Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Sukh-vipaak-sutram

Swami, Sudharma · 2011/01

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

प्रस्तावना। सुखचिपाक, विपाकसूत्र का दूसरा स्कन्ध है। इस के दश अध्ययनो मे दश कुमारो की कथाओ द्वारा पुण्य का साक्षात् फल स्वर्गादि की प्राप्ति और परपरा फल मोक्ष की प्राप्ति, बताया गया है। इसकी पूर्णता ज्ञाता धर्मकथाङ्ग औपपातिक रायपसेनी भगवती आदि के पाठो से की गई है। इसलिये सुखविपाक सूत्र अब तक बहुत सक्षिप्त मिलता था । प्रायः सब प्रतियो मे किस जगह का कितना पाठ लेना चाहिए, ऐसी सूचनामात्र रहती थी। इससे पाठको को उतना लाभ न होताथा जितना होना चाहिए । फलत. पाठको को इसके पूर्ण लाभ से वचित रहना पड़ता था । इस कमी की पूर्ति करने के लिये हमने एक प्राचीन प्रति के आधार से सस्कृत प्राकृत न जानने वाले पाठको के लाभ के लिये हिन्दी मे अनुवाद कराकर प्रकाशित करने का विचार किया था। हर्ष है, आज हमारा विचार सफल हुआ और आपके सामने इसे रखने का अवसर प्राप्त हुआ। पाठको के सुभीते के लिये, जो पाठ जहा से लिये गये है, उनका टिप्पणी मे उल्लेख कर दिया है। टिप्पणी मे सूत्रो की पृष्ट पक्ति भाग- मोदय समिति के सूत्रो के अनुसार दी गई है। अन्त मे निवेदन है, कि यदि अनुवाद आदि मे कोई त्रुटि रह गई हो, तो विज्ञ पाठक सुधार लेवें । और कृपया हमे सूचना देदेवें, ताकि अगली आवृत्ति मे उनका सुधार कर दिया जाय । इस्पलमें . निवेदक-सा. क्र. सेठिया जैन ग्रन्थालय बीकानेर 28-7-26 भैरोंदान जेठमल सठिया

No text on this page.

(२) ४६ सुवाहुकुमार के बहोत्तर कला पढाने का वर्णन । सुबाहुकुमार के लिए ५०० प्रासाट तथा भवन कराने का वर्णन । ८० सुवाहुकुमार से पुप्पचूला प्रमुख ५०० कन्याओ का पाणिग्रहण- (लग्न) कराने का वर्णन । एक सौ वाणु १९२ वस्तुप्रो का दहेज देने का वर्णन महावीर प्रभु का हस्तिशीर्प नगर मे समवसरण । सुवाहुकुमार का प्रभु के दर्शन करने को जाने का वर्णन ७५ सुवाहुकुमार के वारह व्रत अङ्गीकार करने का वर्णन । ७७ श्री गौतमस्वामी का वर्णन | श्री गोतमस्वामी का श्री महावीर स्वामी प्रति सुबाहुकुमार के पूर्वभव का प्रश्न। श्री महावीरस्वामी का श्रीगोतमम्वामी प्रति सुवाहुकुमारके पूर्व- भव का वर्णन करना। सुमुख गाथापति तथा सुदत्त अणगार का वर्णन ८१ सुदत्त अणगार को प्रतिलाभने (दान देने) से सुमुख गाथा- पति के घर मे पचदिव्य प्रकट होने का वर्णन श्रीमहावीर प्रभु का हस्तिशीर्ष नगर से विहार । सुवाहुकुमार के पोषे का करना और शुभभावना का माना तथा श्रोवीरप्रभु का पीछा हस्ति शीर्ष नगर मे आगमन तथा पर्षदा राजा सुबाहुकुमार का वादने को जाना। ८९ सुवाहकुमार का माता पिता से दीक्षा की अनुज्ञा मांगना। सुबाहुकुमार का अपने माता पिता के साथ दीक्षा के विषय में प्रश्नोत्तर। सुवाहुकुमार को एक दिन का राज्य देना १०३ सुबाहुकुमार के दीक्षामहोत्सव का वर्णन | १०५ सुबाहुकुमार के दीक्षा ग्रहण करने का वर्णन । सुवाहु अणगार के ग्यारह अग पढने का तपस्या करने का देवलोक गमनकरने का एव ७ देव का ८ मनुष्य का भव कर के मोक्षजाने का वर्णन। १२० । इति प्रथम अध्ययन । ८५

No text on this page.

ॐ श्रीवीतरागाय नमः सुख-विपाक-सूत्रम् (हिन्दी-भावार्थसहितम्) मृलम्- तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे गरे गुणसीले चेहए होत्था । वपणओ-॥१॥ भावार्थ- इस अवसर्पिणी कालके चौथे आरे मे उस समय(जब कि भगवान् महावीर स्वामी, और वह गजा विद्यमान था) राजगृह नामका नगर था। उसमे गुणशल नामका चैत्यालय-~~-व्यन्तगयतन या। उसका वर्णन आगे कहे अनुसार समझ लेना चाहिए ॥ १ ॥ मूलम्-* तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भग- वओमहावीरस्म अंतेवासी अजसुहम्मे णाम थेरेजातिस- पन्ने कुलसंपन्ने बलरूवविणयणाणदसणचरित्तलाघवसंपन्ने ओयंसी तेयंसी वच्चसी जसंसी जियकोहे जियमाणे जियमाए जियलोहे जियइंदिए जियनिद्दे जियपरीसहे जीवियासमरण- भयविप्पमुक्के तवप्पहाणे गुणप्पहाणे एवं करणचरणणि- ग्गहणिच्छयअनवमहवलाघवखंतिगुत्तिमुत्तिविजामंतवंभ- वेयनयनियमसच्चसोयणाणदसणचरित्तउराले घोरे घोरव्व- ए घोरतवस्सी घोरबंभचेरवासी उच्छूढसरीरे संखित्तविउल- तेउलेस्से चउद्दसपुवी चउणाणोवगते,पंचहि अणगारसए; * ज्ञातासूत्र के सूत्र ४ से प्रारभ (२) सेठियाजेनग्रन्थमाला हिं सद्धिं संपरिबुडे,पुव्वाणुपुचि चरमाणे, गामाणुगामंदृह- जमाणे, सुहंसुहेण विहरमाणे जेणेव रायगिहे गरे, जेणेव गुणसीले चेहरा तेगामेव उवागच्छह। उवागच्छित्ता प्रहा- पडिरूवं ओग्गहं ओगिरिहत्ता संजमेण तवमा अप्पाणं भावेमाणे विहरति । ॥ २ ॥ भावार्थ-उस आरे के उस समय में, अमगा भगवान् महावीर के शिव्य आर्य मुधर्माचार्य, जो कि उत्तम जाति और उत्तम कुलवाले बल रूप शरीर की प्राकृति विनय ज्ञान दर्शन चारित्र और लाघव-- अर्थात् थोड़ी उपाधि रखनेवाले और नीन गाग्वों के त्याग-सहित ये । उनका मन सदा उन्नत, शरीर तेजस्वी मोर वचन बट प्रभावशाली थे । वे यशस्ती, क्रोच मान माया लोभ को जीतने वाले, पाचों इन्द्रियो को वशमें करने वाले तया निद्रा और परीवह को जीतने वाले थे। उन्हें न जीते रहने की ला- लमा यी न मरण का टर | तप ही उनका साध्य या तपके द्वारा प्रधान, और सयमादि गुणों के द्वारा प्रवान थे। पिगडशुद्धि आदि तथा मुनिधर्म (महाव्रत) के अनुष्ठान और विनय में तत्पर थे । आर्जन-निष्कपटना, मार्दव- निरभिमानता, लायन, क्षमा, गुप्ति और मुक्ति- निर्लोभता से युक्त थे । विद्या, मन और ब्रह्मचर्य से युक्त, वद-लौकिक और लोको- त्तर आगम, तथा नय आदि को जानने वाले, अभिप्रह अादि नियों को पालने वाले, मन्य, शौच--- द्रव्य से निर्लेप नया भाव की अपेक्षा समाचारी--को पालन करने वाले,ज्ञान वर्णन चारित्र प्रधान,गग द्वेष प- गिह आदि को जीतने वाले, घोर ततो को पालने वाले, घोर तपस्या करने वाले, घोर ब्रहाचर्य पालने वाले, शरीर की शुश्रूषा आदि न करने वाले, अ- पनी विस्तृत तेजोलेश्गा को सक्षिप्त करने काम में न लाने वाले, चौदह पूर्वो के ज्ञाता, मति श्रुत अवधि और मन पर्याय ज्ञानों से युक्त, पाचसौ शि- ष्यों से घिरे हुए, एक दूसरे के आगे पीछे चलते हुए; मानन्द से कमश.

सुखविपाकसूत्रम् अनेक गावों में विहार करते हुए,उस राजगृह नगर के उसी गुणशील नामक चैत्यालय मे पवारे । पधार कर, मुनियों के योग्य स्थान पाकर सयम और तप से आत्म-भावना करते हुए सुख से विहार करने लगे ॥ २ ॥ मूलम्-ततेणं रायगिहे नगरे परिसा निग्गया, धम्मो कहिओ परिसा जामेव दिसंपाउन्भूया, तामेव दिस पडिग- या। तेणं कालेणं तेणं समएणं अजसुहम्मस्स अणगा- रस्स जेट्टे अंतेवासी अजजंवू णामं अणगारे कासवगोत्तण सत्तुस्सेहे, जाव अजसुहम्मस्स थेरम्स अदृरमासंते उड़े- जाणू अहोसिरे झाणकोटोवगते संजमेणं तवसा अप्पाण भा- वेमाणे विहरति । तते णं से अजजंबू णामं अणगारे जा: यसड्ढे जायसंसए जायकोउहल्ले संजातसड्डे संजातसंसए संजातकोउहल्ले,उप्पन्नसड्डे उप्पन्नसंसए उत्पन्नकोउहल्ले,स- मुप्पन्नसड्डे समुप्पन्नसंसप समुत्पन्नकोउहल्ले उठाए उटेति ॥३॥ भावार्थ- इसके अनन्तर, राजगृह नगर से एक जनसमुदाय (परिपत्) सुधर्मास्वामी की वन्दना करने के लिए आया । सुधर्मास्वामी ने उसे धर्म का उपदेश दिया । वह समुदाय जिस दिशासे---- जिस तरफ से आया था, उसी दिशा--- उसी तरफ चला गया। उसी काल के उसी ममय में आर्य मुवर्माचार्य मुनिराज के सब से बडे शिष्य, कश्यपगोत्रीय ७हाथके(यायत)मार्य जम्बृस्वामी नामक स्थविर,सुधर्माचार्य के न बहुत दूर ही बैठे थे न बहुत पास ही,अर्थात् थोडी सी टूर बेठे थे,तथा ऊपर को घुटना और नीचा शिर करके-गोदुहासन मे ध्यान रूपी कंठ मे प्राप्त थे और सयम तथा ता के द्वारा आत्मा का ध्यान करते हुए विचरते थे। इसके बाद स्थविर जम्बृस्वामी को पदायों के जानने की इच्छा हुई । क्योंकि उन्हें यह सन्दे- ह हुप्रा कि भगवान् महावीरने जिस तरह दस अगों का उपदेश दिया है, उसी तरह ग्यारहवं अगका उपदेश दिया है, या और किसी प्रकार ? इस (2) मेठिया मनाप्रमाला नगह उन्हें नगर होने के उन्मुस्ता पैदा हट न लिए (जम्गुम्बामी। नहा में उट गट तुप ॥ ३ ॥ मलम- उद्याप उहिता जणामेव अनसुहम्मे चंग तेणामेव उवागच्छद उवागन्छिना अचमुहम्मे तिवृत्ती याहिणपयाहिंगा करंद , करहनावंदति नमः सनि, पंदित्ता नमंमित्ता अन्नमुहम्मरस थेरम्म नन्चासन्ने नाहदरे मुम्मममाणे णमंसमाणे अभिमुहं पंजलिउडे विण- गणं पन्जुवासमाणे गवं वयामी-जह गां भंते! ममणेणं भगवया महावीगणं आहगरेण नित्यगण मयंमंबुद्धणं पुरि- मुत्तमेणं पुरिसमीरणं पुरिसवरपुंडगएणं पुरिमवग्गंधहन्थि- rf लोगुनमेण लोगनाहेण लांगहिणं लोगपवणं लोगप- बोयगाणं अभयढपणं मरणदएरंग चवखुदपण मन्गहरणं पोहिदाग धम्मदामा धम्मदेमा धम्मनायगेण धम्मसार. हिएणं धम्मवरचाउरंतचमवाहिणं अपटिहयवरनागदसणध. रेण विद्याछ मेग जिणेग जावां तिण्णणं नारएगा बुदणं पोनगणं मुनग मोयगेण मव्यगणणं मव्वदंमिण सिवमय- लमभ्यमणंतमक्खयमव्यावाहमपुणरावत्तिय मामयं ठाण. मुवगनेणं दुहविवागाग अयम पन्नते. सुरविवागाणंभंते! ममगोणं जाव संपत्तण के अट्टे पत्नत्ते ॥४॥ भावार्थ- नट का जहा मुधमांना स्थविर ये यहा गये । डा संक मुबमाचार को दभिगा दिशा मे नीन नगर प्रनिगा । परिक्रम) १ ज द गमुरमा यार का भित्री र किन इतुरनुमा तने 7 लिए उनका भित्र प्रयोग यि गया मे-जन्यू म्वामी मा न्यान हुई, इस साल या प्रान हुई । प्रयवा उन्ह जानने कभन्दा वयानि मगर हुमा, मंगर: आर इन्दिमुल हुई। । •ानास पाउनाम ।

सुखविपाकसूत्रम् तीर्थकर, " की । प्रदक्षिणा करके स्तुति और नमस्कार किया । स्तुति और नमस्कार करके आर्य सुधर्माचार्य स्थविर से थोड़ी सी दूर पर, सेवा करते हुए और नमस्कार करते हुए साम्हने बैठे | सुनने की इच्छा करके और हाथ जोड़कर विनयपूर्वक इस प्रकार बोले-हे भगवन् ! श्रुत-धर्म की आदि करने वाले अर्थात् आचार आदि सूत्रो के मादि उपदेशक, अपने आप ही ज्ञान प्राप्त करने वाले, समस्त पुरुषों में रूपादि अतिशयो की अपेक्षा उत्तम, वीरता आदि गुणों से पुरुषों में सिह के समान, पुरुषों में पाप अदि से रहित होने से पुण्डरीफ- सफेद कमल के समान, पुरुषों में गन्धहस्ती के समान, (जिस तरह गन्धहस्ती की गन्ध से सब हाथी भाग जाते है उसी तरह जहा भगवान् जाते, वहा से ईति भीति तथा मिथ्यामतवालों के भाग जाने से भगवान् को गन्धहस्ती की उपमा दी जाती है) लोक मे सब से श्रेष्ठ लोक के नाथ लोक ( छह जीव निकाय ) का हित करने वाले, श्रद्धावान् पचेन्द्रिय जीवों को धर्म का उपदेश देने के कारण दीपक के समान, सूर्य के समान लोक ज्ञान का प्रकाश करने वाले, जीवों को अभयदान देने वाले, नाना आपत्तियों में फंसे हुए जीवों को मोक्ष रूपी शरण देने वाले, श्रुतज्ञान रूपी चक्षुको देने वाले, सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्पक्चारित्र रूप मोक्षमार्ग को देने वाले सम्यक्त्व तया चारित्र रूपी बोधि को देने वाले, सामायिक आदि चारित्र-धर्म को देने वाले, श्रुत- चारित्र रूपी धर्म का उपदेश देने वाले, धर्म के नेता,धर्म रथ का चलाने के लिए सारथी के ममान, जैसे चक्रवर्ती चागे दिशाओं में विजय पाता है उमी तरह,चारोगतियों पर विजय प्राप्त करने वाले,केवल-ज्ञान और दर्शन को चारण करने वाले,शठता रहित, राग द्वेष को जीतने वाल, उगस्यों को राग द्वेष जिताने वाल, स्वय तिरने वाले और दूसरों को तारने वाले तावज्ञान प्राप्त करने और कराने वाले, धनादि वाह्य परिग्रह आर क्रोधादि अन्तरंग - " (8) मेठियानमाला परिग्रर को होने वान, तथा तृमगे में छाने वाले, मर्वत और मांदगां, कल्याग म्बम्प अचल नीगंग अन्तरहित वाचा गहन जिममे फिर नहा लौटने मे निन्यस्थान (मोक्ष) को प्राप्त होने गन्न, अमग भगवान महा- वाग्ने दुग्वविपाक का अर्थ का है, किन्तु हे प्रन्य! उन श्रागभगवान्ने गोक्ष को जाने हुए मुग विपाक का क्या अर्थ कहा है ||१|| मलम्-तते गं से सुहम्मे अणगारे जंवृअणगारं एवं घयामी-एवं खलु जंब : ममणेगं जाव संपनेणं सुह विवा- गागां दस अज्झयणा पणता । तं जहा-सुबाहु १ भरनं. दी२ सुजाया सुवासवेट नव जिणदाने धणपती यह महव्यलो ७ भदनंदी ८ महचंटे १ वरदले १० ।।५।। भावार्थ- जम्य स्वामी का प्रश्न मुनगा मुधर्मावामी अप- गार बाल--- नन् ' [यावत] मुक्ति को प्राप्त डा श्रमण भगवान महा- वीग्ने मुग्वविपाक के दश अध्ययन ननाए है ! व डा प्रकार है- १ मु- नाट २ भहनन्दी ३ मुनान ४ मुवानव ५ जिन्दाम ६ वनपति ७ महा- बलभद्रनन्दी महचत नयाँ १० रन ॥ ५ ॥ मूलम्---जह णं भंते ! ममणेणं जाव संपत्तणं सुरविवा- गाणं दस अज्मयणा पण्णत्ता , पहमरस गां भंते ! अज्झय- एस्स मुरविवागाणं ममगोगं जाव संपत्तेणं के अहं पण्णते? । M भावार्थ-जम्बू मामा बोले भगवन् '(पावत्)मुक्ति को प्राप्त हुए भगवान ने मुग्मविपाक के दम अध्ययन कहे है। किन्तु ह भगवन! उन मुक्ति को प्राप्त हुए भगवान ने उनमे में, पहिले अध्ययन में क्या पनाया है ॥ ६ ॥ मुलम्-तते ण से मुहम्मे अणगारे अणगारं एवं वयासी-एवं खलु जंव! तेणं कालेणं तेणं समएणं हत्थिसीसे सुखविपाकसूत्रम् (७) , णामं णगरे होत्था। रिद्धस्थिमियसमिद्धे, पमुहयजणजाणवए, आइण्णजणमाणुस्से , हलसयसहस्ससंकिटविकिट्टलट्टपण्ण- त्तसेउसीमे, कुक्कुडसंडेयगामपउरे, उच्छुजवसालिकलिए, गोमहिसगवेलगप्पभूते, आयारवंतचेझ्यजुवइ विविधसंणि- विट्ठबहुले, उक्कोडियगायगंठिभेदयभडतक्करखंडरक्खर- हिए, खेमे, णिरुवद्दवे, सुभिक्खे,वीसत्थसुहावासे, अणेग- कोडीकोडुबिधाइण्णणिव्वुयसुहे, णडणगजल्लमल्लमुट्टिय- वेलंबगकगपवगलासगाइक्खगलंखमंखतृणइल्लतुंववी- णियअणेगतालायराणुचरिए , आरामुजाणअगडतलाग- दीहियवप्पिणिगुणोववेष नंदणवणप्पगासे उविद्वविउलग- भीरखातफलिहे , चक्कगयमुसुंढिओरोहसयग्घीजमलक- वाडघणदुप्पवेसे, धणुकुडिलवंकपागारपरिक्खित्ते, कविसी- सयवटरइयसंठियविरायमाणे, अद्यालयचरियदारगोपुरतोर- णउण्णयसुविभत्तरायमग्गे , छेयायरियढफलिहइंदकीले , विवणिवणिच्छेत्तसिप्पियाइण्णणिव्यसुहे, सिघाडगनि- गचउक्कचचरपणियावणविविहवत्थुपरिमंडिए, सुरम्मे, पर- बइपविहण्णमहिवइपहे, अणेगवरतुरगमत्तकुंजररहपहकर- सीयसंदमाणीआइण्णजाणजुग्गे विमउलणवणलिणिसो- भियजले, पंडुरवरभवणसण्णिमहिए, उत्ताणणयणपेच्छ- णिजे, पासादीए, दरिसणिज्जे, अभिरुवे पडिरूवे । तस्स णं हत्थिसीसस्स णयरस्स बहिया उत्तरपुरस्थिमे दिसिभागे एस्थ णं पुप्फकरंडे णाम उजाणे होत्था । सव्वोउयपुप्फ- फलसमिद्धे, रम्मे, नंदणवणप्पगासे पासाईए दरिसणिज्जे अभिरुवे, पडिरूवे, तत्थ णं कयवणमालपियस्स जक्खस्स जक्खायतणे होत्था ॥७॥ (१ उब० प्रारम्भ).

15) मेटियानग्रन्थमाला - -- भावार्थ- जल यानी करने पर ) गुमांचा जन्यधामाम टम प्रकार जाने लगे है ! म असमर्पिगी के नौयं मार के उम समय में दम्निा नाम का नगर या । बढ़ नगर, अनेक भवनों में भूषि- स, मय हित नया धन वान्यादि मे भरा था। वहां कहने वाले लोग मदा प्रसन्न रहने थे। यह जन-समद, मे मगया। किसानों ने लाखों हलों में अधिक मीमा वाली टा नग पाम का- सब जगह की जमीन को जोनकर बीज बोने योग्य बना लिया था। उन नगर में मार और मुगी के पालने वालों के जहन में टोले गहने थे। यहाटेच जो चामल मादि मनानी की जमीन थी। बदतमी गाठ भर्म और भेटे याँ । हा मुन्दर २ चैत्यालय और वेश्याफे मुहटे भी बहुत थे। किंतु उन नगर में लाच (घुस)लेने वाली उचकी तुंटों चांगे मुंगीवाटी का और गगका उपद्रव नहीं था । किमीका बुग नहीं होता था। भिन्नुकको मिया बी मुगमता से भिन्नती । मलिर वहा विधानपान और निर्भय लोगों का शुम नि. वाम था । अनेक प्रकार के समान नमुद कुटुम्बियो और मन्नुट लोगों में भग याः इसलिए मुसम्प था 1 यहा नाटक करने वाले, नाच कग्नवाले, गजाकी स्तुति करनेवाले ( चाग ) मद, विदृषक, क्या कहने गाले, नगरु, भाइ, न्योतिषी, अथवा स्वम-शास्त्र आदि जाननेवाले, वाम पर खेलने वाले, चित्र दिखाकर भिक्षा मागने वाले, नुग-एक प्रकार का वाजा- बनाने वाले, चीगा बजाने वाले ताली बजाकर नाचने वाले- इत्यादि लोग रहते थे । फनगडी आग बगीचे, कुया, तालाब, नावड़ी और उपजाउ खेतो मे युक और नन्दन बन के ममान शोममान था। ऊची चोटी और गहरी ग्वाई थी, जोकि पर चोटी और नीचे सकटी धी । चक्र, गदा मुमुगटी अवगेव (बीच का कोट) नया सेंकडों आदमियों मो नाश करने वाली ऊपर लगाई हुई महाशिलामय गनती (चलन) तरा छिद्र रहित किवाड़ों के कारण उन में घुसना बडा कठिन या ! टेटे .

मुखविपाकसूत्रम् (e) - ~ भी ज्यादा टेढ़े परकोटे से घिरा हुआ था । भनेक सुन्दर २ कंगुरों से मनोहर था । ऊची अटारियों, परकोटा के भीतर के आठ हाथ के मार्ग, ऊंचे २ परकोटा के द्वारों गोपुरों तोरणों और चौड़ी चौड़ी सड़कों से युक्त पा । चतुर शिल्पकारों द्वारा बनाए हुए भागल भौर इन्द्रकील (नगर द्वार का एक भाग) से युक्त था । बाजार मौरं वणिकों के बहुत स्थान थे। कुंभार आदि से वहा के निवासियों को बड़ा आराम रहता था । तिरस्नों चौरस्तों चत्वरों (बहुत रास्तों का संगम स्थान) और नाना तरह के वर्तन आदि के बाजारों से शोभित था । अति रमणीय था। वहां का राजा इतना प्रभावशाली या कि उसने अन्य समस्त राजाओं के तेजको फीका करदिया था। अनेक अच्छे अच्छे घोड़ों, मस्त हाथियों रथों,गुमटी वाली पालखियों,स्पन्दमान(पुरुष प्रमाण पालखी)गाड़ी आदि और युग्यों (एक प्रकार की सवारी) से युक्त था । उस नगर के जलाशय, नवीन कमल कमलिनियों से शोभित थे । वह नगर चन्द्रमा जैसे स्वच्छ उत्तम उत्तम महलों से युक्त था। वह इतना म्वच्छ था कि विना पलक मारे (एक टक) देखने को जी चाहता था । देखते ही चित्त प्रसन्न हो जाता और आखों को आराम मिलता था । बड़ा ही मनोज्ञ था। देखने वालों को उसका जुदा २ ही रूप मालूम होता था । इसी हस्तिशीर्ष नामक नगर के बाहर ईशान कोण में पुष्पकरगडक माम का उद्यान था । वह सर्व ऋतुमों के फूल और फलों से सम्पन्न था । नन्दन वन की तरह रमणीय या । देखते ही चित्त को प्रसन्न कर देता और भाखों को बड़ा आनन्द आता था। बड़ा ही मनोज्ञ था । देखने वालों को जुदा जुदा ही रूप दिखाई देता था । इसी उद्यान में कयवण- मालपिक (कृतवनमालप्रिय) नाम के एक यक्ष का यक्षायतन था ॥७॥ मूलम्-चिराइए, पुव्वपुरिसपएणत्ते, पोराणे, सद्दि- १ स्व. पत्र ४ पृ० २५०१ से प्रारभ ।

(१०) मेडियाजनप्रन्यमाला हावे, - - ए, वित्तिए, णाए, सच्छत्ते, सज्झए, सघंटे, मपडागे, पडागाइपडागमंडिए, मलोमहत्ये, कयवेपहिण, लाउ- स्लोइयमहिए, गोसीससरमरत्तचंदणदहरदिण्णपंचंगुलि • तले , उवचियचंदणकलसे, चंदणघडसुकयतोरणपडिदु- वारदेसभाए , आसत्तोसत्तविउलवद्वग्घारियमल्लदामक- पंचवरागासरससुरहिमुक्कपुष्फपुजीवयारकलिए , कालागुरुपवरकुंदुझफतुनकध्वमवमनगंधुद्धयाभिरामे , सुगंधषरगंधगंधिए, गंधवधिभूए, णडणगजल्लमल्लमुटिय- संपयपबगकहगलासगआक्खगलंखमंखतृणहल्लतुंयवि णियभुयगमागहपरिगए,यहुजणजाणवयस्स विस्सुयकित्तिए, बहुजणस्स आहुरस आहुणिज्जे , पाहुणिज्जे, अञ्चणिज्जे बदणिज्जे , नमंसणिज्जे पूयणिज्जे, सकार णिज्जे , सम्माणणिज्जे, कल्लाणं मंगल देवयं चेइयं विण- एणं पज्जुवासणिज्जे, दिव्वे सच्चे सच्चोवाए, सण्णिहिय- पारिहरे जागसहस्सभागपडिच्छए, बहुजणो अच्चेह आगम्म पुप्फकरंडचेयं कवणमालपियस्स जक्खस्स जक्खा- यतणं ॥८॥ भावार्थ-यह यक्षायतन, प्राचीन कालीन पूर्व पुरुषों द्वारा सन्मा- निन, पुगना, प्रसिद्ध, पागधन करने वालों को जीविका देने वाला, न्याय का निर्णय करने वाला, घटा सहित, ध्वजा और ध्वजा के ऊपर की ध्वजामों से मंडित और रोम की पूंजणी से युक्त या। उसमें वेदी बनी हुई थी। गोबर से लीगा हुआ था । खडिया मिट्टी से पोता हुआ था यहा साजे विसे हुए मल्यागिर और लाल चदन से पाच अंगुलियों का हाथ (थापा) बनाया हुआ था। चैत्यालय के बाहर मागलिक घट बने हुए थे। अच्छे २ सोग्ण हरएक द्वार पर वधे हुए थे । वहा भूमि को भौर सुखविपाकसूत्रम् . - ऊपरी भाग को छूती हुई, विपुल विस्तार वाली गोल और लम्बी २ मालाए थी। पाचों रंगों के फूलों से युक्त था । महकती हुई मगर आदि की सुगंध से मुगधित, तथा चीड और लोचान आदि उत्तमोत्तम गंध वाले द्रव्यों से युक्त था । बहुत मुगव वाला होनेमे ऐसा मालूम होता था, जैसे गंध-द्रव्य की गोली हो । वहा नट,नाचने वाले, रस्से पर खेल करने वाले, मल, मुष्टि युद्ध करने वाले, विदूपक, तैराक, कथक, रास को गाने वाले, शुभाशुभ को कहने वाले, ऊचे वास पर खेलने वाले, चित्र दिखा. कर भिक्षा मागने वाले, तण और वीणा बजाने वाले भोजक और भाट आदि लोगों से युक्त या । बहुत नगर निवासियों में उसकी कीर्ति प्रसिद्ध थी। अनेक लोग मत्रोच्चारण करके वहा आहुति देते और भाराधन करते थे । चन्दन गध आदि से, स्तुति से, नमस्कार से, फूलों से और वस्त्रों से पूजनीय या । इष्टसिद्धि, अनिष्टके निवारण के लिए, देव तथा देव की प्रतिमा प्रधानरूप में सेवन करने योग्य है ऐसा समझ कर पूजनीय था। सत्य-आदेश करने से सत्य, और सत्य प्रभाव-महिमा वाला था। अधि टायक देवों ने उसकी महिमा बढा रक्खी थी। हजारों यज्ञों का भाग उसे प्राप्त होता था। उसमे बहुत लोग पाकर पूजा करते थे । इस प्रकार का पुष्पकरण्डक चैत्य कृतवनमालप्रिय नाम के यक्ष का यक्षायतन था॥८॥ मूलम्-से णं पुप्फकरंडे चेइए कयवणमालपियरस जक्खस्स जक्खायतणे एक्केणं महया वणसंडेणं सवओ समंना संपरिक्खित्त,से णं वणसंडे किण्हे किण्होभासे नीले नीलोभासे हरिए हरिओभासे सीए सीओभासे गिद्ध णिद्धो भासे तिव्वे तिव्वाभासे किण्हे किण्हच्छाए नीले नीलच्छा- ए हरिए हरियच्छाएसीएसीयच्छाएणिद्धे गिद्धच्छाए तिब्वे तिब्वच्छाए घणकडिअकडिच्छाए रम्मे महामेहणिकुरंषभूए ।

सेठियाजमग्रन्थमाला . 4 भावार्थ- पुष्पकरण्ड उद्यान में,वह कृतवनमालप्रिय नामक यक्ष का यक्षायतन, एक बड़े वनखण्ड ( अनेक जाति के वृक्षों के समूह को वन- खण्ड कहते हैं)से चारों तरफ विरा हुआ था। वह वनखण्ड कहीं काला और काली प्रभा वाला था, कहीं नीला और नीली प्रभावाला था,कहीं हरा और हरी प्रभा वालाथा। किसी जगह शीतल और शीतल-प्रमथा। किमीस्थान पर स्निग्ध और स्निग्वाम या तीव-वर्ण और तीव्र प्रभावाला था। किसी जगह वह कृष्ण होने से कृष्ण छाया वाला था । किमी जगह मोर के गले की तरह नीला होने से नील छाया वाला था । अन्यत्र तोते के पख के समान हग था, भतएर हरी छाया वाला था। कहीं शीत था, अत शीत छायावाला था। कहीं स्निग्ध या, अतएव स्निग्ध छाया वाला था। कहीं तीन वर्ण था. अत तीन हाया वाला था। वह शाखा प्रशाखाओं सहित था, इमलिए- वहा सदा छाया रहा करती थी । वह पेसा मालूम होता था, जैसे बड़े २ वादलों का समूह हो ॥ ६॥ मूलम्-ते णं पायवा मूलमंतो कंदमंतो खंधतो तयामतो सालमंतो पवालमंतो पत्तमंतो पुष्फमतो फलमंतो घीयमंतो अणुपुव्वसुजायरुइलवभावपरिणया एक्कखंधा अणेगसाला अणेगसाहप्पसाहविडिमा अणेगनरवामसुप्प- सारिजअग्गेझघणविउलवहखंधा अच्छिदपत्ता अविरल. घसा अवाईणपत्ता अणईहपत्ता निद्भुयजरढपंडुपत्ता णवह- रियभिसंनपत्तभारंधकारगंभीरदरिसणिज्जा उवणिग्गयणव- १ वाचनान्तर में-- पाईणपडीणाययसाला उदीणदाहिणवित्थि- राणा ोण्यनयाणयविप्पहाइयोलयपलयलयसाहप्पसाहविरिमा प्रवाईणपत्ता अणुए पत्ता इतना पाठ अधिक है। अर्थ-उनकी गाखाए पूर्व और पश्चिम म लम्बी उत्त और दक्षिण दिशा में चौड़ी थीं, अधोमुस होरर नीचे को.झुकी हुई थीं। कोई झुकती जा रही थीं। फैली हुई मी तथा नीचे की भोर यव लम्बी चली गई थीं।

सुलविपासूत्रम् (१३) तरुणपत्तपल्लवकोमलऊबलचलंतकिसलयसुकुमालपवाल • सोहियवरंकुरग्गसिहरा णिचं कुसुमिया णिच्च माझ्या णिच्च लवड्या णिच्चं थवझ्या णिच्चं गुलझ्या णिच्चं गो. छिया णिच्च जमलिया गिच्च जुबलिया णिच्चं विणमिया णिच्चं पणमिया मिच्चकुसुमियमाझ्यलवड्यथवइयगुलइयगो- च्छियजमलियजुवलियविणमियपणमियसुविभत्तपिंडमंजरि- वडिंसयधरा, सुयवरहिणमयणसालकोइलकोहंगकभिंगारक- कोंडलकजीवंजीवकणंदीमुहकविलपिंगलक्खकारंडचक्कवाय- कलहंससारसमणेगसउणगणमिहुणविरइयसदुष्ायमहुर- सरणाइए, सुरम्मे, संपंडियदरियभमरमहुकरिपहकरपरिलि- न्तमत्तछप्पयकुसुमासवलोलमाहुरगुमगुमंतगुंजतदेसभागे,अ. भतरपुष्फफले याहिरपत्तोच्छण्णे पत्तेहि य पुप्फेहिय उच्छ- गणपडिवलिच्छण्णे साउफले निरोयए अकंटए णाणाविह- गुच्छगुम्ममंडवगरम्मसोहिए विचित्तसुहकेउभूए वावीपुक्ख- रिणीदीहियासु य सुनिवेसियरम्मजालहरए पिडिमणीहारि- भसुगंधिसुहसुरभिमणहरं च महया गंधद्धणि मुयंता णा- णाविह गुच्छगुम्ममंडवकघरकमहसेउकेउबहुला अणेगरह- जाणजुग्गसिषियपविमोयणा सुरम्मा पासादीया दरिसणिना अभिरुवा पडिरूवा ॥ १०॥ 'भावार्थ- उस वनखण्डके धृक्षोंमे उत्तम जड़ें कद् तने छाल शाखाए अंकुर पचे फूल फल और बीज थे । वे गोल गोल वृक्ष, क्रम से लगे हुए बड़े मनोहर मालूम होते थे। उनमें एक ही एक स्कन्ध और अनेक शाखाए और प्रशाखाए थीं । भनेक मनुष्यों के वाह फैलाने पर भी उनका तना वाम (वाहों) में नहीं सकता था। उन वृक्षों के पत्तों मे छेद न ये, तथा वे घने थे, नीचे मुके हुए थे, वे ईति रहित थे। उनमे पुराने मेटियाजनप्रायमाला । भोर पीले पत्ते नहा यानीन मौरी हरे पतों के समुदाय के अन्ध. कार से गमीर दीयते ये निकले हुए चचल नवीन २ पत्तों से, नाम नरम और उचल विशनयों से तमा मुन्दर कोप्रलों मे टनक प्रकर और अपमाग गोभायमान 2.1 हमेशा प्रले रहते.थे। हमेशा मोर r--- वाले रहते थे । सदा पत्तो वाले रहते थे । सदा मृमके वाले रहते थे । सदा गुल्म वाले रहते थे। मटा गुच्छे ले रहते थे। .मदा एकही श्रेणी में रहते थे। सदा दो दो माय रहते थे। सदा फल फलों से नमें हुए रहते थे। कोर्ट सदा नमते जा रहे थे। इसलिए व वृक्ष मदा फूले रहने, मौर युक्त म्हते, पल्लवित रहते, ममके वान रहते, गुच्छे चाले ग्हते, श्रेणीबद्ध रहतं, दो दो माय में रहते, फला के मान से .नमे रहते और कोई नमते जारहे थे। तथा अच्छी तरह उत्पन्न हुए गुच्छे मोर मजरी रूपी लिवर को धारण करने वाले वृक्ष उन वनरागड में थे। उन चनवाट मतोता मना मोर कोयल कोहंगफ (कोभगक) भिगार कोटलक चकोर नन्दीमुग्न कपिल पिंगलाक्ष काण्ड चक्रवाक (त्रका) कलहन माग्स आदि अनेक पक्षियों के जोडा के द्वारा मयुर शाद और पालाप दुआ करता था । वह अतिशय रमणीय या । यहा महोन्मत्त भ्रपर और भागियों के समूह के समूह इकडे रहते थे । और दूसरी दृनरी जगहों मे आने वाले फलों के रस के लोभी भोरे उस प्रदेश मे. 'गुन गुन' शब्द (गृज) किया करते थे | उम वनखगट के वृक्षो क अन्दर, फल फूल थे और बाद पत्तों से ढके हुए रहते थे। वे वृक्ष पत्तों और फलोंसे बिल्कुल टके रहते थे। उनके फल बडे मीठ नीरोग और काटी से गान ये। नाना प्रकार के गुन्हों(वल आदि के )गुल्मों (मालती आदि-टताओं) और लता-मगटपों से गमणीय थे। वहा (वनवगड में) जगह-जगह मागलिकध्वजाए यी । वहा बावड़ी(चौको- ग) पुष्करिणी और दीपिकाओ, परझरोखे वाले मकान बने हुए थे। बहुत दूर तक फैलने वाली शुभ ग को छोड़ने वाले अनेक वृक्ष ये उनके अने.

सुखविपाकसूत्रम् १०) تست - क गुच्छ गुल्म और मटप- गृह थे । उनके नीचे थाले- क्यारिया और ऊपर ध्वजाए थीं । वहा अनेक स्य गाडी पालती आदि सवारिया रक्खी जा सकती थीं । बड़े रमणीय थे। देखते ही चित्त प्रसन्न हो जाता था। 'दर्शनीय और मनोहर थे । देखने वालों को उनका जुदा जुदा सा ही रूप दीखता था ॥१०॥ मूलम्-- तस्स गंवणसंडस्स बहुमज्झदेसभागे एत्थ गां महं एके असोगवरपायवे,पण्णत्ते , कुसविकुसविसुद्धरु- क्खमूले मूलमंते कंदमंते जाव पविमोयणे सुरम्मे पासा. दीए दरिसणिजे अभिरुवे पडिस्वे ॥ ११ ॥ भावार्थ-उम वनखण्ड के बीचोंबीच एक उत्तम अशोकवृक्ष था। उसके आसपास से दूब घास और अन्यान्7 झाड़िया निकाल दी गई थी। वह जड़ वाला या,कन्द (जड़ से ऊपर और तने से नीचे के भाग) वाला था,(यावत)उसके नीचे रथ आदि रक्खे जा सकते थे । वह बडा रमणीय था। उसे देखते ही चित्त प्रसन्न हो जाता था। देखने से आखों को कुछ भी कष्ट नहीं होता था । अत्यन्त मनोहर या। देखने वालों को उसका रूप नया और जुदा जुदा ही दिखाई देता था ॥११॥ १ वाचनान्तर-दूरोवगयकन्दमूलवलसठियसिलिट्ठघणमसिण- णिद्धसुजायनिरुवहउन्विद्धपवरखधी, अणेगनरपवरभुयागेझो, कुसुम- भरसमोनमन्तपत्तलविसालसालो,महकरिभमरगणगुमगुमाइयनिलितउ- इिंतसस्सिरीए, णाणसउणगणमिहुणसुमहुर करणसुहपलत्तसहमहुरे ॥ अर्थ---उस अशोरवृक्ष की जड़ें धरती में घुमी थीं । उसका तना गोल मनोज्ञ सुदर भाकार वाला मीधा मोटा नरम चिन्ना विकार रहित,खूब ऊचा और उत्तम था। अनेक मनुष्यों की लम्बी लम्बी बाहों में भी नहीं पाता था। उनकी डालिया फूलों के बोझ से झुती हुई, पत्ते वाली और बड़ी थी । उस पर भ्रमरी और भ्रमर 'गुनगुन' शब्द करते हुए बैठे थे और कोई २ उड रह थे, इससे उसकी शोभा.दढ़ गई थी। इनके मिवाय नाना तरह के पक्षियों के जोडो की कानो-को मानन्द देने वालीमधुर बचहाहट से वह और भी मनोज्ञ जान पड़ता था। 1 HRomanty . - सेठियांजनप्रन्यमाला मृलम्-सेणं असोगवरपायवे अपणेहिबहहिं तिलएहिं लउएहिं छत्तोवेहिं सिरीसेहिंसात्तपण्णेहिंदहिवपणेहिलोदेहि धवेहिं चंदणेहिं अज्जुणेहिणीवहिं कुडएहिंसवेहि फणसेहिं दाडिमेहिं सालेहिं तालेहिं तमालेहिं पियएहिं पियंगहिपुरोष. गेहिं रायस्क्सहिंदिरक्खेहिंसव्वओसमंतासंपरिक्खिते, ते ण तिलया लवड्या जावणंदिरक्खाकुसक्कुिसविसुद्ध रुक्खमूला मूलमंतो कंदमतो एएर्सि वण्णमो भणियव्यो, जाव सिवियपविमोयणासुरम्मा पासादीयादरिसणिजाअभि- रूवा पटिरूवा, ते गं तिलया जाव पंदिरुक्खा अण्णाहिं पहहिं पउमलयाहिं णागलयाहिं असोयलयाहिं चपगलयाहिं चूपलयाहिं वणलयाहिं वासंतियलयाहिं अहमुत्तयलयाहिं कुंदलयाहिं सामलयाहिं सवमो समंता संपरिक्खित्ता, ताओणं पउमलयाओ णिचं कमियामो जाववडिंसयध. राओ पासादीयानोदरिसणिजामोअभिरुवाओपडिरूवा- ओ ॥ १२॥ भावार्थ -यह अशोक वृक्ष बलुत से तिलक लीची-वहर शिरीष सप्तपर्ण (सात सात पत्तों के गुच्छे वाला वृक्ष) दधिपर्ण लोध्र धव चन्दन अर्जुन कदम्ब कुटज (कृडा) सव्य पनस दाडिम शाल ताद श्यामतमाल प्रियक फलफेन पुरोपग खिानी (रायण) और नन्दि वृक्षों से, सब तरफ से सब जगह विग हुआ या । उन तिलक वड़हर मादि से लेकर मंदि वृक्ष पर्यन्त मत्र वृक्षों की जड़ें भी घास तथा अन्यान्य झाड़ियों से रहित थीं। उनकी जन्हें धरती में तिठी चली गई थीं। ये व उत्तम कन्द वाले थे। वाचनान्तर में इतना पाठ अधिक है तस्सएंसोगवरपायवस्स उपरि घरवे अट्टअट्टमंगलगा पन्नता। मर्थ- टस भयोक यून के जार बहुत से पाठ भार श्रीवत्स भादि मांगलिक थे।

सुखविपाकसूत्रम् (१७) इसके सिवाय पहले वर्णन की हुई सब वाते उन वृक्षों में समझना चाहिए। (यावत्) वहा भी पालखी वगैरह वस्तुए रक्खी जा सकती थीं (क्योंकि वे वृक्ष भी बहुत लम्बे चौडे थे)। वे बहुत ही रमणीय थे । चित्त को प्रसन्न करने वाले थे । दर्शनीय थे | मनोहर थे । देखने वालो को उनके जुदे जुदे ही रूप दिखाई देते थे । तया वे (तिलक आदि वृक्ष) अनेक पद्मलता- ओं से नागलताओं से अशोक लताओं से चपक लताओं से आम लताओं से वन लताओं से वासती लताओ से अतिमुक्तक लताओ मे कुंद लताओं से और श्याम लताओं से चारों तरफ घिरे हुए थे । वे लताए सदा फली रहती थीं। शिखर को धारण करने वाली और चित्तको प्रसन्न करने वाली थी । हर्प को पैदा करती और मनोहर थी। दर्शकों को उनका रूप अलग २ ही दीखता था ॥ १२ ॥ मूलम्- तस्स णं असोगवरपायवस्स हेला ईसि खंध- समल्लीणे एत्य णं महं एक पुढविसिलापट्टए पण्णत्ते, विक्ख. भायामउस्सेहसुप्पमाणे किण्हे अंजणघणकिवाणकुवलयह- लधरकोसेजागासकेसमजलंगीखंजणसिगभेदरिद्वयजम्बूफल. असणकसणयंधणणीलप्पलपत्तनिकरअर्यासकुसुमप्पगासे मरकतमसारकलित्तणयणकीयरासिवण्णे गिद्धधणे अट्टसिरे आयसयतलोवमे सुरम्मे ईहामियउसभतुरगनरमगरविहग- वालगकिण्णररुरुसरभचमरकुंजरवणलयपउमलयभत्तिचित्ते आइयणगरूयवरणवणीततूलफरिसे सीहासणसंठिए पासा. दीए दरिसणिजे अभिरूवे पडिहवे । तत्थ णं हथिसीसे णगरे अदीणसत्तू नाम राया होत्था ॥१३॥ भावार्थ- उस उत्तम अशोक क्ष के नीचे, तने के पास एक बड़ी पत्थर की शिला थी । वह उचित प्रमाण में चौड़ी लम्बी और ऊंची. थी। उसका प्रकाश अंजनक (वनस्पति विशेष) मेघ, तलवार, नीले कमल, मेठियाजनप्रत्यमाला " बलदेव के नत्र, पासमान, शिर के बाल, काजल की कोटगी, राजन (पहिए का कीर) मींग, अरिष्ट (रत्न विशेप) जामुन के फल, बीजक वृक्ष, सन के फल, नील कमल के पत्तों के समूह और अलसी के फल के समान नीश तया उमका वर्ग इन्द्रनील मणि, कनोटी, चमडे के कमरपट्टे और आखों की पुतली के ममान काना या । वह बहुत चिकनी, आठ कोने वाली और दर्पण के ममान चमकीली थी। बडी गमगीय थी। उस पर. भेड़िया बैल घोडा मनुष्य मगर पक्षी सर्प किनर मृग अष्टापट चमरीगाय हाथी बनलता और पद्मनना श्रादि के चित्र बने हुए थे। उसका स्पर्श कमाये चमड़े की तरह, रुई को तरह, वृ नामक वनस्पति की ताह, मक्खन की तरह और आक की नई की तरह कोमल था। मिहासन सरीखा आकार या । बडी मुन्दर, दर्शनीय, और मनोहर--- इतनी मनोहर कि देखने वालो को जुद जुद पप गाली दीवती थी। उस हस्तिगीप नामक नगर म अदीनशत्र नामका गना या॥१३॥ मृलम्-महया हिमवंतमहनमलयमंदरमहिदसारे अच्च- नविसुद्धदीहरायकुलबंससुप्पन्नृप णिरंतरं रायलक्खणविरा- इअंगमंगे यहुजणवहुमाणे पूजिए सब्वगुणसमिद्धे खत्तिए मुहए मुद्धाहिसित्ते माउपिउसुजाए दयपत्ते सीमंकरे सीम- धरेखेमंकरे खेमंधरे मणुरिंसदे जणवयपिया जणवयपाले जणव. यपुरोहिग सेउकरे केउकरे णरपवरे पुरिसवरे पुरिससीहे पुरि- सवग्ये पुरिसामीविसे पुरिसपुंडरीए पुरिसवरगंधहत्थी अड्डे दित्ते वित्त विच्छिण्णविउलभवणसयणासणजाणवाहणाइपणे यहुधणयहुजायस्वरयते आओगपओगसंपउत्त विच्छडिअ. पउस्भत्तपाणे बहुदासीदासगोमहिसगवेलगप्पभूते पडिपुण्ण- जंतकोसकोडागाराउधागारे बलवं दुबलपचामित्ते ओहय- कस्य नियकंट्य मलिअकंट उद्धियकंटथं अकंटयं ओह- 'सुखविपाकसूत्रम् यमत्त निहयसत्तुं मलियसत्तु उद्विअसत्तु निजियसत्तु परा- इअसत्तु ववगयदुभिक्ख मारिभयविप्पमुक्कं खेमं सिर्व सुभिक्ख पसंतडिवडमरं रजं पसासेमाणे विहरड ।। १४ ।। भावार्थ- वह राजा महाहिमवान पर्वत की तरह, तथा मत्लय, मेरु और महेन्द्र पर्वतकी तरह प्रगन ।। सर्वथा निर्दोष और प्राचीन गज- भश मे पैदा हुया था। उसका शरीर साथिया आदि राजलक्षणों से सर्वत्र शोभित या । अनेक जनसमूहो से सन्माननीय और पूज्य था । सर्व गुण सम्पन्न या । क्षत्रिय या । सदा खुश रहता था और निर्दोष माता से उत्पन्न दुआ था। उसके बाप दादासो ने उस का गज्य अभिषेक किया था। माता पिताकी विनय करने वाला ( सत्पुत्र) या । दयालु था। सीमा (कानून आदि की मर्यादा ) बनाने वाला, और अपने बनाए हुए नियमों को स्वय पालने वाला या । क्षेम ( निरुपद्रवता ) करने वाला और स्वय अम रूप था। मनुष्यों का स्वामी य' । प्रजा को पिना समान था, क्योंकि उसकी रक्षा करता या। प्रजा को पुरोहित सरीखा था , क्योकि शान्ति करने वाला था। सन्मार्ग को बताने वाला था। अद्भुत कार्य करने वाला था। श्रेठ मनुष्यों वाला या और वह स्वय मनुष्यों में उत्तम या ) अपराधियों को दण्ड देने में कर होने से वह पुरुपो मे सिह के समान था। शत्रुओं को भयकारी होने से पुरुषों में यात्र के समान था । पुरुषो मे पुडरीक ( सफे- द कमल ) के समान या । क्योकि मुख चाहने वालो के द्वारा सेवनीय था पुरुषो में गन्धहरती के समान था। क्योकि शत्रु राजा रूपी हाथी उसका साम्हना नहीं कर सकते थे ! सब तरह से सम्पन या। आत्म-गौरव वाला था। विनय आदि गुणों मे प्रसिद्ध य । उसके भवन, शयन (सेज) प्रासन यान वाहन आदि बहुत थे। अथवा उसके विशाल भवन, शयन आसन यान(ग्थ आदि ) वाहन ( घोडा आदि ) से भरे रहते थे। उसके मोना चादी भूमि आदि सम्पत्ति बहुत थी । वह आमदनी के उपा- !

(२०) मेटियाजेनग्रन्थमाला - यों में सदा लगा रहता था। उसन बन आदमियों को भोजन यादि का इतना दान दिया था कि उनमे गारा न जाना था। उसके दास दामी गाय बैल मंड भंसादि बहन ये बलुतने खजाने कोटार और प्रायुधशाला थीं । पर्याप्त सेना थी । उसके शत्रु निर्बल थे । उसने अपने कराटकों (विरोध करने वाले गोत्रजी) का विनाश कर दिया था। कण्टको की सम्पत्ति छीन ली थी। कण्टको को देश निकाला देदिपाया। अत.वह करटकों मे रहित या । तथा शत्रुओं का भी नाम कर दिया था। उन- की सम्पत्ति लूटली थी । गर्व मिटा दिया था। उन्हें देश निकान्ना दे दिया या। उन्ह मौन्दर्य यादि गुगो म जीत लिया था। गनुओ को नि मन्च पर दिया था। वहा ( नगर में) दुकान कभी न पडता या । महामारा आदिका भयन या । मब तरह कुशल था । उपद्रव नहीं थे ( नदा मुभिक्ष (मुकाल) रहता था । राजाने गजकुमार आदि दाग होने वाले उपद्रवी को शान्त कर दिया था। वह राजा इस प्रकार राज्य का शासन करता या ॥१४॥ मृलम्- तस्स णं अदाणसत्तुस्स रणो धारिंगीपा- मोक्ख देवीसहस्सं ओगह यावि होत्या। नसणं अदीणसत्तुस्स रपणो धारिणी णामं देवी मुकु- मालपाणिपाया अहीणपडिपुण्णपंचिंदियसरीग लक्षण- बंजणगुणोववेया माणुम्माणप्पमाणपडिपुण्णसुजायसव्वंग. सुंदरंगीससिसोमाकारकंतपियदसणासुरुवा करयलपरिमि- यपसत्यतिवलियवलियमझाकुंडलुल्लियहियगंडलेहा को- मुइयरयणिकरविमलपडिपुण्णमोमवयणा सिंगारागारचाम्बे- सा संगयगयहसियभणियविहियविलाससललियसलावणि- उणजुत्तीयारकुसला पासादीया दरिसणिन्ना अभिरुवा १ सवाईमन में प्रारम्भ ।

सुखविपाकसूत्रम् (२१) पडिरूवा, अदीणसत्तुएण रपणा सद्धि अणुरत्ता अविरत्ता इहे सद्दफरिसरसरूवगंधे पंचविहे माणुस्सए कामभोगे पञ्चभवमाणी विहरति ॥ १५ ॥ भावार्थ- उस मदीनशत्रु नामक राजा के अन्तःपुर (रनवास) म धारिणी आदि एक हजार स्त्रिया यीं | उनमे धारिणी पटरानी थी। अदीनशत्रु राजा की धारिणी नामकी पटगनी के हाथ पैर बडे ही कोमल थे । उसका शरीर सब लक्षणों से सहित और परिपूर्ण पाचों इन्द्रि- यो से युक्त या । साथिया चक्र आदि लक्षण और तिल आदि ध्ययनों से युक्त था। मान (एक पुरुष प्रमाण जल का कुड भरे, उसमे उसी पुरुष को बैठानेसे यदि एक द्रोण प्रमाण (३२ सेर) पानी कुडसे बाहर निकल जाय, उसे मान प्राप्त कहते है) उन्मान (मनुष्य को तराजू पर बैठानेसे जो आधा भार- परिमाण विशेष- होता हो उसे उन्मान प्राप्त कहते है ) प्रमाण (अपने अगुलों से जो १०८ अगुल हो, वह प्रमाण प्राप्त कहलाता ) के अनुसार ही उसके सब अग बने थे। इस लिए वह सुन्दरी थी। चन्द्रमा जैसा सोम्य और मनोहर अग होने से, देखने वालों को उमका रूप बड़ा ही प्यरा लगता या । मतलब यह है कि वह बहुत सुन्दरी थी। उसकी बीच मे रही हुई शुभ त्रिवलियुक्त कमर मुट्ठी मे आजाती थी। उसके गालों पर की गई पत्र रचना (बेल बुटा ) कानों के कुण्डलों से चमकदार होगई थी । उसका मुख कार्तिक में उदय होने वाले स्वच्छ चन्द्रमाकी चन्द्रिका सरीखा था। उसका वेष सिगार-रसका स्थान सा होगया या। या उसका आकार सिगार से सहित और वेष मुन्दर या । उसका चलना, हॅसना, चेष्टा और कटाक्ष उचित या । प्रसन्नता पूर्वक परस्पर भापण करने मे कुशल, तथा लोकव्यवहार मे चतुर थी । देखने वालों का चित्त देखते ही प्रसन्न होजाता था। वह दर्शनीय थी। मनोहर थी। देखने वालों को उसका नवीन नवीन रूप मालूम होता या । अदीनशनु राजा १ सेठियाजेनप्रन्याला में अनुरक्त थी- विक्न नथी । उमका दम्पसगव और स्वर्ण प्रिय था। वह मनुव्यो के पाच प्रकार के काम- भीगा को भीगती दुई रहती थी ॥ १५ ॥ मृलम्-* तते णं सा धारिणी देवी अण्णया कथाइ संसि नारिसगंसि वासघरंसि अभिंतरतो सचित्तकम्मे पाहिरओ दृमियघट्टमहे विचित्तउल्लोगचिल्लिगतले मणिरयणपणा- सियंधकारे बहुसमसुविभत्तदेसभाप पंचवन्नसरससुरहिम- कपुप्फपुंजोवयारकलिए कालागुरूपचरकुंदुक्कतुम्क्कधूव- मघमतगंधुद्धयाभिरामे सुगंधवरगंधिए गंधवद्विभूए तसि नारिसगंसि सयलिसि सालिगणवहिए उभओवियोयणे गंडवियोयणे दुहओ उन्ना मज्लेणयगंभीरे गंगापुलिणवा- लयउहालमालिसए उवचियखामियदुगुल्लपट्टपडिच्छन्ने सु. विरइयरयत्ताणे रत्नंसुयसंधु सुरम्मे आइशागख्यत्ररणव- णीयतृलफासे सुगंधवरकुसुमचुन्नसयणावयारकलिए अद्वर- त्तकालसमयंसि सुत्नजागरा ओहीरमाणी ओहीरमाणी अयमेयारवं उरालं कल्लाण सिंबं धनं मंगल्लं मरिनरीयं महासुविंग पासित्ता णं पडिबुद्धा ॥ १० ॥ भावार्थ- टसके अनन्त किसी समय वह बारिणी महागनी पुण्यात्माओ के रहने याग्य घर मे, (जिन मे एफशच्या यी) वह घर भीतर चित्रो से युक्त और नहर विम २ करके मुन्दर किया गया था। उसके ऊपर का भाग पिवित्र विचित्र चित्रो में युस्न और नीचे का भाग देदीय- मान या । मणियों और रत्नों से वहा का अन्वकार नष्ट होगया था। वह एकदम समतल (ऊचा नीचा नहा) था । पाची रगों के साल मुगन्धित फूलो से मजा हुआ था। अगर चीड लोबान इत्यादि उत्तम उत्तम नुगन्ध- -भगनती श० ११३० ११-पत्र ५.५५०० ५०६ (ग्रामोदय न०) मे प्रारम्भ ।

सुखविपाकसूत्रम् (२३) । वाले द्रव्यों से बनी हुई चूप की लहलहाती हुई मुगन्ध से रमणीय या । अच्छी और उत्तम गव से मुगवित था। सुगन्ध की अधिकता होने से वह गन्ध की गुटिका (गोली) सा मालूम होता था। उस पुण्यात्माओं के रहने योग्य घर मे (एक शय्या थी) वह शय्या शरीर के बराबर तकिया से युक्त थी । शिर गाल और पैरों के नीचे भी तकिया लगा हुआ था । वह शम्या दोनो तरफ ऊची और बीच में नीची थी। जैसे गगा नदी के तट की रेत पर चलने से पैर नीचे चला जाता है, इसी तरह शय्या पर पैर रखने से पैर नीचे फंस जाता था, क्योकि वह बहुत कोमल थी। कसीदा किए हुए सूती और अलसीमय वस्त्रो का चादर विछा हुआ था। धूल आदि से रक्षा करने के लिए एक वस्त्र था, वह अन्य समय शय्या पर ढका रहता था । वह मच्छरदानी से ढकी थी। अतिशय रमणीय थी। उसका स्पर्श चर्म के वस्त्र(साभरी जैसे) रुई, बृर (वनस्पति विशेष) मक्खन और आक की रुई सरीखा या । मुगधि-युक्त उत्तमोत्तम फलोंसे चूर्णी से तया शय्या को शोभित करने वाली अन्य उत्तम वस्तुओं से युक्त थी। उस सेज पर आधी रात के समय- जब कि रानी न तो गाढ निद्रा में थी और न जाग ही रही थी--- बडा कल्याणकारी, उपद्रव रहित, सौभाग्य काने वाला, मगलमय और मश्रीक (मुन्दर) एक महास्वप्न देखकर जागी॥१६॥ मूलम्- हाररययखीरसागरससंककिरणद्गरययमहासेल- पंडुरतरोरुरमणिजपेच्छणिजं थिरलपउदृवपीवरसुसिलि- विसिहतिक्खदाढाविडंघियमुहं परिकम्मियजचकमलको- मलमाझ्यसोभतलहउहरतुप्पलपत्तमउयसुकुमालतालुजीहं वाचनान्तर मे अधिक पाठ-रत्तु पलपत्तमउयसुकुमालतालुनिस्ला- लियग्गजीहं, मगुलियाभिसतपिगलच्छ। अर्थ-लाल फमल के पत्ते के समान अत्यन्त कोमल जीम को निराला है जिसने एसे, और मधु की गोषी के समान प्रासों पाले।

(२४) मटियानप्रन्यमाला -- - मृसागयपवरकणगतावियआवत्तायंतवतडियविमलसरसन- यणं विसालपीवरो पडिपुन्नविउलखंचं मिउविसयसुद्ध मलक्खणपसत्यविच्छिन्नकेसरसडोवमोभियं असियसुनि- म्मियसुजायफोडियलंगृलं माम सोमाकारं लोलायंतं जमायने नहयलाओ ओवयमाण निययवयणमतिवयं सीहं सुविणे पासित्ता गं पडिबुट्टा ।। १७ ॥ भावार्थ- गनी ने म्यान में हार, चादी, भीर ममुद्र, चन्द्रमा की किरण, रजतमहागल (वैनाटा पर्वत) और पानी की वृद्ध की तरह बहुत सफेट, लम्बे चौडे, रमणीय, अत दर्शनी, धि और मनोहर कलार्ट वाले, तथा गांठ स्थल मिली हुई उत्तम और तेज दादों युक्त मुखियाले नस्कार किये गये उ. तम जाति के कमल के समान कोमल, ज्याप्रमाण और अत्यन्त मनोन होठों वाले, लाल कमल ची तरह कोमल ताल और निता वाले, मूम में रक्खे हुए और चुमते हुए नपाए हुए उत्तम मोने और बिजली जैनी निर्मल, बराबर और गोल गोट आसो गन्ने, मोटी और मजवृत जाव वाले, वर्ग और मोटे कंधे वालं, कोमल स्वच्छ सूक्ष्म ओर फैले हुए मुन्दर गर्दन के बालों (केसर) की छटा से शोभित, बन्नी पर फटकार कर ऊपर कर के फिर नीचे को झुकी है पूद्ध जिसकी ऐसे, तथा सौम्य, सौम्याकार, कोदा करते हुए, जमाई लेते हुए सिंह को आकाश से उतरकर अपने मुंह मे घुमते हुए देखा ॥ १७॥ मूलम्-तए णं सा धारिणी देवी अयमेयास्वं उरालं जाव सस्मिरीयं महासुमिणं पासित्ता णं पडिबुद्धा समाणी तुजावहियया धाराहयकलंयपुप्फगपि व समृससियरोम- कूवा तं सुविणं ओगिण्हति , ओगिहित्ता सयणिज्जायो अमूह, सयणिज्जातो अन्भुढेत्ताअतुरियमचवलमसमंताए सुखविपाकसूत्रम् (२५) अविलंविधाए रायहंससरिसीए गईए जेणेच अदीणसत्तुस्स रन्नो सयणिज्जे तेणेव उवागच्छद ॥१८॥ भावार्थ- टसके पश्चात् वह धारिणी नामकी महारानी इस प्रकार के उदार ( यावत् ) सश्रीक महान् स्वप्न को देखकर ( जागी और ) जाग- कर उसका हृदय हर्पित-सतुष्ट हो गया । मेघ की धागसे जैसे कदव वृक्ष का फूल खिल जाता है, उसी तरह रोमाञ्चित होती हुई महारानी ने स्वाम का अवग्रह किया । अवग्रह कर के शय्या से उठी। शय्या से उठकर चप- लता रहित गरीर और स्थिर मन होकर, राजहस की तरह मन्द मन्द गम- न करती हुई, जहा राजा अदीनशत्रु की सेज थी, वहीं पहुँची ॥१८॥ मृलम्-- तेणेव उवागच्छित्ता अदीणसत्तुं रायंताहिं इटाहिंकताहि पियाहि मणुन्नाहिं मणामाहि उरालाहिं कल्ला- णाहि सिवाहि धन्नाहि मंगल्लाहि सस्सिरीयाहिं मियमहुर• मंजुलाहि गिराहि संलवमाणी संलवमाणी पडियोहेति । प- डियोहेत्ता अदीणसत्तुणा रन्ना अभणुन्नाया समाणी नाना- मणिरयणभत्तिचित्तमि भद्दासणंसि णिसीयति । णिसी. इत्ता आसत्था वीसत्था सुहासणवरगया अदीणसत्तुं रायं ताहि इहाहि कंताहि जाच संलवमाणी संलवमाणी एवं व- यासी-॥ १६ ॥ भावार्थ--वहा पहुंचकर अदीनशत्रु राजाको इट, कान्त, प्रिय, मनोज्ञ, अभिगम, उदार, कल्याण कारी, शिवकारी, वन्य, मंगलकारी, स श्रीक, मृदु, मधुर और मजुल वचनो से बोलका जगाया। जगाकर राज अदीन शत्रु के आज्ञा देने पर अनेक मणि और रत्नों से विचित्र उत्तम मासन पर बैठ गई । बैठकर चल्ने के अम और क्षोभ को मिटा कर सुख फर आसन पर बैठी हुई , अदीनशत्रु गजा को इष्ट और मनोहर वचन बोलती हुई, इस प्रकार कहने लगी--- ॥ १६ t.

(२६) मेटियाजनाथमाली मृलम्-~एवं खलु अहं देवाणुपिया! अन्नतंसि तारि. सगंसि सयणिजंसि सालिगणवटि चेव जाव नियगव- यणमइवयंतं नसीहं सुविण पासित्ता गं पडिबुद्धा। तणं देवाणुप्पिया ! एयस्स उरालम्स जाव महासुविणम्स के मन्ने कल्लाणे फलवित्तिविसेसे भविस्सह ? ॥ २० ॥ भावार्थ-हे देवानुप्रिय ! आज म उस प्रकार की संज पर- जिसमें कि शरीर की गवर किया लगा हुआ था और पूर्वोक्त विशेषणों से युक्त यी- अपने मुह में घुमने हुए मिह को नपने म देखकर जागी हैं। ह देवानुप्रिय ' इम ताह के उम उठा महास्वप्न का मुझे क्या विशेष फल होगा ॥ २० ॥ मृलम्-तए णं से अदीणसत्तू राया धारिणीए देवीए अंतिय एयमहँ सोचा निसम्म हट्टतु जाव हिय धाराहय नीवसुरभिकुसुमचंचुमालयतणुयजससियरोमकूवतंसुविणं ओगिरहह । ओगिरिहत्ता ईहं पविसह, ईहं पविसित्ता अप्पणो साभाविएण महपुव्वाणं वुद्धिविनाणेणं तस्स सुविण्स्स अत्याग्गहणं करेड । नस्स सुविणरस अत्योग्गहणं करित्ता धारिणिं देवि ताहि हाहिं ताहि जाव मंगल्लाहिं मिउमहुरसरिसरीयाहि गिराहि सलवमाणे संलवमाणे एवं घयासी-॥२१॥ भावार्थ- उम ममय वारिणी रानी के मुख से इस विषय को मुनकर और हृदय में वारण करके गजा अदीनशत्रु का चित्त (यावत) हर्षित और सतुट हुआ । जैसे मेव (जल)की वागके गिरने से मुगन्धित कदम्ब पृक्ष खिल जाता है, उसी तरह राजा का गरीर पुलकित होगया और गंगटे खड़े होगये । इस प्रकार राजा को स्थान का अवग्रह हुआ, अवग्रह ज्ञान होने पर ईहा-ज्ञान की प्रवृत्ति हुई । ईहा की प्रवृत्ति होकर मतिज्ञान से सुखविपाकसूत्रम् (२७) उत्पन्न हुई स्वाभाविक प्रतिभा मे उस स्वप्न का अर्थ जाना । उस स्वप्न का अर्थ जानकर इष्ट कान्त (यावत्) मागलिक मृदु मधुर और सश्रीक प्रादि वचनों से बोलता हुआ, इस प्रकार कहने लगा-॥ २१ ॥ मूलम्-उराले गं तुमे देवी! सुविणे दिटे, कल्लाणे णं तुसे जाव सस्सिरीए गं तुमे देवी! सुविणे दिहे, आरो. ग्गतुहिदीहाउकल्लागमंगल्लकारए णं तुमे देवी सुविणे दि. हे, अत्यलाभो देवाणुप्पिए ! भोगलाभो देवाणुप्पिए ! पुत्त. लाभो देवाणुप्पिए ! रजलामो देवाणुप्पिए! एवं खलु तुमं देवाणुप्पिए नवाई मासाणं बहुपडिपुन्नाणं अद्धहमाणराई. दियाणं विइक्कंताणं अम्हं कुलकेउं कुलदीवं कुलपव्वयं कुलवडेंसयं कुलतिलगं कुलकित्तिकरं कुलनन्दिकरं कुलज- सकर कुलाधारं कुलपायवं कुलविवद्धकरं सुकुमालपाणि- पायं अहीणपडिपुन्नपंचिदियसरीरं जाव ससिसोभाकारं कंत पियदसणं सुरुवं देवकुमारसमप्प दारगं पयाहिसि । से चियगंदारए उम्मुक्कवालभावे विनायपरिणयमित्ते जोध- णगमणुप्पत्ते सरे वीर विक्रते विधिन्नविउलबलवाहणे रजवई राया भविस्सइ । तं उराले गं तुमे जाव सुमिणे दिहे, आरोग्गतुद्विजावमंगल्लकारए मां तुमे देवी सुविणे दिटेत्तिकटु धारिणि देवि ताहि इटाहि जाव वग्गृहि दोचं पि तचं पि अणुवहति ॥ २२॥ भावार्थ-हे देवी' तुमने उदार स्वम देखा है । तुमने कल्या- णकारी स्वप्न देखा है । हे देवी ' तुमने सश्रीक रन देखा है । हे देवी । तुमने आरोग्य सतोप दीर्व-प्रायु कल्याण और मगल करने वाला स्वप्न देखा है । हे देवानुप्रिये अर्थ-लाभ होगा । हे देवानुप्रिये भोग का लाभ होगा। हे देवानुप्रिये । पुत्र का नाभ होगा। हे देवानुप्रिये ! राज्य । ।

सेटियाजैनग्रन्थमाला का लाभ होगा। इस प्रकार है देवानुप्रिने । पूरे नव महीने और सादे मात दिन बीत जाने पर, हमारे कुल की ध्वजा के समान, कुल के दीपक, कुल में पर्वत के ममान, कुल के मुकुट, कल के तिलक, कुल की कीर्ति बढ़ाने वाले, कुल की समृद्धि करने वाले, पुल का यश करने वाले, कुल के आधार, कुन को आश्रय देने में वृक्ष के समान, कुन को बढाने वाले, कोमल हाय पैर वाले नुन्दर और पाची इन्द्रियों से पूर्ण शरीवाले (यात) सौम्य आकृति वाले, मनोहर, देखने में प्रिय, चन्द्रमा की नाह मुरूप, देवकुमार सरीखी प्रभावाले बालक को उत्पन्न करोगी-जन्म ढोगी। वह बालक बाल्यावस्था को त्यागते ही बहत्ता कलाओं का विशेष जानकार होगा । यौवन अवस्था मे दानवीर, णवी, पराकमी, विस्तीर्ण और विपन मेना तया वाहनों (सवारियों) वाला राजराजेधा होगा ॥ २२ ॥ मूलम् - तए णं सा धारिणी देवी अदीणसत्तम्स रन्नो अंतियं एयम सोचा निसम्म हतुजावहियया करयलप. रिग्गहियं दसनहं सिरसावत्तं मत्थए अंजलि कह एवंवया- सी- एवमेयं देवाणुप्पिया ! तहमेयं देवाणुप्पिया! अदित- हमेयं देवाणुप्पिया ! असंदिद्धमेयं देवाणुपिया ! इच्छि. यमेयं देवाणुप्पिया ! पडिच्छियमेयं देवाणुप्पिया ! इच्छियपडिच्छियमेयं देवाणुप्पिया ! से जहेयं तुझे वदह- त्तिकटु तं सुविणं सम्म पडिच्छद ; पडिच्चित्ता अदीणस- तुएणं रण्णा अभणुन्नाया समाणी गाणामणिरगणमत्ति. चित्तानो भद्दासणाओ अभुटेइ अभुटेता अतुरि- यमचवलजावगतीए जेणेव सए सयणिले तेणेव उचागच्छद ॥२३॥ भावार्थ- तुमने उदार (यात् ) स्वप्न देग्वा है । हे देवि! तुम- ने मारोग्य मन्तोष और (यावत् ) मगल करने वाला स्वप्न देवा है सुखविपाकसूत्रम् (२९) - इस तरह धारिणी महारानी को इष्ट ( यावत्) वचनों से राजा ने दो तीन वार कहा । उसी समय वह धारिणी रानी अदीनशत्रु राजा से इस विषय को सुनकर और हृदय मे धारण करके हर्षित और सन्तुष्ट होकर , हाथ जोडकर आवर्तन करके मस्तक से अजलि लगाकर इस प्रकार बोली- हे देवानुप्रिय । यह इसी प्रकार है । हे देवानुप्रिय यह उत्ती प्रकार है । हे देवानुप्रिय । यह सत्य है , निस्सन्देह है, इष्ट है, अभीष्ट (प्रतीच्छित) हे , इष्ट-अभीष्ट है । आप जो कहते है, उसे मै अच्छी तरह अगीकार करती है । (इस प्रकार) अगीकार करके अदीनशत्रु गजा की आज्ञा मिलने पर नाना मणियों और रनों से विचित्र उस प्रासन (सिहासन) से उठी । उठकर वारे धारे चपलता रहिन (यावत्) गजहम की गति से जहा अपनी सेज थी, व्हीं पागई ॥२३॥ मृलम्-तेणेच उवागच्छित्ता सणिज्जसि निसीयति, निसीइत्ता एवं वयाली-मा से ले उत्तमे पहाणे मंगल्ले सु. विणे अन्नेहि पावसुविणेहि पडिहनिमस्सइत्ति कटु देवगुरु- जणसंबढाहि पसत्यादि मंगल्लाहि धम्मियादि कहाहिं सुविणजागरि पडिजागरमाणी पडिजागरमाणी विहरति ॥ २४॥ भावार्थ-वहा आकर ज पर बैठ गई । बैठ कर इस प्रकार बोली "मेग यह उत्तम प्रधान और मागलिक स्वप्न क्सिी दूसरे पाप स्वप्न से नष्ट न होजाय ' इसलिए वह देव गुरु और जन सम्बन्धी अच्छी ? मागलिक धर्मकथानी से अपने स्वप्न के फल को बनाए रखने के लिए बार २ नीद को त्याग कर जागती रही ॥ २४ ॥ मृलम्-ततेणं से अदीणसत्तू राया पच्चूसकालसम- पंसिकोडवियपुरिसे सद्दावेइ । सद्दावेत्ता एवं वदासी-खिप्पा- जाना अध्य०१सू० १२ से प्रारम्भ ।

सेटियालेनग्रन्थमाला मेव भो देवाणुपिया वाहिरियं उवट्ठाणसालं अज सविसेसं परमरम्मं गंधोदगसित्ततुझ्यसमन्निओवलित पंचवन्नसर- ससुरभिमुक्कपुष्कजोश्यारकलियं कालागुरूपचरकुंदुमक्क तुरुक्कवउझंत मवमघनगंधुदुयाभिरामं सुगंधवरगंधिय गंधवहिभूयं करेह य, कारवेह य, एयमाणत्तियं पञ्चप्पिगह । तते ण ते कोढुंबियपुरिमा, अटीगसत्तणा रणा एवं वुत्ता समाणा इहतुहा जाव पञ्चप्पिणति । तले से अीणमत्तू राया करलं पाउप्पभायाए रयगीए फुल्लुप्पलकमलकोमलु- म्मीलियंमि अहापंडुरे पनाए रत्नामोगप्पगासफिस्सुमसुयमुह गुंजद्वरागबंधुजीवगपारायचलणनयणपरत्यरत्तलोयण- जायणकुमुमजलियनलगत्मनिनकलसहिगुलनिगर- स्वाइरंगरहंतसरितीए दिवागरे अद क्रमेण उदिए, तस्स दिणकरकरपरंपरावयापारटुंमि अंधयारं बालानव- कुंकुमेण खचियव्यजीवलो लोग्णविनमाणुयासविगसं. तविसददसियंमि लोग कमलागरसंडवोहए उहियंमिसरे सहस्सरस्मिमि दिगायरे तेयसा जलंते सबणिज्ञाओउटेति, उठेत्ता जेणेच ग्रहणाला नेणेव उवागच्छड ॥२५॥ भावार्थ- दस के अनन्तर प्रान माल उस अदीनशत्रु गजा ने अपने मेकों को बुलाया । बुला कार टन प्रकार बोला~~ भी देवानुप्रिय गान शीरहीं बाहर की उपग्थानगाला-सभान्थान को विशेष रूप से परम रमणीय, गवोटक से मींचकर पवित्र और माफ करो, लीपो, णचों रंगों के सग्स मुगन्धित फूलों से युक्त कगे, कृष्णागर चीड लोबान आदि की मवमवायमान गर से शोभित, अतण्य गंध की गोली के समान मुगन्धित करो और दृमरा मे कात्रो । मेरी इम आता को पूरी करके मुझं सूचित करो। इसके बाद उन सेवको ने अदीनात्रु राना के ऐमा रहने पर हर्पित सुखविपाकसूत्रम् (३१) फूल, होते हुए आज्ञानुसार कार्य करके सूचित किया । पश्चात् जिसमें खिले हुए पद्म और कमलो (एक प्रकार के हरिणों) के नेत्र खुल गये थे ऐसे- स्वच्छ प्रभात होने पर, लाल अशोक के प्रकाश, ढाक के तोते की चोच, चिमटी के आधे लाल हिस्से, दुपहरिया के फूल, कबूतर के पाव, कोयल की लाल लाल आग्चों, नपा कुमुम, जलती हुई अग्नि, सोने के कलश और हिगुल के समूह की प्रभा से भी अधिक प्रभा वाले सूरज के क्रमश. उदित होने पर, और उस की किरणो के गिरने से अन्धकार का नाश प्रारंभ होने पर बालसूर्य रूपी कुकुम से जीवलोक के रंगे जाने पर लोक में दखे जा सकने वाले विषयो ( पदायो )का स्पष्ट प्रतिभास होने पर, कमलो को विमसित करते हुए एक हजार किरण वाला सूर्य तेज से चमकने लगा । उसी समय गजा अदीनशत्रु शय्या से उठा । उठकर जहा व्यायामशाला (अखाडा) यी वहाँ गया ॥ २५ ॥ मूलम्- उनागच्छत्तिा अट्टणसालं अणुपविसह । अणुपविसित्ता अणेगवायामजोग्गवग्गणवामद्दणमल्लजुद्ध- करणेहि संते परिसंते सयपागसहस्सपागेहि सुगंधवरतेल्ल. मादिएहि पीणणिजेहि दीवणिजेहि दप्पणिज्जेहि महणिजेहि विणिज हि सव्विदियगायपल्हाणिज्जेहि अभंगेहि अभं- गिएसमाणे तेल्लचम्मंसि पडिपुन्नपाणिपायसुकुमालकोमल- तलेहि पुरिसेहि छेएहि दक्खेहि पटेहि कुसलेहि मेहावीहि निउणे हि निउणसिप्पांवगएहि जियपरिस्समेहि अभंगणप. रिमद्दणुव्वलणकरणगुणनिम्माएहि, अटिसुहाए मंससुहाए तयानुहाए रोमसुहाए चबिहाए सवाहणाए संवाहिए समा. णे अवगयपरिस्समे नरिदे अदृणसालाओ पडिनिक्खमइ, पडिनिक्खमित्ता जेणव मजगघरे तेणेव उवागच्छइ, उवा- गच्छित्ता मजण्घरं अणुपविसइ, अणुपविसित्ता समंत.

(३२) सेठियाजेनग्नत्यनाला (मुत्त) जालाभिरामे विचित्तमणिरयणकोहिमतले रमणिन्न पहाणमंडवंसि गाणामणिरयणभत्तिचित्तंमि पहाणपीसि सुहनिसन्ने सुहोदगेहिं पुष्फोदगेहि गंधोदगेहि सुद्धोदगेहिं य पुणो पुणो कल्लागागपवरमनगविहीए मजिए तत्व कोज- यसपदि यहुविहेहिं कल्लाणगपवरमजणावसाणे पम्हलसुकु- मालगंधकासाइयतृहियंगे अहतसुमहग्घसरयणनुसंखुडे सरमसुरभिगोसीसचंदणाणुलित्तगत्तेसुइमालावन्नगविलेवणे आविद्यमणिमुवन्ने कप्पियहारहहारतिसरयपालेवपलंबमाण- कटिसुत्तसुकयसोह पिणद्धगेविज अंगुलिनगलललियंगल. लियकयाभरण णाणामगिकडातुडिययंभियभु अहियाव- सरिसरी कुंडलज्जाडयागणे मउडदित्तसिरण हारोत्थयसु. कयरहयवच्छे पालंवपलंचमाणमुक्यपडउत्तरिजे मुहियापिंग- लंगुली णाणामणिकणगरयणविमलमहरिहनिउणोवियमि- समिसनविरडयमुसिलिट्टविसिट्टलसंठियपसत्याविद्धवीर- वलए कि वहुणा, कप्परक्खा चेव सुअलंक्रियविभृसिए नरिदे सकोरंटमल्लदामेगां दत्तगंधरिजमाणेगा उभओचज- चामरवालबीडयंगे मंगलजयसहकयालोए अणेगगणनाय. गदंडनायगराईसरतलबरमाडंबियकोछवियमंतिमहामंनिगण- गदोवारियअमचचेडपीढमहनगरणिगमसेष्टिसेणावहसत्यवा- हदयसंधिवालसद्धि संपरिखुडे, धवलमहामेनिग्गा विव गहगणदिप्पंतरिक्खतारागणाण माझे ससिव पियदसणे नरवई मजणघराओ पडिनिक्खमति ॥ २० ॥ भावार्थ-जाकर अखाड मे प्रवेश किया। प्रवेश करके कमरत के योग्य उम्लन का एक दूसरे की आपस में बाद आदि को मोडका और कुश्ती प्रादि कसरत करके यक जने पर शनपुट और सहस्रपुट सुखविपाकसूत्रम् वाले सुगधित तेल आदि से, तथा रुधिर आदि धातुओं को सम करने वाले, जठराग्नि को दीप्त (तेज) करने वाले, काम को बढ़ाने वाले, मास को बढ़ाने वाले, पाचों इन्द्रियों और शरीरको प्रसन्न करनेवाले, तेल आदि के लेप से अविकल हाथ पैर वाले, सुन्दर और कोमल तलुवे वाले, भवसर को जानने वाले, ७२ कलाओं को जानने वाले, दक्ष, वाग्मी यो आगे आगे चलने वाले, कुशल, मेधावी, निपुण, मर्दनके तरवको जानने वाले, परिश्रम से न यकने वाले, लेप मालिश और उवटन के अभ्यासी पुरुषों द्वारा मालिश कराई और तैलचर्म (चमड़े के झामे) से रगड़ाया । हड्डियों को सुख देने वाली, मास को सुख देने वाली, चमड़े को सुख देने वाली, रोगों को मुख देने वाली, चार प्रकारकी साधना द्वारा प्राराम लेने से जब राजा की यकावट दूर होगई, तब वह मर्दनशाला से निकला। निकलकर स्नानागार में आया । आकर स्नानागार में घुसा । घुसकर सब तरफ से जालियों से सुन्दर चित्र विचित्र रत्न और मणियों से जड़े हुए सले वाले रमणीय स्नान मंडप में मणियों और रत्नों से खचित चौकी पर बेठकर, शुभोदक (पवित्र स्थानों से लाये हुए जल) गंधोदक (चन्दनादि मिश्रित जल) पुमोदक (फूलकी गंव मिले हुए जल) और शुद्धोदक(स्वाभा- विक जल) से स्वास्थ्यकर विधि से कौतुक पूर्वक बार २ स्नान किया। स्नान कर चुकने पर रुऍदार सुन्दर सुगधित सुकोमल वस्त्र से शरीर पोंछा और बहुमूल्य नवीन वस्त्र पहना । उसी समय घिसा हुआ सुगन्धयुक्त गोशीर्ष चन्दन का शरीर पर लेप किया । पवित्र फूल-माला धारण की और केसर आदि का लेप किया । मणियों और सोने के गहने पहने । हार (अठारह लडों का) अहार (नव लड़ा) और तीन लड़ा हार पहना। कमर में लम्बी और लटकते हुए झूमके वाली करधनी पहनी। गले में मआभूषण और अगुलियों में अगूठिया पहिनीं । इनके सिवाय और भी बहुत से सुन्दर २ आभूषण धारण किए । भनेक तरह के हाथ और भुजाभों के •4 (३०) सेठियाजनग्रन्यमाला . . मणिमय, आभूपणों से उनके हाय यम से गये थे | गरी के अतिगण रूपवान् होने से यह और भी शोभायमान हुआ । कानो के कुटलों से मुह चमकने लगा। मुकुट से मम्तक दीप्न हो गया। हारी से सम्मल(छाती) ढंक साया और मुन्दर मानम होने लगा। एक लटकता हुआ लम्बा मा बदिया दुपट्टाधारण रित्या । अगुलिया अगटियो मे पीली हो गई । नथा चतुर कारीगरों द्वारा बनाए दु नाना तह के विमल विजिट मनोहर देदीप्यमान अच्छे जोड वाले बहुमूल्य मोने मणि रत्नों के वीरवलेय धारण किए। ज्यादा क्या कहें । कल्पवृक्ष के समान प्राभूषणों से अलमृत और वल्लों से भूषित, कोग्ण्टक आदि फली की मालानी से बने हुए छत्र को धारण करने वाला नरेन्द्र, चार चामगे से गोभित मग वाला, जिसे देखकर लोग जयशब्द कह रहे थे ऐमा वह गजा, अनेक गणनायक, दण्टनायक, माएटलिक राजा, युगज, तलयर (गजा द्वारा उपाधि प्रान्त) मुकुटबन्ध राजा, कौटुम्बिक (कुछ कुटुम्त्री के स्वामी) मत्री, महामत्री, ज्योतिषी या भण्डारी द्वारपाल (दग्वान) गज्य के अधिष्ठाता, सेवक, पीटमर्दक (एक प्रकारके मित्रवत सेवक) प्रजा, गजकर्मचारी, सेठ, सेनापति, माहूकार, दृत और सन्धि की रक्षा करने वालो से विग हुमा गना स्नान गृह से इस 'तरह निकला, जैसे उन्बल और बडे २ बादलो में से निक्ला हुआ, ग्रहों से दीप्त नक्षत्र और ताराओं के समुदाय में चन्द्रमा हो ॥ २६ ॥ 5. मृलम्-पडिनिक्खमित्ता जेणेव वाहिरिया उवाण- 'साला तेणेव उवागच्छद । उवागच्छित्ता सीहासणवरगते पुरत्याभिमुहे सन्निसन्ने । ततेणं से अदीणसत्तू राया अप्पणो अदूरमासते उत्तरपुरच्छिमे दिसिभागे अढ भद्दासगाई सेयवत्यपञ्चुत्थुयाई सिद्धत्वमंगलोवयारकयसंतिकम्माई रया- १ कोई ऐसा वीर है, जो मुझे जीत कर इन्हें ले लेवे? ऐसी स्पर्धा करके जो वलय (केडे,धारण किए जाते हैं, उन्हें 'बीरबलय' कहते हैं , M सुखविपाकसूत्रम् 7 वेइ ।रयावित्ताणाणामणिरयणमंडियं अहियपेच्छणिजरूच महग्यवरपट्टणुग्गयं साहबहुभत्तिसयचित्तवाणं ईहामियउस- भतुरयणरमगरविहगवालगकिन्नररुरुसरभचमरकुंजरवणल- यपउमलयभत्तिचित्तं सुखचियवरकणगपवरपेरंतदेसभाग अभितरियं जवणियं अंगावेइ ॥ २७॥ भावार्थ-निकलकर जहा बाहरी सभा थी, वहा गया । सिहासन के पास जाकर पूर्व दिशा मे मुह करके बैठा । इसके पश्चात् उस अदीन- शत्रु राजा ने पास ही, ईशान कोण में, सफेद वस्त्रों से ढके हुए पाठ भद्रासन रेखाए । उन आसनों पर सम्मों अादि मागलिक उपचार द्वारा विघ्नों का उपशम करने के लिए शान्ति- कर्म किया । उन प्रासनो को रखवाकर नाना मणि और रत्नो से शोभायमान, दर्शनीय रूप वाली, बहुमूल्य और अच्छे (जहा अच्छे वस्त्र बनते है) शहर में बनी हुई, मूक्ष्म और अनेक प्रकार के बहुत से चित्रों का स्थान, भेडिया बैल घोडा मगर नर पक्षी सर्प किन्नर रुरु (एक प्रकार के मृग), अष्टापद, हाथी, वनलता, और पद्मलना आदि के चित्रों से चित्रित, जिसके कोने उत्तम सोने की कलायत्तू से मटित थे, ऐसा अन्दर का पर्दा डाल दिया ॥ २७ ॥ " चमरी गाय, मूलम्- अंछावइत्ता अच्छ (? स्थ) रगमअमसरग- उच्छ (त्थ) इयं धवलवन्यपचुत्थुयं विलिटं अंगस्नुहफासयंसु- मउयं धारिणीए देवीए भद्दासणं रयावेइ । रयावेत्ता कोडुषि- यपुरिसे सदावेइ,सद्दावेत्ता एवं वदासी-खिप्पामेवभो देवाणु- प्पिया। अटुंगमहानिमित्तसुत्तत्यपाढए विविहसत्थकुसले सुमिणपाढए सदावेह । सहावेत्ता एयमाणत्तिय खिप्पामव पञ्चप्पिणह । तते ण ले कोटुंबियपुरिसा अदीपासत्तुणा रणा सेटियामेनप्रायमाला एवं वुत्ता समाणा हतुजावदियया करयल परिगहिये दसनहं सिरसावत्तं मत्थर अंजलिं कटु एवं देवो तहत्ति, आणाए विणएणं वयणं पडिसुति । पडिसुणेत्ता, अदीण. सत्तुस्स रनो अंतियानो पडिनिक्खमंति ।। २८ ।। भावार्थ- पर्दा डालकर, महागनी धारिणी के लिए वहां एक अच्छा सा सिंहासन रखवाया ! सिंहामन पर कोमल गलीचा और गलीचे पर एक सफेद वन्त्र विद्याया गया । मिहासन पच्छा और कोमल होनेसे शरीर को मागम पहुँचाने वाला था । मिहामन रखवाकर सेवकों को बुला- या । बुलवाकर कहा हे देवानुप्रिय । शीत्र ही भटाग ज्योतिष शास्त्र के पाठकों को-~- जो कि अनेक शात्रों में क्गल है-- और स्वप्नशास्त्रियों को बुलाओ ) बुलाकर शीन ही मुझे सूचित वगे। मदीनशत्रु राजा के यह कहने पर, सेवकों का हृदय हर्षित और सन्तुष्ट होगया। वे लोग, दोनों हाथ जोडकर, दनों नखों (गुलियों) को इकट्ठा करके, मस्तक के पास अंजलि करके बोले-टेव' आपकी प्रज्ञा प्रमाण है-ऐसा ही होगा। इन प्रकार कहकर पाना को स्वीकार किया। स्वीकार करके गजा पदीनशत्रु के पास मे चल दिये ॥ २८ ॥ मुलम्-पडिनिक्खमित्ताहत्यिसीसस्स नगरस्समजा. मझेणं जेणेव सुमिणपाडगाणं गिहाणि, तेणेव उवागच्छ- न्ति, उवागच्छित्ता सुमिणपाढए सदावति । तते ग ते सुमिणपाढगा अदीणसत्तुस्स रन्नो कोटुंबियपुरिसेहिं सदाविया समाणा हहतुटजावहियया पहायाकयवलिकम्माजावपाय. च्छित्ताअप्पमहग्याभरणालंकियसरीरा हरियालियसिद्धत्य- यकयमुदाणा सयेहि सयेहि गेहे हिंतो पडिनिक्खमंति, पडि- निक्खमित्ता हत्यिसीसरस नगररस मज्भमभेणं जेणेव अदीणससुस्स रणगोभवणवडिंसगवारे तेणेव उवागच्छंति सुखविपाकसूत्रम् (३७) उवागच्छित्ता एगपओ मिलयंति, एगयओ मिलइत्ता अदीणसत्तुस्स रणो भवणवडिंसगदुवारेण अणुपविसंति। भणुपविसित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसालाजेणेच अदी. जसत्तू राया तेणेव उवागच्छंति, उवागच्छित्ता अदीणसत्त रायं जएणं विजएण बद्धावति। अदीणसत्तुणारणा अच्चि- या वंदिया पूहया माणिया सक्कारिया सम्माणिया ममाणा पत्तय पत्तेय पुचुन्नत्थेसु भद्दासणेसु निसीयंति ॥२६ ॥ भावार्थ- जाकर हस्तिशीर्ष नगर के बीचों बीच होकर, जहां स्वप्न शास्त्रियों के घर थे, वहाँ पहुँचे। पहुँचकर स्वमशास्त्रियों को बुलाया। मदीनशत्रु राजा के आदमियों द्वारा बुलाए जाने पर स्वामज्ञ भी बहुत सन्तुष्ट हुए–प्रसन्न चित्त हुए । स्नान करके, गृह-देवतों की पूजा करके, ललाट पर मागलिक तिलक और मस्तक पर दही चावल आदि छिटक कर, थोड़े किन्तु बहुमूल्य आभरणों से शरीरको अलकृत करके, मस्तक पर दूब और सरसों आदि रखकर अपने अपने घरों से निकले ! निकलकर हस्तिशीर्ष नगरके बीच मे होकर, जिस तरफ अदीनशत्रु राजा के मुख्य महल का दर्वाजा था, उसी तरफ गये । जाकर, सब इकट्ठे हुए । इकट्ठे होकर, मुख्य महल के द्वार में घुसकर जहा बाहरी सभा और राजा अदीनशत्रु थे, वहां गये । जाकर 'जय हो' 'विजय हो' कहकर राजा को बधाई दी । गजा अदीनशत्रु ने भी उन सब की अर्चना की, वन्दना की, पूजा की, मान किया, सत्कार और सन्मान किया । वे पहले रक्खे हुए उन भद्रासनों पर अलग अलग बैठ गये ॥ २६ ॥ मूलम्-तते णं से अदीणसत्तू राया जवणियं- नरियं धारिणि देवि ठवेइ । ठवेत्ता पुप्फफलपडिपुन्न परेणं विनएण ते सुमिणपाढए एवं वदासी-एवं खलु देवा- णुप्पिया! धारिणी देवी अन्न तसिनारिसयंसिसयणिजंसि सेठियाजेनग्रन्थमाला । । जाव महासुमिणं पासित्ताणं पडिबुद्धा । तं एयरसणं देवाणु- प्पियों ! उरालस्स जाव सस्सिरीयस्स महामुमिणस्स के मन्ने कल्लाणे पालवित्तिविसेसे भविश्स: ? || ३०॥ भावार्थ- पश्चान् अदीनशत्रु राजाने प्दै के अन्दर धारिणी महारानी को वेटाया। बैठाकर फल फूल हाथ में लेकर, विनयपूर्वक, उन' स्वप्नजों से टम प्रकार कहने लगा -भो देवानुप्रिम । आज उस पहले वर्णन की गई शय्या पर सोते समय गारिणी म्हागनी (यावत) महास्वप्न देखकर उठी है । भा देवानुप्रिय 'इम महान् उदार और नश्रीक स्वप्न का क्या मंगलमय फल होगा २ ॥ ३० ॥ ': मृलम्- तते ण ते सुमिणपाडगा अदीणसत्तुरस रण्यो अंतिए एयमी सांचा निसम्म हतु जावहियया तं सुमिणं सम्मं ओगिण्हंति, ओगिणित्ता ईहं अणुपविसंति, अणुप.' विसित्ता अनमनेगा मद्धि संचालति, संचालित्ता तस्स सुमिणस्त लाहा गाहियटा पुचिया विणिच्छियहा अभि- गयट्टा अदीणसत्तुस्ल रन्नो पुरओमुसिणसत्याई उच्चारेमाणे उचारेमाणे एवं वदानी- एवं खलु यह सामीसुमिग- सत्यसि दायालीसं सुमिणा नीसं सानुनिणा गवत्तरि सबलुमिणा दिहा । तत्थ णं सामी ! अरिहंतमायरो वा चक्करहिमायरो वा अरिहंतसि वा चक्कवादिसि दा गर्भ: वक्कममागसि एएसि नीसाए महालुमिणाणं हमे चउघस- महासुमिणे पासित्ता ण पडिबुज्यति तं जहा- गयउसमसीहअभिलेयतामससिदिणयरं झयं कुंभ । पउमसरसागरविमाणमवणस्यणुचयसिहि च ॥१॥ वासुदेवमायरो वा वासुदेवसि गम्भ वक्कममागसि एसि सुखविपाकसूत्रम् (३६) चउद्दसण्हं महासुमिणाणं अन्नयरे सत्तमहासुमिणे पासित्ता णं पडिवुझंति । बलदेवमायरो वा बलदेवसि गम्भंवक्कम- माणंसि एएसि चउद्दसण्हं महासुमिणाणं अन्नयरे चत्तारि महासुमिणे पासित्ता णं पडिवुझंति। मंडलियमायरो वा मंडलियंसि गम्भ बक्कममाणंसि एएसि चउद्दसण्हं महासु. मिणाणं अन्नयरं एगं महासुमिग पासित्ता णं पडिबुझंति। इमे यणं सामी ! धारिणीए देवीए एगे महासुमिणे दिहे,तं उराले णं सामी ! धारिणीए देवीए सुमिणे दिहे, जाव आरोग्गतुहिदीहाउकल्लाणमंगल्लकारए ण सामी ! धारि- णीए देवीए सुमिणे दिहे, अत्थलाभो सामी ! सोक्खलाभो सामी ! भोगलामो सामी ! पुत्तलामो रजलाभो, एवं खलु सामी! धारिणी देवी नवण्हं मासाणं बहुपडिपुन्नाणं जाव दारगं पयाहिसि ॥ ३१ ॥ भावार्थ- स्वप्नशास्त्री अदी-शत्रु राजा से इस विषय को सुनकर, हृदय मे धारण करके संतुष्ट हुए । हृदय हर्ष से भर गया। उन्होंने उस स्वप्न का अवग्रह किया । अपग्रह करके स्वय ईहा- विचार करने लगे। ईहा करके आपसमे चर्चा करने लगे। चर्चा करनेसे जब उसका फल मालुम होगया, ग्रहीत होगया, आपस मे पूछताछ करने से निश्चित होगया, विनिश्चित होगया और पूर्ण निश्चित होगया , तब वे राजा अदीनशत्रु के साम्हने शास्त्रों के वाक्य उच्चारण कर करके बोले- स्वामिन् ! हमने स्वप्न- शास्त्र में सब व्हत्तर स्वप्न देखे है- बयालीस साधारण और तीस महान् स्वप्न । हे राजन् ' इनमे से जब अर्हन्त और चक्रवर्ती अपनी माताके गर्भ मे आते है, तब उनकी माताए इन तीम महास्वप्नों मे से चौदह महास्वप्न देखकर जागती है । वे चौदह स्वप्न इस प्रकार है- हाथी ? बैल २ सिह ३ लक्ष्नी का अभिपेफ ४ फूलो की माला ५ चन्द्रमा ३ ।

सेठियाजनानन्यमाला " सूरज ७ ध्वजा ८ कलश ६ कमल सहित सरोवर १० समुद्र ११ वैमा- निक देवो का विमान या भग्नपति देवों का भवन १२ रत्नों की राशि और १४ अग्नि की ज्वाला। जब वासुदेव गर्भमें आते है, तब उनकी माताए, इन चौदह महास्य- प्नों में से कोई सान महास्वप्न देखकर जागती हैं । जब बलदेव गर्भ में पाते है, तब उनकी माताए इन चौदह महास्थानों में से कोई चार सपने देखकर जागती है। जब मालिकराजा गर्भमें पाते हैं, तब उनकी माताएं इन चौदह स्वप्नों में से एक म्यप्न देखकर जागती हैं । इन स्वप्नों में से धारिणी महागनी ने एक महान् स्वप्न देखा है। वह :प्न उदार है । है म्वामिन् ' (यावत्) आरोग्य सन्तोष दीर्वायु कल्याण और मंगलकारी स्वप्न धारिणी देवी ने देग्वा है । स्वामिन ! अर्थ- अभ होगा, मुख-लाम होगा, मोग- लाभ होगा, पुत्र- लाभ होगा और गज्य- लाभ होगा। हे स्वामिन् ! इस तरह धारिणी महागनी पूरे नए महीने बीत जाने पर (यावत्) पुत्र का प्रसर करंगी ॥ ३१॥ मृलम्-से वि य ग दारए उम्मुक्कबालभावे विना. यपरिणयमित्ते जोव्यणगमणुप्पत्त सरे धीरे विकन्ते वित्थि. नविपुलयलवाहणे रजवई राजा भविस्सह अणगारे वाभावि. यप्पा,नं उराले णं सामी! धारिणीए देवीए सुमिणे दिहे,जाय आरोग्गतुढि जाव दिखेत्ति कटु भुन्नो भुन्नो अणुव्हेंति । सते णं अदीणसत्तू राया तेसिं सुमिणपाढगाणं अंतिएएय. मढे सोचा निसम्म हतुजाव हियए करयल जाव एवं ध. दासी-एयमेयं देवाणुप्पिया! जाव जपण तुन्भेवदहत्ति कटुत सुमिणं सम्म पडिच्छति, पडिच्छित्ता ते सुमिणपाढए वि. पुलेणं असणपाणखाइमसामेण क्त्वगंधमल्लालंकारेण यस. पकारेति सम्माणेति, सक्कारेत्ता सम्माणेत्ता विपुलं जी.

सुखविपाकसूत्रम् (४१) वियारिहं पीतिदाणं दलयति , दलइत्ता पडिविसलेह । तते णं सेअदीशासत्तू राया सीहासणाओ अभुटेति,अन् हित्ता जेणेव धारिणी देवी तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता धा- रिणीदेवि एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पिए! सुमिणसत्यसि वायालीसं सुमिणा तीस महासुमिणा जाव एगं महासुमिण जाय भुजो भुजो अणुबूहति ।। ३२ ॥ भावार्थ- स्वामिन् । वह बालक बाल्यावस्था का त्याग कर क- लाओ का ज्ञाता होगा । यौवन मे प्रवेश करके दानी वीर विक्रमवान् सेना और वाहन आदि का बढाने वाला, राज्य का स्वामी राजा होगा । अथवा आत्मा में लीन होनेवाला मुनि होगा। इस प्रकार का उत्तम स्वप्न धारिणी देवी ने देखा है । इस स्वप्न के देखने से (यावत्) आरोग्य होगा, सन्तोष होगा, इस प्रकार स्वमज्ञ लोग बारबार कहने लगे। अदीनशत्रु राजा स्वप्नज्ञों से यह फल सुनकर और हृदय में धारणकर (सावत) हर्षित और सन्तुष्ट हुआ। (यावत)हाथ जोडकर इस प्रकार बोला, हे देवानुप्रिय ! वह ऐसा ही है, आप लोगों ने स्वप्न का जो फल कहा है, वह मैने अच्छी तरह समझ लिया है । समझकर उन स्वमशास्त्रियों को बहुत सा मशन पान खाद्य स्वाद्य और वस्त्र सुगधित मालामों तथा अलफागें से सत्कार किया, सन्मान किया । सत्कार और सन्मान करके आजीविका के योग्य प्रीति पूर्वक दान दिया । दान देकर उन्हें अपने अपने घर विदा किए । पश्चात् अदीनशत्रु गजा सिहासन से उठा। उठकर धारिणी देवी के पास आया । आकर इस प्रकार बोला-- हे देवानुप्रिये ! म्यम शास्त्र में बयालीस साधारण स्वप्न और तीस महास्वप्न है । (यावत्) उन में से तुमने एक स्वप्न देखा है। ऐसा बार बार कहने लगा ॥ ३२ ॥ मूलम्-ततेणंसा धारिणी देवी अदीणसत्तुस्सरण्णो अंतिए एघमटं सोचा निसम्म हट्ट जाव हिययातं सुमिणं सम्म (ए) सटियांजिनग्रन्थमाला पडिच्छह, पडिच्छित्ताजेणेव सए वासवर तेणेव उवागच्छद, ज्यागेच्छित्ता संयं भवणमाप्पविद्या । तए णं सा धारिणी देवी पहाया कयवलिकम्मा जाय सव्वालंकारविभृसिया तं गन्भणातिसीतेहिनानिहहि नातिनित्तहिं नातिकदुएहिं नातिकसाएहिं नानिविलेहिनातिमहुरेहिं उउभयमाणमुहे: हिं भोयणच्चायणगंधमल्लहि तस्स गन्भन्स हिनं मिय पत्य गाभपोसणं तं देसे य झाले य आहारमाहारेमाणी विवित्तमडएहिमगारणेहिं पतिरिक्कसुतामणाणुकलाए विधारभूनीए पसत्यदोहला संउन्नदोहला संमागियोहला अविमाणियदाहला गेच्छिन्नटोहला ववीयदाहला ववगय- रोगमोहभयपरित्तासा तं गम्भ सुहंसुहग परिवहति ॥ भावार्थ- तत्पश्चात यह धारिणी महागनी अर्शनशत्रु गजातेदन विषय को मुनकर बहुत ही सन्तुष्ट हुई। स्वप्न को यही नन्ह नमकर जिबर निवान- गृह था, क्या चल कार अपनगहल में धुन गई। वहा जाजर स्नान निग, गुडगामी (यावत) सर्व अलकारों को बार किया। न अविक गीत, न अधिक उग, न अधिक तीखे, न अविक कटुवे, न अधिक कसायले, न अधिक ख न अविक मोठे. अर्थात् ऋतु के अनुसार खाने ओढने और मुगन्धित मानाओं का-- जो कि गर्भ के लिए हित मित और पथ्य यी योर गर्भ को पुट करने वाली यो- दंग काल के अनुसार आहार और उपयोग करने लगी। एकान्त और कोमल शय तथा आसनों द्वारा बदनागोचर नुव निन्नने से, उच्छानुकुल घूमने की जगह होने से, उसे उत्तम इच्छा उत्पन्न हुई। यह पूरी हुई और इन्ठान्न भोग मिलने पर लेगमात्र मी अवर्णन रही, तव दृर हो गई, अत एव वह इच्छा १ भ०२०१२ उ०१+१३६ पृ०१६ १३ से प्रारम्भ.

सुखविपाकसूत्रम् + रहित हुई, रोग मोह और भय रहित होगई । इस तरह वह सुखपूर्वक गर्भ को धारण करने लगी ॥ ३३ ॥ मूलम्-तते णं सा धारिणी देवी लवण्हं मासाणं बहुपडिपुन्नाणं अट्ठमाणराइंदियाणं बीतिझताणं सुकुमा. लपाणिपायं अहीनपडिपुन्नपंचिदियसरीरं लक्खणवंजणगुणां- ववेचं जाव ससिसोमाकारं कंतं पियदसणं सुरुवं दारगं" पयाया। तए णं तीसे धारिणीए देवीए अंगपडियारियाओ धारिणि देविं पनयं जाणेत्ता जेणेव अदीणसत्तू राधा तेणेक उवागच्छंति । उनागच्छित्ता कर यलपडिगहियं जाव अदीण- सत्तुं रायं जएणं विजएणं वाद्वानि । जएणं विजएणं बद्धावे. त्ता एवं वदासी-एवं खल देवाणुप्पिया ! धारिणी देवी नवाहं मासाणं बहुपडिपुनाणं जाव डारग पचाया । तं एयण देवाणुप्पियाणं पियट्टयाए पिचं निवेदेमो। पियं भे भवतु! तए णं से अदीनसत्तु राया अंगपडियारियाणं अंतिए एयमद सोचा निसम्म हतु जाय धारायणीव जाच रोमकूवेतासि अंगपडियारियाणं मउडव जहामालियं आमोयं दलयति, दलइत्ता लेतं रययामयं विमलसलिलपुन्नं भिगारं य गिह- ति । गिमिहत्ता मत्थर धाव घोवित्ता विलं जीवियारिह पीतिदाणं दलयति । दलहत्ता समारंनि सरमाणेति ॥३४॥ भावार्थ- पश्चात नव महीने और साढे सात दिन अर्थात् सवा नौ महीने पूरे होने पर धारिणी देवी ने सुकोमल हाथ पैर वाले, सुडौल और पूर्ण पंचेन्द्रियगरीर वाले, लक्षण और तिलक आदि चिन्हों से युक्त (यावत्) चन्द्रमा की तरह सौम्य, कान्त, देखने मे सुन्दर, और सुरूप वाले बालक को जन्म दिया । धारिणी देवी की परिचारिकाएं उसे प्रसुता जानकर अदीनशत्रु राजा की और चली ! जाकर हाथ जोडकर 'जय हो, मेठियाजेनगन्यमाला विजय हो, कहकर बधाई दी। बधाई देकर बोली- हे दयानुप्रिया पूरे नव महीने बीत जानेपर धारिगी देवीने पुत्र का प्रसार किया है । है देवानुप्रिय : आप की प्रीति के लिए यह प्रिय निवेदन (मृचना)किया है। बाप को प्रिय हो" । गजा बदीनशत्रु, अगमेविकानी से यह बान सुनतर मोर हृदय में वरकर (यावत्) हर्षित और नन्तुष्ट हुा । ऐमागे- माञ्चित हा गया, जैसे कदम्ब पर जलवाग पडने स गेम उठाए हों। वह जी माभूषण पहिने या, मुकुटके मिवाय सब दामियो को दे दिये । दान देकर चादी के बने हुए सफेद, और जलने में हुए मृगार (मार्ग) को उठाया । उठाकर दामियों का सिर धोया, निर बोकमानीविका के योग्य रियुत्न गीति- दान दिया, प्रीतिदान देकर मत्कार किया सन्मान किया ॥ ३४ ॥ मृलम-सकारेत्ता सम्माणेत्ता* पडिविसन्जेति।नते ग से अदीणसत्तू गया कौटुंबियपुरिसे सद्दावेह,सहावेत्ता एवं वधासी-खिप्पामेव भो देवाणुपिया! हत्यिमीस णयां मासित्त जाव परिगयं करह, करेत्ता चारगपरिसोहणं कन्ह करेत्ता माणुम्माणबद्धग करेह, कोत्ता एयमाणत्तियं पञ्चप्पि. गाह, जाव पचप्पिणंति। नतेणं से अदीणसत्तु गया अहार- स सेणिप्पसेणीओ सदावेह, सद्दावेत्ता एवं वयासी-गच्छह ण तुम्भे देवाणुप्पिया ! हत्यिसीसे नगरं असितरवाहिरिए उस्मुक्कं उकार अभडप्पवेसं अइंडिमं कुडंडिमं अधरिम आधरणिज्ज अणुयमुइंग अमिलायमल्लदामं गणियावर- नाडइनकलियं अणेगतालायराणुचरियं पमुइयपछीलिया- भिरामं जहारिहं ठिवडियं ढलदिवसिय करेह । करेत्ता एपमाणत्तियं पञ्चप्पिगत । ते वि करेंति, करेत्ता नहेब पञ्चपिगानि ॥३५॥ * ज्ञाता ०६२०१८ १०३७ ११ प०३ से प्रारम्भ सुखविपाकसूत्रम् (४५) । । ~ भावार्थ- सत्कार और सन्मान करके उन्हे (दासियों को) विदा किया । तदनन्तर राजा अदीनशत्रु ने सेवकों को बुलवाया, बुलवाकर बोले- हे देवानुप्रिय ' हस्तिशीर्ष, नगर को शीघ्र स.फ कराओ, और (यावत्) छिडकाव कगो । सफाई कग कर कैदियो को छुडा दो । छुडा- कर वजारभाव सस्ता करो । सस्ता करके मुझे सृचित करो । सेवकों ने यह सब कार्य समाप्त करके राजा को सूचित कर दिया । पश्चात् अदी-शत्रु महाराज ने कुम्हार आदि अठारह जातियों और अठारह उपजातियों को वुलवाया । बुलवाकर वोले--- हस्तिशीर्प, नगर के बाहर और नगर में जाकर ऐसा (प्रवन्ध) करो कि कोई दश दिन पर्यन्त चुगी न ले, कर आदि न ले, राजा का कोई मनुष्य जनता को सन्ताप न दे, कोई अपराध का उचित या कम दट नहीं देने पावे, अर्थात् अपराव का कुछ भी दण्ड न दिया जाय । कोई ऋण का तगादा न करे । कोई धरना देकर न वठे। दूस- में जगह मृदंग आदि नाजे न नजाने पावे, तथा नगरको ताजी फूलमालाओंसे शोभमान करो। उत्तम गणिकाओं का नाच कराओ। बहुत से तालाचरों (नाटककारों) से नाटक कगओ । प्रमोट और क्रीडा करने वालों से नगर मुशोभित कगे। इसके सिवाय पुत्रजन्म सम्बन्धी कुल की मर्यादा के अनुसार दश दिन तक और २ कार्य कराओ, कसकर हमें सूचित करो। उन छत्तीस श्रेणियों के लोगों ने भी सब कार्य करके महाराज को खबर दी ॥३५॥ मूलम्-तते ण से अदीणसत्तू राया वाहिरियाए उवट्ठाणसालाए सीहासणवरगए पुरत्थाभिमुहे सन्निसन्ने सइएहि य साहस्सिएहि य सयसाहस्सिएहि य जाएहि दाएहि भोगेहि दलमाणे दलमाणे पडिच्छेमाणे पडिच्छेमाणे एवं च ण विहरति । तते णं तस्स अम्मापियरो पढमे दिवसे जातकम्म करेंति, करेत्ता बितिए दिवसे जागरियं करेंत्ति, करेत्ता ततियदिदरले चंदसूरदसणियं करेंनि, करेता एवा. ।

(४६) सेठियाजेनग्रन्थमाला मेव निव्वत्ते सुइजानकम्मकरणे संपत्ते वारसाहे दिवसे विपुलं असण पाणं खाहमं साइमं उवक्खडानि, उवख- डावेत्ता मित्तणाहनियगसयासंबंधिपरिजणं बलं च बहवं गणणायगदंडनायग जाव ग्रामति नतो पच्छा पहाया करवलिकम्मा कयकोच्य जाव सदालंकारविमृमिया महनिमहालयंसि भोयणमंडसि तं विपुलं असणं पाणं खाहम साहम मित्तणाहनियगसयणसंबंधि परियण जाव सद्धिं आसाएमाणा विमाण्मागगा परिभाण्माणापरिभुजेमा- णा एवं च णं विहानि ॥६॥ भावार्थ- पवान् अदीनशत्रु गजा बाहर की सभा में पूर्व दिशा की ओर करके नितानन पा विगजे देवपूजा के लिए और आहार लभर आदि दान के लि कडा हजाग लागों द्रव्यों का दान दिया। तदनन्तर उन बालक के माता पिता नहिले दिन जानकर्म (जन्म के समय की कि- याप) किया। दम दिन त्रिजागग किया, भार तीन दिन चन्द्रमा और सूर्य के दर्शन के लिए उन्मर किना। दिन जागरण किया । इन कानों में निवृत्त होकर शुचि जानमर्म करनेवर बारह दिन बटुनमा अशन, पान, साय ओर म्याद भोजन कापाय | U-मित्र मानि (माता पिता भाई जगह) निजा (पुत्रादि) यमन (पिता के नन्बन्धी काका वगैरह) सम्बन्धी (ममुर आदि) परिजन, मेना और बहुत में गणनायक, दण्डनायक आदि को (यावत्) आमन्त्रण दिलवाया। तत्पश्चात् स्नान किया । गृह- देवता की पूजा की । और कौतुक (तिलक आदि मगलिस- चिन्ह) किया । ममन्त अलकागे ने विभूषित हुआ, तथा बडे भागे सोडे मे जाकर मिन, जाति (यात्) गएनायकों के साथ अचान पान खाद्य और स्वाद्य पदाथों का स्वाद लिया । विशेष स्वाद लिया । दूनरी को चाटा और उपभोग किया । अर्थात् जिनमे बोटाव्यर्थ जार ज्यादा गरा जाय, सुखविपाकसूत्रम् (४७) ज्यादा व्यर्थ जाय थोडा खाया जाप, पूग खा लिया जाय, इस प्रकार के आहारों को प्रीति पूर्वक ग्रहण करने लगे ॥ ३६ ॥ मूलम्- जिमियभुत्तुत्तरागया वि य णं समाणा आ. यंता चोक्खा परमसुइन्भूया तं मित्तनातिनियगसयणसंबंधि- परियणगणनायग० विपुलेणं पुष्फवस्थगंधम्मल्लालंकारेणं सकारेंति सम्माणति, सक्कारेत्ता सम्माणेत्ता एवं वयासी-- अम्हें इमस्स दारगस्स नामेणं सुबाहुकुमारे , तस्स दारगस्स अम्मापियरो अयमेयारूवं गाणं गुणणिप्फन्न णामधेज करेंति सुबाहुत्ति, तते णं से सुबाहुकुमारे पंच- धाई परिग्गहिए तंजहा- खीरधाईए मंडणधाईए मजणधाईए कीलावणधाईए अंकधाईए अन्नाहिय बहूहि खुजाहिचिला- इयाहि वामणिवडभिवयीवडसिजाणियपल्हविणईसि- णियाचाधोरुगिणिलासियलउसियमिलिसिहलियारविपुः लिंदिपक्कणिवहालिमुरुंडिसवरिपारसीहि जाणादेसीहि वि. देसपरिमंडियाहि इंगितचितियपत्थियवियाणियाहि सदेसणे- वत्थगहितसाहि निउणकुसलाहि विणीयाहि चेडियाचक्क- वालवरिसघरकंचुहजमहयरगवंदपरिक्खित्ते हत्थाओ हत्थं साहरिजमाणे अंकात्रो अंकं परिभुजमाणे परिगिजमाणे चालिजमाणे उवलालिजमाणे रम्मंसि मणिकोहिमतलंसि परिमिजमाणे परिमिजमाणे णिव्यायणिवाघायंसि गिरि- कंदरमल्लीणेव चंपगपायवे सुहंसुहेणं वड्डइ ॥३७|| भावार्थ- भोजन करने के प चात् राजा और रानी सिहासन पर विराजे । विराज कर निर्मल जल से परम पवित्र होकर, मित्र, ज्ञाति, निजी स्वजन, मम्बन्धी, परिजन और गणनायकों का फूल, वस्त्र सुग न्धित माला और अलकारों से सत्कार और सन्मान मिया । सत्कार और (ट) मेठियाजनप्रन्यमाजा . - मन्मान करके बोने- हमने उस बालक का गुण नियन मुबाहकुमा यह नाम रम्या है । नदन्ना मुत्रा कुमार को पाच धायों ने प्राग किया। वे इस प्रकार है-- १ दूध पिलाने वाली, २ मा कान वानी, ३ म्नान कराने वाली, ४ मेल करने वाली, ५ गोद में विधाने और पलने में मुनाने वाली तया और ना अनेक टेढी जाच वाली चिनान देगा की, योना शरीर वाला, बटे पेट वाली, बर्बर देश का बकुन देशकी, गेनक (जोगिय) देश की, पनप देश को, टमिनिक देश की, जानकिन देश फी, लानक देश की, लगलिक दश की, द्रवित दंगकी, मिहल देशकी, अवदेशकी, पुलिदेशी, परगदेगकी, बहलदेगनी, मुन्टादेशकी गवर देश की, 'फग्म देश की हत्यादि यहत में अनार्य दयों की प्रदेश और पदेश में प्रात होने वानी, चेटा में अभिप्राय को जानने वाली गोरे में मन में मांचे द्रा को जानने वाली, यवन में न कहने पर भी बार- सकता को मनमा पाठी, अपने ३ देश का वेश पहनने वाली, बहुत ही चतुर और विनीत, दानियों के समूह और कचकी (नवानके ग्यवाले) तमा अत पुर की रक्षा का चिन्ना करने वालों में घिरा हुआ हाथों हाथ रहने लगा। यह एक नी गोद से दूसरे की गोद में जाना, दासिया गाना मुनानी, मुलाती और प्यार करती यो । इन प्रकार अनि रमणीय मगियों से विभूषित पागन में अनेक प्रकार के मानन्द करता हुआ वाधा रहित होकर सेटना हुआ नुवानुकुमार पर्वत के मंडप में रहने वाले चम्मक वृक्ष के समान मुष मे बहने लगा ॥३७॥ मूलम् + तग गं नस्म सुबाहुस्म दारगस्स अम्मा- पियरी अणुपुञ्चेणं टिनिवडियं वा चंदसरदमावणियं वा जागरियं वा नामकरणं वा परंगामणं वा पयचकमणं वा जे. मामण चा पिंडवणं वा पजपावणं वा कण्णवेहगं वा +भगवती श-१९३६१ , सुखविपाकसूत्रम् (४६) - - संवच्छरपडिलेहणं वा चोलोयणगंवा उवणयणंवा अण्णा- णिय वहणि गम्भाधाणजम्मणमादियाई कोउयाई करति । * तते णं तं सुबाहुकुमारं अम्मापियरो सातिरेगअहवास- जातगं चेव गन्भट्टमे वासे सोहणसि तिहिकरणमुहुत्तसि कलायरियस्स उवणेति। तते ण से कलायरिए सुबाहुकुमारं लेहाइयायो गणियप्पहाणाओ सउणरुयपजवसाणाओ था- वत्तरि कलाओ सुत्तओ य अत्थओ य करणओ य सेहा- वेति सिक्खावेति ॥३८॥ तं जहा- भावार्थ- तत्पश्चात् उस सुबाहुकुमार बालक के माता पिता का से स्थित पतित (पुत्र जन्म का उत्सव विशेष) यावत् चन्द्रसूर्यद- शन गत्रि जागरण, नामकरण, घुटनों से चलना, पैरों के बल खडे करना, भोजन कगना, प्रास का बढाना, उच्चारण करवाना, कानों का छिद्राना, वर्षगाठ मनाना, चोटी रखाना, उपनयन सस्कार (क्ला ग्रहण करवाना) आदि अनेक गर्भावान और जन्म आदिके कौतुक करने लगे। इस प्रकार जब माठ वर्ष और कुछ दिन बीत गए, तब सुबाहुकुमार के माता पिताने उसे शुभतिथि शुभकरण और शुभमुहूर्त मे कलाचार्य ( पण्डितजी) को सोंप दिया। सापने के अनन्तर पण्डितजी ने सुबाहुकुमार को लिखना, गणित से लेकर पक्षी आरिके बोलनेका शकुन ज्ञान तक बहत्तर कलाएँ,सूत्र अर्थ (व्याग्व्यान) और करण (प्रयोग) द्वारा सिखाई ॥३८॥ वे निम्न प्रकार है मूलम् - तंजहा-लेहं गणियं स्वं णटै गीयं वाइयं सरम(ग)यं पोक्खरगयं समतालं जूयं १०, जणगयं पासयं अट्टावयं पोरेक (व) चं दगमटियं अन्नविहि पाणविहि वस्थ- विहि विलेवणविहि सयणविहि २०, अजं पहेलियंमागहियं गाहं गीतियं सिलोयं हिरण्णजुत्ति सुवष्णजुत्ति चुन्नजुत्ति * माता न.१ स १८ पत्र३८१ ~ 7 (५०) मेठियाजेनप्रन्थमाजा आमरणविहिं ३०, तमगीपडिकम्मं हत्यिलक्खणं पुरिमल- क्खणं हयलक्खणं गयलक्खगंग गोणलवणं कुक्कुडल- क्खग छत्तलकग्वगं डंडलकवणं असिलवणं ४०, मगिालक्खग कागणिलक्खगा वन्युविन खंधारमाणनगर- माणं वृहं पडिबृहं चारं पडिचारं चक्रवृहं ५०, गमलबृहं मगडबृहं जुडं णिजुद जुद्धानिजुद्धं अद्विजुद मुहिजुद्धं बाहु जुद्धं लयाजुद ईसय ३०, हरप्पवायं धणुव्वेयं हिरन्नपागं सुवनपागं सुत्तखेमु बटिखेनालियाखेडं पत्तच्छेज कटच्छे- ज्नं मन्जीवं ७०, निज्जीवं मउणमयमिनि ॥३०॥ भावार्थ-१ अक्षा लिपन की कला २ गणितला ३ सपकला चित्रकारी) ४ नाटक करने की कला , गानका बाजे बजाने का जान ७ स्वर के आलाप का वि.गन ८ मर्दन वादन कला ममतार व नाना १० जुआ खेलने का दान ११ जनबाट (वादविवाट करना) १२ पामा पेलने का ज्ञान १३ गनरज या चौपड वेल्ने का ज्ञान १४ प्राग नगर आदि की रक्षा करना १५ जल और मिट्टी के नयोग में बनने वाली वस्तुओं का ज्ञान १६ अन्न पकाने की कला १७ जल के म- म्कार करने की कना १८वत्र नम्बन्धी नव तरह का ज्ञान हागर पर तेल आदि का मर्दन लंप करने का ज्ञान २० शयन का ज्ञान २१ प्रायां हर में ग्चना करने का जान २२ पहेली बनाने की कन्या २३ मागधी भाषा की कविता बनाने का ज्ञान २४ गाथा ग्चना करने का जान २५ गीत बनाने का ज्ञान २६ भोक बनाने का ज्ञान २७ चाटी बनाने की विधि का ज्ञान २८ मुवर्ग बनाने की विधि का ज्ञान २६चूर्ग (अवीर आदि) बनाने का ज्ञान ३० आभूषण घटने का ज्ञान ३१ तरुण स्त्री का श्रृंगार मम्मली जान ३२ स्त्रियों के लक्षणों का ज्ञान ३३ पुरुषों के क्षणों का नान ३४ घोडों के लक्षणों का ज्ञान ३५ हाथियों के लक्षणों का जान सुखविपाकसूत्रम् ३६ गाय बैल के लक्षणों का ज्ञान ३७ मुगो के लक्षणों का ज्ञान ३८ छत्र के लक्षण का ज्ञान ३६ बास आदि के दटों के लक्षण का ज्ञान ४० तलवार के लक्षण का ज्ञान ४१ काकणी (व्याघ्री हसी आदि) के लक्षण का ज्ञान ४२ मणियों के लक्षण का ज्ञान ४३ वास्तु शास्त्र (घर आदि- बनाने की विधि) का ज्ञान ४४अक्षौहिणी आदि सेना के निर्माण (रचना) करने की कला ४५ नगर बसाने के परिमाण का ज्ञान ४६ व्यूह रचना करने का ज्ञान ४७ शत्रुसेना के व्यूह को भेदने की कला ४८ सेना का सचार करने का ज्ञान ४६ विरोधी सेना के विरुद्ध सेना सचार करने का ज्ञान ५० चक्र के आकार की व्यूह-रचना करने का ज्ञान ५१ गरुडाकार व्यूह- रचना करने का ज्ञान ५२ शकट (गाडी) के आकार व्यूह रचना करने का ज्ञान ५३ सप्राम (युद्ध) करने का ज्ञान ५४ विशेष युद्ध करने का ज्ञान ५५ धावा मारकर घोर सग्राम करने का ज्ञान ५६ अस्थि (हड्डी) से युद्ध करने का ज्ञान ५७ मुष्टि (मुट्टियो से) युद्ध करने का ज्ञान ५८ बाहु-युद्ध करने का ज्ञान ५६ लतायुद्ध करने का ज्ञान ६० बाण शास्त्र का ज्ञान अथवा योडी चीज को बहुत और बहुत को थोडी दिखाने की कला ६१ खुरपे सरीखे शस्त्र चलाने का ज्ञान ६२धनुर्विद्या का ज्ञान ६३ हिरण्यपाक (चादी शुद्ध करने) का ज्ञान ६४ सुवर्णपाक (मोना शुद्ध करने) का ज्ञान ६५ सूत्रछेदन कला ६६ प्रन्यिखेट कला ६७ कमल के दद को भेदने की कला ६८ पत्तों को छेदने की कला ६६ कट (चटाई) के समान वस्तु- ओं को छेदने का ज्ञान ७० मरे हुए को मत्र से जिन्दा करने का ज्ञान ७१ जिन्दे को मरा सा दिखाने की कला और ७२ पक्षियो का शब्द सुनकर शुभाशुभ फल का ज्ञान ॥ ३९ ॥ मूलम्- तते णं से कलायरिए सुबाहुं कुमारं लेहा- इयाओ गणियपहाणाओसउणरुयपजवसाणाओवावत्तरि- कलाप्रोमुत्तो य अत्थओय करणओयसेहावेति सिक्खा- मेठियाजेमप्रन्यमाना वेति, मेहावेत्ता सिक्खावेत्ता अम्मापिऊग उवणे । ततेणं सुवाहुकुमारस्स अम्मापियरोनं कलायग्यिं महुरेहिं वयणेहि विपुलेणं वत्यगंधमल्लालंकारेण सरकारति सम्माणति। मकारेत्ता सम्माणेत्ता विपुलं जीवियारिहं पीहदाणं दलयंति। दलहत्ता पडिविमन्नति। तते ण से सुबाहुकुमार यावत्तरिक- लापंडिग गावंगसुत्तपडियाहिए, अहारमविहिप्पगारदेसीभा. साविसारण गीयरई गंधचनकुमल हयजोही गयजोही रहजोही बाहुजाही बाहुप्पमही अलभोगममन्ये साहमिए वियालचारी जाए यावि होन्या । नते णं नम्मसुयाहुकुमा- रस्स अम्मापियरी सुबाई कुमारं यावत्तरिकलापंडियं जाय विषालचारी जायं पासंनि । पामित्ता पंचसयपामायबाँसगे करति, अन्भुग्गयमृसिय पहमिय विवमणिकणगग्यणभत्ति. चित्ते वाउद्धृयविजयवेजयंतीपडागाळत्ताछत्तकलिए तुंगे गगणतलमभिलंघमाणमिहरे जानतरग्यगापंजमम्मिल्लियर- यमणिकणगभियाए वियमियमयपनपुंडगए निलयरया- दचंदच्चिए णागामणिमयटामालकिते अतो यहि च मण्हे. नवगिाजमहलवालयापन्थरे सुहफामे सम्सिर्गय पासादीए दरिसणिन्न अभिरूचे पडिस्चे, तेसिं गं पामादवहिंसगाणं पाहुमज्मदेसभागे एत्य गा महेग भवणं करेंनि. अणेग- खंभसयसन्निविटं लीलठ्यिसालभंजियागं अभुग्गयसुकय- घयरवेढ्यातोरग वररहयसालभंजियारतुसिलिट्टविसिट्टलह- संठियपसत्यवेमलियखभं णाणामणिरुणगरयणखचियउ. ज्जलं यहुसमसुविभत्तनिचितरमणिनभृमिभागं ईहामिय. उसमतुरगणरमगरविहगवालगकिण्णररुरुसेरभचमरकुंजर. १ चेवार भग० उ०११ पर पृ२१३ मे।३माता त्राला सुखविपाकसूत्रम् घणलयपउमलयभत्तिचित्तं खभुग्गयवयरवेड्यापरिंगयाभि- रामं विजाहरजमलजुयलजुत्तं पि व अच्चिसहस्समालणीयं रूवगसहस्सकलिय भिसमाणं भिभिसमाणं चक्खुल्लोयण- लेसं सुहफासं सस्सिरीयरूवं कंचणमणिरयणभियागं जाणाविहपंचवण्णघंटापडागपरिमंडियग्गसिहरं धवलमी- चिकवयं विणिम्मुयंत लाउल्लोइयमहियं गोसीससरसरत्तचं- दणदद्दरदिन्नपंचंगुलितलं उवचियचंदणकलसं चंदणघडसुकय- तोरणपडिदुवारदेसभागं आसत्तोसत्तविउलवटवाघारियम- ल्लदामकलावं पंचवण्णसरससुरभिमुक्कपुप्फपुंजोवयारकलिंय कालागरुपवरकुंदुरुक्कतुरुक्कधूवमघमघतगंधुद्धयाभिरामं सु- गंधवरगंधियं गंधवभूियं पासादीयं रिसणिज अभिरुवं पंडिरूवं ॥ ४०॥ भावार्थ-कलाचार्य ने लिपि और गगिात से लगाकर शकुनरुत तक बहत्तर कलाओं को सूत्र अर्थ और करण (प्रयोग) करके मुबाहुकुमार को सिखाया,और सिखाकर उसके माता पिताको वापस सौप दिया। मुबाहुकुमार के माता पिताने भी मधुर वचनो बहुत से वस्त्र फलमाला और आभूषणों से आचार्य का सत्कार-सन्मान किया । मत्कार सन्मान करके उतना दान दिया, कि वह उन के समस्त जीवन को पर्याप्त या । दान देकर उन्हें विदा किया। अब सुबाहुकुमार बहत्ता कलाओं मे कुशल हुआ। उसके २ कान २ नाक २ पाखे १स्पर्शन इन्द्रिय १ जिला और १मन ये नौ अग जाग से गए, कार्या त विशिष्ट ज्ञानवाले हुए, अठारह देश-भाषाओ मे प्रवीण हुमा । गीतो का प्रेमी तथा गाने और नृत्य करने में प्रवीण हुआ । वोड़े, हाथी और रथ द्वारा युद्ध करने वाला हुआ | बाहुयुद्ध करने वाला, भुजाओं को मर्दन करने वाला और पर्याप्त भोग भोगने मे सशक्त हुआ । वह अपने साहस के द ज्ञाता अ१. सूत्र १६ तक। , 4 (४) सेठियाजेनगन्याला । बलपर अकाल मे ही विचग्गा करता था। मुबाहकुमार के माता पिता ने मुबाहकुमार को बहार कलानी म प्रयोग (यावत) असाल ही म विचरण कान वाला जानकर पाचौ उत्त- म उत्तम महल बनवाए । महल बहुत ऊचे थे और स्वच्छ प्रभा में ऐमे मालूम होते, मानो हॅम रहे है । मग्यि, सुवर्ण, और पत्नी से गचित होने से अचम्भा पैदा करते थे। विजय की सूचना करने वाली वायु से हिलती दुर्ट पताकाओं और पताकाओ के ऊपर की पताकाओं तथा कुत्र और छत्रों के ऊपर के छत्री से युक्त ये । बहुत ऊँचे थे, अन एमे मालू- म होते थे, मानो उन के शिवा आकापतन को लाच रहे हो । जालियां के मध्य-भाग म अपना विडकियो म लगे नए रत्न चमकने ये 1 ग्वम्भ, मगि और मुवर्ग में जंडं हा या उन म शतपत्र (नौ पत्ते वाले)कमल ग्विले हुए थे । तिलक रत्न और मीडिया से युक्त ये । नाना मणिमय मालामा से शोभमान थे। मीना बाहर से चिकने थे । तमे हुए मोन की मुन्दर रेन के बने हुए फर्णवाले महलो के आगन नई भले मालम होने थे । ढूने में बच्टे, मुन्दर रूपवाले चित्तको प्रसन्न करने वाले, दर्शनीय मनो- हर और देगने वालो को भिन्नभिन्न रूप वाले मालूम होते थे। उन उत्तम मालोके बीचोंबीच एक बडा भवन वनवाया, उसमे मैकडो खम्भ बने थे, जिमम लीला करती हुई पुनलिया बनी हुई थीं। वनमय वेदिकानो पर तोर- ण बने थे। तोग्गो के ऊपर भी मुन्दर२ पुनलिया बनाई गई या। विशे- मुन्दर जडे हुए वैडर्य मगि के ग्वम्भी पर पुत- लिया बनी हुई थीं। अनेक मणि मुवर्ण र नासे वह भवन प्रकाशित या। वहाँ की भूमि समनल अच्छी तरह ग्ची हुई और अनिशय गमगीय थी। उनमें भेडिया बन बोडा मनु य मगर पक्षीसर्प किनर मृग मष्टापट चमरी गाय हाथी बनलता ओर पद्मलताओं के चित्र बने ये । खम्भा के ऊपर हीरे की बनी हुई वैदिकामा से मनोहर या! एकही पक्ति म विद्यावरों के घ आकार वाले और बच्च सुखविपाकसूत्रम् (५५) - . जोडों की चलती फिरती प्रतिमाएं बनी थीं । उसमे से हजारों किरणे नि- कल रहीं थीं। उस मे हजारों ग्ग थे । देदीप्यमान या- अतिशय देदीप्य- मान था । उसे देखते ही नेत्र उस में गड जाते थे | स्पर्ण मुखकर, रूप मनोहर या। नीचे की भूमि सोना, मणि और रत्नों की बनी थी। उस का दिशग्वर अनेक तहरके पाचवर्ण वाले घण्टा और पताकाओं से मडित था । सफेद किग्ण रूप कवच को धारण कर रहा या, लिपा पुता था। घिसे हुए ताजे गोशीर्ष (मलियागिरि चदन) और रक्तचदनके छापे (हाथे) लगे हुए थे । दरवाजे पर मागलिक कलश स्थापन किये गए थे। चन्दन लित घट, तोरण और प्रतिद्वारों पर स्थापित किए थे। नीचे से ऊपर तक लम्बी चौडी फूलों की मालाए ल्टकी हुई थीं । पाच वर्णो के ताजे सुगन्धित फूलों के ढेर लगे थे । कृष्णागर चीड लोबान और दशावप की लहराती हुई सुगन्ध से युक्न-उत्तमोत्तम सुगन्धि से सुगन्धित, अत- एव गधकी गोली जैसा किया गया था। उस भवन को देखते ही चित्त प्रसन्न हो जाता था। उसे देखने में नेत्रों को कुछ श्रम न पडता था,और देखने वाले को भिन्नभिन्न रूप दिखाई देते थे । मतलब यह कि- वह भवन अत्यन्त मनोहर या ॥४०॥ मूलम्--*तए णं तं सुबाहुकुमारं अम्मापियरो अन्न- या कया वि सोभणंसि तिहिकरणदिवसनक्खत्तमुहुत्तमि पहायं कयवलिकम्मं कयकोउयमंगलपायच्छित्तंसवालंकार- विभूसियं पमक्खणगण्हाणगीयवाइयपसाहणटुंगतिलगकंक- ण अविहववहुउवणीयं मंगलसुजंपिएहि य वरकोउयमंगलो- धधारकयसंतिकम्म सरिसियाण सरित्तयाण सरिव्वयाण सरिस्सलावन्नरूवजोव्वणगुणोक्वेयाण सरिसएहितो राय- १६ भगवती शतक ११ उद्देश ११ सूत्र ४३० ५५४६ पृ ११ १ १ शाता अ १ सू० २० पत्र ३९१प से तक।

(७६) मेठियाजैनप्रन्यमाला कुलेहिंतो आणीहल्लियाण पसाहटंगअविहयवहुप्रोवयगा- मंगलसुजंपियाहि पुष्पचलापामोक्खाहि पंचसयाहि रायव- रकपणयाहि मिद्धिं एगंदिवसेगं पाणि गिहाविंसु । तते णं तस्म सुबाहुस्स कुमारम्स अम्मापियरी अयमेयाम्वं पी. घटाणं दलयंति। तंजहा-पंचसयहिरगणकीडीओ पंचसयसुवनकोडी. ओ पंचसयमउडे मउपवरे पंचसयकुंडलजुए कुंडलजुयल्प- परे पंचसयहारे हारप्पवरे पगासयवहारे अद्वहारप्पवरे पणमयएगावलीओ एगावलिप्पवरायो एवं मुत्तावलीओ एवं कणगावलीओ एव रयणावलीग्रां पंचसयकहगजोए कडगजीयपवरे एवं तुडियजोए पणसयग्वोमजुवलाई खा. मजुवलप्पवराह एवं वडगजुवलाई एवं पहजुवलाई एवं दु. गुजुवलाई पणसयमिगी पणसयहिरीयो एवं धितीओ कित्तीओ बुद्धीग्रो लच्छीयो पणसयनन्दादं पणसयभवाई पणमयनले तलप्पवरे मन्चरयणामए णियगवरभवणकेऊ. पगामयज्झप झयप्पवरे पणसयव वयप्पवरे दसगोसा- हरिमाणं वरणं पणसयनाडगाई नाडगप्पवराडं वत्तीमयदेणं नाइएण पणमयामे आसप्पवरे सव्वरयाणामए सिरिघर- पडिरूवा पणसयहत्यी धिप्पवरे सव्यरयणामए सिरिघर- पडिस्वर पगामयजाणाई जाणाप्पवराई पणसयजुग्गा जुग्गप्पवराह एवं सिवियाओएवं संदमाणीओ एवंगिल्लीमा घिल्लीओ पणमयवियडजाणाहं वियडजाणापराई पणस- घरह पारिजाणिप पणमयरहे संगामिए पणसयआसे आस- (पवरे पगासयहत्यी हत्यिपवरे पणसयगामे गामापवरे २ भगवती चालू सुखविपाकसूत्रम्' (५७) दसकुलसाहस्सिएणं गामेण पणसयदासे दासप्पवरे एवं चेव दासीनो एवं किंकरे एवं कंचुइज्जे एवं वरिसधरे एवं महत्तरए पणसयसोवन्निए ओलवणदीवे पणसयरुप्पामए ओलंबण- दीवे पणसयसुवन्नाप्पामए ओलंबणदीवे पणसयसोवन्निए उकंचणदीवे एवं चेव तिन्निवि, पणसयसोवन्निए पंजरदीवे एवं चेव तिन्निवि, पणसयसोवन्निए थाले पणसयरुप्पामए थाले पणसयसुवन्नरुप्पामए थाले पणसयसोवन्नियाओ पत्तीग्रो पणसयरुप्पामयाओ पत्तोओपणसयसुवन्नाप्पामयाओ पत्ती- आपणसयसोवन्नियाई थासगाहं पणसयरुप्पामयाई थासगा- ई पणसयसुवन्नरुप्पामयाई थासगाई पणसयसोवन्नियाई मल्लगाई पणसयरुप्पामयाई मल्लगाई पणसयसुवन्नरुप्पाम- याई मल्लगाइं पणसयसोवन्नियाओतलियाओ पणसयरुप्पा- मयाओ तलियाओ पणसयसुवन्नरुप्पामयाओ तलियाओ पणसयसोवन्नियाओ कहवियाओ पणसयरुप्पामयाओ कइवियाओ पणसयसुवन्नरुप्पामयाअो कवियाओ पणसय- सोवन्निए अवएडए पणसयरुप्पामए अवण्डए पणसयसुवन्न- झप्पामए अवण्डए पणसयसोवणियाओ अवयकाओ पणसयरुप्पामयाओ अवयकाओ पणसयसुवष्णरुप्पामयामो अवयकाओ, पणसयसोवणिए पायपीढए पणसयरुप्पामए पायपीढए पणसयसुवण्णमप्पामा पायपीढए, पणसयसोव- जियाओ भिसियाओ पणसयरुप्पामयाओ भिसियाओ पणसयसुवण्णरुप्पामयाओ भिसियाओ पणसयसोवष्णि- पाओ करोडियाओ पणसयरुप्पामयाओ करोडियात्रो पणसयसुवण्णमप्पामयाओ करोडियाओ,पणसयसोवण्णिए पल्लंके, पणसयरुप्पामए पल्लंके पणसयसुवण्णरुप्पामए प- मठियाजेनप्रन्यमाला ल्लंके,पणसयसोवपिणयाओपडिसजाओ पासयम्प्पामया. ओ पहिसेनाओं पणसयसुवरागामप्पामयाओपडिसेजाओ, पणसयहंसासणाई पणमयकोचामगाई एवं गम्लासगाई उन्न- यासगाई पणयासगाई दीहासणाई महासणाई पश्खासा मगरासणाई पणसयपउमासणाई पणमपदिसासोवत्थियास- गाई पणसयतेल्लसमुग्गे जहा रायपमेणिले जाव पणसय. सरिसवसमुग्गे पणसयखुवायो जहा उववाहएजाव पणस- यपारिसीओ पासपत्ते पणसयबत्तधारीओ चेडीओ पपा- सयचामराजी पणतयचामरधारीओ चंडीना पणमयतालि- यंटेपणसयतालियंटधारीओ नहीलोपासयकराडियाधारीयो चेडीओ पणमयाबीरधाईओ जाव पणसयकाईओ पणसय अंगमहियाओ पणमयउम्मडियाओ पणसयोहावि- याओ पगासयपसाहियाओं पणसयवनगपेसीयो पणसय- चुन्नगपेमीयो पगमयकोडागारीओ परामयदवकारीओ प. सयउवयाणियाओं पणसयनाडहलाओं पणसयकोमुषि- गीओपगसयमहाणसिणीओपणसयभंडागारिणीओ पण- सयअज्झाधारिणीओ पणसवपुप्फधारिणीओ पणसयपाणि- अधारिणीओ पासपलिकारियाओ पणसयसेवाकारिया- ओ पासययभतरियानो पडिहारीओ पणसययाहिरपडि- हरीओ पणमयमालाकारी पासयपेसणकारीमो अपर्ण वा सुवहं हिरणं वा सुवणं वा कंस वा दस वा विउलध- शकणारयणमणिमोत्तियसंखसिलपवालरत्तरयणसंतसार- 'मावइल अलाहि जाव आसत्तमाओ कुलवंसाओ पकार्म दाई पकामं परिभोत्तुं पकामं परिभाए ॥४|| सुखविपाकसूत्रम् (५६) " भावार्थ- इसके बाट (सुबाहुकुमारके) माता पिताने शुभ तिथि शु- भ करण शुभ दिन शुभ नक्षत्र और शुभ मुहूर्तमे मुबाहुकुमाग्को, जो कि स्ना- न कर चुका था । देव पूजा करचुका था। मागलिक तिलक आदि किये हु- ए था । सब अलंकारों से भूषित था । सुहागिन स्त्रियों से मर्दन (मालिश) स्नान, गीत वादित्र मडन और आठों अगों पर तिलक लगवाया तया, ककण बधाया, मागलिक वचन बोलकर प्रधान कौतुक, मगलोपचार और शान्तिकर्म किया। फिर एक-सरीखी, समान त्वचावाली, समान वय वाली, समान रूप लावण्य और यौवन वाली, विनीत, कौतुक मगल प्रायश्चित्त कर लिया है जिन्हों ने ऐसी, समान गजकुलों से बुलाई गई, 'पुष्फचूला' वगैरह उन पाच मौ राजकन्याओं को, मुहागिनी स्त्रिया से आठो अगो मे भूषण पहनाकर और मागलिक गान पूर्वक , उन कन्याओ के माय एक ही दिन पाणि-ग्रहण (विवाह) कग दिया, पश्चात् मुबाहुकुमार के माता पिता में नीचे लिखा हुआ दान प्रम पूर्वक दिया, वह इस प्रकार पाच सौ चादी के सिकं, पाच सौ मोने के सिंक, पाच मौ पाच मौ उत्तम मुकुट, पाच सौ कुडलो के जोड, पाच सौ उत्तम कुडला के जोड़, पाच सौ हार, पाच सौ उत्तम हार, पाच सौ अर्द्धहार, पाच मौ उत्तम अर्द्धहार, पाच सौ एकावली हार पाच सौ उत्तम एकावली हार, पाच सौ मुक्तावला हार, पाच सौ उत्तम मुक्तावली हार, पाच सौ कनकावली हार, पाच सौ उत्तम कनकावली हार, पाच मौ रत्नावली हार, पाच सौ उत्तम रत्नावलो हार, पाच सौ जोड कडे, पाच सौ उत्तम जोडे कड़े, पाच सौ जोडे भुजबब. पाच सौ जोडे उत्तम भुजबत्र, इसी त- ग्ह अलसी के वस्त्र युगल, टसर के वस्त्र युगल, पाच सौ पट्टसूत्र के यु- गल, पाच सौ दुकूल, पाच सौ श्रीदेवी की प्रतिमाए, पाच सौ ह्रीदेवी की प्रतिमाए, पाच मौ धृतिदेवी की प्रतिमाए, पाच सौ कीर्तिदेवी की प्रति- माए, पाच सौ बुद्धिदेवी की प्रतिमाए, पाच सौ लक्ष्मीदेवी की प्रतिमाए; है. - मुकुट, . ~ , , मेटियामप्रत्यमाला पाच नौ नन्दामन, पाच नौ भद्रासन, पाच मी नालन, पाच सौ उत्तम रत्नों से जुटे हुए नाल वृक्ष.(ये अाननादि नव रत्ना में जट इपये)अपने अपने प्रधान वर्ग के लिए पाच मी पताका, पाच नौ मावागा व्यजार पाच सौ गोल, पाच नौ उत्तम गांठल, दश दश हजार गायों का एक गोकुल होता है । वसीम बनीम पात्र याने पाच नौ मावागा नाटक और पाच सो उत्तम नाटक, पाच नौ नावागा वोट, पाच लो बढ़िया बोट, मर्वरत्नमय लक्ष्मी के भहार मग पाच २ मा मापारण और उत्तम हाथी, सर्वरत्नमय लक्ष्मी के भडार जमे पाच नौ सागर और प्रधान माग (गाडी आदि), पाच मी उत्तम तामझाम दमा तरह पालनी स्यन्दमानी (विशेष पालवी) हाथी का होदा, और दो बोट की बधी, पाच पाच मौ माधारण और उनम विकट-यान (विना छन नी माग) पाच नौ ग्य क्रीडा आदि के लिए, पाच लोय मग्राम के लिए (कुट के लिए), पाच मौ नावारण और श्रेय बोट, पाच २ नौ मायाग औरट दायी, एक गार के प्राचीन दम दम हजार गार मे पाच नौ मावाग ग्राम, पाच नौ उत्तम नाम, पाच नो नाधारण और पात्र नौ प्रधान दान, उनी नग्ह दामियग, फिकर कचुकी (अन पुर का चपनी) वर्धा ( बोजा- ते नपुमका जो अन्त पुर में कार्य करते है ) महत्ता अन्न पुर का काम- काज करने वाले, पाच मा मानकी नाकल गन्न दीपक, पाचमा चादीकी नाकल वाले दीपक, पाच नो मुवाम्प्यमर नाकन के दीपक, पात्र मी मोने की ममार्ट ( दीपट ) पाच नो चादी मार पाच ना चादी-सोने के टीट, पाच २ मो नोने चादी और मान- चाटी के लालंटन वाले दीपक, पाच २ मो मोने, चाटी और नोने-चादी के बन हुए दापक, पाच मी नोने के यान्न, पाच नो चादी के थान, पाच ला मुवर्ण-चादी के बाल, पाच नो मोने के पगत, पाच सो चादी के पान, एच नौ लोन-चाटी क परान, पाच नो मोन के तासक, पाच सो चादी २ - सुखविपाकसूत्रम् के तासक, पाच सौ सोन. चादी के तासक, पाच सौ सोने के कटोरे, पाच मो चादी के कटोरे, पाच मो सोने-चादी के कटोर, पाच सो सोने के चमचे, पाच सौ चाटी के चमचे, पाच सौ सोने-चादी के चमचे, पाच सौ सोने के पीकदान, पाच सौ चादी के पीकदान, पाच सौ सोने- चादी के पीकदान, पाच सौ सोने के तापिकाहस्त (खुरप), पाच सौ चाढी के तापिकाहस्त, पाच सौ मोने- चादी के नापिकाहस्त, पाच सौ सोने के अवपाक्य (तबा) पाच मौ चादी के अवपास्य, पाच सौ सुवर्ण- मप्यमय अवपाक्य, पाच२ सौ मोने, चादी और सोनाचादी के बाजोट, तीनों तरह के पाच सौ आमन- विशेष, तीनो तरह के पाच पाच सौ पानदान, अथवा कुटा, तीनो तरह के पाच पाच सौ पलग, तीनो तरह के पाच पाच मौ प्रतिशय्या (छोटे पटग) पाच सा हसादिक के आकार के आमन, पाच सौ क्रौचासन, पाच सौ गरुडामन, पाच सौ उन्नतासन, पाच सौ पनकामन, पाच सौ दीवामन, पाच सौ भद्रासन, पाच मी पक्षा- मन, पाच मो मकरासन, पाच सौ पद्मासन, पाच सौ दिशा सवस्तिकामन (दक्षिणावर्त स्वस्तिक के आकार वाले आनन) पाच सो तेल के वर्तन । इनके सिवाय रायपसेणी सूत्र में कह नग्मों ग्वने के वर्तन नक सब चीजे, पाच मो कुबडी दामिया, इन के मिवाय औपपातिक सूत्र में कहा हुई पाच मां पानी दासियों तक, पाच सा छत्र, पाच मौछन यामन- वाली दासिया, पाच मो चॅवर, पाच नो चंबर टोग्न बानी दासिया, पाच यो पखे, पाच सौ पखे मलने वाली दामिया, पाच मा पानदान उठानवाल। दामिया, पाच मौ धाग, यावत् पाच सा गोड में खेलाने वाली वाण, पाच सो अग को मलने वाली ठामिया, पाच सौ मर्दन करने वाली ठानिया, पाच सौ स्नान कगन वाली दामिया, पाच मा शृंगार कगने वाली दासिया, पाच सौ चन्दन आदि को पीमने वाली, पाच सौ चूर्ण (ताम्बूल-पान का ममाला अथवा मुगधि द्रव्य) पीसने वाली, पाच सौ क्रीडा गनेवाली, - सेटियाजननयमाला - पाच मो मनोरजन करन वाली, पाच नौ गजममा के ममयमाय म्हन वानी, पाच मो नाटक सम्बन्विनी पाच मो किड्ग (चपगनिन), पाच मो ग्मोर्ड बनाने वाली, पाच मी मटार की ग्यवाली (देखभाल) करने वानी, पाच नो बालको को मलान वाली, पाच मो फलो के बाकी ग्व- वाली करने वाली, पाच नौ जलवा की रक्षा करने वाली, पाच मी पूजा करनेवाली पाच मो सेज (विलीना) हिने वाला, पाच नौ अन्त पुर की परिचारिकाः पाच मी बार की परिचारिका, पाच मी माना गयने वाली, श्री पाच लो पीमने वाली दामिया दी । टन के मिवाय बहुतमी नादी सोना कामा वान्त्र विपुल बन आदि विद्यमान उत्तम उनम चीदा। वे चाज दतनी काफी था, फिदि मन को कहा करके उन का मान पीढी नकदीनो को दान दिया जाय घय उपभोग किया जाय गौर हिम्सेदारों को ना वाटा नार लोभी समान न हो ॥ 2 ॥ मृलम्-नए णं से सुबाहुकुमारे पगमेगाए भजाएग- गमेगं हिरण्यकाडि दलयति । गमेगं सुवष्ण-कोडिं दलय- नि । एगमग मरई टलयति । एवं चव सत्रं जाव एगमेगं पेसणकारि दलपनि । अण्णं च सुबहं हिरण जाव परिभा- ॥४॥ भावार्थ- इसके पश्चात् मुबाहुकुमार ने हायक पन्नी का एक एक कोट चाटके और एक एक गट माने केमिक दिये । इसी तरह पोनने वाला दानियों तक सब वस्तु बाढीतमा और भी उपभोग आदि के लिए बहुत ना नोना चादी दे दिया ॥४२॥ मलम्- नाणं से सुबाहुकुमारे उप्पिपासायवरगए फुटमाणेहि मुइंगमत्यहि यत्तीमनियहि नाडएहि गागा. भगवती गाना 13. 11 पत्र... नर पर 1 प. प..।

सुखविपाकसूत्रम् विहवरतरुणीसंपउत्तेहि उवनचिजमाणे उवनचिजमाणे उवगि- जमाणे उवगिजमाणे उवलालिजमाणे उवलालिजमाणे पाउ- स १ वासारत्त २ सरद ३ हेमंत ४ वसंत ५ गिम्ह ६ पञ्जते छप्पि उर्दु जहाविभवेणं माणमाणे माणमोणे कालंगालेमाणे गालेमाणे इहे सद्दफरिसरसख्वगंधे पंचविहे माणुस्सए काम- भोगे पचणुभवमाणे विहरति ॥४॥ भावार्थ- अनन्तर सुबाहुकुमार ऊपर के महल में रहता हुमा अनेक तरुणी रमणियो से युक्त तथा मृदगों की ध्वनि सहित, बत्तीस प्रकार के नाटकों में इच्छानुसार नाच और गान करता हुआ,सुहावनी २ क्रीडाएं करता हुआ रहने लगा । प्राट्, वर्षा, शग्द, हेमन्त, वसन्त, और ग्रीष्म इन छह ऋतुओं में ऐश्वर्य के अनुसार काल को व्यतीत करता हुआ पाच प्रकार के इष्ट रूप-ग्म-गध स्पर्श-कामभोगों को भोगता हुआ रहने लगा॥४३॥ मूलम्- तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महा- वीरे आइगरे तित्थगरे सयंसंबुद्ध पुरिसुत्तमे पुरिससीहे पुरिसवरपुंडरीए पुरिसवरगंधहत्थी अभयदए चक्खुदए मग्ग- दए सरणदए जीवदए दीवो तागं सरणं गई पइटा धम्मवर- चाउरंतचक्कवट्टी अप्पडिहयवरनाणदसणधरे वियदृच्छउमे जिणे जाणए तिन्ने तारए मुत्ते मोयगे वुद्ध बोहरा सव्वन्न सव्वदरिसी सिवमयलमरुअमणंतमक्खयमव्वावाहमपुणरा- वत्तिअं सिद्धिगइनामधेनं ठाणं संपाविउकामे अरहा जिणे केवली सत्तहत्थुस्सेहे समचउरंससंठाणसंठिए बजरिसहना- रायसंघयणे अणुलोमवाउवेगे कंकग्गहणी कवोयपरिणामे सउणिपोसपितरोमपरिणए पउमुप्पलगंधसरिसनिस्साससु- रभिवयणे छवी निरायंकउत्तमपसत्यअइसेयनिरुवमपले जल्लमल्लकलंकसेयरयदोसवज्जियसरीरनिरुवलेवेछायाउनो- (६४) मेठियाजेनग्रन्थमाला इअंगमंगे घणनिचियसुबद्धलक्ग्वणुप्रणयक्रडागारनिभपि- डियरगसिप मामलिवांडघा निचियच्छोडियमिडविसयप- मधसुहमलक्खणसुगंधसुंदरभुयमोयगभिंगनेलकज्जलपाहि- हममरगणणि दणिकुरवणिचियकुंचियपयाहिणावत्तमुहमिः रण दाडिमपुप्फप्पगामतवगिजसरिसनिम्मलसुणिकेसं. सकेसभूमी घणनिचिय० छत्तागामतमंगदेमे णिव्यासम. लमचंददममणिडाले उड्डवहपडिपुण्णमामवयणे अल्लीण- पमाणजुत्तसवणे सुस्मवणे पीणमंसलकवालदेसभा आ- णामियचावम्हलकिण्ह भराहनणुकमिणणिभमुहे अवदा- लियपुडरीयणयणे कोयासिअधवलपत्तलच्छे गम्लायतर- ज्जुतुंगगामे उचिअमिलप्पवालयियफलसण्णिभाहरोहे पडरसमिसपलविमलणिम्मलसंखगोखीरफेणकुंदनगरय- मुणालिआधवलदन्तमेढी अग्बडदंते अप्फुडियदंते अवि- रलदंते सुगिाहदंते सुजायने पगदंतमेटी विवअणेगदंते हुय. वहणिदंतधोयतत्ततवणिज्जरत्ततलनालुजीहे अवटिय- सुविभत्तचित्तमंन्स मंसलसंठियपसन्धसहलविउलह चर- रंगुलसुप्पमागणकंवुवरसरिसग्गीवे वग्महिसवराहसोहसल- उमभनागवरपडिपुन्नविउलवंधे जुगसन्निभपीणरयपीवर- पउटसुसंठियसुसिलिट्टविसिघणथिरसुबद्धमंधिपुरवरफलिह- बटियभुए भुअईसरविउलभोगआदाणपलिहउच्छूढदीहयाह रत्ततलोवयमअमंसलसुजायलक्खणपसत्धमच्छिद्द - जालपाणी पीवरकोमलवरंगुली आयंवतंयतलिणसुहरूहलणि- ढणक्खे चंदपाणिलेहे मरपाणिलेहे मंखपाणिलेर चक्कपा- णिलेहे दिमामोधिअपाणिलेहे चंदसरसंखचक्कदिसासोत्थि- सुखविपाकसूत्रम् (६५) अपाणिलेहे कणगसिलातलुजलपसत्थसमतल उवचियवि- च्छिण्णपिहलवच्छे सिरिवच्छंकियवच्छे अकरंडअकणग- रुपएनिम्मलमुजायनिरुवहयदेहधारी असहस्सपडिपुन्नवर- पुरिसलक्खणधरे सण्णयपासे मंगयपासे सुंदरपासे सुजा. यपासे मियमाइअपीणरइअपाने उज्जुअसमसहियजच्चतणु- कमिणणिआहजलउहरमणिजरोमराई झसविहगसुजा- यपीणकुच्छी झसोदरे सुहकरणे पउमविअडगामे गंगाव- त्तकपयाहिणावत्ततरंगभंगुररविकिरणतरुणयोहियअकोसा - यंनपउमगंभीरवियडगभे साह्यसोणंदमुसलदप्पणणिकरि- यवरकणगच्छरुसरिसवरवडरवलिअमज्झे पमुझ्यवरतुरग- सीहवरवद्वियकई वरतुरगसुजायसुगुज्झदेसे आइण्णहउव्व- गिमवलेवे बरबारणतुल्लविश्कमविलसियगई गयससणसु- जायसन्निभारू समुग्गणिमगगृहजाणू एणीकुरुविंदावत्तव- द्वाणुपुचजचे संठियसुसिलिट्टविसिटगृढगुप्फे सुप्पइटियकु- म्मचारचलणे अणुपुचसुसंयंगुलीए उण्णयतणुतंबणिद्वण- क्खे रत्तुप्पलपत्तमउणयतणुतंवणिदणक्खे रत्तुप्पलपत्त- मउअसुकुमालकोमलतले असहस्सवरपुरिसलक्खणधरेन- गनगरमगरसागरचक्रवरंकमंगलंकियचलणे विसिहरू । हुयवहनिमजलियतडितडियतरुणरविकिरणसरिसतेए अणासवे अममे अकिचणे छिन्नलोए निरूवलेवे ववगयपेम- रागदोसमोहे निगंधस्स पचयणस्स देसए सत्धनायगे पहट्टा- वए समणगपई समणगविंदपरिअटए चउत्तीसवुद्ववयणाति- सेसपत्ते पणतीससचचयणातिसेसपत्ते । आगासगएणं चक्के- णं आगासगएणं छत्तेण अागासगयाहि सेयवरचामराहिं आ- गासफलिहामएणसपारणढेणं सीहासणेण धम्मज्झएणं पुर- - ६.

(६६) मेठियाजनग्रन्थमाला , - । ओ पाहिजमाणेण(*चउमाहि समणसाहमाहितीसा- ए अनियासाहम्सीहि) सद्धि संपरिबुडे पुब्याणुपुब्बि चर- माणे गामाणुग्गामं दृहनमाणे सुहंमुहेण विहरमाण हस्थि- सीसे नगरे पुप्फकरंडे उजागो बन्न पुढची मिलापट्टा बन्न - ओनहेव समोसरति ।। ४४ ।। भावार्थ- उनी गाल के उनी ममा भगवान मनोनिअरि हत अपम्पा में वर्म की आदि करने वाले, चार नबोकी स्थापना जाना ले, स्वयुद्ध पुन्पोत्तम पुरुषांसह पुपपुण्टीक पुरवगन्ध,स्ता अभय दाता, ज्ञानदाता मोहमार्गदाता अगाण के गाण जयमदाना, नमार लम् दम द्वीप की नार्ट महाग देने वाले, पनीया के साया भत करना की तरह तीन नमुद और निमान पर्वत तक वाचक चलाने बान्ने, नि: वाण और उत्तर जान दर्गा की बाग काम्न बात, हा (अमर) ता से हिन, गगडेप को जीतने गाने, रगहन आदि के बन्ला मारा और फल को जानने वाल ममा त नमुद्र से तिने और ताने बान म्घा वातिया कर्मा से मुक्त और टनरी को मक्त करने वाले तत्वाके - नकार और दुनगे को ज्ञान देने वान, सिट अम्मा की अपना नामोर मद, नियटन, नियल, नीगंग अनन्त, अक्षय, निबार जिन ने वापस न पांव ऐसी सिद्धगति तो प्रम होन गने, उन्त्रों से पृश्य, जिन, केली,मानहायलम्य, नमवतुवनम्यान वाले, यमन गच महननवाले, शरीर के अन्दर की अनुमाल वायु के वेगपाते, कामाक्षी की नाई नीगंग गुदा स्थान वाले, कतर की तरह नीन जय ग्निाले, शकुनि पनी की ताह मन मे निर्लप मगान (गुदा) चाले, पीठ पसमां और बाघों के विशेष (मुन्दर) आकार वाले थे। भगवान् का पा मुगन्धि द्रविशंप) और नीले कमल सरीवी मुगन्ध वाले नि श्याम से मुगन्धिन या । * यह पाठ टीका में नहीं ह। - सुखविपाकसूत्रम् . के उन के शरीर की छवि निगली थी और त्वचा अति कोमल थी। उन का मास नीरोग उत्तम सफेट और निरुपम था। उनका शरीर मैल, प्रशुभ तिनकादि, पसीना और चूल आदि की मलिनता से रहित अतएव निर्मल था। उनके अगोपाग कान्ति से चमकते थे। उनके स्नायुक्न्धन शुभ लक्षण वाले और इतने मजबूत थे जैसे लोहे का घन । उनका शिर ऐसा मालूम होताया, जेमे पर्वत के शिवर का पाषाण पिण्ड । उन के सिर के बाल सेमल की गई की तरह नरम, स्वच्छ शुभ, चिकने और शुभ- लक्षणा से युक्त थे । सुगपवाले मुन्दर भुजमोचक रत्न और भृग (एक ताह का कीडा) की तरह, नील की तरह कजल की तरह और मदोन्मत्त भारे की तरह काले काले दक्षिण की ओर घुमे हुए घने और घुबरवाले थे। उनके मस्तक की त्वचा (बालों के पे होने की जगह) अनार फूल या तपे हुए लोन की नाई (लाल) निर्मल (स्वच्छ) और चिकनी थी। उनका मस्तक भग दया छन के समान उनत था । ललाट घान आदि से रहिन, समान मनोज और दीप्त या, अत ऐमा मान्नभ होता था, मानो अर्द्ध चन्द्र हो । मुग्व पूर्ण चन्द्रमा की तरह मौम्य या । कान सटे हुए थे- न छोटे न बड-प्रमागायुक्त-थे । वे बडे भले म तृम होते थे और उनका विाय तेन था। उनके गाल स्यूल और मासल (पुष्ट) य । भोहे थोडे नमे हुर धनप की नाई मनोज्ञ या काले बादल की रेखा की तरह काले और स्निग्ध । नेत्र खिने हुए मफेद कमल जेसे थे,अत उनके कोये विकसित कमल सरीखे उज्वल और पक्ष्म (पलक) वाले थे । नाफ गरुड की तरह लग्बी मीवी और ऊची यी नीचेका ओठ कामदार सिलारूप प्रवाल (म्गा) और विनफल सरोग्ना लाल या । दातों की पक्ति स्वच्छ चन्द्र का टुकडा, अत्यन्त निर्मल शाव, गात्र के दब के फेन कुन: पुष्प . जल वीवृंद और प्राणामियचावरुदलकगहाभराइसठियसगयआययसुजायभमुए । उन के भाहे थोड़े नमे हुए धनुप की तरह सुन्दर और काले मेघकी रेखा के स मान काले सुन्दर आकार के, उचित लवे पार अच्छे बने हुए थे।

(६५) सेठियाजन मण्यमाला कमल के दगड मगरवी मफट या ने दान टूट विदर (दर) न थ । अतिशय स्निग्ध थे । मनोहर थे और एक दात की पक्ति की तरह ही अनेक दान थे (क्योंकि वन होने से एक दूसरे से अलग मान्नृम न पडतेथ) तालु और जिद्रा, अग्नि स निर्मल किए हुए, पानी मे बोर हुए नया फिर अग्निम नपाए हुए मान की नार्ट लाल थी। दाढी ओर मॅट के बाल, न वढन वाल, अलग अलग और मनोहर थे। दाढी भरी हुई मुन्टा शुभ लक्षणयुक्त विस्तीर्ण और व्यात्रकी नाडीकी तरह थी । ग्रीवा (गर्दन), चार अगुल की और उत्तम गाव जमी थी। कब, महिष शुकर सिंह नाई- ल यात्र बल और गजेन्द्र मगरवे याप्रमाग और विस्तीर्ण , ना यप (यन के खभं) मदृश लम्ब नोड, माटे और मनोहर थे । उन की कलाई भी स्थल थी मुन्दः आकारवाला मुसङ्गत उत्तम पृष्ट स्थिर और मजबूत जोड वाली या । मुना नगाद्वार की बागल का तह थी। व ण्मी मालूम हानी थी,जेमे किसी इष्ट पदार्थ को ग्रहण करने के लिए जान हुए नागराज का लम्बा शरीर हो । हाम (हयली) उठी हुई, काम्ल लाल, मामल (पुष्ट) सुन्दर और मामुहिक मात्र के शुभ चिन्हों में युक्त थे। अगुन्नियों के बीच म छद नहा टन य । अगुलिंगा स्थल कोमल और मुन्दर या । अगुलियो क नग्य, ताव की तरह कुछ कुछ लाल पन पवित्र चमकाले और चिकन य । हार का रवा चन्द्रमा जेम आकार वाला मरज जैसे आकार वाली शव जम आकार वाली और चक्र के आकार का तथा दाहिने ओर घुमे हुए माथिया के प्रकार वाली थी। चद्र, सूर्य गख, चक्र दिशा के आकार का और दक्षिणावर्त भाचिया के आकार का ग्वाप या । वक्षस्थल, सोने की शिला के ममान उन्चल शुभ, समतल मामल (पुष्ट) विस्तीर्ण और अत्यन्त विशाल था। श्रीवत्स के चिन्ह से - प्रवान विषय को अधिक उत्कृष्ट दिखाने के लिए दुहराया गया tw सुखविपाकसूत्रम् (६६) . शोभित था। उन का दह मामल (भराहुआ) या, अत. पीठ की हड्डी दिसाई न देती थी । मोने की सी कान्ति वाला था। मुन्दर और रोगादि स रहित था । पुरुष के सम्पूर्ण १००८ लक्षणों से युक्त था । पसवाड क्रमशः पतले होते गये थे । गरीर के प्रमाण के अनुसार ही पसवाडे थे। इसीलिए वे मुन्दर और मनोहर थे तथा अच्छे परिमाण वाले मोटे और और सुन्दर थे । रोमराजि, सीधी विषमता रहित बनी पतली काली स्निग्ध दर्शनीय लावण्य वाली और रमणीय थी, कृख, झष (मछली) और पत्नी की तरह सुन्दर भरी पूरी थी । उदर (पेट) मच्छ की तरह या। पाच इन्द्रिया पवित्र या । नाभि, कमल की तरह विरसित थी। तया गगा के मेवरकी तरह नगुर तथा तमग (दोपहर के) सूर्य से विकसित होनेवाल कमल की नाई गम्भार र विशाल थी । गव्यभाग, त्रिकाठिका (तिम्टा) मुसल, दर्पण पकाउन के काष्ट तथा शुद्ध किए हर सीन को नलवार की मृठ की तरह पतला श्री आर उत्तम बन के मध्यभाग की नाह दली नई यो । अति जिस तरह निफठी (निवाही), ऊपर का भाग ममल के नीच का भाग, दर्पण पकडन का काठ, तलवार की मठ का मध्यभाग पता होता है, उसी तरह भगवान का मध्यभाग ( कमर) पतला या और वन की तरह जगसा टटा । कमर, नीगेग बार्ड और बच्चा शा की कमर सरी- ग्या गोल या । गुह्य देश, घोडे के गुह्य देठा की तरह मुजान ( मुदर । था । जात्यश्व (उत्तम अश्व) की तरह उनका शरीर मल मूत्र आदि म रहित या । गजराज की तरह पराक्रम और बिलाम पूर्ण गमन या । जाय हाथी का सूड की तरह पुष्ट या । घुटने, माम स भरे हुए होने के कारगा ऐसे मिले हुए थे,जैसे अनान रनकी कोठी और उसका टकन आपसम मिना रहता है । पिटला हरिणी की पिडली और कुरुविन्द ( तृण विशेष ) की नाह नीचे रकमसे पतली होती गई थी । घुटिका मुन्दर आकार वानी, उत्तम गौर मामल होने से ग्रह या । चग्ण, सुटर और कछुव के समान (७०) मेठियानन्यमाला - स्नन थे। अगुनिया समायोग्य हाटा वडा और एक दमी में मिली हुई यो । पके नग्व, उन्नत पनन ताये के गम बहर लाल गौर चिकने छ । ननुव, लाल कपल क त नर्गपे कोमर और मुन्दर थे। मगर १०८ पुम्पा के शुभ लक्षणों से युक्त था । नाग ना (पति) नगर मगर माग ग्य का पहिया और उनके अतिरिक्त यंट तथा मागतिक चिन्ही से अकित थे। विशिष्ट रपवाले थे। उनका तंज, [मा नहिन अग्नि , कितनी बारदा पहा के सूर्य की नार्ट दीप्त या । उनको का का आ- र नहा होना था। माना सहित । किचन (गि हित ) | गोफ शन्य - भार परिव में हिन यात्रा (क्तिर) नाग (विषयानुराग) टंग और माह मदाय । निन्ध प्राचन (ग्रा- गम) के उपदणक य । उपदेशका कनक और उगती यापना करन चाले । । ना नरके अधिपनि यो माओ मगहीको बहान वाले थे। नीयगक वचनादि चानीम अनगयों में और गनीम मन्य चिन के ग्रनिगा युक्त | भगवान राग अग मनन आकाटा में चलता था । नान म मगन के ऊपर रहते य । प्रकाश म या ना तुलने ये । आकाश की तरह बह रमटर कनिकानन पर बैट दाये। 'वर्मा (टन्द्रजा)का देलेआगे आगे ले जा रहे थे। चौदह हजार मात्र और उत्ताम हा नाजियमे विना म पाग बाळे) चरते हुए ग्रामानुग्राम (एक ग्राममे दर प्रार) जाते हुए,ग्रानन्द के मार विहार करने हा इम्तिमार्य नगर म प्रोक्त पुरगड उघ न में पूर्व- गित पृथ्वीमिना पट्ट नहा या, नापलरमा महिन पवारे ॥४४॥ । मलम्- परिसा निग्गया अटीण सत्तू जहा कोगिए तहब निगगते । जहा उववाहए, जाव निविहाए पज्जुवास- Fema----- MaruMasti सुखविपाकसूत्रम (७१) नं णाए पज्जुवासति । तए णं तस्स सुबाहुस्स कुमारस्स महया जणसई वा जाव जणसन्निवायं वा सुणमाणस्स वा पासमाणस्स वा अयमेयाहवे अज्झथिए जाव समुप्पजित्था किण्णं अज हथिसीले नगरे इन्दमहेइ वा खंदमहेह वा मुगुंदमहेह वा णागमहेइ वा जक्खलहेइ वा भूयमहेइ वा कूवमहेइ वा तडागलहेइ वा नईमहेह वा दहमहेड वा पञ्च- यमहेइ वा रुखमहेइ वा चेक्ष्यमहेइ वा थूममहे वा ज- पणं एए बढे उग्गा भोगा राइन्ना इक्खागा णाया कोरव्या खत्तिया खत्तियपुत्ता भडा भडपुता सेणावई पसत्यारोले- च्छह माहणा इमा,जहा उक्वाडा जाव सत्यवाहप्पभिति- ए पहाया कयवलिम्सा जाब निगच्छंति,एवं संपेहेति एवं संपेहेत्ता कंचुइज्जपुरिन सहावेइ, सहावेत्ता एवं व्यासी, कि णं देवाणुप्पिया! अज्ज हथिलीले नगरे इंदमहेइ वा जाव निग्गच्छंति? तण से कंचुइज्जपुरिसे सुबाहुणा कुमारणं एवं वुत्ते समाणे हतुझे समणस्स भगवा महावीरस्स आ- गमणगहियरिणिच्छिा करयल० सुबाहुकुमारं जगण विज- पणं वदावेइ, बहावेत्ता ग्वं वयासी, णो खलु देवाणुप्पिया! ग्रज हत्यिग्नीसे नगरे इंदमहेह वा जाव निग्गच्छति । एवं रबल देवाणुप्पिया! अन्ज समणे भगवं महावीरे जाच सचन्न सम्बदरिमी हथिसीसस्स नगररस हिया पुप्फकरंडे चेहरा अहापडिरूवं उग्गहं उगिमिहत्ता गण जाव विहरति ॥४५॥ भावार्थ--- जनसमूह भगवानको वन्दना कर नके लिये निकला । गढीमात्रु राजा भी महाराज कोणक मी तरह निकला । ओपपातिक (उववाई) सूत्र के अनुसार (यावत) मन बचन और काय इन तीन प्रकारों १भग ०श ०६उ ० ३३ प्रा० स० पब ४६१ -१२५ से। Pr मेठियाजनमत्यमाल - म यामना की । उनी उपय मामिाग्न जाना मनुष्य के शत्र (पान) बहत का गहल मुनका इन्, दपकर उना मेटम प्रभा नकला गया। प्रारम्तिमानाच्या दिया है कानिकेत-महात्मा यानामुदव अपना काम नग. जगार का उत्सव है? या पर काम ना मानवामी दय विशेष) का महीना माय महारा' या नाना दामन है। पा नदी महोत्मा है' या दर (गट महात्मा' या 8 मादी 71 महीना? 7 चयमा म ( 7 म निमम कि ग चन्नमें वीर भीग गरे न्यार पीय गरयात्रीय मंत्रित रिपुर नगी नगीरपत्र मनाप्रति. जास्त्र के पटर, लकी -विंगर ) बाग (एसके मित्र बाई म का पनागर मान । -गाह राग गह लोग म्नान करक महदेवा 7 (1न निरन है है । मुत्रानुमान टम नाह दानाका ( म नामही देयमान जान गन्ने) का बुलाम । बलाक गोन्ना-..देवानुप्रिय मार हम्निमार्ग नगरमे क्या इन्द्रादिका गटानमा निम्मे कि (यायत) लोग बाहर निमन्न | ना यह कचुकी नवानमारमा गत नुनकर मन दया। और यमण नगमान् महावीर प्रगान का निश्चय कर के हाय जीटकर, जय हो' विना है। कक वा देने लगा | बधाई कर इस प्रकर बोन्ना, है न्यामिन नाज हस्ति नगम इन्दादि महो मन नहा है (यायन ) लोग बाह निकर रह है। हैवानुप्रिय' ग्राज श्रमण भगवान महावीर (गत ) नर्वत, सर्वदया, हम्निशीप नगर के बाहर पुप कागट चत्य म यथायोग्य, अभिप्रहको महग करवे (यावत् ) विहार कर रह है ॥१५॥ 1 सुखविपाकसूत्रम् (७३) मूलम् - तणं एए बहवे उग्गा भोगा जीव अप्पेगह- या वंदगावत्तियं अप्पेगइया पूयणवत्तिय एवं सकारवत्तियं सम्माणवत्तियं दंसणवत्तियं कोऊहलवत्तियं अप्पेगड्या अत्यविणिच्छयहेडं अस्मुथाई सुणिस्तामो सुयाइ निस्संकि पाइं करिस्सामो । अप्पेगहा अट्ठाई हेऊ कारणाई वागर- णाई पुच्छिस्सामो,अप्पेगासवो समंतामुंडे भवित्ता, अगारायो अणगारियं पवइस्सामो, अप्पेगहयापंचाणुव्वयं सत्तसिक्खावइयं दुवालसविहं गिहिधम्म पडिवजिस्सामो। अप्पेगइआ जिणभत्तिरागेण अप्पेगइया जीअमेयंति कटु- पहाया कयवलिकरमा कयकोउयमंगलपायच्छित्ता मिरसाकंटे मालाकडा आविद्यमणिसुवण्णा कप्पियहारद्धहारतिसरयपा- लंबपलबमाणकडिसुत्तसुकरसाहाभरणा पवरवत्यपरिहिया चंदणोलित्तगायसरीरा अप्पेगइया ह्यगया एवं गयगया रहगया सिवियागयासंदमाणियागया अप्पेगइया पायविहार चारेणं पुरिसवरगुरापरिक्खित्ता महया उक्किटसीहणाय- बोलकलकलरवेणं पक्खुभियमहासमुहरवभृतं पि व करे- माणा हत्थिसीसस्स नगरस्स मझमझेणं णिग्गच्छति । तएं णं से सुबाहु कुमारे कंचुइज्जपुरिसस्स अंतिए एयमढे सोचा निसम्म हट्टतुट्ट० कोडुंबियपुरिसे सहावेइ । सहावेत्ता एवं वयासी-खिप्पामेव भी देवाणुप्पिया!चाउग्धं आसरहं जुत्तामेव उवटवेह । उववेत्ता मम एयमाणत्तिय पञ्चप्पिणह । तप णं ते कोडंबियपुरिसा सुबाहुकुमारे णं एवं वुत्ता समाणा जाव पञ्चपिणंति॥४६॥ १भगवती शहउ ३३ प ४६१२५ ११तक २ उव सूत्र २७ वां प ५८ पृ.१ प १४ से १भग ० श. उ ३३ प ४६१-१ प ११से (७४) मेठियानमत्यमाला भावार्थ- मीलिए ये काई २ उप्र के भागवाके (यावत् ) लोग बन्दना के लिए, कई एक पूजा करने के लिए ण्य मन्कार करने के लिए, मन्मान करने के लिए, दर्शन के लिए, कोतहल के लिए, सूत्रों के अर्थ का निश्चय करने के लिए, नहीं मुने को सुनने और मुने हुए का सन्देह दूर करने के लिर,कोई अर्थ (जीवादिय) हनु, कारण और शका ममाधान सम्बन्धी प्रश्न पढ़ने के लिए, कोर्ट सब प्रकार मुटित(द्रव्य की अपक्षा कंगा को अलग करना मान की अपेक्षा क.पायादि से अलग होकर गृहस्थ ने साधु होने के लिए कोई पचागुनत और मान शिक्षाबत(३ गु- ण व्रत और शिक्षानत) म प्रका बारह तरह के गृहस्थधर्म को अंगी- कार करने के लिए, कोई जिनेन्द्र भगवान् की भक्ति में प्रेम होने से, कोई जीत (परम्परागत हमाग आचार) है इन प्रकार मीच चरक स्नान कर, गृहदेवता की पूजा का, तिलक आदि कौतुक और मागलिक दही अक्षत आदि प्रायश्चित्त से पवित्र होकर. मम्तक और कठ मे मालाए बाग करके, मणि और मोने के गहने पहिन का नगा लटकते हुए लम्ब हार, अर्द्ध- हार,तिलडा हार मुन्दारलव लटकने हुए गुच्छोवाली करधनी आदि मुन्द- र २ आभृपण पहनकर,बटिया वढिया वस्त्र पहिन कर, चन्दन का शरीर पर लेप कर, कोई घोडे पर सवार होकरे, कोई हाथी पर सवार होकर, कोई स्य पर मवार होकर, कोर्ट पालखी पर नमार होकर, कई म्यदमान (पुरुषाकार मारी विशेष)पर सवार होकर कोई पटल चलते हुए पुरुषों के समूह के नम्ह तुमून हर्षचनि मिहनाद बोल (अव्यक्तशब्द) या कलमल (व्यक्त) शब्द मे क्षोभिन समुद्र के तीन गट की नाई नगर को क्षोभित करते हुए, हस्तिशीर्ष नगा के बीचोंबीच होकर निकल रहे हैं । मुवाहु- कुमार कचुकी मे यह बात सुनकर हर्ष मेमन्तुष्ट हुआ। फिर अपने सेवकों को बुलाया । बुलाकर बोला-भो देवानुप्रिया चारघटों वाले घोड़ों के रख को शीघ्र ही लाओ । लाकर मुझे सूचित कगे । मुबाहुकुमार के यह कहने सुखविपाकसूत्रम् (७५) पर सेवको ने ग्य लाकर उन्हें सूचित किया ॥४६॥ मूलम्-तए ण से सुबाहुफुमारे जेणेव मजणधर तेणेव उवागच्छति । उवागच्छित्ता पहाए कयबलिकम्मे जहा उववाइए परिसावनओ तहा भाणियव्यंजाव चंदणीव- लित्तगायसरीरे सव्वालंकारविभूसिए मजणघराओ पडि निक्खमह, मजणघराओ पडिनिक्खमित्ताजेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव चाउग्धंटे आसरहे तेणेव उवागच्छह, उवागच्छित्ता चाउग्घंटं आसरहं दुरूहह । चाउग्घंटं आसरह दुरूहित्ता सकोरंटमल्लदामेणं छत्तेणं धारिजमाणे णं महया भडचडकरपहकरबंधपरिक्खित्ते हत्यिसीस नगरं मझ- मज्झेणं निग्गच्छइ । निग्गच्छित्ता जेणेव पुप्फकरंडे चेहए, तेणेव उवागच्छह । तेणेव उवागच्छित्ता तुरए निगिण्हेइ । तुरए निगिन्हित्ता रहं ठवेति । रहं ठवेत्ता रहाओ पचोरुह- ति । रहाओ पचोरुहित्ता पुष्फतंबोलाउहमादियं वाणहा- ओ य विसजति । विसजित्ता एगसाडियं उत्तरासंगं करेह । उत्तरासंग करेत्ता आयंते चोक्खे परमसुइन्भूए अंजलि- मउलियहत्थे जेणेव समगे भगवं महवीरे तेणेव उवागच्छ- इ । उवागच्छित्ता समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आया- हिणपयाहिणं करे। आयाहिणपयाहिणं करेत्ता तिक्खुत्तो २ जाव तिविहाए पजुवासणाए पजुवासह ॥४७॥ भावार्थ - तब वह मुबाहुकुमार स्नान घर की तरफ चला आया। वहा आकर स्नान किया । गृहदेवता की पूजा की (परिषद-सभा का वर्णन उववाई सूत्र के अनुमार जान लेना चाहिए या त् चन्दन का शरीर पर लेप किया। समम्त अलकारो से भूषित हुआ, और स्नानागार से निकला। निकलकर जहाँ बाहर सभाभवन और चार घटों वाला घोंडो का स्य था,वहीं सेठियाजेनग्रन्थमाला आया । यहाँ आकर ग्य पर चढा । चढकर, कोरट के फूलों से शोभित मालाओ क छत्र को वारा करके बहुत में मुभट और चाकरों के समूह से विग हुआ हस्तिगीर्य नगर के बीचोबीच होकर निकला । निकलकर जहा पुपरगत चव या, वहा आया । आकर बोडों को रोक कर, ग्य गया । ग्य ठग कर प्य मे उनग। उता कर पुष्प, ताम्बूल अस्त्र मन्त्र था जने वगैरह को वहा छोड दिया । छोट करे एक दुपट्टा डाला। कुल्ले किये, और परम पवित्र होकर अञ्जलि करके (दोनों हाथ जोड कर) श्रमण भगवान महावी क निकट आया । आकर, श्रमण भगवान महावीर की दक्षिण दिशा से प्रारम्भ करके तीन प्रदक्षिणा का | प्रदक्षिणा करके यावत् भगवान की मन वचन काय म उपासना का ॥ ४७ ॥ मृलम्-तपणं समगा भगवं महावीरे सुबाहुस्स कुमा- रस्स नीसे य महति महालिया इसिजाव धम्मकहा जाव परिसा पडिगया। नए णं मे सुवातुकुमारे समणस्स भग- वो महावीरस्स अनियं यम्मं सोचा निसम्म हतुढे जाव हियए उठाए उटेति, उठाए उद्वित्ता समण भगवं महावीर निक्खुत्तो जाव नमंमित्ता एवं क्यासी-महहामि ण भंते निगंयं पावयगं,पत्तियामिणंभंते णिमयं पावयण,रोएमिणं भंते णिगंथं पावयणं अम्भुमि ण भंते णिगंथं पावयणं, पवमेयं भत,तहमेयं भंते,अविनहमेयं भते, अमंदिवमेयं भंते, जाव से जहेयं तुभे वदत्ति कटु एवं वयासी-जहा ण देवाणु- पियाणं अंनिए बवे उग्गा उगपुत्ता एवं दुष्पडियारे गं भोगा राहण्णा इक्खागा नाया कोरव्या खत्तिया माहणा भडा जोहा पमत्यारो मल्लई लेच्छई पुत्ता अण्णे च बहवे राईसरतलवरमाडंबियकोडेवियमसेडिसेणावसत्यवाह भगवनी श ० उ ३३ पृ०-२ प २नक । - सुखविपाफसूत्रम् (७७) पभितिओ मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइया, अहं अहणे नो संचाएमिजाव पव्वयए। अहं देवाणुप्पियाणं अंतिए पंचाणुव्वयं सत्तसिक्खावयं दुवालसविहं गिहिधम्म पडिवजिस्सामि । अहानुहं मा पडिबंध करेह । तए णं से सुबाहुकुमारे समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिएपंचाणु- व्वयं सत्तसिक्खावयं दुवालसविहं गिहिधम्म पडिवजइ । पडिवजित्ता तमेव चाउग्छदं आसरहं दुरूहति। दुरूहित्ता जासेव दिसं पाउन्भूते तामेव दिसं पडिगते ॥ ४८॥ भावार्थ - तदनन्तर श्रमण भगवान महावीर ने सुबाहुकुमार तथा बहुत विस्तारवाली ऋपियों की यावत् परिपद् (सभा)को धर्मोपदेश दिया। यावत् जब परिषद लौट गई, तब सुबाहुकुमार श्रमण भगवान् महावीर के पाम धर्मोपदेश मुनकर, उसे हृदय में धारण कर यावत् हदयसे सन्तुष्ट होकर उठे । उठकर श्रमण भगवान महावीर को तीन वार प्रणाम (नमस्कार) करके इस प्रकार बोले, हे भगवन में इन नियन्य प्रवचन (जैन-मार्ग) पर श्रद्धान करता और बडे प्रेम से इस पर प्रतीति करता है । भगवन यह निर्ग्रन्थ- मार्ग मुझे बड. भला मान्न्म होता है। हे भगवन् निर्ग्रन्थ-मार्ग में में उद्योग करता ह । हे भगवन् निर्ग्रन्य प्रवचन यही है, जैसाकि आपने उपदेश किया है और यह ऐसा ही है । अन्यथा नहीं है। हे भगवन' यह सन्देह रहित है । यावत् जो आपने कहा है । इतना कहकर फिर इस प्रकार बोले जिस प्रकार देवानुप्रिय (भगवान् महावीर) के समीप बहुत से उप्रवशज, उग्रवंश के कुमार, भोगवशज, भोगवश के कुमार, भगवान् के काज और भगवान् के वश के कुमार, इक्षवाकु वंशज, इक्षवाकु वशके कुमार, ज्ञातवशज, कुमार, कोग्य वराज कौग्व वश के कुमा, क्षत्रिय वा के कुमार, शूरवीर, योद्धा, प्रशस्तार (धर्मशास्त्र क पाठक)मल्लकी (गजविणेप,) लेच्छकी (गजविशेष,) तथा अन्य बहुत से गना, युवराज सातवश के क्षत्रिय वशज, (७८) सेठियाजेनग्रन्थमाला तलवर मडवाविपति, कुटुम्बनायक, इभ्य (जिस के पास इतना मोना हो कि जिस सोने से हायी टक सके वह) ग्रेष्टि, लेनापति, और सार्थवाह वगैरह न मुण्डित होकर गृहत्याग करके मुनि-दिक्षा स्वीकार की है। किन्तु मेरा दुर्भाग्य है, फि में यावत् दीक्षा लेने के लिए समर्थ नहीं है। ह दवानुप्रिय म आप के समीप पाच अणुव्रत (एकदेश अहिसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचैर्य, और परिग्रह परिमाण) और सात शिक्षाबन (दिव्रत, देशव्रत, अर्थदण्डवत, मामायिक प्रोषधोपवास, भोगोपभोग-परिमाग और अतिथिमविभाग) इस तरह बारह प्रकार के गृहन्यधर्म को वारण करूगा (भगवान् ने कहा) जिम प्रकार मुख हो उसमें ढील न करो । तदनन्तर उम मुबाहुकुमार ने, श्रमण भगवान् महावीर के समय बारह प्रकार के गृहस्थधर्म को-पचा- गुवत और मान शिक्षावतः को- स्वीकार किया । म्वीकार करके उसी चार घटोवाले घोडा के रथ पर सवार हा । मबार होकर जिन दिशा-जिन नफ से - आया था, उमीदिशा- उनी और- - वापस चला गया ॥४८|| मृलम्-नेणं कालेणं तेणं समए समणस्स भगवत्री महावीरस्स जेहे अंतेवासी इंदभूतीनानं अणगारे गोयमगो. तेण सत्तुस्सेहे समचरंससंठाणसंठिए वनरिसभनारायसं- बयणे कणगपुलगनिघसपम्हगोरे, उन्गतवे दित्ततवे तत्ततवे महातवे उराले घोरे घोरगुणे, धोरतवस्सी, घोरबंभचेरवासी उच्छृढसरीरे संखित्तविउलतेयलेस्से चोइसपुब्बी चउण्णाणो- वगए सव्वक्खरसन्निवाती समणस्स भगवओ महावीरस्स अदूरमासंते उड्डेजाअहोसिरे आणकोहोवगए संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरह । तए णं से भगवं गोयमे जायसड्डे, जायसंसएजायकोउहल्ले, उत्पन्नसड्ढे उत्पन्नसंसए उप्पन्नकोउहल्ले संजायसड्डे संजायसंसए संजायकोउहल्ले भग० १उ १ पत्र ११ पृ १ प ९ से प्रारंभ सुखविपाकसूत्रम् (७६) समुत्पन्नसड्ढे समुप्पन्नसंसए समुप्पन्नकोउहल्ले उट्टाए उट्टेइ, उठाए उद्देत्ता जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता समणं भगवं महावीरं निक्खुत्तो आयाहिणप- याहिणं करेइ, करेत्ता वंदति, णमंसति । वंदित्ता णमंसित्ता णनासन्ने णातिदूरे सुस्मृसमाणे णमंसमाणे अभिमुहे विण- एणं पंजलिउडे पज्जुवासमाणे एवं *वयासी ॥ ४९ ।। भावार्थ-- उसी काल के उसी समय मे श्रमण भगवान् महावीर के पट्टशिष्य इन्द्रभूति नामक अनगार-- जिनका गोत्र गौतम या । सात हाथ का शरीर या । जो समचतुरस्र सस्थान और वज्रवृषभनाराच सहनन से युक्त थे । शरीर कसौटी पर घिसे हुए सोने या पम (कमल) सरीखा गोरा था । उग्र तपस्वी (अचिन्तनीय तप करने वाले)दीप्त तपस्वी(अग्नि- के समान कर्मरूपी वन को जलाने वला तप करने वाले) तप्ततपस्वी(कर्म- को तपाने वाली तपस्या करने वाले) महातपस्वी (निष्काम तपस्या करने- वाले) उदार और घर (परिघह जीतने मे निर्दयी) ये । घोर-गुण शाली ये । घोर तप करने वाले थे। घोर ब्रह्मचारी थे । शरीर की मेवा शुश्रूपा- से रहित थे। अपनी विपुल तेजोलेश्या को सक्षिप्त करने काम में नलाने- वाले थे। चतुर्दश पूर्व के ज्ञाता थे । चार-मति श्रुत अवधि और मन पर्यय- ज्ञानों को धारण करने वाले थे। सर्व अक्षरों के दातादि विकल्पों को जानने वाले थे । वे इन्द्र भूति गौतम, श्रमण भगवान् महावीर के पास-न बहुत दूर न बहुत पास- बैठे हुए थे। घुटन ऊपर की ओर तथा शिर नीचे किए हुए ध्यान रूपी कोठे में प्राप्त थे, सयम और तप के द्वारा आत्मा की भावना करते हुए विहार कर रहे थे । उसी समय इन भगवन् गौतम को तत्वों की श्रद्धा होने से, सशय(जिज्ञासा रूप) हुआ इसी कारण उन्हे कौ- तूहल पैदा हुआ। इस लिए वहा से उठ कर जहा श्रमण भगवान् महावीर * भगवती पाठ समाप्त ।

(८०) मंठियानग्रन्थमाला ये वहा पाये। पाकर ब्रमण भगवान महावीर की दलिगा दिशा में प्रा. रम्भ कर के तीन प्रदक्षिणा दी। प्रनिगा देकर स्तुति और नमस्कार किया । स्तुनि और नमम्कार कर के न अन्त पाम और न नन्त दर में अति थोड़ी दर मे सामने शुश्रुषा ग्रो नमस्कार करने दण् गिय पूर्वक हाय जाड का मेवा करते दय, इन प्रका' बोल- ॥४६॥ मूलम्- अहोणं भंते! नुवादकुमारं हे मचे कंते कंतस्वे पि पियस्व मग्गुगणे मणुण्णवे मणाम मगाम- स्वे सोमे सुभगे वियदसणे मुख्वे बहुजणाम वि यणभंते, सुबाहुकुमारे इष्ट हरुवे जाच सुख्वे, साहुजगास्स वि च णं भंते सुबाहुकुमारे इढे हरूवे जाव तुल्वे सुबाहुणा भंते कुमारेण इमेयाख्वाउरालामाणुस्सरिद्वी किण्णालदा किण्णा पत्ता किण्णा अभिसमपणागया, के वा एरव आसी पुचभत्रे कि नामए वा किंवा गोपगंग कयासि वा गामंसिवा सन्निव- संसि वा कि वा दचा कि वा मोचा किवा समायरित्ताकस्स वा तहाख्वस्स समगाम्स वा माहणस्स वा अतिए एगमवि पायरियं सुवया सोचा निसम्म मुबाहुणा कुमारेण इमा गयाख्या उराला माणुम्सिट्टी लहा पत्ता अभिस- मण्णागया ॥ ५॥ भावार्थ-दृ भगान् यह मुबारकुमार कदन मे आदमियों को इष्ट, इस्प वाला, कान्त (मुन्दर), कान्तरूप वाला, प्रिय, प्रियरूप वाला, मनोज, मनोज्ञरून वाला, मनाहा, मनाइप वाला, लोम्य, नुभग (मौभाग्यवान्) प्रियदर्शन (देखने में प्याग) मुग्प लगता है, और ह भगवन' यह मुबाहुकुमार साधुजनों को भी इ2 रूपनाला यावत् मुम्प लगता है। है भगवन्' मुबाइकुमार को दृष्टता, इ2 रनता यावत् मुरूपता, और हे भगवन इस तरह की उदार मनुष्य-मृद्धि का लाभ कसे हुप्रा है। वह कैसे पाई है? .

सुखविपाकसूत्रम् (८१) ? इसके सामने वह म्वय ही आई थी' पूर्वभव में यह कौन था ? इसका नाम क्या या गोत्र क्या या किस गार और किस जगह रहने वाला या कौनसा दान देकर कौन से भोग भोगकर, कौनला आचरण करके, किस श्रमण (साधु) या ब्राह्मण के पास, किम आचार सम्बन्धी एक भी वचन को मुनकर और हृदय मे बरकर इस मुबाहुकुमार ने इस प्रकार की यह उदार मनुष्य ऋद्धि पाई है? या म्वय यह सामने आई है। ॥५०॥ मूलम्- एवं खलु गोयमा! तेणं कालेणं तेणं समएणं, इहेव जम्बूहीवे दीवे भारहे वासे हथिणाउरे नाम नगरे होत्था । रिद्वित्थिमियसमिद्धे वन्नओ । तत्थ णं हथिणाउरे गगरे सुमुहे नामंगाहावई परिवसति। अड्डे दित्ते विच्छिण्ण- विपुलभवणसयणासणजाणवाहणाइण्णे बहुधणयहुजायख्व- रया आओगपओगसपउत्ते विच्छड्डियपउरभत्तपाणे वहुदा- सीदासगोमहिसगवेलगप्पभृए बहुजणस्म अपरिभूएँ । तेणं कालेणं तेणं समएणं धम्मघोसा णाम थेरा जातिसंपराणा जहेव सुहम्मसामी तहेव पंचहि समणसतेहि सद्धि संपरिघु- डा पुवाणुपुब्धि चरमाणा गामाणुगामं दूइजमाणा जेणेव हत्यिणापुरे, जेणेव सहस्संबवणे उजाणे, तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता प्रहापडिस्वं उग्गहं उग्गिमिहत्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरड । तेणं कालेणं तेणं समय- गं धम्मघांसाणं थेरागा अंतेवासी सुदत्त णामं अणगारे उराले जाव सखित्ततेउलेस्से मासंमासेणं खममाणे विहरह। तपणं से सुदत्ते अणगारे मासक्खमणपारणगंसि पढमाए पोरिसीए सज्झायं करेति । बीयाए पोरिसीए झाण झिया- १ म श २ उ ५ प सू० २०७१:४-२प ४ से प्रारभ - २भग- समाप्त (२०) मेटियांजनग्रन्थमाला ति | नहया पारिमा पम्मघाम धेरे आपुच्छलि. आपुः च्छिना दधिणारे नगरे अरगुपचिटे. उचनीयमझिमाई कुलाई घरसमुदाणाम अठमाणे मुमुहम्म गाहावनिम्म गिह अणुप्पविंद्र । न मे सुमुहे गाटाबर्ट मुदत्तं अणगारं पत्रमाण पामह, पामित्ता हतुढे जाव ग्रामपाता अत्भुटे- नि, अन्मुहिता पायपीटाओ पञ्चोम्हनि. पचोरहित्ता पाउया. ओ मुयति, मुहत्ता गमाटियं उत्तगमंग करेह करेत्ता सुट नं अणगारं मनपा अगुगच्छद,अणुगन्छिना तिरबु. तो आयादिणपगादियां करंट, करित्ताचंह ममः, बंदित्ता गामंमित्ता जणव भत्तवरतणव उवागनट, यागन्धित्ता मण हत्या विपुलेग अमापागाग्वाइममा मेगा पटिलाभिम्मामि नि तुडे, पडिला मागो वि तुडे पटिला. भित्ति तुटे । नानम्म सुमुनस्म गाहावटमार तेगा दन्य- सुद्धगणं दायगमुढेगा पत्ननुद्रेण निविष्ण निकरणसुद्रण सुदत्त अगागारे पहिलाभिा ममाणे ममारे परित्तीकते मरगुम्मा निबद्रे गिहामि य मे दमाई पंचदिव्या पाउम्भृ- याट । जहा--१ वस्नुहारा चुहार दमद्रवण कुसुमे निघा. निते : चेन्नुकम्वेवे कते ४ यात्यायो देवहीर अंत- रावि य ग आगामंमि "अहोदागामहांढाणं चुढे याहधि- गाउरे मिघाटगजानु बहुजगी अण्णमणाम एव ग्राटवेट, एवं भामट, एवं पनवंट. पव पम्वेट, धन्ने गां देवाणुग्पिा सुमुहे गाव सुकयपुन्ने कयलक्खणे सुलन्द गण मगुम्मजम्मे सुकयत्वरिट्टी य जाव नं धपणे ॥५१॥ भावार्थ- श्रमण जगतान नहाती बोले- ह गौतम' उन काल के उन समय में इनी जम्मार नामक द्वीप में मानक्षेत्र या । उम में सुखविपाकसूत्रम् (८३) हस्तिनापुर नामक नगर था। वह ऋद्धि से परिपूगी- समृद्ध था। उसका विशेष वर्णन आपपातिक सूत्र में है। उस हस्तिनापुर नगर में मुमुख नाम का गायापति (मेठ) रहता था । वह बन बान्य से परिपूर्ण, विस्तृत मोर संडे बडे भवन, शय्या, आमन, यान, आर वाहना से युक्त था । बहुत से धन और सुवर्ण से परिपूर्ण था। उसी समय जातिसम्पन्न(जिन का मातृप- क्ष शुद्ध था), प्रोर मुवमायामा की नारी पाच नौ अमगा से साय२-- उन मे विग हुए - धर्मवोप नामक स्थविर अनुक्रम से चलते हुए, एक गाव से दृमर गाव होकर, हस्तिनापुर म जिम ओर 'सहममाम्र वन' नामक उद्यान 1), उसी ओर आये । आकर यथायोग्य पाना लेकर नयम और तप ग मात्मा का चिन्तन करते हुए विहार करने लगे। उमा काल के उनी समय मधोग रयविर के जिय, उतार और यावन अपना तेजानश्या को सक्षिप्त करने वान मुदत्त नामक प्रनगार महीन महीन म पारणा करते हुए विहार का रह थे । इस के बाद वह मुरत्न अनगार एक महीने के पारगा क दिन, पाले पहर म सज्झाय (म्पाव्याग) करके दृमेर पहर म धर्मव्यान और नामरे पहर मे वर्मबोप स्थपिरसे अथात् अपन गुरु मे प्राज्ञा लेकर हस्तिना- पुर नगर मे घुमे । वहाँ ऊच नाच और मध्यमकुछ वाले घर म मिना क लिए चूमने चुमते मुमुग्न नामझ गायापति (प्रतिष्टित माहकार) के घर में प्रतश किया । मुमुग्व गायापति ने मुटत्त अनगार को पाते दुर देखा । देखकर हर्षित और सन्तुष्ट हाफर यावत् आमन से उठ बठा । उठकर गासन से उनग । उतरकर पॉवडी उतारी । पावडी उतार कर एक दुपा टाला, दुपट्टा टालका सान पाठ हाय सामने गया, और वहाँ जाकर दक्षि- ण दिशा से प्रारम्भ करके तीन प्रदक्षिणाए दा । वन्दना की ओर नमस्कार किया । पन्दना आर नमस्कार करके भोजनशाला की ओर आया। वहाँ आकर 'यपने हाथ से अशन पान खाद्य और स्वाद्य- चागें प्रकार के... आहार का दान दगा ऐसा सोचकर प्रमुदित हुआ। देते समय यानन्दिन (८८) मेठियाजेननन्यमाला . है। हुआ और देकर भी सन्तुष्ट दृया। टम मुमुख गायापनि न शुद्ध द्रव्य (टेय) शुद्ध दाता शुद्ध पान होन तया तीन कारण और तीन योगों का शुद्धि- पूर्वक मुदत्त अनगार को ग्राहार-दान देकर समार हलका क्रिया-- कमफिया-- और मनुष्य आयु का बन्ध किया, नपा उस के घर पाच दिव्य प्रगट दु । व इस प्रकार है-१ गाह कगेट मुवर्ण दानाग की वाण दुर्ट, २ पाच वर्ण के फला की दृष्टि हुई : मुगवित वस्त्रानी दृष्टि हट । आकाग देव दुन्दुभिका गट यात्राकानमे "अहोदान'अहोदान" शब्द हुआ । हस्तिनापुर में निग्न्तों चौरस्तों यावत सडकों पर अगन जगह २ अनेक मनुष्य मापन में टन प्रकार बातचीत कान लगे इस प्र- कार भाषण करने लगे टम प्रकार प्रतिपादन करन लगे, टम प्रकार प्रा. गग करने लगे--यह दयानुप्रिय मुमुग्न गायापनि वन्य है पुगवान मुलक्षगा है। शुभकर्म का नाम टम हुआ है । मनु जन्म और उत्तम ऋद्धिवाला यावत यह बन्य है || १ || मृलम्-से सुमुहे गाहावई यह वाससयाई आउयं पालेति । पालित्ता कालमाते कालं किचा इहेव हत्यिमीसे णगरे अदीणसत्तुस्स रणो धारिणीए देवी कुच्छिसि पु. तत्ता उववणो । तए णं सा धारिणी देवी सयणिमि सुत्तजागरा ओहीरमाणीरतहेव सीहं पासह । मेसं तं चैव जाव उप्पिपासायवरगने विहरड न एवं खलु गोयमा ' सुबाहुणा हमा ण्यास्वा माणुम्सरिडी लद्धा पत्ता, अभिस- समन्नागया । पह णं भने ' सुवाहुकुमारे देवाणुप्पियाणं अ- तिए मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पचहत्ता? ताप- भू । तने णं मे भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदह , नमंसह । वंदित्ता नमसित्ता संजमेग तवसा अप्पाणं भा- वेमाणे विहरति । तए ण मे समणेभगवं महावीरे अपणया सुखविपाकसूत्रम् (८५) कयाह हथिसीसाओ नगराओ पुप्फकरंडाओ उजाणाओ कयवणमालप्पियजक्खस्स जक्खायतणाओ पडिणिक्ख- मति । पडिमिक्खमित्तावहिया जणवधविहारं विहरह । तते णं से सुबाहुकुमारे समणावासए जाते अभिगयजीवाजीवे उचलद्धपुन्नपावे आसवसंवरणिजरकिरियाहिगरणबंधमोक्ख- कुसले असहिजदेवतासुरनागसुवण्णजक्खरक्खसकिन्नर- किपुरिसगरुलगंधचमहोरगाहएहि देवगणेहि निग्गंधाओ पावयणाओ अणहक्कमणिजे निग्गंथे पावयणे निस्संकिए निक्कंखिए निश्चितिगिच्छे लढे गहियटे पुच्छियो अहि- गयडे विणिच्छियढे अद्विमिजपेम्माणुरागरत्ते अयमाउसी णिग्गंथे पाक्यणे अटे अयं परमटे सेसे अणड असियफलि- हे अवंगुयदुवारे चियत्तंतेउरघरप्पवेसे बहहि सीलब्वयगुणवेरम- णपञ्चक्खाणपोसहोववासेहि चाउद्दसहमुहिट्टपुणिमासिगासु पडिपुगणं पोसहं सम्मं अणुपालेमाणे समाणे निग्गंथे फासु- सणिजेणं असणपाण खाइमसाइमेणं क्त्यपडिग्गहकंबल- पायपुंछणेणं पीढफलगसिज्जामंथारएणं ओसहभेसजेश य पडिलाभेमाणे अहापरिग्गहिएहि तवोकम्मेहि आपाण भावेमाणे विहरइ ॥२२॥ भावार्थ-नह मुमुख गायापति बहुत दिना तक जीवित रहा। अन्त मे काल करके- मग्कर- इसी हस्तिशीर्ष नगर म अदीनशत्रु गजा के यहा धारिणी देवी की कग्व से, पुत्र रूप से उत्पन्न हुआ है । जब यह गर्भ मे आया तब उस महागनी वारिणी ने शय्या पर कुछ सोते और कुछ जागते हुए- अर्द्धनिद्रा--- मे जागने के समय पहले कह अनुसार सिह को मपन म न स्वा या। शेष पूर्व के समान समझना, यावत् ऊचे प्रामाद मेगहन लगा। सोह १ भग० । २५ प १३८-२ प ६ से प १३ तक।

मेठियाजनग्रन्थमाला गोनम मुबानकुमा ने टमप्रकार यह मनुष्य- अद्धि पार्ट है, वह मन्मुस आई है । गौतम स्यामा बोल्ने ह भगवन' मुबाहकुमार क्या आप के सगीप मुदित होकर, घर से निकल कर, माधु-दीला लेने को लार्य हे भगपान बोले -हो, समर्थ है । तत्वधात भगवान गौतम ने अमग भगवान महावार का दिना की और नमस्कार किया । बन्दना और नमस्कार करक १७ प्रकार के मयम और १२ प्रकार के तप पूर्वक प्रात्मचिन्तन करते हुए पिहार करन लगे । नदनन्तर अमगा भगवान महावार हस्तिजाप नगर के पुष्पकपड उद्यान क, कुन पनगाप्रिय यस क, यक्षायतन न निकन्न, और निकनकर वाटर देशों में विहार करन लग। अब वह मुनामार भाका उमन जीप और अजान नच्चों का जाना पुण्य पार पाप को जाना, माया-सर- निग क्रियाविकागा- ना और माल क नानन म कुशल आ। उमे काट भी सम्पनर म विचलित ना कर सकता या यमुनामा नागकुमार ज्यानिरदेव न गलस किला फिम्पुरुप गाडयन (मुपगी कुमार) गन्य मोग आदि देवा के नम की सहायता न लेन जाला या । और व उम से निगन्य प्राचन का उल्लचन नहा कग सकत ये उमे निग्रन्य प्रवचन में मका नहाया। अन्य दर्शना ।मता) की आकाक्षा नहा यी । दानादि के फल म उम का नहीं था । उसनजी। 1द नन्वा को मुना, उन के अर्थ को जाना, प्रठा और निश्चय किया गया उन का तात्पर्य जान लिया था। उसकी हड्डिया और मना, सर्वज्ञत्र के पान के प्रेम अनुगग मे ही अनुक्त थीं। ह आयु मन' वह यह लोचा करता था, कि निग्रंन्य प्राचन ही अर्थ है। यही परमार्थ है, और जग मत्र अनय है। उम के मकान का पागल (भागल-मोगल बेंडा) अलग पड़ा रहना या दरवाजा गुग पड़ा रहता था । वह यदि तमगे के अन्न पुर या वर म जाता तो उन्ह अच्छा लगता था, अयात् उसपर ।दर .

मुग्मविपाकसत्रम (८७) किनी का अविश्वास नहा या । अथवा उसने तमगे के अन्त 'पुर और घर म जाना साना छोट दिया था, वह शीलवत, गुणव्रत, वेग्मगा (गगद्वेष. आदि की निवृत्ति), प्रत्याख्यान (पोग्मिी प्रादि) और पापध उपवास करता या चतुर्दगी अमी अमावस्या और पूर्णिमा के दिन पूर्ण पोपच अच्छी तरह पालन करता था। निर्गन्य मुनियों को प्रामुक -निटांप प्रशन पान, खान और स्वाना, तथा पत्र,पात्र, कवल, जोहरण बाजौठ पाटिया, शय्या, और समाग, तथा औषध भेषज आदि दान करता हुआ, स्वीकार किए अनुमार ना प्रादि क्रियाओं को करके आत्मा का चिन्तन करता रहताया॥५२॥ मृलम्-ततेणं से सुबाहुकुमारे अण्णया कयाई चाउ- दमहमुट्टिपुष्णमासिगीसु जेणेव पोसहमाला, तेगोव उ- वागछ । उवागनिछत्ता पासहसाल पमजति । पमजित्ता उच्चारपाग्नवणभृमि पडिलेहेद । पडिलेहित्ता दम्भसंधार संघरे । संथरित्ता दम्भनंधारं दुम्हड । दुम्रहित्ता अट्टम- भत्तं पगिहति । पगिणिहत्ता पामहमालाए पोसहिए अहम- भत्तिए पोम पडिजागरमाणे विहरति । नतेणं तस्स सुबा- हुकुमारस्स पुव्यरत्तावरत्तकालसमयसि धम्मजागरि जागरमागास्स इमेयारवे अन्झन्थिए चितिए मणोगते मंक- पे, धण्णा गं ते गामागरनगरखेडकव्वदोणमुहपट्टणा- ममणिगमसंवाहमपिणवेमा जत्थ णं समणे भगवं महावीरे विहरति । धण्णा णं ते राईमरतलबरमाटवियफोटुंचियइम- मेटिनेणावहसत्यवाहप्पभिहो ममणस्म भगवो महा- चौरस्त अतिए मुंडा भवित्ता अगाराओ अगागारियं पव्वयं- ति । धण्णा गं ते राईसग्नलवरमाडंपियकोटुंबियइन्भसे- हिमेगावहमत्यवाहप्पभिडओ, जेणं ममणस्म भगवओ महाचीरस्स अतिएपंचाणुव्वयाट जाव गिहिधम्म पटिवति।

(८८) मेटियाजनग्रन्थमाला ------ धण्णा गां ते राईसरतलवरमावियकोडुवियहन्भसेडिसेणा- वहसत्यवाहप्पभिहा जेणं समणस्स भगवओ महावीरस्म अंतिए धम्म सुगति । तं जड णं समणे भगवं महावीरे पुव्याणुपुचि चरमाणे गामाणुगामं दृहजमाणे हमागच्छेना जाव विहरिना तते ण अहं समणस्स भगवओ महावीरस्म अंनिए मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वएज्जा ।। ५३॥ भावार्थ-उसके बाद वह मुबाहुकुमार, किमी ममय चतुर्दगी, अष्ट- मी, अमावस्या और पूर्णमामी के दिन पोपवंशाला में आया । वहा आकर पोपचगाना को प्रमार्जित किया (पूजा) गोच और लघुगका करने के स्थान का प्रतिलेखन किया- अच्छी तरह देवा भाला । देग्वभालकर टाम(दृव) का आसन बिछाकर, उसी आसन के ऊर बैठा। वेठकर अष्टभक्तवन का पालन किया । टम के बाद किमी लमय सुबाहुकमार मावी गत के गमप धर्म जागागा कम्हा या । उस समय,उसे इस प्रकार का अव्यात्मि- कविवार पैग दृप्रा-वह गाव आकर (जहाँ नमक आदि की खान हों वह) नगर, पेट (जहा बान्नु का किला हो वह ) कर्वट (कुगार) मटम्ब (जि- म के ग्रामपाम दृमर्ग वन्ती न हो वह ) द्रोणमुग्व (जल और स्थलमार्ग चाला नगर) पत्तन(ग्यलमार्ग या जलमार्ग से गम्य और व्यापार का केन्द्र अथवा ग्लभूमि) आत्रम (नपस्वी आदि का निवासम्यान) निगम व्यापा- गिक शहर) नया सत्राह (पर्वत के ऊपर या किले के अन्य का गाव) मन्निनंग टेला मोहल्ला)आदि वन्य ह । जहा बमग भगवान् महा- वीर विहार करते है । और वह गना राजकुमार तलवर मटवरान कौट- मित्रक मष्टी सेनापति और मार्थिवाह बगह भी वन्य है जो अमा भगवान महावीर के समीप मुगिटत होकर गृहस्थी से अनगाग्पन वारण । पहिले दिन गकाशन कर के, तीन दिन उपवास करना, फिर अगले दिन एकाशन करना अष्टभक्त व्रत होता है। क्योकि दन मे अष्ट-पाट बार का- भक्त-भोजन का त्याग किया जाता है। (पुग सुखविपाकसूत्रम् (८६) करते है । तथा वे राजा गजकुमार तलवर मडबराज कोटम्विक दभ्य श्रेष्टी, मेनापति आर नार्यवाह वगैरह भी धन्य है। जो श्रमण भगवान् महावीर के ममीप गृहस्य धर्म स्वीकार करते है । तथा वे गजा गजकुमार तलवर मडबराज झोलुम्बिक इभ्य श्रेष्ट्री मेनापति सार्थवाह वगैरह भी धन्य है,जो अमण भगवान् महावीर स्वामी के समीप वर्मोपदेश मुनते है। इसलिए यदि श्रामण भगवान् महावीर पूर्वानुपूर्वी से चलते हुए प्रामानुग्राम विहार करते हुए, यहॉ आवगे, जावत् विहग करगे, तब ही में श्रमण भगवान् महावीर के समीप, मुण्टिन होकर, गृहस्थी न्यागकर मुनि-दीक्षा वारण काँगा ॥५३॥ मृलम्- तते णं समणे भगवं महावीरे सुवाहुस्स कुमारस्स इमं एयारूवं अज्झत्थियं जाव वियाणित्ता पुवा- णुपुचि चरमाणे गामाणुगाम दुइन्जमाणे जेणेव हत्यिसीसे णगरे जेणेव पुप्फकरडगउजाणे वण्णओ, कयवणमालप्पि- यस्स जक्खस्स जक्खायतणे वण्णओ, तेणेव उवागच्छड। उवागच्छित्ता अहापडिरूवं उग्गहं उग्गिहित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरति । तहेव परिसा रायानि- गता। तते ग से सुबाहुकुमारे तं मया जहा पढमं तहा निग्गी । धम्ममाइक्खड, तंजहा- सवओ पाणातिवा- याओ वेरमण, सचओ मुसावायाओ वेरमणं, सव्वओ अदिनादाणाओ वेरमण, सवो मेहुणाओवेरमणं,सच- ओ परिग्गहाओ वेरमणं । तर गां सा मतिमहालिया मणूसपरिसा समणस्स भगवो महावीरस्स अतिए धम्म सोचा तहेव परिसा राया पडिगया ॥ ५४॥ १ उचाइ प ८०-०प से २उवचार समाप्त (१०) मेठियांजनग्रन्थमाला । भावार्थ- तत्पश्चात ही अम्मा भगवान् महावीर ने मुबालकुमार के इस प्रकार के आध्यात्मिक विचारको पावत जानकर,अनुरुम ने चलते हुए ग्रामानुग्राम विहार करते हुए हन्निशीर्ष नगर क, पहले वर्णन किये हुए पुष्करण्ट उद्यान में जो कृतवनमालप्रिय क्ष का बनायतन या, उस मे -जिसका कि वर्णन पहिले किया चुका हैं- पाये । गकर यथोचित आनापूर्वक म्यान लेकर, सयम और तप पूर्वक आत्म-चिन्तन करते हुए विहार करने लगे। पहले का नाई पग्पिद (जन समूह) और गजा वन्दना करने क लिए निकला। बाद में मुबाहकुमार बडे ठारबाट से पहले की तरह वन्दना करन निकन्ना । भगवान् महावीर ने इस प्रकार वर्मोपदेश दिया-मत्र प्रकार के प्रागाानिपात (हिमा) से रहित होना, मन तरह के असत्य वचनो का त्याग करना, सब तरह के अदनादान से रहित होना. सब प्रकार के मथुन से विरक्त होना और मन तरह के परिग्रह में रहित होना दे पाच महावत है । अनन्तर वह बहुत बटा जन- समुदाय और गजा, श्रमण भगवन् महावीर से धर्मोपदेश मुनकर पहले की तरह वापस चला गा ॥५४॥ लम् तते . तेलुबाहुकमारे सपगाल भगवओ महावीररस अंतिए धम्म सोचा निसरम हट्ट तुट्टे सेमणं भगवं महावीरं निक्खुत्तो प्रायाहिगा पयाहिणं करेह, करेत्ता वंदेह नमसह, दित्ता नमंसित्ता, एवं वयासी-सहहामि णं भंते ! निगं पाक्यणं, एवं पत्तियामि गं, रोएमि गं, अन्भुटेमिण भते । शिगंध पावणं, एकमेयंभंते! तहमेयं भंते ! अवितहमेयं मंते ! इच्छियमेवं भंते ! पडिच्छिय- मेयं भंते । इच्छियपडिच्छियमेयं भंते ! से जहेब ने तुम्भे वदह । जं नवरं- देवाणुप्पिया! अम्मापियगं आपछामि । माता श्र२प ४६-०प-नाचेसे - मुखविपामसूत्रम् (६१) ततो पच्छा देवाणुप्पियाण अंतिए मुंडे भवित्ताणं अगारा- ओ अणगारियं पव्वहस्सामि । अज्ञासुहं देवाणुप्पिया! मा पडिबंध करेह ॥ ५५॥ भावार्थ-- तदनन्तः सुबाहुकुमार ने श्रमण भगवान् महावीर के समीप धर्मोपदेश सुनकर, उसे हृदय में धारण करके, र्पित और सन्तुष्ट होकर, श्रमण भगवान् महावीर को, तीन वार दक्षिण दिशासे शुरू कर के प्रदक्षिणा की । प्रदक्षिणा करके बन्दना और नमस्कार किया । नन्दना और नमस्कार करके इस प्रकार बोला-- हे भगवन्' मै इस निर्बन्ध प्रवचन म श्रद्धा रखता हूँ, प्रतीति करता है, वह मुझे रुचता-- भला लगता है। है भगवन्' में इस निर्ग्रन्थ प्रवचन को स्वीकार करता है । हे भगवन निम्रन्य प्रवचन यही है, यह इसी प्रकार है,जैसा आपने कहा है । यही तथ्य -सत्य-- है । हे भगवन् यह अन्यथा नहीं है। हे भगवन् यही इष्ट है । हे भगवन । यही अभीष्ट यही अभीष्ट है । है भगवन् । यही इष्ट-अभीष्ट है । यह सब ठीक है , जो कि आपने कहा है, किन्तु है देवानुप्रिय' टतना विशेष है कि में अपने माता पिता मे पूछता हूँ, और पूछने--आज्ञा लेने-क अनन्तर आपके पास मुगिडत हाकर, गृहस्थी को त्याग कर मुनि दीक्षा स्वीकार रूगा। भगवान् महावीर बोले-- ह देगनुप्रिय' जिस प्रकार सुग्व की प्राप्ति हो, उस मे टील न करो ॥ ५५ ॥ मूलम्-तते से सुबाहुकुमारे समणं भगवं महा- वीरं वंदति मंसति, वंदित्ता णमंसित्ता जेणेव चाउरघंटे आसरहे, तेणेव उवागच्छद । उवागच्छित्ता चाउघंट आसरहं दुरूहति, दुरूहित्ता महया भडचडगरपकरेणं हत्थिसीसस नगरस्स मज्झमझेणं जेणामेच सए भवणे १ वारंवार दष्ट या भाव पूर्वक स्वीकृत किया।

(२) सेठियानग्रन्थमाला तेणामेव उवागच्छह, उवागच्छित्ता चाउबंटाओ आसर- हाओ पच्चोमहइ । पञ्चोकहित्ता जेणामेव अम्गपियरोतेणा- मेव उवागच्छह,उवागच्छित्ता अम्मापिऊणं पायवडणं करेड, करेत्ता एवं क्यासी-एव खलु अम्मयायो! म समास भगवओ महावीरम्स अति धम्मे णिसंत, से विय धम्मे मे इच्छिर पडिच्छिए अभिम्हए । तते गं नम्म मुबाहुम्म कुमारस्स अम्मापियरोसुबाहुकुमार एवं क्यामी-धन्नोमि गंतुमंजाया संपुण्णो कयत्यो० कयलक्खणोमितुम जाया, णं तुमे समणम्स भगवओ महावीरस्म अतिए धम्म गिसंते से वि य ते धम्मे इच्छिए पडिच्छिण अभिन्डाए । नते गा मेसुबाहुकुमारे अम्मापियरो टोपि तच्चपि एवं वयासी- एव खलु अम्मयायो!मए समणस्स भगवओमहावीरम्स अनिए धम्म णिसंते, सेतिय धम्मे इच्छिएपडिच्छिए अभिम्हए न इच्छामिणं अम्मयाओ!तुम्भेहि अभणुन्नाए समाणे समगस्म भगवामहावीरस्तति मुंडे भवित्ताणं अगाराप्रो अण- गारियं पचहत्तए । नते ण धारिणी देवी त अणि अकंत अप्पियं अमणुन्नं अमणामं असमुयपुव्वं फम्म गिर सोच्चा जिसम्म इमेणं ण्यास्वणं मणोमाणसिएगा महया पुत्तदु- क्खेण अभिभूता समाणी सेयागयरामकृवपगलनविलीण- गाया सोयभरपवेवियंगी णित्तेया,दीणविमणवयणा करयल- मलियव्य कमलमाला तक्खणओ लुगगनुचलमरीग लाव- नसुन्नणिच्छायगयसिरीया पसिढिलभृमणपडनखुम्मियमचु नियधवलवलयपभट्टउत्तरिना सूमालविकिन्नकेसहत्या मु च्छावसणचेयगरुई परसुनियत्तव्य चंपगलया, णिव्यत्तमह- ब्च इंदलट्टी, विमुक्कमंधिबंधणा कोटिमतलंमि सञ्चगेहिं मुखविपाकसूत्रम् (१३) ३ धत्ति पडिया । ततेणं साधारिणी देवी मसंभमोववत्तियाए नुरियं कंचणभिगारमुहविणिग्गयसीयलजलविमलधाराए परिसिचमाणा निवावियगायलट्ठी उक्खेवगतालविटवीयण- गजगियवाएणं सफुसिएणं अताउरपरियणेणं आसासिया ममाणी मुत्तावलिसन्निगासपवडंतसुधाराहिं सिचमाणी पओहरे, कलुणविमणदीणा रोयमाणीकंदमागी,तिप्पमाणी, सोयमाणी विलवमाणी सुबाहुकुमारं एवं क्यासी ॥५६॥ भावार्थ-- इसके अनन्तर मुबाहकुमार न श्रमण भगवान् महा- पीर को वन्दना की और नमस्कार किया। वन्दना और नमस्कार करके, जिबर चार घटों वाला ग्य या, उधर पाया । आकरके, चार घटों वाले त्य पर सवार होकर, बहुत से मुभट और चाकरों सहित, हस्तिशीर्प नगर के बीचों बीच होकर अपने भवन की तरफ पाया । आकर चार घटेवाले ग्य मे उतर कर, जिम ओर माता पिता थे, उस ओर प्राया । आकर माता पिता को प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगा- हे माता पिता मने श्रमण भगवान् महावीर के समीप धर्मोपदेश मुना है, उस धर्म की मै इच्छ' करता है, और वार वार इच्छा करता हूँ। मुझे वह रुचता है यह मुनकर मुबाहुकुमार के माता पिता मुबाहुकुमार से इस प्रकार वोले- हे पुत्र' तुम वन्य हो, पुण्यवान् हो, कृतार्थ हो, और हे पुत्र' तुम शुभ- सला हो, क्योंकि तुमने श्रमण भगवान् महावीर के समीप धर्म श्रवण किया है, और वह धर्म तुम्हें इष्ट और अभीष्ट तथा रुचिकर हुआ है। अनतर सुबाहुकुमार ने माता पिता से दो तीन बार कहा,कि हे माता पिता में न श्रमण भगवान महावीर के समीप धर्म श्रवण किया है , गर्म मुझे इष्ट, प्रत्यंत इष्ट तथा रुचिकर हुआ है। इस कारण हे माता पिता । में आपकी आज्ञा लेकर श्रमण भगवान महावीर के समीप मुण्टत हो कर, घर से निकल कर मुनि-दीक्षा लेना चाहता है। धारिणी और वह १ .

मेटियाजनयत्यमाला
देवी दन अनिष्ट अमुता, अप्रिय अननी जनांचा अश्रुत (जिमे
पहले नहा मुना में )ी- लो- बचने को बना दोन रदय में
वाग कर के दम प्रकार पुत्र के गननिक भोक में मादुई ।
मेन गेम में निचलते दर पनीन में भाग गया। गोक में गर्ग
या या कापन लगा, ना फीमा पट मार्दन नौ नुध नगन
वचन बोलने लगी। वह रे मुम्मा गर्ट, जाममलने म कमल
सी माला नुमा जानी है ! दी लेना चाहता ह सुनते सम्बई।
उनका ननिल ना होगा। उना गर्ग लान्य होगा
और उनकी टीमा नट होगः। 7 में बाटी हो ।
नंफेद चुटिया पनी ना गिर्ग और टाकान होगः । ओटन
गनर ने दर हो गई, न नाम
टिनय उबर बिना
मृच्छा पाने में चतना नए होगट । - भागही गया। घर में
बोदीगई चम्पलता जी नाई प्रो. उन्मा ममात होने र टन्द्र-नम्म
मी नाह गामा रहित हो गई । -न गर्ग- ६ विना (जोड)
टीनी होने में माग गरी बटागन न मि प्रडा गथान के
नीती गिर पडीगना जनरल चिरनी म
गिर गई ता दामियों ने उन्दी ही बोने की मन न निकलता
दृढ निम्न शीतल की वार में उनकी : गचका न्टा
किग । फिर म आदि के पने की टा नारे नाल पने के
बीजन (पी) में पानी कब्रो नहिन हना जके शान्त नि !
गन्न होना मंतिगेका कतिनी निरन्तका गिती दुई पामुनी
बागों में जुत्रों का निवन जाने लगी ! दबाकर उदास मोर दीन
होनी हुई, गेली तुर्ट, चिल्लाती दुई उसका क गती दुर्ट,गोरु करती
दुई, और विलार करती दुई मुबाटमान्ने इन प्रकार जाने लगी ॥५६॥

सुखविपाकसूत्रम् मृलम्-तुम्हंसि गं जाया अम्हें एगे पुत्ते, इहे, कंते, पिए, मणुने, मणामे, धिजे, वेसासिए, सम्मए, बहुमए, अणुमए भंडकरंडगसमाणे, रयणे, रयणभृते, जीवियउस्सा- सए, हिययाणंदजणणे, उंबरपुष्पं व दुल्लहे सवणयाए, किमंग पुण पासणयाए,णो खलु जाया अम्हे इच्छामो ख- णमवि विप्पओगं सहित्तए, तं भुंजाहि ताव जाया! विपुले माणुस्सए कामभोगे जाव, ताव वयं जीवामो। तओ पच्छा अम्हेहि कालगतेहि, परिणयवए वड्डियकुलवंसतंतुकजंमि निरावयक्खे, समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए मुंडे भवित्ता आगाराओ अणगारियं पव्वइस्ससि । तते णं से सुबाहुकुमारे अम्मापिऊहि एवं वुत्ते समाणे अम्मापियरो एवं वयासी-तहेव णं तं अम्मताओ जहेव णं तुम्हे ममं एवं वदह “तुमंसि णं जाया! अम्हं एगे पुत्ते तं चेव जाव निरावयक्खे समणस्स भगवओ महावीरस्स जाव पव्वइस्ससि" एवं खलु अरमयारो माणुस्सए भवे अधुवे अणियए आसासए, बसणसउवद्दवाभिभूते, विजु- लयाचंचले अणिञ्चेजलवुवुयसमाणे कुसग्गजलबिदुसन्नि- भे, संझन्भरागसरिसे, सुविणदसणोक्मे सडणपडणविद्धं- सणधम्मे पच्छापुरं च णं अवरसविप्पजहणिजे, से के णं जाणंति अम्मयाओ! के पुवि गमणाए, केपच्छा गमणाए। तं इच्छामि णं अम्मयाओ! तुम्भेहि अभणुन्नाए समाणे समणस्स भगवो महावीरस्स जाव पचहत्तए ।तते णं तं सुबाहुकुमारं अम्मापियरो एवं वधासी ॥ ५७ ॥ भावार्थ-बेटे हमारे तुम इकलौते लडके हो और इष्ट कान्त प्रिय मनोज्ञ मनोरम धीरज वधाने वाले, विश्वास-पात्र मानने योग्य बहुत मेटियांजनग्रन्यमाना . मानने योग्य मम्मति टनेवाले अनुम्न (कार्य होन के बाद भी मानन योग्य प्राभग्गा के पिटारे जमे, स्त्र तथा मनुष्य जाति में नामे ही मेरे जीवन क ग्वाम हो, हदय को आनन्द देने वाले हो । ऊमर क फल की नाई, देग्वना तो दर हा तुम्हारा नाम मुनना भी मुश्किल हो नायगा । अत पुत्र हम लेग नियोग, कला भा भी नहा लहन करना चाहते। टमलि वंटे जब तक हम जीन है, नबनक मनुयो के अन्क भोगीपभोग भोगी। हमारे मग्न के बाद पम्पिय अपस्या पाकर, कुल की वृद्धि करने वाले पुन पोत्रों को बढान मत्र प्रयोजन मावकर धनगा भगवान महाननीय मुण्टिन होकर बछोड माधुरना लेलेना । माता पिता के ऐसा करने पर मुबानकुमार माना पिता में महान लगा, है माता पिता : जो पापने कहा है हमार तुम उसलौते बेटी यावत् हमारे माने के बाद नत्र प्रयोजन मावसबाण नगवान महावी- के नमीप यावत् दीक्षा लेना" । मो है माता पिता' यद मनुन्य भव नद्रा टिकने वाला नहीं है। नियन नहीं है । यहा सम्म नष्टही नकता है। नैकडों व्यसनों-जुमा चोरी अादि के उपद्रवों में मग है । निजली का नाई चपर है । अनिन्य है। पानी के बुलबले की नाद चादर के ऊपर ठहरी दुई पानी का बूर नाटे चचन्न । ।नया सम्रा लागि और म्यान दर्गन की नन्द अगिक है। नटकर मलना न होना ही शरीरका स्वभाव है । पहले या पीछे-कमी न कभी टम अश्य ही होना होगा। है माता पिता कौन जानता है कि माता पिना और पुर म में कौन पहले ग कौन पीहे गंगा दीलिए हे ता पिना' प्रार प्राज्ञा लेका धमग भगवान महावी नमीप ती गागा वाहना। यह नुनकर माता पिता सुबाहटमार ने कहने ||१७|| मृलम्-इमाओ ते जाया! मरिमियाना मरित्तया- ओ सरिव्ययाओ मरिमलाचनस्पजोवणगुणावधानी सुसविपाकसत्रम् (३७) मरिमेहिता रायकुलेहितो आणिल्लियाओ भारियाओ, तं भुजाहि ण जाया! ताहि मद्धि विउले माणुस्सएकामभोगे, तओ पच्छा भुत्तभोगे समणस्स भगवओ महावीरस्स जाव पञ्चइस्ससि। तते णं से सुबाहुकुमारे अम्मापियरं एवं वयाती-तहेव णं अम्मयाओ! जण्णं तुम्भे ममं एवं वदह "सरिसियाओ जाव समणस्स० पव्वहस्ससि"एवं खलु अम्मयाओ! माणु- स्सगा कामभोगा असुई, असासया, वंतासवा, पित्तासवा, खेलासवा, सुकासवा, सोणियासवा, दुरुस्सासनीसासा, दुरू- यमुत्तपुरीसपूयवहुपडिपुन्ना उच्चारपासवणखेलजल्लसिंघा- णगवंतपित्तसुक्कसोणियसंभवा अधुवा अणितिया असा- सया, सडणपडणविद्वंसणधम्मा, पच्छा पुरं च णं अवस्स- विप्पजहणिज्जा, से के गं अम्मयाओ! जाणंति, के पुव्वि गमणाए के पच्छा गमणाए,तं इच्छामि गं अम्मयाओ!जाव पव्वहत्तए॥५८॥ भावार्थ- हे पुत्र यह तेर सरीखी, तेरी त्वचा के समान त्वचा वाली समान उम वाली ममान लावण्य रूप यौवन और गुणों से युक्त अपने सगान गजकुलो से लाई हुई पाच सौ पनियों को भोग । हे पुत्र' इन के साथ खूब कामभोग भोग करके, भुक्तभोगी होकर, श्रमण भगवान महावीर के समीप गावत् दीक्षा ले लेना। गह सुनकर, मुनाकुमार माता पिता से नोला- हे माता पिता! जो आपने मुझे कहा है कि "सगान त्वचा वाली इत्यादि विशेषणों महित पियों को भोग तथा भुक्त भोगी होकर भ्रमण भगवान महावीर के समीप दीक्षा लेना" सो हे मातापिता' मनुष्यों के कामभोग के आधार शरीर मादि अपवित्र है | अशाश्वत है, इन से लमन उत्पन्न होता है, पित्त १३ , - श्री खानागोग मान मन्दिा जयपक्षठियाजेनग्रन्थमाता (१००) वणाहि य पनवेमाणा एवं वयासी-एस णं जाया! णिग्गंथे पावयणे सच्चे अणुत्तरे केवलिए पडिपुन्ने णेयाउए ससुद्ध सल्लगत्तणे, सिद्धिमग्गे मुत्तिमरगे निजाणमग्गे निव्वाण- मग्गे सव्वदुक्खप्पहीणमग्गे, अहीव एगंतदिट्टीए, खुराइव एगंतधाराए लोहमया इव जवा चावयव्या वान्ठ्याकवले इव निरस्साए गंगा व महानदी पडिसोयगमणाण महासमुहां दव भुयाहि दुत्तरे तिक्खं चकमियध्वं गम्यं लंवेयचं असि. धोरव्य संचरियव्वं, णो खल कप्पनिजाया समगाणं रिणा- धाणं आहाकम्मिए वा उद्देसिए वा कीयगडे वा ठविए चा रहए था दुभिक्खभत्ते वा कनार भत्ते वा वालियाभत्त वा गिलाणभत्तं वा मूलभोयणे वा कंदभायणे वा फलभायण वा पीयभोयणे वा हरियभोयणे ग भोत्ता वा, पायए वा, तुमं च णं जाया! सुहसमुचिएको चेवणं दुहसमुचिण, णाल सीयं, णालं उण्हं, णाल खुहं, णालं पिवास णाल वानिय- पित्तियसिभियसन्निवाहयविविह रोगार्थक उन्नावर गामकंटण बावीस परीसहोवसग्गे उदिन्ने सम्म अहियासित्तए, मुंजाहि ताव जाया! माणुस्सए कामभोगे तो पच्छा भुत्तभागी समणस्स जाव पव्वहस्ससि ॥ १०॥ भावार्थ- इसके अनन्तर मुबाहुकुमार के माता पिता मुबाहुकुमार को जत्र, विषय (रूप ग्म आदि) के अनुकल सामान्य वचनों से विशे- प वचनों ने, सम्बोधन बचना से, विनीत बचना में सामान्यरूपम, विशेषरूप से पार सम्वोधन करके सन्नेह नन्न वचनों से न समझा मके तब विषयों के प्रतिकट सम्म से भय और उट्टा पद, करनेवाले -चनी से इस तरह बोले- बेटा यह निम्रन्य प्रवचन मचा मन मे पचान अद्विताय या केवली मुखविपाकसूत्रम् (१०१) - भगवान से उपदिष्ट, मोक्ष दिलाने वाले गुणस परिपूर्ण मोक्ष का स्वरूण नलाने वाला एकान्तबाट रूपी कलम से रहित (अनेकान्तात्मक) तोन शल्यो-----माया, मिथ्यात्व, निठान-मो नए करन वाला, सिद्धि (हित की प्राप्ति) का गार्ग, मुक्ति (अहितकर कमा क नाश) का मार्ग, सिद्धिक्षेत्र का गार्ग, निर्माण का मार्ग, आर समस्त दु या के नाश करने का उपाय है। जिस तरह सॉप गाम का ग्रहण करने के लिए ग्म की ताक में रहता है, इसी तरह इस निर्गन्ध प्रवचन का पालन करने के लिए इम म ही एकाम बुद्धि रखनी पडती है । यह छुरे का तरह एका वार वाला है,क्योंकि इस में अपवाद रूप क्रियाओं का प्रभाव है (अर्थात् चारित्र पालने में किसी तरह की छूट नहीं है) इम का पालन करना लोह के जौ (चने) चबाना है। बालू के कौर के समान (वैगयिक मुख रहित होने से) नि.स्वादु है। गगा महानदी के पूर का पार करना जैस मुश्किल है, उसी तरह चारित्र पालन करना भी मुश्किल है । भुजाओ री जैसे समुद्र का पार करना कठिन है, मे ही इस प्रवचन का पालन करना कठिन है। तीग्वी धार वाली तलवार पर आक्रमण करने की तरह कठिन है। जैसे पत्थर की भारी शिला का उठाना महज नहीं है, उसी तरह चारित्र का पालन करना भी सहज नहीं है। तलवार की धार पर चलने की नाई इस प्रवचन का पालन करना भी कठिन काम है । क्योंकि हे पुत्र निन्य साधुओं को आगकर्मी आहार, औटेशिक आहार, साधुओं के लिए सामग्री खरीद कर बनाग हुआ आहार, मावुओं के लिए ग्ग्व छोडा हुआ आहार और साधुओं के लिए फिर नवीन तैयार किया हुआ आहार कल्पनीय-- ग्रहण करन ये ग्य----नहीं है । तपा दुर्भिक्ष के समय निवारियों के लिए बनाया हुआ, जगल मे सन्यानी आदि भिन्नुमो के लिए दानशाला आदि में तैयार किया हुआ माहार, पानी बग्मने पर अनायो के लिए बनाया हुआ, पपने मारोग्य होन के लिए दिया हया आहार, मूल (नड), कट (१०) मेठियाजननयमाता ( सृग्गा आदि ) पर ( आम या ि) ब्रान, ना अन्य प्रकार का मचित्त माजन-पान मा माग कान योग्य नहीं है । योर है पुत्र' तंग नुन में लालन प्रानन नया है इस देना नही है, इसलिए न लदा, गमा, नव प्रयास मान पित्त कम मात्रवीद व सन्नि पान जगह विविध गंग प्रानकायचानक पागा का बालगन वाले गंग) टन्दिया के प्रनिन बार्टम प्रका का परिपदा के और उसमर्ग के प्राम होनेपर उन्ह नान न कर सकेगा । समलित है पुत्र' यापन मनु य सम्प्रन्या ताम भागा का मांगी | भीगन क बाट मृतभोगी होकर श्रमण गगवान महावीर के नमार यावत् दीनाललेगा ॥ ६ ॥ मृलम-नते ण से सुबाहुकुमारे अम्मापिऊहिं एवं युत्ते ममाणे अम्मापियर एवं वयासी-नहेव गंग तं अम्म याओ जणं तुम्भे ममं गवं वदह "एमग जाया! निग्गये पावयणे सच्चे अणुत्तरे पुगरवि त चेव जाव नओ पच्छा भुत्तभोगी समणम्स भगवओमहावीररस जाव पवहस्समि" एवं खलु अम्मयायो! निगये पाययणे कीवाणं कापुरिसाणं इहलोगपडियद्वाणं पग्लोगणिप्पिवासाणं दुरणुचरे,पाययज. पास गो चेव गां धीरस्स गिच्छ्यिश्वसियस्म एत्य किं दुष्करं करणयाए नं इच्छामि गं अम्मताओ! तुम्भेहि अन्भ- गुन्नाए समाणे समणरस जाव पचहत्तए । २१॥ भावार्थ- माता पिता जा चारित्र की कठिनना बना चुके, तब सुबाहुकुमार माता पिता मे बोटा- ह माता पिता आपने जो मुझसे इस प्रकार कहा है, कि "ह पुत्र यह निर्घन्य पाचन मत्य है, सब से प्रधान है। (यावन् सन्द से पूर्वोक्त नत्र विशेषण लगा लेना चाहिए) और इसके पश्चात् भुक्तभोगी होकर, अमग भगवान् महावीर के समीप (यावत्) दीक्षा ले लेना" मो है माता पिता' यह निर्घन्य प्रवचन ननक सुखविपाकसत्रम् (१०३) सागर और कापुरषो (नीच पुरुषां ) को, मग लोक सम्बन्नी लालमाओं मे गधे हुए लोगों को और परलोक के मन की गना न करने वालों की कटिन है। किन्तु मे जगे भी निश्चित व्यवसाय वालो को-कर्म- जीग को---- इसका पालन करना का कटन हैइसलिए हे माता पिता' आपकी आना लेतमण भगतान नहावीर के समी। (यावल) दीक्षा लेना चाहता है ॥३१॥ मूलम्-तते ण तं सुबाहुकुमारं अम्मापिपरो जाहे को संचाएति बहरि विसयाणुलोमाहि य विसयपडिफूल्लाहि य आघवणाहिच पप्णवाहि यसण्णवणाहिय विनवणा- हिय आचवित्तए वा तणविरुए वासप्पावित्त वा विष्ण- वित्तए वा, ताहे अकामर वेव सुबाहुकुमार एवं वयासी- इच्छामो ताव जाया गदिवममविते रायसिरि पासित्ता। तते णं से सुबाहुकुमार अम्मापियरमणुवत्तमाणे तुसि- गी संचिति । तते ग में प्रदीणमत्त राया कोडुवियपुरिसे सदावेद, सहावेत्ता एवं वयासी-विप्पामेव भो देवाणुप्पि- या! सुवाहुस्स कुमारस्स महत्थं महग्धं महरिहं विउलं रायाभिसेयं उवटवेह । तते णं ते कोटुंबियपुरिसा जाव ते वि तहेव उवढवेन्ति । तए णं से अदीणसत्तु राया वहहि गणणायगदंडणायगेहि य जाव संपरिचुडे सुबाहुकुमारं अट्टसएणं मोवणियाणं कलसाणं एवं मप्पमयाणं कलसाणं रसुवण्णरुप्पमयाणं कलमाणमणिमयाणं कलसाण४सुवपण, मणिमयाणं कलसाणमप्पमणिमयाणं कलसाणं सुवण्ण- सप्पमणिमयाण कलसाणं ७ भोमेजाणं कलसाणं ८सच्ची- दएहिं सव्वमटियाहि सव्वपुप्फेहि सव्वगंधेहि सचमल्लेहि सम्बोसहिदि य सिद्धत्यएहि य सव्विड्डीए सव्वजुतीए (१०४) मेठियाजनप्रन्यमाला और प्रतिलि बढ़न मन्वयलेणं जाव दुंदुभिनिधोमणादितरवणं महया महया गयाभिमेण अभिमिचति. अभिमिचित्ता करपल जाय कटु एवं ययामी-जय २ नंदा! जय २ भदा! जय नंदा! भदं ते, अजियं जिणाहि जियं च पालियाहि. जियमझे यसाहि, अजियं जिणाहि मत्तपक्वं, जिय च पालहि मित्तपत्र, जाव भरही उवमणुयाणं, हथिसीसस्मणगरस्म अन्नसि च बहण गामागरनगरजावसन्निवेसाणं आहे. बच जाव विहराहि त्तिकटु जय जय मह पति ॥ ३२॥ भावार्थ-सम के अनन्तर माता पिता – मुबाहकमा को विषयों के अनुगल में मामान्य चनो विगए वचन मालोधन यचना नया विनय चिनी से न मममा मके, नर निगम होकर मुवाहकुमार से कहने लग--, पुत्र' हम कम से कम एक दिन भी तुम्हें पहले गज्यलक्ष्मी भोगने दर मिहामनानीन दखना चाहते हैं। जब मुबाकुमार माता पिता के कथन को मानकर चुप होन्हा नव गजा अदीनशत्रु ने मेवकों को बुलाया । उन्द बुलाकर कहा-~- भो देवानुप्रिय' महान कार्यों में काम आने वाले वहमल्य तथा महान पुरषो के योग्य (अथवा महान् पुरमा हाम पून्य) गन्याभिषेक की मामनी नपार कगे। सेवकों ने भी (यावत्) उसी प्रकार मय नामी तयार की। तदनन्तर बत से गणनायकों तथा दडनायको-अर्थात् गजकर्मचारिय।- से यावत्) घिरे हुए महागज अदीनगनु ने एक मौ आठ मोने के कल्श, एक नौ आठ चादी के फलश एक सौ बाठ मोने-चादी के-दोनों को मिला कर बनाये हुए-एफ मौ पाठ गगियों के एक मो आठ गांगागों से जटे हुए सोने के, एक गो माट मणियों से जहा चादी को, एक नो पाट मणियों से जड़े हुए सोने चादी के और एक मौ पाठ गिट्टी के करशों में, भरे हुए मव नीया के जल मे मरतीयों की मिट्टी से, मा तीधी के सुखविपाकसूत्रम् (१०५) फूलों से, सव तीयों की सुगंधित चीजो से, सव तीयों की मालाओं सव औषधियों से, सरसों आदि से. समस्त आभूषण आदि ऋद्धियों से सव कान्ति युक्त पदार्थों से, समस्त सेना द्वारा (यावत्) दुन्दुभि आदि वाजों के घनघोर शब्द से महान महान् गज्याभिषेक किया । अभिषेक कर चुकने पर, सब लोगों ने हाथ जोडकर (यावत्) इस प्रकार कहना शुरू किया- हे समृद्ध तेरी जय हो जय हो' हे कल्याणकर! तेरी जय हो जय हो! हे आनन्द देनेवाले तेरा कल्याण हो जय हो नहीं जीते दुओं पर विजय प्राप्त करो | जीते हुओं का भलीभाति पालन करो। कुलाचार को पालने वाले कुटुम्बियों मे निवास करो। नहीं जीते हुओं को जीतो , जीते हुए शत्रुओं का मित्र के समान पालन करो । जैसेकि मनुष्यों का भरत चक्रवर्ती ने पालन किया था। हस्तिशीर्ष नगर का तथा इस के सिवाय और और गाव, आकर (यावत) सन्निवेश का आधि- पत्य करते हुए (यावत) आनन्द से रहो । इतना कह कर फिर जय २ शब्द किया ।। ६२ ॥ मूलम्- तते णं से सुबाहुकुमारे राया जाए, महया जाव विहरति, तए णं तस्स सुधाहुस्स रन्नो अम्मापियरो एवं वयासी-भण जाया ! किं दलयामो कि पयच्छामो, किवा ते हियइच्छिए सामत्थे (मंते) ? तते णं से सुबाहू राया अम्मापियरो एवं वयासी-इच्छामि णं अम्मयायो ! कुत्तियावणाओ रयहरणं पडिग्गहगं च आणिय, कासवयं च सहावेउं । तते णं से अदीणसत्तू राया कोडुविधपुरिसे सहावेइ । सदावेत्ता एवं क्यासी- गच्छह णं तुम्भे देवाणु- प्पिया! सिरिघराओ तिन्नि सयसहस्साई गहाय दोहि सय- सहस्सेहि कुत्तियावणाओ रयहरण पडिग्गहगं च उवणेह, सयसहरसेणं कासवयं सहावेह । तए ण ते-कोडुबियपुरिसा (१०६) मेठियाजेनग्रन्यमाना अदीणसत्तुणा रण्णा एवं वुत्तासमाणाहतुट्टा सिरिघरानो तिन्निसयसहस्माई गहाय,कुत्तियावणायोटोहिमयसहस्सेहि रयहरणं पडिग्गहं च उवणंति । मयसहस्सेणं कामवयं महा- वेति । तते णं मे कामवा तेहि कौटुंबियपुरिसेहिं सद्दाविए ममाणे हट्टे जाव हिय बहाए कयलिकम्मे कयकोडयमंगल. पाच्छित्ते सुद्धप्पावेसाई वत्याई मंगलाई पवरपरिहिए अप्पमहग्याभरणालंकियमरी जेणेव अर्दाणमत्त राया तेणेव उवागच्छह, उवागच्छिन्ना अटीगासत्तु गयं करयलमंजलि कट्ट एवं वयासी-संदिसह गंदेवाणुप्पिया! जमा करणिनं? तते ण से अढीणसत्तू राया कासवयं एवंवयासी-गच्छा- हि णं तुमं देवाणुप्पिया ! सुरभिणागंबाढणं णिक्के हत्य- पाण पक्खालेह । सेया चउकाला पात्ती मुहं बंधित्ता सुबाहुस्स कुमारस्स चउरंगुलवन्ने णिक्कमणपाउगे अग्ग- केसे कप्पेहि । तते गण से कासव अदीणसत्तुणा राणा एवं वुत्ते समाणे हट जाव हियर जाव पडिसुणेड, पडिसुणेत्ता सुरभिणा गंधोदण्ण हत्यपाए पक्खालेह । पक्खालेत्तासुद्ध- वत्येणं मुहं बंधह । वित्ता परेणं जत्तेणंसुयाहुस्सकुमारस्स चउरंगुलवन्ने निक्खमणपाउग्गे अग्गकेसे कप्पेह । तते गं तस्स सुबाहुस्म कुमारस्त माया महरिहेणं हंसलक्खणेणं पडसाडणं अग्गकेसे पडिच्छट । पडिच्छित्ता सुरभिणा गंधोदएगां पक्खालेड, पक्खालित्ता सरसेणंगोसीसचंदणेणं चच्चायो दलयनि, दलहत्ता मेयाए पोतीए बंधेति।बंधिता रयणसमुग्गयंसि पक्खिवति, पक्खिवित्तामंजूसाए पक्खि- वह, पक्खिवित्ता हारवारिधारसिंनुवारछिन्नमुत्तावलिप्पगा- साई अंसूई विणिम्मुयमाणी विणिम्मुयमाणी रोयमाणी खविपाकसूत्रम् (१०७) यमाणी कंदमाणी कंदमाणी विलवमाणीविलवमाणी एवं दासी-एसणं अम्हं सुबाहुस्स कुमारस्म अन्भुदएमय स्सवेसु य पसवेसु य तिहीसु य छणेसु य जन्नसु य पव्व- सु य अपच्छिमे दरिसणे भविस्सहत्ति कहु जसीसाम- क्वेति ॥६॥ भावार्थ-तदनन्तर, जब मुबाहुकुमार गजा होकर ( यावत् ) हाहिमवन पर्वत की नाई श्रेष्ठ होकर विहार करन लगा, तब राजा बाहुकुमार के माता पिता बाले-~-पुत्र' कहो, तुम्हें क्या देवी तुम्ह ग इष्ट है जो दिया जाय तुम हृदय मे क्या चाहते हो? गजा मुबाहु- मार माता पिता से बोले----हे माता पिता' में कुत्रिक दुकान (देवता से रधिष्ठित होने के काग्गा जहा तीन लोक की सब चौजे मिल सके उसे त्रिक दृकान कहत है) से ग्जाहरण और पात्र मगवाना चाहता है और आई को बुलाना चारता ह । तदनन्तर गजा अदीनशत्रु ने नौकरी को नाया और बोले- ह देवानुप्रिय' तुम जाया पार तान लाख सिक्के जाने म ल जाकर कुत्रिक टकान से दा लाख का जोहरगा और पात्र ले आना तया एक लाख देकर कार्ड को बुला नाना। मेवक लोगो न राजा दानशत्रु की आज्ञा मुनकर हर्पित और सन्तुष्ट होकर, ग्वजाने में तीन खि सिक्के लेकर, कुत्रिक ढकान पर जाकर, दा लाग्य सिक्को से ग्जो- रण और पात्र लिया तथा एक लाख सिरके देकर नाई को बुलाया । वकों द्वारा बुलाए हुए नाइ ने भी हापित और सन्तुष्ट हदय होकर स्नान था, कुलदेवता की पूजा का, कातुक और मागलिक प्रायश्चित्त (तिलक |दि ) किये । राजसभा म प्रवा करन योग्य शुद्ध मागलिक श्रेठ वस्त्र इन, योट किन्तु बहुमूल्य आभरणों से शरीर को भूषित किया और जा अढीनशत्रु की ओर गया। यहा जाकर, हाथ जोड कर गजा अदीन- त्रु'से इस प्रकार बोला--हे देवानुप्रिय आज्ञा दीजिये, जो मुझे करना ।

(१०८) सेठियाजेनग्रन्थमाला है ? राजा अदीनशत्रु ने नाई से कहा—हे देवानुप्रिय' तुम जाओ और निर्मल मुगधित गंबोटक से हाथ पर साफ वोकर चार पड (पट्टी) वाले वस्त्र से मुंह वाध कर मुवाहकुमार के दोना के लायक चार अंगुल छोडकर केशों के अग्रभाग काटो । राजा प्रदीनशत्रु की आज्ञा मुनकर नाई ने हर्षित (यावत्) हृदय होकर प्राता स्वीकार की स्वीकार करके सुगव ग्घोटक से हाथ पैर धोए । वोकर शुद्ध वत्र से मुँह बावा । मुंह वाधकर बडे ही यत्न से चार अगुल छोडकर दीक्षा के योग्य, मुवाहुकुमार क केशों के अप्रभाग काटे | सुवाहुकुमार की माता ने वडे आदमियों के योग्य, हम जैसे सफेद या हंस के चिन्ह से शोभमान वत्र में उन कटे हुए केशों को रख लिए और मुगध गधोटक से उन्हें धोया। वोकर बावन चन्दन के छोटे दिये, और उसी सफेट वस्त्र मे बाधकर रत्नों के डिब्बे में रख लिए। उस डिब्बे को सदुक मे धर कर मोतियो की माला जल की धाग या निर्गुण्डी के फूल सरीखे सफेढ अमृ टारती हुई रोता २ आन्दन और विलाप करती हुई इस प्रकार बोली-हम अभ्युदय के समय, उत्सव मे पुत्राटि के जन्मोत्सव में तिथियों मे इन्द्रादि के उत्सव के समय, पवा मे यही दर्शन सुबाहुकुमार का अन्तिम दर्शन होगा, ऐसा सोचकर उसने वह वालों की पेटी सिराने रख छोडी ॥ ६३ ॥ मूलम् - तते ण तस्स सुबाहुस्स कुमारस्स अम्मापि- यरो उत्तरावक्कमणं सीहासणं रयाति, रयावेत्तासुवाहु- कुमारं दोचंपि तचंपि सेयपीयएहि कलसेहि पहावंति, पहावे. त्ता पम्हलसुउमालाए गंधकासाड्याए गायाइं लूहेंति, लूहि- त्ता सरसेणं गोसीसचंदणेणं गायाई अणुलिपंति ! अणुलि- पित्ता नासानीसासवायवोज्झं जाव हंसलक्खणं पडगसाडगं नियंति । नियंसित्ता हारं पिणद्वंति, पिणद्धित्ता अद्वहारं पिणद्वंति, पिणद्वित्ता एवं एगावलि मुत्तावलि कणगावलि सुखविपाकसूत्रम् (१०६) रयणावलि पालंब पायपलंब कडगाई तुडिगाई केऊराई अंग- याई दस मुहियाणतयं कडिसुत्तयं कुंडलाइं चूडामणि रयणु- क्कडं मउडं पिणद्धति, पिणद्वित्ता दिव्वं सुमणदाम पिणद्धं- ति, पिणद्धित्ता दद्दरमलयसुगंधिए गंधे पिणद्धति। ततेणं नं सुबाहुकुमारं गंथिमवेढिमपूरिमसघाइमेणं चउविहेणं मल्लेणं कप्परुक्खगं पि व अलंकियविभूसियं करेंति । तते ण से अदीणसत्तू राया कोडुंबियपुरिसे सद्दावेइ , सद्दावेत्ता एवं वयासी- खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! अणेगखंभस. यसन्निविटं लीलष्ट्रियसालभंजियागं ईहामिय-उसभतुरगन- रमगरविहगवालगकिन्नररुरुसरभचमरकुंजरवणलयपउमल- यभत्तिचित्तं घंटावलिमहुरमणहरसरं सुभकंतदरिसणिज णिउणोचियमिसिमिसतमणिरयणघंटियाजालपरिक्खित्त भन्भुग्गयवहरवेझ्यापरिगयाभिरामं विजाहरजमलजंतजुत्तं पि व अञ्चीसहस्समालणीयं रूवगसहस्सकलियं भिसमाण भिन्भिसमाणं चक्खुल्लोयणलेस्स सुहफास सस्सिरीयख्व सिग्घं तुरियं चवलं वेइयं पुरिससहस्सवाहिणी सीयं उवहवे. । तते णं ते कोडवियपुरिसा हतु जाव उचढावति । लते णं से सुबाह कुमारे सीयं दुरूहह, दुरूहित्ता सीहासणवरगते पुरस्थाभिमुहे सन्निसन्ने ।। ६४ ॥ भावार्थ- -तदनन्तर, मुबाहुकुमार के माता पिता ने उत्तर दिशा में एक सिहासन रखवाया । रखवाकर मुबाहुकुमार को उस पर बैठा कर दो तीन वार सफद और पीले (चादी सोने के) कलशो से स्नान कराया। स्नान कग चुकने पर रुऍदार सुकोमल सुगधित ग्गीन वस्त्र से शरीर पोछा । शरीर पोछकर सरस बावन चन्दन का लेप किया । लेप करके

सेठियाजनप्रमाला
,
नाफ के निस्वाग की हना से उटने वाला--बटन पतला--(याक्त)
हम जैमा स्वच्छ वा पहनाया। पहनाकर, हार (अठार लटों का )
और अर्ध हार पहनाया, नया कावलि मुफ्तापलि कनकालि ग्वालि
हार पहनाए । पेगें तक लटकन वाला लम्बहार, कंड नुटिका(बाहु-पक्षिका)
भुजबर टगों अगुलियो मे दमा मुद्रिकाएँ, कवना कुटल चूडामगि
( मस्तक में लगाने का रत्न ) और ग्न्न से जटा टया मुकुट पहनाया।
पहनाकर दिव्य फलमाला पहनाई | पहनाकर मलयपर्वत पर पहा
होने वाले चन्दन का अनर लगारा, नदनन्तर मुबानकुमार को
मृत मादि
में गयी हुई फलो की गंद मोवी गय कर लपेटा दुई, पृमि और फलों
के पम्पा मग म बनाई इट टन चार नगद का मालामी में कल्पवृक्ष
की तरह लत और विभूषित किया । पश्चात गजा अदीनशत्रु ने नौकरी
बुलाकर कहा---- भा देवानुप्रिय मकडो ग्वभों वाली लीना करनी
इ. अनेक गुतलिया में युक्त भंटिया बैल बोटा ना नगर पक्षी मर्म
किन्नर क ( मग विगत ) अष्टापद चमर्ग गाय हाया वनलना और पदा
लता के चिन्दी में जाममान इंटी २ घटियं के मनोहर गलों में
गदायमान, शुभ मुन्दर और दर्शनीय, चतुर कागगरों द्वारा बनाट ट.
देदीप्यमान मांगा और पत्नी की बनी दुर्द घंटियो के नमुदाय में व्याप्न
वन का वनो डट ऊँची वेदी में युक्त, मनोहर विद्याधग की चलती
फिरती पुतलियों के जोडे से युक्त ( चित्रित) हनार किगों वाली
और प्रास्त हजार रूपो मे युक्त चमकती इंट-~~व चमरुती हुई,
अतिशय दर्शनाय मुखद म्पर्श वाली मश्रीक म्प वाली गीत्र--मति
गीत चलन वाली, चाल, वंग वाली एक हजार पुरुषों में उठाई जान
वाली पालकी ले आया। यह सुनकर सेवक लोग हर्पित और मन्तुष्ट
होकर (यापन् । पानकी ले आये। मुबाहकुमार उस पर बढ कर पूर्व
दिशा की ओर मुंह करक वेदी पर बठ गया ॥ ६४ ॥

सुखविपाकसूत्रम् (१११) मूलम्-ततेणं तस्स सुबाहुस्सकुमारस्स माया पहाया कयवलिकम्मा जाव अप्पमहग्घाभरणालंकियसरीरा सीयं दुरूहह, दुरूहित्ता सुबाहुस्स कुमारस्स दाहिणे पासे भहा. ससि निमीयइ । तते णं तस्स सूवाहुस्स कुमारस्स अय- धाई रयहरणं पडिग्गहगं च गहाय सीयंदुरूहह, दुरूहित्ता सुबाहुस्स कुमारस्त वामे पासे भद्दासणंसि निसीयति । तते णं तस्स सुपाहुस्स कुमारस्रू पिट्टओ एगा वरतरुणी सिंगारागारचाम्वेसा संगयगयहसियभणियचिट्टियविलास- संलावुल्लावनिउणजुत्तोवयारकुसला आमेलगजमलजुयलव- हियअन्भुन्नयपीणरतियसंठियपयोहरा हिमरययकुंदेंदुपगासं सकोरेंट मल्लदामधवलं आयवत्तं गहाय सलीलं अोहारेमाणी ओहारेमाणी चिट्ठइ । ततेणं तस्स सुबाहुस्स कुमारस्स दुबे वरतरुणीओ सिगारागारचारुवेसाओ जाव कुसलाओसीयं दुरुहंति, दुरूहित्ता सुबाहुस्स कुमारस्स उभोपासं नाना- मणिकणगरयणमहरिहतवणिजजलविचित्तदंडाओ चिल्लिया. ओ सुरुमवरदीहवालाओ संखकुंद्गरयअमयमहियफेणपुं- जसन्निगासाओ चामराओ गहाय सलीलं ओहारेमाणीयो ओहारेमाणीओ चिटुंनि । तते णं तस्ससुयाहुस्सकुमारस्स एगा वरतरुणी सिगारा जाव कुसला सीयं जाव दुरुहति, दुरूहित्ता सुपाहुस्स कुमारस्स पुरओ पुरथिमेणं चंदप्पभव- इरवेरुलियविमलदंडं तालियट गहाय चिति । तते णं तस्स सुयाहुस्स कुमारस्स एगा वरतरुणी जाव सुरूवा सीयं दुरू- हनि । दुरूहित्ता सुयाहुस्स कुमारस्स पुव्वदक्खिणेणं सेयं रययामयं विमलसलिलपुन्नं मत्तगयमहामुहाकितिसमागं भिगारं गहाय चिटइ,ततेणं तस्स मुयाहुस्स कुमारस्स पिया मेठियांजिननन्यमाला --- -- कोटुंबियपुरिम महावेति, सहावेत्ता एवं वढामी-- विप्पा- मेव भी देवाणुप्पिया! मरिमयाणं मरित्तयाणं मरिव्ययाणं एगाभग्गगयिनिजोयाणे कोटुंबियवरतमणाणं महस्म महावेह । जाव सदावति, तते गां ते कौटुंवियवरतमणपुरि- सा अदीणसत्तुस्स रन्नो कोटुंबियपुरिमेहिं महाविया समाणा हहा पहाया जाव पगाभरणगहिग्गिनीया जेणामेव अदी- गासत्त राया तणामेव उवागन्छति, उवागन्छित्ता अदीण- सत्तु रायं एवं वदामी संदिसह णं देवाणुपिया ! जन्न अम्हेहि करणिनं । ततेग मे अटीणसत्तृ गया नं कोर्सेविय- बरतम्णमहम्मं एवं वयामी-गच्छह गं देवारगुप्पिया! मुया- टुस्स कुमारस्म पुरिममहस्मवाहिणि मीयं परिवहेह। तते गा तं कौटुंवियवग्नम्णमहरम अदीणसत्तुणा रणाचं वृत्तं मंतं हतुटं सुबाहुम्स कुमारम्स पुरिमसहस्मयादिणिं सीयं परिवहह । तए ण मुवाहुम्म कुमारस्स पुरिमसहस्सवारिणि मीयं दुरुढस्स समाणम्म हमे अमंगलयातप्पडमयाए पुर- ओ अहाणुपुश्वी संपत्विया । तंजहा- मोत्थिप १ सिरी- वच्छ २ गंठियावत्त वाढमाणग४ महासन ५ कलस मच्छ ७ दप्पण, जाव ववे अत्यत्थिया जाव ताहिंइट्टा. हिं जाव अनवरयं अभिगदंता य अभियुताय एवं वया- मी-जय जय नंदा ! जय जय भद्दा ! जय नदा! भई ते, अजिया जिणादि दंदिया, जियं च पालेहिसमणधम्म, जियविग्यो विय साहि नं देव ! सिन्द्रिमज्झे, णिहणाहि रागदोसमहे, तवेणं घितिणियवद्धकच्छे महाहि य अहक- म्मसत्तू भाणे उत्तमेणं सुक्केणं, अप्पमत्ते पावय, विति- मिरमणुत्तरं केवलं नाणं, गच्छध परमपयं सासपंच अयलं सुखविपाकसूत्रम् (११३) हंता परीसहच, णं, अभीओ परीसहोवसग्गाणं धम्मे ते अविग्धं भवत्ति कटु पुणो पुणो मंगलजयजयसद पउं- जंति। तते णं से सुयाहुकमारे हत्यिसीसस्स नगरस्समझ- मज्झेणं निग्गच्छइ । निग्गच्छित्ता जेणेव पुप्फकरंडे उज्नाणे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता पुरिससहस्सवाहिणीओ सीयाओ पचोरहा । तते णं तस्स मुयाहुस्स कुमारस्स अम्मापियरो सुबाहुं कुमारं पुरो कटु जेणामेव समणे भगवं महावीरे तेणामेव उवागच्छइ । उवागच्छित्ता समण भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिण करेंति, करेत्ता वंदति नमसंति, वंदित्ता णमंसित्ता एवं क्यासी--॥६५॥ भावार्थ-- तदनन्तर, सुबाहुकुमार की माता स्नान करके गृहदेवता की पूजा करके (यावत्) थोडे किन्तु बहुमूल्य वाले अलंकारों से शरीर को अलंकृत करके पालकी पर सवार हुई। सवार होकर सुबाहुकुमार की दाहिनी ओर, भद्रासन पर बैठ गई । इसके बाद सुबाहुकुमार को दूध पिलाने वाली धाय रजोहरण और पात्र लेकर पालकी पर चढी और सुबाहु. कुमार की बाई ओर भद्रासन पर बैठी। पश्चात् एक उत्तम तरुणी (जवान स्त्री) सुबाहुकुमार के पीछे बैठी । वह ऐसी जान पड़ती, मानो सिगार का आगार ही हो । उसका वेष सुन्दर था । वह चलने में, हॅसने में, बोलने में, चेष्टा करने में, विलास (नेत्र के विकार) में, मलाप और उल्लाप में निपुण, तथा लोकव्यवहार में चतुर यी । उसके कुछ २ आपस में मिले हुए, समश्रेणी में रहे हुए दोनों स्तन गोल ऊचे मोटे सुख देने वाले और विशेष (सुन्दर) आकार वाले थे । वह युवती वर्फ चादी कुद के पुष्प या चन्द्रमा के समान कान्ति वाले कोरंट वृक्ष के फूलों के गुच्छों की मालाओं से सफेट छत्र को लेकर, उसे लीला पूर्वक धारण किये हुए थी। इसके अनन्तर सिगार के भंडार के समान सुन्दर वेष वाली दो तरुण स्त्रिया युक्त, (६१४) मेठियाजेनप्रन्थमाला पालकी पर चढका मुवा कुमार की दानी और आकर, गाना मगि मुवर्ग ग्न मोर रहमृत्य लाल मोन से युक्त उन्बल टी वाले, तरा प्रचामा पंदा करने वाले, चाटार, पतले उत्तम और लावे बालों वाले, शेष कुंद के प्रल पानी की ई टी मी बद (क) मयं दृ अमन के पान के पुज की नाह मट बों को लेकर लोला पूर्वक मनी हर्ट टगं । पचात् निगार के भागार की नाई .- 11 JAATE किरे gu--- यावत काल एक उत्तम नरगा (मावत) सुबानमार के समीप पाटकी पानवार दुई । सवार होकर गुवाटमार के माने, पूर्व मिाटी होकर, चन्द्रका ममि और ममि में जो रवाने जानने की लेकर हाकि निगार किंग" एक प्रो मुना गया मुवाममार के मीप पाटीपारका, नुनाना में पूर्वनिए --- आग्नेय दिशा में पटी होग, निर जल में ना?, मदान्मनी के मुंह के जैसे जाना वाले चादी के भार (भाग) को लेकर दी। इसके बाद मुबा कुमार पं. पिता गजा दीनान ने सपनों का बुटा कर कहा---- मो देवानुप्रिम ममान, ममान मग को, ममान उम्र की, समान पोशाक (या आभाग) वाले एक हजार जवान मेवको को शीत बुला लामो । (याउन) मेवकों ने उन्हें बुलाया । नर वे अच्छे एक हजार जवान पुरुष गना अदीनशत्रु के आदमियों के बुलाने पर हर्पित होकर, म्नान करके (भारत) एक ही नगरे माभागों को बाण करके, जिन और महागज ग्यटीनशत्रु थे, टमी और आये ! आकर महाराज अनशत्रु से बोले- हे देवानुप्रिय' आना लीजिये, हमें क्या करना है? गजा मदीनात्रु ने उन एक हजार ताण मेवको मे कहा-- देवानप्रिय' जाओ, पुपमहन्त्रवाहिनी (कना पाटमियों में चलाई जाने वाली) मुबानुकुमार की पालकी को उठायो । उग एक हजार आदमियो ने अदीनगद राजा की मात्रा मुनकर हर्षित और सन्तुष्ट होकर, मृवावुमार की पुषिसहसवाहिनी पालवी लाई। - सुखविपाकसूत्रम् पालकी उठाने के बाद, पुरुषसहस्रवाहिनी पालकी पर आरूढ हुए मुनाकु- मार के आगे आगे क्रम से ये आठ मागलिक द्रश्य चले-- १ ग्वस्तिक (साथिया) २ श्रीवत्स ३ नदावन ४ बर्द्धमान ५ मिहासन ६ पूर्ण कलश ७ मत्स्य युगल और ८ दर्पण । (यावत) बहुत से याचक (यावत्) इष्ट वचनो से (यावत्) बारम्बार अभिनदन और स्तुति करते हुए इस प्रकार बोले---- "ह समृदः तुम्हारी जय हो जय हो' हे भद्र तुम्हारी जय हो. जय हो' है आनन्द देने वाले' तंग कल्यागा हो जय हो नहीं जीती हुई इन्द्रियों को जातो । चिal को पार करके परम्पग से चले आये हुए श्रम- वर्ग का पालन करो। हे देव सिद्धि को प्राप्त कर तप के द्वारा राग देष रूगी मल्लों का निग्रह कगे। अत्यन्त वीरता के साथ, कमर कस कर पाठ कर्म रूपी शत्रुआ का गर्दन कगे । उत्तम शुक्लध्यान से अप्रमत्त होकर देदीप्यमान ओर सर्वो-कृष्ट केवलजान प्राप्त करके, परम पद नित्य ओर मचल मोक्ष म जाओ। परिपत रूपी सेना को जीतकर, परिषह ओर उपमगों में निर्भय होओ ! तुम्हाग सानु धर्म निनि होवे'। इस प्रकार घारनार मालिक जय जयकार करने लगे। पश्चात् सुबाहुनुमा हस्तिशार्ष नगर के तीनोनाव होकर निकाला । निकटकर जिस ओर पुगकर गटक उगान या, उसो पार आया। माकर पुम्पसहरमवाहिनी पालकी से उतग। उत्ताने । बार, मुना कुमार के माता पिता, मुनाहनुमा को भागे करके, श्रमण भगवान महावीर की ओर पाये । पाकर पण भगवान् महावीर को तीन बार प्रदक्षिणा करके बन्दना और नमस्कार किया। नन्दना नमस्कार करके नोले- - ॥ ६५ ।। मृलम्-- एस णं देवाणुपिया! सुयाफुमारे अम्हं एगे पुरा हे कंते पिए मणुन मणामे वीसामिए जीवियऊसासए हिययगां दिजणए उपरपुप्फ पि व दुल्लहे सवणयाए, किमंग पुण पासणयाए, से जहानामए उप्पलेति वा पउमेति वा

सेठियाजैनप्रन्थमाला
कुमुदेति वा पंके जाए, जले संवड्डिए नोवलिप्पइ पंकरएणं,
नोवलिप्पह जलरएणं एवामेव सुयाहुकुमारे कामेसु जाए,
भोगेसु संवड्डिए, गोवलिप्पद कामरएणं णोवलिप्पइ भोग-
रएणं, एस णं देवाणुप्पिया! संसारभउविग्गे, भीए जम्मण-
जरामरणाणं, इच्छइ देवाणुप्पियागं अंतिए मुंडे भवित्ता
आगाराओ अगागारियं पव्वदत्तए। अम्हेणं देवाणुप्पियाणं
सिस्सभिक्ख दलयामो । पढिच्छंतु णं तुम्हे देवाणुप्पिया!
सिस्सभिक्खं । तते णं समणे भगवं महावीरे सुबाहुस्स
कुमारस्स अम्मापिऊहिं एवं वुत्ते समाणे एयमढे सम्म
पडिसुणेह । तते णं से सुयाहुकुमारे समणस्स भगवओ
महावीरस्स अंलियाओ उत्तरपुरत्थिमं दिसीभागं प्रवक्क-
मति, अवक्कमित्ता सयमेव पाभरणमल्लालंकारं उम्मुयइ ।
तते णं से सुबाहुकुमारस्स माया हंसलक्खणेणं पडगसाड-
एणं आभरणमल्लालंकारं पडिच्छह,पडिच्छित्ताहारवारिधार-
सिंदुवारछिन्नमुत्तावलिप्पगासाई असणि विणिम्मुयमाणी
विणिम्मुयमाणी, रोयमाणी रोयमाणी, कंदमाणी कंदमाणी,
विलवमाणी विलवमाणी, एवं वयासी-जतियव्वं जाया!
घडियध्वं जाया! परिक्कामियव्वं जाया! अरिंस च गं अहे
नो पमाएयव्वं । अम्हं पिणं एवमेव मग्गे भवउ ति कहु.
सुथाटुस्सकुमारस्स अम्मापियरोसमणं भगवं महावीरं वंदंति
नमसंति,वंदित्तानमंसित्ताजामेव दिसिंपाउन्भूया तामेव दिसिं
पडिगया। तते से सुयाहुकुमारे पंचमुट्टियं लोयं करेह,
करेत्ता जेणामेव समणे भगवं महावीरेतेणामेव उवागच्छा,
उवागच्छित्ता समण भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिण
पयाहिणं करेह, करेत्ता यंदह नमसह, वंदित्ता नमंसित्ता एवं
वयासी-॥६६॥

सुखविपाकसूत्रम् (११७) भावार्थ- हे देवानुप्रिय' यह सुबाहुकुमार हमाग इकलौता पुत्र है। यह इष्ट कान्त प्रिय मनोज मनोरम विश्वासपात्र जीवन का श्वास तथा हृदय को आनन्द देने वाला है । ऊमर के फूल की नाई देखना तो दूर रहा, इसका नाम सुनना भी दुर्लभ है । नीला उत्पल कमल (सूर्य विकाशी) कुमुद (चन्द्र विकाशी) कीचड में उत्पन्न होकर और जल में बढ़ कर भी जैसे उनमें लिप्त नहीं होते, उसी प्रकार सुबाहुकुमार ने कामों में ही जन्म लिया है, भोगोपभोगों में यह बड़ा हुआ है (इसका लालन पालन हुआ है) किन्तु यह काम और भोगोपभोगों में लिप्त नहीं हुआ है । हे देवानुप्रिय' यह ससार से उद्विग्न और जन्म जरा मरण से डरा हुआ है। इसलिए आपके पास मुण्डित होकर गृहस्थावस्था त्यागकर मुनि-दीक्षा लेना चाहता है, और हम आपको शिष्य की भिक्षा देते है ।हे देवानुप्रिय! आप शिष्य-भिक्षा को स्वीकार कीजिये | सुबाहुकुमार के माता पिता के इस कथन को श्रमण भगवान महावीर ने अच्छी तरह सुना । मुबाहुकुमार श्रमण भगवान् महावीर के समीप ईशान कोण में आया । वहा आकर अपने आप आभरण फूलमाला और अलकारो को उतार दिया, और सुबाहुकुमार की माता ने हस के ऐसे स्वच्छ वस्त्र में उन्हें ले लिया । तथा हार जल की धारा सिदुवार (निर्गुडी) के फूलों या हार से टूटे हुए मोतियों की तरह आसू ढारती २ रोती २ ऋदन करती २ विलाप करती २ बोली- हे पुत्र! सयम में यत्न करना । हे पुत्र' अप्राप्त वस्तु (गुण) को प्राप्त करना। हे पुत्र सयम में पराक्रम करना और इस विषय मे प्रमाद न करना । हमारा भी यही मार्ग होवे । इस प्रकार कह कर सुबाहुकुमार के माता पिताश्रमण भगवान् महावीर को वन्दना नमस्कार करके, जिस ओर से आये थे, उसी ओर वापस लौट गये। उनके लौट जाने पर, सुबाहुकुमार ने अपने हाथों से पचमुष्टि लोच करके, जिधर श्रमण भगवान् महावीर थे, उसी तरफ़ जाकर श्रमग भगानी र प्रदक्षिणा करके वन्दना (११८) सेठियाजेनप्रन्यमाना मोर नमस्कार किया । वन्दना नमस्कार करके बोला-~-11६६ ॥ मृलम्- आलितं ण भंते! लोए, पलित्ते णं भंते! लोए, आलितपलित णं भंते! लोए जराए मरणेण य, से जहा नामए केई गाहावती आगारंसि झियायमाणसि जे तत्य भंडे भवति अप्पभारे मालगुमए तं गहाय प्रायाए एगंतं अवक्कमह, एस मे णित्धारिए समाणे पच्छा पुरा हियाए सुहाए खेमाए निस्सेसाए अणुगामियत्ताए भविम्सह, एवामेघ ममवि एगे आया भंडे इहे कंते पिए मणुग्ने मणामे एस मे निच्छारिए समाणे संसारवोच्छेयकरे भविस्सा, इच्छामि गं देवाणुप्पिएहिं सयमेव पवावियं, सयमेव मुंडा- वियं सेहावियं मिक्खावियं मयमेव पायारगोयरविणयवेण- इयचरणकरणजायामायावत्तिय धम्ममाइक्खियं । तते समणे भगवं महावीरे सुबाहुकुमारं मयमेव पवावेह, सय. मेव मुंडावेह, सयमेव मायार जाव धम्ममाहक्खिड। एवं देवाणुप्पियागिंतवं चिट्टियाचं निसीयवंतुष्ट्रिय भुजियब्ध भासियचं एवं उठाए उहाय पाणेहि भूतेहिं जीवेहि मत्तहि संजमेण संजमियत्वं,अरिंस चणं अटेणोपमादेयव्यं । सते णं से सुबाहुकुमारे समणस्म भगवो महावीररस अंतिए हम एयास्वंधम्मियं उवएम निसम्म सम्म पडिवजह। तमाणाए तह गच्छह तह चिट्ठह जाव उहाए उठाय पाणेरि भूएहिं जीवहिं सत्तेहि संजमेहे ॥ ६७ ॥ भावार्थ- हे भगवन्' यह समार जग और मग स्पो अग्नि से जल रहा है, सब जल रहा है और हे भगवन् चार्ग ओर से अत्यन्त जल १ज्ञाता .०१ प.६० पृ.२५.१२ तक सुखविपाकसूत्रम् (११६) । + रहा है । जैसे कोई सेठ, घर में आग लगने पर, घर मे रक्खे हुए थोडे बोझे वाली किन्तु बहुमूल्य चीजों को लेकर स्वय एकान्त मे जाकर सोचता है-- कि मेरे द्वारा निकाली हुई ये चीजे इस लोक मे, आगामी काल में हित के लिए, सुख के लिए क्षेम के लिए निश्रेयस (कल्याण) के लिए होगी, इसी प्रकार मेग आत्मा भी एक भाड (उपकरण) है, यही इष्ट कान्त प्रिय मनोज्ञ और मनोरम है । मैं आत्मा को जलते हुए ससार से निकालगा, तो यह संसार (कर्म सहित अवस्था) का नाश करने वाला होगा। इसलिए मै आप से स्वय दीक्षा लेना, स्वय मुगिडत होना, स्वय प्रतिलेखना आदि क्रियाओं को ग्रहण करना, स्वयं सूत्र अर्थ सीखना, तथा आचार गोचरी • विनय विनय का फल कर्म क्षय आदि, चारित्र, करण (आहाररादि की शृद्धि मादि) सयम की यात्रा, मात्रा (आहार आदि का परिमाण) धर्म-कथा मादि वृत्ति वाले धर्म को धारण करना चाहता है । इसके अनन्तर श्रमण भगवान महावीर ने सुबाहुकुमार को स्वयं ही दीक्षा दी, स्वयमेव मुगिडत किया, स्वयमेव आचारादि धर्म की इस प्रकार शिक्षा दी-हे देवानुप्रिय ईर्या समिति से चलना चाहिए, निर्दोष पृथिवी पर टहरना चाहिए, पृथिवी को प्रमार्जन करके बैठना चाहिए, भुजा को तकिया बना कर, सम्तारक के ऊपर एक कपडा : विछा कर शरीर की प्रमार्जना करके सामायिक आदि का उच्चारण करके सोना चाहिए, निर्दोष भोजन करना चाहिए, हित मित प्रिय बचन बोलना चाहिए, इस प्रकार प्रमाद और निद्रा का त्याग कर भूत (सब वनस्पति) जीव (पंचेन्द्रिय सत्व (पृथ्वी पानी अग्नि और वायु) की सयम पूर्वक रक्षा करनी चाहिए । मुबाहुकुमार ने श्रमण भगवान् महावीर के समीप इम धर्मोपदेश को सुनकर सम्यक प्रकार अंगीकार किया। वह पूर्वोक्त आज्ञानुसार ही चलता, उठता बैठता निद्रा और प्रमाद को त्याग कर के प्राण भूत जीव और सत्वों की । रक्षा करता था ॥६७॥.

(१२०) मेटियाजैनप्रन्थमाला मूलम्-तते रंग मे सुयाहुकुमारे अगागारे जाते हरियासमि0 जाव यंभचारी। तते गं से सुयाह अणगारे ममणास भगवओ महावीरस्म नहारुवाणं थराणं अंतिए सामाध्यमाडया एक्कारमअंगाई अहिज्मेनि,अहिमित्ता यहहिं चउत्थहम ० जाव तवोविहाणेहि अप्पाणं भावेत्ता यहहिं वासाई सामण्णपरियागंपाउणित्तामासियाए संलेटणाए अप्पाणंभूसित्ता सटिभत्ताई अणसणाएछेदिता पालोठ्यपडिक्कते ममाहिपत्ते कालमासे कालं किचासोह- म्मे कप्पे देवत्ताए उववण्णे । से गं ततो देवलोगाओ पाउ- क्खएणं भवक्खएणं ठिढक्खएणं अणंतरं चयं चहत्तामाणु- स्सं विग्गहं लभिहिति, लभित्ता केवलं योहिं बुझिहिति, बुझिहित्ता तहारूवाणं । राणं अनिए मुंडे भवित्ताजाव पव्वहरसति।सेणं तत्य यहई वासाई सामनपरियागं पाउणि- ताआलोइयपडिक्कंते समाहिपत्ते कालगए सणकुमारेदेवताए उववन्ने। सेण ताओ देवलोगाओ तहेव माणुस्सं पञ्चज्जा, तहेव महासुक्के, ताओ देवलोगाओ तहेवमाणुस्सं पव्वज्जा तहेव आणाएताओदेवलोगाओतहेवमणुस्सं पवज्जा,तहेव आरणाए, ताओदेवलोगात्रोतहेव माणुस्सं पञ्चज्जा, तहेव सव्वदृसिद्ध , से ण देवलोगाओ अण्तरं चयं चहत्ता कहिं गच्छिहिति , कहिं उववन्जिहिति ? गोयमा ! महावि देहे वासे जाहं डमा कुलाई भवंति , अड्डाई दित्ताहं वित्ताई विच्छिण्णविउलभवणसपणासणजाणवाहणाई यहुधणयह जातरूवरययाई आयोगपोगसंपउत्ताई विच्छड्डियपउर- भत्तपाणाई यहुदासीदासगोमहिसगवेलगप्पभूयाई वहुजण स्स अपरिभ्याई तहप्पगारेसुकुलेसुपुमत्ताए पच्चायाहिति। , सुखविपाकसूत्रम् (१२१) तए णं तस्स दारशस्त माया नवराहं मासाणं बहुपडिपुन्नाणं सुरुवं दारयं पयाहिति , जहेव पुवं तहेव नेयव्वं जावभोय-रगणं नावलिप्पइ । तहेव मित्तनाइनियासंबंधि- परिजणेणं, से ण तहारुवाणं थेराणं अंतिए केवल घोहि बुज्झिहिति । केवल मुंडे भवित्ता आगाराओ अणगारिय पव्वइस्सति । से ग अणगारे भविस्सति, इरियासमिए जाव सुहुयहुधासणो इच तेयसा जलंते । तस्सणं भगवओ अणु- त्तरेणं नाणेणं एवं दसणेणं चरित्तेणं आलएण विहारेणं अन्न- वेणं मदवेणं लाघवेण खतीए गुत्तीए मुत्तीए अणुत्तरेणं सब- संजमतवलुचरियफलनिव्वाणमग्गेणं अप्पाणं भावेमाणस्स अणते अणुत्तरे कसिणे पडिपुण्णे निरावरणे निव्वाघाए केवलवरनाणदंसणे समुपजिहिति। तते णं से भगवं अरहा जिणे केवली भविस्ताइ । सदेव मणुयासुरस्स लोगस्स परि- यागं जाणिहि पासिहिह, तं जहा- आगति गति ठिति चवर्ण उववाय तक्कं पच्छाकडं पुरेकडं मणो~ माणसियं खड्यं भुत्तं कडं पडिसेचियं आवीकम्मं रहोकम्मं अरहा अरहस्स भागी तं तं कालं भणवयकायजोगे वहमाणाणं सन्चलोए सव्वजीवाणं सव्वभावे जाणमाणे पासमाये विहरिस्सइ । तते णं से गुवाहू केवली एयारवेणं विहारेणं विहरमाणे बहूई वासाई केवलिपरियागं पाउणित्ता अप्पणो आउसेसं आभोएत्ता बट्टई भत्ताई पचक्खाइस्सह, पञ्चक्खा- इत्ता यहई भत्ताई अणसणाए छेदिस्सइ, छेदित्ता जस्सट्टाए कीरह नग्गभावे मुंडभावे केसलोचे बंमचेरवासे अण्हाणगं अदंतवणं अछत्तगं अणुवाहणगंभूमिसिज्जाओ फलहसिज्जा- रायप. प.१४९ प ४से।

सेठियाजनप्रन्थमाजा भोपरघरपवेसोलद्वावलढाई मागावमाणाई परेहिं हीलणा- श्रो निदणाओविमणामोगरहणामोतन्त्रणाओ तालणा- मो परिभवणाओ पन्चहणाओ उच्चावया विस्वा यावीम परीसहोवसग्गा गामकंटगा अहियासेन्जंति तम पाराहेड, आराहित्ता चरमेहिंसासनीसामेहि मिनिहित,बुनिभरि मुचिहिइ परिनिव्वाहिद सव्वदुक्खाणमंतं करहिट । सेवं भंते! सेवं भंते! भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदनि गामंसति, वंदित्ताणमंसित्ता संजमेग तवसा अप्पागां भावे. माणे *विहरति । एवं खलु जंवासमणेणं जाव संपत्ते सुर- विवागाणं पढमजायणस्स अयम? पत्नत्तत्ति वेमि ॥२८॥ पढमायण समत्त। भावार्थ-अब सुबाहुकुमार मुनि ईयासमिति से युक्त (यावत) ब्रह्मचारी हुमा । तदनन्तर मुबाइकुमार मुनि ने श्रमा भगवान् महावीर जैसे ईर्यासमिति भादि के पालनेवाले स्थविगे के समीप मामायिक मादि ग्यारह अगों का अध्ययन किया । अध्ययन करके बहुत से चतुर्भक्त. (उपवास) षष्टभक्त (वेला) वगैरह ( यावत) नाना प्रकार के तपों द्वारा मात्मा का चिन्तन करके, बहुत वर्षों तक श्रामण्यपर्याय (मुनि-अवत्या) का पालन करके एक मास की मलेविना करके भात्मचिन्तन करते हुए एक महीने का अनशन करके, भलोचना और प्रतिक्रमण करके, समाधि पूर्वक मायु पूर्ण होने पर काल करके मोधर्मकल्प में (प्रथम देव- लोक में) देव होगा। तदनन्तर वह मुबाहकुमार का जीव पहले देवलोक से भायुक्षय भवक्षय और स्थितिक्षय करके मनुष्य होगा। फिर जैनधर्म को समझकर उसी प्रकार के स्थविरों के समीप मुण्डित भराय० प० २९५ पं.६ तक।

सुखविपाकसूमम् (१२३) ? होकर (यावत् ) दीक्षा लेलेगा । वहा बहुन वर्षों तक सावु-पर्याय को पालकर आलोचना और प्रतिक्रमण करके समाविमरण करके सनत्कुमार देवलोक मे देव उत्पन्न होगा। फिर यह तीसरे स्वर्ग से उसी प्रकार मनुष्य भर पाकर दीक्षा लेकर ब्रह्मलोक मे देव होगा। फिर उस देव. लोक से उसी तरह मनुष्य भव पाकर, दीक्षा लेकर, उसी तरह महाशुक्र स्वर्ग में देव होगा। उस स्वर्ग से उसी प्रकार मनुष्य होकर, दीक्षा लेकर आनत स्वर्ग में देव होगा उस देवलोक से चयकर मनुध्य होकर, दीक्षा लेकर उसी प्रकार पारण स्वर्ग में देव होगा । उससे चयकर मनुष्य भव पाकर दीक्षा ले कर सर्वार्थसिद्धि में देव होगा | उस देवलोक से चय कर सीचा कहा जायगा ? कहा उत्पन्न होगा ? हे गौतम' महाविदेह क्षेत्र में धनादि से परिपूर्ण, प्रतापी, दानादि गुणों से प्रसिद्ध, तथा जिन में वि. स्तीर्ण और बहुत से भवन शयन आसन यान वाहन है और बहुत ध- नाट्य-चादी सोने वाले है, जिन मे लेन देन या व्याज आदि का काम होता है. भोजन पान का बहुत दान दिया जाता है, बहुत से दासी ठाम गाय भैस बैल आदि है, बहुत आदमी भी जिनका अपमान नहीं कर सकते-ऐसे कुलों मे महा पुरुष रूप से जन्म लेगा । तदनन्तर उस बालक की माता पूरे नव महीने बीन जाने पर ( यावत् ) सुन्दर बालक का प्रसव करेगी । जन्म आदि का वर्णन जैसा पहले किया था, उसी प्रकार समझ लेना चाहिए। ( यापन ) वह बालक भोग-रज से लिप्त नहीं होगा । पहले कहे अनुसार मित्र जाति सगे सम्बन्धियों और नौकर चाकरों में भी मोहित नहीं होगा । तदनन्तर यह मुबाहुकुमार का जीव उसो प्रकार के स्थविरों के समीप केवलि-धर्म को समझकर, मुण्डित होकर गृहस्थावस्या को त्यागकर मुनि दीक्षा से दीक्षित होगा । वह अनगार होगा। ईर्या आदि समितियों से युक्त होकर (यावत) अच्छी तरह जाज्वल्यमान अग्नि की नाई तेज-से देदीप्यमान होकर - (१२४) मेठियाजैनप्रन्यमाला . भगवान के कद हा सर्वोत्तम गन टीन 'पौर चारित्रम गणित होकर, उपाश्रय छोडकर विहार करने गए, जार्जव गाय लावा भान्ति गुष्ट्रिय और मुक्ति (निलोभना ) मन्य मयम ना चासि पोर टन फन्न म मोक्ष के मार्ग द्वारा आत्मा का भावना करना नमा, नन्त यनुतर अन्यावात निरापरम् परिपूर्ण उना कालमान और कसनशन पाना होगा : नत्र वह अईन जिन पोर नाचली गादे लोक मनु पलीक और अमुरलोक ( अधोनोक) को मान पयागे को जानेगा देगा। अर्थात् जीप जान बार जाया करते है, भास्पिति , (पर्याय का त्याग) उत्पत्ति, विचार, भग किया जाने वाला, पीछे किया हुआ, मन ने सोचा हुआ न2 मा, भोगामा किया नमा, नयन किना टमा, प्रगट और गुन मामी को मानगा देगा । मर्वया एकान्त में नहीं रहने वाला, देव और मनु ने निगमता माग्न जीयो के हर नगर होने वाले मन वचन कार नबन्धी व भाग का जानना दुआ देसता हुआ विहार केगा। टानन्तर, मुबाह केवली दन प्रकार विहार करते हो वात वो तक केवली अवस्था में रहक, 'प्रग्ने वायुनर्म अंग जानकर अनेक भता-प्रत्यारपान दाग अनशन रंग । करके जिनके लिए-नग्नता मुगिटतपन केनोच करना जन्मचर्य पालन, स्नान न करना, दातन न करना, छर न बारग करना, जत न पहनना, बग्नी पर सोना चतुर्मास में पाटे पर मोना मिआ के लिए पर घर म गमन, तभी भोनन का मिलना कभी न मिलना सादर अनादर म समभान रखना, दूसरों के नीच वचन सुनना, निन्तित होना, लोगा क मामने विकार के वचन सुनना, वृणा महना, प्रगुति उठाकर कर गये अपशब्द सुनना कोडे आदि की मार सहना,निग्न्कार को पीटा महना, होटी वडी अनेक प्रकार की परिपह और उपमर्ग जो कि इन्द्रियों को कटक स्य है, ये

सुखविपाकसूत्रम्
(१२५)
सन-~-सहन किये जाते है, उम पदार्य (मोक्ष) का आरावन करेंगे,पागधन
करके अन्तिम श्वास लेकर सिद्ध ( कृतकृत्य होगे, बुद्ध होंगे,पाठ कर्मो से
मुक्त होंगे, निर्वाण (कर्म रूप अग्नि के शान्त होने से शान्ति ) प्राप्त
करेगे और सब दुखों का अन्त करेगे । गौतम गणवर बोले-हे भगवन्
ऐसा ही है ऐसा ही है । इतना कहकर अमग भगवान महावीर की बन्दना
और नमस्कार करके सयम और तप से आत्मा की भावना करते हुए
विहार करने लगे।
हे जम्बू' इस प्रकार श्रमण भगवान् महावीर ने ( यावत् ) मोक्ष
जाते हुए मुखविपाक के प्रथमाध्ययन का वह अर्थ प्ररूपरग किया है ।
मने (सुवर्मा स्वामी ने ) जैसा श्री अमगा भगवान् महावीर से
गुना है, वेसा कहा है ।। ६८ ॥
-
*
इस प्रकार मुखविपाकसूत्र में सुबाहुकुमार
अनगार का वर्णन करने वाला
प्रथम-अध्ययन
समाप्त
हआ

(१२६) मठियाजेनप्रत्यमाला द्वितीय अध्ययन। मलम्-- यिनियस्स णं उक्वेयां-- ग्वं खलु जंव! तेग कालेण तेणं समापणं उसमपुरे गागरेथूभकरंडउनाणे, धन्नोजक्खो, धणावहोराया, सरस्सा देवी, सुमिणदंसगां, कहणं, जम्मग बालत्तणं कलाप्रो य, जुवणे, पाणिग्गहणं दाओ पासाद • भोगायजहा सुयाहु- स्स । नवरं-भइनंदी कुमार सिरिदेवीपामोक्खाणं पंचसया, मामी समोसरणं मावगधम्मं पुन्वभवपुच्छा-महाविदेहे वासे पुंटरीकिणी नगरी विजयते कुमार, जुगयाह नित्ययरे पडिलाभिए माणुम्माउण नियढ़े हहं उप्पन्ने सेसं जहा सुबा- हुस्स जाव महाविदेहे वासे मिझिहिनि बुज्झिहिति मुचिहिति परिनिवाहिनि, सञ्चदुक्खाणमनं करेहिति ॥२॥ भावार्थ - अब दृमरे मध्ययन का अर्थ कहते है-.. है जम्' उस काल में उस समय में अपभपुर नामक नगर या । उसमें स्तपकड उचान था । वहा वन्य नामक गक्षया ।धनारह नामक राजा था। सरस्वती गनी योरमका देखना स्याकागजा से करना, पुत्र का जन्म होना, नाल्यापा, ७२ कलाओं का अध्ययन करना, यौवन पवस्था का नान, पाच सो नियों से पाणिग्रहण , दहज महल गहना प्रादि का देना, भोग भोगना भाटि मुवासकुमार के समान जानना चाहिए। विशेष यह है कि नाम भनन्दिकुमार या। उसके श्रीदेवी वगैरह पाच सो विया या । भगवान् महावीर समवशरण सहित पधारे । उनके समीप उसन शासक वर्म स्वीकार किया । गौतम स्वामी ने भवनन्दिकुमार के पूर्वभर पूछे ! भगवान् महावीर ने कहा-- - महाविदेह क्षेत्र में पुंटरीकिग्गी नगरी यो। विजयकुमार नाम या । गुगनाड तीर्थकर से प्रतिबोधित होकर, मनुष्य आयु वाधा या। फिर यहा (ऋपभपुर नगर मे)उत्पन हुमा! - सुखविपाकसूत्रम् (१२७) , शेष सत्र कथा सुबाहुकुमार समान जानना। (यावत्) महाविदेह क्षेत्र में सिद्ध होगा, बुद्ध होगा, मुक्त होगा, निर्वाण प्राप्त करेगा और सर्व दुखों का अन्त करेगा ॥२॥ दूलग अध्ययन समाप्त हुआ। तृतीय अध्ययन. मूलम्- तच्चस्स उक्खेवो- वीरपुर णगरं, मणोरमं उजाणं, वोरकण्हो जक्खो मित्ते राया, सिरी देवी,सुजाए कुमारे, बलसिरीपामोक्खा पंचसयकन्ना, सामी समोसरणं, पुब्वभवपुच्छा-उसुयारेनयरे उसमदत्ते गाहावई पुप्फदत्ते अणगारे पडिलाभिए मणुस्साउसे निबद्धे। इह उप्पन्ने जाच महाविदेहवासे सिझिहिति ॥३॥ भावार्थ- वीरपुर नगर मे मनोरम नाम का उद्यान था । उस मे वीरकृष्ण नाम के यक्ष देवता का यक्षायतन था। नगर का मित्र नाम का राजा था । और श्री नामकी रानी थी। उनका सुजात नामका कुमार था । उसके बलश्री प्रमुख पाचसौ स्त्रिया थीं । वहा भगवान् महावीर स्वामीका समवसरण पाया । गौतम स्वामी ने सुजातकुमारके पूर्वभव पूछे । भगवान महावीरने कहा- इपुकार नगरमे ऋषभदत्त गायापतिने पुष्पदत्त अनगार को दान दिया था । वहा मनुष्य आयु का बध करके यहा उत्पन्न हुआ है। (यावत्) महाविदेह क्षेत्र से सिद्ध होगा ॥३॥ तीसरा अध्ययन समाप्त हुआ। चतुर्थ अध्ययन । मूलम्- चउत्थरस उक्खेवो-- विजयपुरं णगरं, गंदणवणं उजाणं, असोगो जक्खो, , सेठियाजैनग्रन्थमासा वासवदत्ते राया, करहा देवी सुवासवे कुमार भद्दापामोक्खा- ग पंच सया जाव पुन्वभवे कोसंबी गरी धणपाले राया, वेसमणभद्दे अणगारे पडिलाभिए इह जाव सिद्धे ॥४॥ चउत्थं अज्झयणं॥ भावार्थ-विजयनगर मे नन्दनवन उद्यान या । उसमें अशोक नामके यक्ष का यक्षायतन गा । नगर का राजा वासवादत्त और गनी कृष्णा थी । कुमार का नाम वानव कुमार या । भद्रा प्रभत्ति पाच सौ स्त्रिया थी। (यावत्) वह कुमार पूर्व भव मे कौशाम्बी नगरी का वनणल नामक राजा या । वामणभद्र मुनि को दान दिया था। हा (यावत) उत्पन्न हुआ और सिद्ध होगा ॥४॥ वासयकुमार का वर्णन करने वाला चौथा अध्ययन नगप्त हुआ पंचम-अध्ययन मृलम्--पंचमस्स उक्खेवो- -सोगंधिया णगरी, नीला सोए उन्नाणे सुकालो जक्खो, अप्पडिहओ राया, सुकन्ना देवी महचंदे कुमारे, तस्स अरहदत्त भारिया, जिणदासो पुत्तो,तित्यरागमणं, जिणदासपुयभवो,मज्झमिया णगरी, मेहरहो राया,सुधम्मे अणगारे पडिलाभिए,जाव सिद्धे ॥५॥ पंचम अज्झयणं समत्तं भावार्थ-सौगन्धिका नगरी में नीलाशोक उद्यान था। उसमे मुकाल नामके यक्ष का यक्षायतन या राजा अप्रतिहत जौर रानी मुकन्या थी। महचद सुखविपाकसूत्रम् (१२६) कुमार था। उसकी भरदत्ता स्त्री और जिनदास पुत्र या । तीर्थकर आये। गणधर भगवान् ने जिनदास के पूर्वभव पूछे । भगवान ने कना-माध्य. मिफा नगरी में सुवर्म राजा ने मेवग्य अनगार को दान दिया [यावत् ] मिद् होगा ॥ ५ ॥ पाचवा अध्ययन समाप्त । छठा अध्ययन। मूलम्-छट्टरस उक्खेवो-कणगपुरं णगरंसेयासोय उजाणं वीरभद्दो जक्खो, पियचंदो राया, सुभद्दा देवी, वेसमणे कुमारे जुवराया, सिरीदेवीपामोक्खा पंचसयकन्ना, पाणिग्गहणं तित्थयरागमणं, धनवती जुवरायपुत्ते, जाव पुधभवो-मणिवया नगरी, मित्तो राया, संभूतिविजए अणगारे पडिलाभिते. जाव सिद्धे ॥ ६ ॥ ई अझयणं समतं । भावार्थ- --कनकपुर नगरमे श्वेताशोक उद्यान था। जिसमे वीरभद्र नामके यक्षका यक्षायतन या नगरका गजा प्रियचन्द्र और रानी सुभद्रा थी। युवराज श्रमणकुमार या । श्रीदवी प्रमृति पाचसो कन्याए उसे परिणाई गई। तीर्थकर भगवान् श्राये। उन्होंने वनपनि युवराजके पुत्रके पूर्वभव वताए कि- यावत्परिणपटा नगरी मे मित्र नामक राजा था । समूतिविजय अनगारको दान देकर यहा उत्पन्न हुआ और [ यावत् ] सिद्ध होगा ॥ ६ ॥ छठवा अध्ययन समाप्त हुआ । सप्तम-अध्ययन । मृलम्-सत्तमस्ल उक्नेचो- महापुरं णगर, रत्तासोगं उजाण, रत्तपाओ जक्खो, बले राया, सुभदा देवी महब्बले ~ (१३०) सठियाजनप्रन्यम कुमारे रत्तवईपामोक्खाओ पंचसयकनाओ, पाणिग्रहण, जाव पुन्वभवो - पागढत्ते गाहावती , इंदपुरे अणगारे पडिलाभिए जीव सिद्ध ॥ ७ ॥ ॥ सत्तमं अज्झय समत्त ।। भावार्थ- महापुर नगर मसाणाक उचान था। उममें पतपाद नामके यक्ष का यक्षायतन या । गजा का नाम बल या । गनी मुभद्रादेवी थी। महाबल कुमार या रक्तवती प्रमुग्व पाच मी कन्याओं के नाय पाणिग्रहण हुमा । तीर्थकर भगवान पाए । पूर्वभव बनाए- मणिपुर नगर म नागपत्त गायापति ने इन्द्रपुर अनगारको दान दिरा (यात्रत) वह सिद्ध होगा||७|| सातवा अध्ययन ममानना ॥ अप्टम-अध्ययन। मृलम्- अहमस्स उक्खेवा- सुधोसं णगरं, देयरमणं उज्जाणं, वीरमेणो जक्खो, अज्जुणो राया, तत्तवती देवी, भहनंदी कुमारे सिरीदेवी पामोक्खापंचमयाजाव पुब्बभवे पुच्छा-महाघोमे अणगारे धम्मघोसे गाहावती धम्मसीहे अणगारे पडिलाभिप जाव सिद्धे ॥८॥ अहमं अज्झयगं समत्तं । भावार्थ- मुघोष नगर म देवमग उद्यान या । उममे वीरसेन नामके यक्ष का यक्षायतन या । राजा अर्जुन था । गनी तत्त्ववती यो । भद्रनटी कुमार था । श्रीदेवी प्रमुख पाच नौ कन्या परिगार्ट गई । पूर्व भव इस प्रकार है-महायोग नगर म मोप मेठ ने वर्ममिह अनगार को दान देकर, यहा जन्म लिया है, (याचन) निद होगा ॥८॥ आठवा अध्ययन समाप्त हुआ। - . , सुखविपाकसूत्रम् (१३१) नववा अध्ययन । मृलम्--- नवमस्स उक्खेवो. चंपा नगरी, पुन्नभद्दे उजाणे, पुन्नभद्दो जक्खो, दत्ते राया, रत्तई देवी, महचदे कुमारे जुवराया, सिरिकंतापामो- क्खाणं पंचसया कन्ना, जाव पुचभवो तिगिच्छी णगरी जियसत्तू राया, पम्मवीरिए अणगारे पडिलाभिए जाव सिद्धे ॥९॥ नवमं अज्झयणं समत्तं ore भावार्थ- चम्पा नगरी मे पूर्णभद्र उद्यान मे पूर्णभद्र नामके यक्ष का यक्षायतन था । राजा का नाम दत्त और रानी का नाम रक्तवती था। युवराज कुमार महचन्द्र या । श्रीकान्ता वगैरह पाच सौ कन्याओंसे विवाह हुआ। पूर्व भव- तिगिच्छी नगरीमें जिनशत्रु गजाको धर्मवीर अनगार को दान दिया था। वह यहा उत्पन्न हुआ, ( यावत्) सिद्ध होगा ॥६॥ नववा अध्ययन समाप्त हुआ। दशवॉ अध्ययन मूलम्-जति णं भंते! दसमस्स उक्खेवो- एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समएणं साएयं णाम- णगरं होत्था। उत्तरकुरुजाणे पासमिोजक्खो मित्तनंदीरा- या सिरिता देवी, वरदत्त कुमारे वीरसेणा(वरसेणा) पामो- क्खाणं पंचदेवीसया, तित्थयरागमण, सावगधम्मं, पुचभव- पुच्छा सतदुवारे नगरे विमलवाहणे राया धम्मरुचिनामं अपागारं एजमाणं पासति । पासित्ता पडिलाभिते समाणे संसार परित्तीकये मणुस्साउए निबद्धे, इहं उप्पन्ने, सेसं (१३२) मेठियाजनप्रन्यमाला जहा सुयाहुस्स कुमारस्म पोम चिंता जाय पञ्चजा, कप्पं- तरिओ जाव सव्वमिद्धे । ततो महाविदेहे, जहा दढपदन्नी जाव सिन्निहिनि बुझिहिनि मुचिहिनि परिनिव्याहिति सव्वदुक्खाग्मतं करेहिति । एवं खल जं! समगोणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तणं सुहविवागाणं ढममरस अज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते । मेवं भंते! मेवं भंते! सुहविवागा ॥ १०॥ दममं अझयण समत्तं । भावार्थ- हे भगान' दन। अध्ययन का वर्णन कया है? है जम्वृ' उम काठ में उन समय माकन नागक नगर पा । उम में उत्तर- कुरु उद्यान या। पानमिक नागके यक्षका यसायन या। मित्रनन्दी गना था। श्रीकान्ता गनी थी। बादत्त कुमार या। उनके नीरसेना(या बरसेना)प्रमुग पाच सौ गनिया यों । यहा तीयकर पपारे । उन्दन ने प्रारकर्म स्वीकार किया । गगावर महागन ने उसके पूभव पूरे । भगवान् ने बताया-- शतद्वार नगर में विमल पाहन गजा ने धर्मरचि नामक भनगार को माता देखा । देखकर, विविधक दान देकर मना को हलका किया । मनुष्य आयु बावकर यहा उत्पन्न हुआ है। शेष सन मुनादुकुमारकी तरह जानना चाहिए- पौषधमें माव्यात्मिक विचार पैदा हुमायावत) और दीक्षित हो गया । अनुकम से कल्पो में ( यात) और मानिनि में देव होगा। पश्चात् महाविदेह क्षेत्र में 2 प्रति की नाई ( यावत् १) मिद बुद्र मुक्त और परिनित होगा तथा मत्र दुखों का यन्त करेगा । हे जम्ब' इस प्रकार भ्रमण भगवान् महावीर ने (यावन्) मोक्ष को प्राप्त होते हुए सुप विपाक के दस अगवन म यह अर्थ प्ररूपण किया है। जम्बू स्वामी बोले- ।

सुखविपाकसूत्रम् (१३३) हे भगवन् । ऐसा ही है, ऐसा ही है।। दसवा अध्ययन समाप्त हुआ मूलम्-नमो सुयदेवघाए। विवागसुयस्त दोसुयक्वं- धा-दुहविवागोयसुहविवागो या तत्थदुहवियागे दस अज्झ- यणा एकासरगा। दससु चेव दिवसेसु उद्दिसिर्जति । एवं सु- हविवागो वि।सेसं जहा आयारस्स ॥ इइ सुहविवागसुत्तं समत्त । भावार्थ-श्रुत देवता के लिए नमस्कार हो । विपाक सूत्र के दो श्रुतस्कन्ध है-एक दुखविपाक और दूमग मुखविपाक । उनमे से दुखविपाक में दश अध्ययन है और वे एक सरीखे है । इनका उपदेश दश दिनों में ही दिया जाता है। इसी प्रकार सुखविपाक भी जानना चाहिए। शेष सव आचाराङ्ग की तरह जानना चाहिए । ॥ इस प्रकार मुखविपाक सूत्र समाप्त हुआ। इसे असज्माय टालकर जणाय से पढे - (मुग्वविपासूत्र) शुद्धि--पत्र. पृ पं २४ ५ h JI शुद्ध तावान सुबाहु वहा संपंडिय० १३ १० १७ २३ ૨૦ ૨ २० २१ २२ ३ . शुद्ध तत्त्वज्ञान सुवाह वह सपिटिय० वृत्त सुभिरख यन्त्र खजाने गल्तिहिय० पञ्चान्भवमाणी उसी कड़ ० गधमरलालं. पश्चात् चम्पक णामे निरुवलेवे भगवान का मुंह पद्म सुभिक्ख खजाने ल्लियहिय० पञ्चभवमागी उप्ती केडे ० गधम्मल्लाल० पचात चम्मक भे निस्वलेवे भगवान का पद्म ३४ २५ ४७ ५ २७ २२ उठी हुई उठे हुए ६५ २० ६६ २३ ८४ ७८ १३ ७६ १२ ८६ ७ और ओर वला वाला विहरा विहार वासयादिके पत्तेकी वास की याफत् यावत् तहारूवाण । थेराण नहाम्वाण थेरागा चन्य नामक धन्य नामक यक्ष का यतथा यक्षायतन धा ११०१ १२०१२ १२६५

No text on this page.

Sukh-vipaak-sutram

Author
Swami, Sudharma
Title
Sukh-vipaak-sutram
File name
Sukh-vipaak-sutram
Text
OCR done
Citation
1926
Published
2011/01
Publisher
Bikaner., Agarchand Bherodan Sethiya, Jain Shastra Bhandar
Language
Sanskrit
Pages
138
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
446204
Barcode
99999990027823.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
oCYc3XfBadO
Download PDF

Sukh-vipaak-sutram