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Nepal Ateet Aur Vartmaan

Saxsena,shankar Sahay · 2010/12

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नेपाल : अतीत और वर्तमान
सेक्षक
श्री शकरसहाय सक्सेना
डायरेक्टर राजस्थान कासज जमपुर भूसपूष प्रिसिपल बनस्थली
विद्यापीठ तया प्रिसिपल महाराणा भूपाल कालेज उदयपुर,
एष भूतपूय निक्षा सघाला (राजस्थान)
प्रकारक
नवयुग ग्रन्थ कुटीर
बीकानेर

प्रकारात
नययुग ग्रन्थ कुटीर
मीरानेर
प्रभम सस्करण १९६५
मूल्य १० रुपए
एजूपे गनर प्रेम
बीकानेर

भूमिका नपाल भारतवासिया के लिए अत्यन्त प्राचीन काल से आक पण का केंद्र रहा है । उसका कारण यह है कि यद्यपि राजनीतिक दृष्टि से नपाल एक स्वतत्र देश था परन्तु नपालियो मे भारतीय रुधिर है, वहा का धम, सस्कृति, रीति रिवाज, कला-कौशल मान्यताए भारतीय है । हजारा वर्षों से नपाल और भारत के अटूट संबच रहे है। ब्रिटिश काल में जब भारत पराधीनता को शृखला म जकडा हुआ था तो भारतीय नपाल को स्वतत्र देखकर प्रसन्न हाते थे और आत्म- सतोप करते थे । गजवश में ही नहीं नपाली नागरिको क विवाह सम्बध भी भारत से होते है । कहने का नात्पय यह है कि भारत और नपाल के सम्बध इतने दृढ़ और समीप के है कि नपाली जव भारत में आता है तो वह यह नही मानता कि वह विदेश में आया है। भौगोलिक दृष्टि से ता नपाल भारत भूमि का विस्तार मात्र है । पवत राज हिमालय के दक्षिण मे होने के कारण नपाल उत्तर भारत के मदानो से मिला है । यदि नार पर शत्रु देश चीन का अधिकार हा जाय अथवा नपाल उस प्रभाव मे चला जाय तो वह भारत के आंगन मे ही आजायगा । वास्तव मे बात तो यह है कि भारत की सुरक्षा के लिए भी यह नितान्त आवश्यक है कि नपाल और भारत एक सूत्र म बंधे रहे । नपार के हितो की दृष्टि से तो यह और भी आवश्यक है कि वह भारत से घनिष्ठ सम्बच रक्खे नही तो उत्तर से उसके अस्तित्व को ही भयकर खतरा है । भारत के स्वत न हो जाने के उपरान्त हमारी सरकार न इस तथ्य को भुला दिया । नपाल और भारत को उत्तरी रक्षा पक्ति तिब्बत का जब साम्राज्यवादी और विस्तारवादी चीन ने पदाकान्त किया तो हमने विरोध तक न किया । हमने जसा लज्जाजनक व्यवहार तित्रत के साथ किया वह सदव के लिए भारत के माथे पर फलक के टीक के समान चमकता रहेगा। विवश होकर नपाल को भी तिम्बत पर चीन की प्रभुता को मान्यता देनी पड़ी । नपाल के नेता भारत सरकार को निर्वलता को समझ गए। तभी से उनका भारत पर स भरोसा उठ गया और वे भारत के शत्रु चीन को ओर झुकने लगे। दुर्भाग्यवश यदि कभी चीन तिवत को भांति नपाल, सिक्किम और भूगन को उदरस्य कर सका और रहास तथा नेफा मे प्रवेश पा गया त! समस्त उत्तर भारत चीन से पदाक्रान्त होने से नहीं बच सकेगा। नपाल की सुरक्षा भी भारत से बधो हुई है । अस्तु भारतीयों और नपालियो को यह तथ्य न भूल जाना चाहिए कि नपाल और भारत का भविप्य प्रकृति द्वारा एक प्रथि मे वाघ दिया गया है । यदि मूर्खतायश हमने इस यि को खोल दिया और नपाल भारत से अलग हो गया तो उसका अस्तित्व तो समाप्त हो ही जायेगा चीन द्वारा पदाकात नपाल भारत के लिए भी एक महान् खतरा बन जायेगा। दोनो देशो को इस तथ्य की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर ही अपने सम्वधों को निर्धारित करना चाहिए । अतएव दोना दश एक दूसरे को जानें, यह नितान्त आवश्यक है । नपार नसर्गिक सौदय का प्रद्वितीय भूम्बड है वह वीर गोरखों का देश है जिनकी वीरता और गौय ने दा महायुद्धा म संसार के महान् सेनापतिया या चकित कर दिया था जिहें आज भी विटेन अपनी सेना में भर्ती करने के लिए लागयित रहता है । अस्तु अग्रजी में नेपाल के सम्बध में अनेक सुदर पुस्ता लिग्वी गई और प्रकाशित हुई। परत हिदी म नपाल व सम्ब व म साहित्य लगभग नहीं के बराबर है। लेगक न इस पुस्तक के द्वारा इस ममी को पूरा करने का प्रयत्न किया है। हिदी भाषा भापियो म यदि इम पुम्नर द्वारा नपाल के सम्बध मे रुचि उत्पन्न हुई और वे नपाल के महत्त्व को जान सके तो लेखक अपना परिश्रम सफल समझगा । पुस्तक लिसने म यह ध्यान रखा गया है कि नेपाल के भूगोल इतिहास राजनीति और आधिक समस्याओं के सम्बध म पर्याप्त जानकारी दी जाय । राजस्थान कलिम, जयपुर शकर सहाय सक्सेना विषय-सूची अध्याय पहला अध्याय दूसरा मपाल देश - अध्याप तीसरा अध्याय चौथा अध्याय पांचवां २१ अध्याय छठा २६ भम्पाय सातवा २९ अध्याय आठवा मध्याय मा अध्याय दसवा अध्याय पारहवा मध्याय बारहवा अध्याय तेरहवां मध्याय चौदहा नपाल का प्राचीन इतिहास पाल्पा किराती और छियालीस राज्य गुरखा अयवा गोरखाली गोरखा राजा पृथ्वीनारायन मपाला विस्तार ४२ भीमसेन थापा मपाल की शोचनीय स्थिति और मोट हत्याकांर ७० राणाशासन को स्थापना राणा नगवहादुर ८४ राणा उदीप धोरणमोर ध देवशमशेर पामशेर भीमगमशेर जुखामशेर सपा पप्रशमोर 11५ नपालको मन जागृति १२७ महाराजाधिराज त्रिभुवनवीरविक्रमशाह क्रान्ति को सफलता राणालाही का पतन और जनता का उदय १५० प्रयम धुनाव, कोइरासा मत्रिमरल सपा पचायत राज्य १६७ महाराजाधिराज महे द्रविक्रमदेवगाह भारत और नपाल के सम्बन्ध मपाल और चीनसम्बाप मपाल सीमापित समस्याए २१५ परिशिष्ट अध्याय पद्रहवा भन्याय सोलहया अम्याप सत्रहवा मध्याप अठारहवा मम्याय उन्नीसवा १८० १९० २०६ २६९

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नेपाल : अतीत और वर्तमान

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अध्याय पहला नेपाल देश नपाल भारत के उत्तर मे तया तिरमत (चीन) में दक्षिण मे पयत राज हिमालय की पषतमालाओं से घिरा हुआ दम है । इसके उत्तर मे तिब्बत पूर्व मे सिक्किम और पश्चिमी बगाल दक्षिण में उत्तर प्रदश और पश्चिम में उत्तर प्रदा या कुमायू डिवीजन है। यह दश मोटे रूप मे २६ और ३० डिगरी अक्षाग रेखाओं तया ८० और ८८ डिगरी पूर्वी पशान्तर रेखाओं के बीच स्थित है। इसको पश्चिम से पूष तक लम्बाई ५२० मील और औसत चौदाई ९० से १०० मोल है। अधिकतम चौडाई १४० मोल है। मपाल पा क्षेत्रपर ५५ हजार वगमोल और जनसख्या ८५ लाख से अधिक है। प्राकृतिक दृष्टि से नपाल को तीन मागो मे विमत पिया जा सकता है। तराई नपाल मा दक्षिणी भाग तरारा प्रदश है सराई को पट्टी पूर्व से पश्चिम सक पली है। यह बस से सीस मोल सप घौड़ी है। तराई में जल बहुत अधिक होने के कारण और भूमि नीची होने के कारण ममी बहुत अधिक है । इग प्रब की ऊचाई पेवर एक हजार फीट है भूमि नरम और समतल है वर्षा ९० इच होती है। इस कारण तराई प्रवरा अत्यन्त नन और सघन बना आछावित है। मलरिया 7 वित्र तराई मे मयार प्रकोप है। सारा प्रदा अस्यास्थ्यफर है। परन्तु तराई के सघन वन ससार म शेर आदि के शिकार के लिए अद्वितीय स्थान है। ससार या प्रत्येक महत्वपूर्ण गिरी नपार को तराई म शिकार खेलने पा स्वप्न दपता है। जिस गिकारी पो नपाल को सराई । के सपन दमों में शिकार खेलन का अवसर मिलता है यह उस महोमाग्य मामता है। तराई में कहीं भी यन पो पाट कर उपजाऊ मदान तयार लिए गये हैं जहां खेती होती है। पहरा को भूमि बहुत उवरा है। महाँ को मुत्य पदावार घावर पना ज़ट तथा तम्बापू जो मुख्यत भारत को निर्याप्त की जाती हैं। तराई मपाल को दक्षिणी भूमि को पट्टी को पहते हैं जिसका प्रपल ८ हजार वग नौल है। इसके उत्तर में मामर का प्रदत है जिसरी ऊचाई ४ हजार पोर है। इसपा क्षेत्रफ्स ६ हजार पग मौत है। यह घने नगों से मरा है यहां मे मूल्ययान स्करी मिलती है। जहां जगल साफ रिये गये हैं वहीं शती हानी है। गता तिलहन तपा पापल यहाँको मुरय पदावार है। तिलहन रा निर्यात होता है। मध्यप्रण-यह प्रदा तराई तया भीतरी रिमामय को माताश घुमी पर्वत थेणियों के बीच घाटियों और पहाड़ियों पा प्रदा है । इसकी घाई सर्वत्र एक समान नहीं है। इस प्रदा को ऊचाई चार हजार फोट से १५००० फीट तक है। यह प्रदा नपाल का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। यहाँ की उबरा घाटियों म नेपाल का सर्वोत्तम कृषि प्रदेश है और विस्तृत तया घास से भरे हुए पनी चरागाह है जहाँ अगणित पशु घराए जाते हैं। यहा गीतोष्ण और आस्परा पर्वतीय प्रदश को जलवायु उपलग्ध होने से उसी प्रकार को पदावार होती है। यहां की औसत वर्षा ४० इंच है। भीतरी हिमालय-यह प्रवश नपाल के उत्तर मे उत्तरी सीमा पर एक ऊधी दीवार के समान खदा है। यह सारा प्रवेश गगनष यो पयत अणियों से मरा है और इसी प्रदा मे मसार के कुछ अत्यन्त महत्वपूण कचे पषप्त गियर विद्यमान है। नपाल का यह प्रदेश सत्रह हजार फीट से २९ हजार फीट तक ऊंचा है और यप मर हिम से आच्छादित रहता है। एक प्रकार से यह ऊंचा प्रदेश नपाल या उत्तर मे रह प्रहरी है। अमी तक नपाल और भारत हिमालय की गगनचंयी प्राचीर के कारण अपनी उत्तरी सीमा को सुरक्षित समझते पे परतु पिछले वर्षों में चीन ने दक्षिण में जिस प्रकार अपना विस्तार करना आरम्म किया है उससे पह सुरक्षा समाप्त होगई है। माज नपार और भारत को चीन के विषय अपनी उत्तरी सीमा की रक्षा के लिये सजग और सतक रहना पड़ता है। पवतमागए-नपाल को उत्तरी सीमा पर गगनघुयी हिम आच्छादित पयतमालाए समार म सबसे ऊघी है। पूर्व से पश्चिम तक फली हुई इन पवसमालाओं मे ससार के अनेक प्रसिद्ध हिमाच्छावित शिखर हैं । सागरमाथा (माउन्ट एवरेस्ट) मकालू घोलगिर ममपूर्णा किचिनज गा तया अप पचास से अधिक शिक्षर रहीं पर्वतमालाओं में स्थित हैं। हिमाच्छादित पयतीय प्रबों का ऐसा मसगिक सौन्दय ससार में कहीं भी वसने को नहीं मिलता। वह अभूतपूष दृश्य देखने और उस पर्वतीय प्रदेश के सौन्दय को निरसने के लिये हो असत्य पर्यटक पृथ्वी के पोने कोने से नपाल आते हैं। सम्र तो यह है कि पृष्यो का अन्य कोई श नपास के इस नसगिद पवतीय सौग्दय को समता नहीं करसक्ता। नपाल के मुख्य शिखर नीचे लिखे हैं- (1) सागर मापा (माउट ऐवरेस्ट)-२९१४१ फोट (२) रचनयगा २८१४६ फीट (३) भालू- २७७९० फोट (४) सहारसे--२७१९०फोट (५) धौलागिर- २९८१० फीट (६) चोयु- २६५६५ फोट, (७) मनसुला-२६,६५८ फीट (८) अन्नपूर्णा- २६ ३९१ फीट (९) गासन पान- २६२९१ पोट (१०) हिमाल चूलो-२५.८०१ फोट (11) पौरीगकर-२३४४० पोट । इनफ अतिरिक्त नेपाल मे ३८ और ऐसी पोटिया ह मिन पर न सो अमी तर आगेहण हुआ है और म उनको अभी तक कोई नाम हो रिया गया है। यह शिखर २२ हमार फोट से अधिक कधे हैं। नदिया--पास में ऊची पर्वतमालाओं के अतिरिक्त मध्य में बहुत सी नदी पाटियाँ हैं। पर पाटिया क्षेत्रफल तथा ऊपाई में एक समान २ महीं हैं इनके क्षेत्रफल मौर ऊचाई में बहुत विभिन्नता है। काठमांडू पाटो जो नपाल को घाटा रे नामस भी प्रतिम है सबसे पगे घाटी है। इस घाटी पा क्षेत्रफल २४२ दामोर है। यह समुद्रतल से ४५०० पोट कमी है इतो घाटो म मपाल तान सपने को नगर स्थित है। कारमार (राजधानी) पाटन (ललितपुर) और मतपर (मट गांव) इसी घाटी मे है । काठमांडू घाटी मे तीन नदियां महती है। मागमती अस्यत पवित्र नदी है जो पानी के जल को लेकर गगा में मिलती है। इस अतिरिक्त इस घाटी में दिन्नुमती मोर हनुमती मरियां और यहती हैं। यह दोनों नदियां सागमती को सहायक है। पूर्व मे भोजपुर धनकुलो पाटी है जिमम म सप्तकोसी नदी बहती हुई भारत में कोसी के नाम से बहती ह। मध्य भपाल में माल्या को घाटी है जिसमें हरणाकालो गरको नदी बहती है जो रक्षिण में गडकरे नाम से (उत्तर प्रदा) मारत म महती है। मपाल के पश्चिम म राप्ती और परनाली नरियां महती हैं। परनारी जब भारत में घुसती है तो उसका नाम घाघरा हो जाता है या एफर मह गगा से मिल जाती है। पास्या और रातोपाटियों में मछलियां बहसामत से मिलती है। न भाटियों में पथ परली पानिकार मौका वाहन समा माओं FIT घटत करते हैं। इन घाटियों में पतिपय ससार प्रसिट नस गिर साँस्य यत है और यहाँ समार प्रसिद्ध रिकारी तथा फोटोग्राफर मायागरते हैं। इस पहाडी वा में इन नदियों में बहुत से प्रपात सपा साले है जिनश स्व जल और नर्मागर सौदयं मनोक्षा है। इस दश के नगिक सौदय स्यों की तुलना में संसार के पास कम सौंदय स्थल रखे जा सरसेनपाल को मोले प्राकृतिक सौरय को अद्वितीय निधि हैं और ससार के पट उतरा मानदलने के लिए माते हैं। उनमें मुख्य बोलें आगे लिखो है, फेवा ताल, दिपग ताला मरो सास, और स्पताल प्यारि। इन नगिक स्थलों वर्णन ससनी को सामभ्य के बाहर है यह सा अनुभव होरिया मा सरता है। पहारों म रोती रिए भूमि मत कम होने का कारण तथा अन्य कठिनाइमों शरण यही को मनमल्या का निर्वाह नहीं हो साता। यही कारण है लाखों की संख्या में मपालो मारत में अपना गोवन निर्वाह करने के लिए जाने हैं । पहारों में जींदारी तो नहीं है मगपर है फिर भी यहां की जिमुधार (जमीनकाल) सराई के जमी दारों ने सरह हो पिसानों समापण करके पनी बन जाते हैं। इन मिषालों तस्यातीय राज्य कर्मचारियों पर विशेष प्रभाव होता है । इस कारण न्यायालयों से किसानों का उनक विरड म्याय प्रास नहीं होता। भौतरी मध्य मे दुध कृषि योग्य भूमि मवाय ह परन्तु यह बास मायरोमांति उपजाऊ नहीं है। मोतरी मप्या से पर, बाजरा, तमा उर विशेष रस से उत्पन्न होते हैं। यही देतो मो देती होती है। परिधमी भीतरी मध्यरतरे मिमवात माय' असे पड़ी तोर हो परवाते हैं। सोरो भूमि जिमुवाल को होतो है परन्तु मासामियों से 1 विमा मजदूरी दिए अथवा बहुत पम मजदूरी में जुताई बुवाई जाती है पयोंकि वे उसको जमीन पर बसे हुए हैं। इसी प्रकार की गेती को "सल' कहते हैं । "सल जिमुघाल की भूमि होती है उसमें भूमि को आसामी को आधा बटाईद दी जाती है। फसल को भाषी पदावार किसान जिमु याल को दे देता है। तीसरी प्रकार की जोत मेगारी' होती है। वेगारी जोत जिमुवाल की होती है परन्तु आसामो को बेगार में उस पर काम फरना पड़ता है। जिमयाल फेगारा मे घो दूध एफओ, अनाज पल फूल भी किसानों से जबरदस्ती लता था। पास तराई म खेती योग्य बहुत अधिक ममि है। उसमे जमीवार ग्रही पडी सोमवाते हैं सरकार ने हरी वेगारी बद करती है उसे गरकानूनी घोषित कर दिया गया है परन्तु पुरानो परम्परा एक साय समाप्त नहीं होती। जमीनगर स्मिानों को डरा धमकावर वेगार से लते है वे यासामी को गांव से निकाल देने की धमकी देते हैं। गांव वालों कोपाल मिलकर भीदार को सोर बोजोतमा बोना पड़ता है और फिर वे अपनो सतो परते हैं। गांव , पोखरो तालायों बार्गों पर जमींदार का सर्वाधिकार होता है। पिसार उनका उपयोग नहीं कर पाते । पोखरों तालाओं और दिया की मछलियों पर जमीदारा ही अधिकार होता है। गांवों में अधिकाश भूमि जमीदार की सीर होती है। शेष भूमि क्सिानो (आसामियों) को आप मटाई पर अपवा मालगुजारी पर उठा दी आती है। सौरी वसमाल करने के लिए जमीदार गांव मे सौर के मकान रखते हैं सौर मकान में जमींदार पापारिदा तया तीन चार सौरवार रहते है जो हलवाहां की सहायता से जीसरी सौर फरवाते हैं। मारिदे और सीरवार किसानों का खूप शोषण करते है और उन पर मरयाचार करते हैं। कारिद मिहें मालगुजारी पर भूमि जोतने के लिए देते हैं। उनसे पूस उते हैं क्रान्ति के समय सोर के मकाना को किसानों ने गिरा दिया था। पश्चिमीय सराई को भूमि व्यवस्था पूर्वी तराई को अपेक्षा सपया मित्र है। पश्चिमी तराई । पिसानों में अपिगर मे जो मूमि होती है उसे तिरमा' या नम्बरी करते हैं। तिरजाको मालगुमारी जमीदार अपवा सरकार को रोना सरती है। तिरनाक अतिरिक्त एक ' फाम की भूमि होती है। फाय की मोम वस्तुत जींदारी ओर --मे रिसान को मिली हुई होती है। तीसरे प्रकारको 'उस मूमि फहलाती है। उसका भूमि उस भूमि को करते है जो जमादार मयमा मासामी को मोर से किसी तासरे व्यक्ति को आप बदाई या मालगुजारी पर साल से साल के लिए उठा दी जाती है। उमा भूमि पर लगान बहस ऊषा दिया जाता है और वदपोत गान से अपिल पन भी लिया जाता है। पूर्वो नपाल तरा में भूमि व्यवस्या दूसरो तरह को ह। यहाँ एसे मी जमीवार है जो रस पीत बोधारे अमोवार है परन्तु वे हजारों पोपोंरे जोतार होते हैं। पूर्वीय तराई में सीर को जिरापन और सौर मान पोरामा कहते हैं। यहाँ रोप्त हो आप बटाई पर तया - १ लगान पर मोसने का आम रिवाज है। नपार मे भूमि नेपाल की कुल भूमि का क्षेत्रफल ३ ४७ ९१,६८० एकर है जो कि मोटे रूप मे नोच लिखे अनुप्तार विमाजित किया जा सकता है। वनों से आच्छादित भूमि ३१३% सदम हिम से डको रहनेवाली भूमि १५२% अल्पाइन (उच पर्यतीय) चरागार मरियो, गांवों सपा नगराको आवादी से घिरी मूमि १२५% मौतोड़ बजर भूमि (पेस्ट लह) जो सेतो ये योग्य बनाई जा सकती है १६२% भूमि जिस पर सेतो होती है १७७% १००% ७१% मुख्य फसलें पसल हजार मनों मे तम्बाकू २८८ क्षेत्रफल भनुमानित उत्पारन हजार एक्से में धान (धायस) ६५८४ ९८७६० मक्का ज्वार, बाजरा २९२० २९२०० ७६८ ७६८० सिलहन ४०८ २०४० भाल ८६४,००० ३४५६ पटसन (जूट) १००१ मन्य १००० तराई और भाभर प्रदेश-दाका सबस गरम प्रवरा है । पास्तव मे यह गगा के मदान काही भाग है। इसम मदान और जगल हैं। यहां उष्ण कटिवष को पदावार होती है। यह अत्यन्त उपजाऊ प्रण है और नपाल का खतिहान कहलाता है। बावस, गेहूँ मका निरहन मूट सम्याकू यहाँ पूर पैदा होते हैं तथा वन सम्पत्ति तथा को भी महत होती है। इसके अतिरिक्त आम का रोची और अमरद खूय पमा होते हैं और फले को पदावार को पढ़ाने को बहुत अधिक सम्मा घमाए है। मध्यप्रदम पापल गेहूँ और मरमा पो खूम पदावार होती है तथा नापू मारगो मोर शीतोष्ण कटिव पके फल उत्पन्न होते हैं। नपाल में एनों को पदावार यढ़ाए जा सपने को बहुत अधिक सम्भावनाए हैं। सेव नासपाती मोब नारगी बादाम तया पिते पी पदापार बहुत बढ़ाई जा सकती है। मध्यप्रदा म प ग या महत उस्मत हो सकता है। पहागे। मन मे सेतो की समावनाए गम है परन्तु पापालन होता है तथा पायथा विपसित रिया जा रास्ता है। भूमि व्यवस्था-नेपाल में भूमि । स्वामित्व सोन थपियों में पटाई (1) रेपर (२) रिता (३) गुठी। रेकर--यह भूमि है ना राग्य में अपने पास एसो है गिरासे उसे मालगुजारी प्राप्त होती है।

उसका क्षेत्रफल फितना है यह ज्ञात नहीं है। विरता-यह भूमि है जिरो राज्य ने व्यक्तियों को उमको सेवामो के उपलक्ष्य में दे दिया है। वे एक प्रकार को आगोर हैं। बिरता भूमि कितनी है यह ज्ञात नहीं है परन्त यह अनुमान किया जाता है कि मिरता भूमि सबसे अधिक है। गुठी~वह भूमि है जो पार्मिक संस्थाओं तया धामिक व्यक्तियों को वातव्य के रूप में दी गई है उस पर कोई कर नहीं लगाया जाता है। ऐसा मनुमाम किया जाता है कि देश मे दस साव रोपानी भूमि इन पार्मिक सस्थाओं को गुठी के रूप म बी हुई है। मपाल में नीचे लिखी श्रेणी के किसान होते हैं। स्वामी कृषक- जो अपनी भूमि पर सेतो परते हैं। साझीदार क्सिान- जो अप किसी की भूमि पर खेती करते हैं और उनको पार का एक निश्चित हिस्सा धते हैं । (३) आसामी क्सिान- जो भूमि के स्वामी से लगान पर भूमि लार सेतो परते हैं। (५) विरता भूमि का आसामी पिसान-- मिरता भूमि जिसे राज्य के द्वारा खेती के लिए मिली है वह उसे आसामी को उठा देता है और उससे लगान पसल करता है । (५) एक यह पिसान होता है जो अनुपस्थित भूमि के स्वामी को भूमि पर सेतो करता है और उसे लगान देता है। नपाल को भूमि व्यवस्था भारत की रयतवारी मया के अनुरूप ही है।तराई प्रदा म मालगुजारी जमींदारों और पटवारियों के द्वारा वसूल की जाती है और पहाडी प्रदा म जिम्मेवाल और ताल्लपवारों केबारा वसूल की मासो है। तराई मे जमींदार को उसके द्वारा वसूल की हुई मालगुजारो पर ५ प्रतिगत और पटवारी को २३% कमीशन मिलता है। पहाड़ी प्रदश म जिम्मेयाल और साल्सकवारों दोनों को ही ५ प्रतिशत कमीशन मिलता है। काठमाडू घाटी में रिसाम सोपे समाने में मालगुजारी जमा कराते हैं। वहाँ कोई बीपवाला नहीं है। सराई के जमींदार भारत के नीदारी की मांति नहीं हैं। वे सरकार की ओर से मालगुजारी प्रसूल करते हैं। अपनो खेती के लिए सरकार उनें अलग से भूमि बती है जिसे पश्चिमी तराई मे सोर' कहते हैं मोर प्रोप तराई में जिरायत' कहते हैं। वे उस भूमि को वेच भी सकते हैं। सिंचाईमपाल में अधिकतर सेती वर्षा पर निर्भर करती है। देवल १२८००० एकर भूमि पर सिंचाई होती है। खेती की पदावार का निर्यात-पाल घावल आलू तिलहन, जूट, गन्ना तम्बाकू पा मुख्यत' निर्यात करता है। परिवसा आये तो मपाल का मुत्य निर्यात मेतो की पायार तपा दनों की लपीतपा मान्य वन सम्पत्ति क्सिाना का स्थिति नपालक प्रथम राणा प्रधान मत्री नगबहादुर ने सराईरी मि को रोती करने वालों को मकर घड़े बड़े चौधरियों (जमींदारों) सया भपने चाटार रियारियों को दी। यही चौधरी और चाटार रबारी वहां रिसानों को भूमि से उठा कर उनका अनवरत गोषण करते रहे। फिर भी प्रमश तराई म पिसान खेती करने के लिए बसते गए। महाराजा चद्र शमशेर राणा ने अपने शासन काल में राज्य को आमदनी बढ़ाने के लिए तराई के प्रदा मे नापी (पमाइश) करवाई। मापी मे मी महत पांघली और भ्रष्टाचार हुआ। जिसने जितनी अधिक रिश्वत दी उसको उतनी ही अधिक भूमि मिल गई। लाखों की संख्या में खेत वाले किसानों की भूमि को महाजनो से घूस लकर सोर के रूप मे लिख दी और पिसान भूमि रहित कर दिए गए। इसके पचात सराई मे नापी को प्रथा हो घल पगे। राणा सर कार मापी परने के लिए कुछ वर्षों के उपरान्त अपने मचारी तराई में भेजती थी। मापी के समय फिर वही यांपली और भ्रष्टाचार की क्रिया दोहराई जातो पो । घूस दकर महाजन किसान की भूमि अपने माम करवा लते थे। घूस लकर राज्य गमधारी गांव की मालगुजारी घटा देते न देने पर यदा दते थे। नापी के द्वारा किसान का ऐसा भयकर शोषण होता था कि आज भी नापो के नाम से किसान भयभीत हो जाता है। तराई का प्रदा ही नपाल का कृषि प्रवश है। यहां मल को सुविधा है। भूमि उपर परन्तु जलवायु अच्छा नहीं है। नपास का पहो कृषि प्रदेश है। नपाल के पहाड़ी लोग पत्यरो से सरकर खेती करते हैं। नपास का पहाडी प्रदश का किसान जैसा विक्ट परिश्रम करता है उसको तुलना मसार का कोई किसान नहीं कर सकता है। वह पत्थरों से सपर खेतो करता है। पानी का वहीं नितान्त अभाव है। सिंचाई कोई सापन उपरम्प नहीं है। यह दूर-दूर से घरों में पानी भर कर लाता है और उस जल से फसल को सोंचता है। उसके परिभम को समता कोई अन्य दारा क्सिान नहीं पर सक्ता। जलवायु तराई प्रदश का छोरपर रि जहाँ उष्ण कटिबंधीय जलवायु है मपास के मिन्न भिन्न प्रबलों में जलवायु मिन्न रहता है। गर्मियो में तराई म सूप गर्मी रहती है। तापमान ९० डिग्री से ११० डिग्री तक ऊचा धद आता है। उसी समय पहारियोंर क्षेत्र में तया घाटियों में पसत ऋतू रहती है और परसोय प्रदेश मे शोतकार होता है। वर्षा ऋतु-जून मतसे १५ सितम्बर तक मपाल म दक्षिण पश्चिमी मानसून से वर्षा होती है। यहां अधिक्तर वर्षा गर्मियों में हो होती है । मन्य मौसमों मे वर्षा यहुत कम होती है। पूर्वाय भाग में वर्षा का मौसत १०० उचह परन्नु पश्चिम में वर्षा का औसत देवस ४०प है। काठमाएको घाटी में ५७१ वर्षा मौसत है। सराई प्रा मर्यात रक्षिणी सीमा प्रदश में वर्षा ७५ एच से ९० इंच तक होती है। वर्षा ऋतु में तापमान विभिन्न भागों मे मात मिन्न रहता है। मपास में उस समय उष्ण टिप और आल्पस नसे तापमान विभिन्न भागों में रखने को मिलते हैं।

r प्रदेश भौसत सापमान फरनहोट तराई का प्रदश ७५ से 110 तक पहारियों का प्रदेश ५० से ७० काठमाडू घारी ६५ से ८० तक भीतरी हिमालय ३२ से ५५ तक शरद ऋतु-वर्षा के उपरात नयम्यर तक शरद का मौसम होता है। कमी कमी थोडी वर्षा हो जाती है। परन्तु उससे तापमान पर कोई प्रभाव नहीं परता। नवम्बर में पहाटा पर यफ पहने लगती है। दृश्य अत्यन्त मनमोहरू और सुहावना हो जाता है। उस समय तापमान नीचे लिखे अनुसार रहता है । प्रदा भौसत तापमान फरनहोट तराई प्रदेश ६० से ८० पहारियों का प्रदेश स ५० काठमाडू की घाटी ५० से ६० शीतकाल-दिसम्बर स फरवरी तक शीतकाल होता है । मपाल की घाटी के चारों ओर जा नीची पवतश्रणिया की वायार है उन पर यफ जम माता है और उन पर सूर्य की किरणें पार कर घाटी के सौंदय को बहुत यदा देती हैं। सराई प्रदेश में तापमान का औसत ६० से ७० फरनहोट, पहारियों के क्षेत्र मे २४ से ४० तक और काठमार की घाटी में ३२° से ५५ सक रहता है। बसत ऋतु माच से मई तक होती है। यह नपाल को सबसे सुहायमी ऋतु है। वनस्पति से समस्त प्रदेश लहलहाता हुआ एक विशाल उद्यान मारूप धारण कर लेता है और हिमालय पवस पर श्वेन बफ होती है। तराई प्रदा का तापमान ६० फॉरनहीट पहारियों के प्रदेशका ४० से ६० सक और काठमांडू घाटी का ५० तक रहता नगर और जनसत्या नपाल छोटे गांवों का है। देश में कुल मिलाकर २८७८० मगर स्वे और गांव है परन्तु इनमे से ८५ प्रतिशत की आयादी पांच सौ म्पत्तियों से कम है। वा भर में केवल बस क्स्वे या नगर ऐसे हैं कि जिमको जनसख्या पांच हजार से अधिक है। वा को तीन चौथाई जन सस्या एक हजार का आवायो से कम क गांवों में रहती है। ऊपर लिखे यस पस्वों और नगरों म दावी पुल जनमरया का रेवल ३ प्रनिशत। निवास करती है उनमें से पाच परवे और मगर काठमाडू घाटी में है। धार कस्बे पूर्वी तराई मे और एक मुदूर पश्चिमी तराई में स्थित है। नीचे उन दम पस्यों और नगरों की जनसख्या दी जाती है। पाठमाडू-१०६५७९ ललितपुर- ४२.१८३ भरतपुर- ३२,३२० मपालगन 1०,८१३ यरिगण-१० २६ पिमी - ८६५७, विराट मगर ८०६०रातापूर -७०३८ जनरपुर -७०२७ राजवरातवा ५०७१ ऊपर विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि मपाल मुत्पत छोटे गांवों काम है और यहां की ९५ प्रतिगत से अधिक जनसरसा गांवों में रहती है। से ९० T १९६१ को जनगणना के अनुसार नपालको जनसख्या ९३८७६६१ थी। प्रतिषग मील जनसख्या का धनस्य १७२ घ्यक्ति है। दस पप पर जनसंख्या का घनत्व १५२ व्यक्ति प्रति पग मोल पा ऐसा अनुमान है कि प्रति एक हजार के पोछ ४५ इन दर तया ३० मृत्यु दर है अस्तु प्रतिषय प्रति हजार पीछे १५ को वृद्धि होती है अर्थात नेपाल को जन सस्या १३ प्रतिशत के हिसाब से प्रतिदय बढ़ रही है। प्रति व्यक्ति पोछ वार्षिक आय देवल ३५० नपाली सिक्या है। नपाली रुपए का मूस्य भारतीय रुपए का दो तिहाई से कुछ अधिक है। अतएव नपाल एक अधिसित जोर पिवन दश है। प्रति ने उसको बहमूल्य प्राकृतिक सम्पत्ति प्रदान की है परतु नपाल अभी उसका विकास नहीं कर सका है। तीयभूमि नपाल नपाल सीय स्थला से भरा हुआ है। तिब्बत + लोग मपाल को नेपा कहते हैं । तिमती नापा म उसका अप तोषयासी होता है। वे लोग नपास को पुष्य तीथस्थान गानते हैं। हिद धर्मावलम्बो मी नपाल को थक्षा की दृष्टि से दसत है क्योंरि यहा बहुत स हिदुओं के तीयस्थान है । बौद परिलम्पियों के लिए मी नपाल महान सोय है। सयागत नगवान बुद्ध ने यहां Tम लिया या तया स्वम्मू घत्य महा यौपदत्यादि प्रसिद्ध मंदिर यहा हैं। पवि खा जाय ता नपाल ऐसा रमणीष दा हे और पा ऐसे नसगिक एरात स्थान है जहां कि आध्यात्मिक जीवन व्यतीत रने वाल व्यक्ति पहाडों और धना मे रह कर मापना करते रहे है। वनों सपा पवतोंमागान्त वातावरण मनुष्य ५ मन में रावणक्तिमान परम पिता परमेश्वर के प्रति सहा मक्ति टस्पन परता है। यही कारण है कि युग-युगा से मारतीय ऋषि और साधव यहा जाकर सापना और तपस्या करते हैं। हा नपाल में पतिपय प्रसिद्ध सोय म्यागो का नीचे वणन करेंगे। पशुपतिनाथ-पशुपतिनाथ का शिवमदिर नपाल का सबसे प्रसिट प्राचीन तीयस्थान है । ह पवित्र यागमती नदी किनारे है। समीप हो मार्याघाट है जहा गमशान तया स्नान घाट है। यह पूध म हिन्दू तीयस्थानो म सबसे पुराने और प्रशिट तोयस्या मे से एक है । लाखों मारतीय हिन्दू प्रतिवर्ष फाल्गुन के महोन मे शिवचतुदशो पे अवसर पर पदा सहित यहां दाा परने आते हैं । पशुपतिनाम के दशन नपाल ने हिन्दू और तिग्बत के बौद्ध सभी करते हैं। वे सनी इस पवित्र तीय स्थान को अत्यन्त श्रदा कोटि में दराते हैं। मंदिर कोपला अत्यन्त मुबर है। एतों पर सो वा मुबर काम है। अस्य दोघ पास से पह पवित्र मदिर कोटि कोटि जन का श्रद्धा स्परा है। वोधनायबोधनाय को बौद्ध पत्य गोहते हैं। उसका स्यस्प एक स्तूप सो मानि है। स्तूप से ऊपर जो भाति बनी है वे अत्यन्त प्रमावगाली और पलापूण ₹। कमल पा है उसमे यरमूल्य रत्न नहे ह । नोचे घसूतरे पर प्रायना को मनि हनिपर पवित्र पाश्य 'भोम गाम परम भोश्म भकिस है।

जारों में नवम्बर से एप्रिल तक तिम्बत सिक्किम मुटान तथा मध्यचीन से बौट लोग यहां दशनाय आते है उस पत्र के समय पर सबसे महत्वपूर्ण पय सहस्रग्योति का पर्व होता है। उस समय समस्त मविर इतने सुर ग से सजाये जाते है कि देवता भी उसके पशन को लालायित हो उठे। पूजन मी दर्शनीय और अनोखा होता है। एक हजार एक ज्योतियां स्थापित की जाती हैं। वह दृश्य ससार में एक मनोसा होता है जिसे एक बार बनकर कोई विस्मरण नहीं कर सकता। इस मदिर का धार्मिक अध्यक्ष पिनाई लामा होता है जो दलाई लामा का प्रतिनिधि होता है । स्वयम्भूनाथ स्वयम्भूनाय के सम्बय में यह प्रसिद्ध है कि ससार में यह सबसे प्राचीन चौट मन्दिर है। ऐतिहासिक लखों के अनु सार यह मस्य त सुदर मदिर दो हजार वर्ष प्राचीन है। यह मदिर एक पहाड़ी पर बना ह और पांच सौ सीढ़िया घढ़ कर वहां पहुंचा जा सस्ता है। मुख्य मदिर के अतिरिक्त उसमें १३ अन्य मधिर है जो बोलों के तेरहों स्वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके स्वनितर समस्त अवस्पल मे मय्यता भर दते हैं। मदिर मे एक विनाल बोट मूर्ति है। म अत्यन्त प्राचीन मदिर को स्थापत्य कला और मूर्तिकला को देख मपाल की कला को प्रसा फरमो पाती है। इससे विदित ह कि दो हजार वप पूर्व भी नपाल कला की दृष्टि से बहुत उन्नत पा। इसके अतिरिक्त गुहेश्वरी का मदिर तांत्रिक पुटों का अत्यन्त प्राचीन और भाका स्थान है। घारमती विहार को जिसे डा याहिस भी रहते हैं प्रिय दशी सम्राट अशोक की पुत्री राजकुमारी चारुमित्रा मे बनवाया था। आग से हगारों यप पूय जब धापमित्रा नपार माई पो तब यह विहार मना था। उसके पास हो एक दूसरा विहार है मिसे मावाज बाहल कहते हैं। ये दोनों ही बिहार अत्यन्त मध्य है। उनकी भवन निर्माण कला बहुत आस्था है। उनकी दीवारों पर मिति चित्र है जो कि मूल पनिज रगों में बने हैं वे एसा उत्कृष्ट नमूने - अध्याय दूसरा नेपाल का प्राचीन इतिहास नपाल सम्बध मे एक अत्यात प्राचीन स्थिरती है कि महान मजुश्री मुदूर उत्तर महाचान के शिररान पवत मघारिया से चलकर तिम्वत ऊचे पठार को पार करते हुए और गगनचुम्यो पवत राम हिमालय के दरों को पार करते हुए नागवासा झील पर आए। नाग वासा मोल सलिल शुद्ध जल से मरी हुई उस पवत्तीय घाटो मे स्थित यो। मजुधी उस झील के चारों ओर घूमते हुए झोल क रक्षिणी सिरे पर पहुंचे। यहा उन्होंने अपनी तलयार को ऊचा उठावर जोर से घटटानों पर मारफर पटानों को पाट दिया। मजुश्री द्वारा घटटानों के काट दिए जाने से पवित्र वाघमती नदी की जलधारा प्रवाहित हो गई । इस प्रकार महामारत पवत से निकलकर भारत के मवानों में बहती हुई पवित्र वाघमती पटना के नीचे गगा से मिल जाती है। इस सम्बध म दूसरी क्विद तो यह कि भगवान विष्ण ने नागवासा मील की घटटानों को फाटर झोल पानी को घाघमती की अलपारा मे प्रवाहित कर दिया। जव मोल सप्न गई तो मजुत्री और दूसरी विषद तो के अनुसार भगवान विष्ण अपने सहघरों के साथ यहां यस गए और उन्हीं से नेवार जाति का जम हुआ जो नपार कयादि निवासी है। हजारों वर्षों के उपरान्त भारत से एक ऋषि मे-मुनी इस प्रा में आए उनर साप गुप्त या गोपाल धाका एक राजकुमार भी था जो उस प्रब का पासक बन पर उस पर राय परता रख । ने-मुनी को उस प्रथा के लोग इतनी गहरी श्रद्धा से दसते पे कि यह पयतीय पाटो उनके नाम पर मपाल की शान हो और जिस राजवा को उन्होंने वहां स्थापित क्यिा उसक उत्तराधिकारी अपने नामों क साप गुप्त शर जोड़ने लगे। नपाल का मारत से अत्यन्त प्राचीन सम्बध रहा ह। महामारत और तात्रिक प्रपों म उसके उल्लस है। इससे यह सिट होता है कि अत्यन्त प्राचीन 7 से यह मारत से सम्बधित पा और यहां की मनसख्या भारत से जाकर यहा बसनेवालों को ही सन्तान है। कुछ लोगों यह धारणा ह कि "गुप्त मौप ने नपाल पर विजय प्राप्त पी पी और ने मुनी पिसी गुप्त राजकुमार को लेकर मपार घाटी में पहुंचे। दोंने स्वप भयया उस राजकुमार रे दारा गुप्त मपा गौपाल राजवाचसापा।

पाटी पर मानमण क्यिा, और फिरतानो पासों का पतन हो गया। मारमणकारियों ने पिरतानियों से घाटी से खदे दिया और थे पुन अपने पूर्व निघास स्पाम पहाड़ों में चले गए। अव मपाल की घाटी में वमन राजयश का उदय हुआ और वे यहां के शासक बने। इस राज का पांचा गासक मास्करवमन अत्यन्त महत्वाकांक्षी और वीर पा। उसने भारत के मदानों पर आक्रमण पिया और पूर्व में समुर । तब उसने भारत के मदानों को अपनी विजयवाहिनी से रौंद गला। पमन राजवश के शासनकाल में रला याणि य, और साहित्य को मद्भुत उन्नति हुई। बात यह थी कि इस राजश के शासन काल में नपाल को घाटी में बहुत लम्बे समय तक शान्सि रही। यही कारण पा वहाँ को कला वाणिग्य और साहित्य की अभूतपूर्व उन्नति हुई। वमन राजद के इक्कीसवें उत्तराधिकारी महादयवमन के शासन पाल में मपाल घाटी कला वाणिज्य और साहित्य के विकास में अपनी घरम सीमा पर पहुँच गई यो । महादयधमन स्वय अस्यन्त विद्वाम और का प्रेमी सफ्ल शासक था। उसका व्यक्तित्व अत्यन्त आकपर और प्रमावनाले या। उसगासन पाल में नपाल राज्य मपाल पार्टी से बाहर पूर्व मे फल गया था और पश्चिम में गडक नवी तक उसका विस्तार हो गया। इस राजवा + अन्तिम नाराक शिवदययमन के कोई पुत्र महीं था। कयल एक पुत्रो यो। शिवववमन मे अपनी पुत्री का विवाह गुर सूययगी क्षत्रिय अमसूवमन जो ठाकुर जाति का था और सम्भवत उत्तर भारत के अवध प्रवग का था से कर दिया। । शिवदयवर्मम ने मपार का सिंहासन अपने मामाता अमनवमम को दे दिया और अपने सदाधियों को जागीर पाट दी। उसके उपरात वह स्वय भजन पूजन करने पे लिए एकान्तवास परन मट में चला गया । यह छठी शताब्दी के अन्त और सातवी के आरम्म को घटना है। जय शिवदयवर्मन एका नवास मे घसा गया तोमपाल की घाटी में गृह पलह अगान्ति और विपत्ति का घोर ताडप आरम्भ हो गया। शिवदववमन अपने एकान्तवास से पापस आया और उसने स्थिति को सम्मालने का प्रयत्न पिया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। इसी प्रयत्न । में उसकी मृत्यु हो गई। मपाल की घाटी मे जो अगान्ति और गृह कलह उठ खरा हा पा हपवयन ने पूर्वी भारत में विद्रोह की -घयाने के लिए एक सेना को सकर पूष किया। हो सस्ता है कि कुछ विद्रोही तत्व नपाल की ओर मागे हों और उसने मपाल पर मो आक्रमण कर दिया हो। परन्तु हावधन और उसकी सेनाए अपिल समय नपाल मे महीं रहीं। शीघ्र ही धापस चली गह। ईसा के ६२७ वप पपात जब प्रसिस चौमी यात्री frयाग-बाग न पाल में गया तो उस समय अमनवमन नपाल के राजसिंहासन पर विराजमान था। - या तो अमरवमन नेहप की सेनाओं को मार भगाया पा अपवाद मे अपनी सेनाओं को वापस लौटने की आज्ञा दी थी यह रहना कठिन । उस समय मपाल की पाटो में नेवार जाति के लोग अपनी पारी परी में गान्तिपक ध्यस्त और हिन्दू सपा पौर धर्म दोनों सही १४ अमसषमन नो प्रचलन था। ठापुर जाति का पा उससे ठाकुर राजवा का आरम्म हुआ। अमन अरयत धीर शक्तिवान और प्रभावशाली था। उसको घोरता विद्वत्ता शोय इत्यादि की कहानिर्या नपाल के इतिहास में ही नहीं बोन और सिरवत र इतिहास में भी बहुत मिलती है। इसस पता चलता है फि अमसू नपाल का अत्यात प्रतापी शासक था। यह बहुत बलिष्ठ, आकषक व्यक्तित्ववाला और महान प्रतिमा सम्पन्न प्यक्ति था। उसके शासन काल मे विज्ञान साहित्य शिक्षा (प्रपम संस्कृत व्याकरण उसके शासन काल मे हो लिखा गया) और वाणिग्य का बहुत अधिक विस्तार हमा। उसने शासन का भी विकास किया। उसरे समय मे उसका गासन उत्तर में सिावत की सीमा और दक्षिण मे भारत की सीमा को छता था। उसकी प्रशसा मे नपील के तत्कालीन प्रयों में उसके समकालीन लसकों मे लिखा है- 'उसरे गुणों के कारण उसका यश समस्त पृथ्वी पर फल गया था। उसके गासन काल तक दवता सशरीर नपाल से घाटी में प्रकट होते थे। उसके बाव दवता लोग महश्य हो गए अब हम मपाल के उत्तर तिम्वत अर्यात मोट (तिस्थत कावास्त विक नाम मोट है आज भी वह इसी नाम से प्रसिट है) की ओर दृष्टि पात करें। इसी समय से तिम्मतानपाल से घनिष्ठ सम्बय स्थापित हुआ था। मोट (सिम्बत) उस समय पूर्व एम राष्ट्र नहीं था वहाँ पूमने फिरने वाले स्वील रहते थे। ये पलिप्ठ कठोर जीवन में अभ्यस्स और लहापू थे। उन स्मोलो र मुखिया 'मान्न सोंग वत्सन' के शासन कास मे तथा उसके योग्य उसराधिकारी खाना-मत्सन स्पाम्पों के नेतृत्व में तिप्यत एक दश और सगठित राष्ट्र मन गया। उसने एप लाख सनिकों को एक प्रदल सेना का निर्माण किया और सिक्किम और भूटान को विजय परतामा मारत तक पहुंच गया। यद्यपि बार को भूटान और सिक्किम स्वतंत्र हो गए। उसने चीन भारत और मपाल के पारों में अपने राजदूत नियुक्त किए। उसने एक मिशन मारत इस उद्दश्य से भेजा कि वह वहां के शिक्षा द्रों मे बारर भोट मापा (तिग्यतो भाषा) के लिए एक लिपि खोम निकाल । जब वह मिशन सौटकर आया तो उस तरुण और प्रतिभावान गासक ने उस सिपिका पश में प्रचार कराया और सिम्यत को एक लिपि प्राप्त हुई जिससे तिम्बत में भविष्य के लिए शिक्षा और साहित्य के निर्माण 7 मार्ग उसी समय तिम्बत रामपास से सम्बन्ध स्थापित हमा। अमन ने 'भोट' को प्रमुसा को स्वीकार कर लिया। जय 'साना बत्सन' मपाल की मतीय सुन्दरी अमकी पुत्री रे सौन्दर्ग से इतना अधिक प्रभावित हमा कि उसने उससे विवाह करने को प्रकट को सो अमन मे सो स्वीकार कर लिया। मपास राजकुमारी तिव्यतरी राजमहिषी बनकर सिम्पत में आ गई । नपाल रानमारो बोट धर्मको अनन्य मात थी। पर मपने साप तथागत नगवान मुटके अवशेष तपा अन्य पामा चिह तया पार्मिर प्रय लपर पति के साप गई । उसने मपने सनिक पति को बौद्ध धम का अनुयायी बना दिया और अपने पति के द्वारा उसने तिरवत में बौद्ध धम पा प्रचार दिया। क्रमश तिस्बत के निवासियो ने बौद घम का स्मोकार पर लिया। 'सान्ग-परसन स्माम्पों' के पास अब सम्म जीवन को तीन आयशफताए उपलब्ध पी। उसके । देश में लिपि का प्रचार हो रहा था। उससे साहित्य का और शिक्षा का विकास हो रहा या देश मे एक ऊचा और परिष्कृत धम फैल चुका था और उसकी पत्नी मुगिलित उच्च यश को विदुषी महिला re अपनी इस सफलता मे उत्साहित होकर उसने चीन के सम्राट ताई-जग' को एक आशा मेजो कि वह अपनी राजकुमारी उसको पत्नी के रूप मे दे दे। चीन के सम्राट ने अस्पा अमद्रप्तापूवर अपमान जनक शवों में तिम्वत के तरुण गातक की मांग को ठुकरा दिया। तिग्वत के उस तरुण नासा ने चीन पर आक्रमण कर दिया। जय सिम्यस को सेनाए चीन प्रवश को विजय करती हुई सम्राट ताई-अंग 1 को राजधानी घगान के समीप पहुंच गई तब विया होकर घोन सम्राट को अपनी पुत्री राजकुमारा वेन चोग' को उमे धना पडा। पर घटना सन ६१ ईसवी की है। राजकुमारी घेन-चाग' के सार यौट धर्म की महत सो पुस्तके, मय धार्मिक वस्तुए तया वा भगवान को एक भव्य मूर्ति मी ल्हासा तिरस्त वी राजधानी पहुंची। उसने सथा मपाती राजरानी श्री पररान दोनों ने मिलकर तिवत में वोट घम का इसनी लगन से प्रचार किया कि लामा थम म उहें श्वेत-सारा और हरित-सारा ( देवी) के नाम से पुकारा जाता है । उस समय स सिग्यत मे नपाली जो कि वास्तव में मारतीय संस्कृत और हमसफला ह उसरा प्रभाव बढ़ता गया और धोनी प्रभाव कम होता गया। ति बत मपाल तया सिक्किम के माग स कग्नि पहाग परौ और मार्गों से उस समय भारत से व्यापार होने लगा था। चीन का एक मिशन मारत आया। पातु वहाँ उपक साप दुय्यवहार हा । किसी प्रकार उहाने भाग पर अपनी जान बचाई। पानी मिन का 'नेता 'वांग-हियूम-सौ नपाल गया और यहा उसने सहायता मांगी। अमसू को मृत्यु हो घरी पो और उसरा पुत्र नर-दव' सिंहासन पर या। उसने चीनी मिगनमा स्वागत दिया। तिम्चत पापागा जिसे तिम्पत का सिकन्दर मी रहते हैं उसने तब यह सुना तो वह अपनी सेना र नपाल में आया। यहा उसने और सना ली और तिरकृत पर 'आक्रमण पर दिया। मारतीय से पराजित हुई और उसने दही के पारसक तया उसक परिपार को कद पर चीन भेज दिया। नरेन्द्र दव अयन यदिमान और सफल पासा या दूसरे प उसने चीन को एक नपारी मिगन मना इस प्रसर चीन स मपाल के समप अधिक धनिष्ठ हो गए और दोगा बगो मे ग्यापार होने लगा। चीनी यात्री अधिक सम्मा में नपार आने लगे। मपाल के पास मे हिदू और यौर पवित्र स्थानों का ओ गोवार गया नहरें गुगाई और मरनों के अला मिचाई लिए उपयोग पिया और अरनी - . १६ पर प्रणाली का सुधार रिया। नपाल नरे उदय पेगासनकाल मे समृद्धिगालो बन गया और वहां की प्रजा मुखौ यो । नरेद्रदय की मृत्यु उपरात जरा पुन परादय सिंहासा पर मठा। उसके शासनकाल में भगवान गराचाय नपाल आए । करादय उनका भक्त हो गया और उसो बौद्ध धम पा नपाल समूटोच्छद परने का प्रयत्न किया । उसके गासनकाल में पौद्ध मदिरों का पिनाग या बौस साहित्य को नष्ट दिया गया और बौद्ध धर्माचापों पर अत्याचार हुए। इसका परिणाम यह हुआ पि यद्यपि बौद्ध धम नपाल में क्षीण हो गा फिन्तु नष्ट नहीं हुआ। ठाकुर राजघश के एम्बे शासनकाल मे नपाल की घाटी में खेती के अतिरिक्त व्यापार पा बहुत विकास हुआ और पातीपुर (वाठमाहू) तथा पाटन प्रसिद्ध व्यापारिए मटियो यन गए। ठाकुरी राजवा दे उपरांत अमसूवमन में ही पा को एक नाता का मैपाल की घाटी पर गातन हो गया। पर इसरे उपरांत राजयश जल्दी जल्दी बदलते रहे परतु नो राजश नपाल की घाटी मे गासन करते रहे ये ठाकुर राजया सही सम्बन्धित थे। इन राजामओ ने शाद पो पाल की घाटीको तीन छोट-छोटे राज्यो मे बांट दिया। इस बीच म राजवा का नाम 'मल्ल' पट गया था। बात यह थो कि अरिदेय रात जब मुरती एट रह ये तब उहें सूचना दी गई कि राजकुमार पाम हुआ ह । राजा गरिदव ने उरको मल्ल पी उपाधि दे दी। समी समरत राजधश पा उदय हुआ। जव ान दमन राग बना और उसने मतपूर (भटगांय) बसाया तो उसने कातीपुर (काठमाडू) और पाटन अपने भाई को व दिया और मटगांव पर स्वय गासन करने लगा। इस प्रकार मपाल की घाटी में तीन राज्य यन गए। पर सो भूल थी कि जिस कारण नपाल की घाटी की रानौतिक स्थिति नियल हो गई। अय नपाल मे पातीपुर (पायनाडू) पाटन और भटगांव तीन राज्य हो गए। १०९७ में नददव नामर एक दक्षिणी राजपूत ने जो कि उस समय सिमरओ मर्यात तिरात पा गासर था जो मिनपात के बहुत समीप है (पसौल रो बोरा मील पूर) उसन नपाल की घाटी पर आक्रमण रिया और तीनों राज्यों को अस्यायो एप से ही सही समाप्त कर दिया। उसी समय पग्चिमकपरतीय प्रदश से खास जाति पेपरवसिया नपाल की घाटी मे सारर यसे और वहा व्यापार करने लगे। कालांतर में उनमें से कुछ यहुत प्रभाव शाली और महत्वपूर्ण नागरिक बन गए। सन् ग्यारह सौ ईसवी मे तालीन राजा हरिदव के दरबार में मागर जाति का एक परवतिया ऊ घी स्थिति में पहुच गया था । दरवार में नपाल घाटीमो उससे ईर्षा परो एगे और पनि पश्यत्र परके उसको पदस्युत परवा दिया। इस अपमान स यह बहुत नारा हुआ और पर अपन पतृप गृह पश्चिम मतानजिग अर्यात पापा गया। यहां के राजा को उसने अपने अपमान को क्या मुना और बताया कि नपार को पाटो भरपत समृदिगाली प्राण है। काटमार को गम्पिों में सोना यितरा रहता यहां का बाजार मामल्प यस्तुआ से भरा हुआ है और वहां र व्यापारियों पे पास पल्पनातीत पन है । ताजिग पाल्पा राजा मुक्दसेन ने नपाल को पाटो रे मन को सुनकर अपने राय को निधनमा से तुलना पो तो उसका हृदय लोम और ईर्था से गया । उसने नपाल को घाटो पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया। जब मुकरसेन की सेना मवान में उतरी और उसन नपान की घाटी पर आक्रमण किया तो रिदय युद्ध करने आया। मपाल की घाटी में चावला ये खेतों मे भयकर युट एमा। नपाल की घाटोक सनिकों को अगी सर से लड़ाकू, योर साहसी और भयकर गिय और मागर सनियों से पाला नहीं पड़ा या। हरिदव की सेना बुरी तरह परास्त हुई। मुक दसन को सेना ने उसे नष्ट कर दिया। तीनों नगरा म मय और घबरा हट छा गई। विजयी सेना ने मयकर नरमेध किया मदिरों और मूतियों को तोड डाला और लटपाट फर बहुत सा धन ल गए। किंवदन्ती है कि मुक वसन जिस समय पाटन आया उस समय पुरोहित मनाथ का पवित्र पव मनाने को तयारी पर रह थे। पुजारी लोग भय से भाग पर हुए। उस समय भगवान के ऊपर बने पटवारे रूपी सो के से देवता तथा मुक दसन पर सुदर फूलों की वर्षा हुई । मुकन्दसन ने आश्चम धकित होकर भगवान की मूति पर अपन घोड की गवन मे परीई सोने की नजीर की जिसे मगवा मछद्रनाय ने लकर अपनी गवन के चारों ओर लपेट लिया। कियदतो यह है कि आज भी सोने की यह घन उनको गर्दन में लिपटी हुई है। परन्तु भगवान पशुपतिनाथ मुफ दसन के अधार्मिक कार्यों से इसने कट हुए कि उहोने क्यो महामारी को मुक दसेन पी सेना नष्ट करने के लिए भेजा। धौदह दिन मे मुक्दसेन की पौर वाहिनी नष्ट हो गई और यह भी भेष यदल कर पहारों की ओर भागा । यह कठिनाई से दवी घाट तक पहुंचा जहाँ ताडो और त्रिमली नविया मिलती हैं। यहां वह गिर पड़ा और मर गया। पर प्रथम मवसर था कि मपाल की घाटी के लोगों ने पश्चिम के परपतिया को पुर-पुमलता और गौर्य को देखा । मुकदमेन के इस विध्वसपारो लाक्रमण से मपाल की घाटो मे सक्त विष्यस के चिह दिखलाई पड़ते थे। दस वध तक मपाल को स्थिति बहुत सराम रहो । मुस्दसेन पी सनावे नष्ट हो जाने के उपरात नवकोट के ठाकुर पुन उस घाटी में आए और उहोंने पुरा अपमानासन जमा लिया। उसके उपरांत थे दो सौ वर्षों तक नपाल को घाटी मे राम करते रहे। चौदहवीं शताटी में नपाल में अमोप्या राशनगरापरहा। यह राजवा किस प्रकार नपाल में आया इसके विपय मनि घयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। सम्मवत तिररत का राजा हरी सिंह विष्लो मुस्तान मुहम्मद रिन-तुगलक स पराजित होकर मपाल की घाटी में घुस आया और अन्तिम ठाकुर राजा को पराजित पर यहां का नागक यन पठा। यात यह थी मुहम्मद बिन तुगल ने उस राय को सीन लिया था और उसके क्लि को घर लिया या। हरोसिंह किसी प्रकार पीछे से निरल कर मपाल में घुस गया और २२६ वष पूर जिस प्रकार उसके पूर्वज न दवय ने नपाल +सिंहासन को विमय पिया या उसी प्रकार उमने नमाल.. रानसिहासन को पुन प्रात क्यिा। यह घटना सन् १३२६ ईसनी की है। सौ यों तक अपोध्या राजग मे नपाली धागे मराम्य पिया। अयोध्या राजवन शासनकाल में जाति नामा ठाएरमल राजकुमार जिसरे पूबा मारत से आए थे और मिन्हाने मपाल सो घाटी में नगरों पर गारान रिया या 14 प्रधान मन्त्री बना। यह इतना शक्तिवान और प्रनायगाटी था कि राजा क्वल नाममात्र को था। सारी गस्ति जयस्थिति प्रधान मत्री के हाथ मे फेद्रित थी। जयस्थिति और उसके पुन ने नपाल म ब्राह्मणों का वचस्य स्थापित कर दिया । उसरे परिणामस्वरूप नपाल को प्रना का दृष्टिकोण हो यदल गया। पाला तर म अतिम अयोध्या वगरे राजा ने अपनी पुत्री का विवाह टाकुरमल्ल वग के राजकुमार से कर दिया और यह नपाल या शासा बना। यह तीसरा ठापुर रागवश या जो नपाल के राजसिहासन पर जाया। तीसरे ठाकुर राजवा मे एर महान शासक यमल्ल (१४२९६०) मा उसने मुस्लिम शासन के नियल होने पर मोरग और तिरहत को भी अपने राय मे मिला लिया। नपा के प्राचान इतिहासकारों न तो विमा है कि उसने बिहार मे नौर गया तक अपना राज्य विस्तार कर लिया था। उत्तर में उसने तिच्यत पर आक्रमण किया और गेवर जोग' पर अधिकार कर लिया। पश्चिम में उसने घाटे से गोरखा राज्य पो भी अपने अधिकार मे पर लिया। उसने पाठांद और पाटन के राजाओ को भी पराजित किया था। यक्षमाल जब अपनी मृयुगम्या पर 437 था तो उसने अपने राग्य को विभाजित कर धार चार राज्यों में बांट दिया। काटना भटगांव पाटन और फाठमादक पूध मे दस मील दूर यनेपा। चार राज्यो की राजधानिर्मा पों। चारो रामधारियां एक दूसर ६ समोर पूछ ही मील की दूरी पर स्थित थी। उनके राज्य उनक पीछ दूर तक उत्तर पूष तथा पश्चिम मे फल हुए पे उसका परिणाम यह एभा कि उनके सुदूर क्षेत्र उनके राय से निकल गए और माई आपस में लड़ने लगे। अरत प्यर को राय रह गए-~मटगांव और काठमाडू । १७६९ तफ यही स्थिति रही। यक्षमल्ल को मत्यु के अरात उसके तीसरे पुत्र रत्नमल को पाठमांडू मा राज्य मिला परन्तु उसपो अपने राज्य पर अधिार परने के लिए नव कोट के ठाकुरो से १४७1 म लरना पडा। नवकोट के ठारों को परास्त कर ररनमल्ल ने अपनी स्थिति को सुदृद्ध पर लिया। इसबै उपरात यह मूटान और तिम्घत रोएस महा। उसकी परागय निश्चित यो । रिन्तु पापा मा परवत्तिपा राना मुक् दसैन का बज उसकी सहापता वो आगया और उसकी विजय रोगई। अपनी रक्षा और विजय १ उपलक्ष्य मे उराने द्राह्मणों को बहुत पान रिया और हिंदू पम को और अधिषमा यता और माधय प्रदान दिया। न पाल ने इतिहास पर भविष्य म इसका स्थायी प्रमाय पा। रस्नमस्त फा एक उत्तराधिकारी सगिरा' अत्यन्त अत्याचारी था। उसको घोड़ों का पहत नौय या। यह अपने घोड़े को सता मे चरने के लिए छोड़ दता था। इससे पिसाना पो तो पसर नष्ट हो गाता गो। इराके अतिरिक्त जिस रिसी सुदर मी पर वह भावपित हो जाता उराको परर भगवासा । इस मरयाघार से प्रजा वितही हो उठो यौर उसो काठमांडू से निकाल माहर पिया गया। उपर नपाल को घाटी मे १७६९ सा दो महत्वपूर्ण घटनाए और एन । पान्तीपुर ६ राना लक्ष्मी नर्सहर न काठपा पर यहत बा मिधामगृह पामार यनयाया जिप्तर कारण पानीपुर का नाम काठमांडू प्रसित हो गया। नपारे प्राचीन प्रयों में इस सम्बय मा लिती फया प्रसिद्ध है।

लक्मी नरसिंह के शासनकाल में एक दिन भगवान मच्छन्द्रनाय को यात्रा का उत्सव था । स्वर्ग ने कल्पतरु पुरुष येश मे उस उत्सव को बसने के लिए आया। उसको एक व्यक्ति ने पहचान लिया और उस समय तक महीं छोड़ा अब तक उसन यह पचन नहीं दे दिया कि उसके प्रभाव से वह व्यक्ति एक पेर कसने से एक बया विश्रामगृह बना सकेगा। इस घटना के चौथे दिम कल्पतर ने एक साल का वृक्ष भजा और उस ध्यक्ति ने राजा से आज्ञा लेकर उस साल के वृक्ष चिरवा पर उसको लफडी से सातल बनाया और उसका नाम 'माहू सातल' रखा। याकि यह एक ही वृक्ष को लरजी से बना पा उसका नाम काठमांडू हो गया और उसके कारण ही कान्तीपुर को लोग काठमार कहने लगे। सदमी-मरसिंह कोधी पा। उसन ईर्षावग आने एक मंत्री मीममा को मरवा डाला। भीममल की पत्नी सी हो गई । उसने चिता पर पठपर यह भाप क्यिा कि बरवार में कमी याय नहीं होगा । लक्ष्मी-मरसिंह पश्चात्ताप और श्राप मय से पागल हो गया। सन् १७०२ में मास्फरमल की प्लग से मृत्यु हो जाने पर यह सूपधशी राज पराना समाप्त हो गया । किंवान्ती यह है कि उसने दारे का उत्सव उस निकृष्ट मास में मनाया कि जो कभी भी नपाल में पाता है। भास्करमत ने यहुत कुछ दाम धर्म किया पर यह उस रोग से न बचा और उसके साथ हो वह राजवा समात हो गया। इस पाल मे पूसरी महत्वपूर्ण घटना १७३६ में हुई जयकि गारखा राजा नरभूपाल विद्रोही होकर काठमांडू के सिंहासन पर अपने वा का दावा करने लगा और उसने पूर्ण मे नयकोट ता अपना अधिकार कर लिया। नरकोट पाठमांडू से पेय पवह मील या। सस्कालीन नपाल की घाटी के शासक जय प्रकार से उसका युट हुआ। जयप्रकारामल्ल ने उसे परागित कर पीछे खदेर दिया। पराजित गोरखा राजा मरमूपाल १७०२ में स्वर्गवासो हो गया और बारह धष की आयु में उसका पुत्र पृथ्वीनारायन गोरखा राजसिंहासन पर पठा। पृथ्वीनारायन ने इतिहास को बदल दिया और तभी से समस्त रश पर गोरखा रागवा का शासन स्थापित हो गया। आइए वर्षे कि यह गोरखा कौन थे। २० अध्याय तीसरा पालपा-किरान्ती और छियालीस राज्य नपाल के इतिहास मे मकवानपुर अयदा पालपा राज्य का महत्व पूर्ण स्थान है इस कारण उसके सम्बय मे जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। हमे पालपा के इतिहास को जानने के लिए पीछे लौटना होगा और सन् १३०० ईसवी में जाना होगा । मपाल की घाटी के दक्षिण मे पहारियो के साथ साथ जहां से भारत को माग जाते हैं एक रामा करमसिंह राज्य करता था। उस प्रदश में भावर नाति के लोग रहते थे। एक समय इस मावर जाति का विशाल राज्य था जिसको राजपानी गोरखपुर यी कयर समस्त दक्षिण नपाल हो उस राज्य में नहीं पा घरन तिष्हत (बिहार) का प्रदश भी उस राय का एक माग था। परम्सु कालांतर मे आपसी शगहों सया बाहरी आक्रमणों से यह विशाल राज्य छोटे छोटे टुक्तों में वट पर नष्ट हो गया। उस राज्य का एक अदि शेष भूमाग छोटा-सा राज्य गडर नदी के पश्चिम के प्रदेश मे पा उसको राज पानी राजपूर था। जहा गरक नदी भारत में प्रवेश करती है उस राज्य का शासक परमसिंह पा । उसके दो माई ये एक कोसी नदी के प्रदा का पासक पा दूसरा तिराहत का शासक । तीनों भाइयों में लगातार पुर होता रहता अतएव प्रत्येक माई एक दूसरे से सतफ रहता था। इसी कारण करमसिंह किराती सनिकों को एक सेना राजधानी के समीप पहाड़ी प्रदश मे रखता था। जय चितौरगढ़ा पतन हुआ और बहुत-से राजपूत वीर उत्तर मे हिमालय स्थित नपाल में चल आए तो उस समय सात सौ वीर राजपूत सनिकों का एक दल फरमसिंह के पास पहुंचा और परमसिंह की सेना में मौकरी करने को पटा प्रस्ट की। उन राजपूत सनिको के दो सेनापति थे। एक का नाम जिल था और दूसरेरा नाम अजिल था। बाईस वप तक वे लोग रमप्तिह की सेवा मे रहे। सद्उपरान्त उन्होंने विद्रोह पर दिया तथा परमसिंह मारा गया और अनिल सेन राजा मना । अजिल सैन के पुत्र सुला सेन मे पहाड़ों पर मक्यानपूर का दुग बनवाया। उस मुहर दुग से उसने समीपषों प्रतिरो जोतना आरम्म दिया। प्रमा उसने पुराने भावर राज्य को पुन एक यो राज्य का स्वरूप द दिया और मावर प्रदाने पहाड़ी भाग पर भी अपना अधिकार कर रिया। उस उतराधिकारी ने उस प्रदा मे मौर बहुत सा माग विजय पिया और पालपा नगर पो विजयर लिया। प्रसन मपवानपूर रामवता पहला घासा पा जिसने अपने को पाल्पा राजा' घोषित पिया। सेन पुत्र मुरदसेन प्रपम एक बहुत बड़े राज्य का स्वामी बना । उसका राम दक्षिण म मरुपानपूर से मागर तया गुरग प्रदा तरु फला हुआ था। उसने अपने इस विशाल राम को अपने चारों लड़कों में बांट दिया। सबसे बड़े लडफे वो उसने गहप नदी के पश्चिमा प्रदश दिया । दूसरे पुत्र मानिक' यो उसने पा पा दिया बिगा को तानाहग का प्रदा और लोहगा' को मकवानपूर का प्रदग दिया। इनमें लोहगा' अत्यन्त पराक्रमी आर तजस्वी या। उसक राय के पूर्व में राजा विजयनारायन राम करता था को कामरप (आसाम) से आया था। उस राय मे वोसो धौर कनकाई नदिया के वोष मोरगका प्रदा और महानदी तक सराई का योठा भाग सम्मिलित था। यह राजा घमडी और सनपी था। उस राजा ने एप दिरान्ती नायक सिंघराय का उसके योद्धाओं सहित अपनो सेया में रख लिया। उन सनिया की सहायता से उसने अपनी गति को बढ़ाया और राम का विस्तार किया। इसके उप रान्त उसने विजयपुर माम से एक नई राजधानी यताई जो पहाओं पर स्थित यो और विजय मारतों' की उपाधि पारण की। सिघराय का प्रमाय बढ़ गया था। राजा विजयनारायन उसको जय समाप्त कर दना चाहता पा । सिंघ राप शुद्ध हिदू नहीं था। उसने किसी हिलू को को भ्रष्ट कर दिया उस महाने राजा न उसको पक्रया पर मार डाला। सिंधराय र पुत्र याजूराय अपने किराती सनिकों सहित मकवान पूर भाग गया। उसन मपवानपूर के तरुण गपूत राजा से प्रायना को कि यदि वह उसको सहायता करे तो यह अपर पिता के यप का बदला लना चाहता है। यदि वह सहायता करेगा तो यह रामा विमयनारायन मा राम्य उसके घरों में में वर वगा। फिन्तु मरवानपूर और विजयपूर पे बीच में कोसी नदी के पश्चिम म बहुत-से छोटे-छोटे राज्य थे। लोहगा के लिए इससे अच्छा अवसर पपने राज्य का विस्तार करने के लिए और कौनसा हो सकता या। अस्तु उसने याजू राय के किराग्नी सनिकों को सहायता से एक के बाद दूसरे छोटे रायको एल्पना आरम्भ कर यिा। जब उसने 'गिधा' पर मारमण किया तो उसके राजा ने इतने भीम धेग से प्रत्याक्रमण किया कि लोहगा को सना पराजित होरर भागने हो वाली थी कि अस्मात् गिपात राना मारा गया और सोहगा को विजय हो गई। वहां से भाग यदपर उसने विजयपूर पर रमण करना चाहा परन्त वहां पहुंचने पर उसे ज्ञात हुआ कि राजा विजयनारायन को मृत्यु हो सकी है। अतएव उसे तड़ना नहीं पग और विमयपूर पर उसका अधिगार हो गया। याराप इस युद्ध में मारा गया । इस प्रकार पिरागतो सनिक की सहायता से लोहगा न एष विगाल राय की स्थापना की जिसरी सीमाएं पचिम मे आरिया नदी और पूर्व में महानदी तर और उत्तर में सिम्यत से सकर दक्षिण में भारत के मदानों को छूतो थी। वानरापरा पुत्र किराति? कामाय बना। रोहगा को मृत्यु के उपरान्त उसरे उत्तराधिकारी एक दूसरे से लडने हगे। पिरान्ती सनापापक जिसरा पण एता यही विजयपूर सिंहा सन पर बटता था। अत में विरान्ती सेनानापर न परनसन को विजयपूर +सिंहासन पर रिठाया। सा १७७२ मपरनमेन को मृत्यु हो गई। उसका एक ही पुत्र या निगे वह अपने स्वाभिमत पिरान्तो सेनानायक क सरक्षण H १२ छोटकर मर गया। १७७२ मे गोरखा आदमण हुआ। भाइए अय हम पालपा को भोर दृष्टिपात करें। यहा लोहगा का माई मानिय रामाया। मानिक का धग समाप्त हो गया और सोहगा के सबसे मरे माई विनायक के उत्तराधिकारिमों का पानपा पर अधिकार हो गया । पापा के नेतृत्व में गरगोट' रिगिग छिरिंग अरपा बादी और गुल्मी' मागर राजपूत राजामओ ने एक सघ बना लिया था। नरभूपाल गोरखा जिसने १७३६ मे काठमांडू पर असफल आक्रमण किया गोरमा का राा था। उसने पालपा राजा गयसेन को बहिन से विवाह किया था। उसी रानी से पृथ्वीनारायन यदा हुआ। गधवसेन की मृत्यु पर उसका पुत्र मुकदरोन पालपा के सिंहासन पर यठा। अस्तु पृग्याना रापन मुकदसेन (पालपा रे राजा) का ममेरा भाई पा। 1७४२ मे नपाए का राजनीतिर मानचित्र नीचे लिखे अनसार पा। नपाल की घाटी के पूर्व और दक्षिण म लोहाग का विशाल राय का भग्नामाप पा जिसको राजधानी विनमपूर थी । उतर पूर्व तया पूर्व मे स्वतत्र निराली राग्य था। पश्चिन मे गोरखा राज्य था जो नाममात्र को काठमांडू के अधीन था जिसरे राजा नरभूपाल गोरखा ने काठमाडू पर असफल आक्रमण किया था। उसदे पश्चिम मे घौधीम तथा याईस छोटे छोटे रजवार थे। यह घीयोसा और बाईसा कहलाते थे। धौयोसा राज्य गुरग और मागर प्रदेश राग्य थे। उनरे भो पश्चिम मे बाईसा गर। उनमें सबसे बड़ा राग्म जुम्ला उसर म हिमाल्य वालों पर स्थित था। यह ज्यिालोस छोटे छोटे राज्य भारत से आए हुए रानबूतों मे स्थापित रिये ५। इनमें याहत से तो बहुत ही छोटे रायप। राजपानी के भासपास से घार मौल भूमि हो राम या। यह छोटे राज्य अपनी सुरक्षा के लिए पार पाच मित कर क्सिी बडे राय के नेतृत्व में सम बना लेते थे। उदाहरण के लिए पालपा फ नेत्य में एक सघ था। इसी प्रकार साममग' और बीरकोट के नेतृत्व म भी इन राज्यों के सघ रने हए थे। फेवल गारसा' राज्य ही पृपा था। यह रिमी सघका सरस्य नहीं पा गोरखा राज्य पपिसम में मरसियागदी नदी और पूर्व म मिास नदी तफ फसा हुआ था। परने को वह नाममात्र को नपाउ राजा के अधीन था परन्तु वह नपाल को परावर धुनौती देता रा। यह छियालीस रियासत जुम्ला मो कि सबमे बड़ी रियासत थी जो उसक राजा को अपना अपी'वर मानती थी परन्तु अयसर होने पर घे उसरी सताोचनौती भी दे देती थी। जर पृप्पीनारायन नपाल मे उरय हुआ उस समय नपाल का ऊपर सिसा राजनतिर मानचित्र या। पूर्वीय नपार निरान्ती नपाल की गारियो म शिान्ती गामि सम्बपम नीच लिसा उस्लेख है- चार युग ८,३४००० वर दर घरा। पिरान्ती नपाल महापर पुग पाह हमारवें यप म आए और रहनि नपाल पर दस हजार वर सर २३ - राप पिया। किराती के पश्चात देयता नपाल म आए। इसम इता सरय अवश्य है कि पूत्र ऐतिहासिक काल में पिरासियों मे नपाल को पाटी को विनय कर उस पर शासन किया और बहुत काल ध्यतीत हो जाने र उपरान्त अधिक सभ्य माति ने उनको नपाल को घाटो से निकाल बाहर किया । ये लोग गिहें यगावली म देवता कहा गया है भारत से आई हुई जातियों यी जो हिदू या चौद्ध थे। यह किराती फौन हैं ? आज ५ लिम्बू और राय के नाम से प्रसिद्ध है। यह दोनो जातियां भी पुप्रिय और कुशल तथा वीर सनिफ होती हैं। ये मागर तया गुरग की भांति ही रणको गल वीरता और कष्टसहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध हैं। यही कारण था जि मिटिग सेना में यह भी गुरसा के नाम स ही भर्ती किया जाता था। हिदुओं के अत्यन्त प्राचान प्रथा यही सर पि यदा में भी किरातो का उल्लख मिलता है। यह कह सका। कठिन हे फि रािन्ती शाद का उप योग उत्तर भारत पे हिमालय प्रदेश, पूव म आसाम की पाठियों मागा खासिया और परमा की सीमा पर रहनेवाल समा पोले वर्ग के लोगों के लिए किया जाता था अयवा वह फोई जाति विप पो । सम्भवत यह किर तानो जाति समस्त पहाडी प्रग म फ्ली हुई थी। मारत क रामाय ने उनमें रायों को विजय फर उन्हें पहाग मटाल दिया था। महाभारत में किरान्ता का बहुत अधिक विवरण मिलता है। मोम और अगु न पो पई वार किरान्तों से लड़ना पड़ा था। पागप के सम्राट भागदत्त पो सना में पिरतानी और चीनी पीले यहुत अधिष थे। उनका उस्लप करते हुए रिणा है कि किराती और धोनी समिर मामो स्वर्ण के यने हुए हैं। उनकी सेना पीले फूलों का वन असो दिसलाई पड़ती थी। रामायण में भी उनके स्यण असे वर्ण का उल्लख मिलता है। जो भी हो ऐसा प्रतीत होता है कि फिरातो तिग्वस के मारि निवासी थे और फिर मारतीय जामिया के ससग स यह जाति उत्पन्न हुई। किरातियों की यायतुम्या जाति याद को घलपर लिम्मू रहलाने लगी और 'खम्बु' और 'पपका' गासामों से 'रायों' का उदय हुमा । राय नाम तो बहुत नपोन है। सर १७८० म जब भयपर पुद र उपरान्त पिरान्ती नपाल रे गुरमा नरेग से पराजित हुए तो मपाल सम्राट 1 उनपे कतिपय प्रभावशाली सैनिक नेताओं को अपने आधीन कुछ जिला पा शासक यमा दिया जिससे कि पिरान्ती रोग उपद्रप न परें और शात रहें। इन जिसा पासकों को उसने 'राय' की उपाधि दी। कालान्तर में यह उपापि सम्पूर्ण जाति को पन गई मौर के समी राय करे जाने लगे। इसी उद्देश्य से की उपाधि सिम्यू जाति के प्रमाषणाली नेताओं को योगह थी परन्तु वह मो समस्त जाति की उपाधि धन गई। "गुनवार' अथवा सुनपार' जाति लोग राय और गुरग नाति के बीच में बसे हुए हैं। मुनकोसी नदी ये दोनों विना पर बसे होने के पारण उमा नाम सुनवार या मुनपार १४ गया। पयपि मारम्म में उमरी एक पृपर जाति पो और सम्भवत वे सियत से गासर मास घाटी में उसर मे यो पे परन्तु पर उनम गुरग मोर राय र रपिर 7 महुत मिश्रण हो चुका है। वे पुट और गिर दोनों को हो माना हैं। गुरपा विजय पूर्व निरारती अपने देश म पूर्ण स्वतन पे । मपाल २४ को घाटी के पूर्व मे जो प्रदेश है उसी मे आ7 भी किराती बसे हुए हैं । किरान्तो प्रदेश अर्यात अरुण नदी पूर्व से सिविषम तर सम्पूप मपाल मे किरातो पल हुए हैं। ये सिक्दिम और वाशिलिंग में भी बसे हुए हैं। लिम्बू लोग पश्चिम म अरुण नदी से पूर्व में सिगारिया तक पवतीय प्रदेश में यसे हए हैं। इसके पश्चिम मे राय लोग पाल को घाटो तय फल हुए हैं। लिम्मू और राय गुरग और मागर को ही मांति बलिळ साहसी बोर और कष्टसहिष्णु होते हैं। वर उनसे अधिक राहाकू और तेज मिजाज होते हैं नहीं तो जहां तक सनिक गुणों का प्रश्न है ये एक्समान हैं।

मध्याय चौथा गुरखा अथवा गोरखाली - . जो लोग मबार तिहास में नहीं जानत वेमपाल समो नपालियों को गुरसा ही समानते हैं । अग्रम लामो मे भी पहो मूलरी और मपाल प्रत्येक रहनेवाल को उहाने गुरखा मान लिया । परन्तु वास्तव में यह सही नहीं है। वास्तव में गुरसा फेवल खारा पा छयो लिम्मू और राय मागर या गुरग पनि प लाग है । इहीं वीर सनिकों ने नपाल फो रौद हाला और उन्होंने गसार में नपााला लिए सिर ऊचा किया । गुरखा सनिक क गौर्य वीरता और यष्टसहिष्णता को कौन नहीं जानता । वह समार की अन्य त प्रसिद शाति है। गुरखा सनिकों का रण और धीरता जगत प्रतिद्ध है। योगेर यो रणभूमि पर मलाया के जगलों म प्रथम और द्वितीय महायुता मे मिल नापतियों ने गुरम्या सनिकों को तरसे बसा है उहोंने उनकी भूरि भूरि प्रशसा की है। यही कारण है कि रिटेन बहुत बड़ी संख्या में गुरमा सनिका को अपनी सना मे गरता करता है । अब हम इन वीर गुरखाओं के इतिहास अध्ययन करग। गुरक्षा जाति पूनम गोरणा गाय और उसक समीपवर्ती प्रयास निक्ले इस कारण गुरना या गोरवार कहलाए । मिस पहाड़ी पर गोरखा गाय घसा है उसम एर गुफा आज मो विद्यमान है उसी गुफा में सत गोरसनाए जी रहते थे। उही स उम गाय पानाम गोरपा पर गया । गोरसा जाति सम्बन्ध में लोग अधिक नहीं जानते । गोरसा जाति में भारतीय राजपूतों का रधिर पहुत अपिर मात्रा में मौजूद है । इसी कारण यह जाति सनिओं की जातियन गई। जब तेरहवीं शताादी म राजस्थान से राज्यों पर दहली के सुल्तानों म आक्रमण करना आरम्म पिया लौर एप क याद दूसरा राग्य मुसलमानों के आरमण रे सामने गिरता गया तो कुछ राजपूत सनापति नपास रे पश्चिमीय पपतीय नाग में घस आए । विपार जय रामरतों के प्रसिद पढ़ चित्तौरगा और रणथम्भोर 1 पतन आ सय बहुत स बोर राजपूत मपाल मे आपर यम गए । उस समय सीसोदिया राठौर चंदेल पुदेला और दाग + राष्ट्राट राजपूत आर पश्चिमी मपाल में मग ये हिप इस प्रदेश म मुसलमानो से अपने धर्म सस्कृतिको रक्षा परने और मुसलमागको अपीमता को स्वीकार न करने में उदय से माए। उस समय चित्तौर रााय वा एप परिवार पचिग नपाल म रिरो पहुँमा और यहां से पाल्पा मार प्रवेन म पहुँधा। इस परिवार का नेपाल में जाकर पसनमा तिहास इस प्रकार है- २६ रिया। गोरसा राजवश क उदय सम्बत्र मे नपारा मे नीचे लिखे हुए यो विवरण मिलते हैं। ए मा यता है कि गोरखा राधा चित्तौर . भूपति राणाजी राय से निकला है। भूपति रणाजी राव के पुत्र पत्ता राणम सम्राट अपयर को पुत्री पत्नी ५ रूप में देश मस्तीसार पर गिा। युद्ध हुना और पत्ता राणा रणभूमि म वीरगति को प्रात हा चित्तो पतन हो गया । विन्तु पत्ता के दो उदयम्बरा उदयपुर में गिरा रान यसाया ओर ममय उग्ज से मुगल सम्राट को पनौती प्ते रहे। ममय का पुत्र तथा प्रोत्र भूपाल रानाजी १४९५५ आसास र पलह रे मारण नपान की ओर रिरी पहुंचे और मिरकोट तथा समीनों प्रश में एक छोटा राज्य स्थापित दूसरा मत यह है कि गोरसा यशरे पूर्वज चितौर से उस समय मागे जय मलाउद्दीन खिलजी ने चिनौर पर क्रमण किया। गुरसा यशापली और रायबहादुर सादर गौरीगपर ओमा सी मत फ है। फ्ना टाठ का मन है कि गोरपा राजयग रामरसिंह राणा से निकला है। जो मो हो सनी इस बारे में एपमत है । गोरखा राजग का चिसौर राजवा गे उदमय हमा है। अधिर प्रामाणिक यह पोर होता है कि अलाउद्दी सिलजी के पम्मा समय चितीर राजवश की कोई शाखा चित्तौर से विभिन्न स्थान पर मटकती हुई हिमालय के इस प"तीर प्रवेग मे आई और उमस गोरप्ता राया का उद्भव हजा। भूपति राणा के पुत्र पत्ता राणा क चित्तौर में मारे ने पर जय चित्तौर का पतन हो गया तो पत्ता राणा दा पुत्र मामय राणाजा राप चित्तौर से भाग कर उन पहुंचा । उसरे दो पुरा दुर्भाग्य से उनम सदा उठ खड़ा हा। बड़ा भाई तो उगान मे जन गया और छोटा मई अपन भाग्य की परीक्षा मरने उग्ज न छोडकर बल दिया। पर उत्तर पूर्व महिमालय की ओर बढ़ता चला गया। महीनों तर लगातार यात्रा परन उपरान यह हिमालय २ पवसीय सारे मागों से होता हुआ दुगम पहाडा और सवन पनों को पार रता हुआ पात्रा प्रदेश फरिरी गांय पहुँचा गोपि भागर प्रवेश पा और जहां के निवासियो न सपन नता मुव दरान के नेय मे दो सौ वर्ष पूर्व मपाल की घाटी पर माक्रमण रिया था। बार यर यो नि मागर प्ररेग और उत्तर भारत के मदानों पे योच मे मो पहाडी प्रोगया उसम सात शति यसो हई पो जो क्ट्टर हिलू पे और अपने को रापूत रहते थे। अस्त चिसौर राजघश क सारसी राजपुमार का इस प्रदेश मे बहस स्वागत हुआ । सभी जातियार मुखियों ने उसरा स्वागत किया। उसने बरि पोट ( गुरग प्रदा को सोमा पर) मएर मरान बनाया और भूमि खरीद पर यह एक पिसान पा जीयनपतीत रन लगा। जब वश का क्षत्रिय होने के कारण लोग उसको सपना नेता मानने लग। यहा उस पाया और मिया दो पुत्र उत्पन्न हए। ये उस प्रदन म नता प म स्योरार दिये गये और उनके वगको उपाधि रान प्रतित और प्रसिद्ध हो गई। वे चित्तौरा राणा पहलान सगे । उस समय जो लोग चिरीर राजा राजपुर पे साय इस पटरी प्रदा म साप उनमें से अधिकतर रामपूत और पालण थे। उनके ससग स सास मागर सौर गुरग जातियों में यहुत अधिर राजपूत रधिर प्रविष्ट हो गया और ब्राह्मणों न उहँ पत्रिपक्षण म अभिषिक्त पर दिया।

अध्याय चौथा गुरखा अथवा गोरखाली जो लोग गाल में इतिहास को नहीं जानते वे नपार के समी नपालियो को गुरसा ही समझते हैं। अग्रज उसकों ने भी यही भूल की और नपाल के प्रत्येक रस्नेवाल को उहाँने गुरग्या मान रिया। परन्तु यास्तष में यह सही नहीं है । वास्तव म गुग्या केवल सारा या छत्रो लिम्मू और राय मागर या गुरग पानि पे लोग है। ही थोर सैनिकों ने नपाल को रोव हाला और उन्होंने ससार म नपालिया के लि सिर ऊचा क्यिा । गुरक्षा सनिक के गीय वीरता और पष्टसहिष्णता पो कौन नहीं जानता। वह समार की अत्य त प्रषिद्ध मानि है। गुरसा सनिकों फा रणपोगा और थोरता जगत प्रसिस है। योगा यो रगभूमि पर मलाया के जगला म प्रयम और द्वितीय महायुमा म जिम नापत्तियो न गुरखा सरियों को उने रखा है रहोंने उनकी भूरि भूरि प्रशसा की है। यही कारण है कि ब्रिटेन बहुत बड़ी संख्या में गुरखा सनिकों को अपनी मना में भरती करता है । अब हम इन धीर गुरसाओं इतिहास का अध्ययन करग । गुरखा जाति के पूरज गोरखा गांव और उसके समीपवर्ती प्रवास निम ने इस कारण गुरसा या गोरवाली कहलाए । जिस पहाडी पर गोरखा गाव वसा है उसम ए गुफा आज भो विद्यमान है उसी गुफा मे सत गोरखना जी एते थे। उही स उस गाय पानाम गोरखा पड गया । गोरखा जाति के सम्बध में लोग अधिक नहीं जानते । गोरसा जाति में भारतीय राजपूर्तों का रधिर यहुत अधिर मात्रा में मौजूद है । इसी कारण पर जाति समिकों की जाति बन गई। पर सेरहवों सादी म राजरयान के राज्यों पर बहली के सुल्तानों ने माक्रमण परना आरम्भ किया और एवरे याव पूसरा रा य मुसलमानों के आरमण के सामने गिरता गया तो कुछ राजपूत सेनापति मपास रे पश्चिमीय पवतीय भाग में पुरा पाए । विशेषार जब राजपूतों के प्रसिद्ध गढ़ चित्तौरगा और रणथम्भोर का पतन हुआ सय यहुत स वीर रामपूस मपार मे आर बम गए । उस समय सीसोनिया राठौर परेल पुरता और दभिग र राष्ट्रकूट राजपूत आर पश्चिमी मपास म परो । ये हिमाम के इस प्रदेश म मुसलमानों गे अपने धर्म सस्कृति को रक्षा परने और मराएमा11 की मधीमता को स्वीकार न करत उदय से पाए। उस समय वित्तौर राजयमा एक परिवार पचिम नपाल मे रिरी पहुंचा और वहां से पाल्पा मागर प्रदेश मचा। इस परिवार का नेपाल में जाकर यसने का इतिहास इस प्रकार है- गोरसा राजवश के उदय के सम्मरम मपाल मे नीमे लिखे हुए दो विवरण गिरते हैं। एद माना है कि गोग्या रामा चित्तोर भूपति राणाजी राय से निकला है। भूपति रणालो गव के पुत्र पसा राणन प्रार अस्वर यो पुत्री पत्नी के रूप में दा अशर पर शि। युट और फत्ता राणा रणभूमि में बोरानि को प्रात हुए। चित्तौरा पत्त हो । विन्तु पत्ता के दो उदपावरा उदयपुर मे जिगे उराने उसाया ओर ममय उर्जा से मुगल सम्राट को पनौती दते रहे। मामय का पुत्र तया प्रोत्र भूपाल रानाजी १४९५५ आसरात राह परह के कारण नपा की ओर रिरी पहुँचे आर मिरकोर तया समीपवर्ती प्रश में एक छोटा राज्य स्थापित दिया। दूसरा मत यह है कि गारगाव पूषज चितौर से उस समय मागे ग्य अलाउद्दीन खिलजी ने चिनौर पर गारमण किया। गुरसा यापली और रायबहादुर गक्टर गौरोगावर ओझा पसी मत प हैं। फ्नल टास का मन है । गोरखा रातया रामरसिंह राणा से निकला है। जो भी हो सनी इस बारे में एकमत है कि गोरखा राजवारा चितौर राजपागे उदमन हुआ है । अधिर प्रामाणिक यह पतीत होता है कि मलाउद्दीन खिलजी फ साम्मा समय चित्तीर सावन को कोई नाखा चित्तौर से विभिन्न स्य नों पर मटकती हुई हिमाय के इस पतीय प्रदेश म आई और उमस गोरपा राय का उदभव हना। भूपति राणा के पुत्र फ्ता राणा चित्तौर म मारे ने पर जव चित्तौर का पतन हो गया तो पत्ता राणा पुन ममय राणामी राय दिसौर से भाग पर उगन पहुंचा । उसके दो पुगपे।दुर्भाग्य से उनम सगा उठ खरा हा। बड़ा भाई तो उगन मे जन गया और छोटा भाई अपा भाग्य को परीक्षा करने उम्स न छोडकर चल दिया। वह उत्तर पव महिमाय को मोर यढ़ता चला गया। महीना तर लगातार यात्रा परने उरात यह हिमालय २ पवसीय सपरे मार्गों से होता हुआ दुगम पहारों और सघन वनो को पार परसा हुआ पाला प्रदेश के रिरी गान पहुंचा को पि भागर प्रग था और जहां के शिवासियो न अन्न नता नुव दरोन के नेय म दो सौ वर्ष पूय मपाल की पागे पर माक्रमग दिया था। बात यह यो नि मागर प्रग और उत्तर भारत के मदानों के बीच म जो पहाडी प्रोगया उसम सास अति पसो हई पो जो कट्टर हिन्दू थे और अपन को रागपूत रहते थे। अस्त चित्तौर राजघन क साहसी राजकुमार कादरा प्रदेश में बढ़त स्वागत हमा। सभी जातियों मुसियों न उसरा स्वागत किया । उसने बरि पोट (गुरग प्रदाको सीमा पर ) म एर मान बनाया और भूमि खरीद पर वह एर क्सिामा जीपन पतीतरन सगा।जप यग पा क्षत्रिय होने कारण लोग सो सपना नेता मान्ने हो । यहाँ उसप सांचा और मिधा दो पुष उत्पन्न हुए। उस प्रदा म नता एप मे स्वीगार दिये गये और उनके बाकी उपापि राणा प्रचलित और प्रतिद हो। चितौरा राणा रहतान सगे । उस समय जो लोग चित्तार राजवा रामपुर में साय स पररी प्रदाम आप उनम से अधिकतर रा पूत और घासण थे। उनके ससग स खास मागर और पुरण जातिया मयत मभिप राजपा पिर प्रविष्ट हो गया और बाह्मणों न रहें क्षयिय यण में अमिविक्त पर शिपा।

समी से यह वीर जातियां अपने को क्षत्रिय मानने लगों और उहोने हिन्दू रीति रिवाजा को अपना लिया। तरुण राणा पुन 'सांधा और मिचा' द्रमा जपन प्रदेश के छोटे शासक बन बैठे। पिता न खांचा को चरिकोट का मकान और भूमि दी थी। और मिचा के लिए वह नवोट के पान दूसरी भूमि छोर गया। इन दोनों चित्तौर राजन के राजपूत राजयुमारो से मपाल म गोरखों का प्रभुत्व स्थापित होना भारम्म होता है। सोचा ने अपने जीवन काल में यपनी जागीर को बढ़ाकर समस्त मागर प्रम पर अपना अधिकार कर लिया। गुल्मी घोर' और 'घान-दुर्ग + मागर प्रदेश का यह स्वामी बन गया । मिया ने नवकोट से आगे पदपर समस्त पुरग प्रवेश (कास्की लमजग तया तनाहग) पर अधिकार जमा लिया। कालान्तर मे मिधा के उत्तराधिकारी सामनग सन्नाहग मे स्वतन गासक बन गय । सामजग अधिक शक्तिशाली पा इस कारण और दोनों उसकी सत्ता को स्वीकार करते थे। लामजुंग के ठाकुर राजा हसो पुत्र थे। छहे पुत्र को मजग की गद्दी मिली छोटा भाई बया शाह' जो अपने माई का प्रधान मनी था रान अपना स्वय का राज्य निर्माण परने का निचय किया और निवल पग । लामजुंग से वस मील पूर एक पहाड़ी पर जो कि एक अद्धगोलाकर पयतमासा की निचली अणी मे यो और जो एफ कृषि से लहलहाते मैदान को घेरे हुई थी गोरखा गांव स्थित था । उसका राजा खास जाति का था । वववाशाह ने उस पर आक्रमण कर दिया । पुर में राजा द्रववाशार क राय से मारा गया और दयाशाह यही का राजा बना । तब से यषाशाह के उत्तराधिकारी गोरसा के राजा बने और गोरसा राजवा का आरम हुआ । कास्की सया बाद के दो अध्याय पचिया गोरखा राजा पृथ्वीनारायन यह हम पहले झा १६ के है कि सन् १५५९ में, इववागाह ने गोरखाको विजय रिया या । उसी नवी पीढ़ो मे मरमपालशाह गोरखा सर राजा हुआ । पाडू और भटगाय के राजाओं के आपसी कलह से साम उठाकर उसरे नवोट पर अधिकार कर लिया और पास को घाटी पर आक्रमण कर दिया परतु वह ममफल रहा। सन् १७४२ मे नरभूपाल शाह की मृत्यु शे गई और उसका पुत्र पृथ्वीनारायनशाह पारह वप को मामु मे गहो पर बहा। पृप्यानारायन का नाम जनवरी १७२३ ईसवी में हुआ था। वह सात महीने पापदामा था और उसरी सौतेली मो से कमाई और उत्पन हुआ। अतएव यह विधाव का प्रश्न मन गया विराम का उत्तराधि पारी कौन हो । यात मह थी कि जय पह सात महीने का था तो उसका माई मा गर्भ मे था । परन्तु यह गाव अवस्था में ही मर गया इस कारण उसरा पिपरा प्रश्न स्वस ही हल हो गया। उसकी माता का नाम कौशल्या रेषी थानो पारपारे राजा को पुत्री थी । पृथ्वीनारायन के पिता नरभूपाल के घार रानिया यों। पृथ्वीनारामन की शिक्षा-दीक्षा में उसकी सरवाक माता (उसकी मासा नहीं) प्रमावसी का बहुत बड़ा हाय पा । प्रमायसी की देखभाल में ही पृथ्वीनारायन में एक महान् विमता और सफल प्रशासक २ गुण विकसित मह हम पहले ही रिख धके हैं कि पृथ्वीनारापन के पिता मरमू पास मे अवनपाल घाटी को विजय रिया तो यह दुरी तरह परास्त हुआ और पराजय से उसका मस्तिष्क विकृत हो गया । उस दाम पद पप सक प्रमावती राज्य की प्रासिका (रिमेट) रहो । प्रमारतो ने मेयर पृथ्वीनारायन को शिक्षा-रीमा ही नहीं की धान उसने उसम महत्वाकांक्षा भी भर हो । यह उसो को दूरपशिता थी कि भटगांय के राजा ने पृथ्वीनारायन को मिन के रूप में अपने यहां मामत्रित किया तो उसने उमे मर गांव में जाकर रहने के लिए प्रोत्साहित किया। प्रवीनारायन अम भटगांव म सौन प रहा तो उसे मपास घाटोपी दयनीय दशपता चल गया पार पारी तीनों राजा एष दूसरे में रितनी गहरी पणा परते है वहां जिस प्रकार के पापत्र पल रहे हैं और नपालो घाटी पे रामा तिने निबस है यह उसमे छिपा नहीं रह १७३९ मे वह अपनी माता प्रमावती क साम राय । सरसक बनाया गया और अपनी मां पी देपरेम में नरभूपानगरी मृत्यु पर यह गही पर मठा । पृभ्योनारायन का राज्यतिहासन रामनयमो , शुभ दिन हुआ था। जिस समम पृथ्वीनाराया गोरखा सिमासा पर घठा उस समय मपाल की राजातिक स्थिति आओ लिसे अनुसार था । मपाल की घाटी में काठमाडू पाटन और भटगाय के राय थे । गोरसा राज्य जिसका अधी-पर स्वय पृथ्वीनारायन या पश्चिम में चौबीसी और वाईसी के राज्य थे जो सयो में चंटे हुए थे। पूर्व मे गिरान्तो राय थे। उस समय नपारी राजनीतिक वगा अत्यन्त दयनीय थी। उस पवतीय देश म को ऐसा शक्ति न थी जो समूचे देश को एक सूत्र में योध सस्सी । अनप छोटे मोटे राजा अपने रापो को व्यक्तिगन अथया जागीरपी माति घरतते थे । मुचक कुगासन भ्रष्टाचार पड्यन तया प्रजा फा भीषण पोषण यही नपार को पहानी थी। पृथ्वीनारायन पो सरक्षर माता ममावती देवी ने इस सम्मको ममम लिया था। उसा वाम राजा को समझाया कि नपाल की दगा ऐमी है कि यदि कोई प्रमर और प्रमायशारी शत्ति उत्पन्न नहीं हुई और उसने ममूचे देश को एक सूत्र में बाध नहीं दिया तो नपाल की स्यनयता नहीं थप सकती। कागतर मे नपाए पर भी अप्रेजों का गासन स्थापित हो जायेगा । अतएप पृथ्वीनारायन को समस्त नपाल को एक करने समा पक्तिवान राष्ट्र निर्माण का प्रयत्न करना चाहिए । पृथ्वीनारायन के मस्तिष्क मे समस्त नपाल को एक न म मायने र महान् लक्ष्य चक्कर काटन लगा और यह उस लक्ष्य को प्राप्त करने को तैयारियां करने लगा। प्रभावती ने पृथ्वीनारायन का वियाह मक्यानपुर क राजा हेमकरण की पुत्री से दिया । प्रभावती का इस वियाह को स्वीकार भरना राजन तिक उद्दश्य से खाली नहीं था। बात यह थी कि मपाल घाटी में प्रवेश करन के लिए पर दो ही मुख्य द्वार थे। घिम में नवकोट और दक्षिण में मकवानपुर । यपि मरवानपूर को राजकुमारी आतीय पुरी थी परन्तु प्रभावती रा पृथ्वीनारायन पा उससे यिघाट परन का मुग्य उद्देश्य उसका साँवय न होपर मकवानपुर का मपाल घाटो पो विजप करने में सहयोग प्राप्त करना था। इस विवाहम दोनों रामधनों में अनबन हो गई । कारण यह पानि वियाह के उपरात वप के अपने पिता के राह में कुछ समय तक भोर रहने की परम्परा पो । गोरखा लोग इस परम्परा को तोर दना साहले थे। गोरसा पगावली र आसार गनवम इस यात पर ह कि विवाह के समय राजकुमारी तो मौससा हार पहने मी उमे पौर एकति नामक हाथी को मकयासपूर के राजा ने पृम्बीनारायन रो देना अस्वीकार कर दिया। जो भी हो रोना दलों में अनयन हो ग और पृथ्वीनारायन को बिना यपूर लौटना गोरसा के रामसिंहासन पर यठने के उपरास पृथ्वीनारापनाह ने सपने राज्य विस्तार भी दोगना तयार पो और नपा घामो विजय करने का निधय पिपा । पाल पारी को विनय परा फा सफ्ल्प उस परिस्थिति को बलते हुए पागलपन था। पृथ्वीनारायनगार क पिता को उस प्रयत्न म भयार असपता का सामना करना पगया । पग्नु पृम्वीनारा मनगाह कटिनाच्या स ययरानमारा व्यक्ति नहीं था। उस गद्दी पर बठते हो ५० विजय अभियान की सवारिया प्रारम्म करदों पर निर मारियां हो रही भी उपर पृश्वीनारायसाह ने पुष्यभूमि याराणसी (काशी) की तीय मात्रा की। यह अपनी सफलता के लिए भगवान विश्वनायबान करने के लिए गया । रास्ते में उसने ईस्ट इंडिया परी सी सनिक छागियों को देक्षा भौर अस को सनिए मगटन का अध्ययन रिया सानुमान है कि उसने मरने सुडों में जिन यदूगरों का उपयोग दिया था जनसरी रामपुर पार लखनऊ के म दूदियों ने बनाया था। मनारस राज्य की सीमा पर उसका यो अभिशारियों से सगग हो गया और कोष मे नापर उसने अपने सोश (अस्त्र) से एक धुगी अपि कारो को हत्या परो । घर पयसा जाता परतु एक बरामी म सा का वेश धारण करा उसे अपने दल महिपा लिया और यह अवध होता हुआ मफाल पहुंचा दिया । कुछ वर्षों के उपरात जव पृटगेनारायन माह एक समृदिगाली मासक बन गया सो घर परागी सायू बहुत बड़ी सख्या मा साधुओं का सेना लेकर आया और पृथ्वीनारायन से उसन था की माग की अन्यथा उत्पात पारने की धमकी दी। पृथ्वी शारापन म उनमें कुछ को नो मरवा दिया और कुछ को जेल मे स दिया। पृथ्वीनारायन का मुरूप अमरप (41) अहिराम कुवर एफ सास जाति का गोरखा पा । यह मत्यन्त साहसी धीर और चतुर मा । उसी से राणा या उदय हुमा जिसन सो वष तक नपार पर गासन किया । गोरला गप भाषिक हष्टि से अधिक समृद्धिमानी नहीं था। यात यह यो कि उमया मारत और तिवत से कोई सर नहीं हो सकता था उनर तथा गोरखा राम के बीच में अपराग्य थे । यतएव गोरसा राय व्यापारिक माग पर न होने कारण प्राधिय पुष्टि से सम्पन्न नहीं था । परन्तु गोरक्षा राज्य मवीर गोरखा पते । पृष्मीनारायन ने उनकी चोरता और साहस से गोरमा राय का एक विशाल राज्य बनाने पा सकल दिया। नपाल की घाटो ये तीनों राम्या में जो सापमो परह ई थी पृष्मीनारामा उसस परिचित था ! साडू NAT जयप्रकाश से उसरी ना प्रसन्न पो मोर मगांव तया पाटन समे पृणा परते थे । उस नाम उठाने सपा काठमाडू को नियर बने ५ उप से रापन मांडू ये कुछ लोगों को लाया मरने पाम पर लिया और पटना में एक प्रमागासी घमांगी दल हमर दिया जोरा दिघटाश प्रधान परसा पा । पाठमाह क रामा जयप्रकाश नार यादो में सनी लोग यराम ये । स्थय उमरवारी उसस पहली जनसम 2 । उसप मा पाटन सौर गट गांवसर उसम मा परने पे। पारण यह था fr? पूर और सनको या। जयप्रगानो कमो दरबार म प्रमुख रवारियों का अपमान पर बसा या उस? नाराज होकर वारियों ने उमर माई राम का समयान पिया और काटमार राय योो से प्रदेशका उसे राजा पित्त र यिा। परन्तु ममत्रा ने मारमण राि रायपोरापोरर मागमा परा। परनु अपर विर पामर समान नहीं हरा । पावारिणे ने गारो रानी रयायती समिरमर पत्र गिरा और मिह पर दिया ।

मंत्री ने रानी दयायसी । पुत्र मो राजा घोषित कर दिया । एर दो घष इधर उधर भटकने के उपरान जयप्रकाश ने पहपापद्वारा पुन राजसिंहा सन प्राप्त कर लिया। रागी वयावती सरन गई कि अब उसकी स्थिति दयनीय हो होगी । उसने उस मत्री पो भिसगे उस पुत्र को राज्यसिहासन पर बिठाया था पांसी दिपावो । परतु उससे भी उसकी रक्षा नहीं हो सकी। जयप्रकाश ने उसको एक नमरी कोठरी में रवा दिया और उसको गीत हो मृत्यु हो गई। नरकोर मे काशीराम थापा एक प्रसिद्ध सामन्त पा । उसके बा को बहुत प्रतिष्ठा भी और लोग उसरा आदर और श्रद्धा के साथ देखते थे। जयप्रमाग को उस पर यह सवह था कि वह पृथ्वीनारायन से मिला हुआ है। भागीराम पापा उन राणाओं मा पूर्वप था frहोंने वाद को एक सो वष तक सम्पूण नपाल पर निरकुग साक्यिा । नवकोट का सामन नाममात्र को काटमार के अधीन था। वास्तव मे वह अढ स्यतन या और काठमांडू सया गोरखा दोनों से ही स्वतंत्र रहना चाहता था । १७४३ में जयप्रकार ने काशीराम थापा को अपने वरयार में पात्रित किया और उसको गोरखा राजा से मिल रहने क अपराप में घोर से मर डाग। इससे नयकोट में बहुत असतोप पर गया और नरकोट जयप्रकाश के विरत हो गया। जयप्रकारका एक नाई पाटन का राजा था। वहां के प्रधानों (नेवार सामतों) मे उसके विरुद्ध पश्यत्र परके उसको अधा कर दिया । अत एव जयप्रकार ने उन्हें पुस्तकर पा लिया दिन्तु उसने बहें फांसी न देकर लांधित और अपमापित पिया तथा घोट दिया। उन ६ प्रयानों और उनकी पत्नियों को सारे गहर में फिराया गया और जपमानित पर छोर दिया गया । ये जयप्रकार के विरुन पड्या करने लगे। भटगाव पे राजा रणजीतमल्ल से भी जयप्रकाशा मनमुटाव हो गया था क्योंकि मटगांव के राजा ने काठमाड के कछ व्यक्तियों को कर लिया था। उसका यदला लेने के लिये जयप्रकार ने भदगांव रेछ घ्पत्तियों को जो भगयान पशुपतिनाथ क दशन करने आए थे फदर लिया और पन पर ही छोटा। जयदि अपप्रकार पृग्वीमारायन से युट कर रहा था तो उसे अपनी सेना पर विश्वास नहीं था। अतएव उनको हटाकर उसने सराई तमा गोरखपुर के क्षेत्र से बाहरी मारे के सिपाहियों को सेमा में रपमा उससे वहाँ के सनिक और जनता दष्ट हो गई। पय पहत अधिक बढ़ जाने से और पुरके कारण खाना खाली हो जाने से जव चराको युद्ध के लिये धन की आवश्यक्ता परी सो उसने मदिरों से सोना-चांदी और धन लिया । उसरा परिणाम यह हमा कि माह्मण तया पामिर व्यक्ति उसरे विष्ट हो गये। पाटन पो राजनीतिक स्थिति अग्यात शेन यी । विद्रोही प्रपान एष राजाको गद्दी मे उतार कर दूसरे को गद्दी पर बिठाते थे। अन्त में उहोंने पृथ्वीनारायन को पाटन के सिंहासन पर पटने के लिये मामप्रित दिया। चतुर और पुटिमान पृश्योनारायन ने स्वय राजा धमना अस्वीगर फर दिया और अपने स्थान पर अपने भाई इसमदनगाह को भेगा । पाटन प्रधानों ने पृथ्वी नारायन पो दुलाने में अपनी कारो समाा लिया । अस्तु उरोने परमर्वन शाह को पाटन से रामसिहासन पर मिठार पृश्योनारापन के विरुड पुद्धको h था। घोपणा परदी। चार वप क उपरान १७६५ मे उन्होंने दलमदनगार को भो सिंहासन से हटारर एक नाममात्र प राजा को सिंहासा पर बिठाया । इरासे पाटन बहुत गमजोर हो गया था और अपना रक्षा करने मे असमय उपर न्टगाव मोर हाटमाद में पुराना पर था। काठमांडू को मीचा दिसाने के लिये उसन १७४९ म पृष्मानागयन पो मपार घाटी पर मारमण दर पाटमांडू राय को परास्त करने यि आमत्रित किया। इस प्रसार मटगांप ने भी अपनी व पोक्ली । नपा को घाटी में तीनों राज्य एक दूसरे से गात्रता रखते ये एप पृथ्वीनारायन व मिरज वे सपठित नहीं हो राषते थे। जयप्रकाश रिद्ध स्य उसके दरवाी और जनता थी। पाटन की स्थिति खराब थी । इसस अघा अवसर पृथ्वीनारायन के लिये नपार पी घाटी पर आपमण परन ा और पया हो सपता था। पृथ्वीनारायन के मन में समस्त नपा- पर सपना राज्य स्थापित करा तथा अपने पिता की पराज्य का बदला रने वा तीन महावापाक्षा थी और यह उसी हडता से तयारी पर रहा था। पृथ्वीनारायन 7 पवन राजनीय स्तर पर ही नपारसी पारी और समस्त नपार विज्य करन पी तयारियां नही की। समस्त गोरखा राज्य की प्रा भी इस महायनियाम म उमर साय सहयोग कर रही पो। पुगे नारापनगाह अपनी प्रजा म एसा उताह मर दिया कि प्रा तरुण र छा स उमकी से मे भरती हान लापा । पाहा क्षत्रिय टाफुरी सास नेवार यग्य निसान गुरग और मगर रामी सेना में भरती सिरे गप। गहा तर विदर्जी लहार चमार महतर वाल सनो से इस महमियान म सम्मिपित पिया गया । इरर उपरात पृथ्वीनारायन गाए न धन एकगित किया । उसने प्रत्येक गारखा राययाती सयुद्ध के लिए पा देने पो पोल भी। इसा परिणाम यह हुआ कि कोयोग गरीर रा पिपर भे यस नि नहीं नासते थे जत्ने पद सो चादी हीरे मेयर लिगगेच पे उहोंन अना। पर और सजिया दी। यदि पुर घल रहा था तो ओ घायल हो जात थे उनको सेवा सुपूपा को ध्ययस्या गोगों ने स्येला सया ८ आधार पर फो। साराम स्मस्त तराची प्राइम पुद्ध में उतर पडी। रवीगारा यन ने स तपारो अतिरिकालूपाने जसे वीर सहमो और राजनीति दिगारद को पना मुख्य मत्री बनाया । उपर पृथ्वीनारायनगार नया प्रवध मो पर दिया हिय पर दरा सन्चे युद्ध में गाहो तो गोरसा राज्य की रक्षा हो जाय । उसने अपने पुर मरोस के नापटियां तया फ्मचारियों पस इमपे लिप पोराछोर दिया। मर तयारा पर चनवाद उमा नोट पो पिज्य परतेश पिचर पिय । गिस दप पृश्योनारा गो पर वटा उगो ८५ १७४२ म एष यसरी ने पटगांडू रजा को सूचना से रिपोरपा राना स्पिानकोट बाजार भ उन रोहै। जयान तुरना ही एप जो जिसने 'नारायन लिपियों रो नपाट रा टायिा। बात यह यो निरापन ने पो सेतीनिर नवोट नन । दूसरे १५ गोरखा राजा न पुन अपन सनिय नवोट की ओर भेजे । दोरायन पो अपने मित्र कालीराम पापा से भागा मोलि यह उसे गड़ को पापियो सौंप देगा परन्तु उससे पूत्र हो जयप्रकाश ने पामीराम पापा यो युलाकर घोवे मे भार साला। परन्तु काठमांडू से राना ने पृथ्वीरायन के विस्ट माप्रमण ही रिमा । अपने मित्र कालीराम थापा मारे जाने से पुग्यो नारायन यहत पद्ध हुआ और उसने भीमवेग से नवफोट पर एक बडो सेना लेकर मालमण दिया। इस यार भयकर पुर ५ पधात् उआन काटमार को सेना को परास्त कर मयकोट मे हटा दिया और न पाल से घाटी के प्रमुख द्वार नवोट पर उसका अधिकार हो गया । कालीराम पापा को मृत्यु से नपकोट सदयलिये गोरखा रामदा एक माग बन गया। जब पृश्योनारामन के मयिवार म TRकोट मा गया तो उसने कोतापुर की ओर दृष्टि उठाई । तीपुर नपाल पाटो दे दक्षिण पश्चिम कोन में महान से तीन सौ मोर की अचाई पर एक महत्वपूर्ण नगर था। अब गोरता सनिर पहाधियों में पहली बार मवान म मन को उत्तरे । पृथ्वीरायन मा प्रधान मन्त्री और सापति फालपोड कीर्तीपुर के अजेय दुग पर जारमण करने से विद्ध था। पर जानता था कि पीतापुर को विजय फो५ लिये पया तपारी नहीं है। परतु पृथ्वीनारामन कुछ मुनने से तयार नहीं था । जब उम राहमी पोर ने फीतापुर पर आक्रमण परने का घोर विरोध क्यिा तो तर गोरमा पृप्पीतारापन ने उसकी बामक्ति और राजभक्ति पर सवर पिया और उसे घिमारा । पालपा को अपने स्वामी की स या रो महा गति और दुरा हमा frघर जसरी स्थानिमक्ति और वशक्ति पर सवह परते हैं। यह अपनी पत्नी ५ पास गया। उसस अतिम विदा सो पौर अपन इन पुत्र पो पृश्योनाराया ये पास से गया । पृथ्वी नारापन स उसन पहा-मामी । में अर पोर्तोपुर पर आरमण कर गा यदि मैं युद्ध में मारा जा तो मेरे पुत्र की दचमार परना और उसको अपना सेवा में रखना। सबमे विदा रु पार मेना को लघापा और पोतीपुर पर आमप र किया। परतु कति पुर ५ लोग भी साहसा और बार थे। उहोंने पट कर मफामलला क्यिा । घमासान युद्धा।दोनों आरोषलत यसो गस्या में मनित रणभनिभ सो गए। पालपाटे मी योरगति को प्राप्त हो गया। मोतीपुरवारों ने पापरि हथियाराको मागभैरवरे मदिर की दीयास पर टांग पर उनसरा प्रदा पिया। ये रपियार माज उस मदिर में मौजूद हैं। गोरणा सेना भाग पार । भागत हुई सना या जयप्रकार की सेना में पोछा किया और गोगा रोना से बहुत गहरी हानि उठानी पड़ी। जयप्रकाश पी भारतीय सेना मलिन सरदार क रेनापतिरव म पृम्मीनारायन को सेना को तितर बितर पर पिया। गोरसा गना सोपड़ी म भागी कि पृष्योनारायन स्पर याला पर गया उस साप एक भी सनिप नहीं था। सौमाप्यया राति पड़ गई पी और गाय की उम पर नजर नहीं परी परत पृथ्वीनारायन इतना गिरिल सौर १६ गया पायिह ौड़ नहीं सकता था। एष मीच जाति र प्यक्ति ने उमयो अपनी पीठ पर लादार उरो वाहचौक पहुंचाया था । ग य म पृष्योगाराया पो पराजय तो उससे बहुत से वीर सेनापति मारे गमे । शत्रु को मो गयर मानिसकारीमपि का सेमा परागापोहो गई। पृथ्वीनारायम निराण और पराजित होकर । १४ मय नवोट लौट आया। यहां पर षष तक मावी आरमणको तयारी परसा रहा। उसने यह प्रण कर लिया था पि मै नपास की घाटी को बिना विजय पिए वापस नहीं लौटूगा। पृथ्वीनारायनगाह ने नपाल घाटी की माथिए नाय दी परदी पी। कोई भी व्यक्ति किसी यस्त को मपाल घाटी मे नहीं ला सपता था। आयि नायती इसनी कठोर पो कि नपाल घाटीका व्यापार ठप्प हो गया और जो भी वरतए नपाल घाटी मे बाहर से आतीयों उनका असल पर गया। मपाल को घाटो मे जो सात दर थे जिनसे होकर नपार घाटी का गेप देश से सम्बप या उन सबको पृथ्वीनारायन ने रोक दिया। पृथ्वीनारायन ने यह मार्षिक नाक्यदी ऐसी क्टोरतापूयफ की थी कि परिसिी व्यक्ति के पास पोहा-सा भी नमम और पास मिल जाता तो उसको पासो पर पेट पर स्टफा दिया जाता था। यहां तक यदि किसी स्त्री या बच्ते को मी नम पपास अथवा अय वस्त ल जाते पक्ट पा जाता तो उसे भी कठोर पर दिया जाता। इसके अतिरिक्त उत्तन नपाल की पारी के सामानों तथा ऊचे अघि पारियों को भविष्य मे उन्हे ज्चे पर और जागीरों का एच दकर अपनी ओर मिला लिया। इस काय लिये उसने दो हजार ग्राहकों को अपना मेरिया वनार नपाली घाटी मे रमता पा । जो मोललोग ग्यप्रकार से अस तुष्ट थे उनको इन माह्मण जासूसों क द्वारा पृथ्वीनारायन ने अपनी ओर मिला लिया। इसके अतिरिक्त वह अपनी सनिक सवारी तो फरही रहा था। इपर कीर्तीपुर जो कि पाटन राज्य पा एमगर पा उसके प्रधाना ने यह रसपर कि पाटन राज्य ने विपति दे समय उनकी कोई सहायता नहीं को और काठमांडू फ राजा जयप्रकाश ने सहायता की एर प्रतिनिधिमटल जयप्रकाश के दरयार मे अपनी ताता प्रक्ट करने और भविष्य में काठमांडू को अपना अधो पर स्वीकार करने क सम्बघ म प्रायना परने लिए भेजा। सनको जपत्रमार ने उस प्रतिनिधिमडल को घोर दवा की। कोर्मोपुर के कतिपय प्रधान व्यक्तिया पोतो उमने मरवा गला प्रतिनिधियों को कद कर लिया और उन नेता दनवत या उसर साथियों को सौरतों के कपडे पहनापर काठमांडू को सडरों पर घुमाया। हो तो यह पाहिए था कि जप प्रमाग उनका यादर करता आर उनका मामारी होता पयोंकि पीतीपुर के नियासियों को वीरता और साल के कारण ही पीनारायन यो घोर परा गय हुई थी और पाटी सया पाठमाडू की रक्षा हुई थी। इसी बीच म उसने मरवानपूर क पश्चिम प्रदा राजा विगवदन पर आक्रमण कर दिया और मपार घाटी के दक्षिण पश्रिम में प्रदेश द्वार पर अपना अधिकार पर लिया। विगवदनका परिवार माग र पाल्पा रे राजा कोपारण में चला गया। इस प्रकार पूरी नपारी पर गोरसा राजा ने ट्रमरो यार कीर्ती पुर पर आ मण दिया। मोना तर ग्यार या पोतापुर र नेताओं ममपाल पाटील तीनों रायों मे सहायता को प्रापना को किन्तु कोई मी पीतापुर को सहायता के लिए नहीं आया। परन्तु पीतापुर सनिरों ने पृथ्वी मारापन की सना को एप पार पुन परास्त पर दिया । इस पद म पप्वी मारापन का नाई सरपरत्न यात अधिर घायल हो गया और उससे एक भाष नष्ट हो गई। विधा शेकर गारखा सेना फिर नवोट लोट गाई। उस समय गवषि पृथ्वीनारापन नपाल यो पाटो म युद्ध पर रहा या रसरा भाई एमाग या राजा गडवड कर रहा था । अस्त पृग्योनारायन में सोचा कि अपने राय पश्चिम से इस राज्य को परास्त करके ही पूर्व में नपाल यी घाटी को विजय पराा चाहिए। पृथ्वीनारायन ने लमजग पर आश्रमण पर जमे परास्त कर सधि परने पर दिवा पिा frस किवह निम्चिन्त होकर नपाल परी घाटी में बढ़ सके । इसके उपरान उसने मपवान पर के राजा पर आरमण कर उसपे राप को अपने गधिकार कर लिया । पृयीनारायन ने मप दानपूर ऐ राजा थे तराई के मामी भाग को भी छीन लिया और उसके मुसलमान साम 7 अबदुग को भगाया उमर जागीर में वाईस गायों पर भी अधिकार कर लिया। अपन राज्य समीरयतों राज्यों को पराणायो पर परवीनारायन पुन मपाल पो घाटी को जोर पौटा और उरान नवफोर स फिर तीसरी बार पोर्तीपुर पर आक्रमण दिया । पोतोंपुर धे बहादुरो न फिर इरफर मुकायला दिया । महीनों तर घमारान पुरता। पोरसा सेमाए कीर्तीपुर नगर चन म सकी । गोरखा सेना का सेनापत्ति पृथ्वीनारायन का मई स्वरुप राथा और वोटरे ऊचे परवार भग्न स्वय पृथ्वीनारायन पुर का सचालन कर रहा था । जब यह पुर लम्बे समय तक चलता रहा तर कहीं मागवि और पाग्न पे राजाओं को यर फुरसत हुई कि ये उन आपसी गतमेव फोरर कर पृथ्वीनारायन का विरोध फग्न मात । परन्तु मर महत दर हो गई थी । काठमाटू क यहत मे साम । पृथ्वीनारायन से मिल गये थे । गोरखा सा 7 उमो सहायता से मयाल पो घाी की सना को भार भगाया । परन्तु फिर भी कोतापुर में गोरखा सना नहीं पस सकी । कीर्तीपुर प्रमुप प्रधान वनृपन्त निमका जयप्रकाण न घोर गरमान यिा था मगर से शिषल भागा और पृथ्वीनारायन सजा मिला । उमन धोखे स गोरखा योमीपर मे प्रग करा दिया। गोरखा सना पास नगर मे घरा मा और सन नगर के सभी पाट पर अपना आधार पर गिया । पर मुख्य पर गमी मी परागित नहीं आ पा । पृथ्वीनाराया ने घोषणा की कि यति नगर्रायासी हरियार डाल देंगे तो सभी को मना कर दिया जायेगा । पर और निगा धीर नगरवासियों ने युद्ध समाप्त र हपियार रस दिप । पोर्तीपुर यिनय हो गरा । पृथ्वीनाराया न जो मोट में पा सपन मा स्यरपरस्न को आशा की फि प्रमुग्न नागरिपों को मार दिया जाय थोर प्रयेक भी पुरप और यम्चे को नार और मोड पार किा गाय । पा रहीं चर्चा को छोग जाये जो गोद म हो । गाना 1 पासन मा । रानी + नार और पोट काट दिए पर। वह एप अपन्न परत पा । ना और ओर तो गए पई मन ए । कासापुर नाग मागररिपुर रस दिया गया। पृषीपारायन ने बोनापुर में ऐसा अमानवीय स्यवहार इममिये पिया पोरि पौमापुर में गई भार अपमानजनर पराजम गिरी ने और उमर योर सेनापति मारे गये थे। उरारी गा मा पनान शिान और स मा पार गरे अतिरिक्त पृथ्वीनारायन इसपे द्वारा मपार धागे नागरिका म भप और सात विठा ३६ देना चाहता था जिसमे कि वे उसका विरोध करने का साहस न करे । जर पृथ्वीरापन की सेनामो न मरुगापूर को ल लिया और उसके मुस्लिम सामत के सराई ५ पाईस गाव भी छीन लिए At बमार पा मवाब मोर हासिम और ईस्ट इलिया कमनी मी धोकपी हो गई । समी तक सो पगाल के यार और ईस्ट इटिमा म्पनी यही समझसे ये रिगोरखा राना अपने प्रशदे परासी राजाओं से लर रहा है परसु मरयानपूर की विजय ने रहे विश्वास दिला दिया कि वह सम्पूर्ण हिमालय को विजय करना चाहता है। मकवानपुर के राजा में मोर फानिम से सहायता की प्रायना को और अपने पुत्र तथा अपने प्रधान मत्रो मासिह ये साप मागदर नवाय के राज्य में पहुंचा। जनवरी १७६३ म नवाव ने गुरगोनमा यो अधीनता म एक बड़ी सेना मरयानगर पर आरमण करा क लिए मजा और स्वम नवाब बेतिया पर इस पदपा परिणाम रखन, लिय सहर गया। मीर कासिम तया अग्रओं को यह विश्वास था कि मपाल म माना खाने हैं इसी कारण उनकी रचनरी दृष्टि नपाल पर यो । यही कारण कि मोर कासिम मे मप वानपूर पर आप किया । भयका यस हुआ । गुगीनसाको सना का समूल मटुआ मार गोरखो में हप म यहत सो सनिष सामग्री पद गई। इस युद्ध से पृथ्वीनारायन को शक्ति यहम यह गई और उसकी प्रसिप्टा भी अची हो गई। जिस समय पृथ्वीनारायर को सराए पाटन ९ फाट पर पुर फर रहा भों चम समग्र काठाक राजा रामप्रकाशमला और भगा राना रणनीतमल मे अप्रेगों से सहायता यी प्राय मा की। सजा की मपाल पर गिद टि यो । उसको रुपना चाहते थे । अस्तु उहों। पृशानारायन को लिख भेजानिये उसरे तया नपाली राजाओं के बीच मध्यस्थता करना चाहते । परन्तु पृथ्वीनारायन न नपर्मा को उत्तर दिया कि उसे अपनों का मध्यम्यता की कोई आवश्यकता नहीं है । वह अग्रमो से कोई भी पास्ता नहीं रखना कप्टेन रिना या मधीनता में एक अप्रजो समा मान भनी गई। पृथ्वीनारायन मे अपना मान पाटन से हटा कर मन सना ही मार लगाया । पसन अती मेला कोमिओपड़ी सर आने दिया जिसस अग्रेज समावि उसम उनका सामाना परन की गति नहीं है। पृथ्वीनारायन सरेनों त तराई मदान में नहीं एरना चाहता था। यह चाहता था कि जब अप्रेन पहाड़ी क्षेत्र में मा ना तवला जावे । इसी कारण पृमीनारायन ने सियूली गयो पर अपनों का अधिकार श जाने दिया । जब मिली से अपनी सेना प्रशाम यही तो गोरया सेना उस पर टूट पटी। मोरा सना की दो एक रिया ने गैरमा तपा यसा गुर ग ६ सनापनिर मे अग्रो सना से धुरी तर परास्त कर दिया । अधिोग अभी सेना नष्ट हो गई। रबररटेन स्तितोच मोर पोहे से रक्ति इस अपमानजनक पराजय को कहानी सुनाने में सिपे अघ गए इस पराजय उपरात अपमों का पुन पृषीनारायन पुट परने का सार महीं हमा । अप्रजास निवित हाएर पृथ्वीनारायन मे पुन मपातीपाटोको ओर अपना ध्यान लगाया। पृथ्वीनारायन पूर्व की ओर बढ़ गया और रामाण राणा की ।

भधीनता में उसने गोरता सेना को पाटन को जोर मेजा । रामकृष्ण राणा राणा अहिरामवर का पुत्र पा जिससे मपाल का प्रसिद्ध राणा वा पला । गोरखा सेना रामहष्ण राणा की अधीनता में पाटन को और गई और उस नगर को घेर लिया। पाटन की सेना गोरक्षा सनिकाक्ति का सामना फरने में असमय थी। गोरमा रोनाध्यक्ष ने पाटन , नियासियो को यह धमकी दी कि यदि उहोंने हथियार नहीं रक्से तो फोतीपुर की भांति वहां के मिया सियों की नाक और ओंठ तो फाटे हो जायेंगे सीधा हाथ भी काट दिया जावेगा और यदि वे हथियार डाल देंगे तो उनके प्राणों की रक्षा की जावेगी। अन्त में पाटन के गागरिकों ने हथियार टाल दिए । पृथ्वीनारायम ने वहां के नाग रिकों के साथ तो पूरता का व्यवहार नहीं किया और भारम्न में यहां के उन प्रधानों का मी उचित आदर सम्मान किया जो कि विग्यासघात फरफ उससे मा मिल थे और उसपो पाटन ने पानिमत्रण दिया था। परन्तु जय नगर पर उसका पूरा अधिकार हो गया और पे राब प्रधान पृथ्वीनारायन कम्जे मे आगये तो उसने उन सभी प्रधागो को मरवा पिया। उसपा सिमान्त यह था कि जो एक बार विश्वासपात पर सपता है वह सदय विश्वासघात करेगा। अय गोरसा सेना पाठमाहू की ओर बढ़ो । काठमांडूरे प्रधान व्यक्तियों को पृथ्योनारायन ने पन दकर अपदा भविष्य में पय येने का लालच कर अपनी मोर पहले ही मिला किया था। अयप्ररा दरबारी सेना तया मय सभी लोग मिले हुए ५ । उस समय काठमांडू में नपा पाटी का प्रमुख उत्सय बन यात्रा हो रहा पारी सेना उस्सय म मग्न थी। पृथ्वीनारायन की सेनातीन ओर से काठमाङ्कम घसी । काठमांडू पर सरलता से अधिशार हो गया । जय प्रकार अपने पोर से विश्वस्त सनियरों के साथ भागा। बीच में पाटन के राजा को साथ रूपर वह भटगाय गया । अब गोरखा सना मपाल की घाटीगांवा को विजय करती भटगांप पहचो । प्रत्यक गपि य निवासियों ने गोरखा सेना पा यहादुरी से मुपायला फिया । मटगाय का रागा रणजीतमल पाटन का राणा जनसिहगल और काठमादमा राजा जयप्रकाशमल्ल सीनों हो इकट्ठे थे। गोरखा सेनाओं ने मटगाय को यिजय कर लिपा । जयप्रकास योरतापूर्वक पुरा परते हुए महत जएमी हो गया । तेजनरसिंह को पृथ्वीनारायन ने जेल म गल विया जहां वह एक पवी पी मांति मरा और रणजीतमल्स को उसने वाराणसी जान की आना दे दी। बात यह थी जि लड़पपन मे यह भटगांव भापर रणजीतमारपास रहा था और उसका मित्र था। जपप्रकाशमल्ल मे अपभुत धीरता का परिचय दिया था। यह अस तक यहत यहादुरी से रहा और लरते हुए उसन पोर गति प्रास पो पो। उरा मत्रियों दरयारिया ने उसके सार विश्वासघात किया था। जयप्रकाश पशुपतिनाप रे मदिर रे नीचे यागमती नदी रेमिनारे आयोघाट पर मरा। ज्य पप्रा अपनी मृत्युगम्मा पर पा पृथ्वीनारायन पाह अपने शन से मिलने गया । पृथ्वीनारायन मे अपप्रवास से पूछा दहिये अब आप षया कहते हैं आपने गय से पहा था कि आप मुग पराजित र कैद फरेंगे। जयप्रकाश ने उसर दिया--में अपनी पराजय स्वीकार करता हूँ तुम पिजयो एप मौर में परास्त हुआ । नियति को यही स्वीकार था। मुल पवल इस यात पा रा है कि मेरे यादमियों ने ही मुझे धोसा दिया। ये विधारापासो थे, उनि अपवित्र मोजा साया पा । मुझे प्रसन्नता है कि मैं भव मर रहा हूँ पत्र को कद मे रहने से रणभूमि म युद्ध करते हुए मरना कहीं अच्छा है। पृथ्वीनारायन जपने वोर शन जयप्रराश के इस उत्तर से प्रभावित हुआ। उसने जयप्रकाश से कहा कि यदि आपको कोई इच्छा हो कहिए मै पूरी करूगा। पहल तो जयप्रकाश चुप रहा कितु जब पृथ्वीनारायन ने यहत आग्रह पिया तो उपप्राग हसा और फिर गम्भोर हो गया जसे कि यह कुछ सोच रहा हो । उसका अन्त समीप आ रहा था यकायक उत्तरित होकर उसने कहा अच्छा तुम मुल एक छाता और जूहे दो। समो यह सुनकर स्तब्ध हो गए। पृथ्वीनारायन ने कहा कि उसकी वास्तविक इच्छा उस समय सक पूरी नहीं की जा सकेगी जब तक कि मेरी तीन पीढ़ियां सिंहासन पर न घठ जाये परन्तु उसने एक छाता और जूते जयप्रकाश को दे दिए। भटगांव के राजा को भी अपने सम्पषियों दरवारिया तथा प्रजा से घृणा हो उठी थी। यात यह थी कि सभी ने उसके साथ विश्वासघात किया पा। अतएव उसने नपाल में रहने को अपक्षा अपने दा को छोडफर धारा णसी मे जारि रहना उचित समता । भटगांव के सात अवष (जारज) पुत्र थे। घे सातों पृथ्योनाराया से मिल गए थे। अब रणजीतमल्ल मदद के लिए मपाल छोड़कर वाराणसी जा रहा था और जब घर पगिरी पषत के सिर से मपाल की घाटी को जीवन म अन्तिम बार दख रहा था उस समय उसने एष कविता कही जिसका आशय यह था कि उस पानी लोग विश्वासघाती हैं। उसने उन सात राजवंशीय बियामघातियों के विश्वासघात का भी उल्लप किया। पृष्योनारायन ने उन साता को पुतपर उहे बहुत धिक्कारा । उनकी नाक्टवा दी और उनकी सारी सम्पत्ति जन्त करली। नपाल की घाटी को विजय करने के उपरान्त पृथ्वीनारायनगाह ने अपने ठाकुर सनापति रहरसिरको उत्तर की ओर कुटी और किर ग दरों तक विजय परन लिए भेगा जिससे कि भविष्य मे तिम्मत नपाल के क्षेत्र म हस्तक्षेप न करे। पृथ्वीनारायन स्वय रामकृष्ण रागा को लकर पूर्व को मोर दिरान्ती पबीलों से युद्ध करने के लिए चल पा । पिरान्ती क्योल पूध मे पहाड़ी प्रश में रहते थे और जिस प्रकार पघिमीय पहाला प्रापे परपतिया (गुरा) वोर और लयाकूपे उसी प्रकार यह किराती लोग मी विकट साहसी और धीर थे। दोनों ओर से मयपर युद्ध हुआ। ऐसा पठिन युद्ध पृथ्योनारायन की कल्पना पे बाहर पा । अन्त मे गुरसा समानों ने मिरान्ती सेना को ठूलो तेल सकस दिया । वहां धीर और योग्य पिराती सेनापति मोहिराप ने उसका माग रोर दिया । इस प्रकारे लोग माग गए । उहोंने मोहिन्न से मी भागने रोपहा बिन्तु उसने यहाँ से एटना स्पोपारनरिया। उसरी सना फम होती जा रही पी, गोरता सा उर पर पठोर आग्रमण पर हो यो विन्तु यह घोर रणभूमि से महीं हटा और सरते ए पोरगति को प्राप्त हो गया । यह पुस २१ जून १७६८ मे हमा था । दृग्योनारायन जय घोडे पर सवार होकर रणभूमि पो बसने गया तो उसन अन्न पोर ग पर सो मादर और सम्मान गिया! पृप्योनारायन यह समा गया Eि उसक सिए भविष्य में ऐसा मयारपुर साना गम्मत नहीं है इस कारण उसने मिरान्तो शासक सया ..

उसय आदमिया + साथ बहुत उदारता का व्यवहार किया और उसके परिवार को अपने सरक्षण मल रिया। उसने सभी किराती नेतालों को उ. प्रदन का अपनी अधीनता म राज्यपाल बना दिया । राप्रपार उसने इन पोर जातियों की स्वामिभक्ति को प्राप्त किया । अब फिराती भी गोरमा हो गए। ये गोरसा गायक अधीन आगए। पूय के पिराती जातियान प्रभुत्व में ला र पृथ्वीनाराया घाटी को जार लोटा और उसने फाठमार को अपने राज्य पो राजधानी बमा पर स्वय अपने को मपाल का राजा घोषित कर दिया । अब पृथ्वीनारायन फा रा य पश्चिम म पुरा । गोरक्षा राज्य नपाट यो घाटो पूय में सिविषय तक किराती प्रवा और उत्तर म ति प्रत तव फल गया । ममी तक नपा की घाटी को ही नपाल वहा जाता या जितु अब इस मिशाल राय को नपाल कहा जान एा और उसने सभा रहनेवाला को नाली या गोरसा फहा जाने लगा। परन्तु अभी भी पश्चिम में चौबीसी और पासी राय थे जो कभी भी नपल नवीन राज्य के लि सतरा बन सते थे। अस्तु पृथ्वी नारायन न एक एक फरवे उनको समाप्त परा आरम्म कर दिया। उसन समी Trयों को ल लिया । किन्तु जर वह दक्षिण की ओर बढ़ा तो तानाहग के राजा में कड़ा मुकाबला यिा। पृथ्वीन रायन पोल पर उसने इतने प्रपल प्रहार किए कि पृषीनारायन न उसमे पुद्ध न करना ही उचित समना । पिजित प्रदश को व्यवस्था करने के लिए यह और गया और फिर सामाग से लसा-जोखा पूरा करने के एि कभी वापिस नहीं आया । दूसर पप उसन वियपूर राय पर नाममण कर पिया । पृथ्वी नारायन इस राय वो समात पर बना चाहता था क्योंकि यह मारा को जानयार नपाली मागों महा नजदीक था । विषयपूर के राजसिंहासन पर पांच यप का थाएक था। उसकी मां तथा उनमा प्रधान मनी अगमसिर मालय राजा को लकर ईस्ट इठिया कम्पनी के प्रदाम माग गए । विजयपूर विजय हो गया । पृथ्वीनारायन का विचार था कि यदि यह यालक ईस्ट इडिया कम्पनी के प्रमाव में रहा तो भविष्य में ग्वतरा हो सकता है। पहले तो उसने यह प्रयत्न किया फि बाला उसके अधिकार में नामावे। उसने उसे राासिहासन पर बठा मावासन भी दिया । परन्तु जब वर असफल रहा ता उसन उस प्रदा को अपने अधिकार में रखने और जो विजयपूर राय ईस्ट इडिया कम्पनी को वापिर फर दता था उस पृथ्वो मारायन मे दना स्वीकार किया। पृथ्योनारायन सिद्धिन राग्य या विजय पर नपार मो सोमाया पो भूतान तर ल जामा चाहता था। किंतु यह अपने जीवन-काल म यह न गर सफा । पृथ्वीनारायन ने उन सगी प्रमुख परपत्रकारियों को जिहाने अपने ज्याभियों यिद उसे सहायता दा पो मरा दिया था। इससे लकर पहपा पृश्वीनारायन को भारीपना पो गाती है। परतु उस समय मपाल में छोटे लोट राज्यों दरवारों म इतने अधिक पम्ययकारी पे कि जय सप पावी मारायम उनको समाप्त न करता तय तक उसरा राग्य भी सुरक्षित नहीं रह सकता था। पृथ्वीनारायन पोर, साहसा, दूरदर्गा और चतुर राजनीतिज पा। यह - । लिया। जानता था कि यदि नप इन छोटे छोटे रायोको समाएर एक सुहद नपार को जाम नहीं दिया जावेगा तो बिटिरनपाल मो विजयकर उसको अपने साधीन पर लेंगे। ईस्ट इंडिया कम्पनी को गिप्टि नपाल पर ची। यदि पृथ्वीनारायन इस सनिक अभियान द्वारा नपार को एप सुर और बलवान रायन या देता तो नपाल भी मिटिश साम्रा के उदर मे समा जाता। पृथ्वीनारायन ने नपाल पा एकीकरण पर उसे अग्र जो की दासता से यचा यही नहीं उसने अग्रजी साम्राज्य के अग्रदूत ईसाई धमप्रचारको को भी नपाल की घाटी से निकाल याहर किया। उनके मिगन को समाप्त पर दिया । पृथ्वीनारायन अग्र जो की चाल को जानता था वह उसे घणा परता था अतएय उसने अंग्रजों को नपाल से दूर हो रखा। यही कारण था कि नव भारत मा अग्रओं की दासता म फस गया नपाल अपनी स्वतप्रता पो रक्षा कर सका । यास्तव में यदि दखा जाय तो पृथ्वीनारायन आधुनिक नपाल का जाना है। पृथ्वीनारायन नपा दिय के उपरात अधिक दिनो तक जीवित नहीं रहा । अपनी विजय ये उपगत जो थोरे समय यह जीवित रहा उसम उसने अपने विगाल राज्य के प्रशासन मे सुधार रिए, मुद्रा में सुधार किया । यही नहीं उसने गोरसा सना को सुसगठित किया और उसे एफ सवल सेना बना दिया। पृथ्वीनारायन बीमार पउ गया। उसी बीमारी बढ़ती गई वयो ने उसे शरद रात में देवघाट जाने की राय दी क्योंरि यहां की जलवायु गरम है । कुछ इतिहास-लसकों का कहना है कि पृथ्वीनारायन १७७१ या १७७२ म मोहन तोय में गडप मदारे समीप मरा परतु थास्तव में उसकी मृत्यु १७७५ मई । पृथ्वीनारायन को मृत्यु के उपरात उसका पुत्र प्रतापसिंह नाह नपाल मे राजसिंहासन पर यठा ।

अध्याय छठा नेपाल का विस्तार महाराष पृथ्यो नारापनशाह को मृत्यु होते ही उसके ज्येष्ठ पुत्र प्रतापसिंहशाह ने अपने माई बहादुरगाह पोपद पर रिया जिससे कि उसके सिंहासनादत होने में कोई महिना न हो । फुछ समय उपरान्त प्रतापसिंह गाह ने अपने भाई यहादुरसार को निकाला दिया । यपि प्रतापसिंहगाह अपने पिसा में समान तजम्यो भौर प्रभाव शालीगासर नहीं था परन्तु उसम पिता के समान होमपार के विस्तार की महत्वाकांक्षा मोगर पो । फिर पिता द्वारा छोडी हुई एक सुसरित और अनेक पुओं का धनुभवप्राप्त सेना उसके पास थी । उसन शिपियम के कुछ भाग को सपम राज्य में मिलाने का प्रमस्न पिया। उधर पौवासा राने बहुत गया करते थे। ये मपाल महाराजा को अधी-सा को स्वीकार परत ए भी कमी कमी उसकी प्रभुमा को घनौती रत थे । अस्तु पतापसिंहगाह ने उनका इमन मरना निश्चय दिया । उमगीघ्रो सोमेयर उपाोग और जोगीमारा पहारी राज्यों को विजयकर उनकी सत्ता को समाप्त कर दिया । १७७७ में उसकी मृत्यु हो गई । उसकी मृत्यु उपरान्त रापा पुत्र धारक रणबहादुरगाह नपा के सिंहासा पर बठा । वारक रणयहादुरगाह छोटी उमर का था इस कारण यशासन चलाने के अधिपार पो पर उसके धापा यहादुरला और उसकी मां में भयकर विग्रह उठ खरा हुआ। बात यह पो कि पारगाह को जम दानिकाय 4 दिया गया तो वह बिहार के रेतियाह म्यान पर रहन लगा पा । नसे ही उसे अपन भाई प्रतापसिंहगाह की मृत्यु की सूचना मिली या बिहार से नपाल वापस लौट बाया सपा रिजेंटे बनकर नपालानाराम करने पे अपन अधिपारी घोषणा।राजमाता ने उसका विरोध किया दोनों पक्षों में पुहमा । राजमाता विजयी हुई और बहादुरगाह को एक यार पुन सा से भागना पड़ा। रासपाता राजेपी के शासनकालम उमरे शिनापति रामकृष्ण राणा न मास पी सीमाओं का परिचम म मोर अपिर विस्तार पिया । उसने Inी ओर गुरुयोरे को विजय दिया । सामजंग तथा सानाहग को भी उसने परास्त कर दिया यपि उन पोनों पुत्रों म मिनिसों मे अभुत गोप और पीरता रामान रिया था। इस समय उपरान्त राजमामा राजदरमो पी मो मृत्यु हो गई । बहादुरगारगोन होमपात र माया सपा उसने माल पासन लिया । पारसनगल म तया पार रो रणबहादुलाह नारामराल में मपाल ने सैमानों में मन अपन हाय में ब दामोदर पाडे सरूपसिंह रामायण राणा और अनरसिंह थापा नसे वीर और मुगल सेनापतियों को अधीनता मे पाल्पा को छोड पर सभी चौबीसा और बाईसा राजामा को सदय क लिए परस्त कर दिया और किरान्ती मताओं को स्वतत्रता को समासपर फिरान्ती प्रदश को पूर्ण रूप से नपाल शासन के अधीन कर लिया। नपाल को सनाआ ने पश्चिम में गढ़वाल और कुमायू प्रदेश पर भी अपना अधिकार कर लिया। १७८८ म बहादुरशाह ने मोरग थे गोरखा मुमा को ६ हजार सनिकों के साथ सिमिम पर भारमण करने के लिए भगा । फिरतानी प्रवेश से उसने सिक्किम पर आक्रमण रिया। सिक्रिम को राजधानी गगटोक तक नपाली सेनाए विरा अधिक समय किए बढ़ती गई । सिक्किम का रामा एक बहुत बड़ी सना लपर नफाल की सेना का सामना करने साया । मयफर और घमासान पुट हुआ। यद्यपि नपाली सेनाआ ने सिक्किम की सेनाओं पर पूण विजय प्राप्त फो और सिस्विम की अधिकार सना नष्ट हो गई परतु नपाल को सेना को भी इस पुर मे गहरी क्षति उठानी पड़ी। सिक्किम का राजा भाग कर तिम्वत घल गया । सिक्किम प रा न तिमत की सीमा मे पहुँच पर ल्हासा सरकार स सहायता की प्रापना को । ल्हासा सरफार न चीन सरकार स नपाल फे विरत सहायता को प्रायना को क्योंकि पिछले कुछ वर्षों स नपाली सेनाए फुटी के दुगम दर को पार कर ति को पदाबान्त कर रही थी । नपाल तिस्पति को अपन पहा सोटे सिक्कों का प्रचल्न करने से रोपना चाहता था । चीन सम्राट ति तथा समीपवर्ती पवतीय प्रमा में गोरखा सेनामा के इन आक्रमणों से चौगा। उसने दावा कि गोरता सेनाए तिम्चतम घुस रही हैं तथा घुम्दी घाटी के व्यापारिक माग पर अधिकार समाना चाहती हैं । यस्तु उसने तिान से सहायता + लिए सेना भेजने पा निचय दिया। नपार की यह बहुत दिनों से शिकायत थी कि तिवतो व्यापारी नपाल मे सोटे सिक्कों का प्रवलन करते हैं । उस व्हान होने तिरवत पर आवमण परन की योजना तयार ही। नपाल पासपी दृष्टि तिग्यत क पनी मठों पर लगी हुई थी। ये उसे धन को प्राप्त करना चाहते थे । मपाल की सेना गेरर-जाग' तर ति यत म घसती घरी गई। रोग को नपाली सेना न घर रिया । तिनत को सना ने पई पार अपरन पिया मित नपालो सेना महर वार उमे भार नाया। फिर मी नपाली सना पूरी तरह स नियती राना को परास्त न पर सकी। परत गोरमा सेना ने उस स्थान की पत्पनातीत सम्पत्ति को सूग । उसी समय धीमो सेनापत्ति 'धान- एए यहुत पड़ी चीनी सेना के साथ ल्हासा आया । सम्राट मे उसे नपाली सेनाको तिमत २ बाहर सदः दने को आजादी पो । इस सम्बप में पानी इतिहासरार वी-पूझान का विवरण यहां देना उषित होगा । गोरखा नासकों ने नपाल र प्यापारिर माल पर अपिए पर लगाने और नम में मिट्टी मिली होने का बहाना परक तिम्बत पर माक्र- मण कर दिया। धोन सरवार न जिा सनापतियों को गोरता सेना तिम्रत से नियार पाहर करन म हामा सरकार की सहायता + लिए मेगा पा उन्होंने रमाईलामा को सलाह दी शिवह प्रतिवय १५ हमार स्वण सिपो

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मिलने आये। यहादुरशाह ने कहला मेजा कि यह चीनी सनापति को यह सम्मान नहीं द सस्ता । यदि या उससे मिलने जाना चाहता है तो जा सकता है अपया यह अपने स्वामी के पास वापस जा सकता है । चीनी सनापति न उस अपमान को पी लिया आर काठमांडू आया। वहाँ भी उसका विशेष सम्मान नहीं किया गया । उसका लान के लिए एक नेपाली चोपदार को भेजा गया और उसको प्रतीक्षा कराई गई। घीनी सम्राट पत्र में यह माग की गई थी कि नपाल सरकार ५२ करोड़ रुपए स्हासा सरकार को द ल्हासा के जिम मनी दोमपाली सेना ने कद कर रखा है उसको सौर दिया जाये। बहादुर शाह न चीन सम्राट की उन मांगाको ठकरा दिया। जब दूत अपमानित होकर लौटा और चीन सम्राट को नपाली पासक द्वारा की गई अमद्रता की सूचना दी गई सो सम्राट ने सनिक अभियान की आज्ञा दी। माग फका गान ने पुन पाठमांडू से सम्राट की मांगों को पूरा करने को पहा । नपाल के शासक ने तिब्बत क मत्री को इस गत पर छोइन का बचन दिया कि सपि हो जावे । तय चीनी सेनापति ने युद्ध की घोषणा करदी । यहादुरगाह न नपास के अत्यन्त गुगल और योग्य सनापति दामोदर पाडेको घोगी सा का सामना करने के लिए भेगा । यद्यपि धोनी सेना वहत बढी पी पर नपासी सनिप वडी वीरता और सहस से लड़। दामोरर पाडे सीधीरतारताय चीनी सेना पर आक्र मण करता हुआ पीछे हटता जाता था। यापि चीनी सेना बहुत बड़ी होने के कारण नपाली आक्रमण को सहन पर रती थी परतु उसको बहुप्त पति होती थी। नपाली सेना इस बोरता और साहस से ही निधीनी सेना मातक्ति हो गई। उस ऊचे पयतीय प्रदा मनपाली सनापा साहस और गौय देसकर धोनी सना चरित और मपमीत हो उठी। नपाली सेना ने धोनी से। को कई पुओंम परागित किया और क्षति पहुँचाई। परन्तु दामोदर पॉो योजना के अनुसार पीछे एता जा रण था। पीछ हटन फ गाद यह मागों और पुखों को नट परसा जा रहा था। इस कारण धीमी सेना को आगे बढ़ने मे रहत अधिक पठिनाई होती थी। मगरत १७९२ म येतरायती नदी को हो स पार पिया जा रापता था और नयकोट को माग पता था यहाँ दामोदर पांडे यपनी सेना सहित नी दूसरे रिनारे पर छिप गया। उसन धोनी गना को उम सोण पुल पर आने दिया और जचीनी सेना पुल पर आ गई तो उसने भयरर वेग से चीनी गना पर आक्रमण पर दिया। सामने थोर गुरसा सनिर भयकर मार पर रहे पोर पीछ म पहारी पर रा स्तर पर सो विगार चीनी सेना आगे यह रही पीपरपीट से घीनीनाको पा रही थी। चीनी सेना बरी तरह से परागापोहोोगी। ममत्त चीनी सेना म वराह पल गई । वह मपनीस होगर आतथ्यस्त हो गई। उसी समय दामोदर पार पुल को तोड निया और था उराहारी भरार दाग हो याली नमबर गया। गोरता सेना या पूर्योय माग दिगाधों की सरावामूल्य माल लिये आग पड़ रहा था। साधारणतया उसे वरस नकार की योर बदना मारिए पा परन्तु उमर सेनापति को मय था कि वहां नसीमारक्षर पा धगो से उना सामान गोजाब परेंगे और नोएटा यात मारत RTI पे वह उनमेल मिया मायेा भए उन्होंने ने बरसन जारर हानिया यापती- नर से जाना निश्चित रिया। इस भयानर रें को मयापहता रायदिवित थी। इस मपानकरम हिम और बर्फीमी सेग हवामों से दो हजार गपाली सनिर मर । सपिन वे लूट रा सामान सार उस भयामर दरग पार पर गए। उस घर को पानपता और यहां की विपतियों को क्या को आज सर नपाल नहीं भूसार। यारलाह से उस समय यही राजनीतिा नर । उमने मूल से समश लिया कि धौनी रोना महत घलयान है और यही यह मपाल परमाग्रमण म कर व भए उसने चीनी सना से सपि रन की चर्चा की। उगने तितके बोर को घोर रिया सुमहरलामा को नपाल से बाहर पल जाने को कहा। सुमहरतामा ने विप सारर आत्महत्या पर सौ। परन्तु वास्तयि स्थिति यह थी कि धोनी सेना उस मयपर पुर रो पर गई पो और आतक्ति थी । मस्त उहोंने तुरत सपि पर लो। उस सघिरे अनुसार यह निश्चित हमाfr प्रति पांचवें बप नपारा एक प्रनितिधिमाल भेंट सर धोनी सम्राट पी सेवा में पेरिंग जाया परेगा। जहाँ तर दिगार्थी वो लट पे मारा पा मन है धोन इतिहासकारों का पहना है कि-मांगान ने नपारियों को जग माल पो चापस परने पर विवा पिया। पितु नपाको इतिहासकारों का कहना है कि सूट माल में से एर पण मी यापस नरी किया गया। यहादुरगाह ने सपि पर मुल की। इस पारण नपाली सेनापति को जानते थे कि चीनी सनारसी दुदना में है और उनका नपाल पर जामभण करापा पमी साहस नहीं हो सपता अपन सासर से नारा हो गए। तिम्बत को इस संघप में ही ही हुई। उसे पोई पासि-पुति की रपम नहीं मिली। उपर में चीन की सेना तिनत में ईमपौ क लिए जम गई। अब यह पुर चल रहा था तर तिायत और नपाल दोनों ने ही अग्रेजों से सहायता चाही । ला वानवारिस ो उन दोनों को ही सनिक सहायता देने से इनकार पर दिया, क्योंकि अपजों से दोनों देशों से मित्रता यो। जय सुदूर तिम्रत में मपा सेना चीनी सेनाओं से गूश ही ची उसी समय गोरखा रोनाए रामकृष्ण गणा तया याद म समरसिंह पापा के नेतृत्व में गढ़वाल और कुमाय प्रग पर आममण पर रही थी । गोरखा सेमाओं ने कुमायू प्रवा पर विजय प्राप्त कर ली । १७९२ मे जव गढ़वाल पर मी गुरता सेना की विजय समीप थी और गड़वार पर पतन होने हो याला था कि अमरसिंह को वापस युला लिया गया। कारण यह पा कि चीनी सेनाए मपाल की घाटी धार पर पहुँच घी पीपा जस छोटे दा की मनिक शक्ति और गोरसा सनिकों की वीरता अद्भुत थी नहीं तो नपाल जसा छोटा दा उत्तर में चीन पूर्व में सिक्किम और पश्चिम में गढ़वाल और पुमायू से एक्साय पुट कसे कर सपता था। इसमें पाघात म धामोदर पाने और उसके बाद अमरसिह पापाक मेतृत्व म गुरखा साओं न पदयाल को विजय पर लिया । उनको घाटी में गुर धना में समोम निर्णायक युस में गोरखा रोनाए विगयो हुई । गदवार को सेनाए नष्ट हो गई और गढ़याल का राजा प्रदुम्न मारा गया । इस प्रकार १८३ तर नेपाल पा राज्य सिक्किम के मध्य से काश्मीर राज्यको सीमा तप फल गया । देवर पास्पा का अघ स्यतत्र राज्य हो बघा हुआ था। पाल्पाका राजा महादत्त दक्षिण में मवप के भयाय वजीर ८० ये का गहरा मित्र था इस पारण नपाल गासक उसको छोरे । वह एक प्रयल वेगवान समुद्र की नयर नहरोंम एक छोटे टोप क समान किसी प्रकार अपने अस्तित्व को यमाए हुए था। नेपाल वा दुर्दमनीय तया योर सेनापति एक बार फिर अपनी विजयवाहिनी को लकर काश्मीर राप की ओर बढ़ा। उस साप मागते पापा मी था। अमरसिंह पापा ने काश्मीर राय मे घुस कर कांगडा मिले पर आक्रमण दिया और मागतेयापा ने सुजानपुर पर धावा बोल दिया। नपाली सेनाओं ने दोनों को घेर लिया और एसा दिसलाई दने उगा कि नपाली सेनाए इन दोना क्लिों पर विजय प्राप्तकर उस प्रदा पर अपना अधिकार कर लेंगी । कांगरा का राजा सगसार स्लि के बाहर निकलकर युद्ध कर रहा था। सगसार ने प्रवल गतिमान लाहौर के सिवन महाराजा रणजीतसिंह से सहा यता को प्राथना की। उधर अमरसिंह थापा ने अपजों स सहायता पाही परन्तु अग्रेजों ने इस झगड़ में पडना स्वीकार नहीं रिया। महाराजा रणजीत सिंह ने दमा कि इन पहाडी राज्यों को अपनी अधीनता में लाने का अच्छा अवसर है मस्तु एक बहुत बढी सना को उसने अमरसिंह थापा विरुद्ध मेगा। अमरसिंह पापा को छोटो सो सा उमका सामना न र सकी । उसको सिरमूर राज्य की ओर भागना परा। सिरमर का राजपूत राजा परनप्रकाण उस समय सिरमूर की गद्दी पर पा। सिरमूर रे रामा परनप्रकाश को एक वप पहले अमरसिंह थारा रक्षा कर चुका था। यात यर यी कि एक वप पूर्व कांगड़ा के राजा सगसार तथा हिदूर रामा ने सिरमूर पर माक्रमण कर दिया था। दो राज्यों सम्मिलित आक्रमण वा सिरमूर का राजा सामना नहीं कर सकता था। भयभीत होकर उसने अमरसिंह पापा से सहायता चाही। अमरसिंह पापा ने नागत पापा को एक हजार सेना पर उत्तकी सहायता को भेजा। गिरमूर का राग आगे यदा किन्तु दोनों राया पो सम्मिलित सेना के सानने म टिक सका। यह नाग र अमरसिंह पापा के शिविर म आ गया। सय अमरसिंह पापा ने हिदूरपो सेनाओं पर आरमण पिया आर उन्हें परास्त किया। उसके उपरात यह गिमा को मोर धड़ा। अमरसिंह पापा समझता पापि सिरमूर का राजा इस समय उसकी सहायता करेगा। अस्त अमरसिंह पापा ने रिरमूर के राजा को युना भेजा परन्न सिरमूर के राजा ने यह समाप्त फर नि अमरसिंह थापा को सेनाए सियारे पराजित होकर नष्ट हो गई हैं तया टामरसिंह पापा को गति क्षीण हो गइ ह जाने से इनकार कर दिया। यद्यपि गोरक्षा स रा समय अत्यन्त मसत ग्यस्त पी और नपानी सना को घरयन्त जोम्पिम का सामन करना पर रहा पाक्ति अमरसिंह थापा को क्रोप या गया। उसने अपने पुत्र की अपानता में ए टकरी सिरमूर पर आक्रमण परने लिए भनी । राजा माग गया भार अमरसिंह थापा ने सिरमूर राज्य को नपार म मिला पिया। अब यह हिदूर की ओर बढ़ा रिन्त अपज मपाल इस पिरतार म सना हो उट । अतएव उहोंने अमरसिंह थापा को चेतावनी कि यदि यर मागे पडगा तो अग्रजों को हलोप परना होगा। अमरसिंह पापापी सना पी स्थिति देसी नहीं थी कि यह यप्रजों स युद्ध कर सकता अतएव पर धप हो गया और आगे नहीं यहा। उन दिनों जय रिनपाल की रपपराक्रमी सनाए घीन तिग्यत माय मोर पप्रजों को आतस्ति कर ही यो मपार के दरवार में पापण पल रह थे। यह सो परले यनरपा गया है निरागाला सरा'यहा दुरगाह म राम्यासन गपिरार व गगहमा गौर राममा नपार गासन परती रहौं । उनी मृपुरे उपरात बहादुरगाह र हाय में दा हा गारान नपिर आ गया । उसन साण माराामो पनिवारी और निषम्मा बनाने मो मरसर घेण्टापी जिसस मिया ऐमा रिम्मा हो जाये पि उसकोपमो नो पागन परन यायम समना जाये । गत उगा ताण महाराजा पो रिना और गरायचीच रपमा गौर उराको स्यमिवारी गौर मिपम्मा माने र सारे प्रपल रिय। कुछ लोगों पा तो यहां पर परा या नियदि उसपी हरया पर दी जाती तो अचाया। पर रानीतिर दृष्टि से यह यानीय नहीं था। परिणाम पर हुआ रि सरग महाराा रहार गार अत्यात प्यभिचारो जिद्दी और मनरी याया । उसो तुरा गुदरी गुल्मी राजा की एमी रा विवाह रिया परन्तु उसर यो मतान न होने । मारण उगको उपेरित कर दिया। पह अय स्त्रिया का पता था और उसरी रमेर एप दासा पती रा उसरा पहला पुत्र मा। १७८५ में उसने सपने पो महाराणा (सरातापान) पोति पर अपन चाचा यहादुरगार को गिरफ्तार पर उराशे मरया दिया। सरस पहने उसन जमा राजाविरुद्ध अभियान पिया जिस रामी उपना बडा नेता मानत । उसन मराको सवरा ये पाहा कर दिया। यह भाग र अवध योरवीगरण में चला गया। रणरहा उरणार एप भरपत मुरर दियरा पापण पुपती पर आमत हो गया और उसरो यलपूय मगगार उसन पिन महा मे एप रिया। हितुओं में विधवा बाह्मणी से यौन सदस्य रसना पापरम मापा । सस्त पग्तिों न राजा तया उसी विषया वाह्मणी उपपरीकोपाप दिया और जापनीय घोषित पिया । युट रोगा। कहा है कि रणवहादुर न मामणी को इस कारण अपनी पत्नी बया लिजिगमे मावी नपार गारपो जानि ऊची हो जावे। पुश रामय उपरात उमर चेचर निरल पा रणबहादुरगाह ने ब्राह्मणों तथा पुरोहितां को या पूजा-पाठ और अनुष्ठान परन रिए पल्पनातीत धन दिया। यह यच ता गर्न परत 77 सौदय चला गया। जम उसने सोगे में अपना पुरुप चेहरा दसा तो उस गारमत्या पर हो गया। उसन वाह्मणों छीन लिया। मतिया मोपचिनों का मरवा रिया मिहोन मदिरों को नष्ट करने को मना दिया । रणहादुरगाह , विधवा ब्राह्मणी से विवाह पर लेन पर ग्राह्मगों न उसफो श्राप दिया। याह्मणी यीमार हो गई। ब्राह्मण न एर लाप रूपए धाप उटापे मागे कित रुपए द दन पर नौ यह नहीं वधी व मर गई। उस पर “णवहादुरगाह 27 ग्रह हमा । उसन ग्राह्मणों को सम्पत्ति छीम ली। उनके मदिरा तया मतियों को तोड डाला। इस कारण जाता विरोधी हो उटी रणवत्रादुर को रिहामन छोडना पा । उराको पाह्मण रानी न मी मरत समय उससे रामसिंहासा छोउन फो कहा था । अपनी प्रिय रानी को मृरप के उपर यह सनकी हो गया। उसन और भी अधिक धार्मिक और राजनीतिक अत्यावर क्येि । इस घोर अधार्मिक पृरय से समस्त नपाल घाटी की जनता उससे - . . ४८ विरुद्ध उठ खड़ी हुई । ब्राह्मणों मे उसको श्राप दिया । रणबहादुरशाह ने भयभीत होकर राजसिंहासन छोड़ दिया। उसकी विधवा ब्राह्मणो सुदरी का पुत्र गिरपान जुद्धविक्रम सिंहासन पर बठा। रणवहादुरशाह सयासी बनकर भगवत भक्ति करने तथा अपने पापों से मुक्ति प्राप्त परने काशी चला गया। यह घटना सन् १८०० की है। रणवहादर के पूर्व नेपाल का गासन महाराजाधिराज 'भारादार' राज्य का भार वहन करनेवाली परामरावानी समा को सहायता से करता था। मारावार मे एक चौतरिया (मुख्य मत्री) ४ काजी (मत्रो) धार सरदार सनिक सेवा करनेवासे २ सारदार १ पवार (महल के प्रबंधक) और । खजांची होता था । रणबहादुरलाह ने एक चौतरिया और ४ काजी (मपियों) को नियुक्त करना शुरू किया था। रणवहादुरगाह को पास्तविक सम-पत्नी त्रिपुरा सुन्दरी उसके साथ पाणी धली गई आर उसकी दासी उपप नी किती बालर महाराजामोअमि भावक बनो और गासन करने लगी। यद्यपि उसकी धम पत्नी त्रिपुरा सुबरी उसके प्रति सच्ची और विश्वासपात्र रही परतु फिर भी रणवहादुरशाह का प्यवहार उसके प्रति कठोर रहा । पास्तव में रपयहादुरशाह ने जय सिंहासन स्याग रिया तभी यह अपनी भूल पर पाघात्ताप करने लगा था और उसकी सयास सेकर पाने की इच्छा लस हो गई थी। वह पुन सिहासा प्राप्त परने के लिए काशी न जाकर पाटन की ओर चला गया और वहां उसके समयफ चारों ओर ट्ट हो गए। परतु दामोदर पांडे नेगीघ्रतापूर्वक काय पाहो की । पाटन मे रणबहादुरगाह र समयकों को उसने यहाँ से भगा दिया और रणबहादुरगाह को देश छोएकर कागो जाने पर विया किया। रण पहावरशाह दामोदर पाडे तया उसके घराने से दर रमता था। वाराणसी मे भी रणबहादुरगाह का जीवन पूर्वदत हो चलता रहा। यह विलासिता म अनाप-गनाप ध्यय रता और अपना पचाने के लिए उसने ऋण सेना आरम्भ किया । थतर अप्रजों ने इस स्थिति से लाम उठाना पाहाय निर्वासित मपाल शातको ऋण वन एगे । उस मृण को अदायगी रे सवध मे अग्रजों ने रहादुरगाह से एड सपि री । उस सधि मे रणबहादुर ो यह स्वीकार किया कि नमिप्य ने मपाल परमार पो एप अग्रम प्रतिनिधि (रजोडट) को स्योपार करना चाहिए । १८०१ में पह सपिहुई और फरवरी १८०२ मे क्प्टे कारस प्रयम अपज रजोष्ट की हैसियत स नपाल म घुसे । यद्यपि रणबहावरगाह को उपपत्नो दासी तो सम्भवत उसको स्योर करने पक्ष म पो परतुनपाए सामन्त तपा दरवारी इस विषद्ध थे । इरापारण स सधि और अधिए विश्व ये पयोंकि रणबहादुरगाह । यह सधि की थी । इप्टन म पो विवा होकर १८०३ म यहाँ सौट आना पड़ा। पुन एक न सघि सम्रा ने रणवहादुर गाह से की मोर दामोरर पोटे से आग्रह पर येतो नासिरा ने उस पर हस्ता दार मोर दिए परतु मोनही जराप्त समात पर पिया गया । निर्वासित प्रणवहादुरगाह अपनी रगरेलियों में (मनारस मे ) मस्त पा । उसने पारापसी पी एम मुरारी से रख लिया और महारानो ग्रिपुरा गुरोरे समस्त आभूषण उसो भेंट कर दिये। नियासित महाराजा ने अपनी पतिमात परनो से अवररस्तो समस्त मामूषण टोन कर मपनी नई प्रेपसी को द 1 रिपे । मय त्रिपुरा सुन्दरीको आपिर स्थिति यनीय हो रटी । उसरे पास जोपा वह उसर पति ने टीन सिपा और गीती मासिरा ने उसी पंगन पदर दी। मिरा और पिवता यातायररा में यह अपमी रासियों भोर मौषरों में साप अरनो प्रिप गारभूमि मपाल की ओर पल पसे । मपास म पेती ने रामोटर पर एष भतीजे को प्रधानमत्री नियुक्त कर दिया । उस रारण प्रपानमन्त्री ने अपने चाचा पक्षासमपम न पर उसपी स्थितिमोर रनेको भररार घेटा हो। परिपरिवार रे प्रत्येक सदस्य को जा रोना रे ऊघे पद पर पे उसने हटा दिया । जिनके पारा दुई पे उन्हें दुर्ग TANT पद से हटा दिया। पर परियार उराके सम्बपी तथा अन्य सामन्स उसरे विपरहो गए। ये उरारो प्रणापरले घे । उराव पाओं गे मोगा पारर उसको हत्या परयो । दामोदर पार सम्भपत विलास निर्याप पा परन्तु सोगों ने उस पर रावेह हामिह घरय उसी परमार में एवं मपर गुट बन गया मिरापी मेत्री ती पारािापी । ती रामोदर पौडे से पणा परतो घो। मृत प्रधानमन्त्री ने स्थान पर रेसी गे एक मोधो स्थिति में व्यक्ति को निपुरः र दिया जिसपे कारण रामो मुरूप ररपारी मारामहो गए । जय मपास के परयार मे ऊपर लिरो परमात्र चल रहे थे तो नपात रोमहारानी त्रिपुरा सुम्ररी मपाली मोर पद ही पो । पति द्वारा पीडित तथा गायिप पुष्टि से पिपम महारानी मिपुरा गुवरी नपा की सराई रेसमीप पहपी । रारा मकर ग्यर का मौसम आने हो याला पा । नेपाल को महारानो त्रिपुरा पुरोग असा चरित्र पतिमति तमा उग्न व और उसकी पिपलता में मपालिमारे हरप में उसने प्रति सहानुभूति उत्पन्न करो पी। वह पठिनाइयों । सामना परती हुई पहारों में भर रो पो । उपर पाटमार में एक बासी' रेती शासन पर रही यो जिरागे अधिक लोग पूणा परते थे। सेनापति (पानी) रामोवर पांडे ने त्रिपुरा पुरी को नपाल माने सानिमयण भेगा। मपास के दो प्रमुख घरानों पर और पाराम पीदियों से पारिवारिक पात्रता थी। उस समय पह पानुता और गहरी हो गई। वामोवर पारे ने महा रामी त्रिपुरा पुररो को निगवित पर उस रापप पो परम सीमा पर पहुँया जय शारिता मे बसा •ि महारानो त्रिपुरा गुपरी पदी चली मा रही है। उसने सेरा मेगी और यह आमा यो नि महारानी के समो पुरुष सहायों सया सेवों को कापराया जाये। मपासी सेना महारानी विपुरा मुबरी रामी पुरष सहायों सथा रोष पो पर लिया । लोगों का यह विधार पा पिमहाप महारानी उन रापन पनों तथा पहारों में मटककर समाप्त हो जायेगी । परन्तु महारानी एक गुरसा राजा की पुत्री थी । उसमें पोर गोरखा या मारत या यह हतामही हुई उसने नियम रिया यह पी नहीं लौटेगो । मरतु अपनी पोली सी स्त्री रोविकारो कपर यह मितापानी भाईजहां एष भरने रे पास पहारी पर दुग पा। पापमोडू से पुन एक समिर देवली महारानी को रोपने के लिए भेजो गई । उस स निकटकली के सभापति को यह आगा हो गई यो जिवा महारामो को दुग में प्रवेशम ने । रा रानापति की सहानुभूति महारानी के साप पी परन्तु यह राम माशा को अपहेलना भी नहीं करना चाहता था । अस्तु उसने माजा 47 मक्ष .

रश पालन किया । उसने उस दुग मे अपनी समस्त सेना को ल आकर दुग के फाटक बद पर लिए । महारानी त्रिपुरा सुदरी को रोक्ने वा उसने प्रयत्न ही नहीं किया । अब राजधानी मे गहरी चिता छा गई और एक दूसरी सेना भेजी गई । उस सेना को मह निश्चित आदा दिया गया था कि महारानी को आगे पड़ने से रोका जाये । उस सेना के सेनापति पो विपति की मारी महारानी त्रिपुरा सुदरी अपनो सेविकाओं के साथ सडक पर मिली । सेनापति एक भोर और प्रतिष्ठित सनिक या । बढे सपोच और हिचपिचाट के साथ उसने महारानी भो राज-आशा बताई । महारानी त्रिपुरा सुदरी तनिक भी भयभीत नहीं हुई । उसने म्यात से सलधार निकाली और बोली या सम गोरखा राजा को धमपत्नी को नपास की महारानी फो, अपने यश म लौटने से रोपने का साहम करोगे? यह यह कर महागनी ने सेनापति के हाप पर तलवार से वार पिया । सेनापति ग्जित होकर हट गया । उसे वी ला अनुभव हुई कि उसे उस गहित पाय क लिए मेग गया । महारानी आगे बढ़ती गई और उसी दिन प्रात काल उसने नपाल घाटी में प्रवेश दिया। जब वह काठमाई से पांच मील दूर रह गई तो वह क गई । जसे ही यह समाचार राजधानी में पहुधा दामोदर पाहे उसकी सेवा मे उपस्थित हो गया। साय सय वर्गों के लोग भी अपनी महारानी क प्रति स्वामिभक्ति प्रदर्शित करने लिए उसके पास प्रा पदचे। यहां तक कि थोडे से नीच दर्जे के पासिका के कृपापात्र कमचारियों को छोडार समी राय अधिकारी महारानी की सेवा मे उपस्थित हो गए । गामिका पापात्र राजामय निष्पत की ओर माग गए । नासिका अब अक्ली पड़ गई। वह गजा तथा अपने के साथ एक मदिर गिरणस्थल मे पलो गई और साथ में समाने से सारा रुपया तपासव हीरे जवाहारात भी ल गई। अप महारानी त्रिपुरा सुबरी ने गासनकाय अपने हाथ में ले लिया। उसने उदारता और अपने पद के अनुरूप शासन एरना जारम्म दिया । उसने दासीपारिको गन परदी और नपा की परम्परा विरस उन लोगों पोजिहोंने उस विरोव पिया पान मरवा कर उरें क्षमा करवा दिया। उसने दामोदर पांडे को अपना मुख्यमो यनाया । त्रिपुरा सुदरी सया दामोदर पाडे दोनों को यह मय था कि रण घरादुर कहीं यापम न गट आए। उसो सदेह था रिपही अंग्रज रणवहादुर को नेपाल लाने पा पाय न करें। इसी कारण उसने अपने मुख्यमत्री को इच्छा के पिष्ट भी अप्रजों से होनाली सघि पोस्वीकार नहीं किया। दामो वर पांडे ने वाराणसी में एक प्रमायगारी व्यक्ति पो लिपा -ियह रणवहादुर गार को वाराणसी से गाने दे । रासकारण यह पा कि लार बलजली ने नपाल दरवार को प्रचितर दिया या रिजर अप्रेगों को नपा7 दरवार से कोई नो सपि नहीं है तब ननपूर महाराणा रपबहादुर प्ही भी जाने रेरित स्पसन है। बागोदर -मजी पवारातीर प्रमाणाध्यसि पोरण यहादरलाह को वाराणगो न आने दने शिलिसा था दुर्भाग्य रण यहादुरगाह या और वह रतनपासपी जोर चल पडा। लोगों को यह पल्पना भी नहीं हुई कि नूतपय महाराना वाराणसी छोर पुरा है और शव क कि लोगों को यह मालूम पगरि यह धारापो से घर पर है पर पुत्र *पाल पहुंच गमा।

वामोरर पो सेना लेकर गोत्र हो मागे बढ़ा । मह रणबहादुरलाह हो काठमार को मोर पड़ने नहीं दना चारता पा । जयकि दामोदर पारेरी सेना उसके पास पहुंची तो रणबहादुरलार ने अपने पनिष्ठ सचिव भीमसिंह पापा से परामर्न पिया । भौनसिंह पापा पारपा ये पागो प्रमरसिंह पापा का पुष, धतुर और साहसो पक्ति था। यह जानता पारिनपाली सनिरों में राग मक्ति यूटयूटरर भरो है और ये राजा सा भी क्यों न हो उससे पटा से देखते हैं । अस्तु मोमसिह पापा ने सलाह दी कि महारामा सेना को अपनी ओर माने पे लिए आह्वान करें। रणवहावरगाह मे निभय होरर वामोर परिकी सेना तथा उच्च सनिक अधिकारियों को सम्बोधन करते हए कचे स्वर में कहा 'माप मतलाइ frमाप मुग यथवा दामोदर पति को अपना स्वामी स्वीकार करना चाहते हैं ? उसो क्षण समस्त नपाली सेना भागकर रणवहा दुरगाह रे पास मा गई और मपास के लिए सतत युट परनवाला धोरण मक्त तथा राजनीतिज्ञ दामोर परि तया उसका पुन पर उकर यांप लिए गए। रणरादुर स्वामी अयवा प्रशासन के आम से गासन करने सगा परन्तु वास्तव मे वह महाराा मन गया । महाराणो मिपुरा सुदरी मे भी अपने स्वामी का स्वागत रिया किन्तु रणमादुरगाह म वाराणसी की उस सुकुमार सुवरी को मो मुला मेजा और उराको वो यमव क साप अपने रनिवास में यूर रणयहाएर दामोदर परि से यदला लना पाहता पा । उपर भीमसेन थापा का पिता अमरसिंह पापा जो दामोदर पका पत्र पा और जिसे पांडे ने पद मे डाल रखा था, जेर में पड़ा था । रणरहावरगाह ने उसे मुक्त पर दिया और उसे अपन पर पापा भेज दिया । अमरसिंह पापा में चौबीसा सदामा के प्रमस जुमला रामा पर भावमण लिया विन्तु जुमला राजा न गोरपा सेना का एसा कड़ा मुकाबला पिया कि गोरखा सेना उसफो पराजित र सको। दो वर्षों तक गातार पुट होता रहा चिन्तु शुमा राजा अपनो २२ हमार सेना के साय बहादुरी से पुट करता रहा । रणवहादुरलाह दो यप सक युद्ध परफे मी सपल नहीं हुआ। अस्त पह हट गया। जुमला राजाने यह समझा कि अब युद्ध समाह हो गया उसने अपनी सेना के अधिकांश मनिकों पो घर जाओ तो छट्टी दे दी। उसी समय रणयहादुरगाह मे पुन उस पर आक्रमण पर दिया । शुमला राजा परा जिस हुआ । रणवहादुरगाह ने ऐसी निदयता और क्रूरता का परिचय दिया कि मिष यता भी कांप उठी । मोमसेन थापा रणवहादुरगाह को पामोवर परि विष्ट मरकाता रहता था । रणबहादुरगाह मे दामोदर पाडे को यह पत्र जो उसन पाराणसी लिखा था बताया और उसरो मृत्युवा दार यधिकों के सुपुर्व पर दिया । जब दामोदर पडे और उसके पुत्र को वध करने के लिए ले जाया जा रहा था उस समय पारे के पुत्र ने विरोध करके शिक्ल मागन पा प्रस्ताव रखा । पुत्र का प्रस्ताय था कि यह समिकों से अस्त्र शस्त्र छीनबर पुस करे। उनको धारता और साहस को ऐसते हए यह सम्मय या फिर जो सनिक उनको पपस्थल पर रेगा रहे थे उनमें से कुछ उनके प्रशसक और समया ये । विन्तु पिसा म प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया । उसका कारण यह था कि उसे मय पाकि यदि उन्होंने विरोध किया तो उनका समस्त परिवार समाप्त कर दिया मावेगा।

मस्तु, उसने अपने पुत्र को रोक दिया मौर इस प्रकार उस वोर मौर साहसी सेनापति का अत हुआ। रणवहादुर इसो से सतप्ट नहीं हमा । उसका एक प्रतिद्वन्दी पाल्पा का राजा पृथ्वीपाल था। उसने अपना एक दूत पाल्पा के राजा के पास उसकी बहिन से शादी करन का प्रस्ताव लकर मेगा । उसने कहलाया कि यदि यह अपनी यहिन र उससे विवाह करत तो यह उसको और मपिक आगीर देगा। पाल्पा ने राजा ने अपनी बहिन को अपने छोटे भाई के साथ भेजा। वह स्वयं विश्वासघात रे भय से नहीं आया । रणवहादुरशाह बहिन और माईत बहुत अधिक स्वागत-सत्कार किया किन्तु राजा क पुरोहित को भेजकर यह पहलाया कि मैं पापफे हाय से ही कयावान स्वीकार कहगा । उसने शपप साई कि आपके साथ कोई धोखा नहीं होगा । मैं पापक रामों ही आपको महिन को स्वीकार करना चाहता हूँ। पृम्योपाल काठमांडू आया। उसके साप जो पारसी सनिफ ये उनके हथियार छीन लिए गए और पृथ्वीपाल को कद लाने में गल दिया गया । रणवहादुर ने पाल्पा रे राज्य को तथा मुटपाल के जिले को जिसे पाला पे राजा ने अप्रेजों को सौंप दिया पा अपने राय में मिला लिया । बुटयान मे मालगुजारी यसूल करने सया उस पर अधिकार करने के लिए उसने सेना भेज दी । इसी को लेकर दस वष उपरान्त नपाल और अपनों पा पुट हमा। पाल्पा के रामा को यहिन से होनेवाली शादी के बारे मे आगे कुछ सुनाई नहीं पड़ा । सम्भवत पाल्पा के राजा को यह दण इस कारण मिला क्योकि उसने रणयहादुरगाह को प्रसन्न करने के लिए अपने पुराने मित्र दामोदर पार की विधवा और उसके एकमात्र जीवित पुत्र को उस निवपी के सुपुर पर पिया था। अब रणवहादुरशाह ने अपने अषय भाई गेरवहादुरशाह को युलाया और उस पर पश्यत्र में सम्मिलित होने तया पाल्पा को मपाल के सिंहासन पर पटाने के प्रयत्न परने सामारोप लगाया । उसफो काठमांडू छोडने तया सेना मे मतों होने के लिए कहा गया। परतु शेरवहादुर में माना को स्वीकार नहीं किया-हा कि हम दोनों एक ही पिता दो सन्तान है तुम काठमांडू छोड़कर घलो में भी तुम्हारे पोछे घलगा। रणवहादुर क्रोध से पागल हो गया। उसने शेरबहादुर पे अप करने को माता द दी। शेरवहादुर ने भी अपनी तलवार निकाल ली और राजा पर मरपुर वार रिया। रणवहादुरशाह का गरीर पट गप । प्रसिद्ध जगबहादुर का पिसा बलनारसिंह पर यहीं लग पा उसने भपनी सलवार से गैरवहादुर को मार गला । जब रणबहादुरगाह मरा तो उसने अपनी पाह्मण पत्नी से उत्पन्न अवध पुत्र गिरवान जुदविक्रमगाह को भीमसेन पापा के सुपुर पर दिया । भीमसेन पापा ने रासो रानी को रणमहावरशाह की चिता पर सतो होने के लिए विवश पर उससे छुटकारा पाया | भव मीमसेन ने अपने विरोयिमों को एक-एक कर समाप्त करमा आरम्म रिया । घास सेना अघि पारियों सपा भनेर सामन्तों वपर दिया गया। उसने अपने पिता अमर सिंह पापा को पाल्पा पर मधिकारपर उस पर नपाल महारानारे नाम पर शासन रन मेगा । पाल्पा र समीप ही महाराना पृवीनारापनगाहपी पुत्री सासिमाना राजाको म्याही यो। मीमसेन न उसो भागोर को मम कर सिया सपा उसको और उसके पुत्र मोसो बनाकर काठमाडस माया।

। पृथ्वीपाल भी उसमे क्य कर दिया। इस प्रकार उसने अपने समी विरो पियों को समाप्तपर अपनी प्रयास समय प्रिपुरासुरी को शासिका यनाया। जसे हो रणयहादुरगाह से मृत्यु हुई वह महाराणा पो ध्यतिगत सेना के सामन गया और उनका समर्थन प्राप्त किया। महलों की सेना पा सम पन मास पर उसन यो हाल को घेर रिया जहां दरयारी इ8 ये और उन समी का उसन वध कर दिया जो उस विरोधी थे। उनसे मारन का महाना उसने यह प्रस्ट पिया रिवेरा को मरवान म गेरवहादुर व सहायर थे। वह अब नपारा प्रधानमत्री मना और राज्य पी समस्त सत्ता और अधिकार उसके राय म आ गए। उस दिन स यस्तुत राज्यसत्ता प्रधान मनोरे हाप म आ गई । नपाल पा महाराजा नाममात्र का राजा रह गया । पास्तव म यह अपने सपथ गहर में एक सम्मानित पदो की माति रहता था । मपाल के राजा उस दिन से प्रधानमत्री के पदराने पदी मा गए । उस दिन से १९५० तप नरफि महाराजा त्रिभुवन ने प्रधानमत्री के शासन के विरुद्ध विद्रोह रिया मपास प महाराजा प्रधानमत्री के कदीमात्र थे । यही मपाल का वास्तविफगासक था। अय राजसिंहासन पर महाराजा गिरयान सविनमशाह यठा परसु उसको सौतेली मा महारानी प्रिपुरा सुवरी अमिमायफ गासिफा थी और भीम सेन थापा प्रधानमत्री था। यह घटना १८०४ की थी। उस समय नपाल अपने विकास को परम सीमा पर पहुँच पुका था। भीमसेन पापा रा पिता काशी अमरसिंह पापा काठमांडू से ६०० मील पूर पागड़ा में युद्ध पर रहा था। नपाल उस समय पूर्व पश्चिम और उत्तर प्रत्येक रिना म विस्तार पर रहा था। रेवल दक्षिण में अपजों को भक्ति रद रही थी। उस समय सिक्किम गढ़वाल कुमाएँ, सिरमूर और इन के प्रदेश पाल अधीन आ चुक थे। उधर भारत म अग्रेज मराठों सपा देशी शक्तियों से पुटवर अपनी पाक्ति को बढ़ाने का प्रयत्न कर रहे थे। मपाल म देग को देखते हुए यहुत बड़ी सा थी । प्रत्येक प्रधानमंत्री कलिये उस सेना को काम देने पे लिये उसका कहीं न कहीं उपयोग करना शिवार्य था । यदि यह उसको छुट्टी दे देता तो येकारी फल सफ्ता थी । यही कारण है दिगोरमा युद्ध के उपरात यंप्रेजों ने गोरखा योताओं को अपनी सेना में भर्ती करना आरम्म पिया था। यही कारण पा कि भीमसेन थापा अंग्रेजों से भी एक बार मोर्चा लेना चाहता था। एक यार उसने मरे वरपार में शरण महारामा समहा-एक मार घोमियों ने से रिया कितु उन्ह विवश होकर सधि परनी पगे तो फिर अग्रेन हमारे पहाड़ों मे किस प्रकार घुसकर नेपाल पर आक्रमण फर सकते हैं ? भरतपुर का छोटा-सा क्लिा जिसका निर्माग मनुष्यों ने किया पा उसे तो मेग्रेम यिगय पर ही न सके तो हमारे पहाड़ों जिनका निर्माण भगवान में किया है उसको पार कर ये हम पर रिस प्रकार आगमण कर सकते हैं ? १८०१ मे अवप के नयाय पनीर मे गोरखपुर का प्रवेगई इडिया कम्पनी को दे दिया था। इस पारण मपाल और ब्रिटिश राज्य को सीमाएं एक दूसरे से मिल गई थी। मपाल ने जान-मूक्षपर अग्रेजों के प्रदेश में घुसना' मारम्भ कर दिया । धीरे धीरे नपात ने तराई के बहुत-से गांवों पर अपमा अधिकार कर लिया । मपाल धीरे-धीरे एक के बाद दूसरे गांव पर अधिकार' 1 । न ममाता था। ये गांव या सो अग्रेजी राग्य के होते अयया उस प्रदेश के होते जिनक पारे में झगड़ा होता था।सास वर्षों तक यह क्रम चलता रहा। भीमसेन को विश्वास हो गया कि अग्रज उस ओर अधिक ध्यान नहीं दे रहे हैं । अन्त में गवनर जनरल चौका। उसे स्पष्ट गया कि यदि नपाल को रोका नहीं गया तो यह खतरनार हो जायेगा । उसने काठमाडू को यह सूचना भेजो कि सीमा सवधी झगड़ों को निपटाने के लिए एक आयोग स्थापित पिया जावे और उसमे नपाल का एक प्रतिनिधि रहे। यह भायोग यह तय करे कि नपाल ने अग्रेजी राग्य को कितनी भूमि पर अनधिकार पाजा कर लिया है और भविष्य मे दोनों देशों की सीमा को निर्धारित किया नावे । सीमा आयोग (कमीशन) ने सोमा का निरीक्षण दिया और अंग्रजों के रावे को उसने सही मानकर स्वीकार कर लिया। परन्तु नपाल के प्रतिनिधि ने लोटकर भीमसेन को ऐसी गलत रिपोट दी कि उसने कमीगन की सिफारिशों की तो अपहेलना की भविष्य मे भी पहले की नीति अति अपनी सीमा के गांवों पर अधिकार करना जारी रखा। भीमसेन थापा के पिता कामी अमरसिंह थापा जो अग्रजों की पाक्ति से परिचित था और अधिक अनुभवी और यपाययदी था यह यह नहीं चाहता था कि मपाल अपजा से युद्ध हरे । उसने प्रधानामत्री को घेतावनी दी कि अंपजों से मिटना देश क हित में नहीं है । परन्तु भीमसेन मे एक न सुनी। यह पुरवी तयारो परने लगा और अग्र जी राज्य को भूमि पर गाजा करता गया। लार मोपरा जो भी विरोध-पत्र भेजता उसरा भीमसेन गोलमाल उत्तर देता। अन्त मे अग्रेजों ने गोरखपुर के तराई प्रदेश में जिन गायों पर नपाल ने अधि पार कर लिया उनको २५ दिन मे खाली कर देने की मांग की। उस पर भी जम नपाल ने कोई ध्यान नहीं दिया तो लाट मोयरा मे जिलाधीश को माना हो कि वह नपालियों को हटाने के लिये सेना मेले । गोरखा रोना मे कोई विरोध नहीं किया और पौधे हट गई। काठमांडू मे परमार के याईस सलाहगारों को सभा हुई । प्रात पाल ९बजे से रात्रि के ८ बजे तक बहस होती रही कि पुट पिया जाय या नहीं। रिपारियों ने अन्त मे पसारने निश्चय दिया। अमरसिंह थापा मे मुदूर पश्चिम से लिख कर भेजा हमने अमो तक हिरनों का शिकार दिया है और मदि हम अब युट करना चाहते हैं तो हमें शेरों से लड़ने के लिये तयार रहना पाहिए।' भीमसेन जो पट पे पस मे है और अग्रजों को परागित करना चाहता है परयार में रहा है । उसको गुट को यिभीषिका अनुभव नहीं है। उसने सलाह दी कि अग्रेजों से सधि की जाये और जिन पोषो पर हमने अधि कार पर लिया है उनको वापस पर दिया जाये । भीमसेन इस लिये समार मही या क्योंकि उन गांवों को माप उसको मिलती थी। अप्रेल १८१४ म उस प्रदेश पर भप्रेजों मे अधिकार कर लिया था। मई में स्थिति बिगड़ गई । गोरखा ने सोमा पर घुटवार जिसे से तीन धोरियों पर माफमण पर दिया। अठारह पुलिस सिपाहियों सपा यहाँ रे पानेरार को रहने मार गया । गोरता सेनारे उन पायों से हट जाने पर अंग्रेजों मे यहाँ यह पौरिया स्थापित की थी। बात यह पो हि सराई मे जब भारवर रोग फलता पा तो नपासो वहां से हट जाते थे। अस्तु जब भप्रेगों मे वहाँ, बोरिया क्यापित करणे तो पालियों में आक्रमण कर दिया। पानेर तपा सिपाहियों के मारे जाने पर अप्र को न नपाल को पुट को घेतावनो रे बो। उस समय मपाल क दरबार में पुरनगमया यहमम या। मौमसन ने हा कि यदि अप्रजनपाल से पुराना चाहते हैं तो उन्हें पुट मिलेगा। मय उसने धोन पर यह प्रमाय मसा दि अंग्रेज गरिए नपाल पर आक्रमण परना धारते हैं जिसमे य आगे चलकर तिमयत और धोन पर मामण पर सरें। उसने एसा प्रशन रिया हि मानपाल धीम की दाल पनर अप्रेनों में भारुमत से चीन की रक्षा करना पारना है। उसने म मामार पर घोन से संनिर सहायता मांगो।परा में जय अग्रजों कोसी सूचना मिली तो वे चितित हए । रोने चीन का स्थिति से अवगत रापा और गीघ्र ही मपाल पर बारमण परन का निचय पियाला मायरा न दीनापुर पारा पसी, मरठ सहारनपुर मौर एधियाना म अपनी सनाओं पोहा पिया। दीनापुर से आठ हमार रानिये सायरा मा म विधिपा बोह सपा होरात्रों से पाटमार पर मानमण परन कस्सेि पूछ लिया। धाराणसी से जनरल पुष्ट पी अधीनता म चार हजार गनिरों मे सोमा प्रदेश पुदवाल और शिवराम पर यायमगरिया । राहारापुर से जनरल गिलस्पी की अपी नता में ४००० सनिक दून पो पाटी पर भागमण परने लिए आगे पढ़ें। परिमी और जनरस आफ्टरसोनी की अधीनता महनार सनिर सतसम निारे अमरसिंह पापा से पुटरनल प्राप्त पर। पर भीमसेन पापा ने मा पुरको तयारियों को । उसन अपने पिता तपा अपन सेनापनियों को अपीनता में मना से पारगर अप्रजों का सेना के मुशायले वा तयारी वो। नवम्बर १८१४ो लखनऊ में गवनर जनरल मेनपास से पुटको घोषणा परदो। अंग्रेजों को चारों सेनाए आगे बढ़ी रिन्तु समो क्षेत्रों में मपारियों मे करा मुरावा रिया । यदपि मप्रेजों की सेना तीस हजार थी और नगाल २ पास पुल बारह हमार सनिर थे रिन्तु धीर नपालियों में अपने से पाई गुनी सेना को आगे नहीं पढ़ने रिया । मनरल वर रो भीमसेन रे मतीने उमरसिंह ने पोधे हटन पर दिया पर दिया । अपनी से वगनी सेना को उमरसिंह ने पीछाम पिया । उपर जारल मोरले ने अपने क्षेत्र में प्रत्येक चौकी पर पांच सौ समिफों को रलकर तीन घौकिया त्यारित करली थी। फनस रणधीरसिंह मे उन पर आरमगर उन्हें समाप्त र दिया। मारले मो पीछे हटा । मपारियों ने उसको सो दरमा करदो रि उसरो सेना हिन मिनरो गई । मनरल मारले इतना मपमीत हो गया कि किसी को बिनापत साए योर बिना पा दिये यह रात्रि को घो) पर मठकर नाग पड़ा हुआ । गवनर जनरस को जय यह मालूम हुआ तो उसे हटा दिया और अत घोपित फर दिया। उपर नपाली सेना में मौ योग समतोष उत्पन्न हो गया था। भगतसिर के पास दुल सौ रानिक थे। गर वह मारमे शो सेना के सामने पहुँचा तो उसको तुरत माक्रमण करन की आशा दी गई परन्तु अपने से इस गुनी सेना पर मारमण करने से यह हिचकिचाया। मोमसन ने उसे काठमांडू पापस पुला लिया और सनिर मदालत में मामा दी Fउसे घरवार मे घाघरा पहनकर माने को विवश किया जाये। उपर अग्रेजो समाएं पश्चिम म अमरसिंह पापा से अरमोदा मोर 1 गढ़वाल मे लडने के लिये आगे बौं । ममरसिंह पापा का वीर मतीमा सात महादुर कागा के किले में थोड़ी सी सेना को लेकर अंग्रेजों को मिलाल रण चाहिनी को रोके हए था। मनरल गिलम्पो ने चार हजार सैनिको को लेकर उस पर भाप्रमण किया किन्तु वीर मपालियों ने उन्हें पढ़ने नहीं दिया। कई बार अग्रजी सेनाओं ने क्ति पर आक्रमण किया शिलु उहें नालियों ने पीछे धकेल दिया । उन पुद्ध मे जनरल गिलस्पी मारा गया । जब पारबहादुर ने दक्षा कि भोजन सामग्री क्सेि में समाप्त हो गई तो रात्रि के अयकार में यह अपने पो से सनिकों को तर क्लि गया । यह घटना गुरमा सनिकों के साहस को प्रकट परती है। जब किले पर तोर्पोत गोल बरस रहे थे तो एक गोरखा सैनिक मागता मा पहाड़ी पर भाया । उसने हाय हिल्लया। गोली चलना भव हो गई । अप्रेमी ने उसका अपने शिविर म स्वागत किया । उता निघला अवदा गोली ला पाम स क्षत विक्षत हो गया था। वह अग्रेज सजन रे पास चिकित्मा रिपे आया था । मन यह अस्पताल से मुक्त कर दिया गया तो उसने पुन अपनी गेना में जाकर अप्रेजों से लड़ने की मामा मांगी । अप्रेज नपालिया की बहादुरी से पकिन तो थे हो उनको इस मक्ति से वे आश्चय अपित हो गये। गिलस्सी र स्थान पर अनरल माटिनल को नियुक्त किया गमा। मारिनरल ने समरांसह पापा पर भारमण विमा । भयकर मुख हमा । अपनों की एक तिहाई सेना नष्ट हो गई। परन्तु अमरसिंह के मास बहुत कम मेना थी। संजों में पास इ गुनो सना के अतिरिक्त तो भात पौ। अमरसिंह बगे बहादुरी स प्रत्येद स्थान पर लाता रहा । अन्त म मौलान के दुर्ग पर मयंरर मुख मा । अमरसिंह बहादुर समानायक भागते पापा हो हजार गुरक्षा सनिकों को लरर याजों को मिल रपयाहिनी से मिट गया। सापों पो भयपर मार २६ तनिक भी परयाह न पर धोर मापते पापा भरमुम रपालील दिक्षा या था । उस दिन जसा मपानर पुद हुआ उससे अपेज बग थे। अपने जीवन की परवाह न कर धौर गोरसे यत्यत मिषम परिस्थिति में अपनो सन्यास गई गुनी सेना से युद्ध कर रहे थे। उस रिम युद्ध के अन्त में पाय सी गोरसा धीर सनिय पराशायी हो गपे और पौरपर भागते पापा मी पदव लिये रणभूमि म सो गया। समरसिह यो स्थिति एयनीय हो गई । उसो सराराको जब भात दमा कि अल्मोडा हाय से निपस गया तो ये अमरमिह पापा पाम भाए और उससे सपि करने रेसिपे कहा । अमरसिंह ने सपिपरना प्रस्तोतारारदिया। थे रोग उसे छोराले गये। भर ममरसिंह के पास दो सौ सनिफर गये ये यह थोड़े-से सेनिफ उसलाम दुगोरक्षा नहीं कर सरते थे। मागते पापा मर धुषा पासमारसिंह ऐ शहार सरकार से मोहपात गपे थे। दिनार अमरसिंह ने माफटरलोनी से सपि को दानों के बारे में बुधगया पाटरलोनी अगरसिंहसी वीरता और देश भक्ति से इतना प्रभावित हो गया था जिसने पह स्वीकार कर लिया कि अमरसिंह अपने सारिकों ५ सय दो सोपों के साय सया आनी समस्त पति सम्पत्तिले जाता है। अपार में अमरसिह के पुत्र रपनुरसिंह को भी यही गर्न दना स्वीकार किया गया।पिता मौर पर सर पर हा धा मिल सपने हैं । इहें सारनपुर, हरिशर, नमायागर होकर काली नदी को पारफर मपास म माना था।सरे मति । रिक्त भाटरसौनी मे जो पतससी यो ये पात बटोर पोनपाल तराई, कुमायूं और गदयाल तया गिमस्त से मिले अंग जो पो रने होंगे । शिविरमा यह माग जो मपाल ने ल लिया है यहां के राजा को हटाना होगा और काठमांडू परमार म अप्रम र गोस्ट को रखना होगा। भीमसेन पापा ने इस सपिरो स्वोशार परमे मरी। उसे मालूम पारि भनों अपनों से युर को तयारी कर रहे है। लाहौर में महारामा रणनीतासर सपारी पर रहे थे । भमोरसा के पठान मागरा के समीप से भामणगी सपारियो कर रहे थे। मराठे मी सप्रिय हो गये थे। मैपाल की सफ्पता मे ईस्ट रियारपनी समोपात्रों को रानिय मोर मागावान पना दिया था। उसने उस राधि को पतों से मस्यौपार पर दिया। उरामा ऐसा कराठीग मी पापोंकि पूर्व और मध्य म मपाल पी सेनाओं मे अप्रजोंगो सेनाओं से गुरी तरए परास्त किया पा। एवल गुदूर पपिम म माली प मुखमसमरमिह पापा यो असफरता मिली थी। जब अमरसिंह रामपानी पा माडू में आया तो उसने भी सपिको स्वी पारन लिए जाने पर पा नेतृत्व दिया । भीमा रापि को स्वीकार मे से हियष्पिाता था । लाट हटिस सराईपोसना पाहता था। उसवे यदले में २० हगार से ३० हजार पर प्रति वप क्षतिपूतिरेपम बने को तपार पा। भीमसेन सपा उरावे सामन्तों को उस प्रदेश से मारी बामदनी होती पो उस शारण ये उस प्रदेश को देने को तयार न थे। मातृ सपि-पर्क टूट गई । अपनों ने रोनापुर में राना संगति की और गालोनी को उसका सेनापति नियुक्त किया गया। नपालियों ने भी धूरिया घाटो रे बरें रो रक्षा सपा पाटमार के माग में पड़ने वाले दुग मक्वानपूर की रक्षा का प्रबंध किया। अपन इतिहासगरों तथा मा विशेषज्ञों ने यहा है कि सार बलाइव स लफर उस दिन तक भारत में अप्रमों को ऐसा भयानक और पटिन पुटकमी मही लरना पड़ा। मारक्टलोनी चौदह हजार सेना को लररसारम स जनवरी १८१९ में आगे बढ़ा। यह जानता पा लिपुरिया घाटी के दर परी मपालो अन्त ता रक्षा करेंगे । अतएव उसने रोई और मार्गदने का प्रयत्न किया। कैप्टेन पिपस गिल ने एप ऐसा माग छ निकाला जो होगों को पिरित महीं था और परत कम प्यवहार में आता था। रातिको आक्टरलोनी ने भपनी सनासहित उरा गाम से उस पहा को पार कर लिया। गुरखा सेनापति पो प्रात पाल हात हुआ कि अप्रेजी सना पहाड़ पार कर गर्न । अप रणसुरसिंह हरिहरपुर और मकवानपुरमीभोर यदा जिससे कि यहां अंग्रेजों को रोका जा सके । मकवानपुर पर घमासान पोर मयपर पुखहमा। ऐसा भयंकर पुर अप्रजों ने महोदया था। नपाली सेनामक फिगानमहारराणा मे बहो पीरता से युट पिया मोर मारा गया । अब अप्रजी तोपें भर गोलों की मार रने लगीं। परन्तु गोरक्षा सनिक मागने का नाम ही नहीं लेते थे। में इतने शनिक मारे गए कि पृष्यो झर्यों से टक गई। मक्यानपूर पतन हो गया । स्थिति की भयानकता को दखकर रणजुरसिंह तया उसके साथियों ने रानि अंधकार में हरिहरपुर के दुग को छोड़ दिया । यद्यपि एण सुरसिंह मे यहत से पुत्रों में अद्भुत धोरता प्रदागत की थी और देरी सेवा कोपी परस्त हरिहरपुर को छोड़ने का कलक जीवन भर वह पो न सका । भोमम पापा महों पाहता पाकि यानी सेमा मपाल की पाटी, उस यु ५८ में प्रवेश करे। मस्तु उसने पुन सषि-वर्चा चलाई और ४ माघ १८१६ को सिंगोली की सधि पर हस्ताक्षर हो गए । गत पूर्ववत हो रही । नपास उन शों में शुम पा । वह अग्रज रजीहर को रिसी भी प्रकार सहन नहीं करना पाहता था। उस युद्ध के फलस्वरूप आकटरलोनी को वीर गुरमो के अरभुत शोप का परिचय मिला। उसने गवनर जनरल तथा प्रधान सेनापतिको लिसा कि हमें पोरों को अपनी सेना न भरती करना चाहिए । ऐम वीर सनिक हमें कहीं नहीं मिल सफ्ते । तमौ से गोरसासनिक अपनी सेना में भरती होने लगे। गोरखा सैनिकों क सम्बए म जौनशिप ने १८१६ में लिखा था पीरों में सवश्रेष्ठ चोर" पुन उसने लिखा मैंने अपने जीयन मे ऐती हाता और योरता ही नहीं देती। मागने का नाम नहीं लते। उहें मरने का माना भय ही नहीं है । मम उनक सायो एक एक कर हमारी तोपों और गोलियों से परासायी हो रहे थे वे निर्भय हो युद्ध कर रहे थे। आकटरसानी न लार स्टिास से कहा था कि गोरखा सनिरों को तुसना कोई सनिय नहीं कर सकता। गुरखा सनिप माप घटे में भोजन कर सलाई क लिए तयार हो जाता है और कई दिनों के लिए भोजन सामग्री अपनी पीठ पर सेपर घस सकता है । नेपाल पुर से अप्रमों में मपालिमों की वीरता को पहचाना और समोसे पोरमा सनिक म प्रेजो सेना मे मतों किए जाने लगे।

प्रध्याय सातवा भीमसेन थापा ललिता मिपुरा मुदरी पे शासनकाल म तया भीमसेन पापा के मत्रित्वकाल में मपाल मनक्ति प्राप्त की और विकास पिया । उस तीस पप के सम्ये पाल के नीचे लिखे फारण महत्यपूण थे। (1) मोमसेन पापा की पढ़ती हुई पक्ति और असाम सत्ता (२) पापा और पांडे परिवारों मे पतृक पात्रता । इस शत्रता का नेतृत्व दामोदर पां वे एक पुन रननग परि ने किया जिसको १८०७ में भीमसेन । छोर दिया था। (३) महारागाराने द्रविक्रमगाह से दोनों महारागिया को आपसी ईर्षा और पलह । (४) भौमसेन थापा के छोटे माई रनवीरसिंह पापा वा विश्वासपात । तया (५) काठमांडू के प्रमाव काली तया शक्तिशासी ग्राह्मणों का सतोष । हम सारे सघप मे केवल भीम सेन पापा का मती मातयसिह थापा हो एक ऐसा व्यक्ति पाजो निष्ठा और साहस - साप अपने चाचा साय रहकर उसकी सहायता करता रहा । वह उस गद कोटभरे सालाब में शुद्ध और स्य छ जल की भांति पवित्र पा। रन मा परि मोर रनमारसिंह पापा न इस समस्त पड्य प्र में पूणित काम किए मिन्हें पसकर लग्जा को मजा आती। मपाल की राजधानी वाटमार में सत्ता और शक्ति प्राप्त करने का एफ ही माग था और वह पा महत्वाक्षो व्यक्ति से हषिर में स्नान करके आगे बढ़ना । मौमसन पापा मी पपिर मे नाम किया था और जब वह शक्तिवान बन गया तो वह सता सावधानी रसता या । काठमांडू मे शक्ति को बनाए रखने के लिए सतत सावधानी की आवश्यक्ता पो । प्रत्येव सत्तावान व्यक्ति को यह मूल्य घकाना हो परता पा परन्त यह मूल्य भी कम पा । १८१६ मे महाराजा गिरवान फुसविक्रम धधक से मर गए । वह स्वय अल्पवयस्क थे। उनकी मृत्यु के उपरात उमका बालक पुत्र राजेन्द्रविक्रम शाह सिंहासन पर बठा । बालक महारागा की सौतेली दापी महारानी त्रिपुरा सुबरी शासिका (रिजेंट) थी और मीमसेन थापा प्रधानमत्री था । भीमसेन पापा की शक्किमरिमिस पी। यही देश का वास्तविक शासक पा । कोई उसकी शक्ति को चुनौती दनेयाला नहीं था। सब उससे मममीत रहते थे । वह गपासमा सयक्तिगाली शासक था। भीमसेन पापा न अपन शासनकाल में मपास का निर्माण किया । उसने विभिन्न तरीकों से नपाल परी आय में वृद्धि की। उसमे एकत्तिपाली सेना का निर्माण पिया । उसने केवल सेना की सरया ही दस हजार से पद्रह हजार नहीं बढ़ाई सेना के लिए उत्तम अस्त्र-शस्त्र तपा अन्य सनिक सामग्री की व्यवस्था भी की और सनिक घफशाप स्यापित किया जिससे आवश्यकता परों पर युद्ध के समय ४५ हजार सेना को भी पुट सामग्री उपलम्प की जा सके । नगर के पूर्व मे उसने तुन्दौखेल नामक यिस्तृत परेर भूमि बनाई महा समिकों के लिए परके यनाई गई, शस्त्रागारों का निर्माण पराया गया और सनिय वर्कशाप खड़े किए गए। वहीं सोपों के निर्माण 10 की व्यवस्था भी की गई। सच तो यह है कि मोमसेन पापा ने प्रशासन को व्यवस्थित क्यिा और मपाल की क्ति को बढ़ाया। उसकी गति और प्रमाव अपरिमित था। वास्तव मे प्रधानमत्रियों की सर्वोच सत्ता का आरम्म भीमसेन थापा न किया। बाद को राणाओं ने उस सूत्र को और भी अधिक मजमूत कर दिया। सिगौली को सधि के कारण १८१६ से नपाल मे अग्रेजी रजीस्ट मा गया था किन्तु भीमसेन थापा अप्रेजी रजोस्ट का विश्वास नहीं करता था। अंग्रेज फ्रमा समस्त भारत पर छा गए थे । एक एक परफे सारे हिन्दुस्तान के स्वतत्र दगी राज्यों पर अपजों का अधिकार होता जा रहा था। फिर नपाल सत्ता प्राप्त करन के लिए यों हो पडयन होते रहते । फिर मीम सेन पापा का साम्राज्यवादी अप्रजों स सशक रहना स्वाभाविक ही या । परन्तु अपन अन्तिम वर्षों में वह ग्रिटिश र जीडट हाजसन पर विश्वास करने लगा था और बिटिम रजीडट उसका मिय बन गया था । १८३२ म महारानो त्रिपुरा सुदरी की मृत्यु हो गई । वह योग्य, दूरदर्गों और स्थिर तया दृढ़ युद्धिवारी शासिराथी । भीमसेन थापा पर उसका गहरा भरोसा और विश्वास था। वह उसका प्रिय था। महारानी त्रिपुरा सुन्दरी भय सक जीवित थी उस दिन तक भीममेन पापा की शक्ति अपरिमित पो । उसकी स्थिति सुरक्षित थी। कोई उसको पनौती नहीं द सक्ता पा । किन्तु त्रिपुरा सुदरी के मरने के उपरान्त उस पात्रुओं की शक्ति और सख्या बढ़न लगी। नपास एक सनिय राष्ट्र या । यहाँ के अनावशाली व्यक्ति सनिक- वित में विश्वास करते थे। नपालियों को यह मय था कि अप्रन भारत के अन्य रायों की भांति नपाल को भी हड़प लेंगे । अस्तु म प्रजों से नपाली सशक और भयभीत थे। साथ ही ये ब्रिटिश भारत के समीपवर्ती सीमा प्रदेश घुसपठ पर अपने राज्य का विस्तार करने को गो इच्छा नपाली सनिक पौर पे । उनको पुट करने की परम्परा बन गई थी । पृथ्वीनारायनगाह समय से उनकी पुट फरने की प्रवृत्ति बन गई थी । ये पुर के द्वारा राज्य. विस्तार और पुट की लूट स लामाषित होने के अभ्यस्त हो गये थे। अतएव कोई भी प्रधानमन्त्री उनको इस आझांसा की अवहेलना नहीं कर रापता पा। पही पारण पा कि भीमसेन थापा अपनों से अच्छ सम्बध नहीं रखना चाहता पा । साय हो यह विटिग नारत मे सीमाप्रदा के गांवों को पोरे पोरे मपाल में मिलान का प्रयत्न करता रहता था। यह कमी एक गांव लेता तो कुछ दिनों बाद दूसरे गांव को से सेता । जय सक मोममेन पापा न अधिक परया नहों को सब तर अपनों न नपाल की ओर ध्यान नहीं दिया। परन्तु जय मपाल मे बहुत मपिर भूमि पर जा करना शुरु कर दिया तो अपनों सपटमा । यह दुर्भाग्य से वात पो पि आरम्म से ही मीमरोन पापा न अंप्रमों से एपछार पुरदी । मपाल रेसनिक-दम में समान वह भी अप्रजों से गहरी घृणापरता था । रित उसने अग्रजों की गति और साधनों का गलत मनुमान लगाया । १८१४ म गोरखपुर जिने पर आक्रमण परके उसने मूल हो । यदि यह अप्रमों से छटपुट सघर भर परता रहता तो नेपाल में यह समपात भी सतुष्ट एहता और प्रमों से बगपुर भो न सरना पड़ता। .

सापही प्रमों रो सपप परते एनेका परिणाम पर तो होता हो नि म प्रेमों को मपाल पर अपना प्रभुग्य जमाने ना पाहम ही नहीं होता । अप्रेजों को र रखन रे लिए यहत यो पुरको भाव परसा नहीं थी। मोमगन पापारे घोर पारे परिवार तथा प्रगायगा बाह्मण वा संपजों का घोर पिरोपपरते थे। परि भौममन थापा यपत्रों की मोर अधिक मुषसा तो उसका देल में गहरा विरोप होना । मातु मप्रगों का विरोध तो उसपो परमा ही पा भिन्तु यह यो पदयो यथा सकता था। यही कारण पादिपाद को मोमगेन अग्रेस सपप तो करता रहा परतु उसने रोई पो गईमो नौवत सिगौली की पिने पार नहीं आने दी। भीमसेन पापा धतुर राजनीतिज्ञ भी था। सिंगौसी को सपिए उपरान्त पसने बड़ी चतुराई से हेरिराज को इस बात - रिए तपार पर लिया रि तराईरापहमदा जो पूप में गरर नदी और पपिम म परानी मदो यीप में परता पाइस प्रदा यस म रटाया सम्पनी मपाल को प्रतिक्ष घोस हजार पोर दगी । भीमसेन ने हेस्टिा पर यह प्रमाय दाला निगल २ महाराजा बाला है उनी गल्पवयस्पता-पारमई सघि स्थायी नहीं होगी। नपारियों को परयात नहीं भूस्गो नि उनको तराई का प्रथा उनम छिन गया । मातु भाजपरिमपार से माछ सम्याप बनाय रखना चाहते हैं मौर यह चाहते है कि सिगौरी पौ सघि पायो हो सो रहें तराई का प्रदर पापरा पर बना पाहिए । हेस्टिान ने मपाल को तराई प्रश वापस पर रिया । उस प्रदरे लिए मपाल को ईस्ट इंडिया कम्पनी मे जितनी पापिक रकम मिरती पो उसम चार गुनी से अपिष आय मिलने एगो यपि पह समझौता एकपक्षीय पा । प्रत्यक्ष उससे रेवल मपाल कोहो गरम पा रिन्त इसका यह परिणाम मपय मा कि मैपार पा र अग्मनों की तरफ कुछ नरम एमा। इतना होने पर मो अग्रज रजीस्ट से नपाल सरकारको सम्पप महीं रखती थी । उसका एक प्रकार मे वरिमार होता पा और उगा एि मपाल के सम्पप में जानकारी प्रास रन के सनी घोन बन्द । यात यह थी कि उस समय अपन मराठों पिगारियों और धर्मा स युद्ध में से हुए थे। भीम सेन मड़ी सावधानी से स्थिति का अध्ययन कर रहा था । साथ ही यह सनिक तयारिप भी कर रहा था तथा सिपीसीको समिकी मना करता था। मोमसेन ने उस समय अपने जीवन की समग मी भूल से। उसे सेना तथा प्रशासन के लिए अधिक धन की माष याता पी। उसने पनी माह्मणों को जोराग्य से धन मिलता या वह छीन लिया। उनके लिए जोरोप पा शागीरें पी वह ले लिए गए। ब्राह्मण प्रमावगाती थे। भीमसेन थापा वैकमा पनि परिवार ये सगे और जाति विरादरी + । अनाव परि परिवार और पाह्मण-यग उस घोर नत्र हो गए। उस समय मुछ समय में उपरांत भीमसेन थापाको हितपिगो युदिमता महारानी त्रिपुरा मुरी का स्वगवास हो गया । सब भीमसेन थापा पर कोई अपुरा नहीं रहा। वह निर पुग हो गया । उस समय महाराजा त्रिम को ज्येष रानी ने पार्ट तया ब्राह्मणों का पप लिया और छोटा महारानी मीममन पापा सथा पापा परि चार साय हो गई । एक यष उपरान्त महारामा रामेशविरमगार यासिंग हो गए । गासनाधिकार उमा हाय म आ गया । युवा अवस्था में मोग विसास में रमा हा महारामा मौमसेन पापा द्वारा उसकारवाया माना सहन २ नहीं कर सकता मा । उसे भपने प्रधानमत्री भीमसेन उस पर मग मौर प्रमाप बहुत मसरने सगा । यह भीमसेन के प्रभाव और शक्ति को कम परता चाहता था। वह चाहता था कि भीमसेन को नीचा दिखलाया जाये और उसकी शाक्ति को समाप्त कर दिया जाये । अस्तु यह भी बड़ी महारानी के कारण पांडे तथा ब्राह्मण दल की ओर मुक गया । परि दल र नेता रनमा पारे पा जो वामोदर पति का पुत्र था। रणजग पाडे के नेतृत्व में पांडे परिवार के वे सभी उत्तराधिकारी सगठित हो गए जिन पर प्रधानमत्री भीमसेन थापा १८०४ और १८०७ मे अत्याचार हुए थे। महाराजा राजे द्रविक्रमवार देवल भीमसेन थापाको शक्ति को कम करना चाहता पा । रनजग पारे अपने घोर पिता दामोदर पारेका बदला घाना चाहता पा जिसको भीमसेन पापा ने निदयतापूर्वक मरवा दिया था। माह्मण अपनी जागीरें, पन और दोष पुन प्रात करना चाहते थे और भीमसेन थापाको अवनति दखना चाहते पेपयोकि उसने ही उनके घन को जात र लिया था । बगे महारानी छोटी महारानी तथा उनके समर्थक भीमसेन के प्रभाष तथा शक्ति को नष्ट रिना चाहती थी । परतु पिसी का भी यह साहस नहीं होता था कि वह भीमसेन पापा का खुलकर विरोध करे । ये सब के सब गुप्त रूप से मीमसेन को पकड़ पर उसे अपमानित पर उस पर अत्याचार करके उसको मारने का पश्यत्र पर रहे थे। इसम तनिक भी संदेह नहीं कि उस समय महाराजा को स्थिति मत्यन्त दयनीय और असहनीय यो । वह एक प्रकार से सम्मानित कदीमात्र पा । जो स्थिति बाद को राणाओं के पास मे नपाल नरेग की हुई यह उसका पूर्वामास था। विटिग रजीस्ट हाजरान ने अपनी सरकार को इस सम्म प में लिखा पा राजा अपने महल मे याद रहता है। उसके पाहर बह मिना मन्त्री हो साय लिए नहीं जा सकता । यह मो योरी दूर घोड़े पर सवार होकर अपवा गाड़ी में घूमने जा सकता है। उस महल में ही प्रधान मन्त्री तथा उसका माई भी रहते हैं। प्रधानमन्त्री पा माई महाराजा रे सरक्षक हप में रहता है । गत थप महाराजा ने पहारियों मे गिफार खेलने की इच्छा प्रकट की पिन्तु उसको अनेर प्रकार से ध्यय की विपर्दा तया तथा कठिनाइयां बता र रोज दिया गया। इस वप वह गपकोट के महल मे जापर कुछ दिन रहना चाहता था जहां उसका पिता गीतपाल म जाकर रहता था । परन्तु इस बार भी उसे रोप दिया गया । जहाँ शक्ति प्रश्न है उस पास रिचितमात्र मी शक्ति नहीं है और न पर पिसी को कुछ द ही सस्ता है । भीमसेन के आदमी उसो इस प्रार घेरे रहते हैं कि वह अपने महल में भी एप कैदी को भांति एता है । न यह कहीं जा सकता है और न अपने सरदारों या मा प्रमा से मिल हो सकता है। ज्येष्ट महारानी पो महाराजा को यह दासता अप्परतो पो मौर महाराजा को हरा पायरता से प्रद होरर उसने अपने मित्रों और सहायरों से भपना हद निषय प्रस्ट रिपारि वह या तो महाराजा को विधा रेगी कि यह मपनी ध्यषितगत सपा राजनीतिक स्वत प्रतालिए प्रपन परे और अपने मपिशार प्राप्त करे या यया स्यय रो पुत्रों की जननी होने के पारण नपालमा पासन महारामा काम स्वय पाने पाहावा पी। इस प्रभार नप व्येष्ठ महारानी मे महाराजा को लगातार उपसापा सो महारामा ने अधिकार और सारित प्राप्त करने प लिए प्रपरन रिया । शिन्सु प्रधानमन्त्री मे तरण महाराजा पो उस अधिकारों कम करन तया अपने अपितारों को पढ़ाने प्रपरनों को यिपल कर दिया । महारानी को भीमरोन पापादेविट महाराणा उभारने का अवसर मिल गया । अव उसका पति सरण महाराजा विरोपियों भर्गत पारे तया ब्राह्मणों के पक्ष म हो गया । महा रानी मे भोमरोन पापा विष्ट प्रकट रूप से अपना असन्तोष और मोप प्यपत रिया और प्रधामम श्री पर दोषारोपण पिया । परतु तरुण महारामा राजेन्द्रपिम मगाह उस समय भी अपने मत्री का विरोध करने साहस न पर सका । साधारण जनता को यह माना नहीं पी मि महारानी प्रधानमन्त्री का इस प्रकार सुला विरोय परने का साहस परेगी । तरण महाराजा मन में तो अपने प्रधानमत्री से अत्यन्त भुम्य पा परन्त प्रक्टरप में अपने उस प्रमाव भासी पमचारी का विरोध करने परा साहस नहीं घटोर पाता पा । ज्येष्ठ महारानी उससे उभार रहो पो परन्तु उस समय उसने कुछ भी करने का साहस नहीं पिया। वह याषिक 'पजनी समारोह को प्रतीक्षा परता रहा । पजनी समारोह प्रति षष होता था । परम्परा अनुसार उस दिन सभी साप जनिर राजनीय पद और उसक यिशर महाराजाधिराज मपाल मरेल को सौंप एि जाते थे और महाराजाधिराज पा तो पुराने घ्यक्तियों को पुन उसी पद पर नियुार देता था यथया नए अधिकारियों को नियुक्त करता पा । उस दिन उसने भीमसेन थापाको प्रधानमन्त्री नियुक्त करना अस्वीकार पर दिया । जीयन म प्रथम बार महाराजा ने अपने प्रमावगाली और असीम शक्तिवान प्रधानमन्त्री के यिद सपने अधिार प्रदर्णन किया । यद्यपि पुछ ही दिनों में उपरात अमिवाय आवश्यकता के कारण भीममेन पापा को उसे पुन' भुलाना पड़ा। अपने प्रधानमत्री को अवहेलना करके तरुण महाराजा ने १८३८ में महाराजा रणजीतसिर से एक गुप्त रामनौता कर लिया । उधर उसने एक दूस गुप्त रस से तेहरान मेजा बहो मे पह यह पता लगाए कि इस फा भारत पर सम्मवित आक्रमण कय होगा तया यहाँ सम्बप क्यापित करे । बिटिन रजी पेट को महाराजा पी इन पुरमिसपियों का पता पा। जपा कारण यह पा कि मीमसेन थापा फा यह विग्यासगन बन गया था। सम्मवत' उसके द्वारा हो उसे महाराना की इन दुरमिसधियों का पता चलता था। उस समय जय कि मिटिश सरकार सिसों से युग में फंसी हुई थी और इस के मारमण पा मय सिर पर सवार था नपाल की ओर से यह महुत अधिक सक था । १८४० से १८५७ तक अंग्र जनपाल कोगका और भय दृष्टि से देखते थे। १८५७ चे स्वतत्रता के प्रथम युद्ध में जब कि भारत में अप्रेजों के पर उसड़ गए थे उस समय जय मपाल ने अग्रेजों का साथ दिया तब जाफर अप्रज नेपाल को भोर से भाग्यस्त हुए। उस समय अंग्रेज विरोधी पांडे दल का महाराजा पर अधिक प्रभाव हो गया पा इस कारण पुन नपाल ने ब्रिटिश भारत की सीमा पर स्थित गांवो पर धीरे धीरे अधिकार करना आरम्म किया। मप्रज सरकार उस समय घप रही क्योंकि परिस्थिति उसके प्रतिकूल यो। भीमसेन भाने वाली विपत्ति और खतरे का आभास पर रहा था। उसने ब्रिटिश रजीस्ट का समपन और सरसण पाहा । यह मिटिश रजीस्ट से मिल गया। गुप्त मात उस पर प्रकट करने एगा। प्रिटिग रमोहट उसफा मित्र बन गया। भीमसेन थापा यधपि बहुत बडे खतरे का सामना कर रहा था परन्तु उसके इस काय का कोई भी समस्त समयन नहीं कर सकता। मोम सेन थापा मे ब्रिटिश रजीस्ट को यह मी चेतावनी दी कि अक्तूबर में यदि मपाल के महाराजा को यह ज्ञात हमा जि लाहोर पकिंग तया आया क समा धार अनुकूल है तो वह अग्रेजों के विष्ट पुट को घोषणा पर रगा। युद्ध का समय-दल मिटिंग रजोडट को नपाल से सुरन्त निकालबाहर करने के लिए महारामा पर जोर सल रहा था । यद्यपि बिटिग रजीस्ट हाजसन को अपने जीवन का खतरा या किन्तु यह सनिर भी भयमीत न हुआ और काठमाह मे स्टा रहा । मत्रियों में उसके मित्र विश्वासघाती मंनिया ने उसे पतलाया कि महारामा ने अपना एक दूत सिक्किम और आसाम के रास्ते वर्मा भेजा है और वह अत्यन्त गुप्त एस से भारत क उदयपुर जोधपुर, ग्वालियर हैदरापाव मराठों सिस्तों परिंग ( चीनियों ), पुल ( अफगानिस्तान ) तया तेहरान (ईरान) से मप्र जो रे विरद सपि-चर्चा कर रहा है। हाजसन जानता था कि उसकी रक्षा करने के लिय मारत से रोना नहीं आ सकती थी परन्तु उसने यह तनिक भी प्रस्ट नहीं होने दिया कि यह मपनीत है। यह दरबार में उसी महम् और गान के साथ जाता और ध्यवहार करता मानो उसपे पीछे असीम विटिग गक्ति है। उसन सोचा मि पांडे एलको शक्ति को कम करने का एक उपाय यह हो सकता है कि गोरखा सनिकों को अधिक से अधिर अग्रेजी सेना में भरती पिया नापे । उसने अपनी सरकार को रिपा कि हमें सास मगर, सया गुरग जाति के गोरखा धोरों को अधिक से अधिक मस्या में अपनी सेना में भरती करना चाहिये उसका परिणाम यह होगा कि मपाल की सनिक-क्ति कम होगी और नपाल रे सनिश्-वर्ग मे नो राज्यविस्तार की लालसा जागृत हो उठी है और जो नपाली युद्ध परने के लिए सत्पर है वे मर पर जायेंगे। इसफ अतिरिक्त उसने न पाल से मारत और तिम्बत के पाच एष ध्यापारिक मार्ग बनाने की योजना तयार की। उसका परिणाम यह हुआ कि नपाल रा ध्यापार बढ़ा। उसरे उपरान्त उसने नपाल और अवप की सीमा निर्धारण की मोर प्यान दिया। बात यह थी कि १८१६ को सधि के अनुसार तराईमा प्रदेश अषय को ये रिया गपा पिन्तु बाद को भीमसेन थापा को प्रापना पर पश्चिमी तराईम माग पुन नपास को यापस मिल गया पा। इस कारण सोमा निर्धारण आवश्यक हो गया पामपाल के प्रधानमत्री ने यह स्वीकार पर लिया कि अपन अधिकारी अध्यक्षता में एक सीमा-आयोग सीमा निरिण परे जिसम मपास और मवप प्रतिनिपि हों। १८३३ में सोमा निर्धारण पाराय समास हा मोर सभी पो ने उगको सोशर कर लिया। इस प्रकार मालियों द्वारा सीमा अतिक्रमण का एक कारण दूर हो गया। रमोस्ट पिछले कुछ समय से पह प्रयल पर रहा पावि मारत और मपास म य्यापारिप-सपिहो। उसने जो प्रस्ताव रक्या उसशे मौमसे न पापा ने तो स्वीकार कर लिया परन्तु भारत सरकार ने उस अस्वीकार कर दिया। रजोएट हामसन तपा भीमसेन पापा एए दूसरे कमजोरमा गए थे। हाज सन मे भीमसेन पापा को मृत्यु उपरात उसको जसो सुने गादों म प्रसा को पो पर उसरी मौमसेन थापा र प्रति सम्बो ममिम्मक्ति यो। यह स्पष्ट - १५ पा कि यह पिछले वर्षों में भीमसेन । प्राक मौर मित्र बन गया था। 1000 और १८०७२ पूनी सपए और अंग्रेजों के विपर प्रारम्भिर पपत्र वाव नब भी हागरान ने भीमरोन पापा को अन्तिम यों में अपना मित्र पना लिया महाराजा राजेद्रविमाह अपनी ज्येष्ठ महारानी सपा पाह्मणों से प्रोत्साहन पार भीमसेन थापा असतुष्ट होकर मासे मतभेद और विशेष प्रपट करने लगा। जसे-जैसे महाराजा मोर भोममेन रेसबम बिगड़ने लगे बसे ही पसे भीमगेम से दानु परि लोग पड़ी महारानी रे साप अपि यनिष्ठ होते गए। भीमसेन पापात विश्वासघाती होटे माई रणवीरसिर में देखा हिमास्ति प्रास रायमाछा प्रथरार है वहमहारानी तथा पारों से मिलकर पर यंत्र में सम्मिलित हो गया और उसने प्रधान सेनापतिमा पर प्राप्त कर लिया। प्रधान सेनापति पमपर उसने निर्दल किन्तु अहवारी महाराजा को अपने दो माई को पद से हटाकर उसे प्रधानमत्री बनाने को सपार पर लिया। जब भीमसेन पापारे विषय यह सय पात्र पल रहे पे तब पानमनी का मतीमा मापयरसिंह उसकी सहायता और रामघमरे लिए उसके साय हो गया । मापपरमिह मत्पन्त पोर, हाल सेनापति सेना का भरपन्त प्रिय, साहसी प्रमा पगालो मोर मिहोपा पारेपा ने अपनपने प्रधानों को दिला यस यो। उन्होंने अपने पोर और देगाप्रिय पूवा दामोदरको जो रे में प्रतिष्ठा पो उसका उपयोग रिया। पचपि दामोदर पारेको मरे हुए सोस वर्ष से अपिल हो गए थे परन्तु सवसाधारण उसको मूता नहीं था। मपाल का सवसापारण उसी सम्मानपूर पादरता पा। पर परिवार मे महाराजा राजेद्रविक्रम गाह से अपने परिवार को गागोर मौर प्रतिष्णको पुन पापस देने का आपह किया और यह मांग की कि जिरा प्रधानमंत्री ने उनके परिवार को नष्टप्राय पर दिपा उसरो पर से हराया जाय । महाराजा के मामने पर केस को विकल्प थे। उसे भीमसन पापा तथा उसके विपश्यामवालों में एक 'को धुनना पा। फिर भी महाराजा त्रिविसमगाह हिचक रहा था । पद्यपि यह मोमान थापा स पणा करता पा उसका मकना करना चाहता था, किन्तु वह उस भयभीत था। पापारियों ने देला मापवरसिंह पे कारण भीमसेन शक्तिशाली है। उन्होंने मापवरसिंह को भीचे गिराने का प्रयान किया। उस पर यह पोषा रोपण दिया गया कि उसने अपनी विधवा मामी को भ्रष्ट कर दिया उसके साए बलात्कार पिया। हिरामों में यह अक्षम्य माराप पाना जाता पापिन्तु इस होपारोपण को सिद्ध नहीं किया जा सका पोंकि वह भसम्य या फिर मी जिस व्यक्तिम दोषारोपण दिया या उसके विरुद्ध कोई मो माययाही महीं को । १७१२ की सपि के अनुमार १८३७ नपास मे पंचवर्षीय प्रति मिभि मंडल तपा भेंट पकिग को जाती थी। भीमसेनको प्रतिनिषि-मरल में माने वाले लोगों का धनाव करना था। परन्तु इस बार महारामा रामेग्न विक्रममाह मे इस यान पर पल रिया कि यह मधिकार उसका है। अपने अधि कारका मागह परके उसने स्वयं प्रतिनिधि मरल नियुक्त किया। भीम सेम पापापी प्रतिष्ठा को इतना अधिक गिरान पा सो घर साहस न परसरा कि यह उसके ग पार को उसका नेता मनोनीत करता । अस्तु उसने अपने एक -- "..

. चचेरे भाई को उसका नेता मनाया। परत उससे प्रधानमन्त्रीला महत्व और प्रभाव गिरने लगा। प्रधानमत्री र प्रमाय और गति कम होने लगी और पापा परिवार की प्रतिष्ठा का मपन गिरने लगा क्योंकि उस प्रतिनिधि मडल मे उनके विरोधियों को स्थान दिया गया था। ब्राह्मणों न महाराजा पर दवाव गलर अपन एक आदमी को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करवा लिया। पारे परिवारको मागोर, सम्पत्ति तथा प्रतिष्ठा जिसे भीमसेन पापा ने छीन लिया 'था रणमा पारे में महाराजा से पुन प्राप्त करली । गोरखा प्रान्त के गवनर (पासक) पद से मापवरसिंह को हटा दिया गया और दामोदर पांडे पे एक दूसरे पुत्र को गोरसा प्रान्त का गवनर (शासन) नियुक्त किया गया। किन्तु भोमसेन पापा को पद से हटान का साहस नहीं हुआ। महाराजा और अय समी 'लोग उससे मपमौत थे। इस सघष का मुछ समय के उारात नाटकीय ढग से पटाक्षेप हमा । भीमसेन पापा की घोर शत्रु बड़ी महारानी के सबसे छोटे पुत्र की मृत्यु हो गई। पारे परिवार ने यह अफवाह फला बो कि भीमसेन थापा मे परी महारानी को विष कर मार डालने का षड्यन्त्र पिया था किन्तु परपत्र सफल नहीं हुआ । वह विप करके मे पी रिया । राजधानी में इस काण्डको लेकर भूचाल मा गया। पश्यत्र अपनी घरम सीमा पर पहुंच चुका था। रणजग पारे ने महाराजा राजेन्द्रविग्रम कान भरने आरम्म दिए कि यही समय है कि जब भीमसेन पापा पर वार किया जा सकता है। सेना तथा मनता उसका साथ नहीं दगी । महाराजा ने उसरी बात मानकर मीमसेन पापा को प्रधानमन्त्री पद से हटाकर अपमानित पर जेल में डाल दिया । माय घरसिंह को भी कैद कर उसे चाचा रे साप जेल में रख दिया गया । रणजग पारे प्रधानमन्त्री बना । अब यह भीमसेन से बदला लेना चाहता था। भीमसेन के विरट गवाही की गहरत थी । पछि उसरे यिख गवाही प्राप्त करने का प्रपत्नपरने गा । उसने पचों पर अत्याचार करना आरम्न पिया। उनमें से एमपचन अत्याचार से पदड़ाकर स्वीकार किया और मठा बयान दे दिया "कि भीमसेन थापा मे उसको विप देने की माशा री थी। भविष्य में यह अपना बयान म बस सके इस उद्देश्य से उस वद्य को मरवा गला गया । एक दूसरे को गरम लोहे से माये पर जलाया गया रिससे उसका मेगा खुल गया और पाल पर सब ता जलाया गया जब तक कि हड्डी न रिसाई पच्ने सगो । एप नेवारकी छाती में गहरा धीरा लगाया गया । उसको काटा गया परन्तु उस बयाना समयन करनेवाला कोई भी दूसरा व्यक्ति नहीं मिला । महाराजा राजेन्द्रविक्रमनाहास भयकर अत्याचार को देख रहा था किन्तु बोसा नहीं। सासन मे लिखा है कि उस घटना के चार वय उपरांत पारे लोगों ने यह स्वी पार पिया कि भीमसेन पापा पर वह मिप्यारोपण था, उसमें कोई सम्याई महीं महीं पी। जय मीमसेन थापाका परामय हुआ तो उसरे विश्वासघाती माई रणवीरसिंह पापा से भी प्रपान सेनापति के पर से हटाकर सर रिया गया । भव समो राम्प-समचारी मपमौत हो उठे । रणनग परि मे ऐसे सभी मयिारियों को पद से हटा रिया मोर अपमानित रिया मिनको भीमसेन पापा प्रति पोरी भी सहानुभूति थी। उसने उन समो नमोनों को जो कि उसरे पिता के बार तीस वर्षों के भीतर पिना मासगुनारी रे रो पई पो अर्थात गिन .

पर मालगुगारो माफ पी, छीन लिया । उसने सामन्तों और सरारों से जया पस्तो पन पपुलरमा बारम्म रिया । एक एक सामन्त से मस्सी हजार पोर तक जबरदस्ती ऋण वसूस किया गया । चौतरिया सामन्तों ने भभों और महाराजा से विरोध किया । जय महारामा मे देखा कि दरवार रे सभी लोग विरोध कर रहे हैं तो उसने रणजग पांडे को परण्युत पर दिया । अव रपमाप परि प्रपानमन्त्री बना । वह नितान्त प्रमाणहीन और शूग्य पा । छोटो रानी लकमोरवी में हस्तक्षेप रिया और भीमसेन पापा और मापवरसिह को छोर दिया गया। उनके छूटने पर सेना में प्रसन्नता की सहर फेस गई ! सेना ने अपनी प्रसन्नता भोर हप का खूब ही मन किया । महाराजा मे देसा कि रीना पर पापा का यहुत प्रभाव है । मस्त सेना पर से पापा का प्रभाव हटाने के लिए तपा रणजग को संतुष्टरले के लिए महारामा मे रगजग परिको प्रभान सेनापति नियुक्त कर दिया । रणनंग परि मे पापामा सेना पर से प्रमाव समास हो इसका प्रपस्न परना भारम्म कर दिया । मायपरसिंह ने अनुरल अवसर खबर रेप छोड़ दिया । यह लाहौर में महारामा रणजीतसिंह के दरयार में गया । सम्भवत' वह महाराजा रण जीतसिंह को अपने पक्ष में सहायता प्राप्त करने के लिए गया हो परन्तु वह सफल नहीं हुआ । उपर भीमसेन पापा का छोटा माई विश्वासपाती रणबीर सिंह प्रायर्या चत्तस्यदप एक साए की सरह मावास करने चला गया और मोम सेन पापा राजनीति से मलग हो एक नागरिक का जीवन व्यतीत करने लगा। सनको महाराजा राजेन्द्रविक्रमगाह अब मपने प्रमाव होन प्रधानम त्रियों के द्वारा शासन करने का प्रयत्न रते लगा । एक के बाद दूसरा प्रधानमत्री बदलता। १८३९ में महत्त्वामी रणक्षा परि ने पुन प्रपानमत्रित्व को प्राप्त कर लिया । इस भार उसने अपने पुराने शत्रु से भवला सेने का पूरा मि घय किया था । उसने दो पप पहले का विष देने का यमियोग भीमसेम पर पुन चलाया मुण्द्दमे का नाटक पिया गया, और पुन: उस महान् राजनीतिज को जेल में गल दिया गया । भीमसेन पापा को सहलाने की अत्यन्त मम, गंवी, भघरी वापुरहित कोठरी में रक्षा गया। उन कापरों को उस समय भी पह साहस नहीं हुआ कि उसरो मृत्युदण दे देते । रणजग पारे ने दी कि भीमसेन साप ऐसा कर सथा शस और अपमानजनक व्यवहार किया जाये कि यह निराण होकर आत्महत्या करसे । उसी उदय से उसके पास एक कुरकी रख दी गई पो फिर मी मोमसेन दृढ़ता से सहता रहा फिस्तु उसने मारमहरया नहीं को। जब उसके शत्रुओं ने देखा कि वह सब कुछ सहन । करके भी है तो उसके पास यह पयर भेजी कि उसकी पत्नी को भगा करके दिन में काठमांडूपी सरकों पर चलने को विवश किया गया है। इस सयर मे उसके दिल को तोड़ दिया । उसन कुरवी से अपने गले को काट दिया । विम सफ यह सिसकता रहा । २९ शुलाई १८३९ को उसकी मृत्यु हो गई । नपाल एक अत्यन्त बहादुर और राजनीतिमा इस प्रकार शुखद अन्त हुआ । ब्रिटिश रजीस्ट ने अपनी सरकार को जो सूचना भेजी उसका सारांश यह है- "मीमसेन पापा के शव का मग्नि-सस्कार नहीं होने दिया गया । उसके शव के टुकमेटको कर उसका मगर में प्रशन पिया गया और उसके उपरात उसके शव के टकड़ों को नदी के किनारे फेंक दिया गया जहां कुत्तो मौर गिों ने उसको साया। यह आशा दे इस प्रकार नेपाल के उस योग्य वीर और महान शासर का दुखद मन्त हुमा जिसने सोस लम्बे वर्षों तक नेपाल पर किसी नरेश से अधिक प्रभाव पूण शासन दिया। उसको अपने सभी राजनीतिक कार्यों मे जो एकसमान माश्चर्यजनिक सफलता प्राप्त हुई वह उसको कापक्षमता सपा बुद्धिमता के अनुरूप ही अनोखी यो । मैं घतमान मे महाराजा रणजीतसिंह के अतिरिक्त किसी अन्य भारतीय को नहीं जानता जिसकी तुलना मपाल के जनरल भीम सेन पापा से की जा सके।

अध्याय प्राठवा नेपाल को शोचनीय स्थिति और कोट हत्याकांड महाराजा रानेद्रविनमगाह भीमसेन पापा के इस प्रकार मारे जाने से इतना घरहा गया रिवह पिटिन रंजीष्ट रे पास उस गस हत्य की सफाई बने के लिए गया । हानसन ने हरी ढंग से उसरा स्वागत किया मौर पुप रहा व अपिर बात नहीं हो । उसने ब्रिटिश सरकार को अपनी सम्मति लिख भेजी। गवनर-जनरल मावला ने हागरानो सिखा रि उसे अपनी और ब्रिटिश सरकार को इस मृगस हत्या के सम्बन्ध मे मीचे लिषी सम्मति मपाल मरेल तथा सरकार को पतला देनी चाहिए । नपाल सरकार ने राम्प ने योग्य और वीर प्रधानमन्त्री रे साप जसा निर्वयतापूण, मपमानगनक और फर व्यवहार किया है उससे गवनर मनरल के मन में अत्यत पूणा तपा सोम को भावना उत्पन्न हुई है। ब्रिटिन रजीडट मे उस संदेपो जय व्यक्तिगत साक्षातार में महाराजा को पतलाया तो महाराजा रामयिमताह योग भयभीत हुमा धौर उसरा अपने पर से तया जो लोग उसफे पास थे उन पर से विश्वास हिस गया । यह मय प्रधान मत्री रणजग पतिया उसके सनिक दल को शका की दृष्टि से देखने लगा। उपर प्रधानमन्त्री रणजग परि तया उसकी सहायव वडी महारानी सपा मय पुख-समर्थक सहायकों ने अपने उद्दश्य के लिए तयारियां आरम्म परी । रामवीय घोषणा द्वारा मृत प्रधामम श्री भीमसेन थापा तथा उसके परिवारवालों की भूमि तपाजायवार जस्त पाली गई और पिछले पतीस पर्यों में भीमसेन थापा अयवा महारानी त्रिपुरा गुदरी मे यदि किसी से भूमि पी वह मात करली गई । जय महाराजा राजेन्द्रविक्रमगाह रजौरसी से लोटा तो उसको विवश किया गया कि वह उस राज आमा पर हस्ताक्षर करे कि जिसके द्वारा समस्त पापा जाति को सात पीढ़ी तक राज्य के किसी पर को प्राप्त करने भयवा राग्य की नौररी कर सपने के अधिकार सेवचितपर दिया गया था। रणजग पाटे समझ गया कि महारामा उसको मोर से तया उसके बत की भोर से उशसीन होने लगा है। अतएव उसने यह मावश्यक सममा हिपहनपाल को अंग्रेजों से यूर करने की मोति को स्वीकार करवा रे। उसने नेपाल को सैनिक गतिनी एक मुठी गणना करवाई और यह बतलाया कि देश में चार साप्त प्रशिक्षित सनिर है। उसने अस्त्र-शस्त्र तया गोला पाव यमाने के लिए एक बहुत बड़ा कारखाना स्थापित किया। उसके उपरान्त उसने ७० ब्राह्मणों की भविष्यवाणी का देश मे सूब प्रचार किया कि गौन ही भारत में अनओं को सत्ता और शक्ति का अन्त हो जायेगा । फिर भी वे लोग महाराजा को पुट की नीति को स्वीकार करन के लिये तयार न कर सके। महारानी तया रणजग पारे यह नान गए थे ब्रिटिश रजीस्ट उनके विरुद्ध है और महा राजा उससे भयमीत और प्रभावित है अतएव उहोंने उसके विषस पश्यत्र कर उसे अपमानित कर निकालने को युक्ति सोची। हाजसन भीमसेन थापा का व्यक्तिगत मित्र ही नहीं था परन् यह युद्ध विरोधी दल का समपक मौर सहा पफ मी या । अस्तु उसको दृष्टि में हाजसन को हटाना आवश्यक या। बड़ी महारानी तथा रणनग पांडे ने बहुत प्रयत्न किया कि हाजसन महला तपादर धार के पस्यों मे फस जाये न्सुि हाजसन सतक तया विवेकशील था। यह परयार तथा महलों के षस्यत्रों में नहीं फसा । रणमग पाडे के प्रभाव के कारण भीमसेन के परामव के उपरान्त पहने हो सीमा पर छटपुट घुसपठ होने लगी थी। अब रणजग पारे के प्रपानमत्रित्व मे सीमा पर अधिक सक्रियता हो गई। नपाल के सनिफों मे रामनगर पर आक्रमण किया और उसको लूटा। ब्रिटिश रैजीस्ट हामसन ने मांग की कि नपाल सरकार हर्जाना दे, रामनगर से तुरन्त हट जावे और गवनर-जनरल से क्षमा याचना करे। परी महारानी तथा रण जग पारे न ऐसा पायत्र दिया कि बिना उनके उस दुरमिसधि में लिप्त हए विटिश रजीस्ट को हत्या करदो जाये । २१ जून १८४० को काठमाह में सेना को परेर युलाई गई और उन्हें यह आमा सुनाई गई कि भारत सरकार को माजा से उनका घेतन कम कर दिया जायेगा । रानिक सुग्ध होर मिटिश रजोस्ट के निवासस्थान रजीसी की ओर कूच कर गए। वहां पहपकर उनका कोष कुछ मद पड़ा क्योंकि हाजसन नपाल फेसनिक वर्ग में विशेष प्रिय था। कर सनिकों ने यहां जारर कानाफूसी की और विचार विमर्श कर यह निश्चय किया कि इतने बड़े अधिकारी के विषय कुछ पायवाही करने के पूर्व महाराजा से माता ले लनी चाहिए । अस्तु वे महल की ओर गए। महारानी ने इससे पहले ही रामपानी छोर दी थी और यह राजधानी रे बाहर चली गई थी। महाराजा स्वय घबरा गया विन्तु फिर भी उसने महल से बाहर निकलकर सनिकों से कहा कि उनका वेतन इसलिपे पटाया जा रहा है कि उन्हें मारत पर माक्रमण करने के लिये धन पाहिए । महाराभा मे यह कह कर भपकर भूस पो । यात यह थी कि पिछले योस वर्षों से सनिकों को पुर करने को नहीं मिला था। ये युट और लूट के लिए छटपटा रहे थे। उनके नेताओं ने कहा कि सपना और पटना पर आक्रमण पिया जाये और मपाल राज्य की सीमा का गगा रे सट तर विस्तार दिया जाये । परन्तु पहले उन्हे रमोरसी पर माफ- मण करना चाहिए और रजीस्ट को समाप्त करना चाहिए । परन्तु जब उहोंने यह मांग की कि उन्हे रमीट को मारने की माशा प्रदान की जापे तोमहाराजा का सारस महीं हमारमोस्ट ने महाराजा से कहताया कि उसे इस परपत्र तो पहले से ही सदर पो और उसकी सूचना मैंने मपास से एक संदेशवाहक के साय भारत को मिमवा दी। इस पल्पत्र को सूचना मन मपाल से निकसार भारतरे मवानों मे पहुँष की है । शीघ्र यह सूचना पलस्त्ता पहुँच जापेगी। इसका परिणाम यह हुआ कि यह पाया असफल हो गया। सारमारसैर पवनर-जनरल अप योखला रहा ! उसने जोरट को मामा रोकियह मपाल सरकार से पहे कि वह रामनगर से सुरम्त अपने सनिकों पोटाले अपपा भारत सरकार उनको हटा देगी। साप ही वह जपाल सरकार से यह मांग परे मिपुर-समर्थ दल को सता और अधिकार से हटा दिया जाये। विटिगरमोरट हालसन ने मपास सरपार को भस्टी मेटम दिया कि वह तुरन्त रामनगर से अपने रामपर सनिरों को हटाले और पुर-समययों को पद से हटा दे। नपाल र दरयार में इस पुनौती को लकर घोर मतमेव था। पो महारानी मे रामनगर से सुरत चुपचाप अपने सनिरों को हटा लिया। परन्तु जहाँ तप पुख-समर्थक दल को सता से हटाने हा प्रश्न पा रवार मे घोर मात भेद पा । हाजसन मे उचित अवसर रेखकर इस बार जोर दिया कि प्रधान मत्री रणनग परिको हटा दिया जावे। मिटिला रोस्ट को मपाल के अब हनी मामले में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं पा परन्तु कूटनीतिश अंग्रेजों की यह मोति यो मिजबकि राम्य की स्थिति खराब हो तो कुछ रे। प्रोहियों और विश्वासघातियों को साय सेवर राज्य की स्वातत्रता को समास पर दिया जाये । भारत रेरायों के साथ उहोंने यही किया था और वे उसकी पुनरावृत्ति मपाल मे भी करना चाहते थे। हामसन को इस प्रकार को मांग करने का कोई अधिकार नहीं था परन्तु उसे मपाल के एक दरबारी रस मा समर्थन प्राप्त था। हाजसन को धमकी का परिणाम यह हुआ कि रणनंग पारो हटा रिया गया और एक चौतरिया प्रधानमत्री बना । उसको अपि कान ब्राह्मणा भूस्वामियों का समपन प्राप्त था जो कि राज्य की अस्त-व्यस्त दगा से ऊब गए थे। राजा ने अपने मत्रि-मण्डल मे देवल उन्हीं लोगों को सिया जो नेपाल और भारत में मत्री के समपक थे और उसने मत्रिमण्डलको सूची हानसन को स्वीकृति के लिए भेमी । एक प्रसर से बिटिगरीरट हाज सन मपाल राज्य का अभिभावक मन गया । नपाल का महाराजा उसकी स्वी कृति से मनि-मण्डल घुनने पर विवा हो गया । जय नपास को रामनोति में ब्रिटिश रजीस्ट हाजसन प्रमाव इतना अधिक बढ़ गया तो उसको विरो पिनी ज्येष्ठ महारानी ने स्याग दिया अथवा या कहना चाहिए कि उसे रेल को छोड़कर जाने पर विवश किया गया। महारानी दे। छोरकर पाशीवास करने चली गई । महाराजा राजेन्द्रविक्रमगह इस सारी घटना से भयभीत और सापक हो उठा । उसे अपनी सुरक्षा का खतरा विमा बने लगा। एक प्रकार से रिटिश रजोरेट उस समय मपाल का सर्वेसर्वा बन गया था। महाराणा भी पपराकर रेप छोबर महारानी के पीछे-पीछे शाशीषास के लिए चल पड़ा। अंग्रेज गवर्नर-जनरल इस सारी घटना से भयमीत हो उठा । यह मानता था कि महाराजा को रवाकर नेपाल में सब कुछ करवाया जा सकता है। महाराजा पोमार मे अपज अपना स्वार्थ सिद्ध कर सकते हैं परन्तु महाराजा के न होने पर नपाल में स्थिति भयावह हो उठेगी और अप्रजों को लम्मा पुर करना होगा। अंग्रेज मपाल की सनिष-क्तिको जानते थे इस कारण गवर्मर जनरल ने महाराजा और महारानी को भारत में आने कामाशा-पत्र (पासपोर्ट) देना अस्वीकार कर दिया। उसने हाजसम को आशा की कि वह महाराजा को गम छोरमे के लिये समनाने को कहा । इस पर महाराजा और महा रानो रामपानी को लौट पाए । काठमाह में महारानी का यमूतपूर्व स्वागत हा। जनता मे उसके लौटने पर अपूर्व हर्ष प्रकट किया। इसका परिणाम पह हाकिमपीन मशि-मण्डल के विरुय जनता में रोष उत्पन्न हो गया। मैपाली 6 यह सोचते पे कि नयीन मनि-मण्डल में महारानी को विवश किया कि यह देश एमाग करते। सवसाधारण की सहानुभूति का महारानी ने अपनी स्वार्य सिद्धि के लिए उपयोग करना चाहा | समको योजना यह थी कि महारामा पासन करने व समोय हैं, वे अस्पात निघल और मुखिहीन हैं । अतएव उनको सिंहा सन से उतारकर अपने पुत्र को राज्यसिंहासन पर बाये और स्वम अमि भावर शासिका पनकर मेपाल पर शासन करे। परन्तु उसका यह प्रयत्न विफल हो गया। उसको योजना के असफल हो जाने पर उसे अपनी सुरक्षा को आशका हो गई। अतएष वह एक बार पुन काली की ओर चल पडी । परन्तु इस धार तराईमपकर पवर से वह पीरिस हो गई और ६ अक्तूबर १८४१ को उसकी मृत्यु हो गई। महाराना की मृत्यु के साथ हो पुट समयक इस की मागायें तिरो हित होगई पोंकि महारानी मराठा सरदारों, सिक्खों राजपूत राजाओं और अफगान के अमौर से भयमों के विरुद्ध मुटपेडने क सबध में पत्र-व्यवहार कर रही पी और यह अग्रेजों के विरुद्ध एक सगठित मोर्चा बनाने का प्रयत्न कर यही हो । उसक मरते हा यह आदि अप्रेजोंग उन शत्रुओं को मपाल को सहायता मिल सकसी समाप्त हो गई और पुर समय दल गतिहीन हो गया। अब मपाल को नोति एकदम बदल गई। महाराजा ने अपज गव मर जनरस को सिखा कि वह अपनी सेनाओं को थफगानिस्तान और पर्मा के विष्य अंग्रेजों की सहायता के लिए भेजने को तयार है । यद्यपि अंग्रेजों ने मपाल की इस सनिक-सहायता को स्वीकार नहीं दिया परन्तु उससे भावी अग्रेजों मोर नपाल की मिन्नतारा आरम्म हा मारम्म में अग्रेजो रे मन मे नपाल की ओर से चोरी शका थी परन्तु १८५७ में अब भारत में अप्रेमी घासन को उलटकर स्वतप्रताप्राह करने के लिए सशस्त्र क्रान्ति हुई उस समय मसमपाल ने अंग्रेजों को सहायता की तो अपनों को नपाल पर पका विश्वास है यद्यपि मपास की बाहरी राजनीति में बहुत अधिक अन्तर मा गया पा पर मनजों की घोर शाबड़ी महारानी मर चुकी थी और पुर-समपक बल शक्तिहीन होकर विघटित होना था किन्तुनपाती प्रान्तरित राजनीति में कोई मन्तर नहीं आपापा । मी महारानो रे मरने के उपरान्त उसका पुत्र राज्य का उत्तरा पिकारी यना । महाराजकुमार सुरेन्द्रको छोटो महारानी से अपनी रक्षा करने के लिए सतत समय करना पा रहा था। छोटी महारानी पड़ी महारानी की मृत्यु के उपरान्त दाक्तिमासी हो गई थी। उसने वही महारानी का स्थान से लिया था और उसरा नियय था कि उसका पुत्र मपाल २ रामसिहासन पर अपने पिता या बठेगा। महो कारण पाkि महाराजकुमार सुरेत को अपने जीवन की रक्षा के लिए मतक रहना पड़ता था। छोरी महारानी का पहना पा कि महारामकुमार सुरेश नियस मस्तिता और शासन करने के मयोग्य है। एक दो पटनाए ऐमो हर जिममे महाराजा और महाराजकुमार मुरेन्द्र के मारे में लोगों की यह मावना छ हो गई कि वह पासन करने के योग्य नहीं है। एप अत्यन्त मनोरना पटना पटो जिसके फलस्वरूप महाराना मौर महारामकुमार रेगरी प्रतिष्ठा कम हो गई। मारत में एक समाचार - पत्र में यह समाचार प्रकाशित हुमा किपड़ी महारानी को जहा पर मार गला गया। महारामा राजेन्द्रविन माह सपर से इतना कर मा कि पर तुरत रेगोरसो गया और यह मांग की कि उस परनाम रनेवाले प्यक्तिको मृत्युदरा दिया माये। उन दिनों एगे महारानी की मृत्यु के कारण दरवार में शोर पाानो ऐ दिनों मघोड़े पर पटना वजित था । अतएव महा राजा और महाराजकुमार दो वृट म्पत्तियों से र्षों काठी पर मठकर रजोरसी पहुंचे। बोप मे मरे हुए महाराजा ने हासन से कहा 'पयनर जन एरोहिए कि उन्हे उस आरमोजिसने यह बात सिसी है मुझे देना हो होगा। मैं उसकी जिदा साल सिंघयाऊगा और मरन तक उस पर गमक और नीयू रगहवामगा । गश्नर मनरल से वह दोमिए कि यदि वह व्यक्ति हमारे सुपुर महीं पर दिया जाता तो नपाल मौर अंपगी सरकार मे पुर होगा। महारामकुमार सुरंद्र को अपने पिता रे इस व्यवहार से क्षोम हुमा और उसने हस्तक्षेप पिया। महाराभा बोप में मरा पा । वह महाराजकुमार पर झपटा। दोनों में पूसों की लड़ाई होने लगी। एड़ते हुए गेनों अपने मानवीय पोहा पर से गिर पड़े और रेजीसीने फाटय समीप लड़क गए । पुत्र ने पिता को पराजित पर रिया और उसे रजोस्ट से अपो व्यवहार के लिए क्षमा मांगने पर दिया पिया । पुछ समय के उपरान्त पुन पुत्र को अपने पिता को ताडना देनी पड़ी। उसने अपने पिता को दिवा किया कि वह रजीसी में विरिण मारसरे निवासी कापीनाप को, जिसने यहां शरण ली थी उसको केंद परे । उस समय रामा एक सेना लेकर रजोउसो गया । रंजीरट हामसन फाटक पर राजा से मिलने आया । रामा मे मागीनाप को उनके सुपुर्द कर देने रेमिएए। रजीस्ट ने रसापूर्वक उसकी मांग को मस्योकार कर दिया । इस पर राजा मे दौडार काशोनाप को पकड़ना पाहा। रजौडेट ने उस व्यापारी को चिपटा लिया और तेजी से राजा से कहा कि तुम हम दोनों को कर कर सक्ते हो । में उसको अकेले कद नहीं होने दूगा। राजा का यह साहस मही हमा कि वह धोनों को कर करता। महाराजकुमार सुरेश अपने पिता से पहले मामह परता रहा कि उसको कर कर लिया जाये और पाप को उसने पिता पू से मारे । परन्तु पिता पा साहस नहीं हुआ कि वह उन दोनों को कर करता । जबकि यह भगमा पल रहा था तो हालसन के मित्र चौतरिया उसके फान मे पहत पे कि तुम पय और हदसा से काम लो, सब ठीक हो जायेगा। सब कुछ तुम पर निर्भर करता है। समी घर्ग के लोग महारामा से कब गए पे और मपाल को स्पिति ठीक नहीं थी। हाजसन मपाल शामन में परिवतन के पक्ष मे था फिन्तु उसी समय लाई मापसेर ने अपने पद से अवकाश ले लिया और साई ऐलमयरो उसके स्थान पर गवनर-जनरल यना ।हानसन के विषय यह बात तो स्वय सिद्ध पी रिवहनपाल के माम्सरिक मामलों में बहुत हस्तक्षेप करता था। मस्तु उसने पहले सो उसे मपाल से वापस बुलाने की माशा मिकाल वो परन्तु उच्च अधिकारियों की सलाह मानकर उसने उसे पापस तो नहीं बुलाया परन्तु उसा अधिकारों को बहुत अधिक सीमित पर रिया और मपाल के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेर म परने की माशा दी। मी महारानी के मरने पर महाराजकुमार सुरेश मे अपनी माता का स्यान ले लिया। वह भी अंग्रेगों का घोर विरोधी था । मब हामधन नपास - के मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। महाराजकुमार मनमानी करता पा वह अपने पिता को भी परवाह न करवे मनमाने हग से काम करता था । राज कान मे महाराजा का कोई दखल नहीं था। राजकुमार उस पर और उसकी प्रजा पर अत्याचार करता था। १८४२ में सामत लोग तया सवसाधारण विद्रोही हो उठ । लोगों का कहना था कि ये यो स्वामियों भी माशा नहीं मान सकते। उन्होंने ऐसे-ऐसे बहुत से उदाहरण दिए जिनमे पिता की भाशा मानने पर पुत्र ने उन्हें दण्ड दिया और पिता उसका प्रतिकार नहीं कर सका । महाराजकुमार प्रजा पर मो अत्याचार करता लोगों को अपमानित करता उनको दर देता महारामा उनम से एक का मी प्रतिकार परन मे असमर्थ था। अस मे समी वर्ग और दस एक हो गए और उहाँने महाराजा को शासन-अधिकार छोड़ने पर विवश किया। महाराजा ने शासन-अधिकार छोड़ दिए । अव गासन अधिकार छोटो महारानी लक्ष्मी देवी को प्राप्त हुए। ५ जनवरी १८४३ को रामे द्रविक्रमशाह ने अपनी प्रभुसत्ता छोटी महारानी को सौंप दी। राज्य के प्रमुख अधिकारियों के सामने महाराजा धिराज ने घोषणा की 'आप सबों को ज्ञात होना चाहिए कि यह राजामा और हमारी इच्छा है और प्रसन्नता है कि माज से आप लोग महारानी लक्ष्मी देवी (राज्य लक्ष्मी देवी) को माना माने । वे हो नपाल को अधीश्वरो होंगी । उन्हें प्राणदण्ड जीवनदान निपुत्ति और बरखास्तगी का शाही परिवार के लोगों को छोड़कर सभी पर अधिकार होगा । ये युद्ध और सधि कर सकेंगी। हम निष्ठा के साप वचन देते हैं कि हम बिना उनकी सहमति और आज्ञा के कुछ नहीं महारानी लक्ष्मी देवी घोर महत्वाकांक्षी स्त्री थी। उसका कोई सिांत नहीं था । वह पांडे और चौतरियों को विरोयो यो और पापा परिवार की मित्र पो। उसको अपने शत्रुओं पडे परिवार और उनका सहायक अपने सौतेले पुत्र महाराजकुमार को समाप्त परने का अवसर मिल गया। शासन अधिकार हाय में आते हो उसन गीघ्रता से काय किया और राप-म्यवस्या में यकायक परिवतन हुआ । प्रधानमन्त्री भीमसेन पापा का निर्वासित मतीना मापवरसिंह मपानराठमाडू मे प्रगट हुमा । सेना और जनता मे हय और उल्लास के साय उसका स्वागत किया। मायवरसिंह अत्यन्त सुन्दर आक्षक और मध्य प्यक्तित्व पापीर पुरप पा । वह गिमला में मप्रजों को पेंशन पर रहता पा। छोटो महारानी २ सकेप पर ही यह आया पा । मायवरसिंह रे पदाद होते हो एक्यार फिर नसाल दरयार में घिर यहा और दरयारियों ने इघिर मे स्नान पिया । छोटो महारानी और महारामा ने मायपरसिंह को पारे परिवार का समूल नारनेरी एट्रो ३ दी जिससे कि आगे चलकर उसे कोई कठि- नाईम हो । पह संहार पड़ी सतरंता से किया गया । परे लोगों का पपरिया गया । वे स्वप मपनी कुरुगेको तेग पर लाते थे जिससे उनरे गले साफ रट बाय अपि रष्ट न हो । रणजग पाडे तो प्राकृतिाप से ही मरणासन्न पा जब यह वयस्यस पर लाया गया। उसके अतिरिक्त कुरवान पारे पुवराई परि वो विवासपाती पापा इनवीर और रगम, सयापनसिंह मारत न्यायापी जिसने यिना मुकदमा सुने हो भीमसेन पापा फो मृत्युराण दिपा पाने सिर काट रिए गए । गोदमान पाररीकी नाक और होठ काट रिए -पए तपा बसराम बसनत को मारु काट दी गई । इसरे पदसे में मापारसिंह . ७५ को उन चौतरिया मत्रियों पो समाप्त करना या जिन्हें महाराजा और महारानी पूणापीरष्टि से रखते थे। १८४३ में सि पय पांडे पप हुआ उसी पप मेम हाजसन रिटायर हो गया और हैनरी लारस उसपे स्थान पर ग्रिटिश रमोस्ट यता । उसो वर्ष मापयरसिंह नपाल रा प्रधानमत्रो घना । वास्तय म मायपरसिंह बहुत ही साहसी और मायाकांक्षी हो गया । सभी यह नपाल लौटा और अपने राज्य के शासन को यागमेर को उसने अपने शय म ले लिया । भीमसेन पापापी जैसी दुखद मृत्यु हई उसे देखते कोई अप व्यक्ति मपाल पापस भापर उसका प्रधानमत्री बनने साहस नहीं परता । वह अपने मतीने अगवहादुरपु परको साप साया पा । जगबहादुरकु पर उसके साथ उसकी रोया में था। दो वर्षों तक चाचा और मतीजे ने नपाल सरकार का निवेगन महाराजा के उत्तराधिकारी महाराजकुमार मुरेद्रविक्रम शासन रे अधीन पिया । सय सफ महाराजा राजेन्द्रविनमगाह मे प्रशासनिक अधिकार महाराज कुमार को सौंप दिए थे। पास्तविक स्थिति यह पी वि पिता और दोनों ही पाठमांडूरेय दरवार हाल में साथ बठते थे। यहां अधिकारियों और मंत्रियों को प्रापनाए सुनते और निर्णय दसे थे। औपचारिक रूप से घे निणप महाराजा के होते पे परन्तु वास्तव मे ये होते पुत्र के थे। जगबहादुर दरबार में साधारण पोक में उपस्थित होता पा । पिता अरय त निबल और प्रास निक योग्यता की दृष्टि स निपम्मा था । महारामकुमार विलासी, परित्रहीन या जिसमें मतिक्ता की बहुत कमी पो । महारानी मे मापदर सिंह पापा को इस कारण प्रधानमन्त्री बनाया था पोंकि उसको धारणा पो यह कहे अनु सार काय करेगा और इस प्रकार उसफा शासन पर गहरा प्रभाष होगा। उसकी यह मातरिक मामिलापा पो निमहाराजकुमार सुरेन्द्र विक्रम का मैपाल राजसिंहासन पर अधिकार अस्वीकार कर दिया जाय और उसका पुष मपाल के राजसिंहासन का उत्तराधिकारो स्योकार दिया जाय । परन्तु मापवरसिंह पापा ने उसको स्वीकार नहीं दिया । म तो भये प्रधानमन्त्री को यह स्वीकार था कि महाराजकुमार सुरेद्रयिक्रम को राजसिंहासन से उत्तराधिकारी होने से पचित किया जाये और न पह महारानी के पुत्र को उत्तराधिकारी स्वीकार किए जाने के पक्ष में पा । यही नहीं प्रधानमत्री मापवरसिंह पापा ने महा राजकुमार सुरेन्द्रविक्रम रे साप अपना घनिष्ट सम्पप स्थापित कर लिया और उसका समर्षर मौर सहायक बन गया । महाराजकुमार सुरेशविक्रम महारानी का घोर विरोपो और शत्रु पा तया उसके मतोजे जगवहादुर को मृत्पुरण दिलानेवाला पा । यति मायवरसिह महारानी के कहे अनुसार माधरण परता सो उस को महारानी के पत्रुओं की हत्या में सहायक तो अवश्य ही होना प्रता। महाराजा निमल पासक हो पाप नकारी महारानी मिसका एक प्रेमी हो, और महाराजा और महारानी का विरोधी प्रधानमंत्री हो तो उसका परिणाम यही हो सकता पा कि नपास के महलों में फिर एक बार अधिर-स्नान हो । जाम महारानी मायमरसिंह को अपनी इच्छा के अनुसार काप करने के लिए राजी म कर सको तो उसने यह निश्चय कर लिया कि उसके स्थान पर ऐसे व्यक्ति को लाया जाय जो उसके कहे अनुसार काम करे। गगनसिंह की माग्यता थी कि वही ऐसा व्यक्ति है कि जो महारानी की इच्छाओं को सकता है । अतएव यह यह चाहता था कि किसी प्रकार मी मापयरसिंह पापा को हटाकर यह प्रधानमन्त्री यन आये । अतएष वह ऐसे किसी पडयन्त्र में सम्मिलित होने को तयार या जो मायवरसिंह को हटाने के लिए किया जाने पाला हो। उसने महारानी को सलाह दी रि यह महाराजा से कहे कि मायवर सिंह महाराजा को अपने पुत्र महाराजकुमार सुरेद्रविक्रम के पक्ष मे सिंहासन छोड़ने के लिए विवा करने का पठ्यत्र रच रहा है। यही नहीं उसरी योजना का देवल प्रयम घरण सुरेद्रविक्रम को राजसिंहासन पर बिठाना है। उसके उपरांत वह स्वय राजसिंहासन हयियाकर राजवा से समाप्त पर दना चाहता है । उसको अपने पति महाराजा राजेद्रविक्रम को इस बात के लिए सपार कर लेना चाहिए कि वह इस खतरनार प्रधानमन्त्री को मृत्युदण्ड की आज्ञा दे दे । महा रानी ने महाराजा को मायमरसिंह के लिए मृत्युदण्ड की आशा वने के लिए राजी पर लिपा । महारानी तया गगनसिंह की योजना यह थी कि प्रधानमत्री के समाप्त होते ही सारी गति उन दोनों रेहायों मे मा जावेगी । परन्तु प्रश्न यह था कि मापबरसिंह की हत्या कोन परे । महारानी और महाराजा ने इस कृत्य के लिए जगवहादुर को चुना। उन दोनों ने जगयहादुर को अपने चाचा की हत्या करने के लिए पर्यो चना, यह कहना कठिन है । साप हो यह कहना भी कठिन है कि उहें यह कसे अनुमान हुआ कि जगवहादुर इस गाय कोपरने के लिए तयार हो आवेगा। महाराजा ने जगवहादुर को दुला मेजा और उसे अपने चाचा को मारने की मामा यो । साय हो यह धमकी भी दी कि यदि वह इस कार्य को करना अस्वी कार करेगा तो उसको मरवा दिया जायेगा । महाराजा मे जगवहादुर से कहा कि नो मी हो मायवरसिंह की मृत्यु निश्चित है उसको जोषित नहीं रहने दिया जा सकता। वगवहादुर अपने चाचा की हत्या के लिए तुरन्त तयार हो गया । १७ मई १८४५ को महाराजा ने प्रधानमत्री को महारानी रे महला में बुला मेगा । महाराजा ने स्वय अपने हायों से भरी हुई बंदूक जगबहादुर हाप में पराई और उस पर पी आर म छिप रहने के लिए कहा । उसके साप हो गगनसिंह तया कामी पुलमानसिंह थापा भी परे को आर में छिप गए । से हो माथवरसिंह कमरे में घुसा जगवहादुरसिंह ने गोली मारदी और यह मर पर महारानी रे चरणों में गिर परा | उररे गवमो पिरको से बाहर फेर दिया गया । उRT उपरान्त उस गयो सड़कों पर घसीटा गया और पशुपतिनाय से जाया गया । भगवहादुर ने अपन दो भाइयों उदीप और बमबहादुर को शीघ्र बुरा भेजा और उनसे मापयरसिंह र दोरों लटों को नपाल की घाटी के मुदूर गांव में जाकर उहें भारत मेन (मादा रिया । महारानी रोवल मायवरमिट योमरयाररहो सतोप नहीं हुआ। वह उन सभी को मरवा देना पाहतो पो जो उसरीप्तीदा अर्यात अपने पुरोगासरे रानसिंहासन पर यटान का पिरोप परते थे । मायबरसिंह का स्थान पलपरनेवाला पोई नहीं था। बात यह पो कि मास में सब एपमत नहीं ये frfrसरी प्रधानमन्त्री बनाया जारे और कोई भी उस पदरे लिए गया परने का साहस नहीं पर रहा था । महाराजा मौर महारानी की सम्मति से जगवार गासन काय घनान सगा। उसोई वधानिए स्पिति मही पी पोंकि उसे प्रधानमत्री नियुक्त नहीं दिया गया था। महारानी अपने प्रेमी और अपने पुत्रों ने निक्ष गगनसिंहको प्रधानमन्त्री पनामा चाहती थी। महाराजा गगनसिंह को प्रधानमत्री पनान सतरे को जानता पा । मातु उसने गगनसिंह को प्रधानमत्री यनाना स्वीकार नहीं पिया।निराश और हसाला होपर उसने चौतरिया फसहगार को युला भेगा। परन्तु उसको महाराजा महारानी के रोपने शरण प्रधानमत्री बनाने का साहस मर सपा । यह गगनांसह दो पिसी प्रकार मो प्रधानमत्री मनाने के लिए तयार नपा। यह फतहनगरे द्वारा महारानी के प्रेमी गगनसिंह को मरवा गलना चाहता था। सनि चयन पर सपनारण उसने एक ऐसा समझौता स्वीकार रिया जिसरी रिसोई भी माराज गरो । प्रधानमत्री पदरे लिए चार प्रार्थी ये मि विभिन्न दलों का समयन प्रास या उसने उन पारों से हो प्रपाम सेमा पति नियुक्त कर दिया । गगनसिंह रे अधीन सात रजीमेंट, पतहनग, जग पहादुर, और अमिमानसिह में से प्रत्येक के अधीन तीन-तीन रमीमेंट रस्तो गई । फतहह्मग पे अधिकारों और शक्ति को पम परके उसे प्रधानमन्त्री बमाया गया। शेष तीनों प्रमा उसरे यार अधिकारी पे। फतहजए और अभिमानसिंह महारावे मारमी पे गगनासह महारानी रामादमी या, और सपरो मधिप माय की बात यह थी रिसय नंगवहादुर महाराजकुमार का मावमो पा । राजनीति में कर पोई रिसो का मित्र पोर पात्र होता है यह पहना कठिन है । नाल में तो यह रहा और भी कठिन था। फतहनग प्रधानमत्री यमा । परन्तु जगरहादुरकी सेना को भाए निक ढग से प्रनिपिस करने और उसके अनुशासन में सुधार करने का काय सौंपा गया।मगबहादुर सनिर्मों का प्रिय और स्वाभाविप नेता पा । उसे उसका मनचाहा पाप मिस गया । भगवहादुर को सेना के सुपार का कार्य सौपकर महारानी तथा भय तीनों ने भयकर मूल को । उहोंने यह महों सोचा कि जगवहादुर सनिकों का आदमी है व सेना में सर्वप्रिय है। उसमें सेना का भाधुनिकरण करने का काम सौंपकर वे उसकी गति को पढ़ा रहे है। १८४५ में सिक्स सेनाओं में सतलज नदी पार की और मप्रेगों से पुरणि गया । महारामा रणजीतसिंह मर धुके पे भोर परस्पर सहनेवाले सेनापति गक्तिवान पे। लाहौर दरयार ने नपास से सरायता मांगी । मपाल की काउसिल में यह प्रश्न विचाराप उपस्थित हुमा । फसहाग और अभिमान सिंह ने महाराजा सलाह दी कि यह सालसा (सिक्खों) की सहायता करे । जगबहादुर और गगनसिंह में उसका विरोध किया । जगबहादुर पंजाव में रहा पा। सिकवारे बारे में उसकी पारणा ची महाँ पो । उसने अग्रेज सेना के बारे में और अग्रेज सनिक अफसरों रे बारे में जो कुछ सुमा पा उससे यह अंग्रेजों से अधिक प्रभावित पा । मालाम पुटरे सेनानी अमरसिंह ने जो कुछ मनजों के बारे में कहा था और महान राजनीतिश भीमसेन थापा मे अंग्रेजों के बारे में जो कुछ पहा पा जगबहादुर मूला नहीं पा । महाराजा और महारानी ने बीच का मार्ग अपनाया । उहोंने सिप घरदार से कहता भेजा कि जसे हो वहलो के क्लि पर सिरसों की विजय होगी नपाल को सनिक -सहायता पहच जायेगी । परन्तु शीघ्र ही सियों को पराजय हो गई और भपात को इस सम्पप में कोई निर्णय करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। मगरहादुर यो हो सावधानी से खतरनाक माग का अवलम्बन कर रहा था । यद्यपि अपने धाचा मापयरसिंह से मांति वह महाराजकुमार सुरे द्रविक्रम के पक्ष में आ गया था परतु यह महारानी और उसके प्रेमी गगनसिंह गिविर में भी अपना एक कदम रखता था । यद्यपि यह माग खतरनाक पा किन्तु उसने बरी चतुराई से उसको नियाहा । मपाल मे ह्या करना साधारण बात थी। जिस प्रकार सवसाया रण क्षाने और पीने के अभ्यस्त होते हैं उसी प्रकार नपाल में राजनतिक हत्यायें एक साधारण-सी बात पी । प्रत्येक महत्वपूर्ण व्यक्ति को खतरा था कि यह दिन उसका अतिम दिन हो सकता है । जगबहादुर इतना शक्तिशाली या दि कोई उस पर पुले रूप में आक्रमण नहीं कर सकता था । परतु बहुत से उसको गुप्त स्प से मार डालने इन्टुफ थे । अस्तु वह जहां भी जाता अपने भरोसे के वीर अगरक्षकों को साप रखता यहां तक कि यह शिकार में भी मगरक्षकों को साथ ले जाता । १२ सितयर १८४६ को महाराजा राजेद्रविक्रम ने अपने दो पुत्रों सुरेद्रविक्रम और उपद्रविक्रम को आना दी कि वे महारानी के नीच वारे प्रमी गगनसिंह को मारपर राजघराने पर लगी हुई इस कालिमा को यो डालें। गगनसिंह आरम्म में राजदरवार में एक एसीदार था। उसकी प्रेयसी महारानी मे उसे जनरत और प्रधान सेनापति बना दिया। उपेन्द्रको अब महारामा मे प्रधान सेनापति को मारने की आज्ञा दी तो उस काप को गुरुता रे भार से दबकर यह प्रधानमन्त्री से सलाह करने गया । फतहना ने अपने सहयोगी ममिमानसिंह तया काउसित क पांडे सदस्य धीरक्निोर से सलाह को मौर उहाँने उपेन्द्र को यह सलाह दी कि वह गगनसिंह को मारने के लिए किसी को किराये पर सपार करे । उसकारण या कि उपेत्र ममी सडका पा और सुरेद्रवियम सनको और निबल पा । उहोंने महाराजकुमारों के लिए एक पाह्मण लाल मा तयार पर दिया । यो दिन पश्चात् लाल झा ने गगनसिंह के मकान के पास से एक दूसरे मान की छत पर से, जय गगनसिंह पूजा कर रहा था उसे गोली से मार दिया। पुष लोगों का मानना यह है कि जगबहादुर मे ही वास्तव में गगनसिंह को मरवाया था । महारानी ने नव अपन प्रमो की हत्या का समाचार सुना तो यह कोप से जल उटी । सुरन्त हो वह अपने प्रमी रे मकान पर गई और उसकी सोनों विपदा स्त्रियों को उसने उसरी चिता पर सती होने से मना कर दिया। वह नहीं चाहती थी यि उसरी चिता पर सती होर उसकी विधिवत पम परनी होने का दावा परें। उसके उपरान्त उसने सभी मुख्य ५ राज्य अधिषा रियों को कोट में बुला मेमा । भगवहादुर मग्नी तीनों रजीमैंटों के साथ वहाँ गया । साप हो पर भपने सभी माइयों और सम्बधियों को भी सायल गया। उसरे पास मपने घर को एक सेना हो गई। पाटदि में होने के कारण वह सबसे पहले अपनी सेना के साप पटवा । महारानी इससे मारान हुई मोर उतनी सेना लाने सपारण पूछा। धतुर जगवरापुर ने न केवल उसरे मय पौर दाराशेही दूरपर दिप यरन उसते एक माना पर हतासर मोरया लिए जिससे उसने अन्य समी सेनापतियों को बोट में अपनी सेना साने के लिए मनापरवा रिपापा । तर तर जगवहार सनियों में चोट की इमारत को पेर लिया। अमएब उस समय पहो जगवार ही सवारिसमान पन पामगबहादुर मे अपनी मुसि मे मपने रानी प्रतिनियों सेहो महों अपनी मित्र-महारामीको भी मनारदिया । सभी सनिफ सपा सिविल अधिकारी बोट म पहुँचन लगे । महारानी पोप में इसनी अधिक मरी हुई पी रिवह पोई पातपोत परन लिए तैयार न थी। वह तो पेवल अपन प्रमीको मृत्युका पहला लेना पाहतो पी। जय लोग मोट में कई हो गए तो उसने अपनी अगुती परि मोर गिोरी ओर उठारारि यह हत्यारा है और उसन अभिमानसित मागा दी कि उस कदर लिया जावे। अमिमामसिंह मे परे धीरपितोर को परर लिया । पीरनिगोर मे साहस और तेजो क साप इस अपराध को अरपोर लिया। महारानी की परियों से भी यह मही रा और उसने अपरापी स्वीपरपरन से साफ मना कर दिया । कोप से महारानी की मा लाल हो रही पौ । उसन भमिमानसिंह रो भागा दी कि यह कही पोरगिोरा उसी पान पर सरपाट। महारामा राजेन्द्रविक्रम में हस्तक्षेप किया कि बिना मुगदमे रे प्राणरण नहीं दिया जा सकता । अमिमानसिंह ने भी इस शिखांत प्रतिपावन दिया । महाराजा घमड़ा गया। वह महारानी से भयमीत पा । मस्तु यह महाना यनापर बाहर निास गया और पोरे पर सवार होपर तेजी से प्रधामनी पतहजग वे मकान पर पहचा। उसने प्रधान मत्रीको कोट जाने का मार दिया । प्रधानमंत्री को कोट भेजकर पह भप्रेग रजीस्सो में गरण (सुरक्षा प्राप्त करने के लिए गया । मिटिश रजीस्ट रा मातरिक मामले में पता मही पाहना था । अस्तु उसमे महाराजा राजेन्द्र विग्राम से मिलना अस्वीकार कर दिया । निरा होकर वह फिर कोट लौट कर माया । यहाँ बापर उसन रसा शिफाटप सपा नालियों में घिर पर रहा है तो वह फिर वापस फाग रे भगन से चला गया । उस समय कोट में नामहापुर की स्थिति समसे अधिक मजबूत पी पयोंकि उसकी सेना और उसके शास्त्र सवो यहां मौजूद थे। वह यह कहता पा कि अमिमानसिंह म गगनसिंह की हत्या परयाई । अस्तु जसे हो फतहनग अवर पाया, उसन उसे रोका और रहा किया तो मोरग्निोर और अभिमानसिह को मृत्युदण्ड वेमा होगा अथवा महारानी सोकरना होगा। उस समय तक महारानो रो यह ज्ञात हो गया पानि अंसा में चाहती हूँ सारी बात उसी तरह नहीं हो रही और उसकी मावान लोगों से मुनाई मीरे रहो १ साप ही अपनी सुरक्षा का प्यारो पर महलों पर चली गई और खिड़की से बारकर उसने उत्तजित मोरोला और उसन घोलकर फतह जग से पूछा कि यह बतलाए कि हत्या रिसन पी है। फतहनगम चिल्लार कहा कि यह जानने में समय लगेगा । जगबहादुर केसान में पतहजग में पीरे से कहा कि उसको भी यही राय है कि महारानी को करना चाहिए । किन्तु उसमो कब करने का यह समय अनुकस समय नहीं था। इस पर कर महारानी बौसलाई हुई नीचे उतर आई और उसने मोर को धीरफर अपने हाप में तस्वार लकर मोरकिशोर को स्वयं मार गलना चाहा । मेक्नि मग यहाइर मे धतुराई से बिना महारानी को मारान किए उसे वीरसिंगार को मारने से रोक दिया। स्थिति उस समय अगवहादुर हाप में वी । पहजो पाहे कर सकता था किन्तु यह उस समय महारानी को माराम नहीं करना पाहता पा पयोंकि वह महारानी का उपयोग करना चाहता था। अब उसके पास यह सूचना भाई कि अमिमानसिंह मौर फतहनग शाह बिना उसको पूछे और विश्वास में लिए परामर्श कर रहे हैं । वह तुरन्त समझ गया । जोना घडपर महारानी के पास गया और उससे वारा किया कि मभिमानसिंह के सनिक उस समयकों को पराभूत पर उसको कर करने के लिए आ रहे हैं । क्या यह तुरत अमिमानसिंह को कद करने की आज्ञा देगी? महारानी ने अमिमानसिंह को कर फरने की आज्ञा दे दी।जसे हो मनिमानसिंह मपने सनिकों से जिन्हें उसने बुला भेजा पा मिसन के लिए जान लगा सो सतरी ने उसे रोका । अमिमानसिंह न पूछा कि किसरी आजा से तुम मुझे रोक रहे हो ? संसरो ने कहा कि महारानी ने काजी जगबहादुर रे द्वारा उसे रोकन की माशा दी है। अमिमानसिंह न स्थिति को समझ लिया और उसन सतरी को हटारर निफ्तना चाहा । सतरियों के नायक ने उसको रोका तो वह कोपित हो उठा । पह सुनकर कि अमिमानसिंह उसरी याना की अवहेलना करना चाहता है महान रक्षकों को माता दी कि यदि अमिमानसिंह जबरदस्ती निकलना चाह सो वे अपन गरों को काम मे लायें । पह हर चल हो एा था कि जनरल अभिमानसिंह राणा बहुत उसे जित और मर हो गए । सतरी भी उत्तजित हो उठा । उसन पदूक उठा भी और अनिमानसिंह को छाती में अपनी विच घमेट दी। अमिमानसिंह मर्मान्तक पीगर कारण गिर गया । जब यह मरने लगा तब उसन चिल्लार कहा मि स्वयं भगवहादुर मे गगनसिंह की हत्या की है । फतहनग के सबसे बड़े सारे सरविक्म ने पह सुनार चिल्लाकर कहा कि जगबहादुर रोहम सबको पोसा दिया और विधामपात शिया है । अस्त सभी को उसके साथ मिलकर मावायरता हो तो अपना जीवन उत्सर्ग परन + लिए तयार हो जाना चाहिए। जगवहादुर क छोटे भाई पृष्ण ने उससे मुरयर करने और धूप रहने को कहा। खरकन उसी पर अपनी तस्वार में मार दिया। वृष्ण ने हाय से पार से बचाया फिन्तु उसका भाग ट गया । परक न दूसरा पार परने लिए अपनी तयार उठाई ।परतु जगरहार के दूसरे माई न हस्त क्षेप किया और उसरे सर पर गहरा घाव लगा । जगवहादर का तीसरा भाई धीरतमोर जो सलवार घराने में प्रसिद्ध पा, पास हो था। तब तक उसने अरनो ततधार (सोरा) निकाल लो यो । एक बार में ही उसन परफपिक्रम के दो टकरार दिए । सब योर समाटा छा गया। जगवहादुर पतहजग के पास गया और कहा कि सरवविक्रम ने मरापुर रिया पा। पिता से उस रियो भूल जान और क्षमा फर इन के लिए रहा। उससे यात न कर फतहजग तया अप मत्री महारानी रे पास दौर। नगरहादुर न उनै रोका और कहा कि गगनसिंह को मृत्यु के मामले म वह मवपा निर्दोष है । परनु नाजग उस पर द रिमा और यह भपने सायो पत्रिों के साथ महारानी के पास आने लिए आगे बढ़ने लगा। जगाहार ने उस नौन (सीहियों) को रतारे लिये जो रक्षर सनिर नियुक्त लिए पे उस मायक न माशासनिक न गोलियां चला दी और सीमों मत्री मरर गिर गए। शोर विगार प्रांगण मे एर ओर पर पर जगवहार में पाये भाई उदीपको ए धौतरिया मार रहा था। मगबहादुर के माई असाप भान थे। सारण उन विरोधी अनजाने में वारपरने हो। दमादुर और ष्ण में जय देशा पिउना माई उदीप सतरे मे है तो उन्होंने अपनी तस्पार निरास ली और ये अपम माई को सहायता के लिए भरटे और चौत रिया परागापोर रिया। फतहनगरमाई म जब देखा कि उसका माई प्रधानमत्री मारा गया तो उसने पिल्लातरमहा कि राजपूत एमी पोट नहीं दिखाते भामो हम परियों से यदला लें। प्रत्येर घ्यक्ति न जो भी अस्त्र उसके हाथ में यापासार पार परमा मारम्भर दिया । जगमहार को मोर पुछ लोग आपटे । उसी समय यफायर जगयहादुर की सेना को एक कम्पनी बाहर से उस प्रांगण में पस भाई और जो भी जगवरादुर मात्र उसके सामन आए उनका सफाया कर दिया। धौतरिया भय के मारे दीवार पे साय यन हुए मकानों में घुस गए अयवा उनकी दीवारों पर पड़ गए। उस समय भयकर मरसहार हुआ ।सरों पीसस्पा मे सामत, उच्च अधिकारी इस माम-परस में मारे गये। उसी समय महाराजा राजेद्रपिसम रंजीसी से निराश होकर वापस आया और उसने फाटक तथा मालियों से घिर बहते हुए देखा और लौट गया । इरा भयपर हत्याकोर मे फतहनग, परागप्रम अमिमानसिंह मत्री दलबदानसिंह पारे पर पुटका वीर रणदुर थापा मारे गए। मगयहादुर म फतहमग के माई से जान बचाई और उससे सुर सित बाहर निकाल दिया। जब यह पुट घल रहा पा और रुधिर यह रहा पा तो उस समय नगयहादुर महारानी को रक्षाय उसके समीप ही खा रहा । महारानी मे उसी समय उसको प्रधानमत्री और प्रधान सेनापति पद पर नियुक्त पर दिया। जब वह भयर पाकर समाप्त हो गया तो महारानी ने महा राजकुमार सुरेन्द्रविक्रम को मुलाया जिससे वह इतमा भयमीस हो गया कि वह भी अपने पिता साय बनारस घले जाने को यात सोचने लगा किन्त जग यहादुर महाराजकुमार से अपनी मुट्ठी से बाहर नहीं जान देना चाहता था। यह महारामामार से मिला और उसको सममाया कि उसके सारे शत्रु मारेला चुके है और वह उसकी रक्षा करेगा । यस्तु उसे नपाल छोरपर नहीं जाना चाहिए। सुरक्षा का आश्वासन पाकर महाराजकुमार सुरेशविक्रम काठमांडू में ही व्हरारा। अव सुरेद्रविक्रम जगयहादुर के हाथ परी पठपुतली था। यह उसका उपयोग भयानक महारानी के विरोधी के रूप में करना चाहता था। महारामकुमार सुरेद्रविक्रम और उपे विक्रम की महारानी से रक्षा रे लिए जंगवहावर ने अपने विश्वस्त सनिकों की टुकड़ियों को उनके मकानों पर मियत कर दिया। महारामी यह पमकी दे रही थी कि यदि महाराजा ने उसके पुत्र रानेद्रो सिंहासन पर नहीं बठाया तो ऐसा भयानक हत्याकार होगा कि जिसके सामा कोट-हत्याफार मगग्य हो जायेगा। जय महाराजा राजेद्रविक्रम ने सुना कि फतहमग मारा गया तो वह उसके मकान से हनुमामघोक महल चला आया जहां महारानी भी माई थी। हनुमानघोर महल मे जगवहादुर नये प्रधानमन्त्री के रूप मे उसका अमि वादन करने पहुँचा । जय महाराजा ने पूछा कि यह हत्याफार पिसकी माना से तो उसने सारा दोष स्वयं महाराजा पर माल दिया। उसने कहा महा राज, यह सब महारानी की आज्ञा से हुआ जिनको आपने महाराजा के संपूर्ण अधिकार दिए थे। महाराजा चुप हो गया। - - - महाराजा राजेन्द्रविक्रम इतना घबडा गया और भयभीत हो गया कि यह काठमांडू छोड़कर पाटन चला गया और वहां से कागो जाने की सया रियां करने लगा। अब सारी सत्ता जाबहादुर के हाथ मे आगई थी। उसने पूरी तरह अपनी ससा को अपुण्ण बनाने के लिए तेजी मे शाम पिया। जो भो सामत और अखे अधिकारी जन हत्या में मारे गए थे या जो भाग गए थे, उनके परिवार को उसने देश से निर्वासित कर दिया और भामा दे दी कि यदि ये फिर मी नपाल मे यापस आए तो उनको मृत्युषण रिया जावेगा। जबकि वार्षिक पजनी समारोह हुआ और सघ पर और अधिकार राजा को समर्पित कर दिए गए सो उसने ऐसे एक् मी अधिकारी को पुन नियुक्त महीं होने दिया जिसमे उसको यह आएका यी कि वह उसका विरोध करेगा। उनके स्थान पर उसने अपने समयको नियुक्त करवाया । उसने अपने माइयां और समापियों को सभी महत्वपून राजमतिक पदों पर तिरधिमा । जगबहादुर ने मदान में एक शिाल सनिक परेड काई भोर उसने स्वय सावजनिए घोषणा की कि में मपाला प्रधानमत्री और प्रधान सेनापति है। १८४६ मे उसने अपने लिए और अपने बालों के लिए गौरवपूर्ण रामा उपाधि धारण हो । महाराजा ने उसको सया उसके बाजों को 'राणा की गौरवमयी उपाधि प्रदान को यो । अब जगबहादुर राणा भगवरार हो गया। उसरी भक्ति और सत्ता अपरिमित यो । नाममात्र को यह केवर प्रधानमत्री था। वास्तव में यही नपाला स्वामी और गासक यन गया। विटिस जोस्ट हैनरी हारम ने इस सम्बध म कहा था कि यह कौन विभास करेगा कि जिस देश के राजदरवार मे आए दिन रुधिर-स्नान होता हो यहां क सोग बिना उतनना और शांति के रहते हैं। मपाल मे जहाँ रामदरबार में यह घटनाए घट रही थी सव-साधारण गांतिपूर्वक थे।

अध्याय नवा -- राणा शासन की स्थापना- राणा जगबहादुर १७४२ में अब पृश्वीनारायनगाह न अपने स्वर्गीय पिता का राह सरकार पर गोरसा म पोस्रोताल को वापस सौटा तो उसके साथ उसका मुख्यमत्रो महिरामकु पर था जो पास जाति का पा । अहिराम पर पहाड़ी राजपूत था । हिरामकुकर का पुत्र रामकृष्ण था जो पृथ्वीनारायनहरा अत्यन्त विश्वासपाय साहसी और वोर सेनापति या मिसने धोोसा और पासिा राज्यों को विजप पिया। रामकृष्ण का पुन रणजीसायर मी प्रपने पिता की मांति हो योर और साहसी था । उसने कांगग और यटौली के पुर्वी में महत पराक्रम प्रदगित दिया था और पा रनाया था । रणजीत पर के सोम पुर पे । ज्येष्ठ पुत्र यलनारसिंहकु वर पा निसने औरयहार को परवार मे ही मार गला था जबकि उसो अपने सौतेले माई महाराजा रणवहादुर को १८०७ में भरे दरबार में अपनी सरकार से काद राता था । उसरे फलस्वरूप यसनारसिंहहु पर की परमार म यहत अधिक प्रतिष्ठा मढ़ ग पो । यसको महारामारे सामने अपनी दास ले गान का अधिकार प्राश हुमा और उससे चा-परम्परागत काजी (मयो) की उपाधि प्रत हुई । पारसिंह ने प्रधानमत्री भीमसेन पापा को मनोनी से विवाह दिया। उससे पसनारसिंह क सात पुत्र हुए । जंगबहादुर उसका दूसरा पुत्र पा। वह १८ जून १८१७ रो पदा हा । उसके माता पिता न उसका माम विरनारािह रमया या किन्तु उस पाचा मायवरसिंह रे कहने पर उसका नाम जगवहादुर रखा गया ।जगवहादुर उमी अपने चाचा मापदरसिंह के साय Her में काठमांडू पापस होता। जगबहादुरसिंह के यचपन को बहन-सी कहानियां प्रसित है । उसका पिता काशी बसनारमिह उत्तर पश्चिमी जिले का सनिक कमांडर पा । इस कारण जगयहादुर तथा उसके मारों को बचपन में राठमांडू (राजधानी) से पूर रहना पड़ा। जगवहादुर के मय छह माई बमवहादुर वीनरसिह कृष्णबहादुर राजा उदीपसिंह जगतशमशेर और घोररामर थे। जगरहादुर साहसौ चौर पयवान परिस्थिति के अनुसार साधन पुटानेवाला सिदातहीन व्यक्ति पा । इन गुणों रे साय उसमें स्नेह और ममता नहीं पी और वह एकान्तप्रिय पा । उसके विचार मरने थे वह अपने रिवारों को किसी पर प्रक्ट नहीं करता था। दूसरों में मतभेद और वमनस्य उत्पन्न करान में उमे प्रसन्नता होती थी। यद्यपि यह दुबला पा परन्तु यह बहुत फुर्तीला और शक्तिशाली या । सब मिलाकर ४ मह बहस सन्दर नहीं था किन्तु उसके चेहरे से गौय मोरहता धमरती थी। उसक स्वमाय म कठोर प्रशासन की जमजात कठोरता यी । यह पाय में तनिक भी टोलवाल पसद नहीं करता था। थोड़ी मो मूल होने पर प्रद हो उठता था और पय पोदता था। यह तनिक भो पिरोप सहन नहीं कर सक्ता था । वह गिक्षित नहीं था यह कहना चाहिए कि वह अगिक्षित पा। परन्तु सप्तार के घटना की यह जानकारी रखता था । इङ्गलर और भारत के समाचार पत्रों को यह पदभार सुनता था वह बहुत मितव्यपी और सादा पा । शान-गौरत मे धन ध्यय नहीं करता था । वह एक यहादुर सनिक था। उसको दिनचर्या बहुत अनिश्चित पी । कनी बहुत जल्दा उठ जाता, तो मी पाहत घर से उठना । इसी प्रकार उमक सोने का समय भी निश्चित नहीं था। जगबहादुर अब सेना में भर्ती हुआ तो उसका अपने अधिकारियों से मग हो होता रहा तभी उसको जानते थे कि वह मनुशासन मे नहीं रह सकता क्योंकि यह एर प्रतिप्रित घराने (कानो परिवार) का पुत्र पाइस कारण सभी अधिकारी उसको नानते थे। उसको अनुशासनहीनताको चर्चा काठमांडू में सपा होती थी । उसका पिता भी अपने इस स्वत प्रताधिप स्वच्छन्द पुष को अकुरा में महीं रख सकता था। यह स्वारया। किसी कायदे कानून को नहीं मानता था। उसका कामून स्यय उसकी इच्छा भो । वर परिणाम की चिता नर मनमाने काय करता था। परन्तु सेना में साधारण निफा यह प्रिय और विश्वासपात्र मा साधारण सनिष उसी प्रतिष्ठा करते थे । महमपाल सेना क कायदों और नियमों की अवहेलना करता था अपने से उच्च अधिकारियों की मामा उल्लंपन परता था, परन्तु फिर भी उसका व्यक्तित्व सा प्रभावशाली और भापक पानि सनि उसको चाहते थे। यह एक साहसो गतान या यह घोर सुभारी था और जीवन भर जुमा खेरता रहा । सनिरों का पिय नेता और पिन्बासपात्र पापह एक अस्पन्तकात शिकारी पाल और सिय इल पिकारी के नाते उसरी कौति समो पर विदित पो। १८३७ में पर भीमसेन थापाका पतन हुआ तो पसनारसिंह और TAN पुरारय-मेया से निकाल रिए गए क्योंकि यह पापा परिवार थे। भगवहादुर ने सोचा कि वह अपना जीवन-पापन तथा जुए के ऋण को पकाने के लिए तराई में हाथियों को पकान राराम रेगा । मस्तु वह सराई के भगलों म पसा गर । परन्तु आर्थिक दृष्टि से यह नितान्त असफल रहा भाग्य पाउसफो सेना में पुन सोम वापस बुला लिया गया भौर उसी जीवन- पापन प्रश्न हल हो गया। हायियों से उसे विरोप लगाव था । ये उसके भारपण का देश । हाधियों में पारने म उसो धतुराई और गति काम मासी पौ। एए बार काठमाह में एक हापो मस्त हो गया । बम हापी मस्त हो जाता है तो वह परयन्त भयावह हो भाता है। अनुमयी महावत रस अस्पायी मस्ती के चिह परमानते हैं मोर पस्त होन पुष हो उसरे परों से शोहरी मोटो सोहे को मनोरों से बांध हते हैं। उस मस्त हापो ने मपने महावत से मार mei पा और यह पाम से भपकर बोतार रसा गांवों की ओर माग गया भोर वहां उसने सभी को मौतर दिया । होई उससे पुन पाने का साहस महों परतापास जंगबहादुरको यह सवर मिसो तोवह मोला उसोपान गया बहहापो प्रतिदिन एक ही रात से माता पामीर उसी क्षेत्र में किसापारमा पहाता जातातोएगांव के पास निरमवाया।

नगयहापुर ने शाही महावत को पास हो पाएने की मामा दो और सड़क के पास एप पेट पर पदार उसको पालों पर हायो की प्रतीक्षा करता रहा । जब पागल हायी उस नीचे से निपला तो वह धीरे से उसरी गवन परपूर पठा। हाथी मम उसको मीच फॅक धने के लिए प्रयत्न करने एगा । अंगमहा दुररे लिए यह जीवन-मरण सघय मा । यदि हायो उसको अपनी गवम पर से फेंक दने मे सफल हो जाता सो फिर उसनरी मृत्यु निश्रित पो । पिन्तु नगयहादुर बोंक दो तरह घिपट गया । साहो महावत दोग और उसने हापी की एक टांग म सोहे भी नजीर गलकर उसे पैर से योष रिया । जगवहादुर मे फिर पेर की गल को पकड़ लिया और पेट पर से उतर गया। भगवहादुर जसे सारसी और महरवासी युवक के लिए मपास को छोटी-सी सेना में विशेष उन्नति के लिए अवसर नहीं पा । अस्तु उसने सेना छोर दी। उसने पिना भवकाही अवफा से लिया । परि लोगों को दृष्टि उस पर थी । उसो पतरनाक व्यक्ति मानते थे। अस्त उसने देश ही छोड़ दिया मौर लाहोर पसा गया । लाहौर में उसने क्या पिया और यह पिस उदश्य से गया यह महीं कहा जा सकता । यदि उस उदय महाराजा रणजीतसिंह को अपनों के विरुख उमारना या तो यह अमफल रहा यदि उसका उदृश्य उसकी सेना मे कोई उच पर प्राप्त परना पा सो भी यह सफल म हुमा । लाहौर में सफल न होने से उसरी आधिप दा गिर गई। उसके पास रापन गय समास हो गया तो बिना पिसी हिचक के वह नपाल मापा और अपनी सेना मे हामिर हो गया। नपाल सेना में उसे कोई दर नहीं दिया गया परन उसकी पोनति हो गई। उसके पिता पामो यलनार को भी बेस से मुक्त कर दिया गया । नपाल सेना के अधिकारियों ने सोचा कि सिम्य सेना में रहकर नगवहादुर मवीन रण-कौशल की शिक्षा सकर लौटा है। जगबहादुर मे लौटने पर पाया कि यह बड़े ही मनुकूल समय पर लोटा है क्योंकि उसी समय महारानी ने उसफ पाचा मायबरसिंह को वापस पुला भेजा था । मायवरसिंह को महारानी नेरा के सर्वोच्च पर (प्रधानमंत्री) पर नियुक्त पिया था । पश्यत्रों के बीच माथवरसिंह प्रधानमत्री यना पा । उसको एक विश्वासपात्र सहायक की भावग्यकता थी। उसने अपने मतीने जग बहादुर को मो साहसी, वोर और विधारवाला था अपना सहायक भुना । भगवहादुर ने एक बार फिर सेना को छोराऔर मपने चाचा के साय फाठमांडू आ गया । आरम्म में जगवहादुर अधिक सक्रिय नहीं हुमा । वह केवल मपाल की राजनीति को दस और परस रहा था। जगबहादर के प्रारम्भिक यूटनीतिर अनुमव मधिक सुखद नहीं थे। मापवरसिंह थापा अप्रेमों से प्रसन्न नहीं था । उसने अंग्रजी पम्पनी की शक्ति का सही अवाज नहीं लगाया। मायवरसिह पुन सिक्किम, गढ़वाल और कुमायू को सेना पाहता पा तया भवान के उत्तरी भाग को हरपना चाहता था । लाहौर-दरवार रणनीसिह मो अंग्रेजों पर भाक्रमग करना चाहता पा और क्योंकि मायमरसिंह का लाहौर-चरवार से परिचय पा अस्तु सिक्स राय और मपाल में अग्रजों के विरुण पुरमिसपि परने लगी। सिक्ख मतिनिधि माल बनारस पहुंचा और मायवरसिह ने जगमहावर को उससे बात करने के लिए भेजा। नपाल सरकार सपा सिपस एक बार सभी स्वतन्त्र शासाों को संगठित कर अप्रेजों को देश से निकालबाहर करना चाहते । बनारस में सभी मिलकर,यप्रेम, विरोधी अभियानको योजना बनाना चाहते थे।धनारस के स्थानीय अग्रज अधिकारी महत सतर थे। उहोंने नपाली मिशन तया सिक्ख प्रतिनिधि-माल को मिलने ही नहीं दिया। विवश होकर जगवहादुर तमा नगली मिलन को लौटना पड़ा। गवनर जनरल ने मपाली मिशन को बनारस सुरन्त छोड देने को आमा दी और सिक्ख मिगन को सम्मान के साथ लाहौर के लिए विदा कर दिया गया।नपाल सया सिक्कों का पश्यत्र सफल न हो सका। जगवहादुर काठमांडू लौटकर पुन फौज मे काम करने लगा। महा राजा बुद्धिहीन और शासन मे प्रभावशाली हस्तक्षेप करने के अयोग्य था। वह या की राजनीति में प्रभावहीन था। महारानी थापा परिवार की मित्र पौ। उसका मित्र और प्रेमी गगनसिंह प्रधानमत्री के प्रभाव को सरह की दृष्टि से रखता था और उससे ईर्षा करता था। महाराजकुमार सुरेद्रविक्रम पहले को भांति पा समर्थक और जिद्दी था। जगवहादुरसिंह परिस्थितिवश माप वरसिंह का आवमी पा। महाराजपुमार सुरेद्र जगवहादुर की यढ़ती हुई शक्ति को देखकर ई करता था और उसको अपना शत्रु मानता था । यदि जगवहा दुरसिंह सावधान और सतर्क नहीं रहता तो उसके जीवन का अन्त शीघ्र ही हो जाता । सुरेन्द्रविक्रम उसको मार डालना चाहता था। यह उसको गहरी पूणा से वखता था। एक बार जगवहादुर महाराजकुमार सुरेन्द्रविक्रम के साथ घोड़े पर सवार चल रहा था। वर्षा रे दिन थे सभी नदी नालों में मयर बाद मा रही पो तो ये एक मयर नाले के समीप आए मिस पर सफड़ो का पुल पा। उस पर केवल दो लकड़ोस्ट पड़े थे। सुरेद्रविक्रम ने अपने मगर क्षक जगवहादुर को उन लट्ठों के पुल को पार करने की आशा दो । मगरहा दुर आगे बढ़ा । जव महारामकुमार सुरेद्रविक्रम ने बता दि यह उस भयकर जल-पारा में गिरकर पार निकल जावेगा तो उसने माशा दी कि वह पीय से ही लौट आवे । भयपर खतरा था। तनिक भी विचलित होने पर उसका अन्त समीप था । परतु जगवहारसिंह यत्यन्त कुगल अपारोहो था। नेपाल में उससे अच्छा कोई अवारोही नहीं या। उसने घोड़े दापर उसका मुंह पीछे को मोड़ दिया और उसने माथ यौच से पीछ को मोर पुल पार कर दिया। महारामकुमार सुरेद्रविधमसिंह का यह चार सालो गया। उसके कुछ समय उपरान्त महाराजकुमार सुरेन्द्रविधमसिंह ने महा राजा से मगवहादुर को कुए मे फिक्यार मार गलने की आज्ञा प्राप्त काली। उसने अगवहादुरसिंह पर कोई सूठा दोषारोपण किया। उस मूटे दोषारोपण रे पास्वाप भगवहादुर को मृत्युदण्ड दिया गया। मापवरसिह मे अपने भतीजे को बचाने कामोई प्रयत्न नहीं दिया। यह भी सम्भव है कि वह विवाहो इस स्थिति में म हो कि उसको सहायता पर सस्ता । भागबहादुरसिंहको सम्मवत मानेवाली विपत्ति का अनुमान था। उसने राटमार के समीरों का अध्ययन पिया । उहें घस पर रखा और उनमें पदने अभ्यास पिया । यह हो सकता है कि उसने उस कुए को ही पसर किया हो मिसे वह मलोमांति जानता या भयवा उसने अपनी मृत्यु । यह तरी स्वीकार पिया पोरि उससे बघ निकलने को सम्मावना पो । मो मो हो जसको कुए में फंगर मार गसने की आशा र गई । नब बग बहादुरसिंह हुए पर सापा गपा भिसमें फेंककर यह मारा जानेवासा पा तो उसने दखा वि महारागामार तथा उसके अंगरक्षक यादि उसकी मृत्यु रेपने लिए एपित हैं । जगबहादुरसिंह ने महारामकुमार से प्रायना से कि उसे पुर में कार अपमानित न किया जाये । वह स्वय हो उममें कूद पड़ेगा। महाराजमार ने अपनी उदारता प्रगिल परने के लिए उसे स्वप ने को मामा रो। मगवहावर कुए मर गया । दशक लोग अपने-अपने स्मामों को लौट गए। जव जगवहावर एक धार पामीर अपर आया तो उसने कये की होवारक निकल हुए पत्थरों को ढ़ता से परह लिया और पानी की तेजी से पह उसको पर रहकर अपने को ड्रयने से पचाए रख सका । रात्रि परन पर उसके मिय आए और उन्होंने रस्सी स्टकारी । जगबहादुर उस रस्सी के सहारे ऊपर आ गया। ये से मिलते ही उसने मारामार छोर दिया। वह मनात पास म चला गया और अनुपूरा अवसर की प्रतीक्षा म छिपा रहा । वह उस समय प्रकट होना चाहता पा जब पापा-यग का प्रभाय बहुत अधिक हो और महारामकुमार प्रमावहीन हो जायें। कुछ समय के उपरान्त अनुपूल अब सर दसगर वह अपने गुप्त स्थान से निस्लपर प्रकट हो गया । ऐसो परिस्थितियों मे जवकि गबहादुरसिंह को सय सरफ से खतरा पा और चारों ओर से गात्रों से घिरा हुआ था तो यदि यह स्वमान से सहिष्णु और गान्त व्यक्ति होता तो भी उसका शांत और सहिष्ण पने रहना सम्मय नहीं पा । परन्तु जगवहादुर जस असहिष्ण और स्वच्छद प्रकृति के व्यक्ति को इन परिस्थितियों ने उसे और स मशात और कठोर धमा दिया । यदि वह चाहता तो काठमांडू को जहां पश्यत्र हत्या तया एपिर स्नान भाए दिन को यात पी छोड़ कर अपने पतृक गृह को जा सकता था। पदि यह ऐसा करता और भविष्य मे कमो पांडे शक्तिशाली हो जाते तो उसके सम्पूर्ण परिवार का विमाश अवश्यम्भावो पा । उसको पतरा होते हुए भी उसे उस खतरनाक स्थिति में रहना था। पदि यह राजनीति को तिलांजलि देकर पाठमांडू छोड़ वसा तो उसकी मृत्यु और परिवार का विना अवश्यम्भावी था। जगवहादुर राणा जगयहादुर राणा मे जब नपात का गासम-सूत्र सम्हाला तो उसके उपरान्त मपाल का इतिहास उसर जीवनकाल में वास्तव में उसका व्यक्तिगत इतिहास बन गया। यह सर्वगतिमान था परन्तु वह स्वप अपना परामर्शदाता पा । वह किसी से परामश करके कोई काम नहीं करता था। जगबहादुर राणा का अब तक का जीवम-वृत्तान्त उसके चरित्र को कोई महत उज्ज्यल रूप में प्रकट नहीं करता । उसने अपने उस पापा को जिसने उसको भागे मढ़ाया मार गा। लोग कह सकते हैं कि महाराजा क क्रोध के भय से और अपने जामस को रक्षा के लिए उसने अपने चाचा को मारना स्वीकार कर लिया। परन्तु भगवहादुर ऐसा कापर नहीं था कि वह महाराजा के मय से ऐसा जघय कार्य करता । उसने कोट हत्याकार द्वारा नेपाल में अपनी सत्ता को स्मापित किया चा यह कार भी उसके पश को बढ़ानेवाला महीं था। रोट-हत्याकांड के सम्बन्ध मे राणा जगवहादुर की मृत्यु पयन्त यह माम्यता थी कि उसका एकमात्र कारण महारानी का उच्छ खत और वीमत्स आचरण था । परन्तु विचारवाम प्यक्तियों को मान्यता थी कि उसने अपनी सता स्थापित करन के लिए ऐसा किया था। ܨܪ ta 1 महारानी उस समय मी नपाल को नासिका (रिजेंट) थी । हनुमानधोक महल से यह नासिका के अधिकारों का प्रयोग करती थी। काठ मांडू मे जगवहादुर के कठोर और शासन के कारण कुछ दिनों तक गान्ति हो । मववि उसका अमागा पति महाराजा राजे द्रविक्रम पानी-यात्रारे लिए प्रस्थान परने ही वाला था उसन एक बार फिर प्रहार क्यिा । महाराजा का स्वामिभक्त सेवक भवानीसिंह मो अपने स्वामी के पास हायी पर बठा पा महा र नो की आज्ञा से मार डाला गया । काठमांडू मे आता और भय छा गया। राणा जगवहादुर ने सेना को सजग और सतक रवसा क्योंकि यह मपाल को घाटी को एक दूसरे भयकर थिर-स्नान से यचाना चाहता था। महारानी को अब भी विश्वास था कि राणा जगवहादुर उसके कहे अनुसार करेगा अतएव वह उस पर विश्वास करती थी । उसने राणा जगबहादुर से अनवरत मांग करना आरम्म करवी कि महाराजकुमार सुरेन्द्र तथा उसके भाई को मारकर उसरे पुत्र को रामसिंहासन पर बठाया आये । राणा जगबहादुर से जय भो वह इस सम्बंध में बात करती तो यह मम्रतापूषक उसमे विचार से अपना मतभेद प्रकट करता । बात यह थी कि राणा जगबहादुर मानता था कि महा रानी अत्यत मयकर है । यदि उसको पराभूत नहीं किया गया तो वह उसके लिए खतरनाक हो गयेगी। अस्तु यह मो कारण या कि उसने उसकी इच्छा को पूरा नहीं दिया । यदि महाराणा राजे द्रविमम सनकी और बुद्धिहीन था सो महारामो राक्षसी स्यमाव को पो । राणा जगबहादुर ने धीरे धीरे महारानी के त्यों तथा पस्यों के प्रमाण इक्ट करना आरम्म स्मिा और उस रक्त की प्यासी महारानी को गतिको समाप्त रने की योजना सयार करली । एक रिन प्रातपाल जय कि महारानी भरनी भयानक योजना पर सोच विचार कर रही थी कि उसको राणा भगवहादुर का एप पत्र मिला । उसमे लिखा था-- 'मुश साम्राज्ञी का पत्र मिला मिराम मुझे इस राय को करने का आदेश दिया गया है जिसे में अपय अपराध मानता हूँ। मैं मम्रतापूर्वक श्रीमती रे इस भादेश का विरोध करता हू क्योंकि यह अस्पत अयायपूर्ण यात होगी कि बरे लरक अधिकार को छीनकर छोटे को सिंहासन पर बठाया माये । न सो पह स्पायसगत है म यह हमारी परम्परा ही है और यह सभी कानूनों के विक्र है। फिर चाहे घे मानषीय कानून हों या दयो नियम हो । इसके अतिरिक्त महाराजकुमारों को प्रत्या, आत्मा तया एम विरुट नयर पाप पारणों से मुझे खेद है मि मैं धीमती पो आजा नहीं मान सस्ता मासिका के रूप मे मरा जो आपके प्रति पतध्य है उसके अतिरिक्त मेरा अपने दा और राग्यप्रति भीस्तव्य और पदि बोनाक्तयों मे टवार होगी तो राग्य के प्रति एतस्य व्यक्तिगत सम्बधा से ऊपर होगा। राज्य व प्रति मेरा क्तप्प मुझे आदेश दता है कि यदि साम्राजो मुझ पुन ऐसी माना रंगी तो श्रीमती को राज्य मानून के अनुसार हत्या का प्रयत्न ररने लिए कानून द्वारा रप्ति रिया नावेगा। उस पनको पदरर महारानी को पात प्रोष माया । उसने देखा निराणा जगमहादुर ने मारम्म में तो नम्रता से अपना विरोध प्रस्ट रिया पारितु पत्र रे मत मता और पोरता का परिचय दिपा । महारानी मेरा विनिराध्यक्ति पर उसने अनी सर विचार किया था जिसकपा मार नपामा सर्वोच्च पर प्रान रिया मौर जिसके कहने पर उसने कोट इन मे हत्याकार रयाया और जो उस समय उसकी रक्षा के लिए छापा की तरह उसो पास ही लग रहा पावही उमे हत्या के प्रयत्न रे लिए हारावून दारा दस्ति करने की धमकी दे रहा है। महारानी को तो एप हो कानून पार पा अर्थात् जो उसरा विरोध गरे उसको मरवा दना । अस्तु उसने राणा जग महादुर को मरवा डालने का निश्वयर लिया । यह भूल गई कि राणा जग यहादुर अत्यन्त पूत धतुर, रिपति को नाप तौल करनेवाला और कूटनीतिज पा । उसको मरवाना सरल नहीं था। उसने अपनी योजना को परे गुप्त रूप से सयार पिया था। उसका विश्वास था कि उसकी गुप्त योजना का किसी को पता नहीं चलेगा । उसन एप व्यक्ति धिरपोज बसनत को राणा जगवहादुर को मारने के लिए पार पिया । उसने उससे पवित्रतम दापथ दिलावर नियह इस पत्यत्र को गुत रखेगा राणा अगवहादुर की हत्या करने को नियुक्त दिया। उसका पुरस्कार भी मनोखा था। महारानी ने उसको पग-परम्परागत प्रधान मत्री का पद बने का यवन दिया था । कहने का तात्रय यह रि प्रधानमत्रिव उसी रे या में रहेगा। प्रधानमत्री पद पर यो रहने के लिए पदि भाव यकता हो तो उसको तथा उसक घगमों में से प्रत्येक को सात सून माफ में अर्यात प्रत्येक वार को सात व्यक्तियों की हत्या करन को छ पो । उसको को एण्ड नहीं दिया जा रास्ता पा। अन्य हो रानव रिसी सदस्य की यह हत्या नहीं कर सकता था । उस रस्त पिपामु महारानी तथा उस शक्ति और सत्ता से लारची विरघोज यसनस में यह अपूप सौदा हुआ । महारानी की योजना यह थी कि विरघोज धरानत जगबहादुर और उसके ६ माइपों को दोनों महाराजकुमारों के महलों मे रहने के लिए राजी करे और इस प्रकार वे दोनों राजकुमारों के महलों म हो सोवे । एक रात्रि को यसनस का दल उस महत म घुसकर उन दोनों महाराजकुमारों को और पवि उसफा पति भी वहां मिल जाय तो महाराजा को मार डाले । जगबहादुर राणा और उसके माइयों पर यह दोषारोपण रिया जाये कि उसने दोनों महाराज कुमारों और महाराजा को मारा हे गसएव उनको प्राणदण्ड दे दिया जाप । इस प्रकार एकसाय हो सब गमों का सफाया कर दिया जाय । उनको यह योजना छोड़नी पडी। राणा माई फोई मूस और बुद्धिहीन नहीं पे जो इस पडया गिनार हो जाते । दूसरी योजना तयार की गई । उस योजना के अनुसार यसनत किसी प्रकार राणा जगवहादुर को हामानधोक महल के एक एकांत पक्ष में बुला से जहां महारानी मो उपस्थित रहे और जगवहादुर को मारनेवाले उपयुक्त स्थान पर छिपे रहें । महलों म राजघराने के बच्चों के लिए एम शिक्षक या उसका नाम विजयराज था। यह विद्वान परतु मोह पुरुष था। विरयोज बसनत ने उसे सफलता प्राप्त होने पर राजपुरोहित बनाने का वचन र जंगबहादुर को हनुमानयोक महल मे निश्चित कक्ष तक किसी प्रकार लान के लिए तैयार कर लिया। विजयराज राणा नगवहादुर को दुला लाने के लिए गया और बिसनेत तमा उसके सायी उपयुक्त स्थान पर छिपकर जगबहादुर के आने की प्रतीक्षा करने लगे । बहुत समय व्यतीत हो गया किन्तु म सो राणा जगबहादुर हो प्राया और म विजयराज हो लौटा। विजयराम कुछ घरगया हुआ-सा महाप्रभावपाली प्रपानमत्री के महल लगमटोल में घुसा । उसको राणा जगवहादुर मे सुरत बुला लिया ।

विजयराज ने महारानी का सदश रह सुनाया। जगबहादुर ने उसे ऊपर-नीचे अत्यन्त सूखे ढग स गम्भीर होकर देखा और घुड़कर कहा कि तुम्हारा इस प्रायना से वास्तयिक उद्दश्य क्या है ? विजयराज मोर षडयत्रकारी था। वह घबडा गया उसने इस घुडको का यह अप लगाया कि प्रधानमत्री को पर पत्र का पता लग गया है। भय के कारण उसने समस्त पध्यत्र का भडाफोर कर दिया । तुरत ही जगवहादुर न अपनी सेना की कम्पनियों को साप से हमानयोर महल को प्रस्थान पर दिया। विरघोज ने भी मूखों की भाति व्यवहार किया। वह यह न समाप्त सपने के कारण कि राणा जगबहादुर अभी तर क्यों नहीं आया और न उसका परित सदगवाहक ही लौटा घोड़ पर चदकर तेजी से सरक पर प्रधानमन्त्री के मयन लगलटोल को ओर चल दिया । वह सीधा जगवहादुर की सेना के सामने पहुंच गया। फिर भी यह सोया आगे बढ़ा चला गया । पीछे मुरकर अपने सायो पत्यकारियों को माग जान को चेतावनी भी उसने नहीं दी । कृष्णवहादुर ने उसे दखा और उसे पकड़ लिया । उसके अस्त्र-शस्त्र छोन लिए और उसे अपने भाई राणा जगबहादुर के सामने ले गया । विसनत ने महामहिम प्रधानमत्री को अभिवादन किया और उससे कहा कि महारानी उससे तुरत हो महल मे मिलना चाहती हैं । प्रधानमत्री ने उत्तर दिपा यह श्योंकर होगा प्रधानमन्त्री तुम हो न रि मैं ! महारानी ने तुम्हें प्रधानमत्री मनापा है न कि मुश । उहें मुझसे मिलने की अभिलाषा क्यों है ? प्रधानमत्री ने इतना कहकर सफेत किया वह मिसनस को मृत्यु का सकेत था । विरपोज मार दिया गया और जगबहादुर सेनासहित आगे बढ़ा । महल मे पहुँचार भगवहादुर को सेना ने विसनत रे सहयोगियों को घेर लिया। जिन्होंने विरोप पिया रह मार दिया गया । जिहोंने अपने हथियार दे दिये उन्हें पकाकर जजीरों से बाप दिया गया। भगवहादुर विना दायें बायें दखे सीध महाराजा के रहने के पमरों में तेजी से चला गया। महारानी मे भयभीत होकर दसा कि जिस ग्यक्ति को यह मरे हुए के परावर समझती थी वह महो तर घोड़ पर चढ़कर माया है और महारामा से मिलना चाहता है यही नहीं यह महाराजा स मरेल मे तुरन्त ही मिलने की इच्छा प्रकट करता है। उसने कुछ अपने सदेशवाहा भेजे । जगवहादुर ने उनको ओर मृकुटी पदापर सीधे दसा तो ये लोग मय भोत हो उठ । यह महत मे टहसने लगा और इस यात की मांग की कि उसे तुरन्त महाराजा के पास से जाया गाय ।महारानी जान गई कि पयरत्र अस फल हो गया। परन्तु फिर भी उसने पराजय स्यीपार नहीं की। यह महाराजा रे पास चली गई और उसकोगस में गई जिससे कि नगयहादुर महाराजा रोमकेल में न मिस सरे । महाराजकुमार सुरेन्द्रविषम उनके समीप हो सहापा। महारानी मे हस्तक्षेप परमा पाहा स्न्तुि उसने मूक पूणा के साप रस स्पेदा की और अपनी पगो सिंहासन के पाये रे पास रसकर स्पष्ट दामों में बिना पिसी उसमनारे गम्भीरतापूर्वक महारानी को सुरन्त निकाले और मपाल समाहर भेज दिए जाने की आशा देने की मांग से। उसने अपने सनिरों की ओर देखा। महारानी गरी यहां से ले जाया गया मौर उसरे मिन के कमरों मेंरर रिया गया। प्रधानमत्री महलों से वापस चला गया। ..

पापस माफर उसने राय परिषद (रोसिल) को पुलाया और खूनी महारानी के पारे मे निणय दिया। महाराना और महाराजकुमार ने महारानी के अपराधों को ग्रनी पर और उसरे विश्व राज्य परिषद ने जो निणय किया था अपनी मुहर लगादी । औपचारिक रूप से उससे पासिका (रिमेंट) के पद से हटा दिया गया । उस विस्य इन भागों मनिणय दिया गया । 'तुमन सफड़ों म्यक्तियों को मरया दिया और अपनी प्रमाको धारा पत्रणा दी प्रमाको घोर पष्ट दिए और उनरा घोर अहित किया उना पप्टो पा तय तक अन्त नहीं होगा जय सब कि तुम देग में रहोगी ऊपर लिखे अपराधों के दण स्वरुप तुम्हें मामा दी जाती है कि वेग से बाहर निकाल जानो और पुरस पाराणसी जाने को तयारी परो। महारानी के सारे पहपत्र असफल हो पपेपे । उसको देश से पाहर निगल जाने की मात्रा मिल चुकी थी। उसने इस बात पर यस दिया कि वह अपने दोनों पुषों रानेट और पोतेर को मपाल म म छोकर अपने साप से जावेगी। यह उन्हें काठमांडू म यहीं छोड़ पायेगी जहां उनक जीयन का खतरा है। जग यहादुर पो इच्छा थी कि को मां के साय न जान दिया जाय जिससे fr महारानी पाहर से पम्पन्न न पर सपे । किन्तु महारानी अपने पुत्रों को साप ले जाने पर तुरई । अत में जगवहादुर को अनिच्छापूवक राजकुमारों का उसके साथ जाना स्वीकार करना पड़ा। उसने नियस महाराजा को मी यह घोषणा परोके लिए विवश कर दिया कि वह भी पवित्र गगा के तट पर पाराणसी म रह फर अपने पापों को धोना चाहता है । मस्तु वह मी महारानी के साथ वाराणसी जायेगा । महारानी जानती थी कि महाराजा को अपनी मुट्ठी म रखकर फिर भी वह नपाल को राजनीति म थोडा बहुत दराल दे सपती है। जगबहादुर ने महारानी के उस पल रे साथ अपनी सेना को छ दुपहियों को सोमा तक पहुंचाने को मे जिससे कि पदाचिस महारानो वापस म लौट आये । महाराजा का परियार २१ नवम्बर १८४६ को देश छोड़कर भारत की ओर चल दिया । राम्य परिषद् ने महाराजकुमार सुरेद्रविक्रम को महाराजा को अनुपस्थिति म शासक (रिजेंट) नियुक्त कर दिया। मनारस में मपाल से निर्वासित दलयहादुर को महारानी मे अपना मया प्रमी स्योकार पर लिया। अपने नये प्रेमी के साप मिलकर यह नेपाल के पर्तमान शासन के बिखपच्यत्र रचने को पल्पमा परने एगी। मिस दिन महाराजा और महारानी नपाल छोड़कर वाराणसी गए (२३ मवम्बर १८४६) और जिस दिन नम्बर १९५० में राणाशाही का अन्त हुआ उस रूम्बे सौ वप से अधिक समय में मपाल पर राणाओं का एपछत्र शासन रहा । महाराजा अपने प्रधानमत्री रे हाय की कठपुतली या । यही नहीं महाराजा को स्थिति तोकदी की सी थी। वह देवल अपने महल में मोग विलास भर कर सकता था। शक्ति के नाम पर यह षेधारा शून्य और भराध्य था। महागजा और महारानी के मपाल छोड़कर घस जाने के उपरात समस्त सत्ता राणा जंगबहादुर में केन्द्रित हो गई । राणा जंगबहादुर प्रधानमत्री पा और उसके भाई भतीजे तथा अय सम्धियों के अधिकार में मपाल के सभी महत्वपूर्ण पद पे । सेना उसके माई के अधिकार में थो । सुरेशविक्रम जो शोन हो महारामा यमनेवाला पा नाममान पे शाषक से भी कम प्रभावशाली पा। । ।

Nepal Ateet Aur Vartmaan

Author
Saxsena,shankar Sahay
Title
Nepal Ateet Aur Vartmaan
File name
Nepal Ateet Aur Vartmaan
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2010/12
Publisher
Bikaner,navyug Granth Kutir
Language
Sanskrit
Pages
101
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
History
DLI number
514946
Barcode
4990010022613.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
oWnHPkt6EIX
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