Saaraswatha Nikethanam, Veetapalem
Raama Charchaa
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(हिन्दाह कदयही
सवारसभामद्रास.
రామాయణఘు.
राम चर्चा 7/3
हक
करी
-
प्रेमचन्द
.
भारतजननी
image
क्षिण भारत
TA
प्रकाशक
दक्षिण भारत हिन्दुस्तानी प्रचार सभा,
मद्रास
सर्वाधिकार स्वरक्षित]
[दाम १-०-०
है
हिन्दी प्रचार पुस्तक-माला---पुष्प ७९.
पहला संस्करण-१९४४-२.
दूसरा
हिन्दुस्तानी प्रचार मे
त्यागरायनगद
मद्रास.
पालामा आप से राम की कहानी और श्री प्रेमचन्द जी की कलम-उसके बाद और कुछ कहने को नहीं रह जाता। इतनी आसान ज़बान लिखना प्रेमचन्द जी का ही काम था। दक्खिन के लोग इसको पढ़कर प्रेमचन्द जी की ‘सलीस उर्दू' का लुत्फ उठा सकते हैं। यह किताब फारसी हरूफ़ में लिखी व छापी गयी थी। हमने उस उर्दू किताब को नागरी हरूफ़ में छाप दिया है । न अपनी तरफ से एक लफ़्ज़ जोड़ा है, न असल में से एक नुक़्ता घटाया है । हाँ, किताब बड़ी होती जा रही थी-बेतरह ; इसलिए 'उत्तर कांड' को कतई छोड़ दिया है और बन, किष्किधा व सुन्दर कांड को मुख्तसर में दिया है। मुख्तसर करते वक्त भी हमने प्रेमचन्द जी की ज़बान में कलम लगाने की हिमाकत नहीं की। रामचंद्र की कहानी हरदिल-अज़ीज़ है। उसका मुख्तसर किसी को नहीं खटकेगा । फिर कुछ खामी या खराबी आ गयी हो तो पढ़नेवाले हमें मुआफ फ़रमायेंगे। प्रेमचन्द जी के लायक साहब-जादे श्रीपतराय ने हमें इसे इस तरह छापने की इजाजत दी है, उसके लिए हम उनका शुक्रिया अदा करते हैं। प्रकाशक
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రామాయణ
सूची
पृष्ठ
१
१. बाल कांड
२. अयोध्या कांड
३. बन, किष्किंधा और सुंदर कांड
४. लंका कांड
८३
हीमा
सब खतम हो
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વિ કોલ ફૉવ ar Qalz- રામા बालाकांड Gituan છે ? d શનિ જ ત २१ मा 에 ન -ળા છે
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రాములవారి पैदाइश गंगा की उन मुआविन नदियों में, जो शुमाल से आकर मिलती हैं, एक सरयू नदी है। इसी नदी पर अयोध्या का मशहूर कस्वा आदि है। हिन्द लोग आज भी वहाँ तीर्थ करने जाते हैं। आजकल तो अयोध्या एक छोटा-सा कस्बा है। मगर कई हज़ार साल हुए, वह हिन्दुस्तान का सब से बड़ा शहर था। वह सूर्यवंशी खान- दान के नामी-ग़रामी राजाओं का पाये-तख्त था। हरिश्चन्द्र जैसे सखी, रघु जैसे गरीब-परवर, भगीरथ जैसे जी-हिम्मत सूर्यवंशी खानदान में हुए। राजा दशरथ इसी मिवर खानदान के एक राजा थे। रामचंद्र राजा दशरथ के बेटे थे। राजा इसी
राम चर्चा
4
उस जमाने में अयोध्या नगरी इल्म व हुनर का मरकज
थी। दूर दूर के व्यापारी रोजगार करने आते थे और वहाँ
की बनी हुई चीजें खरीदकर ले जाते थे। शहर में वसीम
सड़कें थीं। सड़कों पर हमेशा छिड़काव होता था । दो रूया
आलीशान महल खड़े थे। हर किस्म की सवारियाँ सड़कों
पर दौड़ा करती थीं। अदालतें, मदरसे, शिफाखाने सब
मौजूद थे। यहाँ तक कि नाटक-घर भी बने हुए थे, जहाँ
शहर के लोग तमाशा देखने जाते थे। इससे मालूम होता
कि उस कदीम ज़माने में भी इस मुल्क में नाटकों का रिवाज
था। शहर के नवाह में बड़े बड़े बाग थे। इन वागों में
किसी को फल तोड़ने की समानियत न थी। शहर की
हिफाजत के लिए मजबूत चहारदीवारी बनी हुई थी । अंदर
एक किला भी था। किले के चारों तरफ गहरी खाई
गयी थी, जिसमें हमेशा पानी लबरेज़ रहता था। किले के
बुज़ों पर तोपें लगी रहती थीं । तालीम इतनी आम थी कि
कोई जाहिले आदमी हूंढे से भी न मिलता था। लोग बड़े
मेहमान-निवाज़, ईमानदार, सुलह-पसंद, इल्म-दोस्त, धर्म के
पाद और दिल के साफ़ थे। अदालतों में आजकल की तरह
छोटे मुकद्दमे न दायर किये जाते थे। हर घर में गायें पाली
जाती थीं। घी दूध की
इफरात
थी। खेती में अनाज इतना
पैदा होता था कि कोई भूखा न रहने पाता था। किसान
ब
खोदी
बाल कांड
खुशहाल थे । उनसे लगान बहुत कम लिया जाता था। डाके
और चोरी की वारदातें सुनाई भी न देती थीं और ताऊन,
हैजा वगैरह बीमारियों का नाम तक न था। यह सब राजा
दशरथ के हुस्ने-इन्तजाम की बरकत थी।
एक रोज़ राजा दशरथ शिकार खेलने गये और घोड़ा
दौड़ाते हुए एक नदी के किनारे जा पहुँचे । नदी दरख्तों की
आड़ में थी। वहीं जंगल में श्रवण नाम का एक अंधा रहता
था। उसकी बीवी भी अंधी थी। उस वक्त उनका नौजवान
बेटा नदी में पानी भरने गया हुआ था। उसके कलसे के
पानी में डूबने की आवाज सुनकर राजा ने समझा कि कोई
जंगली हाथी नहा रहा है । फौरन आवाजी निशानी बांधकर
तीर चला दिया। तीर नौजवान के सनि में जा लगा। तीर का
लगना था कि वह ज़ोर से चिल्लाकर गिर पड़ा। राजा घबराकर
वहाँ गये तो देखा कि एक नौजवान पड़ा तड़प रहा है ।
अपनी ग़लती मालूम हुई। बेहद अफसोस हुआ। नौजवान ने
उनको नादिम और रंजीदा देखकर समझाया अब रंज करने
से क्या फायदा? मेरी मौत शायद इसी तरह लिखी थी।
मेरे माँ-बाप दोनों अंधे हैं। उनकी कुटी वह सामने नज़र
आ रही है। मेरी लाश उनके पास पहुँचा देना ।—यह
कहकर वह मर गया।
राजा ने नौजवान की लाश को कंधे पर रखा और अंधे
6 राम चचो 2nd के पास जाकर यह माजराये-गम सुनाया। बेचारे दोनों बुड्ढे, इसपर दोनों आँखों के अंधे। यही इकलौता बेटा उनकी जिंदगी का सहारा था। इसके मरने की कैफियत सुनकर दोनों फूट-फूटकर रोने लगे। जब आँसू जरा थी तो उन्हें राजा पर, गुस्सा आया । उनको खूब जी भरकर कोमा और यह बंद- दुआ देकर कि, जिस तरह बेटे के ग़म में हमारी जान निकल रही है, उसी तरह तुम भी बेहेडी के गम में मरोगे, दोनों मर गये । राजा दशरथ भी रो-धोकर यहाँ से रुखसत हुई। राजा दशरथ के अब तक कोई औलाद न थी। औलाद ही के लिये उन्होंने तीन शादियाँ की थीं। बड़ी रानी का नाम कौशल्या था । मॅझली रानी का सुमित्रा और छोटी रानी का कैकेयी। तीनों रानियाँ भी औलाद के लिए तरसती रहती थीं। अंधे की बदै-दुआ राजा के हक में दुआऐ-खैर ही गयी । चाहे बेटे के गम में मरना ही पड़े, बेटे का मुँह तो देखेंगे। ता| तख़्त का वारिस तो पैदा होगा। इस ख़्याल से राजा को बड़ी तस्कीन हुई। इसके कुछ ही दिन बाद अपने गुरु वसिष्ठ के मशविरे से राजा ने एक यज्ञ किया। इसमें बहुत से ऋषि- मुनि जमा हुए और सब ने राजा को दुआ दी। यूज्ञ के पूरे, होते ही तीनों ही रानियाँ हाँमिला हुई और वक्त मुअयन के बाद तीनों रानियों के चार राजकुमार पैदा हुए। कौशल्या से रामचंद्र हुए, सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न और कैकेयी से maratTRAJ.
बाल कांड भरत। सारे राज में शादियाने बजने लगे। रिआया ने भी खूब जश्न मनाये । राजा ने इतना सोना-चांदी खैरोत किया कि सारे राज में कोई मुफलिस न रह गया । उनका दिली मुहमा बर आया । कहाँ एक बेटे का मुंह देखने को तरसते थे, कहाँ चार-चार बेटे पैदा हो गये। घर गुलजार हो गया। बे-नूर आँखें ग्रेशन हो गयीं।30308:२ . चारों लड़कों की परवरिश होने लगी। जब वह जरा सयाने हुए तो गुरु वसिष्ठ ने उन्हें तालीम देना शुरू किया। चारों लड़के बहुत ही जहीन थे । थोड़े ही दिनों में वेद, शास्त्र सब खतम कर लिये और इल्मे जंग में भी खूब होशियार हो गये । नेजा-बाज़ी, तीर-अंदाजी, कुश्ती किसी फन इनका सानी न था । चारों, बुजुर्गो का अदब करते थे। छोटों को भी वह कभी सख्त-सुस्त न कहते । उनमें आपस में बड़ी गहरी मुहब्बत थी। एक दूसरे के लिए जान देते थे। चारों ही खबरू, तवाना और खलीक थे। उन्हें देखकर हर कस व नाकस के मुँह से दुआ निकलती थी। सब कहते थे, ये लड़के खानदान का नाम रोशन करेंगे। यों तो चारों में एकसाँ मुहब्बत थी, मगर लक्ष्मण को रामचंद्र से और शत्रुघ्न को भरत से खास उन्स था। राजा दशरथ मारे खुशी के फूले न समाते थे। 5. KauM
suose
తాటకి మారీచులవర
ताड़का और मारीच का मारा जाना
एक दिन राजा दशरथ दरबार में बैठे हुए वज़ीरों से
कुछ वातचीत कर रहे थे कि ऋषि विश्वामित्र तशरीफ लाये।
विश्वामित्र उस जमाने के बड़े तपस्वी थे। वह क्षत्रिय होकर
भी महज़ अपनी इबादत के ज़ोर से ब्रह्मऋषि के दर्जे पर पहुँच
गये थे। सभी ऋषि उनके सामने ताजीम से सर झुकाते थे।
मगर ज्ञानी होने पर भी किसी कदर गुस्सेवर थे। किसी ने
उनकी मरजी के खिलाफ काम किया और उन्होंने बद-दुआ
दी। इससे सभी राजे-महाराजे उनसे डरते थे। क्योंकि उनकी
बद-दुआ को कोई रद न कर सकता था। लड़ाई के हुनर में
भी वह यगाना-रोजगार थे। राजा दशरथ ने तख्त से उतर
कर उनकी ताजीम की और उन्हें अपने सिंहासन पर बिठाकर
बोले-आज गरीबखाने को अपने कदमों से पाक करके
आपने मुझपर बड़ा एहसान किया। मेरे लायक अगर कोई
खिदमत हो तो फरमाइये । -सरोचश्म बजा लाऊँ।
विश्वामित्र ने दुआ देकर कहा-महाराज ! हम
तपस्त्रियों को राज-दरबार की याद उसी वक्त आती है, जब
हमें कोई तकलीफ होती है या जब हमारे ऊपर कोई जुल्म
करता है। मैं आजकल एक यज्ञ कर रहा हूँ।
मगर
बाल कांड
आप
Deman
राक्षस लोग उसे नापाक करने की कोशिश करते हैं। वे यज्ञ
की वेदी पर खन और हड्डियाँ फेंकने हैं । मारीच और सुबाहु
दो बड़े ही सरकश राक्षस हैं। यह सारा फसाद उन्हीं दोनों
का है। मुझमें अपनी तपस्या की इतनी ताकत है कि चाहूँ
तो एक बद-दुआ देकर उनकी सारी फ़ौज को जलाकर खाक
कर हूँ। पर यज्ञ करते वक्त गुस्से को रोकना पड़ता है।
इसलिए मैं आपके पास फरियाद लेकर आया हूँ ।
गजकुमार रामचंद्र और लक्ष्मण को मेरे साथ भेज दीजिये
ताकि वे मेरे यज्ञ की हिफाजत करें और उन राक्षसों को
हलाक कर दें। दस दिन में हमारा यज्ञ पूरा हो जायगा ।
राम के सिवा और किसी से यह काम न होगा।
अलग राजा दशरथ बड़ी मुश्किल में पड़ गये। राम की
जुदाई उन्हें एक लमहै के लिए भी गवारा न थी । यह अंदेशा
भी
हुआ
कि लड़के अभी नातजुर्बकार हैं। खौफनाक राक्षसों
से मुल्य क्या मुकाबिला कर सकेंगे । डरते हुए बोले-'ऐ
पाक ऋषि ! आपका हुक्म सर और आँखों पर । मगर उन
कम-उम्र लड़कों को राक्षसों के मुकाबिले में भेजते हुए मुझे
खौफ़ होता है। इन्हें अभी तक मैदाने-जंग का तजुर्बा नहीं।
खुद अपनी सारी फ़ौज लेकर आपके यज्ञ की हिफाज़त
करने चलूँगा। लड़कों को साथ भेजने के लिए मुझे मज़बूर
न कीजिये।
मैं
१० राम चची विश्वामित्र हँसकर बोले--महाराज ! आप इन लड़कों को अभी नहीं जानते। इनमें शेरों की सी हिम्मत और ताकत है । मुझे पूरा यकीन है कि ये राक्षसों को मार डालेंगे। उनकी तरफ़ से आप बेखौफ रहिये । इनका बाल भी बांका नहीं होगा। निडर राजा दशरथ फिर कुछ उन्न करना चाहते थे। मगर गुरू वसिष्ठ के समझाने पर वे राज़ी हो गये और दोनों राज- कुमारों को बुलाकर ऋषि विश्वामित्र के साथ जाने का हुक्म दिया। रामचंद्र और लक्ष्मण यह इजाजत पाकर दिल में बहुत खुश हुए। अपनी जवांमर्दी के इजहार का ऐसा अच्छा मौका इन्हें पहले न मिला था। दोनों ने जंगी-लिबास पहना, हथियार सजाये, और अपनी माताओं से आशीर्वाद लेने के बाद राजा दशरथ के कदमों को बोसा देकर खुशी खुशी विश्वामित्र के साथ चले। रास्ते में विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को एक ऐसा मंत्र बताया जिसको पढ़ने से थकावट पास नहीं आती थी। नये-नये, अजीब व ग़रीब हथियारों का इस्तेमाल करना भी सिखाया जिनके मुकाबिले में कोई ठहर नहीं सकता था। कई दिन के बाद तीनों आदमी गंगा को पार करके एक घने जंगल में जा पहुँचे। विश्वामित्र ने कहा-बेटा, इस जंगल में ताड़का नाम की एक देवनी रहती है। वह इस रास्ते से २(ईली
बाल कांड
गुज़रनेवाले आदमियों को पकड़कर खा डालती है। पहले
यहाँ एक अच्छा कस्बा आबाद था। पर इसने सारे आदमियों
को खा डाला। अब वही आबाद कस्बा घना जंगल है।
कोई,आदमी इधर भूलकर भी नहीं आता। हम लोगों की
आहट पाकर वह देवनी आती होगी । तुम फ़ौरन उसे तीर से
हलाक कर देना। मारल्य
विश्वामित्र अभी यह वाकया बयान कर ही रहे थे कि
हवा में जोर की सनसनाहट हुई और ताड़का मुँह खोले दौड़ती
हुई आती दिखायी दी । उसकी सूरत इतनी डरावनी और कद ।
इतना बड़ा था कि कोई कम-हिम्मत आदमी होता तो मारे खौफ
के गिर पड़ता । उसने इन तीनों आदमियों के सामने आकर
गरजना और पत्थर फेंकना शुरू किया। विश्वामित्र ने रामचंद्र
को तीर चलाने का इशारा किया। रामचंद्र एक औरत पर
हथियार चलाना उसूल के खिलाफ समझते थे । ताड़का देवनी
थी तो क्या, थी तो औरत । मगर ऋषि का इशारा पाकर
उन्हें क्या उन्न हो सकता था ! ऐसा तीर चलाया कि वह
ताड़का की छाती में चुभ गया। ताड़का जोर से चीखकर गिर
पड़ी और एक लमहे में तड़प तड़प कर मर गयी । पला
तीनों आदमी फिर आगे चले और कई दिनों के बाद
विश्वामित्र के आश्रम में पहुँच गये । था तो यह भी जंगल,
पर इसमें ज़्यादातर ऋषि लोग रहते थे। शेर, हिग्न, नीलगाय
--
१२
राम चर्चा
बेखौफ़ घूमा करते थे । इस तपो-भूमि के असर से शिकारी
दरिंदे भी शिकार की तरफ़ रागिब न होते थे ।
दूसरे दिन से विश्वामित्र ने यज्ञ करना शुरू कर
दिया। राम और लक्ष्मण कमर में तलवार लगाये, तीर
और कमान हाथ में लिये, जंगल के चारों तरफ गश्त
लगाने लगे। न खाने-पीने की फिक्र थी, न मोने-लेटने
की। रात-दिन वेख्वाब व खूर पहरा देते थे। इस
तरह पाँच दिन खैरियत से गुज़र गये । मगर छठे
दिन क्या देखते हैं कि मारीच और सुबाहु राक्षसों की
फौज ले यज्ञ को नापाक करने चले आ रहे हैं। दोनों
भाई फौरन संभल गये। ज्यों ही मारीच मामने आया
रामचंद्र ने ऐसा तीर मारा कि वह बड़ी दूर जाकर गिर
पड़ा। सुबाहु बाकी था। उसे भी एक अग्नि-बाण ने
ठंडा कर दिया। फिर तो राक्षसी फौज़ के कदम उखड़
गये। दोनों भाइयों ने दूर तक उनका पीछा किया और
कितनों ही को हलाक कर दिया। इस तरह यज्ञ ब-हुस्न
व ख़बी पूरा हो गया। किसी किस्म की रुकावट न हुई।
'विश्वामित्र ने दोनों भाइयों की खब तारीफ की।
भ
दूर दूर से
రామకళ్యాణము
शादी
राम और लक्ष्मण अभी विश्वामित्र के आश्रम में ही थे
कि मिथिला के राजा जनक ने विश्वामित्र को अपनी लड़की
सीता के स्वयंवर में शरीक होने के लिए न्योता भेजा। उस
ज़माने में अक्सर शादियाँ स्वयंबर के तरीके से होती थीं।
लड़की का बाप एक जलसा करता था, जिसमें
आकर लोग शरीक होते थे। जलसे में ताकत या लड़ाई के हुनर
का इम्तिहान होता था। जो नौजवान इस इम्तिहान में कामयाब
होता था, उसी के गले में कन्या जयमाल डाल देती थी।
उसीसे उसकी शादी हो जाती थी। विश्वामित्र की दिली-
ख्वाहिश थी कि सीता की शादी राम से हो जाय । वे यह
भी जानते थे कि राम इम्तिहान में ज़रूर कामयाब होंगे।
इसलिये जब वे मिथिला जाने लगे तो राम और लक्ष्मण को
भी साथ लेते गये। राजा दशरथ से इजाज़त लेने के लिए
अयोध्या जाने और फिर वहाँ से मिथिला आने के लिए काफी
वक्त न था। मिथिला वहाँ से करीब ही था। इसलिये
विश्वामित्र ने सीधे वहीं से जाने का फैसला किया।
आजकल जिस सूबे को हम विहार कहते हैं, वही उस
ज़माने में मिथिला कहलाता था। मिथिला के राजा जनक
राम चर्चा बड़े विद्वान, ज्ञानी आदमी थे। बड़े बड़े ऋषि-मुनि उनसे ज्ञान सीखने आते थे। कई साल पहले मिथिला में बड़ा भारी करत पड़ा था। उस वक्त ऋषियों ने मिलकर फैसला किया कि यह कहत यज्ञ ही से दूर हो मकता है। इस यज्ञ को पूरा करने की एक शर्त यह भी थी कि राजा जनक खुद हल चलायें । राजा जनक को अपनी रिआया जान से भी ज़्यादा अज़ीज़ थी। इसके सर से उस मुसीबत को दूर करने के लिए उन्होंने इस यज्ञ को शुरू कर दिया। जब वे हल-बैल लेकर खेत में पहुँचे और हल चलाने लगे तो क्या देखते हैं कि फाल की नोक से जो जमीन खुद गयी है, उसमें एक चाँद सी लड़की पड़ी हुई है। राजा के कोई औलाद न थी। फौरन इस लड़की को गोद में उठा लिया और घर लाये । उसका नाम सीता रखा। क्योंकि वह फाल की नोक से निकली थी। फाल को संस्कृत में सित् कहते हैं। इस खुदा-दाद निआमत को गजा जनक ने बड़े लाड़-व-प्यार से पाला, और अच्छे अच्छे विद्वानों से उसे तालीम दिलवायी । इसी सीता की शादी पर यह स्वयंवर रचा गया था। राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र, सोन, गंगा वगैरह नदियों को पार करते हुए चौथे दिन मिथिला पहुँचे। सारे शहर के लोग इन राजकुमारों का हुस्न और कद-व-कामत देखकर उनपर फरेफ़्ता हो गये। सभी के मुँह से यही सदा निकलती
बाल कांड
-
१५
थी कि सीता के लायक कोई है तो यही राजकुमार है। जैसी
हसीन वह है वैसे ही खूबसूरत रामचंद्र हैं। मगर देखना
चाहिये कि उनसे शिव का धनुष उठता है या नहीं?
राजा जनक को विश्वामित्र के आने की खबर हुई तो
उन्होंने इनकी बड़ी खातिर व तवाज़ा की । जब उन्हें मालूम
हुआ कि ये दोनों नौजवान राजा दशरथ के बेटे हैं, तब उनके
दिल में भी यही ख्वाहिश पैदा हुई कि काश, सीता का ब्याह
रामचंद्र से हो जाता। मगर स्वयंवर की शर्त से मज़बूर थे।
विश्वामित्र ने राजा जनक से पूछा,-महाराज! आपने
स्वयंवर के लिये कौन-सा इम्तिहान तजवीज़ किया है ?
जनक ने जवाब दिया,--भगवान् ! क्या कहूँ, कुछ कहा
नहीं जाता । सैकड़ों बरस गुजर गये। एक बार शिवजी ने
मेरे एक बुजुर्ग को अपना धनुष दिया था। वह धनुष तब से
मेरे घर में रखा हुआ था। एक दिन मैंने सीता से अपनी
पूजा की कोठरी को लीप डालने के लिये कहा। उसी कोठरी
में वह पुराना धनुष रखा हुआ था। सैकड़ों बरस से कोई
उसे उठा न सका था। सीता ने जाकर देखा तो उसके आसपास
बहुत कूड़ा जमा हो गया था। उसने धरप को उठाकर एक
तरफ रख दिया और उसके नीचे की जमीन लीपकर फिर
उम् धनुष को वहीं रख दिया। मैं पूजा करने गया तो धनुष
को हटा हुआ देखकर मुझे बड़ा तअज्जुब हुआ। जब मालूम
राम चर्चा हुआ कि सीता ने उसे हटाकर जमीन साफ़ की है, तब मैंने शर्त की कि ऐसी बहादुर कन्या की शादी उसी वर से करूँगा जो इस धनुष को चढ़ाकर तोड़ देगा । अब देखू, लड़की की तकदीर में क्या है ? दूसरे दिन स्वयंवर की तैयरियाँ शुरू हुई। मैदान में एक वसीअ शामियाना ताना गया। सैकड़ों सूरमा जो अपनी ताकत के ज़ोम में दूर दूर से आये हुए थे, आ आकर बैठे। शहर के लाखों मर्द-औरत जमा हुए। शिवजी के धनुष को बहुत से आदमी उठाकर सभा में लाये । जब सब लोग आ गये तो राजा जनक ने खड़े होकर कहा-ऐ भारतवर्ष के वीरो! यह शिवजी का धनुष आप लोगों के सामने रखा हुआ है। जो इसे तोड़ देगा उसी के गले में सीता जयमाल डालेगी। यह सुनते ही सूरमाओं और दिलावरों ने धनुष के पास जा-जाकर ज़ोर लगाना शरू किया। सभी राजकुमार सीता से शादी करने का ख्वाब देख रहे थे। कमर कस-कसकर ग़रूर से ऐंठते-अकड़ते धनुष के पास जाते और जब तिल- भर भी न हटता तो खिरफ़्फत से गरदन झुकाये, अपना-सा मुँह लिये लौट आते थे। सारी सभा में एक भी ऐमा योद्धा न निकला जो धनुष को उठा सकता, तोड़ने का तो ज़िक्र ही क्या? राजा जनक ने यह कैफियत देखी तो उन्हें बड़ा अंदेशा
बाल कांड
हुआ। सभा में खड़े होकर मायूसाना अंदाज से बोले-
शायद यह वीर-भूमि अब वीरों से खाली हो गयी है। जभी तो
इतने आदमियों में एक भी ऐसा न निकला जो इस धनुष को
तोड़ सकता। अगर मैं ऐसा जानता तो स्वयंवर के लिए यह
शर्त ही न रखता । ऐसा मालूम होता है कि सीता बिन-ब्याही
रहेगी । यही इसकी तकदीर में है तो मैं क्या कर सकता हूँ।
आप लोग अब शौक से तशरीफ ले जायें। इस हौसले और
ताकत पर आप लोगों को यहाँ आने की ज़रूरत ही क्या थी?
लक्ष्मण बड़े जोशिले नौजवान थे। जनक की ये बातें
सुनकर उनसे जब्त न हो सका । जोश से बोले-महाराज!
ऐसा अपनी जबान-ए-मुबारक से न फरमाइये । जब तक राजा
रघु का वंश कायम है, यह देश वीरों से खाली नहीं हो
सकता। मैं डींग नहीं मारता । सच कहता हूँ कि अगर
अपने भाई साहब का हुक्म पाऊँ तो एकदम मैं इस धनुष के
पुरजे पुरज़े कर दूँ। मेरे भाई साहब चाहें तो इसे एक हाथ से
तोड़ सकते हैं । इसकी हकीकत ही क्या है ?
लक्ष्मण की ये पुर-जोश बातें सुनकर सारे सूरमा दंग
रह गये । रामचंद्र छोटे भाई के मिजाज से वाकिफ थे । इनका
हाथ पकड़कर खींच लिया और बोले,-भाई, यह मौका इस
तरह बातें करने का नहीं है । जब तक तुम्हारे बड़े मौजूद हैं,
तुम्हें ज़बान खोलना मुनासिब नहीं।
२
राम चर्चा
-
लक्ष्मण बैठ गये तो विश्वामित्र ने रामचंद्र से कहा-
बेटा अब तुम जाकर इस धनुष को तोड़ो ताकि गजा जनक
को तस्कीन हो।
रामचंद्र सीता को पहले ही दिन एक बाग में देख चुके
थे। दोनों भाई बाग में सैर करने गये थे और सीता देवी की
पूजा करने आयी थीं । वहीं दोनों की आँखें मिली थी। उसी
वक्त से रामचंद्र को सीता से मुहम्मत हो गयी थी। वे इसी
मौके के मुंतजिर थे । विश्वामित्र की इजाजत पाते ही उन्हें
प्रणाम किया और धनुष की तरफ चले । सूरमाओं ने अपनी
खिफ़्फत मिटाने के लिए उनपर आवाजें कसना शुरू किये ।
एक ने कहा-जरा संभले हुए जाइयेगा। ऐसा न हो, अपने
ही ज़ोर में गिर पड़िये। दूसरा
बोला इस पुराने धनुष पर
रहम कीजिये । कहीं पुरजे पुरजे न कर दीजियेगा। तीसरा
बोला-ज़रा आहिस्ता-आहिस्ता कदम रखिये । जमीन हिल
रही है। मगर रामचंद्र ने इन तंज़ों की तरफ मुतलक तरजह
न की । जाकर धनुष को इस तरह उठा लिया गोवा कोई फूल
हो, और इतनी जोर से चढ़ाया कि बच से इसके दो टुकड़े हो
गये। इसके टूटने से ऐती आपाज हुई कि लोग चौंक पड़े। धनुप
ज्यों ही टूटकर गिरा, वे जोसे-मुरत से उछलकर दौड़े ।
राजा जनक समा के बाहर खड़े मुतफिक्र निगाहों से
यह नज्जारा देख रहे थे । रामचंद्र को गले लगा लिया और
पर, 21-14 बाल कांड सीता जी ने आकर उनके गले में जयमाल डाल दिया। शहरवालों ने खुश होकर जय-जयकार करना शुरू किया, शादियाने बजने लगे, बंदूकें छूटने लगी और सूरमा लोग एक- एक करके चुपके-चुपके मरकने लगे। शहर के छोटे-बड़े, अदने- व-आले सब खुशी से फूले न समाते थे। सभों ने मुँह-मांगी मुराद पायी । सलाह हुई कि राजा दशरथ को इस खुशखबरी की इत्तला देनी चाहिए। कई सांड़नी-सवार फौरन कोशल की तरफ रवाना किये गये। विश्वामित्र राजकुमारों के साथ राजभवन में जाना ही चाहते थे कि अहाते के बाहर शोर-व गल सुनाई देने लगा। ऐसा मालूम होता था गोया बादल गरज रहा है। लोग घबरा-घबराकर इधर-उधर देखने लगे कि यह क्या आफत आनेवाली है । एक लमहे के बाद राज खुला कि परशुराम ऋषि गुस्से से गरजते चले आ रहे हैं। देवों का सा कद, अंगारे सी लाल-लाल आँखें, गुस्से से चेहरा सुख, हाथ में तीर-कमान, कंधे पर फरमा, यह आपकी कता थी । मालूम होता था सब को कच्चा ही खा जायेंगे। आते ही आते गरजकर बोले-'किसने मेरे गुरु शिवजी का घल्प तोड़ा है ? निकल आये मेरे सामने ! जरा मैं भी देल, वह कितना बहादुर है ? रामचंद्र ने बात मुलायमत रोकहा, 'महाराज ! आपके किसी भक्त ही ने तोड़ा होगा, और क्या ?
राम चर्चा परशुराम ने फरसे को घुमाकर कहा, 'हरगिज़ नहीं। यह मेरे भगत का काम नहीं । यह किसी दुश्मन का काम है। जरूर मेरे किसी बैरी ने यह फेल किया । मैं अभी उसका सर तन से जुदा कर दूंगा। किसी तरह मुआफ नहीं कर सकता। मेरे गुरु का धनुष और उसे कोई क्षत्रिय तोड़ डाले ! मैं क्षत्रियों का दुश्मन हूँ,-जानी दुश्मन ! मैंने एक-दो बार वहीं किइक्कीस बार क्षत्रियों के खून की नदी बहायी है। अपने बाप के खून का बदला लेने के लिए मैंने जहाँ क्षत्रियों को पाया है चुन-चुनकर मारा है । अब फिर मेरे हाथों क्षत्रियों पर वही आफत आनेवाली है । जिसने यह धनुष तोड़ा हो, मेरे सामने निकल आये। दिलेर और मनचले लक्ष्मण यह ललकार सुनकर भला कब जब्त कर सकते थे ! सामने आकर बोले,-'आप एक सड़े से धनुष के टूटने पर इस कदर जामे से क्यों बाहर हो रहे हैं ! लड़कपन में ऐसे कितने ही धनुष खेल-खेलकर तोड़ डाले । तब तो आपको ज़रा भी गुस्सा न आया । आज इस पुराने बोसीदा धनुष के टूट जाने से आप क्यों इतना बेरहम हो रहे हैं ! क्या आप समझते हैं कि इन गीदड़ भभकियों से कोई डर जायेगा ?, जैसे घी पड़ जाने से आग और भी तेज़ हो जाती है, उसी तरह लक्ष्मण के ये अलैफ़ीज़ सुनकर परशराम और भी ww-
बाल कांड
२१.
ग़ज़बनाक हो गये। फरसे को हाथ में लेकर बोले- 'तू कौन
है, जो मेरे साथ इस गुस्ताखी से पेश आता है ? तुझे क्या
अपनी जान की ज़रा भी मुहब्बत नहीं जो इस तरह मेरे सामने
जवाँदराज़ी करता है ? क्या यह धनुष भी वैसा ही था जैसे
तूने लड़कपन में तोड़े थे ? यह शिवजी का धनुष था।'
लक्ष्मण बोले-'किसी का धनुष हो, मगर था बिल्कुल
सड़ा हुआ; छूते ही टूट गया। ज़ोर लगाने की जरूरत ही
न पड़ी । इस ज़रा-सी बात के लिए आप नाहक इतना बिगड़
रहे हैं।"
परशुराम और भी झल्लाकर बोले-'अरे मूर्ख, क्या तू
मुझे नहीं पहचानता ? मैं तुझे लड़का समझकर अभी तक तरह
देता जाता हूँ और तू अपनी गुस्ताखी से बाज नहीं आता।
मेरा गुस्सा बुरा है । ऐसा न हो मैं एक ही वार में तेरा काम
तमाम कर दूं।"
लक्ष्मण- मेरा काम तो तमाम हो चुका। हाँ,
मुझे खौफ़ है कि कहीं आपका गुस्सा आपको नुकसान न
पहुँचाये। आप जैसे ऋषियों को कभी गुस्सा न करना चाहिए।'
परशुराम ने फरसा सँभालते हुए दाँत पीसकर कहा,
क्या कहूँ, तेरी उम्र तुझे बचा रही है। वरना अब तक तेरा
सिर तन से जुदा कर देता ।।
लक्ष्मण---'जी, कहीं इस भरोसे में न रहियेगा। आप
२२ 22
राम चर्चा
కూడుట
फूंककर पहाड़ को नहीं उड़ा सकते । आप ब्राह्मण हैं; इसलिए
आपके ऊपर मुझे रहम आता है। शायद अभी तक आपका
किसी क्षत्रिय से पाला नहीं पड़ा, जभी आप इस कदर विफर
बाल पर
रामचंद्र ने देखा कि बात बढ़ती जा रही है तो लक्ष्मण
हाथ पकड़कर बिठा दिया और पसाराम से हाथ जोड़कर
बोले-'महाराज! लक्ष्मण की बातों का आप बुरा न माने।
यह ऐसा ही गुस्ताख है, यह अभी तक आपको नहीं जानता।
वरना आपके मुँह न लगता। इसे मुआफ कीजिये ।
छोटों का कुसूर बड़े ही मुआफ किया करते हैं। आपका
कुसूरवार मैं हूँ। मुझे जो सज़ा चाहें, दें। आपके सामने सर
झुका हुआ है।
रामचंद्र की यह अदब आमेज गुफ्तगू सुनकर परशुराम
कुछ नरम पड़े कि यकायक लक्ष्मण को हँसते देखकर फिर उनके
जिस्म में आग लग गयी । बोले-'राम ! तुम्हारा यह भाई
बेहद शरीर है। सलीका और तमीज और अदब तो इसे छ
तक नहीं गया । जो कुछ मुँह में आता है वक डालता है।
रंग इसका गोरा है, पर दिल इसका स्याह है। ऐसा बे-अदब
लड़का मैंने नहीं देवा ।
अभी तक तो लक्ष्मण परशुराम को सिर्फ छेड़ रहे थे।
मगर ये बातें सुनकर उन्हें गुस्सा आ गया । बोले-'सुनिये
बाल कांड
महाराज! छोटों का काम बड़ों का अदब करना है। मगर
इसकी भी हद होती है । आप अब इस हद से बढ़े जा रहे हैं।
आखिर आप क्यों इस कदर खफा हो रहे हैं ? आपके बिगड़ने
से तो धनुष जुड़ न जायगा । हाँ, जग-हँसाई अलबत्ता होगी।
अगर यह धनुष आपको ऐसा ही प्यारा है तो किसी कारीगरी
से इसे जुड़वा दिया जायगा । इसके सिवा हम और क्या कर
सकते हैं ? आपका गुस्सा बिलकुल फिजूल है ।'
मारे गुस्से के परशुराम की आँखें बीर-बहूटी की तरह
सुख हो गयीं। वे थर-थर काँपने लगे। उनके नथुने फड़कने
लगे । रामचंद्र ने उनकी यह हालत देखकर लक्ष्मण को वहाँ
से चले जाने का इशारा किया और निहायत आजिजी से बोले,
'महाराज ! बुजुर्गों को छोटे, कम-महम आदमियों की बातों,
पर ध्यान न देना चाहिए। इसके बकने से क्या होता है।
हम सब आपके गुलाम हैं। धनुष मैंने तोड़ा है। इसका
खताबार मैं हूँ। इसकी जो सजा आप मुनासिब समझें, मुझे
दें। आप इसका जो तावान माँगें, मैं देने को तैयार हूँ ।'
परशुराम ने नरम होकर कहा-'तावान मैं तुमसे क्या
लूँगा ? मुझे यही खौफ है कि इस धनुष के टूट जाने से
क्षत्रियों को फिर ग़रूर होगा और मुझे फिर उनका ग़रूर तोड़ना
पड़ेगा । यह शिव का धनुष नहीं टूटा है, ब्राह्मणों के तेज और
ताकत को सदमा पहुँचा है ।।
राम चर्चा
रामचंद्र ने हँसकर कहा-'ऋषिराज! क्षत्रिय ऐसे
ओछे नहीं हैं कि इस जरा-से धनुष के टूट जाने से उन्हें
ग़रूर हो जाय । अगर आप मेरी बहादुरी का जौहर देखना
चाहते हैं तो इससे भी बड़ा इम्तहान लेकर देखिये ।।
परशुराम-'तैयार है ?
राम-'जी हाँ, तैयार हूँ।"
परशुराम ने अपना तीर और कमान रामचंद्र के सामने
फेंककर कहा-'अच्छा, इस धनुष पर चिल्ला चढ़ा दे। देखू
तो कितना ताकतवर है !"
रामचंद्र ने धनुष उठा लिया और बड़ी आसानी से चिल्ला
चढ़ाकर बोले-'कहिये अब क्या करूँ, तोड़ दूँ इस धनुष को ?'
परशुराम का सारा गुस्सा ठंडा हो गया । उन्होंने बढ़-
कर रामचंद्र को सीने से लगा लिया और उन्हें दुआएँ देते
हुए अपना धनुष-बाण लेकर रुखसत हो गये। राजा जनक
का खून खुश्क हो रहा था कि न जाने क्या आफ़त आनेवाली
। परशुराम के चले जाने से उनकी जान में जान आयी।
फिर शादियाने बजने लगे।
राजा दशरथ रामचंद्र और लक्ष्मण की कुछ खबर न
पाने से बहुत मुतफिक्र हो रहे थे। यह खुशखबरी पायी तो
बाग़-बाग़ हो गये । अयोध्या में भी जशन होने लगा। दूसरे
दिन धूम-धाम से बारात सजाकर वे मिथिला चले।
बाल कांड
राजा जनक ने बारात की खूब खातिर व मदारात की,
और शास्त्र-विधि से सीताजी का ब्याह रामचंद्र से कर दिया।
उनकी एक दूसरी लड़की थी, जिसका नाम उर्मिला था।
उसकी शादी लक्ष्मण से हो गयी। राजा जनक के भाई के
भी दो लड़कियाँ थीं। वे दोनों भरत और शत्रुघ्न से ब्याही
गयीं। कई दिन के बाद बारात रुखसत हुई । राजा जनक ने
बेशुमार सोने-चाँदी के बरतन, हीरे-जवाहिर मुरस्सा झलों से
सजे हुए हाथी, नागौरी बैलों से जुते हुए रथ, अरवी नस्ल
के घोड़े दहेज़ में दिये।
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అయోధా ధ్యాకాండ अयोध्या कांड
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వనహిసము
बन-बास
राजा दशरथ कई साल तक बड़ी तनदेही से राज करते
रहे। लेकिन बुढ़ापे के बाइस उनमें अब वह पहला सा जोश
न था। इसलिए उन्होंने रामचंद्रजी से रियासत के कामों में
मदद लेना शुरू किया। इसमें एक मस्लहत यह भी थी कि
रामचंद्र को हुक्मरानी का तजुर्बा हो जाय । यो वराये नाम
खुद राजा थे, मगर ज़्यादातर काम रामजी के हाथों
अंजाम पाता था। राम के हुस्ने-इंतजाम की सारे राज
तारीफ होने लगी। जब राजा दशरथ को यकीन हो गया
कि राम अब फरमाँ-रवाई के उसूलों से खूब वाकिफ हो गये हैं
और उनपर काबिलियत के साथ अमल भी कर सकते हैं तो
एक दिन उन्होंने अपने दरबार के अराकीन और शहर
- 30३० राम चर्चा मुअजिज आदमियों को बुलाकर कहा, 'मुझे आप लोगों की खिदमत करते एक मुद्दत गुजर गयी.। मैंने हमेशा इन्साफ के साथ राज करने की कोशिश की । अब मैं चाहता हूँ कि राज रामचंद्र के सिपुर्द कर दूं और अपनी जिन्दगी के आखिरी दिन किसी गोशे में बैठकर परमात्मा की याद में बसर करूँ। यह तजवीज़ सुनकर लोग बहुत खुश हुए और बोले- महराज! आपके साये में हम लोग जिस सुख और चैन से रहे उसकी याद हमारे दिलों से कभी न मिटेगी। जी तो यही चाहता है कि आपका हाथ हमारे सिर पर हमेशा रहे, लेकिन जब आपकी यही मरज़ी है कि आप परमात्मा की याद में जिन्दगी बसर करें तो हम लोग इस कारे-खैर में हारिज न होंगे। आप शौक से इबादत करें। हम जिस तरह आपको अपना मालिक और मुरब्बी समझते थे, उसी तरह रामचंद्र को समझेंगे।' इसी असना में गुरु वशिष्ठजी भी आ गये। उन्हें भी यह तजवीज़ पसंद आयी। राजा ने कहा, 'जब आप लोग राम को चाहते हैं तो फिर अच्छी मायत देखकर उनका गज- तिलक कर देना चाहिए । जितनी ही जल्द मुझे फुरसत मिल जाये उतना ही अच्छा ।' सब लोगों ने इसे बड़ी खुशी से मंजूर कर लिया। तिलक की सायत मुकरर हो गयी। शहर में ज्यों ही लोगों को मालूम हुआ कि गमचंद्र का तिलक होनेवाला " अयोध्या कांड ३१.31 है, जशन मनाने की तैयारियाँ होने लगी। जिस दिन तिलक होनेवाला था उसके एक दिन पहले से शहर की सजावट होने लगी। घरों के दरवाजों पर वंदनवारें लटकायी जाने लगी, बाजारों में झन्डियां लहराने लगों, सड़कों पर छिड़काव होने लगा ; बाजे बजने लगे। रानी कैकेयी की एक लौंडी मंथरा थी। निहायत बद- सूरत, कुबड़ी औरत थी। कैकयी के साथ मैके से आयी थी। इसलिए कैकेयी उसे बहुत चाहती थी । वह किसी काम से रनवास के बाहर निकली, जो यह धूम-धाम देखकर एक आदमी से इसका सबब पूछा। उसने कहा -तुझे इतनी खबर भी नहीं! अयोध्या ही में रहती है या कहीं बाहर से पकड़ आयी है ! कल श्री रामचंद्र का तिलक होनेवाला है। ये सब उसी की तैयारियां हैं। यह खबर सुनते ही मंथरा को गोया लर्जा आ गया। मारे हसद के जल उठी। उसकी दिली ख्वाहिश थी कि कैकेयी के राजकुामर भरत गद्दी पर बैठे और कैकेयी गजमाता हो । तत्र में जो चाहूंगी करूंगी। फिर तो मेरा ही राज होगा। और गनियों की लौंडियों पर रोब जमाऊँगी। सर से पैर तक गहने से लदी हुई निकलूंगी तो लोग मुझे देखकर कहगे, वह मंथरा देवी जाती हैं। फिर मुझे किसी ने कुबड़ी कहा तो उसे मजा चखा दूँगी। इसी तरह के मंसूबे उसन दिल में धोका
राम चर्चा
बाँध रखे थे। इस खबर ने इसके सारे मंसूबे खाक में मिला
दिये । जिस काम के लिए जाती थी उसे बिलकुल भूल गयी।
बदहवास दौड़ी हुई महल में गयी और कैकेयी से बोली-
'महारानी जी ? आपने कुछ और सुना ? कल राम का तिलक
होनेवाला है।
तीनों रानियों में बड़ी मुहब्बत थी। उनमें नाम को
भी सौतिया डाह न था। जिस तरह कौशल्या भरत को राम
ही की तरह प्यार करती थी उसी तरह कैकेयी भी राम को
प्यार करती थी। रामचंद्र सब से बड़े थे इसलिए यह मानी
हुई बात थी कि वे ही राजा होंगे। मंथरा से यह खबर
सुनकर कैकेयी बोली-'मैं यह खबर पहले ही सुन चुकी
हूँ। लेकिन तूने सब से पहले मुझसे कहा है, इसलिए यह सोने
का हार तुझे इनाम देती हूँ, यह ले ।'
मंथरा ने सिर पर हाथ मारकर कहा, 'महारानी! यह
इनाम मैं शौक से लेती, अगर राम की जगह राजकुमार भरत
के तिलक की खबर सुनाती। यह इनाम देने की बात नहीं
है, रोने की बात है। आप अपना भला-बुरा कुछ नहीं समझतीं।
कैकेयी-चुप रह डोईन ! तुझे ऐसी बातें मुंह से निकालते
शरम भी नहीं आती? रामचंद्र मुझे भरत से भी प्यारे हैं।
तू देखती नहीं कि वे मेरी कितनी इज़्ज़त करते हैं ? बिला
मुझसे सलाह लिये कोई काम नहीं करते। फिर वह सब से
अयोध्या कांड
३३
बड़े हैं। गद्दी पर हक भी तो उन्हीं का है। फिर जो एसी
बात मुंह से निकाली तो ज़बान खिंचवा लूंगी।
मंथरा–हाँ, जबान क्यों न खिंचवा लोग्री ! जब बुरे
दिन आते हैं तो आदमी की अङ्गल पर इस तरह परदा पड़
जाता है। तुम जैसी भोली-भाली और नेक हो, वैसी ही मव
समझती हो। राम को 'बेटा, वेटा' कहते यहाँ तुम्हरी जवान
खुश्क होती है, वहाँ रानी कौसल्या चुपके चुपके तुम्हारी
जड़ खोद रही हैं। चार दिन में वही रानी होंगी। तुम्हारी
कोई बात भी न पूछेगा। बस, महाराज के पूजा के बरतन
धोया करना । मेरा काम तुम्हें समझाना था, समझा दिया ।
तुम्हारा नमक खाती हैं, उसका हक अदा कर दिया। मेरे
लिए जैसे राम वैसे भरत । मैं लौंडो से रानी तो होने की
नहीं। हाँ, तुम्हारे खिलाफ कोई बात होते देखती हूँ तो रहा
नहीं जाता। मेरे मुँह में लूका लगे, कहाँ से कहाँ मैंने यह
ज़िक्र छेड़ दिया कि सवेरे सवेरे डायन, चुडैल बनना पड़ा।
तुम जानो, तुम्हारा काम जाने ।
इन बातों ने आखिर कैकेयी पर असर किया। समझी,
ठीक ही तो है। रामचंद्र राजा होकर भरत को निकाल दें या
मरवा ही डालें तो कौन उनका हाथ पकड़ेगा? मैं भी
की मक्खी की तरह निकाल दी जाऊँगी। बहुत होगा, रोटी
और कपड़ा मिल जायेगा। राज पाकर सभी का मन बदल
।
३
राम चर्चा - - जाती है। राम को भी गरूर हो जाये तो क्या ताज्जुब है ! जभी कौसल्या मेरी इतनी खातिर करती हैं। यह सब मुझे तबाह करने की चालें हैं। यह सोचकर उसने मंथरा से कहा 'मंथरा देख, मेरी बातों का बुरा न मान। मैं क्या जानती थी कि मुझे और भरत को तबाह करने के लिए ये करिश्म- सौजिया हो रही हैं। मैं तो सीधी-सादी औरत हूँ। छक्का-पंजा क्या जानूँ! अब तूने यह बात समझायी तो मुझे भी हकीकत मालूम हो रही है। मगर अब तो तिलक की सायत मुकरर हो चुकी। कल सवेरे तिलक हो जायगा। अब हो ही क्या हैं Manbi सकता है ?, मंथरा होने को बहुत-कुछ हो सकता है। बस, ज़रा तिरिया-हठ से काम लेना पड़ेगा। मैं सारी तरको। बतला दूंगी। ज़रा उन लोगों की चालाकी देखो कि तिलक की सायत उस वक्त ठीक की जब राजकुमार भरत ननिहाल में हैं। सोचो, अगर दिल साफ होता तो दस-पाँच दिन और न ठहर जाते । भग्त के आ जाने पर तिलक होता तो क्या बिगड़ जाता ? मगर वहाँ तो दिलों में मैल भरा हुआ है। उनकी गैर-हाज़िरी में चुपके से तिलक कर देना चाहते हैं । कैकेयी-हाँ, तुझे यह बात भी खूब सूझी! शायद इसीलिए भरत को पहले से यहाँ से खिसका दिया गया है। पहले ही से यह बात सधी-बधी थी। अफसोस ! मुझे मिट्टी में
अयोध्या कांड
) با
मिलाने के लिए ऐसे ऐसे फितने गढ़े जाते रहे और मैं बे-
खबर बैठी रही। बतला, अब क्या करूँ ! मेरी तो अक्ल
कुछ काम नहीं करती।
मंथरा ने अपना कूबड़ हिलाकर कहा–वारी जाऊँ
महरानी, आप भी क्या बातें करती हैं ! आपको ईश्वर ने
ऐसा रूप दिया है और महाराज को आपसे ऐसी मुहब्बत है
कि रात भर में आप न जाने क्या क्या कर सकती हैं। आप
तो सारी बातें भूल जाती हैं। ऐसी भुलक्कड़ न होतीं तो
बैरियों को ऐसे फितने खड़े करने का मौका ही क्यों मिलता!
अब तक तो भरत का भी तिलक हो गया होता। तुम्हींने
एक बार मुझसे कहा था कि महाराज ने तुम्हें दो वरदान देने का
वादा किया है। क्या वह बात भूल गयीं ?
कैकेयी-हाँ, भूल तो गयी थी, पर अब याद आ
गया। एक बार महाराज लड़ाई के मैदान से जख्मी होकर
आये थे और मैंने मरहम-पट्टी करके रात भर में उन्हें अच्छा
कर दिया था। उसी वक्त उन्होंने मुझे दो वरदान दिये थे ।
मैंने कहा था कि मुझे आपकी दया से किस बात की कमी
है ? जब ज़रूरत होगी, माँग लूंगी।
मंथरा-बस फिर तो सारी बात बनी बनायी है,
आज तुम कोप-भवन में जाकर बैठ जाओ। जेवर वगैरह सब
उतार फेंको; सिर्फ एक मैली-कुचैली साड़ी पहन लेना और
राम चर्चा
३६
सिर के बाल खोलकर जमीन पर पड़ रहना । महाराज तुम्हारी
यह हालत देखते ही घबड़ा जायेंगे। बस, उसी वक्त दोनों वरों
की याद दिलाकर कहना कि अब उन्हें पूरा कीजिये। एक यह
कि राम के बदले भरत का तिलक हो, दूसरे यह कि राम को
चौदह बरस के लिए बन-बास दिया जाये। महाराज कौल
के पक्के हैं। ज़रूर ही मान जायेंगे । फिर मज़े से राज करना।
दिन तो जशन की तैयारियों में गुज़रा । रात को जब
राजा दशरथ कैकेयी, के महल में पहुँचे तो चारों तरफ अँधेरा
छाया हुआ, न कहीं गाना न बजाना, न राग न रंग! घबराकर
'एक लौंडी से पूछा-यह अँधेरा क्यों छाया हुआ है ? चारों
तरफ़ नहूसत क्यों फैली हुई है ? तू जानती है, महारानी
कैकेयी कहाँ हैं ? उनकी तबीयत तो अच्छी है ?
27 लौंडी ने कहा-महारानी जी ने गाने-बजाने की
मुमानियत कर दी है। वह इस वक्त कोप-भवन में हैं।
महाराज का माथा ठनका यह रंग में क्या भंग पड़ा?
ज़रूर कोई न कोई मुसीबत आनेवाली है। उनका दिल धड़कने
लगा। घबराये हुए कोप-भवन में गये तो देखा, कैकेयी ज़मीन
पर पड़ी सिसकियाँ भर रही है। 8755 \ /
राजा दशरथ कैकेयी को बहुत प्यार करते थे । उसकी
यह हालत देखते ही उनके हाथों के तोते उड़ गये। जमीन
पर बैठकर बोले-महारानी, खैरियत तो है! तुम्हारी तबीयत
-
-
अयोध्या कांड
आप भी
मुहब्बत करते
कैसी है ? जल्द बतलाओ, वरना मैं पागल हो जाऊँगा । क्या
बात हुई है ? तुम्हें किसीने कुछ ताना दिया है..? कोई बात
तुम्हारी मरज़ी के खिलाफ हुई है ? जिसने तुमसे यह गुस्ताखी
की है, उसको इसी वक्त सजा देगा।
ककेयी ने आँसू पोंछते हुए कहा-मुझे कुछ नहीं
हुआ है। बहुत अच्छी तरह हूँ। खाने को रोटियाँ, पहनने
को कपड़े और रहने को मकान मिल ही गया है। अब और
किस बात की कमी हो सकती है ?
ही हैं। जाइये, जशन मनाइये, मुझे पड़ी रहने दीजिये। जिसकी
किस्मत ही खराब हो, उसे आप क्या करेंगे!
राजा ने कैकेयी को जमीन से उठाने की कोशिश करके
कहा-महारानी, ऐसी बातें न करो। मुझे सदमा होता है।
तुम्हें मालूम है, मैं तुमसे कितनी मुहब्बत करता हूँ। मैंने
कभी तुम्हारी मर्जी के खिलाफ कोई काम नहीं किया । तुम्हें
जो शिकायत हो, साफ साफ कह दो। मैं वादा करता हूँ कि
इसी वक्त उसे पूरा करूँगा ।।
कैकेयी ने त्योरियाँ बदलकर कहा-आप जितना
मुंह से कहते हैं उसका एक हिस्सा भी करते तो मेरी हालत
आज ऐसी खराब न होती। अब मुझे मालूम हुआ है कि आप
की यह मुहब्बत सिर्फ ज़बानी है। आप बातों से पेट भरना
खूब जानते हैं ; दुनियाँ आपको कौल का पक्का कहती है ।
है
राम चर्चा
आपके खानदान में लोग कौल के पीछे जान देते चले आये
हैं। मगर मुझसे तो आपने जितने वादे किये, उनमें एक भी
पूरा न किया । अब और किस मुँह से माँD ?
राजा-मुझे यह सुनकर सस्त ताज्जुब हो रहा है।
जहाँ तक मुझे याद है, मैंने तुम्हारे साथ जितने वादे किये हैं,
वे सब पूरे किये । वह कौनसा वादा है, जिसे मैंने पूरा नहीं
किया ? इसी वक्त पूरा करूँगा। इस जरा सी बात के लिए
तुम्हें कोप-भवन में बैठने की क्या जरूरत थी ?
कैकेयी सँभलकर उठ बैठी और बोली-याद कीजिये,
एक बार आपने मुझे दो बरदान दिये थे, जिस दिन आप
लड़ाई में जख्मी होकर लौटे थे
राजा-हाँ, याद आ गया। ठीक है, मैंने दो बरदान
दिये थे । मगर तुमने ही तो कहा था कि जब मुझे ज़रूरत
होगी, ले लूंगी।
कैकेयी-हाँ, मैंने ही कहा था । अब वह मौका आ
गया है। आप उन्हें पूरा करने को तैयार हैं ?
राजा-दिलो-जान से । अगर तुम जान भी मांगो
तो निकालकर दे दूँगा।
कैकेयी ने जमीन की तरफ़ ताकते हुए कहा-तो
सुनिये, मेरा पहला बरदान यह है कि राम के बदले भरत का
अयोध्या कांड
३९'
!
तिलक हो और दूसरा यह कि राम को चौदह बरस के लिए
बन-बास दिया जाय । काल
ओह, संगदिल कैकेयी ! तूने यह क्या किया ? तुझे
अपने बूढ़े शौहर पर ज़रा भी रहम नहीं आया ! क्या तुझे
मालूम नहीं कि रामचंद्र ही उनके जीवनाधार हैं ! राजा के
चेहरे का रंग जर्द पड़ गया। मालूम हुआ, साँप ने काट लिया
हो । एक ठंडी साँस भरकर बोले- 'कैकेयी, क्या तुम्हारे मुँह
से यह जहर के कतरे टपक रहे हैं ? क्या तुम्हारे दिल में राम
की तरफ से इतनी कदरत है ? राम का आज दुनियाँ में कोई
बदरवाह नहीं । वह राव की नजरों का तारा है। तुम्हारी
वह जितनी इज्जत करता है, उतनी शायद अपनी मां की नहीं
करता । तुमने आज तक कभी उसकी शिकायत न की । बल्कि
हमेशा उसकी खुल्क और मुख्यत की तारीफ किया करती थी।
आज यह काया-पलट क्यों हो गयी ? जरूर किसी दुश्मन ने
तुम्हारे कान भरे हैं और राम की बुराइयाँ की हैं ।
कैकेयी ने तुनककर कहा-कान तुम्हारे भरे गये हैं, मेरे
कान नहीं भरे गये हैं । अपना नफा और नुकसान जानवर तक
समझते हैं। क्या मैं जानवरों से भी गयी-गुज़री हूँ। सरीह देख
रही हूँ कि मेरा बाग़ वीरान किया जा रहा है ; क्या उसकी
हिफाजत न करूँ ? अपनी गर्दन पर तलवार चल जाने दूँ ?
आपको मैं अब तक साफदिल समझती थी। मगर अब मालूम
राम चर्चा हुआ कि आप भी जवानी मुहब्बत के सब्ज़ बाग दिखाकर मुझे तबाह करना चाहते हैं । कौसल्या रानी ने आपको ख़य मंत्र पढ़ाया है। उस नागन के काटे का इलाज नहीं । अब मैं दिखा दूंगी कि कैकयी भी राजा की लड़की है, किसी शूद्र- चमार की नहीं कि इन चालों को न समझे। राजा-कैकेयी ! मैं कभी झूठ नहीं बोला । मैं तुमसे सच कहता हूँ कि मैंने राम के तिलक का फ़ैसला खुद किया । कौसल्या ने इस मुआमिले में मुझसे एक लफ़्ज़ भी नहीं कहा । तुम्हारा उनपर शुबहा करना बे-इन्साफी है। राम ने भी कमी भरत के खिलाफ एक लफ़्ज़ नहीं कहा । मेरे लिए राम और भरत दोनों बराबर हैं। मगर हक तो बड़े लड़के ही का है । अगर मैं भरत का तिलक करना भी चाहूँ, तो क्या तुम समझती हो कि भरत इसे मंजूर करेंगे ; हरगिज नहीं । भरत के लिए यह गैर-मुमकिन है कि वह राम का हक छीनकर खुश हो । राम और भरत एक जान, दो कालिब हैं। तुमने इतने दिनों के बाद बरदान भी मांगे तो ऐसे, जो इस घर को बरबाद कर देंगे। शायद इस राज का खातमा ही कर दें ! अफसोस ! कैकेयी ने उँगली नचाकर कहा-अच्छा, तो क्या आपने समझा था कि मैं आपसे खेलने के लिए गुड़ियाँ माँगूंगी ! क्या किसी मजदूर की लड़की हूँ ? अब इन चिकनी- चुपड़ी बातों में आप मुझे न फंसा सकेंगे। आपको और इस M ? 1 अयोध्या कांड N घर के सब आदमियों को ख़ब देख चुकी । 'आँखें खुल गयीं। अगर आपको कौल के पक्के बनने का दावा है तो मेरे दोनों बरदान पूरे कीजिये । वर्ना फिर कभी रघुबंशी होने का घमंड न कीजियेगा। यह कलंक हमेशा के लिए अपने माथे पर लगा लीजिये कि रघुकुल के राजा दशरथ ने वादे किये थे, पर जब उन्हें पूरा करने का वक्त आया तो साफ निकल गये। राजा ने पेचो-ताब खाकर कहा -कैकयी ! क्यों जले जख्म पर नमक छिड़कती हो ? मैं अपने कौल से कभी नहीं फिरूँगा ; चाहे इससे मेरी ज़िन्दगी, मेरे खान्दान और मेरे राज का खातमा ही क्यों न हो जाय । शायद ब्रह्मा ने राम की तकदीर में बन-बास ही लिखा हो। शायद इसी हीले से इस खान्दान की तबाही लिखी हो। मगर इसका अपजश हमेशा के लिए तुम्हारे नाम के साथ लगा रहेगा ), मैं तो शायद यह चोट खाकर जिन्दा न रहूँगा। मगर मेरी यह बात गिरह में बाँध लो कि राम को बन-बास देकर तुम भरत के राज का सुख न देख सकोगी। कैकयी ने झल्लाकर कहा- यह आप भरत को बद- दुआ क्यों देते हैं ? भरत राजा होंगे। आपको उन्हें राज देना पड़ेगा। वह राजा हो जाय, यही मेरी ख्वाहिश है। मैं सुख देखने के लिए जिन्दा रहूँगी या नहीं; इसका हाल ईश्वर जाने ।"
राम चर्चा
राजा-यह तो मैं बड़ी खुशी से करने को तैयार
हूँ। मेरे लिये राम और भरत में कोई फर्क नहीं। मैं इसी
वक्त भरत को बुलाने के लिये आदमी भेज सकता हूँ। ज्यों
ही वह आ जायेंगे, उनका तिलक हो जायेगा । मगर राम को
"ब्न-बास देते हुए मेरे जिगर के टुकड़े हुए जाने हैं। हाय !
मेरा प्यारा राजकुमार चौदह साल तक जंगलों में कैसे रहेगा?
जो हमेशा फूलों की सेज पर सोया, वह पत्थर की चट्टानों पर
घास-पात का बिछौना बिछाकर कैसे सोयेगा ? कैकयी ! ईश्वर
के लिये मुझपर रहम करो ; इस खानदान पर रहम करो।
अपना दूसरा बरदान पूरा करने के लिये मुझे मजबूर न करो।
कैकयी ने राजा की तरफ़ देखकर आँग्वं नचायीं और
बोलीं, तो साफ साफ क्यों नहीं कहते कि मैं अपने वादे न
पूरे करूँगा। क्या मैं इतना भी नहीं समझती कि राम के
रहते ग़रीब भरत कभी आराम से बैठने न पायेगा राम
अपनी मीठी बातों से रिआया का दिल काबू में करके राज
में बग़ावत करा देंगे। भरत का ज़िन्दा रहना मुश्किल हो
जायेगा। मेरे दोनों बरदान आपको पूरे करने पड़ेंगे।
अब आपके धोखे में न आऊँगी।
राजा समझ गये कि कैकयी को समझाना अब बेकार
है । मैं जितना ही समझाऊँगा, उतना ही यह झल्लायेगी । सर
थामकर सोचने लगे कि क्या जवाब दें? मालम होता था,
४३५ d Pror अयोध्या कांड आँखों में अंधेरा छा गया है। कोई जिगर को चीरे डालता है । हाय ! जिंदगी की सारी आरजुएँ खाक में मिली जा रही हैं। ईश्वर! अगर तुम्हें यही करना था तो बेटे दिये क्यों ? वला से ला-बन्द रहता; जवान बेटे की मुसीबत तो न देखनी पड़ती। यह तीन तीन शादियाँ करने का नतीजा है ! बुढ़ापे में शादी करने का यह फल है ! उससे ज़्यादा बेबकूफ दुनियाँ में कोई इन्सान नहीं जो बुढ़ापे में शादी करता है। वह जान-बूझकर ज़हर का प्याला पीता है ! हाय ! सुबह होते ही गम मुझसे जुदा हो जायेंगे। मेरा प्यारा लखते-जिगर जंगलों की राह लेगा! भगवन! उससे पहले कि इसके बन-बास का लफ़्ज़ मेरी जवान से निकले, तुम मुझे इस दुनियाँ से उठा लेना। इससे पहले कि मैं उसे फकीराना-सूरत बनाये जंगल की तरफ जाते देखू, तुम मेरी आँखों को बेनूर कर देना । हाय ! काश, राम इतना फरमाबरदार न होता ; काश, वह मेरा हुक्म मानने से इनकार कर देता! कैकयी राजा को फिक्र में ग़क देखकर बोली-आप सोच क्या रहे हैं ? बोलिये, मेरी बातें मंजूर करते हैं या नहीं? राजा ने आँसुओं से भरी हुई आँखों से कैकयी को देखकर कहा- रानी ! यह पूछने की बात नहीं। अपने कौल से न फिरूँगा। तुम्हारी दोनों बातें मंजूर हैं। तुम इतनी हसीन होकर दिल की इतनी स्याह हो, इसका मुझे वहम व
राम चची
स
गुमान न था। मैं न जानता था कि तुम मेरे दोनों बरदानों
का यह इस्तेमाल करोगी। खैर, तुम्हारा राज तुमको मुबारक
हो। प्यारे राम! मुझे मुआफ करना। तुम्हारा बाप जिसने
तुम्हें गोद में खिलाया, आज एक औरत के फरेब में पड़कर
तुम्हारी गरदन पर तलवार चला रहा है। मगर बेटा! देखना
रघुकुल के नाम को दाग न लगने पाये।
यह कहते कहते राजा बेहोश हो गये । कैकयी दिल में
खुश हो रही थी कि कल से अयोध्या में मेरे नाम का डंका
बजेगा। वह सवेरे किसी कासिंद को कश्मीर भेजकर भरत
को बुलाने के मंसूबे बाँध रही थी। 'अहा! वह घड़ी कितनी
मुबारक होगी ! जब भरत अयोध्या के राजा होंगे।' राजा,
थोड़ी थोड़ी देर के बाद करवट बदलते और कराहते थे।
'हाय राम! हाय राम!" इसके सिवा उनके मुँह से और
कोई लफ़्ज न निकलता था।"
इस तरह सारी रात गुज़र गयी। सुबह को शहर के
रऊसा, विद्वान, ऋषि, मुनि और दरबार के उमराव तिलक की
रसम अदा करने के लिये हाजिर हुए। हवन कुंड में आग
जलाई गयी। आन्नार्य का वेद-मन्त्रों का पाठ करने लगे।
फकीरों का एक जम्मे-ग़फ़ीर खैरात के रुपये लेने के लिए
फाटक पर जमा हो गया। लोगों की आँखें राजमहल के
दरवाजे की तरफ लगी हुई हैं। राजा साहब आज क्यों इतनी
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अयोध्या कांड
देर कर रहे हैं, हर शख़्स अपने पास बैठे हुए आदमी से यही
सवाल कर रहा है। शायद राजसी-पोशाक पहन रहे हों।
मगर नहीं, वे तो बहुत तड़के उठा करते हैं। अंदर से
कोई खबर भी नहीं आती। रामचंद्र स्नान-पूजा से फारिग
होकर बैठे हैं। जानकी भी जेबरों से आरास्ता हैं । कौसल्या
की खुशी का अंदाज़ा कौन कर सकता है ? महल में
मुबारक-बादियाँ गायी जा रही हैं। दरवाजे पर नौबत बज
रही है। पर दशरथ का पता नहीं।
आखिर गुरु वसिष्ठ ने साइत टलते देखकर मंत्री सुमन्त्र
को महल में भेजा कि जाकर महाराज को बुला लाओ। सुमंत्र
अंदर गये, तो क्या देखते हैं कि महाराज ज़मीन पर पड़े
कराह रहे हैं और कैकयी दरवाजे पर खड़ी है। सुमन्त्र ने
रानी कैकयी को प्रणाम किया और बोले-महाराज की नींद
क्या अभी नहीं टूटी ? बाहर गुरु वसिष्ठ जी बैठे हुए हैं।
तिलक का मुहूर्त टला जा रहा है। आप ज़रा उन्हें जगा दें।
कैकयी बोली-महाराज को खुशियों के मारे आज
रात भर नींद नहीं आयी। इस वक्त ज़रा आँख लग गयी
है । अभी जगा दूंगी तो उनका सिर भारी हो जायेगा। तुम
जरा जाकर रामचंद्र को अंदर भेज दो। महाराज उनसे कुछ
कहना चाहते हैं।
सुमंत्र ने कयाफे से ताड़ लिया कि ज़रूर कोई फ़ितना
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राम चर्चा
खड़ा हुआ है। जाकर रामचंद्रजी से यह पैगाम कहा।
रामचंद्र फौरन अंदर आकर राजा दशरथ के सामने खड़े हो
गये और प्रणाम करके बोले -पिताजी, मैं हाज़िर हूँ, मुझे
क्यों याद फरमाया है ?
दशरथ ने एक बार बेकसाना-निगाहों से रामचंद्र को
देखा और एक ठंडी साँस भरकर सर झुका लिया। उनकी
आँखों से आँसू जारी हो गये। रामचंद्र को अंदेशा हुआ
कि शायद महाराज मुझसे नाराज़ हैं। बोले-माताजी!
पिताजी ने मेरी बातों का कुछ जवाब नहीं दिया। शायद
वह मुझसे नाराज हैं।
कैकयी बोली-नहीं बेटा, वे तुमसे नाराज नहीं हैं।
तुमसे वह इतनी मुहब्बत करते हैं। तुमसे नाराज क्यों होने
लगे? वे तुमसे कुछ कहना चाहते हैं। मगर इस खौफ से
कि शायद तुम्हें बुरा मालूम हो, या तुम उनका हुक्म न
मानो, कहते हुए झिझकते हैं। इसलिये अब मुझी को कहना
पड़ेगा। बात यह है कि अर्सा गुज़रा, महाराज ने मुझसे दो
वादे किये थे। आज वे उन वादों को पूरा करना चाहते हैं।
अगर तुम उनको पूरा करने के लिये तैयार हो तो मैं कहूँ ?
राम ने बेखौफ लहजे में कहा-माताजी, मेरे लिये पिता
का हुक्म मानना फज़ है। दुनियाँ में ऐसी कोई ताकत नहीं
जो मुझे यह फ़र्ज़ पूरा करने से रोक सके। आप जरा भी
अयोध्या कांड
४७
ताम्मुल न करें। मैं ब-सरो-चश्म उनके हुक्म की तामील
करूँगा। मेरे लिये इससे ज़्यादा रखुशनसीवी की और क्या
बात होगी।
कैकयी-हाँ! सपूत बेटों का धर्म तो यही है । महाराज
ने अब तुम्हारी जगह भरत का तिलक करने का फैसला किया
है और तुम्हें चौदह साल के लिये बन-बास दिया है। महाराज
ये बातें अपने मुँह से न कह सकेंगे । मगर वे जो कुछ चाहते
हैं, वह मैंने तुमसे कह दिया। अब मानना तुम्हारे अख्तियार
में हैं। अगर तुमने न माना तो दुनियाँ में गजा पर यह
इलज़ाम लगेगा कि उन्होंने अपने कौल को पूरा न किया,
और तुम्हारे सिर यह कि बात के हुक्म को न माना ।
रामचंद्र यह हुक्म सुनकर ज़रा देर के लिये सहम उठे।
क्या समझते थे, और क्या हुआ! सारी कैफियत उनकी
समझ में आ गयी। अगर वे चाहते तो इस हुक्म की परवाह
न करते। सारी अयोध्या उनके नाम पर मरती थी। मगर
सआदतमंद बेटे बाप के हुक्म को ईश्वर का हुक्म समझते
हैं। राम ने उसी वक्त इरादा कर लिया कि मुझपर चाहे जो
कुछ गुजरे ; बाप का हुक्म मानना मुकद्रम है। बोले-
माताजी, मेरी तरफ से आप ज़रा भी अंदेशा न करें। में आज
ही अयोध्या से चला जाऊँगा। आप किसी क्रासिद को
भेजकर भरत को बुला भेजिये । मुझे उनके राज-तिलक होने
४८
राम चर्चा
का ज़रा भी मलाल नहीं है। मैं अभी माता कौसल्या से
पूछकर और सीताजी को तशफ़्फ़ी देकर जंगल की राह लूंगा।
यह कहकर रामचंद्र ने राजा के कदमों पर सर झुकाया;
माता कैकयी को प्रणाम किया और कमरे से बाहर निकले।
राजा दशरथ के मुँह से रंज या ग़म का एक लफ़्ज़ भी न
निकला। ज़बान उनके
काबू
में न थी। ऐसा मालूम हो रहा
था, गोया रगों से जान निकली जा रही है। जी में आता
था, राम के पैर पकड़कर रोक लूँ। अपने ऊपर गुस्सा आ
रहा था। कैकयी के ऊपर गुस्सा आ रहा था। ईश्वर से प्रार्थना
कर रहे थे कि मुझे मौत आ जाये । इसी वक्त इस ज़िन्दगी
का खात्मा हो जाये। सीना फटा जाता था। आह! मेरा
प्यारा बेटा इस तरह चला जा रहा है और मैं ज़बान से
तशफ़्फ़ी का एक कलमा भी नहीं निकाल सकता। कौन
वाप इतना बेरहम होगा। यह सोचते सोचते राजा को फिर
गश आ गया।
रामचंद्र यहाँ से कौसल्या के पास पहुंचे। वे उस वक्त
गरीबों को ग़ल्ला और कपड़े देने का इंतजाम कर रही थीं।
राम को देखते ही बोलीं-क्या हुआ बेटा ?. राजा बाहर गये
कि नहीं ? अब तो देर हो रही है।
रामचंद्र ने आवाज़ को सँभालकर कहा--माताजी,
मुआमला कुछ और हो गया। महाराज ने अब भरत को राज
अयोध्या कांड
देने का फैसला किया है और मुझे चौदह वरस के बन-बास
का हुक्म दिया है। मैं आपसे इजाजत लेने आया हूँ।
आज ही अयोध्या से चला जाऊँगा।
रानी कौसल्या को सकता सा हो गया । रामचंद्र की
तरफ़ बेहिस आँखों से ताकती हुई रह गयीं; गोया कोई मिट्टी
की मूरत हो।
लक्ष्मण भी वहीं खड़े थे। ये वातें सुनते ही उनकी
त्योरियों पर बल पड़ गये । आँखों से चिनगारियाँ निकलने
लगी । बोले—यह नहीं हो सकता । हरगिज़ नहीं हो सकता।
भरत कभी लक्ष्मण के जीते जी अयोध्या के राजा नहीं हो
सकते । आप क्षत्रिय हैं। अपने हक के लिए जंग करना क्षत्रिय
का धर्म है । सारी अयोध्या, सारा कोसल आपकी तरफ़ है ।
फौज आपका इशारा पाते ही आपकी तरफ आ जायगी।
भरत अकेले कर ही क्या सकते हैं। यह सब रानी कैकयी
की साजिश है।
रामचंद्र ने लक्ष्मण की तरफ मुहब्बत-आमेज नज़रों से
देखकर कहा-भइया, कैसी बातें करते हो? रघुकुल में जन्म
लेकर बाप का हुक्म न मानें तो दुनियाँ को क्या मुँह दिखा-
ऊँगा। तकदीर में जो लिखा है, वह पूरा होकर रहेगा। उसे
कौन टाल सकता है ?
लक्ष्मण-, भाई साहब! तकदीर की आड़ वे लोग
राम चर्चा
लेते हैं, जिन में हौसला और हिम्मत नहीं होती । आप क्यों
तकदीर की आड़ लें। आपके अत्रुओं के एक इशारे पर
सारी अयोध्या में तूफान बर्षा हो जायेगा। किस्मत अहले-
हिम्मत की लौंडी है। उनकी रानी नहीं। अगर आप मुझे
इजाजत दें तो मैं इस तीरो-कमान के ज़ोर से तकदीर को
आपके कदमों पर गिरा हूँ। फिर आपसे महाराज ने अपनी
ज़बाने-मुबारक से तो कुछ कहा नहीं।
कुछ कहा नहीं। क्या यह मुमकिन
नहीं कि रानी कैकयी ने अपनी तरफ से यह फ़ितने खड़े
किये हों?
रानी कौसल्या ने आँसू पोंछते हुए कहा—बेटा, मुझे इस
बात की तो सच्ची खुशी है कि तुम अपने काबिल-एहतराम बाप
का हुक्म मानने के लिए अपनी ज़िन्दगी को कुर्बान करने को
तैयार हो । मगर मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि लक्ष्मण का
ख्याल ठीक है। कैकयी ने अपनी तरफ़ से यह फरेब रचा है।
रामचंद्र ने अदब के साथ कहा-माताजी! पिताजी
वहीं मौजूद थे। अगर रानी कैकयी ने उनकी मरज़ी के
खिलाफ कोई बात कही होती तो क्या वह कुछ एतराज़ न
करते! नहीं माताजी! फर्ज से मुंह मोड़ने के लिए हीले
हूँढना मैं धर्म के खिलाफ समझता हूँ। कैकयी ने जो कुछ कहा
है पिताजी की रजामंदी से कहा है। मैं उनके हुक्म को
किसी तरह नहीं टाल सकता। आप मुझे अब जाने की
अयोध्या कांड
इजाजत दें। अगर जिन्दा रहा तो फिर आपके कदमों की
ज़ियारत करूँगा।
कौसल्या ने रामचंद्र का हाथ पकड़ लिया और बोली
बेटा, आखिर मेरा भी तो तुम्हारे ऊपर कोई हक है। अगर
राजा ने तुम्हें बन-बास का हुक्म दिया है तो मैं तुम्हें इस हुक्म
को मानने से मना करती हूँ। अगर तुम मेरा कहना न
मानोगे तो मैं दाना-पानी त्याग दूंगी और तुम्हारे ऊपर माता
की हत्या का इलज़ाम लगेगा।
रामचंद्र ने एक सर्द आह खींचकर कहा-माताजी!
मुझे फ़ज़ के सीधे रास्ते से न हटाइये । वरना जहाँ मुझपर
धर्म को तोड़ने का इलज़ाम लगेगा, वहाँ आप भी उस इलज़ाम
से न बच सकेंगी। मैं कोह व बयावान, चाहे जहाँ रहूँ
मेरी आत्मा सदा आपके चरणों के पास मौजूद रहेगी।
आपकी मुहब्बत बहुत रुलायेगी। आपकी मुकद्दस सूरत देखने
के लिए आँखें बहुत रोयेंगी। पर बन-बास में ये तकलीफें
न होती तो तकदीर मुझे वहाँ ले ही क्यों जाती। कोई लाख
कहे, मगर इस ख़्याल को दूर नहीं कर सकता कि तकदीर
ही मुझे यह खेल खिला रही है ; वरना क्या कैकयी-सी देवी
मुझे बन-बास देती!
लक्ष्मण बोले-कैकयी को आप देवी कहें ; मैं नहीं
कह सकता।
राम चर्चा ५२ 52 रामचंद्र ने लक्ष्मण की तरफ़ नाराजगी के अंदाज से देखकर कहा-लक्ष्मण ! मैं जानता हूँ कि तुम्हें मेरे बन-बास से बहुत मलाल हो रहा है, मगर मैं तुम्हारे मुँह से माता कैकयी की शान में कोई बेअदबी की बात नहीं सुन सकता। कैकयी हमारी माता हैं। तुम्हें उनकी इज्जत करनी चाहिए। मैं इसलिए बन-बास नहीं ले रहा हूँ कि यह कैकयी की ख़्वाहिश है। बल्कि इसलिए कि अगर मैं न जाऊँ तो महाराज का वादा झूठा होता है। दो चार दिन में भरत आ जायेंगे। जैसी मुझसे मुहब्बत करते हो, वैसी ही उनसे मुहब्बत करना। अपने कौल या फेल से यह हरग़िज़ मत जाहिर करना कि तुम उनके ख़्वाह हो । बार-बार मेरी चर्चा भी न करना; वरना शायद भरत को नागवार गुज़रे । लक्ष्मण ने गुस्से से सुख होकर कहा-भइया, बार- बार भरत का नाम न लीजिये । उनके नाम ही से मेरे जिस्म में आग लग जाती है। हर चंद गुस्से को रोकना चाहता हूँ। पर हक्क को यों मिटते देखकर दिल काबू से बाहर हो जाता है। भरत का राज पर कोई हक नहीं। राज आपका है और मेरे जीते जी कोई उसे आपसे नहीं छीन सकता। क्षत्रिय अपने हक के लिए लड़कर मर जाता है। मैं खून की नदी बहा दूंगा। लक्ष्मण का गुस्सा बढ़ते देखकर राम ने कहा - लक्ष्मण !
अयोध्या कांड
Mainalisanimaa
होश में आओ। यह गुस्सा और जंग का मौका नहीं है ।
यह महाराजा दसरथ के कौल को निभाने की बात है। मैं
इस फर्ज को किसी हालत में भी नहीं तोड़ सकता। मेरा
बन जाना यकीनी है। फ़ज़ के मुकाबले में जिस्मानी आराम
और
आसाइश की कोई हकीकत नहीं।
लक्ष्मण को जब मालूम हो गया कि रामचंद्र ने जो
इरादा कर लिया है उससे टल नहीं सकते, तो बोले-अगर
आपका यही फैसला है तो मुझे भी साथ लेते चलिये।
आपके बगैर मैं यहाँ एक दिन भी नहीं रह सकता। जब
आप बन में घूमेंगे तो मैं इस महल में क्यों कर रह सकूँगा!
आपके बगैर यह राज्य मुझे श्मशान-सा लगेगा। जब से
मैंने होश संभाले, कभी आपके कदमों से जुदा नहीं हुआ ।
अब भी उनसे लिपटा रहूँगा।
रामचंद्र ने लक्ष्मण को मुहब्बत-आमेज़ नजरों से
देखा । छोटे भाई को मुझसे कितनी उलफत है। मेरे लिए
जिन्दगी के सारे आगम व आसाइश पर लात मारने के लिए
नैयार है। बोले नहीं लक्ष्मण, इस ख्याल को तर्क कर
दो। भला सोचो तो, जब तुम भी मेरे साथ चले जाओगे
तो माता कौसल्या और सुमित्रा किसका मुंह देखकर रहेंगी।
कौन उनके दुख के बोझ को हल्का करेगा ? भरत के राजा
होने पर रानी कैकयी स्याहो-सफेद की मालिक होंगी।
PPPMADRAPAN
राम चर्चा 4 मुमकिन है, वह हमारी माताओं को किसी किस्म की तकलीफ़ दें। उस वक्त कौन उनकी मदद करेगा! नहीं, तुम्हारा मेरे साथ चलना मुनासिब नहीं। लक्ष्मण-नहीं भाई साहब ! मैं आपके बगैर किसी तरह नहीं रह सकता। भरत की जानिब से इस किस्म का अंदेशा नहीं हो सकता ; वह इतना बुज़दिल और कमीना नहीं हो सकता। रघु रघु के खानदान में ऐसा कमीना इंसान पैदा ही नहीं हो सकता। आपका साथ मैं किसी तरह नहीं छोड़ सकता। रामचंद्र ने बहुत समझाया; मगर जब लक्ष्मण किसी तरह न माने तो उन्होंने कहा-खैर, अगर तुम नहीं मानते तो मैं तुम्हारे साथ जबर्दस्ती नहीं कर सकता। मगर पहले जाकर माता सुमित्रा से तो पूछ आओ। लक्ष्मण ने जब सुमित्रा से बन जाने की इजाजत मांगी तो उन्होंने उसे सीने से लगाकर कहा-शौक से बन जाओ, बेटा! मैं तुम्हें खुशी से इजाजत देती हूँ। मुसीबत में भाई ही भाई के काम आता है। राम से तुम्हें जितना उन्स है, उसका तकाजा यही है कि तुम इस कठिन वक्त में उनका साथ दो। मैं सदा तुम्हें आशीर्वाद देती रहूँगी । इसी असना में सीताजी को भी राम के बन-बास की खबर मिली। वे अच्छे अच्छे जेवरों से आरास्ता होकर राज-
अयोध्या कांड
-
तिलक के लिए तैयार थीं। यकायक यह गमनाक खबर
मिली और मालूम हुआ कि राम तनहा जाना चाहते हैं तो
दौड़ी हुई आकर उनके कदमों पर गिर पड़ी और बोली-
स्वामी, आप बन जाते हैं तो मैं यहाँ अकेली कैसे रहूँगी ?
मुझे भी साथ चलने की इजाजत दीजिये। आपके बगैर
मुझे यह महल फाड़े खायेगा। फूलों की सेज कांटों की तरह
गड़ेगी। आपके साथ जंगल भी मेरे लिए बाग है।
आपके बगैर बारा भी जंगल है।
कौसल्या ने सीता को गले से लगाकर कहा-बेटी!
तुम भी चली जाओगी तब मैं किसका मुँह देखकर जिऊँगी।
फिर तो घर ही सूना हो जायेगा। सोचती थी कि तुम्हीं को
देखकर दिल को तस्कीन दूंगी। मगर अब तुम भी बन जाने
को तैयार हो; ईश्वर!
अब और कौनसा
दुख दिखाना चाहते
हो? क्यों इस अभागिन को नहीं उठा लेते !
रामचंद्र को यह ख़्याल भी न हुआ था कि सीताजी
उनके साथ चलने को तैयार होंगी, समझाते हुए बोले-सीता!
इस ख्याल बाज़ आओ। जंगल में बड़ी बड़ी तकलीफें
हैं। कदम कदम पर दरिन्दों का खौफ, जंगल के खं -
ख्वार आदमियों से साबिका, रास्ता कांटों और संगरेजों से
भरा हुआ, भला तुम्हारा नाजुक जिस्म ये सरित्तयाँ कैसे झेल
सकेगा? पत्थर की चट्टानों पर तुम कैसे सोओगी? पहाड़ों
से
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राम चर्चा
राम
का पानी ऐसा खराब होता है कि तरह तरह की बीमारियाँ
पैदा हो जाती हैं। तुम उन तकलीफों को कैसे वरदाश्त
कर सकोगी?
सीता आँखों में आँसू भरकर बोलीं- स्वामी ! जब
आप मेरे साथ होंगे तो मुझे किसी बात का खौफ़ न होगा ।
वह खुशी सारी तकलीफ़ों को मिटा देगी। यह कैसे हो सकता
है कि आप जंगलों में तरह तरह की सख्तियाँ झेलें और में
राजमहल में आराम से सोऊँ ! औरत का फ़र्ज़, अपने शौहर
का साथ देना है। वह खुशी और रंज हर हालत में उसकी
शरीक-ए-हाल रहती है। यही उसका सबसे बड़ा फर्ज है।
अगर आप सैर छ तफरीह के लिए जाते होते तो मैं आपके
साथ जाने पर ज़्यादा इसरार न करती। मगर यह जानकर
कि आपको हर तरह की तकलीफ़ होगी, मैं किसी तरह नहीं
रुक सकती। मैं आपके रास्ते से काँटे चुनूंगी आपके लिए
घास और पत्तों का सेज बनाऊँगी, आप सोयेंगे तो आपको
पंखा झलूंगी। इससे बढ़कर किसी औरत को और क्या सुख
हो सकता है ?
रामचंद्र लाजवाब हो गये। उसी वक्त तीनों आदमियों ने
शाही लिबास उतार दिये और फकीरों का-सा सादा कपड़ा
पहनकर कौसल्या से आकर बोले -माताजी, अब हमको
चलने की इजाजत दीजिये।
अयोध्या कांड कौसल्या ज़ारो-क्रतार रोने लगी, बोलीं-बेटा, किस मुंह से जाने को कहूँ। दिल को किसी तरह तस्कीन नहीं होती। धर्म का मुआमला है, रोक भी नहीं सकती। जाओ, मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ रहेगा। जिस तरह पीठ दिखाते हो, उसी तरह मुँह भी दिखाना । यह कहते कहते कौसल्या रानी फ़-ग़म से ग़श खाकर गिर पड़ीं। यहाँ से तीनों आदमी सुमित्रा के पास गये और उनके चरणों पर सर झुकाकर, रानी कैकयी के कोप- भवन में महाराजा दसरथ से रुखसत होने गये। राजा लाश- बेजान की तरह बे-हिसो-हरकत पड़े थे । तीनों आदमियों ने बारी बारी से उनके चरणों पर सर झुकाया, तब राम वोले- महाराज, मैं तो अकेला ही जाना चाहता था; मगर लक्ष्मण और जानकी किसी तरह मेरा साथ नहीं छोड़ते। इसलिए उन्हें भी लिये जाता हूँ। हमें आशीर्वाद दीजिये । यह कहकर जब तीनों आदमी वहाँ से चले तो राजा दसरथ ने ज़ोर से रोकर कहा-हाय राम! तुम कहाँ चले ? उनपर एक जनून की सी कैफियत छा गयी। नेक-व-बद का ख्याल न रहा। दौड़े कि पकड़कर रोक लें, मगर गश खाकर गिर पड़े। रात ही भर में उनकी हालत ऐसी खराब हो गयी थी, गोया वरसों के मरीज़ हों। अयोध्या में यह खबर मशहूर हो गयी थी। लाखों
राम चर्चा
?
wision
meermionline
?
आदमी राज-भवन के दरवाजे पर जमा हो गये थे। जब ये
तीनों आदमी फकीराना सूरत में रनवास से निकले तो सारी
रैय्यत जार ज़ार रोने लगी। सब हाथ जोड़ जोड़कर कहते
थे-महाराज आप न जायें; हम सब चलकर महारानी
कैकयी के कदमों पर सिर झुकायेंगे ; महाराज से मिन्नतें करेंगे।
आप न जायें। हाय ! अब हमें कौन पालेगा; कौन हमारे
साथ हमददी करेगा? हम किससे अपना दुख कहेंगे? कौन
हमारी सुनेगा ? हम तो कहीं के न रहे ।
रामचंद्र ने सबको समझाकर कहा-मुसीबत में सब के
सिवा और कोई चारा नहीं, यही आपसे मेरी दरख्वास्त है।
मैं हमेशा आप लोगों को याद करता रहूँगा।
राजा ने सुमंत्र को पहले ही बुलाकर कह दिया था कि
जिस तरह हो सके राम, सीता और लक्ष्मण को वापस
लाना । सुमंत्र रथ तैय्यार किये खड़ा था। रामचंद्र ने पहले
सीताजी को रथ पर बिठाया; फिर दोनों भाई बैठे और सुमंत्र
को रथ चलाने का हुक्म दिया। हज़ारों आदमी रथ के
पीछे दौड़े और बहुत समझाने पर भी रथ का पीछा न
छोड़ा। आखिर शाम को जब लोग तमसा नदी के किनारे
पहुँचे तो राम ने उन्हें दिलासा देकर रुखसत किया ।
इधर अयोध्या में कुहराम मचा हुआ था। मालूम
होता था, सारा शहर वीरान हो गया है। जहाँ कल सारा
अयोध्या कांड,
शहर चिरागों से जगमगा रहा था वहाँ आज तारीकी छायी
हुई थी। सुबह जहाँ शादियाने बज रहे थे, वहाँ इस वक्त हर
घर से रोने की आवाजें आती थीं। दूकानें बन्द थीं । जहाँ
दो आदमी मिल जाते यही जिक्र होने लगता-बेटा हो तो
ऐसा हो। बाप का हुक्म पाते ही राज-पाट पर लात मार
दी। संसार में ऐसा कौन होगा ? बड़े बड़े राजा एक एक
बालिश्त जमीन के लिए लड़ते मरते हैं। भाई भी हो तो
ऐसा हो। सबसे ज़्यादा तारीफ़ सीताजी की हो रही थी।
मों के लिए तो जंगल की तकलीफ सहना कोई गैर-मामूली
बात नहीं औरत के लिए गैर-मामूली बात थी। सती स्त्रियाँ
ऐसी होती हैं। जिसने कभी जमीन पर पाँव नहीं रखा,
वह जंगल में चलने के लिए तैयार हो गयी। सच है, बुरे वक्त
में ही औरत और दोस्त की परख होती है।
उधर रनवास मातमसरा बना हुआ था। किसी को.
तन-बदन की सुध न थी।
DURAisazUNAMIN
83840902088050. राजा दसरथ की वफ़ात तमसा (तौंस) नदी को पार करके पहर रात जाते जाते रामचंद्र गंगा के किनारे जा पहुंचे। वहाँ भील सदर गुह का राज था। रामचंद्र के आने की खबर पाते ही उसने आकर प्रणाम किया। रामचंद्र ने उसकी नीची जात का ज़रा भी ख्याल न करके उसे सीने से लगा लिया और खैर-व- आफियत पूछी । गुह सरदार बाग़ वाग़ हो गया। कोसल के राजकुमार ने उसे सीने से लगा लिया, इतनी इज़्ज़त उसके खानदान में और किसी को नसीब नहीं हुई थी। हाथ जोड़कर बोला-महाराज, आप गरीब-खाने को अपने कदमों से रोशन कीजिये । इस घर के नसीब भी जागें । जब मैं आपका सेवक यहाँ मौजूद हूँ तो आप यहाँ क्यों तकलीफ़ उठायेंगे ? रामचंद्र ने गुह की दावत मंजूर न की । जिसे वन-बास का हुक्म मिला हो, वह शहर में क्योंकर रहता। वहीं एक दरख्त के नीचे रात बसर की। दूसरे दिन अहल सुबह रामचंद्र ने सुमंत्र से कहा, अब तुम लौट जाओ। हम लोग यहाँ से पैदल जायेंगे। माताजी कह देना कि हम लोग खैरियत से हैं। घबराने की कोई बात नहीं। सुमंत्र ने रोकर कहा-महाराज दसरथ ने तो मुझे आप से
अयोध्या कांड
*
लोगों को वापस ले आने का हुक्म दिया था। खाली स्थ
देखकर उनकी क्या दशा होगी?
राम ने सुमंत्र को समझा-बुझाकर रुखसत किया।
सुमंत्र रोते हुए अयोध्या लौटे। मगर वह शहर के करीब
पहुँचे तो दिन बहुत बाकी था। उन्हें खौफ़ हुआ कि अगर
इसी वक्त अयोध्या चला जाऊँगा तो शहर के लोग हज़ारों
सवाल पूछ-पूछकर परेशान कर देंगे। इसलिये वे शहर के बाहर
रुके रहे। जब शाम हुई तो अयोध्या में दाखिल हुए।
इधर राजा दसरथ इस इंतजार में बैठे थे कि शायद
सुमंत्र राम को लौटा लाये । उम्मीद का इतना सहारा बाकी
था । कैकयी से नाराज होकर वे कौसल्या के महल में चले गये
थे और बार बार पूछ रहे थे कि सुमंत्र अभी लौटा या नहीं।
चिराग जल गया। अभी सुमंत्र नहीं आया। महाराज की
बेकरारी बढ़ने लगी। आखिर सुमंत्र राजमहल में दाखिल हुए।
दसरथ उन्हें आते देखकर दौड़े और दरवाजे पर आकर पूछा-
राम कहाँ है ? क्या उन्हें वापस नहीं लाये ? सुमंत्र कुछ न
बोल सके। पर उनका चेहरा देखकर महाराज की उम्मीद का
आखिरी तार भी टूट गया। वे वहीं गश खाकर गिर पड़े
और ' हाय गम' 'हाय राम' कहते हुए दुनियाँ से रुखसत हो
गये। मरने से पहले उन्हें उग अंधे तपस्वी की याद आयी
जिसके बेटे को आज से बहुत दिन पहले उन्होंने हलाक किया
राम चर्चा
अब
था। वह जिस तरह लड़के के लिए तड़प-तड़प कर मर गया
था, उसी तरह महाराज दसरथ भी लड़कों की जुदाई में तड़पकर
परलोक सिधारे। उसकी बद-दुआ ने आज असर दिखलाया।
रनवास में मातम बर्षा हो गया। कौसल्या महाराज
की लाश को गोद में लेकर विलाप करने लगी। उसी वक्त
कैकयी भी आ गयी। कौशल्या उसे देखते ही गुस्से से बोली,
तो
तुम्हारा
कलेजा ठंडा हुआ ! अब खुशियाँ मनाओ।
अयोध्या के राज का सुरव लूटो; यही चाहती थीं न ? लो,
मुराद बर आयी । अब कोई तुम्हारे राज में दखल देनेवाला नहीं
रहा । मैं भी कुछ घड़ियों की मेहमान हूँ। लड़का और बहू पहले
ही चले गये। अब स्वामी ने भी साथ छोड़ दिया। जिन्दगी
में मेरे लिए क्या रखा है ! पति के साथ सती हो जाऊँगी।
कैकयी सूरते-तस्वीर खड़ी रही। लौंडियों ने कौसल्या
की गोद से महाराज की लाश अलग की और कौसल्या को
दूसरी जगह ले जाकर तस्कीन देने लगीं। दरखार के अमीरों
को ज्यों ही खबर मिली सब के सब घबराये हुए आये और
रानियों को तस्कीन देने लगे। इसके बाद महाराज की लाश
को तेल में डुबोया गया जिससे सड़ न जाये और भरत को
बुलाने के लिए एक मोतबर कासिद खाना किया गया ।
उनके सिवा अब क्रिया-कर्म कौन करता ?
600kmsin भरत की वापसी जिस रोज़ महाराज दसरथ की वफ़ात हुई उसी रात को भरत ने कई डरावने ख़्वाब देखे । उन्हें बड़ी फ़िक्र पैदा हुई कि ऐसे बुरे ख्वाब क्यों दिखायी दे रहे हैं। न जाने अयोध्या में लोग खैरियत से हैं या नहीं। नाना से जाने की इजाजत माँगी। पर उन्होंने दो चार दिन और रहने के लिए इसरार किया। आखिर जल्दी क्या है ? कश्मीर की खूब सैर कर लो, तब जाना। अयोध्या में इस कुदरती दिल-कशी के सामान कहाँ मिलेंगे। मजबूर होकर भरत को रुकना पड़ा। उसके तीसरे दिन कासिद पहुँचा। उसे सख़्त ताकीद कर दी गयी थी कि भरत से अयोध्या के हालात का ज़िक्र न करना। इसलिए जब भरत ने कासिद से पूछा, क्यों भई ? अयोध्या में सब खैरियत है न? तो उसने कोई साफ जवाब न देकर तन्ज से कहा, 'जी हाँ, आप जिनकी खैरियत पूछते हैं, वे खैरियत से हैं।' कासिद भी दिल में भरत से बद- गुमान था। भरतजी को क्या खबर कि कासिद इस एक जुमले में क्या कह गया। उन्होंने नाना और माँम से इजाजत ली, और उसी रोज़ शत्रुघ्न के साथ अयोध्या के लिए रवाना हुए। रथ के घोड़े हवा से बातें करनेवाले थे। तीसरे ही दिन वे
राम चर्चा
६४०५
अयोध्या में दाखिल हुए। मगर यह शहर पर उदासी क्यों
छायी हुई है ? शहर वीरान-सा क्यों हो रहा है ? गली-कूचों
में खाक क्यों उड़ रही है ? बाजार क्यों बंद हैं ? रास्ते में
जो भरत को देखता था, बिला उनसे कुछ बातचीत किये,
विला खैर-व-आफियत पूछे या प्रणाम किये कतराकर निकल
जाता था। उनके आगे बढ़ आने पर लोग आपस में सरगोशियाँ
करने लगते थे। भरत की समझ में कुछ न आता था कि
राज़ क्या है ? कोई उनसे मुखातिब भी न होता था कि उससे
कुछ पूछे । राजमहल तक पहुँचना उनके लिए मुश्किल हो
गया। राजमहल पहुंचे तो उसकी हालत और भी अवतर थी।
मालूम होता था उसकी जान निकल गयी है। सिर्फ लाश
बाकी है। नहूसत मंडला रही थी। कई दिन से दरवाज़े पर
झाडू तक न दी गयी थी। दो चार संतरी के चपरासी खड़े
जम्हाइयाँ ले रहे थे। वे भी भरत को देखकर एक कोने में
दुवक गये, गोया उनकी सूरत भी नहीं देखना चाहते ।
दरवाजे पर पहुँचते ही भरत और शत्रुघ्न स्थ से कूदकर
अंदर दाखिल हुए । महाराज अपने कमरे में न थे। भरत ने
समझा, जरूर कैकेयी माता के घर में होगे। वे अक्सर कैकयी।
ही के महल में रहते थे। लपके हुए माता के पास गये ।
महाराज का वहाँ भी पता न था। कैकयी बेवाओं के से
लिबास पहने खड़ी थी। भरत को देखते ही वे खुशी. से फूली
अयोध्या कांड
न समायीं। आकर भरत को गले से लगा लिया और
बोली-जीते रहो बेटा, रास्ते में कोई तकलीफ़ तो न हुई ?
भरत ने माता की तरफ़ तअज्जुब से देखकर कहा-
जी नहीं, बड़े आराम से आया। महाराज कहाँ हैं ? ज़रा
उन्हें प्रणाम तो कर लूं।
कैकयी ने ठंडी आह खींचकर कहा-बेटा! उनकी
बात क्या पूछते हो, उन्हें परलोक सिधारे तो आज एक हफ़्ता
गया। क्या तुमसे अभी तक किसीने नहीं कहा ?
भरत के सर पर गोया ग़म का पहाड़ टूट पड़ा। सिर
में चक्कर-सा आने लगा। वे खड़े न रह सके। जमीन पर
बैठकर रोने लगे । जब ज़रा जी संभला तो बोले-उन्हें क्या
हुआ था, माताजी ? क्या बीमारी थी ? हाय, मुझ बद-नसीब
को उनके आखिरी दर्शन भी नसीव न हुए।
कैकयी ने सर झुकाकर कहा-बीमारी तो कोई नहीं
थी, बेटा ! राम, लक्ष्मण और सीता के बन-बास के सदमे से
उनकी मौत हुई। राम पर तो वे जान देते थे।
भरत की रही सही जान भी नाखूनों में समा गयी। मिर
पीटकर बोले-भाई रामचंद्र ने ऐसा कौनसा पाप किया था,
माताजी, कि उनको बन-बान की सज़ा दी गयी ? क्या
उन्होंने किसी ब्राह्मण का खून किया था, या किसी गैर-औरत
राम चर्चा ? पर बुरी निगाह डाली थी ? धर्म के अवतार रामचंद्र को देस- निकाला क्यों हुआ कैकयी ने सारी कैफियत तफ़सील के साथ बयान की और मंथरा को खूब सराहा । जो कुछ हुआ इसी की मदद से हुआ । अगर इसकी मदद न होती तो मेरे किये कुछ न हो सकता और रामचंद्र का राज-तिलक हो जाता । फिर तुम और मैं कहीं के न रहते । गुलामों की तरह जिंदगी बसर करनी पड़ती। इसीने मुझे राजा के दिये हुए दो बरदानों की याद दिलायी और मैंने दोनों बरदान पूरे करा लिये। पहला था, रामचंद्र का बन-बास ; वह तो पूरा हो गया । अकेले राम ही नहीं गये ; लक्ष्मण और सीता भी उनके साथ गये। दूसरा बरदान बाकी है । वह कल पूरा हो जायगा, तुम्हें गद्दी मिलेगी। कैकयी ने दिल में समझा था कि उसकी कारगुजारी की दास्तान सुनकर भरत उसका बहुत एहसान मानेंगे। बात कुछ और ही हुई । भरत के तेवरों पर शिकन पड़ गया और आँखें गुस्से से सुख हो गयीं । कैकयी की तरफ नफरत आमेज निगाहों से देखकर बोले-माता! तुमने मुझे दुनिया में कहीं मुंह दिखाने के लायक न रखा। तुमने जो काम मेरी भलाई के लिए किया, वह मेरे नाम पर हमेशा के लिए स्याह- दाग लगा देगा। दुनियां यही कहेगी कि इस मुआमले में भरत की जरूर साज़िश होगी। अब मेरी समझ में आया मगर !
अयोध्या कांड ६७ 61 कि क्यों अयोध्या के लोग मुझे देखकर मुह फेर लेते थे। यहाँ तक कि दरबानों ने भी मुझसे मुखातिब होना मुनासिब न समझा। क्या तुमने मुझे इतना सिफला समझ लिया कि मैं रामचंद्र का हक छीनकर खुशी से राज करूँगा। रघुकुल में ऐसा कभी नहीं हुआ। इस खानदान का हमेशा से यही उसूल रहा है कि बड़ा लड़का गद्दी पर बैठे । क्या यह बात तुम्हें मालूम नहीं थी ? हाय ! तुमने रामचंद्र जैसे देवता-ए-सिफ़त आदमी को बन-बास दिया, जिसकी जूतियों का तस्मा खोलने के काबिल भी मैं नहीं । माता, मुझे तुम्हारी इज्जत करनी चाहिए। लेकिन जब तुम्हारी हरकतों को देखता हूँ तो बे-अख्तियार सख्त अलफाज़ मुँह से निकल आते हैं। तुमने इस खानदान को मलिया-मेट कर दिया। हरिश्चन्द्र और मांधाता के खानदान की इज्जत खाक में मिला दी। तुम्हीं ने मेरे सत्यवादी पिता की जान ली । तुम हत्यारिनी हो । यह राज-पाट तुम्हें मुबारक हो । भरत इसकी तरफ़ आँख उठाकर भी न देखेगा। यह कहते हुए भरत रानी कौसल्या के पास गये और उनके चरणों पर सिर रख दिया । कौसल्या को क्या मालूम था कि इस वक्त भरत कैकयी को कितना सस्तो-सुस्त कह आये हैं। बोलीं-तुम आ गये बेटा! लो, तुम्हारी माता की मुराद वर आयी । तुम उन्हें लेकर मज़े से राज करो । मुझे राम के पास पहुँचा दो। मैं अब यहाँ रहकर क्या करूंगा ?
राम चर्चा " ये अल्फाज भरत के सीने में तीर की तरह लगे। आह ! माता कौसल्या भी मेरी तरफ से बद-गुमान हैं। रोते हुए बोले-माताजी, मैं आपसे सच कहता हूँ कि यहाँ जो कुछ हुआ है उसका मुझे मुतलक इल्म न था। माता कैकयी ने जो कुछ किया उसका फल उनके आगे आयेगा। मैं उन्हें क्या कहूँ। मगर मैं इसका यकीन दिलाता हूँ कि मैं राज न करूँगा। राज रामचंद्र का है और वे ही इसके मालिक हैं। मैं तो उनका सेवक हूँ। मैं क्रिया-कर्म से फ़ारिश होते ही जाकर रामचंद्र को मना लाऊँगा। मुझे उम्मीद है कि वे मेरी दरख्वास्त मान जायेंगे। मैंने पूर्व जन्म में न जाने ऐसे कौन से पाप किये थे कि यह कलंक मेरे माथे पर लगा। मुझसे ज़्यादा बदनसीब दुनियाँ में और कौन होगा, जिसके कारण पिताजी की जान गयी, रामचंद्र बन गये और मुल्क में जग- हँसाई हुई। देवी कौशल्या के दिल से सारे शकूक दूर हो गये । उन्होंने भरत को सीने से लगा लिया और रोने लगीं। मंथरा उस वक्त किसी काम से बाहर गयी हुई थी। उसे ज्यों ही मालूम हुआ कि भरत आये हैं, उसने सर से पांव तक गहने पहने, एक रेशमी साड़ी जेपतन की और छम-छम करती, कूबड़ हिलाती, अपने हुस्न-खिदमात की दाद लेने के लिए आकर भरत के सामने खड़ी हो गयी। भरत ने तो ,
अयोध्या कांड
उसे देखकर मुँह फेर लिया। मगर शत्रुघ्न अपने गुस्से को
न रोक सके। उन्होंने लपककर मंथरा के बाल पकड़ लिये और
कई लात और चूंसे जमाये । मंथरा हाय-हाय करने लगी
और महारानी कैकेयी की दुहाई देने लगी। आखिर भरत ने
उसे शत्रुघ्न के हाथ से छुड़ाया और वहाँ से भगा दिया।
जब भरत महाराजा के क्रिया-कर्म से फ़ारिग़ हुए तो
गुरु वसिष्ठ, शहर के उमराव और अले-दरबार ने उन्हें गद्दी
पर बैठाना चाहा । मगर भरत किसी तरह राजी न हुए।
बोले--आप लोग ऐसा काम करने के लिए मुझे मजबूर न करें,
जो मेरा लोक और परलोक दोनों मिट्टी में मिला देगा । भाई
रामचंद्र के रहते यह गैर-मुमकिन है कि मैं राज का ख्याल
दिल में भी लाऊँ। मैं उन्हें जाकर मना लाऊँगा और अगर
वे न आयेंगे तो मैं भी घर से निकल जाऊँगा । यही मेरा
आखिरी फैसला है।
लोगों के दिल भरत की तरफ से साफ हो गये । सब
उनकी नेक-नीयती की तारीफ़ करने लगे। यह बड़े बाप का
सपूत बेटा है। भाई हो तो ऐसा हो। क्यों न हो, ऐसे नेक
और धर्मात्मा लोग न होते तो दुनियाँ कायम कैसे रहती।
दूसरे दिन भरत अपनी तीनों माताओं को लेकर राम
को मनाने चले । गुरु वसिष्ठ और शहर के मुअज्ज़िजीन भी
उनके साथ साथ चले।
10..
చకూటమై
चित्रकूट
राम, लक्ष्मण और सीता गंगा नदी पार करके पैदल
चले जा रहे थे। अनजान रास्ता, दोनों तरफ घने जंगल,
बस्ती का कहीं पता नहीं, इस तरह वे प्रयाग पहुँचे । प्रयाग
में भारद्वाज मुनि का आश्रम था। तीनों आदमियों ने त्रिवेणी
में स्नान करके भारद्वाज के आश्रम में कयाम किया और रात
को उनके उपदेश सुनकर सुबह उनकी सलाह से चित्रकूट के
लिए रवाना हो गये। कुछ दूर चलने के बाद जमुना नदी
मिली। उस ज़माने में वह खित्ता बहुत आबाड़ नहीं था।
जमुना को पार करने के लिए कोई किश्ती न मिल सकी।
अब क्या हो, आखिर लक्ष्मण को एक हिकमत सूझी। उन्होंने
इधर-उधर से लकड़ी, शाखें जमा की और उसे छाल के रेशों
से बांधकर एक तख्ता-सा बना लिया। उस तलने पर हरी-
हरी पत्तियाँ विछा दीं और उसे पानी में डाल दिया । उसपर
तीनों आदमी बैठ गये। लक्ष्मण ने उस पनौती को खेकर
दम के दम में जमुना नदी पार कर ली।
नदी के उस पार कोहिस्तानी सर-ज़मीन थी। पहाड़ियाँ
हरी हरी झड़ियों से लहरा रही थीं। दरख़्तों पर मोरं, तोते
वगैरह परिंद चहक रहे थे। हिरनों के गोल वादियों में चरते
नज़र आते थे। हवा इतनी पाकीज़ा और सेहत-बख़्श थी
अयोध्या कांड
७१71
कि रूह को ताजगी हो रही थी। इस दिलकश मन्जर का
लुत्फ उठाते तीनों आदमी चित्रकूट जा पहुँचे । वाल्मीकि
ऋषि का आश्रम वहीं एक पहाड़ी पर था। तीनों आदमियों ने
पहले उनके दर्शन करना मुनासिब समझकर उनके आश्रम का
रुख किया वाल्मीकि ने उन्हें देखा तो बड़े तपाक से गले
लगा लिया और रास्ते की खैरो-आफियत पूछी। उन्होंने
योग के बल से उनको चित्रकूट आने का सबब जान लिया
था। बतलाने की ज़रूर न पड़ी। बोले-आप लोग खूब
आये ; आपको देखकर बड़ी मुसरत हुई। आप लोगों पर जो
कुछ गुज़री है, वह मुझे मालूम है । जिन्दगी खुशी और रंज
के
इत्तफाकात ही का नाम है । इन्सान को चाहिए कि सब
से काम ले।
राम ने कहा-आशीर्वाद दीजिये कि हमारे बन-बास
के दिन खैरियत से गुजरें।
वाल्मीकि ने जवाब दिया-राजकुमार, मेरे एक एक
रोएँ से तुम्हारे लिए आशीर्वाद निकल रहा है । तुमने जिस
त्याग से काम लिया है, उसकी मिसाल तारीख में कहीं नहीं
मिलती। धन्य है वह माता, जिसने तुम जैसा सपूत बेटा
पैदा किया। चित्रकूट तुम्हारे लिए बहुत अच्छी जगह है।
हमारी कुटी में काफी जगह है। हम सब यहाँ आराम से
रहेंगे।
७२
राम चर्चा
रामचंद्र को भी चित्रकूट बहुत पसंद आया । वहीं रहने
का फैसला किया। मगर यह मुनासिब न समझा कि ऋषि
"वाल्मीकि के छोटे से आश्रम में रहें। उनके रहने से जरूर
ऋषि को तकलीफ होगी, चाहे वह मुरव्वत के वाइस मुँह से
कुछ न कहें। अलहदा एक कुटी बनाने की तजवीज़ हुई।
लक्ष्मण को हुक्म मिलने की देर थी । जंगल से लकड़ी काट
लाये और शाम तक एक खूबसूरत आराम-देह कुटी तैयार कर
दी। उसमें खिड़कियाँ भी थीं, दरवाज़ा भी था । ताक भी थे।
सोने के अलग अलग कमरे भी थे। रामने यह कुटी देखी
तो बहुत खुश हुए। गृह-प्रवेश के तौर पर देवताओं की पूजा
की और कुटी में रहने लगे।
भरत और रामचंद्र इधर भरत अयोध्या-बासियों के साथ राम को मनाने के लिए चले जा रहे थे। जब वह गंगा नदी के किनारे पहुँचे तो भील सरदार गुह को उनकी फ़ौज देखकर शुवहा हुआ कि शायद यह रामचंद्र पर हमला करने जा रहे हैं। फौरन अपने आदमियों को जमा करने लगा। मगर बाद को जब भरत का इरादा मालूम हुआ तो उनके सामने आया और अपने घर चलने की दावत दी। भरत ने कहा--जब रामचंद्र ने बस्ती के बाहर दरख्त के नीचे रात बसर की तो मैं बस्ती में कैसे जाऊँ? बतलाओ, श्री रामचंद्र और सीताजी कहाँ सोये थे ? जब गुह ने उन्हें वह जगह दिखायी तो भरत बे-अख्तियार रो पड़े। हाय, वह, जिन्हें महलों में नींद नहीं आती थी, आज ज़मीन पर दरख़्त के नीचे सो रहे हैं। यह दिनों का फेर है । मुझ बद- नसीब की बदौलत उन्हें ये सारी तकलीफें हो रही हैं। इन घास के सख्त टुकड़ों से नाजुक-बदन सीता का जिस्म छिल गया होगा। रामचंद्र को मच्छरों ने रात भर दिक किया होगा। नींद न आयी होगी। लक्ष्मण ने जंगली जानवरों के खौफ से सारी रात पहरा देकर काटी होगी और मैं अभी तक शाही-लिबास पहने हुए हूँ। मुझे हज़ार बार धिक्कार है।
TA
७४
राम चर्चा
यह कहकर भरत ने उसी वक्त शाही-लिबास उतार फेंका
और फकीराना-लिबास पहन लिया। फिर उसी दरख्त के नीचे
उसी घास-फूस के विछावन पर रात भर पड़े रहे। उस दिन
से चौदह साल तक भरत ने फकीराना जिन्दगी बसर की।
दूसरे दिन भरत भारद्वाज मुनि के आश्रम में पहुँचे ।
वहाँ दर्याप्त करने पर मालूम हुआ कि रामचंद्र चित्रकूट की
तरफ गये हैं। रात भर वहाँ ठहरकर भरत मवेरे चित्रकूट
रवाना हो गये।
शाम का वक्त था। रामचंद्र और सीता एक चट्टान
पर बैठे हुए ग़रूबे-आफताब का नजारा देख रहे थे और लक्ष्मण
जरा दूर पर तीर और कमान लिए खड़े थे।
सीता ने दरख्तों की तरफ देखकर कहा-ऐसा मालूम
होता है कि इन पेड़ों ने सुनहरी चादर ओढ़ ली हो।
राम :-और पहाड़ियों की ऊदी शबनमी चादर
कितनी खूबसूरत मालूम होती है। कुदरत सोने का सामान
कर रही है।
सीता :-नीचे की घाटियों ने स्याह चादर से मुँह ढाँक
लिया।
राम :-और पसूनी को देखो, जैसे कोई नागिन
लहराती हुई चली जाती हो।
सीता:-केतकी के फूलों से कैसी सुगंध आ रही है।
75 अयोध्या कांड लक्ष्मण खड़े खड़े यकायक चौंककर बोले-भइया, वह सामने धूल कैसी उड़ रही है ? सारा आसमान गुबार- आलूदा हो गया। राम :-कोई चरवाहा भेड़ों का गल्ला लिए चला जाता होगा। लक्ष्मण:-नहीं भाई साहब! कोई फ़ौज है। घोड़े साफ नज़र आ रहे हैं। वह लो, रथ भी दिखाई देने लगे। रामचंद्र :-शायद कोई राजकुमार शिकार खेलने निकला हो। लक्ष्मण:-सब के सब इधर ही चले आते हैं। यह कहकर लक्ष्मण एक ऊँचे दरख्त पर चढ़ गये और भरत की फौज को गौर से देखने लगे। रामचंद्र ने पूछा-कुछ साफ नजर आता है ? लक्ष्मण :-जी हाँ, सब साफ नज़र आ रहा है। आप तीर-व-कमान लेकर तैयार हो जायें। मुझे ऐसा मालूम हो रहा है कि भरत फौज लेकर हमारे ऊपर हमला करने चले आ रहे । इन शाखों के बीच से भरत के रथ की झंडी साफ नज़र आ रही है। खूब पहचानता हूँ, भरत ही का रथ है। वही सुरंग घोड़े हैं। उन्हें अयोध्या का राज पाकर अभी तस्कीन नहीं हुई । आज सारा कजिया पाक कर दूंगा। रामचंद्र :- नहीं लक्ष्मण, भरत पर शुबहा न करो। भरत ७६ राम चर्चा इतना खुदग़र्ज, इतना बेमुरब्धत नहीं है। मुझे यकीन है कि वह हमें वापस ले चलने आ रहा है। भरत ने हमारे साथ कभी बुराई नहीं की। लक्ष्मण :-- उन्हें बुराई करने का मौका ही कब मिला, जो उन्होंने छोड़ दिया। आप अपने दिल की तरह औरों का दिल भी साफ समझते हैं। मगर मैं आपसे कहे देता हूँ कि भरत दगा करेंगे। वे यहाँ उसी नीयत से आ रहे हैं कि हम लोगों को मार कर अपना रास्ता हमेशा के लिए साफ कर लें। रामचंद्र-मुझे जीते जी भरत की तरफ से ऐसा गुमान नहीं हो सकता। अगर तुम्हें भरत का गद्दी पर बैठना बुरा मालूम होता हो तो मैं उनसे कहकर तुम्हें राज दिला सकता हूँ। मुझे उम्मीद है कि भरत मेरा कहना न टालेंगे। लक्ष्मण ने शर्मिन्दा होकर सर झुका लिया। रामचंद्र का यह ताना उन्हें बुरा मालूम हुआ। पर मुँह से कुछ नहीं बोले। उधर भरत को ज्यों ही ऋषियों की कुटियाँ नज़र आने लगीं, वह रथ से उतर पड़े और नंगे पाँव रामचंद्र से मिलने चले । शत्रुघ्न और सुमंत्र भी उनके साथ थे। कई कुटियों के बाद रामचंद्र की कुटी नज़र आयी। रामचंद्र कुटी के सामने एक पत्थर की चट्टान पर बैठे थे। उन्हें देखते ही भरत 'भइया,' 'भइया' कहते हुए बच्चों की तरह रोते दौड़े और रामचंद्र के पैरों पर गिर पड़े। रामचंद्र ने भरत को उठाकर
अयोध्या कांड
छाती से लगा लिया। शत्रुघ्न
ने भी आगे बढ़कर रामचंद्र
के कदमों पर सर झुकाया। चारों भाई गले मिले। इतने
में कौसल्या, सुमित्रा, कैकयी सब पहुँच गयीं। रामचंद्र
ने सब को प्रणाम किया। सीताजी ने भी सासों के पैरों
को आंचल से छुआ। सासों ने उन्हें गले से लगाया।
मगर किसी के मुँह से आवाज न निकलती थी। सबके गले भरे
थे और आँखों से आँसू जारी थे। बनवासियों का यह
साधुओं का-सा भेष देखकर सबका कलेजा फटा जाता था।
कैसी बेबसी है। कौसल्या सीता को देखकर बे-अल्तियार
रो पड़ीं। वह बहू जिसे वह पान की तरह फेरा करती थीं,
भिवारिणी बनी हुई खड़ी है । समझाने लगीं-बेटी, अब भी
मेरा कहा मानो, यहाँ तुम्हें बड़ी बड़ी तकलीफें होंगी। इतने
ही दिनों में सूरत बदल गयी है। बिल्कुल पहचानी नहीं
जातीं। मेरे साथ लौट चलो।
सीताजी ने कहा-अम्माजी ! जब मेरे स्वामी बन-बन
की खाक छानने फिरंगे तो मुझे अयोध्या में ही नहीं, स्वर्ग
में भी सुख न मिलेगा। औरत का धर्म पुरुष के साथ रहकर
उसके दुख-सुख में शरीक होना है । पुरुष को दुख में छोड़कर
जो औरत आराम की ख्वाहिश करती है, वह अपने फर्ज से
मुँह मोड़ती है। पानी के बगैर नदी की जो हालत होती है,
वही हालत शौहर के बगैर औरत की होती है।
७८ राम चर्चा रंज तो यह हुआ कौसल्या को सीता की बातों से खुशी भी हुई और रंज भी हुआ। कि यह नाज़-ब-नेमत में पली हुई लड़की यों विपत में जिंदगी के दिन काट रही है। खुशी यह हुई कि उसके ख़यालात इतने ऊँचे और पाफीजा हैं। बोलीं-धन्य हो बेटी, इसी को अस्मत कहते हैं। यही औरत का धर्म है। ईश्वर तुम्हें सुखी रखे और दूसरी औरतों को भी तुम्हारे रास्ते पर चलने की तौफिक दे। ऐसी ही देवियाँ इन्सान के लिए माय-नाज़ होती हैं। उन्हीं के नाम पर लोग इज्जत से सर झुकाते हैं। उन्हीं के जस घर- घर गाये जाते हैं। चारों भाई जब गले मिल चुके तो रामचंद्र ने भरत से पूछा-कहो भइया, तुम कश्मीर से कब आये ? पिताजी तो-खैरियत से हैं। तुम उनको छोड़कर नाहक चले अकेले बहुत घबरा रहे होंगे। भरत की आँखों से टप-टप आँसू गिरने लगे । भर्राई हुई आवाज में बोले-भाई साहब, पिताजी तो अब इस संसार में नहीं हैं। जिस दिन सुमंत्र रथ लेकर वापस आये उसी रात को वे परलोक सिधारे। मरने वक्त आप ही का नाम उनकी जबान पर था। यह पुर-मल.ल खार सुनते ही रामचंद्र पछाड़ खाकर गिर पड़े। जब ज़रा होश आया तो रोने लगे। रोते रोते आये। वह
अयोध्या कांड
७९
हिचकियाँ बंध गयीं । हाय ! पिताजी का आखिरी दीदार भी
नसीब नहीं हुआ। अब रामचंद्र को मालूम हुआ कि
महाराजा दसरथ को उनसे कितनी मुहब्बत थी ! उनकी जुदाई
में प्राण त्याग दिये। बोले-यह मेरी बद-नसीबी है कि
आखिरी वक्त उनके दर्शन न कर सका । जिन्दगी भर इसका
अफसोस रहेगा। अब हम उनकी सबसे बड़ी यही सेवा कर
सकते हैं कि अपने कामों से उनकी आत्मा को खुश करें ।
महाराज अपनी प्रजा को कितना प्यार करते थे। तुम भी
प्रजा की परवरिश करते रहना। फौज के
खुश
रहने ही पर
राज की हस्ती कायम रहती है। तुम भी सिपाहियों को
खुश
रखना। उनकी तनख्वाह बराबर ठीक वक्त पर देते रहना ।
इंसाफ के मुआमिले में किसी के साथ जरा भी रू-रिआयत न
करना। हर एक काम में मुशीरों से जरूर सलाह लेना और
उनकी सलाह पर अमल करना । गरीबों को अमीरों के जुल्म
से बचाना। किसानों के साथ हरगिज़ सख्ती न करना।
जराअत की आब-पाशी के लिए कुएँ, नहरें, ताल बनवाना।
लड़कों की तालीम की तरफ से गाफिल मत होना और
सरकारी अहलकारों की सख्ती से निगरानी करते रहना,
वरना ये लोग रिआया को तबाह कर देंगे।
भरत ने कहा, भाई साहब ! मैं ये बातें क्या जानू ! में
तो आपकी खिदमत में इसीलिए हाज़िर हुआ हूँ कि आपको
राम चर्चा
अयोध्या ले चलूँ, अब तो हमारे पिता भी आप ही हैं।
आप हमें जो हुक्म देंगे, हम उसे वजा लायेंगे। हमारी आपसे
यह इल्तिजा है। इसे कबूल कीजिये । जब से आप आये
हैं, अयोध्या में वह रौनक ही नहीं रही। चारों तरफ़ स्यापा-
सा छाया रहता है। लोग आपको याद कर-करके रोया
करते हैं। अब तक मैं सबको यही तस्कीन देता रहा हूँ कि
रामचंद्र जल्द वापस आयेंगे। अगर आप न लौटेंगे तो राज
में कुहराम मच जायेगा और सारा इल्जाम और कलंक मेरे
सिर पर रखा जायेगा।
रामचंद्र ने जवाब दिया-भइया, जिन वादों को पूरा
करने के लिए पिताजी ने अपनी जान तक दे दी, उन्हें पूग
करना मेरा फर्ज है। उन्हें अपना कौल अपनी जान से भी
ज़्यादा प्यारा था। उस हुक्म की तामील में न करूं तो
दुनियाँ में कौन-सा मुँह दिखाऊँगा। तुम्हें भी उनका हुक्म
मानकर राज करना चाहिये । मैं चौदह बरस गुजरने के बाद
ही अयोध्या में कदम रखूगा ।
भरत ने बहुत आरजू-मिन्नत की। गुरु वसिष्ठ और
मुअज्ज़िज आदमियों ने रामचंद्र को बहुत समझाया। मगर
वह अयोध्या चलने पर किसी तरह राज़ी न हुए । तब भग्त ने
रोकर कहा-भैया, अगर आपका यही फैसला है तो मज़बूर
होकर हमको भी मानना पड़ेगा। मगर आप मुझे अपनी
अयोध्या कांड
खड़ाऊँ दे दीजिये। आज से यह खड़ाऊँ ही राजसिंहासन पर
विराजेगी।
हम सब आपके चाकर होंगे। जब तक आप
लौटकर न आयेंगे, अभागा भरत भी आप ही की तरह फकीरों
की सी जिन्दगी बसर करेगा। लेकिन चौदह साल गुजर जाने
पर भी आप न आयें तो मैं आग में जल मरूँगा।
यह कहकर भरत ने रामचंद्र की खड़ाऊँ को सिर पर
रखा, और रुखसत हुए । रामचंद्र ने कौसल्या और सुमित्रा के
पैरों पर सर रखा और
उन्हें बहुत दिलासा देकर रुखसत
किया। कैकयी शरम से सिर झुकाये खड़ी थी। रामचंद्र जब
उसके पैरों पर झुके तो वह फूट-फूटकर रोने लगी। रामचंद्र
की शराफ़त और पाकदिल ने साबित कर दिया कि राम पर
उसका शुबहा बे-बुनियाद था।
जब सब लोग नंदीग्राम में पहुँचे तो भरत ने वजीरों
से कहा-आप लोग अयोध्या जायें। मैं चौदह साल तक इसी
तरह इस गाँव में रहूँगा। राजा रामचंद्र के सिंहासन पर
बैठकर अपनी आकवत न बिगाहूँगा। जब आपको मुझसे
किसी मुआमले में सलाह व मशविरा करने की जरूरत हो मेरे
पास चले आइयेगा।
भरत की यह शराफत और फय्याजी देखकर लोग
हैरत में आ गये । ऐसा कौन होगा, जो मिलते हुए राज को
यों ठुकराकर अलग हो जाये । लोगों ने बहुत चाहा कि भरत
६
राम चर्चा,
Memes
अयोध्या चलकर राज करें, लेकिन भरत ने वहाँ जाने से माफ
इन्कार कर दिया। एक शायर ने सच कहा है कि भरत जैसा
शरीफ बेटा पैदा करके कैकयी ने अपनी सारी बुराइयों पर
खाक डाल दी।
आखिर सब रानियाँ, शत्रुघ्न और अयोध्या के बाशिंदे
भरत को वहीं छोड़कर अयोध्या चले आये। शत्रुघ्न वज़ीरों की
मदद से राज-काज संभालते थे और भरत नंदीग्राम में बैठे
हुए उनकी निगरानी करते रहते थे।
इस तरह चौदह साल गुज़र गये।
65,82G-OF, No. 6500666.
बन,
किष्किंधा
ओर
सुन्दर
कांड
(मुख्तसर)
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పరకాండ
बन कांड
भरत के चले आने के बाद रामचंद्र ने भी चित्रकूट से
चले जाने का इरादा कर लिया। तीनों आदमी घूमते हुए
अत्रि मुनि के पास पहुंचे। यहाँ कई महीने रहकर दंडकवन
की तरफ चले। दंडकवन में विराध नाम का एक बड़ा
जालिम राजा था। उसको कत्ल करके तीनों आदमी और
आगे बढ़े।
कई दिनों के बाद तीनों आदमी पंचवटी जा पहुंचे।
पंचवटी में लंका के राजा रावण की एक बहन शूर्पणखा
रहती थी।
एक दिन रामचंद्र और सीता दरख्त के नीचे बैठे हुए
बातें कर रहे थे कि शूर्पणखा उधर से होकर गुजरी। ऐसे
खूबसूरत इन्सान उसने कभी न देखे थे। वह थी तो
काली-कलूटी, निहायत बदसूरत, मगर अपने को परी समझती
राम चर्चा
थी। रामचंद्र को देखकर वह फूली न समायी। बहुत
दिनों के बाद उसे अपने जोड़ का एक जवान दिखायी
दिया। करीब आकर बोली-तुम जैसे आदमी तो मैं ने
कभी देखे नहीं। मैं तुम्हारे ही जैसा शौहर ढूँढ़ रही थी।
अब मुझसे शादी कर लो। तुम्हारी खुशनसीबी है कि मुझ
जैसी नाज़नीं तुमसे शादी करना चाहती है।
रामचंद्र ने जवाब दिया बेशक, यह मेरी खुशनसीबी
है। मगर मुशकिल यह है कि मेरी शादी हो चुकी है और
यह औरत मेरी बीवी है। मेरा छोटा भाई, जो वह सामने
बैठा हुआ है, यहाँ अकेला है। चाहे तो तुमसे शादी कर
सकता है। तुम उसके पास जाओ।
शूर्पणखा लक्ष्मण के पास गयी और बोली-तुम्हारे
भाई रामचंद्र की निगाह मुझपर पड़ गयी तो वह मुझपर
आशिक हो गये। पर मैंने ऐसे आदमी से शादी करना
पसंद न किया, जिसकी बीवी मौजूद है। तुम्हारी
खुशनसीबी है कि मेरा दिल तुम्हारे ऊपर आ गया। तुम
मुझसे शादी कर लो।
लक्ष्मण ने मुस्कुराकर कहा-हाँ, इसमें तो शक नहीं।
तुम रानी बनने के लायक हो । जाकर भाई साहब ही से
कहो। वे ही तुमसे शादी करेंगे।
शूर्पणखा फिर राम के पास गयी।
जब उसे यकीन.
बन कांड
हो गया कि यहाँ मेरी तमन्ना पूरी नहीं होगी तो वह मुँह
बना-बनाकर गालियाँ बकने लगी।।
उसकी यह शरारत देखकर लक्ष्मण को गुस्सा आ गया।
उन्होंने शूर्पणखा की नाक काट ली और कानों का भी सफ़ाया
कर दिया।
अब क्या था ! उनके भाई खर और दूषण यह हाल
सुनकर गुस्से से पागल हो गये। दम के दम में उनको इस
शरारत की सजा देने चले। मगर वे दोनों मारे गये। अकेली
शूर्पणखा अपने भाइयों का मातम करने को बच रही।
शूर्पणखा के दो भाई तो मारे गये। मगर अभी दो
और बाकी थे। उनमें से एक लंका देश का राजा रावण था।
वह भी राक्षस था। शूर्पणखा रोती पीटती उसके पास पहुंची
और छाती पीटने और आप-बीती सुनाने लगी।
राम और लक्ष्मण का नाम सुनकर रावण के होश उड़
गये।
मगर उसने बहन को तशफ़्फ़ी दी और उसी वक्त मारीच
नामी राक्षस को बुलाकर कहा-अब अपनी कुछ कारगुजारी
दिखाओ । रामचंद्र और लक्ष्मण पंचवटी में आये हुए हैं। उन्होंने
शूर्पणखा की नाक काट ली है और राक्षसों को तबाह कर
दिया है। बतलाओ, मेरी कुछ मदद करोगे?
मारीच को रामचंद्र से पुरानी अदावत थी। बोला--
ma
राम चर्चा
ऐसा चकमा दें कि एक कतरा खून भी न गिरे और दोनों भाई
मारे जायें। इस तरह दोनों सीता को हर लाने की तैयारियाँ
करने लगे।
राम और सीता कुटी के सामने बैठे वातें कर रहे थे
कि यकायक एक निहायत खूबसूरत हिरन सामने कुलेलें करता
हुआ दिखायी दिया। वह इतना खूबसूरत, इतना खुश-रंग
था कि सीता उसे देखकर रीझ गयीं। और उन्होंने रामचन्द्र
से कहा-इसको पकड़कर मुझे दीजिये ।
रामचंद्र तीरो-कमान लेकर चले। हिरन भुलावे देता
हुआ रामचन्द्र को बहुत दूर ले गया। मारीच भागा तो
जाता था, पर लक्ष्मण के न आने से उसकी चालं कारगर
होती नज़र न आती थी। जब तक सीताजी अकेली न
होंगी, रावण उन्हें हर कैसे सकेगा? यह सोचकर उसने कई
बार ज़ोर-जोर से चिल्लाकर कहा-"हाय लक्ष्मण, हाय
सीता"।
रामचंद्र का कलेजा धड़क उठा। समझ गये। यह
नकली हिरन है। तब ऐसा निशाना मारा कि पहले ही वार में
हिरन गिर पड़ा। उधर सीताजी ने जो "हाय लक्ष्मण,
हाय सीता" की आवाज सुनी तो उनका खून सर्द हो गया।
आँखों में अंधेरा छा गया। रोकर लक्ष्मण से बोली-मुझे ऐसा
खौफ होता है कि यह स्वामी ही की आवाज़ है। जरूर उन
बन कांड
पर कोई बड़ी आफ़त आयी है। वरना तुम्हें क्यों पुकास्ते !
लपककर देखो क्या माजरा है।
ऐसी हालत में सीता को तन्हा छोड़कर जाना लक्ष्मण
कब गवारी कर सकते ! बोले-भाई साहब की तरफ से
आप बे-फिक्र रहें। जिसने बड़े बड़े राक्षसों का साया
कर दिया, उसे किसका खौफ हो सकता है ? आपको तन्हा
छोड़कर मैं न जाऊँगा।
सीता ने गुस्से से कहा-क्या मुझे कोई शेर या
मेडिया खाये जाता है ! ज़रूर स्वामी पर कोई मुसीबत
आयी है और तुम हाथ पर हाथ धरे बैठे हो। क्या यही
भाई की मुहब्बत है, जिसपर तुम्हें इतना गरूर है ।
यह ताना तीर की तरह लक्ष्मण के दिल में चुभ गया।
उन्होंने तीरो-कमान उठा लिया और रंजीदा होकर चल दिये।
रावण ने जब देखा कि मैदान खाली है तो उसने
हाथ में कमंडल लिया और 'नारायण-नारायण' करता हुआ
सीताजी की कुटी के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया।
सीताजी ने पत्तल में कन्द, मूल और कुछ. फल
रखकर रावण के सामने लायीं। रावण ने पत्तल लेने के
लिए हाथ बढ़ाया। मगर पत्तल के बदले सीताजी को ही गोद
में उठाकर वह अपने स्थ की तरफ दौड़ा और एक मिनिट में
उन्हें स्थ पर बिठाकर घोड़ों को हवा कर दिया।
राम चर्चा - जब सीता की बातों का रावण पर कुछ असर न हुआ तो सीता "हाय राम! हाय राम!" कहकर ज़ोर जोर से रोने लगीं। इत्तफाक से उसी नवाह में जटायु नाम का एक साधु रहता था । वह रामचन्द्र की सच्ची अकीदत रखता था। उसे फौरन शुबहा हुआ कि कोई राक्षस सीता को लिये जाता है। हथियार लेकर रथ के सामने आकर खड़ा हो गया और ललकारकर बोला-तू कौन है ? सीताजी को कहाँ लिये जाता है ? फौरन रथ रोक ले, वरना अभी वह लठ मारूँगा कि भेजा निकल पड़ेगा। -१) रावण इस वक्त लड़ना तो न चाहता था। मगर जव जटायु रास्ते में खड़ा हो गया तो उसे मजबूर होकर स्थ रोकना पड़ा। घोड़ों की बाग खींच ली और बोला-अपना भला चाहता है तो रास्ते से हट जा। रावण बड़ा ताकतवार था। जटायु कमजोर था, मगर जान पर खेल गया। वह बेहोश होकर गिर पड़ा और रावण ने फिर घोड़े बढ़ा दिये । थोड़ी देर बाद दोनों भाई अपनी कुटी पर आये। देखा तो सीता का कहीं पता नहीं। होश उड़ गये। इधर- उधर चारों तरफ दौड़-दौड़कर सीता को ढूँढ़ने लगे । रामचंद्र की हालत पागलों की सी हो गयी। इस तरह बेकरारी के आलम में वे बढ़ते चले जाते थे यकायक एक दरख़्त के नीचे जटायु को पड़े कराहते देखकर रामचन्द्र रुक गये ।
बन कांड जटायु रामचन्द्र को देखकर बोला-आप आ गये! बस, इतनी ही तमन्ना थी। वरना अबतक दम निकल गया होता। सीताजी को लंका का राक्षस राजा रावण हर ले गया है। उसी के साथ लड़ने में मेरी यह हालत हो गयी। आह ! बहुत दर्द हो रहा है, अब चला । राम ने जटायु का सर अपनी गोद में रख लिया । जटायु की जान निकल गयी। यही दोस्ती का फर्ज है। यही इन्सानियत का फर्ज है। रामचन्द्र ने वेद-मंत्रों का पाठ करते हुए उसकी दाह- क्रिया की। फिर वहाँ से आगे बढ़े। चलते चलते सूरज डूब गया। इसी फिक्र में थे कि सामने दरख्तों के कुंज में एक झोपड़ी नज़र आयी। दोनों आदमी उस झोंपड़ी की तरफ चले। यह झोंपड़ी एक भीलनी की थी, जिसका नाम शबरी था। उसे जो मालूम हुआ कि ये दोनों भाई अयोध्या के राजा दशरथ के बेटे हैं, तो मारे खुशी के फूली न समायी। वह जंगल में गयी और ताजे फल तोड़ लायी। कुछ जंगली बेर थे, कुछ करोंदे, कुछ शरीफे। शबरी खब रसीले, पके हुए फल ही चुन रही थी। इस खौफ से कि कोई खट्टा न निकल जाय, वह अकसर फलों को कुतरकर उनका ज़ायका ले लेती थी। भीलिनी क्या जानती थी कि जूठी चीज़ खाने के लायक नहीं रहती !
राम चर्चा
h
।
इस वक्त रंज के मारे रामचंद्र का जी कुछ खाने को न
चाहता था। पर शबरी की खातिर मन्जूर थी। जब फल
खाने शुरू किये तो बाज बाज कुतरे हुए नजर आये। मगर,
दोनों भाइयों ने उन फलों को और भी ररावत के साथ
खाया। गो वे जूठे थे, मगर उनमें प्रेम का रस भरा हुआ था।
उधर रावण रथ को भगाता हुआ जब पंपासर पहाड़
के करीब पहुँचा तो सीताजी ने देखा कि पहाड़ पर कई बंदरों
की सी सूरतवाले आदमी बैठे हुए हैं। सीताजी ने ख्याल
किया कि रामचन्द्र मुझे ढूँढ़ते हुए जरूर इधर आयेंगे, इसीलिए
उन्होंने अपने कई जेवर और चादर स्थ के नीचे डाल दी।
लंका पहुँचकर रावण ने सीताजी को अशोकान में ठहरा
दिया और कई राक्षसिन औरतों को इसलिए तैनात किया कि
वह सीता को सतायें और हर तरह की तकलीफ पहुँचाकर
उन्हें उसकी तरफ मुखातिब होने के लिए मजबूर करें। मौका
पाकर उसकी तारीफ से भी सीताजी को मायल करें। लेकिन
राक्षसिन औरतें थोड़े ही दिनों में सीता जी की नेकी और
शराफत देखकर उन्हें तकलीफ पहुँचाने के बदले हर तरह का
आराम देने लगीं।
కిష్కింధా కాండు
किष्किधा कांड
राम और लक्ष्मण सीता की तलाश में कोहो बयावान
की खाक छानते चले जाते थे कि सामने 'ऋष्यमूक' पहाड़
नजर आया। उसकी चोटी पर सुग्रीव अपने चंद वफादार
साथियों के साथ रहा करता था। वह शख्स किष्किंधा
शहर के राजा बाली का छोटा भाई था। 'बाली ने एक बात
पर नाराज होकर उसे राज से निकाल दिया था और उसकी
बीबी तारा को उससे छीन लिया था। सुग्रीव भागकर इस
पहाड़ पर चला आया था। उसने राम और लक्ष्मण को
तीर और कमान लिये गुजरते देखा तो रूह फ़ना हो गयी।
हनुमान से बोला-भाई, मुझे तो इन दोनों आदमियों से
डर लगता है। बाली ने इन्हें मुझे मारने के लिए भेजा है।
अब बतलाओ, कहाँ जाकर छियूँ ?
राम चर्चा
९४ 1
हनुमान सुग्रीव का सच्चा रफीक था। उसने एक
ब्राह्मण का भेष बनाया और रामचन्द्र के पास जाकर वोले-
आप लोग यहाँ कहाँ से आ रहे हैं ? मुझे तो ऐसा मालूम
होता है कि आप लोग परदेशी हैं। और शायद आपका
कोई साथी खो गया है।
रामचन्द्र ने कहा-हाँ देवता जी, आपका ख्याल
दुरुस्त है । किस्मत के मारे अयोध्या का राज छोड़कर यहाँ
जंगलों की खाक छान रहे हैं। इसपर नयी मुसीबत यह
पड़ी कि कोई मेरी सीता को भी उठा ले गया। देखें, अभी
कहाँ-कहाँ ठोकरें खानी पड़ती हैं।
हनुमान ने हमदर्दाना अंदाज़ से कहा-महाराज!
घबराने की कोई बात नहीं है। मेरे साथ पहाड़ पर चलिये।
वहाँ राजा सुग्रीव रहते हैं। बड़े ही नेक और मिलनसार हैं।
अगर उनसे आपकी दोस्ती हो गयी तो फिर बड़ी आसानी से
आपका काम निकल जायेगा।
राम ने लक्ष्मण से कहा- मुझे तो यह आदमी दिल
का साफ और शरीफ़ मालूम होता है। कौन जाने सुग्रीव से
ही हमारा काम निकले । चलो, ज़रा सुग्रीव से भी मिल लें।
दोनों भाई हनुमान के साथ पहाड़ पर पहुँचे । सुग्रीव
ने दौड़कर उनका इस्तकबाल किया और लाकर अपने बरावर
सिंहासन पर बिठाया। फिर बातें होने लगीं। अब सुग्रीव
किष्किथा कांड
१५
को उन ज़ेवरों की याद आयी, जो सीताजी ने रथ पर से नीचे
फेंके थे। उसने उन जेवरों को मंगवाकर रामचंद्र के सामने
रख दिया।
जेवरों को देखकर रामचंद्र की आँखों से आँसू गिरने
लगे। मारे ग़म के इन गहनों को देख न सके। मुँह फेरकर
लक्ष्मण से कहा-भइया, ज़रा देखो तो ये तुम्हारी भाभी के
जेवर हैं?
लक्ष्मण ने कहा-भाई साहब, उस गले के हार
और हाथों के कंगन की निस्बत तो मैं कुछ अज नहीं
कर सकता। क्योंकि मैंने कभी भाभी के चेहरे की तरफ
देखने की जुरअत नहीं की; हाँ, पाँव के ये बिछुए और पाजेब
भाभी ही के हैं।
सुग्रीव बोला-तव तो इसमें शक नहीं कि दक्खिन
की तरफ ही सीताजी का पता लगेगा। आप जितनी जल्द
मुझे राज दिला दें उतनी ही जल्द मैं आदमियों को उधर
भेजने का इन्तजाम करूँ। मगर यह समझ लीजिये कि
मेरा भाई बाली निहायत ज़ोरावर आदमी है और लड़ाई का
फन भी खूब जानता है। मुझे यह इतमीनान कैसे होगा
कि आप उस पर फतह पा सकेंगे? वह एक तीर से तीन
दररूतों को एक ही साथ छेद डालता है।
यह सुनकर रामचंद्र ने तीर को कमान पर चढ़ाकर
राम चर्चा
६६
छोड़ा तो वह सातों दरख्तों को जो कि पहाड़ के नीचे कतार
में थे, पार करता हुआ फिर तरकश में आ गया। रामचंद्र
का यह कमाल देखकर सुग्रीव को यकीन हो गया कि ये
पाली को मार सकेंगे।
दूसरे दिन सुग्रीव ने जाकर बाली को ललकारा । दोनों
मैदान में आकर लड़ने लगे। बाली ने जरा देर में सुग्रीव
को दे पटका और उसकी छाती पर सवार होकर चाहता था
कि उसका सर काट ले कि यकायक किसी तरफ से एक ऐसा
तीर आकर उसके सीने में लगा कि वह फौरन नीचे गिर पड़ा।
बाली को मुहल्लिक-जख्म लगा था। बाली की जान
निकल गयी । सुग्रीव किष्किंधा पुरी का राजा हुआ और
वली-अहद बनाया गया। इसके बाद सीताजी की तलाश
करने का इन्तोम करने लगा। मुअत्तबिर और आजम्दा-
कार आदमियों को चुन-चुनकर मुल्क के हर एक हिस्से में
मेजना शुरू किया। हनुमान उन आदमियों में सबसे
वहादुर और तजुर्वेकार थे। उन्हें उसने दक्खिन की तरफ
मेजा। हनुमान की मदद के लिए अंगद, जामवंत, नील,
नल वगैरह वहादुरों को भी तैनात किया ।
रामचंद्र ने अपनी अंगूठी निकालकर हनुमान को दे
दी और बोले-अगर सीता से तुम्हारी मुलाकात हो तो
उन्हें समझाकर कहना कि राम और लक्ष्मण उन्हें बहुत जल्द
किष्किंधा कांड
छुड़ाने आयेंगे। जिस तरह इतने दिन काटे हैं, थोड़े दिन
और सब करें। हनुमान अंगूठी लेकर अपने रफीकों के
साथ चले। एक महीने के करीब गुजर गया। मगर
अभी तक सीताजी की कुछ खबर ही नहीं।
एक दिन ये मुसीवत के मारे बैठे सोच रहे थे कि
किधर जायें कि उन्हें एक बूढ़ा फकीर आता हुआ दिखायी
दिया। उस फकीर का नाम संपाती था। सबने दौड़कर
उसे घेर लिया और पूछने लगे क्यों बाबा, तुमने कहीं
रानी सीता को देखा है ?
संपाती बोला-हाँ भाई, सीता को लंका का राजा
रावण अपने रथ पर उठा ले गया है।
यह सुनकर हनुमानजी समुंदर की तरफ मदाना-कदम
उठाते हुए चले।
సుందరకాండ
सुन्दर कांड
रासकुमारी से लंका तक तैरकर जाना आसान काम न
था। मगर वीर हनुमान ने हिम्मत न हारी। शाम होते
होते वे उस पार जा पहुँचे । देखा कि लंका का शहर एक
पहाड़ की चोटी पर बसा हुआ है। पहाड़ों में तो वे पैदा
ही हुए थे। पहरेदारों की आँख बचाकर फ़ौरन एक दरख़्त
पर चढ़ गये। और पत्तों में छिपे बैठे रहे। जब आधी
रात हो गयी और चारों तरफ सन्नाटा छा गया, रावण भी
अपने महल में आराम करने चला गया तो वह आहिस्ते
एक शाख को पकड़ कर महल के अंदर कूद पड़े।
महल के अंदर की चमक-दमक देखकर हनुमान की
आँखों में चकाचौंध आ गयी। हनुमान ने दबे पाँव महलों में
IAN
Humandu
९९
सुन्दर कांड
घूमना शुरू किया। कोई गोशा ऐमा न बचा जिसे उन्होंने न
देखा हो। पर सीता जी का कहीं निशान नहीं । जब सवेरा
होने लगा और कौए बोलने लगे तो वे उसी दरख़्त की शाख
से बाहर निकल आये।
उन्होंने दो दिन से कुछ खाया न था। भूख भी लगी
हुई थी। बाग़ के सिवा और मुफ़्त के फल कहाँ मिलते। यही
सोचते चले जाते थे कि कुछ दूर पर एक घना बाग़ दिखायी
दिया। अशोक के बड़े-बड़े दरख्त हरे-हरे खूबसूरत पत्तों से
लदे हुए थे। हनुमान ने उसी बाग़ में भूख मिटाने और दिन
काटने का फैसला किया। बाग़ में पहुँचते ही एक दरख्त पर
चढ़कर फल खाने लगे।
यकायक कई औरतों की आवाजें सुनाई देने लगीं।
हनुमान ने उधर निगाह दौड़ायी तो देखा कि एक निहायत
हसीन औरत मैले-कुचैले कपड़े पहने, सर के बाल खोले उदास
बैठी जमीन की तरफ़ ताक रही है। और कई राक्षसिन औरतें
उसके करीब बैठी हुई उसे समझा रही हैं। हनुमान उस हसीना
को देखकर समझ गये कि ये ही सीताजी हैं।
सब जब वहाँ से चली गयीं और सीताजी अकेली रह
गयीं तो हनुमानजी ने ऊपर से रामचंद्र की अंगूठी उनके
सामने गिरा दी। सीताजी ने अंगूठी उठाकर देखी तो
रामचंद्र की थी। रंज और हैरत से उनका कलेजा धड़कने
रामचर्चा
लगा। वह अंगूठी को हाथ में लिये इसी सोच में बैठी
हुई थीं कि हनुमान दरख्त से उतरकर उनके सामने आये
और उनके पैरों पर सर झुका दिया ।
और हाथ जोड़कर कहा-माताजी, मैं श्री रामचंद्र ही
के पास से आ रहा हूँ। यह अंगूठी उन्हीं ने मुझे दी थी।
अब ज्यों ही मैं पहुँचकर उन्हें आपकी खबर दूँगा, वह फौरन
लंका पर हमला करने की तैयारी करेंगे।
सीताजी को हनुमान ने बहुत तसल्ली दी और चलने
को तैयार हुए। मगर उसी वक्त ख़्याल आया कि जिस तरह
सीताजी के इतमीनान के लिए रामचंद्र की अंगूठी लाया था,
उसी तरह रामचंद्र की तशफ़्फ़ी के लिए सीताजी की भी कोई
निशानी ले जाना चाहिए। बोले-माताजी, अगर आप
मुनासिब समझें तो अपनी कोई निशानी दीजिये जिससे रामचंद्र
को यकीन आ जाय कि मैंने आपके दर्शन पाये हैं।
सीताजी ने अपने सिर की बेनी उतारकर दे दी।
हनुमान
ने उसे कमर में बाँध लिया और सीताजी को प्रणाम
करके रुखसत हुए।
इस अशोक के बाग़ से चलते चलते हनुमान के जी में
आया कि जरा इन राक्षसों की बहादुरी का इम्तहान भी करता
चलें। यह सोचकर उन्होंने बाग के दरख्तों को उखाड़ना
शुरू किया। कुछ दरख्तों की शाखें तोड़ डाली और फल
सुन्दरमंड
तो इतने तोड़कर गिरा दिये कि उनका फर्श-सा बिछ गया।
कई आदमियों को जान से मार डाला, तव बाहर से और
कितने ही सिपाही आकर हनुमान को पकड़ने लगे। मगर
आपने उन्हें भी मार भगाया। राजा रावण के पास खबर
पहुँची। रावण ने अपने लड़के अक्षयकुमार को हनुमान
को गिरफ्तार कर लाने के लिए भेजा।
हनुमान ताल ठोंककर अक्षयकुमार पर झपटे और
उसकी टांग पकड़कर इतनी जोर से पटका कि वह वहीं ठंडा
हो गया। और सब आदमी हुर्र हो गये।
मेघनाद निहायत दिलेर, ताकतवर और लड़ाई के फ़न
में होशियार था। तीर कमान हाथ में लेकर अशोक वाटिका में
पहुँचा । हनुमान ताकत में मेघनाद से कम न थे । बराबर का
मुकाबला था। मगर उस वक्त उससे लड़ना मस्लहत के खिलाफ
था । मेघनाद के सामने ताल ठोंककर खड़े तो हुए, पर उसे
अपने ऊपर जान-बूझकर गालिब आ जाने दिया। मेघनाद ने
समझा, मैंने इसे दबा लिया । फौरन हनुमान को रस्सियों से
जकड़ दिया और मूंछों पर ताव देता हुआ रावण के सामने
आकर बोला-महाराज, यह लीजिये, आपका कैदी हाज़िर है।
करीब था कि रस्सियों में जकड़े हुए हनुमान की
गर्दन पर उसकी तलवार गिरे कि रावण के भाई विभीषण ने
खड़े होकर कहा-भाई साहब ! पहले इससे पूछिये कि यह
राम चची
1
कौन है, और यहाँ किसलिए आया है ? मुमकिन है कि
ब्राह्मम हो, तो हमें ब्रह्महत्या का पाप लग जाये ।
यह सुनकर कि यह रामचंद्र का एलची है और
सीताजी का सुराग लगाने के लिए आया है, रावण का खून
खौलने लगा। उसने फिर तलवार उठायी : मगर विभीषण
ने फिर उसे समझाया। विभीषण बड़ा खुदा-तरस, सच्चा,
बाईमान आदमी था।
रावण सोचने लगा, इसे ऐमी कौन-सी सज़ा दी जाय
कि इसकी जान तो न निकले ; फिर यह खूब जलील और
रुसवा हो । सोचते सोचने उसे एक अनोखी दिल्लगी सूझी।
इसे बंदर बनाकर उसकी दुम में आग लगा दी जाय और
इसका नाच देखा जाय । अजीव-व-ग़रीर तमाशा होगा।
फौरन हुक्म दिया कि इस आदमी का मुँह रंग दो। इसके
बदन पर भूरे भूरे रोएँ लगा दो और एक लंबी दुम लगाकर
अच्छा, खामा लंगूर बना दो। उस दुम में लत्ते बांधकर तेल
में भिगा दो और उसमें आग लगाकर छोड़ दो।
हनुमान अपनी ज़िल्लत और हँसी पर दिल में
खब
कुढ़ रहे थे । इससे तो कहीं अच्छा होता, अगर ज़ालिम ने मार
डाला होता । दिल में कहा, इस जिल्लत का अगर बदला न
लिया तो कुछ न किया और वह भी इसी वक्त । ऐसा तमाशा
दिखाऊँ कि उम्र भर न भूले । सारे शहर की होली हो जाय ।
सुन्दर कांड
में
जब दुम में आग लग गयी तो वे एक दरख्त पर चड़े
गये । शाख से कूदकर वे रनवास में पहुँच गये और एक लम्हे
में सारा राजमहल जलने लगा। सब लोग छतों पर थे। कोई
रोकनेवाला न था। हनुमान जिधर से अपनी आतिशीन दुम
लिये निकल जाते थे उधर ही शोले भड़कने लगते थे ।
राजमहल में आग लगाकर हनुमान बस्ती की तरफ झुके।
छतों से छतें मिली हुई थीं। एक घर से दूसरे घर में कूद
जाना मुश्किल न था। घंटे भर में सारा शहर आग के परदे
में ढंक गया। चारों तरफ कुहराम मच गया। इत्तफाक से
इसी वक्त जोर की हवा चलने गयी। आग और भी भड़क उठी।
शहर की होली बनाकर हनुमान समुद्र की तरफ भागे।
और पानी में कूदकर दुम की आग बुझायी। उन्होंने लंका-
वासियों को सचमुच अजीबो-गरीब तमाशा दिखा दिया।
हनुमान ने रातों-रात समुंदर को पार किया और अपने
साथियों से जा मिले। उन्हें देखते ही सबके सब खुशी से
उछलने लगे । दौड़-दौड़कर उनसे गले मिले । और सब
किष्किन्धा को रवाना हुए।
जब सब लोग सुग्रीव से गले
मिल चुके तो हनुमान ने लंका की सारी दास्तान कह सुनायी।
सुग्रीव खुशी से फूला न समाया। उसी वक्त उन लोगों
को साथ लेकर रामचंद्र के पास पहुँचा ।
सीताजी की बेनी रामचंद्र के हाथ में रख दी ।
हनुमान ने
101
रामचंद्र ने इस बेनी को देखा तो बे-अख्तियार आँखों से
आँसु जारी हो गये। उसे बार-बार चूमा और आँखों से लगाया।
थोड़ी देर तक कुछ सोचने के बाद रामचंद्र ने सुग्रीव
से कहा-अब हमला करने में देर न करनी चाहिए। तुम
अपनी फौज को कब तक तैयार करोगे?
सुग्रीव ने कहा-महाराज! मेरी फौज तो पहले ही से
तैयार है। सिर्फ आपके हुक्म की देर है ।"
हनुमान के चले आने के बाद राक्षसों को बड़ी फ़िक्र
। उन्होंने सोचा, जिस फौज का एक सिपाही इतना ताकतवर
और बहादुर है, उस फ़ौज का सरदार कितना वहादुर होगा।
दूसरे दिन शहर के खास खास आदमी रावण की
खिदमत में हाजिर हुए। और अर्ज की-महाराज आप
सीताजी को रामचंद्र के पास पहुँचा दें और मुल्क को इस
आनेवाली आफ़त से बचा लें। रावण का ख्याल था किरिआया
का काम है, राजा का हुक्म मानना, न कि उसके कामों पर
एतराज़ करना। जिस शख्स ने मेरी बहन की आबरू खाक
मिलायी, उससे इसका बदला न लूँ! ऐसा कभी नहीं हो सकता।
फटकार सुनकर सब लोग खामोश हो गये। सभी
रावण के गुस्से से डरते थे। मगर विभीषण रिआया का दोस्त
था और हक-बात कहने में उसकी जबान कभी न रुकती थी।
रावण ने जब देखा कि उसका भाई भी रिआया की
में
सुन्दर कांड
3
-तरफ से वकालत कर रहा है तो और भी जामे से बाहर होकर
बोला-विभीषण, तू पूजा करनेवाला,पोथी-पुराण का कीड़ा है।
निकल जा मेरे राज से। इसी वक्त निकल जा। मैं तुझ
जैसे बागी और दगाबाज़ का मुंह नहीं देखना चाहता । तू मेरा
माई नहीं ; मेरा दुश्मन है।
विभीषण ने उठकर कहा-महाराज, आप मेरे बड़े भाई हैं,
इसलिए मैंने आपको समझाने की जुरअत की थी। उसकी आपने
मुझे सजा दी । आपका हुक्म सर आँखों पर । मैं जाता हूँ।
विभीषण यहाँ से जलील होकर सुग्रीव की फ़ौज में
पहुँचा और सुग्रीव से अपना सारा हाल कहा। सुग्रीव ने
रामचंद्र को उसके आने की खबर दी।
रामचंद्र ने विभीषण को बहुत तशफ़्फ़ी दी और वादा
किया कि रावण को मारकर लंका का राज तुम्हें दूँगा। उसी
वक्त विभीषण का राज-तिलक भी कर दिया। विभीषण ने भी
हर-हालत में रामचंद्र की मदद करने का पक्का वादा किया।
दूसरे दिन से लंका पर चढ़ाई करने की तैयारियाँ
शुरू हो गयीं और फ़ौज समुंदर के किनारे आकर समुंदर को
उबूर
करने की तदबीर सोचने लगी। आखिर यह फैसला
हुआ कि एक पुल तामीर किया जाय। नल और नील बड़े
होशियार इंजीनियर थे। उन्होंने पुल बनाना शुरू किया ।
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లంకానాం
అండ
लंका कांड
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Pas- P50 60-700/- 8 575 రావణగర్బారు vdio 206 रावण के दरबार में अंगद रामचंद्र ने समुद्र को पार करके लंका का मुहासरा कर लिया। किले के चारों दरवाजों पर चार बड़े-बड़े सरदारों को खड़ा किया । सुग्रीव को सारी फौज का सिपहसालार बनाया। आप और लक्ष्मण सुग्रीव के साथ हो गये । तेज दौड़नेवालों को चुन-चुनकर खबरें लाने और ले जाने के लिए मुकर्रर किया। जिस सर्दार को कोई हुक्म देना होता, उन्हीं आदमियों की मारफत कहला भेजते थे। शहर के चारों दरवाजे बंद हो गये । राक्षसों को बाहर निकलना मुहाल हो गया। रसद का बाहर के देहातों से आना बंद हो गया। लोग अंदर भूखों मरने लगे। रावण ने सोचा-अब तो रामचंद्र की फौज लंका पर ११० राम चर्चा चढ़ आयी। मालूम नहीं लड़ाई का अंजाम क्या हो। एक बार सीता को राजी करने की आखिरी कोशिश कर लेनी चाहिए । अब की उसने धमकी के बजाय फरेव से काम लेने का फैसला किया। एक होशियार कारीगर से रामचंद्र की शवीह से मिलता-जुलता एक सिर बनवाया। वैसे ही तीर और कमान बनवाये और उन चीज़ों को सीताजी के सामने ले जाकर बोला --- यह लो तुम्हारे उस शौहर का सिर है, जिसपर तुम जान देती थीं। मेरी फौज के एक आदमी ने उन्हें लड़ाई में मार डाला है और उनका सर काट लाया है । रावण की ताकत का अंदाजा तुम इसी से कर सकती हो । अब मेरा कहना मानो, मेरी रानी बन जाओ। सीता धोखे में आ गयीं। सर पीट-पीटकर रोने लगीं। दुनियाँ उनकी आँखों में तारीक हो गयी । इत्तफाक से विभीषण की बीवी सरमा उस वक्त अशोक-बाटिका में मौजूद थी। सीताजी की गिरिया-व-जारी सुनकर वह दौड़ी हुई आयी और पूछने लगी-क्या माजरा है ? रावणने देखा, अब परदा. फाश हुआ चाहता है तो फ़ौरन वह बनावटी सिर और तीर- कमान लेकर वहाँ से चल दिया। सीताजी ने रो-रोकर सरमा से सानिहा बयान किया। सरमा हँसकर बोली-बहन, यह सब रावण की दगाबाज़ी है। वह सिर बनावटी होगा, तुम्हें फरेव देने के लिए रावण ने यह चाल चली है। रामचंद्र तो
लंका कांड
किले काः मुहासरा किये हुए हैं। लंका में तहलका मचा
हुआ है। कोई किले के बाहर नहीं निकल सकता। यहाँ
किसमें इतनी ताकत है जो रामचंद्र से लड़ सके। उनके
एक मामूली कासिद ने तो लंकावालों के छक्के छुड़ा दिये ।
भला, उन्हें कौन मार सकता है ? सरमा की बातों से
सीताजी को तस्कीन हुई। समझ गयीं, यह रावण की
शरारत थी।
उधर किले का मुहासरा करके रामचंद्र ने सुग्रीव से
कहा-एक बार फिर रावण को समझाने की कोशिश कर
लेनी चाहिए। अगर समझाने से मान जाय तो खून-खराबी
क्यों हो! सलाह हुई कि अंगद को कासिद बनाकर भेजा
जाय । अंगद ने बड़ी खुशी से यह बात मंजूर कर ली।
रावण अपने सलाहकारों के साथ दरबार में बैठा था कि
अंगद जा धमके और बुलंद आवाज़ से बोले-ऐ राक्षसों
के रामा रावण ! मैं राजा• रामचंद्र का कासिद हूँ। मेरा
नाम अंगद है। राजा वाली का लड़का हूँ। मुझे राजा
रामचंद्र ने यह कहने के लिए भेजा है कि या तो आज ही
सीताजी को वापस कर दो या किले के बाहर मैदान में
निकलकर जंग करो।
रावण ग्ररूर से अकड़कर बोला-जाकर अपने
छोकरे ग्रजा से कह दे कि रावण उनसे लड़ने को तैयार
पम चर्चा
बैठा हुआ है। सीता अब यहाँ से नहीं जा सकती। उसका
न्याल छोड़ दे। वरना उनके हक में अच्छा न होगा।
राक्षसों की फौज जिस वक्त मैदान में आयेगी, सुग्रीव और
हनुमान दुम दबाकर भागते नज़र आयेंगे। राक्षसों से अभी
रामचंद्र को साविका नहीं पड़ा है। हमने इन्द्र तक से
अपना लोहा मनवा लिया है। ये पहाड़ी चूहे किस शुमारो-
कतार में हैं।
अंगद-जिन लोगों को तुम पहाड़ी चूहे कहते हो वे
तुम्हारी एक एक फौज के लिए अकेले काफ़ी हैं। अगर
उनकी ताकत का इम्तहान लेना चाहते हो तो उन्हीं पहाड़ी
चूहों में से एक अदना चूहा तुम्हारे दरबार में खड़ा है, उसका
इम्तहान कर लो। अफसोस है कि इस वक्त कासिद
हूँ और कासिद हथियार से काम नहीं ले सकता। वरना
इसी वक्त दिखा देता कि पहाड़ी चूहे किस ग़जब के होते
हैं। है इस दरबार में कोई योद्धा, जो मेरे पैर को जमीन से
हटा दे ? जिसे दावा हो, निकल आये।
अंगद की यह ललकार सुनकर कई सूरमा उठे और
अंगद का पैर उठाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया।
मगर जो भर भी न हटा सके। अपना-सा मुँह लेकर अपनी
अपनी जगह पर जा बैठे। तब रावण खुद सिंहासन से उठा
और अंगद के पैर पर झुककर उठाना चाहता था कि अंगद
११३
लंका कांड
ने पैर खींच लिया और बोले-अगर पैरों पर सिर झुकाना
है तो रामचंद्र के पैरों पर सिर झुकाओ। मेरे पैर छूने से
तुम्हें कुछ फायदा न होगा। रावण शर्मिन्दा होकर अपनी
जगह पर जा बैठा।
अंगद अपना पैगाम सुना ही चुके थे। जब उन्हें मालूम
हो गया कि रावण पर किसी के समझाने का असर न होगा
तो वह रामचंद्र के पास लौट आये और सारी कैफियत बयान
कर दी।
మేఘనాదుడు
मेघनाद
आखिर दोनों फौजों में जंग छिड़ गया। दिन भर
तलवारें चलती रहीं। रात को भी लड़नेवालों ने दम न लिया।
लाशों के अंबार लग गये। खून की नदियाँ बह गयीं।
रामचंद्र की फौज इतनी बड़ी बहादुरी से लड़ी कि राक्षसों की
हिम्मत टूट गयी। रावण जिस फ़ौज को भेजता, वही घंटे
दो घंटे में जान लेकर भागती, यहाँ तक कि उसने झल्लाकर अपने
लड़के मेघनाद को भेजा। मेघनाद बड़ा बहादुर था। उसे
इंद्रजीत का लकब मिला था। राक्षसों को उस पर नाज़ था।
मेघनाद के मैदान में आते ही लड़ाई का रंग बदल
गया। कहाँ तो राक्षस लोग मैदान से भाग रहे थे। कहाँ
अब रामचंद्र की फ़ौज में भगदड़ पड़ गयी। मेघनाद ने
तीरों की ऐसी बारिश की कि आस्मान स्याह हो गया।
लक्ष्मण ने अपनी फौज को दबते देखा तो तीरो-कमान लेकर
मैदान में निकल आये। मेघनाद लक्ष्मण को देखकर और
भी जोश से लड़ने लगा और ललकार कर बोला, 'आज तुम्हारी
मौत मेरे हाथों लिखी है। तुमसे लड़ने का बहुत दिन से
इरादा था। आज वह पूरा हो गया।" लक्ष्मण ने जवाब दिया,
'हार और जीत ईश्वर के हाथ है। डींग मारना जवाँमर्दी का
काम नहीं, मगर, शायद तुम भी जिंदा घर न लौटोगे।
लंका कांड
मेघनाद ने तैश में आकर तरह-तरह के हर काम में लाने शुरू
किये । कभी कोई जहरीला तीर चला देता, कभी गदा लेकर
पिल पड़ता। मगर लक्ष्मण भी कुछ कम बहादुर न थे। वे
उसके सारे हमलों को अपने तीरों से ग्द कर देते थे। यहाँ
तक कि उन्होंने उससे स्थ, स्थवान, घोड़े-सबको तीरों से
छेद डाला । मेघनाद पैदल लड़ने लगा। अब उसे अपनी
जान बचाना मुश्किल हो गया । चाहता था कि जरा दम लेने
की मुहलत मिले तो दूसरा रथ लाऊँ, मगर लक्ष्मण इतनी
तेजी से तीर चलाते थे कि उसे हिलने की भी मुहलत न मिलती
थी। आखिर उसने गजब-नाक होकर शक्ति-वाण चला दिया।
यह बाण इतना कातिल था कि उसका ज़ख़्मी आनन-फानन
में मर जाता था। यह तीर लगते ही लक्ष्मण बेहोश होकर
जमीन पर गिर पड़े। मेघनाद खुशी से मतवाला हो गया।
उसी वक्त भागा हुआ रावण के पास गया और बोला-दो
भाइयों में से एक को तो मैंने आज ठंडा कर दिया। ऐसा
शक्ति-बाण मारा है कि बच नहीं सकता। कल दूसरे भाई को
भी मार लूँगा। बम, लड़ाई का खातमा हो जायेगा। रावण
ने बेटे को छाती से लगा लिया।
इधर रामचंद्र की फ़ौज में कुहराम मच गया। हनुमान
ने बेहोश लक्ष्मण को गोद में उठाया और रामचंद्र के पास
लाये । राम ने लक्ष्मण की यह कैफियत देखी तो बे-अख्त्यार
राम चर्चा
के
आखों से आँसू जारी हो गये। रो रोकर कहने लगे, 'हाय
लक्ष्मण, तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गये । हाय! मुझे क्या
मालूम था कि तुम यों मेरा साथ छोड़ दोगे, नहीं तो मैं पिता
हुक्म
को रद कर देता, कभी बन की तरफ कदम न उठाता।
अब मैं कौन मुँह लेकर अयोध्या जाऊँगा। औरत के पीछे
भाई की जान गँगाकर किमको मुँह दिखाऊँगा। औरत तो
फिर भी मिल सकती है, पर भाई कहाँ मिलेगा। हाय ! मैंने
हमेशा के लिए माथे पर कलंक लगा लिया ।' जामवंत अभी
तक कहीं लड़ रहा था। राम का विलाप सुनकर दौड़ा हुआ
आया और लक्ष्मण को गौर से देखने लगा। बूढ़ा, तजुर्बेकार
आदमी था। कितनी ही लड़ाइयाँ देख चुका था; बोला,
महाराज! आप इतने निराश क्यों होते हैं। लक्ष्मणजी अभी
जिन्दा हैं । मिर्फ बेहोश हो गये हैं । जहर सारे बदन में दौड़
गया है। अगर कोई होशियार बैद मिल जाये तो अभी जहर
उतर जाये और यह उठ बैठे। वैद की तलाश करनी चाहिए ।
विभीषण ने कहा, शहर में सुखेन नाम का एक बैद रहता
है। जहर का इलाज करने में वह बहुत माहिर है। उसे
किसी तरह बुलाना चाहिए। हनुमान ने कहा, मैं जाता हूँ,
उसे लिए आता हूँ। विभीषण से सुखेन के मकान का पता
पूछकर भेष बदलकर शहर में जा पहुंचे और सुखेन से यह
हाल कहा। सुखेन ने कहा, 'भाई, मैं बैद हूँ। रावण के
लंका कांड
दरबार से मेरी परवरिश होती है। उसे मालूम हो जायेगा
कि मैंने लक्ष्मण का इलाज किया है, तो मुझे जिन्दा न
छोड़ेगा।
हनुमान ने कहा-'आपको ईश्वर ने जो कमाल
बख्शा है, उससे -हर-एक को फायदा पहुँचाना आपका फर्ज
है। खौफ के बाइस फर्ज से मुँह मोड़ना आप जैसे बुजुर्ग
के लिए शायाँ नहीं।
सुखेन लाजवाब हो गया। उसी वक्त हनुमान के
साथ चल खड़ा हुआ। बुढ़ापे के बाइस वह तेज न चल
सकता था। इसलिए हनुमान ने उसे गोद में उठा लिया
और भागे हुए अपनी फ़ौज में आ पहुँचे। सुखेन ने
लक्ष्मण की नब्ज़ देखी, जिस्म देखा और बोला, 'अभी
बचने की उम्मीद है। संजीवनी बूटी मिल जाये तो बच
सकते हैं। मगर सूरज निकलने के पहले बूटी यहाँ आ
जानी चाहिए । वरना जान न बचेगी।"
जामवंत ने पूछा, 'संजीवनी बूटी मिलती कहाँ है?
सुखेन ने कहा, 'उत्तर की तरफ़ एक पहाड़ है। वहीं
यह बूटी मिलेगी।
बारह घंटे के अंदर वहाँ जाना और बूटी तलाश करके
लाना आसान काम न था। सब एक दूसरे का मुँह ताकते थे।
किसी की हिम्मत न होती थी कि जाने को तैयार हो। आखिर
राम चर्चा रामचंद्र ने हनुमान से कहा-'दोस्त! यह मुश्किल तुम्ही आसान कर सकते हो। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नजर नहीं आता ।' हनुमान को हुक्म मिलने की देर थी। सुखेन से बूटी का पता पूडा और आंधी की तरह दौड़े। घंटों में वे उस पहाड़ पर जा पहुँचे । मगर रात के वक्त बूटी की पहचान न हो सकी। बहुत ही घासपात जमी हुई थी। हनुमान ने उन सबों को उखाड़ लिया और उल्टे कदम लौटे। इधर सब लोग बैठे हनुमान का इंतज़ार कर रहे थे। एक-एक पल का शुमार किया जा रहा था। अब हनुमान फलाँ मुक्काम पर पहुँचे होंगे, अब वहाँ से चले होंगे। इस तरह अंदाज करते करते तड़का हो गया । पर हनुमान का कहीं पता नहीं। रामचंद्र घाराने लगे। एक घंटे में हनुमान न आ गये तो ग़ज़ब हो जाएगा। कई आदमी उन्हें देखने के लिए छूटे। कई आदमी दरख्तों पर चढ़कर उत्तर की तरफ़ नज़रें दौड़ाने लगे। पर हनुमान का कहीं निशान नहीं। अब सिर्फ आध घंटे की और मीआद है। इधर लक्ष्मण की हालत पल- पल पर खराब होती जाती थी। रामचंद्र मायूस होकर फिर रोने लगे कि यकायक अंगद ने आकर कहा, ' महराज! हनुमान दौड़ा चला आ रहा हैं। बस आया ही चाहता है। रामचंद्र का चेहरा चमक उठा। वह बे-करार होकर खुद हनुमान की तरफ दौड़े और उसे छाती से लगा लिया। हनुमान ने घास-
लंका कांड
पात का एक ढेर सुखेन के सामने रख दिया। सुखेन ने उसमें
से संजीवनी बूटी निकाली और फौरन लक्ष्मण के जख्म पर
उसका लेप किया। बूटी ने अक्सीर का काम किया। देखते
देखते ज़ख़्म भरने लगा। लक्ष्मण की आँखें खुल गयीं।
एक घंटे में वे उठ बैठे और दोपहर तक तो बातें करने लगे।
फौज में खुशी के नारे बुलंद हुए।
मगर
శుభకు వద్
कुभकर्ण
रावण ने जब सुना कि लक्ष्मण चंगे हो गये तो
मेघनाद से बोला, 'लक्ष्मण तो शक्ति-वाण से भी न मरा ।
अब क्या तदवीर की जाय। मैंने तो समझा था, एक का
काम तमाम हो गया; अब एक ही और बाकी है।
फिर दोनों के दोनों संभल गये ।'
मेघनाद ने कहा, 'मुझे भी बड़ा तअज्जुब हो रहा है
कि लक्ष्मण कैसे बच गया। शक्ति-बाण का जख्म तो
कातिल होता है। बारह घंटे के अंदर आदमी मर जाता है।
जरूर उन लोगों को संजीवनी बूटी मिल गयी। खैर, फिर
समशृंगा।' जाते कहाँ हैं ? आज ही दोनों को ढेर कर देता
लेकिन कल का थका हुआ हूँ। मैदान में न जा सकूँगा।
भाज चचा कुंभकर्ण को भेज दीजिये।
कुंभकर्ण रावण का भाई था। ऐसे डील-डौल का
दूसरा सूरमा राक्षसों में न था। उसे देखकर हाथी का गुमान
होता था। बहादुर ऐसा था कि कोई उसका मुकाबला करने
की जुरअत न कर सकता था। मगर जितना ही बहादुर था
उतना ही काहिल और ऐशपसंद था। रात-दिन शराब के
नशे में मस्त पड़ा रहता। लंका पर हमला हो गया। हजारों
आदमी मारे जा चुके । पर उसे अब तक कुछ स्खबर न थी
लंका कांड
कि कहाँ क्या हो रहा है। रावण उसके पास पहुँचा तो
देखा कि वह इस वक्त भी बेहोश पड़ा हुआ है। शराब की
बोतलें सामने पड़ी हुई थीं। रावण ने उसका शाना पकड़कर
जोर से हिलाया; तब उसकी आँखें खुलीं। बोला, 'कैसे
मजे की नींद ले रहा था। आपने नाहक जगा दिया।'
रावण ने कहा, 'भइया, अब सोने का मौका नहीं रहा।
रामचंद्र ने लंका का मुहासरा कर लिया। हमारे कितने ही
आदमी काम आ चुके। मेघनाद कल लड़ा था, पर आज
थका हुआ है । अब तुम्हारे सिवा और कोई दूसरा मददगार
नहीं नज़र आता।
यह सुनते ही कुंभकर्ण संभलकर उठ बैठा। हथियार
बांधे, और मैदान की तरफ चल खड़ा हुआ। उसे मैदान में
देखकर हनुमान, अंगद, सुग्रीव सब के सब दहल उठे।
आदमी क्या! खासा देव था। सिपाही तो उसकी
खौफनाक सूरत ही देखकर भाग खड़े हुए। कितने ही
सरदारों को उसने ज़ख़्मी कर दिया । आखिर रामचंद्र खुद
उससे लड़ने को तैयार हुए। उन्हें देखते ही कुंभकर्ण ने भाले
का वार किया। मगर रामचंद्र ने वार खाली दिया और दो
तीर इतनी फुर्ती से चलाये कि उसके दोनों हाथ कट गये।
तीसरा तीर उसके सीने में लगा। काम तमाम हो गया ।
१२२
राम चर्चा
राक्षस फौज ने आने सरदार को गिरते देखा तो भाग खड़ी
हुई। इधर रामचंद्र की फ़ौज में खुशी मनायी जाने लगी।
रावण को जब यह खबर मिली तो सर पीटकर रोने
लगा। कुंभकर्ण से उसे बड़ी उम्मीद थी। वह खाक में मिल
गयी। भाई के गम में बड़ी देर तक मातम करता रहा।
మేఘనాభి యందు జాత్తు) వద్ద मेघनाद का मारा जाना दूसरे दिन मेघनाद बड़े सज-ब-धज से मैदान में आया । उसने दोनों भाइयों को मार गिराने का पक्का इरादा कर लिया था। सारी रात अपनी देवी की पूजा करता रहा था। उसे अपनी ताकत और जवाँमर्दी का बड़ा ग़रूर था। रावण की सारी उम्मीदें आज ही की लड़ाई पर कायम थीं। लंका में पहले ही से फतह का जशन मनाने की तैयारियाँ होने लगीं। मेघनाद ने मैदान में आकर डंके पर चोट डलवाई तो विभीषण ने उसके सामने जाकर कहा, 'मेघनाद, मैं जानता हूँ कि चाकत और हिम्मत में तुम अपना सानी नहीं रखते। मगर हक्क की हमेशा जीत हुई है और होगी। मेरा कहना मानो, चलकर रामचंद्रजी से सुलह कर लो। वे तुम्हें मुआफ कर देंगे। मेघनाद ने गुस्से से आँखें निकालकर कहा, साहब! तुम्हें शरम नहीं आती कि मुझे समझाने आये हो। बग़ावत से बढ़कर दुनियाँ में दूसरा गुनाह नहीं। जो आदमी मुद्दई से मिलकर अपने घर और अपने मालिक की बद- ख्वाही करता है, उसकी सूरत देखना भी गुनाह है। आप मेरे सामने से चले जाइये। चचा
१२४
राम चर्चा
विभीषण तो इधर शर्मिंदा होकर चला गया। उधर
लक्ष्मण ने सामने आकर मेघनाद को दावते-जंग दी।
लक्ष्मण को देखकर मेघनाद बोला, 'अभी दो चार रोज
जरूम की मरहम-पट्टी और करवा लेते, कहीं आज ज़ख़्म फिर
न ताजा हो जाय । जाकर अपने बड़े भाई को भेज दो।'
लक्ष्मण ने कामन पर तीर चढ़ाकर कहा, 'ऐगे ऐसे
ज़ख़्मों की जवाँमर्द लोग बिलकुल परवाह नहीं करते। आज
एक बार फिर हमारी और तुम्हारी हो जाय। जरा देख लो
कि शेर जख्मी होकर कितना ख़बार हो जाता है। बड़े
भाई साहब का मुकाबिला तो तुम्हारे बाप ही से होगा।
दोनों दिलावरों ने तीर चलाना शुरू कर दिया। धन
धन धन की आवाजें आने लगीं। मेघनाद पहले तो ग़ालिब
आया। लक्ष्मण को उसके चारों का काटना मुश्किल पड़
गया। मगर ज्यों ज्यों वक्त गुजरता गया, लक्ष्मण संभलते
गये और मेघनाद कमज़ोर पड़ता गया। यहाँ तक कि
लक्ष्मण उसपर गालिब आ गये और एक तीर उसकी गर्दन
पर ऐसा मारा कि उसका सिर कटकर अलग जा गिरा।
मेघनाद के गिरते ही राक्षसों के हाथ-पाँव फूल गये ।
भगदड़ पड़ गयी। रावण ने यह खबर सुनी तो उसके मुंह
से ठंडी आह निकल आयी। आँखों में अँधेरा छा गया।
इन्तकाम के जोश से पागल हो गया। राम और लक्ष्मण तो
लंका कांड
२२०
उसके काबू से बाहर थे। सीताजी को कतल कर डालने के
लिए तैयार हो गया। तलवार लेकर दौड़ता हुआ अशोक
वाटिका में पहुँचा। सीताजी ने उसके हाथ में नंगी तलवार
देखी तो सहम उठीं। मगर रावण का वजीर बड़ा दाना
था। वह भी उसके पीछे पीछे दौड़ता चला गया था।
रावण को एक बेकस औन्त की जान लेने पर आमादा
देखकर बोला, 'महागज, गुस्ताखी मुआफ हो, औरत
पर हाथ उठाना आप की शान के खिलाफ है। आप
वेदों के आलिम हैं। हिम्मत और दिलावरी में आज दुनियाँ
में आपका हमसर नहीं। अपने रुतबे और इल्म का ख्याल
कीजिये और इस फ़ेल से बाज आइये ।। इन बातों ने रावण
का गुस्सा ठंडा कर दिया। तलवार म्यान में रख ली और
लौट आया।
उसी वक्त मेघनाद की अस्मत-माअब बीवी सुलोचना
ने आकर कहा, 'महाराज, अब मैं जिन्दा रहकर क्या
करूँगी ? मेरे पति का सर मंगवा दीजिये। उसे लेकर सती
हो जाऊंगी।
रावण ने आंखों में आँसू भरकर कहा-'बेटी, तेरे
पति का सर तुझे उसी वक्त मिलेगा, जब मैं दोनों भाइयों
का मर काट लूंगा।
सुलोचना अपनी मास मंदोदरी के पास आयी।
मत्र कर।"
१२६
राम चर्चा
दोनों सास-बहुएँ गले मिलकर खूब रोयीं । तब सुलोचना
बोली, 'माताजी, मैं अब अनाथ हो गयी। मेरे पति का
सर मंगवा दीजिये तो सती हो जाऊँगी। अब जीकर क्या
करूँगी। जहाँ स्वामी हैं, वहीं मैं भी जाऊँगी। यह जुदाई
अब मुझसे नहीं सही जाती।'
मंदोदरी ने बहू को प्यार करके कहा, 'वेटी, अगर
तुमने यही फैसला किया है तो मुबारक हो। मेघनाद का
सर और तो किसी तरह न मिलेगा। तुम खुद जाकर मांगो
तो अलबत्ता मिल सकता है। रामचंद्र बड़े नेक आदमी हैं।
मुझे यकीन है कि वे तुम्हारे सवाल को रद न करेंगे।'
सुलोचना उसी वक्त राज-महल से निकलकर रामचंद्र
की फौज में आयी और रामचंद्र के रू-ब-रू जाकर बोली,
महाराज, एक अनाथ विधवा आपसे एक दरख्वास्त करने
आयी है। उसे कबूल कीजिये। मेरे पति वीर मेघनाद का
सर मुझे दे दीजिये।
रामचंद्र ने फौरन मेघनाद का सर सुलोचना को
दिलवा दिया और उसके थोड़ी ही देर बाद सुलोचना सती
हो गयी। चिता की लपट आसमान तक पहुँची। किसी
ने सुलोचना को जाते न देखा। पर वह बहिश्त में दाखिल
हो गयी।
*
రావణుడురణరంగమున
रावण मैदान में
रात भर तो रावण ग़म और गुस्से से जलता रहा। सुबह
होते ही मैदान की तरफ़ चला। लंका की सारी फौज उसके
साथ थी। आज लड़ाई का फैसला हो जायेगा। इसलिए दोनों
सरफ़ के लोग अपनी जानें हथेलियों पर लिये तैयार बैठे थे।
रावण को मैदान में देखते ही रामचंद्र खुद तीरो-कमान लिये
निकल आये। अब तक उन्होंने सिर्फ रावण का नाम सुना
था। अब उसकी सूरत देखी तो मारे गुस्से के आँखों से
शोले निकलने लगे। उधर रावण को भी अपने दो बेटों के
खून का और अपनी बहन की बे-इज्जती का बदला लेना था।
घमासान लड़ाई होने लगी। रावण की बराबरी करनेवाला
लंका में तो क्या, रामचंद्र की फौज में भी कोई न था ।
सुग्रीव, अंगद, हनुमान वगैरह दिलावर उसपर एक-साथ भाले,
गुज़ और तीर चलाते थे। नील और नल उसपर पत्थर
मारते थे। पर उसने इतनी तेजी से तीर चलाये कि कोई
सामने न ठहर सका। लक्ष्मण ने देखा कि रामचंद्र उसके
मुकाबले में अकेले रह जाते हैं तो वे भी आ खड़े हुए और
तीरों की बौछार करने लगे। मगर रावण पहाड़ की तरह
अटल खड़ा सबके हमलों का जवाब दे रहा था। आखिर
उसने मौका पाकर एक तीर ऐसा चलाया कि लक्ष्मण बेहोश
राम चर्चा
होकर गिर पड़े। दूसरा तीर रामचंद्र पर पड़ा। वे भी गिर
पड़े। रावण ने फौरन तलवार निकाली और चाहता था कि
रामचंद्र को कतल कर दे कि हनुमान ने लपककर उसके सीने
में एक गदा इतने ज़ोर से मारी कि वह संभल न सका।
उसका गिरना था कि राम और लक्ष्मण उठ बैठे। रावण भी
होश में आ गया। फिर लड़ाई होने लगी। आखिर रामचंद्र
का एक तीर रावण के सीने में तराजू हो गया। खून की धार
वह निकली। उनकी आँखें बंद हो गयीं। स्थवान ने समझा
कि रावण का काम तमाम हो गया। रथ को मैदान से भगाकर
शहर की तरफ चला। रास्ते में रावण को होश आ गया।
रथ को शहर की तरफ जाते देखकर गुस्से से आग हो गया।
उसी वक्त रथ को मैदान की तरफ़ ले चलने का हुक्म दिया।
इत्तफाक से उसी वक्त विभीषण सामने आ गया। रावण ने
उसे देखते ही भाले से वार किया। चाहता था कि उसकी
दगाबाज़ी की सजा दे दे। मगर लक्ष्मण ने एक तीर चलाकर
भाले को काट डाला। विभीषण की जान बच गयी। अब की
रावण ने अग्नि-वाण छोड़ने शुरू किये। उन तीरों से आग
के शोले निकलते थे। रामचंद्र की फ़ौज में खलबली पड़
गयी। मगर रावण के सीने में जो जरूम लगा था, उससे
वह हर लम्हे कमजोर होता जाता था। यहाँ तक कि उसके
हाथ से कमान छूटकर गिर पड़ा। उस वक्त रामचंद्र ने कहा,
n
लंका कांड
१२९
राजा रावण! अब तो तुम्हें मालूम हो गया कि हम लोग
उतने कमज़ोर नहीं है जितना तुम समझते थे! तुम्हारा सारा
खानदान तुम्हारी हिमाकत का शिकार हो गया। क्या अब भी
तुम्हारी आँखें नहीं खुलीं ? अब भी अगर तुम अपनी शरारत
से बाज़ आओ तो हम तुम्हें मुआफ कर देंगे।
रावण ने सँभलकर कमान उठा ली और बोला-क्या
तुम समझते हो कि कुंभकर्ण और मेघनाद के मारे जाने से मैं
डर गया हूँ। रावण को अपनी हिम्मत और कुत्रत का भरोसा
है। वह दूसरों के बल पर नहीं लड़ता । दिलेरों कीऔलाद
लड़ाई में मरने के सिवा और होती ही किसलिए है ? अब
सँभल जाओ, मैं फिर वार करता हूँ।
मगर यह महज़ गीदड़ भभकी थी। रामचंद्र ने अबकी
जो तीर मारा तो वह फिर रावण के सीने में लगा। एक ज़ख़्म
पहले लग चुका था । इस दूसरे जख़्म ने खातमा कर दिया ।
रावण रथ के नीचे गिर पड़ा और तड़प-तड़पकर जान दे दी।
जालिम था, बे-इन्साफ था, कमीना था, मगर दिलेर भी था।
मरते वक्त भी कमान उसके हाथ में थी।
रावण को रथ के नीचे गिरते देख, विभीषण दौड़कर
उसके पास आ गया। देखा तो वह दम तोड़ रहा था ।
१३० राम चर्चा उस वक्त भाई के खन ने जोश मारा। विभीषण रावण की खून- आलूदा लाश से लिपटकर ज़ार-ज़ार रोने लगा। इतने में रावण की रानी मंदोदरी और दूसरी रानियाँ भी आकर मातम करने लगीं। रामचंद्रने उन्हें समझाकर रुखसत किया। सिपाहियों ने चाहा कि चलकर लंका को लूटें। मगर रामचंद्र ने उन्हें मना किया। हारे हुए दुश्मन के साथ वह किसी किस्म की ज़्यादती नहीं करना चाहते थे।
వితరణ పట్టు షేకము
विभीषण की ताजपोशी
एक दिन वह था कि विभीषण जलील होकर रोता
हुआ निकला था। आज वह फतह-मंद और सुर्खरू होकर
लंका में दाखिल हुआ। सामने सवारों का एक दस्ता था ।
तरह तरह के बाजे बज रहे थे। विभीषण एक खूबसूरत रथ
पर बैठे हुए थे। लक्ष्मण भी उनके साथ थे। पीछे फौज
के नामी सूरमा अपने अपने रथों पर शान से बैठे हुए चले
जा रहे थे । आज विभीषण का वा-कायदा राज-तिलक होगा।
वह लंका की गद्दी पर बैठेंगे। रामचंद्रने उनसे जो वादा
किया था उसे पूरा करने के लिए लक्ष्मण उनके साथ जा रहे
हैं। शहर में डोंडी पिट गयी है कि अब राजा विभीषण लंका
के राजा हुए। दोनों तरफ़ छतों से उनपर फूलों की बारिश
हो रही है। उमरा नजरें पेश करने की तैयारियाँ कर रहे हैं।
आम मुआफी का ऐलान कर दिया गया है। रावण का ग़म
कोई नहीं करता। सभी उसके
जुल्म
से बेज़ार थे। विभीषण
का सभी जस गा रहे थे।
विभीषण को गद्दी पर बिठाकर रामचंद्र ने हनूमान को
सीताजी के पास भेजा। विभीषण पालकी लेकर पहले ही से,
हाजिर थे। सीताजी की खुशी का कौन अंदाज़ा कर सकता
है ? इतने दिनों की कैद के बाद आज उन्हें आजादी मिली
१३२
राम चर्चा
वे
आते, मगर
है। मारे खुशी के उन्हें ग़श आ गया। जब होश आया तो
हनूमान ने उनके कदमों पर सर झुकाकर कहा, 'माता, श्री
रामचंद्रजी आपके इंतज़ार में बैठे हुए हैं।
खुद
शहर में आने से मजबूर हैं।' सीताजी खुशी खुशी पालकी पर
बैठीं। रामचंद्र से मिलने की खुशी में उन्हें कपड़ों की भी परवाह
न थी। मगर विभीषण की रानी सरमा ने उनके जिस्म पर उबटन
मला, सर में तेल डाला, बाल गूंथे, बेश-कीमती साड़ी पहनायी
और रुखसत किया। सवारी खाना हुई। हज़ारों आदमी साथ थे।
रामचंद्र को देखते ही सीताजी की आँखों से खुशी के
आँसू बहने लगे। वह पालकी से उतरकर उनकी तरफ चलीं।
रामचंद्र अपनी जगह पर खड़े रहे। उनके चेहरे से खुशी नहीं
जाहिर हो रही थी, बल्कि रंज जाहिर होता था। सीता करीव
आ गयीं। फिर भी वह अपनी जगह पर खड़े रहे। तब सीताजी
उनके दिल की बात समझ गयीं। वह उनके पैरों पर नहीं गिरी।
सर झुकाकर खड़ी हो गयीं। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
एक मिनट के बाद सीताजी ने लक्ष्मण से कहा-भइया,
खड़े क्या देखते हो। मेरे लिए एक चिता तैयार करवाओ।
जब स्वामी को मुझ से नफरत है तो मेरे लिए आग की
गोद के सिवा और कहीं जगह नहीं । उनके दर्शन हो गये ।
'मेरे लिए यही खुश-नसीबी की बात है । हाय ! क्या सोच रही
थी, और क्या हुआ!
लंका कांड
थे
यह बात न थी कि रामचद्र को सीताजी पर किसी
किस्म का शुब्हा था। वे ख़ब
जानते थे कि सीताजी ने कभी
रावण से सीधे-मुँह बात भी नहीं की। हमेशा उससे नफरत
करती रहीं। लेकिन दुनियाँ को सीताजी की साफ-दिली पर
कैसे यकीन आता। सीताजी भी दिल में यह बात ख़ब समझती
थीं। इसलिए उन्होंने अपने बारे में कुछ नहीं कहा। जान
देने के लिए तैयार हो गयीं। रामचंद्र का सीना फटा जाता
था। मगर मजबूर
जरा देर में चिता तैयार हो गयी। उसमें आग लगा
दी गयी। शोले उठने लगे। सीताजी ने रामचंद्र को प्रणाम
किया और चिता में कूदने चलीं । वहाँ सारी फौज जमा थी।
सीताजी को आग की तरफ बढ़ते देखकर चारों तरफ़ शोर
मच गया । सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे-'हमको
सीताजी पर किसी किस्म का शक नहीं है। वे देवी हैं,
हमारी माता हैं, हम उनकी परस्तिश करते हैं। हनूमान,
अंगद, सुग्रीव वगैरह भी सीताजी का रास्ता रोककर खड़े हो
गये । उस वक्त रामचन्द्र को यकीन हुआ कि अब सीताजी
की पाकदामनी पर किसी को शुब्हा नहीं। उन्होंने आगे
बढ़कर सीताजी को छाती से लगा लिया । सारा मैदान खुशी
के नारों से गूंज उठा।
-52) ४
ఆగి అయోధ్యకు పోవుట
अयोध्या को वापसी
रामचंद्र ने लंका पर जिस इरादे से हमला किया था
वह पूरा हो गया। सीताजी छुड़ा ली गयीं । रावण को सज़ा
दी जा चुकी । अब लंका में रहने की ज़रूरत न थी। रामचंद्र ने
चलने की तैयारी करने का हुक्म दिया। विभीषण ने सुना कि
रामचंद्र जा रहे हैं तो आकर बोला-महाराज! मुझसे
एसी कौन-सी खता हुई, जो आपने इतनी जल्द चलने की ठान
ली। भला, दस-पाँच दिन तो मुझे खिदमत करने का मौका
दीजिये। अभी तो मैं आपकी कुछ मेहमानी कर ही नहीं सका।
रामचंद्र ने कहा-विभीषण, मेरे लिए इससे ज़्यादा
खुशी की और कौन सी बात हो सकती थी कि कुछ दिन तुम्हारी
सुहबत का लुत्फ उठाऊँ। तुम जैसे
तुम जैसे साफदिल आदमी बड़े
नसीबों से मिलते हैं। मगर बात यह है कि मैंने भरत से
चौदहवें साल के पूरे होते ही लौट आने का वादा किया था।
अब चौदह साल पूरे होने में दो ही चार दिन की कसर है।
अगर मुझे एक दिन भी देर हो गयी तो भरत को बड़ा सदमा
होगा । बशर्ते-ज़िन्दगी फिर कभी मुलाकात होगी। अभी तो
अयोध्या तक पहुँचने में महीनों लगेंगे ।
विभीषण-महाराज, अयोध्या तो आप दो दिन में
पहुँच जायेंगे।
लंका कांड रामचंद्र-सिर्फ दो दिन में ? यह कैसे मुमकिन है ? विभीषण-मेरे भाई रावण ने अपने लिए एक हवाई- सख्त बनवाया था। उसे पुष्पक विमान कहते हैं। उसकी चाल एक हजार मील रोजाना है। बड़े आराम की चीज़ है। दस-बारह आदमी आसानी से बैठ सकते हैं। ईश्वरने चाहा तो आज के तीसरे दिन में आप अयोध्या में होंगे। मगर मेरी इतनी अज़ आपको कबूल करना पड़ेगी। मैं भी आपके साथ चलँगा। जहाँ आपके हज़ारों चाकर हैं, वहाँ मुझे भी एक चाकर समझिये। उसी दिन पुष्पक विमान आ गया। अजीबो-गरीब चीज़ थी। कल घुमाते ही हवा में उठकर उड़ने लगती थी। बैठने की जगह अलग, सोने की जगह अलग, हीरे व जवाहरात जड़े हुए ; ऐसा मालूम होता था कि कोई उड़नेवाला महल है। रामचंद्र उसे देखकर बहुत खुश हुए । मगर जब चलने को तैयार हुए तो हनूमान, सुग्रीव, अंगद, नील, जामवंत सभी सर्दारों ने कहा-महाराज! आपकी खिदमत में इतने दिनों तक रहने के बाद अब यह जुदाई नहीं सही जाती। अगर आप यहाँ नहीं रहते तो हम लोगों को भी साथ लेते चलिये । वहाँ आपकी ताजपोशी का जशन मनायेंगे। कौसल्या माता के दर्शन करेंगे। गुरु वसिष्ठ, विश्वामित्र, भारद्वाज, वगैरह के उपदेश सुनेंगे और आपकी खिदमत करेंगे । .
१३६
राम चर्चा
अब और
रामचंद्र ने पहले तो उन्हें समझाया कि आप लोगों ने
मेरे ऊपर जो एहसान किये हैं, वही काफी हैं।
ज़्यादा एहसान के बोझ से न दवाइये। मगर जब उन लोगों ने
बहुत असरार किया तो मजबूरन उन लोगों को भी साथ
ले लिया। सबके सब विमान पर बैठे और विमान हवा में
उड़ चला। रामचंद्र और सीताजी में बातें होने लगीं।
दोनों ने अपने अपने हालात वयान किये। विमान हवा में
उड़ता चला जाता था। जिस रास्ते से आये थे, उसी रास्ते
से जा रहे थे। रास्ते में जो खास खास मुकामात आते थे
उन्हें रामचंद्रजी सीताजी को दिखा देते थे। पहले समुंदर
नजर आया। उसपर बंधा हुआ पुल देखकर सीताजी को
बड़ा तअज्जुब हुआ। फिर वह मुकाम आया जहाँ रामचंद्र
ने वाली को मारा था। उसके बाद किष्किन्धा-पुरी नज़र
आयी। रामचंद्र ने कहा, 'जिस राजा सुग्रीव की मदद से
हमने लंका फतह की, उनका मकान यहीं है।' सीताजी ने
सुग्रीव की रानी से मुलाकात करने की ख्वाहिश जाहिर की ।
इसलिए विमान रोक दिया गया और लोग सुग्रीव के घर
उतरे । तारा ने सीताजी के गले में फूलों की माला पहनायी
और अपने साथ महल में ले गयीं। सुग्रीव ने अपने मुअज्ज़िज़
मेहमानों की दावत की और उन्हें दो-चार दिन रोकना चाहा ।
मगर रामचंद्र कैसे रुक सकते थे। दूसरे दिन विमान फिर
लंका कांड खाना हुआ। सुग्रीव वगैरह भी उसपर बैठकर चले । रामचंद्र से उन लोगों की इतनी मुहब्बत हो गयी थी कि उनको छोड़ते हुए उन लोगों को सदमा होता था। रामचंद्र ने फिर सीताजी को खास खास मुकामात दिखाना शुरू किया। देखो, यह वह जंगल है जहाँ हम तुमको तलाश करते फिरते थे। अहा! देखो वह छोटी-सी झोंपड़ी जो नज़र आ रही है वही शवरी का मकान है। यहाँ रात भर हमने जो आराम पाया उतना कभी अपने घर में भी न पाया था। यह लो, वह मुकाम आ गया, जहाँ पाक- सीरत जटायु से हमारी मुलाकात हुई थी। वह उसकी कुटी है। सिर्फ दीवारें बाकी रह गयी हैं। जटायु ने हमें तुम्हारा पता न बताया होता तो खबर नहीं, कहाँ कहाँ भटकते फिरते । वह देखो, पंचवटी का मुकाम है। वह हमारी कुटी है। जी बे-अख्तियार चाहता है कि चलकर एक बार उस कुटी के दर्शन कर लूँ। सीताजी उस कुटी को देखकर रोने लगीं। आह! यहीं से उन्हें रावण हर ले गया था। वह दिन, वह घड़ी कितनी मनहूम थी कि इतने दिनों तक उन्हें एक जालिम की कैद में रहना पड़ा। रावण की वह फकीराना सूरत उनकी नजरों में फिर गयी। आँसू किसी तरह न थमते थे। ब-मुश्किल रामचंद्र ने उन्हें समझाकर चुप किया। विमान और आगे बढ़ा। अगस्त्य मुनि का आश्रम नजर आया। रामचंद्र ने
*
राम चर्चा
उनके दर्शन किये। लेकिन रुकने का मौका न था। इसलिए
थोड़ी देर के बाद फिर विमान वाना हुआ। चित्रकूट नज़र
आया। सीताजी अपनी कुटी देखकर बहुत खुश हुई । कुछ
देर बाद प्रयाग दिखायी दिया। यहीं भारद्वाज मुनि का
आश्रम था। रामचंद्र ने विमान को उतारने का हुक्म दिया
और मुनि जी की खिदमत में हाजिर हुए। बड़ी देर तक
रामचंद्र उन्हें अपने हालात सुनाते रहे। फिर और बातें
होने लगीं। रामचंद्र ने कहा-महाराज! मुझे तो उम्मीद न
थी कि फिर आपके दर्शन होंगे। मगर आपके आशीर्वाद से
आज फिर आपकी कदमबोसी का मौका मिल गया।
भारद्वाज बोले-बेटा, जब तुम यहाँ से जा रहे थे,
उस वक्त मुझे जितना रंज हुआ था उससे कहीं ज़्यादा खुशी
आज तुम्हारी वापसी पर हो रही है।
राम-आपको अयोध्या के हालात तो मिलते होंगे?
भारद्वाज-हाँ बेटा, वहाँ के हालात बरावर मिलते
रहते हैं। भरत तो अयोध्या से दूर एक गाँव में कुटी बनाकर
रहते हैं। मगर शत्रुघ्न की मदद से उन्होंने बहुत अच्छी
तरह राज का काम सँभाला है । रिआया खुश है। जुल्म का
नामो-निशान नहीं, मगर सब लोग तुम्हारे लिए बेकरार हो
रहे हैं। भरत तो इतने बेकरार हैं कि अगर तुम्हें एक दिन
की भी देर हो गयी तो शायद तुम उन्हें जिन्दा न पाओ।
लंका कांड
१३९
रामचंद्र ने उसी वक्त हनूमान को बुलाकर कहा, 'तुम
अभी भरत के पास जाओ और उन्हें मेरे आने की खबर दो।
वे बहुत घबरा रहे होंगे। मैं कल सवेरे यहाँ से चलूँगा।"
यह हुक्म पाते ही हनूमान अयोध्या की तरफ रवाना हुए
और भरत का पता पूछते हुए नन्दीग्राम पहुँचे। भरत ने
ज्यों ही यह खुशखबरी सुनी, उन्हें मारे खुशी के ग़श आ
गया। उसी वक्त एक आदमी को भेजकर शत्रुघ्न को बुलाया
और कहा-भाई, आज का दिन बड़ा मुबारक है कि हमारे
भाई साहब चौदह बरस की जलावतनी के बाद अयोध्या आ
रहे हैं। शहर में डोंडी पिटवा दो कि लोग अपने अपने घर
चिराग़ जलायें और उस खुशी में जशन मनायें। सबेरे तुम
उनके जुलूस का इंतजाम करके यहाँ आना। हम सब लोग
भाई साहब की पेशवाई करने चलेंगे।
दूसरे दिन सवेरे रामचंद्र जी भारद्वाज मुनि के आश्रम
से रवाना हुए। जिस अयोध्या की गोद में पले और खेले
उस अयोध्या के आज फिर दर्शन हुए । जब अयोध्या के बड़े
बड़े आलीशान महल नजर आने लगे तो रामचंद्र का चेहरा
मारे खुशी के चमक उठा । उसके साथ ही आँखों से आँसू भी
बहने लगे । हनुमान से बोले-'दोस्त, मुझे दुनियाँ में कोई
जगह अपनी अयोध्या से ज़्यादा प्यारी नहीं। मुझे यहाँ के
काँटे भी दूसरी जगह के फूलों से ज़्यादा खूबसूरत मालूम होते
२४०
राम चर्चा
हैं। वह देखो, सरजू नदी शहर को अपनी गोद लिये कैसा
बच्चों की तरह खिला रही है। अगर मुझे फ़कीर बनकर भी
यहाँ रहना पड़े तो दूसरी जगह राज करने से ज़्यादा खुश
रहूँगा।' अभी वे यही बातें कर रहे थे कि नीचे हाथी, घोड़ों
और रथों का जुलूस नजर आया। सब के आगे भरत गेरुए
रंग की चादर ओढ़े, जटा बढ़ाये, नंगे पाँव, एक हाथ में रामचंद्र
की खड़ाऊँ लिये चले आ रहे थे। उनके पीछे शत्रुघ्न थे।
पालकियों में कौसल्या, सुमत्रा और कैकयी थीं। जुलूस के
पीछे अयोध्या के लाखों आदमी अच्छे अच्छे कपड़े पहने
चले आ रहे थे। जुलूस को देखते ही रामचंद्र ने विमान
नीचे उतारा। नीचे आदमियों को ऐसा मालूम हुआ कि
कोई बड़ा तायर पर जोड़े उतर रहा है। कभी ऐसा विमान
उनकी नजर से न गुज़रा था। मगर जब विमान नीचे उतर
आया तो लोगों ने बड़े तअज्जुब से देखा कि उसपर रामचंद्र,
सीता, लक्ष्मण और उनके सरदार बैठे हुए हैं। 'जय जय'
के नारों से आसमान हिल उठा ।
ज्योंही रामचंद्र विमान से उतरे, भरत दौड़कर उनके
पैरों से लिपट गये। उनके मुँह से आवाज़ न निकलती थी।
बस, आँखों से आँसू बह रहे थे । रामचंद्र उन्हें उठाकर छाती
से लगाना चाहते थे, मगर भरत उनके पैरों को न छोड़ते थे।
कितना पाक नज़ारा था। रामचंद्र ने तो बाप के हुक्म को
लंका कांड
मानकर बन-बास लिया था। मगर भरत ने राज मिलने पर
भी उसे कबूल न किया। इसलिए कि वह समझते थे कि
रामचंद्र के रहते राज पर मेरा कोई हक नहीं है। उन्होंने
बादशाहत ही नहीं छोड़ी, बल्कि फकीराना जिंदगी बसर की।
क्योंकि कैकयी ने उन्हीं के लिए रामचंद्र को बन-बास दिया
था। वे फ़कीरों की तरह रहकर अपनी माँ की बेइन्साफ़ी का
बदला चुकाना चाहते थे। रामचंद्र ने बड़ी मुश्किल से उन्हें
उठाया और उन्हें छाती से लगा लिया। फिर लक्ष्मण भी
भरत से गले मिले। उधर सीताजी ने जाकर कौसल्या और
दूसरी माताओं के कदमों पर सर झुका लिया। कैकयी रानी
भी वहाँ मौजूद थीं। तीनों सासोंने सीता को दुआएँ दीं।
कैकयी अब अपने किये पर नादिम थी। अब उसको दिल
रामचंद्र और कौसल्या की तरफ से साफ हो गया था।
శ్రీరామున తుపు
33.6702
చంద్రుపట్టాభషేకము,
रामचंद्र की राजगद्दी
आज रामचंद्र की ताज-पोशी का मुबारक दिन है।
सरजू के किनारे मैदान में एक वसीअ शामियाना खड़ा है।
उसकी चोवें चांदी की है और रस्सियाँ रेशम की। कीमती
ग़लीचे विछे हुए हैं। शामियाने के बाहर खुशनुमा गमले
रखे हुए हैं । शामियाने की छत शीशे के वेश-कीमत सामानों
से सजी हुई है। दूर दूर से ऋषि-मुनि बुलाये गये हैं ।
दरवार के उमरा और बाजगुजार राजे अदब से बैठे हुए हैं।
सामने एक सोने का जड़ाऊ सिंहासन रखा हुआ है।
यकायक तो दगीं। सब लोग सँभल गये। मालूम
हो गया कि श्रीरामचंद्र राम-भवन से रवाना हो गये। उनके
सामने घंटा और शंख बजाया जा रहा था। लक्ष्मण, भरत,
शत्रुघ्न, हनुमान, सुग्रीव, वगैरह पीछे चले आ रहे थे। रामचंद्र
ने आज शाहाना लिबास पहना है और सीताजी के बनाव
और सिंगार की तो तारीफ ही नहीं हो सकती ।
ज्योंही ये लोग शामियाने में पहुँचे, गुरु वसिष्ठ ने उन्हें
हवनकुंड के सामने बैठाया । ब्राह्मणों ने वेद-मन्त्र पढ़ना शुरु
कर दिया। हवन होने लगा। उधर राजमहल में मुबारकबाद
के गीत गाये जाने लगे। हवन खतम होने पर गुरु वसिष्ठ ने
रामचंद्र के माथे पर केसर का तिलक लगा दिया। उसी
लंका कांड
वक्त तोपोंने सलामियाँ दागीं। उमरा नज़रें पेश करने लगे।
कवीश्वरों ने कवित्त पढ़ना शुरू कर दिया। रामचंद्रजी और
सीताजी सिंहासन पर रौनक-अफरोज़ हो गये। विभीषण
मोरछल झलने लगा। सुग्रीव ने चोरदारों का असा सँभाल
लिया और हनूमान पंखा झलने लगे। वफादार हनुमान
की खुशी की थाह न थी। जिस राजकुमार को बहुत दिन
पहले उसने ऋष्यमूक पहाड़ पर इधर-उधर सीता को तलाश
करते पाया था, आज उसीको सीताजी के साथ सिंहासन पर
बैठे देख रहा था। इन्हें इस मंजिले-मकसूद तक पहुँचाने में
उसने कितना हिस्सा लिया था। ग़रूर-आमेज़ मुसर्रत से
वह फूला न समाता था।
भरत बड़े बड़े थालों में मेवे, ग़ल्ले भरे हुए बैठे थे।
रुपयों का अंबार उनके सामने लगा हुआ था। ज्योंही
रामजंद्र और सीता सिंहासन पर बैठे, भरत ने दान देना शुरू
किया। उन चौदह सालों में उन्होंने किफायत करके शाही
खज़ाने में जो कुछ जमा किया था वह किसी-न-किसी सूरत में
फिर रिआया के पास पहुँच गया। ग़रीबों को भी अशर्फियों
की सूरत नजर आ गयी। नंगों को शालदोशाले मयस्सर
हो गये और भूखों को मेवे और मिठाई से सीरी हो गयी ।
चारों तरफ भरत की फय्याजी की धूम मच गयी। सारे
राज में कोई ग़रीब न रह गया। काश्तकारों के साथ खास
राम चर्चा
रिआयत की गयी। एक साल का लगान मुआफ कर दिया
गया । जा-त्र-जा कुएँ खुदवा दिये गये। कैदियों को रिहा कर
दिया गया। सिर्फ वे ही आजाद न किये गये जो दगा
और फरेब के मुजरिम थे। रईसों और अमीरों को खितावात
दिये गये और खिल्लतें तकसीम हुई।
M
कठिन शब्दार्थ बाल कांड खाई - गड्ढा अतिथि सत्कार करने वाला 3 ३ मुमानियत - रोक, मनाही मुआविन - सहायक, मददगार हिफ़ाज़त - रक्षा शुमाल, उत्तर "मशहूर - प्रसिद्ध लबरेज़ - लबालब, भरा हुआ कस्बा - नगर बुर्ज - गुंबद, मीनार आबाद - बसा हुआ तालीम - शिक्षा, विद्या खानदान • कुटुंब आम - प्रचलित नामी-गरामी - प्रसिद्ध, मशहूर जाहिल - अपढ़, बेवकूफ पाये-तगत - राजधानी मेहमान-निवाज़ सखी - उदार ग़रीब-परवर - ग़रीबों पर दया करने- सुलह-पसंद - शांति-प्रिय वाले इल्म-दोस्त - विद्या-प्रेमी जी-हिम्मत - हिम्मतवाला पाबंद - पालन करनेवाला नामवर - प्रसिद्ध, मशहूर मुकद्दमा दावा, अभियोग दायर करना - पेश करना इल्म व हुनर - विद्या और कला इफ़रात - अधिकता, ज्यादती मरकज़ - केंद्र रोज़गार - व्यापार, तिजारत खुशहाल - अच्छी हालत में वसीअ - चौड़ा वारदात - दुर्घटना दो रूया - दोनों तरफ़ ताऊन - प्लेग आलीशान - बड़े बड़े हुस्ने-इंतज़ाम - अच्छा प्रबन्ध शफ़ाखाना - अस्पताल बरकत - प्रसाद, कृपा कदोम - पुराना दरम्त - पेड़ रिवाज़ - प्रथा, चाल, रीति कलसा घड़ा नवाह - आसपास के प्रदेश आवाज़ी निशाना - शब्द-बेधी बान N - राम चर्चा . सीना - छाती बर आना - पूर्ण होना नादिम - शर्मिन्दा, लजित गुलज़ार - आनंद और शोभा भरा रंजीदा - दुखी परवरिश-पालन-पोषण तालीम देना - पढ़ाना ६ माजरा-ये-ग़म - दुखद समाचार ज़हीन - अक्लमंद, बुद्धिमान कैफियत - समाचार, हाल इल्मे जंग - युद्ध-विद्या नेजा-बाज़ी - भाला चलाना बद-दुआ - शाप तीर-अंदाज़ी - धनुर्विद्या रुखसत हुए - बिदा हुए औलाद - संतान फ़न -कला सानी - बराबर, समान हक मे - विषय में, पक्ष में अदब - इज्जत दुआ-ए-खैर - आशीर्वाद सन्त-सुस्त कहना- भला-बुरा कहन ताजो-तस्त - मुकुट और सिंहासन वारिस - उत्तराधिकारी मुहब्बत - प्रेम, प्यार तस्कीन - धैर्य : सांत्वना खबरू - खूबसूरत, सुंदर मशविरा • सलाह तवाना - तंदुरुस्त, बलवान खलीक - सुशील दुआ - आशीर्वाद हामिला होना - गर्भवती होना कस-व-नाश्स - छोटे-बड़े सभी रोशन - प्रकाशित वक्ते-मुअय्यन - नियत समय एकसों - एक समान, एक-सी उन्स - प्रेम शादियाना - मंगल गीत, एक तरह रिआया - प्रजा [কা আলা ताड़का और मारीच का जशन - उत्सव खैरात - दान, भीख मारा जाना मुफलिस - ग़रीब, निधन 68 दिली-मुद्दा मन की इच्छा, वज़ीर - मंत्री मनोभिलाषा तशरीफ़ लाना - पधारना, आना . , - , कठिन शब्दार्थ हुनर - कला महज़ - केवल, सिर्फ लमहा-क्षण, पल इबादत - पूजा, आराधना गवारा - पसंद ज़ोर - बल अंदेशा - डर, भय ताज़ीम - आदर, इज्जत नातजुर्बेकार - अनुभवहीन कदर - हद, मात्रा खौफ़नाक - भयकर, डरावने गुस्सेवर - क्रोधी मुकाबला करना-सामना करना मरज़ी - इच्छा मैंदाने जंग - युद्धक्षेत्र तजुर्बा - अनुभव, अभ्यास यगाना - अनुपम, बेजोड़, अद्वितीय मज़बूर करना - विवश करना रोज़गार - पेशा या व्यापार तख्त - सिंहासन यकीन - विश्वास ताज़ीम की झुककर प्रणाम किया बेखौफ़ - निडर गरीबखाना - गरीब का घर बाल बांका न होना पैर नुकासान कदम - वरण, न होना पाक - पवित्र, साफ़ उज्र - आक्षेप, आपत्ति एहसान - भलाई, उपकार इजाज़त - अनुमति खिदमत - सेवा जवामर्दी - वीरता फरमाना बताना ब-सरोचश्म - सर आँखों पर इज़हार करना - दिखाना, प्रकट करना जंगी-लिबास - युद्ध में जाते समय जुल्म • अत्याचार पहनाये जानेवाला कपड़ा या नापाक - गंदा, अपवित्र पोशाक सरकश - विद्रोही, बागी अजीब-व-गरीब - अद्भुत फ़साद-उपद्रव खाक करना-भस्म करना देवनी - राक्षसी हलाक करना - नाश करना, मार ११ ॥ डालना आहट-शब्द . 7 बोसा देना - चूमना ' राम चर्चा इशारा - संकेत वाकया-घटना, समाचार इम्तिहान - परीक्षा सूरत-रूप, शकल कामयाब-सफल कद - ऊंचाई, डील दिली-ग्वाहिश - हार्दिक इच्छा फैसला करना - निर्णय करना, निश्चय उसूल के खिलाफ़ - सिद्धांत के विरुद्ध करना नीलगाय गाय की तरह का एक सूबा - प्रांत, प्रदेश जानवर १४ कहत- अकाल बेखौफ़ - निडर, निर्भय अज़ीज़ - प्रिय, प्यारा दरिदे फाड़कर खानेवाले जानवर फाल - हलका अग्रभाग रागिब - प्रवृत्त वदा दाद - ईश्वर से दिया हुआ कमान - धनुष निआमत -देन गश्त लगाना - घूमना क़द-व-कामत...होना - मोहित होना फिक - चिता फरेका होना - दिल ललचा जाना बे-नवाब व खूर - बिना सो, बिनाये सदा - आवाज़ खाये . खैरियत • कुशल गुज़र जाना-बीत जाना हसीन - सुंदर ब-हुस्न व खूबी - सुन्दर और अच्छी खातिर-व-तबाज़ा - आदर-सत्कार रीति से काश - क्या ही अच्छा होता किस्म - प्रकार, तरह मज़बूर - लाचार तजवीज़ करना - चुनना (३) शादी ताज्जुब - अचरज शरीक होना - संमिलित होना 16 अकसर -प्राय: तकदीर - भाग्य जलसा-उत्सव बुजुर्ग - पूर्वज 12 वसीअ - बड़ा कठिन शब्दार्थ सूरमा - वीर - दिलावर - बहादुर कैफ़ियत - हालत शामियाना तानना - खेमा या डेरा तन्ज़ - ताना, व्यंग्य खड़ा करना मुतलक - तनिक भी, ज़रा भी तवजह करना - ध्यान देना जोम - घमंड, गर्व गोया मानों जोगे-मुसर्रत - खुशी का जोश नवाब-सपना मुतफ़िक्र निगाह - चिंतित दृष्टि खिफ़्फ़त - अपमान लज्जारा - दृश्य 7 17 सरकना - खिसकना मायूसाना अंदाज़ - निराशा-सूचक अदने-व-आले - छोटे-बड़े तशरीफ़ ले जाना - जाना मुराद-इच्छा हौसला - हिम्मत खुश-खबरी - शुभ-समाचार जब्त होना - सहना इत्तला देना - सूचना देना मुबारक - शुभ, मंगल साँड़नी - ऊँटनी पुरजे पुरज़े करना - टुकड़े टुकड़े करना अहाता - मंडप हकीकत - असलियत, सचाई राज़-रहस्य पुर-जोश - जोश पूर्ण सुख - लाल मिज़ाज - गुण, तबीयत कता - रूप, बनावट वाकिफ़-परिचित मुलायमत - नम्रता मौका - संदर्भ २० मुनासिब - योग्य, ठीक फ़ेल - कार्य, काम जुदा करना - अलग करना तस्कीन - सांत्वना, तसल्ली दिलेर - वीर मुंतज़िर - प्रतीक्षा करनेवाला इस कदर - इतना आवाजें कसना - ताना मारना, परि- जामे से बाहर होना - आपे से बाहर हास करना होना, गुस्से में आना आहिस्ता - धीरे धीरे बोसीदा - बेदम, पुराने , राम चर्चा - बेरहम होना - गुस्से में आना अलबत्ता - बे-शक गीदड़ भभकी - झूठी धमकी, व्यर्थ फ़िजूल - व्यर्थ की धमकी बीर-बहूटी एक तरह का लाल अलफ़ाज़ - शब्द (लफ्ज़ का बहु.) बरसाती कीड़ा २१ ॥ निहायत - अन्यत गज़बनाक-भयावना आजिज़ी - विनीत-प्रार्थना गुस्ताखी - पृष्टता कम-फहम-कमसमझ पेश आना - व्यवहार करना खतावार - दोषी जबाँ दराज़ी करना - बढ़-बढ़कर मुनासिब - उचित बोलना तावान - दंड नाहक - व्यर्थ ग़रूर - घमंड तरह देना - ध्यान न देना सदमा - दुख, अफसोस बाज़ आना • छोड़ना वरना - नहीं तो ओछा - नीच जौहर - विशेषता, रत्न पाला पडना काम पड़ना, वास्ता चिल्ला - प्रत्यंचा, धनुष की डोरी पड़ना बिफरना - वश में न रहना, नाराज़ खुश्क - सूखा होना रुखसत - बिदा अदब आमेज़ • आदर-पूर्ण मुतफ़िक - चिनित गुफ्तगू - बातचीत बारा बाग़ होना - फूला न ममाना जिस्म - शरीर, बदन जशन - आनंद, उत्सव शरीर - दुष्ट, सृष्ट सलीका - सभ्यता, खातिर व मदारात - सेवा-सत्कार बरताव तमीज़ - शील, विक बेशुमार - अनगिनत स्याह-काला मुरस्सा - जड़ाऊ नस्ल - जाति खफा होना - नाराज़ होना दहेज़ - वर दक्षिणा २३ ।
बनवास २९. तनदेही - मेहनत, प्रयत्न बाइस - कारण मस्लहत - भलाई हुक्मरानी - शासन अयोध्या कांड सायत - समय, घड़ी मुकर्रर - निश्चित ३१. ॥ लर्जा आना - कंप आना हसद - ईष्या रोब जमाना - धाक जमाना मंसूबा - अभिलाषा - नाम के वास्ते ३३. तजुर्बा - अनुभव बराये-नाम अंजाम पाना - पूरा होना फरमाँ-रवाई - बादशाही लूका-आग ज़िक्र - बात, विषय उसूल - सिद्वांत, धर्म पाकिफ़ होना - परिचित होना अमल में लाना - कार्य में लाना अराकीन • प्रमुख व्यक्ति तबाह करना - बरबाद करना करिश्मे-साजियों - कौशल , छक्का-पंजा - कपट-छल सधी-बधी - आपस में तय हुई . फ़ितने - षडयन्त्र जख्मी - घायल ज़ेवर - ओभूषण ३६. मुअजिज़ : प्रतिष्ठित मुदत - समय गोशा - एकांत स्थान तजवीज़ - प्रस्ताव मरज़ी - इच्छा कारे-खैर - शुभ-कार्य हारिज - बाधक इबादत- उपासना, पूजा मुरब्बी - संरक्षक असना - समय, बीच क़ौल - वचन नहूमत - उदासी, अशुभ-लक्षण मुमानियत - मनाही हाथों के तोते उड़ गये हिम्मत हार गये, निराश हो गये , राम चर्चा गुस्ताखी - सृष्टता स्योरी - नज़र, दृष्टि ३८. MLA पेचो-ताब खाना-तिलमिलाना हीला - बहाना तबाही- नाश गिरह में बाँधना - याद रखना ४२. बग़ावत - क्रांति, कलह दिलो-जान से - मन और प्राण से संगदिल - निष्ठुर शौहर - पति जर्द - पीला कतरा - बूंद कदूरत - मैल, मालिन्य बदरवाह - बुरा चाहनेवाला आरजू - अभिलाषा लावल्द - निस्संतान लगते-जिगर - हृदय का टुकड़ा फ़क़ीराना-सूरत • साधु का वेष बे-नूर - निस्तेज, प्रभाहीन फरमाँ बरदार - आज्ञकारी गर्क - डूबा हुआ, मग्न वहम - शंका - शील, सजनता मुरव्वत . कायापलट - परिवर्तन तुनकना - गुस्से में आना सरीह - प्रकट, स्पष्ट वीरान करना- उजाड़ना सब्ज़ बाग - प्रलोभन मुआमिला - विषय शुबहा - सन्देह बेइन्साफ़ी - अन्याय कालिब - शरीर खातमा - अंत गुमान- अनुमान मुबारक - सुखी, शुभ फ़रेब - छल, धोखा दाग़ - कलंक क़ासिद - दूत मंसूबे बाँधना - इरादा करना, रऊसा - प्रमुख, धनी मानी भादमी उमराव-सभासद, दरबारी जम्मे-गफ़ीर - भिक्षुओं का दल अब्रू - भौंह कठिन शब्दार्थ जंग - लड़ाई फ़ारिश होना - निवृत्त होना साज़िश - घडयन्त्र जेवर- गहना, आभूषण मुहब्बत आमेज़ - प्रेम-पूर्ण आरास्ता - सजाया हुआ मुबारकबादी - मंगल गीत नौबत - एक तरह का बाजा बर्षा होना - आना कयामा - सूरत, आकृति, रंग-ढंग अहले-हिम्मत - साहसी मुमकिन - संभव पैग़ाम - संदेश, खबर क़ाबिल-एहतराम - योग्यतम, आदर- याद प्र.रमाना - बुलाना कुर्बान - निछावर, बलि [णीय बेकसाना निगाह - विवश दृष्टि रज़ामंदी - स्वीकृति अर्सा गुजरा - बहुत दिन हुए ५१.51 ज़ियारत • दर्शन ताम्मुल करना - देरी करना सर्द-आह - ठंडी साँस ब-सरो-चश्म - सिर आँखों पर कोहो बयाबान - पहाड़ और सरुभूमि खुश-नसीबी - सौभाग्य सआदतमंद - सुगील ५२. मुकद्दम - प्रधान, मुख्य नाराज़गी - गुस्सा बेअदबी - अशिष्टता मलाल - दुख, रंज क्रिया तशफ़्फ़ी - आश्वासन, ढाढ़स नागवार -बुरा कलमा-वाक्य हरचंद - कितना ही ग़श - मूर्छा यकीनी - निश्चित गल्ला - अनाज, अन्न जिस्मानी - शारीरिक सकता - मूर्छा आसाइश आराम, आनंद बेहिस - बेनूर, निस्तेज उलफत -प्रेम मुकद्दस - पवित्र ४८. फेल - काम, . ५३. . ४९.५१ राम चर्चा ज़ार ज़ार रोना - फूट-फूटकर रोना हमदर्दी - सहानुभूति तक करना - त्याग देना स्याहो सफेद - भला-बुरा ५४.54 जानिब से - ओर से बुज़दिल - डरपोक कमीना - नीच - उन्स-प्रेम तारीकी - अंधेरा बालिश्त-बित्ता गैर-मामूली - असाधारण मातमसरा - शोकभवन राजा दशरथ की वफ़ात ५५. ग़मनाक -दुखद तनहा • अकेले खूरवार - डरावने वफ़ात - मृत्यु M Hal जात - जाति साबिका - वास्ता संगरेज़ - कंकड़ सहितयाँ - कठिनाइयाँ वर-व-आमियत कुशल-समाचार अहल-सुबह - संघरे, तड़के ५६.58 बेकरारी - बेचैनी शरीक-ए-हाल - संगिनी तफरीह - मन-बहलाव इसरार - आग्रह लाजवाब- निरुत्तर शाही लिबास - राजसी-पोशाक ५७.57 जारो-कतार रोना - फूट-फूट कर रोना फ़र्त - अधिकता, ज्यादती बे-हिसो-हरकत - निष्प्राण और निस्पंद जनून - पागलपन मरीज़ - रोगी. मातम बर्षा होना - शोक छाना मुराद बर आना - इच्छा पूरी होना सूरते-तस्वीर - चित्र-लिखित मोनबर - विश्वासी क़ासिद - हरकारा . बदगुमान - असंतुष्ट ६४५ सरगोशियाँ - कानाफूसी भबतर- खराब, अव्यवस्थित दुबकना - छिपना । कठिन शब्दार्थ चित्रकूट बेवा - विधवा ६६.66 खित्ता - भाग, हिस्सा घनौती - तता तफ़सील - विस्तार कोहिस्तानी - पहाड़ी कारगुजारी - कार्य-पटुता गोल - झुंड दास्तान - वर्णन, कथा वादी - घाटी तेवर - त्योरी तेवरों पर शिकन पड़ना - त्योरियों परिद - पक्षी पाकीज़ा - पवित्र, स्वच्छ पर बल पड़ना, गुस्सा आना, सेहत -वन्त-स्वास्थ्यप्रद नफ़रत-आमेज़ - घृणा-सूचक ६७. 27 रूह - आत्मा मुखातिब होना - ध्यान देना दिलकश - मन को लुभानेवाला सिफ़ला- नीच मन्जर - दृश्य देवता-ए-सिफ़त - 'देवता के समान इत्तफ़ाक़ात - मेल, मिलत गुणवाला तस्मा - बंधन ताक-आला बे-अख्तियार - आप से आप भरत और रामचन्द्र ७१, 71 . ७२. / " ७३.7 ६८. . - ७४. "111 - दिक करना - तंग करना, सताना फ़ारिश होना छुटकारा पाना शकूक - शक का बहुवचन ग़रूबे-अफ़ताब - सूर्यास्त जेबतन करना पहनना नज़ारा- दृश्य हुस्न-खिदमात - आदर्श सेवा लेना शबनमी - ओसकण से भीगे हुए दाद लेना - तारीफ सुनना, पुरस्कार ७५. 71 गुबार-आलूदा होना - धूल से भरना. अहे दरबार - दरबारी . ६९.69 गल्ला - झुंड राम चर्चा कज़िया पाक करना - विवाद का अंत आब-पाशी - सिंचाई करना गाफ़िल - असावधान ७८. 15 अहलकार - कर्मचारी नाज़ व नेमत - सुख और ऐश्वर्य अस्मत • पातिव्रत्य इल्तिजा - प्रार्थना, बिनती तौफ़ीक़ देना-प्रेरणा देना बजालाना- पालन करना माय-नाज़ - गौरव का विषय रौनक - श्री, शोभा पुर-मलाल - दुखपूर्ण स्यापा - बुरी घटना, मृत्यु की नीरवत कुहराम - रोना-पीटना दीदार - दर्शन हस्ती - अस्तित्व फ़रयाज़ी - उदारता मुशीर - मंत्री, वज़ीर हैरत - आश्चर्य ज़राअत - खेती, कृषि शायर - कवि बन कांड athe Crores शौहर - पति नाज़नी - सुन्दरी गवारा करना - सहन करना 67 ८७ नवाह - आसपास के प्रदेश अकीदत - विश्वास सफाया करना - नष्ट करना तशफ्फ्री- सांत्वना अदावत - शत्रुता 880 आलम अवस्था 22 ९२ ग़बत - अनुराग मायल करना रुजू करना, प्रवृत्त - चकमा देना - धोखा देना कारगर होना - सफल होना खून सर्द होना - डर जाना कठिन शब्दार्थ १५७. किष्किंधा कांड बिछुआ पैरों की उंगलियों में कोहो-बयाबान - पहाड़ और जंगल पहने जानेवाला एक आभूषण रूह फना होना - बेहद डरना (सुहाग चिन्ह)। 14 रफ़ीक़ . दोस्त महल्लिक - प्राण लेनेवाला हमदर्दाना अंदाज़ - सहानुभूतिपूर्ण ढंग वली-अहद - युवराज इस्तकबाल - स्वागत मुअत्तबिर - विश्वसनीय ९५ जुरअत - साहस सुन्दर कांड गोशा - कोना, एकांतस्थान १००.16 बेनी - सिर का एक आभूषण सुराग लगाना - पता लगाना खुदातरस - भगवद्भक्त जलील - अपमानित रुसवा - बदनाम हुरे हो गये - भाग गये गालिब आना - विजयी होना १०३. 103 आतिशीन - अग्निमय १०५. 10 उबूर करना - पार करना १०२.10 एलची - राजदूत NBech तामीर करना बनाना लंका कांड १०९.104 मारफ़त द्वारा मुहासरा करना - घेरा डालना मुहाल - मुष्किल - राम चर्चा M . . ११४.14 124 110 ११०. शबीह - तस्वीर, सूरत शाना - कंधा, गिरिया व जारी- शोक-सलाप, रोना- काम आना - मर जाना सानिहा - दुर्घटना [धोना देव - राक्षस ११.IIT- १२३. खून-खराबी- रक्तपात गरूर-धमंड ११२.॥ जशन-उत्सव [बजवाना साबिका पड़ना - पाला पड़ना डके पर चोट डलवाना - युद्ध के बाजे शुमारो-कतार - गिनती मुद्दई - दावा करनेवाला, शत्रु बद-रवाही - अहित, बुराई लकब-उपनाम, खिताब गुनाह- पाप ११५.॥ तैश - जोश दावते-जैग - युद्ध का निमंत्रण हरबा- अस्त्र-शस्त्र कातिल - घातक खन-वार - रक्त पिरासु, खन -माहिर - होशियार, दक्ष ग़ालिब आना - विजय पाना ११७. 12 हाथ पाँव फूल जाना सयभीत हो परवरिश - पालन-पोषण इंतकाम - बदला, प्रतिशोध जाना बरन्शना - देना अभीष्ट दाना - अक्लमंद, बुद्विमान् नब्ज़ - नाडी हमसर-बराबर, समान ११९. 11 फेल - कृत्य, कार्य अक्सीर - सब रोगों को नष्ट करनेवाली बाज़ आना - छोडना, विमुख रहना १२०. [औषधि अस्मत-माअब - पतिव्रता काहिल - आलसी - 2' १२६. ऐश-पसन्द - विलासी रू-ब-रू - सामने वाला, भयंकर - शायाँ - उपयुक्त, M कठिन शब्दार्थ १२७. 141 - गुर्ज - गदा असरार करना आग्रह करना, हठ १२८.1 करना तराजू होना - चुभ जाना मुअज्ज़िज़ - प्रतिष्ठित १२९. १३७. A कुवत - ताक़त, [लुंठित पाक-सीरत - पवित्र गुणों-वाला खून-आलूदा - रक्त से लथ-पथ, रक्त १३०.० जला-वतनी - देश निकाला ज़ार ज़ार रोना - फूट-फूटकर रोना पेशवाई - अगवानी, स्वागत १४०. ताजपोशी - राज्याभिषेक तायर - पक्षी, चिडिया दस्ता - समूह १४१. ऐलान करना - घोषणा करना नादिम - लजित, शर्मिन्दा बेज़ार - व्याकुल, पीडित १४२. वसीअ - लंबा-चौडा, विशाल बाल गूंथना - बेणी बनाना चोब - शामियाना खड़ा करने का १३३. १४३. [खभा साफ़-दिली - निर्मल हृदयता रौनक-अफ़रोज़ - शोभायमान मोरछल - मोर का पंखा पाकदामनी - पवित्रता असा - लाठी मंज़िले-मकसूद - निर्दिष्ट स्थान, ध्येय सुहबत - संसर्ग, संगति ग़रूर आमेज़ - अभिमानपूर्ण बशर्ते-जिंदगी - यदि जिन्दा रहा सीरी - संतुष्टि १३५. फ़य्याज़ी- दानशीलता, करमा हवाई-तहत - वायुयान काश्तकार - कृषक Latest परस्तिश - पूजा NSWATA
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