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2005/07/25

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ROMARRITAMINISTER
उपयोगितावाद
लेखक
RAR
स्टुअर्ट मिल
--
उमरासिंह कारक
काश मन्दिर, माछरा, मेरठ,

ज्ञान प्रकाश ग्रन्थमाला की चौथी पुस्तक
स्टाक प्रमाजी ४-११८५
उपयोगितावाद

ज्ञान प्रकाश ग्रन्थमाला की
कुछ विशेषतायें
१-इस ग्रन्थमाला में सब विषयों की
पुस्तकें प्रकाशित होती हैं।
२--इस माला की पुस्तकों की भापा
सरल तथा कविता के समान सरस
होती है।
३-इम ग्रन्थमाला में संसार-प्रसिद्ध
पुस्तकों के अनुवाद तथा प्रतिभा-
शाली लेखकों की मौलिक पुस्तकें
प्रकाशित होती है।
४-इस माला की पुस्तकें सब के लिए
उपयोगी होती हैं।
५--इस माला की पुस्तकें बढ़िया
कागज़ पर सुन्दर टाइप में छपती
हैं तथा आवश्यकतानुसार चित्रों
से भूषित रहती हैं
६--इस माला की पुस्तकें बहुत सस्ती
होती हैं।
व्यवस्थापक
ज्ञानप्रकाश मंदिर,
पो० माछगा, जि० मेरठ.

उपयोगितावाद अर्थात् स्टुअर्ट मिल की संसार-प्रसिद्ध पुस्तक 'युटिलेटिरियनिज्म' का हिन्दी अनुवाद अनुवादक उमराव सिंह कारुणिक बी० ए०, रचयिता " कार्नेगी" इत्यादि । प्रकाशक- चौधरी शिवनाथ सिंह शाण्डिल्य ज्ञानप्रकाश मन्दिर, पो. जि० मेरठ । • माछरा, पहिलो संस्करण ] सन् १६२४६० [ मूल्य १) --- केवल १६ पृष्ठ विद्या प्रिंटिंग प्रेस, मेरठ में मुद्रित ।

मुद्रक- साहित्य मुद्रणालय, मेरठ. -- प्रकाशक- चौधरी शिवनाथ सिंह शाण्डिल्य ज्ञानप्रकाश मन्दिर, पो० ० माछरा, मेरठ.

विषय सूची।
विषय
निवेदन
६-१०
भूमिका
...
११.१६
जीवन चरित्र
...
१७-२६
...
पहिला प्रकरण
२७-३५
दूसरा प्रकरण
तीसरा प्रकरण
...
७०-८४
चौथा प्रकरण
E५-६७
... ...
पांचवां प्रकरण
बम-१३८

आवश्यक निवेदन बहुत से हिन्दी प्रेमियों का आग्रह था कि ज्ञान- काश ग्रन्थमाला में छोटी बड़ी-सब प्रकार की-पुस्तकें प्रकाशित की जाया करें। अतएव अब से इस ग्रन्थमाला में दस श्राने से कम तथा अधिक दोनों प्रकार की पुस्तके प्रकाशित होगी । स्थायी ग्राहकों से प्रवेश फीस ॥) है और सव पुस्तके पौने मूल्य में मिलती हैं। व्यवस्थापक- ज्ञान प्रकाश मन्दिर । mer

निवेदन।
यों तो इङ्गलैंड के प्रसिद्ध तत्त्ववेता स्टुअर्ट मिल के सब ही
ग्रन्थ एक से एक बढ़िया है, किन्तु Liberty (स्वाधीनता),
Subjection of Women (स्त्रियों की पराधीनता),
Representative Government (प्रतिनिधि-सत्तात्मक
राज्य-व्यवस्था तथा Utilitarianism (उपयोगितावाद)-
ये चार ग्रन्थ-विशेष महत्त्वपूर्ण हैं । प्रस्तुत पुस्तक मिल की
Utilitariauism नामक पुस्तक का अनुवाद है।
बहुत दिन हुवे लेखक ने इस पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद
करने का विचार किया था किंतु यह मालूम होने पर, कि
साहित्याचार्य पं. रामावतार जी पाण्डेय इस पुस्तक का
अनुवाद ग्रन्थ-रत्नाकर कार्यालय के लिए कर रहे हैं, वह
विचार छोड़ दिया था। दार्शनिक पुस्तकों का अंग्रेजी से
हिन्दी में अनुवाद करना बहुत ही कठिन है । श्रद्वय
पं० महाबीर प्रसाद द्विवेदी या साहित्याचार्य पं० रामावतार
पाण्डेय प्रभृति विद्वान् ही इस कार्य को सफलता पूर्वक कर
सकते हैं। इस कारण लेखक को यह जामकर बड़ा हर्ष दुवा
था कि साहित्याचार्य जी ने इस पुस्तक का अनुवाद करना
प्रारम्भ कर दिया है। किन्तु कई वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी
जब — Utilitarianism' का अनुवाद प्रकाशित नहीं हुवा
तो हिन्दी के प्रसिद्ध प्रेमी श्रीयुत चौधरी शिवनाथसिंह के
अाग्रह से लेखक ही को इस पुस्तक का अनुवाद करना पड़ा।
।

संभव है अनु गद-संबन्धी अनेक भूलें हो गई हो। यद्यपि
ऐसे कठिन कार्य में हाथ न डालना ही उचित था, किंतु यह
सोच कर कि जिन बातों का विचार इस पुस्तक में है उनके
जानने की बड़ी श्रावश्यकता है, अनुवाद करने का साहस
करना ही पडा।
माननीय पं० महाबीर प्रसाद द्विवेदी के कथनानुसार इस
समय हिन्दी में जितनी पुस्तकें लिखी जायें खूब सरल भाषा
में लिखी जानी चाहिये । इस कारण इस पुस्तक की भाषा
यथा संभव सरल रखने का प्रयत्न किया गया है, किंतु फिर
भी पुस्तक का विषय ऐसा कठिन है कि वहीं २ पर विवश
होकर सँस्कृत के क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग करना ही
पड़ा
है।
मेरठ
उमरावसिंह कारुणिक बी० ए०
१-१-२४

भूमिका
"00+
श्राधुनिक युग " युक्ति का गग (Age of
Rationalism)" है। प्रत्येक बात के लिये युक्ति माँगी
जाती है । इस कारण प्राचार शास्त्र की भी सहेतुक कसौटो
निश्चय करना अत्यन्तावश्यक हो गया है, क्योंकि अब पुरानी
पुस्तकों से बचन मात्र उद्ध त करने से ही काम नहीं
चलता है।
इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध तत्ववेत्ता स्टुअर्ट मिल ने अपनी
संसार प्रसिद्ध पुस्तक Utilittrianism अर्थातू
उपयोगितावाद में इस ही विषय पर विचार किया है।
प्राचार-शास्त्र का मूल अधार क्या होना चाहिये ? कोई काम
करना ठीक है या नहीं ?-यह बात किस प्रकार निश्चित करनी
चाहिये । मिल उपयोगितावादी थी। उस का विचार था कि
जिस काम से जितने अधिक आदमियों का हित होता है वह
उतना ही अधिक अच्छा । इस सिद्धान्त को इस पुस्तक में
बहुत अच्छी तरह प्रमाणित किया गया है । इस पुस्तक के
पढ़ने से मालूम होगा कि इस सिद्धान्त की पुष्टि में मिल
ने जिन दलीलों या युक्तियों से काम लिया है वे बहुत प्रबल
तथा अकाट्य हैं।
इस पुस्तक में पांच अध्याय हैं । पहिले अध्याय में मिल ने
इस सिद्धान्त के विषय में कुछ साधारण बातें कहीं हैं । इस
अध्याय को मूल पुस्तक की भूमिका समझना चाहिये।
है

The मतलब है ( १२ ) दूसरे अध्याय में मिल ने ' उपयोगितावाद' का अर्थ समझाया है। अन्य अध्यायों को समझने के लिये इस अध्याय को ध्यान पूर्वक पढ़ना अत्यन्त आवश्यक है। मिल साहब के शब्दों में उपयोगितावाद का अर्थ यह है कि जो काम जितना आनन्द की ओर ले जाता है उतना ही अच्छा है तथा जो प्रानन्द से जितनी विपरीत दशा में ले जाता है उतना ही बुरा । प्रानन्द से सुख तथा कष्ट का न होना। किन्तु आनन्द भिन्न २ प्रकार के होते हैं। इस कारण प्रश्न उठता है कि भिन्न २ प्रकार के प्रानन्दों में एक को ऊंचा तथा दूसरे को नीचा किस प्रकार ठहरावे ? परिमाण के विचार को छोड़ कर और किस प्रकार एक अानन्द दूसरे की अपेक्षा अधिक मूल्यवान ठहराया जा सकता है ? इस प्रश्न का बहुत ही सन्तोषजनक उत्तर मिल ने इस प्रकार दिया है यदि ऐसे सब मनुष्य जो दो भिन्न २ अानन्दों का अनुभव कर चुके हों बिना किसी प्रकार के नैतिक दबाव के उन में से एक मानन्द को दूसरे की अपेक्षा अधिक अच्छा अानन्द बतावें तो वही प्रानन्द अधिक इष्ट । यदि वे मनुष्य , जो दो आनन्दों से परिचित है, एक आनन्द को यह बात जानते हुवे भी कि उस आनन्द को प्राप्त करने में अधिक अशान्ति का सामना करना पड़ता है - दूसरे अानन्द की अपेक्षा अच्छा समझे और उस अानन्द को दूसरे ओनन्द के किसी भी परिमाण के लिये जिस का कि वे उपयोग कर सकते हैं छोड़ने के लिये तो ऐसी दशा में हम उस प्रानन्द गुण की दृष्टि से इतना ऊंचा दर्जा देने में ठीक हैं कि जिस से तुलना करते समय परिमाण का विचार उपेक्षणीय रह जाय । बहुधा मनुष्य प्रश्न करते हैं कि उपयोगितावाद के है। तैयार न हों, को

( १३ )
सिद्धान्त की सनद क्या है ? हम इस सिद्धान्त के मानने के
लिये को विवश हों ? किसी की हत्या न करने, या किसी
का माल न लूटने तथा विश्वास-घात न करने या धोखा न
देने के लिये तो हम बाधित है किंतु सार्वजनिक प्रसन्नता
यादुःख बढ़ाने के लिये हम क्यों बाधित हों ? उपयोगितावाद
के तीसरे अध्याय में मिल ने इस प्रश्न पर विचार किया है
और उपयोगितावाद के सिद्धान्त की सनद पेश की है।
संसार में दो प्रकार के मनुष्य देखे जाते हैं । एक तो वे
जो ईश्वर की नेकी में विश्वास रखते हैं और उस की नाराजी
से डरते हैं दूसरे वे मनुष्य कि जिन का ईश्वर में विश्वास
नहीं है, और जो सुख पूर्वक अपना जीवन व्यतीत करना ही
अपना लक्ष्य समझते हैं।
जिस मनुष्य का ईश्वर की नेकी में विश्वास है उस मनुष्य
को इस बात में भी विश्वास करना होगा कि कर्तव्य ऐसा
काम होना चाहिये जिस को ईश्वर पसन्द करता है। इस
कारण ईश्वर की ओर से पुरस्कार की प्राशा तथा दण्ड का
भय उसको इस सिद्धान्त - अर्थात् सार्वजनिक सुख के
सिद्धान्त अनुसार
कार्य करने के लिये विवश करेंगे।
अब रहे वे मनुष्य जिन का लक्ष्य केवल सुख की प्राप्ति है।
ऐसे मनुष्य स्वयं चाहे कैसे ही काम क्यों न करते हों , किंतु
वे यही चाहते हैं कि दुसरे उन के साथ ऐसा व्यवहार करें
जिससे उनके विचारानुसार
उनके
सुख
की वृद्धि होती हो।
दूसरों के ऐसे ही कामों की वे प्रशंसा करते हैं । इस कारण
अपने भाईयों की ओर से पुरस्कार की प्राशा तथो दण्ड का
भय तथा दूसरों के प्रति निस्स्वार्थ प्रेम तथा सहानुभूति के

( १४ ) न्यूनाधिक भाव - जितने मनुष्य-प्रकृति में होने संभव हो- ऐसे मनुष्यों को भी सार्वजनिक सुख के सिद्धान्त के अनुसार कार्य करने के लिये विवश करेंगे। उपयोगितावाद के चौथे अध्याय में मिल ने इस सिद्धान्त की पुष्टि में प्रमाण दिये हैं । यह बात तो सब को माननी होगी कि विज्ञान तथा शास्त्र के मूल पूर्वावयव (First Premises ) हेतु देकर प्रमाणित नहीं किये जा सकते । किंतु मूल सिद्धान्तों का वास्तविकता को परखने वाली शक्तियों अर्थात् ज्ञानेद्रियों तथा आंतरिक चेतना के द्वारा ही निर्णय किया जा सकता है। उपयोगितावाद का सिद्धांत है कि सुख इष्ट है तथा उद्देश्य की दृष्टि से एक मान मुख ही इष्ट है । अन्य सारी घस्तुएं इस उद्देश्य - प्राप्ति में सहायक होने के कारण ही इष्ट हैं । जिस प्रकार किसी ध्वनि के श्रोतव्य होने का एक मात्र यहो प्रमाण दिया जा सकता है कि श्रादमी वास्तव में उसे सुनते हैं . इस ही प्रकार उपयोगितावाद की पुष्टि में यही प्रमाण दिया जा सकता है कि मनुष्य वास्तव में सुख चाहते हैं तथा सुख श्राचारयुक्तता का एकमात्र निर्णायक है । मनुष्य सुख क्यों चाहते हैं ? इस का एक मात्र प्रमाण यही दिया जा सकता है कि सुख अच्छा है। प्रत्येक मनुष्य का सुख उस के लिये अच्छा है । इस कारण सर्व साधारण का सुख सब मनुष्यों के समाज के लिये अच्छा है । सुख श्राचार का एक उद्देश्य है । इस कारण आचार-युक्तता का एक निर्णायक है । यहां तक तो साफ़ बात है किन्तु केवल इतने ही से काम नहीं चलता । उपयोगितावाद को प्रमाणित करने ( १५ ) के लिये यह प्रमाणित करना होगा कि सुख प्राचार - युक्तता का एक निक हो नहीं वरन् एक मात्र निर्णायक है या दूसरे शब्दों में यह समझ लीजिये कि यह बात प्रमाणित करनी चाहिये कि मनुष्य केवल सुख ही को नहीं चाहते हैं वरन् सुग्ध के अतिरिक्त वे किसी और वस्तु की कामना ही नहीं करते हैं। विपक्षियों का कहना है कि मनुष्य सुख के अतिरिक्त और चीजे भी चारते है जैसे ने की यो पुण्य ( Virtuti ), शाहरत, शक्ति तथा धन । फिन्तु विचार करने से मालूम होगा कि उपराक्त सब चीजे सम्ख का साधन होने ही के कारण इट ! जा मनुष्य पुराध या नेकी की कामना करते हैं , वे इस प्रकार की कामना इन दो कारणों में से किसी एक कारण की वजह से करते हैं । या तो उन्हें अपने नेक होने का ध्यान पाने से सुख मिलता है या अपने नेक न होने का ख्याल थाने से दुःख होता है । शोहरत या शक्ति मिलने के साथ ही साथ हम का तत्क्षण कुछ आनन्द सा प्रतीत होने लगता है किन्तु फिर भी मनुष्य स्वाभवतया शक्ति तथा ख्याति इस कारण चाहते हैं कि शक्तिशाली या प्रसिद्ध होने पर उन्हें अपनी इच्छाओं की पूर्ति में बड़ी सहायता मिलती है। धन का यही भूला है कि उस के द्वारा और सीजें खरीदी जा सकती है। इस कारण श्रारम्भ में धन की इच्छा उन वस्तुओं के कारण होती है जो उस धन द्वारा प्राप्त की जा सकती हैं । और उन वस्तुओं की इच्छा इस कारण होती है कि उन वस्तुओं के मिलने से सुख मिलता तथा न मिलने से दुःख । इन सब बातों से प्रमाणित होता कि सुख के अतिरिक्त और कोई चीज़ इष्ट नहीं है। अन्य

( १६ )
सब वस्तु। सुख का साधन होने के कारण ही इष्ट हैं । इस
प्रकार उपयोगितावाद का सिद्धान्त प्रमाणित हो जाता है ।
इस के अतिरिक्त उपयोगितावद की पुष्टि में और कोई प्रमाण
नहीं दिया जासकता और न कोइ प्रमाण देने की आवश्यकता
प्रत्यक्षं किं प्रमाणम्
प्राचीन काल से उपयोगिता या
सुख
को
प्राचार-शास्त्र
की
कसौटी मानने में एक बड़ी रुकावट यह रही है कि बहुत से
मनुष्यों के दिल में यह शङ्का बनी रहती है कि कहीं इस सिद्धानत
को आचार-शास्त्र की कसौटी माननो न्याय-विरुद्ध तो नहीं है।
उपयोगितावाद के पांचवें अध्याय में मिल ने इस ही शङ्का को
दूर करने का प्रयत्न किया है तथा बहुत ही योग्यता पूर्वक
अनेक अकाट्य युक्तियां देकर प्रमाणित किया है कि न्याय
युक्तता (justice ) का आधार ही मुख्यतया उपयोगिता है
तथा न्याय युक्तता कतिपय उन प्राचार-विषयक नियमों का
नाम है जिनका मानुषिक भलाई की प्रधान बातों से सम्बन्ध
है और जो इस कारण बिना और किसी बिचार के प्राचार
विषयक सोधारण नियमों से अधिक मान्य है।
उमराव सिंह कारुणिक बी. ए.

Mock जान स्टुअर्ट मिल जान स्टुअर्ट मिल इंग्लैण्ड के सरस्वती मन्दिर में स्टुअर्ट मिल का आसन बहुत ऊंचा है । इमका जन्म २० मई सन् १८० ईस्वी को लन्दन में हुआ था। इसके पिता का नाम जेम्स सिल था। वह भी अपने समय का प्रसिद्ध तत्ववेत्ता था। स्टुअर्ट मिल को उसके पिता ने शिक्षा पाने के लिये किसी स्कूल नहीं भेजा वरन् घर पर स्वयं ही पढ़ाना आरम्भ किया। तीन वर्ष कीअवस्था ही में उम्मने उम्मको ग्रीक भाषा पढ़ाना आरम्भ कर दिया। आठ वष लैटिन भाषा का प्रारम्भ भी करा दिया। मिल का पिता प्रति दिन प्रातःकाल तथा सायंकाल टहलने के लिये जाया करता था। साथ में अपने पुत्र को भी ले जाया करता था और मार्ग में तात्विक तथा गहन विषयों को समझाया करता था जैसे, सुधार किसे कहते हैं ? गवर्नमैन्ट का क्या अर्थ है ? इत्यादि इत्यादि । मिल का पिता बिल्कुल पक्षपातहीन था। वह सदैव इस बात का प्रयत्न करता रहता था कि उनका पुत्र भी उसके समान ही निष्पक्ष बने। जिन दिनों अमरीका का स्वतंत्रता-युद्ध (American War of Independence) होरहा था, तो मिल के पुत्र ने अपने पिता से कहा कि हमारा देश सत्य के लिये लड़ रहा है। उसके पिता ने तत्काल ही उसको समझा दिया कि तुम अपने हृदय की दुर्घलता के कारण ऐसा समझते हो । इंग्लैण्ड अमरीका के साथ अन्याय कर रहा है। पिता की इस सुशिक्षा ही का परिणाम था कि स्टुअर्ट मिल ने जाति तथा देश के झूठे अभिमान को कभी अपने पास नहीं फटकने दिया। अस्तु ।

( १८ ) बारह वर्ष की आयु में मिल ने ग्रीक और लैटिन भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था ! तेरह वर्ष तीन मास की आयु में मिल ने अपने पिता के मित्र सर सैमुअल यन्थम (Sir Sanual Banthem) को एक पत्र लिखा था जिसमें उसने गत चार वर्ष के अपने अध्ययन का व्यौरा दिया था। इस पत्र को देखने से पता चलता है कि इन चार वर्षों में उसने यूनानी भाषा में थ्यूसीडीडोज़ ('Thusidides), अनाक्रियन (Anacreon) तथा थियोक्रीटस के ग्रन्थ पढ़ डाले थे। होमर की औडेसी (Odyessey ) भी देख डाली थी। एसकीज़ (Aeschis), डिमा- सेथिनीज़ (Demosthenes), एसकाईलस (Aeschy lus), सोफ़ोक्लीज़ ( Sophocles ), यूप्रीडीज़ ( Euprides ) तथा परिस्टोफेन्स (Aristophanes) के बहुत से ग्रन्थों का अध्ययन भी किया था। अरस्तू की रिटारिक (Rhetoric) तथा आरगैनन (Organon) का कुछ भाग भी देखा था । प्लेरो के डायलाग (Plato's Dialogues) तथा पिन्डार (Pindar), पौलीबियस ( IPoly bius ) और जेनोफन (Xenophon) के कुछ ग्रन्थ भी पड़े थे। लैटिन में सिसरों की बहुतसी वक्तृतायें, ओविड (Ovid), होरेस (Horace), वरजिल ( Virgil ) के ग्रन्थ तथा 'लिवी' ( Livy ) की पांच पुस्तकों का अध्ययन किया था। टैसीटस ( Tacitus ), जुवैनल (Juvenal) तथा क्विनटिलियन की तो करीब २ सब ही पुस्तकें पढ़ डाली थी गणित शास्त्र में बीज- गणित, रेखागणित तथा त्रिकोणमिति का आरम्भ कर दिया था । अन्तिम वर्ष में यूनानी, लैटिन तथा अङ्गरेजी भाषा के लेखकों के तर्क शास्त्र विषयक ग्रन्थों का अध्ययन किया था। अर्थ शास्त्र तथा रसायन शास्त्र (Chemistry) भी देखा था। द्वितीय ( १६ ) फिलिप के विरुद्ध विद्रोह करने के समय से इङ्गलैण्ड के सिंहासन पर विलियम तृतीय के सिंहासनारूढ़ होने के समय नक का युनाइटेड प्राविन्सेज़ का इतिहास भी लिखा था। यह सब काम चार वर्ष में १४ वर्ष से कम की आयु ही में किया था। हमारे यहां के छात्रों को यह सुनकर अवश्य आश्चर्य होगा। मिल के पिता ने उसको धर्म विषयक कोई ग्रन्थ नहीं पढ़ाया था क्योंकि उसका ईसाई धर्म के किसी भी पन्थ पर विश्वास नहीं था। वह बहुधा कहा करता था....यह समझ में नहीं आता कि जिस सृष्टि में अपार छुःख भरे हुवे हैं उसे किसी सर्व शक्ति. मान् तथा दयालु ईश्वर ने बनाया हो । लोग एक ईश्वर की कल्पना करके उसका पूजन केवल परम्परा के अनुसार चलने की आदत के कारण ही करते है, "हमको किसने बनाया? इस प्रश्न का यथार्थ तथा युक्ति-सिद्ध उसा नहीं दिया जा सकता। यदि कहा जाय कि "ईश्वर ने" तो तत्काल ही दूसरा प्रश्न खड़ा हो जाता है कि "उस ईश्वर को किसने बनाया होगा?" यद्यपि मिल के पिता ने मिल को धार्मिक शिक्षा देकर किसी मत का अनुयायी बनाने का प्रयत्न नहीं किया था किन्तु नैतिक शिक्षा देने में किसी प्रकार की कसर नहीं छोड़ी थी। न्याय पर चलना, सत्य बोलना, निष्कपट व्यवहार रखना आदि बातें मिल के हस्पटल पर अच्छी तरह जमा दी थी। मिल पर अपने पिता की उत्कृष्ट शिक्षा का ऐसा अच्छा असर हुवा था कि कभी कभी मिल अपने पिता के विचारों तक में भूल निकाल देता था । किन्तु इस बात से उसका पिता रुष्ट नहीं होता था वरन् प्रसन्नतापूर्वक निस्संकोच अपनी भूलों को स्वीकार कर लेता था।

( २० ) लगभग १४ वर्ष की आयु में अपनो गृह-शिक्षा को समाप्त कर मिल देशपर्यटन के लिये निकला और एक वर्ष तक सारे पोरुप में घूमा। सन् १८२३ ईस्वी में सत्रह वर्ष की अवस्था में मिल ने ईस्ट इन्डिया आफिस में नौकरी करली । किन्तु अध्ययन करने तथा लेख लिखने का काम बराबर जारी रखा और वैस्ट मिनिस्टर रिव्यू में नियमित रूप से लेख देने लगा । धीरे २ उसने वक्तृता देने का अभ्यास भी कर लिया। सन् १८२८ ई० में मिल ने कतिपय कारणों से वैस्ट मिनिस्टर रिव्यू से अपना संबन्ध ताड़ लिया। सन् १८२६ के जुलाई मास में फ्रांस की प्रसिद्ध राज्य-क्रान्ति हुई । क्रान्ति का समाचार सुनते ही मिल फ्रांस गया और प्रजा के प्रसिद्ध नेता लाफ़ायटी से मिला। राज्य-क्रान्ति के विषय में मुख्य २ बातों का ज्ञान प्राप्त करके इंगलैंड लौट आया और समा- चार पत्रों तथा मासिक पत्रों में क्रान्ति के संबन्ध में जोर शोर से आन्दोलन आरम्भ कर दिया। इङ्गलैण्ड की पार्लियामैन्ट के सुधार के सम्बन्ध में भी प्रतिभा- शाली लेख लिखने आरम्भ कर दिये । सन् १८३१ ई० में वर्तमान काल की महिमा' नामक एक लेख माला लिखनी आरम्भ की। इस लेखमाला के लेखों की नूतनता तथा विद्वत्ता ने प्रसिद्ध तत्वज्ञानी का यल तक को चकित कर दिया । काायल स्वयं आकर मिल से मिला । सन् १८३०-३१ ई० में मिल ने 'अर्थशास्त्र के अनिश्चित प्रश्नों पर विचार' ( Essars on Unsetteled Questions in Political Economy ) शीर्षक पांच विद्वत्ता- पूर्ण नियन्ध लिखे।

सन् १८३० ई० में मिल के जीवन ने नया पलटा खाया । इस वर्ष उसका मिसेस टेलर से पहिले पहिल परिचय हुवा । यह बड़ी विदुषी स्त्री थी। मिल के विचारों पर इस स्त्री के विचारों का बहुत कुछ प्रभाव पड़ा। सन् १८३२ ई० में मिल ने तर्कशास्त्र System of Logic) नामक ग्रन्थ लिखना आरम्भ किया। अवकाशाभाव के कारण यह ग्रन्थ १८४१ ई० में पूर्ण हुवा । मिल ने यह ग्रन्थ बहुत से ग्रन्थों का मनन करके बड़े परिश्रम से लिखा था। मिल ने यह ग्रन्थ बिल्कुल ही नई पद्धति पर लिखा था। इसके प्रकाशित होने का प्रबन्ध करने में कोई दो वर्ष व्यतीत हो गये। १८४३ ई. की वसन्त ऋतु में यह ग्रन्थ प्रकाशित हुआ । यद्यपि उस समय इंगलैण्ड में गूढ़ विषय की पुस्तकों की कद्र नहीं थी, किन्तु फिर भी छ: वर्ष ही में इस ग्रन्थ के तीन संस्करण निकल गये सन् १८४५ ई० में मिलने अर्थशास्त्र (Political Economy) नामक ग्रन्थ लिखना आरम्भ किया। १८४७ ई० में यह प्रन्थ पूर्ण हो गया । इस ग्रन्थ में मिल ने केवल अर्थशास्त्र के तत्वों ही का विचार नहीं किया है, वरन् इंगलैण्ड, स्काटलैण्ड आदि देशों के तत्कालिक इतिहास के प्रत्यक्ष उदाहरण देकर यह भी दिखाया है कि उक्त तत्व किस प्रकार व्यवहार में आ सकते हैं। मिल के इस ग्रन्थ की भी अच्छी बिक्री हुई। इसके बाद कुछ दिनों तक मिल ने कोई महत्वपूर्ण ग्रन्थ नहीं लिखा । केवल फुटकर लेख लिखता रहा। १८४६ ई. में मिसेस टेलर के पति का देहावसान हो गया। मिल अभी तक कुंवारा था। इस कारण उसने १८५१ ई० में मिसेस टेलर के साथ विवाह कर लिया। दोनों में मित्रता का संबन्ध तो पहिले ही सं था। अब यह संबन्ध और भी घनिष्ट हो ( २२ ) गया और दोनों का समय बड़े आनन्द से कटने लगा। 'काव्यशास्त्र विनोदेन कालोगच्छति धीमताम् ।' विवाह होने पर मिल ने छ: मास इटली, सिसली तथा यूनान में भ्रमण किया। सन् १८५६-५८ ई० में मिल ने स्वाधीनता (Liberty) नामक ग्रन्थ की रचना की। मिल का यह ग्रन्थ बहुत ही महत्वपूर्ण है । इस ग्रन्थ के लिखने में मिल ने जितना परिश्रम किया था, उतना और किसी ग्रन्थ के लिखने में नहीं किया मिल की पत्नी ने भी इस ग्रन्थ के लिखने में बहुत सहायता दी थी। इस ग्रन्थ को मिल तथा उसकी पत्नी की संयुक्त-रचना कहना अधिक उपयुक्त होगा। सन् १८५६ ई० में फ्रांस में प्रवास करते समय मिल की प्यारी स्त्री का कफ रोग के कारण, स्वाधीनता के प्रकाशित होने मे पहिले ही, स्वर्गवास हो गया। पत्नी-वियोग के असीम दुःस्त्र के कारण मिल स्वाधीनता का अन्तिम संशोधन नहीं कर सका। मिल ने यह ग्रन्थ अपनी पत्नी ही को समर्पित किया है। यह समर्पण पढ़ने योग्य है। इस के बाद मिल ने पार्लियामैन्ट के सुधार-संयन्धी विचार ( Thoughts on Parliamentary Reform ) नामक प्रन्य लिखा। इस प्रन्थ में मिल ने इस विषय पर विचार किया है कि गुप्त वोट ( राय ) देने की प्रथा अच्छी नहीं है तथा थोड़े वोट मिलने वाले कुछ प्रतिनिधियों को भी पार्लियामैन्ट में रखना चाहिये। सन् १८६० और १८६१ ई. में मिल ने प्रतिनिधि सत्तात्मक राज्य व्यवस्था ( Representative Government ) तथा स्त्रियों की पराधीनता (Subjection of Women ) नामक दो और विद्वत्ता पूर्ण तथा सारगर्भित ग्रन्थों की रचना की। ।

( २३ ) पहिले ग्रन्थ में मिल ने इस मिद्धान्त का प्रतिपादन किया है कि कानून बनाने के लिये राजनीति विशारद् विद्वानों का एक कमी- शन रहना चाहिये क्योंकि प्रतिनिधियों की विराट् सभा में कानून बनाने की योग्यता का सर्वथा अभाव होता है। प्रतिनिधि. सभा को कमीशन द्वारा बनाये गये कानूनों के स्वीकार या अस्वी- कार करने का अधिकार होना चाहिये। त्रियों की स्वाधीनता नामक ग्रन्थ में मिल ने स्त्री जाति की परतन्त्रता का बहुत ही हृदय-विदारक चित्र खींचा है तथा सिद्ध किया है कि स्त्रियां मनुष्यों से शारीरिक, मानसिक आदि किसी भी शक्ति में कम नहीं है । मनुष्यों ने अपने स्वार्थ के कारण स्त्रियों को केवल अपने भोग विलास की सामग्री बना रखा है। संसार का कल्याण इसी में है कि मनुष्य अपनी स्वार्थपरता छोड़ कर स्त्रियों को समानाधिकार दें। इस पुस्तक से स्त्रियों के स्वाधीनता विषयक आन्दोलन को बड़ी सहायता मिली है। इस के बाद मिल ने अपने कतिपय पुराने लेखों में कुछ संशोधन, परिवर्तन तथा परिवर्द्धन करके उपयोगिता वाद ( Utilitarianism ) नामक ग्रन्थ प्रकाशित कराया । मिल के ग्रन्थों में यह प्रन्थ भी बहुत महत्वपूर्ण है। इसी बीच में उत्तर अमरीका तथा दक्षिण अमरीका में गुलामों के सम्बन्ध में युद्ध छिड़ गया । मिल तत्काल ही समझ गया कि यह युद्ध राज्यों के बीच में नहीं है वरन् स्वाधीनता तथा गुलामी के बीच में है। इस कारण उस ने उत्तर अमरीका के पक्ष में पत्रों में बहुत से लेख लिखकर प्रकाशित कराये। कुछ समय के बाद मिल ने हैमिल्टन के तत्व-शास्त्र की artean ( Examination of Hamilton's Philosphy ) ( २४ ) नामक ग्रन्थ प्रकाशित कराया। उस समय सर विलियम हैमिल. टन एक प्रसिद्ध तत्वज्ञानी समझा जाता था। वह देववादी था। सन् १८६० तथा १८६१ ई. में उसके तत्वशास्त्र विषयक कुछ व्याख्यान छपकर प्रकाशित हुवे थे । इस पुस्तक में मिल ने विशेषतया इन्हीं व्याख्यानों पर समालोचनात्क दृष्टि डाली है। सन् १८६५ ई० में वैस्टमिनिस्टर के आदमियों ने मिल से प्रार्थना की कि आप हमारी ओर से पार्लियामैल्ट की सभालदी के लिये खड़े हो । सन् १८५५ ई० में आयलैंण्ड वालों ने भी उस से सभासदी के लिये उम्मेदवार होने की प्रार्थना की थी किन्तु मिल ने उन की प्रार्थना को कतिपय कारणों से अस्वीकार कर दिया था। एक तो ईस्टइन्डिया में नौकरी करने के कारण उस के पास समय नहीं था और दूसरे वह किसी पक्ष का आज्ञाकारी नहीं होना चाहता था और न सभासद् होने के लिये रुपया खर्च करना उचित समझता था। उस का कहना था कि जो मनुष्य अपने पास से रुपया खर्च करके मभामद् होता है वह मानो सभासदी माल लेता है और प्रगट करता है कि मैं सार्वजनिक सेवा के विचार से नहीं वरन् अपने किसो स्वार्थ के कारण सभासद् होना चाहता हूं। मिलने वैस्टमिनिस्टर वालों की प्राथना को भी अस्वीकार करना चाहा, किन्तु उन लोगों ने किसी प्रकार पीछा छोड़ा ही नहीं। उनके इस प्रकार के आग्रह को देख कर मिल ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करली, किन्तु साफ़ २ शब्दों में कह दिया कि न तो मैं वोट प्राप्त करने तथा रुपया व्यय करने के झंझट में पडूंगा और न इस बात का वचन दे सकता हूं कि सभासद् होजाने पर स्थानीय बातों के विषय में अवश्य प्रयत्न करूंगा । इस प्रकार की स्पष्ट बातें कह कर भी सभासद् निर्वाचित हो जाना मिल ही

( २५ )
का काम था । इतना स्पष्टवादो तथा निस्पृह बन कर यदि
सर्व शक्तिमान ईश्वर भी इंग्लैण्ड की पार्लियामैन्ट का
मैम्बर बनना चाहता तो न बन सकता था।
लगातार तीन वर्ष तक मिल पार्लियामैन्ट का मैम्बर रहा ।
पार्लियामैन्ट में उस की वक्तृतायें बहुत ही महत्त्वपूर्ण तथा
प्रभावशालो हुई। इस का कारण यह था कि वह जो कुछ
कहता था उस की पुष्टि में प्राकाट्य युक्तियाँ देता था ।
इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध राजनीतज्ञ ग्लैड्स्टन उस की युक्तियों
की बहुत प्रशंसा किया करते थे । मिल विशेषतया उस
पक्ष को लेता था जो ठीक होकर भी बलहीन होता
था जिस समय श्रायलैंण्ड के एक सभासद ने आयरलैंड
के अनुकूल एक विल पार्लियामेण्ट में उपस्थित किया था
तो मिल ने ही सब से पहिले उस बिल का समर्थन
किया था । यह बिल इंगलैण्ड तथा स्काटलैण्ड वालों को
इतनी अरुचिकर था कि उन में से मिल के अतिरिक्त केवल
चार सभासदों ही ने इस बिल के पक्ष में सम्मति दी थी ।
इस ही अरसे में जमैका द्वीप के हब्शी अग्रेजों के जुल्म
से तङ्ग आकर सरकारी अफसरों के विरुद्ध उठे खड़े हुए
थे। वहां के अंग्रेज़ी गवर्नर ने उन की शिकायतों के दूर
करने के स्थान में पंजाब के प्रोडायर के समान सैंकड़ों
निरपराधियों को गोली से उड़वा दिया था तथा विद्रोह शान्त
हो जाने पर भी अबला स्त्रियों तक को चाबुक से पिटवाया
था। जमैका के गवर्नर के इस नृशंस कार्य की जांच के लिये
जमैका कमेटी नाम की एक सभा स्थापित हुई थी। मिल
उस का सभापति था। मिल ने बहुत कुछ प्रयत्न किया कि
उस दुष्ट गवर्नर को यथोचित दण्ड मिले किन्तु लोकमत
विरुद्ध होने के कारण अपने प्रयत्न में कृतकार्य न हो सका।
.

सन् १८६८ई० में पार्लियामेंट का नया चुनाव हुवा । इस
चार मिल के प्रतिपक्षियों ने बडा जोर बांधा। टोरी दल तो
बिल्कुल विरुद्ध था ही भारत-हितैषी ब्राडला साहब के चुनाव
में आर्थिक सहायता देने तथा जमैका के गर्वनर को दण्ड
दिलाने का प्रयत्न करने के कारण बहुत से लिबरल दल बोले
भी उसके विरुद्ध हो गये। परिणाम यह निकला कि इस बार
मिल वैस्टमिनिस्टर की ओर से मैंम्वर निचित होने में
असमर्थ रहा। वैस्टमिनिस्टर में मिल की असफलता का
समाचार सुन कर तीन चार अन्य स्थानों के प्रादमियों ने
मिल से इस बातका प्राग्रह किया कि छह रन के यहां से
उम्मेदवारों के लिये खड़ा हो, किन्तु मिल ने फिर इस झगड़े
में
पड़ना
उचित न समता।
पार्लियामेण्ट के झंझट से छुट्टो पाकर मिल ने फिर लेख
लिखने कार्य प्रारंभ कर दिया । Suijection of
Woimon अर्थात् 'लियों की पराधीनता' नामक पुस्तक भी
छपा कर प्रकाशित की
सन् १८७३ई० में ६७ वर्ष की आयु में मिल ने इस संसार
को सदैव के लिये छोड़ दिया।
हक मग़फ़रत करे अजब आजाद मर्द था "
उमराव सिंह कारुणिक
--

उपयोगितावाद ।
पहिला अध्याय ।
.
साधारण वक्तव्य
र्शनशास्त्र के प्रारम्भ ही से अच्छे बुरे का प्रभ
या दूमरे शब्दों में प्राचार के आधार का प्रश्न
द
दर्शनशास्त्र की मुख्य समस्या रहा है। बड़े २
प्रतिभाशाली विद्वानों ने इस पर विचार किया है
और मत-भेद के कारण भिन्न २ शाखाओं में विभक्त
होगये हैं तथा एक दूसरे पर खूब आक्षेप प्रत्याक्षेप
किये हैं। श्राज दो सहस वर्ष पश्चात् भी वे ही झगड़े बने हुवे
हैं। अब तक तत्वज्ञानी इस समस्या के सम्बन्ध में परस्पर विरोधा-
त्मक विचार रखने वाली शाखाओं में बटे हुवे हैं । इस समस्याके
सम्बन्ध में जितने भिन्न २ मत उस समय थे, जब कि युवावस्था

૨૮ उपयोगितावाद में सुकरात बूढ़े प्रोटोगोगस (Protogoras) का उपदेश सुना करता था-यदि प्लेटो के 'वाद विवाद' (Dialogue) का प्राधार वास्तविक बाम चीत है-और उस समय के शास्त्री कहलाने वालों (Sophists) के अन साधारण में प्रचलित प्राचार विषयक सिद्धान्तों के विरुद्ध उपयोगितावाद का सिद्धान्त प्रमाणित किया करता था, उतने ही भिन्न २ मत इस समय भी हैं। -- यह बात ठीक है कि ऐसा ही भ्रम तथा प्रमन्दिग्धता तथा कुछ २ दशाओं में ऐसा ही वैमत्य सब विज्ञानों के मूल सिद्धान्तों में है। गणित शास्त्र तक -जिसके सिद्धान्त अन्य सब शास्त्रों के सिद्धान्तों से स्थिर समझे जाते हैं-इस दोष से मुक्त नहीं है। किन्तु इस वैमत्य से इन शास्त्रों की विश्वसनीयता में कुछ बट्टा नहीं लगता । इस ऊपरी उच्छखलता का स्पष्टीकरण इस प्रकार किया जा सकता है कि साधारणतया किसी शास्त्र के विस्तृत सिद्धान्त उन सिद्धान्तों से नहीं निकाले जाते हैं जिनको मूलसिद्धान्त कहा जाता है । न उनका अस्तित्व ही मूल सिद्धान्तों पर निर्भर रहता है। यदि ऐसा न होता तो बीज गणित से अधिक सन्दिग्ध तथा अपरियाप्त निष्कर्ष वाला कोई और शास्त्र नहीं होता क्योंकि वीज गणित का कोई भी प्रसन्दग्ध सिद्धान्त उन सिद्धान्तों से नहीं निकला है जो साधारणतया विद्यार्थियों को उसके मूल सिद्धान्त बनाये जाते हैं। ये मूल सिद्धान्त-बीजगणित के बहुत प्रतिष्ठ शिक्षकों की व्याख्या के अनुसार-अंग्रेजी कानून शास्त्र के समान कल्पनात्मक तथा ईश्वर विद्या (Theology ) के समान रहस्यमय हैं। वे सञ्चाइयां, जिनको अन्त में किसी शास्त्र के मूल सिद्धान्तों के रूप में स्वीकार किया जाता है, वास्तव में उस शास्त्र के प्रारम्भिक विचारों के अध्यात्मिक वैयधिकरण का परिणाम से लब्ध पहिला अध्याय worlN.) annormal होती हैं। उन शास्त्रों से उनका सम्बन्ध ऐसा नहीं है जैसा बुनियाद और इमारत का होता है। उनका सम्बन्ध जड़ और वृक्ष का सम्बन्ध है। जिस प्रकार जड़ बिना खोदे हुवे तथा प्रकाश में लाये हुवे ही अपना काम करती रहती है, इसी प्रकार मूल सिद्धान्त कहाने वाले सिद्धान्त भी बिना पूर्णरूप से स्पष्टीकग्या हुवे भी शास्त्र का पोषण करते रहते हैं । यद्यपि विज्ञान शास्त्र में विशेष २ घटनाओं से साधारण नियम बनाया जाता है, किन्तु व्यवहारिक शास्त्र में -जैसे प्राचार शास्त्र या कानून-इस का' उल्टा भी हो सकता है। सब काम किसी ध्येय को लक्ष्य में रखकर किये जाते हैं। इस कारण यह मानना युक्ति-सङ्गत प्रतीत होता है कि काम करने के नियम उस ध्येय को ध्यान में रख कर बनाये जायें जिस ध्येय के लिये काम किया जाता है । जब हम किसी काम में लगते हैं तो सब से पहिली आवश्यक बात यह है कि हम को इस बात का ठीक २ तथा साफ़ साफ़ झान होना चाहिये कि हम क्या कर रहे हैं । पीछे के स्थान में हमको मागे की भोर दृष्टि रखनी चाहिये । इस कारण गलत और ठीक का निर्धारण इस प्रकार नहीं होना चाहिये कि हम पहिले ही से कुछ बातों को ठीक और कुछ बातों को गलत मान लें। ठीक और गलत की कसौटी ही से इस बात का निर्धारण होना चाहिये कि कौन काम ठीक है और कौन काम --- गलत । यह कठिनाई जन साधारण में प्रचलित प्राकृतिक शक्ति ( Natural faculty) की कल्पना से दूर नहीं होती । प्राकृ- तिक शक्ति की कल्पना को मानने वालों का कहना है कि एक प्रकार की ज्ञानेन्द्रिय या नैसर्गिक बुद्धि होती है जो हम को ठीक ३० उपयोगितावाद . या गलत बता देती है। पहिले तो ऐसी नैसर्गिक बुद्धि का अस्तित्व ही विवादात्मक विषय है। इसके अतिरिक्त इस सिद्धान्त के वे पोषक, जो तत्त्वज्ञानी होने का भी दावा करते हैं, इस विचार को छोड़ देने के लिये विवश हुवे हैं कि नैसर्गिक बुद्धि किसी काम के ठीक या गलत होने को इसी प्रकार बता सकती है जैसे कि हमारी अन्य इन्द्रियां सामने की चीज़ को या आवाज़ को । उन सब पोषकों के अनुसार, जो विचारक कहे जाने के भी अधिकारी हैं, हमारी नैसर्गिक बुद्धि श्राचार संबन्धी निर्णय के सामान्य सिद्धान्त बताती है। यह हमारे हेतु की शाखा है, सचेतन शक्ति (Sensitive faculty) की नहीं। यह शक्ति श्राचार विषयक अमूर्त सिद्धान्तों को मालूम करने में सहायता दे सकती है, किन्तु उन सिद्धान्तों के अनुसार किसी काम के ठीक या गलत होने में नहीं। प्राचार शास्त्र में प्रत्यक्ष ज्ञान तथा परीक्षावाद के माननेवाले सामान्य नियमों की आवश्यकता पर जोर देते हैं। ये दोनों इस बात पर सहमत हैं कि केवल ऊपर से देखकर ही किसी काम को ठीक या गलत नहीं कहना चाहिये, प्रत्युत् किसी नियम के अनुसार उस कार्य विशेष के ठीक या गलत होने का निर्णय करना चाहिये । बहुत कुछ हद तक दोनों एक प्रकार के नैतिक नियम मानते हैं, किन्तु उन नियमों के पुष्टी- करण में भेद है। एक स्कूल के अनुसार तो प्राचार शास्त्र के सिद्धान्त स्वत: सिद्ध हैं। उनको मनवाने के लिये किसी प्रकार का प्रमाण देने की अावश्यकता नहीं है । फेवल उन का अर्थ समझ लेना ही पर्याप्त है। दूसरे स्कूल के अनुसार ठीक और गलत तथा सत्य और असत्य निरीक्षा तथा अनुभव के प्रश्न हैं। किन्तु इस बात पर दोनों सहमत हैं कि प्राचार शास्त्र की पहिला अध्याय ३ - भित्ती कुछ साधारण नियम होने चाहिये । दोनों का प्राचार शास्त्र के अस्तित्व में पूर्ण विश्वास है, किन्तु वे उन स्वतः, सिद्ध सिद्धान्तों की सूची नहीं बनाते जो इस शास्त्र के पूर्वावयव का काम दें। उन सिद्धान्तों को एक मूल सिद्धान्त का अनुवर्ती सिद्ध करने का तो वे बिल्कुल ही प्रयत्न नहीं करते । या तो वे प्राचार शास्त्र के साधारण उपदेशों को स्वत: सिद्ध मानलेते हैं या उन सर्वतन्त्र सिद्धान्तों ( उसूलों ) की किसी समानता को मूल सिद्धान्त बतादेते हैं । यह समानता उन सर्वतन्त्र सिद्धान्तों या उसूलों से भी कम प्रमाणिक जंचती है । इस ही कारण इस प्रकार के सत्वज्ञानियों के सिद्धान्तों को सर्व प्रियता प्राप्त नहीं हो सकती है । किन्तु फिर भी अपने कथन की शास्त्रीय पुष्टि के लिये या तो उन्हें कोई मूल सिद्धान्त या नियम बताना चाहिये जो सब प्रकार के प्राचार की भित्ती हो अथवा यदि कई सिद्ध न्त हों तो उन में पहिले पीछे का क्रम निर्धारित करना पाहिये तथा एक ऐसा सिद्धान्त या नियम निश्चित करना चाहिये जिस के अनुसार भिन्न २ सिद्धान्तों में परस्पर विरोध होने की दशा में निर्णय किया जा सके। यह सिद्धान्त या नियम स्वत: प्रमाण होना चाहिये । यह बात बताने के लिये -कि व्यवहार में इस कमी का बुला प्रभाव कहांतक हुश्रा है या किस सीमा तक मनुष्य जाति के प्राचार विषयक विचार किसी निश्चित अन्तिम प्रादर्श न होने के कारण अनिश्चित होगये हैं--प्राचार विषयक प्राचीन तथा अर्वाचीन सिद्धान्तों का वर्णन तथा उनकी प्रालोचना करनी पड़ेगी। किन्तु यह बात आसानी से प्रमाणित की जा सकती है कि इन प्राचार-विषयक विचारों में जो कुछ उपयोगितावाद -- नियम-वद्धता पाई जाती है उसका कारण किसी न माने हुए श्रादर्श का प्रध्याहार्य प्रभाव है । यद्यपि किसी सर्व सम्मत मूल सिद्धान्त के न होने के कारण प्राचार शास्त्र ने पथ-प्रदर्शक का इतना काम नहीं किया है जितना मनुष्य की वासनाओं को पवित्र बनाने का; किन्तु फिर भी चूंकि मनुष्य की भावनाओं पर-रुचि तथा घृणा दोनों प्रकार की इस बात का बहुत प्रभाव पड़ता है कि कौन २ सी वस्तुओं का मनुष्य की प्रसन्नता पर कैसा प्रभाव माना जाता है; इस कारण उपयोगितावाद के सिद्धान्त का-या उस सिद्धान्त का जिसको बाद में बैन्थम ( Bentham ) ने सब से अधिक प्रानन्द के सिद्धान्त का नाम दिया था-उन मनुष्यों के प्राचार विषयक सिद्धान्तों पर भी बहुत कुछ प्रभाव पड़ता है जो उपयोगितावाद की प्रमाणिकता को घृणा पूर्वक अस्वीकार करदेते हैं । तत्वज्ञानियों का ऐसा कोई सा सम्प्रदाय नहीं है जो इस बात को नहीं मानता है कि प्राचार शास्त्र की बहुत सी छोटी २ बातों में कार्यों द्वाग प्रसन्नता के ऊपर पड़नेवाले प्रभाव पर विशेष ध्यान दिया जाता है; चाहे तत्त्वज्ञानी लोग इस बात को प्राचार शास्त्र का मूल सिद्धान्त तथा नैमित्तिक धर्म मानना किसना ही अस्वीकार क्यों न करें। बल्कि मैं तो यहां तक कह सकताहूं कि स्वतः सिद्ध सिद्धान्त के पोषक प्राचार शास्त्रियों के लिये उपयोगितावाद की दलीलों का मानना अनिवार्य है। इस प्रकार के तत्वज्ञानियों की मालोचना करने का इस समय मेग विचार नहीं है। किन्तु उदाहरण के रूप से इस प्रकार के तत्त्वज्ञानियों में सब से प्रसिद्ध तत्त्वज्ञानी कान्ट (Kant) की 'Metaphysics of Ethies' नामक पुस्तक का उल्लेख करने से पहिला अध्याय रहेगी, एक सर्वतन्त्र नहीं रुकसकता। इस प्रसिद्ध मनुष्य ने, जिसकी विचार प्रणाली बहुत दिनों तक दर्शन शास्त्र के इतिहास में उल्लेखनीय बात अपनी उपरोक्त पुस्तक में मूल सिद्धान्त का वर्णन किया है। वह सिद्धान्त यह है इस प्रकार काम कर कि जिससे उस नियम को, जिसके अनुसार तू काम करता है, सब हेतुवादी कानून मान ले" । किन्तु जब उसने इस सिद्धान्त से आचार विषयक व्यवहारिक धर्मे (फगयज़) का निर्धारण किया है तो इस बात को प्रमाणित कामे में बिल्कुल अकृत- कार्य रहा है कि अत्यन्त दुगचारपूर्ण नियमों को सब हेतुवादियों का प्राचार के नियम मान लेना परस्पर विरोधात्मक है तथा तर्कशास्त्र (भौतिक का ज़िक्र नहीं है) की दृष्टि से असम्भय है । जो कुछ उसने प्रमाणित किया है बस यही है कि इन नियमों के सर्व सम्मत हो जाने का परिणाम यही होगा कि फिर कोई भाक्षेप नहीं करंगा। इस समय अन्य सिद्धान्तों पर और अधिक वाद-विवाद किये बिना ही में उपयोगितावाद या प्रसन्नतावाद को समझाने का प्रयत्न करूंगा और इस सिद्धान्त की पुष्टि में ऐसे प्रमाण दूंगा जो कि दिये जा सकते हैं । यह तो प्रत्यक्ष ही है कि जिस अर्थ में साधारणतया प्रमाण शन लिया जाता है उस अर्थ में किसी प्रकार का प्रमाण नहीं दिया जा सकता । अन्तिम ध्येय से सम्बन्ध रखने वाली समस्यों का साक्षात् प्रमाण ( Direct Proof) नहीं दिया जा सकता। किसी चीज़ को इसी प्रकार अच्छा प्रमाणित किया जा सकता है कि उसके कारण अमुक वस्तु प्राप्त होगी और उस वस्तु का अच्छा होना स्वत: सिद्ध है अर्थात् उसका अच्छा होना प्रमाणित करने के लिये किसी उपयोगितावाद । प्रकार के प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। वैद्यकशास्त्र इस ही कारण अच्छा है कि वह स्वास्थ्य प्रदान करता है । किन्तु यह प्रमाणित करना किस प्रकार सम्भव है कि स्वास्थ्य अच्छा है ? सङ्गीतशास्त्र अच्छा है क्योंकि उसके अच्छा होने के प्रमाण में एक यह बात भी कही जा सकती है कि वह आनन्द प्रदान करता है। किन्तु श्रानन्द अच्छा है इस बात की पुष्टि में क्या प्रमाण देना सम्भव है । अब यदि ऐसा कहा जाय कि एक सूत्र हो जिसके अन्दर सब ऐसी चीजें भाजायें जो स्वतः अच्छी हों तथा इसके अतिरिक्त जो कुछ अच्छा हो वह स्वतः अच्छा न हो प्रत्युत इस कारण अच्छा हो कि किसी स्वत: अच्छी चीज़ की ओर ले जाने वाला है, तो ऐसे सूत्र को या तो मानलिया जा सकता है या मानने से इन्कार कर दिया जा सकता है। किन्तु इस प्रकार का प्रमाण साधारण अर्थों में प्रमाण नहीं है। यह मतलब नहीं है कि ऐसे सुत्र को अन्ध आवेग या मन की मौज के कारण मान लेना चाहिये या अस्वीकृत कर देना चाहिये । प्रमाण शब्द के विस्तृत अर्थ भी हैं । इस अर्थ के अनुसार इस समस्या का भी दर्शनशास्त्र की अन्य विवाद- प्रस्त समस्याओं के समान उत्तर दिया जा सकता है। यह विषय प्रानुमानिक शक्ति का विषय है। किन्तु इस शक्ति से भी बिल्कुल प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता है केवल इस प्रकार के विचार उपस्थित किये जा सकते हैं कि जिन के प्रकाश में बुद्धि या तो इस सिद्धान्त को स्वीकार करले या अस्वीकृत करदे । यह बात भी प्रमाण ही के बराबर है। हम अभी इस बात की परीक्षा करेंगे कि ये विचार किस प्रकार के हैं, किस प्रकार इस सिद्धान्त पर लागू होते हैं और पहिला अध्याय ३५ इस कारण किन २ सहेतुक प्रमाणों के आधार पर उपयोगिता- वाद के सिद्धान्त को स्वीकार या अस्वीकार किया जा सकता है। किन्तु सोच समझ कर उपयोगितावाद को मानने या न मानने से पूर्व उपयोगितावाद के ठीक २ अर्थ समझ लेना अत्यन्त आवश्यक है । मेरे विचार में इस सिद्धान्त के फैलने में सब से बड़ी रुकावट यही पड़ी है कि साधारणतया इस के ठीक २ अथ नहीं समझे जाते हैं। उपयोगितावाद को समझने में जो बडे २ भ्रम होरहे हैं यदि केवल उन का ही निवाग्गा हो जाय तो भी समस्या बहुत कुछ सीधी हो जाय तथा बहुत सी उलझने दूर हो जायें। इस कारण उपयोगितावाद के श्रादर्श के समर्थन में शास्त्रीय कारण देने के पूर्व मैं उपयोगिताव द के सिद्धान्त ही के कुछ उदाहरण दूंगा जिस से साफ़ तौर से समझ में श्रा जाय कि इस सिद्धान्त के क्या अर्थ हैं तथा क्या अर्थ नहीं हैं तथा ऐसे श्राक्षेपों का उत्तर भाजाय जो ऐसे मनुष्यों की ओर से किये जाते हैं जिन्होंने इस सिद्धान्त को ठीक तौर से नहीं । इस के बाद मैं दार्शनिक सिद्धान्त के रूप में उप- योगितावाद पर प्रकाश डालन का प्रयत्न करूंगा। समझा है

दूसरा अध्याय ।
उपयोगितावाद का अर्थ ।
-
हुत से यथेष्ट ज्ञान न रखने वाले भूल से यह
मान लेते हैं कि उपयोगितावादी उपयोगिता
ब
शब्द को संकुचित तथा बोलचाल के अर्थ में-
जिस में उपयोगिता शब्द प्रानन्द का विरोधी
है लेते हैं। कैसे श्राश्चर्य की बात है कि दूसरी
ओर कुछ मनुष्य उपयोगितावाद पर इस से उल्टा आक्षेप करते हैं।
वे कहते हैं कि उपयोगितावादी प्रत्येक बात का प्रानन्द-एक
मात्र श्रानन्द-ही की दृष्टि से विचार करते हैं। जिन्हों ने इस
विषय पर कुछ भी विचार किया है वे जानते हैं कि एपीक्यूग्स
(Epicurus) से लेकर बैन्थम (Bentham) तक जितने
उपयोगितावाद के पोषक हुवे हैं उन में से किसी का भी यह भाशय नहीं

दूसरा अध्याय ३७ था कि उपयोगिता तथा प्रानन्द परस्पर विरोधी हैं । प्रत्युत् उन का कहना था कि उपयोगिता का मतलबत्रानन्द-प्राप्ति तथा दुःख से बचना है। उन लोगों ने उपयोगी को सुखद तथा सुन्दर का विरोधी दिखाने की जगह सदैव यही कहा है कि उपयोगी के अर्थ ही ये हैं कि अन्य बातों के साथ२ सुखद तथा सुन्दर भी हो । किन्तु फिर भी अन साधारण जिन में बहुन से लेखक भी हैं- जो कि केवल समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं ही में लेख नहीं लिखते हैं वग्न दार्शनिक पुस्तकों के भी ग्चयिता हैं-इस विषय पर विचार करते हुवे यही मामूली भूल करते हैं । उपयोगितावाद के विषय में बिना कुछ विचार किये ही ये लोग उपयोगिता शब्द को पकड़ लेते हैं और बैठते हैं कि यह सिद्धान्त अानन्द के फतिपय रूपों का तथा सौन्दर्य, प्राभूषण या चित्तजन का विरोधी है । इस प्रकार की भद्दी भूल इस सिद्धान्त की उपेक्षा करने ही की दृष्टि से नहीं की जाती वग्न कभी कभी इम सिद्धान्त की प्रशंसा करने में भी ऐसी ही भूल की जाती है मानो इस सिद्धान्न का लक्ष्य साधारण बातों या क्षणिक श्रानंद को महत्त्व देना है। मान उस सम्प्रदाय का, जो उपयोगितावाद या सब से अधिक प्रानन्द के सिद्धान्त को प्राचार शास्त्र की भित्ति मानता है, कहना है कि जो काम जितना अानन्द की ओर ले जाता है उतना ही अच्छा है तथा जो काम प्रानन्द से जितनी विपरीत- दशा में ले आता है उतना ही बुग है । प्रानन्द से मतलब है सुख तथा कष्ट का अभाव । भानन्द के प्रभाव का अर्थ है कष्ट तथा सुख का न होना । इस सिद्धान्त द्वारा स्थिर किये गये, प्राचार के आदर्श को साफ तौर से समझाने के लिये बहुत सी -- उपयोगितावाद का अर्थ है तथा बातें बताने की आवश्यकता है। विशेषतया इस बात का स्पष्टी- करण होना चाहिये कि कौन कौन सी चीज़ों को यह सुखद समझता है तथा कौन कौन सी चीज़ों को दुःखद । किन्तु इन बातों की व्याख्यानों का जीवन के उस सिद्धान्त पर-जो प्राचार के इस सिद्धान्त का श्राधार है-कुछ प्रभाव नहीं पड़ता। अथात् श्रानन्द तथा दुःख से मुक्ति ही एक मात्र इष्ट लक्ष्य है और सारे इष्ट पदार्थ (जिनकी संख्या उपयोगितावाद की स्कीम में भी उतनी ही अधिक है जितनी और किसी स्कीम में) इसही कारण इष्ट है कि या तो उनमें प्रानन्द है या उन के द्वारा प्रानन्द बढ़ता कष्ट कम होता है। जीवन का इस प्रकार का सिद्धान्त बहुत से मनुष्यों के मस्तिष्क में चक्कर लगाता है। इन मनुष्यों में कुछ ऐसे भी हैं जो इस सिद्धान्त के घोर विरोधी हैं । ऐसे लोगों का कहना कि यह मान लेना, कि जीवन का आनन्द में उच्चतर (उन्हीं लोगों के अनुसार ) कोई लक्ष्य नहीं है, जिस की प्राप्ति की हम इच्छा करें तथा जिसके लिये हम काम करें, विल्कुल ही नीचता है। उन के कथनानुमार यह सिद्धान्त शूकों का है । प्राचीन ममय में भी प्रनिघृणा दिग्वाने के लिये एपीक्यूमि (Epicuurus) के अनुयायियों की भी शूकों से तुलना की गई थी । इम मिद्धान्त के अाधुनिक पोषकों पर भी श्राजकन जर्मन, फ्रांसीसी तथा अंग्रेज़ विरोधी इम ही प्रकार के नुक्के छोड़ते हैं। इस प्रकार के श्राक्षेप किये जाने पर एपीक्योरियन लोगों (Epicureans) ने सदैव यही उत्तर दिया है कि हम लोग मानुषिक प्रकृति को नीच नहीं प्रदर्शित करते । हमारे विरोधियों ही पर यह दोष घटित होता है जो यह समझते हैं कि मनुष्यों ।

दूसरा अध्याय की दृष्टि में उस प्रानन्द से अधिक और कोई प्रानन्द नहीं हो सकता जो शूकरों की दृष्टि में है । यदि यह कल्पना ठीक होती कि मनुष्य उन्हीं आनन्दों का अनुभव कर सकते हैं जिन का अनुभव शूकरों को होता है तो उस दशा में एपीक्योरियन लोगों (Epicureans) पर किये गये भाक्षेपों का कुछ उत्तर नहीं दिया जा सकता था। किन्तु फिर यह आक्षेप किसी प्रकार का इलज़ाम नहीं रहता । क्योंकि यदि मनुष्य और शूकर दोनों के प्रानन्दो- द्वार एक होते तो जीवन का जो नियम एक के लिये ठीक होता वही दूसरे के लिये भी ठीक होता । एपीक्योरियन लोगों के जीवन की जानवरों के जीवन से तुलना करना मनुष्य-जीवन को नीच मानना है क्योंकि जानवर के प्रानन्द मनुष्य की तुष्टि नहीं कर सकते । जानवर की भूख से मनुष्य की अनुभव-शक्तियां । अधिक उच्च हैं । जब एक बार मनुष्य को उन शक्तियों का ज्ञान हो जाता है तो वह किसी चीज़ को प्रानन्द नहीं मानता जब तक कि उस चीज़ से उन शक्तियों की तुष्टि न हो । निस्सन्देह मेग यह विचार नहीं है कि एपीवयो रयन लोग (Epicureans) उपयोगितावाद के सिद्धान्त से अपने अनुक्रमों की अनुसंधि बनाने में बिल्कुल निर्दोष थे। पर्याप्त रीति से ऐसा करने के लिये बहुत से तितिक्षावाद (Stoicisim) नथा ईसाई धर्म के तत्त्वों को सम्मि लन करना पड़ेगा । किन्तु ऐसे किसी एपीक्योरियन (Epicurean) सिद्धान्त का पता नहीं है जो मस्तिष्क, अनुभव तथा कल्पना से सम्बन्ध रखने वाले श्रानन्दों को केवल संवेदना जनक प्रानन्दों से ऊंचा दर्जा नहीं देता है । फिर भी यह बात माननी पडेगी कि साधारणतया उपयोगितावादी लेखकों ने शारीरिक भानन्दों की अपेक्षा मानसिक आनन्दों उपयोगिताधाद का अर्थ . को इस कारण ऊंचा दर्जा दिया है कि वे अपेक्षाकृत अधिक कालतक स्थिर रहने वाले, सुरक्षित तथा सस्ते होते हैं-अर्थात मानसिक अानन्दों को ऊंचे दर्जे पर उन के असली गुणों की अपेक्षा अन्य कारणों की वजह से रक्खा है। और इन सब बातों में उपयोगतावादियों ने अपने दावे को भली भांति प्रमा- णित कर दिया है। किन्तु उपयोगितावादी लोग अपने दावे को और भी उच्च प्रादर्श रखकर बिना किसी प्रकार की परस्पर विरोधात्मक बान कहे हुवे प्रमाणित कर सकते थे। इस बात को मानना उपयोगितावाद के विरुद्ध नहीं है कि कुछ प्रकार के श्रानन्द अधिक इष्ट तथा मूल्यवान हैं। यह बात बिल्कुल बेतुकी मालूम पड़ती है कि और सब चीजों पर विचार करते समय तो गुण तथा परिमाण दोनों पर विचार करें और प्रानन्द का विचार करते समय एकमात्र परिमाण ही को ध्यान में रखें यदि प्रश्न किया आय कि भिन्न २ प्रानन्दों में गुण का क्या भेद हो सक्ता है तथा परिमाण के विचार को छोड़ कर और किस प्रकार एक श्रानन्द दुसरे श्रानन्द की अपेक्षा अधिक मूल्यवान हो सकता है तो ऐसे प्रश्न का एक ही उत्तर हो सकता है । वह उत्तर यह है:-यदि ऐसे सब मनुष्य या उन में से अधिकतर मनुष्य जो दो आनन्दों का अनुभव कर चुके हैं बिना किसी प्रकार के नैतिक दबाव के उनमें से एक अानन्द को दूसरे की अपेक्षा अधिक अच्छा प्रानन्द बतावे तो वहीं प्रानन्द अधिक इष्ट है। यदि वे मनुष्य जो दो प्रानन्दों से परिचित हैं एक श्रानन्द को, यह बात जानते हुवे भी कि उस प्रानन्द के प्राप्त करने में अधिक अशान्ति का सामना करना पड़ेगा, दूसरे प्रानन्द से अच्छा समझे और उस भानन्द को दूसरे मानन्दों के किसी दूसरा अध्याय ४१ भी परिमाण के लिये, जिस का कि वे उपभोग कर सकते हैं, छोड़ने के लिये तैयार न हों तो ऐसी दशा में हम उस इष्ट प्रानन्द को गुण की दृष्टि से इतना ऊँचा दर्जा देने में ठीक हैं जिस से कि तुलना करते समय परिमाण का विचार उपेक्षणीय रह जाय । अब यह निर्विवाद बात है कि जो मनुष्य दोनों भानन्दों से बगबर परिचित हैं तथा दोनों के उपभोग करने की बगबर सामर्थ्य रखते हैं वे उम आनन्द को अच्छा समझते हैं जिस का उपभोग करने में उन को अपनी उच्चतर शक्तियों को काम में लाना पड़ता है। यदि किसी मनुष्य से कहा जाय कि अगर तुम जानवर बनना स्वीकार करो तो तुम को जितना आनन्द जानवर अनुभव कर सकता है उतने प्रानन्द को अनुभव करने का पूर्ण अवसर दिया जायगा, तो वह मनुष्य कभी भी इस प्रलोभन के कारण जानवर बनना स्वीकार न करेगा। कोई बुद्धिमान् मनुष्य मुख बनना न चाहेगा, कोई पढ़ा लिखा मनुष्य पागल बनना पसन्द न करेगा, कोई सहानुभूत रखने वाला तथा अन्तगत्मा के आदेशानुसार कार्य करने वाला मनुष्य खुदगर्ज तथा कमीन बनने के लिये तैयार न होगा, चाहे उनसे कितना ही क्यों न कहा जाय कि मूर्ख, पागल तथा बदमाश अपनी दशा में उनकी अपेक्षा अधिक सन्तुष्ट हैं। ऐसे श्रादमी कभी भी अपने विशेष प्रानन्द को सर्व साधारण द्वाग उपयुक्त प्रानन्द के लिये तिलांजलि न देंगे। यदि कभी ऐसा करने का विचार भी करेंगे तो बहुत ही दुःखित अवस्था में । ऐसे समय में वे उस दुःख से बचने के लिये अन्य किसी भी दशा में-चाहे वह कैसी ही घृणित क्यों न हो-परिवर्तित होना चाहते हैं । उच्च विकाश प्राप्त मनुष्यों को सुखी होने के लिये अधिक बातों की ४२ उपयोगितावाद का अर्थ आवश्यकता है । वे निस्सन्देह साधारण मनुष्यों की अपेक्षा अधिक कारणों से दुःखी हो सकते हैं। किन्तु ये सब असुविधायें होते हुवे भी वे कभी माधारण विकाश-प्राप्त मनुष्यों की श्रेणी में श्राना पसन्द न करेंगे । हम उनके ऐसा न करने का चाहे कुछ कारण क्यों न बतावें । चाहे हम उन के ऐसा न करने के कारण उनका घमण्ड बतावें-मनुष्य की उच्चतम तथा नीचतम दोनों प्रकार की भावनाओं के लिये इस शब्द का बेसोचे समझे प्रयोग किया जाता है। चाहे हम इस बात का कारण उनकी स्वातन्त्र्य-प्रियता तथा व्यक्तिगत स्वाधीनता ठहगवें। चाहे हम इसका कारण उनका शक्ति तथा श्रावेश का प्रेम-जिन दोनों बातों का ऐसा बनना रुचिकर न होने देने में बहुत कुछ भाग है- ठहगवे । किन्तु मान-मर्यादा के विचार को इस बात का कारण १ बताना अधिक उपयुक्त होगा। मान-मर्यादा का ख्याल थोड़ा बहुत प्रत्येक मनुष्य को होता है। हां ! यह बात ठीक है कि सब मनुष्यों को बराबर नहीं होता । अधिक विकाश प्राप्त मनुष्यों को मान मर्यादा का ख्याल अधिक होता है। इस कारण ऐसे मनुष्य कभी भी ऐसी बात की इच्छा नहीं कर सकते जिम से उनकी मान-मर्यादा में बट्टा पाने की संभावना हो। यह बात दूसरी है कि किसी कारण विशेष से ऐसे मनुष्य थोडी बहुत देर के लिये अपनी मान-मर्यादा का ख्याल भूल जाये जिन मनुष्यों का विचार है कि उच्च-विकाश प्राप्त मनुष्य ऐसा करने में अपने सुख की कुरबानी करते हैं-अर्थात् उच्च-विकाश प्राप्त मनुष्य और सब बातें बराबर होने पर साधारण मनुष्यों की अपेक्षा अधिक सुखी नहीं हैं-वे लोग सुख तथा तुष्टि के दो बहुत भावों को गह मह कर देते हैं । यह बात - भिन्न २ . दूसरा अध्याय निर्विवाद है कि उस मनुष्य की इच्छाओं की पूर्णरूप से तुष्टि हो जाने की बहुत अधिक संभावना है जो बहुत थोड़ी वस्तुओं को आनन्द समझता है। उच्च विकाश-प्राप्त मनुष्य समझेगा कि संसार की इस दशा में जितने भानन्द हैं अपूर्ण हैं । किन्तु ऐसा मनुष्य सह्य होने की दशा में सुखों की अपूर्णतानों को सहन करना सीख सकता है। ऐसा मनुष्य कभी ऐसे मनुष्य से ईर्षा नहीं करेगा जो वास्तव में इन अपूणताओं से अपरिचित है। क्योंकि वह जानता है कि अपूर्णताओं से अपरिचिन मनुष्य उस लाभ को अनुभव नहीं कर सकता जो अपूर्णताओं से परिचित होने की दशा में होता है । सन्तुष्ट सुवर से असन्तुष्ट मनुष्य होना अच्छा है तथा सन्तुष्ट मुर्ख से असन्तुष्ट सुकरात (Socrates) होना अच्छा है । यदि मूों और सुवरों का ऐसा विचार नहीं है तो इस का कारण यही है कि वे सवाल के एक पहलू ही को जानते हैं भोर विकाश-प्राप्त मनुष्य सवाल के दोनों पहलुभों से परिचित होता है। यह प्राक्षेप किया जा सकता है कि बहुत से ऐसे मनुष्य भी हैं जो उच्चतर मानन्दों के उपभोग करने की योग्यता रखने पर भी कभी२ प्रलोभन के कारण उनसे नीच कोटि के आनन्दों का उपभोग करने में लग जाते हैं। किन्तु इस बात से हमारे कथन की पुष्टि पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता । बहुधा चरित्र की दुर्बलता के कारण मनुष्य शीव्र प्राप्त होने वाले प्रानंद के मुकाबले में उससे देर में प्राप्त होने वाले किन्तु उच्चतर मानन्द को छोड़ देते हैं । अब दो शारीरिक मानन्दों में इस प्रकार का मुकाबला होता है तो भी ऐसा ही होता है। शारीरिक तथा मानसिक भानन्दों के मुकाबले में भी यही बात देखने में ra उपयोगितावाद का मथ ही नाजुक पाती है। मनुष्य ऐसे प्रानन्दों का उपभोग करते हैं जो स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद हैं यद्यपि वे मानते हैं कि स्वास्थ्य-रक्षा अधिक अच्छी है। फिर यह भी आक्षेप किया जा सकता है कि बहुत से मनुष्य जवानी के जोश में तो बड़े उदार होते हैं किन्तु जू जू भायु बढ़ती जाती है वे सुस्त तथा स्वार्थी होते जाते हैं । परन्तु मेरा यह विश्वास नहीं है कि ऐसे मनुष्य जिन की प्रकृति में यह साधारण परिवर्तन हो जाता है, जान बूझ कर उन आनन्दों के मुकाबले में निम्न कोटि के प्रानन्दों को पसन्द कर लेते हैं। मेरा विश्वास है कि निम्न कोटि के मानन्दों के उपभोग में संजग्न होने से पहिले ही वे उच्च कोटि के प्रानन्दों को अनुभव करने में असमर्थ हो जाते हैं । उच्च भावों की शक्ति बहुत से मनुष्यों में बहुत पौधा होती है जो केवल विरुद्ध असर पड़ने ही से नहीं वरन् सहारा न मिलने ही के कारण बडी श्रासानी से नष्ट हो जाती है । बहुत से युवा पुरुषों में, यदि उन का पेशा जिस के करने के लिये वे विवश हुवे हैं तथा उन का समाज इस प्रकार की शक्ति का विरोधी है, यह शक्ति शीघ्र ही मृतावस्था को प्राप्त हो जाती है। जिस प्रकार मनुष्य अपनी मानसिक रुचियों (Intellectual tastes) को छोड़ देते हैं, उसी प्रकार समय तथा अवसर न मिलने के कारण उच्च भावनाओं को भी तिलाञ्जलि दे देते हैं और निम्न कोटि के प्रानन्दों का उपभोग करने में लग जाते हैं। ऐसा करने का • कारण यह नहीं होता है कि वे निम्न कोटि के आनन्दों को जान बूझ कर अच्छा समझने लगते हैं। उनके ऐसा करने का कारण यही होता है कि या तो उनकी निम्न कोटि के मानन्दों तक ही पहुंच होती है या वे उच्च कोटि के प्रानन्दों का उपभोग दूसरा मध्याय करने में असमर्थ हो जाते हैं। यह प्रश्न किया जा सकता है कि क्या कभी किसी ने दोनों प्रकार के प्रानन्दों का उपभोग करने में समर्थ होने पर भी निम्न कोटि के मानन्दों को उच्च कोटि के मानन्दों पर सरजीह दी है ? हां यह तो देखा गया है कि बहुत से मनुष्यों ने दोनों प्रकार के प्रानन्दों को मिलाना चाहा है और वे अपने इस प्रयत्न में असफल रहे हैं। एक मात्र अधिकारी पंडितों के इस निर्णय का मेरे विचार में कोई अपील नहीं हो सकता। इस विषय पर-कि दो भानंदों में या दो प्रकार के रहन सहन के ढंगों में, बिना किसी प्रकार की नैतिक दृष्टि से विचार किये हुवे, तथा उनके परिणामों की ओर कुछ ध्यान न देते हुवे कौनसा मानन्द अधिक अच्छा है या कौनसा ढंग अधिक प्रानन्दप्रद है-उन मनुष्यों के निर्णय ही को, जो दोनों प्रकार के प्रानन्दों तथा रहन सहन के ढंगों का पूर्ण ज्ञान रखते हों, अन्तिम निर्णय समझना चाहिये। मतभेद होने की दशा में बहुमत से निर्णय होना चाहिये। मानन्दों के गुणों के विषय में भी इस निर्णय को मानने में किसी प्रकार की हिचकिचाहट नहीं चाहिये क्योंकि और कोई ऐसा दरबार नहीं है जहां परिमाण तक के विषय में निर्णय कराने के लिये जाया जाय । दो कष्टों में कौनसा कष्ट अधिक है या दो आनन्दों में कौनसा मानन्द अधिक अच्छा है -इस बात का निर्णय हम इस के अतिरिक्त और कैसे कर सकते हैं कि उन मनुष्यों की, जो दोनों प्रकार के दुःखों सथा सुखों से परिचित हों, सम्मति लें। न तो मानन्द ही समजातिक हैं और न कष्ट ही । भानन्द के मुकाबले में कष्ट सदैव विविध जातिक है। तजुरबेकार मनुष्यों के अनुभव तथा निर्णय की सहायता के बिना सपयोगितावाद का अर्थ और कैसे कहा जा सकता है कि अमुक भानन्द को प्राप्त करने में इतने कष्ट की कुछ परवाह न करनी चाहिये। इस कारण जब अधिकारी मनुष्यों का अनुभव और निर्णय बतावे कि उच्च शक्तियों द्वारा प्राप्त प्रानन्द, परिमाण के प्रश्न को छोड़ कर, उन भानन्दों से जिन का अनुभव जानवर भी कर सकते हैं अधिक अच्छे हैं तो उच्च शक्तियों द्वारा प्राप्त प्रानन्दों को ऊंचा दर्जा देना ही ठीक है। मैं ने इस विषय की इस कारण विस्तृत विवेचना की है क्योंकि बिना इस के यह बात अच्छी तरह समझ में नहीं प्रा सकती कि 'उपयोगिता या सुख' किस प्रकार मानुषिक प्राचार के नियमों का पथ प्रदर्शक है। किन्तु उपयोगितावाद के श्रादर्श को मानने के लिये इस बात का मानना अनिवार्य नहीं है क्योंकि उपयोगितावाद का यह प्रादर्श नहीं है कि कर्ता को सबसे अधिक भानन्द मिले । उपयोगिताबाद का प्रादर्श तो यह है कि सबको मिला कर सब से अधिक प्रानन्द मिले । इस बात में सन्देह हो सकता है कि क्या उच्च श्राचारवाला मनुष्य अपने उच्च प्राचार के कारण सदैव अधिक सुखी रहता है। किन्तु यह बात निस्सन्दिग्ध है कि उच्च प्राचार बाला मनुष्यों को अधिक सुखी बनाता है और इस कारण संसार को ऐसे मनुष्य से बहुत लाभ पहुंचता है । इस कारण उपयोगिताबाद उस ही समय अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकता है जब कि सर्व साधारण प्राचार. की उपसा के महत्व को समझें। सब से अधिक प्रानन्द के सिद्धान्त के अनुसार, जैसा कि ऊपर समझाया जा चुका है, मन्तिम लक्ष्य, जिस के कारण और सब बाते इष्ट हैं (चाहे हम अपने भले का विचार करें चाहे दूसरा अध्याय मुक्त है दूसरों के भले का ) ऐसी स्थिति है जो यथा संभव दुःखों से तथा गुण तथा परिमाण दोनों की दृष्टि से इतनी अधिक भानन्दमय है जितनी कि हो सकती है । गुण की कसौटी तथा परिमाण के मुकाबले में उस को नापने का नियम यही है कि वही आनन्द अधिक अच्छा है जिस के पक्ष में उन मनुष्यों की सम्मति हो जो अपने ज्ञान तथा निरूपण शक्ति के कारण दोनों की तुलना करने के योग्य हों । उपयोगितावाद के अनुसार मानुषिक कार्यों का यह लक्ष्य होना चाहिये । इस कारण प्राचार का प्रादर्श भी यही होना चाहिये अथात् प्राचार से सम्बन्ध रखने वाले नियम ऐसे होने चाहिये जिनके अनुमार चलने से मनुष्य यथा सम्भव अधिक प्रानन्द प्राप्त कर सकें; यही नहीं बल्कि सारी मनुष्य जाति वरन् यथा सम्भव समप्र ज्ञान-ग्रहणशील सृष्टि यथा सम्भव भानन्दमय स्थिति को प्राप्त हो सके। इस सिद्धान्त का विरोधी एक और सम्प्रदाय भी है । इस सम्प्रदाय का कहना है कि किसी भी रूप में प्रानन्द मानुषिक जीवन तथा कार्यों का सविवेक लक्ष्य नहीं हो सकता, क्योंकि पहिली बात तो यह है कि मानन्द अप्राप्य है। व्यङ्ग के ढंग। से यह लोग पूछते हैं, "तुझ को सुखी रहने का क्या अधिकार है ?" इस प्रश्न को कुछ तोड़ मरोड़ कर कारलायन (Corlyle) ने पूछा था,“ कुछ देर पहिले तुझको अस्तित्व में प्राने ही का क्या अधिकार था ? " इसके बाद वे कहते हैं कि मनुष्य का काम बिना अानन्द के चल सकता है । सारे उच्च प्राशय मनुष्यों ने इस बात को अनुभव किया है । त्याग का पाठ पढ़े बिना वे च्च प्राशय बन ही नहीं सकते थे। इन लोगों के अनुसार! ?

उपयोगितावाद का भावं इस पाठ को समझना तथा इसके अनुसार कार्य करना सब गुणों की प्रारम्भिक तथा प्रावश्यक शर्त है । सुख-प्राप्ति नहीं है इनमें से पहिलाप्राक्षेप यदि कुछ वास्तविकता लिये होता तो बड़ा वजनदार होता । क्योंकि यदि सुख मनुष्यों के लिये भप्राप्य है तो सुख-प्राप्तिप्राचार या अन्य किसी सविवेक कार्य का लक्ष्य नहीं होसकती । यद्यपि ऐसी दशा में भी उप- योगितावाद की पुष्टि में थोड़ा बहुत कहा आ सकता था, क्योंकि उपयोगिता सिद्धान्त केवल की चेष्टा ही वरन कष्ट का कम करना भी है। इस कारण यदि सुख-प्राप्ति की भाशा माकाश-कुसुम पाने की आशा ही के समान होती तो भी उस समय तक के लिये, जब तक कि मनुष्य जाति जीवित रहना चाहे और प्रात्म-हत्या की शरण न ले, उप- योगितावाद को बहुत कुछ काम करना रहता और इस सिद्धांत की बहुत कुछ आवश्यकता रहती। इस बात का ज़ोर से कहना- कि मानुषिक जीवन में सुखी होना असम्भव है, यदि मनमानी बात बकना नहीं है तो भी बात को बढ़ाकर कहना अवश्य है। यदि श्रानन्द से यह मतलब है कि निरन्तर सुखप्रद मावेश रहे तो यह प्रत्यक्ष ही है कि ऐसा होना असम्भव है । बहुत अधिक हर्ष की उमंग केवल कुछ क्षण रहती है या कुछ दसानों में कुछ रुकावट के साथ कुछ घन्टे या कुछ दिन रहती है। इस बात से वे तत्वज्ञानी, जो मानन्द को जीवन का उद्देश्य बताते हैं, उतने ही परिचित ये जितने परिचित वे लोग हैं जो उनकी खुश्की उड़ाते हैं। जिस आनन्द से उनका मतलब था यह उमङ्ग में अपने आप को भूल जाने का जीवन नहीं था। उन का मतलब ऐसे जीवन से था जिस में ऐसे अवसर प्रावे + दूसरा अध्याय ४९ रहें तथा बहुत से तथा मिन्न २ प्रकार के सुखों का अनुभव। होता रहे तथा कभी कभी-सो वह भी क्षणिक-कष्ट का अनुभव हो । ऐसे मनुष्य जीवन से उस से अधिक प्रानन्द पाने के इच्छुक नहीं थे जितना कि जीवन से प्राप्त होसकता है। जिन मनुष्यों को ऐसे जीवन के उपभोग करने का सौभाग्य प्राप्त हुवा है उन्होंने सदैव ऐसे जीवन को सुखमय समझा है, और अब भी बहुत मनुष्य अपने जीवन के अधिकांश में इस प्रकार के सुख का अनुभव करते हैं । प्राधुनिक रही शिक्षा तथा दूषित सामाजिक बन्धनों ही के कारण सब मनुष्य इस प्रकार का जीवन व्यतीत करने में असमर्थ हैं। है तथा बहुत स्यात् अब विरोधी यह आक्षेप करें कि क्या मनुष्य सुख को जीवन का लक्ष्य समझते हुवे, इतने थोड़े सुख से सन्तुष्ट हो आयेंगे । किन्तु बहुत से मनुष्य इस से भी कम सुख से सन्तुष्ट रहे हैं। सन्तुष्ट जीवन के मुख्य अवयव दो मालूम पड़ते हैं-शान्ति तथा प्रावेश । कभी २ इन में से एक भी पर्याप्त हो जाता है । बहुत शान्ति होने पर मनुष्य थोड़े ही सुख से सन्तुष्ट हो जाता भावेश होने पर अधिक दुःख सह सकता है । निस्सन्देह कोई ऐसी समवायिक (Inherent) बात नहीं है जिसके कारण मनुष्य जाति के अधिकांश को इन दोनों का मिलाना असम्भव हो क्योंकि ये दोनों बातें इतनी कम प्रसङ्गत हैं कि दोनों में प्राकृतिक मेल है । इन में से एक का बढ़ाना दूसरी की तैयारी और उस की इच्छा पैदा करना है। केवल वे ही मनुष्य जिनमें प्रालस्य हद से ज्यादा बढ़ गया शान्ति के बाद भाबेश की इच्छा नहीं करते । केवल वे ही मनुष्य जिनको भावेश.की मावश्यकता का मज ही होगया है उपयोगितावाद का अर्थ भावेश के बाद की शान्ति को बद मज़ा समझते हैं, बजाय इसके कि जितना पहिले प्रावेश को सुखद समझते थे उसी के बराबर अब शान्ति को सुखद सममें । जब कि ऐसे मनुष्य जिन को देखती प्रांखों कोई दुःख नहीं होता जीवन से असन्तुष्ट हो जाते ! हैं तो इस का कारण साधारणतया यह होता है कि वे अपने अतिरिक्त किसी की परवा नहीं करते । ऐसे मनुष्यों के लिये, जिन्हें साधारणतया अपने इष्ट मित्रों और संबन्धियों से कुछ प्रेम नहीं होता है, जीवन के प्रावेश बहुत कम हो जाते हैं । न्धुं न्यूँ अपने से संबन्ध रखने वाले सब सुखों की इति श्री करने वाली मृत्यु भायु बढ़ने के कारण निकटतर होती जाती है उन्हें जीवन शुष्क मालूम देने लगता है । किन्तु वे मनुष्य जो बाद में अपने प्रेम पात्रों को छोड़ जाते हैं तथा विशेषतया वे मनुष्य, जिन की प्रकृति मनुष्य जाति के भलाई के कामों में सर्वसाधारण से सहानुभूति रखने की हो जाती है, मृत्यु के सन्निकट होनेपर भी जीवन में वैसाही प्रानन्द अनुभव करते हैं जैसाकि जवानी के जोश में तथा खूब स्वस्थ होने की दशा में अनुभव किया करते थे। स्वार्थ-प्रियता के अतिरिक्त जीवन के असन्तोषकारी प्रनीन होने का दूसरा प्रधान कारण मानसिक संस्कृति की कमी है। संस्कृत मस्तिष्क-संस्कृत मस्तिष्क से मेग मतलब तत्त्वज्ञानी के मस्तिष्क से नहीं है वरन् प्रत्येक ऐसा मस्तिष्क जिस के लिये ज्ञान-भण्डार का द्वार खुल गया है तथा जिस को उचित सीमा तक अपनी शक्तियों को काम में लाना सिखाया गया है-अपने चारों भोर के पदार्थों में अनन्त मानन्द का उद्गार अनुभव करता । ऐसे मस्तिष्क को प्राकृतिक पदार्थों, कला के कारनामों, कविता की कल्पनाओं, मनुष्य जाति के रहन सहन के ढंगों है दूसरा अध्याय MAAN में तथा मनुष्य जाति की प्राचीन तथा अर्वाचीन दशा और भविष्य प्राशामों में अनन्त प्रानन्द की सामग्री मिलती है । निस्सन्देह ऐसा होना भी संभव है कि कोई मनुष्य इन चीज़ों के प्रानन्द के सहस्रांश का भी उपभोग किये बिना ही सनकी ओर ध्यान न दे। किन्तु ऐसा होना उसही दशामें संभव है कि जब उस मनुष्य ने प्रारम्भ ही से इन चीजों में किसी प्रकार की नैतिक या मानुषिक दिलचस्पी न ली हो और उन को केवल उत्कण्ठा मिटाने की दृष्टि से देखा हो । कोई कारण नहीं मालुम पड़ता कि सभ्य देश में जन्म लेने वाले मनुष्य को इतनी मानसिक संस्कृति दाय स्वरूप में क्यों न मिले जिस से वह इन विचार- शील विषयों में यथेष्ट दिलचस्पी ले सके। कोई कारण प्रतीत नहीं होता कि क्यों कोई मनुष्य अपनेही ख्याल में मस्त रहे और अपने स्वार्थ से संबन्ध न रखने वाली किसी वस्तु की ओर ध्यान ही न दे । अब आजकल ही-अनेक शिक्षा-सम्बन्धी त्रुटियों तथा निरर्थक सामाजिक बन्धनों के रहते-अनेक मनुष्य ऐसे देखे जाते है जो सर्वसाधारण के लिये तन, मन, धन सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं तो निस्सन्देह उचित शिक्षा होने पर इस प्रकार के मनुष्यों की संख्या • बहुत कुछ बढ़ सकती है। उचित शिक्षा प्राप्त प्रत्येक मनुष्य में, कम या अधिक मात्रा में, इष्ट मित्रों के प्रति शुद्ध प्रेम तथा सार्वजनिक कार्यों की भोर रुचि का होना सम्भव है। ऐसे संसार में, जहां पर चित्तरअन के लिये इतनी अधिक सामग्री है तथा इतनी अधिक बातें सुधाग्ने तथा जनता- वस्था को पहुंचाने के लिये हैं, साधारण नैसिक तथा मानसिक विकाश प्राप्त प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को इस प्रकार व्यतीत कर सकता है कि दूसरे मनुष्यों के हृदय में उस को .

उपयोगितावाद का अर्थ देखकर उसके समान जीवन व्यतीत करने की लालसा हो । ऐसा मनुष्य, यदि निर्धनता, बीमारी, तथा प्रेम-पात्रों की बेवफाई अथवा असामयिक मृत्यु प्रभृति शारीरिक तथा मानसिक वेदना पहुंचाने वाले जीवन के वास्तविक कष्टों से बच जावे और दूषित क़ानून तथा पराधीनता उस के मार्ग में हकावट न डालें तो इस मत्सरजनक स्थिति को प्राप्त कर सकता है। इस कारण मुख्य समस्या तो यह है कि कष्टों से बचा जाय । कोई बड़ी तकदीर वाला ही इन कष्टों से बचता है। माधुनिक स्थिति में ये कष्ट दूर नहीं किये जा सकते तथा अधिकतर दशानों में उचित अंश में कम भी नहीं किये जा सकते । किन्तु कोई भी मनुष्य, जिस की सम्मति क्षण भर के लिये भी माननीय है, इस बात में सन्देह नहीं कर सकता कि संसार के बहुत से कष्ट दूर किये जा सकते हैं और यदि मनुष्य उन्नति करता रहा तो ये यष्ट अन्त में बहुत कम रह जायेंगे। कष्ट पहुंचाने वाली निर्धता को समाज की बुद्धिमानी तथा व्यक्तिगत सद्भाव बिल्कुल खो सकते हैं। सब से बड़ा दुर्भग दुश्मन रोग भी अच्छी शारीरिक तथा नैतिक शिक्षा सथा दृषिन प्रभावों के न फैलने देने से बहुत कुछ कम किया जा सकता है । विज्ञान की भविष्य उन्नति से भी इस दुर्जय दुश्मन पर विजय पाने की बहुत कुछ प्राशा होती है। जितनी विज्ञान की उन्नति होती मा रही है उतना ही अपनी असामयिक मृत्यु नथा इस से भी अधिक कष्टप्रद अपने सुख के प्राधार प्रेम-पात्रों की प्रसामयिक मृत्यु का खटका कम होता आ रहा है । अब रही बदकिस्मती तथा सांसारिक बातों में निगशाभों की बात सो उनका कारण मुख्यतया हमारी प्रदरदर्शिता, दुर्व्यवस्थित इच्छायें तथा दूषित या अपूर्ण संस्थायें हैं । संक्षेप यह कि मानुषिक कष्टों के सब बड़े २ कारण अधिकांश में और बहुत से कारण सर्वोश में प्रयत्न करने तथा सचेत रहने से दूर किये जा सकते हैं। हां ! इसमें शक नहीं कि ये कष्ट बहुत ही धीरे २ कम होंगे और इन दुश्मनों पर विजय पाने तथा संसार को आदर्श स्थिति पर लाने के लिये भनेको पीढियों को अपनी प्राहुति देनी पड़ेगी। किन्तु इस उद्देश्य की प्राप्ति के प्रयत्न ही में विवेकशील तथा उनार मनुष्यों को इतना प्रानन्द मिलेगा जिसको अपने वे किसी स्वार्थ के लिये छोड़ने को तय्यार न होंगे। अब दुमरे भाक्षेप पर विचार करना चाहिये । प्राक्षेपकारियों का कहना है कि बिना सुख के भी काम चल सकता है। निःसंदेह बिना सुख के रहा जा सकता है । हमारे भाधुनिक संसार के उन भागों में भी जहां बर्बरता सब से कम है, मनुष्य जाति का भंश विवश होकर विना सुख के जीवन व्यतीत कर रहा है । बहुधा महापुरुष या शहीद लोग किसी ऐसी चीज़ के लिये, जिसको वे अपने व्यक्तिगम सुख से प्रधिक मूल्यवान समझते हैं, जान-बूझ कर सुख को तिजाब्जलि दे देते हैं। किन्तु वह चीज़, जिसके लिये वह अपने सुख की परवा नहीं करते, दूसरों के सुख या दूमगें के सुख के किसी प्रकार के साधन के अतिरिक्त भोर क्या है ? अपनं सुख या सुख पाने के अवसरों को छोड़ देने का साहस रखना बड़ी बात है। किन्तु फिर भी यह प्रात्म-त्याग किसी उद्देश्य के लिये होना चाहिये। प्रात्म-त्याग का उद्देश्य प्रात्म-त्याग ही न होना चाहिये । यदि कहा जाय कि इम अत्म-त्याग का उद्देश्य सुख नहीं है वरन् धर्म ( Virtue ) है तो मैं प्रश्न करूंगा कि क्या उपयोगितावाद का अथ ~ on."...... महापुरुष या शहीद का इस बात में विश्वास न रखते हुवे भी, कि हमारे इस श्रात्म-त्याग से दूसरों को इस प्रकार का प्रात्म-त्याग। न करना पड़ेगा, प्रात्म-त्याग करते ? क्या महापुरुष या शहीद यह जानता हुमा प्रात्म-त्याग करता है कि उसके ऐसा करने से उसके भाइयों को कुछ फल न मिलेमा और उनका जीवन भी सुग्न का त्याग कर देने वालों के समान ही हो जायगा । उन मनुष्यों का यथासम्भव सम्मान किया जाना चाहिये या जो संसारके उपकार या संसार का सुख बढ़ाने के लिये अपने सुख को लात मार देते हैं। किन्तु ओ मनुष्य इसके अतिरिक्त और किमी उद्देश्य के लिये आत्म-त्याग करना है वह उस योगी से अधिक सम्मान का पात्र नहीं है जो प्रकारण अपने शरीर को नाना प्रकार के कष्ट देता रहता है। ऐसा मनुष्य इस बात का ज्वलन्त उदाहरण हो सकता है कि मनुष्य क्या कर सकता है किन्तु इस बात का नहीं कि मनुष्य को क्या करना चाहिये । यद्यपि संसार की प्रत्यन्त अपूर्ण या अव्यवस्थित दशा ही में मनुष्य सुख को बिल्कुल तिलाञ्जलि देकर दूसरों के सुख को बढ़ा सकता है; किन्तु जब तक भी संसार इस अपूर्ण या अव्यवस्थित दशा में है इस प्रकार के प्रात्म-त्याग के लिये तैयार रहना मनुष्य का सब से बड़ा गुगा है मे कि. उस में हो सकमा है। मैं इतना और कहूँगा कि-चाहे यह बात परस्पर विगे- धात्मक प्रतीत हो-कि संसार की इस दशा में आन बूझ कर सुख को सिलाउजलि दे देने की क्षमता से ऐसे सुख को पाने की, जो कि पाया जा सकता है, बहुन अधिक प्राशा बंधती है। क्योंकि जान बूझ कर ऐसा कर सकने के अतिरिक्त और V दूसरा अध्याय किसी प्रकार जीवन उच्च नहीं बन सकता, केवल इस ही प्रकार मनुष्य अनुभव कर सकता है कि चाहे भाग्य कितनाही. मेरे विरुद्ध क्यों न रहे, मेरे ऊपर काबू नहीं पा सकता । एक कार ऐमा ख्याल.. जमते ही जीवन के दुःखों की अत्यधिक चिन्ता काफूर हो जाती है और रोम सम्राज्य के सबसे बुरे समय में रहने वाले स्टायक अर्थात् तितिक्षावादियों के समान ऐसा मनुष्य शान्ति के साथ प्राप्य साधनों द्वाग तुष्टि प्राप्त कर लेता है। किन्तु इस बीच में उपयोगितावादियों को इस बाम की घोषणा करने से नहीं चूकना चाहिये कि प्रात्म-त्याग ( Self-devotion) पर हमारा भी उतना ही अधिकार है जितना तितिक्षावादी (Stoies) या प्रतीतात्यकों (Transcendentalists) का । उपयोगि- तात्मक प्राचार शास्त्र इस बात को मानता है कि मनुष्य दूसरों के फायदे के लिये अपने सबसे अधिक फायदे को छोड़ सकते हैं। किन्तु ऐसा प्रात्म-त्याग जो सुख के समूह (Snm total of happiness) को नहीं बढ़ाता या बढ़ाने में सहायता नहीं देता निरर्थक प्रात्म-त्याग है। उपयोगितावाद एक मात्र उस प्रात्म-त्याग की प्रशंसा करता है जो मनुष्य जाति या किसी जाति विशेष के सुख या सुख के कुछ साधनों को बढ़ाता है। मुझे इस बातको फिर दुबाग कहना चाहिये-क्योंकि उपयोगिता- वाद के विरोधी इस बात को स्वीकार करने की उदारता प्रदर्शित नहीं करते हैं कि किसी प्राचार के ठीक होने का उपयोगितात्मक प्रादर्श वह प्रसन्नता नहीं है जिस का सम्बन्ध केवल कर्ता ही से हो वरन् उन सब मनुष्यों की प्रसन्नता है जिनका कि उस बान से सम्बन्ध है। अपनी निजी प्रसन्नता तथा दूसरों की प्रसन्नता का विचार करने में उपयोगितावादी को उदासीन उपयोगितावाद का मर्य परोपकारी दृष्टा के समान न्यायशील ( Impartial ) होना चाहिये । यशूमसीह के सुवर्ण नियम में उपयोगितात्मक प्राचार शास्त्र का पूर्ण भाव मिलता है। दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करो जैसा कि तुम चाहते हो कि वे तुम्हारे साथ करें तथा अपने पडौसी को अपने ही समान प्यार करो-इम सिद्धान्त को मानने से उपयोगितात्मक प्राचार का प्रारश पूर्णता को पहुंच जाता है । इस प्रादर्श के यथा संभव निकट पहुंचने के लिये उपयोगितावाद के अनुसार प्रथम तो नियम (कानून) तथा सामाजिक व्यवस्था ( Arrangement ) इस प्रकार की होनी चाहिये कि यथा संभव व्यक्तिगत प्रसन्नता या लाभ तथा सामाजिक प्रसन्नता या लाभ में परस्पर विरोध न हो वरन् प्रत्येक का एक दूसरे के साथ सन्निकट संबन्ध हो जाय । दूसरी बात यह है कि शिक्षा और जन सम्मति, जिन का मनुष्य के आचरण पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है, प्रत्येक मनुष्य के मस्तिष्क में इस बात को जमादें कि उस के निजी सुख तथा सामाजिक सुख का प्रथक न हो सकने वाला ( Indissoluble ) संबन्ध है । विशेषतया यह बात सुमा देनी चाहिये कि किसी व्यक्ति को उन्हीं कामों को करने से वास्तविक सुख प्राप्त हो सकता है जो सामाजिक सुख को दृष्टि में रखकर ठीक या गलत निर्धारित किये गये हैं । ऐसा होने पर उस मनुष्य को यह विचार भी नहीं प्रायगा कि समाज के हित के विरोधी कार्य करने से मैं सुखी हो सकूँगा । इसके अतिरिक्त प्रत्येक मनुष्य के हृदय में इस प्रकार के भाव उठने लगेंगे कि में ऐसे काम करूं जिन से ममाज की भलाई हो । प्रत्येक काम में, जो वह करेगा, उसका यही उद्देश्य रहेगा। यदि उपयोगितावाद के विरोधी रुपयोगितावाद के इस पसनी दूसरा अध्याय Prataru स्वरूप को समझने तो फिर मैं नहीं समझता कि अन्य प्राधार पर स्थित प्राचार शास्त्र की कौनसी खूबी उन्हें उपयोगितात्मक प्राचार शास्त्र में नहीं मिलेगी। अन्य प्राचार प्रणाली (Ethical system) ही मनुष्य-प्रकृति को इससे अधिक और क्या उच्च तथा उदार बना सकती है ? उपयोगितावाद के विरोधियों पर सदेव ही यह इल्ज़ाम नहीं लगाया जा सकता कि वे इम सिद्धान्त को बुरे स्वरूप में पेश करते। हैं। जिन लोगों ने इस सिद्धान्न की उच्चता को कुछ २ ठीक तरह समझा है वे यह प्राक्षा करते हैं कि इस सिद्धान्त का आदर्श जन साधारण के लिये बहुत उच्च है । उनका कहना है कि मनुष्यों से इस बात की भाशा नहीं की जा सकती कि वे सदेव जो कुछ करेंगे जनमाधारण के हित को दृष्टि में रग्बते हुवे करेंगे। किन्तु ऐसा प्रक्षेप करना चार के प्रादर्श के अर्थ ही न समझना है। ऐसा आक्षेप करने वाले कार्य करने के नियम को उसके उद्देश्य के नियम में मिला देते हैं। प्राचार शास्त्र का उद्देश्य है कि वह हमें बताये कि हमारा क्या धर्मा क्या फ़रायज़ हैं तथा इस बात को जानने की क्या कसोटी है। किन्तु प्राचार शास्त्र का कोई क्रम यह नहीं कहता कि जो भी हम करेंगे उसका एक मात्र प्रयोजन (Motive ) धर्म या फ़र्ज (Duty) की भावना ही होगी। इसके विपरीत हम सो में से निन्यानवे अन्य और प्रयोजनों में करते हैं और ये सब काम, यदि प्रयोजन के निगम के अनुसार दूषित नहीं हैं, तो ठीक हैं । इस प्रकार ठीक अर्थ न समझ कर उपयोगितावादियों पर आक्षेप करना तो और भी अधिक अनुचित है क्योंकि सपयोगितावादियों ने अन्य प्राचार-शास्त्रियों की अपेक्षा इस बात उपयोगितावाद का अर्थ » पर अधिक जोर दिया है कि कार्य के अच्छे या प्राचारयुक्त होने का उस कार्य करने के प्रयोजन ( Motive ) से कुछ सम्बन्ध नहीं है। प्रयोजन से सो कर्धा की उच्चता या नीचता का पता चलता है। यदि कोई मनुष्य किसी डूबते हुवे मनुष्य को डूबने से बचाता है तो प्राचार-नीति की दृष्टि से उसका काम ठीक है, चाहे उसने अपना धर्म समझ कर ऐसा किया हो या इस कष्ट के बदले किसी प्रकार का पुरस्कार पाने की नियत से । जो ऐसे मित्र के साथ, जो उस में विश्वास करता है, विश्वासघात करता है वह बुरे काम का दोषी है, चाहे उसने यह काम किसी ऐसे मित्र की खातिर किया हो जिस का वह अधिक ऋणी है। किन्तु यह समझ लेना, कि उपयोगितावाद का मतलब यह है कि मनुष्य सदैव संसार या सारे समाज को दृष्टि में रक्खे, ठीक नहीं है। अधिकार काम संसार के लाभ की दृष्टि से नहीं वरन् मनुष्यों के फायदे की नियत से किये जाते हैं । संसार का लाभ भी मनुष्यों के लाभ के मिलने से ही होता है । इस कारण यह मावश्यक नहीं है कि उच्च कोटि का पुण्यात्मा मनुष्य ऐसे अव- सरों पर अपना ध्यान, उन विशेष मनुष्यों से जिन से उस के कार्य का सम्बन्ध है, हटाले । हां ! इस बात का दृढ़ निश्चय करलेना अत्यावश्यक है कि कहीं वह उन विशेष व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने में किसी अन्य व्यक्ति के अधिकार पर तो प्राघात नहीं कर रहा है। उपयोगितावाद के अनुसार सुख का बढ़ाना ही नेकी का प्रयोजन है। ऐसे अवसर जब कोई मनुष्य-हज़ार में किसी एक व्यक्ति की बात दूसरी है-बहुत आदमियों को लाभ 'पहुंचा सकता है बहुत कम होते हैं ! ऐसे अवसरों ही पर उस को एक मात्र सार्वजनिक हित का ख्याल रखना चाहिये ।

दूसरा अध्याय अन्य अवसरों पर वह व्यक्ति विशेष या कतिपय व्यक्तियों के हित का ध्यान रख सकता है । केवल उन्हीं मनुष्यों को, जिन के कार्यों का प्रभाव संसार या समाज पर पड़ता है, सार्वजनिक हित के विचार को ध्यान में रखना चाहिये। अब रहे वे काम जिन्हें प्राचारयुक्तता को ध्यान में रखते हुवे नही करना चाहिये चाहे उनका किसी विशेष दशा में अच्छा ही फल क्यों न हो । सो इन कामों के विषय में प्रत्येक विवेकशील कर्ता जान सकता है कि ये ऐसे काम हैं कि यदि साधारणतया उन्हें किया जाने लगे तो साधारणतया उनका फल बुग ही होगा । सार्वजनिक हित को ध्यान में रखने की जितनी प्रावश्यकना उपयोगितावादी बताते हैं, उतनी अावश्यकता सब ही प्राचार शास्त्री बताते हैं क्योंकि उन सब का कहना है कि ऐसे काम नहीं करने चाहिये जो देखती अांखों समाज को हानि पहुंचाते हैं। प्राचार के श्रादर्श के प्रयोजन को ठीक तौर से समझने में इससे भी अधिक भूल करने वाले तथा ठीक और राजत शब्दों के अर्थ ही न समझने वाले बहुधा यह श्राक्षेप करते हैं कि उपयोगितावाद आदमियों को महानुभूनि-शून्य बना देता है अर्थात् अन्य व्यक्तियों के प्रति मनुष्यों के नैतिक भावों को टण्डा कर देता है । इस सिद्धान्त के मानने वाले कार्यों के शुष्क परिणामों ही का ध्यान रखते हैं और उन गुणों का विचार नहीं करते जिनके कारण ये कार्य होते हैं। यदि उनके इस कथन का यह अर्थ है कि उपयोगितावादी कर्ता के किसी काम के ठीक या गलन होने का निर्णय करने में कर्ता के गुणों का कुछ ख्याल नहीं करते तो उनका यह प्राक्षेप केवल उपयोगितावाद ही पर नहीं हैं प्रत्युत प्राचार का कोई आदर्श या फसौटी (Standard) .

उपयोगितावाद का अर्थ । इन बातों मानने ही पर है क्योंकि जहां तक हमें मालूम है निस्सन्देह प्राचार शास्त्रियों का कोई भी सम्प्रदाय किसी काम को इसी कारण अच्छा या बुरा नहीं ठहराता है कि उसको किसी अच्छे या बुरे मादमी ने किया है। इस बात का कुछ भी ध्यान नहीं रखता है कि उस काम को किसी प्रेम-पात्र, वीर या परोपकारी मनुष्य ने किया है या घृणित, डरपोक या स्वार्थी मनुष्य ने का विचार तो मनुष्यों से सम्बन्ध रखता है, कामों के अच्छा या बुरा होने से नहीं । उपयोगितावाद में कोई ऐसी बात नहीं है जो हमें इस बात के मानने से रोके कि मनुष्य अपने कामों के ठीक या गलत होने ही के कारण रुचिकर या अरुचिकर नहीं होते। तितितावादी (Stoics), जिनको विरोधाभासात्मक भाषा इस्तेमाल करने की लत थी और जो इस प्रकार वे अपना ध्यान नेकी को छोड़कर और सब बातों से हटाना चाहते थे, बडे शौक से कहा करते थे कि जिस के पास नेकी है सब कुछ है । नेक मनुष्य-एकमात्र नेक मनुष्य ही-धनी है, सुन्दर है और बादशाह है। किन्तु उपयोगितावाद का सिद्धान्त नेक मनुष्यों के विषय में ऐसी कोई बात नहीं कहता । उपयोगिता- वादी खूब अच्छी तरह जानते हैं कि नेकी के अतिरिक्त और भी पदार्थ हैं जिन की प्राप्ति की मनुष्य को कामना होनी चाहिये । उपयोगितावादी इन सब पदार्थों का यथा योग्य सम्मान करने के लिये बिल्कुल राज़ी हैं। वे जानते हैं कि ठीक काम करने वाले मनुष्य का नेक होना आवश्यक नहीं है तथा अन्य प्रशंसनीय गुण होने की वजह से भी मनुष्य बहुधा निर्दोष काम करते हैं। जब उपयोगितावादी इस बात का कोई उदाहरण देखते हैं तो इससे कर्ता संबन्धी निर्णय में हेर फेर कर लेते हैं दूसरा मध्याच *- किन्तु निस्सन्देह काम के ठीक या गलत होने के विचार में कुछ परिवर्तन नहीं करते । मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि इन सब बातों के होते हुवे भी उपयोगितावादियों का विचार है कि अन्त में किसी मनुष्य के सदाचारी होने का सबसे अच्छा प्रमाण उसके अच्छे काम हैं। वे ऐसे भादमी को अच्छा मानने से बिल्कुल इन्कार कर देते हैं जिसकी मानसिक वृत्ति अधिकतर बुरे कामों की ओर है । इस कारण बहुत से मनुष्य उपयोगितावादियों से रुष्ट हो जाते हैं। किन्तु जो कोई भी ठीक और गलत जांचने की कड़ी कसौटी रक्खेगा उसे बहुत से मनुष्यों की रुष्टता को सहन करना ही पड़ेगा। इसलिये उपयोगितावादी को इस प्रकार बुरे भले कहे जाने की परवा भी नहीं करनी चाहिये। यदि माक्षेप यही प्राशय हो कि बहुत उपयोगितावादी एकमात्र उपयोगिता की कसौटी पर कस कर ही किसी कार्य की प्राचार युक्तता का निर्णय करते हैं तथा चरित्र की दूसरी खूबियों पर-जिनके कारण मनुष्य प्रेम किया जाता है या प्रशंसा पाता है-काफी जोर नहीं देते तो यह बात मानी जा सकती है। वे उपयोगितावादी, जिनकी नैतिक भाव- नाओं का विकाश हो गया है किन्तु सहानुभूति तथा सौन्दर्य-विवेक- शक्ति ( Artistic Perceptions) अपरिपक्वावस्था में हैं, इस प्रकारकी भूल करते हैं। ऐसी परिस्थिति में अन्य भाचार-शास्त्री भी ऐसी ही भूल का शिकार होते हैं। जो बातें अन्य प्राचार शास्त्रियों के बचाव में कही जा सकती हैं वे ही बातें इस प्रकार के उपयोगितावादियों के बचाव में भी कही जा सकती हैं। यदि भूल है तो प्राचार शास्त्र के सपही सम्प्रदायों में है। वास्तविक का केवल से उपयोगितावाद का अर्थ बात तो यह है कि अन्य सम्प्रदायों के अनुगामियों के समान उपयोगितावादियों में भी ठीक ग़लत की कसौटी को काम में से बहुन अधिक सख्त हैं तथा बहुत अधिक नर्म हैं। लाने में बहुत से बहुत उपयोगितात्मक प्राचार शास्त्र पर किये गये दो चार अन्य छोटे मोटे आक्षेपों की भी इस स्थान पर विवेचना करना अनुचितन होगा। इस प्रकार के प्राक्षेप करनेवाले उपयोगितावाद के ठीक अर्थ बिल्कुल नहीं समझे हैं । बहुधा सुनने में श्राता है कि उपयोगितावाद का सिद्धान्त नास्तिकता को लिये हुवे है। यदि इस प्रकार की कल्पना के विरुद्ध कुछ कहना आवश्यक है तो हम कहेंगे कि प्रश्न का उत्तर इस बात पर मुनहसिर है कि ईश्वर के गुणों के विषय में हमाग क्या विचार है। यदि यह विश्वास ठीक है कि ईश्वर की सबसे बड़ी इच्छा यह है कि उसके बनाये प्राणी सुखी रहें तथा इसी प्रयोजन से उसने सृष्टि की रचना की है तो उपयोगितावाद का सिद्धान्त केवल नास्तिकता को लिये हुवे ही नही हैं वरन् सब सिद्धान्तों से अधिक धार्मिक है । यदि प्रक्षेप का यह मतलब हो कि उपयोगितावाद ईश्वरादिष्ट धर्म या श्रौत-धर्म को श्राचारों का सबसे बड़ा नियम नहीं मानता तो मैं इसका उत्तर दूंगा कि जो उपयोगितावादी ईश्वर की नेकी और बुद्धिमता में विश्वास रखता है इस बात में भी अवश्य विश्व स रखता है कि ईश्वर ने प्राचारों के संबन्ध जो कुछ बताना उचित समझा है वह बहुत अंश में उपयोगिता की आवश्यकताओं को पूरा करने वाला होना चाहिये । किन्तु उम्पोगिनावादियों के प्रति. रिक्त अन्य बहुत से मनुष्यों की सम्मति है कि ईमाई धर्म भेजने से ईश्वर का आशय था कि मनुष्यों के रुद्रय और मस्तिष्क में दूसरा अध्याय Arrrrrr ऐसे भाव पैदा हो जाये कि स्वयं सत्य को मालूम करने तथा तदुपरान्त उसके अनुसार कार्य करने का प्रयत्न करें। साधारण-.. तया बता देने के अतिरिक्त ईश्वर ने पूर्ण रूप से यह बताना उचित नहीं समझा है कि क्या २ ठीक है । इस काग्गा हमको एक ऐसे सिद्धान्त की श्रावश्यकता है जो हमको बतलावे कि ईश्वर की इच्छा यह है । इस सम्मति पर-चाहे ठीक हो या गलत-यहां विचार करना व्यर्थ है क्योंकि यह समस्या-कि आचार-शास्त्र के नियम निर्धारित करने में प्राकृतिक अथवा श्रोत-धर्म से कहां तक सहायता लेनी चाहिये-प्राचार-शास्त्र के सब ही सम्प्रदाय वालों के लिये है। बहुन से प्रादमी उपयोगितावाद को सुसाधकता या मरूहन ( Expediency ) का नाम देकर ही दुराचारी सिद्धान्त होने का लाञ्छन लगा देते हैं। साधारणतया मस्लहत शब्द 'सिद्धान्त के विपरीत' अर्थ में व्यवहृत होता है । ये लोग इस साधारण अर्थ से लाभ उठाने का प्रयत्न करते हैं। किन्तु जब मस्तहत शब्द उचित या ठीक (Right) के विपरीत अर्थ में प्रयुक्त होता है तो साधारणतया मस्लहत शब्द से उस कार्य का मतलब होता है जो कर्ता ही के लिये विशेष लाभकारी हो । किन्तु जब मस्लहत शब्द इससे अच्छे अर्थ में प्रयुक्त होता है तो मस्लहत शब्द से मतलब होता है कि वह काम जो तत्कालिक उद्देश्य या क्षणिक प्रयोजन के लिये अच्छा हो किन्तु उसके करने से किसी ऐसे नियम का उल्लंघन होता है जिमका उल्लंघन न करना ही अधिक मस्लहत की बात है । इस अर्थ में मम्लहत शब्द उपयोगी शब्द का समानार्थी होने के स्थान में हानिकारक होने के माने रखता है। ।

६४ उपयोगितावाद का मर्य उदाहरणतः कभी २ झूठ बोलने से हम किसी क्षणिक मंझट से बच सकते हैं या किसी ऐसे उद्देश्य की सिद्धि कर सकते हैं जो हमारे लिये या दूसरों के लिये लाभकारी हो । किन्तु सत्यादिता की बान डालना हमारे लिये बहुत उपयोगी है तथा सत्यशीलता की प्रादत को कमज़ोर करना हमारे लिये बहुत हानिप्रद है क्योंकि सत्य के पथ से डिगना -चाहे भूल से ही हो-मनुष्यों के बचन की विश्वसनीयता को बहुन कुछ कम करता है और मनुष्यों के बचन की विश्वसनीयता पर ही सारी प्राधुनिक सामाजिक सुव्यवस्था का प्राधार है तथा मनुष्यों के कथन की विश्वसनीयता पर विश्वास न रहने से सभ्यता की बढ़ती या प्रसार में सब से अधिक रुकावट पड़ती है । इस कारण क्षणिक लाभ के लिये इस सर्वातीत या बहुत अधिक मस्लहत के नियम को तोड़ना मस्तहत नहीं है । जो मनुष्य अपने या किसी दूसरे मनुष्य की सुविधा के लिये ऐसा करता है समाज को हानि पहुंचाता है क्योंकि सामाजिक कार ब्यवहार एक दूसरे के बचन को विश्वसनीय मानकर ही चलते हैं। इस कारण ऐसे मनुष्य की गणना समाज के सबसे बड़े दुश्मनों में होनी चाहिये । किन्तु सत्य पर भारुढ़ रहने के इतने महत्वपूर्ण तथा पवित्र नियम का कहीं२ अपवाद (Exception) भी होता है। इस बात को सब सम्प्रदाय के प्राचार शास्त्रियों ने मानाहै । विशेष अपवाद उस समय के लिये है जब कि किसी बात को छिपाने से (जैसे किसी ज्ञात सूचना को मुजरिम से छिपाने से या किसी बुरी सूचना को किसी बहुत ज्यादा बीमार प्रादमी के छिपाने से.) किसी मनुष्य की (विशेषतया अपने से अतिरिक्त किसी और व्यक्ति की ) बहुत बड़ी बना टन माय । ऐसी दशा में

दूसरा अध्याय
यदि सत्य को छिपाने अर्थात् झूठ बोलने से ही काम चल
सकता हो तो ऐसा किया जा सकता है। किन्तु फिर भी ऐसे
अपवाद की सीमायें निर्धारित कर देना चाहिये जिससे बिना
आवश्यकता के ही लोग अपवाद की शरण न लेने लम और
एक दूसरे के कथन को अविश्वसनीय न समझाने लगे । यदि
उपयोगितावाद का सिद्धान्त कुछ भी उपयोगी है तो यह
सिद्धान्त इस काम के लिये उपयोगी होना चाहिये कि दो
उपयोगितामों में संघर्ष उपस्थित होने पर दोनों की तुलना
करके इस बात का निर्णय कर सके कि अमुक स्थान पर अमुक
उपयोगिता उच्च स्थान की प्राधिकारी है तथा अमुक स्थान
पर अमुक।
उपयोगितावादियों को बहुधा इस प्रकार के प्राशेपों का
भी उत्तर देना पड़ता है कि काम करने से पहिले हमको इतना
समय नहीं मिलता कि हम इस बात को सोच सकें कि इस
कार्य का जनसाधारण के सुख पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यह
माक्षेप तो ऐसा है कि जैसे कोई कहे कि ईसाई मत के अनु-
सार कार्य करना असम्भव है क्योंकि प्रत्येक अवसर पर अब
कुछ काम करना हो पुराने तथा नये टैस्टैमैन्ट ( Testament)
को पढ़ने का समय नहीं मिल सकता । इस पाप का उत्तर
यह है कि यथेष्ट समय मिल चुका है। मनुष्य जाति अब सक
इस विषय पर विचार करती आई है। बहुत दिनों से मनुष्य
जाति इस बात का सजुरबा करती आई है कि कौन २ से कार्य
का कैसा २ परिणाम होता है तथा क्या प्रभाव पड़ता है । गत
समय के तजुरबे के आधार पर ही कार्यों की प्राचारयुक्तता
निर्धारित की गई है। प्राक्षेप करने वाले इस प्रकार की बातें

उपयोगितावाद का अर्थ कहते हैं जिन से सूचित होता है कि मानो भभी मनुष्य को पहिले अनुभवों का कुछ पता ही नहीं है और जब किसी मनुष्य का जी हत्या या चोरी करने के लिये ललचाता है तो यह पहिले पहिल सोचना प्रारम्भ करता है कि क्या हत्या तथा चोरी सामाजिक सुख में बाधा डालने वाली हैं। यह बात तो शेखचिल्लियों की सी कल्पना मालूम पड़ती है कि यदि मनु य जाने उपयोगिता को प्राचारयुक्तमा निर्धारित करने की कसौटी मान भी ले तो भी इस बात का कोई निश्चय नहीं हो सकेगा कि कौनसा काम उपयोगी है और इस कारण समाज युवकों को इस विषय पर निर्धारित विचारों की शिक्षा देने तथा कानून द्वारा नियमों का पालन कराने की चेष्टा नहीं करेगी । मनुष्य जाति को विवेक-हीन मान लेने की दशा में तो हम आसानी से प्रमाणित कर सकते हैं कि किसी भी प्राचारयुक्तता परखने की कसौटी से काम नहीं चलेगा। किन्तु मनुष्य जाति को कुछ भी विवेकशील मानने की दशा में हमको यह बात माननी पड़ेगी कि मनुष्य जाति ने अब तक के अनुभव से जान लिया है कि कौन २ से कार्य का क्या २ परिणाम तथा प्रभाव होता । गत अनुभवों के आधार पर जो विश्वास चले आते हैं वे ही सर्व साधारण के लिये श्राचार शास्त्र के नियम है। तत्त्वज्ञानियों को भी, जब तक कि वे कोई अधिक अच्छे नियम उपस्थित न कर सकें, इन विश्वासों को प्राचार-शास्त्र के नियम मानना पड़ेगा । मैं इस बात को मानता हूं या यों कहना चाहिये कि मेरा हार्दिक विश्वास है कि तत्वज्ञानी लोग बहुत से विषयों के संबन्ध में आसानी से अधिक अच्छे नियम उपस्थित कर सकते हैं । माधुनिक प्राचार-शास्त्र के नियम ईश्वर-प्रणीत नहीं हैं।

दूसरा अध्याय है अभी मनुष्य जाति को इस सम्बन्ध में बहुत कुछ सीखना है कि हमारे कामों का सामाजिक सुख पर क्या प्रभाव पड़ता प्रत्येक प्रक्रियात्मक कला के समान उपयोगितावाद के उपसिद्धान्तों में अभी बहुत कुछ सुधार हो सकता है और ज्यूँ २ मनुष्य उन्नति करता जारहा है बराबर सुधार हो रहा है । किन्तु भाचार शास्त्र के नियमों में सुधार के लिये स्थान मानना और बात है तथा पिछले अनुभव को बिल्कुल विस्मरण कर देना तथा प्रत्येक व्यक्तिगत कार्य को मूल सिद्धान्त की कसौटी पर कसना दूसरी बात है। किसी बटोही को उसके निर्दिष्ट स्थान की सूचना देने के यह माने नहीं हैं कि उस को मार्ग में पड़ने वाले दूरी तथा स्थान सुचक खम्भों से सहायता लेने के लिये निषेध कर दिया है। प्रसन्नता प्राचार शास्त्र का अन्तिम लक्ष्य तथा उद्देश्य इस सिद्धान्त को उपस्थित करने के यह अर्थ नहीं हैं कि उस लक्ष्य पर पहुंचने के लिये कोई मार्ग निर्धारित नहीं करना चाहिये तथा उस लक्ष्य की ओर जाने वाले मनुष्यों को यह न. बताया जाय कि अमुक दशा के स्थान में प्रमुक दशा से जाना उचित है। इस विषय पर लोगों को ऊपपटांग बातें कहना या सुनना नहीं चाहिये । कोई आदमी यह नहीं कहता कि मल्लाह लोग नाविक पञ्चाङ्ग (Nautical Alamanak) की गणना करने के लिये नहीं ठहर सकते, इस कारण सामु- द्रिक विद्या का प्राधार गणित ज्योतिष (Astronomy) नहीं है । विवेक-शील प्राणी होने के कारण मल्लाह लोग पहिले ही से सामुद्रिक पञ्चाङ्ग की गणना करके समुद्र पर जाते हैं। सारे विवेकशील प्राणी ठीक या बे ठीक सम्बन्धी साधारण प्रश्रों पर अपने विचार निश्चित करके जीवनरूपी समुद्र में उत्तरते हैं। अब तक दूरदर्शिता प्रशंसनीय मानी जाती रहेगी, उपयोगितावाद का अर्थ ऐसा ही होता रहेगा । हम प्राचार शास्त्र का चाहे कोई मूल सिद्धान्त मान लें हमें उसके अनुसार कार्य करने के लिये गौण सिद्धान्तों की भी आवश्यकता पडेगी । किसी विशेष सम्प्रदाय पर गौण सिद्धान्त मानने के लिये विवश होने का इल्ज़ाम नहीं लगाया जा सकता क्योंकि सब सम्प्रदायवाला ही को ऐसा करना पड़ता है। किन्तु यह कहना कि ऐसे गौण सिद्धान्त स्थिर नहीं किये जा सकते तथा मनुष्य जाति मानुषिक जीवन के अनुभव से अब तक कतिपय साधारण परिणामों पर नहीं पहुंची है और न कभी पहुंचेगी नितान्त मुर्खता है। उपयोगितावाद के विरुद्ध शेष आक्षेपों में-जो बहुधा किये जाते हैं-अधिकतर मानुषिक प्रकृति की कमजोरियों का इल्ज़ाम उपयोगितावाद के माथे थोपा जाता है तथा कहा जाता है कि विवेकशील मनुष्यों को अपने जीवन का मार्ग स्थिर करने में बड़ी कठिनाइयां पड़ेगी। आक्षेप किया जाता है कि उपयोगिता- वादी मनुष्य अपने आप को नैतिक नियमों का अपवाद मान लेगा तथा प्रलोभन मिलने पर नियम को मानने की अपेक्षा उसका उल्लङ्घन करना उपयोगी समझेगा । किन्तु क्या उपयोगितावाद ही ऐसा मत है जिसका अनुयायीं होने से हमको दूषित कार्य करने का बहाना मिल सकता है और हम अपने अन्तःकरण को धोखा दे सकते हैं ? सब सिद्धान्त इस बान को मानते हैं कि याचार शास्त्र में परस्पर विरोधात्मक पग्भिावनाएं (Considerations) उपस्थित होती हैं अर्थात् यह निश्चय करना कठिन हो जाता है कि कौनसी बात प्राचार- युक्त है । यह किसी मन विशेष की त्रुटि नहीं है । इसका कारण मानुषिक कार्यों की जटिलता है जिसके कारण श्राचार के अपवाद रहित नियम नहीं बनाये जा सकते । किसी भी दूसरा अध्याय कार्य को सदैव के लिये अच्छा या बुरा बताना कठिन है । प्राचारशास्त्रियों का कोई सा भी ऐसा सम्प्रदाय नहीं है जो कर्ता की नैतिक उत्तरदातृता या जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुवे असाधारण परिस्थितियों के लिये अपने नियमों को ढीला नहीं कर देता है। इस कारण नियमों को ढीला करने की वजह से प्रत्येक मत में आत्म-बचना तथा बेईमानी की तर्क- प्रणवता घुस बैठती है। ये वास्तविक कठिनाइयां हैं। प्राचार शास्त्र की कल्पना में तथा अन्त:करण के प्रादेशानुसार अपने चरित्र को बनाने के मार्ग में ये कठिन समस्याये हैं। व्यवहार में कर्ता अपनी बुद्धि तथा दृढ़चरित्रता की न्यूनाधिकता के कारण इन कठिनाइयों को थेड़ा या बहुत दूर कर सकता है। किन्तु विरोधात्मक अधिकारों तथा कर्तव्यों का निर्णय करने के लिये अन्तिम कसौटी उपस्थित करने की दशा में उपयोगि- तावाद को क्रम उपयोगी किस प्रकार ठहगया जा सकता है ? यदि किसी कार्य की प्राचाग्युक्तता का अन्तिम प्रमाण उस कार्य की उपयोगिता है तो दो कर्तव्यों में परस्पा-विरोधात्मक होने की दशा में उपयोगिता की कसौटी पर कस कर ही इस झगड़े को निपटाना चाहिये । यद्यपि इस आदर्श या कसोटी को काम में लाना कठिन है, फिर भी कोई भी प्रादर्श या कसौटी न होने से तो किसी प्रादर्श या कसौटी का होना ही अधिक अच्छा है। अन्य सम्प्रदायों में प्राचार-शास्त्र के नियम स्वतः प्रमाण हैं । इस कारण विवाद उपस्थित होजाने की दशा में कोई मध्यस्थ नहीं है । वाक्चतुरता (Sophistry) ही से झगड़ा निपटाया जाता । हमको याद रखना चाहिये कि गौगा सिद्धान्तों में विरोध उपस्थित होने पर मूल सिद्धान्तों के अनुसार निर्णय करना ही आवश्यक है है

TAPAINA
तीसरा अध्याय ।
उपयोगितावाद के सिद्धान्त की सनद ।
हुधा यह प्रश्न किया जाता है कि उपयो-
गितावाद के सिद्धान्त की सनद क्या है ?
ब
किन प्रयोजनों से हम इस सिद्धान्त को
माने ? या हम इस सिद्धान्त को किस
कारण मानने के लिये बाधित हों ? अर्थात
इस सिद्धान्त का मूल आधार क्या है ?
किसी नैतिक या श्राचार विषयक प्रादर्श या कसौटी के संबन्ध
में ऐमा प्रश्न करना ठीक भी है। इस प्रश्न का उत्तर देना नैतिक
दर्शन शास्त्र का प्रावश्यक अङ्ग है। किन्तु यह प्रश्न कभी २
उपयोगितावाद के विरुद्ध श्राक्षेप के रूप में किया जाता है
मानो इस सिद्धान्त के सम्बन्ध ही में ऐसा प्रश्न हो सकता है
वास्तव में सब प्रादर्शी तथा कसौदियों के सम्बन्ध में ऐसा प्रश्न

तीसरा अध्याय ७१ AAP उठता है। उपयोगितावाद ही के विषय में ऐसा प्रश्न उठाने का कारण यह है कि जब किसी आदमी से कहा जाता है कि वह किसी चीज़ को श्राचार शास्त्र का श्राधार माने जिसको मानने का वह श्रादी नहीं है, अर्थात् जिस बात को अब तक वह आधार मानता हुश्रा नहीं आया है, तो वह पहले पहल घबराता है क्योंकि प्राचार शास्त्र की वे बातें जो उसकी शिक्षा के कारण तथा दूसरे लोगों की देखा-देखी उसके दिल में बैठ गई हैं उसको स्वत: सिद्ध मालूम पड़ती हैं । जब उससे किसी ऐसे सर्वव्यापक सिद्धान्त को मानने के लिये कहा जाता है जिस पर प्रचलिन रस्म-रिवाज़ ( Custom ) की वैसी मौहर नहीं लगी हुई है तो उसको ऐसे सिद्धान्त में विरोधाभास प्रतीत होता है । मूल सिद्धान्त की अपेक्षा कल्पित उप सिद्धान्तों को अनुकरणीय मानने की ओर अधिक प्रवृत्ति होती है । ऐसा मालूम पड़ता है कि ऊपरी इमारत नीव के आधार पर खडी रहने की अपेक्षा बिना नीव के ही अधिक अच्छी तरह खड़ी रह सकती है। वह अपने दिल में कहता है कि किसी की हत्या न करने या किसी का माल न लूटने तथा विश्वासघात न करने या धोखा न देने के लिये तो मैं बाधित हूं किन्तु सार्वजनिक प्रसन्नता या सुख बढ़ाने के लिये मैं क्यों वाधित हूं ? यदि किसी बात में मेरा हित है तो मैं सार्वजनिक हित की अपेक्षा अपने ही हित को क्यों न अधिक अच्छा समझू ? यदि प्राचार विषयक भावना ( Moral Sense ) के सम्बन्ध में उपयोगितावाद की कल्पना ठीक है तो इस प्रकार की कठिनाई उस समय तक सदैव उपस्थित होती रहेगी जब तक कि वे प्रभाव-जिन से चरित्र बनता है-मूल सिद्धान्त पर भी उतना ही ज़ोर न देने लगेंगे जितना ज़ोर मूल सिद्धान्त के उपयोगितावाद के सिद्धारत की समद कतिपय परिणामों पर देते हैं तथा जब तक शिक्षा के सुधार से इम अपने भाइयों के साथ एकता के सूत्र में न बँध जायेंगे अर्थात् उनके सुख दुःख को अपना सुख दुःख न समझने लगेंगे तथा जिस प्रकार साधारण युवक जुर्म के भय से कांपता है उसी प्रकार अपने समान सर्व प्राणयों को समझना (प्रात्मवत् सर्वभूतेषु) हमारी भादत ही में दाखिल न हो जायगा । किन्तु ऐसी दशा को प्राप्त होने से पहिले उपरोक्त कठिनाई उपयोगिता के सिद्धान्त पर ही विशेष रूप से लागू नहीं होती है। जब कभी भी हम श्राचार विषयक कार्यों का विश्लषण करके उनको सिद्धान्तों का रूप देने का प्रयत्न करेंगे, यह कठिनाई उस समय तक सदैव उपस्थित रहेगी जब नक कि मनुष्यों का मस्तिष्क मूल सिद्धान्त को भी मूल सिद्धान्त के उपयोगों ( Applications ) के समान ही प्रमाणिक न मानने जगेगा। उपयोगितावादी भी अपने सिद्धान्त की प्रमाणिकता के सम्बन्ध में प्राचार-शास्त्र के अन्य सम्प्रदाय वालों के बराबर ही सनद ( Sanctions ) दे सकते हैं। ये सनद या तो बाह्य हैं या श्रान्तरिक । बाह्य सनदों के सम्बन्ध में यहां पर अधिक विस्तार से लिखना आवश्यक नहीं है। ये बाह्य मनद ये हैं- अपने भाइयों या ईश्वर को प्रसन्न करने की प्राशा तथा उनकी माराज़गी का डर तथा अपने भाइयों के प्रति न्यूनाधिक अंश में प्रेम और सहानुभूति तथा न्यूनाधिक अंश में ईश्वर का प्रेम और डर जिसके कारण हम अपने स्वार्थ का विचार छोड़ कर ईश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करने की भोर प्राकर्षित होते हैं। प्रत्यक्ष में कोई कारण नहीं मालूम कि अन्य प्रकार के प्राचार शास्त्रों के समान उपयोगितात्मक भाचार । - तीसरा अध्याय NAA । शास्त्र का पालन करने में भी उपरोक्त प्रयोजन उतने ही पूर्ण रूप से तथा उतने ही ज़ोर से प्रवृत्त न करें। निस्सन्देह अपने भाइयों के प्रति प्रेम तथा सहानुभूति के भाव मानसिक विकाश के अनुसार कम या अधिक होंगे । नैतिक कर्तव्य निर्धारित करने की सार्वजनिक सुख के अतिरिक्त चाहे और कोई कसौटी हो या न हो, किन्तु यह बात निम्सन्दिग्ध है कि मनुष्य सुख चाहते हैं । सुख के पाने के लिये मनुष्य स्वयं चाहे कैसे ही काम क्यों न करते हों, किन्तु वे चाहते हैं कि दूसरे उनके साथ ऐसा व्यवहार करें जिससे उनके विचागनुसार उनके सुख की बढ़ती होती हो। दूसरों के ऐसे ही कामों की वे प्रशंसा करते हैं । अब शर्मिक उद्देश्य को लीजिये । यदि मनुष्यों को ईश्वर की नेकी में विश्वास है जैसा कि बहुत से मनुष्य प्रगट करते हैं तो उम मनुष्य को, जो सार्वजनिक सुख को कर्तव्य निर्धारित करके की एकमात्र कसौटी मानता है, इस बात में भी विश्वास करना होगा कि कर्तव्य ऐसा काम होना चाहिये जिसको ईश्वर पसन्द करता है । इस कारण पुरस्कार की प्राशा तथा दण्ड का भय-चाहे शारीरिक चाहे नैतिक तथा चाहे ईश्वर की ओर से चाहे अपने भाइयों की ओर से--ये सब बाने तथा साथ में बिना मतलब के दुमरों के प्रति प्रेम नथा सहानुभूति के न्यूना- धिक भाव-जितने मनुष्य प्रकृति में होने सम्भव हों-हमको इस सिद्धान्त के अनुसार कार्य करने के लिये विवश करेंगे। शिक्षा तथा साधारण संस्कृति (Cultivation) ज्यूं २ इन उद्देश्यों की ओर अधिक झुकाती जायेंगी, ये सब कारण और भी अधिक ज़ोर से काम करने लगेंगे। ये तो वाह्य कारण हुवे जो हम को इस सिद्धान्त के अनुसार कार्य करने के लिये विवश करते हैं। अब भान्तरिक कारण उपयोगितावाद के सिद्धान्त की सनद लीजिये । चाहे हमारा कर्तव्य ( Duty ) का कुछ भी प्रादर्श या कसौटी क्यों न हो प्रान्तरिक कारण सदैव एक ही है। वह प्रान्तरिक कारण यह है कि हमारे ही मस्तिष्क में एक प्रकार की भावना है। कर्तव्य-पथ से विचलित होने पर कम या अधिक कष्ट होता है। उचित विकाश-प्राप्त तथा सदा- चारी मनुष्यों में यह भावना इतनी प्रबल होती है कि विशेष दशाओं में उनको कर्तव्य-पथ से विचलित होना असम्भव हो जाता है । यह भावना ही, जब स्वार्थ भाव से रहित होकर अर्थात् निष्कामरूप से कर्तव्य का विचार करती है, अन्त:करण का सार है। निस्सन्देह अन्त:करण की बनावट बड़ी पेचीदा है । सहानुभूति, प्रेम, भय, धार्मिक विचार, बचपन तथा बीते हुबे जीवन की याद, प्रात्म-सम्मान, दूसरों का मान करने की इच्छा और कभी कभी प्रात्म-पतन ( Selfabasement ) भी-इन सब बातों का प्रभाव अन्त:करण पर पड़ता है। अन्तःकरण कैसे बना है ? -यह प्रश्न बड़ा जटिल है। किन्तु इस विषय में हमारे चाहे कुछ भी विचार क्यों न हो यह बात निर्विवाद है कि अन्त:करण ऐसे कामों को करने से, जो हमारे उस प्रादश के जिसको हमने ठीक मान रक्खा है विरुद्ध हैं. रोकता है तथा अन्तःकरण की बात न मानने से एक प्रकार की वेदना होती है। इस कारण सारे सदाचारों की (Sanction) बाह्य प्रयोजनों को छोड़कर हमारे ही मस्तिष्क की एक श्रात्मगत ( Subjective) भावना है। जिन लोगों का प्रादर्श उपयोगिता है उनको इस प्रश्न का उत्तर देने में, कि इस सिद्धान्त की सनद क्या है, किसी प्रकार की अड़चन नहीं होनी चाहिये । हम उत्तर दे सकते हैं---मनुष्य जाति की अन्तिम सनद

तीसरा अध्याय
।
सद्सद्विवेकिनी भावनायें । निस्सन्देह इस सनद से वे
मनुष्य उपयोगितावाद को मानने के लिये वाधित नहीं किये जा
सकते जिनमें इस प्रकार की भावनाएं नहीं हैं जिनको यह
सिद्धान्त उत्तेजित करता है। किन्तु ऐसे आदमी तो अन्य
किसी नैतिक सिद्धान्त के भी उपयोगितावाद के सिद्धान्त से
अधिक आज्ञाकारी नहीं होंगे। ऐसे लोग तो वाह्य कारणों से
ही किसी कार्य की प्राचारयुक्तता मान सकते हैं। किन्तु यह
बात निस्सन्दिग्ध है कि इस प्रकार की भावनाएं मनुष्यों में हैं।
अनुभव अर्थात् नजुरबा इस बात को प्रमाणित करता है कि
ऐसी भावनाएं हैं तथा उन मनुष्यों पर, जिनमें
इस प्रकार की
भावनाओं का उचित रीति से विकाश किया गया है, प्रभाव
डालती है। कभी इस बात का कोई कारण नहीं बतलाया गया
है कि ये भावनाएं अर्थात अन्तगत्मा इस प्रकार विकसित क्यों
नहीं की जासकती कि जिनसे अन्य प्राचार विषयक नियमों
के समान उपयोगितावाद के
अनुसार
कार्य करने के लिये भी
समान शक्ति से उत्तेजित करे ।
मुझे मालूम है कि कुछ लोगों का ऐसा विश्वास है कि
ऐसे मनुष्य, जो प्राचाग्युक्तता का प्राधार किसी इन्द्रियातीत
( Transcendental ) बात को मानते हैं अर्थात् इस ही कारण
से किसी कार्य को करना ठीक समझते हैं क्योंकि वह ठीक है,
अपनी अन्तगत्मा ही को प्रमाणिकता का श्राधार मानने वाले
मनुष्यों की अपेक्षा अपने पक्ष से कम विचलित होंगे। किन्तु
अध्यात्म-शास्त्र की इस समस्या के संबन्ध में किसी मनुष्य
की कोई सम्मति क्यों न हो, वह शक्ति जो वास्तव में मनुष्य
को कार्य करने के लिये उत्तेजित करती है उस ही की

उपयोगितावाद के सिद्धान्त की सनद आत्मगत भावना है। किसी मनुष्य का कर्तव्य के अनात्म सम्बन्धी (Objective) होने में ईश्वर के अनात्म-सम्बन्धी होने से अधिक विश्वास नहीं है। किन्तु फिर भी ईश्वर के विश्वास का-पुरस्कार की प्राशा तथा दण्ड के भय की बात छोड़ कर-चरित्र पर आत्मगत धार्मिक भावनाओं के द्वारा तथा उन्हीं के अनुसार प्रभाव पड़ता है। स्वार्थ-भाव से रहित होने की दशा में प्रमाणिकता का विचार बगबर मस्तिष्क में बना रहता है। किन्तु इन्द्रियातीत प्राचार-शास्त्रियों का ख्याल है कि यदि हम इस प्रमाणिकता का प्राधार मस्तिष्क से बाहर नहीं मानेगे तो यह प्रमाणिकता कायम नहीं रहेगी । यदि कोई मनुष्य अपने दिल में कहने लगे कि जो चीज़ मुझे रोक रही है तथा जिसे मैं अपना अन्त:करण कहता हूं मेरे ही मस्तिष्क की भावना मात्र है तो यह नतीजा निकाल सकता है कि जब यह भावना नष्ट हो जायगी तो मैं उसके अनुसार कार्य करने के लिये वाध्य नहीं रहूंगा । इस कारण ऐसा मनुष्य अन्तगत्मा की उपेक्षा करने तथा उससे छुटकाग पाने का प्रयत्न करेगा। किन्तु क्या यह खतरा उपयोगितावाद तक ही संकुचित है। क्या नैतिक फ़र्ज़ या कर्तव्य का प्राधार मस्तिष्क से बाहर मान लेने के विश्वास से ही हमारी एतद् सम्बन्धी भावना इतनी दृढ़ हो जायगी कि फिर हम उससे छुटकारा न पा सकेंगे । किन्तु यह बात नहीं है। सारे भाचार-शास्त्री इस बात को मानते हैं तथा इस बात पर खेद प्रगट करते हैं कि अधिकतर मनुष्य बहुत आसानी से अपने अन्तःकरण को चुप कर सकते हैं । उपयोगितावाद को मानने वालों के समान वे मनुष्य भी, जिन्हों ने कभी उपयोगितावाद के विषय में कुछ नहीं सुना है, ऐसा तीसरा अध्याय nin बहुधा प्रश्न करते हैं, " क्या मुझे अपनी अन्तरात्मा का प्रादेश मानना चाहिये ?" यदि वे मनुष्य भी, जिनकी अन्तगत्मा इतनी कमज़ोर पड़ गई है कि ऐसा प्रश्न उठाते हैं, इस प्रश्न का उत्तर 'हो' में देते हैं और अपने कर्तव्य का पालन करते हैं तो इसका कारण उनका इन्द्रियातीत सिद्धान्त (Transcendental Theory ) में निश्वास नहीं है वरन् इसकी वजह यह है कि वे वाह्य कारणों से जिनका विवेचन किया जा चुका है करना ठीक समझते हैं। इस समय इस बात का निर्णय करना आवश्यक नहीं है कि कर्तव्य की भावना नैसर्गिक है या कृत्रिम । नैसर्गिक भानने की दशा में प्रश्न उठता है कि कुदरती तौर से इस भावना का सम्बन्ध किन किन बातों से है ? नैसर्गिक मानने वाले तत्त्वज्ञानी इस विषय पर एकमत हैं कि नैसर्गिक भाव का संबंध श्राचार विषयक सिद्धान्तों ही से होता है, एतद् सम्बन्धी छोटी छोटी बातों से नहीं। यदि कोई भी भाव नैसर्गिक होता है तो इस बात की पुष्टि में कोई कारण नहीं दिया जा सकता कि वह नैसगिर्क भाव दूमरों के सुख दुःख के' सम्बन्ध में नहीं हो सकता। यदि प्राचार विषयक किसी सिद्धान्त को मानने की प्रेरणा नैसर्गिक हो सकती है तो वह इसी सिद्धान्त की-अर्थात् दूसरों के दुःख का विचार रखने ही की हो सकती । यदि नैसर्गिक प्राचार-नीति प्राचार शास्त्र की उस ही बात को बताने लगे जिस को उपयोगितात्मक प्राचार शास्त्र मानना है, तो फिर इन दोनों में प्रागे कुछभी झगड़ा नहीं रहेगा। किन्तु मौजूदा हालत में भी, यद्यपि नैमर्गिक प्राचार-शास्त्री दूसरे मनुष्यों के सुख दुःख का विचार रखने की भावना ही को उपयोगितावाद के सिद्धान्त की सनद - एक मात्र नैसर्गिक भावना नहीं मानते हैं किन्तु फिर भी इस प्रकार की भावना को-अर्थात् दूसरों के सुख दुःख के विचार को-एक नैसर्गिक भावना अवश्य मानते हैं। वे एक मत होकर कहते हैं कि श्राचाग्युक्त अधिकांश कार्यों में दूसरों के लाभ ही का ख्याल रहता है । इस कारण नैतिक कर्तव्य की उत्पत्ति प्रतीतात्मक मानने के विश्वास से यदि अान्तरिक प्रमाणिकता को किसी प्रकार की और अधिक पुष्टि मिलती है तो मेरे विचार में उपयोगितात्मक सिद्धान्त को भी इस का लाभ पहुंच रहा है। इसके विपरीत यदि नैतिक भावनाये नैसर्गिक न हों वरन् अर्जित हों, जैसा कि मेग भी विश्वास है, तो भी अर्जित होने के कारण से इन भावनाओं को कम स्वाभाविक नहीं समझना चाहिये । मनुष्य के लिये बोलना, तर्क करना, शहर बनाना तथा जमीन जोतना बोना स्वाभाविक हैं, यद्यपि ये सब शक्तियां अर्जित हैं। इन अर्जिन शक्तियों के समान नैतिक भावना भी, हमारी प्रकृति काभंग नहीं है, किन्तु इनके समान ही हमारी प्रकृति से स्वाभाविकतया उत्पन्न होती है तथा इन शक्तियों के समान ही, किन्तु कुछ कम अंश में, स्वत: उत्पन्न होकर संस्कृति द्वारा बहुत कुछ विकसित की जा सकती है । अभाग्यवश बाह्य कारणों का काफी प्रभाव पड़ने से तथा प्रारंभिक संस्कारों की वजह से नैतिक भावना प्रत्येक दिशा में मुड़ सकती है। अत: उन प्रभावों के द्वाग नैतिक शक्ति को इतना मज़बूत बनाया जा सकता है कि अन्तःकरण के समान ही यह शक्ति मनुष्य के मस्तिष्क पर अपना प्राधिपत्य जमा सकती है। मानुषिक प्रकृति में उपयोगितात्मक सिद्धान्त का भाव नैसर्गिक न होने पर भी इस सिद्धान्त का भाव उत्पन्न तथा विकसित कराया जा

तीसरा अध्याय
ट
सकता है--इस विषय में सन्देह कग्ना अनुभव के बिल्कुल
विपरीत जाना है।
किन्तु मानसिक संस्कृति बढ़ने पर शिक्षा द्वारा उत्पन्न किये
हुवे पूर्णरूप से कृत्रिम नैतिक भावों के (Aribitrary) प्रतीत
होने पर उपयोगितात्मक कर्तव्य की भावना के धीरे धीरे
लुप्त हो जाने की प्राशंका है। इस कारण ऐसे शक्ति-शाली
स्थायी भाव होने चाहिये जिनके कारण हम को कर्तव्य की
भावना नैसर्गिक प्रतीत हो तथा इस स्थायी भाव को केवल दूसरों
ही में नहीं वरन् अपने में भी बढ़ाने की भोर रुचि हो । सागंश
यह कि उपयोगितात्मक श्राचार शास्त्र के लिये स्थायी भाव का
भी एक नैसर्गिक आधार होना चाहिये ।
इस प्रकार के प्राकृतिक म्थायीभाव का प्राधार है और
वह दृढ़ आधार मनुष्य जाति की सामाजिक भावना अर्थात्
मनुष्य को अन्य मनुष्यों के साथ सम्वद्ध रहने की इच्छा ।
। मनुष्य प्रकृति में इस समय ही यह इच्छा बहुन मन्श
में विद्यमान है तथा सभ्यता की बढ़ती के साथ २ स्वयमेव
ही अधिकाधिक होती जाती है। मनुष्य को सामाजिक दशा
इतनी अधिक प्राकृतिक तथा इतनी अधिक स्वाभाविक प्रतीत
होती है कि सदैव अपने पापको समाज का सभ्य ही समझता
रहता है । असाधारण परिस्थितियों की या उस समय की
और बात है जब कि मनुष्य किसी कारण से जान बूझ कर
समाज से पृथक होने की चेष्टा करता है । ज्यूं २ मनुष्य
बर्बर अनपेक्षता की दशा से दूर होता आयगा, सामाजिक
बन्धन भी अधिक दृढ़ होता जायगा । अब देखना चाहिये कि
मनुष्य किस दशा में समाज में रह सकते हैं। स्वामी और

उपयोगितावाद के सिद्धान्त की सनद सेवक के सम्बन्ध को छोड़कर मनुष्य उसी दशा में समाज में रह सकते हैं जब कि सब मनुष्यों के हिताहित का ध्यान रक्खा जाय । इसके अतिरिक्त और किसी प्राधार पर समाज का स्थिर रहना देखती पाखों असम्भव प्रतीत होता है । समान मनुष्यों का मेल इसी समझौते पर रह सकता है कि सब मनुष्यों के हित की ओर बराबर ध्यान दिया जायगा । सभ्यता की प्रत्येक दशा में, अनियन्त्रित शासक को छोड़ कर, प्रत्येक मनुष्य के समान अन्य मनुष्य भी रहते हैं। इस कारण प्रत्येक मनुष्य को अन्य मनुष्यों के साथ बराबरी का सम्बन्ध रखने के लिये विवश होना पड़ता है। दिन प्रति दिन हम ऐसी दशा के निकटतर पहुंचते जा रहे हैं जब सदैव के लिये किसी मनुष्य के साथ बराबरी के अतिरिक्त और किसी प्रकार का सम्बन्ध रखना असम्भव होजायगा । इस कारण दिन प्रतिदिन हमको दूसरों के हित की बिल्कुल उपेक्षा का विचार कल्पना- तीत प्रतीत होता जा रहा है । हम एक दूसरे के साथ काम करना सीखते जा रहे हैं तथा अपने कामों का उद्देश्य व्यक्ति- गत हित के स्थान में सामाजिक हित ( कम से कम इस समय के लिये ) बताने लगे हैं । जब तक हम दूसरों के साथ काम करते रहेंगे तथा हमारे और उनके उद्देश्य एक रहेंगे उस समय कम से कम यह क्षणिक भावना अवश्य उत्पन्न होजायगी कि दूसरों का हित हमाराही हित है । सामाजिक बन्धनों के दृढ़ होने तथा समाजके उन्नतावस्था को प्राप्त होने से दूसरों के सुख का ध्यान रखने की प्रोर केवल हमारी अधिक अभिरुचि ही नहीं हो जायगी वग्न् हमारी भावनाएं उनकी भलाई के रंग में रंग जायेंगी । कम से कम व्यवहार रूप में दूसरों की भलाई का ।

तीसरा अध्याय चाहे मनुष्य बहुत अधिक विचार रखने लगेंगी। अन्य शारीरिक श्राव- श्यकताओं के समान ही दूसरों की भलाई का ध्यान रखना भी स्वाभाविक तथा आवश्यक प्रतीत होने लगेगा । अस्तु । में इस प्रकार की भावना कितने ही अंश में क्यों न हो, वह लाभ तथा सहानुभूति के प्रयोजन से इस भावना को प्रगट करने के लिये उत्तेजित होना है तथा यथाशक्ति दूसरों में इस प्रकार की भावना को उत्तजित करता है । यदि किसी मनुष्य में इस प्रकार की भावना बिल्कुल भी न हो तो ऐसा मनुष्य भी यह चाहेगा कि अन्य मनुष्यों में इस प्रकार की भावना पैदा हो । इन सब कारणों से इस भावना का छोटे से छोटा अंकुर भी जड़ जमा लेगा तथा शिक्षा की बढ़नी के साथ २ विकसित अवस्था को प्राप्त हो जायगा । वाह्य ज़बरदस्त कारण ( Powerful external sanctions) इस भावना का अनुमोदन करते रहेंगे। सभ्यता की बढ़ती के साथ २ मानुषिक जीवन को इस रूप में देखना अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता जायगा । प्रत्येक गजनैतिक उन्नति के साथ २ अर्थात् हित-विरोध के कारणों के दूर होने तथा कानूनी रियायतों के काग्गा फैली हुई भिन्न २ व्यक्तियों तथा भिन्न २ जमानों की आममानता को मिटाने से, जिम के कारण बहुत से मनुष्यों के सुख की उपेक्षा करना अब भी संभव है, उपरोक्त भावना को प्राकृतिक समझना और भी अधिक संभव होता जा रहा है । ऐसे प्रभाव बराबर बढ़ते जा रहे हैं जिन के कारण प्रत्येक में यह भावना-कि मैं तथा शेष मनुष्य एक हैं-जड़ जमाती जा रही है । इस प्रकार की भावना जब पूर्णता को प्राप्त हो जायगी तो मनुष्य कभी ऐसे काम नहीं सोचेगा या .

८२ उपयोगितावाद के सिद्धान्त की सनद ऐसे काम को करने की कभी इच्छा नहीं करेगा जिस से उसके लाभ के अतिरिक्त और किसी का लाभ न होता हो। अब यदि हम मानने कि एकता की इस भावना को धर्म के समान सिखाया जायगा तथा शिक्षा, संस्थाओं और लोक मत से इस भावना को दृढ़ करने में यथासंभव सहायता ली जायगी जैसी कि किसी समय में धर्म के लिये ली जाती थी तथा प्रत्येक मनुष्य बचपन ही से इस भावना का प्रचार तथा कार्यरूप में व्यवहार देखेगा तो मेरे ख्याल में किसी मनुष्य को-जो इस प्रकार की स्थिति की कल्पना को समझ सकता है-सुखवादी सदाचार की अन्तिम सनद के काफ़ी जोरदार होने में सन्देह नहीं रहेगा। प्राचार-शास्त्र के जिन विद्यार्थियों के लिये इस प्रकार की स्थिति को ठीक २ समझना कठिन मालूम पड़े उन्हें कान्ट की (System de Politique Positive) नामक पुस्तक पढ़नी चाहिये । जिन मनुष्यों की मानसिक भावनाएं उपयोगितात्मक प्राचार शास्त्र को मानने की ओर प्रवृत्त करती हैं उनको उस समय की प्रतीक्षा करते रहने की आवश्यकता नहीं है जब कि सामाजिक प्रभाव इस प्रकार के होजाएंगे कि अधिकांश समाज इस सिद्धान्त को मानने की ओर प्रवृत्त होने लगेगा । समाज उन्नति की आधुनिक आदिम अवस्था में मनुष्य के दिल में दूसरों के प्रति सहानुभूति का भाव इतना गहरा नहीं हो सकता कि जन माधारण के हित के विपरीत कार्य करना उसके लिये असम्भव ही होजाय । किन्तु अाधुनिक स्थिति में भी कोई मनुष्य, निमके दिल में समाज के विचार ने कुछ भी स्थान जमा लिया है, यह नहीं ख्याल कर सकता कि शेष मनुष्य सुख प्राप्ति के उद्देश्य में मेरे प्रतिद्वन्दी हैं तथा मेरी उद्देश्य तीसरा अध्याय ८३ हृदय में सिद्धि के लिये उनकी प्रकृतकार्यता श्रावश्यक है। अब प्रत्येक मनुष्य अपने पापको समाज का एक सभ्य समझने लगा है और इस कारण प्रब प्रत्येक मनुष्य के इस प्रकार के विचार स्वाभाविक रूप से स्थान अमाते जारहे हैं कि मेरी और अन्य मनुष्यों की भावनाओं तथा उद्देश्यों में समानता हो । यदि मत-विपरीतता तथा मानसिक संस्कृति के भेद के कारण एक मनुष्य की भावनायें अन्य मनुष्यों की बहुत सी भावनाओं से नहीं मिलती तथा कभी २ एक भादमी दूसरे आदमियों की बहुत सी भावनाओं को दूषित बताता है तथा उनका खण्डन करता है, किन्तु फिर भी उसको ध्यान रहता है कि उसके तथा अन्य मनुष्यों के उद्देश्य परस्पर-विरोधी नहीं हैं तथा वह जो कुछ कर रहा है अन्य मनुष्यों की भलाई के लिये ही कर रहा है उनकी बुराई के लिये नहीं। कुछ मनुष्यों में इस प्रकार की भावना बहुत कम मात्रा में होती है। स्वार्थ का ध्यान अधिक बना रहता है। कुछ मनुष्यों में इस प्रकार की भावना बिल्कुल भी नहीं होती। किन्तु जिन मनुष्यों में इस प्रकार की भावना होती है, उन्हें यह भावना नैसर्गिक ही प्रतीत होती है । वे यह नहीं समझते कि शिक्षा के कारण उनके मस्तिष्क में इस प्रकार के मूह विश्वास ( Superstition ) ने स्थान कर लिया है। उनकी यह भी धारणा नहीं होती कि इस प्रकार की भावना समाज के नादिरशाही शासन का प्रभाव है। वे यही समझते हैं कि इस प्रकार की भावना का होना उचित ही है । इस प्रकार का निश्चय ही अधिक प्रसन्नतात्मक भाचरण का अन्तिम हेतु या दलील है। इम ही निश्चय के कारण सुविकसित भावनाओं वाला मनुष्य दूमरों के हित का ध्यान रखता हुवा कार्य करता है। उनके हित की अवहेलना नहीं करता । बाहरी हेतुओं से ।

८४
उपयोगितावाद के सिद्धान्त की सनद
भी, जिनका अभी वर्णन किया जा चुका है, ऐसा होता है।
बाहरी हेतुओं की अनुपस्थिति तथा विपरीत ले जाने की दशा में
यह निश्चय ही मार्ग से विचलित नहीं होने देता है। भिन्न
मनुष्यों में उनकी प्रकृति के अनुसार इस प्रकार के निश्चय की
शक्ति कम या अधिक अवश्य होती है किन्तु उन मनुष्यों के
अतिरिक्त, जिन में नैतिक विचारों का बिल्कुल ही प्रभाव है,
ऐसा प्रादमी कोई ही होगा जो केवल अपने मतलब ही से
मतलब रक्खे और बिना मतलब के दूसरों के हित की भोर
बिल्कुल भी ध्यान न दे ।

चौथा अध्याय ।
उपयोगिता के सिद्धान्त की पुष्टि में किस
प्रकार का प्रमाण दिया जासकता है।
ह. पहिले भी बताया जा चुका है कि अन्तिम
उद्देश्यों से सम्बन्ध रखने वाले विषयों का
साधारण अर्थ में प्रमाण नहीं दिया जा सकता।
सारे मूल सिद्धान्त, विज्ञान (Knowledge) तथा
प्राचार के मूल पूर्वावयव (First Premises)
हेतु देकर प्रमाणित नहीं किये जासकते । किन्तु
मूलसिद्धान्त वास्तविकता लिये होते हैं, इस कारण वास्तविकता
को परखने वाली शक्तियों अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों तथा भान्तरिक
चेतना के द्वारा उनका निर्णय हो सकता है। क्या प्रक्रियात्मक
उद्देश्यों से सम्बन्ध रखने वाले विषयों का भी ज्ञानेन्द्रियों तथा
पान्तरिक चेतना के द्वारा निर्णय हो सकता है ? या और किस
प्रकार उनकी वास्तविकता जांची जा सकती है ?

किस प्रकार का प्रमाण दिया जा सकता है । उद्देश्यों से सम्बन्ध रखने वाले विषय दूसरे शब्दों में इस 'घात के प्रश्न होते हैं कि क्या २ चीजें इष्ट हैं। उपयोगितावाद का सिद्धान्त यह है कि-सुख इष्ट है तथा उद्देश्य की दृष्टि से एकमात्र सुख ही इष्ट है। अन्य सारी वस्तुएं इस उद्देश्य-प्राप्ति में सहायक होने ही के कारण इष्ट हैं । अब प्रश्न उठता है कि इम सिद्वान्त के पोषक क्या वात प्रमाणित करें कि जिससे और लोग भी इस सिद्धान्त को मानलें । किसी वस्तु के प्रत्यक्ष होने का एक मात्र माननीय प्रमाण यही दिया जा सकता है कि श्रादमी वास्तव में उसे देखते हैं। किसी ध्वनि के श्रोतव्य होने का एकमात्र प्रमाण यह है कि श्रादमी उसे सुनते हैं । इसी प्रकार किसी वस्तु के इष्ट होने का एक मात्र प्रमाण यही दिया जा सकता है कि मनुष्य उस वस्तु को वास्तव में चाहते हैं। सर्व साधारणा का सुख क्यों इप्ट है ? --- इस बात का सिवाय इसके और कोई प्रमाण नहीं दिया जा सकता कि प्रत्येक मनुष्य अपने सुख का यथा- सम्भव इच्छुक रहता है । यह एक वास्तविक बात है । इस काग्गा यही प्रमाण है जो दिया जा सकता है कि सुख अच्छा है। प्रत्येक मनुष्य का सुख उस मनुष्य के लिये अच्छा है। और इस कारण सर्व साधारण का सुख सब मनुष्यों के समाज के लिये अच्छा है । सुख श्राचार का एक उद्देश्य है और इस कारण प्राचार-युक्तता का एक निर्णायक है। किन्तु इतने ही से सुख प्राचारयुक्तता का एकमात्र निर्णायक प्रमाणित नहीं हो जाता । इस बात को प्रमाणित करने के लिये इस ही नियम के अनुसार यह दिखाना श्रावश्यक है कि मनुष्य केवल सुख ही को नहीं चाहते हैं । ।

वीधा अध्याय वरन सुख के अतिरिक्त वे कभी किसी और वस्तु की कामना नहीं करते । अब यह बान स्पष्ट है कि मनुष्य बहुनसी ऐसी चीजों की कामना करते हैं जो साधाग्ण भाषा में सुख से भिन्न हैं। उदाहरणत: मनुष्य ठीक उसी प्रकार पुण्य या नेकी ( Virtue ) की कामना करते हैं तथा बदी से बचना चाहते हैं जिस प्रकारसुख की कामना करते हैं तथा दुःख से बचना चाहते हैं। पुण्य की कामना सुख की कामना के समान सावलौकिक नहीं है, किन्तु सुख की कामना के समान ही पुण्य की कामना का होना भी निर्विवाद है। इस कारण उपयोगितात्मक प्रादर्श के विगेधी कहते हैं कि हमको यह परिणाम निकालने का अधिकार है कि सुख के अतिरिक्त मानुषिक कार्यों के और भी उद्देश्य होते हैं और इस कारण उपयोगिता की कसोटी से ही किसी काम को करने या न करने के योग्य नहीं ठहराया जा सकता । किन्तु क्या उपयोगिता का सिद्धान्त कहता है कि मनुष्य पुण्य की कामना नहीं करते ? बिल्कुल इससे उल्टी बात है। उपयोगितावाद का कहना है कि पुण्य की कामना ही नहीं करनी चाहिये वग्न निष्काम होकर पुण्य की कामना करनी चाहिये । उपयोगितावादी प्राचार-शास्त्रियों की इस विषय में, कि कोई पुण्य कार्य प्रारम्भ में किस प्रकार पुण्य का कार्य बन गया, कोई मम्मति क्यों न हो तथा चाहे उनका कैसा ही यह विश्वास हो (जैसा कि है भी) कि कोई कार्य या मनो- वृत्ति इम ही कााण धार्मिक है क्योंकि उमसे पुराय या नेकी ( Virtue ) के अतिरिक्त किसी और उद्देश्य की पूर्ति में सहा- यता मिलती है, किन्तु इस प्रकार किसी कार्य के धार्मिक या अधार्मिक होने का निर्णय कर लेने पर उपयोगितावादी नेकी .

किस प्रकार का प्रमाण दिया जा सकता है अर्थात् धर्म कार्य या पुण्य कार्य को अन्तिम उद्देश्य की प्राप्ति में सहायता देने वाले पदार्थों में केवल सब से ऊंचा स्थान ही नहीं देते हैं वरन् उनका विचार है कि मनोविज्ञान के अनुसार प्रत्येक मनुष्य में इस प्रकार की भावना का होना सम्भव है कि वह नेकी या पुण्य को बिना किसी और उद्देश्य को ध्यान में रखते हुवे स्वत: अच्छा समझे। उपयोगितावादी लोगों का यह भी कहना है कि जब तक इस प्रकार की भावना नहीं भाती है अर्थात् मनुष्य नेकी को इस प्रकार प्यार नहीं करता है, उस समय तक उस मनुष्य का मस्तिष्क ही ठीक दशा में नहीं है। उस मनुष्य का मस्तिष्क उस दशा को प्राप्त नहीं हुवा है जिस दशा को प्राप्त होना सार्वजनिक हित की दृष्टि से अत्यावश्यक है। इस प्रकार की सम्मति सुख के सिद्धान्त के बिल्कुल भी विरुद्ध नहीं है । सुख के बहुत से साधन हैं। प्रत्येक साधन, केवल सुख-गशि बढ़ाने की दृष्टि से ही नहीं, वरन् स्वत: इष्ट है । उपयोगिता के सिद्धान्त का यह मतलब नहीं है कि कोई मानन्द जैसे गायन या दुःख से मुक्ति जैसे स्वास्थ्य केवल इस ही कारण इष्ट होने चाहिये क्योंकि वे किसी समष्टिरूप पदार्थ प्रसन्नता के साधन हैं । गायन तथा स्वास्थ्य स्वतः इष्ट हैं और होने चाहिये क्योंकि उद्देश्य के साधन होने के अतिरिक्त उद्देश्य का एक भाग भी हैं । उपयोगितावाद के सिद्धान्त के अनुसार नेकी या पुण्य स्वाभाविकतया तथा प्रारम्भ से तो उद्देश्य का भाग नहीं हैं किन्तु उद्देश्य का भाग बन सकते हैं। जो लोग नेकी को निष्काम रूप से प्यार करते हैं उन मनुष्यों के लिये नेकी उद्देश्य का भाग होगई है । ऐसे लोग अपने सुख का एक भाग समझने के कारण ही नेकी या पुण्य की प्राकांक्षा करते हैं। वे लोम नेकी को सुख का साधन नहीं समझते हैं। ।

चौपायास अध्याय
इस बात को और अधिक अच्छी तरह समझने के लिये
हमको यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि केवल नेकी या
पुण्य ही भारम्भ में उद्देश्य का साधन होने पर बाद में उद्देश्य
का भाग नहीं बन गये हैं। उदाहरण के लिये धन की लालसा
ही को ले नीजिये । धन का यही मूल्य है कि उसके द्वारा और
चीजें खरीदी जासकती हैं। इस कारण प्रारम्भ में धन की
इच्छा उन वस्तुओं की इच्छा के कारण होती हैं जो उस धन
द्वारा प्राप्त हो सकती हैं। इस कारण धन हमारी इच्छा-पूर्ति
का एक साधन है। किन्तु धन की लालसा केवल उन बातों
के अन्तर्गत ही नहीं है जिनका मानुषिक जीवन में बहुत अधिक
प्रभाव पड़ता है, वरन् बहुतसी दशाभों में धनी होनेके एकमात्र विचार
से ही बहुत से मनुष्य धन की भावना करते हैं। धन का प्रयोग
करने की अपेक्षा धन का स्वामी बनने की कामना अधिक
बलवती होती है। इस कारण यह कहना गलत नहीं है कि धन
की कामना इस कारण नहीं की जाती कि धन किसी उद्देश्य
प्राप्ति का साधन है वग्न् धन की कामना इस कारण की जाती
है कि धन हमारे उद्देश्य का एक भाग है। भारम्भ
सुख का एक साधन था, किन्तु अब मनुष्य धन को सुख का
एक मुख्य अवयव समझने लगा है। यही बात मनुष्यों के
और बहुत से इष्ट पदार्थों के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है,
उदाहरणतया शक्ति या शोहरत । शक्ति या शोहरत में एक
विशेषता है जो धन में नहीं है। वह विशेषता यह है कि शक्ति
मिलने या शोहरत पाने के साथ ही साथ हमको तत्क्षण कुछ
श्रानन्द सा प्रतीत होने लगता है। इससे कम से कम ऐसा
मालूम अवश्य होता है कि शक्ति तथा शोहरत में है।

६० कित प्रकार का प्रमाण दिया जा सकता है किन्तु फिर भी मनुष्य स्वभावतया शक्ति तथा ख्याति इस कारण चाहते हैं क्योंकि शक्ति-शाली या प्रसिद्ध होने पर उन्हें अपनी अन्य इच्छाओं को पूर्ति में बड़ी सहायता मिलती है । शक्ति और ख्याति तथा हमारे अन्य इष्ट पदार्थों में इतना घनिष्ट संबंध होने के कारण ही बहुधा मनुष्यों में शक्ति तथा ख्याति की इच्छा इतनी बलवती हो गई है। कुछ मनुष्यों में तो ख्याति तथा शक्ति की इच्छा अन्य सब इच्छाओं से बढ़ जाती है। इन दशाओं में साधन उद्देश्य का एक भाग बन जाते हैं। केवल स धारण भाग हो नहीं वरन् उन पदार्थों की भी अपेक्षा, जिनके वे साधन हैं, उद्देश्य का अधिक महत्त्वपूर्ण भाग हो जाते हैं । जिस पदार्थ की पहिले इस कारण कामना की जाती थी कि वह सुख-प्राप्ति का एक सावन है, अब उस पदार्थ की ही खातिर कामना की जाने लगती है। उस साधन की प्राप्ति सुख का भाग होने के कारण की जाने लगती है। मनुष्य उस पदार्थ को (जो पहिले साधन था ) पाने से ही खुश हो जाता है या अपने पापको खुशो समझने लगता है तथा उस पदार्थ के न मिलने से दुखी हो जाता है या अपने आप को दुखी समझने लगता है । जिस प्रकार सङ्गीत का प्रेम तथा स्वास्थ्य की इच्छा सुख की इच्छा से पृथक् नहीं हैं, इस ही प्रकार उस पदार्थ की सुख की इच्छा से भिन्न नहीं है । ये सब बाने सुख में भाजाती हैं। ये सुख की इच्छाके कुछ तत्व हैं । सुख अमूर्त भावना ( Abstract idea ) नहीं है, वरन् मूर्न साकल्य ( Concrete whole ) है और ये उस के भाग हैं। इनका इस प्रकार होना उपयोगितावाद के प्रादर्श के अनुमार है । जीवन बहुत ही शुष्क हो जाता तथा सुख के अवसर बहुत हो इच्छा भी चौथा अध्याय कम हो जाते यदि वे वस्तुयें, जो प्रारम्भ में उदासीन थीं किन्तु हमारी प्रारम्भिक इच्छाओं की पूर्ति की ओर लेजाने वाली थीं, बाद में स्वयं ही प्रारम्भिक प्रानन्दों की अपेक्षा प्रानन्द के अधिक मूल्यवान् उद्गार---प्राधिक्य तथा जीवन काल में नित्यता दोनों के विचार से---न बन जाती । उपयोगितावाद की विभावना के अनुसार नेकी या पुण्य इस प्रकार की अच्छी चीज़ है । प्रारम्भ में नेकी या पुण्य की एकमात्र इस ही कारण कामना थी कि नेकी या पुण्य सुख की ओर ले जाता है तथा विशेषतया दुःख से बचाता है। किन्तु इस प्रकार का सम्बन्ध होने के कारण नेकी स्वयं ही अच्छी समझी जासकतीहै तथा नेकी की भी इतनी ही प्रबल इच्छा हो सकती है जितनी किसी अन्य अच्छी चीज़ की । नेकी में तथा धन, शक्ति तथा ख्याति की लालसा में इतना अन्तर है कि धन आदि की लालसा के कारण मनुष्य अपने समाज को हानि पहुंचा सकता है जैसा कि बहुधा देखने में भी पाया है। किन्तु मनुष्य जितना लाभ समाज को नेकी ( Virtue ) के निष्काम प्रेम के कारण पहुंचा सकता है, उतना किसी और प्रकार नहीं पहुंचा सकता। इस कारण उपयोगितावाद के आदर्श के अनुसार धन प्रादि की लालसा उस सीमा तक ठीक है जब तक कि इस प्रकार की लाजसा से सार्वजनिक सुख की वृद्धि हो तथा सार्वजनिक हित के मार्ग में रुकावट न पड़े । किन्तु उपयोगितावाद का कहना है कि नेकी की इच्छा जितनी अधिक बढ़ सके उतना ही अच्छा है क्योंकि नेकी की इच्छा सार्वजनिक सुख के लिये सब से अधिक प्रावश्यक है।

६२ किस प्रकार का प्रमाण दिया जा सकता है इन सब बातों से प्रमाणित होता है कि सुख के अतिरिक्त और कोई चीज़ इष्ट नहीं है। अन्य वस्तुवे सुख का साधन होने के कारण इष्ट हैं। जिन वस्तुवों की स्वत: उन वस्तुओं की खातिर ही इच्छा है वे वस्तुवें सुख का एक भाग हैं। जब तक कोई वस्तु सुख का भाग नहीं बन जाती तब तक उस वस्तु की उस वस्तु की खातिर इच्छा नहीं होती। जो मनुष्य नेकी की नेकी ही के विचार से कामना करते हैं वे इस प्रकार की कामना इन दो कारणों में से किसी कारण की वजह से करते हैं। या तो उन्हें अपने नेक होने का ध्यान पाने से सुख मिलता है या अपने नेक न होने का ध्यान पाने से दुःख प्राप्त होता है। या उपरोक्त दोनों कारणों की वजह से भी इस प्रकार की कामना हो सकती है क्योंकि वास्तव में सुख तथा दुःख पृथक् :२ कभी ही रहते हैं, नहीं तो सदैव साथ ही साथ देखे जाते हैं। कोई मनुष्य कतिपय अंश में नेक होने के विचार से प्रानन्द अनुभव कर सकता है तथा अधिक नेक न होने के विचार से दुःख अनुभव कर सकता है । यदि इन में से किसी कारण से उसे सुख या दुःख अनुभव न हो तो वह नेकी की कामना नहीं करेगा। यदि कामना करेगा भी तो इस विचार से कि नेकी के कारण मुझे या मेरे प्रेमपात्र अन्य मनुष्यों को अन्य लाभ पहुंच सकते हैं। अब हम ने इस प्रश्न का-कि उपयोगितावाद के सिद्धान्त का किस प्रकार का प्रमाण दिया जा सकता है-उत्सर दे दिया है। यदि मेरी उपरोक्त सम्मति मनो-विज्ञान के अनुसार ठीक है.-अर्थात् यदि मनुष्य की प्रकृति ही ऐसी है कि वह किसी ऐसी वस्तु की कामना नहीं करता जो सुख का भाग अथवा सुख का साधन नहीं होती तो हम इस बात की पुष्टि में-कि केवल ये चौथा अध्याय ही चीजें इष्ट हैं और कोई प्रमाण नहीं दे सकते और न कोई भौर प्रमाण देने की आवश्यकता ही है। अब इस बात का निर्णय करना चाहिये कि क्या वास्तव में ऐसा ही होता है ? अर्थात् क्या मनुष्य जाति केवल उसी वस्तु को कामना करती है कि जिससे उसको सुख मिलता है या दुःख का प्रभाव होता है । प्रत्यक्ष ही में यह प्रश्न अनुभव का प्रश्न है । इस प्रकार के प्रश्नों का निर्णय साती पर ही होता है। इस कारण यह बात जानने के लिये कि क्या वास्तव में वैसा ही होता है जैसा ऊपर वर्णन किया गया है, हमको अपने अनुभव सथा अपनी निरीक्षा ( Ovservation ) को काम में जाना चाहिये तथा दूसरों के निरीक्षण से सहायता लेनी चाहिये। मेरा विश्वास है कि यदि निष्पक्षपात होकर अपने अनुभव तथा निरीक्षण से काम लिया जायगा तो यह बात माननी पड़ेगी कि किसी वस्तु की इच्छा करना तथा उसे रुचिकर अनुभव करना तथा किसी वस्तु से घृणा करना और उसके कष्टप्रद होने की कल्पना करना-ये दोनों बातें-एक दूसरे से पृथक नहीं की जा सकती। ये दोनों बातें एक ही वस्तु के दो रुख हैं या दार्शनिक भाषा में एक ही मनो-वैज्ञानिक घटना का नाम रखने के दो तरीके हैं। किसी चीज़ को इष्ट समझना ( उसके परिणामों के विचार से इष्ट सम में तो दूसरी बात है ) तथा उस वस्तु को सुखद सम्झना-ये दोनों एक ही बात है। किसी वस्तु को सुखद न समझते हुवे उस वस्तु करना भौतिक तथा प्राध्यात्मिक दोनों प्रकार से असम्भव हैं। यह बात मुझको इतनी साफ मालूम पड़ती है कि मेरे विचार में इस पर कोई भी भाक्षेप नहीं करेगा। कोई आदमी यह । की इच्छा किस प्रकार का प्रमाण दिया जा सकता है नहीं कहेगा कि किसी वस्तु के सुखद होने तथा उसके प्रभाव के दुखद होने के अतिरिक्त और भी किसी कारण से उस वस्तु की इच्छा की जासकती है। हां इस प्रकार का प्रक्षेप होना सम्भव है कि आकांक्षा ( Will ) इच्छा ( Desire ) से भिन्न है। बहुत से नेक मनुष्य अर्थात् सन्त या ऐसे मनुष्य जिनके उद्देश्य निश्चित हैं अपने उद्देश्य की पूर्ति ही में लगे रहते हैं। वे इस बात का ध्यान नहीं करते कि ऐसा करने से हमें आनन्द मिल रहा है या हमें अन्त में प्रानन्द मिलेगा। वे तो अपने उद्देश्य की पूर्ति ही का ध्यान रखते हैं चाहे इसमें उनको अपने सुखों की कुर्बानी करनी पड़े चाहे उनको अनेक आपदाओं का सामना करना पड़े। ये सब बाते मैं पूर्ण रूप से मानता हूं। इस बात का मैंने कहीं उल्लेख भी किया है। आकांक्षा इच्छा से भिन्न है। अकांक्षा ( Will ) क्रियावान विकृति है तथा इच्छा ( Desire ) निष्क्रिय संवेतृता ( Passive Sensibility ) है । यद्यपि प्रारम्भ में प्राकांक्षा इच्छा ही की शाखा है किन्तु समय पाकर जड़ जमा सकती है तथा इच्छा से भिन्न रूप धारण कर सकती है। इस कारण अभ्यस्त उद्देश्य की दशा में हम उस चीज़ की इस कारगा भाकांक्षा नहीं करते क्योंकि हम उसकी इच्छा रखते हैं वग्न् बहुधा हम उसकी इस ही कारण इच्छा करते हैं क्योंकि हम उसकी प्राकांक्षा रखते हैं। यह अभ्यास की शक्ति का एक उदाहरण मात्र है। केवल अच्छे ही कामों में ऐसा नहीं होता है। मनुष्य बहुत सी उदासीन बातों को पहिले इसी प्रकार के उद्देश्य से करते हैं किन्तु फिर उन्हीं बातों को अभ्यास या प्रादत के कारण करने लगते हैं। कभी २ हम अचेतन रूप से ऐसा कर जाते हैं।

चौथा अध्याय काम कर चुकने के बाद ज्ञान (Consciousness ) होता है कभी २ सङ्कल्प के कारण, जिसका ज्ञान हमें रहता है, ऐसा करते हैं। किन्तु यह सङ्कल्प अभ्यस्त होता है। अभ्यास पड़ जाने के कारण ही इस प्रकार का सङ्कल्प उठने लगता है, भविवेक रुचि के कारण नहीं । यह बात बहुधा उन लोगों में देखने में आती है जिन्हें बुरी लत लग जाती है। तृतीय तथा अन्तिम दशा वह है जब हमारा अभ्यस्त कार्य पूर्व की बहुधा बनी रहने वाली इच्छा के विरुद्ध नहीं होता है वरन उस इच्छा की पूर्ति ही के लिये होता है। यह बात सन्त लोगों तथा उन मनुष्यों में देखी जाती है जो समझ-बूझ कर किसी निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति में बराबर लगे रहते हैं। प्राकांक्षा तथा इच्छा का यह भेद प्रमाणिक तथा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मनो- वैज्ञानिक बात है। किन्तु बात केवल इतनी है-हमारे संस्थान के अन्य सब भागों के समान आकांक्षा अभ्यास पर निर्भर है। जो वस्तु अब हमें स्वतः इष्ट नहीं रही है, हम उसकी आकांक्षा अभ्यास के कारण कर सकते हैं, या केवल इस कारण इच्छा कर सकते हैं क्योंकि हमें उसकी आकांक्षा है । यह बात बिल्कुल ठीक है कि प्रारम्भ में आकांक्षा पूर्ण रूप में इच्छा से पैदा होती है । इच्छा में कष्ट के प्रभाव से खिंचाव तथा प्रानन्द की ओर आकर्षण-ये दोनों बातें प्रागई। उस प्रादमी को छोड़ दो जिसके दिल में ठीक करने की आकांक्षा ने पूग भासन जमा लिया है। उस आदमी का उदाहरण लो जिसके अन्दर अभी इस प्रकार की आकांक्षा कमज़ोर हालत में है और जहां इस बात का खटका है कि कहीं प्रलोभन मिलने पर यह प्राकांक्षा नष्ट न होजाय । इस वजह से माकांक्षा पूर्ण रूप किस प्रकार का प्रमाण दिया जा सकता से विश्वसनीय नहीं है। ऐसी दशा में हम किस प्रकार से ऐसी कमज़ोर भाकांक्षा को दृढ़ बना सकते हैं ? जहां पर नेक होने की माकांक्षा यथेष्ट रूप में नहीं हैं वहां पर इस प्रकार की माकांक्षा को किस प्रकार उत्पन्न या जागृत किया जा सकता है ? केवल इसी प्रकार कि ऐसे मनुष्य के दिल में नेकी की इच्छा पैदा कराई जाय । इस बात का प्रयत्न किया जाय कि वह नेकी को सुखद तथा उसके प्रभाव को दुखद समझे । उसके जहन में यह बात जमा दी जाय कि सुखद तथा ठीक काम करने का और दुखद तथा गलत काम करने का प्रभेद सम्बन्ध है । उसको यह बात पूर्ण रूप से अनुभव करादी जाय की नेक काम करने से स्वभावतया सुख होता है तथा बुरे काम करने से दुःख होता है यह सम्भव है कि इस तरह नेकी की इस प्रकार की प्राकांक्षा उत्पन्न हो जाय, जिसके एक बार जड़ जमा लेने पर, पादमी फिर बिना सुख दुःख का विचार किये हुवे काम करने लगे। भाकांक्षा इच्छा का बच्चा है । इच्छा की सीमा से निकल कर भाकांक्षा अभ्यास ही की सीमा में भाती है। अभ्यास अर्थात् पादत ही के कारण हमारी भावनाओं तथा पाचरणों-दोनों-में निश्चयता माती है । यह बहुत आवश्यक है कि मनुष्य परस्पर एक दूसरे की भावनामों तथा आचरणों पर भरोसा रक्खें तथा प्रत्येक मनुष्य में भी अपनी भावनाओं तथा प्राचरणों पर भरोसा रखने की क्षमता होनी चाहिये । इस कारमा ठीक करने की माकांक्षा को बढ़ाते२ अभ्यास अर्थात् भादत्त की दशा को पहुंचा देना चाहिये । दूसरे शब्दों में भाकांक्षा की यह दशा इष्ट (Good) का एक साधन है असली इष्ट नहीं है। इस कारण आकांक्षा की यह दशा इस सिद्धान्त का विरोध नहीं करती कि मनुष्यों

चौथा अध्याय
१७
के लिये कोई वस्तु उसी समय तक इष्ट है जब तक कि यातो
वह स्वयं सुखद हो या सुख पाने अथवा कष्ट दूर करने
का साधन हो।
किन्तु यदि यह मत ठीक है तो उपयोगितावाद का सिद्धान्त
भी प्रमाणित होजाता है। यह मत ठीक है या नहीं-इस बात
का निर्णय हम विचारशील पाठकों पर छोड़ने हैं।

पांचवां अध्याय।
न्याय से सम्बन्ध
प्रा
चीन काल से उपयोगिता या सुख को प्राचार
शास्त्र की कसौटी मानने में एक बड़ी रुकावट
यह रही है कि क्या ऐसा मानना न्याय-विरुद्ध
या अनुचित तो नहीं है। उचित या अनुचित
का ख्याल इतने अधिक अंश में रहता है कि बहुत
से तत्त्वज्ञानियों का यह विचार होगया है कि
वस्तुओं में एक प्रान्तरिक ( Imherent ) गुण हैं जो इस बात
को प्रगट करता है कि 'उचित' का प्रकृति में पृथक् अस्तित्व
है तथा भौचित्य
सुसाधकता
से भिन्न है।
अन्य नैतिक स्थायी भावनाओं के समान इस भावना में
भी भावना की उत्पत्ति तथा व्यापकता में कोई प्रावश्यक संबंध
नहीं है । केवल किसी भावना के प्रकृति-दत्त होने के कारण ही
हमको प्रत्येक दशा में उस भावना का नेतृत्व मानना प्रावश्यक
नहीं हो जाता । उचित का ख्याल एक सहज क्रिया (Instinct)
हो सकता है किन्तु फिर भी अन्य सहज क्रियाओं के समान

पांचवां अध्याय ६६ 'उचित' की भावना को उच्चतर विवेक द्वारा समझने तथा वश में रखने की आवश्यकता हो सकती है। यदि हमारे अन्दर मानसिक सहज क्रियायें हैं जो हमको किसी विशेष रूप से निर्णय करने की प्रेरणा करती है तथा पशु-सहज क्रियायें (Animal instincts the feet जो किसी कार्य को किसी विशेष प्रकार करने की प्रेरणा करती हैं तो यह आवश्यक नहीं है कि अन्तिम सहज क्रियाओं की अपेक्षा पहिली सहज क्रियाओं को अपने काम में अधिक अविलुप्तधी अर्थात भूल से रहित ( Infallible ) होना चाहिये । जिस प्रकार कभी २ पशु सहज क्रियाये गलत काम करने की प्रेरणा करती हैं उसी प्रकार मानसिक सहज क्रियायें भी कभी २ ग़लत निर्णय करने की प्रेरणा कर सकती हैं । यद्यपि यह विश्वास करना कि हमारे अन्दर न्याय या इन्साफ़ की प्राकृतिक भावनायें हैं तथा इन भावनाओं को प्राचग्गा की अन्तिम कसौटी मानना दो भिन्न २ बातें हैं, किन्तु वास्तव में इन दोनों मतों में बहुत घनिष्ट सम्बन्ध है । मनुष्य जाति का यह पहिले ही से विश्वास रहा है कि कोई श्रात्म-गत भावना (Subjective feeling) किसी और तरह से नहीं समझा सकते-किसी अनात्म सम्बन्धी वास्तविकता (Objective reality) का ईश्वरादेश है । इस समय हमारा उद्देश्य इस बात के निर्णय करने का है कि क्या न्याय की भावना ऐसी भावना है जिसके लिये किसी विशेष ईश्वगदेश की आवश्यकता हो ? क्या किसी कार्य का न्याय- संगत या न्याय-विरुद्ध होना कोई ऐसी चीज़ है जो उस कार्य में विशेष रूप से विद्यमान हो तथा उसके अन्य सारे गुणों से पृथक् हो अथवा न्याय-संगत या न्याय-विरुद्ध होना उस कार्य के कतिपय गुणों का संगठन है जो एक विशेष रूप धारण कर जिसको हम - न्याय से सम्बन्ध लेता है। यह बात जानने के लिये इस बात पर विचार करना मावश्यक है कि क्या न्याय तथा अन्याय की भावना रंग तथा स्वाद की चेतनाओं के समान अव्युत्पन्न है या अन्य भावनाओं के मेल से बनी हुई व्युत्पन्न भावना हैं । इस विषय पर प्रकाश डालने के लिये इस बात के जानने का प्रयत्न करना प्रावश्यक है कि न्याय या अन्याय की क्या पहचान है। न्याय-विरुद्ध समझे जाने वाली तमाम भाचरण- पद्धतियों में क्या कोई सामान्य गुण है जिस से इस बात का पता चल सके कि अमुक प्राचग्ण-पद्धतियां न्याय-विरुद्ध होने के कारण नापसन्द की जाती है तथा अमुक भाचरण- पद्धतियां अन्य कारणों से ? यदि ऐसा कोई सामान्य गुण है तो वह क्या है ? यदि प्रत्येक बात में जिसे मनुष्य न्याय-संगत या न्याय-विरुद्ध समझते हैं कोई सामान्य गुण या सामान्य गुणों का समुदाय सदैव उपस्थित रहता है तो हम इस बात का निर्णय कर सकते हैं कि क्या यह सामान्य गुण या गुण- समुदाय उस वस्तु के चारों भोर हमारे मनोविकारों के संगठन के साधारण नियमों के अनुसार उपरोक्त विशेष स्थायी भाव (Sentiment ) उत्पन्न कर सकते हैं या इस प्रकार के स्थायी भाव का स्पष्टीकरण नहीं किया जा सकता और इस कारण इस को प्रकृति का विशेष प्रबन्ध चाहिये । पहिली बात ठीक निकलने की दशा में तो इस प्रश्न के स्पष्ट होने के साथ २ ही प्रसनी समस्या भी स्पष्ट हो जाती है। किन्तु यदि दूसरी बान ठीक निकले तो हम को किसी और उपाय का सहारा लेना होगा। भिन्न २ वस्तुओं के सामान्य गुणों को मालूम करने के लिये हम को पहिले उन वस्तुओं का निरीक्षण करना पड़ेगा। --- पांचवां अध्याय १०१. इस कारण हमें उन भिन्न २ प्राचरण-पद्धतियों पर विचार करना चाहिये जिन को सब मनुष्य या अधिकतर मनुष्य न्याय- संगत या न्याय-विरुद्ध मानते हैं। १. किसी की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, जायदाद या और कोई चीज़ जिस का वह कानूनन अधिकारी है छीन लेना अधिकतर न्याय-विरुद्ध समझा जाता है। यहां पर न्याय-संगत तथा न्याय-विरुद्ध शब्दों का बिल्कुल सीमा-वद्ध अर्थों में प्रयोग हुवा है । अर्थात् किसी मनुष्य के कानूनी अधिकारों का ध्यान रखना न्याय-संगत है तथा उस के कानूनी अधिकारों की भव- हेलना करना न्याय-विरुद्ध है। किन्तु इस निर्णय में भी न्याय तथा अन्याय के ख्याल को दूसरे रूप में लेने के कारण कई अपवाद हो सकते हैं। उदाहरणतः वह मनुष्य जिस के अधिकार छीन लिये गये हैं उन अधिकारों को खो बैठा हो । इस उदाहरण की हम अभी मागे चल कर व्याख्या करेंगे। किन्तु साथ साथ:- २. ऐसा भी हो सकता है कि वे कानूनी अधिकार जो छीन लिये गये हैं ऐसे अधिकार हों जिन का अधिकारी वह मनुष्य होना ही नहीं चाहिये था अर्थात् वह कानून जो उस को वे अधिकार देता है दूषित कानुन हो । अब ऐसा हो या जब ऐसा समझा आय-हमारे मतलब के लिये दोनों बाते एक हैं तो इस बात पर मतभेद होगा कि इस प्रकार का कानून तोड़ना न्याय-संगत अर्थात् उचित है अथवा न्याय-विरुद्ध अर्थात अनुचित । कुछ विद्वानों की राय है कि किसी नागरिक को कभी भी किसी कानून को भंग नहीं करना चाहिये चाहे वह कैसा ही दूषित कानून क्यों न हो । अधिक से अधिक न्याय से सम्बन्ध इतना किया आ सकता है कि अधिकारी वर्ग से उस कानून को बदलवाने का प्रयत्न किया जाय । इस मत के अनुसार बहुत से लब्धप्रतिष्ठ मनुष्य जाति के उपकारक निन्दनीय ठहरते हैं । इस मत के अनुसार भयंकर संस्थाएं, जिनके नाश करने में प्राधुनिक स्थिति में एक मात्र इस ही हथियार के थोड़ा बहुत कृतकार्य होने की आशा हो सकती है, बहुधा रक्षित हो जायेगी। इस मत के मानने वाले मस्लहत की बिना पर अपने कथन का समर्थन करते हैं। विशेष दलील वह यह देते हैं कि मनुष्य जाति के सार्वजनिक हित के लिये कानून उल्लंघन न करने का भाव बना रहना, श्रावश्यक है। दूसरे विद्वानों का बिल्कुल इसके विपरीत मत है। उनका कहना है कि यदि कानून अनुचित या मस्लहत के विरुद्ध हो तो उसको तोड़ने में कोई दोष नहीं है । बहुत से विद्वान् कहते हैं कि केवल अनु- चित क़ानूनों ही को तोड़ना चाहिये । किन्तु कुछ विद्वानों का कहना है कि जो कानून मस्लहत के विरुद्ध है वे अनुचित भी हैं। प्रत्येक कानून मनुष्यों की प्राकृतिक स्वतन्त्रता में कुछ बाधा डालता है । जब तक इस बाधा में मनुष्यों का कुछ लाभ न हो यह बाधा अनुचित है। इन भिन्न २ मतों से यह बात सर्व- सम्मत मालूम पड़ती है कि अनुचित कानून भी हो सकते हैं । इस कारण कानून न्याय या उचित का अन्तिम निर्णायक नहीं हो सकता । कानून किसी प्रादमी को फायदा पहुंचा 'सकता है, किसी को हानि । यह बात न्याय के विरुद्ध है। किन्तु जब कभी कोई क़ानून अनुचिन समझा जाता है तो इसी कारण अनुचित समझा जाता है कि उससे किसी व्यक्ति के अधिकार पर व्याघात पहुंचता है । उस व्यक्ति के इस अधिकार को, जिस पर कानून व्याघात पहुंचाता है, हम

पांचवां अध्याय
कानूनी अधिकार तो कह नहीं सकते । इस कारण इस अधिकार
को दूसरे नाम से पुकारते हैं । इस अधिकार को नैतिक अधि-
फार कहते हैं। इस कारण हम कह सकते हैं कि दूसग अन्याय
या नाइन्साफ़ी उस दशा में होती है जब हम किसी व्यक्ति का
नैतिक अधिकार छीनते हैं
३. इस बात को सब लोग ठीक या उचित समझते हैं
कि प्रत्येक व्यक्ति को वह चीज़ मिलनी चाहिये जिसका वह
अधिकारी है-चाहे वह चीज़ अच्छी हो या बुरी । यह बात
अनुचित समझी जाती है कि किसी मनुष्य को ऐसा लाभ
कगया जाय या ऐसी हामि पहुंचाई जाय जिसका वह अधि-
कारी नहीं हैं । साधारणतया मनुष्य उचित या अनुचित अर्थात
न्याय-संगत या न्याय-विरुद्ध अथवा इन्साफ या ना इन्साफ के
भाव को इस रूप में समझते हैं । चूंकि अधिकारी होने का
सवाल है, इस कारण प्रश्न होता है कि अधिकारी कैसे होता है?
साधारणतया यदि कोई मनुष्य ठीक काम करता है तो वह
भलाई का अधिकारी समझा जाता है । यदि गलत काम
करता है तो बुराई का अधिकारी समझा जाता है। विशेषतया
यदि कोई मनुष्य किसी के साथ नेकी करता है तो इस बात का
अधिकारी हैं कि वह मनुष्य भी उसके साथ नेकी करे । इसी
प्रकार यदि किसी के साथ बुगई करता है तो इस बात का
अधिकारी है कि वह मनुष्य भी इसके साथ बुराई करे। बुराई
के बदले भलाई का उपदेश कभी इस बात को दृष्टि में रख कर।
नहीं किया गया है कि ऐसा करना इन्साफ़ है । इस प्रकार के
उपदेश में तो अन्य बातों को
ख्याल
में रखकर इन्साफ की
बात को छोड़ दिया जाता है।

१०४॥
न्याय से सम्बन्ध
निम्न लिखित बाते सब लोग अनुचित समझते हैं:
(१) किसी के साथ विश्वास-घात करना।
(२) किसी (Engagement)
को तोड़ना-चाहे स्पष्ट हो
याभस्पष्ट ।
(३) अपनी बातों या अपने कामों से प्राशा बंधा कर
निराश करना। कम से कम उस समय तो अवश्य ही जब
हमने जान-बूझ कर तथा अपनी इच्छा से प्राशाय बंधाई हो ।
पूर्वोल्लिखित बातों के समान, जिनका करना न्याय की दृष्टि से
हमारा कर्तव्य है, यह बात अनन्य-सम्बन्ध (Absolute)
नहीं समझी जाती है। किन्तु न्याय की दृष्टि से हमारा यह
कर्तव्य भी हो सकता है कि हम इस बात की अवहेलना करें ।
अथवा वह मनुष्य जो हम से लाभ पाने की भाशा कर रहा
है, कोई ऐसा काम कर बैठे कि जिससे फिर हमारा यहे
कर्तव्य नहीं रहे कि हम उसे लाभ पहुंचावें ।
(४) इस बात को भी सब मानते हैं कि पका-पात
करना न्याय या इन्साफ के विरुद्ध है। ऐसी बातों में, जहां
पक्षपात ठीक नहीं है, किसी मनुष्य को दूसरे मनुष्य पर प्रका-
रण तरजीह देना अन्याय या बेइन्साफी समझा जाता है।
किन्तु ऐसा मालूम पड़ता है कि पक्षपात-रहित होना इस
कारण उचित नहीं समझा जाता है क्योंकि पक्षपात रहित होना
ही कर्तव्य है। पक्षपात रहित होने से हम किसी दूसरे कर्तव्य
को पूरा करते हैं । इस ही कारण पक्षपात-रहित होना कर्तव्य माना
जाता है क्योंकि यह बात मानी हुई है कि विशेष कृपा
Favour ) या तरजीह सदेव निन्दनीय नहीं है । वास्तव
में वे दशायें जहां पर विशेष कृपा तथा तरजीह निन्दीय है
।

पांचवां अध्याय १०५ अपवादरूप हैं नियम नहीं। यदि कोई मनुष्य अच्छी नौकरी देने में अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों को प्रजनबियों पर तर. जीह देता है और ऐसा करने में अपने किसी दूसरे कर्तव्य से च्युत नहीं होता तो ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं है। बल्कि तरजीह न देने की दशा ही में निन्दा होने की अधिक सम्भा- वना है। किसी विशेष मनुष्य को अपना मित्र, सम्बन्धी या साथी बनाना कोई भी अनुचित या अन्याय नहीं समझता है। जहां अधिकारों का प्रश्न है वहां पर निष्पक्षपात होना बेशक कर्तव्य है । किन्तु निष्पक्षपात होना इस बात के अन्तर्गत आ जाता है कि प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि दूसरे को उस का अधिकार दे। उदाहरणत: न्यायाधीश को पक्षपात हीन होना चाहिये क्योंकि उस का कर्तव्य है कि किसी विवाद-प्रस्त वस्तु को दोनों पार्टियों में से किसी पार्टी को बिना किसी अन्य प्रकार का ख्याल किये, उस के अधिकारी को देदे । बहुत सी ऐसी अवस्थायें हैं जहां पर निष्पक्षपात होने का अर्थ एक मात्र अधिकार का ध्यान रखना है। उदाहरणत: न्याया- धीशों, शिक्षकों, माता-पिताओं तथा शासकों को सज़ा या इनाम देने में निष्पक्षपात होना चाहिये । कतिपय अवस्थाओं में निष्पक्षपात होने का अर्थ यह भी है कि एक मात्र सार्व- जनिक हित का ध्यान रखा जाय, उदाहग्णत: सरकारी नौकरी के लिये उम्मेदवार चुनने में । संक्षेप यह कि न्याय अर्थात् इन्साफ की दृष्टि से निष्पक्षपात होने का प्राशय यह है कि जिस स्थान पर जिन बातों को ध्यान में रखना मावश्यक समझा जाता है वहां पर उन्हीं बातों को ध्यान में रख कर काम करे।

न्याय से सम्बन्ध जाता निष्पक्षपातता के ख्याल से करीब करीब मिलता-जुलता 'घराबरी' का ख्याल है । बहुधा 'बगबरी' के ख्याल को ध्यान में रख कर ही 'इन्साफ़ी' या 'बेइन्साफ़ी' का निर्णय किया जाता। बहुत से मनुष्यों का तो यहां तक विचार है कि इन्साफ़ अर्थात न्याय का विशेष प्राधार बराबरी का ख्याल ही है। प्रत्येक मनुष्य का विचार है कि न्याय समानता अर्थात् बराबरी चाहता है। यह बात दूसरी है कि कभी कभी मस्लहत के ख्याल से असमानता का बर्ताव आवश्यक हो जाय। जो लोग सब मनुष्यों के समान अधिकार नहीं मानते हैं वे भी इस बात को मानते हैं कि सब मनुष्यों के अधिकारों की समान रक्षा करना न्याय-संगत है। उन देशों में भी जहां गुलामी की प्रथा प्रचलित है कम से कम इतना माना अवश्य कि स्वामी के समान सेवक के अधिकार भी, जितने कुछ भी हों, ग्क्षणीय हैं । यदि कोई अदालत स्वामी सथा सेवक दोनों के साथ समान साक्षी का व्यवहार नहीं करती है तो वह अदालत इन्साफ़ से गिर जाती है। किन्तु साथ ही साथ वे संस्थायें भी अन्यायी नहीं समझी जाती हैं जो गुलामों को कुछ भी अधिकार नहीं देती हैं। क्योंकि उनका ऐसा करना मस्लहत के विरुद्ध नहीं समझा जाता है । जिन मनुष्यों का विचार है कि उपयोगिता के विचार से मत-भेद होना अवश्य है, वे धन के असमान बटवारे को बेइन्साफ़ी नहीं समझते। वे सामाजिक ऊंच नीच को न्याय के विरुद्ध नहीं समझते । किन्तु जिन लोगों का ख्याल है कि धन का असमान बटवारा तथा सामाजिक ऊंच नीच मस्जहत के खिलाफ़ है वे इस प्रकार की बातों को बेइन्साफ़ी समझते हैं । जो मनुष्य सरकार को ।

पांचवां अध्याय
१०७
भावश्यक समझता है वह इस बात को बन्साफ़ी नहीं समझता
कि मजिस्ट्रट को क्यों वे अधिकार देदिये गये हैं जो साधारण
मनुष्यों को नहीं हैं । बराबरी का सिद्धान्त मानने वालों
में भी मत-मंद है । कुछ साम्यवादियों का कहना है कि समाज
के श्रम की पैदावार एक मात्र बगवरी का धान रन कर बांटी
जाना चाहिये । दूसरे साम्यवादियां का कहना है कि जिसको
सब से अधिक आवश्यकता हो वसं सबसे अधिक मिलना
चाहिये । कुछ ऐल साम्यवादी भी हैं जिनका विचार है कि
ऐसे मनुष्य को, जो अधिक कठिन काम करता है या
जिसकी सेवा समाज के लिये अधिक मूल्यवान है, कुछ अधिक
ददेना अनुचित नहीं है। इन सब मतों के समर्थन में दलाल
दी जा सकती हैं।
न्याय या इन्साफ का शब्द इतने भिन्न स्थानों में व्यवहृत
होता है, किन्तु पर भी यह शब्द यथार्थ नहीं समझा जाता
है। इस कारण यह निर्धाग्नि करना कठिन काम है कि वह
मानांसर कंडी कौनसी है जिम ने इन सब भिन्न २ प्रयोगों
को बांच रक्खा है । स्यात् इस बात को समझने में न्याय, उचित
या इन्साफ़ शब्द की व्युत्पत्ति से कुछ सहायता मिल । इस
कारण इस शब्द की व्युत्पात्त पर विचार करना चाहिये।
यदि सब नहीं तो भी अधिकांश भाषाओं में उचित
शब्द के समानार्थ शब्दों की व्युत्पत्ति से पता चलता है कि
भारम्भ में इस शब्द का सम्बन्ध क़ नून या क़ नून के प्रारम्भक
रूप अर्थात् माने हुवे रिवाज से था। अंग्रेज़ा का । Just"
शब्द
Justum ' से निकला है और o Justun
+ : Jussum' का एक रूप है जिस के अय है वह जिस की

१०८ न्याय से सम्बन्ध तथा प्राज्ञा दीगई है।"Jus' की भी यही व्युत्पत्ति है । Recht' जिस से Right Righetous शब बने हैं, कानून का समानार्थक है । फ्रैंच भाषा में La Justice कानूनी अदालत के लिये प्राता है। यही बात लैटिन तथा ग्रीक भाषाओं में है । हीब्र लोग भी ईसा की उत्पत्ति के समय तक क़ानून के अनुसार बात ही को न्याय-संगत अर्थात् उचित मानते थे। ऐसा होना स्वाभाविक भी था क्योंकि हीव्र लोगों के क़ानून सब विषयों से-जिन के सम्बंध में उपदेश की श्रावश्यकता है-संबंध रखते थे तथा उन लोगों का विचार था कि ये कानून ईश्वर की भोर से हैं। किन्तु अन्य जातियां और विशेषतया यूनानी और रोमन लोग, जिनका ख्याल था कि कानूनों को प्रारम्भ में मनुष्यों ने बनाया था और अब भी मनुष्य ही बनाते हैं, यह बात स्वीकार करने में नहीं हिचकते थे कि यह भी सम्भव है कि कानून बनाने वाले मनुष्यों ने बुरे कानून बनाये हों। इस प्रकार सब क़ानूनों का उल्लंघन करना अनुचित नहीं समझा जाने लगा। केवल उन्हीं मौजूदा कानूनों का उल्लंघन करना अनुचित समझा जाने लगा जिन का होना उचित है । ऐसे कानूनों का उल्लंघन करना भी, जो हैं तो नहीं किन्तु जिनका होना उचित है, मामुनासिब समझा जाने लगा। ऐसे कानून भी, जो कानून होने योग्य नहीं समझे जाते थे, अनुचित समझे जाने लगे। इस प्रकार क़'नूनों के उचित तथा अनुचित की कसौटी न रहने पर भी न्याय के ख्याल के साथ २ कानून का ख्याल भी बराबर बना ही रहा । यह बात ठीक है कि मनुष्य जाति न्याय या इन्साफ के ख्याल को बहुत सी ऐसी बातों में भी व्यवहृत करती है जिनका पांचवां अध्याय १०६ सञ्चालन कानून के द्वारा नहीं होता है और न होना चाहिये। कोई मनुष्य यह नहीं चाहता कि घरेलू जीवन की छोटी २ बातों में भी कानून दस्तन्दाजी अर्थात् हस्ताक्षेप करे । किन्तु फिर भी प्रत्येक मनुष्य की धारणा है कि हम अपने सब दैनिक कार्य उचित या अनुचित करते हैं । किन्तु यहां पर भी उस बात को उल्लंघन करने का विचार, जो कानून होना चाहिये थी, परिवर्तित रूप में विद्यमान है । हम सदैव उन । कामों के लिये, जिनको हम अनुचित समझते हैं, दएड मिलता देखकर प्रसन्न होंगे, यद्यपि हम इस बात को मस्तहत के विरुद्ध समझते हैं कि सदैव इस प्रकार का दण्ड अदालतों के द्वाग दिया जाय । हम यह बात देख कर प्रसन्न होंगे कि उचित आचरण को बढ़ावा दिया जा रहा है तथा अनुचित प्राचरण को दबाया जा रहा है। यह बात दूसरी है कि हम न्यायाधीश को अन्य मनुष्यों की अपेक्षा इतना निस्सीम अधिकार तथा शक्ति देने से डरें । हम यह देख कर खुश होंगे कि शासक-चाहे वह कोई क्यों न हों-मनुष्यों को उचित कार्य करने के लिये विवश कर रहा है। यदि हम समझते हैं कि कानून द्वारा किसी उचित कार्य का पालन कराना मस्लहत के विरुद्ध या असम्भव है तो हमको बड़ा खेद होता है।हम अनुचित व्यवहार के लिये दएड न मिलना बुग समझते हैं और इस कारण उपरोक्त कमी को पूरा करने के लिये हम अनुचित कार्य करने वाले के प्रति बड़े जोर से अपनी तथा समाज की घृणा प्रकट करते हैं। इस प्रकार न्याय या उचित के भाव के साथ २ कानून का बन्धन फिर भी बना ही रहता है । निस्सन्देह कानून तथा न्याय या उचित के सम्बन्ध में, जिस अर्थ में न्याय से सम्बन्ध है। उचित शब्द का व्यवहार उन्नत समान में होना है, बहुत कुछ परिवर्तन हुवा मेरे विचार में न्याय गा उचित के विचार की उपरोक्त उत्पत्ति तथा वर्धमान विकाश का वृत्तान्त बिल्कुल ठीक है । किन्तु अभी तक यह बात माफ़ नहीं हुई है कि माधाण कर्तव्य तथा नैतिक कर्तव्य में क्या अन्तर है। वास्तविक बान तो यह है कि दण्ड के विधान का विचार, जो कानून या मार है, केवल अनुचित ही के लिये नहीं होता वरन सब प्रकार के दोषों के लिये होता है। हम कभी किसी बान को ठीक कहते ही नहीं जब तक कि हमाग यह श्राशय नहीं होना कि ऐमा काम न करने वाले को किसी न किसी प्रकार दराड मिलना चाहिये । यदि क नून से ऐसा उगड नहीं मिलना तो मगाज की मम्मनि द्वाग मिलना चाहिये । इस प्रकार भी न हो सके तो ऐमा होना चाहिये कि उम की अन्तगत्म (Conscience) ही ऐसे काम के लिये उस को लानत मलामन करती रहे । ऐसा मालूम पड़ता है कि माधारण म मानहन नथा प्राचार नीति में वास्तव में नहीं से भेर पड़ना प्रारम्भ होता है। चाहे हम किसी रूप में कर्तव्य (Duty) की कल्पना क्यों न करें, हमाग यह श्राराय होता है कि कर्तव्य वह है जिमका पालन करने के लिये प्रत्येक मनुष्य को विवश करना ठीक हो । जिम प्रकार किसी मनुष्य से ज़बर्दस्ती क़र्जा व पिम लिया जाता है उसी प्रकार उस से ज़बर्दम्ती कर्तव्य का पालन कगया जा सकता है । अब तकहम यह नहीं समझते कि किसी बात का ज़बर्दस्ती कगना ठीक है तब तक हम उम बात को कर्तब्य ही नहीं कहते। यह बात दूसरी है कि दूरदर्शिता अथवा अन्य मनुष्यों के हित के विचार से हम किसी पांचयां अध्याय VAAAAPhonKAMAA मनुष्य को कर्तव्य-पालन करने के लिये वास्तव में विवश न करें किन्तु यह बात माफ़ नौर से ममझी जानी है कि यदि हम उस मनुष्य को कर्तव्य पालन के लिये विवश करेंगे तो उस मनुष्य को शिकायत का कोई अधिकार न होगा । इस के विपरीत बहुत सी ऐसी बातें भी हैं जिन को हम चाहते हैं कि और अदमी करें तथा हम उन बातों को करने के लिये करने वालों को पसन्द करते हैं या उनकी प्रशंसा करते हैं; किन्तु फिर भी हम यह मानते हैं कि वे प्रादमी ऐसा करने के लिये विवश नहीं हैं अर्थात ऐमा करना उनका नैतिक कर्तव्य (Moral obligation) नहीं है। ऐसा न करने के कारण हम उन की निन्दा नहीं करने अर्थात हम इस बात के लिये उन को दण्ड का उचित पात्र नहीं ममझने । दयड के उचित पात्र होने या न होने का बिचार कैमे उत्पन्न हुवा-इमका पना स्यात् भागे चलकर चलेगा; किन्तु मेरः ख्याल है कि निस्सन्देह ठीक या बे ठीक अर्थात् गलन' की कल्पना की तह में यह भेद ही काम कर रहा है। हम किसी अचमा को उम सीमा तक गलत समझते हैं या किसी अन्य प्रकार से अपनी प्रस्त्रीकृति देते हैं, जिम सीमा तक हम यह समझते हैं कि उक्त काम के लिये डण्ड मिलना चाहिये या नहीं । हम कहते है कि ऐमा २ करना ठीक होगा या केवल प्रशमनीय होगा जब कि हमारी इच्छा होती है कि ऐसा करने के लिये उस मनुष्य को, जिम का इस कार्य से संवन्ध है, इस प्रकार करने के लिये विवश किया जाये, प्रलोभन दिया जाय या जबरदस्ती की जाय । उपरोक्त बात साधाग्गा प्राचार नीति तथा मसलहत और प्रशंसनीयता (Worthiness) का भेद बताती है। अभी न्याय न्याय से सम्बन्ध अर्थात इन्साफ़ और भाचाग्नीति की अन्य शाखाओं का भेद मालूम करना है । प्राचारशास्त्र के लेखकों ने नैतिक कर्तव्यों के दो भेद किये हैं। एक तो वे कर्तव्य होते हैं जिन को करना यद्यपि प्रावश्यक है, किन्तु जिन को करने के अवसर हमारी इच्छा पर छोड़ दिये जाते हैं, जैसे दान या उपकार के काम । दान देना तथा उपकार करना हमाग धर्म है किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि किसी विशेष मनुष्य ही को दान दें या उसका उपकार करें तथा किसी निर्धारित समय पर ही ऐसा करें । इस प्रकार के कर्तव्य अपूर्ण कर्तव्य कहे जाते हैं दूमरे वे कर्तव्य होते हैं जिन का पालन करना सदैव प्रावश्यक होता है। इस प्रकार के कर्तव्यों को पूर्ण कर्तव्य कहते हैं। अधिक नपी तुली दार्शनिक भाषा में हम इस प्रकार कह सकते हैं कि पूर्ण काव्य वे होते हैं जिन के साथ २ कोई मनुष्य या कतिपय मनुष्य अधिकार के पात्र हो जाते हैं । अपूर्ण कर्तव्य वे होते हैं जिनके कारण कोई अधिकार का पात्र नहीं होता। मेरे विचार में ठीक यही भेद न्याय अर्थात् इनसाफ तथा अन्य नैतिक कर्तव्यों में है। न्याय शब्द के भिन्न २ साधारण प्रयोगों के जो उदाहरण इस अध्याय के प्रारम्भ में दिये गये हैं उन सब उदाहरणों में साधारणतयाः व्यक्तिगत अधिकार या हक़ का भाव मौजूद है। चाहे अन्याय या बे इन्साफ़ी किसी का माल छीनने में हो, चाहे उसके साथ विश्वासघात करने में हो, या उसके साय ऐसा बर्ताव करने में हो जिसका वह अधिकारी नहीं है, या उसके साथ उन मनुष्यों की अपेक्षा बुरा व्यवहार करने में हो जिन के दावे (Claim) उस से अधिक नहीं हैं। प्रत्येक दशा में न्याय की कल्पना में दो बातें मौजूद हैं—एक तो दूषित कार्य जो हुवा है और दूसरे वह मनुष्य जिस के साथ दुषित कार्य हुवा है। किसी पांचवां अध्याय मनुष्य के साथ दूसरे मनुष्यों की अपेक्षा अच्छा बर्ताव करने से भी अन्याय हो सकता है। किन्तु इस दशा में हानि उस मनुष्य के प्रतिद्वन्दियों को पहुंचती है । मेरी समझ में यह बात अर्थात् नैतिक कर्तव्य के साथ २ किसी मनुष्य में अधिकार का होना-न्याय तथा उदारता या परोपकार का विशेष भेद है। न्याय से केवल उसी बात का प्राशय नहीं होता है जिस का करना ठीक है और जिस काम करना गलत है वरन् न्याय से उस चीज़ का माशय होता है जिस का दावा और कोई आदमी अपना नैतिक अधिकार बताकर हम पर कर सकता है। हमारी उदारना या हमारे परोपकार का पात्र बनने का किसी को मैतिक अंधिक र नहीं है, क्योंकि हम परं कोई नैतिक बन्धन नहीं है कि हम किसी विशेष व्यक्ति के प्रति उदारता दिखायें या उस का उपकार करें । जो उदाहरण इस ठीक परिभाषा के प्रतिकूल मालूम पड़ते हैं वे ऐसे उदाहरण हैं जो इसके बहुम ही अधिक अनुकूल हैं । यदि कोई प्राचार शास्त्री इस बात को प्रतिपादित करने का प्रयत्न करता है-जैसा कि कुछ प्राचार शास्त्रियों ने किया भी है-कि यदि कोई विशेष व्यक्ति नहीं तो भी कुल मिलकर मनुष्य जाति तो उस सब भल ई की अधिकारी है जो हम कर सकते हैं तो वह सत्क्षण ही अपने पूर्व पक्ष में उदारता तथा उपकार को न्याय के साथ सम्मिलित कर देता है। वह यह कहने के लिये विवश होता है कि यथा शक्ति प्रयत्न द्वाग हम समाज के भृणं से उमृण हो सकते हैं । इस प्रकार हमाग यथा शक्ति भलाई करने का प्रयत्न करना भृण चुकाने के समान हो जाता है। या वह यह भी कह सकता है कि जो कुछ समाज हमारे लिये करता है उस का बदला इस से कम कुछ नहीं हो सकता कि हम समाज की भलाई का यथा शक्ति है ११४ न्याय से सम्बन्ध Mainik प्रयत्न करें । इस दशा में भलाई करने का यथा शक्ति प्रयत्न कुनझता-प्रकाशन का रूप ग्रहण कर लेता है। यह दोनों बातें अर्थात् मृग का चुकाना तथा कृतज्ञता-प्रदर्शन न्याय के अन्तर्गत हैं। न्याय या इन्साफ के साथ अधिकार लगा हुवा परोपकार के साथ अधिकार-पात्रता का प्रश्न नहीं है । जो न्याय अर्थात् इन्साफ़ तथा साधारण प्राचार नीति में यह भेद नहीं मानता वह दोनों को गडबड कर देता है। इस बात को मालूम करने के बाद कि न्याय का विचार किन २ भिन्न २ बत्वों से बनता है हम को यह बात भालूम करने का प्रयत्न करना चाहिये कि जो भावना इस विचार के साथ उठती है वह कोई विशेष नैसर्गिक देवाज्ञा है या यह भावना कतिपय ज्ञान नियमों के अनुसार इस विचार ही से विकसित हुई है और विशेषतया क्या इस प्रकार की भावना मस्लहत के विचार से उत्पन्न हो सकती है ? मेरा विचार है कि न्याय का भाव ( Sentiinent ) किसी ऐसी चीज से उत्पन्न नहीं होना मिस को हम साधारण- सया या ठीक तौर से मस्लहत का विचार कह सकते हों; किन्तु 'न्याय' या 'इन्साफ' के विचार में जो कुछ प्राचाग्युक्तता बह मसलहत के विचार से उत्पन्न हुई है। हम प्रमाणिन कर चुके हैं कि 'न्याय' की भावना के दो मुख्य अवयव ( Ingredienis ) ये हैं ---उस मनुष्य को दयह देने की इच्छा जिस ने हानि की है तथा इस बात का ज्ञान या विश्वास कि कोई मनुष्य या कुछ मनुष्य ऐसे हैं जिन को हानि पहुंची है।

पांचवां अध्याय मुझे यह प्रतीत होता है कि किसी को हानि पहुंचाने वाले को दण्ड देने की इच्छा दो भावों से खुद बखुद पैदा होती है। ये दो भाव प्रात्म-रक्षा का भावेग तथा सहानुभूति की भावना है। ये दोनों भाव बिल्कुल प्राकृतिक हैं भोर यातो निसर्ग (Instincts) हैं या निसर्ग से मिलते जुलते हैं। यह प्राकृतिक है कि यदि हम को या उन मनुष्यों को, जिन से हमें सहानुभूति है, हानि पहुंचाई जायगी तो हम को बुरा मालूम देगा या हम उस हानि को रोकने या उस हानि का बदला लेने की चेष्टा करेंगे। यहां पर इस प्रकार के भाव की उत्पत्ति के विषय में वाद-विवाद करने की प्रावश्यकता नहीं है। चाहे यह निसर्ग हो या मनीषा का परिणाम हम सब 'मानते हैं कि ऐसा करना सब पशुओं की प्रकृति में है क्योंकि हम देखते हैं कि प्रत्येक जानवर उन को हानि पहुंचाने का प्रयत्न करता है जो इस को या उस के बच्चों को हानि पहुंचाते हैं या जिन को वह समझता है कि हानि पहुंचाने वाले हैं। यहां पर मनुष्यों तथा अन्य जानवरों में दो बातों का भेद है। पहिली बात तो यह है कि मनुष्यों में मनुष्य जाति तथा सब ज्ञान-ग्रहण-शील सृष्टि के प्रति सहानुभूति होना संभव है। अन्य जानवर अपने बच्चों के साथ ही सहानुभूति. रखते हैं। कुछ उच्च श्रेणी के नानवर ( Noble ) ऐसे बड़े जानवर के साथ भी सहानुभूति रखते हैं जो उन पर मेहरबान होता है। दूसरी बात यह है कि मनुष्यों की बुद्धि अधिक विकसित होती है। इस कारण भावों का, चाहे भात्म-सम्बन्धी हो चाहे सहानुभूति विषयक-डायरा अधिक बड़ा होता है । सहानुभूति का दायरा बड़ा होने के विचार को छोड़कर भी मनुष्य अपनी अधिक १ न्याय से सम्बन्ध vom विकसित बुद्धि के कारण अपने तथा मनुष्य समाज के हित के सम्बन्ध को जिस का वह एक सभ्य है समझ सकता है। वह जान सकता है कि जिस प्राचरण से साधारणतया समाज की हस्ती ( Security ) खतरे में पड़ती है उस की हस्ती भी खतरे में पड़ती है। इस कारण इस प्रकार के भाचरण पर उस के अन्दर प्रात्म-रक्षा का निसर्ग ( यदि यह बात निसर्ग हो ) मागृत हो जाता है । इस अधिक विकसित बुद्धि तथा साधारण- तया मनुष्य जाति के प्रति सहानुभूति का भाव रखने की क्षमता के कारण ही मनुष्य अपनी जाति, अपने देश तथा मनुष्य जाति का इस प्रकार ख्याल कर सकता है कि जिस से उनको हानि पहुंचाने वाले कार्यों को देखकर उसके अन्दर सहानुभूति तथा बदला लेने के भाव जागृत हो जाते हैं। इस प्रकार न्याय के भाव में दण्ड देने की इच्छा का अवयव उस हानि का जो हमको या समाज को पहुंचती है, बदला लेने की प्राकृतिक भावना है। बदला लेने के ख्याल में स्वत: कोई प्राचार नीति नहीं है। जो प्राचार नीति वह यह है कि हम इस ख्याल को बिल्कुल सामाजिक सहानुभूति के आधीन कर देते हैं । प्राकृतिक भावना तो यह है कि किसी मनुष्य का जो कुछ भी काम हमें अरुचिकर हो हम उस से बुग माने अर्थात् क्रुद्ध हों, किन्तु समाज का ख्याल मा जाने के कारण हम उन कामों से बुरा मानते हैं जो समाज के लिये अहितकर हों । उदाहरणतः मनुष्य ऐसे काम से क्रुद्ध होते हैं जो यद्यपि उन के लिये अहितकर नहीं होता है वग्य समाज के लिये हानिकारक होता है। बहुत से मनुष्य कहेंगे कि अब हम में इस प्रकार का भाव उत्पन्न होता है कि अन्याय हो रहा है तो हम उस समय समाज ।

पोचवा अध्याय या सामुदायिक हित का ध्यान नहीं रखते हैं वरन् किसी व्यक्ति का ख्याल करते हैं। किन्तु इस प्रकार का कथन इस सिद्धान्त के विरुद्ध कोई प्राक्षेप नहीं है । बेशक साधारणतया मनुष्यों को इस कारण क्रोध पाता है कि उन्हें कष्ट पहुंचा है। किन्तु यह मनुष्य, जिस में इस प्रकार के क्रोध का भाव नैतिक भाव ( Moral feeling ) है अर्थात् जो क्रोध करने से पहिले इस बात का विचार करता है कि काम निन्दनीय है भी या नहीं, चाहे प्रगट रूप से अपने दिल में यह न कहे कि मैं समाज का पक्ष ले रहा हूं किन्तु इस बात को अनुभव अवश्य करता है कि वह एक ऐसे नियम का पालन कर रहा है जो उस के तथा समाज के लिये हितकर है। यदि वह इस बात का अनुभव नहीं करता है अर्थात् यदि वह केवल इस ही बात का विचार करता है कि उस कार्य का उस पर क्या प्रभाव पड़ता है तो वह मनुष्य इस बात को नहीं जानता कि मैं सत्य पर हूं या नहीं। ऐसा मनुष्य अपने कार्यों के उचित या अनुचित होने का विचार नहीं करता है। इस बात को उपयोगितावाद के विरोधी माचार शास्त्रियों ने भी माना है। जब कान्ट (जैसा कि पहिले भी लिखा जा चुका है) प्राचार नीति का मुख्य सिद्धान्त यह बताता है कि इस प्रकार आचरण करो कि जिस से तुम्हारे पाचरण के नियम को सब सहेतुक धर्मवादी (Rationalists) कानून मान लें तो वह वास्तव में इस बात को मान लेता है कि जब कोई व्यक्ति किसी कार्य के प्राचार-युक्त होने का निर्णय करता है तो उस के दमारा में मनुष्य जाति या समाज का ख्याल रहना चाहिये । यदि कान्ट का यह भाशय नहीं है तो उस का कथन निरर्थक है। भला यह कैसे हो सकता है कि बिल्कुल खुदगर्जी से भरे हुवे नियम को सारे सहेतुक धर्मवादी

न्याय से सम्बन्ध
मान लेंगे। यदि कान्ट के कथन के कुछ अर्थ हो सकते हैं तो
यही होने चाहिये कि हमको ऐसे नियम के अनुसार भाचरण
करना चाहिये कि जिस नियम को सारे सहेतुक धर्मवादी सामु.
दायिक हित के विचार से मान लें।
अच्छी तरह समझाने के लिये सब बातों को फिर दुहराये
लेते हैं। 'न्याय' का विचार दो बातों की कल्पना करता एक
तो पाचरण का नियम और दूसरा वह भाव ( Sentiment )
जो इस नियम की अनुमति देता है। प्राचरण का नियम मनुष्य
मात्र के लिये समझा जाना चाहिये और उन के लिये हितकर
होना चाहिये । न्याय का भाव इस बात की इच्छा है कि जो
लोग भाचरण के नियम का उल्लंघन करें उन को दण्ड
मिलना चाहिये । इस के साथ २ किसी भादमी या बहुत से
मादमियों का भी ध्यान होता है जिन को आचरण का नियम
उल्लंघन करने से हानि पहुंचती है और उनके अधिकार कुचले
जाते हैं। न्याय का भाव ( Sentiment ) मुझे इस बात की
प्राकृतिक इच्छा जान पड़ती है कि उन लोगों को हानि पहुंचाई
नावे जो हैम को या उन को जिन से हमें सहानुभूति है हानि
पहुंचावें। यह इच्छा सब जानवरों में पाई जाती है ।
इस समस्या पर विचार करते हुवे मैंने इस बात का वर्णन
किया है कि अन्याय होने पर किसी व्यक्ति या कतिपय व्यक्तियों
का अधिकार कुचला जाता है। अच्छा तो अधिकार कुचले
माने का क्या अर्थ है ? जब हम कहते हैं कि अमुक चीज़ पर
अमुक व्यक्ति का अधिकार है तो हमारा प्राशय होता है कि
उस व्यक्ति का समाज पर पूरा दावा है कि समाज उस व्यक्ति
को वह चीज़, कानुन की ताकत, शिक्षा अथवा लोक-मत के

पांचवां अध्याय द्वारा दिलवाये । हम इस बात को प्रमाणित करने के लिये, कि प्रमुक वस्तु पर अमुक व्यक्ति का अधिकार नहीं है, इस बात को प्रमाणित करते हैं कि समाज को उस वस्तु को उस व्यक्ति को दिलाने का प्रबन्ध नहीं करना चाहिये किन्तु उस वस्तु की प्राप्ति को उस व्यक्ति के भाग्य या उद्योग पर छोड़ देना चाहिये इस प्रकार हम कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य को अधिकार है कि किसी व्यवसाय में इमान्दारी के साथ स्पर्धा अर्थात् मुकाबिला करता हुवा जितना कमा सके कमाये क्योंकि समाज को नहीं चाहिये कि वह उस आदमी को ईमान्दारी के साथ यथाशक्ति कमाने से रोके । किन्तु उस आदमी को यह अधिकार नहीं कि वह ३००) मासिक कमायेगा, चाहे वह इतना कमा रहा हो क्योंकि समाज इस बात की ज़िम्मेदार नहीं है कि वह ३० अवश्य कमाये । इस के विपरीत यदि उस के पास तीन प्रतिशत व्याज का १० सहस्र पौण्ड का स्टाक अर्थात् कम्पनी काग़ज़ है तो उस का अधिकार है कि वर्ष भर में उसे ३०० पौन्ड मिले क्योंकि समाज पर ज़िम्मेदारी प्राजाती है कि वह उस को उसके मूलधन पर इतने पौण्ड की प्राय करावे । इस प्रकार मेरा विचार है कि अधिकार रखने का मतलब किसी ऐसी चीज़ को रखना है जिस को कब्जे से बाहर न जाने देना समाज का धर्म है । यदि कोई प्राक्षेप करने वाला मेरे से प्रश्न करे कि समाज को ऐसा क्यों करना चाहिये तो मैं इस के सिवाय कुछ उत्तर नहीं दे सकता कि सार्वजनिक हित के विचार से ऐसा करना चाहिये । यदि सार्वजनिक हित का विचार ऐसा करने के लिये काफी जोरदार प्रमाण नहीं मालूम पड़ता है तो उसका कारण यह है कि हमारे न्याय के भाव की नीव केवल हेतुवाद ही पर नहीं है वरन् इस भाव में पशु-प्रकृति अर्थात् बदला लेने भ्याय से सम्बन्ध की इच्छा भी बहुत हद तक शामिल है । यह बदला लेने की इच्छा इस कारण प्राचारयुक्त ठहगाई जा सकती है क्योंकि इस का एक बहुत बड़ी उपयोगिता से सम्बन्ध है । यह बहुत बड़ी उपयोगिता 'हिफाज़त' हैं। हमारे लिये हितकर बातों में सब से अधिक महत्वपूर्ण बात 'हिफ़ाज़त' है । और सारी सांसारिक लाभदायक बातें ऐसी हैं जिनकी एक प्राइमी को प्रावश्यकता है किन्तु दूसरे को नहीं है । इन लाभदायक बातों में से बहुन सी ऐसी हैं जिन को आवश्यकता पड़ने पर हम सहर्ष छोड़ सकते या उन के स्थान की अन्य प्रकार से पूर्ति कर सकते हैं । किन्तु बिना हिफाज़त' (Security ) के किसी आदमी का काम नहीं चल सकता । 'हिफ़ाज़त' होने की दशा ही में अन्य मनुष्य हमको हानि नहीं पहुंचा सकता। हिफ़ाज़त होने ही पर इष्ट पदार्थ हमारे काम के हैं नहीं तो क्षणिक उपयोग के अतिरिक्त इष्ट पदार्थों का हमारे लिये कोई मोल नहीं रहता क्योंकि यह अंदेशा बना रहता है कि ज्यूंही कोई हम से मज़बून आदमी हमको मिलेगा तत्काल ही हमें इन पदार्थों से वञ्चित कर देगा । इस कारमा उदर-पूर्ति के बाद सब आवश्यकताओं में सब से अधिक अनिवार्य श्रावश्यकता हिफ़ाज़त की है। और हिफ़ाज़त उस समय तक नहीं हो सकती जब तक कि वह संस्था, जिसके सुपुर्द हिफाज़त का काम हो, सदैव अपने काम पर मुस्तैद न रहे। इस कारण हमारी यह कल्पना--कि अन्य मनुष्यों का कर्तव्य है कि हिफाजन के काम में, जिस पर हमाग अस्तित्त्व तक निर्मर है, हमारा हाथ बटावे. -इतनी दृढ़ हो जाती है जिसनी अधिक साधारण उपयोगी कार्यों के विषय में नहीं होती । इस प्रकार हिफ़ाज़त का दावा अन्य उपयोगी कार्यों से बिल्कुल भिन्न हो जाता है और निरपेक्षता ( Absoluteness) wn~~~~ ~~~~~ पांचवां अध्याय १२१ ... का रूप धारण कर लेता है अर्थात् प्रत्यक में यह मालूम पड़ता है कि इस दावे का प्राधार अन्य बातों का ख्याल नहीं है । यदि न्याय का उपरोक्त विश्लेषण या स्पष्टीकरण न्याय की कल्पना का ठीक वृत्तान्त नहीं है-यदि न्याय का उपयोगिता के विचार से कुछ सम्बन्ध नहीं है, यदि न्याय ऐसा भादर्श है जिस को मस्तिष्क अपने ही अन्दर दृष्टि डाल कर जान सकता है तो समझ में नहीं पाता कि यह प्रान्तरिक मादेश कर्ता ( inner oracle ) इतना सन्दिग्ध क्यों है ? क्यों बहुत सी बातें एक प्रकार से विचार करने से उचित मालूम पड़ती है, और फिर दूसरी प्रकार से विचार करने से वे ही बातें अनुचित मालुम पड़ती हैं। sho हम से बार २ कहा जाता है कि उपयोगिता का प्रादर्श प्रनिश्चित है। प्रत्येक मनुष्य भिन्न २ प्रकार से अर्थ लेता है। इस कारण न्याय के आदर्शों का पालन उचित है जो नित्य (Inmutable), अनिवार्य ( Ineffaceable) तथा भूल से मुक्त (Unmitsakable ) है तथा जो अपने प्रमाण स्वयं है और जिन पर लोकमत के परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता । इस कथन से स्यात् कोई कल्पना करे कि न्याय से संबन्ध रखने वाले प्रभ निर्विवाद हैं तथा यदि हम 'न्याय' को अपने भाचरण का नियम बनाने तो प्रत्येक प्राचार के ठीक बे ठीक होने का निर्णय ऐसे असिन्दिग्ध रूप से होगा जैसे किसी गणित के प्रश्न के उत्तर के ठीक या गलत होने का निर्णय हो भाता है। किन्तु यह बात बिल्कुल गलत है। जितना विवादा- स्मक यह विषय है कि समाज के लिये क्या हितकर है और क्या अहितकर, उतना ही विवादात्मक यह विषय है कि क्या १२२ न्याय से सम्बन्ध । उचित अर्थात न्याय-संगत है और क्या अनुचित अर्थात् न्याय के विरुद्ध । केवल भिन्न २ जातियों तथा व्यक्तियों ही में न्याय की कल्पनायें भिन्न २ नहीं है कान एक ही व्यक्ति के मस्तिष्क में भीन्याय की कल्पना का आधार कोई एक नियम, सिद्धान्त या उसूल नहीं है। एक ही व्यक्ति की भी न्याय की कल्पना बहुत से नियमों, सिद्धान्तों या उसूलों से मिलकर बनती है। कभी २ ऐसा भी होता है कि इन भिन्न २ नियमों, सिद्धान्तों या उसूलों के प्रादेश समान नहीं होते हैं और ऐसी दशा में और उस समय वह व्यक्ति या तो किसी अन्य प्रादर्श का भासरा लेता है या अपनी ही पसन्द को काम में लाता है। उदाहरणत: कुछ प्रादमियों का कहना है कि किसी भादमी को इस कारण दण्ड देना, कि दूसरों को उदाहरण हो, अनुचित है । दण्ड उस ही दशा में ठीक है जब कि दण्ड भोगने वाले के फायदे ही के लिये दण्ड दिया जाय । दूसरे लोग इस से बिल्कुल उल्टी बात कहते हैं। उन का कहना है कि समझदार भादमियों को उन्हीं के फायदे के लिये दण्ड देना मादिग्शाही सथा अन्याय है। यदि केवल उन्हीं के फायदे का प्रश्न है तो अपने फायदे को वे स्वयं ही समझ सकते हैं। हां ! उन को इस काग्गा दण्ड दिया जा सकता है कि दूसरे प्रादमियों में वह बुराई न फैले । प्रात्म-रक्षा के विचार से ऐसा करना न्याय- संगत है। मिस्टर भोवेन ( Owen ) का कहना है कि दण्ड देना बिल्कुल ही अनुचित है क्योंकि मुजरिम ने अपना चरित्र प्राप ही नहीं बनाया है। अपनी शिक्षा तथा अपने चारों ओर की परिस्थिति के कारण मुमरिम बन गया है। इन सब बातों के लिये वह जिम्मेदार नहीं है । ऊपर से ये सब मन बिल्कुल पांचवां अध्याय १२३ युक्ति-संगत प्रतीत होते हैं। जब तक इन प्रश्नों पर केवल न्यायसंगत या उचित होने की दृष्टि से विचार किया जायगा और न्याय के उन प्राधारभूत सिद्धान्तों पर ध्यान न दिया जायगा जिन पर न्याय की प्रमाणिकता निर्भर है तो मेरी समझ में नहीं पाता कि उपरोक्त तीनों मतों में से किसी एक मत का खण्डन किस प्रकार किया जासकता है। तीनी मतों ने न्याय का सर्वसम्मत भिन्न २ प्राशय लिया है। पहिला मत कहता है कि यह मानी हुई बात है कि दूसरे भादमियों के भले के लिये किसी व्यक्ति की बिना उसकी इच्छा के कुरबानी करना अन्याय है। दूसरे मत का कहना है कि यह बात मानी हुई है कि प्रात्म-रक्षा का ध्यान न्याय-संगत है और यह अन्याय है कि किसी मनुष्य को उसकी इच्छा के विरुद्ध यह मानने के लिये विवश किया जाय कि अमुक काम उस के लिये हितकर है। प्रोवेन के अनुयायियों का कहना कि यह मानी हुई बात है कि किसी मनुष्य को ऐसे काम के लिये, जिसका वह ज़िम्मेदार नहीं है, दण्ड देना अनुचित है। इन तीनों मतों में से प्रत्येक मत उस समय तक खण्डनीय रहेगा जबतक कि उस मत के अनुयायियों को न्याय के उस उसूल के अतिरिक्त, जिस को उन्हों ने मान रक्खा है, किसी और उसूल को मानने के लिये विवश न किया जायगा । जब तक भिन्न २ उसूल रहेंगे, प्रत्येक मत अपने दावे के सबूत में बहुत कुछ कह सकेगा, प्रत्येक मत को अपनी ही न्याय की कल्पना स्थिर रखने के लिये न्याय की अन्य कल्पनाओं को, जो उस की कल्पना के समान ही प्रमाणिक हैं, कुचलना पड़ेगा। यह कठिनाइयां हैं। सदैव से तत्त्वज्ञानियों ने इन कठिनाइयों को अनुभव किया है। इन कठिनाइयों से बचने की बहुत सी युक्तिये भी सोची हैं। किन्तु उन युक्तियों से कठिनाइयां दूर नहीं होतीं, केवल उन का रुख

न्याय से सम्बन्ध
फिर आता है। उपरोक्त तीनों कठिनाइयों में से अन्तिम कठि-
नाई से बचने के लिये जो युक्ति सोची है वह इच्छा की
स्वतंत्रता कहाली है। दण्ड देने के कार्य को युक्ति-संगत प्रमा-
शित करने के लिये कहते हैं कि मुजरिम की इच्छा तो स्वतंत्र
थी। दूसरी कठिनाई से-अर्थात किसी मनुष्य को उस ही के
नाम के लिये दसड देना अनुचित है-बचने के लिये इस बात
की कल्पना करली गई है कि किसी प्रज्ञात समय में समाज के
सब सभ्यों ने इस बात का मुमाहिदा ( Contract ) कर
लिया था कि हम सब कानूनों का पालन करेंगे तथा उनके
उलंघन करने की दशा में दसड के पात्र होंगे और इस प्रकार
या तो अपने था समाज के लाभ के विचार से कानून बनाने
वालों को वह अधिकार दे दिया था जो ऐसा न करने की
दशा में उनको नहीं होता। यह ख्याल किया जाता था कि
इस दिल को खुश करने वाले विचार से सब दिक्कत दूर हो
गई है तथा दसड का देना न्याय-सङ्गत सिद्ध हो जाता है
क्योंकि यह बात मानी हुई है कि मनुष्य को उस ही की इच्छा
के अनुसार दण्ड देना अनुचित नहीं है। यह प्रमाणित करना
मनावश्यक है कि उपरोक्त विचार यदि केवल कल्पना-मात्र न
समझा जाय तो भी न्याय का यह उसूल-कि मनुष्य को सस
ही की इच्छा के अनुसार दण्ड देना अनुचित नहीं है-अन्य
उसूलों से, जो पेश किये जाते हैं, अधिक प्रमाणिक नहीं है।
इस बात से पता चलता है कि किस प्रकार बिना किसी नियम
का अनुसरण करे न्याय के कल्पित सिद्धान्त ( Supposed
principles ) बन जाते हैं। ऐसा मालूम पड़ता है कि यह
उसून तो कानूनी अदालतों की सहूलियत के लिये बना लिया
गया है। किन्तु कानूनी प्रदानते भी इस उसूल का पूर्णरूप से

पांचवां अध्याय
पालन नहीं कर सकती हैं क्योंकि इच्छापूर्वक किये हुवे मुभा-
हिदों को भी छल या कभी २ केवल भूल या गलत सूचना
की बिना पर रद कर देती हैं। अस्तु ।
दण्ड देने की न्याय-युक्तता को मान लेने पर भी
यह बात बड़ी विवादग्रस्त रहती है कि जुर्म के लिये कितना
दण्ड देना उचित है। न्याय के प्रारम्भिक तथा स्वाभाविक
भाव को कोई नियम इतना प्रबल नहीं मालूम पड़ता. जितना
यह नियम-कि. भांख मांख के लिये और दांत दांत के लिये ।
यहूदियों तया मुसलमानों के कानून के इस सिद्धान्त को यूरुपः
ने अमली उसूल मानना साधारणतया छोड़ दिया है । किन्तु
मुझे सन्देह है कि बहुत से मनुष्य दिल में इस बात को पसन्द
करते हैं। संयोगवश जब किसी मुजरिम को इस ही परिमाणा
में दण्ड मिलता तो जन साधारण सन्तुष्ट होते हैं । इससे पता
चलता है कि इस प्रकार के दण्ड का भाव कितना प्राकृतिक या.
स्वाभाविक है । कुछ आदमियों का विचार है कि जुर्म के.
अनुसार ही दण्ड देना उचित है अर्थात, मुजरिम को उसके
नैतिक अपराध (Moral guilt) के अनुसार दण्डः मिलना
चाहिये । नैतिक अपराध नापने का उनका पैमाना चाहे कुछ
भी हो, ये लोग इस बात का विचार नहीं करते कि किसी
जुर्म को करने से रोक के लिये कितने दण्ड की आवश्यकता
है। दूसरे मनुष्यों का कहना है कि दण्ड देते समय केवल
इस ही बात को ध्यान में रखना चाहिये कि कितना दण्डा
देना चाहिये जिससे फिर ऐसा जुर्म न हो । इन लोगों का
कहना है कि किसी मनुष्य का चाहे कुछ ही अपराध क्यों न
हो उसको इतना दण्ड देना उचित है कि जिससे वह मनुष्या

१२६ न्याय से सम्बन्ध फिर उस अफाध को दुबारा न करे तथा दूसरे लोग उसका अनुसरण न करें। इस से अधिक दण्ड देना उचित नहीं है। एक और विषय का, जिसका पहिले वणन हो चुका है, उदाहरण लीजिये। Co-operative Industrial Association में कार्य-दक्षता के कारण अधिक प्रतिफल देना न्याय- संगत है या नहीं ? जिन लोगों का विचार है कि कार्य-दक्षता के कारण अधिक प्रतिफल देना उचित नहीं है उन लोगों का है कि जो कोई भी यथाशक्ति प्रयत्न करता है बराबर प्रतिफल का अधिकारी है। जितना उससे हो सकता है वह करता है । यह उसका कसूर नहीं है कि वह अधिक दक्ष नहीं है। इस कारण उसे कम प्रतिफल देना उचित नहीं है। कार्य में अधिक दक्ष होनेवालों को तो और भी बहुत से लाभ हैं। उनकी प्रशंसा होती है । उनका प्रभाव अधिक होता है । दक्षता के कारण उनका चित्त अधिक प्रसन्न रहता है। इस कारण उसको अधिक प्रतिफल देने की आवश्यकता नहीं है। न्याय तो यह कहता है कि समाज को ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये कि जिससे सब मनुष्यों को उन्नति का समान अवसर रहे । समाज को उन लोगों के साथ और रियायत नहीं करनी चाहिये जिन्हे पहिले ही से उन्नति का अधिक अवसर है। जिन लोगों का विचार है कि कार्य-दक्षता के कारण अधिक प्रतिफल मिलना चाहिये उनका कथन है कि दक्ष कारीगर समाज का अधिक काम करते हैं तथा उनका काम अधिक फायदेमन्द होता है इस कारण वे लोग अधिक प्रतिफल के अधिकारी हैं। जो काम सब प्रादमी मिल कर करते हैं उस काम में दक्ष कारीगर का अधिक भाग होता है, इस कारण उसको अधिक -- पांचवां अध्याय १२७ । अनुसार उससे प्रतिफल न देना एक प्रकार का लुटेरापन है । यदि उसको औरों के बराबर ही प्रतिफल दिया जाता है तो उससे औरों के बगबर ही कामलेना चाहिये । उसकी अधिक दक्षता के कम समय काम लेना चाहिये तथा कम मेहनत कगनी चाहिये। न्याय के इन परस्पर विरोधात्मक सिद्धान्तों का निर्णय कौन करेगा ? दोनों पक्षवाले न्याय का प्राश्रय लेते हैं। दोनों न्याय के भिन्न २ रूप लेते हैं। एक पक्ष इस बात पर दृष्टि रखता है कि प्रत्येक व्यक्ति को कितना मिलना न्याय-संगत है । दूसरा पक्ष इस बात को ध्यान में रखता है कि समाज को कितना देना न्याय-संगत है। प्रत्येक का दावा उसके दृष्टिकोण के अनुसार श्रखण्डनीय है। न्याय की बिना पर किसी एक पक्ष को अधिक अच्छा केवल स्वेच्छानुसार ( Arbitrarily) ही बताया जा सकता है। एक मात्र सामाजिक उपयोगिता ही इस बात का निर्णय कर सकती है कि कौनसा पक्ष अधिक मान्य है। इसी प्रकार टैक्स लगाने के सम्बन्ध में भी बहुत से परस्पर विरोधात्मक न्याय के उसूल उपस्थित होते हैं। कुछ भादमियों का कहना है कि आर्थिक प्राय के अनुसार है टैक्स जगाना चाहिये । कुछ भादमियों की सम्मति है कि क्रमशः वर्धित कर ( Graduated taxation ) चाहिये अर्थात् जो आदमी अधिक बचा सकते हैं उन से अधिक प्रतिशत के हिसाब से टैक्स लेना चहिये । प्राकृतिक न्याय के न्याय के अनुसार श्रार्थिक प्राय पर बिलकुल भी ध्यान न देना चाहिये । प्रत्येक मनुष्य से जब तक मिल सके बराबर टैक्स लेना चाहिये जिस प्रकार किसी मैस या क्लब के सब मैम्बर-चाहे उनकी प्रार्थिक भाय कितनेही हो-समान ( Privilege) अधिकार के लिये बराबर १२८ भ्याब से सम्बन्ध चन्दा देते हैं। चूंकि सरकार कानून द्वारा सब की रक्षा करती है तथा सब को रक्षा की आवश्यकता होती है, इस कारण न्याय यही है कि सब से रक्षा करने का बराबर मूल्य लिया जाये । यह बात न्याय-संगत समझी जाती है-न्याय के विपरीत नहीं-कि सौदागर किसी चीज के दाम सब खरीदारों से-बिना इस बात के ख्याल के कि उनकी प्रार्थिक स्थिति कैसी है-समान ले। किन्तु जब इस ही सिद्धान्त को टेक्स लगाने पर लगाया जाता है तो इस सिद्धान्त के पोषक नहीं मिलते क्योंकि ऐसा करना मनुष्यता के भाव तथा समाजिक सुसाधकता के विपरीत है। किन्तु न्याय का जो उसूल बगबर टैक्स लगाने का समर्थन कर रहा है उतना ही ठीक है जितने वे उसूल जो बराबर टैक्स लगाने से विपक्ष में दिये जा सकते हैं। रईसों से अधिक टैक्स लेना न्याय- संगत प्रमाणित करने के लिये आदमी यह युक्ति देने के लिये विवश होते हैं कि सरकार गरीबों की अपेक्षा रईसों के लिये अधिक काम करती है। किन्तु वास्तव में यह बात ठीक नहीं हैं। अमीर लोग तो कानून तथा सरकार की अनुपस्थिति में भी गरीबों की अपेक्षा अपनी रक्षा अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं और संभवतः गरीबों को अपना गुलाम बना लेने में कृतकार्य हो सकते हैं। कुछ और भादमियों की सम्मति है कि जीवन की रक्षा के लिये तो सब को बराबर टैक्स देना चाहिये क्योंकि सब को अपनी जान बराबर प्यारी है किन्तु सम्पत्ति भादि की रता के लिये न्यूनाधिक टैक्स देना चाहिये क्योंकि सब के पास समान धन सम्पत्ति नहीं है। दूसरे प्रादमी इस सिद्धान्त के उत्तर में कहते हैं कि सब मनुष्यों के लिये, जो कुछ भी जिस • किसी के पास है, समान मूल्य का है। एक निधन मनुष्य के लिये एक रुपया उतना ही मूल्यवान है जितनी एक अमीर को पांचवां अध्याय १२६ एक अशफ़ी । इन सब परस्पर विरोधात्मक सिद्धान्तों का निर्णय केवल उपयोगितावाद ही कर सकता है । तो क्या न्याय-संगत अर्थात् उचित ( Just ) और मस्महत अर्थात् सुसाधकता में केवल कल्पित भेद है ? क्या मनुष्य जाति अब तक भ्रम में पड़ी हुई थी जो यह सोचती थी कि न्याय (Justice ) नीति (Policy ) से अधिक पवित्र चीज़ है तथा न्याय-सङ्गत होने पर ही किसी काम को मस्लहत या सुसाधकता के विचार से करना चाहिये ? कदापि नहीं। न्याय के भाव की प्रकृति तथा उत्पत्ति का विवरण, जो हमने दिया है, 'उचित' और 'मस्लहत' में वास्तविक भेद मानता है। जो लोग इस बात को बिल्कुल घृणा की दृष्टि से देखते हैं कि किसी कार्य की प्राचार-युक्तता उसके परिणाम पर निर्भर होनी चाहिये वे न्याय-युक्तता तथा मस्लहत के भेद को मुझ से अधिक महत्त्व नहीं देते हैं। यद्यपि मैं उन सिद्धान्तों का विरोध करता हूं जो उप- योगिता को न्याय-युक्तता का आधार न मानकर न्याय-युक्तता का कतिपय प्रादर्श अपने सन्मुख रखते हैं, किंतु मैं उस न्याय-युक्तता को, जिसका प्राधार मुख्यतया उपयोगिता है, सारी प्राचार नीति में सब से अधिक पवित्र तथा मान्य समझता हूं। न्याय-युक्तता (Justice ) कतिपय उन प्राचार विषयक नियमों का नाम है जिनका मानुषिक भलाई की प्रधान प्रधान बातों से सम्बन्ध है और जो इस कारण, बिना और किसी विचार के, प्राचार-विषयक साधारण नियमों से अधिक मान्य हैं । न्याय के विचार की मुख्य कल्पना-अर्थात् किसी आदमी या कुछ भादमियों में अधिकार का रहना-इस बात को प्रदर्शित न्याय से सम्बन्ध तथा प्रमाणिन करती है कि न्याय-युक्तना से सम्बन्धं रखने वाली बातें अधिक मान्य हैं। -- मनुष्य जाति के सुख के लिये प्राचार-विषयक वे नियम*- जो मनुष्यों को आपस में एक दूसरे को हानि पहुंचाने से रोकते हैं-उन उसूलों से, जो मानुषिक कार्यों के किसी विशेष विभाग का प्रबंध करने का सबसे अच्छा तरीका बताते हैं, अधिक आवश्यक है। इन नियमों में यह भी विशेषता है कि मनुष्य जाति की सारी सामाजिक भावनाओं का निर्णय मुख्यतया इन्हींके अनुसार होता है। इन नियमों का पालन करने से ही मनुष्यों में शांति रहती है। यदि इन नियमों का पालन करना नियम तथा इन का उल्लंघन करना अपवाद न हो तो प्रत्येक मनुष्य दुसरे मनुष्य को दुश्मन समझने लगे और सदैव उससे अपनी रक्षा करने का प्रयत्न करता रहे । मनुष्य जाति इन नियमों का एक दुसरे से पालन कराने का अधिक प्रयत्न करती है क्योंकि ऐसा करना आवश्यक समझती हैं । दूर-दर्शिता के विचार से प्रत्येक मनुष्य को उपदेश या प्रोत्साहन देने से मनुष्यों को लाभ हो सकता है या वे ऐसा भी सोच सकते हैं कि ऐसा करने से कुछ लाभ नहीं होता है। प्रत्येक मनुष्य को यह निश्चय कगदेना कि परोपकार करना उसका कर्तव्य है निस्सन्देह समाज के लिये हितकर है, किन्तु बहुत अधिक नहीं । ऐसा होना तो सम्भव है कि किसी मनुष्य को इस बात की आवश्यकता न पड़े कि दूसरे उसका उपकार करें, किंतु प्रत्येक मनुष्य को सदैव " * इन नियमों में हमको उन नियमों को सम्मिलित करना नहीं भूलना चाहिये जो एक दूसरे की स्वतन्त्रता में बाधा डालने से रोकते हैं।

पांचवां अध्याय १३१ इस बात की भावश्यकता रहती है कि दूसरे मनुष्य उसको हानि न पहुंचावे । इस कारण वे प्राचार विषयक नियम, जो प्रत्यक्ष रूप में प्रत्येक मनुष्य को दूसरे मनुष्यों द्वारा हानि पहुंचाये आने से बचाते हैं तथा पगेन रीति पर प्रत्येक मनुष्य को केवल अपने ही लाभ का ध्यान रखने से रोकते हैं, ऐसे नियम होते हैं जिनको प्रत्येक मनुष्य दिन से चाहता है और इसमें अपना भला समझता है कि इन नियमों का प्रचार करे तथा अपने वचनों तथा कार्यों द्वाग इन नियमों का दूमरे मनुष्यों से पालन कगने का प्रयत्न करे। नियमों का पालन करने से ही इस बात की परीक्षा तथा निर्णय होता है कि कोई मनुष्य मनुष्य-समाज का सभ्य होने योग्य है या नहीं क्योंकि इस ही बात पर इस बात का दारोमदार है कि वह मनुष्य उन मनुष्यों के लिये, जिन से उसका वास्ता पड़ेगा, कष्टप्रद (Nuisance) तो नहीं होगा। न्याय-युक्तता की दृष्टि से मान्य बातों में मुख्यतया ये ही प्राचार-विषयक नियम पाते हैं। अन्याय के खास उदाहरण वे हैं अब कोई किसी की चीज़ पर जबरदस्ती क़ब्ज़ा कर लेता है या किसी पर अनुचित बल का प्रयोग करता है । इस उदा- हरण से उतर कर वे उदाहरण हैं जब कोई बिना किसी कारण के किसी को वह चीज़ नहीं मिलने देता है जिसका वह अधिकारी है। दोनों दशाओं में एक आदमी को हानि पहुंचती है। वेही प्रबल उद्देश्य, जो इन प्रारम्भिक प्राचार-नियमों के पालन करने की प्राज्ञा देते हैं, उन मनुष्यों को दण्ड का पात्र ठहराते हैं जो इन नियमों का उल्लंघन करते हैं। चूंकि इन नियमों का उल्लंघन करने वाले मनुष्यों के विपरीत भात्म-रक्षा, दूसरों की रक्षा तथा बदले के भाव जागृत हो जाते हैं, इस .

१३२ . भ्याय से सम्बन्ध ही कारण दण्ड या प्रतिकार तथा बुराई के बदले बुराई का न्याय के भाव के साथ घनिष्ट सम्बन्ध हो गया है तथा सब लोग इन बातों को न्याय के विचार में सम्मिलित कर लेते हैं। नेकी के बदले नेकी भी न्याय का एक प्रादेश है। यद्यपि इस मादेश की सामाजिक उपयोगिता प्रत्यक्ष है तथा यह प्रादेश इन्सानियत या मनुष्यता का प्राकृतिक भाव लिये हुवे हैं; किन्तु तत्क्षण ही इस भादेश का हानि या नुकसान के साथ उतना प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं दीखता जितना न्याय के बहुत साधारण उदाहरणों में दृष्टि-गोचर होता है। परन्तु चाहे प्रत्यक्ष में इस आदेश का हानि या नुकसान के साथ कम संबंध मालूम पड़े किंतु वास्तव में कम नहीं है। जो प्रादमी दूसरों से लाभ उठाता है किन्तु आवश्यकता पड़ने पर उन भादमियों 'को लाभ का प्रतिकार नहीं देता अर्थात् उनके साथ भलाई नहीं करता वह उन लोगों को वास्तविक कष्ट पहुंचाता है क्योंकि इस बात से उनकी अत्यन्त स्वाभाविक तथा सहेतुक भाशाभों पर पानी फिर जाता है। इस कष्ट का कारण लाभ उठाने वाला मनुष्य ही है क्योंकि वह लाभ पहुंचाने वाले मनुष्य के हृदय में प्रावश्यकता पड़ने पर भलाई किये जाने की प्राशा का अंकुर अप्रत्यक्ष रूप से बोता है। यदि यह मालूम होजाय कि जिसके साथ हम भलाई कर रहे हैं वह समय पड़ने पर हमारे साथ भलाई न करेगा, तो स्यात् ही कोई मनुष्य कभी किसी के साथ मनाई करे। मनुष्यों के साथ जो बुराइयां की जाती हैं उन बुगइयों में भाशानों पर पानी फेरने का दर्जा बहुत ऊंचा है क्योंकि मित्रता तथा बादे का तोड़ना-दोनों बाते-बहुत ही अनाचारयुक्त समझी जाती है। मनुष्यों के दिल को इतनी चोट कभी नहीं पहुंचती जितनी उस समय पहुंचती ।

पांचवां अध्याय है अब वह मनुष्य, जिस पर उनको पूरा भरोसा होता है, समय पड़ने पर धोखा देदेता है। किसी मनुष्य को उसकी भलाई का प्रतिकार न देना उसके साथ बड़ी ज्यादती है। भलाई का बदला न पाने पर किसी मनुष्य को या उस से सहानुभूति रखने वाले को जितना बुग मालूम होता है और किसी बात से उतना बुरा नहीं मालूम होता । इस कारण प्रत्येक मनुष्य के साथ वैसा बर्ताव करने का सिद्धान्त जिसका वह अधिकारी है अर्थात् भलाई के बदले भलाई तथा बुगई के बदले बुगई का सिद्धान्त केवल न्याय-युक्तता (Justice) के विचार ही में नहीं पाता है वग्न् इस सिद्धान्त से न्याय के भाव/ को वह दृढ़ता प्राप्त होती है जिसके कारण मनुष्य न्याय-युक्तता को केवल सुसाधकता या मस्लहत से ऊंचा दर्जा देते हैं। न्याययुक्तता के बहुत से सिद्धान्त, जो संसार में प्रचलित हैं तथा साधारणतया व्यवहृत होते हैं, न्याय-युक्तता के उपरोक्त सिद्धान्तों को कार्यरूप में परिणत करने के कारण-मात्र ( Instrumental ) हैं। मनुष्य केवल उस ही बात के लिये ज़िम्मेदार है जिस बात को उसने अपनी इच्छा से किया है या जिस बात को वह अपनी इच्छा से रोक सकता था। बिना किसी आदमी का बयान सुने उसको दोषी ठहराना अनुचित है । दण्ड अपराध के अनुसार ही होना चाहिये । ये सब बातें तथा इनसे मिलती जुलती बाते वे सिद्धान्त हैं जिनका यह प्राशय है कि बुराई के बदले ही बुगई हो तथा बिना बुराई के किसी के साथ बुगई न की जाय। ये साधारण सिद्धान्त अधिकतर न्यायालयों के कारण प्रचलित होगये हैं। न्यायालयों ने अपना काम छोक रीति से करने के लिये अर्थात् दण्ड-पात्र को दण्ड देने के न्याय से सम्बन्ध लिये तथा प्रत्येक मनुष्य को उसका अधिकार दिलाने के लिये इन सिद्धान्तों के अनुसार बहुत से नियम बना लिये हैं। न्यायाधीश का पहिला गुण निष्पक्ष होना है। न्याय की रष्टि से निष्पक्षता भी एक फ्रज है। ऐसा होना इस कारण से भी मावश्यक है क्योंकि निष्पक्ष हुवे बिना न्यायाधीश अपने दूसरे फ्रों को भली प्रकार प्रदा नहीं कर सकता । किन्तु कंवल इसी कारण से मनुष्य के कर्तव्यों में समानता तथा निष्पक्षता के । सिद्धान्तों को इतना ऊंचा दर्जा नहीं दिया गया है। एक प्रकार से समानता तथा निष्पक्षता के सिद्धान्त उन सिद्धान्तों के, जिन को हमने अभी प्रतिपादित किया है, उप-सिद्धान्त ( Corollaries ) समझे जा सकते है। यदि यह कर्तव्य है कि प्रत्येक मनुष्य के साथ वैसा ही बर्ताव किया जाय जिसका वह अधिकारी है अर्थात भलाई के बदले भलाई और बुराई के बदले बुराई की जाय तो इस सिद्धान्त से यह बात भी अवश्य निकलती कि उन सब मनुष्यों के साथ, जो समान बनाव किये जाने के अधिकारी हैं, समान बर्ताव किया जाय । उस समय की बात दूसरी है जब किसी इस से ऊंचे कर्तव्य के कारण ऐसा करना उचित न हो। इसी प्रकार समाज को, उन सब मनुष्यों के साथ |मो समान बर्ताव के अधिकारी हैं समान बर्ताव करना चाहिये । सामाजिक तथा विभाजक ( Distributive) न्याय का यह मब से बड़ा संक्षिप्त ( A bstract ) प्रादर्श है। सब संस्थाओं तथा अच्छे नागरिकों का कर्तव्य है कि इस प्रादर्श को अपने सामने रक्खें। किन्तु इस बड़े नैतिक कर्तव्य की एक और भी अधिक गहरी नीव है। यह सिद्धान्त प्राचार-नीति के मूल-सिद्धान्त का. साक्षात नि:सरण ( Direct-emanation ) है। गौण पांचयां अध्याय को या व्युत्पन्न सिद्धान्तों का तर्क शास्त्रीय उप-सिद्धान्त मात्र नहीं है। यह सिद्धान्त उपयोगिता या अत्यधिक सुम्ब के सिद्धान्त के अर्थ ही में घुसा हुवा है । जब तक कि यह न माना जाय कि प्रत्येक मनुष्य का सुख, समान अंश में (सुखों की भिन्नता का उचित विचार रखते हुये ), बिल्कुल इतना ही गिना जायग जितना, दूसरे मनुष्य का सुख, यह सिद्धान्त सहेतुक अर्थ विहीन शब्दों का रूप-मात्र रह जाता है । इन शतों के पूग होने पर बेन्थम का वचन -प्रत्येक मनुष्य एक गिनना चाहिये, किसी को एक से अधिक नहीं-उपयोगिता के सिद्धान्त के नीचे व्याख्यात्मक भाष्य के रूप में लिखा जा सकता है । प्राचार-शास्त्री तथा कानून बनाने वाले की दृष्टि में सुख के सम्बन्ध में प्रत्येक मनुष्य का बगवर दावा होने के साथ २ प्रत्येक मनुष्य का सुख के सब साधनों के विषय में भी बगबर दावा हो जाना है। उस समय की बात को छोड़ दीजिये जब कि मानुषिक जीवन की अनिवार्य दशाभों तथा जन साधारण के हित की दृष्टि से, जिस में प्रत्येक मनुष्य का हित शामिल है, इस सिद्धान्त को सीमा-बद्ध करना पड़ता है। इन सीमानों की खूब अच्छी तरह से व्याख्या होनी चाहिये । न्याय के अन्य सब सिद्धान्तों के समान इस सिद्धान्त का भी सब स्थानों पर प्रयोग मावश्यक नहीं है। किन्तु जहां कहीं भी इस सिद्धान्त का प्रयोग उचित समझा जाता है, यह सिद्धान्त न्याय का श्रादेश माना जाता है। यह माना जाता है कि सब मनुष्य समाज बर्ताव के प्राधकारी हैं सिवाय उस समय के अब कि किसी मानी हुई ( Recognised ) सामाजिक मस्लहत के कारण इसके विपरीत करना भावश्यक ? होता है। इस कारण अब मनुष्य समान बर्ताव के अधिकारी हैं तो तमाम सामाजिक असमानतायें, जो मस्लहत नहीं समझी जाती

१३६
न्याय से सम्बन्ध
।
केवल मस्नहत के विरुद्ध ही नहीं समझी जाने लगती
वग्न अन्याय समझी आने लगती हैं। मनुष्य इस बात पर
प्राश्चर्य करने लगते हैं कि किस प्रकार मनुष्यों ने इस अन्याय
को बर्दाश्त कर लिया होगा, किन्तु यह बान भूल जाते हैं कि
स्यात् वे भी मस्लहत के वैसे ही भ्रमात्मक विचार में पड़े हुवे
बहुत सी अन्य असमानतामों को बरदाश्त कर रहे हैं। ठीक
हो जाने पर ये असमानतायें भी उन्हें उन्हीं असमानतामों के
समान, जिनको निन्दनीय समझना उन्होंने सीख लिया है,
घृणित मालुम पड़ने लगेंगी। समाज सुधार का समग्र इतिहास
परिवर्तनों से भरा पड़ा है। वही रिवाज या संस्था जो प्रारम्भ
में सामाजिक अस्तित्व के लिये प्रावश्यक समझा जाता था
बाद
में अन्याय तथा अत्याचार समझा जाने लगता है और
इस बात की भावश्यकता अनुभव होने लगती है कि उस
रिवाज या संस्था का स्थान किसी दूसरे ग्विाज या संस्था को
दिया जाय । गुलामों और स्वतन्त्र मनुष्यों के मेद, सरदारों
तथा नौकरों ( Servants ) के मेद तथा उच्च वंश वालों तथा
निम्न वंश वालों के भेद के सम्बन्ध में ऐसा ही हुवा है तथा मागे
भी ऐसा ही होता रहेगा। रंग, जाति तथा स्त्री-पुरुष के भेद
के सम्बन्ध में अब भी कुछ २ ऐसा ही हो रहा
जो कुछ कहा गया है उम्र से प्रमाणित होता है कि न्याय
या इन्साफ कतिपय नैतिक अावश्यकताओं का नाम है जिनका
पलड़ा कुल मिलकर सामाजिक उपयोगिता की तराज में
भारी है और जो इस कारण अन्य नैतिक कर्तव्यों की अपेक्षा
अधिक मान्य हैं। नि:स्सन्देह कभी २ ऐसा अवसर हो सकता
है जब कोई और सामाजिक कर्तव्य इतना महत्त्व-पूर्ण हो जाता .
है

पांचवां अध्याय कि उसके सामने न्याय या इन्साफ के साधाग्य सिद्धान्तों को ताक पर रखना पड़ता है, उदाहरणतः मान बचाने के लिये श्रावश्यक भोजन या औषधि को चुगया या जबरदस्ती छीन लेना अथवा एक मात्र प्रशंसापत्र प्राप्त डाक्टर को जबरदस्ती भगा- लाना या उसे इलाज करने के लिये विवश करना केवल अनुमत ही नहीं वरन् कर्तव्य हो सकता है। ऐसे अवसरों पर हम किसी चीज़ को, जो पुण्य या गुण (virtue) नहीं है, न्याय या इन्साफ नहीं कहते । हम साधारणतया यह नहीं कहते हैं कि किसी दूसरे नैतिक सिद्धान्त के कारण न्याय को साक्क पर्ग रखना चाहिये वरन् कहते हैं कि जो बात साधारण दशा में न्याय-युक्त होती है इस विशेष स्थिति में उस दूसरे सिद्धान्त के कारण न्याय-युक्त नहीं रहती । भाषा का इस प्रकार प्रयोग करने के कारण न्याय या इन्साफ की नित्यता में भेद नहीं पड़ता हम को यह प्रतिपादित करने की प्रावश्यकता नहीं पड़ती कि अन्याय या वे इन्साफी प्रशंसनीय भी हो सकती है।। यह बात सदेव प्रत्यक्ष रही है कि न्याय-युक्त कार्य मसहलत के काम भी होते हैं। मेद यह होता है कि न्याय- युक्तता के साथ एक विशेष भाव ( Sentiment ) होता है जो उसे मसजहत से पृथक् करता है । यदि इस विशेष भाव का कारण पूर्ण रूप से प्रतिपादित कर दिया गया है, यदि इस भाव की कोई विशेष उत्पत्ति मानना भावश्यक नहीं है, यदि यह भाव बुग मानने का प्राकृतिक भाव है तथा सामाजिक भलाई के अनुसार होने के कारण प्राचार-युक्त है, यदि यह भाव न्याय-युक्तता से संबन्ध

१३८
न्याय से सम्बन्ध
रखने वाली सब बातों में केवल मौजूद ही नहीं रहना है वरन्
मौजूद रहना चाहिये तो फिर न्याय या इन्साफ का विचार
उपयोगितात्मक प्राचारशास्त्र के मार्ग में कोई अड़चन नहीं है ।
न्याय उन कतिपय सामाजिक उपयोगिताओं का ठीक नाम
रहना है जो बहुन अधिक महत्वपूर्ण हैं और इस कारण
अन्य उपयोगितामों से जाति के रूप में अधिक निरपेक्ष तथा
मान्ग है। विशेष दशा में किसी अन्य उपयोगिता का अधिक
महत्त्वपूर्ण होना सम्भव है । इन कारणों से न्याय की कल्पना
में साधारण उपयोगिताओं की अपेक्षा किसी और अधिक हद
भाव से काम लिया जाना चाहिये और ऐसा ही होता भी है।

- SUPPLEMENTARY NOTES. watara ( Transcendeutalists ) तत्त्वज्ञानियों के एक विशेष समुदाय का नाम है । इन्द्रियातीत सिद्धान्तों (Transcendental Theories) TTT 019* ftare ( Ritcher ), फिशटे ( Fichte ) तथा शैलिंग हुए हैं । अमरीका में इस प्रकार के सिद्धान्तों का प्रचार एमरसन ( Emerson ) ने किया था। एपीक्योरियन-एपीक्यूरस ( ३४२-२७० ईसा से पूर्व ) नामक तत्त्ववेत्ता के अनुयायी । एपीक्यूरस का कहना था कि हम को इस कारण नेकी करनी चाहिये क्योंकि नेकी करने से सुख मिलता है और सुख से बढ़कर अन्य कोई चीज़ नहीं है। कान्ट-एमैन्युअल कान्ट (१७२४-१८०४ ई० ) नाम का जर्मनी में एक प्रसिद्ध तत्ववेत्ता तथा वैज्ञानिक हुधा है । १८ वीं तथा १६शताब्दो के तत्त्ववेत्तानो पर इस के विचारों का बड़ा प्रभाव पड़ा था। काायल-टामस कार्लाबल (१७६५-१८८१०)नाम का एक प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक हुआ है। इसकी निम्न लिखित रचनाएं बहुत प्रसिद्ध हैं:- (1) French Revolutioil (2) Past and Present, (3) Life & Letters of Oliver Cromwell (4) Fredrick the Great. प्लेटो-प्लेटो (४२६-३४७ ई० से पूर्व) यूनान का प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता था। इसका असली नाम एरिस्टोक्लीज़ ( Aristocles ) था। यह सुकरात का शिष्य तथा अरस्तू का गुरु था। 'डायलोग्स' (Dialogues) तथा 'रिपब्लिक (Republic) नामक इसकी दो पुस्तकें बहुत प्रसिद्ध हैं।

प्रोटोगोरस-ईसा से १.० वर्ष पूर्व इस नाम का यूनान में एक प्रसिद्ध तत्त्वेत्ता हुआ है । प्रोटागोरस का उस समय के यूनानी देवताओं में विश्वास नहीं था। इस कारण इसके देशवासी इससे बहुत नाराज हो गये थे और इसको डुबो दिया था। वैन्थम-बैन्थम जरमी (१७४८-१८३३) नामक एक अंग्रेज़ तस्व- घेत्ता हुवा है । इसने अपने ग्रन्थों में उपयोगितावाद के सिद्धान्तों को खूब अच्छी तरह समझाया है। सुकरात-यह प्रसिद्ध यूनानी तत्ववेत्ता था। इसका जन्म सन् ४६६ बी०सी०में हुवा था। यह बड़े स्वाधीन विचारवाला था। अपने स्वाधीन विचारों के कारण ही सन् ३६8 बी० सी० में इस को जहर का प्याला पीना पड़ा था। स्टायक्स-(Stoies )-जीनू नामक यूनानी तत्वशानी के भनुयायो । भूल सुधार अशुद्ध शुद्ध दुःख समझता समभा १७ २१ निन्यानवे निन्यानवे काम ३ किसी चीज़ किसो ऐसी चीज भावों के । भावों के निरंकुश ( Arbitrary (Arlitrary) जाता १०६ १५ समान साक्षी का व्यवहार समान व्यवहार १११ २१ इस प्रकार करने के लिये विवश किया जाय। } विवश किया जाय -- पृष्ठ पंक्ति जाता है

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आत्म-कहानी। २-टाल्सटाय की जगत्-प्रसिद्ध रशियन महर्षि टाल्सटायको कौन नहीं जानता। टाल्सटाय का जन्म एक उच्च घराने में हुवा था। उस समय के उच्च-कुटोत्पन्न नव-युवकों के समान टाल्सटाय का यौवन काल भी अनेक घृणित कामों में बीता । दुराचार, मिथ्या-भाषण, लूटमार, मद्यपान, निदेयता आदि सब ही दुष्कर्म उसने किये किन्तु अन्त को उसके जीवन ने ऐसा पल्टा खाया कि महात्मा और ऋषि के नाम से पुकारा जाने लगा। यदि आप जानना चाहते हैं कि टाल्सटाय के जीवन में ऐसा बड़ा परिवर्तन किस प्रकार होगया तो आप यह पुस्तक अवश्य पढ़ें। यह पुस्तक टाल्सटाय की “My Confession" नामक पुस्तक का सरल तथा सरस हिन्दी में अनुवाद है । योरोपीय भाषाओं में इस पुस्तक के सैंकड़ों संस्करण निकल चुके है । पुस्तक के आदि में भूमिका के अतिरिक्त टललटाय का चित्र और जीवनचरित्र भी है। पृष्ठ संख्या १२० के लगभग। मूल्य केवल ||) प्रताप-यह महर्षि टाल्सटाय की आत्म-कहानी है । जिज्ञासुओं को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिये। महात्माओं की विचार-धारा में निमजित होने से चित्त को शान्ति मिलती है । विशेषतः हिन्दी के पाठकों को असहयोग के इस युग में टाल्मटाय के विचार अवश्य जानना चाहिये । पुस्तक की भाषा अच्छी है। ज्योति-महात्माओं के जीवन-चरित्र का पाठ सदैव लाभदायक होता है और फिर टास्मटाय जैसे महात्मा का जीवन -जिसने अन्धकार से प्रकाश में, कुमार्ग से सत्मार्ग में प्रवेश किया हो तो अवश्य ही शिक्षा-प्रद है। पारम्भ में १५ पृष्ठ में कारुणिक जी ने टाल्सटाय का जीवन-चरित्र देकर पुस्तक की उपयोगिता को और बढ़ा दिया।

३-उपयोगिता वाद। प्रसिद्ध तत्वज्ञानी स्टुअर्ट मिल की युगपरिवर्तनकारी पुस्तक युटिलिटेरियनिज्म ( Utilitarianism ) का सरलहिन्दी में अनु- बाद । मूल पुस्तक के लेखक के नाम से ही पाठक पुस्तक की उत्त- मता का अनुमान कर सकते हैं। मिल की पुस्तक की प्रशंसा करना सूर्य को दीपक दिखाना है। पुस्तक के आरम्भ में मिल का चित्र और जीवन-चरित्र भी है। पृष्ठ संख्या १२० के लगभग । मूल्य ॥1) ४-याधुनिक सप्ताश्चर्य । व्योमयान, सब मैरीन (पनडुब्बियां), एक्सरंज, बेतार का तार, टेलीफ़ोन, ग्रामोफ़ोन, तथा रेडियम-अर्थात् आधुनिक काल के सात अत्यन्त महत्वपूर्ण, आश्चर्योत्पादक तथा युगपरिवत्तानकारी आविष्कारों का सरल तथा भाषा में मनोरञ्जक तथा सारगर्भित वृत्तान्त जिस को साधारण वुद्धि रखने वाले पाठक भी आसानी से समझ सकते हैं बहुधा लोगों का विचार है कि वैज्ञानिक पुस्तके शुष्क तथा भरुचिकर होती है, किन्तु इस पुस्तक के पढ़ने से पाठकों को मानना पड़ेगा कि वैज्ञानिक विषयों की पुस्तकें भी मनोरन्जक तथा रोमाञ्चकारी होने की दृष्टि से अच्छे से अच्छे तिलस्म तथा ऐय्यारी के उपन्यासों को नीचा दिखा सकती है। पुस्तक के आरम्भ में विज्ञान के धुरन्धर विद्वान् श्रीयुत डाक्टर रामजीनारायण जी डो. एस. सी० को सारगर्भित तथा विद्वत्तापूर्ण भूमिका है। पुस्तक अनेक चित्रों से भूषित है । छप रही है । शीघ्रही प्रकाशित अंगी।

५--मुगलों के अन्तिम दिन । उर्दू के प्रसिद्ध लेखक मुमघिरे फ़ितरत श्रीयुत ख्वाजा इसन निजामी के अन्तिम मुग़ल गजकुमार तथा राजकुमारियों से सम्बन्ध रखने वाले लेखों का सरल तथा सरस हिन्दी में रूपान्तर। बहादुरशाह बादशाह और उनके बीवी बच्चों की भापीती दुःखभरी सच्ची कहानियां। पुस्तक को पढ़ने से पाठकों को मालूम होगा कि जिन मुग़ल सम्राटों के सामने एक दिन साराभारतवर्ष सर झुकाता था उन्हीं के वंशज आज पेट भर रोटी को तरसते हैं । कोई चपरासी का काम कर रहा है और कोई ठेला चला रहा है। कोई भीख मांग. कर ही ज़िन्दगी के दिन पूरे कर रहा है। पुस्तक ऐतिहासिक होने के साथ ही साथ मनोरञ्जकता की दृष्टि से अच्छे २ उप- भ्यासों का मात करती है। एक बार आरम्भ करके बिना समाप्त किये छोड़ने को जी नहीं चाहता। पुस्तक के आरम में एक सारगर्भित भूमिका है जिस में मुग़ल साम्राज्य का संक्षिप्त इतिहास है। पुस्तक सचित्र और बहुत अच्छे काग़ज़ पर रंगीन स्याही में छपी है। कुल मिला कर १६२पृष्ठ है । तिस परभी सर्व साधारण के सुभीते के लिये मूल्य लागत मात्र केवल ॥५) रक्खा गया है । हमारी अन्य पुस्तके १-अनार कली। कवि सम्राट रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक प्रसिद्ध गला का सरल तथा सरस हिन्दी अनुवाद । जहांगीर बादशाह और नादिरा बेगम केकड़ों वर्ष पुराने प्रेम का जीता जागता चित्र । मूल्य ॥

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Upayogitavad

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Title
Upayogitavad
File name
Upayogitavad
Text
OCR done
Published
2005/07/25
Publisher
Gurukul Kangri Vishwavidyalay
Language
Sanskrit
Pages
145
Library
University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
DLI number
476955
Barcode
99999990169200.00
Scanning centre
Gurukul Kangri Vishwavidyalaya, Haridwar
Digital publisher
Digital Library Of India
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oVbZfuHlnBK
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