब जगत् * जीने का हेतु और प्राण से भी प्रिय है। इससे परमेश्वर का नाम (ः) (भुपरित्यपानः ) जो मुक्षि की इच्छा करनेवालों मुक्तों और अपने सेवक धारमानों को सब दुःखों से अलग करके सर्वदा रखता है इसलिये परमेश्वर का नाम (भुवः) है। (स्वरिति व्यानः ) जो सब जगन् में व्यापक होके सब को नियम में रखता और सब का ठहरने का स्थान तथा सुखस्वरूप है इससे परमेश्वर का नाम (स्वः) है, यह व्या- इतियों का संप से अर्थ लिख दिया ॥ अव गायत्री मन्त्र का अर्थ दिखते हैं-(सवितुः ) जो सब जगत् का उत्पन्न करनेहारा और ऐश्वर्य म देनेवाला है, ( देवत्य) जो सब के श्रारमाओं का प्रकाश करनेवाला और सब सुखों का दाता है, ( वरेण्यं ) जो अत्यन्त ग्रहण करने के योग्य है, (मगर्गः ) जो शुद्ध विज्ञानस्वरूप है ( तत् ) उसको (धीमहि ) हम डोग सदा प्रेमभकिसे निश्चय करके अपने श्रात्मा में धारण करें, किस प्रयोजन के लिये कि (यः ) जो पूर्वोक्क सविता देव परमेश्वर है वह (नः) हमारी ( धियः ) बुद्धियों को ( प्रचोदयात् ) कृपा करके सब बुरे कामों से अलग करके सदा उत्तम कामों में प्रवृत्त करे इसलिये सब लोगों को पाहिये कि सत् चित् आनन्दस्वरूप, नित्यज्ञानी, नित्यमुक्त, अजन्मा, निराकार, सर्वशक्रिमान्, न्यायकारी, व्यापक, कृपालु सव जगत् के जनक और धारण करनेहारे परमेश्वर ही की सदा उपासना करें कि जिससे .

पञ्चमहायज्ञविधिः ॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जो मनुष्यदेहरूप वृक्ष के चार फल हैं वे उसकी भक्ति और कृपा से सर्वथा सब मनुष्यों को प्राप्त हो। यह गायत्री मन्त्र का अर्थ संक्षेप से होचुका ॥ अथ समर्पणम् ॥ हे ईश्वर दयानिधे ! भवत्कृपयाऽनेन जपोपासनादिकर्मणा धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यःसिद्धिर्भवेन्नः। तत ईश्वरं नमस्कुर्यात्॥ नमः शम्भवाय च भयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥१॥ य० अ० १६ । मं० ४१॥ ॥ भाष्यम् ॥ (नमः शम्भवाय च ) यः सुखस्वरूपः परमेश्वरोस्ति तं वयं नमस्कुर्महे । (मयोभवाय च ) यः संसारे सर्वोत्तमसौख्यप्रदा- तास्ति तं वयं नमस्कुर्महे । ( नमः शङ्कराय च ) यः कल्याणका- रफा सन् धर्मयुक्तानि कार्य्याएयेव करोति तं वयं नमस्कुर्महे । ( मयस्कराय च ) यः स्वभक्तान सुखकारकत्वाद्धर्मकार्येयु युन- क्ति तं वयं नमस्कुर्महे । ( नमः शिवाय च शिवतराय च ) यो- त्यन्तमङ्गलस्वरूपः सन् धार्मिकमनुष्येभ्यो सोतसुखप्रदातास्ति तस्मै परमेश्वरायास्माकमनेकधा नमोऽस्तु ॥ ॥ भाषार्थ ॥ इस प्रकार से सव मन्त्रों के अर्थो से परमेश्वर की सम्यक् उपासना करके भागे समर्पण करे कि हे ईश्वर दयानिधे ! आपकी कृपा से जो २ उत्तम काम हम लोग करते हैं वे सब आपके अर्पण हैं जिससे हम योग आपको प्राप्त होके धर्म जो सत्य न्याय का आचरण करना है, अर्थ जो धर्म से पदार्थों की प्राप्ति करना है, काम जो धर्म और अर्थ से इष्ट भोगों २५ सन्ध्योपासनम् ॥ का सेवन करना है और मोक्ष जो सब दुःखों से छूटकर सदा आनन्द में रहना है । इन चार पदार्थों की सिद्धि हमको शीघ्र प्राप्त हो ॥ इति समर्पणम् ॥ इसके पीछे ईश्वर को नमस्कार करे (नमः शंभवाय च) जो सुखस्वरूप, ( मयोभवाय च ) संसार के उत्तम सुखों का देने वाला, (नमः शंकराय च ) कल्याण का कर्ता, मोक्षस्वरूप, धर्मयुक्त कामों को ही करने वाला, ( मयस्कराय च ) अपने भक्तों को सुख का देनेवाला और धर्म कामों में युक्त करने वाला, (नमः शिवाय च शिवतराय च) अत्यन्त मङ्गलस्वरूप और धार्मिक मनुष्यों को मोक्ष सुख देनेहारा है उसको हमारा वारंवार नमस्कार हो । इति सन्ध्योपासनविधिः ॥ अथाग्निहोत्रसन्ध्योपासनयोः प्रमाणानि ॥ सायंसायं गृहपति! अग्निः प्रातः प्रात:सौमनस्य दाता । वसौर्वसोर्वसुदान एधि वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम ॥१॥ शतः प्रांतर्गृहपतिनों अग्निः सायंसायं सौमनस्य दाता । चौविसोर्चसुदान एधीन्धानास्त्वा शतहिमा ऋधेम ॥ २ ॥ अथर्व० कां० १९ । अनु० ७ । मं० ३॥ ४ ॥ तस्माद्ब्राह्मणोऽहोरात्रस्य संयोगे सन्ध्यामुपास्ते । स ज्यो- तिष्या ज्योतिपो दर्शनात्सोऽस्याः कालः सासन्ध्या तत् सन्ध्या- याः सन्ध्यात्वम् । पड्विंश वा० प्रपा० ४ । ख० ५। उद्यन्तमस्तं यान्तमादित्यमभिध्यायन कुर्वन् ब्राह्मणो विद्वान् सकलं भद्रम- श्नुते ॥ तैत्तिरीय आ० २।प्रपा० २। अनु० २॥ न तिष्ठति तु यः पूर्वी नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् । स शगवदहिष्कार्यः सर्वस्मा- द्विजकर्मणः ॥ मनु० अ० २। श्लो० १०३ ॥ (सायंसायं) अयं नोस्माकं गृहपतिर्गृहात्मपालको भौतिकः परमेश्वरश्च ( प्रातः -- 1 . २६ पञ्चमहायशविधिः॥ प्रातः) तथा (सायंसायं ) च परिचरितस्सूपासितः सन् (सौ. मनस्य दाता) आरोग्यस्यानन्दस्य च दाता भवति तथा (क- सोर्व० ) उत्तमोत्तमपदार्थस्य च । अतएव परमेश्वरः । ( वसुः । दानः ) वसुप्रदातास्ति । हे परमेश्वर ! एवं भूतस्त्वमस्माकं रा- ज्यादिव्यवहारे हृदये च ( एधि) प्राप्तो भव तथा भौतिकोऽप्य- ग्निरत्र ग्राह्यः । ( वयं त्वे) हे परमेश्वर! एवं त्वा त्वामिन्धानाः । प्रकाशयितारस्सन्तो वयं (तन्वं ) शरीरं (पुपेम) पुटं कुर्य्याम- हि । तथाग्निहोत्रादिकर्मणा भौतिकमग्निमिन्धानाः प्रदीपयितारः सन्तः सर्वे वयं पुष्येम ॥ ३॥ (प्रातःप्रातर्गृहपति!) अस्थार्थः पूर्ववद्विज्ञेयः परन्त्वयं विशेष:-चयमग्निहोत्रमीश्वरोपासनं च कुर्वन्तः सन्तः (शतहिमाः) शतं हिमा हेमन्तर्तवो गच्छन्ति येषु संवत्सरेपु ते शतहिमा यावत्स्युस्तावत् (ऋधेम) वर्दैमहि । एवं कृतेन कर्मणा नोस्माकं नैव कदाचिद्धानिर्भवेदितीच्छामः ॥४॥ ॥ भाषार्थ ॥ (सायंसायं ) यह हमारा गृहपति अर्थात् घर और आत्मा का रक्षक भौतिक अग्नि और परमेश्वर प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल श्रेष्ठ उपासना को प्राप्त होके (सौमनस्य दाता) जैसे आरोग्य और श्रानन्द का देनेवाला है उसी प्रकार उत्तम से उत्तम वस्तु का देनेवाला है इसी से परमेश्वर ( वसुदानः ) वसु अर्थात् धन का देनेवाला प्रसिद्ध है। हे पर- मेश्वर ! इस प्रकार आप मेरे राज्य आदि व्यवहार और चित्त में प्रकाशित रहिये । तथा इस मन्त्र में अग्निहोत्र आदि करने के लिये भौतिक अग्नि भी ग्रहण करने योग्य है ( वयं त्वे. ) हे परमेश्वर । पूर्वोक्त प्रकार से हम भाप को प्रकाश करते हुए अपने शरीर को ( पुपेम) पुष्ट करें इसी प्रकार भौतिक अग्नि को प्रज्वलित करते हुए सव संसार की पुष्टि करके पुष्ट हों (प्रातःपातर्गृहपति/०) इस मन्त्र का अर्थ पूर्व मन्त्र के तुल्य जानो सन्ध्योपासनम् ॥ परत या विशेष है कि मनिलोत्र और ईश्वर की उपासना करते हुए म योग र शतहिमाः) साहेमन्त सानु बीत जायं जिन पपी में अर्थात् सौ व पर्यन्त ( ऋधेम) घनादि पदार्थों से वृद्धि को प्राप्त होते रहे और पूणे प्रकार से अग्निहोत्रादि कर्म परके हमारी हानि कभी न हो ऐसी खारते है ॥ २ ॥ (तस्माद्यालणा० ) महा का उपासक मनुष्य रात्रि भार दिवस के सन्धि समर में नित्य उपासना करे, जो प्रकाश और प्रकाश का मंयोग यही मन्या का काल जानना और उस समय में जो सन्योपासन को प्यान किया करनी होती है वही सन्ध्या है और एक इंपर को पार के मरे की उपासना न करनी तथा सन्ध्योपासन भी न बार देगा इसी को सन्ध्योपालन करते हैं ॥ ३ ॥ ( उपन्तमस्त पान्त० ) जय मूल के उदय और प्रत का समय आये उसमें नित्य कायस्वरूप भाभिव्य परमेश्वर की उपासना करता हुपा ब्रह्मोपासक ही मनुष्य संपूर्ण मुर को प्राप्त होता है। इससे भय मनुष्यों को उचित है किदा समय में परमेश्वर की नित्य उपासना किया करें ॥ ४ ॥ इसमें मनुस्मृति की मी साशी है कि दो घदी रानि से लेके सूर्योदय पर्यन्त गनःसन्न्या भौर सूर्यास्त से लेकर तारों के दर्शन पर्यन्त सायंकाल में पविता भयांत सर जगत् की उत्पत्ति करने वाले परमेश्वर की उपासना गायत्यादि मन्दों के अर्थ विचारपूर्वक नित्य करें ॥५॥ (न तिष्ठति तु०) जो मनुष्य नित्य प्रातः और सायं सन्योपासन को नहीं करता उसको समान समझ कर द्विजकुल से अलग करके शूदकुल में रखदेना चाहिये । वह सेवाकर्म किया करे और उस के विद्या का चिह्न यज्ञोपवीत मी न रहना चाहिये, इससे सब मनुष्यों को उचित है कि सब कामों इस काम को मुख्य जानकर पूर्वोक्त दो समयों में जगदीश्वर की उपा- बना निस्य करते रहे। इत्यग्निहोत्रसम्योपासनप्रमाणानि ।। इति प्रथमो प्रायज्ञः समासः ।। 1 PUR । पञ्चमहायज्ञविधिः ॥ अथ द्वितीयोऽग्निहोत्रो देवयंशः प्रोच्यते ॥ उसका आचरण इस प्रकार से करना चाहिये कि सन्योपासन करने के पश्चात् अग्निहोत्र का समय है । उसके लिये सोना, चांदी, तांबा, लोहा वा मिट्टी का कुण्ड बनवा लेना चाहिये जिसका परिमाण सोलह अंगुल चौड़ा, सोलह अंगुल गहिरा और उसका तला चार अंगुल का लंबा चौड़ा रहे । एक चमसा जिसकी डंडी सोलह अंगुल और उसके अग्रभाग में "अंगूठा की यवरेखा के प्रमाण से लम्या चौदा आचमनी के समान बनवा लेवे सो भी सोना चांदी वा पलाशादि लकड़ी का हो । एक श्राज्यस्थाली अर्थात् घृतादि सामग्री रखने का पान सोना चांदी वा पूर्वान लकड़ी का पनवा लेवे । एक जल का पात्र तथा एक चिमट और पलाशादि की लकड़ी समिधा के लिये रख लेवे । पुनः घृत को गर्मकर छान लेवे। और एक सेर घी में एक रत्ती कस्तूरी, एक मासा केसर पीस के मिलाकर उक्र पात्र के तुल्य दूसरे पात्र में रख छोड़े। जब अग्निहोत्र करे तब शुन्द स्थान में बैठ के पूर्वोक सामग्री पास रख लेवे । जल के पात्र में जल और घी के पात्र में एक छटांक वा अधिक जितना सामर्थ्य हो उतने शोधे धी को निकाल कर अग्नि में तपा के सामने रख लेवे । तथा चमसे को भी रख लेवे । पुनः उन्हीं पलाशादि वा चन्दनादि लकड़ियों को वेदी में रखकर उनमें प्रागी धरके पंखे से प्रदीत कर नीचे लिखे मन्त्रों में से एक २ मन्त्र से एक २ आहुति देता जाय, प्रातःकाल वा सायंकाल में। 'अथवा एक समय में करे तो सब मन्त्रों से सव आहुति किया करे ।। ॥ अथाग्निहोत्रहोमकरणार्थाः मन्त्राः ॥ सूर्यो ज्योतिज्योतिः सूर्यः स्वाहा ॥ सूर्योव) ज्यो- तिर्वर्चः स्वाहा ॥ ज्योतिः सूर्य सूर्योज्योतिः स्वाहा ॥ सुजू- ईवेन सवित्रा सजूलपसेन्द्रवत्या ।। जुपाणः सूर्योतु स्वाहा ।। ..

देवयविधि ॥ एते चत्वारो मन्त्राः प्रातःकालस्य सन्तीति योध्यम् ॥ अग्निर्कोतिर्योतिग्निः स्वाहा ॥ अग्निवर्णोज्योति- वर्चः स्वाहा ॥ अग्निज्योतिरिति मन्त्रं मनसोच्चार्य्य तृतीयाहुतिया ॥३॥ सवेने सवित्रा सजूराव्येन्द्रवत्या ।। जुपाणो अग्नि- तु स्वाहा ॥ य० अ० ३ । मं० १ । १० ॥ एते सायंकालस्य मन्त्राः सन्तीति वेदितव्यम् ॥ अयोभयोः कालयोरग्निहोत्र होमकरणार्थास्समाना मन्त्राः ओं भूरग्नये प्राणाय स्वाहा ॥ओं भुवयवेऽपानाय स्वाहा ॥ ओं स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा ॥ ओं भूर्भुवः स्वरग्निवावादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा || ओं आपो ज्योती रसोमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरों स्वाहा ॥ ओं सर्व नै पूर्ण स्वाहा ॥ ॥ भाप्यम् ॥ (मुख्या०) यश्चराचरान्माज्यातिषां प्रकाशकानामपिज्योति:- प्रकाशकः सर्वप्राणः परमपरास्ति तस्मै स्वाहार्थात् तदाज्ञा- पालनार्थ सर्वजगदुपकारायैकाहुति दगः ॥ १ ॥ (सूर्योव०) यो बर्चः सर्वविद्यो ज्योतिषां मानवतां जीवानामपि वच्चान्तर्यामि- नया सत्यापदेष्टा सर्वात्मा सूर्यः परमेश्वरोस्ति तस्मै० ॥२॥ (ज्योतिः सूर्य्य:०) यः स्वयंप्रकाशः सर्वजगत्प्रकाशकः सूर्यो अगदीश्वरोस्ति तस्मै० ॥ ३॥ (सजू० ) यो देवेन द्योतकेन सवित्रा सूर्यलोकेन जीवेन च सह तथा (इन्द्रवत्या) सूर्यप्रका- . -- ~ ~ महाया शवत्यापसाथवा जीववत्या मानसवृत्या (सजूः) सह वर्तमानः परमेश्वरोस्ति सः (जुपाणः ) संप्रीत्या वर्तमानः लन् (सूर्य:) सर्वात्मा कृपाकटानणास्मान वेतु विद्यादिसद्गुणेपुजातविज्ञाना- न करोतु तम्मै० ॥४॥ इमाश्चतस्र आहुतीः प्रातरग्निहोत्रे कुर्वन्तु । अथ सायंकालाहुतयः । (अग्नि० ) योऽग्निर्ज्ञानस्वरू- पो ज्ञानप्रदश्च ज्योतिषां ज्योतिः परमेश्वरोऽस्ति तस्मै० ॥१॥ (अग्निर्व) यः पूर्वोत्तोऽग्निरनन्तविद्य आत्मप्रकाशकः सर्व- पदार्थप्रकाशकश्च सूर्यादिद्योतकोऽस्ति तस्मै० ॥२॥ अग्निD- 'तिरित्यनेनैव तृतीयाहुतिया तदर्थश्च पूर्ववत् ॥ ३॥ (सजू०) यः पूर्वोक्लेन देवेन सवित्रा सह परमेश्वरः सजूरस्ति । यश्चन्द्र- वत्या वायुचन्द्रवत्या राज्या सह सजूर्वरीते सोग्निः (जुपाणः ) संप्रीतोस्मान् वेतु नित्यानन्दमोक्षसुखाय स्वकृपया कामयतु तस्मै जगदीश्वराय स्वाहेति पूर्ववत् ॥ ४ ॥ एताभिः सायंकाले ग्निहो- त्रिणो जुह्वति। एकस्मिन् काले सर्वाभिर्वा (सर्व वै०) हे जगदीश्वर! यदिदमस्माभिः परोपकारार्थ कर्म क्रियते भवत्कृपया परोपकारा- यालं भवत्विति । एतदर्थमेतत्कर्म तुभ्यं समर्प्यते॥ (ओं भूर०) एतानि सर्वाणीश्वरनामान्येव वेद्यानि । एतेषामर्था गायत्र्यर्थे द्र- एन्याः ॥ एवं प्रातः सायं सन्ध्योपासनकरणानन्तरमेतैर्मन्त्रैहोम कृत्वाऽने यावदिच्छा तावद्गायत्रीमंत्रण स्वाहान्तेन होमं कुर्या- त् ॥ अग्नये परमेश्वराय जलवायुशुद्धिकरणाय च होत्रं हवनं यस्मिन् कर्मणि क्रियते तदग्निहोत्रम् ॥ सुगन्धिपुष्टिमिटबुद्धिवृ- द्विशौर्यवैर्यबलकररोगनाशकरैर्गुणैर्युक्तानां द्रव्याणां होमकर- णेन वायुवृष्टिजलयोः शुद्धया पृथिवीस्थपदार्थानां सर्वेपां शुद्ध- वायुजलयोगादत्यन्तोत्तमतया सर्वेषां जीवानां परमसुखं भवत्ये- वातः । तत्कर्मकर्तृणां जनानां तदुपकारतयाऽत्यन्तसुखलाभो भ- ॥ देवयन्नविधिः ॥ बतीश्वरप्रसन्नता चेत्येतदाद्यर्थमग्निहोत्रकरणम् || || भाषार्थ ॥ (बायो०) जो घरायर का भात्या प्रकाशश्वरप और सूर्यादि प्रकाशक कोने का भी प्रकाशक है उसकी प्रसन्नता के लिये हम लोग होम करते हैं । (स्यांव० । जो सूर्य परमेश्वर हम को सय विद्याओं का देनेवाला और हम लोगों से उनका प्रचार करानेवाला है उसी के अनुग्रह से लोग पग्निहोत्र करते हैं । (ज्योतिः सूर्यः) जो आप प्रकाश- मान और जगत् सा मनाश करनेवाला सूर्य अर्थात् सब संसार का बर है उसको प्रमाना के भय हम लोग होम करते हैं। (सजूदेवेन०) को परमेश्वर सुन्यादि लोकों में व्यापक, वायु और दिन के साथ परिपूर्ण, सब परनि करने वाला और सब के शंग में व्याश है। वह अग्नि परमेश्वर TRA शिक्षित हो। उसके शर्थ हम हाम करते हैं। इन चार पासुनियों को प्रातःकाल अग्निहोत्र में करना चाहिये, (अग्निज्योति०) अग्नि मी परमेभर ज्योतिःस्वरूप है उसकी प्राज्ञा से हम परोपकार के निये हान करते है और उसका रचा हुआ जो यह भौतिकाग्नि है जिसमें इन्य मो इसलिये है कि उन दन्यों को परमाणु करके जल और पायु, अष्टि के साथ मिलाके उन को शुद्ध करदे जिससे सब संसार मुखी होके पुरुषार्थी हो । ( अग्निवंशी० ) अग्नि जो परमेश्वर वर्च अर्थात् सब विधात्रों का दनवाला तथा भौतिक अन्नि आरोग्य और बुद्धि बढ़ाने का देत है इसलिये हम लोग होम करके परमेश्वर की प्रार्थना करते हैं यह दूसरी पाहुति दुई। तीसरी पाहुति प्रथम मन्त्र से मौन करके करनी चाहिये पार चौधी ( सदैवेन०) जो परमेश्वर प्राणादि में व्यापक, वायु और रात्रि के साथ पूर्ण, सब पर प्रीति करनेवाला और सब के अंग र में व्याप्त है यह अग्नि परमेश्वर हमको मात हो जिसके लिये हम होम करते ॥ जिन मन्त्रों से दोनों समय में होम किया जाता है उन- पञ्चमहायज्ञविधिः ॥ को लिखते हैं (ओं भू०) इन मन्त्रों में जो २ नाम हैं वे सब ईश्वर के ही जानो । उनके अर्थ गायत्री मन्त्र के अर्थ में देखने योग्य है और (आपो०) श्राप जो प्राण परमेश्वर के प्रकाश को प्राप्त होके रस अर्थात् नित्यानन्द मोक्षस्वरूप है उस ब्रह्म को प्राप्त होकर तीनों लोकों में हम लोग आनन्द से विचरें । इस प्रकार प्रातः और सायंकाल सन्ध्योपासन के पीछे इन पूर्वोक्त मन्त्रों से होम करके अधिक होम करने की जहांतक इच्छा हो वहांतक स्वाहा अन्त में पढ़कर गायत्री मन्त्र से होम करें। अग्नि वा परमेश्वर के लिये जल और पवन की शुद्धि वा ईश्वर की प्राज्ञा पालन के अर्थ होत्र जो हवन अर्थात् दान करते हैं उसे अग्निहोत्र कहते हैं । केशर, कस्तूरी आदि सुगन्ध । घृत दुग्ध प्रादि पुष्ट । गुड़ शर्करा आदि मिष्ट तथा सोमलतादि श्रोपधि रोगनाशक जो ये चार प्रकार के घुद्धि, वृद्धि, शूरता, धीरता, बल और आरोग्य करनेवाले गुणों से युक्त पदार्थ हैं उनका होम करने से पवन और वर्षाजल की शुद्धि करके शुद्ध पवन और जल के योग से पृथिवी के सब पदार्थों की जो अत्यन्त उत्त- मता होती है उससे सब जीवों को परम सुख होता है । इस कारण उस अग्निहोत्र कर्म करनेवाले मनुष्यों को भी जीवों के उपकार करने से अत्यन्त सुख का लाभ होता ह तथा ईश्वर भी उन मनुष्यों पर प्रसन होता है ऐसे २ प्रयोजनों के अर्थ अग्निहोनादि का करना अत्यन्त उचित इत्यग्निहोत्रविधिः समाप्तः ॥ अथ तृतीयः पितृयज्ञः ॥ तस्य द्वौ भेदी स्तः । एकस्तर्पणाख्यो द्वितीयः श्राद्धाख्यश्च । तत्र येन कर्मणा विदुषो देवानृपीन् पितॄश्च तर्पयन्ति सुखय- न्ति तत् तर्पणम् । तथा यत्तेपां श्रद्धया सेवन क्रियते तच्छ्राद्धं वेदितव्यम् । तदेतत् कर्म विद्वत्सु विद्यमानेष्वेव घट्यते । नैव मृतकेषु कुतः तेषां सन्निकर्पाभावेन सेवनाशक्यत्वात् । मृतको- पित्याविधिः ॥ ३३ देशेन यत्क्रियते नैव तेभ्यस्तत्याप्तं भवतीति व्यर्थापत्तेः । तस्मा- विद्यमानाभिप्रायणतत्कम्मापदिश्यते । सेन्यसेवकसन्निकात्सर्व- मेतत्कर्तुं शक्यत इति । तत्र सत्कर्तव्यास्त्रयः सन्ति । देवाः, अषयः, पितरश्च, तव देवेषु प्रमाणम् ॥ पुनन्तु मा देजनाः पुनन्तु मनसा धियः ॥ पुनन्तु विर्घा भूतानि जानवेदः पुनीहिमा ॥ य० अ० १६ । मं० ३६ ॥ द्वयं वाऽइदं न तृतीयमस्ति । सत्यं चैवानृतं च सत्य- मेव देवा अनृतं मनुष्या इदमहमनृतात्सत्यमुपैमीति तन्मनुष्ये- भ्यो देवानुपति ॥ स वै सत्यमेव वदेत् । एताद्ध बै देवा व्रत चरन्ति यत्तन्यं तस्मात्त यशो यशोह भवति य एवं विद्वां- सत्यं वदति ॥ शत० कां० १। अ० १ । ब्रा० १ । कं० ४ । ५ ॥ विद्वाथसो हि देवाः ॥ शत० कां०३ । अ०७। मा०६। कं० १०॥ ॥ भाष्यम् ॥ (पुनन्नु० ) हे (जातवेदः) परमेश्वर !(मा) मां (पुनीहि) सर्वथा पवित्रं कुरु भवन्निष्ठा भवदाशापालिनो ( देवजनाः ) विद्वांसः श्रेष्ठा मानिनो विद्यादानेन (मा) मा (पुनन्तु) पवित्रं कर्वन्तु तथा (पुनन्तु मनसा धियः) भवदत्तविज्ञानेन भवद्विष- ययानेन वा नो वुद्धयः पुनन्तु पवित्रा भवन्तु (पुनन्तु विश्वा भूतानि० ) विश्वानि सर्वाणि संसारस्थानि भूतानि पुनन्तु भव- स्कृपया पवित्राणि सुखानन्दयुक्तानि भवन्तु । (द्वयं वा०) मनु- या द्वाभ्यां लक्षणाभ्यां द्वे एव संझे भवतः । देवाः, मनुष्या- मेति । तत्र सत्यं चैवानृतं च कारसे स्तः (सत्यमेव०) यत्स- पञ्चमहायज्ञविधिः ॥ awra । त्यवचनं सत्यमानं सत्यं कम्मैतद्देवानां लक्षणंभवति तथैतदनृतं वचनमनृतं मानमनृतं कर्म चति मनुष्याणाम् । योऽनृतात् पृथ- ग्भूत्वा सत्यमुपेयात् स देवजातौ परिगण्यते । यश्च सत्यात् पृ- थग्भूत्वाऽनृतमुपयात्स मनुष्यसंज्ञां लभेत तस्मात्सत्यमेव सर्वदा वदेन्मन्येत्कुरुयाञ्च यत्सत्यं व्रतमस्ति तदेव देवा आचरन्ति स यशस्विनां मध्ये यशस्वीति देवो भवति तद्विपरीतो मनुष्यश्च तस्मादत्र विद्वांस एव देवास्सन्तीति । ॥ भाषार्थ॥ अव तीसरा पितृयज्ञ कहते हैं । उसके दो भेद हैं एक तर्पण, दूसरा श्राद्ध । तर्पण उसे कहते हैं जिस कर्म से विद्वान् रूप देव, ऋपिऔर पितरों को सुखयुक्त करते हैं । उसी प्रकार जो उन लोगों का श्रद्धा से सेवन करना है सो श्राद्ध कहाता है । यह तर्पण आदि कर्म विद्यमान अर्थात् जो प्रत्यक्ष हैं उन्हीं में घटता है मृतकों में नहीं क्योंकि उनकी प्राप्ति और उनका प्रत्यक्ष होना दुर्लभ है । इसी से उनकी सेवा भी किसी प्रकार से नहीं हो सकती किन्तु जो उनका नाम लेकर देवे वह पदार्थ उनको कभी नहीं मिल सकता इसलिये मृतकों को सुख पहुंचाना सर्वथा असंभव है इसी कारण विद्यमानों के अभिप्राय से तर्पण और श्राद्ध वेद में कहा है । सेवा करने योग्य और सेवक अर्थात् सेवा करने वाले इनके प्रत्यक्ष होने पर यह सब काम होसकता है। तर्पण श्रादि कर्म में.सत्कार करने योग्य तीन हैं । देव, ऋपि और पितर । उनमें से देवों में प्रमाण- (पुनंतु० ) हे जातवेद परमेश्वर आप सब प्रकार से मुझको पवित्र करें। जिनका चित्त आप में है तथा जो आपकी आज्ञा पालते हैं वे विद्वान् श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुष भी विद्यादान से मुझ को पवित्र करें । उसी प्रकार प्रापकां दिया जो विशेष ज्ञान वा आपके विषय का ध्यान उससे हमारी बुद्धि पवित्र हों ( पुनन्तु विश्वाभूतानि०) और संसार के सब जीव श्रापकी 1 पितृयज्ञविधिः ॥ ३५ कृपा से पवित्र और आनन्दयुक्त हो ( द्वयं वा० ) दो लवणों से मनुष्यों की दो संज्ञा होती हैं अर्थात् देव और मनुष्य । वहां सत्य और झूठ दो कारण है । (सत्यमेव०) जो सत्य बोलने, सत्य मानने और सत्य कर्म करनेवाले हैं वे देव और वैसे ही झूठ बोलने, झूठ मानने और झूठ कर्म करने वाले मनुष्य कहाते हैं। जो झूठ से अलग होके सत्य को प्राप्त होवे वे देवजाति में गिने जाते हैं और जो सत्य से अलग हो के झूठ को आप्त हों वे मनुष्य असुर और राक्षस कहे हैं, इससे सब काल में सत्य ही कहे, माने और करे । सत्यव्रत का श्राचरण करनेवाला मनुष्य यश- स्त्रियों में यशस्वी होने से देव और उससे उलटे कर्म करनेवाला असुर होता है । इस कारण से यहां विद्वान् ही देव हैं । ॥ अपिंप्रमाणम् ॥ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुपं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥ य० अ० ३१ । मं०६॥ अथ यदेवानुब्रुवीत । तेनर्पिभ्य ऋणं जायते तद्धयेभ्य एतस्करोत्यृपीणां निधिगोप इति ह्यनूचानमाहुः ॥ शत० कां० १ । अ०७ । कं० ३ ॥ अथार्षेयं प्रवृणीते । ऋ- पिभ्यश्चैवैनमेतद्देवेभ्यश्च निवेदयत्ययं महावीर्यो यो यज्ञं प्राप- दिति तस्मादायं प्रवृणीते ॥ शत० कां० १। प्रपा० अ०४। कं० ३॥ ॥ माध्यम् ॥ तं यशमिति मन्त्रः सृष्टिविद्याविषये व्याख्यातः । (अथ यद- वा० ) अथेत्यनन्तरं यत्सर्वविद्या. पठित्वानुवचनमध्यापन कार्या- स्ति तदृषिकृत्यमस्ति । तेनाध्ययनाच्यापनकर्मणर्षिभ्या देयमृर्ण '६ पञ्चमहायज्ञविधिः ॥ जायते । यत्तेषामृषीणां सेवनं करोति तदेतेभ्य एव सुखकारी भवति । यः सर्वविद्याविभूत्वाध्यापयति तमनूचानमृषिमाहुः । (प्रथायं प्रवृणीते०) यो मनुष्यः पठित्वा पाठनाख्यं कर्म प्रवृ. सोते तदायं कर्मास्ति । य एवं कुर्वन्ति तेभ्य ऋषिभ्यो देवेभ्य- तत्प्रियकरं वस्तुसेवनं च निवेदयति सोयं विद्वान महावीर्यो भूत्वा यज्ञं विज्ञानाख्यं (प्रापत् ) प्राप्नोति ते चैनं विद्यार्थिन विद्वांसं कुयुः । यश्च विद्वानस्ति यश्चापि विद्यां गृह्णाति स ऋ. षिसंज्ञां लभते । तस्मादिदमायं कर्म सर्वैर्मनुष्यैः स्वीकार्यम् ॥ ॥भापार्थ ॥ (ते यज्ञं० ) इस मन्त्र का अर्थ भूमिका के सृष्टिविद्या विषय में कह दिया है, अब इसके अनन्तर सव विद्याओं को पढ़ के जो पढ़ाना है वह ऋषिकर्म कहाता है उस पढ़ने और पढ़ाने से ऋषियों का ऋण अर्थात् उनको उत्तम २ पदार्थ देने से निवृत्त होता है और जो इन ऋषियों की सेवा करता है वह उनको सुख करनेवाला होता है (निधिगोपः ) यही व्यवहार अर्थात् विद्या कोश का रक्षा करने वाला होता है। जो सब विद्याओं को जान के सव को पढ़ाता है उसको ऋषि कहते हैं । (प्रथा- बेयं प्रवृणीते० ) जो पढ़के पढ़ाने के लिये विद्यार्थी का स्वीकार करना है से आय अर्थात् ऋपियों का कर्म कहाता है जो उस कर्म को करते हैं उन ऋषियों और देवों के लिये प्रसन्न करनेवाले पदार्थों का निवेदन तथा सेवा करता है वह विद्वान् अति पराक्रमी हो-के विशेष ज्ञान को प्राप्त होता है। जो विद्वान् और विद्या को ग्रहण करनेवाला है उसका ऋषि नाम होता है। इस कारण से इस आर्षेय कर्म को सब मनुष्य स्वी. कार करें। ॥अथापिटपु प्रमालम् ॥ अर्ज वहन्तीरमृतं धृतं. पर्यः कीलाल परिस्रुतम् ॥

. पित्याविधिः- सपा स्य तर्पयत मे पितॄन् ॥ य० अ० २। मं० ३४ ॥ ॥ मानम् ॥ (ऊज्ज वहन्ती०) ईश्वरः सर्वान्प्रत्याज्ञां ददाति सर्वे मर- न्या एव जानीयुर्वदेयुश्चाशापयेयुरिति, मे पितॄन् मम पिपिता- महादीन् प्राचार्यादश्चि यूयं सर्वे मनुष्याः तर्पयत सेक्या.प्रस: भान् कुरुत तथा (स्वधा स्थ) सत्यविद्यामनिस्वपदार्थधारि- यो भवत । केन केन पदार्थेन ते सेवनीया इत्याह । ऊर्ज पराक में प्रापिकाः सुगन्धिता हृद्या अपस्तेभ्यो नित्यं दधुः (अमृतं.) महतात्मकमनेकविधरसं (घृतं) आज्यं (पयः) दुग्धं (की लालं) अनेकविधसंस्कारैः सम्पादितमन्नं माक्षिकं मधु च (प. रितं)कालपक्वं फलादिकं च दत्वापितॄन प्रसन्नान कुर्युः ॥१॥ ॥ भाषार्थ ॥ ( अज्ज वहन्ती ) पिता वा स्वामी अपने पुत्र पौत्र बी वा नौकरों को सय दिन के लिये भाज्ञा दे के कहे कि (तर्पयत मे पितॄन), जो पिता पितामहादि माता मातामहादि तथा प्राचार्य और इनसे मित्र भी विद्वान् लोग अवस्था अथवा ज्ञान से वृद्ध मान्य करने योग्य हों उन सब के आत्माओं को यथायोग्य सेवा से प्रसन्न किया करो । सेवा करने के पदार्य ये है । (उज्ज वहन्ती )-जो उत्तम २ जल (अमृतम् ) भनेक- विधरस (घृतं ) घी ( पयः-) दूध :(.कीलालं) अनेक संस्कारों से. सिद किये रोगनाश करने वाले उत्तम-२ :अम (परिश्रुतम् ) सब प्रकार के उत्तम २ फन हैं इन सब पदार्थों से उनकी सेवा सदा करते रहो जिससे उनका पारमा प्रसन्न होके तुम लोगों को आशीर्वाद देता रहे कि उससे तुम लोग भी सदा प्रसन्न रहो (स्वधास्थ०.) हे पूर्वोक्त पितृलोगो ! तुम सब हमारे अमृतरूप पदार्थों के भोगों से सदा सुखी रहो। और जिस । पञ्चमहायज्ञविधिः॥ पदार्थ की तुम को अपने लिये इच्छा हो जो जो हम लोग कर सके उसरे की आज्ञा सदा करते रहो । हम लोग मन वचन कर्म से तुम्हारे सुख करने में स्थित हैं । तुम लोग किसी प्रकार का दुःख मत पाओ । जैसे तुम लोगों ने वाल्यावस्था और ब्रह्मचर्याश्रम में हम लोगों को सुख दिया है वैसे हम को भी आप लोगों का प्रत्युपकार करना अवश्य चाहिये जिससे हम को कृतघ्नता दोप न प्रास हो॥१॥ ॥ अथ पितॄणां परिगणनम् ॥ येषां पितृसंज्ञा ये सेवितुं योग्याश्च ते क्रमशो लिख्य- न्ते । सोमसदः । अग्निष्वात्ताः । वर्हिपदः । सोमपाः । हविर्भुजः । आज्यपाः । सुकालिनः । यमराजाचेति । । भाष्यम् ॥ (सो०) सोमे ईश्वरे सोमयागे वा सीदन्ति ये सोमगुणाश्च ते सोमसदः । (अ०) अग्निरीश्वरः सुष्टुतया श्रात्तो गृहीतो यैस्ते अग्निष्वात्ताः यद्वा अग्नर्गुणशानात्पृथिवी, जलं, व्योम, यानयन्त्ररचनादिका, पदार्थविद्या सुष्टुतया आत्तागृहीता यैस्ते। (ब०) बर्हिषि सर्वोत्कृष्टे ब्रह्मणि शमदमादित्तमेपु गुणेषु वा सीदन्ति ते वहिपदः । (सो०) यशेनोत्तममौपधिरसं पिवन्ति पाययन्ति वा ते सोमपाः । (६०) हवि तमेव यज्ञेन शोधितं सृष्टिजलादिकं भोक्तुं भोजयितुं वा शीलमेषां ते हविर्भुजः । (श्रा० ) आज्यं घृतम् । यद्वा अज गतिक्षपणयोर्धात्वर्थादाज्यं विज्ञानम् । तदानेन पान्ति रक्षन्ति पाययन्ति रक्षयन्ति ये विद्वां- सस्त आज्यपाः। (सु०) ईश्वरविद्योपदेशकरणस्य ग्रहणस्य च शोभनः कालो येषां ते । यद्वा ईश्वरज्ञानप्राप्त्या सुखरूपः स- देव कालो येषां ते सुकालिनः । (य० ) ये पक्षपातं विहाय न्या- यव्यवस्थाक रस्सन्ति ते यमराजाः ॥

पित्याविधिः ॥ ३६ ) जो ॥ भाषार्थ ॥ (सो०) जो ईश्वर और सोमयज्ञ में निपुण और जो शान्त्यादिगुण साहित हैं वे सोमसद् कहाते हैं (म० ) अग्नि जो परमेश्वर वा भौतिक उनके गुण ज्ञात करके जिनने अच्छे प्रकार अग्निविद्या सिद्ध की है उनको भग्निप्वात्ता कहते हैं। (ब०) जो सब से उत्तम परब्रह्म में स्थिर होके राम दम सत्य विद्यादि उत्तम गुणों में वर्तमान हैं उनको बर्हिषद् कहते हैं। (सो. यज्ञ करके सोमलतादि उत्तम ओषधियों के रस के पान करने और कराने वाले हैं तथा जो सोम विद्या को जानते हैं उनको सोमपा कहते हैं (ह० ) जो अग्निहोत्रादि यज्ञ करके वायु और वृष्टि जल की शुद्धि द्वारा सब जगत् का उपकार करते और जो यज्ञ से अनजलादि को शुद्ध करके खाने पीने वाले हैं उन को हविर्भुज कहते हैं (श्रा०) आज्य कहते हैं घृत स्निग्धपदार्थ और विज्ञान को जो उसके दान से रक्षा करने वाले हैं उनको श्राज्यपा कहते हैं । (सु०) मनुष्य-शरीर को प्राप्त होकर ईश्वर और सत्यविद्या के उपदेश का जिनका श्रेष्ठ समय और सदा उपदेश में ही वर्तमान हैं उन को सुकालिन कहते हैं । ( य० ) जो पक्ष- पात को छोड़ के सदा सत्य व्यवस्था न्याय ही करने में रहते हैं उनको यमराज कहते हैं । मातृपितामहप्रपितामहाः । मातृपितामहीप्रपितामह्य स- गोत्राः सम्बन्धिनः॥ ॥ भाष्यम् ॥ (पि०) ये सुष्ठुतया श्रेष्ठान विदुषो गुणान् वासयन्तस्तत्र वसन्तश्च विज्ञानाद्यनन्तधनाः स्वान् जनान् धारयन्तः पोषयन्त- श्च चतुर्विंशतिवर्षपर्यन्तेन ब्रह्मचर्येण विद्याभ्यासकारिणः स्वे जनकाश्च सन्ति ते पितरो वसवो विज्ञेया ईखरोपि। (पिता) ४० पञ्चमहायज्ञविधिः यं पक्षपातरहिता दुष्टान् रोदयन्तश्चतुश्चत्वारिंशद्वर्पपर्य्यन्तेन ब्रह्मचर्यसेवनेन कृतविद्याभ्यासास्ते रुद्राः स्खे पितामहाश्च प्रा. हास्तथा रुद्र ईश्वरोपि । (प्रपि०) आदित्यवदुत्तमगुणप्रकाश- का विद्वांसोश्ष्टचत्वारिंशद्वर्षेण ब्रह्मचर्येण सर्वविद्यासम्पन्नाः सूर्य- वद्विद्याप्रकाशाः स्वे प्रपितामहाश्च ग्राह्यास्तथाऽऽदित्यो विनाशी- श्वरो वात्र गृह्यते (मा०) पित्रादिसदृश्यो मात्रादयः सेव्याः । (स०) ये स्वसमीपं प्राप्ताः पुत्रादयस्ते श्रद्धया पालनीयाः । (श्रा०सं० ) ये गुर्वादिसख्यन्तास्सन्ति ते हि सर्वदा सेषनी. याः ॥ इति पितृयज्ञविधिः समाप्तः ॥ ॥ भाषार्थ ॥ जो वीर्य के निपेकादि कमी करके उत्पत्ति और पालन कर और चौबीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्याश्रम से विद्या को पढ़े उसका नाम पिता और वसु है ( पिता०) जो पिता का पिता हो और चवालीस वर्ष पर्यन्त प्रह्मचय्याश्रम से विद्या पढ़ के सब जगत् का उपकार करता हो उसको प्रपितामह और आदित्य कहते हैं तथा जो पित्रादिकों के तुल्य पुरुप हैं उनकी भी पित्रादिकों के तुल्य सेवा करनी चाहिये । (मा० ) पित्रादिकों के समान विद्या स्वभाव वाली नियों की भी अत्यन्त सेवा करनी चाहिये (सगो० ) जो समीपवती शाति के योग्य पुरुप हैं वे भी सेवा करने के योग्य हैं (प्राचार्यादि सं०) जो पूर्ण विद्या के पढ़ाने वाले और श्वसु- रादि सम्बन्धी तथा उनकी स्त्री हैं उनकी यथायोग्य सेवा करनी चाहिये । एतेषां विद्यमानानां सोमसदादीनां सुखार्थ प्रीत्या यत्सेवनं क्रियते तत्तप्पणम्, श्रद्धया यत्सेवनं क्रियते तच्छ्राद्धम् ॥ ये सत्यविज्ञानदानेन जनान् पान्ति रक्षन्ति ते पितरो.विझे- याः । अत्र प्रमाणानि-ये नः पूर्वे पितरः सोम्यास इत्यादीनि ४१ बलिवैश्वदेवाविधिः ॥ यजुर्वेदस्यैकोनविंशतितमेऽध्याय सप्तसु सोमसदादिपु पितृपु द्रष्ट- म्यानि । तथा ये समानाः समनसः पितरो यमराज्ये । इत्यादीनि यमराजेषु । पितृभ्यः स्वधायिभ्यः खत्रा नमः । इत्यादीनि पितृपि- तामहप्रपितामहादिपु एवं नमो वः पितरो रसायेत्यादीनि पितॄणां सत्कारे च । इति ऋग्यजुरादिवचनानि सन्तीति वोध्यम् । अ. न्यच्च-बसून् वदन्ति वै पितॄन् रुद्रांश्चैव पितामहान् । प्रपि- तामहाश्चादित्यान् श्रुतिरेपा सनातनी ॥ १॥ म० अ०.३। श्लो० २८४ ॥ ॥ भापार्थ ॥ जो सोमसदादि पितर विद्यमान अर्थात् जीवते हो उनको प्रीति से सेवनादि से तृप्त करना तर्पण और श्रद्धा से. अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सेवन करना है सो श्राद्ध कहाता है जो सत्य विज्ञानदान से जनों को पालन करते हैं वे पितर हैं । इस विषय में प्रमाण -ये नः पूर्वं पितरः सोम्यासः इत्यादि मन्त्र सोमसदादि सातों पितरों में प्रमाण हैं। समानाः समनसः पितरो यमराज्ये । इत्यादि मन्त्र यमराजॉ.। पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वमा नमः । इत्यादि मन्त्र पितृ पितामह प्रपितामहादिकों तथा-नमो वः पितरो रसायत्यादि मन्त्र पितरों के सेवा और संस्कार में प्रमाण हैं । ये ऋग्य- शुर्वेद आदि के वचन हैं और मनुजी ने भी कहा है कि पितरों को बा, पितामहाँ को रुद्र और प्रपितामहों को श्रादित्य कहते हैं यह सनातन भुति है। मनु० भ० ३ । श्लो० २८४ ॥ इति पितृयज्ञविधिः समाः । ॥ श्रथ वलिवैश्वदेवविधिलिख्यते ॥ . यदन्नं पक्वमक्षारलवणं भोजनार्थ भवेत्तेनैव बलिवैश्वदेव- कर्म कार्य्यम् । वैश्वदेवस्य सिद्धस्य गृहोज्नौ विधिपूर्वकम् ॥ प्राभ्यः कुर्य्याद्देवताभ्यो ब्राह्मणो होममन्वहम् ॥ मनु० अ०.३ । नो०४॥ .

४२ पञ्चमहायज्ञविधिः ॥ ॥ अथ वलिवैश्वदेवकर्मणि प्रमाणम् ॥ अहरहर्वलिमित्ते हरन्तोश्वायेव तिष्ठते घासमग्ने । रायस्पोपेण समिपा मदन्तो मा ते अग्ने प्रतिवेशारिपाम॥१॥ अथर्व० कां० १६ । अनु० ७ । मं० ७ ॥ पुनन्तु मा देव जनाः पुनन्तु मनसा धियः। पुनन्तु विश्वा भूतानि जात- वेदः पुनीहि मा ॥ २ ॥ य० अ० १६ । मं० ३६ ॥ ॥ भाष्यम् ॥ (पुनन्तु०) अस्यार्थी देवप्रकरणे उक्तः ॥ (अहरहलि०) हे अग्ने परमेश्वर ! ये भवदाशया वलिवैश्वदेवं नित्यं कुर्वन्तो मनुष्याः (रायस्पोपेण समिपा) चक्रवर्तिराज्यलदम्या घृतदु- ग्धादिपुष्टिकारकपदार्यप्राप्त्या च सम्यक् शुद्धेच्छया (मदन्तः) नित्यानन्दमाताः सन्तः मातुः पितुराचार्यादीनां चोत्तमपदार्थ: प्रीतिपूर्विकां सेवां नित्यं कुर्युः ( अभ्वायेव तिष्ठते घासं० ) यथाश्वस्य सन्मुखे तद्भक्ष्यं तणवीरुधादि वा तत्पानार्थं जला- दिपुष्कलं स्थाप्यते तथा सर्वेषां सेवनाय वहून्युत्तमानि वस्तूनि दधुर्यतस्ते प्रसन्ना भवेयुः (माते अग्ने प्रतिवेशारिपाम ) है पर- मगुरो अग्ने परमेश्वर ! भवदाक्षातो ये विरुद्धव्यवहारास्तेषु वयं कदाचिन्न प्रविशम। अन्यायेन कदाचित्प्राणिनः पीड़ा न दद्याम। किन्तु सर्वान् स्वमित्राणीव स्वयं सर्वेषां मित्रमिवेति प्रात्वा पर- स्परमुपकारं कुर्य्यामेतीश्वराक्षास्ति ॥ ॥ भाषार्थ ॥ (पुनन्तु.) इसका अर्थ देवतपंण विषय में कर दिया है (अहर- हलि ) हे अग्ने परमेश्वर ! आपकी आज्ञा से नित्यप्रति बलिवैश्वदेव कर्म ABAR.4 .4 Nu...... 4AAN.ARANA वलिवैश्वदेवविधिः ॥ ४३ करते हुए हम लोग ( रायस्पोपण समिपा ) चक्रवत्तिराज्यलक्ष्मी घृत- दुग्धादि पुष्टिकारक पदार्थों की प्राप्ति और सम्यक् शुद्ध इच्छा से ( मदतः) नित्य भानन्द में रहें तथा माता पिता भाचार्य आदि की उत्तम पदार्थों से नित्य प्रीतिपूर्वक सेवा करते रहें ( अश्वायेव तिष्ठते धासं )जैसे घोड़े के. सामने बहुतसे खाने वा पीने के पदार्थ धर दिये जाते हैं वैसे सब की सेवा के लिये बहुत से उत्तम २ पदार्थ देवें जिनसे वे प्रसन्न होके हम पर नित्य प्रसन्न रहे, ( मा ते अग्ने प्रतिवेशारिपाम ) हे परमगुरु अग्नि परमेबर ! आप और आप की भाज्ञा से विरुद्ध व्यवहारों में हम लोग कभी प्रवेश न करें और अन्याय से किसी प्राणी को पीढ़ा न पहुंचाव: किन्तु सब को अपना मित्र और अपने को सब का मित्र समझ के पर- पर उपकार करते रह॥ अथ होममन्त्राः॥ ओमग्नये स्वाहा ॥ओं सोमाय स्वाहा ।। ओमग्नीपो- माभ्यां स्वाहा ॥ ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥ ओं ध- न्वन्तरये स्वाहा ॥ओं कुहै स्वाहा ॥ ओमनुमत्यै स्वाहा ॥ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ ओं सह द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा ॥ ओं स्विष्टकृते स्वाहा ॥ माष्यम् ॥ (प्रोम०) अग्न्यर्थ उक्तः (ओं सो०) सर्वानन्दप्रदो या सर्वजगदुत्पादक ईश्वरः सात्र ग्राह्यः (ओं वि०) विश्वेदेवा वि- श्वप्रकाशका ईश्वरगुणाः सर्वे विद्वांसो वा (ओं धन्वं.) सर्व.. रोगनाशक ईश्वरोत्र गृह्यते । (ओं कु०) दर्शएयर्थोज्यमारम्भः । अमावास्येणिप्रतिपादितायै चितिशक्तये वा (ओम० ) पौर्णमा- सेटवर्थोष्यमारम्भः । विद्यापठनानन्तमतिर्मननं शानं यस्याश्चिः- पञ्चमहायज्ञविधिः॥ तिशक्तेः सा चितिरनुमतिर्वा (ओं प्र०) सर्वजगत: खामी रक्षक ईश्वरः (ओं सह० ) ईश्वरेण प्रकृष्टगुणैः सहोत्पादितयोः पुष्टि- फरणाय, (ओं स्विष्ट०) यः सुष्टु शोभनमिष्टं सुखं करोति स चेश्वरः । एतैर्मन्त्रों में त्वाऽथ बलिप्रदानं कुर्य्यात् ॥ ॥ भापार्थ ॥ (ओम०) अग्नि शब्दार्थ कह पाये हैं (ओं सो०) जो सब पदायों को उत्पन और पुष्ट करने से सुख देनेहारा है उसको सोम कहते हैं . (ओम० ) जो प्राण सय प्राणियों के जीवन का हेतु और अपान अर्थात् दुःख के नाश का हेतु है इन दोनों को अग्नीपोम कहते हैं। (ओं वि०) यहां संसार को प्रकाश करनेवाले ईश्वर के गुण अथवा विद्वान् लोगों का विश्वेदेव शब्द से ग्रहण होता है । ग्रहण होता है (ओं ध०) जो जन्ममरणादि रोगों का लाश करनेहारा परमात्मा वह धन्वन्तरि कहाता है (ओं कु. ) जो अमा. वास्येष्टि का करना है (ओं म.)जो पौर्णमास्येष्टि वा सर्वशासपति- पादित परमेश्वर की चिति.शक्ति है यहां उसका ग्रहण है। (ओं प्र०) जो -सब जगत् का स्वामी जगदीश्वर है वह प्रजापति कहाता है (मो स० ) यह प्रयोग पृथिवी का राज्य और सत्यविद्या से प्रकाश के लिये है (ऑवि०) जो इष्ट सुख करनेहारा परमेश्वर है वही स्विष्टकृत कहावा है । ये दश अर्थ दश मन्त्रों के हैं। अब बलिदान के मन्त्रों को लिखते हैं । ओं सानुगायेन्द्राय नमः।ओं सानुगाय यमाय नमः। ओं सानुगाय वरुणाय नमः । ओं सानुगाय सोमाय नमः। ओं मरुद्भयो नमः । श्रीमद्भयो नमः । ओं वनस्पतिभ्यो नमः । ओं श्रियै नमः । ओं भद्रकाल्यै नमः । श्री ब्रह्म- पतये नमः । ओं वास्तुपतये नमः । ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। ओं दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नमः ।ओं नक्तंचारिभ्यो -- बलिवैश्वदेवविधिः ॥ भूतेभ्यो नमः । ओं सर्वात्मभूतये नमः । ओं पितम्या सधायिभ्य: स्वधा नमः॥ ॥ माम्पम् ।। (ो सा०) सम प्रदत्वे शब्दे घेत्यनेन सत्क्रियापुरस्सर विचारेण मनुष्याणां यथार्थ विज्ञानं भवतीति वेद्यम् । नित्यैर्गुणै- स्सह वर्तमानः परमैश्वर्यवानीश्वरोऽत्रेन्द्रशब्देन गृह्यते ।(ओं सानु०) पक्षपातरहितो न्यायकारित्वादिगुणयुक्तः परमात्मा यमशब्दार्थेन वेद्यः । ( ओं० सा०) विद्याधुत्तमगुणविशिष्टः सर्वोत्तमः परमेश्वरोऽत्र वरुणशब्देन ग्रहीतव्यः (ओं सानुगाय सो०) अस्यार्थ उक्तः । (ों म०)य ईश्वराधारेण सकलं विश्वं धारयन्ति चेष्टयन्त्यर्थेन गृह्यन्ते ते अत्र भरुतो गृह्यन्ते (ओम) अस्यार्थः शन्नौदेवीरित्यत्रोक्तः । (ओं व०) वनानां लोकानां पतय ईश्वरगुणाः परमेश्वरो वा बहुवचनमत्रादरार्थम् । यद्वोत्त- मगुणयोगेनेश्वरेणोत्पादितेभ्यो महावृतेभ्यश्चेति वोध्यम् । (ओं श्रि०) श्रीयते सेव्यते सवैजनस्सः श्रीरीश्वरस्सर्वसुखशोभाक- त्वाद् गृह्यते । यद्वा तेनोत्पादिता विश्वशोमा च। (ओं० भ०) भद्रं कल्याणं सुखं कालयितुं शीलमस्याः सा भद्रकालीश्वरश- किः। (ओं व्र०) ब्रह्मणः सर्वशास्त्रविद्यायुक्तस्य वेदस्य ब्रह्मा- एडस्य वा पतिरीश्वरः । (ओं वा०) वसन्ति सर्वाणि भूतानि यस्मिंस्तद्वास्त्वाकाशं तत्पतिरीश्वरः । (ओं वि०) अस्यार्थ उक्तः। (ओं दि०) (ओं ननं०) ईश्वरकृपयैवं भवेद् दिवसे यानि भूतानि विचरन्तिारात्रौ च तान्यस्मासु विघ्नं मा कुर्वन्तु तैः सहास्माकमविरोधोऽस्तु । एतदर्थोऽवमारम्भः । (ओ.स०) सर्वेषां जीवात्मनां भूतिर्मवनं सत्तेलरो नान्यः (ओं पि०.).

*४६ पञ्चमहायज्ञविधिः॥ स्यार्थः पितृतर्पणे प्रोक्तः । नम इत्यस्य निरभिमानद्योतनार्थः । परस्योत्कृष्टतया मान्यज्ञापनार्थश्चारभ्भः ॥ ॥ भाषार्थ ॥ (ओं सा०) जो सर्वैश्वर्ययुक्त परमेश्वर और जो उस के गुण हैं सानुग इन्द्र शब्द से ग्रहण होते हैं ( श्री सा० ) जो सत्य न्याय करनेवाला ईश्वर और उसकी सृष्टि में सत्य न्याय के करने वाले सभासद् हैं वे 'सानुगाय' शब्दार्थ से ग्रहण होते हैं (ओं सा० ) जो सव से उत्तम परमात्मा और उसके धार्मिक भान हैं वे सानुग वरुण शब्दार्थ से जानने चाहिये (यो सा० ) पुण्यात्माओं को आनन्दित करनेवाला और पुण्या- स्मा लोग हैं वे सानुग सोम शब्द से ग्रहण किये हैं (ओं मरु० ) जो 'प्राण अर्थात् जिनके रहने से जीवन और निकलने से मरण होता है उनको मरुत् कहते हैं इनकी रक्षा करनी अवश्य चाहिये । (श्रीमद्या०) इसका अर्थ शन्नोदेवी इस मन्त्र के अर्थ में लिखा है (ओं व०) जिनसे चपी अधिक होती और जिनके फलादि से जगत् का उपकार होता है उनकी भी रक्षा करनी योग्य है । (श्री भि०) जो सव के सेवा करने योग्य परमात्मा है उसकी सेवा से राज्यश्री की प्राप्ति के लिये सदा उद्योग करना चाहिये । (ओं भ.) जो कल्याण करनेवाली परमात्मा की शक्ति 'अर्थात् सामर्थ्य है उसका सदा श्राश्रय करना चाहिये (ओं ७०) जो वेद का स्वामी ईश्वर है उसकी प्रार्थना और उद्योग विद्या प्रचार के लिये अवश्य करना चाहिये, (.ओं वा० ) जो वास्तुपति गृहसम्बन्धी पदार्थों का पालन करनेहारा मनुष्य अथवा ईश्वर है इनका सहाय सर्वत्र होना 'चाहिये (ओं वि०) इसका अर्थ कह दिया है (ो दि०) जो दिन में विचरनेवाले प्राणियों से उपकार लेना और उनको सुख देना है सो मनुष्यजाति का ही काम है। (ओं नकं ) जो रात्रि में विचरनेवाले प्राणी हैं उनसे भी उपकार लेना और जो उनको सुख देना है इसलिये यह .

अतिथिपूजाविधिः ॥
प्रयोग है (मओ सर्वात्म० ) सब में व्याप्त परमेश्वर की सत्ता को सदा ध्यान
में रखना चाहिये । (ओं पि०) माता, पिता, प्राचार्य, अतिथि, पुत्र,
भृत्यादिकों को भोजन कराके पश्चात् गृहस्थ को भोजनादि करना चाहिये।
स्वाहा शब्द का अर्थ पूर्व कर दिया है। और नमः शब्द का अर्थ यह है
कि भाप अभिमान रहित होके दूसरे का मान्य करना है । इसके पीछे के
भागों को लिखते हैं।
शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम् ।
वायसानां कृमीणां च शननिर्वपेद्भुवि ।।
अनेन पड भागान भूमौ दद्यात् । एवं सर्वप्राणिभ्यो भागान
विभय दत्वा च तेषां प्रसन्नतां संपादयेत् ॥ इति बलिवैश्वदेव-
विधिः समाप्तः॥
॥ भाषार्थ ॥
कुत्तों कङ्गालों कुष्टी आदि रोगियों काक श्रादि पशियों और चींटी
मादि कृमियों के लिये छः भाग अलग अलग वांट के देदेना और उनकी
प्रसमता सदा करना । यह वेद और मनुस्मृति की रीति से बलिवैश्वदेव
की विधि लिसी ॥
॥ अथ पञ्चमोतिथियज्ञः प्रोच्यते॥
यत्रातिथीनां सेवनं यथावत् क्रियते तत्रैव कल्याणं भवति ।
ये पूर्णविद्यावन्तः परोपकारिणो जितेन्द्रिया धाम्मिकाः सत्यवा-
दिनश्छलादिदोपरहिता नित्यभ्रमणकारिणो मनुष्यास्सन्ति तान-
तिथीन् कथयन्ति । अत्रानेके प्रमाणभूता वैदिकीयमन्त्रास्सन्ति।
परन्त्वत्र संक्षेपतो द्वावेव लिखामः ॥
तद्यस्यैवं विद्वान् व्रात्योऽतिथिहानागच्छेत् ॥ १ ॥

पञ्चमहायज्ञविधिः ॥ स्वयमैनमभ्युदेत्य त्याद्वात्य कावासी_त्यौदकं चात्य तर्पयन्तु वात्य या ते प्रियं. तथास्तु ब्रात्य या ते वश- स्तथास्तु व्रात्य या ते निकामस्तथास्त्विति ॥ अथर्व कां० १५ । ३० ११ । अ० २। मं० १।२॥ ॥ भाष्यम् ॥ (तय०) यस्य गृहे पूर्वोक्तविशेषणयुक्तो विद्वान् (व्रात्यः ) महोत्तमगुणविशिष्टः सेवनीयातिथिराधस्यागमनागमनयोरनि- यततिथिर्न यस्य काचिनियततिथिर्भवति किन्तु स्वेच्छयाक- स्मादागच्छेद्गच्छेच्च स यदा गृहस्थानां गृहेषु प्राप्नुयात् ॥१॥ (स्वयमेनम० ) तदा गृहस्थोऽत्यन्तप्रेम्णोन्थाय नमस्कृत्य च तं महोत्तमासने निपादयेत् । तदनन्तरं पृच्छेद भवतां जलादेर- न्यस्य वा वस्तुन इच्छास्ति चेत्तद यूहि । सेवां कृत्वा तत्प्रसन्न- तां सम्पाद्य स्वस्थचित्तस्सन्नेवं पृच्छेत् (ब्रात्य क्वावान्सीः) हे व्रात्य पुरुषोत्तम ! त्वमितः पूर्व क्व अवात्सीः कुत्र निवासं कृतवान् (व्रात्योदकं ) हे अतिथे ! जलमेतद् गृहाण (व्रात्य तर्पयन्तु ) भवान् स्वकीयसत्योपदेशेनास्मांश्च तर्पयतु प्राण- यतु तथा भवत्सत्योपदेशेन तत्सर्वाणि मम मित्राणि भवन्तं (तर्पयित्वा) विज्ञानवन्तो भवन्तु । (ब्रात्यं यथां०) हे विद्वन् यथा भवतः प्रसन्नता स्यात्तथा वयं कुर्य्याम । यद्वस्तु भवत्प्रिय- मस्ति तस्याज्ञां कुरु (वात्य यथा ते०) हे अतिथे ! यथेच्छतुं भवान् तदनुकूलानस्मान् भवत्सेवाकरणे निश्चिनोतु ( प्रात्य यथा ते०) यथा भवदिच्छापूर्तिस्स्यात् तथा भवत्सेवां वयं कुर्य्या- म। यतो भवान् वयं च परस्पर सेवासत्सङ्गपूर्विकया विद्या- वृद्धया सदानन्दे तिष्ठेम॥

1 अतिथिपूजाविधिः॥ ॥ भाषार्थ ॥ भव जो पांचवां अतिथियज्ञ कहाता है उसको लिखते हैं जिसमें अतिथियों को यथावत् सेवा करनी होती है । जो पूर्ण विद्वान् परोपकारी जितेन्द्रिय धार्मिक सत्यवादी छल कपट रहित नित्य भ्रमण करने वाले मनुष्य होते हैं उनको अतिथि कहते हैं। इसमें अनेक वैदिक मन्त्र प्रमाण है। परन्तु यहां संवेप के लिये दो ही मन्त्र लिखते हैं (तग्रस्यैवं विद्वान्) जिसके घर में पूर्वोक्त गुणयुक्त विद्वान् (प्रात्यः) उत्तम गुणविशिष्ट सेवा करने के योग्य अतिथि भावे जिसकी आने जाने की कोई भी निश्चित तिथि नहीं हो अकस्मात् भावे और जावे जब ऐसा मनुष्य गृहस्थों के भर में प्रात हो ॥१॥ (स्वयमेनम०) तब उस को गृहस्थ अत्यन्त प्रेम से उठकर नमस्कार करके उत्तम थासन पर बैठा के पश्चात् पूले कि को कुछ जल वा किसी अन्य वस्तु की इच्छा हो सो कहिये, इस प्रकार उसको प्रसन्न कर और स्वयं स्वस्थचित्त होके उससे पूछे कि (मात्य कावासीः) हे नात्य उत्तम पुरुष अापने यहां आने के पूर्व कहां पास किया था (मात्योदकं ) हे अतिथि ! यह जल लीजिये (वात्य तर्पयन्तु) और हम लोग अपने सत्य प्रेम से श्राप को तृप्त करते हैं और सब हमारे इष्ट मित्र लांग श्राप के उपदेश से विज्ञानयुक्त होके सदा प्रसम हो (मात्य यथा०) हे विद्वान् ! प्रात्य जिस प्रकार से आपकी प्रसन्नता हो वैसा ही हम लोग काम करें और जो पदार्थ श्राप को प्रिय हो उसकी प्राज्ञा कीजिये (मात्य यथा० ) जिस प्रकार से आप की कामना पूर्ण हो वैसी श्राप की सेवा हम लोग करें। जिससे श्राप और इम बोग परस्पर सेवा और सत्संगपूर्वक विया वृद्धि से सदा आनन्द मेंहूँ॥२॥ ।। इति संक्षेपतोऽतिथियज्ञः॥ ॥ इति पंचमहायज्ञविधिः समाप्तः ॥

* ओ३म् *
आर्यसमाज के नियम ।
१-सव सत्यविद्या और जो पदार्यविद्या से जाने जाते हैं उन
सब का आदिमूल परमेश्वर है।
२-ईश्वर सचिदानन्दखरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्याय
कारी, दयालु, अजन्मा,अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम,
सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर.
श्रमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्चा है। उसी की
उपासना करनी योग्य है।
३-वेद सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना पढ़ाना और
सुनना सुनाना सव आय्यौं का परमधर्म है।
४-सत्य ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत
रहना चाहिये।
१-सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार
करके करने चाहिये।
६-संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश है
अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति
करना।
७-सब से प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिये।
८-अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।
१-प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिये
किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।
१०-सव मनुप्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में
परतन्त्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम में
सवस्वतन्त्र रहें।

Ath Panchmahayagyavidhi

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Ath Panchmahayagyavidhi
File name
Ath Panchmahayagyavidhi
Text
OCR done
Citation
1926
Published
2009/09
Publisher
Ajmer
Language
Sanskrit
Pages
59
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
322466
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99999990252937.00
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Banasthali University
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