Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Vigbhattalandkara
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R.I ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... HORARIS विषयानुक्रमणिकlas N........( विषय. पृष्ठ. | विषयं. द्वाददादलपप्राध ७२ सशय व निधय ३१ गोमूनिकावंध... सशयका उदाहरण चोक्ति ७३ | दृष्टान्तालंकार प्रथम सभंगलेपनमोतिका उदाहरण व्यतिरेक अभंगरेपोतिका उदाहरण अपति अनुप्रासलधण ऐकानुप्रासका उदाहरण तुल्ययोगिता १३८ उत्प्रेक्षा राटानुप्रासके उदाहरण अर्यान्तरन्यास ८१ १४२ पादयमक के उदाहरण ठेपरदितअर्थान्तरन्यास ८२ १४३ समासोक्ति पश्यमक विमावना अथार्थालंकाराः। १४८ अतिशयालकार समानोक्ति हेतु मागउदाहरण. १.६मारत उदाहरण पयांपत्ति ७७ ... ७८ ... ... ... ... ८९ ... ... ... ... .... ... ... ... .... ... .... उपमारक्षण... ... ... ... ... .... १११ समादित .... ... " उपमारक्षा भाषा अन्योन्योरमा अनन्वयारमार अनचपराभरा एमुगोपमालकार ... .... परित्ति यथाराग्य ११३ | रिमारकार... सहोति ११४सिप ११५ अवसर ११९रयर ... .... ... ... ... ... मागरमारण मारा... ... ... ... .... ... ... ... ... . ... १२ भिका उदाहरण सम्पर १२८मपरशा १७२ १७४ ... .... ... भ. का उदारप... ... १२: Sena ... ....
.. २०९ ... ... ... ... ... ... २१० ... ... ... १८७मान, ... ... ... ... २१७ २१८ विषयानुक्रमणिका विषय. पृष्ठ. विषय, पृष्ठ, अनुमानालकार १७८ स्वकीया २०७ परिसख्या १८२ परकीया प्रश्नोत्तर तथा सकर ... १८३ सामान्या ... व्यक्त प्रभोत्तरोदाहरण १८४ | विमलम गूढ प्रश्नोत्तरोदाहरण ... १८५ | पूर्वानुराग सकर... प्रवास... २१३ करुणा २१४ अथ रीतिवर्णनम्। वीररस रीतिद्वार १८९ करुणा गौडीका उदाहरण १९१ हास्य... २२० वैदर्भीका उदाहरण १९३ अद्भुत २२२ भयानक २२४ अथ पञ्चमपरिच्छेदः । रसोंका वर्णन... १९५ | बीभत्स ૨૨૭ नायकलक्षण... २०१|शान्त... २२९ नायकभेद २०२ परिशिष्ट २३१ अनुकूल और दक्षिणकेलक्षण... २०३ रसाना विरोधः दर्पणे... २३२ नायिकावर्णन... २०४ टीकाकारस्य मे परिचायकाः श्लोकाः२३५ अनुढालक्षण... २०५ | प्रथसमाप्तिः २३६ इत्यनुक्रमणिका समाप्ता. .... ... .... ... २२५ ... ... ... .. ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ...
श्रीगणेशायनमः । वाग्भटालंकारः। सान्वयसंस्कृतटीका-भापाटीकोपेतः। प्रथमपरिच्छेदः। श्रीगोपालं नमस्कृत्य करोति मुरलीधरः । वाग्भटालंकतेष्टीकामन्वयार्थप्रबोधिनीम् ॥ श्रीगोपालं नमस्कृत्य मुरलीधरः अन्वयार्थप्रबो- धिनी वाग्भटालंकृतेः टीका करोति इत्यन्वयः॥ श्री- गोपालम् गां वेदवाणी पृथिवीं वा पालयतीति अथवा श्रीवृंदावने गाः पालयतीतिश्रियासहितम् श्रीकृष्णाव- तारस्वरूपविष्णुम् अन्वयार्थप्रबोधिनीम् अन्वयार्थयोः प्रबोधकारिणी वाग्भटालंकृतेः वाग्भटालंकारस्य- ग्रंथस्य निर्विघ्नतापरिसमाप्त्यर्थमिदं मंगलं स्वेटदेवता नमस्कारात्मकमाचरितम् ।। श्रियं दिशतु वो देवः श्रीनाभेयजिनः सदा। मोक्षमार्ग सतां ब्रूते यदागमपदा- वली॥ १॥ टीका-यदागमपदावली सतां मोक्षमार्ग बृते (स) श्रीनाभेयजिनः देवः वः सदा श्रियं दिशतु इत्यन्वयः॥
वाग्भटालंकार-परि० १. जयति संसारमिति जिनः जिञ्जये धातोर्नक् प्रत्ययः। ब्रह्मा विष्णुः बुद्धः (इति शब्दस्तोम०) नाभेयः नाभि- जन्मा श्रीविधातादेवः वः श्रियं संपत्तिं लक्ष्मी बुद्धिं वा दिशतु। अथवा ग्रंथकर्तुरिप्रदेवो जिनः नाभिनामा नृपतिः जिनस्य जनकः तदपत्यत्वान्नामेय इति॥१॥ अर्थ-जिनके आगमनकी पदावली सत्पुरुपोंको मोक्षमार्गके बतानेवाली है सो श्रीनाभेय जिन भगवान् आपको सदैव लक्ष्मी अथवा युद्धिके देनेवाले हो ( नाभेयका अर्थ जो नाभिसे उत्पन्न हो अथवा नाभिनाम राजाका पुत्र हो और जिनका अर्थ जो 'संसारको जीतसके इससे कई नाभेयजिनका अर्थ नाभिसे उत्पन्न होनेवाले विधाता ऐसा करतेहैं और कईक ऐसा कहते हैं कि इसमन्य के रचयिता जैनमतावलंबी थे इससे नाभेयजिन का अर्थ नाभि नामक नरेशके पुत्र जिन (भगवान् ऋपभदेव ) मानतेहैं ॥ १ ॥ साधुशव्दार्थसंदर्भ गुणालंकारभूषितम् । स्फुटरीतिरसोपेतं काव्यं कुर्वीत कीर्तये २ टीका--कीर्तये काव्यं कुर्वीत किंभूतं काव्यं साधुशब्दार्थसंदर्भगुणालंकारभूपितं स्फुटरीतिरसोपेतम् इत्यन्वयः ॥ साधुशब्दार्थयोः संदभों रचनाक्रमो यत्र तत् गुणाः प्रसादादयः अलंकाराश्च चित्रादयः उपमादयश्च ते पितं रीतिः गौडीत्यादिका रसाश्च शृंगारादयस्तैरुपेतम् ॥२॥ अर्थ-श्रेष्ठ शब्द और अर्थसे गुंफित तथा प्रसादादि गुणों तया चित्रादिक शब्दालंकारों और उपमादिक अर्यालंकारोंसे JA सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । विभूपित और स्फुट गौडी आदि रीतियों तथा शृंगारादि रसोंसे उपयुक्त काम्पकी रचना कीर्तिके अर्थ कवि करे ॥ २ ॥ प्रतिभा कारणं तस्य व्युत्पत्तिस्तु विभूप- णम् । भृशोत्पत्तिकृदभ्यास इत्याचकवि- संकथा ॥३॥ टीका--तस्य काव्यस्य कारणं प्रतिभा विभूपणंव्यु- त्पत्तिः अभ्यासः भृशोत्पत्तिकृत् इति आद्यकविसंकथा (भवति) इत्यन्वयः ॥ अतिशयेन काव्यरचनोत्प- त्तिकरणं भृशोत्पत्तिकृत् ॥३॥ अर्थ-उस काव्य ( कवित्व ) का कारण कविकी स्फुरणशीला बुद्धि होतीहै और विभूपण व्युत्पन्नता है और अतिशयकाव्य रचना करनेसे अभ्यास होताहै आद्यकवियोंका इसमकार कथन है॥३॥ प्रतिभालक्षणम् । प्रसन्नपदनव्यार्थयुक्त्युबोधविधायिनी । स्फुरंती सत्कवेर्बुद्धिः प्रतिभा सर्वतो- मुखी ॥४॥ टीका--सर्वतोमुखी स्फुरती सत्कवेयुद्धिः प्रतिमा (भवति) किंविशिष्टा सा प्रसन्नपदनव्यार्थयुक्त्युद्रोध विधायिनी इत्यन्वयः ॥ प्रसन्नानि मनोहराणि पदानि नव्यार्थाः नृतनार्थाश्च तेषां युक्तिः योजनं तदुद्धोध- (४) वाग्भटालंकार-परि० १. विधायिनी स्फुरती स्फुरणशीला सर्वतोमुखी सर्वेषु विपयेषु प्रवृत्ता॥४॥ अर्थ-सब विषयों में प्रवृत्त होनेवाली स्फुरणशीला जो सत्कषि फी यदि उसे मतिभा कहतेहैं वह कैसी हो कि मनोहर पदों और नवीन अर्थोकी योजनाका उद्धोध करनेवाली हो ॥४॥ व्युत्पत्तिः। शब्दधर्मार्थकामादिशास्त्रेष्वाम्नायपूर्विका। प्रतिपत्तिरसामान्या. व्युत्पत्तिरभिधी- यते ॥५॥ टीका--शब्दधर्मार्थकामादिशास्त्रेषु आम्रायपूर्विका असामान्या प्रतिपत्तिः व्युत्पत्तिः अभिधीयते इत्यन्व- यः॥शब्दशास्त्राणि व्याकरणकोशादीनि धर्मशास्त्राणि श्रुतिस्मृतिपुराणादीनि कामशास्त्राणि वात्स्यायनादी- निआदिशन्देन काव्यालंकारादीनां ग्रहणम् तेपुआमा- य पूर्विका गुरुपरंपरया चोपदेशपूर्विका असामान्या असाधारणरूपा प्रतिपत्तिः प्रवृत्तिः॥५॥ अर्थ-व्याकरण कोशादिफ शब्दशास्त्र और श्रुति स्मृति पुरा पादिक धर्मशास्त्र और वात्स्यायन कोकादिक कामशास्त्र तथा आदिशब्दसे काव्यालंकारादि शास्त्र इन सबमें जो गुरुपरंपरासे रीतिपूर्वक उपदेश ग्रहण कर असाधारण प्रतिपत्ति(परिज्ञान) होना उसको व्युत्पत्ति कहतेहैं ॥ ५.॥'
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (५) आयास लक्षणम् । अनारतं गुरूपति यः काव्ये रचनादरः। तमभ्यासं विदुस्तस्य क्रमः कोप्युपदि- श्यते ॥६॥ टीका--अनारतं (यथास्यात्तथा) गुरूपांते काव्ये यः रचनादरः वुधाः तम् अभ्यासं विदुः तस्य कोपि क्रमःउपदिश्यते इत्यन्वयः॥ अनारतं निरंतरं गुरूपति गुरुसमीपे रचनादरः रचनारंभः ॥ आदरः सन्माने आरंभे च( इति शब्दस्तोम०)॥६॥ अर्थ-निरंतर बहुतसमयतक गुरुके समीपमे जो काब्यकी रचनाका आरंभ उसे विदान अभ्यास कहतेहैं (अब इस ग्रंथमें) उसके कुछ क्रमोंका उपदेश कियाजाताहै ॥ ६ ॥ छंदःकारणम् । विभ्रत्या बंधचारुत्वं पदावल्यार्थशून्य- या । वशीकुर्वीत काव्याय च्छंदासि निखिलान्यपि ॥७॥ टीका-बंधचारुत्वं विभ्रत्या, अर्थशून्यया पदा- वल्या अपि काव्याय निखिलानि छंदांसि वशीकुर्वीत (कविरिति शेपेण ).अम्बयः ॥बंधचारुत्वं छंदसां चारुत्वम् अर्थशून्यया वर्णमानोच्चारणरूपया ध्वन्या- त्मकरूपया वा पदावल्या अपीति कथनेन अर्थसहि- (६) वाग्भटालंकार-परि० १. तया अपि-निखिलानि छंदांसि श्रीप्रभृतीनि एको गः श्रीः इत्यादीनि एको ग श्रीः इति तु सार्थकं का खा गा घा इति निरर्थक परंतु श्रीछंदस्त्वमुभयत्रैव केचि- दिति व्याख्यानयति पदावल्या अष्टगणरूपया ॥७॥ अर्थ-छंदोंकी मनोहरता (रीतिक्रम) धारणकरनेवाली अर्थ शून्य पदावली करके भी कवि काव्यके लिये समस्त श्री इत्यादि छंदोंका निबंध करसक्ताहै ( तथा सार्थकपदावलियोंसे तो छंदों का निबंध होताहीहै ) ( "एको गः श्री" अर्थात् एक अक्षर गुरु जिसके एक चरणमें हो वह श्रीछंदहै अस्तु यहां सार्थक पदावली- से श्रीछंद हुआ) और 'देवं वंदे' भी सार्थक श्रीछंद हुआ परंतु "काखागापा" यह निरर्थक होनेपर भी श्रीछंद बनगया और कई ऐसा कहतेहैं कि मगण आदि अष्टगण रूप पदावलीसे छंद होतेहैं तीनों गुरुका पगण , तीनों लघुका नगण. आदि गुरुका भगण ॥,आदि लघुका यगण 15, मध्यगुरुका जगण [51, भध्यलयका रगण 515, अन्तगुरुका सगण ॥5, और अंतलघुका तगणी, होताहै ॥ ७ ॥ पश्चाद्वरुत्वं संयोगादिसर्गाणामलोपनम् । विसंधिवर्जनं चेति वंधचारुत्वहेतवः॥८॥ शिते कृपाणे विधृते त्वया घोरे रणे कृते बधीश क्षितिपा भीत्या वन एवं गतो जवात् ॥९॥ टीका--संयोगात् पश्चाद्गुरुत्वं विसर्गाणाम् अलोपनं च विसंधिवर्जनम् इति बंधचारुत्वहेतवः (संति)इत्य.
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (७) न्वयः॥ संयोगात् संयुक्तवर्णात् पूर्व गुर्वक्षरखदुचारणं विसंधिवर्जनं विकटसंधिविवर्जनं बंधचारुत्वहेतवः छंदोरचनाचारुत्वस्य कारणानि ॥८॥(उदाहरणम्) हे व्रधीश त्वया शिते कृपाणे विधृते घोरे रणे कृते (सति) शितिपा भीत्या जवात् वने एवं गताः (इत्यन्वयः)॥ शिते तीक्ष्णे नृणाम् अधीशः बधीश स्तत्संबुद्धौ धीश । क्षितिपाः वैरिणो राजानः । जवात् वेगेन । अब बधीश इत्यत्र विकटसंधिकरणात बंधाचारुत्वम् ॥ ९॥ अर्थ-संयुक्त अक्षरसे पीछे लघु वर्णका भी गुरुवत् उच्चारण करना और विसौंका लोप (अनुच्चारण) नहीं करना और विकट अमनोज्ञ संधिका नहीं करना ये श्लोकादिकोंकी सुंदरताके हेतु होते हैं ॥ ८॥ (इसका उदाहरण दिखाते हैं ) हे बधीश ! नरोंके अधीश आपके तीक्ष्ण खङ्ग धारण करके घोर संग्राम कर- नेपर ( आपके शत्रु ) सर्व राजा भयसे शीग्रही वनको भाग गये इसमें बधीश पद नृ-अधीशकी संधिसे बना है और यह संधि विकट है अर्थात् मनोहर नहीं इससे यह सुंदरताका हेतु नहीं किंतु सुंदरता क्षति होगई (बधीश पद संविवेकट्य होनेहीसे प्रचलित नहीं किंतु नरेश नृपति आदि ही प्रायः प्रचलित हैं ॥ ९॥ अनुल्लसंत्यां नव्यार्थयुक्तावभिनवत्वतः। अर्थसंकलनातत्त्वमभ्यसेत् संकथास्वपि ॥१०॥आगम्यतां सरवे गाढमालिं- (८) वाग्भटालंकार-परि० १. ग्यात्र निषीद च संदिष्टं यन्निजभ्रातृ- जायया तन्निवेदय ॥११॥- टीका--अभिनवत्वतः नव्यार्थयुक्ती अनुल्लसंत्यां संकथासु अपि अर्थसंकलनातत्त्वम् अभ्यसेत् इत्य- न्वयः॥ अनुल्लसंत्याम् अप्रकाशमानायाम् अनुबुध्य- मानायां ( सत्यां) नव्यार्थयुक्तौ नवीनार्थनियुक्ती नवीनस्य पूर्वेः अनुद्भावितस्य अर्थस्य नियोजनायाम् इत्यर्थः। अभिनवत्वतः अभिनवत्वेन संकथासु वार्ता- लापादिषु इतिहासादिषु च अर्थसंकलनातत्त्वं अर्थ संयोजनचारुत्वम् ॥१०॥ (उदाहरणं) हे सखे आग- म्यतां गाढम् आलिंग्य च अत्र निपीद यत् निजभ्रातृ जायया संदिष्टं तत् निवेदय इत्यन्वयः॥ अव मत्स- मीपे निपीद उपविश निजभ्रातृजायया निजभ्रातृ- पत्न्या ॥११॥ अर्थ-नवीन प्रकारसे नूतन अर्थ योजनाका प्रकाश ( उद्बोध) न होनेपर कथाओं वार्तालापादि तथा इतिहासादिकमें भी अर्थ योजनाको सुंदरताका अभ्यास करे ॥ १० ॥ (इसका उदाहरण) हे मित्र ! आओ गाढ आलिंगन करके यहां मेरे पास बैठो और हमारी भोजाईने जो संदेशा भेजा सो कहो अथवा आपकी भोजाई (मेरी स्त्री) ने जो संदेशा भेजा सो कहो (निजभ्रात जाया कथनसे हमारी भोजाई ऐसा भी अर्थ हो सकता है और आपकी भोजाई (मरी स्त्री) ऐसा भी अर्थ हो सकता है । प्रयोजन यह (कि इतिहासों और वार्तालापादिकों में जहां विशेष सान्वय सं० टी० भापाटीकासहित । नवीन अर्थोकी (तथा ललितशब्दोंकी) योजनाका प्रकाश और उद्घोध नहींहो तो अर्थकी सुन्दरताका अभ्यास करे )॥ ११॥ पदार्थवंधाद्यश्च स्यादभ्यासो वाच्य- संगती। सन श्रेयान् यतोऽनन कवि- र्भवति तस्करः॥ १२॥ टीका-वाच्यसंगतौ परार्थबंधात् च यः अभ्यासः स्यात् स न श्रेयान् यतः अनेन कविः तस्करो भवति इत्यन्वयः॥ वाच्यसंगतौ वचनरचनायां परस्य अर्थात् अभिप्रायात् बंधात् श्लोकादितोभ्यासः पराभिप्रायश्लो कादिकं वा गृहीत्वा निबनातीतिभावः स न श्रेयान् न श्रेष्ठ इत्यर्थः॥ १२ ॥ अर्थ-वचनरचनामें ( श्लोकादिरचनामें) पराये अर्थसे अर्थ लेना अथवा पराये श्लोकादिसे पद लेना (अथवा पराये रचित. को अपना बताना ) यह अभ्यास श्रेष्ठ नहीं क्योंकि ऐसा करनेसे कवि चोर होताहै ।। १२ ।। परकाव्यग्रहोपि स्यात् समस्यायां कवे- र्गुणः। अथ तदर्थानुगतं नवं हि रचय- त्यसौ॥ १३॥ टीका-समस्यायां परकाव्यग्रहः अपि कवेः गुणः स्यात् हि असौ तदानुगतं नवम् अर्थ रचयति इत्य- न्वयः॥ परकाव्यग्रहः परकाव्यात् ग्रहणं समस्यायां वाग्भटालंकार-परि० १. संक्षेपेण उक्तस्य श्लोकपादादेः शेपस्य पूरणार्थ कृतप्रश्नरूपायां तदर्थानुगतं समस्यार्थानुगतम् ॥१३॥ अर्थ-समस्याहारराये काव्यका ग्रहण (पराये अर्थ अथवा पदादिका ग्रहण ) होजाना कविका गुण होताहै क्योंकि यह समस्याके अर्थक अनुगत नवीन अर्थकी रचना करताहै, (और पदार्थ तथा पर पदोंका परिज्ञान भी समस्यापूर्तिमें एक दूसरे कविको नहीं होता इससे यदि दो कवियों या कई कवियोंका आशय अथवा पद एक भी हो तो एक दूसरे कविका गुण होता है दोष अर्थात् चोरत्व नहीं चोरत्व गभी होताहे कि जब जान वूझकर कवि दूसरेके आशय या रचना पदादिका ग्रहणकरे) ( समस्या उसे कहतेहैं जहां अंतका पद या कोई अंश बताकर उस श्लोकादिकी तदनुसार पूर्ति करने का प्रश्न हो)॥ १३ ॥ दोहा-अन्य कविनके अर्थपद, ग्रहण चोर सम होय । अपर समस्या पूर्तिमें, गुण कहलावत सोय ॥ मनःप्रसत्तिः प्रतिभा प्रातःकालोऽभियो- गता । अनेकशास्त्रदर्शित्वमित्यर्थालोक हेतवः॥ १४॥ टीका-मन प्रसत्तीत्यादयः अर्यालोकहेतवः इति सरलान्वयः॥ मन प्रसत्तिः मनसः प्रसन्नता प्रतिभा पूर्वोक्ता सत्कवेघुद्धिः प्रातःकाल प्रभातसमयाअभियो- गता विलक्षण पदाथोंदीनामवलोकनसंयोगत्वम्। प्रात: कालेभियोगिता इति वा पाठः । तत्र प्रभाते रचना प्रवर्तनमिति अनेकशास्त्रदर्शित्वं अनेकशास्त्राणामलो . सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (११) कनकारित्वम् इति अर्थालोकहेतवः अर्थस्य उद्देश्यस्य आलोकहेतवः उद्योतहेतवः आलोकः उद्योतः (इति श. स्तो.)॥१४॥ अर्थ-मनकी प्रसन्नता कविकी स्फुरणशीला बुद्धि प्रातःकाल- का समय विलक्षण पदार्थोंका दर्शनसंयोग तथा अनेक शास्त्रों. का देखना ये सब ( काव्यरचनामें) वर्णनीयमें चारुत्वके उद्योत होनेके कारण हैं (अर्थात् इनसे कवितामें सुंदरता होती है) ॥१४॥ संक्षिप्त काव्यनियमाः । समाप्तमिव पूर्वाहें कुर्यादर्थप्रकाशनम् । तत्पुरुषवहुव्रीही न मिथः प्रत्ययावहौ१५ टीका--पूर्वार्दै अर्थप्रकाशनं समाप्तमिव कुर्यात् (तथा) तत्पुरुपबहुव्रीहिसमासौ मिथः प्रत्ययावही न इत्यन्वयः॥ पूर्वार्दै श्लोकस्य पूर्वार्दै अर्थप्रकाशनं समाप्तमिव कुर्यात् अत एव द्वितीयपादांतस्य तृतीय- पादायेन सह संधिसमासौ न कर्तव्यौ इतिभावः। तत्पु- रुपबहुव्रीही मिथः परस्परं प्रत्ययावहौ विश्वासयोग्यौ न कार्यों असंदिग्यौ कार्यों इत्यर्थः ॥ १५॥ अर्थ-श्लोकके पूर्वार्द्ध में अर्थप्रकाशकी समाप्ति सी ही कर देनी चाहिये यदि कुछ अर्थाश रहे तो भी पूर्वार्द्ध और उत्तरार्दमें अर्थात् द्वितीय पदके अंत और तृतीय पदके आदिमें संधि अथवा समास आदि फुछ नहीं करना चाहिये प्रयोजन यह कि पूर्वार्द और उत्तरार्द्ध जुदे जुदे से रहने रचित हैं तथा तत्पुरुष और बहुचीहि समास एकत्र संदेहयुक्त नहीं रखने चाहियें (जैसे, (१२) वाग्भटालंकार-परि० १. "कृष्णपुत्र" पदमें कृष्णका पुत्र "कृष्णपुत्र" यह तत्पुरुष समास है और इसीमें कृष्ण है पुत्र जिसका सो "कृष्णपुत्र" यह बहु- बीहि है अर्थात् कंही अवसर हो तो विशेपणोंसे वहाही संदेह निवृत्त करदेना चाहिये ॥ १५॥ एकस्यैवाभिधेयस्य समासं व्यासमेव च। अभ्यसेत्कर्तुमाधानं निःशेषालंक्रि- यास्वपि ॥ १६ ॥ स्यादनातपादांतेऽप्य- शैथिल्पे लघुर्गुरुः।पादादौन च वक्तव्या श्चादयः प्रायशो बुधैः ॥ १७॥ टीका-निःशेपालंक्रियासु अपि एकस्य अभिधे यस्य एव समासं व्यासं च आधानं कर्तु अभ्यसेत इत्यन्वयः ॥ अभिधेयस्य प्रतिपाद्यस्य समासं संक्षे. पतःच्यासं विस्तारतः कथनम् आधानम् आरोपणं निः शेपालंक्रियासु सर्वत्रालंकारेषु ॥ १६ ॥ अनौत पादांते अपि अशैथिल्पे (सति) लघुः गुरुः स्यात् । च बुधैः प्रायशः पादादौ चादयः न वक्तव्याः इत्य- न्वयः ॥ अनीतपादांते प्रथमतृतीयपादांते अशैथि- ल्ये गुरूच्चारणावश्यकत्वे ॥ १७॥ अर्थ-समस्त अलंकारोंमें एफ वर्णनीयका संक्षिपस वर्णन कर ने अथवा विस्तारसे वर्णन करनेक आरोपण फरनेका अभ्यास फरें प्रयोजन पह कि जिस प्रकार आरंभ फरें पैसे ही समाप्त सान्वय सं० टी० भापाटीकासहित । करना चाहिये ॥ १६ ॥ पहले और तीसेर पदके अंतमें भी यदि गुरु वर्णके उच्चारण की आवश्यकता हो तो वहांका लघु वर्ण मी गुरुके समान होताहै (और श्लोकाई अर्थात् दूसरे पदके अंतमें तो ऐसा होताहै ही) और प्रायः विद्वानों का ऐसा कथन है कि पदके आदिमें चकारादि अव्ययोंका नियोजन करना उचित नहीं (किंतु हे भो अहो हा हंत दिष्ट्या इत्यादि अव्यय पदके आदिमें हों तो अनुचित नहीं जैसे "दिष्ट्यांवते कुक्षिगतः परः पुमान्" इसमें पदके आदिमें "दिष्टया" अव्यय है सो अनु- चित नहीं ॥ १७ ॥ भुवनानि निवधीयात त्रीणि सप्त चतुई- श। अप्यदृश्या सितां कीर्तिमकीर्ति च ततोऽन्यथा ॥ १८॥ वारणं शुभ्रमि- द्रस्य चतुरः सप्त वाम्बुधीन चतस्रः की- तयेहाप्टौ दश वा ककुभः कचित् ॥१९॥ टीका-भुवनानि-जीणि सप्त चतुर्दश निवन्नीयात् की- तिम् अदृश्याम् अपि सिताम् अकीर्ति चततःअन्यथा (निबनीयात् ) इत्यन्वयः॥ सिताम् शुभ्रां ततोन्यथा कृष्णाम् ॥ १८॥ इंद्रस्य वारणं शुभं अंबुधीन चतुरः सप्त वा ककुभः चतस्रः वा अष्टौ क्वचित् दश कीर्तयेत् इत्यन्वयः ॥ वारणं गजम् ॥ १९॥ अर्थ- कवितामें भवनोंको (लोकोंको) तीन या सात या चौदह वर्णन करना चाहिये जैसे त्रिभुवन लोकत्रय सप्तलोक .
(१४) वाग्भटालंकार-परि० १.
इत्यादि और कीर्ति दीखनेवाली नहीं है तौभी उसे श्वेत रूपसे
वर्णन करना चाहिये और अकीर्ति अपयशको काले रूपसे वर्णन
करना जैसे "वं कर्तुं धवलच्छविं स्वयशसाऽलं सर्वमुवीतलम"
इति । अर्थात् तुम अपने यश करके सम्पूर्ण पृथ्वीको श्वेत कर
सक्तेहो॥१८॥इंद्रका हाथी श्वेत रूपसे वर्णन करना चाहियेसम-
दोको चार अथवा सात वर्णन करे और दिशाओंको चार अथवा
आठ अथवा दश वर्णन करे ॥ १९ ॥
यमकश्लेपचित्रेषु बवयोर्डलयोन भित्।
नानुस्वारविसर्गौच चित्रभंगाय संमतौ २०
टीका-यमकश्लेपचित्रेषु बवयोः डलयोः न भित्
च अनुस्वारविसर्गों चित्रभंगाय न संमतौइत्यन्वयः॥
यमकश्लेपचित्रादयः शब्दालंकाराः तत्र बबयोन भित्
बकारवकारयोः डकारलकारयोश्च न भेदः इत्यर्थः ।
चित्रभंगायचित्रव्याघातायन संमतौ नगणितौ॥२०॥
अर्थ-यमक और क्षेप और चित्र इत्यादि शब्दालंकारोंमें
बकार वकारका तथा डकार लकारका भेद नहीं समझा जाता
है और अनुरवार एवं विसगाँसे चित्र भंग (चित्रकाव्यका भंग)
नहीं होता ( यमक तुफमिलने जुडनेको कहते हैं दो पक्षमें
अर्थ देनेवाले शब्दालंकारको कहते हैं और चित्र हारबंध पम-
बंध आदि रचनाको कहते हैं इन सबके उदाहरण अगाडी
लिसे हैं)॥२०॥
सान्वय सं० टी० भापाटीकासहित ।
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यमकाउदाहरण ।
शंकमानैर्महीपाल कारागारविडंवनम् ।
वहरिभिः सपत्नीकैः श्रितं बहुविडं
वनम् ॥२१॥
टीका-हे महीपाल सपत्नीकैः शंकमानैः वरि-
भिः बहुविडं (बहुविलं ) कारागारविडंबनं वनं श्रि-
तम् इत्यन्वयः॥शंकमानैः चिंतायुक्तैः कारागारवि-
डंबनं कारागार इव विडंबनं क्वेशः यत्र एवं भूतं वनं
बहुविडम् अर्थात् वहुविलं बहूनि विलानि सर्पादिवास
विवराणि यत्र एतादृशं वनं श्रितम् आश्रितम् अत्र
द्वितीयपादांते चतुर्थपादांते उभयत्र विडंवनं विडंबनम्
इति वर्णशादृश्येन यमकं तत्र डलयोर्भेदाभावः ॥२१॥
अर्थ-हे महीपाल ! चिंतायुक्त आपके वैरी सपत्नीक अर्थात्
स्त्रीसहित ऐसे पनमें प्राप्त होगये हैं ( जाकर छिपे हैं ) जिसमें
अनेक सादिकोंके बहुतसे पिल हैं और जिसमें कैदखाने जैसा
शेश है । यहां बहुविड अर्थात् बहुचिल युक्त वन ऐसे डकारके
बदले लकार मानकर अर्थ किया इसका प्रयोजन यमककी सि-
दिसमझना नहीं समानस्वर व्यंजनोंकरके तुफ से तुक मिल-
जाप उसे यमक कहतेहैं जैसे यहां दूसरे पदके अंतमें 'विडंबन है
और चौथे पदके अंतमें भी उसी प्रकार विडंबन' है ॥ २१ ॥
' (१६) वाग्भटालंकार-परि० १. श्लेषका उदाहरण । खयादयाद्रेण विभोरिपूर्णां न केवलं संय- मिता न वालाः॥ तत्कामिनीभिश्चवियो- गिनीभिः मुहुर्महीपातविधूसरांगाः॥२२॥ टीका-हे विभो दयाइँण त्वया केवलं रिपूणां बा- लाःन संयमिता इति न किंतु संयमिता एव कीदृशा वाला मुहुर्महीपातविधूसरांगाः च वियोगिनीभिः त- कामिनीभिः वाला केशा न संयमिता इति न की- हशा वालाः मुहुर्महीपातविधूसरांगाः इत्यन्वयः ॥ . संयमिता संस्थापितांः बालाः स्त्रियः वालकाः अथवा केशाः वियोगिनीभिः पतिरहिताभिः मुहुर्महीपातविधू सरांगाःमुहुः महीपतनेन विधूसराणिमलिनानि अंगानि यासां येपांवाअत्र वालाः इतिश्लेपे बवयोरभेदः२२॥ अर्थ-हे विभो ( हे राजन् ) आपने दयावान होकर फेवल शत्रुओंकी स्त्रियां नहीं सँभाली ऐसा नहीं किंतु आपने अवश्य उनको सँभाला और उन वियोगिनी स्त्रियोंने अपने विखरेवाल नही सँभाले ऐसा नहीं किंतु उन्होंने भी अपने वाल सँभाल फर बांधे कैसी वे स्त्रियां हैं कि बार बार पृथ्वी में पड़ने से म. लिन होगये हैं अंग जिनके अथवा वे वाल फेश कैसे हैं कि वार बार पृथ्वी में गिरनेसे मलिन होगयेहैं अंग जिनके फई वाला कयनसे शवोंके बालक ऐसा अर्थ भी करते हैं यहां बाला शब्दका अर्थ स्त्रियां अथवा बालक तथा केश है और 'मुहुर्मही पातविधूसरीमा, दोनों तीनों पक्षोंका विशेषणहै तथा बाला शब्द सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (१७) कई पक्षमें अर्थ देताहै इससे श्लेष अलंकार हुआ और बकार वकारका अभेद दिखाया गया ॥ २२॥ देव युष्मद्यशोराशिं स्तोतुमेनं जडात्म- कम् ॥ उत्कंठयति मां भक्तिरिंदुलेखेव सागरम् ॥२३॥ टीका-हे देव भक्तिः एनं जडात्मकं मां युष्मद्यशो- राशि स्तोतुम् उत्कंठयति इंदुलेखा जलात्मकं सागरम् इव इत्यन्वयः॥ जडात्मकं मूर्ख सागरपक्षे डलयोर- भेदात् 'जडात्मक' इत्यस्य स्थाने 'जलात्मकम्' इति विशेपणम् ॥२३॥ अर्थ--हे देव भक्ति (जो है सो ही) इस गडबुद्धि मुझको आपकी यशोराशिकी स्तुति करनेको उत्साहित करती है जैसे चंद्रमाको कला जडात्मक (जलात्मक) समुद्रको उत्कंठित (उत्तंभित ) करती है यहां भी श्लेपमें डकार और लकारका अभेद है मांका विशेपण जडात्मक है और समुद्रके विशेपणके लिये इसे जलात्मक समझो।॥ २३ ॥ चित्रका उदाहरण । चंद्रेडितं चटुलितस्वरधीतसाररत्नासनं रभसकल्पितशोकजातम्। पश्यामि पाप तिमिरक्षयकारकायमल्पेतरामलतपः क- चलोपलोचम् ॥२४॥ टीका-(अहं) जिनं (शिवा)पश्यामि कीदृशं जिनं वा शिवं चंद्रेडितम् पुनः कीदृशं चटुलितस्वरधी-
(१८) वाग्भटालंकार-परि० १.
तसाररत्नासनम् पुनः कीदृशं रभसकल्पितशोकजातम् ।
पुनः कीदृशं पापतिमिरक्षयकारकायम् पुनः कीदृशं
अल्पेतरामलतपः कचलोपलोचम् इत्यन्वयः॥ चंद्रे-
डितं चन्द्रेण ईडितं स्तुतम् अथवा चंद्र इव ईडितं स्वर
धीतसाररत्नासनं रत्नानाम् आसनं रत्नासनं स्वों के
'अधीतः सारो सिद्धांतो यस्य स स्वरधीतसारः इंद्रः
तस्य रत्नासनं स्वरधीतसाररत्नासनं चटुलितं प्रकंपितं
स्वरधीतसाररत्नासनं येन तम्, रभसकल्पितशोकजातं
रमसेन वेगेन कल्पितं खंडितं शोकजातं दुःखादिकं
येन तम्, पापतिमिरक्षयकारकायं पापमेव तिमिरं
तस्य क्षयकारः ध्वंसकारी कायः शरीरं यस्यतम् अल्पे
तरामलतपः कचलोपलोचम् अल्पेतरं प्रचुरम् अमलं
तपः तेन कचानां लोपः तदेव लोचम् आलोचं दर्शनं
यस्य तम् ॥ २४॥
अर्थ में जिन ( या शिव) को देखू ( दर्शनकरूं ) कैसे जिन
(या शिव हैं ) कि चंद्रमा जिनका पूजन करें और जिन्होंने इंद्र
फा रत्नसिंहासन कंपित करदिया और शोकजात (दुःखादिक)
जिन्होंने शीबही नष्ट करदिये और पाप रूप अंधकारके क्षप कर
नेवाला जिनका शरीरहै और प्रचुर निर्मल तपसे गिरे हुए बाल
ऐसा है दर्शन जिन्होंका अथवा प्रचुरतपसे वालोंका गिरना
ऐसी ही बुद्धि जिनकी (अर्थात् ऐसे घोर तपमें गद्धि स्थित करें
फि जिससे केश तक गिर जावं यह हारबंध चित्र है इसमें ड.
फार और लकारका अभेद है ॥ २४ ॥
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (१९)
::और अनुस्वार तथा विसर्गादिकी गणनाचित्रभंगके लिये नहीं
होती है जो नीचे हारबंध चित्रसे प्रगट होता है।
हारबंध चित्रं ।
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वाग्भटालंकार-परि० १.
प्रचंडवल निष्काम. प्रकाशितमहागम ॥
भावतत्त्वनिधे देव
मालमत्राद्वतं
तव ॥ २५ ॥
टीका-हे प्रचंडवल हे निप्काम हे प्रकाशितमहा-
गम हे भावतत्त्वनिधे हे देव अब तव भालम् अद्भुतम्
इत्यन्वयः ॥ प्रचंडं बलं यस्य तत्संबोधनं निप्काम
निर्गतः कामो यस्मात् प्रकाशितमहागम प्रकाशितः
महान् आगमः शास्त्रं येन भावतत्त्वनिधे भावानां
समस्तपदार्थानां तत्त्वम् तस्य निधिः तत्संबद्धो भालं
मस्तकं (भालमत्राद्भुता इति वा क्वचित् पाठः तत्र
तव मा कांतिः अद्भुता अलम् इति)॥२५॥
अर्थ-हे प्रचंडवलयुक्त कामरहित हे महत् शास्त्रोंके प्रफा-
शित करनेवाले हे समस्तपदाथोंके तत्वके निधान देव इस संसा.
रमें आपका मरतक. अद्भुत है यह छवबंध है इसमें वकार पकार
फा अभेद है ॥२५॥
सान्वर्य सं० टी० भाषाटीकासहित ।
छत्रबंधचित्र।
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भवकाननमत्तेभ भग्नमायातमःप्रभ ॥
विनयात्त्वां स्तुवे वीर विनतत्रिदशेश्वर २६
टीका- हे भवकाननमत्तेभ हे भग्नमायातमन्प्रभ हे
वीर हे त्रिदशेश्वर अहं विनयात् त्वां स्तुवे इत्यन्वयः॥
भव एव काननं भवकाननं तत्र मत्तः इभः मातंगः
तत्संबोधनम् । तमश्च प्रभा च तमःप्रभे मायाया तमः
प्रभे मायातमःप्रभे भने मायातमःप्रभे येन स भग्न
मायातमप्रभः तत्संबोधनम् विनतः त्रिदशेश्वरः य-
स्मिन् यत्समीपे तत्संबोधनं विनतत्रिदशेश्वर विनयाद
नम्रीभावात् त्वांस्तुवेस्तवनं कुर्वेअहमिति शेपः॥२६॥
(२२) वाग्भटालंकार-परि० १. अर्थ-हे संसार रूप वनके मतवाले मातंगरूप हे मायाके अंधकार ओर चमकके नष्टकरने वाले हे इंद करके वंदित हे देव ( मैं ) विनय पूर्वक आपकी स्तुति करताहूं यह भी छत्रबंध चित्र है इसमें भी बकार वकारका अभेद है हम छत्रबंधका चित्र पहले छत्र रूपमें लिखकर भी दिखाचके हैं उसी भाँत इसे जानो ॥२६॥ अधीत्य शास्त्राण्यभियोगयोगादभ्यासव- श्यार्थपदप्रपंचः॥ तंतं विदित्वा समयंक वीनांमनःप्रसत्तौ कवितां विदध्यात्॥२७॥ टीका--अभ्यासवश्यार्थपदप्रपञ्चः (कविः )शा- स्त्राणि अधीत्य कवीनां तंतं समयं विदित्वा मनः- प्रसत्तौ अभियोगयोगात् कवितां विदध्यात् इत्य- न्वयः ॥ अर्थानां पदानां च प्रपंचः अर्थपदप्रपंचः अभ्यासेन वश्यः अर्थपदप्रपंचः यस्य एवंभूतः कविः शास्त्राणि व्याकरणकोशकाव्यालंकारादीनि कवीनां तंतं समयं प्राचीनानां पूर्वोक्तवक्ष्यमाणादिकं सिद्धांतम् अभियोगयोगात् विलक्षणदुर्शनादियोगात् अथवा अभिनिवेशवशात् मनःप्रसत्तो मनसः प्रसन्नतायां कवितां विदध्यात् श्लोकादिरचनां कुर्यात् ॥ २७॥ अर्थ: अर्थों और पदोंफा प्रपंच अभ्यासवश होगया है जिसके ऐसा कपि व्याकरण छंदालंकारादि शास्त्रीको पढ़कर और प्राचीन कवियोंके पूर्वोक्त मिदान्तीको जानकर (समझकर) मनकी प्रसनताके समय विलक्षण दर्शन श्रवणादिके संयोगस तदनुरूप स्फूर्तिसे शोकादिकी रचना करे ॥ २७ ॥ इति वाग्भटाटकारे प्रथमः परि छेदः ।
सौन्वय सं०टी० भापाटीकासहित । द्वितीयपरिच्छेदः। संस्कृतं प्राकृतं तस्यापभ्रंशो भूतभाषि- तम् ॥ इति भापाश्चतस्रोपि यांति काव्य- स्य कायताम् ॥ १॥ टीका-संस्कृतं प्राकृतं तस्य अपभ्रंशः भूतभापितम् इति चतस्रः अपि भापाः काव्यस्य कायतां यांति इत्य न्वयः ॥ काव्यस्य कायतां काव्यांगतां यातीति।॥१॥ अर्थ-संस्कृत और प्राकृत और उसका अपभ्रंश और भूतभापा ये चारों भाषा काव्यका अंग होसक्तीहैं इन चारोंमें काव्य रचना होसक्ती है ॥ १॥ संस्कृतं स्वर्गिणां भापा शव्दशास्त्रेषु नि- श्चिता ॥ प्राकृतं तज्जं तत्तुल्यं देश्या- दिकमनेकधा॥२॥ टीका--संस्कृतं शब्दशास्त्रेषु निश्चिता स्वर्गिणां भापा प्राकृतं तजं तत्तुल्यम् अनेकधा देश्यादिकम् इत्यन्वयः ॥ शब्दशास्त्रेपु व्याकरणादिपु निश्चिता निश्चितरूपा स्वर्गिणां देवानां भापा प्राकृतं प्रकृतेः संस्कृतात् समद्भूतं तजं संस्कृतजं तत्तुल्यं तदनुरूपं अनेकधादेश्यादिकं माग, महाराष्ट्रियम् इत्यादि॥२॥ अर्थ-व्याकरणादि शब्दशा से निश्चित अर्थात् नियमवद्ध संस्कृत देवताओंकी भाषा है अर्थात् व्याकरण शास्त्रसे संस्कार (२४) वाग्भटालंकार-परि० २. कीहुई देवताओंकी भाषा संस्कृत कहलाती है और उस संस्कृत से ही निकली हुई और उसके तुल्य अनेक देशोमें अनेक रूपकी प्राकृत भाषा हुई जैसे मागधी प्राकृत, महाराष्ट्री मारत इत्यादि अनेकदेशभेदसे अनेक प्रकारको प्राकृत हुई ॥२॥ अपभ्रंशस्तु यच्छुद्धतत्तद्देशेषु भापितम्।। यद्भूतैरुच्यते किंचित्तौतिकमिति स्मृतम् ॥३॥ टीका--यत् तत्तद्देशेषु शुद्ध भापितं तत् अपभ्रंशः । यत् किंचित् भूतेः उच्यते तत् भौतिकम् इति स्मृतम् इत्यन्वयः ॥ तत्तदेशेषु यवनवर्वरादिपु शुद्धं तत्तद्रीत्या एवं शुद्धम् अपभ्रंशः अपभ्रंश्यते अधर्महेतुतया पत्यते अनेन इत्यपभ्रंशः साधुशब्दभिन्ने अपशब्दे यज्ञादी तत्कथनेन पापहेतुत्वात (इति शन्दस्तोममहानिधिः) (अथवा “यदाद्धमपभ्रंशः" इति पाठांतर केचित्प- ठांति तत्र यत् अशुद्धं तत्तद्देशेषु भापितं तत् अपभ्रंशः यथा समुद्रस्थाने समंदर इति) भूतः प्राणिभिः देव- योनिविशेषश्च ॥३॥ अर्थ -जो दूसरे दूसर देशाम शुद्ध भापा मंकृतसे भिन्न बोली जाती है टम अपभ्रंश करते ह जैसे अरबी यूनानी इत्यादि (अपघा "यदशुद्धमपभ्रंशः" पमा पाठांतर मई मानते है और एसा अर्थ करते है जो संस्टन प्रातमे गिटार अगुट भापा दशीम योली जाने लगी टम अपभ्रंश यहंत है जग ममुद्रा अपभ्रंश समंदर ) और जो यही पुल प्राणी मनुष्य रपयंपापित
सान्धय सं० टी. भापाटीकासहित ।
भाषा बोलने लगे उसे भौतिक कहते हैं अथवा भूत (देवयोनि)
राक्षस यक्ष पिशाचादिकी भाषा भूतभाषा कहलाती है ॥ ३ ॥
छंदोनिवहमच्छंद इति तहाङ्मयं द्विधा॥
पद्यमाद्यं तदन्यच गचं मिश्रंचतव्यम४॥
टीका-छंदोनिबद्धम् अच्छंदः इति तत् द्विधावाङ्म
यं (तत्र) आद्यं पद्यं तदन्यच्च गद्यं तवयं मिश्रम् इत्य-
न्वयः ॥ अच्छंदः छंदोरहितं वाङ्मयं काव्यं भापा-
मानं वा आयं छंदोनिबद्धं पद्यं तदन्यच छंदोरहितं
गयं तवयं पधगद्यात्मकं मिश्रम् ॥ ४॥
अर्थ-छंदबद्ध तथा छंदरहित इस प्रकार काव्य (या भाषा
मात्र) के दो भेद हैं उनमें से छंदवद्ध (श्लोकबद्ध) को पद्य
और छंदरहितको गद्य कहतेहैं तथा जिसमें गद्य पद्य दोनों हों
उसको मिश्र (मिश्रित) कहते हैं ॥ ४ ॥
अदुष्टमेव तत्कीत्त्यै स्वर्गसोपानपंक्तये॥
परिहार्यानतो दोषाँस्तानेवादौ प्रचक्ष्महे॥
॥ ५ ॥ अनर्थकं श्रुतिकटु व्याहतार्थम
लक्षणम् ॥स्वसंकेतप्रप्तार्थमप्रसिद्धमस
म्मतम् ॥६॥ ग्राम्यं यच प्रजायेत पदं
तन्न प्रयुज्यते॥कचिदिष्टा च विद्वद्भिरेपा
मप्यपदोषता॥७॥
(२६) वाग्भटालंकार-परि० २.
टीका-तत् अदुष्टम् एव कीत्यै स्वर्गसोपानपंक्तये
(भवति इति शेपः ) अतः तान् परिहार्यान् दोपान
आदौ एव प्रचक्ष्महे इत्यन्वयः ॥ तत् काव्यम् अदुष्टं
दोपरहितं कीत्य इह यशसे परत्र च स्वर्गसोपानपंक्तये
परिहार्यान् परित्याज्यान ॥६॥ अनर्थकम् इत्यादि
पदे॰पाणां गणना एव कथिता तेषां पार्थक्येन लक्ष
गानि सोदाहरणानि चाग्रे वक्ष्यते क्वचित् विद्वद्भिः
एपां दोपाणाम् अपदोपता निदोपता च इप्टा तबाह
'इतिहासपुराणादौ देवतानां नुती स्तुती शब्दालंकारके
चापें दोपाणामप्यदोपता" इति अब दोपाणाम् अनर्थ-
कादीनामाप निदोपता ॥ ६॥७॥
अर्थ-वह गद्यपद्यात्मक काव्य दोपसि रहित स्त्रागानेस
संसारमें फीति देता है और परलोकमें स्वर्गप्राप्तिका हेतु होताहै
इससे जो त्याज्य दोप हैं उन्हींको पहले वर्णन करते ह॥५॥ये दोप
इस प्रकारसे, १ अनर्थक, २ श्रुतिफटफ, ३व्याहतार्थ, ४ अलक्षण,
५ स्वसंकतमहतार्थ, ६ अमसिद्ध, ७ असंमत, ८ ग्राम्य, जो पद
उनका प्रयोग इस प्रकार ये ८ शान्द दोप हैं पिदानाने फहीं इन
दोपॉसी निपिता भी मानी है जहां इनकी निदोपता मानी है ये
इसमकार हैं कि इतिहास पुराणादिक और देयताओंकी स्तुति
तथा नमन तथा चिनादिक शन्दालंकार और आप (ऋषि प्रोत
पाक्प) इतने म्यानाम य शब्ददाप हो तो भी उनका विशेष
दपण नहीं समझना चाहिये इन सब अनर्थकादिक दीपा
जुद जूदे लक्षण और उदाहरण अब अगाड़ी वर्णन किंय
जाते हैं।॥ ६ ॥७॥
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (२७) अनर्थक । प्रस्तुतेऽनुपयुक्तं यत्तदनर्थकमुच्यते ॥ यथा विनायकं वंदे लंबोदरमहं हि तु॥८॥ टीका-यत् प्रस्तुते अनुपयुक्ततत् अनर्थकम् उच्यते यथा लंबोदरं हि तु विनायकम् अहं वंदे इत्यन्वयः॥ प्रस्तुते स्तवनकृते अनुपयुक्तं स्तुतिविरुद्धं निरर्थकम् योग्यं वा--तत अनर्थकं नाम दोषः यथा विनाय- कस्य स्तुतिविपये लंबोदरमिति विशेपेणं स्तुतिविरुद्धं तथा च हि तु पदद्वयं निरर्थकम् ॥ ८॥ अर्थ-जो स्तुतिमें स्तुतिके विरुद्ध ( निंदासूचक) पद आजावे अथवा निरर्थक पद आजावे तो उसे "अनर्थक' दोष कहते हैं जैसे मैं लंबे पेटघाले गणेशजीको वंदना करता हूं इसमें गणेश- जीके वंदना करने में लंबे पेट्वाले ऐसा विशेषण स्तुतिके विरुद्ध है तथा हि और तु अव्यय निरर्थक हैं ॥ ८॥ (उदाहरण) दोहा-अनुपयुक्त जो स्तुतिवि, होत अनर्थक सोइ । नमन करूं गणनाथको लंबपेटयुत जोइ ।। श्रुतिकटुक । निष्ठुराक्षरमत्यंतं बुधैःश्रुतिकटु स्मृतम् ॥ एकाग्रमनसामन्ये स्रष्ट्रेयं निर्मितायथा९॥ टीका--अत्यंत निष्टुराक्षरं बुधैः श्रुतिकटु स्मृतं यथा स्रष्ट्रा इयमेकाग्रमनसा निर्मिता (अहम् इति) मन्ये - . (२८) वाग्भटालंकार-परि० २. इत्यन्वयः ॥ निष्ठुर कठोरं यदक्षरं निष्टुराक्षरं अथवा अत्यंत निष्ठुरम् अक्षरं यत्र तत् श्रुतिकटु कर्णकटुकं श्रवणकटुकं वा एकाग्रमनसा एकाग्रेण मनसा स्रष्टा विधात्रा इयं सुंदरी यत्र अत्यंत निष्ठुराक्षरं तत् श्रुति कटुकं नाम दूपणं यथा इयं सुंदरी स्रष्टा एकाग्रमनसा निर्मिता अत्र स्रष्ट्रा अत्यंत निष्ठुराक्षरं ( एतदूषणं वि- शेपतया शृंगाररसे करुणारसे च वर्जनीयं न तु वीररसे रौदरसे च ॥९॥ अर्थ-जहां अत्यंत कठोर शब्द ( शृंगारादिके वर्णनमें ) हो उसे विद्वान् श्रुतिकटु या कर्णकटुक दोष कहतेहैं जैसे यह सुंदरी 'स्रष्टा' अर्थात् विधाताने एकाग्रचित्त होकर ही बनाईहै मैं ऐसा जानताहूं इसमें स्रष्टा शब्द अत्यंत कठोर है ॥ ९ ॥ (उदाहरण दोहा ) अति कठोर जहँ वर्ण हो, कर्णकटुक तिहिं जान । मुक्तासे माणिक भई दाना चावें पान ॥ यह श्रुतिकटुफ दोप शृंगार रसमें दूपित है बीररीदादिमें दूपित नहीं। व्याहतार्थ यदिष्टार्थवाधकातिराश्रयम् ॥ रतस्त्वमेव भृपालं भृतलोपकृतौ यथा १० टीका-यत् इप्टार्थबाधकातिराश्रयम् ( तत् ) व्याहतार्थम् । यथा हे भूपाल त्वं भूतलोपकृती एवं रतः इत्यन्वयः ॥ इप्टार्थस्य वांछितार्थस्य यत् वाध- कार्थातरम् तदाश्रयम् यत्र वांछितार्थस्य बाधकम् अर्थान्तराश्रयं दृश्यते तत व्याहतार्थ दूपणं भवति
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (२९)
यथा हे भूपाल त्वं भूतलोपकृतौ भूतलस्य उपकृतौ
उपकारे रतः एव अत्र भूतलोपकृतौ पदे भूतानां
प्राणिनां लोपः नाशः भूतलोपः तस्य कृतौ करणे
रतः इति इष्टार्थस्य बाधकार्थांतरदर्शनात् व्याहतार्थ
भवति ॥ १०॥
अर्थ-जहां वांछितार्थसे विपरीत दूसरा अर्थ भी प्रकाशित हो
तो उसे व्याहतार्थ दोष कहते हैं जैसे हे भूपाल तुमभूतलोपकृतिमें
रत हो अर्थात् भूतलकी उपकृति (उपकार ) में रत हो यहाँ
भूतलोपकृति इस पदमें भूतलकी उपकृतिके सिवाय भूते लोप
कृति अर्थात् प्राणियोंका नाश करना ऐसा विरुद्ध अर्थ भी प्रका-
शित होता है इससे व्याहतार्थ दोष हुवा ॥ १० ॥
(उदाहरण) दोहा-च्याहतार्थ जहँ इष्टका, वाधक अर्थ
लखाय । भूतलोपकारी नृपति तुम सबतें अधिकाय ।।
अलक्षण।
शब्दशास्त्रविरुद्धं यत्तदलक्षणमुच्यते॥ .
मानिनीमानदलनो यथेंदुर्विजयत्यसौ ११
टीका-यत् शब्दशास्त्रविरुद्धं तत् अलक्षणम् उच्यते
यथा मानिनीमानदलनः असौ. इंदुः विजयति इत्य-
न्वयः॥शब्दशास्त्रविरुद्धं व्याकरण विरुद्ध मानिनी
मानदलनः माननीनां मानवतीनां सुंदरीणां मानस्थ
दलनः विध्वंसकः इंदुश्चंद्रमाः अत्र विजयति इति वि
पूर्वात् जयते धातोरात्मनेपदानुशासनात् परस्मैपद
प्रयागो व्याकरणविरुद्धस्तस्मादलक्षणम् ॥११॥
(३०) वाग्भटालंकार-परि० २. अर्थ--जो शब्दशास्त्र (व्याकरण) के विरुद्ध पद हो उसे अलक्षण दोप कहतेहैं जैसे मानवती सुंदरियों के मानका नष्ट करनेवाला यह चंद्रमा उत्कर्ष करके वर्तमानहै अर्थात् प्रकाशमान होरहाहै यहां 'विजयति' परस्मैपद व्याकरण विरुद्धहै किंतु विजयते आत्मनेपद उचित था इससे अलक्ष्ण दोप हुआ॥११॥ (उदाहरण)दोहा-शब्दशास्त्र वरतावते, पृथक अलक्षण होत । तारकविचे अकाशमें होत चंद्र उद्योत ॥ स्वसंकेतकुमार्थ । स्वसंकेतप्रकप्तार्थ ज्ञेयार्थातरवाचकम् । यथा विभाति शैलोयं पुष्पितैर्वानर- ध्वजैः॥ १२॥ टीका-ज्ञेयार्थीतरंवाचकम् स्वसंकेतप्रकृतार्थं यथा अयं शैलः पुष्पि वानरध्वजैः विभाति इत्यन्वयः॥ स्वसंकेतेन प्रकप्तो रचितोऽर्थो येन तत् स्वसंकेतप्रक तार्थ ज्ञेयस्य ज्ञातुं योग्यस्य यत अर्थातरवाचकं तत् क्षेयार्थांतरवाचकम् यथा पुष्पितैः वानरध्वजैः अर्जुन वृक्षैः अयं शैलो विभाति वानरध्वजकथनेन पार्थस्या र्जुनस्य ग्रहणं भवितुमर्हति नतु अर्जुनवृक्षस्य तत्र स्व संकेतकल्पितार्थत्वेनवानरध्वजशब्देऽर्जुनवृक्षस्य ग्रह- णमेव स्वसंकेतप्रकृतार्थ दूपणम् भवति ॥ १२॥ अर्थ-जहां ज्ञेय पदार्थसे अर्थात् पाचकको अपने संकेत फल्पित अर्थमें उपयोग किया जाय उसे स्वसंकेतप्रप्तार्थ नाम सान्वय सं० टी० भाषादीकासहित । दूषण कहतेहैं जैसे यह पर्वत फूले हुए वानरध्वज नाम अर्जुनके वृक्षोंसे शोभायमान होरहा है वानरध्वज शब्दसे पांडव अर्जुन का वोष होसका अर्जुनवृक्षका नहीं परंतु यहां अपने संकेत कल्पनासे वानरध्वजका अर्थ अर्जुनवृक्ष किया गया इसीसे स्वसं- केतप्रवृतार्थ दोष हुवा ॥ १२ ॥ (उदाहरण ) दोहा-स्वसंकेतकृतार्थ जो, संकेतार्थविकाश । रावणसुत मुसमें धरे, होत काशका नाश ।। अप्रसिद्ध । यस्य नास्ति प्रसिद्धिस्तदप्रसिद्ध विद्ध यथा॥ राजेंद्र भवतः कीर्तिश्चतुरो हति वारिधीन् ॥ १३ ॥ टीका-यस्य प्रसिद्धिः नास्ति तत् अप्रसिद्धं (बुधाः) विदुः । यथा हे राजेंद्र भवतः कीर्तिः चतुरो वारिधीन हंति इत्यन्वयः ।। बुधा इति शेपः वारि धीन समुद्रान हंति गच्छंति अत्र हनहिंसागत्योर्धा- तोः गमनार्थस्य अप्रसिद्धत्वादप्रसिद्धं दूपणम् ॥१३॥ अर्थ- जिसकी प्रसिद्धि नहीं हो ऐसे अर्थका पद उपयोगहो तो उसे अप्रसिद्ध दोष कहतेहैं जैसे हे राजेंद्र आपकी कीर्ति चारों समुद्रापर्यंत गमन करतीहै इसमें हतिका अर्थ जाना कियाहै जो मसिद्ध नहीं है किंतु हतिका अर्थ मारना मसिद्धहै इसीसे अमसिद्ध दोप हुवा ॥ १३॥ (उदाहरण) दोहा-अप्रसिद्ध जहँ अर्थमें, अप्रसिद्धपद योग । ग्रीपम ऋतुमें अधिक वन, पीवतहें सब लोग।
(३२) वाग्भटालंकार-परि०२. असंमत । शक्तमप्यर्थमाख्यातुं यन्न सर्वत्र संमतम्॥ असंमतं तमोंभोजंक्षालयंत्यंशवोरवेः१४ टीका--अर्थम् आख्यातुं शक्तमपि यत् सर्वत्र न संमतं (तत्) असंमतम् (यथा ) खेः अंशवः तमों- भोजं क्षालयंति इत्यन्वयः। तमोंभोज तमसः अंभोजं पंकम् अथवा तमः एव अंभोजम् अंशवः किरणाः रखेः अंशवः तमोभोजं क्षालयंति इत्यत्र अंभोजशब्दः अंभसोजातत्वात् कमलकर्दमादौ वर्तते अपि परं च योगरूढत्वेन कमले एव स्थितः नतु पंकादौ अत्र पंकाथै ग्रहणत्वादसंमतं नाम दूपणम् ॥ १४ ॥ अर्थ-जो अर्थक कहनेमें समर्थ भी हो पर वह पद सर्वत्र संमत नहीं हो तो उसे असंमत दोप कहते हैं जैसे सूर्यकी किरण तमोभोज अर्थात् अंधकार रूप कीचड़को धो ( साफफर) सक्तीहैं अंभोज पदका अर्थ जलसे पैदा होने वाले कमल कीचड़ शैवाल आदि सभी होसक्तेहैं परंतु योगरूढित्व करके अंभोज़ पदका अर्थ कमल ही मुख्यतासे होताहै कीचड़ आदि नहीं होते और यहां अंभोज पदका अर्थ कीचड है इसीसे असंमत दोप हुवा ।। १४ ॥ (उदाहरण) दोहा-योगरूटि पदमें जहां, अर्थ योगवश होय। दोष असंमत सोयथा, ओढ अंगरसा सोय॥ प्रसंगवशं यहां पर हम रूढी आदि शाब्दिक शक्तियों का वर्णन करते हैं वह शाब्दिक शक्ति संक्षेपसे तीन प्रकारकी होतीहै (१) ।
" सान्वय सं० टी० भापाटीकासहित ! रूढि (२) यौगिक (३) योगरूढि देखो साहित्यसार श्लोक "सापुनस्त्रिविधारूढियोगतन्मिश्रभेदतः । समुदायैकशत्तिर्या सैव रूढिर्यथाशिवः १ योगो वयनमात्रस्य शक्तिर्यदत्मबोधकः उभयोः शंकरो योगरूढिः नारायणो यथा २" साहित्य शास्त्रके अनुसार शाब्दिक शक्ति ३ प्रकारकी होतीहै जैसे रूढि, यौगिक, तन्मिश्र अर्थात् योगरूढि उनमेंसे जो धातुप्रत्ययादिके आश्रय न होकर केवल समुदायके आश्रयसे अर्थ प्रकाश करे जैसे शिव अथवा भाषामें गाडी जो गाडी हुई न होकर उसके विपरीत चलने वाली होकर गाडी कहलाती है इसे रूढि कहतेहै । और जो अवयव (पदोंके टुकडे अथवा धातुप्रत्ययादि) के आश्रयसे अर्थ प्रकाश को उसे योग अर्थात् यौगिक कहतेहैं जैसे प्रबोधक या पाठक पढ़ाने वाला अर्थात् जो पढ़ाताहो वही पाठक कहलाता है ।। तीसरे योगरूढि उसे कहते हैं जिसमें दोनोंके आश्रयसे अर्थ प्रकाश हो अर्थात् टुकडोंसे या धातु प्रत्ययादिसे अर्थ प्रकाश होकर भी एक ही पदार्थमें नियत रहे जैसे नारायण अथवा अंभोज अंभोजका अर्थ जलसे पैदा होने वाले कमल कीचड शिवाल आदि कई हो सक्तेहैं तो भी जलसे पैदा होने वाले एक मात्र कमल ही को मुख्यतासे अंभोज कहते हैं कीचड़ आदिको अंभोज नहीं कहतेहैं ॥ १४ ॥ यद्यत्रानुचितं तद्धि तत्र ग्राम्यं स्मृतं यथा॥ छादयित्वा सुरान्पुष्पैः पुरोधान्यं क्षिपाम्यहम् ॥ १५॥ टीका-यत् यत्र अनुचितं तत् तत्र ग्राम्यं स्मृतम् यथा अहम् सुरान् पुष्पैः छादयित्वा पुरः धान्यं (३४) वाग्भटालंकार-परि० २. क्षिपामि इत्यन्वयः॥ छादयित्वा संपूज्य पुरः अग्रतः धान्यं क्षिपामि अक्षतं समर्पयामि अंत्र पुष्पैः छाद- यित्वा थान्यं क्षिपामि च ग्राम्यं पदम् ॥ १५॥ अर्थ-जहां जो कोई अनुचित अयुक्त ग्रामीण पद हो तो उसे ग्राम्पपद (ग्राम्यपद प्रयुक्ति नाम) दोष कहते हैं जैसे मैं देवताओंको पुष्पांसे ढककर उनके आगे धान्य बखेरताहूं यहाँ पुष्पोंसे पूजन करनेकी जगह ढककर और अक्षत समर्पण कर. नकी जगह धान्य बखेरना ग्राम्य पद है इसीसे ग्राम्यपदप्रयुक्ति नाम दूषण हुघा ॥ १५॥ (उदाहरण) दोहा-नागर कवि जो ग्राम्पपद, युक्त करे नाहिं ठीक । जिमि विशाल प्रासादमें न लघु औवरीनीक ॥ अथ वाक्यदोप। पदात्मकत्वाहास्यस्य तद्दोपाः संतिशा ब्दिकाः ॥ अपदस्थास्तु ये वाक्यदोपा स्तान्महेऽधुना ॥ १६ ॥ टीका-वाक्यस्य पदात्मकत्वात् तदोपाः शाब्दि- काः संति तु अपदस्था ये वाक्यदोपाः तान् अधुना महे इत्यन्वयः ॥ तदोपाः उक्तदोपाः तद्दोपाः संति शान्दिका इत्यत्र तदोपाः संति तत्र दि इति वा पाठां- तरः अपदस्थाः पदाश्रयेण न स्थिताः इत्यर्थः ॥१६॥ अर्थ-वाक्यके पदोंमें होनेसे जो दीप पीछे कहे गयेहैं ये शाब्दिक अर्थात् शब्ददोप अथवा पदोप हैं और जो पदमात्रके
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (३५)
आश्रय नहीं होकर वाक्यके आश्रय दोप होतेहैं उन्हें अब अगाडी
वर्णन करते हैं ॥ १६ ॥
खंडितं व्यस्तसंबंधमसंमितमपक्रमम् ॥
छंदोरीतियतिभ्रष्टं दुष्टवाक्यमसकि-
यम् ॥१७॥
टीका-खंडितम् इत्यादि पदैः वाक्यदोपाणांगणना
एव कृता । स्फुटान्वयः । छंदोरीतियतिभ्रष्टम् इति
छंदोभ्रष्टं रीतिभ्रष्टं यतिभ्रष्टम् इति दोपत्रयम् ॥ १७॥
अर्थ-वाक्यदोप इस प्रकारसहैं कि १ खंडित, २ व्यस्तसंबंध,
३ असंमित, ४ अपक्रम, ५ छंदोभ्रष्ट, ६रीतिभ्रष्ट, ७यतिभ्रष्ट, ८
दुष्टयाक्य, अर्थात् दूपितवाक्य, ९ असत्तिया इनके लक्षण और
उद हरण यथाक्रम आगाड़ी कहते हैं ॥ १७ ॥
खंडितदोप।
वाक्यान्तरप्रवेशेन विच्छिन्नं खंडितं मतम्।
यथा पातु सदा स्वामी यमिंद्रःस्तौति
वो जिनः॥ १८॥
टीका-वाक्यान्तरप्रवेशेन (यत्) विच्छिन्न (तत्)
खंडितं मतम् यथा यम् इंद्रस्तौति (स)जिनः स्वामी
सदा कः पातु इत्यन्वयः॥ अत्र जिनः स्वामी सदा
वापातु इति वाक्यं यमिंद्रः स्तौति इति वाक्यांतरप्रवे-
शेन विच्छिन्नं भवति अतः खंडितं नाम दोपः॥ १८॥
वाग्भटालंकार-पार०२ अर्थ-जो वाक्य दूसरे वाक्यांतरके बीचमें आजाने से विच्छिन्न होजावे तो उसे खंडित दोष कहतेहैं जैसे वह जिन स्वामी, जिनकी इन्द्र स्तुति करता है सदा तुम्हारी रक्षा करो यहाँ वह जिन स्वामी सदा तुम्हारी रक्षा करो के बीचमें जिनकी इन्द्र स्तुति करता है वाक्यांतर आजानेसे खंडित नाम वाक्यदोष हुवा ॥ १८ ॥ (उदाहरण) दोहा-वाक्यांतरसे वाक्पमें, खंडित दोप बखान । जिन जिनकी स्तुति सुर करें करो सदा कल्यान ॥ व्यस्तसंबंध। संबंधिपददूरत्वे व्यस्तसंबंधमुच्यते ॥ यथाद्यः संपदं ज्ञाता देयात्तत्त्वानि वोड हताम् ॥ १९॥ टीका--पूर्वार्द्धस्यान्वयः सरलः ॥ यथा अर्हता मायः तत्त्वानि ज्ञाता वः संपदं देयात् इत्युत्तरार्द्धस्या न्वयः ॥ अत्र अर्हताम् आद्य इत्यादिसंबंधिपददूरत्वे सति व्यस्तसंबंधनामकं दूपणं भवति ॥ १९॥ अर्थ-जहां सबंधिपद दूर होताहै उसे व्यस्तसंबंध नामक दोष कहते हैं जैसे अर्हताम तत्त्वोंको जानने वाले ऋपभ.. देवनी आपको संपत्ति दो यहां आयका संबंधिपद अर्हताम् दूर होनेसें व्यस्तसंबंध नामक वाक्यदीप हुवा ॥ १९ ॥ (उदाहरण) दोहा-संबंधी पद दूरते, होत व्यस्तसंबंध । भवको दीनदयाल प्रभु कब काटोगे पंध सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । असंमित । शब्दार्थों यत्र न तुलाविधृताविव सं- मतौ । तदसंमितमित्याहुक्यिं वाक्य- विदो यथा ॥२०॥ मानसौकः पतद्यान देवासनविलोचनः । तमोरिपुविपक्षारि- प्रियां दिशतु वो जिनः ॥२१॥ टीका-यत्र शब्दार्थो तुलाविधृतौ इव न संमितौ तत् वाक्यं वाक्यविदः असंमितम् इति आहुः इत्यन्वयः ॥ तुलाविधृतौ तुलायां संस्थापितो इव यथा पदस्य अग्रिमेण सह संबंधः ॥ २० ॥ यथा मानसौकः पतद्यानदेवासनविलोचनः जिनः तमोरिपुविपक्षारि- प्रियां वः दिशतु इत्यन्वयः ॥ मानसौकः पतयान- देवासनविलोचनः मानसं नामकं सरः तदेव ओकः स्थानं यस्य स मानसौका हंसः मानसौकाः चासो पतत् पक्षी च मानसौकापतत् स एव यानं यस्य स मानसौकःपतधानः स एव देवः मानसौकःपतद्यान देवः ब्रह्मा तस्य आसनं कमलं तद्वत् लोचनं यस्य स मानसौकापतद्यानदेवासनविलोचनः तमोरिपूविप- क्षारिप्रियां तमसो रिपुः तमोरिपुः सूर्यः तस्य विपक्षी राहुः तस्य आरिः विष्णुः तस्य प्रिया लक्ष्मीः तांतमो- रिपुविपक्षारिप्रियाम्। अत्र शब्दास्तु बहवः अर्थः स्वल्प
(३८) वाग्भटालंकार-परि० २.
एव अतः न शब्दार्थयोः तुलाविधृतयोरिव माने साम्यं
एतस्मादेव असंमितनामकं वाक्यदूपणम् ॥ २१ ॥
अर्थ-जहां शब्द और अर्थ तराजूमें नुलें जेसे ठीक नहीं हो
तो वाक्य विद्वान पंडित उसे असंमित दोप कहते हैं (यक्ति
अक्षर स्वल्प होकर अर्थ अधिक होना तो श्रेष्ठ होताहै परंतु
अक्षर अधिक होकर अर्थ स्वल्प होना दूपित है )॥२०॥ जैसे
जिन भगवान् आपको तमोरिपुविपक्षारिपिया अर्थात् लक्ष्मी दो
इसमें तमोरिपुविपक्षारिप्रियाका अर्थ लक्ष्मी इसप्रकार हुवा कि
तम अन्धकार इसका रिपु सूर्य सूर्यका विपक्षी राहु राहुका अरि
शत्रु विष्णु विष्णुकी प्रियालक्ष्मी हुई इसी प्रकार मानसोकापतद्यान
देवासनविलोचनका अर्थ जिन होकर विशेपण हुवा फि मानस
मानसरोवर है ओक स्थान जिस पक्षीका सो हंस वह हंस है
वाहन जिस देवका सो ब्रह्मा उस ब्रह्माका आसन कमल, कमल
जैसे हैं विलोचन नेत्र निनके ऐसे जिन भगवान यहां मानसोकः
पतधानदेवासनविलोचन और तमोरिपुविपक्षारिप्रिया इनपदोंमें
अक्षर बहुतहैं अर्थ केश कल्पना करनेसे स्वल्प निकलताहै इससे
असंमित दोष हुवा ॥ २१ ॥
(असंमितलक्षण ) दोहा-शब्द अर्थजहँ वाक्यमें, तुले न होय
समान । शब्द बहुत अरु अर्थ लघु ताहि असंमित जान ॥
( उदाहरण-अन्यकविका ) दोहा-अनासहेली तासु रिपु
ताजननी भरतार । ताके सुतके मित्रको भजिये बारम्बार ।।
अपक्रम।
अपक्रम भवेद्यत्र प्रसिद्धक्रमलंघनम् ॥
यथा भुक्त्वा कृतस्नानो गुरून्देवांश्च वं-
दते ॥२२॥
सान्वय सं० टी० भापाटीकासहित । टीका-यत्र प्रसिद्धक्रमलंघनम् भवेत् (तत् )अप मम् यथा भुक्त्वा कृतस्नानः गुरून् च देवान वंदते त्यन्वयः॥प्रसिद्धस्य क्रमस्य लंघनं प्रसिद्धक्रमलं- नम् अत्र भुक्त्वा स्नानकरणं तत्पश्चात् गुरूणां देवानां व वंदनम् इति न प्रसिद्धक्रमः किंतुस्नानानंतरं गुरुदेवा दीनां वंदनं तत्पश्चात् भोजनमिति प्रसिद्धः क्रमः तल्लं पनादेव अपक्रम नाम दूपणम् ॥२२॥ अर्थ-जहां वाक्यमें प्रसिद्ध क्रमका उल्लंघन हो उसे अपक्रम शाक्यदोप कहते हैं जैसे किसीने भोजनकरक स्नान किया और फिर गुरु और देवताओंको वंदना करी यहाँ प्रसिद्ध क्रमका लंघन होनेसे अपक्रम वाक्यदोष दुवा प्रसिद्धक्रम यह है कि पहले जान करना फिर गुरुदेवादिकी वंदना करना फिर भोजन करना परंतु यहां पहले भोजन फिर स्नान फिर गुरु देवादियंदना होनेसे ही अपक्रम होगया ।। २२ ॥ (उदाहरण दोहा)कमप्रसिद्धलंघन किये, होत अपकम जाय। तेलक किये न्हाये पिया पौढे पलँग विछाय ॥ छंदोश्चष्ट । छंदःशास्त्रविरुद्धं यच्छंदोभ्रष्टं हि तद्यथा॥ स जयति जिनपतिः परब्रह्ममहानिधिः२३ टीका-यत् छंदःशास्त्रविरुदं तत् छंदोभ्रष्टं हि यथा स परब्रह्म महानिधिः जिनपतिः जयति इत्य- न्वयः ॥ छंदःशास्त्रेण विरुद्ध छंदःशास्त्रविरुद्धं पर (१०) वाग्भटालंकार-परि० २. च तत् ब्रह्म च परब्रह्म परमात्मा स एव महानिधिः परब्रह्ममहानिधिः छंदोभ्रपत्वं पद्यवाक्ये छंदोबद्ध एव संभवति यथा स जयति जिनपतिः अत्र श्लोके पष्टं गुरु ज्ञेयमित्यनुष्टुप्छंदोलक्षणवैपरीत्यात् छंदोभ्रष्ट त्वमेव ॥२३॥ अर्थ-जो पद्यात्मक वाक्य छंदशास्त्रसे विरुद्ध हो उसे छंदो- भ्रष्ट कहते हैं जैसे ये परब्रह्म महानिधि जिनपति जयको प्राप्त हो यहां स जयति जिनपति अनुष्टुप् श्लोकका पद है और अनुष्टुप् के लक्षणोंसे विरुद्धहै अनुष्टुप्के लक्षण ये हैं कि " श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पंचमम् इत्यादि ॥ २३ ॥ (उदाहरण) दोहा-छंदोभ्रष्ट जो पद्यमें,छंदरीति विपरीत। फांता कंबल फुथ बिन, सभीको सतावे शीत ॥दोहके प्रथम और तीसरे चरणमें १३ मात्राहोती हैं और दूसरे चौथे पदमें ११ मात्रा यहां चौथमें मात्रा बढनेसे छंदोभ्रष्ट हुवा ॥ रीतिवष्ट । रीतिभ्रष्टमनिर्वाहो यत्र रीतेर्भवेद्यथा ॥ जिनो जयति स श्रीमानिंद्राद्यमरवं दितः॥२४॥ टीका--यत्र रीतेः अनिर्वाहो भवेत् ( तत् ) रीति भ्रष्टम् यथा स इंद्रायमरवंदितः श्रीमान् जिनः जयति इत्यन्वयः॥ इंद्रायमरवंदितः इंद्रादिभिः अमरैः देवैः वंदितः यत्र गौडी वैदर्भीत्यादिरीतीनां पूर्वापरतया
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (४१)
नर्बाहो न भवेत् तदा रीतिभ्रष्टं बाहुल्येन असमस्ता-
| पदानां प्रयोगो वैदर्भी रीतिः तथा च समासबाहु-
न्यतया पदप्रयोगो गौडी रितिः। तथा चोक्तं साहित्य-
पणे "माधुर्यव्यंजकर्णै रचना ललितात्मिका|अबू-
तेरल्पवृत्ति वैदर्भीरीतिरुच्यते ओजःप्रकाशकवण-
धआडवरः पुनः।। समासबहुला गौडीरीतिरुक्ता मनी
पेभिः॥२॥"इति अबोदाहरणे प्रथमपदे वैदर्भी रीतिः
देतीये गौडी इति रीतिविरोधाद्रीतिभ्रष्टम् ॥२४॥
अर्थ-जहां गौडी वैदर्भी आदि रीतियों का पूर्वापर निर्वाह नहीं
हो तो उसे रीतिघ्रष्ट कहतेहैं जैसे ५ इन्द्रादि देवताओं करके
(दित श्रीमान् जिन भगवान् जयको प्राप्तहो । यहाँउदाहरण रूप
त्तरार्द्धके प्रथम पदमें वैदर्भी रीति प्रतीत होतीहै और दूसरेमें
सोडी इससे आद्योपांत एक रीतिका निर्वाह न होनेसे रीतिभ्रष्ट
होप हुवा । जिसमें विशेष कर समासहित पदोंका विशेष
योग होताहै वह रीति वैदर्भी कहलातीहै और जहां विशेषकर
समासांत पदोंका अधिक प्रयोग होताहै वह गौडी रीति होती
। (भाषामें इस प्रकारकी रीतियां प्रतीत नहीं होती इससे
इदाहरण नहीं दिया)॥ २४ ॥
यतिवष्ट ।
पांतपिरतिः प्रोक्तं यतिप्रष्टं चुर्थया ।।
नमस्तस्मै जगत्स्वामिने सदा नेमयेऽ
हते ॥२५॥
(४०) वाग्भटालंकार-परि० २. च तत् ब्रह्म च परब्रह्म परमात्मा स एव महानिधिः परब्रह्ममहानिधिः छंदोभ्रपत्वं पयवाक्ये छंदोबद्ध एव संभवति यथा स जयति जिनपतिः अत्र श्लोके पष्टं गुरु ज्ञेयमित्यनुष्टुप्छंदोलक्षणवैपरीत्यात् छंदोभ्रष्ट त्वमेव ॥ २३॥ अर्थ-जो पद्यात्मक वाक्य छंदशास्त्रसे विरुद्ध हो उसे छंदो- भ्रष्ट कहतेहैं जैसे घे परब्रह्म महानिधि जिनपति जयको प्राप्त हो यहां स जयति जिनपति अनुष्टुप् श्लोकका पद है और अनुग्रुप के लक्षणोंसे विरुद्धहै अनुष्टुप्के लक्षण ये हैं कि " श्लोके पष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पंचमम् इत्यादि ॥ २३ ॥ (उदाहरण ) दोहा-छंदोभ्रष्ट जो पद्यमें,उंदरीति विपरीत। कांता फंवल कुथ विन, सभीको सतावे शीत ॥दोहके प्रथम और तीसरे चरणमें १३ मात्राहोती हैं और दूसरे चौथे पदमें ११ मात्रा यहां चौथेमें मात्रा बढनेसे छंदोभ्रष्ट हुवा ॥ रीतिवष्ट । रीतिभ्रष्टमनिर्वाहो यत्र रीतेर्भवेद्यथा ॥ जिनो जयति स श्रीमानिंद्राद्यमरवं दितः॥२४॥ टीका-यत्र रीतेः अनिहो भवेत् ( तत्) रीति भ्रष्टम् यथा स इंद्रायमरवंदितः श्रीमान् जिनः जयति इत्यन्वयः॥ इंद्रायमरवंदितः इंद्रादिभिः अमरैः देवैः वंदितः यत्र गौडी वैदर्भीत्यादिरीतीनां पूर्वापरतया
सान्धय सं० टी० भाषाटीकासहित ।
निर्वाहो न भवेत् तदा रीतिभ्रष्टं वाहुल्येन असमस्ता-
नां पदानां प्रयोगो वैदर्भी रीतिः तथा च समासवाहु-
ल्यतया पदप्रयोगो गौडी रितिः। तथा चोक्तं साहित्य-
दर्पणे।"माधुर्यव्यंजकैर्वर्ण रचना ललितात्मिकाअ-
त्तिरल्पवृत्ति विदर्भारीतिरुच्यते ओजःप्रकाशकवण-
वैधआडवरः पुनः।। समासबहुला गोडीरीतिरुक्ता मनी
पिभिः॥२॥"इति अत्रोदाहरणे प्रथमपदे वैदर्भी रीतिः
द्वितीये गौडी इति रीतिविरोधाद्रीतिभ्रष्टम् ॥२४॥
अर्थ-जहां गाडी चैदी आदि रीतियोंका पूर्वापर निर्वाह नहीं
हो तो उस रीतिभ्रष्ट कहतेहैं जैसे व इन्द्रादि देवताओं करके
वंदित श्रीमान् जिन भगवान् जयको प्राप्तहो । यहाँ उदाहरण रूप
उत्तरार्द्ध के प्रथम पदमें वैदर्भी रीति प्रतीत होतीहै और दूसरेमें
गोडी इससे आद्योपोत एक रीतिका निर्वाह न होनेसे रीतिभ्रष्ट
दोप हुवा ।। जिसमें विशेष कर समासरहित पदोंका विशेष
प्रयोग होताहै यह रीति वैदर्भी कहलातीहै और जहां विशेषकर
समासांत पदोंका अधिक प्रयोग होताहै यह गौडी रीति होती
है (भाषामें इस प्रकारकी रीतियां प्रतीत नहीं होती इससे
उदाहरण नहीं दिया)॥ २४ ।।
यतिवष्ट ।
पदांतर्विरतिः प्रोक्तं यतिभ्रष्टं बुधैर्यथा ॥
नमस्तस्मै जगत्स्वामिने सदा नेमयेऽ
हते॥२५॥
.(४२) वाग्भटालंकार-परि०२. टीका--पदांतर्विरतिः बुधैः यतिभ्रष्टं प्रोक्त यथा तस्मैजगत्स्वामिने अहंते नेमये सदानमः इत्यन्वयः।। पदस्य विभक्त्यंतस्य अंतः मध्ये विरतिः विच्छेदः यथा जगत्स्वामिने अर्हते नमः अत्र जगत्स्वामिने विभत्त्यंतपदमध्ये जगत्स्वामि इत्यात्मके स्थाने पूर्व स्य पदस्य समाप्तित्वात् विरतिरेव एतस्मात् यतिभ्रष्टं नाम दूपणम् ॥ २५॥ अर्थ-जहां पदके वीचमै विराम अर्थात् तोड़ (छंदका विश्राम) आजाये तो उसे यतिभ्रष्ट कहतेहैं जैसे वे जो जगत्के स्वामी पूज्य नेमिनाथ हैं उनको प्रणाम हो यहाँपर स्वामिने पदके बीचमें पहला पद समाप्त होनेसे केवल ने टूटकर अगले पदमें चला गया और वीचमेंसे पद टूटगया इससे यतिभ्रष्ट हुवा ॥ २५॥ (उदाहरण ) दोहा-यतिभ्रष्टमें होतहै, पदके बीच विराम । जैसे रे नर जाय गंगा तट भज हरिनाम ॥ असक्रिया। क्रियापदविहीनं यत्तदसत्क्रियमुच्यते। यथा सरस्वती पुष्पैः श्रीखंडैधुमृणैः स्तवैः॥२६॥ टीका-यत क्रियापदविहीनंतत् असतक्रियम् उच्य- ते। यथा पुष्पैः श्रीखंडेः घुसृणैः स्तवैः सरस्वती (अर्च- यामीति ) शेपेणान्वयः ॥ क्रियापदविहीनमित्यत्र सान्वय सं० टी०भाषाटीकासहित । (४३) सक्रियापदहीनम् इति ना पाठांतरः असत्कियमसती न विद्यमाना किया यत्र श्रीखंडैः चंदनैः घुसृणैः कुंकुमैः अत्र पूजयामि इत्यादि क्रियापदाभावात् असक्रिय नाम दूषणम् ॥२६॥ अर्थ-जही (क्रियासाध्य वाक्यमें) क्रियापद नहीं हो तो उसे असक्रिय दोप कहते हैं पुष्पोंसे चंदनसे केशरसे और स्तुतिसे सरस्वतीको इस इतने वाक्यमें कोई क्रियापद नहीं होनेसे अस- क्रिय दोप हुवा । तथा इसमें पूजयामि अर्थात् पूजन करूँ इस क्रियायोग किये बिना अर्थ नहीं होता इसीसे इस अनुक्त क्रियाका उपयोग होनेसे अर्थ हुवा ॥ २६ ॥ (उदाहरण) दोहा-क्रिया न हो जहँ वाक्यमें,ताहि असक्रिय जान | गंधाक्षत फल विमल जल, पुष्पोसे भगवान ॥ दृषितवाक्य । देशकालागमावस्थाद्रव्यादिषु विरोधिनम्। काव्येष्वर्थं न वनीयाद्विशिष्टं कारणं विना ॥२७॥ टीका-विशिष्टं कारणं विना देशकालागमावस्था द्रव्यादिषु विरोधिनम् अर्थ काव्येषु न बनीयात् इत्य- न्वयः ॥ देशविरोधिनं कालविरोधिनमागमविरोधि मवस्थाविरोधिनं द्रव्यादिविरोधिनं च अर्थमितिभावः आदिशब्देन गुणकियाजात्यादीनां ग्रहणमेषु विप- येषु विरोधिनं विरुद्धतया प्रतिभासमानं विशिष्टं कारणं . (४४) वाग्भटालंकार-परि०२. विशेपकारणमसंगत्याचलंकाररूपकं विनेत्यर्थः । यदा देशकालादिविरोधिनं बनीयात् तदा दूपितं वाक्यं भवतीति फलितार्थः॥२७॥ अर्थ-किसी विशेष कारणके विना देशके विरुद्ध कालके विरुद्ध आगम (शास्त्रों के विरुद्ध अवस्थाके विरुद्ध तथा द्रव्यादिके विरुद्ध अर्थकी योजना करनी काव्यमें उचित नहीं, आदि शब्दसे गुणके विरुद्ध जातिके विरुद्ध इत्यादिफी योजना भी नहीं करनी चाहिये (विशेप कारणसे प्रयोजन कोई नियत कारण अथवा असंगति आदि अलंकार इत्यादि हैं अर्थात् कोई विशेष कारण या असं- गति आदि अलंकारोंमें विरुद्ध अर्थ की योजना होसक्तीहै अन्यत्र नहीं)(और यदि कोई विशेष कारण विना देश कालादिके विरुद्ध अर्थकी योजना करे तो वह दूपित वाक्य होताहै इसका उदाहरण अगाड़ी लिखते हैं ॥ २७ ॥ प्रवेशे चैत्रस्य स्फुटकुटजराजिस्मित दिशि प्रचंडे मार्तडे हिमकणसमानोष्म महसि । जलक्रीडायातं मरुसरसि बाल हिपकुलं मदेनांधं विध्यंत्यसमशरपतिः प्रशमिनः॥२८॥ टीका--प्रशमिनः मदेन अंधं वालद्विपकुलम् अ. समशरपतिः विध्यंति कीदृशम् वालद्विपकुलं मरु- सरसि जलक्रीडायातम् कदा चैत्रस्य प्रवेशे किंभूते चैत्रस्य प्रवेशे स्फुटकुटजराजिस्मितादीशापुनः वसति
सॉन्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (४५)
हिमकणसमानोष्ममहसि मातडे प्रचंडे सति इत्य-
न्वयः ॥ चैत्रस्य प्रवेशे वसंततॊ स्फुटा विकसिता
कुटजानां गिरिमल्लिकानां राजिपिंक्तिः स्फुटकुटजरा-
जिभ्यः स्मिता दिशः यत्र तस्मिन् हिमस्य कणाः
बिंदवः तैः समानानि ऊष्ममहांसि उष्णतेजांसि
यस्य तस्मिन् जलक्रीडायै आयातं जल कीडा-
यातं बालद्विपकुलं करिकलभन्दम् असमशरपातैः
तीक्ष्णशरप्रहारैः अत्र ,चैत्रस्य प्रवेशे मार्तडस्य प्रचं-
डत्वं कालविरुद्धम् मरुसरसि देशविरुद्धं मदेन
अंधं बालद्विपकुलम् इति अवस्थाविरुद्धम् प्रशमिनः
असमशरपतिः विध्यंति इति आगमविरुद्धं स्वभाव
विरुद्धं च ॥२८॥
अर्थ-फूलीहुई कुटज (पहाड़ीमल्लिका) की पंक्तियोंसे मानी
हँसरही हैं दिशा जिसमें ऐसे चैत्रके प्रवेश अर्थात् वसंत ऋतु में
जब कि बरफके कोंके समान है उष्णताकी तीक्ष्णता जिसमें
ऐसे सूर्यके प्रचंड होनेपर मह देश (वागड) के सरोवरोंमें
श्रीडाके लिये आया हुवा जो मदांध (मतवाला) हाथीके
बच्चोंका समूह उसको शान्ति वाले (मुनीश्वर ) तीखे वाणोंके
महारसे मारते हैं यहां चैत्रके प्रवेशमें सूर्यका प्रचंड होना समय
विरुद्ध है बागडके सरोवराम क्रीडा दशविरुद्ध है हाथोक बच्चाका
मदांध ( मतवाला पन) अवस्था विरुद्ध है तथा शांत मुनियों-
फे हायर्याक बच्चे मारना शास्त्र (आगम) विरुद्ध है इसीसे ऐसे
अोंके प्रयोग करनेस वाक्यदूषित कहलाता है ॥२८॥
वाग्भटालंकार-परि० २. (भाषालक्षण) दोहा-देश समय बय आदिके, होत विरुद्ध प्रतीत । ऐसी कविता जनि करो, बिन कारण विपरीत ॥ ( उदाहरण) बुढिया चढी पहाडते, उतरी सागर पार । पंछ उठाकर देखले, होलीके दिन चार ॥- इति दोषविषनिषेकैरकलंकितमुज्ज्वलं सदा विबुधैः ॥ कविहृदयसागरोत्थितम मृतमिवास्वायते काव्यम् ॥ २९ ॥ टीका-विबुधैः इति दोपविपनिसेकैः अकलंकितम् उज्ज्वलं कविहृदयसागरोत्थितं काव्यम् अमृतम् इव सदा आस्वायते इत्यन्वयः।।इति दोपा एव विपाणि तेषां निपेकाः मिश्रीभावाः तैः अकलंकितं शुद्धम् उज्ज्वलं निर्मलं कवेः हृदयं कविहृदयं तदेव सागरः तस्मात् उत्थितं समुद्भूतं काव्यम् अमृतमिव विबुधैः पंडितैः सदा आस्वाद्यते ॥ २९॥ अर्थ-पूर्वोक्त जो दोपरूप विप उनके संसर्गके कलंकसे रहित निर्मल और कविके हृदयरूप सागरसे उत्पन्न दुवा जो काव्य है उसे पंडित लोग अमृतकी भांति पान करते हैं अर्थात् उत्तम कविताका आनन्द लेना विद्वानोंको अवश्य परमप्रिय होता है२९।। इति वाग्भटारकारे द्वितीयपरिच्छेदः ।
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित। (४७) तृतीयपरिच्छेदः। गुणाः। अदोपावपि शब्दार्थों प्रशस्येते न यैर्वि- ना॥ तानिदानी यथाशक्ति बमोऽभिव्य- क्तये गुणान् ॥ १॥ औदार्य समता कांतिरर्थव्यक्तिः प्रसन्नता समाधिः श्लेष ओजोथ माधुर्यं सुकुमारता ॥२॥ टीका--अदोपौ अपि शब्दार्थों यैः विना न प्रश- स्येते तान् गुणान् इदानीम् अभिव्यक्तये यथाशक्ति ब्रूमः इत्यन्वयः ॥ अदोपौ उक्तानर्थकादिदोपरहितौ अभिव्यक्तये प्रकटीकरणाय ॥१॥ औदार्यमित्यादि पदैर्वक्ष्यमाण गुणानां संख्या व्याख्याता यथा १ औ- दार्यम्, २ समता,३कांतिः, ४ अर्थव्यक्ति,५प्रसन्नता, ६समाधिः, ७ श्लेपः,८ओजः, ९माधुर्यम्, १० सुकु- मारता, इति दशसंख्यात्मका काव्यस्य गुणाः कथिता तेषां सोदाहरणानि लक्षणानि वक्ष्यतेऽग्रे॥२॥ अर्थ-पूर्वाध्यायोक्त अनर्थकादि दोषोंसे रहित शब्दार्थ भी जिन गुणोंके विना श्रेष्ठताको प्राप्त नहीं होते उन गुणोंको परि- ज्ञात होनेके लिये हम अब अगाड़ी यथाशक्ति वर्णन करते हैं ॥१॥ वे गुण इस प्रकार हैं कि १ औदार्य, २ समता, ३ काति, ४ अर्यव्यक्ति, ५प्रसन्नता, ६ समाधि, ७ श्लेष, ८ ओज,९ , (४८) याग्भटालंकार-परि०३. माधुर्य, १०सुकुमारता, ये १० गुण काव्यके होतेहैं (इनके लक्षण और उदाहरण अगाडीके श्लोकोंमें यथाक्रम वर्णन करतेहैं )॥२॥ औदार्य । पदानामर्थचारूत्वप्रत्यायकपदांतरैः॥ मि लितानां यदाधानं तदौदार्यस्मृतं यथा ॥ ॥३॥ गंधेभविभ्राजितधाम लक्ष्मीली- लाम्बुजच्छत्रमपास्य राज्यम् ॥ क्रीडा- गिरौ रैवतके तपांसि श्रीनेमिनाथोऽत्र चिरं चकार ॥४॥ टीका-अर्थचारुत्वप्रत्यायकपदांतरैः मिलितानां पदानांयत् आधानंतत्औदार्य स्मृतम् यथाइत्यन्वयः।। अर्थस्य चारुत्वं मनोज्ञत्वं तस्य प्रत्यायकानिप्रबोध- कानि पदांतराणि तैः अर्थचारुत्त्वप्रत्यायकपदांतरैः मिलितानां परस्परसंमिलितानां पदानां विभक्तयं- तानां यत् आधानम् आरोपणं स्यात् तत् औदार्य नाम गुणः स्यात् । यथेति वक्ष्यमाणोदाहरणार्थम् ॥ ॥३॥(औदार्यस्योदाहरणं दर्शयति गंधेभेति)श्रीने मिनाथः अत्र रेवतके क्रीडागिरी चिर तपांसि चकार (किं कृत्वा) राज्यम् अपास्य कीदृशं राज्यं गंधभवि- भ्राजितधाम । पुनः कीदृशं लक्ष्मीलीलांबुजच्छत्रम् इत्यन्वयः ॥ गंधप्रधानाः इभा हस्तिनः गंधेभाःतैः सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (४९) विभ्राजितानि शोभितानि धामानि यस्मिन् तथोक्तं राज्य लक्ष्म्याः राजश्रियाः लीलाम्बुजम् इव छत्रं य- स्मिन् तथोक्तं च राज्यम् इतिभावः। अत्र गंधशब्देन इभाना लीलांबुजशब्देन च छत्रस्य तेनैव राजश्रियाः चारुत्वं द्योत्यते तेन औदार्य नाम गुणः ॥४॥ अर्थ-(चारुवअर्थ अर्थकी श्रेष्ठता) के बोधक पदातरों करके संमिलित पदोंका जहां आधान (नियोजन हो) उसे औदार्य नाम गुण कहते हैं ॥३॥ (जैसे ) श्रीनेमिनाथ रैवतक नाम क्रीडापर्वत पर चिरकाल तक तप करते भये क्याफरके कि मदकी गंधवाले हस्तियोंसे शोभित धाम और राजलक्ष्मीके लीला कमलके समान छत्रयुक्त राज्यको छोडकरः या गंधसे हस्तियोंका और लीलांबुज शब्दसे हस्तियोंका तथा लक्ष्मीका और छत्रका तथा इन सबसे राज्यश्रीका चारुत्व (श्रेष्ठत्व) घोतन होताहै इससे औदार्य नामक गुण हुवा ॥ ४ ॥ (भाषा) दोहा-मिलित चारुता बोधकर, होत पदोंका योग । ताहि कहत औदार्य गुण काव्यरशिग जे लोग ॥ १ ॥ यथा- गंधहस्तिशोभित सदन, श्रीरतिपंकज छत्र । नेमिरान तन कीन्ह तप, रैवत गिरि एकत्र ॥२॥ समता और कांति। बंधस्य यदवैषम्यं समता सोच्यते बुधैः॥ यदुज्ज्वलत्वं तस्यैव सा कांतिरुदिता यथा॥५॥ ३ (५०) वाग्भटालंकार-परि० ३. टीका-बंधस्य यत् अवैपम्यं बुधैः सा समता उच्यते तस्य एव यत्-उज्ज्वलत्वं साकांतिः उदिता- ( यथावक्ष्यमाणोदाहरणार्थम् इत्यन्वयः)॥ बंधस्य श्लोकादेः अवैपम्यं विपमतारहितत्वम् उज्वलत्वम्- उद्दीप्तत्वम् ॥५॥ अर्थ-बंध अर्थात् श्लोकादिकी रचनामें अवैपम्य विषमताका अभाव अर्थात् समता (सरलता) होतो उसे "समता" नामक गुण कहतेहैं और जहां बंध (श्लोकादि) में अर्थ तथा पदोंकी उज्ज्वलता हो तो उसे "कांति" नाम गुण जानो॥ ५॥ (भाषा) दोहा-अविपमता जहँ बंधमें, सो समता गुन जान। जहँ उज्ज्वल हों अर्थ पद सो गुन कांति बखान । समताका उदाहरण । कुचकलशविसारिस्फारलावण्यधारामनु वदति यदंगासंगिनी हारवल्ली ॥ असह- शमहिमानंतामनन्योपमेयां कथय कथ महंते चेतसि व्यंजयामि ॥६॥ टीका--यदंगासंगिनी हारवल्ली ताम् अनन्योपमे. याम् असदृशमहिमानं कुचकलशविसारिस्फारलावण्य धाराम् अनुवदति अहं ते चेतसि कथं व्यंजयामि (इति) कथय इत्यन्वयः ॥ यदंगासंगिनी अंगस्थि- ता हारवल्ली हारलता अनन्योपमेयाम् अन्याभिः
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित ।
उपमातुम् अशक्याम् असहशमहिमानम् असामान्य
महत्वयुक्तां कुचकलशयोः विसारिणी प्रसारिणी स्फा-
रा उत्कटा लावण्यधारा यस्याः ताम् अनुवदति
अनुकथयति ते चेतसि तव हृदये कथं व्यंजयामि ।
अत्र अवैपम्येन समता नाम गुणः स्यात् ॥ ६॥
अर्थ-कांताके अंगस्थित हारवल्ली ( हारकी लडी ) उस
अनन्योपमेय अर्थात् जिसकी उपमा नहीं होसके और असामान्य
महत्व युक्त कुचकलशों पर फैली हुई उत्कट लावण्यकी धारा
हैं जिसके उसके प्रति कहती हैं कि तेरे हृदय पर मैं किस
प्रकारसे प्रकाशमान हो सक्तीहूं अर्थात् तेरे कुचकलशोंपर लाय-
ण्यकी उत्कट धारा मुक्ता रूपसे शोभायमान है फिर कहो
मैं हारकी एक लड़ी तेरे हृदय पर कैसे प्रकाशमान हो सक्ती हूँ
अर्थात् लावण्यधाराके सामने मैं प्रकाशमान नहीं हो सक्ती
यहां बंधकीविषमता नहीं होनेसे समता नाम गुण हुवा ॥ ६ ॥
(भाषा ) दोहा-कुचपर अति लावण्यकी, शोभित धार
अपार । मुक्तामाणकसम जटित, कहा वापुरो हार ।।
कांतिका उदाहरण ।
फलैः कप्ताहारः प्रथममपि निर्गत्य सद-
नादनासक्तः सौख्ये कचिदपि पुराज-
न्मनि कृती॥ तपस्यन्नश्रांतं ननु वनभुवि
श्रीफलदलैरखंडैः
खंडेन्दोश्चिरमकृत
पादार्चनमसौ॥७॥
.. (५२) वाग्भटालंकार-परि०३. टीका-असौ पुराजन्मनि कृती प्रथमम् अपि सद्- नात निर्गत्य वनभुवि अखंडैः श्रीफलदलैः खंडेन्दोः पादार्चनं चिरम् अकृत किं कुर्वन् ननु अश्रांतं तपस्यन् कथंभूतोसौ क्वचित् अपि सौख्ये अनासक्तः पुनः किं. भूतोसौ फलेः क्प्ताहारः इत्यन्वयः ॥ पुराजन्मनि कृती पूर्वजन्मनि कृतसत्कर्मा सदनात् गृहात् निर्गत्य गत्वा सौख्ये अनासक्तः सुखभोगे आसक्तिरहितः अश्रांतम् अविरतं तपस्यन् तपः कुर्वन् ननु निश्चयेन श्रीफलदलैः विल्वपत्रैः अखंडैः अखंडितैः खंडेंदोः शिवस्य पादार्चनम् अकृत चरणपूजनं कृतवान् इत्यर्थः॥७॥ अर्थ-यह पुरुप जिसने पूर्व जन्ममें सुकर्म कियाहै प्रथम ही घरसे निकलकर वनकी भूमिमें अखंडित बिल्वपत्रोंसे शिवजीकी बहुत समय तफ पादार्चन (चरणपूजा) फरताभया क्या करता हुया अविश्रांत तपश्चर्या करता हुवा फैसा पुरुषहै फलोंसे ही आहार कल्पना फर रक्खाहै जिसने तथा कभी भी सुखभागोंमें आसक्त नहीं हुवाहै यहांपर बंधमें शब्द और अर्थकी उज्ज्वलता होनेसे पांति गुण है ॥ ७ ॥ (भाषा) दोहा-इस कृतिने पर जन्ममें, तनघर वनफल खाया बिल्वदलनसे हर चरण पूजे अति चितलाय ॥ अर्थव्यक्ति। यदमेयत्वमर्थस्य सार्थव्यक्तिः स्मृता
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (५३)
यथा॥ त्वत्सैन्यरजसा लुप्ते सूर्ये रात्रिर-
भूदिवा ॥८॥
टीका-यत् अर्थस्य अमेयत्वं सा अर्थव्यक्तिः,
स्मृता यथा.त्वत्सैन्यरजसा सूर्ये लुप्ते (सति) दिवा
रात्रिः अभूत् इत्यन्वयः ॥ अमेयत्वं प्रमाणस्य
अनावश्यकत्वं-सुखबोध्यत्वं वा सूर्ये लुप्ते तु अवश्यम्
एव रात्रिभवितुमर्हति नाच प्रमाणावश्यकत्वम् अतोऽ
र्थव्यक्तिनामको गुणः ॥ ८॥
अर्थ-जहाँ अर्थको प्रमाणकी आवश्यकता न हो अथषा
सुखबोध्यता हो उसे अर्थव्यक्ति नामक गुण कहतहैं जैसे तुम्हारी
सेनाकी रजसे सूर्य लोप होनेपर दिनसे रात्री होगई जबकि
सूर्य लोप होजाताहै तब रात्रि होती है इसमें प्रमाणकी आव-
श्यकता नहीं और अर्थकी मुखबोधता भी है इसीसे अर्थव्यक्ति
गुण हुवा ।। ८॥
(भाषा) दोहा-जहँ अमेयता अर्थमें, अर्थव्यक्ति बरवान ।।
तुम दल रज सूरज छिपे,दिन हो रजनि समान ।
प्रसन्नता।
झटित्यर्थापकत्वं यत्प्रसत्तिः सोच्यते
यथा॥ कल्पद्रुम इवाभाति वांछितार्थप्रदो
जिनः॥९॥
वाग्भटालंकार-परि० ३. टीका-यतझटिति अर्थापकत्वं सा प्रसत्तिः उ. च्यते यथावांछितार्थप्रदो जिनः कल्पद्रुम इव आभाति इत्यन्वयः ॥झटितीत्यव्ययं शीघ्रम् अापकत्वम् अर्थ- -स्य आपकत्वं बोधकत्वं सा प्रसत्तिः प्रसादः वा प्रस- त्रता नाम गुणः । यथा कल्पद्रुमवत् वांछितार्थप्रदः वांछितस्य अर्थस्य प्रदाता इति अब शीघ्रार्थाववो धकत्वात् प्रसन्नता नाम गुणः स्यात् ॥९॥ अर्थ-जहां शीघ्र श्रवणमासे ही अर्थका बोध होजाये तो उसे प्रसत्ति अर्थात् प्रसाद अथवा प्रसन्नता नाम गुण कहतेहैं जैसे कल्पवृक्षकी तुल्य वांछित अर्थके देने वाली जिन शोभाको प्राप्त होते हैं यहां पर शीग्रही अर्थका बोध होनेसे प्रसत्ति अर्थात् प्रसाद या प्रसन्नता नाम गुण हुवा ॥९॥ (भापा ) दोहा-अर्थवोध जहँ शीघ्र हो, सो प्रसाद गुण नाम। साहहिं सुरतरु सम सदा, वांछितार्थप्रद राम ॥ समाधि । ससमाधिर्यदन्यस्य गुणोन्यत्र निवेश्य- ते॥ यथाऽश्रुभिररिस्त्रीणां राज्ञः पल्लवितं यशः॥१०॥ टीका-यत् अन्यस्य गुणः अन्यत्र निवेश्यते स समाधिः । यथा अरिस्त्रीणाम् अश्रुभिः राज्ञो यशः पल्लवितम् इत्यन्वयः ॥ अन्यस्य वस्तुनो गुणः अन्य स्मिन् वस्तुनि यत्र निवेश्यते यथा शवनिताश्रुभिः सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । राज्ञो यशसि पल्लवितत्त्वं लतावृक्षादेर्गुणो निवेश्यते अनेन समाधिनाम गुणो भवति ॥१०॥ अर्थ--जहां अन्य वस्तुका गुण अन्यमें नियुक्त किया जावे तो. वह समाधि नाम गुण कहाताहै जैसे शत्रुवोंकी स्त्रियोंके आँसुवोंसे राजाका यश पल्लवित होगया अर्थात् यशमें अंकुर फूटकर सपत्र होगया (वृद्धिको प्राप्तहुवा ) यहां शत्रुकी स्त्रियोंके आँसुवाँसे राजाके यशमें पल्लवित होना लता वृक्षादिका गुण निविष्ट हुवा इससे समाधि नाम गुण होगया ॥ १० ॥ (भापा ) दोहा-सो समाधिगुण अन्यके, हो निवेश अन्यत्र । अरिनारी असुवनसुं हों, नृपयश अंकुर पत्र । लेप और ओजके लक्षण । श्लेषो यत्र पदानि स्युः स्यूतानीव पर- स्परम् । ओजः समासभूयस्त्वं तद्गद्य- प्वतिसुंदरम् ॥ ११॥ टीका-यत्र पदानि परस्परं स्यूतानि इव स्युः स श्लेपः । समासभूयस्त्वम् ओजः तत् गोपु अतिसुंद- रम् इत्यन्वयः ॥ स्यूतानि गुंफितानि संश्लिष्टानि समासभूयस्त्वं समासवाहुल्यं तत् ओजः गयेषु अति- सुंदरम् ॥ ११॥ अर्थ--जहां परस्पर आपसमें गंफित हुए से पद हों वह श्लेष नामक गुण कहलाता है । और समासकी बहुलता होना अर्थात् मनोहर बडे समास होना ओज नामक गुण कहलाता है
वाग्भटालंकार-परि० ३,
और वह ओज नामक गुण विशेप करके गद्यमें अतिसंदर
होता है ॥ ११ ॥
शिरिणी श्लेपका उदाहरण ।
मृदा यस्योद्गीतं सह सहचरीमिर्वनचरै-
मुहुःश्रुत्वा हेलोद्धृतधरणिभारंभुजवलम्।
दरोगच्छद्दीकुरनिकरदभात्पुलकिता-
श्चमत्कारोद्रेकं कुलशिखरिणस्तेपि द-
धिरे ॥ १२॥
टीका-यस्य हेलोद्धृतधरणिभारं भुजवलं सहच-
रीभिः सह वनचरैः मुदा उद्गीतं मुहुः श्रुत्वा कुल
शिखरिणः ते अपि दरोद्गच्छदर्भाकुरनिकरदंभात
पुलकिताः चमत्कारोद्रेकं दधिरे इत्यन्वयः ॥ हेलया
लीलया उद्धृतः धरणेरिः येन तत् भुजवलं बाहुवलं
मुदा हर्पण उद्गीतम् उच्चैर्गीतं दरोद्गच्छदीकुरनिकर
दंभात् इति दर ईपत् उद्गच्छंतो ये दीकुराः तेपी
निकरः समूहः तस्य दंभात् व्याजात पुलकिताः कुल:
शिखरिणः कुलपर्वताः चमत्कारस्य उद्रेकम् आधिक्यं
चमत्कारोद्रेकं दधिरे धृतवंतः “महेंद्रो निपधः सद्यः
शुक्तिमान् पारियाचकः॥ विध्यो हिमगिरिश्चैव सप्तते
कुलपर्वताः" अब पदानां परस्परं स्यूतत्वेन श्लेपो
गुणः स्यात् ॥१२॥
सान्वयसं० टी० भापाटीकासहित । (५७)
अर्थ-इस (राजा) की लीला करके धारण किया है धरणीका
भार जिसमें ऐसे मुनवलको सहचरी सहित वनचरों करके आनं-
दसे खूब गाया हुवा चार बार सुनकर कुलपर्वत ( बडे बडे पर्वत)
वे भी थोडे थोडे निकले हुए दर्भके अंकुरोंके समूहके दंभ
(मिस) से पुलकित हुए हुए चमत्कारके उद्देकको धारण करते
भये (महेन्द्र निषध सह्य शुक्तिमान् पारिया। विंध्य और हिमा-
चल इन सात पर्वतोंको कुलपर्वत कहते हैं) यहां परस्पर पदोंमें
गुंफना सी होनेसे श्लेप गुण हुवा ॥ १२ ॥
(भाषा) दोहा-होत परस्पर पद जहां, गुंफित से सो लेप ।
तरुवर तर वरविनतियहि, युगसम जात निमेष ॥
ओजका उदाहरण ।
समराजिरस्फुरदरिनरेशकरिनिकरशिरः
सरससिंदूरपूरपरिचयेनेवारुणितकरतलो
देवः ।। १३ ॥
इतिगद्यम् ॥
टीका-देवः (राजा) समराजिरस्फुरदारनरेशकर
निकरशिरःसरससिंदूरपूरपरिचयेन इव अरुणितकर-
तलः इत्यन्वयः॥ समरः एव अजिरम् अंगणं तत्र
स्फुरति यानि अरिनरेशानां करिनिकरस्य हस्तिसमूह-
स्य शिरांसि तेषु सरसा आर्द्रा ये सिंदूरपूराः तेषां परि
चयेन संगेन इव अरुणितकरतलः रक्ताकृतकरतलः
तथाभूतो देवः राजा भातीति शेपः । अब समासबाहु-
ल्येन ओजो नाम गुणः स्यात् ॥ १३॥
(५८) वाग्भटालंकार-परि० ३. अर्थ-देव ( राजा ) अरुणित करतल अर्थात् रक्त होरहीहैं हाथोंकी हयेली जिसकी ( सो शोभाको प्राप्त होरहाहै ) (मानो) समररूपी अंगणमें स्फुरायमान जो शत्र नरेशोंके गज समूहके शिर उनपर जो सरस गीला सिंदूर पूर (सिंदूरकी पूरणा) उस के परिचय (संयोग ) से ही हाथलाल होगयेहैं यहां इस गाभ समासकी बहुलता होनेसे ओज नामक गुण हुषा ॥ १३ ॥ "प्रचलित हिंदी भाषाके गद्य सरल निबंधों उपन्यासों में अधिक समास युक्त वाक्योंका विशेष उपयोग नहीं होता इससे भापाउदाहरण नहीं लिखा। माधुर्य और सौकुगार्यके लक्षण । सरसार्थपदत्वं यत्तन्माधुर्यमुदाहृतम् ॥ अनिष्टुराक्षरत्वं यत्सीकुमार्यमिदं यथा१४ टीका--यत् सरसार्थपदत्वं तत् माधुर्यम् उदाह अनिष्ठुराक्षरत्वं (तत्) र्यम् इत्यन्वयः ॥ यथा वक्ष्यमाणोदाहरणार्थ सरसा र्थपदत्वं सरसार्थत्वं सरसपदत्वं च अनिष्टुराक्षरत्वं वर्णानां कोमलत्वं तत् सीकुमार्य शृंगारकरुणादि रसेपु विशेपतो ग्राह्यम् ॥१४॥ अर्थ-नो अर्थ तथा पदामं सरमन्य हो तो उसे माधुर्य नाम गुण कहते हैं और जहां अक्षर कठोर न ही टमै सीयुमार्य (मुरुमारता गुण) समझे यह मुश्मारता गुण शृंगार फरणादि रममि पिशप फर प्राय और अंट ममनानाना है ॥ १४ ॥ ( भापा ) दोहा-सरस अर्थ पद ही नहीं, तिहि माधुर्य निहार । जहँ कठोर असर न ही, सा गुण हो मुरमार ॥ तम् । यत् इदम् सौकुमां-
सान्वयसं० टी० भापाटीकासहित ।
माधुर्यका उदाहरण!
फणमणिकिरणालीस्यूतचंचन्निचोलः कु
चकलशनिधानस्येव रक्षाधिकारी ॥ उर-
सि विशदहारस्फारतामुज्जिहानः कि-
मिति करसरोजे कुंडली कुंडलिन्याः१५॥
टीका-कुंडलिन्याः करसरोजे कुंडली किम् इति
किंभूतः कुंडली फणमणिकिरणालीस्यूतचंचनिचोलः
कुचकलशनिधानस्य रक्षाधिकारी इव उरसि विशद
हारस्फारताम् उजिहानम् इत्यन्वयः ॥ कुंडलिन्याः
कुंडलं कर्णभूपणं विद्यते यस्याः सा कुंडलिनी तस्याः
करसरोजे हस्तकमले कुंडली सर्पः किम् इति कथम्
इत्यर्थः। फणे मणिः फणमणिः तस्य किरणाली किर-
णानां पंक्तिः तया स्यूतः व्याप्तः चंचन् स्फुरन् नि-
चोलः कंचुकः यस्य तथाभूतः कुंडली कुच एव
कलशः कचकलशः कुचकलशे निधानं निधिरूपकं
तस्य रक्षाधिकारी रक्षायां नियुक्त इव उरसिं हृदये
विशदः स्वच्छः यः हारः तद्वत् स्फारताम् उज्वल-
ताम् उनिहानः प्राप्नुवन् नायिकाया हस्तस्थितं हारं
दृष्ट्वा सर्पभ्रांत्या कस्यचित् कामिन उक्तिरियम् अत्र
सरसार्थपदत्वेन माधुर्य नाम गुणः ॥१५॥
(६०) . वाग्भटालंकार-परि० ३. अर्थ- कुंडल कर्णभूपगोंसे अलंकृत कामिनीक हायमें सर्प क्यों है कैसा सर्प कि फणको मणिकी किरणपंक्तियोंसे व्याप्त होरही है स्फुरित निचोल अर्थात् कंचुकी जिसकी और कुच- कलशके खजानेका मानो रक्षाधिकारी ( रखवाला) ही है और हृदयपर उज्ज्वल हारकी शोभाको प्राप्त होरहा है (अर्थात् किसी सुंदरीने अपने वक्षःस्थलके हारको हाथमें लेलिया है उसे देखकर किसी कामीको सर्पकी भ्रांति हुई उसका यह वचन है ) यहाँपर अर्थ और पदोंकी सरसता होनेसे माधुर्य नामक गुण हुवा॥१५॥ (भाषा) दोहा-फण मणि किरण समूहसे, द्यौतित सरस निचोल । कुचनिधि रक्षक हार सम तिय कर अहि किमिलील ॥ सौकुमार्यका उदाहरण । प्रतापदीपांजनराजिरेव देव खदीयः कर- वाल एपः॥ नोचेदनेन द्विषतां मुखानि श्यामायमानानि कथं कृतानि ॥ १६ ॥ टीका-हे देव त्वदीय एपः करवालः प्रतापदीपा- जनराजिःनो चेत् एव (तदा) अनेन द्विपता मुखाः नि श्यामायमानानि कथं कृतानि इत्यन्वयः ॥ हे देव हे राजन् त्वदीयः तावकः करवालः खड्गः प्रताप एव दीपः तस्य अंजनराजिः कन्जल श्रेणी यदि नोचेदेव (तदा) अनेन खड़ेन द्विपतां वैरिणा मुखानि आननानि श्यामायमानानि कृष्णानि कर्थ कृतानि ॥१६॥ .
- सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित. अर्थ-हे राजन् यह तेरा खड्ग जो कि प्रतापके दीपकके क. जल की श्रेणी नहीं हो तो इसने शत्रुवोंके मुहँ काले कैसे कर दिये ( वस्तुतः यह आपका खड्ग प्रतापके दीपकके कजलकी श्रेणी ही है मानों इसीसे इसने शत्रुवोंके मुहँ काले करदिये हैं) यहां कठोर अक्षर नहीं होनेसे सुकुमारता गुण हुवा ॥ १६ ॥ (भापा) दोहा-तव प्रताप दीपक मसी, जो नहिं हो कर- बाल ।सो इन किस विध करदिये, शत्रुनके मुख काल ॥ गुणैरमीभिः परितोऽनुविढं मुक्ताफलाना- मिव दाम रम्यम् ॥ देवी सरस्वत्यपि कं. ठपीठे करोत्यलंकारतया कवित्वम् ॥१७॥ टीका--देवी सरस्वती (कवेईद्धिः) अपि अमीभिः गुणैः परितो अनुविद्धं कवित्वम् अलंकारतया कंठपीठे मुक्ताफलानांरम्यं दाम इव करोति इत्यन्वयम् सरस्वती कवेः प्रतिभा बुद्धिः अमीभिः उक्तैः औदार्यादिगुणैः गुणशब्देन सूरिति ध्वनितोर्थः। अनुविद्धं स्यूतं कवि- त्वं काव्यं मुक्ताफलानां रम्यं दाम इव कंठपीठे कंठदेशे अलंकारतया भूपणतया करोति (धारणं करोति)॥१७॥ अर्थ-सरस्वती कविकी बुद्धि इन औदार्यादि गुणों से अनु. विद्ध (पिरोयी हुई ) व्याप्त जो कपिता है उसे आभूपण रूपसे मोतियोंकीरमणीक मालाकीभांत कंठदेशमें धारण करतीहै।॥१७॥ इति वाग्भटालंकारं तृतीयपरिच्छेदः ।
.. (६२). वाग्भटालंकार-परि०१.. अथ चतुर्थः परिच्छेदः। दोषैर्युक्तं गुणैर्युक्तमपि येनोज्झितं वचः॥ स्त्रीरूपमिव नो भाति तं वे लंक्रियोच- यम् ॥१॥ टीका--दोपैर्मुक्तं गुणैः युक्तम् अपि येन उज्झितं वचः स्त्रीरूपम् इव नो भाति तम् अलंकियोच्चयं वे इत्यन्वयः॥ दोपैः अनादिकः मुक्त रहितं गुणैः औ- दार्यादिभिः युक्तं सहितं वचः काव्यम् उज्झितं त्यक्तम् अलंकियोच्चयम् अलंकारसमूहम् ॥ १॥ अर्थ-दोषों करके रहित और गुणों करके सहित भी वचन (काव्य ) जिसके विना स्त्री रूपके समान शोभाको प्राप्त नहीं होता उस अलंकार समूहको (अब ) वर्णन करते हैं ॥१॥ अलंकारगणना । चित्रं वक्रोक्त्यनुप्रासो यमकं ध्वन्यलं क्रियाः॥ अर्थालंकृतयो जातिरुपमा रूपकं तथा ॥ २ ॥ प्रतिवस्तुपमा भ्रांतिमानाक्षेपोऽथ संशयः॥ दृष्टांतव्य- तिरेको चापहृतिस्तुल्ययोगिता ॥३॥ उत्प्रेक्षार्थांतरन्यासः समासोक्तिर्विभाव- ना ॥ दीपकातिशयौ हेतुः पर्यायोक्तिः सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । समाहितम् ॥ ४ ॥ परिवत्तिर्यथासंख्यं विपमः स सहोक्तिकः॥ विरोधोऽवसरः सारं संश्लेपश्च समुच्चयः ॥५॥अप्रस्तु- तप्रशंसा स्यादेकावल्यनुमापि च॥परिसं- ख्या तथा प्रश्नोत्तरं संकर एव च ॥६॥ टीका-चित्रं वक्रोक्तिः अनुप्रासः यमकम् एते च- स्वारः ध्वन्यलंक्रियाः शब्दालंकाराः अर्थालंकारा- श्च जात्यादयः संकरांताः पंचभिः श्लोकैः अलंकारा- णां नामान्येव ( एपामन्वयः सरलः ) ॥ २ ॥ ॥३॥४॥५॥६॥ अर्थ-इन पांच श्लोकोंमें केवल अलंकारोके नाम मात्रकी गणना है जिसमें आरंभमें चित्र वक्रोक्ति अनुप्रास और यमक ये चार शब्दालंकार हैं और जातिकी आदिले संकर पर्यंत अर्थालंकारों के नामोंकी गणना है इन सबके जुदे जुदे लक्षण भेद तथा उदाहरण अगाड़ी लिखे जायेंगे ॥२॥३॥४॥५॥६॥ यत्रांगसंधिस्तद्रपैरक्षरैर्वस्तुकल्पना ॥ स- त्यां प्रसत्तौ चित्रं स्यात्तचित्रं चित्रकृच यत् ॥७॥ टीका-यत्र प्रसत्तौ सत्यां यत् तद्रुपैः अक्षरैः वस्तु कल्पना चित्रं ( यथा भवति तथा ) चित्रकृत् अंग- संधिः स्यात् तत् चित्रम् इत्यन्वयः ॥ प्रसत्तौ सत्य ..
- (६४) वाग्भटालंकार-परि०४. प्रसादगुणसत्त्वे तद्रूपैः तदनुकूलैः अक्षरैः वर्णैः वस्तुनः प्रतिपावस्य कल्पना चित्रकृत् चमत्कारकृत् अथवा चित्ररूपकृत् अंगसंधिः अंगसंकलनं स्यात् तत् चित्रं चित्रनामकं शब्दालंकारः ॥ ७॥ अर्थ-जहां प्रसाद गुण होनेपर तद्रूप अक्षरोंसे चित्र होजावे तैसे वस्तु कल्पना रूपक चमत्कार करनेवालाअंगसंकलन होजावे तो उसे चित्र नामक शब्दालंकार कहतेहैं जैसे अक्षरोंसे कमल छत्र मुकुट आदि आकार बनजावें उसे पबंध छत्रवन्ध आदि चित्रकाव्य कहते हैं ॥ ७॥ पनवंबंधचित्रका उदाहरण । जनस्य नयनस्थानध्वान एनश्छिनत्त्वि- नः॥ पुनःपुनर्जिनः पीनज्ञानध्यानधनः - नः॥८॥ टीका-स जिनः नः एनः पुनःपुनः छिनत्तु कीदृशो जिनः जनस्य नयनस्थानध्वानः पुनः कीदृशः इन: पुनः कीदृशो जिनः पीनज्ञानध्यानधनः इत्यन्वयः॥ ध्वान इत्यत्र मानः इति वा पाठः । जनस्य लोकस्य नयनं स्थानं यस्य तादृशो ध्वानः निर्वाणप्रवर्तकशब्दः मानः पक्षे जनस्य नयनस्थानं तदेव मानं यस्य इन: स्वामी पीनज्ञानध्यानधनः पनि महत् ज्ञानं ध्यानं .सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (६५). च धनं यस्य स नः अस्माकम् एनः पापं पुनःपुनः वारंवार छिनत्त नाशयतु ॥ एपः पोडशदलपद्मवंधः तथा गोमूत्रिकाबंधश्च ।। ८ ॥ मर्थ-वे जिन भगवान् हमारे पापोंको बारवार नाश करी कैसेहैं जिन-जनोंके नयनस्यान वहीं, ध्वान (निर्वाणप्रवर्तकवचन- जिनके और ध्वानको कई मान ऐसा पाठांतर मानतेहैं अर्थात् मनुष्योंकि नयनस्थान हो हैं मान ( सन्मान) जिनका तथा फिर कैसे जिनहें कि इन अर्थात् पूज्यअथवा स्वामीहैं और फिर कैसे हैं कि बृहत् ज्ञान और ध्यान ही है धन जिनका ॥ यह पोड शदलपमबंधहै तथा गोमूत्रिकाबंध भी होसक्ताहै देखो चित्र ॥८॥ पोडशदलपनबंधचित्रस्य स्वरूपम्, 2 प रथा ता न धा पी ए पु अयमेवगौमृत्रिकाबंधश्च यया । जानाम्य पुन: नन.पी FIनग्यान नसनः (६६) पाग्भटालंकार-परि० ४. गणवरगणवरकरतरचरण! परपदशरण- गजनपथकथक!॥ अमदन! गतमद गजकरयमल! शममय ! जय भयधन- वनदहन!॥९॥ टीका-(हे) गणवरगणवरकरतरचरण (हे) परपद शरणगजनपथकथक (हे) अमदन (हे) गतमद (हे) गजकरयमल (हे) शममय (हे) भयघनवनदहन (त्व) जय इत्यन्वयः॥ गणेषु वराः तेपांगणः संघः तस्य वरं वांछितार्थम् अतिशयेन करोति एवंभूतौ चरणौ यस्य तत्संबुद्धिः हे गणवरगणवरकरतरचरण परपदं नि- वणिं तस्मै शरणगा ये जनाः तेपां पथः पंथाः तस्य कथकः तत्संबुद्धिः हे परपदशरणगजनपथकथक हे अमदन मदनेन रहित हे गतमद गतो मदः यस्मात तत्संबुद्धिः तथा गजस्य करमिव करयमलं यस्य तत्संबुद्धिः हे गजकरयमल हे शममय शांतिरूप भय एव धनवनं तस्य दहनः तत्संबुद्धिः हे भंयघनवनदहन वंजय सर्वोत्कण वर्तस्व (एतत् एकस्वरचित्रम)॥९॥ अर्थ-गामें जो श्रेष्ठ सो गणपर उनके गण उनको घर यो. छितार्थ करने वाले अतिशय करके हैं चरण जिनके तथा परपद (निर्वाण ) के अर्थ शरणागत जो जन ( मनुष्य ) उनके मार्ग के उपदेश करने वाले तथा अमदन (कामदेय फरफे रहित ) ..
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (६७) और गतमद मदरहित तथा गजके कर(सुंड) वत् विशाल हैं दोनों भुजा जिनकी तथा शांतिमय और भयरूप धनवन उसके दग्ध करने वाले ऐसे जो श्रीजिनभगवान् आप जय हो । यह एक स्वर चित्र है अर्थात् इसमें अकारके सिवाय और स्वर (मात्रा) नहीं है ।। ९॥ मूलस्थितिमधाकुर्वन् पात्रैर्जुष्टो गता- क्षरैः ॥ विटः सेव्यः कुलीनस्य तिष्ठतः पथिकस्य सः ॥१०॥ टीका--मूलस्थितिम् अधःकुर्वन् सन् गताक्षरैः पात्रः जुष्टः स विटः कुलीनस्य पथिकस्य तिष्ठतः सेव्यः इत्यन्वयः । अत्र इकारच्युतौ विटस्थाने वटः इति चित्रम् । विटपक्षे मूलस्थिति द्रव्यात्मिकांशक्तिम् अधः कुर्वन् भूतले संस्थापयन् अथवा मूलस्थितिम् अधः कुर्वन् द्रव्यानुरूपम् आडंबरं न संपादयन् सन् गताक्षरेः पात्रैः जुटः विद्याविहीनः सत्पात्रैः जुष्टः युक्तः अथवा गताक्षरैः गतः आसमंतात क्षरः क्षरणं येभ्यः तथाभूतैः पात्रैःभांडादिभिर्जुष्टःस विटः महाजनः वैश्यः कुलीनस्य सत्कुलप्रसूतस्य पथिकस्य पथिवर्तमान- स्यतिष्ठतः स्थितस्य सेव्यः सेवायोग्यः तथा च वटयक्षे मूलस्थितिमूलैः शिफाभिः स्थितिम् अधः कुर्वन् तलप्र- देशेकुर्वन् सन् गताक्षरः पात्रैः गतानि प्राप्तानि अक्षरा- . (६८) पाग्भटालंफार-परि०४. ‘णि दृढानि तथाभूतः पात्रैः पत्रसमूहैः जुष्टः युक्तः स वटः कुलीनस्य को पृथिव्यां लीनस्य अध्वगमनश्रमाद- वसादं गतस्य एवंभूतस्य तिष्ठतः पथिकस्य सेव्यः सेवायोग्यः ॥१०॥ अर्थ-इस श्लोकमें विट शब्द इकार मात्रा हटानेसे वट हो- जाताहै और दोनों प्रकारसे अर्थ होताहै १ (विटपक्षमे) विट- का अर्थ महाजन वैश्य है तहा मूलस्थितिको दबाते हुए सादे सत्पात्रों या नवीन बडे पात्रोंसे युक्त वह विट (महाजन ) कुली न ( खांदानी) राह पर चलने वाले और स्थिति रखने वाले मनुष्योंको सेवनीय है और मूलस्थितिको दबानेके दो अभिप्राय हैं एकतो यह कि मूलस्थिति (मुख्यद्रव्य ) को पृथिवी आदिमें दवाकर गुप्तरखना दूसरे यह कि मूलस्थिति अपने द्रव्यानुकूल शक्तिको नीचा रखना अर्थात् द्रव्यानुरूप आडंबर नहीं करना सादे ढंगसे रहना (जैसे कि प्रायः वैश्योंका व्यवहार बहुतही सीधा सादा था)२ ( वटपक्षमें ) मूलस्थिति जडोंकी स्थि. तिफो नीचेको करते हुए प्राप्त हुए हैं नवीन पत्र जिसमें ऐसा वट वृक्ष मार्गकी थकावटसे पृथिवीमें लीन हुए बैठे हुए पथिक मुसाफिरोंको सेवनीय है ॥ १०॥ धर्माधर्मविदः साधुपक्षपातसमुद्यताः ॥ नरके दुःखिता यांति गुरूणां वंचने रताः॥११॥ टीका-( अत्रास्मिन् श्लोके गुरूणां वंचने रता इत्यत्र अनुस्वारच्युतौ गुरूणां वचने रता इति चित्रम्) सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । वंचने रताः इतिपक्षे) गुरूणां वंचने रताः धर्माधर्म वेदः साधुपक्षपातसमुद्यताः दुःखिताः नरके यांति त्यन्वयः ॥ गुरूणां पित्रादीनाम् उपदेशकर्तृणां वृद्धा नां वा वंचने प्रतारणे कापटये रताः निरताः धर्माधर्म विदः धर्मम् अधर्मम् अधर्मम् धर्मम् विदः इति जानंती- भ्यर्थः। साधुपक्षपातसमुद्यताः साधूनां पक्षः तस्य पाते समुद्यताः इति (वचनेरताः इति पक्षे)हे नर गुरूणां बचने रताः धर्माधर्मविदः धर्माधर्मविवेकिनः साधुपक्ष पातसमुद्यताः साधौ पक्षपाते समुद्यताः अदुःखिताः के स्वर्ग यांति ॥ ११॥ अर्थ-इस श्लोकमें वंचने शब्दकी अनुस्वार हटानेसे वचने होजाताहै और दोनों प्रकारसे अर्थ होताहै यही चित्रहै (वंचने पक्षमें ) जो गुरुवो (बडों) के वंचनमें ( ठगनेमें) रतहैं (वे) धर्मको अधर्म जानने वाले औरसाधुवोंके पक्ष अथवा उत्तम पक्ष को पात करने (विगाड़ने ) में उद्यत हैं (.सो) दुःखित होकर नरकमें जातेहैं और (वचने पक्षमें) हे नर जो गुरुवाफे वचनों में रत रहतेहैं वे धर्माधर्मके विवेकी और साधुवोंके पक्षपातमें अथवा उत्तम पक्षपातमें उद्यत, वे दुःखरहित होकर क अर्थात् स्वर्ग में जातेहैं ॥ ११॥ ककाकुकंककेकांककेकिकोकैककुः ककः॥ कककोकाककाककळकुकुककांककु:१२ टीका-कककोकः ककः ( कीदृशः कककोकः) ककाकुकंककेकांककेकिकोंकैककुः ( पुनः कीदृशः) ham . वाग्भटालंकार-परि०४. काककाककळकुकुककांककुः इत्यन्वयः ॥ कं शब्द कुर्वन्ति इति ककाः ककाः कोकाः (चक्रवाकाः) यस्मिन् स कककोकः समुद्रः ककः कं सुखं करोतीति ककः सुखकारक इत्यर्थः । ककाकुकंककेकाककेकिको- कैककुः कं सुखं तस्य काकुः पुनःपुनः उक्तिः सुख जनककाकुः इत्यर्थः । पुनःपुनरुक्तिः येषां ते कंकाः जलपक्षिणः केका मयूराणां वाणी तया अंकिताः के किनः मयूराः कोकाः चक्रवाकाः तेपाम् एककुः अद्वि- तीयंस्थानमित्यर्थः। काककाककर्काकुकुककांकः।का- का एव काककाः स्वार्थेकन् तान् आकयंति प्रीण- यति इति काककाकका ऋचः। ऋग्वेदीयमंत्रविशेपाः तत्तन्मंत्रैः काकेभ्यः वलिः उपवियते इति तेपां मंत्रा- णां काकप्रीणनत्वमिति भावः ता एव ऋक्काकुवः ध्वनिविशेपाः तान् कोकति उच्चरति इति काककाक कर्काककुकः तथाभूतः कः ब्रह्मा स ब्रह्मा अंके यस्य सः विष्णुः तस्य कु स्थानम् अत्र समुद्रस्य वर्णनम् । एकव्यंजनचित्रम् अत्रोद्धंगतो रेफः ऋकारसंजात- त्वान गणनीयः ॥ १२॥ अर्थ-कंका अर्थ शब्द उसका करने वाला कक कक अर्थात शब्द करने वाले कोक चकवे हैं ( विशेप) जहां ऐसा जो समुद्र सो ककः अर्थात् सुखका करने वालाई फका अर्थ सुख भी है फैसाहै समुद्र क (सुख) की काकु (ध्यान ) करने वाले जो सान्वयसं० टी० भाषाटोकासहित । (७१) कंक (पक्षी) और केका (मयूरॉकीवाणी ) करके अंकित जो केकी ( मयूर) और कोक (चक्रवाक ) इन सबका एक कु: (अद्वितीय स्थान ) है तथा काकोंको काकक भी कहतेहैं (क प्रत्यय होनेसे ) इनको आवाहन या तृप्त करना काककाकक हुया इसप्रकार ऋग्वेदमें काकबलिके मंत्र सोऋग्वेदोक्त काकुटसका कुकने वाला उच्चारण करनेवाला ब्रह्मा वह ब्रह्मा है अंक (गोर्दै) में जिसके ऐसे विष्णु उनका कुः अर्थात् स्थान है यह एक व्यंजन चित्रहै इसमें जो ऊपर रकारहै सो ऋ स्वर का रूपहै इससे इस की गिनती नहीं (इस श्लोकमें समुद्रका वर्गनहै ।। १२ ॥ कुर्वन्दिवाकराश्लेषं दधचरणडंवरम्॥ देव यौष्माकसेनायाःकरेणुः प्रसरत्यसौ॥१३॥ टीका-अत्र करेणुशन्दस्य ककारच्युतौ रेणुः इति चित्रम् (हे) देव यौष्माकसेनायाः असौ करेणुः अथवा रेणुः प्रसरति किंकुर्वन् दिवाकराश्लेपं कुर्वन कीदृशः करेणुः रणडंबरंच धत् रेणुः कीदृशः चरण- डंबरं दधत् इत्यन्वयः ॥ यौष्माकसेनायाः युष्माकं सेनायाः करेणुः हस्ती दिवा आकाशेन सह करस्य शुंडस्य आश्लेपम् आलिंगनं कुर्वन् चरणस्य संग्रामस्य डंबरम् आडंबरं दधत् ककारच्युतौ रेणुः धूलिः दिवा- करस्य मूर्यस्य आश्लेपम् अवरोधं कुर्वन् चरणानां पदानां डंवरम् आयोजनं दधत् प्रसरति चलति ॥१३॥ अर्य-(इस श्लोकम करेणुशन्दके ककार दूर कर देने- से रेगु होताहै तथा दोनों पक्षमें अर्थ होताहै यह चित्र है) हे सः विष्णुः तस्य कु स्थानम् अत्र समुद्रस्य वर्णनम् । ककककका तथाभूतः काब्रह्मा स ब्रह्मा अंके यस्य (७०) वाग्भटालंकार-परि०४. काककाककर्काकुकुककांककुः इत्यन्वयः ॥ कं शब्द कुर्वन्ति इति ककाः ककाः कोकाः (चक्रवाकाः) यस्मिन् स कककोकः समुद्रः ककः कं सुखं करोतीति ककः सुखकारक इत्यर्थः।ककाकुकंककेकाककेकिको- कैककः कं सुखं तस्य काकुः पुनःपुनः उक्तिः सुख जनककाकुः इत्यर्थः । पुनःपुनरुक्तिः येषां ते कंका जलपक्षिणः केका मयूराणां वाणी तया अंकिताः के किनः मयूराः कोकाः चक्रवाकाः तेपाम् एककुः अदि- तीयस्थानमित्यर्थः। काककाककर्काकुकुककांककुका- का एव काककाः स्वार्थेकन् तान आकयंति प्रीण- यति इति काककाकका ऋचः। ऋग्वेदीयमंत्रविशेषाः तत्तन्मः काकेभ्यः बलिः उपवियते इति तेषां मंत्रा- णां काकप्रीणनत्वमिति भावः ता एव ऋक्काकुवः ध्वनिविशेपाः तान् कोकति उच्चरति इति काककाक एकव्यंजनचित्रम् अत्रोर्द्धगतो रेफः ऋकारसंजात- त्वान गणनीयः ॥ १२॥ अर्थ-कंका अर्थ शब्द उसका करने वाला कक कक शब्द करने वाले कोक चकये हैं (विशेप) जहां ऐसा जो समुद्र सो ककः अर्थात् सुखफा करने वाला का अर्थ सुख भी है कैसाहै समुद्र क ( सुख ) की काकु ( ध्वनि ) करने वाले जो अर्थात सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । कंक (पक्षी) और केका (मयूरोंकीवाणी) करके अंकित जो केकी ( मयूर ) और कोक ( चक्रवाक ) इन सबका एक कु: (अद्वितीय स्थान ) है तथा काकोंको काकक भी कहतेहैं (क प्रत्यय होनेसे ) इनको आवाहन या तृप्त करना काककाकक हुवा इसमकार ऋग्वेदमें काकबलिके मंत्र सोऋग्वेदोक्त काकुउसका कुकने वाला उच्चारण करनेवाला ब्रह्मा वह ब्रह्मा है अंक (गोद) में जिसके ऐसे विष्णु उनका कुः अर्थात् स्थान है यह एक व्यंजन चित्रहै इसमें जो ऊपर रकारहै सो ऋ स्वर का रूपहै इससे इस की गिनती नहीं (इस श्लोकमें समुद्रका वर्णनहै ॥ १२ ॥ कुर्वन्दिवाकराश्लेपं दधचरणडंवरम्॥ देव यौष्माकसेनायाःकरेणुः प्रसरत्यसौ॥१३॥ टीका-अत्र करेणुशब्दस्य ककारच्युतौ रेणुः इति चित्रम् (हे) देव योष्माकसेनायाः असौ करेणुः अथवा रेणुः प्रसरति किंकुर्वन् दिवाकराश्लेपं कुर्वन् कीदृशः करेणुः रणडंवरं च दधत् रेणुः कीदृशः चरण- डंबरं दधत् इत्यन्वयः ॥ यौष्माकसेनायाः युष्माकं सेनायाः करेणुः हस्ती दिवा आकाशेन सह करस्य शुंडस्य आश्लेपम् आलिंगनं कुर्वन् चरणस्य संग्रामस्य डवरम् आडवरं दधत् ककारच्युती रेणुः धूलिः दिवा- करस्य मूर्यस्य आश्लेपम् अवरोधं कुर्वन चरणानां पदानां डंबरम् आयोजनं दधत् प्रसरति चलति ॥१३॥ अर्थ-(इस श्लोकमें फरेणुशन्दके फकार दूर कर देन- से रेणु होताह तया दोनों पक्षमें अर्थ होताहै यह चित्र है) हे (७२) वाग्भटालंकार-परि०४. देव यह आपकी सेनाका करेणु ( हस्ती ) चलताह अथवा रेणु (धूलि) उडताहै हस्ती दिवा (आकाशसे) कर (शुंड) का आक्षेप (स्पर्श) करताहुआ रणके आडंबरको धारण करने वालाहै तथा धूलि दिवाकर (सूर्य) का आक्षेप ( अवरोध ) करता हुवा चर- गोंके आयोजनको धारण करने वालाहै ॥ १३ ॥ (भापा) दोहा-हो वियित्रता वर्णते, या हो चित्र अफार । चित्र काव्य तिहिं कहतहैं, ताके भेद अपार ॥ उदाहरण द्वादशदलपद्मबंध। चौपाई-पाहि पाहि मोहि गहि गहि बाँहि । तोहि गाँहि रहि रहि महि माँहि ॥ द्वादशदल पद्म बंध। पा म ग ग गो हो यही गोमूत्रिकाबंध भी होसक्ताहै । पा हि पा हि मो हि ग हि ग हि वा हि तो हि गाँ हि रहि र हि म हि माँ हि चित्र कान्यके भेद असंख्य होसक्तेहैं जैसे छत्रबंध, मुकुटबंध, गदाबंध, कपाटबंध इत्यादि तथा एकाक्षरादि ॥
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । वक्रोक्तिः । प्रस्तुतादपरं वाच्यमुपादायोत्तरप्रदः॥ भंगश्लेपमुखेनाह यत्र वक्रोक्तिरेव सा॥१४॥ टीका-यत्र उत्तरप्रदः भंगश्लेपमुखेन प्रस्तुतात अपरं वाच्यम् उपादाय आह सा एव वक्रोक्तिः इत्य- न्वयः ॥ उत्तरप्रदः उत्तरदाता भंगश्लेपमुखेन भंगाश्र- येण श्लेपाश्रयेण च प्रस्तुतात् वक्तः प्रस्तावितात् अपरं वाच्यम् अन्यार्थसूचकं वाक्यम् उपादाय आश्रित्य आह प्रत्युत्तरं ब्रवीति सा एव वक्रोक्तिः वक्रोक्ति- नामा शब्दालङ्कारः यत्र शब्दस्य खंडं कृत्वातिर प्रतिपाद्यते सा सभंगलेपवक्रोक्तिः यत्रशब्दस्यार्थान्तरा येणोत्तरं प्रदीयते सा अभंगश्लेपवक्रोक्तिः ॥१४॥ अर्थ-जहां उत्तर देनेवाला भंग (सभंगशेप ) और शेष ( अभंगलेप) के आश्रयसे वक्ताके प्रस्तावित वाक्यका अन्पार्थ- सूचक वचन संपादन करके ( अन्यरीतिका ) उत्तर दे अथवा पचन कहे तो उसे धक्रोक्ति कहते हैं (जहां शब्दके टुकड़े करके अर्थातरका प्रतिपादन किया जाये उस सभंगश्लेषवक्रोक्ति कहते हैं और जहाँ शन्दंक दूसरे अर्थक आश्रयसे उत्तर दिया जाव से अभंगलेपवक्रोक्ति नानो) सीपी यातको देही कहदेना वह यकोक्तिहे॥१५॥ U (७१) योग्भटालंफार-परि०४. प्रथम सभंगश्लेपवक्रोक्तिका उदाहरण । नाथ मयूरो नृत्यतितुरगाननवक्षसः कुतो नृत्यम् ॥ ननु कथयामि कलापिनमिह सुखलापी प्रिये कोस्ति ॥ १५ ॥ टीका-(कांतया कथितं ) हे नाथ मयूरः नृत्यति (कांतेन कथितं) तुरगाननवक्षसः नृत्यं कुतः ( पुनः कांतया कथितं ) ननु कलापिनं कथयामि (पुनः कांतेनोक्तं )हे प्रिये इह सुखलापी कः अस्ति इत्य- न्वयः॥ प्रस्तुतस्तु मयूरः पक्षिविशेपः वक्रोच्या अप रार्थसूचकं वाच्यं मयोः तुरगाननस्य यक्षस्य उरः वक्षः तुरंगवदनो मयुरित्यमरः पुनः प्रस्तुतस्तु कला पिनं कलापः मयूरपिच्छः सोस्ति यस्य स कलापी तं कलापिनं मयूरमेव कथयामीति भावः पुनः तया अपरार्थसूचकं वाच्यं के सुखं तदालापी कलापी इति भंगलेपवक्रोक्तिः ॥ १५॥ अर्थ-किमी कांतान कहा है. नाय मर (मार ) नाय रहाहै पुरुपने पक्रोनिम रहा मयु यक्षका टर हदय मपर टमा नाचना मे होसक फिर यांनाने फहानदि मैती पलापी (मार.) यो वदनी ई फिर पुम्पन यानिःसे कहा कि क मुख उमा टाती आलार मारने वाला का मागिय यहाँपर मुगलान फोन है या मभंगपंक आप्रयम यानि दुई ॥ १५ वको साधय सं० टी० भाषाटीकासहित । (७५) अभंगश्लेप वक्रोक्तिका उदाहरण । भर्तुः पार्वति नाम कीर्तय नचेत्त्वां ताड- यिष्याम्यहं क्रीडाब्जेन शिवेति सत्यम नघे किंते शृगालः पतिः ॥ नो स्थाणुः किमु कीलको नहि पशुस्वामी तु गोप्ता गर्वा दोलाखेलनकर्मणीति विजयागौ- योगिरः पातु वः॥ १६॥ टीका-दोलाखेलनकर्मणि इति विजयागौर्योः गिरः वः पातु इतीति किम् (विजयोक्तिः ) हे पार्वति भर्तुः नाम कीर्तय न चेत् अहं त्वां क्रीडाब्जेन ताड- यिष्यामि (गौयोक्तं) शिव इति सत्यं (विजयोक्त) हे अनचे किं ते पतिः शृगालः (पुनर्योक्तं ) नो स्थाणुः (विजयोक्तं) किम् उ कीलकः ( पुनर्गौय्र्यो- तं) नहि पशुस्वामी (पुनर्विजयोक्तं) तु गवां गोप्तां इत्यन्वयः ॥ अत्र प्रस्तुतस्तु शिवः शंकरः वको क्या अपरार्थसूचकं वाच्यं शिवः शृगालः पुनः प्रस्तुतः स्थाणुः शंभुः अपरार्थसूचकं वाच्यं स्थाणुः कोलकः एवमेव पशुस्वामी पशुपतिः गवां गोप्ता च इति अभंगश्लेपवक्रोक्तिः ॥१६॥ लो. १६ अन शिवशब्दस्य शंकरवाचकत्वात् शृगारवाचकवाच एवं स्थागुशब्दस्यापि शिवयाचित्यात कोलक्याचिन्धाच एपमेर पशुस्वामिशब्दश्य पशुपतिशिषताचियात् गोपवाचिबाद भमंगलेषः ।
(७६) वाग्भटालंकार-परि०४. अर्थ-हिंडोले झूलते समय विजया और गौरीके ये ( हास्या स्मक ) वचन तुह्मारी रक्षा करो जैसे विजयाने कहा हे पार्वति तुम भर्ताका नाम बतावोनही तो तुझे मैं क्रीडा कमलसे ताडना करूंगी गौरीने कहा सञ्चही शिवहै ( तब विजयाने अर्थ पलटके कहा ) कि क्या तुह्मारा पति शिव अर्थात् शृगाल है फिर गौरी ने कहा नहि स्थाणुः ( शंकर ) है फिर विजयाने कहा क्या स्थाणुः (अर्थात् कीलक ) डुंठ है फिर गौरीने कहा नहि पशु. स्वामी (पशुपति) है फिर विजयाने कहा तो गौवोंका रखवाला है यह अभंगश्लेषवक्रोक्ति है ॥ १६ ॥ (भाषा) दोहा-काकु श्लेष व भंगसे अर्थ आनका आन । फेरफार उत्तर कहै वक्रउक्ति तेहि जान ॥ १ ॥ ( उदाहरण) पीलो पानी तिय कहे पिय कहि का लें फूस। नहि जल लो हम क्यों जलें जलें हमारे दूस ॥२॥ (दूस अर्थात् द्वेपी शत्रु) अनुप्रास लक्षण । तुल्यश्रुत्यक्षरावृत्तिरनुप्रासः स्फुरद्गुणः ॥ अतत्पदः स्याच्छेकानां लाटानां तत्पद- श्व सः॥ १७॥ टीका-स्फुरगुणः तुल्यश्रुत्यक्षरावृत्तिः सः अनु- प्रासः स्यात् अतत्पदः छेकानां च तत्पदः लाटानाम् इत्यन्वयः॥ तुल्या शृतिःश्रवणं येपां तथा भूतानाम् अक्षराणाम् आवृत्तिः पुनःपुनः आवर्तनम् उच्चारणम् इत्यर्थः स्फुरद्गुणः स्फुरंतो माधुर्य्यादयो गुणा यत्र तथाभूतः सअनुप्रासः अनुप्रासो द्विविधः छेकानुप्रासो सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (७७) लाटानुप्रासश्च तत्र अतत्पदः तत्पदरहितः छेकानां छेकानुप्रासः इत्यर्थः (छेको नागरो विदग्धः इति शब्द- स्तोमः) तथा च तत्पदः तानि एव पदानि यत्र स तत्पदः लाटानां लाटानुप्रास इत्यर्थः (लाटो देश- विशेषस्तत्र वासिनो लाटाः)॥१७॥ अर्थ-जहां तुल्यभति ( एकसे अथवा वैसेही ) अक्षरोंकी वारंवार आवृत्ति हो अर्यात् उच्चारण हो और माधुर्य्यादि गुण स्फुरायमान हो तो टसे अनुप्रास कहतेहैं अनुमासके दो भेद हैं एक छेकानुप्रास दूसरा लाटानुप्रास जहांपरे उन्ही पदोंकी आ- तिं न हो कुछ वोकी आवृत्ति हो वह छेकानुप्रास पहाताहै और जहां पूरे उन्ही पदोंकी आवृत्ति हो उसे लाटानुप्रास कहतेहैं ।। १७ ॥ छेकानुप्रासका उदाहरण । अलं कलंकशृंगारकरप्रसरहेलया॥चंद्र चंडीशनिर्माल्य मसि न स्पर्शमर्हसि॥१८॥ टीका-हे चंद्र हे कलंकश्रृंगार करप्रसरहेलया अलं (त्वं) चंडीशनिर्माल्यम् असि स्पर्श न अर्हसि इत्य- न्वयः॥ कलंकः लांछनं श्रृंगारो यस्य स तत्संवृद्धिः हे कलंकशृंगार चंद्र करप्रसरहेलया किरणप्रसरण- विलासेन अलं किरणप्रसारणं मा कुरु इत्यर्थः त्वं चंडीशस्य शिवस्य निर्माल्यं भुक्तशेपः उच्छिएः आस अंतः स्पर्श न अर्हसि अग्राह्यं शिवनिर्माल्यमिति वच-
(७८) वाग्भटालंकार-पार० ४.
नात् न स्पर्शयोग्य इत्यर्थः अत्र पूर्वार्दै अलंकलंक
इति वर्णावृत्तिः तथा रकारस्यावृत्तिः उत्तरार्दै सकारस्य
चकारस्यावृत्तिः अतः अतत्पदावृत्या छेकानुप्रासः१८
अर्थ-हे कलंकशृंगार चंद्र तू अपनी किरण फैलाने के विलास
फो (घसकर) अर्थात् किरण मत फैला क्यों कि तू चंडीश (महा.
देव ) का निर्माल्य है ( उनके शिरसे उतरा हुवाहै ) इससे स्पर्श
करने योग्य नहीं है ( शिवका निर्माल्य अग्राह्य होताहै ) यह
विरहिणी कांताका वचनहै इस श्लोकके पूर्वार्द्ध में अलंकलंक
इत्यादि वर्गोंकी तथा रकारकी आवृत्तिहै और उत्तरार्द्धमें चकार
और सकारकी आवृत्तिहै इससे अतत्पदावृत्ति होनेसे ठेकानु
मास इवा ॥ १८ ॥
लाटानुप्रासके उदाहरण।
रणे रणविदो हवा दानवान्दानवहिपा।
नीतिनिष्ठेन भूपाल भूरियं भूस्त्वया
कृता॥१९॥
टीका-हे भूपाल रणे रणविदो दानवान् हत्वा दान-
वद्धिपा नीतिनिष्ठेन त्वया इयं भूःभूः कृता इत्यन्वयः॥
भुवं पृथिवीं पालयतीति भूपालः राम इति भावः तत्सं-
बुद्धि भूपाल रणे संग्रामे रणविदः रणकोविदान
दानवान् असुरान् दानवान् द्वेष्टि इति दानवद्रिट तेन
दानवदिपा दानवारिणा नीतिनिटेन नीतिपरायणेन
इयं भूः पृथिवी भूः रत्नादीनां प्रसविनी कृता अत्र रण
दानवभपदानां पुनरावृत्त्या तत्पदो लायनुप्रासः॥१९॥
सान्षय सं० टी० भाषाटीकासहित । (७९) अर्थ-हे भूपाल ( रामचंद्र ) संग्राममें रणविक्ष दानवोंको मारकर दानवदेषी राजनीतिनिपुण (जो आपहैं ) आपने यह पृथिवी रत्नादिके उत्पन्न करने वाली बनादी यहाँ रण दानव और भूपदोंके दोबार आनेसे तत्पद लाटानुप्रास हुवा ॥ १९ ॥ खं प्रिया चेचकोराक्षि स्वर्गलोकसुखेन किम् ॥ त्वं प्रिया यदि न स्या मे स्वर्गलो- कसुखेन किम् ॥२०॥ टीका-हे चकोराक्षि त्वं मे प्रिया चेत् (तदा) स्वर्गलोकसुखेन किं यदि त्वं मे प्रिया न स्याः (तदा) स्वर्गलोकसुखेन किम् इत्यन्वयः ॥ त्वं प्रिया चेत्तदा स्वर्गलोकसुखम् अमृताप्सरादिसंभोगरूपं तेन किं न किमपि प्रयोजनम् इत्यर्थः त्वं प्रिया न स्याः तदा . स्वर्गलोकसुखेन किं स्वर्गलोकसुखेपि न सुखानुभव इत्यर्थः अत्र स्वर्गलोकसुखेन किम् इति पादस्य द्वि- राहत्या पादावृत्तिको लाटानुप्रासः॥२०॥ अर्थ-हे चकोराक्षि (चकोरनेत्र) जो तू मेरी प्यारी हो तो मुझे स्वर्गलोकके सुखसे क्या प्रयोजन है अर्थात् स्वर्गके सुख अमृत पान अप्सरासंभोग आदिको भी आवश्यकता नहीं और जो तू मेरी प्रिया नहो तो भी स्वर्गलोकके सुखसे क्याहै अर्थात् तेरे विना स्वर्गलोकके समस्त सुख भी सुख मालूम नहीं होंगे (किंतु दुःख प्रतीत होंगे) यहां "स्वर्गलोकसुखेन किम्" इस पूरे पादकी आवृत्ति होनेसे अर्थात् पूरा पाद फिर आनेसे यह पादा वृत्तिक लाटानुप्रास हुवा ॥ २० ॥ -- (८०) वाग्भटालंकार-परि० ४. एकत्र पात्रे स्वकलत्रवत्रं नेत्रामृतं विवि- तमीक्षमाणः ॥ पश्चात्पपौ सीधुरसं पुर- स्तान्ममाद कश्चिद्यदुभूमिपालः ॥२१॥ टीका-कश्चित् यदुभूमिपालः स्वकलत्रवत्र नेत्रा- मृतम् एकत्र पात्रे बिंबितम् ईक्षमाणः (सन् ) पुरस्तात् ममाद पश्चात् सीधुरसं पपी इत्यन्वयः ॥ यदुभूमि- पालः यदुराजः स्वकलत्रवत्रं स्वकीयकांतामुखं नेत्रा- मृतं प्रेमाश्रु एकत्र पाने एकस्मिन् पानपात्रे विवितं प्रतिविवीभूतं पश्यन् पुरस्तात् मद्यपानात् पूर्वम् एव ममाद मदोन्मत्तो बभूव अत्र पूर्वार्दै । इत्यक्षरस्य पुनःपुनरावृत्तिः उत्तरार्दै पकारस्य तस्मात् छेकानु- पासः॥२१॥ अर्थ-कोई यदुराजा अपनी स्त्री मुखको और नेत्रामृत (प्रेमाश्रुपात ) को एकही पात्रमें प्रतिबिंबित देखकर मद्यपानसे पहले ही मदोन्मत्त होताभया और पीछेसे सीधुरस (मद्य) पान किया यहां पहले पदोंमें प्रकारके बारबार आरत्तिसे और पीछले पदमें पफारकी आवृत्ति होनेसे अतत्पद छेकानुप्रास हुवा ॥२१॥ (भापा) दोहा-पुनि पुनि आवत वर्ण जहँ सो छेकानुप्रास । वह लाटानुप्रास हो जहँ पुनि पद हो खास ॥१॥ (छेकानु- मासका उदाहरण दोहा)-कच रचना लख पीयको सुन सच वचन विलास । मुख रुख सुखदायक परख तिय हिय होत हुलास ॥२॥ (लाटानुप्रासका उदाहरण दोहा)-पियप्यारी M सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (८१) जो संगहो तिन्हे स्वर्ग किह काम पियप्यारी जो संग नहिं तिन्हे स्वर्ग किह काम ॥३॥ यमकलक्षण । स्यात् पादपदवर्णानामावृत्तिः संयुता- युता ॥ यमकं भिन्नवाच्यानामादिमध्या- तगोचरम् ॥ २२॥ टीका--भिन्नवाच्यानां पादपदवर्णानां संयुतासंयुता आवृत्तिः आदिमध्यांतगोचरंयमकं स्यात् इत्यन्वयः। भिन्नवाच्यानां पृथगर्थानां पादपदवर्णानां पादः श्लोक- स्य चतुर्थाशः पदं विभत्त्यंतं शब्दात्मकं वा वर्णाः अक्षराणि तेषां संयुता मिलिता असंयुता छिन्ना आवृ- त्तिः पुनरुक्तिः यमकं तत् आदिमध्यांतगोचरम् आदि- गतं मध्यगतम् अंतगतं च तस्य पादपदवर्णभेदेन संयुतासंयुतभेदेन आदिमध्यांतगोचरत्वभेदेन च अष्टादश भेदाः यमके पृथगर्थत्वं लायानुप्रासे चैकार्थ- त्वमिति भेदः ॥२२॥ अर्थ-पृथक् अर्थवाले पाद पद और अक्षरोंकी संयुत अखंड रूपसे और असंयुत छिन्न रूपसे आवृत्ति (पुनरुक्ति) हो उसे यमक फहतेहैं वह आदिगत मध्यगत और अंतगत होताहे पाद श्लोकके एक चरण (चतुर्याश) को कहतेहैं पद विभक्त्यंत अथवा शब्दरूपको कहतेहैं और वर्ण अक्षरको कहतेही हैं अस्तु पाद पद वर्ण भेदसे तथा संयुत असंयुत भेदसे तया आद (८२) वाग्भटालंकार-परि०४. मध्य और अंतगत भेदसे यमक १८ प्रकारका होताहै यमकमें अन्य अर्थवाले पद होते हैं और लाटानुपासमें प्राय पदोंका अर्थातर होना आवश्यक नहीं यही भेद है ॥ २२ ॥ पादयमकके उदाहरण । दयांचवे दयांचक्रे॥सतां तस्माद् भवा- वित्तम् ॥ २३ ॥ टीका-भवान् दयां चके तस्मात् सतां वित्तं दयां- चक्रे इत्यन्वयः॥ दयां चक्रे दयां कृतवान् तस्मात सतां साधूनां वित्तं धनं दयांचक्रे दत्तवान् अत्र प्रथम- पादस्य द्वितीयपाद आवृत्तिः (चूडा नाम चतुरक्षरा वृत्तिः) ॥२३॥ अर्थ-आपने दया करी निससे साधुवोंको धन दान दिया (एक जगह दयाचक्रेका अर्थ दया करी दूसरी जगह दिया) इसमें प्रथम पादकी भावृत्ति दूसरेमें हुई अर्थात् पूरा प्रथम चरण दूसरे चरणकी जगह फिर कहागया परंच अर्थ पलट गया यह चूडानाम छंदहै इसका ४ अक्षरका एक चरण होताहै ॥ २३ ॥ यशस्ते समुद्रान्सदारोरगारेः ॥ सदा- रोरगारेः समानांगकांतः ॥ २४॥ द्विषा- मुडतानां निहसि त्वमिंद्र ॥ मुदं भो धराणामुदम्भोधराणाम् ॥२५॥ टीका--उरगारेः समानांगकातेः आरोरगारे तेसत यशः सदा समुद्रान आर इत्यन्वयः ॥ उरगारेः गरु- सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (८३) डस्य समाना अंगकांतिः यस्य स उरगारः समानांग कांतिः तस्य आरोरं दारिद्यं गच्छंतीति आरोरगाःता- दृशा अरयःशत्रवो यस्य स आरोरगारिः तस्य आरो रगारेः ते तव सत् श्रेष्ठं वर्तमानं च यशः सदा निरं- तरं समुद्रान् आर अगमत् इत्यर्थः अत्र द्वितीयपाद- स्य तृतीयपादे आवृत्तिः सोमराजीनाम छंदः पडक्षर पदात्मकम् ॥२४॥ भो इंद्र त्वम् उदंभोधराणां धरा- णाम् उद्धतानां द्विपां मुदं निहंसि इत्यन्वयः ॥ हे इंद्र (हे शक) उद्गताः अंभोधराः मेघाः येषु ते उदंभोधराः तेषाम् उदम्भोधराणां धराणां पर्व- तानाम् उद्धतानां उहप्तानां द्विपां शत्रूणां सुदं ह निहंसि नाशयसि पक्षच्छेदादिति भावः अत्र तृतीयपादस्य चतुर्थपादे आवृत्तिः इदमपि पडक्षर चरणात्मक सोमराजीछंदः ॥ २५ ॥ अर्थ-उरगारि (गरुडके ) समान अंगकी कांति ( अर्थात् सुवर्णके रंगकीसी अंगकांति ) है तुम्हारी और आरोर (दरिद) को प्राप्त होने वाले हैं अरि ( शत्रु ) तुम्हारे ऐसे जो आप सो आपका सुंदर यश सदा समुद्रो पर्यंत गमन करता भया यहाँ इसरे पदकी आवृत्ति तीसरे पदमें पूर्ण रूपसे है और यह छह अक्षरके चरण वाला सोमराजी छंद है ॥ २४ ॥ भो इंद्र आप उद्धत (प्रबल) और ऊपर छाये हुवेह मेघ जिनके ऐसे जो ( आपके) शत्रु पर्णत हैं उनके हर्षको नाश करते हो ( अर्थात् पर्षतोके पक्ष टेदन करके आपने उनका हर्ष और दर्प नाश का वाग्भटालंकार-परि०४. दिया है ) यहां तीसरे पादकी पूरी आवृत्ति चौथे पादम है तथा यह भी छहवर्णके चर वाला वही सोमराजी छंदं है ॥ २५ ॥ विभाति रामा परमा रणस्य विभातिरामा परमारणस्य। सदैव तेऽजोर्जितराजमान सदैवतेजोर्जितराजमान ॥ २६ ॥ टीका-हे अजोर्जितराजमान हे सदैवतेजोर्जितराज मान परमारणस्य ते रणस्य अतिरामा परमा रामा विभा सदा एव विभाति इत्यन्वयः ॥ अजः विष्णुः तस्य इव ऊर्जितं बलं तेन राजमानः तत्संबुद्धौ हे अजो जितराजमान ! सदैवं सभाग्यं यत् तेजः प्रतापः तेन अर्जितः संपादितः राजसु नृपेषु मानः सन्मानः येन तत्संबुद्धौ ह सदैवतेजोर्जितराजमान ! परमारणस्य शत्रुघातिनः ते तव रणस्य संग्रामस्य परमा उत्कृष्टा रामा मनोहारिणी रामं रामचंद्र परशुराम वा अति- क्रम्य वर्तते इति अतिरामा विभा शोभा सदा एव विभाति शोभते अब प्रथमपादस्य द्वितीये तृतीयस्य चतुथै आवृत्तिः॥२६॥ अर्थ-हे अनोजितराजमान.अन विष्णु तिसके पलके समान घलफरफे राजमान और भाग्य फरक सहित जो तेज प्रताप उस करके प्राप्त कियाह राजावाम सन्मान निसन ऐस जो आप पर (शत्रु ) के मारनेवाले तुम्हारे रणकी परशुरामफे संग्रामस
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (८५)
अधिक परम मनोहारिणी दीप्ति सदाही शोभाको प्राप्त होती
है इसमें पहले पादकी दूसरे पादमें और तीसरेकी चौथेमें
आवृत्ति है ॥ २६ ॥
सारं गवयसान्निध्यराजि काननमग्रतः॥
सारंगवयसांनिध्यदारुणं शिखरे गिरेः२७
टीका-गिरेः शिखरे अग्रतः सारं काननम् अदा-
रुणम् कथंभूतं काननं गवयसान्निध्यराजि पुनः कथं
भूतं काननं सारंगवयसांनिधि इत्यन्वयः॥ गिरेः पर्व-
तस्य काननं वनं सारम् उत्कृष्टम् अदारुणं कोमलं
रम्यमित्यर्थः गवयानां गोसदृशमृगाणां सानिध्यं
सामीप्यं तस्य राजिः पंक्तिः यत्र तत् गवयसान्निध्यरा
जि सारंगाणां वयसां पक्षिणां निधि सारंगवयसां
निधि अत्र प्रथमपादस्य तृतीयपादे आवृत्तिः॥२७॥
अर्थ-पर्वतके शिखर पर अगाडी मुख्य वन कोमल अर्थात्
रमणीक है कैसा वह वन है गवय गौके समान मृग (नील-
गाय) उनका सानिध्य समीपता अर्थात् एकत्रित समूह उसकी
है पंक्ति जिसमें और फिर कैसा वह वनहै कि सारंग जो पक्षी
उनका निधि अर्थात् स्थान है यहाँ पहले चरणकी तीसरे चरणमें
आवृत्ति है ॥ २७ ॥
आसन्नदेवा न रराज राजिस्वैस्तटाना-
मियमत्र नाद्रौ॥ क्रीडाकृतो यत्र दिगंत-
नागा आसन्नदे वानरराजराजिः॥२८॥
(८६) पाग्भटालंफार-परि०४.
टीका-अत्र अद्रौ उच्चैः तटानाम् इयम् आसन्नदेवा
वानरराजराजिः राजिः न रराज (इति) न (अपितु
रराज एव) यत्र नदे दिगंतनागाः क्रीडाकृतः आसन
इत्यन्वयः ॥ अद्रौ पर्वते उच्चैः तटानाम् उन्नततंटानां
शिखराणामित्यर्थः राजिः पंक्तिः । आसन्नाः संनिहिता
देवा यत्र सा आसन्नदेवा वानराणां राजानः तेषां राजिः
समूहो यत्रसा। वानरराजराजिः एवंभूता राजिः रराज
एव दिगंतनागाः दिग्गजाः । अत्र प्रथमपादस्य चतुर्थे
आवृत्तिः ॥२८॥
अर्थ-इस पर्वतमें यह ऊंचे शिखरोंकी पंक्ति जहाँ देवता
निवास करते थे और वानरोंके रानावों ( अर्थात् श्रेष्ठ वानरोंका
जहाँ समूह था सो शोभाको माप्त नहीं ऐसी नहीं) किन्तु
शोभाको प्राप्तहोही रही थी और नहाँकी नदियोंमें बड़े बड़े
दिग्गज हाथी क्रीडा करते थे इसमें पहले पादकी, चौथे पादमें
आवृत्ति है ॥२८॥
अमरनगरस्मेराक्षीणां प्रपंचयति स्फुर-
सुरतरुचये कुर्वाणानां वलक्षम रंहसम् ॥
इह सह सुरैरायांतीनां नरेश नगेऽन्वहं
सुरतरुचये कुर्वाणानां वलक्षमरं
हसम् ॥ २९॥
सान्वय सं• टी० भाषाटीकासहित । (८७)
• टीका-हे बलक्षम नरेश इह नगे स्फुरत्सुरतरुचये
बाणानां कुः अन्वहं सुरैः सह आयांतीनां वलक्ष
हसम् अरं कुर्वाणानाम् अमरनगरस्मराक्षीणां सुरत
रुचये रहसं प्रपंचयति इत्यन्वयः ॥ बले पराक्रमे
क्षमः समर्थः तत्संबुद्धिः हे बलक्षम इह नगे अत्र पर्वते
स्फुरन् सुरतरूणांचयो यस्मिन् तथाभूते पर्वते वाणानां
बाणवृक्षाणां कुः भूमिः अन्वहं प्रतिदिनं सुरैः देवैः
सह आयांतीनाम् आगच्छंतीनां वलक्षं धवलं हसं
हास्यम् अरम् अत्यथै कुर्वाणानाम् अमरनगरस्य
सुरपुरस्य स्मराक्षीणां मंदस्मितलावण्यलोचनानां सुंद-
रीणां सुरांगनानामित्यर्थः सुरतस्य संभोगस्य रुचिः
वाछा तस्यै सुरतरुचये सुरताभिलापाय इतिभावः ।
रंहसम् आवेगं प्रपंचयति प्रकटयति (वलक्षः धवलः
इसः हसनम् अरम् अलमर्थे अत्यर्थम्। इतिशब्दस्तोम)
अत्र द्वितीयपादस्य चतुर्थे आवृत्तिः ॥२९॥ .
अर्थ-हे बलक्षम नरेश इस पर्वतमें जहां फुरायमान कल्प-
पृक्षोंका संचय है वाणवृक्षोंकी पृथ्वी नित्य देवताओंके साथ
आनेवाली और अवंत उज्ज्वल हास कामवाली स्वर्ग लोककी
मुसकराते लोचनोंवाली सुंदरियोंके संभोगको अभिलाषाके लिये
रंहस आवेग अर्थात् उमंग प्रकट करती है । यहां दूसरे चरणकी
चौथे चरणमें आपत्ति है ॥ २९ ॥
(८८) वाग्भटालंकार-परि०४. भारामा कुरवक ! कमलारंभा रामा कुरवककमला ॥ रंभारामा ऽकुरवक कमलाऽरंभारामाऽकुरवककमला॥३०॥ टीका-हे अवक ! रंभारामा कुः अरं रामा कथं- भूता कुः कमलारंभा पुनः कुरवककमला पुनःरंभारामा पुनः अकुः पुनः अवककमला पुनः भारामा पुनः अकुरवककमला इत्यन्वयः ॥ अवति रक्षतीति अव- कः तत्संबुद्धिः हे अवक रंभारामा कुः रंभाणां कदली. नाम् आरामो वाटिकाविशेपः यस्यां सा रंभारामा कु: पृथिवी अरम् अत्यर्थ रामा रमणीया इत्यर्थः कथं भूता कुः कमलारंभा कमलानां पंकजानाम् आरंभो यत्र सा कुरवककमला कुरवकाणां तदाख्यवृक्षाणां कमला लक्ष्मीः शोभा यत्र सा रंभारामा रंभा देवांगना एव रामा रमणार्थ विद्यते यत्र सा अकुः न कुत्सि- ताशोभना इत्यर्थः अवककमला वकैः वकपक्षिविशेपैः रहितं कमलं जलं यत्र साभारामा भाभिः कांतिभिः रामा रमणीया अकुरवककमला कुत्सितो खः शब्दः कुरवः न कुरवः अकुरवः अकुरवं कुर्वन्ति इति अकुर- वकाः तादृशाः कमला मृगा हरिणाः यत्र सा । अत्र प्रथमपादस्य द्वितीये तृतीये चतुर्थे चावृत्तिः ॥३०॥ (लो० ३०) "मा" कदली देवांगनाच "रामा" मनोहरा गीतादि. फलाभिज्ञानारी "फमला" लक्ष्मी शोभाच"कमटम्" पंकजं जलं नपुंसके कमल: भूगः सारसनिहंगच पुंसि (इतिशम्दस्तोमे)।
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (८९) अर्थ-हे अषक हे रक्षक कदलीवृक्षोंके आराम अर्थात् बगीचे पाली पृथिवी अत्यन्त रमणीक है कैसी है वह पृथिवी कि क्म- लोंका है आरंभ प्रस्ताव जिसमें और कुरवकके वृक्षोंकी शोभा करके संयुक्त है तथा रंभा देवांगना है रामा रमणीय जहांपर तथा अकु अर्थात् कुत्सित नहीं किन्तु सुंदर है और वकरहित निर्मल है कमल अर्थात् जल जिसमें तथा भा कांति करके रम. णीक है तथा सुंदर शब्द करनेवाले अथवा सुंदर चाल चलने- वाले कमल (अर्थात् हरिण) हैं जिसमें । इस श्लोकमें प्रथम पादकी दूसरे पादमें तथा तीसरे और चौथे पादमें आवृत्ति है कमल शब्दका अर्थ कमल तथा जल तथा मृग है ।। ३० ॥ पदयमक। हारीतहारी ततमेप धत्ते शेवालसेवाल- सहंसमम्भः॥ जंवालजं वालमलं दधानं मंदारमंदारववायुरद्रिः ॥३१॥ टीका--एपः हारीतहारी मंदारमंदारववायुः अद्रिः ततं शेवालसेवालसहसं जंबालजं वालमलं दधानम् अंभः धत्ते इत्यन्वयः ॥ हारीतानां पक्षिविशेपाणां. हारःअस्य स हारीतहारी मंदाराणां कल्पवृक्षाणां मंदा- खो मंदः आरवो गतिविशेपः शब्दो वा यस्य तथा भूतो वायुः यस्मिन् तथोक्तः एपः पुरो दृश्यमानः अद्विः पर्वतः तत विस्तृतं शेवालेन सेवायाम् अलमाः मंथरा हंसा यत्र तत् शेवालसेवालसहसं जंबालज वाग्भटालंकार-परि०५. जंवालात् पंकात् शेवालादा जातं बालं नूतनं मलं दधानम् एतादृशम् अभः जलं निर्झररूपकं सरोरूपकं वा धत्ते धारयति । अत्र हारीतहारीत इत्यादि पद- यमकम् ॥ ३१ ॥ अर्थ-यह पर्षत जिसपर हारीतपक्षियोंका हार (पंक्ति) है और कल्पवृक्षोंका मंद चलनेवाला वायु जहाँपर है सो विस्तार- वाले और सेवाल करके सेवामें (चलने में ) मंद होरहे हैं हंस जिसमें और जंबाल कीचड या सिवालसे उत्पन्न हुवा नूतन मल धारण किया है जिसने ऐसे जल (शिरने या सरोवर रूप जल) को धारण करनेवाला है । इसमें हारीत हारीत इत्यादि पादके आदिमें पदयमक है ॥ ३१॥ नेमिर्विशालनयनो नयनोदितश्रीरभ्रांत वुद्धिविभवो विभवो ऽथ भूयः॥ प्राप्तस्तदे- ति नगरान्नगराजि तत्र सूतेन चारु जग- दे जगदेकनाथः॥३२॥ टीका-विशालनयनः नयनोदितश्रीः अभ्रांतवुद्धि- विभवः विभवः जगदेकनाथः नेमिः अथ नगरात् तत्र नगराजि सूतेन प्राप्तः तदा भूयः चारु इति जगदे इत्यन्वयः ॥ नयेन नीतिमार्गेण नोदिता प्रेरिता श्रीः लक्ष्मीर्येन स नयनोदितश्रीः अभ्रांतायाः बुद्धः विभवों यस्य स अभ्रांतबुद्धिविभवः विगतःभवः संसारोजन्म- मरणादिरूपो यस्य स विभवः जगताम् एकनाथः सान्वप सं. टी. भाषाटीकासहित । (९१) जगदेकनाथः नेमिः नेमिनाथः नगराजि पर्वतराजोपरि सूतेन सारथिना नगरात पुरात् प्राप्तः तदा चारु जग- दे भद्रं जातमिति जगाद । अत्र जगदे जगदे विभवो विभव इत्यादि पादमध्यगतपदयमकम् ॥ ३२॥ अर्थ-विशालनेत्र विनय करके प्रेरित करी श्री जिसने और अधांत (दृढ़) बुद्धि है विभव ऐश्वर्य जिसका और नष्ट होगया है जन्ममरणादि संसार जिसका ऐसे जगत्के एक स्वामी नेमि- नाथ जब नगरसे पर्वतराज ( गिरनार ) पर सारथीने पहुँचाये तव वारंवार बहुत श्रेष्ठ दुवा बहुत अच्छा हुवा ऐसा कहते भये यहाँ जगदे जगदे विभनो विभव इत्यादि पदयमक चरणोंके । मध्य में हैं ॥ ३२ ॥ यदुपांतिकेषु सरलाः सरला यदनूच्चल- न्ति हरिणा हरिणाः ॥ तदिदं विभाति क- मलं कमलं मुदमेत्य यत्र परमाप रमा॥३३॥ टीका--तत् इदं कमलं विभाति यदुपांतिकेपु सरलाः सरलाः यत् अनु हरिणाः हरिणा उच्चलंति यत्र रमा कमलम् एत्य परं मुदम् आप इत्यन्वयः॥ कमलं जलं (सलिलंकमलंजलम् इत्यमरः) उपांति- केपु समीपेषु सरलाः धूपकाष्ठवृक्षाः सरला ऋजवः हरिणाः मृगाः हरिणा वायुना समम् उचलंति उदच्छति कमलं पंकजं रमा लक्ष्मीः मुदं हर्पम् ।
वाग्भटालंकार-परि० ४.
अत्र सरलाः सरलाः हरिणा हरिणा कमलं कमलं
परमा परमा इतिपादांतगं पदयमकम् ॥३३॥
अर्थ-यह जल शोभाको प्राप्त होरहा है जिसके समीपमें
सरल (सीधे ) सरलके (रालके) वृक्ष हैं और जिसके पास
हिरण हवाके समान दौडते हैं और जहां लक्ष्मी कमलको प्राप्त
होकर परम आनंदको प्राप्त होती है। यहां सरलाःसरला हरिणाः
हरिणाः कमलं कमलं परमा परमा पादांतगत पदयमक है ॥३३॥
कांतारभूमौ पिककामिनीनां कां तार-
वाचं क्षमते स्म सोढम् ॥कांता रतेशे-
ऽध्वनि वर्तमाने कांतारविंदस्य मधोः
प्रवेशे ॥३४॥
टीका- कांतारतेशे अध्वनि वर्तमाने (सति) कां-
तारविंदस्य मधोः प्रवेशे कांतारभूमौ पिककामिनीनां
का तारखाचं सोढुं क्षमते स्म इत्यन्वयः॥ कांता का-
मिनी रतेशे रतस्य संगमस्य इशः रतेशः तस्मिन्
कांते अध्वनि मार्गे वर्तमाने प्रोपिते सति कांतानि
मनोहराणि अरविंदानि पंकजानि यत्र तथाभूतस्य
मधोः चैत्रस्य प्रवेशे कांतारस्य वनस्य भूमौ वनप्रदे
शे पिककामिनीनां पिकांगनानां कां तारवाचं उच्चैर्म-
नोज्ञां वाणी सोढुं सहनं कर्तुं क्षमते स्म (न कापि
.सोढुं क्षमते इत्यर्थः)। अब पादानामादिपु कांतारेति
पदावृत्तिः ॥३४॥
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (९३) अर्थ-कामिनी जब कि कांत मार्ग (विदेश) में हो फूल मनोहर कमलों युक्त चैत्र (वसंत) के प्रवेश समय वन प्रदेशमें पिकांगनाओंकी कौनसी ऊंची और मनोहारिणी पाणीकों सहन करनेको समर्थ होसक्तीहै ( अर्थात् नहीं होसक्ती)। इसमें चारों पादोंके आदिमें कांतार शब्दकी आवृत्ति है ॥ ३४ ॥ चकार साहसं युद्धे धृतोल्लासा हसं च या॥ दैन्यं वा साहसंप्राप्ता द्विपांसोत्सा- ह संहतिः॥ ३५॥ टीका-हे सोत्साह ! या द्विपां संहतिः धृतोल्लासा ( सती ) युद्धे साहसं चकार सा हसं दैन्यं वा साहसं प्राप्ता इत्यन्वयः॥ द्विपां शत्रूणां संहतिः सेना धृतोल्लासा धृतः उल्लासो यया युद्धे साहसं विक्रम समु- द्यमं च चकार सा सेना हसं हास्यम् अथवा दैन्यं दीनत्वं कातर्यमित्यर्थः अथवा साहसं दंडं बंधना- दिकमिति भावः प्राप्ता प्राप्तवती । अत्र चतुर्यु चरणेषु मध्ये साहसम् इति पदस्यावृत्तिः।। ३५॥ अर्थ-हे सांत्साह उत्साह युक्त राजन् जो शत्रुओंकी पान जोशमें आकर युदमें साहस (उद्योग तथा पराक्रम) करती भई सो हास्यको तथा दीनताको तथा बंधनादिक दंडका मान होती भई । यहाँ साहसं पद चारों चरणोंमें आया है उसस. मध्यगत पदयमक है ॥ ३५ ॥ .
(९४) वाग्भटालंकार-परि०४.
गिरां श्रूयते कोकिला कोविदारं यतस्त-
द्वनं विस्फुरत्कोविदारम् ॥ मुनीनां वस-
त्यत्र लोको विदारं न चव्याधचक्र कृतौ-
को विदारम् ॥ ३६॥
टीका-अत्र गिरी कोविदा कोकिला अरं श्रूयते
च विदारं (यथा भवति तथा ) मुनीनां लोकः वसति
यतः विस्फुरत्कोविदारं तत् वनं विदारं व्याधचक्र
कृतौको न इत्यन्वयः ॥ अत्र वने गिरां वाचां को-
विदा पंडिता कोकिला अरम् अत्यर्थ श्रूयते च वि-
दारं दाररहितं यथा भवति तथा मुनीनां लोकः मुनि
समूहः वसति यतः कारणात् विस्फुरत्कोविदारं विस्फुरं.
तः विकसंतः कोविदाराः कांचनारवृक्षा यत्र तथाभूतं
तदनं विदारं वीन पक्षिणः दारयति नाशयतीति वि-
दारं पक्षिविनाशकं व्याधचक्र हिंसकवृंदं कृतौकः कृत
म् ओका स्थानं येन तत् तथाभूतं न तत्र वनेऽस्ती-
त्यर्थः । अत्र पादांते विदारशब्दावृत्या अंत्यपद
यमकम् ॥३६॥
अर्थ--इस जगह वाणीके विद्वान् कोकिला खूब सुनाई देते हैं
और कांतारहित मुनियोंका समूह यसता है इस कारणसे
स्फुरायमान कचनालके वृक्षोंवाला यह वन पक्षिविनाशक हिंस-
'कोंका स्थान नहीं है । यहां चारों चरणोंके अंतमें कोविदार
काम्द होनेसे अंत्ययमफ हुंपा ॥३६॥
.
सान्षय सं० टी० भाषाटीकासहित । (९५)
सिंधुरोचितलताग्रशल्लकीसिंधुरोचितमु-
पेत्य किन्नरैः ॥ कंदराजितमदस्तटं
गिरेः कंदराजितगृहनि गीयते ॥३७॥
टीका--सिंधुरोचितलताग्रशल्लकीसिंधुरोचितं कंद-
राजितं कंदराजितगृहथि अदः गिरेः तटम् उपेत्य-
किन्नरैः गीयते इत्यन्वयः ॥ सिंधुराणां गजानाम् उ-
चितः योग्या लता तासाम् अग्रे शल्लकी तरुविशेषः
यत्र तथाभूता सिंधुः नदी तयारोचितं शोभितं सिंधु
रोचितलताग्रशल्लकीसिंधुरोचितं कंदराजितं कंदैः मूल
विशेषः राजित पूरितं कंदराभिः गुहाभिः जिता गृहा-
णां श्रीः शोभा येन तत्कंदराजितगृहथिएवं भूतं गिरेः
पर्वतस्य तटम् उपेत्य आगत्य किन्नरैः किंपुरुपैः गीय-
ते गानं कृयते इत्यर्थः । अत्र सिंधुरोचित सिंधुरोचित
कंदराजित कंदराजित इति आदियमकम् ॥३७॥
अर्थ-मिधुरों ( हाथियों ) के योग्य लता और उनके अगाडी.
शल्लकोके वृक्ष हैं जिस सिंधु नदीमें ऐसी नदी करके रोचित
अर्थात् शोभित और कन्दों करके पूरित तथा कंदराओंकरके
जीती है घरोंकी शोभा जिसने ऐसा जो यह पर्वतका तट वहां
आकर किवरोंकरके गान किया जाता है। यहां सिंधुरोचित
सिंधुरोचित और कंदराजित कंदराजित आदियमक है ॥ ३७॥
वसन्सरोगोऽत्र जनोन कश्चित्परंसरोगोय-
दि राजहंसगीतंकलं को न करोति सिद्धः
शैले कलंकोज्झितकाननेऽस्मिन् ॥३८॥
वाग्भटालंकार-परि०४. टीका-अस्मिन् कलंकोज्ज्ञितकानने शैले कः सिद्धः कलं गीतं न करोति अत्र वसन् कश्चित् जनः सरोगः न परं यदि राजहंसः ( तदा) सरोगः स्या- दिति शेपेणान्वयः॥ कलंकेन दूपणेन उज्झितं वर्जि- तं काननं वनं यत्र तस्मिन् कलंकोज्झितकानने शैले पर्वते कः सिद्धः कलं गीतं न करोति अपि तु सर्व एव मधुरगानं कुर्वन्ति अब पर्वते वासं कुर्वन् कश्चिदपि जनः सरोगः रोगयुक्तो न भवति अतीवस्वास्थ्यकरोऽयं •शैल इतिभावः परं परंतु यदि अत्र राजहंसः वासं करोति तदा सरोगः स्यात् सरसि गच्छतीति सरोगः सरसि गत्वा क्रीडां करोतीत्यर्थः पर्वतोयं सरसापियुक्त इति भावः। अत्र सरोगः सरोगः कलंकः कलंक इति मध्यगतपदयमकम् ॥ ३८॥ अर्थ-इस फलंकरहित वनयुक्त पर्वतपर कौनसा सिद्ध (गंधर्व) मधुर गान नहीं करता है अर्थात् सभी करते हैं और यहां वसकर कोई भी मनुष्य सरोग (रोगयुक्त) नहीं होता ( अर्थात् अतिस्वास्थ्यकारक है ) परंतु यदि यहां राजहंस निवास करे तो वह सरोग (सरसरोवर उसमें गमन करनेवाला) होवे अर्थात् वहां सरोवर भी हैं। यहां पहले दो पदोंमें सरोग सरोग और पिछले दो पदोंमें कलंक कलंक मध्यगत पदयमक है ॥३८॥ जहुर्वसंते सरसी न वारणा वभुः पिका- नां मधुरा नवा रणाः ॥ रसं न का मोह सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (९७) नकोविदाऽऽर कं विलोकयंती वकुलान विदारकम् ॥ ३९॥ टीका-वसंते वारणाः सरसी न जहुः पिकानां मधु- रा नवा रणाः बभुः का मोहनकोविदा बकुलान् विलो- कयंती (सती) विदारकं कं रसं न आरइत्यन्वयः॥ वारणाःहस्तिनःपिकानां कोकिलानां नवा नृतनारणाः शब्दाः वभुः शोभते । का काचित् अपि मोहने को- विदा मोहनकोविदा अथवा कामोहनकोविदा कामस्य ऊहनं वितर्कः तस्मिन् कोविदा ज्ञानवती सुंदरी बकु- लान् वकुल वृक्षान विलोकयंती सती विदारक विशेपेण दारकंचित्ते व्यथाकारकम् अथवा विशेपेण दारं करो- तीति विदारकः भर्ता तत्संबंधिनं कं रसं न आरन प्राप आपि तु प्राप एव । अत्र नवारणाः नवारणाः विदारक विदारकम् इति अंत्ययमकम् ॥३९॥ अर्थ-वसंत ऋतुमें हस्ती सरोवरोंको नहीं त्यागते हैं और पिकों (कोकिलों) के नवीन २ मधुर शब्द शोभाको प्राप्त दुवा करते हैं (ऐसी वसंत ऋतुमें) कामकी जो वितर्कना उसमें कोविद अर्थात् जाननेवाली सुंदरी वकुल (मोलसरी)के वृक्षोंको देखती हुई कौनसे विदारक (दुःखदायक ) रसको नहीं प्राप्त होती भई (अथवा दारक नाम भर्ता विशेष फरके तत्संबंधि कौनसे रसको न प्राप्त हुई अर्थात् वसंतमें सभी प्रकार संभोग रसको प्राप्त होती भई)।यहां पहले दो पदोंमें नवारणा नवारण और पिछलोंमें विदारकं विदारकं अंत्यपदयमक है ॥ ३९॥ ५
(९८) वाग्भटालंकार-परि०४.
वरणाः प्रसूननिकरावरणा मलिनां वहं-
ति पटलीमलिनाम् ॥ तरवः सदात्र शि-
खिजातरवः सरसश्च भाति निकटे
सरसः॥४०॥
टीका--प्रसूननिकरावरणाः वरणाः तरवः अलिनां
मलिनां पटलीं वहंति अत्र च सरसः निकटे सदा
सरसः शिखिजातरवः भाति इत्यन्वयः ॥ प्रसूननि-
कराणां पुष्पसमूहानाम् आवरणम् आच्छादनं येषां
तथाभूता वरणा वरणाख्याः तरवः अलिनां भ्रमराणां
मलिनां श्यामलां पटली पंक्तिं वहंति धारयंतीत्यर्थः
अत्र सरसः सरोवरस्य निकटे समीपे सरसः रससहितः
शिखिजातरवः शिखिभ्यः मयूरेभ्यः जातः उच्चरितः
खः शब्दः केकावाणीत्यर्थः। अत्र वरणा वरणा इत्या-
दिकम् आद्यतयमकम् ॥४०॥
अर्थ-नवीन पुष्पोंसे आच्छादित जो वरणोंके वृक्ष हैं सी
भ्रमरोंकी श्याम पंक्तियोंको धारण कर रहे हैं और यहां मरो.
परके निकट सदा मयूरोंकी सरस वाणी शोभाको प्राप्त होती है।
यहां प्रथम पादके आदि और अंतमें वरणा वरणाहै इसी प्रकार
सय चरणों में आयंत यमक है ॥ ४० ॥
यथाथथा द्विजिह्वस्य विभवः स्यान्मह-
त्तमः॥ तथातथास्य जायेत स्पर्धयैव
महत्तमः॥४१॥
सान्वय-सं० टी० भाषाटीकासहित । (९९)
टीका-यथायथा द्विजिह्वस्य महत्तमः विभवः
स्यात् तथातथा अस्य स्पर्द्धया एवं महत् तमः
जायेत इत्यन्वयः॥ द्विजिह्वस्य दुर्जनस्य अग्रे अन्य-
त् पृष्ठतः अन्यत् कथयतःतस्य द्विजिह्वत्वम्। महत्तमः
अतिशयेन महान् इति महत्तमः विभवः संपत्तिः अस्य
दुर्जनस्य तथातथा स्पर्द्धया एव परामिभवेच्छया
महत् तमःमहान् मोहः जायेत अब महत्तमः इत्यस्य
द्वितीयपाद चतुर्थपादे च आवृत्तिः॥४३॥
अर्थ-जैसे जैसे दुर्जन मनुष्यका अधिक अधिक विभव वढता
जाता है वैसेही वैसे पर्दा पराई अवनतिकी इच्छा बढ़ बढ़कर
महान् मोह उत्पन्न होताहै । यहां दूसरे और चौथे पादके अंतमें
महत्तम शब्दकी आवृत्ति है ।। ४१॥
दास्यति दास्यतिकोपादास्यति सति
कर्करान शापम् ॥ भवति भवति ह्यन-
थों भव स्तिमितस्तेन वटुक खम् ॥४२॥
टीका-हे वटुकादासी अतिकोपात् भवति कर्करान
आस्यति सतिशापं दास्यति हि अनर्थो भवति तेन
त्वं स्तिमितो भव इत्यन्वयः। कर्करान् चूर्णितपापा-
णखंडान् आस्यति आ समंतात् अस्यति क्षिपति
असुक्षेपणे धातोगस्तिमितः निश्चलो भव । अत्र संयुता-
संयुतभेदेन दास्यति दास्यति इत्यादिपदानाम्
आवृत्तिः॥४२॥
(१००) पाग्भटालंकार-परि० ४.
अर्थ-हे बालक तुम्हारे कंकर फैंकनेसे दासी अतिकोपसे
शाप देगी (अर्थात् गाली देगी) जिससे अनर्थ होगा इस
कारण तू निश्चल रह अर्थात् चपलता मत कर । इसमें दास्यति
दास्यति इत्यादि संयुत और असंयुत पदोंकी आवृत्ति है अर्थात
प्रथम पादमें दास्यति दास्यति और तृतीय पादमें भवति भवति
आदिमें है इससे आदियमक है ॥ ४२ ॥
कुलं तिमिभयादेव करेणूनांन दीव्यति ॥
नदीव्यतिकरेऽणूनांप्राणिनांगणनापि का४३.
टीका--नदीव्यतिकरे तिमिभयात् एव करेणूनां
कुलं न दीव्यति अणूनां प्राणिनाम् अपि का गणना
इत्यन्वयः ॥ नदीव्यतिकरे नदीसंगमे तिमिभयात्
वृद्धमत्स्यभयात् करेणूनां कुलं हस्तिनां वृदं न दी-
व्यति न क्रीडति तदा अणूनां क्षुद्राणां प्राणिनां
जीवानां का गणना कापि न इत्यर्थः। तिमिः महाका-
यो मत्स्यः (इतिशब्दस्तोमः )। अत्र द्वितीयपादस्य
व्यत्यासात तृतीयपादे आवृत्तिः ॥४३॥
अर्थ--नदीके संगममें बड़े मत्स्पोंके भयसे हस्तियोंका समूह
भी क्रीडा नहीं कर सकता है ( वापर ) छोटे २. जीवोंकी तो
क्या गिनती है। इसमें दूसरा पाद उलट कर तीसरेमें है। ४३॥
गांगाम्बुधवलांगाभो मुमुक्षुध्यानगो-
चरः ॥ पापार्तिहरणायास्तु स सज्ज्ञानो
जिनः सताम् ॥४४॥
सान्षय सं० टी० भाषाटीकासहित । (१०१) टीका-स गंगांबुधवलांगाभो मुमुक्षुध्यानगोचरः सज्ज्ञानः जिनः सतां पापार्तिहरणाय अस्तु इत्य- न्वयः ॥ गंगाया अंबु गांगांवु तद्वत् धवला अंगस्य आभा यस्य स तथा मुमुक्षूणां ध्यानेन गोचरः मुमुः क्षुजनसाक्षात्करणीय इत्यर्थः सत् समीचीनं ज्ञानं यस्य तथाभूतः जिनः सतां साधूनां पापार्तिहरणाय पापक्केशनिवारणायं अस्तु । इदं पद्यं प्रक्षिप्तं यमको- दाहरणं नैव भवति किंतु अनुप्रासोदाहरणं भवति ४४ अर्थ-वे गंगाजलके समान उज्ज्वल शरीरकी कांतिवाले और मुमुक्षु जनोंके ध्यानगोचर होनेवाले श्रेष्ठ ज्ञानयुक्त जिन भगवान् साधुओंके पाप क्लेश निवारण करनेके लिये हों। यह श्लोक क्षेपक मालूम होता है यह यमकका उदाहरण नहीं होसक्ता किंतु अनुः प्रास छेकानुप्रासका उदाहरण होसक्ता है ॥ १४ ॥ जनमात्मकीर्तिशुभ्रं जनयन्नुद्दामधाम- दोपरिघः॥ जयति प्रतापपूपा जयसिंहः क्ष्माभृदधिनाथः ॥४५॥ टीका-क्ष्माभृदधिनाथःप्रतापपूपा उद्दामधामदो:- परिषः जयसिंहः जनम् आत्मकीर्तिशुभ्रं जनयन् (सन् ) जयति इत्यन्वयः ॥क्ष्मामृतां राज्ञाम धिमा नाथः अधीश्वरःप्रतापपूपाप्रतापे पूपा सूर्यख उदाम- धामदो परिघः उद्दामं उत्कटं धाम तेजस्य तथा... 20074
(१००) वाग्भटालंकार-परि०५.
अर्थ-हे बालक तुम्हारे कंकर फेंकनेसे दासी अतिकोपसे
शाप देगी (अर्थात् गाली देगी) जिससे अनर्थ होगा इस
कारण तू निश्चल रह अर्थात् चपलता मत कर । इसमें दास्यति
दास्पति इत्यादि संयुत और असंयुत पदोंकी आवृत्ति है अर्थात
प्रथम पादमें दास्यति दास्यति और तृतीय पादमें भवति भवति
आदिमें है इससे आदियमक है ।। १२ ॥
कुलंतिमिभयादेव करेणूनांनदीव्यति ॥
नदीव्यतिकरेऽणूनांप्राणिनांगणनापि का४३
टीका-नदीव्यतिकरे तिमिभयात् एव करेणूनां
कुलं न दीव्यति अणूनां प्राणिनाम् अपि का गणना
इत्यन्वयः ॥ नदीव्यतिकरे नदीसंगमे तिमिभयात्
वृद्धमत्स्यभयात् करेणूनां कुलं हस्तिनां वृंदं न दी-
व्यति न क्रीडति तदा अणूनां क्षुद्राणां प्राणिनां
जीवानां का गणना कापि न इत्यर्थः। तिमिः महाका-
यो मत्स्यः (इतिशब्दस्तोमः )। अत्र द्वितीयपादस्य
व्यत्यासात तृतीयपादे आवृत्तिः ॥४३॥
अर्थ-नदीके संगममें बडे मत्स्योंके भयसे हस्तियोंका समूह
भी क्रीडा नहीं कर सक्ता है (वहाँपर ) छोटे २. जीवोंकी तौ
क्या गिनती है। इसमें दूसरा पाद उलट कर तीसरेमें है। ४३॥
गांगाम्बुधवलांगाभो मुमुक्षुध्यानगो-
चरः ॥ पापार्तिहरणायास्तु स सज्ज्ञानो
जिनः सताम् ॥४४॥
सान्षय सं० टी० भाषाटीकासहित । (१०१) टीका-स गंगांबुधवलांगाभो मुमुक्षुध्यानगोचरः सज्ज्ञानः जिनः सतां पापार्तिहरणाय अस्तु इत्य- न्वयः ॥ गंगाया अंबु गांगांबु तद्वत् धवला अंगस्य आभा यस्य स तथा मुमुक्षूणां ध्यानेन गोचरः मुमु- क्षुजनसाक्षात्करणीय इत्यर्थः सत् समीचीनं ज्ञानं यस्य तथाभूतः जिनः सतां साधूनां पापार्तिहरणाय पापक्केशनिवारणायं अस्तु । इदं पद्यं प्रक्षिप्तं यमको- दाहरणं नैव भवति किंतु अनुप्रासोदाहरणं भवति ४४ अर्थ-वे गंगाजलके समान उज्ज्वल शरीरकी कांतिवाले और मुमुक्षु जनोंके ध्यानगोचर होनेवाले श्रेष्ठ ज्ञानयुक्त जिन भगवान् साधुओंके पाप क्लेश निवारण करनेके लिये हों। यह श्लोक क्षेपक मालूम होता है यह यमकका उदाहरण नहीं होसक्ता किंतु अनु- पास छेकानुप्रासका उदाहरण होसक्ता है ॥ १४ ॥ जनमात्मकीर्तिशुभ्रं जनयन्नुद्दामधाम- दो परिघः॥ जयति प्रतापपूपा जयसिंहः क्ष्माभृदधिनाथः ॥४५॥ टीका-क्ष्माभृदधिनाथः प्रतापपूपा उद्दामधामदोः- परिधः जयसिंहः जनम् आत्मकीर्तिशुभ्रं जनयन् (सन् ) जयति इत्यन्वयः ॥क्ष्माभृतां राज्ञाम अधिक नाथः अधीश्वरःप्रतापपूपाप्रतापे पूपा सूरय उद्दाम- धामदो परिघः उद्दाम उत्कटं धाम तेज यस्य तथा--- 20074 :(१०२) वाग्भटालंकार-परि० ४.. भूतं दोः भुजः एव परिघः मुद्गर इव यस्य तथोक्तः जयसिंहः जन लोकम् आत्मकीर्तिशुभ्रम् आत्मनः कीर्तिभिः यशोभिः शुभ्रं धवलं जनयन् कुर्वन सन् जयति सर्वोत्कर्पण वर्त्तते । अत्र प्रथमद्वितीयपादादौ जन जन इत्यस्य तथा तृतीयचतुर्थपादादी जय- जय इत्यस्य आवृत्तित्वात् आद्ययमकम् ॥ ४५ ॥ अर्थ-राजाओंके राजा सूर्य समान तेजस्वी और अति बलिष्ठ हाथ जिनके अर्गलास्वरूप हैं ऐसे जयसिंह अपनी कीर्तिसे लोकोंको श्वेत करते हुए जयको प्राप्त होते हैं ॥ ४५ ॥ मामाकारयते रामा सासा मुदितमान- सा ॥ याया मदारुणच्छाया नानाहेला- मयानना ॥ ४६॥ टीका-याया मदारुणच्छाया नानाहेलामयानना सासा मुदितमानसा रामा मां आकारयते इत्यन्वयः मदेन मद्यपानेन.अरुणा रक्ता छाया कांतिः यस्याः नानाहेलामयानना नानाहेलामयं विविधविलास- पूर्णम् आननं यस्याः तथाभूता मुदितमानसा हृष्ट- चित्ता सासा रामा कांता माम् आकारयते ममावाह- नं करोतीत्यर्थः। अत्र पादेपु आदौ अंतेच मामासा- सा याया नाना इत्यादि वर्णावृत्तिः॥ ४६॥ .
सान्वय सं० टी० भाषादीकासहित । (१०३)
अर्थ--जो जो मद्यपान करके लाल वदनवाली और नाना
प्रकारके हेलामय मुखवाली होनाती है सो सो स्त्री प्रसन्नचित्त
होकर मुझे बुलाती है । यहां सब चरणोंके आदि और अंतमें
मामा तथा सासा मामा और नाना वर्गोंकी आवृत्ति होनेसे वर्ण-
यमक हुवा ॥४६॥
(भाषा) दोहा-अर्थ पलट आवत वहुरि, जहां वर्ण पद पाद ।
यमक ताहिको कहत हैं, अंत मध्य अरु आद ॥१॥
इति वाग्भटालंकारे चतुर्थपरिच्छेदस्य पूर्वार्द्धम् ।
.
अथार्थालंकाराः।
स्वभावोक्ति।
स्वभावोक्तिः पदार्थस्य सक्रियस्याक्रिय-
स्य वा ॥ जातिविशेपतो रम्या हीने
तत्रार्भकादिषु॥४७॥
टीका--सक्रियस्य अक्रियस्य वा पदार्थस्य स्वभा-
वोक्तिःजातिः तत्र होने अर्भकादिषु विशेषतः रम्या
इत्यन्वयः ।। सक्रियस्य चेतनस्य अक्रियस्य जडस्य
वृक्षादेः स्वभावस्य उक्तिः कथनं साजाति मालंकारः
एपा स्वभावोक्तिशब्देन प्रायशो व्यवतियते । सा
स्वभावोक्तिः हीने निकृष्ट तथा अर्भकादिपु बालादि-
पु विशेषतः रम्या रमणीया ॥४७॥
(१०४)
वाग्भटालंकार-परि०४.
अर्थ-क्रियावान् (चैतन्य) तथा क्रियारहित (जड वृक्षा.
दिक) पदार्थोंके स्वभावका वर्णन हो उसे जातिनामक अथवा
स्वभावोक्ति नामक अर्थालंकार कहते हैं वह हीन तथा वालका
दिकमें विशेष रमणीक होता है ॥ ४७ ॥
वर्हावलीवहलकांचिरुचो विचित्रभूर्यत्व-
चारचितचारुदुकुललीलाः ॥ गुंजाफल-
ग्रथितहारलताः सहेलं खेलंति खेलगत-
योऽत्र वने शवर्यः ॥४८॥
टीका-अत्र वने बविलीबहलकांचिरुचः विचित्र
भूर्यत्वचारचितचारुदुकूललीलाः गुंजाफलग्रथितहार-
लताः शबर्यः सहेलं खेलगतयः खेलंति इत्यन्वयः ॥
बर्दावली मयूरपिच्छानां श्रेणी सा एव बहला विशा-
ला काची मेखला तया रोचंते इति बविलीबहल-
कांचिरुचः विचित्रभूर्यत्वचा विविधवर्णभूर्यवृक्षस्य
वल्कलेन रचिता दुकूलस्य पदृस्य लीला याभिः ताः
गुंजाफलैः ग्रथिता हारस्य लता याभिः तथोक्ताःशव-
र्यः भिल्लनार्यः खेलगतयः खेले क्रीडायां गतिर्यास
तथाभूताः सत्यः सहेलं सविलासं खेलंति क्रीडंती-
त्यर्थः । अत्र हीनानां भिल्लबालानांस्वभावस्य कथन-
त्वात् स्वभावोक्तिरलंकारः॥१८॥
-
सान्वय सं० टी० भापाटीकासहित। (१०५)
. अर्थ--यहां वनमें मोरपंखोंकी पंक्तिकी मेखला (तगडी )से
शोभित और विचित्र भोजपत्रसे रेशमी वस्त्रोंकी लीला रचे हुवे
चिरमिठियोंसे गूथ रक्खी हैं हारकी लडी जिन्होंने ऐसी भिल्लोकी
मुग्धा स्त्री हेलापूर्वक खेलमें मन लगाये हुवे खेलती हैं। यहां
हीनजाति भिल्लयालाओंके स्वभावका कथन होनेसे स्वभावोक्ति
अलंकार हुवा ॥ १८॥
प्रास्त उदाहरण ।
आरत्तनैणभीसणवअणुक्केरा कुरंग-
च्छि ॥ उल्लसिअवीसभुअवणविणिवे-
सो दसमुहो एसो ॥४९॥
टीका-(अस्य संस्कृतम्) आरक्तनयनभीपणवदन
समूहः कुरंगाक्षिोउल्लसितविंशतिभुजवनविनिवेशो दश
मुखः एपः ॥ अस्यान्वयः। हे करंगाक्षि एप दशमुखः
आरक्तनयनभीपणवदनसमूहः उल्लसितविंशतिभुज-
वनविनिवेशः इत्यन्वयः ॥ आरक्तैः नयनः भीपणः
भयंकरः वदनसमूहो यस्य सःतथा उल्लसितो विशति
भुजानां वनस्य विनिवेशो यस्य । सीतां प्रति कस्या-
श्चित राक्षस्या उक्तिरियम् । अत्र रावणस्य स्वभाव-
कथनत्वात् स्वभावोक्तिरलंकारः॥४९॥
अर्थ- सीतास किसी राक्षसीन फहा) हे कुरंगाक्षि ! यह
रावण ऐसा है कि लाल लाल डरावने नेत्र युक्त दश मुखोंवाला
है और इसके बड़े बड़े वीस हायोंका समूह है इसमें रावणके
स्वभाषका वर्णन होनेसे स्वभावोक्ति हुवा ॥ १९ ॥
-
(१०६) वाग्भटालंकार-परि
(भाषा) जड अथवा चैतन्यका, स्वभाव वर्णन होइ । स्वभा.
वोक्ति तिहे कहत हैं, जाति कहत हैं कोई ॥ १ ॥ (उदाहरण)
लोचन लाल डरावने तापर तीखी सैन । भयदायकवीसों भुजा
दशमुख ऐसो ऐन ॥२॥
उपमालक्षण ।
उपमानेन सादृश्यमुपमेयस्य यत्र
सा ॥ प्रत्ययाव्ययतुल्यार्थसमासैरुपमे
यता॥५०॥
टीका-यत्र प्रत्ययाव्ययतुल्यार्थसमासैः उपमानेन
उपमेयस्य सादृशं सा उपमेयता इत्यन्वयः। प्रत्ययैः
पतिप्रभृतिभिः अव्ययैः इवादिभिः तुल्यार्थः समतुल्या
दिभिः तथा समासैः कर्मधारयबहुव्रीह्यादिभिः उपमा-
नेन उपमीयते अनेन इति उपमानं तेन सादृश्यज्ञान
साधकेन उपमेयस्य उपमातुं योग्यः उपमेयः तस्य
सादृश्यं साम्यम् उपमेयता उपमा इत्यर्थः । वस्तुतस्तु
उपमेयोपमानधर्मवाचकैश्चतुर्भिः पूर्णोपमालंकारः। एपु
उपमेयादिषु एकस्य द्वयोः त्रयाणां वा लोपात् लुप्तो-
पमालंकारः । स चाएविधः तथाचोक्तं कुवलयानंदे
"वोपमानधर्माणामुपमावाचकस्य च । एकद्वि-
ध्यनुपादानभिन्ना लुप्तोपमाऽरधा" इति।। वर्ण्यः उपमेयः
धर्मः द्वयोः सादृश्यहेतुः मनोज्ञत्वशुक्लत्वादिः वाचका
मानिन्दः ॥५०॥
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (१०७) अर्थ-जहां प्रत्यय वत् आदि और अव्यय इव आदिक तथा तुल्य सम समान आदि वाचक शब्दों करके तथा कर्मधारय बहुव्रीहि आदि समास करके उपमानसे उपमेयकी समानता कही जावे तो उसे उपमा अलंकार कहते हैं प्रयोजन यह कि (१) उपमेय (२) उपमान (३) धर्म (४) वाचक इन चारोंके होनेसे पूर्णीपमालंकार होता है और इनमेंसे किसी एकके या दोके या तीनके लोप होनेसे लुप्तोपमा अलंकार होता है (कुव. लयानंदमे लुप्तोपमाके आठ भेद लिखे हैं) जिसकी उपमा करी जावे उसे उपमेय कहते हैं जिसकी तुल्यता वर्णन करी जावे उसे उपमान कहते हैं और जो सादृश्यमाव दोनों में पाया जावे उसे धर्म कहने हैं और जो समताद्योतक शब्द होता है उसे • वाचक कहते हैं जैसे चंद्रवत् उज्ज्वलं मुखं अर्थात् चांदसा सुंदर मुख है इसमें मुख उपमेय है चांद उपमान है सा वाचक और सुंदर धर्म है ॥ ५० ॥ गत्या विभ्रममंदया प्रतिपदं या राजहं- सायते यस्याः पूर्णशशांकमंडलमिव श्रीमत्सदैवाननम् ॥ यस्याश्चानुकरोति नेत्रयुगलं नीलोत्पलानि श्रिया तां कुंदा ग्रदती त्यजन् जिनपती राजीमती पा- तुवः॥५१॥ टीका-जिनपतिः तां कुंदाग्रदती राजीमती त्यजन् वः पातु तांकां या विभ्रममंदया गत्या प्रतिपदंराजहं- सायते च यस्याःआननं सदा एव पूर्णशशांकमंडलम् (१०८) वाग्भटालंकार-परि०५. इव श्रीमत् च यस्या नेत्रयुगलं श्रिया नीलोत्पलानि अनुकरोति इत्यन्वयः॥विभ्रमः मदोन्मत्तस्य इव चेष्टा तेन मंदया गत्या प्रतिपदं पदं पदं प्रति राजहंसायते राजहंस इव आचरति आननं मुखं पूर्णशशांकमंड- लम् इव पूर्णचंद्रबिंवम् इव श्रीमत् शोभायुक्तं नेत्रयुगलं श्रिया शोभया नीलोत्पलानि नीलकमलानि अनुक- रोति नीलकमलानीवाचरतीत्यर्थः अत्र प्रथमचरणे या (राजीमती) उपमेयः राजहंसः उपमानं मंदगति धर्मः इवार्थक्यङ् प्रत्ययः वाचकाद्वितीय चरणे आन- नम् उपमेयः पूर्णशशांकमंडलम् उपमान श्रीमत् धर्मः इव वाचकः इतिपूर्णीपमालंकारः। तृतीयपादेनेत्रयुग- लम् उपमेयः नीलोत्पलानि उपमानम् अनुकरोति तुल्यार्थक्रियावाचकः अस्य धर्मलोपत्वात् धर्मलुप्ता लुप्तोपमालंकारः। कंदाग्रदती इत्यत्र दंता उपमेयः कुंदा ग्रम् उपमानं धर्मस्य वाचकस्य चलोपात् धर्मवाचक लुप्ता लुप्तोपमा अलंकारः॥५१॥ अर्थ-जिनपति नेमिनायनी उस छंदवलीये समान दातो. पाली रानमतीको त्याग करते हुवे तुम्हारी रक्षा करो ऐमी राजमती कि जो झलती दुई मंद मंद चालस रानदंसपी भात जाचरण करती है और निममा मुख पूर्णमाके चंद्रमंडलंक समान सुंदर है और निसके दोनों नेत्र मुंदरतामें नील पामलयी समानता करते हैं इस श्लोकक पहले पादमें या (रागमती)
सान्वय सं० टी० भोपाटीकासहित। (१०९)
तो उपमेय है और राजहंस उपमान तथा मंदगति उभय व्यापी
धर्म है और तुल्यताद्योतक प्रत्यय (जो राजहंसायतेक साथमें
है) वाचक है इसी भांत दूसरे चरणमें आनन (मुख) उपमेय
है पूर्ण शशांक मंडल उपमान है श्रीमत् उभय व्यापी धर्म है
और इव शब्द वाचक है इससे पूर्णोपमा अलंकार हुवा और'
तीसरे चरणमें नेत्रयुगल उपमेय नीलोत्पल उपमान और अनु-
करोति वाचक है यहां सादृश्य बोधक उभयव्यापी धर्म नहीं
कहे जानेसे धर्मलप्ता अलंकार हुवा और चौधेचरणके कुंदाग्दत्ती
वाक्यमें दंत उपमेय और कुंदान उपमान है इसमें वावक और
धर्म दोके नहीं कहे जानेसे धर्मवाचक लुप्ता लुप्तोपमा अलंकार
हुवा ( इसी प्रकार और उदाहरणोंमें जानलेना)॥ ५१ ॥
चंद्रवदनं तस्याः नेत्रे नीलोत्पले
इव ॥ पक्कविवं हसत्योष्ठः पुष्पधन्वधनु
र्भुवः ॥५२॥
टीका--तस्याः पुष्पधन्वधनुर्भुवः वदनं चंद्रवत्
नेत्रे नीलोत्पले इव ओष्ठः पक्वविवं हसति इत्यन्वयः॥
पुष्पधन्वा कामदेवः तस्य धनुरिव भ्रूः यस्याः सा
पुष्पधन्वधनुर्भूः तस्या अत्रापि धर्मलोपात्लुप्तोपमा-
लंकारः॥५२॥
अर्थ-उस कामदेयके धनुष तुल्य भुकुटीवाली सुंदरीका मुख,
चंद्रमाके समान है और दोनों नेत्र नीले कमलके तुल्य हैं और
होठ पके हुए विचका टपहास्य करते हैं इस श्लोकमें समंत्र सा.
दृश्य बोधक धर्मका लोप होनेसे लुप्तोपमा अलंकार है ॥५२॥
(११०) वाग्भटालंकार-परि० ४. प्रारुतम्। मदभरिअमाणसस्सविणिचं दोखाअर स्स ससिणो च तुह विरहे तीअ मुहं सं- कुइअंसुदृअ कुमुअंव ॥ ५३ ॥ टीका-( अस्यसंस्कृतम् ) मदभृतमानसस्यापि नित्यं दोपाकरस्य शशिन इव तव विरहे स्त्रियाः मुखं संकुचितं सुभग ! कुमुदमिव ( अस्यान्ययः ) हे सुभग मदभृतमानसस्य अपि दोपाकरस्य शशिन इव तव विरहे स्त्रियाः मुखं कुमुदमिव नित्यं संकुचितम् इत्य- न्वयः॥ मदेन गर्वेण भृतं मानसं यस्य अथवा मदेन मद्येन भृतं मानसं यस्य पक्षे मदः कस्तूरी तां बिभर्ति इति मदभृतः मृगः स मानसे उत्संगे यस्य तथा दोपा- करस्य दोपाणाम् आकरः दोपाकरः तस्य चंद्रपक्षे दोपाकरः निशाकरः तस्य तथाभूतस्य शशिन इवतव विरहे वियोगे स्त्रियाः मुखं कांतायाः मुखं कुमुदमिव संकुचितं चंद्रस्य विरहे कुमुदसंकोचनं युक्तम् एव अत्रा प्युपमालंकारः॥५३॥ अर्थ-हे सुभग मद (कस्तूरी ) धारण करनेवाले मृग सो है हृदय में जिसके (अर्थात् मृगांक) और दोपा (रात्रि) के करने वाले चंदमा तिसके समान । मद (गर्व) से भरा हुवा मानस (चित्त ) है जिसका और दोप (दुष्टता)निसकोआकर (खान) ऐसे जो तुम हो तुम्हारे विरहमें स्त्रीका मुख कुमोदनीकी भात
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित। (१११)
संकुचित होरहा है (चंद्रमाके विरहमें कुमोदनीका संकुचित
होना उचितही है ) (यहां मदभृत मानसस्य और दोपाकरस्य
चंदमा और सुभग पुरुप दोनोंके विशेषण श्लेषके आश्रयसे हो
सक्ते हैं ) ( यहां भी उपमा अलंकार है ) ॥ ५३ ॥
उपमालक्षण भाषा।
(सोरठा ) उपमेयरु उपमान, वाचक धर्म समानपन । ताहि
ऊपमा जान, शशि सो सुंदर तियवदन ॥१॥ (लुप्तोपमा)
इन चारोंमें कोई, इक विन दो दिन तीन विन । लुप्त ऊपमा
सोइ, विनारि द्युति पंकज नयनि ॥२॥
अन्योन्योपमा।
तंणमहवीतराअंजिणंदमुद्दलिअदढअर
कसाअम्॥जस्स मणंव सरीरंमणं सरीरं
वसुप्पसणम् ॥ ५४॥
टीका-(अस्य संस्कृतम्) तं नमत वीतरागं जिनं
दमोदलितदृढतरकपायं यस्य मन इव शरीरं मनः
शरीरमिव सुप्रसन्नम् ( अस्यान्वयः)तं वीतरागं दमो
दलितदृढतरकपायं जिनं नमत यस्य मनः इव शरीरं
शरीरम् इव मनः सुप्रसन्नम् इत्यन्वयः॥वीतः विगतः
रागो यस्मात् इति वीतरागः तं दमेन बाहोद्रियनि-
ग्रहेण उद्दलितः दूरीकृतः दृढतरः कपायः अंतःकरण
दोपः येन तं नमत प्रणामं कुरुत सुप्रसन्नं प्रसन्नता
युक्तम् । अत्र मन इव शरीरं शरीरमिव मनः इत्यन्यो
न्योपमेयोपमानत्वेन अन्योन्योपमालंकारः॥ ५४॥
(११२) वाग्भटालंकार-परि०४.
अर्थ-उन वीतराग और दश ( इंद्रिय निग्रह ) करके दूर कर
दिया है दृढ़तर कपाय (अंतःकरणके ईपीदि दोप) जिन्होंने
ऐसे जिन भगवान्को नमस्कार करो जिनका मन शरीरकी भांत
और शरीर मनकी तरह प्रसन्न रहता है यहां शरीर और मन
परस्पर उपमेय और उपमान होनेसे अन्योन्योपमा अलंकार
हुवा ॥ ५४॥
अनन्ययालंकार।
ये देव ! भवतः पादौ भवत्पादाविवाश्रि.
ताः॥ते लभतेऽद्धतां भव्यां श्रियं त इव
शाश्वतीम् ॥ ५५॥
टीका-हे देव ये (जनाः) भवत्पादौ इव भवतः
पादौ आश्रिताःतेअद्भुतां भव्यां शाश्वतीम् श्रियं लभ-
ते ते ते इव इत्यन्वयः ॥ अद्भुताम् अद्वितीयां भव्यां
समीचीनां शाश्वतीम अविनाशनीम् अत्र एकत्रैवोपमे-
योपमानत्वात् अनन्वयोपमालंकारः अनन्वयालंकार
इत्यर्थः (उक्तं च साहित्यदर्पणे) "उपमानोपमेयत्वमे-
कस्यैव त्वनन्वयः" इति ॥५५॥
'अर्थ-हे देव जो मनुष्य आपके चरणों जैसेही आपके चर:
गोके आश्रित हैं वे अद्भुत समीचीन और निश्चल लक्ष्मीको प्राप्त
करते हैं सो वे (भक्त ) उन जैसेही हैं यहां एकही उपमान और
उपमेयत्व होनेसे अनन्षयोपमा (अनन्वय )अलंकार दुना ॥५५॥
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित। (११३) , अनन्वयलक्षण भापा। दोहा-उपमेय रु उपमान दोइ, एक वस्तुमें होय ॥ नाम अनन्वय ताहिको चांद चांदसो जोय ॥ १॥ समुच्चयोपमालंकार । आलोकनं च वचनं च निगृहनं च या- सां स्मरन्नमृतवत्सरसं कृशस्वम् ॥ तासां किमंग! पिशितास्थिपुरीपपात्रं गा- नं विचित्य सुदृशां न निराकुलोसि ॥५६॥ टीका-हे अंग यासां सुदृशाम् आलोकनं च वचनं च निगृहनं अमृतवत् सरसं स्मरन् त्वं कृशः तासां पिशितास्थिपुरीपपानं गावं विचिंत्य किं ननिराकुलः असि इत्यन्वयः ॥ आलोकनम् ईक्षणं वचनं संभा- पणं निगृहनम् आलिंगनम् अमृतवत् सरसम् अमृतेन तुल्यं सुखदं स्मरन् कृशः स्मरन् सन् दुर्बल एवं पिशितास्थिपुरीपाणां मांसास्थिमलानां पात्रं स्थानं गानं शरीरं विचित्य किं न निराकुलः असि अपितु निराकुल एव अत्र आलोकनादीनां वहूनाम् उपमे- यानाम् एकेनामृतेन उपमानन सादृश्यम् अतः समुच्च- योपमालंकारः॥५६॥ अर्थ-हे अंग (हे शिष्य) निन सुंदर नम्रपाली नियोंके दर्शन और पवन और आलिंगनको अमृतफे समान सरस जान.
(११४) वाग्भटालंकार-परि० कर तू दुर्बल हो रहा है उनके मांस हाड और विष्ठाके पात्र शरीरको चितवन करके तू व्याकुल भी होहो रहा है यहां आलो- कन वचन और निगहन तीन उपमेयोंका अमृत एक उपमान होनेसे समुच्चयोपमा या समुच्चय अलंकार हुवा ॥ ५६ ॥ दोहा-इक साधक बहुकार्य बहु, वर्ण्य एक उपमान । सोइ समुच्चय जिमि नयन, कर पद कमल समान ॥ मालोपमा। कलेन चंद्रस्य कलंकमुक्ता मुक्तावलीवो- रुगुणप्रपन्ना ॥ जगत्रयायाभिमतं ददाना जैनेश्वरी कल्पलतेव मूर्तिः॥५७॥ टीका-जैनेश्वरी मूर्तिः कलंकमुक्ता चंद्रस्य कला इव उरुगुणप्रपन्ना मुक्तावली इव जगत्रयाय अभि- मतं ददाना कल्पलता इव इत्यन्वयः॥जिनेश्वरस्य ऋप भदेवस्य मूर्तिःजैनेश्वरी मूर्तिःकलंकमुक्ता कलंकरहिता चंद्रकला इव उरुगुणेन महता सूत्रेण प्रपन्ना गुंफिता मुक्तावली मुक्तापंक्तिरिव जगत्रयाय लोकत्रयाय अभि- मतं वांछितंददाना कल्पलताइव अत्र एकस्योपमेयस्य नीणि चंद्रकलादीनि उपमानानि अतः मालोपमालं. कारः। तथा च दर्पणे "मालोपमा यदेकस्योपमानं बहु दृश्यते" इति ॥ ५७॥ अर्थ-जैनेश्वरी मूर्ति कलंक रहित चंद्रकलाके समान है तथा घडेगुण (डोरे) में पिरोई दुई मोतियोंफी लडीके समान है
सान्वयं.सं० टी० भाषाटीकासहित। (११५)
तथा त्रिलोकीको वांछितफल देनेवाली कल्पलताके समान है
यहां एक मूर्तिः उपमेय है और चंद्रकलादिक तीन उपमान हैं
इससे मालोपमा है उदाहरणों में अन्य अलंकार भी झलकते हैं
परंतु जिनके उदाहरण हैं वेही मुख्य दिखाते हैं ॥ ५७ ॥
मालोपमालक्षण भापा।
दोहा-एक वर्ण्य उपमान बहु,मालोपमा वखान । वदन कमल
सम अति सरस, सुंदर चन्द्र समान ॥
विभिन्नलिंगवचनां नाति हीनाधिकां च
ताम् ॥ निवनंति बुधाः क्वापि लिंगभेदं तु
मेनिरे॥५८॥ -
टीका-बुधाः कापि तां विभिन्नलिंगवचनां हीना-
धिकां च निवनंति तु लिंगभेदं न मेनिरे इत्यन्वयः ॥
बुधाः पूर्वाचार्याः ताम् उपमा विभिन्ने लिंगवचने यस्या
तां च हीनाधिका हीना च अधिका च होनाधिका तां
निवनंति भिन्नलिंगं भिन्नवचनांहीनाम् आधिकाम् अपि
उपमां कचित् नियोजयंतीत्यर्थः क्वचिच लिंगभेदं न
मेनिरे इति भावः।। ५८॥
अर्थ-पहलेके विद्वान् कहीं फहीं पृयक लिंग और पृथक् वचन
फी उपमाफो भी उपयोग करते हैं और कहीं लिंग भेदको नहीं
मानते हैं (इसका उदाहरण यह है) ॥५८॥
हिममिव कीर्तिवला चन्द्रकलेवातिनि-
मला वाचः ॥ध्वांक्षस्येव च दाक्ष्यं नम
इव वक्षश्च ते विपुलम् ॥ ५९॥
(११६) वाग्भटालंकार-परि०४. टीका-तें कीर्तिः हिमम् इव धवला वाचः चंद्रकला इव अतिनिर्मला दाक्ष्यं ध्वांक्षस्य इव वक्षः नभ इन विपुलम् इत्यन्वयः॥ हिमम् इव कीर्तिः अत्र उपमानो- पमेययोः लिंगे पार्थक्यं चंद्रकला इव वाचः इत्यत्र वचने पार्थक्यं ध्वांक्षस्येव दाक्ष्यमित्यत्र ध्वांतः काकः तस्य दाक्ष्यं चातुर्य प्रसिद्धम् अत्रोपमानस्य हीनत्वं ते वक्षः हृदयं नम इव आकाशमिव विपुलं विशालम् इत्यत्र उपमानस्य अधिकत्वम् ॥१९॥ अर्थ-(हे राजन् ) तेरी कीर्ति हिम (वरफ) जैसी श्वेत है और वचन चंद्रकला जैसे निर्मल हैं और चतुराई काककी जैसी है तथा हृदय आकाश जैसा विशाल है इसमें कौति हिम जैसी यह कीर्ति स्त्री लिंग और इसका उपमान हिम नपुंसक लिंग है इसमें भिन्न लिंग है वचन चंद्रकला जैसे इसमें वचन बहुवचन और चंद्रकला एक वचन होनेसे भिन्न वचन है चतुराई काककी जैसी यहां उपमानमें हीनता है और हृदय आकाशसा इसमें उपमानमें अधिकता है ॥ ५९ ॥ शुनीयं गृहदेवीव प्रत्यक्ष प्रतिभापते ॥ खद्योत इव सर्वत्र प्रतापश्च विराजते॥६॥ टीका-इयं शुनी प्रत्यक्षं गृहदेवी इव प्रतिभापते च प्रतापः सर्वत्र खद्योत इव विराजते इत्यन्वयः॥ शुनी कुकुरी अब पूर्वार्दै उपमानस्याधिकत्वम् उत्तरा- हीनत्वं वा ॥६॥ .
सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित । (११७)
अर्थ-यह कुक्कुरी प्रत्यक्षमें घटको देवीसी दिखाई देती है
और प्रताप सब जगह खद्योत सूर्यकी भांत दीप्तिमान है यहां
पूर्वार्दमें उपमानकी अधिकता है और जो खद्योतका अर्थ
(अगिया कृमि) पटवीजना करें तो उत्तराईम उपमानकी
हीनता है ॥ ६०॥
सफेनपिण्डः प्रौढोमिरब्धिः शाीव शं-
खभृत् ॥ श्चोतन्मदः करी वर्पन विद्युत्ला-
निव वारिदः॥ ६१॥
टीका-सफेनपिंडः प्रौढोर्मिः अब्धिः शाही इव
शंखभृत् श्चोतन्मदः करी वर्पन विद्युत्वान् वारिद इव
इत्यन्वयः ॥ फेनपिंडैः सह वर्तमानः सफेनपिंडः
प्रौढाः ऊर्मयः.तरंगा यस्य स प्रौढोमिः तथाभूतः
अन्धिः समुद्रः शाङ्गी विष्णुः इव शंखभृत् शंखधारक
इत्यर्थः॥श्चोतंतः स्रवतो मदाः यस्मात् स श्चोतन्म-
दः करी हस्ती वर्षन् वृष्टिं कुर्वन् सन् विद्युत्वान् तडि-
वान् वारिदः मेघ इव अत्र पूर्वार्दै उपमेयस्य उत्तरार्दै
च उपमानस्य विशेषणाधिक्यम् ॥ ६॥
•अर्थ- झागाँफे पिंडों सहित और बडी तरंगोंवाला समुद्र
विष्णु भगवानकी तरह शंख धारण करनेवाला है अर्थात् विष्णु
भगवान् भी शंख रखते हैं और समुद्र भी शंख रखता है तथा
मद झिरता हुवा हाथी वर्षते हुए बिजलीवाले वादलकी समान
है अर्थात् वादॉमसे भी जल बरसता है और हाथीमैसे भी
मदका जल परसता है इसके पूर्वाईमें उपमेयमें विशेषणको
अधिकता है और उत्तरार्द्धमें उपमानमें ॥६॥
- (११८) वाग्भटालंकार-परि० ४.. मुखं चंद्रमिवालोक्य देवाहादकरं तव ॥ कुमुदंति मुदाक्षीणि क्षीणमिथ्यात्वसं- पदाम् ॥६२॥ टीका-हे देव चंद्रम् इव आहादकरं तव मुखम् आलोक्य क्षीणमिथ्यात्वसंपदाम् अक्षीणि मुदा कुमुद ति इत्यन्वयः ॥ आहादकरम् आनंदजनकं क्षीण मिथ्यात्वसंपदा क्षीणा मिथ्यात्वस्य संपत् संपत्ति येषां तेपाम् अक्षीणि नेत्राणि मुदा हपेण कुमुदंति कुमुदानी- व आचरंति इत्यर्थः अत्रोपमानोपमेययोः लिंग- भेदः ॥२॥ अर्थ-हे देव चंद्रमाके समान आनन्दकारकं आपके मुखको देखकर क्षीण होगई है मिथ्यापनेकी संपदा जिनकी उनके नेत्र हर्पसे कुमोदनीके समान प्रकाशित होते भये चंद्रफे दर्शनसे कुमदका प्रकाशित होना युक्तही है यहां उपमेय और उपमानका लिंग दूसरा होनेसे भी उपमा है ॥ १२ ॥ निजजीवितेशकरजाग्रकृतक्षतपंक्तयः शुशुभिरे सुरते कुपितस्मरप्रहितवाणगण व्रजर्जराइव सरोजशः॥ ६३ ।। टीका--सुरते सरोजदृशः निजजीवितेशकरजाप्रकृत क्षतपंक्तयः कुपितस्मरप्रहितवाणगणत्रणजर्जरा इव शुशभिरे इत्यन्वयः॥ सुरते संगमे सरोजदृशः कमल सान्वय सं० टी० भाषाटीकासहित। (११९) नेत्रायाः निजजीवितस्य ईशः निजजीवितता भर्ता तस्य करजाप्रैः नखाग्रैः कृतानां क्षतानां पंचयः श्रे- णयः निजजीवितेशकरजाग्रकृतक्षतपंक्तयः कुपितस्म- रेण कुपितेन कामदेवेन प्रहिताः प्रेपिताः येवाणगणाः तेपावणाः तैःजर्जरा विदीर्णीभूताः इव शुशुभिरे अत्रा- पि उपमानोपमेययोः लिंगभेदः॥ ६३ ॥ अर्थ-संगमके समय कमल जैसे नेत्र वाली सुंदरीके (शरीर- पर) निज भर्ताके नखोंके अग्रभाग फरके फरी हुई जो क्षतोंकी पंक्ति (झरोटें ) हैं ये कुपित हुए कामदेव करके छोडे इए बाणोंके समूह उनके व्रणोंसे वौदीर्णके समान शोभाको प्राप्त होती है इसमें भी उपमेय पंक्ति स्त्रीलिंग है और उपमान जर्जर पुल्लिंग है इससे लिंग भेदमे भी उपमा हुई । ६३ ।। रुपका रूपकं यत्र साधम्यादर्थयोरभिदा भवेत्॥ समस्तं वासमस्तं वा खंडं वा खंडमेव वा॥६४॥ टीका--यत्र साधात् अर्थयोः अभिदा भवेत् (तत्) समस्तम् असमस्तं वा खंडम् अखंडं वा रूप के ( भवेत् ) इत्यन्वयः ॥ साधात् समानधर्म- वात् अर्थयोः उपमानोपमेययोः अभिदा अभेदः भेद राहित्यमित्यर्थः । भिदा स्त्री द्वैधीकरणे (इति शन्द- स्तोम. ) समस्तं समासवटितम् असमस्तं समास:
(१२०) वांग्भटालंकार-परि० । भिन्नं खंडं न्यूनाधिकत्वयुक्तम् अखंडं पूर्ण समम् एवं चतुर्विध रूपकमित्यर्थः कुवलयानंदे तु रूपकं पचिं निरूपितम् ॥ ६४॥ अर्थ-जहां साधर्म्यसे उपमान और उपमेयका भेद नहीं हो ( अर्थात् उपमेय और उपमानफा सावयव तद्रूप वर्णन किया जावे ) तो उसे रूपक अलंकार कहते हैं वह चार प्रकारका होता है (१) समस्त अर्थात् समासघटित (२) असमस्त समासके विना फिर यह भी दो प्रकारका है एक अखंड पूर्ण या सम दूसरा खंड न्यूनाधिक (चंद्रालोको कारिकाओंके अनुकूल कुवलयानंदमें रूपकके छः भेद लिखे हैं अभेद और तद्रूप इन दोनोंके फिर अधिक न्यून और सम तीन तीन भेद किये हैं जैसे अभेदसम अभेदन्यून अभेद अधिक तपसम तद्रूपन्यून तप अधिक)॥ ६४॥ कीणीधकारालकराजमाना निवडतारा- स्थिमणिः कुतोपि॥ निशापिशाचीव्यचर- द्दधाना महात्युलूकध्वनिफेत्कृतानि॥६५॥ टीका-कीणीधकारालकराजमाना निवद्धतारास्थि- मणिः महात्युलूकध्वनिफेत्कृतानि दधाना निशापि- शाची कुतः अपि व्यचरत् इत्यन्वयः ॥ कीर्णः संकीर्णः अंधकारः स एव अलका केशकल्पः तेन राजमानाः निबद्धाः मालाकारेण परिहिताः तारा एवं अस्थीनि तानि एव मणयः यस्याः उलूकानां ध्वनयः एव फूत्कृतानि फूत्काराणि तानि महान्ति एव दधाना 4 सान्वयसं० टी० भापाटीकासहित । (१२१) ना कुतः अपि कस्मादेशात् आगत्य व्यचरत् परि- वभ्राम अत्र उपमेयभूतायाः निशायाः उपमानभूतया -पिशाच्या साधात् सम्यगाख्यानात् अभेद एव निशापिशाची इत्युपमेयोपमानयोः समस्तत्वातं समस्तम् अखंडरूपकम् ॥६५॥ अर्य-संचित हुवा जो अंधकार वेही हुई अलक लढा रूप जिस करके शोभित और मालाकार जो तारागण वही हुए हड्डी रूप मणि जिसके और उल्लुवोंकी ध्वनि वही है बडी फुकार शब्द उसे धारणकरनेवाली पिशाची राक्षसी रूप रात्री कहींसे (आकर ) विचरती भई यहां निशा उपमेय और पिशा- ची उपमान दोनोंका सावयव एक रूप होनेसे रूपक अलंकार दुवा और निशापिशाची यह उपमेय और उपमान एकत्र समा. सांत होनेसे समस्त और सावयव साधर्म्य वर्णन करनेसे अखंड हुवा ॥६५॥ संसार एव कूपः सलिलानि विपत्तिजन्म दुःखानि ॥ इह धर्म एव रज्जुस्तस्मादु- द्वरति निर्मग्नान् ॥६६॥ टीका-संसारः कूप एव इह विपत्तिजन्मदुःखानि सलिलानि धर्म एव रज्जुः निर्मग्नान् नस्मात् उद्धरति इत्यन्वयः॥ विपत्तेः जन्मनश्च दुःखानि तानि एव इह संसारकूपे सलिलानि निर्ममान् निश्चयेन मग्नान् (१२२) वाग्भटालंकार-परि०४. तस्मात् संसारकूपात् धर्मः रज्जुः एव उदरति उद्धार करोतीत्यर्थः अत्र संसारस्य उपमेयभूतस्य कूपेन उप मानभूतेन असमस्तेन साधात् अभेद इति अस- मानम् अखंडरूपकम् ॥६६॥ अर्थ-संसार कूप है अर्थात् कूपरूप है इसमें विपत्ति जन्म इनके दुःखही जल रूपहै धर्म रूप रज्जुही डूबे हुवोंको इसमें से निकालतीहै यहां संसार और कूप ये दोनों तथा धर्म और रज्नु ये दोनों पद समाससे मिलकर समासांत एक पद रूप नहीं हुए किन्तु जुदे जुदे हैं इससे असमस्त अखंड रूपक हुवा ॥६६॥ अधरं मुखेन नयनेन रुचि सुरभित्वमज- मिव नासिकया॥ नवकामिनीवदनचन्द्र- मसः तरुणा रसेन युगपन्निपपुः॥ ६७॥ टीका--तरुणाः रसेन नवकामिनीवदनचंद्रमसः अधरं मुखेन रुचिं नयनेन अजम् इव सुरभित्वं नासिकया युगपत् निपपुः इत्यन्वयः ॥ तरुणाः युवानः रसेन रागेण नवा नवोढा कामिनी नवका- मिनी तस्याः वदनमेव चंद्रमाःतस्य नवकामिनीवदन चंद्रमसः अधरम् ओष्टं मुखेन रुचिं कांति नयनेन अजं कमलमिव सौगंध्यं युगपत एकस्मिन् एव काले निपपुः पिवंति स्म अत्र उपमेयस्य वदनस्य सर्वप्रबंधप्रतिपादितो धर्मः उपमानस्य चंद्रमसस्तु सान्वयसं० टी० भापाटीकासहित । (१२३) कश्चिन्नैव क्षतिः खंडं नवकामिनीवदनचंद्रमस इति समस्तं च अतः समस्तं खंडं रूपकमिति ॥ ६७॥ अर्थ-तरूण पुरुप प्रेमसे नई कामनाके मुखरूपक चंद्रमाके होठोंको मुखसे और उसकी कांतिको नेसि और कमल जैसी सुगन्धको नासिकासे एकही समयमें पान करते भये यहां उप- मेय वदनका सब प्रबंधसे प्रतिपादित धर्म और उपमानभूत चंदमाके सावयव धर्म एकत्र पूर्णतया वर्णन नहीं होनेसे खंड हुवा और वदनचंद्रमस: यह समासांत है इससे समस्त खंड रूपक अलंकार हुवा ॥ ६७ ॥ ज्योत्स्नया धवलीकुर्वन्नुर्वी सकुलपर्व- ताम् ॥ निशाविलासकमलमुदेति स्म नि शाकरः॥ ६८॥ टीका-निशाविलासकमलं निशाकरः सकुलपर्व- ताम् उर्वी ज्योत्स्नया धवली कुर्वन् (सन् ) उदेति स्म इत्यन्वयः ॥ निशाविलासाय यत् कमलं निशावि- लासकमलं निशाकरः चंद्रः कुलपर्वतैः सह वर्तमानां सकुलपर्वताम् उर्वी पृथिवीं ज्योत्स्नया चंद्रिकया अत्र निशाविलासकमलं निशाकरः एतयोः उपमानो- पमेययोः लिंगपार्थक्ये असमस्तं खंडं रूपकम्॥६८॥ अर्थ-रात्रीका पिलास यमलरूप नो चंद्रमा है सो कुल. पर्वतों करके सहित पृथिवीको अपनी चाँदनी करके धौली (मुफेद ) करता हुवा उदय होरहा है पहा निशापिलासकमल (१२४) वाग्भटालंकार-परि०४. और निशाकर इन दोनों उपमान और उपमेयमें लिंगभेद है तथा समासांत एक पद रूप नहीं है और दोनोंके साधर्म्यका सावयव वर्णन भी एकत्र नहीं हुवा इससे असमस्त खंड रूपक अलंकार हुवा ॥ ६८॥ हस्ताग्रविन्यस्तकपोलदेशा मिथोमिल स्कंकणकुंडलश्रीः ॥ सिषेच नेत्रस्रवद- श्रुधारैर्दोःकंदली काचिदवश्यनाथा ॥६९॥ टीका-हस्तायविन्यस्तकपोलदेशा मिथोमिलत्कं. कणकुंडलश्रीः काचित्.अवश्यनाथा नेत्रस्रवदश्रुधारैः दो कंदली सिपेच इत्यन्वयः ॥ हस्ताने विन्यस्तः कपोलदेशः यया सा हस्तापविन्यस्तकपोलदेशा मिथः परस्परं मिलंती कंकणकुंडलयोः हस्तालंकार- कर्णालंकारयोः श्रीः शोभा यस्याः तथाभूता का चित्. अवश्यनाथा अवश्यः नाथो भर्ता यस्याः सा अस्वाधीनपतिका नेवाभ्यां स्रवद्भिः अश्रूणां धारैः धाराभिः दो कंदली दोर्भुज एव कंदली कदली तां सिपेच अभिपिक्तवती । अत्र समस्तं खंडं रूपकम् अत्रापि लिंगभेदः ॥ ६९॥ अर्थ--हस्तको अग्र अर्थात् हयेलीपर घर रक्खा है फपोल प्रदेश जिसने जिससे मिल गई है हायके कंकण और फानके कुंडलकी शोभा एकत्र जिसके ऐसी कोई अस्वाधीनपतिका अर्थात नहीं है वशमें पति जिसका ऐसी कांता नत्रोंसे झिरती सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (१२५) हुई अश्रु धारोंसे भुजारूप जो कंदली (केला) है उसे सींचती भई ( अर्थात् पतिअवश होनेसे शोकाकुल होकर हाथपर कमोल रखकर अश्रुपात करती भई जिससे हाथरूप कदलीका साँचना हुवा) इसमें भी दो और कंदली उपमेय और उपमानमें लिंग भेद है तथा समस्त है अस्तु यहां समस्त खंड रूपक है ॥ ६९ ॥ (रूपक लक्षण भाषा) दोहा-रूपक उपमिति वर्ण्यका, हो साधर्म्य अभेद । अथवा हो तद्रूप वश, न्यून अधिक सम भेद।।१।। (उदाहरण )विन सल.नरपति कल्पतरु, सबकी पूरतआश। तेज तरणि यशवंतका, निश दिन करत प्रकाश ॥ १॥ कीर्ति कौमुदी रावरी, जनमन करत हुलास । इंदरूप भूपालका, हो मताप अविनाश ॥२॥ इनमें प्रथम दोहेका पूर्वार्द न्यून अभेद और उत्तराई अधिक अभेदका उदाहरण है और दूसरे दोहेका पूर्वार्द्ध सम अभेदका उदाहरण है और उत्तराई तद्रूप समका उदाहरण है ।। प्रतिवस्तूपमा। अनुत्पत्ताविवादीनां वस्तुनः प्रतिवस्तु ना ॥ यत्र प्रतीयते साम्यं प्रतिवस्तूपमा तु सा ॥७०॥ टीका--यत्र इवादीनाम् अनुत्पत्ती वस्तुतः प्रति- वस्तुना साम्यं प्रतीयते सा तु प्रतिवस्तूपमा इत्य- न्वयः॥इवादीनां साधर्म्यव्यञ्जकानां वाचकशब्दानाम् अनुत्पत्ती अनुपादाने सति वस्तुनः उपमेयस्य प्रति- (१२६) वाग्भदालंकार-परि०४. वस्तुना उपमानेन साम्यं प्रतीयते सा प्रतिवस्तूपमा. लंकारः (साहित्यदर्पणे उक्तंच) “प्रतिवस्तूपमा सा स्यात् वाक्ययोर्गम्यसाम्ययोःगएकोपिधर्मः सामान्यो यत्र निर्दिश्यते पृथक् " ॥७॥ अर्थ-जहां इवादिक नहीं होकर वस्तु अर्थात् उपमेयकी प्रतिवस्तु उपमानभूत अन्यवस्तुसे पृथक् समता प्रतीत हो तो उसे प्रतिवस्तूपमा अलंकार कहते हैं ॥ ७० ॥ बहुवीरेऽप्यसावेको यदुवंशेऽद्धतोऽभव- त् ॥ किं केतस्यां दलानि स्युःसुरभीण्य- खिलान्यपि ॥७१॥ टीका-बहुवीरे यदुवंशे अपि असौ एकः अद्भुतः अभवत् किं केतक्याम् अखिलानि दलानि सुरभीणि स्युः इत्यन्वयः॥ बहुवीरे बहवो वीराःयस्मिन् । असो श्रीकृष्णः अद्भुतः असाधारणः किं केतक्यां केतकी गुल्मे आखिलानि समग्राणि दलाणि पत्रानि सुरभीणि सुगंधयुक्तानि स्युः अपितुन सर्वाणि पत्राणि सुरभीणि भवंतीत्यर्थः । अत्र इवादीनामनुपादानेपि यदुवंशस्य उपमेयभूतस्य उपमानभूतायाः केतक्या सह साम्यप्र- तीतेः प्रतिवस्तूपमालंकारः ॥ ७१ ॥ अर्थ-बहुत बीरवाले यदुवंशमें भी एक ये श्रीकृष्ण अद्भुत होते भये क्या केतकीके सभी पत्र सुगंधयुक्त होते हैं (अर्थात्
"
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (१२७)
सभी सुगंधयुक्त नहीं होते किंतु एक दो ही सुगंधित होते हैं)
यहां इव आदिक शब्द न होनेसे उपमेयभूत यदुवंशका उपमान
भूत केतकोसे पृथक् साधर्म्य होनेसे प्रतिवस्तूपमाअलंकारहवा १
(प्रतिवस्तूपमा ल० भापा) दोहा-जहां वस्तु प्रतिवस्तुका,
पृथक् साम्य दरसाव । प्रतिवस्तूपम ताहिको, फहत सुकविजन
नाव ॥ १॥ (उदाहरण) धनि वैदर्भा गुणनतें, राखे वश नल
भूप । कहा चांदनीकी कहैं, खेचत सिंधु अनूप ॥२॥
त्रांति ।
वस्तुन्यन्यत्र कुत्रापि तत्तुल्यस्यान्यव-
स्तुनः॥ निश्चयो यत्र जायेत भ्रांतिमान
स स्मृतो यथा॥७२॥
टीका-यत्र कुत्रापि अन्यत्र वस्तुनि तत्तुल्यस्य
अन्यवस्तुनः निश्चयो जायेत स भ्रांतिमान् स्मृतः
इत्यन्वयः॥ यथापदस्य अग्रिमेण सहोदाहरणसूच-
का संबंधः। वस्तुनि उपमेये तत्तुल्यवस्तुनः उपमानस्य
निश्चयः प्रतीतिः भ्रांतिमान् भ्रांतिनामालंकारः ॥७२॥
अर्थ-जहां कहीं अन्य वस्तुमें तत्तुल्य अन्य वस्तुका निश्चय
(मृतीति ) हो उसे भ्रांतिमान् अर्यात् भ्रांति अलंकार कहते हैं
(जैसे निम्न उदाहरण है)॥७२ ॥
उदाहरण प्राकृत ।
हेमकमलंतिवअणे णीलप्यलंतिनअणे-
पमुअच्छिकुममंति तुमहसिएनिवडति
भमराणं रिंगोली॥७३॥
(१२८) वाग्भटालंकार-परि०४.. टीका-( अस्य संस्कृतम् ) हेमकमलमिति वदने नीलोत्पलमिति लोचने प्रस्ताक्षि कुसुममिति हि तव हसिते निपतति भ्रमराणां श्रेणी ( अस्यान्वयः) हे प्रस्ताक्षि तव वदने हेमकमलम् इति लोचने नीलो- त्पलम् इति हसिते कुसुमम इति (भ्रांत्या) भ्रमराणां श्रेणी निपतति इत्यन्वयः ॥ भ्रांत्या इति शेपेणा न्वयः॥ हेमकमलं स्वर्णपंकजम् अत्र वदनादिषु हेम कमलादीनां प्रांत्या प्रमाणां श्रेणीनिपतनात् भ्रांति- मान् अलंकारः ॥७३॥ अर्थ-हे विशाल नेत्र सुंदरी तेरे मुखमें सुवर्णके कमलको और नेत्रोंमें नीलकमलकी और हास्यमें पुष्पोंकी (भ्रांतिसे) भ्रमरोंकी पंक्ति आसक्त होकर उनपर पडती है यहां वदन आ- दिकोंमें स्वर्ण कमलादिककी भ्रांतिसे भ्रमर पंक्तिका पड़ना कहा इससे भ्रांतिमान् अर्थात् भ्रांति अलंकार हुवा ॥ ७३ ॥ (भ्रांतिलक्षण भाषा) दोहा-जहां अन्यकी अन्यमें, भ्रांति भ्रांति सो जान । तव मुख पंकज मानके, भाराभ्रमत नदान॥१॥ आक्षेप । उक्तिर्यत्र प्रतीतिर्वा प्रतिपेधस्य जायते ॥ आचक्षते तमाक्षेपमलंकारं बुधायथा७४॥ टीका-यत्र प्रतिपेधस्य उक्तिः वा प्रतीतिः जायते बुधाः तम् अलंकारम् आक्षेपम् आचक्षते इत्यन्वयः।। यथा इति अग्रिमोदाहरणसूचकं प्रतिपेधस्य उत्तया , सान्वयसं० टी० भाषार्टीकासहित। (१२९) प्रतीत्या च वाशब्दात् प्रतिपेधस्य कैमर्थ्यात् आभा- सादपि आक्षेपालंकारः स्यात् ॥ ७॥ अर्थ-जहां प्रतिपेधको उक्ति ( कथन) हों अथवा प्रतीति हो तो उसे विद्वान् आक्षेप अलंकार कहते हैं और कई वा शब्दसे प्रतिपेवके कैमर्थ्य (आर्थात् अमुक क्या है ) तथा प्रतिपेधके आभाससे भी आक्षेप अलंकार होता है ऐसा कहते हैं ॥ ७ ॥ आक्षेपका उदाहरण । इंद्रेण किं यदि स कर्णनरेन्द्रसूनुरैरावते न किमहो यदि तदिपेन्द्रः ॥ दंभोलिना प्यलमयं यदि तत्प्रतापःस्वर्गोप्ययं ननु मुधा यदि तत्पुरी सा॥ ७५॥ टीका-यदि स कर्णनरेंद्रसूनुः (तदा ) इंद्रेण किम् अहो यदि तहिपेंद्रः (तदा) ऐरावतेन किम् यदि तत्प्र- तापः (तदा) दंभोलिनाप्यलम् ननु यदि सा तत्पुरी (तदा) अयं स्वर्गः अपि मुधा इत्यन्वयः ॥ कर्ण- नरेंद्रमनुः कर्णनृपतेः पुत्रः जयसिंहःदंभोलिना वज्रेण। दंभोलिः वज्रः (इतिशस्तो०) मुधा मिथ्या वृथा च अत्र प्रतिपेधस्य इंद्रादेः कैमर्थ्यात् आक्षेपा- लंकारः॥७९॥ अर्थ-यदि वह कर्णासह राजाका पुत्र (जयसिंह) है तब इंदसे क्या और जब उसका बडा हाथी है तब ऐरावत से क्या और जब उसकी प्रताप है तब पक्की आवश्यकता ही क्या है (१३०) वाग्भटालंकार-परि० ४. और जब उसकी नगरीहै तब स्वर्गभी यथाही साहै यहां प्रतिपेध इंद्रादिकके कैमर्थ्य (क्या ऐसा) होनेसे आक्षेपालंकार हुवा७५॥ यस्यास्ति नरकक्रोडनिवासरसिकं मनः॥ सोऽस्तु हिंसान्तस्तेयतत्परःसुतरांजनः७६ टीका-यस्य मनः नरककोडनिवासरसिकम् । अस्ति स जनः सुतराम् हिंसानृतस्तेयतत्परः अस्तु इत्यन्वयः ॥ नरकस्य कोडे निकटे निवासः स्थितिः तस्मिन् रसिकं नरककोडनिवासरसिकंहिंसा च अनृतं च स्तेयं च हिंसानतस्तेयानि तेषु तत्परः सुतराम् अतिशयेन ॥ ७६॥ अर्थ-जिसका मन नरकके बीच में निवास करनेका रसिक है वह मनुष्य अत्यंत हिंसा झूठ और चोरीमें तत्पर रहो यहां प्रति- पेध नरक क्रोड निवास तथा हिंसा स्तेयादिकी उक्ति होनेसे भी आक्षेप अलंकार हुवा ।। ७६ ॥ इच्छंति ये ण कित्तिं कुणंति करुणाकणं वि येण अ॥ तेधणजक्ख वणरा दिति धणं मरणसमये वि॥७७॥ टीका-( अस्य संस्कृतम् ) इच्छंति ये न कीर्ति कुर्वति करुणाकणमपि ये न च ते धनयक्षा व नराः ददति धनं मरणसमयेपि ( अस्यान्वयः)ये नराः कीर्ति न इच्छंति च ये करुणाकणम् अपि न कुवैति ते धनयक्षा इव मरणसमये अपि धनं ददति इत्य- न्वयः ॥धनयक्षा धनरक्षकाः व इवार्थे अन्ययः॥ व सान्वयसं० टी० भापाटीकासहित। (१३१) सादृश्ये (इति श० स्तो०) अत्र प्रतिषेधस्य प्रतीतिः तस्मात् आक्षेपालंकारः॥ ७७॥ अर्थ-जो कीर्तिकी इच्छा नहीं करते और जिनमें करुणा (दया) का भी लेश नहीं है वे मनुष्य यक्षकी भांत धनके रखवाले हैं मरनेके समय तो धन देहींगे अर्थात् औरके पास धन छोडही जावेंगे यहांपर धनके प्रतिषेधको प्रतीति होनेसे आक्षेप अलंकार हुवा ॥ ७७ ॥ . (आक्षेप ल० भाषा) दोहा-उक्ति होय प्रतिपेधकी, प्रतीति या आभास । या किमर्थ हो तो सुकवि, आक्षेपनु कहैं तास॥१॥ (उदाहरण प्रतीतिपर आक्षेपका) जो जग जस चाहत,नहीं, ना मन करुणा लेश । वे जन धन भरते समय, छोड जाहिं निःशेप ॥ २ ॥ (ग्रंथ बढ़नेसे आक्षेपके उदाहरण नहीं लिसे अन्यत्र देख लेना)॥ संशय व निश्चय । इदमेतदिदं वेति साम्यादबुद्धेहि संशयः॥ हेतुभिर्निश्चयः सोपि निश्चयान्तः स्मृतो यथा॥ ७८॥ टीका-साम्यात् एतत् इदं वा इदम् इति बुद्धेः संशयः ( संशयः ) स च हेतुभिः निश्चयांतः अपि निश्चयः स्मृतः इत्यन्वयः॥ यथापदमग्रिमोदाहरणा- थै साम्यात् सादृश्यात् इति बुद्धेः संशयः एतत् इदं वा इदं स संशयः संशयालंकारः हिमं संदेहालंकार- (१३२) वाग्भटालंकार-परि० ४. नामत्वेनापि वदंति हेतुभिः कारणैः निश्चयांतः निश्च- यरूपः स निश्चयः निश्चयनामालंकारः॥ ७८ ॥ अर्थ-समान भाव होनेसे यह पदार्थ वह है अथवा यह है ऐसे बुद्धिका संशय हो तो वह संशयनामक अलंकार होताहै तथा इसका नाम कई “संदेह" अलंकार भी कहते हैं और जो कार- णोंसे निश्चयरूप हो जावे तो उसे निश्चय कहते हैं अर्थात् उसका नाम निश्चयालंकार होता है ।। ७८ ॥ संशयका उदाहरण। किं केशपाशः प्रतिपक्षलक्ष्म्याः किंवा प्रतापानलधूम एषः। दृष्ट्वा भवत्पाणि- गतं कृपाणमेवं कवीनांमतयःस्फुरति७९ टीका-भवत्पाणिगतं कृपाणं दृष्ट्वा कवीनां मतयः एवं स्फुरंति एपः किं प्रतिपक्षलक्ष्म्याः केशपाशः किं वा प्रतापानलधूमः इत्यन्वयः॥हे राजन् इति शेपः भवतां हस्तगतं कृपाणं खरं दृष्ट्वा सादृश्यात् कवीनां बुद्धिपु एवं संशयः संजातः किम् एप प्रतिपक्षलक्ष्म्याः प्रतिपक्षे या लक्ष्मी तस्याः अथवा प्रतिपक्षस्य शत्रो लक्ष्मीः स्त्री तस्याः केशपाशः करे गृहीत्वा आकृष्टः इति भावः । किंवा प्रतापानलस्य चूमः इति संशये संजाते सति संशयालंकारः॥ ७९ ॥ अर्थ हे राजन् आपके हायमें सग देसर करियोंकी बुद्धि इस प्रकार स्फुरने लगी ( अर्यात् सादृश्यतासे ऐसा संशय m सान्वयसं०टी० भाषाटीकासहित । (१३३) . कवियोंकी बुद्धिमें होने लगा कि क्या यह प्रतिपक्ष लक्ष्मीक या शत्रकी स्त्रीके केशपाश हैं (चोटी) है ( अर्थात् शत्रुकी स्त्रीकी चोटी पकड़ रक्खा है)या प्रतापरूप अमिका धूवाँ है इस प्रकार संशय होनेसे संशय अथवा संदेह नामक अलंकार हुग७९।। इंद्रः स एष यदि किं न सहस्रमणां ल- क्ष्मीपतिर्यदि कथं न चतुर्भुजोऽसौ॥ आः स्यंदनध्वजधृतोद्धरताम्रचूडः श्रीकर्णदेव नृपसूनुरयं रणाग्रे॥८॥ टीका-स एप यदि इंद्रः (तदा) अक्षणां सहस्रं किं न असौ यदि लक्ष्मीपतिः तदा चतुर्भुजः कथं न आः अयं रणाग्रे स्पंदनध्वजधृतोद्धरताम्रचूडः श्री कर्णदेवनृपसूनुः इत्यन्वयः॥ स्पंदनस्य रथस्य ध्वजे धृत उद्धरः उत्कटः तामचूडः कुक्कुटः येन सस्यंदन ध्वजधृतोडुरताम्रचूडः श्रीकर्णदेवनृपस्य सूनुः पुत्रः श्रीजयसिंहदेवोस्ति अवहेतुभिः संशयस्य निराकरणात् निश्चयालंकारः॥८॥ अर्थ-यह यदि इंद्र है तो इसके हजार नेत्र क्यों नहीं हैं और जो लक्ष्मीपति विष्णु हैं तो ये चतुर्भुग क्यों नहीं हैं ओह (विदित हुवा) यह रणके अगाडी रथको ध्वनामहै उन कुक्कुट निसके ऐसा यह श्रीकर्णदेव रानाका पुत्र जयसिंहदेव है यहां फारणांसे संशय निहत होकर निश्चय होगया इससे निश्चपा. लंबार इवा ।। ८०॥
(१३४) वाग्भटालंकार-परि०४.
(संशय और निश्चय लक्षण भापा ) दोहा-जह समताते
बुद्धिमें, संशय संशय जान । कारणते निश्चित भये, निश्चय नाम
वखान ॥१॥(उदाहरण) तव मुख शशि या कमल है, कवि
मति होत हरान । कमल न निशि शशिइति न दिन, ताते श्री
फल मान ॥ २ ॥
दृष्टांतालंकार।
अन्वयख्यापनं यत्र क्रियया खतदन्व-
योः॥ तं दृष्टांतमिति प्राहुरलंकारमनी-
पिणः ॥ ८१॥
टीका-यत्र स्वतदन्ययोः क्रियया अन्वयख्यापन
तम् अलंकारमनीपिणः दृष्टांतम् इति प्राहुः इत्यन्वयः।।
स्वस्य वर्ण्यस्य उपमेयस्य तदन्यस्य उपमानस्य
दृष्टांतभृतस्य च अन्वयख्यापनं संबंधेन याथातथ्येन
कथनम् अलंकारमनीपिणः अलंकारशास्त्रस्य विद्वांसः
तं दृष्टांतं दृष्टांतनामकम् एव आहुः ॥ ८॥
अर्थ-नही वर्णनीय और टससे दुसरे टपमान या दृष्टान भृत-
पानिया चेष्टा गुण व्यापारादिमे मंबंध पूर्वक पायातव्य या
पयन हो ( अर्थात् जैसे यद येमे यह इत्यादि पयन हो) तो
टमे भलंगार शाबर माता विद्वान् लोग दृष्टांतनाम अरंगार
पहर्तहं ।। ८१॥
पतितानां संसर्ग त्यजंतु दूरेण निर्मला
गुणिनः ॥ इति कथयञ्चरतीनांहारः परि
हरति कुचयुगलम् ॥ ८२॥
सान्वपसं०टी० भापाटीकासहित । (१३५) टीका-हारः इति कथयन् (सन् ) जरतीनां कुच- युगलं परि हरति (इतीति किम् निर्मलाः गुणिनः पति-: तानां संसर्ग दूरेण त्यजंतु इत्यन्वयः ॥जरतीनां वृद्ध- स्त्रीणां स्तनयोः पतितत्वात् तत्र गुणवतो हारस्य च न शोभा इति तत्परिहारेण गुणिनां पतित संसर्ग- परिहारसाम्यप्रतीतेः दृष्टांतालंकारः॥८२॥ अर्थ-हार यह कहता हुवा वृद्धास्त्रियोंके कचाओंको परित्याग करता है कि निर्मल मुणियोंको पतितोंका संसर्ग दूरसेही छोड देना चाहिये (वृद्ध स्त्रियोंके कुच पतित होतेही हैं इससे निर्मल गुण (सूत्र ) वाला हार उनको त्यागता है ऐसेही निर्मल गुणि- योंको पत्तितीका संसर्ग छोड़ देना चाहिये) इसमें हारके पतित कुचपर शोभा नदेनेका दृष्टांत है इससे दृष्टांत अलंकार हुवा।।८२॥ ( दृष्टोत ल० भाषा) दोहा-वर्णनीय अरु अन्यका,यथातथ्य सम भाव। ताहि कहत दृष्टांत कवि, काव्यरसिक जननाव॥१॥ (उदाहरण) पतितोंके संसर्गकू, देतहँ गुणी विसार । वृद्ध कामिनी पतित फुच, निकट न सोहत हार ॥२॥ व्यतिरेक। केनचिद्यत्रधर्मेण योःसंसिद्धसाम्ययोः॥ भवत्येकतराधिक्यं व्यतिरेकः स उ- च्यते॥८३॥ टीका-यत्र द्वयोः संसिद्धसाम्ययोः केनचिद्धर्मण एकतराधिक्यं भवतिसः व्यतिरेकः उच्यते इत्यन्वयः॥ .
. (१३६) वाग्भटालंकार-परि० ४. - संसिद्धसाम्ययोः उपमेयोपमानयोः एकतरस्य द्वयो- मध्ये एकस्य उपमेयस्य उपमानस्य वा ॥ ८३ ।। अर्थ-जहां पर उपमेय अथवा उपमानक किसीधर्ममें (गुणा- दिमें) अधिकता हो तो उसे व्यतिरेक अलंकार कहते हैं ॥८३॥ अस्वस्तु पौरुषगुणाजयसिंहदेव पृथ्वी- पतेर्मगपतेश्च समानभावः ॥ किं वेकतः प्रतिमटाः समरं विहाय सद्यो विशंति वनमन्यमशंकमानाः॥८४॥ टीका-जयसिंहदेवपृथ्वीपतेः च मृगपतेः पौरुप- गुणात् समानभावः अस्तु अस्तु किंतु एकतःप्रतिभटाः सद्यः समरं विहाय वनं विशति अन्यम् अशंकमानाः (वनं विशति) इत्यन्वयः ॥ एकतः पृथ्वीपतेः प्रति- भटा विपक्षिणः अन्यं सिंहम् अशंकमानाः निः- शंकिताः अगणयंतः संत एव वनं विशंतीति अत्र सिंहात् राज्ञः पौरुपाधिक्यात व्यतिरेकालंकारः अयं-जयसिंहदेव राना और मृगपति (सिंह) का पौरप गुणमें समान भाव हो तो हो किंतु एक (राना)स टसंके प्रतिपक्षी शीमही युद्ध भूमिको छोड फर पनमें छिपनाते हैं और सिंहकीशंका न फरके उसके प्रतिपक्षी वनमें घुसे रहते ही हैं यहाँ रानाक पराक्रमसे सिंहके पराकमसे अधिकता होनेम व्यति रेक अलंकार है ।। ८१ ॥ .
1 सान्वयसं०टी० भापाटीकासहित (१३७) (भापा व्यतिरेकालं० ) दोहा-उपमेयरु उपमानके, धर्म वीच कोइ एक । आधिक होय जहँ ताहिकों, कहत कवि व्यतिरेक॥ १॥ (उदाहरण) बलमें नृप अरु सिंह सम, नृपते पर रण छोड । के. हरित निःशंकहो, शत्रु जान वन भोड ॥२॥ अपह्नुति । नैतदेतदिदं ह्येतदित्यपह्नववपूर्वकम् ॥ उ च्यते यत्र सादृश्यादपहनुतिरियं यथा ८५ टीका-यत्र सादृश्यात् एतत् एतत् न हि एतत् इदम् इति अपह्नवपूर्वकम् उच्यते इयम् अपहनुतिः इत्यन्वयः॥ सादृश्यात् साम्यात् अपह्नवपूर्वकं प्रति- पेधपूर्वकम् अपह्नवः वस्तुनोऽसत्त्वेन कथनरूपकाप- लापः अपहनुतिः पदार्थासत्त्वे तत्साम्यत्वादपला- पोक्तिः ॥ ८५॥ अर्थ-जहां समानताके आभाससे यह वह नहीं है किंतु यह वह है ऐसा निषेधारोप पूर्वक वर्णन किया जाये तो उसे अपह्न- ति अलंकार कहतेहैं । कुवलयानंदमें इसके ६, छह भेद लिखेहैं शुद्धापनुति हेत्वपनुति पर्यस्तापनुति चातापति छेफाप- इनुति और ऊतपापहनुति ।। ८५ ॥ नैतन्निशायां शितसुच्यभेद्यमंधीकृता- लोकनमंधकारम् ॥ निशागमप्रस्थितपं- चवाणसेनासमुत्थापित एप रेणुः ॥ ८६ ॥ टीका-एतत् निशायां शितमूच्यभेद्यम् अधीकृता लोकनम् अंधकारं न एपः निशागमप्रस्थितपंचवाण .
(१३८) वाग्भटालंकार-परि० १. सेनासमुत्थापितः रेणुः इत्यन्वयः॥ शितसूच्या तीक्ष्ण सूच्या अभेद्यं भेत्तुमशक्यम् अतिगाढमिति भावः अधीकृतम् आलोकनं दर्शनं येन तथाभूतम् अंधकार तिमिरं न किं तहि निशायाः आगमे प्रस्थिता प्रच- लिता पंचवाणस्य कामस्य सेना तया समुत्थापितः रेणुः धूलिः एव अत्र अंधकारप्रतिपेधे रेणुसमारोपात् अपनुतिरलंकारः॥८६॥ अर्थ-रात्रीमें यह तीक्ष्ण सुईसेभी अभेद्य (घोर) और जिसमें कुछ दीसे नहीं ऐसा अंधकार नहीं है किंतु रातफे आगममें प्रयाण करती हुई जो कामदेवकी सेनाद उससे उठी हुई धूलिहै यहां अंधकारका निषेध करके असत्त्व काम देवकी सेनासे उठी हुई धलिया आरोपण करनेसे अपहनुति अलंकार हुवा ॥ ८६ ॥ (भापा अपहनुतिल ) दोहा-अपहनुती सादृश्यते, यह पह नहिं यह मान । व्योम न घन विरहनि विरह, अमि धूम इह जान ॥१॥ तुल्ययोगिता। उपमेयं समीकर्तुमुपमानेन योज्यते ॥ तुल्येककालक्रियया यत्र सा तुल्ययो- गिता ॥८७॥ यत्र तुल्यैककालक्रियया उपमानेन उपमेयं समी कर्तुं योज्यते सा तुल्ययोगिता इत्यन्वयः ।। तुल्या एककाल किया तया समीकत सादृश्यी कर्तु (प्रस्तुता सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित (१३९) प्रस्तुतानां चैकधर्माभिसंबंधात्तुल्ययोगिता इतिसा- हित्यदर्पणे)॥ ८७॥ अर्थ-जहां तुल्य एक काल क्रिया करके उपमानका उपमेयसे समभाव करनेको योग किया जाये तो उसे तुल्ययोगिता कहते हैं (साहित्यदर्पणमें प्रस्तुत और अप्रस्तुतका एकधर्मीय संबंध होनेसे तुल्ययोगिता हो ऐसा लक्षण लिखाहै ।। ८७ ॥ तमसालुप्यमानानां लोकेऽस्मिन्साधुव. म॑नाम् ॥ प्रकाशनाय प्रभुता भानोस्तव च दृश्यते ॥ ८८॥ टीका-अस्मिन् लोके तमसालुप्यमानानां साधुव- म॑नां प्रकाशनाय भानोः तव च प्रभुता दृश्यते इत्य- न्वयः॥ तमसा अंधकारेण मोहेन च भानोः सूर्यस्य तव राज्ञश्च प्रभुता प्रतापः अत्र उपमेयस्य प्रस्तुतस्य च राज्ञः उपमानेन अप्रस्तुतेन सूर्येण एककालक्रिय- यासमीकरणातल्ययोगिता स्यात् ॥ ८८॥ अर्थ-इस लोकमें अंधकार या मोह करके लुप्त हुए साधु मागाके प्रकाश करनेको सूर्य अथवा आपका प्रताप ही दिखाई देता है यहां उपमेयभूत राजा और उपमानभूत मूर्यका प्रताप दर्शन रूप एक कालीय तुल्य क्रियासे समीकरण होनेसे तुल्य योगिता अलंकार हुवा ॥८॥ (भाषा) दोहा-जहां वर्ण्य टपमानकी, समता हो इक्ठौर । तुल्ययोगिता ताहि फो, कहत कवी करगौर ॥१॥(जैसे) तमलो-
(१४०)
वाग्भटालंकार-परि०४.
-
पित शुभ मार्गके, जगमें करण प्रकाश । प्रकट प्रताप नरेश कर,
या रवि किरण विकाश ॥२॥
उत्प्रेक्षा।
कल्पना काचिदौचित्याद्यत्रार्थस्य सतो-
न्यथा ॥ द्योतितेवादिभिः शब्दैरुत्प्रेक्षा
सा स्मृता यथा॥८९॥
टीका--सतः अर्थस्य औचित्यात् यत्र इवादिभिः
शब्दैः काचित् अन्यथा कल्पना घोतितासा उत्प्रेक्षा
स्मृता इत्यन्वयः ।। ततोर्थस्य विद्यमानार्थस्य औचि-
त्यात् योग्यत्वात् काचिदन्यथा कल्पना अन्यप्रका-
रेण काचित्संभावना इवादिभिः शब्दैः इव मन्ये शंके
इत्यादिभिः योतिता लक्षिता सा उत्प्रेक्षा (कुवल
यानंदे तु वस्तूत्प्रेक्षा हेतूत्प्रेक्षा फलोत्प्रेक्षाभेदात्रियो
त्प्रेक्षा कथिता)॥ ८९॥
अर्थ-जहां विद्यमान स्पष्ट अर्थकी उचित भावसे इवादि
शब्द करके कोई और कल्पना द्योतन करी जाये तो उसे उत्प्रेक्षा
अलंकार कहतेहैं चंद्रालोककी कारिकानुसार कुवलयानंदमें इसके
तीन प्रकार लिखे हैं वस्तूत्प्रेक्षा हेतूमेक्षा फलोत्प्रेक्षा ॥ ८९॥
नभस्तले किंचिदिव प्रविष्टाश्चकाशिरे चं-
द्ररुचिप्ररोहाः ॥ जगद्विलित्वा हसतः
प्रमोदाइंता इव ध्वांतनिशाचरस्य ॥१०॥
:
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (१४१)
टीका--नभस्तले किंचित् इव प्रविष्टाः चंद्ररुचि-
प्ररोहाः जगत् गिलित्वा प्रमोदात् हसतः ध्वांतनिशा-
चरस्य दंता इव चकाशिरे इत्यन्वयः ॥ नभस्तले
आकाशे किंचिदिव अल्पमात्रं यथा स्यात्तथा प्रविष्टाः
प्रवेशं गताः चंद्ररुचिप्ररोहाः चंद्रकिरणांकुराः जगत्
गिलित्वा संसारं ग्रसित्वा प्रमोदात् हात हसतः दास्यं
कुर्वतः ध्वांतनिशाचरस्य ध्वांतम् अंधकार एवं निशा-
चरः राक्षसः तस्य दंता इव चकाशिरे दीप्तिं गतवंतः
अत्र सतः चंद्रकिरणांकुरस्य हसतो निशाचरस्य
दंतरूपेण कल्पना इत्युत्प्रेक्षा इयं तु वस्तूत्प्रेक्षा॥९०॥
अर्थ-आकाशमं थोड़ेसे निकसे हुए चंद्रमाकी किरणोंके अंकुर
ऐसे हैं जैसे संसारको प्रसकर आनंदसे हँसते हुए अंधकार रूप
राक्षसके दांतही हों यहां विद्यमान अर्थवाले चंद्र किरणांकुरको
हँसते हुए अंधकार रूप राक्षसके दांत कल्पना करनेसे उत्प्रेक्षा
अलंकार हुवा (यह वस्तु उत्मेक्षा है इसी तरह जहां हेतुकी अन्य
कल्पना हो वहां हेतु उत्प्रेक्षा और जहां फलकी अन्य कल्पना हो
वही फल उत्प्रेक्षा समझलेनी)॥९०॥
(भाषा) दोहा-रचित अर्थ जहँ युक्तिसे, और कल्पना होय।
उत्प्रेक्षा तिहँ कहत हैं, वस्तु हेतु फल जोय॥ १ ॥
(उदाहरण) तिय उर दोइ उरोनको, कनक लता फल जान।
तीखे नैन कटाक्षको, पुष्पवानके वान ॥२॥ कठिन धरन पर
धरनते, सुंदरि तो पग लाल । तव गति समता लहनकों, सेवत
कमल मराल ॥ ३ ॥
(१४२) वाग्भटालंकार-परि०१. अर्थातरन्यास । उक्तसिद्ध्यर्थमन्यार्थन्यासो व्याप्तिपुरः सरः॥ कथ्यतेऽथोतरन्यासः श्लिष्टोऽश्लिष्ट- श्च स हिधा॥९१॥ टीका-उक्तिसिद्धयर्थ व्याप्तिपुरःसरःअन्यार्थन्यासः (स) अर्थातरन्यासः कथ्यते स च श्लिष्टः अश्लिष्टः द्विधा इत्यन्वयः॥ उक्तसिद्धयर्थ कथितस्य प्रामाण्याथै व्याप्तिपुरःसरः युक्तिपूर्वकः अन्यार्थन्यासः अन्यस्य अर्थस्य विन्यासः श्लिष्टः श्लेपसहितः अश्लिष्टः श्लेप- रहितः ।। ९१॥ : अर्थ-जहां कहे हुए वाक्यकी सिद्धि के लिये युक्तिपूर्वक अन्य अर्थका उपयोग किया जाये तो उसे अर्थातरन्यास अलंकार कहते हैं वह दो प्रकारका होता है एक श्लेप पूर्वक दूसरा लेप रहित ॥ ९१॥ शोणत्वमक्ष्णामसिताब्जभासां गिरां प्र- : चारस्त्वपरप्रकारः ॥ वभूव पानान्मधुनो वधूनामचिंतनीयो हि सुरानुभावः ॥९२॥ टीका--मधुनः पानात् वधूनाम् असिताजभासाम् अक्षणां शोणत्वं तु गिरां प्रचारः अपरप्रकारः बभूव हि सुरानुभावः अचिंतनीयः इत्यन्वयः ॥ मधुनः मद्यस्य मधुररसस्य वा पानात् वधूनां सुंदरीणाम् सान्यपसं० टी० भापाटीकासहित । (१४३) असिताजभासां भीलोत्पलच्छवीनाम् अक्ष्णा नेत्राणां शोणत्वं रक्तत्वं तु पुनः गिरा वाचां प्रचारः प्रयोग अपरप्रकारः अन्यथाभूतः हि युक्तोयमर्थः सुरानुभावः सुराया मदिरायाः अनुभावः अथवा सुराणां देवानाम् अनुभावः प्रभावः अचिंतनीयः दुर्भावनीयः मधुर- रसस्य पानभोजनानंतरं यत्र कुत्रचिद्गमनेन सुकुमा- रेषु देवानामावेशो भवेदिति लोकोक्तिः मधुनः पाना- नंतरम् अक्ष्णां शोणत्वमित्यादिचिह्नः सुरानुभावः अचिंतनीय इत्यत्र श्लेपवशेन अर्थातरन्यासालं- कारः॥ ९२॥ अर्थ-मधु ( मद्य ) अश्या मधुर रस पीनेके पीछे सुंदरियों के नीलोत्पलसरीखे नेत्र लाल होगये और वाणीका प्रचार भी अन्य प्रकारका होगया सो सुरानुभाव सुरा मदिरा जिसका प्रभाव अथवा सुर देवता उनका अनुभाव प्रभाव दुर्भावनीय होताही है यहां मद्यपान जनित नेत्रोंकी लाली आदि फर्थनमें युक्ति पूर्वक देवानुभावका श्लेप रूपसे अर्थातरन्यात किया जानेसे अर्थातर- न्यास अलंकार हुवा मद्यपानके पीछे नेत्र लाल होना आदि मद्यका प्रभाव होताही है तथा मधुर रस खा पीकर जहां तहां जानेसे सुकुमार (नाजुक) मनुष्योंके देवादिका आवेश होनाना लोकोक्ति है ही इसीसे श्लेपपूर्वक अर्थात्तरन्यास होगया ।। ९२ ।। श्लेपरहित अर्थातरन्यास। शुंडादडैः कंपिताः कुंजराणां पुष्पोत्सर्ग पादपाश्चारु चक्रुः ॥ स्तव्धाकाराः किं (१४४) वाग्भटालंकार-परि० ४. प्रयच्छंति किंचित्क्रांता यावन्नोडतै:- तशंकम् ॥ ९३ ॥ टीका-कुंजराणां शुंडादंडैः कंपिताः पादपाः चार पुष्पोत्सर्ग चक्रुः स्तब्धाकाराः यावत् उद्धतैः वीतशंकं (यथा स्यात्तथा) नआक्रांताः (तावत) किं किंचित् प्रयच्छंति (न प्रयच्छंतीत्यर्थः) इत्यन्वयः ॥ कुंज- राणां गजानां शुंडादंडैः शुंडाघातैः पादपाः वृक्षाः चारु शोभने यथास्यात्तथा पुष्पोत्सर्ग पुष्पाणाम् उत्सर्गः त्यागः तम्, स्तब्धाकाराःसंबद्धहृदयाः कृपणा इत्यर्थः यावत् उद्धतेः महद्भिः निःशंकं न आक्रांताः तावत् किमपि न प्रयच्छंतीति अत्र पूर्वपदद्वयस्योक्त- स्याग्रेतनपवयेन अन्यार्थन्यासरूपेण सिद्धिर्वर्णिता अतोऽश्लिष्टार्थातरन्यासः ॥ ९३॥ अर्थ-हाथियोंके झुंडापातसे कंपित हुए वृक्ष यथायोग्य पुप्पों- का उत्सर्ग (त्याग) करते हैं क्योंकि जड (कृपण) मनुष्य जब तक प्रबलमनुष्य फरके निःशंक आक्रांत नहीं होता (दवाया नहीं जाता) तब तक क्या वह कुछ भी देता है अर्थात् कुछ नहीं देता यहां पहले दोपादों के कथनकी सिद्धिकेलिये पिछले दो पादोंका अांतर न्यास किये जानेसे श्लेप रहित अर्थारन्यास अलंकार हुवा ।। ९३ ॥ (भाषा) दोहा-उक्त सिद्धि हित होत जहूँ, अन्य अर्थ वि- भ्यास । श्लेपाश्लेप प्रकारसे, दो अतिरन्यास ॥ १॥ (उदा.
सान्षयसं० टी० भापाटीकासहित । हरण) मधु पीये राते नयन, तीखे वैन बनावा नवलवधूकी विकल छवि, छायो सुरानुभाव ॥ १॥ हस्ति शुंड आहत तरू, देतह सुमन विसाराआंट लगे पर कृपणं जन, कौडी देत उधार ॥२॥ समासोक्ति। उच्यते वक्तुमिष्टस्य प्रतीतिजनने क्षम- म् ॥सधर्म सा समासोक्तिरन्योक्तिर्वा- भिधीयते ॥९४॥ टीका-इष्टस्य प्रतीतिजनने क्षमं वक्तुं सधर्मम् उच्यते सा समासोक्तिः वा अन्योक्तिः अभिधीयते इत्यन्वयः ॥ इष्टस्य विवक्षितार्थस्य प्रतीतिजनने क्षम प्रतीत्युत्पादने समर्थ सधर्म समानधर्मम् अन्यत् वस्तु उच्यते सा समासोक्तिः अथवा अन्योक्तिः अभिधीय- ते कथ्यते ॥ ९४॥ अर्थ-वर्णन करने योग्य पदार्थकी प्रतीति उत्पादन करने- वाले समानधर्मी अन्य पदार्थका वर्णन किया जवि तो उसे समासोक्ति अथवा अन्योक्ति अलंकार कहते हैं ॥ ९४ ॥ मधुकर मा कुरु शोकं विचर करीरदुम- स्य कुसुमेपु॥ धनतहिनपातदलिता कथं सा मालिती प्राप्यते ॥ ९५॥ टीका-हे मधुकर शोकं मा कुरु करीरद्रुमस्य कुसु- मेषु विचर घनतुहिनपातदलिता सा मालती कथं ७ वाग्भटालंकार-परि०४. प्राप्यते इत्यन्वयः ॥ घनतुहिनपातदलिता घनश्च असौ तुहिनपातः हिमपातः तेन दलिता विनष्टा सा मालती कथं प्राप्यते कथमपि न प्राप्यते इत्यर्थः ॥ अत्र विवक्षितस्य मालतीकुसुमस्य विनष्टस्य प्रतीतये तत्सधर्मस्य अन्यत् वस्तुनः करीरकुसुमस्य कथन- त्वात् समासोक्तिरन्योक्तिरलंकारो वा ॥ ९५ ॥ अर्थ-हे भ्रमर तू सोच मत कर कैरके वृक्षोंके पुष्पोंपर ही विचर क्योंकि विशेष पाला ( शीत ) पडनेसे विनष्ट हुई वह मालती कैसे प्राप्त हो सक्ती है । यहां विवक्षित मालतीके विनष्ट हुए पुष्पकी प्रतीति के लिये समानधर्मी करीर(कैर ) के पुष्पों- का कथन होनेसे समासोक्ति अलंकार हुवा इसे ही अन्योक्ति भी कहसक्ते हैं ॥ ९५ ॥ चिंतयति न चूतलतां याति न जाति न केतकी क्रमते॥कमललताभग्नमना मधु- पयुवा केवलं कणति॥९६ ॥ टीका-कमललताभग्नमना मधुपयुवा चूतलतां न चिंतयति जातिं न याति केतकी न क्रमते केवलं कणति इत्यन्वयः॥ कमललतया पभिन्या भग्नं मनः यस्य तथाभूतः मधुपयुवा चूतलताम् आम्रलतां जाति मल्लिकां न क्रमते न अभिगच्छति किंतु केवलं कण- ति तामप्राप्य रौतीत्यर्थः (श्लोकोयं प्रक्षिप्तः)॥९६|| अर्थ- कमललता अर्थात् पमिनीकें विना भम हो रहाहै मन जिसका ऐसा तरुण भ्रमर आमको लताका चितवन नहीं करता
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (१५७)
और चमेलीकी तरफ भी नहीं जाता तथा केतकीके पास भी.
नही फिरताहै किनु पद्मिनीको न पाकर केवल रोताही है यह
श्लोक क्षेपक है कई पुस्तकोंमें नहीं है ॥ ९६ ॥
(भापा ) दोहा-वर्णनीय जहँ वस्तुको, करण समर्थ प्रतीत।
कया जाय साधर्म कछु, समासोक्ति यह रीत ॥१॥(उदाहरण)
विचर फरीरज कुसुम पर, अलि चितित मत होपातुहिन विनष्टा
मालती, किसविध पावत तोय ॥२॥
विभावना।
विना कारणसद्धावं यत्र कार्यस्य दर्श-
नम् ॥ नैसर्गिकगुणोत्कर्पभावनात्सा वि-
सावना ॥१७॥
टीका-यत्र कारणसद्भावं विना नैसर्गिकगणोत्कर्ष
भावनात् कार्यस्य दर्शनं सा विभावना इत्यन्वयः ॥
नैसर्गिकगुणः स्वाभाविकगुणः तस्य उत्कर्पः अति-
शयत्वं तस्य भावनात् यत्र कारणासत्वे कार्यस्य दर्शनं
भवेत्सा विभावना विभावनालंकार इत्यर्थः ॥ ९७।।.
अर्थ-जहां कारणके विना हुए ही स्वाभाविक गुणोत्कर्षकी
भावनासे कार्यका होना प्रगट हो तो उसे विभावना अलंकार
कहते हैं ।। ९७ ॥
अनध्ययनविहांसो निर्द्रव्यपरमेश्वराः।
अनलंकारसुभगाः पातु युष्मानिने-
श्वराः॥९८॥
(१४८) वाग्भटालंकार-परि०४, टीका-अनध्ययनविद्वांसः निर्द्रव्यपरमेश्वराः अन- '. लंकारसुभगाः जिनेश्वराः युष्मान् पातु · इत्यन्वयः ॥ अनध्ययनविद्वांसः अध्ययनवर्जिताः विद्वांसः ज्ञान- वतः निद्रव्यपरमेश्वराः नास्ति द्रव्यं येषां तथाभूताः परमेश्वराः ऐश्वर्यसंपन्ना इत्यर्थः अनलंकारसुभगाः अलंकाराभावे भूपणासत्वेपि सुभगाः शोभना इत्यत्र अध्ययनादिकारणाभावेपि विद्वत्तादिकार्यदर्शनाद विभावनालंकारः ॥९८॥ अर्थ-विनाही पढे विद्वान् (ज्ञानी) और विनाही द्रव्य के ऐश्वर्यसंपन्न और विनाही अलंकारोंक सुभग ऐसे जिनेश्वर श्री ऋपभदेव तुम्हारी रक्षा करो यहां अध्ययनादि कारणके विनाही विद्वत्तादि कार्योका होना सिद्ध है इससे विभावना अलंकार हुवा ॥ ९८ ॥ (भाषा) दोहा-विन कारण कारज जहाँ, कहि विभावना तास । तप शर विन लांग नृपति, होत शत्र सब नास ॥१॥ दीपक । आदिमध्यांतवत्यैकपदार्थेनार्थसंगतिः ॥ वाक्यस्य यत्र जायेत तदुक्तं दीपकं यथा ॥ ९९॥ टीका-यत्र आदिमध्यांतवत्यैकपदार्थेन वाक्यस्य अर्थसंगतिः जायेत तत् दीपकम् उक्तम् इत्यन्वयः ॥ यथा उदाहरणसूचकम् । आदिवतिना मध्यवर्तिना -- Ve सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (१४९) अंतवर्तिना एकेनैव पदार्थेन क्रियारूपेण कारकरूपेण वा वाक्यस्य अर्थस्य संगतिः॥ ९९ ॥ अर्थ-जहां आदिवर्ती या मध्यवर्ती या अंतवर्ती किसी एक पदार्थ (क्रियारूप या कारकरूप) से वाक्यके अर्थकी संगति होय तो उसे दीपक अलंकार जानो ॥ ९९ ॥ जगुस्तव दिवि स्वामिन् गंधर्वाः पावनं यशः॥किन्नराश्च कुलाद्रीणां कंदरेषु मुहु- र्मुहुः ॥ १०॥ टीका-हे स्वामिन् तव पावनं यशः गंधर्वाः दिवि किन्नराः कुलाद्रीणां कंदरपु मुहुर्मुहुः जगुः इत्यन्वयः॥ अब जगुः इति आदिगतं क्रियापदम् उभयोर्वाक्ययो- मध्ये समन्वितम् अतः दीपकालंकारः॥ १० ॥ अर्थ-हे स्वामिन् आपके पवित्र यशको गंधर्ष स्वर्गमें और किन्नर कुलपर्वतोकी कंदराओमें वारंवार गान करते भये यहां जगुः अर्थात् गाते भये यह आदिगत क्रियापद दूसरी जगह भी समन्वित होता है इससे दीपक अलंकार हुवा ॥१००॥ विराजते तमिस्राणि धोतंते दिवि तार- काः॥विभांति कुमुदश्रेण्यःशोभते निशि दीपकाः ॥ १०१॥ टीका--तमिश्राणि विराजते तारका दिवि द्योतते कुमुदश्रेण्यः विभांति दीपकाः निशि शोभते इत्य- (१५०) धाग्भटालंकार-परि०४. न्वयः । अत्र पृथक् पृथक् क्रियातिरेकेऽपि पदार्थ- स्त्वेक एव नार्थभेदः अतो दीपकालंकारः॥ १०१ ॥ अर्थ-अंधेरे विराजतेहैं आकाशमै तारे चमकते हैं कुमुद शो- • भित हो रहेहैं और दीपक रातमें शोभायमान होरहे हैं यहां पर यद्यपि क्रियापद अनेक हैं तो भी सबका अर्थ एकसाही है इससे दीपक हुवा ॥१०१॥ (दीपकालं. भाषा) दोहा-दीपक एकपदार्थसे, अर्थ संग- ती होय। गावत यश दिवि मेरु, मयु अरु किन्नर सोय॥ १॥ अतिशयालंकार । वस्तूनां वक्तुमुत्कर्षमसंभाव्यं यदुच्यते॥ वदंत्यतिशयाख्यं तमलंकार खुधा यथा ॥ १०२॥ टीका-वस्तूनाम् उत्कर्षे वक्तुं यत् असंभाव्यम् उच्यते बुधाः तम् अतिशयाख्यम् अलंकारं वदंति इत्यन्वयः॥ (यथा इति उदाहरणसूचकम् ) वस्तूनां पदार्थानाम् असंभाव्यम् असंभवात्मकम् अर्थस्य वक्तुम् असंभाव्यं यत्रोच्यते सोतिशयालंकारः॥१०२॥ अर्थ-अर्थको टकर्पताके वर्णन फरनेको जहाँ असंभाष्य वचन कहे जाये तो उसे पंडित अतिशयालंकार कहते हैं।१०२।। त्वदारितारितरुणीश्वसितानिलेन संयू- च्छितोर्मिपु महोदधिषु क्षितीश ॥ अंत- . सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (१५१); लुंठगिरिपरस्परशृंगसंगघोरारवैर्मधुरि- पोरपयाति निद्रा॥ १०३ ॥ टीकाहे क्षितीश ! त्वदारितारितरुणीश्वसितानि. लेन संमूच्छितोर्मिघु महोदधिषु अंत ठगिरिपरस्पर शृंगसंगघोरारवैः मधुरिपोः निद्रा अपयाति इत्य- न्वयः॥ त्वया दारिता निहता ये अरयः शत्रवः तेपा तरुण्यः कामिन्यः तासां श्वसितानिलेन निःश्वास- वातन संमृच्छिताः ऊर्मयः कल्लोला येषां तथाभूतेषु महोदधिषु समुद्रेषु अंतर्जुठंतः इतस्ततः चलंतः ये गिरयः पर्वताः तेपां परस्परं श्रृंगांणां संगःसंघर्पःतस्य घोराःप्रचंडाः आरवाः शब्दाः तैः मुररिपोः मुरारेः विष्णोः समुद्रे शयितस्येति भावः निद्रा अपयाति निर्गच्छतीत्यर्थः अत्र राज्ञो यशः प्रतिपादयितुं शत्रुव- निताश्वसितेन संमूच्छितोर्मिसमुद्रेषु लुठत्पर्वतश्रृंग- संगशब्देन विष्णोनिद्राभंगादिकम् असंभाव्यकथनम् अतएव अतिशयालंकारः॥ १०३ ॥ अर्थ-हे राजन् आपके मारे हुए शत्रवोंकी स्त्रियोंकी निश्वास- वायु फरके समुद्रोंकी तरंग बढ़ जानेपर उसके भीतर लुटते हुए पहाडोंकी चोटियोंके संघर्षके प्रचण्ड शब्दसे समुदमें सोते हुए विष्णु भगवान्की निद्रा खुल गई यहाँ राजाकी कीर्तिके बहानेके- लिये शत्रुवोंके खियोंकी श्वासपायुसे समुदकी तरंग बढ़ना और उसके भीतर पहाडोंका लुढकना और उनके परस्पर टक-
(१५२) : वाग्भटालंकार-परि०४.
रानेके प्रचंड शब्दसे विष्णुकी निद्रा खुलना इत्यादिक असंभाव्य
कथन होनेसे अतिशयालंकार हुवा ॥ १०३ ॥
एकदंडानि सप्त स्युर्यदि छत्राणि पर्व-
ते ॥ तदोपमीयते पार्श्वमूर्ध्नि सप्तफणः
फणी ॥ १०४॥
टीका-यदि. पर्वते सप्त छत्राणि एकदंडानि स्युः
तदा पार्श्वमूर्ध्नि सप्तफणः फणी उपमीयते इत्यन्वयः ॥
पार्थः पार्श्वनाथः॥ १०४॥
अर्थ-पदि पर्वतपर सात छत्र एक दंडवाले हों तो पार्श्वनाथके
शिरपर जो सात फणोंवाला सर्प है उसकी उपमा दी जासक्ती
है यहां पार्श्वनाथकी फीर्तिके उत्कर्षके लिये सात छत्रोंको एक
दंड होना इत्यादि असंभाव्य कथन होनसे अतिशयालंकार
हुवा ॥ १०४॥
(भाषा) सोरठा-वस्तु बडाई हेत, असंभाव्य वर्णन जहाँ ।
तेहि अतिशय कहि देत, काव्य रसिक जे अति निपुण ॥ १ ॥
(उदाहरण ) दोहा-तव रिपु तिय श्वासा पयन, चलित सिंधु
गिरि शृंग । संघर्षणके शन्दसे, विष्णु नींद भइ भंग ॥२॥
हेतु।
यत्रोत्पादयतः किंचिदर्थ कर्तुः प्रकाश्य-
ते ॥ तद्योग्यतायुक्तिरसी हेतुरुक्तो बुधे-
र्यथा ॥ १०५॥
सान्वयसं० टी० भापाटीकासहित । (१५३ )
टीका--यत्र किंचित् अर्थम् उत्पादयतः कर्तुः यो-
ग्यतायुक्तिः प्रकाश्यते बुधैः असौ हेतुः उक्तः
इत्यन्वयः ॥ यथाशब्दस्तृदाहरणसूचकः।हेतुनामा-
लंकारः॥ १०५॥
अर्थ-जहां कोई अर्थ उत्पादन करनेवाले कर्ताकी योग्यताको
युक्ति प्रकाश करी जाये तो उसे विद्वान् लोग हेतु अलंकार
कहते हैं ॥ १०५॥
प्राकृत उदाहरण ।
जुव्वण समओम्मत्ता तत्ता विरहेण कु-
गडू णाहस्स॥ कंठभ्यंतरघोलिदमहररसं
वालिया गीअम्॥ १०६॥
टीका--(अस्य संस्कृतम्) यौवनसमयोन्मत्ता तप्ता
विरहेण करोति नाथस्य कंठाभ्यंतरघोलितमधुरस्वरं
बालिका गीतम् ॥ इति यौवनसमयोन्मत्ता नाथस्य
विरहेण तप्ता बालिका कंठाभ्यंतरघोलितमधुरस्वरं
गीतं करोतीत्यन्वयः॥ यौवनसमयेन उन्मत्ता नाथस्य
पत्यः विरहेण तप्ता बालिका कंठाभ्यंतरे एव घोलितः
अनाविष्कृतः मधुरः स्वरः यस्य तत् गीतं करोति
गायतीत्यर्थः । अत्र कर्तृरूपायाः बालिकायाः गीत-
मिति उत्पादितोर्थः तस्य योग्यतायुक्तिः पत्युः वि-
रहः यौवनोन्मत्तता गीतस्य हेतुः अतो हेतुन मालं-
कारः॥ १०६॥
। (१५४) :. वाग्भटालंकार-परि० १. अर्थ-युवावस्थाके कारण उन्मत्त, पतिक विरहसे व्याकुल नव युवंती गलेके भीतर ही अस्पष्टशब्द फरती हुई गाती है १०६ विपसोदरो मृगांकः कृतांतदिशात आ- गतः पवनः ॥जातपलाशः शिखरी पथि- कान्मारयति ते त्रयः ॥१०७॥ टीका-विपसोदरः मृगांकः कृतांतदिशात आगतः पवनः जातपलाशः शिखरी ते त्रयः पथिकान् मारयंति इत्यन्धयः ॥ विपं सोदरः सहोदरः यस्य एवंभूतः मृगांकः चंद्रः कृतांतो यमः तदिशातो दक्षिणतः आगतः पवनः जातपलाशः जातानि पला- शानि पत्राणि यस्य तथाभूतः शिखरी वृक्षः अथवा जाता पले मांसे आशा अभिलापा यस्य तथाभूतः अत्र विपसोदरत्वाचंद्रस्य कृतांतदिशातः आगमनात् पवनस्य तथा पले वांछाजातत्वात् शिखरिणः मारक- त्वंयुक्तम् इतित्रयाणामेव पथिकमारणे योग्यताकारण- त्वात् हेतुरलंकारः॥ १०७॥ अर्थ-विप सहोदर चंद्रमा और यमकी दिशा दक्षिणकी ओर- से आया हुवा वायु और जातपलाश अर्थात् नवीन पत्र उत्पन्न हो जिसमें ऐसा वृक्ष अथवा जातपलाशका अर्थ प्राप्त हुई है पल अर्थात् मांसकी आशा अभिलाषा जिसको ऐसा वृक्ष ये तीन पथिकोंको मारक अर्थात् कामदेवकी बाधासे मृतप्राय करने वाले हैं इसमें विषका सहोदर अर्थात् समुद्रसेही विष ..
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (१५५) और चंद्र दोनों उत्पन्न होनेसे चंद्रमाको और यमकी दिशासे आनेसे दक्षिणकी पवनको और मांसकी अभिलापा ऐसे शिखरी- को मारकत्व ठीक ही है इससे इन तीनोंमें पथिक मारणकी योग्यताके कारण होनेसे हेतु अलंकार हुवा ॥ १०७ ॥ (भाषा) दोहा-जहाँ उत्पादक कर्तृकी, युक्त योग्यता होय । काव्यरसिक पंडित कहे, "हेतु" अलंकृत सोय ॥१॥(उदाहरण) विपसोदर शशि काल धन, यम दिशिवदत वयार। जातपलाश पलाश तरू, विरहिनि मारत चार ॥२॥ पायोक्ति । अतत्परतया यत्र कल्पमानेन वस्तुना। विवक्षितं प्रतीयेत पायोक्तिरियं यथा॥ १०८॥ टीका-यत्र अतत्परतया कल्पमानेन वस्तुना विवक्षितं प्रतीयते इयं पर्यायोक्तिः इत्यन्वयः ॥ यथा- पदं मुदाहरणार्थम् अतत्परतया न विवक्षितपरतया कल्पमानेनं वस्तुना अर्थेन विवक्षितं वलुमिष्टं प्रतीय- ते प्रतीति प्राप्यते सा पायोक्तिः पर्यायेण शब्देन अर्थेन च उक्तिः वचनं यत्र सा ॥ १०८॥ अर्थ-जो कुछ कहनेकी इच्छाहो उससे भिन्न वचनोंसे कथित वस्तुमें जहां विवक्षित वक्ताके अभीष्टकी प्रतीति हो जाये तो उसे पर्यायोक्ति अलंकार कहते हैं ।। १० ।। त्वत्सैन्यवाहनिवहस्य महाहवेपु. द्वेपः प्रभो रिपुपुरंथ्रिजनस्य चासीत् ॥ एकः (१५६) वाग्भटालंकार-परि० ४. खुरैर्वहुलरेणुततिं चकार तां संजहार पुन- रश्रुजलैस्तदन्यः ॥ १०९॥ टीका-हे प्रभो महाहवेषु त्वत्सैन्यवाहनिवहस्य च रिपुपुरंथ्रिजनस्य द्वेपः आसीत् एकः खुरैः बहुलरेणुतति चकार तदन्यः पुनःअश्रुजलैः तां संजहार इत्यन्वयः॥ सैन्यस्य वाहाः अश्वादयः तेपां निवहः समूहः रिपूणां पुरंथ्रिजनः स्त्रीजनः तस्य द्वेपः वैरं महाहवेषु महा- रणेषु एकः सैन्यवाहनिवहः खुरैः बहुलां रेणुततिं धूलि- विस्तारं चकार तदन्यः रिपुपुरधिजनः अश्रृजलैः तां रणुतति पुनः संजहार निराकार अब अविवक्षित- परतया विवक्षितस्य रिपुमारणस्य तत्पुरंथ्रिजनरुदनेन प्रतीतिःजायते अतः पर्यायोक्तिरलंकारः॥ १०९॥ अर्थ-हे प्रभो हे राजन् महासंग्राममें आपकी सेनाके अश्वा- दिकोंके समूहका और आपके शत्रुवोंकी स्त्रियोंका वैरही हो गया है क्योंकि एक ( आपकी सेनाके वाहनोंका समूह ) तो अपने खुरों (की रोंद) से (शत्रुके महलमें) रज फैलाता है और दूसरा (आपके शत्रुवोंका स्त्री समाज) अपने अश्रुपातोंसे उसे धो डालता है यहां वर्णित शब्दांसे पृथक रिपु स्त्रियोंके रुदनसे विवक्षित अर्थ शत्रुमारणकी प्रतीति हुई इससे पर्यायोक्ति अलं. फार हुवा ॥ १०९॥ (भाषा) दोहा-होय विवक्षित अर्थका, विना कहे विज्ञान । अन्य कल्पनासे तिसे, पायोक्ति वसान ॥ १॥ (उदाहरण) सान्वयसं०टी० भाषाटीकासहित । अरि तिय अरु तव दल तुरग, वैर परस्पर होत । ये खुर रज डारत महल, वे निज अँसुवन धोत ॥२॥ समाहित। कारणांतरसंपत्तिः दैवादारम्भ एव हि ॥ यत्र कार्यस्य जायेत तज्ज्ञायेत समा- हितम् ॥ ११०॥ टीका-यत्र कार्यस्य आरंभे देवात् एव कारणा- न्तरसंपत्तिाहि जायेत तत् समाहितंज्ञायेत इत्यन्वयः।। कारणांतरसंपत्तिः हेत्वंतरस्य संपत्तिः ॥ ११०॥ अर्थ-जहां कार्यके आरंभमें देवसे ईश्वर अथवा भाग्यसे स्वयं भी अन्य कारणकी संपत्ति पैदा हो जावे तो उसे समा- हित अलंकार कहते हैं ॥ ११० ॥ मनस्विनी वल्लभवेश्म गंतुमुत्कंठिता या- वदभूद् निशायाम्॥ तावन्नवांभोधरधीर- नादप्रबोधितः सौधशिखी चुकूज॥१११॥ टीका-मनस्विनी निशायां यावत् वल्लभवेश्म गंतु- म् उत्कंठिता अभूत् तावत् नवांभोधरधीरनादप्रबोधितः सौधशिखी चुकूज इत्यन्वयः॥ मनस्विनी मानवती कांता वल्लभस्य भर्तुः वेश्म गृहं गंतुम् उत्कंठिता गम- नाय उत्सुका अभूत् स्वमनसा एव मानं त्यका प्रिय- तमागारे गंतुमुद्यतेति भावः तावत् नवांभोघरस्य win- (१५८) - वाग्भटालंकार-पार० ४. नवमेघस्य धीरनादेन गंभीरध्वनिना प्रबोधितः सन् सौधशिखी अट्टालिकास्थितो मयूरः चुकूज शब्द कृतवानित्यर्थः अत्र मानत्यागे कर्यारंभे दैवात् मेघ- गर्जनस्य च मेघगर्जननादेन मयूरध्वनेश्च कारणांतर- संपत्तिदर्शनात् समाहितालंकारः मेघगर्जनं मयूर- ध्वनिश्च मानिनीमानभंगे कारणांतरम् ॥ ११ ॥ अर्थ-मानवती कामिनी रातको ( स्वयं मान त्यागनेकी इच्छा कर) पति के स्थान में जानेको तयार होना चाहती ही थी कि इसी अवसर पर नवीन प्राट ऋतुके मेघोंकी गर्जनाके शब्द होनेसे बोधित हुवा अटारी स्थित मोर कृकने लगा मेघोंका शब्द और मोरोंकी कूक अधिक कामोदीपक होनके कारण मान त्याग- में यह दैवी कारणांतरकी संपत्ति होनेसे समाहित अलंकार हुवा ॥११२ (भाषा) दोहा-जहां कार्य आरंभमें, देवा हेतु सहाय । अन्य आपही होय कछ, फहत समाहित ताय ॥ १ ॥(उदाहरण) जय कामिनि निज मान तजि, चलन चहत पति पास । तबहि मेघरव मोर धुन सुन अति बढ्यो हुलास ॥ २ ॥ परिवृत्ति । परिवर्तनमथेन सदृशासदृशेन वा ॥ जा- येतार्थस्य यत्रासौ परिवृत्तिर्यथा मता११२ टीका-यत्र सहशासदृशेन वा अयन अर्थस्य परिवर्त्तनं जायेत असौ परिवृत्तिः मता इत्यन्वयः ।। - सान्वयसै० टी० भाषाटीकासहित। (१५९) यथापदमुदाहरणार्थ सहशासहशेन समेन न्यूनाधि- केन वा परिवर्तनं विनिमयः ।। ११२॥ अर्थ-जहां समान अथवा न्यूनाधिक अर्थसे अर्थका पलटाहो- जावे तो उसे परिवृत्ति अलंकार कहते हैं ॥ ११२ ।। अंतर्गतव्यालफणामणीनां प्रभाभिरुद्धा- सितभूषु भर्तः॥ स्फुरत्प्रदीपानि गृहाणि मुक्त्वा गुहासु शेते त्वदरातिवर्गः॥११३ ॥ टीका-हे भर्तः त्वदरातिवर्गः स्फुरत्प्रदीपानि गृहाणिमुक्त्वाअंतर्गतव्यालफणामणीनांप्रभाभिःउद्भा- सितभूपु गुहासु शेते इत्यन्वयः ॥ हे भर्तः हे राजन् । त्वदरातिवर्गः तव अरातिवर्गः शत्रुसमूहः स्फुरतः प्रदीपाः येषु तथाभूतानि गृहाणिमुक्त्वा विहाय अंतर्ग- तानांव्यालानांसाणां येफणामणयः फणास्थमणयः तेपां प्रभाभिः कांतिभिः उद्भासिता भूः पृथिवी यासा तथाभूतासु गुहासु पर्वतकंदरासु शेते शयनं करोती- त्यर्थः अब स्फुरत्प्रदीपस्य गृहस्य व्यालमणिप्रभा- सितगिरिकंदरेण परिवर्तनम् अतः परिवृत्तिरलं- कारः॥ ११३॥ अर्थ-हे भतः ह रागन् आपके शत्रयों का समूह स्फुरित दीप. कोंसे संयुक्त अपने स्थानोंको छोडकर भीतर घुसे हुए सपाक
(१६०) वाग्भटालंकार-परि०४.
फोंकी मणियोंकी कांतिसे प्रकाशित भूमिवाली पर्वतोंकी गुफा-
में ( छुप कर ) सोते हैं यहाँ स्फुरित दीपयुक्त स्थानोंका
सर्पमणि कांति प्रकाशित गुफासे बदला होनेसे सादृश्य रूप परि
वृत्ति अलंकार हुवा ॥ ११३।।
दत्त्वा प्रहारं रिपुपार्थिवानां जग्राह यः सं.
यति जीवितव्यम् ॥ श्रृंगारभंगी च
तुदंगनानामादाय दुःखानि ददौ स:
दैव ॥ ११४ ॥
टीका-यः संयति रिपुपार्थिवानांप्रदारं दत्त्वा जीवि-
तव्यं जग्राह च तदंगनानां शृंगारभंगीम् आदाय सदैव
दुःखानि ददौ इत्यन्वयः ॥ संयति संग्रामे रिपुपार्थि-
वानां शचनृपाणां प्रहारं शस्त्रप्रहारं दत्त्वा जीवितव्यं
जीवितं जग्राह ग्रहणं चकार तदंगनानां शत्रुवनितानां
शृंगारभंगी शृंगारविन्यासम् आदाय गृहीत्वा दुःखानि
ददौ दत्तवान् (संयत् स्त्री. युद्धे, भंगीस्त्री. विन्यासेभेदे
चेति शब्दस्तोम०) अत्र प्रहारजीवनयोः शृंगारभंगी-
दुःखयोश्च असादृश्येन विनिमयः अतः असादृश्य-
परिवृत्तिरलंकारः॥११॥
अर्थ-वह राजा युद्धमें अपने वैरी नृपोंको (शस्त्रका ) प्रहार
देकर उनका जीवन लेता भया और शत्रुओंफी स्त्रियोंका शृंगार
छीनकर सदा उनको दुःख देता भया यहाँ प्रहार देकर पलटेमें
जीवन लेना और शृंगार लेकर पलटेमें दुःख देना पेसा वर्णन
होनेसे असादृश्य परिवृत्ति अलंकार हुवा ॥ ११ ॥
सान्वयसं० टी०,भाषाटीकासहित। (१६१) (भाषा) दोहा-जहां वस्तुका वस्तुसे,पलटा वर्णन होया परि- वृत्ती तिहि जानिये, असम और सम होय ॥१॥ (उदाहरण) प्यारे मोमन लेयके, दीनो दुःख अपार । जब तब मुख दीसे नहीं, देखू कमल निहार ॥२॥ यथासंख्य। यत्रोक्तानां पदार्थानामर्थाः संबंधिनः पुनः॥ क्रमेण तेन वध्यते तद्यथासंख्य- मुच्यते ॥ ११५॥ टीका--यत्र उक्तानां पदार्थानां संबंधिनः अर्थाः पुनः तेन क्रमेण बध्यते तत् यथासंख्यम् उच्यते इत्यन्वयः ॥ तेन क्रमेण पदार्थवर्णनक्रमेण ॥ ११॥ अर्थ जहां उक्त पदार्थोसे संबंधरखने वाले अर्थ फिर उसी क्रमसे बांधे जायें अर्थात् कहे जावें तो उसे यथासंख्य अलंकार कहते हैं ॥ ११५॥ मृदुभुजलतिकाभ्यां शोणिमानं दधत्या चरणकमलभासा चारुणा चाननेन ॥ विसकिसलयपद्मान्यात्तलक्ष्मीणि मन्ये विरहविपदि वैरात्तन्वते तापमंगे ॥ ११६॥ टीका-विसकिसलयपमानि मृदुभुजलतिकाभ्यां शोणिमानं दधत्या चरणकमलभासाच चारुणाआन- नेन आतलक्ष्मीणि मन्ये विरहविपदि वैरात् अंगे 'वाग्भटालंकार-परि० ४. तापं तन्वते इत्यन्वयः॥ विसानि मृणालानि किस- लयाः पल्लवाः पनानि कमलानि एतानि यथाक्रम आत्तलक्ष्मीणि विसानि भुजलतिकाभ्यां किसलया- नि शोणिमानं दधत्या चरणकमलभासा, पमानि चारुणा आननेन मुखेन आत्तलक्ष्मीणि आत्ता प्राप्ता लक्ष्मीः शोभा यः तथाभूतानि विसकिसलयपद्मानि मृदुभुजादीनां लक्ष्मीहरणवैरात् विहरविपत्तौ शरीरे तापं न निराकुवैति किंतु तापं कुर्वत्येव अत्र भुजल- तादीनां पदार्थानां संबंधिनः पदार्था विसादयः यथा- क्रम निबद्धाः अतो यथासंख्यमलकारः ॥ ११६ ॥ अर्थ-कमलकी नाल और पत्र तथा कमल इतने कोमल भुगल. तासे तया रक्तत्व धारणकिपे चरण कमलकी शोभासे तथा सुंदर मुखसे यथाक्रम सुंदरता माप्त करी है (छीन कर ली है ) इस पैरसे ही ये विरह विपत्तिमें अंगोंमें संताप करते है यहाँ विप्स (कमलनाल ) और किसलय (पर) तथा पद्म इनके संबंधी पदों मृदु भुजलता चरण कमल की कौति और सुंदर मुखका उसी क्रमसे यथासंख्य वर्णन है इससे यथासंख्य अलं- कार इवा ॥ ११६ ॥ (भाषा) दोहा-यथासंख्य संबंधि पद, होय यथाक्रम संग। मुंदरि मुसग फच निरखि, लजहि फन मृग भंग ॥ १॥ पिमालंकार। वस्तुनोर्यत्र संबंधमनौचित्येन केनचित्॥ असंभाव्यं वदेहक्ता तमाहर्विपमं यथा ॥
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित ।
॥११७ ॥ वेदं तव वपुर्वत्से कदलीगर्भ-
कोमलम् ॥ कायं राजमति ! क्लेशदायी
व्रतपरिग्रहः ॥ ११८॥
टीका-यत्र वक्ता वस्तुनोः असंभाव्यं संबंधं केन-
चित् अनौचित्येन वदेत् तं विपमम् आहुः इत्यन्वयः।।
(यथापदं वक्ष्यमाणोदाहरणसूचकम् ) वस्तुनोः द्वयोः
पदार्थयोः अनौचित्येन केनचित् औचित्यरहितेन
असंभाव्यं संभाव्यताविरुद्ध संबंधं वदेत् तं विपमं
विषमालंकारम् आहुः बुधा इति शेपः ॥ ११७ ॥
( अस्योदाहरणम् ) हे राजमति ! हे वत्से ! कदली-
गर्भकोमलम् इदं तव वपुः क क्लेशदायी अयं व्रतपरि-
ग्रहः क इत्यन्वयः ॥ कदलीगर्भकोमलं रंभागर्भवन्मू-
दुलं केशदायी दुःखदः व्रतपरिग्रहः उपवासादिग्रहण-
नियमः अत्र कोमलवपुपः कठिनव्रतपरिग्रहस्य च
अनौचित्येन संबंधः अतो विपमालंकारः ॥ ११८॥
अर्थ-जहां वक्ता दो वस्तुका असंभाव्य संबंध किसी अनु-
चित भावसे वर्णन करे तो कवि लोग उसे विषम अलंकार
कहते हैं ( इसका उदाहरण ) जैसे हे राजमति हे वत्से, फेलेके
अंतरगर्भके समान कोमल तुम्हारा शरीर तो कहां और केश-
दायक यह व्रत (उपवासादिका ) परिग्रह धारणानियम कहाँ
इसमें कोमल शरीरका कठोर व्रतादिसे असंभाव्य अनुचित भाव-
पूर्वक संबंध वर्णन होनेसे विपमालंकार हुवा ।। ११७ ॥ ११८ ॥
(१६४) वाग्भटालंकार-परि०४.
(भाषा) दोहा-विषम जहां संबंध हो, अनुचित दुइ इक
भोर। कित सिय अति कोमल वदन,कित वन गमन कठोर ॥१॥
सहोक्ति ।
सहोक्तिःसा भवेद्यत्र कार्यकारणयोःसह॥
समुत्पत्तिः कथाहेतोर्वक्तुं तज्जन्मशः
क्तिताम् ॥ ११९॥
टीका--यत्र कथाहेतोः तजन्मशक्तितां वक्तुं कार्य-
कारणयोः सह समुत्पत्तिर्भवेत् सासहोक्तिः इत्यन्वयः।।
कथाहेतोः कथननायकस्य तजन्मशक्तितां तयोः
कार्यकारणयोः जन्मशक्तिः तस्याः भावः ताम् अथवा
हेतोः कारणस्य तजन्मशक्तितां तस्य कारणस्य का-
र्यस्य वा उत्पत्तिशक्तितां वक्तुं कार्यकारणयोः सह
समुत्पत्तिकथा समकालसमुत्पादनवार्ता भवेत् सा
सहोक्तिः समुत्पत्तिः कथाहेतोः इत्यत्र समुत्पत्तिकथा-
हेतोः इति वा छेदः ॥ ११९ ॥
अर्थ-जहां कथाके हेतु अर्थात् कथनके नायक और कई
कारणके उत्पादन शक्तिके भावको कहने में कार्य और कारणकी
माथही उत्पत्ति हो तो उसे सहोक्ति अलंकार कहते हैं अथवा
कई समुत्पत्तिकथा इतना एकपद मानते हैं ।। ११९ ॥
आदत्ते सह यशसा नमयति सार्द्ध मदेन
संग्रामे। सह विहिपां श्रियाऽसौ कोदंड
कर्पति श्रीमान् ॥ १२० ॥
सावयासं० टी० भाषाकासहित । (१६५) टीका-असौ श्रीमान संग्रामे कोदंडं विद्विपा यशसा सह आदत्ते मदेन सादै नमयति श्रिया सह कर्पति इत्यन्वयः ॥ असौ श्रीमान् नृपः कोदंडं धनुः विद्विपां शत्रूणां यशसा सह आदत्ते गृहातीत्यादि अत्र कथा- नायकस्य राज्ञः तत्सामर्थ्य वक्तुं कोदंडकर्पणादिकं कारणं यशोग्रहणं मदापनयनं श्रीहरणं कार्य समकाल मेवोक्तम् इति सहोक्तिरलंकारः ॥ १२०॥ अर्थ-यह राजा संग्राममें धनुपको शत्रुवोंके यशके साथही लेता भया और उनके गर्वके साथही नवावता भया और उनकी लक्ष्मीके साथही खेचता भया यहां कथानायक राजाके प्रताप वर्णन करनेमें धनुप लेना नवाना खेंचना कारण शनुका यश लेलेना गर्व नवादेना और लक्ष्मी खंचना कार्य साथही हुए इससे सहोक्ति अलंकार हुवा ॥ १२० ॥ (भाषा) दोहा-सो सहोक्ति जहँ कार्य अरु, कारण सायहि होय । भूप राज्य यश सिंधु तक, साथहि पहुँचे दोय ॥ १ ॥ विरोध। आयातेहि विरुद्धत्वं यत्र वाक्ये नतत्त्वतः॥ शब्दार्थकृतमाभाति स विरोधः स्मृतो यथा॥ १२१॥ टीका-यत्र वाक्ये आयाते शब्दार्थकृतं विरुदत्वम् आभाति हि तत्त्वतः न स विरोधः स्मृतः इत्यन्वयः।। (यथापदमुदाहरणार्थः) आयाते तत्काले पठनश्रवण ।
वाग्भटालंकार-परि०४. मात्रे इत्यर्थः शब्दार्थकृतं शब्दकृतम् अर्थकृतं च विरु- इत्वम् आभाति दृश्यते परंतु तत्त्वतः वाक्यार्थतत्त्व- ज्ञानतः विरोधत्वं न भवेदितिस विरोधः विरोधालंकारः (एप विरोधाभासनानापि प्रसिद्धः )॥ १२१ ॥ अर्थ--जहां वाक्यमें तत्काल पठन श्रवण होतेही ती शब्दका अथवा अर्थका विरुद्धत्व जाना जावे परंतु वाक्यका तत्व जानने पर विस्थत्व न हो तो उसे विरोधालंकार कहते हैं (इसे विरो. धाभास भी कहते हैं)॥ १२१ ॥ दुर्वारवाणविभवेन सुवर्मणापि लोकोत्त- रान्वयभुवापि च धीवरेण ॥ प्रत्यर्थिए प्रतिरणं स्खलितेषु तेन संज्ञामवाप्य युयुधे पुनरेव जिष्णुः ॥ १२२ ॥ टीका--जिष्णुः प्रतिरणं प्रत्यर्थिषु स्खलितेषु तत्सु तेन दुर्वारवाणविभवेन सुवर्मणा च लोकोत्तरान्वय- भुवा धीवरेण अपि संज्ञाम् अवाप्य पुनरेव युयुधे इत्यन्वयः॥ जिष्णुः जयनशीलः वारवाणः कवचः दुर्वारबाणविभवः दुर्भगो निद्यावारबाणस्य विभवो यस्य स तेन सुवर्मणा सुष्टु वर्म कवचो यस्य सः सुवर्मा तेन यः निंद्यकवचः स सुवर्मा न भवति इति श्रवणमात्रे 'तु विरोधः वस्तुतस्तु दुवारवाणविभवन दुवारः वाण- स्य विभवो यस्य स तेन सुवर्मणा इत्यर्थः एवमेव लोकोत्तरान्वयभुवा ळोके उत्तरा श्रेष्टा अन्वयस्य वं-
सान्वयसं० दी भाषाटीकासहित । (१६७)
शंस्य भूः उत्पत्तिस्थानं यस्य सलोकोत्तरान्वयभूः तेन
श्रेष्टवंशोद्भवेन धीवरेण धीवरो निपादः यो धीवरः
स कथं श्रेष्टवंशोद्भवः इति तत्काले तु विरोधो दृश्यते
वस्तुतस्तु धीवरःधी बुद्धिः वराश्रेष्ठा यस्य स धीवरः
तेन सुबुद्धिना श्रेष्टवंशोद्भवेनेत्यर्थः अत्र तत्काले तु
शान्दिको विरोधो दृश्यते परंतु नतत्त्वतो विरोधः इति
विरोधालंकारः ॥ १२२॥
अर्थ-जिष्णु अर्थात् जयनशील कोई शूरवीर हरेक युद्धमें
प्रतिपक्षियोंके स्खलित (पराजित ) होनेपर उस दुर्वारवाण सुष
र्मा (खरावकवचवाले व अच्छे कवचवाले ) से तथा श्रेष्ठ वंश
में उत्पन्न होने वाले धीयर कहारसे भी चैतन्य होकर फिर युद्ध
करता भपा ( यहां पहले दुरिवाणविभवका अर्थ सराय
रुपचकै विभव वाला दीखनेसे सुवर्मा अच्छे वाला वही कैसे
हो यह विरोध दीखता है परंतु वाक्यार्थ विचारनेसे दुर्वारवाण
विभवका अर्थ दुर्निधार है वाणांका विभव जिसका ऐसा सुवर्मा
यह तत्वार्थ हुवा और वास्तविक विरोध नहीं रहा इसी प्रकार
अच्छे घंशमें होने वाला फिर धीवर कहार कैसे यह विरोध
प्रतीत हुवा परंतु वस्तुतः धीवरका अर्थ यौगिक शक्तिसे धी
बुद्धि है घर अर्थात् श्रेष्ठ जिसकी सो धीवर ऐसा अर्य करनेसे
वास्तविक विरोध नहीं रहा इससे यह शाब्दिक विरोधालंकार
हवा ॥ १२२ ॥
येनातं सिंहासनमारभूमृच्छिसि वि
नतानि ॥क्षिप्ता युधि शरपंक्तिः कीर्तिर्या-
ता दिगंतेषु ॥ १२३ ॥
(१६८) वाग्भटालंकार-परि०४. टीका-येन सिंहासनम् आक्रांतम् अरिभूभृच्छिरां- सि विनतानि युधि शरपंक्तिः क्षिप्ता कीर्तिः दिगंतेषु याता इत्यन्वयः ॥आरभूभृच्छिरांसि शत्रुनृपमस्त- कानि अत्र सिंहासने आक्रांते शिरसां नमनं तथा च शरपंक्तिक्षेपणे कीर्तेः दिगंतगमनम् इति अर्थे विरोधः॥ १२३॥ अर्थ-उस ( राजा) ने सिंहासनपर आक्रमण किया और शत्रु नृपोंके शिर नीचे होगये और युद्धमें बाणोंकी पंक्ति छोडी और कीर्ति दिशाबोंके अंत तक पहुंची इसमें सिंहासनपर आक्र. मण होना और नीचा होजाना पैरियों का शिर इसीतरह छोडना तो वाण और दिगंतमें पहुँचना कीर्ति ये दृष्टि मात्रके अर्थसे विरुद्ध प्रतीत होते हैं इससे यह आर्थिक विरोधालंकार हुवा१२३॥ (भाषा) दोहा-विरुद्ध शब्दार्थ जु लखे,सो विरोध कहि दीन। कमल नहीं यह कमलहै, जो मन करत मलीन ॥ १॥ अवसर । यत्रार्थातरमुत्कृष्टं संभवत्युपलक्षणम् । प्रस्तुतार्थस्य स प्रोक्तो बुधैरवसरो यथा ॥ १२४ ॥ टीका-यत्र प्रस्तुतार्थस्य उत्कृष्टम् अर्थातरम् उप- लक्षणं संभवति स बुधैः अवसरः प्रोक्तः इत्यन्वयः॥ यथापदमुदाहरणार्थ प्रस्तुतार्थस्य प्रकृतार्थस्य उप- लक्षणं समीपस्थस्य लक्षणं ज्ञानं भवति यस्मात् तदु- .
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (१६९) पलक्षणं स्वस्य तत्संबंधिनोऽन्यस्य च अजहत्स्वार्थया लक्षणया बोधकमित्यर्थः॥ १२॥ अर्थ-जहां प्रस्तुत अर्थका उत्कृष्ट अर्थातर उपलक्षण रूपसे हो तो विद्वान उसे अवसर अलंकार कहते हैं ॥ १२४ ।। स एप निश्चितानंदः स्वच्छंदतमविक्र- मः॥ येन नक्तंचरः सोपि युद्धे वर्वरको जितः ॥ १२५॥ टीका-स एप निश्चितानंदः स्वच्छंदतमविक्रमः नक्तंचरः वर्वरकः सःअपि येन युद्धे जितः इत्यन्वयः॥ निश्चितानंदः निश्चितः आनंदो यस्य अतिशयेन स्व- च्छंदः विक्रमो यस्य स स्वच्छंदतमविक्रमः नक्तं रात्री चरति इति नक्तंचरः वर्वरको वर्वरदेशीयो राक्षस:१२५॥ अर्थ-यह जो निश्चय आनंदवाला अर्थात् अखंड आनंदवाला और अत्यंत स्वच्छंद पराक्रमवाला रात्रिचर जो वर्वर (अर्थात् वर्वर देशका राक्षस अथवा मूर्ख) है उसेभी जिस राजाने युद्धमें, जीत लिया यहां रानाके जयमें शत्रके निश्चयानंद और स्वच्छं. दतमविक्रमत्व यह सस्कृष्ट अतिर उपलक्षणमें होनमे अवसरा. लंकार हुवा ॥ १२५ ॥ (भाषा) दोहा-सो अवसर ऊंचो अरथ, उपलक्षणमें होय । यह पर्वर अतिपल विभव, नृपने जीत्यो सोय ॥१॥ सार 1 यत्र निर्धारितात्सारात्सारंसारं तत- ८ (१७०) वाग्भटालंकार-परि०४. स्ततः ॥ निर्धार्यते यथाशक्ति तत्सार- मिति कथ्यते ॥ १२६ ॥ टीका-यत्र ततस्ततः निदारितात् सारात् यथा- शक्ति सारंसारं निर्यते तत् सारम् इति कथ्यते इत्यन्वयः ॥ निर्दारितात् निरूपितात् ॥ १२६॥ अर्थ-जहां निर्धारित सारमेंसे फिर फिर यथाशक्ति सार निकाला जाये तो उसे सार अलंकार कहते हैं ॥ १२६ ॥ संसारे मानुष्यं सारं मानुष्यके तु कौ- लीन्यम्॥कौलीन्ये धर्मित्वं धर्मित्वे चापि सदयत्वम् ॥ १२७॥ टीका-संसारे मानुष्यं मानण्ये कोलीन्यं कोलीन्ये धर्मित्वं धर्मित्वे अपि च सदयत्वं सारम् इत्यन्वयः।। मानुष्यं मनुष्यत्वं कोलीन्यं कुलीनत्वम् ॥ १२७॥ अर्थ-संसारमें मनुष्यता सार है और मनुष्यतामें कुलीनता सार है और कुलीनतामें धर्मिष्ठता सार है और धर्मिष्ठतामें भी दयायुक्त होनासार है यहां एकसे एकमें सार होनेसे सार अलंकार दुवा ॥ १२७ ॥ (भाषा) दोहा-सार एकका एकहो, सार ताहिको जान । गगमें सार समृद्धता, समृद्धतामें दान ॥ १ ॥ ( सवैय्या) रूपे की एक सुरूप संदूकसे सोनेकी और संदूक निकारी तामें धरी उजरीसी जरी लिपटी डिविया पुसरान सवारी । तासु निकार धरी एक फाँकार देखके लाज मरी छवि सारी ज्यों पट ओढत सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (१७१) हैं बहु मोल महा सठ लोग कुरूपनि नारी ॥ २ ॥ इसमें पहले सार और फिर दृष्टांतालंकार है। श्लेष। पदैस्तैरेव भिन्नैर्वा वाक्यं वक्त्येकमेव हि ॥अनकमथै यत्रासौ श्लेष' इत्युच्यते यथा। १२८॥ टीका-यत्र तेः एव पदैः भिन्नैः वा एक हि वाक्यम् एव अनेक अर्थ वक्ति असौ श्लेप इति उच्यते इत्यन्वयः ॥ यथापदमग्रिमोदाहरणार्थ वक्ति प्रति-. पादयति ।। १२८॥ अर्थ-जहाँ एकही वाक्य ( या शब्द) उन्ही यथारूप पदों फरके अथवा भिन्न पदों ( शब्द या वाक्यके खंडों) करके अनेक अर्थको प्रतिपादन करे तो उसे श्लेष अलंकार कहतेहैं१२८ आनंदमुल्लासयतः समंतात्करैरसंताप- करैःप्रजानाम् ॥ अस्योदये क्षोभमवा- प्य राज्ञोजग्राह वेलांकिल सिंधुनाथः१२९ टीका-अस्य राज्ञः उदये सिंधुनाथः किल क्षोभम् अवाप्य बेला जग्राह कीहशस्य राज्ञः असंतापकरः करः समंतात् प्रजानाम् आनंदम् उल्लासयतः इत्य- न्वयः ।। राज्ञः नृपतेः चंद्रस्य वा उदये अभ्युदयेच सिंधुनाथः सिंधुदेशाधिपतिः कश्चित् भूपः अथवा
(१७२) वाग्भटालंकार-परि०४.
समुद्रः क्षोभम् अवाप्य पराभवम् उद्धगं वा प्राप्य वेलां
तटभूमि मर्यादा वा जग्राह गृहीतवान् इत्यर्थः । असं.
तापकरैः सुखदायकैः करैः राज्यग्राह्यभागैः वा हस्तैः
किरणैः वा प्रजानां लोकानाम् आनंदम् उल्लासयतः
हर्पम् उत्पादयतः अत्र तैरेव पदैः श्लेपः ॥ १२९ ॥
अर्थ-इस राजाके अभ्युदय (प्रताप ) के समय सिंधु देश-
का राजा भी पराभव (हार) मान कर मर्यादाको प्राप्त होता
भया अर्थात् स्वाधीन नहीं रहा कैसा यह राजा है कि सुखदेने
वाले करों (लगानों) से अथवा हाथोंसे प्रजाका आनंद बढाने
यालाहै इन्ही पदोंके दूसरे अर्थ होकर और भी अर्थ हो सक्ताह
कि इस चंद्रमाके उदयके समय समुद्र क्षोभ उद्वेग को माप्त हो-
कर किनारों को.प्राप्त होता भया कैसा चंद्रमा है कि सुखदायक
शीतल किरणोंसे मनुष्योंके हर्पका बढ़ाने वालाहै । यहाँ
राजाका अर्थ राजा और चंदमा दोनों हो सक्ते हैं इसी भांत
उदयका अर्थ उदय और प्रताप तथा सिंधुनाथका अर्थ समुद्र
और सिंधु देशका राजा तथा क्षोभका अर्थ पराभव और उद्वेग
तथा वेलाका अर्थ तट और मर्यादा है इसी भांत करका अर्थ
रानाका लगान मसूल आदि या हाथ अथवा किरण है गिससे
राजा पक्षमें और चंद्रमा पक्षमें दोनों में उन्हीं पदोंक अर्थभेद-
से दो अर्थ होनेसे तत्पदश्लेष अलंकार हुवा ॥ १२९ ॥
भिन्नपदश्लेपका उदाहरण।
कुर्वन् कुवलयोल्लासं रम्या-भोजश्रिय
हरन् ॥ रेजे राजापि तचित्रं निशांते कां-
तिमत्तया ॥ १३०॥
सान्वपसं० टी० भाषाटीकासहित। (१७३ ) टीका-राजा कुवलयोल्लासं कुर्वन् रम्यां भोजश्रियं हरन ( सन् ) निशांते अपि कांतिमत्तया रेजे तत् चित्रम् इत्यन्वयः॥ राजा नृपःअथवा चन्द्रः राजपक्षे कुवलयोल्लासंकुः पृथिवी तस्याः वलयं मंडलं भूमंडल- मित्यर्थः तस्य उल्लासम् आनंदं कुर्वन् रम्यां भोजस्य नृपतेः श्रियं हरन् निशांते गृहमध्ये अपि कांतिमत्तया शोभावत्तया रेजे शुशुभे चंद्रपक्षे कुवलयानां कुमु- दानाम् उल्लास विकास कुर्वन् तथा रम्या या अंभो. जानां श्रीः तां हरन् निशाया अंतं निशांतं तस्मिन् निशांत निशायाः चतुर्थप्रहरे अपिकांतिमत्तया दीप्ति- मत्तया रेजे शोभाम् अवाप इति तत् चित्रम् (निशांत गृहं निशावसानं चेति श. स्तो.) अत्र भिन्नः भेदखंडं प्रातः पदैरनेकार्थस्य प्रतिपादनम् इति भिन्नपदैः श्लेपः अयं च सभंगश्लेप इत्युच्यते ॥ १३०॥ अर्थ-इस श्लोकमें पदोंके खण्डार्थ करनेसे दूसरा अर्थ होजाता है राना राजाको भी कहते हैं और चंद्रमाको भी कहते हैं ( १) राजा पक्षमें यों अर्थ है कि राजा फवलय कु पृथ्वी वलय मंडल अर्थात् भूमंडल को उल्लास (आनंद )करता हुवा और रमणीक भोज राजाको लक्ष्मी तिसको हरण करता हुवा कौतिके प्रभाषसे निशात (घर) में भी शोभाको प्राप्त होता भया यह विचित्र है और चंद्रमा पक्षमें कुवलय (फमोदनी) के समूहको उल्लास विकासित करता हुवा और रमणीक जो फमलोंकी शोभा उनको नष्ट करता हुवा कांतिमत्ता दीप्तिमत्तासे निशाके अंतमें भी (१७४) वाग्भटालंकार-परि० ४. चंद्रमा शोभाको प्राप्त होता भया यह विचित्र है पहाँ कुवलय कुमुद तथा भूमंडल और रम्यांभोज राजाकी श्री तथा रम्य अंभोजोंकी शोभा निशांत निशाका अंत तथा घर इस भांत खंडं करके पदोंके अनेक अर्थ होनेसे भिन्नपद लेप हुवा इसे सभंग श्लेप भी कहते हैं ॥ १३० ॥ (भाषा) दोहा-एक वाक्यके वीचमें, अर्थ अनेक जुहोय । भिन्न अभिन्न पदोन ते, श्लेप कहावत सोय॥१॥ (उदाहरण) करतपातरनमेंखुशी, नित उठ चाहें पान । तिनको सब संसारमें, भडवे कहत बखान ॥ इस उदाहरणके दोहेमें भड सुर वीर और भडवे पातरोक भडवे । समुच्चय । एकत्र यत्र वस्तूनामनेकपां निबंधनम् ॥ अत्युत्कृष्टापकृष्टानां तं वदंति समुच्च- यम् ॥ १३१॥ टीका-यत्र अत्युत्कृष्पापकृष्टानाम् अनेकेषां वस्तू- नाम् एकत्र निबंधनं (स्यात्.) तं समुच्चयम् वदंति इत्यन्वयः ॥ उत्कृष्टानां श्रेष्टानाम् उग्राणाम् अपंकृष्टा- नां निकृपानाम् ।। १३१॥ अर्थ-जहां अत्यंत श्रेष्ठ (ऊये ) या नीचे पदार्थोंका एकत्र निबंधन हो तो उसे समुच्चयालंकार कहते हैं ॥ १३१ ॥ अणहिल्लपाटलं पुरमवनिपतिः कर्णदेव- नृपसूनुः॥श्रीकलशनामधेयः करीचज- सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (१७५) गतीह रत्नानि ॥ १३२ ॥ ग्रामे वासो नायको निर्विवेकः कौटिल्यानामेकपात्रं कलत्रम् ॥ नित्यं रोगः पारवश्यं च पुंसामे- तत्सर्वं जीवतामेव मृत्युः॥ १३३ ।। टीका-अणहिल्लपाटलं पुरं कर्णदेवनृपसूनुः अव- निपतिः च श्रीकलशनामधेयः करी इह जगति रत्ना- नि इत्यन्वयः ॥ अणहिल्लपाटलं नामकं पुरं कर्ण- देवनृपसूनुः कर्णदेवराज्ञः पुत्रः श्रीजयसिंहदेवः अवनि- पतिः भूपतिः श्रीकलशनामा करी हस्ती इह जगति संसारे त्रीणि रत्नानि इत्यर्थः अत्र उत्कृष्टानां वस्तूनां निबंधनेन समुच्चयालंकारः ॥ १३२ ॥ ग्रामे वासः निर्विवेकः नायकः कौटिल्यानाम् एकपात्रं कलत्रं नि- त्यं रोगः च पारवश्यम् एतत्सर्व जीवताम् एव पुंसां मृत्युः इत्यन्वयः ॥ नायकः पतिः निर्विवेकः मूर्खः कौटिल्यानां कुटिलभावानाम् एकपात्रं कलत्रं पत्नी अत्र अपकृष्टानां वस्तूनां निबंधनेन समुच्चया- लंकारः॥ १३३॥ अर्थ-अणहिल्लपाठल नामक नगर और कर्णदेव नृपका प्रश्न जयसिंह देव राजा और श्रीकलश नामक हायी ये तीनों इस संसारमें रन हैं यहां श्रेष्ठ श्रेष्ठ वस्तुधाका एकत्र निबंध होनेस समुच्चयालंकार हुवा ।। १३२ ॥ छोटे ग्राममें वसना निविवेक
(१७६) वाग्भटालंकार-परि० ४.
(मूर्ख ) पति और अत्यंत कुटिलताकी खान स्त्री नित्य रोग
रहना तथा परवश होकर रहना ये सब जीते हुवे ही मनुष्योंकी
मृत्यु (के समान ) हैं यहां निकृष्ट वस्तुवोंका एकत्र निबंध होने
से समुच्चयालंकार हुवा ॥ १३३ ॥
(भाषा) दोहा-एक ठौर शुभ या अशुभ, बहु वस्तुनका होय ।
समावेश तिहिं कहतहैं, नाम समुच्चय होय ॥१॥ (उदाहरण) पूत
सुपूत सुशील तिय, सरल मित्र दृढकाय । स्थिरसंपत सुंदर
भवन, राम कृपाते पाय ॥ २. ॥ सुत कुपृत तिय कर्कशा धूर्त
मित्र थिर रोग। दुख दरिद्र कुलपापते, पावहिं पामर लोग॥३॥
अप्रस्तुतप्रशंसा।
प्रशंसा क्रियते यत्राप्रस्तुतस्यापि वस्तु-
नः॥ अप्रस्तुतप्रशंसांतामाहुः कृतधियो
यथा ॥ १३४॥
: टीका-यत्र अप्रस्तुतस्य अपि वस्तुनः प्रशंसा
• क्रियते तां कृतधियः अप्रस्तुतप्रशंसाम् आहुः इत्य-
न्वयः।। अप्रस्तुतस्य अप्रकृतस्य प्रस्तुतादन्यस्ये-
त्यर्थः कृतधियः कृता धीः बुद्धिः यः ते कृतधियः
पंडिताः॥ १३४॥
अर्थ-जहाँ अप्रस्तुत अर्थात् वर्णनीयसे अन्यकी प्रशंसा फरी
जावे तो उसे कृतबुद्धि पंडितजन अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार कहते
हैं प्रशंसाफा अभिप्राय यहां सत्मशंसा स्तुति और असत्मशंसा
निंदा दोनोंही होते हैं ॥ १३४ ॥
सान्वयसं०टी० भाषाटीकासहित । (१७७) स्वैर विहरति स्वैरं शेते स्वैरं च जल्प- ति ॥ भिक्षुरेकः सुखी लोके राजचौरभ- योज्झितः॥ १३५॥ टीका-स्वैरं विहरति स्वैरं शेते च स्वैरं जल्पति (अतः) लोके राजचौरभयोज्झितः एकः भिक्षुः सुखीइत्यन्वयः ॥ स्वैरं स्वातंत्रण राजचौरभयोज्झितः राजभयेन चौरमयेन च उज्झितः रहितः अत्र अप्र- स्तुतस्य संसारिणः असत्प्रशंसासूचनात् अप्रस्तुतप्रशं- सालंकारः॥ १३५॥ अर्थ-इस संसारमें राजा और चोर आदिके भयसे रहित एक भिक्षुकही सुखी है वह स्वतंत्रतासे विचरता है स्वतंत्रता पूर्वक सोता है और स्वतंत्रता पूर्वक बोलता है यहां अमस्तृत संसारी मनुष्यकी पराधीनतासे असत् प्रशंसाकी सूचनासे अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार हुवा ॥ १३५ ॥ भाषा ) दोहा-अप्रस्तुतकी स्तुतिभये, अप्रस्तुतप्रशंसा पनि जन पद इत धरनि रज, चढहि भूप अवतंस ॥१॥ एकावली। पूर्वपूर्वार्थवैशिष्टयनिष्ठानामुत्तरोत्तरम्।।अ- र्थानांया विरचना बुधैरेकावली मता१३६॥ टोका-पूर्वपूर्वार्थवैशिष्टयनिष्ठानाम् अर्थानाम् उत्तरोत्तरं या विरचना (सा) बुधैः एकावली मता ।
(१७८)
वाग्भटालंकार-परि०४.
इत्यन्वयः ।। पूर्वपूवार्थेभ्यः वैशिष्टयनिष्ठानां श्रेष्ठत्व-
निष्टानाम् अर्थानाम् वस्तूनाम् ॥ १३६॥
अर्थ-जहां पहले पहलेसे श्रेष्ठ श्रेष्ठ वस्तुवोंकी उत्तरोत्तर रचना
हो तो पंडित लोग उसे एकावली अलंकार कहते हैं । १३६ ॥
देशः समृडनगरो नगराणि च सप्तभू-
मनिलयानि ॥ निलयाः सलीलललना
ललनाश्चात्यंतकमनीयाः ॥ १३७॥
टीका-समृद्धनगरः देशः सप्तभूमनिलयानि नग-
राणि सलीलललना निलयाः अत्यंतकमनीयाललना
इत्यन्वयः ॥ सप्तभूमानिलया आवासगृहाणि यत्र
अनोत्तरोत्तरमर्थस्य वैशिष्टयात् एकावलीनामालं-
कारः॥ १३७॥
अर्थ-देश वही उत्तम है जहां समृद्ध बहुतसे नगर हो और
नगर वही हैं जहां बहुतसे सतमनले मकान हो मकान वही
जहां लीलायुक्त स्त्रीजन हों और स्त्रीजन यही जो अत्यंत
सुंदर हों यहाँ उत्तरोत्तर अर्थको विशिष्टतासे एकावली अलंकार
हुवा ॥ १३७॥
(भाषा) दोहा-उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हो, सो एकावलि जान ।
सुग्रह वही गित कामिनी, कामिनि सो मित कान ॥१॥
अनुमानालंकार।
प्रत्यक्षाल्लिंगतो यत्र कालत्रितयवर्ति-
नः॥लिंगिनो भवति ज्ञानमनुमानं तदु-
च्यते ॥ १३८॥
सावयसं० टी० भाषाटीकासहित । (१७९) टीका-यत्र प्रत्यक्षात लिंगतः कालत्रितयवर्तिनः लिंगिनः ज्ञानं भवति तत् अनुमानम् उच्यते इत्य- न्वयः ॥ प्रत्यक्षात लिंगतः इंद्रियार्थसनिकर्पजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षं तस्मात् परिदृश्यमानचिह्नात् काल- त्रितयवर्तिनः अतीतवर्तमानानागतस्य त्रिकालसंबं- धिनः अनुमेयस्य वस्तुनः यत्र ज्ञानं भवति तत् अनुमानम् ॥ १३८॥ अर्थ-जहां प्रत्यक्ष चिह्नसे निकालात अदृश्य वस्तुका ज्ञान (बोध) हो तो उसे अनुमान अलंकार कहते है ॥ १३८ ॥ नूनं नद्यस्तदाभूवन्नभिपेकाम्भसा प्रभोः॥ अन्यथा कथमेतासु जनः स्नानेन शु- ध्यति ॥ १३९॥ टीका-प्रभोः अभिपेकाम्भसा तदा नूनं नयः अभूवन् अन्यथा एतासु तानेन जनः कथं शुध्यति इत्यन्वयः ।। प्रभोः कृष्णस्य जिनस्य वा तदा जन्म- काले अभिषेकांभसा अभिपेकजलेन नूनं निश्चयेन नद्यः अभूवन् नद्यः आसन् अन्यथा नो चेत् तदा एतासु नदीपु स्नानेन जनः मनुष्यः कथं केन प्रकारेण शुध्यति अत्र प्रत्यक्षतः जनशुद्धिरूपलिंगात् गतका. लवर्तिनः प्रभोः अभिषेकजन्यजलस्य ज्ञानात् अनु- मानालंकारः ।। १३९॥
(१८०) वाग्भटालंकार-परि०४. अर्थ-प्रभु कृष्ण या ऋपभदेवके जन्मकालके अभिषेक स्नान रूप जलसे अवश्य ये नदियां बनी हैं यदि ऐसा नहीं तो इनमें स्नान करके मनुष्य क्यों शुद्ध होजाते हैं यहां प्रत्यक्ष जनशुद्धि रूप चिह्नसे गत प्रभुके अभिषेकका बोध होनेसे अनुमानालंकार हुवा ॥ १३९ ॥ जंभजित्ककुभि ज्योतिर्यथा शुभ्रं वि. जुभते॥उदेष्यति तथा मन्ये खलः सखि निशाकरः॥१४०॥ सुखप्रभावाधितकां- तिरस्या दोपाकरः किंकरतां विभर्ति ॥ तल्लोचनश्रीहतिसापराधान्यजानि नो- चेत् किमयं क्षिणोति ॥ १४१॥ टीका-हे सखि यथा जंभजित्ककुभि शुभ्रं ज्यो- तिः विज़ुभते तथा मन्ये खलः निशाकरः उदेष्यति इत्यन्वयः ॥ जंभजित् जंभासुरनिहंता इंद्रः तस्य ककुप दिशा तस्यां शुभ्रं ज्योतिः श्वेतप्रकाशः वि- जुभते प्रदीप्यते अत्र पूर्वस्यां दिशि प्रकाशदर्शनरूप- वर्तमानचिह्नात् भाविनः निशाकरोदयरूपलिंगिनः ज्ञानात् अनुमानालंकारः ॥ १४० ॥ अस्याः मुख- प्रभावाधितकोतिः दोपाकरः किंकरतां विभर्ति नो चेत् अयं तल्लोचनश्रीहतिसापराधानि अन्जानि किम् क्षिणोति इत्यन्वयः ॥ अस्याः कांताया मुखप्रभाभिः
.
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (११)
वाधितानिर्जिता कांतिः यस्य तथाभूतः दोपाकरः चंद्रः
किंकरतांदासतां बिभर्ति यदि एव नोचेत् तदाअयंदोपा
करः तल्लोचनश्रीहतिसापराधानि तस्याः लोचनयोः
श्रीः शोभातस्याः हतिःहरणं तयासापराधानि अपरा
धसहितानि अब्जानि कमलानि कथं क्षिणोति पीड-
यतीत्यर्थः-"युक्तं चैतत् दासेन प्रभोः शत्रूणां पीड-
नम्" अत्र प्रत्यक्ष अब्जपीडनरूपचिह्नात् तदैव
दोपाकरस्य किंकरत्वं वर्तमानतया अनुमाना,
लंकारः॥ १४१॥
अर्थ-हे सति इंद्रदिशा ( पूर्व) में ज्योंही श्वेत प्रकाश मालूम
देने लगा त्योही मैंने जाना कि खल चंद्रमा उदय होगा विरहि-
णी चंदमासे पीडित होती हैं इससे खल विशेषण दियाहै और
यहाँ पूर्वदिशा में प्रत्यक्ष प्रकाश दर्शन रूप चिह्नसे आगामी चंद्रो-
दय के ज्ञान होनेसे भविष्य अनुमानालंकार हुवा ॥ १० ॥
इस संदरीके मुखकी शोभासे हारा हुवा दोपाकर (चंद्रमा) इसका
दास होगयाहै क्योंकि जो ऐसा नहीं है तो इसके नेत्रोंकी काति
चुराने के अपराधी कमलोंको यह क्यों पीडा देताहै (क्योंकि
नौकरका कामहै कि मालिकके वैरीको केश देवे ) यहां प्रत्यक्षमें
कमलोंको पीडा देना विहसे वर्तमानमें ही चंदमाका दासत्व
बोध होनेसे वर्तमान अनुमानालंकार हुवा ॥ १४१ ॥
(भाषा) दोहा-व्याप्ति रूपता लिगको, कर प्रत्यक्ष जु ज्ञान ।
फरहि बोध अनुमेयको, ताहि फहत अनुमान ॥ १॥ (टदाहरण)
निरस वदन छवि होगयो, चांद वापुरो दासानहि तो
मुख
प्रति
पख कमल, क्यों नहि करत हुलास ॥२॥
वाग्भटालंकार-परि०४. परिसंख्या। यत्र साधारणं किंचिदेकत्र प्रतिपाद्यते ॥ अन्यत्र तन्निवृत्त्यै सा परिसंख्योच्यते वुधः॥१४२॥ टीका-यत्र किंचित् साधारणम् “अन्यत्र तन्निव- त्यै” एकत्र प्रतिपाद्यते सा बुधैः परिसंख्या उच्यते इत्यन्वयः ॥ यत्र काव्ये ( कवित्वे) किंचित् साधा- रणं वस्तु अन्यत्र निवृत्त्यर्थम् एकत्र प्रतिपाद्यते यद- स्तु एकत्र एकस्मिन् स्थाने भवति अन्यत्र तनिवृत्तिः भवति सा परिसंख्या इत्यर्थः ॥ १४२ ॥ अर्थ-जहाँ कोई साधारण वस्तु एक जगह प्रतिपादन करी जाये तथा और जहगसे उसकी निवृत्ति हो तो पंडित लोग उसे परिसंख्या अलंकार कहते हैं ॥ १४२ ॥ यत्र वायुः परं चौरः पौरसौरभसंपदाम् ॥ युवानस्तत्र राजंत एकनिक्षिप्तभी- तयः॥१४३॥ टीका-यत्र वायुः पौरसौरभसंपदा परं चौरः तत्र युवानः एकनिक्षिप्तभीतयः राजते इत्यन्वयः ॥ यत्र यस्मिन्नगरे पौरसौरभसंपदा पौराणां प्रासादानां सौर- भस्य सौगंध्यस्य या संपत् संपत्तिः तासां चीरः परं वायुरेव नान्यश्वीर इत्यर्थः तत्र पुरे युवानः तरुणाः सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (१६३ ) एकनिक्षिप्तभीतयः एके धर्मे निक्षिप्ता निहिता भीतिः यैः तथाभूताः युवानः राजते धर्मस्यैव भयं नान्यस्ये- त्यर्थः अत्र चौर्यस्य सर्वेभ्यो निवृत्तिं कृत्वा वायौ प्रतिपादनत्वात् परिसंख्यालंकारः ॥ १४३ ॥ अर्थ-जहां ( जिसनगरमें ) महलों स्थानोंकी सुगंधि रूप संपत्तिका भारी चौर एक वायुही है (और कोई अन्य चोर नहीं) पहाँके मनुष्य एक धर्मसेही डरते हुए रहतेहैं सिवाय धर्मके और किसीका डर (भय ) नहींहै यहां पर चोरीकी नियत्ति मनुष्यादिसे करके वायुमें प्रतिपादन करनेसे तथा भौति राजा व्यावादिसे निवर्त करके एक धर्ममें प्रतिपादन करनेसे परिसंख्या अलंकार हुवा ॥ १३ ॥ (भापा ) दोहा-जहँ साधारण कथन अरु, अन्य निवृत्तिहु होय । एक जगह वर्णनविपे, परिसंख्या कहँ सोय ॥१॥ (उदाहरण-जैसे ) जहां एक वायू भवन, सौरभ संपति चौर। मनुजन को इक धर्म विन, तहां नहीं भय और ॥२॥ प्रश्नोत्तर तथा संकर । प्रश्ने यथोत्तरं व्यक्तं गूढं वाप्यथवोभ- यम् ॥ प्रश्नोत्तरं तथोक्तानां संसर्ग संकरं विदुः ॥ १४४॥ टीका-यत्र प्रश्ने व्यक्त गूढम् अथवा उभयम् उत्तरं (तत्) प्रश्नोत्तरम् तथा उक्तानां संसगै संकरं विदुः इत्यन्वयः॥ व्यक्तं प्रकटरूपेण गूढम् अप्रकटरूपेणे- त्यर्थः । अथवा उभयं व्यक्ताव्यक्तम् उत्तरं भवति तत् 1
(१८४)
वाग्भटालंकार-परि०४.
प्रश्नोत्तरं नामकमलंकारः तथा च उक्तानां कथितानां
संसर्ग संमेलनं तत् संकरं तदाख्यम् अलंकारं विदुः
वुधा इति शेपः॥ १४॥
अर्थ-जहां प्रश्नका प्रवट रूपसे या गूढ (गुप्तरीतिसे) अथवा
दोनों प्रकारसे उत्तर दिया जाये तो उसे प्रश्नोत्तर नामक अलंकार
कहतेहैं तथा जहां कहे हुए अलंकारोंका संसर्ग अर्थात् संमेलन
होताहै तो उसे संकर अलंकार कहतेहैं ॥ १४४ ॥
व्यक्त प्रश्नोत्तरोदाहरण ।
अस्मिन्नपारसंसारसागरे मज्जतां स-
ताम् ॥ किं समालंवनं साधो रागद्वेपपरि
क्षयः॥१४५ ॥
टीका-हे साधो ! अस्मिन् अपारसंसारसागरे म-
जतां सतां समालंबनं किम् ( इति प्रश्ने )रागद्वेपपरि-
क्षयः ( इत्युत्तरम् ) इत्यन्धयः॥ अपारसंसारसागरे
पाररहितसंसारसमुद्रे मन्जतां निपततां सतां साधूनां
समालंबनम् आश्रयः किम् रागस्य पीतेः द्वेपस्य वैरस्य
च परिक्षयः अत्र व्यक्तम् उत्तरम् अतः प्रश्नोत्तरा-
लंकारः॥१४५॥
अर्थ-हे साधी इस अपार संसार समुद्र में पड़ते हुए सजना-
को समालंबन (आश्रय) क्या है यह प्रश्न हुया इसका राग
देषका परित्याग करना ही आश्रय मात्र है यह प्रघट रूप उत्तर
हवा इससे व्यक्त प्रश्नोत्तर अलंकार हुवा ॥ १४५॥
सान्षयसं० टी० भाषाटीकासहित ।, (१८५) गूढ प्रश्नोत्तरोदाहरण । क वसंति श्रियो नित्यं भूभृतां वद को- विद॥असावतिशयः कोपि यदुक्तमपिनो ह्यते ॥ १४६ ॥ किमभं श्लाघ्यमाख्याति पक्षिणं कः कुतो यशः ॥ गरुडः कीदृशो नित्यं दानवारिविराजितः ॥ १४७॥ टीका-हे कोविद वद भूभृतां श्रियः नित्यं क वसंति (इति प्रश्ने) असौ इत्युत्तरं यत् उक्तम् अपि न उह्यते स कोपि अतिशयः इत्यन्वयः॥ भूभृतां नृपाणां श्रियः लक्ष्म्यः नित्यं व कुत्र वसंति निवासं कुर्वति इति प्रश्न असौ कृपाणे इत्युत्तरं गृढम् । तथा यत् उक्तम् अपि कथितम् अपि न उद्यते न ज्ञायते स कश्चित् आशयः अतिशयः अतिशयगूढः इत्यर्थः। असिः खड्गः (इति श० स्तो०)।१४६॥ ऐभं किंश्लाघ्यम् आख्याति "दानवारि" कः पक्षिणं (आख्याति) "विः" यशः कुतः "आजितः" नित्यं गरुडः कीदृशः "दानवारि- विराजितः" इत्यन्वयः। ऐभं किं श्लाघ्यम् आख्यातीति प्रश्न "दानवारि" इत्युत्तरं इभः हस्ती तत्संबंधि ऐभं किं प्रशंसनीयम् अस्योत्तर "दानवारि मदजलम्" कः शब्दः परिगम् आख्याति अस्योत्तरं "विः" विशब्दः
(१८६) . घाग्भटालंकार-परि०४.
पक्षिणमाख्यातीत्युत्तरम्, यशः कुतः अस्योत्तरम् आ-
जितः संग्रामात् यशः संग्रामात् भवतीत्युत्तरम्, गरुडः
कीदृशः अस्योत्तरं “दानवारिविराजितः" दानवानाम्
असुराणाम् आरिः शत्रुः विष्णुः तेन विराजितः शो-
भितः अत्र व्यक्ताव्यक्तं प्रश्नोत्तरम् एपा प्रश्नोतरी
अंतापिकापि कथ्यते ॥ १४७॥
अर्थ-हे पंडित वतावो राजोंकी लक्ष्मी नित्य कहां वसति हैं
इस प्रश्नका गूढ उत्तर “असौ" अर्थात् 'खड्न" में यही है और
जहां वह कहभी दिया जाय और समझमें नहीं आये वह अति.
शय गूढ होता है असौ का अर्थ खड्ग में यह अतिशयं गूढ है
क्योंकि प्रघटमें कह देनेपर भी समझमें प्रायः नहीं आता है
इसीसे अतिगृढ प्रश्नोत्तरालंकार हुवा ॥ १४६ ॥ हाथीफे क्या
प्रशंसनीय कहाता है इस प्रश्नका उत्तर हुवा “दानवारि" अर्थात्
मदका जल प्रशंसनीय होता है और कौन शब्द पक्षीको बताता
है अर्थात् कौन शब्द पक्षी वाचक है इसका उत्तर हुया "विः"
अर्थात् वि शन्द पक्षी वाचक है और यश काहेसे होता है इसका
उत्तर हुवा "आजित" अर्थात् सेना संग्रामसे और नित्यगरुड
फैसा रहता है इस प्रश्नका उत्तर हुवा समस्त पदसे "दानवारि-
विराजितः" अर्थात् दानवोंका अरि विष्णु जिस करके विराजित
शोभित यहां व्यक्त और गृढ दोनों भातके प्रश्नोत्तर हैं और इसे
अंतापिफा भी कहते हैं ॥ १७ ॥
(भापा) दोहा-प्रश्नोत्तर जहँ प्रश्नका, उत्तर गूढ अगृढ ।
नाम फह्यो अतिगृडको, समझे तदपि न मृढ ॥ १ ॥
(उदाहरण) अगृह (प्रघट ) प्रश्नोत्तर-कौन सुखी संतोष
युत, कौन दुखी बहु काम । मित्र कौन मीठे वचन, अभय कौन
हरिधाम ॥२॥
*
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (१८७)
(गूढ प्रश्नोत्तर) रतिसु नपोठा का कहे, कंठ काह शिव लेया
श्वास कास को का हरे, “नागर" उत्तर देय ॥ ३॥ यह दोहा
अंतर लापिका भी है ॥
संकर।
वंभंड सुत्ति संपुड मुक्तिअ मणिणो पहा
समूह व्व ॥सिरिवाहडत्ति त्तणतो आसि
वुहो तस्स सोमस्स ॥ १४८॥.
टीका-( अस्य संस्कृतम्) "ब्रह्माण्डशुक्तिसंपुट
मौक्तिकमणेः प्रभासमूह इव श्रीवाग्भट इति तनय आ-
सीत बुधस्तस्य सोमस्य " ब्रह्मांडशुक्तिसंपुटमौक्ति-
कमणेः सोमस्य तस्य प्रभासमूह इव श्रीवाग्भटः बुधः
तनयः आसीत् इत्यन्वयः ॥ ब्रह्मांडम् एव शुक्तिसंपुढे
मुक्ताशुक्तेः संपुटम्। इत्यर्थः। तस्य मौक्तिकमणिः मुक्ता-
रत्नं तथाभूतस्य सोमस्य चंद्रगुप्तस्येत्यर्थः प्रभासमूह
इव कांतिपुंज इव श्रीवाग्भट: वुधः विद्वान् तनयः पुत्रः
आसीत् अत्र वुधः पंडितः चंद्रपुत्रो ग्रहश्च वोध्यः सो-
मात् बुधस्य जन्म योग्यमेव ब्रह्मांडं शुक्तिसंपुटमी-
क्तिकमणेरिति रूपकं प्रभासमूह इवेत्युत्प्रेक्षा बुधः वि-
द्वान् चंद्रपुत्रो ग्रहश्चेति श्लेपः श्रीवाग्भट आमीदिति
जाति इति चतुर्णा अलंकाराणां संभोगात संकंग-
लंकारः ॥ १४८॥
(१८८) वाग्भटालंकार-परि० ४.
अर्थ-ब्रह्मांड रूप मोतिया सीपका संपुट उससे पैदा हुए मौ.
क्तिक मणि ऐसे सोम अर्थात सोमदेव जिनके कांति पुंजके
समान श्रीवाग्भट नामक बुध उत्पन्न होते भये श्रीवाग्भटाचार्यके
पिताका नाम सोम अर्थात् सोमदेव था उनके बुध रूप पंडित
या बुध ग्रह रूप श्रीवाग्भट उत्पन्न हुए सोमके बुधको उत्पन्न
होना योग्यही है यह श्लेष अलंकार है और ब्रह्मांड रूप सीपीके
मुक्तामणि यह रूपकहै और प्रभा समूह इव यह उत्प्रेक्षाहै श्री
वाग्भटका वर्णन यह जातिहै इस प्रकार चार अलंकारोंका एकत्र
संयोग होनेसे संकर अलंकार हुवा इसी प्रकार और जगह भी
जहां दो तीन या अधिक किसी भी अलंकारोंका-संयोग हो तो
उसे उन्हींके संयोगसे संकर अलंकार समझना चाहिये ॥१४॥
(भाषा) दोहा-अलंकार जहँ कइ मिलें, संकर नाम ज होय।
ताप हरन को कमलसे, हरिपद अपर न कोय ॥२॥
अचमत्कारिता वा स्यादुक्तांतर्भाव एव
वा ॥ अलंक्रियाणामन्यासामनिबंध-
निबंधनम् ॥ १४९॥
टीका-अन्यासाम् अलंक्रियाणाम् अनिबंधनिबं-
धनम् अचमत्कारिता वा स्यात् वा उक्तांतर्भावः एव
इत्यन्वयः ॥ अन्यासाम् असंगतिमहर्पणादीनाम्
अलंक्रियाणाम् अनिबंधनिबंधनम् अकथनस्य का-
रणं वा अचमत्कारिता चमत्कारराहित्यं स्यात् अथवा
उक्तांतर्भावः उक्तेपु अंतर्भावः स्यादित्यर्थः । चमत्का-
रिता एव अलंकारस्य मुख्यत्वेन हेतुरितिभावः
--- (निबंधनं कारणमिति शब्दस्तोम०)॥ १४९॥
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (१८९) अर्थ-और जो असंगति महर्पणादिक अलंकारोंके नहीं वर्णन करनेका कारण है सो या तो विशेषकर चमत्कारका न होना है या जो यहां वर्णन करे गये हैं उन्होंमें बिना कहे हुवाँका अंत. र्भाव हो सका है और खासकर चमत्कारही अलंकारका मुख्य हेतु है (और शब्द अथवा अर्थके चमत्कारके प्रभावसे अलं. कारोंके असंख्य भेद हो सक्ते हैं)॥ १४९ ।। अथ रीतिवर्णन । रीतिदारमाह। द्वित्रिपदा पांचाली लाटीया पंच सप्त वा यावत् ॥शव्दाः समासवंतो भवति यथा संक्ति गौडीया ॥ १५०॥ टीका--द्वित्रिपदाः पांचाली (यत्र )पंच सप्त वा शब्दाः यावत् समासवंतः ( सा ) लाटीया (यत्र) यथाशक्ति (शब्दाः समासवंतः) सा गौडीया भवति इत्यन्वयः ।। पदानां संघटनाविशेपः रीतिः यन द्वि- त्रिपदानि समासर्वति सा पांचालीरीतिः यत्र पंच सप्त वा शब्दाः समासवंतःसा लाटीया रीतिः यत्रच यथा शक्ति शब्दाः समासर्वतः स्युः सा गोडीया रीतिः इत्यर्थः । देशभेदेन रीतिभेदा बहवः संति तथा चोक्तं (प्रथमपदा वत्सोमी विपदसमा च मागधी भवति । उभयोरपि वैदर्भी मुहुर्मुहुर्भापणं कुरुते ) अन्यच्च (१९०) बाग्भटालंकार-परि० ४. (लाटी हास्यरसे प्रयोगनिपुणे रीतिः प्रबंधे कृता पांचाली करुणा भयानकरसेशांते रसे मागधी गोडी वीररसे च रौद्रजरसे वच्छोमदेशोद्भवा बीभत्साद्भुतयों विदर्भविपया शृंगारभूते रसे) इति (श्लोकोयं प्रक्षिप्तो दृश्यते ) बहुपु रीतिभेदेष्वपि मुख्यत्वेन द्वे एव रीती गौडीया वैदर्भी चेति ॥ १५०॥ अर्थ-जहां दो तीन पद समस्त हो.वह पांचाली रीति है और जहां पाँच सात तक शब्द समस्त हों वह लाटीया रीति होतीहै और जिसमें यथाशक्ति बहुत शब्द समासवाले हों उसे गौडीया रीति कहतेहें पदोंकी संघटनाविशेपका नाम रीति होता है सो रीति देशोफ भेदसे अनेक जैसे मागधी लाटी पांचाली गौडी वैदर्भी आदि परंच मुख्यतासे यहां दो ही रीतियां लिखते हैं एक गौडी दूसरी वैदर्भी (मागधीआदिके लक्षण और उदाहरण और ग्रंथोंसे देखें (यह श्लोक भी क्षेपक मालूम होताहै )॥१५०॥ हे एव रीती गौडीया वैदर्भी चेति सां तरे॥ एका भूयः समासा स्यादसमस्त पदा परा॥ १५१॥ टीका-गौडीया वैदर्भी च इति सांतरे द्वे एव रीती एका भूयः समासा स्यात् अपरा असमस्तपदा इत्य- न्वयः॥एका गौडीया भूयःसमासा समासबहुलास्यात् अपरावैदर्भीच असमस्तपदासमस्तपदवर्जिताइत्यर्थः साहित्यदर्पणे तु रीतिश्चतुर्धा प्रोक्ता यथा (पद संघ. .
सान्वयसं० टी० भापाटीकासहित । (१९१)
ट्रना रीतिरंगसंख्याविशेषवत् । उपकी रसादीनां
सा पुनः स्याचतुर्विधा॥ वैदर्भी चाथ गौडी च पांचा-
ली लाटिका तथा । माधुर्यव्यंजकैवर्ण रचना
ललितात्मिका ॥ अवृत्तिरल्पवृत्तिर्वा वैदी रीतिरि-
ध्यते । ओजप्रकाशकणेवैध आडंबरः पुनः ।। समा-
सबहुला गौडी वर्णैः शेपैः पुनयोः । समस्तपंचप-
पदोबंधः पांचालिका मतालाटी तुरीतिवैदर्भी पांचा-
ल्योरंतरा स्थिता।) इति ॥ १५१ ॥
अर्थ-ऊपर लिख आप हैं कि यहां मुख्यता करके दो रीतिही
लिखते हैं एक गौड़ी दूसरी वैदर्भी इनमेंसे एक अर्थात् गौडी बडे
समासांतपदीवाली होती है और जिसमें विना समासके पदों
उसे वैदी कहते हैं साहित्यदर्पणमें ४ रीतियां लिखी हैं वैदी,
गौडी, पांचाली, और लाटी यहाँपर वैदर्भी और गौडी दोहीके
उदाहरण लिखे हैं ।। १५१ ।।
गौडीका उदाहरण ।
दर्पोत्पाटिततुंगपर्वतशतग्रावप्रपाताहति
क्रूराक्रंददतुच्छकच्छपकुल।कारघोरी-
कृतः॥ विश्वं वरवध्यमानपयसः सिप्रा-
पगायाः स्फुरन्नाक्रामत्ययमक्रमेण बहु-
लः कल्लोलकोलाहलः ॥ १५२॥
( १९२). वाग्भटालंकार-परि०४. टीका--ववरवध्यमानपयसः सिप्रापगायाः अयं बहुलः कल्लोलकोलाहलः अक्रमेण स्फुरन् विश्वम् आक्रामति (कीदृशः कल्लोलकोलाहलः) दर्पोत्पाटि- ततुंगपर्वतशतग्रावप्रपाताहतिक्रूराक्रंदतुच्छकच्छपकु- लफ्रेंकारघोरीकृतः इत्यन्वयः ॥ र्वरो नाम राक्षसः अथवा वर्वरदेशाधिपः तेन वध्यमानं पयः यस्याः तथाभूतायाः सिप्रापगायाः सिप्रानद्याः बहुलः प्रभूतः अयं कल्लोलकोलाहलः तरंगाणांकलकलशब्दः अक्र- मेण स्फुरन् सन् क्रमं विहाय प्रसरन् सन् विश्वं संसा- रम् आक्रामति आक्रमणं करोतीत्यर्थः स कीदृशः दर्पण उत्पाटिताःतुंगाः उन्नतायेपर्वताःतेपांशतस्य ग्रावाणः पापाणाः तेपांप्रपातेन या आहतिः आघातः तथाकरम् उत्कटं यथा तथा आक्रदतः चीत्कारं कुवैतो ये अतु- च्छाः महांतः कच्छपाः तेपां कुलस्य समूहस्य को- कारण शब्दविशेपेण घोरीकृतः रौद्रीकृतः इत्यर्थः अत्र समासबाहुल्यात् गौडीरीतिः॥ १५२॥ अर्थ-वर्वर राक्षस या वर्वरदेशाधिपतिन जब सिमा नदीका जल बंध करदिया (रोदिया) समुद्रमें न जाने दिया (तब) उसके रावसे यह तरंगोंका कोलाहल (शब्द) क्रमरहित फैलकर देशपर आक्रमण करने लगा (कैसा तरंगांका कोला. हल है ) कि दर्प ( वेग या चढाय) से टसाडे है ऊँचे ऊँचे सैंकडों पहाड निसने निमसे पड़ने वाले बडे बडे पापागों के भाषातसे बहत आनंदित हुए चीत्कार करते हुए जो बहुत बड़े लिष्यति आलिंगनं करोतीत्यर्थः (कैरवः निपादः के जले रखते गच्छतीति केरवः रु गती धातोः)॥१५॥ अर्थ-विप्र (ब्राह्मण स्वभावसेही लोल चपल हनिह यह हो. फोक्ति कभी मिथ्या नहीं है इस कारणसे जिदिन चंद्रमा भी भ्रमरोंसे चुंचित कमोदनीको किरणांस आलिंगन करता अथवा द्विजेश (श्रेष्ठ ब्राह्मण) भी कोई मयामि नृवित कविणी निपा- दपत्नीको फरामों हायोंकी अंगुलियांस आलिंगन करता है यहाँ सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (१९३) कछवे उनके समूहका जो केंकार शब्द जिस करके घोर होरहाहै यह तरंगोंका शब्द यह समासकी विशेषतासे गौडीरीति हुई॥१५२।। वैदर्भीका उदाहरण । विप्राः प्रकृत्यैव भवंति लोला लोकोक्ति- रेपा न मृषा कदाचित् ॥ यच्चुव्यमानां मधुपैर्हिजेशः श्लिष्यत्यसौ कैरविणी क- राग्रेः॥ १५३ ॥ टीका-विप्राः प्रकृत्या एव लोलाः भवंति एपा लो- कोक्तिः कदाचित् मृपा न यत् असौ द्विजेशः मधुपैः चुंव्यमानां कैरविणी कराप्रैः श्लिष्यति इत्यन्वयः॥ विप्राः ब्राह्मणाः प्रकृत्या स्वभावेनैव लोलाः चपला भवंति इति लोकोक्तिः जनप्रवादः कदाचित् अपि मृपा मिथ्या न यत् यतः असौ द्विजेशः द्विजराजश्चंत्रः द्विजश्रेष्ठश्च मधुपःभ्रमरैः मद्यपैश्च चुव्यमानां करविणी कुमुदिनी निपादपत्नी वा करायैः किरणाः हस्तायः वा (१९४) वाग्भटालंकार-परि० ४. द्विनेश मधुप कैरविणी और कराग्र इन पदोंके श्लेपसे दो दो अर्थ हो जाते हैं यहां समासांत पद प्रायः न होनेसे वैदर्भी रीति है ॥ १५३ ॥ अलंकारकी भांत हिंदी भाषामें रीतियोंका वर्णन संस्कृतके अनुसार नहीं होसक्ता इसलिये दोहोंमें रीतियोंका वर्णन नहींकिया। अर्थेन येनातिचमत्करोति प्रायः कवि- वं कृतिनां मनस्सु । अलंक्रियात्वेन स एव तस्मिन्नभ्यूह्यतां प्राज्ञ दिशान- यैव ॥ १५४॥ टीका-हे प्राज्ञ कवित्वं प्रायः येन अर्थेन कृतिनां मनस्सु अतिचमत्करोति तस्मिन् स एव ( अर्थः) अलंक्रियात्वेन अनया एव दिशा अभ्यूह्यताम् इत्य- न्वयः॥ कवित्वं काव्यं कृतिनां पंडितानां मनस्सु अतिचमत्करोति अतिचमत्कारं करोति तस्मिन् कवित्वे स एव अर्थः अलंक्रियात्वेन अलंकारत्वेन अनया एव दिशा अनया एव मदुक्तया संकलनया अभ्यूह्यताम् विचार्यताम् (प्राज्ञ इत्यत्र दत्त इति वा केपुचित् पुस्तकेषु पाठांतरम् ॥ १५४॥ अर्थ-हे प्राज्ञ कवित्य ( काव्य) प्रायः जिस अर्थसे पंडितोंके मनमें अत्यंत चमत्कारी मालूम हो उस कवित्वमें वहीं अर्थ अलं. कारता करके इस भेरी वर्णन करी हुई संकलना (रीति) से ही विचार लेना चाहिये ॥ १५ ॥ इति याग्मटाटंकारे चतुर्थपरिच्छेदः ।
सान्वयस० टी० भापाटीकासहित । अथ पंचमपरिच्छेदः। साधुपाकेप्यनास्वाद्यं भोज्यं निलवणं यथा । तथैव नीरसं काव्यमिति बमो रसानिह ॥१॥ टीका-यथा साधुपाके अपि निर्लवणं भोज्यम् अनास्वायं तथा एव नीरसं काव्यम्, इति इह रसान् ब्रूमः इत्यन्वयः ॥ साधुपाके सुष्टुपाके नीरसं रसंव- जितम् ॥१॥ अर्थ-जैसे अच्छे पके हुए भी विना लवणके भोजन सुस्वाद नहीं लगते उसी प्रकार रस वर्जित काव्यमी हृदय प्रिय नहीं होते हैं इसी कारणसे अब हम रसोंका वर्णन करते हैं ॥ १ ॥ विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारि- भिः। आरोप्यमाण उत्कर्ष स्थायी भा- वःस्मृतो रसः॥२॥ टीका-विभावः सात्त्विक व्यभिचारिभिः अनुभा- वैश्व उत्कर्षम् आरोग्यमाणः स्थायी भावः रसः स्मृतः इत्यन्वयः ॥ विशेपेण भावयंति उत्पादयति रसम् इति विभावाः खीवसंतादयः विभावो रसकारणम् इत्यर्थः ॥ अनुभूयते लक्ष्यते रसः यः इति अनुभावाः कंपप्रस्वेदप्रलापमोहादयः रसोत्पत्ती सत्यां ये भावाः 'वाग्भटालंकार-परि०५. जायंते ते अनुभावा ज्ञातव्या इति रजस्तमोभ्याम् अस्पृष्टमनोवृत्तिविशेपःसत्त्वंतत्संभूताःविकृतिविशेषा: सात्त्विकाः उक्तं च साहित्यदर्पणे "रजस्तमोभ्याम: स्पृष्टं मनः सत्त्वमिहोच्यते।विकाराः सत्त्वसंभूताः सा- विकाः परिकीर्तिताः॥स्तंभःस्वेदोथ रोमांचःस्वरभंगो- ऽथवेपथुः। वैवर्ण्यमथुप्रलय इत्यप्टौ सात्त्विकाः स्मृताः। सत्त्वमात्रोद्भवत्वात्ते भिन्ना अप्यनुभावतः" इति सत्त्व- मात्रोद्भवात् केवलसत्त्वोद्भवात्ते अनुभावतः भिन्नाः गोवलीवर्दन्यायेन यथा गामानयेत्युक्ते बलीवर्दस्य च गोत्वात्तदानयने निप्यन्नेऽपि वलीवर्दग्रहणं तथा अनु- भावरूपत्वेऽपि सात्त्विकानां विशेपग्रहणमिति भावः "व्यभिचारिणो यथा" दर्पणे-विशेपादाभिमुख्येन चरंतो व्यभिचारिणः । स्थायिन्युन्मग्ननिर्मशास्त्रय- स्त्रिंशच्च तद्भिदास्थायिनि रत्यादी उन्मग्नाः कदाचित उद्विक्ता निर्मग्राः कदाचित् तिरोहिताः ये धर्माःते व्यभिचारिणः ("निर्वेदावेगदेन्यश्रममदजडता औ- ग्यमोहौ विवोधः स्वप्रापस्मारगर्वामरणमलसतामर्ष- निद्रावहित्थाः।औत्सुक्योन्मादशंकास्मृतिमतिसहिता व्याधिसत्रासलनाः हमियाविपादाः सधृतिचप- लताग्लानिचिताविताः। इति ) स्थायीभावः दर्पण-अविरुद्धा विरुहा वायं तिरोधातुमक्षमाः। आ. " (१९८) पाग्भटालंकार-परि०५. साहित्यदर्पणमें स्थायी भावके विषय में यह लिखा है कि अवि- रुद्ध या विरुद्ध निसको छिपा नसके वह उस रसका स्थायी भाव होता है मानो मास्वादके अंकुरका यह मूल है जैसे शृंगार रस- का स्थायी भाव रति हास्य रसका हँसपडना करुणाका शोक रौन- का क्रोध वीरका उत्साह अर्थात् उमंग भयानकका भय (डर- जाना ) बीभत्सका जुगुप्सा अद्भुतका विस्मय और शांतरसका शम स्थायी भाव होताह ॥ २ ॥ शृंगारवीरकरुणाहास्याद्रुतभयानकाः ॥ रौद्रवीभत्सशांताश्च नवते कथिता बुधैः ॥३॥ टीका-शृंगारादयः एते नव ( रसाः) बुधैः क- थिताः ( यथा) शृंगारवीरकरुणाहास्याद्भुतभयानकाः च रौद्रवीभत्सशांताः इत्यन्वयः।अत्र प्रथमं शृंगारस्य सर्वप्राणिनामतीव मनोज्ञत्वात् उपादानं शांतस्य सर्वे पामवसानत्वात् अंते समुपादानम् एभ्योतिरिक्त दशम- रसो वात्सल्यनामापि चास्ति प्रत्यक्षचमत्कारित्वात् उक्तं च साहित्यदपणे-वत्सलश्च रस इति तेन स दशमो रसः"स्फुटं चमत्कारितया वत्सलं च रसं विदुःस्थायी वत्सलता स्नेहः पुत्राद्यालंबनं मतम्।।उद्दीपनानि तच्चेष्टा विद्याशौर्योदयादयः । आलिंगनांगसंस्पर्शशिरश्चुंबन- मीक्षणम्।।पुलकानंदवाप्पाद्या अनुभावाः प्रकीर्तिताः।। संचारिणोऽनिष्टशंका हर्पगर्वादयो मताः इति ॥३॥"
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित ।
अर्थ-ये शृंगार आदिक रस १ हैं १ शंगार,२ वीर, ३करुण,
४ हास्थ, ५अद्भुत, ६भयानक, ७ रौद्र, ८ वीभत्स, ९शांत इनके
सिवाय दशवाँ रस वात्सल्य भी मानतेहैं क्योंकि उसका प्रत्यक्ष
चमत्कार है साहित्यदर्पणमें लिखाहै कि स्फुट चमत्कारी होनेसे
दशवा कसल रस भीहै इस वात्सल्य रसका स्थायी भाव नेह है
(जो प्राणी मात्रमें अनुभाव उत्पन्न करताहै) पुत्रादिके आलं.
बन विभाव हैं और पुत्रादिकी चेष्टा विद्या शौर्य आदिक उद्दी-
पन हैं और उनका आलिंगन अंगस्पर्श ( प्यारकरना) शिरवू-
मना प्रेमसे देखना रोमांच होजाना आनंद और प्रेमाश्रुपाता-
दिक उसके अनुभाव हैं और अनिष्टशंका हर्ष गर्वादिक संचारी
भाव होते हैं इससे अवश्य वात्सल्य रस दशवा है यहां सवप्राणि.
योंका अति प्रिय होनेसे शृंगार रस प्रथम रक्खा और शांत रस
सवका अवसान रूप होनेसे सबके अंतमें वर्णन किया गया।
(भाषा) दोहा--साधुपके भोजन यथा, विन लवणादिनस्वाद ।
तैसे विन रस काव्य सब, ताते कह रस बाद ॥ १ ॥ नव रस हैं
शृंगार अरु, वीर जु करुणा हास । अद्भुत भय बीभत्स सुन, रोद
शांत परकाश ॥२॥ दशवा रस वात्सल्पहै, पुत्रादिक पर प्रीति,
विभाव अरु अनुभावते, हो प्रत्यक्ष प्रतीति ॥ ३ ॥
जायापत्योमिथो रत्यां वृत्तिः शृंगार उ-
च्यते ॥ संयोगो विप्रलंभश्वेयेष तु हि.
विधो मतः॥४॥ तौ तयोर्भवंतो वाच्यौ
बुधैर्युक्तवियुक्तयोः॥ प्रच्छन्नश्च प्रकाशश्च
पुनरेप द्विधा मतः॥५॥
(२००) वाग्भटालंकार-पार० ५.
टीका--अस्यान्वयस्तु सरलः जायापत्योः स्त्रीपुरु-
पयोः मिथः अन्योन्यं मिलित्वा च रत्यां सुरते वृत्तिः
स एव शृंगाररसः उच्यते स एप तु श्रृंगारः द्विविधः
मतः संयोगः विप्रलंभश्च संयोगः संयुज्यते स्त्रीपुरुपी
यत्र इति संयोगः विप्रलंभ्येते वंच्यते केनचित् कार-
णेन संभोगात् यत्र स विप्रलंभः॥४॥तौ (संयोग-
विप्रलंभौ) तयोः (जायापत्योः ) युक्तवियुक्तयोः
वाच्यौ भवतः च पुनः एप प्रच्छन्नः च प्रकाशः बुधैः
द्विधा मतः (इत्यन्वयः)। युक्तयोः मिलितयोःतयोः
संयोगः संभोगः वियुक्तयोः विरहितयोः पृथक् भूतयोः
तयोः विप्रलंभः इत्यर्थः पुनश्च स द्विविधः प्रच्छन्नः
गुप्तरूपेण वर्तते प्रकाशः प्रकटतयावर्तते इत्यर्थः अस्य
शृंगाररसस्य श्यामवर्णः विष्णुर्देवता तथाचोक्तं साहि-
त्यदर्पणे (शृंगं हि मन्मथोद्भेदस्तदागमनहेतुकः ।
उत्तमप्रकृतिप्रायो रसः श्रृंगार उच्यते ॥ १॥ परोढां
वर्जयित्वात्र वेश्यां चाननुरागिणीम् ।। आलंबनं ना.
यिकाः स्युदक्षिणाद्याश्च नायकाः ॥२॥ चंद्रचंदन-
रोलंबरुताद्युद्दीपनं मतम् ॥ भ्रूविक्षेपकटाक्षादिरनभावः
प्रकीर्तितः ॥३॥ त्यक्तीमयरणालस्यजुगुप्साव्य-
भिचारिणः।। स्थायी भावो रतिः श्यामवर्णोयं विष्णु-
देवतः) इति ॥५॥
2014
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (२०१)
अर्थ-स्त्री पुरुषोंकी परस्पर जो रति (रमण) में वृत्ति
(प्रवृत्ति ) हो उसे शृंगार रस कहते हैं वह भंगार रस विद्रा-
नोंने २ प्रकारका कहा है ( १ ) संयोग (या संभोग) दूसरा
*विप्रलंभ (जिसमें स्त्रीपुरुषोंके परस्परमें मिलकर रमणादि हो
वह संयोग है और जहां किसी भी कारणसे उनके संयोगमें क्षति
या विलंब या विरह या वियोग हो उसे विप्रलंभ कहते हैं ॥४॥
वह रस स्त्री पुरुपोंको संयुक्तिसे संयोग और वियुक्ति वियोगसे
-विमलंभ कहाता है फिर वह भी दो प्रकारका होता है एक
प्रच्छन्न अर्थात् गुप्त दूसरा प्रगट साहित्यदर्पणमें विस्तारसे यो
लिखा है कि शृंग नाम कामदेवके उद्भेदका है और जिसमें
कामके उद्धेगका आगम हो उसे शृंगार कहते हैं परोटा (पर-
कीया) और वेश्या और विना प्रेमवतीको छोडकर जो रमणी
स्त्री है वह इसका आलंबन विभाग है और अनुकूल दक्षिण आदि
पुरुष नायक हैं चंद्र चंदन भ्रमरादिका शब्द ये उद्दीपन हैं और
भूविक्षेप कटाक्ष आदि अनुभाव हैं और उग्रता मरण आलस्य
जुगुप्ता इन्हें छोड़कर शेष व्यभिचारी हैं और रतिस्थायी भाष
है बर्ण श्याम है विष्ण इसका देवता है ।। ५ ।।
(भाषा) दोहा-कांत कामिनी दुउनकी, वृत्ति सुरतिमें होय।
ताहि कहें श्रृंगार रस, भोग वियोग सुदोय ॥ १ ॥ भोग कहे
संयोगको, विरह वियोग विचार । पुनि प्रच्छन्न प्रकाशते, चार
भाँत शृंगार ॥२॥
:
नायक लक्षण ।
रुपसौभाग्यसंपन्नः कुलीनः कुशलो
युवा ॥ अनुडतः मूनृतगीः ख्यातो ने-
तात्र सदणः ॥६॥
. (२०२). वाग्भटालंकार-परि०५. टीका-अत्र रूपसौभाग्यसंपनः कुलीनः कुशलः अनुदतः सूनृतगीः सद्गुणः युवा नेता ख्यातः इत्य- न्वयः ॥अत्र शृंगारे अनुद्धतः औद्धत्यरहितः सूनृतगीः सत्यमधुरवादी सद्गुणः श्रेष्टगुणसंपन्न नेतानायकः॥६॥ अर्थ-यहां श्रृंगार रसमें रूप सौभाग्य युक्त कुलीन चतुर और जो उद्धत न हो सत्य और मधुर भाषी जिसमें क्षमादि श्रेष्ठ गुण हों ऐसा तरुण पुरुष नायक कहलाता है ।। ६॥ नायकभेदाः। अयं च विबुधैरुक्तोऽनुकूलो दक्षिणः शठः॥धृष्टश्चेति चतुर्थः स्यान्नायकाः स्यु- श्चतुर्विधाः ॥७॥ टीका-अयं च विबुधैः अनुकूलः दक्षिणः शठः उक्तः च चतुर्थः धृष्टः स्यात् इति नायकाः चतुर्विधाः स्युः इत्यन्वयः ॥ अयं नायकः विबुधैः साहित्य- पंडितः॥७॥ अर्थ-यह नायक साहित्य शास्त्र के ज्ञाता पंडिताने चार प्रका- रका कहा है अनुकूल, दक्षिण, शठ और चौथा धृष्ट इस भांति नायकके चार भेद कहे हैं ॥७॥ (श्लो० . ) धृष्टश्चेति चतुर्धा स्यान्नायिकाः स्युश्चतुर्विधा इति वा पाठांतरः तत्र तु विबुधैः भयं नायरः चतुर्धा उक्तः स्यात् अनुकूलः दक्षिणः शठः धृष्टश्व इति च नायिका अपि चतुर्घा स्युः अन्दा, स्वकीया, परकीया, सामान्या । इति पश्पमागभेदादित्यर्थः ।
सान्वयसं० टी० भापाटीकासहित । (२०३)
(अनुकूल और दक्षिणके ल.)
नीलीरागोनुरक्तः स्यादनन्यरमणीरतः ॥
दक्षिणश्चान्यचित्तोपि यः स्यादविकृतः स्त्रि-
याम् ॥८॥
.
टीका-अनन्यरमणीरतः नीलीरागः अनुरक्तः
स्यात् । च प्रदक्षिणः अन्यचित्तः अपि स्त्रियाम्
अविकृतः स्यात् (इत्यन्वयः) ॥ अनन्यरमणीरतः
न अन्यरमणीरतः सर्वथा परांगनापराङ्मुख इत्यर्थः
नीलीरागः नीलीवत् परिपक्कारागः अनुरागः यस्य स
स्वांगनायां परिपक्वानुरागवानित्यर्थः दक्षिणस्तु अन्य-
चित्तः अपि अन्यवनितायां चित्तं यस्य स तथाभूतोऽपि
स्त्रियां विकृतः न स्यात् ॥ ८॥
अर्थ-जो अन्य स्त्रियांम प्रेम नहीं रक्से अपनी स्वकीया स्त्री-
होम परिपक्क प्रेम रक्खे वह अनुरक्त अर्थात् अनुकूल नायक
कहलाता है। और जो अन्य स्त्रियोमे चित्त रखकर भी स्त्रीसे
विकृत नहो अर्थात् विगाढ न करे ( सर्वत्र यथा बुद्धि प्रेम व्य-
वहार रखे) उसे दक्षिण नायक कहते है ॥८॥
प्रियं वक्त्यप्रियं तस्याः कुर्वन् योऽविक-
तःशठः॥धृष्टो ज्ञातापराधोऽपि न वि-
लक्ष्योऽवमानितः॥९॥
(२०४) वाग्भटालंकार-परि० ५. टीका-यः तस्याः अप्रियं कुर्वन् अविकृतः सन् प्रियं वक्ति (स) शठः ज्ञातापराधः अपि अवमानि- तः न विलक्षः (स) धृष्टः इत्यन्वयः॥ तस्याः कां- तायाः अप्रियं कुर्वन् अपि अविकृतः विकाररहितो यथा तथा प्रियं वाक्यं वक्ति स शठनायकः । यश्च ज्ञातापराधः अवमानितः तिरस्कृतः अपि न विलक्षःन लज्जितो भवति स धृष्टः॥९॥ अर्थ-जो स्त्रीका अप्रिय कार्य करके चित्तमें विना विकार लाये ( सादे पनसे ही.) प्रिय बोले प्यार प्यारकी बातें बनावे उसे शठ नायक कहते हैं और जो अपने किये हुए अपराधको जान कर और स्त्रीसे तिरस्कार किये जाने पर भी लजित न हो उसे धृष्ट नायक कहतेहैं (साहित्यके ग्रंथों में इनके भेद धीरउदात्त, धीरउद्धत, धीरललित, धीरप्रशांत आदिभी लिखेहे जिन्हें ग्रंथ बाहुल्य भयसे इस ग्रंथमें ग्रंथकारने नहीं लिखा)।॥९॥ (भाषा) दोहा-नायक रस शृंगारको, पुरुप युवा सुज्ञान । युवति सुंदरी कामिनी, ताहि नापिका जान ॥ १॥ नायकके साहित्यमें, भेद बताये चार। सुअनुकूल दक्षिण शठह, धृष्ट लेह नि- र्धार ॥ २॥ परनारी रतिसे विमुख, सो अनुकूल बखान । दक्षिण परतिय चित दिये, तिय प्रिय परम सयान ॥ ३ ॥ कर अप्रिय विन विकृतिके, शठ बोले प्रिय बोल । नहिलाने अपराधयुत, धृष्ट तिरस्कृत लोल ॥४॥ नायिका वर्णन । अनूढाच स्वकीया च परकीया पणांगना।।
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (२०५)
त्रिवर्गिणः स्वकीया स्यादन्या केव-
लकामिनः॥१०॥
टीका--(अन्वयस्तु सरलः) अनूढा अविवाहिता
स्वकीया स्वस्य विवाहितास्त्री परकीया परस्त्रीपणांगना
पण्यांगना सानान्यवनिता वेश्या इत्यर्थः एवं नायिकाः
चतुर्विधाः तासु त्रिवर्गिणः धर्मकामार्थिनः पुरुपस्य
स्वकीया एव स्त्री स्यात् अन्या परकीया सामान्या च
केवलकामिनः कामिजनस्यैवेत्यर्थः ॥१०॥
अर्थ- अनूदा अर्थात् विना ब्याही नवयौवना, दूसरे स्वकीया,
अपनी विवाहिता स्त्री, तीसरे परकीया, पराई स्त्री,परनारी, चौथे
पणांगना वाजारू स्त्री अर्थात् वेश्या, इस प्रकार नापिका चार
प्रकारकी होती हैं इनमेंसे त्रिवर्ग धर्म, काम और अर्थके चाहने
वालोंके लिये केवल स्वकीया अपनी विवाहिता स्त्री ही होती है
और अन्य परकीया बेश्या आदि केवल कामियोंके ही लियेहैं १०
(भाषा) दोहा-होत नायिका चार विध, प्रथम अनूढा जाना
स्वीया परकीया तथा, गणका और वखान ॥ १॥ धर्म अर्य
अरु काममें, सुखद सुकीया नार । कामहेत अपयश सहित, गण-
का अरु परनार ॥२॥
अनूहा लक्षण।
अनुरक्तानुरक्तेन स्वयं या स्वीकृता भवे-
त् ॥ सानूढेति यथा राज्ञोदुष्मंतस्य शकुं-
तला॥११॥
. (२०६) वाग्भटालंकार-परि० ५. टीका-या अनुरक्ता स्वयम् अनुरक्तेन स्वीकृता भवेत् सा अनूढा इति यथा दुष्मंतस्य राज्ञः शकुंतला इत्यन्वयः ॥ अनुरक्ता अनुरागिणी अनुरतेन अनु- रागयुक्तेन नायकेन स्वयं स्वेच्छयैव स्वीकृता गृहीता अथवा यस्यामपरिणीतायां कस्यचित्पुरुपस्यानुरागः साप्यनूढा सा कन्यकापि कथ्यते उक्तं च साहित्यदर्प- णे ( कन्या त्वजातोपयमा सलज्जा नवयौवना इति तदुदाहरणं रसमंजयों यथा “किंचित्कुंचितहारयटित- रलभूवल्लिसाचिस्मितं प्रांतांतविलोचनातिभुजाप- यस्तकर्णोत्पलम् । अंगुल्यास्फुरदंगुलीयकरुचागंडस्य कंडूयनं कुर्वाणा नृपकन्यका सुकृतिनं सव्याजमालो- कते ॥” इति ॥११॥ अर्थ-जो विना विवाही नवोढा कन्या अनुरागयुक्त होकर अनुराग युक्त पुरुपसे स्वयं ग्रहण की जाय तो उसे अनूठा कहते हैं जैसे राजा दुष्मंतके शकुंतला अथवा जो नवयौवना कन्या किसी पुरुपमें अनुराग प्रगट करे वहभी अनूढा कहातीहै उसे कन्यका भी कहतेहैं ॥ ११ ॥ (भाषा) दोहा-अति सुंदर नवयौवना, हुवा न होय विवाह । ताहि अनूढा कहत जो, फरे पुरुपकी चाह ।। १॥(उदाहरण) मात अम्बिफे भगवती, मैं नित पूजूं तोय । जैसो मम सखिको पती, पैसो दीज्यो मोय ॥२॥ 8 सान्वयसं० टी० भापाटीकासहित। (२०७) । स्वकीया। देवतागुरुसाक्ष्येण स्वीकृता स्वीयना- यिका ॥क्षमावत्यतिगंभीरप्रकृतिःसच्चरि- त्रभृत् ॥१२॥ टीका-समावती अतिगंभीरप्रकृतिः सचरित्रभृत् देवतागुरुसाक्ष्येण ( या) स्वीकृता (सा) स्वीय- नायिका (भवतीति शेपेणान्वयः)॥ देवतानां गुरु- जनानांसाक्ष्येण सान्निध्येन स्वीकृता अंगीकृतास्वीय- नायिका स्वकीया भवतीत्यर्थः (उक्तंच साहित्यदर्पणे) विनयाजवादियुक्ता गृहकर्मपरा पतिव्रतास्वीयाकथि- ता सापि त्रिविधा मुग्धा, मध्या, प्रगल्भेति ॥ १ ॥ स्वकीयोदाहरणं रसमंजयों यथा “गतागतकुतूहलं नयनयोरपांगावधिस्मितं कुलनतभ्रुवामधुर एव विश्रा- म्यति । वचः प्रियतमश्रुतेरतिथिरेव कोपक्रमः कदा- चिदपि चेत्तदा मनसि केवलं मजति" ॥ २॥ इति तत्र अंकुरितयौवना लज्जावती मुग्धा समानलजा- मदना मध्या पतिमात्रकेलिकलापकोविदा प्रगल्भा इतिरसमंजयां तदुदाहरणानिच मुग्धाया यथा 'आ ज्ञप्तं किल कामदेवधरणीपालेन काले शुभेवस्तुं वास्तु- विधि विधास्यति तनौ तारुण्यमणीहशादृष्टयाखंजन- (२०८) वाग्भटालंकार-पार० ५. चातुरीमुखरुचा सौधाधरी माधुरी वाचा किं च सुधा- समुद्रलहरीलावण्यमातन्यते" ॥ ३ ॥ मध्यायाः यथा “स्वापे प्रियाननविलोकनहानिरेव स्वापच्युतौ प्रियकरग्रहणप्रसंगः ॥ इत्थं सरोरुहमुखी परिचिंतयं- ती स्वापं विधातुमपहातुमपि प्रपेदे" ॥ ४ ॥ प्रग- ल्माया यथा “आश्लिष्य स्तनमाकलय्य वदनं संश्लि- प्य कंठस्थली निष्पीडयाधरबिंबमंबरमपाकृष्य व्युद्- स्यालकम् ॥ देवस्यांबुजिनीपतेःसमुदयं जिज्ञासमाने प्रिये वामाक्षी वसनांचलैः श्रवणयोर्नीलोत्पलं निहते ॥ इति ॥ १२॥ अर्थ-क्षमायुक्त अतिगंभीर प्रकृति अज्ञावर्तित्वादिक अच्छे चरित्रोंको धारण करने वाली ऐसी जो सत्कुल प्रसूता स्त्री सो देवता और गुरु जन (बडों) के समक्षमें अंगीकार करी जाषि वही स्वकीया स्त्री होतीहै साहित्य दर्पणमें ऐसा लिखा है कि जो विनय (नम्रता) और ऋजुता सीधेपनसे युक्तहो और गृह- स्थके कामोंमें रत रहने वाली और पतिव्रता स्त्री स्वकीया कह लातीहै यह स्वकीया अवस्था भेदसे तीन प्रकारकी होतीहै प्रथम मुग्धा दूसरे मध्या तीसरे प्रगल्भा इनमेंसे अंकुरितयौवना लना. वती नवीन स्त्रीको मुग्धा कहतेहैं और जिसमें लना और काम देव समान हो उसे मध्या कहतेहैं और पतिकी क्रीडामें प्रवीण होगई हो उसे प्रगल्भा कहते हैं इनके उदाहरण ऊपर संस्कृत टीकामें देखो अथवा नीचे भापा दोहोंमें ॥ १२ ॥ (भाषा) दोहा-जो गुरु देवनके निकट, करीजाय स्वीकार। अति सुशील गृह कर्म रत, सोइ स्वकीया नार ॥ १ ॥ इसहि . - सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (२०९) स्वकीया नारिके, होत उमर अनुसार। मुग्धा मध्या प्रगल्भा, तीन भेद निर्धार ॥२ ॥ मुग्या हो नव यौवना, मध्या सम मद लाज । करे प्रगल्भा निपुणता, निज पति रति के काज ।। ३ ॥ मुग्धा उदाहरण-लाजभरी अँखियान, सन्मख नाहिं लखाया पति जल माग्यो भवनमें, बाहर ही घर जाय ॥ ४ ॥ (मध्या उदाहरण) मदन कहे पिप मिलनकू, लाल को सार । बस्न चहे फिर फिर रुके, मनमें करे विचार ॥ ५ ॥ प्रगल्भा उदाहरण । देख उजेरो प्रातको, विदित न होभरतार | प्रेमालिंगनके सहित, झट देदिये किवार ॥ ६॥ परकीया। परकीयाप्यनूढेव वाच्यभेदोऽस्ति चान- योः ॥ स्वयमप्यतिकामैका सख्या चैका प्रियं वदेत् ॥ १३ ॥ टीका-परकीया अपि अनूढा इव ( भवति) अ- नयोः च वाच्यभेदः अस्ति एका अतिकामा स्वयम् एका च सख्या प्रियं वदेत् इत्यन्वयः॥ अनयोः पर- कीयानूढयोः वाच्यभेदः वचनभेदः आस्ति एका पर- कीया अतिकामा अतिकामवती स्वयं प्रियं कांत वदेत् सुरताभिप्रायं प्रकाशयेत् एका च अन्या अनूढा सख्या सखीमुखेन प्रियं कांतं वदेत् स्वाभिप्रायं प्रका- शयेदित्यर्थः परपुरुपानुरक्ता परकीया अस्याश्चोदाहर- णम्"स्वामी मुग्धतरो वनं धनमिदं वालाहमेकाकिनी। ..
(२१०) वाग्भटालंकास्-परि० ५. शोणीमावृणुतेतमालमलिनच्छायातमःसंततिः ॥तन्मे सुंदर ! कृष्ण मुंच सहसा वत्मेति गोप्या गिरः श्रुत्वा तां परिरभ्य मन्मथकलासक्तोहरिः पातुनः" इति१२॥ अर्थ-परकीया भी अनूढाकी भांत ही होतीहै इनमें सिरफ वचनोंका ही भेद होताहै इनमेंसे परकीया अति कामवती होने से स्वयं आपही पर पुरुपसे अपना अभिमाप कहदेतीहै और अनूढा सखीके द्वारा प्रायः अपना अभिप्राय प्रकट करतीहै परकी. याका लक्षण मुख्य परपुरुषमें अनुरक्त होनाहै इसका उदाहरण ऊपर श्लोकमें अथवा नीचे दोहेमें देखो ॥ १३ ॥ (भाषा) दोहा-रुष्ट रहे निज जननसे, गृहका करेन कार । प्रेम करे पर पुरुप से, सो परकीया नार ॥१॥ ( उदाहरण ) मैं बाला रहुं एकलो, वृद्ध सास रहे सोय। छैल रात मुझ घर रहो, वरजे तुमे न कोय ॥ २ ॥ सामान्या। सामान्यवनिता वेश्या भवेत्कपटपं- डिता ॥ नहि कश्चित्प्रियस्तस्या दाता- रं नायकं विना ॥ १४ ॥ सर्वप्रकाशमेवै- पा याति नायकमुद्धता॥वाच्यःप्रच्छन्न- एवान्यस्त्रीणां प्रियसमागमः॥ १५॥ टीका-सामान्यवनिता वेश्या कपटपंडिता भवेत दातारं नायकं विना हि तस्याः कश्चित् प्रियःन एपा उद्धता सर्वप्रकाशम् एव नायकं (प्रति) याति अन्य -
(२११)
सान्वपसं० टी० भाषाटीकासहित ।
स्त्रीणां प्रियसमागमः प्रच्छन्न एव वाच्यः इत्यन्वयः॥
कपटे अर्थग्रहणचातुर्य पंडिता विचक्षणा एपा उद्धता
उच्छृखला सती सर्वप्रकाशं सर्वेपां जनानां समक्ष
नायक कातं प्रति याति गच्छति अन्यस्त्रीणां स्वकी-
यापरकीयानां प्रियसमागमः कान्तं प्रतिगमनं प्रच्छन्नः
गुप्तत्वेनैव (उक्तं च रसमंजर्याम्)द्रव्यमानोपाधिसकल-
परपुरुषाभिलापा सामान्यवनिता तस्या उदाहरणम्
"दृष्ट्वाप्रांगणसन्निधौबहुधनं दातारमभ्यागतं वक्षोजौ
तनुतः परस्परमिवाश्लेपं कुरंगीदृशः॥ आनंदाश्रुपयासि
मुंचति मुहुर्मालामिपात कुंतला दृष्टिः किंच धनागमं
कथयितुं कर्णातिकं गच्छति॥” इति ।। १४ ॥१५॥
अर्थ-सामान्यवनिता अर्थात् वेश्या कपट करनेमें पंडिता
होती है सिवाय द्रव्य देनेवालेके इसको कोई भी प्यारा नहीं
होता है यह उद्धत निःशंक होके सबके सामनेही पर पुरुषके
पास चली जाती है इसके सिवाय और स्त्रियों ( स्वकीया पर-
कीया सब)का पुरुषके पास गमन करना एक प्रकार गुप्त रूपसे ही
होता है रसमंजरीमें लिखा है कि द्रव्य मात्रहीके कारण समस्त
परपुरुषोंकी अभिलाषा रखनेवाली सामान्यवनिता अर्थात्
वेश्या होती है इसका भी उदाहरण ऊपर श्लोक तथा नीचे
दोहेमें ॥ १४ ॥ १५॥
(भाषा) दोहा-करे प्रीति टन नरन, अधिक द्रव्य जो देत।
ताको गणिका कहत हैं, पिन धन फरेन हेत ॥११॥ (उदाहरण)
अति भूपण बहु वसनते, मम नित करे सिंगार । लाउ इती उस
धनिकः, गणिका कहे पुकार ॥२॥
(२१२) वाग्भटालंकार-परि० ५. विप्रलंभ। पूर्वानुरागमानात्मप्रवासकरुणात्मकः ।। विप्रलंभश्चतुर्धा स्यात् पूर्वः पूर्वो ह्ययं गुरुः ॥ १६॥ टीका-विप्रलंभः पूर्वानुरागमानात्मप्रवासकरुणा- स्मकः चतुर्धा स्यात् अयं हि पूर्वः पूर्वःगुरुः इत्यन्वयः।। पूर्वानुरागात्मकः मानात्मकः प्रवासात्मकः करुणा त्मकश्च एवं विप्रलंभः चतुर्धा भवति विप्रलंभः पूर्व शृंगारभेदे चोक्तः अयं पूर्वः पूर्वः गुरुः यथा करुणात प्रवासः प्रवासात् मानः मानात् पूर्वानुरागः श्रेष्ठ इत्यर्थ॥१६॥ अर्थ-(पहले शृंगारके दो भेद जो कहे थे कि संयोग और विप्रलंभ जिसमेंसे संयोगका संक्षिप्त वर्णन कुछ हो चुका अब विप्रलंभका वर्णन करते हैं ) वह विप्रलंभ अर्थात् वियोग चार प्रकारका होता है पूर्वानुराग मान प्रवास और करुणा इनमेंसे पिछलेकी अपेक्षा पहला पहला श्रेष्ठ समझा जाता है जैसे फरुणसे प्रयास प्रवाससे मान और मानसे पूर्वानुराग श्रेष्ठ होता है ॥ १६ ॥ पूर्वानुराग। स्त्रीपुंसयोर्नवालोकादेवोल्लसितरागयोः ॥ ज्ञेयः पूर्वानुरागोऽयमपूर्णस्पृहयोर्दशा१७॥
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (२१३):
टीका-नवालोकात् उल्लसितरागयोःअपूर्णस्पृहयोः
स्त्रीपुंसयोः दशा अयं पूर्वानुरागः ज्ञेयः इत्यन्वयः ।।
नवालोकात् नव्ययोः स्त्रीपुंसयोः आलोकात् दर्शनात
श्रवणादपि उल्लसितरागयोः उल्लसितः उद्भासितः रागः
ययोः अपूर्णस्पृहयोः अपूर्णा स्पृहा ययोः अपूर्ण-
मनोरथयोरित्यर्थः एवं भूतयोःस्त्रीपुंसोः या दशा स
एव पूर्वानुरागः दशा अवस्था सा दशविधा दर्पणे
"अभिलापश्चिंतास्मृतिगुणकथनोदेगसंप्रलापाश्च-उ-
न्मादोऽथ व्याधिजडतामतिः" इति दशात्र इति॥१७॥
अर्थ-नवीन स्त्री या पुरुपके देखनेसे ( तथा उसके गुण सुन-
नेसे ) उल्लसित अर्थात् उद्भासित हुवा है अनुराग (प्रेम) जि.
नका ऐसे जो स्त्री पुरुष अर्थात् नूतन स्त्रीके दर्शनादिसे पुरुष
और नूतन पुरुपके दर्शनादिसे स्त्री उनकी जो दशा ( अवस्या)
उसे पूर्वानुराग कहते हैं वह दशा प्रायः दश प्रकारकी होती है
जैसे अभिलाप, विता, स्मृति, गुणकथन, उद्वेग, संप्रलाप,
उन्माद, व्याधि, जडता, मृति इति ॥ १७ ॥
(मान, प्रवास,)
मानोऽन्यवनितासंगादीवा॑विकृतिरुच्य-
ते ॥ प्रवासः परदेशस्थे प्रिये विरह-
संभवः ॥१८॥
(२१४) वाग्भटालंकार-परि० ५. टीका--अन्यवनितासंगात् ईयो विकृतिः मानः उच्यते । प्रिये परदेशस्थे विरहसंभवः प्रवासः इत्य- न्वयः ॥ अन्यवनितासंगात् परस्त्रीणां संगः मैथुनाला पादिकः तस्मात् तस्य दर्शनश्रवणानुमानात या ईर्ष्या- विकृतिः ईय॑या विकारः स मानः मानात्मको विप्र- लम्भः उच्यते इत्यर्थः । तथा प्रिये कांते परदेशस्थे यः विरहस्य संभवः स प्रवासात्मको विप्रलंभः ॥ १८॥ अर्थ-परस्त्रीके संग मैथुनालापादिके देखने सुनने तथा अनु- मानादिसे जो ईसे विकार पैदा होजाता है उसे मान नामक विमलंभ श्रृंगार कहते हैं और पतिके परदेश रहनसे जो विरह उत्पन्न होता है उसे प्रवास नामक विप्रलंभ शृंगार कहते हैं।॥१८॥ करुणा। स्यादेकतरंपंचत्वे दंपत्योरनुरक्तयोः ॥ शृंगारः करुणाख्योयं वृत्तवर्णन एव सः१९ टीका--अनुरक्तयोः दंपत्योः एकतरपंचत्वे अयं करुणाख्यः शृंगारः स्यात् स एव वृत्तवर्णनः इत्य- न्वयः ॥ अनुरक्तयोः अनुरागयुक्तयोः दंपत्योः स्त्री- पुरुपयोः एकतरपंचत्वे द्वयोर्मध्ये कस्यचिदेकस्य मरणे (तथा प्रबजितेऽपि)अयं करुणाख्यो विप्रलंभः शृंगारः स्यादित्यर्थः स एव वृत्तवर्णनः गतस्य वर्णन- रूपको भवति नतु वर्तमानस्य भाविनो वा वर्णनरूपः
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (२१५)
एतेषां उदाहरणानि च यथाक्रमं दृष्टव्यानि पूर्वानु-
रागस्य यथा “ दृष्ट्वा चित्रितचित्रमूपा भूपा तु चित्र-
लेखातःअनिरुद्धस्य सुकृतिनो भूमौ पतिता निरुद्ध-
चित्ता सा" ॥3॥ मानस्य यथा दर्पणे "विनयतिसु-
हशो दृशोः परागंप्रणयिनि कौसुममाननानिलेन॥तद-
हितयुक्तेरभीक्ष्णमक्ष्णोईयमपि रोपरजोभिरापुपूरे॥
॥ २॥ प्रवासस्य यथा “इतः केकीनादैस्तुदति शत-
कोटिप्रतिभटैरितः कामः कामं कठिनतरवाणैः प्रहरति।।
इतो गर्जत्युचर्जलधरगणो भीमनिनदैविना नाथ
जाने न सखि भविता किं ननु मम ॥३॥” (करुण-
स्य यथा) "जाति न याति नहि गच्छति यूथिकायां
नायाति कंदकलिकामपि सौरभाढयाम्।। भग्नोद्यमस्तु-
हितनाशितमल्लिकायाः शोकाकुलः क्वगति रोदति
पटपदोऽसौ॥४॥" इति एपांमध्ये पूर्वानुरागस्य ना-
यिका प्रायशः अनूढा कुत्रचित् परकीयापि मानस्य
मानवती क्वचित् खंडितापि प्रवासस्य प्रोपितभर्तृका
करुणस्य शोकवती इति आसां मध्ये ज्येष्टाकनिष्ठा
धीराधीरादिभेदास्तथा च स्वाधीनपतिकाखंडि-
ताऽभिसारिकाकलहांतरिताविप्रलन्धाउका प्रोपित-
भर्तृकावासकसजा इत्यादिभेदाः संति ग्रंथवाढल्यभ-
यामात्र लिखिताः ॥ १९॥
(२१६) वाग्भटालंकार-परि० ५. अर्थ-प्रेमी दोनों स्त्रीपुरुपौमिसे एक किसीकी मृत्यु होजानसे या (पतिके संन्यस्तादि होजानेसे ) करुणा नामक विप्रलंभ शृं. गार होताहै इसमें गई हुई वानोंका वर्णन होता है ॥ १९ ॥ इन पूर्वानुराग मान प्रवास और करुणा विप्रलंभके उदाहरण कमसे ऊपर टीकामें लिखे श्लोकोंमें देखिये तथा नीचे दोहोंमें (विप्रलंभ वर्णन ) (भापा दोहा) विप्रलंभ इमि चार विध, प्रथम पूर्व अनुराग । दूजो मान प्रवास पुनि, चौथे करुण विराग ॥१॥ ( इनके यथाक्रम लक्षण) सो पूरब अनुराग हैं, देखे सुने जु प्रीति । रोप होप पति विमुखते, यहै मानकी रीति ॥२॥ पीय बसे परदेशमें, ताको विरह प्रवास । करुण मरण संन्यासते, जामें होय निरास ॥३॥ (उदाहरण) (पूर्वानुराग) देव ऋपिनसे कृष्णगुन, सुनकर भीम कुमारि । भइ अनन्य अनु रागिनी, मिलिहो कृष्ण मुरारि ॥ ४ ॥ (मान) बंशीवट तट कृष्ण सन, कोउ सुंदर बज नारि । रोष भरी मुख मोरके, लख वृपभानु दुलारि ॥ ५ ॥ (प्रवास) पीत भये सखियन वसन, खेळस पीतम संग । मैं विन पी पीरी परी, भयो केसरी अंग ॥ ॥ ६ ॥ (करुणा) कर विलाप पुनि सिर धुने, गोपीचंदकी नार। कर पकरेकी नाकरी छोड चले मझधार ॥७॥ इनमेंसे पूर्वानुरागकी नायिका प्रायः अनूठा होती है कदा चित् कहीं परकीया भी होजाती है। और मानकी मानवती कभी खंडिता भी होता है प्रवासकी प्रोपितभर्तृका और करुण की शोकवती होती है इनके सिवाय ज्येष्ठा, कनिष्ठा, धीरा, अधीरा, स्वकीयाके भेद होते हैं और अनुशयना कुलटा आदि परकीयाके तथा स्वाधीनपतिका खंडिता, अभिसारिका, फलहांतरिता,विप्र- लब्धा, उत्का प्रोपितभर्तृका, वासकसना इत्यादि भेद भी होते. हैं जो ग्रंथ वाहुल्य भयप्ते यहां नहीं लिखे रसमंजरी रसराज आदिमें देखें। -
सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित। (२१७)
वीररस ।
उत्साहात्मा भवेदीरस्त्रिधा धर्माजिदा-
नतः॥ नायकोत्र भवेत्सर्वेः श्लाघ्यैरधि-
कतो गुणैः ।। २०॥
टीका धर्माजिदानतः उत्साहात्मा वीरः विधा भवेत्
अत्र सर्वेः श्लाध्यैः गुणैः अधिकतो नायको भवेदित्य-
न्वयः धर्मतः आजितः दानतः एवं विधा उत्साहात्मा
वीरः आजिः युद्धम् यथाचधर्मवीरः युद्धवीर दानवीरः
( उक्तं च साहित्यदर्पणे ) "उत्तमप्रकृतिवीर उत्साह
स्थायिभावकः॥ महेंद्रदेवतो हेमवर्णीयं समुदाहृतः॥३॥
आलंबनविभावास्तु विजेतत्यादयो मताः। विजेतव्या-
दिचेष्टायास्तस्योद्दीपनरूपिणः ॥२॥ अनुभावास्तु
तत्र म्युःसहायान्वेपणादयः॥३॥संचारिणस्तु धृति
मतिगवस्मृतितर्करोमांचाः॥ स च दानधर्मयुदैर्दयया
व समन्वितश्चतुर्वासा (युद्धवीरस्योदाहरणम् ) भो
लंकेश्वर दीयतां जनकजा रामः स्वयं याचते कोयं
ते मतिविभ्रमः स्मर नयं नाद्यापि किंचित् कृतम् ।।
नेवं चेत् खरदूपणत्रिशिरसां कंठामृजा पंकिलः पत्री
नेप सहिप्यते मम धनुविधवंधूकृतः ॥५॥"॥२॥
(२१८) वाग्भटालंकार-परि० ५. अर्थ-धर्म और युद्ध और दान इनमें उत्साहरूपी होनेसे वीर रस तीन प्रकारका होताहै, जैसे धर्मवीर, युद्धवीर और दानवीर इसमें नायक सच प्रशंसनीय गुणोंसे अधिक होता है (साहित्य दर्पणमें) चारप्रकारका लिखा है जैसे युद्धवीर, धर्मवीर, दानवीर, और दयावीर इस वीररसका स्थायीभाव उत्साह है और महेंद्र देवता है सुनहरा वर्ण है और युद्ध वीरका आलंबन विभाष विजेतव्यादि हैं विजेतव्यकी चेष्टादि उद्दीपन है और सहाया- दिका अन्वेषणादि अनुभावह धृति, मति, गर्वादिक संचारी हैं २० (भाषा) दोहा-युद्ध धर्म और दान में, हो अविफल उत्साह। ताहि वीररस कहत हैं, उद्दीपन वाहवाह ॥१॥ (उदाहरण) यश राख्यो यशवंतने, भुजबल प्रबल बढ़ाय । हटे न तव तक जब तलक, नाहर ना हर जाय ॥ २ ॥ करुणा। शोकोत्थः करुणो ज्ञेयस्तत्र प्रणतरोदने॥ वैवर्ण्यमोहनिवेदप्रलापाश्रूणि कीर्तयेत् २१ टीका-करुणः शोकोत्थः ज्ञेयः तत्र प्रणतरोदने वैवर्ण्यमोहनिर्वेदप्रलापाश्रूणि कीर्तयेत् इत्यन्वयः ॥ शोकोत्थः शोकात् इएनाशानिष्टावाप्तिजनितात् उ. त्थितः करुणः करुणारसो ज्ञेयः तत्र रसे प्रणतं रोदनं च वैवण्य विवर्णत्वं मोहो मूर्छा निर्वेदः वैराग्यं प्रलापः प्रलपनम् अश्रूणि नयनजलानि इत्यादयो अनुभावाः कीर्तितव्या इत्यर्थः अस्य स्थायीभावः शोकः ( उक्तंच सा दर्पणे)"इष्टनाशादनिष्टाप्तेःकरुणाख्योरसोभवेत्॥
सान्षयसं० टी० भाषाटीकासहित ।
धीरैः कपोतवर्णोऽयं कथितो यमदैवतः॥ १॥ शोकोत्र
स्थायिभावास्याच्छोच्यमालंबनं मतम्।। तस्य स्मृत्या-
दिकावस्था भवेदुद्दीपनं पुनः ॥२॥ अनुभावा दैव-
निदाभूपाताक्रंदनादयः ॥ वैवण्याच्यासविश्वासस्तंभ-
प्रलयनानि च ॥३॥ निवदमोहापस्मारव्याधिग्लानि-
स्मृतिश्रमाः।। विषादजडतोन्मादचिंताद्या व्यभिचारि-
णः॥४॥ उदाहरणम्-विपिने क जटानिबंधनं तव
चेदं क मनोहरं वपुः ॥ अनयोर्घटना विधेः स्फुटं ननु
खड़ेन शिरीषकर्तनम् ॥५॥" इति ॥ २१ ॥
अर्थ-वांछित पदार्यके नाश तथा अनिष्टकी अमाप्ति इनसे
हुवा जो शोक उससे उठा हुवा करुणा रस होताहै उसमें प्रणत
नघता या पतन तथा रुदन और वर्ण विगड जाना मोह मूछा
होना निर्वेद अर्थात् वैराग्य होजाना मलाप (वकवाद) होना
तथा नेत्रोंसे आंसू गिरना इत्यादि (अनुभाव ) कीर्तन किये
जाते हैं इस रसका स्थायीभाव शोक है (साहित्य दर्पण) लिखा
है कि इस रसका वर्ण कपोतके रंगका (साखी) है इसको देवता
यम है शोक स्थायीभाव और शोच्य वस्तु आलंबन है उसकी
याद आना आदिउद्दीपनहें और देवकी निंदा पृथिवीमें पड़ना
विलाप करना आदि अनुभाव हैं और वर्ण विगडना, ऊंची श्वास
लेना स्तंभित होजाना प्रलाप, निर्वेद, मोह, अपस्मार, व्याधि,
लानि, स्मृति, श्रम, विषाद, जडता उन्माद, चिंता इत्यादि व्यभि•
चारी भावहे उदाहरण ऊपर श्लोकमें तया नीचे दोहेमें देखो२१
(भाषा) दोहा-इष्टनाश या दुख मिलें, होय शोक फिर
जासु । मोह विषाद विलाप हो, करुणा रस कहि तास ॥ १ ॥
. (२२०) वाग्भटालंकार-पार०५. ( उदाहरण ) पत उतरत मम वसन सन, हे पत राखन हार । आरत हो द्रोपदि निवल, रो रो करत पुकार ॥१॥ हास्य। हासमूलः समाख्यातो हास्यनामा रसो बुधैः ॥ चेष्टांगवेपवैकृत्याहाच्यो हास्य- स्य चोद्भवः ॥ २२॥ कपोलाक्षिकृतोल्ला- सो भिन्नोष्टः समहात्मनाम् ॥ विदीर्णा- स्यश्च मध्यानामधमानांसशब्दकः॥२३॥ टीका -हासमूलः हास्यनामारसःबुधैःसमाख्यातः चेष्टांगवेपवैकृत्यात हास्यस्य च उद्भवः वाच्यः॥स महा- त्मनां कपोलाक्षिकृतोल्लासः अभिन्नोष्ठःमध्यानां च वि. दीर्णास्यःच अधमानां सशब्दकः इत्यन्वयः॥हासःमूलं यस्य स हासमूलः चेष्टांगवेपवकृत्यात् चेप्टया अंगस्य घेपस्य च वैकृत्यात विकृतिभावात् हास्यस्य च उद्भय उत्पतिरित्यर्थः स हासः प्रकृतिभेदेन विधा महात्मना तुकपोलाभितोल्लासःकपोलाभ्याम् अनिभ्यां च कृतः उल्लामः विकासः यम्मिन् तथाभृतः अभिन्नोष्टश्च न भित्री ओष्टी यस्मिन् तथाभृतश्र मध्यानां विदीर्णास्य विदीर्णम् आस्यं मुग्यं यम्मिन् एवं भृतः अधमाना त सशब्दकःशब्दमाहितः इत्यर्थः (क्तंच साहित्यदर्पण) "विकृताकाग्वागयेपचेष्टादः कुहकावेवादासो हास्य- सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (२२१) * स्थायिभावः श्वेतः प्रथमदैवतः॥१॥ विकृताकार- वाक्चेष्टं यदालोक्य हसेजनः ॥ तदवालंबनं प्राहुस्त- चेष्टोद्दीपनं मतम् ॥ २॥ अनुभावोऽक्षिसंकोच वदन- स्मरेतादिकानिद्रालस्यावहित्थाद्या अत्र स्युर्व्यभिचा- रिणः॥३॥ (उदाहरणम्) (सा. दर्पणे ) गुरोगिरः पंच दिन्यान्यधीत्य वेदांतशास्त्राणि दिनत्रयं च।।अमी समा- प्राय च तर्कवादान् समागताः कुक्कुटमिश्रपादाः ॥४॥" इति ॥ २२ ॥ २३॥ अर्थ-पंडितोंने कहाहै कि हँसी जिससे हो उसे हास्य रस कहाहै वेष्टा अंग और भेषको विकृति इत्यादिसे हास्यकी उत्पत्ति वर्णन फरी है वह हास्य ( हसना) ऐसे तीन प्रकारका है कि महात्माओंका हँसना ऐसाहै फि जिसमें फपोल और नेत्रोंहीमें उल्लास रहे होठ खिलें नहीं और मध्यम लोगोंके हँसनेमें मुह सुल- जाताहै दाँत दिख जातेहैं और अधर्मोके हँसनेमें तो खूब कहा, यहाका शब्द होताहै साहित्यदर्पणमें लिखाद फि हास्परसका स्थायी भाव हँसना है और वर्ण श्वेतहै ममय देवताहै विकृता- कारादि देखना जिनसे हँसी आवे सो. आलंबन विभावहैं और विकृताकारादिकी चेष्टा उदीपनहैं और नेत्र संकोच मुह फेरना आदि अनुभाव हैं.और निदा आलस्य अपहित्य (अंग गोपन अन्यथा भाषणादि व्यभिचारी भावहैं उदाहरण ऊपर लोकमें तया नीचे देखो ॥ २२ ॥२३॥ (भाषा) सोरठा-मुख्य हास निह मूल, हास्य नाम रस होत सो । ये इसर अनुहल, वप पचन चेष्टा विकृत ॥१॥ १ पिप यर्ग: धास्तु शास्यति भेदः । .
(२२२) वाग्भटालंकार-परि० ५५ .. (उदाहरण ) दोहा-तीन दिना सब शास्त्र पढ, एक दिना पड़ घेद । कुक्कुट मिश्र पधारिहैं, सिर पर धरे लवेद ॥ ॥ ३ अद्भुत । . विस्मयात्मानतोज्ञेयः सचासंभाव्यवस्तु- नः ॥ दर्शनाच्छ्रवणाहापि प्राणिनामुप- जायते ॥ २४॥ तत्र नेत्रविकासः स्या- त्पुलकः स्वेद एव च ॥ निस्यंदनेत्रता साधु साधु वा गद्गदा च गीः ॥२५॥ टीका-विस्मयात्मा अद्भुतः ज्ञेयः स च प्राणिनाम् असंभाव्यवस्तुनः दर्शनात् श्रवणात् अपि वा उप- जायते तत्र नेत्रविकासः पुलकः च एव स्वेदः निस्य- दनेत्रता वा साधु साधु गद्गदा च गीः स्यात् इत्य- न्वयः॥ विस्मयात्मा विस्मयः आत्मा स्थायीभावः यस्य स च अद्भुतः असंभाव्यवस्तुनः न संभवितुं योग्यम् असंभाव्य तादृशस्य वस्तुनः दर्शनात् श्रव- णात् वा प्राणिनां प्राणवताम् उपजायते संभवतीत्यर्थः तत्र रसे नेत्रयोः विकासः पुलकः रोमांचः निस्पंद- नत्रता नेत्रयोः किंचित्स्थैर्यमित्यर्थः वा साधु साधु इत्येवंरूपा गद्गदा च गीः वाणी स्यात् (उक्तं च सा- हित्यदर्पणे) अद्भुतो विस्मयस्थायिभावो गंधर्वदेवतः।। पीतवर्णों वस्तु लोकातिगमालंबनमतम्॥१॥गुणानांत- सान्वयसं टी० भाषाटीकासहित । (२२३) स्यमहिमा भवेदुद्दीपनं पुनः॥ स्तंभः स्वेदोथ रोमांच- 'गद्दस्वरसम्भ्रमाः॥२॥तथा नेत्रविकासाचा अनुभावाः प्रकीर्तिताः। वितर्कावेगसंभ्रांतिहर्षाया व्यभिचारिणः • ॥३॥लोकातिगम् अलौकिकम् । ( अत्रोदाहरणम् ) दोर्दडांचितचंद्रशेखरधनुदैडावभंगोद्यतर्यकारध्वनिरा- र्यबालचरितप्रस्तावनाडिडिमः॥ द्राक् पर्यस्तकपाल- संपुटमिलद्ब्रह्माण्डमांडोदरभ्राम्यत्पिण्डितचंडिमा क- थमहो नाद्यापि विश्राम्यति॥४॥"इति ॥२४॥२५॥ अर्थ-विस्मय आश्चर्यरूप स्थायी भावधाला अद्भुत रस जा- नना चाहिये यह असंभवरूप पदायोंके देखने अथवा सुननेसे प्राणियोंको उत्पन्न होता है इसमें नेवॉका खुला रहना तथा रोमांच होना पसीना आजाना अथवा नेत्र स्तंभितसे रहजाना तथा पदत अच्छा बहुत अच्छा ऐसी गद्गद पाणी हो जाना आदि होते हैं देतो साहित्यदर्पण इस अद्भुत रसफा स्थायी भाव आचर्य होता है गंधर्व देवता है पीला वर्ग है अलौकिक वस्तु आलंबन है उसके गुणोंकी महिमा उद्दीपन है और स्तंभ, स्पेद, रोमांव, गद्गद स्वर, संभ्रम, नेत्रविकास इत्यादि अनुभाष हैं वितर्क, आवेग संभाति,हर्ष इत्यादि व्यभिवारी हैं उदाहरण पर श्लोकी देखो तथा नीचे ॥ २४ ॥२५॥ (भाषा) दोहा-अद्भुत रस आश्चर्य मप, कह कपि चतुर सु. जान । सो अद्भुत पस्तूनफे, देखे सुने घसान - १॥ (उदाहरण) तर यस मुतिपन तय गुनन, दुइ ले पोपत माल । अग्दि आध गुन अनत लस, भइ विस्मित मुर पाल || २ || 4.२२१) । वाग्भटालंकार-परि० भयानक। भयानको भवेद्भीतिप्रकृति?रवस्तुनः॥ स च प्रायेण वनितानीचबालेषु शस्यते॥ ॥ २६ ॥ दिगालोकास्यशोषांगकंप गद्दसंभ्रमाः ।। त्रासवैवर्यमाहाश्च येते विबुधैरिह ॥ २७॥ टीका-घोरवस्तुना भीतिप्रकृति भयानको भवेत् स च प्रायेण वनितानीचबालेषु शस्यते । इह दिगा- लोकास्यशापांगकंपगद्गदसंभ्रमाः च त्रासवैवर्ण्य- मोहाः बुधैः वयते इत्यन्वयः ॥ घोरवस्तुनः राक्ष- *सादितः व्याघ्रादितश्च भीतिप्रकृतिः भीतिः भयम् एव प्रकृतिः स्वभावः स्थायीभावः यस्य तथाभूतो भयानका भयानकरसः स रसः प्रायेण वनितादिपु शस्यते-प्रशस्यते इत्यर्थः । इह अस्मिन् रसे दिगा- लोकादयः त्रासादयश्च (अनुभावाः ) वण्यते (उक्तं च सहित्यदर्पणे)"भयानकोभयस्थायिभावः कालाधि- दैवतः ॥ स्त्रीनीचप्रकृतिः कृष्णो मतस्तत्त्वविशारदैः। -॥१॥यस्मादुत्पद्यते भीतिस्तदत्रालंबनंमतम्॥ चेष्टा घोरतरास्तस्य भवेदुद्दीपनं पुनः॥२॥अनुभावोत्रवैवर्ण्य- गद्दस्वरभापणम् ॥ प्रलयस्वेदरोमांचकंपदिक्प्रेक्षणा- सान्वयस०टी० भाषाटीकासहित १३२५) दयः॥ जुगुप्सावेगसंमोहः शंकाद्या व्यभिचारिणः॥३॥ (उदाहरणम् ) घनविटपतिमिरपुंजे काननकुंजे दिनां- तसंपाते। उत्फालितमतिमीता व्याघ्रं दृष्ट्वा पला- यिता भिल्ली (मु० घ) ॥ २६॥ २७॥ भधु-घोर । उरावनी ) वस्तुसे उसके दर्शनादि शम्दादिसे मिय-प्रकृतिवाला अर्याद भय स्थापी- भाववाला भयानक रस होता है वह भयानक रस विशेषकर स्त्री नीच पालक इनमें अच्छा लगता है इसमें दिशावोंकी ओर (चारों तरफ महसूखना शरीर कापना गद्गदवाणी संभ्रम त्रास वैवण्य मोह ये पंडितोंने (अनुभाव ) वर्णन किये हैं (देखोसा० दर्पण) भयानकका स्थायी भाष भर काल देवता स्त्री नीच प्रकृति कृष्णवर्ण कहाहै जिससे भयहो वह आलंबन उसकी घोर चेष्टा उद्दीपन और वैवर्ण्य गढ़द स्वर मलय पसीना रोमांच कंप आदिक अनुभाव हैं और जुगुप्सा आवेग मोह शंका इत्या. दिक व्यभिचारी भाव होते हैं (उदाहरण ऊपर श्लोकमै देखो या नीचे भापामें)॥ २६ ॥ २७ ॥ (भाषा) दोहा-कहत भयानक नाम रस, जिसमें अनि भप होप । नीच प्रकृति अरु वाल तिय, तिनमें सोहत सोप ॥१॥ .( उदाहरण ) धन तरू तिमिर समूह बन, ताम वाप लखाय । बास युक्त कंपत भगी, भिल्ल नारि भय खाय ॥२॥ रोद्रा क्रोधात्मको भवेद्रौद्रः क्रोधश्चारिपराम- वात्।भीष्मत्तिर्भवेदुग्रः सामर्पस्तत्र ना- यकः ॥२८॥स्वांसापातस्वसंश्लाघाक्षेप- (२२६) वाग्भटालंकार-परि० ५. भृकुटयस्तथा ॥ अबारातिजनाक्षेपो द- लनं चोपवर्ण्यते ॥२९॥ टोका-रौद्रः क्रोधात्मको भवेत् च क्रोधः अरिपरा- भवात् (भवेत् तत्र सामर्षःभीष्मवृत्तिः उग्रः नायकः भवेत् । अत्र च स्वांसापातस्वसंश्लाघाक्षेपभ्रुकुटयः तथा अरातिजनाक्षेपःदलनं च उपवर्ण्यते इत्यन्वयः॥ क्रोधात्मकः क्रोधस्थायिभावः अस्पिराभवात् शत्रुतः अवमानात् भीष्मवृत्तिः भयंकरावृत्तिः सामर्पः अम- पेंण कोपेन सहितः नायकः वर्णनीयः स्वांसापातः स्वस्य अंसस्य जहल्लक्षणया बाहोः आपातः स्वसं- श्लाघा स्वस्य आत्मनः भूतभविष्यद्रूपा श्लाघा न तु वार्तमानिका आक्षेपः निर्भत्सनं भ्रुकुटिः भृकुटिसंको- च इत्यर्थः अरातिजनाक्षेपः अरातिजने आक्षेपः उपा- लंभः दलनं मर्दनम् उपवर्ण्यते अनुभावरूपेण वर्ण्यते इत्यर्थः(उक्तंचसा दर्पणे)"रौद्रकोधस्थायिभावोरक्तो रुद्राधिदेवतः॥ आलंबनमरिस्तत्र तच्चेप्टोद्दीपनं मतम् ॥ ॥१॥ अनुभावास्तथाक्षेपक्रूरसंदर्शनादयः ॥ उग्रता वेगरोमांचस्वेदवेपथवो मदः|| मोहामादयश्चात्र भावाः स्युर्व्यभिचारिणः॥२॥ ( उदाहरणम् ) कृतमनुमतं दृष्टं वा यैरिदं गुरुपातकं मनुजपशुभिर्निमर्यादैर्भव- निरुदायुधैः ॥ नरकरिपुणा साई तेषां सभीम-
सान्षयसं० टी० भाषाटीकासहित। (२२७)
किरीटिनामयमहममृङ्मेदोमांसैः करोमि दिशा
बलिम् ॥२८॥२९॥
अर्थ-शत्रुसे हारजाने इत्यादिसे क्रोध उत्पन्न होताहै और
क्रोधही है स्थाई भाव जिसका ऐसा रौद्र रस होताहै और इस
रसका नायक कोच युक्त उग्र और भयानक वृत्ति वाला होताहै
और अपने भुजा पटकना अपनी श्लाघा करना परायेको भर्स-
ना करना भ्रकुटी चढाना तथा पराये को टपालंभ देना मर्दन ये
अनुभाव रूपसे वर्णन कियेहैं (देखो सा० दर्पण) रौद्ररसका क्रोध
स्थापी भाष है रक्त वर्णहे रुद्र देवता है और शत्रु ( तथा अन्य
अप्रियादि ) आलंबनहैं और उसकी चेष्टादि उद्दीपन हैं और
आक्षेप, क्रूर दर्शन,उग्रता,आवेग,रोमांच, स्वेद, कंप, मद इत्यादि
अनुभावहैं और मोह अमर्प इत्यादि व्यभिचारी हैं ( रौद और
युवीर रसमें भेद यह है कि युद्ध वीरमें उत्साह स्थायीभाव
होताहै और इस रौद्र रसमें कोष स्थायीभावहै ) उदाहरण ऊपर
टीकाके श्लोकमें देखो या नीचे भाषामें ॥ २८ ॥ २९ ॥
(भाषा) दोहा-आरिते हारे क्रोधहो, कोर रौद्रको भाव ।
भीष्म वृति कोपित यहां, नायक उग्र सुभाव॥ १ ॥ (उदाहरण)
मनुनपशू गुरुपातकी, फीने कर्म कठोर। तुम तनु आमिष रुधिर.
को देह वली व ओर ॥ ३ ॥ (यह अश्वत्थामाका पवन पांड-
बोके मति है)
बीमत्स ।
वीभत्सः स्याज्जुगुप्सा तु सद्यो यच्छु-
वणेक्षणात् ॥ निष्ठीवनास्यभंगादि स्या-
दत्र महतां न च ॥३०॥
(२२८) वाग्भटालंकार-परि० ५. टीका-यच्छ्वणेक्षणात् सद्यः जुगुप्सा (स) वी- भत्सः स्यात् अत्र निष्ठीवनास्यभंगादि स्यात् च महतां न इत्यन्वयः॥ यच्छ्रवणेक्षणात् यस्य श्रवणात दर्शनात् वा सद्यः शीघ्र जुगुप्सा घृणा भवति स वी- भत्सः वीभत्सनामा रसः स्यात् अत्र अस्मिन् रसे निष्ठीवनास्यभंगादि निष्ठीवनं थूत्करणम् आस्यभंगः मुखविकारः इत्यादिस्यात् निष्ठीवनादिःअनुभावः स्या- दित्यर्थः महतां समदृष्टीनां महात्मनां च न महात्मन निष्ठीवनादिकंन स्यादिति फलितोर्थः(उक्तं च साहित्य- दर्पणे)जुगुप्सास्थायिभावस्तु वीभत्सःकथ्यते रसः॥नी- लवर्णो महाकालदैवतोयमुदाहृतः॥१॥दुर्गधमांसपिशि- तमेदांस्यालंवनं मतम् ॥ तत्रैव कृमिपातायमुद्दीपन- मुदाहृतम् ॥२॥ निष्टीवनास्यवलननेत्रसंकोचनादयः। अनुभावास्तव मतास्तथा स्युर्व्यभिचारिणः। मोहोप- स्मार आवेगो व्याधिश्च मरणादयः॥३॥(उदाहरणंसा. दर्पणे ) उत्कृत्योत्कृत्य कृत्तिं प्रथममथ पृथूच्छोथभूयां- सि मांसान्यंसस्फिक्पृष्ठपिंडाद्यवयवसुलभान्युग्रपूती- नि जग्ध्वा ॥अंतःपर्यस्तनेत्रः प्रकटितदशनः प्रेतरंकः करंकादंकस्थादस्थिसंस्थं स्थपुटगतमपि क्रव्यम- व्यग्रमत्ति ॥४॥ इति ॥ ३०॥ अर्थ-जिस सडे पदार्यके देखने या सुननेसे उसी वखत घृणा उत्पन्न हो यह पीभत्स रस होता है इसमें थूकना मुह सिकोडना सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (२२९), आदिक अनुभाव होते हैं परंच समदर्शिपोंको ये महँ सिको- डना आदि नहीं होते देखो साहित्य दर्पणमें इस भांत लिखा है कि इस बीभत्स रसका जुगुप्सा (घृणा) स्थायी भाव है नीला- वर्ण और महाकाल देवता है और दुर्गध, मांस, चरबी आदि आलंबन हैं और उसमें दुर्गध कृमिपडना आदि उद्दीपन है थूकना,मुँहसिकोडना, नेत्रमूंदना,नाक बंदकरना इत्यादि अनुभाव हैं और मोह,अपस्मार, आवेग,व्याधि और मृत्यु इत्यादि व्यभि- चारी हैं उदाहरण टीकाके श्लोकमें या नीचे भापामें देखो।॥३०॥ (भाषा) दोहा-ग्लानि रूप बीभत्स रस, रक्त मांस विद् घाव । आलंबन नासा ढकन, मुख मोरन अनुभाव ॥ १ ॥ (उदाहरण) जैसे-हाड मास मल मूतकी, बॅधी पोट नर देह । ढके चाम उपरे फव्रण, कुष्ट दस्त और मेह ॥ २ ॥ शांतः। सम्यग्ज्ञानसमुत्थानः शांतों निस्पृहना- यकः ॥ रागद्वेपपरित्यागात्सम्यग्ज्ञान- स्य चोद्भवः ॥३१ ॥ टीका-सम्यग्ज्ञानसमुत्थानः निस्पृहनायकः शांतः (अत्र) चरागद्वेपपरित्यागात् सम्यग्ज्ञानस्य उद्भव इत्यन्वयः ॥ सम्यग्ज्ञानसमुत्थानः सम्यग्ज्ञानात् समुत्थानम् उत्पत्तिः यस्य स निस्पृहनायकः निस्पृह इच्छारहितः नायको यस्य स तथाभूतः शांतः शांत (२३०) वाग्भटालंकार-परि०५. नामा रसो भवति अत्र रागद्वेषपरित्यागात् सम्यग्ज्ञा. नस्य उद्भवः उत्पत्तिः स्यात् इति (उक्तं च साहित्य दर्पणे )"शांतःशमस्थायिभावः उत्तमप्रकृतिर्मतः ॥ कुंदेंदुसुंदरच्छायः श्रीनारायणदेवतः॥ १ ॥ अनि- त्यत्वादिनाऽशेपवस्तुनिःसारता तु या॥ परमात्मस्व- रूपं वा तस्यालंबनमिष्यते ॥२॥ पुण्याश्रमहरिक्षेत्रं तीर्थरम्यवनादयः ॥ महापुरुपसंगाद्यास्तस्योद्दीपन रूपिणः ॥३॥ रोमांचाद्याश्चानुभावास्तथा स्युभि चारिणः ॥ निर्वेदहर्पस्मरणमतिभूतदयादयः ॥४॥ (उदाहरणम्) कुसुमशयनं पापाणो वा श्रियं भवनं वनं पतनुममृणस्पर्श वासत्वगम्यथ तारवी ॥ सरसमशनं कुल्मापो वा धनानि तृणानि वा शमसुखं सुधापान:- व्ये समं हि महात्मनाम् ॥” इति ॥ ३१॥ अर्थ-सम्यग्ज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला शांतरस होताह संसारी सुखोंकी इच्छा रहित इसका नायक होताहै राग और देषके परि त्यागसे इसमें सम्पगज्ञानकी उत्पत्ति होती (देखो साहित्यदर्प- गर्ने) यूं लिखाहै फि शांत रसका स्थायी भाव शम है उत्तम प्रकृति है कुंद चंद्रमाके समान श्वेत वर्ण है श्रीनारायण देवताहै और अनित्यत्व आदिसे सब वस्तुवोम निःसारता तथा परमा स्माका रूप ये आलंबन हैं पुण्याश्रम हरिक्षेत्र तीर्थ रम्य वन महात्माओंका सन्संग इत्यादि दद्दीपनहें और रोमांचादिक अनु सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (२३१) भाव है निवंद हर्ष स्मरण भूतों (जीपों ) पर दया इत्यादिक व्यभिचारी हैं उदाहरण ऊपर श्लोकमें या नीचे भाषा दोहेमें देखो ॥ ३१॥ (भाषा) दोहा-आलंबन निःसारता, शांति रूप रस शांत । देष राग विन जगतसे, निस्पृह जाको कांत ॥ १॥ (उदाहरण ) शिला पुष्प सय्या सदृश, अहि अरु हार समान । मित्र शत्रु दोउ एकसे, पूर्ण शांत तिह जान ॥२॥ (परिशिष्टः) रसाभासभावाभासौ साहित्यदर्पणे यथा। टीका-(अनौचित्यप्रवृत्तत्त्वे आभासो रसभावयोः (यथा) उपनायकसंस्थायां मुनिगुरुपत्नीगतायां च ॥ बहुनायकविषयायां रतौ तथानुभयनिष्टायाम् ॥ १॥ प्रतिनायकनिष्ठत्वेतद्वदधमपात्रतर्यगादिगते ॥ शृंगारे नौचित्यं रौद्रे गुर्वादिकृतकोपे ॥ २॥ शांते च हीन निष्ठेगुर्वाधावलंबने हास्ये ब्रह्मवधाधुत्साहेऽधमपात्रग ते तथा वीरे ॥३॥ उत्तमपात्रगतत्वे भयानके ज्ञेयमेव मन्यत्र ॥ भावाभासो लजादिके तु वेश्यादिविपये स्यात् ॥४॥ अर्थ-अनुचित रूपसे प्रवृत होनेपर रस और भाव इनका आभास (निंदनीय रूप ) होनाताह जैसे शृंगार रसमें उप- नायक अर्थात् टपपति नारकी रतिमें अयथा मनि गुरु इत्यादि (२३२) वाग्भटालंकार-परि०५. की स्त्रियोंकी रतिमें अथवा जहां अनेक नायकहों अथवा जहां दोनों स्त्रीपुरुषों में प्रेम नहींहो अथवा जहां पतिकी रतिमें जारका सामी. प्यादि हो अथवा अधम पात्रकी रति तथा तिर्यक् जीवोंकी रति इत्यादिमें रसाभास होताहै ( अर्थात् ऐसे अवसरोंके वर्णनमें शृंगार रस निंदनीय तथा दूषणरूप और अनुचित है ) और रौद्र रसमें गुरु आदि पर कोप करना अनुचित दूपण रूप है, शांत रसमें हीन ( नीच ) में उसका वर्णन अनुचित है हास्य रसमें गुरु आदिकी हँसी करना दूपित है वीर रसमें नीचमें ब्राह्मणके मारने आदिका उत्साह दूपित है भया. नक रसमें उत्तममें भयका वर्णन दूपित होताहे इसी प्रकार वीभत्स रसमें गुरुपुत्रादिकके ग्रणादिकी परिचर्या में ग्लानि- का वर्णन भी दूपित रूपसे होताहै और इसी भात वेश्यादिके वर्णनमें लज्जा आदिका होना यह भावाभास (भाव दूपणहोता है ) इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिये ॥ १ ॥२॥३॥४॥ रसानां विरोधः दर्पणे । टीका--आधः करुणवीभत्सरौद्रवीरभयानकैः ॥ भयानकेन करुणेनापि हास्यो विरोधभाक् ॥ १॥ करुणोहास्यशृंगाररसाभ्यामपि तादृशः॥रौद्रस्तु हास्य शृंगार भयानक रसैरपि ॥२ ॥ भयानकेन शांतन तथा वीररसः स्मृतः॥शृंगारवीररौद्राख्यहास्यशांतर्भया नकः॥३॥शांतस्तु वीरश्रृंगाररीद्रहास्यभयानकैः ।। शृंगारेण तु वीभत्स इत्याख्याता विरोधिनः॥४॥ .
" " सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (०२३३) अर्थ-आध अर्थात् "शृंगाररस" करुणा, वीभत्स, रौद, वार और भयानक इनका विरोधी है और " हास्यरस भया- नक और करुणाका विरोधी हो जाताहै ॥ १॥ और "करुणारस" हास्य और शृंगारका विरोधी है इसी भांत "रौदरस" हास्य शृंगार और भयानकका विरोधी होता है ॥२॥ और “वीररस" भयानक और शांतका विरोधी है तथा भया- नकरस" शृंगार, वीर, रौद्र, हास्य, शांत इनका विरोधी है।॥३॥ "शांतरसे" पीर शृंगार रोद हास्य और भयानक इनका विरोधी है और “वीभत्सरस" शृंगारका विरोधी है इत्यादि (इनके अतिरिक्त इसी भान रसोंकी मैत्री भी होती है जैसे अद्भुती हास्यसे मैत्री है इसी प्रकार और भी जानो (इति परिशिष्ट) . दोपेरुज्झितमाश्रितं गुणगणैश्चेतश्चम- त्कारिणं नानालंकृतिभिः परीतमभितो रीत्या स्फुरत्या सताम् ॥ तैस्तैस्तन्मय- तां गतं नवरसैराकल्पकालं कविस्रप्टा- रो रचयंतु काव्यपुरुपं सारस्वताध्यायि- नः॥३२॥ इति पंचम परिच्छेदः ॥५॥ समाप्तोऽयं ग्रंथः ॥ टीका-सारस्वताध्यायिनः कविखष्टारः आकल्प- कालं काव्यपुरुप रचयंतु कीदृशं काव्यपुरुपं दांपैः .
(२३५) वाग्भटालंकार-परि० ५. उज्झित पुनः गुणगणैः आश्रितं पुनः नानालंकृतिभिः चेतश्चमत्कारिणं पुनः स्फुरत्या सतां रीत्या अभितः परीतं पुनः तेस्तैः नवरसैःतन्मयतां गतम् इत्यन्वयः॥ दोपैः अनर्थकादिकैः उज्झितं रहितं गुणगणैः माधु- योथैः आश्रितं युक्तं नानालंकृतिभिः चित्राद्यैः उपमा- यैश्च चेतश्चमत्कारिणं चेतसि चमत्कारं कुवैतं सतां लाटादीनाम् अभितः स्फुरत्या रीत्या परीतं निवर्ट तैस्तैः शृंगारादिभिः नवरसैः तन्मयतां गतं तन्मय- रूपिणम् एवंभूत काव्यपुरुपं सारस्वतं सरस्वतीनि- मितं शास्त्रमित्यर्थः तदध्यायिनः शास्त्रपाठिनः इति कविस्रष्टारः कवयश्च ते सप्टारश्च कविस्रहारः काव्य- रचयितार इत्यर्थः आकल्पकालं कल्पपर्यतं काव्य- पुरुपं काव्यरूपपुरुषं रचयंतु सृजंतु ॥ अत्र सार- स्वताध्यायिनः इति कथनेन सरस्वतीप्रणीतसूत्र व्याकरणशास्त्रस्य प्राचीनता घोतिता ॥ ३२॥ अर्थ-सरस्वतीके निर्मित शास्त्र जिनके पटनेवाले कविता रचनेवाले फवि दोपोंसे अनर्थकादि पूर्वोक्त दोषांसे रक्षित और माधुर्यादि गुणोंसे संयुक्त और चित्रादि शब्दालंकारों और उपमादि अर्यालंकारोंसे चित्तमें चमत्कार पैदा करनेवाले और सत्पुरुषोंकी स्फुरित रीतियोंसे निवद्ध और शृंगारादिक टन उन . सान्वयसं० टी० भाषाटीकासहित । (२३५१) रसॉस तन्मयताको प्राप्त हुए ऐसे काव्यरूपी पुरुषको कल्पकालं पर्यंत रचते रहो यहां (सारस्वताध्यापिन ऐसा कहनेसे सरस्वती सूत्र संबंधी व्याकरणकी भी माचीनता प्रघट होतीहै शुभम्।॥३२॥ पूर्तिः। टीकाकारस्य मे परिचायकाः श्लोका : (श्लो०) रम्ये रैवतपत्तने जनिरभूद् प्रामाधिपानां कुले मे तातो भुवि लब्धमानविभवः श्रीरामकर्णः सुधीः श्रीमद्रामसहायकस्तदनुजो यस्य प्रसादान्मया विद्या कीर्तिविवर्द्धिनी सुकविताप्राप्ता च भक्तिहरेः॥३॥ कुशालीरामाख्या स्फुरकनगरे सत्कविरभूत्सदाचारो निष्ठः सुपर्थि मम मातामह इति ।। तदागारे स्फारे विपुलपरिवारे सुविभवे मया लब्धा धीश्रीभृतिरति विभाकीर्तिधृतयः ॥ २॥ शैलाननेशनृपवर्यसमाश्रि- तेन सदैवशास्त्रिमुरलीधरशर्मणेयम् ।। टीका कृता भव तु वाग्भटभूषणस्य साहित्यशास्त्ररसिकेषु विलासरूपा ॥३॥ द्विरसांकेन्दुके वर्षे तृतीयाया दिन अये। अक्ष- यानंददा चास्तु टीकेयं पूर्तितां गता॥४॥ अर्थ-मणीक रैवतपतन अर्थात् रेवाडी शहरमें प्रामाधिप (खेडा पतियों ) के वंशमें मुझ टीकाकारका जन्म हुवा और पृणीय बात मानाप विभव प्राप्त करने वाले भीपंडित राम पंजी मेरे पिताइए और उनके लघु धाता (मेरे वचा) भी वाग्भटालंकार-परि०५. पं० रामसहायनी हैं जिनके प्रसाद (कृपा) से मुझे विद्या और कीर्तिके वढाने वाली सुंदर कविता तथा परमात्माकी भक्ति प्राप्त हुई ॥ १ ॥ तथा स्फुरफनगर अर्थात् फर्रुखनगर में पं० कुशालीरामजी अच्छे कवि हुए जो सदाचारी और सन्मार्गमें निष्ठ थे सो मेरे मातामह ( नाना) हुए उनके विपुल परिवार और अच्छे विभव युक्त विशाल घरमें मुझको बुद्धि लक्ष्मी भरण पोपण रति ( आनंद ) विभा ( शोभा) कीर्ति (यश) और धृति (सुख अथवा धैर्य ) ये सभी प्राप्त हुए ॥ २ ॥ और शैला नन अर्थात् सैलाना राजधानीके अधीश नृपवर्य (हिज हाइनेस श्रीमहाराजाधिराज श्री १०८ श्रीयशवंतसिंहजी धीरवीर जी. सी. आइ. ई. उनके समाश्रित मुझ सद्वैद्य शास्त्री मुरलीधर शर्माने वाग्भटालंकारकी यह टीफा बनाई है जो साहित्यशास्त्रके रसिकहें उनको विलास रूप होवे ॥ ३ ॥ द्वि(२) रस (६) अंक (९) इंदु (१)(अंकानां वामती गतिक क्रमसे) संवत् १९६२ की अक्षय तृतीयाके दिन ( अर्थात् वैशाख शुका तृतीया फो) यह टीका संपूर्ण हुई जो अक्षय आनंदफी देने वाली हो । इतिश्रीराजवैद्यशात्रि पं० मुरलीधरशर्मविरचितायो श्रीवाग्भटा- लंकारस्य टीकायां पंचमपरिच्छेदः समाप्तः ॥ ५ ॥ समाप्तोयं ग्रंथः। पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम् प्रेम-चंबई.
करती है काटादि है तो भी कोननसे चढ़कर १०० जाहिरात । सुश्रुतके सान्वय टीकाकार आयुर्वेद विद्यालय दिल्ली के परीक्षक प्रसिद्ध राजवैद्य पं० मुरलीधर शर्माकाआरोग्य सुधाकर । "कार्यालय" इस कार्यालयसे सब प्रकार देशीय औपधैं श्रेष्ठ शास्त्रोक्त बनी सस्ती मिलती हैं जैसे- १-"नयनामृत अंजन" नेत्रोंके अनेक विकार नाशक दृष्टिं स्थिर कर्ता व तन्दुरस्तीमें भी लगानेसे गुणकारी १) तोला। २--"मूत्रशोधनी सिद्ध शिलाजीत गुटी” मूत्रमें पीप रुधिर शुक्र शर्करा कुछ ही आताहो चीस जलन सुजाक प्रमेह स्त्रियोंके प्रदर सबको जादूकी तरह आ- राम करती हैं रक्तशोधन कर पाचनशक्ति वढा शरी- रको पुष्ट और कांतिमान करती है ४० गुटी २) ३-ज्वरहरी गुटी अनुमानसे सब ज्वरोंको नष्ट गुटी १->
जाहिरात ।
४-धातुपुष्टि पूर्ण सिद्ध सुश्रुतोक्त परमं प्रमेहनाशक
बलकर्ता पुष्टिकर्ता १० तोला २० मात्रा १॥)
विशेष।
यदि कोई प्रतिष्ठित महाशयं किसी भारी रोगके
निदान चिकित्सादिके लिये हमारा कुछदिन आवा-
हन करना चाहैं तो वह भी परस्पर पत्र व्यवहारसे
निश्चय होसक्ता है।
शुभचिंतक
पं० मुरलीधरशर्मा राजवैद्य,
फर्रुखनगर पंजाब.
हमारे रचित पुस्तक।
१-सुश्रुतसंहिताकी सान्वय सटिप्पणीक सपरि-
शिष्ट भाषाटीका मूल्य १२)
२-"शरीरपुधिविधान" शरीरहर पुष्ट करने और
रखनेकी विधि मृ. 13)
३-"डाक्टरी चिकित्सा सार" इसमें डाक्टरी मत
से और साथही देशीवैद्यकसे हरेक रोगका नाम
लक्षण उपायादि लिखाहे संक्षिप्त डाक्टरी निघंटु
भी है)
जाहिरात ।
४-महामारीविवेचन जिसमें प्रचलित महामारी
प्लेगके निदान लक्षण उत्पत्तिका कारण यत्न आदि
वैद्यकसे लिखाहै.।)
५-सर्व विषचिकित्सा इसमें स्थावर अफीम सं-
खिये आदि:जंगम सर्प विच्छु आदिके विपोंके सहल
उपायादि लिखेहैं ॥=)
६-सत्कुलाचरण इसमें शिक्षा धर्म कुरीतिशोधन
व्यापार कृपि शिल्प गृहस्थ स्वास्थ्यरक्षादि ११
विषयहैं यह नये ढंगका एक उत्तम उपन्यास है ।)
७ वाग्भटालंकारकी यह टीका जिसमें ऊपर मूल
फिर अन्वय और संस्कृत टीका फिर सरल हिंदी
भापा टीका है फिर उसी , विषयके संक्षिप्त दोहे बना
कर लिखेहैं ऐसी उत्तम टीका किसी ग्रंथकी नहीं छपी
ये सभी पुस्तकें सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजीके
श्रीवेंकटेश्वर छापेखाने बंबईसे मिलती हैं।
: निवेदक-.;
पं० मुरलीधरशर्मा राजवैद्य,
फर्रुखनगर निवासी टीकाकार.
KAAL