Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Shri Shakdal Putra Shravak Ki Katha

Jawaheer Lal Maharaj · 2011/01

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॥ श्री॥
SN
व्याख्यान सग्रह सारमालाका द्वितियपुष्प
श्री सकडालपूत्र श्रावक की कथा
श्रीमनाचार्य पूज्य महाराज श्री १००८ श्री
जवाहिरलालजी महाराज
व्याख्यानों के आधार पर
श्रीसाधुमार्गी जैनपूज्य श्रीहुक्मीचन्दजी महा-
राज की सम्प्रदायके हितेच्छु आवक मण्डल
प्रॉफिस रतलाम
ने
प० मुन्नालालजी वैद्य शास्त्री सोजत निवामी
द्वारा सम्पादन कराके
धीजेन प्रभाकर प्रिन्टिग प्रेस रतलाम में
छपवाकर प्रकाशित की
प्रथमावृति वीर स०२४१५
१०००
विक्रम १६५
मूरय ।)

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॥ श्री।। वक्तव्य सजीवति गुणायश्य यश्यधर्मः सजीवति ।। गुण धर्म विहिनश्य जीवितं निष्प्रयोजनम् ॥१॥ यह मय कोई निर्विवाद स्वीकार करलेंगे कि जीवना उन्हीका मार्थक है जो विद्यमान न होते हुवे जिनको दुनिया अपना आदर्श बनावे अर्थात जिनकी चरीया को अपने उत्थान में बालपन भूत बनाने किन्तु जिनकी चरीया की नोंच श्रीमद्गणधर भग. गान् श्री सुधर्मास्वामि जगत जीवों के कल्याणर्य द्वादशागी में लेवे उनका ही जीवन परम जीवन है और नीतिकार भी कहते हैं कि "मजीवती" अर्थात वे विद्यमान न होने हुवे भी जीवित हैं श्राम कल्याण के लिये मुख्य आवश्यक्ता भेद विज्ञान की है कि जिम के द्वारा प्रात्मा अपन निज सरूप को पहिचान उसे प्राप्त करने की चेष्टा करे किन्तु ऐसे अध्यात्मिक ज्ञान द्वारा ध्येय का प्राप्त कर लेना हरेक आत्मा के लिये मरल नहीं हैं अतः जो आत्माए इस लायक नहीं हैं नहृत पश्चात हैं उनको योग्य बनाने के लिये वैसे आदर्श पुरूषों ने ग्रहण किया हा मार्ग और उन्होंने जो साफल्यता माप्त की है मे द्रष्टात रसकर उसके द्वारा उनको सशक बनाना यह मार्ग दर्शक महात्माओं का मुख्य धर्म है इस कुदरती नियम को जैन धर्म के प्रचारकों ने भी अपन या है - और हमारे जैसे अल्प मतीयों के लिये सूत्रों में जगह २ आदर्श पुरुषों के चरित्रों को स्थान दिया है उनको प्रायः सभी मुनि महाराज व महासतीयाजी वाचते व हम लोगों को सुनाते हैं किन्तु व्याख्यान याचकर उम इतिहास द्वारा हमे क्या लाभ उठाना चाहिये क्या २ शिक्षाए गृहण करना चाहिये वह समझा देना सभी मुनिराज व सतिया नहीं करसक्ने । वर्तमान समय में श्रीमद जैनाचार्य श्री श्री १००८ श्री जाहिरलालजी महाराज साहब की उपदेश पद्धति अधिक रोचक प्रतिभाशाली तथा सारगर्भित होने से उन व्याख्यानों का संग्रह कराना आवश्यक जानकर मडल के तरफ से व्याख्यान लिखने का कार्य गत तीन चातुर्मास से शुरू है जिस में से प्रथा करण करके "श्रावक का अहिसावत" नामक प्रथम पुष्प तो गत वर्ष श्रापके कर कमलों में ऑफिस ने पहुचाया है इसी तरह हिंसा अहिंसा के भेदको समझकर सच्ची अहिंसा का पालन किन २ गृहस्थोंने फिम २ प्रकार किया हैं ऐसे श्रीमद् महावीर प्रमुके उपासकों में से "श्रा मकडानपुत्र श्रावककी कथा" नामक यह द्वितीय पुष्प पाचक के कर कमलों में पहुचाते हुवे ऑफिस के कार्य कर्ताओं को प्रत्यानन्द होता है। इस कथा में अपने धर्म की द्रढ़ श्रद्धा रखते हुवे सत्संगति की रुची, सत्यका सशोधन, गृहण किये हुवे सत्यपर आरूढ होना, पाखड और प्रपच से बचना, सत्य सिद्धान्त द्वारा प्रपचीयों को निरुत्तर करना इत्यादि विषयों का दिग्दर्शन आज के कम- जोर जैनीयों के लिये जिम खूबी से कराया गया है वे सास्तव में मनन करने योग्य हैं, हम अन्तः परण से चाहते हैं कि जनता इम व्याख्यानमार सग्रह के पुष्पों को अपनायकर अपने जीवन को भादर्श जीवन पना।

यहतो निर्विवाद सिद्ध है कि पुस्तकें जनता को वस्तु स्थिति का सच्चा मान करानेवाली हैं और प्रत्येक गृहस्थ को अपने जीवन का आदर्श उच्च बनाने में सहायक होने से प्रति घर में एक २ पुस्तक रहने लायक है. विज्ञप्ति पुस्तक को सुन्दर व रोचक तथा शुद्ध बनाने का प्रयत्न बन सका उतना विशेष किया गया तथा प्रुफ के सोधन का कार्य भी विशेष सावधानी से किया गया है तथापि द्रप्पी दोपसे अशुद्धियें रही हो अथवा भूल हुई होतो क्रपया सूचित करें ताकि आगामि आवृति में सुधार किया जाय. स्पष्टीकरण माधु महात्माओं की भाषा परिमित होती है, इसीलिये वे खूब सोच समझ कर शास्त्र को दृष्टी में रखकर ही उपदश फर- माते हैं। पर सग्राहक, अनुवादक, सशोधक व मम्पादक महाश- यों से भाव उलट होगये हों अथवा साधुकी भाषा मे विपरीत वचन लिखे गये हों तो यह जुम्मेवारी पूज्य श्री के अपर नहीं है. किन्तु यह दोष कार्य कर्ताओं का समझे । जो २ विषय शास्त्र की 'दृष्टी से विरुद्ध मालूम दे उसका खुलामा पुज्य श्री से अथवा ऑफिम के साथ लिखा पढी करने से हो सकेगा। इत्यलम् भवदीय- घालचद श्री श्रीमाल बरदमाण पातलिया सेक्रेटरी सिदेएट श्री श्वे. साधुमार्गी जन पूज्य श्री हुक्मीचदजी महाराज की सम्प्रदाय के हितेच्छु भावक मडल ऑफिस, रतलाम (मालवा)

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-
लढे , गहियटे , पुच्छियहे, विणिच्चिय?, अभिगय?
थहिमिंज पेमाणुराग रत्ते।
लद्धडे अर्थात् उसे अपने धर्म का पास्तविक अर्थ मालूम हो
गया था।
जिम मनुष्य को अर्थ
मालूम
हो गया पर हृदय में पारण
न कर सका तो उसका सुनना किम काम का ? एक भाई कानों
में मोती पहने हुए है , यदि वह सोने के तार में उन्हे न पिरोये
होते तो ये टिके रह सकते थे?
नहीं।'
एमी प्रकार जो शास्त्रों के अर्थ को 'गहि अट्ठा' हदय के प्रेम
रूपी सूत्र में नहीं पिरोता उसका शास्त्र श्रमण करना न करना
परापर है।
मफडाल ने गोशालक के धर्म को हदय में स्थान दिया था। जैमा
गोशालक ने कहा . वैसा ही धारण कर लिया, यह बात नहीं
थी पर 'पुछि यहा' अर्थात् पूँछता भी था । याने जिस जिम
पिम में उसे जो कुछ शका होती थी पूंछ पूंछ कर उसका
निवारण कर लेता था।
प्यारे भाईयों । भाप लोगों को भी यह वात ध्यान में रखने
की है कि जिस विषय में शका हो ' पूछ कर , उसका समधान
कर लेना चाहिये।
यह बात किसी खास धर्म वालों के लिये ही नहीं, तमाम
मजहब पालों को इसका पूरा ध्यान रखना चाहिये ।
कई भाइयों को क्रिया करत देख दुमरे लोग उनसे उस किया

(२)
सत्य धर्म का नियम होता है कि वह सब प्रकार के मनुष्यों
को अपने में स्थान देता है। किसी को वञ्चित नहीं रखता।
अपने मनमे ही कोई वञ्चित रहे, यह बात दूसरी है ।
गोशालक ने भी अपने शासन (धर्म) के विस्तार के लिये
इस नियम को अपनाया । जिस प्रकार वह ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य को स्थान देता था वैसे ही वह शुद्र को भी देता था।
जो धर्म चारों वर्णों को समानता का स्थान नहीं देता
वह कभी नहीं फलता फूलता पर जिस धर्म में चाहे वह पासड
रूप से ही क्यों न खडा किया गया हो, चारों वर्गों को स्थान
देता है, वह जरूर चल निकलता है, । हां यह बात जरूर है कि
बह पाखडी शासन सत्य धर्म की तरह ससार का कल्याण नहीं
कर सकता पर दुनिया में अतीत की स्मृति जरुर छोड जाता है।
गांश लक का शासन इसी प्रकार का था। उसने पाखर
द्वारा अपन मत का प्रचार अच्छा कर लिया पर भाग दुनियां में
उसका सिर्फ नाम ही शप है।
मित्रों ! जिम प्रकार महावीर प्रभु के अनुयायी श्रमणो
पासक कहे जाते है उसी प्रकार गोशालक के अनुयायी श्राजी
विक कहलाते थे ये श्राजीविक उपामक गोशालक को ही अपना
वीर्थकर मानत और उसी के प्रति श्रद्धा भक्ति रसते थे।
सकटाल गोशालक के मुख्य प्रानुयायिओं में से एक
था। इसने गोशालक के धर्म का खूब अच्छी तरह मनन किया
और उस पर पूरी प्रास्ता रखता था। इसका वर्णन गणधरों
ने इन शब्दो में कीया है-

(३)
लहे , गहियहे , पुच्छियहे, विणिच्छियहे , भमिगयडे
यहिमिंज पेमाणुराग रत्ते।
लद्धढे अर्थाद उसे अपने धर्म का वास्तविक अर्थ मालूम
गया था।
मालूम
हो गया पर हृदय में धारण
न कर मका तो उसका सुनना किम काम का ? एक भाई कानों
में मोती पहने हुए है , यदि वह सोने के तार में उन्हे न पिरोये
होते तो ये टिके रह सकते थे ?
नहीं।'
उमी प्रकार जो शास्त्रों के अर्थ को 'गहि महा' इदय के प्रेम
रूपी सूत्र में नहीं पिरोता उसका शास्त्र श्रमण करना न करना
जिम मनुष्य
को अर्थ
परायर है।
मफडाल ने गोशालक के धर्म को हदय में स्थान दिया था। जैमा
गोशालक ने कहा . वैसा ही धारण कर लिया, यह बात नहीं
थी पर 'पुतिया' अर्थात् पूँछता भी था । याने जिस जिस
विषय में उसे जो कुछ शका होती थी पूछ पूंछ कर उसका
निवारण कर लेता था।
प्यारे भाईयों । भाप लोगों को भी यह बात ध्यान में रखने
की है कि जिस विषय में शका हो 'पूच कर , उसका ममधान
कर लेना चाहिये।
यह बात किसी खास धर्मपालों के लिये ही नहीं, तमाम
मजहर वालों को इसका पूरा ध्यान रखना चाहिये।
को भाइयों को किया करत देख दूसरे लोग उनसे उस किया
-

(४) का वास्तविक भर्य पूछने की जिज्ञासा करते हैं पर 'तो यूं ही करा हो ; इस उतर के सिवाय वे समाधान कारक कोई जवाब नहीं दे सकते । इसका खास कारण हमको तो यही मालूम होता है कि वे भाई शास्त्र श्रवण ध्यान पूर्वक नहीं करते। शास्त्र श्रवण यदि ध्यान पूर्वक किया जाय तो कभी कोई न कोई शका उप- स्थित होजाना संभव है। शास्त्र श्रवण अच्छी तरह किया ही नहीं तो फिर शका किस प्रकार उपस्थित हो सकती है ? एक आदमी पढ़ा लिखा कुछ नहीं , उसके हाथ में कोई पुस्तक देकर पंछे कि तुम्हें इसमें कोई शका है? वह कहेगा-'नहीं।' ठीक है , वह इसके सिवाय दूसरा उतर ही क्या है। दूसरे प्रकार का स्वर तो वह देसकता है जो उसके पढने की योग्यता रखता है। भाईयों ! आप श्रावक कहलाते हैं । अतएव जिस प्रकार ३०-३२ वर्ष का जवान पहा तरूनि स्त्रियों के मधुर संगीत से मस्त बोकर पुलकित हो उठता है , अपनी सुधबुध भूल जाता है , उसी प्रकार शान्त श्रवण करने में भापको भी तन्नान होजाना चाहिये । पर देखते हैं, भाज कल के बहुत से श्रावकों में पर गुण नहीं-दिखलाई देता । कइयों का आसन परावर नहीं टिकता, कई बातें करने लग जाते हैं और कुछ भाईयों का ध्यान किसी और तरफ ही बटा होता है। इससिपे लाचार होकर उन भाईयों को कईबार एकाग्रता करने के लिये भी कहना पड़ता है । भवण करना गर्भाधान जैसी क्रिया है। शुद्ध वीर्य से शुद्ध गर्भ रहता है और फल भी अच्छा निकलता है। जो मनुष्य भने प्रकार शुद्ध वना से शुद्ध श्रवण करता है उसका नतीजा बहस

अच्छा निकलता है पर जो शुद्ध भषण नहीं करता ससका फल चुरा
ही होता है।
श्रोता को पहले निश्चय कर लेना चाहिये कि अमुक का उपदेश
श्रवण करने लायक है या नहीं। यदि है तो इन्द्रियों की विखरी हुई
शक्षियों का भौर चचल मन का एकीकरण करके सुनना चाहिये।
जो श्रोता देह भान भूल चना की ही तरफ भाखें गाड़ कर
एफापता से श्रवण करता , उसको निश्चय लाभ मिलता है।
उपदेश श्रवण करने का यह तरीका होता है कि पहले ख्य
ध्यान से श्रवण करना चाहिये वाद में मनन करना चाहिये।
यदि कोई प्रश्न जैसी बात मालूम हो तो उसका समाधान वक्ता
से ही कर लेना अच्छा होता है।
उस सकडाल ने भी ऐसा ही किया था। उसे जो शकाए
होती अपने गुरु गोशालक से पूछ लिया करता था।
भाइयों, वह कुम्हार गोशालक का शिष्य था और भाप
महावीर के । भाप दोनों में से किसको अच्छा मानते है ?
'पहावीर के शिष्यको।
गोशालक के शिष्य ने अपने प्रभु के वचन को भत्रण कर
उसके भादर्श को रग रग में रमा लिया, क्या भाप में ऐसी श्रद्धा
है ? यदि है तो फिर भैरू भोपा सीतला ओरी पीर कबरस्तान
आदि को क्यों पूजते हो? याद रसिये, यह खोटी श्रद्धा भाप का
पतन करने वाली है।
आपने अपने भज्ञानसे सीतला, जो एक प्रकार की रिमारी है,
उमको भी देवी मानली, बडा आश्चर्य है।

मेरी बहुतसी रहने ' चालूडा रखनाली, कह कर सीतला
के गीत गाती है पर फिर भी उनके बच्चों की रक्षा नहीं होती,
पर ग्रेजों ने इसे गोद डाला (टीका लगा डाला) ता भी
उन के बच्चे तन्दुरस्त मोटे ताजे दिखलाई देते है। इसका क्या
कारण ! उनका ज्ञान और आप लोगों का ज्ञान ।
अंग्रेज लोग जबरदस्ती टीका लगा कर इसको नष्ट करना
चाहते है पर श्राप लोग अभी पूजते ही है । मैं टीका लगवाने
का पक्षपाती नहीं हु । में इसे घृणित उपाय समझता हु ।
कारण टीके के अन्दर जो दवाई लगाई जाती है, पह गौ की
आँत में मे निकाली जाती है। ऐसी अपवित्र चीज आपके और
अापके बच्चों के शरीर में प्रवेश करके आप लोगों का रक्त
विगाडा जाता है। बहुत से विद्वान चिकित्सकों का कहना है
कि इससे [ टीम ] कूछ लाभ भी नहीं होता । अतएव इसका
प्रतिकार करना आवश्यक है । दूसरी बात यह है फि सीतला
को माता कहने की भावना अपने हृदय में से निकाल डालिये
और अपनी श्रद्धा पर कायम पने रहिये ।
आप लोग अईत भक्त हैं। एक के भक्त वन फर दूसरी
श्रद्धा नहीं रखनी चाहिये । जो मनुष्य एक पर श्रद्धा नहीं रखता
उसका जीवन डावा डोल हो जाता है और उमकी दशा धोबी
का कुत्ता घर का न घाट का, सी हो जाती है ।
याज भारत वर्ष के लोगों की, और जिसमेभी ज्यादातर
जैन समाज की भावना बहुत दुर्वल हो गई है । अहंत के भक्त को
यह वात शोभा नहीं देती । अहंत का सच्चा भक्त, ताड़ जैसे लवे
भयानक पिशाच के हाथ में चमकती हुई वलवार को देख कर भी

नहीं डरता, उसका एक रोम भी नहीं कांपता। क्या ११४१ आदमियों को मारने वाले पर्जुन माली मे सुदर्शन कापा था? . पर श्राप तो राक्षम के नाम से ही डरते है। बहुत मे साधु, चौपायें दोहे निगडे माहित्य के छंद गाय गाय कर भूतों पिशा- घों डाफनियों शाकनियों के मृति मान चित्र खडे कर देतेहै । जब साधु साधिया में भी ऐमे ऐसे वहम घुमे हुए है तर पापकों में दृढता कैसे पा सकती है ? सच्चा साधू वही है जो दुर्बलता को निकाल कर जनता में दृढता का भाव भरदें। मित्रों। सत्य की स्थापना के लिये प्रश्न समाधान करना जरूरी है पर किसी को कुछ नेश न हो इसका ध्यान रखना चाहिये। सकडाल अपने गुरु से प्रश्न पूछ पूछ कर भाजीरिक धर्मग पका अनुयायी बन गया । उसकी उसमें पूरी श्रद्धा वैठ गई। प्यारे मित्रों ! अद्धा दो तरह की होती है । एक जीती हुई और दूसरी मुर्दार । समडाल में उसके धर्मकी जीती हुई श्रद्धा थी । क्या आप सत्र में भी जीता हुई श्रद्धा है। 8झे तो बहुधा पालूम नहीं देती। अभीतक श्राप में बहुत से भाइयों की श्रद्धा जितनी कलदारों पर है उतनी तो क्या पर उमसे आधी भी धर्म पर नहीं है। मैं यह नहीं कहता कि कलदार वाले धर्म पर श्रद्धा नहीं रस सकते । रखते हैं, यदि नहीं रसते नो यह साडाल कुम्हार कैमे रखता ? इसके पास कलदारों की कमी नहीं थी। शास्त्र वत- साता है कि उनके पाम ३ करोड मुनये (आज के हिसार से करीब ६० करोड रुपैये) की द्धि थी।

(८) भापको आथर्य होगा कि-'कुम्हार के पास इतनी ऋद्धि पर, मित्रों ! इस में भार्थर्य करने की कोई बात नहीं है । याद रखि- ये जो देश ऋद्धिशाली होता है उसके तमाम वर्ग वाले बडे २ मनाढ्य होते हैं। अमेरिका आज ससार में सब से वढा ऋद्धिशाती देश गिना जाता है । वहा के एक वांस बेचने वाले के पास पहूत सा धन बतलाया जाता है । सुनते है कि उसने अपनी कन्या के दहेज में कितने ही करोड का धन दिया था । कहलाता तो यह चांस का व्यापारी, पर धन इस के पास कितना है ! जब प्राज भी ऐसे २ उदाहरण मिलते हैं तब उन दिनों भारत के-उस भारत के जो संसार का सिर मौर समझा जाता था, जिसको सारे देश अपना गुरु मानते थे, कुम्हार के पास इतना धन होतो कौनसी बड़ी चात है? आज भारत बहुत कंगाल देश होगयाहै । इसका कारण यह है कि यहां का भधिकांश व्यापारी वर्ग कच्चा माल विदेश भेजता दे और पका माल यहां मगवाता है। क्या ऐसे व्यापारी, देशके रितपी गिने जा सकते हैं ? कभी नहीं । यह बात कइयों को मले ही पुरी लगे पर सत्य कह बिना नहीं रहा जाता । जिस देश में यह रहता है, जिसको वह अपनी मातृ भूमि कहता है, अपने स्वार्थ के लिये सी देशका भधित करना कभी हित कर नहीं गिना जाता। मित्रों ! यदि भान की तरह पहले का व्यापारी वर्ग अपने ६ स्था का व्यनसाय करता तो क्या कभी मारत रमत यशापर होता। 'नहीं। शास्त्र के भन्दर, मरणक श्रावक का एक उदाहरण मिलाता है कि वह भारत का पक्का माल विदेश भेजता था । जिन दिनों

भारत का पक्का माल पाहर जाता था उन्ही दिनों का जिक्र है कि
यहां के सम्हाल नामक कुम्हार के पास ३ करोड सुनये थे।
गणधरों ने इस कुम्हार की भूद्धि की नोध लेकर हमारी
भाखें खोल दी है।
कई भाई कहते हैं 'महाराज तो समार की बातें पांचते है।
पर मित्रों! यह कथन जो गणधरी सूत्रों में फरमाया है उसका
पएिकरण पूर्वक कथन करके समझाने का नाम ही व्याख्यान
है यदि गादरच कार्यों के विचार को समझाने में साधू को
दोप लगता हो तो भी गणधर भगवान् सूत्रों में ऐसा कथन
क्यों करते ? पर गणधर भगवान ने अगाध पिचार में ग्रहस्मों के
कृत्य कर्म की शाला में नोध ली है और उसका देतु भी अवश्य
है भाज उन गणधरों के बाक्यों का रहस्य पूर्ण विचार ग्रहाथों
को न ममझाने से कृत्याकृत्य का भान बाधा नपृ भ्रष्ट हो गया
है इम मे अल्प पाप और न्याय नीति के बदले महा पाप और
अन्याय को कई भाई श्रष्ठ मान बैठे हैं
मित्रों ! शास्त्र में लिसा है कि उस जमाने में निमके
पाम जितने करोड मुनये का व्यापार होता था वह अपने
पास उतने उतने गौओं के गोकुल रखता या । जिन दिनों
भारत के अन्दर गौमों का ऐमा मान होता था उन दिनों
यहभाशाली बना था इसमें कौनसी घडी बात है। गौ श्राद्ध
मिद्धि की देन वाली मानी गई है । जहा ऋदि सिद्धि की देन
वाली हो चहा वैभव की क्या कमी ?
१-इस इजार गोनों का एक गोकुन होता था।

-
(१०)
भाइयों ! अपने शास्त्रो में गौ को बहुत ऊंचा आसन दिया है,
इतना ही नहीं वेदों और पुराणों में भी इसे बहुत उंचा स्थान दिया
गया है। ब्राह्मण लोग गायत्री मत्र का जाप 'गौ मुखी, के अन्दर
हाथ डाल कर फरते हैं पर इसका मर्म समझने वाले कितने होगें !
गौ ऋद्धि सिद्धि की देनेवाली है इसी लिये वैदिक ऋषि ने
भी ऋग्वेद के अन्दर ईश्वर से प्रार्थना की है कि-
गौ में माता सूपमः पिता में,
दिवः शर्म जगती मे प्रतिष्ठा ।
भर्थात् जिन सात्विक भोज्यानों और गव्य पदार्थों की
सहायता से में संसार सुख भोग कर अपने को कल्याण का अधि.
कारी बना सकता हु, वे गौ और बैल की सहायता ही से मिल
सकते हैं। अतः गौ मेरी माता और प्रैल मेरा पिता है। उन्ही से
मेरी प्रतिष्टा हो अर्थात मुझे बलवान और मेधापी बनाने के लिये
वे मुझे प्रचुर सख्या में मिलते रहें।
और देखिये, क्या श्री कृष्ण कोई भोले मनुष्य थे १,
'नहीं।।
उन्होने गौएँ चराई थी या नहीं !
'चराई।
मित्रों इसका मर्म कौन समझेगा? एक कवि ने तो यहां तक
कहा है कि गौ वश की रक्षा के लिये ही कृष्ण ने अवतार धारण
किया था।
हाथ में लकढी लेकर गौमों के साथ कृष्ण का जगल में
जाना, इसमें कितना गहरा तत्व भरा हुआ है। श्राज गौओं की
रक्षा के लिये पिंजरा पोलें सोली जाती हैं पर चन्दे उघा २ कर

कहां तक काम चलेगा। गौ रक्षा का तत्त तो कृष्ण ने बतलाया वही ऊडी जड़ वाला और ठोस उपाय कई विद्वान मानते है । मान आप में अज्ञान का राज्य है इसीलिये ऋद्धि सिदि की देनेवाली भी भापको वोम रूप मालूम दे रही हैं। कई लोग तर्क करते हैं कि किसी जमाने में गौ ऋद्धि सिद्धि देनेपाली रही होगी पर भाजके मदगी के जमानेतो शायदही हो इसका उत्तर गौ रक्षा के रहस्य के जानन वाले बन्धु देते हैं और कहते हैं कि जो भाई गौ पालन की इच्छा रखते है वे यदि शान्ति के साथ गौ का थामद सर्च का हिसाब भलि भाति लगाले तो उन्हें मालूम हो जायगा कि आज के जमाने में भी गौ ऋद्धि सिद्धि की दानी है या नहीं। वे हिसार बतलाते हुए कहते हैं भाज एफ भच्छी गाय १००) रुपैये में आती है। आप इन सौ रु० को गाय के खाते में लिख लीजिये। गाय मायः करके १० महिने तक द्ध दिया करती है, इस समय तक ज्यादा से ज्यादा खर्चा २००) रु. गाय के नाम और लिखलिजिये । कुल ३०० रु. गौ के खाते में गये । यह तो हुआ खर्च का हिसाब । अव थामदनी का हिसाब लगाईये । दुधारू, गाय, जिसको आपने सौ रु. में ली है, अन्दा- जन साम सुबह मिलाकर ८ सेर दूध देन वाली होगी । अच्छा दूध पाजार में ४ सेर का मिलता है इस हिसार से १० महिनों में गौ से भाप को कितनी भापदनी हुई, जोडिये । खर्च तो हुए ३०० और आमदनी हुई ६०० की रतलाईये, ऐसा व्यापार कोई दूसरा है, जिसमें एक के दो होते हों ? यहा कीची को यह शमा हो सकती है कि आमदनी का हिमाच तो आजके गौ रक्षक बतलाते हैं पर यह बात तभी तक की हुई जब तक गाय दूध देती रहे । बाद में हानि हो साती है ? इसका उत्तर वे 'नहीं' में देते हैं और कहते हैं-'जो गौ सौ रुपये में सरीदी गई थी वह गौ दूसरे साल पालक के पास मुफ्त में रही और उसके साथ उसका बछड़ा भी मुफ्त में ! गर्मा वस्था में करीव १० महिने गौ द्ध नहीं देती. अत एष इस समय इमकी खुराक भी कम होती है केवल अंदाजन १००) रपे के बदले में पालक का बछडा सहित गो१२५) रु. का माल मिला । इसके अलाना कडे तथा गौ मूत्र के कुदरती लाभ अलग ! इस तरह हिसाब लगाने पर बिना दुध देने वाली गौ भी खरच के बदले ज्यादा लाभ दाता ही है हानि फारक नहीं। सभव है इस कथन में कुछ अतिशयोक्ति हो पर यहतो कहा जा सकता है कि गौ थोडा सर्च लेकर ज्यादा लाभ देने चाली होती है। आज कल के कई लोग थोड़ी हैसियत होते हुएभी अपने को ज्यादा हैसियत वाला प्रमाणित करने के लिये बाह्याडबर वहुत यहा लेते हैं । यद्यपि ये बिना जहवाली इज्जत की इमारत खडी कर महल के रहन वाले कहता जाते है पर किसी समय समय का झोक ऐसा आता है कि इनका सारा दिसावटी सुख नष्ट हो जाता है । और ये दूकडे टुकडे के लिये हाथ फैलाने वाले बन जाते हैं। सकहाल की नीति ऐमी नहीं थी, पर वट वृक्ष की भानि थी। वनस्पति विज्ञान के विशपज्ञों का कहना है कि वट वृक्ष हिन्दुस्थान के सिवाय और किसी देश में नहीं होता। वहत से

.
हिन्द लोग उमे विष्णु का शयन स्थान पान कर पूजते हैं पान्तु
इम अलकार के रहस्य माय: नहीं जानते और विष्णु को वट वृत
शायी कहते हैं । इमक्ष का ऐसा मान क्यों किया गया, यह
क्या शिक्षा देता है, लोग उसे भूल गये । यदि पट वृक्ष की
शिक्षा भारतवामी फिम्से ग्रहण करलें तो उनका सारा नैतिक
जीवन सुधार सकता।
वट रक्ष में यह खूबी है कि वह अपनी जड जमीन में जित
नी गहरी जमायेगा उतना ही जार उठगा। जा यदि एक गज
गहरी जागी तो जमीन क ऊपर भी एक गज, जड दो गन
जमीन में हे मी तो ऊपर भी दो गज, और दश गज होगी तो
ऊपर भी दश गज दिखाई देगा। कहने का मतलब यह है कि
इमकी अह जितनी नीच जायगी उतने ही गज यह ऊपर उठेगा।
इमी कारण यह इतना मजबूत हो जाता है कि चाहे इसक ऊपर
हाथी घूमा कर, कुछमी बिगाड़ नहीं हो सकता । अतः यह
भारतवामियों को शिक्षा देता है कि 'जितनी शक्ति तुम्हारे अन्दर
हो उतना ही बाहर फैलाव कग । यदि तुम इस प्रकार करोगे
तो
कभी
दुःख
को मामना न करना पड़ेगा। पर आज इस
स उलटी दशा देखी जाती है। घर में चाहे कुछ मत हो पर हाय
में सोने की बगडिये तो चाहिये ही। बतलाइये यह र वन
जैमा काम कहा हुना। यह तो एरड वृक्ष के ममान हुआ। जिम
एक गधडा भी अपनी पीठ के बलमे उसाड सकता है । कहा
तो वट वृक्ष और कहा परह । वट वृक्ष में एक बात और भी देखी
गईहे इसकी जटा जर निकलती है तब वह नीच उतर जमीन में
अपना घर कर लेती है । जटायें बद पद पर सम्म रूप हो उस

चंट वृक्ष की और गहरी जड जमा देतीहै । वट वृक्ष अपना फैलाव
चे ढगे तौर से नहीं करता, मुहावने ढंग से करता है । प्रत्येक
भारतवासी को इसकी गहरी शिक्षा का मनन करना चाहिये
और इसकी शिक्षा अपने जीवन में उतारना चाहिये । क्ट वृक्ष
अपनी इसी चातुरी के बल हजारों मनुष्यों को अपने नीचे विठ.
लाने में समर्थ हो जाता है । मैने 'विनोता' के अन्दर ऐमा
वट देखा था। वट वृक्ष की शिक्षा गृहस्य को ही नहीं साधु को
भी लेनी चाहिये । भो साधु ध्यान मौन अध्यवसाय नहीं करता
सिर्फ उपरी आडंबर ही रखता है उसकी दशा भी एरंट के
समान हो जाती है। पर जो वट वृक्ष के समान बनता है उसका
प्रकाश संसार के ऊपर सहज ही पड़ जाता है।
सकडाल ने मानों वट व्रत का ही अनुकरण किया हो उस
प्रकार अपने पास के तीन करोड़ सुनवैयों के तीन हिस्से कर एक
हिस्सा जमीन में गाद दिया , एक व्यापार में और एक स्थावार
जगम सम्पति में विभाजित कर दिया।
सकढाल के अनि मित्रा नाम की भार्या थी यह बडी रूपवती
और बुद्धिमती थी। उसके चरण रज की बराबरी आज की
सेठानिये कहलाने वाली बहुतसी बहने भी नहीं कर सकती।
सकडाल गौए तो पालता ही था, उसके द्वारा उसे बहुत
खासी आमदनी हो जाती थी। पर यह अपना जातीय पेशा
(कुम्हार का काम) भी करता था। वर्तनों की इसके
५०० दुकानें या । और वे शहर के बाहर थी। कई भाई कह
सकते हैं कि दुकानें शहर के बाहर क्यों रक्खी गई । इस
का मतलव यह था कि पहले लोगों का ध्यान सास्थ्य की
.

तरफ भी रहा करता था । यदि ५०० दुकानें बर्तनो की करने
बाला शहर ही में रहता तो उसे शहर के अन्दर ही वर्तन पकाने
पडते । इससे सारे शहर धूमा
और लोगों के
स्वास्थ्य को हानि पहुचती । इसी बुद्धिमता से अपनी दुकानें
शहर के बाहर रक्सी गई हों।
'क्या यह कुम्हार इतनी दुकानों का अकेलाही मगध करता था।
मे
फैल जाता
नहीं।
इसके पास कई नौकर थे। इन नौकरों को वेतन के रूप में
अन्न और वस्त्र मिलते थे।
मित्रों ! आज की नौकरी में और पहले की नौकरी में जमीन
आसमान का असर है । जब से रुपैयै (सिके) देकर नौकरी
कराने की प्रथा भारत में चली तभी से इसमें यहा दुष्टता फैल गई
है। रूपैये का चलन पहले इतना नहीं था अन्न वख लेकर अपनी
ईमानदारी से काम करते थे पर जब से सिका चला तभी से
लोगों की नियत विगड़ गई। भामदनी होती है २०. की और
सर्च होता है ५०० का। कहा से आयेंगे ?
'बेइमानी से।'
आज कल का विचारा नौकर विमार परजायतो उसकी धन
ख्वाह काटी जाती है पर पहले के लोग इतने मिर्दयी नहीं थे।
वे अन्न वस्त्र से लोगों की पूरी सहायता किया करते थे।
प्यारे मित्रों ! यह कुम्हार भी ऐसे मनुष्यो में से था। आप
(पोसवाल) इसे कुम्हार समझ कर सोचते हो कि- इस का
क्या, पाँच सो दुकाने चलाने के लिये इसे हजारों वर्तन पनपाने
पडते होंगे और उनको पकाने के लिये मोटे प्रमाण में अग्नि
का उपयोग भी करता ही होगा भतएव यह तोमहा भारभी था।

" . भाइयों। आप इसे महामारंगी भले ही सममें पर जब, इमकी श्रांतरिक नीति कितनी ऊँची थी, जिसका विचार करेंगे तो मालूम हो जायगा की हम (श्रााक) बडे या वह कुम्हार । उस कुम्हार के यहां कई प्रकार के वर्तन बनाये जाने थे। शास्त्र के अन्दर उनके नाम दिये गये हैं। न वर्तनो को देखना तो दूर रहा , नाप तक भी न सुना होगा । बहत पुगने टीका कार भी इन चैतनों का सुलासा नाम न लिख मके इससे भापको मालूम हो जाना चाहिये कि शास्त्र कितने पुगने हैं। विक्रम संवत् ११ सौ के टीकाकार ने भी इन बर्तनों का देश मसिद्ध लिस कर छोट दिये। मित्रों! यह कुम्हार मुझ मजब कुम्हार मालूप देता है। आपके बहुत से भाई हमे हांडी वाला ममझ कर देंगे कि यह शूद्र है इमलिये नीच है । पर हांडी बनाने वाले को श्राप नीच कैसे कहने हे यह मग ममझ नहीं पाता । हांडी बना कर लोगा का सहायता पहुंचाये वह नीच पर, झूठ बोले. पाप करे, गरीब के गले पर छुरी फेरे वह ऊन ! हाग. भापकी इम ऊच नीच की व्याख्या का में क्या कहू ? माचिये, यदि हाही घड़ने वाला नीच गिना जाता तो धर्नन घडन की विद्या भगवान पभदेव जी ने सिखलाई, ऐसा जैन ग्रयों का प्रमाण है तो क्या भगवान पभदेव ने नाचता मिखलाई ? भाइयों ! आप छोट२ कार्य करने वालों को नीच मत समझो य आपके महाया हैं। इन महायों की अपलहना कर आप अपने जीवन को सुन्दरता मे व्यतीत नहीं कर सकेंगे। अवलेहना करने सभापके य सहायक इच्छा न होते हुएमी भन्य विदेशी धर्म के शरण में जाकर कई एक आपके घोर शत्रु बन बैठे हैं। जरा विचार कीजिये । जो आपकी बहन देटियों की रक्षा करसकते थे, जो हिंदूओं के मदिरों के लिये सर्वस समर्पण कर सकते थे, जो आपके पमीने की जगह खून बहाने को तैयार हो सकते थे, जो गौ को माता कहने में गोरव मानते थे वही आप लोगों के अत्याचारों से सग आकर आपकी बहन बेटियें चूराने में, मदिरों को घस करने में, गौ पर छूरी चलाने में, और आपके खून चूसने के लिये तैयार होगये हैं। जिस सकडाल की बात आप सुन रहे हैं उसके जमाने में उदार सिद्धान्त के पुजारी बहुत थे। वे किसी को प्रणित नहीं समझते थे । इमका प्रमाणे भाप हरिकेशी श्रमण महाराज के दृष्टान्त से ले सकते हैं। सफडाल का जीवन, आज कल के लोगों की तरह वेदगा न था। आज कल के लोग दिन रात काम करते हैं फिर भी पूरा नहीं होता तो आत्मचिंतन के लिये सगय कहां से निकाले ? यह सब समय की रे-परवाही, अनियमितता का कारण है । समसाल फा जीवन नियमित होने से वह आत्म चिंतपन किया करताथा और आत्म चिन्तवन के लिये उसने एक अशोक वाटिका दना रखी थी । आप लोगों में आज भी धनवान बहुस है किसी के यहा आत्म चितवन के लिये ऐसा कोई स्थान करैर किया हुआ है ? आप लोग तो ऐश आराम करने चाले श्रापको भात्म चितवन की क्या जरूरत? आप लोग व्याख्या न सुनने आते हैं पर फिर भी आपको शाति कहाँ ? बहुत सी बाने आते ही किया करती हैं। ये नतो स्त्रय वखान (व्याख्यान) ३ (१८) सुनती और न दूसरों को सुनने देती । ऐसा नहीं चाहिये । भात्मा को शांत रक्खो। शांत रखने से अजब भानन्द प्राप्त होता है चमका उल्लेख गीता में भी भाया है। अजब आनन्द प्राप्त करने के लिये ही सकडाल अशोक वाटिका में बैठकर आत्म चितवन किया करता था। जो मनुष्य आत्म चितवन में लीन हो जाता है उसके घर- णों में देवता कर रहते है। भाप लोगों को अभी इस बात पर विश्वास नहीं है इसीलिये रामदेवजी भैरूजी प्रौलिया पार कवर स्तान पर ना जा कर धक्के खाते फिरते हो । यदि आपको अपने आप पर विश्वास हो तो देवता आपकी हाजरी में रह सकते हैं। आपको कहीं जाने की जरूरत ही न पडेगी। याद रखिये सामान्य मनुष्यों को देवता नहीं मिलते । जो डरपोक है, कायर है, सकुचित हृदय चालाद, लोभी है, लालची है , विश्वास घाती है उससे देवता सदा दूर रक्षा करते हैं पर जो वीर है, वीशाल ददय वाला है, उदार है, मब भात्माओं को अपनी आत्मा के तुन्य पानता है उसकी सेवा में देवता सदा हाजिर रहने के अभिलाषी हुआ करते हैं। सकडाल में भी इन गुणों में से कइएक गुण विद्यमान थे। एक दिन जब वह गोशालक के मतानुसार आत्म चिन्तवन में ली न था तब देववा आकाश में आकर सड़ा हुआ । साधारण मनुष्य भी इस बात को जानते हैं कि देवता प्रथ्वी को नहीं छुआ करते। यह देवता पांच वर्ण के सुन्दर वस्त्रों से सन्जित था उन पर अनेक प्रकार के द्विन्याभरण सुशोभित होरहे थे। कानों में कुडल , गले में रत्नो का दिव्यहार , तेजस्वी किरण मडल के अन्दर दिव्य - (१६) मुखमंडल, दशों दिशाओं को भालोकित करता था। पैरों में पहनी हुई रत्न जड़ित घुघर माल की मधुर मकार चारों तरफ झकारित हो रहीथी। मित्रों ! मापने भी कभी देवता के दर्शन किये है ? नहीं।' भाप लोगों को कुम्हार की ५०० दुकाने देख कर विचार आता होगा कि इसके यहां हमेसा कितनी मिट्टी घोंदी जाती होगी आग्न का भारम्भ कितना होता होगा हाप हाप यह महा पापी हैं ! भाइयों भापको उपर की दृष्टि से यह कुम्हार भले ही आरम्भी समारम्भी दिखे पर चारित्र का पता ऊपर से नहीं लगता। चारित्र का असली पता प्रांतरिक ज्ञान से करना चाहिये ऊपर की क्रिया को देखकर महा प्रारभी महापापी ठहरा देना दिल कुल मूर्खता है। यदि यह वास्तव में महापापी या महामारम्भी होवा तो देवता किस प्रकार उसके यहां भासकता था? क्या देव में कम अक्ल थी? नहीं। देवता पहाज्ञानी हुमा करते हैं। उनकी बुद्धि मनुष्यों से विशेष विकसित रहा करती है। सकाल के अन्दर देवता ने विशेष प्रकार की उदारता, पुण्य मावना देखी तभी तो पाया। जिस प्रकार अग्नि के साथ धुभारहना अवश्यम्भावी है उसी मकार गृहस्थ की तमाम ससारिक क्रियामों में पाप भारभ जर है। क्रिया पर हस्त से कराई जावे या सहस्त से. पाप का मागी तो अवश्य होना ही पड़ता है कुम्हार इस नियम से मुक्त नहीं था पर अन्य कई कारणों से- अर्थाद- आत्मा की विशाल (२." भावना से साधारणों मे बहुत आगे बढ़ा हुआ था । यह कुम्हार पर स्त्री को माता व बदिन मानता, किसी से द्वेष न करता था। ऐसी हालत में इसे क्या मानना चाहिये ? ऐसी उब क्रिया करने वाले के पास यदि दवता न भावेगा तो किम के पास भावेगा? जिस सेठ के यहाँ अग्नि मादि का भारंभ समारम्भ ऊपर से नहीं दिखता उसे आप धर्मात्मा कहते हैं पर उसके हृदय के अन्दर कैसी २ छुरियें चल रही है 'आन म्हारी हाट में देऊ थारी टाट में' का कैमा धधा चल रहा है, कितने गरीबों के प्राण चूमे जाते हैं इसकी खबर है ? एक मनुष्य ऊपर से व्यवहारिक काम करने वाला और अन्दर में आत्मा की महा जाग्रति कर रहा है । दूसरा ऊपर से विशेष प्रारम्भी समारंभी नहीं दिखता पर भन्दर खुखार भेड़िये की तरह गरीयों का शिकार किया करता है । बतलाइये, मैं पुण्यात्मा किमे कहू ? देवता किसके यहां पावेगा? जिसका हृदय पवित्र है उसके दर्शन के लिये देवता आया करते हैं । जो ऊपर से अच्छे २ कपड़े लत्ते पहने, भाभूषणों से लदे, अतर फुलेल लगावें पर पेट में छुरीयें चलती रहें, उसके देवता कभी नहीं फटकते-द्वार पर कभी सड़े नहीं रहते । बहुत से लोग, सेती करने वालों, हांडा घडने वालों, जूती गांठने वालों को पापी ममझते है, पर मैं तो कई बडे बडे धन- वानों को इनसे ज्यादा पापी मानता है ये विचारे अपनी खरी, मजदूरी करने वाले है, इन्हें तो आप पापी कों पर जो गदियों पर पड़े पटे उसे मारूं, उसे गिराऊं, उस का धन स्वाहा कर जाऊं, इस मुकदमे में हरा द ऐसा करू पैसा करूं उसे अाप पुण्यात्मा "

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। २२) 'महामहाय किसे कहते हैं।' जो पुरूप पाहणो माहयो ३ अर्थात् किसी को पत मारो- मन मारो-~मत मारो, पेसा महा उपदश देता है, उसे महा महाण कहते हैं। सामान्य रीति से महाण साधु को तमा श्रावकमारिका को भी कहते हैं, सब से बड़ा जो महाग है उसे महा माहय करते हैं। देवता ने किस महा महाण की खबर दी? महावीर प्रसु की। ये उस समय के महा महाण थे। महा महाण कैमे होते हैं ? जिनके अन्दर ज्ञान दर्शन चारित्र भले प्रकार से उत्पन्न हो गये हो । महावीर प्रभु के अन्दर ज्ञान दर्शन चारित्र भले प्रकार से उत्पन हो गये थे। कोई प्रश्न करे की क्या उनके मन्दर पहले ज्ञान दर्शन चारित्र नहीं थे ? थे। पर चे ढंके हुए थे हरेक आत्मा में ये गुण मौजूद हैं पर ढके रहने के कारण मालूम नहीं पड़ते । जब इन पर से आवरण दूर हो जाता है तब यह दिखाई देते हैं । सूर्य बहुत दिनों से वही है फिर भाप प्रातः काल उदय होने पर उदय हो गया क्यों कहते हैं ? इसीलिये कि वह आपकी आखों से छिप गया था, बाद में फिर दिखने लग गया इसीलिये 'उदय हो गया, ऐसा कहते हैं। यही बात ज्ञान दर्शन चरित्र के विषय में समझना चाहिये । जिस भात्मा के ज्ञान दर्शन चारित्र शुद्ध हो गये है उसे परमात्मा कहते हैं। भात्मा और परमात्मा के अन्दर उतना ही फरक है जितना शुद्ध सोना और मिट्टी में मिला हुआ सोना में होता है । साधारण लोगों की द्रष्ठि में सोना जितना महत्व रखता है उतना

(२३ ।
मिट्टी में मिला हुआ सोना नहीं रखता । पर जो विशेषज्ञ है उन्हें
दोनों वरावर मालूम होता हैं वे जानते हैं कि मिट्टी अलग करने पर
इसमे से शुद्ध सोना निकल आवेगा। अस्तु-
वह देवता सकडाल से फिर कहता है कि-हे देवाणुपिया!
कल तुम्हारे यहाँ जो महामहाण मानेवाले हैं, वे भूत भविष्य और
र्वतमान काल को अच्छी तरह प्रत्यक्ष रूप से देखने वाले हैं और
वे तीनों लोकों को अपनी हस्त रेखा के समान स्पष्ठता से देखते हैं।
मित्रों ! देवता ने महामाहण का-जिसे माप परमात्मा कहते हैं
उनका परिचय इस प्रकार दिया।
यहा विचारणीय बात यह है कि जो परमात्मा तीनों काल
और तीनों लोकों को जानने वाला है. क्या बद्द आपके कामों
को नहीं देखता ! आपके काम तो क्या, पर मैं कहता हूँ कि
वह आपके हृदय सागर की उठती हुई प्रत्येक तरग अच्छी
तरह जानता है । परमात्मा सत्य से प्रेम करने वाला
है । यदि श्राप परमात्मा को प्रसन्न करना चाहते हैं तो
उसे सत्य काम कर प्रसन्न कीजिये । पर आज दिखलाई देता है
कि आप दुनिया के बहकावे में आकर दुनिया को प्रसन करने
के लिये असत्य एप तिरस्करणीय कार्य के धडक हो कर कर
रहे हैं। क्या ऐसे कार्यों से परमात्मा प्रसन्न होगा ?
,
नहीं।
परमात्मा सब कुछ जानने वाला है उसे प्रसन्न करने के
लिये सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना चाहिये।
यह वात सकडाल के लिये ही नहीं थी। यदि ऐसा ही होता
तो इस कथा की नौंध शास्त्र में नहीं ली जा सकती। अपने को

(२४) समझाने के लिये इस बात की नौंध शान ने ली है, इस पर हमें विचार करना चाहिये । कई वार किसी काम करने के लिये हम कहते हैं कि 'कोई देखतो नहीं रहा है ?, पर मित्रों ? भगवान सर्वत्र देखता है, यह बात हमें अच्छी तरह कबूल कर लें तो हम से कोई बुरा फाम नहीं हो सकता । वह तीन फाल का ज्ञाता है। उस में कोई वात छुपी हुई नहीं रहती, इस लिये शास्त्र के अन्दरं उसे अरह' कहा है । 'अरह' उसे कहते हैं जिस से कोई बात गुप्त नहीं रहती । चाहे घने जंगल की गुप्त से गुप्त गुफा के अन्दर जाकर की जाने । गुप्त बातों को जानने के लिये उसे किमी की सहायता की जरूरत नहीं रहती हमी लिये उमे केवली' कहा है । केवली का अर्थ-सपूर्ण ज्ञान का भडार-किसी वस्तुको जान ने के लिये जिस किसी इन्द्री मन आदि की सहायता लेने की आवश्यकता नहीं होती है। महावीर स्वामी के ममय में तीर्थकर नामधारी छ पुरुष थे उन में महावीरजी निनय ज्ञात पुत्र के नाम से कहे जाते थे पर श्रीमहावीरजी का तीर्थकर पद सर्वज्ञ आदि गुणों से निभूपित था वैमा तीर्थकर नाम धारियों का न था। इसी कारण देवता ने महावीर स्वामी के तीर्थकर पद को भलि भाति समझाने के लिये 'महामहागा' श्रादि विशेष बतलाये । * नोट पूर्णकाश्यप, मशकरी गौशालक, अजितकेश कवल, कुकुधकात्यायन, सजयवलास्थी पुत्र, निनथ ज्ञात पुत्र, ये छ नाम ऐतिहासिक बौद्धपर्व नाम के पुस्तक में दिये हुए हैं और लिखा है कि सिंहली भाषा में जो चौद्ध ग्रंथ है उन तिर्थकरों का नाम घ वर्णनं लिखा है। अन्य में इन'छ

दे महामहाण कैसे हैं, इसके लिये देवता फिर कहसा-
'त्रिलोकज्ञ' हैं, तेजोमय है, उन के दर्शन तीनों लोकों के प्राणी
हर्प भर करते हैं। उन के तेज में सारा ऐश्वर्य छिपा हुआ है ।
देवता लोग भी जिनके दर्शन के लिये उत्कठित रहते हैं और
दर्शन से गद् गद हो जाते हैं। वे ही त्रिलोक के नाप अहंत तुम्हारे
यहां आने वाले हैं।
हे सकडाल ! उन महामहाण को सब से महान् मान कर
सीनों लोक-स्वर्ग मृत्यु पाताल के प्राणियों ने महा पूजन की है।
मित्रों ! उनकी पूजन पुष्पादि से की गई होगी, ऐमा आप
मत समझना । कारण पुष्पादि से पूजन करने में मामहाण' में
बाधा आ जाती है । जिन्हों ने 'मत मारो ३' की महान् घोषणा
की, उनकी पूजन में पुष्प काम में लाये जायें तो महामदाणपना
उन में कैसे रह सकता है।
उयचाई सूत्र में कोणिक राजाने भगवान् महावीर स्वामी की
पूजा की वह पाठ इस प्रकार है-
तिविहाए पनवामणाऐ पज्जुवामइ त जहा-काइयाए,
वाइयाए, माणसीयाए, काश्याए ताव सकुइ भग्गहत्थपाऐ
सुस्सुप्तमायो ग्राम समाणे अभिपुरे विणएण पजलिउ?
परजवासई वाइयाए ज ज भगवं वागरेइ एप पेष भते !
तह मेय भते ! अवितह मेय भते । श्रम दिद्धमेय भते ! इच्छिम
मेम भते ! पहिच्चित्र मेश्र भते ! इच्छिय पडिच्छिय मेम भत!
से जहेय तुम्भे वह अपडि कुलमाणे पन्जुवासति माणसि-
याए महया सोग जणइत्ता तिवधम्माणु राग रतो पज्जुराई
अर्थात् पूजन तीन प्रकार की होती है-मनमा वचसा और कर्मणा ।

(२६)
अति चाहे कहीं विराजमान हो थान्तरिक मन से उन का
स्मरण करना मनकी पूजा है । भहेतों के वचनों पर पूर्ण भदा कर
उनके वचनों के माफिफ काम करना वचन की पूजा कहलाती है।
और उनको पचांग नमाकर भक्तिपूर्वक नमस्कार करना, इसे
कर्म-पूजन समझनी चाहिये।
पूजा पूज्य के अनुसार की जाती है अर्थात् जैसा पूज्य हो
चैसी ही पूजा करनी चाहिये । क्या साधु की पूजन डोरा कंठी
उनके गले में डालने से हो सकती है ? क्या रुपैये पैसे देकर उनकी
पूना हो सकती है ? क्या अतर फुलेल पान पुष्पाहार साधु की पूजन
में आ सकता है।
नहीं'।
क्यों ? इसी लिये कि ये वस्तुएं, जिन गुणों के कारण
साधु पूजनीय गिना जाता है, ऐसे पच महाजनों का नाश करने
पालीह। जिन वस्तुओं के द्वारा गुणों का नाश हो उसे पूजा कहनी
चाहिये या अनसा?
अवज्ञा'।
व्यवहार में भी यह बात देपलें ठाकुर जी की मूर्ति पूजने
वाले भाई, ठाकुरजी की पूजन किन वस्तुप्रों से करते हैं ?
चदन पुष्प आदि से।
और भेरूजी की?
• तैन बाकला वगैरा से।'
अब तैल बाफलों से ठाकुरजी की और चदन पुष्प मादि
से भैरूजी की पूजा की जाय तो ?
उलटा काम कहलायेगा।"
।

(२७)
अब पिचार कीजिये, जिन अहतों ने 'माहणों ३' का महान्
उपदेश दिगा, पुष्पादि से उनकी पूनन करना क्या उनकी
अवज्ञा नहीं है ? वैसे तो उन परमात्मा के चरणों में सर्वस्त
समर्पण है पर भक्ति ऐसी करनी चाहिये जिससे वे प्रसन्न हों।
ये वीतराग हैं अतएच राग पैदा करने वाली वस्तुओं से उनकी
पूजा करना योग्य नहीं फहला मकता। उनकी पूजा मनसा
बचसा और कायमा ही हो सकती है।
मैं कई बार कह चुका हु कि यह धर्म वीरों का है क्षत्रियों
का है। मापने पनियों की पोशाक पहनली तो क्या, है तो
भाप वीर क्षत्रिय सतान हो।
मित्रों ! धर्म का पालन कहने मान से नहीं होता। मुंह से
कहना कुछ और है, और करके बतलाना कुछ और । पत्रिप
लोग जिसको पचाम से नमस्कार करलेता है, उसके लिये यह
माण समर्पण करने के लिये भी उद्यत रहता है।
नमस्कार खूप सोच समझ कर ही करना चाहिये । जो
नमस्कार के योग्य हो, उसे करना चाहिये, न हो उसे न करना
चाहिये । महाराणा प्रताप ने बादशाह को नमस्कार के भयोग्य
सममा इसीलिये १८ वर्ष तक जगल जगल भटकता रहा,
मखमती बिछौने को लात मार कर घास की शय्या पर सोना
कल किया पर मस्तक न झुकाया । इसे कहते है-वीरों का धर्म ।
भाप लोग जिन साधुओं को मस्तक झूकाते हैं. 'तिखुत्ता
फन्लाण मगल' करते है, उनके घर माने पर रोटी देने में भी हाथ
धूमने लग जाय, कहिये यह आपका कैसा पुज्य माव? क्या
यह धर्म है या तो मस्तक झुकाना ही नहीं, यदि झुका दिया
थर
५

अति चाहे कहीं विराजमान हो थान्तरिक मन से उन का
स्मरण करना मनकी पूजा है । महतों के वचनों पर पूर्ण भदा कर
उनके वचनों के माफिफ काम करना वचन की पूजा कहलाती है।
और उनको पचांग नमाकर भक्तिपूर्वक नमस्कार करना, इसे
कर्म-पूजन समझनी चाहिये।
पूमा पूज्य के अनुसार की जाती है अर्याद जैसा पृष्य हो
वैसी ही पूजा करनी चाहिये | क्या साधु की पूजन डोरा कंठी
उनके गले में डालने से हो सकती है ? क्या रुपैये पैसे देकर उनकी
पूजा हो सकती है ? क्या अतर फुलेल पान पुष्पाहार साधु की पूजन
में आ सकता है।
नहीं'।
क्यों ? इसी लिये कि ये वस्तुएं, जिन गुणों के कारण
साधु पूजनीय गिना जाता है, ऐसे पच महाजनों का नाश करने
पालीहै । जिन वस्तुओं के द्वारा गुणों का नाश हो उसे पूजा कहनी
चाहिये या मनका
अवज्ञा'।
व्यवहार में भी यह बात देगलें ठाकुर जी की मूर्ति पूजने
पाले भाई, ठाकुरजी की पूजन किन वस्तुओं से करते हैं ?
'चंदन पुष्प आदि से।
और भरूजी की?
तेन वाफसा वगैरा से।'
अब तैल वाकलों से ठाकुरजी की और चदन पुष्प भादि
से भरूजी की पूजा की जाय ता ?
उलटा काम कहलायेगर ।'

(२७)
अब विचार कीजिये, जिन अहंतों ने 'माहणों ३' का महान्
उपदेश दिया, पुष्पादि से उनकी पूनन करना क्या उनकी
अवज्ञा नहीं है ? वैसे तो उन परमात्मा के चरणों में सर्वस्व
समर्पण है पर भक्ति ऐसी करनी चाहिये जिसमे वे प्रसका हो।
वे चीतराग हैं अतएव राग पैदा करने वाली वस्तुओं से उनकी
पूजा करना योग्य नहीं कहला मकता । उनकी पूजा मनसा
पचसा और कायमा ही हो सकती है।
मैं कई बार कह चुका हु कि यह धर्म वीरों का ई-पत्रियों
का है। मापने पनियों की पोशाक पहनली तो क्या, हैं तो
आप वीर क्षत्रिय सतान हो।
मित्रों ! धर्म का पालन कहने मात्र से नहीं होता। मुंह से
कहना कुछ और है, और करके बतलाना कुछ और । पत्रिप
लोग जिसको पचाम से नमस्कार करलेता है, उसके लिये बह
भाषा समर्पण करने के लिये भी उद्यत रहता है।
नमस्कार सूब सोच समझ कर ही करना चाहिये । जो
नमस्कार के योग्य हो, उसे करना चाहिगे, न हो उसे न करना
चाहिये । महाराणा प्रताप ने बादशाह को नमस्कार के भयोग्य
समझा इसीलिये १८ वर्ष तक जगल जगल भटकता रहा,
मखमत्ती पियौन को लात मार कर घास की शय्या पर साना
कबूल किया पर मस्तक न झुकाया। इसे कहते है-वीरों का धर्म ।
भाप लोग जिन साधुओं को मस्तक झुकाते हैं, 'तिखुत्ता
कल्लाग्य मगल' करते है, उनके घर भाने पर रोटी देने में भी हाथ
थर • धूजने लग जाय, कहिये यह आपका कैसा पूज्य माव? क्या
यह धर्म है ? या तो मस्तक झुकाना ही नहीं, यदि झंका
,

(२८)
तो उसके लिये सर्वस्व अर्पण करने के लिये तैयार रहना चाहिये ।
सर्वस्व अर्पण से भाप यह न समझ लेना कि हमारे धन
के मालिक साधू बन जायेंगे । नहीं, साधु धन के मालिक फनी
नहीं बनते । जो ऐसी लालसा रखते हैं वे सचे साधूभी नहीं
कहला सकते । सर--
देवता सफडाल से कहता है-हे देवाणु प्रिय ! जब तुम्हारे
पर त्रिलोक की विभूति अर्थात महामहाण पधारे उस समय उन
मगल प्रभु को वंदना करना, पढ़े भक्ति भाव से शव्या संधारा
पाट पाटला से प्रतिलाभित करना ।
भाइयों ! देवता, सफडाल को ऐसी सूचना देकर वापस
चला गया।
दवता के चले जाने पर सकहाल विचार करता है कि
देवता ने मुझे सूचना दी है, वे महामहाण कौन होगे ?
मेरे खयाल से तो वह मेरे माने हुए गोशालक मभु ही होंगे।
इस के सिवाय दुसरा और कौन हो सकता है।
देखिये, इस कुम्हार की अपने धर्म पर कितनी प्रास्ता है ।
प्यारे मित्रों ! सकडाल के घर देवता आवे और भाप
महावीर के उपासक तथा अमलोपासक कहलाने वाले श्रावक
देवताओं के पीछे इधर उधर मार मारे फिरा करे, यह कैसी
आश्चर्य की बात है।
आप कहेंगे कि-' महाराज ! हमारे घर देवता नहीं आते
इसलिये हम जाते हैं।'
में पूछताछ कि-आपको जो वस्तु सफडाल को बड़े परीश्रम से
मिली थी वह जन्म से ही मिल गई फिर देवता भाकर क्या करे ।

(२६)
मित्रों जरा श्रद्धा रखिये और अपने अन्दर देवी शक्तिये
प्रकट करने के लिये उद्योग कीजिये । देवता लोग भापके
परणों में सिर झुकाएंगे।
जिस समय देवता ने सकडाल को महामहाण के माने की
चमा दी और कहा कि-तू ऐमा मत समझना कि मैं ही उनकी
तेवा करूगा, उनकी सेवा मनुष्य तो क्या देवता तक करते हैं।
'क्यों?"
इसलिये कि वे बच्च फम्म सम्पया' है। तच्च कम्म सम्पया'
उसे कहते हैं जिसके अन्दर किसी प्रकार का सन्देह न हो।
जिस क्रिया के करने से जैसा फल पाना चाहिये वैसा ही आवे,
उसे तच (तय ) कहते हैं । जिस क्रिया के करने से जैसा फल
भाना चाहिये वैसा फल न आवे उसे तच्च (तथ्य ) नहीं कह
सकते । भाम के वृक्ष के 'माम' भाना तच्च है। ग्राम के लिये
क्रिया की जाय पर ग्राम पैदा न हो उसे तच नहीं कह सकते।
उदाहरण सप-आक के वृक्ष को लगा कर आप लाना चाहे, यह
क्रिया तथ्य नहीं फहला सकती। यह अतथ्य है।
'देवता ने तथ्य फर्म पतलाया, इससे समहाल को क्या
लाभ झेगा।"
कर्म से महावीर के साथ सबंध स्थापित हो जायगा।'
रेल के ऐंजिन के कुदे के साथ, डिबे का कुदा जुड़ जाने से
जिन उन दिब्बों को अपने साथ दूसरे स्टेशन पर लगा देता है।
सब डिने जिन नहीं बन सकते । यदि सर ऐंजिन बन जाय तो
मैसर्गिक कोई लाभ प्राप्त नहीं हो सकता । ऐंजिन का धर्म है
लियों को खींच कर अपने साथ ले जाना । यदि वह इम काम

- (२८) तो उसके लिये सर्वस अर्पण करने के लिये तैयार रहना चाहिये । सर्वस मर्पण से आप यह न समझ लेना कि हमारे धन के मालिक साधू बन जायेंगे । नहीं, साधु धन के मालिक कनी नहीं बनते । जो ऐसी लालसा रखते हैं वे सचे साधूभी नहीं कदला सकते । सर- देवता सफहाल से कहता है-हे देवाणु प्रिय ! जब तुम्हारे पर प्रिलोक की विभूति अर्थात महामहाण पधारे उस समय उन मंगल प्रभु को चंदना करना, पड़े भक्ति भाव से शम्या सबारा पाट पाटला से प्रतिलामित करना । भाइयों ! देवता, सफहाल को ऐसी सूचना देकर वापस चला गया। दवता के चले जाने पर सकढाल विचार करता है कि देवता ने मुझे सूचना दी है, वे महामहाण कौन होंगे। मेरे खयाल से तो वह मेरे माने हुए गोशालफ मन ही होंगे। इस के सिवाय दुसरा और कौन हो सकता है। देखिये, इम कुम्हार की अपने धर्म पर कितनी प्रास्ता है। प्यारे मित्रों ! सकडाल के घर देवता आवे और भाप महावीर के उपासक तथा श्रमणोपासक कहलाने वाले श्रावक देवताओं के पीछे इधर उधर मारे मारे फिरा करे, यह कैसी आश्चर्य की बात है। आप कहेंगे कि-' महाराज ! हमारे घर देवता नहीं आते इसलिये हम जाते हैं।' में पूछताछ कि-आपको जो वस्तु सफडाल को पड़े परीश्रम से मिली थी वह जन्म से ही मिल गई फिर देवता भाकर क्या करे ?

है " (३१) फे भन्दर सब प्राणियों को स्थान दो, उनके लिये अपने घर के फिवार सदा खुल्ले रक्तो। तीर्थ के अन्दर करुणा-दया होती है। आप तीर्थ कहलाते प्राप के मन्दर दया अवश्य होनी चाहिये । जिसके अन्दर दया होती है यही धर्मी पहलाता है। जिन धर्मी कहलाने वाले साधु साध्मी भावक श्राविकाओं क मन्दर दया न हो वे पर्मी नहीं कहला सकते। भाज दया के हास हो जाने से ही भाई भाई भौर विरादरी बिरादरी में झगडे चल रहे हैं। तीर्थ कहलाने वाले भाइयों भापके अन्दर मनुष्य के प्रति प्रेम हो, यह कोई पदी पात नहीं है । भापके अन्दर तो पशुओं तक की दया चाहिये। योसे पशुओं के श्रमय दान के लिये रुपये देकर आप यह मत समझिये कि-'हमारा काम पूरा हो गया। इससे तो आपकी भावना और मदी होजायगी। पाप पशुओं के लिये रु०वन करें और मनुष्यों की तरफ से उदासीन रहेंगे तोभी लोग भाप को पागल कहेंगे- मूर्ख समझेग | जिस मनुष्य क अन्दर पशुकी दया आई और मनुष्य की न माई वह सच्चा दयावान् नहीं कहला सकता । पशु की बनिस्मत दया करने का पहला भधिकार मनुष्य के मति होना चाहिये। जिसके में मनुष्य के प्रति दया आगई सम- मना चाहिये कि वह १८ पापों से छूट जायगा । जो मनुष्प मनुष्य के प्रति दया नहीं करता, उसके '८ पाप छूट नहीं सकते। याद रखिये-झूठ मनुष्य के साथ ही बोला जाता है ।

(३०)
में उदासीनता करे तो उमका ऐंजिन पना खोटा है। यदि एंजिन
इस काम के लिये तैयार हैं पर दिने इस के साथ अपना
सबंध नहीं जोरते तो उनका कम नसीप समझना चाहिये ।
मित्रों । अवतारों के त्रिपय में यही बात समझनी चाहिये ।
जिस व्यक्ति के अन्दर दूसरों को खींच कर अपने साथ सच्चे मार्ग
पर ले जाने की शक्ति होती है, उसे अवतार कहते हैं । हरेक
मनुष्य अवतार नहीं बन सकता । अवतार इमी लिये प्रगट होते
हैं कि लोगों को अधर्म मार्ग से छुटाकर धर्म मार्ग पर लाने ।
गीता के अन्दर भी यही पात कही गई है। *
'तीर्थकर किमको कहते है ?'
'जिमके द्वारा ससार मार्ग का उलघन हो ।'
'बह तीर्थकरल कैसे पैदा होता है?"
'सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन भौर सम्यक् पारित्र मे ।
'ये फिस में पैदा हाते ?'
'मनुष्य में।
साधु, साध्वी, श्रावक, आविका ये सब तीर्थ हैं, तीर्थकर
नहीं । तीर्थकर पेंजिन है, तीर्थ दिये।
डिन्ने के अन्दर एक वर्ण वाला बैठे और दूसरे वर्थ वाले
को उसमें बैठने का हक न मिले तो क्या यह जुल्म नहीं कहला-
येगा? महसूल देकर हिने के अन्दर बैठने का हक सब को
बराबर है। मनुष्य ही नहीं, हाथी घोडा गाय भैस आदि सन
बैठते है । आप (श्रावक वर्ग) तीर्थ रूप दिये हैं, अपने हृदय
* यदा पदा हि धर्मस्य ग्लानि भवति भारत । अभ्युत्थानम
धर्मस्य तदात्मान सृजाम्यहम् गीता अग्लोक।

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(३२) चोरी, दगा-फटका-लड़ाई-झगडा, मुकदमेवानी मनुष्प के साथ ही होते हैं । अतएव मनुष्य से दया (प्रेम ) रसभेवाला कभी इन कामोंको नहीं करता । इसीलिये कहना पड़ता है कि- मनुष्य दया रखनी चाहिये । इसके बिना कोई सिद्धि नहीं हो सकती। चाहे गले में जनोई डालिये, मुंहपर मुहपत्ति बांधिये, ललाटपर तिलक लगाईये या मेरी तरह सिर मुंडवाइये । मैं कई बार पहनों तथा भाइयों के मुह से सुनता ह-'मालू खाने में इतना पाप है, हरी मिर्च चीरने से इतनी मिराधना होती है, ' पर यह कभी नहीं सुनता कि-' हमें मनुष्यों की दया किस तरह करनी चाहिये, गरीबों के प्रति हमारा क्या कर्तव्य है, हम गरीबों का उद्धार कैसे कर सकते हैं।' मेग के समय, जब कि घरवाले भी अपने उत्तर दायित्व को भूलकर, घर के विमार मनुष्य को छोड भाग जाते है, उस समय अमेरिका भादि देशों से भाये हुए भाई बहनों को निर्भयता के साथ उसकी चिकित्सा का मार अपने ऊपर उठाये देखते हैं तब सहसा मुहसे निकल पड़ता है-'पहरे ममुष्प दया !" भाज आप लोगों में पेसा विश्वास घुम गया है कि प्रसूता स्त्री को पानी पिलाने से 'तेले'का दद लेना चाहिये ।' हाथ हाय, यह कैसा उलटा न्याय | क्या इस निर्दयता को भी दया फहनी चाहिये ? मै तो नहीं कह सकता। महामहास के पधारने की सूचमा देकर देता अपने स्थान पर चला गया , तर से रात भर मकडाल के मन में यही विचार (३) भान्दोलित हो रहा था कि हो न हो ने महामहाण मेरे पूज्य गुरु भी गोशालक प्रभु ही होंगे। दूसरे दिन मात:काल जब हजारों नर नारियों के झुंड के अँड सहस्त्रचन् उद्यान के अन्दर पधारे हुए महामहाण के दर्शन करने जाने लगे तब सकडाल भी स्नानादि से निवृत्त हो वह भाभूपण पहन जाने को तैयार हुआ। बहुत से भाई सोचते होंगे कि 'स्नान से निहन हो' ऐसा कर कर तो महाराज ने प्रारंभ समारभ करना बतला दिया । इन भाइयों को मैं क्या कहू ? क्या गणधरों के लिखे हुए पाठ को दवा लू ? और मार के अध विश्वास के भनुमार उपदेश द? मित्रो मेरे में तो ऐसा नहीं हो सकता। गणधरी के पार्टी को दवाल ऐसी मेरी मावना नहीं है। 'सकराल ने मगल बन पहने ' शास में ऐसा पाठ मिलता है। इस से मालूम होता है कि गृहस्थों के बसों में भी दो भेद होते हैं एक मांगलिक,मरा अपालिका शुद्ध और सच्च पत्रों को शासकार मांगलिक कहते हैं और युद्ध तथा गन्दे पत्रों को अमांगलिफा प्राज कल के बारकों में बहुत से भाई भमांगलिक वस पहनने में ही अपना मंगल समझते हैं पर सच पूछा जाय तो यह समझ गृहस्थाश्रम धर्म से विरुद्ध है। यदि ममालिक वस्त्र पहनने से ही गृहस्थाश्रम धर्म की घटना होती सो जगह जगह भावों की यदन विधि में 'शुद्ध मगल रख पहने' ऐसा कथन क्यों कर चलता। अतएर जैन धर्म की अवज्ञा हो, भारकों को मलीन रखने का आरोप साधुओं पर थाये देसा अनुचित व्यवहार कोई बुद्धिमान् भावक नहीं करता।

।
(४)
सफडाल ने मंगल बच परिधान किये और थोड़े पर पह
पुन्य भाभूपणों को पहन कर मनुष्यों से घिरा हुआ पोलासपुर के
पद्यानकी तरफ रसना दुधा।
यहां भगवान महावीर के तेजस्वी रूपको देख कर प्रेम से
गद गद हो भक्ति पूर्वक वन्दना और स्तुति की।
बाद में भगवान् ने सफहाल प्रादि श्रावकों को अपनी पवित्र
अमोघपाणि सुनानी आरम्भ की।
मित्रों ! यहां पर 'सफडाल आदि श्रावकों को,' इस पर
विचार करने की जरूरत है। वहां पर बहुत से सेठ-साहूकार
राजा भादि होंगे, उनमें से किमी के नाम के अगाडी 'शादि
शब्द न लगा कर सभडाल के भगाड़ी क्यों दागाया ! इसका
मतलब यही था कि पहले गुणों की पूजा होती थी। मुकदजी
सा' ही अगुआ बने रहें, यह बात पहले नहीं थी। जो गुणों में
विशेष हो वही अगुना।
भगवान महावीर की देशना गंगा की पवित्र धारा के
समान चलने लगी । उस अमोघ वाग्धारा की प्रशसा कौन कर
सकता? अहा, उन लोगों को सहस्रशः पन्य जिन्हों ने
अगवान् की चाणि सुनी।
मित्रों ! उन लोगोंने भगवान् की अमोघ चाणि सुनकर
पात्मगुण प्रगट किया। आप लोग मेरे से उपदेश सुनते हैं। में
उन भगवान् की वाणि सुनाता हू । आप इमे सुनकर कुछ मात्म
गुण प्रगट करेंग जो बड़ा करयाण होगा।
भगवान् ने अपनी अमोघ धारा के अन्दर क्या फरमाया
या। इसका इतिहास तो मेरे पास नहीं है पर उन्होंने अपने

उद्देश्य की पूर्ति के लिये मनोविजय का उपदेश जरूर दिया
होगा।
मित्रों! मन पर विजय जरूर करना चाहिये । जो मन पर
विजय नहीं करता उसके दुर्गुण दर नहीं हो सकते । ससार के
अन्दर जिवने विजयी होते हैं उन सब से महाविजयी बही
निसने मनका विजय कर लिया है।
एक राजा ने अपने भुज ग्ल से पड़ी भारी विजय प्राप्त की।
जब वह विजय माप्त कर घर लौटा तो पड़ी खुशी के साथ माता
के पास नमस्कार करने गया । मावा ने उसे देखकर मुह फेर
लिया । माद भा रानाने हाथ जोड़कर कहा-'माताजी ! मेरे
से क्या अपराम हुमा १ आज में विजयी होकर आया हु मैंने
अपने पल को और आप की कख को लगाया नहीं है। भाप
की कीर्ति सब जगह फैल रही है। माताजी ऐसे समय में भाप
नाराज होकर बैठे हैं, यह क्या बात ! कृपा कर फाहिये ।
माता गभीर होकर-तूने क्षत्रिय वीरवा तो पालन करती
पर अभी तू कायर है।
राजा चकित होकर-' यह कैसे माताजी ?'
.
।
न विजये
--
बेटा! तूने मग्राम में विजय प्राप्त करली पर मैं इसे अमली
वीरता नहीं मानती। तुपने जड वस्तु को अपने कब्जे में करती
पर इससे तुम्हारा क्या विकाश होगा? यह तो तुम्हें और दुखी
पनाने वाली वस्तु है । मैं सच्चा विजयी उसे मानती जिसने
मनोविजय कर लिया हो । तूने अभी तक एक भी इन्द्रिय का वश
में नहीं किया, मैं तुझे पार कैसे कहूं.१ .

मोर
.
(२६)
एक तरफ हजारों युद्ध में विजय प्राप्त करनेवाला रावण
दूसरी तरफ राम । राम ने रावण को जीत लिया भर विगयी किसे
कहना चाहिये।
राम को।'
क्यों ? इसलिये कि रसने राक्षको नीत लिया। रावण को
असली हरानवाला राम नहीं, पर उसकी इन्द्रिय थीं । यदि वा
इन्द्रियों से न हार जाता तो उसे कोई न हरा सकता था। रावय
इन्द्रियों से हार गया इसी लिये इन्द्रिय-विनयी राम ने रावण को
हरा दिया।
माता अपने पुत्र को फिर कहती है-बेटा! तूने बड़ा भारी
युद्ध जीत लिया पर अपने क्रोध को न जीत सका, बता मैं तुम
कैसे विजयी कहू ? एक स्त्री के थोड़े से हाव भाव से वेरा मन पचल
हो उठता है, संगीत के थोडे शब्दों को सुनकर तू कान देने लगता
है, जिक्षा तरे वश नहीं, आ तेरे अधिकार में नहीं, बतला में
तुझे किस प्रकार विजयी कहूँ ? बेटा ! याद रख, यदि तूने मनो
विजय करलिया-इन्द्रियों पर अधिकार जमा लिया तो में मांगी
कितने त्रिलोक को जीत लिया।
मित्रों ! यह वात तो माता पुत्र की हुई । माता के कथनानुमार
राजा ने किया पर अपन ने क्या किया? जरा इसका विचार
करना चाहिये । दूमरों की बातों से अपने को क्या लाभ ? जर
भंपन स्वयं करेंगे तभी अपने को लाभ होगा।
देशना (उपदेश) जर समाप्त हो चुकी तब महावीर मर
सफदाल से पूछते हैं-
सकबाल ! फल तु अपनी अशोक वाटिका में बैठा था उस

(२७) समय तेरे पास एक देवता पाया था? क्या उमने खबर दी थी कि फल एक महामहाण आने वाले हैं। क्या यह भी कहा था कि उनकी मंदना नमस्कार सेवा करना ? और यह सलाह दी थी कि भात, पाणी, वस्त्र, पात्र, पाट. पाटला प्रतिलाभना? सफहाल नम्रता से-'हां प्रस, कहा था ? महावीर-उस देवता के चले जाने पर तेरे मन में ये विचार प्राय थे कि देववा ने कहे वैसे महा गुण मेरे गुरु गोशालक में ही हो सकने ये? आज प्रातःकाल तूने सुना कि महामहाण पधारे । तर तेरे मन में ये विचार उठे थे कि 'मेरे गुरु गोशालक पधारे है, पलू दर्शन फरू क्या ये बातें सच हैं? सकदात-सत्य है मास में गोशालफ को ही मारे जान कर पहां भाया हूं। महावीर-सफडाल ! जिस महामहाण के लिये देवता ने तुझे सूचना दी थी वह तेरे गुरु गोशालक के लिये नहीं थी। सफाल महावीर प्रभु के वचन सुन कर बडा चकित हुआ। मन में विचार करने लगा-पन्हों ने मेरे मन की गुप्त की गुस बातें मगट कर दी, ओ: इनके अन्दर कैसी अद्भुत शक्ति है ? देवता महामहाण के जिस प्रकार के लक्षण प्रगट किये थे वे सप लक्षण इनके अन्दर मिलते हैं, तो क्या ये (महावीर ) मेरे गुर गौशालक प्रभु नहीं? न होंगे। लोग इन्हें महावीर प्रभू के नाम से परिचय कराते हैं। ये गोशालक नहीं हैं, मत हो, ये सच्चे महा- महाग्य है इसलिये इनकी बदना भादि करनी चाहिये । मैने पाले बो वदना की थी, वह मेरे गुरु गोशालक जान कर की थी। यता एझे इनको दुवारा नमस्कार करना चाहिये।

(३८)
सकडाल खड़ा हुआ । महावीर प्रभुको वन्दना की, नमस्कार
किया, बाद में हाथ जोड़ कर कहा-
पूज्यवर पौलाशपुर नगर के बाहर मेरी ५०० दुकान है,
कृपा करके वहां पधारिये । वहां आपके योग्य सब प्रकार की
सुभीता है।
प्रभूने प्रार्थना स्वीकार की। उसके वहां पवारे ।
सकडाल ने मनु की सेवा, जिस मकार देवता ने बतलाई थी
उसी प्रकार पड़ी भक्ति के साथ की।
भाइयों ! महावीर प्रभु कुम्हार के घर गये । अब जरा इसका
तुलनात्मक दृष्टि से विचार कीजिये इन्द्र, तीर्थकर प्रभु के जन्म
जात कन्याण को पूजता है पर उसके घर न जाकर ,कुम्हार के
पर गये । भन बतलाइये, इन्द्र पड़ा हुमा या यह कुम्हार ?
है, कुम्हार।
श्राज यदि कोई मुनि, कुम्हार के घर चला जाय तो
हा-ह' मचाना शुरू कर देते हैं। क्या आपने महावीर के
महातत्वों के गूढ रहस्यों को जानने का प्रयत्न किया है ? यदि
किया होता तो आपके ऐसे संकुचित भाव न रहते । महावीर
जानते थे कि-यह कुम्हार है, इसके यहां मिट्टी पानी अनि आदि
का प्रारभ समारभ होता होगा पर फिर भी उसके घर पधारे ।
पहा यह बात तो निश्चय ही समझ लेनी चाहिये कि महावीर
मधु अकेले न पधारे होंगे साथ में गौतम आदि गणधर और
दूसरे मुनि भी होंगे।
इन्द्र के घर प्रभु पधारते तो उनका प्रतिषि सत्कार ज्यादा
होता पर उसके वहां न जाकर मनुष्य का मातिथ्य स्वीकार
,

करते हैं । मित्रों! आपके पास कितनी बड़ी सामग्री है, ऐसी
सामग्री देवता के पास भी नहीं हैं। आप अपने को तुन्य क्यों
समझ रहे हैं क्यों नहीं अपनी शक्ति को प्रगट करते?
भाज प्रभु कुम्हार के घर क्यों पधारे 'इमलिये कि जिस
भकार कुम्हार मिट्टी का पहा बनाता है उसी प्रकार प्रभु मनुष्य
को सच्चा मनुष्य बनाने के लिये।
सकहाल सभ्य मनुष्य था पर सच्चे मनुष्य में जो खास
गुण होता है उमकी उसमें कमी थी अर्थात् वह होनहारवादी था।
वह समझता था कि जो कुछ होता है होनहार से ही होता है
प्रयोग करने से कुछ नहीं होता। इसी भ्रम को दूर करने के लिये
भगवान् ने जर वह चाफ पर उतरे हुए वर्तनों के कुछ फरके पडन
पर अपनी शाला के बाहर निकाल रहा था तब प्रश्नोचर करने
शुरू किये।
भाप लोगों को यह बात सुनकर थाथर्य होता होगा कि
निमक ५०० दुकानें थीं, सैकडों नौकर थे, वह अपने हाय से
मन बनाने का काम करता था' शफ वह बडा घनिक था,मैकड़े
नौकरों का मालिक था, फिर भी सपने हाथ से काम करता था।
मान कल पाप मालिक किसे कहते हैं ?
'जो स्वय काप न करे।'
• सेठानी किसे कहते हैं।"
'जो मजदूरनियों से काम कराती हो।'
हाथ से काम करने में सेठ और सेठानीजी को शरम पानी
है, उन्हें छोटे बन जाने का भय रहता है, पर मैं कहता है कि यह
सब इनका ढोंग है। ऐमे तुच्छ विचारों को हृदय में स्थान देना

अपनी तुच्छता बतलाना है। जो सेठ या सेठानी अपने घमंड में रह कर नौकरों ही के द्वारा काम करवाते हैं, वह काम यथा याग्य सम्पन्न नहीं होता।वाज वक्त उस काम का सत्यानाश हो जाता है। जो मालिक या मालकिन अपने हाथों से नौकरों से डबल काम करते हैं, नौकरों पर उनका पूरा प्रभाव रहता है और वे श्रालस्य रहित बन कर काम क ढग से करते हैं। जो मालिक या मालकिन बालस्य में पड़े रहते हैं। उनके नौकर कुछ भी काम सुधार कर नहीं करते और मुक्त में पड़े २ तनख्वाह साते हैं। मित्रों ! यह केवल आप लोगों के लिये ही नहीं है पर राजा महाराजाओं के लिये भी है । जो राजा महाराजा महलों में पर्व रहते हैं, राज्य का काम राज कर्मचारियों के भरोसे दाल देते हैं, उनके राज्य का नाश हुए बिना नहीं रहता । श्राप पृथ्वीराज चौहान के नाम से अनजान न होंगे। यह एक बड़ा भारी चीर पुरुष था। इस की वीरता की कहानियां मुदो दिलों में भी जान डालने वाली हैं। इसने कई काम ऐसे किये जिन को देख कर या सुन कर लोगों को भ्रम हो जाता था कि यह कोई पुस्प है या देवता! पर जब से इसने संयुक्ता रानी के साथ १२ वर्षे तक महल में ही रहना किया, राज्य का कुछ भी काम स्वय न कर सब कार्य राज्य कर्मचारियों के ही भरोसे पर रख दिया तब स इमकी सेना शिथिल पड़ने लगी और राज्य का नाश होने लगा । फल खरूप खप ही गुलाम न बना पर सारे भारत को गुलाम बना दिया। थापके कानों में सदा ये शब्द गूंजते रहते हैं कि-' यथा बाजा तथा प्रजा' पर इससे उलटा भी हो सकता है-' यथा मजा

(४१)
तथा राजा।' जो राजा मना के मत के अनुसार न चले, सरल
प्रजा उस राजा को अपने पद से नीचे उतार देती है और
मरा
राजा स्थापित कर देती है। इतना ही नहीं, मजा 'सराज्य'
भी स्थापन कर देती है।
राजा का प्रधान कितना ही विश्वास पात्र और कार्य दक्ष
क्यों न हो, राज कर्मचारी कितने ही स्वामी भक्त, सेवा निष्ठ क्यों
न हो पर राजा यदि बालसी ढोगी होगा तो इन दुर्गुणों की छाग
जनपर (राज कर्मचारियों पर ) पड़े रिना न रहेगी।
सेठों को भी यह बात याद रखने की है कि स्वय भांग-ठंडाई
पीने में मस्त रहें और सर काम मुनामा गुमास्तों के भरोसे पर ही
रक्खेंगे तो बुरे दिन नजदीक आने में देर न लगेगी।
जो किसान हल-जुताई आदि के कष्टों से डर कर मजदूरों के
ही भरोसे पर लाभ माप्त करना चाहता है उसकी यह प्राशा निष्फल
हुए विना नहीं रहती।
अगाडी के पूरुष हरेक काम अपने हाथों करते थे। जो मनुष्य
अपने काम में भी लजा करता है वह सचमुच में श्रालमी है।
और इस से भी पालमी तथा अपना ही सत्यानाश करने वाला
वह शक्म है जो अपनी आजीविका के काम को सय अच्छी तरह
नहीं जानता।
जो मनुष्य जिस काम को नहीं जानता उसको उसमे होने
वाले फल का अधिकार नहीं है । जो कपडा बुनना नहीं जानता
उमे कपड़ा पहनने का अधिकार नहीं है। जो भन्न पैदा नहीं
कर मकता उसे अन्न साने का हक नहीं है । बुद्धिमानों को इमी
प्रकार और-और बानें भी समझ लेनी चाहिये ।

(४२)
भाइयों ! यह पात में अपने मन में ही नहीं पर शास्त्र के
आधार से कह रहा हू । पहले के जमाने में प्रत्येक को ७२ कला
फर्नियात सीएनी पड़तीथी। क्या ७२ कला में खेती करना
कपडा युनना आदि कार्य नहीं पा जाते ?
आ जाते हैं।
शास्त्रों के अन्दर पालित श्रावक का वर्णन आया है। यह
निग्रन्थ प्ररचनों का जानने वाला था और या महावीर प्रभु का
सच्चा दृढ धर्मी श्रावक । मह ७२ कलाओं का आनने वाला था।
उमका विवाह समुद्र के पार किसी द्वीप की वणिक पुत्री के माय
हुया था। इसके पुत्र का जन्म समुद्र में हुआ था इस लिय
उमका समुद्रपाल नाम रक्सा था। उमको भी ७२ कलाऐं सिखलाई
गई थीं । शास्त्र के अन्दर इसका कथन आया है-
आज जैन धर्मका बहुत सकुचित कार्य क्षेत्र मान लिया
गया है। अन्य लोग यही समझते होंगे कि अत्यन्त सकु
चित वृत्ति घारण करनेवाला ही जैन धर्म पालन कर सका
है । साधारण मनुष्य के लिये भी जब यह पालना कठिन
है तब राजा महागजाओं के लिये कितना मुश्किल होगा।
पर मित्रों ! असलियत में यह बात नहीं है। जैन धर्म का
पालन र २ महाराजाओं से ले कर साधारण से साधा-
रण पुरुष भी कर सक्ने है । जैन धर्म विशाल धर्म है । इस
के श्रावक पहले अपनी जरूरत की चीजों के लिये दूसरों का
मुह नहीं ताका करते थे । जो परतत्रता से अपना जीवन
व्यतीत करते-छोटी २ चीजो के लिये भी जो मुहताज
बने
रहते हैं। उन्हें व्यवहारिक सुख नहीं मिल सका।
भारतवासियों ने स्मय काम करना छोड दिया, दूसरे के

मुंहकी तरफताकने लग गये तभी से इस देश का पतन होने लगा। आज भारतवासी ऐसे पराधिन हो गये कि इनको अन्य भाषा, अन्य वेश, अन्य प्रकारका रहन सहन, अन्य नाच रंग बहुत पसन्द आते हैं। इन्हें मारतकी भाषा, भारतका वेप, भारत का रहन सहन बहुत बुरा मालूम होता है। पराये देश से भीख मागते हैं-कपड़ा भेजो।' यहां के निवासियों का नैतिक पतन भी खूब हुआ । अधिकांशों का तो यह हाल है कि वे उपदेश के पात्र कहे जाने की भी योग्यता नहीं रखते । कुदरत का नियम है कि दुःख निर्वलों को ही प्राप्त होता है, सबलों को नहीं । लोग विचारे बकरों को बलिदान करते है क्या कोई सिंह को भी करता है ?, आज आप लोग इतने बैठे हुए हैं यदि कोई एक लह- धारी आ जाय तो उसका सामना कितने कर सकते है , श्रावकगण-'सब भाग जाय ।, बस, क्या आप इसी बल पर महावीर के शिष्य बने हुए हैं ? क्या महावीर के श्रावक पहले ऐसे डरपोक ही हुआ करते थे ? नहीं नहीं, वे ऐसे वीर होते थे कि राक्षस के हाथ में खड़- खडाती तलवार देख कर भी डर नहीं लाते थे । मित्रों आज आपकी और आपके देशकी इतनी अवनब दशा आलस्य के कारण ही हो रही है । आलसी का कोई भी सुधार नहीं हो सकता। सकटाल आलमी नहीं था इसी लिये भगवान् ने उसे सुधारने का प्रयत्न किया। यदि वह आपकी तरह आलसी होता तो क्या ने उसे सुधार सकते थे ? ।

(४४)
'नहीं।'
मित्रों ! अब भगवान् उस सफदाल की परिक्षा लेते है
क्या लेते हैं, मुनिये-
सहालपुत्ता ! एस ण कोलाल भएडे को ?,
सकडाल पुत्र ! ये घडे किस प्रकार बने हैं ?,
देखिये महावीर का युक्तिवाद ! क्या उन्हें मालूम नहीं था
कि घड़े किस प्रकार बनते हैं ? मालूम थी पर लोगों को पाठ
देने के लिये और उसके ( सफडाल के) कार्य की सिदि के
लिये यह प्रश्न करते हैं।
सफडाल उत्तर देता है-
एसणं भन्ते ! पुब्बि मट्टिया आसी, तो पच्छा उदएवं
मीयति छारेणय करसेगय एक करेउ मिसझति चवके आली
अंति
प्रभो ! पहले मिट्टी लाई गई बाद में पानी से भिगाई
गई, इसके बाद राख और लाद मिलाई गई फिर खूब गोंदी
गई, जर मिट्टी अच्छी तरह काम लायक बन गई तब चाक पर
चढ़ा कर ये वर्तन बनाये गये हैं।
मित्रों ! वर्तन वनाने का तो क्या सारी बातों का ज्ञान
भगवान् को था पर फिर भी कुम्हार से ऐसा प्रश्न किया इसका
क्या मतलब
इसका मतलन यह था कि सकहाल भवितव्यवादी होन
हारवादी' था। वह पुरुषार्थ को नहीं मानता था । इसीलिये
उसी के मुह से पुरुषार्थ की सिद्धि कबूल कराने के लिये
भगवान् ने यह प्रत्यक्ष का प्रश्न पूछा था ।

सकढाल ने पक्ष में आकर अर्थात् अपने पक्ष को न गिरने
देने के लिये ( भगवान् के प्रश्न के आशय को समझ कर )
कहा-'भगवन् , यह सब होनहार से होता है, हम लोगों ने जो
कुछ भी काम किये हैं वे सब होनहार के प्रताप से ही हुए हैं।
सफडाल ने ऐसा जवाब केपल अपने पक्ष को न गिरने
देने के लिये ही दिया था पर वास्तव में कार्य की सिद्धि तो
पुरुषार्थ से ही होती है।
कार्य सिदि के लिये तीन साधनों की जरूरत रहती है।
जैसे-उपादान कारण, निमित्त कारण और कर्ता । घडा इन
साधनों से ही चना । घडा बनाने के लिये जो मिट्टी भाई वह
उपादान कारण, वडा बनाने के चाक आदि साधन निमित्त कारण
क्योंकि विना कारणों के कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकी और तीसरा
कार्य करने वाला अर्थात कर्चा | इन तीनों में से एक की भी खामी
रह जाय तो कार्य नहीं बन सकता ।
शायद भाप लोग इसको भच्छी तरह न समझ सके होंगे।
मतः रोटी के ऊपर यह पात घटा कर समझाता द् ( चदिने
रोटी बनाती है । रोटी आटे की बनती है। रोटी बनाने के लिये
आटा उपादान कारण, साथ में चकला बेलन आदि निमित्त
कारण है और बनाने वाली बाई कर्चा हुई।
महावीर प्रभुने जो प्रश्न फिया उसका उत्तर मिलने पर
भगवान फरमाते है--सफडाल ! यह घड़ा पहले नहीं था, जय
था नहीं और बाद में बना, इसमें क्रिया जरूर की गई, जब
क्रिया की गई ता क्रिया के सद्भाव में कर्ता अवश्य ही सावित
होता है। क्रिया के विना कर्म नहीं और कर्ता के बिना क्रिया
नहीं । कर्ता के पुरुषार्थ करने पर ही क्रिया बनती है, यह बात

(४६)
हरेक जानता है । तू जरा मोटी बात से समझ कि घड़ा बनाने
के लिये सर से पहले मिट्टी लाई गई, मिट्टी को घड़ा नहीं कह
सकते । बाद में मिट्टी भिगोकर उसमें खाद व राख मिलाई गई,
तव भी उसे घड़ा न कहा और न कह ही सकते है फिर उस
कमाई हुई मिट्टी को चाक पर चढाई, क्रिया करने पर उसका
घडा बनाया गया । प्रिय सकडाल ! इस घड़े पनाने में उठाण
कम वल वीर्य पुरुषार्थ प्रधान है, यह बात तू मानता है ?
सकडाल-नहीं।'
महावीर प्रभु-यदि नहीं तो क्या मानता है ?
सकडाल पक्ष में आकर कहता है-
-घडा बिना उद्यम
भवितव्यता से बना है।
महावीर-तुमने यह नियतिवाद कहा, क्या यह ठीक है?
सकडाल-'जी.
महावीर-तब एक प्रश्न उठता है।'
सकहाल-'क्या ?
महावीर-'तेरे कच्चे तथा पके घड़ों को कोई पुरुष चुरा
ले जाय, इधर उधर विसेर दे, तोड़ फोड डाले तो तू उस
पुरुष के साथ क्या वर्ताव करेगा ? तेरी भार्या अग्निमित्रा,
जिसे तू बहुत प्यार करता है यदि उस पर कोई दुष्ट जबरदस्ती
अनाचार सेवन करे तो क्या तू उसे दड देगा?'*
* सहालपुत्ता! जहण तुम्भे केइ पुरिसे पक्केणय पातहयं कोला
लभड अवहरेज वा चिकरिम वा भिन्देज वा अच्छिन्देझ वा परिष्ट्र
घेझ वा अगिमित्ताए या भारियाए सजि उरालाई विउलाई भोगमी
गाई भुज्जमाणे विहरेज्जा, तस्स ण तुम्म पुरिसस्स किं दड दत्तेजासी'
5 अहणं त पुरिस पाउसेज्ज पाहणेज वायधिझ वा तज्जेज्ज
चा ताड़ेझ वा निच्छोडेज्जा वा निभच्छेन्ज चा अकाले चैत्र
जीवियानो घवरोचेज्जया।

(४७) सकडाल-मैं उस दुष्टको अवश्य दड दंगा। मैं उसे लातों से घुस्मों से, लकही से, मर प्रकार दंड दगा और मौका आ पड़े तो उसके प्राण भी ले लूं! सकडाल शायद ऐमा जोशीला उत्तर नहीं देता पर तेरी भार्या अग्निमित्रा पर कोई दुष्ट जबरदस्ती अनाचार सेवन करे तो क्या तु उसे दड देगा १,' इसी के उत्तर में उसने ऐसा कहा । मित्रों ! मफडाल ने ऐसा उत्तर क्यों दिया, इसका रहस्य वही समम सक्ता ई जो वास्तव में पति कहलाने योग्य है । इसका रहस्य वह मनुष्य नहीं समझ सका जो 'भैयों। के भरोमों पर स्त्री की रक्षा कगते हैं । आज लोग छोटे २ बच्चों का व्याह कर देते हैं । ये विचारे समझते ही नहीं कि व्याह किम चिडिया का नाम है । जब ये समझते ही नहीं, तव त्रियों की रक्षा का रहस्य ये क्या समझते होंगे? महावीर प्रभु कहते है कि-भाई, तू कहता है कि मैं उस पुरुप को दह दूंगा' यह बात तो तेरे सिद्धान्त के खिलाफ मालूम हुई कारण तू कहता है कि जो होनहार होता है वही होता है । तर उस पुरुप ने-जिसने घड़े आदि वर्तन चुराये, तोडे, फोडे या फेक दिये उसने यह काम होनहार के अधीन होकर ही किया। इसी प्रकार जिस पुरुष ने तुम्हारी स्त्री पर अत्याचार किया वह भी होनहार के वश से किया फिर तुझे दड देने की क्या पाव श्यता ? यदि तू देता है तो यह काम तेरे 'नियतिवाद के रि- रुद्ध है। क्या तुझ ऐसी हालत में नियतिवाद स्वीकार है ? सफडाल का हृदय हिलगया । कुछ विचार में पड़ा। उसके मन ने कबूल किया कि पुरुषार्थ में सब कुछ है, बालसी जीवन से कुछ भी नहीं होता।

(८) सकडाल ने स्त्री पर अत्याचार करने वाले को दंड देने का कहा , यह उसका पुरुषार्थ था । कायर कुछ भी नहीं कर सकता वह अपनी कायरता से कहता है कि ' में अत्याचार करने वाले को क्षमा देता हूं।' पर वास्तव में इसे क्षमा नहीं कह सकते । यह क्षमा ' श्रधम क्षमा' है। मित्रों ! इस बात को शायद आप अच्छी तरह न समम सके होंगे, इसलिये उदाहरण देकर समझाता हू- तीन पुरुप साथ जा रहे है, किसीने उनको गालिये दी उनमें से एक आदमी सोचता है-इसने हमें चोर, बदमाश,लपर आदि कहा है, क्या वास्तव में मैं चोर हूँ ? यदि मैंने चोरी बदमाशी, लपटता आदि की, तब तो मुझे इन विशेपणों मे पुका रना ही चाहिये। यह कोई गाली नहीं है । इसने तो मेरा गुण प्रगट किया है। यदि मैंने चोरी श्रादि नहीं की और इन विशेषणों से ताना मारता है तो मुझे समझना चाहिये कि चोर, पदमाश लपट को लोग बुरा कहते है, समान में इनका आदर नहीं होता, यह मेरे लिये गाली नहीं पर उपदेश है। मुझे इसमें घुरा मानने की क्या . . जरूरत? अव दुमरा मनुष्य विचार करता है कि इसने मुझे व्यर्थ में गाली दी, यह मेरे लिये इज्जत इतक की बात है, लोग सुनकर मुझे श्र-विश्वास की दृष्टि से देखेंगे अतः इसे प्रतिवाद रूप में कुछ दड देदेना चाहिये या राज्य कानून से इमे दंडित करना चाहिये ताकि भविष्य में किसी को झूठा बदनाम न करे। तीसरा, उस मनुष्य की गालिये सुन कर जलता है, मन में द्वेप सता है, पर इसलिये चुप चाप रहता है कि यदि मैं कुछ .

(४६)
प्रतिकार करूंगा तो यह बडा आदमी है, मुझे कहीं फसा देगा या
जूते मारेगा, इसलिये चुपचाप रहना ही अच्छा है।
मित्रों ! एक तो यह पहला पुरुप था जिसने मनको शान्त
रस कर क्षमा की । दूसरा यह मनुष्य है जिसने यथेचित उमका
मतिकार किया, उसका अपमान महन न किया और तीसरा यह
पुरुष है जिसने मन को शान्त नहीं किया पर डर कर शाति रखता
है। आप इन तीनों में से किसे अच्छा समझेंगे ?
'पहले को।
क्यो ? इसलिये कि उसने शशि रखते हुए भी शान्ति के
द्वारा क्रोध का बहिष्कार कर दिया है। पहले मनुष्य ने मची शाति
माप्त की, दमरे ने अपने व्यवहार का पालन किया और तीसरे ने
कपट पूर्ण शाति समलवन की, इमलिये पहला ऊचा, दूसरा मध्यम
और तीसरा नीच है।
शास्त्र के अन्दर पहले मनुष्य को मास्विक,दसरे को रानसिक
और तीमरे को तामसिक प्रकृति का कहा है।
श्राज ससार में तामसिक प्रकृति अर्थात् तमोगुण बहुत बद
गया है इस लिये ससार में शांति नजर नहीं पाती।
तमोगुणी कायर होते हैं।
जो मनुष्य घर के कार्य भार को वहन न कर सकने के
कारण दीक्षा अगीकार करता है, वह सच्चा त्यागी नहीं कहला
सकता।
शास्त्र के अन्दर अहकार्ग, क्रोधी, प्रमादी, रोगी आदि के
लिये दीक्षा ग्रहण करने का निषेध है।
मित्रों ! महावीर प्रभु की युक्ति मगत दलील सुन कर सकडाल

१
(५०)
का हृदय हिल गया यह बात मैं कह चुका हूं । फिर क्या हुआ
इसके लिये शास्त्र लिसता है-
तएणं से सद्दालपुत्ते श्राजीवि श्रीवासए समणं भगव महावीर
बन्दइनमसह २त्ता
अर्थात्-सफडाल ने श्रमण भगवान् महावीर को भाक्त
पूर्वक नमस्कार किया।
सकडाल ने पहले महावीर प्रभु को जो वंदना आदि की थी;
यह, देवता के कहने से, महावीर के अतिशय से या लोगों के
लिहाज से की थी। हार्दिक प्रेम से नहीं ।
प्रश्न उठ सकता है कि उसने ऐसा क्यों किया ? इसका
उतर यही है कि वह निश्चय और व्यवहार दोनों को पालता था।
बुद्धिमान् श्रावक ऐसा ही करता है । पर आज कल देसा
जाता है कि बहुत से भाई निश्चय पर बहुत जोर देते हैं पर
व्यवहार की तरफ चिलकल उपेक्षा भार दिसाते है। इस वक्त
भाई भूल जाते है कि व्यवहार का सम्यक् प्रकार से पालन करने
पर ही निश्चय का रास्ता ठीक हाथ में आता है । जो व्यनहार
तूच्छ समझता है उसे 'निश्चय ' अच्छी तरह प्राप्त नहीं होता।
निश्चय पर विशेष आग्रह करने पर व्यवहार हवा हो जाता है
याद रसना चाहिये कि लाखो का पालन करने वाला व्यवहार
ही है। साधु और श्रावक का काम भी व्यवहार से ही चलता है।
मित्रों ! हरेक वस्तु के दो अग होते हैं । एक निज का और
दूमरा रक्षा का । उदाहरण रूप-धन और तिजोरी का संबंध ।
धन सब प्रकार से गृहस्थों के लिये उपादेय है पर उसकी रक्षा
के लिये तिजारी की गिनती भी उसी के माथ है।
ये
.
को

दूसरा उदाहरण, पापको नामकी जरूरत है, आप बाजार गये और ग्राम खरीदे । यद्यपि आपको भाम के रस की जरूरत है तो भी उस रस की रक्षा करने वाले या या कहिये कि रस पैदा करने के मूल साधन गुठली छेतरा आदि का भी पैसे देकर सरीद लाते हैं। आप आम चूमने पर गुठली नधा छतरे आदिको फेंक देंगे तोभी उसके लिये पैसे देने ही पड़ते हैं। कई बार आप ग्रामों के साथ करहिया और घास भी लाते हैं। क्यों ? इसलिये कि उनके बिना आप ग्रामों की रक्षा अच्छी तरह नहीं कर सकते । आपका आखिरी कार्य यद्यपि रस चूसना ही है पर रस रक्षा के इतर साधनों को पहले से ही त्याग देने से इष्ट कार्य सफल नहीं हो सकता। मैं पहले ही कह चुका हु कि प्रत्येक कार्य क्रमसर होता है और होना चाहिये । विना ऐसा किये काम ठीक नहीं होता । आप लोग ग्राम खाते है, शरीर को किस प्रकार पोपण करता है इसकी भापको मालूम नहीं है यदि मालूम हो तो समझ सकते हैं कि क्रम विकाश का नियम कितना मजबुत है। आप आम आदि पदार्थ शरीर पोपण के लिये साते है। पर साते ही शरीर का पोपण नहीं हो जाता , कम से होता है । जिम प्रामको श्राप चुमते हैं, पहले वह आमाशय में जाकर पचता है। पचने पर विशेष प्रकार का रस बनता है । उस रस का उपयोगी भाग रत वन नाता है और अनुपयोगी भाग मल मूत्र के रास्ते बाहर निकल पाता है । रक्त मोटी तथा छोटी नसों के द्वारा सारे शरीर में फैलता है। रक्त के दो भाग हो जाते हैं । शुद्ध और अशुद्ध । शुद्ध रक्त लाल रंग का होता है

( ५२)
और अशुद्ध काले रंग का । रक्त की और भी कई क्रियाएँ
होती है । सूक्ष्म से सूक्ष्म पोपण तत्व आखों को मिलता है
और स्थुल से स्थुल स्पर्श इन्द्रिय को। रक्त से मांस, मेदा,
अस्थि मजा, शुक्र बनते है ।
आप लोगों ने शरीर पोपण की मोटी बात समझी इस
उदाहरण से भापको यात्मिक तत्व की तरफ ध्यान देना चाहिये ।
आत्मिक तत्व की चरम सीमा तक पहुंचने के लिये आपको पहले
दूसरी बातों की भी रक्षा करनी चाहिये, बिना ऐसा किये माप
यात्मिक तत्व तक पहुच नहीं सकते।
क्रमसर विकाश करते जाना ही उन्नति का मूल मत्र है।
सफडाल ने पहले भगवान को नमस्कार किया था वह
व्यवहारिक दृष्टि से किया था अब उसने हृदय के प्रेम से किया
और चोला-
इच्छापि ण भन्ते ! तब्भ अन्तिए धम्म निसामेत्तए, तए णं
समण भगव महानरे सद्दालपुनस्स माजीवि ओवासगस्स तीसे य
जाव धम्म परिकहेइ।
प्रभो ! मैं धर्म सुनना चाहता हूँ ।
मकडाल ने पहले धर्म सुना था पर सुना था ऊपर के मन
से । हृदय के प्रेम से नहीं । जो मनुष्य ऊपर के मन से धर्म
सुनता है उसे कोई धर्म समझ में नहीं पाता 1 धर्म तभी
समझ में आता है जब हृदय के प्रेम से सुना जाय ।
भगवान् महावीर ने सकडाल के प्रार्थना करने पर
देशना और भारभ की । यद्यपि धर्म देशना सकडाल के लिये
भारम्भ की, पर इसका मतलब यह नहीं है कि इसी के लिये
धर्म

की । अन्य लोगों ने भी सुनी और लाभ उठाने का प्रयल किया। वर्षा किमी पास के लिये नहीं चरसती उसका उद्देश्य तपाम बनस्पतियों को हरीभरी करने का है वर्षा का लाभ वही किमान उठा सकते हैं जो उद्योगी होत हैं । भालसी किसान उससे लाभ नहीं उठा सकते । उन बालमियों के लिये वर्षा घरसना न बरसना बराबर है। प्रभु की वाणि सुनने पर मकडाल की इच्छा भगवान के पास से १२ व्रत धारण करने की हुई । भगवान ने उसकी इच्छा पूरी की। चीर प्रभु की वाणि सुनने पर सकहाल को उम प्रकार आनन्द थाया जिस प्रकार निर्धन को धन, अपुत्र को पुत्र और रक को गज्य मिलने से पाया करता है। सकडाल ने भगवान् महावीर के धर्म को धारण कर लिया है ऐसा जान कर उसका पूर्व गुरु गोशालक अपने धर्म पर उसे पुनः भाषत करने के लिये सकढाल के पास थाया। मित्रों ! यहां यह कह देना जरूरी है कि धर्म पर जिम की पूरी आस्ता हो जानी है उसे फिर कोई नहीं डिगा सकता। महावीर के धर्म और गोशालक के धर्म में बड़ा भारी फर्क यह था कि महावीर आत्मा को कर्ता मानते थे और इसी का प्रचार दुनिया में करते थे। पर गोशाला इस सिद्धान्त से बिलकुल भिन्न मत रखता था । वह इस सिद्धान्त का प्रचार करता था कि जो कुछ होता है वह होनहार याने भवितव्यता से होता है । सकडाल पहले इसी सिद्धान्त का मानने वाला था पर उसके हृदय से अप यह भाव मिटकर इस बात पर पूरा दृढ हो गया है कि जो कुछ होता है यह श्रात्मा के कर्म का ही फल है।

(५४) आत्मा को कर्ता धर्ती मानने वाले सिर्फ महावीर ही नहीं पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भी इसीका उपदेश गीता में दिया है। उद्धरेदात्मनात्मान नात्मानमवसादयेत् प्रात्मैव प्रात्मनो बन्धु रात्मैव रिपुरात्मनः। अर्थात् हे अर्जुन ! अपनी आत्मा से ही अपनी आत्मा का उद्वार करना चाहिये । आत्मा ही आत्मा का वन्धु और आत्मा ही आत्मा का रिपु है। आप लोग जान गये होंगे कि महावीर प्रभु और श्रीकृष्ण के उपदेश में कितनी साम्यता है, बिल कुल मिलते जुलते । परन्तु जा होनहार को को मानते हैं तो ऐसी ऐसी बातें आकर सामने खड़ी हो जाती हैं कि उनका वे निराकरण नहीं कर सकते । उदाहरण समझिये कि लडका स्कूल में पढ़ने जाता है । अब उस लडके का पढ़ाना लिखाना प्रश्नोत्तर करना ये सब क्यों किये जाते हैं। जहा भवितव्यता का ही सिद्धान्त माना जाता है वहा इन कृत्यों की कोई जरूरत मालूम नहीं पड़ती। क्योंकि इस सिद्धान्त के अनुसार लड़का अपने आप पढ़ लिस जायगा । पर हम इससे उलटा होते देखते हैं। मास्टर लड़के को पढ़ाता है तब पढ़ता है और सिखाता है तब सीखता है । इससे यही नतीजा निकलता है कि कर्ता के विना कर्म होना अशक्य है । मिट्टी में घड़ा बनने की ताकत है पर यदि कुम्हार बनाने का काम न करे तो वहनें भवितव्यता पर ही रह कर आटे को चुन्दे के पास रखदे तो रोटी बन सकती है ? 'नहीं।' अनुमान कीजिये कि यदि चार दिन ही भवितव्यता के सिद्धान्त को मानकर भाटे के भरोसे पर रोटी बनाना दाल दे " - तो संसार की कमी स्थिति हो जाय कैसा हाहाकार मच जाय ? . इन्हीं सब सिद्धान्तों को पोचे देख कर सफडाल ने महावीर के सिद्धान्त को पड़ी भक्ति पूर्वक स्वीकार किया। जब गोशाला सकडाल के पास पहुच रहा था तत्र सकहाल समझ गया कि यह मेरे पूर्व के गुरु मुझे अपना सिद्धान्त फिर मनवाने के लिये भाये हैं । सकडाल चुपचाप बैठा रहा, मुह से एक शब्द भी न बोला। गोशालक कोई मूर्ख तो था ही नहीं, बड़ा पुद्धिमान और विरक्षण था। उसने सकडाल के भावों को ताड़ लिया । मित्रों ! थाप जानते हैं कि गोशालक सकडाल का पूर्व गुरु था, फिर वह ऐसा उदासीन क्यों रहा ? इस लिये कि गोशाला का मिद्धान्त मेरे लिषे और जगत के लिये अकल्याण- कारी है। ऐसे मिद्धान्त चादी के प्रति विनय मक्ति प्रदर्शित करना, उसके सिद्धान्त को मान देना है । इमसे पडे अनर्थ की सभावना रहती है। इसी लिये सकडाल ने ऐसा भार प्रदर्शित किया। इसे कहते हैं 'अमहयोग । जिस प्रकार धर्म सिद्धान्त के लिये अमहयोग करना जरूरी है उसी मकार यदि लौकिक नीति पूर्ण व्यवहारों में राज्यापी तरफ से अन्याय मिलता हो ऐसी दशा में राज भक्ति युक्त सविनय असहकार करना प्रजा का मुख्य धर्म गया है। यह माना नपुंसक है जो अन्याय को चुपचाप सहन कर लेती है और त्रु तक भी नहीं करती । ऐसी प्रजा अपना ही नाश नहीं करती पर उस राजा का भी नाश का हेतु धन जाती है जिसकी वह प्रना है । जो प्रना अपने में इतना बल नहीं रखती कि उस अन्याय का पूर्ण प्रतिकार कर सके, ऐसे मौके पर नीति विशाग्द सलाह देते है कि-कम से कम इतना तो जरूर ही राजा तक प्रगट कर दे कि अमुक कानून या कार्य हमारे लिये हित कर नहीं है। कौरव पाडवों के युद्ध में दुर्योधन की तरफ महा विच- क्षण भीष्म और द्रोण आदि थे । वे जानते थे कि दुर्योधन का पक्ष अन्याय का है और युधिष्ठर का न्याय का । ये लोग धन्न दुर्योधन का साते थे इसलिये उनके विरुद्ध शस्त्र उठाना हेय मपझते थे पर फिर भी अपने हृदय के भान स्पष्ट तया व्यक्त कर देने में नहीं हिचकिचाए । अन्याय के प्रति अ-सहयोग न करने से बड़ा भारी अनर्थ हो जाता है यह बात मै ऊपर कह चुका हू । पुष्टि के लिये श्राप महाभारन के युद्ध के ऊपर ही दृष्टि डालिये | भीष्म द्रोण आदि यदि कौरवों से अ-सहयोग कर देते तो इतना बड़ा रक्तपात न होता और इस देश के पतन की नींव न पडती । अन्याय के प्रति अ-सहयोग न करने के फल स्वरूप ही रक्त की बडी भारी नदी वही और देश का अधःपतन इतना हुआ कि सदिय बीत जाने पर भी सम्हल न सका। कौन सा काम अन्याय का है और कौनमा न्याय का किस कानुन से प्रजा के कल्याण की सम्भावना है और किम से प्र-कल्याण की; यह वात हरेक मनुष्य नहीं समझ सकता। समझदारों का कर्तव्य है कि इस बात का ज्ञान मत्येक को फरारें । जो इस प्रकार कल्याण का ज्ञान समय समय पर कराते रहते हैं, उन्हें जनता अपना पृज्य नेता मानती है ।

( ५७ ) जनता ने जिन पुरुषों को नेता या श्रेष्ठ पुरुष मान लिया है उन्हें ऐसा मार्ग अवलम्बन करना तथा अपने आचरण ऐसे रसने चाहिये जो दूसरों के प्रादर्श रूप हो । क्योंकि लोग नेताओं तथा अगुवाओं का ही अनुकरण करना चाहते है । गीता में कहा गया है- यद्यदा चरति श्रेष्टो तत्तदेवो जनोत्तरः। म यत्प्रमाणं कुरते लोकस्तदनु वर्तते ।। मित्रों ! इतनी लम्बी बात कहने का मेरा मतलब यह था कि वह सकडाल कुम्हार होते हुए भी श्रेष्ठ पुरुषों में गिना जाता था। यदि वह गोशालक के सिद्धान्त के प्रति असहयोग न करता तो दूसरे भोले लोग उस मिद्धान्त के अगाडी मिर झुका देते और अकर्मएय वन जाते। जरा आप भी सोचिये, क्या कर्ता को भूल जाने से काम मुधर मकते हैं ? मिर्फ होनहार पर ही बैठे रहने मे कोई काम बन सकता है। मैंने पहले दृष्टान्त दिया था कि पहनें यदि होनहार के भरोगे पर ही रोटी का काम दो-चार दिन के लिये छोड दे नो समार की फ्या स्थिति हो ? पुरुष एक दिन भी होनहार के भरोसे पर रहकर धोती न पहने तो कैसी पीते ? नगा होने पर दोप किस दिया जाय ? क्यों कि जहां होनहार का सिद्धान्त माना जाता है वहा दुमरे और किसी को तो दोप देही नहीं सकते । लडके पढ़ने जाते हैं फिर उनकी परीक्षा लेकर योग्यतानुमार नयर देकर फैल पास क्यों किया जाता है? क्यों उन्हें उत्तेजनादी जाती है कि यदि तुप पाम हुए तो इनाम दिया जायगा । किमान वरमाद के दिनों में परमाद

(५८)
माने पर भी सती का काम न करे और होनहार के भरोसे पर घर
भाकर बैठ जाय और विचार करे कि धान पैदा होना होगा तो
अपने आप हो जायगा मै क्यों सिर पच्ची करूं? जुलाहा भी उसी
सिद्धान्त को मान कर वन बनाने का काम सूत के ऊपर ही हाल कर
बैठ जाय तो?
श्रापकगण-काम नहीं चल सकता।'
इमी लिये इस सिद्धान्त के प्रति मकहाल को असहयोग
करना पड़ा कि कहीं इस मिद्धान्त को मान कर जनता होनहार
वादी न बन बैठे । उसे महावीर का सिद्धान्त हृदयगम हो गया कि
पुरुषार्थ करने स ही कार्य मिद्धि होती है। गीता के अन्दर
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही बात कही है
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफल हेतुर्मूर्मा ते सगोऽस्त्व कर्मणि ।।
कर्म करो, कर्म फल की प्राशा मत करो । कर्म फल को
ही कर्म करनेका कारण मत बनाओ और निकम्मे भी मत रहो।
मित्रों ! सफडाल ने अन्याय के प्रति असहयोग कर दिख
लाया । वह भी सभ्यता के साथ ।
भारत के चारों वर्ण पहले किस प्रकार सभ्यता रसते थे
इसका वर्णन जैन शास्त्रों में मिलता है । यह सफडाल जातिका
कुम्हार, इसके ५०० दुकानें वर्तन बेचने की, ३ करोड़ सुनवैयों
का अधिपति, १०००० गानों का प्रति पालक, फिर भी नीति
पूर्ण व्यवहार का ध्यान कितना रहता था, जरा सोचिये ।
जिस कुम्हार का चरित्र मैं आपको सुनाता हूं उसकी
जाति कुम्हार थी और घर का धनी थापर नियमों का पैसा

पालन करता था, और वह भी सभ्यता के माथ । यही कारण
है कि भगवान महावीर भी जिस सभ्यता के साथ एक राजा को
उपदेश दते हैं उसी प्रकार एक शूद्र को भी ।
भगवान् यह खयाल करते कि यह कुम्हार है इस लिये मैं
उपदेश नहीं देता । पर उनके सामने तो सब घराबर थे। यह
तो लोगों ने पीछे मे दग पकड़ा है कि वे नीच और हम ऊच ।
हमारी बराबर वे कैसे बैठ मकते है।
सफडाल ने भगवान् का उपदेश सुना और निधय कर
लिया कि कर्ता प्रात्मा ही है होनहार कुछ चीज नहीं ।
श्राप भाइयों में केवल होनहार को मानने वाले शायद न
होंगे पर भगवान् करते हैं वह होताहै। मानने वाले बहुत
मिल जायेंगे। ये कहते हैं कि । ईश्वर करता है वही होता
है, हमारे किये धरे कुछभी नहीं होता।' इस भ्रमका मिटाने
के लिये, उन्हें गीता देखनी चाहिये । उसमें लिखा है:-
न कर्तृत्व न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रमुः।
न कर्मफल सयोग स्वभावस्तु प्रवर्तते ।।
'परमेश्वर न तो मनुष्य को कर्ता बनाता है, न कर्म की
सृष्टि करता है, न कर्म-फलका सयोगही करता है। ये सब
स्वभाव मे होत रहत हैं।
जैनी भाई भी अन्ध विश्वास से दूर नहीं है । वे भी
'काई करा महाराज, कर्मों की गति ' कह कर सब दोष कर्म
पर डाल देते हैं, मानों सय तो कुछ करने वाले ही नहीं।
मित्रों ! यह बात आपको पहले वतला दी गई थी कि
सकडाल के विचारों को परिवर्तन करने के लिये गोशामक
उसके पास गया । उसने सोचा कि सकराल मेरा शिष्य का
लेकिन अन महावीर का हो गया है। पलू शायद मेरे पूर्व मेक

--
(६०)
को देख कर या मेरे से प्रभावित हो अपना मत पलट दे और
मेरे सिद्धान्त को फिर से मानने लग जाय ।
'मित्रों ! गोशालक के इस विचार में बड़ा भारी गभीर
विचार है । यद्यपि आज गोशालक दुनिया के पर्दे पर नहीं है
परन्तु बहुत से धर्मावलम्बी उसी के जैसी मनोवृत्तियों को
लेकर आज धर्म प्रचार कर रहे है । पर याद रखना चाहिये
कि इस प्रकार से धर्म प्रचार करना यह बतलाता है कि उस
धर्म में सत्य की मात्रा बहुत कम है । जहा सत्य नहीं होता
वहीं इस प्रकार की दुर्बलता हुआ करती है । सत्य को मानने
वाला कभी इस मार्ग का अनुमरण नहीं करता कि मैं किसी
को कुछ लालच देकर या किमी को अपनी सूरत से प्रभावित
कर अपने मत का अनुयायी बना लू' । कोई माने या न माने
जिसको उसने सत्य समझ लिया है, निष्काम हो कर उसी का
प्रचार विना किमी लगावट के करता रहता है। जिसकी इच्छा
हो माने न माने पर अपनी तरफ से किमी भी प्रकार के बल
का प्रयोग नहीं करता।
सकडाल, गोशालक को देख कर न तो प्रभावित हुआ
और
न पहले जैसा श्रादर सत्कार किया, केवल मौनावलम्बी बन गया।
गोशालक को वडा अाश्चर्य हुआ। उसकी मुख मुद्रा देख
कर समझ गया कि महावीर के उपदेश का इस पर गहरा असर
पहा है । कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि महावीर हरेक बात इस
ढग से समझाते थे फि कोई दिशा खाली नहीं रहती । पहले
सकडाल मुझे देस कर सड़ा हो जाता और बडी स्वागत करता
पर'पान स्थिर भाव से बैठा है, इम से मालूम होता है कि यह
महावीर के उपदेश से सन्तुष्ट हो गया है ।
.

मित्रों को यहां पर शका हो सकती है कि 'पूर्व गुरु के प्रति सकडाल को ऐसा भविनय का भाव प्रदर्शित न करना चाहिये था, चाहे कुछ भी हो-उसके मिद्धान्त से मत भेद हो गया हा तो भी घर भाये अभ्यागत के नाते में भी उसका कुछ न कुछ भादर सत्कार करना चाहिये था।' इसका समाधान यह है कि गोशालक सकडाल के पास अतिथि या अभ्यागत के रूप में नहीं भाया था । यदि उस रूप में पाता तो सकडाल उसका जरूर सत्कार करता, पर वह इसलिये भाया था कि मैं अपना सिद्धान्त उस से मनवा लूगा ! सकडाल ऐसे अवसर पर उमका आदर करता तो उस अपूर्ण सिद्धान्तबादी का आदर होता जो ससार के अन्दर असत्य का प्रचार करता था । लोग इस आदर को देखकर भ्रम में पड़ जाते भौर यह भी सभा था कि भपने सत्य सिद्धान्त से न्युत हो जाते । गोशाला की आत्मा को जस असत्य सिद्धान्त के प्रति आदर भाव दिखला कर क्लेश में डालना मेरा कर्तव्य नहीं है। इसी बात को ध्यान में रख कर सकराल ने गोशालक का भादर नहीं किया। गोशालक, सकडाल के भार को ताड़ कर विचार करता है कि मैं चला कर इसके पास आया हु । मैं जिस कार्य के लिये माया था वह तो सिद्ध नहीं हुमा, साली लौटना ठीक नहीं, खाली लोटने से मेरे भक्तों का मेरे प्रति कुछ भाष बदल जाना कोई मुश्किल नहीं है इसलिये कुछ न कुछ इससे सन्मान लेकर जाना ठीक है । और तो इसके पास से मैं वपा ले सकता है, हा पीठ (पाट) फलक (बाजोट ) सम्जा (मकान) सथारा ( यास

का निछौना) प्रचूर है, इन लेकर अपनी मुराद पूरी करू । वैसे
तो यह शायद देगा नहीं, महावीर के गुण ग्राम करने से माश्य
देदेगा । महावीर के गुण ग्राम करने चाहिये ।
यहां शका उत्पन्न हो सकती है कि गोशाला लाखों
मनुष्यों का पूज्य था । उसे पीठ, फलक आदि और जगह में भी
प्राप्त हो सकते थे, फिर अपने पति द्वदी महावीर की तारीफ कर
इनके लेने की जिज्ञासा प्रगट की, इसका क्या मतलब
मित्रों ! इसका वास्तविक रहस्य क्या है, यह तो पूर्ण ज्ञानी
ही जान सकते हैं, पर छमस्थ को जो विचार भाये हैं, वे इस
-
१
प्रकार हैं-
(१) गोशालक ने विचार किया होगा कि सकाल एक
रा भादमी है, यदि इस के यहा से अनादर हो गया तो मेरे
दूसरे भक्कों पर भी इसका असर पर बिना न रहेगा। इसके घर में
मेरा भादर होता रहेगा तो लोग समझेंगे कि सकाल मेरा
(गोशालक का ) भी भनुरागी है।
मित्रों ! यह बात समार व्यवहार में भी देखी जाती है कि
जिन दो मनुष्यों में कुछ मनो मालिन्य होन के कारण एक दूसरे के
पर नहीं जा-आ सकते, सहसा किमी कारण से मनो मालिन्य
दूर न होने पर भी घर पर आना-जाना हो जाय तो लोग यही
समझेंगे कि इनमें पूरा सद्भाव नहीं तो आधा जरूर हो गया है ।
यही बात यहा समझनी चाहिये ।
(२) गोशालक ने शायद यह भी सोचा हो कि इम के घर
माना जाना रहने से कभी न कभी शायद विचार परिवर्तन
करा सका

(३) झे, यीद यह पाठ, फलक श्रादि देदेगा और लोग
देखेंगे तो समझेगे कि यह महावीर को और मुझे (गोशालक को)
बराबर मानता है। याने में ह वही महावीर हैं, और महापार है
मही में है।
गोशालक सकडाल से अपनी इच्छा पूर्ति के लिये गुम भाषा
कहता है--
श्रागए णं देवाणुप्पिया । इह महामाहणे ।
देवाणु प्रिय ! सकटाल! यहा महामहाण आये थे?
सकहाल यद्यपि गोशालक को पूज्य दृष्टि से इस समय नहीं
देखना था फिर भी मीठे शन्दों में बोलता है-
केण देवाणुप्पिया ! महामाहणे ?
देखा आपने, कैसे मोठे पचन है ? अहकार का नाम नहीं।
यह जानता था कि मेरा मत भेद इसके सिद्धान्त से है, मैं इसके
सिद्धान्त को मान न द यह मेरा कर्तव्य है पर यह कहा की बात
कि सभ्यता से बात न करू ? मेरा अनुभव है कि बहुव
में माई
जो अपने को नहीं मानते उन्हें जली कटी सुनाते हैं, पर याद
रखिये यह आचरण सभ्यता में नहीं गिना जाता।
बोलना तो यह है--
देवाणुपिय! आप महामहाण किस को कहते हैं ?
गोशालक समझ गया कि यह तो मेरे मुह से साफ तौर
पर कहलाना चाहता है ।
बोला--
समणे भगव महावीरे महापाहणे उत्पन्नशाण दसणधरे जाव
अहिगहए जाब तब कम्मसम्पयासम्पउत्ते
--

(६४)
अर्थात्-मैं श्रमण भगवान् महावीर के लिये कहता है।
श्रमण उमे कहते है जो चचल संसार से अपनी मात्मा
को निकाल कर परमात्मा बनने के लिये परिश्रम करता है।
भगवान् उमे कहते है जो सब प्रकार से ऐश्वर्यवान् हो,
ज्ञान का भंडार हो, श्रात्मा के धन से धनी हो।
महावीर उसे कहते है जिसने कर्म रूपी शत्रुओं का नाश कर
विजय प्राप्त कर ली हो।
जिज्ञासु प्रश्न कर सकता है कि इन तीन विशेषणों के देने
से गोशालक का क्या अभिप्राय था ?
उत्तर यह है कि एक नाम के कई व्यक्ति होते हैं । किस
का नाम लिया गया यह पूरी मालूम नहीं पडती; लेकिन जाति
विशेप, गोत्र विशेप या पदनी विशेष माथ बोलने से उस व्यक्ति
का स्पष्ट बोध हो जाता है, यही बात यहां ममझनी चाहिये ।
इन तीनों विशेषणों के देने से सकडाल समझ गया कि 'महा
महाण' कहन का अभिप्राय मिद्धार्यपुत्र त्रिशलानन्दन से ही है ।
गोशालक, प्रभु महावीर के साथ शिष्य रूपसे ६ वर्ष तक
रहा था । महावीर ही के प्रताप मे गोशालक के प्राण एक बार
वचे गे । महावीर के प्रताप को यह अच्छी तरह जानता या
इसी लिये इम ने इतनी बात जानकार के रूप में कही ।
गोशालक के प्राण किस कारण से जाते थे और महावीर
प्रभु के द्वारा इस क प्राण कैसे वचे इसकी कथा थोड़े में यों है।
वैशम्पायन नाम के एक वाल तपस्सी थे । वे सूर्य की
आतापना लेकर तपस्या करते थे और प्रकृति के बढे दयालु थे ।
एक दिन महावीर प्रभु और गौशालक आगे पीछे कहीं जा रहे
-

थे रास्ते में गोशालक ने इन तपस्त्री को प्रातापना लेते देखा ।
इन के शरीर में जूए पड गई थीं, वे सूर्य की गरमी से नीचे
गिर रही थीं। तपस्वी करुणाय हो कर उन्हें उठा • कर वापस
यथा स्थान रस देते थे । गोशालक का बडी हंसी पाई मौर
उपहास रूप में बोला-इस तपस्या से और तो कुछ भी नहीं
हुश्रा, तेरा शरीर जूओं का घर जरूर बन गया ।
आत्मा का तिरस्कार बुरा होता है, लेकिन वैशम्पायन ने
मूर्ख समझ कर छोड़ दिया। गोशालक ने दुवारा और कहा,
तर भी तपस्नी शात रहे । पर जब तीमरी वार कहा तब तपस्वी
का क्रोध न रुका सिद्धियें तो उनको कई प्राप्त हो चुकी थीं। विचार
किया इम दुष्ट को कुछ चमत्कार दिखाना चाहिये । उन्हों ने
तेजु लेश्या प्रगट की, आखों में से एक तेज अमि की किरण
निकली । गोशालक राख का ढेर बन जाता पर महावीर को
मालूम होते ही उस पर दया लाकर उसे शात कर दी। वैशम्पायन
चकराया मेरी लेश्या किमने रोक दी। इधर उधर दृष्टि फेंकने
से मभु महागीर दिखाई पडे । इन्हें अईत जान कर शर्मिंदा हो गया।
गोशालक के हृदय में विचार आया-मोह, महावीर में इमी
लेश्या का प्रताप है। मै भी इसे प्रगट करू और चमत्कार
दिसलाऊ।
लोग यहा पर कहा करते है कि-महावीर ने गोशालक की
दया कर वहा पाप कमाया। यदि वह मर जाता तो इतना
मिथ्यात्व न फैलने पाता।
मित्रों ! पदि पाप लगने का काम होता तो महापौर चार
ज्ञान के धनी होने के कारण उसे जान कर कभी न करते । पर
३

की नहीं है, यह वीरों की है। जड वादियों को दया का महात्म्य ऐसा नहीं था। जो भाई महावीर के सिर पाप मंढते हैं, उनकी बुद्धि पर दया आती है। वे अभी ज्ञानियों के मर्म को नहीं समझ पाये । चं नहीं जानते कि प्रतिस्पर्धी खडा करने में मना पुरुषों का क्या मतलब होता है । याद रखिये, जब एक शक्ति को दूसरी शक्ति रोकने का प्रयत्न करती है तब उस शारि का पूरा निश्चय हो जाता है । पहलवान यह नहीं चाहता कि मेरे सामने कोई पहलमान न आवे तो मेरा नाम वढेगा । पहित नहीं चाहता कि मै अकेला ही पडित बना रहू । ये लोग यही चाहते हैं कि हमारा प्रतिपक्षी हमारे सामने आवे तो हमें अपना पल दिखाने का मौका मिले । जो कच्चे पहलपान या पंडित होते है, उनकी वात जुदी है। वे यही चाहते हैं कि हमारा प्रति द्वदी कोई सडा न हो तो अच्छा है, नहीं तो हमारी पोल खुल जायगी । महावीर कच्चे सिद्धान्त के प्रचारक नहीं थे। इमी लिये उन्हें इस बात में हर्प था कि प्रति द्वदी खडे हों और मेरे मिद्वान्त की कमोटी दुनिया के सामने रसदे । गोशालक की दया करन में उनका एक यह भी तत्व होगा, ऐमा अनुमान होता है । कई भाई कहा करते है कि जैनियों की दया ने देश का सर्वनाश कर दिया । ' समझ में नहीं आता लोग यह अपवाद जैन धर्म पर कैसे रखते हैं ? किसी सिद्धान्त को बिना समझ उम के अनुयायियों के ऊपर के व्यवहार को देख कर कुछ का कुछ अपवाद कर नैठना गनती है । वे कहते हैं-'जैनियों की दया कायरता मिखलाती है, जैन धर्म कायगें का धर्म है ।' इन भाइयों का समझ लेना चाहिये कि महावीर की दया कायरी , (६७) समझ में नहीं आ सकता। ये व्यर्थ की हिमा करने में ही वल समझते हैं। इसी लिये श्राज समार में चारों तरफ यों की बातें चलती है और हाहाकार मच रहा है । हृदय दि सच्ची दया प्रगट हो जाय तो निर के मताप से ससार हुत जल्दी शाति फैल सकती है। महागीर के दृष्टान्त से तमा जा सकता है कि वे जहा जाने थे, मों कोम की परिधि के न्दर रहने वाले सम पाणी निर बन जाते थे । यह उनकी सच्ची दया का ही प्रताप था । बैठे ठाले कोई भी समझदार पुरुप लडाई करना पसन्द नहीं करता। आप श्रीकृष्ण की तरफ का ही दृष्टान्त लीजिये, वो पाडवों की तरफ से कौरवों के पाम जाकर सिर्फ पाच गार लेकर ही सपि करने को तैयार हो गये थे। ऐमा क्यों किया गया? क्या श्रीकृष्ण कायर ये शाति रसना ही यदि कायरता हो तो श्रीकृष्ण को भी कायर कहना चाहिये । पर नहीं, लोगों को जैन की हिंमा में ही कायरता मालूम पड़ती है यह डे आश्रय की चात है। क्या वेदों में महिंसा नहीं है ? क्या गीता अहिमा का उपदेश नहीं देती ? क्या पुराणों में दया का महात्म्य वर्णन नहीं किया गया ? और तो क्या, लोग कुरान को, खूनी शिक्षा देने बाली पुस्तक समझने है। उसमे लिसा है जिसका सुदा दयालु हो, उसके भक्त को क्या दयालु बनना चाहिये ? जो सय दयाल नहीं पनता उसे क्या हक कि वह दूमरों के पास दया की याचना करें । अद्वेष्टा सर्वभूताना मैत्रः करुण एव च । गोनिरहकारः सम दुःख सुखःक्षमी ।। है गीता के अन्दर-

(६८)
लिखा है।
जव दया कायरता ही सिसलाती है तब यह उपदेश क्यों
दिया गया?
लोक कहते हैं-दूसरे धर्मों में अहिंसा का उपदेश तो है
पर साथ में वीरता के भी बहुत से उदाहरण मिलते हैं।
क्या जैन में नहीं मिलते ? उदई राजा के यहां से चड
प्रद्योतन राजा दामी उड़ा ले गया। जब मालूम पड़ी तो उसे
कहला मेजा कि या तो दासी को ले गये वैसे चुप चाप भेज
दो, नहीं तो लड़ाई ठनेगी।
दूसरा उदाहरण-कोणिक ने हार हाथी ले लिये । चेड़ा
ने कहला भेजा कि जैसे तुम दस भाई हो वैसे ही वहिलकुमार
भी ११ वां भाई है । इसका भी हिस्सा होना चाहिये ।
कोणिक ने न माना । चेडा उसका पक्ष लेकर केवल न्याय
रक्षा की बुद्धि से युद्ध में आ धमका ।
जो भाई जैन की अहिंसा को कायरों की कहते हैं उनको
इन उदाहरणों पर ध्यान दे कर अपना मत सचाई से स्थिर कर
लेना चाहिये।
*
.
मित्रों ! 'आप महामहाण किसे कहते हैं, इस प्रश्न के
उत्तर में गोशालफ ने महावीर का नाम वतला दिया तब भी
सकडाल चुप रहा । गोशालक बडा दक्ष था । दक्ष पुरुष अपने
कार्य की सिद्धी के लिये जब तक सफलता प्राप्त नहीं हो जाती
तव तक चुप हो कर नहीं बैठते । सकडाल को चुप देख कर
गोशालक ने फिर पूछा-

-
'आगए णं देवाणुप्पिया ! इह महागोचे ?
'हे देवाणुप्रिय ! क्या यहा महागोप पधारे थे?'
भाइयों, पाप लोग शायद ' महागोप ' का अर्थ नहीं
समझते होंगे। गोप उसे कहते हैं जो गानों की भले प्रकार
रक्षा करे । उन गोपों में भी जो अग्रेसर-मुखिया, उसे महागोप
कहते हैं।
आज कल 'गोप' जिम -ष्टि से देखा जाता है पहले
ऐसा नहीं था। गोप पूर्व जमाने में ऊची दृष्टि से देसा जाता
था, इसी कारण महा पुरुषों को भी इसकी पदवी दी जाती थी।
महापुरुषों को वही पदवी दी जाती है जो उन गिनी जाती है।
निष्ठ पदवी महापुरुषों को कोई नहीं देता। गोपका काम नीच
गिना जाता तो श्रीकृष्ण महाराज सुशी से इस पदवी को
धारण न करते । श्रीकृष्ण ने इस को धारण कर इसका महात्म्य
दुनिया में और वढा दिया।
गोशालक ने जय 'महागोप पधारे थे' यह प्रश्न किया
बच सकडाल ने पूछा-
केण देगणुपिया ! महागोवे ?'
'देवाणुप्रिय ! आप महागोप किसे कहते हैं ?'
गोशालक-'समणे भगव महावीरे महागोचे ।'
श्रमण भगवान् महावीर को कहता हू ।'
सकडाल-से केण्टेण देवाणुप्पिया ! जान महागोवे ?
सो किस प्रकार
गोशालक-एव खलु देवाणुप्पिया ! समणे भगध महा
Om बहने जीवे तस्माये विणस्स माणे खजमाणे।

(७०) माणे भिजमाणे लुप्पमाणे पिलुप्पमाणे धम्ममरण दण्डेणं मार क्खमागो सगोवेमाणे निधाण महागाह साहित्य सम्पावति । * गोप जंगल में गायों को ले जाता है । उनके ऊपर किरी प्रकार का भय उपस्थित होना जान पड़ता है तो गोप उन्हें बचाने की कोशीश करता है । गौयों के माथ यदि गोप रक्षक न हो तो उनकी रक्षा होनी मुश्किल हो जाती है । गौए जब चलती चलती सतरे के मार्ग की तरफ जाने लगती हैं तो गोप फौरन उनसे ठीक रास्ते पर ले पाता है। गौओं के बचाने के लिये गोर महा संकट का सामना करने से नहीं चूरुता । मौस आ जाय तो प्राणों की भी बाजी लगा देता है। गोपों ने गायों की रहा करने में किन २ आपत्तियों का सामना किया इस इतिहास को जानने के लिये महाभारत, भागवत, पुगण या जैन शास्त्रों में जमा इनका वर्णन चला है, वहा देखना चाहिये । जिस प्रकार मृग ऊपर सिंह हमला करता है, दुष्ट पुरुप उमी प्रकार गौओं के पीछे भी पढते हैं, लेकिन अगर गोप साय होता है तो उन की रक्षा कर लेता है । गौओं को कोई तलनार मे मारता है, का भाले से भेदन करता है, कोई सजा से प्राण हरण करता है इनसे रक्षा करने वाले को गोप कहत है । पर जो इमसे भी ऊन मकार की रक्षा करे उसे कहते है-'महागोप'। मित्रों ! सासारिक महागोप का अर्थ तो आप समझ ग होंगे अब जरा महावीर को महागोप की पदवी किस प्रकार दी ग- यह भी समझ लीजिये । महावीर को जो महागोप की पदवी दं गई है वह इसमे भी ऊची है । गोप सिर्फ गोत्रों की रक्षा करत है । । . परन्तु महावीर 'गो' याने इन्द्रियों के समूह को रखने वाले सब की रक्षा करते है | गोप जगल में घूमती हुई गौ को कुमार्ग में जाने म रोकता है, महावीर चतुर्विध गति रूप जगल में भटकते जीन को अन्याय पथ से बचाते हैं। कोई पूछ सकता है कि यहा गों की उपमा क्यों दी गइ ?' इसका मतलब यह है कि गौ बने बिना अपनी रक्षा नहीं हो सकती। थाप जानत है कि गौ जन गोप का स्वामी पना स्वीकार करती है तब उस की रक्षा का भार गोप अपने ऊपर समझ लेता है। अपन सब गौएँ मन कर महावीर प्रभु क स्वामी पने के नीच नाजायेंग तभी वे हमारी रक्षा कर सकेंगे। सासारिक गोप को गौओं की रक्षा करने से कुछ न कुछ लाभ होता ही है पर महावीर एक ऐसे गोप है जो अपने सार्य के लिये कुछ भी नहीं लेते। हमारी आत्मा ने नाना योनियों के अन्दर घूम कर कई चार जन्म मरण के दुःस उठाये है। किसी ने हमको मारा, किमी ने काटा, किमी ने भेदन किया, किसी ने नाथा, इस प्रकार के कह दुःस इम उठा चुके हैं । अब हमें महावीर को अपना रक्षक बनाना चाहिये । गोप अपने हाथ में डडा, मारने के लिये नहीं पर रक्षा करने के लिये लेता है। उसी प्रकार महावीर ने धर्म रूपी दंड अपने हार में लिया है। गोप अपने रक्षितों को चाह में डालकर हिंसक पशुमो की रक्षा मे निश्चन्त हा जाता है, उसी प्रकार प्रभु हमको निर्वाणम्पी चाहे में डालकर निधन्त हो जाते हैं, जहा किसी प्रकार का दुरा नहीं होता । जन्म मरण के दुःख यहीं छूट जाते हैं। निर्माण माप्त पुरुष को इन कष्टों का सामना नहीं करना पडता ।

(७२)
हे मकाडाल ! इसी लिये महावीर, महागोप है, ऐसा
गोशालक ने कहा।
मित्रों ! आपने उपमा उपनय सुनलिया कुछ चर्चा की बात
भी सुन लीजिये-
एक आदमी कहता है-गौओं की लिय भिद्य आदि मे
बचाने में जम पुण्य है तब साधु क्यों नहीं बचाते ? वे बैठ क्यों
रहते है ? साधु रक्षा नहीं करते इस लिये मानना चाहिये कि रक्षा
करने में पुण्य नही, पाप है।
इसका समाधान शायद आप नहीं कर सकते इस लिये
एक दृष्टान्त समझ लीजिये फिर आपके लिये सहज हो जायगा।
एक आदमी अपने पाम विशेष धन न होने के कारण टके पैसों
का व्यापार करता है दुसरा आदमी रत्नों का। क्या टक्के पैसों
के व्यापार में फायदा नहीं है ?
अब कोई उम जौहरी से कहे कि 'आप टक्के पेसों का
गापार क्यों नहीं करते ?' वह कहता है-'मैं यदि टक्के पैसों
का व्यापार करता हु तो मेरे रत्नों की कीमत मारी जाती है,
इम लिये नहीं करता । जौहरी टक्के पैमों का व्यापार नहीं करता,
क्या इस लिये यह समझना चाहिये कि टके पैसों के व्यापार
फायदा है ही नहीं ?
में
नहीं।
फायदा जरूर है पर जितने समय में वह जौहरी रत्नों से
धन पैदा कर सकता है उतना टक्के पैसों के व्यापार से नहीं कर
सकता, इसलिये वह उसे नहीं करता।

. (७३) यही बात धर्म में भी समझनी चाहिये । जिस मनुष्य ने महावत् पारण किये हैं, उसे आप रत्नों का व्यापारी समाझिये और अन्य धार्मिक काम करने वालों को टक्के पैसों के व्यापारी | जितने समय में अन्य धार्मिक काम करने में मनुष्य पुण्य संचय करता है उस से अधिक वह उन व्रतों के द्वारा करता है। छोटे २ काम करने से महावत धारी के लिये कई विघ्न आ सकते हैं इस लिये उन को नहीं करता । इसका यह मतलब नहीं कि छोटा काम करना ही नहीं चाहिये । याद रखिये छोटे काम किये बिना बडे २ काम अधुरे रह जाते हैं, छोटे कामों के ऊपर ही पडे कामों का आधार है। छठे बारे में श्रावक नहीं रहेंगे इस लिये साधृ भी नहीं रहेंगे, इसका मतलब यही कि छोटे काम करने वाले नहीं तव बडे काम करने वाले कैसे पैदा हो सकते हैं ? गौ की रक्षा करने में पुण्य है और महावत पालने में भी पुण्य है । जो गौ की रक्षा करने में पाप मानता है उसके खुद के ही पाप उदय होगये हैं इस लिये ऐसा कहता है, यो मानना चाहिये। जो भाई यह कहता है कि गौ की रक्षा करेंगे तब वह हरा घास खायगी, पानी पावेगी, सन्तान पैदा करेगी, फिर उनकी भी रक्षा करनी होगी ता कितना पाप बढ़ जायगा ? जो भाई ऐमा कहते हैं, उन्हें पूछना चाहिये-तब तो महावीर को भी पाप का भागी होना पडता होगा क्योंकि वे उपदेश देते । सब प्राणी एक साथ तो मोक् में जाते ही नहीं, कोई सर्ग में भी जाता होगा, वहा उसे विलास की सामग्री भी मिलती होगी, बहा से चव कर यह यस्तुओं की जोगवाई में भी जन्म हैं

.
(७४)
लेता होगा, उसे धन मिलता है, पेत मिलता है, दास दासी
मिलते हैं, ऊच कुल में भी जन्म लेता है, उनको वह भोगता भी
है, वतलाइये ये पाप किस लगते होंगे ? क्या महावीर को ?
कदापि नहीं।
सकडाल महागोप की व्याख्या सुन कर भी चुप रहा तर
गोशालक फिर बोला-
‘ागरण देवाणुप्पिया ! इई महा सत्यवाहे ?'
देवताओं के प्रिय ! क्या यहां महा सार्थवाही आये थे!
'के णं देवाणुपिया । महासत्य बाई ?
श्राप महासार्थवाही किसे कहते हैं ?
प्रश्न किया।
सहालपुत्ता ! सपणे भगव महावीरे महासत्थ वाहे ।'
श्रमण भगवान महावीर को।' गोशालक ने उत्तर दिया।
'से केणटेण महासत्यवाहे ?"
कैसे ?' सकडाल
गोशालक--' एव खलु देगणुप्पिया! समणे भगव महावीरे
समाराडवीए वहवे जीवे नस्समाणे विणस्समाणे जाव विलुप्प
माणे धम्ममएण पन्धेणं सारक्खमाणे निवाण महापट्टणाभिमुई
साहत्यि सम्पाइ। से तेणठेण सदालपुत्ता एव वुचइ समणे भगव
महावीरे पहासत्यवाहे।
सकडालन
.
.
ने
पूछा।
मित्रों ! भाप जानते हैं कि आज पाश्चात्य लोग धन कमाने
के लिये कितने कटिबद्ध है। एक अग्रेन कवि ने तो यहा तक कहा
है कि यदि हम को यह मालूम पड जाय कि सूर्य और चन्द्रमा के

पास से कुछ भी न लेते थे । वे साफ कह देते थे कि तुम्हार माग का सर्च मेरे ऊपर है । विदश में तुम लोग जो कुछ धन कमाओगे उसमें मेरा कुछ भी हिस्सा नहीं है। वह सब तुम्हारा होगा। जो सेठ इस प्रकार लोगों की सहायता किया करता था यह सार्थवाही इसी जन्म का सार्थवाही होता था और वह (७५) पाम सुवर्ण है, तो हम उनमे भी लड़ाई करने से न चूकें और सुवर्ण इग्ण करलें।' इन लोगों की लालसा कितनी बढी हुई है। भारतीय लोगों की तो इतनी भयकर लालसा कभी नहीं हुई । यद्यपि भारतीय धन कमाना जीवन यापन का मुख्य साधन मानते थे पर उस के पीछे न पढते थे । वे धर्म अर्थ काम और मोन के साथ अर्थ को मिलाते थे । अन्याय से अपनी ही जे मरते रहे इस इच्छा से कमी धन न कमाते थे । जब कोई वडा आदमी धन कमाने विदेश जाता था तर गाव में ढिंढोरा पिटा दिया जाता था कि-'मैं विदेश जाता हू, जिन्हें धन कमाने की इच्छा हो वे मेरे साथ चलने को तैयार हो जाय । मैं उनके खाने पीने पहनने श्रोदने प्रादि तमाम गातों का प्रबन्ध करूगा, जो खर्च करने में असमर्थ होंगे उन की अपने धन से महायता करूगा। मित्रों ! यह बात मैं अपने मुह की नहीं कहता । शास्त्र में इसका उल्लेख मिलता है । सूत्र में तो यहा तक लिखा गया है कि जिसके जूता न होता था उसका भवन्ध भी वही सेठ कर देता था । ये सहायक सेठ उनके वह सार्यवाही कहा जाता था। . भी किसी एक नगर तक पहुचाने वाला । पर महावीर प्रस अनक जन्मों का सार्थवाही है और आखिर मोत नगर तक अपने हाथ से पहुंचानेवाला बनता है इसीलिये इन्हें महासार्थ- चाही की पदवी दी गई है। गोशालक ने यही बात सफडाल से कही। सार्थवाही शन्द का अर्थ साथ ले चलने वाला होता है। जो अपने साथियों को साथ ले चले, मार्ग में किसी प्रकार की वाधा उन्हें न आने दे, उसे सार्थवाही कहते है । सार्यवाही अपने साथियों के साथ अटवी में प्रवेश करता है। अटवी महा भयकर सिंह व्याघ्र यादि हिंसक पशुओं से परिव्याप्त, गहन झाड़ियों से पूर्ण, जिसके अन्दर बडे २ उन्नत मस्तक पर्वत, टेटे मीधे अनेक प्रकार के मार्ग होते हैं, ऐसे कठिन पथ से सार्थवाही अपने साथियों को निर्विघ्नता पूर्वक निकाल देता है । सार्थवाही के बिना वह पथिक इस दुर्धान्त पथवाली अटवी को देखकर थर्रा उठता है, एक कदम आगे रखने का भी साहस नहीं कर सकता। मित्रों ! यह उस अटवी का थोडासा परिचय दिया गया है जिसे हम आखों से देख सकते हैं। अब जरा आध्यात्मिक चिपय की ओर दृष्टि डालिये। विचार कीजिये-सार्थवाही शब्द से निस मनुष्य का बोष होता है उसमें और उसके साथ रहने पाले पथिक में बाहिरी दृष्टि से कोई भेद नहीं दिखाई देता । वह भी मनुष्य है और यह भी । इसके दो आँसें हैं और उसके भी। इसके दो कान है और उस के भी । हाथ पैर इसके है और उसके भी । हाथ से यह भी साता है यह भी । कहने का तात्पर्य यह है कि । (७७) के हैं और जिन २ अगों से जो २ काम यह लेता है वे सर भग उसके भी है और उन्हीं अगों से वह भी इसी के जैसे काम ले सकता है । इमी पाहिरी दृष्टि को सामने रख कर नास्तिक कहा करते हैं कि सब मनुष्य बराबर हैं, भेद कुछ भी नहीं। पर आस्तिक इस रातको स्वीकार नहीं करता। वह कहता है कि बाहरी अगों की समानता होने पर भी इनमें पड़ी भारी असामान्यता रहती है। भाप इतिहास के पन्ने उलटिये आपको पता लग जायगा कि जो जो महापुरुष नेता, प्रमुख श्रादि हुए हैं उनमें आत्मिक विकाश कितना जबरदस्त था । लाखों मनुष्यों की बालबुदि एक तरफ और उनकी एक तरफ । इसे ही कहते हैं सार्थवाही । सार्थवाही के प्रताप से उस पथिक को वह भयंकर अखी भी नन्दन वन जैसी सम्पन्न मालूम देती है । जो सार्थवाही होना चाहता है उसमें पहले श्राम विकाश होना बहुत जरूरी है । श्रात्म विकाश विना कोई सार्थवाही नहीं बन सकता । जिस पथिक के साथ सार्थ- चाही नहीं होता वह उस अटवी में कदाचित् प्रवेश करे तो भी भटक जाता है, उसे कहीं रास्ता हाथ नहीं लगता कई रास्ते देख कर वह चकरमें पड़ जाता है । हिंसक पशुओं को देख कर वह भयाक्रान्त हो जाता है और चौरादि को देस कर विवल हो उठता है । परन्तु जिनके साथ सार्थ- चाही होता है उनको इन कठिनाइयों का तनिक भी अनुभव नहीं होने पाता | एक बच्चाभी सुगमता के साथ उम अटवी को पार कर सकता है। सार्थवाही और साधारण मनुष्य में, सूर्य भौर दीपफ जितना अन्तर होता है। सूर्य अपने प्रकाश से सारे लोक को " -

मानता है। पर यह रक्षा केगल एक समयकी हुई। हम ससार रूपी म
भयकर अटवी में भ्रमण कर रहे है, इसमें इस से भी भयंकर पा
हमारे ऊपर आते रहते हैं, हम किसे सार्थवाही बना ।।
भटवी में साधारण सार्थवाही काम नहीं दे सकता, इसमें
महा सार्थवाही की जरूरत होती है। वह महा सार्थवादी कौन
श्री महावीर प्रम को यदि हम अपना सार्थवाही बनाने
'श्री महावीर प्रभु ।'
(७८)
भालोकित कर देता है, दीपक हजारों होने पर भी प्रकार का
सम्पूर्ण नाश नहीं कर सकते।
मित्रों ! सोचिये संसार भटवी कितनी भयकर
है । जन्म मरण से यह अटवी भरी पड़ी है । राग
शोक सन्ताप आदि हिंसक पशुओं की इस में बाहुल्यता
है । इस में विचरने वाले पथिकों ( मनुष्यों ) को अनेक
प्रकार के दुःख उठाने पड़ते हैं। अपन भी इन्हीं पथिकों में
से हैं । क्या अपने को इन दुःखों से मुक्त होना है ? यदि होना
है तो किस प्रकार, इसका विचार करना बहुत जरूरी है।
मित्रों ! निचार बड़ा गभीर है। जब कोई तलवार से मारता
है तो मनुष्य समझता है कि तलवार मुझे मार रही है । पर
यह विचार गलत है। तलवार मारने में किसी हद तक सहायक
जरूर है पर दूसरी शक्ति की सहायता के बिना यह किसी को
नहीं मार सकती । जब कोई किसी को तलवार से मारन +
लिये उद्यत होता है, उसका सार्थवाही, उस दुष्ट मनुष्य
से तलवार छीन लेता है और अपने साथी की रक्षा करता है। ना
मनुष्य अपने सार्थवाही के गुणगान करने लगता है और भाभा
के

आप यह हमारे ऊपर घात करने वाले के हाथ से तलवार ही नहीं चीन लेगा पर तलवार उठाने के कारण को ही नष्ट कर देगा । हमारे अन्दर जब कोई घातक प्रकृति काम करती है तभी हमारे ऊपर कोई घात कर सकता है। जब हमारे अन्दर इस मकति का नाम ही नहीं तव किमी की ताकत नहीं कि हम पर कोई पात कर सके । आप बिजली के पावर से परिचित है, जानते हैं जर मनुष्य लकडी पर खड़ा होता है तप पिजली उसका कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकती पर पृथ्वी पर रहने से कर सकती है, यह क्यों ? इसलिये कि लकड़ी में बिजली का पावर नहीं होता और पृथ्वी में होता है । यह जड़ ज्ञान हुआ । चेतन ज्ञान करना जरूरी । मब जानते है कि तलवार काट सकती है, अमि जला सकती है, विष मार सकता है, फिर बतलाइये सीता को अग्नि ने क्यों नहीं मलाया और मीरा बाई के ऊपर विप ने अमर क्यों नहीं किया ? इस का मतलब यह था कि उनकी श्रात्माओं में दुष्परिणाम नहीं था । जिसकी आत्मा में दुष्परिणाम नहीं होता उसका को छ नहीं कर सकता । मित्रों ! यदि आप अपने में ऐसी शक्ति प्रगट करना चाहते है तो महावीर को अपना सार्थवाही बनाइये। उनको सार्थनाही वनाने मे अनेक जन्म के चक्कर काटना मिट है जायगा। श्राप में से कोई प्रश्न करे कि-निस की आत्मा में दुष्परि- णाम नहीं होते उसके ऊपर अग्नि विष आदि अमर नहीं कर सकते, तब गजमुकुपालनी क्यों जले १ खदक मुनि की खाल कम उतारी गई १५०० पनि पानी में कैसे पिले गये ? क्या इन में धर्म तत्व नहीं था ? क्या इन्हों ने दुष्परिणामों का नाश नहीं

(८०)
किया था, फिर ये क्यों जले, क्यों खाल उतरी और घासी में
पीले गये।
इसका आप लोग क्या उत्तर देते हैं ?
(श्रापकगण--'खमा !')
खमा क्या? मै आपसे इसका उत्तर मांगता हूं और आप
लोग 'खमा' कर देते है।
खैर, आप उत्तर नहीं दे सके, मैं बतलाता हू उसे याद
रखिये । गजसुकुमालजी इस लिये जले कि उनकी न जलने की
भावना ही नहीं थी। वे तो शीघ्र मोक्ष में जाने की भावना रखते
थे । यदि ये न जलने की किंचित मात्र भी भावना मन में लाते तो
अग्नि की ताकत नहीं थी कि उनको जला सकती। उन के मन
में तो उस समय यही भावना काम कर रही थी कि ससुरजी ने
मेरा काम बना दिया। जिस समय सीताजी ने अग्नि में प्रवेश
किया उस समय उनकी आत्मा इस से उलटा काम कर रही
थी। वे चाहती थी कि मुझे अग्नि न जलावे इस से अग्नि
शीतल जल के समान हो गई और इनका एक रू भी न जला।
मित्रों ! क्या आप ऐसी शक्ति प्राप्त करना चाहते हैं ? यदि
चाहते हैं तो तैयार हो जाइये।
फारसी में एक कहावत है जिसका साराश यह है.
'मर्दानगी और नामर्दी में मिर्फ एक कदम का फर्क है ।'
मित्रों ! यही बात आप मोक्ष के लिये भी समझिये । आप
अपना इधर का मुइ उधर फेर दीजिये अर्थात् आप अपना मुंह
दुनिया की तरफ से मोड़ कर मोक्ष की तरफ कर दीजिये, मोच
आपके नजदीक हो जायगा। जब तक आपका मुह इधर है तभी

(८१)
तक मोक्ष प्रापसे दर है। दृष्टान्त लीजिये-पाई का ममाफिर
रीकानेर पाने के लिये और बीकानर का मुसाफिर वाई जाने के
लिये रेल में सवार हुआ । यद्यपि ये अपने अपने स्थान के पास
है तो भी रेल चली तभी से वाई चाले के लिये बीकानेर और
बीकानर वाले के लिये यई नजदीक होगया। इसका कारण क्या।
यही कि इनकी क्रियाओं में फेर हो गया।
मनुष्य गृहस्थाश्रम में दीर्घकाल नक रहे पर जिमने मोक्ष की
वरफ मुह कर लिया है उसक लिये मोक्ष नजदीक है। जो दिसनमें
मोक्ष का पथिक मालूम पडता हो और कठिन किया उसके लिये
करता हो पर मन उस तरफन लगा हुआ हा तो समझना चाहिये
कि वह मोक्ष से उलटा बह रहा है ।
गोशालक ने सफडाल के पूछने पर 'महामहाण' 'महागोप'
'महामार्थवाही की व्याख्याकी, और ये सब गुण महावीर में
पतलाये फिर भी अपनी इच्छा सफल होते न देख, बोला-
श्रागागण देवाणुप्पिया! इह महायम्मकही १ दवताओं के प्रिय !
या यहा महाधम्मकी आये थे?
धर्म के उपदेश देने वाले को 'धर्म की' कहते हैं। उन
उपदेशकों में मर से बडा धर्मोपदेशक उसे ' महाधम्म कथी'
सकडाल केगा देवाणुप्पिया ! महा रम्म कही ? श्राप महा-
उम्मकथी कि कहते हैं?
गोशालक-समये भगा मडावीरे महायम्मकड़ी में श्रमण
गवान महावीर को कहता है ?

(२) सम्हाल-से केण ठेणं समणे भगर महागीरे महाधम्म कही किस प्रकार गोशालक-एव खलु देवाणप्पिया ! समणे भगव महावीरे महइ महालयसि संसारसि चहरे जीवे नस्समाणे विनस्स माणे ख० छि० मि० लु०वि० उम्मग्गपडिबन्ने सप्पहचिप्पणद्वे मिच्छत्त चलाभि भूए अट्टविह कम्म तम पडल पहोच्छन्ने बहुहिं अटेहि य जाव वागरणेहि य चाउरन्तायो संसारन्तारानो साहस्थि नित्था- रेड, से तेणटेण देवाणुप्पिया! एव वुच्चइ-समणे भगव महावीरे महाधम्म कही। संसार रूपी महा समुद्र में जो जीव नष्ट हो रहे हों याने उलटे पथ पर चलते हों या नाना प्रकार के जीवों से दुखी हो रहे हों, उनसे रक्षा करने वाले मत्पय पर लगाने वाले वे प्रभु महावीर हैं और वेही 'महाधम्मकही है।' मित्रों पृथ्वी मार्ग जलमार्ग से सहजहै । पृथ्वी पर किसी प्रकार भूलता भटकना भी मनुष्य अपने स्थान पर जा पहुचता है पर जल मार्ग को तै करना बडा कठिन है। इसका अनुमान उमी को हो सकता है जिस को जल मार्ग से यात्रा करने का कभी अवसर प्राप्त हुआ हो । पृथ्वी के प्राणी को जल का डर बहुत लगता है। कोई कदे कि हम तुम्हें सब प्रकार की रिद्धियें देंगे, बाद में डुबा देंगे, क्या इसे कोई मजूर करेगा? 'नहीं'। पर हचते हुए को यह कहा जाय कि इम तुम्हें निकालते हैं, तुम्हारा मर्चस्व हमें देना होगा, तो? मजूर कर लंगा' (८३) क्यों ? इस लिये कि मनुष्य को अपने प्राण बहुत प्यारे हैं। बचपन में मुझे अनुभव हुआ था कि एकबार हमारे मात्र से ४कोस की दूरी पर भोजन था। बहुत से स्त्री पुरुषों को वहा का निमत्रण या। मेरे ससारिक मामाजी भी सामिल थे। रास्ते में नदी भरपूर आई हुई थी। स्त्री पुरुषों की हिम्मत नहीं थी कि उसे पार कर लें। इस लिये कुछ मनुष्य इनकी सहायता के लिये तैनात किये गये। बच एक भारपी मुझे अपने कंधे पर बैठा कर पार ले जाने लगा तष थोड़ी दूर तो कुछ नहीं, बीच माने पर बड़ा दर लगने लगा। उस समय यह मनुष्य मुझे इतना प्यारा लगा कि माता पिता आदि भी याद न आये । उस आदमी ने पहले कुछ पैसे तो ठहरा ही लिये ये इस पर भी मैं कहता- मैं तुझे इस से ज्यादा दगा, देखना गिराना मत ' मेरे गिरने का मौका आया ही नहीं था फिर भी यह मुझे प्यारा लगता था, जब मनुष्य के हरने का वक्त पाता होगा तब उमे कैमा लगता होगा, इसका अनुमान आप लोग कर सकते हैं। मित्रों ! जल में डूबने का हमें इतना भय रहता है पर हम न चैतेंगे तो हमारे अनन्त भव डूब जायेंगे क्या हमें इसकी चिंता न करनी चाहिये ? दुमरी बातों में रस पैदा हो और जन्म मरण कटने की धर्म कथा सुनते समय निद्रा माती हो-आलस्य याता हो तो अपना कम नमीय समझना चाहिये । धर्म कथा ऐसी वी बात नहीं है । यह समार सागर से तिरानेवाली नौशाह । धर्मकथा सुनने के लिये बैठकर बातें करना, इधर उधर की हाकना, नौका को टल्ला देना जैसा है । यहनों को यह बात विशेष ध्यान में रखनी चाहिये । जिस समय धर्म कया

.
जहाज टकराता नहीं सीघा स्थान पर पहुंच जाता है लोग उस
विशप धन्यवाद का पात्र यही है । क्योंकि इसने अपनी बुद्धि से
(२४)
चलनी हो उस समय ' हा-ह' मचाकर, न स्वयं सुनना और
न दूसरों को सुनने देना यह महा पाप है ।
'महाधम्मकही' की व्याख्या सुनकर भी सकडाल कुछ
न बोला तब गोशालक फिर पुछना है-
आगए ण देवाणुप्पिया ! इई महा निजामए ?
यहा महा निर्यामिक आये थे ?'
सकडाल--'केण देवाणुप्पिया! महानिजामए?'
'आप महा निर्यामिक किसे कहते हैं?"
गोशालक-समणे भगव महावीरे महानिआमए ।'
'भगवान् महावीर प्रभुको ।'
सकडाल-से केणटेण।"
किस प्रकार?
गोशालक-' एव खलु देवाणुप्पिया ! समणे भगव
महावीरे ससार महासमुद्दे बहरे जीव नस्ममाये विणस्ममाणे
जाब विलु० वुड्डमाणे नियुड्डमाणे उप्पियमाणे धम्ममईए नागाए
निधाणतीराभिमुहे माहत्यि सम्पावेइ, से तेणटेण देवाणुप्पिया !
एवं चुच्चइ-समणे भगव महावीरे महानिजामए ।'
ससार समुद्र में बहुत से जीव है उन्हें पार लगाना एक
चतुर कप्तान का काम है । समुद्र के अन्दर पहाड़ की टकर
खाने से जहान खतरे में आनाता है । चतुर कप्तान उसको बचा
लेता है तो लोग उसकी बहुत तारीफ करते है पर जिसका
कप्तान की तारीफ नहीं करते । पर वास्तव में सोचा जाय तो
.

उसे टकराने नहीं दिया। ससारिक समुद्र से पार उतरना कोई मुश्किल नहीं, मुश्किल तो समार समुद्र को पार करने में है । इस समुद्र से पार उतारने वाला महानगर प्रभु है इसीलिये इन्हें महानाविक की उपाधि दी गई है। सफडाल ने महामहाण, महागोप, महासार्थवाही, महा धम्मकही, महा निर्यामिक की व्याख्या गोशालक के मुह से सुनी और यह निश्चय करलिया कि ये उपापिये महावीर प्रभु के लिये ही कही हैं तब गोशालक से बोला- आप बडे विचक्षण हैं, बुद्धिमान हैं, पडितों में भी पडित गिने जाते है, कुशल हैं, जिस बात का भाप अच्छी मानते है उसे सिद्ध करने में कभी देरी नहीं लगाते, अपूर्ण वात के तत्व को भी थाप तत्काल ग्रहण कर लेते है, महावीर प्रभु के गुणों से श्राप मब प्रकार अभिज्ञ हैं फिरभी आपके और उनके बीच भेद क्यों हैं? यदि आपको कोई बात ठीक न जचती हा तो आप मेरे धर्म गुरु ( महावीर ) से वाद विवाह कर सत्य का निर्णय क्यों नहीं कर लेते ? गोशालक- मैं भगवान् स वाद विवाद नहीं कर सकता। मित्रों ! गोशालक ऊपर मे प्रभुके गुणगान करता था पर हृदय से नहीं । यदि हम भी ऊपर से स्तुति आदि करें और हृदय में प्रेम जागृत न करें तो हम भी गोशालक के वरावर ही होंगे। समहाल-( गोशालकमे ) भाप श्रमण भगवान महावीरनी से वाद विवाद क्यों नहीं करते हैं गोशालक-मैं समर्थ नहीं है। सकडाल-क्यों, क्या कारण ! गोशालक- (८६. सद्दालपुत्ता ! से जहानामए केइ पुरिस तरुणे जुगवं जार निउणसिप्पोवगए एग महं अयं वा एलय वा सूयर था, कुछ वा तित्तिर वा पट्टय चा लाग्यं वा कोयं वा कविजयं वा वागम घा सेयण वा हत्थसि वा पायंसि वा सुरसि वा पुच्छसि वा पिच्छसि वा सिङ्गसि वा विमाणंमि वा रोमसि वा जहिं जाई गिएहइ तहिं तहिं निश्चल निष्फद धरेइ, एनामेव समण भगवं महावीरे मम बहूहि अडेहि य हेऊहि य जाव वागरणेहि य आदि नहि गिएइ तहिं तहिं निप्पट्टपसिणवागरणं करेइ, से तेण्डेण सद्दालपुत्ता । एव दुबइ-नो खलु पभू अह तव धम्मा यरिएण जान महावीरेण सद्धिं विवाद करेत्तए । प्रिय सकडाल ! एक ऐसा पुरुष जिसकी जवानी उमड़ रही हो, काल ने जिमके ऊपर दुष्ट इलमा न किया हो, जो बलशाली हो, सामथ्र्यवान् हो, जिसके हाथ पैर दृह, हड्डिये मजबूत, दोनों पार्श्वभाग में पीठ सुदृढ, जिसकी दोनों भुजाए बलशाली, कधे मासल, इमके सिवाय जिसने नाना प्रकार के व्यायामों से शरीर को परिपुष्ट कर दिया हो, जो लाँघने में, कूदने में, फुदकने में, दौडने में तेज हो, चनल हो, जो निश्चित कार्य को शीघ्रता से कर डालता हो, जो बुद्विमान और मेधावी हो, ऐमे पुरुष के हाथ से बकरी, भेड, मुर्गा, सूअर तीतर, चत्तक, लापा, कबूतर, बंदर, कौआ, वाज, आदि छूट कर नहीं जीत सकते उसी प्रकार महावीर प्रभु मे मै वाद विवाद में जीत नहीं सकता। मित्रों ! शरीर की दो स्थिति होती है। एक तो जन्म ही मजबूत हो और दूसरा व्यायामादि से किया हुआ हो । , , , से १७) मनुष्य अपन को बलवान व निर्गल दोनों बना सकता है फर्ड मनुष्य तो ऐसे होते है जो जन्म से बिलकुल निर्बल हाते हैं पर व्यायाम श्रादि से अपना शरीर मजबूत कर लते है । कई ऐसे होते हैं जो अपने माता पिता के ब्रह्मचर्य के प्रताप से शरीर अच्छा प्राप्त करने है पर पीछे से अपना शरीर बिगाड़ देते है । शरीर अच्छा मिलने मे ही कुछ नहीं होता, पीछे उस का स- स्कार होता रह तो तेजी पनी रहती है। श्राप देखते हैं, मई कई प्रकार की होती है, अच्छी रुई का अच्छा कपडा बनता है । यदि कोई अच्छी रुई को ठीक दग से न पीने मौर महीन सूत निकाले यह उस टू का दोष नहीं है, यह तो उस मनुष्य का दोप है । जन्म जात शरीर मजबूत होना यह अच्छी रु. के समान है, बाद में किसी अच्छे कलाचार्य के पास जाकर व्यायाम की शिक्षा रुई को सस्कारित करने के समान है। आमाल आप लोगों का ध्यान पुरुषार्थ की तरफ नहीं- सा मालूम पडता है। श्राप लोग थान हरेक बात में 'राम करे सा सही' या 'होणो सो होला' कहा करते हैं, यह बडे याचर्य की बात हैं। जिस बच्चे को ८ वर्ष को ऊपर में व्याया मादि की शिक्षा देकर उसका शरीर मजात बनाना चाहिये या समी ऊमर में पाप लोग उसके विवाह आदि की चर्चा कर उसके दिमाग में जहर भर देते हैं । आप लोग यही समझते हैं कि बच्चे का व्याद किया और हमारा कर्तव्य पूरा हुा ।' माइयों । माता पिता कहाने वालों का सिर्फ इतना ही कर्तव्य नहीं है । यह कर्तव्य तो तन करना होता है जब पालक सुशि- n जरूरी हैं। वे कहते थे~अभ्यास से मनुष्य लशाली हो सकता (८) क्षित और वलनान बन जाय । आज कल की शिक्षा को हम सुशिक्षा नहीं कह सकते । यह शिक्षा स्वावलम्बिनी नहीं है, पर मुखापेक्षी है । स्कूलों कॉलेजों की पढ़ाई कर फिर नौकरी के लिये इधर उधर चक्कर काटना इसे कौन चुद्धिमान् स्वावलम्बिनी शिक्षा कहेगा ? जिम शिक्षित कहलाने वाले को १०-५ मनुष्यों का पालन करना चाहिये था वह स्वयं १० मनुष्यों से पालित होता है। उसके लिये कपड़ा पहनाने वाला, यूट कमने वाला, स्नान कराने वाला, टट्टी जाते समय लोठा लेजाने वाला आदि कई मनुष्य हो तब उसका एक दिन कटे । भला, यह भी काई शिक्षा हुई ? इसे शिक्षा नहीं कह सकते । यह तो अमीरी सिस लानी हुई । पहले के मनुष्यों को ऐमी शिक्षा दी जाती थी कि वे किसी काम के लिये दमरे के मुह की तरफ नहीं देखते थे । व अपना ही साना अपना ही पहनना आदि में सुचतुर थे । अन्न पैदा करना, पीमना रमोई बनाना जैमी कलाओं से भी वे अनभिज्ञ नहीं थे। आज आप सा जानते हैं पर एक दिन रसा इया न आए तो मुंह पर हवाइयों उडने लगे या किसी इलपाई की दुकान टटोलनी पडे। राममूर्ति मेरसे अहमद नगर में मिले थे। मैंने उनसे कहा कि अापने वल तो प्राप्त किया पर धर्म आगवन भी कुछ करना चाहिये । उन्होंने कहा- बहुत अन्या। फिर वाले-मनुष्य को पहले बल की जरूरत है, बाद में धर्म की । क्योंकि बलहीन धर्म पालन नहीं कर सकता ! वल के लिये ब्रह्मचर्य पालन करना - है । यदि किसी को इममें सन्देह हो तो वे मुझे ५ वर्ष का निर्बल बचा दे, २० वर्ष की आयुतक अपने पास रसकर यदि दुसरा राममूर्ति न बना द् तो वान क्या ? राममूर्ति कहते थे कि मैं पहले बहुत दुर्बल और रोगी था लेकिन अभ्याम से मैं इस स्थिति को पहुंचा है। मेरी खुगक निरापिप है । मैं किसी व्यमन का सेवन नहीं करता। पित्रों। क्या आप भी अपने बच्चों को बलवान बनाने का प्रयत्न करते हैं १ दिखाई तो नहीं पड़ता। आप उन कोमल बच्चों के ऊपर लग्न सस्कार अमा भारी जोसम का काम डालकर सचमुच महा अन्याय करते हैं। जो समाज पुनर्लग्न को नहीं चाहता उसे इस तरफ विशेष ध्यान देना चाहिये। अणुयोग द्वार में पाठ आया है उसमें कहा गया है कि दुपद चौगट भार अपद सस्कार करने में सुधरते है योर ला परवाही करने से बिगड़ जाते है । मनुष्यों की गिनती दुपदों में हे य किस प्रकार सुधरते हैं इसका उदाहरण राममूर्ति है । भारत की गौओं का अमेरिकन लोग सस्कार करते हैं इससे वे यहा मे बहुत ज्यादा दूध देने लग जाती है, यह चौपदों का उदाहरण है। इसी प्रकार चैज्ञानीक ने कई पेड़ों के सरकार कर माटों वालों को गिना काटे वाले और छोटे फल वालों को बड़े फल साल बनाय इमसे अपदों का उदाहरण समझ लीजिये । क्या उन उदाहरणों को देस कर भी पाप कर्मों की गति ' पर ही विश्वास सो ? पाप गोशालक को बुरा मानते हैं पर उसके सिद्धान्त को मानते है क्या यह वास्तव में गोशालक को मानना न हुआ ? मित्रों ! आप महाशर के शिष्य कहलाते हैं पर काम करते गोगालक के, तलाइये फिर आप महावीर के शिष्य किस प्रकार .

हुए १ महावीर के सच्चे शिष्य आप तभी कहलायेंगे जब श्राप उनके सिद्धान्त के अनुसार काम करने लग जायेंगे। सफडाल महावीर का सच्चा शिष्य था इमीलिये आज गोशालक से कहता है कि आप मेरे गुरु से शास्त्रार्थ कर लीजिये। शास्त्रार्थ करने पर सत्य सिद्धान्त का निश्चय हो जायगा। गोशालक कहता है कि मै महावीर प्रभु मे शास्त्रार्थ करने में असमर्थ हू उनसे शास्त्रार्थ करने के लिये साहस करना बकरी का सिंह से सामना करना है। मित्रों । आप लोग कहेंगे--' आज गोशालक के शिष्य मोजूद नहीं और महावीर के शिष्य मौजूद है इसलिये आप उसे बकरी बना रहे है।' नहीं मित्रों ! वात ऐसी नहीं है। महावीर का सिद्धान्त ' स्याद्वाद' है। यह ऐमा सिद्धान्त है कि इमकी भित्ति तोडना अ-सभन है । जहा लोगों ने किमी वस्तु को एकान्न कहा, वहा महावीर ने अनेकान्त कहा ! एकान्त से वस्तु स्थिति ठीक नहीं रहती, अनेकान्त से वह पूर्ण होती है। आप किमी मनुष्य से पूछे कि-तुम पिता हो या पुन ? यदि वह कहे कि 'पिता वो उसका यह कहना एकान्त रूप से झूठ हैं । कारण, अपन पिता की अपेक्षा वह पुत्र भी तो है । कहने का मतलब यह है कि एक वस्तु में एक ही बात एकान्त स्वीकार करना यह गलत है। हुए भाइयों में बहुत मे डम मिद्धान्त के अनुयायी हैं पर बहुतों को शायद ही मालूम होगा कि ' कहत है । खैर, इस पर फिर कभी विस्तृत विचार, किया + , . अनेकान्त' किम जायगा।

- (६१) गोशालक ने पहावीर प्रभु से शास्त्रार्थ करना अ-सीकार कर लिया तर सकडाल कहता है--- जम्हाण देवाणुप्पिया ! तुम मम धम्मायरियस्त जाव महावीरस्स सतेहिं तच्चेहि तहिएहि सम्भूएहिं भावेहिं गुणकित्तण करेह तम्हा णं अह तुम्भं पाहिहारिएण पीढ जाव सथारएण उचनिमन्तमि, नो चरण धम्मोति वा तपोत्ति वा, त गच्छह ण तुम्भ मम कुम्भारावणेसु पाहिहारिय पीढफलग जाव ओगिएिह- ताणं विरहह। हे देवाणुप्रिय ! तुमने मेरे धर्माचार्य श्रीमहावीर भगवान प्रभु का गुणानुवाद उचित ही किया है । वे ऐसे ही हैं। तुम्हारी उम स्तुति से प्रसन्न होकर मै तुमको आमंत्रण करता है कि तुम मेरी कुम्भकार शाला में जाकर सुख से निवास करो और वहा के पीठ फलक पाट पाटला आदि को काम में लायो । गोशालक की कामना सिद्ध हुई । वह सफडाल की कुम्भकार शाला में विचरने लगा | अब उसे यह प्राशा व गई होगी कि सकडाल की कुम्भकार शाला में मैं रहता है, वह कभी कभी मेरे पास भाता जाता रहेगा, मैं उस पर फिर से अपना प्रभाव जमा दूगा, लोग मेरे यहा ठहरने से समझ जायेंगे कि सकडाल गोशालक का ही शिष्य है। तए ण से गोसाले मखलिघुचे सद्दालपुच समणांवासर्य जाहे नो सचाएइ बहिं आघवणाहि य पएणवणादि य सएणव- खादि य विएणवाहि य निग्गन्यानो पावपणामो चालितए वा सौमित्तए वा पिपरिणामिचए वा सन्ते तन्ते परितन्ते पोजसपुरानो नगराओ पढिणिक्खमह २ चा पहिया जणवय विहार निदरह ।

(६२) , J के अरणोचय विमाण में उत्पन्न हुवे वहा से चर्व कर महाविदेह क्षेत्र में जन्म लेकर केवली प्ररुपित धर्म से प्रतिबोध पाकर कवल झान केवल दर्शन प्राप्त कर यावत् सिद्धि पद को मात करेंगे गोशालक ने सकडाल के भावों के परिवर्तन करने के लिये बहुत कोशीशे की, कई प्रकार के तर्क वितर्क किये, उपदेश दिये, उदाहरण दिये, पर सफडाल अपने सिद्धान्त से बिलकुल भी विचलित नहीं हुआ | गोशालक समझ गया कि मैं मन से, वचन से, कमसे सब प्रकार से कोशिप कर चुका पर सफल न हुआ। गोशालक ने वहा से विहार कर दिया। सकहाल पुत्र श्रावक आजकी तरह श्रद्धा लेकर नामधारी श्रावक ही न रहा किन्तु महावीर के तत्वों का एवं सिद्धान्तों का जाणकार हुवा। वह महावीर के सिद्धान्त प्रवचनों का ऐसा पार- गत हुवा कि देवता भी जिनको प्रवचन से चलाने के लिये या, अनेक उपसर्ग दिये पर सत्य सिद्धान्त से विचलित सुखपूर्वक श्रारकति पालन करते हुये चौदह वर्ष व्यतित हुवे तब आपने कल्याण की तरफ विशेष लक्ष देते हुवे सासारिक कार्यों से निवृत होकर साडे पांच वर्षतक श्रावक की ११ पडिमा वहन कर के बालोयणा निंदवणा कर आत्मा को विशुद्ध बनाय एक माह का सथारा करके काल के समय काल कर सुधर्म देवलोक नहीं करसका. । सेवभते.

(१३)
1
नोट
उक्त कथा का पिछला भाग चातुर्मास के व्याख्यान सग्रह
में न थाने से जिस खूबी और जिस रोचकता के साथ विवेचन
पाना चाहिये न देसके। यही वर्णन यदि श्रीमान् आचार्य महा-
गज साहब के श्रीमुस से फरमाया हुवा व्याख्यान हमारे संग्रह
में आता तो वाचक को अधिक बोध प्रद और असर कारक होता
किन्तु ऐसा नहोने से पिछला भाग हमें पूर्ण करना पड़ा है
सम्पादक
-

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Shri Shakdal Putra Shravak Ki Katha

Author
Jawaheer Lal Maharaj
Title
Shri Shakdal Putra Shravak Ki Katha
File name
Shri Shakdal Putra Shravak Ki Katha
Text
OCR done
Citation
1905
Published
2011/01
Publisher
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Language
Sanskrit
Pages
106
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546425
Barcode
4990010024901.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
oEAeF7OwVTq
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