Kumarappa Institute Of Gram Swaraj, Jaipur
Urdhyan Viyadhi Vigyan
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पुस्तक के सम्बन्ध मे यहां आयुर्वेद विद्यालय के द्वारा प्रतिवर्ष आयुर्वेद विशारद को परीक्षा दिलाई जाती है। उसमें अन्यान्य विषयों पर तो उपयुक्त पुस्तकें हैं पर उर्ध्वाङ्ग चिकित्सा पर संक्षिप्त एवं सरल प्रारम्भिक शिक्षा के योग्य जिसमें मानसिक रोगों पर भी प्रकाश डाला गया हो ऐसी कोई पुस्तक देखने में नहीं आ रही है । अतः इसी उदेश्य की पूर्ति के लिए श्री नवजीवन औषधालय उसकी रसायनशाला और आयुर्वेद विद्यालय के प्रधान वद्य श्री पं० लेखराम जी शमी शास्त्री आयुर्वेदाचार्य ने यह पुस्तक लिखी है आशा है कि छात्रों के उपयोग में आयेगी। १.१-२००५ केशवानन्द दो शब्द असित गिरि समं स्यात कज्जलं सिन्धु पात्रे । सुर तरु परशाखा लेखनी पत्र मुवीम् ।। लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्व कालं । वदपि तब गुणाना मीझपारनयाति ॥ ईश्वर की कृपाले पञ्जाव तथा राजपूताना प्रान्त में हिन्दी भापा के प्रसारक एवं हिन्दी में श्राशुर्वेद के (अध्यापक ही वैध प्रणाली से) प्रवल इच्छुक श्रीस्वामी केशवानन्द जी महाराज द्वारा संचालित जाट विद्यालय संगरिया बीकानेर के अन्तर्गत श्रायुर्वेद विद्यालय में हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के वैद्य- विशारद एवं आयुर्वेद रत्नके छात्रों को पढ़ाने का सन् १६४२ ई० से मुझे अवसर मिला है तभी से उर्वाङ्ग चिकित्सा के प्रश्न पत्र में विद्यार्थियों को बहुत से इधर उधर के अन्य जुटाने पड़ते थे परन्तु हिन्दी में आयुर्घद के ग्रन्थ भाव प्रकाश आदि अधिक मूल्यवान होने से बहुत से असमर्थ छात्र उन पुस्तकों को न खरीदने के कारन केवल विपय को. कोपियों में नोट करके ही अपना कार्य चलाते रहे हैं । श्री शुक्ल जी द्वारा लिखित इस विपय की पुस्तक बहुतविस्तृत और कई भागों में विभक्तहोने के N पारण वैध विशारद के छात्रों के लिए समझ से दूर की वस्तु है, अतः इन्ही विद्यार्थियों के कष्ट को देख कर हृदय में यह भाव पैदा हुवा कि इस विषय की एक साधारण संक्षिप्त पुस्तक लिखी जावे जिस से परीक्षार्थी छात्रों का कष्ट दूर हो, यह भाव श्री स्वामी जी के सामने भी कहा उन्हों ने भी श्रावश्यक समझ कर मुझे पुस्तक तैयार करने की सन्मात दी इस पुस्तक में संक्षिप्त, मुख, कान, नालिका, नेत्र तथा शिर के रोगों की संख्या नाम निदान लक्षण तथा चिकित्सा श्रादि के वर्णन के साथ २ मस्तिष्क तथा वात नाड़ियों से सम्बन्ध रखने वाले उन्माद, अपस्मार, मदात्यय, सन्यास, सृच्छा, पक्षाघात श्रादि रोगों का भी यथा योग्य चिकित्सा सहित वर्णन किया गया है । इसी प्रकार नपुंसस्ता के लक्षण भेद के साथ २ उसको मिटाने वाले रसायन तथा वाजीकरण का जी दिग्दर्शन करायागया है । साथ में छात्रों के सुभीता के लिए छ. वर्ष के प्रश्न-पत्र भी दे दिए गए हैं, यदि इस पुस्तक से जनता एवं छात्रों का कुछ भी उपकार होगा तो मैं मेरा परिश्रम सफल समझेगा । विनीत लेखक- अक्षय तृतीया २००४
विषय सूची
१ प्रथम अध्याय में पृष्ट १ से २० तक मुखरोग तया
चिकित्सा का वर्णन है।
२ द्वितीय अध्याय में पृष्ट २१ से २८ तक नाशा रोग तथा
चिकित्सा का वर्णन है ।
३ तृतीय अध्याय में पृच २६-से ३६ तक कर्ण रोग विज्ञान
तथा चिकित्सा का वर्णन है।
४ चतुर्थ अध्याय में पृष्ट ४०-से ६० तक नेत्र रोग विज्ञान
तथा चिकित्सा का वर्णन है।
५. पश्चम अध्याय में पृष्ट ६६ से ७८ तक शिरो रोग विज्ञान
ज्या चिकित्सा का वर्णन है।
६ षटमा अध्याय में पृष्ट ७६-से ११० तक योपपस्मार
अार्दित उन्माद, अपस्मार, मूर्छा, सन्यास, पक्षाघात
मदात्यय आदि रोगों केलक्षण तथा चिकित्सा का वर्णन है।
७ सप्तमाध्याय
में पृष्ट १११ से ११६ तक नपुंसकता के कारण
लक्षण भेद तथा रसायन वाजीकरण का वर्णन है ।
८ पृष्ट १२० से १२७ पृष्ट एक परीक्षा प्रश्न पत्र ।
॥ श्री गणेशायनमः ॥ ॐ * प्रथम अध्याय * मुख रोग निदान- जलचर जन्तुओं का मांस, दूध, दही, मच्छसी, के अधिक सेवन से कफ प्रधान दोप कुपित होकर मुह के भीतर रोग पैदा कर देते हैं । मुख रोगों की संख्या ६५ हैं । जैसे-दान्तों में - अोष्ट में ८ दन्त मूल में १५ तालु में जीम में ५ कण्ठ में १७ तथा शेष मुह के भाग में ३ हैं। अोष्ट में होने वाले ८ रोगों की व्याख्या। वावज श्रोष्ट.रोग के लक्षण-वायु के कोप से अोष्ट खरखरे, रूवे और कड़े हो जाते हैं और फट ली नाते हैं। पैतिक ओष्ट रोग के लक्षण-पित्त से श्रोष्ट में छोटी छोटी फुम्सियां होकर पक जाती हैं, उनमें जलन होती हैं तथा होठ का रङ्ग पीला हो जाता है।
लक्षण
( २ )
कफज ओष्ट रोग के लक्षण-इसमें त्वचा के वर्ण की
फुन्सियां होती हैं, उनमें पीड़ा कम होती है, होठ भारी
होजाता है और गीला रहता है।
त्रिदोपज के लक्षण—इसमें काली, पीली, लाल और सफेद
अनेक वर्ण को फुन्सियां होती हैं, जिनमें वातादि दोपों
के.
मिलते हैं।
रक्तज प्रोष्ठ रोग के लक्षण—इसमें खजूर के रङ्ग के समान
फुन्सियां निकलती हैं, और वे लाल होती हैं। तथो उनसे
खून निकलता है।
मांसज प्रोष्ठ रोग के लक्षण- इसमें ओंठ मोटे भारी होमाते
हैं, और ओंठ के दोनों तरफ कीड़े दिखाई पड़ते हैं।
मेदोज ओष्ट रोग के लक्षण-इसमें अोठों पर खुजली चलती
है, तथा घी के समान चिकनी पपड़ी जम जाती है। और
सफेद पीप बहता रहता है। व्रण भुलायम भी नहीं होते
और भरते भी नहीं हैं।
अभिवातज प्रोष्ट रोग के लक्षण-चोट लगने से अोठ कट
जाते हैं लाल एवं गठीले होजाते हैं। तथा उनमें खुजली
चलती है।
..
( ३ ) दान्तों की जड़ में होने वाले १५ रोगों का विवरण १-शीताद के लक्षण-कफ और रक्त के बिगड़ने से मसूड़ों से विना चोट के अकस्मात खून बहने लगता है, वदयू आती है, तया वे काले एवं मुलायम पड़ जाते हैं। और आगे से आगे रोग वह कर नसूढ़े गल कर गिर जावें, उसे शीताद कहते हैं। २-दन्तपुप्पट के लणण कफ और रक्त के दोष से दो चा तीन दान्तों में सूजन हो जावे उसे दन्तपुप्पुट कहते हैं। ३-दन्त येण्ट (पायरिया) के लक्षण-रक्त के बिगड़ने से दान्त हिलने लगें तथा मसूड़ों से पीव एवं खून बहे और बदबू आवे से दन्तवेष्ट कहते हैं। ४-शोषिर के खक्षण-(गप वाइल) कफ और रक्त के कोप मसूढों में लाल रङ्ग की सूजन हो और उसमें पीड़ा हो • तथा लार बहें उसे शौपिर कहते हैं। ५-महाशौपिर के लक्षण- -सन्निपात के कोप से दांव हिलने लगे दान्त, तालु तथा ओठ फट नावें तो उसे महा शौपिर कहते हैं। ६-परिदर के लक्षण-निसमें मसूढ़े गले और फटें तथा थूक के साथ खून वहे उसे परिदर कहते हैं।
-.
( ४ )
७-उपकुरा के लक्षण-मसूड़ों में पाक और जलन होने से दांत
हिलने लगें तया बदबू युक्त रक्त आवे तथा साधारण दर्द
हो और मसूढे फूल जावें उसे उपकुश कहते हैं।
८-वैदर्भ के लक्षण_मसूड़ों में चोट या दान्तुन. की रगड़ से
सूजन होकर पक जावें उसमें दर्द एवं जलन हो तथा दांत
हिलने लगें उसे वैदर्भ रोग कहते हैं।
ह-खली पद्धन के लक्षण—(एक्स्ट्राटूथ ) वायु की अधिकता
से दान्त पर दान्त पैदा होता है उस समय बड़ी पीड़ा
होती है, और वान्त जब पूरा निकल पाता है तवं पीड़ा
अपने आप शान्त होजाती है, उसे खलीवर्द्धन रोग
कहते हैं।
१०-कराल के लक्षण अपने कारणों से कुपित हुआ वायु
दांतों को टेढ़ा तथा नोंकीला बना देता है, उसे कराल
रोग कहते हैं, और यह असाध्य है।
११-अधिमांस के लक्षण-प्रवड़े के अन्तिम भाग में भारी
सूनन होजाती है, तथा उसमें दर्द होता है और लार
गिरती है, उसे अधिमांस कहते हैं, और कफ के कोप से
होता है।
१२-दन्तनाड़ी के लक्षण दांतों की जड़ में एक सुराक हो
नाता है और उससे पीक या रक्त निकलता है इसमें तीनों
ही दोषों का समावेश होता है, उसे दन्तनाड़ी कहते हैं।
[ '५ ] १३-दालनाख्य दन्तरोग के लक्षण-वायु के कोप से दांतों में चीरने जैसी पीड़ा हो उसे दालनाख्य रोग कहते हैं। १४-क्रिसिदन्त के लक्षण:-(करीज श्राफ टूथ) खून की खराबी से कीड़े पड़ने से मसूढ़ों में सूजन तथा जलन होती है, तथा पक पार सयङ्कर दद दो दांतों में छिद्र हो जावे से क्रिमिदन्त कहते हैं। इसमें वात का कोप होता है। के १५-भजनक लनाम- कफ वात के कोप से दान्त टूट कर गिर जावें तथा मुख टेढा होनावे उसे भञ्जनक कहते हैं। १६-दन्तहर्प के लक्षण (इरिटेशन इन दी टूथ) . वात पित्त के कोप से दांतों में ठंडक, हवा और खटाई के लगने से विशेष तकलीफ (दांतों का श्रामना) हो उसे दन्तहर्प कहते हैं। १७-दन्त शर्करा के लक्षण-(टारटर) दांतों में लगे हुए मल का पित्त और वायु शोषकर शकर का रूप बना देते हैं, उसे दन्त शर्करा कहते हैं। १८-कपालिका के लक्षण-दन्त शर्करा पपड़ी के रूप में दांतों से उतर २ कर गिरे उसे कपालिका कहते हैं। इसमें दांत का हिस्सा भी टूट २ कर गिरता है और अन्त में दांत का नाश होनाता है।
( ६ )
१६-श्यावदन्स के लक्षण-( ब्लेकने कोल्ड टूथ ) खून और
पित्त के कोप से जल कर दांत काला या नीला हो जावे
उसे श्याचदन्त कहते हैं।
२०-दन्तविद्रधि के लक्षण-सरक्त सन्निपात के कोप से दांतों
के मसूढों में बाहर भीतर सूजन होकर पक जावें, उसमें
जखन तथा पीड़ा हो और खून तथा पीप बहे रसे दन्त
विद्रधि कहते हैं।
जिहा रोगों के लक्षण
१-वायु के कोप से-जीम फट जाती है तथा गाजवान के
पत्तों के समान खरदरी होजाती है एवं रसों का स्वास ठीक
प्रतीत नहीं होता है।
२-पित्त के कोप से-जील में बलन होती है लम्वे २ लास २
कांटे पैदा होजाते हैं।
३-कफ के कोप से-जीम भारी, मोटी होजाती है और उसके
: चारों और सेमा के कांटों की तरह मस्से उनर आते हैं।
४-अलास रोग-(सम्लिग्वल एवसेस) जीन के नीचे एक मोटी
कड़ी सूजन होती है इसके बढ़ने पर बोलना, ; खाना,
पीना, जीम का स्वाद श्रादि वंध होनाता है, और जीम
की जड़ पक जाती है, यह कफ और रक्त के कोप से:
होता हैं।
हवा भरे
( ७ )
५-उपजिह्वा के लक्षण-(रेन्युता) जीभ के नीचे अगले भाग
में समान कक और रक्त के कोप से एक सूजन हो जाती
है, जिससे जीन ऊंची होजाती है एवं सुई चुभने जैसी
पीड़ा होती है उसे उपजिह्वा रोग कहते हैं।
६-फण्ठशुण्डी के लक्षण -(एलोंगेटेड युज्युला) गलसूवा कफ
और रक्त के कोप से तालु की जड़ में एक लम्बी सूजन
हो जाती है,
जो
फूटवाल के समान होती है।
इससे कास श्वास और प्यास रोग हो जाता है इसको
हिन्दी में गलमुवा भी कहते हैं।
७-तुण्डीकरी के लनण-तालु में एक बड़ी सूजन होती है वह
पक जाती है तथा उसमें बलन कोंच होता है, यह भी
खून और कफ की खरावी से होती है।
८-अध्रुप के लक्षण तालु में एक मुलायम लाल सूजन होती
है उसमें तीव्र पीड़ा एवं ज्वर हो जाता है, यह रक्त की
खराबी से होता है।
ह-कच्छप के लजण-तालु के अन्दर कछुवे की पीठ के
समान कम पीड़ा पाली एक सूजन होती है और धीरे २
घढ़ती है, उसे कच्छप करते हैं।
१०-ताल्वाद के लक्षण—(पेलेटेल केन्सर) तलु के मध्य
में कमल के केशर के समान लम्बे २ मांस के अक्षरों से
( ८.)
युक्त एक सूजन होती है, उसे ताल्वावुद कहते हैं, यह
रक्त के कोप से होता है। कफ के कोप से तालु में मांस
इकट्ठा होजाता है इसमें पीड़ा नही होती है, यह मांस
संघात कहलाता है।
११-तालु पुप्पुटके लक्षण–तालु में मेन और कफ से एक कड़ी
केर के समान पीडा रठित्त गांठ हो जाती है, उसे तालु
पुप्पुट कहते हैं।
१२-जालुशोप के लक्षण-वायु के कोप से. तालु सूखता है,
बड़ी तेजी से श्वास चलता है, उसे तालु शोष कहते हैं ।
१३-सालुपाक के लक्षण—पित्त के कोप से तालु पक जाता है,
उसे तालु पाक कहते हैं, यह बड़ा ही भयानक रोग है।
१४-रोहिणी के सामान्य लक्षण वात पित्त कफ के कोप से
मांस तथा रक्त के खराब होने से गला में मांसाङ्कुर हो
जाते हैं जो कि प्राण नाश करने वाले होते हैं, इसे
रोहिणी कहते हैं।
१५-वातज रोहिणी के लक्षण-नीम के चारों तरफ मांस के
अंकुर होजाते हैं जिनमें बड़ी पीड़ा होती है और गले को
रोक लेते हैं, तथा वात सम्बन्धी उपद्रव होते हैं।
१६-पित्तज रोहिणी के लक्षण यह जल्दी ही पकती है तथा
इसमें जलन एवं तीन ज्वर हो जाता है।
(६ ) १७-कफज रोहिणी के लक्षण यह गले को रोक लेती है, स्थिर होती है तथा धीरे २ पकती हैं। १८-सन्निपातज रोहिणी के लक्षण--यह रोहिणी नीचे गह- राई तक रहती है तथा तीनों दोपों के लक्षण होते है, यह असाध्य है। १६-रक्तज रोहिणी के लक्षण -नो रोहिणी पीड़िकाओं से व्याप्त हो तथा पित्तज रोहिणी के लक्षण मिलते हों उसे रक्तन जानना। के २०-कराठ शालूक लक्षण -कफ के कोप से गले में वेर के समान स्थिर कड़ी कांटों से युक्त गांठ पैदा हो जावे उसे कण्ठ शालूक कहते हैं और यह शस्त्र चिकित्सा साध्य है । २०-अधि जिह्वक रोग के लक्षण-कफ और रक्त के कोप से जीभ के ऊपर जीम की फूग (अग्रभाग) की तरह एक सूजन हो जाती है यह पाने पर ठीक नहीं होती। २२-वलय रोग के लक्षण-कफ के कोप से गले में सूजन हो जाता है जिससे भोजन का मार्ग रुक जाता है। यह असाध्य है काई भाग्य वाला ही शस्त्र चिकित्सा से ठीक होता है। २३-वलाश के लक्षण-~~-बात और कफ के कोप से गले में सूजन होती है । जिस से दम फूलता है और मर्म छेदन
( १० )
जैसी तीव्र पीड़ा होती है अच्छे चिकित्सक इसे कष्ट साध्य
समझते हैं।
२४-एक वृन्द के लक्षण-गले में एक गोल सूजन होती है
उसमें जलन खुजली होती है । तथा कम पकती है और
भारी प्रतीत होती है.। इसे एक वृन्द कहते हैं।
२५-वृन्द के लक्षण-पित्त और रुधिर के कोप से गले में
एक ऊन्ची सूजन होती है जिसमें बड़ी जलन तथा तेज
ज्वर होता है।
२६-शतघ्नी के लक्षण-तीनों दोषों से गले के अन्दर एक
गांठ लम्बी वत्ती के आकार में होजाती है, जिसके चारों
और अंकुर मांस के वन जाते हैं, जिससे जलन पीड़ा
होती है, तया गला रुक जाता है जिस प्रकार तोप के
सामने तोप के गोले से आदमी बच नहीं सकता इसी
प्रकार इससे भी नही वचता, अतः चिकित्सक लोग इसे
शतघ्नी कहते हैं।
२७-गनायु रोग के शणण-गले में प्रांवले की गुठली के
समान कड़ी सूजन होनाती है जिससे भयङ्कर पीड़ा होती
है, मानों भोजन का पास गले में अटक गया हो । यह
कफ और रक्त से होता है तथा विना चीरा के ठीक नहीं
होता ।
( ११ )
२८-गलविद्रधि के खक्षण—गल में एक प्रकार की सूजन होती
है, जिसमें तीनों दोषों के लक्षण होते हैं तथा यह त्रिदोपक्ष
विद्रधि के समान लक्षणों वाली होती है।
२६-गलौध के लक्षण
._कफ और रक्त के कोप से गल में एक
बड़ी सूजन होजाती है जिससे अन्न तथा श्वास मार्ग रुक
जाते हैं, तीव्र बर होता है यह नी भयङ्कर रोग है ।
३०-स्वरघ्न के लक्षण-बड़ा हुआ वायु श्वास मार्ग को रोक
लेता है, जिससे कफ बोलने लगता है, तथा मूर्छा श्रा
जाती है, श्वास फूलता है, गला सूखता है और स्वर भेद
होजाता है, गले से कुछ भी निगला नहीं जाता उसे
स्वरन्न कहते हैं।
३१-मांस तान के लक्षण-गले में एक फैली हुई सूजन होती
है जो फैल कर गले को रोक लेती हैं तथा तीन पीड़ा
करती हैं और लटकती रहती है इसे मांस तान कहते हैं,
यह तीनों दोषों से होती है एवं प्राण नाशक है।
३२.विदारी रोग के लक्षण
गले में जलन युक्त लाल सूजन
होती है जिससे वहां का मांस बदबूदार सड़ जाता है, यह
रोग अधिकतर जिस करवट मनुष्य सोता है उसी
तरफ होता है, और पित्त के कोप से माना
-
गया है।
(. १२ )
३३-पातिक सर्वसर रोग के लक्षण-( स्टाम ट्रीसा) जिसके
सम्पूर्ण मुह में कुन्सियां जलन युक्त हों और पीड़ा होती
हो तो उसे वात से सर्वसर मुख रोग कहते हैं।
३४-पैत्तिक सर्वसर रोग के लक्षण-मुह सर में लाल एवं
पीली जलन युक्त फुन्सियां होजाती हैं।
३५-कफज सर्वसर रोग के लक्षण-इसमें सफेद रङ्ग की
खुजलीदार फुन्सियां होती हैं और उनमें पीड़ा नहीं
होती हैं।
असाध्य सुख रोगों की संख्या-
गोष्ट रोगोंमें मांसज रक्तन और त्रिदोषज वीन असाध्य हैं
दन्तमूलमें त्रिदोपज, नाड़ी और शोपिर असाध्य हैं
दन्तरोगमें-दालन, श्याबदन्त, और सञ्चनक असाध्य हैं
निहा रोगों में वलाश असाध्य है । तालु रोग में अर्बुद
असाध्य है । गल रोग में स्वरघ्न, वलय, वृन्द, पलाश,
विदारिका गलौध, मांसतान, शतध्नी और रोहणी में
उन्नीस रोग असाध्य हैं। इनको भी असाध्य कह कर
छोड़ना नहीं चाहिए । परन्तु पहिले रोगी के अनिआवकों
को असाध्यता प्रकट करके चिकित्सा करे शायद वच
जावे । कारण कि कनी २ देखा गया है कि अरिष्ट और
असाध्य लक्षण होने परभी भाग्य से रोगी बच जाता है।
अंत चिकित्सा सर्वा वस्या में करनी उपयुक्त है।
.
( १३ )
* होठ के रोगों की चिकित्सा *
मुंह और मसूड़ों के रोग और होठ के रोगों में कफ और
रक्त की प्रधानता होती है अतः: वारम्वार खून निकलवाना
चाहिए।
१-वातज अोष्ठ रोगोंगान स्नेह सेक, लेप, घी पीना, तेल
मालिस आदि उपचार हितकर हैं वात नाशक औषधियों
से तैल पका कर नस्य स्वंद मालिश आदि इस रोग में
हितकर है।
२-पित्तज श्रोष्ठ रोग में-शिरावेध, उल्टी जुलाब देना निक्त
निम्बादि का सेवन कराना । ठंडे लेप और सेचन
हितकर हैं।
३-रक्तज ओष्ट रोग में जोक लगाना और पित्त विधि के
समान इबान करना चाहिए।
४ कफज अोष्ट रोग में खून निकलवाने के बाद शिर साफ
फरने वाला नस्य देना चाहिए । कलव धूपपान
और
स्वेदन कराना चाहिए
५-मेद जन्य ओष्ठ रोग में-स्वेद शोधन और अग्निका
सन्ताप करना चाहिए । दूपित मांस निलवा कर लेप
करना चाहिए।
[ १४ ]
६-क्षतज ओष्ठ रोग में होठ में घाव होने पर दवाकर स्वेद
करना चाहिए। और सौ वार का घोया
हुचा
घी लगाना
चाहिए।
७-वातज ओष्ठ रोग में मोम, गुड़ और राल इनको समान
भाग लेकर तैख या वी में पकातो इसको लगानेसे वातन
पोष्ट रोग ठीक हो जाता है।
८
-पित्तज प्रोष्ठ रोग में-ठण्डी चीजों का लेप करना चाहिए।
8-कफज प्रोष्ठ रोग में-सौंठ, मिर्च, पीपल और जवाखार
को समान भाग लेकर शहद में लगाने से आराम
हो जाता है।
१०-मेदज ओष्ठ रोग में-त्रिफला ( हरड़ बहेड़ा बांबला
समान भाग ) का चूर्ण शहद में मिला कर लेप करना
चाहिए।
११-त्रिरोपज ओष्ठ रोग में निस दोषः की अधिकता हो
उसी दोष का इनान करना चाहिए।
नोट-पानी में सवार घोए हुए लोनी घो में कपूर मिलाकर
लेप करने से सब प्रकार के भोष्ठ रोग शांत हो जाते हैं।
( १५ )
* दन्त रक्षा विधि *
यदि अपने दांतों को सुरक्षित निदो प और सुदृढ़ रखना
चाहते हो उनको निम्न लिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए।
प्रातः काल प्रतिदिन नीम या कीकर का दांतुन अथवा
कोई मञ्जन एवं कड़वे सैल में सेंधा नमक मिला कर दांत मलो
और कुल्ले करो।
खडिया या कायलोंके चूर्णसे दांतोंका मलो या कपड़े से
साफ करो वालु या नमक से दांत साफ करना भी लाभदायक है।
भोजन के बाद दांतों को साफ करो। ठण्डे भोजन के बाद गर्म
एवं गर्म वस्तु के वाद ठण्डी वस्तु का सेवन न करो। इस प्रकार
करने से दांत ठीक रहते हैं।
--
दन्त रोग चिकित्सा-
१-शीताद की चिकित्सा-सौंठ, सरसों, हरड़ बड़ी, बहेड़ा,
आंवला इनके काढ़े से कुल्ला करने से शीवाद ठीक हो
जाता है।
२-दन्त पुपुट चिकित्सा-इसमें खून निकलवा कर तिल चिता
और सफेद सरसों इनको समान माग लेकर गर्म जल में
पीस कर कवल धारण करने से दांतों की सूजन अर्थात्
दन्त पुपुट रोग ठीक होता है।
(१६ )
३-दन्तयेष्ट ( पायरिया) चिकित्सा-नागर माथा, हरड़ बड़ी
बहेड़ा, आंवला, सौंठ, मिर्च, पीपल, पायविडङ्ग, और
नीम के पत्ते इन सब को समान भाग लेकर पानी में पीस
कर गाली वनाला, इस इस गोली को रातको सोते समय
मुंह में रखने से दन्तवेष्ट ( पायरिया) तथा दांतों
सम्बन्धी सव रोग ठीक हो जाते हैं। :
४-शौपिर चिकित्सा-इसमें खून निकलवा कर नागर माथां,
लाध और रसौत का चूर्ण शहद में मिला कर लेप
. करना चाहिये।
५-परिदर रोग चिकिता-शहद, पीपल और वो इनको एकत्र
मिला कर मुंह में रखने से परिदर ठीक हो जाता है ।
६-उपकुश चिकित्सा-पीपल, सफेद सरसों और टिकड़ी सोंठ
इनका समान भाग ६ माशा एक सेर गर्म पानी में मिलाकर
कुल्ले करने से उपकुश रोग ठीक हो जाता है।
७-दन्त नाड़ी चिकित्सा जावित्री, मांजूफल और कुटकी
इनका काढ़ा मुंहमें रखने से दन्तंनाड़ी ठीक होजाती है।
८-दन्त हर्ष चिकित्सा-इसमें मुनक्का और सैंधव नमक के
काडे से कुल्ला करने से श्रीराम हो जाता है।
६-दन्व शकरा चिकित्सा-दांतों के ऊपर से चाकू द्वारा धीरे
धीरे शकर उतार कर लाख का चूर्ण शहद में मिला कर
मलो दांत चमकने लगेंगे।
(१७ )
कपालिका चिकित्सा- नमक और कत्ये को पानी में मिला
कर कुल्ले करने से कपालिका ठीक होती है।
क्रिमिदन्त चिकित्सा- श्राक, थूहर अथवा पिलखनका
दूध दांतों में भरने से अथवा रीगणी (बड़ी कटोरी)
का धु'वा देने से एवं तमाखू दांतों के नीचे रखने से
कीड़ा मर जाता है। लवङ्ग के तैल का फावा लगाने से
मी कीड़ा मर जाता है।
(क) कत्था २ तोला, मांजू फल २ तोला, कपूर १ तोला, खड़िया
मिट्टी ६ तोले, मोलसरी की छाल २ तोले, अफरकश
२ तोले इनका चूर्ण बना कर दन्त मजन करने से दांतों
के समस्त रोग ठीक हो जाते हैं।
(ख)-अमृतधारा का फावा दांतों पर लगाने से दन्त पीड़ा
शांत हो जाती है।
वाल दन्त चिकित्सा- बच्चों के दांत निकलते समय तरह
तरह की तकलीफें होती हैं। यदि दांत निकलते समय
सुहागे, चूने को शहद में मिला कर मसूदों पर लगाया
जावे तो बच्चों को विना कष्ट के दांत आशानी से
निकलते हैं।
पथ्यापथ्य-- दांतके रोगी को खट्टेल शीतल जल रूखा
अन्न दातुन करना और फड़ी चीन खाना मना है।
( १८ )
जीभ के रोगों की चिकित्सा।
वातज जिह्वा रोगमें-वातज ओष्ठ रोगके समान चिकित्सा
करनी चाहिए।
पित्तज जिह्वा रोग में-खुरदरे पत्ते से घिम कर जिह्वा से
रक्त निकाले फिर शतावर गिलोय विदारी कम्द मुलेठी,
खैर सार इनको समान भाग लेकर चूर्ण बना कर जीभ
पर घिसने या काढे के कुल्ले करने से पित्तन जिह्वा रोग
शांत हो जाता है।
कफज जिह्वा रोग में--पूर्वचत् पत्तेसे रक्त निकलवाकर पीपल
पीपलामूल, चव्य चित्ते की जड़, सोंठ, इलायची, अज.
वायन, सेंधा नमक इनका समान भाग लेकर कुल्ले करने
से कमान जिह्वा रोग शांत हो जाता है ।
उपजिंहा रोग में खून निकलवा कर जवाखार को जील
पर घीसा । लगातार १५ दिन तक इस प्रकार उपचार
करने से उपजिह्वा रोग शांत हो जाता है।
शहद में फिटकंड़ी फूला मिला कर जीभ पर लगाने से
जीभ के छाले मिट नाते हैं।
वायविडङ्ग, पीपल, संघव नमक और रसौत इनका
समान भाग का काढा बना कर कुल्ले करने से या इनका चूर्ण
जीभ पर मलने से.जिह्वा के समस्त रोग शांत हो जाते हैं।
( १६ )
तालु रोग चिकित्सा ।
तालु शुण्डी चिकित्सा-कूठ, कालीमिर्च, वच, सधव
नमक, केवटी माथा इनको पीस छानकर शहद में मिला
कर घिसने से तालु शुण्डी रोग ठीक हो जाया है।
गल शुण्डी चिकित्सा-थूहर के दूध का लेप करने से
गलं शुण्डी रोग शांत हो जाता है ।
तालु पाक रोग में-पित्त नाशक क्रिया करनी चाहिए ।
तालु शोप रोग में- स्वेदन तथा अन्यान्य वात नाशक
चिकित्सा करनी चाहिए।
गल रोग चिकित्सा ।
हरड़ के काढे में शहद मिला कर पीने से गल रोग ठीक
हो जाते हैं।
कुटकी, अतीस, देवदारू, पाठो माया और इन्द्रजी
इनका समान भाग १ तोला लेकर दो छटांक गोमूत्र में पकावे
जब २॥ तोला रह जावे तब उतार कर पिलाने से समस्त कण्ठ
रोग ठीक हो जाते हैं।
हल्दी, गुड़, तिल तैल, कणक का चून आमा हल्दी इनकी
पुल्टिश बना कर गले के बांधने से सूजन चली जाती है ।
-
.२०..)
सर्वसर मुख रोग चिकित्सा ।
चमेली पत्ते गिलो, दाख, नवासा, दारू हल्दी, हरड़बड़ी,
वहेड़ा, और आंवला इनके काढे में शहद मिला कर गर्म २
कुल्ले करने से मुख पाक या मुंह के छाले और घावों में भाराम
हो जाता है।
एक तोला नीला थोथे को तवे पर जला कर २ सेर पानी
में घोल लो और कुल्ले करो। इस से हर प्रकार के मुंह के
छाले ठीक हो जाते हैं।
पथ्यापथ्य-लालमिर्च, गुड़, तैल तथा अधिक खट्टे, चरपरे,
तीक्ष्ण पदार्थ खाने सर्वथा वर्जनीय हैं। इसमें हरड़बड़ी
का विरेचन अत्यन्त हो हितकर है। कारण कि मुख रोग .
पेट की खराबी से होते हैं। अतः पेट साफ रखना
आवश्यक है । मोलसरी के हाथ में तैल पका कर
मुह में लगाने से सब तरह के मुख रोग शांत हो
नाते हैं।
।.२१ ) * द्वितीय अध्याय नासिका की साधारण रचना- अन्त इसका कुछ भाग हड़ियों से तथा कुछ भाग कारटिलेज (तरुणस्थियों ) से बना हुआ है, एक परदे के द्वारा इसके दो भाग हे जाते हैं । उनको नासा गुहा कहते हैं, प्रत्येक नासा गुदा में एक प्रकार की श्लेष्मिक कला होती है। उसमें गन्ध ग्रहण करने की शक्ति होती है उसे घ्राण प्रदेश कहते हैं। प्राण प्रदेश से नाड़ियां चलकर प्राण पिण्ड में जाती हैं और यहीं पर इनका जाता है, ग्राण पिण्ड से नए तार निकल कर घ्राण केन्द्र को जाते हैं इस बीच के मार्ग को प्राण पथ कहते हैं। हमें गन्ध ज्ञान कैसे होता है। हवा में मिले हुए दूषित पदार्थों को नासिका में पैदा हुए बाल रोक लेते हैं। तथा गन्ध द्रव्य अन्दर की तरफ हवा के साथ चले जाते हैं। प्रत्येक नासा गुहा में ऊर्व शुकि का तथा उसके सन्मुख परदे की श्लामिक कला का नाम गंध पहिचानने का है इन दोनों स्थान की कला को प्राण प्रदेश कहते हैं। प्राण प्रदेश से गन्ध प्राण नाड़ियों द्वारा प्राण' पिण्ड को जाती है.तथा प्राण पिण्ड से नए तार निकल कर गन्ध प्राण पथ के द्वारा नाण केन्द्र में नाती है तब ज्ञान होता है कि अमुक गन्य सुगन्ध या दुर्गन्ध है। -
( २२ )
* नासा रोगों की संख्या *
मनुष्य की नाक में चौवीस रोग हैं।
पीनस, पूतिनस्य, नासापाक, पूयशोणित, क्षवथू, भ्रन्शथु,
दीप्ति, प्रतिनाइ, प्रतिस्राव, नासाशोष, पांच प्रतिश्याम, सात
अर्बुद, अश, सूजन, रक्तपित्त के भेद से।
बीनस रोग (ोजीना) के लक्षण वातं और कफ के
कोप से नाक के अन्दर कक सूख कर नाकं रुक जाती है
और गिली रहती है। जिससे सुगन्ध दुर्गन्ध का ज्ञान
नहीं होता तथो जीम तक इसका असर होने से रस ज्ञान
भी नहीं होता है। नाक से पीला पानी बहता रहता है ।
तथा कीड़े भी पड़ जाते हैं, प्रविश्याप के सब लक्षण
इससे मिलते हैं। आधुनिक चिकित्सकों का मत है कि
पुराने प्रतिश्याप को ही पीनस कहते हैं।
पूतिनस्य के लक्षण- गला और तालु थूल में कुपित वाव
पित्त कफ रक्त से मिलकर श्वास को बदबूदार कर देते हैं।
इसे पुतिनत्य कहते हैं।
नासापाक के चलप- (पुरचुंबुल इन्दीनोज ) पित्तके कोप
से नाक में फुन्सियां हो कर पक नावें जिससे नाक गिली
तथा बदबूदार हो जावे उसे नासापाक कहते हैं ।
( २३ ) पुप रक्त के लक्षण- देोषों के बिगड़ने से या ललाट आदि में चोट लगने से.नाक से रक्त मिश्रित पीप निकला करती है उसे पूय रक्त कहते हैं। क्षवथू ( स्नीजिङ्ग ) के लक्षण-शृङ्गाटक नामका ना नाक का मर्म होता है उसमें कुपित हुवा वायु कफ से मिल कर शब्द (पा० छी०) के साथ निकलता है उसे छींक या क्षवथू रोग कहते हैं। तीक्ष्ण काय फल या तम्बाकू आदि के सूचने या सूर्य की तरफ से देखने एवं नास में किसी चीज के द्वारा छोक होती है उसे आगन्तुक छींक कहते हैं। भ्रंशथु रोग के लक्षण-अस्तिष्कसे अध पका नमकीन कफ सूर्य के सन्ताप से पियल कर नाक से निकलता है उसे भ्रंशथु रोग कहते हैं। दीप्ताख्य नासा रोग के लक्षण-श्वास धूम के नि. कलत है । और नाक में जलन होती है उसे दीप्ताख्य रोग कहते हैं। प्रविनाह के लक्षण-कफ और वायुसे श्वास मार्ग रुकजाता है उसे प्रतिनाहं रोग कहते हैं। नासास्राव के नाक से पीला सफेट और गाढा कफ (सेडा) निकलता है उसे नासा स्राव कहते हैं। समान - लक्षण-
रहना, श्रोस
[ २४. ]
नासा. शोष (ड्राईनेस आफ नोज ) वात पित्त के द्वारा
नाक का कंफ सूख जाता है जिससे श्वास लेने में तकलीफ
होती है उसे नासा शोप रोग कहते हैं।
प्रतिश्याप रोग की संपति- (सेरीज फटेरह पार कोल्ड
इनदी नोज) मल मूत्र का रोकना, अजीर्ण, नाक में धूल
घुसना अधिक बोलना अतित्रोध ऋतुचर्या के विपरीव
आहार विहार-धुवां और धूप में रहना, रात में जागना
दिन में सोना, ठंडा जल पीना, ठण्डी हवा
में
में सोना अधिक मथुन, अधिक रोना, गाढा कफ सिर में
नमना आदि कारणों से वायु कुपित्त होकर प्रतिश्याप
(जुकाम ) पैदा कर देता है।
प्रतिश्याप के पूर्व रूप-- छींक आना, शिरसारी, शरीर
का जकड़ता, नाक में.जलन, रोमाञ्च होना, गला बैठना
तालु फटना आदि इसके पूर्व रूप हैं।
बावज़ प्रतिश्याप के लक्षण:- नाक से पानी बहना, नाक
का वन्द होना, तालु, गल.और होठों का सूखना, कनपटी
में पीड़ा, छींक आना, मुंह का नायका, फीका तथा गल
वैठनाये लक्षण बातज़ प्रतिश्याप में होते हैं।
पैत्तिक प्रतिश्याप के लक्षण, इसमें पीला तया गर्म स्त्राव
नाक से होता है मानों नाक से भाग की लपटें निकलती
हा शरीर का रङ्ग पीला तथा रोगी दुबला होजाता है।
के लक्षण
( २५ )
कफज प्रतिश्याप के लक्षण नाकसे पीला कफ निकलता
है, शरीर का रङ्ग तथा आंखें सफेद प्रतीत होती हैं।
शरीर भारी तथा गला, तालु, ओठ, और शिर में खुजली
चलती है।
सन्निपातिक प्रतिश्याप के लक्षण-जो प्रतिश्याप पके या
विना पके ही होकर अकस्मात बन्द हो जावे उसे
मन्निपातिक समझना चाहिये ।
दुष्ट प्रतिश्याप
कभी नाक कक से गिली हो
जावे तथा कभी सूख जावे, कती बन्द हो जावे तथा
कभी खुल जावे श्वास बदबूदार हो और गन्ध का ज्ञान
न हो ऐसा प्रतिश्याप विगड़ा हुआ कहते हैं और यह
कष्ट साध्य है।
रक्तज प्रतिश्याप के लक्षण-इसमें नाक से खून निकलता है
और आंखें साम्बेके समान लालहो जाती है छातीमें पीड़ा
कास ज्वर आदि लक्षण होते हैं श्याम बदबूदार पाती
है तथा गन्ध का ज्ञान नही होता है।
असाध्ध प्रतिश्याप के लक्षण-यदि प्रतिश्याप की समय
पर ठोक चिकित्सा न की जावे तो वे विगड़ कर असाध्य
होमाते हैं। बाद में नाक से छोटे २ कोड़े सेंद के साथ
निकलते हैं और क्रिमिज शिरोरोग से लक्षण मिलते
जुलते होते हैं।
(२६ )
प्रतिश्याप के उपद्रव-इसके अधिक बढ़ने से बहरापन
नेत्र सम्बन्धी रोग मन्दाग्नी, खांसी आदि उपद्रव होते हैं।
नासा के अन्य रोग-सात प्रकार का प्रावुदरोगं (वात, पित्त,
कक, रक्त मांस, मेद, सन्निपातन ) चार प्रकार के शोथ ।
(वात पित्त, कफ, सन्निपातन ) चार प्रकार का अर्श।
(वात, पित्त, कफ, रक्तज) चार प्रकार का रक्त, पित्त,
(वात, पित्त, कफ, सन्निपातन) ये रोग भी नाक में
होते हैं किन्तु इनके लक्षण यहां विस्तार भय से नहीं
लिखे गये हैं। ये निदान में पृथक देखें।
नाक के रोगों की चिकित्सा ।
पीनस रोग चिकित्सा -यदि पीनस रोग होते ही दही में
गुड़
मौर काली मिर्च मिला कर खाना प्रारम्भ करदे तो
बिना कष्ट के पिनस शांत हो जाता है।
सेठ, पीपल छोटी, इलायची छोटी प्रत्येक तीन २ माशे
तथा पुराना गुड़ ८ ताले लेकर कूट पीस और छान कर गोलियां
वनाला । इसमें से २ माशे की गोलो रात को सोते समय प्रति
दिन खाई नावें । तो पीनस रोग शांत हो जाता है।
पूतिनस्य चिकित्सा-कटेरी बड़, दन्ती, पच, सहिजना
तुलसी, सोंठ, काशी मिचं, छोटी पीपल और सैंधा नमक
( २७ )
इनको समान भाग लेकर शिलपर महीन पीस कर लुगदी
वनालो, एक छटांक लुगदी और एक पाव दूबका रस
इसको पकावो, तैल वाकी रहने पर उतारलो, इस तैल का
नस्य लेने ले पूतिन्श्य तथा दीप्ति रोग ठीक हो जाते हैं।
रक्तपित्त (नकसीर) चिकित्सा-दूब घास का निखालिस रस
निकाल कर नस्य लेने से नकसीर तथा रक्तपित्त रोग
ठीक होजाता है।
नासार्श चिकित्सा-आकका दूध, थूहर का दूध, करज वीज
कड़वी तुम्बी के पत्ते इनका समान भाग लेकर वकरी के
मूत्र
में पीस कर लगाने से नाक के मस्से चले जाते हैं।
क्षवयू और प्रशथु चिकित्साघी, गूगल, और मोम को
घूनी देने से क्षवयू और प्रशथु रोग चले जाते हैं ।
रोति रोग चिकित्सा-नीम के पत्तों का रस और रसौत
की नस्य लेने से दीप्ति रोग चला जाता है। इसमें नीम के
पत्तों का लेप तथा ठण्डे पानी का माथे पर सिंचन करना
मी अत्यन्न लाभप्रद है।
नासासाव चिकित्सा-देवदारू तया चित्रक छाल के चूर्ण
को चिलम में डाल कर तेज भुवां पिलाने से नासासाव
रोग ठीक होजाता है। इसमें वकरी का दूध तथा दही
खिलाना भी हितकर है।
( २८ ) नासांपाक चिरित्सा-सोबार धोया हुआ नौनी घी तथा कपूर को मिलाकर लगाने से नासापाक तथा नासा शोप रोग ठीक होजाते हैं। प्रतिश्याप चिकित्सा-अडूषा, मुलेठी, गाजवां, उन्नाव, वनप्सा, अजीर, मुनक्का, मिश्री, इनका समान भागं शा तोला लेकर एक पाय पानी में पकावो, जव एक छटांक रह जावे तब छानकर एक तोला शहद मिलाकर पीने से सब प्रकार के प्रतिश्याप शान्त हो जाते हैं। शीतल पदार्थों का सेवन वर्म्य है। नासा क्रिमि चिकित्सा-कायफल और वाय विडङ्ग का चूर्ण बना कर सूबने से प्रतिश्याप तथा नासाक्रिमि नष्ट होजाते हैं। .. सम्पूर्ण नासा रोगों पर अचूक योग- महानारायण तैल, तारपीन तैल, जैतुन तैन, चन्दन तैल, खश तैल, इन पांचों तैलों को समान भाग लेकर नस्य लेने से किसी प्रकार के नासा रोग नहीं होते हैं, और उत्पन्न हुए विभिन्न प्रकार के नासा रोग इस योग के लगातार इस्तेमाल करने से चले जाते हैं। खाश करके दुष्ट प्रतिश्याप. के लिए यह राम वाण" है। :
( २६ ) तृतीय-अध्याय * कर्ण रोग रोग निदान- कर्णशूल के सक्षण-अपने कारणों से वढ़ा हुमा वायु उल्टी पाल से चलता हुआ कान में पीड़ा पैदा करता है, इतर दोषों की मिलावठ से उन दोषों के मी लक्षण पैदा कर देता है, इसे कर्णशूल कहते हैं और पाश्चात्त्य चिकित्सक पोटाल्जिया ओटाइटिन के नाम से पुकारते हैं। कर्ण नाद के लक्षण-कान में वायु के कुपित होने से भेरी मृदङ्ग शख आदि के विविध शब्द सुनाई देते हैं, इसे कर्णनाद कहते हैं, अंग्रेजी में न्याईजेस इन दी इयर कहते हैं। वाधिर्य के लक्षण-~-कफ युक्त वायु या केवल वायु शब्द वहन करने वाली नाड़ियों ( अत्रणनाड़ी) को खराब कर देवा है, तब आदमी बहरा (वोला) होनाता है, उसे वाघिर्ष कहते हैं। यह इङ्गलिश में डेफनेस के नाम से प्रसिद्ध है। कर्म श्वेद के लक्षण---पित्तादि से युक्त वायु कान के पडदे को खराब कर देता है, जिससे वंशी का ण शब्द सुनाई देता है, उसे कर्ण श्वेद कहते हैं । कर्णनाद और श्वेद में
के
( ३०)
इतना ही अन्तर है कि नाद में शंख मेरी मृदङ्ग आदि
विभिन्न शब्द सुनाई देते हैं और श्वेद में केवलं वंशी का
ही शब्द सुनाई देता है।
कर्ण स्राव के लक्षण-(श्रीटोहिया ) शिर में चोट लगने से
या पानी में डूबने से या कान में फुन्सी होजाने से कान
से पीप, खून या पानी बहता है इसे कर्णस्राव कहते हैं।
कर्ण कण्डू और कर्ण गूथ के लक्षण–वायु कफ से मिल
कर कान में खुजली पैदा करता है उसे कर्ण कण्डू कहते
हैं। वायु और पित्त से कान में कफ सूख कर खूटकी
सुरत में हो जाता है उसे कर्ण गूय या कान का चिट्टा
कहते हैं।
कर्ण प्रतिनाह के लक्षण--वह ही कर्ण गूथ ( कान का मल)
पतला होकर नासिका या मुंह के द्वारा निकलता है. उसे
कर्ण प्रतिनाह कहते है।
क्रिमि कर्ण के लक्षण-कान के भीतर मांस और रक्त के
कोप से कफ पित्त और जल की सड़ाहन होती है जिससे
छोटे २ कीड़े पड़ जाते हैं। अथवा कान के अन्दर
मक्खियां अपने अण्डे छोड़ देती हैं उनसे भी कान में
क्रिमि पड़ जाते हैं।
( ३१ )
कर्ण में प्रविष्ट पतन आदि के लक्षण-पत्तङ्ग कीड़े या
कनखजूरे के कान में वड़ने से बड़ी वेचैनी और पीड़ा
होती है। कान में फरफरात होती है जब कीड़ा हिलवा
है तव पीड़ा होती है और नहीं
हिलता है तब पीड़ा
शांत हो जाती है।
कर्ण विंद्रधि के लक्षण-(एक्सेस इन्दीइयर) कान के अन्दर
घाव या चोट लगने से अथावा भीतर वातादि के कांप
से विद्रधि हो जाती है तो लाल, पीला, गुलावी रङ्ग का
नाव होता है तथा जलन एवं चूसने जैसी पीड़ा प्रतीत
होती है।
कर्ण पाक के लक्षण-(सप्युरेशनइन्द्री इयर) कर्ण विद्रधि
पक जाने से या पानी भर नाने से तया पित्त के कोप से
कान पक जाता है । और सीवर सड़ान पैदा हो जाती है
और कान गीला रहता है इसे कर्ण पाक कहते हैं ।
पूति कर्णके लक्षण (फिटिड डिस्चार्ज फ्राम दी इयर) जिस
कान से बदबूदार पीप बहती है उसे पूति कर्ण अथवा
कानं का वहना कहते हैं।
कर्ण, शोथ, अर्बुद. अर्थ के लदाण-( इन्फ्लमेशन इन् दी
इयर ).कान में चार प्रकार का शोथ तया चार प्रकार
का अर्श एवं सात प्रकार के अर्बुद भी होते हैं इनके
लक्षण अर्श, शोथ, अर्बुदके समान ही जानना चाहिए ।
(३२ )
वातज कर्ण रोग के लक्षण-कान में सांय २ आवाज पीड़ा
तथा कान के मन का सूखना पतला स्राव होना और
नहीं सुनना वातिक कर्ण रोग के लक्षण हैं।
पित्तज कर्ण रोग के लक्ष्ण-लाल सूजन कान का फटमा
जलन पीले रङ्ग का बदबूदार स्राव हो तो पित्तज कर्ण
रोग जाने।
कफज कर्ण रोग के लक्ष्ण-कुच्छ का कुछ सुनना कड़ी सूजन
खुजली सफेद चिकना साप और थोड़ी २ पीड़ा हो तो
. कफज कर्ण रोग जानें।
सन्निपातज कर्णरोग के लनण-सन्निपात में दोषों के
अनुसार नाना वर्ण के स्राव होते हैं ।
परिपोटक के लक्षण-सुकुमारता के कारण वचपन में कान न
वढ़ा कर बड़ी अवस्था में कान बढ़ाने से कान की लोर
में लाल काली तया कड़ी सूनन होती है वह साधारण
फटी हुई होती है तथा पीड़ा करती है, इसे परिपोटक
कहते हैं और यह वायु के कोप से होता है।
उत्पात लक्षण-मारी गहने के डाल लेने से या चौट से
अथवा मलने से पाली में सूजन होती है जिसमें पीड़ा
तथा जलन होती है इसे उत्पात कहते हैं, यह रकअयवा
पित्त रक्त से होता है।
( ३३ )
उन्मन्य के लक्षण-कान को जवरदस्ती बढ़ाने से कान की
लोर में वायु कुपित्त होकर कफ की सहायता से विना
पीड़ा की सूजन कड़ी पैदा कर देता है और खुजली
चलती है इसे उन्मथ कहते हैं, यह कफ बात से
होता है।
दुःखवर्धन के लक्षण-अनलिज्ञ वृद्ध मनुष्य के द्वारा कान
छेदने से कान में एक सूजन होजाती है उसमें पाक
खुजली तया पीड़ा होती है इसमें तीनों दोप होते हैं और
इसे दुःख वर्धन कहते हैं।
परिलेही के लक्षण-कक और खून के सड़ने से कान में कीड़े
पड़ जाते हैं, ये सरसों के समान होते हैं और फैसफर
कानकी पालियां शष्युली पर जलन पाक एवं पीड़ा युक्त
फुन्सियां पैदा करके पाली तथा शप्कुली को घाट जाते
हैं उसे परिलेही कहते हैं।
ॐ कान की रक्षा के लिए उपयोगी वातें ,
१-दान्त दर्द नाश करने के शिए कान में कोई दवा न
डालो।
२-कान से पीप आदि पहता हो तो रूई लगा कर कार बन्द
न करो।
(३४ )
३-कान की भीतरी नली में कभी पुलटिश न बांधों।
४-कान में तैल पानी श्रादि बिना गर्म किए कभी न
डायो।
५-कान की पीप धोने के लिए गर्म जल के अतिरिक्त अन्य
वस्तु न डालो।
६-बालक या विद्यार्थी के कान पर कभी तमाचा मत मारो
इससे फौरन कान का परदा खराव होकर कान बहना या
वहरापन हो जाता है।
७-अगर बहरापन हो तो मस्तिष्क के ऊपर के नाल मत
'कटाओ।
८-कान में खुजली चलती हो तो अंगुली से खुजाओ तिनका
सींक या सलाई कान में न रालो ।
E-कान में कोई जीव पड़ जाए तो गर्म पानी से भरदो, जीव
मर कर वाहर आनावेगा। तम्बाखू के युवां से मी जीव
मरता है।
१. कानों में प्रतिदिन तेल गर्म करके डालने से कान के वात
पित्त कफ सम्बन्धी रोग नहीं होते हैं।
११-कान में बटन या कौड़ी भादि के घुसने पर अपने श्राप
खराव न करके योग्य चिकित्सक के पास लेजावो जिसके
पास निकालने का समान भादि हो ।
( ३५ ) * कान की साधारण रचना * फान के तीन भाग होते हैं। वाह्य कर्ण, मध्य कर्ण तथा अन्तः कर्ण। वाह्य कर्ण-इमें बाहर से दिखाई देता है और इसमें एक टेढ़ी नली होती है जिसको कर्णाजली कहते हैं । कर्णाञ्जली के आगे एक पड़दा लगा रहता है, जिसको कर्णपटह कहते हैं। कर्णपटह से आगे मध्य कर्ण श्रारम्भ होता है, मध्य कर्ण में तीन हडियां होती हैं जिनमें पहिली को मुद्गर तथा दूसरी को निहाई एवं तीमरी को रकाव कहते हैं । ये हडियां एक दूसरी से मिली हुई रहती हैं। तथा इनमें चल सन्धि बनी रहती है, मध्य कर्ण से आगे अन्तकर्ण प्रारन्म होजाता है । अन्त कर्ण में अर्ध चन्द्राकार नलियां कर्णकुटी तथा कर्णकोकिला होते हैं । और कर्णकोकिला से श्रवण नाड़ियां निकल कर मस्तिष्क के श्रवण केन्द्र को जाती हैं। हमें किस प्रकार शब्द सुनता है ? के वाह्य कर्ण को भोंपू पकड़ता है तथा उससे कर्ण पटह पर कंपन होती है और कर्णपटह पर कंपन होने से फर्ण पटह के लगी हुई मुद्गर अस्थि हिलती है मुद्गगर से निहाई तथा निहाई से रकाव हिलती है । रकाव कर्ण फुटी पर लगी हुई होती है अतः रकाव के हिलने से कर्णकुटी का तरल हिलता है क्या शब्द .. (३६ ) करणकुटी के तरल के हिलने से कर्णकोकिला का तरल दिलता है। एवं कोकिला का तरल हिलने से श्रवण नाड़ियों में भी कम्पन होता है और वह कम्पन मस्तिष्क के प्रवण केन्द्र में पहुँचता है तब हमें ज्ञान होता है कि अमुक शब्द हारहा है। उपरोक्त कान के आगों में से किसी एक नाग के पुर्जे में कमी आने से हमें सुनना बन्द होजाता है, बुढ़े आदमियों के कान के पुतं बिगड़ जाते हैं, अतः वृद्धावस्था में प्रायः मनुष्य बहरे ही होते हैं । ॥ कर्ण रोग चिकित्सा ॥ कर्णशूल चिकित्सा-कर्णशूल में एरण्डी के तेल का जुलाव लें तथा भोजन के बाद घृत पिलावें, अथवा गर्म दूध में घी मिलाकर पिलाने से कर्णशूल ठीक होता है। गर्म करके तिल का तैल कान में डालने से या सुदर्शन का रस कान में टपकाने से अथवा गर्म गोमूत्र को हालने से या शराब एवं स्त्रीट के डालने से कर्णशूल तुरन्त चला जाता है । स्वर्जिकादि तैल-जी सूखी, मूली हीङ्ग, पीपल, सोंठ और मोंक इनको वरावरं २ लेकर पानी के साथ शिल पर पीसलो इस लुगदी से चौगुना तेल और तैल से चोगुनी कांजी इनको भाग पर चढ़ा कर तैल पकालो, इस तेल को-कान में डालने से कर्णशूल, कर्णनाद, कर्णवाधिर्य और कर्ण नाव रोग अक होजाते हैं। --
( ३७ )
कर्णस्राव, पूतिकर्ण, और कृमिकर्ण की चिकित्सा
(१) बीनोरे निम्बू के रस में सजी खार मिलाकर कान में
डालने से कान वहना कान का दर्द एवं जलन ठीक
हो जाती है।
(२) कान में गुगल की धुनी देने से पूतिकर्ण कान को दुर्गन्ध
ठीक हो जाती है।
( ३) हरताल पीली को महीन पीस कर गोमूत्र में मिलाकर कान
में डालने से कान के कीड़े मरजाते हैं।
(४) नीम के पत्तों का पानी बनाकर या रांग जड़ का पानी
बनाकर कवोष्ण से पिचकारी द्वारा कान साफ करने से
मवाद आदि वादर माजाते हैं, और कान साफ हो
जाता है।
कर्णपालीवर्धक योग-नई सफेद मूसली को पीस कर
बैंस के नोनी घी में मिला कर सात दिन तक धान के देर में गाड़
दिया जाए फिर निकाल कर पाली पर लगाने से पाली बढ़
जाती है।
उन्मन्थ चिकित्सा-कलिहारी की लुगदी शतावर की
लुगदी, गोह की चरबी इनका मान भाग तथा इनसे चौगुना
तिल का तैल भौर तैल से चौगुना पानी लेकर पकायो, तैल २
३८)
:
वाकी रहने पर छानलो । इस तैल के लगाने से उन्मन्य रोग
यानी पाली की खुजली पीड़ा तथा सूजन ठीक होजाती है।
दुःखवर्धन चिकित्सा-तैल से पाली को चुपड़ कर प्राम
तथा जामुन के पत्तों का चूर्ण बुरकाने से दुःख वर्धन रोग ठीक
होजाता है।
परिलोहीचिकित्सा-बकरी के मूत्र में कपूर पीस कर
लेप करने से परिलोही चला जाता है।
कर्ण उत्पात चिकित्सा-जामुन के पत्तों का रस एक
पाव तथा एक पाव आम के पत्तों का रस एवं एक सेर कांजी
में एक पाव तैल पकायो जब तैल २ अविशिष्ट रहे तब छान लो,
इस तेल की मालिश करने से, कर्ण उत्पात रोग ठीक हो
जाता है।
कान के घाव नाशक योग-देशी शराब में हल्दी
का चूर्ण डालकर कान में घालदे से कान के सम्पूर्ण घाव ठीक
हो जाते हैं तथा कान के कीड़े मर जाते हैं।
कर्णशोथचिकित्सा-प्रांवले १ तोला तथा हल्दी २
तोला इनको मोर के अण्डे के रस में घोट कर लेप करने से कर्णः
शोय तथा कर्ण मूल भयंकर से भयंकर ही ठीक होजाता है।
कान ( ३६ ) कान से पानी निकालने के उपाय-अगर कान में पानी रह जावे तो छीको या खांसो और शिर को उस वरक झुकाए रखो जिस तरक के में पानी भरा हो । अथवा तिल का तेल गर्म करके कान में टपकानो या हथेली कान पर रख कर एक पैर से खड़े होजागो और जिस तरफ के कान में पानी हे। उस तरफ शिर को मुकादो। अर्क तैल -आक के पीले पत्तों का रस एक पाव तथा ऊंट का मूत्र एक पाव एवं तिल का तेल एक छटांक इन सबको एक लोहे के बर्तन में डालकर पकायो जब तैल बाकी बचे तब छानकर एक शीशी में सरलो इस तेल को कान में डालने से कानं सम्बन्धी सम्पूर्ण रोग ठीक हो जाते हैं । प्याज का रस एवं अमृतधारा डालने से बहरापन तथा कोशूल ठीक होती हैं। तिल तेल प्रयोग- तिलों के तेल को गर्म तैल को गर्म करके प्रातःकाल डालने से कक उत्पन्न कान का दर्द शान्त होता है। तया मध्यान्ह में डालने से पित्त से उत्पन्न हुचा, तथा शाम को बालने से वायु का दद शान्त होजाता है। एवं प्रतिदिन डालने से कान पन्पन्धी रोग कभी भी नहीं होते हैं। कान से मैल निकालने वाली सलाई से कान सा करने चाहिए, जिससे कान में (कर्णगूय) मल पैदा न हो सके, कारण कि कर्णगूय से भी प्रायः घहरापन हो जाता है ( ४० ) * * चतुर्थ अध्याय चक्षु की साधारण रचना- हड्डियों के बने हुए गढ़े में पलक तथा पलकों पर लगे हुए लोमों से सुरक्षित अक्षिगोलक रहता है। इसके सफेद भाग को कनीनिका त्या काले भाग को उपतारा कहते हैं। और उपतारा के मध्य गइरे काले भाग को तारा कहते हैं। तारा के बीच में गोल छिद्र जिसमें प्रत्येक वस्तुका बिम्ब दिखाई देता है उसको दृष्टि कहते हैं। नेत्र की आन्तरिक रचना चित्र बँचने वाले कैमरे से मिलसी जुलती होती है, इसमें तीन अगला, पिछला तथा वृहत् कोछ होते हैं। अगले से पीछे तथा पिछले से आगे तारा के पीछे भीतरी भाग में चक्षुताल लगा हुवा होता है, चक्षुताल से आगे अन्धकार युक्त बृहत कोष्ट होता है जिसमें स्वच्छ द्रव भरा रहता है तथा अन्तरीय या सविदनिक पटल होता है इस पटल पर एक पीला धन्बा होता है जिसको पीत विन्दू कहते हैं, पीत बिन्दू में जो गढ़ा होता है उसको पीत हिन्दू नामि कहते हैं, इसके नजदीक ही कुछ दूरी पर चनु विम्ब होता है जिससे दृष्टि नाड़ियां निकल दाहिने नेत्र की मस्तिष्क के बाएं भाग को तथा वाएं नेत्र की दाहिनी भाग को नाती हैं जहां ये नाड़ियां एक दूसरी के ऊपर से गुजरती हैं, .
( ४१ )
उस माग को दृष्टि नाड़ी योजिका कहते हैं । दृष्टि नाड़ी योनिका
के अग्रिम भाग को दृष्टि पथ कहते हैं। दृष्टि पथ से होकर ये
नाड़ियां मस्तिष्क के दृष्टि केन्द्र को जाती हैं और वहां पर इनका
अन्त हो जाता है।
हमें दिखाई किस प्रकार
देता है ?
आदि में प्रकाश की किरणें कनोनिका पर पड़ती है
कनीनिका में से होकर वे चनु के भीतर प्रवेश करती हैं और
तारा ताल तथा बृहद् कोष्ट में रहने वाले स्वच्छ द्रव में से होकर
वे दृष्टि पटल पर पढ़ती हैं। इस पटल पर वस्तु का प्रतिबिम्ब
वनता है और यह प्रतिविन्य उल्टा होता है जैसे दम दूसरे
मनुष्य को देख रहे हैं । तो प्रतिविन्ध में पैर ऊपर तया शिर
नीचे दिखाई देता है जैसा कि छाया चित्रण यन्त्र में
होता है।
प्रकाश की किरणों से आन्तरीय या सांवेदनिक पटक्ष
को सेलों में एक विचित्र रासायनिक प्रक्रिया होती है, इसी
प्रक्रिया का प्रभाव दृष्टि नाड़ी द्वारा मस्तिष्क के दृष्टि केन्द्र
को पहूँचता है और हमको रङ्ग भाकार श्रादि का ज्ञान
होता है।
( ४२ ) * नेत्र रोग वर्णन * नेत्र रोग के कारण-- गर्मी या धूप से सन्तप्त होकर शीतल पानी में प्रवेश करने से, दूर के पदार्थ देखने से, नींद आने पर या समय पर न सोने से, दिन में सोने या रात में नागने से, अग्नि आदि के अधिक सेवन करने से, नेत्रों में धूल या धुवां जाने से, वमन का वेग रोकने या अधिक वमन से, तरल पदार्थ अधिक खाने से, खट्टे रसों का अधिक सेवन करने से, मल मूत्र और अपान वायु के रोकने से, वहुत दिनों तक रोने से, शोक जन्य संताप से, मस्तक में चोट आदि के शगने से अत्यंत तेनी से पलने वाली सवारी पर बैठने से, ऋतुचर्या में लिखी विधियों विपरीत चलने से, काम क्रोधादि की वजह से पैदा हुई पीड़ा से, अत्यंत मैथुन करने से, श्रांसुवों का वेग रोकने या वारीक छापे के अक्षर देखने से नेत्रों में तरह २ के रोग पैदा होजाते हैं। बिजली तथा किराशमी (मिट्टी के.) तैल की रोशनी से आजकल बहुत से लोग अकाल में शीघ्र ही अंधे होजाते हैं। और उनको चश्मा लगाना पड़ता है। मनुष्य शरीर में नेत्र सव से मूल्यवान अंग है, नेत्र हैं जो जहान है अतः नेत्रों की रक्षा फरना मनुष्य का मुख्य कर्तव्य है (४३) नेत्र रोगों की संख्या- नेत्र सन्धि में ६, पलक में २१, श्वेत भाग में ११, कृष्ण भाग में ४, सारे नेत्र में १७, आंख की पुतली में १२, वाहरी भाग में २, इस प्रकार कुल आंख के ७६ रोग हैं। - दृष्टि रोग वर्ण- दृष्टि के लक्षण-नेत्र के काले डने के बीच में मसूर की दाल के समान क्षण में पट बोजने के समान, क्षण में अग्नि के प्रकाशे के समान चिरस्थायी तेजों से सिद्ध जो चीज है उसे ही वष्टि कहते हैं। नेत्र में चार पटल- ऊपर का पहला पटक्ष रस के आश्रय रहता है दूसरा पटल मांस के, तीसरा मेद के और चौया हट्टियों के आश्रय रहता है। भीतर से पहिले पटल में दोष- पहिले पटल में दोष के रहने से मनुष्य रूपों को कुछ चुछ अन्तर से देखता है । यदि दोप कम होजाता है तो साक भी देखने लगता है।
( ४४ ) दूसरे पटल में दोष- दूसरे परदे में दोप होने से कोई भी वस्तु भली भांति दिखाई नहीं देती और विना हुई वस्तुवें दिखाई देती हैं, जैसे मक्सी मच्छर आदि । एवं दूर की वस्तुवें पास में और पास की दूर दिखाई देती हैं । तथा सूई में धागा नहीं पिरो सकता है। तीसरे पटल में दोष- तीसरे परदे में दोष होने पर उपर की वस्तुवें कपड़े से ढकी हुई सौ प्रतीत होती हैं और नीचे की वस्तु विल्कुल दिखाई नहीं देती हैं। आदमी आंख कानों से विहीन विरूप दिखाई देता है. यदि दृष्टि में वायु की अधिकता होगी तो दृष्टि का स्याह रङ्ग होगा, यदि पित्त की होगी तो पीला एवं कफ की अधिकता होगी तो सफेद रङ्ग होगा इसे तिमिर रोग कहते हैं, कुछ लाल रङ्ग होने पर काच भी कहते हैं। चोथे पटल के दोष- चोथे परदे में दोष होने से दृष्टि को चारों ओर से रोक लेता है इसे लिङ्गनाश (मोतियाविन्द ) भी करते हैं, इसके प्रारम्भ में विजली, सूरज चन्द्रमा, आदि की रोशनी दिखाई देती हैं परन्तु पृथ्वी पर बिना चमकदार कोई वस्तु दिखाई नहीं देती है भौर पृथ्वी पर अन्धकार ही नजर भाता है।
( ४५ ) दृष्टि रोगों के नाम वातज लिङ्ग नाश कफन लिङ्ग नाश पित्तब लिङ्ग नाश रक्तज लिङ्ग नाश तन्निपातज लिङ्ग नाश परिम्लाई लिङ्ग नाश पित्त विश्व दृष्टि कफ विग्ध दृष्टि धूमदर्शी हस्व जात्य नकुलान्ध्य गम्भीरिका वातज लिङ्ग नाश के लक्षण. (मोतियोंकटरक्ट) तृतीय पटल का दोष चतुर्थ पटल में आजाता है उसे ही लिङ्ग नाश ( मोतियाविन्द ) नीलिका कहते हैं, इसमें वात प्रधान होने से घूमती हुई टेढ़ी एवं लाल वस्तुचें दिखाई देती हैं पित्तज लिङ्ग नारा- इसमें सूरज, जुगनू, इन्द्र धनुप, भौर बिजली की सुरतें एवं नाचते हुए मोर को पूछ के समान सब चीजे नीली दिखाई देती है। कफज लिङ्ग नाश- इसमें भाकाश पादलों से विरा तथा सब वस्तु पानी से भीगी हुई सी दिखाई देती हैं । रक्तज लिङ्ग नाश- इसमें सब वस्तु लाल एवं काली दिखाई देती हैं, और तमाम सफेद (व्हाइट) चीजे मी फाली एवं लाल दिखाई देती हैं।
(४६ ) त्रिदोपज लिङ्ग नाश- इसमें तीनों दोषों के लक्षण नजर आते हैं। परिम्लायी खिङ्ग नाश- रक्त से मिल कर पित्त परिम्लायी नाम का लिङ्ग नाश पैदा कर देता है। जिससे सब दिशाएं पिली चारों तरफ जुगनू आग एवं सूरन नजर आते हैं। दोष भेद से मोतिया विन्द का रंग वात के लिङ्ग नाश में रङ्ग लाल होता है। पित्त के लिङ्ग नाश में पीला तथा नीला होता है, कफ से सफेद रक्त से लाल एवं सन्निपात से आंख का रङ्ग विरना होता है । पित्त विदग्ध दृष्टि के लक्षण-( डेव्ला इन्डनेस आरहेयेरे लापिया ) कुपित पित्त दृष्टि के पहले और दूसरे पटल में जाकर उसे पीला कर देता है । जिस से सम्पूर्ण वस्तुवें पीली दिखाई देती हैं। इसे पित्त विदग्ध दृष्टि कहते हैं। पित्त जब तीसरे पटल में पहुंचता है तब दिन में सूरज की गर्मी से पित्त कम न होने से दिन में कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता परन्तु राव को ठंडक की वजह से पित्त कम पड़ जाता है । अतः रात को दिखाई पड़ता है इसे दिवाव्य कहते हैं। हिन्दी में इसे दिनोंन्यो कहते हैं । श्लेष्म विदग्ध दृष्टिके लचरण-(नाइट ब्लाइन्डनेस आरनिक - ( ४७ ) टालोपिया) नेत्र के पहले दूसरे परदे में कक के होने से दृष्टि मण्डल सफेद पड़ जाता है और सब वस्तुवें सफेद ही नजर आती हैं। कफ से तीसरे पटल में जाने से रात को कफ के कम न होने से दिखाई नहीं देता परन्तु दिन में सूरख की गर्मी से कफ कम हो जाता है अतः दिन में दिखाई देता है इसे नप्तान्ध्य कहते हैं । हिन्दी में इसे रतोन्धी कहते हैं। धृम दर्शी के लक्षण- शोक घर परिश्रम एवं शिर में चोट लगने से पित्त कुपित हो कर तीसरे परदे में चला जाता है तो सब चीजे घूमाकृत (बूधली ) दिखाई देती है इसे धूम दर्शी कहते हैं । हस्व जात्य के लक्षण- पित्त कुपित्त होकर दृष्टि में आनाता है जिस से दिन में मनुष्य बड़ी कठिनाई से बड़ी वस्तुवों को भी छोटे रूप में देख पाता है। इसे हस्त्र जात्य कहते हैं। गम्मोरिका के लक्षण- वायु के कोप से दृष्टि मण्डल धंस जाता है तथा पीड़ा होती है। इसे गम्भीरिका कहते हैं। नकुलान्ध्य के लक्षण- जिसकी दृष्टि नकुल (नेवला) की आंख के समान चमकती हो तथा रङ्ग विरङ्गा दिखाई दे उसे नकुलान्ध्य कहते हैं। .
( ४८ ) आगन्तुज.लिङ्ग नाश- चरक के मत से दो लिङ्ग नाश ओर हैं, एक निमित्त से और दूसरा विना निमित्त के । निमित्त लिङ्ग नाश-विपेले पेड़ की हवा लगने से शिर और नेत्र का खून बिगड़ने से होता है, और देखने की शक्ति नष्ट होजाती है। अनिमित्त लिङ्ग नाश-सूरज, तथा भयंकर सर्प आदि के. देखने से होता है, अचानक उपरोक्त वस्तुओं के. देखने से आंख चकाचौंध हो जाती है । और अांख का रङ्ग पहिले जैसा ही रहता है यदलता नहीं। कृष्ण मण्डल गत रोग- सवण शुक्र, अत्रण शुक्र, पांकात्य, अजका, ये चार रोग होते हैं। सत्रण शुक्र (घाव सहित फूला) के लक्षण नेत्र के काले भाग में गढ़ेशर फूला हो उसमें पीड़ा हो तथा पानी गर्म २ बहता हो उसे सत्रण शुक्र कहते है । अत्रण शुक्र लक्षण आंख दूखने से पैदा हुआ फूला शङ्ख या चन्द्रमा के समान सफेद होता है उसे अत्रण शुक्र कहते हैं वह साध्य होता है।
( ४६ ) अक्षिपाकात्यय के लक्षण- अगर दोपों की वजह से नेत्रों के काले हिस्से में सफेदी फैल जावे तो उसे पाकात्यय कहते हैं। अजका के लक्षण घकरी की मींगणी के समान पीड़ा वाली कलाई लाल और चिकने आंसू नाली जो ऊंचाई नेत्र के काले भाग में होती है उसे अजका जात कहते हैं। नेत्र के सफेद भाग में होने वाले रोग। प्रस्तार्यम, शुक्लार्म, रतार्म, अधिमांसार्म, नायवर्म, शुक्कि, अर्जुन, पिष्टक, शिराजाल, शिराज पीड़िका, क्लास प्रथित यह ११ रोग नेत्र के सफेद.भाग में होते हैं। प्रस्तार्यम के लक्षण- आंख के सफेद भागमें पसला फैला हुआ ललाई या सुखी मायल नो सफेद चिन्ह होता है उसे प्रस्तार्यमै कहते हैं । शुक्लार्म के लक्षण- आंख के सफेद भाग में नो बहुत ही सफेद और फेमिल चिह्न होता है । उसे प्रस्ताबम कहते हैं। रक्कम के लक्षण- अांख के सफेद भाग में नो लाल और नर्म मांस बढ़ता है उसे रक्तार्म कहते हैं।
. shc ( ५० ) अधिमांसर्म के लक्षण आंख के सफेद भाग में विस्तीर्ण नर्म गाढा और किसी कदर कलाई लिए जो मांस बढ़ता है उसे अधिमांसा कहते हैं। स्नायबर्म के लक्षण- आंख के सफेद भाग में जो कठिन फैलने वाला और स्राव रहित जो ऊंचा मांस होता है उसको स्ताप्वर्म कहते हैं । शुक्ति के लक्षण- नेत्र के सफेद भाग में काले रङ्ग का जो मांस विन्दू. होता. हे, अथवा जो सीपसी होती उसे. शुक्ति कहते हैं । अर्जुन के लक्षण- आंख के सफेद भाग में खरगोश के खून जैसी एक बिन्दू होती है उसे अर्जुन कहते हैं। पिष्टक के लक्षण-- श्रांख के सफेद भाग में और वायु. के प्रकोप से चूने के समान सफेद और मैल से भरे हुए आइने की तरह जो ऊंचा मांस होता है उसे पिष्टक कहते हैं। शिराजाल के लक्षण- आंख के सफेद भाग में बाले के समान कठिन शिराओं सें व्याप्त मो लाल शिराओं का समूह होता है उसको शिराजाल कहते हैं। कष्ट ( ५१ ) शिराज पोदिका के लक्षण- श्रांख के सफेद आग में काले भाग के पास शिराओं से घिरी हुई जो सफेद फुन्सियां होती हैं उन्हें शिराज पीड़िका कहते हैं । वलास ग्रथित के लक्षण- आंख के सफेद भाग में कांसी के समान सफेद फठिन और जल की बून्द के समान ऊंची जो बून्द होती है उसे वलास प्रथित कहते हैं। 8 वर्त्मज (पलक) रोगों का वर्णन उत्सङ्गिनी, कुम्भिका, पोथकी, वम॑शर्करा, अर्शोवर्म शुष्काश, अञ्जन नामिका, वढ्लवम, वर्त्मवन्धक, लिष्टवर्ती वमफर म, श्याववर्त्म, प्रक्लिन्नपर्ला, अक्लिन्नवम, वातहतवम, पाखुर्द, निमेष, शोरिणतार्श, लगण, मिपवन, कुञ्चन ये पलकों में २१ रोग होते हैं। उत्सङ्गिनी के लक्षण नीचे पलक में एक फुन्सी होती है उसका मुंह मीतर होता है तथा वाइर की तरफ उठी हुई दिखाई देती है, उसके चारों ओर छुटी २ फुन्सियां होती हैं, ये लाल वर्ण की तथा पौड़ा और खुलली युक्त होती हैं उसे उत्सङ्गिनी कहते हैं।
( ५२ ) कुम्भिका के लक्षण- पलक के किनारे कुम्लिका के बीज के समान फुन्सी होती है यह फूटती है बहती है और कि मवाद मर जाती है और फिर वहा करती है उसे कुम्सिका कहते हैं। और वह सन्निपात से होती है। पोथकी के लक्षण- पलक में लाल सरसों के समान छोटी २ फुन्सियां होती हैं। उनमें पीड़ा खुजली और भारीपन रहता है। भौर स्राव होता है उसे पायकी कहते हैं। वम शर्करा के लक्षण पाक के अन्दर खरदरी एक बड़ो पीड़िका होती है उसके चारों ओर छोटी २ फुन्सियां होती हैं, यह पाक को खराव कर देती हैं इसे वर्त्म शर्करा कहते हैं। अर्शोवर्ल्स के लक्षण-(ग्रेनुलर कानज कटि विटिस) पलक में ककड़ी के बीज के समान चिकनी खरदरी फुन्सियां होती हैं, इनमें पीड़ा कम होती है इसे अर्शीवर्त्म कहते हैं। शुष्कार्श के लक्षण- पक्षक के अन्दर खरदुरे कड़े पीड़ा करने वाले मांस के लम्बे २ अंकुर होते हैं इसे शुष्कार्श कहते हैं।
-- ( ५३ ) अजन नामिका के लक्षण-(स्टाई) रक्त के कोप से पलक के अन्दर छोटी मुलायम लाल रङ्ग की फुन्सि होती है और इसमें पीड़ा होती है, हिन्दी में घुमाणी या विलाई कहते हैं। वहुल वर्ल के लक्षण- पलक के अन्दर सयान रङ्गकी बहुतसी पीड़ादार फुन्सियां हो जाती हैं उसे वहुत वर्त्म कहते हैं ये सन्निपात से होती है । वर्त्म वधन के लक्षण- पलक में सूजन होजाती है जिसमें खुजली एवं पीड़ा होतो है । और मांख ठीक तरह से बंध नहीं होती इसे वर्त्म वन्धन कहते हैं। क्लिष्ट वर्ल्स के लक्षण- कफ रक्त के कोप से दोनों पलकें मुलायम हो जावें ताम्र वर्ण की तथा लाल होजा और थोड़ी २ पीड़ा हो उसे लिष्ट कहते हैं। वन कर्दप के लक्षण- लिष्ट वर्म रोग में पित्त कारक आहार विहार करने से पित्त कुपित्त होकर जब खून में अधिक दाह पैदा कर देता है। और पलक गीली होजाती है उसे वर्त्म कर्दप कहते हैं । श्याव वर्त्म के लक्षण- वावधिक सन्निपात से पलक बाहर तथा भीतर से काली होजाती है पीड़ा तया दाह होती है इसे वर्त्म श्याव कहते हैं। वर्म . प्रक्लिम्न वर्क्स के लक्षण- जिसके पलक के अन्दर सूजन होनाती है और उसके आस पास क्लेद हो तो उसे. प्रक्लिन्न वन कहते हैं। अतिम वर्म के लक्षण विर्ना पके ही मिसके पलक परस्पर में चिप जावे और वार २ धोने पर भी चिपक जावें उसे अक्लिन्न वर्त्म कहते हैं। वातहत वर्त्म के बनण-(टासिस) जितकी पलक तथा शुक्ल भाग को सन्धि अलग होनाती है तथा पलक झपती नहीं, पीड़ा कभी होती है और कभी नहीं भी होती.उसे वातहत वर्त्म कहते हैं। अर्बुद के लक्षण- पलक के अंदर टेढ़ा मेढ़ा कम पीड़ा करने वाला कुछ लाल और शीघ्र बढ़ने वाला या लटकता हुआ मांस की सूरत में मासांकुर होजाता है उसे वावुद कहते हैं। निमेप, के लक्षण (ब्लेफेरोस्पैजम) पलक को खोलने वाली शिरायें वायु प्रविष्ट होकर पलक को ढीला कर देती है जिससे पलक वंद या खुल नहीं सकता इसे निमेष कहते हैं और यह असाध्य है। शोणितार्श के लक्षण-(ग्रेनुलर कौनजंकटिविटिज ) खून की खराबी से पलक के अंदर लाल रङ्ग का मांस का अंकुर होता है उसे वार २ काटने पर भी बढ़ता ही रहता उसे शोणितास कहते हैं।
( ५५ ) लगण के लक्षण- पलक में कड़ी मोटी एक गांठ होती है जोकि पकती नही और उसमें थोड़ी २ पीड़ा होती है उसे लगण कहते हैं यह कक से पैदा होता है। विप वर्म के लक्षण- तीनों दोप कुपित होकर प्रांख की पलक के वाहर सूजन करके अंदर छिद्र होते हैं जिन से पानी बहता है उसे विपवन कहते हैं। कुञ्चन के लक्षण वातादि दोपों से पलक बंद होजाते हैं खुलते नहीं जिससे कुछ भी दिखाई नहीं देता इसे कुम्चन रोग कहते हैं। पलकों की वालों के रोग । पलकों के बालों में पक्ष्य कोप, और पक्ष्य शात ये दो रोग होते हैं। पत्य कोप के लदाख- पलकों के वाल मुड़कर आंख के सफेद या काले भाग रगड़ खाते हैं जिससे बड़ी पीड़ा होती है। और यांस लाल हो जाती हैं बाल उखड़ २ कर गिर पढ़ते हैं इसे पक्ष्य कोप कहते । यह रोग बड़ा दारूण है।
( ५६ ) पक्ष्य शात के लनण पलक में जो बालं होते हैं उनकी जड़ों में रहने वाला पित्त उनका पका देता है जिससे बाल गिर जाते हैं और खुजली तया जलन पैदा होती है इसे पक्ष्य शात कहते हैं। दृष्टि सन्धियों में होने वाले रोग- पूयास, उपनाह, पित्तस्राव, कफ स्राव, सन्निपात सावं रक्त स्राव, पर्वणी, अलजी, जतुपन्थी ये ना रोग होते हैं। पूयालस के लक्षण- पूंयालस रोग दृष्टि की संधी में होता हैं संभो में सूजन होती है और उसमें बदबूदार और गाढी राध आती है। उपनाह लक्षण- दृष्टि संधी में बड़ी कम पकने वाली अधिक खुजली वाली लाल सख्त थोड़े पर्द वाली गांठ पैदा होती है। उसे उपनाह कहते हैं। पित्तनं साव के लक्षण- सन्धि के बीच में लाल और पीला मिला हुआ भयवा फेवल पीला और गर्म नल बहता है उसे पित्तज स्राव कहते हैं । कफन-साव के लक्षण अगर सफेद गाढा और चिकना नाव होता हो तो उसे कफज स्राव कहते हैं। - - - ( ५७ ) सन्निपातज स्त्राव के लक्षण- सन्धियों में पकने वाली सूजन शधव होती हो तो उसे सन्निपातज नाव पमझो। रुधिर जन्य स्राव के लक्षण- स्राव गर्म हो और उसमें विशेष खून बहता हो तो उसे रुधिर जन्य साव कहते हैं। पर्वणी के लक्षण सन्धि में गोल सूजन वाली लाल पारीक जलने वाली और पकने वाली जो फुन्सी होती है उसे पर्व पर्वणी कहते हैं। अलजी के लक्षण- लाल और सफेद फुन्सियों से व्याप्त एक फुसी संधि में . होती है । उसे अलजी कहते हैं। जतुग्रान्यि के लक्षण- पलक और पलक रोमों की संधियों में उत्पन्न होने पाली भनेक भाति वाली कीड़े और खुलली उत्पन्न करने वाली और नेत्र को निगाह २ कर पलक और सफेद भाग की संधियों में बाने वाली प्रान्थिको नतुप्रान्यि कहते हैं। - ( ५८ सशोथ पाक, अशोथ पाक, 8 सारी आंखों में होने वाले रोग वाता भिष्यन्द, कफा भिष्यन्द, पित्ता भिष्यन्द, रक्ता निष्यन्द, वाता भिष्यन्द जन्य अधिमन्थ, पित्तां मिष्यन्द जन्य अधिमन्य, कफा मिष्यन्द जम्य अधिमन्य, रक्ता भिष्यन्द जन्य अधिमन्थ, हताधिमस्थ, · वातपर्यय, शुष्काक्षिपाक, अन्यतोवात, अम्लाध्युपित, : शिरोत्पात, शिरा हर्ष ये १७ रोग सारी अांखों में होते हैं। वाताभिष्यन्दं के लक्षण तोड़ने या भोंकने जैसी पीड़ा हो जड़ता रोमाञ्च तथा खुजली चले, नेत्रों में रूखापन, तथा शिर. में दर्द, नेत्र न चिपकें और शीतल आंसू पावें तो वातामिष्यन्द सममना चाहिए । पित्ताभिष्यन्द के लक्षण- नेत्रों में जलन तथा पाक दो शीतल पदार्थों की इच्छा हो नेत्रों से अवां सा निकलता हो तथा पीले हो तो पित्ताभिध्यन्द सममना चाहिए। कफाभिष्यन्द के लक्षण- नेत्रों में भारीपन खुजली तथा कीचड़ अधिक हो आंखें चिपके शीतलता अधिक हो और सून न हो गर्म पदार्थों की इच्छा, आंखों का अधिक स्नाय कफाभिष्यन्द में होता है। रक्ताभिष्यन्द के लक्षण आंसू क्या नेत्र लाल हों आंख की शिनस लाल होजावें - (५६) तथा पित्ताभिष्यन्द के भी लक्षमा मिलते हों तो रतामिप्यन्द समझना चाहिए । अभियन्द प्रांख दूखनी को कहते हैं। अधिमन्य के लक्षण- आंग्य दुःखनी पाने पर यदि उनकी उचित चिकित्सा न की जाये तो पावे माथे में भी मन्यन जैसी पीड़ा होती है उसे अधिमन्य रोग कहते हैं। मारवाड़ी में (चोमा) के नाम से यह रोग प्रसिद्ध है। जिस प्रकार अनिष्यन्द चार होते हैं उसी प्रकार अधिमन्य भी चार प्रकार का होता है और लक्षण भी होपानुसार वैसे ही होते हैं, विशेषता इतनी ही है कि प्रावे माथे या शंख देश में पीड़ा विशेष अधिमंथ में होती है और अभिष्यंद में नहीं होती। ककाभिष्यम्द से होने वाला अधिमन्य जात रात में दृष्टि का नाश कर देता है। रक्ताभिष्यन्द से होने वाला अधिमन्य पांच रात में दृष्टि का नाश कर देता है। वातामिप्यन्द से होने वाला अधिमन्य छः रात में दृष्टि का नाश कर देता है। पित्तामिप्यन्द्र से होने वाला अधिमन्य तीन दिन में दृष्टि का नाश कर देता है। संशोथ पाक के लक्षण- नेत्रों में चिपकना, खुजली, आंसुवों से भरे रहना सूनन पके हुए हों तो सशोध पाक ममना चाहिये ।
(. ६० ) अशोथ पाक के लक्षण- उपरोक्त सशोथ पाक के सभी लक्षण हो केवल सूजन न हो तो उसे अशोथ पाक कहते हैं । हाधिमन्य के सक्षण- वाताभिष्यन्द से पैदा हुवा अधिमन्य की ठीक तरह से चिकित्सा न की नावे तो भयङ्कर पीड़ा होती है, और पीड़ा से आंख नष्ट हो जाती हैं तव उसे होषिमन्य कहते हैं। वात पर्यय के लक्षण- जब वायु भुषां तथा नेत्रों में बार २ घूमता है और पीड़ा करता है उसे वात पर्यय रोग कहते हैं। शुप्फाति पाक के लक्षण- यदि पनकोंमें रुक्षता हो जिससे आंखें मिची रहें तया पीड़ा हो, बलन हो, तथा ठीक तरह से दिखाई न पड़े खोलते समय आंख विकृत हो तो शुष्काक्षि पाक समझना चाहिए। अन्यतो बात के लवण- एक स्थान में रने वाला वायु दूसरे स्थान में जाकर कान, शिर, ठोडी, मन्यानाड़ी भौर पृष्ट वंश की वायु नेत्र और भुवों में तीन वेदना करती है तब अन्यतोवात रोग कहते हैं। अम्बा युक्ति के लक्षण - खट्टे रस खाने से नेत्र फाले, साल, कोने वाले जलनयुक्त, सूपन और नाव युक्त होते हैं, तब.मम्लाघ्युषित रोग कहते हैं।
- - ( ६१ ) शिरोत्पात के लक्षण- वेदना राहत या सहित नेत्र को शिरा लाल हया वार २ विकृत हो जावें उसे शिरोत्पात रोग कहते हैं। शिराहर्प के लक्षण- शिरोत्पात की चिकित्सा न होने से शिराहर्ष रोग होजाता है। इसमें आंखें लाल तया नाव युक्त होती हैं पानी तथा कीचड़ वहता है, तथा दिखाई नहीं पड़ता उसे शिराहर्प कहते हैं। निराम नेत्रों के लक्षण- आंखों में वेदना तथा लाली जादा हा तया भोंकने की सी पीड़ा एवं शूल होती हो तथा आंसू गिरते हो तो साम नेत्र सनमाने चाहिये, अर्थात नेत्र नहीं पके हैं एवं कच्चे हैं ऐसा समझना चाहिए । साम अवस्था में प्रस्तन, भारी मोजन, स्नान, वृत्तपान काढा आदि वर्जनीय हैं निराम नेत्रों के लक्षण- अगर नेनों में वेदना कम हो, खुजली चलती हो, परन्तु कम हो सूजन घटी हो आंसू कम आते हो और वर्ण या रङ्ग निर्मल हो, वो निरामंता सममो, यानी नेत्रों को भाम रहित पक्के सममो । इस अवस्था में अञ्जन, भारी भोजन, घृतपान, स्नान वया काढा आदि के पीने में कोई मनाही नहीं है, बदि साम अवस्थामें ये कर लिए जावें वो हानिकी संभावना होजाती है
( ६२ )
* नेत्र रोग चिकित्सा *
निम्न लिखित, उपचारों से नेत्र रोगों की चिकित्सा
की जाती है।
सेक-पानी आदि की बारीक धार नेत्रों में डालना ।
पाश्चोतन-पोटली या पिचकारी आदि से प्रांखों में
दवा डालना।
पिण्डो-नेत्रों के ऊपर लूपरी आदि बांधना ।
विडालक-नांफण वचा कर आंखों के चारों और
लेप करना।
तर्पण-आंखों में घी या गर्म पानी भरना ।
पुटपाक-पकाया हुआ रस . आंखों में भरना ।
अञ्जन-दोप पकने के वाद आंखों में अस्खन डालना।..
सेक विधि-
रोगी की आंखें बन्द करा कर उन पर चार अंगुल ऊंचे
से धी श्रादि की धारः वांधनी चाहिए इसी को सेक
कहते हैं।
आश्चोतन विधि-
रोगी की आंखों को दो अंगुलियों से खोल कर उनमें
कादे या शहद अथवा. ची, दूध, आदि की बून्द डोपर
(पिचकारी) द्वारा डालने को भाश्चोचन कहते हैं।
'
.
( ६३ )
पिण्डी विधि-
नीम की पत्ती मेथी आदि चीजों को घोट कर टिकियां
बना कर आंख पर बांधने को पिण्डी कहते हैं।
विडालक विधि-
अफीम, रसोंत, हल्दी आदि वस्तुवों को पीस कर
मांकण वाकर आंखों के चारों ओर लेप करने को विडालक
कहते हैं ।
तर्पण विधि-
श्रांखों के चारों और उड़द आदि के जून
की वाट करके
आंखों को मिचवा कर उनमें घी, शहन आदि को भरदें धौर
बाद में धीरे २ आंखों को खोलें इसे तर्पण कहते हैं।
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पुट पाक विधि-
कमल नाल आदि को शिलापर पीस कर उसकी लुगदी
का गोला बनालें इस गोले के चारों ओर मिट्टी लपेट कर भाग
में देदें जय गोला लाल हो जाये तब निकाल कर लुगदी को
नीचोड़ कर इसका रस अांख में डालें इसी को पुटपाक कहते हैं।
भजन विधि-
गोली, रस भौर चूर्णादि भेद से अबन तीन प्रकार का
है । थके हुए बहुत होने के बाद डरे हुए, शराव पीए हुए, ज्वर
रोगी एवं जिसके मल मूत्र आदि रुके हुए हाँ उनका अञ्जन नहीं
लगाना चाहिए।
६४.).
नेत्र रोगों पर पुनर्नवा (साटा)
पुनर्नवा की जड़ को दूध
में पिस कर लगाने से आंखों
की खुजली चली जाती है।
शहद में पीस कर प्रांजने से पानी बहना रुक जाता है।
घी में पीस कर प्रांजने से फूला नाश हो जाता है।
तैल में पीस कर अांनने से तिमिर या जाला ठीक होता है।
कांजी में पीस कर प्रांजने से रातोंघा ठीक होता है। इस दवा
को देशी ममीरा कहते हैं। इसके समकक्ष नेत्र रोग नाशक
दूसरी दवा कम ही नजर आती है।
नेत्राभिष्यन्द चिकित्सा
फिटकरी फूला १ माशा, सैंघा नमक १ माशा, रसौंत ६
माशा इनका एक पाव गुलाव जल में मिला कर आंखों में डालने
से सब प्रकार की दूःखनी आंखें ठीक हो जाती हैं।
गुवार पाठे का गुदा-४ ताले, अफीम २ माशे और
फिटकरी २ माशे सव की पोटली बना कर दिन. रात कई बार
श्रांखों पर फेरने से नेत्र रोग आराम हो जाते हैं।
रतोंची चिकित्सा-
सफेद साटे की जड़ पीपल और अरीठे की गुठली गावर
के रस में पीस कर नेत्र में डालने से रतोंधा चला वाता है।
मोतिया विन्द (लिङ्ग नारा ) चिकित्सा--
नासादर को महीन पीस कर बारीक से बारीक कपड़े से
छान कर मांखों में लगाने से मोतिया विन्द चला जाता है।
-
( ६५ ) लड़के वाली औरत के दूध में भीमसेनी कपूर रगड़ कर लगाने से भी मोतिया विन्द चला जाता है। कोकीन से पांखों को सुन्न करके काले और सफेद भाग की संधि में शस्त्र से छिद्र करके ताल यंत्र से गुवार की दाल के सकल की मोतिया विद की टिकीया निकाल ली जाती है। बाद में - दिन तक साधारण आंख पर पट्टी बांधनी चाहिये । रोगी को इधर उधर हिलने न दें और पथ्य में केवल दूध और दलिया देना चाहिए । नेत्र खुजली नाशक रोग- यशद को और पीपल को पिसाकर आंख में डालने से नेत्रों की खुजली एवं जलन शान्त होती है। शुक्र (फूला) चिकित्सा- लाहोरी नमक १ माशा कबूतर की वीठ १ माशा पाक की जड़ १ माशा, मुर्गी की वीठ १ माशा को निम्बू के रस या में पीस कर आंखों में लगाने से फूला, जाला, तथा मोतिया विन्द चला जाता है। सर्व नेत्र रोग नाशक चिकित्सा हरद पड़ी, बहेड़ा, आंवला, इनको समान भाग लेकर राव को पानी में भिगोदें, सुबह इस पानी से प्रांख धोने से समस्त नेत्र रोग शान्त होते हैं। भोजन के याद हाथ मलकर भांखों पर लगाने से नेत्र रोग कम होते हैं। गोमुत्र (६६ ) रसोंत को पकरी या स्त्री के दूध में फिस कर लगाने से समस्त नेत्र रोग चले जाते हैं। गुप्तावजल एक पाव में १.माशा एकी फ्लीवन मिला कर आंमों में डालने से समस्त नेत्र रोग तथा उनके घाव नासूर आदि ठीक होते हैं। कपूर को बड़के दूध में पीस कर लगाने से उभरा हुभा फूला नष्ट होजाता है। काला सुरमा १ छटांक को मृत काले सांप के मुंह में भर कर एक महीने तक रक्खें, उसके वाद नीम के वृक्ष के कोटरे में एक महीने रख कर, सोंफ, अजवायन, गुलाव जल, नीम की पत्तियों के रस, इनमें सात २ बार भावितकर, १ माशा मोती की गुलाब जल में पिष्टी करके मिलादे, तथा एक माशा उसमें ममीरा मिलादें, इस सुरमे के लगाने से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है तथा नेत्रों के समस्त रोग शान्त हो जाते हैं। पैरों को धोकर साफ रखने से नेत्रों की न्योती बढ़ती कारण कि पैरों तथा नेत्रों का एक शिरा द्वारा सम्बन्ध है। भारों के लिए पथ्य- चावल, मूग, मो, वथुवा, चोलाई, परवल, करेले, बैंगन, आदि घी में पका कर खाने चाहिये। मधुर तथा. कड़वे रस भी हितकर हैं। है . - ( ६७ ) मन को एकाग्र करके पांव घोना, आंखों में निकला जल का छींटा मारना, पैरों में तेल लगाना, हरियाली देखा, पानी में डूबकी लगाकर नेत्र खोलना, जूते पहनना, स्त्री का दूध आंखों में लगाना आदि पथ्य हैं। अपथ्य-. चरपरे, भारी, खट्टे, तीक्षण और गर्म पदार्थ, उद्द, लाविया, मैथुन, शराव, सूखा मांस, रबल मछली, अंकुर वाले अनान और जलन करने वाले खाने पीने के पदार्थ क्रोध, शोक, रोना, मलमूत्रादि वेग रोकना, दन्तुन करना, नहाना, रात में भोजन करना, धूप में किरना, धुवां में रहना, बहुत बकना, वारम्वार पानी पीना, महुधा, दही पत्तों के साग, तरवून, मांस और पान नेत्र रोगियों के लिए हानि कारक है। नेत्राञ्जन- सोंठ, मिर्च, पीपल, फरञ्च की मिंगी, हल्दी, दाल हल्दी, सैन्धानमक, बिल्व मूल, वरुण छाल, नल अंगरा नोसादर, समुद्र माग, इनका महीन थञ्जन वना कर आंग्व में डालने से अर्जुन शुक्र (मूला ) पटलगत दोप, तिमिर (जाला) मोतिया विन्द आदि रोग चले जाते हैं। तथा आंखों की ज्योती बढ़ती है क्या आंखें कमी खराब नही होती हैं । भोलन के वाद हाथों घोकर परस्पर में मल कर यदि प्रांखों पर लगाए ना तो आंखों सम्बन्धी रोग नहीं होते हैं।
। ६८ )
नेत्रों पर त्रिफला प्रयोग
हरड़ बड़ी, बहेड़ा, आंवला इनका समान भाग लेकर
चूर्ण बना ले इस चूर्ण को रात में सोते समय ६ माशा दूध के
साथ लेने से आंखें ठीक होती हैं। तथा त्रिफला के पानी से
आंखें धोने से श्राराम होता है। एवं त्रिफला से सिद्ध किया
हुआ घी खाने से श्राखों में पूर्ण श्राराम होता है तथा त्रिफला
चूर्ण शहद में मिला कर खाने से भी श्रेयकर है।
(६ ) पञ्चरम अध्याय * मस्तिष्क की साधारण रचना। में मस्तिष्क को देखने के लिए सब से पहिले हम त्वचा को काटेंगे और उसके बाद सौत्रिक तन्तु से निर्मित कला और प.ला के नीचे पेशी तथा उसकी कंडरा और उसके बाद पारिकपमलिका नाम को पतली फेला काटने के बाद कपाल यो हड्डी को काटेंगे। और उसके बाद वाह्य आवरण, मध्य शापरण, तथा अन्तः आवरण को हटाने के बाद मस्तिष्क दिखाई देगा । नवजव पालक के मस्तिष्क का भार ७ छटांक के लगभग होता है। पहिले वर्ष के अन्त दुगना होजाता है। छठे वर्ष में तिगुना तया १८ वर्ष के बाद .२ छटांक भार हो जाता है। बाहर से मस्तिष्क का रङ्ग फूमर होता है जिस प्रकार हल चलाने से खेत में नालियां क्या में वन जाती है इसी प्रकार मस्तिष्क में घाइयां और चक्रांग होते हैं, गहरे भाग को वाई या सीता कहते हैं। और उभरे हुए भाग फो चक्रांग व्हते हैं, । जिसके थे वाइयां गहरी होती वह बुद्धिमान होता है तथा कम होती है वह पागल या मूर्ख होता है । यदि ऊपर से देखें तो वह मस्तिष्क के चोचो कोच एक दरार पड़ी हुई होती है इससे मस्तिष्क के पांच तथा दत्यां दो भाग होजाते हैं, इस दरार को जोड़ती हुई घोच
( .७. .)
में एक सफेद चीज होती है इसको महा संयोजक कहते हैं।
इसमें तीन शिरे या ध्रुव होते हैं बलाट ध्रुव, शंख ध्रुव, तथा
पश्चात ध्रुव।
-
• .
जिस प्रकार एक राज्य में तरह २ के महकमें होते
और उनके अलग २ कार्य होते हैं । तया वे सम्पूर्ण राज्य का
संचालन करते हैं उसी प्रकार मस्तिष्क में भी अलग २ केन्द्र होते
हैं । जैसे गति केन्द्र, बुद्धि केन्द्र, ज्ञान केन्द्र, विद्या केन्द्र;..
दृष्टि केन्द्र, श्रवण केन्द्र, धान केन्द्र आदि इन केन्द्रों का भी
नामों के अनुसार अलग अलग कार्य हैं। इन केन्द्रों में शरीर
से भिन्न २ स्थानों से वार आते हैं और विशेष २ केन्द्रों से
शरीर को तार जाते हैं। इससे यह ही सिद्ध होता है कि मस्तिष्क
हमारे शरीर का राजा हैं, बृहत मस्तिष्क के नीचे
लघु
मस्तिष्क
रहता है, और लघु मस्तिष्क · से संयुम्नाका प्रारम्भ
होती है।
यह शरीर का प्रधान अंग होने से यदि इसमें किसी
प्रकार की कमी आती है तो इससे पागल पन, मृगी, मूर्छा,
आदि रोग होकर, शरीर वेकाम हो जाता है. । और
अन्य अंग श्रेष्ट तथा काम नहीं करते हैं। अतः .. मध्यम
अंग की हमें सब तरह से रक्षा. ( हिफानत ) करनी
चाहिये।
.
है
.
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पित्तज, वातज, करुन, कृमिज, रक्तज, क्षयज, शंखक, अनन्त वात, (७१ ) * शिरो रोग वर्णन * शिर में निम्नलिखित ११ रोग होते हैं- सन्निपातज, सूर्गवर्त, अधवि भदेक, वातिक शिरो रोग के लक्षण- जिसमें बिना कारण से अकस्मात शिर में पौड़ा हो और रात को ठण्ड में अधिक बढ़े, शिर वांधने तथा तपाने से शांत हो तो वातिक शिरो रोग होता है। पैतिक शिरो रोग लक्षण- शिर में पीड़ा तया जलन हो जैसे किसी ने भगारे रक्खे आंख और नाक में मानों धुवां निकलता हो ऐसा प्रतीत होता है रात्रि में ठण्ड के कारण शांत हो जावे तो पैतिक शिरो रोग होता है । श्लेष्मिक शिरो रोग लक्षण- शिर में पीड़ा तया कफ से भरा हुआ भारी वोमदार नकड़ा हुआ और ठण्डा हो, आंख और मुंह में सूजन हो तो ककन शिरो रोग होता है।
से २) सन्निपातिक शिरो रोग के लक्षण : तीनों दोषों से उत्पन्न शिरा रोगमें तीनों दोषों के पूरे २ लक्षण होते हैं। रतज शिरो रोग के लक्षण रक्तज शिरो रोग में पित्तज शिरो रोग के. समान ही लक्षणं होते हैं केवल भेद इतना ही होगा है कि छूने पर बढ़ी तकलीफ होती है। यक्षज शिरो रोग के लक्षण- जव शिर खून वसा कफ मेद मज्जा शुक्र और वायु खाली हो जाता है। उस समय शिर में बड़ी तेज पीड़ा होती है। इसमें पसीना, धूम, नस्य, वमन आदि कराने से पीड़ा अधिक होती है । एवं रक्त आदि के निकलवाने से भी पीड़ा बढ़ती है। इसे क्षयम शिरो रोग कहते हैं। क्रिमिज शिरो रोग के लक्षण क्रिमिन शिरो रोग में कीड़े पड़ने से रक्त आदि धातुओं को चाट जाते हैं, जिससे शिर में सुई चुभने जैसी पोड़ा होती है और नाड़ें फड़कती हुई नजर आती हैं तथा नाक से पीव और पानी के साथ कीड़े निकलते रहते हैं। यह क्रिमिन शिरो रोग में होता है। सूर्यावर्त रोग के लक्षण- सूरज उदय हो कर जैसे २ चढ़ता जाता हैं वैसे २ ही शिर, आंख, भुवों में पीड़ा बढ़ती जाती है। जब सूर्य मध्यं में ( ७३ ) पाताहै तब पीड़ा तीव्र होती नातीहैऔर सूरज ढलते समय कम होती जाती है । एवं छिपने पर एक दम शांत हो जाती है अर्थात् पौड़ा रहती ही नहीं है, यह सन्निपाता है। और बड़ा कष्ट दायक है। अनन्त वात रोग के लक्षण- तीनों दोष कुपित होकर गर्दन की शिरा तथा गर्दन के पृष्ट भाग में आंख और भों तया शङ्ख देश में हर समय बड़ी पीड़ा होती है । कपल में एक जगह पीड़ा होती है तथा वड़ा वैठ जाता है और प्रांखोंमें विविध रोग हो जाते हैं इसे अनन्त वात कहते हैं हिन्दी में इसे समल वायु कहते हैं। (आंधा शीशी) अविमेदक के लक्षण ( हेमिक्रेनियां) रुक्ष भोजन, अति भोजन, भोजन पर भोजन करने से पूर्व को वायु सेवन करने से, अधिक श्रोसका सेवन, परिश्रम, भैथुन, टट्टी, पेशाब का रोकना, कसरत करना आदि कारणों से रहा हुआ वायु कफ के साथ या अरसेला श्राधा मस्तक एक तरफ की कनपटी, आंख, ललाट में शस्त्र से काटने और आग से जलने या मथने, पिसने जैसी पड़ी तेज पीड़ा कर देता है। यदि इस रोग की लापरवाही से ठीक चिकित्सा न की जाये तो यह बहुत बढ़ कर एक आंख या कान खराव कर देना है। अर्थात् आंख से दीव्रता नहीं एवं कान से सुनता नहीं है । इसे अर्धाव मेदक या आंधा शीशी या अधकपकारी कहते हैं।
( ७४ )
शंखक के लक्षण
कुपित वात पित्त, कफ तथा रल शङ्ख देश में इकठे हे।
कर एक बड़ा ही भयङ्कर शोथ पैदा कर देते हैं। जो कि लाल
होता है। और पीड़ा एवं जलन होती है यह शोथ थिप के समान
फैल कर शिर और गले को रोक देता है और तीन दिनों में ही
मार डालता है। यदि बड़ी निपुणता के साथ अनुभवी चिकित्सक
चिकित्सा करे तो शायद भाग्य वाला ही रोगी इससे बच सकता
है परन्तु वैद्य पहिले यह साफ कहदे कि यह रोगी असाध्य है
प्रयत्न किया जा रहा है यदि भाग्य हुआ तो बच सकता है ऐसा
कह कर ही इलाज करना चाहिए। अन्यथा वैद्य अपयश का
भागी होता है।
वातज शिरोरोग चिकित्सा-
वातन शिरोरोग में दशमूल आदि वात नाशक औषधियों
से पकाया हुआ दूध शिर पर सींचना चाहिये । रात के समय
मूंग, उड़द और कुलत्यी को घी में भून कर और मिर्च आदि
तीक्षण वस्तु मिला कर खाना चाहिये । इसमें स्नेहन स्वेदन भोर
मस्तक में तेल आदि मलना हितकारी है। एवं गर्म
दूध.
पीना
चाहिए कूठ, एरण्ड को जड़ सोंठ इनको समान भाग लेकर छाछ
में पीस कर शिर पर लेप करने से. वातज शिरो रोग ठीक
हो जाता है।
-
( ७५ )
पित्तज शिरोरोग चिकित्सा-
पित्तन शिरोरोग में रोगी को घृत श्रादि से स्निग्य करके
निशोथ ३ माशा गर्म पानी या दूध के साथ देना चाहिये ।
बिससे विरेचन हो जायें, और विरेचन से शिर का दर्द शान्त
होनावे । शिर को घार २ ठण्डे पानी में डबोने से या सफेद चंदन
को गुलाब जल में रगड़ कर लगाने से या गुलाब जम की पट्टी
लगाने से पित्तज शिरोरोग शान्त होता है। प्रांवक्षों को पानी
में पीस कर लेप करने से भी पित्तज शिर दर्द चला जाता
है । इसमें शीतल पदार्थों का लेप
तथा सोचन
हितकर है।
कफज शिरोरोग चिकित्सा-
कफन शिरोरोग में लंघन कराना चाहये तथा कायल
का नस्य देना चाहिए | रूग्वी, गर्म और पाचन औषधियोंका लेप
और स्वेद देना चाहिये, गर्म जल पीना, गर्म पानी से नहाना
पसीने निकल पीना, चाए पीना, केशर या रोठ, मिर्च काली,
पिप्पल का लेप करना, गर्म भुने हुए मूंग या अजवायन सूचना
ये सब कफन शिरोरोग में लालदायक है, तेल मालिश इसमें
पड़ी हानिकारक है।
रक्तज शिरोरोग चिकित्सा-
इसमें भोपन लेप सीचन आदि मव पित्तज शिरोरोग के
समान करने चाहिये।
१ ७६ )
इसमें रक्तमोक्षण अर्थात फस्त खुलाने की बड़ी आवश्य
कता है। एक बार शीतल तथा एक वार गर्म क्रिया करनी
चाहिये। अमृतधारा या मक्खन में कपूर पीपरमेन्ट एवं
अनवायन के फूल मिलाकर शिर में मलने से रक्तज शिरोरोग
चला जाता है।
त्रिदोषज शिरोरोग चिकित्सा-
दशमूल से सिद्ध किया हुअा दूध पीने से. या नस्य लेने
से मेंठ और गुड़ को एक साथ सूधने से त्रिदोषज शिरोरोग
ठीक हो जाता है।
कृमिज शिरो रोग की चिकित्सा
रीठे को पानी में पीस कर दो चार बूंद नाक में टपकाने
से शिर के एवं माथे के कीड़े मर जाते हैं ।
बिडङ्ग के चूर्ण को चिलम में डाल कर तमाखू की तरह
पीने से कीड़े मरजाते हैं।
सूर्यावर्त चिकित्सा-
घी और गुड़ को मिला कर पीने या नस्य लेने से घेवर
या जलेबी, एवं पूड़े दूध में खाने से, फस्त खुलाने से एरण्ड के
तैल का विरेचन लेने से या घी और दूध मिला कर पीने से
सूर्यावर्त रोग ठीक होता है ।
धनियां, लाल चन्दन, कायनी और इसवगाल इन सब
को पोस्त के पानी में पीस कर लेप करने से सूर्यावर्स चला जाता
( ७५ )
। नाक के द्वारा दूध या पानी पीना इस रोग में अत्यन्त ही
लाभकारी है।
अर्धात्र भेदक चिकित्सा-
स्नेहन, स्वेदन, विरेचन, धूप और स्निग्य तथा गर्म
भोजन से अर्धाव भेदक या श्रांधा शीशीफा दर्द शांत होता है।
वाय विडङ्ग और काले तिल बरावर २ लेकर दूध में
पीस कर लेप करने से और इसी का नस्य लेने से अर्धावभेदक
शांत हो जाता है।
इस में नाक के द्वारा दूध पानी या नारियल का पानी
पीना अत्यन्त ही लाभदायक है।
केशर को घी में भून कर और वरावर को मिश्री मिला
कर वकरी के दूध में पीने से प्राव भेदक शांत हो जाता है।
इसी की नस्य लेने से भी तुरन्त फायदा होता है।
शंखरु शिरोरोग चिकित्सा-
शंखक की चिकित्सा सूर्यावर्त की तरह ही होती है केपल
वेदन कर्म इसमें वर्जनीय है।
अनन्त वात चिकित्सा-
अनन्त वात में भी सूर्यावर्त के समान ही चिकित्सा
लाभदायक है। इसमें खून निकलवाना या फस्त खोलना हितकर
है शहद मिले रसगुले, घेवर, मलेवी आदि का दूध के साथ
सेवन करना हितकर है।
( ७८ ). सब तरह के शिर दर्द में विरेचन लेना आवश्यक है । मुलेठी २ तोले, सुनाय १ तोला, सॉफ ६ माशा; शूठगन्धक, ६ माशा, मिश्री ६ तोला, इनका चूर्णकपड़छान करके ६माशा दूधके साथ लेने से कब्ज मिट जाता है। और कब्ज मिटने से शिर में शान्ति हो जाती है। कपूर ६ माशा, दालचिनी तैल १ तोला पीपरमेन्ट २ माशा वेरलीन २ तोला इनका वाम लगाने या एस्प्रीन ४ रत्ती पानी के साथ लेने से शिर दर्द चला जाता है। मस्तिष्क तथा वात नाड़ियों का एक दूसरे से परस्पर सम्बन्ध है रज और तम दोषों के द्वारा मन विगड़ने से मस्तिष्क में खराबी होजाती है जिससे उन्माद, मूर्छा, अपस्यार, सम्यास महात्यम आदि रोगों की उत्पत्ति हो जाती है एवं वेदना वाहक वात नोड़ियों का मस्तिष्क से सम्बन्ध विच्छेद होने से पक्षाघात (लकवा) हो जाता है उपरोक्त रोगों का शिर से सम्बन्ध होने से इनका भी यथा योग्य निदान लक्षण चिकित्सा सहित संक्षेप से विवेचन किया जावेगा । इसी प्रकार मस्तिष्क तथा मन पर बुरा प्रभाव पड़ने से मनुष्य अकस्मात नपुंसक हो जाता है अतः नपुंसकता के भी निदान लक्षण तथा चिकित्सा का वर्णन करना भावश्यक है । नपुंसकता की चिकित्सा के लिए वानीकरण तथा रगयन का लिखना भी जरूरी है। अतः इन सव का संक्षेप से वर्णन आगे किया ना रहा है।
( ७६ ) - * षष्ठम-अध्याय * उन्माद रोग वर्णन । उन्माद के कारण । संयोग विरुद्ध, अपवित्र, विप मिला हुआ भोजन करने से पूज्य देवता और गुरु का अपमान करने से अत्यन्त दुःखी या प्रसन्न होने से बलवान के साथ युद्ध करने से या मय से, वात, पित, कक, सन्निपात मनोज दुःख और विष के भेद से छः प्रकार का उन्माद हो जाता है। उन्माद की सम्प्राप्ति- काम, शोक, भय, लोभ, क्रोध आदि कारणों से मन के रज और तम दोष बिगड़ कर मन को दूपित करते हैं मन के ऊपर कुप्रभाव पड़ने से शारीरिक वात, पित, कफ आदि दोप बिगड़ जाते हैं। और वे ज्ञान वादक नाड़ियों एवं दिल तया मस्तिष्क पर अपना प्रजाव डालते हैं उसी में उन्माद रोग उत्पन्न हो जाता है। उन्माद के सामान्य लक्षण- बुद्धि भ्रम मनकी चञ्चलता बधि का इधर उधर घूमाना अधीरता, असम्बद्ध भापण, एवं ज्ञान शून्यता आदि कारणों से यह रोगी पहचाना जाता है।
(८०) बातज उन्माद के लक्षण- रुक्ष शीतल और अल्प सोजन करने से उपावस से अधिक वमन या विरेचन से या धातु के क्षीण होने से वायु कुपित होकर वातज उन्माद कर देता है। इसमें रोगी विना कारण के हंसता, नाचता, गाता है तथा रोता है। हाथ पैरों का चटकना, अधिक बोलना, श्रादि कारणों एवं रोगी का शरीर रुखा दुबला और लाल होने से तथा भोजन पचने के बाद इस का दौरा होने से वातिक उन्माद समझना चाहिये । पित्तज उन्मांद के लक्षण- गर्म कच्चे कड़वे कट्टे तथा जलन कारक पदार्थ खाने से पित्त बढ़ कर उन्माद पैदा कर देता है, इसमें क्रोध श्रानां लज्जा और मनुष्यता को छोड़ कर नंगा होना, सहनशील न होना, शरीर गर्म रहना, डर कर भागना, ठंडी वस्तुओं को अधिक चाहना चेहरा पीला होना आदि लक्षण होते हैं। कफज उन्माद के लक्षण- कम भूम्ब में पेट भर खाना, परिश्रम न करना, आदि कारणों से कम बढ़ कर कंकज उन्माद करता है. इसमें रोगी एकान्त में रहना पसन्द करता है, कम बोलता है । स्त्रियों को अधिक चाहता है, नींद अधिक आती है, भोजन में इच्छा नही रहती, कभी २ उल्टी आती है, या जी मचलता है, मुह से लार पड़ती हैं भोजन करते ही उन्माद का जोर बढ़ता है तथा नाखून चमड़ा मल मूत्र तथा आंखों का रङ्ग सफेद होनाता है।
( १ ) सन्निपातज उन्माद के लक्षण- हैं, इस में सव दोपों के मिले हुए कारण तथा लक्षण होते यह उन्माद बड़ा ही भयङ्कर तथा दुश्चिकित्स्य है। शोकज उन्माद के लक्षण- चौर, शत्रु, राज पुरुप, राजा, सिंह, व्याघ्र या सर्प श्रादि से डरना, धन, पुत्र, स्त्री या स्वजन के नष्ट होने से, यथेच्छ स्त्री के न मिलने से मनुष्य के दिल में अत्यन्त दुःख हो कर शोकन उन्माद हो जाता है । इसमें मनुष्य गुप्त बातों को कहता है । तरह २ की बातें करता है, इंसता है, गाता है, और रोता है। और अत्यन्त ही मूर्ख हो जाता है । विष जन्य उन्माद के लत्रण- जहर खाने से ना उन्माद होता है उसमें रोगी की आंखें लाल हो जाती हैं तथा वल और वर्ण का नाश होना, इण्डियों की शक्ति का नाश होना, मुह या शरीर का रङ्ग काला पड़ना वेहोश होना आदि लक्षण हो जाते हैं। असाध्य उन्माद के लक्षण- रोगीका मुंह सीदा नीचेकी या ऊपर की ओर रहना मांस और बलका क्षीण होजाना, नींद न आना भादि कारणों से रोगी को असाध्य जानना चाहिए। - के ( ९२ । भूतोन्माद के लक्षण- भूतोन्माद में बोल चाल पराक्रम शति उठना, बैठना, चलना, दौड़ना, पकड़ना, कूदना, लांघना, ज्ञान विज्ञान, कारीगरी आदि ऐसे विचित्र होते हैं । निनका सामान्य श्रादमी नहीं कर सकता तथा इसका समय निश्चित नहीं होता है। देव जुष्ट उन्माद लक्षण- इसमें मनुष्य संतुष्ट तथा पवित्र रहता है सुगन्धित माला धारण करना, तन्डा रहित रहना, लगातार संस्कृत वालना, तेज युक्त दूसरों को वर देना, नेत्रों का स्थिर रहना, ब्राह्मणों का भक्त होना आदि लक्षण देव जुष्ट के हैं। जिनको क्रोध हो 'शरीर के अव यव ढीले पड़ जावें, मुंह से लार या माग पड़ते हों, नींद अधिक प्राति हो, शरीरमें कम्प कपी रहना, गूगासा बना रहना, आदि लक्षण गण माता के कोप से जो उन्माद होता है उसमें होता है। राक्षस ग्रह ग्रहीत उन्माद के लक्षण- इसमें पसीना अधिक आना ब्राह्मण गुरू देवता आदि की निन्दा करना, टेढी नजर रखना, निडर रहना, कुमार्ग में दृष्टि रखना, उचित्त खान पान से सन्तुष्ट न होना आदि लक्षण, होते हैं। गन्धर्व ग्रह गृहीत उन्माद के लक्षण- इसमें प्रसन्न चित्त नदी के तट पर घूमना, सदाचार युक्त ( ३ ) रहना, गाना, नाचना, हंसना आदि में रुचि रखना सुगन्धित गुस्स या मालाभों से प्रेम रखना आदि लक्षण होते हैं। यक्ष ग्रह गृहीत उन्माद के लक्षण- इस्में प्रांखों का लाल रहना, महीन लाल वन्न धारण करना, जल्दी चलना, गम्भीर सहिष्णु तथा थोड़ा बोलना, एवं दाता सब में प्रेम रखना श्रादि लक्षण होते हैं। सर्प ग्रह गृहीत उन्माद के लक्षण- इसमें रोगी सर्प की तरह पृथ्वी पर पेट के बल चलता है जीम से श्रोष्ट के अगल बगल शिरे को चाहता है, कोधित रहना गुड़, शहद, दूध आदि को चाहना आदि लक्षण होते हैं। पितृ ग्रह गृहीत उन्माद के लक्षण- इसमें रोगी डाम की शायरियों पर पित्तरों को अपव्य होकर पिण्ड दान करता है, मांस तिल गुड़ धादि की खीर चाहता है, तथा पित्तरों का भक्त होता है। पिशाच ग्रह गृहीत उन्माद के लक्षण इसमें ऊपर को हाथ उठाए रहना, नंगा रहना, कृप होना, ऊट पटांग वकना, शरीर से दुर्गन्ध आना, अधिक खाना, रात्री में जंगल आदि में घूमना, रोना आदि लक्षण होते हैं। ग्रह गृहीत उन्माद के असाध्य लनण- मह तीन प्रयोजन से लगते हैं। खेलने के लिए, पूजाने के - - - (८४ ) लिए, और मारने के लिए। इनमें मारने के लिए जो दागते हैं वे असाध्य होते हैं, अर्थात विना मारे नहीं छोड़ते, उनके लक्षण निम्न प्रकार से हैं। अखि फाड़:२ कर देखे, जल्दी चले, मुंह से भाग निकलें उन्हें चाट जावे, अधिक सोवे, गिर २ कर पड़े, कांपे, पर्वत हाथी पेड़ मकान आदि से गिरने पर जो पागल हो नावे तो असाध्य होता हैं। यदि तेरह वर्ष तक लगातार को मनुष्य पागल रहता है वह भी असाध्य होता है । देव आदि ग्रहों के लगने का समय- देव ग्रह पूर्णिमा को लगते हैं, असुर सन्ध्या के समय, गन्धर्व अष्टमी को, यक्ष ग्रह प्रतिपदा को, पित्तर अमावस्या को मर्म पञ्चमी को, राक्षस रात्री को, तथा पिशाच ग्रह चतुर्दशी को लगते हैं। प्रश्न यह उठता है कि यदि देवादिकों के लगने से उन्माद होता है तो फिर लगते समय वे क्यों नहीं दिखाई पड़ते ? उत्तर यह है कि जैसे शीशा में आदमी का प्रतिविम्म शरीर में सर्दी, गर्मी का प्रवेश सूर्य कान्त मणि में सूर्य किरणों का प्रवेश और शरीर में आत्मा का प्रवेश होते समय नहीं जान पड़ता, उसी प्रकार देवादि ग्रह भी मनुष्य के शरीर में प्रवेश करते समय नहीं देख पड़ते, किन्तु शरीर में घुस कर तुरन्त ही कष्ट देते हैं । उन्हीं कष्टों से देवादिकों का लगना माना जाता है । "स्पष्ट वक्तव्य- देवादि ग्रह प्रायः पवित्र होने से न तो वे मनुष्यों के (२५) शरीर में प्रविष्ट होते हैं, और न लगते ही हैं वस्तुतः उन प्रह के जो खून, चर्वी, मांस लाने वाले भयंकर रात में घूमने वाले लाखों, करे।ड़ों नौकर ( फीटाणु ) है वे ही लगाते हैं । उन्माद रोग में किचित्ता क्रम- वातज उन्माद में घृत आदि पिलाना, पित्तज उन्माद में निशोथ श्रादि का विरेचन देना तया कतज उन्माद में येन पल श्रादि से वमन कराना हितकर है। एनेमा या पति लगाना भी इसमें अत्यन्त ही लान प्रद है। उन्माद रोगी । वृक्ष, अग्नि पर्वत जल प्रादि विपय स्थानों से बचाना चाहिए । देव, पितृ और गन्धर्व गृहीत उन्माद में तीक्षण 'अख नस्य तथा क्रूर 'कर्म त्याग देने चाहिये । नींद न आने से प्रायः यह रोग बढ़ता है, अतः पारम्न में यदि अजीम दे दिया जावे तो रोगी को नीद आजाती है । और रोग रुक जाता है शिर को घुटवाकर उसमें १ पावं पादाम रोगन में १ छटांक चन्दन का तेल डाल कर मालिश करवानी चाहिए। यदि उण फल हो तो ३ या चार घण्टे तफ रोगी को पानी के नल के नीचे भी बैठाना चाहिए। विशेष प्रयोग- प्राप्ती स्वरस चार सेर झूठ, शंस पुप्पी, तथा वच, का कल्क समान भाग १ पात्र और शुद्ध गाय का घृत एक सेर इन सपको एक लोह की कढाई में डालकर नंद २ 'अग्नी से पका
.
( ८६)
जब घृत बाकी बचे तव छान कर एक शीशी में भरलें। इस घृत
को २॥ तोला सुबह तथा २।। तोला : शाम को एक पाव दूध में
डालकर || माशा सर्प गन्धा के चूर्ण को साथ में लेने से और
उपरोक्त तेल मालिश करने से एवं रात के सोते समय २॥ तोला
की मात्रा में ब्रह्मरसायन लेने से सब रह के उन्माद शान्त
हो जाते हैं।
कायफल वाकस्य तथा मनः शिला और हरताल का
अंजन इसमें लाभप्रद हैं।
शोकन उन्माद में तीर्थाटन कथा वाती वीत राग साधुवों
के दर्शन तया वैराग्य सम्बन्धी घातौ से लाभ होता है । धन के
क्षीण होने से जो उन्माद होता है उसमें दान पुण्य की गाथाएं
तथा धन वापिस देखने से लाभ होमाता है शोक या इर्ष से
अचानक चित्त म्रम होने से जो उन्माद होता है उसमें पुलिश के
कर्मचारियों द्वारा एकान्त में पिटवाना डराना या सर्प से
कटवाना या अन्य भयोत्पादक कारणों से उन्माद शान्त
हो जाता है।
एक छटांक शव पुष्पी के रस में १ तोला शहद तथा १
रत्ती स्वर्ण भस्म डाल कर २१ दिन पीने वे उन्माद शर्तिया चला
लाता है। पीपल, काली मिर्च, सेंधा नमक शहद तथा गोलोचन
इन औपधियों को समान भाग लेकर महीन पीस कर अञ्जन के
लगाने से भूत प्रहादि से पैदा हुआ तथा वातादि दोष जनित
उम्माद शांत हो जाता है।
( ८७ ) ग्रह दशा हर धूप- नीम के पत्ते, वच, हीङ्ग, सांप की कांचली तथा सरसों इन औषधियों के द्वारा धूप देने से सब तरह के उन्माद शांत हो जाते हैं । इसमें महा कल्याण, महाचेतस महा पेशाचिका, घृत भी लाभ प्र हैं जो कि चक्रदत्त में बताए गए हैं। इसमें उष्ण पदार्थ छोड़ कर घृत, दूध, मक्खन, गेहूँ, मूग, चावल आदि सात्विक भोजन करना चाहिये । नाम रसायन तथा अंगुरासव का प्रयोग भी इसमें लाभ कारक है। मूर्छा के कारण । भधिक हर्ष तया अधिक दुःख, क्रोध, दुर्वलता एवं मच्छी दूध आदि का विरुद्ध भोजन करना, टट्टी पेशाय का रोकना, चोट लगना, सतोगुण की कमी तथा तमोगुण की अधिकता आदि कारणों से दोप कुपित होकर जब इन्द्रिय घाही तथा मनोवाही स्रोतों को रोक लेते हैं तब मूर्छा होती है। मूर्छा के सामान्य लक्षण- इसमें मनुष्य अचानक अचेत होकर गिर पड़ता है, किसी प्रकार का मान नहीं रहता पथा हिलता जुलता नहीं और लकड़ी की तरह निरचेष्ट पड़ा रहता है। मूर्छा के भेद- पात, पित्त, कफ, रक्त, शराम और विप के भेद से मूर्छा छः प्रकार की होती है। - , (८८) मूर्छा के पूर्व रूप- हृदय में पीड़ा उवासी मन में ग्लानी स्मृति का नाश आदि लक्षणों से पूर्व रूप जानना चाहिये । वातज मूर्छा के लक्षण जिसमें नीला काला या लाल रङ्ग आकाश को देखते हुए मूञ्छित होता है । और चेतां जल्दी ही होनावे हृदय में पीड़ा धुजनी अंगड़ाई आदि हों तथा चेहरा काला या लाल हा नावे तो वायु की मूछी जानना चाहिये। पित्तज मुर्छा के लक्षण- जिसमें हरा, लाल, पीला, दिखाई पड़ते हुए मूच्छी हो तथा चहरे का रङ्ग भी पीला पड़ जावे और पसीने के साथ २ चेतनवा आवे, शरीर गर्म प्यासका लगना, पीली टट्टी का लगना, जलन होना आदि लक्षण हो तो पित्त की मूर्छा जानें। कफज मूर्छा के लक्षण- जिसमें आकाश को मेघों से घिरा हुआ देखते हुए मूच्छित हो जावे, और देरी से चेतनता आवे, मुह में लार, जी मचलान आदि लक्षण हो तो कफ की मूर्छा जानना चाहिए । सन्निपातिक मूर्छा के लक्षण- इसमें तीनों दोषों के लक्षण मिलते हैं। और यह बड़ी भयकर होती है।
( ६ ) रक्तज मृर्छा के लक्षण- पृथ्वी और जल में तमोगुण होता है और पृथ्वी तया जल का अंश रक्त में रहता है। अतः द्रव्य स्वमाव या रस्त से भी मूर्छा हो जाती है। अर्थात् रक बहता हुआ देख कर कमजोर हृदय वाले तमोगुणी मनुष्य नेहोश हो जाते हैं। इसमें शरीर अकड़ नाता है तथा अांखें खुली रहती हैं एवं श्वांस घुटता है। मयज मूछो के लक्षण- इसमें अण्ड वण्ड वकता हुआ पड़ा रहता है और किसी पात की स्मृति नहीं रहती है तथा जव तक मद्य फा पाक नहीं होता, तब तक हाय पैर पटकता हुआ पड़ा रहता है। विपज मूर्छा के लक्षण- इसमें शरीर कांपता है, प्यास लगती है, नींद भाती है। और जैसा भी विष खाता है उसके लक्षण विशेष होते हैं। भ्रम रोग के लक्षण- चफर की तरह शरीर घूम फर पृथ्वीपर पढ़नावे नसे भ्रम रोग या चफर थाना कहते हैं। निद्रा के लक्षण- जप मन और ज्ञानेन्द्रियां थफ कर अपने २ विषयों को प्रहण नहीं करते तव मनुष्य से जाता है। - 7 - (१०) तन्द्रा के लक्षण- इन्द्रियां अपना काम न करें जंभाई श्रावे थकावट. मालूम हो, सोने की सी ईच्छा हो उसे तन्द्रा कहते हैं । के लक्षण- जिसमें श्वास फूले नहीं और विना परिश्रम के. थकावट हो और शरीर भारी पड़जावे उसे क्लम कहते हैं । मूर्छा, भ्रम, निद्रा, तन्द्रा के कारण भेद- मूर्छा पित्त की प्रधानता से होती है भ्रम में रजोगुण पित्त तथा वायु प्रधान होते हैं। तमोगुण वात तथा कफ से तन्द्रा आती है और निद्रा में कफ प्रधान होता है । निद्रा और तन्द्रा में भेद- निद्रा में इन्द्रिय तथा मन को मोह होता है और तन्द्रा में इन्द्रिय मोह होता है। मूर्छा और सन्यास में भेद- मद और मूर्छा दोषों का वेग खतम होने पर स्वयं शान्त हो जाते हैं । परन्तु सन्यास विना औषध के ठीक नहीं होता है। सन्यास के लक्षण- दोष भत्यन्त प्रबल होकर हृदय में स्थित हो शरीर वाणी मन और इन्द्रियों को वेकाम कर सतोगुण से हीन मनुष्य को वेहोश कर देते हैं। और मनुष्य मरे हुए के समान काठ की . ।
र ) तरह पृथ्वी पर पड़ जाता है। यदि समय पर चिकित्सा न की नावे तो मर भी नाता है। मूर्छा की साधारण चिकित्सा- यदि गर्मी के कारण या अन्य कारणों से अचानक मनुष्य मूच्छित हो जावे तो शीतल जल के छिड़के अवगाहन पंखे से हमा करना काय कल के चूर्ण का नाक में नस्य देना हुक्के का गुल तथा नन शिला लहसुन प्रादि से बनाया हुआ तीक्षण अंजन आंखों में डालना आदि उपचार करने से मूळ भंग हो नाती है। सन्यास में कोच की फली शरीर में रगड़ना चाल खोचना सुई चुनोना, लोड़ी लगाना, दांतों से काटना, अञ्जन आंखों में अञ्जना नस्य देना आदि साधनों से होश में लाना चाहिये। विशेष पोग- एक माशा कपूर और छः माशा चन्दन सफेल गुलाब जल में वोट कर माथे या शरीर पर लेप करने से मृा शान्त होती है। छोटी पीपल का चूर्ण १॥ माशा शहद में मिलाकर चटाने से या पोवान की धूनी देने से मूळ चली जाती है। मद्यज विपज लच्छो चिकित्सा- मद्यज मृच्छी में मैन कल के द्वारा वमन कराकर मनुष्य को सुला देना चाहिये । तया विपन मूछों में शिरीप के पुप्पोंका स्वरर चार चार रत्ती दो २ घन्टे वाद देना चाहिये ।
- ( १२ । भ्रम चिकित्सा- दुरालमा का काय या त्रिफला चूर्गा ३ माशा रात को सोते समय दूध के साथ लेने से ग्रन रोग चला जाता है । मृा में पथ्य- शीतल जल से छोटे देना, मरिण या हार पहनाना, शीवल चन्दन आदि द्रव्यों का लेप करना, तिल तेल मलना, शीतल बहती हुई नदो या तालाब में स्नान करना, पंखे की हवा फरना, मुगन्धित शीतम शर्यत पीना, पारे पाले मकान में रहना, चन्द्रमा को शीतल किरणों का सेवन करना, अंजन लगाना, नस्य लेना, शिरावध करना, डाम लगाना, सुई चुमोना, बाल उखाड़ना, नाहन दवाना, . दान्तों से फाटना, और मुंह का श्वास रोकना, विरेचन देकर लंघन फराना, क्रोध कराना, इराना दुःख प्रद खाट पर सुलाना, रोगी के मन बहलाने वाली विचित्र २ कहानियां फहना, ऊंची आवाज से बोलना सुन्दर पाजे जोर से वजाना, रोगी की भूमी हुई बातों को याद करना, आत्मज्ञान में लगाना, धीरज घराना, छाया, वर्षा का पानी, सौवार पानी में धोया हुवा घृत, कोमल और तीखे रस, ग्वीलों का माण्ड पुराने जो लाल चावल, हाण्डी घृत, मूंग और मटर का यूप, गाय का दूध, मिश्री, अनार, नारियल, चौलाई कुए का पानी, सफेद चन्दन, कपूर का पानी, नेत्र वाला, मक्खन, दाख आदि मूर्छा रोग में हित कर है. और पथ्य हैं। नाक शीतल याल, (३) मूर्छा में अपथ्य- टट्टी पेशाब आदि का रोकना, पान खाना, मेथी का शाक, धूप में फिरना, विरुद्ध अन्न पान करना, स्त्री प्रसङ्ग करना, घरपरे रस सेवन करना, पसीना लेना, प्यास, निद्रा आदि के चेग से रोकना, मठा पा छाछ पीना, रात दिन वैठा रहना, अग्नि से तपना इच्छा के विरुद्ध कार्य करना, परिश्रम करना, चिन्ता करना, घोड़े की सवारी करना, दातुन करना आदि कारण से मूर्छा से मूर्छा अधिक होती है। और यह असाध्य है। मदात्यम के कारण- विप में जो लघु, रक्ष, आशु, विशद, व्यवापी, तीक्ष्ण, विकाशी, सूक्ष्म, उष्ण, अव्यक्त रस यह दश गुण कहे गए हैं। वे मद्य (शराब) में भी रहते हैं। अतः यह मद्य यदि विधि पूर्वक सेवन न किया जावे तो इससे बड़ा भयङ्कर पागल पन हो जाता है उसी को मदात्यय कहते हैं। मद्य (शराव)को स्वभाव-- इसका स्वमाव भन्न के समान है यदि यह युक्ति युक्त पिया जावे तो अमृत के समान है भोर भयुक्ति युफ पिया जाये तो जहर से भी पढ़ कर है। जिस प्रकार प्राणियों के प्राण मन के आश्रित ही रहते हैं परन्तु वह भी अयुक्ति युत सेवन करने से विप के समान शरीर को नष्ट कर देता है। मौर विप जो है वह . .. (६४) प्राणों को नष्ट करने वाला है । परन्तु युक्ति युक्त सेवन करने से अमृत के समान गुण करने वाला तथा शक्ति दाता है, यह ही उक्ति मद्य के विषय में जानें। विधि पूर्वक. मय पान के गुण- विधि पूर्वक समय पर उचित मात्रा से स्निग्ध पदार्थ तथा हित कर अन्न के साथ प्रसन्न होकर मद्य पीता है उसके वह अमृत के समान गुण कारक है और आयु शरीर तथा शक्ति को बढ़ा कर तेन कान्ति एवं वीर्य को बढ़ाता है। प्रथम मद के लक्षण- विधि पूर्वक मद्य सेवन से मदात्यम (नशा) जो होता है उनमें प्रथम मदात्यय के लक्षण इस प्रकार होते हैं। इसमें स्मरण शक्ति, बुद्धि आनन्द, गाने में रूचि, खान पान में वृद्धि, नींद आना, काम शक्ति की प्रवलवा आदि लक्षण होते हैं यह प्रथम मद्य सुखकारी तथा आनन्द दायक होता है। द्वितीय मद के लक्षण- इसमें बुद्धि, स्मृति, वाणी आदि का नाश हो जाता है। मनुष्य पागल की तरह हो जाता है और पालस्य तथा नींद आती है यह द्वितीय मद मध्यम दर्जे का है। तृतीय मद लक्षण- इसमें अगम्य वैश्या आदि से मैथुन करता है अपने बड़ों का अपमान करता हैं। अभक्ष्य पदार्थ खाता है तथा वेहोश हो के - 1 (६५ ) जाता है, और अपने दिल की गुप्त बातों को कहता है यह तृतीय मद के लक्षण हैं। चतुर्थ मद के लक्षण- इसमें मनुष्य एक दम पागल होकर कटे हुए वृक्ष की तरह बेसुध होकर गिर पड़ता है। उसके मुंह में मक्खियां मिन भनाती हैं तथा कुत्ते मुह चाटते हैं मानों मुर्दा पढ़ा हो ऐगे अवस्या उसकी हो जाती है और शरीर अकड़ जाता है, वेवकूफ, पागलों को छोड़ कर शायद ही कोई बुद्धिमान ऐसा मयकर मद्य का सेवन करता है । पर्थात कोई नहीं करता है। तो मनुष्य बिना मोजन किए खाली पेट मद्य का सेवन फरते हैं, उनके तरह १ की व्याधियां पैदा हो जाती हैं। तथा शरीर को नष्ट कर देती है। विधि रहित मद्य सेवन से उपद्रय- क्रोध, भय, प्यास, शोक, भूख, व्यायाम, भार, और मान चलने से क्षीणता हो, टही पेशाव की हाजत हो, अधिक साने पीने से पेट फूला हो, अजीर्ण निर्वलता, गर्मी से व्यायुक्षता हो ऐसी अवस्था में मध पीने से चाहे भोजन के साथ ही क्यों न पिया गया हो आगे कहे जाने वाले पानात्यम श्रादि पनेरु रोग पैदा हो जाते हैं। मद्य के विकार- पानात्यम, परमद, पानाजीर्ण, पानविभ्रक ये चार विस्म मध के विशेष होते हैं।
. -- (६६) वातिक मदात्यम के लक्षण- इसमें हिचक्री, श्वास, शिरका काम्पना, पसवाड़े में पीड़ा. नींद का न.पाना, अधिक बड़बड़ाना आदि लक्षण होते हैं। पैतिक मदात्यम के लक्षण इसमें प्यास लगना, जलन होना, ज्वर, पसीना माना, टट्टी लगना, चक्कर आना, शरीर का रङ्ग हरा होना आदि लक्षण होते हैं। कफज मदात्यम के लक्षण- इसमें वमन, अरुचि, जी मिचलाना, तन्द्रा शरीरका भारी होना, जाहा लगना, शरीर गीला रहना आदि लक्षण होते हैं। सन्निपातिक मदात्यम के लक्षण- इसमें सब दापों के लक्षण एक साथ होते हैं । परमद के लक्षण--- इसमें अरुचि होना; मुहका जायका बिगड़ना, टट्टी, पेशाव का रुकना, मुह से फफ आदि गिरना, शरीर भारी होना, वन्द्रा प्राना, प्यास लगना, शरीर में पीड़ा तथा सन्धियों में दर्द आदि लक्षण होते हैं। पानाजीर्ण के लक्षण- इसमें पेट का फूलना, वमन होना, जलन लगना, डकारें आना आदि लक्षण होते हैं। .
(१७) चुभने जैसी पान विभ्रम के लक्षण- इसमें शरीर तथा हृदय में सुई पीड़ा का होना, मुंह से ककका गिरना, करठ में पीड़ा तथा धुवांमा निकलना, मूळ, वमन, शिर पीड़ा, जलन हेाना निसी प्रकार के मय तथा भोजन में रुचि का न होना चादि लक्षण होते हैं। मदात्यय के असाध्य लक्षण- इसमें यदि ऊपर का होठ लकट जावे बाहर जाड़ा तथा शरीर के भीतर जलन जान पड़े, बिना तेल लगाए ही मुंह विपना हो, जीभ, दन्त और होठ फाले या नीले पड़ जावें शांचे पीली या लाल हो जावें तो असाध्य सनमें ऐसी हालत में चिकित्सा नहीं करनी चाहिए। मदात्यय रोग के उपद्रव- इसमें हिचकी वमन वर कम्पकपी पंमुली में दर्द खांसी चक्कर आना, आदि उपद्रव होते हैं। मदात्यय का चिकिला क्रम- मठा या छाछ पिलाने से मय का वेग उतर जाता है। पीटने या धमकाने से भी मच का वेग शीघ्र ही उतर जाता है। रात के समय ४ माशा निला का चूर्ण शहद के साय तथा प्रातः फाल षद्क ३ माशा गुढ़ के साथ खाने से और पथ्य पूर्वक रहने से सब प्रकार के मदात्यय पले पाते हैं। ठंडे जल में गोते लगाना तया दूध पीना भी इसमें हितकर है।
(६८) मदात्यय नाशक योग- थोड़ा घृत तथा चावलों के सत्तु वों में पिण्ड खजूर किशमिश, चांगेरी, इमली, अनोर, फालना तथा आंवला इन औषधियों के रस को डालकर घोल दें इसके पीने से मच (शराब) पान से होने वाले विविध प्रकार के विकार शान्त हो जाते है। वातिक मदात्यय चिकित्सा- सौचर नमक, सोंठ, काली मिर्च पीपल इनका समान भाग चूर्ण लेकर करके १ माशा बल मिश्रित मद्य में डाल कर पीने से 'वातिक मदात्यय शान्त हो जाते हैं। पैतिक मदात्यय चिकित्सा- इसमें शीतल क्रियाएं क्या मूंग के यूष में मिश्री डाल फर पिलाना चाहिये इस प्रकार करने से पैतिक मदात्यम चला नाता है कफ. मदात्यय चिकित्सा- इसमें बल के अनुसार लंघन करवा करके, पीपल पीपला मूल, चव्य चित्ते की जड़ और सोंठ के चूर्ण के साथ मद्य का सेवन कराना हितकर है । सन्निपातिक मदात्यय में हम दोषों की चिकित्सा करनी चाहिए । .
(६) तोप पानात्यय नाशक अचूक योग- चव्य काला नमक, घी में भूनी हीङ्ग बीजोरे, निन्बू के प.ल की छाल, सोंठ, अजवायन इन औषधियों को समान माग लेकर चूर्ण बनालें । इस चूर्ण की ४ रत्तो से ६ रत्ती की मात्रा में लेने से नब तरह के मदात्यय चले जाते हैं। * वात-नाड़ियां * हमारे शरीर में वांत नाड़ी दो प्रकार की होती है, एक जो शरीर की शाखामों से सम्बन्ध रखने वाली सेलों से प्रारम्भ होकर मस्तिष्क को जाती हैं, इनको वेदना वाहक नाड़ियां कहते हैं। दूसरी वे जो कि मस्तिष्क से प्रारम्भ होकर शरीर के प्रत्येक अंग, प्रत्यंग तथा सेलों को जाती हैं, इनको श्राज्ञा बाहक नाड़ियां कहते हैं । ये नाड़ियां लघु मस्तिष्क में से होती हुई दाहिने शारीरिक नाग की वृहन्मस्तिष्क के पांई तरफ तथा वाएं भाग की दाहिनी तरफ जाती हैं। यह ही कारण है कि मस्तिष्क के पाए भाग में चोट लगने से जव पात नाड़ियों का सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है तब शरीर का दाहिना भाग निरचेष्ट होजाता है । तया दाहिने माग में चोट लगने से वायां भाग निश्चेप्ट हो जाता है । इनही नाड़ियों के मेल से शुपुम्ना की रचना हुई है। इन्हीं नाड़ियों के द्वारा मस्तिष्क सम्पूर्ण शरीर को प्राक्षा देता है- जिससे हाय पैर तथा अन्य अङ्ग प्रत्यंगों को इपर उधर हिलना डुलना होता है।
- (१००) इन्हीं नाड़ियों के द्वारा सम्पूर्ण शरीर की पीड़ाओं का मस्तिष्क को ज्ञान होता है। अतः मस्तिष्क तथा वात नाड़ियों का परस्पर सम्बन्ध है। जिससे शरीर का कार्य ठीक तरद चलता हैं। यदि आज्ञा वाटक नाड़ियों के टूटने से मस्तिष्क तथा शरीर का सम्बन्ध विच्छेद हो जावे तो मनुष्य पांगल ( उन्मत) हो जाता है तथा वेदना वाहक मस्तिष्क को जाने वाली नाड़ियों का सम्बन्ध विच्छेद हो जावे तो मनुष्य के. लकवा (पक्षाघात ) हो जाता है। यह ,नाड़ियां मस्तिष्क की आज्ञा सम्पूर्ण शरीर को देती हैं तथा मस्तिष्क को शरीर की वेदना की सूचना देती हैं यह ही इनका मुख्य कर्तव्य है। अपस्मार ( एपीलेप्सी) मृगी के कारण चिन्ता, शोक श्रादि से दोष कुपित होकर, हृदय में स्थित हो कर स्मरण शक्ति को नष्ट कर देते हैं । उसे अपस्मार कहते हैं। मृगी के सामान्य लक्षण- इसमें आंखों के सामने अंधेरा श्राजाता है। वे होश हे। कर जिस अवस्था में हो उसी अवस्था में गिर पड़ता है, दांत किट किटाता है, आंखें टेडी हो जाती हैं, तथा मुंह में भाग निकलते हैं हाथ पैर पंटकता है यह सामान्म लक्षण हैं । वातादि भेद से चार प्रकार की मृगी है। ho - - - ( १०१) मृगी के पूर्व रूप- दिल धड़कता है, हरय शून्य होता है, ध्यान सा लगा रहता है, इन्द्रियां वे काम हो जाती हैं । तया नींद नहीं आती। घातिक मृगी के लक्षण- रोगी कांपता है, दांत किटकिटाता है, मुंह से भाग निकलते हैं, हांपता है तथा उसका ऐसा प्रतीत होता है मानों लाल, नीला, रुक्ष शरीर वाला कोई प्राणी मेरी तरफ दौड़हा हुश्रा श्राता है। पैतिक अपस्मार के लक्षण- इसमें आंख माग तथा मुंह पीले हो जाते हैं सव ही वस्तुवे पोनी तथा लाल दिखाई देती है, प्यास लगती है और संसार उसको अग्नि से व्याप्त दिखाई देता है। श्लेग्मिक मृगी के लक्षण- फैन शरीर मुंह, अांखें सफेद हो, ठण्ड नाम हो, रूंगटे खड़े हो जावें, सफेद रूप दिखाई दे तथा चेता देर में हो उसे श्लेप्मा मृगी जानें। सन्निपातिक मृगी के लक्षण- तीनों दोषों के लक्षण निममें मिलते हों और क्षीण दुर्वत मनुष्य के कई दिनों से हो तो असाध्य मानें। - ( १०२. ) - अपस्मार में असाध्य लक्षण- जो मृगी वाला अधिक कांपता है, कमजोर होता है, भों तथा आंखें चलायमान (फड़कती) हो तो असाध्य , जानना चाहिए। अपस्मार का समय- जिस प्रकार भूमि में पड़ा हुआ वीज़ वर्षा ऋतु में पानी एवं समय पाकर उगता है उसी प्रकार समय पाकर दोप कुपित्त होकर पन्द्रह, वारह, दिन या एक महीने से मृगी का दौरा करते हैं। मृगी में चिकित्सा क्रमः- वातन मृगी में (वस्ति) इनेमा लगाना चाहिए तथा पित्तज में विरेचन एवं कफन में वमन हितकर है जव रोगी सब तरह से शुद्ध हो जावे तयं घोरज वंधा कर समन चिकित्सा करनी हितकर है। अपस्मार में अंजन:धूनी एवं नस्य देना अत्यन्त ही लान प्रा है, अतः ये अवश्य करने चाहिये । मृगी में एरण्ड के तेल का विरेचन तथा मैन फल से वमन एवं सावुन के गर्म पानी एवं तैल का इनेमा देना चाहिये। कायफल के चूर्ण का बस्य तथा सफेद मिर्च और मनशिला का अंजन हित कर होता है। अनवायन तथा लोवान की धूनी से मृगी ठीक हो जाती हैं।
( १०३ )
अरीठे का पानी नाक में टपकाने से सब तरह की मृगी
चली जाती है।
जो मनुष्य सुबह, दोपहर, और शाम को तीन २ माशे
बचके चूर्ण को शहद के साथ चाटता है और ऊपर से खीर
का भोजन करता है, इस प्रकार तीन महीने के प्रयोगसे अपरमार
अवश्य ही ठीक होजाता है यदि असाव्य न हो तो।
ब्राधी के रस ४ तोला में १ तोला शहद मिलाकर पीने से
सब तरह की भृगी चली जाती है, बाह्री वृत व्या मद्य फल्याण
एवं महा चेतम घृत भी इसमें नाम प्रद है । दूध, ची मक्खन,
बादाम रोगन बादाम पाक या हलुवा, चावल, मूंग की दाल,
श्रादि पदार्थ इसमें हितकर हैं। तीक्षण गर्म एवं चरपरे पदाये
छोड़ दें।
गो
मृत्र
में सफेद सरसों पीस कर उसका उयटन करावे
तथा निम्नलिखित कल्याण चूर्ण लिलावे, इसे सब तरह का
मृगी रोग चला जाता है।
पीपल, पीपला नूर, चव्य, चिते को सड़, सोक, काली
मिर्च, वायविडङ्ग, हरड़, बहेड़ा, आंवला, जीरा, धनियां, करज
बीज, सैन्वा नमक, विड़ नमक, काला नमक, अजवायन इन सब
को समान भाग लेकर कपड़ छान, चूर्ण करलें । इसको कल्याण
चूर्ण कहते हैं। इसकी ३ से ६ माशा तक की मात्रा गर्म पानी
के साय लेनी चाहिये अवश्य पाराम होजाता है।
(१०४ ) ब्राह्मी घृत- ब्राह्मी पत्तों का रस १ सेर घृत १ पाव वच, कूठ तथा शंख पुष्पी इनका कल्फ १ पाव इन सवतो कली के वर्तन में डाल कर पकावो जब घी बाकी रहे तव उतार कर टण्डा होने परं छान कर एक शीशी में डाल लो, इसको २ तोला से २॥ तोला तक की मात्रा दूध के साथ सेवन कराने से भयङ्कर से भयङ्कर मृगी तथा उन्मार चला जाता है यह घृत वुद्धि वर्धक एवं मानसिक शक्ति दाता है । योपापस्यार--( हिस्टीरिया) अपतन्त्रक वायु-के लक्षण- वायु कुपित हो कर हृदय, कनपटी और शिरमें पीड़ा करता हुआ शरीर को घनुपकी तरह नमा देता है । वेहोशी पैदा करता है इस समय श्वास बड़े कष्ट से आता है। आंखें या तो वन्द रहती हैं या खुली रहती हैं और कण्ठों में कबूतर की तरह भावान या शब्द होता है यह रोग भी मृगी से मिलता जुलता ही होता है मनुष्य की बजाय औरतों को यह रोग अधिकतर देखा गया है। चिकित्सा क्रम- इस रोगी को एकांत स्थान में रखना चाहिए, उसके पास पास शस्त्र या वर्तन आदि न होने चाहिए।
से चला
।
(१०५ )
यदि कब्ज हो तो एरण्ड का तेल १ तोला एफ पाव दूध
में मिला कर पिलायो। ब्राह्मी, घृत कल्याण चूर्ण, चेतस या
महाचेतस घृत भी इस में लाभप्रद है । चन्दन तथा बादाम के
रोगन की मालिश करानी चाहिए। बाह्म रसायन च्यवनप्राश
तथा द्राक्षासव का उपयोग भी इसमें लाभप्रद देखा गया है ।
शु० फुचिला २ रत्ती तथा शु० धतूरे के वीज २ रत्ती नागर
पानी में डालकर खाने से योपापस्यार शान्त हो जाता है। तथा
कई दिनों तफ लगातार सेवन करने से
यह
रोग
जड़
जाता है।
इस रोग में रोगी को प्रसन्न रखो। औरतों को यदि रजो
दर्शन होने के कारण यह रोग हुवा हो तो मूली के वीज १
माशा गाजर के बीन १ माशा चम्बल ३ माशा तथा गुड़
एक छटांक का काढ़ा बना कर दो।
रोगी को शारीरिक परिश्रम कराना इस्में हितकर है, यदि
वदे घराने की औरतों को यह रोग हो तो कम से कम चार या
पांच सेर बाटा पाको से पिसवाना चाहिये, इस प्रकार वह
शारीरिक परिश्रम करेगी तो यह रोग अवश्य ही चला जावेगा ।
दोरा को दूर करने के लिए सरसों के तेल में अलसी का तेल डाल
कर मालिश करनी चाहिए।
मनः शिला हरताल पीला, तया पोपल को महीन पीसकर
नेत्रों में भजन आजना चाहिये । नोमादर तथा चने को परावर
वरावर पीस फर इसका नत्य देना चाहिये । या भरीठे का पानी
( १०६ ) बनाकर उसी की दो चार बून्दे नाफे में टपकानी चाहिये । इस प्रकार उपचार करने से हिस्टीरिया का दोरा शान्त होनाता है। बाद में पोष्टिक घृत पाक या अवलेह आदि का उपयोग करना चाहिये। कस्तूरी आधी रत्ती अम्वर आधी रत्ती केशर 'आधी रत्ती युक्तापिष्टी भाधी रत्ती इनकी तीन मात्रा मक्खन के साथ लेने से योषापस्यार चला जाता है। यदि यह मात्रा छः महीने वक उष्ण काल को छोड़ कर लीजावे ते. योषांपस्यार समूल नष्ट हो जाता है। पक्षाघात के कारण और लक्षण- अपने कारणों से कुपित हुवा वायु शरीर के एक तरफ की शिरा तथा स्नायू , एवं वात नाड़ियों को सुखाकर एक अंङ्ग या दाहिने तथा बायें हिस्से को अकर्मण्य कर देता है । जिम हिस्से में यह होता है उस हिस्से के नोड़ ढीले हो जाते हैं, शरीर वेकाम हो जाता है, ठण्डे गर्म आदि का स्पर्श ज्ञान नहीं होता तथा पीड़ा भी नहीं होती है, इसको कोई एकाङ्ग तथा कोई पक्षवध एवं कोई लकवा कहते हैं। आधुनिक मतवाले रक्त का दोरा न होने से वेदना वाहक तथा आज्ञावाहक तारों का जिस शरीर के. भाग से सम्वन्ध ढूंद जाता है, उसी भाग में लकवा होताता है । ऐसा मानते हैं। परन्तु इनका मत भी प्राचीन आचार्यों से मिलता जुलता ही है। यदि यह शरीर के दोनों भागों में होजाता है तो दोनों साग ही . ( १७ ) अकर्मण्य हो जाते हैं, यह अवस्था बड़ी भयानक है। इस रोग को, वात, पित्त, कफ तथा क्ष्य के भेद से चार प्रकार का मानते जैसे पित्त युक्त वायु से जो लकचा होता है उसमें चित्त संताप जलन मूर्छा श्रादि लक्षण होते हैं। यदि कफ युक्त वायु से होता है तो शरीर टण्डा तथा नारी एवं सूजन आदि लक्षण होते हैं। एवं केवल वायु से होता है तो कष्ट साध्य होता है। तथा धातुक्षय से होता है तो असाध्य होता है। असाध्य लनण- गर्मिणी प्रसूता वालक बूढ़ा एवं जिसका रक्त क्षीण होगया हो क्षीण इनको पक्षाघात हो और पीज्ञा न हो तो असाध्य समझना चाहिये। आदित (चेहरे का लकवा) फेसियल परलिसिस के लक्षक्ष- माठिन चीजों के खाने से, जोर से बोलने या इंसने से, उपासी से पायु कुपित होकर चेहरे के आये माग या सारे भान कोविकृत कर देता है जिससे मुह टेढ़ा हो जाता है आलं विश्व होजाती हैं चेहरा भक्षा लगता है बोली साफ नहीं होती, जिए भाग में यह रोग होजाता है उसी भाग की नाद टेडी होजाती है त्वचा से जाती है तथा ग्रीव ठोडी तथा दान्तों के पास में पीड़ा होती है इसे अर्दित या चेहरे का लक्या कहते हैं।
( १०८ ) अर्दित के असाध्य लक्षण- जो रोगी कमजोर हो, जिसकी पलकें नहीं पड़ती हो। जितकी आवान साफ नहीं हो और जो तीन वर्ष का पुराना हो गया हो अथवा मुह नाक तथा आंख से पानी एवं का गिरता हो, जो कांपता हो वह अगध्य होता है। पाक्षाधात चिकित्सा- इसमें महानारायण तैल तया विष गर्म तेल की मालिश करके अरण्ड तया धतूरा एवं आक के गर्म करके पत्ते बांधने चाहिये । पाक की जड़ के चारों ओर की मिट्टी को गर्म करके उसका सेक देना चाहिए। इस रोग में कबूतर का मांस यो उसका मांस रस खिलाना. अत्यन्त ही हितकर है । प्रायः कबूतर के मांस से ही यह रोग चला जाता है। इस में पारे तया गन्धक को कञ्जली तथा हरताल भस्म दो २ रत्ती दशमूलार्क या क्वाथ के साथ सेवन करने से पाक्षा- घांत चला जाता है। कुचेले के पत्ते, हींग भौर सीमर का सीग सोंठ इनका समान भाग लेकर पानी में पीस कर लेप करने से लकवा चला जाता है। धतूरे के बीन और पत्तों का अर्क, वकायन के पत्तों का अर्क, आक के पत्तों का अर्क; नीम, असगन्ध, सहिजना, एरण्ड . .
( १०६ ) मकोय, थूहर इन सब के पत्तों का अर्क समान भाग एक २ पाव तथा मिठा तैलीया १ पाव लेकर सोंठ, मिर्च, पीपल, प्रसगन्ध रास्ना, कूठ, नागर माथा, देवदारू वच इन्द्रजी भारङ्गी कायफल, पोहकरमूल, तज, तेजपान, इलायची, लोग नागकेशर प्रत्येक अाठ २ माशे लेकर तिल तैल दो सेर तथा २ सेर ही पानी डाल कर एक कढ़ाई में सब चीजें डाल कर पकावें, जव तैल वाको रहे तष छान कर एक शीशी में भरलें इसे विष गर्भ तेल कहते हैं मालिश लकवे में अत्युत्तम है। इसमें मल्ल चन्द्रोदय शु० शचिया तया पात चिन्तामणी रस का उपयोग भी लानप्रद है । भांग तथा काली मिर्च का चूर्ण समान भाग लेकर बनालें इसे ६ माशा तक गर्म पानी के साथ इस चूर्ण का सेवन करने से पक्षाघात चला जाता है। अर्दित चिकित्स- इसमें पता तेल की मालिश तया दशमूल का काढ़ा पीने से आदित ( चहरे का लकवा) पला जाता है । फधूतर का मांस रस पीने से लकवा चला जाता है एक. पोथिया लहसुन १ तोला का शिल पर पीस फर २ तोला तिल तेल में मिला कर खाने से लक्ष्या भादित तया सब तरह की बात न्याधियां नष्ट हो जाती हैं। उदद की दाल की पिष्टि मसन के गथ खाने से लकवा चला जाता है । मल्ल पन्द्रोदय का ( ११० ) सेवन भी इसमें हितकर है शुद्ध शास्त्रिया १ चावल से लेकर एक रत्ती की मात्रा तक सेवन करना तथा एकाङ्गवीर रस और मल्ल चन्द्रोदय का सेवन भी लाभं करता है । पक्षाघात तथा आर्दित में खट्टे एवं शीत पदार्थ एवं ठण्ड तथा वात वर्धक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिये। महानारायण या विप गर्म तेल की मालिश करें या मीठा तैल या कुचिला शतावर असगन्ध, इनका समान भाग कल्क १ छटांक तथा १ सेर धतूरा पञ्चाङ्ग का स्वरस तया एक पाव तिल का तेल एक लोह की कढाई में डालकर पकावें जब तैल २ वाकी बचे तव छानकर शीशी में रखले । इस तेल की मालिश करने से सर्वाङ्ग वात पक्षाघात अर्दित आदि रोग नष्ट होजाते हैं। इस मालिश के साथ २ एक रति से लेके डेढ रति को मात्रा तक मल्ल चन्द्रोदय शहद और पान के रस के साथ सेवन करावें तथा भोजन में दूध, घी, हलवा, जलेबी, घेवर, पूए, खीर श्रादि पौष्टिक वात नाशक पदार्थ खिलाना चाहिए । आक के नीचे की रेती को कांजी में सेककर उसका सेक देना चाहिए । इस प्रकार का उपचार करने से पक्षाघात तथा भादित में प्रायः लाम होजाता है। कंन को मिटाने के लिए दूध के साथ वला तैल या एरण्ड के तैल को पीलाना चाहिए। भगदडप ( १९१ ) * सप्तम-अध्याय * नपुंसकता के कारण- अप्राकृतिक नपुंसकता-किसी प्रकार की अंडकोषों पर चोट लगने से, अधिक मधुन से; हस्त मैथुन तथा अप्राक. तिक मैथुन एवं मानसिक आपातों के कारण चिन्ता शोक आदि के होने से, अच्छे भोजन न मिलने से साईकिल तथा घोड़े की यधिक सवारी करने से, एवं मानसिक कुविचारों से होती है। प्राकृतिक नपुंसकों के भेद- प्राकृतिक नपुंसक पांच प्रकार के होते हैं। श्रार.क्य, सुगन्धी, पु.म्भिक, ईमेक, और पण्ड के भेद से। इनमें पाटि के चार प्रकार के नपुंसक वीर्ययुक्त होते हैं, और मधुन कर सकते हैं, किन्तु उनके वीर्य में शुक्रकीटों के प्रभाव से स्त्री को गर्न स्थिति नही होती है । पांचवां पण्ड नसके वोर्य हीन होता है और यह मैथुन नहीं कर सकता। आमेक्य नपुंसक के लक्षण- पिता के वीर्य, और माता की रन की कमो से पासेक्य नाम का नपुंसक पैदा होता है, वह दूतरे मनुष्य का वीर्य चाट - 4 ( ११२ ) कर फिर मैथुन करने की शक्ति को प्राप्त करता है, इसका दूसरा नाम मुख योनि मी है। सुगन्धि नपुंसक के लक्षण- सुजाक या गर्मी ( उपदंश) के कारणसे जो खराब योनि हो जाती है । उस से जो बच्चा पैदा होता है. वह सौगन्धिक या सुगन्धि नपुंसक होता है । वह योनि तथा अण्डकोषों को सूप कर ही मैथुन सक्ति को प्राप्त कर सकता है अन्यथा नहीं, बकरे तथा वेल भी सौगन्धिक नपुंसक होते हैं। कुम्भिक नपुंसक के लक्षण- अपनी गुदा में मैथुन करा कर फिर मैथुन करने की शक्ति को प्राप्त करता है उसे कुन्मिक या गुदे योनि नपुंसक कइते हैं। यक नपुंसक के लक्षण- जो दूसरों के मैथुन को देख कर फिर मैथुन करने की शक्ति को प्राप्त करता है । उसे ईय॑क या ईष्ट योनि नपुंसक कहते हैं। पण्ड नपुंसक के सपण- यह लिङ्ग भादि चिन्ह होते हुए भी शिथिलता के कारण मैथुन शक्ति से रहित होता है। नपुंसकता के सामान्य लक्षण- वीज (शुक्रकीट ) के क्षीण होने से ध्वज भङ्ग गुप्त स्थान पर चोट आदि के लगने से, वीर्य क्षीण होने से, तथा बुढापा ( ११३ ) से जो क्लीयता होती है उसके निम्न प्रकार के लक्षण होते हैं। मनोवांछित स्त्री के पास जाने पर भी इन्द्री शिथिलता से भाग न कर सके और कदी २ इन्द्रियोत्यान से सावे भी तो श्याम का दौरा हो पसीना पाजावे तथा चीच में इन्द्रिय शिथिल हो जावे जिससे मोग कर नहीं सकता। क्तीवता का चिकित्सा क्रम- मनुष्य को ३ दिन तक घी पिलावे, उसके बाद शरीर पर तैल मालिश करके पसीना दिलावे तथा इनेमा लगावे, या अरण्ड तैल आदि का विरेचन देवे इसके बाद वाजीकरण तथा रसायन आदि का प्रयोग कराना चाहिये। वया विलों का भी प्रयोग करें। इस प्रकार का उपचार करने से नपुंसकता श्रेष्टतया चली नाती है पुस्प शक्ति के लिये वाजीकरण प्रयोग उपयुक्त होते हैं अतः वाजीकरण के प्रयोग पहिले लिखे जा रहे हैं। वाजीकरण के लक्षण- जिन पदार्थों से मेथुन करने में घोड़े की सी शक्ति पैदा हो जावे उन पदार्थों को वाजीकरण कहते हैं । चाजीकरण के फल- वाचीकरण पदार्थ वीर्य को पढ़ाते हैं क्या पुत्र रन फो उत्पन्न करने में सहायक होते हैं । विना पुत्र के इस संसार में मनुष्य का जीवन सुके पीड़ हली नदी प्रादि फी वह निमल होता है। जिस पुरुष के अधिक सन्तान हैं वह हो मुबी वधा
है
(.११४ )
मान्य है । अतः अधिक संतानों की प्राप्ती वाजीकरण से ही
होती है।
वाजीकरण योग
कोंच के बीज एक सेर लेकर चार सेर दूध में प्रकावे जब
वे स्विन्न हो. नावें तब उनके छिलके उतार कर महीन पीप्लें. फिर
आध सेर घी में सेक कर.६-६ माशा की गोलियां बना कर
खाण्ड की चामनी या शहद में डालदें। इन गोलियों को सुबह
शाम एक २ दूध के साथ लेने से. नपुंसकता चली जाती है।
तया स्त्री संभोग में अपूर्व आनन्द प्राता है । यह योग सर्व
साधारण के लिए अमृत के समान है।
उड़द की दाल तया साठी चायलों को पका कर घी डाल
कर खाने से तथा उपर दूध पीने से मनुष्य पुंस्त्व शक्ति को
प्राप्त हो जाता है।
सफेद मूबली स्याह मूषली ताल मखाना वीज वन्द शतावर
गोखरू वहमनं सफेद बहमन, सुर्क शालम मिश्री पल्ला मिश्री
असगन्ध इनका समान भाग लेकर चूर्ण: करलें तया सब के
बराबर खाण्ड डाल कर सुवह शाम तीन २ माशे धारोष्ण दूध
के साथ लेने से वीर्य तथा पुंस्त्व शक्ति बढ़ती है। १ सेर घी को
चार सेर शतावर का रस तथा १६ सेर दूध में पकायें तव गाढ़ा
होजावे तव खाण्ड डालकर लडडू बनालें। एक.२ छटांक लंड
दूध के साथ खाने से मनुष्य वृष्य होनाता है।
( ११५ ) शुद्ध शिलाजीत के सेवन करने से भी मनुष्य पुंस्त्व शक्ति को प्राप्त होता है। केशर कस्तूरी अम्बर तथा स्वर्ण भस्म भी परमं शक्तिदायक वृप्य है। मन को प्रसन्न करने वाली तमाम वस्तुएं भी वृष्य हैं । ३ माशा भांग का चूर्ण दूध के साथ लेने से परम वृष्य है घी, दूध, मक्खन, मलाई मालपूर, घेवर, जलेबी आदि व्यंजन मी वृष्यत्तम हैं, वाजीकरण प्रयोग- सफेद चिरमी तया शतावर का समान भाग लेकर चूण घनाला, इस चूर्ण की १ माशा मात्रा सुबह शाम धारोपण दूधके साथ सेवन करने से मनुष्य मथुन करने में घोड़े के समान शक्ति प्राप्त कर सकता है। नागवलादि योग- खरेंठी बीम, गोखरू कांचयीज, ताल मखाना शतापर अतिवला, ( कंघी ) इनका समान भाग लेकर चूर्ण बनालें। इस चूर्ण को ४ माशा की मात्रा में रात को सोते समय दूध के साथ लेने से एक से अधिक भी मनुष्य स्त्रियां रख सकता है. इतनी पुंस्त्व शक्ति भामाती है। घीर्य स्तम्भक योग- चकरी तया अंटनी के दूष में गाय का घी मिला कर पैर के तलुवों पर १ घण्टा तक मालिश करके भोग करने से वीर्य स्वलित नहीं होता है।
( ११६ ) तिल्ला- सूवर की चर्बी तथा शहद की इन्द्रिय पर मालिश करने से काम शक्ति बढ़ती है। अन्य जिल्ला- ऊंट कटेरी की जड़ को वफरी के मूत्र में १ महिने तक मिंगोदें फिर उसको निकाल कर इन्द्री पर लेप करने से रति काल में तथा उसके बाद भी दृढ़ता बनी रहती है। अन्य विल्ला- केंचवों को पीस कर शेर की चर्वी में मिला कर इन्द्री या पैर के तलुवों में मालिश करने से नपुंसकता नष्ट हो जाती है तथा वुढा मी जवान होजाना है। * रसायन के लक्षण * नो औषध वुढापा तथा रोगों को दूर करती है उसे रसायन कहते हैं। रसायन के फल- जो शारीरिक उन्नति तथा मानसिक सुन्दर भान हैं वे रसायन से ही होते हैं। तथा दीर्घमायु स्मृति, मेघा बुद्धिजवानी कांति, शारीरिक तथा मानसिक वन बचन सिद्धि आदि रसायन के ही फल हैं। .
( १९७ ) रसायन के भेद- रमायन वातातपिक तथा कुटी ग्रावेशिक के भेद से दो प्रकार का है। वातातपिक- जो रसायन चलते फिरते हया घूप आदि में संचन किया जाता है उसे वातांतपिक कहते हैं । कुटी प्रावेशिक विधि- जिस नगर में साधु, राना, एवं धर्मात्मा पुन्प बसते हैं। उस नगर के पूर्व, या उत्तर की तरह एक कुटी बनायें, जिसमें तीन खण हो तथा मजबूत और सुन्दर हो, यदि पण काल हो तो उसमें रोशनदान आदि हों और शीतकाल हो तो चारों ओर वन्द हा तथा वहां पर किसी प्रकार का कोलाहल एवं स्त्री जाति का जाना माना एवं शब्द धादि न हो एवं लान पान औपच वैध आदि का स्त्र तरह का प्रयन्य हो ऐसी फुटी में शुक्ल पक्ष शुभ मुहुर्त एवं नक्षेत्र में रसायन सेवन अमिलापी पुरुप क्षोर कर्म कराकर तथा वमन विरेपन के द्वारा शुद्ध होकर मानसिक विकारों को नष्ट कर सम्पूर्ण प्राणियों पर व्या भाव रखता हुआ प्रवेश कर के रसायन का सेवन करे । कुटी प्रादेशिक रसायन का सेवन जो धनिक हैं तथा जिनके पास समय है तथा पहरेज के पक्के हैं वे ही कर सकते हैं। बाकी सर्व साधारण फे लिए वातातपिक हो रसायन का उपयोग करना चाहिए । - ( ११८ ) रसायन प्रयोग काल- योवन अवस्था के आदि में या अन्त में रसायन का प्रयोग करना चाहिए । जिस प्रकार मैले कपड़े पर रङ्ग नहीं चढ़ता है उसी प्रकार विना वमन विरेचन से शरीर शुद्ध किए विना रायन भी फल प्रद नहीं होता है। अतः शरीर को शुद्ध करके ही रसायन का प्रयोग करना चाहिए। हरड़ का रसायन- पुराना गुड़, शहद, सोंठ, पीपल, या सैन्धव नमक के साथ दो २ हरड़ प्रतिदिन किसी एक गुड़ आदि वस्तु के साथ खाने से रोगों से रहित होकर १०० वर्ष हक मनुष्य जीवित . रहता है। अश्वगन्धा रसायन एक माशा से ३ माशा तक असगन्ध के चूर्ण को गर्म दूध या बलके साथ सेवन करने से रोगों से रहित होकर १०० बर्ष तक मनुष्य जीता है। धावी रसायन- एक सेर आंवलों के चूर्ण को एक सेर आंवलों के रस में भावित करके एक पाव शहद तथा आघ सेर घी डाल कर एक महीने तक एक भाण्ड में डालकर राख के ढेर में गाददें, फिर निकाल कर एफ २ तोला प्रतिदिन खाने से मनुष्य रोग रहित होकर १०० वर्ष तक जीवित रहता है ।
( ११६ ) च्यवन प्राशावलेह, ब्राह्म रसायन, लोह रसायन, शिलाजतु, लोह भस्म- श्रादि का प्रयोग भी अवस्था को बढ़ाते हैं । और शरीर को हृष्ट पुष्ट बनाते हैं । बुद्धि वर्धक रसायन- गिलोय, अयामार्ज, वायबिटङ्ग, वच, हरड़, कृठ, शस्त्र पुष्पी, तथा शतावर इन औपषियों का समान भाग लेकर चूर्ण पनाले इस चूर्ण की ३ माशा मात्रा दूध के साथ तीन दिन तक लेने से एक हजार श्लोक, दोहे मनुष्य एक दिन में याद कर सकता है। केवल शख पुप्पी का स्वरस या बाली का स्वरस पीने से ही मनुष्य की बुद्धि बढ़ जाती है। आचार रसायन- सात्विक भोजन, सदाचार, ब्रह्मचर्य, तप ईश्वरोपासना, ‘सत्य वचन, सघ प्राणियों पर दया पवित्रता, बड़ों की सेवा आदि कारणों से चित्त को शान्ति एवं आनन्द मिलने से शरीर को पुष्टि होती है, धातु बढ़ती है तथा पिना रसायन यस्तुवों के सेवन से ही रसायन का फल मिल जाता है। विदारी कन्द रसायन- गिदारी कन्द के चूर्ण को विदारी कन्द के रस में भावित करके खाने से रसायन है।
( १२० )
* वैद्य विशारद परीक्षा *
सम्वत् १९६८
उर्चाङ्ग चिकित्सा पूर्णाङ्क १००
(१) पीनस रोग के लक्षण तथा चिधित्सा लिखिए ।
( २) मोतिया विन्दु रोग को आयुर्वेद शास्त्र में किस
नाम से कहा गया है और उसके लक्षण तथा
चिकित्सा क्या है।
(३) कर्ण वाधिर्य और कर्णनाइ क्यों होता है इनकी
चिकित्सा और पथ्यापथ्य वताइये ।
१०
(४) वाजीकरण की परिभाषा उसके उपयोग और
विधि लिख कर एक वाजीकरण प्रयोग लिखिए ।
(५), (क) उन्मादरोग का यिप्रक्टष्टं निदान क्या है ।
(ख) विषजन्य उन्माद के लक्षण तथा उसकी
चिकित्सा लिखीए।
१७
(६) (क) पक्षाघात के लक्षण और उसकी चिकित्सा
लिखिए।
(ख) किस प्रकार का पक्षाघात असाध्य होता है १७
(७) मूर्छा तथा सन्यास रोग में क्या भेद है।
(5) रणयान की विधि और उसके उपकार वतला कर भाव
प्रकाश के मत से एक सिद्ध रसायन लिखिए। १४
१०
१२
( १२१) सम्वत् १९६६ पूर्णाङ्क १० १) किस प्रकार के आहार विहार सेवन करने से दृष्टि शक्ति न्यून होती है, तथा अधिक होती है । इसका विपद विवेचन करते हुए दृष्टि बढ़ाने वाले प्रसिद्ध शास्त्रीय प्रयोग लिखिए। १२ (२) पीनस रोग का निदान तथा कर्म वाधिर्य रोग की चिकित्सा लिखिए। १२ (३ ) उन्माद रोग का पथ्यापथ्य सन्यास रोग को चिकित्सा तथा अपस्यार के भेद लिखिए । १२ (४) मनो दुःखज रोग का निदान या लक्षण और नाड़ीवात संस्थान के विकारों पर उपाय लिखिए। २० ५) ब्रह्मचर्य के सेवन से रसायन तथा वाजीकरण सम्बन्धी क्या २ लाभ होते हैं ? इसका पृथक २ स्पष्ट तथा पूर्ण विवेचन कीजिए। १६ (६ ) सर्वदा और सर्वया पथ्य वस्तुवों का नाम निर्देश क रसायन की परिमापा और सपयोगिता लिग्दिए । १२ (७) लंघन करना किस अवस्था में किन रोगियों के लिए अपथ्य हैं । शास्त्र तया युक्ति द्वारा लिखिए और हरणों फे उपाय वतलाइये। १२ (1) असाध्य पक्षाघात के लक्षण. आंख की फूली पर एक वत्ती मुस पाक पर एक तेल और दांत के दर्द पर एक मञ्जन लिखिए। २४
( १२२ )
सम्बत् २०००
पूर्णाङ्क १००
सूचना-किन्हीं पांच प्रश्तों को उत्तर लिखिए। छटा प्रश्न अनि
वार्य है। समी प्रश्नों के लिए समान अङ्क नियत हैं।
(१) रसायन और वाजीकरणमें क्या भेद है बालकों को इसकी
आवश्यकता के विषय में आप क्या विचार करते हैं ?
ब्रह्मचर्य से क्या २ लान हैं ? विना औषधि रसायन और
पाजीकरण की किस प्रकार पूर्ति हो सकती हैं ?
(२) पीनस पूतिनस्य और प्रतिश्याप के भेद लिखते हुए तत्
सम्वन्धी लक्षण और चिकित्सा पर प्रकाश डालिये।
(३) आयुर्वेद में मोतियाविन्द सम्वलबाई और आंख.पानेको
क्या कहते हैं ? उनके लक्षण और चिकित्सा का उल्लेख
कीजिए । आयुर्वेद के अनुसार नेत्र चिकित्सा के ६ प्रकार
के उपचारों का पूर्ण विवरण लिखिए ।
(४) नाड़ी और मस्तिष्क में क्या सम्वन्ध है ? उन्माद और
पक्षाघात में विकार कहां उत्पन्न होता है दोनों के निदान
सक्षण तथा चिकित्सा लिखिए।
(५) एक बेहोश व्यक्ति को देख कर आप यह कैसे निर्णय
करेंगे कि उसकी वेहोशी मानसिक उद्रेक, चाट, रोम,
.
....
( १२३ )
शराव, विषपान अयवा विपात श्राहार के कारण है।
सविस्तार वर्णन करके उसके होश में लाने की तत्कालिक
चिकित्सा लिखिए।
(६) मुवामपिड़िका, कृमिदन्त, दन्तहर्प, कण्ठशालक अभिप्यन्द
सूर्यावर्त, अर्धांवमेदक के विषय में संक्षेप से लिखिए ।
(अ) आयुर्वेद के आठों अट्दों का वर्णन करो।
व) रोग परीक्षा करते समय निहा और नेत्रों की
परीक्षा क्यों की जाती है सविस्तार लिखिए ।
सम्वत् २००१
पूर्णाङ्क १०
(१) उन्माद और अपस्यार का निदान तथा लक्षण लिखिए,
और इन दोनों रोगों के पारस्परिक अन्तर का स्पष्ट
विवेचन कीनीए ।
१६
(२) क्लव्य के कितने भेद हैं ? अप्राकृतिक मैथुन जन्य
क्लीवता का समावेश किस भेद में हो सकता है ? इस
प्रकार के क्लीत्व दीचिकिरा लिखिए।
नेत्रामिप्यन्द, अञ्जननामिका, शिरोत्सात, और विनाश
( अगले पृष्ठ पर)
.
।
( १२४ )
से आप क्या अभिप्राय समझते हैं । किस प्रकार का
आहार विहार नेत्र रोगों को उत्पन्न करता है।
(३) वामीकर औषधों का सेवन किस हेतु से किया जाता है।
वीर्य के शीघ्र स्खलन से पीड़ित रोगी के लिये कौन कौन
से वाजीकर पदार्थ हितकर हो सकते हैं ?
प्रथवा
। अर्घावभेदक, सूर्यावर्त, मुखदूपिका और नीलिका की
लक्षण सहित चिंकित्सा लिखिये।
१३
(४) वर्तमान समय में सुप्रचलित पाइरिया नामक दन्त रोगकी
शास्त्रोक्त संज्ञा लिखिये । दन्त शुद्धी के लिये
ब्रुश
और
दातुन में से आप किसे अधिक उत्तम समझते हैं और
क्यों ? सामान्य दन्त रोग नाशक कोई मंजन लिखिये १४
(५) रसायन का लक्षण और फल लिखकर वयः स्थापक
और मध्य रसायन का नाम लिखिये।
१२.
(६) पीनस की चिकित्सा और दुष्ट प्रतिश्या के प्रक्षण लिखिये
और यतलाइये, पुराने प्रतिश्याप के कारण किन रोगों के
उत्पन्न होने की सम्भावना होती है ? : . १५
(७) कर्णनाव की चिकित्सा लिखिये । वाधिर्य में किस किस
दोष की प्रधानता मानी जाती है ? कर्णशूल की चिकित्सा
और उसके उपद्रव लिखिये।
।
( १२५ )
सम्वत् २००२
पूर्णाङ्क १००
(१) वातिक मदात्य का लक्षण और पक्षाघात का निदान
एवं चिकित्सा लिखये।
१६
(२) यजरा व्याधि विध्वंसि वयः स्तम्भ कर तथा
चक्षुप्यंबृहणं वृष्यं भेवलं तद्रसावनम् ॥
इस लक्षण को ध्यान में रखते हुए वनस्पतिओं, रत्नों
और धातुओं में से ऐ। किन्दी तीन तीन द्रव्यों के
नाम लिखिये जिन्हें आयुर्वेद में रसायन माना
गया हो।
२०
अथवा
बुटि प्रावेशिक और पातातपिक विधि का वर्णन कीजिये
रसायन सेवन करने वाले व्यक्ति के लिए रसायन सेवन
से पूर्व शरीर शुद्धि क्यों आवश्यक है ? यह शरीर शुद्धि
क्या है और क्यों की जाती है ?
(३) कर्णस्राव, कर्णनाद, नासापरिशोप और नासापाफ का
लक्षण भौर चिकित्सा लिखिए।
(४) शिराबाल और पोयफी का लक्षण और चिकित्सा लिख
कर पाश्चातन विधि का सष्टीकरण कीजिये।
(अगले पृष्ट पर देखें)
( १२६ )
(५) मुख पाक , दन्त हर्ष अलास और अनन्त वात का निदान
लक्षण और चिकित्सा लिखिये।
१८
(६) वाजीकरण का क्या अर्थ है ? एक वाजीकरण प्रयोग
लिखिये
सम्वत् २००३
पूर्णाङ्क १००
( १) सूर्यावर्त अनन्त बात और शङ्खक में से किन्ही दो रोगों
का निदान तथा चिकित्सा संक्षेप में लिखकर "शिरोवास्ते"
का अभिप्राय स्पष्ट कीजिये ।
१२
(२) दृष्टि किसे कहते हैं ? इसमें होने वाले एक प्रधान रोग का
वर्णन कीजिये । घष्टिगा रोगों में पथ्यापथ्य का विचार
क्या करना चाहिये, विस्तार सहित लिखिये ।
१६
अथवाः
सत्रम शुक्र और अव्रण शुक्र में भेद बतला कर अनका
जात के विषय में जो कुछ भी जानते हो लिखिये।
बिडालक एवं आश्चोतन से क्या समझते हैं ?
( १२७ )
(३) कर्णशूल का आशुलाभप्रद उपचार निखकर पीनसके उपर
एक सर्वाङ्गपूर्ण निवन्ध लिखिये ।
१८
४) दन्त वेष्ट की पहचान क्या है ? इसकी मुकप चिकित्सा का
उल्लेख कीजिये । मुख रोगों की सामान्य चिकित्सा कैसे
की जाती है ?
१५
(५) पोयकी क्या है ? पिण्डी किसे कहते हैं और इस का
प्रयोग कव किया जाता है ?
६
(६) मूर्छा, अपस्यार और गन्यास में क्या अन्तर है ?
पानात्यय कैसे होता है और उसकी चिकित्सा
क्या है ?
१५
अथवा
पक्षाघात के निदान, लक्षण, साध्या छाध्यता एवं
चिकित्सा का विशद वर्णन कीजिये।
(७) उन्माद के सामान्य लक्षण लिखकर इसके अरिष्ट लिङ्गों
का उल्लेख कीजिए । इसे अपस्यार से प्रयक कैसे
किया जाता है ?
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पृष्ठ १ १ १ मछली २ ૨ ६ नस्दै ४ ६ शुद्धाशुद्ध विवरण-पत्र पं.ले शुद्ध मशुद्ध मच्छसी खरंदरे सरसरे १० ओंठ ११ होठ ओंठ होठी प्रॉठो १६ होठ ओठ मसूड़े १३ गम गय १७ होठ श्रोट पीय पीक सेमर सेमा ऐन्युटा रेन्युता युक्त रठित १५ में तिक्त नित १५ धूम्रपान धूमपान है अकरकरा प्रकर करा चूर्ण चू १६ भुनेसुहागे सुहागे रोगाहोते हैं रोग है ४ नासानाव १४ शूल ६ नाक नाम १ ८ ६ DIR १२ १३ १३ है १० १६ २ प्रति स्राव २२ २९ २२ २३ १० २ २७ २६ ४ ५ २६ २६ २६ १३ १६ ឬធំ घूम गम्च उतना ही तैल (छूट गया है) प्रतिश्याय प्रतिश्याप मिलावट मिलावठ श्रवण नाड़ी श्रवन नाड़ी कर्ण स्वेड कर्ण स्वेद स्वेड श्वेद अर्श अर्थ को के का को विदग्ध विग्य २ ३१ १८ १६ १६ ४ २५ ४५ पाकात्यय पाकात्य केक ५१ १२ १५ १२ १६ १६ १३ १ 8 २ १७ ११ २१ वर्त्म कर्दम कर्टम कर्दम कदेव शिरामें शिराये पक्ष्म पदम पक्ष्म पदम से सधन स्त्राव शघव होने जाने वातानिष्यन्द वाताभिष्यन्द शिएए शिनत हताधिमन्थ इतोधिमन्य भांगरा ६० ७ १५ अंगरा नववत ८ १२ ६६ ६६ ६६ ६६ पृ.मर aia इत्या ३ नवजात घूमर वांया चाहिना पञ्चात घ्राण होता तबा उत्तम अर्घावभेदक हों ७) पश्चात ध्राय हाती तथा मध्यम अवधिनदे। १४ १८ १६ ७० ७० ६ छुट गया है ७१ १२ १२ रक्त . "" ७३ ७३ ७३ कराल कम्पन अधकपारी ७४ ७५ २१ ૨ २ २ ७२ रक्त स्निग्य शुध्द गन्धक अपस्मार मादात्यय वाहक रल्क कपल पोड़ा अधकय कारी सल्क लिग्थ शुगंधक अयम्यार महात्म वादक मी में फट्ट इण्डियों तन्डा पसन्य ७६ ११ १३ १४ उन्ही से ७६ ८० १० १३ ८१ ६२ ८३ खट्टे इन्द्रियों तन्द्रा अपशव्य १२ लगते मैन विशेषः कनिस्य लगाते यन विषय ६ ६ वाकस्य ८५ ८६ ८६ ६२ से बे १८ २ दुरालमा ६३ ६ अपथ्य ૧૩ दुरालमा असाध्य रक्ष व्यवापी विव.म मदात्यम निसी ११ रूक्ष : ११ व्यवायी विद्यार १.४.८.११ मदात्यय किती ६३ ६५ २१ ४ १०३ $ महा योषापस्मार है १०४ १.५ १०५ मद्य योषपस्यार पानी योषापस्थार लक्षथा चिकित्स इष्ट घावी अयामार्ग १०७ पान योषापस्मार लक्षण चित्मिा द्रूप धात्री अपामार्ग १३ १३ १४ ११२ ११८ १६ ११६ ६
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