Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Gautamiya Kavyam

Muni,kanakavijaya · 2012/08

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Setho Deraturda Lālalža Jaza Putałoddi.ind
Hiviles
GAUTANIYA, KAVYAŅI
BY
PATHAKA RŪPACANDRA GANI
WITH
GAUTAMIYA-PRAKASA,
3 commentary by Kamakalyāna Gagi
(composed is V. S. 15*-1952)
EDITED BY
MUNI KANAKAVIJAYA
Vikra. Era 1996
[Christina D3 1940
Price 1-8-0

॥णमोऽत्यु णं वीयरायाणं ॥ 4 आदिवचन MVETER गौतमीयकाव्य ग्रन्यः गौतमीयकाव्य नामनो काव्यग्रन्थ विद्वान जनसमाजनी समक्ष रजू थाय छे. श्रीजेनशासनना चार प्रकारना अनुयोगोमां, धर्म- कथानुयोगना विपयनी साथे द्रव्यानुयोगना विपयनुं प्रतिपादन करवाना कारणे आ काव्यग्रन्थ, श्रीजिनकथित सम्यक् श्रुतज्ञाननी प्राप्तिनुं परम साधन गणी शकाय तेम छे. सामान्य रीतिये (१) द्रव्यानुयोग, (२) गणितानुयोग, (३) चरणकरणानुयोग अने (४) धर्मकथानुयोग-आ मुजबना चारे अनुयोगोमां श्रीजिनकथित अंग, उपांग अने प्रकीर्ण श्रुतज्ञान संकळायेलं छे. जो के द्रव्यानुयोग आदि अनुयोगो अमुक दृष्टिये परस्परनी तरतमता अवश्य धरावे छे, छतां, ते सधळा य परस्पर एकमेकनी साथे एक सांकळमां सळंग संकटाई. रहेला अंकोडाओनी जेम एकांगीमावे जोडाईने रहेला छे. आ अपेक्षाये द्रव्यानुयोगं ऑदि चारे य अनुयोगो, जैनशासनमा मोक्षप्राप्तिा सम्यग आलंबन तरिके एक सरखी रीतिये उपास्य छे. श्रीजिनकथित प्रवचनना सारभूत द्वादशांगीरूप गणिपिटकना अंगसमा द्रव्यानुयोग तेम ज धर्मकथानुयोगना विपयोर्नु सुन्दरतर प्रतिपादन आ अन्यमा करवामां आव्यु छे. आ कारणे श्रीजिनकथित- । .

६ प्रवचनरसना रसिक, श्रद्धासंपन्न मव्य आत्माओने सारु आ काव्य- ग्रन्थर्नु महत्त्व खूब वधे छे. ग्रन्थरचयिता महापुरुपे काव्यमय शैलीथी पद्धतिपूर्वक बन्ने अनुयोगोना विपयोनुं प्रतिपादन आ ग्रन्थमा कर्यु छे. आथी काव्य के महाकाव्य तरिके प्रस्तुत गौतमीयकाव्य अनेरी भात पाडे छे. काव्य के महाकाव्यना सामान्य अभ्यासी या तेमां रस लेनार सौ कोई सहृदयजनने आ ग्रन्थ सुंदरमा सुंदर आलंबनरूप बने तेवो छे. आटली वात स्पष्ट छेः काव्य ए शब्दशास्त्रनी व्युत्पत्तिनुं साधनभूत अंग छे. व्याकरण, कोश, लिंगानुशासननी जेम काव्य पण शब्द- शास्त्ररूप गंमीरसागरने पार पामवा माटेर्नु सहकारी आलंबन छे. साहित्यनी साथे पण कान्यने गाढ संबन्ध होवो आवश्यक छे. आ आवश्यकतानी दृष्टिये, प्रस्तुत काव्यग्रन्थ साहित्यना अलंकार, रस, गुण वगेरे अंग-प्रत्यंगोनी साथे सविशेष विकासने पामी शक्यो छे, एम कहे, ए यथार्थ छे. माटे ज श्रीगौतमीयकाव्य, काव्यग्रन्थोमा पोतानुं विशिष्ट स्थान मेळवी शके तेम छे. भागीरथीना खच्छ जळप्रवाहनी जेम वहेतो प्रतिभाप्रकर्ष नैसर्गिक कवित्वशक्ति; अने मनोहर विषयप्रतिपादनशैली: -ग्रन्थ- कारना आ णे य विशिष्टगुणोना संगमरूप प्रस्तुत गौतमीय- काव्य साचे ज साहित्य के काव्यरसना पिपासु वर्गने तोप आपी शकवाने समर्थ छे. विविध छन्दो, अलंकारप्रौढ मापा, अर्थगंमीर' शब्दो-काव्य के साहित्यना अन्योनी साथे सहज संकळायेली आ वस्तुमो प्रस्तुत काव्यमन्थमाथी आपणने मळी रहे छे.

७ : एकंदरेः प्रस्तुत काव्यग्रन्थ, एक सामान्य काव्य नहि, पण महाकाव्य तरिके, विद्वान वर्गनी समक्ष ओलखावी शकाय तेम छे. आने अंगे ग्रन्थ प्रत्यक्ष होवाधी विशेष विवेचननो अत्र अवकाश जोतो नथी. ग्रन्थना अवलोकनथी आ वस्तु समजी शकवी शक्य छे. 'चरमतीर्थपति श्रमण भगवान श्रीमहावीर परमात्माए, : अपापा- नगरीना महसेनवनमा इन्द्रभूति आदि अगियार ब्राह्मणोना जीवादि संशयोनुं निराकरण कयु'-ए वस्तु प्रस्तुत काव्यग्रन्थनों प्रतिपाद्य विषय छे. विविध प्रकारना वर्णनोथी प्रासंगिक अलंकारोथी; अने अनेक रसोना समन्वयथी; ए वस्तुने आ ग्रन्थमां वर्णववामां आवी छ. शास्त्रीय परिभाषामां गणधरवाद तरिके ओळखातो विषय अत्र हूंकमां काव्यकार तरिके विशिष्ट शैली मुजब ग्रन्थकारे आपणी समक्ष मूक्यो छे. आ वस्तु, विशेषावश्यक भाष्य, बृहटीका, आवश्यकटीका चगेरेमां खूब विशद रीतिये स्पष्ट करवामां आवेल छे. प्रस्तुत ग्रन्थमा केवळ दिशासूचन तरिके ज गणघरवादनी वस्तु रजू थई छे. काव्यना ग्रन्थ तरिके अन्य काव्यग्रन्थोनी जेम आ मुजब वन ए संभाव्य छे. ग्रन्थकार पाठकश्री रूपचन्द्रगणि: गौतमीयकाव्यना रचयिता पाठक श्रीरूपचन्द्रगणिवर छे. अन्थकार महापुरुषने अंगेनी विशेष माहिती प्रस्तुत काव्यमन्थना प्रशख्रिगत अन्तिम श्लोको परथी आपणने मळी रहे छे. ग्रन्थकारनो सचाकाल, गच्छ, मन्थरचनाकाल वगेरे विगतो ढूंकमांआ मुजब छ। 'विद्याचारवर खरतर-गच्छमा, श्रीमत् श्रीजिनलामसूरिना शासन- काळमां, श्रीदयासिंह गुरु महाराजना शिष्य, अभयसिंह राजवी द्वाराये जेणे प्रतिछा मेळवी छे अने अर्हतशास्त्रना तत्त्वरसिक; वळी साधुसमुदायमां रामविजयना नामयी प्रसिद्ध श्रीरूपचन्द्र गणिए, वि० सं० १८०७ ना मागशरमहिनाना शुरूपक्षमां बीजने दिवसे जोधपुरनगरमां आ काव्यग्रन्थनी रचना करी छे'. आथी प्रस्तुत ग्रन्थकारनो सत्ताकाल, विक्रमना १८मा शत- कनी अन्त्यनो अने १९मा शतकनी शरूआतनो होवो संभावित छे. ग्रन्थकार तरिके श्रीरूपचंद्रगणिवरनां प्रौढ प्रथनशक्ति नैसर्गिक कवित्वगुण; वगेरेना कारणे करपी शकाय छे के 'प्रस्तुत ग्रन्थ- कारनी अन्य ग्रन्थकृतिओ होवी जोईए'; आने अंगेना विशिष्ट के निश्चयात्मक प्रमाणो आपणने मळी शकतां नथी, जो के प्रस्तुत काव्यना प्रशस्तिना श्लोको परथी ग्रन्थकार श्रीरूपचन्द्रगणिवरना गच्छ, सत्ताकाल, ग्रन्थरचनानी देश-कालपरिस्थिति विगेरे सामान्य- रीतिये जाणी शकाय छे. ते सिवाय विशेष ऐतिहासिक वृत्तान्त हजू अनुपलब्ध न रहे छे. प्रस्तुत ग्रन्थकारना कालनी साहित्य परिस्थितिने अंगे आथी विशेष काईक जाणवा जेवू मळे छे, ते 'जैन साहित्यनो संक्षिप्त इतिहास' नामना प्रन्यना संपादक श्रीमोहनलाल दलीचंद देसाईना शब्दोमां आ मुजव छः "१९मी सदीमा संस्कृत साहित्यमा यहु ग्रन्यो रचाया नयी, "जे काई रचाया छे तेनी नोंच लईशं. सं० १८०४मां ओ० उदय- "सागरपरिए सातपंचाशिका. सं० १८०७मां खरतरगच्छीय "क्षेमकीर्तिशाखाना शांतिहर्प-जिनहर्ष सुखवर्धन अने श्रीदया। "सिंह-अभयसिंहना शिष्य श्रीरूपचंद्र अपरनाम श्रीरामविजये, "श्रीजिनलामसूरिना राज्ये जोधपुरमा रामसिंहना राज्यमां गौतमीय- "महाकाव्य ११ सर्गमां (रचेल छे). * * * सं० १८१४ मां "उक्त ख. श्रीरामविजयगणिए, श्रीजिनलामसूरिनी आज्ञाथी "गुंणमाला-प्रकरण( नी रचना करी)". पृ० ६७५-६, पा०९९३. व्याख्याकार श्रीक्षमाकल्याण : मूलकारना गंमीर आशयोने स्हमजावनारी प्रस्तुत काव्यमन्थनी १ श्रीअभयसिंहना शिष्य तरिकेनो आ निर्देश असंगत छे. गौतमीयकाव्यनी प्रशस्तिमां आ मुजब उल्लेस छे. 'तच्छिप्याः मुखपर्धना अपि दयासिंहास्तदीयास्तथा 'तरिछप्योऽभयसिंहनामनृपतेर्लब्धप्रतिष्टो महा. 'गंमीराऽऽहतशास्त्रतत्त्वरसिकोऽहं रूपचंद्रायः 'प्रख्यातापरनामरामविजयो गच्छे स दत्ताख्यया ।' वळी गुणमाला प्रकरणमां पण आ मुजब स्पष्ट उल्लेख छ। 'तरिष्यविदितदया दयादिसिंहाव्यवाचका विवुधाः 'तचरणरेणुरंजितमौलिरयं रामविजयाख्यः।' आ यने उल्लेसोथी आ यस्तु स्पष्ट थाय छे, के श्रीरूपचंद्रपाठक अपरनाम श्रीरामविजयपाठकना गुरुनु नाम श्रीदयासिंह छे. ज्यारे अभयसिंह, ए राजान नाम छे. अने ते राजा द्वाराये प्रस्तुत प्रन्यकारे प्रतिष्टाने प्राप्त करी. आ कारणे अन प्रस्तुत प्रन्यनी प्रशस्तिमां ते राजाना नामनो निर्देश प्रन्यकारे कर्यो रे. २ आ गुगनाला प्रारण प्रत्यार पाठक श्रीरूपचन्द्रगणि अपरनाम पाठकधी रामविजयगगिये जेसलमेरमा आमो सुदि दशमीना दिवसे रच्युं छे. श्रीपंचपर- मेष्टीना वेम अभावकनागुणोनुं वर्णन आमा करवामां आन्युं छे. वि० सं० १९८०. मां आ प्रन्यन प्रतापरे प्रयशन घयुंछ, अन्यतुं श्योकप्रमाण मारे ३०००र्नु है.

व्याख्या, के जे 'गौतमीयप्रकाश'ना नामयी रचायेली छे, ते प्रकाश व्याख्याना रचयिता पाठकश्री क्षमाकल्याणजी गणिवर छे. प्रस्तुत व्याख्यामा व्याख्याकार महापुरुषे अति परिश्रम लईने मूलकारना अर्थगंमीर शब्दोने तेम गूढ भावोने खूब ज सरळ अने मनोरम पद्धतिपूर्वक स्पष्ट करेल छे. साचे ज 'गौतमीय- काव्यांनी व्युत्पत्तिना मार्गमां, आ व्याख्या सुन्दरतर प्रकाशने पाथरे छे. आ कारणे प्रस्तुत व्याख्यानुं 'प्रकाश' ए अभिधान वास्तविक छे. व्याख्याकारे, मूळ काव्यग्रन्थना अभ्यासक वर्गना उपकारनी दृष्टिये प्रस्तुत व्याख्यामा, मूलकारना आशयने स्पष्ट करवानी खूब काळजी लीची छे. साथे मूलश्लोकोना शब्दोने सहमजाववा माटे, व्याकरणना सूत्रो ठामठाम मूक्या छे. तेम श्रीअभिधान चिन्ता- मणि आदि कोशोनी साक्षी पण अवसरे अवसरे टांकी छे. आ प्रकारनी विशिष्टताना योगे प्रस्तुत प्रकाश व्याख्या, काव्यना विपयनुं ज्ञान मेळयवा इच्छनार अभ्यासक वर्गना; व्याकरण तेम ज कोश वगेरेना ज्ञानको विकास करे छे. आ रीतिये दरेक दृष्टिये प्रस्तुत व्याख्या, अभ्यासी के विद्वान सौ कोईनुं आकर्पण करी शके तेवी छे, अने व्याख्याकारनी समर्थ विद्ववा; प्रौढ अनुभव- शीलता; तथा अनुपम विवेचनाशक्ति; वगेरे सूचित करे छे. व्याख्याकार पाठकश्री क्षमाकल्याणजीना सत्ताकाल वगेरे जीवनवृत्तने अंगे, प्रस्तुत प्रकाश व्याख्यानी प्रशस्तिमा व्याख्याकारे स्वयं करेल उल्लेख परथी केरलंक जाणवा जेवू आपणने मळी रहे छे. आविपेना विशेष प्रतिषवृत्तनी नोंघ, 'जैन साहित्यना संक्षिप्त इतिहास'मां मा मुजव छः BHARARYA VIDYALAVAN "आ (१९मा) शतकमां खरतरगच्छना श्रीक्षमाकल्याण उपा- "ध्याय थया के जे खरतरगच्छीय श्रीजिनलामरिना शिप्य अमृत- "धर्मना शिप्य हता. तेमणे सं० १८२९थी १८६९ना गाळामां "अनेक ग्रन्थोना दोहनरूपे सादी भाषामां विवरण करेल छे. तेमना "ग्रन्थो आ छे: श्रीगौतमीयकाव्य व्याख्या, सं० १८३०मां "खरतरगच्छ पट्टावली, सं० १८३५मां चातुर्मासिक-होलिका आदि .. १ जिनलाभसूरिना शिष्य नहि, पण जिनलाभरिना गुरु श्रीजिनभक्ति- सूरिना शिष्य प्रीतिसागरना शिष्य अमृतधर्म हता. जुओ उपाध्याय क्षमाकल्याणजीनी-खकृत खरतरगच्छपट्टावलीप्रशस्ति'- 'श्रीजिनमक्तिसूरि जिनलामसूरि प्रीतिसागर 1 श्रीअमृतधर्म उपा० क्षमाकल्याण "श्रीजिनभक्तिसूरीन्द्र सु]शिप्या बुद्धिवार्द्धयः । प्रीतिसागरनामानस्तच्छिप्या याचकोत्तमा"॥२॥ "श्रीमन्तोऽमृतधर्माख्यास्तेषां शिष्येण धीमता। क्षमाकल्याणमुनिना, शुद्धिसम्पत्तिसिद्धये" ॥३॥ "संयत्सरे व्योमकृशानुसिद्धि-क्षोणीमिते फाल्गुनमासि रम्ये । विशुद्धपक्षे लिखिता नवम्यां,गुरुस्तुतिर्जीर्णगढे नवाऽसौ"॥an [१८३०]. खरतरगच्छ-पावली-संग्रह, बाबू पूरणवंदनी नाहरपाली, सने १९३२ नी छापेली पार्नु ३९.

x x "दशपर्वकथा, सं० १८३९मां जेसलमेरमां यशोधरचरित, "१८४७मा मकसुदाबादमां सूक्तमुक्तावलीवृति, सं० १८५०मां "वीकानेरमा जीवविचार पर वृत्ति". "सं० १८५१ प्रश्नोचर सार्धशतक, सं० १८५४मां तर्कसंग्रह "फकिका, सं० १८५०मां जेसलमेरमा अक्षयतृतीया अने पर्युपण "अष्टाहिक व्याख्यान, अने ते ज वर्षमा बीकानेरमा मेस्त्रयोदशी "व्याख्या अने सं० १८६९मां (श्री)श्रीपालचरित्रव्याख्या योजेल "छे. ते अरसामा योजायेला तेमना अन्य ग्रन्यो नामे परमसमयसार- "विचारसंग्रह, विचारशतकवीजक, समरादित्यचरित, सूक्तरना- "वलीवृत्ति आदि छे". x "भाषासाहित्यमा तेमणे जूनी गूजरातीमां गद्यरूपे श्रावकविधि- "प्रकाश नामनो ग्रन्थ गुंथ्यो छे. ख० श्रीक्षमाकल्याणे सं० १८३८- "मां पाक्षिकादि पडिकमणविधि गद्यमां संग्रहित करी तथा प्रश्नोत्तर- "सार्धशतक मापामा रच्यु". पृ० ६७६-८०, पा० ९९४-९९९; प्रस्तुत संपादन अने प्रकाशन : आ गौतमीयमहाकाव्य व्याख्यासहित, आजे प्रथम पार ज प्रसिद्ध याय छे. अत्यार अगाऊ काशीनी पुस्तक प्रकाशन संस्था द्वारा आ काव्यप्रन्य केवळ मूळमात्ररूपे प्रकाशनने पाम्यो हतो, ज्यारे श्रेष्ठी देवचंद लालमाई जैन पुस्तकोद्धार फंड संस्था मारफते आ रीतिये प्रस्तुत काव्यग्रन्थ व्याख्यासहित प्रसिद्धिने पामे छे. १ तदुपरांत चतुर्विशतिजिनचैत्यवंदनो तेमणे सस्कृत भाषामां रच्या छ, जे इटि प्रचलित छे.

कोईपण पुस्तकप्रकाशकसंस्था के व्यक्तिना प्रकाशनकार्यनी साथे, ते ते पुस्तकोना संपादकना संपादनकार्यनो पण संबन्ध संक- ळायेलो रहे छे. प्रस्तुत पुस्तकना प्रकाशनकार्यनी साथे संपादक- तरिके संपादनकार्यमां मारो संवन्ध आ मुजब संकळायो:- 'गतसाल (वि० सं० १९९५)नु अपाढ चातुर्मास, पू० पर- मगुरुदेवोनी आज्ञा मुजव मुंबई लालवाग-मूलेश्वर खाते थयु, ते अवसरे पूज्यपाद परममाननीय आचार्यदेव श्रीमद् विजयक्षमा- भद्रसूरि महाराजनी हिवद सूचनाथी आ पुस्तकना संपादनकार्यमां में मेहनत लीघी'. आ प्रसंगे एक स्पष्टता करी दउं. संपादनकार्यने अंगेनो' मने तेवा प्रकारनो खास अनुभव नथी. आ कारणे, आवा अन्थोनुं संपादनकार्य मारे माटे आ विषयनी नवी शरूआत गणी शकाय. हुं जाणु छु; कोईपण ग्रन्थनुं संपादन के संशोधन वगेरेर्नु कार्य, ए अगत्यनी जुवाबदारी मरेलु गणाय छे. अति सावधानी; अमुक महेनत; अने सर्वतोमुखी पहुश्रुतता वगेरेना सुन्दर सह- कारना योगे अन्यनुं संपादनकार्य सफळ अने संतोषप्रद बनी शके छे. जो के प्रस्तुत काव्यग्रन्थ- संपादनकार्य, . आ उच्चतर स्थितिए न पहोंची शक्युं होय ए संमाव्य छे. छता य प्रस्तुत संपादनकार्य, जे विद्वान जनसमाजने संवोपी शके ते रीतिये थयुं छे, तेना आदिकारण तरिके पूजनीय शान्तमूर्ति समर्थ विद्वान आचार्यदेव श्रीमद् विजयक्षमामद्रसूरीश्वरजी महाराज छे. तेओश्रीनो विशाल अनुभव, प्रौट प्रतिमा अने १४ सास तकेदारी आ त्रणेयना सुमेळे मारा हाथे ा रीतिनुं संपादन- कार्य थई शक्युं छे. मुख्यतयाए आ अन्यना संपादनने अंगे, हस्तलिखित प्रेसकॉपी- योनो आश्रय लेवायो छे. जे प्रेसकॉपीयो संस्थाना अवैतनीक मंत्री जीवणचंद साकरचंद झवेरी द्वाराये मने प्राप्त थई हती ते, तेम अत्यार अगाउ काशीथी प्रकाशित थयेल मूळग्रन्थ पण आना संशोधननी वेळाये नजर समक्ष राखवामां आव्यो हतो. आ त्रणे य प्रतिओ सामान्य रीतिये अर्घ शुद्ध जेवी हती, आ कारणे महेनत लई, वस्तुसंकलनाने लक्ष्यगत करी यथामति परिमार्जन करवामां आव्युं छे. आमां ज्या ज्या संशय जेवू लाग्युं, त्या त्यां कौंस वगेरे मूकीने अमुक सूचन कयु छे. काशीना मुद्रित पुस्तकमांनी केटलीक स्खलनाओ, संदिग्यताओ वगेरेनो निर्देश अत्र करवामां आल्यो छे. अवसरे आवश्यक टीप्पणी पण करवामां आवी छे. केटलीक टीप्पणीओ मूळ प्रतिमा हती ते पण अत्र मूकवामां आवी छे. आ प्रकारना संपादन पछी, श्रेष्ठी देवचंद लालभाई जैन पुस्तको- द्वार फंड संस्थाद्वारा प्रस्तुत गौतमीय-काव्यमन्य व्याख्यासहित प्रकाशनने पामे छे. आ प्रकाशननी पाछळ, श्रेष्ठी दे० ला० जैन पु० फं० संस्थाना प्राणभूत व्यवस्थापक मंत्री झवेरी जीवणचंद साफरचंदनी मुंगी व्यवस्थाशक्ति, यथाशक्ति आपभोग, अने संस्थाना प्रकाशनकार्यने आगळ वधारवानी काळजी; आ त्रणे य वस्तुओनो मेळ कारणभूत छे. या कारणे आ प्रकाशन आ रीतिये विद्वान जनसमाज समक्ष रजू याय छे.

१५
मारा पूजनीय परमोपकारी परमशासनप्रभावक परमगुरुदेवोना
अमेय उपकारने हुं आ अवसरे याद करूं छु, के जेओनी असीम
कृपादृष्टिना योगे हुँ रत्नत्रयीनी आराधना यथाशक्ति करी शकुं
छु. प्रस्तुत संपादन कार्यमा मने पूर्ण हितभावी मार्गदर्शन आपनार
पूजनीय शासनप्रभावक आचार्यदेव श्रीमद् विजयक्षमाभद्रसूरी-
श्वरजी महाराजजीना ए वात्सल्यभावने हुं कम भूली शकुं !
प्रान्तेः प्रेसदोष, गुफसुधारणानो दोष के अन्य अज्ञानताजन्य
स्खलना आ ग्रन्थमा रहेवा पामी होय तेनुं परिमार्जन करवापूर्वक
विद्वान अने अभ्यासी वर्ग आ काव्यग्रन्थy अध्ययन-अध्यापन
करी, श्रीजिनकथित श्रुतधर्मनी आराधनामां पोतानुं वीर्य फोरवो
अने आत्मकल्याणने साधो ए अभिलापा.
पू० परमशासनपभावक आचार्यदेव श्रीमद्
श्रावण शुक्ला पूर्णिमा. विजयरामचन्द्रसूरि-विनेयाणु
जैनशाळा-टेकरी,
स्थंभनतीर्य. [खंभात].
मुनि कनकविजय
वि० सं० १९९६,

शेठ देवचंद लालभाई जैनपुस्तकोद्धार फंडना कार्यकरो
टूस्टीमंडल
(१) मंछुभाई साकरचंद झवेरी
(२) नेमचंद अमेचंद जे. पी.
(३) नेमचंद गुलाबचंद देवचंद
(४) हीरामाई मंछुमाई झवेरी
(५) साकरचंद खुशालचंद झवेरी
अवैतनिक मंत्री
जीवणचंद साकरचंद झवेरी.

-प्रस्तावना :-- मन्याम्भोरुहबोधने दिनकरत्रिंशसमा भूतले मोहाज्ञानतमोमरं विघटयन् यो धर्मराज्यं व्यधात् ।। यश्चाहाय निनाय जन्तुनिकरं सर्गापवर्गालयं स श्रीवीरजिनेश्वरी भवतु वै सङ्घस्य हि श्रेयसे ।। -मारतीय-साहित्य म् - प्रकृतकाव्यविपये प्रास्ताविक किञ्चिद्यावन्निवेदयामि ततः पूर्व मारतीयसाहित्यम खरूपाऽनिवेदने न किल प्रकृतसंदर्मशुद्धिर्मवेदिति साहित्यस्यास्स सरूपमंशतो निवेदयामि भारतीय किल साहित्यं विश्वसाहित्यम् । अस्माद्धि साहित्याल्लु- दूरदूरवर्तिप्वपि देशेपु-अन्यान्यमापामयानि साहित्यानि कुत्रचि- जननमवापुः, कुत्रचिच्चारमनः संस्कारमकापुः । दृष्टान्तरूपेण गृह्यताम् -आर्यावर्त एवाविभूताद् बौद्धसंप्रदायात् कसिंश्चन समये ते ते ग्रन्थाः प्रादुर्भूताः, यैर्हि न केवलं भारतवर्ष एव अपि तु समुद्रपरपारवर्तिप्यपि देशेषु लोकानां हृदये सीयः प्रमावः प्रतिष्ठा- पितः । येषां प्रमावेणानुप्राणिताः सिंहल ब्रह्म-चीन-जयप्राणदेशीया बौद्धाः प्रत्यक्षमेव नः प्रमाणम् ।। न केवलमेतावदेव, मारतीयसारखतभाण्डागारस्सालौकिकरन- च्छटया प्रलोमितह्दया निर्निमेषीकृतनेत्रद्वयाश्च अन्यान्यदेशीया विद्वांसः सुमहता परिश्रमेण मारतवर्षे समागत्य तांस्तान् ग्रन्यान् लिलिखुः । अत्रत्येभ्यः पण्डितेभ्यश्च पठित्वा वस्खमापायां तान् ग्रन्या- . 2 १८ नन्ववादिपुः । सुप्रसिद्ध किल चीनदेशीययात्रिणां ह्युएनत्सांग'इत्सांग- प्रभृतीनां भारतयात्रावर्णनम् , यत्र हि ते समागत्य भारतीय साहित्य महता गौरवेण स्वभापायां निन्युः । एतदर्थ कियान् परिश्रमः सोढस्तैः, कियती दूरयात्रा चाऽनुभूता, कियन्तः पण्डिताश्च खप्रयोजनसिद्ध्यर्थमुपासितास्तैः, इत्यायध्यवसायस्तेषां यात्रावर्णने सुस्पष्ट एवैतिहासिकानाम् । फलमिदं तस्य संपन्नम् ---- आर्यावर्ताद् चौद्धसाहित्ये विलयं गतेऽपि तत्संवन्धिनो यहवो ग्रन्थाधीनमाप- याऽनूदिताः सांप्रतं चीनदेशे समुपलभ्यन्ते । नैतत् किल भारतीयानां खसाहित्यकीर्तिकीर्तनं खमुखजल्पितम् , अपि तु इदंयुगस्य सुम- थिताः प्रामाणिकाः साहित्यानुरागिणः पाश्चात्त्यदेशीया एव तवेषु साहित्यविवरणपुस्तकेषु इदं सडिण्डिमघोपमुद्घोषयन्ति । एवं सति भारतीयसाहित्येन चीनसाहित्यस्य कस्यचिदंशस्य जननं संपादि- तमिति न किं वक्तुं शक्यते ? सत्येवं च भारतीय साहित्यं विश्वसाहित्यमिति न किं साधयितुं प्रभवेम ? पाश्चात्त्यदेशीयैरसत्साहित्यादर्शनशास्त्राणां न्याय( तर्क )शास्त्रस्य ज्यौतिपादिविषयाणां च खभाषायां वर्तमानसमय एव समावेशः कृतो यं हि सांप्रतिका उभयमाषाविद्वांसः प्रत्यक्षं परिजानते । चत्वारिंशद्वर्षेभ्यः पूर्व तर्कादिविषयपाठनाय नासन् समुचिताः समपेक्षिताश्च मन्या इंग्लिशभापायाम्, परं सांप्रतं 'लॉजिक' (Logic) विपयस्य पाठ्यक्रमः (Course) सतग्ररूपेण नियमित- 1 Cf. "Yuan Chwang's Travels in India" by Huan Tsang, and also the Records of Buddhist Practices in India by I.tsang.

खैरात्ममापायाम् । कि नेदं मारतीयसाहित्यादपरसाहित्यस्य संस्करणं नाम ? अपि च -समुद्रपरपारवर्तिपु देशेषु अलल्ला- हित्योपजीवनेऽपि किं भारतीय साहित्यं विश्वसाहित्यमिति नाला- मियतुं शक्येत: -जैन संप्रदा यः, तत्सा हि त्यं च- कारणमस्येदमेव-यदत्र साहित्यप्रचारका महापुरुषास्तथा प्रभाव- शालिनः समभूवन येषामनुमावात् साहित्यमेव किम् , समग्रो देश एव सर्वतः प्रमावाक्रान्तः समभवत् । सकलजगति श्रेयःप्रचाराय परितो घोषितडिण्डिमो हि बैनसंपदाय एव गृह्यताम् । अत्र हि तत्ताशा महापुरुषाः प्रादुरासन् चेपामुपदेशाचरितानि च जनवाया हृदये मन्त्रस्येव प्रभावमुत्पादयामासुः । येन किल मनीषिणा पक्षपाव- त्यज्य तेपामुपदेशः श्रद्धयाऽश्रद्धया वा परिगृहीतते बलादिव दिनुगामिनो बभूवुः, श्रद्धानेन च वान् नियमान् स्त्रीचक्रुः । पार्यावर्तस्य कोणकोणे आहतसंप्रदायस्य विजयदुन्दुमिः कश्विन बले यसमन्तान्मुखरितो बभूव तस्य किं नायं स्पष्टो हेतुर्यचस्य पर्मस्य साहित्ये तादृशी शक्तिरासीत् , यत् मार्मिकजनताया हृदये अक्षुण्णं प्रमावं प्रस्फुटमुत्सादयामास ? अवश्यं श्रोतुहृदयवीकारे उपदेशकस्य आध्यात्मिकं चलम् , चारित्र्यसंपत्, सत्यं श्रद्धानं वेत्यादिकं कारणम् , किंतु एवंविधैर्महापुरुषैः प्रचारितं साहित्यमपि जाशमेव प्रभावशालि भवति यस हि हृदयतो मननै कृते मनन- कर्तुरन्तःकरणे अवश्यं खलु श्रद्धानसोदयो मवेत् । जैनधर्मेण श्रद्धानानां शिवप्राप्तये ते ते ग्रन्यास्ते ते उपदेशाम्बानि वानि साधनानि च संपादितानि येषां प्रमावो न केवलं मारते एव, अपि तु भारतदूरवर्तिदेशेप्वपि कदाचित्रं प्राचरत् । देश-काल- शासकादिमहिना सांप्रतं यद्यपि विपरीता परिस्थितिस्तथापि भारतेऽस्मिन् अन्यान्यधर्मापेक्षया जैनधर्मस्य कियान प्रसारः, कियद् गौरवम् , तदनुयायिषु च कियत् श्रद्धानमिति न वर्णनविस्तरमर्हति । स्थूलरूपेणैव गृह्यताम् - यद् व्यावहारिककार्यक्षेत्रेप्वेव जैनधर्मानु- यायिनां कियान भागः कीदृशश्च प्रभावो नाम । अस्तु, कारणमेतस्य प्रभावशालिनः साहित्यस्य प्रचारणमेव सर्वोपरिगम् । यस्य हि धर्मस्य सिद्धान्तो निर्दुष्टो वरीवर्ति, साहित्य सुदृढं प्रमावसंपन्नं च भवति, स एव धर्मः प्रसरति, लोकेषु श्रद्धानं च लमते, चिरकालं च लोकालये विहरति । जैनसाहित्ये त इमे गुणाः सुस्पष्टं प्रमाणिता भवन्ति । एतदर्थ न प्रमाणान्वेषणस्य परिश्रमः सोढव्यो भवेत् । प्रत्यक्षमिदमेव प्रमाणमस्ति यदसद्धयेषु वर्षेषु व्यतीतेपु, तत्प्रचारकेषु शासकेषु नष्टेषु, प्रत्युत विपरीत- धर्मानुयायिषु शासकेषु वर्तमानेषु, किं देशे किं काले पाने सर्वत्रैव विपरीतपरिस्थितावुपस्थितायामपि सांप्रतं जैनधर्मः खैर विहरति, मोदते अन्यान्यधर्मापेक्षया बहुलं बलशाली च । किं नास्य कारण- मिदम्, यदेतस्य साहित्यं प्रचुरं प्रभावशालीति ? सचायां गुप्तायामपि यकस्यचिन्मतस्य परितः प्रचारो दृश्यते तत्र तदीयं साहित्यमेव कारणमूतम् । साहित्यं हि व्यतीतेप्वप्यनन्तवर्षेषु अक्षुण्णवलमिव सर्वतः समभावं प्रसारयति । -जैन काव्या नि- साहित्यपदेन 'लिटरेचर (Literature) पदयाच्यं तदीयं बाम- यम् (लेखसाहातः, ग्रन्थसमूहो वा) गृह्यते । साहित्ये च यथा शासन- २१ - नियमग्रन्थाः पुराणानि सूत्रग्रन्थसङ्घातो न्याय-व्याकरणादिप्रमाण- अन्याश्च परिगृह्यन्ते तथा काव्यान्यप्यत्रैवान्तर्मवन्ति । मर्मविचारे तु प्रधानं स्थानमधिकुर्वन्ति । लोकानुरञ्जको रमणीयोऽर्थः, तदनु- कूलाः कर्णसुखदाः शब्दाश्चेत्येतत्सङ्घातात्मक हि काव्यं प्रख्यायते । काव्यं हि खमाधुर्येण विद्रोहिणमपि जनमात्मवशे करोति । खिन्न- मपि हृदयं प्रसादयति, प्रतिकूलमप्यनुकूलमापादयति । धर्मस्य तत्सिद्धान्तानां च प्रचारे कठिनकठिनाः प्रमाणग्रन्था वादग्रन्थाश्च कदाचिन्न प्रभवन्ति । तेषां हि शक्तिस्तद्हणसामर्थ्यशालिषु विद्व- रखेव परिजृम्भते । विद्वांसश्च खखमते दृढाग्रहशालिनो भवन्ति । अत एव तेषां पुरतः खधर्मविवादस्योपस्थापनेन न तावत् फलमीक्ष्यते । ; ये तु सामान्यबोधशालिनो भवन्ति, येषां च हृदयं जिज्ञासा- परवशं भवति, ज्ञानपिपासा च येषां हृदये जागर्ति, कस्मिन्नपि विषये येषां संशयो खुदेति, कमपि विषयं ज्ञातुं कौतुकं वा येषां भवति ते हि मार्मिफरूपेण बोषिताः खल्पायासेनैव वक्तव्यविषय गृहन्ति । यदि च वक्तव्यविषयः सत्यः प्रभावशाली च भवति तर्हि सर्वदाऽर्थ ते तदनुयायिनोऽपि भवन्ति । एवंविधानामधिकारिणां बोधाय 'काव्यम्' एव सर्वतो लब्धसाफल्यम् । क्लिष्टम् अमनोनीत- मपि गुडजिहिकारूपेण ग्रहीतुमेव काव्यस्य जन्म । काव्यं हि. । श्रोतुहृदयम् अनुरञ्जनपूर्वकं खवशे कृत्वा ततस्तदनन्तरं खोपदेशः तस्मिन् संचारयति । एतदेव प्रमेयानामभिमुखीकरणं । नाम । अस्तु नाम नायं विषयो विस्तरमहति । . जैनसंप्रदायस्य साहित्यांशः, तत्रापि च काव्यविभागो न कस्स-. [ - ।

२२ चिदपि संप्रदायस्य साहित्यान्न्यूनतां स्पृशति, जैनविद्वद्भिरनेकानि गद्य-पद्यकाव्यानि प्रकटितान्यद्यावधि येषां हि प्रभावच्छन्ना न केवलं जैनधर्मानुयायिन एव, अपि तु अन्यान्यधर्मग्राहिला अपि काव्यमाधुर्यमुग्धास्तेषु सप्रशंसं प्रवर्तमाना दृश्यन्ते । प्रत्यक्षं प्रमाणमि- दमेव यत् शैव-वैष्णवधर्माग्रहिभिरपि विद्वद्भिरात्मपुस्तकमालासु जैन- काव्यानि परमादरेण संगृहीतानि, यद्यपि जैनपुस्तकमालासु शैवादीनां काव्यानि न कदाचिस्पृष्टानि । मुंबय्यां निर्णयसागरयन्त्रालयेन बहोः कालापूर्व या 'काव्यमाला' नाम्नी ग्रन्थमाला (Series) प्रकाशिता यस्या हि प्रारंभको महामहोपाध्यायः पं. श्रीदुर्गाप्रसाद- शर्माऽभूत् । एतस्याश्च पुस्तकमालायाः संस्कृतसाहित्योपरि अनपाकर- णीयमृणम् । यतो हि काव्यमालायां तचादृशानि पुस्तकानि प्रकाशि- तानि यैर्विना संस्कृतसाहित्यमन्दिरस्य मूयानंशः शून्य एवासीत् । काव्यमालाप्रकाशनात् पूर्व प्रायः पञ्च महाकाव्यान्येव विद्वांसो जानन्ति स्म । किन्त्वनया पुस्तकमालया अलङ्कार-नाट्य-नाटक- काव्यादीनां ते ते ग्रन्थाः प्रकाशिता यान् दृष्ट्वा समग्र साहित्यजगत् चमत्कृतमभूत् , यैश्च संस्कृतसाहित्यमिदं वास्तव एव शोभाशालि संवृतम् । एतस्याः काव्यमालाया भूयानंशो जैनविदुषां लेखनीप्रसूतः । श्रीतीर्थकरचरितानि चन्द्रप्रमचरित-नेमिदूत-नेमिनिर्वाणादिका. न्यनेकानि यथा प्रकटितानि तथा धर्मशर्माभ्युदयादीन्यपि प्रकाशं नीतानि । साक्षात्स्तोत्रग्रन्थानां श्रीभक्तामरस्तोत्रादीनां तु मालैव पृथगेका प्रकाशिता येषां कृते तस्या एको 'गुच्छकः एव पृथङ्ग निगुम्पनीयोऽभवत् । एवमेव गद्यकान्यानि यशखिलकचम्पू-तिलक- मञ्जरीप्रमृतीन्यपि काव्यमालायां प्रकाशितानि जैनपण्डितानां सार- खतवैभवसूचकानि । एमिः काव्यलोंकानुरञ्जनपूर्वकं धर्मथद्धान- प्रचारस्य जैनसिद्धान्तप्रकाशनस्य च कार्य किमार्यावर्ते न कृतम् ! प्रत्यक्ष प्रमाणमिदमेव-यत् काव्यमाला विना जैनकाव्यैरपूर्णेवा- भविष्यत् । अद्यापि च तत्तेपां काव्यानां प्रशंसका अन्यान्यधर्मनिष्ठा अपि काव्यमालावाचका विद्वांसो यहुशः थ्रयन्ते । इदमेव हि काव्यनिर्माणस्य मन्ये साफल्यं नाम । -श्री गौतमी य काव्यम् - प्रकृतमिदं काव्यमनेनैवोद्देश्येन जैनसारखतभाण्डागारे रत्नमिव चमत्कुरुते । जैनसंप्रदायं प्रति प्रमेयानुन्मुखीकर्तुम् , अहिंसा-दया- व्रतानुगामिनां श्रद्धानं दृढीकर्तुमेव च कविगगनचन्द्रेण श्रीमता पाठकेन रूपचन्द्रेण तदिदं काव्यमुपनिवद्धम् । नामतम्तदिदं काव्यम्, किंतु जैनसंप्रदायरहस्ययोधने प्रमाणग्रन्था वादग्रन्था वा यावन्न प्रभवन्ति ततोऽप्यधिकमिदं तनुशरीरं महाकाव्यं सिद्धान्तबोधने सम्यक् प्रभवति । अत एवैतदर्थकृते अमोघं साधनम् , वाचकलोका- नाममिमुखीकरणाय सफलमुपकरणम्, आर्हतमतप्रचारणाय च सर्वतः प्रमावशालि शस्त्रं नाम । एतस्मिन् '.हि श्रोतृणां मनोरञ्जनाय पूर्वमुपवनशोमावर्ण- नम्, पङ्गनुवर्णनम्, समवसरणमुपमावर्णनम्, एतदादिका विषयाः प्रगुम्फिनाः कविना 1 तदनन्तरं तु साक्षादुद्देश्यमेव (अर्थात् जैनसिद्धान्तवर्णनम् ) उपक्रान्तं भवति । काव्यगगनरवेः श्रीरुपनन्द्रकवेः कवितानिगुम्मनपाटवं तया विद्यते येन हि २४ क्लिटोऽपि विषयो नीरसोऽपि च वयो लोकानां हृदयावर्जनक्षमो भवति । कस्यचन संप्रदायस्य प्रमेयवर्णनं सिद्धान्तपरिस्थापनं वा न किल मनोरक्षककथेव लोकानां हृदयहरणे समवेदिति जानन्ति सर्वेऽपि । किंतु श्रीमतो रूपचन्द्रगणेः कवितानैपुण्येन शुष्कापि सेयं सिद्धान्तवर्णनाऽऽरमटी तथा संवृत्ता यथा मनोयोगेन याचयि- तुरन्तःकरणमवश्यं तदनुगामि भवति । अयमेव कवेः कवितायाश्च प्रमावो नाम । एतेनैव हि काव्यस्य साफल्य परीक्षितं भवति । प्रमेयानामुपदेशायैव हि काव्यानामुत्पतिः । यत उक्तम् - -"काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये सद्यः परनिर्वृतये कान्तासंमिततयोपदेशयुजे" इति । ततश्च श्रोतारो मनोरञ्जनपूर्वकं वक्तव्यविषयानुगामिनश्चेत् संपद्यन्ते तर्हि सुस्पष्टमिदं सफलं काव्यं नाम । -काव्यस्य वर्णनाशैली- ऋतु-उपवनादिवर्णने तु कवेर्मधुरा रचनाऽस्त्येव, परं सिद्धान्त- तत्त्ववोधनेऽपि सैव कवेः शैली एकान्तभावेन प्रचलतीति महदेव गौरवं कवयितुः । दृश्यताम् -गौतमस्य (इन्द्रभूतेः) संशयनिवा- रणपूर्वकं चारित्रमवेशाय यदिदं मगवतः प्रकथनमुपनिबद्धं तस्य - प्रारम्मे, "यदहं संशयच्छेदी सर्वज्ञ मां प्रतीहि तत् ।" इत्यारभ्य (पृ० १४०, श्लो० १४) सप्तमसर्गस्यान्तपर्यन्तमति- गहनो विपयो वर्णितोऽस्ति । अत्र हि आत्मपदस्य साधनं कृतम् । पाश्चात्त्या वैज्ञानिका आरमपदार्थ नाऽधुनापि मन्यन्ते । बहवः किश्चित् किचिन्मत्वापि न मन्यन्त एव.। यहवस्तु-बुद्ध्या न बोदूं २५ शक्यत इति निरस्ता भवन्ति । एवंविषगहनस्याप्यात्मविपयस्य कान्येऽस्मिंस्तथा वर्णनम्, आत्मनस्तथा सिद्धिः कृता दरीदृश्यते यथा काव्यबोधशक्तिशाली जनो निःसंशयं तचत्ववोधने क्षमेत । वीरेण भगवता गौतमस्य हृदयगतः संशयः स्वमहिम्ना परिज्ञातः । आसीद् गौतमस्य हृदये वेदवाक्यतत्त्वानवबोधात् संदेहः । तस्य हि खगास्त्रा. नुसारमात्मनः साधनं निःसन्देहतया हृदि सिरीभवति स । यतो हि आत्मज्ञाने न प्रत्यक्ष प्रमाणं भवितुमर्हति । माह कविः- "प्रत्यक्षेण प्रमाणेन ग्रहीतुं नैव शक्यते । इन्द्रियग्राखताभावातस्मान्नास्ति खपुप्पयत् ॥ १८" एवमनुमानमपि तत्र न प्रमाणं प्रभवति । यथा- 'कृशानोमवल्लिङ्गं किमप्यस्य न लभ्यते । यत्संबन्धेन जीयोऽयमदृष्टोऽप्यनुमीयते ॥ १९" अनुमान हि लिनेन ( हेतुना) लिगिनः (साध्यस्य) संबन्धे सति (यथा धूमस्य यहिना सह कार्यकारणभावसंबन्धे सति) सिध्यति । तथा आत्मनः किश्चिल्लिनं न दृश्यते येनाऽनुमानं भवेत् । ननु चेतना आत्मनो लिङ्गम् । न हि आत्मानं विना चैतन्यमव- तिष्ठते । अत एव चैतन्येन लिनेन आत्मनोऽनुमान स्यादिति पूर्वपक्षमपि निरस्पति कविः अस्तु वा चेतना लिहं संवन्धस्त्वनयाऽस्य च । प्रत्यक्षो नेक्षितः कापि प्रारू, ततः कानुमेयता ! ।। २०" एवंप्रकारेण - अनुमानमुपमान शब्दादिकं सर्वमपि प्रमाणजात- मात्मनः साक्षात्काराय निरत्सति श्रीमहावीरो मगवान् । किं बहुना, .

-
शब्दरूपं वेदाख्यं प्रमाणमपि यद् गौतमस्य हृदये जागर्ति स
तदपि भगवता निरस्यते । यथा
"परस्परविरोधिन्यागमानामपि भारती ।
वृहस्पतिहि भूतातिरिक्तं जीवं न मन्यते ॥ २६"
(पृ० १४८)
एवं किल आत्मनः साधनाय ये ये उपायाः प्रसिद्धा आसंस्ते
सर्वेऽपि निरस्ता तत्रभवता वीरभगवता । समाधानाय अप्रभवन्
महाविद्वानपि गौतमश्चित्रीयते स्म,
"श्रुत्वेति भगवद्वाक्यं गौतमोऽन्तश्चमत्कृतः ।
अहो! सर्वज्ञ एपोऽस्तु दध्याविति विशुद्धधीः ॥ ३६"
(पृ० १५३)
एवं प्रमाणवले गर्वितस्यापि गौतमस्य सर्वमपि ज्ञानबलं निरस्य
खयुक्तिभिरात्मपदार्थस्य साधनं शिक्षयति श्रीवीरो भगवान् -
"सुखदुःखे स्वसंवेद्ये प्रत्यक्ष भवतो यदि ।
शृणु गौतम ! संदेहविज्ञानं किं तथा न हि ॥ ४१
विज्ञानमय एवं हि प्रत्यक्षो जीव इप्यते ।
प्रमाणान्तरसाध्यत्वमसत्यस्मिन् विचार्यते ॥ ४२"
(पृ० १५५)
अर्थात् तव सुखदुःखे खेनैव संवेये, ततश्च प्रत्यक्षज्ञानविपये ।
एवं तव हृदये संशयोऽपि जागत्येव, यतो संशयवशादेव त्वं
च्यामुघसि । एवं च मुखदुःखानुभवस्य स्वीकारे, संशयज्ञानस्य
चामीकारे सिद्ध एवारमा । यतो सारमानं विना नानुभवः, न

२७ चानानम् । अत एव विज्ञानमय आत्मा स्पष्टं सिद्यत्येवेत्याशयः। एवमेव- "अहंप्रत्यय एकोऽपि क्रियां त्रैकालिकी स्पृशन् । प्रत्यक्षो दृश्यते, जीवं विनाऽहंप्रत्ययः कुतः । ॥ १३ शरीर एव चेदेप प्रत्ययो गृह्यते तदा। तदवसे शरीरेऽपि मृतस्य न मरेकथम् ॥ ४१" (पृ० १५७) इत्यादिमिरन्यामिरपि युक्तिभिः यात्मपदार्थस साधनं बोधयति भगवान् श्रीमहावीरः । किं बहुना, ये ये विपया वेदादितोऽपि गौतमस्य हृदये सम्यग्रूपेण प्रमाणिता नासन् तेऽपि सर्वे गहनविपया श्रीवीरेण भगवता तथा चोधिता यथा न केवलं गौतमश्चकित एव, अपि तु, "इत्यं संशयघातकानि वचनान्यापीय वीरप्रमोः सर्वन्त्वमिहाधिगत्य जगतामीशलमालोक्य च । वाणैश्चात्रशतैरसौ परिवृतो मिथ्यालमोहोझित- चारित्रं प्रविवेश सर्वविरति तीर्याप्रणीस्तमः ॥ ८१" (पृ० १७९) एवमेव गौतमस्य (इन्द्रभूतेः) भातुः अग्निभूतेरपि मनोगतं संशयादिकं ज्ञात्वा तं तयोपदिशति यथा सोऽपि एतत्प्रमावाच्छन्नो भवति । अलिन् प्रकरणे कर्मण एव सर्वतः प्रमुतं समर्थितम् । तदपि तथा युक्तिमिर्यथा ताः समधिगम्या मवेयुः. "साधनेप्विह समेषु विशेषो यः फलेऽस्ति च कारणयोगात् । गौरपन्धुपु समेपु य एकः श्यामलः स विषमाशनहेतोः ॥ १५" (पृ०१८७) - अयमपि तथोपदिष्टो मवति यथाऽन्ते-- "खण्डिकैः : सह शिवोचितमागें सोऽग्निभूतिरपि दीक्षित आसीत् ॥" एवमनयोात्रोल घुबन्धुर्वायुभूतिरपि देह-जीवयोमेंदं रोचकयुक्ति- भिरुपदिष्टः । यथा हि- " यत्सुराङ्गसमवायसमुत्था क्षीयता न परतोऽञ्चति किश्चित् ।। चेतना क्षिति-जला-ऽनलवायु- व्यूहजेयमिति चेतसि वेसि ॥ ३४" (पृ० १९८). इति शङ्कायाम्, "या च शक्तिरसती प्रतिवस्तु सा कुतः समुदये समुदेति । चेदिदं न, सिकतासमवाये किं न तैलजननं जगतीप्टम् ॥ ३६" (पृ० १९९) इत्युत्तरमाह । अर्थात् यद्येकस्मिन् वस्तुनि असती अपि चेतना वस्तुसमुदये खतः समुदेति तर्हि सिकताया एकैककणे असदपि तेलं सिकतासमुदये कुतो नोत्पद्येत ? अतो देहे भूतसमुदयजा चेतना नास्तीत्याशयः। एतदनन्तरं व्यक्ताचार्य-सुधर्मोपाध्यायमण्डितखामि-मौर्यपुत्र-अक. पितोपाध्याय-अचलमातृ-मैतार्यादयो विभिन्नसंपदाये लब्धप्रतिष्ठाः सुमहान्तो विद्वांसोऽपि वथोपदिष्टा यथा ते भक्तिपूर्वकं जैनागम-- दीक्षां जगृहुः, ये भगवदनुमहेण गणनाथाः सन्तश्चतुर्विधसई प्रति- पोधयन्तो मुक्तिपदं प्रापयामामुः । एतेपामुपदेशमसोन देवाना- मस्तित्वं, नारकादिसचा, धर्माऽधर्मव्यवस्मादिकं च तथा स्फीताभि- २९ रुपपत्तिमिः प्रतिपादितं यथा साधारणव्युत्पचिशास्यपि जनो गूढानपि विषयानिमानजसाऽवबुध्येत । कविमुकुटमाणिक्यचन्द्रेण श्रीरूपचन्द्रेण इतिहासोऽयं तथा महत्त्वशालिन्या पद्धत्या प्रगुम्फितो यथा विरुद्धविचारशालिनोऽपि जनस्य जैनागमं प्रति महत्त्वबुद्धिरुदयेत् । यतो हि गौतमो महा- विद्वान् वेद-वेदाङ्ग-द्वासप्ततिकलादिसमग्रजातव्यानां पारंगम आसीद, यश्च शिशुत्वे क्रीडाऽऽसक्तोऽपि शब्दशास्त्रवेदिनां मूर्द्धमणिरभूत् । उक्तं हि- "पुरःसरोऽसौ पदवाक्यवेदिना- ममूच्छिशुत्वेऽपि ललन् स्वलीलया ॥ ततो द्वयोर्गीपतिसर्पराजयो- रयं तृतीयो मुवि पूज्यतापदे ॥ १५" (पृ० ८४) यो वेदोक्तकर्मकलापे जन्मतः शब्दशाली सुनिपुणश्वासीत् , यस वैतादृश्यलौकिकी शक्तिरासीत् सोऽपि महाप्रमावो गौतमो वीरजिनेश्वरस्य वचनामृतेन आजन्माऽभ्यस्त मार्ग परित्यज्य जैनागमे दीक्षितो बभूव । ततः सांपतिकविद्वन्मानिनां तु जैनमत- खण्डनाय को या दम्मः स्यात् ! एवं किल जैनागमविजयडिण्डिमं सर्वतः प्रचारयन् महाकाव्य- मिदं यथा धर्मतत्त्वबोधनायाऽलम् , तथा श्रद्धानदृढीकरणायापि पर्याप्तम् । विचार्यतामिदानीमस्य काव्यस्य साफल्यं गार्मिकैः काव्यं हि शिक्षीयान् स्वाभिमुखीकृत्य सामिप्रेतमुपदेशविपयं तेषु .

३० - प्रचारयत्येव काव्यनिर्माणस्य मुख्यमुद्देश्यम् । तदिदमुद्देश्य सुस्फुट- मेव पूरितम् , यतो हि जैनागमस्य तात्त्विकमुपदेशं श्रुत्वा वैदिका. दिमागेषु सुदृढाः, सर्वतः प्रसिद्धपाण्डित्या अपि महाविद्वांसोऽत्र श्रद्धाशालिनः संपद्यन्ते । एवंविध एवं प्रभावस्तीर्थकरमहिना प्रचारितः, अयमेवातिशयो महावीरादिवाणीनामिति सुदृढमुपदेशः काव्येनानेन वाचयतां हृदये दृढीक्रियते । अनेनोपदेशेनाभिमुखी- भूतेषु प्रमेयेषु किं न साफल्यं महाकाव्यस्याऽस्य ? तदिदम् पाठकश्रीक्षमाकल्याणगणिकृत 'गौतमीयप्रकाशाख्य'- व्याख्यासहितं श्रावकानां ज्ञानदृढीकरणाय संप्रति महता परिश्रमेण प्रकाश्यते । टीकेयमतिविशदा, अतिसरलपद्धत्या सान्वयं व्याख्यान- मुपस्थापयति । लोकप्रसिद्धस्य पाणिनीयव्याकरणस्यानुसारेण च सर्वत्र शब्दसाधुत्वं बोधयति । सांप्रदायिकमावश्यक तत्त्वमपि स्थाने स्थाने सेयं सुरुचिरया सरण्योपदिशति । स्थले स्थले श्रीहेमचन्द्रसूरीणां विशेपावश्यकवृत्त्यादीनां चोद्धरणान्यपि टीकायामस्यां दचानि । काव्यमिदं कस्मिन् स्थाने कदा निर्मितम् , कश्चायं कविरवी रूपचन्द्रकविरित्यादिकं विवरणं नाहमत्रोल्लिखामि । अन्थे एव "संवच्छैल-वियद्गजोमुप(१८०७ )मिते मासे सहस्याऽऽदिमे पक्षे दक्षमुताधिनाथदिवसे शुद्धे तृतीयातिथौ । श्रीमद्योधपुरे कमध्वजरवी श्रीरामसिंहे नृपे श्रीमच्छी जिनलामसूरिगणभृद्राज्ये पुनामिके ॥१ विद्याचारवरे गणे सरतरे श्रीक्षेमकीय॑ऽन्वये समाता मुवि शान्तिहर्पगणयः श्रीवाचकाख्याभृतः ।

तच्छिष्या जिनहर्पनाममुनयो वैरङ्गिकाग्रेसरा- तच्छिप्याः सुखवर्द्धना अपि दयासिंहास्तदीयास्तथा ॥ २ तच्छिप्योऽभयसिंहनामनृपतेलब्धप्रतिष्ठो महा- गम्भीराऽऽहंतशास्सतत्त्वरसिकोऽहं रूपचन्द्राहयः । प्रख्याताऽपरनामरामविजयो गच्छे स दत्तास्यया काव्येऽकार्पमिमं कवित्वकलया श्रीगौतगीये श्रमम् ॥ ३॥ (पृ० २८८) इत्यादिभिः स्पष्टरूपेण दत्तम् । एतदन्थस्य तत्त्वानु- शीलनेन मार्मिकजनाः खयमेतस्य गुणान् महत्त्वं च परिजानीयुरिति किं वा वृथाक्षरक्षरणेन ? सर्वथा जैनागमदीक्षापालकानां शिक्षोपयोगि महाकाव्यमिदं श्रद्धालूनां निश्चितं श्रद्धावर्धनाय भवेदिति भगवतः संप्रार्थ्याह विरमामि- ‘निर्णयसागरमुद्रणालयम् सुधीविधेयः मुंबई नं.२ नारायण राम आचार्यः "काव्यतीर्थः" ।

श्रीमत्कृप्याराधितपाईनेमिजिनाभ्यां नमः किञ्चिद्वक्तव्य " विद्वद्वन्दमनोज्ञकाव्यततिभिर्यः स्तूयते सर्वदा, भूपालप्रतिवोधको गुस्मतिः सिदान्तपारगमी। व्याख्यादानविचक्षणः शुमगुणैविख्यातकीर्तिः सुधीः, आनन्दाब्धिमुनीश्वरं गणपति वन्दे महाज्ञानिनम् ॥ शेठ देवचंद लालभाई जैनपुस्तकोद्धार फंडनो " 'गौतमीयमहाकाव्य' अन्य प्रसिद्ध करवा सिद्धिदातानीकृपावडे प्रयत्नवान् थयो छु. अन्यकार, टीकाकार तथा काव्यादि संबंधे संशोधक श्रीकनकविजयजीना आदिवचनमा भने शास्त्रीजी नारायण राम आचार्य “काव्यतीर्थ" नी प्रस्तावनामां कहेवामां आवेलु होवाथी विशेष कांई कहेवू रहेतुं नथी, शास्त्रीजी काव्यतीर्थ नारायण आचार्य संस्कृतमा विद्वत्ता अने विचारपूर्ण प्रस्तावना लखी अन्यने समझवामा सुगमता करी आपी होवाथी ए महाशयनो उपकार मार्नु छु. तपगच्छनी विजयशाखामां मुप्रसिद्ध पंजाब-उद्धारक श्रीविजयानंद (आत्मारामनी) सूरीधरनी पहेली विजयकमलमूरीय शाखामां श्रीमद् दानमूना शिष्य विद्यमान आचार्य म. श्रीविजयप्रेमसूरिजीना पट्टधर श्रीमद् विजयरामचन्द्रसूरिना शिष्य बालब्रह्मचारी श्रीकनकविजयजीये श्रीमद् विजयक्षमामदसूरिनी प्रेरणाथी आनुं संशोधन करी आप्यु छे, वे बदल एओश्रीनो अंतःकरणपूर्वक आभार मार्नु छ. आ पठी प्रसिद्ध यनारा ग्रन्योमा (१) वैराग्यशतक,वैराग्यरसायन, पद्मानंदात उस्लासिकस्तोत्र, धर्मशिक्षाप्रकरणं आदि वैराग्यादि शतको (२) अभिधानकोप, निघंटुरोप, लिंगानुशासन, शब्दमेदप्रकाश, एकाक्षर नाममाला, शिलोंछ आदि अने (३) जैनकुमारसमवसटीक वगेरे प्रेसमां चाल है. तेमज (१) प्रमाण- नयतस्वलोसलंकार न्यायावतारिका टीका, टिप्पण, पंजिन सहित तथा (२) आवस्यकनियुक्ति छपाययानो विचार ट्रस्टीयो करी रया छे. मुंबई ता. १३-१-४१ सं. १९९७ पाप ध पूर्णिमा, अवैतनिक मंत्री. } जोयणचंद साकरचंद जयेरी ॥ विश्वहितयोधिदायफश्रीअमीविजयगुरुभ्यो नमः॥ श्रेष्टि-देवचन्दलालभाई-जैनपुस्तकोद्वारे- पाठकथीरूपचन्द्रगणिविरचित श्रीगौतमीयकाव्यम् । श्रीक्षमाकल्याणगणिकृतगौतमीयप्रकाशाख्यटीक्रया सहितम् । ॥ॐदी नमः॥ ॥ श्रीगवडीपार्श्वनाथाय नमः ॥ --00-000- ३ अनन्तविज्ञानमयं विशुद्धं निरुद्धरागादिपरप्रचारम् ॥ जिनोत्तम वीरमचिन्त्यशक्ति निधाय भन्या हृदयाजकोशे ॥१॥ निराश्रवोद्दामगुणैकयामसमुल्लसद्विघ्नविघातक्षम् ॥ गणेश्वराणां गणमुक्तियुक्त्या विधाय सद्यास्तुतिगोचरं च ॥ २॥ प्रणम्य रम्यं गुरुपादपनं सरस्वतीं चामिनिवेश्य चिचे ॥ श्रीगौतमीयोत्तमकाव्यवन्धे वितन्यतेऽसौ प्रवरः प्रकाशः॥३॥६ त्रिभिः संटहः । अथ तत्रभवन्तः श्रीमन्तः कवयः पाठकरूपचन्द्रगणयः सत्का- व्यस्याऽनेकशेयःसाधनतां पश्यन्तो निर्दुष्टसकलजनमनश्चमत्कार-१ कारि चारु गौतमीयाख्यं महाकाव्यं चिकीर्षवश्चिकीर्षितस्यार्थस्यावि- मपरिसमाप्त्यर्थम्, 'आशीर्नमस्किया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखम्'. इत्युक्तत्वादन्यादावाशीराधन्यतमं मङ्गलमवश्यं कर्तव्यमिति मन्वानाः ११ १ अनेन ज्ञानातिशयः सूचितः। २ अनेनापायापगमाविशयः सूचितः । ३ अनेन पूजातिशयः।.४ अनेन वचनातिशयः ।

२ श्रीगौतमीयकाव्यं श्रीवीरप्रमोरपापापुरी मति या प्रस्थानेच्छा तद्रूपं वस्तु निर्दिशन्तः प्रबन्धमुपनिबध्नन्ति ॥ तत्रादिम काव्यमाह- श्रीराचिरासीदिव दिव्यदीप्तिर्यस्यात्मनि ज्ञानमयी समग्रा । तीर्थप्रवृत्त्यै स च वीरनाथः प्रस्थातुमैच्छन्नगरीमपापाम् ॥१॥ ६. स वीरनाथो वीरप्रमुस्तीर्थस्य चतुर्विधसङ्घस्य प्रवृत्त्यै प्रवृत्ति का, तीर्थ प्रवर्तयितुमिति यावत् । अपापाम् । अपापासंज्ञिकां नगरी प्रस्थातुं गन्तुमैच्छत्-वाञ्छति स । यचदोर्नित्याभिसम्बन्धात् स क इत्यत ९आह-यस्वेत्यादि । यस्य वीरप्रभोरात्मनि चेतने समयाऽखण्डिता ज्ञानमयी निखिलधनघातिकर्ममण्डलविपक्षपक्षक्षयसमुद्भूतकेवलज्ञान- खरूपा श्रीलक्ष्मीराविरासीत्-प्रादुरभूत् । श्रीः केव ? दिव्यदीप्तिरिव १२ अद्भुतं ज्योतिरिव, यथा भगवत एव अन्यस्य वा कस्यापि उत्तम- स्थात्मनि दिव्यदीप्तिः प्रादुर्भवति तथेयमपीति भावः । केवलश्रियो हि लोकालोकप्रकाशकत्यादिव्यदीप्त्यौपम्यम् ॥ आविरासीदिति । १५ आविरिति निपातः प्राकट्यार्थस्तत्पूर्वात् 'अस् मुवि' इत्यस्माद्धातो:- करि लङ् । दिव्यदीप्तिरिति । दिव्या चासो दीप्तिश्चेति कर्मधारयः, दिव्येत्यत्र 'द्युमागपाक्' (४।२।१०१) इति यत् 'दिव्यं वरगु-लवनयोः, घुमवेऽपीति हैमानेकार्थः । ज्ञानमयीति । ज्ञायते परिच्छिद्यते वस्त्व- नेनेति ज्ञानं तत्स्वरूपमस्या इति स्वरूपेऽर्थे मयद, ततः "टिड्डाण" (१११११५)इति डीप् । तीर्थप्रवृत्त्य इति । तीर्यते संसारवारिधिरने- २. नेति तीर्थम्, 'तृ प्लवनतरणयोः' इत्यसादौणादिकस्थसत्ययः, पवर्तनं प्रवृत्तिस्ततः षष्ठीतत्पुरुषः "क्रियार्थोपपदस्य" (२।३।१४) इति २३ चतुर्थी, तादध्ये चतुर्थी वा । वीरनाथ इति । वीरण्यासौ नाथश्चेति गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । ३ कर्मधारयः । 'वीरो जिने मटे श्रेष्ठे' इति हैमः । प्रस्थातुमिति । अपूर्वात् 'ठा गतिनिवृत्तौ' इत्यस्मात् “समानकर्तृकेपु" (३।३।१५८) इति तुमुन्प्रत्ययः, यतोऽत्र प्रस्थानविपयिणीच्छा प्रतीयते, न तु३ प्रस्थानार्थेच्छा इत्यतः "तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियायाम्। (३३३३१०) इति पूर्वसूत्रेणाप्राप्तिरिति भावः। ऐच्छदिति । 'इषु इच्छायाम्' इत्यस्मात्करि लङ् । ननु भगवतो वीतरागस्य सर्वथा निःस्पृहेन इच्छाया अभावात् कथमैच्छदित्युक्तम् ? उच्यते। उपचारात् । इत्थमेव च श्रीभगवतीसूत्रवृत्त्योः प्रारंभेऽप्युक्तमस्ति । तथाहि 'संपा- वितुकामित्ति,' प्राप्नुकाम इति च यदुच्यते तदुपचारात्, अन्यथा हि ९ निरभिलाया एव भगवन्तः केवलिनो भवन्ति । 'मोक्षे भवे च सर्वत्र निःस्पृहो मुनिसत्तम' इति वचनादिति । अपापामिति । प्रायः सकल सुकृतिजनाधिष्ठितत्वात् नास्ति पापं यस्यां सा, तामित्यन्वर्थसंज्ञेयम् । १२ स चेत्यत्र चकारस्तु पादपूरणे वाक्यालङ्कारे वा, अव्ययानामनेकार्थ- त्वादिति भावः । इह प्रबन्ध आदितः श्रीशब्दप्रयोगाद्वर्णगणादिदोषो- ' पनि त्रातीवोपयोगभाग् भवति । तथोक्तम्- "देवतावाचकाः शब्दा १५ ये च मद्रादिवाचकाः । ते सर्वे नैव निन्द्याः स्युर्लिंपितो गणतोऽपि च' इति ॥ १॥ सर्गेऽस्मिन्निन्द्रवज्रोपेन्द्रवजोपजातयो वृत्तानि । । तल्लक्षणानि यथा-"स्यादिन्द्रवजा यदि ती जगौ गः १, उपेन्द्रवजा १८ जतजास्ततो गौ २, अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजी पादौ यदीयावुपजात- यस्ताः ॥ ३॥" इत्यलं प्रसङ्गेन ॥ १॥ तदानीं कि संजातमित्याह- तावद्विदित्वागममस्यं धात्रीपतेरिय व्यन्तरदेवसङ्घः । इव क्रियावान्वनपालवर्गस्ससर्ज रम्यं महसेनपण्डम् ॥ २॥: २५ - -- - २१ ति का

श्रीगोवमीयकाव्यं
1 • तावत् प्रथमं क्रियावान् खोचितकार्यकरणोद्यतो व्यन्तरदेवसको
व्यन्तरजातीयमुरसमूहोऽस्य वीरप्रमोरागममागमनं विदित्वा ज्ञात्वाऽव-
६ पिज्ञानेनेति शेषः । महसेनपण्डं । अपापापुर्युपकण्ठवर्ति महसेनना-
मकं वनं रम्यं रमणीयं ससर्ज रचयामास व्यन्तरदेवसङ्घः । क इव ।
वनपालवर्ग इव, वनपालकसमूह इव अस्य । कस्येव । घात्रीपतेरिव
६ भूपतेरिव, यथा क्रियावान् वनपालवर्गो धात्रीपतेरागमनं विदित्वा
काननं रम्यं सृजति तथेत्यर्थः । विदित्वेति । "विदक् ज्ञाने" इत्य-
मात्पूर्वकाले क्त्वाप्रत्ययः । "रुदविद-" (१२८) इति तस्स
९ कित्वान्न गुणः । आगममिति । आगमनमागमः, "ग्रहवृदृनिश्चि-
गमध" (३।३।५८) इति गमेर्भावेऽप् । अस्येति । “कर्तृकर्मणोः
कृति" (२।३।६५) इति करि षष्ठी । धात्रीपतेरिति । दधाति
१३ भूतानीति धात्री भूमिस्तस्याः पतिर्नाथस्तस्य । व्यन्तरेत्यादि । चक्र
वादिसेवाकारित्वाद्विगतमन्तरं विशेपो नरेभ्यो येषां ते व्यन्तरास्ते
च ते देवाश्च व्यन्तरदेवास्तेषां सङ्घः । क्रियायानिति । करणं क्रिया;
१५सा विद्यतेऽस्येति अस्त्यर्थे मतुप् । 'क्रियावान् कर्मसूद्यतः' इत्यभिधान-
चिन्तामणिः । वनपालेत्यादि । वनं पालयन्तीति वनपालास्तेषां वर्गः।
'वर्गस्तु सदृशाम्' इति हेमः । सहशानां वृन्दं वर्ग उच्यते इति
तदर्थः । ससर्जेति । 'सृज विसर्गे' इत्यस्मात्करि लिट् । रम्यमिति।
रन्तुं योग्यमित्यर्थे रमेर्यत् । महसेनेति । महसेनयक्षाधिष्ठितत्वादे-
तद्वनं महसेनाख्ययैव प्रसिद्धिं गतम् । स्यात् पण्डं 'काननं
वनम्' इति हेमः।
ऋतुस्तदान्यानपि वर्तमानः समाजुहापैकपदे वसन्तः ।
॥जगत्पति दर्शयितुं जनः को न धत्सहेतेश्वरदर्शनाय ॥३॥

गौतमीयप्रकाशाख्यटीच्या सहितम् । तदा तस्मिन् काले वैशाखमासे वर्चमानः साक्षाद्विद्यमानो वसन्तो सन्ताख्य ऋतुः । जगत्पतिं विश्वनायं वीरं दर्शयितुं दृविपयं कारयितुमन्यानपि तव्यतिरिक्तान् ग्रीष्मवशरद्धिमशिशिरात्यानपिर ऋतून् एकपदेऽकलात्समाजुहाव आहृतवान् । युक्तोऽयमर्थः-हि यतः कारणात् ईश्वरदर्शनाय त्रिमुवनेश्वरं द्रष्टुं को जनो लोको न उत्सहेत नोत्साहं कुर्यात् ! अपि तु सर्वोऽप्युत्सहेत एवेत्यर्थः ।। वर्तमान इति । वर्तते इति विग्रहे 'वृतु बने' इत्यस्मात् करि लटः शानच् । समाजुहावैति । सम् आपूर्वात् हु दानादावित्यलात्कार लिट् । एकपदे इति । एतदव्ययम् अकलादित्यर्थे । 'सहसैकपदे ९ सद्योऽकस्मात् सपदि तत्क्षणे' इति हेमचन्द्रोक्तेः । दर्शयितुमिति हेतुमण्णिजन्तात् दृशेस्तुमुन् । उत्सहेतेति । उत्पूर्वात् सहेः करि लिझाईश्वरेत्यादि।ईष्टे इतीश्वरः। दृष्टिदर्शनं, ईश्वरस्य दर्शनमीश्वर-२ दर्शनं तस्मै 'क्रियार्थोपपदस्य- (२।३।११) इति चतुर्थी ॥ ३ ॥ स्वराज्यदेशानिय राजवर्या विमज्य वृक्षानृतवोऽध्यवात्सुः। स्वसारसम्भारमयाभिरामं विकासयामासुरिनार्चनाय ॥ ४ ॥ ५ ऋतयो वसन्ताधा वृक्षान् सहकारादितलन् विमग्य यथावं विमागं विधाय । मध्यवात्सुराश्रयामासुः, वृक्षेपु निवसन्ति लेत्यर्थः । के कानिव ! राजवर्या नृपमुख्याः खराज्यदेशान् निजराज्यजनपदा-14 निव, यथा प्रधाना राजानः स्वराज्यदेशान् विमग्य तेषु निवसन्ति तयेत्यर्थः । अथापिकासानन्तरे(२) ऋतवः इनार्चनाय इन परमेश्वरमर्च- यितुं पूजयितुं अभिरामं मनोहरं खसारसग्मारं निजसारमूतपुप्पफल-२१ पत्रप्रकरं विकासयामामुर्विकसरं चक्रुः यद्वा प्रकटं चक्रुः, तदानीं सर्वेऽपि तरवः पुष्पादिमन्त्र आसचित्यर्थः खिराज्येत्यादि । राज्ञः ॥

६ श्रीगोतमीयकाव्यं ९ कर्म राज्यं स्सस्स राज्यं स्वराज्यं, तस्य देशास्तान् । 'देशो जनपदो नीवृत्' इति हैमः । राजेत्यादि । राजमु वर्याः । 'मुख्यं प्रकृष्टं प्रमुखं ३प्रबह वर्यम्' इति हैमः । विभज्येति । विपूर्वाद्धजेः पूर्वकाले क्त्वा तस्य ल्यवादेशः । वृक्षानिति । "उपान्वध्याझ्वसः (१।४।१८) इत्यधिकरणस्य कर्मवाद्वितीया । अध्ययात्सुरिति । अधिपूर्वाद्वसः ६ कर्तरि लुङ् । स्वसारेत्यादि । खखात्मनः सारं पुप्पादिद्रव्यं तस्य सम्मारस्वं यथासारं प्रधानीभूतं वस्त्वित्यर्थः । 'सारो मजस्थिरांशयोः, बले श्रेष्ठे च सारं तु द्रविणन्यायवारिषु' इत्यनेकार्थः । विकास- यामासुरिति । णिजन्तात् "कस गौ" इत्यस्मात् 'कास्प्रत्ययात्'. (३।१।३५) इत्याम् । ततोऽस्तेरनुप्रयोगः । “विकासः स्फुटने व्यको" इति दन्त्यान्तो धरणिः । इनार्चनायेति । इनस्सार्चनमि- ३२ नार्चनं तस्मै, चतुर्थी प्राग्वत् , 'ईशितेनो नायकश्च' इति हैमः ॥ ४॥ प्राग ये स्थिताः श्रीवियुतास्तदानीं सश्रीकतां प्रापुरगास्त एव । श्रियस्तु लम्याः समयेऽसुमद्भिः सर्वत्र सत्यो हि दशाविवर्चः॥५॥ येऽगा वृक्षाः प्राक् पूर्व श्रीवियुताः शोभारहिताः स्थिता अति- छन् ते एव तेऽपि वृक्षाखदानी तसिन्काले प्रमोरागमनसमये सधी- कतां शोमायुक्तत्वं प्रापुः प्राप्नुवन्ति स । युक्तोऽयमर्थः-असुमद्भिः प्राणिमिः श्रियो लक्ष्म्यस्तु समयेऽवसरे लम्याः काप्यवसरे एवं ११ लभ्यन्ते, नतु यदा तदापीति भावः । कथमित्याह—सर्वत्रेत्यादि। हि यतो दशायाः अवस्थायाः विवर्तः परावर्तः सर्वत्रास्मिन् लोके २० सत्योऽवितयोऽस्तीति शेषः। प्राणिनां हि यदा सद्दशाऽभ्युदेति तदैव गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । सौख्यादिलामो भवतीत्यर्थः। स्थिता इति । स्याघातोरकर्मकत्वात्करि क्तः । श्रीत्यादि । श्रिया लक्ष्म्या वियुताः इति तृतीयातत्पुरुषः । तदानी मिति । अखण्डमव्ययमिदं सटीकतामिति सह श्रिया वर्तन्ते ३ इति सटीकास्तेषां मावसत्ता तां पापुरिति । प्रपूर्वादामोतेर्लिन् । अगा इति । न गच्छन्तीत्यगाः । 'नगोऽप्राणिपु' (६३७७) इति वैकल्पिकत्वात्पक्षे नत्रो न लोपः । त एवेति । अत्र एवकारोऽपि-६ शब्दार्थे । लभ्या इति । "पोरदुपधात्" (३।१।९८) इति कर्मणि यत् । अमुमद्भिरिति । असवः प्राणाः सन्त्येषामित्यसुम- न्तस्तैः करि तृतीया, "पुंसि मून्यसवः प्राणा" इत्यमरः १९ दशेत्यादि । “अवस्था तु दशा स्थितिः" इति हैमः । “विवों नने सझेडपावृत्तौ" इत्यनेकार्थः ॥५॥ रागातलोकेरितदृष्टिपातादिवाप्तरागैः प्रचिताः प्रथालैः । द्रुमा न पुंसां न मनांसि जहुर्मनोहरं किं न मवेत्समृद्धम् ॥६॥ रागेण मेहेनाक्ता युक्ता ने लोकास्तैरीरिताः प्रेरिता या दृष्टयो नेत्राणि तासां पातः पतनं तलादिव आतः प्राप्तो रागो रक्तिमा १५ यस्तैः पवालेः किसलयैः प्रचिताः पुष्टाः द्रुमाश्तादिवृक्षाः पुंसां मनुष्याणां मनांसि चेतांसि कर्मतामापन्नानि न न जदुःन न हरन्ति स, हरन्ति सैवेत्यर्थः । 'द्वौ नत्रौ प्रकृतमर्थ सूचयंत' इत्युक्तवादिह १८ नद्वयेन हरणरूपोऽध एव घोत्यते, नतु निषेधार्थः । उक्तमर्थमर्या- न्तरन्यासेन द्रुदयति । समृद्धं समृद्धियुक्तं सत् किं वस्तु मनोहरं मनोहारकं न भवेत् ! । सर्वमपि स्यादेवेति भावः । अक्तेति । 'अY२॥ गतो' असाकरितः । 'यस विमापा' (७।२।१५) इति 'नदी। ईरितेति । ईर गतिकम्पनयोः अलात्कमणि कः। एवमासेत्यत्रापि । २३ -

श्रीगातमीयकाव्य
८
रागैरिति "रागः स्यालोहितादिषु । गन्धारादो केशादिकेऽनुरागे मत्सरे
नृपे” इति हैमः । प्रचिता इति । प्रपूर्वाच्चिनोतेः कर्तरि क्तः। जहु-
रिति । हलः कर्तरि लिट् । समृद्धमिति संपूर्वात् 'ऋधु वृद्धौ' इत्यस्मा-
करि क्तः, “यस्य विमापा” (७१२।१५) इति नेट् ॥ ६॥
सुस्निग्धसान्द्राणि हरिच्छदानि प्रपश्यतां भूमिरुहोऽनिमेषम् ।
६अत्यन्तभेदेऽपि तदा नराणामकारयन्देवगणैरभेदम् ॥ ७॥
तदा तस्मिन् काले भूमिरुहो वृक्षाः मुस्निग्धसान्द्राणि सुतरामति-
शयेन निग्यानि चिकणानि सान्द्राणि निविडानि हरिच्छदानि हरि-
९द्वर्णपत्राणि अनिमेषमक्षिस्पन्दरहितं यथा स्याचथा प्रपश्यतां प्रकर्षण
विलोकयता नराणां देवगणैः सुरसमूहैः सहात्यन्तमेदेऽत्यन्त-
मिन्नत्वे सत्यपि अमेदं तैः सहाऽभिन्नत्वमकारयन् कारयामासुः ।
१२ अयमर्थः-यद्यपि नराणां सुरैः सहेश्वर्यादिकृतो महान् विशेषोऽस्ति
तथापि तदानीमनिमेषतयाऽवलोकनेन तैः सहाऽभिन्नत्वं जातमिति ।
एतेन वृक्षाणामतिरमणीयत्वमुक्तम् । ननु देवानामनिमेपत्वे किं प्रमा-
१५णम् । न तावत्प्रत्यक्षादित्रय, प्रकृते तत्तलक्षणानामसंभवादिति चेत्,
आगमप्रमाणमत्राऽवेहि । तदुक्तं-"अणिमिसनयणा मणकजसाहणा
पुप्पदाम अमलाणा । चउरंगुलेण भूमि न छिवंति मुरा जिणा बिति-
ति" ॥१॥ हरिदित्यादि । हरिति च तानि छदानि चेति विग्रहः ।
'हरिदिशि तृणान्तरे, वर्णभेदेऽश्वभेदे च' इत्यनेकार्थः 'वह पर्ण छदं
दलम्' इति हैमः । प्रपश्यतामिति । प्रपूर्वादृशेर्लटः शतृधातोः पश्या-
२॥ देशः । भूमीत्यादि । मूमौ रोहन्तीति रहेः किम् । अनिमेपमिति ।
न विद्यते निमेपो यत्र कर्मणि तत् क्रियाविशेषणमिदम् । अत्यन्ते-
त्यादि । अन्वं विराममतिक्रान्तोऽत्यन्तः, स चासो मेदश्च तसिन् ।
अकारयन्निति । हेतुमण्णिजन्तात् कृनो लङ् ॥ ७ ॥

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । वातोच्छलत्पाहवहस्तताले रोलम्बझकारमुगीवनादः। कारस्करास्तीर्थकरागमोत्थं निदर्शयामासुरिव प्रमोदम् ॥ ८॥. फारस्करा वृक्षाः कारः वातेन वायुना उच्छलन्त उत्पतन्तो ये३ पल्लयाः प्रवालास्त एव हस्तताला प्रसारिताङ्गुलिपाणयस्तैस्तथा रोल- म्बानां प्रमराणां ये झक्षारशब्दास्त एव सुष्टु शोभना गीतनादा गान- ध्वनयस्तैः करणमूतैः तीर्थकरागमोत्यं वीरजिनागमनसमुद्भवं प्रमोद हर्षे निदर्शयामामुरिव ज्ञापयामायुरिवेत्युत्प्रेक्षा । उच्छलदिति । उत्पूर्वात् 'शल गतौ' इत्यस्मालटः शतृ । हस्ततालैरिति । यद्यपि 'प्रसा- रिताली पाणी चपेटः प्रतलखलः, प्रहस्तम्तालिकाताल' इत्युक्तत्वादत्र १ तालपदेनैव प्रस्तुतार्थावगती हस्तपदं व्यर्थमिव प्रतिमाति । तथापि अस्य करिकलमादिवदुक्तपोपकत्वान्न दोपः। रोलम्बेत्यादि । "इन्दि- न्दिरोऽली रोलम्बो द्विरेफ' इति हैमः । गीतेत्यत्र मावे क्तः । गीतं १२ गानं गेयं गीतिः' इति हेमः । कारस्करा इति । पारस्करादित्वात्साधुः 'जों दुटिपी कुठः, क्षितिरुहः कारस्करो विष्टर' इति हेमः । तीर्थकरेत्यादि । तीर्थ चतुर्विधः सहः प्रथमगणमृद्वा तत्करोतीति ५ 'कृयो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु' (३।२।२०) इति टपत्ययः, तीर्थ- करस मागमेन उचिठतीति तीर्थकरागमोत्यसं उत्पूर्वात् साधातोर्ड- प्रत्यये 'टदः स्थास्तम्मो:--' (८४६१) इति पूर्वसवर्णः । निदर्श-१८ यामामुरित्यादि । हेतुमण्णिजन्ताोलिट् कास् प्रत्ययादित्याम् । इह जनमिति शेषः । तस्य चाऽणिकर्तुः 'दृशेश्व' (५४० वा.) इत्यनेन णो कर्मवार द्वितीया ॥ ८॥ १"विशिष्टवाचनना पदानां सति पृथक विशेषगवाचकपदसमवधाने पिशेष्यमालपरसम्" इति भ्यायोऽत्र पहचते, 'रिकलमादिवत्' इति टीका. फुगमाधानप्रन्योऽप्येतश्यायपर्मितः इति प्रतिमाति.

श्रीगौतमीयकाव्यं - इति सामान्यतः पड् ऋतवो वर्णिताः । अथ विशेषतस्तान्वर्ग- यितुकामः कविस्तावद्दशभिः काव्यैर्वसन्तं वर्णयति- ३सूनुप्रसूताविव मोदमाप्ताः सूनोद्गमे चूततरोह्निरेफाः । एपामतो मङ्गलगायनानामिव ध्वनिर्माङ्गलिको जजृम्मे ॥९॥ द्विरेफा अमराः चूततरोः सहकारवृक्षस्य सूनोद्गमने पुप्पोद्गमने ६ जाते सति मोदं हर्षे आप्ताः प्रामुवन्ति स । कस्यामिव, सूनुप्रसूताविव पुत्रोत्पत्वाविव, यथा पुत्रोत्पत्ती सत्यां जना मोदमाप्नुवन्ति तथेत्यर्थः । अतोऽसाकारणादेव एपां , अमराणां मानलिको मङ्गलसूचक इव ९ध्वनिकारशब्दो जजृम्मे उल्ललास, विसृतवानित्यर्थः । केपामिव । मङ्गलगायनानामिव, यथा कापि हर्पकारणे मन्नलगानकर्तृणां माङ्गलिको ध्वनिर्गीतनादो जृम्भते तथेत्यर्थः । सून्वित्यादि । सूनोः प्रसूतिः १२सूनुप्रसूतिवस्यां, अपूर्वात् पूछो भावे तिच् । 'प्रसूतिः स्यादपत्ये प्रसवेऽपि च' इति हैमः । सूनेत्यादि । सूनानामुद्गमः सूनोद्गमस्तस्मिन् 'पुष्पं सून सुमनस' इति हैमः । द्विरेफा इति । द्वौ रेफो येषां १५अमरखरूपे नाम्नि ते द्विरेफाः । मङ्गलेत्यादि । मङ्गलं गायन्तीति मन- लगायना गान्धर्वादयस्तेपां । माङ्गलिक इति । मङ्गलं प्रयोजनमस्येति 'प्रयोजनम्' (५।१।१०९) इति ठक् । यद्वा मङ्गलमहतीति तदर्हति' १८(५१६६३) इति ठक् । अथवा मङ्गले नियुक्त इति 'तत्र नियुक्त' (१।४।६९) इति ठक् । जनृम्मे इति । 'मी गात्रविनामे' अस्माकर्तरि लिट् । घातूनामनेकार्थत्वादस्य विस्तारार्थता ॥ ९ ॥ ये मुन्दरीणां मुखशीधुलामा- दामोदमत्ता चकुला वभूवुः। ते पट्पदान् उन्मदविष्णवः कि नासन् यतः कारणकार्यसाम्यम् ॥ १० ॥ २१ २४ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । ये बकुला वृक्षविशेषाः सुन्दरीणां स्त्रीणां मुखशीधुलामात् । आमोदेन परिमलेन मचा मदयुक्ता बभूवुस्ते वकुलाः षट्पदान् अमरान उन्मदयिप्णवो मदोत्पादकाः किं न आसन् न वमूवुः, बम्-३ वुरेवेत्यर्थः । अत्र किं कारणमित्यत आह—यत इत्यादि । यतो यसात्कारणात् कारणकार्ययोहेंतुहेतुमतोः साम्यं सादृश्यमस्तीति शेषः । अयमर्थः--कारणं हि प्रायः खानुरूपमेव कार्य जनयति, न तु । खतो विरुद्धखभावम् , प्रायेण पित्रा तुल्यः पुत्र इत्याद्यमिधानात् । ततश्चात्र चकुलानां स्त्रीमुखमद्यस्वीकारजनितमत्तत्वेन तन्मकरन्दपा. यिनां अमराणां मचत्वं युक्तमेवेति । एतावता बकुलमत्तताकारणं ९ प्रमरमतता च कार्यमिति स्थितम् । निःशेषामरणभूपिता भामिनी समीपमुपेत्य यदा वकुले खमुखान्मद्यचुलुकं निक्षिपति तदैव तस्य पुप्पादिसम्पत्तिरुपजायते इति तस्वमावः । मुखेत्यादि । मुखस्य यः १२ शीधुस्तस्य लामस्तसात् 'मेरेये शीधुरासव' इति हेमः । लभेप- नि वृद्धौ लामेति । न च जलमेश्थे' त्यनेन नुमागमः कुतो न स्यादिति चेदुच्यते, 'उपसर्गारखल्पनोः' (६।१।६७) इति नियमान्न नुम् ।१५ सल्घनोः परयोरुपसर्गादेव लमेर्नुम् न तु केवलसेति तदर्थः । आमोदेति । 'भामोदो गन्धहर्पयोः' इति हेमः । मचा इति । 'मदी हर्षे' 'कर्तरि निष्ठानध्याख्यायमूर्छिमदां' इति निषेधात् निष्ठा () तस्य १० न नत्वं । बकुला इति । 'वकुलः केसर' इति हेमः । पडित्यादि। पद पदा येषां ते तान् 'नलोकाव्यय- (२२३६९) इति पष्ठी- निषेधः । उन्मदयिष्णव इति । उत्पूर्वाण्णिजन्तात् 'मदी हर्षे' इत्य-२१ सात् 'मेच्छन्दसि' (३।२।१३७) इति सूत्रेण इष्णुम् । अयागन्तेति । गेरय 'मदी हर्पग्लेपनयो रिति मिलात् 'मितां-(६१।९२) इति २५ १२ श्रीगावमीयकाव्य । हखः । ननु छान्दसोऽयं प्रयोगः कथमत्रोपात इति चेदुच्यते । लोकेऽपि कविमिराहतत्वान्न दोषः । यथा छान्दसमपि प्रमविष्णु- ३शब्दं माधः प्रायुत 'जगत्प्रभोरप्रमविष्णुवैष्णवं' इति वृहत्सिद्धान्त- कौमुद्यां वहुपु माधपुस्तकेषु तु असहिष्णु इति पाटो दृश्यते । किं नासन्निति काकूक्तिरियं अस्तेः कर्तरि लङ् । कारणेत्यादि । कारणं ६च कार्य च कारणकार्ये, समयोर्मावः साम्यं, कारणकार्ययोः साम्यमिति विग्रहः । 'अल्पान्तरं' ( २।२।३४ ) इत्यनेन कार्यशब्दस्य प्रामिपाते प्राप्तेऽपि कारणस्य प्राधान्यादभ्यर्हित चेति तत्पूर्वनिपातः ॥१०॥ ९पश्यन्तु भो भो प्रमदाकटाक्षान्मधुप्रताली मधु पाययन्तु । इत्यागमोक्तीरिव सौगतानां सत्यापयन्तस्तिलका विरेजुः ।।१।। तिलकास्तिलकनामानो वृक्षा विरेजुः शोभन्ते स्म । किं कुर्वन्त १२इव इति । इत्थं सौगतानां यौद्धानां आगमोक्तीः शास्त्रवचनानि सुगत- प्रणीततत्त्ववाक्यानीति यावत् , सत्यापयन्त इव सत्याः कुर्वन्त इव । इतीति किमित्याह-पश्यन्वित्यादि । भो भो लोकाः भवन्तः प्रम- १५दानां स्त्रीणां कटाक्षान् कटाक्षविक्षेपान् पश्यन्तु तथा मधुव्रताली मद्यपजनश्रेणिं मधु मयं पाययन्तु पानं कारयन्तु इति ॥ अयमत्र तात्पर्यार्थः-यत्सत्तत् क्षणिकमिति च्यातिवादिनः सौगता एव. मुपदिशन्ति, 'यदहो लोकाः परमरमणीयरमणीरूपनिरीक्षणमनोs. मिलपितभोज्यमक्षणमधुपानमृदुशयनीयशयनादिभिरेव मोक्षावाप्तिः, न तु तपोनुष्टानादिमिस्त्रेपा हि क्लेशरूपत्वेन लोके दुःखस्यैव साधनत्वात् । तलान्मोक्षार्थिमिः मुखेन स्त्रीमोगादि भोक्तव्यम्', तथा ये मुरा- पानकारतेषां तत्यानं कारयितव्यमेतदेव तत्त्वमस्तीति तिलकानां पुनरयं समावः । मदा नवयौवना कामिनी अभ्युपेत्य कटाक्षान गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १३ विक्षिपति तदैव ते पुप्पादिमाजो भवन्ति । तथा विकसिताः सन्तो मधुव्रताली अमरणि मधु मकरन्दं पाययन्तीति । तत्रेदं कविनों- मेक्षितम्-पश्यन्विति । एतक्रियाभिसम्बन्धादिहानुक्तोऽपि भवन्त । इत्येव कर्चा अध्याहायों न तु यूयमिति तघ्याहारे तु पश्यतेति क्रियापदस्य प्रसक्तिः स्यात् । तथा च सति छन्दोमन इति । मधु- प्रतेत्यादि । 'मधुप्रतो मधुकर' इत्यमरः । मधु नतं भक्ष्यं यस्येति । तद्वृत्तिः । एवं च मधु मयं व्रतं यस्येति योगमात्रेण मधुव्रताः मद्य- पायिन उच्यन्ते, योगलढ्यां तु मधुशब्दस्य मकरन्दार्थतामपेक्ष्य मधुरता अमरा उच्यन्ते । मधुब्रतानां या आली श्रेणिवां 'माला-६ त्यावलिपवय' इति हेमः । इह 'गतिबुद्धि-(११४५२) इत्या- दिना कर्मत्वाहितीया । यद्यपि पा-धातोः पानमर्थः, नतु मक्षणम् , तथापि भक्षणमपि विशेपर्णाभूय मासते इत्येतावन्मात्रेण प्राप्तिबोध्या । मध्विति । 'मधु क्षीरे जले मद्ये क्षौद्रे पुष्परसेऽपि च' इत्यनेकार्थः। पाययन्त्विति । हेतुमण्णिजन्तारिपवतेलोंट् । आगमेत्यादि । आग- मस्स उक्तयः आगमोक्तयस्ताः । सौगतानामिति । सुगतस्येमे में सौगठानेपा 'तस्येदम् (२२१२०) इत्यम्' । सत्येत्यादि । सत्यशब्दावत्करोतीत्यर्थे 'सत्यापपाश- (३।१।२५) इत्यादिना णिन् । सूत्रे सत्यापग्रहणादापुगागमः, ततो लटः शतृ । विरेजुरिति विपूर्वात् 'राजू दीसौ' इत्यस्मात्करि लिट् ।। ११ ।। निवम्बिनीनां परिरम्मलामा: पादप्रहारोऽपि सुखाय येपाम् । तेऽशोकसाला विलसत्प्रवाला: सेसः सखायो न कयं सरस्य ॥ १२ ।।

श्रीगौतमीयकाव्यं परिरम्भ आलिङ्गन तस्य लाभः प्राप्तिर्यस्मिन् स तथाभूतो नित- म्बिनीनां कामिनीनां पादस्य चरणस्य प्रहारताडनं, लत्तापहार इति ३ यावत् । येषामशोकवृक्षाणां सुखाय सम्पद्यते सुखकारको भवती- त्यर्थः । ते मेरा विकसिता अत.एव विलसन्तः शोभमानाः प्रवाला येषां ते तथाभूता अशोकसाला अशोकवृक्षाः सरस्य कामस्य कथं ६ केन प्रकारेण न सखायो न सहायाः, अपि तु सखायस्ते इत्यर्थः । अशोकानां किलाऽयं समावो यदा सकलालङ्कारशोभिता सुन्दरी प्रवरनूपुररणत्कारकारिचरणेन मूले प्रहार विधत्ते तदैव ते पुष्पादि- ९प्रसवन्तीति तैनतेषां कामोद्दीपकत्वं युक्तमेवेति भावः । नितम्बिनीना- मिति । स्त्रीकट्याः पश्चाद्भागो नितम्बः सोऽस्त्यासामिति मत्वर्थे इनिः, ततो डीप् । परिरम्मेति । परिरम्भणं परिरम्भः, 'रम रामस्ये भावे १२ पञ् 'रमेरशब्लिटोः' (७११६३) इति नुम् । 'आलिशनं परिष्वशः संश्लेप उपगृहनम् । अङ्कपाली परीरम्म' इति हैमः । सुखायेति । कृत्यर्थक्रियाया गम्यमानत्वात् 'क्लपि संपद्यमाने च' (५८० वा.) १५इति चतुर्थी, साला इति दन्त्यादिरयं, 'साल: मात्रप्राकारयोरपि' इति हैमः । सेरा इति । 'सेरं विनिद्रमुन्निद्रे' इति हेमः । सरेति । 'मधुदीपमारी मधुसारथिस्सरौ' इत्यभिधानचिन्तामणिः ॥ १२ ॥ शश्वत् सुरूपे फिल यत्सुगन्धः पुप्पोचयेप्पैक्ष्यत चाम्पकेषु । वचार्किकाः संशयिताः श्रुती किं वाझ्मात्रमेवन गुणा गुणेषु ॥ १३ ॥ किलेत्युप्रेक्षायाम् , यत् यसाकारणात् चारपकेषु चम्पकसम्ब- पिपु पुप्पोययेषु पुपसमूहेषु मुटु शोमनं यद्रपं तस्मिन् सुरूपे शध- २४ निरन्तरं सुगन्धः शोमनगन्धः पेक्ष्यत दृष्टः, सर्वरपि लोकैरिति तत्र गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । शेपः। तचमाचार्किकास्तर्कशास्त्रवेचारो विद्वांसः श्रुतौ शास्त्रे किं संशयिताः कथं संशयमापन्नाः, प्रत्यक्षनिर्णीते वस्तुनि संशयविधानम- युक्तमित्यर्थः। एवं तर्हि 'गुणेषु गुणा न भवन्ति' इति तर्कवाक्यस्य कार गतिरित्याशझ्याह-वाङित्यादि । गुणेषु रूपादिपु गुणा गन्धादयो न तिष्ठन्तीत्येतद्वाक्यं वाङ्मानं वचनमात्रमेवास्ति नतु तात्त्विक- मित्यर्थः । इह 'मुरूपतायां च सुगन्धता यत्' इति पाठान्तरम् , प्रयोगद्वयेऽपि भावे तल्प्रत्ययस्तु न संमवति । प्रस्तुतार्थाऽसङ्गतेः, ततः मुरूपमेव सुरूपतेत्यादि विगृह्य कथंचित्वार्थे तत्प्रत्ययं विधाय समा- धेयम् । पुप्पोच्चयेविति । पुष्पाणामुच्चयाः पुप्पोचपास्तेषु ऐक्ष्यतेति ९ ईस्धातोः कर्मणि लङ। चाम्पकैप्यिति । चम्पकानामिमे चाम्पकास्तेषु 'तस्पेदम्' (४।३११२०) इत्यण् । तार्किका इति । तक विदन्त्य- घीयतेति तदधीते तद्वेद' (४।२।५९) इति ठक् । संशयिता इति । १२ संशयो प्रमात्मकं ज्ञानम् , स जात एपामिति, तारकादित्वादितम् । वामात्रमिति । वागेव वामात्रं मात्रं कारयेऽवधारणे' इत्यमरः॥१३॥ दूरोज्झिता या नवमालिकाली सा चैव सेव्या भ्रमरैर्वभूव । अहो अहो खार्थपरो हि लोकः स्वार्थ विना कोऽपि सुहन्न कस ॥१४॥ अमरैर्या नवमालिकाली सप्तलास्यलताश्रेणिर्दूरोज्झिता पूर्व दूरे मुक्ता आसीत् सेव वनमालिकाश्रेणी सांप्रतं प्रमरैः सेन्या सेवनीया बभूव, यतः पूर्वनिःश्रीकत्वेन त्यक्ता सांप्रतं पुंसः श्रीकत्वेन पुनराहता २१ इत्यर्थः । एतदेव द्रदयति-अहो इत्यादि । हि यतः अहो अहो लोकः सर्वोऽपरः स्वकीयकार्यसायनतत्परो विद्यते इति शेपः । साथै २३ १८ श्रीगौवमीयकाव्यं विना कोऽपि जनः कस्य जनस्सन सुहृत् न मित्रम् ,अस्तीति शेषः । एता. वता प्राणिनां यावत् सार्थसिद्धिः सुखेनोपजायते तावदेव परस्परं प्रचुर- इतराप्रीतिरीतिरीवति तदभाव (प्रीत्यमाव :) एवेत्यन्वयन्यतिरेकाम्या खार्थ एव सौहार्दकारणमिति मावः। उदितेति । 'उज्झ त्यागे कर्मणि कः । नवेत्यादि । 'सप्तला नवमालिका' इति हेमः। नवमालिकानां आलीति विग्रहः । सेव्येति । सेवितुं योग्याः 'पेड सेवायां' असात् 'ऋहलोर्ण्यत्' (३।१।१२४) । अहो अहो इति । 'मोत्' (१११।१५) इत्यनेन प्रगृह्यसंज्ञा, ततः 'प्लुतप्रगृह्या' (६।१।१२५) ९इति प्रकृतिमावः । स्वार्थेत्यादि । स्वस्यार्थः कृत्यं तत्र परः खार्थ एव परः प्रधानं यस्य स इति वा । 'अर्थः कृत्य प्रयोजन मिति हेमः। स्वार्थमिति । 'पृथग्विनानानाभि: (२।३।३२) इति विनायोगे २ द्वितीया । सुहृदिति । शोभनं हृदयं यस्य स 'मुहृदुईदो मित्रा- मित्रयोः' (५।४।१५०) इति हृदयस्य हृदादेशः ।। १४ ॥ सेवन्तिकानां मधुपानलोभात्कण्टाटनं नक्तमकारि जडे। ५मधुव्रतानां मधुपा जना यद्भपातदुःखेऽपि सुखं लमन्ते ॥१५॥ मधुव्रतानां अमराणां मधुपानलोमात् मकरन्दपानलिप्सया सेव- न्तिकानां लताविशेषाणां यत् कण्टेपु कण्टकेयु अरनं अमणं तत् १८क्लमकारि अमोत्पादकं न जज्ञे न जातं, लुब्धो जनो हि समविषम- 'प्रदेशसंचारसमुद्भवं किमपि श्रमादिकं नापेक्षते इति भावः । युक्तो- ज्यमर्थः । यत् यस्मात्कारणात् मधुपा मद्यपानकर्करो जना भूपात- सदुःखेऽपि भूमिपतनादिदुःखे सत्यपि सुखं लभन्ते सौख्यमनुभवन्ति, 'तदमावे उदमावः' इति 'सार्यामावे-मेहामाव' इत्यर्थः पाटोऽत्र रातिमानुयादिति प्रतिमादि। २'धरणसत्वे आर्यसत्ता, कारणाभावे कार्या- मावः' इति तयोरयणम्।

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् १७ अतिलुब्धत्वात् ते हि मद्यपानं सुखकारकं मन्वाना बहुलमपि भूमि- पातादिदुःखं न गणयन्तीत्यर्थः । मध्वित्यादि । मघुनः पान मधुपानं तस्य लोभस्तस्मात् 'लोमा तृप्णा लिप्सा वशः स्पृहा' इति ३ हेमः । क्लमेत्यादि । क्वमं करोतीति 'सुप्यजाती' (३३२।७८) इति णिनिः, 'क्लमः क्लेशः परिश्रमः' इति हैमः । जज्ञे इति । 'जनी प्रादुर्भावे' करि लिट् । मधुपा इति । मधु पिबन्तीति । मधुपूर्यास्पाघातोः किम् ॥ भूपातेति । पतनं पातः, मुवि पातो भूपातस्तस्य दुःखं तलिन् ॥ १५॥ पुप्पथिया किंशुकपादपाना- माच्छादिता पत्रंदरिद्रताऽपि । नरः सुरूपः खलु दुर्गतोऽपि स्थादेव लोकस्य विलोकनीयः॥ १६ ॥ किंशुकानां पलाशात्यवृक्षविशेषाणां पुप्पश्रिया पुप्पलक्ष्या पत्र- दरिद्रतादि आच्छादिता, पत्रैर्यद्धिदारियं तदपि आच्छाद्यते सोत्यर्थः । एतावता अपना अपि किंशुकाः केवलं पुप्पैरेव दर्शनीया बमूवुरिति १५ भावः । युक्तोऽयमर्थः-खलु निश्चयेन दुर्गतोऽपि दरिद्रोऽपि नरो मनुप्यः मुरूपः शोमनाकृतियुक्तः सन् लोकस्य विलोकनीयो दर्श- नीयः स्यादेव भवत्येवेत्यर्थः । किंशुकानां किलाऽयं समावो यतः पुष्प-१८ काले पत्राणि न मयन्ति पत्रसमये पुष्पाणि नेति । किंशुकेत्यादि । पादैः पिबन्तीति पादपाः किंशुकाश्च ते पादपाश्च तेषां । 'त्रिपत्रक पलाशः स्याकिशुको ब्रमपादपः' इति हैमः । आच्छादितेति ।। आइपूर्वायुरादिणिजन्तात् 'छद अपारणे' इत्यस्मारकर्मणि क्तः। पोत्यादि । दरिद्राणां मावो दरिद्रता, पौः दरिद्रतेति विग्रहः । २२ १२ २ श्रीगौवमीयकाव्यं सुरूप इति सुष्टु रूपं यस्य सः । दुर्गत इति । 'दरिद्रो दुर्विघो दुःस्सो दुर्गत' इति हैमः ॥ १६ ॥ निमत्रिता यन्न समृद्धिकाले वयं तदेभिर्नहि सौहृदं नः । इतीच पुप्पैर्हृदये खकीये कवो मधुकेषु नु पर्णपातः ॥ १७ ॥ मधूकवृक्षाणामपि किंशुकवत् पत्रसमये पुष्पाणि न, पुष्पसमये पंच पत्रपातः स्यादिति खमावततत्र कविरुत्प्रेक्षते-यत् यस्मात्कार- णात् एभिः पत्रैः समृद्धिकाले निजसंपतिसमये वयं न निमत्रिता न आहृवाः, तत् तस्माद्धेतोनोंऽस्माकमेभिः सह सौहृदम् , मैत्र्यं नहि-न विद्यते इत्यर्थः । इत्येवम्भूतविचारेणेव मध्केषु वृक्षविशेषेषु पुष्पैः कुसुमैः खकीये उदये सति आत्मीयप्रादुर्भावे सति पर्णपातः पत्र• विनाशः कृतो विहितः । इह नुशब्दो वितद्योतकः । निमन्त्रिता इति । निपूर्वाचुरादिणिजन्तात् 'मनि गुप्तमापणे' इत्यस्मात्कर्मणि क्तः। समृद्धीत्यादि । समृद्धेः कालः समृद्धिकालस्तस्मिन् , 'स्यात्कालः समयो- दिष्टे'ति हेमः । सौहृदमिति । सुहृदो भाव इत्यथें युवादित्वादण् । १५ वाहुलकादुचरपदस्य न वृद्धिः, 'सख्यं तु सौहृदम्' इति हेमः ।न इति बहुवचनस्य वनसौ' (१११) इति आमन्तस्यासदो न सादेशः। खेत्यादि । खकस्यायं खकीयस्तसिन् खाधिककन्नन्तास. १६शब्दाद, 'गहादिम्यश्च' (१२/१३८) इति छपत्ययस्तस्येयादेशः । कृत इति कृतः कर्मणि क्तः। मधूकेष्विति । 'मधूकस्तु मधुष्ठीलो गुहपुप्पो मधुद्रुम' इति हेमः । पर्णपात इति । पातनं पातः, पर्णानां २१ पातः इति विमहः, पतेर्णिजन्ताद् घम् ॥ १७ ॥ निरन्तरधेतसुमोचयान्तर्यपुर्विकाशा चरणा विरेजुः । १३ महसमुक्ताफलजालगुप्ता हरिन्मणीनां निवहा इवोचैः ॥१८॥ " गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । निर्गतमन्तरं व्यवधानं येभ्यस्तानि निरन्तराणि संमिलितानि श्वेतानि उज्ज्वलानि यानि सुमानि पुष्पाणि तेषामुच्चयः समूहस्त-- स्यान्तर्गध्ये वपुपः खशरीरस्य विकाशः प्रकाशो येषां ते वथाविधा ३ वरणास्तविशेषा विरेजुः शोमन्ते स । के इव, सुष्टु सम्यक् प्रकारेण सृवं रचितं यन्मुक्ताफलानां मौक्तिकानां नालं जालिका तेन गुप्ता आच्छादितास्तथा उच्चैरुन्नताः हरिन्मणीनां मरकतमणीनां निवहाः समूहा इव यथाऽमी शोमां विप्रति तथा तेऽपीत्यर्थः । इह पुष्पाणां घेतत्वान्मौक्तिकैरौपम्यं वरणानां च हरिद्वर्णत्वात् हरिन्मणिभिरौप- म्यमस्तीति । सुमेत्यादि । 'प्रसून कुसुमं सुम'मिति हैमः । वपुः ९ पुद्गलवमणी' इति च। परणा इति । 'वरणो वरुणद्रुमे 'प्राकारे वरणं. वृत्यां' इति हैमानेकार्थः । विरेजुरिति । विपूर्वाद्राजतेः लिट् । हरिदित्यादि । 'पीतनीलः पुनहरिदिति हेमः । हरितश्च ते मणयश्च १२ तेपाम् । 'मरकतं त्वमगम गारुत्मतं हरिन्मणि' रिति हेमः । निवहा इति । 'जालं निवहसंचयो' इति च ॥ १८ ॥ इति वसन्तवर्णनम् ॥ १॥ सांप्रतं पद्भिः पद्यैीमं वर्णयितुमुपक्रमते-- राज्य भागादिवसार्द्धभाग यापदिशः सौरममुद्वमन्त्यः । । शिरीपपुष्पस्पृशि वाति वायायाह्लादयामासुरशेपलोकम् ॥१९॥ १० शिरीपस्य घृक्षविशेषस्य पुष्पाणि स्पृशतीति शिरीपपुप्पस्पृक् । तस्मिन् , एवंविधे वायो पवने वाति सति सौरमं सौगन्ध्यमुद्रमन्त्यः प्रादुःकुर्वाणाः दिशः पूर्वाद्याः ककुमो राज्य मागात् अर्द्धरात्रादारभ्य २१ दिवसार्द्धमागं यावत्, अशेषलोकं समस्तजनमाझदयामासुरानन्दितं । पनुः । अयमयः-प्रीमती हि एतदेव प्रहरचतुष्टयं शीतादिगुणोपपन-२१ १५ । - २० श्रीगौतमीयकाव्य . ९ पवनयुक्तत्वात्सुखदं, शेपं तु अतिवापकारित्वान्न तादृशमिति, तथा तदैव शिरीपवृक्षोऽपि पुष्पितो भवतीति । रात्रीत्यादि । अद्धश्चासौ ३ मागश्चार्द्धभागः, रात्रेरर्द्धभागस्तस्मात् समांशवाच्यर्द्धशब्दविवक्षायां तु अर्द्धश्चासौ भागश्चेति विग्रहः, 'अर्द्धः खण्डेऽद्धं समांशे' इति हेमः । एवमग्रेऽपि । उद्वमन्त्य इति । उत्पूर्वात् 'टुवम् उद्गिरणे' इत्यमाल्लंटः ६ शत्, तत उगितश्च' (६।३।४५) इति डीप्, 'शपश्यनोः'' (७१११ ८१) इति नुम् । वातीति । वा गतिगन्धनयोः'. अस्मालटः शत, ततः सप्तम्येकवचनं डिः । आह्लादयामासुरिति । 'हादी सुखे' आइपूर्वः अस्माण्णिजन्तादाम् । अशेपेत्यादि । अशेपश्चासौ 'लोकश्चेति विग्रहः, 'विश्वाशेषाखण्डकृत्स्मेति हैमः ।। १९ ।। भ्रमद्घटीयत्रजलप्रपातोच्छलत्किरच्छीकरशीतलासु । २ भूमिप्वधःपुप्पितपाटलानां सुखं निदद्रौ वनचारिलोकः ॥२०॥ वनचारिलोकः काननसञ्चारिजनः भ्रमतो भ्रमणं कुर्वतो घटी. यन्त्रस्य यत् जलं पानीयं तस्य अपातेन प्रपतनेन उच्छलन्त उत्प. ५तन्तोऽत एव किरन्तो निजावयवान् विक्षिपन्तो ये शीकरा जलक. णास्तैः शीतलाः शिशिरास्तासु एवंमूतासु पुष्पितपाटलानां कुसुमित- पाटलीवृक्षाणामघोभूमिपु अघोवर्चिपृथ्वीप्रदेशेषु सुखं यथा स्यात्तथा १८निदद्रौ निद्रा चकार । भ्रमदित्यादि । 'श्रम चलने' असालटः शत, 'उद्घाटकं घटीय' इति हैमः । किरदिति । 'कृ विक्षेपे' तुदादि- रस्मालटः शत, 'ऋत इत्- (७१।१००) इतीत्वेरपरत्वम् । २१शीकरेति । 'अथ शीकरः वाताखजलेऽम्बुकणे' इत्यनेकार्थः । अध इति । पृथक्पदमेवत्, अव्ययत्वाद्विमक्तेर्छन् । पुष्पितेत्यादि । २३ पुष्पाणि जातान्यासामिति तारकादिलादितम् । पुप्पिताश्च ताः ६ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । पाटलाश्च पुप्पितपाटलास्तासाम्, 'पारलिः पाटले ति हेमः । निद्राविति । 'द्रा कुत्सायां गतौ' असान्निपूर्वोत्कचरि लिट् । वनेत्यादि । वने चरति तच्छीलो वनचारी, शीले णिनिः, स चासौ ३ लोकश्चेति विग्रहः, 'स्यात् पण्डं काननं वनं' इति हेमः ॥ २०॥ रसं निपीपार्जुनमञ्जरीणां मत्तालिभिस्तत्र तथा जुगुले । यथा प्रमोदोगुरमानवानामुद्गायतां गानसहायताऽभूत् ॥२१॥ अर्जुनः ककुमवृक्षस्तस्य या मञ्जयस्तासां रसं मकरन्दं निपीय पीत्वा मचालिमिर्मदयुक्तैर्भमरैस्तत्रार्जुनतरौ तथा जुगुले गुजारवो विहितो यथा उद्गायतामुचैः खरेण गानं कुर्वतां प्रमोदोदुरमान-९ वानामानन्दमममनुष्याणां गानसहायता गीतेषु साहाय्यकारित्वममूत् जाताः ! एतावताऽर्जुनतरुतलस्थितानां खेच्छया गायतां नराणां गाने गुञ्जदिर्घमरैः साहाय्यं कृतमिति मावः । यद्वा सहायतेत्यत्र सामू-१२ हिकमत्ययं सीकृत्यायमों विधेयः, अमरैस्तथा जुगुले यथा उद्गायतां मानवानां गाने सहायता साहाय्यकर्तृणां समूहोऽभूदिति । निपीयेति । 'पीट पाने दिवादिः, निपूर्वादस्मात्पूर्वकाले क्वा तस्य ल्यवादेशः । १५ अर्जुनेति । 'ककुमोऽर्जुन' इति हैमः । मत्तेत्यादि । मचाश्च तेऽल. यथ तैः । जुगुझे इति । 'गुजि अन्यक्ते शन्दे' अस्मारकर्मणि लिट् । प्रमोदेत्यादि प्रमोदेनोद्भुरा उन्मदास्ने च ते मानवाश्च तेषां 'आहादः १८ प्रमोदः प्रमद' इति हेमः । 'मनुजो मानकः पुमान्' इति च । उद्गायतामिति । उत् ऊर्दू गायन्तीति उद्गायन्तस्तेषाम् । गानेत्यादि । सहायानां भावः सहायता, मावे वल्, यद्वा सहायानां २१ समूह इति विद्महे सामूहिकम्तम्, ततः सप्तमीतत्पुरुषः ॥ २१ ॥ समालिलिगुर्गुरुमारनना आना भुवं लोलदुलाहताभिः । छायाप्रदानेन पनाम्युपेवान्न्यमत्रपनिव सत्फलैथ ।। २२ ॥ २४ ..

२२ श्रीगौतमीयफाव्यं गुरुर्महान् योऽसौ भारस्तेन नया नमनशीला आमाः सहकारतरवो लोलाश्चञ्चला अत एव लुलन्त्यो नम्रीभवन्त्यो या लताः शाखास्ता- ३ भिUवं पृथ्वी समालिलिहुरालियामासुः । उत्प्रेक्ष्यते---चनाम्युपेतान् वनं प्राधान् नून् :मनुष्यान् छायायाः प्रदानेन वितरणेन च पुनः सत्फलैन्थमन्त्रयन्निव निमन्त्रयामासुरिव, यथाऽन्योऽपि सत्पुरुषः स्वस्थाने समागतं जनं वसतिप्रदानेन सद्भोजनादिभिश्च निमन्त्रयतीति छायार्थः । समालिलिगुरिति । सम्-आइपूर्वात् 'लिगि गतौ' अस्मालिट् । लोलेति । 'चटुलं चपलं लोलं' इति हैमः । लुलदिति । ९'लल विलसने' तुदादिरस्मालंटः शत्, यद्यपि धातुपाठेऽयं धातुर्न दृश्यते तथापि हैमकोशवृहद्वृत्तौ लोलशब्दाधिकारे लिखितोऽस्ति, यद्यपि तत्र भौवादिकस्य प्रयोगः कृतोऽस्ति परं महाकविपयोगाची. १२ दादिकोऽपि ज्ञायते, तथाच श्रीहेमाचार्यकृतपरिशिष्टपर्वणि तृतीयसमें नागश्रीदृष्टान्ते जुलैदिति तौदादिकस्य प्रयोगः । एवं 'लुलकर्ण नमसुच्छे' इत्यादियशोधरचरित्रादायपि ज्ञेयम् । अमरवृचौ तु लोल- १५ शब्दाधिकारे 'गुड विलोडने' घातुः मोक्तोऽस्ति, डलयोरैक्यमादित्य शब्दसिद्धिः कृतास्ति । धातुपाठे तु अयमपि धातुर्न दृश्यते इति सघीभिर्विमान्यम् । लतेति । 'शिखा शाखा लताः समाः' इति हैमः। १८ पनेत्यादि । मनमभ्युपेता बनाभ्युपेतांस्तान् अभिउपपूर्वात 'इण् गती' इत्यसास्कर्तरि कः । न्यमत्रयनिति । निपूर्वान्मन्यतेल । सत्फलैरिति । सन्ति समीचीनानि च तानि फलानि च तैः ॥२२॥ नीलामलुम्न्याचिवहारहरोच्चैर्मण्डपेवास्तृतचारुपत्राः । २२ द्राक्षासपाधूर्णितवाननेवाः कृतार्थयन्ति सक्यो युवानः॥२३॥ परपम्-... गृहोवाचलुलदयोंकरा तस्यां शये कयम् ॥३०॥"

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २३ नीलानि नीलवर्णानि यान्याम्राणि सहकारफलानि तेषां लन्त्रिः भिराचितानि पूरितानि यानि हारहूराणां दीक्षालतानामुञ्चरुन्नतानि मण्डपानि तेपु ास्तृतानि चारूणि सुन्दराणि 'पत्राणि कदल्यादि-३ दलानि यस्ते तथा द्राक्षासवेन द्राक्षामुरापानेन आसमन्ताद् धूर्णि- तानि घूर्णनयुक्तानि अत एव ताम्राणि रक्तानि नेत्राणि येषां तें तथाविधा युवानस्तरुणपुरुषा वयस्तारुण्यामिधानं कृतार्थयन्ति सह कृतकृत्यं चक्रुः, सफलमकार्परित्यर्थः । आचितेति । आईपूर्वात् 'चिञ् चयने' अस्माकर्तरि क्तः, 'पूर्ण साचितं छन्नपूरिते भरित निचितं व्याप्तं' इति हेमः।। हारहरेति । 'द्राक्षा तु गोस्तनी । मृद्री. का हारहरा चेति च हैमः । मण्डपशब्दोऽर्द्धची दित्वात्पुक्कीचलिङ्गः । आस्तुतेति । आइपूर्वात् स्तृनः कर्मणि क्तः । आसवेति । 'मद्य- सन्धानमासुतिः । आसवोऽभिपवः' इति हैमः । आपूर्णिवेति । 'पूर्ण १२ प्रमणे' असाकरि कः, कृतार्थयन्तीति कृतार्थ कुर्वन्तीति विग्रहे कृतार्थशब्दात् 'तत्करोति' (ग०) इत्यर्थे णिच् , 'लट्ने (३२२।११८) इति स्मयोगे लिटोऽपवादो लट् ॥ २३ ॥ प्रलम्बजम्यूसहकाररम्माछायातिशीतोदकपुष्करिण्यः । सूर्यातपशान्त्यपनोददक्षा वनेयनासन् किमु सेवनीयाः॥२४॥ अत्रासिन्वने कानने सूर्यस्य आतपेन प्रतापेन उत्पन्ना यी श्रान्तिः श्रमस्तस्सा अपनोदे विनाशे दक्षाश्चतुराखथा प्ररम्यानां प्रचण्डानां जम्बूसहकाररम्माणां जम्वाम्रकदलींवृक्षाणां छायं प्रलम्ब जम्बूसहकाररम्माछायं तेन अतिशीतमुदकं पानीयं यामु तास्तया २१ विधाः पुष्करिण्यो वाप्यः किमु सेवनीया . आश्रयणीया नासन्न चमूवुः, अपि तु परेवेत्यर्थः । जनानामिति शेषः । रमार १५ .

श्रीगौतमीयकाव्यं छायेति । 'रम्मा मोचा कदल्यपि' इति हैमः । 'छाया वाहुल्ये' (२२२) इति क्लीवत्वं 1 पुष्करिण्य इति । पुष्करं जलं पद्म ३ वा अस्ति आखिति । 'पुष्करादिभ्यो देशे (५।२।१३५) इतीन् , मानेभ्यः (४।१५) इति डीप् । 'पुष्करिण्यां तु खातकं' इति हेमः। 'समचतुरसा वापी पुष्करिणी' इति मिश्राः। श्रान्तीति । 'श्रमु तपसि खेदे च' इत्यस्माद्भावे तिन् , 'तितुत्रतथ- (७९) इति नेट् । 'अनुनासिकस्य- (६।४।१५) इति दीर्घः, सूर्यातपे- नोत्पन्ना श्रान्तिः सूर्यातपश्रान्तिः शाकपार्थिवादित्वान्मध्यपदलोपः । ९ आसन्निति । अस्तेः कर्तरि लइ ॥ २४ ॥ इति ग्रीष्मवर्णनम् ॥२॥ अथ चतुर्भिर्वा वर्णयति-~- १२ दिव्युच्छलहुन्दुभिनादमेघध्वनिमयूरान् मदयाञ्चकार । तत्क्रूजनोत्कण्टकितैः कदम्बैरिहैव लेभे सुमनोवनश्रीः॥२५॥ दिवि आकाशे उच्छलनुत्पतन् योऽसौ दुन्दुभिनादो दिव्यपरह- १५ निर्घोपः स एव मेघध्वनिर्धनगारवः स कर्तृतामापन्नो मयूरान्वर्हिणो मदयाञ्चकार मदयति स, आनन्दितान्विदधे इत्यर्थः । अथ इहव अस्मिन्नेवावसरे तेषां मयूराणां कूजनेन जल्पनेन उत्कण्टकिता उल्ल- १४ सितासत्तूजनोत्कण्टकिवास्तैः कदम्बैनीपवृक्षैः सुमनोयनश्रीः पुष्परूपा वनलक्ष्मीलेंमे, प्राप्यते सत्यर्थः । एतावता त्रैलोक्यनाथागमन- समुद्भवं दुन्दुमिनादमेव मेघध्वनिमाराम प्रमुदितानां मयूराणां २॥ कूजनेन समुल्लसिताः कदम्याः प्रचुरतरपुप्पसम्पत्तिमाजो वरिति मावः । दुन्दुमीति । भेरी दुन्दुमिरानकः पटह' इति हैमः । मद- रायामित्यादि । णिजन्तान्मदेराम्, 'मदी हर्पग्रपनयोः' इति मित्तान " ९ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकयो सहितम् । 'मिता हवः' (६४९२)। कदम्बैरिति । 'अथ हलिप्रियः, नीपः कदम्ब' इति हैमः । लेमे इति । लभैः कर्मणि लिट् । सुमन इत्यादि। वनसम्बन्धिनी श्रीर्वनश्रीः, सुमनसः पुप्पाण्येव वनश्रीरिति विग्रहः, ३ सुमनसूशब्दो नित्यं वहुवचनान्तः स्त्रीलिङ्गश्च 'पुष्पं सून सुमनस' इति हेमचन्द्रोक्तेः, 'भूग्नि स्त्रियां सुमनसः' इति रलकोपकारोक्तेश्च । किञ्च 'पुप्पं सुमनाः कुसुम' इति नाममालादिदर्शनेनास्यैकवचनान्तत्वमपि ६ प्रतीयते । तथा च प्रयोगः-'वेश्या श्मशानसुमना इव वर्जनीया' इत्यादि ।। २५॥ आच्छादितो यद्यपि यत्नवृत्त्या यः केतकैः स्वप्रसवस्तथापि । खसौरभेणाथ स विश्रुतोऽभू- न्महानुभावः क्व निलीयते यत् ॥ २६॥ केतकैर्वृक्षविशेषैर्यः खप्रसवो निजपुष्पं यद्यपि यत्नवृत्त्याऽऽच्छा- दितो यत्नपूर्वकमाच्छाद्य रक्षितोऽभूदित्यर्थः । तथापि अथ स प्रसवः स्वसौरभेण निजसौगन्ध्येन विश्रुतोऽभूत् प्रकटीबभूव । युक्तोऽय-१५ मर्थः-यत् यस्मात्कारणात् महान् अनुभावः प्रभावो यस्य स महानुभावः पदार्थः क निलीयते कुन प्रच्छन्नभावं मजते, अपि तु न कापीत्यर्थः। आच्छादित इति । आइपूर्वाच्छादयतेः कर्मणि क्तः। यत्नेत्यादि । १८ यतनं यलसेन वृत्तिवनं तया 'वृत्तिस्तु वर्तने, कैशिक्यादौ विवरणे' इत्यनेकार्थः । केतकैरिति । 'केतकः कचच्छद'. इति हैमः । प्रसव इति । 'पुष्पं सूनं सुमनसः प्रसवश्च मणीवर्क' इति च हैमः । विश्रुत २६ इति । 'अथ विश्नुतं ज्ञाते हृष्टे प्रतीते च' इत्यनेकार्थः । अनुभावः इति । 'अनुमावो प्रभावे स्यानिश्चये भावसूचने' इति अनेकार्थः २३ .

२६ श्रीगौतमीयकाव्यं च । निलीयते इति 'लीड श्लेपणे दिवादिरात्मनेपदी च । निपूर्वाद- स्माकर्तरि लट् ॥ २६॥ ३ सदय॑मर्हन्ति सदाहणाऱ्या इतीच बुद्धा कुटजैविदग्धैः । श्रीतीर्थनाथार्चनचारुहेतुं वितत्य पुष्पश्रियमाशु तस्थे ।। २७॥ अर्हणां पूजामर्हन्तीति अर्हणाऱ्याः पूजायोग्याः पुमांसः सदा ६ निरन्तरं सत्समीचीनमय पूजाविषियोग्यपुप्पादिद्रव्यमर्हन्ति । तदु- पादानाय योग्या भवन्तीत्यर्थ इति एतत्पागुक्तं वुद्धा इव ज्ञात्वा इव विदग्धैः विचक्षणः कुटजैस्वरुविशेपैः श्रिया लक्ष्म्या निरुपमोत्तम- * केवलज्ञानादिलक्षणया युक्तस्य तीर्थनाथस्य वीरप्रभोरनने पूजने चारुः शोभनो हेतुः कारणं तथाभूतं पुष्पश्रियं कुसुमलक्ष्मीमाशु शीघं वितत्य विस्तार्य तस्थे सीयते स । अर्घ्यमिति । 'मूल्ये पूजाविधी १२ चार्थे' इत्यमरः । अर्घाय पूजाविधये इदमयं पादार्घाभ्यां च' (५।४।२५) इति यत् । अर्हन्तीति । 'अर्ह पूजायां' करि लट् । अहणेति । 'पूजार्हणा सपर्यार्चा' इति हैमः । कुटजैरिति । १५ 'कुटजो गिरिमल्लिका' इति च । श्रीतीर्थेत्यादि । उतरपदलोपी समासः । अत्र हेतुशब्दो नित्यपुंलिङ्गः । वितत्येति । विपूर्वाचनोते. पूर्वकाले का तस्य श्यबादेशो 'वा त्यपि' (६।४।३८) इत्यनुना- १८ सिकलोपः । तस्ये इति । स्साघातो वे लिट् ।। २७ ।। पनच्छटाच्छोटनतो धनोयर्पामु हर्षेण यथोजजृम्भे । श्रीवीरनाथागमजातहर्पस्तथा पुपुष्पे तरुमिः शिलीन्धैः ॥२८॥ घनेन घनवृष्टया उद्यत्य उद्गच्छन्त्यः प्रादुर्भवन्त्यो या वर्षास्तासु पना निविडा याश्छटास्तासामाच्छोटनत आच्छोटनात् शिलीन् सिलामिपानसरुमिहिषेण प्रमोदेन यथा उज्जम्भे विकसितं तथा गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २७ तेनैव प्रकारेण श्रीवीरनाथस्यागमेन आगमनेन जात उत्पन्नो हों येषां तैस्तथाविधैः सद्भिः शिलीन्यवृक्षः पुप्पे पुप्पितम् । इदमत्र तात्पर्यम्- यथा किल वर्षाकाले सान्द्रजीमूतच्छटासंस्पर्शादुत्पन्नप्रमोदाः शिलीन्ध्रा । विकखरा वमूवुस्तथैवेदानीमपि श्रीवीरेश्वरागमनसमुद्भूतहर्षास्ते चारु- तरपुप्पसम्मारमाजो जाता इति । घनेति । निविडं तु निरन्तरं, निविरीसं धनं सान्द्र' इति हैमः । धनोदित्यादि । अयं धन-६ शब्दो मेघपर्यायः । 'इण् गतो' अदादिरुत्पूर्वादस्मालटः 'उगितश्च' (४।१६) इति डीप्, 'पुंवत्कर्मधारय-' (६।३।४२) इति पुंवद्भावाद् डीपो निवृत्तिः, 'वास्तपात्ययः प्रायद्' इति हैमः । ऋतु-९ विशेषवचनोऽयं वर्षाशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः स्त्रीलिङ्गश्च बोध्यः । यस्तु वृष्टिवाचको वर्ष(पी)शब्दस्स तत्र न प्रायः, तस्य पुंक्लीय- लिगलाबहुवचनान्तत्वानियमाच । जजृम्भे इति । जृम्भते वे लिट् । १५ पुपुप्पे इति । 'पुप्प विकासने' अस्माद्भावे लिट् ॥ २८ ॥ इति वर्षाऋतुवर्णनम् ॥ ३॥ संप्रति चतुर्भिः शरतुं वर्णयति- कुत्रापि सान्द्रद्रुमजालगर्भ सरो विरेजे विमलाम्बुगर्भम् । वृतान्धकारेण सुखैकभूमिः समुचिता शारदकौमुदीव ॥ २९ ।। कुत्रापि सान्द्रा घना ये द्रुमा वृक्षास्तेषां जालं समूहस्तस्स गर्मो १८ मध्यप्रदेशस्तसिन् निविडतस्वृन्दमध्यदेशे इत्यर्थः, विमलं वर्षा- पगमेन फर्दमामावानिर्मलं यदम्बु पानीयं तद्गमें मध्ये यस्य तत्था- विघं सरखडागो विरेने शुशुभे सरः । केन : अन्धकारेण पार्धवर्गि-१५ कुड्यादितमसावृता वेष्टिता तथा मुखस्सैकाऽद्वितीया भूमिः सुखैक- भूमिखमा पुनः समुचिता. एकीमला इंशी शारदकौमुदी इव घर-२५ २८ . श्रीगौतमीयकाव्यं द्भवचन्द्रज्योत्ला इव यथैवंविधा शारदकौमुदी विराजते तथा तदि- त्यर्थः । जालेत्यादि । 'जालं निवहसंचयो'. इति हेमः । गर्मः ३ कुक्षौ शिशौ सन्धौ भ्रूणे पनसकण्टके । मध्येऽनावपवरके' इत्यने- कार्थः । विरेजे इति । विपूर्वाद्राजतेः कर्तरि लिट् । वृतेति । वृत्रः कर्मणि क्तः, 'श्युकः कित्ति' (२।११) इति ने । शारदकौमु- ६ दीति । शरदि धनात्यये भवा शारदी 'तत्र भवः (४।३।६३) इत्यण, 'टिड्डा- (११।१५) इति डीप्, सा चासौ कौमुदी चेति विग्रहः । 'शरधनात्यये' इति हैमः । 'चन्द्रातपः कौमुदी च ज्योत्ला' ९ इति च हैमः । नन्वत्र भिन्नलिङ्गयोः कौमुदीसरसोरुपमानोपमे- यत्वेनोपादानमयुक्तमिति चेत्', मैवं, उपमानोपमेययोभिन्नलिङ्गत्वं न दोपाय बहुभिर्महाकविमिराहतत्वात् उक्तं च-'लिङ्गसंख्याविमेदेऽपि १२ विशेषणविशेप्यताविभक्तिः पुनरेकैव विशेषणविशेप्ययोरिति' । यथा विशेषणविशेप्ययोस्तयोपमानोपमेययोरपि बोध्यम् ॥ २९ ॥ चन्द्रातपे मूठितचन्द्रपादैर्दीप्रोदविन्दूम्नलिनीदलेपु । १५ इह प्रमचा जगलुः सलील मुक्ताफलभ्रान्तिमिता मरालाः॥३०॥ इहास्सिन् ऋती प्रमचाः प्रकृष्टमदोपेता अत एव मुक्ताफलानां मान्ति प्रममिताः प्राप्ताः मराला हंसपक्षिणश्चन्द्रातपे चन्द्रज्योत्सायां १८ नलिनीनां - कमलिनीनां यानि दलानि पत्राणि तेषु मूर्छिता वृद्धि प्राप्ता ये चन्द्रपादाश्चन्द्रकिरणास्वैर्दीपा दीप्तिमन्तो ये उदविन्दवो, जलकणास्तान सलीलं लीलासहितं यथा स्याचया जगलुर्गलन्ति स, २१मक्षयामामुरिति यावत् । अयमर्थः-शरकाले हि चन्द्रवत्या रजन्यां चन्द्रकिरणैदीप्तिमन्तो नलिनीदलस्सा जलकणा मतैमरोलैर्मुक्ताफल- २३ प्रान्त्या मक्षिता इति । चन्द्रातपै इति । 'चन्द्रातपः कौमुदी चं २९ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । ज्योत्स्ना' इति हैमः । मूच्छितेत्यादि । 'मुर्छा मोहसमुच्चाययोः' अस्माकरि तः, 'पाद-दीधिति-कर-द्युति-द्युत' इति हैमः । दीप्रेत्यादि । 'दीपी दीप्तो' 'नमिकपिलि- (२२।१६७) इति ३ रक्, उदकस्य विन्दव उदविन्दवः, अत्र 'मन्थोदनसक्तुविन्दुवज-' (६३।६०) इति उदकस्योदादेशः । जगलुरिति । 'गल अदने'. अस्मालिन, इता इति इणः कर्वरि क्तः ॥ ३० ॥ परस्परालिशितमातुलिङ्गा दादमेदं प्रतिदर्शयन्तः । परस्परप्रत्युपदापदात सापर्मिकस्नेहमिव प्रपन्नाः ॥३१॥ परस्परालिग्नितमातुलिका अन्योऽन्यानालिन्य स्थिता वीजपूरकतरवो ९ जनान् दूरात् दूरदेशादभेदमभिन्नत्वं प्रतिदर्शयन्तः सन्तः । परस्परेभ्यो चतुर्थीबहुवचनम् , अन्योऽन्येभ्यः प्रति आमिमुख्येन या उपदा प्रामृतं सद्वस्तुढीकनमिति यावत् । तयाऽवदातं निर्मलं मनोज्ञ वा १२ साधर्मिकस्नेहं समानधर्मधारकजनप्रीतिं प्रपन्ना इव प्रामुवन्ति सेवे- त्युत्प्रेक्षा । परस्परेत्यादि । परस्परैरन्योऽन्यैरालिमिताः संश्लिष्टाः पर- स्मरालिहितात्रे च ते मातुलिझाश्चेति विशेषणसमासः । 'मातुलिको १५ वीजपूर' इति हेमः । दर्शयन्त इति । हेतुमण्णिजन्ताद् दृशेलटः शत, पत्र जनानिति द्वितीयं कर्मपदमध्याहार्यम् । प्रत्युपदेत्यादि । प्रतिशब्दोऽत्राभिमुल्यवचनः, उक्तं च 'व्याध्याभिमुख्ययोव्हौ १८ वारणे प्रतिरुच्यते' इति । उपदानमुपदा उपपूर्वाद्दान् , 'आतश्चोप- सगें' (३३११३६) इति स्त्रियामइ, 'उपदा प्रामृतं प्रोक्तमुपमाह्य मुपायन' इति हलायुधः । 'अवदातं तु विमले मनोज्ञे सितपीतयोः' २१ इति हेमः 1 सापर्मिकेति । समानो धर्मः सधर्मस्तं चरन्तीति साथ- मिकाखेपां स्नेहलं 'धर्म चरति' (१४४१) इत्यनेन ठक् । प्रपन्ना इति । 'पद गती' दिवादिसलात् मपूर्वादलात्करि कः ॥ ३१ ॥ २४ श्रीगौवमीयकाव्यं नगानुपङ्गात्तु वितानिताशा वल्लीः समुल्लासवती: समीक्ष्य । संयोगमिष्टैः सकलार्थसारं विलासिलोकोऽत्र विदाञ्चकार ॥३२॥ अवासिन् ऋतौ विलासिलोको भोगिजनो नगानां वृक्षाणां नगैः सह योऽनुपङ्गः सम्पर्कः सङ्गम इति यावत् , तस्मात् वितानं विस्तारो जातमस्सेति वितानितं तथाविधमहं शरीरं वाऽऽसांता ६वितानिताशास्ता अव एव समुल्लासो विकाशोऽस्ति - आसामिति समु. ग्लासवत्यस्खा एवंविधा वल्लीलताः समीक्ष्य दृष्ट्वा इष्ट्रेवल्लभजनैः सह यः संयोगः संसर्गवं सकलार्थेषु समस्तवस्तुपु सारं तत्त्वमूतं विदाञ्चकार ६ जानाति स । अयं भावः-तरुवल्लभसंसर्गाप्राप्तसमुल्लासा लता निरीक्ष्य विलासिजन इत्यमतर्कयत्-'यदत्र संसारे इष्टसंयोगात्परं सारं किमपि नास्तीति' ] अनुपशाचिति । 'पज सङ्गे' अनुपूर्वः अस्मानावे २ पञ्, 'उपसर्गात् सुनोति०' (८३।६५) इत्यादिना पत्वं, च 'चोः कु:' (८।२।३०) .इति कुत्वं, तुशब्दः पादपूरणे पुनरर्थे वा । वितानितेत्यादि । वितानं कदके यज्ञे विस्तारे क्रतुकर्मणि' इत्यने १५ कार्थः । 'तदस्य सञ्जातं' (५।२।३६) इति तारकादित्वात् इव । समीक्ष्येति । संपूर्वादीक्षतेः क्वा तस्स ल्यप् । इटैरिति । सहार्थस्य गम्यमानत्वात् 'सहयुक्तेऽप्रधाने' (२।३।१९) इति i८ तृतीया । 'वृद्धो यूना' ( ११२१६५) इति निर्देशात् । विलासीति । विलसति तच्छीलः 'सस् संश्लेषणादी' 'चौकपलस- (३।२।१४३), इति पिनुण् । ततो लोकशब्देन कर्मधारयः । विदामिति । 'विद २.ज्ञाने' 'उपविद- (३६१३३८) इत्याम् , विदेत्यकारान्तनिपातनाल, लघुपथगुणः (:) |॥ ३२॥ इति शरदर्णनम् ॥४॥ . २३ ३१ . गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । साम्प्रतं त्रिमिहेमन्तं वर्णयति- यथा रसो व्यापिपरद्धिमचौं पुण्देक्षुकाण्डेपु तदा तथैव । कालो जडवेत्सकलार्थसिद्धी क्षमो भवेतिक न पतित्रिलोक्याः ॥ ३३ ॥ यथा येन प्रकारेण हिम” हेमन्तकाले पुण्ड्राः पुण्ड्रजातीया ये इक्षवो रसालवृक्षास्तेषां काण्डेषु स्कन्धेषु रसो मधुराखांदो व्यापिपरत् व्यापृतोऽभूत् परिणमति सेति यावत् । तथैव तेनैव प्रकारेण तदा तस्मिन् काले प्रमोरागमनसमयेऽपीत्यर्थः । इक्षुकाण्डेपु रसो व्यापि-९ परत् इत्यावृत्त्या योज्यम् । 'ननु कालद्रव्यस्याऽजीवत्वेन जडरूपत्वा- कथमीदग्विधानसामर्थ्य सनाघटीति' इत्याशश्याह-काल इत्यादि । चेद्यदि कालोऽनेहा नडोऽचेतनस्तथाविधकार्यकरणेऽशमोऽस्तीत्यर्थः ।१२ तथापि त्रिलोक्याः पतिस्त्रैलोक्येश्वरो जिनः सकलार्थसिद्ध्यै समस्त- कार्यसिद्धयै कि न क्षमो न समर्थो भवेत्, अपि तु मवेदेवेत्यर्थः । एतेन भगवदतिशयादैवकसिन् काले सर्वर्तुप्रादुर्भावो न वन्यस्य १५ कस्यापि प्रभावादित्यावैदितम् । व्यापिपरदिति । 'पृ पालनादौ' दीर्घान्तो जोहोत्यादिकश्च न्याइपूर्वादलात्करि लङ् । ततो द्वित्वादी कृते 'मोदिसोवा' इत्यडागमः, यद्यपि पाणिनीयादौ एतत्सूत्रा-१० भावाद् व्यापिपरित्येवं रूपं दृश्यते तयापि सारखतादापेतत्सद्भापान दोषः । हिमर्चाविति । हिमं प्रधानं यत्र स हिमप्रधानः, स चाऽसौ .. ऋतुध हिमतुस्खलिन् चाकपार्थिवादित्वान्मध्यपदलोपः । पुण्द्रेति , स्टेवरसुदपालयप्रमाणिते माधवविवरणोपेते सारस्वतन्याकरणे २ सम नरमपनोवाकिमपेज पढे. १ .

३२ श्रीगौतमीयकाव्यं तस्याः . 'भेदाः कान्तारपुण्डायास्तस्य' इति हैमः । कान्तार १ पुण्डू २ इत्यादयस्तस्यैक्षोर्मेदाः सन्तीति तदर्थः । काण्डेप्विति । 'काण्डो ३ नालेऽधमे वर्ग दुस्कन्धेऽवसरे शरे! इत्यनेकार्थः । सकलेत्यादि । सकलाश्च तेऽर्थाश्च सकलार्थास्तपां सिद्धिनिप्पत्तिस्तस्यै अलमर्थकस्य क्षमपदस्य योगे 'नमःस्वस्ति- (२।३।१६) इत्यादिना चतुर्थी । पत्रिलोक्या इति । त्रयाणां लोकानां समाहारस्त्रिलोकी, 'तद्धितार्थ-(२,१५१) इत्यादिना समाहारे द्विगुः । 'द्विगो:' - (१।१।२१) इति डीप् ॥ ३३ ॥ प्राकुमलेषु प्रसवेषु पश्चा- जनानुरागेण ततः फलेषु। दः पदं दाडिमपादपानां यत् सुन्दराणां न हि सुन्दरं किम् ॥ ३४ ॥ जनानां लोकानामनुरागोऽनुरतिस्तेन कर्तृभूतेन प्राक् पूर्व दाडि- मपादपानां दाडिमवृक्षाणां कुबलेषु मुकुलेषु ईपद्विकसितकलिका ५ इति यावत् , पदं स्थानं दः धृतं, पश्चात् प्रसवेषु तेपामेव पुप्पेषु पदं द । ततस्तदनन्तरं तेषां फलेषु पदं दधे । अयमर्थः-पुप्पफलोत्पचेः पूर्व(हि)दाडिमानां मुकुलेप्येव जनानामनुरागः समाजनिष्ट ततः पुप्पो- १८ पती सत्यां तत्रानुरागोऽभूत् तदनु फलपादुर्भाव तत्रैव जनानु- रकता जातेति । एतदेव द्रढयति-यत् यससाकारणात् सुन्दराणां शोमनाना किमऽवयवादि सुन्दरं न हि भवेत् सर्वमपि सुन्दरमेव २१स्यादित्यर्थः । इदमत्र तात्पर्यम्-'यतो दाडिमवृक्षाः स्वयमेव शोम. नास्ततो गुकुलापाखदवयपास्तु शोमनाः स्युरेव अथ शोमनत्वाथ सर्वत्र सर्वावयवेषु जनानुरागो पटत' एवेति । कुमलेप्यिति । कुभलो २४ गुकुलोऽस्त्रिया' इत्यमरः । अन्वित्यादि । 'रागोऽनुरागो रतिः' इति .

. गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । हैमः । दधे इति । धृञः कर्मणि लिट् । पदमिति । 'पदं स्थाने विभक्त्यन्ते शब्दे वाक्येऽङ्कवस्तुनोः' इत्यनेकार्थः ।। ३ ।। विनाऽपि कालं यदहो कुवल्यः पुप्पैदलैः सान्द्रतरा बभूवुः। ३ तदैवतैर्देवपतेः प्रभायो व्यक्तीकृतो भक्तिपरैः पुरैव ॥ ३५ ॥ अहो इति आमन्त्रणे, भो लोकाः ! कुवल्यो वदर्यः कालं विनाऽपि पुप्पाद्युत्पत्तिसमयमन्तरेणापि यत्पुष्पैः कुसुमैर्दलैः पत्रैश्च सान्द्रतरा ६ अतिनिबिडा बभूवुस्तद्भक्तिपरैः सेवातत्परैर्देवतैः सुरैः पुरेव प्रभो- रागमनात् प्रागेव देवपतेर्वीरप्रभोः प्रभावो माहास्यं व्यक्तीकृतः प्रकटितोऽभूदित्यर्थः । कुवल्य इति । 'कर्कन्धुः कुवली कोलिर्वदरी'९ इति हैमः । सान्द्रेत्यादि । अतिशयेन सान्द्राः 'अतिशयेऽर्थे तरप्' । दैववैरिति । देवता एव दैवतं, 'प्रज्ञादित्वात् खार्थेऽण्' .. पुंडलीवलिङ्गोऽयम् । देवेत्यादि । देवानां चतुर्विधसुराणां ब्रह्मविष्णु-१९ महेशादीनां वा ज्ञानादिपरमातिशयसम्पन्नत्वात्पतिर्विमुर्देवपतिस्तस्य । व्यक्तीत्यादि । अन्यको व्यक्तः सम्पद्यते तथाकृतो व्यक्तीकृतः 'कृभ्वस्ति- (५।४।५०)इत्यादिना च्चिप्रत्ययेऽस्य 'चौ' (६।३।१३८) १५ इतीकारः । भक्तीत्यादि । भक्तौ परा भक्तिपरास्तैः भक्तिरेव परा श्रेष्ठा येषां तैरिति वा । पुरेति । आदन्तमव्ययमिदं 'प्राक् पुरा प्रथमे' इति हैमः ॥ ३५ ॥ इति हेमन्तवर्णनम् ॥ ५॥ अथैकेन शिशिरं वर्णयति- मुस्वादुरूपैर्वदरैठुलन्त्यो यतो पदों भुवमाससञ्जः। नद्योगिनां चापि विलासिपुंसरमासीद्रहोभूमिरिहाऽऽथितानाम् ॥२२ ३ गो. का. ।

श्रीगौतमीयकाव्यं . इहालिन् पाती सुखादुरूपैः सुखादुभिः सुरूपैध चनिजफ - लुलन्त्यो नमीमवन्त्यो बदर्यः कुवलीवृक्षा यतो यस्मात्कारणाद्भुवं ३ पृथ्वीमाससजुरालिलिः, तत्तसाढेतोः आश्रितानाम्-एना मुवमाश्रित्य स्थितानाम् , योगिनां योगवतां नराणां, च पुनर्विलासिपुंसां भोगिमनुप्या- णामपि रहोमूमिरेकान्तस्थानमासीद्वभूव । रहोभूमिकाक्षिणो हि योगिनो ६ वा भोगिनो वा भवन्तीत्यतस्त्रेपामेव ग्रह्णम् । सुखादुरूपैरिति । सादु मधुरो रसः, रूपं वर्ण आकृतिर्वा, खादु च रूपं च खादुरूसे शोमने खादुरूपे येषां तानि तैः । वदरैरिति । वदर्याः फलानि ९ बदराणि वैः, अनुदाचादित्वादञ् ‘फले लुक्' (४।११६३) इति लक्, 'लक्तद्धित' (१।२।४९) इति डीपो उक् । आससअ. रिति । 'पञ्ज सङ्गे' आइपूर्वादलात्कार लिट् । योगिनामिति । १२ 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', सोऽस्त्येपामिति मत्वर्थे इनिः । विलासी. त्यादि । विलासिनश्च ते पुमांसश्च तेपाम् । रह इत्यादि । रहवासी भूमिश्चेति विग्रहः । रह इति सान्तमव्ययमनन्ययं च । रहो मुखे १५रते तत्त्वे' इति हेमः । गुह्ये एकान्ते इत्यर्थः ॥ ३६॥ पति शिशिरवर्णनम् ॥ ६॥ अथ लेशतः सर्व साधारणवर्णनमाह- दलान्यपीप्ये खल दुर्लभानि चेपामगानां मुमनःफलस्ते । स्व विधात्यन्तविलोकनीया भूता अहो भागवतोऽनुमायः ॥ ३७॥ येपानगानां वृक्षाणां इये यसन्ते दलानि पत्राण्यापि दुरीमानि २५ अगूपनिति शेपपुष्पफलादिकं तु दूरे तिष्ठतु दसन्यपि नासलिति . PM गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । अपिशव्दार्थः, ते वृक्षाः खस्यात्मनो यः ऋतुस्तस्मिन्निब सुमनःफलैः पुष्पफलैरत्यन्तविलोकनीया · अत्यन्तं यथा स्याच्या निरीक्षणीया भूता अभवन् । यथा खौं अतिरम्या भवन्ति तथैदानी अभूता इत्यर्थः । ३ अनोपपत्तिमाह-'अहो इत्याश्चर्ये' भगवतोऽयं भागवतः भगवत्सम्बन्धी अनुभावः प्रभावो विलोक्यतामिति शेपः, यद्दधाना एवंविधास्तरवो जातास्तत्र प्रभोरतिशय एव कारणं नवन्यत् किमपीति भावः । इप्ये इति । 'वसन्त इप्यः सुरभिः' इति हैमः । खल्विति । इदं वाक्या- लकारे निश्चये चा, दुर्लभानीति दुःखेन लभ्यन्ते इति ईषद् दुःसुपुर (३।३।१२६) इति खल् । 'उपसर्गात्' (७११६७ ) इति नियं-९ मान्नुम्मावः । सुमन इत्यादि । सुमनसश्च फलानि च तैः । भाग- वत इति । तस्येदम् ( ४३३२१२०) इत्यण ॥ ३७ ॥ अथ सामान्यतो वनं वर्णयति- पुप्पैः फलैर्या युगपत्समिद्धे नीरन्ध्रनीलगुमकाननेऽसिन् । पतत्रिणस्तारविराववन्तो वर्क्सच्छुभोदकमियाचिकीर्चन् ॥३८॥ { पुष्पैर्वा पुनः फलैर्युगपत्समकालं समिद्धे न्यावे शोभिते वाऽ-११ स्मिन् नीरन्ध्राणां सान्द्राणां नीलानां नीलवर्णानां द्रुमाणां वृक्षाणां कानने वने तार उच्चस्तरो यो विरावो ध्वनिः स विद्यते एपामिति तथाविधाः पतत्रिणः पक्षिणः कोकिलाद्याः वर्मन् प्रवर्तिप्यमाणः ३६ शुमः प्रशस्तो य उदर्क आगामिकालोद्भवं फलं तमचिकीर्चन्निव कथ- यामासुरिवेत्युत्प्रेक्षा । उचरकाले हि अत्र शुभप्रवृत्तिभविष्यतीत्या- यूचुरिवेति भावः । समिद्धे इति । 'त्रिइन्वी दीप्तौ' संपूर्वादस्माकपरि २१ का, ईदित्त्वानेहनीरन्ध्रेति । 'निविरीस धनं सान्द्रं नीरन्' इति हैमः । पतत्रिण इति । पतत्राणि तनूरुहाणि सन्त्येपामिति मत्वर्थे २३ १२ . .

श्रीगौतमीयकाव्यं
इनिः । तारेति । 'तारोऽत्युच्चैनिः' इति हैमः । वर्ल्सदित्यादि।
'वृतु वने आत्मनेपदी 'वृन्यः स्यसनोः (११३।९२) इति परस्मै.
३पदं, 'न वृयश्चतुर्व्यः' (७२।५९) इतीडमावः, शुममस्त्य-
लिन्निति शुमः अर्शआदित्वादन्, 'उदर्कस्तद्भवं फल' इति हेमः।
उत्तरकालोद्भवमित्यर्थः । अचिकीनिति । 'कृत संशब्दने'
चुरादिः लइ । 'उपधायाश्च' (७१११०१) इति 'ऋत इत्-'
(७।१।१००) इति रपरत्वम् ॥ ३८ ॥
विभ्राजमानाऽनघटेव दूरातच्छयामलाभं विपिनं चभासे ।
५ मेरोरिवानीय धृतं धरियामैन्द्रं वनं भक्तिभृतैरमत्यैः॥३९॥
दूरादपदेशात् श्यामला आमा प्रमा यस्य तत्तथाविधं तत्
प्राग्ज्यावर्णितखरूपं विपिनं महसेनाख्यं वनं विभ्राजमाना दीप्यमाना:-
१२ प्रघटा इव मेघघटा इव वमासे शुशुभे। यथा दूरात श्यामलामा धनघटा
शोभते तथैदमित्यर्थः। उत्प्रेक्ष्यते-किमिव : भक्तियुक्कैरमत्यदेवमेरोः
कनकाचलाव आनीय धरित्र्यां पृथिव्यां घृतं स्थापितं ऐन्द्र इन्द्रसंबन्धि
१५वनमिव-नन्दनायं काननमिव इदं महसेनपण्डं भवति(भातिः), किंतु(8)
मतः मुरैमरोः सकाशादिहानी नन्दनं यनमेवातीति उत्प्रेक्ष्यते इति
भावः । अमेति । 'असं मेघो पारिवाहः' इत्यमरः । श्यामलेति ।
१८ सादामःसामलः श्यामः' इति हेगः । विपिनमिति । 'अटव्यरण्यं
विपिनं गहनं काननं चन' इत्यमरः । यमासे इति । 'भार दीसी'
फचरि लिट्र । आनीयेति । आर पूर्वाजयतेः पूर्वकाले क्या
२० तस्स स्यम्, प्रतिमति घृनः कर्मणि सः। ऐन्द्रमिति । इन्द्रस्सेदमित्यर्थे
'तन्येदम्' (१३.१२०) इत्यम् । भक्तीत्यादि । गतया भूताः
२२ पूरिता: । अमायरिति । 'यमा अमृताधमः' इत्यमरः॥३९॥

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । छायाभरेणोच्छ्रितभूरुहाणां वभार सा भूपि मेचकामाम् । त्रैलोक्यनाथक्रमधारणाय स्तृतेव गारुत्मतशक्रनीलैः॥४०॥ यत्र भुवि महसेनपण्डं वर्चते सा भूरपि पृथ्वी अपि उच्छित-३ भूरूहाणामुन्नतवृक्षाणां छायामरेण छायासमूहेन मेचकामां कृष्णप्रमा बमार धारयामास । अत्रोत्प्रेक्षते-त्रैलोक्यनाथस्य वीरप्रमोः क्रम- योश्चरणयोर्धारणाय विन्यासाय गारुत्मतशक्रनीलैः मरकतेन्द्रनील ६ मणिभिः स्तृता इव आच्छादिता इव, यतो मरकतादिभिरास्तृताऽपि भूमिर्मेचकाऽऽभां विभर्ति। वभारेति । मृञः कर्तरि लिट् । मेचकैति । 'कृष्णस्तु मेचकः' इति हैमः । मेचका चासौ आमा चेति विग्रहः १९ त्रैलोक्येत्यादि । त्रयश्च ते लोकाश्च त्रिलोकास्ते एव त्रैलोक्यं, 'सार्थे प्य' | 'पदोऽहिश्चलनः क्रमः' इति हैमः। अत्र तादयें चतुर्थी । स्तृतेति । स्तृजः कर्मणि क्तः । गारुत्मतेत्यादि । गारुत्मतानि च १२ शक्रनीलाश्च तैः 'मरकतं सश्मगर्भ गरुत्मतं हरिन्मणिः' इति, 'नीलमणिस्विन्द्रनीलः' इति च हैमः ॥ ४०॥ अथोपसंहरति- इत्थं तत्फलकुसुमच्छदाभिरामं तत्कर्माधिकृतकृती जिनेन्द्रभक्तः। खासमैः सह महसेनयक्षराजः खं पण्डं लघु परिमण्डयाञ्चकार ।। ४१ ।। तस्मिन् कर्मणि वनसंस्कारक्रियायां येऽधिकृता अधिकारिणो देवास्तेषु कृती विचक्षणतथा जिनेन्द्रस्य वीरपभोर्मकः सेवकः एवंवियो। महसेनयक्षरानो महसेननामा यक्षाधिपतिः स्वस्याऽऽत्मनो येऽसमाः , सेवकमाया व्यन्वरदेवास्तैः सह फलकुसुमच्छदाभिरामं फलपुष्पपत्र २३ - १५ १८ श्रीगौतमीयकाव्यं रमणीयं तत् प्रागुक्तसरूपं स्वमात्मीयं पण्डं काननमित्थमुक्तप्रकारेण लघु शीघ्रं परिमण्डयाञ्चकार समन्तात् शोभितं चक्रे । फलेत्यादि। ३ फलानि च कुसुमानि च छदानि च फलकुसुमच्छदानि तैरभिरामं रम्यं 'वह पर्ण छदं दलम्' इति हेमः । अस्खमैरिति । सहयुक्ते-' (२।३।१९) इति तृतीया । 'गीर्वाणा मरुतोऽखमा' इति हैमः । ६ महसेनेत्यादि । यक्षाणां राजा यक्षराजः 'राजाहःसखिभ्यः- (५।४।९१) इति ट्च् । महसेनश्चासौ यक्षराजश्चेति कर्मधारयः । लध्यिति । 'शीघं क्षिप्रं द्रुतं लघु' इति हेमः । परिमण्डयामिति । ९ मडि भूपायां' चुरादिः 'कास्प्रत्ययात्- (३।११३५) इत्याम् । 'अयामन्त- (६१५५) इति णेरयादेशः । इदं प्रहर्पिणीहत्तम् । तल्लक्षणं च---- -'नो जो गस्त्रिदशयतिः प्रहर्षिणीयम्' इति ॥४१॥ अथ कविः काव्यवर्णन(स्व)नामाख्यानपूर्वकं सर्गसमाप्तिं कथ- यति- इति श्रीकविरूपचन्द्रविरचिते गौतमीये महाकाव्ये महसेनवनवर्णनो नाम प्रथमः सर्गः॥१॥ इतिशब्दः परिसमाप्ती, श्रीरूपचन्द्रति कविनामकथनम्, गौत- मीय इति काव्यनामकथनं, गौतममधिकृत्य कृतो ग्रन्थ इति १८ गौतमीपं छमत्ययः । गणितं चात्र पद्मातुवर्णनद्वारा महसेनवगमिति, एवमुतरत्रापि द्रष्टव्यम् ॥ इति पापनापार्यक्षमाफल्याणगणिस्तायो गौतमीयप्रपन्यव्याट्यायो गीतमीयप्रकाशाच्या प्रथमः सर्गः॥१॥ ३५ . २१ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । अथ द्वितीयः सर्गः। अथ पवनकुमारनिर्जराणां हृदि जगदीश्वरभक्तिराविवेश ॥ रणरणकभृतां तया समेपां प्रतिमुखमाविरभूच भारतीयम् ॥१॥३ जगत्रयाऽधीश्वरतां यदीयां जनेषु प्रख्यापयितुं किलोचः । व्यधायि वप्रनयमाशु लेखैस्तमीश्वरं वीरजिनं प्रणामि ॥१॥ अथाऽनन्तरं पवनकुमारनिर्जराणां वायुकुमारदेवानां हृदि मानसे ६ जगतामीश्वरो वीरप्रमुस्तस्य भक्ति उपास्तिः। आविवेश प्रवेशं कृतवान् । सया तया भपया रणरणकभृतामौत्सुक्यं विनतां समेपां समस्तानां तेपां देवानां प्रतिमुखं मुखे मुखे इयं वक्ष्यमाणा भारती वाणी ९ आनिरभूत् प्रादुर्वभूव । चशब्दः समुच्चये । निर्जरेति । 'अमरा निर्जरा देवाः' इत्यमरः । आविवेशेति । 'विश प्रवेशने' करि लिट् । रणरणकैति । 'मौसुक्यं रणरणकोत्कंठे' इति हैमः । रणरणकं १२, विमतीति भृनः किम् । तेपामिति । समशब्दः सपर्यायोऽत एव सर्वनामकार्यम् । प्रतिमुखमिति । मुखं मुखं प्रतीति विग्रहः । 'अन्ययं विभक्ति' (२०१६) इत्यादिना वीप्सायामव्ययीभावः । भार-१५ तीति । 'पावाली भारती गौर्गी'रिति हेमः । अस्मिन् सर्गे पुप्पि- ताप्रावृवं, तलक्षणं च-'अयुजि नयुगरेफतो यकारो युजि च नजी. जरगाश्च पुष्पितामा' इति ॥ १॥ .. केयमित्याह- कुस्त कुरुत रे रजोपनोदं विपत सुदूरमदास्सलादमेध्यम् ।

४०
श्रीगौतमीयकाव्यं
३
,
समवसरणहेतुनाऽस भर्तु-
वितनुत योजनमाशु भूमिशुद्धिम् ॥२॥
रे देवाः, अस्य भर्तुर्महावीरवामिनः समवसरणहेतुना समवसरण-
निमित्वं रजसो घूलेरपनोदोऽभ्याहारस्तं कुरुत, तथाऽदःस्सलादेतत्स्था-
नादमेध्यमपवित्रं वस्तु सुतरामतिशयेन दूर दूरप्रदेशे क्षिपत मुञ्चत ।
६ इत्थं च योजनं यावत् आशु शीघ्रं भूमिशुद्धिं वितनुत विस्तारयत ।
कुरुतेत्यादि । अत्र 'संप्रमेण प्रवृत्तौ' (वा०) इत्यादिवचनाहित्वम् ।
स्थलादिति । अत्र दूरशब्दयोगे 'दूरान्तिकार्थः' (२।३।३४) इति
९पञ्चमी ॥२॥
द्रुततरमय विक्रियामसूतैर्भमदनिबनभूतलादुदतः ।
विकिरदवकरोपि योजनान्ते निपतित उन्नववप्रतामवाप ॥३॥
अधेम्वाणीप्रादुर्भावानन्तरं विक्रियया वायुकुमारदेवकृतविकुर्व-
गया प्रसूतैरुत्पन्नम्रमद्धिरितस्ततः सञ्चरद्धिरनिर्वायुभिर्वनमूतलाद्वन-
भूमेः सकाशात् द्रुततरं शीप्रतरं उदस्त उत्क्षिप्तः, उत्पाटित इति यावत् ।
१५.अत एव विकिरन् प्रतिदिशं विक्षिपन् अबकरोऽपि अस्थिकाट-
फण्टकादिकचवरोऽपि योजनान्ते चतुःक्रोशमान्ते निपतितः सन्
उन्नतरमा तुहमाकारतां अवास पासवान् बाहुल्यादुचस्तरमाकार
इवादित्यर्थः । प्रस्तरिति । पूढो कर्मकत्वविवक्षया करि क्तः।
अनिलंरिति । फरि तृतीया । उदस्त इति । उत्पूर्वादस्पतेः
पमणि क्तः । विकिरदित्यादि फर्मधारयः ॥ ३ ॥
विपिनपरिमृजापराः समीरास्तदयकरोपरि पिक्षिपू रजांसि ।
२९ मगपति मवतीह सन्निकट सरजमठा तु कुतो न विप्रकटा ॥४॥

गौतमीयप्रकाशास्यटीकया सहितम् । विपिनपरिमृजायां वनप्रमार्जने परास्तत्पराः समीरा वायवस्तस्या- वकरस्योपरि रजांसि धूलीश्चिक्षिपुः क्षिपन्ति स्म । युक्तोऽयमर्थ:- 'इहालिन् लोके भगवति श्रीमजिनेन्द्रे संनिकृष्टे समीपवर्तिनि भवति३ सति कुतः कस्मात् सरजसता मलिनता न विप्रकृष्टा न दूरीभूता। मगवत्सांनिध्यतो हि सर्वेभ्योऽपि मालिन्यं दूरीभवेदेवेत्यर्थः । विपि- नेत्यादि । तत्पुरुषोऽयं, यद्वा विपिनस्य या परिमृजा शोधनं सा परा प्रधानीमूता येपामिति बहुव्रीहिः । 'कान्तारं विपिनं कक्षः स्यात् पण्डं काननं वन मिति हेमः । परिमृजेत्यत्र भिदादित्वास्त्रियामा । ततष्टाप् भवतीति शत्रन्तात् सप्तमी । सरजसतेत्यादि । रजसा सह वर्चमा ९ सरजसमिति बहुव्रीहिः, ततस्तस्य मावस्तता । अत्र 'अचतुर' (५/४७७) इत्यादिना समासान्तोऽच् , ततस्तल् । 'ननु रजोऽप्यऽ. परित्यजेति सरजसमित्यव्ययीभावे एवाऽच् , बहुव्रीही तु सरजःपंकज-१२ मित्येवं इति शब्दशास्त्रोक्तेः कथमत्राऽच् इति चेत्'-सत्यं महाक- विभिबहुव्रीहायपि प्रयुक्तत्वान्नाऽन्न दोपः । तथा च माधः-'सरज- सगकरंदनि राम्' (७४२) इत्यादि । एवं 'सरजसतामवनेरपा १५ निपात' इत्यादावपि बोध्यम् । तुरवधारणे, 'विपकृष्टपरे पुनः दूरे', इति हेमः ॥४॥ सपदि तदनुगाः प्रभूतभूता ललनपरास्तुमुलक्रियाभियुक्ताः। इस खनकजना विभज्य भाग- विपमतमामराजन् समां धरित्रीम् ॥५॥ तत इत्यध्याहारात् तदनन्तरं ललनं क्रीड़न परं प्रघानं येषां ते तथाऽत एव तुमुल क्रियायां व्याकुलशब्दकरणेऽभियुका उद्यता एवं-२२ २१

४२
श्रीगौतमीयकाव्यं
९
विधास्तपां वायुकुमारदेवानामऽनुगाः सेवकप्रायाः प्रभूता वह्वो भूता
मूतजातीया व्यन्तरदेवाः खनकजना इच भूमिखनकलोका इव विषम-
३ तमा निनोन्नतरूपेणाऽतिविषमा धरित्री भागैविभज्य विमागीकृत्य
सपदि शीघ्रं समां समप्रदेशामऽसृजन् कुर्वन्ति स्म । ललनेति । 'देवनं
कूर्दनं खेला ललनं वर्करोऽपि चेति हैमः । ललनपरा इत्यनेन हि
तेषां खभावोक्तिः। 'तुमुलो व्याकुलो रवः' इति हैमः ! असृजनिति ।
सृजेस्तौदादिकाकर्तरि लङ्ग ॥ ५ ॥
इति पवनकुमारदेवस। स्वकुलकृती कृतकृत्यतामयाप्ते ।
स्वपतिनयननोदनप्रणुनः स्तनिततडित्सुमनोवजः ससज॥६॥
इत्यमुना प्रकारेण पवनकुमारदेवानां सङ्घ समूहे खकुलस्य या कृतिः
क्रिया तस्यां विपये कृतकृत्यतां अवासे प्राप्ते सति स्वपत्योः स्वस्खा-
२मिनोयी नयननोदना नेत्रप्रेरणा तया, प्रणुनः प्रेरितो यद्वा सपतिभ्यां
नयननोदनया प्रणुनः प्रेरितः सन् , स्खनिताः स्खनितकुमारास्तडितो
विद्युत्कुमारा ये सुमनसो देवास्तेषां प्रजः समूहः ससज खोचितक्रियां
१५ विघातुं सजो बभूवेत्यर्थः । कृतेत्यादि । कृतानि कृत्यानि
कार्याणि येन स कृतकृत्यस्तस्य मावस्ता ताम् । प्रणुन्न इति ।
'नुदविदोद- (८२५६) इत्यादिना क्तस्य वैकल्पिकं नत्वम् ।
१. स्तनिवेत्यादि । द्वन्द्वाऽनन्तरकर्मधारयगर्मस्तत्पुरुषः 'वृन्दारकाः मुमन-
सखिदशा अमा' इति हेमः । ससोति । 'परज गौ मौवादिक.
सतः करि लिट् ॥ ६॥
फयमित्याह-
सिनतनुजलभृद्विकुणामिर्दिवममरा धुरि चरप्रलिप्तीम् ।
तदनु सलिलसमाभिरामं मृदुमुदिरं दुवमाता विचः ॥७॥

५ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् अमराः स्तनितकुमारादयो देवा धुरि आदो सिता श्वेता तनुः शरीरं येषां ते सिततनवः एवंविधा ये जलभृतो मेघास्तेषां विकुर्व- णाभिः रचनाभिर्दिवमाकाशं अम्रलिप्तीमऽल्पाऽम्रपटलयुक्तां चक्रुः३ फुर्वन्ति स्म, तदनु ततः पश्चात् ते देवाः आदृता आदरयुक्ताः सन्तो द्रुतं शीघ्र सलिलस्य पानीयस्य सङ्क्रमः सङ्क्रमणं तेन अभिराम मनोहरं मृदुः फोमलो यो मुदिरो मेघसं विचक्रुः विकुर्वति स्म । दिवमिति । ६ 'दिवशब्दः' स्त्रीलिङ्गः । अप्रेत्यादि । अल्पैरभैलिति विग्रहे 'तादरुपाख्यायाम्' (१।११५१) इति ङीप् । मुदिरमिति । 'नम्राट तडित्वान् मुदिरो घनाघनः' इति हैमः ॥७॥ ततः किं संजातमित्याह- मधुरमतितरां जगर्न नभ्राइभिमुखगुञ्जनवायुघट्टनेन । उपलयुगलयत्समीरपचितसृषु दिक्षु विदियुते च विद्युत् ।।८।। नम्राट् मेघः अभिमुखं सम्मुखं गुञ्जनं यस तादृशो यो वायुस्तस्य पट्टनं सचट्टतेग अतितरामतिशयेन मधुरं यथा स्यात्तथा जगर्न गर्नति स। च पुनश्चतरपु दिक्षु विद्युत् उपलयुगलबत् पापाणद्वयमिव समीर-१६ धर्पाद् पायुसंसर्गाद् विदियुते चोतते । यथा पापाणद्वयं परस्पर- धर्पणाद् योतते तथेत्यर्थः । विदिद्युते इति । 'धुत दीप्ती' कर्तरि लिट् । 'पुतिस्याप्योः' (७४६७) इति संप्रसारणम् ।। ८॥ तदनु तणतणायमानमेघोऽप्यविरलजालमसुनुवजलानाम् । उपशमभृदिवोदितं कपायं असमरमाशु रजो निनाय शान्तिम्।।९।। ...तदनु ततः पश्चात तणतणायमानखणचणच्छन्दं कुर्वाणो मेपोऽपि जलानामविरलजालं निषिसमूहमसतुवत् सपति ल । अत एव स २२ १० ४४ श्रीगौतमीयकाव्य मेघः जलवर्पणादेव प्रसृमरं विस्तरणशीलं रजो धूली आशु शीघ्र शान्तिमुपशमं निनाय प्रापयति स । कः कमिव । उपशमं विभीति ३ उपशमभृत् उपशमी साधुः कुतोऽपि कारणात् उदितमुदयं प्राप्तं कषायं क्रोधादिकमिव । यथाऽसौ तं सघ उपशमयति तथेत्यर्थः । तण- तणेत्यादि । तणतण(त्)भवतीति तणतणाभवति 'अव्यक्तानुकरणा' ६(५।४।५७ ) इति तणच्छब्दात् डान् , ततो द्वित्वे कृते पूर्वपरयो- वर्णयोः पररूपं तकारस्ततप्टिलोपः, तणतणाभवतीति तणतणायते २ तणतणायमानः 'लोहितादिडाज्म्यः- (३१११३) इत्यनेन डाज- ९न्ताद्भवत्यर्थे क्यम् । ततो लटः शानम् । असुनुवदिति । 'सु गतौ' 'णिश्रिद्रुसुभ्यः' (३१११४८) इति करि चङ्ग । ततो द्वित्वम् । निनायेति । द्विकर्मकान्नयतेः करि लिट् ॥ ९॥ मृदपि धनजलाभिपिक्तभूमेः सुरभितरं विभविभूव गन्धम् । प्रकटयति सहायतां हि यावं सहजगुणानपि वस्तुनो निमिचम् ॥१०॥ तस्मिन्नवसरे पनजलेन मेघपानीयेन अभिषिक्ता सिक्का या मूमि- खस्सा मृत् मृविकाऽपि सुरभितरं अतिसुरमिगन्ध विमरांवमूव धार- १८ यामास । युक्तोऽयमर्थः---हि यतः कारणात् निमिचं निमिचकारणं सहायतां साहाय्यं यातं प्राप्तं सत् वस्तुनः पदार्थस्य सहजगुणान् सामाणिकगुणागपि प्रकटपति प्रफटीफरोति । एवायता गन्धः सभावा- २. देव लोपे' पृधिव्या गुणत्वेन स्यातोऽसि, सच जलमृचिका. पी पिवी' इति नमाविकतोफे। १२ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । संयोगे विशेषतः प्रादुर्भवतीत्यर्थः । बिभरामिति । 'मीहीभूहन्नाम्-' (३।१।३९) इत्यादिना भृमो लिटि आम् , लुबद्भावाद्वित्वादि ॥१०॥ गगनसृतजलच्छटाप्रपाता. दपहृतरेणुमला द्रुमा विरेजुः। अखिलवनमपि प्रकाशमा द्रवदिव रङ्गरसौ तदाऽऽवभासे ॥११॥ पुनस्तस्मिन्नवसरे गगने आकाशे सृताः प्रस्ता या जलच्छटास्तासां प्रपातः पतनं तसात् अपहृतमपगतं रेणुमलं रजोरूपं मलं येषां ते एवं विघा द्रुमा वृक्षा विरेजुः शोभन्ते सस, यद्वा किमनया वृक्षमात्र-९ शोमावर्णनया तत्प्रागुतखरूपं अखिलं समस्तं वनमपि जलच्छटाप्रपत- नात् प्रकाशमुद्दयोतमाप्त प्राप्तं सत् रङ्गरसौ द्रवदिव स्रवदिव आब- मासे शुशुभे । विरेजुरिति । 'फणां च सप्तानाम्' (६।४।१२५) १२ इति लिटि एत्वाभ्यासलोपो । आयभासे इति । 'भास दीप्तो' फरि लिट् ॥ ११ ॥ त्वरितमथ पिशाचभूतपक्षा- धनिमिपसङ्घ इह स्वनाथनुन्नः । उपवनमनु योजनप्रमाणां वलयमिलद्विधिनाञ्चकद्धरित्रीम् ॥ १२॥ अथ धनवर्पणानन्तरं पिशाचभूतयक्षादयो येऽनिमिपा देवास्तेषां सदः समूहः खनाथैः खखामिभिर्नुन्नः प्रेरितः सन् त्वरितं शीघं इहाऽस्मिन् शुद्धीकृते क्षेत्रे उपवनमनु उपयनस्य समीपे योजनं प्रमाण २१ यस्याः सा तां धरित्री वलयः प्राकारवल्यस्तेन मिलन् यो विधिस्तेन प्राकारवस्यरचनोचितविपिना आश्चक्त् अकयति ल । उपवन.२३ १८ श्रीगौतमीयकाव्य ९ मन्विति । उप समीपे वनमुपवनं 'अपोपाभ्यां वनं वेलमारामः कृत्रिमे पने' इति हेमः । 'अनुर्लक्षणे' (१९८४) इत्यादिनाऽनोः कर्म- ३प्रवचनीयसंज्ञा तद्योगे द्वितीया । 'अनुर्यरसमया' (२।१।१५) इत्यस्य वैकल्पिकत्वात्समासामावः । आश्चकदिति । 'अङ्क पदे लक्षणे च' चुरादिरदन्तस्तस्याऽग्लोपित्वान्न वकार्यम् ॥ १२ ॥ शतयुगधनुरायतां जिनाङ्गो- च्छ्रितिनिचितां खचितां विचित्ररतैः। विटपिवनमवाधस्तर्घ मणिधरणी निववन्ध मध्यभागे ॥१३॥ अघो पर्वमानं विटपिनां वृक्षाणां वनं अवाधयन् अपीडयन् व्यन्तरदेवसमूहसदूर्द्ध तस्या अकिताया वनभूमेरुपरि मध्यमागे १२ मध्यप्रदेशे शतयुगधनुरायतां द्विशतधनुःप्रमाणदीर्घा तथा जिनानं भगवच्छरीरं तस्येव, उत्प्रमाणेत्यर्थः । या उच्छितिरुचत्वं तस्यां निचितां पुष्टां, न तु रिकां पुनर्विचित्ररनैर्नानाप्रकाररतः खचिता जटितां १५मणिधरणी मणिपीठिका नियवन्ध वनाति स । शतेत्यादि । शतयुगं शतद्वयं तत्सत्यानि धषि आयतां दीर्घा, विस्तां चेत्यर्थः । इहाऽयामविस्तारयोस्तुल्यत्वात् सचितामिति 'खच भूतमा- दुर्भावे' फर्मणि क्तः ॥ १३ ॥ मधुकरकुललीदमअरीकं चटुलरणनिपण्टिकापताकम् । प्रमुदितमस्तस्तदन्तराले रुचिरमकापुरशोफत्यसालम् ॥१४॥ प्रमुदिता मानन्दिता गरुतो देवानन्या मणिपीठिकाया अन्तराले मध्ये रुचिरं मनोनं अशोकास्यं चैत्यसालं चैत्यवृक्षं अकार्पः कुर्वन्ति ॥स ! यीशं तम् । मधुकरपुलमरसहेलीदा आखादिता मजरी

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् ।
४७
९
यस्य स तं । 'नवृतश्च' (५४१५३) इति कम् , तथा रणदित्येवं-
भूतो अव्यक्तो ध्वनियांसां ता रणद्धृनयस्वाश्च ता घण्टिकाश्चेति
विग्रहः । यद्वा ध्वनिप्रधाना घण्टिका ध्वनिपण्टिका:, रणन्त्या३
शब्दायमाना ध्वनिपण्टिका इति विग्रहः । ततो रणवनिपण्टिकाश्च
पताकाश्चेति द्वन्द्वस्तदनु चटुलाश्चपला रणद्ध्वनिपण्टिकापताका यस्मिन्
स तमिति बहुव्रीहिः । अकापुरिति । कृनः करि लुङ् । चैत्य-६
सालमिति । 'चैत्यं जिनौकतद्वियं चैत्यो जिनसमावरुः' इति
हेमः (अनेकार्थः) । इह सालशब्दो दन्त्यादिरेव ॥ १४ ॥
प्रतिदिशमुपनीयते स तस्सा-
कनकमयी चतुरासनी पुनस्तैः ।
श्रिय इव मिलिवाः समस्तदिश्याः
प्रभुचरणाम्युजपर्युपास्तयेऽस्थुः ॥१५॥
पुनस्रैर्देवैस्तस्मादशोकवृक्षात् प्रतिदिशं चतुर्दिक्षु कनकमयी वर्ण-
मयी चतुरासनी सिंहासनचतुष्टयी उपनीयते स स्थाप्यते । अत्रो-
प्रेक्षते-'प्रमोर्वीरवामिनश्चरणाम्बुजयोश्चरणकमलयोः पर्युपास्तये सेवाय १५
मिलिता एकत्रीमूताः समस्तदिश्याश्चतुर्दिगुद्भवाः श्रियो लक्ष्य इव
अस्थुस्तिष्ठन्ति स' । उपनीयते इति । उपपूर्वानियः कर्मणि लट्, स
च सयोगे भूतायें वोघ्यः । कनकेत्यादि । कनकस्य विकार इत्यर्थे १०
मयद । टित्वात् हो । चतुर्णामासनानां समाहार इति विग्रह 'तद्धि-
तार्थ-(२१५१) इत्यादिना समासः, 'द्विगोः' (१1१।२१) इति
डीप् । दिश्या इति । भवार्थे 'दिगादिम्यो यत्' (१३०५४)।
अस्थुरिति तिष्ठतेः फरि लङ ॥ १५॥

४८ श्रीगौतमीयकाव्यं नटननिपुणसालभञ्जिकाभि- विविधविलासवतीभिरभ्युपेतैः । सुरचितमणितोरणैः पुरस्ता- त्तदभिमुखाः ककुभो यमुश्वतस्रः ॥१६॥ विविधा बहुप्रकारा ये विलासाः स्त्रीणां खाभाविकाऽलकारास्ते ६सन्ति आसामिति विविधविलासवत्यस्ताभिरत एव नटने नृत्यक्रियायां निपुणा दक्षा एवंविधा याः सालमञ्जिकाः पञ्चालिकाः 'पुत्तलिकेति' लोकपसिद्धास्ताभिः अभ्युपेतैः समन्तायुक्तः पुरस्तादग्रतः सुष्छु ९रचितानि यानि मणितोरणानि तैः करणभूतैः तेषां तोरणानाममि- मुसाः संमुखाश्चतस्रोऽपि ककुभो दिशो वभुः शोमन्ते स । 'साल- मजी पाश्चालिका च पुत्रिका' इति हैमः ॥ १६ ॥ चतसृषु च ककुप्सु वेदिकान्ता- दृशशवयोजनदीर्घतोच्छितोऽधः।' विविधमणिमयो ध्वजोऽमरस्तै- यंधित चतुष्टयमात्रवेव धर्मः ॥ १७ ॥ च पुनस्वैरमरैर्देवैश्वतस्पु ककुप्मु चतुर्दिक्षु वेदिकान्तात् मणि. पीठिकाप्रान्तादऽयोमागे दशशतयोजनानि सहस्रयोजनानि दीर्घतया १८मलम्पत्वेन उच्छित उन्नतो विविधमणिमयो बहुप्रकाररलमयो ध्वजो व्यधित निर्मितः, रचित इत्यर्थः । इवशब्द उत्प्रेक्षायाम् । ततश्यो- स्पेक्षते-'अयं धजो न भवति, किंतु चतुष्टयमात्रया चतुष्टयमानेन दानादिलक्षणो धर्म एव रचित इति' । व्यधितेति । विपूर्वाद्धामः २२ फर्मणि उद् । चतुष्टयेत्यादि । चत्वारो अयया अस्पत्यमें १२ १५ वर।

३ - गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । ४९. 'मात्रं त्वघृतौ स्वाथें काव्ये मात्रा परिच्छदे । अक्षरावयवे द्रव्ये मात्येऽसे कर्णभूपणे । काले वृत्ते च इति हैमः (अनेकार्थः) ॥१७॥ तदुपरि विलसत् सिवातपत्रं चंटुलितमौक्तिकजालकिङ्किणीकम् । अभवदिव नृलोकसंमुखीनं शिवपदमधिनाथहाईहूतम् ॥ १८ ॥ तस्य ध्वजस्योपरि ऊर्ध्वमागे विलसत् शोममान तथा चटुलितानि अचिन्त्यदेवशच्या चपलीकृतानि मौक्तिकजालानि अथितमुक्ताफल- समूहाः किक्किण्यो लघुघण्टिकाश्च यस्तित् एवंविधं सितातपत्रं ९ घेतच्छनं अमवत् अत्रापि इवशब्द उत्प्रेक्षाद्योतकः, ततश्चोत्प्रेक्षते- 'नास्तीदं छत्रं किंतु अधिको नाथोऽधिनाथस्त्रिजगन्नायको धीरप्रमु- स्तस्य हाईमभिप्रायस्तेन हुतमाकारितं सत् शिवपदं मुक्तिस्थानमपि १२ नृलोकस्य मनुष्यलोकस्य संमुखीनं अभिमुखममवदिति', आस्तां किला. इन्यो महेन्द्रादिलोक इति अपिशब्दार्थः । किङ्किणीति । 'किङ्किणी क्षुद्रघण्टिका' इति हेमः । मतान्तरे किवणीति निरिकारक-१५ कारोऽपि ॥ १८ ॥ अहमहमिकयाऽय भक्तिमाजो निजनिजनाथनियुक्तकाय शक्ताः। यधिकदशविकल्पकल्पदेवा मणिरचिताऽगणरक्षणं विचक्रुः ॥ १९ ॥ अथाऽनन्तरं भक्ति मनसि निर्मरप्रीति भजन्तीति भक्तिमाजस्तया निजनिजनाथेन स्वस्खसामिना देवेन्द्रेण नियुक्ता एव नियुक्तका २२ मतान्तरे घरविरदितः कारः शिणीचन्दः इति भावः । , १८ ५० श्रीगौतमीयकाव्यं - आज्ञापिताश्च पुनः शक्ताः शक्तिमन्त, एवंविधा व्यधिकदेश विकल्प- कल्पदेवाः द्वादेशदेवलोकवासिनो,देवाः अहमहमिकया परस्पराऽमि- ३मानेन वेदिकायाः समन्ताब्यन्तरदेवैर्मणिभिः रचितस्याऽङ्गणस्य रक्षणं विचकुर्विशेषेण कुर्वन्ति स्म । 'स मिथोऽहमहमिका' इति हेमः । यधिकेत्यादि । व्याभ्यामधिका दश विकल्पा मेदा येषां ते तथा- ६विधा ये कल्पा देवलोकास्तद्वासिनो ये देवास्ते तथा शाकपार्थिवा- दित्वाद्वासिपदलोपः । अङ्गणेति । पृषोदरादित्वाणत्वमिति कश्चित् । वहवस्तु अजनमिति नान्तमेवाहुः ॥ १९ ॥ अथ मणिमयवप्ररचनाप्रकारमाह- वहिरवततचैतनप्रदेशैः सहकृतमानसपुद्गलान् वितत्य । जगति तदवगाहपुद्गलौघं मुमणिमयं परिणामयांबभूवुः ॥२०॥ ततस्ते देवाः बहिःशरीराबहिर्देशेऽवतता विस्तारिता ये चेतन- प्रदेशा असक्ष्येया आत्मप्रदेशास्तैः सहकृतान् युक्तान् मानसपुद्गलान मनस्त्वेन परिणमितानि मनोवर्गणादन्याणि जगति लोके वितत्य. विस्वार्य तस्मिन् क्षेत्रेऽवगाढवदवगावस्तरक्षेत्रमवगाय स्थितो यः पुद्गलोपः सूक्ष्मपुद्गलसमूहस्त्रं सुमणिमयं शोमनरत्नमयं परिणामयां- यम्युः परिणामयन्ति । अत्र परिपूर्वान्नमेहेत्वणिजन्तादाम् , १८ अस्याऽऽमन्तत्वेन मित्वात् 'मितां हसः' (६१४५९२) इति इखत्वं तु न शक्यं, इससूत्रे व्यवसावा'शब्दाऽनुवृत्तेः । एवमेव च 'रजो विश्रामयन् ! 'राज्ञां धुयर्यान्विश्रामयेति स इत्यादिप्रयोगेप्यपि हवाइ- माषपतिपादनादिति । यद्वा परिणमनं परिणाम इति पनन्तात् 'तत्क- २९ रोति' (ग.) इति णावऽयं प्रयोगो योध्यः ॥ २०॥ ૧૨ . गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । अविरलवलयाकृतीकृतोऽसौ सपदि च पञ्चधनुशतोन्मितोचः। समुचितविपुलत्वसंयुतोऽभादविपरिवेप इवामिरतवैदिम् ॥२०॥ तस्मिन्नवसरे सपदि शीघ्र अभिरलवेदि मणिपीठिकायाः समन्तात् । अविरलो दृढो वलयः प्राकारवलयः स आकृतिराकारो यस्य सोऽवि- रलवलयाऽऽकृतिः नाऽसौ असौ सम्पद्यते तथाकृतोऽविरलवलयाऽऽ. कृतीकृतः प्राकाराऽऽकारेण निप्पादित इत्यर्थः । च पुनः पञ्चसपानि धनुपां शतानि सन्मितमुन्मानं यस स पञ्चधनुःशतोन्मितः स चासो उच्चश्चेति तथोक्तः, पञ्चशतधनुःप्रमाणप्रांशुरित्यर्थः । पुनः समुचितं सयोग्यं यद्विपुललं भित्तिविस्तारस्तेन संयुतो युक्तः, एवंविधोऽसौर मणिमयपरिणमितपुद्गलसमूहो रवः सूर्यस्य परिवेप इव मण्डलमिव अभादति ल । वलयाकृतीत्यत्र च्चिप्रत्ययः । समुचितेत्यादि । इह समुचितपदोपादानात्साधिकत्रयस्त्रिंशद्धपि सूचितानि । 'अटुंगुलि-१२ शारयणीतितीसंधणुह बाहल मिति वचनात् । परिवेप इति । 'मण्डलं , तूपसूर्यकम् । परिधिः परिवेपश्च' इति हैमः ॥ २१ ॥ तदुपरि कपिशीर्पमालिका द्राक् पविमणिमिविदधे तथैव चमिः। असिलमिदमकारि यत्क्षणेन घुवसत्यस्तदहो महानुमावाः ।। २२ ॥ चः समुपये, एमिर्चमानिकदेवर्यया सद्यो मणिमयप्राकारो निर्मित- तथैव तेनैव प्रकारेण तस्स प्राकारस्योपरि द्राक् शीघ्रं पविमणिमिः हीरकरनेः कपिशीर्षाणां मालिका श्रेणिर्दिदये रचिता । अत्र कविः२१ प्रशिद् (३३) धनुत्रियदल्धुलतम् । २ श्रीयद्योमदमुनीन्द- प्रवीद-श्रीमाल-गया (3) अत्र २-३१ टीग्रयाम् ।

५२. श्रीगौतमीयकाव्यं ६ 5 ९ सम्भावनां करोति---ययमाद्देवैरखिलं समस्तमिदमनन्तरोक्तं कृत्यं क्षणेन क्षणमात्रेण अकारि निष्पादित' तपस्माद् ज्ञायते अहो इति ३ आश्चर्ये, चौः खर्ग एव वसतिगृहं येषां ते धुवसतयो देवा महानु- भावा महाप्रमावाः । विद्यन्ते इति शेषः । पवीत्यादि । 'सूचीमुखं तु हीरकः वरारक रनमुख्यं वज्रपर्यायनाम च' इति हेमः ॥ २२ ॥ अत उपरितनाऽमरौघकृत्ये हितरतिनितिहेतुतां प्रपन्ने । शशधरदिवसेशयोर्निदेशा- चदनुचराखिदशास्त्वरां प्रतीयुः ।। २३ ।। अतोऽस्मिन् उपरितनाऽमरौपस्स अलोकोद्भवदेवसमूहस्य कृत्ये कार्ये हितरतिनितीनां हितमुखमुक्तीनां हेतुतां कारणत्वं प्रपन्ने प्राप्ते १२सति, एतावता सम्यक् फलसत्तामुत्पाद्य निष्ठां परिपूर्णतां गते सति शशधरदिवसेशयोश्चन्द्रसूर्ययोनिर्देशात् आज्ञातस्तयोरेयाऽनुचराः सेवकमायास्त्रिदशा देवास्त्वरां प्रति ईयुः प्रापुः । अर्हद्भक्तिं विधातुं. १५सवरा बभूवुरित्यर्थः । अत इति । सप्ठम्यर्थे तसिल् । उपरिभवा उपरितनास्ते च तेऽमराध तेपामोष इत्यादिविग्रहः । इह हितेत्यादि सिद्धांते-'हियाए मुहाए खेमाए नि:सेयसाए' इत्याधर्हद्भक्तिफलोके- १०रुपाचम् । शशधरेत्यादि । 'देवताद्वन्द्वे-' (६।३।२६) इत्यस्य प्रायिकत्वादन पूर्वपदस्य नाऽऽनइ ईयूरिति । इण करि लिट् ॥२३॥ अय स्वर्णमयपमरपनामकारमाह- त्रिदियगुरविपुर्यणानुकारी भगण उपाहितग्रक्ष्मपुद्गलेषु । २९परिणतिमुपपादयाकार घुतितहिरण्मयतां गवां क्षणेन ॥२४॥ .

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । प्रथमवरणतो धनु शतानि त्र्यधिकंदशैत्य वहिस्तवान वप्रम् । परिमितिमधिकृत्य चोक्तपूर्वा पृथुलतयोचतया च भक्तिरक्तः ॥ २५ ॥ युग्मम् ।' त्रिदिवसुराणां स्वर्गवासिदेवानां विकुर्वणामनुकरोति तच्छीलो वैमानिकदेववद्विकुर्वणां कुर्वाण इत्यर्थः । तथा भक्तिरकोऽहद्भक्य-६ नुरागी एवंविधो माना ज्योतिप्कानां गणः समूहः उपाहिताः संयो- जिता ये सूक्ष्मपुद्गलास्तेपु क्षणेन द्युतितहिरण्मयतां गतां दीप्तिम- त्वर्णस्वरूपत्वं प्राप्तां परिणति परिणमनं उपपादयाञ्चकार उत्पादयति ९ ल। अथैवं पुद्गलंपरिणामं कृत्वा प्रथमवरणतः प्रथमनिर्मित मणिमय- प्राकारात् वहिःप्रदेशे व्यधिकदशैधनुःशतानि त्रयोदशधनुषां शतानि एत्य आगत्य एतावद्भुवमतिक्रम्येत्यर्थः । पृथुलतया विस्तीर्णतया च १२ पुनरुचतया उन्नततया पूर्वमुक्तामुक्तपूर्वा 'पञ्चघनःशता' (२।२१) इत्यादिना प्रान्दर्शिता परिमिति परिमाणमधिकृत्य आश्रित्य वर्ष स्वर्णमयप्राकार ततान विस्तारयति स, विकुर्वितवानिति यावत् । १५ त्रिदिवेत्यादि । गौस्त्रिदिवमूव॑लोक' इति, संयोजित उपाहिते' इति च हेमः । हिरण्मयेति । 'दाण्डिनायनहस्तिनायन--(६।४।१७४) इत्यादिना साधुः । वरणेति । प्राकारो वरणः साल,' इति हेमः | १८ अत्र चकारी द्वावपि समुच्चयार्थी ॥ २४ ॥ २५ ॥ मणिमयवरणाऽग्रमालयाऽसावति- शुशुमे परितोऽन्तरालभूमेः। अनुलवणसमुद्रमा वितः स हि जगतीवलयस साम्पमापत् ॥ २६ ॥. २१ श्रीगौतमीयकाव्यं ९ अन्तरालमूममध्यभूमेः परितः समन्ताद्वर्तमानोऽसौ स्वर्णमयः प्राकारो मणिमयानि यानि वरणाऽग्राणि कपिशीपाणि तेषां मालया ३श्रेण्या अतिशुशुमेऽत्यन्तं शोभते स । कीगित्याशय औपम्येन शोभाप्रकारमेव दर्शयतिस हीत्यादि । स प्राकारो हि आवितः जगतीवलयोपरिवर्तिवेदिकां विना अनुलवणसमुद्रं लवणसमुद्रस्य ६ समीप स्थितस्य जगतीवलयस्य साम्यं सादृश्यमापत् प्राप । तस्याऽप्येवं- विधस्थित्याऽतिरमणीयत्वादिति मावः । आवितर्देरिति । मर्यादा - दाइयोगे पञ्चमी । 'वेदी वितर्दिः' इति हैमः ॥ २६ ॥ अथ रूप्यवप्ररचनाप्रकारमाह-- ददिह विद्युधैः सहाम्यसूयामसुरगणोऽथ गृहीतनायकाज्ञः। प्रथममुदितया सुपर्वशक्या रजततयाऽऽहतपुद्गलांस्ततान ॥२७॥ अथ वर्णवप्ररचनानन्तरं गृहीता नायकाज्ञा खखाम्याऽऽदेशो येन स एवंविधोऽसुराणां देवविशेषाणां गणो, विबुधैरुपरितनदेवैः सह अभ्यसूयां मात्सर्य्य दधत् धारयन् , इह समवसरणरचनाधिकारे प्रथम १५उदितया प्रागुक्तया सुपर्वशत्तया देवशत्त्या आइतपुद्गलान् गृहीत. पुगलान् रजततया रूप्यमावेन ततान विस्तारयामास परिणमयति लेति यावत् । अभ्यसूयामिति । 'असूयाऽन्यगुणदूषणम्' इति १८ हेमः ॥ २७॥ अगदितमितिभूमिकां विहायार्जुनपरणं वलितः स क्वेिटे । उपरि परिणतः सुवर्णसिद्ध्या ध्वगशिरोभिरलञ्चकार शालम् २८ ततः सोऽमुरगणः सर्णयप्रात् प्रगदितमितिम्मिकां प्रागुक्तप्रमाण- भूमि विहाय त्याचा पलितैर्वरयाहत्या व्यवस्सितः सौरप्यमयपरि- आपः पुगलैः फरणम्रर्जुनवरणं सर्णयमा विवेष्टे पेटयामास ।

, R गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । तथा उपरि उध्यदेशे सुवर्णसिध्या स्वर्णपरिणत्या परिणतः प्लवग- शिरोमिः कपिशीर्षः शालं रुप्यमयप्राकारमण्डले अलञ्चकार शोममानं चके । अगदितेत्यादि । प्रगदिता प्रथमं कथिता त्रयोदशशतधनुः-३ खरूमा मितिर्मानं यस्याः सा प्रगदितमितिः, सा चासो भूमिका चेति विग्रहः । अर्जुनति । 'अर्जुननिष्ककाखरकर्बुराणि' इति हेमः । विवेष्टे इति 'वेष्ट वेष्टने' इत्यतः करि लिद ॥ २८॥ ६ समुदितवरणत्रयं तदासीन अयमिव गुप्तिनिवद्धमात्मनीनम् । भगवदमिहितोऽयवा शिवाघ्या त्रिकविधयेव नु मूर्ततामयामोत् ॥ २९ ॥ नु इति वितकें । तत् समुदितं समुदायरूपेण स्थितं वरणत्रयं प्राकारत्रयम्, आत्मने हितमात्मनीनं गुप्तिमिर्मनोवाकायगुतिमि-१३ निबद्धं रनितं त्रयमासीदिवेत्युपेक्षा । अथवा भगवता सर्वजेन अभिहितः कधितो यः शिवावा ज्ञानदर्शनचारित्रात्मको मोक्षमार्गः स एव त्रिकविघया ज्ञानादित्रिकमेदेन मूर्ततां मूर्तिमत्त्वमबाऽऽनोत् ५ प्राप्त इत्यऽप्युमेशा ॥ २९ ॥ मुरपतियनुपी नु मीलपित्ला कृतमिव कौतुकचारिणामघोना । विविधवमुचितं दिदेव दीप्रद्युतिवरणत्रयमम्बरप्रतिष्ठम् ॥३०||१८ पुनर्नु इति वित, विविधर्वहुप्रकारेयेसुमी रत्नादिद्रव्यश्चित निर्मितं अन एव दीपा दीपनशीला द्युतियोतियल तत्थोक्तं तयाऽम्बरे आकादो प्रतिष्टा सितिर्यस्य तदेवंविधं वरणत्रय चारिणा कौतुकवता मघोना इन्द्रेण मुरपतियनुपी मोलंयिला संयोज्य कृतमिवेत्येवं दिदेव शोमते ल । कौतुकति । कौतुकं चरति प्रामो-२३ तुक-२१ श्रीगौतमीयकाव्यं । ६ तीत्येवंशील इति विग्रहे शीले णिनिः । दिदेवेति । 'दिवु क्रीडादौ' इत्यस्मालिट् ॥ ३०॥ इह पुनरपि गुह्यकादिदेवा व्यदधत गोपुरतोरणानि सद्यः। प्रतिदिशमपि रोहणाय पाद- स्थितिकरणानि सहस्रविशतिं च ॥३१॥ पुनरपि गुह्यकादिदेवा यक्षादिदेव विशेषा इहाऽस्मिन् प्राकारत्रये प्रतिदिशं चतुर्दिक्षु सद्यः शीघ्रं गोपुराणि च द्वाराणि तोरणानि च ९प्रतीतानि तानि व्यदधत कुर्वन्ति स्म । सतोरणानि द्वाराणि चक्रुरि- त्यर्थः। च पुनरधिरोहणाय अर्हद्वन्दनार्थमागच्छतां जनानामाऽऽरोहण- निमितं प्रतिदिशं सहसविंशति विंशतिसहस्राणि पादस्थितिकरणानि १२ सोपानानि व्यदधतेति पुनयोगः । गुह्यकेति । 'यक्षः पुण्यजनो राजा गुणको वटवास्यपि' इति हेमः । व्यदधतेति । विपूर्वाद्धामः कर्तरि लङि आत् । गोपुरेति । 'पूरे गोपुरम्' इति हैमः । ४५'द्वारमात्रेऽपि गोपुरम्' इत्यनेकार्थः । पादेत्यादि । पादयोः स्थितिः क्रियते एमिरिति विग्रहे करणे स्युट । इदं हि यौगिकं नाम ॥३१॥ अवसरमुपभुज्य तीर्यकचं प्रविशति चात्मलयं सदैव यत्र । १८ प्रतिसमयमघातिकर्मजालं विदलयति स्फुटवीर्यवानपीयः॥३२॥ मणिमयतपनीयवप्रग) गिरिशदिशामुपसृत्य चैत्यसालात् । तदमरगणमृन्निपेरणीपं शुचितरमैचरमन्दिरं व्यबुर्यन् ॥३३॥ २०... युग्मम् । फुटं प्रकटं यीर्यमस्सास्तीति तद्वान् अनन्तपलसम्पन्न इत्यर्थः । पशिखिजगत्पतिनिनोऽवसरे देशनादानश(१)तीर्थकृत्त्वमऽनन्यसा. 1.

५७ + गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । पारणधर्मरूपकथनादितीर्थकृत्त्वमुपभुज्य मुक्वा देशनानन्तरं यत्र मन्दिरे सदैव सर्वदा आत्मलयं स्वभावविलासं प्रविशति स्वभावे वस्तुमिच्छति । च पुनर्यत्र स्थितः सन् प्रतिसमयं अघातिकर्मणां ३ वेदनीयादीनां जालं समूहं विदलयति क्षपयति तत् अमरैर्देवैर्गण- भृद्भिर्गणधरैश्च निपेवणीयं सेव्यं अत एव शुचितरमऽतिपवित्रम् ईश्व- रस्य प्रभोरिदमैश्वरं प्रभुसम्बन्धि मन्दिरं देवछन्दाऽख्यं मणिमयतपनी-६ यवप्रयो रलवर्णप्राकारयोर्गन्में मध्यदेशे चैत्यसालादशोकवृक्षागिरिश- दिशामीशानकोणमुपसृत्य आश्रित्य व्यकुर्वन् विकुर्वन्ति स्म । व्यन्तरा इति शेपः । अवसरेत्यादि । 'लोपः शाकल्यस्य' (८।३३१९)९ इत्यस्य वैकलिकत्वान्नाऽत्र यलोपः । लयमिति । 'लयस्तूर्यत्रयीसाम्ये संश्लेपणविलासयोः' इति हेमः । मणीत्यादि । मणिमयं च तपनी- यवत्रं चेति विग्रहः ॥ ३२ ॥ ३३ ।। अथ सवर्णनं चतुर्वापीरचनाप्रकारमाह- पुनरपि पुरतोऽपि गोपुराणां दिशि दिशि हस्तिनखादयास्सलीस्याः । समवसरणभूमिमारुरक्ष- ज्छ्रमहरणा त्वरयन्ति मानवान् याः ॥३४॥ विमलजलभृताः सुखापतारा विकसितवारिजराजिराजमानाः। अनिलतरलिवाभिरामतीरं जललहरीभिरिवाध्वगान्मिलन्त्यः ॥ ३५ ॥ कलरूखललिता मरालमाता विलसति या मुघोपमेखलेन । १८ २. २३ श्रीगौतमीयकाव्यं ३ तनुशुचिकरणानि पुष्करिण्यः शुचिमुवि निर्ममिरे बरामरैस्ताः ।। ३६ ॥ निभिर्विशेषकम् । पुनरपि वरागरैः प्रधानदेवैः शुचिभुवि समवसरणाद्वहिः शुद्ध- भूमिकायां ताः अनन्तरमेवोच्यमानसरूपाखनोः शरीरस यः शुचिः शृक्षारतस करणानि प्रधानकारणभूताः पुष्करिण्यश्चततोऽप्टो वा वाप्यो निर्ममिरे निर्मिताः, रचिता इत्यर्थः । ताः का इत्याह-या वाप्यो दिशि दिशि चतुर्दिा गोपुराणां प्रतोलीद्वाराणां पुरतोऽमतो ५ हस्तिनसात् क्रमनिलोचरणमार्गात् अधःसलीसाः अघोपदेशस्थिताः सत्यः समवसरणभूमि आरुरान् आरोदुमिच्छून् मानवान् श्रमहर- णात् त्वरयन्ति त्वरां कारयन्तीवेत्युत्मेक्षा । अत्र अपिशब्दस्य इवाऽर्थ- १२ फत्यात् पुनयी वाप्यो विमलजलै ताः पूर्णाखया मुखेनाऽवतारोऽव- तरणं याउ वाः, यद्धा मुखपतीति मुखः मुखप्रदोऽवतारो यामु तासया विकसितागां प्रफुल्तानां पारिजानां फमलानां राजिभिः १५मिमी रानमानाः शोभमाना एवंविधाः सत्यः आमतीरं तटपर्यन्तं अनिलेन यापुना रलिताभिचपलीकृतागिर्जललहरी मिलोलेरध्यान समवसरणमार्गगतटोफान् निरन्त्य इव सिता इति शेपः 1 पुनर्यत्र १८ या पापामु फरर रिव्यमरगदलिता मनोज्ञा गरालागां हंस- पक्षिा मारा भेगिः सोमनो पोपो पनियरसाः सा मुपोषा या गैसला सीनां फर्टिगरा गा इस पिलराति शोमो एवंविधा पाप्यो देवनिता इति न्यः । हम्मीत्यादि । जिनसः परि- परम् इरिहायुधः, 'दुर्गद्वारोपरणमागे सापिनि' नहीका, ययप्पर करिस्तोरात् गमदारमाहिरमातीमा याप्य उपासपारि गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । ५९ - बहिर्वपान्तस्ता योध्याः । यदुक्तं समवसरणस्तवे-'पहिवप्पदारम- ज्झे दो दो वावीउ हुंति वदृमि । चउरंस समोसरणे इग इग वावीय कोणेसु ॥१॥ इति । अन्यस्मिन् स्तोत्रे' पुनरेवं 'वीयंतो तिरि ईसाणि ३ देवच्छंदो.अ जाण तइअंतो। तह चउरंसे दुदु वावी कोणओवट्टि इकिका ॥१॥ इति। त्वरयन्तीति । त्वरमानान् प्रेरयन्तीत्यर्थः । 'निलरा संग्रमे' अस्स घटादयः पित इति पित्याणिचि हसतम् ।६ आप्रतीरमिति । 'तटं तीरं प्रतीरं च' इति हेमः । तनुशुचीति । 'शुचिः शुद्धे सितेऽनले । ग्रीप्माऽपाढानुपहतेपूपधाशुद्धमन्त्रिणि, शृङ्गारे' इति हेमः।निर्ममिरे इति । निरपूर्वान्माङः कर्मणि लिट् ।।३४-३६॥ ९ ननु महदाश्चर्यमेतत् यत्सर्वमपीदं सद्य एव व्यधायीत्याशङ्कयाह- सकलमपि निमेपमात्रमेव प्रभवति कर्तुमिदं यदेककोऽपि । तदिह सुरवराचतुनिकाया युगपददो रचयन्तु किं नु चित्रम् ॥ ३७॥ यद्यदि एककोऽपि देवः सकलमपीदं कव्यजातं निमेपमात्रमेव १५ निमेपमात्रेणैव कालेन फतुं विधातुं प्रभवति समर्थो मवति, तर्हि इह प्रस्तावे चतुनिकायाः सुरवराश्चतुर्जातीया देवा युगपत् समकाल- मदः समवसरणं रचयन्तु, किं नु चित्रं किमत्राऽऽश्चय : न किमपीति 10 भावः । निमेपेत्यादि । निमेपो पक्ष्मस्पन्दनप्रमाणः काल उच्यते । स एव मात्रा प्रमाणं यत्र फर्मणि, तदिति क्रियाविशेषणमिदन् । चतुरित्यादि । चत्वारो निकाया निवासा उत्पत्तिस्थानानि येषां ते इति विग्रहः । नुशब्दोऽत्र वितर्के ॥ ३७ ॥ १ समवसरणप्रकरणे-गा. 'तमा । १२ २२ १० - ३ ६ श्रीगौतमीयकाव्यं अथ समवसरणस्य सर्वोत्कृष्टं सौन्दर्यमुपंपादयति- अपरसुरग्रहस्य चेदुदनां श्रियमृपयोऽपि हि वर्णयांबभूवुः । किमु सकलमुरासुरेश्वराा- श्रयनिलयो न भवेदनुत्तरश्रीः ॥३८॥ हीति निश्चितं, ऋषयो मुनीश्वरा अपरसुरग्रहस्यापि अन्यदेवभव- नादेरपि चेद्यदि उदग्रामतिप्रवरां श्रियं शोभा वर्णयांबभूवुः वर्णयन्ति स्म । आगमे इति शेषः । तर्हि सकलसुरासुरेश्वराणां सर्वसुराऽसु. रेन्द्राणां योऽयः पूज्यो भगवान् तस्याऽऽथयो निवासमूतो यो निलयः प्रासादः सोऽनुतरा सर्वोत्कृष्टा श्रीः शोमा यस्य सोऽतिप्रधानश्रीकः किमु न भवेत् ! अपि तु भवेदेवेत्यर्थः ॥ ३८ ॥ अथोपसंहरन्नाह--- इत्थं नाथाऽऽगमनजनिताऽऽमोदमत्ताः प्रसक्ताः श्रीमद्भस्या भवनपतयो व्यन्तराः खेचराश्च । कल्पावासाः पुनरजरसोऽनादिकृत्याऽभियुक्ताः प्रीत्या चक्रुः समवसरणस्थापनां प्रेक्षणीयाम् ॥३९॥ नाथस्य वीरमभोराऽऽगमनेन ननिव उत्पन्नो य ामोदो हर्यतेन १८ मा हर्षिताः अत एव श्रीमतस्तीर्थकृद्विभूतिमतो जिनेन्द्रस्य भत्यां प्रसकाः प्रकण लाः पुनरनादीनि अनादिकालसंबन्धीनि यानि हत्यानि ससकर्तव्यानि तेषु अभियुका उद्यता एवंविधा भवनपतयोऽमु. २.रायाः १ व्यन्तराः पिशाचायाः २ च पुनः खेवरा ज्योतिका- चन्द्रादयः ३ पुनः कसावासा वैमानिकाः सौधर्मजादयः ४ चतु- -२३ विधा थपि अजरसो देवाः प्रीत्या पानन्देन इत्यमुकप्रकारेण प्रेक्ष. १२ -- गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । ६१ णीयां अनिमिषं दृष्ट्वा विलोकनीयां समवसरणस्य स्थापनां रचनां चक्रुः कुर्वन्ति स । अजरस इति । न विद्यते जरा येषां ते इति विग्रहः । इदं च मन्दाक्रान्तावृत्तं, तल्लक्षणं च-'मन्दाक्रान्ता जल-३ घिपडगैम्भॊ नती ताद्गुरू चेत्' इति । अस्मिन् सर्गे यन्नृमणिपीठिका- परिमाणं वप्रमित्तिपरिमाणं सोपानपरिमाणं च प्रोक्तमस्ति तदावश्य- कादिनन्थे तु न दृश्यते, परं पूर्वाचार्यविनिर्मितप्रकरणेषु विद्यते, तथा चोक्तं समवसरणस्तवे श्रीयशोभद्रमुनीन्द्रः-"गाउ(य)मेगं छस्स- यषणुहपरिछिन्नमंतरं तेसिं । अटुंगुलिफरयणीतिचीसंधणुवाहला॥ पंचसयपणुचतं चउदारि विराइआण वप्पाणं । सघप्पमाणमेयं निय९ निय हत्थेणय जिणाणं ॥२॥ सोचागदससहस्सा भूमीओ गंतु पदम- पायारो । पन्नासधणुरूपयरो पुणो वि सोवाणपणसहस्सा ॥ ३ ॥ तत्यविय वीयवप्पो पुव्वुचविही तयंतरं नेयं । तो तइए एवं वीससह-१२ स्साणि सोवाणा ॥४॥ दस पंच पंच सहस्सा सघे हत्युञ्चहत्यविस्थिन्ना । बाहिरमगितरिया चप्पाण कमेण सोवाणा ॥५॥ तम्मो मणिपीढं भूमीओ सदनिकोसुचं । दोधणुसयविच्छिन्नं चउदारं जिणतणु-१५ समुचं ॥ ६ ॥ "इत्यादि उपदेशसप्ततिग्रन्थेऽप्युक्तं-'चउदारतिसो- वाणं मज्झे मणिपीठयं जिणतणुचं । दोधणुसयंपिहुदीहं सहृदुको- सेहि घरणियला ॥१॥" इत्यादि । अतो न कश्चिद्दोपः ॥ ३९ ॥१८ इति भगवत्समवसरणवर्णनो नाम द्वितीयः सर्गः ॥२॥ इतीति स्पष्टम् । शति धीगीतमीयप्रवन्धव्याख्याने गौतमीयप्रकाशामियाने द्वितीयः सर्गः ॥२॥ २१ गौवमीयप्रकाशायटीकया सहितम् । ९ - यथा स्वशिष्यकान् गुरुः श्रुतं सहैव पाठयेत् । तथाऽपरान् सुरान्न कान् सघोपमन्वघोपयत् ॥३॥ यथा गुरुः पाठकः स्खशिप्यकान् निजलघुशिप्यान् सहेव श्रुतं ३ शास्त्रं पाठयेत् स्वयं पठन्नेव तान्पाठयेदित्यर्थः । तथा स देवदुन्दुमि- रऽपरान्कान् मुरान् घोपं शब्दं न अन्वघोपयत् नानूचारयति ल। खयं नदन् सर्वानपि देवान् शब्दाकुलानकरोदित्यर्थः । शिष्यका-६ नित्यत्र इसाथै फन् । अन्वघोपयदिति । 'घुप शन्दे' मला तु- मण्णिजन्ताकरि लङ् । 'उत्सतिममृतीनामुपसंख्यानम्' (वा.) इत्यनेनाणी कर्तुंर्णी कर्मतम् ॥ ३ ॥ तदा किं जातमित्याह- तदा रसातलाधिगा मनुष्यलोकमा अपि । वर्द्धगाथ खेचरास्तथा विमानवासिनः ॥ ४॥ तदारवानुमानजायधिप्रयोधयोधिवाः । मुरा हि कोटिकोटयः प्रभुं प्रमाय दुद्रुयुः ॥ ५॥ युग्मम् । तदा तलिनवसरे तस्स दुन्दुमेर्य आरयः शब्दस्तदनुमानान्जातो १५ योऽवधिप्रयोघोऽवधिज्ञानोपयोगनेन योधिता ज्ञापिताः सावधानीकृताः कोटिकोटयोऽनेककोटिकोटिसासाका रसातलमधिगाः पातालवासिनो मयनपतयः । अपिः पुनरर्थे । पुनर्गनुन्यलोकगा नवलोकवासिनो १८ • व्यन्तराः । च पुनम्वदूर्ध्वगानेभ्यो व्यन्तरेभ्य ऊदंगा उपरिवासिनः सेचरा ज्योतिफानथा विमानवासिनो वैमानिकाः मुरा देवाः प्रभु श्रीगीरसामिनं प्रमाय विहारोन्मुख ज्ञात्वा दुद्रुवुनद्भक्यर्थ धावन्ति २१ ल। रमातलेत्यादि । 'नागलोको रसातलम्' इति हैनः । रसावर- मधिगच्छन्तीति विनई 'जन्यत्रापि दृश्यते (वा० ) इति गमेटः १२५ १२ .

. ३ ६ ६२ श्रीगौवमीयकाव्यं तृतीयः सर्गः। अथर्जुवालुकानदीतटस्थसालसालतः । विहर्तुमुद्यते विभौ ननाद देवदुन्दुभिः ॥१॥ मुरासुरश्रेणिवृतः समन्ताद्यो दिव्यधाम स्वकमाजगाम । विभ्राजमानो विलसद्विभूत्या तमीश्वरं वीरजिनं प्रणोमि ॥१॥ अथाऽऽनन्तरं विभौ श्रीवीरखामिनि ऋजुवालुकानामनद्याः तटस्थो यः सालो नाम सालो वृक्षस्तस्माचदधस्तनप्रदेशाद्विहत्तु उद्यते सति आकाशे देवदुन्दुभिर्देववाद्यं मनाद ध्वनति स्म । सालेत्यादि । ९ सालः सर्जतरौ वृक्षमात्रमाकारयोरपि' इत्यनेकार्थः । ननादेति । 'नद अव्यक्ते शब्दे' अस्माकरि लिट् । अस्मिन् सर्गे प्रमाणिका- वृत्तम् , तल्लक्षणं च-'प्रमाणिका जरी लगाविति' ॥१॥ तकद्गमीरनिःखनो दिगन्तराणि चानो। इवाज्यविन्दुरेकतो गतो जलानि पल्वले ॥२॥ वस्य देवदुन्दुभेगमीरो यो निःस्खनो ध्वनिः स दिगन्तराणि सर्व- ५दिग्मध्यप्रदेशान् आनशे व्यामोति ल । कः कानीवेत्याह--पल्वले लघुसरसि एकत्र एकलिन्पदेशे गतः प्राप्त माज्यविन्दुरस्त्यानघृत- बिन्दुरुपलक्षणाचलबिन्दुसानीय यथा पत्पलैकमदेशसबैलादिपिन्दुः १८ प्रायः सर्वाग्यपि तद्गतजलरानि व्यामोति तथेत्यर्थः । तकदित्यादि । 'अव्ययसर्वनामा (५३७१) इति टेः प्रागकन्, 'मन्द्रो गम्भीर' पति हेमः । गम्भीरवद्भीरशब्दोऽपि योध्यः । चः समुच्चये । आनशे इति । 'अशुद्ध व्याधी' फरि लिट् । पल्बले इति । 'धेशान्तः पवलोऽस्पं तत्' इति हैमः ॥२॥ १२ . ६ . गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । ९. वथा हे प्रमो ! अनन्ता शक्तिर्यस्य सोऽनन्तशक्तिस्तस्सै अत एवं जगजनोपकारिणे त्रैलोक्यलोकोपकारकरणशीलाय तुम्यं नमोऽस्तु । पुनहें प्रभो! अनन्ता ये भावाः पदार्या द्रव्यपर्यायादयस्तेषु प्रकाश-३ कत्वादाखान् सूर्य इव अनन्तमावमाखान् तस्मै, तथा स्वयमात्मना परोपदेशव्यतिरेकेणैव भवतीति, तीर्थप्रवर्तकः संबुद्धो वेति स्वयंमू- स्तस्मै ते तुभ्यं नमोऽस्तु ॥ ८॥ इति प्रणूय किन्नरा जिनेशभक्तितत्पराः ।' सुमन्द्रमध्यचारकैः स्खरैः पुरो यशो जगुः ॥९॥ इतीत्थं प्रणूय स्तुत्ला तेषु देवेषु ये किन्नरा व्यन्तरविशेपा देवास्ते ९ जिनेशस्य भगवतो भक्तो तत्पराः सन्तः सुष्टु शोभनैर्मन्द्रमध्यता- रकैरुरःकण्ठशिरोमवैः स्वरैः. पड्डादिभिः पुरः प्रमोरग्रे यशो भग- वत्कीर्ति जगुर्गायन्ति स । अणूयेति । 'णू स्तवे' अमात् क्त्वो ल्यप् । १२ सुमन्द्रेत्यादि । तारकैरित्यत्र खार्थे कप् । 'ते मन्द्रमध्यताराः स्यु- हरःकण्ठशिरोमवाः' इति हेमः। 'तारोऽसुधैर्ध्वनिमन्द्रो गंभीरः' इति १८ अथ मगवतो विहारसमयेऽग्रतः किं चचालेत्याह- सहस्रसकैररैर्विनिर्मितं मणीमयम् । इयार्कमण्डलं नभोगवं स्फुरन्महांप्रमम् ॥ १०॥ जयाय धर्मचक्रिणथंचाल चक्रमग्रतः । तदीपरोचिपा निशा दिवखरूपमादधे ॥११॥-युग्मम् । .. सहसं सध्या येषां ते सहससक्ष्यात एव सहस्रसस्यकारेश्य कावयवैर्विनिर्मित रचितं पुनर्मणीनां विकारो मणीमयं रतमयं तथा- २२ ५ गो.का.

श्रीगौतमीयकाव्यं - ६ . एवमग्रेऽपि । हिः पादपूरणे । प्रमायेति । प्रपूर्वान्मालो ल्यपि न ल्यपि' (६।४।६९) इतीत्वाभावः । दुदुरिति । 'दु गौ' ३ असात्करि लिट् ॥५॥ ततस्ते सुराः किं कृतवन्त इत्याह- पुरा निपीय लोचनैर्महामहोभिरश्चितम् । कृतप्रदक्षिणात्रया जगत्प्रभु चवन्दिरे ॥६॥ ते चतुर्विधा देवा अश्चितं त्रैलोक्यपूजितं जगत्प्रभु श्रीवीर- जिनेश्वरं पुरा पूर्व महन्महः प्रमा येषां तानि महामहांसि तैरति- ९ भास्वरलोचनैर्नत्रैर्निपीय सादरं विलोक्य कृतं प्रदक्षिणात्रयं यैस्ते कृत- प्रदक्षिणात्रयाः सन्तो भगवन्तं ववन्दिरे प्रणामपूर्वकं स्तुवन्ति । निपीयेति । निपूर्वात् ‘पी पाने' इति देवादिकात् त्यो ल्यप् । १२ महोमिरिति । 'भा मयूखमहसी छबिर्विमा' इति हेमः । ववन्दिरे इति । 'यदि अभिवादनस्तुत्योः' कर्तरि लिट् ॥ ६ ॥ कथं स्तुवन्ति लेत्यत आह- नमो नमोऽस्तु ते प्रमो पराऽऽत्मरूपधारिणे । नमो नमोऽस्तु ते प्रभो जगत्प्रकाशकारिणे ॥७॥ नमोऽस्त्वनन्तशक्तये जगजनोपकारिणे । अनन्तभावभासते नमोऽस्तु ते स्वयंभुवे ।। ८॥ हे प्रभो! परं प्रकृएं आत्मनः स्वस्थ रूपं स्वभावं धारयति तच्छील.. पराऽऽत्मरूपधारी तसे ते तुभ्यं नमोऽस्तु । भ्योऽसाकं नमस्कारोऽस्वि- त्यर्थः । पुनहें प्रभो ! जगत्सु त्रैलोक्ये प्रकाशमयोतं करोतीति २२ वच्छीलो जगत्प्रकाशकारी तलै ते तुभ्यं नमो नमोऽस्तु ॥ ७ ॥ १५ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । तथा हे प्रमो! अनन्ता शक्तिर्यस्य सोऽनन्तशक्तिस्तस्सै अत एवं जगज्जनोपकारिणे त्रैलोक्यलोकोपकारकरणशीलाय तुभ्यं नमोऽस्तु । पुनहें प्रमो! अनन्ता ये मावाः पदार्या द्रव्यपर्यायादयस्त्रेषु प्रकाश-३ कस्वाद्धावान् सूर्य इव अनन्तमावमाखान् तस्मै, तथा स्वयमात्मना परोपदेशव्यतिरेकेणैव भवतीति तीर्थप्रवर्तकः संबुद्धो वेति स्वयंभू- स्तस्मै ते तुभ्यं नमोऽस्तु ॥ ८॥ इति प्रणय किन्नरा जिनेशमक्तितत्पराः । सुमन्द्रमध्यवारकै स्वरैः पुरो यशो जगुः ॥९॥ इतीत्थं प्रणय स्तुत्वा तेषु देवेषु ये किन्नरा व्यन्तरविशेपा देवास्ते जिनेशस भगवतो भक्तो तत्पराः सन्तः सुष्टु शोभनैर्मन्द्रमध्यता- रकैरुरःकण्ठशिरोभवैः स्खरैः, पड्डादिभिः पुरः प्रभोरगे यशो भग• • वकीर्ति जगुर्गायन्ति स । प्रणूयेति । 'णू सवे' अस्मात् क्त्वोल्यप् । १२ सुमन्द्रेत्यादि । तारकैरित्यत्र खार्थे कम् । ते मन्द्रमध्यताराः स्यु- रुरःकण्ठशिरोमवाः' इति हैमः । 'तारोऽत्युच्चै निर्मन्द्रो गंभीरः' इति च॥९॥ अथ मगवतो विहारसमयेऽप्रतः किं चचालेल्याह- सहस्रसयकैररैर्विनिर्मितं मणीमयम् । इवार्कमण्डलं नमोगतं स्फुरन्महांप्रमम् ॥ १० ॥ १४ जयाय धर्मचक्रिणश्वचाल चक्रमग्रतः। तंदीयरोचिपा निशा दिवखरूपमादधे ॥११॥ गुम्मम् । सहस्र सध्या येषां ते सहस्रसझ्यात एव सहस्रसञ्जयकाररैश्च कावयवैर्विनिर्मितं रचितं पुनर्मणीनां विकारो मणीमयं रतभयं तथा- २२ ५ गौ.का. १५ M

श्रीगौतमीयकाव्य
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६
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एवमग्रेऽपि । हिः पादपूरणे । प्रमायेति । अपूर्वान्माडो ल्यपि 'न
त्यपि' (६४।६९) इतीत्वाभावः । दुदुचुरिति । 'दु गतौ'
३ अस्मात्कर्चरि लिट् ॥५॥
ततस्ते मुराः किं कृतवन्त इत्याह--
पुरा निपीय लोचनैर्महामहोभिरश्चितम् ।
कृतप्रदक्षिणात्रया जगत्प्रभुं ववन्दिरे ॥६॥
ते चतुर्विधा देवा अश्चितं त्रैलोक्यपूजितं जगत्प्रभु श्रीवीर-
जिनेश्वरं पुरा पूर्व महन्महः प्रमा येपां तानि महामहांसि रति-
९मास्वरलोचनैनर्निपीय सादरं विलोक्य कृतं प्रदक्षिणात्रयं यैस्ते कृत-'
प्रदक्षिणात्रयाः सन्तो भगवन्तं ववन्दिरे प्रणामपूर्वकं स्तुवन्ति स्म ।
निपीयेति । निपूर्वात् 'पीङ् पाने' इति देवादिकात् क्त्वो ल्यप् ।
१२ महोभिरिति । 'भा मयूखमहसी छबिर्विमा' इति हैमः । ववन्दिरे
इति । 'वदि अभिवादनस्तुत्योः' कर्तरि लिट् ॥ ६ ॥
कथं स्तुवन्ति लेत्यत आह-
नमो नमोऽस्तु ते प्रभो पराऽऽत्मरूपधारिणे ।
नमो नमोऽस्तु ते प्रभो जगत्प्रकाशकारिणे ॥७॥
नमोऽस्त्वनन्तशक्तये जगजनोपकारिणे ।
अनन्तमायभास्यते नमोऽस्तु ते स्वयंभुवे ॥८॥
हे प्रमो परं प्रकृष्टं आत्मनः सस्य रूपं समावं धारयति तच्छीर-
पराऽऽत्मरुपपारी तस ते तुभ्यं नमोऽस्तु । भूयोऽस्माकं नमस्कारोऽस्वि-
त्यर्थः । पुनहें प्रभो ! जगत्सु त्रैलोक्ये प्रकाशमुयोतं करोतीति.
२२ वच्छीलो जगत्प्रकाशकारी तसे ते तुम्यं नमो नमोऽस्तु ॥ ७ ॥

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । वथा हे प्रमो! अनन्ता शक्तिर्यस्य सोऽनन्तशक्तिस्तसै अत एव जगजनोपकारिणे त्रैलोक्यलोकोपकारकरणशीलाय तुभ्यं नमोऽस्तु । पुन, प्रमो! अनन्ता ये भावाः पदार्या द्रव्यपर्यायादयस्तेषु प्रकाश-३ कत्वादासान् सूर्य इव अनन्तमावमाखान् तस्मै, तथा स्वयमात्मना परोपदेशव्यतिरेकेणैव भवतीति तीर्थप्रवर्चकः संबुद्धो वेति स्वयंभू- स्तसै ते तुभ्यं नमोऽस्तु ॥ ८॥ इति प्रणय किन्नरा जिनेशमक्तिवत्पराः। मुमन्द्रमध्यवारकैः स्वरैः पुरो यशो जगुः ॥९॥ इतीत्यं प्रणय स्तुत्वा तेषु देवेषु ये किन्नरा व्यन्तरविशेपा देवाजे ९ जिनेशस्य भगवतो मको तत्पराः सन्तः मुष्ठु शोभनैर्मन्द्रमध्यता- रकैरुरःकण्ठशिरोभवैः सरैः. पलादिमिः पुरः प्रमोरने यशो भग- वकी िजगुर्गायन्ति ल । प्रणूवेति । 'णू स्ववे' अस्मात् क्त्वो ल्यप् । १२ मुमन्द्रेत्यादि । तारकरित्यत्र साथै कम् । ते मन्द्रमध्यताराः स्यु- र:कण्ठशिरोमवाः' इति हैमः । 'तारोऽत्युच्चैर्वनिर्मन्द्रो गंभीरः' इति च ॥९॥ अथ भगवतो विहारसमयेऽप्रतः किं चचालेत्याह- सहससहपकैरविनिर्मितं मणीमयम् । इवार्कमण्डलं नमोगवं स्फुरन्महाप्रमम् ॥१०॥ जयाय धर्मपत्रिणवचाल चक्रमग्रतः । तदीयरोचिपा निशा दिवस्वरूपमादधे ॥११॥-युग्मम् । सहसं सध्या येषां ते सहससश्यास्त्र एवं सहस्रसासकानररेश्व- कावयवैर्विनिर्मितं रविवं पुनर्मणीनां विकारो मणीमयं रलमयं तथा- २२ ५ गो.का.

श्रीगौवमीयकाव्यं . कमण्डलं सूर्यविम्वमिव नभोगतमाकाशं प्राप्तं पुनः स्फुरन्ती सर्वतः संचरन्ती महापमा यस्य तत् तथोक्तम् ॥ १०॥ ३ एवंविधं चक्रं धर्मचक्र जयाय जयार्थ धर्मचक्रिणः श्रीवीरप्रमोः 'अग्रवश्वचाल अग्रे चलति स । तदा तस्य चक्रस्येदं तदीयं यद्रोचि- ज्योतिस्तेन निशा रात्रिरपि दिवस दिवसस्य खरूपं आदघे धारयति । तत्प्रकाशेन हि भगवद्विहाररात्रिदिवसपायाऽभूदित्यर्थः । मगीति । मणीशब्दस्य पुंस्त्रीलिङ्गत्वाचदिकारादिति स्त्रियां पाक्षिको टीम् । धर्मेत्यादि । धर्मचक्रमस्यास्तीति मत्वर्थे इंनिः । धर्मचक्री ९ वस्य ! दिवेति । दिवशब्दोऽदन्तः । आदघे इति । आपूर्वाद्धानः करि लिट् ॥ ११ ॥ वतोऽनुकूलमारुतेरितस्फुरत्पताकया । १२प्रमोः पया चलन्तु मोयिति प्रणोदयन्निव ॥१२॥ ध्वजोऽन्तरिक्षगोऽचलत् सहस्रयोजनोट्रितः। सुरा हि यस्य वाहकाः कथं महिनि संशयः॥ १३ ॥-युग्मम् । १५ ततस्तदनन्तरं अन्तरिक्षमाकाशं गच्छति प्रामोतीत्यन्तरिक्षगो नमस्तस्तथा सहस्रयोजनानि उच्छित उच्चोऽनेकपताकापरिमण्डितो रलमयो ध्वजः प्रमोः पुरोऽचलत् । किं कुर्वनिव । अनुकूलोऽनुलोमो १८यो मारुतो वायुखेन ईरिता कम्पिताऽत एवं स्फरन्ती इतस्ततः संचरन्ती या पताका तया मो लोकाः ! प्रमोः पया प्रभूपदिष्टमार्गेग चलन्तु इति प्रणोदयन् प्रेरयन्निव मन्यलोकानिति शेषः । युक्तोऽय- २०मर्यः-हि यतः कारणात् यस वजस्स मुरा देवा वाहकाः प्रापकाः तस्य महिनि महत्त्वे कथं केन प्रकारेण संशयः सन्देहः । न कयम २सपीत्यर्थः । इह पताकानां पहुवेऽपि.पताकयेति जावावेकवचनम् ।

.. गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । भोयिति । 'भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि' (८।३।१७) इति रो रि' (८३१४) आदेशे 'लोपः शाकल्यस्य' (८।३।१९) इत्यस्य चैकल्पिकत्वान यलोपः ॥ १२ ॥ १३ ॥ विचित्ररत्नमण्डितं ततो हिरण्मयासनम् । श्रमापनोदनक्षणे यदाश्रयेत तीर्थराट् ॥ १४ ॥ सपादपीठमम्बरे सुरांसगं चचाल वत् । इवाध्यनि सुधाभुजामखण्डचन्द्रमण्डलम् ॥ १५ ॥-युग्मम् । ततस्तदनन्तरं श्रमस्य खेदस्याऽपनोदनं दूरीकरणं तस्य क्षणे प्रस्तावे, यत् सिंहासनं तीर्थराट् श्रीवीरतीर्थराज आश्रयेत आरोहेत्, उप-९ विशेदिति यावत् । तद्विचित्रैरनेकविधै स्लैर्मण्डितं खचितं सपादपीठे पादपीठेन सह वर्तमानं सुराणामसेषु स्कन्धेषु गच्छतीति सुरांऽसगं एवंविधं हिरण्मयासनं स्वर्णसिंहासनं अम्बरे आकाशे चचाल तत् १२ सिंहासनं किमिव सुघामुजां देवानामध्वनि मार्गेऽखण्डं चन्द्रमण्डल- मिव । प्रकाशकत्वादिति भावः । हिरण्मयेत्यादि । हिरण्यस्य 'विकारो हिरण्मयं 'दाण्डिनायन- (६४१७१) इत्यादिसूत्रेण १५ निपातनाचलोपः । 'वणं हेम हिरण्यहाटके'त्यादि हेमः । हिरण्मयं च तदासनं चेति विग्रहः । सपादपीठमिति । 'पादपीठं पदासन'- मिति हेमः।सुरांसेत्यादि। अंसो भुजशिरःस्कंघ' इति हैमः ।। तदुद्वहन्त ऐश्वरासनं मुरा यथाक्रमम् । परस्परार्थनापरा निजान् भुजानपीपवन् ॥१६॥ परस्परेभ्योऽर्धना प्रार्थना परस्परार्थना तसां परास्वत्पराः . मुरा देवाः तत्पूर्ववर्णित ईश्वरस्य मगवत इदं ऐश्वरं आसनं सिंहासनमुद्र- २१ श्रीगीतमीयकाव्य .. हन्तः सन्तो यथाक्रममनुक्रमेण निजान् मुजान अपीपवन् पावयन्ति सा पवित्रीकुर्वन्ति मेति यावत् । अपीपरनिति । हेतुमण्णिजन्ताद ३ 'पूड पवने' घावोझ् । 'ओः पुयण ज्यपरे (७/१८०) इति अभ्यासोकारस्सत्वं, ततो दीर्घः ॥ १६ ॥ प्रलम्यमानमौक्तिकावलीकलापमालितम् । छ इवेन्दुविम्यमास्रवत्सुधासुविन्दुसुन्दरम् ॥ १७ ॥ विजृम्ममाणमालतीविशालमालिकार्चितम् । ध्वनद्विरेफझकृतिप्रकाशिवधि दूरतः॥१८॥ ९सुरलदण्डमण्डित विहायसि प्रभासिवम् । उपर्युपर्यधीश्वरं त्रिधातपत्रमस्फुरत् ॥ १९ ॥-निभिर्विशेषकम् । विहायसि आकाशेऽधीश्वरमुप[परि अधीश्वरस्य भगवत उपरि- १२ष्टात्समीपदेशे त्रिधाऽतपत्रं भुवनत्रयखामित्वसूचनात्रिविधं छत्रं, छत्र त्रयमित्यर्थः । अस्फुरत् चलति स । कीदृशं वदित्याह-प्रलम्ब- माना या मौक्तिकावत्यो मुक्ताफलमालास्तासां कलापैः समूहेर्मालित १५ युकं मत एव सुन्दरं रम्यम् । किमिव । आसवन्तः क्षरन्तः सुघाया ममृतस्य सुमु शोमना विन्दवो यस तचयोक्तं इन्दुविवं चन्द्र- मण्डलमिव यथैवसुन्दरं भवति तथा वदित्यर्थः । पुनः कीदृशम् । १६ विम्ममाणा विकसन्ती या मालती जातिलता तस्याः पुष्परूपा या विशाला विस्तीर्णा या मालिका मालास्वामिरर्चितं पूजितं शोभित- मित्यर्थः । पुनरतो ध्वनन्तो ध्वनि कुर्वाणा ये द्विरेफाः अमरास्तेपा २.शतिवारशब्दसया प्रकाशिता प्रादुकृता श्रीः शोमा यस्य सर- योक्तं पुनः सुष्टु चोमनानि यानि रसानि तेषां दण्डेन मण्डितं तथा २३ प्रमासितं दीधिमन्तम्, यहा प्रमयादील्या सितमुज्वलं श्वेतदीधिमन्त.

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकयां सहितम् । ६९ - मित्यर्थः । प्रकाशितश्रीति । नपुंसकत्वाद् इखलम् । विहायसीति । 'विहाय आकाशमनन्तपुष्करे' इति हैमः । सितमिति । 'श्वेतः श्येतः सितः शुक्ल' इति हैमः । उपर्युपरीत्यादि । 'उपर्यध्यधसः सामीप्य : (८१७) इति द्वित्वम् । तद्योगे 'उभसर्वतसो' (वा०) इत्या- दिना द्वितीया । आतपत्रमिति | आतपात्रायते इति विग्रहः । 'अस्फुरदिति । 'स्कुर चलने' अस्मात्कर्तरि लिङ ॥ १७–१९ ॥ ॥ चतुर्दिशासु चामरावली ततोऽप्यनोदिता । उदच्छलत्सुराननोच्छलज्जयारवैः समम् ॥२०॥ ततस्तदनन्तरं सुराणां देवानामाननेभ्यो मुखेभ्य उच्छलन्त ९ उमादुर्भवन्तो ये जयारवा जयशब्दास्त्रैः समं सार्द्ध अनोदिताऽमेरि- तापि चामराणामावली श्रेणिः चतुर्दिशासु प्रमोश्चतुर्दिा उच्छलत उच्छलति स उत्पतति सेति यावत् । चतुर्दिशास्विति । चततश्च १२. ता दिशाश्चेति विग्रहः । 'आपं चैव हलन्तानाम्' इति, वचनादिशे. त्यत्राम् ॥२०॥ अतो घनं मरुत्पथे विकुळ मेघमालिनः । जलच्छटाभिरायांबभूवुरध्वमेदिनीम् ॥ २१ ॥ अतो अनन्तरं मेघमालिनो देवा मरुत्पथे आकाशे घनं मे विकुळ विरच्य अध्वमेदिनी भगवद्विहारमार्गपृथ्वी जलच्छटामिः १८ आर्द्रयांरगखुराद्रीचक्रुः । मरुत्पथे इति । 'अभं सुराम्रोडुमर- सयोऽम्यर मिति हैमः । विकुव्र्येति । सामयिकपातुप्रयोगः । आर्द्र- यामिति । करोत्यर्थणिजन्तादाम् ॥ २१॥ दिशः प्रसादमासदनिशाऽप्यभून्महोज्वला! विमोचितेत्यनीतिभिर्द्धराप्युदश्वसीत्सुखम् ।। २२॥ २१ श्रीगौतमीयकाव्यं 5.पुनस्तदा दिशः सर्वा अपि प्रसादं प्रसन्नत्वं निर्मलत्वमिति यावत् आसदन प्राप्नुवन्ति स्म । तथा निशा रानिरपि महोज्वलाऽभूत् तथा ३ पुनरा पृथ्वी अपि भगवताऽनीतिभिरन्यायैरुचिता इति हेतोः मुखं यथा स्याचथाऽश्वसीत् श्वासं धृतवती । आसदनितिं । आङ्- पूर्वात् 'पढ्नु'धातो डि लित्त्वात् च्लेश्च । अश्वसीदित्यन हयन्तक्षण- ६(७२५) इत्यादिना न वृद्धिः ॥ २२ ।। सुक्लप्तपुष्पवादलानभस्तलाच विच्युतैः । सुगन्धिभिः सुमोत्करैः सुरा महीं प्रतस्ततः ॥ २३ ॥ च पुनस्तदा सुरा देवाः सुस्तानि सुनिमितानि पुष्पवादलानि पुष्पवर्षणाम्राणि यत्र तत् तस्मान्नभस्तलादाऽऽकाशात् विच्युतैः पतिते- स्तथा सुष्टु गन्धो येषु ते सुगन्धयस्तैः सुमानां पुष्पाणामुत्करैः समू- रहैर्महीं पृथ्वी प्रतस्तरुः आच्छादयामासुः । सुगन्धिभिरिति । 'गन्धस्सेदुत्पूति- (५।४।१३५) इत्यादिना समासान्त इकारः । सुमेति । 'प्रसून कुसुमं सुम'मित्यमरः । प्रतस्तरुरिति । 'स्तु १५ आच्छादने' अस्मात्पूर्वालिट् ॥ २३ ॥ स्थिरा अपि दुमा जलाशया: सुमैश्च शीकरैः । तदानुयायिवायुनोपचेरुरज़मीश्वरम् ॥ २४॥ तदा तस्मिन्नवसरे स्थिरा अपि द्रुमा वृक्षास्तथा जलाशया जलाss. धारास्तडागादयः अनुयायी अनुकूलो यो वायुः पवनस्तेन, प्रेरितेरिति शेपः । सुमैः पुष्पैश्च पुनः शीकरैर्नलफणैरच्यं त्रिजगत्पूज्यमीश्वरं ! भगवन्तमुपचेहराराधयामासुः । भगवद्भक्तौ तत्परा बभूपरित्यर्थः । हुमाः सुमैः जलाशयाश्च शीकरैरिति क्रमेण योग्यम् । स्थिरा अपीति। 'एश्य"वि काजीमुक्तिपाठचिन्तः । १८ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकयां सहितम् । जनमा मनुष्यादयस्तु . भगवदुपकण्ठमागत्य भक्तिं कुर्वन्त्येवेत्यपि- शब्दार्थः । शीकरैरिति । 'वाताऽस्तं वारि शीकरः' इति हेमः । उप- चेरुरिति । करि लिह । अन्नोपपूर्वस्य चरघातोर्मक्तिरर्थः । 'शुश्रूपा-३ राधनोपातिपरिवस्यापरीष्टयः । उपचारः' इति हैमकोशोक्तेः॥२४॥ पुरस्थिता अपि द्रुमाः प्रणम्य रम्यमार्गगा। विनिद्रपुप्पसंहतीरमिप्रभु डुढौकिरे ॥ २५ ॥ : पुनस्तदा रम्यं भगवद्विहारान्मनोहरमार्ग गच्छन्ति प्रामुवन्तीति रंम्यमार्गगाः पुरोऽग्रे स्थिता द्रुमा अपि प्रणम्य प्रमुं नमस्कृत्य अमि- प्रमुं प्रभोरभिमुखं विनिद्राणां विकखराणां पुप्पाणां संहतीः समूहान् ९ डदौकिरे ढोकन्ते स । प्रामृतीचक्रुरित्यर्थः । अभिप्रभुमिति । 'मभिरभागे' इति लक्षणेथेऽमेः कर्मप्रवचनीयत्वाचयोगे द्वितीया । डुढौकिरे इति । 'दौकृ गतौ' करीरि लिट् ॥ २५ ॥ रविप्रभानुकारिणा खचारिचक्ररोचिपा । मृगाः प्रचोधिताः पथि प्रदक्षिणं प्रभोर्ययुः ॥ २६ ॥ ..पथि प्रमोर्विहारमार्गे रवेः प्रमामनुकरोति तुल्यति तच्छीलं रवि- प्रमानुकारितेन सूर्यकिरणसदृशेन खचारिण आकाशगामिनश्चक्रस्य धर्मचक्रस्य रोचिपा किरणेन प्रबोधिताः प्रबोघं नीता विनिद्रीकृता मृगा हरिणाः प्रमोर्भगवतः प्रदक्षिणं पार्श्व ययुः । प्रदक्षिणगत्या १८ यान्ति सेत्यर्थः ॥ २६ ॥ तथैव चामपार्थवस्तरुन्विहाय पंभिणः । विधाय तोरणाकृति गतेर्ययुः प्रदक्षिणम् ॥ २७ ॥ .१ पतत्रिणः' इति काशीमुद्रितपाठोऽयुक्त, छन्दोमहान्यापाताद । - . १२ २१ श्रीगोतमीयकाव्यं तथैव तेनैव प्रकारेण पत्रं पिच्छमस्त्येषामिति पत्रिणः पक्षिणो, मयूराचा वासपार्श्वतस्तरून वृक्षान् विहाय त्यक्त्वा गतेः स्वकीयगमन ३ नस्य तोरणाऽऽकृति विधाय तोरणाऽऽकृत्या गतिं कृत्वेत्यर्थः। प्रमो. प्रदक्षिणं पाच ययुः । पत्रिण इति । 'पत्रं पतत्रं पिच्छं वानखनु रुह मिति हैमः ॥ २७॥ तवाऽस्ति सिद्धिरित्यदो वचो बभूव पृष्ठतः । समेहि भो जयोऽस्ति ते पुरोऽपि गीरभूदिति ।। २८ ॥ पुनस्तदा हे भगवन् , तव सिद्धिरति इत्यद इत्येतत् पृष्ठतो ९वचो देववचनं बभूव । तद्यथा-~मो सामिनु , त्वं समेहि समागच्छ ते तव जयोऽस्ति इति पुरोऽग्रेऽपि गीर्देववाणी अभूत् ॥ २८॥. अनेकतूर्यनिःस्वनानुपातिकिचरखरैः । अवामुखैकपात्रतामुवाह सर्वमम्बरम् ।। २९ ।। पुनवदा सर्व अम्बरमाऽऽकाशं कर्तृ, अनेकानि यानि तूर्याणि वादित्राणि तेपों निःखना शब्दास्तान् अनुपतत्यऽनुसरति तच्छीला ७५ये किन्नराणां खरास्तैः श्रवसां श्रोत्राणां सुखस्य एकपात्रतामद्वितीय- माजनत्वं उवाह धारयामास । 'वह प्रापणे अमात्करि लिट् ॥२९॥ मुगन्धिनीरसंस्कता ससौरभाउप्पभून्मही । जगत्पतेः समागतरुपस्क्रियेत किं न हि ।। ३०।- पुनस्तदा मुगन्धिनारेण मुरमिजलेन संस्कृता संस्कार नीता मही पृथ्वी अपि सह सौरभेण सौगन्ध्येन वर्तते इति ससौरमाऽभूत् । युक्तोऽयमर्थः-हि यतो जगत्पतेर्भगवतः समागतेः समागमनात् किं सन उपस्क्रियेत. सर्वमपि संस्क्रियेतेत्यर्थः, देवादिमिरिति शेषः । १२ १८ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहिवम् । '- अत्रोपपूर्वात् कृषः कर्मणि लिट् । 'उपात्प्रतियन--(६११३९) इत्यादिना भूपणे सुट् ॥ ३० ॥ प्रतिप्रभु सुराङ्गनाञ्चकीर्णमौक्तिकोत्करा। नमन्नभश्चरोडभिः सरूपतां प्रपेदिरे ॥ ३१ ॥ पुनस्तदा प्रभु प्रति सुराङ्गनाभिरवकीर्णा उच्छालिता ये मौक्ति- कानामुत्कराः समूहास्ते नमन्तीव नमन्ति नग्रीभवन्ति यानि नम-६ श्वराणि आकाशचारीणि उडूनि नक्षत्राणि तैः सरूपतां समानरूपता प्रपेदिरे प्राप्तवन्तः उज्ज्वलत्वाद्विकीर्णरूपत्वाच तत्तुल्या बभूवुरित्यर्थः । उड्डमिरिति । 'तारकाप्युड वा स्त्रिया'मित्यमरः । अपेदिरे इति । प्रपूर्वात् पदधातोः कर्तरि लिट् ॥ ३१ ॥ अधोगतानि कण्टकेप्सितान्यतः प्रभृत्यहो। अधोमुखास्तकण्टकाः पथीत्यवी विदन्निय ॥ ३२ ॥ पुनर्भगवद्विहारसमये पथि मार्गेऽधो मुखं येषां तेऽधोमुखा अस्ताः क्षिप्ता ये कण्टका दुःखपदा बब्बूलादिवृक्षाऽवयवास्ते इति अवीवि- दन्निव इति ज्ञापयन्ति स्मेव । इतीति किं ! । अहो लोकाः, अतः १५ प्रमृति इत आरभ्य कण्टकानां कण्टकतुल्यदुष्टलोकानामीप्सितानि दुरध्यवसायरूपवाञ्छितानि अधोगतानि अदृश्यानि जातानीत्यर्थः । अवीविदन्निति । हेतुमण्णिजन्ता द्विद-ज्ञाने' असाल्लुङ् ॥ ३२ ॥ १८ जिनेन हेमपद्मयोः क्रमौ निधाय गच्छता । " ' महादिसेनकाननस्थली सपद्यपूयत ॥ ३३ ॥ इत्थं विहाय मार्गे हेमपद्मयोः वर्णकमलयोपरि क्रमौ चरणौ तियाय सापयित्वा गच्छला विहारं कुर्वता जिनेन श्रीवीपरमेश्वरेण?

७४ श्रीगौतमीयकाव्य 1 ९ सपदि शीघ्रं महादिसेनकाननस्य महसेनवनस्य स्थली भूमिः अपूयत खचरणन्यासैः पवित्रीक्रियते स, तत्राऽजग्मे इति भावः । यद्यप्यत्र ३ हेम्नः पाद्वयमुक्तं तथापि नवपद्मानि चोध्यानि । क्रमाविति । 'पदोंऽविश्चलनः क्रम' इति हेमः । महादीत्यादि । महशब्द आदि. यस्य तन्महादि, ततो द्विः कर्मधारयगर्भस्तत्पुरुषः । अपूयतेति । ६.पूङः कर्मणि लड् ॥ ३३ ॥ सुवर्णरत्नवप्रयोजिनालयेऽन्तरालगे। न्यधायि निर्जरैरधो निजांससंस्थमासनम् ॥ ३४ ॥ तदनन्तरं निर्जरैः सुरैर्निजांससंस्थं खस्कन्धस्थं आसनं सिंहासन सुवर्ण च रत्नं च सुवर्णरत्ने तयोर्वप्रौ प्राकारौ तयोरन्तरालं गच्छ- तीति तस्मिन् अन्तरालगे मध्यस्थे जिनालये देवच्छन्दके अघौ १२ न्यधायि अधः स्याप्यते स । निपूर्वाद्धानः कर्मणि लुङ् ॥ ३४ ॥ निलोकनाथमन्दिरं तदा सुरासुरैतम् । रराज खेचरावलीप्रवेष्टिताद्रिराजवत् ॥ ३५ ॥ तदा तसिन्नवसरे सुरासुरैर्वृतं वेष्टितं त्रिलोकनाथस्य भगवतो मन्दिरं समवसरणं खेचराणां ज्योतिप्काणामावलीमिः श्रेणीमिः प्रकर्षेण चेष्टितो योऽद्विराजो मेरुगिरिस्तद्वत् रराज शोमते स। त्रिलोकेति । त्रिसक्ष्यो लोकस्त्रिलोक इत्यादिविग्रहः । न तु समा- हारे द्विगुः, तथात्वे 'द्विगोः' (४११२१) इति डीप्प्रसङ्गात् ॥३५॥ अमण्डपंच ताण्डवं सुराः मुनृत्यपण्डिताः। जगुय केपि गायनाः प्रमोथरित्रमाऽऽजने ।। ३६ ॥ पुनस्तदा आ समन्ताजना लोका यत्र तदाजनं प्रस्तावात्समवसरणं २५ तस्मिन् मुटु चोमनं यनृत्यं नर्चनं तत्र पण्डिता निपुणाः केऽपि मुरा १५ .. , गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । देवास्ताण्डवं नृत्यममण्डयन् , धातूनामनेकार्थत्वात् कुर्वन्ति सेत्यर्थः । च पुनस्तन केऽपि गायना.गानक्रियाकारो देवाः प्रमोश्चरित्रमाचारं जगुर्गायन्ति स्म । ताण्डवमिति । 'लास्य नाट्यं च ताण्डव'मिति ३ हेमः ॥ ३६॥ तथा श्रुतेपु विश्रुतान् गुणांश्च केऽपि तुष्टुवुः । सुराश्च केपि सादरं मुहुः प्रणेमुरीश्वरम् ॥ ३७॥ तथा तेनैव प्रकारेण केऽपि सुराः श्रुतेपु सिद्धान्तेषु विश्रुतान् प्रसिद्धान् प्रमोर्गुणान् निरुपमशममार्दवादीन् तुष्टुवुः स्तुवन्ति स । चः समुच्चये, च पुनः केऽपि सुरा ईश्वरं श्रीवीरपरमेश्वरं सह आदरेणेति सादरं यथा स्यात्तथा मुहुर्वारंवारं प्रणेमुः प्रणमन्ति स ॥ ३७॥ प्रणीय जानुसंमितां चितिं प्रसूनपाततः। विभूषितां वसुन्धरां व्यधुश्च केपि योजनम् ॥ ३८ ॥ १२ च पुनः केऽपि सुराः प्रसूनानां पुष्पाणां पातनं पातो वर्षण तस्मात् जानुसंमितां जानुप्रमाणां चितिं चयं पुप्पपुञ्ज प्रणीय कृत्वा : योजन योजनप्रमाणां वसुंधरां समवसरणपृथ्वी विभूषितां शोभितां १५ व्यधुः कुर्वन्ति स्म ॥ ३८॥ महस्यमुत्र केचन ससुन्दरीभिरर्थिताः । प्रसादनाय चापरे समतुरेव नाफिनः॥ ३९ ॥. स्वमित्रनोदिताः परेऽपरे खकीयभक्तितः। कुतूहलेन केशपिच प्रमोदमाप्य चाययुः॥४०॥-युग्मम् :- अमुत्र अमुस्मिन् महसि उत्सवे केचन नाकिनः केचिदेवाः वसुन्दरीमिर्निजदेवाअनामिर्थिताः प्रार्थिताः सन्तः आययुः भाग-२२ १८

श्रीगौतमीयकाव्यं
३
६
९
च्छन्ति स्म । च पुनरपरेऽन्ये केचिद्देवाः समतुः खसांमिनः एव
प्रसादनाय प्रसन्नताकरणाय आययुः ।। ३९ ॥
परेऽन्ये केचिद्देवाः खमित्रनोंदिताः प्रेरिताः सन्तस्तत्राययुः ।।
तथाऽपरे केचिद्देवाः खकीयभक्तितस्तत्राययुः । च पुनः केऽपि देवाः,
कुतूहलेन कौतुकेन प्रमोदं हर्षमाप्य प्राप्य तत्राऽऽययुः ॥ १० ॥
ततः किं जातमित्याह--
इत्थं महोत्सवमयीय महोज्ज्वलामा
देवागमेन दिवसादपि दीप्यमाना।
श्रीवर्द्धमानजिनराजविहारपूता
राज्यं प्रदाय दिवसाय निशा पपार ।। ४१ ।।
इत्यममुना प्रकारेण महोत्सवः स्वरूपमस्या इति महोत्सवमयी
१२ इव महोत्सवभूतेष पुनर्देवानामागम आगमनं तेन महोज्वलाऽत्यु-
ज्ज्वला आभा प्रमा यस्याः सा तथोक्ताऽत एवं दिवसादपि "दीप्यते
इति दीप्यमाना तथा श्रीवर्द्धमानजिनराजस्य वीरपरमेश्वरस्य विहारण
१५पूता पवित्रा एवंभूता निशा रात्रिदिवसाय राज्यं प्रदाय दत्वा खयं
पपार परिपूर्णतां प्राप्ता । एतेन निशा व्यतीता, दिवसच उदित इति
भावः । पपारेति । '१ पालनपूरणयोः' अस्माकर्तरि लिट् ॥४१॥
इदं वसन्ततिलकावृत्तं । तलक्षणं च -'उक्ता वसन्ततिलका
.भजा बगौ गः' इति ॥
इति भगवदागमनवर्णनो नाम तृतीयः सर्गः ॥३॥
इति स्पष्टम् ॥
इति श्रीगौतमीयप्रयन्ययाध्याने गौतमीयप्रकाशाभिधाने
उतीयः सर्गः ॥३॥

३ गौतमीयप्रकाशायटीकया सहितम् । चतुर्थः सर्गः। अथोदियायास्परोचिपारुणः सरोजपण्टानि करविकासयन् । दिवस्पृथिव्यावपि रोधमिश्रिते- स्तथानुलिम्पनिय यावकद्रवैः॥१॥ यदीयसंसर्गविवर्जितः पुरा द्विजेन्द्रभूतिः श्रुतपारगोऽपि सन् । ६ चकार वालोचितयाक्षिकमियां स बर्द्धमानः प्रतिमांपुनातु मे ॥१॥ अथानन्तरं आरुणरोचिपा रक्तदीप्या उपलक्षितः पुनः करैः स्खकिरणः सरोजपण्डानि कमलवनानि विकासयन् विकस्वराणि ९ कुर्वन् अरुणः सूर्यः उदियाय उदयं प्राप्तवान् । किं कुर्वनिव ? । रोप्रेण वृक्षविशेपचूर्णेन मिश्रितैर्मिलितैर्यावकद्रवैरलतककदमैर्दिव- स्पृथिव्यावपि आकाशपृथिव्यावपि, तथा तेन प्रकारेण अनुलिम्प-१ निव लि कुर्वन्निव । आखां ग्रामनगरदिप्रदेश इति अपि- शब्दार्थः । उद्गच्छत् सूर्यदीमितुल्यतानिप्पादनार्थ रोप्रमिश्रिवैरिति विशेषणम् । उदियायेति । उत्पूर्वादिण् धातोः करि लिन । दिन- स्पृथिव्याविति । द्योश्च पृथिवी चेति विग्रहः । 'दिवसश्च पृषि- म्याम् (६।३।३०) इति दिवशन्दस : दिवसादेशः। अत्र, सगे प्रायो वंशस्वच्छंदः, तल्लक्षणं च- 'जतो तु वंशसमुदीरितं जरी' १८ इति ॥१॥ गजेन्द्रगत्या च ततत्रिकालवित् सरन्नवस्वर्णसरोजपतिषु । दयत्नमाम्भोजयुगं यथाक्रमं चचार चैत्यद्रुमसमुखं प्रभुः॥२॥२॥ : ततः सूर्योदयानन्तरं त्रिकालवित्-समुत्पन्न केवलालोकेन त्रिकालवेता, प्रमुरिपरमेश्वरः सरन्ति चलन्ति नवनवसद्ध्यानि यानि स्वर्णसरोजानि २३ ,

श्रीगोतमीयकाव्यं :
वर्णकमलानि तेषां पतिपुरणिपु क्रममनतिक्रम्येति यथाक्रम क्रमेण
द्वयोर्द्वयोः वर्णपद्मयोरित्यर्थः । क्रमाम्मोजयोश्चरणकमलयोर्युगं युगलं
३ दधत् धारयत् गजेन्द्रगत्या गजराजसदृशगत्या चैत्यगुमस्य समवसरण-
मध्यस्थाशोकवृक्षस्य संमुखं. चचार सञ्चरति म । चः पादपूरणे ।
दधदिति । 'नाभ्यस्ताच्छतुः' (७११७८) इति न नुम् । चैत्येति ।
६ चैत्यं जिनौकस्तविम्ब चैत्यो जिनसभातरु रित्यनेकार्थः । ननु खर्ण.
पद्मयोः पदस्थापनं तु प्राक्तने सगें उक्तमेवासीत्पुनरत्र तदुक्तिः कथमिति'
चेदुच्यते-पूर्व संक्षेपत उक्तम् , अत्र किंचिद्विस्तर इति न दोपः॥२॥
९ अचेलतां विश्रदपि प्रभामरैरुदारवासोभिरिवोपशोभितः ।
विनाप्यलङ्कारभरावधारणं विभूपणाढ्यस्य रमामियोद्वहन् ॥३॥
सितातपत्रत्रितयाघरे चरन् विलोलवालव्यजनामिवीजितः।
२२ समुत्थविष्वग्जयशब्दसूचितः समागमद्रनचतुष्किकामिनः ४
मगवान् अचेलतां निर्वस्त्रतां विनदपि धारयन्नपि प्रभामरैः
सदेहदीधिसमूहै: उदारवासोभिः प्रधानवस्वैरिव उपशोमितः पुनर-
१५ लंकारमरस्य विभूषणसमूहस्यावधारणं देहे स्थापन विनापि विभूषणे-
रादयस्य समृद्धस्य रमां लक्ष्मी उद्वहन्निव धारयन्निव ॥ ३ ॥
एवंविध ईनः श्रीवीरस्वामी सितं श्वेतं यदातपत्रत्रितयं छत्रत्रय
१८ तस्याऽपरेऽधःप्रदेशे चरन् चलन् पुनर्विलोलानि चपलानि यानि
वालव्यजनानि चामराणि तैरमिवीजितः समन्ताद्वीजिवः सन् तथा
समुत्यो देवमुखात्समुत्पन्नो विष्वक् समन्ताद्यो जयशब्दखेन सूचिटो
२१ज्ञापितः सन् रलचतुप्किकां तृतीयवप्रमध्यसमणिवेदिकां समागम
आगच्छति स । विष्वगिति । 'परितः सर्वतो विष्वक् समन्ताच
२३ समन्वन' इति हेगः ॥४॥

७९ गोवनीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । इमां समांख्य मुसमुस्थरो : दिशस्तु प्राच्याः प्रविवेश वोरणम् । ततः परिक्रम्य हरेदिंगासने 'नमोऽस्तु तीर्थाय वदन्नुपाविशन् ॥५॥ तु इति विशेषे, मुराऽसुराणामीश्वरो भगवान् वीर इमां मणि- 'पीठिका समास्य प्राच्या पूर्वस्या दिशम्तोरणं प्रविवेश ततः परि- क्रम्य चैत्यदुनन्य प्रदक्षिणां विधाय 'तीर्याय नमोऽस्तु' इति वदन् जल्पन् हरेरिन्द्रस्य दिक् पूर्वा तस्यां यदासनं सिंहासनं तलिन् उपा- विशत् उपविशति ल । तीर्थशब्देनात्र सङ्घ उच्यते । प्राच्या इति । 'पूर्वा प्राची दक्षिणाऽपाची'ति हैमः । मत्र प्राक्षरे परे पूर्व- हस्वस्व गुरुत्वाच्छन्दोमट्टो न शङ्ख्यः, छन्दःशास्त्रे हपशब्दयोः परयोः पूर्वहवस विमापया गुरुतामिघानात् ।। ५॥ १२ असह्यतेजो न विपनवे पर- रतोऽस लोकः मुलमं न दर्शनम् । . इति प्रमायानिमिपैः प्रमोमहो- ऽपवर्त्य मामण्डलमेकतः कृतम् ॥ ६॥ न्यधीयतास्यैव बराङ्गपृष्टत- स्ततोच नाथः प्रतिबिम्बपावतः। समस्तकाष्टायपि संमुखं स्थितः समस्तसिंहासनगोऽप्यलक्ष्यत ॥ ७॥-युग्मन् । १ तथा च छन्दःकौस्तुमे- "मनुस्वारी विसगी व दीपों युकारतया। वों गुरुमती है ये पादान्त चापि वा स्युः" । :

८० श्रीगोचमीयकाव्य अस भगवतोऽसह्यतेजोऽन्येषां सोडुमशक्यं तेजोऽपरैलोकैर्न विपाते न विशेषेण सह्यतेऽतोऽस्य दर्शन लोकैन सुलभ न सुमा, ३ दुर्लभं भविष्यतीत्यर्थः । इति प्रमाय इति झालाऽनिमिपैर्देवैः प्रमो- महस्तेजोऽपवयं सां विहाय असह्यं गृहीत्वा भामण्डलं प्रभाचक्र एकतः कृतं एकत्रीकृतमित्यर्थः॥६॥ ६ तद्भामण्डलमस्यैव भगवतो यद्वराङ्ग मस्तकं तस्य पृष्ठतः पृष्ठदेशे न्यघीयत स्थाप्यते स । अनानिमिपैरिति कर्तृपदमुक्कमेव, ततस्त. स्पृष्ठस्थापनानन्तरं अत्र भामण्डले प्रतिविम्वपाततः संमूलदेहस्य ९प्रतिविम्यपतनात् नाथः श्रीवीरपरमेश्वरः समस्तकाष्ठासु सर्वदिक्षु अपि संमुखं स्थितस्तथा समस्खसिंहासनगः सर्वसिंहासनस्सोऽपि अलक्ष्यत दृश्यते स । लोकैरिति शेषः । यस्तु अन शेषदिक्त्रये भामण्डले २२ एष प्रतिविम्बसङ्कम उक्तो न तु पृथरमूर्तित्रयं तन्मतान्तराभिवं ज्ञेयम् । वृहतत्पादौ तु-'तिदिसि पडिस्चयाय देवकया-'(उद्दे०१ भाष्य गा० ११८३) इत्यादिवचनात् शेषदिनु देवकृतं भगवतुल्यरूपं १५पृथग् मत्रियमुक्तमस्तीति । लोकैरिति । 'न लोकाव्यय- (राश६९) इत्यादिना न पष्ठी । पराशति । 'वरा करणत्राणं शीय मतकमित्यपीति हेमः । काठेति । 'काष्टाऽऽशादिग्रहरिक- १० कुरिति हेमः ॥७॥ तदा निनेदुर्दिवि तूर्यकोटयो जयध्वनिय प्रससार सर्वतः । इवामिपित्तो जगदीशवापदेऽधुनैव देवरसमित्यऽदृश्यत ॥८॥ सदा तलिमयसरे दिवि आकाशे सूर्याणी वेणुवीणामृदनादीनां कोटयो निनेनिनादं कुर्वन्ति स । च पुनः सर्वतः सर्वदिशु जय- पनिर्जयजपशब्दः प्रसार पसरति सा! ततश्च देवरऽयं भगवान् २१ गौवमीयप्रकाशाख्यटीकयां सहितम् । नैव इंदानीमेव जगदीशतापदे त्रैलोक्यप्रमुतापदेऽमिपिक्त इव कृताऽभिषेक इव इति अदृश्यत, लोकैरिति शेपः । दशेः कर्मणि लझ॥८॥ अथ यज्जातं तदाह--- द्विजाश्रयोवाऽवसरे तु गुर्वरामिघोऽमवत्संवसथस्तदन्तिक । इहावसद्गोतमगोत्रमास्करो द्विजातिरिन्द्रादिमभूतिराख्यया॥९॥ 'तु' इति विशेषे, अत्राऽसिन्नवसरे वदन्तिके तस्स समवसरणस्य समीपे द्विजानां ब्राह्मणानामाऽऽश्रयो द्विजाश्रयः गुर्वरः अमिया यस्य स गुर्वरामियो गुर्वरनामकः संवसथो ग्रामोऽभवत् । इहाऽस्मिन् गुर्वर-९ प्रामे गोतमगोत्रे भास्करः सूर्यतुल्यः आख्यया नाना इन्द्रादिमभूतिः इन्दमतिनामेत्यर्थः, द्विजातिवांझणोऽवसत् । अमिघ इति । अथाऽs. हयोऽमिधा, गोत्रसंज्ञानामधेयाऽऽल्याऽऽहाऽमिल्याश्च, नाम चेति १२ हैमः । इन्द्रादिमेति । आदौ मव आदिमः, इन्द्र आदिमो यस्य भूतिशब्दस्य इत्यादिविग्रहः ॥ ९॥ अथ गौतमवर्णनमाह- शरनिशानायकरोत्करोडवलं यशो यदीयं विललास भूतले । अवाप पृथ्वीवमुभूतितस्तु यो जनि नूरनं स कथं मवेन हि ॥१०॥ शरदः शरत्कालस्य यो निशानाथश्चन्द्रसस्त कराणां किरणा- नामुत्करः समूहः शरन्निशानाथकरोत्करतद्वदुज्वलं निर्मलं यदीय यो भूतले विललास विलसति स, खेच्छया. संचचारेत्यर्थः । तु २२ ६गौ.का. १५ :

६ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । समुच्चयो देवीसमूहः खलक्षणैस्तथाविधोत्कृष्टशोमालज्जादिचिहैरत्रेन्द्र- भूतावेव एकसिन्नाऽऽश्रये समैक्ष्यतं दृश्यते स । एतावता निरुपम श्रीहीधीकीयोऽस्यासन्निति भावः ॥ १२ ॥ अथास्य पडझ्यादिचतुर्दश विद्यानिपुणत्वमाह- अधीतपूर्वा खलु सर्वसत्कलाः स्मृता इवासनिह यस्य जन्मनि । तदस्थ शिक्षाथुतपाठको गुरुय॑जी- गणत्वस्य गुरुत्वगौणताम् ॥ १३ ॥ खलुर्यदर्थे, यतो यस्येन्द्रभूतेरिह जन्मनि सर्वाश्च ताः सत्कलाश्च ५ सर्वसत्कलाः ? पूर्वमधीता अघीतपूर्वाः भवाऽभ्यस्ताः स्मृता इव स्मरण- विषयीकृता इव आसन् अभवन् । अप्रयासेनैव सर्वाः कलाः समी- युरित्यर्थः । तचमात्कारणात् अस्येन्द्रमतेः शिक्षाश्रुतस्य अकारादि-१९ वर्णविवेचकशिक्षाशास्त्रस्य पाठकोऽध्यापको गुरुः खस्य यद्गुरुत्वं गुरुमावस्तस्स गौणतामप्रधानत्वमजीगणत् गणयति स । खस्य पाठजन्यस्य क्लेशस्याप्यऽभवनात् खतोऽप्यधिकतरविद्याप्रादुर्भावाचेति १५ भावः । अधीतेत्यादि । 'भूतपूर्वे चरद' (५।३५३) इति निर्देशादत्रापि अघीतशब्दस्य पूर्वनिपातः । व्यजीग़णदिति । चुरादिणिजन्ताद्गणसक्ष्यानेऽस्माकर्तरि लुङ् ।'ई च गणः' (७४।१८ ९७) इति अभ्यासस्य पक्षे ईत् ॥ १३ ॥ श्रुतेषु यत् सत्रितमायकोविदः सदौचितं नीतिविचारचेष्टितम् । : तथैव कल्पोऽस भवन् स्वभावत- थकार कल्पाऽऽगममात्मसाक्षिणम् ॥१४॥ २६ श्रीगीतमीयकाव्य ६ ९ पुनर्यः इन्द्रभूतिः पृथ्वीवसुमतितः पृथ्वीवसुभूतिनामभ्यां माता- पितृभ्यां जानिमुत्पत्ति अवाप प्राप्तवान् स नरलं, मनुष्येपु रततुल्यः ३ कथं न हि मवेत् ? भवेदेवेत्यर्थः । जनिमिति । 'जननं जनिरुद्भव' इति हैमः ॥ १०॥ सुलक्षणं सर्वमपि स्वभावतः शरीरमेतस्य गुणानुवाच यत् । सुहृत्यानीक्षितलक्षणान्यपि व्यमावयन्नस्य गुणास्तदुज्वलाः ॥११॥ एतस्स इन्द्रमतेः शरीरं यद्यसाकारणाद्गुणान् गाम्भीर्यादार्यादीन् , नुहतया मित्रतया इन्द्रमतेः सर्वमपि वस्तु समावतः मुलक्षणं शोभेनलक्षणयुक्तं उवाच कथयति स्म, ततस्मात्कारणात् उज्ज्वला गुणा. १२ अस्येन्द्रमूतेः अनीक्षितानि अदृष्टानि लक्षणान्यपि व्यमायन् प्रादु- रकुर्वन् प्रकटीकुर्वन्ति सेति यावत् , एतावताऽस्य शरीरेण ज्ञापि. वानि मुलक्षणानि गुणाः प्रादुश्चरिति भावः । व्यभावयन्निति । १५ विपूर्वादेवमण्णिजन्ताधातोः करि लङ ॥ ११.॥ पृथक्पृथग्ववराचलाश्रयाः श्रुते श्रुताः श्रीप्रमुखास्तु देवताः। समैक्ष्यताऽव सुरीसमुचयः स्खलक्षणरेप तु तत्त्वदर्शिमिः ॥ १२ ॥ भुते सिद्धान्ते तु श्रीममुखाः श्रीदीपीकीर्तिसज्ञिका देवताः २६ पृथक् पृथक् मिनो मिन्नो वर्षघराचलो हिमवदादिवर्षधरः पर्वत आथयो निवाससानं यासा ता एवंविधाः श्रुताः • संतीति शेषः, २३'तु' इति विशेष, तत्त्वदर्शिमितत्त्वज्ञानिभिरेप श्रीहीनमुखाः मुरी- - गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । समुच्चयो देवीसमूहः खलक्षणैस्तथाविधोत्कृष्टशोमालज्जादिचिहरवेन्द्र- मूतावेव एकस्मिन्नाऽऽश्रये समैक्ष्यत दृश्यते स्म । एतावता निरुपम- श्रीहीधीकीयोऽस्यासन्निति भावः ॥ १२ ॥ अथास्य पडझ्यादिचतुर्दशविद्यानिपुणत्वमाह- अधीतपूर्वा खलु सर्वसस्कलाः स्मृता इवासनिह यस्य जन्मनि । तदस्य शिक्षाश्रुतपाठको गुरुय॑जी- गणत्वस्य गुरुत्वगौणताम् ॥ १३ ।। खलुर्यदथें, यतो यस्येन्द्रभूतेरिह जन्मनि सर्वाश्च ताः सत्कलाश्च ६ सर्वसत्कलाः ! पूर्वमघीता अधीतपूर्वाः मवाऽभ्यस्ताः स्मृता इव मरण- विषयीकृता इव बासन् अभवन् । अप्रयासेनैव सर्वाः कलाः समी- युरित्यर्थः । तवसात्कारणात् अस्येन्द्रमूतेः शिक्षाश्रुतस्स अकारादि-१२ वर्णविवेचकशिक्षाशास्त्रस्य पाठकोऽध्यापको गुरुः स्वस्य यद्गुरुत्वं गुरुमावस्तस्य गौगतामप्रघानत्तमजीगणत् गणयति स । खस्स पाठजन्यस्य क्लेशस्याप्यऽभवनात् खतोऽप्यधिकतरविद्याप्रादुर्भावाचेति १५ भावः । अपीतेत्यादि । 'भूतपूर्व चर' (५।३।५३) इति निर्देशादत्रापि अधीतशब्दस्य पूर्वनिपातः । व्यजीगणदिति । चुरादिणिजन्ताद्गणसद्ध्यानेऽस्मारकर्तरि लछ । ई च गणः' (७/४/१५ ९७) इति अभ्यासस्य पक्षे ईत् ॥ १३ ॥ श्रुतेषु यत् सूत्रितमाघकोविदः सदौचित नीतिविचारवेष्टितम् । तथैव कल्पोऽस भवन खमावत- थकार कल्पागममात्मसाक्षिणम् ॥ १४ ॥ २६ श्रीगोवमीयकाव्यं * . आद्यकोविदैः प्राचीनपण्डितैः श्रुतेषु आचारविचारशास्त्रेषु यत् सदा सर्वस्मिन् काले उचितं योग्यं नीतिविचारस्य न्यायविचारस्य १चेष्टितं कर्म सूत्रितं रचितम्, अस्तीति शेषः । तथैव तेनैव प्रकारेण अस्येन्द्रमतेः कल्प माचारः स्वभावतः समावेन शास्त्राऽऽलोकनमन्तरे- गैवेत्यर्थः । भवन् संपद्यमानः कल्पागममाचारप्रतिपादकशास्त्रमात्मनः स्वस्य साक्षिणं साक्षिमतं चकार । मवनिति । भूधातोर्लेटः शतृ ॥१४॥ पुरासरोऽसौ पदवाक्यवेदिना- मभूच्छिशुत्वेऽपि ललन खलीलया। ततो द्वयोर्पितिसर्पराजयो- स्यं तृतीयो भुवि पूज्यतापदे ।। १५ ।। असौ इन्द्रमतिः शिशुत्वे वालभावेऽपि आस्तां तारुण्ये इति १२ अपिशब्दार्थः । खलीलया वक्रीडया ललन् विलासं कुर्वन् पद- वाक्यवेदिनां पदवाक्यज्ञानमृतां शान्दिकानां पुरःसरोऽप्रेसरोऽभूत् । ततस्तरलात्कारणाव्योीतिसर्पराजयोः स्वर्गपावालस्थयोवृहस्पतिशेप- १५नागयोमध्ये मुवि पृथिव्यां पूज्यतापदे पूज्यत्वस्थाने तृतीयोऽयं गौतमोऽभूदिति क्रियापदं पुनर्योज्यम् यथा खर्गे वृहस्पतिः पाताले च शेषनागतया मर्त्यलोकेऽयं पूज्योऽभूदित्यर्थः । 'पदे त्यादि-पदानि मंटपयदीनि, याक्यानि घटमानयेत्यादीनि सर्वशासानुगतानि तानि विदन्ति उच्छीला इति विग्रहः । वैयाकरणानां गते 'मुधिडन्त पदम्', एकतिर वाक्यम् । नयायिकानां तु 'शक्तं पदं शक्किमदित्यर्थः, पदसमूहो वाक्यम् ललनिति । 'लड विलासे' असायटः शत, डलयोरेकत्वसरणाद्रपसिद्धिः । गीर्पतीति । अहरादीनां २१ पत्यादिविति पाक्षिको रेफः ॥ १५॥ .

२५ R गौतमीयप्रकाशाख्यटीकयां सहितम् । सुनृत्यसङ्गीतकवित्वकर्मणां प्रसाधनी छान्दसकर्मपद्धतिम् । अनन्यगम्यां यदसी तथा न्यवे- द्ययाऽधरोऽभूदपि पिङ्गलोरगः ॥ १६ ॥ यद्यसाकारणात् सुनृत्यं च शोमननाट्यं सङ्गीतं च सम्यग्गानं कवित्वकर्म च कान्यकर्तृत्वादिकविलक्रिया तेषां प्रसाधनी प्रकृष्ट- कारणभूतां पुनर्न अन्यैरेतद्यतिरिक्तैस्वादशी गम्यते ज्ञायते या साऽनन्यगम्या ताम् । छन्दोवर्णमात्रावृत्तशास्त्रमघीयते ये ते छान्दसा- नेपा, कर्म क्रिया प्रस्तारादिरूपा तस्य पद्धतिर्मार्गखा, 'नु' इति : वित, असौ गौतमस्तथा तेन प्रकारेण अवेत् जानाति स । यथा पिकलोरगः छन्दःशास्त्रप्रकाशकः पिकलनागोऽपि अपरोऽभूत् । एतदऽपेक्षया न्यूनोऽमृदित्यर्थः । अवेदिति । 'विद ज्ञाने' अधादि-१ कोऽस्मात्करि लङ् ॥ १६ ॥ रवीन्दुतारामहधिष्ण्यचारतः प्रसाध्य कालत्रिवयं निमिचवित् । समस्त्रलोकस शुमाशुमान्यसौ विवेद किं दैवविदां रहः स्थितम् ॥ १७ ॥ निमित्तं निमितप्रतिपादकं शास्त्रं वेचीति निमिचवित्, असौ १८ गौतमो रविश्व इन्दुश्च वाराश्य महाश्च पिण्यानि च नक्षत्राणि रवी- न्दुतारामहधिष्ण्यानि तेषां चरणं चारतसात् कालत्रयं भूत-भविष्य । द्वमानरू प्रसाध्य साधपिला समखलोकस्य शुमाऽशुमानि निमि- चानि वेद जानाति स । युकोऽयमर्थः-दैवं मातं शुमाऽशुम २२ , 4 ८६ श्रीगौतमीयकाव्यं कर्म विदन्तीति देवविदो ज्योतिपिकास्तेषां किं रहः प्रच्छन्नं स्थितं ! प्रायो न किमपीति भावः ॥१७॥ न लौकिकाऽलौकिकशब्दशक्तयः पदार्थबोधे प्रभवन्ति या विना । निरुक्तयस्ताः श्रुतपारश्वतां शशंसुरस्यैव सुधीसभोदरे ॥ १८ ॥ लोके व्याकरणे भवा लौकिकाः अलौकिकास्तद्विपरीता वेदका (वैदिक्यः) इत्यर्थः । एवंविधा ये शब्दास्तेषां शक्तयः सङ्केता या ५निरुक्तीः विना पदार्थयोधे पदार्थज्ञानजनने न प्रमवन्ति न समर्था भवन्ति ता निरुतयः शब्दव्युत्पतयः सुधियां पण्डितानां समा धीसमा तस्या उदरे मध्येऽस्य गौतमस्यैव श्रुतपारदृश्यतां शास्त्रपारगामित्वं १२ शशंसः कथयामासुः । निरुक्तय इति । 'वर्णागमो वर्णविपर्यय. धे'त्यादिमिर्वचनं निरुक्तिः । श्रुतेत्यादि । श्रुतस्य पारं दृष्टवानिति श्रुतपारहवा । दृशेः कनिम् । तस्य भावस्तचा तां । शशंमुरिति । १५'शंस स्तुती' असाकरि लिद ।। १८ ॥ पपाठ चेदान् यदधीत्य पञ्चधा यथासुरन्यासमुपाङ्गसगिनः । ततोऽयमेवाभ्वरकर्मकारिणामुवाह धौरेयपदं घरातले ॥१९॥ यघलात्कारणात् उपानानि वेदोक्तार्थप्रपञ्चनपराः प्रबन्धास्तेषां :सत्रोऽस्त्येपामिति उपानसन्निनस्तान् उपानसंयुक्तान् वेदान् ऋच प्रमृतीन अघीत्य अभ्यस्य गौतमः मुरन्यासमनतिक्रम्येति यथासुर- सन्यास विनिकाले इन्द्रादिसुरस्यापनानतिक्रमेण पञ्चधा पथभिः प्रकारः पाठ पठति ल । वेदानित्येव कर्मपदमत्रापि योज्यं, तत २ समात्कारणादऽयं गौतम एव घरातले पृथिव्यां अध्वरकमकारिणां १८ ८७ गौतमीयप्रकाशाख्यटीफया सहितम् । यनक्रियाकर्तृणां ब्राह्मणानां मध्ये घौरेयपदं धुरीणतामुवाह धारयति स । पञ्चति । अन्न पञ्चधात्वं यज्ञानां पञ्चविधत्वादऽवसेयम् । यदुक्तममरेण-पाठो १ होम २ श्चातिथीनां सपर्या ३ तर्पण १३ वलिः ५। एते पञ्चमहायज्ञा ब्रह्मयज्ञादिनामका' इति । एपामों हैमकोशाद् ज्ञेयः । अध्वरेति । यज्ञो यागः सवः सत्रमित्यादि । 'वितानं पहिरध्वर' इति हेमः। धौरेयेत्यादि । धुरं वहतीति ६ घौरेयस्तस्य पदं स्थानमिति विग्रहः ॥ १९ ॥ यदृच्छयाऽऽक्षिप्तविधेः प्रमाणता प्रमाणमद्वैतमथास्ति तत्त्वतः । इति श्रुतं श्रोत्रियताप्रकाशकं किमस्य मीमांसकतां न चावदत् ॥ २० ॥ केपाश्चिन्मते यदृच्छा नाम एकः पदार्थोऽस्ति, तन्मते सर्वमपि १२ कार्य यदृच्छयैव जायते । 'यदृच्छा रिता खेच्छे ति कोशात् । यदृच्छा नाम खेच्छा उच्यते । तथा मीमांसकमते कर्मणः प्रामा- ण्यमति, तथा चायमर्थः विधेः कर्मणः प्रमाणता प्रामाण्यं यदृच्छया १५ आक्षिप्त आक्षिप्यते स, गृह्यते मेति यावत् । अथ तत्त्वतः परमार्थ- तस्तु अद्वैतं अद्वैतवाद एव प्रमाणमस्ति इत्याकारकं श्रोत्रियतापका- शकं वेदाध्येतृत्वप्रकाशकं श्रुतं शास्त्रं अस्स गौतमस्य मीमांसकतांक मीमांसाशास्त्रज्ञातृत्वं किं न अवदत् न कथयति स ?, अवददेवे- त्यर्थः । चः पादपूरणे । आक्षिप्तेति । आइपूर्वाक्षिपः कर्मणि लुइ । अद्वैतमिति । द्वयोर्मावो द्विता, द्वितैव द्वैतं । प्रज्ञादित्वादण् । न२० विद्यते द्वैतं यत्र तदिति विग्रहः । एकमेव परं ब्रह्मेत्यादिमतमि- त्यर्थः । अथेति । अथशब्दोऽत्र प्रतिज्ञायां, 'मयो अथ समुच्चये ॥२३ ८८ श्रीगौवमीयकाव्यं ६ मरले संशयास्माऽधिकाराऽनन्तरेषु च । अन्वादेशे प्रतिज्ञायां प्रश्न- साकल्ययोरपि' इत्यनेकार्थात् । श्रोत्रियेति । छन्दो अपीते इति ३श्रोत्रियः, छन्दसः श्रोत्रादेशो धप्रत्ययश्च ॥ २०॥ प्रमाणदृष्टान्तवितर्कलक्षणः स्वपक्षसिद्धिः प्रतिपक्षखण्डनम् । यया प्रवन्येच तया हि विद्यया- ऽसिधारयेवाऽस्य जयो व्यजृम्भत ॥ २१ ॥ प्रमाणानि प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दलक्षणानि, दृष्टान्ताः पर्वतो ९वहिमान् धूमात् महानसपदित्यादयः, वितकों व्याप्यारोपेण व्याप- कारोपः, लक्षणानि व्यत्वजातिमद्गुणवद्वा' द्रव्यमित्यादीनि, तेहेतु. भूतैर्यया विघया खपक्षस्य खगृहीतपक्षस्य सिद्धिनिष्पचिः प्रतन्येत १२ विस्तायेत तथा प्रतिपक्षिगृहीतपक्षस्य खण्डनं प्रतन्येत, वार्किकै- रिति शेषः । हि निश्चितम् । असिघारया खड्गधारयेव तया विध- यास्स गौतमस्य जयो विद्वरसमानेतृत्वं व्यनृम्भत विकसति स, १५प्रवर्तते सोति यावत् । प्रवन्येतेति। प्रपूचिनोतेः कर्मणि लिइ ॥२१॥ स धर्मशास्त्राध्ययनं प्रमापयं- यकार गृहाश्रमधर्मसेवनम् । प्रशंसनीयस्तु स एव यः सदा दधाति वादे करणे च तुल्यताम् ।। २२॥ स गौतमो धर्मशास्त्रस धर्मप्रतिपादकशास्त्रस्य स्मृतेरध्ययनं पठनं ५.प्रमावयन् प्रकाशयन् गृसाथमस गृहस्थाश्रमस्य यो धर्मस्तस्स सेवनं प्रतिपालनं पकार कृतवान् । युकोऽयमर्थः-तु इति विशेष, स एवं पुमान् प्रशंसनीयो लोफे प्रचंगाईः, यः सदा सर्पमिकाले वादे .

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । ८९ कथने करणे क्रियायां च तुल्यतां सादृश्यं दधाति बिमर्नि, कथनानु- रूपा क्रियायां दधातीत्यर्थः । अयं गौतमोऽपि तथाऽभूदिति भावः । धर्मेत्यादि । 'धर्मशास्त्रं स्यात् स्मृतिर्द्धर्मसंहिता' इति हैमः ॥२२॥ आरम्य सर्गात्स रवीन्दुवंशगाः पुराणनिर्बद्धकथाश्चिरन्तनीः। वदन सुधास्सन्दसमानया गिरा बहुश्रुतत्वेन बभूव विश्रुतः ॥ २३ ॥ स गौतमः सुधाया अमृतस्य स्पन्दः प्रस्रवणं तेन समाना तुल्या, तया गिरा वाण्या सर्गात्स्टेरारम्य रवीन्दुवंशगाः सूर्यवंशादिगता-९ चिरन्तनीश्चिरफालोद्भवाः पुराणेपु पुराणशास्त्रेषु निबद्धा प्रथिता याः कथास्ता वदन् कथयन् बहुश्रुतत्वेन बहुश्रुततया विश्रुतो लोके प्रसिद्धो बम्व । सर्गादिति । आरभ्य योगे पञ्चमी 'कार्तिक्याः १२ अमृतीति भाप्यप्रयोगात् प्रभृत्यर्थयोंगे पञ्चमीखीकारात् । खी- त्यादि । रविश्व इन्दुश्च रवीन्दू सूर्याचन्द्रौ तयोवंशो गच्छन्ति प्रामु- वन्तीति विग्रहः । चिरन्तनीरिति । 'सायंचिरं'-(१३३२३).५ इत्यादिना युप्रत्ययस्तुद च । 'टिहाणञ्-'(४।१।१५) इति डीए, अनाथपादे भादौ तगणेन अन्येषु चादी जगणेन इन्द्रवंशावंशस्थयो. लक्षणसंयोगात् । उपजातिछंदः ॥ २३ ।। it एतेन काव्यैकादशकेनास चतुर्दशवियापारीणतमावेयाथ यज्ञ- करणखरूपमाह- अर्थप यद्यप्यजुहोदुताशनं सपाभुजः शश्वदियाज यद्यपि । तयापि समिरचोपहेतुनायवान्छयष्टुं त्रिदिवेच्छयात्मनः।।रारर

श्रीगौतमीयकाव्यं
अति प्रारम्भे एष गौतमो यद्यपि हुताशनं वहि अनुहोत्
हन्यद्रव्यैः प्रीणयति सा । पुनर्यद्यपि शधनिरन्तर सधाभुजो देवान्
३ इयाज पूजयति स्म, तथाऽपि सर्वाऽमरतोपहेतुना सर्वेपाममराणां
देवानां तोपस्य तुष्टेहेतोः आत्मनः खस्य त्रिदिवेच्छया खर्गगमनेच्छया
यष्टुं यज्ञं कर्तुं ववाच्छ वाञ्छति स । अजुहोदिति । 'हु दानादौ'
६ असात्करि लङ्ग । इयाजेति । 'यज देवपूजादौ' अस्मा-
'स्करि लिट् । वाञ्छति । 'वान्छि इच्छायो' करि लिह ।
मात्र यद्यपि गौतमः खग्रामे खयं यष्टुं क्वाञ्छेत्युक्तं, तथापि
९ शास्त्रान्तरे अपापापुर्या सोमिल्बामणेन यज्ञार्थ एकादशब्राह्मणोतमा
"आता इत्युक्तमस्ति ॥ २४ ॥
ततोऽसौ किं कृतवानित्याह-
क्रियाविदोस्तत्सहजन्मनोईयो-
रमुप्य सादृश्यवतोः सतोरपि ।
चां सदाननुमापकान् द्विजान
समाजुहावैप जनैः प्रणोदितैः ॥ २५ ॥
क्रिया याज्ञिकक्रियां वित्तो जानीत इति क्रियाविदों तयोरत एवा.
मुष्य अस्प गौतमस मादृश्यमखि, अनयोरिति सादृश्यवन्तौ क्यों
योखस्स गौतमस सहजन्मनो त्रोः सतोर्विद्यमानयोरपि एप
इन्द्रभूतिः मणोदितः स्वयंप्रेरितैनः सदान् सतां विदुषां पूज्यान
ऋचा वेदशाखानामनुमापकान् द्विजान् प्रामणान् समाजुहाव आका.
२१ रयामास, यज्ञनिमिचमिति शेपः । समाजुहावैति । समाइपूर्वात
म्हेनः करि लिट् । 'अभ्यखस्स च' (१९३३) इति संरसारण;
२५ ततो द्वित्यम् ॥ २५॥

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । समानमावा यशसा च विद्यया सु-वर्ण-संस्थान-बया-सदुक्तिभिः। खतोऽतिरिक्ता दश सूरिसिन्धुरा मिथः प्रणम्याऽऽसत तत्र मण्डये ॥२६॥ यशसा की- च पुनर्विद्यया पडद्यादिकया तथा सुष्टु शोमनो , वर्णः शरीरच्छविः संस्थानं समचतुरस्राख्यं वयो यौवनं सदुक्तयः ६ शोमनवाग्विलासास्वाभिः समानः परस्परं तुल्यो भाव आत्मा विभू- तिर्वी येषां ते तथोक्ता एवं विधाः स्वतः स्वस्मादतिरिक्ता मिन्ना दश- सूरिसिंधुरा द्वौ खलघुनातरौ अष्टौ चान्ये एवं दशसंख्याकाः पण्डि-९ तमुख्या मिथः परस्परं प्रणम्य प्रणामं कृत्वा तत्र तसिन् याज्ञिकाहें मण्डपे आश्रयविशेपे आसत उपविशन्ति स । भावा इति । 'भावोऽभिप्रायवस्तुनोः । स्वमावजन्मसत्तात्मक्रियालीलाविभूतिपु' १२ इत्याद्यनेकार्थः । विमूतिरैश्वर्यम् । सुवर्णेत्यादि-वर्णश्च संस्थान च वयश्च वर्णसंस्थानवयांसि, शोभनानि वर्णसंस्थांनवयांसि च सदुक्तय- चेति द्वन्द्वः । सूरिसिन्धुरा इति । 'मेघाविकोविदविशारदसूरि-१६ दोषज्ञ' इत्यादि हेमः । सिन्धुरशब्दः कुञ्जरपर्यायः । 'स्युरुचरपदे व्याघ्रपुनवर्षमकुञ्जरा' इत्यादिवचनात् प्रशस्यार्थवाचको बोध्यः । आसतेति । 'आसे उपवेशने' अदादिकोऽन्मात्करि लङ्॥२६॥ १८ प्रशस्तकाले दिन-लग्न-म-ग्रहै- र्भुवं विशोध्योचितमृचिकाऽऽचितम् । चतुःप्रवेशं चतुरस्रचत्वरं न्यधापयंस्ते चतुरैर्यथाविधि ॥ २७ ॥ .

९२ श्रीगौतमीयकाव्य ते प्राज्ञब्राह्मणा दिन-लम-भ-ग्रहः दिवस-लम-नक्षत्र-ग्रहः प्रशस्त- काले शोमनवेलायां विधिमनतिक्रम्येति यथाविधि वेदोक्तविध्यनुसारेण ३ चतुरैस्तद्विधिनिपुणैः पुरुपैर्मुवं यज्ञोचितपृथ्वीं विशोध्य तद्गताऽशुद्ध- पुद्गलापनयनेन शुद्धां कारयित्वा उचितमृत्तिकाभिस्तयोग्यशुद्धमृति- काभिराचितं पूरितं पुनश्चत्वारः प्रवेशा प्रवेशमार्गा यसिंतच्चतुःप्रवेशम् ६ एवंविधं चतुरसं चतुष्कोणं चत्वरं संस्कृतपीठं व्यधापयन् कारयन्ति स्म । आचितमिति । 'पूर्णे त्वाचित छन्नपूरिते' इत्यादि हेमः । चतुरस्रेत्यादि । चतस्रोऽसयोऽस्येति विग्रहेऽच्प्रत्ययस्तालव्यश-स्थाने ९दन्त्य-सश्च 'सुप्रातसुश्व (५४११२०) इत्यादिना निपातनात् । 'चत्वरं स्यात् पथां श्लेपे स्थण्डिलाङ्गणयोरपी'त्यनेकार्थः । 'स्थण्डिलं संस्कृता भूमि'रिति तद्वतिः । एवं व्याख्यासुघाख्यायाममरवृत्तावपि ७२ 'द्वे यागार्थ संस्कृतभूमेः' इत्यादिपाठोऽस्ति । क्षीरखामीकृतामरवृ: तिहेमाभिधानचिन्तामणिवृत्त्योस्तु 'असंस्कृता भूमि'रित्युक्तमस्तीति । व्यधापयन्निति । 'विपूर्वाद्वानो हेतुमण्णिजन्ताकर्तरि लङ् ॥२७॥ प्रसाध्य सूत्रै यतो दिशः समा निखाय यूपं मुवि मध्यभागतः । समन्ततोऽस्याप्यमरावतीं पुरी सुचित्रयाश्चकुरखण्डवन्दुलैः ।। २८ ।। सूत्रः सूत्रतन्तुभिर्धवतो ध्रुवतारकात् समा अवका दिशः मसाध्य साधयित्वा मध्यमागतस्तस्य च मध्यमागे मुवि पृथिव्यां यूपं २.यज्ञकीलकं निखाय निक्षि अस्स यज्ञस्तम्मस समन्ततोऽपि चत- मृप्पपि दिक्षु अखण्टवण्डलैरमरावती पुरी इन्दनगरी सुचित्रयाय: चित्रयन्ति स, ते विप्रा इति शेपः । युपमिति । 'यूपः स्थापन- ६५ १८ ३ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् कीलक' इति हैम: । सुचित्रयामिति । 'चित्र चित्रकरणे' आले. ख्यकरणे इत्यर्थः । चुरादिरदन्तोऽयममाणिजन्ताल्लिट्याम् ॥ २८॥ ततस्ते किं कुर्वन्ति सत्याह- कुशासनस्थाः कुशपूतपाणयः श्रुतिप्रयोगे खरचारचारिणः। द्विजातिधुर्याः प्रतिकोष्ठकल्पितान् स्वनामवादेन सुरानतिष्ठिपन् ॥ २९ ॥ कुशासनेषु दर्भमयासनेपु तिष्ठन्तीति कुशासनस्याः, पुनः कुशेन पूताः पवित्राः पाणयो हस्ता येपो ते कुशपूतपाणयः पुनः श्रुति-९ प्रयोगे वेदपाठोचारणे खराणामुदात्तादीनां चारसंचारस्तेन चरन्ति प्रवर्तन्ते तच्छीलाः स्वरचारचारिणः एवंविधास्ते द्विजातिपु ब्राह्म- गेपु धुर्या धुरन्धराः कोष्ठ कोष्ठं प्रतीति प्रतिकोष्ठं कल्पितान् मनसि १२ चिन्तितान् सुरान् इन्द्रादीन् देवान् स्वनामवादेन खखनामोचारणेन अतिष्ठिपन् स्थापयन्ति स्म । अतिष्ठिपनिति । हेतुमण्णिजन्तास्था- धातोः करि लुङ् ॥ २९ ॥ ततः सदौवारिकदेवमण्डलं प्रदीप-धूपादिसपर्ययायॆया। गृहाण पूजामिति पाठतत्परा- त्रिधाविशुक्ष्या क्रमतोऽमुमार्चिचन् ॥ ३० ॥ - ततः सुरस्थापनानन्तरं भो भो इन्द्रादिदेव! इह महोत्सवे आगच्छ पूजां गृहाण इत्याकारको यः पाठ उच्चारणं तत्र तत्परास्ते ब्राह्मणा; त्रिधाविशुद्या मनोवाफायशुद्ध्याऽमुं पुरः स्थापितं दौवारिकैः प्रती-२२ श्रीगौतमीयकाव्यं ६ ९ हारतया सापितैर्देवैः सह वर्चमानं देवमण्डलं शादिसुरसमूह क्रमतोऽनुक्रमेण आर्यया शोमनखरूपया प्रदीपधूपादिसपर्यया दीप- ३धूपादिपूजया आर्चिचन् अर्चयन्ति स । सपर्ययेति । 'पूजाणा सपर्याऽचेति हेमः ॥ ३०॥ अथाऽरणेमन्यसमुत्थपावकं प्रणीतमृपाठसखैरिपेत्विकैः। निनाय कुण्डं विधिवत् प्रकल्पितं हुताशदिश्येव स देवयाजकः ॥३१॥ अथाऽनन्तरं स देवयानको हविर्दानादिना देवपूजकोऽमिभूत्यादिः ऋषपाठस्य वेदशासापाठस्य सखायः सहाया ऋपाठसखाः मन्त्र गम्भितवेदशाखापाठयुक्ताक्षरिपेवफैदाध्यायविशेपैः प्रणीतं संस्कृत १२ अरणेररणिकाष्ठस्य मन्येन मथनेन समुत्यं समुत्पन्नं पावकं वर्हि मुख्यं कर्म हुताशस्याऽभिदेवस्य दिग् हुताशदिक् तस्यां भामेय्यां दिशि एव विधिवत् वेदोक्तप्रकारेण प्रकल्पितं रचितं कुण्डं होमकुण्ड ५५ निनाय प्रापयामास, होमकुण्डे स्थापयति स्मेत्यर्थः । णी धातोकि- मकत्वात्कुण्डमित्यन 'अकथितं च (११४५१) इति कर्मसंज्ञा । प्रणीतमिति । 'प्रणीतः संस्कृतोऽनल' इति हेमः । सखैरिति । १६ 'राजाहःसखिभ्यः' इति टम् । इपेत्वकैरिति । 'इपेत्या शब्दोऽस्ति एप्विति इपेत्त्वकाः वेदाऽध्यायविशेषाः 'गोपदादिभ्यो वुन्' (411 ६२) इति मत्वेऽर्थेऽध्येयानुवाफयोः ॥ ३१ ॥ हिरण्यरेवा यधेऽनिलेरितः शमीसमिन्मिथपलाशतर्पणैः। १२ मनोमतादोजनलामतोऽपरं किमुच्यते पुद्गलपोपकारणम् ? ३२ or गौतमीयप्रकाशाख्यंटीकयां सहितम् । ९३ ततों होमकुंण्डयो हिरण्यरेता वहिः अनिलेन वायुना ईरितः प्रेरितः सन् शम्या होमोचिंतवृक्षविशेपस्य समिद्धिरिन्धनेमिश्राणि मिलितानि यानि पलाशस्य किंशुकवृक्षस्य तर्पणानि इन्धनानि तैय-३ वृधे वर्द्धते स । युक्तोऽयमर्थः-मनोमतान्मनोऽभिलपितादोजनस्य लामतः प्राप्तेरपरं अन्यत् पुद्गलानां कार्यादीनां पोपस्य पुष्टेः कारणं किमुच्यते लोके किं कथ्यते !, न किमपीत्यर्थः । आहार एव सर्वेषां ६ पुष्टिकारणमिति भावः । हिरण्यरेता इति । 'वहिहंद्रानुहिरण्य- रेतसाविति हेमः । तर्पणैरिति । 'समिदिन्धनमेषेधमतर्पणैषांसी ति च॥३२॥ अथो हवित्रीमुपसृत्य दम्पती प्रदक्षिणीकृत्य गृहीतविष्टरौ । धृतवती यमुखरिता ऋचोऽनुभाषमाणी प्रयती बभूवतुः॥३३॥ अथो अनन्तरं हवित्री होमकुण्डं उपसृत्य तत्समीपमागत्य तां१२ प्रदक्षिणीकृत्य गृहीतविष्टरमासनं याभ्यां तो पुनघृतं व्रतं यज्ञोचित- नियमो याभ्यां तौ, पुनर्यष्टा याजकस्तस्य मुखेन ईरिताः प्रेरिता या ऋचो वेदशाखास्ता अनुमापमाणौ पश्चात् पठन्ती जाया च पतिश्च १५ दम्पती, सपत्नीक इन्द्रभूतिरित्यर्थः । प्रयतो हविर्दाने तत्परौ वमू- वतुः अमृताम् । हवित्रीमिति । 'हवित्री तु होमकुण्ड मिति हेमः ॥ ३३॥ मुरान् समुद्दिश्य हविर्भुवाऽऽहितं समाहितायर्युवरैरदिती। शुचिमुचा संमुखपाण्युपाचया धनञ्जयं मोजयतः स जम्पती ॥ ३४ ॥ -- ९६ श्रीगोतमीयकाव्यं .1 समाहिताः समाधिमन्तो येऽध्वर्युवरा यजुर्विद्याज्ञिकश्रेष्ठास्सैर- नूदितौ पश्चाजल्पितो जाया च पतिश्च जम्पती स्त्रीभारी सुरान् ३देवान् समुद्दिश्य नामोत्कीर्तनेन समुच्चार्य संमुखेन पाणिना करेण उपाचा गृहीता तया शुचिमुचा निर्मलहोमपात्रेण धुवायां पात्रविशेष आहितं स्थापितं हविहव्यद्रव्यं धनञ्जयं वहि मोजयतः स मोजया- ६ मासतुः । अत्र 'गतिबुद्धि (११४१५२) इत्यादिनाऽणिक नज. यस्य णौ कर्मत्वं । धुवैति । 'ध्रुवा तु सर्वसंज्ञार्थ यस्यामाज्यं निधी- यते' इति हेमः । अध्वयिति । 'यजुर्विदध्वर्युरिति हैमः ॥३॥ गृहीतहन्यो ज्वलनस्तदा मखे दधौ महाज्वाल इतीच गौरवम् । अवाप्तभोगः खलु पूर्वरूपतो दधात्यपूर्वा वररूपसम्पदम् ॥ ३५ ॥ 'होमामिस्तु महाज्वाल' इति कोशात् । होमवहिर्महाज्वाल उच्यते । तत्र कविरुत्प्रेक्षते-तदा तसिन्नवसरे मखे यज्ञे गृहीतं हव्यं १५येन स गृहीतव्यो ज्वलनो वहिर्महत्यो ज्याला यस्य स महाज्वाल इति नामा गौरवं गुरुत्वमिव दधौ धारयति स । युक्तोऽयमर्थः- सलरवधारणेवाप्ताः प्राधा भोगा भोज्यानि येन स अवाप्तमोगो १० जन्तुः पूर्वरूपतः सस्स प्राचानरूपाच अपूर्वा नवीनां वररूपसंपद दधाति सल्ल, धारयत्येवेत्यर्थः ।। ३५ ॥ उपदिदानो हविरुद्धतानलो धगद्धगैत्युत्यिवशन्दसुन्दरः। २१ प्रदक्षिणार्चिदमाधजीजनजनस्य तबाहुतिमप्रवादिनः॥३६॥ 'धावपूर्याम्' इति कासीमुदितपुसकस्थः पारधिन्यः । -- ९ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । तत्र तस्मिन् यजस्थाने हविहातव्यद्रव्यमुपाददानो गृहन् अत एवं धगत् धगदित्येवंरूप उस्थित, उरपन्नो यः शब्दस्तेन सुन्दरो रम्या, पुनः प्रदक्षिणां अचिंपो ज्वाला यस्य स तथोक्त एवंविध उद्धतोऽनल । उत्पतितो पहिः आशु शीघं माहुतिमवादिनो जनस्स होममन- पाठकलोकस्य मुदं प्रीतिमजीजनत् उत्पादयति स । धगद्धगेतीति । धगदित्यऽव्यक्तानुकरणशब्दम्तस्य 'हाचि बहुलम्' (पा०) इति पहु-१ लवचनाद्वित्वं न 'ग्रेडितस्य' (दा२।९५) इत्यादिनाऽन्यतकारस्य इति- शब्दे परे पररूपं, तत 'आद्गुणः' (६।१।८७) मुदमिति । 'मुनीत्याऽऽमोदसंमदा' इति हेमः ॥ ३६ ॥ मुहः मुरोद्देश्यकद्दव्यपाततः समुत्थधूमो गगनं समासजन् । मुपर्वणां तत्क्षणहूतिहेतवे प्रणोदितोऽचर्यमिरादरादिय ।। ३७॥ सुरा देया उद्देश्या उद्देयु योग्या यस्मिन्स सुरोद्देश्यकः, स चासो १२ हव्यस्य पतनं हव्यपातश्चेति कर्मधारयस्तस्मात् मुहुवरियारं मुरो- द्देश्यकहव्यपातात् समुत्यघम उत्पन्नथमोऽध्ययुभिर्यनकमिरादराहतु- मानतः सुपर्वणां देवानां तत्क्षणं तत्कालं इतेराकारणस्य हेतवे १५ निमिणय प्रणोदितः प्रेरित इव गगनमाकाशं समासजत् आलिहति ल। 'प्या परिप्यने अम्मारकर्तरि लसा 'दंगसञ्ज-(६४R५) इति नलोपः ॥ ३० ॥ इत्यं ज्योतिष्टोमयानं विनन्यन् खर्गावास्यायिन्द्रभृतिविधिनः। आगच्छन्ति सर्गमार्गात्सवेग द्रजसोध्यं देवयानान्यपश्यन् ॥ ३८॥ - प श्रीगौतमीयकाव्य इस्थमुक्तप्रकारेण वर्गस्यावासो प्रात्यै 'ज्योतियोमनामकं यज्ञ वितन्वन् विस्तारयन् , कुर्वनिति यावत् । विधि जानातीति विधिज्ञ ६इन्द्रभूतिः द्रङ्गसोय नगरस्योपरि खर्गमार्गात्सवेगं सत्वरं आगच्छन्ति आगमनक्रियां कुर्वाणानि देवयानानि देवविमानानि अपश्यत् पश्य- तिस । द्रङ्गस्येति । 'नगरी पूः पुरी द्रङ्ग' इति हैमः । इदं शालिनी- ६ छन्दस्खल्लक्षणं तु 'शालिन्युक्ता म्रो तगौ गोऽघिलोकैरिति ॥ ३८ ॥ इति यज्ञवर्णनो नाम चतुर्थः सर्गः॥४॥ इति स्पष्टम् ॥ इति भोगौतमीयमकाशाश्यायां श्रीगौतमीयमहाकाव्यव्याख्या चतुर्यः सर्गः ॥४॥ ९ पञ्चमः सर्गः। १२ आकसिको व्योमनि दिव्यनादो विचित्रवादिवनिनादरम्यः । शब्दायमानानपि यायजूकानू_वलोकप्रयतांश्चकार ॥१॥ विहाय य भुपि यस्य सेयना कृते समेतान प्रापिलोक्य निर्जरान् । १५थीगीतमो हर्षविपादभागभूत् स पर्वमानः प्रतिभा पुनातु मे ॥१॥ विचित्राणि नानाविधानि यानि पादिनाणि तेपां निनादः शब्द. स्खेन रम्यो मनोज्ञः अकस्माद्भव भाकस्मिको व्योमन्याऽकाशे दिव्य- १८ नादो देयवृन्दकोलाहलननितो दिव्यध्वनिः, शब्दायमानान् वेद ध्यनिस्सं शब्दं कुर्वाणानपि यायकान् यज्ञकर्तृप्रामणान् ऊर्जा- यलोके उचविलोकने प्रयतास्तत्परान् चकार कृतवान् । शब्दे सत्यादि । शब्दं कुर्वन्तीति विग्रहे शब्दरफलाह- (१९१७) । गीतमीयप्रकाशाख्यंटीकया सहितम् । इत्यादिना क्या, ततः शानच् । यायजूंकानिति । 'इज्याशीलो यायजूक' इति हेमः । अस्मिन् सर्गे इन्द्रवज्रोपेन्द्रवनोपजातिछन्दांसि, तल्लक्षणानि च प्रथमसर्गे एवोक्तानि ॥१॥ नमस्तलं पुष्कलमप्यमुष्माद् ग्रामादपापानगरी च यावत् । सम्बाधमैक्षिष्ट महाविमानवित्रीयमाणोज समस्तलोक ॥२॥ अत्रास्मिन्नवसरे चित्रीयमाणः आश्चर्य प्रामुवन् समस्तलोकः ६ पुष्कलं प्रचुरमपि नभस्तलमाकाशममुष्मादस्माद् गुर्वराभिधानाहामात् अपापानगरी यावत् । महाविमानैः सम्बाघ सकीर्ण ऐक्षिष्ट दृष्टवान् । पुष्कलमिति । 'प्राज्यं प्रभूतं प्रचुरं बहुलं बहु पुष्कल' मिति हैमः।९ चः पादपूरणे । सम्बाघमिति । 'सम्बाधः सटे योना वित्यने- कार्थः । सङ्कटं सङ्कीर्ण चित्रीयमाण इति चित्रं करोति चित्रीयते, विसयते इत्यर्थः । 'नमोवरिवश्चित्रङः क्य' (३।१।१९) अंत्र १२ क्यम् विधानमीत्वार्थ, डित्करणं तु तर्थ, ततः शानम् ॥ २ ॥ उदीयमुत्प्रेपितचिचनेत्राः सविसयाः संस्तरकारलोकाः। हविः सुचोपात्तमपि प्रदातुं हविर्भुजे न प्रभवो बभूवुः ॥ ३॥ १५ तदा तत् ऊर्ध्वा ग्रीवा यत्र तद् उद्दीवं यथा स्यात्तथा क्रियाविशे- पणमिदम् । उप्रेपितानि ऊर्ध्वं प्रहितानि 'चित्तनेत्राणि मनोनयनानि यैस्ते तथोक्ताः, यतः सह विस्मयेन आश्चर्येण वर्तन्ते इति सविसयाः, १८ एवंविधाः संस्तरकारलोका यज्ञकारकजनाः सुचा यज्ञपात्रेण उपावं 2- हीतमपि हविर्हन्यद्रव्यं हविर्भुजे वइये प्रदातुं प्रभवः समर्था न बभूवुः । संस्तरेत्यादि । 'संस्बरः सप्तवन्तुश्च वितानं वर्हिरम्वर' इति हैमः । संस्खरं कुर्वन्तीति संखरकाराः । कर्मण्यम्, ततः कर्मधारयः ॥ ३॥ २२ चितानि च नेत्रानि च चित्तनेत्राणि, यदा चिसयुपनि नेत्राणीति समासः।

१०० श्रीगौतमीयकान्यं सदैक एवोदयमेति सूर्यः श्रुतौ श्रुता या घधिका दशैव । आ! कोटिशोहर्पतयः कुतोऽमी संशेरते सेति जनास्तदानीम् ॥ ४॥ खदानों तस्मिन्नवसरे जना लोका इति संशेरते स इति संशय ६ दधुः । इतीति किं तदाह-सदा निरन्तरं एक एव सूर्य उदयमेति प्रामोति, वा अथवा श्रुतौ शास्त्रे द्वाभ्यामधिका घधिका दश द्वादशैव सूर्याः श्रुताः, सन्तीति शेपः । आ इति आश्चर्ये, 'अमी साक्षाद्वि- ९लोक्यमानाः कोटिशोऽहमतयः सूर्याः कुतः समेताः ?' इति संदेह दधुरित्यर्थः । कोटिश इति वीप्सायां शस् । संशेरते इति । संपूर्वात् शीङः करि लट् ॥ १ ॥ नित्याऽन्तरिक्षभ्रमिसेदसिन्नं ज्योतिष्कचकं भुवमापतेत् किम् ।। इत्यं मुहुः संशयशैलशृङ्गारोहा- वरोहे जनताऽऽकुलाऽभूत् ।। ५॥ 'नित्यं निरन्तरमन्तरिक्षे आकाशे या प्रमिभ्रमणं तया उत्पन्नो यः खेदस्तेन खिन्नं ज्योतिप्कचक्र ज्योतिर्मण्डलं किं मुवं पृथ्वीमापतेत् ।।. १८इत्यं जनता जनसमूहो मुहुर्वारंवार संशय एव शैल पर्वतशिखरं तत्र आरोहाऽवरोहे आरोहणाऽवतरणे आकुलाऽभूत् । आरोहेत्यादि । पूर्वमारोहः पश्चादवरोह आरोहावरोहः । 'पूर्वकालैकसर्वजरल्-' २०(२२१॥३९) इत्यादिना समासः ॥ ५ ॥ . .

३ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १०१ THEE दृश्येत गन्धर्वपुरं फिमत्रो त्पातस्त्ररूपं श्रुतविश्रुतं वा। एवं वितर्के बहुभिर्नृलोकः स्वास्थ्य न लेभेद्भुतमीतियोगात् ॥६॥ अत्र किं गन्धर्वपुरं व्यन्तरनगरं दृश्येत ! वा अथवा श्रुते सिद्धान्ते विश्रुतं प्रसिद्ध किमेतदुत्पातलरूपं दृश्येत । एवममुना प्रकारेण अद्भु-१ वभीतियोगात् आश्चर्यसंयोगाहदुभिर्वितरिकपर्नुलोको मनुष्यलोका सास्थ्यं ससचिचतां न लेमे न प्राप्तवान् । अद्भुतेत्यादि । 'विल- यचित्रमद्भुत'मिति हेमः । अद्भुतं च भीतिश्चाद्धतभीती तयोर्योंगर इति समासः॥६॥ इत्थं तथाऽस्वास्थ्यपथावतीर्णा जनानवादीद्गुरुरिन्द्रभूतिः। तोरनालोच्य महाप्रभार- महो ! मुघा तर्कयताऽनृतं किम् ? ॥ ७ ॥ तथा तेन प्रकारेण अवास्थ्यपथमस्थिरचिचतामार्गम् अवतीर्णान् :५ प्रविष्टान् जनान् इन्द्रन्तिर्गुरुरित्यमवादीत् एवमुक्तवान् । इत्यं कथ- मित्यत आह-'महो लोकाः । तोर्यज्ञस महाप्रमावमनालोच्य अवि- चार्य मुधा यथाऽनृतमसत्यं किं तर्कयत !' यूयमिति कर्तृपदं क्रियामि-16 संपन्यार्थ प्रायम् ॥ ७ ॥ वर्हि किमिदनकलात्समायातीत्याशानिरासार्थ गौतम आह- रम्योऽयमुत्तेजितरतमाभिर्विडम्बयञ्छशरासनामाम् । . सहस्रपप्राकृतिरसपीठप्रतिष्टितः स्तम्भसहस्रशोमी ॥८॥२२ "मिनौरपारसन' इति पानीमुनिवपाविन्तः। १२ AALAALA .. ६ १ १०२ श्रीगौतमीयकाव्यं सुजातजालाकलितः समन्तात् पाञ्चालिकाविभ्रमलोभनीयः। चन्द्रोपलद्योतितचन्द्रशाला स्फुरत्पताकैः शिखरैः स्पृशन्खम् ॥ ९॥ प्रफुलसन्ध्यानसमैर्वितान- नच्छदिश्चित्रितचारुभितिः। प्रलम्बहाराञ्चितनागदन्तो मुक्तामणीजाललसद्वलीकः ॥१०॥ मृदङ्ग-वीणा-पणवा-ऽऽरवाढ्य- घण्टानिनादैनिभृतान्तरिक्षः। आयाति नो मत्रनिमत्रितो य. दिवो भुवं देवविमानवारः ॥ ११ ॥ चतुर्भिः कलापकम् । महो लोकाः! यद्यस्मात्कारणात् अयं साक्षादुपलभ्यमानो रम्यो १५ मनोज्ञो नोऽस्माकं मत्रैर्निमत्रितो देवविमानानां वारः समूहो दिवः सर्गाद्भुवं पृथ्वी आयातीत्यन्वयः । अथ विशेषणानि-अयं किं कुर्वन् । उत्तेजितानि शाणादिना उद्दीप्तीकृतानि यानि रत्नानि तेषां १८माः प्रमास्वामिः शक्रशरासनस्य इन्द्रधनुष आमा प्रभां विडम्बयन तिरस्कुर्वन् । पुनः कीदृशोऽयम् । सहस्रपत्रस्य कमलविशेपस्सेवाकृतिरा- कारो येषां तानि एवंविधानि यानि तेषु प्रतिष्ठितः पुनः स्तम्भानां २. सहसः शोमते तच्छीलः खम्मसहस्रशोभी ॥ ८ ॥ तथा सुजाते. देवप्रभावात् मुनिष्पन्नेलिगवाक्षैरासमन्तात् कलितो युक्तः, पुनः समन्तात्सर्वदितु पाचालिकानां पुत्रिकाणां विनमविलासलोभनीयो १२ ++ - गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १०३ जनानां मोहोत्पादकः, पुनश्चन्द्रोपलैश्चन्द्रकान्तरलैद्योंतिताश्चन्दशाला: शिरोगृहाणि यस्य स तथोक्तः । पुनः पुनः स्फुरन्त्यश्वलन्त्यः पताका घजा येषु ते तैः शिखरैः खमाकाशं स्पृशन् ।॥ ९॥ तथा प्रफुल्ला । विकसिता या सन्ध्या तस्यां यानि अम्राणि वादलानि तैः समास्तुल्याः तैर्विवानैश्चन्द्रोदयैर्नद्धा बद्धा छदिरुपरितनमागो यस्य स तथोक्तः । पुनश्चित्रिताश्चारवो मनोहरा मित्तयो यस्य स तथोक्तः। पुनः प्रलम्बैर्लम्ब-६ मानहीरैरञ्चिताः प्रशस्ता नागदन्ता भितिस्पकीलका यस्य स तथोक्तः। पुनर्मुक्ताध मण्यश्च मुक्तामण्यस्तासां मौक्तिकानां मणीनां च ग्रथितानां जाले समूहेर्लसन्ति शोभमानानि वलीकानि नीवाणि छदिःप्रान्तानि ९ यस्य स तथोक्तः ॥ १०॥ तथा मृदङ्गवीणापणवानां वाद्यविशेषाणा- मारवैः शब्दैराध्यः समृद्धः । पुनर्घण्टानां निनादैः शब्दैनितरां मृत- मन्तरिक्षमाकाशं येन स तथोक्तः । अग्रेतनपादद्वयस्यान्वयः प्रागुक्त १२ एव नवमश्लोके-पाश्चालिकेत्यादि । 'पाञ्चालिका च पुत्रिके'ति हेमः । लोभयतीति लोभनीयः 'लम विमोहने' प्यन्तादस्मात् 'कृत्य- ल्युटो बहुलम्' ( ३।३।११३) इति कर्तरि अनीयर' । 'चन्द्रशाला १५ शिरोगृह' मिति हेमः । दशमलोके-वितानैरित्यादि । 'मथोल्लोचो वितानं कदकोऽपि च । चन्द्रोदये' इति हेमः । 'पटलच्छदिपी समे । नीनं वलीकं तत्प्रान्त' इति च 'नागदन्तास्तु दन्तका' इति १० च (हैमः) । एकादशे श्लोके-वार इति । 'वारः सूर्यादिवासरे । महे स्वराऽवसरयोवृन्दे कुल्लाख्यपादपे' इत्यादि अनेकार्थः ॥११ ।। पुनर्गौतम आह- ध्यानजेपर्चा बटुभिस्तपोभिः समेऽपि यान् द्रष्टुमलं न माः ।

. ५ १०४ श्रीगीतमीयफाव्यं तानद्य देवानिह सप्ततन्तौ प्रत्यक्षतः पश्यत नः प्रसादात् ॥ १२ ॥ यहुमिानैः सरणैर्वहुभिर्मचादिपाठेवहुभिस्तपोभिरुपवासादि- मिर्मर्त्या मनुष्या यान् देवान् खप्नेऽपि द्रष्टुं विलोकयितुं नाऽलं न समर्थाः, तान् देवान् अद्य अस्मिन् दिने इहास्मिन् सप्ततन्तौ यज्ञे ६ नोऽस्माकं प्रसादात् प्रत्यक्षतः पश्यत यूयं । सप्ततन्ताविति । 'यज्ञो यागः सवः सत्रं स्तोमो मन्युर्मखः क्रतुः । संस्तरः सप्ततन्तुश्चे' त्यादि हेमः ॥१२॥ ततः मुराणामिह याज्ञिका भोः! स्तुतौ सपर्योपनतौ यतद्धम् । दुराप एपोऽवसरो नराणां क लभ्यते सङ्गम ईश्वराणाम् १ ॥ १३ ॥ ततस्तस्मात्कारणात् मो याशिकाः ! इह प्रस्तावे सुराणां देवानां स्तुती स्तुतिकरणे, पुनः सपर्यायाः पुप्पादिपूजायाः उपनती १५ समीपनयने प्रगुणीकरणे इत्यर्थः, यूयं यतध्वं यनं कुरुध्वं । नराणां मनुप्याणामेपोऽवसरो दुरापो दुर्लभः, अस्तीति शेषः। यत् ईश्वराणामै- श्वर्यवतां सम्मः संसर्गः कलभ्यते ! यथा तथा न लभ्यते इत्यर्थः । नराणामिति । शेपे पष्ठी, न तु 'कर्तृकर्मणोः कृति' (२१३१६५) इति, 'न लोकाव्यय-' (२६३६६९) इति निषेधात् ।। १३ ॥ इत्युक्तयाक्येन गुरोः सह- स्तत्सण्डिकास्तुएरेतमेव । भगो नमस्ते तव चैव शत- राकटदेवा यदिदामियन्ति ॥ १४ ॥ १२ २१ ९ . गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । इतीत्यं गुरोर्गौतमस्य उक्तवाक्येन कथितवाक्येन सहर्षा हर्षवन्त- स्वस्खण्डिकास्तस्य गौतमस्स शिप्या एतं गौतममेव तुष्टुवुः स्तुवन्ति सं। कथं तुष्टुबुरित्याह-हे मगो ! हे पूज्य! ते तुभ्यं नमोऽस्तु यद्य-३ साकारणात् तवैव शक्तेराकृष्टा देवाः इह गर्त्यलोकेऽभियन्ति आगच्छन्ति, अभिपूर्वादिणः करि लट् । 'इणो यम्' (६४८१) इति यण् ॥ १४ ॥ अश्रौप्म यन्मत्रमहाप्रभावा- द्यागेषु देवागमनं पुराऽभूत् । तत्साम्प्रतं दर्शितमागमस्स प्रामाण्यमणाद् गुरुणा त्वयैव ॥ १५ ॥ पुरा पूर्व यागेषु यज्ञेषु मत्राणां महाप्रभावात् देवानामागमनममूत् इति यद्वयमश्रौप्म शृणुमः स्म, तत्साम्प्रतमधुना आगमस्य वेदस्य १२ प्रामाण्यं प्रमाणत्यमसान् प्रति लयैव गुरुणा साक्षादर्भितम् । इह यज्ञे साक्षाद्देवागमदर्शनादिति भावः ॥ १५ ॥ इत्थं वदत्सेव तदा द्विजेपु ग्रामं तमुल्लवथ कलम्बगत्या । ययुः सुराः सत्त्वरयानसंस्था, फवा विलम्बो महतां मुधा स्यात् १ ॥ १६ ॥ १८ तदा तसिन्नवसरे द्विनेषु ब्राह्मणेषु इत्यमनेन प्रकारेण पदसु कथयत्सु सत्सु एवं सत्वरयानसंस्थाः वेगवद्वाहनस्थिताः मुरा देवाः फलम्बगत्या घाणसदृशगत्या तं प्राममुष्टय ययुरप्रतो यान्ति स । वाऽयया, युकोऽयमर्थः-महतां महात्मनां मुघा वृथा विलम्बः कर -- १५ श्रीगौतमीयकाव्य ३ ६ स्यात् ! न कापीत्यर्थः । कलम्बेति । 'कलम्बो नालिकाशाके पृपत्के नीपपादपे' इति अनेकार्थः ॥ १६ ॥ निरीक्ष्य तानाशुगतिप्रवृत्तान् स्वछात्रवृन्दावृतगौतमस्य । हर्षसयौ शोकरुपावभृतां गते इव क्षौद्रघृते विपत्वम् ॥ १७ ॥ आशु शीघ्रगती, अन्यत्र गमने प्रवृत्तान् तान् देवान् निरीक्ष्य दृष्ट्वा, स्थितस्येति शेषः । स्वछात्राणां स्खशिप्याणां वृन्दैः समूहेरावृतस्य ५वेष्टितस्य गौतमस्य हर्पस्मयौ प्रमोदमानौ शोकरुपौ खेदकोषौ अमू- वाम् । उत्प्रेक्षते-झौद्रवृते मधुहविष्ये विपत्वं गते प्राप्ते इव 'संयुक्त मध्वाज्ये विपरूपे भवत' इत्युक्तरुत्प्रेक्षयम् । सयाविति । १२'मानश्चिचोनतिः लय' इति हैमः ॥१७॥ चैवर्ण्यमास्साय तदेन्द्रभूतिः सिन्नो गतद्रव्य इवात्मवृत्या । निर्धारितार्थादितरत किमेत- सावन्तति सधिया निदध्यौ ॥ १८ ॥ तदा तस्मिन्नवसरे इन्द्रमतिर्गीतमो विवर्णस्य भावो वैवयं विच्छा- १८यत्वमासाय प्राप्य गतं द्रव्यं यस्य स गतद्रव्य इव खिन्नः शोकातुरः सन् , आत्मवृत्त्या समनोव्यापारेण निदारितो निश्चयीकृतो योऽर्थ- सन्नादितरदन्यद् विपरीवं झिमेतत् कार्य प्रापर्यंत प्रवृपं सात- मित्यर्थः । इतीत्वं स्वधिया खवुयां निदध्यो चिन्तयामास । २२प्रापर्चनेति । 'पृतु वर्तने' प्रादरमाकरि लइ ।। १८ ॥ . .

३ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १०७ जगाद चैवं जगदीश्वरीयं हन्ताऽज्ञतैव प्रतिभाति विश्वे । नो चेदिदं यागपदं विमुच्य भ्रान्ताः कथं हव्यभुजो भ्रमन्ति ॥ १९॥ च पुनर्गीतम एवं जगाद वदति स, हन्तेति विपादे विश्वे लोके जगत ईश्वरी जगदीवरी जगत्वामिनी इयमज्ञता मूर्खता एव प्रति-६ भाति प्रतिभासते, चेयदि एवं नो स्यात् तर्हि इदं यागपदं यज्ञस्थानं विमुच्य त्यक्त्वा हन्यनुजो देवाः प्रान्ता प्रान्तचिताः सन्तः कथं अमन्ति ? ततो देवानागप्यन्यत्र गमनाद् ज्ञायते जगदीश्वरी अज्ञ-९ तैवास्तीति भावः ॥ १९ ॥ विज्ञातुमिच्छन्ति परोक्षमर्थ येभ्यो जनाः काऽपि हि सन्दिहानाः । प्रत्यक्षमप्यर्थमिमे विदुर्न ज्ञातं । तदेपा विधाभिधानम् ।। २० ॥ हीति निश्चितं, कापि कस्मिन्नपि अर्थे सन्दिहानाः सन्देहं बिमाणा १५ जनालोका येभ्यो देवेभ्यः परोक्षमप्रत्यक्षमर्थ विज्ञातुमिच्छन्ति, ते इमे देवाः प्रत्यक्षमप्यर्थ यज्ञलक्षणं न विदुर्न जानन्ति, तस्मात्कारणादेपां देवानां विशेपेण बुध्यन्तीति विवुधा इत्येवंरूपमभिधानं नामधेयं १८ ज्ञातं 1, युधैवैपामेतन्नामेत्यर्थः । विशेपार्थापरिज्ञानादिति भावः ॥२०॥ कैरप्यमारिमिरुद्ध प्रसह्य नीयन्त उतान्यतोऽमी । मेघाः समीरैरिख, विभवन्ति श्रेयांसि शचत्खलु सम्मवन्ति ।। २१ ।। १२ २३. ।

श्रीगोतमीयकाव्यं उतेति वितकें, वाऽथवाऽमी देवाः कैरपि उद्धतैः प्रबलैरमर्त्यांना देवानामरिमिरिभिः, दानवैरित्यर्थः । प्रसह्य बलात्कारेण अन्यतो ३ अन्यत्र प्रदेशे नीयन्ते प्राप्यन्ते । कैः के इव? समीरैर्वायुभिर्मेषा इव । यथा सगोरेर्मेघाः प्रसह्य अन्यत्र नीयन्ते तथेत्यर्थः । युक्तोऽयमर्थ:- खलुरवधारणे, श्रेयांसि श्रेयोमूतानि कार्याणि शश्वनिरन्तरं विभवन्ति ६ अन्तराययुक्तानि सम्भवन्त्येव, अतोऽत्रापि मगलकार्ये देवागमने किमपि विनमभूदिति भावः ॥ २१ ॥ वृथाऽधवाऽनेन विमर्शनेन सृतं यतः प्रत्युत सप्रमोदाः । दृश्यन्त एते, खलु चित्तवृत्ति- लक्ष्येत लिङ्गेरिह देहभाजाम् ।। २२ ।। अथवाऽनेन वृथा विमर्शनेन व्यर्थचिन्तनेन सृतं पर्याप्तं यत एते देवाः प्रत्युत सप्रमोदाः सही दृश्यन्ते । खलु निश्चितं, इह लोके देहभाजां प्राणिनां चित्तवृतिमनोव्यापारो लिङ्गैश्चिकैर्लक्ष्येत ज्ञायेत, १५ मुधीभिरिति शेषः । अतो नेपां चैरिकृतोपद्रुतिसम्मव इति मायः ॥२२॥ तथा हि वीणाकणनं मृदङ्ग ध्यानस्तथा किन्नरगीतनादः। नृत्यत्सुरसीजननूपुराणां घनिः उपशामृते प्रमोदान् ॥ २३ ॥ तया हि नान्येव प्रमोदनिहानि दर्शयति इद तावद्वीणानां फगनं चन्दः श्रूयते, पुनर्मदभागां ध्यानो ध्वनिराकर्ण्यते, उया तेर २२पारेण सिराणां देवविशेषाा गीतनादो गानध्वनिः श्रुतिपयं गौवमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १०९ ६ ५ समायाति, पुनर्नृत्यतां नृत्यं कुर्वतां सुरस्त्रीजनानां देवाऽङ्गनालोकानां यानि नूपुराणि चरणाऽऽमरणानि तेषां ध्वनिर्निशम्यते, प्रमोदाहते प्रमोदं विना एते भावाः कथङ्कारं !, कथं मवन्तीत्यर्थः । अतः । सप्रमोदा एवैते देवा दृश्यन्ते इति भावः । अन्यथैवं कथम्' इत्यादिना सिद्धप्रयोगे कृमओ णमुल् ॥ २३ ॥ 'प्रभो! चिरंजीव चिरं विधेहि त्रैलोक्पराज्यं जयताचमेव' । आशिप्यते कोऽयमुदाचगीमि- मुंहः मुरैः संप्रति गीतिपूर्ती ॥ २४ ॥ 'हे प्रभो! हे खामिन् ! त्वं चिरं बहुकालं जीव जीवतात, पुनश्चिरं त्रैलोक्यस्य राज्यं विधेहि कुरु, पुनस्त्वमेव जयतात् सर्वोत्कण वर्तव', इत्यं उदात्तगीहिचैर्वाग्भिः सम्प्रति अधुना गीतिपूर्ती गान-१२ परिसमाप्तौ मुहुर्वारंवारं सुरैर्देवैरयं कः पुमान् आशिष्यते आशी- विषयः क्रियते ॥ २४ ॥ इति वत्येव तदा द्विजेन्द्र प्रादुर्वभूवैति वचोविकासः। अदृएपूर्व किमहो अपापा- पुर्यन्तिक विसयकारि वृत्तम् ॥ २५ ॥ तदा तस्मिन्नवसरे द्विजेन्द्र ब्राह्मणेश्वरे गौतमे इतीत्यं ब्रुवति वदत्येव सति इत्येवं वक्ष्यमाणप्रकारेण चनोविकासो वचसः स्फुटो- धारः प्रादुर्बभूव । इतीति किं तदाह-'अहो इति आश्चर्येऽपापापु- अन्तिके समीपे पूर्वमदृष्टं अहष्टपूर्व विलयकारि आचर्यकारि किं.२१ . १५ 10 ११० श्रीगौतमीयकाव्यं ६ - वृत्तम्, इति वाग् जनमुखात् प्रकटीबभूवेत्यर्थः । विकास इति । विकसनं विकासः, भावे घञ् ॥ २५ ॥ उपात्तवृत्तान्त इतो नियुक्तो वार्चायनोऽप्येवमुदाजहार । सामिन् । प्रवृत्तामिह किंवदन्ती सत्यामवेहि प्रणिधेहि चित्ते ॥ २६ ॥ इतो असाद्वचःमादुर्भावात् परं उपाचो गृहीतो वृतान्तो येन स उपारवृत्तान्तो नियुक्तः स्वयं व्यापारितो वा यनो हेरिकपुरुषोऽपि गौतम प्रति एवमुदाजहार उक्तवान् । कथमित्याह--'हे खामिन् ! इद प्रस्तावे प्रवृत्तां किंवदन्ती लोकवार्चा सत्यामवेहि जानीहि, चिते प्रणिधेहि समाधेहि, स्थापयेति यावत् । वार्तायन इति । 'हेरिको १२गूढपुरुषः * * * वार्तायनः स्पशधार' इति च हैमः । किंवद- न्तीमिति । 'जनश्रुतिः किंवदन्ती' इति च । अवेहीति । अवाइ- पूर्वादिणो लोट् । 'ओमाडोश्च' (६।१।९५) इति पररूपम् ॥२६॥ पुनस्वामेव प्रवृत्ति स हेरिकः प्राह- पप्रत्रयान्तर्मणिपीठिकायां सिंहासनेउये पुरुषः परात्मा । कोऽपि सितस्तत्मणिपाचहेतो- रायान्ति देवा हि विमानसंस्थाः ।। २७ ।। वपत्रयस्थ प्राकारमयस्य अन्तर्मध्ये या मणिपीठिका तस्यामध्ये २०मधाने सिंहासने कोऽपि परात्मा पाटारमा पुरुषः स्थितः, अस्तीति शेषः । हीति निश्चितं, तस्य पुरुषस्य प्रणिपातहेतोः प्रणामनिगि २१एते विमानससा विमानस्थिता देवा भायान्ति ॥ २७॥ १८ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १११ निर्झर्य तां नाहमवैमि मूढ- स्तथापि जाने जगदीश्वरोऽयम् । रूपेण देवैरपि दुर्लमेण ज्योतिर्भरेणाऽपि खगातिगेन ॥२८॥ है खामिन् ! अहं मूढो मूल् यद्यपि निद्धीर्य निश्चयं कृत्वा ते पुरुष नाऽवैमि न जानामि तथापि देवैरपि दुर्लभेन रूपेण सौन्दय्येण । अपि पुनः खगमतीत्य गच्छतीति खगातिगस्तेन, रूपातिशायिना ज्योतिर्भरेण तेजःपुञ्जेन अयं जगतामीश्वरो जगदीश्वर इति जाने जानामि खगातिगेनेति 'अन्यत्रापि दृश्यते' (वा०) इति गमेर्डः । 'सूयोऽक: किरणो भगो ग्रहपुषः, पूपा पतङ्गः खगः' इति हैमः॥२८॥ श्रुत्वेति वाचं चरवकगर्भा- दाचार्यधुर्यो मनसा विमृश्य । विवेकिनो नीतिविचारदक्षानु- वाच सत्रे समवेवसूरीन् ॥ २९ ॥ • आचार्येषु आचारयोग्येषु धुर्यो धुरीणो गौतमश्चरस्य हेरिफरस १५ वक्रगर्भात् मुखमध्यात् इत्युक्तप्रकारेण वाचं श्रुत्ला, पुनस्तां वाचं मनसा विमृश्य विचार्य, विवेकिनो विवेकवतः पुनीतिविचारे दक्षान् निपुणान् , सः यज्ञे समवेताः संमिलिया ये सूरयः पण्डिता १० न्यक्कादयस्वान् उवाच वक्ष्यमाणप्रकारेणोक्तवान् ॥ २९ ॥ यदुवाच तदाह- ब्रह्मा न विष्णुर्न हरोपि नो चा- वधीरयेयो मखमागमिष्टम् । १'सत्रीयप्रमाभरेण सूर्याविशायी ग्रेप मत एद जगहामीवर' इत्यर्थः । १२ २२ श्रीगौतमीयकाव्यं कोऽसौ खमायां बहुलं वितत्य स्थितो जनानां यत वञ्चनाय ॥३०॥ अयं ब्रह्मा न विष्णुर्न वाऽथवा हरो रुद्रोऽपि, न दृश्यते इति शेषः । य इष्टं सर्वेषां देवानां वल्लभं मखमागं यज्ञांशमवधीरयेत् तिरस्कुर्यात् । यतेति खेदे, जनानां वञ्चनाय प्रतारणाय बहुलां प्रचुरां समायां वितत्य विस्तार्या स्थितोऽसौ, को विद्यते । इति शेषः ॥३०॥ आः! एप मायी कुहनेन्द्रजाल- क्रियापटुर्द्धर्मविलोपहेतुः। नो चेदिदानीमवधानहानि कुर्यात्कथं सामगयाजकानाम् ॥ ३१ ॥ आः इति सन्तापे, एपः कश्चित् कुहनया कपटेन परिविस्मापनार्थ १२ मिथ्याकल्पनया या इन्द्रजालक्रिया तस्यां पटुश्चतुरो मायाऽस्यास्तीति मायी कपटी पुमान् धर्मविलोपस्य यज्ञधर्मविनाशस्स हेतुः कारणं, समुपेत इति शेषः । नो चेत् यद्येवं न स्याचर्हि इदानी साम्पतं साम- १५वेदं गायन्तीति सामगा ये याजका यज्ञक रस्बेषां अवधानस समाधानस हानिः कथं कुर्यात् ! । 'आ' इति सान्तो निपातः । 'माः सन्तापमकोपयो रिति अनेकार्थः । कुहनेति । 'कुहना १० दंभचर्या चेति हेमः ॥ ३१॥ एतेषु च व्योमचरेषु कामं सत्यं मुरत्वं न वयं प्रतीमः । मायाविनां यशनपश्चानां माया दुरन्तेति हि किन विभः ।। ३२ ।।

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । ११३ च पुनः काम यथेच्छं व्योमनि आकाशे चरन्तीति व्योमचरा- खेपु, एतेषु देवेषु वयं सत्यं सुरत्वं देवत्वं न प्रतीमो न श्रद्दधामः । यद्यस्मात् कारणात् हीति निश्चितं, जनवञ्चकानां मायाविनां धूर्तानां । माया दुःखेन अन्तो यस्याः सा दुरन्ता दु नेत्यर्थः, इति किं वयं न विद्मो न जानीमो :, विद्म एवेत्यर्थः । एतावता एतेन मायिनैव खमायया एते देवा अपि कल्पिता इति ज्ञायन्ते इति भावः। प्रतीम इति । प्रतिपूर्वादिणः करि लट् ॥ ३२ ॥ मुग्धेषु लोकेषु कुतो विवेको ज्ञासन्ति हा हा! प्रभुमेनमेव । । किं ज्ञायते शासनमस्स कीदृक् ? सोपद्रवः सनिगमो हि भूतः॥३३॥ मुग्धेपु तत्त्वज्ञानहीनेषु विवेको योग्याऽयोग्यत्वनिर्णयः कुतः न.१ कुतोऽपीत्यर्थः । ततश्च हा हा ! इति खेदे, मुग्धलोका एनमेव मायिनं ममुं जगत्स्वामिनं ज्ञास्यन्ति । तथा किं ज्ञायते अस्य शासनं धर्मों- पदेशः कीदृग् अस्ति :, ततो हीति निश्चितं, सन्निगमः सद्धर्ममार्गः १५ सोपद्रवः उपद्रवयुक्तो भूतः सजातः । 'अध्या पन्या निगमः मृतिः'' इति हेमः ॥ ३३॥ ध्वस्ते तु धर्मे जगतो गतिः का? यत्नोग्य तत्कोपि विमर्शनीयः । ऋतुक्रिया तिष्ठतु तापदेत- अपाम्युपायो नियतो विधेयः ॥ ३४॥ तु इति विशेपे । धर्मे घने सति जगतो विश्वस्स का गतिः:, न फापीत्यर्थः । ततस्मात्कारणादस कार्यस्य कोऽपि यलो विमर्श-२५ ८गो.का. - २७ ११४ श्रीगौतमीयकाव्यं नीयो विचार्यः । तर्हि किं कार्यमित्याशझ्याह-ऋतुक्रिया; यज्ञक्रिया तिष्ठतु आस्तां तावत् प्रथमं नियतो निश्चित एतस्य धर्मध्वंसकर्तुजे- ३यस्याऽभ्युपायो विधेयः कर्चव्यः ॥ ३४॥ विद्यावतामेप न दृष्टपूर्वो नापि श्रुतः कापि सुदूरदेशे। विहायसो वा पतितोत्र भूमौ किं वाऽवतीर्णो ननु भूमिगर्भात् ॥ ३५ ॥ : - एप पुरुषो विद्यावतां विदुषां मध्ये पूर्व दृष्टो दृष्टपूतों न, पूर्व ९कदापि विद्वत्सु न दृष्ट इत्यर्थः । न पुनः काऽपि सुतरामत्यन्तं दूर- देशेऽपि श्रुतो वेत्युत्प्रेक्षायाम् । एष विहायस आकाशादत्र भूमी पतितः । किंवा-ननु निश्चितं (वित :) भूमिग मध्यादक- १२ लादत्रावतीणों , न ज्ञायते सद्यः कुतः समेतोऽयमिति भावः ॥३५॥ आयातु यात्वेप यतस्ततो वा स्वार्थ समाराघयतां सुखेन । दुःखाय नः किंतु भवेत्प्रकामं लोकेऽस्य लोकेश्वरताप्रसिद्धिः॥ ३६॥ एप यतस्ततो या प्रदेशात् आयातु आगच्छतु, यत्र तत्र या यातु, १८ अथवा मुखेन साथै सप्रयोजनं समाराधयता साधयतु, नाऽस्माकं किमपि दुःसायेति पाक्यशेषः । किंतु लोके याऽस लोकेश्वरतायाः प्रसिद्धिः सा प्रफाममत्यन्तं नोऽस्माकं दुःसाय भवेत् ॥ ३६ ।। गर्जत्वयं तावदाचपोपो गर्व दपारवीश्वरवामिपितम् ।। । - + गौतनीयप्रकाशायटीकया सहितम् । यावन्न चाऽस्मादृशदृष्टियोगं गतो. गजो व्यानमिवाऽनवेक्ष्य ॥३७॥ अयं पुरुषः उदात्तो महान् घोपः शब्दो यस्य स उदात्योपः३ सन् तावद्गर्जतु ।.पुनरीश्वरता ऐश्वर्येण अभिषिच्यते स्मेति ईश्वरता- मिपितं ऐश्वर्यजनितं गर्वमहङ्कारं तावद्दधातु, धारयतु यावदस्मा- इशानामस्मतुल्यानां दृष्ट्योनॆत्रयोर्योग सम्बन्धं न गतो न प्रातः । कई इव । व्याघ्रं शार्दूलमनवेक्ष्य अप्रेक्ष्य स्थितो गज इव । यथा गजस्ताव- दुदाचोयो गर्जति, तापच्च खमहत्त्वगर्व दधाति यावद्याधं न प्रेक्षते तथा अयमपीत्यर्थः । उदात्तेति । 'उदाचो दातृमहतोद्देद्ये च खर- मिद्यपि' इति अनेकार्थः ॥ ३७॥. शैलालिनां सिद्धिरुतेन्द्रजाले प्रस्तावसम्पादितवस्तुयोगात् ।। विद्यावतामत्र तु कापि नाऽऽस्या मृपाविधौ न प्रतियन्ति युद्धाः ॥ ३८ ॥ . उतेति वितर्के, शैलालिनां नटानां प्रस्ताव अवसरे संपादित १५ निष्पादितं यद्वस्तु कौतुककारिपदार्थतस्य योगात् इन्द्रजाले कुहके, सिद्धिरतीति शेषः । विद्यावतां तु अनेन्द्रजाले कापि आस्थाऽपेक्षा नं, कोऽप्यादरो नास्तीत्यर्थः । कथमित्याह-यतो बुद्धाः पण्डिता १८ मृपाविधी मिथ्याकायें न प्रतियन्ति न प्रतीति कुर्वन्ति । इन्द्रजालस्य मिथ्याकार्य्यवान तत्र विदुपामादर इति भावः । 'नटः. कृशाश्वी शैलाली' इति हैमः । आस्थेति । 'आस्या यत्नालम्बनयोरस्थानाऽपेक्ष-३॥ मोरपि' इति भनेकार्थः । प्रतियन्तीति । प्रतिपूर्वादिणः करि रह ॥ ३८॥ L

३
श्रीगौवमीयकाव्यं
वादाय नैव प्रमविष्णुरेपो-
ऽसाभिः समं निश्वितमेतदस्ति ।
नागाधिराजोऽपि विपं विमुञ्चन्
कि चैनतेयेन समं समर्थः १ ॥३९॥
एष पुमान् अस्माभिः समं सार्द्ध वादाय वादं कर्तुं नैव प्रम-
६ विष्णुः समथों विद्यते एतनिश्चितं निश्चयीकृतमखि । एतमेवार्थ
मर्यान्तरन्यासेन द्रढयति-नागाधिराजः सपेंन्द्रो विषं विमुञ्चन्नपि
परपीडनार्य मुखारहिनिष्कासयन्नपि वैनतेयेन गरुडेन समं सह,
५ योद्धमिति शेषः, किं समयों भवेत् ! न भवेदेवेत्यर्थः । बादा-
येति । "क्रियार्योपपदस्य- (सश१४) इति चतुर्थी ।। ३९ ।।
एवमुक्त्या पुनर्गीतमस्तानाह-
१२ निर्जित्य तं यावदुपैमि गेहं विद्वरैस्तापदिहाऽसितव्यम् ।
पुरोग एवारिवलं जयेत् कृतं तदा पृष्ठगचक्रवीरैः॥४०॥
अहो । विद्वांसो । यावतं पुरुषं निर्जित्य अहं गेहमुपैमि गृहमाग-
५च्छामि, वावद्विद्वद्वरैविद्वत्स प्रधानैर्भवद्भिः इह आसितव्यम् अत्रोप-
येष्टव्यम् । उकेऽर्थेऽर्थान्तरं न्यस्यति--चेयदि पुरोग एवं सैन्याप्रगामी
मुमट एवं परिवलं वैरिसैन्यं जयेत् अभिमवेत्, वदा पृष्ठगचक्र
पारः पृष्ठगामिसैन्यमुमटैः कृतं, स्तमित्यर्थः ॥ ४० ॥
इति सरमसमुयन्माननागाधिरुद्धा
शरमिवशशिप्पैर्दिवोत्साहसार।
समवसरणमेशं द्रमावर्यतुं
मगपदमिमुखं द्रागिन्द्रभूतिः प्रतस्से ॥ ४१ ॥

गौतमीयप्रकाशाख्यंटीकयां सहितम् । ११७ इति अमुना प्रकारेण सरमसं सत्वरमुद्यन् प्रादुर्भवन् यो मानों गर्वः स एव जागो हस्ती तमधिरूढ आरूढः । पुनः शरा बाणा अर्थात्पञ्च, तैः मितानि प्रमितानि यानि शतानि पञ्चशैतानीत्यर्थः ।३. तावन्तो ये शिष्याश्छात्रावर्द्वितो वृद्धिं नीत उत्साह एव सारो वलं यस्य स तथोक एवंभूत इन्द्रभूतिर्गौतमः आश्चर्यहेतुं विस्मयकारणं ईशस्य भगवत इदं ऐशं समवसरणं द्रष्टुं विलोकयितुं द्राक् शीघ्रं भगवतोऽभिमुखं संमुखं प्रतस्थे चचाल । सरभसमिति । 'रमसो वेगहर्षयो' रित्यनेकार्थः । 'वेगो रंहस्त्वरा वेति तदृत्तिः । अधिरूढ इति । 'गत्यर्थ-' (३।४।७२) इत्यादिना करि क्तः । प्रतस्थे ? इति । प्रपूर्वात्स्याधातोः करि लिट् । इदं मालिनीवृतं, तल्लक्षणं तु 'न-न-म-य-य-युतेयं मालिनी भोगिलोकै रिति ॥ ११॥ इति गौतमविपादोत्साहवर्णनो नाम पश्चमः सर्गः ॥५॥ १२ इतीति स्पष्टम् । इति श्रीगौतमीयप्रकाशाख्यायां गौतमीयमहाकाव्ययाख्यायां पञ्चमः सर्गः ॥५॥ १८ पष्ठः सर्गः। प्रस्थितोऽथ वरगुवरावयावामतो वनदिशं दृशौ क्षिपन् । गौतमो विबुधखण्डिकैतो दिव्यदेवरचनामुदैवत ॥१॥ यस्य चारुरचनाविराजिवं दिव्यघाम सुरराजिनिर्मितम् । इन्द्रभूतिरमिवीक्ष्य विस्मयं प्राप सोऽस्तु जिनपुङ्गयो मुदे ॥१॥ अथ यज्ञगृहात् प्रसानाऽनन्तरं वरगुर्वराहयात् 'वरगुवर' नामका- झामतः प्रस्सितश्चलितो विबुधाः पण्डिता ये खण्डिकाः खथिष्यातो २२

११८
श्रीगौवमीयकान्यं
वेष्टितो गौतम इन्दमूतिर्वन दिशं प्रति दृशौ दृष्टी क्षिपन् प्रेरयन् दिव्या
मनोज्ञा या देवानां समूहो देवस्तेन कृता रचना समवसरणरूपा
३ तां उदक्षत उच्चैर्विलोकितवान् । अस्मिन् सर्गे रथोद्धताइतं, तलक्षणं
च 'रान्नरा-विह रयोद्धता लगा'विति ।।१।।
श्यामलच्छविविभासितं वनं तावदस्य नयने व्यलोमयत् ।
६ पूर्वमेव महिमानमैश्वरं ज्ञापयत्कुमतमोहितानिय ॥२॥
तावप्रथमं श्यामला श्यामा या छविः प्रभा तया विभासितं
दीप्यमानं वनं, अस्य गौतमस्य नयने चक्षुपी व्यलोभयत्, विमोहिते
९चकार । वनं किं कुर्वदिव । पूर्वमेव प्रथममेव कुमतेन कुदर्शनेन
मोहितान् लोकान् ईश्वरस्याऽयमैश्वरः तं महिमानं महत्त्वं ज्ञापयदिव ।
'स्याद्रामः श्यामलः श्याम' इति हेमः ॥ २ ॥
१२ एतदेव महसेनकं वनं दृश्यते किमथवाऽत्र नन्दनम् १ ।
श्रीरसुप्य जनिताद्भुता कथं संनिधाय स हदीत्यचिन्तयत् ॥३॥
मात्र प्रदेश एतत् महसेनकं महसेननामकमेय पनं दृश्यतेऽथवा
१५ किं नन्दनं वनं दृश्यते ! अथ चेन्महसेनवनमेवैतर्हि अमुष्य अस
चनस्य श्रीः शोगाऽगुता आश्चर्यकारिणी कथं के प्रकारेण जनिठा
उसादिता ! मालाकारादिमिरिति शेपः । इत्यमुना प्रकारेण स
गौतमः संनिधाय यनरामीपं प्राप्य हदि गनसि अचिन्तयत् चिन्त.
यति ल॥ ३ ॥
पुनर्गातमो यदचिन्तयचदाह-
चिग्रमेठदपरं विलोक्यते स्तम्भयोगमपहाय कारणम् ।
परममिरियमग्नता यतो व्योम्यहो गुरुतरा प्रतिष्ठिवा ॥४॥

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । ११९ एतत् अपरं चिनमाश्चर्यं विलोक्यते, यतः-कारणं प्रतिष्ठानहेतु- भूतं स्तम्भयोग स्तम्भसम्बन्धमपहाय त्यक्त्वा इयं उन्नता सार्द्धकोश- द्वयोचा गुरुतराऽतिमहती, योजनप्रमितेत्यर्थः । एवंविधा रत्नभूमिः३ रलमयी पृथ्वी व्योग्नि आकाशे प्रतिष्ठिता, निराधारा स्थितेत्यर्थः । अहो ! इति पादपूरणे, निपातानामनेकार्थत्वात् ॥ १ ॥ आरुरुक्षुरथं तां स उच्चकै रत्नबद्धरमणीययर्मना । प्रागिरीक्ष्य जलपूर्णदीर्घिकां सेरपद्मसचिवां विसिण्मिये ॥५॥ अथानन्तरं उच्चकैरुन्नतेन रत्नैर्बद्धं यद्रमणीय मनोज वर्त्म मार्गस्तेन तां रतभूमि आरोढुमिच्छुरारुरुक्षुः स गौतमः प्राक् पूर्व सेराणि ९ विकसितानि पद्मानि कमलानि सचिवाः सहाया यस्यास्ताम् , विकच- कमलयुक्तामित्यर्थः । एवंविधां जलपूर्णदीर्घिको जलमृतवापी निरीक्ष्य दृष्ट्वा विसिप्मिये विस्मयं प्राप्तवान् । 'सचिवः सहायेऽमात्ये' इति हेमः।१२ विसिप्मिय इति । 'मिड ईपद्धसने' विपूर्वादस्मारकर्चरि लिट् ॥५॥ विस्मयप्रकारमाह- दीर्घकालमपि शिल्पिकल्पिता नेदृशी भवति दीपिका पुनः । साधुनैव रचिता ततः स्फुटा देवताकृतिरियं प्रतीयते ॥६॥ दीर्घकालमपि यावत् शिल्पिमिः कलादद्भिः कल्पिता रचिता दीपिका पापी ईदृशी न भवति, येयं मया दृष्टा सा पुनर्वापी तु १८ अधुनेच रचिताऽस्ति तत इयं स्फुटा प्रकटा देवताकृतिर्देवक्रिया प्रतीयते, ज्ञायते, न मनुष्यकृतिरियमित्यर्थः ॥ ६॥ १ दीपकालमपि मावत् शिल्पिभिः शिल्पकल्पिता नेशी भवति', इति बाधीमुदितमूलपाठपन्दोमवारयादसनीचौनः । : - १५ . .२० ।

३ ९ १२० श्रीगौतमीयफाव्य सोऽय मोक्षमिय गन्तुमुन्मुखो वप्रसंमुखमितः समुद्ययौ । संमुखीकृतविशुद्धबोधतःप्राप्य शक्तिमिव चोर्द्धगामिनीम् ||७|| यथाऽनन्तरं स गौतमो मोक्षं गन्तुमुन्मुख इव इतोऽसाद्वापीपदे- शाद्वपसंमुखं समवसरणप्रकाराभिमुखं समुद्ययौ सम्यक्प्रकारेण ऊर्द्ध ययौ । किं कृत्वेव । संमुखीकृतो यो विशुद्धबोधो निर्मलज्ञानं तस्मात् ६० गामिनी शक्ति प्राप्येवेत्युत्प्रेक्षा, च पादपूरणे ॥७॥ वप्रगोपुरपुरःस्थतोरणं लम्यमानमणिहारभूपणम् । गन्धलुब्धमधुपावलीमिलत्पुप्पदामसुमशेखराश्चितम् ॥८॥ लोचनातिथिमवाप्प लोभित- स्वच्ट्रिया स मतिमत्र सन्दथे । पूर्वकल्पितविकल्पजल्पना मामिका विघटितेच भासते ॥९॥-युग्मम् । इह इति शब्दोऽध्याहार्यः ततश्चैवमन्वयः--लंबमाना ये मणि- हारा मणिमया हारात एव भूपणानि यस्य तत्तथोक्तं, पुनः पुष्पदामानि २५पुप्पमालाः मुमशेखराणि पुप्पशेखराणि तेपो द्वन्द्वः, गन्धे लुब्या या मधुपावली अमरश्रेगिस्तपा मिलन्ति संसर्गवन्ति यानि पुष्पदाम- मुमशेखराणि ते रचितं प्रशस्त एवंविधं यमगोपुरस्स भाकारस्य पुरोऽने १८ तिष्ठतीति यमगोपुरपुरःसं यतोरणं तल्लोचनयोरतिथि नेत्रयोगोचर- मवाप्य माप्य तस्स तोरणस मिया शोमया लोमितो विमोहितः स गीतमोऽत्र प्रसाये इति मति बुद्धि संदघे पारयामास इतीति कि २०वदाह-मगेयं मामिका पूर्व फरिपता पिहिता ये विफल्या विम- चीनेपा जस्पना विघटिता इव अन्यथामता इव मासते मविकसितेन्द्र जारमात्राऽदर्शनादिति मायः । मुमेति । 'प्रसूनं कुसुमं सममिति १२ ६ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहिवम् १२१ हेमामामिकेति । अस्मदोऽपि ममकादेशः, 'टिवाण (१०१५) इति की प्राप्तायपि 'केवलमामफ- (१९३०) इति नियमात् याप्, ककारस्यादेशावयवत्वेन प्रत्ययस्थत्वामावात् इकाराऽप्राप्तावपि ३ 'मामकनरकयोः' (वा०) इत्युपसमयानात् इत्वम् ॥ ८॥९॥ . . कथमित्याह- इन्द्रजालकुतुकं कशाश्विना दृष्टिसम्म्रमकरं न चार्थकृत् । ' अर्थकच्चमपरोक्षमत्र तु प्रेक्ष्यते किमपरं परीक्षितम् ? ॥१०॥ कृशाश्विनां नटानां सम्बन्धि इन्द्रजालकुतुकं इन्द्रजालकौतुकं स्योर्नेत्रयोः संम्रमकरं चमत्कारकरं वर्चते, परं न चार्यकृत् , कार्य-१ साधकं नास्तीत्यर्थः । अत्र तु अपरोक्षं प्रत्यक्षं अर्थकृत्त्वं विद्यते,, ततश्च अपरमन्यत् परीक्षितुं कि प्रेक्ष्यते किं विलोक्यते ! अपरपरी- क्षाया अत्र किमपि प्रयोजनं नास्तीत्यर्थः । कुतुकमिति । 'कौतुहलं १२ तु कुतुफ मिति हैमः ॥ १०॥ राजती चरणमित्तिरीटशी वीरुदुरपु)लिखितमतिभृपिता । मूभि हेमकपिशीर्पमण्डिता देवकत्यमतिरिच्य न कचित् ।।११।।१५ ईशी एवंविधा वीरुषां विस्तारवल्लीनां उल्लिसिताभिर्मकि- मिपिता शोभिता मूर्ध्नि मखके हेमः स्वर्णमयैः कपिशीपः मण्डिता रजतस्येयं राजती रूप्यमयी वरणमितिः माकारमिचिर्देवानां कृत्यं 10 कार्यमतिरिच्य पृथकृत्य, देवकृत्यं विनेत्यर्थः । न फचिद् दृष्टेति शेपः । अतो निश्चितं देवत्यमेवेदं न लिन्द्रजालमिति भावः । पीरुच्छब्दो धान्तः ॥ ११ ॥ दर्शनीयमिह नास्ति यम वत् सर्वमेव किल चिवहारकम् । निःप्रयोजनविलम्बनं परं यत्र तत्र न मनस्विनो वरम् ॥१२॥२५ १२२ श्रीगौतमीयकाव्यं इह प्रदेशे यद्वस्तु तत् चित्तहारकं मनोहरं विद्यते, परं मनखिनः सुमनसः पुरुषस्य यत्र तत्र प्रदेशे निःप्रयोजनं निष्कारणं विलम्बनं ३ विलम्यकरणं न वरं न श्रेष्ठं, वकृत्यं साधनीयमिति भावः । मनस्विन इति प्रशंसायां विनिः ॥ १२॥ स प्रविश्य विशिखां पुरस्ततः पश्यति स सुविमानमालिकाः । ६ सहधूहृदयदेशशोमिता रत्नहारलतिका इवोचलाः ॥ १३ ॥ ततस्तदनन्तरं स गौतमः पुरोऽग्रे विशिखां प्रतोली प्रविश्य मुविमानमालिकाः शोभनविमानश्रेणीः पश्यति स एवान् । का ९इव । सद्ध्या हृदयदेशे वक्षःस्थले शोभिता उज्ज्वला निर्मला रन हारलतिका इव विविधमणिमयहारलता इव 'प्रतोलीविशिखा: समाः' इति हेमः॥१३॥ ततः किं जातमित्याह- यो गमीरजलवाहगर्जितं हेपयन् प्रसरति स सर्वतः। श्रीजिनेन्द्रहृदयाननोद्गतः शुथुवे स मधुरो महाध्वनिः ॥१४॥ यो ध्वनिर्गमीरं गारं यजलवाहस्य मेघस्स गर्जितं तत् हेपयन् लजयन् सर्वतः सर्वासु दिक्षु प्रसरति स्म विस्तवान् । स श्रीजि- नेन्द्रस पीरप्रमोईदयाननाम्यां हृदयमुखाभ्यां उद्गतो ध्वनिः स्तो १८ मधुरो महाध्वनिः शुश्रुवे श्रूयते स, तेन गौतमेनेति शेषः । हेप- यमिति । 'ही लजायां', हेतुणिजन्तादसाइटः शत, 'अहिी-' (७३३३६) इति पुक् । युवेति । क्षुधातोः कर्मणिलिट् ॥.१४॥ मगपद्वाणी श्रुत्वा गौतमेन यदचिन्ति तदाह- । यस कर्णमुखदः प्रवर्तते ५. देवतूर्यनिनदोपरि घनिः । . - १५ . - ६ ९ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १२३ स.स्वचिन्त्यमहिमाऽनुमीयते कोऽपि संप्रति विनाऽपि दर्शनम् ।। १५॥ कर्णयोः सुखं ददातीति कर्णसुखदो यस्य ध्वनिर्देवतूर्याणां देव-३ चादित्राणां निनदस्य शब्दस्योपरि प्रवर्तते, स तु संप्रति अधुना दर्शनं विनाऽपि कोऽपि अचिन्त्यो महिमा प्रभावो यस्य सोऽचिन्त्यमहिमा पुमान् अनुमीयते ज्ञायते । माङः कर्मणि लट् ॥ १५ ॥ ततः स्वर्णवप्रमालोक्य तेन यचिन्तितं तदाह- मानुभानुमिरुपैघितद्युतिर्भात्यहो! कनकभित्तिरप्रतः। वप्र एप मणिशृङ्गसङ्गतः वर्णशैलसुपमामिवोद्वहन् ॥ १६ ॥ अहो इति आश्चयें, भानोः सूर्यस्य भानुभिः किरणैरुपैधिता वृद्धि गता द्युतिर्दीप्तिर्यस्य स तथोक्तः, पुनः कनकस्य स्वर्णस्य मिचिर्यस्य स कनकमित्तिः, पुनर्मणिशृङ्गमणिमयकपिशीर्षेः सङ्गतो मिलितः अग्रत एवं विध एप वप्रः प्राकारः खर्णशैलस्य मेरुपर्वतस्य सुपमा शोमां उद्वहन्निव धारयन्निव माति शोभते । 'सुषमा तु स्यात्परम- शोभायां कालभिद्यपि' इति अनेकार्थः ॥ १६ ॥ गोपुरं च रुचिरं सतोरणं दीप्यमानमणिभाप्रभासितम् । शकचापकमलाऽपहारकं भन्मनो नयति पगुतामिव ॥ १७ ॥ च पुनदीप्यमानानां मणीनां भामिर्दीप्तिभिः प्रमासितं विराजितं ।। अत एव शकचापस इन्द्रधनुषः कमलाया लक्ष्म्या अपहारकं एवं- विघं रुचिरं मनोज्ञं सतोरणं तोरणसहितं गोपुरं वर्मनाकारद्वारं कर्तृ,२० १ गोपुरं सुचिरं सतोरण' इति काशीमुदितः पाठः, स च छन्दोनरोपादप्य. . " . .. सरसः।

१२४ श्रीगौतमीयकाव्यं मन्मनो मचिचं पङ्गुतां पङ्गुलतामिव नयति प्रापयति, एतत्त्यत्वा- ऽप्रतो गन्तुं न शक्यते इति भावः ॥ १७ ॥ ३ इन्द्रजालरचना विवक्ष्यते चेदिहाप्यभिनिवेशमोहितैः । वर्हि सत्पथकथावधारणे सर्वमप्युदितमप्रमाणकम् ॥ १८॥ अमिनिवेशो जानत एवाऽसदाग्रहस्तेन मोहितैमूदचिवैः पुरुषै- परिहापि चेयदि इन्द्रजालरचना विवक्ष्यते वक्तुमिष्यते तर्हि सत्पथस्स सन्मार्गस्य कथाया वाळया अवधारणे निश्चयकारणे शास्त्रादौ उदितमुक्तं सर्वमपि अप्रमाणकं प्रामाण्यरहितं, स्यादिति शेषः । इह ९सर्वस्यापि सद्भूतवस्तुन एव दर्शनादिन्द्रजालकल्पनाया अन्तलमिति मावः । अवधारणे इति । अवधार्यतेऽनेनेति विगहे करणे १२ 'अस्तु मे गमनमग्रतः' पुनश्चेतसेति विमृशन् द्विजोनमः । प्राविशत्कनकवनगोपुरं प्रेक्षणाय पुरुषोत्तमश्रियः ॥ १९ ॥ पुनः 'मे मम अमतो गमनमस्तु' इति चेतसा हृदयेन विगृशन् १५ विचिन्तयन् द्विजेपु उत्तमो द्विजोवमो गौतमः पुरुषोत्तमस श्रीवर्द्ध- मानवामिनः श्रियोऽशोकादिप्रतिहार्यलक्ष्याः प्रेक्षणाय दर्शनार्थ कनकवमस्य वर्णमाकारस्स गोपुरं द्वारं प्राविशत् प्रविशति । विशेबीदादिकारकरि सह ॥ १९ ॥ जानुदासुमोघयस्तृतां भूमिमृदुरसुगन्यसंमृताम् । ना सुन्दरतरां निरीक्ष्य स वर्गलोकमुखमन्ययोमयीन ॥२०॥ उत्र सर्णमाकारे जानुः प्रमाणमस्येति जानुदमो या कुगुमोषयः पुप्पसमूहनेन स्तृतागाच्छादितां अत एव उदुर उत्कटो यः सुषु २५ योगनो गन्धन संमृता पूर्णा पुनः सुन्दरतरामतिमनोज्ञा एवंविधा १८ । गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १२५ भूमि निरीक्ष्य दृष्ट्वा स गौतमः स्वर्गलोकस्य सुखं अन्वबोमवीत् अतिशयेन अनुमवति म जानुदमेति जानुशव्दात्प्रमाणेऽर्थे 'दान' प्रत्ययः, सुन्दरतरामित्यत्र 'तसिलादिप्वाकृत्वसुचः' (६३३३५)३ इति पुंबद्भावः । अन्ववोमवीदिति यइलुगन्ताद्भवतेः कर्तरि लङ्॥२०॥ तत्र चप्रवलये समन्ततोऽपश्यदद्भुतमतीव चक्षुपा । यद्विहाय कुलशत्रुतां मिथः सङ्गताः स्थलचराश्च पत्रिणः ॥२१॥ तत्र तस्मिन् स्वर्णमये वप्रवलये प्राकारवलये समन्ततः सर्वप्रदेशेषु गौतमश्चक्षुपा अतीवाऽत्यन्तमद्भुतमाश्चर्यमपश्यत् दृष्टवान् । किमा-९ श्चर्यमित्याह-यघलात्कारणातत्र स्थलचरा गोव्यामादयश्च पुनः पत्रिणः पक्षिणः काकोलकादयो मिथः परस्परं कुलशत्रुतां कुल संबन्धवैरिता, जातिविरोधमित्यर्थः । विहाय त्यक्वा सङ्गता मिलिताः सन्ति, इदमेवाश्चर्यमऽपश्यदित्यर्थः ॥ २१ ॥ ततो गौतमेन यदचिन्ति तदाह- ये विवेकविकला मयाकुलाः प्रायशो गिरिवनाधिवासिनः । ताँस्तिरच इह शात्रवोज्यिवान् मारती भगवतो व्यधात्किल ॥२२॥ किलेति संभावनायां, ये तिर्ययो विवेकविकला विवेकहीनाः पुनर्भयेन माकुला व्यमाः पुनः प्रायशो याहुत्येन गिरयश्च यनानि : च गिरिवनानि तानि अधिवसन्तीति तच्छीलासनिवासिन इत्यर्थः । सन्तीति शेपः । वान् तिरश्चतिर्यग्जीवान् इह प्रदेशे शत्रोर्मावः२२ १२६ श्रीगौतमीयकाव्यं . ५ शानवं शत्रुता तेन उज्झितान् रहितान् , भगवतो भारती वाणी व्यधात् करोति म इति संभाव्यते इति भावः ।। २२ ।। ३तद्धनेर्मधुरिमाऽतिमोहितं द्वीपिनं हरिणयूथमध्यगम् । .. व्याघकण्ठमुपसृत्य संस्थिता मोहिता मृगमृगीर्ददर्श सः॥२३॥ तत्र प्रदेशे स गौतमः तस्य भगवतो ध्वनेर्वाण्या मधुरिम्णा ६माधुर्येण अतिमोहितं द्वीपिनं चित्रकं हरिणयूथस्य मृगसमूहस्य मध्यगं विरोधत्यागेन मध्यवर्जिनं ददर्श, तथा व्याघस्य कण्ठमुपसत्य तत्समीपे गत्वा संस्थिताः सम्यक् प्रकारेण स्थिता मोहिता इव मोहिता मृगाश्च मृग्यश्च मृगमृग्यस्ता ददर्श ॥ २३ ॥ शम्बरोऽपि मृगराजसनिघावुजहाविह तदुद्भवां भियम् । एप एच महिमा महात्मनः कापि येन न कुतः पराभवः ॥२४॥ इह प्रदेशे शम्बरोऽपि पशुविशेषो मृगराजस्य सिंहस्य सन्निधौ समीपे तदुद्भवां सिंहादुत्पन्नां भियं भीति उज्जही तत्याज । एपोऽस्य महात्मनो महापुरुषस्यैव महिमा माहात्म्य, प्रभाव इति यावत् । ७५श्यते इति शेपः । येन कारणेन इह कापि जीवे कुतः कसावपि जन्तोः परामवस्तिरस्कारो न नास्ति । तदेतत्सर्वमसैवं माहात्म्यमिति भावः । इति गौतमश्चिन्तितवानिति वाक्यशेषोऽत्र योध्यः । उज. हाविति । उत्पूर्वात् 'मोहार त्यागे' अस्मात्करि लिट् । तदु- हवामिति । उद्भवत्यमादियुद्भवः, स सिंह एव उद्भव उत्पति- कारणं यस्या इति विग्रहः । भियमिति । 'मयं मी तिरातक' इति दमः ॥२४॥ सारमेयपदंशकं पुनः थोतुमीश्वरगिरः समाहितम् । मुक्तवैरमिव जातसौहदं गांवमः स्थितमऽपश्यदेकतः ।। २५ ।। १२ गोतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १२७ पुनस्तन्न गौतमः ईश्वरस्य भगवतो गिरो वाणीः श्रोतुं, समाहितं समाधियुक्तमेकचिवमित्यर्थः । अत एव मुक्तं त्यक्तं वैरं येन, तन्मु. वैरं, ततश्च जातमुत्पन्नं सौहृद मैत्री यस्य तज्जातसौहृदमिव ३ एकत एकत्र प्रदेशे स्थितं सारमेयवृपदंशकं श्वानमार्जारमपश्यत् दृष्टवान् । सारमेयेत्यादि । सारमेयश्च वृपदंशकश्चेति येषां च विरोधः शाश्वतिक इति समाहारे द्वन्दः 'अस्थिभुग मपणः सारमेयः ६ कौलेयकः शुन' इति हैमः । 'विडाल . ओतुर्मार्जारो ह्रीकुश्च वृप- दंशक' इति च ॥ २५ ॥ आलुलोकदपचापलं प्रभो रतीश्रवणतः स यानरम् । मौनधारिणमिवार्यमानवं क्षामणापरमिवैडकाजकात् ।। २६ ॥ पुनः प्रमोऔरत्या पाण्याः श्रवणत आकर्णनात् अपगतं चापलं चपलत्वं यस्य तमपचापलं, अत एव आर्यमानयमिव सत्पुरुषमिव १२ मौनधारिणं तूष्णीकं स्थितं एवंविधवानरं मर्कटं स गौतम एडका- जकात् मेण्डक-वर्कराभ्यां क्षामणापरं क्षामणां कुर्वाणमिव आल- लोकत् पश्यति स्म । आइपूर्वाल्लोकृषातोथुरादिण्यन्ताकर्तरि लङ् । १५ अग्लोपित्वानोपधाहखः । एडकेत्यादि । एडफश्चाऽजकश्चेति द्वन्द्वे 'विमाषावृक्षमृग- (२।४।१२) इत्यादिना वा एकवद्भावः ॥२६॥ सिंहराष्टिमुपधाप लम्बितग्रीवमत्र गवयः पियन् गिरम् । निर्मयस्तनुमचालयन्निजां गौतमेन ददृशे मनस्विना ॥ २७ ॥ अत्र प्रदेशे गश्यो वनगवः पशुविशेषो लम्बिता ग्रीवा यत्र तलम्पितमीयं यथा साच्या सिंहस्य पृष्ठि पृष्ठपदेशमुपधाय आश्रित्य गिरं मगवाणी पिवन निर्मयः सन् निजां तनुं देहमचालयन् मा.२२ १८ १२८ श्रीगौतमीयकाव्य . कम्पयन् मनखिना सुमनसा गौतमेन ददृशे दृष्टः । शेः कर्मणि लिट् । गवयः स्याद्वनगव' इति हेमः ॥ २७ ॥ ३बोधिदध्वनिविमोहितं शशं तस मित्रमिव चित्रकं स्थितम् । शान्तमेकमपरं च निर्भयं गौतमो गतिथिं विनिर्ममे ।। २८॥ चौघिदस्य मगवतो ध्वनिना विमोहितं शशं मूदुलोमकं पशु- ६ विशेष तथा तस्य शशस्य मित्रमिव स्थित चित्रकं शार्दू तयोर्मध्ये एक चित्रकं शान्तं गतक्रोधं च पुनरपरमन्यं शशं निर्भय एवंविध तत्पशुद्वयं तत्र गौतमो दृशोनेंत्रयोरतिथि प्राघूर्णकं गोचरमित्यर्थः । ९विनिर्ममे कृतवान् । योघिदेति । बोधि सम्यक्त्वं ददातीति विगृहे 'आतोऽनुपसर्गे (३।२।३) इति कः । विनिर्ममे इति । विनि- पूर्वान्माडः करि लिट् ॥ २८ ॥ श्येन-गृध्र-शकुनिक्रमान्तरे रक्तलोचन-शुकादिपत्रिणः। सालमिचिपु गिरोऽनुभावतो वीक्षते स स निराइलोचलान् ।। २९ ।। संगीतमः सालमिचिपु माकारमित्तिपु श्येन-गृभ-शकुनीनां श्येन. गृम-पक्षिणा अमान्तरे चरणमध्ये स्थितान् रक्तलोचन कादिपरिणः १८ पारापत-कीरादिपक्षिणो गिरोऽनुमावतो भगवद्वाण्याः प्रभावात् निरा• फुलं उचलं चिकं ये ते तान् ताशान् पीक्षते स ददर्श । 'धेतो हदयं पिसान्तं गूदपयोचले' इति हेमः ॥ २९ ॥ एतदद्धतमुदीक्ष्प तद्गत गौतमोऽय विममर्श मानसे । योज्य कोऽपि पुरुपो महेयरप्लस चैपमहिमाध्यधार्यते ॥३०) १२ -- ६ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १२९ एतदनन्तरोक्तं तद्गतं वर्णप्राकारसं अद्भुतमाश्चर्य उदीक्ष्य दृष्ट्या अथानन्तरं गौतमो मानसे हृदये विममर्श चिन्तयामास । किं विम- मशेत्याह-चशब्दो वाक्यालङ्कारे, अत्र प्रदेशे यः कोऽपि महे-३ घरः पुरुषो विद्यते एप तस्य महिमा माहात्यं अवधार्यते ज्ञायते ॥३॥. ..शम्भुकोणविनिविष्टमाईत सम कल्पतरुमालिकावृतम् । चित्तमस्य हरति म किं मनो- हारि नैव जगदीश्वरास्पदम् ? ॥ ३१ ॥ तत्र प्राकारे एवं शंमुकोगे ऐशान्यां विदिशि विनिविष्टं स्थित ९ पुनः कल्पतरुमालिकाभिः कल्पवृक्षपुष्पमालामिवृतं वेष्टितं अहंत इदं आईतं सद्म गृहं देवच्छन्दकमित्यर्थः । अस्य गौतमस्य चितं हरति म । युक्तोऽयमर्थः-जगदीश्वरस्य भगवत आस्पदं स्थानं किं मनी-१२ हारि नैव भवेत् : भवेदेवेत्यर्थः । नैवेति । अत्र एवशब्दोऽनव- धारणार्थस्तेन 'एवे चाऽनियोगे' (वा०) इति पररूपम् । इत्यमेव शासान्तरेप्वपि 'रूप्यवप्रे यानानि वर्णवप्रे तिर्यञ्चो देवच्छन्दकं चेति ५ दृश्यते । यदुक्तं श्रीजिनप्रभसरिमिर्विधिप्रपायां नन्दिरचनाधिकारे "पीयपायारंतरे अहि-नउल-मय-मयाहिवाइतिरियाणां, दईयपायारंतरे । दिधनाणाईणं ठवणेति" ॥ (मुद्रित० पृ० ३०) श्रीयशोभद्रसरि- कृतप्राचीनसमवसरणस्तोत्रेऽप्युक्तं च 'पहिवप्पे जागाई, वीर सत्तू- वि मिपमावगया । तिरिया मणिमयरन्दो ईसाणे रयणवप्पयहिंति' । एवं द्वितीये समवसरणस्तोत्रेऽपि योध्यम् । तत्पाठस्तु द्वितीयसर्ग- पृगयेय (मत्र पृ०६१) लिखितोऽस्तीति न पुनर्लिस्यते ॥ ३१ ॥ २२ गो.का. . -१८ श्रीगौतमीयकाव्यं रत्नवप्ररमणीयरोचिपो रागरञ्जितमिवाखिलं नमः। पश्यतो द्विजवरस धीरभूद्रागिणी जिनवरोपसर्पणे ॥ ३२॥ रत्नवप्रस्य यद्रमणीयं रोचिज्योतिस्तस्य रागेण रञ्जितमिवाऽखिलं समसं नम आकाशं पश्यतो द्विजवरस्य गौतमस्य धीवुद्धिर्जिनवरस भगवत उपसर्पणे समीपगमने रागोऽस्त्यस्या इति रागिणी अभूत् ॥३२॥ ६स प्रविश्य वरतोरणेन त भास्वरं वरणगर्भमैक्षत । विश्वनाथमहसाऽभिपूरितं निर्मलाद्भिरिव संभृतं सरः ॥३३॥ स गौतमो यरतोरणेन तं मणिवप्रं प्रविश्य विधनाथरस भगवतो ५महसा ज्योतिपाऽभिपूरितं भृतं अत एव भाखरं दीतिमन्तं वरणस्य प्राकारस्य गर्भ मध्यभागं ऐक्षत दृष्टवान् । ईक्षतेः करि लङ्ग । किमिव । निर्मला या आपो जलानि ताभिः संभृतं पूरितं सर इव भगवन्महसो १२ निर्मलजलेनौपम्यम् , प्राकारमध्यस्य सरसा औपम्यम् ॥ ३३ ॥ दिक्चतुष्कनिगमाऽऽगतामरैः पूर्यमाणमरुचत्तदङ्गणम् । सिन्धुनाथ इव वैगपातिभिः सर्वतः प्रस्तसिन्धुवारिभिः ॥३॥ दिशां चतुष्कस्य ये निगमा मार्गास्तानागताः पाता येऽमरा देवास्तैः पूर्यमाणं प्रियमाणं तस्स प्राकारस्यानणं तदनणं अरुचत् शोमते सा । क इव । चेगेन पतन्ति तच्छीलानि धेगपातीनि है, १८ सर्वतः सर्वासु.दिक्षु प्रसृतानि विस्तानि यानि सिन्धुवारीणि गा- दिनदीजलानि सेः पूर्यमाणः सिन्धुनाथः समुद्र इप, यथा स शोभते तभेदमपीत्यर्थः । अरुचदिति । रुचिधातुरात्मनेपदी पाशुद्धि 'घुभ्यो ललि' (१।३।९१) इति परसौपदं युतादित्वात् प्लेर ॥३४॥ रनपीठमय मध्यराजितं तुलराणमिव मेरुसङ्गवम् । ५ बालरोह स विमोदसुद्धमन् ध्यानपद्धतिमियास्सिवो मुनिः।।३५॥ .

गौतमीयप्रकाशाख्यटीफया सहितम् । १३१ अथानन्तरं ध्यानपद्धति ध्यानमार्ग आस्थित आलम्ब्य स्थितो मुनिरिव विमोहं विमूढत्वं व्यग्रचित्तत्वमिति यावत् , उद्वमन् परि- त्यजन् स गौतमो मेरुणा वर्णाचलेन सङ्गतं मिलितं मेरुसम्बन्धी-३ त्यर्थः । तुङ्गमुन्नतं शृङ्गं शिखरमिव मध्ये रत्नप्राकारस्याऽभ्यन्तरे राजितं शोभितं रत्नपीठमारुरोह आरूढवान् ॥ ३५॥ आतपत्रमिव दण्डमण्डितं सत्प्रवालकुसुमैः करम्बितम् । छाययान विनिवारिताऽऽतपंस न्यभालयदशोकपादयम्॥३६॥ सन्ति समीचीनानि यानि प्रवालाश्च नवकिसलयानि कुसुमानि च पुष्पाणि तैः करम्वितं मिश्रितं पुनश्छायया विशेपेण निवारित ९ आतपो स विनिवारिताऽऽतपस्तं पत्राणामतिसान्द्रत्वादिति भावः। अत एव दण्डेन मण्डितं शोमितं आतपत्रं छत्रमिव स्थितं एवंविधं अशोकपादपमशोकवृक्षं स गौतमोऽत्र रत्नपीठे न्यमालयत् पश्यति १२ म । 'ननु 'भल निरूपणे' अस्य चौरादिकस्याकुश्मीयत्वेनात्मनेपदि- वालकि न्यमालयतेति रूपं स्यात् , ततश्च कथमन परस्मैपदप्रयोग इति चेत्-सत्यं, परमत्र निमालनं निमालः भावे पञ् , तमकरोदिति ५ विगृह्य 'तत्करोति' (ग) ण्यन्ताल्लडिति नोक्तदोपः । करम्बित- मिति । 'करम्बः कवरो मिश्र' इति हेमः ॥ ३६॥ तत्र मूलमनुकृत्य काञ्चने रोरुचन्मणिविचित्र आसने । गौतमोऽनुपमदीप्तिदीपितं वीक्ष्य नाथमपुनानिजे दृशौ ॥३७॥ तत्राऽशोकवृक्षे यन्मूलं स्कन्धपदेशस्तदनुरुत्य पश्चात् कृत्वा, स्थिते इति शेषः । कश्चनस्य विकारः काञ्चनं तसिन् , वर्णमये इत्यर्थः । तथा रोरुचन्तो देदीप्यमाना ये मणयः स्फटिकायाखैर्विचित्रे एवं-२२ .

, श्रीगौतमीयकाव्यं विधे आसने सिंहासने स्थितं, तथा न विद्यते उपमा यस्याः साऽनु- पमा ईदृशी या दीप्तिः प्रभा तया दीपितं नाथं 'श्रीवीरप्रभु वीक्ष्य ३ दृष्ट्वा गौतमो निजे खकीये दृशौ नेत्रे अपुनात् पवित्रयति । 'पून पबने', ऊयादिकोऽसाल्लङ् । रोरुचदिति । अतिशयेन पुनः पुनर्वा रोचन्ते इति रोरुचन्तः यइलुगन्तस्य परस्मैपदित्वात् शंत, ६'नाभ्यस्तस्याचि' (७/३१८७) इति लघूपधगुणनिषेधः । भाष्यमते तु-'अतिशयेऽर्थे रुग्धातोर्य न भवति । भृशं शोभते रोचते ,इत्यादौ यङ् नेत्युक्तत्वात् , तन्मतेऽत्र पौनःपुन्ये एव यइ,' दीपित- मिति णिजन्ताद्दीप्यतेः क्तः ।। ३७ ।। अस्य विश्वपतिदर्शनासहावामुखी यदभवन्मृपामतिः । तद्रभूव सुमतिस्तु संमुखी कुत्र न प्रकृतिमेद ईक्ष्यते ॥३८॥ विश्वपतेर्भगवतो दर्शनं न सहते इति विश्वपतिदर्शनासहा अत एवाऽयाइ मुखं यस्याः साऽवामुखी अधोमुखी, विपरीतेत्यर्थः। एवंविधा यदस्य गौतमस्य मृपामतिमिथ्याधुद्धिरभवत् । तु इति विशेपे, १५ तत् संमुखी अविपरीता मुमतिभूव । युक्तोऽयमर्थ:-प्रकृतेः स्वमा- वस्य भेदो भिन्नत्वं, परावर्त इति यावत् । कुत्र न ईक्ष्यते न दृश्यते ! कारणावाप्सी प्राय:सर्यवेक्ष्यते इत्यर्थः । अतोऽस्यापि मृपामतेः सुमति- १८ तया भवनं युक्तमेवेति मायः । दर्शनेत्यादि । सहते इति सहा पचाय, न सहाऽसहा, दर्शनरयाऽसहेति पष्ठीतत्पुरुषः ॥ ३८ ॥ इत्थं यागृह जनस्स पुरतो यांच प्रतिज्ञा ढां चने वा तु पदे पदे शिथिलपनागत्य नाथान्तिक । तस्यो तन्महमा जडीकत इवाथर्योपभोगाययो पाणी मागवती पियन् प्रमुमुद विद्वत्तमो गौवमः ॥३९॥ १२ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १३३ इत्थमनेनोक्तप्रकारेण अतिशयेन विद्वानिति विद्वत्तमो गौतमो यज्ञगृहे जनस्य लोकस्य पुरतोऽग्रतो यां च दृढां प्रतिज्ञा 'निर्जित्य तं यावदुपैमि गेहम्' (अत्र पृ० १२६) इत्यादिकां चक्रे पुरा कृतवान् , ३. तां पदे पदे शिथिलयन् शिथिलीकुर्वन् नाथस्य श्रीवीरप्रभोः अन्तिके समीपे आगत्य तस्य भगवतो महसा तेजसा जडीकृत इव स्खम्मित इव तस्थौ अवतिष्ठते स्म । तत आश्चर्यस्य उपमोगोऽनुभवनं तेन ६ अवशोऽनात्मवशः, पराधीन इत्यर्थः । एवंविधो गौतमो भगवत इयं भागवती तां भगवत्संवन्धिनी वाणी पियन् प्रमुमुदे प्रकर्पण हर्पितो, बभूव । शिथिलयन्निति । 'तत्करोति' (ग०) इति णिजन्तालटः ९ शत् । प्रमुमुद इति । मुदः करि लिट् । इदं शार्दूलविक्रीडित- वृतं, तल्लक्षणं तु 'सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडित'- मिति ॥ ३९॥ इति गौतमसाऽमृतावेशवर्णनो नाम पष्ठः सर्गः ॥ ६॥ इति अद्भुतस्याश्चर्यस्य आवेशः आटोपस्त्रस्य वर्णनं यसिन्स तयोक्तः, शेषं सुगमम् ॥ इति श्रीगीतमीयप्रकाशाण्यायो श्रीगौतमीयमहाकाव्यव्याख्यायां पठः सर्गः ॥६॥ M १५ सप्तमः सर्गः। अथ विज्ञाय मगवांस्ततस्तीर्थप्रवृत्तये । महसेनवनं क्षेत्रमपापायाः पुरोऽन्तिके ॥१॥ पूर्वाहकाले वैशाखवलकादशीतिधेः । द्रव्यं च गौतमामिख्यं.भावं चरमदेहिताम् ॥ २॥ २१ श्रीगौतमीयकाव्यं ३ . . ६ 'इन्द्रभूते ! त्वमायाही'त्यस्य नामोक्तिपूर्वकम् । वाक्येनालापयामास द्विजं मधुरया गिरा ॥३॥ त्रिभिर्विशेषकम् । विशुद्धविज्ञानकर प्रसार्य द्विजेन्द्रभूतिर्भवसिन्धुमध्यात् । समुद्धृतो येन जिनेश्वराय नमोऽस्तु तस्मै निशलात्मजाय ॥ १॥ अथ ततस्तदनन्तरं भगवान् ज्ञानादिमहातिशयसम्पन्नो वीरप्रभु- खीर्थपवृत्तये चतुर्विधसङ्घपवृत्त्यर्थमपापायाः पुरः अपापासंज्ञिकानगर्या अन्तिके समीपप्रदेशे वर्तमानं महसेनवनं महसेनाख्यं काननं क्षेत्रं ९विज्ञाय ज्ञात्या तथा वैशाखवलकादशीतिथेः माधवमासोज्ज्वलैकाद- शीकर्मवाट्याः पूर्वाहसमये, एतावता वैशाख मु(शु)कादशीदिन- पूर्वभागं च कालं विज्ञायेत्यर्थः । तथा गौतमोऽभिख्या नाम यस्य १२ तथाविधं च द्रव्यं विज्ञाय तथा पुनश्चरमदेहितां चरमशरीरित्वं भावं विज्ञाय, एतेन द्रव्यक्षेत्रकालमावचतुष्टयस्यापि योग्यतां ज्ञात्वा 'हे इन्द्रभूते गौतम ! त्वं मायाहि आगच्छ' इतीत्यंभूतेन वाक्येन वचनेन १५ अस्य गौतमस्य नामोक्तिपूर्वकमभिधानोचारणपूर्वक मधुरया मनोज्ञया मृष्ठा वा गिरा वाण्या द्विजमिन्द्रमत्याख्यं ब्राझणमालापयामास संमापयामास । अथेति । अथशब्दोऽत्र मनलार्थो निपातः, सच १८ मृदसध्वनिवत् स्वरूपेणैव मनलं, यद्वाऽधिकारार्थ आरम्माओं वा, न ..स्वनन्तरार्थः; 'ततः' शब्दस्य वैयर्यापतेः । 'अथो अथ समुधये माले संशयाऽऽरम्माऽधिकारानन्तरेषु च' इत्यनेकार्थः। मगपानिति । २. ऐश्वर्यस्य समनस्य रूपस्य यशसः श्रियः । शन-वैराग्ययोश्चैव पण्णा मग इतीना' ।।१॥ इति पदर्थवादको भगशब्दोऽत्र मासा, स ५५विधतेऽस्पति तदस्सास्ति' (पारा९१) इति मतुप्, 'मादु० .

. गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । (८।२।९) इति मतोर्मस्य वः । पुर इत्यादि (. 'पू: खी पुरीनगर्यो वा' इत्यमरः। 'अन्तिक पुनः पार्श्वे' इति हैमः । पूर्वाञ्जेत्यादि । अहः पूर्वः पूर्वाहः 'पूर्वापर' (२।२।१ ) इत्यादिना समासे . 'राजाहः-३ सखिभ्यः- (५४९१) इति टच् । स चासौ कालव्य तसिन् । वैशाखेत्यादि । एकादशी चासौ तिथिश्च एकादशीतिथिः वलक्षा चासौ एकादशीतिथिश्च वलक्षकादशीतिथिः, वैशाखस्य वलौकादशी-६ तिथिः वैशाखवलौकादशीतिथिस्तस्याः । 'वलशो धवलोऽर्जुन' इत्यमरः । 'तिथिः पुनः कर्मवाटी' इति हैमः । चरमेत्यादि । चरमश्चाऽसौ देहश्च चरमदेहः, सोऽस्ति अस्येति चरमदेही, तस्य ९ भावस्तत्ता, तां मत्वर्थिकेन्नन्ताद्भावे तलं । आयाहीति । आपूर्वात् याधातोर्लोट् । नामेत्यादि । नाम उक्तिः कथनं सा पूर्वा यत्र कर्मणि तत्, क्रियाविशेषणमिदं, 'शेपाद्विभाषा' (५।४।१५४) इति कप् । १२ 'आपोऽन्यतरस्याम्' (७४।१५), इति हसः । आलापयांमांसेति । 'लप परिभाषणे' हेतुमण्णिजन्तादसादाम् । मधुरयेति । मधुरस्तु-प्रिये खादा विति हेमः (अनेकार्थः) । प्रिये मनोज्ञे इत्यर्थः ॥२॥३॥१५ अथ स किं कृतवानित्याह- संस्तुतोऽपि चिरं लोको दुर्लक्षो जनसङ्खले । मामेप कथमज्ञासीदित्यसौ प्रत्यचिन्तयत् ।। ४।।" असौ इन्द्रमतिर्द्विज'इत्यमुना प्रकारेण प्रत्यचिन्तयत् प्रतिचिन्त- यति माइतीति किम् ! । यतश्चिरं चिरकालं संस्तुतोऽपि परिचितोऽपि लोको जनैर्मनुप्यादिभिः सङ्घले संकीर्णपदेशे दुर्लक्षो दुखेन लक्ष-२१ णीयो भवति ततोऽपरिचित एप 'जिनो मा "कथमज्ञासीत् : केन प्रकारेण ज्ञातवानिति चिन्तनपरोऽभूदित्यर्थः । संस्तुत इत्यादि ।२१ . .

श्रीगौवमीयकाध्यं, ३ 'संस्खवः स्यात्परिचय' इति । संकीर्णे तु 'सङ्कुलमाकुल मिति च हैमः॥४॥ पुनः किमऽचिन्तयदित्याह- नामवेत्ता च लोकानां वेत्री चाधन दृश्यते । तदहो कंथमहासीनामवादेन मामयम् १ ॥ ५ ॥ च पुनरवामिन् स्थाने लोकानां नामवेचा नामज्ञाता वेत्री वा वेत्रधारी पुरुषोऽपि न दृश्यते न विलोक्यते, तत् तस्मादहो इति आश्चर्य, अयं जिनो मां नामवादेन नामोच्चारणेन कथमहासीत् हूत- ५वान् ? कथनमन्तरेणैव मदीयं नामाऽनेन कुतो ज्ञातमिति भावः । वेत्री घेति । 'वेत्रं वेत्रदण्डोऽस्साखीति मतुबर्थेइनि, 'दौवारिका मतीहारो वेव्युत्सारकदण्डिन' इति हैमः । वाशब्दोऽप्यर्थः । अहा- सीदिति । आइ पूर्वात् हेनः करि लुङ्ग । नामेत्यादि । वदनं वादः, नामो वादो नामवादखेन ॥५॥ गौतमेत्यभिधानं मे विदितं वर्त्तते जने । १५ आहूयन्ते महान्तो हि प्रायो गोत्रामिधानतः ॥६॥ इन्द्रभूतीति मे नाम विरला बहुसंस्तुवाः । विजानन्ति, ततोऽयं तत् कथमाख्यात्यसंस्तुतः ॥ ७ ॥ द्वाभ्यां संबन्धः। मे मम गौतम' इत्येवंप्रकारममिधानं नाम जने लोके विदिवं प्रसिद्ध वर्धते । कयमित्याह-हि यतो महान्तो महापुरुषाः प्रायो १७ याहुल्येन गोत्रस्य निजान्वयस्थ यदभिधानं नाम : तमादायन्ते, अत्र 'कपमहागीत' विवासीयप्रिसपाट वाद्विपिरामरमणीयः।

९ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । गोत्राभिधानमुच्चार्य संमाप्यन्ते . इत्यर्थः । जनैरिति शेषः । परन्तु मे मम 'इन्द्रभूतिः' इत्येवं नामाभिधानं बहु अत्यन्तं संस्तुताः परि- चिताः विरलाः केऽपि नना विजानन्ति, ततो अयमसंस्तुतोऽपरिचितो३ जिनस्तदिन्द्रमूतीति मे नाम कथमाख्याति कथं वक्ति ? अत्र गौत- मेति इन्द्रमूतीति च पदद्वयं निर्विभक्तिकमेवोपात्तमस्ति, गवित्यय- माहेत्यादिवत् , ततो दोपशङ्का न कार्या । आहूयन्ते इति । आइ पूर्वाद् हेनः कर्मणि लट् । अभिधानत इति । 'ल्यवलोपे-' (वा०) इति कर्मणि पञ्चमी । आख्यातीति । 'ख्या प्रकथने अदादिः, आपूर्वादस्मात्कर्तरि लट् ॥ ६ ॥ ७ ॥ शक्तं पदमपि स्वार्थ सङ्केतग्रहणं विना । नाभिधत्ते ततः कोऽत्र सङ्केतं ग्राहयेत्तु यः ॥ ८॥ तु इति विशेपे, शक्तमपि अर्थप्रतिपादनशक्तियुक्तमपि पदं सङ्के-१२ तस्य ग्रहणं विना सार्थ स्वकीयाभिधेयं नाभिधत्ते न प्रतिपादयति इति नियमोऽस्ति, ततो यो जनः सङ्केतं आहयेत् सकेताहणं कारयेत् सोऽत्रास्मिन् स्थान को विद्यते, न कोऽपीत्यर्थः । इदमन तात्पर्यम्-५ यथा 'गामानय' इत्यादी गोपदं यद्यपि स्वनिष्ठार्थप्रतिपादनसमर्थमस्ति। तथापि इयं सामादिमती व्यक्तिोंपदवाच्येति सकेतो येन प्राग् न गृहीतस्त्रमै खाय बोधयितुं न क्षमं तथाऽत्रापि अयं द्विज इन्द्रभूति-१८ पदवाच्य इत्येवंभूतो यः साकेतस्तद्ग्रहणं विना शक्तमपि इन्द्रभूतिपदं खार्थ गमयितुं न समर्थम् । यदि पुनः कोऽपि सङ्केतग्रहणं कारयेत् तदा तु एतदर्योपपत्तिः स्यात्, परमत्र तु यः सकतं ग्राहयति स २१ कोऽपि न दृश्यते, ततः कथमनेन ज्ञातमयमेवेन्द्रमतिरस्तीति । शक्तमिति । शकिरस्त्यसिन्निति गर्शआदित्वादन् । शक्तिमदि-२५ १३८ श्रीगौतमीयकाव्यं त्यर्थः । अभिधत्ते इति । अभिपूर्वो धान् कथनार्थः, असलात्करि लड् । ग्राहयेदिति । हेतुमण्णिजन्तागृहातेर्लिंड ॥ ८ ॥ प्रत्यक्षीकृतमैश्वर्य प्रागेव गृहनिर्गमात् । सर्वज्ञताऽप्यनेनाऽस्य वाक्येनाऽऽविरभृत्पुनः॥९॥ अस्य वीरजिनस्य ऐश्वर्यमीश्वरत्वं मया गृहानिर्गमोऽमिसरणं ६ तस्मात् प्रागेव प्रथममेव प्रत्यक्षीकृतं साक्षान्निीतं ततः पुनरनेन 'इन्द्रमते ! स्वमायाहि' इत्येवमूतेन वाक्येन अस्य सर्वज्ञता सर्वज्ञत्व: मप्याविरभूत् प्रकटीवभूव, सर्वज्ञ विनाऽन्यः कोऽप्येवं वक्तुं न ९ शक्नोतीत्यर्थः । ऐश्वर्यमिति । ईश्वरस्य भाव इत्यर्थे ' व्यञ् । निर्गमादिति । 'अन्यारादितर' (२।३।२९) इत्यादिना प्रार' योगे पञ्चमी । सर्ववतेति । सर्व वस्तुजातं जानातीति सर्वज्ञस्वस्य १२ भावस्तता भावे तल ॥९॥ किंवा स्वसिसान्निध्यात् श्रियः पुंसो न दुर्लभाः। सर्वज्ञवा तु दुःप्रापा या परब्रह्मनिष्ठिता ॥१०॥ . किंवाऽथवा खर्वासिसान्निध्यात् देवसाहाय्यात् पुंसो मनुष्यस्य श्रियो लक्ष्भ्यो न दुर्लभा न दुःप्रापाः, सुलमा एवेत्यर्थः । परं सा ., सर्वनता तु दुःप्रापा दुर्लभा । सा का इत्याह-येति । या सर्वज्ञता १८ परब्रह्माणि परमात्मनि निष्ठिता निःशेपेण स्थिता, अस्तीति शेषः । अयमर्थ:--एतस्य किल वप्रत्रयादिका या ऋद्धिदृश्यते सा तु देवसा. निध्यादपि संमपति परंतु या परमात्मनि स्थिता सर्वज्ञता साऽस्मिन् फर्थ संभवेदिति । स्वासीत्यादि । सरित्यज्ययं खर्गार्थकम् , २१ खर्गे वसन्तीति खर्वासिनो,देवाः, संनिधर्मावः सान्निध्य, सामीप्य- १५ + स्वः - गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १३९ मित्यर्थः, सर्वासिनां सान्निध्यं स्वर्वासिसान्निध्यं तस्मात् हेती पञ्चमी। येति । या शब्दसंवन्धादनुक्तोऽपि सा इति शब्दोऽध्याहार्यः। परे- त्यादि । परं च तद्रूझ च परब्रह्म, तत्र निष्ठिता । परशब्दः परान-३ धानधर्यवद्वचनः ॥१०॥ सर्वज्ञताप्रतीतिर्वा न वाक्येनाऽगुना भवेत् । नामानि तु समाख्याति पिशाचीसाधको यतः॥११॥ वाऽथवा अमुनाऽनेन प्रागुक्तेन वाक्येन सर्वज्ञतायाः सर्वज्ञत्वस्य प्रतीतिः प्रत्ययो न भवेत् । कथमित्याह—यतो यस्मात्कारणात् नामानि तु अभिधानानि तु पिशाचीसापकोऽपि जनः समाख्याति कथयति,९ एतावता एतन्नामोक्तिमात्रज्ञानेनाऽस्य सर्वज्ञवं न प्रत्येमीति भावः । पिशाचीत्यादि । पिशाचो देवविशेपः, तदपिष्ठिता विद्या पिशाची- त्युच्यते, तस्याः साधको जापादिना निष्पादक इत्यर्थः ॥ ११ ॥ १२ वर्णचूडामणिग्रन्थाऽऽम्नाताऽपि च तथा वदेत् । स्वरशास्त्रप्रवीणोऽपि तथा तुम्बरुचक्रवित् ॥ १२ ॥ च पुनः वर्णचूडामणि म यो ग्रन्थः शास्त्रं तस्यानाचा अभ्यास-१५ फारकोऽपि जनस्तथा तेन प्रकारेण वदेत् कथयेत् यथाऽनेन मदीयं नाम प्रोक्तं, तथा सोऽपि नामान्यमियते। इत्यर्थः । तथा सरशास्ने सरसाधनप्रन्ये प्रवीणोऽपि निपुणोऽपि जनम्तथा वदेत् क्या पुन: स्तुण्यरुचकं प्रन्यविशेपं येचीति तुम्बरुचवित् सोऽपि तथा. यदेत् । एतावता सर्वज्ञत्वं विनैव एतेपां शास्त्राणां पलादपि अज्ञातस्य नामा- . मिधानं संमवतीति भावः । आनातेति ।'मा अम्पासे' आपूर्वा- दलातरि तृ ॥ १२ ॥ २२ श्रीगौतमीयकाव्यं इत्येवं विमृशत्यसिन् भगवान् पुनरब्रवीत् । मयि सर्वज्ञतायां त्वं मा धा गौतम ! संशयम् ॥ १३ ॥ ३ अस्मिन् गौतमे इत्येवं प्रागुक्तप्रकारेण विमृशति विचारयति सति मगवान् सर्वज्ञो वीरप्रभुः पुनः अब्रवीत् पुनरपि कथयामास । किमब्रवीदित्याह-हे गौतम ! मयि मद्विपये सर्वज्ञतायां सर्वज्ञत्वे वं ६ संशयं सन्देहं मा धाः मा धारय, मा प्रामुहीति यावत् । विमृशति 'मृश आमर्शने' विपूर्वादस्मात्करि लटः शतृ । अब्रवीदिति । बः करि लङ्ग । मा धा इति । 'डुधाञ् धारणादौ' माङि उप- ९पदेऽसात् 'माङि लुङ(३।३।१७५) इति लुङ् ॥ १३ ॥ मनु कथं सर्वज्ञत्वप्रत्ययो मे स्यादित्याशङ्कयाह- यदहं संशयच्छेदी सर्वज्ञ मां प्रतीहि तत् । अन्यथाऽनुपपत्येवापत्तिमवधारय ।।१४।। हे गौतम ! यद्यस्मात्कारणादहं संशयच्छेदी सन्देहभेदकोऽलि, ततस्माद्धेतोमा त्वं सर्वज्ञ प्रतीहि जानीहि । एतदेवोपपादयति- १५ अन्यथाऽन्येन प्रकारेणानुपपत्त्यैव उपपचेरमावेनैव स्वं अर्थापति- मर्थस्य प्राप्तिमवधारय विचारय । इदमन तात्पर्यम्- सामावे संशयोच्छेदकत्वानुपपत्तिः स्यात् , तत एव संशयोच्छेदकत्वेन १८सर्वज्ञत्वमायातमित्यवधारय । एतेनापिचिममाणमुक्तमथ तस्वरूपं स्पष्टतया दयते, यथा 'पीनो देवदत्तो दिवा में, मुझे इति दृष्टे भुते या पीनताऽन्यथानुपपत्त्या रानिमोजनमर्थापत्त्या करप्यते तयाऽत्रापि सफलजनमनोगतसंशयच्छेदी वीरजिनः कमपि कर्णमूल मागत्य चिन्तिवार्थनिवेदकं देवं नाराघयतीत्यन्न सफलजनमनोगत संशयच्छेदित्साऽन्यथानुपपत्त्या सर्वजत्यमर्यापत्या प्रमायातमिति । (-यतः सर्वज्ञ- , गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । संशयेत्यादि । संशयं छिनत्तीत्येवंशीलः संशयच्छेदी, छिदेणिनिः । प्रतीहीति । प्रतिपूर्वात् 'इण् गतौ' इत्यस्मालोट् । अवधारयेति । 'धृन धारणे अवपूर्वादमाणिच् ॥ १४ ॥ त्वमापृच्छख या मा वा वेभि ते संशयानपि । परस्परविरुद्धार्थवेदवाक्यसमुद्भवान् ॥१५॥ पुनरपि प्रमुर्वक्ति हे गौतमत्वमाटच्छस प्रश्नं कुरु वा मा वा प्रच्छख मा प्रश्नं कुरु वा अहं परस्परेण विरुद्धोऽर्थो येषां वानि तथा- विधानि यानि वेदवाक्यानि तेभ्यः समुद्भव उत्पचियेषां ते तान् ते तव संशयान् सन्देहानपि वेनि जानामि वेदवाक्यानामन्योन्याविरुद्ध-९ मप्यर्थं प्रमाद् विरुद्धत्वेनाशङ्कमानस्य ते हृदि संशयाः समुत्पन्नाः सन्ति तानप्यहं जाने, त्वं निजेच्छया प्रश्नं कुरु मा कुरु वेति भावः । आएच्छखेति । प्रच्छेः करि लोट् । 'ननु 'पच्छ ज्ञीप्सायाम्' इत्यस्य १२ परस्मैपदित्वात्कथमत्रात्मनेपदप्रयोगः? इति चेत्'-उच्यते-पदव्य- वस्थायाम् 'माछि नुपच्छ्योः' (वा०) इति सूत्रेणाइपूर्वात् प्रच्छे- रात्मनेपदविधानान दोपः॥ १५ ॥ अविरुद्धोऽपि मोहाचे विरुद्धोऽर्थोऽवभासते । शहो विरुद्धवर्गद्वीक्ष्यते तिमिरामयात् ॥ १६ ॥ अर्थसंबन्धाद्वेदवाक्यपदमध्याहार्य; ततोऽयमर्थ:-हे गौतम ! १८ वेदवाक्यानामविरुद्धोऽपि विरोधरहितोऽपि अर्थों मोहादज्ञानाचे तव विरोधयान् अयमासते प्रतिमाति । एतदेवार्थान्तरन्यासेन द्रढ-२० १पत्र 'वेदवाक्ये समुद्भवान्' इति फाशीमुदितपाठोऽसमय:1 २ मत्र तो विरुदयों' इति कात्रीमुक्तिपाठः स च टीचहतामसम्मतः प्रविमाति ।

१४२ श्रीगौतमीयकाव्यं ९ यति यत् यस्मात् कारणात् तिमिरामयात् काचकामलरोगत् शङ्ख- कम्युर्विरुद्धवर्णैक्ष्यिते विलोक्यते, नरेणेति शेषः । एतावता : यस्य ३नेत्रयोस्तिमिररोगोत्पत्तिर्जायते स नरः श्वेतवर्णमपि राई विरुद्धैः पीतादिवर्णः पश्यतीत्यर्थः। मोहादिति । 'मोहो मूर्छाविपर्यया विति हैमः (अनेकार्थः) । विपर्ययो विपरीतज्ञानमित्यर्थः । वीक्ष्यते इति । ६ विपूर्वादीक्षतेः कर्मणि लट् । तिमिरेत्यादि । तिमिरं चासावामयश्च तिमिरामयस्तस्मात् हेतौ पञ्चमी। तिमिरं तु दृष्टिरोगान्धकारयो रित्य- नेकार्थः । 'सी रुग् रुजा चोपतापरोगव्याधिगदामया' इत्यमरः ॥१६॥ अथ धीरस्तावतदीयखान्तगतं संशयं प्रकटयतीत्याह-. तावदात्मनि सन्देहस्तव चेतसि वर्तते । जीवः किमस्ति या नास्ति मुहुर्विमृशसीति यत् ॥१७॥ हे गौतम ! तावत्प्रथमं तव चेतसि त्वदीये मनसि आत्मनि सन्देहो जीवविषयकः संशयो वर्तते विद्यते । कथमित्याह-जीव इत्यादि । यद्यस्माद्धेतोः किं जीव आत्माऽस्ति विद्यते । वाऽथवा १५ नाम्ति न विद्यते इत्येवं मुहुर्यारं वारं वं विमृशसि विचारयसि, ततोऽस्माभियते ते हदि आरगविपयका सन्देहोऽस्तीत्यर्थः । विमृशसीति । 'मृग आमर्शने' करि लद ॥ १७ ॥ नन्वयं केन हेतुना जीवस्य नास्तित्वं चिन्तयति :. केन चास्ति- खम् ! इत्यागक्ष्य तायनास्तित्वे हेतूनाह- प्रत्यक्षेण प्रमाणेन ग्रहीतुं नप शक्यते । इन्द्रियग्रापंताऽभावात्तमानास्ति खपुष्पवत् ।। १८ ॥ इन्द्रस्याऽऽत्मनो लिन विदमिन्द्रियं चक्षुरादि, ग्रहीतुं योग्यो माया,

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गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् ।
इन्द्रियेण ग्राह्य इन्द्रियग्राह्यः तस्य भाव इन्द्रियग्राह्यता, तसा अमाव
इन्द्रियग्राह्यताऽभावस्तस्मात् चक्षुरादीन्द्रियग्राद्यत्वाऽमावादेप आत्मा
प्रत्यक्षेण प्रत्यक्षामिधानेन प्रमाणेन ग्रहीतुं ज्ञातुं न शक्यते, तसाढेतोः ।
खपुष्पवदाकाशकुसुमवदसावात्मा नास्ति, एतावता चक्षुरादीन्द्रियमेव
प्रत्यक्षप्रमाणमुच्यते, तेन च योऽग्राह्यः स नास्ति, यथा खपुष्पं तथा-
ऽसाबपीति । अयमत्र प्रयोगःनास्त्यात्मा प्रत्यक्षेणात्यन्तमगृह्य-६
माणत्वात् , इह यदत्यन्ताप्रत्यक्षं तल्लोके नास्त्येव, यथा खपुप्प
यच्चास्ति तत् प्रत्यक्षेण गृह्यते एव, यथा घट इत्यसौ व्यतिरेक-
दृष्टान्तः । अणवोऽपि ह्यप्रत्यक्षाः, किंतु घटादिकार्यतया परिणताः९
सन्तस्ते प्रत्यक्षत्वमुपयान्ति, न पुनरेवमात्मा कदाचिदपि प्रत्यक्ष-
भावमुपगच्छति, अतोऽत्रात्यन्तविशेषणमिति सूत्रेऽपि इन्द्रियग्राह्यता-
भावादित्यतः प्राक् अत्यन्तमिति पदमनुकमपि वाच्यम् । प्रत्य-१२
क्षेणेति । अक्षि अक्षि प्रति प्रत्यक्षं वीप्सायां यथार्थत्वेन समासः ।
यद्वाऽक्ष्णामाभिमुख्यमित्यर्थे लक्षणेन 'अमिप्रति- (१।३।८०)
इति समासः । 'प्रतिपरसमनुभ्यऽक्ष्णः' (सिद्धांतको०) इति समा-१५
सान्तप्टच् । चिविपयेऽशिशब्द इन्द्रियमात्रपरः न तु चक्षुर्मात्रपरः ।
प्रत्यक्षलक्षणं तु अग्रे मूले एव वक्ष्यति । प्रमाणेनेति । 'प्रमाकरणं
प्रमाण मिति तल्लक्षणं, प्रमा यथार्थज्ञानं । प्रपूर्वान्माडः करणे त्युह । १०
ग्राह्येति । अहेरहेऽथें ण्यत् ॥ १८ ॥
'एवं च मन्यसे वं किमित्याह--
कृशानो महिनं किमप्यस्य न लभ्यते ।
यत्सम्बन्धेन जीवोऽयमदृष्टोऽप्यनुमीयते ॥ १९ ॥

१४४ श्रीगोतमीयकान्य कृशानोर्वहेमवत् अस्यात्मनो लिनं चिहं किमपि न लभ्यते न प्राप्यते, यथा वहेश्विहं घूमः साक्षालभ्यते तथाऽस्य किमपि नेत्यर्थः। ३ ननु लिङ्गस्य किं प्रयोजनमित्यत आह-यदित्यादि । यस्स लिऑस्य सम्बन्धन लिङ्गिना साई सम्बन्धस्मरणेन अदृष्टोऽपि अनक्लोकितो- ऽपि अयं जीवोऽनुमीयते अनुमानगोचरः क्रियते, साशं लिङ्गं ६ किमपि न लभ्यते इत्यर्थः । कृशानोरिति । 'कृशानुः पावकोऽनल' इत्यमरः । लिङ्गमिति । 'लिल्यते गम्यतेऽतीन्द्रियार्थोऽनेन' इति लिङ्गम् । अनुमीयते इति । अनुपूर्वान्माडः कर्मणि लट् ॥ १९ ॥ ९अस्तु वा चेतना लिङ्गं सम्बन्धस्त्वनयाऽस्य च । प्रत्यक्षो नेक्षितः कापि प्राक् ततः काऽनुमेयता? ॥२०॥ वाऽथया चेतना चैतन्यस्वरूपं लि# चिह्नमस्तु । आत्मानुमिता- २विति शेपः । परं अस्यात्मनोऽनया चेतनया सह प्रत्यक्षः साक्षातः सम्बन्धः संसर्गस्तु प्राक् पूर्व कापि कुत्रापि प्रदेशे नेक्षितो न हष्ट- स्वतस्तस्मात्कारणादस्य काऽनुमेयता किमनुमेयत्वम् ! अनुमानविषय. १५त्वमिति यावत् । प्रत्यक्षपूर्वकं हि अनुमान प्रवर्चते इति भावः । अनयेति । सहास गम्यमानत्वात् । 'सहयुक्ते (२३११९) इति तृतीया, अस्य चेत्यत्र चः पादपूरणे । प्रत्यक्ष इति । प्रत्यक्षं ज्ञानमस्ति १८ अस्येति मतुवर्थेऽर्शआयच् । ईक्षित इति । 'ईक्ष दर्शनादी' कर्मणि कः । अनुमेयतेति । अनुमातुं योग्योऽनुमीयतेऽसाविति वाऽनुमेयः । १जीवगायकदेवोः। २ टिलिना जीवेन। ३ धनु-हेतु प्रहण समाभ- ग्मरणयोः पयागीयते परियोजनेसामानम् , प्रणयान देना भयोः सम्बन्धस्य, उप महा प्रशामकम् , ठेन पर्वत्र तयोझिदिनिमावोड -नायो।

- गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १४५ माङः 'अचो यत्' (३३११९७) इति यत् । 'ईद्यति' (६४।६५) इति ईकारे गुणः । तस्सं मावस्तता ।। २० धूमान्योरपि सम्बन्धो गृहीतो हि महानसे । ३ पश्चात्सरणतः शैले धूमोऽग्निं प्रतिपादयेत् ॥ २१॥ हीति निश्चये, धूमश्चाऽग्निश्च धूमानी, तयोघूमवढ्योरपि लिङ्ग- लिनिनोः सम्बन्धः कार्यकारणमावादिकः संसों येन केनापि नरेणई यदा पूर्व महानसे पाकस्याने गृहीतः साक्षात्कारेणोपातो भवेत् तदेव तं नरं प्रति पश्चात् कदापि मरणतः प्राग्गृहीतसम्बन्धस्मरणात् शैले पर्वते घूमोऽमि प्रतिपादयेत् ज्ञापयेत् , अग्नेः प्रतिपत्ति कुर्यादि-९ त्यर्थः । इदमत्र तात्पर्यम्-पूर्व यत्र धूमस्तत्र वहिरिति महानसादौ वहिघूमयोलिनिलियोर्व्याप्तिं गृहीत्वा तत उत्तरकालं कचित्पर्वतादौ गगनावलम्बिनीं घूमलेखामवलोक्य प्राग्गृहीतं सम्बन्धमनुस्मरति, १२ तद्यथा-'यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र प्रागहं पहिमद्राक्षं, यया महानसादी, धूमश्चात्र दृश्यते, तस्माद्वहिनाऽपीह भवितव्यम्' इत्येवं लिङ्गग्रहण- सम्बन्धमरणाभ्यां तत्र प्रमाता वहिमवगच्छति, न चैवमात्मनो लिझि-m नश्चेतनया लिङ्गेन साई प्रत्यक्षेण सम्बन्धः सिद्धोऽस्ति, यतस्तत्सम्ब- न्धमनुसरतः पुनस्तलिङ्गदर्शनाजीवे संप्रत्ययः स्यात् , किंच यदि पुनर्जीवलियोः प्रत्यक्षरूपा सम्बन्धसिद्धिः स्याचदा जीवस्यापि प्रत्यक्ष-10 खापत्त्याऽनुमानवैयर्य स्यातत एव तत्सिद्धेरिति । एतेन अस्तु येति धूमाम्योरिति च श्लोकद्वयं सममेव भावितं । महानस इति । 'पाकस्सानं महानस'मिति हेमः। प्रतिपादयेदिति । 'पद गौ' :. प्रतिपूर्वः हेतुमण्णिजन्तादसालिङ ॥ २१ ॥ १ प्रतिपत्ति ज्ञान मित्सर्पः। १.गो. का. २२ श्रीगौतमीयकाव्यं ४ सामान्यतोऽपरत्रापि यद्वा व्याप्त्या गृहीतया ! संसाधयेदनुमिति वापि स्थानेऽनुमित्सिते ॥ २२ ॥ ३यथा स्थानान्तरप्राप्ति पुंसो गत्यावलोक्य च । रखेर्देशान्तरमाया गतिं लोकोऽनुमानयेत् ॥ २३ ॥ तथा सामान्यतो व्याप्ति जीव-चैतन्ययोः पुरा । * गृहीता केन ?, तसान्नाऽनुमानं त्वय साधकम् ॥ २४ ॥ त्रिभिः संवन्धः । यद्वाऽथवा सामान्यतः सामान्येन अपरत्रापि अनुमित्सितादन्यत्रापि ९आपाततो गृहीतया व्याप्त्या साध्यसाधनयोर्नियतसाहचर्यलक्षणया वापि कस्मिन्नपि अनुमित्सितेऽनुमातुमिष्टे स्थानेऽनुमिति संसाधयेत् अनु- मितेः सिद्धिं कुर्यात् , जन इति शेषः । कथमित्याह-यथेत्यादि । १२ यथा लोको जनः पुंसो गत्या गमनेन पुरुषस्य स्थानान्तरप्राप्तिं विवि- क्षितस्थानादितरस्थानप्राप्तिमवलोक्य दृष्ट्वा, देशान्तरमात्या अपरस्थान- प्रात्या रवेः सूर्यस्य गतिं गमनमनुमानयेत् । रवर्गतिमत्तासाधकमनुमानं १५कुर्यादित्यर्थः । 'मन्वेवं जीवस्यापि सिद्धिर्भविष्यति' इत्यत आह-- तथेत्यादि । तथा तेन प्रकारेण पुरा पूर्व सामान्यतो जीवचेतनयो- लिक्निलिनयोाप्तिः केन हयान्तेन गृहीता, न केनापीत्यर्थः । तस्मादेतोरनुमानमनुमानाख्यं प्रमाणं तु अस जीवस साधकं नाति । अनेन प्रमाणेन तुजीयसिद्धिर्न स्यादित्यर्थः । इदमत्र नात्पर्यम्-'यथा गतिमान् आदित्यो देशान्तरप्राप्तेदेवदत्तपदिति सामान्यतो दृष्टादनु २१मानादाऽऽदित्यगतिः सिधति-~'तया सामान्यतो दृष्टादेवानुमाना- १ यत्राय लिरिदिनोः एम्बन्धे, नविन पिस पागम्याद प्रयोगम्यते सत् सामान्यतोत्रमनुमानम् ।

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । .१४७ जीवोऽपि सिध्यतीति तुन वक्तव्यं, यतो हन्त देवदत्ते दृष्टान्तधमिणि सामान्येन देशान्तरप्राप्ति गतिपूर्विको प्रत्यक्षेणैव निश्चित्य सूर्येऽपि तां तथैव प्रमाता साधयतीति युक्तं, न चैवमत्र कचिदपि दृष्टान्ते जीव-३ सद्भावेनाविनाभूतः कोऽपि हेतुः प्रत्यक्षेणोपलक्ष्यते इति, अतो न सामान्यतो दृष्टादप्यनुमानाचसिद्धिरिति । संसाधयेदिति । 'साध सेसिद्धी' संपूर्वीत् णिजन्तादमाथिइ । अनुमित्सिते इति । अनुपूर्वा- सन्नन्तान्माः कर्मणि क्तः। स्थानान्तरेत्यादि। अन्यत् स्वानं स्थाना- न्तरं, मयूरव्यंसकादित्वात्समासः [मयूरव्यंसकादयश्च (२१११७२)] एवमन्यो देशो देशान्तरमित्यपि योध्यम् । अनुमानयेदिति । अनु-९ मानशब्दात् 'तत्करोति' (ग०) इत्यर्थे णिच् , ततो लिङ्ग ॥२२-२१॥ न चागमगम्योऽपि जीव इति दर्शयति- सादागमोऽप्यदृष्टार्थविषयो याप्तनिर्णयात् । प्रमाणं, कः स चानाऽऽप्तः प्रत्यक्षं योऽमुमीक्षते ॥ २५॥. हीति निश्चये, अदृष्टः साक्षादनुपलब्धो योऽर्थः सर्गनार- कादिपदार्थः स विपयो गोचरो यस्य स तयाभूत आगमोऽपि १५ शब्दोऽपि प्रमाणं स्यात् । कुत इत्याह-आतेत्यादि । आप्तो यथार्थवक्ता, तस्य निर्णयो निश्चयस्तस्मात् आप्तेन निर्णीतत्वात् । यद्येवं तर्हि अनेनैव जीवोऽपि सिध्यतीत्याशत्याह-क इत्यादि 116 यघप्येवं तथापि योऽमुमात्मानं प्रत्यक्षं साक्षाद्रपमीक्षते पश्यति स चाऽत्र असिन् लोके आप्तः कोऽस्ति ! न फोऽपीत्यर्थः । एतावता न एवंभूतमा कमपि पश्यामो यस्याऽऽमा प्रत्यक्ष इति । तद्वचन. इति । तद्वचनमागम इति प्रतिपमहीति भावः ॥ २५ ॥ ५ नियतसहवारी इत्यर्थः। १३ श्रीगोतमीयकाव्यं ३ परस्परविरोधिन्यागमानामपि भारती। वृहस्पतिर्हि भूतातिरिक्तं जीवं न मन्यते ॥ २६ ॥ किंच, आगमानामपि भारती आगमसम्बन्धिनी अपि वाणी परस्पर- विरोधिनी अन्योन्यविरुद्धा विद्यते। एतावता तीथिकानां सम्बन्धिनः सर्वेऽप्यागमाः परस्परविरोधिनः खल, अतोऽपि संशय एवात्मनो ६युक्तो न तु निश्चय इति भावः । अथ केपांचिदागमानामात्मनो नास्तित्वप्रतिपादनेन, केपांचिच अस्तित्वप्रतिपादनेन यथा विरोधदावी तथा सार्द्धपट्श्लोकैरुपदर्शयति । वृहस्पतिरित्यादि । हि यतो बृह- ९ स्पतिवृहस्पतिनामा नास्तिकमतप्रवर्तकऋषिः भूतेभ्यः पृथिव्यतेजोवा- ग्वाकाशलक्षणेभ्यः पञ्चभ्योऽतिरिक्तं पृथामूतं जीवमात्मानं न मन्यते नानीकरोति । यत् सलु भूतपञ्चकं तदेवात्मा न तु ततोऽन्य इति १२ मन्यते इत्यर्थः । तथा च तदागमः-'एतावानेव लोकोऽयं यावा- निन्द्रियगोचरः । मद्रे! वृकपदं पश्य यद्वदन्ति न्त्यबहुश्रुताः' (प. दर्शनसमुञ्चय लो०८१)॥ इत्यादि । मन्यते इति । 'मन ज्ञाने' १५दिवादिरलात्करि लट् ॥ २६ ॥ विज्ञानधन एवेति वेदवाक्याशयोऽप्ययम् । संभाव्यते तथा खेप भू-जला-ऽनल वायुतः ॥ २७ ॥ विमानयन उत्पद्य तान्येवानुविनश्यति । प्रेत्येति परलोकेऽस्य कापि संघा न लम्यते ॥ २८॥-युग्मम् । "विज्ञानधन वैतेभ्यो मतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न २॥ष प्रेत्यशाऽसी"त्येवंगूतं यद्वेदवाक्यं तस्याऽऽशयोऽभिपायोऽपि अयं १नालिसप्रतिपादन गीविरोधा, भलिलप्रतिपादन जीवभाव पवा। मुदितमन्ये अयमेटपपारः, "प पिन्सः।

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १४९ जीवनास्तित्वलक्षण एवं संभाव्यते विचिन्त्यते, मयेति शेषः । कथ- मेतत् ज्ञायते इत्यत आह-तथा हीति । निदर्शनेऽव्ययमिदं, तदेव दर्शयतीत्यर्थः, एप प्रत्यक्षविलोक्यमानो विज्ञानधनः पृथि- ३ व्यादिभूतानां विज्ञानलवसमुदायः पृथिव्यादिविज्ञानांशानां पिण्डरूप आत्मेत्यर्थः । मू-जला-ऽनल-वायुतः समुदितेभ्यः पृथिव्यतेजो- वावाकाशेभ्यो न तु व्यस्त्रेभ्यो, ज्ञानस्य तत्समुदायपरिणामानी-६ कारादिति भावः । मद्यकारणेषु धातक्यादिषु मदभाव इत्र उत्सव प्रादुर्मूय, न तु परभवादागत्य ततस्तान्येव पृथिव्यादीनि भूतानि विनाशमनुवानानि अनुलक्षीकृत्य स विज्ञानमात्ररूप आमा विनश्यति ९. प्रलयं याति नत्वात्मवादिनामिवान्यमवं प्रयाति, अत एव प्रेत्येति । अस्य कोऽर्थः ! परलोके लोकान्तरेऽस्यात्मनः कापि संज्ञाऽमिख्या न लम्यते न प्राप्यते, यत्पूर्वभवे नरकादिजन्मनि १२ अभिधानमासीत्, तत्परभवे नास्ति, यदुताऽमुको नारको देवो मूत्वा इदानीं मनुष्यः संवृत्त इत्यादि । नारकादेः प्रागेव सर्वनाशं नष्टत्वा- दिति भावः । एतेन सर्वथाऽऽत्मनः समुत्पद्य विनष्टत्वान्न भवागवा-१५ न्तरं कोऽपि यातीति तात्पर्यवृत्त्या निवेदितं, मूले विज्ञानघन एवेति वाक्यैकदेशः समग्रवाक्योपलक्षको ज्ञेयः । संभाव्यते इति । संपूर्वाण्णिजन्ताद्भवतेः कर्मणि लट् । भूजलेत्यादि । भूश्च जलं १८ चानलश्च वायुश्च एषां समाहारो भूजलानलवायु तस्मात् समाहारद्वन्द्व विधानात्समुदितानामेवैतेषां ग्रहणं, न तु व्यस्खानामिति भावः । इहा- काशपदमनुक्कमपि संपाय, 'पञ्चम्तमयो खात्मा' इत्यादितच्छाखोक-२१ त्वात् । वानीति | 'लक्षणेत्मृतः ८१९०) इत्यादिनाऽनोः (अनु उपसर्गस्य ) कर्मप्रवचनीयसंज्ञवांद , सपोगे 'कर्मभव-२३ १५० श्रीगौतमीयकाव्य ३ (२३२८) इत्यादिना द्वितीया, संजेत्ति 'गोत्रसंज्ञा नामयाs- स्याऽऽहाऽभिख्याश्च नाम चेति हैमः ॥ २८ ॥ शून्यतामेव मन्वानाः सौगताः शून्यवादिनः । क्षणिकत्वात्सतोऽप्यन्ये चौद्धा जीवं न मन्यते ।। २९ ।। तथा सुगतो बुद्धो देवता एपामिति सौगता बौद्धदर्शनिनो मुनयः र शून्यतां शून्यत्वमेव मन्वानाः सीकुर्वाणाः सन्तः शून्यं निराकार वदन्तीति शून्यवादिनः, विद्यन्ते इति शेषः । ते हि सर्व शून्यमे- वास्ति, न तु किमपि तात्त्विकमिति खहृदि श्रद्दधानाः सन्त एतदेव ९ जनानां पुरः प्ररूपयन्तीति भावः । अथान्ये' केचित् बौद्धा बौद्धम- तैकदेशिनो विद्वांसः सतोऽपि विद्यमानस्यापि वस्तुनः क्षणिकत्वात् क्षणमात्रावस्थायित्वात् जीवमात्मानं न मन्यते न स्वीकुर्वन्ति । ते हि २२ 'यत् सत् तत् क्षणिकम् इति व्याप्तिमङ्गीकृत्य सतोऽपि जीवस्य क्षणि- कत्वान्नास्तित्वमेव प्रतिपद्यन्ते इत्यर्थः । मन्याना इति । 'मन ज्ञाने तानादिकादलात्कर्तरि लटः शानम् । सौगता इति । 'सास १५देवता' (8२।२१) इत्यण । 'सर्वज्ञः मुगतो बुद्ध' इत्यमरः । 'शून्ययादी तु सौगत' इति हैमः । क्षणिकेति । क्षणिकस्य भावः क्षणिकत्वं तन्माद, 'द्वितीयक्षणवृतिध्वंसमतियोगित्व' क्षणिकत्वमिति १८ सहक्षणम् । मन्यत इति । तानादिकान्मने करि लद ॥ २९॥ १ एक एव पुर उपदेश परत तस्स शिप्या धतुर्विधा भिषमतय आसन् । संपु मायामानुपादिना गर्वशन्दतावादिनः सई क्षणिक मदते । स्पतिमितीपक्षाने तिर्यस्य एवंधियो यो नारा: तस प्रतियोगिता तत्सनि, सस्थामावस प्रतियोगी सः । सन्मठे प्रथमपणे वन पति दीपने दस नाम: .. .

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १५१ अस्तित्वमपि जीवस्य संमवेद्वेदवाक्यतः । तथा हि जुहुयादग्निहोत्रं वर्गस्य कामुकः ॥ ३० ॥ वेदवाक्यतः श्रुतिवाक्यात् जीवस्य अस्तित्वं सद्भावोऽपि संभ-३ वेत् । कथमित्याह-तथाहीति । तदेव दर्शयति-'वर्गस्य कामु- कोऽभिलापुको जनोऽमिहोत्रं क्रियाविशेपं जुहुयात् यजेत' इति । असाद्वेदवाक्यात् जीवास्तित्वं संमवति, यतो जीवस्य सद्भावं विना वर्गमाप्तिः कस्य भवेदिति भावः । जुहुयादिति । 'हु दानादौ' अस्माकर्तरि लिङ्॥३०॥ अशरीरं वसन्तं वा स्पृशतो न प्रियाऽप्रिये । प्रियाऽप्रियपरित्यागः सशरीरस्य नास्ति हि ॥३१॥ तथा प्रियं चाप्रियं च प्रियाऽप्रिये रागद्वेपो, नास्ति शरीरं यस्य सोऽशरीरो निरुपाधिक आत्मा तं तथाभूतं वसन्तं तिष्ठन्तं प्रति न १२ स्पृशतो न स्पर्श कुरुतः । हीति निश्चये, सह गरीरेण वर्चते इति सशरीरः, सकर्मक आत्मा तस्य प्रियाऽप्रिययो राग-द्वेपयोः परित्यागो निर्मुक्तिर्नास्ति । वाशब्दः पादपूरणे । एतावता 'न ह वै१५ सगरीरस प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वा वसन्तं प्रियाप्रिये न स्टगत' इति वेदवाक्यमपि आत्मनोऽस्तित्वप्रतिपादकमेव, अन्यथा- ऽशरीरतेनावस्थानासमवादिति भावः ॥ ३१ ॥ अकर्ता निर्गुणो मोक्ता चिद्रूपः पुरुषः स्मृतः। एवं विरुद्धार्थवाद निवद्धा आगमा यतः ॥ ३२ ॥ तथा करोतीति कर्चा न कर्ता अकर्ताऽक्रियाफारकः तथा निर्गता गुणा रागादयो यलात् स निर्गुणो रागादिवर्जितस्तथा भुनतिर 10 १५२ श्रीगौतमीयकाव्यं अनन्तसौख्यमिति मोक्ता परमानन्दसंपन्नस्तया पुनश्चिद् ज्ञानमेव रूपं स्वरूपं यस्य स चिद्रूपोऽनन्तज्ञानमयस्तयामूतः पुरुष आत्मा स्मृतः ३ कथितः । एतेन 'अस्ति पुरुषोऽकर्ता निर्गुणो भोक्ता चिद्रूप' इत्यादि- कापिलागमेऽपि जीवास्तित्वमेव प्रतिपाद्यते इत्यर्थः । एवं प्रागुक्त प्रकारेण यतो हेतोः आगमा आप्तोक्यो विरुद्धो योऽसौ अर्थ- वादोऽर्थकथनं तेन निघद्धा प्रथिताः सन्ति, तस्मादागमानां परस्पर- विरुद्धवान्नागमप्रमाणादप्यात्मसत्त्वसिद्धिरिति भावः ॥ ३२ ।। उपमाप्रमाणगम्योऽप्यसौ न भवतीत्याह- आत्मसादृश्यमाविन प्रत्यक्षं न हि वस्तु तत् । यस्योपमाप्रमाणेन साधनीयोऽसुमान् भवेत् ।। ३३ ॥ आत्मनो जीवस्य सादृश्यं तुल्यत्वमाविमत् दधानं तत् प्रत्यक्षं १२ प्रत्यक्षज्ञानविषयं वस्तु पदार्थो न हि अस्ति-यस्य वस्तुन उपमा- प्रमाणेन सादृश्यप्रमाणेन अनुमान् जीवः सापनीयो भवेत् साध्यः स्यात् । इदमत्र तात्पर्यम्---उपमापमाणमप्यस्य साधकं नास्ति, तत्र हि ५ गोसदृशो गवय इत्यादाविव सादृश्यमसन्निकृष्टेऽथे युद्धिमुत्पादयति । न चहान्यः कश्चिनिमुवनेऽप्यामसदृशः पदार्थोऽति, यद्दर्शनादात्मा- नमयगच्छामः। ननु काला-ऽऽकाश-दिगाऽऽदयो जीयतुल्या विद्यन्ते १०इति चेत् । ना तेषामपि विवादाऽऽस्पदीमूतत्वेन तदहिवद्धत्वादिति । आपिम्रदिति ! आइपूर्वाहमा फरि स्टः शत् । अनुमानिति । असयः पाणाः सन्त्यस्येति अमुमान 'जीवः सादयुमान् सत्त्वमिति हेमः ॥ ३३॥ भोपसिपाध्योऽपि नीयोग भवतीत्याहwwww- गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १५३ ९ उपपत्तिविनाऽऽत्मानं न भवेद्यस्य किं च दन् । यदलात्साघवेदेनमर्थापत्या बुधो जनः ॥ ३४ ॥ च पुनर्यस बस्तुन आत्मानं विना जीवमन्तरेणोपपतिः समर्थनं ३ न मवेत् , तद्वस्तु किं विद्यत इति शेपः, यतो बुधो जनो विद्वबनो यद्दलात् यत्स वस्तुनो वलात् एनमात्मानमर्यापत्त्याऽर्थापतिप्रमाणेन साधयेत् । एतावता न हि दृष्टः श्रुतो वा कोऽप्यर्थ आत्मानमन्तरेण ६ नोपपद्यते, यहलातं साधयाम इति भावः ।। ३४ ॥ एवं प्रमाणाविपयो जीवो भावोऽस्ति वा न वा । संशेपे मनसीति खे सर्वत्रत्वात्तु वेड्यहम् ।। ३५ ।। एवं प्रागुतनीत्या प्रमाणानां प्रत्यक्षादीनामविषयोऽगोचरो जीव आत्मा मावः सत्पदार्थोऽस्ति वा, न वा-नास्ति वा : एतावता काप्या. गने एतत्सद्भावप्रतिपादनादयमति अथवा भावोपलम्मकप्रमाणपञ्चक- १२ विषयतातीतत्वात् प्रतिपेघसाधकामावाल्यपष्ठप्रमाणविषय एवायं जीव इत्यर्थः । हे गौतम, इत्यमुना प्रकारेण लं ते निजे मनसि हृदये संशेषे संशयं विदधासि । ननु कुतो भवद्भिरेतद्नावमित्यास पाह-५ सर्वेत्यादि । सर्व वस्तुजावं जानातीति सर्वज्ञः, वस मावनत्वं, तलासर्वज्ञमावेन अहं वेमि, सर्वमपि लन्मनोगतसंशयं जाना- मोत्यर्थः । तुराब्दोऽवपारणे । संशेपे इति । पूर्वात् 'शीङ खने' १० अलात्करि रुद । इति पूर्वपक्षः ।। ३५ ।। श्रुत्वैति मगवद्वानो गौतमोऽन्तयमत्कृतः । अहो! सर्वज्ञ एपोऽस्तु दध्याविति विशुद्धीः ॥३६॥ इतीत्यं भगवतो वीरजिनल पाचो पाण्यखाः सुत्ता निसम्म २१ श्रीगौतमीयकाव्यं . ६ अन्तश्चितमध्ये चमत्कृतश्चमत्कार प्राप्तः, विसित इति यावत् । अत एव विशुद्धा निर्मला धीवुद्धिर्यस्य स तथाविधो गौतम इन्द्र- ३ मूतिः, अहो इति आश्चर्ये, एप वीरजिनः सर्वज्ञः सर्वपदार्थज्ञाता- ऽस्तु भवतु इत्यमुना प्रकारेण दध्यौ चिन्तयामास । दध्याविति । 'ध्यै चिन्तायाम्' असात्कर्तरि लिट् ॥ ३६ ॥ पुनः किं दध्यावित्याह- सन्दिग्धोऽर्थोऽप्रकाश्योऽयमासीच्छल्य इयोरसि । प्रतिष्ठालोपमीतेन मयाऽऽख्यातो न कर्हिचित् ॥३७॥ अयं सन्दिग्धः सन्देहविषयीभूतोऽर्थ उरसि मदीये हृदि शल्य इव अप्रकाश्योऽप्रकाशनीय आसीत् अभवत् । कथमित्याह-~यतः प्रतिष्ठाया गौरवस्य लोपो विनाशस्तस्माद्रीतेन दरितेन मया कर्हि- २चित् कदापि न आख्यातो न निगदितः । एतावता यद्य, समयं विद्वत्सु प्रकटयिष्यामि तहि मे महत्त्वविधातो भविष्यतीत्यागया अयमधः कदापि विदुर्गा पुरो न प्रकटीकृत इति भावः । प्रतिष्ठेति । १५ प्रतिष्ठा गौरवे स्थितावि'त्यनेकार्थः । मीतेनेति । 'दरितश्चकितो भीत' इति हैमः ॥ ३७॥ यावद्विकल्पः सन्देहोऽयनिष्ट मम मानसे । तावद्विकल्पस्त्वधुनाऽमुनाऽयं प्रकटीकृतः ॥ ३८ ॥ मम मानसे मदीये चिचे यावन्तो विकल्पाः सझल्पा यत्रेति यावद्विकल्पः सन्देहः संगयोऽवर्विष्ट अस्तत्, तावन्तो विकल्पा २॥ यत्रेति तावद्विकरपोऽयं सन्देदोऽधुना सम्प्रति अमुनाऽनेन पीरजि. • मप्रारयो य मासीत् 'हामीदिवपाठपिन्स) गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । नेन प्रकटीकृतः प्रादुष्कृतः । यथा मे हृदि सन्देहोऽभूत् तथैवानेन साम्प्रतं स प्रकटितो न तु किञ्चिदन्यथेति भावः । अवलिटेति । 'वृतु वर्त्तने' अस्मारकर्चरि लङ् । तुः पादपूरणे ।। ३८ उपांशु स्थितमेतसान हि किन्चन विद्यते । ततः सर्वविदोऽसान्मे भवतात्तचनिर्णयः ॥ ३९ ॥ एतस्माद्वीरजिनादुपांशु प्रच्छन्नं स्थितं वर्तमानं किंचन किमपि वस्तु न हि विद्यते न हि अस्ति । एतस्य सर्वमपि वस्तुजातं प्रत्यक्ष- मेवास्तीत्यर्थः । ततस्तस्मात्कारणात् अमात्सर्व विदः सर्वज्ञान्मे मम तत्त्वनिर्णयः परमार्थनिश्चयो भवतात् सम्पद्यताम् । उपांविति । अव्ययमिदम् । 'रहस्युपांशु' इति हैमः । किञ्चनेति । इदमप्यव्ययं । सर्वेत्यादि । सर्व वेत्तीति सर्ववित् तस्मात् , किचन्तः ॥ ३९ ॥ इति सङ्कल्पयन्तं तं विज्ञाय पुरुषोत्तमः । आचष्ट पुनरप्येनं नयनुत्तरपक्षताम् ॥ ४०॥ इत्येवं प्रागुक्तप्रकारेण सङ्कल्पयन्तं चिन्तयन्तं गौतमं विज्ञाय ज्ञात्वा पुरुषोत्तमः पुरुषश्रेष्ठो भगवान् एनं गौतममुत्तरपक्षतामुत्तरपक्ष-१५ भावं नयन् प्रापयन् पुनरपि भूयोऽपि आचष्ट अकथयत् । पुरुपे- त्यादि । पुरुषेषु उतम इति विग्रहः । आचप्टेति । 'चक्षिा व्यक्तायां वाचि' आयूर्वादस्माकर्तरि लङ् ॥ ४० ॥ 16 किमाचरेत्याह-~- सुखदुःखे स्वसंवेद्ये प्रत्यक्षे भवतो यदि । शृणु गौतम! सन्देहविज्ञानं किं तथा न हि ? ॥४१॥ विज्ञानमय एवं हि प्रत्यक्षो जीव इप्यते । प्रमाणान्तरसाध्यत्वमसत्यसिन् विचार्यते ॥ ४२ ॥ १२ - +

१५६
श्रीगांवमीयकाव्य
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हे गौतम हे इन्द्रमते, वं शृणु निशामय-यदि भवतस्तव खसं-
वेद्ये निजानुभवसिद्धे सुखदुःखे साताऽसाते प्रत्यक्षे प्रत्यक्षज्ञानविषय-
३ भूते विद्यते तर्हि सन्देहविज्ञानं संशयादिविज्ञान तथा तेन प्रकारेण
खसंवेदनसिद्धम् , अत एव प्रत्यक्षं किं न हि अस्ति। अस्त्येवे.
त्यर्थः । ततः किमित्याह--विज्ञानेत्यादि । विज्ञानं वरूपमस्येति
विज्ञानमय एवंविष एवायं जीव आत्माऽसामिः प्रत्यक्ष इप्यते
वाञ्छयते नतु विज्ञानातिरिक्तोऽन्यः कोऽपीत्यर्थः । तथाऽसिन्
प्रत्यक्षेऽसति अविद्यमाने सति अन्यत्प्रमाणं प्रमाणान्तरमनुमानादि
एतेन साध्यत्वं विचार्यते विचिन्त्यते, सति प्रत्यक्षे वृथा प्रमाणान्तरोप-
न्यास इत्यर्थः । यदाहुः मायव्याख्यातारः श्रीहेमसरयः पूज्या:-
"गौतम ! भवतोऽपि प्रत्यक्ष एवायं जीवः किमन्येन प्रमाणान्तरोपन्या-
१२सेन! 'ननु कोऽयं जीवो मम प्रत्यक्ष इति चेदु'च्यते यदेतत् तदेव
संशयादिविज्ञानं स्वसंवेदनसिद्धं ददि स्फुरति स एव जीवः, संशया-
दिज्ञानस्यैव तदनन्यत्वेन जीवत्वात् । यत्र प्रत्यक्षं तन प्रमाणान्तरेण
१५ साध्य, यथा सशरीर एवात्मसंवेदनसिद्धाः सुखदुःसादयः । [गर्ने]
'प्रत्यासिद्धमपि सप्रामनगरं विश्वं शन्यवादिनं प्रति साध्यते एवेति
चैदने, निरालम्पनाः सर्वे प्रत्ययाः प्रत्ययत्वाद समप्रत्ययवदित्यादे-
सादुनावितबाधकपमाणस्य तत्र निराकरणात् अत्र स्वारममाहफपत्यो
पापकमागाभावादिति" (विशेषाय० हद्दषित गा० १५५१
२.१०६६६७)॥ ११॥ ४२ ॥

गौवमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १५७ ३ ईतश्चायं प्रत्यक्षो जीवः कुत इत्याह-- अहंमत्यय एकोऽपि क्रियां त्रैकालिकी स्पृशन् । प्रत्यक्षो दृश्यते, जीवं विनाऽहंप्रत्ययः कुतः१॥४३॥ शरीर एव चेदेपा प्रत्ययो गृह्यते तदा । तदवसे शरीरेऽपि मृतस्य न भवेत्कथम् ? ॥४४॥ एकोऽपि अहंमत्ययस्त्रैकालिकी भूत-भवद्-भावि-लक्षणकालत्रयो-६ द्भवां कियां स्पृशन् आश्रयन् प्रत्यक्षः साक्षात् दृश्यते विलोक्यते । ततः किमित्याह-जीपमित्यादि । जीवं विनाऽत्मानमन्तरेण अह- मित्याकारकः प्रत्ययः कुतः कस्माद्भवेत् ! जीवसद्भावे एव तत्संमवः९ स्थात् , ततोऽस्त्येव प्रत्यक्षो जीव इति । 'नन्वयमहंप्रत्ययो देहे एवो- त्पद्यते, न जीवे इत्याशापूर्व प्रतिविधानमाह-शरीर इत्यादि । चेदि एषोऽहमित्याकारकः प्रत्ययः शरीरे एवं गृह्यते स्वीक्रियते २ तदा सा अवस्था यस्य तत् तदवस्य, तलिन् तदवस्ये जीवितवत् स्थिते मृतस्य व्यापन्नस्य प्राणिनः शरीरेऽपि कयंन मवेत् । एतावता जीवं विनाऽपि चेदप्रत्ययः स्यानहिं मृतशरीरेऽपि स युज्यते, १५ तलाजीवविषयक एवायमित्यर्थः । यदाहुः पूज्या:--"[यतः) 'कृतवानहं, करोम्यहं, ज्ञातवानहं, जानेऽहं, ज्ञास्याम्यहम्' इत्यादि- प्रकारेण योऽयं त्रैकालिकः कार्यव्यपदेशः, तद्विपये प्रयुज्यमानवया १८ तत्समुत्यो योऽयमहंमत्यय, एतस्मादपि प्रत्यक्ष एवाऽयमात्मेति प्रतिपघस । अयं हि अप्रत्ययो नानुमानिकः, अलैङ्गिकत्वात् ; नाप्या- गमादिप्रमाणसंभवः, तदनभिज्ञानां बालगोपालादीनामप्यन्तर्मुखतया- ऽऽत्ममाहकत्वेन खसंविदितस्य तस्योत्सादात् , घटादौ चानुत्पादादिति । २१ १६वश्यमाणग्ररणात् । २ मलपारिश्रीहेमचन्द्रम् विपादाः । , श्रीगौतमीयकाव्यं . . हे गौतम । हे इन्द्रभूते!, त्वं शृणु निशामय यदि भवतस्तव खस- वेचे निजानुभवसिद्धे सुखदुःखे साताऽसाते प्रत्यक्षे प्रत्यक्षज्ञानविषय- ३ भूते विद्यते तर्हि सन्देहविज्ञानं संशयादिविज्ञान तथा तेन प्रकारेण खसंवेदनसिद्धम् , अत एव प्रत्यक्षं किं न हि अस्ति। अस्त्येवे- त्यर्थः । ततः किमित्याह-विज्ञानेत्यादि । विज्ञानं स्वरूपमस्येति ५ विज्ञानमय एवंविध एवायं जीव आत्माऽसामिः प्रत्यक्ष इप्यते वान्च्यते नतु विज्ञानातिरिक्तोऽन्यः कोऽपीत्यर्थः । तथाऽस्मिन् प्रत्यक्षेऽसति अविद्यमाने सति अन्यत्प्रमाणं प्रमाणान्तरमनुमानादि एतेन साध्यत्वं विचार्यते विचिन्त्यते, सति प्रत्यक्षे वृथा प्रमाणान्तरोप- न्यास इत्यर्थः । यदाहुः भाप्येव्याख्यातारः श्रीहेमसूरयः पूज्याः- "गौतम! भवतोऽपि प्रत्यक्ष एवायं जीवः किमन्येन प्रमाणान्तरोपन्या- १२सेन ? 'ननु कोऽयं जीवो मम प्रत्यक्ष इति चेदु'च्यते-यदेतत् तवैव संशयादिविज्ञानं स्वसंवेदनसिद्धं हृदि स्फुरति स एव जीवः, संशया- दिज्ञानस्यैव तदनन्यत्वेन जीवत्वात् । यच प्रत्यक्षं तन्न प्रमाणान्तरेण १५ साध्यं, यथा सशरीर एवात्मसंवेदनसिद्धाः सुखदुःखादयः । [न 'प्रत्यासिद्धमपि सम्रामनगरं विश्वं शून्यवादिनं प्रति साध्यते एवेति चेत् नैवं, निरालम्बनाः सर्वे प्रत्ययाः प्रत्ययत्वात् खमप्रत्ययवदित्यादे- १८ स्तदुद्भावितबाधकप्रमाणस्यैव तत्र निराकरणात् अत्र त्यात्मग्राहकात्य बाधकप्रमाणाभावादिति" (विशेषाव० वृहद्वृत्ति० गा० १५५४ २० पृ०६६६-७)॥४१॥ ४२ ॥ १ सय विशेषावश्यमाभ्यम्-श्रीजिनमद्रगमिक्षमाधमविहितम्तयारका मलयारिधीहेमचन्द्रसरिवरेविहिता । फाशी यशोविनयमपमालाद्वारेण मुद्रण- पपमानीतम् । २जीवामिभावेन जीवरुपयात् । ३ एपिडरितः पाटो मुभिवमन्ये नाखि। . .

- गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । ईतश्चायं प्रत्यक्षो जीवः कुत इत्याह- अहंप्रत्यय एकोऽपि क्रियां त्रैकालिकी स्पृशन् । प्रत्यक्षो दृश्यते, जीवं विनाऽहंप्रत्ययः कुतः १ ॥४३॥ शरीर एव चेदेपः प्रत्ययो गृह्यते तदा । तदवस्थे शरीरेऽपि मृतस्य न भवेत्कथम् १ ॥ ४४ ॥ एकोऽपि अहंप्रत्ययस्खैकालिकी भूत-भवद्-भावि-लक्षणकालत्रयो-६ द्भवां क्रियां स्पृशन् आश्रयन् प्रत्यक्षः साक्षात् दृश्यते विलोक्यते । ततः किमित्याह-जीवमित्यादि । जीवं विनाऽस्मानमन्तरेण अह- मित्याकारकः प्रत्ययः कुतः कस्माद्भवेत् ! जीवसद्भावे एव तत्संमवार स्यात् , ततोऽस्त्येव प्रत्यक्षो जीव इति । 'नन्वयमहंप्रत्ययो देहे एवो- त्पद्यते, न जीवे इत्याशकापूर्व प्रतिविधानमाह-शरीर इत्यादि । चेद्यदि एषोऽहमित्याकारका प्रत्ययः शरीरे एव गृह्यते स्वीक्रियते १२ तदा सा अवस्था यस्य तत् तदवस्वं, तस्मिन् तदवस्ये जीवितवत् स्थिते मृतस्य व्यापन्नस्य प्राणिनः शरीरेऽपि कथं न भवेत् । एतावता जीवं विनाऽपि चेदहंप्रत्ययः स्यानहिं मृतशरीरेऽपि स युज्यते, १५ वसाजीवविषयक एवायमित्यर्थः । यदाहुः पूज्या:--"[यतः] 'कृतवानहं, करोम्यहं, ज्ञातवानहं, जानेऽहं, जास्याम्यहम्' इत्यादि- प्रकारेण योऽयं त्रैकालिकः कार्यव्यपदेशः, तद्विपये प्रयुज्यमानतया १८ तत्समुत्यो योऽयमहंप्रत्यय, एतस्लादपि प्रत्यक्ष एवाऽयमात्मेति प्रतिपद्यत । अयं हि अहंमत्ययो नानुमानिकः, अलैहिकत्वात् ; नाप्या- गमादिप्रमाणसंभवः, वदनमिझाना वालगोपालादीनामप्यन्तर्मुखतया- ऽऽत्मप्राहकत्वेन ससंविदितस्य तस्योत्पादात् , घटादौ चानुत्पादादिति।३१ १६: वायमाणमामात् । २ मलपारिधीहेमरन्दमूरिपादाः ।

१५८ श्रीगौतमीयकाव्यं ९ [किंच] हन्त कथमसति जीवेऽहमिति प्रतिपन्नं त्वया, विषयामावे विपयिणोऽनुत्थानप्रसनात् , 'देह एव अस्याहंमत्ययस्य विषय इति ३चेन्न, जीवविप्रमुक्तेऽपि देहे तदुत्पत्तिप्रसङ्गात् । सति च जीवविषये. ऽस्मिन्नहंप्रत्यये 'किमहमस्मि (वा]नास्मि' इति भवतः संशयः केन प्रकारेणोपजायते ? अहंप्रत्ययग्राह्यस्य जीवस्य सद्भावादस्यहमिति ६ निश्चय एवं युज्यते इति भावः । सति चास्मिन्नात्माऽस्तित्वसंशये कस्यायमहंप्रत्ययो युज्यते ? निर्मूलत्वेन तदनुत्थानप्रसङ्गादिति" (विशेषा० बृह० पृ० ६६७) ॥ १३ ॥ ४४ ॥ जीवामावे संशयविज्ञानमपि न युज्यते एवेति दर्शयन्नाह- उत्पाद: संशयस्यापि न सान संशयिनं विना । विज्ञानाख्यो गुणो ह्येप विहाय गुणिनं कुतः १ ॥ ४५ ॥ संशयोऽस्ति अस्पेति संशयी संदेहवान् जीवस्तं विना संशयस्यापि उत्पाद उत्पत्तिर्न स्यात् । कथमित्याह---विज्ञानेत्यादि । हि यत एप संशयो विज्ञानमाख्या यस्य स विज्ञानाख्यो विज्ञाननामा गुणो- १५ऽस्ति, स च गुणिनं विहाय गुणाश्रयं द्रव्यं मुक्ला कुतः संभवेत् ! अयमर्थ:- यदि संशयी जीव एव आदी नास्ति तर्हि अस्मि-नालीति संशयः कस्य भवतु : संशयो हि विज्ञानाख्यो गुण एव । नच १८गुणिनं विना गुणः संभवतीति ।॥ ४५ ॥ नन्वत्र देह एव गुण्यस्तु इत्याशस्य प्रतिविधानमाह- भूतत्वाद्वा जडत्याद्वा देहोऽस्य न गुणी भवेद । अमूर्चस्य गुणस्थानुरूपोऽमृर्वो गुणी यतः॥४६॥ २२ मूर्तत्वान्मूर्चिमत्त्वात् वा पुनर्जडत्वादचेतनत्वादेहः शरीरोऽस्य १२ - श्रीगौतमीयकाव्यं गुणी प्रत्यक्ष एव साद्गुणे प्रत्यक्षतां गते । रूपे गुणे हि प्रत्यक्षे प्रत्यक्षः सावटो गुणी ॥ ४७॥ ३ गुणे नानादौ प्रत्यक्षतां गते प्रत्यक्षमा प्रावे सति गुणी गुणाऽऽप्रव आत्मादिः प्रत्यक्ष एव त्यात् । केन दृष्टान्तेनेत्याह-रूपे इत्यादि। हि यतो रूपे कृष्णरकादिके गुणे प्रत्यक्षे सति गुणी कृष्णरकादि. दरूपायो घटा मत्याः स्यात् । अयमर्थः-प्रत्यक्ष एवं गुणी जीवा स्मृति-जिज्ञासा-चिकीपी-जिगमिषा-संशयेत्यादिज्ञानविशेषाणां तद्गु- मानां संवेदनमत्यक्षसिद्धलात् , इह यस्स गुणाः प्रत्यक्षाः स पत्यक्षो ९दृष्टो यथा घटः, प्रत्यक्षगुणश्च जीवस्तस्मात्प्रत्यक्षोऽयं, यसाद् घटोऽपि गुणी रूपादिगुणप्रत्यक्षवादेव प्रत्यक्षः तद्विज्ञानादिगुणप्रत्यक्षत्वादा- स्मापि प्रत्यक्ष इति ॥ १७ ॥ अयोकाथें दोपाविसवपूर्व प्रतिविधानमाह- शब्द गुणे तु प्रत्यक्षे गुण्याकाशस्तथा न किम् ।। मैवं मंसाः, पौगालिकः शब्दो नाकारागो गुणः ।। ४८॥ तुशब्दः प्रने, 'ननु शन्दे शन्दामियाने गुणे प्रत्यक्षे सति गुणी सन्दगुणामय आकाशस्तथा तेन प्रकारेण किं न शन्दवत् प्रत्यक्ष कर्य नास्तीत्यर्थ: । एवममुना प्रकारेण हे गोवम ! वं माऽमंसा मा १८मनस । कवनित्याह-पोद्गलिक इत्यादि । यतः शब्द आकाशगो गुणो न भवति, किंतु पालिका पुदलगुणोऽस्ति, पुद्गलस्तु प्रत्यक्ष स्पेति न शालेयोऽप्या कार्यः । इदमेवाहुः पूज्या:--'नन्य- नैकान्तिकोऽयं, यस्मादायगुणः शब्दः प्रत्यक्षोऽति, न पुनराकार- मारियोमामला: दिन- १२ १५ १६० श्रीगौतमीयकाव्यं गुणी प्रत्यक्ष एव साद्गुणे प्रत्यक्षतां गते । रूपे गुणे हि प्रत्यक्षे प्रत्यक्षः सावटो गुणी ॥१७॥ ३ गुणे ज्ञानादौ प्रत्यक्षतां गते प्रत्यक्षमा प्राप्ते सति गुणी गुणाऽऽश्रय आत्मादिः प्रत्यक्ष एव स्यात् । केन दृष्टान्तेनेत्याह-रूपे इत्यादि। हि यतो रूपे कृष्णरक्तादिके गुणे प्रत्यक्ष सति गुणी कृष्णरकादि- ६रूपाश्रयो घटः प्रत्यक्षः स्यात् । अयमर्थः---प्रत्यक्ष एव गुणी जीवा स्मृति-जिज्ञासा-चिकीपी-जिगमिषा-संशयेत्यादिज्ञानविशेषाणां तद्गु- शाना स्वसंवेदनमत्यक्षसिद्धत्वात् , इह यस्य गुणाः प्रत्यक्षाः स प्रत्यक्षो ९दृष्टो यथा घरः, प्रत्यक्षगुणश्च जीवस्तस्मात्प्रत्यशोऽयं, यस्माद् घटोऽपि गुणी रूपादिगुणप्रत्यक्षत्वादेव प्रत्यक्षः तद्विज्ञानादिगुणप्रत्यक्षत्वादा- स्मापि प्रत्यक्ष इति ॥ १७ ॥ अथोक्ताथै दोषाविर्भावपूर्ण प्रतिविधानमाह- शब्दै गुणे तु प्रत्यक्षे गुण्याकाशस्तथा न किम् ।। मैवं मंस्थाः, पौद्गलिक शब्दो नाकाशगो गुणः॥४८॥ तुशब्दः प्रने, 'ननु शब्दे शब्दाभिधाने गुणे प्रत्यक्षे सति गुणी शब्दगुणामय आकाशस्तथा तेन प्रकारेण किं न शब्दवत् प्रत्यक्षा। कयं नास्तीत्यर्थः । एवममुना प्रकारेण हे गौतम ! माऽमस्या मा १८मनस । कथमित्याह-पोद्गलिक इत्यादि । यतः शन्द आकाशगो गुणो न भवति, किंतु पोहलिकः पुद्गलगुणोऽस्ति, पुद्गलस्तु प्रत्यक्ष एवेति न शहालेशोऽप्यत्र कार्यः । इदमेवाहुः पूज्या:-नन्द- निकान्तिकोऽयं, यलादाकाशगुणः शब्दः प्रत्यक्षोऽस्ति, न पुनराकाश. 1 मसपारधी हेमपन्द्रहरिपादाः विशेपा मारतो १६० श्रीगौतमीयकाव्यं गुणी प्रत्यक्ष एव साद्गुणे प्रत्यक्षतां गते । रूपे गुणे हि प्रत्यक्षे प्रत्यक्षः साटो गुणी ॥ ४७] ३ गुणे ज्ञानादौ प्रत्यक्षतां गते प्रत्यक्षमा प्राप्ते सति गुणी गुणाऽऽश्रय आत्मादिः प्रत्यक्ष एव सात् । केन दृष्टान्तेनेत्याह-रूपे इत्यादि। हि यतो रूपे कृष्णरकादिके गुणे प्रत्यक्षे सति गुणी कृष्णरजादि- वरूपाश्रयो पटः प्रत्यक्षः स्यात् । अयमर्थः-प्रत्यक्ष एव गुणी जीवा स्मृति-विज्ञासा-चिकीर्या-जिगमिषा-संशयेत्यादिज्ञानविशेषाणां तद्गु- पानां संवेदनप्रत्यक्षसिद्धत्वात् , इह यस्स गुणाः प्रत्यक्षाः स प्रत्यक्षो ९दृष्टो यथा घरः, प्रत्यक्षगुणश्च जीववस्मात्प्रत्यक्षोऽयं, यस्माद् घटोऽपि गुणी रूपादिगुणप्रत्यक्षत्वादेव प्रत्यक्षः तद्वद्विज्ञानादिगुणप्रत्यक्षत्वादा- नापि प्रत्यक्ष इति ॥ १७ ॥ अथोक्तार्थे दोषाविर्भावपूर्व प्रतिविधानमाह- शुन्दे गुणे तु प्रत्यक्ष गुण्याकाशवथा न किम् ? । मैवं मंसाः, पौगालिका शब्दो नाफाशगो गुणः ।। ४८॥ तुशब्दः प्रने, 'ननु शन्दे शन्दामिधाने गुणे प्रत्यक्षे सति गुगी सन्दगुणाश्रय आकाशस्वधा तेन प्रकारेण किं न शब्दवत् प्रत्यक्षा करं नालीत्यर्थः । एवममुना प्रकारेण हे गौतम ! वं माऽमंसा मा १८मनस । कथमित्याह-पौद्गलिक इत्यादि । यतः शन्द आकाशगो गुगो न भवति, किंतु पौगलिकः पुगलगुणोऽति, पुद्गलस्तु प्रत्यक्ष एवेति न शशलेयोऽप्यत्र कार्यः । इदनेवाः पूज्या:-'नन्क- निकान्तिकोऽयं, यज्ञादाकाशगुणः शब्दः प्रत्यक्षोऽस्ति, न पुनराकार- 1 मारयोमरमरा या मारतो १२ १६२ 1. श्रीगौवमीयकाव्यं : . - मिति । चक्षुपा गृह्यते इत्यर्थे विशेषे इत्यण् । निरित्यादि । निर्गत उपाधिर्यस्मात् , 'खसमीपवनिनि खवृत्तिधर्मसमकत्व'मुपाघित्वमिति ३तल्लक्षणम् ॥ ५० ॥ - अथोपसञ्जिहीपुराह- इत्यात्मा देशतस्तेऽपि प्रत्यक्षः सर्वथा मम । अस्वलज्ज्ञानयुक्तत्वाद्भवतः संशयो यथा ॥५१॥ इत्येवमुक्तप्रकारेण हे गौतम ! खशरीरे तेऽपि तवापि देशत एकदेशेन आत्मा प्रत्यक्षोऽस्ति, छअस्थत्वेन भवतः सर्वस्यापि वस्तुनो देशविपयत्वात् घटवत् , तथा हि--सर्वमपि सपरपर्यायतोऽनन्त- पर्यायं वस्तु, छमस्यश्च प्रत्यक्षेण साक्षात् तद्देशमेव गृहाति, प्रत्यक्षेण च प्रदीपादिप्रकाशेनेव देशतः प्रकाशिता अपि पटादयो व्यवहारतः १२ प्रत्यक्षा उच्यन्ते एव, सर्वात्मना च केवलिप्रत्यक्षमेव वस्तु प्रकाशयति, अतो मम अस्वलज्ज्ञानयुक्तनादप्रतिहतानन्तज्ञानवत्त्वेन सर्वथा सर्वात्मनाऽपि प्रत्यक्षोऽयमात्माऽस्ति यथा भवतस्त्वत्सम्बन्धी संशयः ५सन्देहः । एतावताऽप्रतिहतानन्तज्ञानिनो मम यथाऽतीन्द्रियमपि वसंशयविज्ञानं प्रत्यक्ष तथा सर्वात्मनाऽयमात्माऽपि; इति प्रति- पयस्व । अस्खलदित्यादि । अस्सलध तद् ज्ञानं च अस्खल- १८ज्ज्ञानं, एतेन युक्तोऽस्खलज्ञानयुक्तस्तस्य भावसत्वं तसात् ॥५१॥ परशरीरे तर्हि कथमित्याह- अनुमानागदाणवमन्यदेहेऽपि चिन्मयम् । जीवमस्तीति प्रवृत्ति-निवृत्तिम्यां स्वरूपवत् ॥ ५२ ॥ या स्फटिके अपामुमरकता, पत्र जपाकुसुमसमीपदातिनि स्फटिके स- अनुमतिरस्सपर्मसभामस्तम् उपाधिसमिसः । २१ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । यथा सदेहे एवममुना प्रकारेणान्यदेहे परशरीरेऽपि अनुमाना- दनुमानप्रमाणेन चिन्मयं विज्ञानात्मकं जीवमात्मानं गृहाणाऽववुध्यस्त्र कथमित्याह-अस्तीति । विज्ञानमय आत्मा विद्यते इति । अनु-३ मानमेव सूचयन्नाह-प्रवृत्तीत्यादि । प्रवृत्ति-निवृत्तिभ्यां हेतुभ्यां खरूपवत् यथा खरूपे इव इति । अयमर्थः-परशरीरेऽप्यस्ति.जीवः इष्टानिष्टयोः प्रवृत्ति-निवृत्तिदर्शनात् यथा स्वरूपे स्वात्मनि, इह यत्रे-६ टाऽनिष्टयोः प्रवृत्ति निवृत्ती दृश्येते तत् सात्मक दृष्टं, यथा- खशरीरं, तथा च प्रवृत्ति-निवृत्ती दृश्येते परशरीरेऽतस्तदपि सात्म- कम् । आत्मामाये च इप्टाऽनिष्टप्रवृति-निवृत्ती न भवतः यथा घटे,९ इत्यनुमानात् परशरीरेऽप्यात्मसिद्धिरिति । चिन्मयमिति । चिद् ज्ञानमेव स्वरूपमस्येति चिन्मयस्सं स्वरूपवदिति स्वरूपे इवेत्यर्थे सप्तम्यन्ताद्वतिः ।। ५२ ॥ ननु लिलिग्निनोः पूर्व सम्बन्धाग्रहणान्न लिङ्गाजीवोऽनुमीयते इत्याशय तत्मतिविधानमाह- अगृहीत्वापि सम्बन्धं पूर्व लिनेन लिनिनः । समं विधीयते चानुमानं लिङ्गेन तद्यथा ॥ ५३॥ हसने रोदनैर्गाने तो गात्रेऽनुमीयते । अवो नैकान्तिकं पूर्व सम्बन्धग्रहणं स्मृतम् ।। ५४ ॥ पूर्व प्रथम लिनेन समं चिद्वेन साद्धं लिग्निनासम्बन्यं भगृहीत्वाऽपि अपरिगृह्योऽपि लिन अनुमान विधीयते क्रियते । कयमित्याह- तधयेत्यादि । तद्दश्यते यतो हसनहस्यै रोदनैरश्रुमोचनैर्गानेगीति २॥ मिथ हेतुमित्रे शरीरे मूतो देवविशेषोऽनुमीयतेऽतोऽसादेतोः पूर्व लिमलिनिनोः सम्बन्धग्रहणमनैकान्तिकमनिधितं स्मृवं कथितम् १२१ . - . 7 • .. - श्रीगौतमीयकाव्यं .. 7 . इदमत्र तात्पर्यम्-'यतो यथा शशकेन समं शृङ्ग केनाऽपि न प्राग्गृहीतं तथा न खल्ल लिङ्गैः कैश्चिदपि समं लिङ्गी जीवः कापि केनापि पुरा ३ उपावः ततो न लिनादनुमेयोऽसौ जीव इति यन्मन्यसे वं-तत्रोच्यते. सोऽनेकान्तः, यसालिङ्गः सममदृष्टपूर्वोऽपि मूतो देवविशेषः शरीरे. हसन-गान-रोदन-करचरणमूविक्षेपादिभूतलिङ्गदर्शनादनुमीयते इतिः बालानामपि मतीतमेवेति । आद्यपद्ये चशब्दः पादपूरणे। लिङ्गेनेति । हेतौ करणे वा तृतीया ॥ ५३ ॥ ५४॥ अनुमानान्तरमप्यात्मसाधकमाह- आदिमन्नियताकारा जाती जाती यतस्तनुः । कुलाल इव कुम्भस्य तत्कर्ता कोऽपि कल्प्यताम् ॥५५॥ यतो यस्माद्धेतोगोंमहिषादिमेदमिनाया जातौ जातौ तनुः शरीरम् १२ आदिमन्नियताकारा आदियुक्ता प्रतिनियताकारवती च दृश्यते । ततस्त- स्थास्तनोः कर्ण निप्पादकः कोऽपि पदार्थः करप्यतां समर्थ्यताम् । कस्य, क इव :--कुम्भस्य घटस्य कुलालः कुम्भकार इव | यथा कुम्भस्या- १५दिमन्नियताकारत्वाका कुलालो विद्यते तथेत्यर्थः, यश्च तनोः कर्ता सजीव एवेति । अयमर्थः-देहः सकर्तृकः, आदिमत्त्वे सति प्रति- नियताकारत्वात् , घटवत् । इह यद्वस्तु आदिमत्प्रतिनियताकारं तत् १०सकर्तृकं दृष्टं, यथा घटः, यत्पुनरकर्तृकं तदादिमत् प्रतिनियताकार- मपि न भवति, ययाऽनविकारः, यथाऽऽदिमत्प्रतिनियताकारो देह- ३.खतः सोऽपि सकर्तृकः, यश्च तस्य कर्चा स जीवः, प्रतिनियता- १भत्र 'जाती यतस्सनुसता इति काशीमुक्तिपाटोऽसरसा, छन्दोमङ्गदोप• उरसाद सारस्पविरदाय।

. । गौतमीयप्रकाशाख्यंटीकया सहितम् । कारत्वं मेर्वादीनामप्यति, नच तेषां कश्चित्कर्चा इति तैरनेकान्तिको हेतुः स्यात् , अतोऽत्रांऽऽदिमत्त्वविशेषणमुपोचमिति । आदीत्यादि। मादिर्विद्यते अस्याः साऽऽदिमती, नियतो निश्चित आकारो यस्याः३ सा नियताकारा, आदिमती चासौ नियताकारा चेति कर्मधारये पुंवद्धावः । तनुशव्दः शरीरवाची नित्यस्त्रीलिङ्गः ॥ ५५ ॥ ननु देहस्य कर्चा तु ईश्वरोऽस्ति, न तु जीवस्ततो नेतदनुमान-६ मात्मसाधकमित्याशयाह- ईश्वरो निर्गुणो यो या न स कर्तृत्वमर्हति । कृतकृत्यत्वसाचिन्यान्निर्विकल्पत्वतोऽपि वा ॥ ५६ ॥ हे गौतम ! ईश्वरो द्विविधः-निर्गुणः सगुणश्च । तत्र यो वा निर्गुणो रागद्वेषादिगुणवर्जित ईश्वरः परमात्माऽस्ति से तु कर्तृलं कर्तृभावं नार्हति, न योग्यो भवति । कुत इत्याह-कृतेत्यादि ।१२ कृतानि कृत्यानि येन स कृतकृत्यो निप्पादितपयोजनस्तस्स भावः कृत- ऋत्यत्वं, सचिवस्य भावः साचिव्यं साहाय्य, कृतकृत्यत्वस्य साचिव्यं कृतकृत्यत्वसाचिन्यं तस्मात् , कृतार्थत्वसाहाय्यात् वा । पुनर्निर्विकल्प-१५ खतो विकल्परहितत्वादपि । एतावता निखिलकर्मक्षयान्मोक्ष प्राप्य कृतकृत्यीभूतोऽत एव विकल्पवर्जितो य ईश्वरस्तस्य पुनः कर्मकर्तृत्वम- युक्तमिति भावः । निर्गुण इति । निर्गता गुणा यस्मात्सः, निष्क्रान्तो। गुणभ्य इति या 'निरादयः कान्त्याद्यर्थे' (वा०) इति पञ्चम्यन्तेन समाप्तः । 'सचिवः सहायेऽमात्ये' इति हेमः (अनेकार्थः) ॥५६॥२० , व्यभिचारापरपर्यायोऽनेकान्तनामाऽसौ हेतामायः, लक्षण-भेदाभ्यां तस्य अविष्यम् , अन तु साधारणो व्यभिचारः, तसच साध्यवदन्यत्तिता:: गेवादीनां नास्ति भादिमत्ता, तेषां कथंचित शाश्वतलाद-निवरषात् ।। . . .

श्रीगौतमीयकाव्यं ९ 'ईश्वरः सगुणो यस्तु त्वंदुक्या कर्तृतां गतः । नामान्तरेण तं जीवं विद्धि गौतम ! बुद्धितः ॥ ५७ ॥ ३ हे गौतम ! यस्तु वदुक्त्या तव वचनेन कर्तृतां गतः कर्रामा प्रातः, अत एव सह गुणै रागद्वेषादिभिर्वते इति सगुण ईश्वरोऽस्ति त बुद्धितो बुद्ध्या नामान्तरेण अपरनाम्ना जीवं विद्धि जानीहि । यं ६ सगुणमीश्वरं त्वं कर्तृत्वेनाङ्गीकरोपि स एवास्माभिर्जीव उच्यते, अतो अस्माकमिष्टसिद्धिरेवेति भावः ।। ५७ ।। अथोक्तानुमाने दोषमाशय परिहरन्नाह- ,, दृष्टान्ते मूर्त्ततां वीक्ष्य दोपमात्मनि मा ग्रहीः । अदृष्टदेहसंयोगान्मूर्तत्वं तस्य निश्चितम् ॥ ५८ ॥ हे गौतम ! त्वं दृष्टान्ते कुलाललक्षणे मूर्ततां मूर्तिमत्त्वं वीक्ष्य १२ दृष्ट्वा आत्मनि जीवे दोपं मूत्वामावलक्षणं मा ग्रहीः मा गृहाण । कथमित्याह-अदृष्टेत्यादि । अदृष्टं शुमाऽशुभं कर्म, देहः शरीरं, तयोर्जीवेन सह यः संयोगः सम्बन्धस्तस्मात् तस्य संसारिणो जीवस्य ५५ मूर्तत्वं मूर्तिमत्त्वं निश्चितमसन्दिग्धं, विद्यते इति शेषः । तथा च सति न तद्दोपसमवः । अयमर्थ:--- 'घटस्य कर्ता कुलालो मूर्णिमान् सद्यातरूपोऽनित्यादिखमावश्च दृष्ट इति,, अतो जीवोऽप्येवंविध एव १८ सिध्यति, एतद्विपरीतश्च किलाऽस्माकं साधयितुमिष्ट इत्येवं साध्य- विरुद्धसाधकत्वात् दुष्टोऽयं हेतु'रिति त्वं मन्यसे-तदेतदयुक्तं, यतः सल संसारिणो जीवस्य साधयितुमिष्टस्याऽदोपोऽयं, स हि अष्टफर्म- पुद्गलसदातोपगूढत्वात् शरीरत्वाच कथंचित् मूत्वादिधर्मयुक्त एवेति २२नं दोपलेशोऽपि शक्ष्य इति ॥ ५८ ॥ . "मेर देहसंयोगात् ति कानीमुदिका पाठौन मनोरमः।।

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । . ३ न ननु मूर्तोऽयं जीवस्तर्हि , घटादिवत् साक्षाकिमिति न दृश्यते । इत्याशङ्कयाह- अदृष्टत्वेऽपि किं बायोमर्चवं नाभिलप्पते । इत्थं चानुमितिग्राह्यो जीवः सद्भावमश्नुते ।। ५९ ॥ बायोः पवनस्प, अदृष्टत्वेऽपि साक्षादनुपलब्धत्वेऽपि किं वया मूलं नाभिलप्यते न स्वीक्रियते । एतावता साक्षादनुपलभ्यमानोऽपि वायुस्त्वया मूर्तत्वेन स्वीक्रियते एव, एवं चामुं जीवमपि स्वीकुरु इति, भावः । इत्यं च वक्ष्यमाणप्रकारेणापि अनुमित्याऽनुमानेन ग्राह्यो जीवः सद्भावमस्तित्वमश्नुते पामोति । अभिलप्यते इति । अभिपूर्वात् । 'लप कान्ती' इत्यस्मात्कर्मणि लट् । अनुते इति । 'अशू व्याप्ती' अस्मात्करि लट् ॥ ५९॥ कथमित्याह- अक्षाणां परतत्रत्वान्करणत्वं विनिश्चितम् । ततोऽधिष्ठायकं सौम्य! विना जीवं कमिच्छसि ॥६॥ हे गौतम ! अक्षाणामिन्द्रियाणां परतत्रत्वात्पराधीनत्वाकरण १५ साधनत्वं विनिश्चितं, निश्चयेन वर्तते इत्यर्थः । ततस्तस्मात् करणत्वात् जीव विनाऽधिष्ठायकमिन्द्रियाणामधिष्ठातारं त्वं कमिच्छसि? एतावता जीव एत्र तेषामधिष्ठाताऽस्तीत्यर्थः । इदमत्र तात्पर्यम् । अयमत्र १८ प्रयोगः-इन्द्रियाणां, अस्ति अधिष्ठाता, करणस्वात् , यथा चक्र-चीवर- : मृत्-सूत्र-दण्डानां कुलालः, यच्च निरधिष्ठातृकं तत्करणमपि न भवति, यथाऽऽकाशं, यश्चेन्द्रियाणामधिष्ठाता स जीव इति ॥ ६०॥ . . . २१ सन्दंशवदुपादानमक्षग्रामं प्रतीहि मोः। कारवदुपादाता विषयग्रहणेऽस्त्ययम् ।।.६१ ॥ ., १'महणेऽस्वयम्' इति काशीमुदितः पाठः। .. १३ .२३ १६८ श्रीगौतमीयकाव्यं . • तथा भो गौतम! अक्षग्राममिन्द्रियसमूहमुपादानं प्रतीहि जानीहि, उपादीयते गृह्यते वस्तु अनेनेति उपादानं, वस्तुग्रहणसाधनमित्यर्थः । ३ किंवत् ? संदंशवत्, यथा सन्देशमुपादानं जानासि तथेत्यर्थः । अथ विपया उपादेयाः शब्द-रूपादयस्खेपां ग्रहणे खीकारे उपादाताऽयं जीयोऽस्ति, उपादत्ते इति उपादाता वस्तुप्राहक इत्यर्थः । किंवत् : कर्मारवत् , यथा कर्मारो लोहकारो लोहादिग्रहणे उपादाताऽस्ति तथेत्यर्थः । अयमत्र मावार्थ:- यत्र खलु आदानाऽऽदेयभावस्तत्राs- वश्यमादाता समस्ति, यथा लोके सन्दंशकलोहानां लोकारः, विद्यते ९चेन्द्रियविपयाणामादानाऽऽदेयमावः, अतस्तेपामप्यस्त्याऽऽदाता स च जीवः, यत्र त्वादाता नास्ति तत्राऽऽदानादेयभावोऽपि न विद्यते, यथाऽऽकाशे इति । सन्दंशेति । 'सन्देशः स्यात्कङ्कमुख' इति रहेमः । 'सांडसी' इति लोकप्रसिद्धो लोहकाराद्युपकरणविशेषोऽयम् । उपादानमिति । उपाझपूर्वादानः करणे न्युट् । कारेति । 'च्योकारः कर्मारो लोहकार' इति हैमः । उपादानेति । करि १५तृ ।। ६२ ।। तनोः सदातरूपत्यात स्वामी जीवोऽनुमीयते । भोग्यत्वाच शरीरस्य भोक्ता जीवोऽनुमीयते ॥ २ ॥ तथा तनोः गरीरस्य सङ्घातरूपत्वात् खामी तन्नाथो जीव आत्माऽनुमीयतेऽनुमानगोचरः क्रियते, तद्यथा-देहादीनां, विद्यते खामी, सघातरूपत्वात् । उपलक्षणं खेतत्-तेन मूर्तिमत्त्वांदैन्द्रिय- २१ करवाचाक्षुपवादित्यादयोऽपि अनैकान्तिकलपरिहारार्थ समवद्विहित- विशेषणा हेतवो योज्याः । यथा गृहादीनां सूत्रपारादय इति २५सान्तः । यत्युनरखामिकं तत्सहातादिरूपमपि न भवति यथा ६ , गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १६९ गंगनकुसुम, सङ्घातादिरूपं च देहादिकं तसाद्विद्यमानखामिकमिति । तथा पुनः शरीरस्य भोग्यत्वात् भोक्ता जीवोऽनुमीयते, तद्यथा देहा- दीनां भोक्ता, समस्तभोग्यत्वात् , यथा शाल्यादिभक्तवस्त्रादीनां नरः,३ यस्य च मोक्ता नास्ति तद्धोग्यमपि न भवति यथा खरविपाणं, भोग्यं च शरीरादिकं ततो विद्यमानभोक्तृकमिति ॥ ६२ ॥ अथ श्लोकत्रयेणापरमप्यात्मसाधकमनुमानमाह- विहाय वस्तुनोऽस्तित्वं न स्यात्संशयसम्भवः । सतोहि स्थाणुपुंसोः सादरण्ये संशयोद्भवः ॥६३ ॥ हे गौतम ! वस्तुनः पदार्थस्याऽस्तित्वं सद्भावं विहाय त्यक्वार संशयसंभव संशयस्य उत्पत्तिर्न स्यात् , वस्तुसद्भावे एव संशयोत्पति- रिति भावः । तथा हि-हि यतो अरण्येऽटव्यां सतोर्विद्यमानयोः स्थाणुपुंसोः शङ्खपुरुपयोः संशयस्य उद्भवः प्रादुर्भावः स्यात् । विद्यमान-१२ स्थाणुपुरुपविषयक एव संशयोऽरण्ये जनानां समुत्पद्यते, नाविद्यमान- वस्तुविषयक इति भावः । विहायेति । विनाऽर्थेऽव्ययमिदम् , नतु त्यबन्तमेव कर्तृत्वासंभवात । तथा च श्रीहर्पप्रयोगः--'विहाय १५ भैमीमपदर्पयावायेति ॥ ६३ ॥ सन्दिग्धं यच्च तत्तत्रान्यत्र वाऽस्तीति निश्चयः। शशीयभृङ्गनास्तित्वेऽप्यन्यत्राऽस्ति तदेव सत् ।। ६४ ॥३० यच्च वस्तु सन्दिग्धं संदेहविषयीमूतं विद्यते तद्वस्तु तसिन् प्रदेशे अन्यत्राऽन्यस्मिन्वा प्रदेशेऽस्ति विद्यते एवेति निश्चयो वर्चते। 'मनु यदि यत्र संशयस्तेनावश्यमेव भाव्यम्, ततः शशशृङ्गमस्तीति । प्राप्त, तत्रापि कस्यचित्संशयसद्भावादि'त्यत आह-शशीयेत्यादि । शशस्य जन्तुविशेषस्सेदं शशीयं शशसम्बन्धि यत् शृङ्गं विषाणं तस्य २३ १७० . श्रीगौतमीयकाव्यं - नास्तित्वेऽपि असद्भावेऽपि अन्यत्राऽभ्यस्मिन् प्रदेशे तत्. शृङ्गलक्षणं वस्तु सदेव विद्यमानमेवास्ति । एतावता शशके एव तत् शृ नास्ति । अन्यत्र गवादावस्त्येवेति न कश्चिद्यभिचारः ॥ ६॥ एवं संशयसद्भावादात्माऽस्तीति प्रतीयते । वन्ध्यापुत्रस्य नास्तित्वे संशयोऽपि न कस्यचित् ॥६५॥ एवममुना प्रकारेण संशयस्य सद्भावात् आत्मा जीवोऽस्ति विद्यते इति प्रतीयते ज्ञायते तथा वन्ध्यापुत्रस्य नास्तित्वेऽसद्भावे संशयोऽपि कस्यचिन्न भवति । एतेन सद्वस्तुन एव संशय इति सिद्धम् । उक्तं च ९ श्रीविशेपावश्यकवृत्ती-“हे गौतम ! अस्त्येव जीवः तव संशयतः, संशयसद्भावात् , यत्र यत्र संशयस्तत्र तदस्ति, यथा स्थाणुपुरुषो, संशयश्च तव जीवे तस्मादस्त्येवाऽयम् । तथा हि-स्थाणुपुरुषयोरूर्वस्वारोह- १२ परिणाहाधुभयसाधारणधर्मप्रत्यक्षतायां चलनशिरःकण्डूयनवयोनिल- यनवठ्यारोहणायुभयगतविशेषधर्माऽप्रत्यक्षतायां चोमयगतैतद्धर्मानु स्मरणे च सति एकतरविशेषनिश्चयं चिकीर्पोः किमिदमिति विमर्श- १५ रूपः संशयःप्रादुरस्ति । एवंभूते च स्थाणुपुरुषादिगतसंशये तत् स्थाणु. पुरुषादिकं वस्तु अस्त्येव । अवस्तुनि संशयाऽयोगात् , एवमात्मशरीर- योरपि: प्रागुपलब्धसामान्यविशेषधर्मस्य प्रमातुम्तयोः सामान्यधर्म- १० प्रत्यक्षतायां विशेषधर्माप्रत्यक्षत्वेऽपि च तद्विषयानुस्मृतौ सत्यामेकतर- १ तथा च चलन-शिरःकण्ड्यनादयः पुरुषगतविशेषधाः, चलनं-गतिः, शिरःकण्डूयनं-हसन हखाभ्यां वा शिरसः कण्ड्रयनम्-खर्जन मित्यर्थः, अपि च वयोनिलयन-वयारोहणादयो धर्माः स्थाणुगतविशेषवर्माः, बयोनिलयन- स्थाणी, क्या-पक्षिा निलमनं आश्रयस्थानमित्यर्थः, ययारोहणं-वल्लीना "आरोहणम् सम्पंगत्यां गमनमित्यर्थः । , - .

गौतमीयप्रकाशास्त्यटीकया सहितम् । २७१ . विशेषोपलिप्सोः 'किमयमात्मा, किंवा शरीरमात्रमिदम् ।। इति विमर्श- रूपः संशयो जायते । अयं चारमशरीरयोः सत्वे एवोपपद्यते, नेकतर- स्याप्यमावे, अतोऽस्ति जीवः, अयैवं पे-- अरण्यादिपु स्वाणुपुरुष-३ संशये तत्र विवक्षितप्रदेशेऽनयोरेकतर एव मवति, न पुनरुमयमपि, तत्कयमुच्यते विद्यमान एव वस्तुनि संशयो भवति ? इति, तदयुक्तम्- अमिमायाऽपरिज्ञानात्, न हि वयमेवं ग्रूमः तत्रैव प्रदेशे तदुमयमप्य-६ नीति किंतु यद्तः सन्देहस्सद्वस्तु तत्रान्यत्र वा प्रदेशे ध्रुवमस्त्येव । अन्यथा पष्ठभूतविपयो संशयः स्यात्, . तस्मात्संशयविपयत्वादस्त्येव जीवः इति सितम्" (विशेषा० वृह० पृ० ६७३) इत्यादि ॥६५॥९ इत्वमात्मानुमित्यापि साध्यतां गीतम! त्वया । अथाविरुद्धवाक्यार्य वेदस्यैवं विभावय ॥६६॥ हे गौतम ! त्वया इत्यं प्रागुतमकारेण भनुमित्याऽपि अनुमान-१२ प्रमाणेनाऽपि मात्मा जीयः साध्यताम् । ननु मागुक्तविरुद्धवेदवाक्यार्य- मनुलग्तस्त्यजतोऽपि मम संशयो'ऽतिविराथिताऽहित इव पृष्ठं न मुञ्चति तरिक करोमीत्यत आह-अयेत्यादि । अथानन्तरं वेदस्य १५ अविरुद्धो विरोपवजितो योऽसौ वाक्याधस्तमेवं यक्ष्यमाणप्रकारेण विभावय विचिन्तय । प्रागुक्तविरुद्धायें आग्रहं मा काीरित्यर्थः ॥६६॥ फयमित्याह - विज्ञानमुपयोगोऽन ज्ञानदर्शनयोः स्मृतम् । उत्सहातो घनतेन विज्ञानयन उच्यते ॥ ६७ ॥ उत्सचिमचातम्यो घटादिम्यो यथायथम् । .स जीवद्रव्यपर्यापः समुत्यायाऽनुनश्यति ।। ६८ ॥ २१ बलिकरनी प्रमोडमा पुनः पुरः दुनो सपः" १७२ श्रीगौतमीयकाव्य ३ . ६ ततः संज्ञाऽपि न प्रेत्याऽपरसंज्ञासमुद्भवात् । एवं हि देहिपर्यायोत्पत्तिनाशौ विवक्षितौ ॥ ६९॥ अशरीरं वसन्तं वेत्यादिवेदोक्तिभिः स्फुटम् । ध्रुवत्वं तस्य जीवस द्रव्यत्वेन प्रदर्शितम् ॥ ७० ॥ चतुर्भिः संबन्धः। अत्राऽस्मिन् 'विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्याय तान्येवानु- विनश्यति न च प्रेत्यसंज्ञा स्त्रीति वाक्ये ज्ञानदर्शनयोरुपयोगो विज्ञानं स्मृतं कथितं, विशिष्टं ज्ञानं विज्ञानमिति तस्य विज्ञानस्य सङ्घातः ९समूहो धन उच्यते, तेन कारणेन जीवो विज्ञानधन उच्यते ॥६७॥ अथ स विज्ञानघनो जीवद्रव्यस्य पर्याय, उत्पत्तिमत्त्वात् घटादिभ्यो मृतेभ्यो यथायथं यथायोग्यं समुत्याय उत्पद्य अनु पश्चात् अर्था- १२न्तरेऽपि योगे सति नश्यति विनाशं प्राप्नोति ॥ ६८॥ तत- खदनन्तरमपरसंज्ञासमुद्भवात् अपरोपयोगिसंज्ञायाः संभवतः प्रेत्य- संज्ञाऽपि नास्ति, प्राक्तनी ज्ञानसंज्ञाऽपि न विद्यते। हि इति निश्चये, १५एवममुना प्रकारेण देहिनां जीवानां ये पर्याया ज्ञानोपयोगाद्या- स्टेपामुत्पचिनाशी उत्पादन्ययौ विवक्षितौ ॥ ६९ ॥ तथा 'अशरीर वसन्त था' इत्यादयो या वेदोक्तयो वेदवाक्यानि ताभिः स्फुटं प्रकटं तस्य जीवस्य द्रव्यत्वेन द्रव्यरूपतया ध्रुवत्वं नित्यत्वं प्रदर्शितमस्ति । वेदोक्तिर्यया--'न ह चै सशरीरस्य प्रियाऽप्रिययोरपहतिरखि, अशरीर वा वसन्तं प्रियाऽप्रिये न स्पृशत' इति, यथा 'अमिहोत्रं २० जुहुयात् स्वर्गकामः' इत्यादि । एतदर्थस्तु मागेवोक्तोऽतः पुनोंच्यते इति । अय लोकचतुष्टयस भावना विघीयते-इह विज्ञानमनो जीव २५ उच्यते, तया हि-विज्ञान शानदर्शनोपयोगः तेन सहाऽभिन्नत्वेन गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १७३ , धनवं निविडत्वं प्राप्तो विज्ञानघनो जीवः, यदि वा प्रतिप्रदेशमन- न्ताऽनन्तविज्ञानपर्यायसङ्घातघटितत्वात् विज्ञानघनो जीवः । एवकारेण तु विज्ञानघन एवाऽसौ न तु नैयायिकादीनामिव 'स्वरूपेण निर्विज्ञान-३ खाजडोऽसौ बुद्धिस्तु तत्र समवेतैवेति नियम्यते । स हि भूतेभ्य उत्पद्यते, भूतानि इह घट-पटादि यवस्तुस्वरूपाणि अभिप्रेतानि, तेभ्यो ज्ञेयमावेन परिणतेभ्यो 'घटोऽयं पटोऽयम् इत्यादिज्ञानपर्याये-६ णोत्सद्यते इत्यर्थः । ततस्तान्येव ज्ञानालम्बनमूतानि कालक्रमेण व्यव- धानस्थानाऽन्यमनस्कत्यादिनाऽर्थान्तरोपयोगे सति विज्ञेयमावेन विना समभुयानानि, अनु पश्चात् तत्तबोधपर्यायेण स विनश्यति । 'ननु किमित्यं सर्वथाऽयमात्मा विनश्यतीति चेत्', नैवम् , एक एवाऽय- मात्मा त्रिखभाषः, तथा हि-अर्थान्तरोपयोगकाले पूर्व विज्ञानोप- योगेनायं विनश्चरखभावः, अपरविज्ञानोपयोगतस्तु उत्पादस्वभावः, १२ अनादिकालप्रवृचसामान्यविज्ञानमात्रसन्तत्या · पुनरयं विज्ञानघनो जीवोऽविनष्ट एवाऽवतिष्ठते । एवमन्यदपि.सर्व वस्तु उत्पादन्ययध्रौव्य- स्त्रमावमेव योध्यम् । न च प्रेत्येति । न चाऽन्यवस्तूपयोगकाले प्राक्तनी १५ ज्ञानसंज्ञाऽस्ति । कुतः । साम्पतवस्तुविषयोपयोगात् । अयमर्थः- यदा घटोपयोगनिवृत्ती पटोपयोग उत्पद्यते, तदा घटोपयोगसंज्ञा नास्ति, तदुपयोगस्य निवृत्तत्वाकिंतु पटोपयोगसंज्ञैवाऽस्ति । तदुपयो-१८ गस्यैव तदानीमुत्पन्नत्वात् , तस्माद्विज्ञानघनात्यो वेदपदेप्वमिहितोऽयं जीवः । ततो गौतम ! प्रतिपद्यरीनमिति ॥ ७० ॥ अथ यत्सवक्षणिकमिति व्याप्तिवादिनां योद्धानामेकान्तवादित्वं दर्शयति- - १७४ श्रीगोतमीयकाव्यं ३ १ क्षणनश्वरताबुद्धिबौद्धानां या थुते श्रुता । ज्ञानपर्यायमाश्रित्य साऽस्तु द्रव्यानपेक्षणात् ।। ७१ ।। बौद्धानां सौगतानां श्रुते शास्त्रे या क्षणनश्वरतावुद्धिः सर्वमर्पि वस्तु जातं क्षणविनश्वरमस्तीत्येवमूता मतिः श्रुता प्रसिद्धाऽस्ति, सां बुद्धिर्दव्यानपेक्षणात् द्रव्याऽपेक्षामविधाय, किंतु ज्ञानपर्यायमाश्रित्य स्वीकृत्य अस्तु भवतु । एतावता पर्यायनयाऽपेक्षया क्षणनश्वरत्वं सर्व- पदार्थानामस्तीत्यर्थः । द्रव्येत्यादि । 'त्यब्लोपे-' (वा०) इति पश्चमी ।। ७१ ।। अथ नास्तिकादिमतं निराकुर्वन्नाह- अनुमानात् स्वसाध्यं यः साधयन्नपि तं पुनः । खण्डयनिह चार्याकः सतां ग्राह्यपचाः स किम् ॥ ७२ ॥ इहाऽमिन् लोके स चार्वाको नास्तिकः, किं सतां सत्पुरुषाणां माधमुपादेयं वचो वचनं यस्य स प्रायवचो भवति ! न भवत्येवे- त्यर्थः । स क इत्याह-प्रन्वित्यादि । यश्चार्वाक: सस्यात्मनः १५साध्यं नास्तित्वमनुमानादनुमानप्रमाणेन साधयनपि तं पुनरनुमानादि- साध्यं जीवं खण्डयन् निराकुर्वन् वर्तते । एतावता यो येन प्रमाणेन ससाध्यं सापयति तेनैव सिद्ध पदार्थान्तरं न स्वीकुरुते । तस्याऽय- याधंगापिणो वचनं कस सत्पुरुषस्योपादेयं भवेदिति भावः ॥७२॥ शून्यतेय परं तवं येषां स्वाइन्यवादिनाम् । तेषां पापोऽर्धशून्यत्वात् प्रतीताः स्युः कदापि न ।। ७३ ।। तथा नेपां न्यदादिना योद्धकदेगिना शून्यता पर पर प्रधान पतसं स्पान विपते, ते पापो गिरोऽर्थशन्पत्यादमिपेपहीनयारक.' १२ - गौतमीयप्रकाशाख्यटीकयां सहितम् । १७५ दापि कमिन्नपि काले .न प्रतीताः स्युन प्रतीतियुक्ता भवन्ति । • अयमर्थः-ये,खलु सर्व शून्यमेवास्तीति वदन्ति तेषां वाचोऽपि सर्ववस्वन्तर्गतत्वात् शून्या एव, ततश्चार्थशून्ये तद्वचने को विद्वान्म: ३ तीतिं कुर्वीतेति ॥ ७३ ॥ चैदान्तिमतमाथित्य ब्रह्मैक्यं यद्यपि स्थितम् । तथापि लिङ्गभेदेनाऽऽत्मभेदमवधारय ॥ ७४ ॥ वेदान्तिनां मतं वेदान्तिमतं, तदाश्रित्य यद्यपि ब्रह्मण आत्मन ऐक्यमेकत्वं स्थितम् , तथाऽपि हे गौतम 1 लिङ्गस्य चिहस्य भेदेन मात्मनो जीवस्य भेदं नानात्वमवधारय जानीहि । वेदान्तिमतं ताव-९ दिदम्-"एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकघा बहुधा चैव दृश्यते बलचन्द्रवत् ॥ यथा विशुद्धमाकाशं तिमिरो- एप्लुतो जनः । संकीर्णमिव मात्राभिभिन्नाभिरभिमन्यते ॥ तथेदममलं १२ ब्रह्म निर्विकल्पमविद्ययया । कलुषत्वमिवापन्नं भेदरूपं प्रकाशते.॥". इत्यादि ॥ ७४॥ ननु कथं लिङ्गमेदेनात्मभेद इत्याशझ्याह- उपयोगो हि लिङ्गं स्यात्तस्योत्कर्षाऽपकर्पतः। मेदास्त्वनन्ता जीवानां मिन्नता तेन गृह्यताम् ।। ७५ ॥ हीति निश्चयेन उपयोगो ज्ञानदर्शनोपयोगः, स च जीवस्य १८ लिहं स्याद् विद्यते । तस्योपयोगस्य तु उत्कर्षापकर्पतः प्रतिशरीरमा. धिक्यन्यूनभावात् जीवानां मनन्ता मैदाः सिद्धाः, तेन कारणेन हे :: गौतम ! त्वया जीवानां भिन्नताऽनेकविधत्वं गृह्यतां स्वीक्रियता, नं तु वेदान्तिवदेकत्वमिति भावः । एषां मिनलं तु संसारीतर(सिद्धा: २२ १७६ श्रीगौतमीयकाव्यं . 'सावरत्रससूक्ष्मयादरपर्याप्ताऽपर्याप्तादिमेदैरवसेयम् । अत्र प्रयोगः- नानारूपा मुवि जीवाः, लक्षणादिभेदात् , कुम्भादिवत् , यच्च न भिन्नं ३न तस्य लक्षणमेदः, यथा नमस इति । अपि च एकरवे सति जीवानां मुखदुःखबन्धमोक्षादयो नोपपद्यन्ते सर्वगतत्वान्नमस इव । यत्र तु सुखादयो न तत्संर्वगतं, यथा देवदत इत्यादि । इत्यं चैकत्वे सुखा- ६ धनुपपत्तेर्नानात्वं जीवानामिति स्थितम् ।। अत्र नैयायिका:-'भवतु सहि जीवानां नानावं किंवैकैको जीवः सर्वजगद्यापकोऽस्तु इति वदन्ति', तत्रोच्यते-जीवस्य सर्वजगद्यापकलं तावदसनवमेक ९मतिमावतः प्रतिमाति । अस्य हि शरीरमात्रावस्थायित्वस्यैव प्रमाणसिद्ध- त्वात् । तथा च प्रयोगः -देहमात्रस्यो जीवः तत्रैव तद्गुणोपलब्धः। यथा स्वात्ममात्रे घट इति । अथवा यो यत्र प्रमाणै पलभ्यते तस्य १२तत्रामाव एव, यथा मिन्ने पटे पटस्य, नोपलभ्यते च.शरीराहि- जीवः, तस्मातस्य तत्रामाव एव । इत्यलं प्रसझेन ॥ ७५ ।। तदेव केषांचिद्वेदपदानामर्थ व्याख्याय साम्प्रतमुपसंहरन् सर्वेषा १५च वेदपदानां सद्धेपतोऽर्थमुपदर्शयंश्चाह- एषां वेदपदानां यत्तमर्थ वैरिस नैव तत् । करोपि संशयं जीवे, सर्वेपामथवा ध्रुवम् ।। ७६ ।। अर्थः किं वा भवेच्छन्दो जातिव्यं गुणः क्रिया । विज्ञानं वस्तुमेदो वाऽयुक्तोऽयं संशयस्तव ।। ७७॥ परस्परमेदमात्रा इन्यपः। बुद्धिमतो नरान् । पटे परस रात नोपलभ्यते अत एव तदमावोऽवसीयते खः । ३ पटाव पृषविस्थते .. . 7 गौतमीयप्रकाशायटीफया सहितम् । १७७ वस्तुधर्मो न युक्तो हि अयमेव न वेत्ययम् । सर्व सर्वमयं चैव ,खान्यपर्यायतो यतः ७८॥ सर्व विवक्षयाऽसर्वमयमप्यस्ति केवलम् । : युक्तः पदार्थः सामान्पविशेषात्मा विवक्षया । वस्तुनो विश्वरूपो यत्पर्यायापेक्षया समः ।। ७९ ॥ पट्पदीयम् । चतुर्मिः कलापकम् । हे गौतम ! यद्यलात्कारणात् एपां 'विज्ञानघन एवेत्यादिपूर्वोक्तानां वेदपदानां योऽयों मया दर्शितस्वमर्थ न वेत्सि न जानासि, ततम्ला- कारणादेव जीवे संशयं करोपि । अर्थवा सर्वेषामशेपवेदपदानाम-९ प्यर्थ भुवं निश्चितं त्वं न जानासि, यस्मात्सर्वेष्वपि वेदपदेषु विषये तवैवंभूतः संशयोऽस्तीति सम्बन्धः ॥ ७६ ॥ कथंभूत' इत्याह- अर्थ इत्यादि । किमतेषां वेदपदानामर्थः शब्दो मवेत् ! यया १२ मेरीपटहहक्कादीनां शब्दस्य शब्द पवार्थः:, वा अथवा किं जातिर- मीपामयों यथा गोशब्दे समुच्चारिते गोजातिरवसीयते, यदि वा किं द्रव्यमेपामयों यथा दण्डीत्यादिषु दण्डादिमद्रव्य, किंवा शुकृष्णा-१५ दीनामिव शुक्लादिगुण एतेषामर्थः, यथवा धावतीत्यादीनामित्र घाब- नादिक्रियाऽमीपानः, यदि वा ययादिशुन्दे समुच्चारिते तदमिये- याविषयं विज्ञानं भवद् दृश्यते ततेपामयः, किंवा पटशब्दे समु-१८ कीर्चिते धुवुनोदरायाकारवान् घटलक्षणोऽर्योऽनेनोको न तु पटा- दिरित्येवं यो वस्तुभेदः प्रतीयते स एपामयः इति-अयं च संशयः, स चाऽयुक्तोऽन्याय्यश्च ॥ ७ ॥ कयमित्याहचस्त्वित्यादि । हि यसादऽयमेवास्ति वाऽथवाऽयं नैवान्ति इत्येवं कन्यापि वस्तुनो २२ १ पत्र 'यत् पर्यायविवक्षया ममः' इति काधीमुद्रितपाठ टन्दोऽनुरोपेन प्रामादिरः। २ भवसीयते इत्सम्याहार्यम् । १२ गौ० का. ."

श्रीगोवमीयकाव्य - धर्मोऽवधारयितुं न युक्ती, शब्दोऽपि वस्तुविशेष एव, तत एवंभूत- सैवार्थस्यायमभिधायको नैव वा:, इत्यंभूतस्याऽर्थस्साऽयं प्रतिपादक इत्येवमेतद्धर्मस्याप्यवधारणमयुक्तमेव । कुत इत्याह-सर्वमित्यादि । यतो यस्मात्सर्वमपि वाच्यवाचकादिकं वस्तु खान्यपर्यायतः स्वपर- पर्यायैः सर्वमयं सर्वात्मकमेव विद्यते सामान्यविवक्षयेत्यर्थः ।। ७८॥ ६ तथा विवक्षया केवलखपर्यायापेक्षया सर्व वस्तु असर्वमयमसर्वात्मक- मप्यस्ति । कीदृशमित्याह केवलं विविकरूपं सर्वतो व्यावृत्त- मित्यर्थः । तस्मात्सर्वेषामपि पदानां विवक्षया विवक्षावशतः सामा- ९न्यविशेषात्मा सामान्यमयो विशेषमयश्च पदार्थों युक्तः, न पुनरे. कान्तेन । इत्थंभूत एव अनित्थंभूत एव वेति कुत इत्याह- वस्तुन इत्यादि । यद्यलात्समः सर्वोऽपि वाच्यस्य वाचकस वस्तुनः १२ समावः, पर्यायापेक्षया विश्वरूपी नानाविधो वर्चते, ततश्च सामान्य- विवक्षायां घटशब्दः सर्वात्मकत्वात्सर्वेपामपि द्रव्यगुणक्रियायानां वाचकः । विशेषविवक्षायां तु प्रतिनियतरूपत्वात् य एवास्येह यु- १५वुमोदरायाकारवानथों वाच्यतया रूढस्तस्यैव वाचकः, एवमन्योऽपि शब्द: विशेषविवक्षया यो यत्र देशादौ यस्यार्थस्य वाचकतया रूदः स तस्य वाचको द्रष्टव्यः । सामान्यविवक्षया तु सर्वः सर्वस्य १८वाचकः सर्व च सर्वस्य वाच्यमित्यनया दिशा सकलं मुधिया माय- नीयमिति । सामान्येत्यादि । सामान्यं च विशेषश्च सामान्य- विरोपी तो आत्मा सरूपं यस्य सः । सम इति । अर्थसम्मन्यात समसार्यवाचकोऽयमत्र पायो न तु तुल्यार्थकः ॥ ७९ ॥ १ सामान्यारेश्या-प्रयाधिकनयस प्राधान्य विवक्षया ।

३ गोवमीयप्रकाशाख्यटीकया सहिवम् । १७९ इत्येवं भगवान्, इन्द्रमूतः संशयं निराकृत्य पुनरपि प्रागुकं सीमेवार्थ द्रवयति- प्रतीत्य मयि सार्वत्यं सत्यं मन्यस्त्र मद्वचः। रागद्वेपमयातीतो न यसत्यं प्रमापते ॥ ८०॥ है गौतम ! मयि मद्विपये सार्वत्यं सर्वज्ञलं प्रतीत्य सर्वज्ञोऽय- मिति प्रतीति विधाय मद्वचो मदीयं वचनं सत्यमवितथं त्वं मन्यस जानीहि । कुत इत्याह-रागेत्यादि । हि यतो रागः प्रीतिपो-' प्रीतिर्मयं साध्वसं तानि रागद्वेषमयानि अतीतोऽतिकान्तः पुमान् असत्यमऽनृतवावयं न प्रभापते न ब्रवीति, ईदृशश्चाहमित्यतो मद्वचनं १ सत्यं मन्यतेत्यर्थः । अत्रैवं प्रयोगः-सर्वमपि मद्वचनं सत्यमनति- पाति च बोध्यम् , रागद्वेषभयाऽज्ञानरहितत्वात् इह यद्भयादिरहितस्य वचनं तत्सत्यं दृष्टं, यथा मार्गजस भयरहितस प्रप्टरि रागद्वेपरहि-१२ तल मार्गोपदेशवचनं, तथा च मद्वचः, उलात्सत्यमनतिपाति चेति, मूले रागद्वेपमये इत्यत्राऽज्ञानपदमनुकमपि सासं, प्रकृतोपयोगि- त्वात् ।। ८०॥ तदेवं त्रिजगत्खरूपवेदिना मगदता श्रीमहावीरेण निःशेपपर- प्रबोधनोपायकुशलतया निपुणयुक्तिमयन्येन समासन्नपरमकल्याण- सेन्द्रमतेः सलिनपि संशये मूलच्छिन्ने सति किमसौ कृतवा- 10 नित्याह- इत्यं संशयघातकानि वचनान्यापीय वीरप्रमोः सर्ववत्वमिहाधिगत्य जगतामीयत्वमालोक्य च । चार्ग छात्रगतैरसों परिश्तो मिथ्यात्वमोहोज्झित- शारित्रं प्रविवेश सर्वविरति तीर्थावणीगौतमः ॥८१॥२३ ३५ २१ श्रीगौतमीयकाव्यं . इत्थं प्रागुक्तप्रकारेण संशयस्य जीवविषयकसन्देहस्य घातकानि विनाशकानि वीरप्रभोः वर्द्धमानखामिनो वचनानि आपीय सादरं ३श्रुत्वा, तथा इहास्मिन् वीरप्रभौ सर्वज्ञत्वं सर्वज्ञमावमधिगत्य विज्ञाय, च पुनरमिन्नेव प्रभौ जगतामीशत्वं विश्वेश्वरत्वमालोक्य दृष्ट्वा, मिथ्या- त्वेन मिथ्यात्योदयेन यो मोहो मौढ्यमविवेकित्वमिति यावत् , तेन ६ उज्झितो मुक्तो मिथ्यात्वोदयजनितमूढत्वविमुक्त इत्यर्थः । तथा बाणैः पञ्चभिश्छात्राणां शिष्याणां शतैः परिवृतो वेष्टितः छात्रपञ्च- शतीसहित इत्यर्थः । एवंविधोंऽसौ गौतम इन्द्रभूतिः सर्वविरति, ९सर्वेविरत्याख्यं चारित्रं चरणं प्रविवेश प्रविशति स्म । भागवती दीक्षा जग्राहेत्यर्थः । अत एव कीदृशोऽसौ गौतमः--तीर्थावणी तीथें चतुर्विधसद्धेऽग्रणीर्मुख्यो, भगवता दीक्षां दत्त्वा प्रथमगणघर, १२ त्वेन स्थापितत्वादिति भावः । आपीयेति । आपूर्वात् 'पीङ् पाने' ऽसात् क्त्वाप्रत्ययस्तस्य ल्यबादेशः । वाणैरिति । मदनस्य पञ्च वाणाः सन्ति, ततो वाणशब्देनाऽत्र पञ्चेति सङ्ख्या परिमाह्येति । इदं च २५ शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् । एतल्लक्षणं तु प्रामुक्तमेवेति ॥ ८१ ॥ इति कविरूपचन्द्रविरचिते श्रीगौतमीयमहाकाव्ये गौतमस्य संशयच्छेदानन्तरं प्रवज्याग्रहणवर्णनो नाम सप्तमः सर्गः ॥७॥ इति स्पष्टम् । इति श्रीगौतमीयप्रकाशाण्यायां गौतमीयमहाकाव्यन्याख्यायो सप्तमः सर्गः॥७॥ इति प्रथमगणधरयादः ॥१॥ " ** ३ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १८१ अष्टमः सर्गः। इन्द्रभृतिमथ सोदरमयं दीक्षित जिनपदेन निशम्य । अग्निभूतिरपि तहधुवन्धुर्भग्नवाहुरिव खेदमवाप ॥१॥ विशुद्धविहानकर प्रसायोऽग्निवायुभूती भवसिन्धुमच्यात् । समुदृती येन जिनेश्वराय नमोऽस्तु तसे निशलात्मजाय ॥ १ ॥ , अथानन्तरं अग्रे मवमयं प्रथममित्यर्थः । सोदरं मातरं इन्द्रमूर्ति ६ गौतम जिनपदेन जिनवाक्येन दीक्षा जाता यति दीक्षित निशम्य श्रुत्वा तस्येन्द्रमृतेर्लयन्युलधुम्राता अग्निमूतिरपि भग्नो बाहु- र्यस्य स भगवाहुरिव खेदं शोकमवाप प्राप्तवान् । पदेनेति | 'पदं खाने विमचयन्ते शब्दे वाक्येऽवस्तुनोः' इत्यादि हेमः । अस्मिन्सगें खागतावृत्तं, तल्लक्षणं तु 'सागतेति रनमागुरुयुग्म मिति ॥ १ ॥ अथाऽसौ कि शुशोचेत्याह- यं वृहस्पतिरपि अतिवाद जेतुमर्हति न युक्तिपत्क। सोऽपि कैनचिदहो! निगृहीतो हन्त ! दैवरचितं हि दुरन्तम् ॥२॥ वृहस्पतिरपि मुराचार्योऽपि श्रुतीनां वेदानां वादे युक्तिपक्कैरु-१५ पपत्तियाणेये मद्रातरं जेतुं न यर्हति न योम्यो मवति, न शको. तीत्यर्थः । अहो इत्याश्चर्ये, सोऽपि मद्राता केनचिद्वादिना निगृ- हीतो निर्जितः । हि यस्मात्कारणात् हन्तेति विषाद, देवेन यदचित । दत् दुरन्तं दुरवसानं, भवतीति शेपः ॥ २ ॥ मातरं मम महान्तमपीयश्छलादिनिपुणः स च वादी । तत्र यत्किमपि संग्रति वृत्तं ज्ञायते न निखिलं वदगत्वा||३॥ च पुनः, यो वादी मम महान्तं ज्येष्ठं प्रावरं गौतम अजेपीत् जयतिर १२ १८२ श्रीगौतमीयकाव्यं स, स वादी छलादौ निपुणः प्रवीणो, दृश्यते इति शेषः । संप्रत्यधुना यत्किमपि कार्य वृत्तं सञ्जातं तन्निखिलं समस्तं तत्र प्रदेशे न गत्वा गमनमकृत्वा न ज्ञायते, अतो ममापि तत्र गन्तव्यमिति भावः ॥३॥ यज्ञपाटकमतीत्य सुरा यनिर्ययुस्तदभवद्विपरीतम् । मत्सहोदरपराजय एवं कोऽध दैव ! विषमो बत काला! ॥४॥ ६ पूर्व तु सुरा देवा यज्ञपाटकमतीत्य विलक्ष्य यन्निर्ययुनियन्ति स तद्विपरीतममवत् । ततश्च एवममुना प्रकारेण मम सहोदरस आतुः पराजयो विपरीत कार्यमभवत् । बतेति खेदे, हे दैव ! अब ९अमिनहनि को विषमः कालः समयः समजनीति शेषः ॥ ४ ॥ कोऽस्त्यसौ सुरवरैरपि सेन्यो यस्य चैप महिमा परिवति । दर्शनेऽस्य विहिते खलु पथातच मे भवतु यद्भवितव्यम् ।।५।। च पुनर्यस्य वादिन एष महिमा प्रभावो परिवर्ति अतिशयेन वर्वते । अयमसौ सुरवरैर्देवेन्द्ररपि सेन्यः कोऽपि, सांप्रतं तु खलु निश्चितं, अस्य वादिनो दर्शने चिहिते कृते सति में मम यद्भवितव्यं १५तद्भवतु । चः पादपूरणे । परिवीति । 'धृतु धातोः' यइलइन्ताल, पूर्वस्य रिगागमः ॥ ५॥ निर्ययावयमपीति विमृश्य छात्रपञ्चशततन्त्रसमेतः । २८ इन्द्रभूतिरिव विसयमृच्छन्नाप तीर्थपतिदर्शनदेशम् ॥६॥ अयममिभूतिरपि इति उक्तप्रकारेण विमृश्य विचिन्स छात्राणां पञ्चशतानि छात्रपञ्चशतानि तान्येव तनं परिकरतेन समेतः संयुका सन् निर्ययो गृहानिर्गच्छति स । ततश्च इन्द्रभूतिरिव विसयमा- २९अर्यमृच्छन् प्रामुवन् तीर्थपतेः श्रीवीरमगवतो दर्शनस्स देशं प्रदेश- १२ ९ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १८३ माप प्राप्तवान् । तत्रेति । 'तन्त्रोपकरणे अपी'ति हेमः । ऋच्छ- निति । 'ऋच्छ गत्यादौ' अस्माल्टः शतृ ॥ ६ ॥ एहि सरिवर ! पाचकभूते । भ्राठवत्त्वमपि संशयमुज्झ । तत्र तीर्थपतिनेति स उक्तो विसयं मनसि बाढमुवाह ।। ७ ।। हे पावकमूतेऽमिमृते ! सूरिवर विद्वद्वर ! एहि आगच्छ त्वमपि भ्रातृवगौतमवत् संशयं सन्देहं उज्झ परित्यज । इत्यमुना प्रकारेण तत्र ६; समवसरणे तीर्थपतिना श्रीवीरखामिना उक्तः सन् सोऽग्निभूतिर्मनसि बाढमत्यर्थ विस्मयमाश्चर्यमुवाह वहति स, धारयति स्मेति यावत् । वहेः कर्तरि लिट् ॥ ७ ॥ अग्रिभूतिरपि वाक्यविचारे प्राविशदुवमसौ सकलनः । अन्यथा परमनोगतमेवं कः प्रकाशयति गूढविमर्शम् ? ॥८॥ अमिमूतिरपि भगवदुक्तस्य वाक्यस्य विचारे विचारणे प्राविशत् १२ प्रविशति स्म । कथमित्याह--असौ जिनो ध्रुवं निश्चितं सकलनः सर्वज्ञो विद्यते इति शेषः । अन्यथा सर्वज्ञमन्तरेण एवममुना प्रकारेण परस्य मनोगतं हृदयमाप्तं गूढविमर्श गुप्तविचारं कः प्रकाशयति प्रकटी-१५ करोति, न कोऽपीत्यर्थः । ततश्च निश्चितोऽयं सर्वज्ञ इति भावः ॥८॥ वेत्ति यः परमनोविचिकित्सां निर्णयोऽपि हि भवेत्तदधीनः । तं च वक्ष्यति ततोऽयमपृष्टो मौनमेव मम साम्प्रतमस्तु ।।९।१८ यः परस्यान्यस्य मनसो विचिकित्सा संशयं वेत्ति, हीति निश्चितं,' तत्संशयस्य निर्णयो निश्चयोऽपि तदधीनस्तदायत्तो भवेत् , ततस्तस्मा- कारणात् तं च सन्देहं सनिर्णय अयमपृष्ट एव वक्ष्यति वदिष्यति । मम तु साम्प्रतमधुना मौनमेवास्तु । विचिकित्सामिति । 'विचि: कित्सा च संशयः' इति हैमः । वक्ष्यतीति । वचेः कर्तृ लट् ॥९॥२३ १८४ श्रीगौतमीयकाव्यं. . सर्ववित्समधिगम्य तदीयं चित्तभावमथ वाचमवोचत् । सौम्य ! वेत्सि विषयः करणानां कर्म नो तदिदमस्ति न वेति ॥१०॥ अथाऽनन्तरं सर्व वेचीति सर्ववित् सवैज्ञः श्रीमहावीरतस्यामि- ६ भूतेरयं तदीयस्तं चिचमा हृदयाभिप्रायं समधिगम्य केवलज्ञानेन ज्ञाला वाचं वाणी अवोचत् अवादीत् । कथमित्याह-हे सौम्य ! शान्तप्रकृते ! अनिमूते! क्रियते मिथ्यात्वादिहेतुयुक्तेन जीवेनेति ९कर्म ज्ञानावरणादिकं, करणानामिन्द्रियाणां विपयो गोचरो नो विद्यते, इन्द्रियगम्यं नास्तीत्यर्थः । तत्तस्मारकारणादिदं कर्म अस्ति न वा! इति वं वेत्सि खहृदये जानासि, परमयमनुचितस्तव संशय १२ इति वाक्यशेपः ॥१०॥ तत्रोपपतिमाह- पचयाऽप्रकटमस्ति तदेत- द्वर्तते प्रकटमेव ममात्र । केनचिच्छरभसिंहगजाथे- अक्षिताः किमु न ते खलु सन्ति ॥११॥ हे अभिन्ते ! अत्रालिन्नवसरे याकर्मादिकं तर अप्रकटमखि तदेतगम प्रकटमेव पर्वते । अथ यदि भवतः प्रत्यक्ष कर्म तर्हि ममापि तत्माक्षं फलाल भवतीत्याराहाह-केनेत्यादि । केनविसुरुषेण ॥षदि घरमसिंहगजाः शरभोऽष्टापदः सिंहगजी प्रतीनी एवंविधाः पशवो न ईशिता न दृष्टासार्ह सल निश्चितं ते जन्तवः किगु न सन्ति:, सन्त्येवेत्यर्थः । इदमय सासर्यम्नहि यदेकस फरसचि- १५ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १८५ - ९ प्रत्यक्षं तेनाऽपरस्यापि प्रत्यक्षेण भवितव्यम् । न हि शरभादयः सर्व- स्यापि लोकस्य प्रत्यक्षाः, न च ते न सन्ति, बालादीनामपि तत्सर्वस्य । प्रसिद्धत्वात् , तस्मात् अस्ति कर्म सर्वज्ञत्वेन मया प्रत्यक्षीकृतत्याद्भव-३ संशयविज्ञानवत् इति, . , . कार्यप्रत्यक्षतया च भवतोऽपि. प्रत्यक्षमेव कर्म, । यथा घटादिकार्यप्रत्यक्षतया परमाणव इति । शरभेति । शरमः कुञ्जराऽरातिरुत्पादकोऽष्टपादऽपि' इति हैमः ॥ ११॥ ६ : एतेन न तावत्प्रत्यक्षं कर्म, अतीन्द्रियत्वात् , खरविपाणवदित्या- घनिभूत्यभिप्राय निराकृत्याऽथानुमानमाह- कर्मसाधनमदोऽप्यनुमानं विद्यते तदवधारय बुद्धौ । प्राणिनामिह फले सुखदुःखे कारणं यदिह व किल कर्म ॥१२॥ हे अग्निभूते ! अदोऽनन्तरं वक्ष्यमाणमनुमानमपि कर्मणः साधनं हेतुभूतं विद्यते, तत्त्वं बुद्धाववधारय । तथा हि-इह लोके प्राणिनां १२ जीवानां मुखदुःखे फले विद्येते, कस्यचित्कारणस्य कार्ये स्त इत्यर्थः । अथेह सुखादौ यत्कारणं तकिलेल्यवधारणे कर्म, उच्यते इति " शेषः । कर्मणः फले सुखदुःखे इति भावः । इदमन तात्पर्यम्-१५ प्रतिप्राणिप्रसिद्धयोः सुखदुःखयोहेंतुरस्ति, कार्यत्वादकरस्य बीजमिव । यचेह सुखदुःखयोहेतु तत्कम्मैवेति ॥ १२ ॥ अथ परस्याऽऽशङ्कामाविष्कृत्य परिहरति- दृष्टमेव रमणीपरिभोगा- धं सुखस्य च विषाद्यसुखस्य । कारणं यदि भवान्मनुते किं. तत्फले विपमताऽस्ति तथाहि ॥ १३ ॥ २२ श्रीगौतमीयकाव्यं - 'हे अमिमूते ! यदि भवान् दृष्टमेव रमणीपरिमोगाचं अङ्गनास- योगसक्चन्दनादिकं सुखस्य कारणं मनुते जानाति, च पुनर्विपादि ३ विपकण्टकादिकं असुखस्य दुःखस्य कारणं मनुते तर्हि तयो रमणी- संयोगादिविपायोः सुखदुःखकारणयोः फलं कार्यम् । तत् फलं तत्र विषमता वैषमता वैषम्यं किमस्ति ? कथमस्तीत्यर्थः । तथाहि- ६ तदेव वैपम्यं दर्शयतीत्यक्षरार्थः । भावार्थस्त्वयम्-~-'सक्-चन्दना-S- नादयः सुखस्य हेतबो दुःखस्य तु अहि-विप-कण्टकादय इति दृष्टमेव सुखदुःखयोहेंतुरस्ति, किमदृष्टस्य कर्मणस्तद्धेतुत्वकल्पनेन ? नहि दृष्ट- परिहारेणाऽदृष्टकल्पना कत्तुं युक्ता अतिप्रसङ्गात्' इति त्वं मन्यसे- तदयुक्तं, कारणसाम्येऽपि कार्यवैपम्यदर्शनादिति ॥ १३ ॥ अथ फले विपमतां दर्शयति- १२ यदुगादि वनितापरिभोगे रोगहानिरपि वा विपभोगे । दृश्यते बहुवरं तददृष्टं कारणं किमपि कल्पयितव्यम् ॥१४॥ यद्यस्मात्कारणाहुतरं यथा स्थाचथा, वनितापरिभोगे स्त्रीसम्भोगे १५मुखस कारणे सत्यपि केपावित्पुंसां रुगादि रोगोत्पत्त्यादिकं दुःस- फलं दृश्यते । अपिः पुनरर्थे, वाऽथवा विपभोगे शृतिकादिविपक्षणे दुःखकारणे सत्यपि बहूनां रोगहानिः सुखफलं दृश्यते, १८ णात् किमपि अदृष्टं कारणं कल्पयितन्यं विचार्य्यम् । पतायता नहि अदृष्ट कमपि हेनुमन्तरेणैतदुपपद्यते, स चादृष्टहेतुः कर्मवेति गायः । पत्र विशेपावश्यकवृत्ती वेपम्यमापना एवं कृतास्ति, तथा २.हि--'इह यस्तुण्यसाधनयोरिष्टशब्दादिविषयमुखसाधनसमेतयोर- निष्टार्थसाधनयुक्तयोश्च द्वयोहूनां या फले मुखदुःसानुमयनलक्षणे २३ विदोपचारतम्यरूपो दृश्यते । नाऽसौ अदृष्ट कापि हेतुमन्तरेणोप- तपलात्कार गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १८७ . पद्यते, कार्यत्वाद्, घटवत्, यश्च तत्र विशेपाऽऽधायकोऽदृष्टहेतुस्त- गौतम ! कर्मेति प्रतिपयखेति' (विशेषा० बृह० गा० १६१३, पृ०६८९)॥१४॥ अमुमेवार्थ सूत्रकारो दृष्टान्तेन द्रढयति- साधनेप्विह समेषु विशेपो यः फलेऽस्ति स च कारणयोगात् । गौरवन्धुपु समेषु य एकः श्यामलः स विपमाशनहेतोः ॥१५॥ इह लोके समेपु तुल्येषु साधनेषु सत्सु यः फले विशेपोऽस्ति, स च कारणयोगात् ज्ञेयः । यथा समेषु सर्वेषु गौरवन्धुपु गौरवणे: भ्रातृषु मध्ये य एको माता श्यामलः श्यामवर्णों भवति । स विप-९ माऽशनहेतीविषमभोजनकारणात् । अयमर्थः-मातापित्रोरेक्येऽपि प्रातृपु यो वर्णमेदस्तत्र व्यवहारादोजनवैषम्यमेव कारणं, यदुत गौर- मातृपु गर्भस्थितेषु मात्राऽन्यद्भोजनं विहितं श्यामे तु गर्मस्थितेऽन्य-१२ दिति । एवमिहापि, साधनसाम्ये यः सुखदुःखानुभवनयोर्विशेषः सोऽदृष्टकारणादेवेति मन्तव्यम् । विपमेत्यादि । विपमं च तदशनं च विपमाशनं तदेव हेतुस्तसात् ॥ १५ ॥ उक्तमेवार्थमुपसंहरन्नाह- दृष्टहेतुकलने व्यभिचार वील्य कल्पय तदेवमदृष्टम् । तच्छरीरमिह कार्मणसंशं यद्भवान्तरविधानसहायम् ॥ १६ ॥ १८ तत् तसाकारणात् एवमुक्तप्रकारेण दृष्टस हेतोः कलने विचारणे व्यभिचारं विरोधं वीक्ष्य दृष्ट्वाऽदृष्टं कल्पय चिन्तय, हेतुत्वेनेति शेपः । तददृष्टं इह कार्मणसंज्ञं कार्मणनामकं शरीरं ज्ञेयम् । तत् किम् । यद्वान्तरस्य एकरसाद्भवादन्यस्य भवस्य विधाने करणे सहायं साहा-२२ + 1 १८८ श्रीगौतमीयकाव्यं य्यकारि वर्चते, सहायशब्दस्य पुंस्त्वेऽपि सहाय इवाचरतीति विग्रहे आचारविचन्तात्पचाद्यचि लीवत्वं बोध्यम् । 'सहाय' इति पाठे तुः ३न काऽप्यनुपपतिः ।। १६ ।। प यद्विनान्यतनुसंभव एव स्थान गौतम ! विचारय चित्ते । मूर्तमन्तरसहाय नु मूर्त वस्तु केन सह गच्छति योगम् ॥१७॥ ६ पुनर्यत् कार्मणशरीरं विना अन्यस्य भवान्तरमाविन्यास्तनोः शरीरस्य औदारिकादेः संभव उत्सतिरेव न स्यात् । हे गौतम ! अग्नि- मूते ! त्वं चिचे विचारय, नु इति प्रश्ने, अन्तर्मध्यवर्ति मूर्त मूर्ति- मद्वस्तु कार्मणशरीराख्यं अपहाय त्यक्त्वा बाह्यं मूत्र वस्तु औदारिका- दिकं केन सह योगं संवन्धं गच्छति प्रामोति ? अनेनाऽनुमानान्तरं सूचितं, तचैवम्-"आधं घालशरीरं, शरीरान्तरपूर्वक, इन्द्रियादि- १२ मत्त्वात् युवशरीरवत् इति । आदिशब्दात् सुख-दुःखित्व-प्राणादयो हेतवो ग्राह्याः । न च जन्मान्तरातीतशरीरपूर्वकमेवेदमिति शक्यते. वक्त, तस्यापान्तरालगतावसत्त्वेन तत्पूर्वकत्वाऽनुपपत्तेः । नचाऽशरी: १५रिणो नियतगर्भ-देश-स्थानप्राप्तिपूर्वकशरीरग्रहो युज्यते, नियामक- कारणाभावात् , नाऽपि समावो नियामकस्तस्य निराकरिप्यमाणत्वात् , यचेह बालशरीरस्य पूर्व शरीरान्तरं तत्कर्मेति मन्तव्यम् , कार्मण- शरीरमित्यर्थः।" इत्यादि विशेषावश्यकवृत्तौ (१०६९०)॥१७॥ अनुमानान्तरमपि तरिसद्धये पाह- या च काचन सचेतनहसा सा किया फलवती न हता चेत् । प्रायः विरोपावस्यकाश्यनुसारेणाध्य पाठः । . (MA गांवमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १८९ तच्छुमाऽशुभकृतेः फलमेत- कर्म सिध्यति कृपेरिख धान्यम् ॥ १८॥ च पुनः सह चेतनया वर्तते इति सचेतनो जीवनेन कृता ३ मारव्या या काचन क्रिया सा फलवती, सफला दृष्टेति शेपः । चेचदिं. हता न भवेत् केनचिद्दोषेण विनष्टा न भवेदित्यर्थः । किं तकल- मित्यत आह—तदेतत् शुमाऽशुभकृतेः शुमाऽशुभक्रियायाः फलं कर्म सिध्यति । कस्याः किमिव ! कृपेर्घान्यमिव, यथा कृपिक्रियायाः फलं धान्यं तधेदमपीत्यर्थः । अयं मावः इह दानादिक्रियाणां फलमस्ति, सचेतनारव्यक्रियाणां फलसद्भावदर्शनात् , यथा कृषिक्रियायाः, इह या सचेतनस्या क्रिया तस्याः फलं दृष्टं, यया कृप्यादिक्रियायाः । सचेत- नारव्याश्च दानादिक्रियाः, तस्साफलवत्यः, यच्च तासां फलं तत्कर्म । या तु निष्फला किया सा सचेतनारव्याऽपि न भवति, यया पर-१२ माण्वादिक्रिया । स्यादेतत्-'अनैकान्तिकोऽयं हेतुः, चेतनारव्या- नामपि कासांचित्कृप्यादिक्रियाणां निष्फलत्वदर्शनात्'–तयुक्तं, फल- वत्वामिप्रायेणैव तदारम्भात् , कचिन्निष्फलत्वमपि दृश्यते, तत्सम्यम्-१५ ज्ञानाद्यमावेन सामग्रीवैकल्याद्रष्टव्यम् । मनःशुध्यादिसामग्रीविकलतया दानादिक्रिया अपि निष्फला इप्यन्त एवेत्यदोषः । शुमैत्यादि । शुमया युक्ताऽशुमा शुमाऽशुमा, सा चाऽसौ कृतिश्चेति विग्रहः॥१८॥ उक्तमेवार्थ द्रढयति- तक्रियामुदयजामषिकुर्वत् साधयेत्खलु फले मुखदुःखे । एवमेव सकलापि फलाढ्या साक्रिया तदिह सिध्यति कर्म ॥१९॥ •. २३ ६ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १९१ 'नीवस्येति शेषः, कसाढेतोः स्यात् !, न कुतोऽभीति भावः । तस्माद्भवाऽटनहेतुभूतं शुभाऽशुभक्रियाजन्यमदृष्टं कर्मैव प्रतिपद्यतेति तात्पर्यम् ॥ २१ ॥ पुनः पराऽऽशकामाविष्कृत्य निराकुर्वन्नाह- सा क्रिया फलतु यत्फललिप्सा मा परेति सफलाः सकलाः किम् ।। नैमिच्छति न बन्धनवाघां चौर्य्यकृत्किम लभेत फलं व १ ॥ २२॥ यकललिप्सा यस्याः क्रियायाः फलस्य लब्धुमिच्छा मवेत् साह क्रिया फलतु सफला भवतु परं अपराऽन्या यस्याः फललिप्सा नास्ति 'सा क्रिया मा फलतु इत्यतः सकलाः समस्ताः क्रियाः सफलाः फलवत्यः किं कथमुक्ता !'इत्यर्थः । एवमिति । हे गौतम ! एवं १२ चेन्मन्यसे तर्हि चौय्ये करोतीति चौर्यकृन्मनुप्यो बधनस्य बाघां पीडां नेच्छति, परं तत् चौर्यक्रियाजन्यं बन्धनबाघादिकं फलं किमु न लभेत न प्रामुयात् ! प्रामुयादेवेति भावः । यदुक्तं विशेषावश्य-१५ कवृत्तौ-'ननु दानादिक्रियाऽनुष्ठातृभिर्यददृष्टं धर्मलक्षणं फलमाशं- सितं ततेषां भवतु, यैस्तु कृषि-हिंसादिक्रियाकर्तृभिरदृष्टमधर्मरूपं फलं नाशंसितं, तचेषां कथं भवति? इति चेत् तदयुक्तं, न 30 बविकलं कारणं स्वकार्य जनयत् करसायाशंसामपेक्षते किन्वऽवि- कलकारणतया खकार्य जनयत्येव, इत्यादिवहुविस्तरः, स च ततं (पृ० ६९२ तः आरभ्य) एवावगन्तव्यः ॥ २२॥ . १ इह 'नेवमिच्छति न वन्धनत्य तु बाधां चौर्यकृत् किमु लभेत् तत्' इति काशीमुद्रितपाठोऽर्थवैकल्याच्छन्दोमनदोषदुष्टलाच प्रामादिकः ।

श्रीगौतमीयकाव्यं . ९ तत्कर्म उदयाजाता उदयजा तां खोदयजनितां क्रियां अघि- कुर्वत् अधिकृतां कुर्वत् , अग्रगामिनी कुर्वदित्यर्थः । खलु निश्चित ३ सुख-दुःखे फले साधयेत् । एवमेव अमुना प्रकारेणैव सकला सम- स्ताऽपि क्रिया फलेन आत्या समृद्धा फलाऽऽन्या फलवती स्यात् भवेत् , तत्तस्मात्कारणादिह कर्म सिध्यति ॥ १९ ॥ अथ पराऽभिप्रायमाविष्कुर्वन्नाह-- कीर्तिलामफलमस्त्यथ दाने मांसभोजनफलं पशुपाते। घान्यपद्भवतु दृष्टफलैच सा क्रिया कथमदृष्पविकल्पः ॥२०॥. अथेति प्रतिज्ञायां, दाने दानादिविपये कीर्यशसो लाभ एवं फलमस्ति । तथा पशूनाम् अज-मृगादीनां पाते विनाशे मांसमोजनमेव फलमस्ति, न तु अदृष्टे पुण्यपापकर्मणि इति भावः । ततश्च सा क्रिया १२ धान्यवत् कृपे(न्यमिव दृष्टं फलं यस्याः सा दृष्टफलैव भवतु । अदृष्टस्य विकल्पो विमर्शः कथं :, किमर्थ क्रियते इत्यर्थः । अयं मायः-कृप्यादिक्रियाः दृष्टयान्यायवातिफला दृष्टा, मतो दानादि- ३५क्रियाणामपि दृष्टमेव कीर्चिलामादिकं फलं भविष्यति, किमएकर्म- लक्षण(फल)साधनेनेति ॥ २० ॥ अथ पराऽभिप्राय निराकुर्वन्नाह-- १८मा ग्रहीजिररेति विवादं यतु दृष्टमिह वच विनष्टम् । साइयाटनमहो। यद कसानहीच्छसि फलं तददृष्टम् ॥२१॥ है द्विजवर बामणश्रेष्ठ ! अमिगते । त्वं इत्युक्तनीत्या विरुद्धो यादो विवाद मा मदीर्मा गृहाण । कयमित्याह-यतु दृष्टं फलं तच रहेर विनष्ट, चेयदि तत् अदृष्टं कर्मरक्षणं फलं त्वं नहि इच्छसि यदि अहो पपिगते । स्वं यद फयय-गयाटन परभवे गमन, गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १९१ 'जीवस्येति शेपः, फसादेतोः स्यात् !, न कुतोऽपीति भावः । तस्माद्वाऽटनहेतुभूतं शुभाऽशुमक्रियाजन्यमदृष्टं कमैव प्रतिपद्यस्वेति तात्पर्यम् ।। २१ ॥ पुनः पराऽऽशङ्कामाविष्कृत्य निराकुर्वनाह- सा क्रिया फलतु यत्फललिप्सा मा परेति सफलाः सकलाः किम् । नैमिच्छति न बन्धनबाधां चौर्यकृत्किमु लभेत फलं तत् ॥ २२ ॥ यत्फललिप्सा यस्याः क्रियायाः फलस्य लब्धुमिच्छा भवेत् सा९ क्रिया फलतु सफला भवतु परं अपराऽन्या यस्याः फललिप्सा नास्ति 'सा क्रिया मा फलतु इत्यतः सकलाः समस्ताः क्रियाः सफलाः फलवत्यः किं कथमुक्ता ! इत्यर्थः । एवमिति । हे गौतम ! एवं १२ चेन्मन्यसे तर्हि चौयं करोतीति चौर्यकृन्मनुष्यो बन्धनस्य बाधा पीडां नेच्छति, परं तत् चौर्य क्रियाजन्यं बन्धनवाघादिकं फलं किमु म लमेत न प्राप्नुयात् ! प्रामुयादेवेति भावः । यदुक्तं विशेषावश्य-१५ फवृत्ती-'ननु दानादिक्रियाऽनुष्ठातृभिर्यददृष्टं धर्मलक्षणं फलमांश- सितं तपो भवतु, यस्तु कृषि-हिंसादिक्रियाकर्तृभिरदृष्टमधर्मरूपं फलं नाशंसितं, तवेषां कथं भवति' इति चेत्तदयुक्तं, 110 खविकलं कारणं खकार्य जनयत् कस्याप्याशंसामपेक्षते किन्त्वऽवि- फलकारणतया सकार्य जनयत्येय; इत्यादिबहुविस्तरः, स च तत (पृ० ६९२ तः आरभ्य) एवापगन्तव्यः ॥ २२ ॥ १६. नेवमिच्छति न यन्धनस्य तु याधां चौर्यकृत् किमु लमेद तत्' इति काशीमुद्रितपाठोऽर्यवेकल्याच्छन्दोमादोषदुष्टलाच प्रामादिकः ।

श्रीगौतमीयकाव्यं . : ननु प्रायेण लोको दृष्टमात्रफलालेव कृप्याद्यसस्क्रियासु प्रवते, अदृष्टफलासु पुनर्दानादिसत्कियासु कतिपयमात्र एव लोकः प्रवर्तते, ३न बहुः । ततश्च हिंसादीनामशुभक्रियाणामदृष्टफलाभावात् शुभ- क्रियाणामपि दानादीनामदृष्टफलाऽभावो भविष्यतीति पराऽभिप्रायमा- शङ्याह- सक्रियाकरणमस्ति सदाऽल्पं दृश्यते हि बहुलं विपरीतम् । यत्र या सकलकारणयोगोऽ- निच्छतोऽपि खलु सा फलदा स्यात् ।। २३ ॥ सक्रियाया दानादिशुभक्रियायाः करणं विधानं सदाऽल्पमें- चाऽस्ति, पुंसामिति शेषः । पुण्यवद्भिरेव तद्विधानात् , तेषां चाल्प त्वादिति भावः । विपरीतं कृप्याद्यशुमक्रियाकरणं हि बहुलं प्रचुर दृश्यते, तत्कणामल्पपुण्यजन्तूनां वहुत्वात् । या पुनर्यत्र यस्या क्रियायां सकलकारणानां योगः सम्बन्धो भवेत् खल निश्चितं सा १५ किया अनिच्छतोऽपि फलमवाञ्छतोऽपि जन्तोः फलदा स्यात् । अयं भावः यद्यपि कृपि-हिंसादिक्रियाफारो दृष्टफलमात्रार्थमेव ताः समारमन्ते नाऽपा तथाऽप्यधर्मलक्षणं पापरूपमदृष्टफल्मभुक्ते १०एप, अनन्तसंसारिजीवाऽन्यथानुपातेः, ते हिंसादिक्रियानिमिचमन, मिलपितमप्यदृष्टं पापलक्षणं फलं बध्वाऽनन्तं संसार परिप्रमन्तो; ऽनन्ता इह तिष्ठन्ति । दानादिक्रियानुष्ठातारस्तु स्वल्पाः, अदृष्टं धर्म- रूपं फरमासाथ क्रमेण मुच्यन्त इति ॥ २३ ॥ पुन: परामिपायमाराम भगवानाद- , ..

. गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । कर्म सिद्ध्यतु परं तददृष्टं मृर्तमित्यविमलं प्रतिमाति । माविधेहि मनसेति विमर्श भूय एव विपुलां शृणु युक्तिम् ॥२४॥ सुख-दुःख-शरीरादिसाघनं कर्म सिध्यतु, परं तददृष्टं दृग्विषया-३ ऽतीतं कर्म मूतं मूर्तिमत् इत्येवं भवदुच्यमानं अविमलं प्रतिमाति, निर्मलं न प्रतिमासते इत्यर्थः । अयं मावः-'मूर्तमेव कर्म, तत्कार्यस्य शरीरादेर्मूर्तत्वात् , इह यद्यत्कार्य मूर्त तस्य तस्य कारणमपि मूर्तम् , ६ यथा घटस्य परमागवः, यच्चाऽमूत्र कार्य न तस्य कारणं मूत्र, यथा ज्ञानस्यात्मेति, समवायिकारणं चेहाधिक्रियते, न निमित्कारणभूता 'लंपा-ऽऽलोकादय' इति--युक्त्या भवद्भिः कर्मणो मूत्वमुच्यते पर-९ मेतनिश्चितं न प्रतिमाति, यतः सुख-दुःखादयोऽपि कर्मणः कार्यम् । अतस्तेपाममूर्तत्वात्कर्मणोऽमूर्चस्वमपि प्रामोति। न हि मूर्तीदमूर्तप्रसवो युज्यते । न चैकस मूत्वममूत्वं च युक्त, विरुद्धत्वात् । इति । र हे अमिमूते ! इत्येवं मनसा विमर्श वितर्क मा विधेहि मा कुरु । भूय- एवेति । अत्र एवशब्दोऽप्यथे, भूयोऽपि पुनरपि विपुलां विस्तीणों युक्ति शृणु, मूय एवेति कथनादेका युक्तिरत्राऽनुक्ताऽप्यूद्या । तथा-१५ हि-अत एवाऽसामिरत्र समवायिकारणमषिक्रियते न निमित्त- कारणम् , सुखादीनां चात्मधर्मत्वादात्मैव समवायिकारणम् । कर्म पुनस्तेषामन्नपानादिविषादिवन्निमित्तकारणमेवेति न कश्चिद्दोपः ॥२४॥16 अथ कर्मणो मूर्तत्वसाधनाय युस्यन्तराण्यप्याऽऽह- वेद्यते मुखमथाप्यसुखं वा भोजनादिदहनाद्यनुपङ्गात् । मूर्तता यदि कर्मणि साऽपि प्रस्फुटा तनुवया न हि दृष्टा ॥२५॥ भोजनादेरशनादेर्दहनादेरम्यादेश्च अनुपमः संसर्गः, तलासुख अथापि असुखं दुःखं वा वेद्यतेऽनुम्यते प्राणिभिः । अथाऽत्र सुखा-२३ १३ गौ.का.

१९४
श्रीगौतमीयकाव्यं
.
दिकारणे भोजनादौ यदि मूर्तताऽस्ति तर्हि कर्मण्यपि सा मूर्चता-
ऽस्त्येवेति शेयः । यद्येवं तर्हि भोजनादाविव कर्मण्यपि सा स्फुटो
३ कथं नोपलभ्यते ! इत्याशझ्याह-प्रस्फुटेत्यादि । तनुतया आन्तर-
शरीरतया सूक्ष्मतया वा कर्मणि मूर्तता प्रस्फुटा प्रकटा न हि दृष्टा,
भवादृशैरिति शेपः । इदमत्र तात्पर्यम्-मूर्त कर्म, तत्सम्बन्धे
६ सुखादिसंवित्तेः, इह यत्सम्बन्धे सुखादि संवेद्यते तन्मूर्च दृएम्, यथा
अशनायाऽऽहारः, यचाऽमूर्त न तत्सम्बन्धे सुखादिसंविदस्ति,
यथाऽऽकाशसम्बन्धे, संवेद्यते च तत्सम्बन्धे मुखादि, तस्मान्मूर्ष
९कर्म इति । तथा यत्सम्बन्धे वेदनोद्भवो भवति तन्मू दृष्टं यथाऽमिः,
भवति च कर्मसम्बन्धे वेदनोद्भवः, तस्माचन्ममिति ॥ २५ ॥
यद्यदात्मगुणधर्मविभेदे
बाह्यवस्तुवलतो चलधारि।
तचदाऽर्य! परिभाषप मृर्च
पश्य कुम्भमपि तेल-धृताक्तम् ।। २६ ।।
आत्मनो गुणानां ज्ञानादीनां च तद्धर्माणां विमेदेऽतिरिकत्वे
सति ययद्वस्तु पावस वस्तुनो बलतो बलपारि भवति तत्तद्वस्तु हे
..आर्य! अमिते! स्वं मूर्त परिमावय चिन्तय। अपि पुनरत्र निदर्शनं,
तेल-घृताम्यां अकं प्रक्षितं कुम्भं पटं पश्येत्यक्षरार्थः । भावार्थः पुन-
रयम्-इह यस्साऽनात्मविज्ञानादेः सतो यायेन वस्तुना यलगाधीयते
उनगर एम् , यथा महादिना थाधीयमानपलो घटः,
मिथ्यात्वादिहेतुमचभिः कर्मण उपनयलक्षणं वलं, तमाउन्मूर्त.
.
आधीयते यायः
२२ मिति ॥ २६ ॥

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १९५ यद्यदात्मगुणधर्मविभेदे भिन्नभिन्नपरिणाममवाप्तम् । तत्तदार्य ! परिभाषय मूत्र क्षीरमाश्रय निदर्शनमत्र ॥ २७ ॥ आत्मगुणधर्मविभेदे आरमगुणधर्मव्यतिरिक्तत्वे सति यद्यद्वस्तु ३ मिन्नं मिन्नपरिणाम अवाप्तं प्राप्त तत्तत् हे आर्य ! मूत्र परिमावय । अत्रार्थे निदर्शनं दृष्टान्तं क्षीरं दुग्धं आश्रय अङ्गीकुरु । अयं भावः-मूर्त कर्म, आत्मादिव्यतिरिक्तत्वे सति परिणामित्वात्, ६ क्षीरमिवेति ॥ २७ ॥ योग्यतापरिणतं खलु भूतं दृश्यतेऽपरमदृश्यमवेहि । ज्ञातमत्र पवनयशुकादि स्पष्टमेवमिह भावय कर्म ॥ २८ ॥ खलु निश्चितं, योग्यतया परिणतं मूर्त वस्तु दृश्यते प्रत्यक्षमुप- लभ्यते घटपटादिवत् , अपरं अन्यत् यद्योग्यतापरिणतं न भवति वद्वस्तु अदृश्यमप्रत्यक्षमवेहि जानीहि । अत्रार्थे पवनो वायुच॑णुकः १२ परमाणुद्वयनिष्पन्नः स्कन्धस्तदादि ज्ञातं दृष्टान्तः, पवनादेर्मूर्तलेऽपि घटाद्यपेक्षयाऽतिसूक्ष्मत्वेन दर्शनयोग्यपरिणतेरमावाददृश्यसमित्यर्थः। एवं पवनादिवदिह लोके कर्माऽपि स्पष्टं निःसन्देहं भावय विचिन्तय । १५ एतेन कर्मणो मूर्तत्वं साधितं इह विशेपावश्यकवृत्ती वेदोक्तद्वारे- णाऽपि कर्म साधित्तमस्ति, तदधिकारश्च बहुत्वेन सूत्रकृताऽनुक्तत्वा- दिहापि न लिख्यते, विशेषार्थिना तत (गा० १६१० पृ० ७००१८ तः आरभ्य) एवावसेयः ॥ २८ ॥ इत्थं भगवतामिहितेऽमिभूतिः किं कृतवानित्याह-- इत्थमात्महृदि संशयभङ्गे सर्ववेदिनमिनं प्रतिपय । है ३ - १९६ श्रीगौतमीयकान्य खण्डिकैः सह शिवोचितमार्गे सोऽमिभूतिरपि दीक्षित आसीत् ॥ २९ ॥ इत्थमुक्तप्रकारेण आत्महृदि खहृदये संशयमने सन्देहनिवृत्ती सत्यां इनं श्रीवीरखामिनं सर्ववेदिनं सर्वज्ञ प्रतिपद्य ज्ञात्वा सोऽमि. भतिरपि सण्डिकैरछात्रैः सह शिवोचिते मुक्तियोग्ये मार्गे जैने ६ इत्यर्थः । दीक्षित आसीत् प्रमुपाधैं दीक्षा जग्राहेत्यर्थः ॥२९॥ * इति अमिमूतेदीक्षामहणवर्णनम् के अथ वायूभूतेखदाह- ५ वायुभूतिरथ तल्लंघुमन्धुओवयुग्ममपि दीक्षितमेवम् । मुकचारवचनादधिगत्य खे मनस्यपि भृशं विममर्श ॥ ३०॥ अथानन्तरं तस्यामिभूतेर्लघुबन्धुर्लघुग्राता वायुमूतिरपि, मुक्तः ११प्रभुपाश्र्वं वयं प्रहितो यश्वारो हेरिकस्तस्य वचनादेवमुकप्रकारेण प्रासयुग्ममपि दीक्षितं अधिगत्य ज्ञात्वा खे मनसि खकीये हृदये मृशमत्यर्थ विममर्श विचिन्तयामास । अत्र चतुर्थपादस्थोऽपिशब्दः ३१ अन्वययोजनायां प्रथमपादस्वकर्तृपदाग्रे योध्यः । अधिगत्येत्यत्र 'वा त्यपि (६४३८) इति वैकल्पिकोऽनुनासिकलोपः ॥ ३०॥ कि विममशेत्याह-- गन्धहस्त्युपमयोपमिती यौ वायुभावपि युधौ मम पन्धू । यं गुरुं विनयतः प्रतिपन्नौ श्रेयसे मवतु मे स उपास्यः॥३१॥ यस्स गन्धेन सर्वेऽपि हस्तिनो निर्मदा भवन्ति स गन्यहखी. खुच्यते । यो परवादिमदनिवारणे गन्धहस्तिन उपमिती युक्ती २२ आसामिति शेषः । ती उभी अपि वुधौ पण्डिवी मम बन्धू प्रातरौ AAI ३ गौतमीयप्रकाशायटीकया सहितम् । विनयतो विनयेन यं गुरुं प्रतिपन्नौ अङ्गीकृतवन्तौ स एव गुरुः श्रीवीरप्रमुमें ममाऽपि उपास्यः सेवनीयः सन् श्रेयसे कल्याणाय भवतु ॥ ३१ ॥ मन्मनोमलविशोधनमद्यो- पेत्य त जिनपति विदधामि । चिन्तयनिति स नाथसमीपे पश्वखण्डिकशनैः सहितोऽगात् ॥ ३२ ॥ तं जिनपति उपेत्य समीपे गत्वाऽध मम मनसो मलस विशो. धनं विदधामि कुर्वे इति चिन्तयन् स यायुभूतिः पञ्चखण्डिकशनैः९ पञ्चशेतंछात्रैः सहितो नाथसमीपे प्रमुपागात् गच्छति स्म ॥३२॥ आजुहाव विमुरप्यमुमेवं किं ब्रवीपि न समीरणभूते।। यां श्रुताध्ययनतो विचिकित्सा- मादधासि तनुजीवविमेदे ॥ ३३ ॥ विभुः श्रीवर्द्धमानप्रमुरपि अमुं वायुमूर्ति एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण १५ माजुहाय आहयति स, जस्पयति स्मेति यावत् । कममित्याह-हे. समीरणभूते । वायुमते ! श्रुताध्ययनतो वेदशास्त्राध्ययनात् तनु- जीवयोर्विमेदे देह-जीवयोमिन्नत्वे यां विचिकित्सा संशयं आदधासि भारयसि ता किं न ब्रवीपि ।। ३३ ।। अथैवमुक्ला भगवान् सयमेव तत्संशयं प्रादुप्कुर्वन्नाह - यत्सुरागसमवायसमुत्या सीरता न परतोऽञ्चति तद्वत् । १२ 7 २१ श्रीगौतमीयकाव्यं . चेतना क्षितिजला-उनल-वायु- व्यूहजेयमिति चेतसि वेसि ॥ ३४ ॥ ३ यद्यस्मात्कारणात् यथा सुराया मदिराया अङ्गानि अवयवभूतानि कारणानि तेषां यः समवायः समुदायो धातकीकुसुम-गुडादिकस्त- स्मात् समुत्था उत्पन्ना क्षीवता मत्तता न परतः अञ्चति नान्यत्र कापि ६ गच्छति कियत्कालं स्थित्वा विनश्यतीत्यर्थः, तद्वत् क्षितिजला- ऽनल-वायूनां पृथिव्यतेजोवायूनां यो व्यूहः समूहस्तमाजाता क्षिति- जलाइनलवायुव्यूहजा इयं चेतनाऽपि न परत्र गच्छति इति वं चेतसि चिने वेत्सि जानासि । अयं भावः-यथा च मद्यानेषु मद- भावः प्रत्येकावस्थायामदृष्टोऽपि तत्समुदाये मूत्वा ततः कियन्तमपि कालं स्थित्वा कालान्तरे तथाविधसामग्रीवशात् कुतश्चिद्विनश्यति, १२ तथा पृथिव्यादिभूतगणेऽपि प्रत्येकमसत् चैतन्यं भूत्वा ततः कालान्तरे विनश्यति, ततो निश्चीयते मूतधर्म एव चैतन्यं, तस्मात्स एवं जीवः तदेव च शरीरमिति त्वं जानासीति ॥ ३४ ॥ १५. वाक्यान्तरेषु पुनः शरीराद्विनो जीवः श्रूयते तदाह- स्वर्गकामुकजनस्तु यजेतेत्यादियाचि तनु-जीवविवेकः । योध्यते पुनरतः सद-सकि सास्थ्यमत्र लभसे न मुधैव ॥३५॥ ic तु इति विशेपे, वर्गकामुकः खर्गामिलापी जनो यजेत यज्ञ कुर्यात इत्यादिवाचि एवमादिकायां वाण्यां पुनः तनु-जीवयोविवेको देहाजीवस्य मिन्नत्यमेव योध्यते ज्ञाप्यते, वेदेनेति शेषः । आदि- शब्दात् 'न ह वै सशरीरस्य प्रियाऽप्रिययोरपहतिरति अशरीरं वा २९ वसन्तं प्रियाऽप्रिये न स्पृशत' इत्यादिवेदवाक्यपरिग्रहः । अतोऽमा- ३ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । १९९ कारणात् अनयोर्मध्ये किं सत् ? किमसत् ? इत्यं मनसि संशयं विना- णस्त्वं हे वायुमूते ! अत्राऽस्मिन्नथें मुधैव वृथैव सास्थ्यं चिचस्यैय्य न लभसे, एतत्संशयस्य कर्तुमयुक्तत्वादिति भावः ॥ ३५॥ अन भगवानुत्तरमाह- या च शक्तिरसती प्रतिवस्तु सा कुतः समुदये समुदेति ? । चेदिदं न, सिकतासमवाये किं न वैलजननंजगतीष्टम् ॥३६|| या च शक्तिः प्रतिवस्तु असती वस्तु वस्तु प्रति अविद्यमाना, सा समुदये वस्तुसमूहे कुतः समुदेति' कथं प्रादुर्भवति !, न समुदे- त्येवेत्यर्थः । चेद्यदि इदं प्रागुक्तं न स्यात् ; एतावताऽवयवैप्वविद्य-९ मानाऽपि शक्तिः समुदाये चेप्रादुर्भवति तर्हि जगति लोके सिक- तासमवाये वालुकासमूहे तैलजननं तैलोत्पत्तिः किं न इष्टम् !, कथं न इप्यते मेत्यर्थः । अयं भावः-न भूतसमुदायमात्रप्रभवा चेतना, १२ भूतप्रत्येकावस्थायां तस्या अंशतोऽपि सर्वथानुपलञ्चेः, यथा प्रत्येक सर्वथाऽनुपलम्माद्रेणुकणसमुदायप्रमवं तैलं न भवति । एवं चात्र प्रयोग:--.-"यद्यधुं पृथगवस्थायां सर्वथा नोपलभ्यते तत्वेषां समुदायेऽपि.१५ न मवति, यथा सिकताकणसमुदाये तैलम् । यत्तु तेषां समुदाय भवति, न तस्य प्र(प)श्राव्यवस्थितेषु तेषु सर्वथाऽनुपलम्मः, यथा एकै- कतिलावस्थायां तैलस्य, सर्वथा नोपलभ्यते च भूतेषु प्रत्येकावस्थायां चेतना, तस्मान्नासौ तत्समुदायमात्रप्रमवा, किंतु अर्थापचेरेव अन्य- किमपि जीवलक्षणं कारणान्तरं भूतसमुदायातिरिक्तं तत्र सङ्घटितं यत इयं प्रभवतीति प्रतिपत्तव्यमिति ॥ ३६ ।। १विशेषा० वृहत्यनुसारेणाऽयं पाठः (पृ. ४०७ गा. १६५२ २चेतना। .

.६ २०० श्रीगोवमीयकाव्यं ननु 'प्रत्येकावस्थायां सर्वथानुपलम्मात्' इति अनेकान्तिकोऽयं हेतुः प्रत्येकावस्थायां सर्वथाऽनुपलव्यस्यापि मदस्य मद्यानसमुदाये ३दर्शनादित्याशझ्याह- शक्तिरन्यवयवं मदिराया अस्ति चेत्समुदिता प्रवला स्यात् । चेन, तहनियत मदिराङ्ग योज्यते न किमु मादसुखायै ॥३७॥ मदिरायाः शक्तिः अन्ववयवं प्रत्यवयवं चेदस्ति तर्हि समुदिता अवयवसमुदायस्था सा प्रयला स्यात् , चेद्यदि एवं न भवेत् तर्हि माद- सुखस्य आत्यै मदसुखस्य प्राप्तये अनियत अनिश्चितं धातकीकुसु- ९ मादतिरिक्त यत्किंचित् भमगोमयादि मदिराया अझं अवयवमूतं कारणवृन्दं किमु न योज्यते कथं न संयुक्तीक्रियते । एतावता घातकीकुमुमादिभिर्नियतैरेव कारणैः संयोजितैर्मदशक्तिरुत्पद्यते न त्वनियतः, धातकीकुसुमादिषु पुनः पृथक् न सर्वथा मदो नास्ति, अपि तु या च यावती च मदमात्रा पृथगपि तेप्वस्त्येव, ततो नानैकान्ति- कता हेतोरिति । मदि(दयोति मदः स एव मादःप्रज्ञादित्वादण्॥३७॥ भूतेष्वपि एवं भविष्यतीत्याशङ्कामाविष्कृत्य परिहरन्नाह- मात्रया क्षिति-जलादिपु विप्या चेतनास्तु सकला समवाये। मा ग्रहीरिति मति, मृतदेहे लेशतोऽपिलमसे न कथं ताम्॥३८ मात्रयाऽल्पेन अंशेन क्षिति-जलादिषु पृथिव्यप्वेजोवायुलक्षणम्तेषु विप्वक् (पृथक्) पृथक् चेतनाऽस्ति, सा चेतना समवाये भूत- समुदाये सकला समस्ताऽस्तु । अयमर्थः-व्यस्तेष्वपि भूतेषु चैतन्य- मस्ति, तत्समुदाये तद्दर्शनात् , मघानेपु मदवदिति, यथा मद्यानेषु २२ मदः पृथक् अस्पत्यानातिस्पष्टः तत्समुदाये तु माकय्यमेति तया १८

९
गोवमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २०१
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भूतप्वपि पृथगवास्थायामणीयसी चेतना तत्समुदाये तु भूयसीयम्
है वायुमते ! इति मति एवंप्रकारां बुद्धिं मा अहीर्मा मलीकुरु भूत-
समुदाये चेतनाया दर्शनात् , इति हेतोरसिद्धत्वात् । तथा हि-यदि।
भूतसमुदायमात्रधर्मश्चेतना मवेत् तदा मृतदेहे मृतशरीरे लेशतोऽपि
तां चेतनां त्वं कथं न लमसे प्रामोषि!, भूतसमुदायस्य तत्रापि
सत्वात् , ततश्च तत्र चेतनाऽनुपलम्मात् न भूतसमुदायमात्रधर्मश्चेतना ६
इति, तथा चासिद्ध एवायं हेतुरिति भावः ॥ ३८ ॥
अथ वायु-वयोस्तदानीं तत्रामावाचदनुपलम्म इत्याशकामावि-
कृत्य परिहरनाह-
वायु-वहिविकले मृतदेहे सा न चास्ति भतिमित्यपि मा धाः।
श्रोत्रतो नलिकया नय पूर्ति तन तौ यदि भवेद्भवदिष्टम् ॥३९॥
वायु-वहिन्यां विकले रहिते मृतदेहे सा चेतना न चास्ति न २
विधते इत्यपि मतिं वं मा धाः मा धारय । यदि वायु-वहिसंयोगे
मवता इष्टं भवदिष्टं चैतन्यं भवेत् तर्हि तत्र मृतदेहे श्रोत्रतः कर्णा-
दिद्वारतस्तौ वाय्वनी नलिकया सुपिरोपकरणविशेषेण पूर्ति पूरणं नय ३५
प्रापय पूरयेत्यर्थः । एतावता नलिकादिप्रयोगतस्तत्र तत्पक्षेऽपि चैत-
न्यानुपलम्मान भूतधर्मश्चैतन्यमिति भावः ॥ ३९॥
अथ विशिष्टतेजो-ऽवाद्यमावादनुपलम्म इत्याशङ्का पादुष्कृत्य १८
प्रतिविधातुमाह-
1406
चेद्विशिष्टपवनाऽनलयोगो
नास्ति तत्र, नु कुतो न विशिष्टौ ।
कारणादपि कुतो यदि तद, किं
देहयर्तिनमुपैपि न जीवम् १ ॥ ४० ॥

२०२ श्रीगौतमीयकाव्यं " . ९ • तत्र मृतदेहे विशिष्टयोः पवनाऽनलयोवाय्वम्योर्योगः सम्बन्धी नास्ति इति चेदाशङ्कसे तर्हि नु इति प्रश्ने, तत्र तो विशिष्टौ कुतो न!, यदि वं पे कुतोऽपि कारणातत्र तो विशिष्टौ न स्तः तवर्हि देहवर्जिनं शरीरस्य जीवं चेतनमेव किं न उपैपि प्रामोपि, कयं नाही- करोपीत्यर्थः । किं नामाऽऽत्मसत्त्वं विहायाऽन्यद्वैशिष्टयं, ननु संज्ञा ६न्तरेणात्मसत्त्वमेव त्वयाऽपि प्रतिपादितं स्यादिति भावः ॥ १०॥ अथ भूतसमुदायातिरिक्तात्मसाधकानुमानसद्धावान्न भूतधर्मश्चैत- न्यमिति ज्ञापयितुं तदात्मसाधकमनुमानमाह--- भौतिकेन्द्रियविभावितमर्थ का सरेयदि भवेन हि जीवः । कि गवाक्षविवरैरनुभृतं संसरेगृहमथो पुरुषो का ? ॥४१॥ है वायुभूते ! देहाद्भिन्नो देहमध्यस्थो यदि जीव आत्मा न हि १२ मवेत् तहिं भूतेषु भवानि भौतिकानि यानि इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि वैः करणमूतैर्विभावितं प्रकाशित साक्षादनुभूतमिति यावत् । अर्थ घटादिकं कः स्मरेत् ! न कोऽपीत्यर्थः । अत्र दृष्टान्तमाह-यथा १५गवाक्षविवरैर्गवाक्षच्छिदैरनुमूतमर्थ किं गृहमालयः संस्मरेत् ! अथो वाऽथवा पुरुषस्तन्मध्यस्सो मनुष्यः संस्मरेत् , एतावता तत्र पुरुष एवं स्मरेन्न तु गृहं, तद्वदत्रापि जीव एव संस्मर्ता नतु देह इत्यर्थः॥४१॥ अमुमेवाऽयं पुनः स्पष्टतरमाह- मन्दिरे धचन पञ्चगवाक्षे भिन्नमिनकतिकारकमेकम् । २०चेत्प्रपश्यसि नरं गृहनायमेरमात्मनि तनावपि पश्य ।। ४२॥ १ विहिरवेनीवायुरूपेश। प्र गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २०३ पञ्च गवाक्षा यसिंस्तत् पञ्चगवाक्षं तस्मिन् कचन कसिंश्चिन्मन्दिरे गृहे भिन्नभिन्नकृतीनां रूपदर्शन-रसाखादन-शब्दश्रवणादिमिन्नभिन्न- क्रियाणां कारक कर्तारं एक गृहनाथं गृहस्वामिनं नरं चेद्यदि वं प्रपश्यसि तर्हि एवममुना प्रकारेण तनौ शरीरे य मात्मा जीवस्तत्रापि पश्य विलोकय, 'विवक्षातः कारकविमक्तयो भवन्तीति वचनात् तनावात्मानमपि पश्येत्यर्थः । इह फायद्वयसूचिताऽनुमानस्वरूपं.१ चेदम्-"भूतेन्द्रियेभ्यो भिन्नरूपस्य पदार्थस्य कस्याऽपि धर्मश्चेतनेति प्रतिज्ञा, मूतेन्द्रियोपलव्यार्थाऽनुस्मरणादिति हेतुः, यथा पञ्चभिर्ग- वाक्षरुपलब्धान् अर्थान् अनुसरतस्तदतिरिक्तस्य कस्यापि देवदत्तादेः९ पुरुषस्य चेतनेति दृष्टान्तः । अयमत्र तात्पर्यार्थः-इह य एको यैरनेकैरुपलब्धानर्थानऽनुस्मरति स तेभ्यो मैदवान् दृष्टः, यथा पञ्च- मिर्गवाक्षरुपलब्धानाननुस्मरन् तेभ्यो देवदत्तः, यश्च यस्माद्भूतेन्द्रिया-१२ त्मकसमुदायाद्भिन्नो न भवति किं तर्हि ? अनन्यः, नायमेकोऽनेकोप- लब्धानामनामनुस्मा, यथा शब्दादिग्राहकमनोविज्ञानविशेषः," इत्यादि विशेपावश्यकवृत्तौ (पृ० ७०९ गा० १६५७) ॥४२॥ १५ अथापरमपि भूतव्यतिरिक्ताऽऽत्मसाधकमनुमानमाह- यच्च धित्सति पयः शिशुरादौ वापि तत्प्रथमवृत्तित एव । जीवमेनमवगच्छ ततस्त्वं देहभिन्नमपराऽपरदेहम् ।। ४३ ॥ १९ १ गवाक्षेभ्यः। २ व्याप्तिरिय-यदुत 'यो यस्मात् भूतेन्द्रियात्मकसमुदायाद् अभिन्नः । स एक एव न अनेकोपलब्धानामर्थानां अनुस्मता, अनेकै तेन्द्रियरुप- लब्धाना पदार्थानां एक एव अनुसर्ता स भवति यो वेभ्यो भूतेन्द्रियेभ्यो भिन्नो " वर्तते, तसान्निगम एप-आत्मा तेभ्यो भूतेन्द्रियेभ्यो भिन्नो, यतः तस्याऽऽत्मनः तैपलब्धानामर्याना एकसैर अनुमत्लात् । . .

श्रीगौतमीयकाव्य . यच्च यत्पुनः शिशुर्वाल आदौ प्रथमत एव पयो मातुः स्तनोद्भवं दुग्धं धित्सति धातुमिच्छति पानं कर्तुं वाल्छतीत्यर्थः । तत् कापि कमिश्विद्भवान्तरे प्रथमवृचितः प्रथमवृत्तेरेव प्राकनजन्माभ्यासा- देवेत्यर्थः । ततस्तस्मात्कारणात् हे वायुमूते ! त्वं एनं देहाच्छरीराद् मिन्नं अत एव प्रतिमवं अपरे अपरे देहा यस्य सोऽपराऽपरदेहस्तं रनीवं चेतनमेवगच्छ जानीहि । धित्सतीति । 'धेट् पाने' सन्नन्तः 'सनि मीमा-' (७४१५४) इत्यादिना इसादेशः । इदमत्र तापर्यम्---योऽयमाधः स्तनामिलापो बालस्य, अयमन्यामिलाप- १पूर्वकः, अनुभवात्मकत्वादमिलापत्वात् वा, सांप्रताभिलापवदिति । इह योऽमिलापः सोऽन्यामिलापपूर्वको दृष्टः, यथा सांप्रतामिलापः यदभिलापपूर्वकश्चायमाधः स्तनामिलापः स शरीरादन्य एव, पूर्व- १२शरीरपरित्यागेऽपि इहत्याऽमिलापकारणत्वात् । ज्ञानगुणश्वामिलापो न गुणिनमन्तरेण संभवत्यतो यस्तस्याश्रयभूतो गुणी स शरीरातिरिक्त आत्मेति ॥१३॥ अनुमानान्तरमाह- एवमेव सुख-दुःख-भपादेर्वेदकः स च परम्परयाभ। चेतना तय मता तनुजा चेदादितः कथमसौ व्यवहारः॥४४॥ च पुनः सोऽर्मो यालः एवमेव उत्तप्रकारेणैव परंपरया जन्मान्तर- संसच्या सुख-दुःख-मयादेर्वेदको विज्ञाता योध्य इति शेषः । चेयदि तनोर्जाता तनुजा शरीरजा एव चेतना तय मताऽभिप्रेता तर्हि आदितः २.प्रथमत एष असौ सुख-दुःख-मयादिसंवेदनलक्षणो व्यवहारः कयं स्यादिति शेषः । अयं भावः-अन्यसुखपूर्वकमिदमाचं पालमुखं, २३ अनुभवारमफत्वाद, सांप्रतमुखवत्, यसुखपूर्वकं घेदमापं सुख गौवमीयप्रकाशायटीच्या सहितम् । २०५ तच्छरीरादन्यदेव, तदत्ययेऽपि इहत्यसुखकारणत्वात् , गुणश्चायन्स च गुणिनमन्तरेण न सम्भवति, असौ यस्तस्याश्रयभूतो गुणी स देहा- द्विनः मुखानुभूतिमयो जीव इति सिद्धम् । एवं दुःख-मयभाग-द्वेष- शोकादयोऽपि जानीयाः । मवेति । 'मतिबुद्धि-(३२२।१८८) इत्यादिसूत्रेण वर्चमाने कः । मतिरिह इच्छा, बुद्धेः पृथगुपादानात् । तवेत्यत्र 'क्तस्य च वर्तमाने' (२॥३॥६७) इति पष्ठी । मता इटा, ६ त्वया इप्यमाणेत्यर्थः ॥ ११ ॥ मथैवमनुमानेन शरीराद्भिनं जीवं संसाध्य पुनः परामिप्रायं प्रादुष्कृत्य निराकुर्वन्नाह- चेत्समावमवलम्ब्य न मुश्चे- राग्रह, वद तदा स च कीटक्,। चिन्मयोऽयमिति चेत्, न जडेना- ऽन्वेति भूतनिवहेन चिदात्मा ॥४५॥ हे वायुमूते ! चेयदि इहत्यमुखाचनुमवस्य कारणं समावमव- लम्व्य आश्रित्य शरीरादमिन्न एवालेति आग्रहं हटं तं न मुञ्चेर्न १५ त्यजेः, तदा वद ब्रूहि स चात्मा कीहक् ? कीदृशोऽन्तीत्यर्थः । अयाऽयमात्मा चिन्मयो ज्ञानमय इति चेपे तर्हि चिदाला चिन्मयो जीवो जडेन भूतनिवहेन भूतसमुदायेन न अन्वेति न समवाय-१८ सम्बन्धमुपगच्छति । अवयवावयविन्यतिरिक्योन्ययोः संयोगसम्ब. न्यस्यैवाभ्युपगमात् , अवयवावयविमावस्त्वनयोन संबाघटीति मिन्ने २० - १ देहात्मनोः। २ सेयम् मिलखमावता यत् आत्मनो ज्ञानमयत्वं- चेतनरूपटा, शरीरस च बहखापता ।

A २०६ श्रीगौतमीयकाव्यं खभावत्वात् । अनयोः संयोगसम्बन्धाभ्युपगमे तु सिद्ध एव देहाद्भिन्नो जीव इति भावः ॥ १५॥ ३ अथोपसंहरन्नाह- अस्ति स प्रकट एव तदात्मा मेदवांश्च मनसोऽप्युपयोगी। व्यापृति जगति यस्य विमुच्य ज्ञानकार्यमखिलं निहतं स्यात् ॥ ४६ ॥ : तत् तस्मात्कारणात् स आत्मा प्रकट एव शरीराद्धेदोऽस्यास्तीति ९मेदवान् , च पुनर्मनसः सङ्कल्पहेतोश्चेतसोऽपि उपयोगोऽस्यास्तीति उपयोगी अस्ति विद्यते । यस्याऽऽत्मनो व्याप्रति व्यापार विमुच्य त्यक्त्वा जगति लोकेऽखिलं समस्तं ज्ञानकार्य ज्ञानविषयीभूतं कार्य १२ निहतं स्यात् निहन्येत । ततश्च स आत्मा शरीराद्भिन्न एव प्रतिपतन्य इति तात्पर्यम् ॥ ४६॥ एवं भगवता संशये छिन्ने सति वायुभूतिः किं कृतानित्याह- इति हृदि कुविकल्पव्याधियाधावियुक्तो भगवति जिननाथे सर्व विचं प्रतीत्य । सपदि सपरिवहस्त्रीणि रत्नानि गृनन् शिवपदपथपान्थोऽभूद्विजो वायुभूतिः ।। ४७ ।। इत्यनेन प्रकारेण हृदि हृदये यः कुविकल्पः कुत्सितविमर्शः स एव व्याधी रोगस्तस्य वाया पीडया वियुक्तो विषमुक्तो वायुभूति- २॥ द्विजो भगवति जिननाये श्रीवीरस्वामिनि सर्ववित्त्वं सर्वज्ञत्वं प्रतीत्यं मिमोरेव द्रव्ययोः संयोगः इति न्वायनयन खोतलात् । - १५ १८ २०७ , गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । ज्ञात्वां सपदि शीघ्रं, सह परिवहणेति सपरिवहः सपरिकरः त्रीणि रतानि ज्ञान-दर्शन-चारित्राणि गृह्णन् भगवत्पाचे सीकुर्वन् शिव- पदस्य मुक्तिस्थानस्य यः पथो मार्गस्वत्र पान्थः पथिकोऽभूत् ।। पथैति । पथशब्दोऽदन्तोऽप्यस्ति 'वाटः पथश्च मार्गश्च' इति त्रिकाण्डशेपकोशे उक्तत्वात् । पान्थ इति । पन्थानं नित्यं गच्छतीति विग्रहे 'पन्थो ण नित्यम्' (५।१७६) इति णप्रत्ययः, पन्थ इत्या-६ देशश्च । इदं मालिनीछन्दः, एतल्लक्षणं तु प्रागुक्तमेवेति ॥ १७ ॥ इति गौतमलघुबन्धुद्वयदीक्षाग्रहणवर्णनो नामाऽष्टमः सर्गः ॥८॥ इति सप्टम् । । इति श्रीगौतमीयप्रकाशाख्यायां श्रीगौतमीयमहाकाव्यव्याख्यायां अष्टमः सर्गः ॥ ८॥ " . नवमः सर्गः। व्यक्ताभिधानोऽथ विशारदानां सदस्युपाध्यायपदप्रतिष्ठः। प्रान्त्रयं प्रबजितं निशम्य श्रीवीरनाथं प्रणिनंसुरासीत् ॥ १॥५ विशुद्धविज्ञानकर प्रसार्य व्यक्तादिविप्रा भवसिन्धुमध्यात् । समुदृता येन जिनेश्वराय नमोऽस्तु तस्मै त्रिशलाऽऽत्मजाय ॥९॥ अथानन्तरं विशारदानां पण्डितानां सदसि सभायां उपाध्याय-१८ पदस्य प्रतिष्ठा स्थापनं यस्य स तथोक्त एवंविधो व्यक्ताभिधानो व्यक्तनामा पण्डितः, प्रातृत्रयमिन्द्रमूत्यादिसहोदरत्रितयं प्रनजितं श्रीवीरपाचे दीक्षितं निशम्य श्रुत्वा श्रीवीरनाथं प्रणन्तुमिच्छुः प्रणिनंसुः मासीत् अभवत् । वयमपि भगवन्तं, नगरकर्तुमैच्छदित्यर्थः २१ २०८ श्रीगौतमीयकाव्यं -- ६ प्रतिष्ठेति। 'प्रतिष्ठा मर्यादादेवादिस्थापनयोरपीति मन्त्रः () अस्मिन् समें इन्द्रवज्रोपजातिछन्दसी, तलक्षणे च प्रागुक्त एव ॥ १ ॥ समाजगाम स्वपरिच्छदेन छम व्यतीत्याऽऽशु जिनोपकण्ठम् । व्यक्ताऽभ्युपेहीति जिनोऽप्यवादी- द्विमुञ्च भूतेषु च नास्तिमावम् ॥२॥ अत्र 'स' इति कर्तृपदमध्याहार्य्यम् । स व्यकनामा उपाध्यायः छम शाठ्यं व्यतीत्य विलय परित्यज्येति यावत् । आशु शीनं ९सपरिच्छदेन खच्छात्रपरिवारेण सह जिनस श्रीवीरपरमेधरस्स उपकण्ठं समीपं समाजगाम संप्राप्तः । तदा जिनो वीरप्रमुरपि है व्यक्त ! त्वमभ्युपेहि अभ्यागच्छ, च पुनर्भूतेषु पृथिव्यादिषु नास्ति- मायं नास्तित्वं विमुञ्च परित्यज, 'मतेषु नास्तित्वबुद्धि मा धा' इत्यर्थ, इत्येवमवादीत् वदति स्म ॥२॥ अथ यथा एतस्य संशयस्तथा दर्शयन्नाह- खमोपमं वै जगदिन्द्रजालो- पमं विचायेति वचो विचारम् । भूतानि लुम्पस्सथवा व्यपेक्षा- माश्रित्य सर्व ननु वेत्ति शून्यम् ।। ३ ।। हे व्यक्त ! वै इत्यवधारणे, इदं जगत् समोपमं अथवा इन्द्रजालो- पमं वर्तते इत्येवरूपं विचारोऽस्त्यस्मिन्निति विचारं 'अर्शआदिभ्योऽ' (५।२।१२७) विचारगमिवमित्यर्थः । यचो वेदवचनं विचार्य २२सहृदये पर्यालोच्य वं भूतानि लम्पसि नास्तित्वेन विजानासि अथवा गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २०९ . विरुद्धा अपेक्षा व्यपेक्षा विरुद्धवेदपदार्थपर्यालोचना तामाश्रित्य, ननु इत्यवधारणे, सर्व लोकं शून्यं वेसि जानासि । अयं मावः :-पृथिव्यप्ते- जोवाय्वाकाशलक्षणानि पञ्चभूतानि तानि च किं सन्ति न वेति त्वं ३ मन्यसे, संशयश्च तवाऽयं विरुद्धवेदपदश्रवणनिबन्धनो वर्तते । तानि चामूनि वेदपदानि–'खमोपमं वै सकलम्' 'इत्येप ब्रह्मविधिरलसा विज्ञेय' इत्यादि, 'तथा पृथिवी देवता आपो देवता' इत्यादि । एतेषांह चायमर्थः तव प्रतिभासते, खमोपमं खमसदृशं वै-निपातोऽवधारणे, सकलमशेषं जगदित्येप ब्रह्मविधिः परमार्थप्रकारः अञ्जसा प्रगुणेन न्यायेन विज्ञेयो ज्ञातव्य इति, तदेवमादीनि वेदपदानि किल भूत-९ निहवपराणि तथा पृथिवी देवता इत्यादीनि तु तत्सत्तापतिपादकानि, अतस्तव संशयः। भूतानां स्वप्मसादृश्यादिभावना त्वेवं, यथा हि-खमे किल कश्चि-१२ निःस्खोऽपि निजगृहाङ्गणे गजघटा-तुरगगण-मणि-कनकराश्यादिक- मभूतमपि पश्यति । "मायायां चेन्द्रजालक्रियारूपायामविद्यमानमपि कनक-मणि-मौक्तिक-रजतभाजनां-ऽऽराम-पुष्प-फलादिकं दृश्यते.तथै- १५ तान्यपि भूतान्येवंविधान्येव, यतो विचार्यमाणान्येतानि सर्वथैव न काञ्चिद्युक्तिं सहन्ते । भूतेषु संशये पुनर्जीवादिषु का वार्ता : तेषां भूतविकाराधिष्ठानत्वात् , तस्मात्सर्वस्यापि भूतजीवादिवस्तुनस्त्वदभि- प्रायेणाऽभावात् सर्वशून्यताशङ्की त्वं निरवशेषमपि लोकं स्वमेन्द्रजा- लमायोपमं मन्यसे इति" । परमेतेषां वेदपदानामर्थ, युक्तिहृदयं च स्वं न वेसि तेन संशयं कुरुषे । एपामर्थस्तु अग्रे वक्ष्यते ॥ ३ ॥ २१ १ विशेषा• वृहदृति (पृ० ७२२ गा० १६९१)। १४ गौ.का.

२१० श्रीगौवमीयकाव्यं : अथ व्यक्तचेतोगतां युकिं भगवान् व्यक्तीकुर्वन्नाह' तथा ह्यकुम्भव्यतिरिक्तकुम्भेऽन्योन्याश्रयाऽपेक्षणमस्ति यस्मात् । ३सिद्धिः स्वतो वस्तुन एव नास्ति, प्रतीयते तेनं तु शून्यतैव ॥४॥ तथा हि तामेव युक्ति दर्शयति-कुम्भाटाद् व्यतिरिक्ता अकुम्भाः स्तम्मादयः पदार्थास्तेभ्यो व्यतिरिक्तो भिन्नः कुम्भः तत्र, ६ यस्मात्कारणादन्योन्याश्रयस्य इतरेतराश्रयस्य अपेक्षणमपेक्षाऽस्ति । न हि अकुम्भव्यतिरेकेण चाऽकुम्भ इति व्यपदेश इति स्पष्टमेवाऽन- योरन्योन्याश्रयत्वमित्यर्थः । तस्मात् स्वतोऽन्याऽनपेक्षया वस्तुनः ९ कस्यापि पदार्थस्य सिद्धिनिप्पतिर्नास्त्येव । तु इति विदोपे, तेन हेतुना शून्यतैव प्रतीयते ज्ञायते ॥ ४ ॥ यथा खतो न सिद्धिस्तथा परतोऽपि नेत्याह- १२ यः कश्चिदर्थः स च कार्यरूपः स्यात्कारणं वा व्यवहारतोत्र। परस्परापेक्षितयाऽनयोर्यवतो न सिद्धिः परतोऽपि नैवम् ॥५॥ अनाऽस्मिन् लोके यः कश्चिदर्थः स च व्यवहारतः कार्य रूपं १५स्वरूपं यस्य स कार्यरूपः स्यात् । कारणं वा कारणरूपो वा स्यात् । अनयोः कार्यकारणयोः परस्परापेक्षितयाऽन्योन्यापेक्षित्वेन यद्यस्मा- कारणात् सतो न सिद्धिः एवममुनै प्रकारेण परतोऽपि न सिद्धिः; १८ अस्तीति शेपः । अत्र विशेषावश्यकवृत्यनुसारेण काव्यद्वयस्य भावना त्वियम्- "हे व्यक्त ! भवतोऽयमभिमायो यथा किल न खतो न २० परतो न चोमयतो नाऽप्यन्यतो भावानां सिद्धिः सम्भाव्यते, कार्य- १वेन नु शून्यतेव' इति अचीमुदितपुखके पाठः, स च टीकाकृतानसम्मत इति प्रतिमाति । २ 'सतोऽपि सिद्धि परतोऽपि नवम्' इति काशीमुद्रितपाठः।

- गौवमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २११ कारणादिमावस्याऽऽपेक्षिकत्वात् , हसदीर्घव्यपदेशवत् । तथा हि- यत् किमपि भावजातमस्ति तेन सर्वेणापि कार्येणापि भवितव्यं, कारणेन या, तत्र कार्य कारणेन क्रियत इति कारणायंच एव तस्स ३. कार्यव्यपदेशः, न तु (कार्यस्स) कार्यत्वं खतःसिद्धं किमप्यस्ति । एवं कारणमपि कार्य करोतीति कार्यायत्त एव तस्स कारणत्व- व्यपदेशः, न तु तस्स कारणसं खतःसिद्ध किंचिदति । तदेवं ६ कार्यादिभावः खतो न सिध्यति, यच्च खतो न सिद्धं तस्य परतोऽपि. सिद्धिर्नाति, यथा खरविषाणस्य । ततश्च न खतःकार्यादिमावो नापि: परतः, 'खपरोभयातर्हि तसिद्धिरिति' चेत् तदयुक्तं, व्यस्वादु-९ मयमाचत्सिद्धेरभावाचसमुदायेऽपि तदऽयोगात् । न हि सिकताकणेषु- प्रत्येकमसत्तैलं तत्समुदाये प्रादुर्भवति, अपि च उमयसारिसद्धिपक्षे; इतरेतराश्रयदोपः प्रामोति । यावद्धि कार्य न सिध्यति न ताव-१२ स्कारणसिद्धिरस्ति । यावच कारणं न सिध्यति न तावत्कार्य सिद्धि- मासादयति, अत इतरेतराश्रयदोपः, तस्मान्नोमयतोऽपि कार्यादि- भावसिद्धिर्नाप्यन्यतोऽनुमयत इत्यर्थः । खपरोभयव्यतिरेकेणाऽन्यस्य १५ वस्तुनोऽसत्त्वेन निर्हेतुकवप्रसङ्गात् । एवं हस्व-दीर्घलक्षणे दृष्टान्तेऽ- प्यन्वयो मावनीयः । तथा हि-प्रदेशिन्या अङ्गुष्ठमपेक्ष्य दीर्घत्वं प्रतीयते । मध्यमां वपेक्ष्य हलत्वं, परमार्थेन त्वियं खतो न हसा१० नापि दीर्घा, तदेवं न सतो हसदीर्घत्वयोः सिद्धिः । ततः परतः,, उभयतः, अनुभयतश्च तत्सियमानो यथोक्तवद्धावनीयः, तस्मात्कथ- मपि वस्तुसिद्धेरसम्भवात् शून्यतेव सिध्यतीति ॥५॥ पुनः प्रकारान्तरेणापि शून्यतासियर्थ यत्तेनाभिप्रेतं वग- वानाऽऽहं-- .. . - -२१ २१२ श्रीगौतमीयकाव्यं सूक्ष्मत्वतो वस्तुनि नाभिगम्या. वाद्यन्तमागी परमाणुरूपौ। लम्यं कथं वा तदधीनमध्यं? तसात्तवाऽऽस्था ननु शून्यतायाम् ॥ ६॥ अत्र परमाणुशब्देन परमाणुप्रतरो लक्ष्यते । ततश्यायमर्थः- ६ परमाणुरूपौ परमाणु-प्रतरखरूपी वस्तुनि स्तम्भादिपदार्थे आद्यन्तभागौ सर्वारातीयमागपरभागौ सूक्ष्मत्वतः सूक्ष्मत्वेन नाभिगम्यौ नोपलभ्यो तः, वा पुनस्तयोराद्यन्तमागयोरधीनं तदधीनं तदन्तरितमित्यर्थः, ९ ईदृशं यन्मध्यं वस्तुनो मध्यमागस्तत्कथं लभ्यम् ? अदर्शनादेव तन्नोपलभ्यते इत्यर्थः । तस्मात्कारणान्ननु निश्चितं तव शून्यताया- मास्वाऽपेक्षा आदरोऽस्तीत्यर्थः । अत्राय भावः-इह यचावदहश्यं २तदसत् एव, अनुपलम्मात् , खरविषाणवत्, इति निवृचा तद्वाश्य- स्थापि च स्तम्म-कुम्भ-कुड्यादेः पर-मध्यभागयोरसत्यमेव, अाग्भागा- न्तरितत्वेन तयोरप्यदर्शनात् , अर्वाग्मागस्यापि च सावयवत्वात्पुनरन्यः ५खल्वाराद्भागस्तस्याप्यन्य इत्येवं तावद्यावत्सराितीयभागस्य परमाणु- प्रतरमात्रत्वेनाऽतिसौक्ष्म्यात्पूर्वेषां चारादागानामन्यस्यान्येनान्तरित्वेना- नुपलब्धिः । ततश्चोतन्यायेन परभाग-सरातीयभागलक्षणोमय- मागानुपलम्मात् सर्वस्यापि वस्तुजातस्यानुपलब्धेः शून्यं जगदिति । तदेवमुक्तयुक्त्या सर्वस्यापि भूतादेरमावः प्रामोति । श्रूयते च श्रुतौ . २० भूतादिसद्भावोऽपीति संशयः ॥ ६ ॥ 'नाभिगम्यौ घाऽऽपन्तमागो' इति काशीमुदितपाठश्चिन्त्यः । २भाराद भवम् मापदीयम्-धमीपस्थम् इत्यर्थः। ३ विशेषा. मृत (पृ.७२५ - गा. १९९६).

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २१३ अधेलं पूर्वपक्षमुक्या भगवान् प्रतिविधानमाह- व्यक्तोतरं तत्र गृहाण पक्षं स्वमेन्द्रजालोपमितं जगवत् । आख्यातमेतत्तु विरागतायै मोहस्स हान्य तदनित्यतातः॥७॥३ हे व्यक! तत्र तसिनुकेऽथें त्वमऽसाभिरुच्यमानं उतरं पक्षं गृहाण उतरं शृणु इत्यर्थः । श्रुतौ यदेतत् खप्नेन्द्रजालोपमित खने- न्द्रजालमायासदृशं जगत् आख्यातं उकं, तनु विरागतायै जन्तूनां ६ वैराग्योत्पादनार्थमित्यर्थः । तथा मोहस्याऽज्ञानस्य हान्यै त्यागार्थ- मित्यर्थः । तथाऽनित्यतातो जगतोऽनित्यत्वादित्यर्थः ॥ ७ ॥ अथ भूतादिसद्भावं युक्त्या प्रतिपादयन्नाह- यचिन्तितं दृष्टमथाऽनुभूतं श्रुतं च तत् स्वप्नगतं सदेव । प्रबोधिनश्चेत्तदसत्तथाऽपि स्थिता परत्रैव तदर्थसत्ता ॥ ८॥ यद्वस्तु चिन्तितं अन्यदा हृदि पर्यालोचितं विभव-वल्लभादि, तथा १२ दृष्टं करि-तुरगादिकं, अथ-अथवाऽनुभूतं खान-भोजन-विलेपनादि, च पुनः श्रुतं वर्ग-नरकादिकं, तत्सर्व वस्तु सदेव विद्यमानमेव खप्ने गतं प्राप्तं भवति, नाऽविद्यमानं किञ्चिदित्यर्थः । चेद्यदि प्रबोधो ३५ जागरणमस्त्यस्येति प्रबोधी तस्य जाग्रतः सतस्तत्सर्व खमंगतं वस्तु असत् प्रायोऽविद्यमानमेव तथापि अपरनाऽन्यत्र प्रदेदो तेषां खा- दृष्टानामर्थानां वस्तूनां सत्ता विद्यमानता तदर्थसत्ता स्थितैव । अतः १८ खप्नदृष्टार्थानामप्यभावाऽभावात् कथं शून्यं जगदिति भावः ॥ ८॥ एवं खम्ममाश्रित्य युक्तिमुक्त्वा इन्द्रजालमाश्रित्याह- यद्यप्यसत्प्रस्तुतमिन्द्रजालं तथाऽप्यसन्तो न तदीयभावाः । तथा जगजालविशालगर्भे भूतानि सन्त्येव न काऽपि शङ्का ॥९॥२२ १ 'यचर्चितं' इति काशीमुदितपाश्चिन्तः।

श्रीगौतमीयकाव्यं । यद्यपि प्रस्तुतं प्रस्तावापन्नं इन्द्रजालं असत् अविद्यमानमेव, तथापि तस्येन्द्रजालस्येमे तदीया इन्द्रजाले दृश्यमाना भावाः पदार्था ३ असन्तोऽसद्भूता, न सन्तीति शेषः, तेपामप्यन्यत्र विद्यमानत्वादिति भावः । तथा तेन प्रकारेण जगदेव जन्तूनां बन्धनहेतुत्वाज्जालं तस्य विशालो विस्तीणों यो गर्मो मध्यं, तस्मिन् भूतानि सन्त्येव । अत्रार्थे ६ काऽपि शङ्का न कर्तव्येति शेपः ॥ ९॥ पुनः सर्वशून्यतायामिप्यमाणायां खमाऽखनादिव्यवहारामावप्रसङ्ग एवेति दर्शयन्नाह- ९समेन्द्रजाले अपि भावरूपे कुतोऽन्यथा सात्तदभावयुक्तिः । अस्सम इत्येवमनिन्द्रजालमिति प्रतीतिर्यत ऊहनीया ॥१०॥ स्वामश्च इन्द्रजालं च खमेन्द्रजाले ते अपि भावरूपे विद्येते, १२नाऽमावरूपे इत्यर्थः । अन्यथा समादेर्मावत्याऽभावे तयोः स्वमेन्द्र- जालयोरमावयुक्तिर्भवदुक्ताऽभावोपपत्तिः कुतः स्यात् !, कुतोऽपि न स्यादित्यर्थः । यतो यसाकारणान्न समोऽसम इत्येव तथा न इन्द्र- १५जालमनिन्द्रजालमित्येयं या प्रतीतिः सा ऊहनीया विचार्या । इद- मत्र तारपर्यम्-सर्वशून्यत्वेऽभ्युपगम्यमाने समोऽयमखमो या :, तथा इन्द्रजालमिदमनिन्द्रजालं वेत्यादिको विशेषः किं कृतः स्यात् ! १८खमादीनां विशेषनिवन्धनाभावात्समवैव कलान भवति ! यादृशः :

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २१५ योऽखप्नः स खमः इत्यादि । तस्मात्सन्ति एवं सवें भावा न पुनः शून्यतेति ॥ १० ॥ : पुनर्भूतसदाय प्रकारान्तरेण समर्थयन्नाह- सद्वस्तुनि सादथ संशयोऽपि यत्स्थाणुपुंसोः स्फुट एप. दृश्यः । तद्भूतसन्देहविशेप एव प्रस्फोरयत्यत्र तदर्थसत्ताम् ॥ ११ ॥ अथ संशयोऽपि सद्वस्तुनि विद्यमाने एव वस्तुनि स्यात् , नावि-६ इमाने इत्यर्थः । कथमित्याह—यद्यस्मात्कारणात् स्थाणु-पुंसोः शङ्कु- पुरुपयोरेप संशयः स्फुटः प्रकटो दृश्यो दर्शनीयोऽस्ति, तत्तस्मात्कार- णात् भूतानां यः सन्देहविशेपः स एव अत्र, लोके तदर्थसचा ९ भूतपदार्थस द्वावं प्रस्फोटयति प्रकाशयति । प्रपूर्वात् 'स्फुर स्फुरणे अस्माद्धेतुमण्णिजन्ताल्लद । अत्राय भावः-असति भूतकदम्बके संशयः खकुसुम-खरविपाणयोरिव न युक्तः, अपि स्वभावनिश्चय एव १२ स्यात् , सत्स्वेवंभूतेषु स्थाणु-पुरुषादिष्विव संशयो युक्तः। यदि पुनर- सत्यपि वस्तुनि सन्देहः सात् तदाऽविशेषेण खरविपाणादिप्यपि स्थात्, न च सोऽस्ति तस्मात्सन्त्येव भूतानीति ॥ ११ ॥ अथ यदुक्तं प्राग् न खतो भावानां सिद्धिरित्यादि तत्पतिवि- धातुमाह- अपेक्ष्य भावं परमर्थसत्तां त्वं मन्यसे तन्न सहेत युक्तिम् । हस्खं च दीर्घ च समं च वस्तु स्वसत्तयाऽपि प्रतिमासमेति ॥१२॥ हे व्यक्त ! त्वं परमन्यं भावं पदार्थमपेक्ष्य अर्थसत्ता पदार्थसद्भाव मन्यसे न खतः, परं तत् त्वन्मतं युक्तिं न सहेत युक्तिक्षम नास्ती-६० त्यर्थः । कर्थमित्याह-हवं चेत्यादि । चकारः समुच्चये, सम; शब्देनाऽत्र तदुभयं गृह्यते । ततश्चायमर्थः- इस दीर्घ तदुभयं च २३ ३ गौवनीयमचाझाल्पीया महिनन् । उत्तमः न समः इत्यादि । लासन्ति एवं स मावा न पुनः शून्यतेति ॥ १०॥ पुनवलमा प्रकारान्तरेण सनयंपनाह- सद्वस्तुनि साइय संश्योप पल्यापुंसोः झुट एप दृश्यः । ततसन्देहविशेष एव प्रकोयत्यत्र तदर्यसत्ताम् ॥ ११॥ मय संश्योऽनि नवनि विद्यमाने एव वन्तुनि सार, नावि- इनाने इत्यर्थः । कयनित्याह—यद्यलात्कारणात् सागु-पुंसोः शङ्क- पुन्लयोरेप संशयः स्फुटः प्रऋटो दृश्यो दुनीयोऽन्ति, तत्तलात्कार- पात् नूजानां यः सन्देहविशेषः । एव अत्र लोके तदर्थवचार भूपदार्थसद्भाव पन्नोटयति प्रचारयति । प्रर्वात् 'कर स्कुरने' अन्नाद्धेतनग्गिजन्तालद । नत्राचं नाव: -अनति तकदन्वके संशयः न्तकुन्दुम-वरविपाणयोरिख न युक्तः, माले त्वभावनिश्चय एव र सात् , सल्लेवभूतेषु लागु-पुस्मादिश्वित्र संशयो युतः । यदि पुनर- सत्त्पनि वस्तुनि सन्देहः सात् तदाऽविशेषेण खरविभागाविष्कार साद, न च मोऽनि तन्नालन्त्येव भूनानीति ॥ ११ ॥ जय यदुवै प्रान् न ततो मावानां सिद्धिरित्यादि तत्ततिति- घातुनाह- अपत्य मावं परमर्यसत्तां वं मन्यसे तन्न नहेतु युक्तिम् । हतं च दीर्घ च समं च वस्तु खसत्यापि प्रतिमासमेति ॥१२॥ हे व्यक्त! तं परनन्यं नावं पदार्थनपेक्ष्य अर्थःचा पदार्थझावं परं तद् लन्नतं युति न रहेन युतिमनं नाती-३ त्यर्थः । कयनित्याह-दलं चेत्यादि । चकारः सञ्चये, सन शन्दैनात्र तदुनयं गृह्यते । श्वायनर्यः- इत्वं दीर्घ न्दुमयं च २३ १५ १८ मन्यते न खता, २१४ श्रीगौतमीयकाव्यं ९ यद्यपि प्रस्तुतं प्रस्तावापन्नं इन्द्रजालं असत् अविद्यमानमेव, तथापि तस्येन्द्रजालस्येमे तदीया इन्द्रजाले दृश्यमाना भावाः पदार्था ३ असन्तोऽसद्भूता, न सन्तीति शेपः, तेपामप्यन्यत्र विद्यमानत्वादिति भावः । तथा तेन प्रकारेण जगदेव जन्तूनां वन्धनहेतुत्वाज्जालं तस्य विशालो विस्तीर्णो यो गर्भो मध्यं, तस्मिन् भूतानि सन्त्येव । अत्रार्थे ६ फाऽपि शङ्का न कर्तव्येति शेपः ॥ ९॥ पुनः सर्वशून्यतायामिप्यमाणायां स्वप्नाऽखमादिव्यवहारामावप्रसङ्ग एवेति दर्शयन्नाह- स्त्रमेन्द्रजाले अपि भावरूपे कुतोऽन्यथा सातदभावयुक्तिः । अस्थम इत्येवमनिन्द्रजालमिति प्रतीतिर्यत ऊहनीया ॥१०॥ खप्नश्च इन्द्रजालं च खमेन्द्रजाले ते अपि भावरूपे विद्येते, १२ नाऽभावरूपे इत्यर्थः । अन्यथा समादेर्भावत्वाऽभावे तयोः स्वप्नेन्द्र- जालयोरमावयुक्तिर्भवदुक्ताऽभावोपपत्तिः कुतः स्यात् !, कुतोऽपि न स्यादित्यर्थः । यतो यस्मात्कारणान्न खमोऽसम इत्येव तथा न इन्द्र- १५जालमनिन्द्रजालमित्येवं या प्रतीतिः सा ऊहनीया विचार्या । इद- मत्र तात्पर्यम्--सर्वशून्यत्वेऽभ्युपगम्यमाने समोऽयमखमो वा !, तथा इन्द्रजालमिदमनिन्द्रजालं वेत्यादिको विशेषः किं कृतः स्यात् ! १८समादीनां विशेपनिवन्धनाभावात्समतेय कस्मान्न भवति ? यादृशः समोऽसनोऽपि ताश एव यादशश्चाऽसनः समोऽपि तादृश एवे- २. त्यादि । अथवा विपर्ययः कुतो न भवति ! यः समः सोऽसमः 'मन्यपास्य पदमावयुधिः' इदि पाशीमुद्रितपाटोऽसारस्पाच्छन्दोमा- दोपाराचामनोरमः।

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २१५ योऽस्वमः स समः इत्यादि । तस्मात्सन्ति एवं स भावा न पुनः शून्यतेति ॥ १० ॥ : पुनर्भूतसद्भाव प्रकारान्तरेण समर्थयन्नाह- सद्वस्तुनि म्यादथ संगयोऽपि यत्स्थाणुपुंसोः स्फुट एप दृश्यः । तद्भुतसन्देहविशेष एवं प्रस्फोरयत्यत्र तदर्थसत्ताम् ॥ ११ ॥ अथ संगयोऽपि सद्वस्तुनि विद्यमाने एव वस्तुनि स्यात् , नावि- द्यमाने इत्यर्थः । कयमित्याह-ययस्मात्कारणात् स्थाणु-पुंसोः शुद्ध- पुरुपयोरेप संशयः स्फुटः प्रकटो दृश्यो दर्शनीयोऽम्ति, तत्तम्मात्कार- णात् भूतानां यः सन्देहविदोपः स एव मत्र लोके तदर्थसचा भूनपदार्थसद्धावं प्रस्फोटयति प्रकाशयति । प्रपूर्वात् 'स्फुर फुरणे' अस्मादेनुमयिजन्तालट् । अत्रायं भावः-बसति मतकदम्बके संशयः सकुसुम-खरविपाणयोरिव न युक्तः, अपि त्वमावनिश्चय पत्र १२ स्यात् , सल्लेवभूतेषु स्थाणु-पुरुषादिष्विव संशयो युक्तः । यदि पुनर- सत्यपि वस्तुनि सन्देहः स्यात् तदाऽविशेषेण खरबिपाणादिग्वपि स्यात्, न च सोऽस्ति तमासन्त्येव भूतानीति ॥ ११ ।। अय यदुक्तं प्राग न स्वतो मावानां सिद्धिरित्यादि तत्पतिवि- धानुमाह- अपेक्ष्य मावं परमर्थसत्तां त्वं मन्यसे तन्न सहेत युक्तिम् । हस्खं च दीर्घ च समं च वस्तु स्वसत्तयाऽपि प्रतिमासमेति ॥१२॥ हे व्यक्त ! वं परमन्यं मा पदार्थमपेक्ष्य अर्थसता पदार्थसद्भाव परं तत् लन्मतं युक्तिं न सहेत युकिंक्षम नाम्नी- त्यर्थः । कथमित्याह-दस्त्रं चेत्यादि । चकारः समुच्चये, समः शब्देनाऽत्र तदुमयं गृप्यते । ततश्चायमर्थः- इस दीयं तदुमयं च २६ . मन्यसे न सता, २१६ श्रीगौवमीयकाव्य वस्तु खसत्तयाऽपि प्रतिभासं एति प्रामोति खसत्तयाऽपि प्रतिमासते, न तु पराऽपेक्षयैवेत्यर्थः । अयमत्र भावार्थ:--न खल्वापेक्षिकमेव ३ वस्तूनां सत्त्वं किं तु विपयज्ञानगमनाद्यर्थक्रियाकारित्वमपि । ततश्च हख-दीपों-मयानि आत्मविषयं चेद् ज्ञानं जनयन्ति तदा सन्त्येव तानि, कथं तेषामसिद्धिः ! यदप्युक्तं- 'मध्यमाङ्गुलिमपेक्ष्य ६प्रदेशिन्यां हसवमसदेवोच्यते' इत्यादि तदप्ययुक्तं, यतो यदि मध्य- मामपेक्ष्य प्रदेशिन्यां खतः सर्वथाऽसत्यामपि हखत्वं मवेचदा विशे- पामावात्खरविपाणेऽपि तद्भवेत्, अतिदीपु इन्द्रयष्ट्यादिप्वपि च तत्स्यात् । तस्मात्स्वतः सत्यामेव प्रदेशिन्यां वस्तुनोऽनन्तधर्मात्मक- त्वात्तवत्सहकार(रि)सन्निधौ तचटू पाभिव्यक्तेस्तत्तज्ज्ञानमुत्पद्यते न पुन- रसत्यामेव, तस्यामपेक्षामात्रत एव हसज्ञानमुपजायते । एवं दीर्घा- १२ भयादिप्वपि वाच्यं, तस्मात्सतः परत उभयतश्च भावानां सिद्धिर- स्त्येव व्यवहारतः, निश्चयतस्तु खतः सिद्धा एव सर्वेऽपि भावाः। तथा हि-इह किञ्चित् स्वत एव सिध्यति, यथा कर्तृनिरपेक्षः तत्का- १५ रणद्रव्यसङ्घातविशिष्टपरिणामरूपो मेघः । किश्चित्तु परतो यथा- कुलालकर्तृको घटः। किञ्चिदुमयतो यथा-मातापितृभ्यां सकृतकर्म- तव पुरुषः । किञ्चिन्नित्यसिद्धमेव यथा-आकाशम्, एतच व्यव- १० हारनयाऽपेक्षया द्रष्टव्यम् । निश्चयतस्तु वाद्यं निमिचमात्रमेवाऽऽचित्य सर्व वस्तु सत एव सिध्यति खरविपाणादिरूपोऽमावस्तु बाह्यनिमित- सद्भावेऽपि कदाचिदपि न सिध्यतीति ॥ १२ ॥ उक्तमेवार्थ पुनदृढयति- इसत्व-दीर्घत्व-समत्व-धर्मा यद्यप्यपैसावरागा भवन्ति । एवथापि यस्त्वेवदिति ससचामालम्बमानं प्रवि धर्ममानम् ॥१३॥ -- न गौतमीयप्रकाशायटीकया सहितम् । २१७ यद्यपि इसत्व-दीर्घत्व-समत्वधर्मा अपेक्षाया वंशं गच्छन्तीति अपेक्षायगा अपेक्षापीना भवन्ति, तथापि 'एतद्वस्तु हसं, एतदीप, एतत् तदुभयम्' इत्येवम्मूतां वसनामात्मसद्भावं आलम्बमानमाश्रयं तं३ पदार्थ प्रति प्रतीत्य आश्रित्य धर्ममानं हसादिधर्मज्ञानं भवतीति शेपः ॥ १३ ॥ पुत्रत्व-पत्रित्व-पितृत्व-धर्मा यद्यप्यपेक्षावरागास्तथापि । सन्तो हि सवेन भवन्ति पुंस. स्तथा च भावाः स्वत एव सिद्धाः॥ १४ ॥ एकलिन्पुरुषे सपित्रपेक्षया पुत्रत्वं, सपितामहापेक्षया पौत्रत्वं, समुताऽपेक्षया तु पितृत्वं, इत्यं तु पोनत्य-पुत्रत्व-पितृत्यधर्मा अपि यपरि अपेक्षायशगाः सन्ति, तथापि हीति निधितं पुंसः पुरुषस्य १२ रात्त्येन सहावेन एते धर्माः सन्तो विधगाना गरन्ति । तदमाये तु फर्य म्युरिति मायः । तथा च सति सर्वे माराः पदार्थाः सत एवं सिता शेया इति शेपः ।। १ ।। सम्बन्धमासाद्य कमप्यपेक्षा प्रयान्ति काभित्परमावतन् । तथापि कार्यादिसमस्तमायाः खबर मुत्तामधिकृत्य सन्तः ॥ १५ ॥ यदि कार्यादिगमनमागः फार्यादयः सर्व पदायीः फमपि सम्पपमासाप माप्प परभावतः परपदार्धतः काचिदपेक्षा प्रयान्ति, मानुपन्ति, वयान ते सर स अधिकृत्य आश्रित्य सन्तो विध- माना भेयाः ॥१५॥ ३५ १८ २१८ श्रीगौतमीयकाव्यं ३ J अथ यदुक्तं प्राक् ( अस्मिन्सर्गे ६ श्लोके ) 'सूक्ष्मत्वतो वस्तुनि नाभिगम्यावाद्यन्तमागा' वित्यादि तत्र प्रतिविधानमाह- तथाऽऽदि-मध्या-ऽन्तविभागयुक्तिः पुंसो विवक्षावशगोपदिष्टा। तत्सौम्य ! मा गाः स्वपरप्रणाशं यतः समृद्धं जगदस्ति सर्वम् ॥ १६ ॥ त्वया उपदिष्टा सर्ववस्त्वभावसाधकत्वेन कथिता या आदिमध्या- न्तविभागयुक्तिः साऽपि तथा तेनैव प्रकारेण पुंसः पुरुषस्य वक्तुमिच्छा ९ विवक्षा तस्या वशगा तदघीनैवाऽस्ति न पुनस्तात्त्विकी, घट-पटादिस- वस्तूनामक्तिनभागस्य, स्फटिका-ऽन(क)पटलादीनां परभागस्य अपि च साक्षादृश्यमानत्वादिति भावः । किंच त्वया सर्वाभावे इष्यमाणे १२वस्तुन आदिमध्यान्तविभागभेद एव कुतः सङ्गच्छते ? सर्वाभावेऽपि चेत्स भवेत् तर्हि खरविपाणस्यापि कुतो न स्यात् ? इत्यलं विस्तरे- णेति । तत्तस्मात्कारणात् हे सौम्य ! हे व्यक्त ! सर्वजगतः शून्यत्व- १५स्वीकारेण स्वस्य परेपां च वस्तूनां प्रणाशमभावं मा गाः मा प्रापः, सर्वामा मा खीकुर्वित्यर्थः । यतो यस्मात्कारणामागुक्तयुक्त्या सर्व जगत् समृद्ध जीवाऽजीवादिसर्वपदार्थरूपदिसंयुक्तमस्ति न तु केनापि १८प्रकारेण शल्यमिति भावः । मागा इति । माइ उपपदादिणो लुङ्ग मध्यमपुरुषैकवचनं 'इणो गा लुङि' (२१818५) इति गादेशो 'गातिस्था-' (२२४७७) इति सिचो लक् ॥ १६ ॥ एवं मगवता मूतास्तित्वे प्रतिपादित्ते व्यपगतसन्देहोऽसौ व्यक्तः २२ संवेगमापन्नः सन् किं कृतवानित्याह- - ३ ९ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकंया सहितम् । २११ १. निशम्य युक्तीरिति वीरवका- द्विहाय मोहं समशून्यतायाः। व्यक्तः समं पञ्चशतैः स्वशिप्यैः पथि प्रववाज जिनाधिपोक्ते॥१७॥ इत्यमुना प्रकारेण वीरवात् श्रीवीरखामिनो मुखात् युक्तीरुप- पत्तीनिशम्य श्रुत्वा तदालोचनेन समशून्यताया सर्वशून्यताया मावि-६ भावकं मोहमज्ञानं विहाय त्यक्त्वा व्यक्तो नाम उपाध्यायः, पञ्चशतैः खशिष्यैः समं सार्द्ध जिनाधिपोक्ते श्रीवीरप्रमुदर्शिते पथि मार्गे प्रवत्राज प्रवज्यां गृहीतवान् ॥ १७ ॥ इति व्यक्ताचार्यदीक्षाग्रहणम् ॥ ४॥*- अथ सुधर्मणखदाह- यत्संशयच्छिअगदेकनाथः श्रीवर्द्धमानोऽवततार विश्थे । श्रुत्वेति मेधाविवरः सुधर्मा समुत्सकोऽभूजिनदर्शनाय ॥१८॥ यः कश्चित् संशयो यत्संशयस्तं छिनचीति यत्संशयच्छित् संशय-: मात्रछेदीत्यर्थः, अत एव जगतो विश्वस्स एकनाथो जगदेकनाथः १५ एवंविधः श्रीवर्द्धगानो जिनो विश्वे लोकेऽवततार अवतरति स, इति श्रुत्वा मेघाविषु विद्वत्सु वरः श्रेष्ठः सुधर्मानामा द्विजः उपाध्यायो जिनदर्शनाय श्रीवीरप्रभुदर्शनार्थ समुसुकोऽभूत् । दर्शनायेति । अत्र १८ 'प्रसितोसुकाम्यामिति' तृतीयासप्तम्योः प्राप्तौ सत्यामपि तादी- विवक्षया चतुर्थी ॥ १८॥ . , १ मा 'निशम्य युक्तिमिति' काशीमुदिवपाठः प्रामादिकः, छन्दोमायोप- घरवादसारस्याथ।

२२० ३ श्रीगौतमीयकाव्यं छात्रैः समं पञ्चशतैः प्रणन्दन्नागत्य तस्थौ जिनसंमुखं सः। कृपालुरप्याह मुधा सुधर्मन् ! मोहं प्रयासीति समं सक्षम् ।।१९।। स सुधर्मा पञ्चशतैश्चछात्रैः समं सार्द्ध प्रणन्दन् समृद्धिमान् सन् आगत्य जिनसंमुखं तस्थौ अवतिष्ठते स्म । ततः कृपालुः सर्वजगजन्तुषु दयावान् भगवानपि तं प्रति आह उवाच । किमाहेत्याह-हे सुधर्मन्! ६ समं सर्व मनुष्यादिकं सदृशं इहभवसदृशं परभवेऽपि स्यात् इति मुघा वृथा मोहं मौढ्यं प्रयासि प्राप्नोपि । अयं भावः त्वमेवं मन्यसे यो मनुप्यादिः यादृश इह भवे स परमवेऽपि तादृश एवं ९ स्यात् । नन्वयुक्तोऽयं तव संशयः यतोऽसौ विरुद्धवेदपदश्रुतिनिबन्धनो वर्तते तानि चाऽभूनि वेदपदानि 'पुरुषो वै पुरुषत्वमभुते पशवः पशुत्वम्' इत्यादि । यथा 'शृगालो वै एप जायते यः सपुरीपो दक्षते' १२इत्यादि । एपां च वेदपदानाममुमर्थ मन्यसे त्वं, पुरुषो मृतः सन् परभवे पुरुषत्वमेवाऽभुते पामोति, तथा पशवो गवादयः पशुत्वमेवे- त्यादि, अमूनि फिल भवान्तरगतजन्तुसादृश्यप्रतिपादकानि, तथा १५शृगालो वे इत्यादीनि तु पैसादृश्यख्यापनानीत्यतस्तव संशयः, अयं चायुक्त एव, यतोऽमीषां वेदपदानां नायमर्थः किन्तु वक्ष्यमाणलक्षण इति ॥ १९ ॥ अगुमेयाथ मुधर्माऽभिमत्युक्त्युक्तिपूर्व दर्शयन्नाह- सदृक्षता कारण-कार्ययोर्य- यो विशी-पि यवं प्रयते । तथा मनुष्यो हि भवेन्मनुप्यो नारी तु नारीति पुमान् पुमांय ।। २० ।। अपि समारने कारण-कार्ययोः सदृक्षता सादृश्यमधि कारणानु। - गौतमीयप्रकाशाख्यदीकया सहितम् । २२१ः , ९ रूपमेव कार्य भवतीत्यर्थः । तत्र दृष्टान्तमाह-यद्यतो यवोधान्य- विशेपो विशीर्य भूजलसंयोगे विदीयं, अङ्कररूपेण मूत्वेत्यर्थः, यवं प्रसूते उत्पादयति, यथा यवबीजानुरूपो यवाङ्कुर इत्यर्थः, तथा तेनैव प्रकारेण हीति निश्चितं, य इह मवे मनुष्यः स परमवेऽपि मनुष्यो भवेत् तत्रापि तु इति विशेषे नारी स्त्री नारी एव भवेत् च. पुनः पुमान् पुरुपः पुमानेव भवेदिति त्वं संभावयसीत्यर्थः । अयं भावः-इहभवकारणं चान्यजन्म, ततस्तेनापि इहमवसदृशेन भवितव्यमित्येवं मन्यमानस्त्वं इहभवसदृशं सर्व पुरुषादिक पर- मवेऽप्यवेपीति ॥ २० ॥ गीयेत वेदे च शरीरभाजां समस्तयोनिग्रहणं समेपाम् ।। सन्देहगुत्पादयतीति वाक्यं मृण्वनिवेशायन ! तत्समाधिम् ॥ २१ ॥ च पुनर्वेदे शृगालो चै इत्यादिके समेपां सर्वेषां शरीरमाजां जीवानां समस्त्रयोनिग्रहणं सर्वयोनिखीकारो गीयेत उच्येत, इतीत्थं १५ उमयरूपं वेदवाक्यं सन्देहं संशयं उत्पादयति । हे अमिवैशायन- गोत्रीय । सुधर्मन् ! तत्समाधि तस्य समाधान त्वं शृणु ॥ २१ ॥ यत् कारणेनाऽनुगुणं हि कार्य नैकान्तिकं वत्परिमापनीयम् । नो चेत्तदा किं तपनीयसिद्धिः केनापि योगेन भवेदयस्तः ।। २२ ।। हीति निश्चितं यत्कारणेन अनुगुणमनुरूपं सदृशामित्यर्थः, कार्य त्वयाऽभिमतगिति वाक्यशेषः । तत् एकान्तिक नैधयिकं न परि-२३ . .

. २२२० श्रीगौतमीयकाव्यं भावनीय विचार्य, नो चेत् यद्येवं न स्यात् , कारणानुरूपमेव कार्य चेत्स्यादित्यर्थः, तदा केनापि योगेन औपध्यादिप्रयोगेण अयस्तो श्लोहात् तपनीयस्य स्वर्णस्य सिद्धिनिप्पत्तिः, किमिति प्रश्ने, भवेत् , कार्यकारणवैषम्यात्साऽपि न स्यादित्यर्थः । भवति हि सा, तस्मान्न कारणानुरूपमेव कार्यमिति निश्चयः । एवं शृगादपि शरो जायते. गोलोमाविलोमभ्यश्च दूर्वा प्रभवति, इत्याद्यपि बोध्यम् ।। २२ ॥ अथवा कारणानुरूपं कार्यमस्तु अत एव भवान्तरे विचित्र- रूपता जन्तूनामिति दर्शयति--- चेदाग्रहः कारण-कार्यसाम्ये तथाऽपि योनिभ्रमणं सुसिद्धम् । यत्कारणं कर्म विचित्ररूपं विचित्रयोनिरपि किं न कुर्यात् १ ॥ २३ ॥ हे सुधर्मन् ! तव कारण-कार्ययोः साम्ये सादृश्ये चेद्यदि, आम- होऽस्तीति शेपः, तथापि जन्तूनां नानाविघासु योनिषु अमणं मुसिद्धं: १५मुतरां सिद्धम् 1 कथमित्याह—यद्यसाकारणार योनिपु प्रमणे कारणं विचित्रं रूपं स्वरूपं यस्य तद्विचित्ररूपं कर्म, तद्विचित्रयो- निरपि किं न कुर्यात् ! कुर्यादेवेत्यर्थः । अयं मावः-मिथ्यात्वा- १८ऽविरत्यादिहेतुवैचित्र्याद्विचित्रं कर्म मयाऽभिहितं, ततश्च तजन्यस्य मवारस्यापि जात्यादिभेदेन विचित्रता युक्तैव । अत्र प्रयोग:- चित्रं संसारिजीवानां नारकादिरूपेण संसारित्वमिति प्रतिज्ञा, विचि- वस्स फर्मणः फलरूपत्वात् इति हेतुः, इह यद्विचित्रहेनुकं , तद्विचित्रं २२ दृष्टं, यह विचित्राणां कृपि-वाणिज्यादिकर्मणां फलं लोके इति ॥२३॥ . . ,

९
गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २२३
“अथाऽमुमेवार्थ स्पष्टतरमाह-
प्राकर्मसिद्धिः प्रतिपादितैव या च क्रिया सा फलशालिनीति ।
ततोऽर्जितं कर्म विचित्ररूप विचित्रयोनिप्रतिपत्तयेऽस्तु ॥२४॥३.
'या च काचन क्रिया सा फलशालिनी फलवती दृष्टा' इति वचनेन
प्राक् पूर्व अमिभूत्यधिकारे कर्मसिद्धिः प्रतिपादिता उता एव । तत-
खस्सात् गुमाऽशुभक्रिययाऽर्जितं उपार्जितं विचित्ररूपं कर्म विचित्र-६
योनीनां प्रतिपत्तये कारणत्वज्ञानाय अस्तु ॥ २४ ॥
अमुमेवार्थ दृष्टान्तेन द्रढयन्नाह-
नाट्ये यथैको भरतो विचित्रान् गृह्णाति वेपानसुमांस्तथैव ।
ततः सुधर्मन्! परिहत्य मोहं मन्यस्व सर्वत्र विचित्रभावम् ॥२५॥
यथा नाट्ये नृत्ये एको मरतो नटो विचित्राननेकविधान् वैपान्
नेपथ्यानि गृहाति रचयति, तथैव असुमान् जीवो नानायोनिपु नाना १२
रूपान् देहान् गृहातीत्यर्थः । ततस्तस्मात्कारणात् हे सुधर्मन् ! मोह- ::
मज्ञानं परिहृत्य त्यत्वा सर्वत्र सर्वस्मिन् जगति विचित्रमा विचित्रत्वं
मन्यख जानीप्य । भरत इति । 'शैलपो भरतः सर्वकेशी' इत्यादि १५
(हेमः) 'नटः कृशाश्वी शैलाली'ति हैमः । असुमानिति । असवः ::
प्राणाः सन्त्यस्येति अस्त्यर्थे मतुप् । किं च 'पुरुषो चै पुरुषत्वमभुते'
इत्यादीनां वेदपदानामयमर्थः--कोऽपि पुरुषः खस्विह जन्मनि १८
प्रकृत्या भद्रको विनीतः सानुकोशोऽमत्सरश्च मनुप्यनाम-गोत्रे कर्मणी ..
बदा मृतः सन् पुरुषत्वमश्नुते, न.तु नियमेन सर्व एव, अन्यस्या-
न्यकर्मवशुगस्याऽन्यथाप्युत्पतेः । एवं पशवोऽपि केचिन्मायादि:२०
दोपवशात्पशुनामगोने कर्मणी बद्दा परमये पशवो जायन्ते न तु.
सर्वेऽपि नियमेन, कर्मापेक्षित्वाजीवगतेरिति ॥ २५॥

२२४३ श्रीगौतमीयकाव्यं - ६ इत्थं भगवता संशये छिन्ने सति सुधर्मा किं कृतवानित्याह- ततः सुधर्माऽपि बुधः प्रबुद्धो दीक्षा ललौ पञ्चशतैः स्वशिष्यैः। अथाऽऽगतो मण्डितसूरिराज- स्साद्धैत्रिभिश्छात्रशतैः समेतः ॥२६॥ ततस्तदनन्तरं बुधो विद्वान् सुधर्मापि प्रबुद्धो भगवद्वचनात्मबोधं प्राप्तः सन् पञ्चशतैः खशिष्यैः सह दीक्षा ललौ गृहाति स । 'ला आदाने' अस्मात्करि लिट् । इति सुधर्मखामिदीक्षाग्रहणमुक्त्वा ९मण्डितस्य तदाह-अथानन्तरं मण्डितो नाम सूरिराजः पण्डितमुख्यः अर्द्धन शतेन सह वर्तमानैः सास्त्रिभित्रछात्राणां शिष्याणां शतैः समेतो युक्तः सन् आगतो भगवत्समीपमिति शेषः ॥ २६ ॥ आगच्छ भो पण्डित ! मण्डित! त्वं स्वामीति संभाष्य पुनस्तमाख्यत् । जीवस्य किं कर्मभिरस्ति बन्धो मोक्षश्च वा नेति जहाहि मोहम् ॥ २७ ।। 'भो मण्डितपण्डित वं आगच्छ' इति संभाप्य इत्थं संभापणं कृत्वा स्वामी वीरप्रभुः, पुनस्तं मण्डितं आख्यत् अवोचत् । आइ. १८ पूर्वारल्याधातोर्लइ 'अस्यतिवक्ति- (३११५२) इति च्लेरछ । किमाख्यदित्याह---जीवस्य कर्मभिः सह पन्धो मोक्षश्च किं अस्ति। नया इति मोहं संशयात्मकमज्ञानं त्वं जहाहि परित्यज, 'मोहाइ. त्यागे'जोहोत्यादिकोऽसालोद । अत्राय भावः-हे मण्डित ! २९त्वमित्यं मन्यसे-किं पन्धमोक्षी तो न या: इति । अयं चानु.

. ६ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २२५ चितस्तव संशयो विरुद्धवेदपदश्रुतिनिबन्धनत्वात् । तथाहि-स एप विगुणो विभुः न वध्यते संसरति वा न मुच्यते मोचयति वा, न वा एप बाह्यमभ्यन्तरं वा वेद' इत्यादीनि वेदपदानि, तथा ३ 'न ह वै सशरीरस्य प्रियाऽप्रिययोरपहतिरस्ति अशरीरं वा वसन्तं प्रियाऽप्रिये न स्पृशत' इत्यादीनि च । एतेषां चार्थ त्वं न जानासि, यतोऽयमेतदर्थस्तव चेतसि वर्तते, तद्यथा-~स एषः अधिकृतो जन्तुर्विगुणः सत्त्व-रज-स्तमोगुणरहितो विभुः सर्वगतो न बध्यते, पुण्य-पापाभ्यां न युज्यते इत्यर्थः । संसरति वा नेत्यनुवर्तते । न मुच्यते न फर्मणाऽभियुज्यते, बन्धस्यैवाभावात् । 'मोचयति वा नान्य'-९ मित्यनेनाऽकर्तृकत्वमाह । न वा एप वाघमात्ममिन्नं महदहकारादि अभ्यन्तरं निजखरूपमेव वा वेद विजानाति, प्रकृतिधर्मत्वाज्ञानस्स, प्रकृतेश्वाऽचेतनत्वात् । ततश्चामूनि 'किल २६ 'बन्ध-मोक्षाभावप्रतिपाद- कानि । तथा न ह वै नैवेत्यर्थः सशरीरस्य प्रियाऽप्रिययोरपहतिरस्तीति वाद्या-ध्यात्मिकाऽनादिशरीरसन्तानयुक्तत्वात् सुख-दुःखयोरपहतिः, संसारिणो नास्तीत्यर्थः । अशरीरं वा वसन्तममूर्तमित्यर्थः । प्रियाऽ-१५ प्रिये न स्पृशतः तत्कारणभूतस्य कर्मणोऽभावादित्यर्थः । अमूनि च बन्धमोक्षावभिधाय कानीत्यतः संशयः, तत्र स एप विगुणो विमुरि- त्यादीनां नाऽयमर्धः किन्तु वक्ष्यमाणलक्षण इति ॥ २७ ॥ उक्तमेवार्थ सद्धेपतः सूत्रकृदाह--- बद्धो हि जीवो विवशोऽध विश्वे नानागतीर्याति पुनर्न मुक्तः । बद्धो न चाऽयं विगुणो न मुक्तो वेदोक्तिमिति दधासि शङ्काम् ॥ २८ ॥ १ धावः अनादिशरीरसन्तान:-औदारिकादिः, आप्यारिमय कामगः । १२ २१ २२६ श्रीगोतमीयकाव्यं - वाऽथवा वेदोक्तिभिः प्रागुक्तवेदवचनैस्त्वमिति शङ्कां दधासि धारयसि, इतीति किमित्याह हीति निश्चितं, अत्रास्मिन् विधे जगति कर्मभिर्बद्धो जीयो विवशः कर्मवशत्वादनात्मवशः सन् नाना- गतीर्याति अनेकविधासु गतिषु संसरतीत्यर्थः, न पुनर्मुक्तः कर्म- विरहितो जीवः, कर्मविरहादेव तस्य तदसंभवात् । अयं च जन्तुर्वि- ६ गुणः सत्त्वादिगुणरहितो न बद्धः कर्मभिर्न (च) मुक्त इति कथं नानागतिगमनमेतस्य सञ्जाघटीति ।। २८॥ इत्थं मण्डितस्स संशयमाविष्कृत्य तद्वितियुक्ति प्रादु- ९प्कुर्वनाह-- स्थात् सादिवन्धे सति चेतनादे- निर्हेतुकत्वान्न हि संभवोऽपि । अनादिवन्धे तु भवेन मोक्षो युक्तीरिति स्फोरयसे वृथा त्वम् ॥ २९ ॥ आत्मना सह कर्मणः सादिबन्धे सति हीति निश्चित, नितुकत्वा- १५ द्धत्वमावात् चेतन आदिर्यस्य स चेतनादिस्तस्य, आत्मकर्मणोरित्यर्थः, संमयोऽपि न स्यात् उत्पचिरपि न भवेत् , आस्तां संयुक्ततयाऽवस्थान- मिति अपिशव्दार्थः । अनादिवन्धे तु सति मोक्षो न भवेत् , अनादेः १८ संयोगस्य जीवाकाशयोरिवाऽनन्तत्वदर्शनात्, तथाचानिष्टापत्तिः, इतीत्थं त्वं वृथा युक्तीः स्फोरयसे । अयमत्र भावार्थ:-हे मण्डित! समेवं मन्यसे जीवस्य यः कर्मणा सम्बन्धः सं आदिमान आदि- २. रहितो था, यद्यादिमांस्वतः किं पूर्व जीव उत्पद्येत, पश्चारकर्म !, पूर्व १२ तस्याऽरमनः तरसमवात्-संसारस्यासमवात् ।

२२७ गौतमीयप्रकाशास्यटीकया सहितम् ।। वा कर्म पश्चाजीव उत्पद्यत , युगपद्वा तौ द्वावपि उत्पद्येयाताम् ।, इति पक्षत्रयम् । तत्र पूर्व जीवः पश्चात्कर्मत्याचपक्षस्तु अयुक्तः । यतो न कर्मणः पूर्व खरगस्येवात्मनः संभयो युक्तोऽहेतुकत्वात् । इह । यदहेतुकं तन जायते, यथा सरनं, यच्च जायते तनिहेतुकमपि न भवति, यथा घटः, निष्कारणस्य च जातस्य निष्कारण एवं विनाशः सादिति । अथ कर्मणः पूर्वमात्माऽनादिकालसिद्ध एवेति किं तस्य । सहेतुक-निर्हेतुकत्वचिन्तयेति चेतर्हि जीवस्य कर्मबन्धो न पामोति, अकारणवादाकाशस्येव । यथ निष्कारणोऽप्यसो भवति तर्हि मुक्त- स्याऽपि पुनः स भविष्यति निष्कारणत्वाविशेपाचतच मुक्तावप्यना- ९ श्वासोऽथवा कर्मयोगामावान्नित्यमुक्त एषाऽसी भवेत् , यदि वा चन्धाभावे करतस्य मोक्षव्यपदेशः । न यस्य नगसो मुक्तव्यपदेशः कस्यापि संमतः, बन्धपूर्वकत्वान्मोक्षस्य, तम्मान पूर्व जीवः पश्चात्कर्मे-११ न्यायविफस्पः । अथ पूर्व कर्म पश्चाजीवो युगपद्वा हायपीति ! पक्षद्वयमपि न संमवति, तथा हि-न च जीवात्माकर्मणोऽपि समु. यो युक्तः । कर्नुनीवस्य तदानीममावाद क्रियमाणस च फर्मया- १५ योगानिष्कारणश्चेत्कर्मसमुद्भवः स्यातर्हि अफारणजातस्याऽकारणत एव विनाशोऽपि सादिति । तथा युगपदुत्पचिमारे च प्रत्येकपक्षोका दोपा याच्याः, निहेतुकत्याप्रत्येकवदुमयस्यापि समुदितस्यानुत्पत्ति-१८ रित्यादि । न च युगपदुसनयो रकमगोरयं जीवः कर्ण इदं च, भानावरणादिपुदलयन्दं फर्मेति कर्तृ-कर्ममावो युज्यते, यया लोके सव्येवरगोविषाणयोरिति । अथ द्वितीयो मलविकल्पो न समवति, २१ तथा हियदि अनादिरेय जीव-कर्मणोः सम्बन्धः साचहि मोझो न पटते, यमापोऽनादिः संयोगः सोऽनन्तो दृष्टो यथा जीवाऽऽका-२१ २२८ श्रीगौतमीयकाव्यं ९ शयोः नहि आकाशेन सह जीवस्य कदाचिदपि संयोगो निवर्चते । एवं कर्मणाऽपि सहाऽसौ न निवर्तते, तथा च सति मुत्यभाव- ३प्रसङ्गः, इत्युक्तयुक्त्या बन्ध-मोक्षौ जीवस्य न घटेते, श्रूयते च वेद- वाक्येवेती ततस्तव संशयोऽयमिति ॥ २९ ॥ इत्यं पूर्वपक्षमुक्त्वा प्रतिविधानमाह- गृहाण सौम्योचरमेतदन परस्परं कारण-कार्यमावाद । अनादिसन्तानमवेहि कर्मा- इयोस्तु बीजाकुरवन्मनीपिन् । ॥ ३० ॥ हे सौम्य! अनाऽस्मिन् सन्दिग्धेऽथे एतदनन्तरमुच्यमानमुतरं गृहाण अङ्गीकुरु । किमेतदित्याह-मनीषा बुद्धिरस्याऽस्तीति मनीपी १२ तत्सम्बुद्धी हे मनीषिन् ! हे प्राज्ञ ! कर्म च अङ्गं च कर्माङ्गं तयोः फर्म-शरीरयोः तु इति विशेपे, वीजाकुरवत् वीजाङरयोरिव परस्परमन्योन्यं कारण-कार्यभावादऽनादिसन्तानमऽनादिसन्ततिमवेहि १५ जानीहि । इदमत्र तात्पर्यम्-यत्तावदुक्तं किं पूर्व जीवः पश्चात्कर्म उत व्यत्यय इत्यादि "-तत्सर्वमयुक्तं, 'कुत इति चेदु'च्यते- शरीरकर्मणोरनादिः सन्तान इति प्रतिज्ञा, परस्परं कारणकार्यमावात् , १० वीजाङ्कुरवदिति । ततश्च प्रागुक्तं सर्वमघटमानम् एवाऽनादित्वात् तत्स- न्तानस्येति । देहकर्मसन्तानस्याऽनादित्वं वित्यं अस्ति- हो योऽतनस्य कर्मणः कारणं यश्वान्यस्यातीतस्य कर्मणः कार्य, तथा सकर्माऽपि तत् समस्ति यदप्रेतनस्स देहस कारणं, यश्चान्यस्यातीतस्य देहस्य कार्यमित्येवमनादौ संसारे न कचिद्विश्राम इत्यतोऽनादिदेह- २५ कर्मसन्तान इति । आह-'ननु वन्धमोक्षाविह साधयितुं प्रस्तुती ततः - 1-स कश्चि- गौतमीयनकाशाख्यटीकया सहितम् । २२९ सकर्मसंन्तानस्यानादित्वसाधनमसम्बद्धमिव लक्ष्यते'~~~तदयुक्तममि- प्रायापरिज्ञानात् । नहि अकृतं कर्म सम्भवति, क्रियते इति कर्म इति व्युत्पत्तेः, यच तस्य करणं तदेव बन्ध इति कथं न तसिद्धिः । तथा३ देहकर्मणोः कर्चा' कर्मदेहस्वरूपकरणयुक्तो जीवोऽवगन्तव्यो घटस्य दण्डादिकरणयुक्तकुलालवदिति ॥ ३०॥ यच्चोक्तं 'योऽनादिः संयोगः सोऽनन्तो दृष्ट इत्यादि' तत्राह- अनादितो मृन्मिलितं सुवर्ण यथा वियुज्येत कृताऽभ्युपायात् । अनादिवद्धो घनकर्मजालैमा॑नक्रियाम्यां हि तथाऽयमात्मा ३१ यथाऽनादितोऽनादिकालात मृदा मृत्तिकया मिलितं सुवर्ण कृतो९ विहितो योऽभ्युपायोऽमितापादिरुपायः तस्माद्वियुज्यते, मृत्तिकातः पृथग्भवतीत्यर्थः । तथा तेनैव प्रकारेण घनेनिविडैः कर्मजालेरनादि- बद्धोऽयमात्मा जीवो हीति निश्चितं, ज्ञानक्रियाभ्यां सदागमाभ्या-१२ सतपःसंयमाद्युपायाभ्यां कर्मभ्यो वियुज्यते । एतावता काचनोपलयोरनादिकालमवृत्तसन्तानमागवतोऽपि संयोगोऽमितापा- घुपायाप्यवच्छिद्यते तथा जीवकर्मणोरपि संयोगोऽनादिसन्तान-१९ गतोऽपि तपःसंयमाधुपायाव्यवच्छियते इति न मोक्षामाव, इति निर्गलितार्थः। एवं वीजाश्रयोः कुफुटा-ण्डकयोः पिता-पुत्रयोरपि च अन्यतरद्यदाऽनिमादितकार्यमेव विनश्यति, तदा तयोरपि अनादिः । सन्तानो व्यवच्छिद्यते इति योऽनादिसन्तानः सोऽनन्तोऽपीति नाऽय. मेकान्त इति ॥ ३१॥ पुनर्जीवकर्मणोः सन्तानस्याऽनादित्वमेव स्पष्टयन्नाह- क्रमेण । यथा - श्रीगौतमीयकाव्यं अनादिमिथ्यात्वकपाययोगाचप्रमादाभिघहेतुसङ्गात् । अंज्ञानेमावेन यतः प्रवृत्ति जीवस वित्ताचमनादितोऽपि ॥३२॥ ३ है मण्डित ! यतो यलात्कारणात् मिथ्यात्वानि आभिगृहिकादीनि कपायाः क्रोधादयः योगा मनोयोगादयः अव्रतानि प्राणातिपाता. ऽविरत्यादीनि तान्येव प्रमादा अनवधानताखरूपासेऽभिधा नाम येषां इते तथोक्का एवंविधा ये हेतवः कर्मवन्धकारणानि ते तथोक्का, अनादिः आदिरहितो यो मिथ्यात्वकपाययोगावतप्रमादामिधहेतूनां सनस्तरलात्, पुनरज्ञानस्य यो भावः सद्धावस्तेन त्वं अनादितोऽपि ९ अनादिकालादपि जीवस्य प्रवृत्ति विविधकर्मवन्ध-नानायोनिपरि- अमणादिरूपां विचात् जानीहि, अनादिमिथ्यात्वादिहेतुसम्बन्धा- दनादिरेव जीवकर्मसन्तान इति भावः ॥ ३२ ॥ १२ अनादिकर्माणि तदाश्रयाणि तत्सन्ततोत्पत्तिरनादिरेवम् । अनानयोगात्सगुणोऽयमात्मा स्वकर्मपद्धव्यपदेशमेति ॥३३॥ स जीव आश्रयो येषां तानि तदाश्रयाणि, अनादीनि कर्माणि, १५ सन्तीति शेषः । एवममुना प्रकारेण तेषां जीवाश्रितकर्मणां सन्ववं निरन्तरमुत्पतिरप्यनादिरनि । ततध अज्ञानयोगादज्ञानसम्बन्धात सगुणसमोगुणादियुक्तोऽयमात्मा सकर्ममिर्वत इत्येवंरूपो यो न्यप देशः कयनं तम् एति प्रामोति ॥ ३३ ॥ पिता स पुत्रय पिता स पुत्रः सम्बन्ध एप क विराममेति।। तया निमितं हि तदेव कर्मान्वयोऽप्ययं रालयाऽस्त्यनादिः ३४ फश्चिद्विवक्षितः पुमान् सपुत्रस्य पिता वर्चते, स एव स पितुः पुत्रंथ तया यस्लादयं समुत्पन्नः सोऽस्य पिता बने, स एव सपितुः गौतमीयप्रकाशायटीच्या सहितम् । २३१ पुत्रश्च एवमेष पितापुत्रसम्बन्धः क विराममवसानमैति प्राप्नोति:, अनादित्वान्न कापीत्यर्थः । तया तेनैव प्रकारेण हीति निश्चितं, यदतीतस्य देहादेः कार्यतापन्नं कर्म तदेव निमितं अग्रेतनदेहादेः३ कारणमस्ति । अयमन्वयो जीव-कर्मणोरनुगमोऽपि शृङ्गलयाऽना- दिरखि ॥ ३४॥ 'अथाऽरूपिणि जीवे कथं रूपिणः कर्मणो बन्ध:-' इत्याशका-६ मपाकर्तुमाह- अरूपिणि व्योमनि चेनिवन्धं घटादिकानामुत मन्यसे त्वम् । तत्कर्मणः पौद्गलिकस्य वन्यं किं शङ्कसेऽनादिविमूढजीवे ३५ १ 'उत प्रश्नवितर्कयो रिति हेमचन्द्रोः । उतेति प्रश्ने, है मण्डित ! चेदि त्वं अरूपिणि व्योमनि आकाशे घटादिकानां घट- पटादिपदार्थानां नितरां बन्धो निबन्धस्तमात्यन्तिकसम्बन्धं मन्यसे, १२ तत्तर्हि अनादिविमूढो मोहाद्याकुलो यो जीवन्तस्मिन् पौद्गलिकस्य पुद्गलैर्निष्पन्नस्य कर्मणो वन्धं प्रति किं शङ्कसे कथं शङ्काविषयं करोषि ! उभयत्र न्यायस्य समानत्वान्न कोऽप्यन शक्षाऽवकाश इति १५ भावः ॥ ३५॥ इत्यमनादिबन्ध प्रतिपाद्य मुक्तवरूपं दर्शयन्नाह- ज्ञात्वा पुनः खं च परं परेभ्यो निवर्तमानो विलसन् स्वभावे । निःशेषशुद्धोऽक्रियतां प्रपन्नो मुक्तो निगद्यत सदा चिदात्मा ३६ खमात्मानं परं सकलपदार्थेभ्यो मिन्नं ज्ञात्वा परेभ्योऽन्येभ्यः पुद्गलादिभ्यो निवर्तमानः पृथग् मवन् पुनः समावे. ज्ञानादिस्वरूपे विलसन् विलासं कुर्वन् , लीनो भवन्निति यावत् । निःशेषेण कर्म-२२ .

२३२ श्रीगौतमीयकाव्य मलापगमात् सामस्त्येन शुद्धो निर्मलीमूतो अत एव अक्रियतां सूक्ष्मयादरमनोवाकाययोगविवर्जितत्वं प्रपन्नः प्राप्तः सन् चिदात्मा ३शुद्धज्ञानमय आत्मा सदा सर्वकाले मुक्तो निगद्येत कर्मनिर्मुक्तः सिद्धामा उच्यतेत्यर्थः । चः पादपूरणे ॥ ३६ ॥ तदेवं युक्तिभिः बन्ध-मोक्षौ व्यवस्थाप्य वेदवाक्यद्वारेणाऽपि ६तद्यवसामाह- - . यनिर्गुणो नैव कदापि पद्धो व्याख्यायि वृद्धैरिह चिन्मयोऽयम् । तन्निययाऽध्यानमपेक्ष्य लक्ष्यं चैतन्य-जाड्योभयमावभेदात् ।। ३७ ॥ चिन्मयतत्त्वतो ज्ञानमयोऽयमात्मा वृद्धः माकनपुरुषैः इहाs- १२ मिन् ‘स एप विगुणो विमुर्न वध्यते' इत्यादौ वेदवाक्ये यन्निर्गुण- खमोगुणादिशून्यस्तथा कदापि कर्ममिव बद्ध एवंरूपो व्याख्यायि व्याख्यातस्तनिश्चयाध्वानं निश्चयमार्ग मोक्षमपेक्ष्य आश्रित्य लक्ष्य १५ ज्ञातव्यम् । कुत इत्याह-चैतन्येत्यादि । चैतन्यं च चेतनत्वं च जाध्यं च जडलं च ते च यो उमौ मावी तयो/दो भिन्नत्वं तस्मात् । अयमर्थः-चैतन्यमालखमावो जाव्यं तु कर्मादिपुद्गलखमावः, १८ आत्मकर्मणोश्च क्षीरनीरन्यायेन सम्बन्धस्ततश्च व्यवहारनयमपेक्ष्य न प्रायेण चैतन्य जाटयमावयोर्भेदः, निश्चयापेक्षया तु सर्वथा मेदोऽ- स्त्येव, ततो मुक्तौ सर्वया जाव्यापगमात् शुद्धचैतन्यस्यैव च सदा- 'स एप विगुण' इत्यादि वेदवाक्यानां मुकजीवविषयत्वं १५योध्यम् । मुक्तस प पन्यापमावेऽविप्रतिपतिरेवेति न ६ यात्, AN- गौतमीयप्रकाशायटीकया सहितम् । २३३ . सशरीरस्य' इत्यादिवेदवाक्याम्यां तु स्फुट एव बन्यो मोसश्च प्रति- पादितोऽस्तीति नात्र शङ्का कायां ॥ ३७॥ तदेवं भगवचा छिन्नसंशयोऽसौ किं कृतवानित्याह- ३ निशम्य युक्तीरिति वीतशङ्कः श्रीवीतरागोक्तगमीरवाचाम् । स मण्डितोऽपि स्वपरिच्छदेन सावद्यकृत्याद्विरतो बभूव ॥३८॥ इत्युक्तप्रकारेण श्रीवीतरागेण वीरस्वामिना उका या गमीरवाचो गम्भीरवाण्यस्वासां सम्बन्धिनीर्युकीरुपपत्तीः निशम्य श्रुत्वा स मण्डितोऽपि द्विजोपाध्यायो वीता गता शङ्का यस्य स वीतशङ्कः सन् खपरिच्छदेन निजशिष्यपरिकरेण सह सावद्यकृत्यात् सपापकार्यात् ९ प्राणातिपातादेः विरतो निवृत्तिमान् वमूव पारमेश्वरी प्रत्रयां, जग्रा- हेत्यर्थः ॥ ३८॥ -*इति मण्डितस्वामिदीक्षाग्रहणम् ॥६॥*- अथ मौर्यपुत्रस्य तदाह-- सार्वश्यमाकर्ण्य जिनेश्वरस श्रीमण्डितं प्रवजितं च युवा । समाययौ मौर्यत्रुषः सतत्रः शियाच्वचारोत्सुकचिचतिः ॥ ३९ ॥ जिनेश्वरस्य श्रीवीरप्रमोः सर्वज्ञस्य भावः सावश्यं सर्वनवं आकर्य: जनमुखात् श्रुत्वा च पुनः श्रीमण्डितं प्रवजितं प्रमुपाचे गृहीतप्रवज्यं वुद्धा ज्ञात्वा सतन्त्रः सपरिवारः पुनः शिवाध्वनि मोक्षमार्ग यश्चारः चरणं गमनं तनोत्सुका चित्तवृत्तिर्यस्य स तथोक एवंविधो मौर्यो मौर्यपुत्रो बुधो विद्वान् समाययौ प्रमुपाचे समायातः ॥ ३९ ॥ ૧૨ २२ २३४ श्रीगौतमीयकाव्यं ततो भगवता यदुकं तदाह- भो मौर्यपुत्राऽमरलोकवार्ता सती न वा संशयवानिति त्वम् । 'मायोपमान् पश्यति निर्जरान् को व्यामोहयेदित्यपि वेदवाक्यम् ॥ ४०॥ ६. मो मौर्यपुत्र ! अमरलोकवार्च देवलोकप्रवृत्तिः सती विद्यमाना न वा इति संशयोऽस्त्यस्येति संशयवान् खमसि । किं देवाः सन्ति न वा? इति संशयः तव चेतसि वर्चते इत्यर्थः । अत्र संशये हेतुमाह- ९'मायोपमान् मायासदृशान् निर्जरान् देवान् कः पश्यति ।" इति वेद- वाक्यमपि खं व्यामोहयेत् व्यामोहं ब्रान्तिमुत्पादयेत् । अयं मायः- उभयथाऽपि वेदपदश्रवणातवाय संशयः। तथा हि-'स एप यज्ञा- १२ युधी यजमानोऽजसा स्वर्गलोकं गच्छति' इत्यादि तथा 'को जानाति मायोपमान् गीर्वाणान् इन्द्र-यम-वरुण-कुवेरादीनि'त्यादि । एपांच वेद- पदानामयमर्थस्तव बुद्धी प्रतिमासते-यथा स एप यज्ञ एव दुरित- १५दारणक्षमत्वादायुधं यस्याऽसौ यन्नायुषी यजमानोऽअसा प्रगुणेनन्यायेन खर्गलोकं गच्छतीति देवसचापतिपत्तिः, को जानातीत्यादीनि तु देवामायप्रतिपादकानि, अतस्तव संशयो, अयुक्तश्यायम्, यतोऽमीपां वेदपदानां नायमर्थः, किं वयं वक्ष्यमाणलक्षण इति ।। १०॥ इत्यं मौर्यपुत्रस्य सन्देहं प्रादुष्कृत्य मगवांतद्वितर्कितयुक्ति प्रकट- यन्नाह- सत्यमूहसे नरयिका यदा आवृत्तिमृच्छन्ति न दुःखदिग्धाः । स्वायत्ततापामपि यत्सुराणां नावृत्तिरीक्ष्येत ततो वितर्कः॥४१|| ५ यदलात्कारणात् नरयिका नरकम्निो जीवा आर्ण क्षेत्रमादिवि- - १ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २३५ विधवेदनया पीडिताः अत एव दुःखेन मानसिकाऽसुसेन पारवश्या- दिना दिग्धा उपचिताः सन्ति, अतो न लावृत्ति इहागमनं ऋच्छन्ति प्राप्नुवन्ति । परं सुराणां देवानां खायचतायां स्वाधीनतायां सत्यामपि ३ यत् आवृचिरागमनं न ईक्ष्येत न दृश्येत, ततो वितर्कः कि सुराः सन्ति न वा ? इत्येवंरूपो विमर्शः, समुत्पयेत इति शेपः, इति त्वमूहसे चिन्तयसि ॥ ११ ॥ स्युर्यज्ञकर्माणि सुराश्रयाणि प्रतीयते तेन तु देवसत्ता । विरुद्धवाचस्तव चित्तमेवं विधूनयन्त्यस्तफिनास्तिभावात् ॥४२॥ सुरा देवा एव आश्रयो येषा तानि सुराश्रयाणि यज्ञकर्माणि रे हविर्दानादीनि सर्वाण्यपि यज्ञकार्याणि स्युभवेयुः, देवानुद्दिश्यैव हविर्दानादिपवृत्तेरिति भावः । तु इति विशेपे, तेन हेतुना देवसत्ता देवानां सद्भावः प्रतीयते ज्ञायते, 'को जानाति' इत्यादिवाक्येन च 13 देवाऽमावो ज्ञायते इत्युक्तमेव प्राक्, एवमित्थं विरुद्धा विरुद्धार्थ- सूचिकाः वाचो वेदवाण्योऽस्तकिनास्तिभावात् सुराणामस्ति-नास्तित्व- माश्रित्य तव चित्तं विघ्नयन्ति प्रामयन्ति । चुरादिण्यन्तस्य धूलो 'धून १५ पीनोः' (वा० ) इति नुक् । अस्तकीत्यादि । अस्तीति तिङन्त- प्रतिरूपकमव्ययं 'अन्ययसर्वनानाम्' (५/३१७१) इति टेः प्रागकच् । अस्तैवास्तकि अस्तकि च नास्तकि च अस्त्रिकिनास्ति, तयो- १८ मीवस्तसात् स्यब्लोपे पञ्चमी ॥ ४२ ॥ अत्रोचरमाह- प्रत्यक्षतः पश्य मनोज्ञवेपा- न्देवानिमानत्र चतुर्निकायान् । ૨૨ , २३६ श्रीगावमीयकाय ९ - जानीहि मा केचिदिमे मनुष्याः सन्तीति पश्यानिमिपत्वमेषु ॥४३॥ ३ मनोज्ञो वेपो येषां ते मनोज्ञवेपास्तान् तथा चत्वारो निकाया निवासा येषां ते चतुर्निकायास्तान् भवनपत्यादिचतुर्विधान् इमान् देवान् अत्र प्रदेशे प्रत्यक्षतः प्रत्यक्षप्रमाणेन पश्य विलोकय, इमे ६ केचिन्मनुप्याः सन्तीति मा जानीहि । कथमित्याह-एषु पुरःस्थि- तेपु अनिमिपत्वं निर्निमेषत्वं पश्य, मनुजा हि चक्षुर्निर्मेपोन्मेपक्रिया- चन्तो मवेयुः न चामी तथा, इति सिद्धं स्पष्टमेवैतेपु देवत्वमिति तात्पर्यम् ॥ १३ ॥ अथैतद्दर्शनात्पूर्व यः सन्देह आसीत् स तु युक्तो भवेदित्यपि न वाच्यं कुत इत्याह- ज्योतिप्कचक्र विचरन्तमने प्रत्यक्षतः पश्यसि किं न सूरे।। जानीहि मा किञ्चिदिदं प्रमेयं तेजोमयं चाऽप्मयमेव वाऽस्ति ॥४४॥ हे सूरे हे विद्वन् ! अमे आकाशे विचरन्तं ज्योतिप्कचक्र ', ज्योतिर्देवमण्डलं प्रत्यक्षतः किं न पश्यसि : एतावता पश्यस्येवेत्यर्थः । एतेन प्रागपि सन्देहो न युक्त इत्यावेदितं, किं च इदं नमसि प्रत्य- क्षतो दृश्यमानं प्रमातुं योग्य प्रमेयं ज्ञेयं सूर्यविम्बादिवस्तु तेजोमयं यदिमयं वाऽथवा अपः सरूपमस्येति अप्मयं जलमयमेव वाऽस्तीति मा जानीहि । अयमों यदुत को जानाति किमेतद्भवेत् ! किं सूर्योऽमि. १५मयो गोलचन्द्रस्तु अम्युमयः समावतः सच्छ इति सूर्यादीनां फय. १५ . गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २३७ मेतेपी देवससिद्धिरिति माऽवबुध्यखेति ॥ ॥ ११ ॥ अत्र प्रतिविधानमाह- तत्वे जडत्वाद्गतिरीक्ष्यते कि सचेतनत्वे खलु युज्यते सा । तवाघ चैदालयमात्रबुद्धिस्तथाऽपि ये वासमृतः सुरास्ते ॥४५॥ तत्त्वे सूर्यादेरग्निमयत्वेऽम्बुमयत्वे च सति जडत्वादचेतनत्वाद् गतिर्नियतप्रदेशे गमनं किमीक्ष्यते ? कथं दृश्यते इत्यर्थः । खलु ६ निश्चितं सा विशिष्टा गतिः सचेतनत्वे सति युज्यते उपपद्यते, ततो नियतगतिमत्त्वादेव तेषां देवत्वसिद्धिरिति भावः । पुनरपि तदाशङ्का- माविष्कृत्य भगवानाह-तवेत्यादि । चेद्यदि अत्र ज्योतिश्चक्रे ९ आलया एवं मात्रं चन्द्रादिविमानानि न तु देवा इति चुद्धि- स्तव भवेत् । अयमर्थ:--'यथा शून्यं पुरं लोकानामालयमात्रं स्थान- मानं न तु तत्र लोकाः सन्ति' एवं चन्द्रादिविमानान्यपि आलया एव १२ न तत्र देवाः केचिचिष्ठन्तीति, अतः कथं तेपा प्रत्यक्षलम् ? इति चेचव बुद्धिः, तथापि वासं तद्विमाननिवासं विनतीति वासभृतः तदा- लयवासिनो ये केऽपि सन्ति ते सुरा देवा, ज्ञेया इति शेपः । यो हि १५ आलयः स सवोंऽपि तन्निवासिनाऽधिष्ठितो दृष्टः, यथा प्रत्यक्षोपलभ्य. माना देवदत्ताद्यघिष्ठिता वसन्तपुराद्यालयाः, आलयाश्च ज्योतिप्कवि- मानान्यत आलयत्वान्यथाऽनुपपत्तेयें तन्निवासिनते देवा ज्ञेया इति भावः । इह पुनराक्षेपपरिहारविस्तरस्तु इहत्यविशेषावश्यफवृत्ते. ज्ञेयः ॥ ४५ ॥ अथ प्रसङ्गादेतेपां मेरुं प्रदक्षिणीकृत्य परिप्रमणे हेतुमाह- १ सूर्यादीनाम् । N - २३८ श्रीगौतमीयकाव्यं रतिर्गतावेव सहाऽप्यमीपां चिरन्तनी वा स्थितिरस्ति लोके। यल्लोकपालानुमताः सुराद्रिं प्रदक्षिणीकृत्य परिभ्रमन्ति॥४६॥ अमीपां ज्योतिप्कदेवानां सदाऽपि सर्वस्मिन्नपि काले गतौ गमने एव रती रागो विद्यते यत आगमेऽमी गतिरतिका उच्यन्ते। वाऽथवा लोके चिरन्तनी चिरकालोद्भवा स्थितिमर्यादाऽस्ति । कासावित्याह- ६ यत् लोकपालैः सोमादिमिरनुमता अनुज्ञाता अमी ज्योतिप्कां सुरादि मेरुगिरि प्रदक्षिणीकृत्य परिप्रमन्ति पर्यटन्ति । ज्योतिप्का हि प्रायेण लोकपालानामपत्यस्थानीयाः श्रीभगवत्यां प्रोक्ताः सन्ति अत एतद्वि- ९शेपणम् ॥ १६ ॥ पुनर्देवास्तित्वे युक्त्यन्तरमाह- तथा सुरा व्यन्तरका मनुष्यान् सुखानि दुःखानि च लम्भयन्तः । सन्ति प्रसिद्धास्तददृश्यता तु प्रतीयतां वैक्रियकाययोगात् ॥४७॥ यथा ज्योतिप्काः प्रत्यक्षतः परिग्रमन्तो दृश्यन्ते, तथा तेनैव प्रकारेण व्यन्तरा एव व्यन्तरकाः, उपलक्षणादन्येऽपि केचित् सुरा देवा मनुष्यान् विमवप्रदानादिना सुखानि, च पुनस्तदपहरणादिना iदुःखानि लम्मयन्तः मापयन्तः प्रसिद्धाः सन्ति । ततो राजादिवत्कय- मते न सन्ति । इति मापः । यद्येवं तर्हि कथं ते सर्वदा मनुष्यादि- वन दृश्यन्ते इत्याशङ्ख्याह-तदित्यादि । तेपामदृश्यता तद. सदृश्यता तु वैक्रियकायस्य क्रियशरीरस्य. यो योगो व्यापारः १२ , कपालानुमता इति ।

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २३९ सम्बन्धो वा तस्मात्प्रतीयतां ज्ञायताम् । वैक्रियकायो हि विविधक्रिया- मृद्भवति, ततो दृश्यो वाऽदृश्योऽपि वा भवेन्नात्र किञ्चिद्वाधकमिति भावः । लम्भयन्त इति । लमेहेतुमण्ण्यन्तात् शतृ, 'लभेश्च', (७/१११ ६४) इति नुम् । एतद्योगे 'गतिवुद्धि-' (१।४।५२ ) इत्यादिना मनुष्यानिति अगौ कर्तुी कर्मत्वम् ॥ १७ ॥ वैक्रियशरीरमाश्रित्योक्तमेवार्थ स्पष्टयन्नाह-~- स्थूलं च सूक्ष्म लघु च प्रलम्यं दृश्यं तथाऽदृश्यमपि प्रकाशम् । देह यदृच्छानुगतं सुराणां यद्वैक्रिपं स्वाद्विविधक्रियातः॥४८॥ सुराणां देवानां यदृच्छानुगतं खच्छानुसारिदेहं शरीरं भवेत् १९ कथमित्याह-कदाचित् स्थूलं पुष्टं भवेत्, च पुनः कदाचित् सूक्ष्ममतिकृशं भवेत् । एवं कदाचित् लघु हवं कदाचिच्च प्रलम्वं दीर्घम् , एवमेव कदाचित् प्रकाशं प्रकटं दृश्यं दर्शनार्ह तथा कदा-२ चिददृश्यमपि भवेत् , यद्यसात्कारणादुक्तनीत्या विविधक्रियातोऽनेक- विधरूपकरणादिक्रियामाश्रित्य वैक्रियं शरीरं स्यात् । ततश्च कदा- चिददृश्यत्वेऽपि न.नास्तित्वशक्षा कार्येति भावः ॥ १८॥' प्रकारान्तरेणाऽपि देवास्तित्वं साधयन्नाह- अत्युग्रपापगुफलोपमोगः ख्यातो यथा नैरयिकेषु सद्भिः। तथा महापुण्यफलोपभुक्त्यै देवा निरुक्ताः खलु तारतम्यात् ॥ ४९ ॥ यथा सद्भिर्विद्वद्भिनॆरयिकेपु नारकजीवेषु अत्युग्रं प्रवस्वरं पाप-२१ १ अन 'महापुण्यफलोपमुक्ती' इति काशीमुद्रितपाठः, स च टीकाकृतां न सम्मत इति प्रतिभात। - २४० श्रीगौतमीयकाव्यं - -९ मेव द्रुः वृक्षस्तस्य फलानां विविधदुःखरूपाणामुपभोगो विपाकानुभवः ख्यातः प्रोक्तस्तथा खलु निश्चितं तारतम्यात् तरतमयोगेन, खख- ३ पुण्यानुसारेणेत्यर्थः । महापुण्यफलानां परमैश्वर्यादिसुखखरूपाणामुप- मुक्त्यै उपभोगाय देवा निरुता निर्निश्चयेनोक्ताः, सन्तीति शेपः। एतावता यथा स्वकृतोत्कृष्टपापफलभोगिनो नारकास्त्वया प्रतिपन्ना- ६ स्तथा खोपार्जितसुबहुपुण्यफलमुजो देवा अपि प्रतिपसव्या इति भावः॥४९॥ अथ 'को जानाति मायोपमानि'त्यादिवेदवाक्यस्य तात्पर्यमाह- मायोपमत्वं यदवादि वेदे ह्यनित्यतायाः प्रतिपादकं तत् । न चेदिदं यज्ञविधिस्तु सत्यो भवेत्कमुद्दिश्य मनोरथाहयै ॥५०॥ अन्न देवानामिति शेपः, ततश्चाऽयमर्थ:--वेदे देवानां यन्मा- १२ योपमत्वं इन्द्रजालमायातुल्यत्वमवादि कथितं तत् हीति निश्चितं, अनित्यतायाः प्रतिपादकमभिधायकं ज्ञेयम् । अयं मावः–को जानाति गायोपमान् गीर्वाणान् इन्द्र-यम-वरुण-कुवेरादीनित्यादिवाक्यं १५ यद्वेदे उक्तं तदपि न देवनास्तित्वाभिधायकं किंतु सुराणामपि मायो- पमत्वाभिधानेन शेपर्द्धिसमुदायानां सुतरामनित्यताप्रतिपादकं बोधव्य- मिति । 'विचित्ररूपाश्रयणात्तदेवत्' इति पाठान्तरम् , तत्राऽय- १८मर्थः-यद्वेदे देवानां मायोपमत्वमुक्तं तदेतद्विचित्ररूपाणामनेकवि- घरूपाणामाश्रयणाद्विधानात् ज्ञेयमिति । चेद्यदि इदं प्रागुक्तं देवा- स्तित्वं न मवेत् तर्हि तु इति विशेपे, मनोरथाप्त्यै खवान्छितप्राप्तये २. क्रियमाणो यज्ञविधिरमिहोत्रादियज्ञानुष्ठान के पदार्थमुद्दिश्य सत्यो मवेत् , यतो 'अमिहोत्रं जुहुयात् वर्गकाम' इत्यादिना वेदवाक्येन ५स्वर्गरूपं यज्ञफलमुकं, सर्मिणां चामावे कुतः सर्ग इति यज्ञविधे.

३ ६ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २४२ वैफल्यमेव प्रसज्यते, उपलक्षणात् समस्तलोकप्रसिद्धं दानादिफलमप्य. युक्तं स्यात् । तथा देवाऽमावे वेदमन्त्रपदैर्देवाह्वानमपि वृथैव भवेत् । तसाद्युक्तितो वेदवाक्येभ्यश्च सन्ति देवा इति स्थितम् ॥ ५० ॥ अवं भगवता छिन्नसंशयो मौर्यपुत्रः किं कृतवानित्याह- इति श्रुत्वा युक्तीर्जिनपतिसुधासोदरगिरां .: पुनस्तत्रोपेतं प्रकटमवघार्याऽमरगणम् । 'निभिः साईः सार्द्ध विनयवनतैः खण्डिकशतैः • स मौर्यः प्रावाजीत्परमपदलिप्सुर्द्विजवरः ॥ ५१ ॥ इति इत्थं जिनपतेः श्रीवीरस्वामिनः सुधासोदरा अमृततुल्या. या९ गिरो वाचस्तासां युक्तीः श्रुत्वा पुनस्तत्र समवसरणे उपेतं प्राप्तममरगणं देवसमूहं प्रकटमवघार्य निश्चित्य स मौर्यो मौर्यपुत्रो नाम द्विजवरो प्रामणमुख्यः परमपदं मोक्षं लिप्सुलव्धुमिच्छुः सन् विनयेन अव-१२ नतैनः साढ़ेः अर्द्धशतसहितैत्रिभिः खण्डिकानां छात्राणां शतैः साई सह प्रात्राजीत् प्रभोः पा. प्रत्रज्यां जग्राह । विनयवनतैरिति । 'वष्टि भागरिरलोपमवाप्योरुपसर्गयो' इति वचनादल्लोपः । इदं ५ तल्लक्षणं च 'रसै रुदैश्छिन्ना यमनसमला ग: शिखरिणी' इति ॥ ५१ ।। इति श्रीव्यक्त-सुधर्म-मण्डित-मौर्यपुत्राणां दीक्षाग्रहणवर्णनो १८ नाम नवमः सर्गः ।।९।। इति स्पष्टम् । इति गौतमीयमहाकाव्यव्याख्यायो गौतमीयप्रकाशाख्यायो नवमः सर्गः ॥९॥ शिखरिणी वृत्तम्, २२ १ इह 'साध सार्ध' इति काशीमुद्रितपाठश्चिन्त्यः । १६ गौ. का.

. ६ - २४२ श्रीगौतमीयकाव्यं दशमः सर्गः। अथ श्रुत्वेन्द्रभृत्यादीन् श्रेयाश्रामण्यसंश्रितान् । ३ अकम्पितोऽप्युपाध्यायो वीरं वन्दितुमाययौ ॥१॥ विशुद्धविज्ञानकर प्रसार्य्य हकम्पिताद्यौ भयसिन्धुमध्यात् । समुद्धृतो येन जिनेश्वराय नमोऽस्तु तसै त्रिशलाऽऽत्मजाय ॥१॥ अथानन्तरं श्रेयोऽतिप्रशसं श्रामण्यं श्रमणत्वं संश्रितमगीकृतं यैस्ते, तान् तथाभूतान् इन्द्रमूत्यादीन् द्विजान् श्रुत्वाऽकम्पितो नाम उपाध्यायोऽपि वीर श्रीवीरप्रमुं वन्दितुं नमस्कर्तुं आययौ समा- ९जगाम ॥ १॥ अभापत जगन्नाथोऽप्यकम्पित ! किमूहसे । तिर्य-नरा-ऽमराः सन्तु नारकाः सन्ति वा न वा ॥२॥ जगतां नाथो जगन्नाथः श्रीवीरप्रमुरपि अभापत तं भापते म । किमित्याह-हे अकम्पित ! तिर्यञ्चश्च नराश्च अमराश्च देवास्तिर्या- नराऽमराः सन्तु परं नारका जीवाः सन्ति वा नवा इति त्वं किं १५ऊहसे कथं वितर्कयसे ?, इमां शङ्कां मा कृथा इत्यर्थः । इदमन तात्पर्यम्--किं नारकाः सन्ति न वेति वं मन्यसे, अयं च तव, संशयो विरुद्धवेदपदश्रवणनिबन्धनः । तथा हि-नारको वै एप १८ जायते यः शद्वान्नमनाति' इत्यादि। एप ब्राझगो नारको जायते यः शद्वान्नमचीत्यर्थः, इत्यादिवाक्यानि नारकसतापतिपादकानि । 'न है चे प्रेत्य नारकाः सन्ति' इत्यादीनि तु नारकामावप्रतिपादकानि । एतेपामर्थ युक्ति च त्वं न जानासि तेन संशयं दधासि, परमऽयुक्तोऽयं २२ संशयो यत एपामयं वक्ष्यमाणोऽर्थ इति ॥ २॥ १२ . गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २४३ इत्थं संशयं प्रादुष्कृत्य भगवास्तद्वितर्कितयुक्ति प्रकटयन्नाह- प्रकटं वीक्ष्य ज्योतिप्कान् प्रतीतिस्ते सुरेष्वपि । तिर्यङ्नरास्तु पंकटाः प्रेक्ष्यन्ते नात्र संशयः ॥ ३॥ ३ तुरीयगतिरुच्येत जीवानां निरयाह्वया । नेक्षितास्तद्गता जीवा गृहीता न च लिङ्गतः॥४॥ अंत आरेकसे तत्राऽस्तित्व-नास्तित्व-चिन्तया । परं यन्न त्वदध्यक्षं तदप्रत्यक्षमेव न ॥५॥. त्रिभिः सम्बन्धः। हे अकम्पित ! ज्योतिप्कान् देवान् प्रकटं यथा स्याचथा वीक्ष्य ९ दृष्ट्वा, अपिशव्दादऽन्यान् अप्रत्यक्षानपि सुरान् विद्यामत्रौपयाचितका- दिफलसिद्ध्याऽनुमानतो ज्ञात्वा सुरेषु देवेषु ते तव प्रतीतिरस्ति, तिर्यनरास्तु प्रकटा एव प्रेक्ष्यन्ते दृश्यन्ते अतोऽत्रापि संशयो नास्ति १२ ॥ ३ ॥ परं निरयो नरक आहयो नाम यस्याः सा निरयाह्वया या जीवानां तुरीयगतिश्चतुर्थी गतिरुच्येत शास्त्रे कथ्येत, तद्गतास्तां गति प्राप्ता जीवा नारका न ईक्षिताः न साक्षादृष्टाः, न च लिङ्गतः केन- १५ चिल्लिङ्गेनाऽनुमानेन गृहीताः ॥ ४ ॥ अतोऽसाकारणावत्र नारकेपु अस्तित्व-नास्तित्वयोश्चिन्तया विचारेण त्वं आरेकसे संदेहं दधासि रेक शङ्कायां' कर्तरि लट् । परं हे अकंपित ! यद्वस्तु त्वदध्यक्षं तव १८ प्रत्यक्षं नास्ति तत् सर्वेषामपि अप्रत्यक्षमेवेति न ज्ञेयम् ॥ ५ ॥ अत्र भगवान् युक्तिमाह- सन्ति यद्यपि सिंहायाः केपांचिन्नाक्षिगोचराः। तथापि ते च केपाश्चित्प्रत्यक्षा वनवासिनाम् ॥ ६॥ २२ १'तत आरेकसे' इति काशीमुद्रितः पाठः टीकाकृदसम्मतः ।

२४४ श्रीगोतमीयकाव्यं ६ सिंहाचाः सिंह-शरभ-हंसादयो जन्तुविशेषा यद्यपि फेपाश्चिन्मनु- प्याणामक्षिगोचरा दृष्टिविपया न सन्ति, तथापि च ते सिंहाद्याः ३ केपाश्चिद्वनयासिनां वनेचराणां भिल्लादीनां प्रत्यक्षाः सन्त्येव ॥ ६॥ त्यदप्रत्यक्षेऽपि तथा प्रत्यक्षा मम नारकाः । तान् प्रतीहि मदुत्त्यैव, प्रमाणं यत आप्तवाक् ॥ ७॥ तथा तेनोक्तेनैव प्रकारेण नारकास्त्वदप्रत्यक्षेऽपि 'एतन्निर्देशस्य भावप्रधानत्वात्तवाऽप्रत्यक्षत्वेऽपि, मम प्रत्यक्षा एवं सन्तीति शेषः, तान् नारकान्मदुत्त्या मद्वचनेनैव प्रतीहि सन्तीति जानीहि । यतो यस्मात् ९ आप्तस्य यथार्थवक्तुर्वाक प्रमाणं यथार्थज्ञानजनने हेतुरस्ति । अतो मदुत्त्यैव नारका अपि सन्तीति प्रतिपद्यस्येति तात्पर्यम् ॥ ७ ॥ अथाभिप्रायान्तरमाशय परिहरन्नाह-~- प्रत्यक्षं मन्यसे यच्चं प्रत्यक्षं तन्न तत्वतः । इन्द्रियोद्भवविज्ञानं परोक्षं तत्तु ताचिकम् ॥ ८॥ हे अकम्पित ! यत् इन्द्रियोद्भवविज्ञानं चक्षुरादीन्द्रियजन्यज्ञानं १५त्वं प्रत्यक्षं मन्यसे तत्तत्त्वतः परमार्थतः प्रत्यक्षं नास्ति । तु इति विशेपे, तत् ज्ञानं तात्त्विक पारमार्थिक परोक्षं वर्चते । अयं भावः-- यदिन्द्रियाणां प्रत्यक्षं तदेव मत्यक्षमिप्यते भवता, मदीयं तु प्रत्यक्षं १८ नाभ्युपगम्यतेऽतीन्द्रियत्वात् । स तु महानयं विपर्यासो यत उपचार- मानत एव तदिन्द्रियप्रत्यक्षतया व्ययहियते । यथा चाऽनुमाने चायधू- मादिलिग वाघमन्यादि वस्तु ज्ञायते । नैवमत्र, तत उपचारा- त्प्रत्यक्षमिव प्रत्यक्षमुच्यते । परमार्थतस्तु इदमपि परोक्षमेव, यतोऽशो २२ जीवः स चानुमानवदनापि यस्तु साक्षान्न पश्यति किं लिन्द्रिय १२ .

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २४५ ३ द्वारेणेव । ततोऽतीन्द्रियमेव सत्यं प्रत्यक्षं ज्ञातव्यम्, तत्र जीवेन साक्षादेव वस्तुन उपलम्भादिति ॥८॥ अथामुमेवार्थ स्पष्टयन्नाह- उणादिकोऽक्षशब्दो यः सायाप्त्यर्थाशिधातुजः। तद्वाच्य आत्मा प्रति तं गतं प्रत्यक्षमुच्यते ॥९॥ व्याप्तिरों यस्य स व्याघ्यर्थ एवंविधो योऽशिधातुः, 'अशूक व्याप्तौ' इत्याकारको धातुः, तस्माजातो व्याप्त्यर्थाऽशिधातुः, उणादौ भव उणादिक, उणादिकप्रत्ययान्त इत्यर्थः । एवंविधो योऽक्षशब्दः स्यात् , उपलक्षणात् 'मक्ष व्याप्तौ' इति धातोः पचायजन्तान्निप्पन्नो-९ ऽक्षशब्दोऽपि वोध्यः, तस्याऽशशब्दस्य वाच्योऽभिधेय आत्मा तं प्रति गतं प्राप्तं प्रत्यक्षमुच्यते । 'अक्षो रथस्यावयवे व्यवहारे विमीतके । प्राशके शकटे क ज्ञाने चारमनि रावणे' इति हैम: ११ (अनेकार्थः) ॥९॥ शाब्दिकैरक्षिशब्देन प्रत्यक्षं यत्प्रसाधित्तम् । तत्तु चाक्षुपमेव सानं साद्वा रासनादिकम् ॥१०॥ शब्द शब्दशास्त्रं विदन्ति अघीयते चा शाब्दिका वैयाकरणास्तै- रक्ष्णोराभिमुख्यमित्यादिव्युतत्त्याऽशिशब्देन यत् प्रत्यक्षं पदं प्रसा. धितं निप्पादितं तत्तु अर्थमाश्रित्य चक्षुपोर्मवं चाक्षुपं चक्षुरिन्द्रिय- १८ जन्यज्ञानविषयमेव प्रत्यक्षं स्यात् । वाशब्दः पुनरर्थः, रसनायां जिह्वायां भवं रासनं तदादिर्यस्य तत् रासनादिकं पुनः प्रत्यक्षं न २० १ इह न स्याद् आसनादिकम्' इदि काशीमुदितः पाठवन्दोनुरोधेन सार- स्यकवैकल्याच त्याज्यः ।

२४६ श्रीगौतमीयकाव्यं ६ स्यात्, अक्षिशब्दस्य चक्षुःपर्यायत्वादिति भावः । प्रत्यक्षमित्यत्र 'लक्षणेनामिप्रति-' (२।१।१४) इत्यादिना समासः, 'प्रतिपरसम- ३नुभ्योऽक्ष्णः' (गणसूत्रम् ) इति टच् । 'यस्येति च' (६।१।१४८) इति लोपः ॥ १० ॥ प्रत्यक्षतानिवेशार्थमत्र या काऽपि कल्पना । सा गौरवात्कथं ग्राह्या पूर्वोक्तौ लाघवं यदिः॥ ११ ॥ अत्र रासनादिप्रत्यक्षे प्रत्यक्षताया निवेशः स्थापनं तदर्थ या काऽपि कल्पनाऽन्या संभावना सा गौरवात्कथं ग्राह्या ? यदि पूर्वोक्तौ पूर्वस्मिन् ९ कथने लाघवं स्यात् । एतावता लाघवं परित्यज्य गौरवं न पाय- मित्यर्थः ॥११॥ इन्द्रियाणि पराण्येवाऽऽत्मनस्तेन परोक्षता | इन्द्रियोद्भवविज्ञाने गौणत्वं यत आत्मनः ॥ १२ ॥ इन्द्रियाणि आत्मगः सकाशात्पराणि अन्यान्येव सन्ति, तेन हेतुना इन्द्रियोद्भवविज्ञाने इन्द्रियजन्यज्ञाने परोक्षता वर्चते, नतु प्रत्यक्षल. १५ मित्यर्थः, यतो यस्मात् इन्द्रियजन्यज्ञाने आत्मनो गौणत्वमप्रधानत्व- मस्ति, अत एव तस्य परोक्षस्वमिति भावः ॥ १२ ॥ द्वारोपचारतचैतदपि प्रत्यक्षमस्तु ते । धृतमायुरिति ख्यातिर्यतः सत्या प्रवर्तते ॥१३॥ च पुनाराणि आत्माधिष्ठितदेहस्स द्वारभूतानि इन्द्रियाणि तेपा- मुपचार आरमतयाऽऽरोपणं तस्माद्वारोपचारतम् तव मतेन एतदि- २.न्द्रियजन्यज्ञानमपि प्रत्यक्षमातु, यतो यसादुपचारादेव धृतमायुः १मत्र 'भारमोपचारतः' इति काशीमुद्रितश्चिन्यः। १८ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २४७ ३ इति ख्यातिः प्रसिद्धिः सत्या प्रवर्तते । अयमर्थः-यथा कारणे कार्योपचारात् आयुषः कारणमपि धृतमायुरित्युच्यते तथा एत- ज्ज्ञानमप्यस्त्विति ॥ १३ ॥ तव प्रत्यक्षविज्ञाने सत्या चैवं परोक्षता। प्रत्यक्षं सकलं यन्मे तेन पश्यामि नारकान् ॥ १४ ॥ एवं चं तव मते प्रत्यक्षं यद्विज्ञानं तत्रोपचारात् प्रत्यक्षत्वे सत्यपि ६ सत्या परोक्षतैव विद्यते । इत्यं नारकाऽदर्शने हेतुभूतं तज्ज्ञानपारो- क्ष्यमुपदश्य स्खस्य तद्वैपरीत्यमाह-यद्यस्मान्मे मम सकलं सर्व वस्तु प्रत्यक्ष प्रत्यक्षज्ञानविषयकं वर्चते तेनाहं नारकान् पश्यामि ॥ १४ ॥५ अथोक्तेऽथे भगवानुपपचिमाह- अनन्यदृष्टं भावं ते निरीक्षे चेन्मनोगतम् । तदा प्रतीहि सकलं प्रत्यक्षं मयि वर्त्तते ॥ १५॥ हे अकम्पित ! ते तव न अन्यैरनतिशयज्ञानिमिष्टं अनन्यदृष्टं मनोगतं भावमभिप्राय पदार्थ वा चेद्यदि अहं निरीक्षे साक्षात्पश्यामि तदा तर्हि मयि सकलं वस्तु प्रत्यक्षं वर्तते इति त्वं प्रतीहि १५ जानीहि ॥ १५॥ अतश्चेन्न परीतोपोऽर्थापत्ति मानमाश्रय । बहुधा साधितं वस्तु दृढतामश्नुते यतः ।। १६ ॥ यतो असारकथनात् चेद्यदि न परीतोपस्तव परितुष्टता नास्ति तर्हि अर्थापति मानं प्रमाणमाश्रय अङ्गीकुरु । यतो यस्मादहुधा बहुभिः प्रकारैः साधितं वस्तु दृढतां. अभुते प्रामोति ॥ १६ ॥ १३ह 'प्रत्यक्षमपि वर्तते' इति काशीमुद्रितपाठोऽस्वारस्यान्न मनोरमः । १२ २४८ श्रीगौतमीयकाव्यं ३ ९ अथाऽापतिमेव दर्शयति-~- अन्यथाऽनुपपत्यकलक्षणात्किल हेतुतः। अर्थापतिः प्रमाणं स्यात्पीनोऽयं रात्रिभुग्यथा ॥१७॥ किलेति संभावनायाम्, अन्यथाऽनुपपत्तिरेव एकं लक्षणं यस्य स तस्मात् हेतुतोऽर्थापतिः प्रमाणं स्यात् । तत्र दृष्टान्तमाह-पीनोऽय- ६ मित्यादि । 'दिवा न मुझे' इति वाक्यशेषोऽत्र द्रष्टव्यः । यथा पीनः पुष्टोऽयं देवदत्वादिः पुमान् दिवा न मुझे अत्र पीनवाऽन्य- थानुपपत्त्या रात्रौ मुझे इति रात्रिभुक् अर्थापत्त्या ज्ञायते ॥ १७ ॥ एवमत्रापि भावयति- उत्कृष्टसुखभोगाय यथा देवाः प्रतिष्ठिताः । तथैवैकान्तदुःखाय विना नैरयिकांस्तु के ? ॥ १८ ॥ यथा उत्कृष्टमुखस्य भोगाय मुत्तयर्थ देवाः प्रतिष्ठिताः प्रतिष्ठां माता: सन्ति, तथैव एकान्तदुःखाय अत्यर्थदुःखानुभवनाय नैरयिकान् विना नारकजीवव्यतिरेकेण तु पुनः केऽन्ये ! न केऽपीत्यर्थः । तत- १५ध्यार्थापत्याऽपि नारकाः सन्तीत्यागतम् ।। १८ ।। ..: ननु पतिदुःखिता ये तिर्यग्मनुष्यास्त एवोकृष्ट पापफलमोगित्यात् नारफव्यपदेशभाजो मविप्यन्ति, किमदृष्टनारफकल्पनयेत्या- रामाह- नैकान्तदुःखभोक्तारम्तियश्चोऽपि नरा अपि। दुःखाद्विश्रान्तिरेनेपां काले काले विलोक्यते ।। १९ ॥ तिर्ययोऽपि नरा मनुप्या अपि अतिदुःसिता अपि सन्तो, न २९एकान्तममोकारः सन्ति । यतः काले काले कसिधित् मयसरे गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २४९ , उत्कृष्टदुःखमोक्तारः १ अबसरे एतेषामतिदुःखिततिर्यग्नराणामपि दुःखाद्विश्रान्तिविश्रामो विलोक्यते दृश्यते । अयमर्थ:---येषामुत्कृष्टपापफलभोगस्पा संम- वद्भिः सर्वैरपि प्रकारैर्दुःखेन भवितव्यं, नचैवमतिदुःखितानामपि । तिर्यगादीनां दृश्यते, आलोक-तरुच्छाया-शीतपवन-सरःकूपजलादिसु- खसातिदुःखितेष्वपि तेषु दर्शनात् नरकपसिद्धेश्छेदनमेदनादिपकार- निरन्तरं च दुःखस्यादर्शनात् । ततश्च न ते किंतु एतव्यतिरिक्ता एव नारकास्तादृशा ज्ञेयाः ॥ १९ ॥ पुन रकास्तित्वे युक्तिमाह- नारफैरुपमेयाः स्युयें चाऽप्पत्यन्तदुःखिताः। : तिर्यञ्चो वा मनुष्या वा तसात्सन्तः कथं न ते? ॥ २० ॥ येऽपि च अत्यन्तदुःखितास्तिर्यञ्चो वा मनुष्या या ते नारकैः उपमेया उपमातुं योग्याः स्युः, तस्माद्धेतोस्ते नारकाः कथं सन्तो१२ विद्यमाना न वर्तन्ते !, सन्त एवेति भावः २०॥ अमुमेवार्थ गुढयति- भावे भावोपमैत्र स्यान्न त्वभावेन धुचिता । वाच्याः शुद्धपदेनते नाभाया नारकास्ततः ॥ २१ ॥: भावे सद्भूते पदार्थे भावेन सद्भूतपदार्थेन उपमा एव उचिता योग्या स्यात् न स्वभावेन असद्भूतपदार्थेन खपुप्पादिना उपमा उचिता। तथा एते नरकस्था जीवाः शुद्धं घटपटादिवत्केवल यन्नारक इत्या- कारक पदं तेन वाच्या अभिधेयाः सन्ति, ततः कारणात् नारका अमावा अभावखरूपा, न किंतु भावरूपा एवेति भावः । पदद्वया- मिधेयस्य कस्यचिदर्थस्य वन्ध्यापुत्रादिवदभावत्वेऽपि शुद्धपदाभिधेयस २१ १५ 1

२५०
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30.
९
श्रीगौतमीयकाव्य
सर्वस्यापि भावत्वमेवेति तात्पर्यम् । यदपि 'न है वै प्रेत्य नारकाः
सन्ति' इत्यादौ वेदवाक्ये नारकाऽभावः शकयते भवता, तदप्ययुक्त,
३ यतोऽयमत्राभिप्रायो बोध्यः-न खलु प्रेत्य परलोके मेदिवच्छा-
श्वताः केचनाप्यवस्थिता नारकाः सन्ति किंतु य इहोत्कृष्टं पापमर्ज-
यति स इतो गत्वा प्रेत्य नारको भवति । अतः केनापि तत्यान
६ विधेयं, येन प्रेत्य नारकैद्भ्यते इति ॥ २१ ॥
तदेवं भगवता छिन्नसंशयोऽसौ किं कृतवानित्याह-
इत्यादियुक्तिभिर्बुद्धः सह च्छात्रैत्रिभिः शतैः ।
अकम्पितोऽपि चारित्रं सामायिकमुपाददे ॥ २२ ॥
इत्यादय एवंप्रकारा या युक्तयो भगवदुक्तोपपत्त्यः तामिवुद्धो
बोधं प्राप्तोऽकम्पितोऽपि द्विजोपाध्यायः त्रिभिः शतैश्छात्रैः सह
१२ सामायिक चारित्रं उपाददै गृहीतवान् । 'आलो दोऽनास्यविहरणे'
(१३।२०) इत्यात्मनेपदम् ॥ २२ ॥
इत्यकम्पितस्वामिदीक्षाग्रहणम् ॥ ८॥
१५ अथाऽचलनातुस्तदाह--
आत्मनो मोक्षकार्याय निशम्य प्रस्थितान् मुनीन् ।
अभ्यागतोऽचलभातोपाध्याय छात्रसम्पदा ॥ २३ ॥
आत्मनः सम्स मोक्षकार्याय मोक्षरूपं कार्य कर्तुं प्रस्थितान्
प्रचलितान् मुनीन् गौतमादिऋषीन, निशम्य श्रुत्वाऽचलमाता नाम
उपाध्यायश्यामाणां सशिष्याणां संपन समृद्धिम्या सह अन्यागतः
"प्रमुगामुसमागच्छति सा॥ २३ ॥

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । जगाद जगतां नाथः प्रेक्ष्याऽऽसन्नाशिवं च तम् । भ्रान्तस्त्वमचलम्रातर्विकल्पैः पुण्यपापयोः ॥ २४ ॥ चः समुच्चये, यदासावभ्यागतस्तदा जगतां त्रिलोकानां नाथ ३ ईश्वरो भगवान् श्रीवीरस्तमचलनातरं आसन्न निकटं शिवं कल्याण मुक्तिर्या यस्य स तं, तथोक्तं प्रेक्ष्य ज्ञानदृष्ट्या विलोक्य जगाद उवाच । किं जगादेत्याह-हे अचलम्रातः ! त्वं पुण्यपापयोवि-६ कल्पैः किं पुण्यपापे तो न वेति विमर्शः प्रान्तः, भ्रमं प्राप्तोऽसीति शेपः । अयं भावः-हे आयुष्मन् ! त्वमेवं मन्यसे 'चा किं पुण्य- पापे तो न इति'?, अनुचितश्चायं तव संशयो विरुद्धवेदपदादिश्रुति-९ निवन्धनत्वात्। तत्र वेदपदानि तावत् 'पुरुष एवेदं सर्वम्' इत्यादीनि, यथा द्वितीयगणधरे तथा याच्यानि तेषां चार्थ स्वं न जानासीत्या- द्यपि तथा व्याख्येयमिति ।। २४ ।। अथ पञ्चभिर्विकल्पैः पुण्य-पापविषयं तत्संशयं प्रादुष्कुर्वन्नाह- पुण्यमेवास्ति दुःखं तु साकि तदपकर्पतः। पापमेवाऽस्ति किं वात्र सुखं तदपकर्पतः॥ २५ ॥ स्याता विविक्ते वा ते द्वे स्वर्णदी-यमुने इव । पुण्यपापमयं वस्तु किं वैकं वर्णभेदवत् ? ॥ २६ ॥ अथवा सुख-दुःखानि स्वभावौदुद्भवन्ति चेत् । किमु तेषां निमित्तत्वे पुण्यपापप्रकल्पनम् । ॥ २७ ॥ एतेषु च विकल्पेषु तुर्योऽसाकमपीहितः । पुण्यपापमयं वस्तु कर्म पौद्गलिकं यतः ॥ २८ ॥ चतुर्भिः सम्बन्धः । ૧ર २२ २७.२ श्रीगौतमीयकाव्यं . किमिति वितर्के, पुण्यमेय एकमस्ति न तु पापं, तर्हि कथं कस्याऽपि दुःखोत्पत्तिरित्याशवयाह-दुःखं तु तस्य पुण्यस्स अप- ३ कर्पस्तरतमयोगाद्धानिस्तस्मात् स्याद्भवेत् , न तु पापादित्यर्थः । इत्येको विकल्पः । किं वा अत्रास्मिन् लोके पापमेवैकमस्ति न तु पुण्यं, केवलपापाभ्युपगमे सुखोत्पतिः कथमित्याशवपाह-सुखं तु तस ६ पापस्याऽपकपः क्रमेण हानिस्तस्मात् स्यात्, नतु पुण्यादित्यर्थः । इति द्वितीयो विकल्सः । इहाऽऽद्ये पथ्याहारवत् , द्वितीयेऽपथ्याहारव- दिति दृष्टान्तद्वयमभ्यूह्यम् , तद्भावना समे दर्शयिष्यामः ॥ २५ ॥ ९वाऽथवा ते पुण्यपापे सर्णदी च यमुना च वर्णदी-यमुने गङ्गा-यमुने इव विवित विभिन्ने स्यातां भवेता, भिनसभाययोः सुखदुःखयोः कारणत्वादिति भावः । इति तृतीयो विकल्पः । खणदीत्यत्र 'गिरि- नद्यादीनाम्' (वा०) इति वैकलिक णवं, किं वा वर्णभेदो हरितालगुलिकादीनामन्यतरन्मीलितं वर्णकद्वयं उपलक्षणान्मे चक- मगिनरसिंहादिवा तद्वत् पुण्यपापमयं पुण्यपापखरूपमेकमेव सङ्कीर्ण "वस्तु विद्यते तद्गतेन एफेन पुण्यांशेन सुखं अपरेण पापांशेन च दुःखमुत्पद्यते इत्यर्थः । इति चतुर्थो विकल्पः ॥ २६ ॥ अथवा चेद्यदि सुखदुःखानि सभावादेव, पुण्यपापाभ्यां विनैवेत्यर्थः, उद्ध- १८वन्ति उत्पद्यन्ते तर्हि तेषां मुखदुःखाना निमित्त्वे कारणत्वे पुण्य- पापयोः प्रकरसनं किमु !, किमर्थमित्यर्थः । इति पञ्चमो विकल्सः ॥ २७ ॥ एतेषु च पश्चम विकल्पेषु तुर्यधनुर्थो विकल्पोऽसाकमपि दहित इटः । कथमित्याह--पुण्येत्यादि । यतो यसात् पुण्यपाप- २५गयं पस्नु पदार्थः पुरोनिप्पन पौगलिक फर्ग पर्यते इति शेपः ।

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २५३ तच शुभाऽशुभपुद्गलात्मकं सामान्येन एकमेवेति मावः । तुर्य इत्यु: पलक्षणम्, तेन तृतीयोऽपि विकल्पः कथंचिदस्माकं संमत एव, यतः पुण्यपापरूपतया विशेष विवक्षायां भिन्ने एव पुण्यपापे स्तः ॥ इति । उक्तश्लोकचतुष्टयार्थः। एतद्भावना त्वेवम्-इह केपांचित्तीथिकानामयं प्रवादः पुण्यमेवैकमस्ति न पापम् ॥ १ ॥ अन्ये त्याहुः-पापमेवैक- मस्ति न तु पुण्यं ॥ २ ॥ अपरे तु वदन्ति उभयमप्यन्योन्यानुवि-६ द्धखरूपं मेचकमणिकल्पं संमिश्रमुखदुःसफलहेतु साधारणं पुण्य- पापाख्यमेकं वस्त्विति ॥ ३ ॥ अन्ये तु प्रतिपादयन्ति स्वतन्त्रमुभयं विविक्तसुखदुःखकारणमिति ॥ ४ ॥ अपरे पुनराहुः-मूलतः कर्मैव ९ नास्ति, स्वभावसिद्धः सर्वोऽप्ययं जगत्प्रपञ्चः ॥ ५॥ अतस्त्वमप्ये- तान् पश्चविकल्पान्मन्यसे, एतेषां च परस्परविरुद्धत्वासंशयदोलामा- रूढोऽसि त्वं, येपां मते पुण्यमेवैकमस्ति तन्मते पुण्यस्स लेशतो १२ लेशतो वृद्धौ सत्यां सुखस्यापि क्रमशो वृद्धिर्मवति तावद्यापदुत्कृष्टं सर्गसुखगिति, तदेव च पुण्यं यथा यथा हानिगुपयाति तथा तथा जीवानां क्रमेण दुःखमुत्पद्यते यावत्सर्वप्रकर्षमाप्तं नरकदुःखं तस्यैव १५ च पुण्यस्य सर्वथा क्षये मोक्षः । एतच सर्व पथ्याहारदृष्टान्ताद्भाव- नीयम् । तथा हि-यथा पथ्याहारस्य क्रमेण वृद्धौ आरोग्यवृद्धिस्तथा पुण्यवृद्धौ सुखवृद्धिर्यथा च पथ्याहारस्य क्रमेण परिहारे सरोगता १८ भवति एवं पुण्यापचये दुःखोत्पत्तिः सर्वथा पथ्याहारपरिहारे च मरण- वत्पुण्यक्षये मोक्ष इति केवलपापमभ्युपगच्छता मते तु अपथ्याहार- दृष्टान्ताद्वैपरीत्वेन भावना कार्या । तथा हि-यथा क्रमेणाऽपथ्यवृद्धौ २१ रोगवृद्धिस्तथा पापवृद्धौ दुःखवृद्धित्तापद्यावदुत्कृष्टं नरकदुःखं यथा चाऽपथ्यत्यागात् क्रमेणारोग्यवृद्धिः, तथा क्रमेण पापस्यापकर्मा-२३ २५४ श्रीगौतमीयकाव्यं सुखस्य वृद्धिर्यावदुत्कृष्टं सुरसौख्यं यथा चापच्याहारस्य सर्वथा परि- त्यागात् परमारोग्यमुपजायते । एवं सर्वपापक्षये मोक्षः इति शेपविक- ३ल्पत्रयभावना तु सद्देपतः प्रागेव कृता ॥ २८ ॥ इत्थं संशयं प्रादुष्कृत्य प्रत्यासचिन्यायेन पञ्चमविकल्पं तावद्दर्श- यितुमाह- उपेक्ष्य भङ्गकानाद्यान् पञ्चमश्चेह चर्च्यते । कोऽयं वस्तुविशेषः स्यायः सभावोऽभिधीयते ? ॥२९॥ चः पादपूरणे, इह विकल्पपञ्चके आद्यान् भड़कान् विकल्पान् १ उपेक्ष्य अनादृत्य पञ्चमो विकल्पश्चर्च्यते विचार्य्यते । कथ- मित्याह--यः समावोऽभिधीयते कथ्यते भवता सोऽयं को वस्तु- विशेषः पदार्थमेदः स्यात् विद्यते ! ॥ २९ ॥ स या मूर्तोऽस्त्यमुत्तों या हि यत्तेऽभिरोचते । मूर्त्तत्वे कर्मणः सिद्धावसाकं सिद्धसाध्यता ॥ ३० ॥ वा पुनः स समायपदार्थों मूनों मूर्णिमान् अस्ति किं वाऽमूर्ती- १५ऽसि यते तुभ्यममिरोचते तद् ब्रूहि कथय समावस्य मूर्तले सति कर्मणः सिद्धी निप्पती सत्यां अन्नाकं सिद्धसाध्यतैव । अयमर्थः- यदि त्वं समावस्य मूर्त स्वीकरोषि तर्हि स्वभावशब्देन कर्मणः सिद्धिर्जाता, तसिद्धी चालाकं सिद्धसाध्यता कर्मजन्यस्यात् सुख- दुःसानामिति । ते इत्यत्र 'रुच्यर्थानां पीयमाण' (१।४।३३) इति चतुर्थी ॥ ३०॥ आकाशवदमृतत्वे कार्यऽस्य सादकता । प्रतिवात विरोधस्ते भवेदवं महामते! ॥३१॥ , ' टर भगवान नाय' इति कादिवाऽमार दुपेश्य एष। १२ - .

गौवमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । . ९ समावस्य अमूर्तत्वे सति अमूर्तत्वं खीकरोपि चेदित्यर्थः, तर्हि अस्य स्खमावस्य कायें उत्पाद्यवस्तुविषये आकाशवत् अकर्तृताऽकर्तृत्वं स्याद् भवेत् , यथा आकाशमऽभूतत्वात् कस्यापि कार्यस्य न कारकं ३ तथाऽयमपि स्यादित्यर्थः । एवं सति हे महामते ! हे महाबुद्धिमृत् । ते तव प्रतिज्ञाते प्रतिज्ञाविषयीकृते समावजन्योऽयं मवप्रपञ्च इत्येवं- रूपे अर्थे विरोधो भवेत् । समावस्याऽकर्तृत्वेन भवप्रपञ्चाऽजनकला-६ दिति भावः ॥ ३१ ॥ अथ समावमाश्रित्य विकल्पान्तरमाह- स्वभावो वस्तुधर्मश्चेत्तदाऽसौ यस वस्तुनः । तच मूर्तममून वैत्यत्राप्येपैव कल्पना ।। ३२॥ चेद्यदि स्वभावो न वस्तुविशेषः किं तु वस्तुनः कस्यचित्पदार्थस्य धर्मः परिणामोऽस्तीति, त्वं मन्यसे इति वाक्यविशेषः, तदा असो १२ स्वभावो यस्य वस्तुनो धर्मः तद्वस्तु मूर्त वाऽथवाऽमूर्तमऽस्ति इत्य- त्रापि पक्षे एसा अनन्तरोक्तैव कल्पना विचारणा नेयेति शेपः । चः पादपूरणे ॥ ३२ ॥ तां कल्पनामेव दर्शयति- अमूर्त्तत्वे ह्यकर्तृत्वं मुर्तत्वे सिद्धसाध्यता । पुण्यपापस्वमा यस्तु कर्मप्रतिष्टितम् ।। ३३ ॥ हीति निश्चितं, स्वभावो यस्य वस्तुनो धर्मः तस्य वस्तुनोऽमूर्तले सति खभावस्याऽकर्तृत्वं स्यात् , तस्य मूतखे सति सिद्धसाध्यता एव ।२० ६ अन्न वस्तु की प्रतिष्टितम्' इति विष्टियः काशीमुद्रितपाठो झुपेक्षणीय १५ १८ एव।

२५६ श्रीगोतमीयकाव्यं ६ ९ कथमित्याह-यद्यस्मात्कारणात् पुण्यं च पापं च पुण्यपापै ते समावौ यस्य तत्तथोकं वस्तु कर्मप्रतिष्ठितं कर्मशब्देन प्रतिष्ठा प्राप्त- ३मित्यर्थः । इदमत्र तात्पर्य्यम्-~-कर्मणो मूर्तत्वेन तत्वभावयोः पुण्य- पापयोरपि मूर्तत्वारिसद्धं तयोः सुखदुःखादिकर्तृत्वम् , तच्चाऽस्माकं .सम्मतमेवेत्यतः सिद्धसाध्यत्वमिति ॥ ३३ ॥ अथ स्वभावमाश्रित्य तृतीयं विकल्पमाह- स्वभावशब्दवाच्योऽर्थभेदकारणता भवेत् । तदा समस्तभावानामेकदैव समुद्भवः ॥ ३४ ॥ चेद्यदि स्वभावशब्दस्य वाच्योऽभिधेयः अर्थोऽकारणता निर्हेतुकत्वं मवेत् तदा सर्वमावानां सर्वेषां घट-पटादिपदार्थानां एकदा एवं एकमिन्नेव काले समुद्भवः समुत्पत्तिः स्यात् ।। ३४ ॥ अस्तु तर्हि को दोप इत्याशवाह--- पदार्थाकम्सिकोत्पत्ती नियताकारता च न । दृष्टाऽभ्राणां विकारे न नियताकारता यतः ।। ३५ ।। पदार्थानामकलाद्भवा आकलिकी, सा चाऽसौ उत्पतिम्ध तरयां पदार्याकलिकोत्पनी सत्यां नियताकारता निश्चिताकारत्वं न स्यात्। चः पादपूरणे, यतोऽग्राणां मेघानां विकारे विविधपरिणती नियता- १८ कारता न दृष्टा अफसादुरपन्नत्यादिति भावः । तसानाफारणतास- मावशब्दार्थः ॥ ३५॥" अन्यच,- सम्भवः मुखदुःखानां समायावेगवेगदा। यर-चन्दन-विपादीनां हेतूनां स्यादहेतुता ॥ ३६॥ १२ २२ गौतमीयप्रकाशायटीकया सहितम् । २५७ चैद्यदि सुख-दुःखानां सम्भव उत्पत्तिः सभावाद्ववेत् तदा सक्- चन्दन-विषादीनां सुखादेहेंतूनां कारणानां प्रत्यक्षतो दृश्यमाना- नामहेतुता स्यात् । अतोऽपि न पुण्य-पापकर्मव्यतिरिक्तः स्वमाव-३ पदार्थः॥ ३६॥ अथ तात्पर्यमाह- ६ १२ अत्यन्ताऽनुपलब्धेऽपि स्वभावे कर्तृता यदि । तदा कर्मणि संसिद्धे कर्तृता किं निपिध्यते ? ।। ३७ ।। खपुष्पवत् अत्यन्तमनुपलब्धेऽपि समावे यदि कर्तृता, भवता (सी)क्रियते इति शेपः, तदा । संसिद्धे युक्त्यादिना सम्यग् १ निष्पन्ने कर्मणि कर्तृता किं निपिध्यते !, कथं नाजीक्रिय इत्यर्थः ॥ ३७॥ ननु कथं कर्मसिद्धिरित्याशदयाह- : कर्मसिद्धिस्वामिभूतैर्वाद चैव प्रपञ्चिता । पुण्य-पापस्वभावाम्यां वैशिष्ट्यमिह सम्मतम् ॥ ३८ ॥ च पुनः कर्मणः सिद्धिनिप्पत्तिस्तु अग्निमूतेर्द्वितीयगणधरस्य वादे १५ एव प्रपञ्चिता विस्तरेणोक्ताऽस्ति, अतोऽत्र पुनर्नोच्यते इति भावः । परं इहाऽस्मिन् प्रस्तावे पुण्य-पापखमावास्यां वैशिष्ट विशिष्टत्त्वं युक्तत्वमित्यर्थः, सम्मत सम्यङ्मननविषयीकृतमस्ति । अयं भावः-१८ प्राक् सामान्यतः कर्मसिद्विरुक्ता, इह तु पुण्य-पापखमावयुक्तं कर्म कथितमिति विशेपः ॥ ३८॥ १ भत्र "मलन्तानुलन्धेष्वपि' इदि काशीमुद्रितपाठश्छन्दोऽनुरोपाद- स्वारस्याच्च प्रामादिकः। गो० का.

२५८ श्रीगौतमीयकाव्य - ३ अथ कर्मणः पुण्य-पापस्वभावविवेकं कुर्वन्नाह- विंशत्युत्तरमानद्धाः कर्मप्रकृतयः शतम । आत्मन्यत्र शुमाः पुण्या अपराः पापसंज्ञिकाः ॥ ३९ ॥ आत्मनि जीवे विंशत्युचरं शतं विंशत्यधिकशत(१२०)संख्या: कर्मप्रकृतयः कर्मभेदा आनद्धा बद्धाः सन्ति, अनाऽस्मिन् विंशत्य- ६धिकशते सुरनरत्रिकादयो द्वाचैरवारिंशत् शुमाः प्रकृतयः पुण्याः, पुण्यप्रकृतय उच्यन्ते इति शेषः । अपरा अन्याः अशुमाः दाशीतिसद्ध्याकाः पापसंज्ञिकाः पापप्रकृतय उच्यन्ते इत्यर्थः । नन्वेत- ९दुमयमीलने चतुर्विशत्युत्तरं शतं. प्रकृतयो जायन्ते, ततः कथमत्र विशत्युत्तरं शतमित्युक्तम् ! उच्यते-वर्णादिचतुष्कस्य शुमाऽशुभ- भेदेन वारद्वयं गणनाच्चतुर्णामाधिक्यं परं बन्धे सामान्यत एव १२वर्णादिचतुष्कस्योपादानानोक्तसद्धयाविघात इति ॥ ३९ ॥. अथ सुख-दुःखहेतुकर्मोपदर्शनायाऽऽह- सातकर्मोदयादाशु प्रजायेत सुखं फलम् । अमातकर्मप्रभवं फलं दुःखाय जायते ।। ४० ॥ सातकर्मणः सातवेदनीयकर्मण उदयात् आशु शीघ्रं सुखं सुख- सरूपं फलं प्रजायेत उत्पधेत, तथाऽसातकर्मप्रमवं असातवेदनीय. १८फर्मोदयजन्यं फलं दुःसाय जायते, दुःखखरूपं भवतीत्यर्थः ॥४०॥ अत्र प्रेरकः आह- ययाऽऽत्मपरिणामत्वात्सुख-दुःखे अरूपिणी । तथैव कारणे किं न पुण्य-पापे उमे अपि ॥४१॥ यया येन प्रकारेण आत्मनो जीवस्य परिणामत्वात् मुख-दुःखे वथैव तेनर मकारेण मुख-दुःखयोः कारणे उमे वे २१पर पिणी सा गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहिवम् । २५९ - पुण्यपापे अपि किं न अरूपिणी ! कथं नेत्यर्थः, कार्यानुरूपं हि. कारणमिप्यते, कार्य च सुखादिकमात्मपरिणामत्वादरूपि, ततश्च तत्कारणं पुण्यपापात्मकं फर्माऽपि अरूप्येव प्रामोति न रूपवत् , इप्यते च भवद्भिः कर्मणो रूपत्वम्, ततः कथमनयोः कार्यकारणत्व- मिति भावः ॥४१॥ अत्रोचरमाह- विकल्पोऽयमपि त्याज्या सर्वे भाया यतः स्थिताः । तुल्याऽतुल्यत्वरूपेण दोपः कोऽपि तवोच न ॥४॥ हे अचलम्रातः ! त्वयाऽयमपि विकल्पो वितर्कस्त्याज्यः। कथ-९ मित्याह-यतो न केवलं कार्यकारणे एव तुल्याऽतुल्यरूपे किं तु सर्वे त्रिभुवनान्तर्गता भावाः पदार्थाः परस्परं तुल्याऽतुल्यत्वरूपेण स्थिताः सन्ति, न पुनः किञ्चित्कस्याप्येकान्तेन तुल्यमतुल्यं वेति १२ मावः । ततस्तस्मात् कारणादत्र सुखादिकारणभूतकर्मणो रूपवत्त्वे न कोऽपि दोपः ॥ ४२ ॥ अमुमेवार्थ श्लोकद्वयेन दृढयन्नाह- मुंखस्य हैतयो मूर्ताः स्रक्-चन्दना-ङ्गिनादयः । एवमेवाऽसुखस्यापि विपा-हि-कण्टकादयः॥४३॥; तुल्याऽतुल्यत्वरूपेण कार्य-कारणवान चेत् । तदा पुण्यं च पापं च मूर्त्तवेन कथं न हि ? ॥४४ ६१९ १ यद्यपि 'मुखस हेतवो मूतः प्रायः सचन्दनादयः' इत्ययं पाठो वर्ति पठितः काशीमुद्रितपुस्तके ह्यत्र, तथाऽपि 'सक्वन्दनाशनादयः' इति पाठः खारस्यवैशियात् टीकाकृद्भिराहत इदि प्रतीयते । . . १५ २६० श्रीगौतमीयकाव्य ५ : मूळ मूर्तिमन्तः सक्-चन्दना-ङ्गिनादयः प्रायः सुखस्स हेतवः सन्ति, एवमेव अनेनैव प्रकारेण विषा-ऽहि-कण्टकादयः प्रायोऽसुखस्य ३दुःखस्य हेतवो विद्यन्ते । अपिः सम्मावनायां, सम्मावय त्वमित्यर्थः ॥ ४३ ॥ चेद्यदि अत्र सगादिजन्ये सुखादौ तुल्याऽतुल्यत्वरूपेण कार्य-कारणता वर्तते, तदा सुखादिकारणं पुण्यं च पापं च मूर्चत्वेन कथं न हि ? उक्तनीत्या इहाऽपि स न विघटते इत्यर्थः । इह सामान्यतः संभवमात्रमाश्रित्येयं दृष्टान्तयोजना कृताऽति, विशेषा- वश्यकवृत्तौ तु नैवमिति ॥ ॥ १४ ॥ तदेवं पुण्य-पापे व्यवस्थाप्येदानीं तयोरेव लक्षणमाह- सुवर्णादिगुणं सम्यग्विपाक पुद्गलवजम् । जीवस्थं सक्रियोद्भूतं सर्व पुण्यमिति स्मृतम् ॥ ४५ ॥ यदेवद्विपरीतं तत्सर्व पापमिति स्मृतम् । एतद्यमपि ज्ञेयं नाऽतिसूक्ष्मं न वादरम् ।। ४६ ॥ सु शोभना वर्णादयो वर्णे-गन्ध-रस-स्पर्श-लक्षणा गुणा यस्य तत १५योक्तं, था सम्यक् समीचीनो विपाकोऽनुमायो यस्य तत्, तथा सत्यं योगना याः किया दानादिकाखामिरुद्भूतं प्रादुर्भूतं एवंविधं जीवस्वं जीवप्रदेशेषु क्षीरनीरन्यायेन स्थित सर्व पुगलमज पुद्गलसमूहः पुण्य- १० मिति स्मृतं कथितम् ॥ १५॥ यत् पुनरेतस्मात्पुण्याद्विपरीतं विप- रीतलक्षणं अशुमपर्णादिगुणमशुमविपाकं जीवपातायसत्कियोभूतं तत् सर्व जीवसं पुद्गलमज पापमिति स्तं, एतत्पुण्यपापरपं द्वयनुभय- २०मपि वस्नु सूक्ष्मेण फर्मवर्गणाद्रव्येण निष्पन्नत्येऽपि न परमायादि १२ कार्यरत .. ९ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहिवम् । २६१ वदतिसूक्ष्म, न पुनमादिमावेन परिणतस्कन्धवद्वादरं स्थूलं ज्ञेयम् ।। १६॥ प्राक् तुल्याऽतुल्यत्वरूपेण कार्य-कारणता दर्शिता, इदानी ३ तुल्यवरूपेण तामाह- साम्यं वास्तववोधे तु कार्य-कारणयोरपि । तथा च सत्यं कार्यानुरूपं कारणमुच्यते ।। ४७ ।। वास्तवबोधे तात्त्विकज्ञाने तु कार्य-कारणयोः साम्यं सादृश्यम- प्यस्ति । तथा च सति यत्कार्यानुरूपं कार्यसदृशं कारणमुच्यते तत्सत्यमिति ॥ १७॥ कथमित्याह- जीवस्यापि परीणामः सुख दुःखाभियानकः। तद्योगात्तेन कार्यानुरूपं कारणमुच्यते ॥४८॥ सुख-दुःखाभिधानकः सुख दुःखनामको जीवस्यापि परिणामी विद्यते । न केवलं कर्मण एवेति अपिशब्दार्थः, तेन कारणेन तयो- जीवसुखाचोर्यो योगः सम्बन्धस्तस्मात्कार्यानुरूपं कारणमुच्यते । अयं ५ भावः--सुखादीनां कर्मेव केवलं कारणं न भवति, किं तु जीवोऽपि तेषां समवायिकारणं भवति, कर्म तु असमवायिकारणमस्ति, ततश्च सुखादेरमूर्तत्वे तत्समवायिकारणस्य जीवस्याऽप्यमूर्तत्वमस्त्येवेति : युक्तमेवोक्त कार्यानुरूपं कारणमिति ॥ १८॥ अथोपसंहारमाह-. i ततः पुण्यं च पापं च सिद्धं पूर्वोक्तयुक्तिमिः । पुद्गलस्कन्धमेवैकं विद्धि चित्रितपत्रवत् ।। ४९ ॥ ततस्तस्मात्कारणात् पूर्वोक्तयुक्तिमिः सिद्धं निष्पन्नं पुण्यं च पापं २३ १२ श्रीगौतमीयकाव्य - ९ च चित्रितपत्रवत् शुमा शुभविविधचित्रयुक्त पत्रमिव एकमेव पुद्ग- लस्कन्धं विद्धि जानीहि । भिन्नकार्यदर्शनेन तत्कारणमूतयोः पुण्यपा- ३पयोः मिन्नत्वावेवक्षया तु पुण्य-पापे मिन्ने अपि सातामित्यप्युपलक्ष- णाबोध्यम् ॥ ४९॥ नन्वत्र पञ्चसु विकरुपेषु अन्तिमपक्षत्रयस्य तु निर्णयोऽकारि, ६ परमाद्यपक्षद्वयस्य का गतिरित्याशड्याह- पुण्यपापद्वये सिद्धे पक्षी केवलयोस्तयोः । अयुक्तावेव मन्तव्यौ सुयुक्तरक्षमत्वतः ॥५०॥ उक्तयुक्या पुण्यपापद्वये सिद्धे सति केवलयोस्तयोः पुण्यपापयोः पक्षौ अयुक्ती एव मन्तव्यौ ज्ञातव्यो । कुत इत्याह--सुयुक्तेः शोमनयुक्तेः अक्षमत्वतोऽसमर्थत्वात् सुयुक्ति सोढुमशक्तत्वादित्यर्थः । १२ तथा हि-केवलपुण्यपक्षे पुण्याऽपकर्षमात्रेण यद् दुःखबहुलत्वमुकं तदयुक्त, यतस्तदुःखबहुलत्वं पुण्यापकर्षजनितं न भवति, किं तु खानुरूपकर्मप्रकर्पजनितं वेदनाप्रकर्षानुमवरूपत्वात् , यथा सौख्यप्रक- ५नुमतिः खानुरूपकर्मप्रकर्पप्रभवा इति दृष्टान्तः, एवमत्रोपपत्त्यन्त. रमपि विशेपावश्यकत्तेजेयम् । तथा केवलपापपक्षेऽपि पापाsप- कर्पमात्रजनितं मुखं न भवति-पापस्यास्पीयसोऽपि दुःखजनकत्वात् । नक्षणीयानपि हि विपलवः स्वास्थ्यहेतुर्मवति, तस्मात्पुण्यजनित- मेवाल्पमपि मुखमित्यादि खवुयाऽन्यूर याच्यामिति ॥ ५० ॥ तदेव जिन्नसंशयोऽसौ किं कृतवानित्याह--- इत्यादियुक्ति प्रतिपन्धशुद्धचित्तोऽचलनावयुधः प्रयुद्धः। २९ समन्वित यात्रशतत्रयेण दीक्षा लली वीरजिनेन्द्रशिष्टाम्।।५१॥ १पृ.२५१ शे..५-१६-१७ ॥ २ मत्र 'पदवित्तः' इह घनी. मुदितपारःटीपादन सम्मतः । . .

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २६३ इत्यादियुक्तीनां प्रतिवन्धः सत्यतया स्वीकारस्तेन शुद्ध्यन्निर्मलीभव- चित्तं यस्य स तथोक्तोऽथवा इत्यादियुक्तिभिर्यः प्रतिबन्धः स्वशङ्का- निरोधस्तेनेत्यादि प्राग्वत् । अत एव प्रबुद्धः प्रवोध प्राप्तोऽचलमातृ-३ वुधोऽचलाता नाम पण्डितश्छात्राणां शैतंत्रयेण समन्वितो युक्तः सन् वीरजिनेन्द्रेण श्रीवर्द्धमानखामिना शिष्टां शिक्षारूपेणोक्तां दीक्षा ललौ गृहाति स । इदमुपजातिच्छन्दः, तल्लक्षणं तु प्रागुक्त-६ मेवेति ॥ ५१॥ इति अकम्पिताचलभ्रातृदीक्षाग्रहणवर्णनो नाम दशमः सर्गः ॥१०॥ इति स्पष्टम् । इति श्रीगौतमीयप्रकाशाख्यायां गौतमीयमहाकाव्यव्याख्यायां दशमः सर्गः ॥१०॥ ९ १२ एकादशः सर्गः। श्रीवीरपादाम्बुजचञ्चरीकानिशम्य सूरीनपरान् प्रयुद्धान् । मेतार्यनामाऽपि सुधीः सुधीभिः समं समेयाय जिनोपकण्ठे॥१॥१५ विशुद्धविज्ञानकर प्रसार्य मेतार्यमुख्यौ भवसिन्धुमध्यात् । समुद्भुतौ येन जिनेश्वराय नमोऽस्तु तस्मै त्रिशलात्मजाय ॥१॥ प्रबुद्धान् प्रवोधं प्राप्तान् अत एव श्रीवीरस्य भगवतः पादाम्बु-१८ जयोश्चरणकमलयोश्चश्चरीका प्रमरा इव श्रीवीरपादाम्बुजचञ्चरीका- स्तान तथाभूतान् अपरानन्यान् गौतमादीन् सूरीन् पण्डितान्निशम्य श्रुत्वा मेतार्यनामाऽपि सुधीविद्वान् सुपीमिः सुवुद्धिमिः खशिष्यैः समं सह जिनस्य श्रीवीरस्य उपकण्ठे समीपे समेयाय समाजगाम ।२१ २६४ श्रीगौचनीयकाव्यं समापूर्वोदिणः कर्तरि लिद । अस्मिन् सर्गे :उपजातिच्छन्दः, तल्लक्षणं तु प्रागुक्तमेव ॥१॥ ३ आभाष्य तं वीरजिनेश्वरोऽपि जगाद वत्सेह जहाहि मोहम् । चिरन्तनं किं परलोकवस्तु स्याद्वा न वेति स्वमनःप्रसक्तम् ॥२॥ वीरजिनेश्वरोऽपि तं मेतार्य आभाष्य हे मेतार्य ! एहीत्यादिवाचा ६सम्भाप्य जगाद उवाच । किं जगादेत्याह-हे वत्स! परलोको भवान्तरगमनलक्षणः स एव वस्तु-पदार्थः, किमिति-वितर्के, स्याद्वा विद्यते वा न वा, न विद्यते वा ! इत्येवंरूपं वमनसि निजचिते प्रसक्तं सम्बद्धं चिरंभवं चिरन्तनं बहुकालोद्भवं मोहं मिथ्याज्ञानं इहाऽस्मिन् प्रस्ताचे जहाहि परित्यन । अयं भावः-हे मेतार्य ! त्वमेवं मन्यसे-कि परलोकोऽस्ति नास्ति वेति, अयं च संशयस्तव १२ विरुद्धवेदपदश्रवणनिवन्धनो वर्तते, तानि च 'विज्ञानघन एवेतेभ्यो भूतेभ्य' इत्यादीनि प्रथमगणधरवादोक्तानि द्रष्टव्यानि, तेषां चार्थ त्वं न जानासीत्यादि तथैव । अतोऽनुचितोऽयं संशयो न कर्तव्य १५इति ॥ २ ॥ अथ यया युक्त्या मेतार्यः परलोकनास्तित्वं मन्यते तो भगवान् व्यक्तीकुर्वन्नाह- १०यचेतना भौतिकदेहधर्मस्तदत्यये जन्म कुतोऽन्यलोके । यद्वारणेहिरिवेयमसादुत्पद्यते नापि ततोऽन्यलोकः ॥३॥ यच्छब्दोपादानात् तच्छब्दस्याऽनुक्तस्याऽप्यत्र ग्रहणम् , ततश्चैवम्- न्वयः-यद्यस्मात्कारणात् चेतना चैतन्यं भौतिकस्य भूतैः पृथिव्यादिभि- सपनस देहस्य गरीरस्य यमों विद्यते इति शेषः, ततस्तस्स देहस्सा- .

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २६५ ५ ऽत्यये विनाशे सति तद्धर्मस्य चैतन्यस्यापि विनाशादन्यलोके परभवे जन्म उत्पत्तिः कुतो भवेत :, न कुतोऽपीत्यर्थः । इदमत्र तात्पर्यम्- चैतन्यं तावद्भूतेभ्यो नार्थान्तरं तद्धर्मस्वात्, यथा गुडधातक्या(दि)-३ मद्यानेभ्यो मदधर्मः, ततश्च यो यदनान्तरभूतो धर्मः स तद्विनाशे नश्यत्येव, यथा पटादिधर्मः शुक्लस्वादिः, अतो भूतैरेव सह प्रागेव नष्टस्य चैतन्यस्य कुतो भवान्तरगमनम् ? इति । अथ भूतेभ्योऽर्थान्तरं ६ मन्यते तथापि न परलोक इत्याह--यद्वेत्यादि । यद्वाऽथवाऽरगे- ररणिकाष्ठाद्वहिरिव इयं चेतनाऽस्माद्भूतसमुदायादुत्पद्यते, ततोऽपि हेतोर्न अन्यलोकोऽस्ति । अत्राऽयं भावः -भूतेभ्योऽर्थान्तरनेऽपि अनित्यं चैतन्यं उत्पत्तिधर्मकत्वात् , अरणिकाष्ठोत्पन्नतद्भिस्रवहिवदिति । यच्चानित्यं तत्किंयन्तमपि कालं स्थित्वाऽमिवदनापि ध्वंसते इति न तस्य भवान्तरयायित्वम् , अत इत्यमपि न परलोकसिद्धिरिति ॥३॥१२ अथवा प्रतिपिण्डं भिन्नानि भूनधर्मरूपाणि बहूनि चैतन्यानि नेप्यन्ते, कित्येक एव समस्तचेतन्याश्रयः सर्वत्रिभुवनगतो निःसन- तोऽक्रियश्चात्माऽभ्युपगम्यते । यत उक्तं-'एक एव हि भूतात्मा १५ भूते भूते व्यवस्थितः । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥' ननु तथापि न परलोकसिद्धिरिति दर्शयन्नाह- पानीयचन्द्रप्रतिविम्बवद्वा तनौ तनौ ब्रह्म पृथक्प्रभासः। तथापि देहापगमेज्यलोक प्रयाति कथेति विकल्पसे किम् ? ॥४॥ वाऽथवा पानीयेषु यच्चन्द्रप्रतिविम्यं तद्वत् तनौ तनौ देहे देहे २२ १'पृथकप्रकाशः' इति काशीमुद्रितपाठः । , १८ २६६ श्रीगौतमीयकाव्य ब्रह्मण उक्तखरूपस्य एकस्यैवात्मनः पृथक् मिन्नः प्रमासः प्रकाशः, वर्तते इति शेपः । यद्येवमभ्युपगम्यते तथापि देहसाऽपगमे विनाशे सति ३ अन्यलोकं परमवं कः प्रयाति न कोऽपीत्यर्थः । तस्यात्मनः सर्वेषु गोमहिप्यादिपिण्डेपु सर्वगतत्वेन निःक्रियत्वेन चाकाशवत् संसर- णामावादिति भावः । चः समुच्चये, है मेतार्य । त्वं किमिति प्रश्ने ५ इत्येवं विकल्पसे विचिंतयसि ॥४॥ पुनर्भगवानाह- शृणोपि शास्त्रेषु शरीरभाजां देहच्युतौ चापि भवान्तराप्तिम् । विरुद्धवादेन मुहुस्तवैवं दोलाचलं चित्तमभूद्वथैव ॥५॥ च पुनर्देहस्य च्युति शस्तस्यां सत्यां शरीरभाजा.जीवानां भवा- तराप्ति अन्यमवप्राप्तिमपि शास्त्रेषु वं शृणोपि । एतेन परलोक- १२ सिद्धिरप्याऽऽवेदिता । हे मेतार्य ! एवममुना प्रकारेण विरुद्धवादेन शास्त्रेषु परस्परविरुद्धकथनेन मुहुर्वारंवारं तव चितं वृथैव दोलावत् चलं चपलं अमूत् ।। ५॥ : इति दर्शितः पूर्वपक्षः, अथाऽत्र प्रतिविधीयते- अत्रास्ति चेदुत्तरपक्षकासा त्वं पृच्छ तद्गौतमवायुभृतिम् । भूतातिरिक्तः प्रकटोऽयमात्मा त्वयाऽवयुद्धोऽत्र कयोपपत्या?॥६॥ अनामिन्सन्दिग्धेऽथे चेद्यदि तवोचरपक्षस्य कादा वान्छाऽस्ति, तत्तर्हि त्वं गौतमो गौतमगौत्रीयो यो वायुभूतितं पृच्छ । कय. २२ मित्याह-हे वायुमते ! अनामिन् शरीरे भूतेभ्योऽतिरिक्तो मिलः 14 गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २६७ ६ प्रकटः अयमात्मा जीवस्त्वया कया उपपत्त्या युक्याऽयबुद्धो ज्ञातः, इत्थं प्रश्नं कुर्वित्यर्थः ॥ ६॥ तमेव दध्याः प्रतिवादितायां पूर्वे विकल्प स समाधिकारी। तथाऽऽत्मसियै पुनरिन्द्रभूति पृच्छ त्वमेवान सृतं बहूत्या ॥७॥ हे मेतार्य, पूर्वे पूर्वस्मिन् विकल्पे किं यच्छरीरं स एव जीव एवंरूपे वितकें प्रतिवादितायां प्रतिवादित्वे तं वायुभूतिमेव दध्यास्त्वं धारयः, यतस्तत्र स वायुमतिरेव समाधि समाधानं करोति तच्छील:९ समाधिकारी, अस्तीति शेषः, तथा तद्वत् आत्मसिधै आरमनः सिद्ध्यर्थं पुनस्त्वमेवेन्द्रमूर्ति प्रथमगीतमं पृच्छ । अत्र प्रस्तावेऽसाकं चहत्तया बहुकथनेन सृतं पर्याप्तं आत्मनः सद्भावे भौतिकदेहाति-१२ रिक्तत्वे च सिद्ध सिद्ध एव परलोक इति भावः ॥ ७ ॥ . अन्यच- प्रतीहि देवानपि नारकान्या तथाऽन्यलोकाधिगमाय धीमन् ।।१५ तं मौर्यपुत्र तमकम्पितं या समाधये पर्यनुयु भद्र! ॥८॥ तथा तद्वत् हे घीमन् हे मद्र ! अन्यलोकस पालोफस्स अधि- गमो ज्ञानं ससे देवान् या पुनर्नारफानपि प्रतीहि जानीहि, देवा 10 नारका अपि च सन्तीति प्रतिपयलेत्यर्थः, समापये देवनारकास्ति- त्वसमाधानार्थ तं प्रागुक्तं मौर्यपुत्रं या पुनर्स अकम्पितं पर्यनुयुद्ध पृच्छ, ताभ्यां तदखित्वस्य प्रागेव निीतत्वादिति भावः । पर्यनु- पूर्यात् 'युजिर योगे' असाद्रौधादिकारकरि लोह । इह ययपि मग-२१ ,

२६८
श्रीगौतमीयकाव्यं
-
वता तु नैवमुक्तं, किं तु साशास्वमुखेनैव तत्संशयापनोदः कृतोऽस्ति,
तथापि कविना ग्रन्थविस्तरभयादेवमुक्तमिति बोध्यम् ॥ ८॥
अथ यदुक्तं प्राक् 'एकः सर्वगतो निष्क्रियश्चात्मे' त्यादि तदा-
श्रित्याह-
यन्मन्यसे ब्रह्मकृतः प्रकाशस्तनौ तनावस्ति मृपेति वाणी ।
६ यल्लक्षणैर्भदि तदेव भिन्नं विशेषतश्चापि यथा घटादि ।। ९ ।।
हे मेतार्य! तनी तनौ देहे देहे ब्रह्मणा एकेनात्मना कृतः प्रकाशो-
ऽस्तीति यत्त्वं मन्यसे जानासि तन्मननकारणभूता वाणी मृपा मिथ्या
९वर्चते । आत्मनामानन्त्यादिति भावः । कथमित्याह--यद्वस्तुलक्षणे-
भेंदो विशेषोऽस्त्यस्येति भेदि भेदयुक्तमित्यर्थः, तद्भिन्नमेव भवेत् ।
चापीति समुच्चये, यथा विशेपतो लक्षणविशेषात् घटादि घटपटादि
१२ वस्तु भिन्नमेवास्ति तथेत्यर्थः । अयं भावः :-न चास्माभिरेक आत्मा
इप्यते किंतु लक्षणभेदादनन्ताः यत उपयोगलक्षणो जीवः । स
चोपयोगो राग-द्वेप-कपाय-विपयाध्यवसायादिभिर्भिद्यमान उपाधिमे-
१५दादानन्त्यं प्रतिपद्यते इत्यनन्ता जीवा लक्षणभेदाद् घटादिवदिति ।
तथा न सर्वगत आत्मा किं तु शरीरमात्रज्यापकस्तत्रैव तद्गुणोपलब्धेः,
स्पर्शनादिति । एवं न निष्क्रिय आत्मा भोक्तृत्वादेहवदित्याधुप-
२८ लक्षणाद् ज्ञेयम् ॥ ९॥
अन्यञ्च--
मुखित्वदुःखित्वमुखा विभेदाः
सर्वत्र सन्तीह पृथक् पृथग् यत् ।
वदात्मभेदात्परलोकयानं
संमान्यते किं न सदुकयुम्या? ॥१०॥

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २६९ 'मुखमुपाये प्रारम्भे श्रेष्ठ निःसरणास्ययोः' इति हेम(अनेकार्थ)- वचनान्मुखशब्दोऽत्र प्रारम्भार्थः, सुखित्व-दुःखित्वे मुखे प्रारम्भे येपां ते तथोक्ताः, सुखित्व-दुःखित्वप्रभृतय इत्यर्थः; विभेदा विशिष्टभेदार इहास्मिन् लोके सर्वत्र सर्वेषु जीवेषु यत् पृथक् पृथक् सन्ति मिन्ना मिन्ना विद्यन्ते तत् आत्मभेदात् आत्मनां भिन्नत्वात् । आस्मैक्ये तु तदसम्भवादिति भावः । ततश्च सती शोभना या उक्तयुक्तिस्तया पर-६ लोकयानं परमवगमनं किं न संभाव्यते : संभाव्यत एवेत्यर्थः । आत्मैक्ये तु तदुर्घट, तन्निरासेन तत्सिद्धिः स्फुटैवेति तात्पर्यम् । यद्वा सदिति पृथक् पद, परलोकयानपदस्य विशेषणं विद्यमानमित्येतदर्थः ॥ १०॥९ उक्तमेवार्थ स्पष्टयति- ब्रह्मैक्यवादे परकर्मभोगः परस्य युज्येत न चैतदिष्टम् । मुखस्य दुःखस्य च सकरत्वे विलुप्यते तद्यवहारभावः ॥११॥१२ ब्रमण आत्मन ऐक्यं एकत्वं तस्य यो वादः कथनं तस्मिन् सति परस्य यज्ञदत्ताचपेक्षयाऽन्यस्य देवदत्तादेः अपरो यज्ञदत्तादिस्तस्य यानि कर्माणि तत्कृतगुभाऽशुभकर्माणीत्यर्थः । तेषां मोगो मुक्तियुज्येत १५ ब्रोक्ये देवदत्तादेर्यज्ञदत्तादिकृतकर्मानुभवो युज्यतेत्यर्थः । न चैतत् इष्टं वान्छितं असम्भवादेवेति भावः । तथा ब्रोक्ये सुखस्य च पुन- दुःखस्स सरत्वे मिश्रितले सति तयोः सुख-दुःखयोर्यों व्यवहार-१० स्तस्य भावः सत्ता विलुप्यते विच्छिद्यते, 'अयं सुखी, अयं दुःखी'- त्यादिव्यवहारस्य सत्य व्यवच्छियते इत्यर्थः॥११॥ ततः किं खितमित्याह- तेनायमात्मा प्रतिदेहभिन्नः स्वकर्ममिरिमवानुसारी। . २३ २७० श्रीगौतमीयकाव्यं १ ३ स्थाने स जातिसरणेन कश्चित् पश्येत्तु पूर्वाणि भवान्तराणि ॥१२॥ तेन कारणेन अयं आत्मा प्रतिदेहं प्रतिशरीरं भिन्नो वर्चतेऽत एव खकर्मभिरिमवान् बहुजन्मानि अनुसरति अनुगच्छतीति तच्छीलः परमवयायीत्यर्थः । स्थाने युक्त एव । कश्चित्तु पुनः स आत्मा इजातिस्मरणेन प्राग्जन्मस्मरणरूपमतिज्ञानविशेषेण पूर्वाणि स्वयं प्राकृतानि भवान्तराणि अन्यजन्मानि पश्येत् विलोकयेत् । ततः सिद्धः परलोक इति भावः । स्थाने इत्यव्ययं युक्तेऽर्थे 'स्थाने तु ९ कारणे युक्ते' इत्यव्ययकाण्डे हैमोक्तेः ॥ १२ ॥ तदेवं छिन्नसंशयोऽसौ किं कृतवानित्याह- तदेन्द्रभृत्यादिमिरप्यमीटः प्रसाधितोत्साहभरः समाधौ । १२ मेतार्यविनोऽपि वभूव भन्यो महावती छात्रशतत्रयेण ॥१३॥ तदा तसिन्नवसरेऽमीप्टैः प्राक्तनातिपरिचयाबल्लभैरिन्द्रभूत्यादि- भिरपि समायौ सन्दिग्यार्थसमाधाने प्रसाधितः प्रकर्षेण निप्पादित- १५उत्साहस्य मरोऽतिशयो यस्य स तथोक्तः एवंविधो मेतार्यविप्रोऽपि छात्राणां शिष्याणां यत् शत्रयं तेन सह भव्यो योग्यो महावती पञ्चमहाबतधरः साधुर्वभूव अमूत् ॥ १३ ॥ *इति मेतार्यसामिदीक्षानहणम् ॥ १०॥*- अथ प्रमासस्य तदाह-- ततः प्रभासाहयपाठकोऽपि श्रुत्वाऽपरान् शान्तिसुखं प्रयावान् । श्रीमजगन्नाथसदस्तडागं समाययौ तृप्णगिवाऽमृतस्य ॥१४॥ ततो मेतार्यदीक्षाग्रहणानन्तरं प्रभास इत्याइयः स चासो पाठ- + ६ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २७१ कश्चेति कर्मधारयः । सोऽपि अपरान् अन्यान् इन्द्रभूत्यादीन् दशाऽपि द्विजवरान् शान्तिसुखं प्रशमसुखं प्रयातान् प्राप्तान् श्रुत्वाऽमृतस्य पानीयस्य तृप्णक् पिपासुरिव श्रीमतो जगन्नाथस्य वीरप्रभोः सदः३ सभा एव तडागः सरोवरस्तं समाययो समाजगाम । 'पयः कीलाल- ममृतम्' इत्यमरः । 'पिपासुस्तृषितस्तृप्णक्' इति हैमः ॥ १४ ॥ देवाधिदेवोऽप्पवदत्प्रभास ! प्रकम्पयेचामिति वेदवाणी। यष्टव्यमानीवनमेव यत्तु स्वर्गाप्तये तन्न च मोक्षहेतोः ॥१५॥ योगो हि साद्यविधिस्वरूपो मोक्षः कुतोऽसादिति मुक्तिलोपः। गुहा हि लोकस्य सुंदुर्विगाहे- ति वेदवाक्येन च मोक्षसिद्धिः॥ १६ ॥ द्वाभ्यां सम्बन्धः। देवाधिदेवः श्रीवीरप्रभुरपि अवदत् उवाच तमिति शेषः । किमित्याद-हे प्रमास ! वेदवाणी 'जरामयं वा एतत्सर्व यदमिहोत्र'- मित्यादिवेदोक्तवाय इतीत्यं त्वां प्रकम्पयेत् बच्चेतसि अममुत्सादये-१५ दित्यर्थः । कथमित्याह -तु इति विशेपे, जीवनं जीवितव्यं आऽभि- च्याप्येति आजीवनं एव यावचीवमेवेत्यर्थः । यष्टव्यं ममिहोत्रं फर्तव्यं, यद्वेदे उक्तमिति वाक्यशेपः, तत्वाधये वर्गप्राप्तये न च मोक्षहेतोः, न पुनमुकिनिमिवमित्यर्थः ॥ १५ ॥ किं कारणमित्यत माह-याग इत्यादि । हि यतः कारणात् यागो यनः प्राणिवध- हेतुलात् सावधः सपापो विधिरनुष्टानं वरूपं यस्य स तथोको पर्णते, ततोऽमायागात् कुतो मोक्षः !, न कुतोऽपीत्यर्थः । इत्येवमुक २२ 'योगोद विपदी मुस्तिपाठपिन्सः ।

२७२ श्रीगौतमीयकाव्यं । खरूपवेदवाक्येन मुक्तिलोपो मोक्षाभावो, ज्ञायते इति शेपः । तथा हीति निश्चितं, 'मुक्तिरूपा गुहा लोकस्य सुतरां दुर्विगाहा दुःप्रवेशा ३प्रवर्तते' इति वेदवाक्येन च मोक्षसिद्धिर्ज्ञायते, अत्र किं सत्यमिति संशयः, इह काव्यद्वयस्य भावार्थस्त्वयम्-हे प्रभास ! त्वमेवं मन्यसे निर्वाणमस्ति न वेति । अयं च संशयस्तव विरुद्धवेदपदश्रवणनिव ६न्धनः । तानि चामूनि वेदपदानि 'जरामयं वा एतत्सर्वं यदग्निहोत्रं तथा 'सैषा गुहा दुरवगाहा' तथा 'द्वे ब्रह्मणी परमपरं च तत्र परं सत्यं ज्ञानमनन्तरं ब्रह्मेति । एतेषां चायमर्थः तव चेतसि वर्तते यदेतदग्नि- ९होत्रं तज्जरामर्यमेव यावज्जीवं कर्त्तव्यमिति । अग्निहोत्रक्रिया च भूत- वधहेतुत्वाच्छबलरूपा, सा च वर्गफलैब स्यान्नाऽपवर्गफला, यावजी- यमिति चोक्ते कालान्तरं नास्ति । यत्रापर्गहेतुभूतक्रियान्तरारम्भः १२ स्यात् । तस्मात्साधनाभावान्मोक्षामावस्ततश्चेत्यादिकानि केवलमोक्षामाव- प्रतिपादकानि । शेषाणि तु तदस्तित्वसूचकानि । तथा हि--गुहाउन मुक्तिरूपा, सा च संसाराभिनन्दिना दुरवगाहा दुःप्रवेशा, तथा पर १५ब्रह्म सत्यं मोक्षः, अनन्तरं तु ब्रह्मज्ञानमिति, ततो मोक्षस्यास्तित्वं नास्तित्वं च वेदप्रतिपादितमवगम्य तव संशयस्तत्रैषां वेदपदानामर्थ त्वं न जानासि यतस्तेपामयमों वक्ष्यमाणलक्षण इति ॥ १६ ॥ अथ मोक्षाभावपतिपादने प्रभासाध्यवसितां युक्तिमपि दुपयितुं भगवान् प्रकटयन्नाह- दीपो यथा नितिमभ्युपेतो । नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् । १ गतमतप्रकल्पितमोशामावपातपादनपरी युकिं प्राटयति भगवान, “ति रानार्थम् इत्यर्थः । ३ मा 'दीपो यथा' इति पानीमुदितपाधिन्यः ।

" गौतमीयमाशाख्यटीकया सहितम् । २७३ दिशं न काचिद्विदिशं न काञ्चि- लेहक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ॥ १७ ॥ जीवस्तथा नितिमम्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् । दिशं न काश्चिद्विदिशं न काश्चित् क्लेशक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ॥ १८ ॥ यथा दीपः प्रदीपो निति निर्वाणं विध्यातिमित्यर्थः अभ्युपेतः पाप्तः सन् नैव अवनि पृथ्वीं गच्छति, न अन्तरिक्षमाकाशं गच्छति, न काञ्चिदिशं पूर्वादिकां गच्छति, न काञ्चिद्विदिश-९ मागेय्यादिकां गच्छति, किं तु मेहक्षयात् तैलनाशात्केवलं शान्ति नाशं एति प्रामोति ॥ १७ ॥ इत्यं दृष्टान्तमुपदर्य दाष्टोन्तिक- माह---जीव इत्यादि । तथा तेन प्रकारेण जीव आत्मा निति १२ मुक्तिमभ्युपेतः सन् नैवावनिं गच्छति, न अन्तरिक्षं गच्छति, न काश्चिदिशं न काचिद्विदिशं गच्छति, किंतु क्लेशक्षयात् रागद्वेपादि- जन्यसंसारिकदुःखनाशारकेवलं शान्ति नाशं एति, दीपस्सेवास्य जीवस्य १५ नाश एव निर्वाणमिति मावः ॥ १८ ॥ पत्सौगतानामिति युक्तिवोऽपि वर्चेत ते चेतसि मुक्तिलोपः। कर्मक्षपानिर्जर-नारकादिपर्यापनाशे तु न चातिरिक्तम् ॥१९॥16 है प्रभास ! इतीत्यं पूर्वोक्तप्रकारेण सौगतानां चौद्धविशेषाणां युक्तितोऽपि ते तव चेतसि मुक्किलोपो मोक्षाभावो यद्यलात, ततोऽपि संशयखवेति वाक्यशेषः । पुनः प्रकारान्तरेणापि मोक्षमावसाधने २१ १पत्र 'चान्तरिक्षम्' इति शनीमुदित पापिन्सः । गो.प.

२७४ श्रीगौतमीयकाव्यं ६ प्रभासामिप्रेतां युक्तिमाह-कत्यादि । कर्मणां क्षयात् निर्जर-नार- कादिपर्यायाणां देव-नारक-तिर्यग्नरमावानां नाशो भवति, तन्नाशे तु ३ अतिरिक्तं देव-नारकादिपर्यायेभ्यो भिन्नमन्यत् जीववस्तु न चास्तीति शेषः । चः समुचये । अयमर्थः-'देव-नारकादित्वमेव संसार उच्यते, तद्भिन्नश्चान्यः कोऽपि जीवो नास्ति, कदाचिदप्यनुपलम्भात् । देवनारकादिपर्यायरूपसंसारनाशे तु जीवस्स स्वस्वरूपनाशात्सर्वथा नाश एव भवति, ततः कस्याऽसौ मोक्ष' इति त्वं मन्यसे ! इति ॥ १९॥ एवं विकल्पहुसंशयान- स्तिष्ठेरिहादत्व मदुक्तयुक्तीः । याभिर्मनस्ते स्थिरतामुपेयात् सत्याग्रतो वा कियती मृपोक्तिः ॥२०॥ हे ममास ! एवममुनोकप्रकारेण विकल्पैर्वितहु प्रचुरं यथा स्थाचया संशयानः सन्देहं कुणिस्त्वं तिष्ठेरवतिष्ठसे, परं इहालिन् १५सन्दिग्धेऽर्थे मदुक्तयुक्तीः आदरस्य गृहाण, याभियुकिभित्रे तय मनः स्थिरता उपयात् प्रामुयात् । पाऽथा सत्यस्य सद्भूतार्थ- वचनस अग्रतः पुरतो मृपोक्तिमिथ्यावचनं कियती: किंममाणा! १८ स्यास्पतीति शेपः, कियत्कालं सास्यतीत्यर्थः । एतावता गदुच्यमान- सत्ययुक्तीनो पुरस्त्वद्विकलिता मिथ्यायुक्तयो न सामन्तीति मावः॥२०॥ अयादी जरामर्यमित्यादि यद्वेदवाक्यं मोक्षागावप्रतिपादकतया ५२प्रभासेनाध्यवसितं तत्पतिविधातुमाह- 4 ३ गौतमीयप्रकाशायटीकयो सहितम् । प्रवृत्तिमार्गाश्रयिमूढलोकान् यष्टव्यमाजीवनमेतदुक्तम् । निवृत्तिमार्गायिणां तु मुक्ति- निपिध्यते क्वापि न वेदवाक्यैः ॥ २१ ॥ प्रवृत्तिमार्गोऽविवेकिजनप्रवर्तनमार्गस्तदायिणो ये , मूढलोका अनारमतत्त्वज्ञजनाः, तानाश्रित्येति शेषः, 'आजीवनं यष्टव्यम्' १ इत्येतद्वेदे उक्तमस्ति, परं निवृत्तिमार्गो मुक्तिमार्गस्तदायिणस्तत्त्वज्ञा. निन इत्यर्थः, तेषां तु कापि प्रदेशे वेदवाक्यैर्मुक्तिर्न निषेध्यते । अयं भावः--'जरामयं या एतत्सर्वं यदग्निहोत्र'मिति वेदवाक्यात मोक्षहेतुक्रियारम्भकालामावात् यत्त्वं मोक्षामावं शासे तदयुक्तं, तदर्थापरिज्ञानात्, तस्य अयमों-यदेतदमिहोत्रं तद्यावजीवं सर्वमपि कालं कर्चव्यम् । वाशब्दान् मुमुक्षुमिमोक्षहेतुभूतमप्यनुष्ठान । विधेयमिति । ततश्च मूर्ख-तत्त्वज्ञमेदेन मार्गद्वयाधिकारिणोभिन्नत्वान्न कश्चिद्विरोधः ॥ २१ ॥ अथ प्रमासाध्यवसितामायां युक्तिमतिक्रम्याल्पवक्तव्यत्वाचाव-१५ हितीययुक्ति निराकर्तुमाह- यथाहि मुद्राङ्गद-कणादिपर्यायनाशेऽपि न हेमनाशः। तथैव मामरनारकादिपर्यापनाशेऽपि न जीवनाशः ॥ २२॥१८ हीति निधितं मुद्रा च स्वर्णमर्या प्रसिद्धा अगदं च वाहुभूपणं करणं च फरम्पणं तानि आदयो येप ते मुद्राहदकक्षणादयः एवं- विषा ये पर्याया विविधाकारभृद्वस्तुविशेपास्त्रेपां नाशेऽपि यथा हेतः २ मुवर्णस नाशो न भवति तथैव तेनैव प्रकारेण मांश्च मनुष्या अमराश्च देवा नारकाय नरकगतिनामकर्मोदयवर्तिनो जीवास्ते २३ - श्रीगौचमीयकाव्य , आदयो येषां ते माऽमरनारकादय एवंविधा ये पर्यायास्तेषां नाशे- ऽपि जीवस्यात्मनो नाशो न भवति । अयं भावः :-नरतिर्यगादिरूपेण ३यो मावः स जीवस्य पर्याय एव, न च पर्यायमात्रनाशे पर्यायिणो जीवद्रव्यस्यापि सर्वथा नाशो मतः, कथंचितु भवत्यपि, न हि मुद्रा- दिपर्यायमात्रनाशे हेनः सर्वथा नाशो दृष्टः, ततो नर-नारकादिसंसार- ६पर्यायनिवृत्ती मुक्तिपर्यायान्तरोत्पत्तिः जीवस्य स्याद्यथा मुद्रापर्याय- निवृत्तौ कर्णपूरपर्यायान्तरोत्पत्तिः सुवर्णस, इति न किञ्चिद्विरुध्यते, अत्र पुनर्विशेषार्थिना विशेषावश्यकवृत्तिर्विलोक्या ॥ २२ ।। अथ प्रदीपदृष्टान्तमावितां प्रथमयुक्ति निराकर्तुमाह- दृष्टान्वभूतेऽपि तव प्रदीपे न सर्वथैवाभिहितो विनाशः। यतः प्रदीपाइयवस्तुनाशेऽप्यनश्वरत्वं स्फुटमस्त्यणूनाम् ॥२३॥ हे प्रमास ! तवापि त्वन्मतेऽपीत्यर्थः, दृष्टान्तभूते प्रदीपेऽभिहित टक्तो यो विनाशः स सर्वथैव सर्वेरेव प्रकारैर्न विद्यते, कथञ्चिदेवा- नीति भावः । कथमेतदेवमित्याह--यतो यस्मात् प्रदीपाहयस्य १५प्रदीपनामकस्य वस्तुनः पदार्थस्य नाशे सत्यपि अणूनां तत्परमाणु- पुद्गलानां स्फुटं प्रकटं अनश्वरत्वमविनाशित्वमस्ति । प्रदीपानलस्वरूप- विनाशेऽपि तत्पुद्गलानां रूपान्तरतया परिणमनान्न सर्वथा विनाश १८इति भावः ।। २३ ॥ यदि सर्वथा प्रदीपवहेर्न नाशस्वर्हि विध्यातानन्तरं किमित्यसो साक्षान्न दृश्यते ! अत्रोचरमाह- आन्धनोपाधिवयो यथाऽग्रिः कृष्णं परीणाममियचिं धूमे। सेदवयाधणवस्तथैव पिछीर्य फापेन वमो मिलन्ति ॥ २४ ॥ १२ " २७७ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । उप समीपे आधीयते स्थाप्यते यः स उपाधिः, आई अशुष्क यदिन्धनं समित् स एवोपाधिस्तस्य यशोऽधीनोऽनिर्यथा धूमे घूमरूपे खविकारे कृष्णं श्यामं परीणामं परिणमनं इयर्ति ग्रामोति । समा-३ वात्वयं रकवर्णोऽपि पश्चादुपाधिवशात् कृष्णवर्णो भवतीत्यर्थः । तथैव तद्वदेव वयणवः प्रदीपाग्निपरमाणयः स्नेहक्षयाचलनिर्णाशात् विशीर्य खण्डशो मूला कृष्णस्य मावः कायं तेन तत्क्षणोत्पन्न ६ ऋष्णत्वपरिणामेन तमोऽधकार प्रति मिलन्ति ! अध्याहारलम्यप्रते- योगे तम इति द्वितीया । अयं भावः-विध्याते प्रदीपेऽनन्तरमेव तामसपुद्गलरूपो विकारः समुपलभ्यते एव, चि(पार चीसो पुरस्ताद्य-९ नोपलभ्यते तत् सूक्ष्मसूक्ष्मतरपरिणामभावात् , यथाऽञ्जनस्य पवनेना- पहियमाणस्य यत् कृष्णरज उडीयते तदपि परिणामसौक्ष्म्यान्नो- पलभ्यते, न पुनरसत्वादिति ॥ २४ ॥ चित्ररूपश्च मुद्गलपरिणाम इति दर्शयन्नाह--- व्याहि निर्वाणदशेन्यनाणून् गृहाति तद्गन्धगुणेन नासा । द्रव्यत्वतस्तेन समस्तमावा विनाशिनो नैव कदापि वाच्याः ॥२५॥ तथाहि । तदेव पुद्गलपरिणामवैचित्र्यं दर्शयति-दशा परिव १८ इन्यनं यस्य स दोन्धनः प्रदीप इत्यर्थः । निर्वाणो विघ्यातो यो दशेन्यनतस्य अगवः परमाणुपुद्गलास्तान् नासा नासिका गृहाति। केने- त्याह-तद्न्यगुणेन तेषां विघ्यातपदीपानां यो गन्धगुणस्तेन,२१ उभप्याहारेण सम्पस प्रवियुपसर्गस्य योगेनाऽष 'तमस्' इति चन्दस दिवीमा सर्पः। २ भयो विचार १५ २७८ श्रीगौतमीयकाव्यं तत्कालमेव तादृग्गन्धगुणपरिणतेरिति मावः । तेन कारणेन द्रव्यत्वतो द्रव्यत्वमङ्गीकृत्य समस्तमावाः सर्वपदार्याः कदापि कस्मिन्नपि काले ३विनाशिनो विनश्वरा नैव वाच्याः कथनीयाः। सर्वेषां भावानां पर्या- यरूपतयाऽनित्यत्वेऽपि द्रव्यरूपतया नित्यत्वमेवेत्यर्थः । इदमन तात्पर्यम्-वायुः स्पर्शनेन्द्रियस्यैव ग्राह्यः, रसो रसनस्यैव, गन्धो प्राण- रस्सैव, रूपं चक्षुप एव, शब्दस्तु श्रोत्रस्यैव प्रायः, तदेवं यथा वाय: ज्यादयः पुद्गला एकैकस प्रतिनियतस्यैवेन्द्रियस्य ग्राह्या मूला पश्चात्परिणामान्तरं किमप्यापन्ना इन्द्रियान्तरमाह्या अपि भवन्तीति ९खयमेवावगम्यते । तथा प्रस्तुता अपि प्रदीपगता आमेयाः पुद्गलाश्चक्षु- ह्या मूला पश्चाद्विध्याते तस्मिन् प्रदीपे त एवं तामसीमूताः सन्तो प्राणेन्द्रियग्राखतामुपयान्ति । ततश्च यथा अनन्तरोकस्वरूपपरिणामो- १२न्तरं प्राप्तः प्रदीपो निर्वाण इत्युच्यते तथा जीवोऽपि कर्मविरहितः केवलाऽमूर्तजीवस्वरूपलामलक्षणमवाधं परिणामान्तरं प्राप्तो निर्वाण उच्यते, तस्माद्दुःखादिक्षयरूपा विद्यमानस्य जीवस्य काचिद्विशि- १५टाऽवस्था निर्वाणमिति स्थितम् ॥ २५ ॥ अथ निर्वाणस्यैव स्वरूपं स्पष्टयन्नाह- सानादिवन्धच्युतिरेव मुक्तिर्यत्रो सेट्रव्यतयैव जीवः । चश्नचिदानन्दमयः परात्मा पत्पृथग्भूतमुवर्णतुल्यः ॥२६॥ अनादिः प्रवाहरूपेण आदिरहितो यो बन्यो जीवस्य कर्मणा सम्पन्धसस्य च्युतिस एव सा मुक्तिरुच्यते इति शेपः । सा केन्याह--यत्रं यस्यां मुक्ती सत्यां जीवश्चेतनो द्रव्यतया द्रव्यत्वेनैव सम्परूपेणेयेत्यर्थः, बासेत् उहसितो मवेत्, तदानीं पुद्गलजन्योला- १बर 'सानादिषन्धरयुतिः' इति पानीमुक्तिपाठः ।।

गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । २७९ ६ सामावादिति भावः । तदानीं कीदृशोऽसौ जीव इत्याह-चञ्चदि- त्यादि । चिच्च ज्ञानं आनन्दश्च निरुपाधिकप्रमोदश्चिदानन्दौ, चञ्चन्ती स्फुरन्ती यो चिदानन्दौ तौ सरूपं यस्य स चञ्चच्चिदानन्दमयः "च५ गतौ" भौवादिकोऽसात् शत, अत एव परः प्रकृष्टश्चासौ आरमा च परात्मा, तया दृपदः पापाणात् पृथग्भूतं यत्सुवर्ण काञ्चनं ततुल्यः कर्मोपाध्यपगमादिति भावः ॥ २६ ॥ ननु जीव-कर्मणोः योऽनादिः सम्बन्धखस्य कयं च्युतिरित्या- शायामाह- अनादिसंयोगवतोर्यधेटः पापाणधात्वोरनलेन मेदः। तथाऽऽत्म-कर्मव्यतिमेदसिद्धि ज्ञान-क्रियाम्यामवगच्छ विद्वन् ! ॥ २७ ॥ अनादिवासी संयोगश्चाऽनादिसंयोगः तद्वतोः पापाणपात्वोप- स्वर्णायोमेंदो भिन्नत्वं ययाऽनलेन वहिना कारणभूतेन इष्टोऽभिम- तस्तथा तेन प्रकारेण हे विद्वन् ! हे प्राज ! आस-फर्मणोय॑तिभेदसं १५ परस्परमिन्नत्वस्य सिदि निप्परि ज्ञान-क्रियाभ्यां करणम्ताभ्यां अब- गच्छ जानीहि ।। २७॥ मोशस सहावादिकं स्पष्टयति- मोक्षस्तु सन्छुद्धपदवशक्या खपुष्पवनय कदाऽप्यसन् सः । मुक्तस भूयोऽय न कर्मपन्यो मोक्षस्थितिस्तेन हि साधनन्ता २८ शुद्ध फेवलं यत्सदं मोक्ष इत्यादिलक्षापं तस.मारलं तच्छच्या गोशो मुक्तिस्नु सन् विपमान एवालि, परं सपुष्पं फायपुष्पं, २२ १२ 1८ २८० श्रीगातमीयकाव्यं तद्वत् स मोझोऽसन् अविद्यमानः कदापि कस्मिन्नपि काले नैवास्ति । खपुप्पस्य शुद्धपदत्वामावादसत्त्वं, नैव मोक्षस्येति मावः । अथ कर्म- ३क्षयानन्तरं मुक्तस्स मोक्षं प्राप्ठस्याऽऽत्मनो मूयः पुनरपि कर्मबन्धो न भवति, उद्धेतो रागादेः समूलकापकषितत्वात् , तेन कारणेन हीति निश्चितं मोक्षे मुक्तावस्थायां स्थितिरात्मनोऽवसानं साधनन्ता वर्तते, १ यस्या आदिरति अन्तश्च नास्तीत्यर्थः ॥ २८॥ ननु यदि मोक्षस्थितिः साद्यनन्ता नहि मोक्षस्यानादित्वं न भवि- प्यतीत्याशङ्कायामाह- ९उत्पद्यमानोऽपि यह कालः प्रयाहरूपेण मवेदनादिः । तथैव मोक्षः समकर्मघातादुत्पद्यमानोऽपि भवेदनादिः ॥२९॥ इहाऽस्मिन् लोके कालः समयादिरहोरात्रादिलक्षणो वा उत्पद्यमा- १२नोऽपि यया प्रवाहरूपेण अनादिः आदिरहितो मवेत् , तथैव मोक्षः समेषां सर्वेषां कर्मणां यो घातो विनाशस्तस्मात् उत्पद्यमानोऽपि अनादिर्भवेत् ॥ २९॥ अथ मोक्षस्यैव वर्णनमाह- तुच्छेन्द्रियनानमपि स्वदेहाद्भिन्नस यस्सास्ति गुणप्रकाशः। समस्तयोधावरणक्षयेण स तत्र तस्स प्रतिमात्यनन्तः ॥ ३०॥ तुच्छ सम्पूर्णज्ञानापेक्षयाऽसं यदिन्द्रियज्ञानं चक्षुरादीन्द्रियजन्य- शानं तदपि, आम्नाम् सम्पूर्णज्ञानमित्यपेरथः, यस्सात्मनः सदेहा. द्विग्नस सतोऽस्ति वियते वस्साऽऽमनः समखयोपापरणक्षयेन सकटमानानां छादकफर्मविनाशेन वत्र मुकौ स गुणानां शानादीनां विरोध्यम् ।

- . गौवमीयप्रकाशायटीकया सहितम् । २८१ प्रकाश उद्योतो अनन्तः प्रतिभाति भासते । मुक्तौ देहाद्विन्नस्यैवा- ऽवस्यानादनन्तज्ञानसद्भावाचेति भावः ॥ ३०॥ अन्यच, त्रिमागहीनखशरीरमाने क्षेत्रे स्थितिर्यस्य स विश्वमोला। विश्वेश्वरश्चिन्मयमूर्तिरेव स्पृष्टो निरायाधमनन्तमुक्तः ॥३१॥ विश्वस्य सर्वलोकस्य मौलिमुकुटमिव विश्वमौलितस्मिन् लोका-६ प्रवर्तिनीत्यर्थः । तथा तृतीयो भागस्त्रिमागतेन हीनं न्यूनं यत्स्व- गरीरं तन्मानमुन्मानं यस्य तस्मिन् एवं विधे क्षेत्रे सिद्धक्षेत्रे इत्यर्थः, यस्य देहाद्भिन्नस्याऽऽत्मनः स्थितिरवस्थान विद्यते इति शेषः । सर आरमा विश्वेश्वरखैलोक्यनाथः । कुतः ? चिद् ज्ञानमेव सरूपमस्या इति चिन्मयी सा मूर्तिर्यस्य स तथोक्त एव, यतश्चिन्मयमूर्तिम्नत एव विन्धधर इति गायः । पुनः अनन्ता एव मुक्ताः सिद्धानिराचार्य परस्परावापारहितं यथा स्लाचया स्पृष्टः, 'यवेकः सिद्धः तत्रानन्ताः सिद्धा' इति वचनात् । निरावापत्वं तु सिद्धानां सर्वपुद्गलसनपरि- त्यागेन अरूपिणि खसरूपे एवाऽवसानादवसेयम् ॥ ३१ ॥ इह पुनर्भगवान् प्रमासस संशयं निराफर्नु प्रादुप्कुर्वनाह-~- पेत्पुण्य-पापक्षयतस्तु मुक्तिस्तदा मुखं दुःखमुमे न कत्र । मुक्तस्ततो निस्मुख-दुःख एव व्योमेव साम्येति मतिं विमुत्र ३२० तुशन्द एवायें, 'चेयदि पुण्यपापक्षयवस्तु पुन्यपापयोः बादल मुकिर्मवति उंदा तय मुक्को मुखं दुःखं उने द्वे मी नमः, तो व्योम इस माकाशवत् गको मुलाला निकान्तः दुम्बा मिति निम्मलदुःसः, मुत-दुःसवर्वित एव प्रमोदीने ः १ २८२ श्रीगौतमीयकाव्यं ६ भावः-पुण्यात्सुखमुपजायते, पापाच्च दुःखमिति मवतामपि सम्म- तम् । ततश्च कारणभूतयोः पुण्य-पापयोः क्षये तत्कार्यरूपयोः सुख- ३ दुःखयोरपि क्षयान्निःसुखदुःख एव मुक्तात्मा प्रामोति, तत्कारणा- भावात् आकाशवत्', इति है सौम्य ! हे प्रभास! त्वं इत्युक्तपकारां मति वुद्धि विमुच्च परित्यज एतद्बुद्धि मा कृथा इत्यर्थः ॥ ३२ ।। अथात्रोचरमाह- यदस्ति देहेन्द्रियजं सुखं त- हुःखानुपङ्गाननु दुःखमेव । निरीहताख्यं च यदात्मसौख्यं निरीहसाघोरिव तत्र तत्स्यात् ॥ ३३ ॥ ननु इत्यामधणे, हे प्रमास ! देहेन्द्रियजं औदारिकादिशरीर-स्पर्श- १२नादीन्द्रियजन्यं यत् सुखमस्ति तत् दुःखानुपङ्गात् दुःखस्यानुसम्य- न्धात् दुःखमेव ज्ञेयमिति शेषः, यच्च निरीहता निःस्पृहता आल्या नाम यस्य तन्निरीहताख्यं आत्मसौख्यं आत्मनः सामाविकं मुखं तत् १५निरीहसायोनिःस्पृहमुनेरिव तत्र मुक्ती स्यात् । अयमर्थः-पुण्य- कर्मफलं देहेन्द्रियजं सुखमम्ति तच लोकव्यवहारात्सुखतया रूढमपि वस्तुतो मरणादिदुःखानुपशिलात्सर्व दुःखमेव, दुःखं तु पापफलत्या- निर्विवादं दुःखमेव । एवं च सति सर्व दुःखमेवास्ति संसारे न सुखं, वघ दुःसं सिद्धस्य सर्वथा क्षीणमतस्तद्विरदासिद्धस साभाविक निरूपममनन्तं युक्तिसिद्धमन्यदेव सुखमस्तीति न कश्चिद्दोपः ॥३३॥ अथ सिद्धमुखमेव वर्णयति- अनिष्टसंयोग-मयाऽमिलाप-रोगाथमावेन च यत्प्रसिद्धम् । पपत्सर्वविचेश्वरवोपलब्धं बदक्षयं सोख्यमनन्तमत्र ॥ ३४॥ . ma ९ गोतनीयवासायटीच्या सहिवम् । २८३ अनिष्टयोगध सनमिलपिवस्तुतंवर्गः मयं च मीतिः समि सापश्य इच्छा रोगध मान्यं ते नादयो चेपां जन्नजरानरणीनां तेऽनिष्टसंयोगमयामिलापरोगादयतेषां योऽनावसेन यत्सौत्यं मसिन वते, च पुनर्यत् सौल्यं सर्वविदः सबैजस भावः सर्वविता सर्व- नत्वं तया युक्ता ईश्वरता ऐवर्यन् , यद्वा सर्वविता एव ईश्वरता वया उपलव्यं प्राप्तमति तत् अक्षयमविनधरमनन्तमनन्तपर्यायोपेतं. सौत्यं अत्र मुक्तौ विद्यते इति शेषः ।। ३१ ॥ तस्यानन्तत्वमेव सष्टयति- समस्तसौख्यं तु जगत्रयसं यदेकराशीक्रियते कथंचित् । तथापि नानन्ततमेपि भागे वन्मुक्तसौख्यस्य तुलां विदध्यात् ॥ ३५ ॥ ३ तु इति विशेपे, जगत्रयस्सं त्रैलोक्ये विद्यमान समस्तसौख्यं सकलमुरासुरनरसुसं यदि कयंचित् केनापि प्रकारेण एकराशीक्रियते एकपुजीक्रियते, तथापि तद्राशीकृतं त्रैलोक्यमुख मुक्तसौख्यस सिद्ध-१५ मुखस्स अनन्ततमे मागेऽपि तुलां सादृश्यं न विदध्यात् न कुर्यात् , तदपेक्षयाऽत्यल्पवातदनन्ततमभागतुल्यमपि न स्यादित्यर्थः ।। ३५॥ तदेवं भगवता छिन्नसंशयः प्रभासः किं कृतवानित्याह- जगद्गुरोर्वक्त्रसरोजगर्भा- द्विनिर्गतानीति वचोऽक्षराणि । निशम्य सम्यक् परिपीय सचं शिवोत्सुकोऽभून्मतिमान् प्रभासः ॥३६॥ ..मन 'तमुफमुखस्य तुला इवि शशीमुद्रितपाल छन्दोऽनुरोधात्प्रामादिक।' ..

२८४ श्रीगौवमीयकाव्यं , इति इत्थं जगद्गुरोः श्रीवीरपभोः वक्त्रसरोजगर्मान्मुखकमलम- ध्याद्विनिर्गतानि वचोऽक्षराणि वचसः सम्बन्धीनि वर्णानि निशम्य ३श्रुत्वा तत्त्वं तद्तपरमार्थ सम्यक् परिपीय पीत्वाऽवधार्येत्यर्थः, मति- मान् बुद्धिमान् प्रमासः शिवे मुक्तौ यद्वा मुक्तिकारणे भगवद्गदिते मागें उत्सुकोऽभूदित्यर्थः ॥ ३६ ॥ ६ ततः समं शिप्यशक्त्रयेण प्रव्रज्य सापद्यविधेविरक्तः। पूर्वप्रबुद्धर्पिसमाजराजो दर्भासनं मेध्यमलञ्चकार ।। ३७ ॥ ततस्तदनन्तरं शिप्याणां शतत्रयेण सम सह प्रव्रज्य भगवत्पार्थे ९प्रयज्यां गृहीत्वा सावधविधेः सपापव्यापारतः विरक्तो विरतः प्रभासः पूर्व प्रबुद्धाः प्रयोघं माता ये ऋषयो गौतमाचा मुनयतेषां समाजः परिपत् तद्रूया या राजिः पतिः तस्यां मेध्यं पवित्रं दर्मासनं कुशमय- २२मासनं अलचकार शोभमानं कृतवान्, वत्रोमविष्टवानित्यर्थः । तदानीं दर्भासनं भवतु वा मा भवतु, परं साधूनां प्रायतत्संगवारहहणमित्य- वसेयम्, समाजेति। "समानः परिपत् सद" इति हैमः । १५ पवित्रं पारनं पूतं पुण्यं मेध्य'मिति च ॥ ३७॥ अथ समग्रमन्योकार्थोपसंहारमाह--- इत्थं मनःसंशयमार्जनेन श्रीवीरदचत्रिपदीमुवीजात् । १८ हत्यागपूर्वाणि गणाधिनाया एकादशापि प्रथिता बभूवुः ३८ इत्यमुक्तप्रकारेण मनस्सु गौतमादीनां हृदयेपु ये संशया सन्देहा- सेपां मानेन शोधनेन श्रीवीरेण दण या प्रयाणां पदानां समाहार- सिपदी 'उपन्नेह या विगमेह या धुवेइ यस्येवसरूपा पदत्रयी सा २५ एष मुशोमनं बीजं, तसा माहानि च मापारादीनि मापूर्वाणि बानि गौतमीयप्रकाशाख्यटीकयां सहितम् । २८५ कृस्वा । कृत्वति । कृपधातोः पूर्वकाले क्त्वा उदितासक्षे नेट् । अङ्गेत्यादि । 'अजाद्यदन्तम्' (२।३।३३) इति द्वन्द्वेऽङ्गशब्दस पूर्वनिपातः ॥ ३८॥ ततस्ते गणमृतः किं कृतवन्त इत्याह- विहृत्य भूमौ प्रतियोध्य सङ्घ चतुर्विधं वीरजिनाजयते । संप्रेषयामासुरिमं भवाब्वेनिस्तार्य मुक्ति त्रिदशालयं वा॥३९॥ ६ एते गणधरा वीरजिनस्य आज्ञया आदेशेन भूमौ पृथिव्या विहृत्य विहारं कृत्वा चतुर्विधं चतुःप्रकार सङ्घ साध्वादिसमूहं प्रति- बोध्य इमं सङ्घ भवाब्धेः संसारसमुद्रान्निस्तार्य, सन्मार्गप्रवर्तनादि-९ नेति शेपः । मुक्ति मोक्षं वाऽथवा त्रिदशानां देवानामालयो गृहं त्रिद- शालयः स्वर्गतं सम्प्रेषयामासुः नियोजयामासुः, प्रापयागासुरिति यावत् । तत्प्रतियोधिताः केचिन्मुक्ति केचिच खर्ग जग्मुरिति भावः। १२ संप्रपूर्वात् 'इप गतौ' इत्यस्माद्धेतुमण्ण्यन्तालिट् । आमि गुणे च कृते 'एङि पररूपम्' (६।१।९१) इति पररूपम् । इममिति । 'गति- बुद्धि-' (१।४।५२) इत्यादिनाऽणिकर्तुर्णी कर्मत्वम् ॥ ३९ ॥ अथ भगवतः कृत्योपसंहारमाह-- इत्यं तीर्थपतिः समेत्य विदिताऽपापानगर्यन्तिके रम्ये श्रीमहसेननामनि वने सन्दर्य विश्वेशताम् । मिथ्यात्वं परिमार्य याज्ञिकनृणां छित्त्वा च वत्संशयान . स्वीयं मुक्तिपथप्रचारचतुरं प्रावीवृतच्छासनम् ॥४०॥ तीर्थपतिः श्रीवीरजिनेन्द्रः इत्यमुक्तप्रकारेण विदिताया लोके प्रसिद्धाया अपापानगर्या अन्तिके समीपे रम्ये मनोहरे श्रीः पुष्पादि:२२ १५ - २८६ श्रीगौवमीयकाव्यं १ १२ लक्ष्मीस्तद्युक्ते महसेननामनि वने समेत्य आगत्य विश्वेशतां त्रैलोक्ये- श्वरत्वं सन्दर्य सम्यग् दर्शयित्वा याज्ञिकनृणां यज्ञकर्तृमनुष्याणां ३गौतमादीनां मिथ्यात्वं परिमाय संशोध्य, च पुनस्तेषां संशयास्तत्सं- शयास्तान् छित्त्वा निराकृत्य मुक्तिपथे मोक्षमार्गे यः प्रचारो जनानां सञ्चारणं तत्र चतुरं निपुणं स्वस्य इदं स्वीयं शासनं आदेशं प्रावीवृतत् प्रवर्चयति स्म । प्रपूर्वात् 'वृतु वर्त्तने' अस्माद्धेतुमण्ण्यन्ताल्लुङि चङ्ग । उर्चत् (७।४।७) इति गुणापवादपाक्षिकऋदादेशः । शासनमिति । 'आज्ञाशिष्टिर्निरानिभ्यो देशो नियोगशासने' इति हैमः ॥४०॥ अथ कविरेतत्काव्यस्याऽविच्छेदप्रवृत्त्यर्थमाशीर्वादात्मकमन्तिम- महलमाह- भव्याम्भोरुहबोधने दिनकरत्रिंशत्समा भूवले मोहाज्ञानतमोमरं विघटयन् यो धर्मराज्यं व्यधात् । यवाद्वाय निनाय जन्तुनिकर स्वर्गापवर्गालयं स श्रीवीरजिनेश्वरो भवतु नः सङ्घस्य च श्रेयसे ॥४१॥ मव्या एव अम्मोरुहाणि कमलानि तेषां चोधने प्रयोधोत्पादने दिनकरः सूर्य इव यः स तथोक्तः, 'हलदन्तात्०' (३।६९) इति सप्तम्या अलुक् पृथक्पदं वा, एवंविधो यः प्रमुतले पृथिव्या मोहश्च मूच्छीऽज्ञानं च कुयोघो मोहाज्ञाने तद्रयं यतमोऽन्यकार तस्य भरमतिशयं विघटयन् दूरीकुर्वन् त्रिंशसमात्रिंशद्वर्षाणि यावत् धर्मराज्यं धर्मसम्बन्धिसाम्राज्यं व्यधात् करोति स, च पुनर्यः २. ममुरदाय शी जन्तुनिकरं भव्यजीवसमूहं स्वर्गापवर्गालयं त्रिदिव. मोक्षम्यानं निनाय प्रापयति । स श्रीवीरनिनेश्वरो नोऽस्माकं च "पुनः सदस्य साध्वादिसमूहस्य पतुर्विधस्स श्रेयसे कल्याणाय भवतु १५

२८७
गौतमीयप्रकाशाख्यटीफया सहितम् ।
सम्पद्यताम् । समा इति । 'वर्ष हायनोऽन्दं समाः शरत्' इति हैमः ।
'कालाध्वनोः' (२।३१५) इति द्वितीया । अहायेति निपातोऽयं
'मवहाय च सत्वर मिति हैमकोशोक्तेः । निनायेति । द्विकर्म-
काण्णीज् भूधातोः कर्तरि लिट् । श्रेयसे इति । 'क्लपि संपद्यमाने
च' (वा.) इति चतुर्थी, इहान्तिमं काव्यद्वयं शार्दूलविक्रीडित-
छन्दोऽलङ्घतं, तल्लक्षणं तु प्रागुक्तमेवेति ॥ ११ ॥
अथ कविः काव्यवर्णननामाख्यानपूर्वकं सर्गसमाप्ति कथयति-
इति वाचनाचार्य श्रीदयासिंहगणिशिष्यकविरूपचन्द्रविरचिते
गौतमीये महाकाव्ये मेतार्यप्रभासदीक्षाग्रहणवर्णनो
नामैकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
इति स्पष्टम् ।
तत्समाप्तौ च समाप्तोऽयं ग्रन्थः।।
इति वाचनाचार्यश्रीमदमृतधर्मगणिविनेयवाचनाचार्य-क्षमाकल्याणगणि-
निर्मितायां गौतमीयप्रकाशाख्यायां गौतमीयमहाकाव्य-
व्याख्यायां एकादशः सर्गः, तत्समाप्तौ च समाप्तेयं
-
९
व्याख्या ॥११॥

२८८ श्रीगौवमीयकाव्यं अथ अन्यकृत्कृता प्रशस्ति । -- ९ अथ संवत्सरादौ यस्मिन् पुरे यदाज्ये चेदं काव्यं यादृशेन च ३सता कविना निर्मितं तत्सर्वं खयमेव ग्रन्थकृदाह- संवच्छैल-वियद्गजोमुप(१८०७)मिते मासे सहस्साऽऽदिमे पक्षे दक्षसुताधिनाथदिवसे शुद्धे वतीयातिथौ । ६ श्रीमद्योधपुरे कमध्यजरयौ श्रीरामसिंहे नृपे श्रीमच्छ्रीजिनलाभमूरिगणभृद्राज्ये पुनर्धार्मिके ॥१॥ विद्याचारवरे गणे खरतरे श्रीक्षेमकीय॑न्वये सञाता भुवि शान्तिहपंगणयः श्रीवाचकाख्याभृतः । तच्छिप्या जिनहर्पनाममुनयो वैरङ्गिकाग्रेसरा- स्तच्छिष्याः मुखवर्द्धना अपि दयासिंहास्तदीयास्तथा।।२।। तच्छिप्योऽभयसिंहनामनृपतेर्तब्धप्रतिष्ठो महा- गम्मीराऽऽहतशास्त्रवचरसिकोऽहं रूपचन्द्राहयः । प्रख्याताऽपरनामरामविजयो गच्छे स दत्ताख्यया काव्येऽकार्पमिमं कवित्वकलया श्रीगौतमीये श्रमम् ॥३॥ दोपाः शब्दसमुद्भवाः कतिपयालकारदोपाः पुनः पघेवेपु मम प्रमादयशवथेत् सम्भवेयुः कचित् । मागीमायलपः । १ पन्द्रमायरे इत्यर्थः। २ण्येटी। "पान्टहगमः' इति वाशीमुदिते पाटः पोऽसंगो सेयः । पिएगाईलमधेशः। १५ ५'वीरो २८९ गौतमीयप्रकाशाख्यटीकया सहितम् । गीतार्थास्तु तथापि युक्तिकविताकार्ये श्रमं प्रेक्ष्य मे 'साधो ! साधु कृतं त्वये ति ददतामुत्साहमेवेप्सितम् ।।४ एतत्पद्यचतुष्टयमपि स्पष्टार्थमिति न व्याख्यातम् । ॥ इति ग्रन्थकृत्कृता प्रशस्तिः॥ प ॥ अथ टीकाकृत्प्रशस्तिः॥ बाहुज्ञानवसुक्षमा (१८५२) प्रमितिजे वर्षे नमस्युज्वलै- कादश्यां विलसत्तिथौ कुमुदिनीनाथान्वितायामिह । श्रीमजेसलमेरुनान्नि नगरे श्रीमूलराजेश्वरे राज्यं कुर्वति यादवान्वयरवौ सन्न्यायमार्गाश्रिते ॥ १ ॥ श्रीदेवार्यपदाजसेवनपटुश्रीमसुधर्मान्वये पूज्यश्रीजिनचन्द्रसूरिमुनिपे गच्छेशतां विप्रति । श्रीमत्पाठकरूपचन्द्रवचसामर्थप्रकाशे क्षमा रम्याऽसौ परिपूर्णताममजत व्याख्या सदाख्यानमृत् ॥ २ ॥ प्रारव्या निधिनेत्रसिद्धिवसुधा (१८२७) संख्ये मुसंवत्सरे याऽऽसीत्सद्गुणमाजि राजनगरे श्रीगुर्जरत्रावनौ । पूज्यश्रीजिनलामरिसुगुरौ सैद्धान्तिकानुचरे सद्भुया समयोचितेन विधिना गच्छावनं कुर्वति ॥ ३ ॥ त्रिमिर्विशेषकम् । १२ १५ १ भादपदमासे। २ चन्देण युक्तायाम् । ३ मूलद्धचसाम् अर्थप्रकाशने समर्या-क्षमा अत एव रम्या इत्यर्थः । १९ गौरका २९० श्रीगौवमीयकाव्यं 7406 श्रीमन्तो जिनमंतिसूरिगुरवश्चान्द्रे फुले जज्ञिरे तच्छिया जिनलामसूरिमुनिपाः श्रीप्रीतितः सागराः । तच्छिष्या गुणराजिराजितमहामज्ञाः सुसंविमकाः श्रीमन्तोऽमृतधर्मवाचकवरा जाता घराविश्रुताः ॥ ४ ॥ तच्छिप्यो वरधर्मवासिवमतिः प्राज्ञः क्षमापूर्वक कल्याणः कृतवानिमां कृतिजनखान्तप्रमोदासये । बुद्धेर्मन्दतया प्रमादवशतो वा किंचिदुक्तं मयां- ऽत्राशुद्धं परिशोधयन्तु सुधियो मिथ्याऽस्तु मे दुप्कृतम् ॥५॥ ॥ इति टीकार्वा प्रशतिः॥ ८ ॥ इति श्रीगौतमीयप्रकाशः सद्भिः पठ्यमानचिरै नन्दवात् ॥ श्रीः॥ 1130 इति श्रेष्ठी देवचन्द्र लालभाई जैनपुस्तकोद्धारे पन्याः ९० ..

गौतमीयकाव्यस्यश्लोकानामकारादिक्रमेण सूची। पृ. 'टो. ५० ७८ ६ पृ. सो. पं. अनादिकमानि तदा- २३० ३३ १२ भकता निगुगो १५१ ३२१९ अनादिनिघ्याल. २३० ३२ मक्षाणा परतत्रता- १६७ ६. १३ अनादितो मृन्मिलित २२९ ३१ अमिमतिरपि वाक्य. १८३ ८१.अनादिसंयोगवतो- २७९ २५ अगृहीताऽपि सम्यन्ध १६३ ५३ १५ अनिष्टसंयोग-मया- २८२ ३४ २२ अचेलता विघ्रदपि ३९/अनुमानगर समायं १७४ ७१.१ अत मारेकचे तत्रा- २४३ ५ अनुमानाद्गृहाणेव- १६२ ५२ २० अत उपरितनाम- अनेकतूर्य निःस्वनानु. ५२ २९ ११ मत्येत परीतोषो. २४५ १६ १७ अन्यथाऽनुपपत्त्यैक- २४८ १७ २ अतो धनं मस्त्ये १९११५ अपरमरपहस्य चेदु- ६.२८ २ भलन्ताऽनुपलब्धे. २५७ ३.६ अपेक्ष्य भावं परम- २१५ १२ १८ भयुप्रपापहफलोप- २३९ ४९ १७ अमापत जगवायो- २४२ अत्राति दुतरपक्ष- २६६ ६१६ अमण्डपंच दारहवं ७४३९२. अप पवनकुमार ३९१२ अमूर्तत्वे प्रकलं २५५ ३३ १७ अपर्जुवाकानी ६२ १२. अर्थः किं वा मवे. १५६ ७७ १८ अप विज्ञाय भगा- १३३ ११७ अरूपिनि थ्योमनि २३१ ३५ . अप भुत्वेन्द्रभूला- २४२ अवसरमुरमुख अपारमन्यममु. अविरलालयाकृती अयोरियायारगरो- १ २ अविस्दोऽपि मोहातै १४१ १६ भयो दमित्रीमुपमूल ९५ ३१. मशरीरे वनन्द वा १५१३० , भाटायेऽपिकि १६७ ५९ अधीन यन्मन्त्र.. १.५ १५ मपीतयों पड सर्व. ८५३ ५ ममदेजो न विप- १ ६१५ अघोगटानिष्ट ७५ १३असितमपि गौवस्य १५११. मनम्बर मात्र हे २७ १५११मति स प्रस्ट एवं २०६४९.४ १ ३ २९० श्रीगाँवमीयकाव्यं 7406 श्रीमन्तो जिनमेतिसूरिगुरवश्चान्द्रे कुले जज्ञिरे तच्छिष्या जिनलाभसूरिमुनिपाः श्रीप्रीतितः सागराः । तच्छिष्या गुणराजिराजितमहाप्रज्ञाः सुसंविमकाः श्रीमन्तोऽमृतधर्मवाचकवरा जाता धराविश्रुताः ॥ ४ ॥ तच्छिप्यो वरधर्मवासितमतिः प्राज्ञः क्षमापूर्वकः कल्याणः कृतवानिमां कृतिजनस्वान्तप्रमोदातये । बुद्धेर्मन्दतया प्रमादवशतो वा किंचिदुक्तं मया- ऽत्राशुद्धं परिशोधयन्तु सुषियो मिथ्याऽस्तु मे दुष्कृतम् ॥५॥ ६ : ॥ इति टीकाकृतां प्रशस्तिः॥ ॥ इति श्रीगौतमीयप्रकाशः सद्भिः पठ्यमानधिर नन्दतात् ॥ श्रीः । 7406 इति श्रेष्ठी देवचन्द्र लालभाई जैनपुस्तकोद्धारे ग्रन्याः ९० गौतमीयकाव्यस्यश्लोकानामकारादिक्रमेण सूची। पृ. श्रे. पं० . ७ पृ. लो. पं० अ अनादिकर्माणि तदा- २३० ३३ १२ भको निर्गुणो १५१ ३२ १९ अनादिमिथ्याल २३० ३२ भक्षाणां परतन्त्रला- १६७ ६. १३ | अनादितो मृन्मिलितं २२९ ३१ अमिभूतिरपि वाक्य. १८३ ४१. अनादिसंयोगवतो- २७९ २७ भगृहीखाऽपि सम्बन्ध १६३ ५३ १५/ अनिष्टसंयोग-मया- २०२३४ २२ भलतो बिभ्रदपि ३१ अनुमानात् खसाध्यं १७४ ७२.१० अत आरेकसे तत्रा- २४३ ५६ अनुमानाद्गृहाणैव- १६२ ५२२० अत उपरितनाम ५२ २३ ६ अनेकतूर्यनिःखनानु. ५२ २९१ अत्तम परीतोपो- २४५ १६ १७ अन्ययाऽनुपपत्त्यैक- २४८ १७ भतो पनं मत्पये ६९ २१ १५/ अपरसुरप्रहस्य चेदु- ६.२८ २ भसन्ताऽनुपलब्धे- २५५ ३.६ अपेक्ष्य भावं परम- २१५ १२ १८ मत्युमपापगुफलोप- २३९ ४६ १७ | अभापत जगमायो- २४२ मनास्ति चेदुतरपक्ष- २६६ ६ १६ भमण्डयंध ताण्डवं ७४३६२. भय पवनकुमार- १ २ अमूर्तत्वे स्वकर्तृत्वं २५५ ३३ १४ अथर्जुवालकानदी- २ अर्थः किया भवे. १५६ ७७ १८ भय विज्ञाय भगवा- १३३ १ १९| अरूपिणि व्योमनि २३१३५ अप भुत्वेन्द्रभूत्या- २४२ १. अवसरमुपभुज्य अधारणेमन्यसमु १४ ३१ ५ अविरलवलयाकृती. १ भयोदियायारणरो- २| विरुवोऽपि मोहाते १४१ १६ १६ भयो हवित्रीमुपएस ९५ ३३१.शरीरं वसन्तं वा १५१ ३. भारत्वेऽपि किं १६७ ५९ अभीष्म यन्मन्त्र-. १०५ १५ अधीतपूर्या सल सच- ८३ १३ ५ सप्रवेजो न विप. अधोगतानि कष्ट ७३ ३३ ११ अखितमपि जीवस्य १५१३. भनन्यरर भावे २४७ १५१ मखि स प्रस्ट एव २०६१.४ १ ८ ७ १ गौतमीयकाव्यस्य ८ ९ 'पृ.लो. पं० पृ. लो. पं० मस्तु मे गमनमग्रतः १२४ १९ १२ इत्थं महोत्सवमयीव ७६ ४१ भस्तु वा चेतना लिङ्गं १४४ २० ९ इत्यं यज्ञगृहे जनस्य १३२ ३९ २० अस्य विक्षपतिदर्श- १३२ ३८ १० इत्यं वदत्खेव तदा १०५ १६ १५ अहंप्रत्यय एकोऽपि १५७ ४३ २ | इत्थं संशयघातकानि १७९८१२० अहमहमिकयाऽथ ४९ १९१७ इत्थमात्मदि संशय. १९५२९ १२ आ इत्थमात्मानुमित्यापि १७१६६ १० थाजुहाव विभुरप्य. १९७ ३३ ११ इति पवनकुमारदेव-. ४२ भाभाष्य तं वीर- २ ३ | इति प्रणय किन्नरा आन्धनोपाधिवशो २५६ २४ २१ इति ब्रुवत्येव तदा १०९२५१५ आः। एप मायी ११२३१ ७ | इति श्रुखा युक्ती २४१ ५१.५ आकस्मिको व्योमनि १ १२ इवि सल्पयन्तं तं १५५ ४. १२ मापाशवदगूर्तत्वे २५४ ३१ २१ इति सरभसमुद्यन्मा- ११६ ४१ १९ आगच्छ मो पण्डित ! २२४ २७ १२ इति हृदि कुविकल्प- २०६ ४७ १५ माच्छादितो यद्यपि २५२६ ९ इत्यात्मा देशतस्तेऽपि १६२ ५१ भातपत्रमिव दण्ड: १३१ ३६ ६ इत्यादियुक्तिप्रतिवन्ध- २६२ ५१ २१ आरमनो मोक्षकार्याय २५० २३ १६ इत्यादियुक्तिभिः २५० २२ मात्मसाश्यमाविभ्रव १५२ ३३ मादिमनियताकारा १६४ ५५ इत्युकवाक्येन गुरोः १०४ १४ २० ९ इत्येवं विमृशत्यस्मिन् १४० १३ मायातु यात्वेप ११४३६१३ इन्द्रजाल कुनुकं कृशा- १२१ १० ४ भारपचरथ तो स इन्द्रजालरचना विव• १२४ १८ ११९ ५ ६ भालुलोकदपचापलं १२५ २६ १ इन्द्रभूतिमय सोदर- १८१ १ २ इन्द्रसूतीति मे नाम १३६ इत्थं ज्योतिशेमय इत्थं तत्फलकुमुम.. ३७ ४१ १६ इन्द्रियाणि पराग्येवा २४६ १२ ११ इयं तथाऽसारथ्य- १.१ ७ ११ इर्मा समारुन मुरा- इथं वीपतिः २८५ ४.१७ इह पुनरपि गुध. ३ इथं माथाऽगमन. ६.३९ १३ एपं मनःसंशयमा. २८४ ३८ १७१ ईश्वरः सगुणो यग्नु १९९.५० १ भारभ्य सर्गस १ ९७ ३८ १९ इन्द्रभूते ! स्त्रमा : लोकसूची पृ. लो.. पृ. सो. पं. ९ ईघरी निर्गुणो यो वा १६५ ५६ क कर्मसापनमदोऽप्य-१५ १२ उणादिकोशशब्दों २४५ कर्मसिदिस्वमिभूतेः २५७ ३८ १३ उत्कृटमुसमोगाय कर्म सिध्यतु-पर २४८.१८ १. १९२ २४ ។ उत्पत्तिमत्त्वार्वेभ्यो १५१ ६८.२१ किंवा स्वासिसानि १३० १० ११ उत्पद्यमानोऽपि ययेह २८० २९ क्रियाविदोस्तरसहज १. २५ १९ उत्पादः संशयस्यापि १५८ ४५ १० | कीर्तिलाभफलमस्त्यय १९. २० संद्रीयमुत्प्रेषितचित्त- ९९ ३ १४ पुत्रापि सान्द्रहमजा. २५ २९ १६ उपपत्तिविनाऽस्मानं १५३ ३४ गुरुत फुरुत रे रजो. ३९ उपयोगो हि लि मुशासनस्था: पुश- ९३ २९ उपात्तवृत्तान्त इतो ११० २६ | कृशानोमवहितं किं १४१ १९ २. उपाददानो हविरुद्ध- ९६ ३६३. कैरप्यमात्योऽरिमिर- १०० २१ २० उपांशु स्थितमेत- कोऽस्यसो पुरयर- १८२ उपेक्ष्य मा कानाधान २५४ २१ क्षणन परतावुद्धि- १७४ ७१ २२. ४ ३ २२ गजेन्द्रगला च तत- गगनमृतजलच्च्टा- ३ ऋतुस्तदान्यानपि गन्धहस्तयुपमयोप- १९६३११० एतदहतमुद्रक्ष्य १२८ ३. २, गर्जलयं तायदात्त. ११४ ३७ २१ एतदेव महसेन यनं 110 ३१२ | गीत पेदे च परी-१२१ २११. एतेषु च व्योमचरेषु १११ १२ १९ गुणी प्रत्यक्ष एव एवं प्रमाणाविषयो १५३३५ ८ गृहाण सोम्योत्तर- १२८ . ६ एवं विकायहुमश- २७४ २. ९ गृहीतहट्यो ज्वलन एवं संसयसद्भाग- १५.६५४ गोपुरं च रचिर १२३ १७॥ एवमेव मुरा- २०४ ४४, गोतमेस्समिधान मे १६ एका वेदपदानां यत पनि रिवर पाव. १८३ ३ घनघटाग्छोटनदो २१ २८१९ THAN 20 गौतमीयकाव्यस्य पृ.लो.पं. ६ पृ० लो.पं. तकियामुदयजामधि- १८९ १९ २० चतरपु च कपुंसु ४८ १७ १२ | ततः पुण्यं च पापं २६१ ४९ २१ चतुर्दिशासु चामरावली ६९ २० ततः प्रभासावयपाठ २७० १४ २० चन्द्रातपे भूतिचन्द्र-२८ ३. १४/ ततः संज्ञाऽपि न १७२६६ १ चित्रमेतदपरं विलो. ११८ ४२१ ततः सदीवारिकदेव- ९३ ३० १६ चेत्पुण्य पापक्षयतस्तु २८१ ३२ १७ | ततः समं शिष्यशत- २८४ ३७ चेखभावमवलम्ब्य २०५ ४५ १० ततः सुधर्माऽपि २ चेदामहः कारण २२२ २३ ततः सुराणामिह १०४ १३ चेद्विशिष्टपवनाऽनल. २.१ ४.२० ततोऽनुकूलमारुतेरित ६६ १२ ११ तत्र मूलमनुकृत्य १३१३७ १८ तत्र वप्रवलये सम. १२५२१ ६ छात्रैः समं पञ्चशतैः १२० १९ १|तरवे जडखाद्गतिरी- २३७ ४५ ३ छायामरेणोच्छ्रितम्- ३७ ४० १ तथाऽऽदि-मध्या २१८१६ ३ ज तथा धुतेषु विश्रुतान् ७५ ३७ जानुदनकुमुमोच्चय- १२४ २० १९ तथा सामान्यतो १४६ २४ जगद्गुरोर्वक्त्रसरोज- २८३ ३६ १७ तथा सुरा व्यन्तरका २३८४०१ जगाद चैवं जगदी. १०७ १९ १/ तथाहि निर्वाणदो- २७७ २५ १४ जगाद जगतो नाथ: २५१२४ तया हि वीणाकणनं १०८ २३ १६ १ जयाय धर्मचक्रिणः ६५१११९ तथा ह्यकुम्भव्यतिरि- २१० २ जिनेन हेमपनयोः तथैव वामपार्श्वत: '७१ २७ २० जीवस्यापि परीणाम: २६१४८११ तदनु तणतणायमान.४३ ९१९ जीवस्तथा निति वदा निनेदुर्दिवि तूर्य- ८० २७३१८३ ज्योतिष्कक विच- २३६४१२ तदारवानुमानजावधि- ११ ५१३ सला पुनः संच पर २१११६१८ तदा रसावलाधिगा तदुपरि कपिशीर्थ- त तदुपरि विलसत सिता-४११०३ तकदमीरनिःसनो २ १२ | तदुदहन्त ऐवरासनं ६५ १६ १७ ३१ | तदेवभूत्यादिभि २७० ४ वच्छिम्योऽमयसिंह- २८० श्लोफसूची पृ. लो.५० • लो.. ६ तद्धनेर्मधुरिमाऽति- १२६ २३ ३ दृश्येत गन्धर्यपुरं १ तनोः सजातरूपत्वात् १६० १२ १६ दृष्टमेव रमणीपरि- १८५१३११ तमेव दम्याः प्रतिवा-२६५ ३ | दृष्टहेतुकलने व्यमि- १८७ १८ १५ तव प्रत्यक्षविज्ञाने २४७ १४ ४ दृष्टान्तभूतेऽपि तव २७६ २३ १. तयाऽस्ति सिसिः ७२२८ ६ दृयन्टे मूर्ततां वीक्ष्य १६६ ५८ तावदात्मनि सन्देह- १४२ १७ १. देवाधिदेवोऽम्यवद. २०१५ तावद्विदिखागममस्य दोषाः शब्दसमुद्भ- २८८ ३ २२३ द्वततरमप विक्रिया. ४० तुच्छेन्द्रियज्ञानमपि २८० १० १६ द्वारोपचारतयेतदपि २४६ १११७ तुरीयगतिरुच्येत २४३ ४ ४ द्विजाभयोऽभावसरे ८१ ५ तेनायमारमा प्रति. २६९ १२ १२ त्रिदिवमुरविकुर्वणान• ५२ २४ २१ | धूमान्योरपि सम्ब- १४५ २१ ૨ निभागहीनखशरीर- २०१३१ ४ घजोऽन्तरिक्षगोऽच. ६६ १३ १३ त्रिलोकनाथमन्दिरं ७४ ३५ १३ घस्ते तु धर्मे जातो ११३ ३१ खदप्रत्यक्षेऽपि तथा २४४ ४प्याने पैर्वा बहुभिः १.३ १२ २३ समाच्यख वा मा १४१ १५ २३४४१२१ नगानुष ३०३२ सरितमय पिशाचभूः ४५ १२ १५ नटननिपुणसालमजि. ४८ १६ १ नमस्खलं पुष्कलमन्य- १९ द नमो नमोऽस्तु ते प्रभो ६४ ददिह विपुधैः न लौकिकालौकिक- ८६१० दर्शनीयमिह नास्ति १२१ १२ १२ / नाट्ये यपेको भरतो २२३ २५ दयन्यपीन्ये खळ १४ १७ १८ नामवेत्ता च लोकानां 0 दिक्पतुष्यनिगमा- ११.२४ १३ नारकैरुपमेयाः स्यु २४९ २. नितम्बिनीनां परिरम्म-१३ १२ २. दिव्युरलाइन्दुमि १४ १५ १२ नित्यान्तरिसप्रमि- १.. ५११ दिशः प्रसादमासद ६९ २२ २२ निमश्रिता या सम-1010 ३ स्पो यया निवि- २७२ १.२. निर्जित्य भाष. ११६४.१२ पिंघलमपि पिलिप- ११९ ६१५ निर्माय सो नाहमा १११२८ . रोरिसता या नरमा- १५१४ १५ निर्ययावयमपीति ४ समूहसे नैरयिका २ ४ ९ गौतमीयकाव्यस्य १. यो.पं. पृ. सो. पं. निरन्तरधेतसुमोघया. १८ १८ २२ पृथक्पृथग्वधरावला- ८२ १२ १६ निरीक्ष्य तानाशुगति- १०६ १७ ३ प्रणीय जानुसंमिता ७५ ३८ ११ निशम्य युक्तीरिति वीत२३३ ३८ ३ प्रतिप्रभुं सुराङ्गनाइव- ७३ ३१ ३ निशम्य युक्तीरिति वीर२१९ १७ १ | प्रतिदिशमुपनीयते स्म ४७ १५ नीलाम्रलम्ब्याचित- २२ २३ २१ प्रतीत्य मयि साश्यं १७९८० ३ नैकान्तदुःखमोक्कार- २४८ १९ १९ प्रतीहि देवानपि २६७ भ्यघीयतास्यैव वराह- ७९ ७ १७ प्रत्यक्षं मन्यसे यत्त्वं २४४ ८१२ नमोऽस्वनन्तशक्तये ६४ ८ १७ प्रत्यक्ष मानसमा १६१४१ प्रत्यक्षतः पश्य मनो-२३५ ४३ २१ पदार्थाकसिकोत्पत्ती २५६ ३५ १३ प्रत्यक्षीकृतमैश्वर्य १३८ । ३ पपाठ वेदान् यदधील ८६ १९१६ प्रत्यक्षेण प्रमाणेन १४२१७१० प्रथमवरणतो धनु:- प्रकटं वीक्ष्य ज्योति- २४३ ३ २ ५३ २५ १ प्रगदितमितिभूमिको ५४ २८ १९ प्रफुछिसन्ध्याभ्रसमैवि.१०२ १० प्रभो। चिरं जीव परस्परविरोधिन्या. १४८ २६ पश्यन्तु भो भो प्रम- १२ ११ प्रमाणदृष्टान्त वितर्क ८८२१ पानीयचन्द्रप्रतिविम्ब-२६५ ४ १८ प्रलम्बजम्बूसहकार २३ २४१६ पिता स पुत्रश्च पिता २३० ३४ १९ प्रलम्बमानमौक्तिका- पुण्यपापद्वये सिद्ध प्रसाध्य सूत्र(वतो . ९२ २८ १५ २६२ ५० पुष्पमेवाऽखि दुःखं २५१ २५ १४ प्रस्थितोऽय वरगुर्व- ११७ पुनरपि पुरतोऽपि ५७ ३४ १४ प्रवृत्तिमार्गाप्रयिमूढ- ३७५ २१ पुरःसरोऽसौ पदवा. प्रशस्तकाले दिन लम- ९१२७ १९ ८४ १५ पुरःस्थिता थपि दुमाः ७१ २५ प्रामुखलेषु प्रसवेषु ३२ ३४. पुष्पधिया किंशुकपाद. १७ १६ प्राग ये स्थिताः श्रीवियु-६ ५ १३ ९ पुरा निपीय लोचनेः ६४.६ ५ च पुप्पः फलेवा युगपत्स. ३५३८ १३ बद्धो हि जीवो विव- २२५ २८ २. पुरल-पौत्रस-पितृख-२१५ १४ ६ पहिरवततचेतनप्रदेशः ५.२.१. पूनिटे शास. ११३ २२१ बोधिदम्वनिविमोहितं १२८ २८ २ १ ९ ४ ។ ३ लोकसूची ७ ४ ४ पृ. सो. पं० पृ ००० ब्रह्मा न विष्णुन १११३० २१ ब्रह्मेश्यवादे परकर्म- २६९ ११ ११ यं वृहस्पतिरपि १८१ यः कचिदर्थः सच २१० ५१२ म यच्च धित्सति पयः २०३ ४३.१७ भव्याम्भोरुहबोधने २८६ ४१ ११ | यचिन्तितं इंटमंथा- २१३ ८९८ मानुमानुभिरुपैधित- १२३ १६ यच्चैतना मौतिकदेह- २६४ ३ १८ माने भावोपमैव स्यान्न २४९ ११ १५ यज्ञपाटकमतील मुरा १८२ मो मौर्यपुत्राऽमर- २३४ ४० २ यत् कारणेनाऽनुगुणं २२१ २२ १८ भौतिकेन्द्रियविभावि- २०२ ४९ ९ यत्तवाऽप्रकटमस्ति १८४ ११ १४ भ्रातरं मम महान्त- १८१ ३ २० | यन्निर्गुणो नैव २३२ ३७ श्रमददीयन्त्रजल २० २० ११ १ यत्संशयच्छिवगदे- २१९ १८ १२ म यत्सुरासमवाय १९७३४२१ यत्सोगतानामिति २७३ १९१७ मणिमयतपनीयवप्र- ५६ ३१ ३ यथाऽऽत्मपरिणाम- २५८ ४१ २० मणिमयवरणाऽप्रमाल. ५३ २६ २० यथा रसो व्यापिपर- ३१३३ २ मधुकरकुललीटमच- ४६ १४ १९ यया स्थानान्तरप्राप्ति १४६ २३ ३ मधुरमतितरां जगर्न ४३ ८ ११ यथाहि मुदाऽजद- २७५२२ १७ मन्दिरे वचन पञ्च- २०२४२ १९ यदति देहेन्द्रियजं २८२ ३३.७ मन्मनोमलविशोधन- १९५ ३२ ४ यदहं संशयच्छेदी १४० १४ १५ महस्यमुत्र केचन ७५ ३९१७ | यदि चाचपमेव १६१५० १७ मा प्रहीदिजवरेवि १९० २११८ यदृच्छयाऽऽक्षिप्त विधेः ८७२० मात्रया क्षिति-जला- २०० ३८१६ | यद्यदात्मगुणधर्मवि- मायोपमतं यदवादि २४० ५० मैदे बारा १७४.२६.११ मुग्धेषु लोकेषु कुनो ११३ ३३ ८] यथदात्मगुणधर्मवि- मुहः मुरोद्देश्यकहव्य- . ९७ ३७ १० भेदे भिन्न १९५२७ -१ मूर्तखाद्वा जदयाद्वा १५८ ४६ २० । यद्यप्यसत्प्रस्तुतमिन्द्र- ११३ ९२१ मुदन-वीणा-पणवा- १.२ ११ ९ ययादि पनिटापरि- १०६ १४.१२ मृदपि धनजल्यभियि ४४ १० १२. यद्विनान्यवनुसंभव .१८८ १७.४ मोक्षसु सन्छुदपद- २७९ २८ १९ यन्मनोमल. • १९७ ३२४ न ९ ८ गौतमीयकाव्यस्य पृ० श्लो. पं. 7 ७ ४ ८ पृ० श्लो.पं. यम्मन्यसे ब्रह्मकृतः २६८ वादाय नेद प्रम ११६३९१ यागो हि सावद्य- २७११६ ८ वायुभूतिरथ तल्लघु- १९६३. ९ या च काचन सचेत. १८८ १८ २० / वायु-बहिविकले मृत. २०१ ३९१. या च धचिरसती १९९ ३६ ५ विकल्पोऽयमपि २५९४२ यावद्विकल्पः सन्देहो १५४ ३८ १७ विचित्ररत्नमण्डितं ततो ६७ १४ ये मुन्दरीणां मुख• १. १०२१/ विजृम्भमाणमालती. ६८१८ ये विवेकविकला १२५ १२ १५ | विज्ञातुमिच्छन्ति १०७ २०२१ यो गभीरजलवाह- १२२ १४ १३ | विज्ञानधन उत्पद्य १४८२८१८ योग्यतापरिणतं खल १९५ २८ ८ विज्ञानघन एवेति १४८२७ १६ विज्ञानमय एवं हि १५५४२ २२ रतपीठमय मध्य १३० १५ २२ | विज्ञानमुपयोगोऽत्र १७१६४ १९ रसवप्ररमणीय- १.विद्याचारवरे गणे २८८ २ रतिर्गतावेव सहा. ११ विद्यावतामेष न हट- 11४१५ रम्योऽयमुत्तेजित- १०१ ८२१ विनाऽपि कालं यददो ३३ ३५ ३ रविप्रमानुकारिणा ७१ २६३ | विघ्राजमानाऽघ्रघटेव ३६३९ रवीन्दुतारामह ८५ १७१४ विमलजलमृताः मुखा- ५७३५१८ रस निपीयार्जुनमशरीगो ४ ३ १२ विहाय वस्तुनोऽस्तिसं १९९ ६३ रागालोकरितष्टिपात ७ ६११ विहल भूमो प्रति- २८५ ३९ ५ राजती परणभिति- १२१११४ वृथाऽपवाऽनेन विम- १०८ २२ एण्यभागारिवसाई- १९१९१७ मैत्तियः परमनो. वेदान्तिमतमाश्रित्य १७५ ७४ वनानिधिमवाप्य ११. वेदवे मुखमयाप्य- १९५ २५ २. वैवर्यमास्याय देन.१.६१८१ पप्रगोपुरपुर.स्थतोरणं १२० ७ व्यामिपानोऽप ११५ बत्रयान्तमगि. ११.२७, पोतर तर गहाण ३११ वर्षपूडामनिमन्या- ११७ १३१ बिरयुत्तरमानाः ३५८ ३९. रापमान युधेदि. ve पोष्टरपनायताले एवं पदमपि साथ ११७ ८ ७ ८ १ ८ पृ. ओ. पं. ४ १ २ श्लोकसूची पृ.श्लो. पं. शक्तिरन्यवयव मंदि- २०.३७ ४ दैक एवोदयमेति १०० शतयुगधनुरायता ४६ १३ ६ सद्वस्तुनि स्यादथ २१५११ शब्दे गुणे तु प्रत्यक्षे १६० ४८ १३ स धर्मशास्त्राध्ययन ८८ २२ १६ शम्वरोऽपि मृग १२६ २४ १० सन्ति यद्यपि २४३ शम्भुकोणविनिविष्ट- १२९ ३१ ५] सन्दंशवदुपादानम- १६७ ६१ २१ शरनिशानायकरोत्क- ८१ १०१६ | सन्दिग्धं यच तत्त- १६९ ६४ ९७ शरीर एव चेदेषः १५७ ४४ ४ सन्दिग्धोऽर्योऽप्र- १५४ ३७८ शश्वत् सुरूपै किल १४ १३ १८ सपदि तदनुगाः प्रभूः ४१ ५१८ शाब्दिकैरक्षिशब्देन २४५ १० १४ | सपादपीठमम्बरे सुर-६७ १५ । शून्यतामेव मन्वानाः १५. २९ ३ स प्रविश्य वरतोर- १३० ३३ शून्यतैव परं तत्त्वं १७४ ७३ १९ स प्रविश्य विशिर्खा १२२ १३ ५ श्यामलच्छविविभा- ११८ ५] सम्वन्धमासाद्य कम- २१७ १४ ६ श्येन-ध्र-शकुनि-, १२८ २९ १२ सम्भवः सुखदुःखाना २५६ ३६ २१ श्रीराविरासीदिव दिव्य- २ १ ४ समस्तसौख्यं तु जग-२८३ ३५ ९ श्रीवीरपादाम्बुज- ११४ समाजगाम खपरि- २०८ २ ३ श्रुतेपु यत् सूप्रितमा- ८३ १४ २० समानमावा यसमा १२६ १ श्रुत्वेति भगवद्वाचो १५३ ३६ २० | समालिलिगुर्गुरुभारनमा २१ २२ २१ श्रुत्वेति वाचं चरवका १११ २९ ११ | समुदितवरणत्रयं तदा- ५५ २९ शृणोषि शास्त्रेषु शरी-२६६ ८] सर्व विवक्षयाऽसर्व- १७७ ९ ३ शैलालिना सिद्धिरुते ११५ ३८ ११ | सर्वज्ञताप्रतीतिर्वा न १३९ ११ ५ सर्ववित्समधिगम्य १८४ १० संवच्छल-वियद्गजो- २८० १ स या मूतोऽस्त्यमूगो२५४ ३० १२ संस्तुतोऽपि चिरं ४१. सहस्रसवकररविनि- ६५ १. १७ सकलमपि निमेषमात्र. ५९ ३५ ११ मा क्रिया फलनु १९१ २२ सत्कियाकरणमस्ति १९२ २३६ सातकर्मोदयादाशु २५८४.१४ सदjमर्हन्ति सदाई- २६ २७ ३. साधनेविह समेषु १८४ १५ ५ सहक्षता कारण २२० २० १९ । साऽनादिवन्यच्युति- २७८ २९ १५ १ १० गौतमीयकाव्यस्य श्लोकसूची . ७ पृ० ग्लो. पं० पृ० . पं सामान्यतोऽपरशापि १४६ २२ १ सुम्निग्धसान्द्राणि हरि- ८.७ साम्यवास्तववोघे तु २६१ ४७ ५ सुखादुरूपैर्वदछुलन्त्यो ३३ ३६ २१ सारमेयपदंश १२६ २५ २२ / सूक्ष्मवतो वस्तुनि २१२ सार्वश्यमाकर्ण्य जिने-२३३ ३९ १४ | सूनुप्रसूताविव मोद- १० सिंहपृष्टिमुपधाय १२७ २७ १८ सेवन्तिकार्मा मधुपान- १६ १५ १४ विततनुजलमृद्विकर्वणा-४२ ७ २२ सोऽथ मोक्षनिव १२० वितातपत्रितयाधरे. ७८ स्यात् सादिवन्धे सति २२६ २९१.. स्थिरा अपि दुमा ७० २४ १६ / स्यादागमोऽप्यशार्थ- १४७ २५ १२ स्थूलं च सूक्ष्म लघु २३९ ४८ ७ स्युर्यज्ञकर्माणि सुरा- २३५ ४२ मुलप्तपुष्पवादलानम ७० २३ खगेन्द्रजाले अपि २१४ १. सुखदुःखे स्वसंवेद्ये १५५ ४१ २०/ खमोपमं वे जगदिन्द्र २०८ मुखस्य मूतः २५९ ४३,१६ खभावशन्दयाच्यो- २५६ ३४ मुखितदुःसितमुखा २६८ १० २० खभावों पन्नुधर्मधे २५९.३२ मुगन्धिनीरसंस्कृता ७२ ३. १७ समियनोदिताः परेऽपरे ७५ ४." गुजातजालाकलितः १०२ वर्गकामुकजनस्तु १९५३४ २१ मुत्यसनीतपित- खण्ज्यदेवानिव राजवयों ५ ४ १४ मुरमदण्डमण्डित विहा- ६.१५ द गुरपतिधनुषी जु मील- ५५ २०१७ मुलक्षणं सर्वमपि ८२ ११ ५ हसनै रोदनेगाने तो १३५४ १५ मुवरिनवायोर्जिनालये ७४ ३४ ७ हिरप्परता वाधेऽनिटे-९४ १२ २१ मुवादिगुगं सम्प- २६.४५ १. हसत-दीपंत-समस- ११६ ११ २२ समातेयं गौतमीयकाव्यस्य लोकसूची। प्रति धेष्ठी देवचन्द्र लालभाई जैनपुस्तकोझारे प्रत्या.९० ९

Gautamiya Kavyam

Author
Muni,kanakavijaya
Title
Gautamiya Kavyam
File name
Gautamiya Kavyam
Text
OCR done
Citation
1940
Published
2012/08
Publisher
Surat.,gopipura Jivachand Jain Pustakbhandar
Language
Sanskrit
Pages
341
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312592
Barcode
99999990321365.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
oMeI5VBLH04
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