Banasthali University
Saarmanjari
Front matter
केन्द्रीय पुस्तकालय
वनस्थली विद्यापीठ
श्रेणी संख्या
1RI.4
564 म
16990
पुस्तक संख्या
AB
अवाप्ति क्रमांक
समाधि और संयम इत्यादि का ऐसा सुंदर वर्णन
है कि थोड़े ही अभ्यास से मनुष्य की विधिन्न
शक्तियों का विकास हो सकता है । मूल्य ,
सजिल्द "
हठयोग-अनुवादक, आकुर प्रसिद्धनारायणा-
सिंह पी० ए० । इसमें योगी रामचारक द्वारा बनाए
हुए ऐसे सरस अम्पास है, जिन्हें आप खाते-पीते,
उठते-बैठते, चलते-फिरते हर समय कर सकते हैं।
थोड़े से अभ्यास से अापकी शारीरिक उन्नति और
मनाशक्ति-प्रबलता उस मात्रा तक पहुँच जायगी,
जिसका श्रापको स्वप्न में भी खयाल न होगा।
मूल्प , सजिल्द )
गंगा-ग्रथागार, लखनऊ
जीवन-मरण-रहस्य
श्रीदुलरिलाल भागेब
(सुधा-संपादक)
योग और अध्यात्म की सुंदर पुस्तकें ज्ञान और कर्म योग-दर्पण , एकाग्रता और दिव्य शक्ति । ईश्वरीय पोष दास-बोध । उपनिषद्-प्रकाश प्राणायाम a), ज्ञाम-योग (दो भाग)) कर्मयोग U भक्ति भिखारी से भगवान् ), 10 भक्ति-योग १॥ हृदय-तरंग 9. भक्ति-नहस्य किशोरावस्था 10), 2) योगासन । मनोविज्ञान ॥७॥ राजयोग १२) १), १७ सीधे पंडित १), सुख तथा सफलता UH2) योग-साधन २) हठयोग १०), un) योग की कुछ विभूतियाँ योगत्रयी "," योगशास्त्रांतर्गत धर्म , संसार-रहस्य १॥ मास्तिकवाद २॥ प्रायायाम सब प्रकार की पुस्तकें मिलने का पता- RECEFER जीवन का सव्यय स्वास्थ्य और योगासन संचालक गंगा-ग्रथागार ३६, लाटूश रोड, लखनऊ
गंगा-पुस्तकमाला का श्वां पुष्प
जीवन-मरण-रहस्य
लेखक
ठा० प्रसिद्धनारायण सिंह बी० ए०, एम० एल० सी०
[राजयोग, हठयोग, प्राणायाम, योग की कुछ विभू-
तियां, योगत्रयी, योगशास्त्रांतर्गत धर्म, सीधे-
पंडित, संसार-रहस्य अदि के रचयिता]
मिलने का पता-
गंगा-ग्रंथागार
३६ लाटूश रोड,
लखनऊ
द्वितीयावृत्ति
सजिल्द)] सं० १६६० वि०
[सादी"
प्रकाशक
श्रीदुलारेलाल भार्गव
अध्यक्ष गंगा-पुस्तकमाला-कार्यालय
लखनऊ
मुद्रक
श्रीदुलारेलाल भार्गव
अध्यक्ष गंगा-झाइनबाट प्रेस
लखनऊ
भूमिका जव से मारतवर्ष का पतन हुआ है, वभी से आर्य-जाति के समस्त गुणों का दिन-पर-दिन हास होता जा रहा है। उसमें अब न तो वह पूर्व-धीरता है, न बल-बुद्धि, न धैर्य, न साहस और न निर्भीकता ही है । जिस देश के ऋषियों ने “एकोहं द्वितीयो- नास्ति' की प्रखंड और अंतिम शंख-ध्वनि की थी, तथा जिस अपने आत्म-स्वरूप के विषय में "नैनं छिदति शस्त्राणि नैनं वहति पायकः, न चैन क्लेदयन्यापो न शोषयति मारुतः।" का अद्वितीय उपदेश दिया था, अब उसी देश के निवासियों को मृत्यु की भयंकर मूर्ति पग-पग पर दिखाई देती है। यदि कहीं धोके में अपनी परछाई दिखाई पड़ी, तो बस, उन्हें भूत पकडा, और वे बीमार पड़े । लाल पगढ़ी-धारी पुलिस के सिपाहियों ने जरा डाँटा, और काटो तो उनके शरीर में खून नहीं। भान राष्ट्रीय महासभा का अधिवेशन है, वहाँ भार्य-जाति के उद्धार पर विचार होनेवाना है, किंतु वे वहाँ नहीं जा सकते, क्योंकि दिशाशूल और भद्रा के पहाड़ सामने ही छाती अड़ाए खड़े है, पितृ-घातक का भयंकर समुद्र उमद रहा है...। इसी प्रकार इस मिथ्या-मृत्यु के भय ने हमारो आर्य-जाति के ऊपर ऐसा कुठाराघात किया, जिससे वह अपने कर्तव्य से नितांत विमुख हो गई, उसमें अकर्मण्यता का भाव कूट-कूटकर भर गया। ऐसी दशा में देश के प्रत्येक विचारशील पुरुष का हृदय दुःख से व्याकुल हुए विना कदापि नहीं रह सकता । अस्तु । मैंने भी इसी विचार से कि जिस मृत्यु के भय ने हमारे समाज को अकर्मण्य बनाया, देश को इस शोचनीय अवस्था में ला दिया, वह मृत्यु है क्या वस्तु ?- ( २ ) अपने प्राचीन शपियों के सिद्धांतों पर इस छोटी-सी (जीवन-मरण- रहस्य) पुस्तक की रचना की । यदि देशवासियों का इससे कुछ भी उपकार हुआ, तो मैं अपने परिश्रम को सफल समर्मंगा। पुस्तक में पहले हाड, मांस, रुधिर के लोथड़े (शरीर) की बनावट और उसकी भीतरी क्रियाओं जैसे अन्नपाचन, रुधिर- संचारण, श्वसन, वेदना और कर्म-संचालन श्रादि तथा क्रियाओं के उदंश का वर्णन किया गया है। आगे चलकर बतलाया गया है कि इन उद्देशों की पूर्ति देहाणु-समूह किस प्रकार करते हैं, और उनके द्वारा (प्राकृतिक रूप से) हमारे समस्त रोग कैसे अच्छे हो जाते हैं । फिर मानस की प्रेरणा, उसका विकास तथा आत्मा के उपरी पट आवरणों (स्थूलशरीर, २ लिंगशरीर, ३ प्राण- शक्ति, ४ प्रवृत्ति-मानस, १ बुद्धि, ६ प्रात्म-मानस और भारमा) का विवेचन करते हुए योग की विभूतियों का दिग्दर्शन कराया गया है। अंत में यह प्रत्यक्ष दिखला दिया गया है कि "मनुष्य सर्वदा रहा है और सर्वदा रहेगा। जिसे हम मृत्यु कहते हैं, वह निद्रा है, जिससे अगले दिन जागना पड़ेगा।" मैं यहाँ पर श्रीमान् माननीय राजा विश्वनाथशरणसिंहजूदेव बहादुर तिलोई-नरेश को धन्यवाद दिए विना नहीं रह सकता, जिनकी अपूर्व कृपा से मुझे 'देश-सुधार अंथमाला' के तीन पुष्प (संसार-रहस्य, सीधे पंडित और यह जीवन-मरण-नहस्य) अपने सहृदय पाठकों के भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । अपनी अल्पा- वस्था में ही श्रीमान् की ऐसी देश-हितकर साहित्य की अभिरुचि तथा उसकी उन्नति में तन, मन, धन से प्रयत्नशील होनेवाली प्रवृत्ति को देखकर किसका हृदय आनंद से प्रफुल्लित न हो उठेगा? काशी, प्रसिद्धनारायण सिंह जून, १९२३
समर्पण
शील-सदाचार-निष्ठ, प्रजा-वत्सल, उदारहृदय
साहित्य-सेवी
श्रीमान् राजा विश्वनाथशरण सिंहजू देव
यहादुर
तिलोई-नरेश
के
करकमलों में
यह
'जीवन-मरण-रहस्य'
लेखक द्वारा
सादर
और सानुराग
समर्पित है
प्रसिद्धनारायण
POSTS
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जीवन-मरण-रहस्य
पहला अध्याय
शरीर की स्थूल बनावट और भीतरी क्रियाएँ
जीवन-मरण रहस्य जानने की चेष्टा करने के पहले यह
आवश्यक होता है कि इस बात को हम जान जायँ कि साधारण
रीति से हम जीवन किसे कहते हैं। साधारणतया जीवन
उसी दशा को कहा जाता है, जब तक यह शरीर यथासाध्य
अपनी सब आवश्यक क्रियाओं को करता हुआ संगठित
अवस्था में वर्तमान रहता है। जब शरीर अपनी आवश्यक
क्रियाओ के करने मे नितांत असमर्थ हो जाता है और इस
कारण संगठित न रहकर गलने पचने लगता है, तब इसकी
मृत्यु की दशा कही जाती है।
हम जब शरीर की बनावट पर दृष्टि डालते है, तो पहले
हमारे ध्यान मे हड्डियों का वह ढॉचा आता है, जिसके सहारे
और अवलंबन से रुधिर और मांस का यह लोथड़ा कड़ा और
तना हुआ रहता है। यदि हड्डियो का यह ढाँचा न रहता, तो
यह शरीर या मांस का लोथड़ा केचुआ और जोंक की भाँति
लुंड-मुंड हो जाता । हड्डी का वह ढॉचा नीचे से ऊपर तक
.
१०
जीवन-मरण-रहस्य
लगातार एक रस नहीं है, पर अनेकों रूप के हड्डियों के खंड
स्थान-स्थान पर ढीले जुटे हुए हैं, जिससे शरीर खड़ा, बैठा,
सोया, उद्यम करता और विश्राम करता हुआ सब दशाओ में
रह सके। हड्डियाँ सब ठोस ही नहीं हैं, आवश्यकतानुसार
कोई खंड ठोस, कोई पोला, कोई लंबा, कोई चपटा आदि
अनेक प्रकार के है। अब इन हड्डियों के भीतर किसी-किसी
खंड में भेजा या गुही है, और कोई-कोई खंड विना भेजे के
हैं। हड्डियों के इस ढाँचे के आश्रित मांस चढ़ा हुआ है। मांस
की तह कहीं मोटी, कहीं पतली है। मांस के ऊपर चमड़ा
है। अब ऐसी स्थूल बनावटवाले शरीर को अपने काम करने
के लिये यंत्रों की आवश्यकता है। इसके आवश्यक कामों में
पहले इसमें अपने आपको पालन और पोषण करने की क्रिया
है। इसके लिये मुँह का द्वार भोजन करने तथा पानी पीने
और नासिका का द्वार साँस लेने के लिये बना है । जो मुँह से
भोजन किया जाता और पानी पिया जाता है, वह मुँह से लार
में मिलता हुआ कंठ में होकर पेट की उस थैली में पहुँचता
है, जिसे आमाशय कहते हैं। यहाँ आमाशय की थैली की
ऐसी बनावट है कि भोजन किए हुए पदार्थों में उसी थैली से
तेजाब निकल-निकलकर मिलते रहते हैं, और पदार्थों का
इधर-उधर उलट-पुलटकर ऐसा मंथन होता है कि खाया
हुआ भोजन एक प्रकार की लुगदी के रूप में बन जाता है।
इसी को शरीर की पाचन क्रिया कहते हैं। जब यह क्रिया
के रूप मे बाहर निकल शरीर की स्थूल बनावट और भीतरी क्रिया ११ समाप्त हो जाती है, तो यह लुगदी आमाशय के निचले भाग में बने हुए एक द्वार से पतली अंतड़ियों में पहुंचती है । इन पतली अंतड़ियो से भी एक प्रकार का तेजाब-सा द्रव निकलकर लुगदी मे मिलता जाता है। पतली अंतड़ियो से लुगदी एक द्वार के मार्ग से मलाशय में पहुंचती है। यहीं पर उस लुगदी से शरीरोपयोगी रस निकाल लिया जाता है, और शेष सीठी छोड़ दी जाती है, जो मल जाती है। रस महीन नलियों द्वारा यकृत में छनता-पकता हुआ कई स्थानों से घूमता-घामता फेफड़ो की कोठरियो मे ऑक्सीजन से मिलकर हपिंड की कोठरी मे शुद्ध रुधिर बनकर आता है । वह रुधिर हृत्पिड से रुधिरोपवाहक धमनियो द्वार सारे शरीर मे पहुँचता है और सर्वत्र आवश्य- कतानुसार पोषण ओर मरम्मत की सामग्री पहुंचाकर शरीर का पोषण और उसकी मरम्मत करता है। फिर रुधिरोपणहक नालिकाओ अर्थात् नसों द्वारा वापस आता है, और सारे शरीर की रहियात और निकम्मे अणुओ को ले आकर हत्पिड की दूसरी कोठरी मे भरता है। इस कोठरी से दूषित रुधिर फेफड़ो की अनगिनत नन्ही-नन्ही कोठरियो मे पहुंचकर बॅट जाता है। श्वास लेने से बाहर की शुद्ध हवा नाक के बालो और द्रव पदार्थों द्वारा शुद्ध होती हुई आकर फेफड़ो की इन अनगिनत कोठरियो मे पहुंचती है। अब बाहर से आई हुई शुद्ध हवा और शरीर के सब भागो से आए हुए
१२
जीवन-मरण-रहस्य
दूपित रुधिर का फेफड़ों की इन्हीं नन्ही-नन्ही कोठरियो में
मेल होता है। दूषित रुधिर अपने दूषण हवा को दे देता
है, और हवा अपना ऑक्सीजन इस रुधिर को दे देती है।
इससे रुधिर फिर साफ होकर हृत्पिड को जाता है, और
हवा गंदी होकर निःश्वास द्वारा बाहर निकल आती है।
हत्पिड से शुद्ध रुधिर फिर रुधिरोपवाहक शिराओं द्वारा
सारे शरीर में पोषण और मरम्मत की सामग्री पहुंचता है
और रुधिरोपवाहक नसों द्वारा शरीर की रहियात लेकर
वापस आता है। इसी प्रकार रुधिर का संचालन हुआ
करता है।
हम ऊपर दो प्रकार के यंत्रों की बनावट और उनकी
क्रियाएँ देख आए। एक तो अन्न-पाचन और रस तथा
रुधिर-निर्माण, दूसरे रुधिर-संचालन । इसी रुधिरसंचालन
के साथ-साथ हमने कुछ थोड़-सा श्वास-प्रश्वास और इसके
द्वारा रुधिर की शुद्ध और ऑक्सीजन के वितरण के विषय
में भी कुछ जानकारी प्राप्त कर ली । अब शरीर मे एक
मुहकमा और है, जिसे शरीर का शासन-विभाग कह सकते
है। इस मुहकमे का मूल-स्थान मस्तिष्क है, जहाँ खोपड़ी में
भेजा या गुद्दी भरे रहते है। उसी से एक गुद्दी से भरी
हुई नलिका निकलकर रीढ़ की हड्डी मे होती हुई नीचे आकर
दोनो जाँघों के जोड़ के पास समाप्त होती है। इसी मस्तिष्क
और रीढ़ की हड्डी अर्थात् मेरु-दंड से निकलकर अनगिनत
शरीर की स्थूल बनावट और भीतरी क्रियाएँ १३
नाड़ियाँ शरीर के सब अंगों, अवयवों, प्रत्यंगों और इंद्रियों
मे जाल की भॉति फैली हुई हैं। शरीर का कोई भाग ऐसा
नहीं है, जहाँ ये नाड़ियां और रुधिरसंचार की धमनियाँ न
पहुँची हों। रुधिर-संचार की धमनियाँ तो शुद्ध रुधिर बाँटती
और अशुद्ध वस्तुएँ बटोरती है, और ये नाड़ियां शरीर के
बाहर और भीतर की घटनाओं के ज्ञान को मस्तिष्क और
शासन-विभाग के अन्य थानो पर पहुंचाती है, वैसे ही
मस्तिष्क और अन्य स्थानों से क्रिया की प्रेरण को शरीर के
प्रत्येक अंग में पहुँचाती है, जिससे शरीर का वह अंग
आकुंचित और प्रसारित होकर क्रिया करता है।
उदाहरण के लिये मान लीजिए कि पैर मे मच्छड़ ने काटा।
वहाँ से इसकी सूचना ज्ञान-नाड़ी या ज्ञान-तंतु द्वारा मस्तिष्क
को मिली। वहॉ से कर्मनाड़ी या कर्म-तंतु द्वारा आज्ञा हाथो
पर पहुंची। हाथ ने आकुचित और प्रसारिता होकर मच्छड़
को हटा दिया और उस स्थान को सहला दिया। ऐसे ही शरीर
के भोवर आमाशय मे पानी की कमी हुई, वहाँ से ज्ञान या
वेदन-तंतुओ द्वारा मस्तिष्क को सूचना हुई, मस्तिष्क से
सूचना गले को हुई, वहॉ पानी की मांग होने लगी-अर्थात्
प्यास लग गई। इसी प्रकार आँख की पुतलियो पर किसी
रंग या रूप का प्रतिबिंब पड़ा, तो वहॉ से वेदन-तंतुओ द्वारा
सूचना मस्तिष्क तक पहुंच गई। इस प्रकार यह मुहकमा
शरीर में वेदन और क्रिया संचालन का काम करता है।
१४ जीवन-मरण-रहस्य अब इसके उपरांत इंद्रियाँ हैं। इंद्रियाँ भी दो प्रकार की हैं-एक ज्ञानेंद्रियाँ और दूसरी कमेंद्रियाँ । आँख, कान, नाक, रसना और त्वचा ये पाँच ज्ञान-इंद्रियाँ हैं। कमेंद्रियाँ तो अनेकों हैं, पर उनमें हाथ, पाँव, वाणी आदि प्रधान हैं। इन इंद्रियों की बनावट बड़ी ही सूक्ष्म, विचित्र और बारीक हैं। एक आँख की बनावट के अनुशीलन में बहुत-से वैज्ञानिक अपना सारा जीवन लगा देते हैं, तो भी उसे पूरा नहीं समझ पाते। ऐसी ही दशा कान, नाक आदि की भी है। इन इंद्रियो से मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी अर्थात् मेरु-दंड से नाड़ियाँ लगी हैं, जो वेदनो को पहुंचाया करती हैं, और वहाँ से कमेंद्रियो तक आज्ञाएँ ले जाती है। अब देखना चाहिए कि शरीर के सब अंगों की बनावट एक ही नहीं है। एक अंग की बनावट से दूसरे अंग की बना- वट मे बड़ा अंतर है। हड़ियाँ मांस से भिन्न हैं, हड्डियो में अनेक रूपांतर हैं। मांस-पेशियाँ भी भिन्न-भिन्न स्थान की भिन्न-भिन्न बनावट की हैं। अवड़ियों की रचना और ही प्रकार की है। धमनियाँ उससे भी न्यारी है। हृदय, यकृत, तिल्ली, गुर्दे सब बनावट में भिन्न-भिन्न हैं। फेफड़ों की रचना सब से न्यारी है। नाड़ियाँ, मस्तिष्क और इंद्रियाँ सब रंग, रूप, गठन और बनावट मे एक दूसरे से भिन्न हैं। सब अंगों मे तत्त्वों का समावेश भी एक ही मात्रा मे न होकर भिन्न- भिन्न मात्राओ में है।
१५
शरीर की स्थूल बनावट और भीतरी क्रियाएँ
इस शरीर की बनावट पर सविस्तर ध्यान दिया जाय,
और उसका विस्तार से वर्णन किया जाय, वो बड़ी भारी
पोथी इसी की हो जाय, तो भी विषय समाप्त न हो सके।
यहाँ पर हमारा उद्देश शरीर की बनावट ही का दिखलाना
नहीं है, किंतु अन्य कुछ है। इसलिये हमने शरीर की बनावट
और क्रियाओ का केवल दिग्दर्शन-मात्र कर दिया है, जिससे
यह जानकारी हो जाय कि शरीर की ऐसी बनावट में अनेक
क्रियाएँ लगातार हुआ करती हैं, जिससे शरीर जीवित
रहता है।
.
१
दूसरा अध्याय
शरीर की भीतरी क्रियाएँ और उनके उद्देश
ऊपर शरीर की बनावट के साथ-साथ हम शरीर के
कुछ
अवयवों और उनकी क्रियाओं पर शीघ्रता से दृष्टिपात कर
आए हैं। उनके विचार से, देखने में आता है कि शरीर की
क्रियाएँ प्रधानतः चार विभागों में बाँटी जा सकती हैं-
(१)अन्न-पाचन क्रिया-इससे खाया हुआ अन्न आमा-
शय में पचता है, पतली अंतड़ियों में भी रस-निर्माण के
निमित्त क्रियाएँ होती हैं और मलाशय में जाकर रस मल से
अलग कर लिया जाता है। रस तो ऊपर शरीर में पहुँचता
है, और मल नीचे के द्वार से बाहर निकाल दिया जाता है।
इस क्रिया से अन्न और जल के द्वारा प्राण शरीर में संचालित
होता है।
(२) रुधिर-संचारण-क्रिया-इससे धमनियों द्वारा रुधिर
सारे शरीर में पहुंचता है। शरीर के अंगे की आवश्यक
सामग्री इसी के द्वारा अपने-अपने स्थान पर पहुंचती हैं।
इसी के द्वारा पहुँचाई हुई सामग्री से कहीं हड्डी बनती और
मरम्मत होती है, कहीं मांस । इसी के द्वारा मज्जा, नाड़ी,
भेजा, मस्तिष्क, इंद्रियाँ आदि सब अवयव बनते और मरम्मत
हुआ करते हैं। यही क्रिया प्रत्येक अंग, प्रत्येक अवयव और
शरीर की भीतरी क्रियाएँ और उनके उद्देश शरीर के प्रत्येक भाग से निकम्मे अंशो को इकट्ठा कर लाती है और फेफड़े, इंद्रियों और त्वचा के छिद्रों द्वारा मल-रूप मे निकाल देती है। आँख, कान, नाक और मुंह से भीतरी मैल निकला करती है। वैसे ही पसीना और देह-वाष्प द्वारा भी स्वचा के छिद्रो से मैल निकला करता है। (३) श्वसन-क्रिया-इससे बाहर की शुद्ध हवा भीतर फेफड़ो मे जाती है। वहाँ अपने ऑक्सीजन को रुधिर के हवाले कर देती है, और रुधिर के मल को आप लेकर निःश्वास द्वारा बाहर निकल आती है। हवा का ऑक्सीजन रुधिर के साथ सारे शरीर मे भ्रमण करता है, और जहाँ आवश्यकता होती है, वहाँ काम में लग जाता है। इसी ऑक्सोजन के साथ अधिकांश प्राण शरीर मे प्रवेश करता और संचालित होता है। इसीसे श्वास द्वारा प्राणायाम करके योगी लोग अपने शरीर मे प्राण संचय करते है। यही प्राण शरीर के प्रत्येक अंगों मे शक्ति का काम देता है। (४)वेदन और कर्म-संचालन-किया-यह नाड़ी-तंतुओ द्वारा होती है, जैसा कि ऊपर कह आए हैं। शरीर के भीतर जितनी क्रियाएँ होतो है, सबकी प्रेरक यही क्रिया है। जसे किसी कारखाने मे जाकर देखिए, जहाँ एंजिन द्वारा मशीनें अर्थात् कलें चलती हो, तो वहाँ आप पावेगे कि एंजिन से शक्ति निकालकर अनेक यंत्रों में पहुंचाई जाती है, और उन यंत्रो से अनेक काम हुआ करते हैं। वैसे ही इस वेदन और कर्म-
जीवन-मरण-रहस्य
,
संचालन-क्रिया द्वारा
अन्न-पाचन, रुधिर-संचालन और
श्वसन आदि सब क्रियाएँ प्रेरित हुआ करती हैं। वेदन और
कर्म-संचालन-क्रिया अपने तो अन्य क्रियाओ से, प्रधानतः
श्वसन-क्रिया से शक्ति प्राप्त करती है, और उलटकर सब
क्रियाओ को प्रेरित किया करती है।
ये तो प्रधान क्रियाएँ हैं। इनके अंतर्गत और अविरिक्त
बहुत-सी छोटी-छोटी क्रियाएँ, जैसे मल-निर्वासन, रस-निर्माण,
रुधिर का साफ करना, अवयवों की मरम्मत करना आदि
हुआ करती हैं।
यह शरीर यंत्रों की क्रियाओं का घर है। यद्यपि देखने में
उतनी क्रियाएँ प्रकट नहीं दिखाई देती, परंतु इसमें तिल-भर
भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ लगातार क्रिया न होती हो ।
सोते हुए मनुष्य को देखकर अनाड़ी आदमी कहेगा कि यह
मनुष्य सो रहा है, इसका शरीर कुछ काम नहीं करता।
परंतु श्राप देखेंगे कि सोती दशा मे भी उसके श्वास चल
रहे हैं। हृदय पर हाथ रखिएगा, तो हृदय भी धड़कता मिलेगा;
हृदय के धड़कने का अर्थ हृदय की पिचकारी द्वारा शरीर
मे रुधिर-संचालन करने का है। उदर में पाचन-क्रिया भी
हो रही है, क्योकि जब रात को मनुष्य भोजन करके सोता
है, तब सोई दशा में यदि अन्न-पाचन न होता, तो प्रातःकाल
आपको वैसा ही प्रतीत होता, जैसा रात को भोजन के
उपरांत प्रतीत होता था, पर वैसा न प्रतीत होकर अन्न
शरीर की भीतरी क्रियाएँ और उनके उद्देश १६ पचा हुआ जान पड़ता है। क्यो ? रात्रि-भर पाचन-क्रिया होती रही। शरीर की इन अनेक क्रियाओं के पूरे रूप से जहाँ और जब संपादित होने मे त्रुटि होती है, तहाँ और तब रोग की नींव पड़ जाती है। ये सारी क्रियाएँ जब बंद हो जाती है, तब वही मृत्यु की दशा कही जाती है। हम देखते है, वो इन भिन्न-भिन्न क्रियाओ के उद्देश्य भी भिन्न-भिन्न है। पाचन क्रिया का एकमात्र उद्देश्य यह है कि भोजन किया हुआ अन्न पचकर इस योग्य हो जाय कि उससे शरीर के उपयोगी रस निचोड़े जा सकें। इसी उद्देश्य से आमाशय की थैली के भीतरी भागों मे जो कोमल कोमल काँटो की भाँति मांस के सूत्र निकले होते हैं, उनसे एक प्रकार का तेजाब-सा द्रव निकलकर उस खाए हुए पदार्थ मे मिलने लगता है। आमाशय मे मुक्त अन्न इधर-उधर उलट-पुलटकर इतना मर्दित और मथित होता है कि पच जाता है। यह पाचन- क्रिया केवल आमाशय ही मे न प्रारंभ होकर मुंह ही से प्रारंभ- होती है । भोजन के मुंह मे जाते ही मुँह के भीतरी अंगो के चारो ओर से एक प्रकार का द्रव स्रवने लगता है । जिह्वा जितनी ही उस अन्न को इधर-उधर उलटती-पलटती है, और दाँत जितना ही अधिक उसे कुँचते और पीसते हैं, मुँह से उतनी ही अधिक लार निकलकर उसमे मिलती जाती है। पाचन मे यह मिली हुई लार बहुत ही उपयोगी होती है।
२० जीवन-मरण-रहस्य इस प्रकार मुँह से लेकर आमाशय, पतली अंतड़ियाँ और मलाशय तक अन्न का मर्दन और उसमें भिन्न-भिन्न द्रवों का मिश्रण हुआ करता है। इन सब क्रियाओं का एक उद्देश्य यही रहता है कि जिससे अन्न पचकर ऐसा हो जाय कि उसमें से शरीरोपयोगी रस निचोड़ा जा सके। अब पतली अंत- ड़ियाँ और मलाशय दो काम करती हैं- एक तो भिन्न-भिम द्रव-तेजाबो को निकालकर मिन्न-भिन्न स्थानों में भेजती हैं कि ये तेजाब संचित रहें और आगामी अन्न के पाचन में काम दें। दूसरे, रस निचोड़कर रुविर बनने के लिये यकृत में भेजती हैं। इतनी क्रिया हो जाने पर मलाशय मल को निचले द्वार से बाहर फेक देने का यत्न करता है। अब यकृत की क्रिया पर ध्यान दीजिए। इसका उद्देश्य रस से पित्त निकालकर उसे पित्त की थैली मे भरना, और शुद्ध रुधिर को साफ करके फेफड़ों में भेजना होता है। फुपकुस या फेफड़े का उद्देश श्वास द्वारा आई हुई हवा से ऑक्सीजन अर्थात् प्राण-प्रद वायु को निकालकर रुविर में भरना, और रुधिर के विकारों को निकालकर हवा में भरना होता है। फुफ्फुस या फेफड़े से जो धमनियाँ हस्पिड को गई हैं, उनका उद्देश स्वच्छ प्राण-प्रद वायु से मिश्रित रुविर को हृत्पिड मे पहुँचाना होता है । हत्पिड से निकलकर जो धम- नियाँ सारे शरीर में फैली हैं, उनका उद्देश शुद्ध रक्त को सारे शरीर मे वितरण करना होता है । रुधिर-वितरण की क्रिया शरीर की भीतरी क्रियाएँ और उनके उद्देश २१ बड़ी ही पेचीदा है। इन धमनियो मे रुविर का जो प्रवाह होता है, उसमे से रुधिर के कण निकल-निकलकर शरीर में सब जगह लग जाते है, जहाँ उनकी आवश्यकता है। जहाँ हड्डी के बनने या मरम्मत होने को आवश्यकता है, वहाँ उसी के अनु- कूल कण निकलकर हड्डी मे लगते है। जहाँ मांस की भाव- श्यकता है, वहॉ मांस के अनुकूल कण रुधिर से निकलकर लग जाते है। इसी प्रकार जहॉ मज्जा, चर्बी, या गुद्दी या भेजा की आवश्यकता है, वहाँ उनके अनुकूल कण जाते है, और शेष कण अपनी आगे की गति करते है। वापसी मे रुविर कणो को लगाता नहीं, किंतु रही और बेकार कणो को खींच- खीचकर अपने मे लेता आता है। इस प्रकार उन कणो को साफ होने और निकालकर फेक दिए जाने के लिये फिर फुफ्फुस मे ला छोड़ता है। इन मिन्न-भिन्न उद्देशो के स्पष्ट ज्ञान के लिये वेदन और कर्म-संचार-नाड़ियो पर ध्यान देना आवश्यक है । वेदन- नाड़ियाँ केवल वेदन को मस्तिष्क या मेरुदंड तक पहुंचाती हैं, और कर्म-नाड़ियाँ केवल क्रिया की प्रेरणा को मस्तिष्क या मेरुदंड से अभीष्ट स्थान को पहुँचाती हैं। अब इंद्रियो और उनकी वेदन-नाड़ियों के विशेष उद्देशों पर ध्यान दीजिए | आँख की इंद्रिय केवल दृश्य पदार्थ को ग्रहण करेगी। यही इसका उद्देश है। शब्द और गंध तथा स्वाद से आँख की इंद्रिय से कुछ भी प्रयोजन नहीं वैसे ही २२ जीवन-मरण-रहस्य कान की इंद्रिय का केवल शब्द ग्रहण करना उद्देश है। दर्शन, स्वाद और गंध से कुछ मतलब नहीं । स्पर्शद्रिय को केवल स्पर्श से काम है, अन्य से प्रयोजन नहीं। इसी प्रकार मिन- मिन्न अवयवों और भिन्न-भिन्न क्रियाओं के उद्देश भिन्न-भिन्न और एक दूसरे से बिल्कुल ही पृथक् हुश्रा करते हैं। इस भेद, इस पृथक्ता और इस अनेकता में भी एकता व्यापक है। अपने आप में तो ये क्रियाएँ और ये उद्देश पृथक्-पृथक् हैं, परंतु जब सबको एक में मिला दीजिए, तो एक जीव की पृथक्-पृथक् सेवाएँ ये सब कर रही हैं। यदि आप किसी जेब-घड़ी को खोलकर देखें, तो उसमें नाना प्रकार के कील, काटें, चक्कर, पहिए, लवे, टेढ़े, सीधे अनेक प्रकार के अवयव हैं। हरएक अवयव का उद्देश भिन्न- मिन्न है, और उसी उद्देश से वह अवयव गति कर रहा है। उस विशेष उद्देश को वह अवयव पूरा न कर सका, गे घड़ी या तो ग़लत समय बताने लगी (बीमार हो गई) अथवा बंद हो गई (मर गई। पर जैसे घड़ी के पुजों के भिन्न उद्देशों और भिन्न क्रियाओं का एक उद्देश समय बताना होता है, वैसे ही शरीर के भिन्न-भिन्न अवयव भिन्न-भिन्न उद्देशों से, भिन्न-भिन्न क्रियाएँ करते हुए, सम्मिलित रूप से, जीवन का एक उद्देश बनाए रहना रखते हैं। अनेकता, भेद और पृथक्ता में भी एकता है।
तीसरा अध्याय उद्देशों के पूर्तिकर्ता अब हमें इस बात पर विचार करना है कि इतनी पेचीदा क्रियाओं का इतने पेचीदा उद्देशों के साथ पूर्ति करनेवाला कौन है ? हम तो अपने शरीर के भीतर की इन क्रियाओं को नहीं करते, यह बात तो निश्चय है। हमारे लिये वो इनका समझना ही पहले बड़ी कठिन बात है, करना तो दूर रहा। दूसरे किसी कारीगर को शरीर मे प्रविष्ट होकर करते हुए न तो हम अपनी आँखों से देखते हैं, और न विज्ञान ही के इतने सूक्ष्म यंत्र बने हैं, जिसके द्वारा वह कारीगर देखा जाय । ईश्वर-भक्त लोग कहते हैं कि ईश्वर करता है। नास्तिक लोग कहते हैं कि प्रकृति आप-से-आप करती है। चाहे ईश्वर करे, चाहे प्रकृति करे, पर इतना ही कहने से तो काम चलता नहीं कि ईश्वर अथवा प्रकृति द्वारा ये क्रियाएँ होती हैं, जब तक समझा न दिया जाय कि कैसे ये क्रियाएँ होती हैं। क्या विज्ञान हमे आगे और सहायता न देगा? हमारी मोटी बुद्धि वो काम नहीं देती। विज्ञानियो की सूक्ष्म बुद्धि का सहारा लेना ही पड़ेगा । उच्च विज्ञान कहता है कि जिस प्रकार जड़ पदार्थ परमाणुओं (Atoms ) से बने हैं, वैसे ही देह सब ।
२४ जीवन-मरण-रहस्य देहाणुओ (Cells) से बने हैं। इन देहाणुओं में भी जीव रहता है। चेतनावादियों का तो यह मत है कि जड़ पदार्थों के पर- माणुओं मे भी जीव है, जो रासायनिक आकर्षण और अप- कर्पण द्वारा अपनी प्रीति और घृणा का द्योतन करता है। पर हम अभी इतनी दूर तक नहीं जाते | अभी हम जड़वादियों की भॉति परमाणुओ को निर्जीव ही मान लेते हैं, परंतु देहाणुओ (Cells) को तो विवश होकर सजीव मानना पड़ता है, क्योकि ये जीवन के अनेक चिह्नों का द्योतन करते हैं, जो आगे चलकर विदित होगा। देहाणु के जीव थोड़ा विकास पाए हुए चैतन्य मानस के अल्प अंश को धारण करते है, जिसकी चेतना से प्रत्येक देहाणु अपना कार्य उचित रीति से करता है। शरीर के देहाणुओं मे तीन तत्त्व होते हैं-(१) द्रव्य, जिसे वे मनुष्य के खाए हुए अन्न से प्राप्त करते हैं, (२) प्राण अर्थात् जीवन-शक्ति, जिससे वे कार्य करने में समर्थ होते है, और जिसे वे हमारे खाए हुए अन्न, पेए हुए पानी और साँस ली हुई हवा से लेते हैं और (३) चेतना वा चित्त, जो सर्व- व्यापक मन से लिया गया है। जैसा हम ऊपर कह आए हैं, प्रत्येक जीवित शरीर नन्हे- नन्हे देहाणुओं का समूह है। यह बात शरीर के प्रत्येक अंग के संबंध में सही है।कड़ी-से-कड़ी हडियो से लेकर उद्देशों के पूर्तिकर्ता २५ कोमल-से-कोमल रेशे तक, दाँत की हड्डी से लेकर आ मिल्ली के अत्यंत कोमल भागो तक सब इन्हीं देहाणुओ से बने हैं। इन देहाणुओं की भिन्न-भिन्न शक्लें होती हैं, जो इनके विशेष उद्देशों तथा क्रियाओ के अनुकूल होती है। प्रत्येक देहाणु सब प्रकार से पृथक्-पृथक् व्यक्ति होते हैं, परंतु ये चैतन्य देहाणु अपने अफसर देहाणु-समूह के चैतन्य मानस के वशवर्ती होते हैं। जैसे व्यक्तिगत देहाणु देहाणु-समूह के मानस का वशवर्ती होता है, वैसे ही छोटा देहाणु-समूह-मानस बड़े देहाणु-समूह- मानस मे रहता है। और, अंत में मनुष्य को केंद्रस्थ मन सबके ऊपर शासन रखता है। मनुष्य के इस केंद्रस्थ मन को, जो शरीर के सब देहाणु-समूहो के मानस पर शासन रखता है, प्रवृत्ति-मानस ( Instinct) कहते है। ये नन्ह-नन्हें देहागु सर्वदा काम मे लगे रहते हैं। शरीर के सब कर्तव्यों का पालन करते है। प्रत्यक के जिम्मे अलग- अलग काम होता है, जिसे वे अपने योग्यतानुसार पूरा करते रहते हैं। कुछ देहाणु फालतू रहते हैं, जो आज्ञा की प्रतीक्षा किया करते हैं, और अकस्मात् जो कार्य आ जाय, उसे करने के लिये तैयार रहते है। अन्य देहाणु क्रियाशील या कामकाजी होते हैं और नाना प्रकार के द्रवों और तेजाबों को बनाया करते है, जिनकी आवश्यकता देह की मिन्न क्रियाओ मे पड़ा करती है। कुछ देहाणु एक स्थानीय होते हैं, जो दूसरे आज्ञा की प्रतीक्षा में स्थायी रहते है, पर आज्ञा २६ जीवन-मरण-रहस्य पाते ही गेमन कर देते हैं। कुछ देहाणु सर्वदा यात्रा किया करते हैं। इनमें से कुछ यात्रा करते हो काम करते हैं, और कुछ अंतर दे-देकर यात्रा करते है। इन यात्री अणुओं मे कुछ तो भार-वाहक होते है, कुछ यात्रा किया करते हैं और मार्ग में जहाँ आवश्यकता देखते हैं, वहाँ कार्य करके फिर आगे बढ़ते हैं। कुछ सफाई के काम में लगे रहते है; कुछ के जिम्मे पुलिस का काम रहता है। देहाणुओं का जीवन, यदि उनके कुल समूहों पर दृष्टि डाली जाय, तो एक उपनिवेश की ऐसी गवर्नमेंट के समान दिखाई पड़ता है, जो सहकारिता और सहयोगिता के सिद्धांतों पर चलाई गई हो। प्रत्येक देहाणु अपने कार्य को समूह-भर के लाभ के लिये करता है, प्रत्येक अणु सबकी भलाई के लिये काम करता है, और सब मिल- कर परस्पर भलाई का काम करते है । नाड़ी-जाल के देहाणु शरीर के प्रत्येक भाग की खबर मस्तिष्क को पहुँचाते, और मस्तिष्क की आज्ञा शरीर के प्रत्येक आवश्यक भागो मे पहुँचाते है। ये तारवी के जीवित तार है । नाड़ियाँ नन्हे-नन्हें देहाणुओ से बनी हुई है। इन देहाणुओ मे सूइ के सदृश कुछ भाग निकला रहता है, एक की सूंड दूसरे को, और दूसरे की तीसरे को स्पर्श किए रहती है। इस प्रकार श्रृंखला बन जाती है, और इसी श्रृंखला द्वारा प्राण गति करता रहता है। प्रत्येक मनुष्य के शरीर में लाखों करोड़ों देहाणु भार-
sho
उद्देशों के पूर्तिकर्ता
२७
वाहक, चलते कामकाजी, पुलिसमैन और सिपाही आदि
का काम किया करते है । यह अनुमान किया गया
कि एक घनइंच रुधिर मे कम-से-कम ७५ अखू केवल, लाल
देहाणु हैं। औरो के लेखे को छोड़िए, यह बड़ी विस्तृत
जाति है।
रुधिर के लाल देहाणु जो भारवाहक होते हैं, वे धमनियों
और शिराओं मे बहा करते हैं, फेफड़ों से ऑक्सीजन ले-लेकर
शरीर के अंगों और प्रत्यंगो में शक्ति भरने के लिये पहुंचाया
करते हैं। जब ये रुधिर के प्रत्यावर्तन के समय वापस आते
है, तो देह-यंत्र के निकम्मे द्रव्यो को लेते आते हैं, जिन्हे फेफड़ा
बाहर फेक देता है। अन्य देहाणु शरीर के अंगो को बनाते
और मरम्मत करते हैं।
रुधिर मे लाल अर्थात् भार-वाहक देहाणुओं के अतिरिक्त
और भी कई प्रकार के देहाणु होते हैं। इनमे पुलिसमैन और
सिपाही बड़े ही मनोरंजक होते है। इन देहाणुओं का कार्य
यह है कि ये देह-मंत्र को उन कीटाणुओ ( Bacteria and
germs) से सुरक्षित रक्खे, जिनसे शरीर मे बीमारी या
पीड़ा पहुँचने की आशंका हो । ज्यो ही कोई पुलिस-देहाणु ऐसे
हानिकारक कीटाणु को पाता है, त्यों ही वह इससे लिपट
जाता है, और इसे निगल जाने की चेष्टा करता है। यदि
यह शत्रु कीटाणु प्रबल हुआ, तो वह देहाणु अन्य देहाणुओ
को अपनी सहायता के लिये बुलाता है, और यह सम्मिलित
२८
जीवन-मरण-रहस्य
सेना उस कीटाणु को पकड़े-पकड़े देह-यंत्र के किसी छिद्र के
पास ले जाती है और उसे बाहर निकाल देती है । फोड़े-
फुसियाँ आदि इसी प्रकार के कीटाणुओ के निकाले जाने के
उदाहरण हैं, जहाँ ये शरीर-यंत्र के पुलिसमैन विषैले
कीटाणुओं को निकालते है।
रुधिर के लाल कीटाणुओं को बहुत काम करना पड़ता
है। वे शरार के अगों में ऑक्सीजन पहुंचाते है। वे अन्न
से ग्रहण किए हुए पोषण-रस को शरीर के उन अंगो मे पहुँचाते
हैं, जहाँ नई रचना या मरम्मत के लिये इसकी आवश्यकता
होती है। वे पोषण से उन्हीं तत्त्वों को खींच लेते है, जिनसे
आमाशयिक द्रव, लार, पेनक्रियाटिक द्रव ( Pancreatic
juice ), पित्त, दूध इत्यादि बनते हैं, और फिर इन
पदार्थों को कार्य के अनुकुल उचित परिमाण मे मिलाते
हैं। वे उसी प्रकार हजारो काम करते हैं और काम में लगे
रहते है, जैसे चीटियाँ करती हैं। पूर्वीय आचार्य बहुत दिनों
से इन देहाणुओ को जानते ओर इनकी क्रियाओ के
विषय में अपने शिष्यो को शिक्षा देते आए है। पश्चिमी
विज्ञान अंब इन्हें जानने लगा है, और आशा है, आगे
वह इसका और भी बृहत् और सुविस्तृत वर्णन करे।
हम लोगों के जीवन के प्रत्येक क्षण मे ये देहाणु उत्पन्न
हुआ और मरा करते हैं। ये देहाणु खूब बढ़कर फिर
अनेक भागों में विभक्त हो जाने के कारण दूसरे देहाणुओं
--- उद्देशों के पूर्तिकर्ता २६ को जन्म देते हैं। पहला देहाणु फूलने लगता है, और फूलते-फूलते दो भागों में हो जाता है, तथा बीच मे जोड़नेवाली कमर रहती है, फिर यह कटि टूट जाती है, और एक देहाणु स्थान में दो देहाणु हो जाते है। फिर नया देहाणु बढ़कर दो भागो मे विभक्त होता है । इस प्रकार क्रिया बराबर जारी रहती है। ये देहाणु शरीर को अपने आप नया बनाए रखने की क्रिया करने के लिये समर्थ बनाए रखते हैं। मानव-शरीर का प्रत्येक भाग लगातार परिवर्तित हो रहा है और इसके रेशे बदल जाया करते है.। हमारे चमड़े, इड़ियाँ, बाल, मांस-पेशियाँ इत्यादि सबमे अनवरत मरम्मत हुआ करती है, और ये ठीक बनाई जाया करती है। हमारे नखो के नए हो जाने में करीब- करीब चार महीने लगते हैं। चमड़े के नए होने में चार सप्ताह लगते है। हमारे शरीर का प्रत्येक अंग लगातार रही हुआ करता, और नया बना करता है। मरम्मत भी जारी रहती है। ये नन्हे-नन्हे देहाणु कारीगर उन मजदूरो के दल हैं, जो इस आश्चर्य-जनक कार्य को किया करते है। ये नई सामग्री जुटाया करते है, और पुराने निम्मे हानिकारक कणों को शरीर-यंत्र के बाहर किया करते हैं। मानव-शरीर मे विकारो और क्षतो को इन्हीं देहाणुओं द्वारा चंगा करने की भी शक्ति है । किसी घाव के अच्छे होने के उदाहरण पर विचार कीजिए । देखिए, क्षत कैसे पूरा ३० जीवन-मरण-रहस्य होता है। कल्पना कोजिए, किसी मनुष्य का शरीर जख्मी हुआ है, अर्थात् कहीं कट गया है या किसी बाहरी चीज के लगने से फट गया है। रेशे, पंछा और रुधिर बहाने की नलियाँ, द्रवस्रावी, मांस-खंड, मांस-पेशियाँ, नाड़ियाँ और कभी- कभी हड्डियाँ खंडित हो जाती हैं और उनकी श्रृंखला टूट जाती है। जख्म से रुधिर बहने लगता, उसका मुंह विवृत हो जाता, और पीड़ा होने लगती है। नाड़ियाँ इस समाचार को मस्तिष्क में पहुँचाती, और तुरंत सहायता पाने के लिये पुकार मचाती हैं। मस्तिष्क से इधर-उधर सहायता के लिये आज्ञाएँ निकलने लगती हैं। मरम्मत करनेवाले देहाणुओं की उपयुक्त सेना झपटकर खतरे के मुकाम पर पहुंचती हैं। इस अर्से में रुधिर को जख्मी नलियों से रुधिर बह-बहकर भीतर घुसे हुए बाहरी पदार्थों को धो बहाता है, या धो बहाने को चेष्टा करता है। ये बाहरी पदार्थ धूल, मैला और कीटाणु इत्यादि हुआ करते है। यदि ये भीतर रह जाये, तो विष उत्पन्न कर दें। रुधिर जब बाहर की हवा के संपर्क मे आता है, तो जम जाता है और सहरेस की भॉति लसलसा पदार्थ बन जाता है, तथा जख्म पर पपड़ी डाल देने की नीव डालता है। करोड़ा देहाणु जिनका कर्तव्य मरम्मत करना है, मौके पर दौड़कर पहुंचते, और रेशो को जोड़ने लग जाते है तथा अपने काम मे आश्चर्यजनक चैतन्यता और कर्मण्यता दिखाते हैं। जख्म के दोनो ओर के रेशों, नाड़ियो, रुविर की नलियों उद्देशों के पूर्तिकर्ता ३१ के देहाणु बढ़ने लगते हैं और करोड़ों नए देहाणुओं को पैदा कर देते हैं, जो दोनो ओर आगे बढ़कर अंत में जख्म के बीच में मिल जाते हैं। पहले तो इन देहाणुओं का बढ़ना बेकायदे और निष्प्रयोजन-सा प्रतीत होता है, परंतु थोड़े ही अर्से में इसका शुभ परिणाम प्रकट होने लगता है। रुधिर की नलियों के नए देहाणु उस पार के उसी प्रकार के देहाणुओं से मिलने लगते हैं, और नई नली बन जाती है, जिसमें रुधिर फिर बहने लगे। जोड़नेवाले रेशों के देहाणु अपनी ही भाँति के अन्य देहाणुओं से मिल जाते हैं, और चारो ओर से जख्म भरने लगते हैं। नाड़ियों के नए देहाणु प्रत्येक पृथक् सिरों पर बनने लगते हैं और बाल-सहश रेशों को आगे बढ़ाकर शनै:- शनैः तार जोड़ देते हैं, फिर विना बाधा के समाचार आने- जाने लगते हैं। जब यह भीतरी कुल काम समाप्त हो जाता है और रुधिर को नलियाँ, नाड़ियाँ और जोड़नेवाले रेशे अच्छी तरह मरम्मत हो जाते हैं, तब चमड़े के देहाणु काम समाप्त करने मे लग जाते हैं, और चमड़े के नए देहाणु बनने लगते हैं तथा जख्म के ऊपर नया चमड़ा बन जाता है, जो जख्म कि अब तक पूरा हो गया रहता है। ये सब बातें बड़ी तरतीब से होती हैं, जिससे चेतना और सुरीति झलकती है। इस प्रकार हम देखते, कि शरीर की सारी क्रियाओं के करनेवाले इन्ही देहाणुओं के ही दल हैं।
चौथा अध्याय देहाणुओं के प्रेरक और नेता पाठकगण देहाणुओ के वर्णन मे देख आए हैं कि ये नन्हे- नन्हे देहाणु जीवित और सचेतन हैं, पर इनका जीवन और इनकी चेतनता बहुत विकास को नहीं प्राप्त है। इनको चेतनता वनस्पति की चेतनता के समान है। इन देहाणुओं को भिन्न- भिन्न आकार, भिन्न-भिन्न गुण और भिन्न-भिन्न उद्देशवाले बनाने के लिये इनसे कुछ और उच्च चेतनता की आव- श्यकता होती है, जो एक दल से रेशा बनाने की, दूसरे दल से हड्डी-बनाने की, और तीसरे दल से आँख की पुतली तथा चौथे दल से नाड़ियाँ बनाने की प्रेरणा करे। देहाणु की चेतनता से ऊपर जो चेतना है, उसे देहाणु-समूह- चेतना कहते है। कई देहाणु-समूहों की चेतना को प्रेरणा करनेवाली जो चेतना है, उसे देहाणु बृहत-समूह-चेतना कह सकते हैं। इस प्रकार कई देहाणु-बृहत् समूह-चेतनाओं के प्रेरणा करनेवाले को देहाणु महाबृहत् समूह चेतना या मानस कह सकते हैं। यह सिलसिला इसी प्रकार ऊपर तब तक चला जाता है, जब तक अंत मे मनुष्य के प्रवृति-मानस (Instinct) तक नहीं पहुंच जाता । देहाणु-चेतना या देहाणु-मानस भौतिक द्रव्य और प्राण अर्थात् शक्ति लेकर ही काम करता है, पर देहाणुओं के प्रेरक और नेता देहाणु-समूह मानस-देहाणुनो के ऊपर ही अपना शासन करता है। भौतिक द्रव्य और प्राण न हो, तो देहाणु-मानस अपने को प्रकट नहीं कर सकता। वैसे ही देहाणु-मानस न हो, तो देहाणु-समूह-मानस अपने को प्रकट नहीं कर सकता। अब हम देखते है, तो इन सब मानसो का शासक मनुष्य का प्रवृत्ति-मानस (Instinct ) है, जो शरीर के सारे देहाणु- मानसो पर समूह-मानसो द्वारा शासन करता है । इससे स्पष्ट हुआ कि मानस, शक्ति और द्रव्य यही तीन मिलकर नीच कोटि के जीवन बनाते हैं । इन तीनो मे से एक की भी कमी हो, तो जीवन प्रकट नही हो सकता। इस प्रवृत्ति-मानस में बड़ी शक्ति है । उदाहरण के लिये कीड़े-मकोड़ो को देखिए, तो वे नई टॉगो और पंजो इत्यादि के जमा लेने में समर्थ होते हैं। घोघे तो अपने सिर के कुछ भागो को भी नया बना लेते हैं। यहाँ तक कि यदि उनकी आँखें नष्ट हो जायें, तो नई ऑखें भी पैदा कर लेते हैं। कोई-कोई मछलियाँ अपनी नई पूंछ पैदा कर लेती है । छिपकली आदि नई पूछे, हड्डियों, मांस-पेशियों और अपनी रीढ़ की हड्डी के भी कुछ भागों को नया पैदा कर लेती है। नीचाविनीच जंतुओ को अपने खोए हुए अंग को फिर से पैदा कर लेने का अधिक- से-अधिक सामर्थ्य है। हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि जो जंतु जितनी ही नीच कोटि का है, वह नए अंगों को बना लेने मे उतना ही अधिक समर्थ है। कुछ बहुत ही अधिक ३४ जीवन-मरण-रहस्य नीच कोटि के ऐसे भी जंतु होते हैं, कि यदि उनके शरीर का छोटे-से-छोटा भाग भी जीवित बचा हो, तो वे उससे नए भागों को पैदा करकं फिर पूरे शरीरवाले बन जाते हैं। ज्यों- ज्यों जंतु उच्च और उच्चतर कोटि के होते जाते हैं, त्यों-त्यों उनकी यह शक्ति क्षीण होती जाती है। प्रकृति नीच जंतुओं में प्रवृत्ति-मानस को पूरा अवकाश और विस्तृत क्षेत्र देती है, परंतु ज्यों-ज्यों जीवन उच्च पदवी धारण करता है अर्थात् ऊँची योनि मे आता है, त्यों-त्यों बुद्धि अधिक विकसित होने लगती है, और प्रवृत्ति-मानस की शक्ति और क्षेत्र संकुचित होने लगते हैं। फिर भी यहाँ एक उदाहरण पर ध्यान दीजिए । भेड़ और बकरी मनुष्य से नीच योनि के हैं। भेड़ और बकरियों की शीत-जाड़ा से रक्षा करने के लिये प्रवृत्ति-मानस उनके शरीर पर ऊन जमा लेता है, पर मनुष्य में बुद्धि का विकास होने क कारण उसका प्रवृत्ति-मानस अपने शरीर पर ऊन नहीं जमा सकता। इसके अतिरिक्त मनुष्य की बुद्धि जव प्रकृति के बहुत प्रतिकूल चलने लगती है, त प्रवृत्ति-मानस की क्रियाओ मे और भी बाधाएँ पड़ती है । तो भी मनुष्य यदि प्रकृति के अनुकूल चले, तो उसका प्रवृत्ति-मानस बहुत कुछ कर सकता है। योगी लोग जो हठयोग के अभ्यासों से अपने प्रवृत्ति-मानस को जगा देते हैं, वे भी अपने शरीर द्वारा अद्भुत-अद्भुत कार्य करने लगते हैं। यह प्रवृत्ति-मानस पशु, पक्षी, मनुष्य आदि सब जीवों में देहाणुओं के प्रेरक और नेता ३५ पाया जाता है। यह शरीर की आभ्यंतरिक क्रियाओं जैसे... पाचन, रुधिर-संचार आदि का..संचालन,तो.करता ही रहता, पर भीतरी. क्रियाओं के अतिरिक्त बहुत-सा बाहरी काम भी करता है। पशु-पक्षियों की चेतना की तो इसी तक परा काष्ठा है। प्रवृत्ति-मानस से अधिक ऊँचा विकास उनकी चेतना का नहीं होता । इसी प्रवृत्ति-मानस ही द्वारा वे अपना सारा काम करते है। किसी-किसी पशु-पक्षी का प्रवृत्ति-मानस आप-से-आप या मनुष्य की बुद्धि के संसर्ग से साधारण दशा से थोड़ा अधिक उन्नति कर जाता है, पर मनुष्य का प्रवृत्ति-मानस ऐसा है कि इसमें बहुत ऊँची श्रेणी तक विकास होने का अवकाश है । पशुओं के बच्चे जन्म से लेकर वृद्वा- वस्था तक बहुत ही कम मानसिक विकास करते है, परंतु मनुष्य के बच्चे बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक बहुत ही अधिक विकास करते पाए जाते है। इनका बचपन के प्रवृत्ति- मानस से लेकर यौवन के गणितज्ञ, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, कवि, कला-कौशल-युक्त ऊँची-ऊंची श्रेणी तक और भिन्न-भिन्न क्षेत्रो मे विकास हो जाता है। यही प्रवृत्ति-मानस विकसते- विकसते बुद्धि, प्रतिभा और आत्म पदवी तक पहुंच जाता है। ऊपर के वर्णन मे आपने खयाल किया होगा कि शरीर के देहाणु एक-एक क्षण मे लाखो-करोड़ो की संख्या मे मरा करते हैं, और उनके स्थान मे नए-नए देहाणु उत्पन्न होकर काम करते हैं। वैज्ञानिको का कथन है कि मानव-शरीर में
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३६
जीवन-मरण-रहस्य
इतने परिवर्तन हुआ करते हैं, अर्थात् पुराने द्रव्य बाहर फेक
दिए जाते और उनके स्थान पर नए द्रव्य आ जाते हैं कि
हमारे शरीर मे आज जो द्रव्य हैं, इनका लेश-मात्र भी
अंश साढ़े सात वर्ष के पश्चात् इसमे न रह जायगा। उसके
स्थान मे नए द्रव्य आ जायेंगे।
द्रव्यों और देहाणुओं का परिवर्तन तो हुआ ही करता है,
पर प्रवृत्ति-मानस अपने स्थान पर बना रहता है। देहाणुओं
द्वारा द्रव्य आते और जाते हैं। पर प्रवृत्ति-मानस वना
ही रहता है। जब तक जीवन है, तब तक यह शर र से हटता
नहीं हैं। इससे सिद्ध हुआ कि प्रवृत्ति-मानस यद्यपि देहाणुओ
द्वारा शारीरिक क्रियाओ का प्रेरक है, पर तो भी देहाणुओं.
और शरीर से भिन्न है।
यह बात इस प्रकार और भी अधिक स्पष्ट रीति से
समझ मे आयगी। कल्पना कीजिए, एक बड़ा भारो एंजिन
है, जिसके द्वारा विद्युत्-शक्ति उत्पन्न की जाती है । वह विद्युत्-
शक्ति तारो द्वारा अनेक स्थानो मे वितरित की जाती है,
और उन अनेक स्थानो मे इसी विद्युत्-शक्ति से प्रकाश किया
जाता है, पंखे चलते हैं, अनक क्रियाएँ होती हैं। एंजिन
का चलानेवाला मनुष्य एंजिन चलाता है, एक स्थान से
प्रेरणा करता है, और जहाँ तक उसके एंजिन से तारों
द्वारा समुचित संबंध है, वहाँ तक उसकी प्रेरणा से काम जारी
रहते हैं। सब रोशनियों और पंखों में एक के स्थान पर
tre
देहाणुओं के प्रेरक और नेता ३७ दूसरा लगाया जाता है, पंखे और तार पुराने होते, और नए बना करते है। परंतु उनके टूटने, दूर होने और उनके स्थान पर नयो के आ जाने से एंजिन चलानेवाले पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसी अवस्था मे हम कहते है कि एंजिन चलानेवाला मनुष्य एंजिन और उसके तारों के विस्तार और क्रियाओं से पृथक् है। वैसे ही प्रवृत्ति-मानस यद्यपि शरीर के मस्तिष्क रूपो एंजिन चलाकर शरीर के सारे देहाणुओ को क्रिया मे प्रवृत्त रखता है, पर उसो मे बैठे होने पर भी वह रंजिन और उससे लगे हुए तारों के जाल से भिन्न है । एक इंजीनियर जैसे आज यहाँ एंजिन बनाकर चला रहा है, वैसे ही संभव है, इस एंजिन को यहाँ ही छोड़कर कहीं अन्यत्र जाकर एंजिन बनावे, और वहाँ अपना कारखाना खोल दे । वैसे ही यह प्रवृत्ति-मानस भी इस शरीर रूपी एंजिन को छोड़कर दूसरे स्थान पर फिर दुसरे शरीर को संघटित, प्रेरित और संचालित कर सकता है। इंजीनियर और मानस मे अंतर यह है कि एक इंजीनियर दूसरे इंजीनियर के बनाए हुए एंजिन पर भी अपनी क्रिया करता है, पर मानस अपन ही आयोजित किए. हुए-शरोर- यंत्र को चलाता है। । कारण इंजीनियर एंजिन को अपने शरीर से अलग बनाता है, और मानस अपने ही गिर्द रेशम के कीड़ो की भाँति ततु रूपी देहाणुओं को लपेटकर अपने लिये शरीर रूपी यंत्र बनाता है, परंतु उस यंत्र रूपी
३८
जीवन-मरण-रहस्य
शरीर के भीतर व्यापक रहते हुए भी उससे भिन्न और न्यारा
है। जो उदाहरण एंजिन और इंजीनियर का दिया गया
है, यद्यपि वह ठीक-ठीक नहीं घटता, पर समझने के लिये
अच्छा दिग्दशन कर देता है।
अब हम लोग समझ गए कि शरीर रूपी जीवित यंत्र का .-
प्रेरक, संचालक और नेता मानस है। यह मानस जब तक
अधिक विकसित दशा को प्राप्त नहीं रहता, तब तक इसे
प्रवृत्ति-मानस (Instinct ) कहते हैं । यह प्रवृत्ति-मानस
पशु-पक्षियों आदि अन्य जंतुओं मे भी पाया जाता है। इस
मानस को विकसने के लिये बहुत बड़ा अवकाश है। यह
बहुत बृहत् मानसिक क्षेत्र मे विकस सकता है, और प्रबल
शक्तियो, चेतना, प्रभाव, ज्ञान आदि का द्योतन कर सकता
है। इसके नियमों का संक्षिप्त वर्णन अगले अध्याय में किया
जायगा । यहाँ पर इस बात पर इतना और ध्यान दे देना
चाहिए कि मानस शब्द को यहाँ पर हम जीव शब्द का
पर्यायवाचक व्यवहार कर रहे हैं। क्योकि जेसे आगे चलकर
मृत्यु के वर्णन में यह दिखलाया जायगा कि इस मानस रूपी
इंजीनियर के निकल जाने पर शरीर रूपी एंजिन क्रिया-
हीन हो जाता है, वैसे ही इस मानस रूपी पंजिन से जब
आत्मा निकल जायगा, तो यह मानस भी क्रिया-हीन हो जायगा।
पर अब तक हम मानस शब्द का प्रयोग आत्म-संयुक्त मानस के
अर्थ में कर रहे हैं। आत्म-संयुक्त मानस को जीव कहा करते हैं।
।
के
देहाणुओ के प्रेरक और नेता ३६
शरीर के संगठन का संक्षिप्त वर्णन हो गया। इसका विस्तार
के साथ वर्णन किसी मानव-शरीर-विज्ञान ( Physiology)
पुस्तक में मिलेगा । हमारा उद्देश मानव-शरीर-विज्ञान
दिखलाना नहीं है, किंतु जीवन-मरण का रहस्य जानना
है। जीवन के समझने के लिये थोड़ा थोड़ा शरीर-विज्ञान
और मनोविज्ञान का जानना आवश्यक है, क्योंकि शरीर
और मन मिलकर ही जीवन होता है। अब शरीर के संबंध
जीवन-संबंधी आवश्यक बातें कहकर अगले अध्याय
में मन-संबंधी आवश्यक बातें कही जायेंगी।
पाँचवाँ अध्याय
मानस का विकास
देहाणुओं के वर्णन मे कहा गया है कि देहाणु जव अपने
का प्रकट करते हैं, तब द्रव्य, प्राण और अणुजीव अर्थात्
देहाणु-मानस इन तीनो के संयोग मे ही प्रकट करते हैं। वैसे
ही यह मानस भी विना द्रव्य, प्राण और अपने संयोग के
कभी हमारे गोचर नही होता। ऊपर हम यह भी कह आए
हैं कि इसका विकास भी होता है । मानस क्या है, इसके कार्य
करने के कौन-कौन-से नियम हैं, कैसे यह प्रकट होता है इत्यादि
बातो के नियम हैं। जिस शास्त्र मे इन नियमों का वर्णन होता
है, उसे मनोविज्ञान ( Psychology) कहते हैं।
मानस मे विकास की प्रवृत्ति .निर्बल या सवल रूप मे
स्वभाव ही से वर्तमान रहती है। इसका विकास स्वभाव ही
से होता है। जहाँ इसके विकास के लिये आंतरिक प्रेरणा
सबल और बाह्य-विधान उपयुक्त हुए, वहाँ इसका विकास
क्षिप्र गति से होता है, पर जहाँ आंतरिक प्रेरणा निर्बल और
बाह्य-विज्ञान प्रतिकूल हुए, वहाँ इसका विकास मंद गति से
अधिक काल में होता है।
कल्पना कीजिए, किसी माता-पिता के यहाँ कोई बच्चा
उत्पन्न हुआ। अब बचपन में इस बच्चे का मानस केवल
मानस का विकास
प्रवृत्ति-मानस होगा। यह प्रवृत्ति-मानस भी सभी बच्चों का
तुल्य और एकसम नहीं रहता। सबके प्रवृत्ति-मानस में भेद
हुआ करते हैं। किसी में प्रांतरिक प्रेरणा प्रबल होती है, और
किसी में निर्बल । किसो बच्चे के प्रवृति-मानस की प्रवृत्तियाँ,
झुकाव आदि एक ओर होते हैं, किसी बच्चे के मानस की
दूसरी ओर होते हैं। ऐसा क्यो होता है ? यह प्रश्न अभी
गूढ़ प्रतीत होता है। संभव है, आगे चलकर हम इस पर
अधिक विचार कर सकें, और इस विषय को अच्छी
तरह समझकर इस प्रश्न का उत्तर द सकें, पर इस समय तो
हम यही उचित समझते हैं कि केवल इसी बात की धारणा
कर लें कि भिन्न-भिन्न बच्चो के प्रवृत्ति-मानस की प्रवृत्तियों
और आंतरिक प्रेरणा में भेद होता है। प्रवृत्ति से हमारा
अभेप्राय मुकाव म, और आंतरिक प्रेरणा से अभिप्राय
आंतरिक शक्ति की न्यूनाधिकता से है।
अब इस प्रवृत्ति-मानस और शारीरिक संगठन को लेकर
बच्चा स्पन्न हुआ । संगठन का अभिप्राय तो आप समझ ही
गए होंगे कि शरीर के सब क्रिया योग्य परस्पर संबद्ध
अवयव । इस बच्चे का प्रवृत्ति-मानस श्वसन, रुधिर-संचालन,
ज्ञान और कम वहन तथा दुग्ध-पाचन. आदि क्रियानो की
प्रेरणा, संचालन और नेतृत्व कर रहा है। शरीर के देहाणु
सेब उस मानस की प्रेरणा से अपने-अपने कतव्यो का विधि-
बत् पालन कर रहे है । दिन-पर-दिन शरीर अपनी शकियो
-
४२
जीवन-मरण-रहस्य
के साथ बढ़ता जाता है । पशुओं के बच्चों का प्रवृत्ति-मानस
तो थोड़ा ही विकास करके रह जाता है, पर मनुष्य के बच्चे
का मानस इस प्रकार अधिक विकास करता है-
उसकी आंख, कान, नाक आदि इंद्रियों पर संसार के
बाहरी पदार्थों का आक्षेप आकर पड़ता है। जैसे आँख पर
-रंग, रूप और आकार आदि के आक्षेप पड़ते हैं। कान पर
शब्द के आक्षेप पड़ते हैं, नासिका मे गंध के, रसना में स्वाद
के और त्वचा मे स्पर्श क, वैसे ही भीतरी अवयवों पर भूख,
प्यास, रोग, पीड़ा आदि के आक्षेप पड़ते हैं। आक्षेपों की
वेदनाएँ ( Sansations) नाड़ी-तंतुओं द्वारा उसके मस्तिष्क
तथा मानस पर पहुँचती हैं। पहले तो इन वेदनाओं के अर्थ
को वह कुछ नहीं समझता कि ये क्या है, कहाँ से आई, और
क्यों ? पर बार-बार इन्हीं वेदनाओ को प्राहण करते-करते
उसका मानस समझने लगता है कि यह वेदना अमुक स्थान
से आई। यह समझ अनुभव से होती है। अब वेदनाएँ केवल
वेदनाएँ ही न रहीं। अब वे समझ (Perception ) के
रूप में बदल गई। कल्पना कीजिए कि उस बच्चे के आँख
के सामने उसकी माता का मुख या स्तन बारम्बार आता है।
माता के मुख या स्तन का प्रतिबिब बच्चे की आँख की पुतलिओं
पर पड़ता है। नाड़ी-तंतु द्वारा उसकी वेदना उसके मानस तक
पहुंचती है। वैसे ही उसी मुखवाली का स्तन जब उसके मुख
में पड़ता है, मुख में दूध जाता है, उसके स्वाद को वेदना भी
मानस का विकास ४३ उसके मानस तक पहुंचती है। जब दूध पेट में जाता है, और पाचन क्रिया के देहाणु संतुष्ट होकर उस क्रिया को करने लगते हैं, तो उसकी वेदना भी उसके मानस तक पहुंचती है। बार-बार इन्हीं वेदनाओं को उसी माता स्थान से उत्पन्न होकर मानस तक आने से अब वह माता को समझने लगता है। इसी प्रकार अपने मानस पर आई हुई वेदनाओ का अर्थ वह मानस से भिन्न पदार्थों पर करने लगता है, और वेदनाएँ परिवर्तित होकर समझ का काम देने लगती हैं। जब उसकी समझ भी विस्तार पाने लगती है और वाह्य पदार्थों के परि- वर्तनो और उनके भीतरो कारण-कार्यों को बार-बार के करने से अनुभव द्वारा समझने लगती है, तो समझ उन्नति करके भावना (Conception ) में परिणत हो जाती है । मानस मे प्रत्येक मानसिक क्रिया का वेदना से लेकर समझ, भावना और इसके भी ऊपर की मानसिक घटनाओं का अंकन हुआ करता है। जो अंकन सर्वदा उदित नहीं रहता, डूबा रहता है, पर कभी-कभी उदित हो जाता है, उसे स्मरण कहते हैं। स्मृत या प्रत्यक्ष दो घटनाओं से तीसरी का अनुमान कर लेना ऊहा या अनुमान कहा जाता है। दृष्ट वस्तुओ की समझ के आधार पर अहष्ट वस्तुओं, घटनाओ और दृश्यों का मानसिक चित्रण करना कल्पना कहा जाता है। घटनाओ से उन घटनाओं के मूल-तत्व या नियम का निकाल लेना तत्त्व- निर्णय या नियम-निर्णय हो जाता है। इन्हीं मानसिक शक्तियों
४४
जीवन-मरण-रहस्य
के साथ सुख दुःख का अनुभव करनेवाली भावनाओं का भी
उदय होता है।
इस तरह हम देखते हैं, तो सीधी-सादी वेदनाओं ही को
लेकर मानस अपना सारा मानसिक संसार रच लेता है।
इन्हीं मानसिक क्रियाओं के समुदाय को बुद्धि कहते हैं। इन
भिन्न-भिन्न क्रियाओं की भिन्न-भिन्न शक्तियों ( Faculties)
होती हैं। किसी के मानस में किसो क्रिया की कम शक्ति होती
है, किसी की अधिक । क्यों ? इसका वर्णन आगे किया
जायगा, क्योंकि इसका संबंध भी पूर्व-वणित मानस की
आंतरिक शक्ति से है।
यह मनोविज्ञान के मुख्य मुख्य अंगों का संक्षेप मे वर्णन
किया गया है, जो केवल दिग्दर्शन-मात्र करा दिया गया है।
इसका सविस्तर वर्णन मनोविज्ञान के किसी भी अच्छे ग्रंथ
में पाया जा सकता है। हमन मनोविज्ञान की केवल उन्हो
मोटी बातों के समझने का प्रयत्न किया है, जिनसे जाना जा
सके कि जीवन क्या है ? शरीर की बनावट कैसी है ? उसमें
मानस क्या काय करता है, और कैमे विकसता है ? इन बातों
को हम थोड़ा-थोड़ा अब 'समझने भी लगे। साधारण मनुष्यों
के मन के विकास का वर्णन अब थोड़ी-सी और बातें कहा
कर हम समाप्त करगे।
मानस मे कर्तव्याकर्तव्य के विवेक की भी स्वाभाविक
शक्ति होती है। यह शक्ति पशु-पक्षियों और अविकसित
मानस का विकास
४५
मनुष्य के प्रवृत्ति-मानस (Instinct ) से लेकर अच्छे-खासे
विकसित मनुष्य को वुद्धि में पाई जाती है।
मुर्गी के अंडों के साथ यदि बतख के अंड़े भी मुर्गी के
सेने के लिये रख दिए जाय, तो मुर्गी अपने और बतख के
अंडो को समान समझकर सेवेगी। अंडे पककर जब उनमें
से बच्चे पैदा होगे, तब भी मुर्गी उनके साथ समान वर्ताव
करेगी, परंतु पानी के तोर जाने पर बतख के बच्चे
पानी मे जाने को चेटा करेंगे, और मुर्गी के बच्चे पानी से
डरेंगे। इसका क्या कारण ? बतख के बच्चे का प्रवृत्ति-मानस
उसे प्रेरणा कर रहा है कि पानी से लाभ उठाओ, वह तुम्हें
हितकर होगा। मुर्गी के बच्चे को ऐसी प्रेरणा नहीं हो रही
है। पशु-पक्षी अपने कर्तव्य की ओर अपने ही प्रवृत्ति-मानस
द्वारा प्रेरित होते हैं। अकर्तव्य से दूर होने के लिये भी उनका
प्रवृति-मानस उन्हे प्रेरित करता है। वसे ही मनुष्य में जब
मानस का विकास होता है, तब भी कर्तव्याकर्तव्य-सूचक
विवेक-शक्ति मानस में वर्तमान रहती है, जिसे अंतःकरण
(Onscience ) कहते हैं।
हम शरीर की बनावट के अध्याय में कई आए हैं कि बुद्धि
का ज्यो-ज्यों उदय होता है, त्योंत्यों प्रवृत्ति मानस संकुचित
होता जाता है। हमने मेड़ और मनुष्य के शीत-निवारण के
लिये रोमों की बहुतायत और प्रभाव का भी उदाहरण दिया
था। यद्यपि प्रवृत्ति-मानस की शक्ति संकुचित होती जाती है,
जीवन-मरण-रहस्य
पर उसका लोप नहीं होता। मनुष्य का कर्तव्य तो यही था
कि प्रवृत्ति-भानस के द्योतित पथ पर अपने बुद्धि का विकास
करता, तब इसका जीवन खाभाविक, आनंदमय और
कल्याणकर बना रहता, परंतु आह! शोक के साथ कहना
पड़ता है। मनुष्य के मानस में जब बुद्धि का प्रदीप जलता
है, तो इसकी आँखों को चकाचौंध आ जाती है। विना दीपक
के जो मार्ग सूमता था, अब दीपक की चकाचौंध में स्पष्ट नहीं
दिखाई देता। मनुष्य अपनी बुद्धि के अभिमान मे आकर
अंतःकरण की प्रेरणा से बागी हो जाता है। अंतःकरण भी
अपना वश न चलता हुआ देखकर अधिक बल के साथ
प्रेरण न करके केवल दिग्दर्शन-मात्र करा देता है, पर
आपके मानस में अंतःकरण की विवेकमय, प्रेरणा करनेवाली
शक्ति वर्तमान है, जो कर्तव्य-पथ पर आगे बढ़ने, और
अकर्तव्य पथ को छोड़ देने का आदेश दिया करती है। इस
अंतकरण की सूचनाएँ मनुष्य के विश्वास और अनुसरण
करने के लिये हैं। ये सूचनाएँ बहुत ही सत्य हुआ करती हैं,
यदि अपनी कृत्रिम और अभिमानी बुद्धि का उस पर आवरण
न डाल दिया जाय । यदि मनुष्य अपने अंतःकरण को
अपने अभिमानों और दुष्कर्मों से दबाकर नीचे न गाड़....
उस पर आवरण न डाल दे, उसके ऊपर श्रद्धा और विश्वास
करे, तो उसकी ज्योति प्रबल होने लगती है। उसकीज्योति मे विना
बुद्धि की अनेक क्रियाओं ही के स्पष्ट ज्ञान और कर्तव्य का उदय
४७ मानस का विकास होता है। उस दशा मे उसी अंत:करण को प्रतिभा कहते हैं। आज जो सत्य किसी अपढ़ मनुष्य की प्रतिभा द्वारा घोतित हुआ है, उसी सत्य पर विज्ञानी और ज्ञानी अपनी बुद्धि का विकास करते-करते पचासो वर्प तथा शताब्दियो पीछे पहुंचते हैं। प्रतिभा और अंतःकरण की कही हुई बातें सत्य और विश्वसनीय हैं । प्रतिभा मन और बुद्धि के ऊपर आत्मा की किरण है। नीतिज्ञो और चालाक बुद्धिमानो ने सोचते-विचारते और अनुभव करते-करते बहुत दिनो के बाद इस सिद्धांत को निकाला कि "ईमानदारी सर्वोत्तम नोति है" (Honesty is the best policy), परंतु अंत:करण सर्वदा सच बोलने के लिय उत्साहित किया करता है और असत्य बोलने पर खिन्न हो जाता है । इसी खिन्नता को अंतःकरण का डंक ( Prich of conscience) कहते हैं। ऊपर देख आए हैं कि बुद्धि का मूल-आधार वेदना है। यही वेदन बुद्धि की इकाई है। इसी इकाई को लेकर बुद्धि समझ, भावना, अनुमान, कल्पना, तत्व-निर्णय या नियम- निर्णय आदि अनेक क्रियाएँ करके अपना ज्ञान प्रकट करती है। जिस घटना की वेदना ही नहीं हुई, बुद्धि उसका कुछ भी ज्ञान नही प्राप्त कर सकती। जिस घटना को वेदना हुई, परंतु गलत हुई, तो उस वेदना पर बुद्धि द्वारा रचा हुश्रा ज्ञान सब अपूर्ण और गलत हो जाता है। वेदन ठीक होने पर भी यदि समझ, भावना, अनुमान, कल्पना आदि क्रियाएँ करने ४८ जीवन-मरण-रहस्य में गलती हुई, जैसी प्रायः हुश्रा करती है, भी बुद्धि द्वारा प्रकटित ज्ञान ग़लत हो जाता है। इस प्रकार हम दखते हैं, बुद्धि द्वारा ज्ञान प्राप्त करने में बड़ी पेचीदा क्रियाएँ करनी पड़ती हैं, तिस पर भी उस ज्ञान के 'पग-पग पर गलत हो जाने की संभावना है, परमनुव्य चूंकि बुद्धि द्वारा ज्ञान प्राप्त करने में बड़ा परिश्रम करता है, इसलिय बुद्धि ही के ज्ञान को प्रबल मानता है। सच भी है। प्रतिमा तो सबको खुली नहीं है, सबको तो थोड़ी या बहुत बुद्धि ही पर अधिकार है। बुद्धि पर भरोसा न करें, तो क्या कर । परंतु इस बात को स्मरण रखना चाहिए कि किसो समय में मनुष्य की बुद्धि जिस ज्ञान को सत्य मानती थी, काल और उन्नति पाकर वही ज्ञान असत्य प्रमाणित हुआ। बुद्धि का ज्ञान पेचीदा रास्ते से प्राप्त होता है। इसके विपरीत अंतःकरण अथवा प्रतिभा द्वारा प्राप्त झान. सीवा, स्पष्ट और अनुवहित प्राप्त होता है। जैसे हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि इस समय दिन है या रात । वैसे ही प्रतिमा द्वारा हमारी प्रतिमा जहाँ तक पहुंचती है, वहाँ तक के ज्ञान को हम स्पष्ट देखते हैं। प्रतिभा द्वारा प्राप्त ज्ञान में कोई आशंका ही नहीं रहती। पर खेद इतना ही है कि सबकी प्रतिभा बहुता विकसतो नहीं, क्योकि हम अपनी बुद्धि के नीचे. प्रतिभा को दबा देते हैं। उसे विकसने के लिये पूरा आंतरिक, और बाह्य विधान नहीं जुटाते । जिन लोगो ने जिस-जिस क्षेत्र में अपनी प्रतिमा के विकan मानस का विकास ४६ सने के लिये प्रांतरिक या बाह्य विधान जुटा दिए हैं, उनकी प्रतिभा उस उस क्षेत्र में खूब ही विकसी है । तब इसी प्रतिमा को दिव्य दृष्टि और दिव्य ज्ञान कहने लगते है। यह प्रतिमा, दिव्य दृष्टि अथवा दिव्य ज्ञान सब काल और सब देशों में कहीं विकसा पाया जाता है, कहीं योगाभ्यास से विकसाया गया है, और कहीं आप-से-आप खुला हुआ प्रतीत हुआ है। मिस्र देश के पुराने निवासियों में, फारस के मेजाई लोगों में, चेल्डियन लोगो मे, पुराने रोमन कैथोलिक लोगो मे, योरप के मिन्न-भिन्न देशो और अमेरिका आदि देशो मे इस गूढ ज्ञान का उल्लेख मिलता और आजकल भी यह ज्ञान पाया जाता है। विना कॉलेज को शिक्षा पाए शेक्सपियर ने कैसे इतनी और ऐसी ज्ञान की बातें कहीं कि बड़े-बड़े विद्वानों की बुद्धि समझने मे चकर खाने लगती है। कवियो में इस प्रतिमा का उदय हुआ है । विना बुद्धि का बहुत विकास किए हुए मनुष्यो मे इस प्रतिमा का ऐसा उदय हुआ है कि अपेक्षतः कम पढ़े-लिखे मनुष्यों ने वाष्प, विद्युत और अन्य संबंधो में बड़े-बड़े आविष्कार कर दिए हैं। भारत में इस प्रतिभा, इस दिव्य दृष्टि के जगाने और विकसाने के लिये तो योगदर्शन और योग-साधन खूब ही विस्तार पाए थे। अब साधारण दृष्टि से हम जीवन को जैसा पाते हैं, उसके अंगो को एक-एक करके देख चुके। हम देख चुके कि देहाणुओं से निर्मित यह शरीर बना हुआ खड़ा है। हम देख चुके जीवन-मरण-रहस्य कि प्रवृत्ति-मानस द्वारा प्रेरित होकर इस शरीर की सब क्रियाएँ हो रही हैं। हम देख चुके कि प्रवृत्ति-मानस में कैसे वेदनों से बुद्धि का ज्ञान अर्जित हुआ है। हम यह भी देख चुके कि इसी मानस में कर्तव्याकर्तव्य का विवेक करनेवाला अंत:- करण भी छिपा पड़ा है, जो धीमो वाणी से कुछ अकाट्य सत्य द्योतन कर रहा है। हम यह भी देख आए हैं, किसी-किसी मनुष्य में प्रतिभा मलककर ऐसी-ऐसी सत्य बातें दिखा देती है कि बुद्धि अपनी पेचीदा क्रियाएँ करते-करते बहुत दिनों मे उस सत्य को ग्रहण कर सकती है। सत्य तो यह है कि मनुष्य-जाति में पहलेपहल प्रतिभा ही द्वारा ज्ञान की. मलक आती है, फिर फिलासनी और विज्ञान द्वारा उसकी.. पुष्टि होती है। ये ही सब बातें मिलकर जीवन है। साधारण बुद्धि और वैज्ञानिक बुद्धि दोनो मिलकर जीवन को जैसा देखती हैं, उसी के अनुसार उसका ढांचा खड़ा कर दिया गया है। अगले अध्याय में 'प्रतिमा की विश्वसनीयता और उसके द्वारा देखे हुए जीवन पर विचार किया जायगा।
देखा हुआ है छठा अध्याय प्रतिभा की विश्वसनीयता और उसके द्वारा जीवन प्रतिभा के विकास द्वारा जीवन-संबंधी जो बातें स्पष्ट रूप से जानी गई है, वे अत्यंत विश्वसनीय हैं। बुद्धि द्वारा जानी हुई बातें उतनी विश्वसनीय नहीं हो सकतीं, जितनी प्रतिभा द्वारा जानी हुई होती हैं, क्योकि बुद्धि मे, जैसा हम लोग ऊपर देख आए है, अनेक गलतिया हो सकती । इसी कारण बहुत दिनो से यह कहावत चली आती है कि 'तकोऽप्रतिष्ठः' अर्थात् तर्क का कोई ठिकाना नहीं। यह तो निश्चय है कि बुद्धि केवल गोचर ही बातों तक पहुंचेगी, क्योंकि इसके आधार ही वेदन हैं। क्या संसार की अवधि उतनी ही है, जहाँ तक हमे गोचर है ? केंचुए को केवल एक ही स्पर्श की इंद्रिय होती है, इसलिये वह स्पर्श से भिन्न और कुछ नहीं जान सकता । तो क्या स्पर्श के अतिरिक्त संसार मे और कुछ नहीं है । वैसे ही मनुष्य की पाँच इंद्रियाँ जहॉ न जायें, वहाँ क्या उस वस्तु का अस्तित्व ही नहीं सव मनुष्य की जहाँ आप ही बुद्धि नहीं पहुँचती, वहाँ जानकार लोगों से सहायता लेते हैं। सारा संसार डॉकर, वैद्य नहीं है, पर रोगों
जोवन-मरण-रहस्य
की दशा में जहाँ उसकी बुद्धि नहीं पहुंचती, वहाँ डॉक्टरों
से पूछता है, और उसकी बात सच मानता है। सारा
संसार ज्योतिषी नहीं है, पर खगोल क विषय मे जहाँ
उसकी बुद्धि नहीं पहुँचती, वहाँ ज्योतिपियों की कही हुई
(पंचांगों की) बातें सत्य मानता है। वैसे ही जीवन
के संबंध में साधारण मनुष्यों की जहाँ बुद्धि न पहुँचे,
वहाँ जीवन के जानकार प्रतिभावालों का विश्वास करना.
चाहिए। यदि यह कहा जाय कि डॉक्टर और ज्योतिषी
अपने विज्ञान के बल से कहते हैं। उस विज्ञान तक हम भी
चाहे, तो पहुंच सकते हैं। तो योगी लोग भी कहते हैं
कि प्रतिमा को जो चाहे, सो विकसा सकता है। उद्योग और
साधन चाहिए । परंतु संसार का कैसा दुराग्रह है कि विज्ञानी
की बातों का तो विश्वास करे, पर प्रतिभावालों को बातों
का इसलिये विश्वास न करे कि वह प्रमाण नहीं देता
है। प्रमाण कैसे दे ? दस आदमी ऐसे हैं, जिन्होंने गुड़ नहीं
खाया, एक मनुष्य ने गुड़ खाया है। जिसने गुड़ खाया ह,
वह कहता है कि गुड़ मीठा होना है। शेष दस आदमी
जिन्होंने गुड़ नहीं खाया है, वे कहें कि क्या प्रामण है कि गुड़
मीठा होता है ? तो गुड़ खानेगला क्या प्रमाण दे सकता है
केवल इतना ही कह सकता है कि खाकर देख लो। वैसे ही
प्रतिभावाले भी कहते हैं कि प्रतिभा जग्गकर देख लो। यह
अंतःकरण या प्रतिमा सबमें है । जिसको जग उठी है, वह
प्रतिभाको विश्वसनीयता और उसके द्वारा देखा हुआ जीवन ५३
बातों को स्पष्ट जान जाता है। जिसका अंतःकरण जगा नहीं
है, वह अंतःकरण द्वारा प्रेरित विषयो और बातों को धुंधले
रूप में देखता है। अब देखना चाहिए, इस जीव के विषय
मे सारे देश का अंतःकरण क्या कहता है ?
जो लोग हठ करक अपने अंत:करण का गला घोंटकर
उसके ऊपर अपनी अप्रतिष्ठ बुद्धि स्थापित करते हैं, उन्हें
छोडकर शेष सारे संसार का अंतःकरण यह कहता है-
(.) जीव के ऊपर एक बड़ी शकि है । असभ्य-से.
असभ्य /मनुष्य मे लेकर सभ्याति सभ्य तक उस शक्ति को
मानते, उससे डरते, और उसे पूजते है । उस शक्ति के अस्तित्व
को तो अंत:करण बतला देता है, पर उसके रूप-गुण को
सवका अंत:करण नहीं बतलावा। अब भिन्न-भिन्न मनुष्यों
को भिन्न-भिन्न बुद्धि अपना समझ के अनुसार रूप-गुण
बतलान लगती ह । काई उसको ईश्वर रूप में मानता है, कोई
भूत, प्रतादि रूप में।
(२) सत्य व्यवहार करना चाहिए; सबको आत्मवत्
समझना चाहिए । जहाँ मनुष्य अंत:करण के इस श्रादश
से विचलता है, वहॉ अंत:करण को कॉटा-सा चुभ जाता है।
(२) जीव मरन पर भी कायम रहता है। इसके उपलक्ष
में सारा संसार मरे हुए मनुष्य क जीव के लिये कोई श्राद्ध
करता है, कोई चढ़ावा चढ़ाता है, और कोई प्रार्थना और
दुधा करता है
जीवन-मरण-रहस्य (४) जीव अपने किए हुए कमों का उत्तरदाता है, इस- लिये सारा संसार मरने पर भी जीव के लिये अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार स्वर्ग-नरक अथवा सुख-दुःख को कल्पना करता है। (५)जीव की त्रुटियाँ कमो-न-कभी पूरी होंगी, इसलिये सारे संसार की आशा बँधी रहती है। इस जीवन में आशाओं के निष्फल होने पर भी आगे के लिये आशा रहती है। और, आगे के लिये सारा मानव-संसार यल करता है। इत्यादि बातें अंतःकरण से धुधले रूप में उत्पन्न हुआ करती हैं। ये बाते प्रायः मनुष्य-मात्र के अंतःकरण से प्रकट होती है, परंतु जिन लोगों का अंतःकरण विना बाधा के विकसकर प्रतिभा रूप में होकर जीवन के विषय में स्पष्ट रूप से अनुभव करता है, वे जीवन के विषय में स्पष्ट बातें कहते हैं। ऐसे लोग योगी हैं। चाहे वे अपने को योगी मानते, जानते और कहते हों, चाहे नहीं। उन्हीं का कथन है कि जीव का मूल तत्व आत्मा है । वह आत्मा सात भूमिकाओं में थोड़े बहुत अंशों में प्रकट है और अपना स्फुरण या धोतन कर रहा है। निम्न-लिखित सात भूमिकाएँ हैं, जिनमें सर्वोच्च तो आत्मा की भूमिका है। शेष छ भूमिकाएँ आत्मा के ऊपर आवरण हैं । इन आवरणों में सबसे बाहर और स्थूल यह स्थूल शरीर है। इससे सूक्ष्म लिंग-शरीर या आकाश-शरीर है। इससे सूक्ष्म प्राण का प्रतिभा की विश्वसनीयता और उसके द्वारा देखा हुआ जीवन ५५ आवरण है। उसके भीतर प्रवृत्ति-मानस है। तब बुद्धि है। फिर आत्म-मानस है, और सबके भीतर आत्मा है। इनका क्रम यों है- ७-आत्मा ६-आत्म-मानस ५-बुद्धि ४-प्रवृत्ति मानस ३-प्राण या जीवन-शक्ति २-लिंग या आकाश-शरीर १- स्थूल शरीर अब नीचे ही से इनका क्रमशः वर्णन किया जाता है, जैसा योगियो ने इनके विषय मे अपनी प्रतिमा, से प्राप्त किया हुआ अनुभव कहा है- (१) स्थूल शरीर इस स्थूल शरीर के विषय में योगियो का भी वही कथन है, जो वैज्ञानिको का है। अंतर केवल इतना ही है कि साधा- रण लोग यह जानते और मानते हैं कि स्थूल शरीर जैसा है, वैसा है, इसमे बहुत अधिक उन्नति नहीं हो सकती, किंतु योगी लोग कहते हैं कि प्रकृति के नियमो का अनुसरण करके, प्राकृतिक नियमों के अनुसार अभ्यास करके मनुष्य इसकी आश्चर्य-जनक उन्नति कर सकता है, इसे उच्चसे-उच्च पूर्णता तक पहुंचा सकता है, और इस शरीर से आश्चर्य- .
जीवन-मरण-रहस्य
जनक लाभ उठा सकता है। शरीर को मन के अधीन रखना
चाहिए, तभी यह उत्तम काम दे सकता है। उलटा इसके जब
शरीर ही मन पर अधिकार रखने लगेगा, तो काम बिगड़
जायगा । इस शरीर से एक प्रकार का भास निकला करता
है, जिसे योगी देख सकते हैं। यह भास शरीर से दो फीट
बाहर के गिर्द अंडाकार वृत्त में रहता है। इस भास के कण
हवा और आकाश मे छुटकर रहते जाते हैं, जिन्हे देखकर
कुते शिकार का पीछा करते हैं । स्वस्थ मनुष्य का भास
सीधा धारीदार होता है, और अस्वस्थ का जानवरो के
ऊन के समान टेढ़ा-मेढ़ा । इस भास में कोई रंग नहीं
होता।
(२)लिंग या आकाश-शरीर
स्थूल शरीर स सूक्ष्म, लिंग या आकाश-शरीर का क्रम
आता है। इसके विषय मे सर्वसाधारण का ज्ञान बहुत ही
कम है । यह स्थूल शरीर से बहुत ही धना संबंध रखता
और उसी का सार है। इस शरीर को कुछ लोग सब काल
में जानते आए है। इसके स्वभाव को अच्छी तरह न जानकर
लोगों ने इस पर बड़ा-बडा भ्रम किया है। इसको लोगों ने
आकाश-पुरुष, छाया पुरुष, भूत, प्रेत और क्या-क्या नहीं
कहा है। यह स्थूल शरीर क ही तत्वों से, उन्हीं के सार
से बना है। जैसे पानी से बर्फ और भाप आदि कई
दशाएँ होती हैं, वैसे ही स्थूल शरीर के तत्वों को भी कई
मे
प्रतिभा की विश्वसनीयता और उसके द्वारा देखाहुआजीवन ५७
दशाएँ होती हैं। पानी की अश्य दशा भाप है। वैसे ही
स्थूल शरीर की अश्य दशा लिग-शरीर है। यह लिंग-शरीर
ठीक-ठीक स्थूल शरीर के अनुरूप होता है, और कुछ दशाओ
स्थूल शरीर से पृथक् भी हो सकता है। जान-बूझकर इसे
स्थूल शरीर से पृथक करना कुछ कष्टसाध्य है। परंतु जिन
लोगो ने कुछ साधना की है, वे इसे पृथक् करके दूर की यात्रा
मे भो भेज सकते हैं। दिव्य दृष्टिवाले को यह लिंग-शरीर
ठीक-ठीक स्थूल शरीर के अनुरूप पतले धागे से जुटा
दिखाई देता है। कभी-कभी किसी दशा-विशेष मे मित्रों का
लिग-शरीर मित्रो को दिखाई देता है। यह शरीर जीव का
वैसा ही आवरण है, जैसा स्थूल शरीर । स्वप्न-दशा में
जब यह लिंग-शरीर को छोड़कर बाहर निकल जाता है, तो
मनोरंजक घटनाओ का अनुभव करता है। इस शरीर से
भाप के रंग-रूप का भास निकला करता है। यह भास भी शरीर
के इर्द-गिर्द तीन फोट बाहर घेरा दिए अंडाकार होता है।
जिन लोगो ने भूत-प्रेत देखा होगा, उन्होने इस भास को भी
उसके गिर्द देखा होगा।
(३)प्राण वा जीवन-शक्ति
प्राण यद्यपि सर्वव्यापक शक्ति है, पर यहाँ हम इसे केवल
जीवन-शक्ति के रूप में देखते है । यह जीवन-शक्ति जीवन
प्रत्यक रूप-वनस्पति से लेकर मनुष्य तक में पाई जाती
है। प्राण सभी जीवों मे रहता है। योगी लोग कहते है,
Pround जीवन-मरण-रहस्य जीवन सभी पदार्थों में है। प्रत्येक परमाणु जोवित है। जड़ पदार्थ और जड़ परमाणु इसलिये निर्जीव जान पड़ते हैं कि उनमें जीवन का विकास बहुत ही कम हुआ है। इसलिये प्राण सव पदार्थों में और सर्वत्र है। योगियों का कहना है, यह प्राण प्राणायाम द्वारा शरीर में अधिक परिमाण मे.एकत्र और संचित किया जा सकता है। इसे शरीर के अंग- प्रत्यंगों में भेजकर शरीर को अधिक शक्तिमान, पुष्ट और विकसित कर सकते हैं। इसके द्वारा अपनो और अन्यो की पीड़ाएँ. अपहरण की जा सकती है,। यह प्राण साधारण मनुष्यों को दृष्टि से तो अदृश्य रहता है, पर अधिक साधना- बालों को दिखाई देता है। इसका भास शरीर से बाहर दो- तीन फोट के घेरे मे, शरीर के चारो ओर, विद्युत् की चिन- गारियो के रूप मे, बादल के रूप का दिखाई देता है। प्राण का रंग फीका गुलाबी होता है । यह केवल योगियों को ही दिखाई देता है। कभी-कभी साधारण मनुष्यों को भी गर्म चूल्हे. से कंपायमान गर्मी की निकलती हुई धार के सदृश दिखाई देता है। उपयुक्त तीनो आवरण अर्थात् स्थूल शरीर, लिग-शरीर और प्राण-शरीर द्रव्यों के बने है, और जीव इनके अंशो को तथा इन्हें उसी प्रकार वदला करता है, जैसे मनुष्य अपने कपड़ों को। अब जो नीचे चार तत्त्व दिए जाते हैं, वे मनुष्य के सोचने-
प्रतिभा की विश्वसनीयता और उसके द्वारा देखा हुआजीवन ५६
विचारनेवाले अंग हैं- चैतन्य अंग हैं। इनमें से जो नीचतम
प्रवृत्ति मानस है, वह भो उच्चतर अंग हो जाता है।
पहली दृष्टि में तो जान पड़ता है कि मनुष्य का चैतन्य
मन ही मनुष्य का अधिकतम कार्य करता है। परंतु थोड़ा ही
ध्यान देने से जान पड़ेगा कि मन को चैतन्य क्रियाएँ केवल
थोड़ी ही होती है। अधिकांश काम तो अचेतन मानस द्वारा
हुआ करता है।
(४)प्रवृत्ति-भानस
इस प्रवृत्ति-मानस का पहला उदय खनिज पदार्थों में और
विशेप करके कलमवालो (Crystals) में पाया जाता है।
वनस्पति मे यह और भी स्पष्ट तथा उच्चतर विक्रस उठता
है। किसी-किसी उच्च वनस्पति मे तो चेतना के घुधले चिह्न
भी पाए जाते हैं। नीच जंतुनो में प्रवृत्ति-मानस की और
भी अधिक मात्रा प्रकट हो जाती है। सबसे अधिक इसका
परिमाण मनुष्य-जीवन में पाया जाता है। मनुष्य मे यही
मानस विकसकर बुद्धि को दशा तक पहुँचता है, और कभी-
कभी बुद्धि को दबाकर अपने वश में कर लेता तथा कभी-
कभी बुद्धि इसे दबाकर आप शासन कर बैठती है।
पर स्मरण रखना चाहिए कि जीव की उच्चतम भूमिका में
भी यह प्रवृति-मानस कमी स्वामी और कभी दास बनकर
क्रमशः क्षीण होता पहुंचता है। प्रारंभिक दशा में प्रवृत्ति-
मानस बहुत ही लाभदायक होता है। शरीर की परवरिश
६०
जीवन-मरण-रहस्य
की सव क्रियाएँ इसी की प्रेरणा से, अज्ञातरूप में, हुआ करती
है। मनुष्य यदि इसे अच्छी तरह समझ जाय. तो इसे अच्छा
सेवक बना सकता है। परंतु यदि मनुष्य इसे अपना स्वामी
बनाए रक्खे, तो फिर उसका उन्नति करना असाध्य हो
जाय । यहाँ पर यह समझ लेना चाहिए कि मनुष्य अभी
विकास ही कर रहा है। अभी तक इसका पूरा विकास नहीं
हुआ है। अव तक जो इसका विकास हुआ है, वह बड़े
परिश्रम की यात्रा से हुआ है। पर तो भी विकास का अभी
प्रारंभ ही है। शरीर के पोषण की क्रियाएँ, . मरम्मत,
परिवर्तन, पाचन, रस-ग्रहण, मल-निर्वासन आदि क्रिया यही
करता है, जिसकी खबर चैतन्य-मानस तक को नहीं होती।
यही सब देहाणुओ
को प्रेरणा
और सबके कामो
का निरीक्षण करता है। यही प्रवृत्ति-मानस पशु-पक्षियों से
उनकी मॉदें और घोसले बनवाता है, जाड़ा आनेवाला होता
है, तो उनसे देश-त्याग कराता है। मनुष्य पहले चैतन्य मानस
द्वारा नया कार्य सोखता है, फिर अभ्यास करके, उस
कार्य को आदत का रूप देकर इसी प्रवृत्ति-मानस के सिपुर्द
कर देता है। फिर तो प्रवृत्ति-मानस उस कार्य को ऐसे करने
लगता है कि चैतन्य-मानस को केवल कभी-कभी निगरानी
ही करनी रह जाती है। आदतें पड़-पड़कर इसी प्रवृत्ति-मानस
मे लीन हो जाया करती हैं। पिछली सीखी और अनुभव
की हुई बातों का बीज इसी प्रवृत्ति-मानस मे रहता है।
,
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प्रतिभाकी विश्वसनीयता और उसके द्वारा देखा हुआजीवन ६१ बाहर से आई हुई भावनाओं का सार भी इसी मानस मे, अज्ञातरूप से, जमा होता जाता है। यही मानस नीच आतुर- ताओ, वृत्तियो, कामनाओ, प्रवृत्तियों और भावनाओं आदि का आधार-स्थल है। भूख, ज्यास, काम, क्रोध, ईर्षा, द्वेष, प्रतिशोध, वासनाएँ आदि इसी मे घर बनाए हैं। अभिमान, मत्सर आदि सब इसी भूमिका की वस्तुएँ हैं। इसमे पाशविक वृत्तियाँ भी हैं, जिन्हे योगी लोग अपने वश मे करके लाभ उठाते हैं, और उनके वश मे होकर अपना अधः पतन नहीं करते। मानस मे जब बुद्धि का विकास होता है, तो इसकी उच्च श्रेणी में उन्नति होती है। अब सच्ची मनुष्यता का आना प्रारंभ होता है। इसके पहले पशुता ही थी। बुद्धि के विकास के साथ-साथ मनुष्य अब अपने को भी कुछ-कुछ जानने लगता है। अपने आपके ज्ञान का उदय होना ही बुद्धि के उदय का चिह्न है। पशुओ को वेदन तो होता है; भूख, प्यास, कामेच्छा प्रकट होती है। इनकी चेतना सीधी रहती है, केवल सूचनाएँ ही मिला करती हैं। चेतना का मुख बाहर की ओर होता है। पशु या अविकसित मनुष्य अपनी आशाओ, आशं- काओं, उत्साहों, उद्देशो, विचारो का चिंतन और इनकी तुलना अन्यों की प्राशाओ आदि से नहीं कर सकते। वे अपनी दृष्टि को अपने ही भीतर घुमाकर सूक्ष्म बातो पर विचार नहीं कर सकते । परंतु जव मनुष्य में प्रापे की चेतना उदय होने
६२
जीवन-मरण-रहस्य
लगती है, तब वह 'हम' को समझने लगता है। वह अन्यो से
अपनी तुलना और तर्क करने लगता है। अपनी चेतना
क्या है, इसका स्वयं समनना तो सरल है, पर सममाना
बड़ा कठिन । विना अपनी चेतनावाला मनुष्य जानता
तो है, परंतु अपनी चेतना की सहायता से ही वह जान
सकता है कि "मैं जानता हूँ"। योगी लोग कहते हैं, जब
'अहम्' की चेतना उदय को प्राप्त होती है, तभी से जीव
का सच्चा जाग्रत् जीवन प्रारंभ होता है। यह जागृति मानस
मे प्रवेश है। इससे ऊँची एक और भी जागृति होती है, जिसे
आत्मा में प्रवेश कहते हैं, पर वह बहुत ही ऊँची है । इस
ऊँची जागृति का वर्णन आगे होगा। इस 'अहम्' के उदय
होते समय ही बच्चे की बुद्धि जगती है। इसके पहले वच्चा
जीता और जानता तो था, पर यह नहीं जानता था कि "मैं
जानता है".। इसी अहम् की जागृति के साथ-साथ पुरुषार्थ,
दुःख और जन्म का समय आता है। जवाबदही के बोझे
सिर पर पड़ जाते हैं। बुद्धि के उदय के साथ विकास तो
होता है, पर यही बुद्धि यदि प्रवृत्ति-मानस की पाशविक
वृत्तियो की दास बन गई, तो वह बुद्धि उन पाशविक वृत्तियो
की शक्ति को और भी बहुत अधिक बढ़ा देती है। मनुष्य
यदि चाहे, तो वह पशु से भी अधिक नीचता को पहुंच सकता
है। वह इतनी नीचता को पहुँच जाय कि जिसका पशु
को खयाल भी न हो । योगी लोग जानते हैं कि बुद्धि
प्रतिमा की विश्वसनीयता और उसके द्वारा देखा हुआजीवन ३
द्वारा पाशविक वृत्तियो को सहायता पहुंचाने का बड़ा ही भयं-
कर परिणाम होता है। जीव इतना नीचे गिर जाता है कि
फिर अपर आना बड़ा ही दुःसाध्य हो जाता है।
मानसिक भूमिकाओ का वर्णन यहाँ तक समाप्त हुआ।
इन भूमिकामो का कुछ-कुछ ज्ञान साधारण मनुष्यों को और
कुछ अधिक ज्ञान मनोवैज्ञानिको को होता है। परंतु आगे
जिन आत्मिक भूमिकाओ के वर्णन की चेष्टा की जाती है,
वहाँ तक हम लोगो की पहुंच ही नहीं हो सकती, जब तक
आत्मा का विकास न हो। उन भूमिकाओं का वर्णन करना
जन्म के अंवे के सामने प्रकाश का वर्णन करना है। तो भी
इस वर्णन मे कुछ-न-कुछ संस्कार हो जायगा, कुछ भावना
हो ही जायगी । इन गूद बातो के जानने की ओर झुकाव
और अधिक प्रकाश की चाहना होना ही इस बात
का द्योतक है कि आस्मिक मानस हमारी चेतना में पाया
चाहता है । यद्यपि संभव है, उसके आने में अधिक काल
लगे, पर तो भी उसका प्रभाव और उसकी सहायता पहुँच
गई है। केवल इतना ही जानना इस समय अलम् होगा कि
आत्मा है। इतने ही ज्ञान से आत्मिक मानस के विषय मे यह
समझने का सहारा मिलेगा कि इसी आस्मिक मानस द्वारा
आत्मा बुद्धि मे प्रकाश डालता है।
(६) आत्मिक मानस
इस आत्मिक मानस को कुछ लोग बुद्धि के ऊपर का
- ६४ जीवन-मरण-रहस्य मानस कहते हैं। यद्यपि इस आस्मिक मानस का अस्तित्व बहुत थोड़े ही मनुष्यो पर हुआ है, पर वो भी ऐसे बहुत-से मनुष्य हैं, जो इस बात से चैतन्य हो रहे हैं कि भीतर कोई ऐसी उच्च वस्तु है, जो उन्हें उच्च या श्रेष्ठ विचारो, अमि- लाषाओं, उत्साहों और कीर्तियों की ओर ले जा रही है। ऐसे मनुष्यों की संख्या तो बहुत अधिक है, जिन्हें आत्मा के धुंधले प्रकाश की धुंधली किरणें प्राप्त हो रही है, और उनके अज्ञात ही मे उन पर प्रभाव डाल रही हैं । मनुष्य के मन मे जितनी भली, श्रेष्ठ और बड़ी बातें आती हैं, वे इसी आत्मिक मन के प्रकाश है। जिन बातो की श्रेष्ठता का सच्ची ईश्वर-भक्ति, दया, मनुष्यत्व, न्याय, निस्वार्थ प्रेम, क्षमा, सहानुभूति आदि से संबंध है, वे सब इसो आत्मिक मानस के प्रभाव से है । इसी पथ से ईश्वरभक्ति और मानव-सहानुभूति उसे प्राप्त हुई है। ज्यो-ज्यों यह मानस अधिक-अधिक विकसता है, त्यों-त्यों वह परमेश्वर के नित्य अस्तित्व का अधिक-अधिक अनुभव करता है, और साथ- ही-साथ मनुष्यों मे परस्पर अधिक घनिष्ठ संबंध पाता है। ये बातें प्रवृत्ति-मानस और बुद्धि से नहीं प्राप्त होती । आत्मिक मन बुद्धि का विरोध नहीं करता, किंतु बुद्धि से बहुत ऊँचे जाता है, जहाँ बुद्धि नहीं पहुँच सकती । बुद्धि नीरस होती है, और आत्मिक मन उच्च भावनाओं के कारस सरस होता है। मनुष्य बुद्धि द्वारा ईश्वर को नहीं देखताः LE , प्रतिमा की विश्वसनीयता और उसके द्वारा देखा हुआ जीवन ६५ वह आत्मिक मन द्वारा ईश्वर के अस्तित्व का. पता पाता. और बुद्धि उस पते के ऊपर अपना प्रमाण और तर्क जोड़ती है। ज्यों-ज्यो मनुष्य मे आत्मिक मन का विकास होता है, त्यो त्यो उसकी सहानुभूति अन्य मनुष्यों के प्रति बढ़ती जाती है। दूसरों का दुःख देखकर उसे पीड़ा पहुंचती हैं, तब वह उसके निवारण मे यत्रवान होता है। साधारण मनुष्य की अहम् चेतना की द्योतक बुद्धि है। इस 'अहम्' के नीचे तो प्रवृत्ति-मानस है, जो 'अहम्'..तक अपनी पुरानी वासनाओ, आदतो और नीच तथा पाशविक वृत्तियो को भेजता रहता है । इस 'अहम्' के ऊपर आत्मिक मन है, जो बुद्धि में अपनी श्रेष्ठ ज्योति हालता रहता है, और 'अहम्' की चेतना को अपनी ओर ऊपर खींचता है, जिससे मनुष्य का विकास हो, और नीच पाशविक वृत्तियो का दमन । इसी आत्मिक मन से वह प्रतिभा प्राप्त होती है, जिसका उच्च कवि, लेखक, उपदेशक और वक्ता आदि द्योतन करते हैं । इस आत्मिक मन के कुछ उच्च आध्यात्मिक शक्तियाँ भी प्राप्त होती हैं, परंतु ये शक्तियाँ तब तक नही विकसती, जब तक मनुष्य का अप- स्वार्थ नहीं छूट जाता। ज्यो-ज्यो आत्मिक मन का विकास होता है, त्यो त्यो प्रात्मा के ऊपर विश्वास होता जाता है। और, ज्यो-ज्यो यह विश्वास बढ़ता है, त्यों-त्यो प्रकाश के और भी अधिक मोके आते है। द्वारा
जीवन-मरण रहस्य
(७) प्रात्मा
अब इसका वर्णन कैसे किया जाय, जिसे उन्नत-से-उन्नत,
मनुष्य भी बहुत ही धुंधला समझ सकते हैं। परिमित जीव
अनंत को कैसे समझ और वर्णन कर सके। यह वही पदार्थ
है, जिसके कारण मनुष्य का विकास होता है। जब मनुष्य
आत्मा का अनुभव करने लगेगा, तो वह इतना उच्च हो
जायगा कि उसको कल्पना करना भी कठिन है। मनुष्य को इस
पदवी से चढ़ते-बढ़ते देवता और महादेवता की पदवी तक पहुँ-
चना होगा, तब कहीं वह आत्मा का पूराअनुभव कर सकेगा
यह बात कभी-कभी होती है कि उसकी ओर से कुछ झलक श्रा
जाय। ऐसे क्षणों में अज्ञात महत् के साक्षात् से एक अद्भुत भाव
हो जाता है। ऐसे क्षण धार्मिक विचार, किसी उच्च कविता
के पाठ, किसी निराशाजनक भारी विपत्ति के समय में भी
कभी-कभी आ जाते हैं। जिनको ऐसे क्षण प्राप्त हो जाते हैं,
उनका ईश्वर के नित्यत्व में अटल विश्वास हो जाता है। सारा
विश्व अपना ही प्रतीत होता है। भले-बुरे सब अपने ही
अंग प्रतीत होने लगते हैं। पूर्ण ज्ञान हो जाता है। अपने
विषय में निश्चय हो जाता है कि हम सर्वदासे हैं, और सर्वत्र
रहेगे। अमरत्व का अनुभव होता है। मन के कोर-कोर से
मय पृथक् होकर झड़ पड़ता है, और निश्चय, श्रद्धा और
विश्वास भर जाते हैं। सारे विश्व के प्रति प्रेम प्रवाहित हो
जाता है। यह झलक जव आकर चली जाती है, तब वह
प्रतिभा की विश्वसनीयता और उसकेद्वारा देखा हुआ जीवन ६७
मनुष्य विलकुल बदल जाता है । आनंद का भाव भर जाता
है। ऐसी मलको का पता पुराने आध्यात्मिको के लेखो, सब
जातियो के उच्च कवियो की कविताओ, सव मजहबो के
परांवरो के उपदेशो से चलता है।
इन कथनो पर बहुतों को संदेह होगा, पर हम कहते है,
आपकी सामर्थ्य क भीतर वे साधन है, जिनके द्वारा आप
अपने जोव का विकास करके इन बातो का अनुभव कर
सकते है ।
स्थूल शरीर, लिग-शरीर और प्राण के भासो को तो हम
उनके वर्णन के साथ देते आए हैं। पर मानसिक और आध्या-
स्मिक भूमिकाओ के भासो अर्थात् निःसृत तेजा को हम यहाँ
एकत्र ही सब वृत्तियो के साथ देते हैं। इनसे विदित होगा
कि कैसे मानस के भास या निःसृत तेज मे कौन-सा रंग होता
है । इन भासो को साधारण दृष्टि नही देख सकती। इन्हे
देखने के लिये विकसित दृष्टि चाहिए।
काला-ईर्पा, द्रुप, प्रतिशोध-वृत्ति और एसी ही वृत्तियो
का द्योतन करता है।
भूरा, चमकोली किस्म का-स्वार्थपरता का द्योतक है।
भूरा, काले रंग का-रंज और शोक का द्योतक है।
हरा, मेली किस्म का-मत्सर का द्योतक है। यदि मत्सर
में अधिक क्रोध मिला होगा, तो हरी भूमिका पर लाल छोटे
दिखाई पड़ेगे।
६८
जीवन-मरण-रहस्य
हरा, स्लेट के रंग का-दगाबाजी का द्योतक है।
हरा, चमकीली किस्म का-क्षमा, चातुरी, मुरौन्वत और
परिमार्जित धोखेबाजी का द्योतक है।
लाल, काला मिश्रित-भोग और पाशविक वृत्तियों का
द्योतक है।
लाल, बिजली की चिनगारियों की भॉति-क्रोध का
द्योतक है।
हलका लाल (Crimson)-प्रेम का द्योतक है। उच्च प्रेम
गुलाबी रंग का होता है।
बादामी, लाली लिए-लोभ का घोतक है।
नारंगी, चमकीले रंग का-अभिमान का द्योतक है।
पीला, बुद्धि का द्योतक है।
नीला, गहरा-मजहबी विचारों अर्थात् भक्ति का
द्योतक है।
नीला-हलका, स्वच्छ और चमकोला-आत्मिकता का
द्योतक है।
स्वच्छ उज्ज्वल (अनिर्वचनीय और अगोचर)-आत्मा
का द्योतक है।
जीवन के विषय में प्रतिभाशाली योगियो का कथन भी
संक्षेप में समाप्त हो चुका । साधारण, वैज्ञानिक और योगियों
की दृष्टि से यही जीवन है।
सातवाँ अध्याय मरण ऊपर वर्णन किए हुए सब अंगो को सम्मिलित करक मनुष्य के पूरे जीवन पर जब हम दृष्टि डालते हैं, तो मनुष्य के जीवन को एक पेचीदा और अद्भुत जीवन पाते हैं। इसमे दो प्रधान अंग हैं-एक तो अपनी सब कारोगारयों को लिए हुए यह शरीर और दूसरे विशाल शक्तियो के बीज, संभाव- नाओ, विकासोन्मुख उच्च भावनाओ को लिए हुए अद्भुत मानस है। जीवन के इन दोनो अंगो मे भी मानसिक अंग प्रधान दिखाई देता है। देह इस मानसिक अंग के आधार के लिये केवल साधन-मात्र दिखाई देता है। मानस अपनी विशाल शक्तियो के बीज को धारण किए हुए और महान् उद्देशों को धुंधले रूप से अपनी दृष्टि के सम्मुख रखते हुए विकासोन्मुख होकर ऊर्ध्व गति की ओर पुरुषार्थ कर रहा है। अभी इसका पुरुषार्थ प्रारंभ हुआ है। अभी इसके उद्देश के अनुसार विकास करने का सारा कार्य शेष है। इसी समय मे मरण हो जाता है। मरणोन्मुख मनुष्य के शरीर की शक्तियाँ शनैः शनैः या शीघ्रता से क्षीण होने लगती हैं, दैहिक क्रिया निर्बल और धीमी होने लगती हैं, प्रफुल्ल रूप मे भी
जीवन-मरण-रहस्य
है
।अब उस मानसका
परिवर्तन आने लगता है, और बस सारी चेष्टा बंद हो जाती
है, तथा मनुष्य मरा हुआ कहा जाता
वह आधार छूटा। अब वह मानस उस शरीर मे होकर कोई
कार्य न करेगा, न अपने हित-मित्रों से इस शरीर द्वारा कुछ
कह-सुन या व्यवहार रख सकेगा। यह व्यवहार सर्वदा के
लिये बंद हुआ । इसी निराशा से घर-परिवारवाले एक
अनभ्यस्त घटना को पाकर व्याकुल हो रोने, पोटने और शोक
करने लगते हैं।
उस देह की यह दशा होती है कि ज्यों-ज्यों समय बीतता
जाता है, त्यों-त्यो देह का आकार कुरूप होता जाता है। शरीर
के भीतर की सभी क्रियाएँ, श्वसन. वेदन, प्रेरणा, रुधिर-संचा-
लन और पाचन आदि बंद हो गई है। कारखाने से इंजी-
नियर चला गया, कारखाना सूना पड़ा है। फिर वह शरीर
बोलने, कहने और सुननेवाला नहीं है। ऐसी दशा को प्राप्त हो
गया, जिस दशा का हमें इन इंद्रियो और बुद्धि द्वारा
कुछ भी ज्ञान नहीं। ज्ञात से अज्ञात में विलीन हो गया। अब
वह शरीर देह न रहकर साँप की छोड़ी हुई केंचुल के समान
निर्जीव हो गया । महान् और भयंकर परिवर्तन! इस जीवन
की कहानी खतम हो गई । काल पाकर यह शव भी बिगड़ने
लगता है। लोग इस शव को निरर्थक और इस विगड़ी
हुई दशा में जीवित लोगों के लिये हानिकारक समझकर
तथा इसकी बिगड़ती हुई दशा देखना अपने को असह्य
गरण
७१
समझकर इसे अन्यत्र कर देते है। कोई इसे जलाकर शीघ्र
पंचत्व मे मिला देता है, और कोई गाड़ या जल-प्रवाह करके
इसे आँख से ओट करता है। साधारण दृष्टि में यही मरण
है। हम लोग यद्यपि अपने विज्ञान द्वारा जानते है कि इस
संसार का कोई पदार्थ नाश नहीं होता; छोटा परमाणु भी
अभाव को प्राप्त नहीं होता; परंतु अपनी दृष्टि के सम्मुख
उस चिर अभ्यस्त रूप, उस चिर अभ्यस्त समागम, उन
चिर अभ्यस्त क्रियाओ को न देखकर यो ही उसका नाश
मान लेते हैं। इसी नाश के मान लेने से हमारे हृदयो पर
बड़ा धक और बड़ी चोट लगती है। इससे यह घटना और
भी भयंकर प्रतीत होने लगती है।
परंतु भय और शोक की लहरें जब हमारे चित्त में शांत
होने लगती है, और मन कुछ-कुछ स्थिर होने लगता है, तब
हम विचार करते है, तो हमे निश्चय जान पड़ता है कि शरीर
का नाश नहीं होता । शरीर के बनानेवाले देहाणु, यदि शव
जलाया नहीं गया है, तो उस केंद्रस्थ प्रवृत्ति-मानस के शासन
से छूट जाते हैं। इन्हे स्वराज्य मिल जाता है। उस शासन से
छूटने पर कुछ देहाणु तो पृथक्-पृथक् और छिन्न-भिन्न होने
लगते हैं, जिस दशा को हम शव का सड़ना कहते हैं। जिस
शक्ति ने इन दहाणुओ को शासन मे धारण किया था, वह
तो हट गई, इसलिये देहाणु अपना-अपना मार्ग पकड़ने
और नए संयोगों को कर लेने के लिये छुट्टी पा गए। कुछ
७२ जीवन-मरण रहस्य दहाणु तो कीड़े-मकोड़े और अन्य जंतुओ के शरीर मे जाकर उनके अंग बन जाते हैं। कुछ खाद के रूप मे पौधों की खूराक होकर उनका अंग बनते और अंत में जंतुओ के शरीर में फिर चरे और खाए जाने पर पहुंचते हैं, तथा कुछ पौधों ही के शरीर मे रह जाते है । कुछ पृथ्वी मे कुछ काल तक पड़े रहते है, परंतु परमाणु का जोवन अनंत और अनवरत परिवर्तन का है। इस प्रकार हम देखते हैं, तो शरीर के बनानेवाले पर-. माणुओं का नाश नहीं होता । ये छिन्न-भिन्न और परिवर्तित दशा मे हो जाते हैं। इनका केवल रूपांतर होता है । सृष्टि मे नाश है ही नहीं। परिवर्तन-ही-परिवर्तन है । पदार्थ सब बने हुए रहते हैं, पर रूप और दशा का परिवर्तन किया करते है। एक समय कुछ परमाणु परस्पर मिलकर एक संयोग बांधते है, फिर दूसरे समय मे उस संयोग को बिगाड़कर दूसरा संयोग बॉध लेते है। इस दृश्य जगत् का ऐसा ही नियम देखने में आता है। इनके नाश का होना न तो कयास मे आता, न विज्ञान से प्रमाणित होता और न साधारण दृष्टि से देखने में आता है। इसी परिवर्तन को हम मोटी बातचीत मे नाश मानकर कहते और सुनते है। वास्तव में यह नाश नही, परिवर्तन ही है। प्रतिभाशाली योगी लोग जिस लिग-शरीर या आकाश- शरीर का कथन करते हैं, उसके विषय मे भी वे ही लोग मरण ७३ कहते है कि मनुष्य की मृत्यु के कुछ समय पश्चात तक यह लिंग-शरीर बना रहता है, और किसी-किसी दशा में कुछ जीवित मनुष्यो की दृष्टि में आ जाता है और प्रेत कहा जाता है। इस लिग-शरीर को भी कुछ काल के उपरांत जीव छोड़ देता है । तब यह शरीर भी सूक्ष्म द्रव्यो से बने हुए शव का भौति निश्चेष्ट रह जाता है। इस शव-दशा मे न तो उसमें जीवन है, न चेतना । वह सूक्ष्म तत्त्वो का एक वादल का टुकड़ा मृत मनुष्य के अनुरूप पाया जाता है। यह फवल सूक्ष्म खोखला और केचुली है। खोखली केंचुल के अतिरिक्त और कुछ नही है । मरता हुआ मनुष्य कभी-कभी इस लिग- शरीर को अपने स्थूल शरीर से बाहर प्रेरित कर देता है। ऐसे समयों में यह उस मनुष्य के प्रिय मित्रो और संबंधिया द्वारा कभी-कभी देखा जाता है। ऐसी बहुत-सी घटनाएं लिखित चली आती है। बहुत-से मनुष्यो को ऐसी घटनाओं का अनुभव है। योगी लोग अपनी विकसित दृष्टि द्वारा देखते हैं कि जब किसी स्थूल शरीर के मरने का समय आता है, तब यह लिग- शरीर स्थूल शरीर से निकलता हुआ दिखई देता है। यह स्थूल देह से एक बहुत ही पतले धागे से जुटा रहता है, और उसी के ऊपर मंडराया करता है। ज्यो ही वह पतला धागा टूटा कि वह स्थूल शरीर मरा। लिंग-शरीर स्थूल पृथक होने पर भी कुछ काल तक जीवित रहता है, पर जैसे इसके से ७४ जीवन-मरण-रहस्य निकल जाने से स्थूल शरीर मर गया, वैसे ही इसमें से भी जीव कुछ काल पर निकल जाता है, और यह शरीर भी मर जाता है । जैसे स्थूल शरीर केंचुल की भाँति छोड़ दिया गया था, वैसे ही सूक्ष्म तत्त्वों से बना यह लिंग-शरीर भी जीव द्वारा त्यक्त हो जाता है। जैसे स्थूल शरीर का शव सड़-गलकर छिन्न- मिन्न हो गया, वैसे ही यह भी योगियों और विकसित दृष्टि- वालो द्वारा छिन्न-भिन्न होता देखा गया है। यही दशा प्राणमय कोष की भी होती है। जब स्थूल शरीर से जीव निकल जाता है, तब यह प्राण जीव के शासन मे न रहने के कारण व्यक्तिगत देहाणुओं और देहाणु-समूहों के शासन में रह जाता है। और, ज्यों-ज्यों स्थूल शरीर सड़ता, गलता और पंचस्स में मिलता जाता है, त्यो-स्यों प्रत्येक परमाणु नए संयोगों के बनाने-भर के प्राण लेता जाता है, और शेष प्राण भंडार में जा मिलता है, जहाँ से आया था। ये ही स्थूल और लिंग-शरीर तथा प्राणमय कोष हैं। ये ही तीनो अत्यंत भौतिक हैं, और जिन परमाणुओं से ये संघटित हुए हैं, वे यद्यपि अविनाशी हैं और सर्वदा अनगिनत रूप और दशा बदला करते हैं, तो भी ये जीव द्वारा परित्यक्त कर दिए जाते हैं, केंचुल की भाँति छोड़ दिए जाते हैं, या पुराने वन की तरह उतार दिए जाते है। , पाठवाँ अध्याय मृत्यु के पश्चात् मानस या जीव की दशा स्थूल कोशो की मृत्यु के पश्चात् जो दशा हुई, उसको हम लोगो ने विचार-दृष्टि से देख लिया। अब उस मानस को विचार-दृष्टि से देखना है, जो जीवित दशा में शरीर के देहाणुओं पर किसी उद्देश से ऐसी चैतन्य प्रेरणा करता था, जो बाह्य पदाथों से संघटित वेदनाओ का. अनुभव करता था, जो इन्ही वेदनाओं का अनुभव करता था, जो इन्हीं वेदनाओ से अपनी एक ज्ञान की दुनिया बना लेना था; जो समझ, भावना, अनुभावना, कल्पना, स्मरण आदि क्रियाएं करता था, जो प्रत्येक क्रियाओं में सुख-दुःख का अनुभव करता था, जो प्रत्येक कियाओ के साथ उचित और अनुचित का विवेक करता था; जो प्रत्येक कर्म के लिये अपने को उत्तरदायी समझता था, जिसमे अपूर्ण अभिला- पात्रो की पूर्ति की आशा भरी थी, जो अपने से ऊपरवाली महच्छक्ति से अपना घनिष्ठ संबंध जोड़ता था; जो अपने नाश की कल्पना को असंभव समझता; जो उस महच्छकि का अपने को नित्य-संबंधी समझता था। वह विकसती हुई अध- खिली कली क्या हुई १ क्या उसका नाश हो गया? क्या
७६
जीवन-मरण-रहस्य
छिन्न-भिन्न होते हुए शरीर के साथ वह भी छिन्न-भिन्न
हो गई?
किसी वस्तु का नाश होना तो हम लोगों के अंत:करण
में बैठता नहीं, अभिमानिनी बुद्धि भी वस्तुओं के नाश को
अस्वीकार करती है। हमारा विज्ञान भी कहता है कि नाश
किसी वस्तु का होता नहीं । तो उस मानस या जीव के
नाश की कल्पना कैसे की जाय ?
तब क्या वह छिन्न-भिन्न हो गया ? उसके परमाणु भी
क्या तितर-बितर हो गए, जैसे शरीर और लिंग-शरीर
तथा प्राण के परमाणु छितर-वितर हो गए ?
परमाणु तो उसी वस्तु या द्रव्य के छितरवितर और
छिन्न-भिन्न हुआ करते है, जो द्रव्य परमाणुओ से बने
रहते हैं। मानस और जीव तो परमाणुओ से बने नहीं है।
वे तो किसी अद्भुत पदार्थ, जिसे चेतना कहते हैं, उससे बने
है। चेतना का छेदन, भेदन, खंडन और छिन्न-भिन्न होना
संभव ही नहीं है, क्योकि यह परमाणुओं से नहीं बनी है।
छिन्न-भिन्न उसी द्रव्य के परमाणुओं का होना संभव है,
'जिसका अस्तित्व देश और काल के आधार पर हो । मानस
और जीव तथा चेतना और अस्तित्व, देश, काल के आधार
पर नहीं हैं, किंतु देश और काल का अस्तित्व अलबत्ता चेतना
और मानस के आधार पर संभावित है। इसलिये जीव का
'छितर-वितर होना भी नहीं कहा जा सकता।
मृत्यु के पश्चात् मानस या जीव की दशा
वैज्ञानिको का कथन हो सकता है कि जब वह जीव
अगोचर है, जब उसे हम अपने यंत्रों द्वारा ग्रहण-मान मे
नहीं ला सकते, तो अव उसका अभाव ही समझना चाहिए।
इस बात को वे वैज्ञानिक कह सकते हैं, जिन्होने अपने अंत:-
करण को उठाकर अपने वैज्ञानिक यंत्रों मे रख दिया है। वे
लोग, जो अपने अंतःकरण को उसके स्वाभाविक स्थान मानस
ही मे रक्खे हैं, कभी नहीं मान सकते कि अगोचर और
अयंत्रचर होने के कारण जीव का अभाव हो गया। जब
मनुष्य जीवित था, तब भी तो वैज्ञानिकों के यंत्र उसके मानस
या चेतनता अथवा जीव को अपने ग्रहण और मान मे नहीं
ला सके थे, तो भी वह था, और उसके अस्तित्व का पूरा
अनुभव था। जैसे उस समय उनके यंत्रो के ग्रहण और
मान मे न आ सकने पर भी उसका अस्तित्व था, वैसे ही
इंद्रियो और यंत्रो के ग्रहण और मान मे अव भी न आ
सकन पर उसका अस्तित्व हो सकता है, यदि किसी प्रकार
अनुभव मे आ सके
कहा जा सकता है कि शरीर को जीवित दशा का वह
स्फुरण था, शारीरिक जीवन-क्रियाओ की वह दशा-मात्र
थी। जीवित दशा और शारीरिक क्रियाओं के अभाव हो
जाने से उसका भी शरीर के साथ संबंध न रहने के कारण
अमाव हो गया। इस कथन को अंतःकरण स्वीकार नहीं
करता। वह मानस जो जीवित दशा में इतनी आशाएँ लगाए
जीवन-मरण रहस्य था, जो स्वप्न-दशा में स्थूल शरीर को सोता हुआ छोड़कर आप न जाने कहाँ कहाँ की सैर करता था, जो अध्ययन और गूढ़ प्रश्नों के चिंतन में इस शरीर से बहुत ही कम संबंध रखकर, यहाँ तक कि कभी-कभी इससे बिलकुल बेसुध होकर अपने अध्ययन और चितन के विषय में लग- कर अपने को पृथक् ही प्रकट करता था, और शरीर से पृथक् ही अपना कार्य करता था, क्या उसका अभाव हो सकता है ? कभी नहीं । बुद्धि के तर्क एक काल में झूठे प्रमा- णित हो सकते हैं, क्योंकि ये अप्रतिष्ट है, पर अंतःकरण के आदेश कभी झूठे नहीं हो सकते । जीवित में वही अंत:- करण अपने नाश को असंभाव्य समझता है, अपने को अपने कर्मों का उत्तरदाता समझता है। यह समझ उसकी भूठ नहीं हो सकती। अपने कमों के दायित्व का विना चार्ज दिए, विना समझौता किए, विना वेबाकी किए दायित्व से इसका छुटकारा अभाव में लय हो जाने के लिये कदापि नहीं हो सकता। अपना ही अंतःकरण अपने अभाव को असंभाव्य सममे, यह बात नहीं है, किंतु दूसरों का अंत:- करण भी जीव की अभाव दशा को मानना अस्वीकार करता है। मनुष्य के मर जाने पर भी उसके जीव के साथ लोग सहानुभूति करते हैं। लोगो का अंतःकरण उस जीव के अशरीरी अस्तित्व को स्वीकार करता है, तभी लोग उसके जीव के साथ सहानुभूति करते हैं। यदि लोगों का अंत:- मृत्यु के पश्चात् मानस या जीव को दशा करण मृत शरीर के परमाणुओ की भाँति जीव को भी छिन्न- भिन्न समझता, तो लोग जैसे मृत शरीर को भुलवाकर उससे निस्संबंध हो जाते हैं, वैसे ही उसके जीव को भी भुलवा- कर निस्संबंध हो जाते, पर लोगों का अंत:करण प्रेरणा करता है कि मरे मनुष्य के साथ सहानुभूति रक्खो। इसी प्रेरणा के वशवर्ती होकर लोग उस जीव पर प्रेम, श्रद्धा और भक्ति रखते हैं। इस प्रेम, श्रद्धा और भक्ति का द्योतन श्राद्ध, मेमोरियल, मरे के लिये दुआ, प्रार्थना, पूजन, चढ़ावा आदि के रूप मे होता है। कौन-सा देश है, कौन-सी जाति है, कौन-सी सभ्यता है, जिसमे इसका द्योतन न होता हो? सारे संसार के मनुष्यो के अंतःकरण से यह आभास निकल रहा है कि मनुष्य के मरने पर भी उसका जीव वर्त- मान रहता है। इस अंतःकरण के आभास को सत्यता के प्रमाण कभी- कभी प्रत्यक्ष भी किसी-किसी के अनुभव में आ जाते हैं। जीव कभी-कभी अपने प्यारे मनुष्य की प्रीति से आकर्पित होकर उससे भीतरो पालाप करते अनुभूत हुए है। भूत- प्रतो की कथा और उनका कभी-कभी प्रकट हो जाना, किस दश, किस जाति और किस सभ्यता मे असंभव है। अमेरिका आदि मे जो मिस्मेरिज्म, स्पिरिचुएलिज्म, सियासेज (भैरवी चक्रों) आदि की लीलाएँ देखने में आती है, उनमें से भ्रम, नजरबंदी, और धोकवाजियों को मिनहा जीवन-मरण-रहस्य से कर देने पर भी बहुत-सी बातें ऐसी रह जाती हैं, जो मरने पर भी जीव के अस्तित्व को मानने की ओर विवश करती हैं। भारतवर्प, वर्मा, चीन, जापान, लंका आदि देश तो मरने पर जीव के अस्तित्व में पूर्ण विश्वास रखते हैं, और उस श्रद्धा और भक्ति रखने को अपने मजहब का एक अंग बना लिए हैं। बहुत-से लड़के ऐसे उत्पन्न होते हैं, अथवा युपक ही ऐसो अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं कि अपने पूर्व जन्म की घट- नाओं का ठीक-ठीक वृत्तांत कह देते है कि इनके कथन उस स्थान पर की उस काल की घटनाओं का मिलान किया जाय, तो पूरा-पूरा मिल जाता है, जिससे प्रमाणित होता है कि मरने पर भी जोर अस्तित्व में रहता है, और दूसरा जन्म लेकर पीछे दूसरा शरीर भी धारण करता है। ये बाते तो साधारण मनुष्यो के अंतःकरण के आदेश, बुद्धि के तर्क और अनुमान तथा इंद्रियों के समक्ष आती हैं। और, इतनी ही वार्ते काफी हैं कि उन सब मनुष्यों को निश्चय करा दें कि मरने पर भी जीव का अस्तित्व रहता है, जो लोग इसको खामखाह अस्वीकार करने के लिये कटिबद्ध नहीं हैं। पर जो लोग अंतःकरण की सूचनाओ से अपने कान मँदे हैं, जो बुद्धि के ऐसे तकों को भी भ्रम कहते हैं, जो सारे संसार की पितृ-भक्ति को मिथ्या विश्वास कहते है, जो मनुष्यों के प्रत्यक्ष अनुभव को इंद्रजाल कहकर टाल
मृत्यु के पश्चात मानस या जीव की दशा १
देते हैं और हठ कर यही कहते हैं कि मरले पर जीव का
अभाव उन्हें कोई नहीं समझा सकता।
किसी मनुष्य से किसी ज्योतिपी ने कहा कि अमुक दिन
तुम मर जायोगे। इस कथन पर उस मनुष्य को विश्वास हो
गया। वह दिन आया और बीत गया । यद्यपि वह मनुष्य
मरा नहीं, पर ज्योतिषी के कथन में अपने दृढ़ विश्वास के
कारण उसने अपने को मरा मान लिया । प्रत्यक्ष, अनुमान
और अनुभव सब बातें तो प्रकट कर रही हैं कि मरण अभी
नहीं हुआ है, पर वह अपने आग्रह के ऐनक से अपने को मरा
ही हुआ समझता है। वेसे ही जिन मनुष्यों का आग्रह
उनके अंतःकरण, बुद्धि और अनुभव को इतना आवृत
कर लिए है कि प्रत्यक्ष, अनुमान, अनुभव और अंत:करण
सवकी उपेक्षा कर बैठते हैं, उनसे विवश ही होना पड़ता है।
साधारण मनुष्यो दी के अंतःकरण की सूचनाओं, बुद्धि
के तर्क और अनुभवो से पूरा प्रमाणित हो जाता है कि
मरण के उपरांत भी जीव वर्तमान रहता है। अव अगले
अध्याय मे यह देखा जायगा कि प्रतिभाशाली और योगी
लोग इस विपय मे अपने विकसित ज्ञान द्वारा अनुभव प्राप्त
करके क्या कहते हैं।
नवाँ अध्याय प्रतिभाशालियों और योगियों के अनुभव जब अपने लिंग-शरीर से आवृत जीव शनैः शनैः स्थूल शरीर से निकलने लगता है, तब उस मनुष्य का सारा जीवन-चरित्र, बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक उसकी मान- सिक दृष्टि के सम्मुख गुजरने लगता है । स्मृति अपनी गुप्त चातों को प्रकट कर देती है, और मन के सम्मुख चित्र-पर- चित्र बड़ी शीघ्रता से आने लगता है तथा बहुत-सी बातें उस प्रस्थानोन्मुख जीव को स्पष्ट हो जाती हैं। बहुत बातों का कारण प्रकट हो जाता है। जीव सब बातों के अभिप्राय को समझने लगता है। अर्थात् वह अपने अब तक के पूर्ण जीवन को पूर्णतया देखता है, क्योंकि वह उस समय को एक साथ ही देखता है। यह मरणोन्मुख मनुष्य को स्पष्ट स्वप्न की भौति दिखाई देता है, परंतु यह गहरा चिह छोड़ जाता है। जीव पीछे इन स्मृतियों को फिर-फिर उभाड़- उभाड़कर इनका व्यवहार करता है। योगी लोग सर्वदा से कहते आए हैं कि मरते हुए मनुष्य के हित और मित्रों को उसके पास खामोशी और शांति रखनी चाहिए, जिससे विरोधी भावनाओं और चित्त के फेरनेवाले शब्दों प्रतिभाशालियों और योगियों के अनुभव ५३ द्वारा उसका उद्वेजन न हो। जीव को चैन और शांति से अपना रास्ता लेने देना चाहिए। जो लोग उसके पास हो, वे अपनी इच्छाओं और शब्दों से उसे रोके नहीं। इसी तरह जीव शरीर से निकल जाता है। कहाँ जाता है ? यहाँ पर इस बात को जान लेना चाहिए कि जीव की भविष्य दशा जो दूसरे जन्म के धारण करने के पहले बीतती है, उसका संबंध स्थान और देश से नही है। वह अवस्थाओं का विषय है, देश का विषय नहीं। अस्तित्व के लिये अन- गिनत स्थान है, और सब एक दूसरे मे होकर वर्तते हैं, जिससे एक ही स्थान बहुत-सी चेतनाओ के जीवन को भिन्न- भिन्न अनको भूमिकाओ (लोको) मे धारण कर सकता है । जो जीव निचली भूमिकाओ मे जीते है, वे वहॉ ही के उच्च जीवो के अस्तित्व और वर्तमानता से अनभिज्ञ रहते है। इसलिये स्थान की भावना को इस समय अपने चित्त से निकाल बाहर कर देना चाहिए। अब सब मामला अवस्थाथो और भूमिकाओ ( अर्थात् लोको) का है। ये जीव शरीर से निकल जाने के पश्चात्, यदि हित- मित्रो की भावनाओं और पुकारो से छेड़े न जायें (यह छेड़-छाड़ बहुत शोक करने, मृत मनुष्य की चाहना करने आदि से होती है), तो वे अर्धचेतनावस्था में पड़ जाते है। यह अर्ध-चेतन अवस्था बड़ी आनंददायिनी, शांति और सुख की अवस्था होती है । यह जीव की स्वप्न-दशा है।
८४. जोवन-मरण रहस्यः ऐसी दशा कुछ काल तक रहती है। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों भिन्न-भिन्न काल. तक रहती है, जैसे, आगे चलकर वर्णन किया जायगा | तब.लिंग-शरीर जीव के मड़ पड़ता है और मानस मंडल में दूर उड़ जाता है। फिर मानस के नीच आवरण जो मानस के नीच अंशों को आवृत किए रहते हैं, क्रमशः गलने और झड़ने लगते हैं। अब जीव अपने उच्च- तम मानसिक अंशों के साथ रह जाता है। जो मनुष्य अभी बहुत नीच ही विकास का होता है और इसलिये पाशविक प्रवृत्ति की अधिक मात्रा धारण किए रहता है, वह अपने मानसिक शरीर की बहुत थोड़ी ही मैल छोड़ता है, और शीघ्र ही अपनी उस उन्नत दशा को पहुँच जाता है, जिसे उसने अपने पार्थिव जीवन में अर्जन किया था । जो मनुष्य उच्चता अर्जन किए रहता है, वह शनैः शनैः अपने मानस-शरीर के बहुत अंशों को त्याग देता है, और अपने कमाए हुए उच्च भावों को छोड़कर सब नीच अंशों को त्याग देता है। जो लोग इन दोनो णियों के बीच के होते हैं, वे भी अपने विकास के अनुकूल थोड़े या बहुत मानसिक नीच अंशों को त्यागते हैं। जब भाड़नेवाले अंतिम नीच अंश सब मड़ जाते हैं, तब वह जीव जगता है, और उस दशा को पहुँचता है, जिसका वर्णन आगे चलकर किया जायगा । यह बात देखने में आयगी कि स्थूल मानसिकता और आत्मिक विकास का मनुष्य इस स्वप्न-दशा में बहुत .
प्रतिभाशालियो और योगियो के अनुभव थोड़े काल तक रहता है, क्योंकि ऐसी दशा में मानसिक केंचुलियों का छोड़ना, सरल कार्य होता है, जिसमें कम समय लगता है। इसी प्रकार यह भी देखने में आयगा कि जो मनुष्य उच्च श्रेणो के आत्मिक विकास को पहुंचा है, वह अधिक काल तक इस विश्राम की अवस्था में रहेगा, क्योंकि उसे बहुत कुछ त्यागना है, और मन की यह त्यक्त वृत्तियाँ गुलाब-सुमन की पंखड़ियों की भाँति एक-एक करके मड़ेगी। वाहर ही से झड़ते-झड़ते भोतर की ओर चलेंगी। प्रत्येक जीव तभी जगता है, जब उसकी कमाई के अनुसार झड़नेवाली सब नीचताएँ नड़ जाती है, और जब वह अपने विकास के अनुसार उच्चतम अवस्था को पहुँच जाता है। जिन लोगो ने इस गत पार्थिव जीवन में अधिक आत्मिक विकास किया है, उनको बहुत-सी नीचताओ को छोड़ना होता है, और जो लोग भू-जीवन के अवसरों को चूके रहते है और वैसे ही मरते है, जैसे जन्मे थे, तो उन्हें बहुत कम नीचताएँ त्यागनी पड़ती हैं, और इसलिये ये बहुत थोड़े ही काल मे जग उठेगे। यहाँ पर इस बात को कह देना हम बहुत आवश्यक समझते है कि विश्राम-दशा में प्रवेश करने पर तथा पूर्ण विश्राम से भूमि पर के मनुष्य बहुत वाधा पहुंचा सकते हैं। जिस जीव को भूमि पर के मनुष्यों को कुछ जताना होता है, अथवा जो भूमिस्थ मनुष्यो के दुःखों मे दुःखित होता है, विशेष- ८६ जीवन-मरण-रहस्य करके जब भूमिस्थ मनुष्य उसके लिये विलाप या चाहना करते हैं, वह अपने ऊपर आती हुई विश्राम-निद्रा को टालता है और भूमि पर जाने के लिये बड़ा उद्योग करता है। ऐसे ही भूमिस्थ लोगों को पुकार उसकी सुख-निद्रा मे भी बाधा पहुँचाती है, और वह जग-जगकर इनकी पुकारों का उत्तर दिया चाहता है। इस प्रकार उसके विकास में बाधा पड़ती है। ऐसे विलापो और ऐसी चाहनामो से हमारे प्रिय मनुष्यों को बड़ी पीड़ा और बेचैनी होती है, यदि वे अपने जीवन-काल ही में विराग न उत्पन्न कर लिए हो। योगी लोग ऐसे जीवों को भी जानते है, जो बरसो तक निद्रा में न गए, और अपने प्यारे भूमिस्थ मनुष्यों की पुकार सुन-सुन- कर उनके पास रहा किए। इस क्रिया से मृत और जीवित दोनो मनुष्यों को कष्ट के सिवा और लाभ कुछ नहीं होता। हमे उचित है कि मृत मनुष्यों को स्वच्छंद विश्राम और विकास करने का अवसर दे, ताकि वे सोवें और विश्राम करे, तथा अपने परिवर्तन की प्रतीक्षा करें। बार-बार की पुकार से जगने-सोने में उन्हें बार-बार की मृत्यु का अनुभव करना पड़ता है। जीव की निद्रा और उसके विश्राम का यह समय बच्चे की गर्भ-स्थिति को दशा के समान है। वच्चा गर्भ में सोता है कि जीवन और शक्ति में जगे। जागृति की अवस्था का वर्णन करने के पहले हमें आवश्यक जान पड़ता है कि यह जता दें कि केवल उन्हीं मनुष्यो के प्रतिभाशालियों और योगियों के अनुभव जीव सुख-निद्रा में तुरंत जाते हैं, जो छेड़े न जायें, और जो स्वाभाविक मृत्यु से मरे हैं। जो दुर्घटना में पड़कर अकाल- मृत्यु से मरते या वध किए जाते हैं, अर्थात् जो अकस्मात् शरीर-त्याग कर निकल पड़ते हैं, वे अपने को जागते हुए और पूर्ण मानसिक शक्तियो-सहित पाते हैं। वे प्रायः नहीं जानते हैं कि उनकी मृत्यु हो गई है, और यह नहीं समझते कि उन्हे क्या हो गया है। थोड़े काल तक अपने पाथिव जीवन की सारी चेतना रखते हैं, और उनके गिर्द जो घट- नाएं होती है, उन्हें देखते और सुनते है। यह सब बाते वे अपने लिंग-शरीर की इंद्रियो द्वारा करते है। वे इस बात की कल्पना ही नही कर सकते कि स्शुल शरीर को छोड़ दिए हैं, इसलिये वे बहुत घबराते हैं। उनका भाग्य अत्यंत दुःखदायी होता, यदि वे और सहायक छाया-पुरुषो की सहायता से निद्रा मे न भेजे जाते । ये छाया-पुरुप उच्च भूमिकाओ या लोको के जीव हैं और इस जीव के पास एकत्र हो पाते हैं तथा बड़ी कोमलता से इसे इसकी वास्त- विक दशा समझा देते हैं। इसको सलाह, धैर्य देते है और इसकी खवरगीरी करते हैं। अंत में यह जीव भी थककर उसी प्रकार सो जाता है, जैसे रोता हुआ बच्चा थककर सो जाता है। ये सहायक अपने कर्तव्य में कभी नहीं चूकते है। और, जो कोई अकस्मात देह-त्याग करता है, चाहे वह मला हो या बुरा, वह इनके द्वारा त्यक्त नहीं होता, क्योकि जीवन-मरण-रहस्य ये सहायक लोग जानते हैं कि सभी ईश्वर के बच्चे औरहमारे भाई-बहन हैं। जब कभी भारी दुर्घटना होती है या बड़ा युद्ध होता है और तत्काल-सहायता और परामर्श की आवश्यकता होती है, तो आत्मिक विकास के उच्च सोपानों की उच्च चेत- नाएँ भी अपने उच्च लोकों से मनुष्य-रूप में उतरती और धैर्य तथा ज्ञान का लाभ पहुँचाती है। यह बात केवल सभ्य ही देशों में नहीं होती, कितु दुनिया के सब भागों में होती है, क्योकि सभी संबंधी है। बहुत से जीव जो आत्मिक विकास को उच्च कक्षा में पहुंचे हैं, और जो अपनी जाति की श्रेणो की अपेक्षा बहुत ऊपर चढ़ गए हैं, और जिन लोगों ने उच्च लोकों को बहुकालीन स्थिति को कमाया है, वे भी इन और ऐसे कामों में अपने को लगाया करते हैं तथा अपने कम भाग्यवान भाइयों की सहायता के लिये अपने अर्जित सुख का त्याग कर देते हैं । अकाल मृत्युवाले मी शनैः शनैः जीव को निद्रा में सो जाते हैं, और उनकी भी आवरणकारिणी कवुलो का उसी प्रकार मढ़ना प्रारंभ होने लगता है, जैसे स्वाभाविक मृत्युवालों का होता है। जब जीव आवरणकारी खोखलों को त्याग चुकता है और उस दशा को पहुँचता है, जिसके योग्य यह अपने का भू-जीवन में बनाए रहता है, तब वह उस लोक में पहुँ- चता है, जिसके योग्य होता है । हम ऊपर कह आए हैं कि ये लोक स्थान नहीं हैं, किंतु दशाएँ हैं। ये लोक एक ८६ प्रतिभाशालियो और योगियो के अनुभव दूसरे में व्याप्त हैं। एक लोक का वासी जीव दूसरे लोक- वालों का कुछ ज्ञान नहीं रखता । एक लोक का जीव दूसरे मे जा भी नहीं सकता। हाँ, यदि उच्च लोक का जीव चाहे, तो वह नीचे के लोको का ज्ञान प्राप्त कर सकता और वहाँ पहुंच भी सकता है। परंतु नीचे के लोकवाला ऊपर के लोक का नतो ज्ञान ही प्राप्त कर सकता है, न वहाँ पहुँच ही सकता है। इनके रोकने के लिये कोई द्वार पर पहरुवा नहीं रहता, क्योकि दशा में द्वार होता ही नहीं है, वरुक् उसी कारण से, जिस कारण से मछली अपना विकास छोड़कर ऊपर आकाश मे चिड़ियों की भांति नहीं उड़ सकती। इसकी प्रकृति ही ऐसा नहीं करने देती । उच्च लोक का जीव इस मृत्यु-लोक में भी आकर किसी प्रेमी का आश्वासन कर सकता है, यदि यह मयं ऐसे आश्वासन की आकांक्षा करे । जब जीवों का एक नियत श्रेणी तक विकास हो जाता है, तो वे शरीर से पृथक होने पर उच्च जीवों के परामर्श को ग्रहण करने के इच्छुक हो जाया करते हैं, क्योंकि वे भू-जीवन के व्यम करनेवाले प्रभावों से पृथक् रहते हैं, और आत्मा की सहायता के लिये खुले रहते हैं। ऊपर के लोक से निचले लोक भहे, उन अविकसित प्रकार के जीवों से, जैसे पृथ्वी पर पाए जाते हैं, भरे रहते हैं। वास्तव में वे इस भू-लोक से इतना धना संबंध रखते है और इसकी ओर इतना आकर्षित रहते हैं कि इसी ६० जीवन-मरण-रहस्य लोक के सहश रहते हैं, और इसी लोक के कहे जा सकते हैं। ये जीव अपने भू-लोक के अधःपतन के दृश्यों के निकट ही रहते हैं, और अपने-से ही जीवों पर, जो मद्य आदि के नशे में रहते है, प्रभाव डालते हैं। वे तो अपना पुराना जीवन जीते ही हैं, साथ ही भू-लोक के जीवित मनुष्यो पर भी अपना बुरा प्रभाव डालते हैं। उच्च लोक और नीच लोक अनेकों हैं और अपने-अपने उपयुक्त जीवो द्वारा बसे हुए हैं। नीच लोकों के जीव नाना प्रकार के उत्पात् और शैता- नियत किया करते हैं। ऐसे जीव बहुत शीघ्र ही फिर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं। जन्म लेते समय अपने ही अनुकूल माता- पिता के घर मे आकर्पित होते हैं। ऐसे जीव बहुत हो धीमी गति से उन्नति करते ह। प्रत्येक जीवन मे तनिक-सा आगे बढ़ते हैं। इन्हें बहुत शीघ्र-शीघ्र जन्म लेना पड़ता है। इनकी कामनाएँ भौतिक पदार्थों में बहुत प्रबल होती हैं, इसीलिये शीघ्र-शीत्र इन्ही की ओर आकर्षित हुआ करते है। आत्मा का प्रभाव इनके ऊपर बहुत ही कम पड़ता है। परंतु सब कुछ-न-कुछ आगे ही को बढ़ते हैं। उच्च लोकों के जीव ज्योज्यों ऊपर विकास करते जाते हैं, त्यों-त्यो उनकी उन्नति की गति तीव्र होती जाती है। और जब भू-लोक में आते हैं, तब भी तीव्र वेग से उन्नति करते है। बहुत काल अंतर दे-देकर उनके जन्म होते हैं, और थोड़े ही जन्म होते हैं। उनकी आकांक्षाएँ और रुचियाँ मे प्रतिभाशालियों और योगियो के अनुभव ३१ उच्च श्रेणी को हुआ करती है, इसलिये वे उच्च ही लोकों रहना अधिक पसंद करते हैं। उनके ऊपर आस्मा की किरणों का प्रकाश भी अधिक पड़ता है, इसलिये उनके विकास में और भी अधिक तीव्रता होती है। शताब्दियों तक ये उच्च ही लोको में रहा करते है। किसी-किसी दशा में जब वे साधारण मनुष्यो को अपेक्षा बहुत अधिक उन्नति कर जाते है, तब सहस्रो वर्ष ऊँचे ही लोकों में रह जाते हैं, ताकि भू-लोक तब तक उन्नति करके उनके जन्म धारण करने योग्य बन जाय। परंतु देर मे या सबेर जीवो को इस भू-लोक मे आकर नए अनुभवों के प्राप्त करने की आकांक्षा होती है। यहाँ आकर वे अपनी उच्च लोक से प्राप्त वृत्तियो को चरितार्थ करते हैं, और अपने मानस को दबी हुई कामनाओं की पूर्ति का अनुभव करते हैं, अथवा अपने किसी प्यारे के प्रेम से आकर्षित होते हैं । जब वे उच्च लोक से इस भू-लोक मे आने लगते हैं, तब वे वहाँ पहले जीव-निद्रा मे पड़ते हैं, फिर वहाँ मरकर इस भू-लोक पर स्थूल शरीर मे आते हैं। जन्म लेते ही जीव यहाँ पूरा-पूरा नही जग जाना; किंतु बचपन स्वप्न की दशा में रहता है । क्रमशः इसकी जागृति होती है, और जागृति के अनुसार चेतना बढ़ती जाती है। ज्योज्यो चेतना बढ़ती जाती है, त्यों-त्यो उसी के अनुकूल उसका मस्तिष्क भी होता जाता है। कभी-कभी समय के पहले ही जागृति १२ जीवन-मरण-रहस्य हो जाती है और हम बहुतों को बचपन ही में बड़ी प्रतिभा का द्योतन करते पाते हैं, परंतु ऐसी दशाएँ नियम-विरुद्ध हैं, और अच्छी नहीं हैं। जन्म धारण करने की अधिकांश तैयारियाँ अचेतन दशा में होती हैं। ये तैयारियाँ अपर आत्मा के विकास और नीच कामनाओं के आकर्षण से निर्णीत होती है। परंतु जब जीव नियमित विकास को पहुँच जाता है, तब वह जन्म- धारण-क्रिया से भी अभिज्ञ रहता है। वह अपन गत जीवनी का भी जानकार रहता है और आगे आनेवाले जन्म-धारण मे बहुत कुछ कार्य अपनी रुचि के अनुसार करता है। ज्यों-ज्यों विकास की उच्च-उच्च श्रेणियाँ प्राप्त होती जाती हैं, त्यो त्यो चेतना और स्वतंत्रता बढ़ती जाती है। योगी लोग कहते हैं कि सात बड़े लोक हैं। इन्ही को अशिक्षित हिंदू सात स्वर्ग कहा करते हैं। प्रत्येक बड़े लोक के अंतर्गत सात अधीनस्थ लोक हैं, और प्रत्येक अधी- नस्थ लोक के अंतर्गत और भो सात छोटे-छोटे लोक है। इसी प्रकार होता चला गया है। भू-लोक के निकटस्थ का लोक इसी से मिलता-जुलता है। ज्योज्यो लोक ऊपर का होता गया है, त्यों-त्यों वहाँ की भाव- नाएँ उच्च होती गई है। बहुत उच्च लोकों के आनंद का वर्णन करना हमारी शक्ति से बाहर है । इन उच्च लोको की बातें करने का हमे प्रयोजन ही क्या है ? जब हम दो संख्याओं
प्रतिभाशालियों और योगियों के अनुभव १३
का जोड़ना तक नही जानते, तो उच्च गणित की बातें करना
निष्प्रयोजन है। पर इतना जान रखना चाहिए कि ये सब
उच्च लोक हमारे ही लिये हैं-सब हमारे लिये हैं-हम
पैत्रिक संपत्ति से वंचित नहीं हो सकते।
दसवाँ अध्याय उपसंहार यही मनुष्य का जीवन और मरण है। इन दोनो का एक- मात्र उद्देश आध्यत्मिक विकास है। इसी विकास के उद्देश से ऐसे जीवन और मरण हुआ करते हैं। कुछ लोगों की यह धारणा है कि मनुष्य मरने पर पशु आदि नीच योनियों मे भी जाता है। अन्य लोगों का यह विश्वास है कि मनुष्य का छुटकारा इस जीवन-मरण से कभी नहीं होता । यही चक्र सदा घूमा करता है, और एक नियत समय के पश्चात् यहाँ के मनुष्य अन्य ग्रहो मे चले जाते हैं, और फिर वहाँ जीवन-मरण-धारण किया करते हैं, फिर और भी उच्च ग्रहो मे जाते है । इसी प्रकार उनक जीवन-मरण का चक्र और ऊपर की गति दोनो हुआ करती हैं। यह गति अनंत है। योगियों का कथन है कि ये बातें सत्य है, पर सच्चाई की एक अंग-मात्र हैं। समग्र सच्चाई नहीं है। यह बात सत्य है कि कोई-कोई पाशविक, स्वार्थी और पापी मनुष्य अपनी ही पाप-कामनाओं के कारण इस जीवन की अपेक्षा और भी नीच गति को प्राप्त हो जाते हैं। वे अपनी श्रेणी में नहीं चल सकते, इसलिये एक दर्जा और नीचे उतार दिए जाते हैं।
उपसंहार ३५ परंतु जो जीव एक बार मनुष्य-योनि को प्राप्त हो गया, वह फिर कभी पशु-योनि को नहीं पतित हो सकता। चाहे जितना पाशविक वृत्ति का क्यो न हो, पर उसने मनुष्यता के थोड़े भी तो गुण प्राप्त कर लिए हैं । ये थोड़े गुण अब उससे पृथक नहीं हो सकते । इन थोड़े गुण को वह पशु-योनि मे चरितार्थ नहीं कर सकता, इसलिये वह फिर मनुष्य ही होकर जन्मेगा। इसी प्रकार यद्यपि मानव-जाति बहुत दिनो तक जन्म- मरण धारण करते-करते थोड़ा-थोडा विकास करेगी, पर जो लोग शीघ्रता से विकास करते हैं, वे उच्च लोको मे निवास करते हुए, मानव-जाति के अपने समान विकास की प्रतीक्षा करते हैं । अपनी जाति के अन्य अविकसित जीवो के साथ वे भी नही पिसा करते । विकसित मनुष्य को कभी अपनी इच्छा के प्रतिकूल जन्म नही धारण करना पड़ता। अविकसित मनुष्यो का जन्म भी इसी कारण होता है कि वे इस भू-लोक के पदार्थों की इच्छा रखते हैं। उनकी रुचियाँ और कामनाएं ऐसी ही होती हैं, जो विना भू-लोक मे स्थूल शरीर धारण किए उनकी पूर्ति ही नहीं हो सकती। यद्यपि वे अपने आगामी जन्म के अभिज्ञ नही रहते, पर वे अपने को आप भू-लोक के आकर्षण मे डाल देते हैं और अपने अनुकूल वाह्य विधान मे जन्म धारण करते है। जब मनुष्य इतना विकास कर लेता है कि अपने को आत्मिक प्रकाश के लिये खोल देता है, तब उसे निश्चित
+
६६.
'जावन-मरण रहस्य
हा जाना चाहिए कि उसका जन्म अवश्य उसके उच्च मानस
की सम्मति ही से होगा । जो लोग अपने अंतःकरणं
मे वस्तुतः अनुभव करते है कि हम सर्वदा से है, और सर्वदा
रहेंगे, उनको निःशंक हो जाना चाहिए कि उनका आगे अचे-
तन पुनर्जन्म न होगा। वे अब उस चेतना को पहुँच गए
हैं, जिससे वे अपने भविष्य-जन्म की सारी पद्धति को समझते
रहेंगे। और, यदि शरीर-परिवर्तन करने की इच्छा होगी, तो
उसी प्रकार शरीर-परिवर्तन करेंगे, जैसे मनुष्य अपने
पुराने वनों का परिवर्तन करता है अथवा जैसे एक स्थान
को छोड़कर दूसरे स्थान में निवास स्वीकार करता है। अब
वे विवश होकर जन्म धारण करने के बंधन से मुक्त
हो गए हैं।
अब तनिक यह देखना है कि योगियों के आत्मिक विकास
का अर्थ क्या है?
योग-शास्त्र यह उपदेश करता है कि मनुष्य सर्वदा रहा
है, और सर्वदा रहेगा। जिसे हम मृत्यु कहते हैं, वह निद्रा
है, जिससे अगले दिन जगना पड़ेगा। मृत्यु में चेतना का केवल
क्षण-भंगुर लोप होता है। जीवन लगातार है। इसका उद्देश
खिलना, विकसना और वृद्धि करना है। हम अब भी वैसे
ही अनंत में हैं, जैसे कभी हो सकते हैं। जीव ही प्रधान
है। यह शरीर का आभूषण या पुछल्ला नहीं हैं। जीव
शरीर से पृथक् भी वैसे ही रह सकता है, जैसे शरीर में रह
अपसंहार ९७ सकता है। हॉ, यह ठीक है कि शरीर धारण ही करने से कोई-कोई अनुभव और ज्ञान प्राप्त होते है। हमें शरीर इस- लिये मिला है कि हमें इसकी आवश्यकता है। जब हम एक निश्चित श्रेणी तक विकास कर लेगे, तब हमे इस किस्म के शरीर को आवश्यकता न रहेगी, जिस किस्म की अव है। जीवन के और भी अधिक स्थूल लोको मे इस शरीर से भी अधिक स्थूल शरीर को जीव धारण कर चुका है। उच्च लोको मे शरीर भी सूक्ष्म होता जायगा। यह जीव बहुत दिनों से विकास करता हुआ इस अवस्था को पहुंचा है, और आगे भी इसे बहुत विकास करना है, जिसे वह चाहे मंद गति से करे, चाहे तीव्र गति से यह आध्यात्मिक विकास किस उहेश की ओर जा रहा है ? इसका अर्थ क्या है ? जीवन के नीचातिनीच रूप से लेकर उच्चातिउच्च रूप तक, सब पथ पर हैं। वह पथ किस स्थान या किस दशा की ओर जा रहा है ? आइए, इन प्रश्नो के उत्तर देने का यत्न इस प्रकार किया जाय-कल्पना कीजिए, करोड़ो अरबो वृत्त एक दूसरे के अंतर्गत है । प्रत्येक वृत्त जीवन की एक-एक कक्षा है । बाहरी वृत्त तो नीच और अत्यंत भौतिक है। ज्योज्यो ये वृत्त केंद्र के निकट पहुंचते जाते हैं, त्यो- त्यो उच्च रूपों को धारण करते जाते हैं। फिर अधिक निकट पहुंचने पर मनुष्य देवता हो जाते हैं। और भी निकट, इससे भी निकट, अधिक निकट, उच्च-से-उच्च
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V-09
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जीवन-मरण-रहस्य
जीवन होता चला जाता है। अब आगे की भावनाओं का
मानव-हृदय ' कल्पना नहीं कर सकता। परंतु केंद्र में क्या
१ सारे आध्यात्मिक शरीर का मस्तिष्क-परमात्मा-
परमेश्वर ! हम लोग उसी केंद्र की ओर जा रहे हैं।
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