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Lok Varta Avem Lok Sahitya
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लोक-वार्ता एव लोक-साहित्य
प्रयोग की समस्या
'सोक-गावापी 'फेल' (Folklore) एम्दा पर्यायवाची
किमी में इसके प्रचार अभियभेय भी मानद गुप्त पर गें.
समशरण अप्रवास।बिस घर का हिनी पसाय 'लोक'
बी प्रति लिया है, उसी मात सोयार्वा शमशा' से
प्रति विस्तृत मागोपाल परखा है।
'शोर' (lore) TP "प्लो सेक्सम lar से निजारे और इस
प्रयोग या बोटीला माय । इस प्रघर फोलोए म शाब्दिक
'प्रकृय सोयों पसन' है।"
पारपाल कि अनुर सस्प से समाम दो वर्गों में बिमक
1-एक उम्प वर्ग और एमप निम्म पर्ग । सो निम्न में सर्व-सामान
श्या में संतति, परम्परमात शिरमात, प्रिान्तियं, माघार विमा
बि, पार्ष, पाते, वृत्वादि मिलते हैं। तम्म मातियों में उपाय
हाने वाले प्रतम्प पर ही मियामा, रविया, ममा, मदा मावामी,
माओ, पीता, भाती भाति परेलर माचित् पपरे पास
न... म प्रथम बार सोर' गाध प्रपोग दिया।'
१ एम्पासपीरिया प्रॉफ मोरा साम्मेज बि पप र
भारतीय कोर N टीक इसी पर्ष अगस्त मास में विश्चिमम बॉन यम्स ने सम्म 'फोरशोर' शीपर सेस प्रकाशन के लिए प्रेषित किया को स्पेस' अनेक मापामों में हेर-फेर साष दस्त किया गया। इसी राम बाच्या जोम्स' अवमा सोमणा मी है। न्तु हिनदी 'सोक-पासा' विशेष रूप से प्रचशित। सन् १६५ में भी म पोयर ने मराठी में 'फोमसोर' लिए 'चोक-विवा' राम पा, दो अधिक प्रम में न प्रासा। भी गो-म प्रशार ने दस्त-सपर प्रयोगमा एवं मछठी पारिमापिक चममुति' राम उपजा है। 'फोहोर २ तिर सोहन प्रपा 'लोक-साहित्य' शरीर प्रयोग मी प्रायः भूल से किया पात्रा मम पाप का निश्चित स्वस्म निति नहीं हो सका है, तो समय पर इसी प्रकार के प्रयोग सम्मुख भावे बहाँ तक मफ्ठी मास मी पि ग में ने 'यो-विपा शम्द ही प्रचलित करने मात्रा मिाहै। • वासुदेवारण प्रप्रयास ने हिन्दी में पाया 'या' सम्बन्धी मयों के अनुरूप (पणामों गाा, परु पार्ता, पा 'होमसोममा पर्याय स्पीभर दिया है। इस विषय में माप विखन-वामी मोसानाप तिवारी ने शादी में अपने विचार । दिने। मोमवानुसार 'लोक-पार्थमपि-से-अधिक 'मोद-पा' भाग पार करने श्री पाता है। रिंग में पावा' अपना भारता' प्रयोग कसा प्रर्य में ही होता है।) संस्कृत-साहित्य में इसी राम का 'भमाह' मा 'मियन्ती' है (संस्कृत नम्बार्य मोस्टम, ... शमा ।) सत पर भी मारे ने 'लोकमाता' समर्थ रिपोर्ट या पति स्मर' दिया है। इसी राम के लिए 'शो संसति' प्रप्रमोम #. पारीप्रसार दिपदी ने किया है) कोलर प्र पास भाराय मस्त यहीं पता है। भी विवारी बी. मुनीतिक पारा बाप मस्त 'सोप्रयम' (कोलोर) लिए विशेष प्रामा हैं। सुमीत गाए के शम्दों में "पितृ-परम्पराव धोरण-यात्रा की परति -- 1 पार्वा एवं लोक साहित्य अनुष्ठानों, सिगास-विचारों या वाम्मर से अपने लौकिक में प्राप्त की है उन्हें अंग्रेजी में 'शोर' पवे है। इस रामद 1 प्रतिशम इमने सोचमा यो पा लिया है। फोर- के लिए वैसे तो शास्त्र, लोक-विशार, सो परम्परा, सोक- सोप-प्रवाह, सोप-पप सोमपान, शो-मह, सोमपन, सदी में भोर में भी शिबारी ने संट किया , किन्तु प्रापर ० मति है। पोर-पाता राम हिटो में प्रमः प्रपमा स्थान निर्धारित म । बबीन शब्दों के गुम्नव और मामा से सोम्बारे प्रति साम्पा म नहीं हो सस्ती। असमर्प पूर्व भी प्यार उसस्नों से प्रमशित 'सोमाया प्रेमासिक ने इसकी बार रो और माइविध साहित्य में बवीन रचनामी में इसका . प्रपोग इसके अस्तित्व में स्पासित प्रदान करने में सफल एमा ५५ सुविधा के लिए फोलोर सिए इम 'सोमवावा' सम्म करेगे। ता एक शास्त्र गितमा मष्य में पारपस्न विना ने पिहरी पतियों के परे मवि अन्वेषस भ मरम्म विपा । प्राचीन मातीन बारमय, पिसान परिश्रम, मापाभी का स्वामी प्रपथ, पैरसव, देश, भारि माप्तीम नीति-पा-साहित्य महत् मन्यों पमन्य भोपामों से पारस्परिक सम्बन्ध, प्रारिकी पोर पिछली पीरनि माया मापा मिलन समारनीमन, खत-शस्त्र से विषयों पित होने लगा लोभाकिमया एक विशन भस्म प्राप्त होता स्थायी भाव (माग-1), ३. प्रता सम्मेपन पत्रिका (मो..नि.) योगायन और पोष-स १६ भारतीय लोक-साहित्य गमा, मॉनि उक्त पियों की प्रषिकाय सामग्री सोम्पाता से ही समाप्ति है। मोग-पाधिस्सन्त्र अस्तित्व है। यह एक शास्त्र और. मात्र ग्पपस्थित रूप से अध्ययन होना चाहिए, या निरिपतरोन में अधिक समर म लगा । सन् १८५८ में विशेम रिपरी ने उन सभी विषयों में समय त्यापित करने मरम्प की मापा, पर-साम, प्राचार विचार, मावि-सम्बन्धी पिशिता, मादि का उनमै समावेश रने लिए विशेष प्रापर या । सन् १ = में बी एस गोम ने शोर सप हिस्टारिकल साइन्स प्रम्प सिखम इस बात ग प्रतिपादन किया किलो बार्वा विरामप्र मन्त्र विषम है, विप्रपने नियम और सिमान ₹ उसकी मान्यतामाको प्रम्प शास्त्रों की मान्यताओं की माँति अपनाना गहिए । परिणामत मन पराम्पेय गोमे की स्थापनामा का स्वागत नहीं किया, किन्तु नवल-शास्त्र के क्षेत्र मेसोमा घमी पपा मात्त है, पर सीभर र लिया । सन् १९२ में भार• भार• मेरा 'साकोसायी एण फोफाहोर' प्रम्ब प्रकाशित हुमा। उसने लिला कि सोमाता परेवल समान शास्त्रीय पस माण करमा एगी शिकोप है। उराध मनोविकशि से भी प्रपयन लिपा बाला पाहिए, पाकि लोनावा विचार विमन महीपाल रूप से प्रापपर पिस्ना पारस्पा है स्खना ही उतम मातरिक पदमी अप्पयन भी रवि से मालाप विप। गतिशील गिजाम घोप-नीम्न पारासर गरमागरे । परम्पराएँ प्रमाह-मेरा माप मही पातीं। ये सा में मगर दो 'सो पीप में गप्पा मा सी पती पुगी में मम पाप भोर म्पात बन मप्प मोमाता में गंगा रही है। सिी समय-विशेष में ही सोमायामनी पाता। पर याबीन, मरिशीय और सम्मान शिक्षा निगराने रोमरस प्रमाणित सिाहै। शिवित बन मरिक प्रशिनियामा १७ कोक-वार्मा एवं मोक-साहित्य और करिबाटी बन में उसय अस्मित गहरा है। समप्र रूप से लोक- पार्वाको मात्र प्रविषय है। 'सोर भी अपरिमित शक्ति, सास, मनोमात्र, मान्यताएँ, मिपास, पाप, परम्पप, माले, टोने-टोटके, अनुष्ठान, पति-रिवाज, परम्पराएँ, गीत-पाएँ, वेष-भूषा, भादि संयुक्त रूप से लो- मारे पेन अस्तित्व की पोपवावे है। बोरकिन ने भाई- "Folklore us not something far away and long ago but real and living among us" (जोम्पा प्रस्थपित दूर और अत्यन्त प्राचीन में पातु नहीं है गावो हमारे मप्प सत्य और बीवित है।) - Here the past has something to say to che present and bookless world to a world that likes to read about itself concerning our busic oral and de mocratic culture as the root of arts and ua side light on bistory * (यहाँ भूवमल को तमाम से और पुस्तपान समाध श्रे उस समा स्वपना है जो अपने ही विषय में पड़ना चाहता है, जिस सम्मान मारे मौलिक मोर लोयान्त्रिक संस्कृति की भूल सामा प्रारम्मिा माँ और विकास के एक अंग के प्रभय से है।) सोमार्ग में शोक की परम्परागत मावनाएँ एवं पेववागत समी अमिम्मकिपाप सेखा-बोला निहित है। अतः लोमा वक्ष प्राचीन, अपरोष मात्र स्वीयाँ म अम्पयन ही प्रस्तुत नहीं बता पान् पीष्टि सोर- भाषा, लोकामिम्पनियों पर उनकी प्राइमाम प्रक्रियामाँगा मी अप्पन तोडपार्ता परितार लोना; मिवार के समय में सौ एम. पर्न एक सरण म अनुसार गें. सस्पेन ने इस प्रकार किया है-"या पाविशोषण अमेरिकन पोमोर (पान)की भूमिका पर भारतीय लोक-साहित्य राम की मॉनि प्रविष्टिय होगमा है जिसके माह पिछी पालियों में प्रचशिर अपना प्रपेचात समुन्नत बातिया असंस्कृत समुगरी मेंबर शिर सिस, पैति-रिवार, मानिा, गांव ठया मा भाती है। मातितम क्या पापगत् के सम्मान में, मूत प्रेता युक्मिा तथा ठपके साथ मनपा सम्बन्धों के विषयों में, बाद, येना, सम्मोहन, पी- करण, वागीय, माम्य, राकुन, रोग तपा मस्यु सम्बन्ध में पारिम या असम्म विश्वास इस पत्र में प्राते हैं। और भी इसमें विवार, उत्तर- विमर, मालपमत वपा मोरबीन के रीति-रिवाच उपा अनुदान और स्पोहार, इय, मालेट, मस्प-यासार, पशु-पाशन भाटि विषयों के मी पति रिमाय और अनुष्ठान र भावे पा धर्म गापाएँ, (सीमेपट), नोमानिया, साले (हेर), मीत, गठियों, पहेलिरों तथा मोरिया मी इतर विषय है। संक्षेप में लोकी मानसिक सम्परता मन्तगत बो मी पस्तु भा सच्ची है समी इस क्षेत्र है। यह किसान आश्रमात नाही पोशो-मार्गमा अपनी मोर मार वि करती है, किन्तु उपचार अपना अनुष्ठान है बो किसान इलये भूमि बोलने के काम में सेने के समय पता है, बास अपना वंगी की बनापट नहीं, करम् के रोरो बो महमा समुद्र पर पता है, न प्रमा निवास प निमाय मही, परन् या पति बो उसले बनाते समरठी और ठल्ये उपयोग में लाने वालों के विश्वाछ । यो मात्रा मस्तुत. पानिम मानब मनोरसनिक अभिव्यकि है, वह पाहे स्राव, पम, रिलतमा प्रोपर रे क्षेत्र में हर हो, पाहे सामाषिक पटक तपा अनुप्टारी में भया विशेषत: इतिहास, पम्प और साहित्य के प्रयास पौरिक प्रवेठ में 10 रो मामुपसरण प्रमशाल शिखते हैं- "लोमा एक नीति शास्त्र-शोर प्रतिमा पासो उलया दी तोर-मादाय विचार है। सोच में पमने पाशा बम बम भूमि और मौविपीन क्या सरे स्पान में समबनविर सौन प्रीमतदायका प्रमाण पर .
,
सोक-वार्ता एवं लोक साहित्य
क्षेत्रों में लोक पूरे शान का अन्तर्माण होता है, और जोर बावा घ सम्पन्न
मी टनी रे साप है।
/ लेनिन का पन है-"Folkloren materal about the
hopes and yearnings of the people"
(लोक-पार्वा पर की प्राचार्यों और माम मायाँ (स्नेह-सपी) से
सम्बन्धित सामग्री है।
गांधीबी दो में Folklore u the literstare of
the people, but it belongs to an order of things that
11 PAHIDI away if it bus pot already done so.*
(सोम-माता लोगों प्रमादिस्म है, पर या एप्त होती र सामग्री,
परि अब कर मर न हो चुकी हो, से सम्पपित है।)
नोम्पा विषया श्रीवासिय प्रफी शम्मी-पौड़ी ने उन्हें
तीन प्रमान समूहों में पाया है। रो. सत्तेन के प्रमुसार उनम्र वर्गीस
इस प्रचार हो सकता है:
१३ सिगास और भापरण-अम्पस पो सम्बग्मित -
पणी और भाभरा से,
पनम्पति चमत् से,
पशु बगल से,
।
मानवसे
मनुप्प-निर्मित पातुओं से,
भारमा वया दूसरे बीन मे,
पफ्-मासमी पकियों से,
रामा अपराकुला, मविप्पयामिमा, मारामागियों से,
पा रोगों से,
रोगों नपा स्यानों की मशा ,
१ एपिषी पुत्र पर
२० भारतीय लोप साहित्य २ रीति रिपाच- सामारिक तथा राजनीतिक संस्था, म्पतिपत जीवन के प्रषिक, म्पसार, पपे क्या ग्पोय, निमियाँ, तदपा स्यौपाय, सेल-इद सपा मनोरथम। ३ कहानियाँ गीत वयापा- पापियाँ (म) मोसम्मी मानस प्री बाणी है। (मा) को मनोरचन के लिए होती है। गीत समी प्रकार मारते क्या पहेलिरों, पचपद पा तथा स्थानीरमा। मोरे तौर पर 'फोलोर' (सोपा) के विपयो परम निम्म रूप में भी परिसर ससे मोमीव, मोक-मार्ग, भारत पालिमाँ पारि। रीति-रिवाय, त्यौहार, पूषा-अनुप्टान, मत प्रादि । बापू-बीना, गेट, मूत प्रेत-सम्माधी मिास भारि । ४ सम्वृत्य तथा मापतमा प्रति प्रसिम्पति। ..बा-मातियों के विमिम स, प्रामीस एवं पारिवासियों के लेज प्रालि इस प्रकार जोमाता पर बल म्यापक मोर को-पारिस्म उसन पर गहै। पहा मार सिमिन मापार-रिवार्य प्रमर्श लोग-माहिस्त से होता है वहाक मोर-मार्च के अन्य पिएर मा सारिस तिए सागपाते है। लोमाहिरस सोमवादिस्य सोम-पासा प्र एक मापण भाग है। मोप्रतमत स्त्रियों, पुरुषों और पप्पो प्रगप एक पच-बातमय पाथरे । मम्मम्म लोकवार्मा एवं लोक-साहित्य २१ मै हम इसका विस्तार प्रस्तुत कर सकते हैं- सोप-साहिस्प स्त्रियों का साहित्य पुरुषों का साहित्य बचा न साहित्य । गीत (समी प्रकार), गी-साहित्य, -उपमास प्रादि की पाएँ, गीत- पार, पहतियों, कपाएँ , मुक्त गाव-पाएँ और टप्रेमशे, कोक्तियाँ मुहापरे मारि। पाशिममा साहित्य पासका साहित्य - त प्रम-संबई पाएँ गातार गीत कम-संबई मा वाचा पतिपय विवाग प्रकपर यह साहित्य मौलिक होतारे प्रतः से 'साहित्य व संयम से हुए पारम्य हा बाना चाहिए । महार गीय वि. का राममो ने 'साहित्य' की अपेक्षा 'वाम' एम्द ही रषिक पसन्द किया पिसे सेव 'शो' से सम्मान में प्रपुमधरना उगम रिग या । अनेश्वरी की दीन भने हुए उनाने सिक्षा का प्रान्तीप, लाठीय पोर अपमा तो-गाएँ, स्न्तममाएँ, गीत, पगारे, सानिया, मारत पानि मामय की डी-गो लोग ऐला प्रमी ऐप है। एक अन्य पम्प में मनाने शिल्प है, "स्त्रयों श्री प्रानियाँ कमासिन सो पाने पर टिपर गार पाने वाली मोबियाँ 'सारस्' भागे हैं। लिया रे गीत, सानेरपरी, प्रप" ।
भारतीय लोक-साहित्य
पानियों, पोपी पारि समी मर समान में सभी समस्याओं में उस
समहोते हैं। इससे स्पोक 'सारस्त शुद उस पेटि में ही
भासा विख्म कि मामप' ति गया है।
शाक-साहित्य रेसमी या प्रेमक कामा यहाँसमीर महार।
संक्षेप में सोमावि पिसी मति-रिप ए मिर्मित कारोवा। उसके
पीचे परम्पपरोपी जिलासमार से मिल नहीं है। सीमि-
म्पकि सामूहिकी। मकिल से परित समर में समान मामा से
पक नेपाली मौलि भिमकिती मोर-साहित्य मेवी माती है।
यहाँ तक कमा और लो-दिम बरे सोत-साहित
प्रशसभाय ही समले में मारे। ऐसा पहिल मीरा रे
पर शोक- म मेल नहीको मादिस्प समाजवादी
धादिम परम्परा र पिछी कम मेक्षित रखा।
पर कोर-गावा-साहिता मूप प्रेय साहिल रिसे रोमको
सीजन रेस्सिी पालू रारा गलती है। इस सादियो इम
आदिम मायभारिम शक्तियों पर है। इस प्रकार
तो-पहिलीपासा करने में या सिरित हो कि उस मूस
मिमी पापिभौतित तय गरी प्रतिदिन पाहिम मानस ने पूर्व
और भयभर संगमे, प्रपाकमोर उपा के प्रेम प्रमाणा
पविविध पप साहित्य सम्म म रिपारेको
स्तमयर कप गर्म माग पसाररता है। वात्पर्य पार
सोब-साहित्य सयको हर तो होतोमानी, पर
वितो प्रमोस होता है सी ऐसे माविक मारपसमो
सपने मासिम पस में बेला मा मौर शिस भामि मामाब
पुरधर्म-गावाला। सोअतिरिक प्राचीन मौत
पम्परा से प्रास पाया गीत-साहिल मी सोम्सादिप सा
, महाराष्ट्र सारस्त (माग दो)
.nोर-समीदवाबमम, पर-4
३ लोक-साहित्य-सकलन की परम्परा उन्नीसी शवागी मप्प मे पश्चास्य देशों में लोक-साहित्य सम्बन्धी तीन पासर्पय रूपन्न एमान पॉर (Jobn Aabrer) द्वारा सिसी गर टिप्पगिपी से मत होता इस मोर सत्रहवीं स्वामी मही विशसा के माब प्रगट हो गए थे। ' नाम-रास्त्र, समाय विस्पन, पावि पियर एवं मापा विपरकबीन मन प्रगति ने जोर-मापामो की मौलिक निविप्रति सभी देशों को समान रूप से प्राप्त किया। समगा मोफ में प्रवाहित मान्यताएँ, करिया, अप-विरमाल, परम्पपएँ, पार्मिमापार विचार और विभिन्न भाषागत अमिम्पचनाएँ भी अप्पन विषय ममते गए यो समग्र रूम से सोम्मावा-साहिस्प के मापा सकते है। शिप परी (Perer) प पोसी गा इस मय की पपा (१५ों स्वाग) सिमपतिम्मित् पेसनिक रूप प्राप्त भए, ओस भौर मेरसमूबर के बैदिक साहित्य के प्रप्पा प प पार, कारों के रूप में प्रस्तारिख और मार दी गोल्डन गो' (१२..) मम्प के म्प में अम्मी तर से निखरी | सेस में सोग्-साहिस्पष मप्प्पन परिपम में विमिम पाठियों के प्रति विममा ति से प्रेरित वा मोम सा में 'रिमेम्स मॉश विस्म एपर गुग्दरम' पर अपने विचार मिल, मोसन् 1451 में प्रवायिताए ।
भारतीय लोक-साहित्य
उमा पौरे पीरे एक प्रक्षग विनम म स्वस्प पारयता गया, जिसने म
त परिचमी देशोभेही प्रमाणित किमा, बस्ति वहाँ से की हर सार
ने स्यूर-पूर्वी देशों को मी शोज ही साबित करना प्रारम्म र रिया ।
मारतयप में इस प्रर्य श्री सहर लो माया रे मन शाडूढे
ए पाक महीं पाए। १५वीं शवाडी मम्म में बम"
शासकीय बागडोर पूर्ण वर अपने हाप मे सैमासी, रो-मानर
अप्पन की प्रामापरा मेधी विवानों ने अपमी पनि गैर।।
पीता, बंगली बावियाँ पिणि प्रपामा और भिम मि सस्कृतिमा प्र.
देश नेगम पारपा नहीं लगा। फलसरप मारतीय सोप-गादि
अप्पम और संपनीनींब पी।
[२] गाँवोस त यारे 'एकास एरा परिरक्स्टिीवार
पषस्थान' (१८२६१.) से मारबप में सोत-बाधा-संघान म भगम्येय
माना पाहिए, किन्तु उसमें बाबा का की अपेक्षा विकास की छात्रीका
नामुल्य है, प्रवासी - गोमर (Goret) पुस्तक सोय
पॉफ सरन विश(सन् १८५२ ) को प्रानिष्वा दी गामा प्रमुरिठ
होगा, बोरिमारित् मारत में सोर-गौरीघ प्रपम संग्रह है।
मुविधा के लिए इस दिशा में माख-समानी प्रतिमा कोरो
भागों में बॉरमा उपित होमा-
() हिमो मापद-सम्मी प्रम्प भोर (भा) पहिली पनपद
समापी प्रन्प।
(म) हिनी बनपा-मापी पम्प संसा में पल दो कम। इसके
अम्मांव मप्प-मारतीय बावियों के सम्म शिसे गए सितारे टेस
(१८६५), जिनमें कुछ मूस सोनभाएं मी माद, परे मामपूर है।
हिस्सा के पश्चात् रॉ. रिपर एमिरे प्रम्प---पोक ये भाक
माभेगम', 'पोर सांग प्रॉनीमगा', 'म मोप मारण
दिल' (स्पामयण हिरासे सहित), 'चि मालदिभरेस' (हिवासे
नति), मराफ मिसि रमिया', 'पुरिया एपर ऐभर पोटल,
लोक-साहित्य-सकान की परम्परा
२५
'टी मेंगा', 'दी प्रगरिमा', मारे एखचन्द्र राय लिखित 'मुया एक
रेभर स्ट्री' (१८१२ ), सिरियन बोन धरा महोत 'विहार प्रोपर'
सपा प्रापर लिखित मन प्रब' कुछ अलवीय प्रम्प रें।
(मा) पहिन्दी मगपर-सम्मपी प्रन्पी में 'भोकर रेमन रे।"
(१८९८), 'मिलिप्टिस एपनाताची माफ गास (१८७१),
'फोक साथ प्रॉफ मैंगाल' (१८८१), एरपट बैलेड्स एस सीएस
पॉफ हिन्दुस्थान" (१८८२), 'लीयेण्ड्स ऑफ दो पंजाब (151),
'बाहर के स्येप' (१८८५), 'फोर जोर इम सदर्न इशिया",
'दिन कोहोर', "मला विशेष टेक्सा', 'रोमापिटा बस मॉम
पंजाब' , 'पंगाशी शान होकर टेक्स, 'भोरिया पर''1",
रियन फेमस' , 'फोक्सोर माफ दी तेसपुष"", 'एस्ट गान
-
,
, मिस पर
प साक्रम
वासपिहारीले
. पोलाप
पारसी रेम्मर
श्रीमठी तीन
• भटेश शास्त्री
८. प्रारसी• मुजी
। भीमबी रे
पी.सी
" एम.हाक
१२ गोममादेवी
1. रसस्वामी राय
" मी. पार• सुमाभित्र पाठ
२१ भारताय सोफ-साहित्य मेड्स', 'पोकसोर मॉप मारे', 'फोहोर नोट्स, शाम एम प्रस्ट मोबा, पारिश्च प्राप अन्य है। प्रमान कि म मयोग होने पारिएं को इन दिनी भारतीय समसपो में उपसम्म नही है। इनपी प्रतिरिक्त परमस मॉप पप एशियाटिक सोसापये, एशियन रिमो', मार्म विरसा बोपमा एक, मार रिसर्च सोसावी परमल', भारि में वपित रेमेन्ट हरे एप- माहीम, रोम्पस, बोर्षिय, म्यूमर, हरपमपम, पयर, स्किन चांगे माग, हॉपमैच, गाउन, आदि कार सेवा में बहुत बम की सामग्री प्रभावित है। पातीय माषामौका पर मीस PिET में सहयोगी विभाहै। मिम्पितिको पशिया (...) मिण्टो में मियन ने य मूल गीता अपार सय प्रस्त घिया है। उपमुक्त सम्बों की सूची से सर मसाट वाहिली सो की अपेक्षा पहिन्दी बनपदों में, मरतीयोभोर अमारतीयों दस प्रति कार्यमा हिन्दी बमपर तो स्लिप, एस्विर और मार दी मारे भाप । पूस, सोमवाओं की भोर मन विचपी गिर अध दिया गपा, मिस्ते लोक साहित्य की अन्य दिशाएँ दूर मरबा सी । मामाभापियो रामो-साहिल्यावर प्रत्यय म्पस मोदी सरिक तारो, प्रक्व नही हैटम मोद- पीप रिमता भी सर मिररिया कैलाप और धर्म-प्राय माम्तीय मामी सप्पन पारसया ने प्रान्तीय मापाभी मौलिक सारिस सम्मान भी परवाही, इसमें एक मही। २. पानीमाम्म में चावीर नेता पोर मारपउवायरूपता पिन मार (भा मिरविणार) • रेपिर 'गोरा' (अमरी, )में प्रशित 'भारतीय बोधीप्रीमो समीप २७ + लोक-साहित्प-सकलम की परम्परा भारम्भ हो गई थी। उसने प्रासमापिपा के प्रपत्नों से प्रेरणा सेर हो- सारिस्म के प्रति रचि-निर्मात्स में योग देना प्रारम्म पिया । इस प्ररणा और पचि के में पदीय मान्दोलन और इने गिने साहिस्पिको में निहित चनोन्मुसी स्नेहन पर मी वा । कुछ अंशों में जोम्मानसी म्या और भोली 'विपा' अमिम्पक्तियो' प्रभाकर्पण मी अमर रहा था। २ हिन्दी में पपित सोक-साहिल पर प्रमय राशने के पूर्व, भन्म प्रान्तीय मापानी में ले गए पारों पर एक बम हाना मारमा है, बिनम गुपपती, पगला, मण्टो, पंचाती विशेष रूप से अप्रपोप रही हैं। गुजराती में मोरबा मेपापी र सम्पान्ति रशियाली एव' (१ भाग), 'सुमन' (२ माग) तमा शो-शाहिस्प', रसचीवपय मेहता लिखित 'योगी' और नर्मगरकर लाजराकर मारा संग्रहीत 'नागर स्त्रियों गावा गीत' ठाननीय है। अंगशा में 'लूमपोर का' (योगीन नाप सरपर), गवार - १९१६ (मनीम माप ठाकुर) 'हम्मदी' (महम्म मन्सूरहीन) मोर पंगतार पाउन' (गम्तीमुरी), पानी में "बाप रे गीत' (4 पमशरणवाट), 'गिया' ११६ (केन्द्र सत्यापी) मराटी में स्त्री बीयन' (साने गुरुजी), साहित्याचे मूलपन' (पामय पोरम, 'भपौरपेय पाहमय (मज्ञापार रेरापोर ), 'पी सोक गी' (गोरे), 'लोगो सोफ्या' (पोशी), 'लोर साहित्याचे लेगे' (मानती दापोर) या मशरण महीत ऐतिहासिक पोगारे' एवं ॐ दुर्गाभागप, रॉ. सरोजिनी बाबर प्रादि के सर मेव अशेखनीय हैं। नेपूनरी गंगाचरम ने हगमग ५... तेलुगु होमीच संकशित किये २१२ दी गन्नायम् न तमिल लोसमामा के दो संप्रा, गोपाश पिश्वर ने मञ्चपास्तम योगोत तपा 'मालिगे रया' असे लिखित मयन इस दिशा में सपानीय सामग्री। सोर-मादिस्य संकलन सम्बन्ध में यो पपिम्पितियाँ पम्प प्रान्तीय रणि, 'पागोषमा कहिन्दी-साहित्य विकास प्रम में पोलमार्ण की पटमि' गीपक म सपकाखेप प १५ . - २८ भारतीय लोक साहित्य मापामारे समय नीती हिमी के सामने पी। २०ी सो पूसरे बराक में 'सरस्वती' मासिक से प्रोत्साहस पार भी मनन रिपोरे प्रयत्नों से 'सबरिया नामक गोरखपुर पिले गीता म एस धोग मह सन् १९१३ मे पञ्चशिक्षामा । शिमीम शोष-सादिस्य-संमान के उपोग पपही से मधमत्वाल प्राम्भ होगा।'मी दिनों 'मस्ती' में सन्तपम पी.एपंगाची लोमगीत' मधरित हए ये, (बिन संबर्षित संस्कार १८२५ में चाली गीत' नाम से प्रकाशित मा) बिनसे 4 रामनरेश पिपाठी प्रय ही प्रमाक्ति ए गिना रो। सन् १८६ परमात् बड़ी गम से इस क्षेत्र में पुस पड़े। परिणामस्वरूप 'करिता-मौमुरी (पॉपणे माय), 'हमारा माम-साहित्य तपा 'मारवाड़ी गीत-संपर पुग्त विमाप हमा । 'पिता-कौमुरी' की भूमिप्र में प्राम-गीत-संबरेपर्य में पाने वाले शीघोत निपलीकी ने ऐसा दंग से किया है। अपना सर्प प्रारम्भ करने के पूर्व सरस्सी' में इस गीतों को लेर उगोने मे लेलो थे। 'बाँद मासिष्मी उस परम सहयोग रहा। त्रिपाठीबी की सगन भौर वापरता अनुमान उनएर पप-पत्र से कीगिर- में विरही है पति पर मबम मेस । माजी राजे गीत की पूम साम। आम बरा पेवा नहीं की निमकी पार मुझे चाहिए गीत गा शिसमें हो रुप पार ॥' बताया गावा(हिनाकीपुर निवासी माता गाएर मायबरे मम् 147 में 'मुसामा नाम गोगमा संस पार स्पिा पाबो मेलाने में यही प्रापा। पवित्र संग्रा ग्पमाप दो घाव हो पा निरचयपूर्वक राजा पाnि प्रेमीकाममालान्तर हिमी में मी मार-मादिप-संकलन कामे परम्म रोगपापा। पिता कौमुसी' (ो माग)ी भूमिमा - 1 A" सोफ-साहित्य-सकसन की परम्परा २१ त्रिपाठीमी की मावि १५.के परमार भी देवम् समाधी मी मीतों की लोग मर गए। भिपाठीमी का क्षेत्र संकुचित और विकनिक रहा, पर सत्पापीनी प विस्तृत, चितरामा [मा और माना प्रपान । उनाने मारतीय प्पो में दूर-दूर तक यात्रा की, गीती प्रसंसन किया उनी गीतों पर 'मार रिम्प'पक्ष शिरा और हिन्दी-उन के पना में कम से शिसवे पे। सत्मार्थीपी के पर परिमम और ममशन प जब ऐसा प्रमाव पाकि सिम्बर, १६ मे लेना से माशाप बरसे हुए गोपीबी ने कहा था-"पचास से अधिक भापानी ईवीन लाल गीत संमार गनाई छोटा भम नहीं है। तुम्हारे पोस वर्ष इसी काम में हर्ष हो गए। गोपीची इस पर से यही संत मिलता कमी सत्यार्थी सन् १९२० से ही गोठा श्रेयने में मस्त हो गए और मतिदिन पीसतन ४१४२ गीत एका पणेय। शो-साहित्य-संसान के प्रपमोत्थान की अवधि सन् १८४२ व समममी पाहिए। इस पोच पत्र-पत्रिप्रमों में रसी-पटाले मोती श्री, भंगारी और रिसी भावनामा मति, 'मार मोर पार की प्राधियों से मोमिल क्षेत्रों का प्रमशन होता था। परस्पान और मारपार एरप इस मानोशन के प्रति जागरूर हो गए थे। सरण पाकरे प्रसन्नों से राजस्थानी गीधी पसंकलन एक मुलामी हर पर वि से भारम्म से गया पा।वो भी प्रमुख रूप से प्रममात्पान यमनरेश त्रिपाठी 'पीठा कौमुरी और रेगेन्द्र सम्पानी के प्रमानो क्षेती से प्रमाणित होर, रस खो-मीचा संशन तक ही सीमित रहा। सन् १८४२ के पश्चात्, दिमी में अपने रस 'भूमधन' के पति पर मद भागस्ता उम्न दुर, बितरे पीछे पनारसीस पतुरी पी मीरप पोबना', व्या रॉ पामुरारम्य प्रमग्री पर पापाशी मोबना मापारापी सिद्ध हो रही पी। राहुल सांस्पायन लिखित रेप सपा'परतो गाधी' मानुस-प।
३० भारतीय सोक-साहित प्रालि मानम्पपामा प्रश्न शेष' तपा शिवराजसिंह चौहान की प्रान्ती मायामों पर निकन्य-प में लिली गई Rपोर्ट', अपने वैनिक शिकोप माते म प्रभावशाली । ये। इस चारित मापोह भ परिणाम या मिन् कोप-पता-साहित्य संग्राम के विषय में सोचने जो, कि किस प्रकार काम किया बार कुछ न मी प्रश्न उपस्थित चिसोक-सादिस अपवा लोसाय माहित्य संम से स्पा होया, उपा साहित्य उमसे किस प्रभावाम की सम्भावना भी मंशा में प्रथम प्रश्न की समस्या धाम मी बनी है विरुष स्परीकरण रिमी- मेस की मार से नहीं मा है। प्रम करने म परन हो पाना २ प्रभाष मे भागे भी बनाए स्पसारे भी राहुल सांस्पायर ने १७ में लोक-साहिस्स-संचार लिए घर पुने बाने विषय में साधारण वोर पर पोचमा प्रस्तुत करते हुए लिखा है- (१) माया ऐसी शे, रिम्स अपेवाश्य योग शे। (२) निस मापा ( सवानियों अन्तर ) भनेक रूप उपक्षण रों, मिस्से सुबमामा मष्पर में पूर्व मरर मिल सके। (१) यहाँ मापा-तस्कर वया उस प्रयास मी मिस परें। (४) बाँकी स्थानीय संस्थाएँ हमके लिए पार हो । (५) माँ उस्माही लेना और कार्यवां मुसम हो । (१) पत्रिम बाटी समाप्त किया जा सस्ता हो।' पूमरे मथान में सोमी अम्पस और सोत-साहित्य संधान के घर लेप बनपगेय संस्थानी ब्रतेबी से निमाप हमा में 'अयसादिस्परस', गावास में 'गापाती पाहिस्प-परिणा', पपेशलरा में 'उपम साहित्य-परिषद, बुन्देशाला में 'ताम्यावा साहित्य- परिप' मोगर में 'मोजपुरी सोक-मादिर-परिषद्', राबत्पान में हस', सितम्बर In . पिण, भिमकामसिंह चौहान की पुस्तक 'प्रगविगा' पाच मियापारी-शिमीनी स्मालीप मारा ,
कोक-माहित्य-सकलन की परम्परा
'भारतीय लोकमा-मास' या माशा 'माता साफ-साहित्य-परिप
भारि मय इसी पचर की संस्थाएँ है। नितीम अपान का बल प्रमी
एमाप्त नहीं माना सवा । प्रत प्रपमास्पान की प्रथा भनेकपामुखी
प्रफनी की दिवीय उत्पात प्ररिक माषपूध है। सुविधा लिए
सक पाशरे प्रपनी पर निम्नलिखित शीर्ष भन्तर्गत प्रकार गला
पा सपता है-
(क) योगीता व संक्शन (म) शास्त्रीय प्रशासनमुक्व हो-
गीतों के सपा, (मा) मावनामक रंग से होगीतों पर शिसे लेता
पर
(A) सोनपामौ का संकल्प
(ग) सोक्तियाँ एवं पातों के संपा
(प) माधोयना-प्रपान सोम्यादा-सम्मन्पी माय प्रवरा प्रम्प
(क) सोम्-मावा सभी पर-पत्रिमर और
(प) कर पफ्न।
()()हिली परेशरतमान बोलियों में रितीपोत्थान के प्रम रावा
में, प्रमुख रूप से मारवाडी, रावस्थानी, भोगपुरी, पचीसगकी, निमाड़ी,
मैपिसो, गुन्देसलसी, माशगी प्रारि गोलियां मचे गीत-स्पद मशित
हुए हैं। इनसे मिम पोलियोरेमी व गीत-समारो पुरे, पिम्नु
प्रभारी प्रभा में टनका प्रधान नहीं हो पा रहा है। प्रशित
संग्रहों की वाशिम इस भरगी-
मारवारी। १ मारवाड़ी गौव-समर (सेवाराम माली), २
'मारपाली गीतमाला' (मनमा ऐय), ३ मारवाड़ी गल' (
पर बर्मा), ४ भारी स्त्री-ति-संग्रह' (वायफ्न मोमा), ..
'मारणाराम-गव' (अगदीरासिंह गेहसोत)।
रापरपानी : १ 'एबम्मान पा' (B. उपेषम सामी)२
'पापान के लोगीव' (स्पमण पारीक, टाकुर एमसिंद), ३ 'पर
स्माम के प्रामगीत' (मपेनम सामी)।
२२
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भारतीय लोक साहित्य
मोगपुरी : 'भोरपुरी प्राम-गीत (प्सर उपाप्पाग), २ 'भोग
पुरी लोगीतों में कम्पनस' (खुर्याएर प्रसादसिह), ३ 'मोचपुरी प्राम
गीत' (मार)।
पचीसगड़ी : 'पगड़ी कोकगीत (स्याम्मरस एरे)।
निमाड़ी : 'निमाड़ी ग्रामगीत' ( रामनापय उपा-माव )।
मैमिली : 'मैपिली लोगीव' (रामापाशसिह 'क')।
बुन्दलसटी : 'मी फागे' (स म्यानन एप्त)।
मालवी : 'मालवी लोर-गति' (माम परमार )।
कोरपी: 'भादि हिन्दी बीमारियाँ और गीत (रास सोपस्सन)।
उक्त संग्रहों में प्रामासिर गीता के अतिरिक, मूमिकामा म सम्पार
हाप लिने गए साम्गीत-सम्मभी मिषन पठनीय साहित्य है। 'मोमपुरी
प्रामीची भूमिम भी बसरेप उपाप्पाप ने हममग प्रोम
क्षिती है, घिसमें गीतों के परिपर, मारतीय और पानास्प परम्पराएँ,
गाने रंग, INR, मौगोसिस प्राधार मादि पर प्रत्रय शासठे हर
मन्त मे मोबपूरी पारस की प-रेखा ही है। इस प्रकार पोश
मी अपने महती भूमिका में सीमगीत श्री ताक पहुँचे हैं। राम
स्थानी शोम' पचपि मेरा संग्रह है, पर सूर्यकरण पारीक ने १२
पठाम राचस्पानी गीता परिम-पिरलेपण अस्पम्त दी रेशविक
परति है। गीतों की गुनगरमा परियाँ और उपमात्रा
भी नाशिम, उपके गीतों में गहरी पैट के पोक। मुभी कामो'
हुन्देसतरा एक लोभी की प्रचशिव फागों प संप्रदर। मानमः
गुम लोम्-पि पीचन और रपमामा पर प्रभा रासने पानीमा
रिमी-सोगीत-आहिस्प में अपम पुस्ता है। उस संग्रहों के प्रति समय स्प
हे पसीना सपि होगा कि छनमै पणाप कोणता प्रदेशाविषमाप
'शा संग्रह में उप मोगपुरी गीतों में ममिमी म्म देने
की पराकी, मिठसे गोनों के मूब मना हो गए हैं। प्रत्तपुर
लिमे पा बाम तिमीमामा सम्मा।
है सोक-साहित्य-सकरन की परम्परा पूर्व कप क्लिप नहीं, वापि के हारा भागी मध्यस्न की नींव भवरण तैयार हो गई। (मा) माझ्नामा दंग से शिले गए लोमति-सम्बन्धी सेकयों के अन्तर्गत स रेन सयापी शिस्ति १ 'पती गाती है। (१er८), २ 'पीरे पो गया' (१९४८), लापले माघी पत' (१९४६) और ४ पाचन भाये टोल' (१८५२) पुस्तकं पाती है। इस दिशा में सस्पार्मी अशे हैं। या तो उन हमने प्रयमोत्थान का पक्तित्व माना है, पर पूर्व सपिस उनकी को-शाहिस्स-सम्बधी सामग्री का प्रकाशन दितीयोरपान हमा । अत: मस्चिम में किसी गीती पनि की मावि उनम प्रमार बना भा है। इसमें सन्दह महीं कि अपनी भाषा और ऐलो से सत्मार्थीजी ने हिन्दी के एक बड़े वर्ग को होगीता के प्रति प्राप्ति किया है। गीता के प्रति मामा-मपान पहुँच हो र, तुलनात्मक परिप्रेय पा समेत पपा सोसावा सम्बन्धी प्रशित सम्मपी र एमोपित शन, मौर फिर उसका सम्मोमारित समय पर सस्प हमें उनके लेती में मिलता है। निश्चय ही उनके संप्रती में मूस गीतों की सफ्पा मारे। पपि गीता रेशिए उन्होंने भनेक मान्या में प्रमाण पिणारे, पर ऐसा प्रतीत होता है कि होने के नाते मनोने अपने लिए, र गौतों की मधुर पकिमाँ ही पुसी है, अपनी रोली पे तमोंने सतव निधी पर्चा की सो मारे। इसलिए या साधारण पाठकों को काम सती है। सत्वापानी पर मासपूर्स पर्ष गीतों के अनुवार-सम्ममी शैली के विषय में है। उन्होंने सोभर पिया है-"भार मी एकारे। सपमुप पर पी पिम्मेदारी प्रम। म एक राम पारा, एक सम्ममा पंक्तिभार अनुरागही अतष्ट्रीय सोनगीत विशेष में रोसी "पहा मी म गपा,ने ठिी न किसी रोमापिए श्री सहायता से गीता प अनुवाद वाय-साप तैयार करने मम्म पारी रा-मस्पेशमा परती गावी, पामुफ्पूपर - भारतीय लोक-साहित्य अनुराद, यस्येक कड़ी का अनुवाद अनुबाद काले-करते में इसी मन में अमरा अति से प्रतिपक्षोठा पसा गया ।" सस्पागाँधी अपने कुब सेखों में शोकमत-समाप्रमुमय मी म्मक रते गए, चिम्से मीवों के खशेखरे अतिरिक्त उनमें पानी-समय मामास मी मिलता पाता है। (स) लोपामा समान प्रयास हिन्दी में गीठ-सचान की अपेक्षा मात ही मामा है। गे रिकर एलसि ने अपने फोन यो मराग्रेशल' की भूमि में प्रसिद्ध शामता मार्म पाउनका प्रणमाम मक मिया है कि मारत या छम परोसी देशों में सरामग २... शो-पाएँ लिरिषर होकर मशित हो बुध है, बिनम पंगत सपास परगना और मम्पमाप्त से लपमय ६ .याएँ प्राप्त की गई। म. एलपिक ने अपने संबह पटेइस प्रॉफ मागल' में १५.सा प्रम्प सपनामों में ५५ रूपाएँ मलिन की। म्यूम फीर प्रतो कामा कि भारतीप सोमपानी में संस्कृत-साहित्य की ही गापाएँ पनिव होती हैं। उन्होंने मागे पर कहा है, "विसे हम मारतीय स्पा-मादिस्प पते हैं, पर पास्तव में परिवार सपा-साहित-विमती, मंगोली मपूर मारतीय, पीनी साहिस-की है।" प्रेमबी सिमी हाप सो-पानी पर कोपा इमा, पुन प्रविष होर मी प्रामाणिक सम है। इसके कारण भने । मुम पारखी उनके शिसही? मनोपर और रोमापक सीमित रहा। पास्तव में या दिया उन्हीं लोगों के सिर प्रपिक मुशम दो अपनी मामों की पोसिया और यहां मकियों की प्रास्मा से परिक्ति हो। इस रिसे हिमी म स्वसे इमानदार प्रयास पं शिकसहास धनुर्वेटी पारे। उनाने पुन्देलारा की सोमवाओं मगह तैयार किया, वितम स्थान और पासारखाप सोनसायी की स्थिरि मान दी। एसी भर गरम्पानी और मसरी तार-यानी समर उपरोसनीय है। सामान्यतः हिन्दी पोनियों भी हिन्दीमाप्पमप्रम दोग - सोक-साहित्प-सकमन की परम्परा परमनिक प्रवचन की प्रथा सहित पैरिक संत, भपश, पाली, भासामी, सिमती, चीनी प्रादि में फैले हुए शो-याओं के सूत्रों को लोबमा उतना ही महायपूर्ण है बो बिना मूस पामोरे (म्म स्तर मौत रहित ) सिश्चिद किये बान से पूर्ण नहीं हो सम्सी। भाभी की भेगो में मीत-कपार मी मादी बिनभा सकसान पापा. रातमा नहीं के पयार है। प्रत सम्पमित मस्तियों की जान से इस दिया मम बप कम होगा बारहमापी संपही से उत्पन्न प्रान्तियों पर नहीं होने की। (ग) लोक्तियों के मनिए प्रयास में मीच हिन्दी मे पिसने गली, पर विवादप प्रश्न है। फिर मी दयालाच सहल रे मा म तपाइमा मैननिरिण मिश्या है। लोकिमी के पर्गव मुरारे अनुपम मसूत्र साविक एम-मोचना और पहेलियाँ भावी है। हिन्दी-मापियों के मिर मुरावय-भेष पसन्म है, उसमें प्रान्तीय पोलियो भनेर गोकोकिपा का समावेश हुमा है। फेलन की 'शिरापर्य मोफ हिन्दुस्तानी प्रासम्म में भी कुछ विहारी भोर मोबपुरी हाकियों के प्रतिरिफ पम्प पोलियो कमिमा प्रेमी स्थान दिया गया है। हिन्दी में अभिभेग मुहावरे झाकियो प्रान्तीय मापामा और मोलियों की सम्पति है, पर उन्हें मूल रूप में संग्रसित रमा मनापरयो से पार है। ससस, पानी, अपश भादि प्राचीन मापामो मे प्राधुनिक होफिया भने मामासस्प विषमान पर प्राथरसको हाँ लोग सिपी मूल कीम्मीबाम, वहाँ पारम्म से प्रभ तक उनके मिन्न मिन्न पो म पता लगाएर मन मनोखनिक माघ्न पिमा पय । हिन्दी में पनपठीस सोधियो भी प्रकाशित पुस्खा रस पॉप ही ₹- 'मेमा मात, ला माग (सभीशात पोशी), २ 'मासणी पहार (सरलास मैहन, 'यस्यानी मीती भी माय, रला माग (मनरिपा), । 'परस्पानी पहा (साताप साल), और .. 'परस्पानी सामों (शता, २..)।
६ भारतीय लोक-साहित्य अंग्रेवी ने मी इस मोर पान रिमा पा । भी देना सत्यार्थी ने किया फुजे प्राधी रात' में पंचानी मुहापप पर एक प्रथा मन्द दिया है। परे मियों संग्रान प्रयास सदोषामक नहीं है। रामनरेश त्रिपाठी ने 'परिता कौमुदी (पा ममें उत्तर प्रदेश की कुछ पहेलियाँ री है। र्पा, पाँधी, पानी, सती मारि के सम्बन्ध में पाप और हरी तपा भन्म पर कवियाँ बाप प्रपक्षित की गई जातियों का एक माया त्रिपाठीची ने शादी में तैयार मिया है।५. गणेशात नि ने पीय, प्रारत मारफ, भाग तथा प्रहाँ प्रादि सम्बन्धी एकम-माता सम् १६४. में 'पयाची प्रताप', वासिपर मै सिठी पी, विटमै बोभेनिनी प पर खासा समावेश हो गया। 'मालती मोकोक्तियाँ एक नया संमा सूर्पनाप- पण म्पास के सम्पारस में छप पारे। सोकियों और मुहावरे बा कान्तियत से गुस्से ३, का उनके स्मो मे परिर्वन हो पाता प्रमामा नहीं । परिस्थिति की मार से करा व दो किसी कर्म तक सीमित होती है, नर होती हैं। पर पाबारेमा गाने से मनुमसभाप के साप माम् और साकिपी उपसरस पराने सम्व है, वमी उरका माग रतिराय भोर तप ररिस पाता। पहेलियाँ, चिम में प्रमोदय' मा बावा रे, भस्पन्ददी भाप मात्रा में संकसित श्री गई, पर स्पट है। सरिफ एसपिन और भार्पर ने सन् मेन इन एशिया में एक से मिला था', बिमम मम मुलझे हुए पेशनिक सिगरेमाने मी मरे गए मपनों की अपेक्षा प्रागेकामा है। सस्पेन्द्र ने पदचिमों रिमस पर अपने विचार म्पक शि-"मारताय में दो दिसते 'प्रयोदय का पालन मिलता है। 'भरमैच मन में प्रमोस अनुप्यास कारी एक माग बा। प्रसौ पापारिक बलि से पूर्व, होर और ग्रामद 'एम इपिध्यम रिसपुष्प, प्रक,मरपा . मोर प्रॉन से ।
लोक साहित्य-सकलम की परम्परा प्रमोन्प पछते थे । रने पृथ्ने का रेवल इन दो ही अपियर या। इस प्रकार पहेलियों का प्रयोग मारतवर्ष में हीमही, प्रम्प पेशा ममी मिलता है। (प) लोक साहित्य-सम्मपी पेशनिक रिपोप मफ करने गाणे (दिया र), हिमी में विल गे मासुदेवशरस प्रयास सिलित पिषी पुजा और में सपेन्द्रशिस्ति च बोक-साहिस्प का अध्ययनरीमत्प हैं। यो पाच कित्सायनले प्रतिपय फुटकर सेमी में मार्ग-दईन की अरिश समपी मिलती है। यह रिया ऐसी है रिसके प्रति सबसे कम प्पान दिया गया। इसम मुस कारण मूल साहित्य संसार का प्रभाव रे।बोबम परिचम में प्रिम ने ना, यह हमारे यहाँ रों पर शरथ और एस्पेन्द्र ने किया है, पर मानना अत्युक्किपूर्ण न होगा। (1) बनपदीय साहित्य के स्थान के लिए निरन्तर प्रयत्नशील राने माती पत्रिय 'मधुर' भी बनारसीदास तुगी सम्पादकत्र में पर्षों से स्कए रही। उसमें प्रामा कुबेरालयासो-पाहित्य सम्बन्धी सामग्री पती रही । 'मधुर' माध्यम से टीकमगा भासपास के प्रान्तों का परत सा मा-साहित्य संचलित मिग्रा सच। भी वतुदी अपनी सम्पादकीय टिप्पणियाँ और पम्प सेखी में 'अन्तर्धनपदीन परिपद की स्थापना पर बराबर बोर रेते, पिससे इस रिण में पारित न मिश गरा। अचमपाल से 'कमी प्रपन हुमा। मारम्म में प्रय ही पर सोमार्ग-साहित के प्रति यासीन रही, पर शीम की पैचारिक भान्दोचन प्रमाक्लस्म प्रमोसोम्साहिल स्पान देने लगी। सन् १६ मे मीप्यान गुप्त रे सम्पारफ्त में सोमाया परिपर , टीकमगा पाप एक अत्यन्त ही भेट मासिक पनि 'सोसाय' प्रकाशित होने सगी। मा परिभ भ प्रशन पन हो पा । ति इस बीच अपने पेशनिक, टोत और मुम्पास्थित प्रयासी रे मरण पत्रिका अपने बैंग की मरमपूर्व स्तु म मा । इस परिधा कोप- 'सोसाहिब का पप्पयर', पूछ २२-1 । .
४ अपारुषेय वाङ्मय 'अपौरपेय गारमा मारतीय मापामों में प्राप उस ताहिरण के लिए समाँ मनोग है,बो साधारण मानपत यही प्रथा पा साहित्य विसत्र सबन देवताओं एपमा है। प्राय मारि मम्प इसीप्रसात माते हैं, किन्तु यहाँ उक पाराय शि से 'अपौरव बारमय प्र प्रयोग नहीं ला मा पारे। अपनप पूर्व मराठी साहित्य को प्रोता सेलिया कमला बार देशपार ने 'प्रपोम्पेर पाइमप' प प्रयोग उस लो- साहिल के लिए नियमो पुष्पा बारा रचित नहीं, परन् बिम्से सबम प्र खम्पूर्ण मालिकों को प्राप्त है। ऐसा साहित्य स्त्रियों के पीवन में मरन्तर उपयोगी है और इसके प्रमात्र म युमा से पसे माते हुए रस बोक्न प्रम में मारी म्परचम उपरिपत होने की सम्भावना है। इस पर प्र जाहिस (मिरोप कम से शो-पहिस्स) मातीय-प्रमारतीय ती भाषामा और बोलिया में विपमान है। स्त्रिया ने अपनी वृतिमी अनुम्प, नामसतिगरा अनुनिक, प्रौपचारिक एवं मनाममा पाहिप म निमाय लिया। उसके सपन प्री निरिक्त समय नहीं। यह परम्पपगव 'मुति' सम्पति है गितम प्रत्येक ग्राम्पा में स्त्रियों ने अपनी मोर से इक पांग दिया है। मुमम सोध्नादिस्स प्रे परि पुष पाप्म्य और स्त्रीवादमय इसी Yo मपौरपेय पामय स्पून गगों में विभक परें तो स्चिय ही स्त्रो पाध्मय (भपौरुषेय) मरर पुफ्ष-बाध्मय की अपेक्षा अधिक रहा होमा। पा ऐसा साहित्य है चिसे 'भवरों' का मन नहीं है, यो पुस्तकों और प्रन्पों में स्पाही साप स्पिर नहीं किया गया है, सिके रचयितानी प्रतिसोधे मन नरी रे और फिर मीन मे विस मिरा स्त्रिी के विभिन्न प्राचार दिनार और अनुष्ठानों को गति नहीं है। यह स्त्रियों की मापीय पोपित है। पर उनकेएम पर प्रेरा गया है। उसे परम्परामा संस्था स्पर्य प्राप्त है जिसके द्वारा मुर्गा पूर्व श्री नारी अपनी बेदना, हर्प, निपार, भानन्द या ग, उल्सार, योग, वियोग, प्रता-बा, प्रथा, सानि, भारि से गुम्फित भाषी को पार की नारी दर 'वापिका अभियान राय पहुंचा रही है। मौसमय मारमय म्मी च की पो भवमत में फैली है, पर पर्वमान में प्रगस्पिट पाम शाब्बएँ, पत्र एष पुष्यों के मीतर एक सामान्य रस का सम्बार दोपा है। यह मुनि-परम्परा के मामय से ही प्राप्त हुमा मान-सम्मधारे विकास साप-साय लिया गया साहित्य मयः दि पाने सगा। परि हम उसे बों के पूर्व ही प्रारम्भ भिमा दुमा पामय मान नवो प्रस्युक्ति न होगी। मपपि भाव हमें उस बाल साहित्य का मन मही, भिन्नु उपशम्भ होने वाले साहित्य में प्रशिर स्वैग माचिस दिमयम असीन नारी के मनोरेगों से मिन्न पदापि न होगा। अपने निरन्म में मना बार देशपार ने मराठी माय की रष्टि से इस बात पर विचार किया है। भपौरुपर पामर का विपन-किस्तार कहाँ सफ इस पर मी स्नान पर्चा है। समप्र स्त्री-साहित्य पे उन्होंने दो प्रकार से वर्गात या है
भारतीय लोक-साहित्य
अपौरपेस वामप
इस्यम सम्प
प्रमार स्वरूप
पहेलियाँ (माया), लगीत, पाएँ, गीत (मोम्पा) श्री
रागीत, महात
गच और पपीरि निम्नशिक्षित वर्गावर
(पा)
अपौरुषेण बारमम
गर-सादिस्प
पच-साहिल
हानियों, सा पहेलिरों
गीत, फेप गीत, प्रगति
समस कीपर ए मा निरोप यिा गया है। समग्र
म ते भारतीय गीतों में प्रपोक दाम्मय प्र विस्तार की है।
[न्म ए, पातक से सम्पमित मात्र, पोरिती, पन्या, पाना, ससना,
पोरिया, पातरे मीत, मापन रे गीत मुमने, पपारी सम्मरि, समानी,
मुम, गीत, देवी-देवताओं के लति-गौत, निवार-गीत, जिनमें
अनेक प्रकार (), परना रे मोत ऋतु-गीत, मउपाठ चोर स्पोहारो
गीत, पति-पस्वीरे प्रम-सम्बन्धी गीत, पनिहारिम, भार बहन के पीस,
पालियों के पाते, मगो, सबा (मागा), पास्या प्रादि अन प्रथा
दे गत है। गय रे भवर्गव , स्योहार, मनोरंजन माटि से समनिट
- ने Am) स्पादि समीप हैं। मातार
प्रपोस्पेय वा मय पोवन में स्त्रिमो की स्थिति पाई सन्चापन यो फितु उस मामय के ते में उनम र प्रभुत प्रएस पड़ा था। मारतीय नो-साहित्य के प्रप्तामो को स्त्रियों के सोफ-साहित्य प्र प्रभात साहित्य काम से प्रवे उसे मोनिक, सामाभिक,मार्पिक एर ऐविहासिक पाचौ की कसौटी पर मी पसरा चाहिए। वर्षों से सन्तप्त, सास ननद भौर मौवार से तानों से लिम, पति की अनुगामिनी, से की रेलदार और बुगापे में उपेक्षिा गारी मिन्न-मिन्न एप उसी पाश्म में मिलते हैं। भरण्टी में तो स्विगरे गीतों पर स्वतन्त्र रूप से विचार किया गया है। 'सापियो गारो', 'स्त्री गीत-रलार', 'स्थी- गति मारि पसी तारे संग्रा है। इसके अतिरिक 'अपौरफेम वारमय अपात् स्त्री गी' मशा माई देशपार का स्क्वात्र प्राप्तोपनामक निगम विसभागार पर प्रस्तुत लेख में पना की पापही है। काल-निएय की समस्या अपौरपेस मामय का अल-विक्षन करना सुपर पर्य है। बदि इस सरस से प्रयत्न लिया बाय दो निश्चय ही उपयोपी सामग्री सामने भा सगी स्त्रिया अधिकांश गोठा पर में है। माप परे सभी गीत प्रपौरस्म , ना कर लिया पार तो मचित न होगा। साली समय में स्त्रियाँ मिश-आर माय पीत पोती है। पर रेक समाचौरेसा पो भायामी पंछियों। पा सहम सम्प्रभात स्त्रिों में रवि कृषि-सम्पदा के पाप-पान की अपेक्षा समृद शाविषप्त में अधिक ममायूस वी पहा संपर्प और निश्मिी-पोर परिमम पना पाण है वहानारी गीत गाने का प्रसर ही प्राप्त नहीं होगा। गीवी के निमास म सागत शति प्र पक्गित प्रयासों की अपेक्षा प्रति प्रमाण है। वैसे स्त्रियों पर तपोड़ने में पा होती । उनमें इस मतिमा मापारय स्त्रियों या पिकाची अमुक गीत भमुपस्त्री पर और समुद्र समय में बनाया गया या, प्रादि माते सात तीनही बानी भारतीय लोक साहित्य पा सकीं । मप्पभलीन गीत तो पत्र मिलते मी नहीं है, कम सके मी पूर्व के गीत प्रो उपलम हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में प्रत नियम समस्या एक प्रमुप्त प्रश्न पत्र बादी है। गीठी में अर्पित प्रसंग मोर संवों से सम्पपिस प्रसगत गान प्रारम हो गया है। उदाहरणार्थ मुगा रे प्रस्पाचारों का प्रान परने वाला एक गीत प्रस्तो। साव बहिनि मा मिडिया वीरे सिविपापरे सदौरे पर भी। प्रागै मस्कम मुगव चना परी मिसाल गीला भम रितु भाई गोरी भोमन की बादा परी गमवावी। इपिपा पासा करमागी। मारामागीबाजी कारियर पमा बेरी परी दोषी मार दी। इपिपामय पदमा मोरा मामजी। पुरनपोत माली बीसंगका विधारपीmu सिमि मोपमा गमिपा मारे रोईनोई ना स रहि महिना दी। ग्राम पर पाप पिपगी तुम्हारी ॥ साधिपादाप मोगमा पा बैगा प्रपये मकान भी। गई मारेरोरिया पौभाषा उपरा पपारे महगी।
अपौरुपेय वाहमय
पानातानो रामोस पगार नीशा
रोग-राय मारानी
मुष मोगडे मोरी मावा
इम धन धीमी रसोदाँ
रमाणु मर जी {}}
सिसि मोगमा कमी मंग
रोह गेह बना मे ती गाय जी।
पिता पारि या मरि गई
नमा तो होई गई राम जी ।
पमा विद्या प्रमाणपत्र
पूना से मरिंगा भEIR बी।
गरिने भोगावी
कोणा नाम ही EN
(बारा)
पति रामनरेश त्रिपाठी ने उक्त गीव इस प्रशमि है।
"ना अपनी पानी के साप सहीती से पार पर तोs ()
पीर रही थी। रने में मुगलों पहरम मा पहुँचा और उनाने का
कोपा सिपा
"पर बा ऋतुमा गर उपर पना पमीलाने में पी। रुपमा
सरसी मरी है। लाल महर रखी है। मुगल, मेसीकोदो १२१
हम पसा लग म पैसा, और न मास मारें। पन्दानी से हम
नहीं सकते। रसके साथ मारेंगे |
"मुगल त गर रोमी गार पर पाई और रोते-रोते मारे
सा नहीं जाता है। पन्दा नेपा-दारा, अपन पर पाभो, में हमारी
पगड़ी की खात्र र गीत
"माझ गली में बेटार पन्दा में अपने घर ले गया। गेहूँ और
मला मान सीप रामभरेय विपाठी एम .
"
भारतीय मोक-साहित्य
पने रोटी पनाकर उसने असर से उस पर गार प्रममा समाया और
प्रा-रे चम्टा रानी, यह बेमनार से हो ।
"रो-रोष पन्दारामी ने प्रामुगन, मेरी बात मुम । म साना
पना धीर म उठा साम्रो ।
"भिकर मुगलने पर मंगामा। घना से -रोते पानी
बावा । फन्दा चिता बजार बरा मपं और एक रोगा।
"पदापिता ऐसी धमकी कि पर-भर माँ मर गया । मुगल
की दादी बस गई और यह भी मर मिय"
निस्चय ही उक्त गीत मालों के समा परेका सम्ये मोरे पाट
। पामी सम्भव है कि इसमें प्रीप परिवर्तन हो गया हो।
सन् १८५७ गदर की परमाएँ तो गीता में मिलती है। उपरनिर
भी पीत लीगिए ।' उसने विद्रोही सिगारिपी म साब रिया पा।
इबरसिंहन अंग्रेजों से जाही) यलम की सेना से श्री
२ अप्रैल को या बुरी तर पापच उभा । पापल प्रपा में हो २३ अप्रेस
को उसने सान सभी सेमा से पुरिमा । मेरा माय गया। तीन
दिन पार इसपी मी मृत्यु हो गई। सम्पूर्ण बिहार में परसिद्ध पीत
रूपों में प्रशित हैं। माया के सजगत उपलब। बापान
वो एमे ऐतिहासिक गांवों का मसार। पहाही बाविया गाता में मी
स्मापिस प्रपितामोने मे मन-बम भल मिल मचा है।
इसी प्रकार रेखगाड़ी, गये प्रामपण, लारी-विषयक प्रमप, गांधीनी या
सक्सेस, म सधी के नाम, स्थान-र्शन, भारि संवेदी से पीता र सम
समय सानोमाय है। कभी-कभी परम्परा से प्रसिय मीमा में
म राम पाल पाग, मिनु इमसे पीता श्रीप्रामु मही परसी।
पुण्नी ग्रेसी न रेली से भिन्न होती ही है। उसे पहपालने में प्रसार
नहीं होती।टो पापमों का योग मी शत हो सम्मान और
परभारम्वारे । अपिग गीतों अग्रल निर्णय अनुमार
तामा
।
प्रपौरपेय वाह मय गम्य ही अधिक सम्मव है। पति-पिरोष का नाम गीत में मानाने से मी गीच का समय मिल पाया है। पुर की महंगाई का परिणाम स्त्रिया गीता में उपयोगी वस्तुओं के ट्यशेम के समय मनसा है। ऐसेर गीत हमै उपमण हुए है। सदियों से सम्बपित गीतों की मी कमी नहीं। काल निर्णय की रि से सदियों के गीत प्रस्पन्त ही उपयोगी है। मह पठाने श्री भागमता नहीं कि प्राचीन मारतीय प्रन्या मे अनेक स्थानों पर गीता के गाये पाने के उपलेख मिलते हैं। ११पी शवाम्दी 'अमिशापा चिन्तामणिग्य में सोमव ने स्त्रियाँ रा गीत गाने का सरस मिया है। 'संगीत-रनार' में 'मोषी' (मपटी) को एक गेय मकार पवाया, पपपि उस बात की 'भोषी उपसम्म नहीं है। गीतों को या परम्पप प्रत्पन्त ही पुरानी है। पन हम अपौरुषेय गीतो पर विचार खेर तो हमें उनकी प्राचीनता पर पौरपेय गीतों की अपेचा अधिक सिमास परमा पाता है। पुराने रामों के अनेक विझत रूप मान के पीता में मिलते रेपो गीत की प्रायु भी मोर देख करते हैं। स्वामियों पूर्व सद गीतों के माध्यम से बसे पाये हैं। राम को ही लीथिए । इसका अर्थ है 'पति' । राम पुराना है। परस्पान, मासा, निमा, यम पप, हुपेशकार, अयप भारि में इस प्रयोग वयपर मिलता है। एक मठी मीत में इसके प्रयोग को देखार विश्वास किया जा सकता है गीत प्रसिप्रापीन होगा : सासुबाई सासु बाई मबा माई मूम महाकाय पुमतेम परीच सिस पुमा मापुस्पा पाहा। परम्परा से पाले माते हुए गीता में मागाव फफ नपे सम्मापरण मा बाता है। न्नुि ऐसारा नगरी ३ विकलवा गाँवों के गीतों मही होता है। मसूर मामा के मीतर कम--कम पार पीड़ी पुग्ने प्रांत हो तीन शवाण पूरे मीत मिशवे है।
४८
भारतीय लोक साहित्य
गीतकी तीन भवस्पा
अपौरपेट पाएमम में गीत निर्मापीवीन प्रास्पाएँ पर दोब्बीरे-
२ सयभराम-रपमा,
२. सपर एम्द-रचना में भी संगति, और
३ अ-प्रधान मलम रचना।
मनुप्प में समारतः नाटपिपता अवस्पित है। नारयुक्त राम-रखना
में मपम स्मिति सशिप सब समय पी। पिरोपग से किसी बात
पोपने मान मात्र में उत्पन्न हुमा। मारमापम से भी प्रस्था
प्रकट ।। या संगति प्रफि उपमुक प्रतीव हुर। प्रपरे संवर्ग से मार
बेमाल मिकने धगा। बाद मी पर कभी-कमी दामी होकर अपने
मभुत्व में पनाने प प्रपन करता रहा। पर पूसरी प्रस्पा पी चितमें
मार भोर प्रर्य दीप विमसमम प्रेरि से संपर्ष हमा। अन्तिम
अवस्था में प्रामापानमा और नार पसाबोय सिप अनि
पार्य विय मा । प्राय पो गीत एवं पा प्राप्त है वे समी वाया है।
मा उपचासकर्ष महान पता।
पहेलियाँ बनी-ति, अपना मवस्ती उतर मारती स्त्रियों
के समाली गीसी में पिचंरात पर शम्द-स्पना मिली है। उता
स्या
सरर सरर सतरी सरकारे पापा कोन
मीठा मी सासरे ममाने पापा
x
भासम्म पारम्स, पपूर का गगे
गाव मारण्यो र म मिग
(शारका पा)
स, मी, दाना (मिमा में साला), पम्प, सात् ।
गागो,
प्रारिम्पो गीती में सपाइया साप प्रति सपाग एवं पार
प्रपौस्पेय वाहमय ४ पार पाने वाशी टेक लय की स्थिति बनाने के लिए माश्या होती है। 2335 पचोद पणे काठी प मुई पारो मेरी पर पत्तो-पणेर- (निमार) x पिन् पिन्क चिन्नई गबर बार पाम्हा पुरे x शाप्नु की शाम की तुमी मामी पासली पामाइ पगड़ा उक उगहरयो में इटैशिक पदक भयहीन है। अपहीनता का यह सदरमपमारस्पा का योतक है, यपि इनमें प्रागामी प्रस्भार कमरा मा मिली है। दूसरी प्रस्था में राम-रपया में पर्य की गति माने सगी। एक पमि के पश्चात् दूसरी पंक्ति सापक हो, इस बात का प्रपल गीतों में मुकर मुमा । फका सहाय को देना भी सम्मन म पा और न पेगा। निय टेक पायामी पळिया प्रेटर में मापा पहुंचती है। सरयुक अपंगत सम विना उसो मगर हो ही मही सम्वे । या तो बास्तर म पालसंगीत' काभम रही है। स्त्रिों प रचित सोरी गीतों में कमान्य गीतों की अपेक्षा मकी मात्रा अधिक पार पाये। धुम प्रथमा बबाल प्रमाण हेतु प्रयुक्त होती है। मोरेनाम पार पर पापने अपना पीन मानो बाम चो ने की प्रति मियों और पाधिमा २ गोता मतपसीन २० भारतीय लोक-साहित्य है। मर्म स्पति के साप म फसामकी का प्रदेश मी या। सूप मेमी, संचा, फुयामा पा फेरा गीतो (फेरी गापी) में वे प्रास होते हैं। स्त्रिया रे गीतों में सिम पान प्रणोदेनी पीस से पक्वरित पर। सस्नेखनीय पात्रों के माम्पम से किया अपने का श्र पटमाएँ एम्फिा कर देती है। इसी अवस्था में रनोचर प्रातिसमें विकास हुमा । विचार्य का उपय मनोतर रोगी के गीतों में सारणीय है। मराठी गीता में 'बावगीत (प) परस्पत-चना है। अन्न गीतों में मेरी पीत मासा शिपिल होते है। गरे गीतों के विपप में मी पही कहा बा मसा है। 'मोदी' पूरता को पहुँमा इमा परे। सम्बनेश्वर ने अपनी धोबी के सम्बन्ध में हापा उसे भी गा सम्वा ही गाये, अम्पपा पार ही परे। 'मोषी की मस्या के पीछे पर परम्परा मराठी मोर-माहिप में उल्लेखनीय है। 'उताणा' मराठी लोक-साहित्य की पूरी सम्पत्ति है। स्त्रियां प्रायः पुरुषों के नाम नहीं लेती । हिन्दू स्त्रियों का परमपान पक्षण है । प्रशंग निरोप पर या उने अपने पति म माम सेवा पातारा मनोरमा ग रचना के माप्पम से अपने पति म नाम म्पक प्रती है। ऐमा सिम कि नाम लेने से पति से प्रापु पीच रोती है। इसी परच प्रफम राम प्रया बासिय नाम भी नही मिरे माते। सन सिमी बनाम से पुपप जाता है। सनेश्वर के समय 'मामा परम्परा रिपमान मी। पिमपी सर' में एनाप ने भी विवाद प्रसंग में इस पप्पणप पभोचित पपर दिया है। 'उहाया प्रने स्प में सम्पर्य महापा समार में प्रपसित है। इसने न समन सिए मार्ग प्रशस्त है। 'उत्पपा एक मारकरे प्रचारपा रामी ममा काया । - पाप पा 'भपौरपेय पाहम', जैसा कि उपर बताया गरारे, पिमिन्न पाँ प्रपौरपेय बाम्मय में है। उसन विस्तार पुरषों के जो-साहिल प्रपेचा पो निवास है। गप के क्षेत्र में उपवास, ख, लौहार और अनुष्यमिक सोप-याएँ प्रादि इसके अन्तर्गव भाते हैं। इस दिशा में स्थान प्रन्य हिन्दी व्या प्रम्प मापायों में अपेचित है। प्रबफ्ठी में मर्मदारांकर सावरकर हारा लिखित 'नागर स्त्रीमो माँ गाता गीत' और मारवाड़ी में वाराचन्द प्रोमा पारा सम्पादित 'मारवाडी स्त्रीगीत संग्रह प्यान देने योग्य प्रम्प है। प्रायमिक प्रापरयन्ता ससप रूप से अपौरपेय वामय के प्रभावन की। वसपात् उसका प्रलोय सम्म अपेक्ति होगा। हिन्दी शारत् क्षेत्र में इस प्रमाव श्री पूर्ति होनी चाहिए । ।
।
लोकगीत क्या है।
पॅरी यनामुमार मोमगीत मारि-मार उमासमय संगीत है।
एफपी में पनपते हुए मानब मेंबा मोहीप बुद्धिमार और उससे पाचार
पर उपम माम्नामापुर घटे तो मरने के लिए उसने किस अमाप
लेना प्रारम्भ पिया। वही प्रादि-गीय परामा सोगव।
("This spontaneous music has beco called Folk sons)
प्रजी का राम Folk son (ोड माँग ) धर्मनी के rodulted प
अप है। समस्त बन-समान में चेतन अपेपन रूप में गो मारमा गीत
पर दोरम्पकर उनके लिए सोमगीत उपयुक्त एम्ब। भिमरे
शमी में 'मोकगीत अपने माप पाते है।"
बनीस मात्र प्रमिापत तो होते है, किन्तु प्रति मही। वहाँ
प्रति हो पाते है, पेण, मस और परिस्थिति की वाया उन्म पालवी
है। मीन प्रम सनम पारे । सो अंध में पाया और मिशाग'
एक प्रबार से गति की सूचना प्रबारस। गारपी में नाबारे
माप उठेवहाँ उनके बोल रिसरफर घर मही गए । वाममाया,
पहा, मैला पा रस्ती में अपरा प में, मापसी बातों में, पिएम,
पटना में, इस पनावे ए, पि, पुस समय, मेस-र पाहवी
माम, बहा मी दो प्रमग मलय प्रम पर गीत बनर परमे
छोकगीत क्या है ने हैं और मसते-मरतले, नये की और शमों की घोहोर के साथ कुछ समय टिक्ने अवश्य हैं। मये गीतों के साथ पिछले घुलते बाते हैं। ना पोदी, नये माय, यही गीतों की परम्परा है । गीतों में मान श्रीवण्य मही, मान-समति का साक्ष्य और म्यापक मावों भ समार होता है। मावो सपियों नम्वे-सम्खेवा-सी सच पेड़ों की नंगी राशा मी 'रफ' ( Rough ) और मिट्टी की सरा सस्प है गीतो की यह परम्परा च तक सीमित है, बास मानव मस्तित्व विएमान । मारि-मानर रेस्ट से दो विकस भाष मी निकले थे, शान्तर में ये गीत बन गए। गीतों के मरम्म प्रति एक सम्भावना हमारे पास है पर उस अन्त की हापमा महीं। मह यह पड़ी पारा है जिसमें अनेक कोटी-मोटी बारामो ने मिलकर उसे सागर पी तय गम्मोर पना रिया है। सरियो पात प्रतिपातों ने इसमें मामय पाया है। मन की विभिन्न स्थितियों ने इसमें अपने ताने-बाने बुने हैं। स्त्री-पुरुष ने था- र इसके मापुर में अपनी पान मिया है। इस पनि में पालक सोरे, भवानों में प्रेम की मस्ती पार है, पूर्ण ने मन पहलाए हैं, यगियों ने उपदेशों का पान कराया है, विपी युपत्र ने मन की फसफ मिटार है, विपवाभों ने अपने एपी पीन में रस पाया है, पथिों ने बच दूर की, रिमामा ने अपने पोबारे पेत मोवे रे, मयूरो ने विशाल मन्ना पर पत्पर पाए और मौरियों ने अपने बोरे है। प्रादि-प्रा में पप सामाजिक चेतना किास की भोर गतिशत थी, स्ती समय ऐसी विद्या प्रबन्म मा विकता बोक्न से सम्बन्ध पा | पीरे धीरे प्रकृति के कुल मागों पर बर मानव की रिचय के प्रासार पाए वो गीती में मी इस विषय के प्रति मारमाएँ म्पकरें। प्राति के सिफरल गरसे पस्त पर प्रशा माना उसके सामने गम भी है। विभिन्न उपायों में इस मघर मुखने की अपेक्षा सामूहिक रूप से उस समक्षा पपने भी समम पोदे ही प्रपाद प्रा गा। एंगटन म मन मोर सामायिकता की भाममा प्रेसने समा। प्रत सामाधिक वल of ६ भारतीय सोक-साहित्य शोभीक-'प्रकृति के मार'-सु-महक से दूर, पारसी पोरो की सा स्यात् । सरलता, रस, माधुर्य और बहन गुग रें। मत इम ठगारो को सबाने में पुस्पी दीप्रमेया स्त्रिया अधिकार पारे। काय, हास्य, भंगार मादि रसों से मरे ए मे गीत कपटों से कर सुप-मुगों से पराठी ही पर सेशते पसे पाये। समप ने इन्द कुचलने प्रयत्न पिया पुचो मी गए, पर भर तक मन्नावशेषों की भाँति मौरव है। गीत ममते और विगाते हैं। विहास इममें दिया है। देश की कालीन रीति-नीति की मानकारी में इन गोवा में मिलती है। मान-पाति रिम मापनममना इन fat कीरही पर बात है। नारी-सबकी निगालवा एम पग-पग पर इनमें पाग। माता एयमे अपने बारे प्रति उटने वाली मुहानी लोरिया, मिस्तमरिया में वापने पाप्ती मा-की वापन, पिथमा की सक, कन्या परस्प, भूसे की पहा, पति-पस्नी मिशन-मिरा कपा, सलादने, पहेलियाँ भाति में प्रोत-प्रोत है। मानव का म गीता में कम से सगार मृत्यु तर सान सम्मा। सन्म पर 'मोहर और 'अम्मा' गीत, विपार पर 'चन्या पली', ही भारि गीत, बनक पर पीव, परवेश-पमन पर गीत, प्रागमन पर गीत और पहा कलमस्म पर मी गोवा प्रगामा बाला एक बार रेस में मिला है। होगीतों का प्रमा विशेष मास है। इस समय में परि । हमारीमा विपरीरिधार मलेखपीय 1 प्रापन निा-"प्राम- पीतो समस्त माल यो पम्प-सौमी तरही सीमित महीमा एक बात ही मारपूस कार है एक विशाल सम्पत का मारन हो प्रात ग्रामस्मृति समुद्र में हो पाया ममम भी गारे। प्रार्य मागमम रेप पर ही समय प्रातर मुम्ता मारताप देनी हर पी, उसके माय भर मी पीसिया छाटो-मार्य सम्पवार इस नियम भू-माग में वैली दुरी माश ने यमनीका में दो माहारी लिय मा, पर यसतिर रूप में पूण म्प से यहां के मूल निवासियों के मोकगीत क्या है र मास्तिो पर थे। यहाँ यी मूत सम्ममा टिक सम्पवा पप्रम भिम भी और माय मी बोपचार, स्त्री-प्राया, पौरासिक परम्परा आदि रूप में विमान है। ग्राममात रस सम्ता र (इति)। भी वा अपने प्रारम्मिा पुग में भुवि मलवे । वेद मी माया प्रेमहान् पाति मीठ होरेनौर बामगाती मति ही सुम-मनपर पार किये पाले में । सौभाम्पायने पाद में भुवि से वरकर लिपि प प धारण पर लिप पर हमारे सामगीत अब मी 'मुति दी। विस मसर की ए प्रार्य समता प्रसान होता है, उसी प्रभर प्रामगीतो पण पार्य-पूर्व हम्पदा मखम हो सकता है। ईट पत्थर के प्रमी विद्वान पद सम्वाम एम, वो चोर बर मापा जाता है कि ग्रामात प माल 'मोहेन- बोडो से भी अधिक है। मोरेन- बोरी ससे मय-स्तूप सामगीता माम्पस प्रम दे सके। लोमति हमारे रिम्स २ तिहास की प्रत्य निधि से समान है। पातीय एरर उमस पुषल, मुस-सुन, गोम विग प्रादि की भाव याएँ मिरमान प्रयामा मचा रूपमा हरारें। इस समय रख-राशि को यदि हम बमा के हो भो हाम स्वरूप मिस होमपाष वारमा रापसमा विकास और राम मैतिक और सामाशित भान मात्रा में ऐसा सुरक्षित मा नारा हमारे लिए धर्माम मात्र होगी। सोमीनों में मारी रोष मार है। पय-श्य रे मात्र इसमें एमए । समाव प्रौनसा ऐसा सजा सिम रूप हममे । स्वप हो। बोरम में प्रेम और कोर तीमाएँ इसमें मिली है। अपमए सामी मोर मा इम्म पुसे र पोलती है। मानों की याद और , 'चोसपाही मोम्पी परिषद। स्पामवरण पुरे। इस्ता की भूमिगत पाया वापराब पत्र पहल, अदिता मेमरी, भार श्री सामनरेश हिरो, पुप..
५८ भारतीय लोक-साहित्य म्यापकता इममें ऐसे नामक दंग से पुस-मिस या प्रारपर्य दवा है। टीम 'सागर में गागरी किसाप परिव दोती है। सोकगीत लपनिा अपूरा है। पन्सारपसोपीरिग किराविक सेवामा पम है-"मी गीत, यहाँ तक किला ही भगत, लो गीता पर मिमर। पीवीस से ये गीत बिना किसी बाप-पत्रके स्थामायिक पयस्पर्शी स्म पतिनिबित्व करते हैं। सोमगीत माना जातिय से, अपने अम्पा बारबम प्रकृति-मश्च भागाप प्रभाव मार प्रार होने पासा मीच है, भीरपा बाम रथ करने के लिए भाषा की अमिम्पति निमिच बोलने की अपेचा मार गावापराम्पक मिापाता।" सीतको म्पास्य विमा ने की। मपरी रे प्रमाण औतारों सदाशिष फारे कापर है-"शादीय नियमों की बियप परवाह न करणेसामाग्य तोक-पवार उपयोग में लाने सिर माग अपने भानन्द-तरम में बो क्रोपर पायी साप समूत पवार, बही सोलगीत है।" पिसमाप्ती बीया साहित्य के प्राप्पापक मी कुमरिहार्य गसके शब्दों में "A Folk out is a spontaneous outflow of life of the people that live in more or less primitive condition outside the sphere of sophisticated Influ cncer" (जामीन लोगी के एम बीवन पवादात्मक अभिव्यक्ति है, जो मुखम्म प्रमापी से पार म मा प्रति स्म में प्रारिम प्रबस्था में है।) रेन्द्र मस्पायों सोप्पीत का मा पातीय संगीत र पाते हैं-- uced lies in community tiples." , मोर-संपति शिपांक, सम्मेपन-पत्रिका, मराठी बोगीत, प. १ पस्सी मारमोरिमय फोरमोर, पप । ३ मोर माई पौरम, - कोकगीत माह पिरोपता सिर पुदुनाप तरIR ने घोगी विरोषवार निम्न राष्ट्रों में 907-Bapidity of movement, simpllaty of dic t1oo. primary cmotions of univerul appeal action rither bo igbtle analyu broad striking chancteri ution, thub-nail sketches of background and the sparert use for rather complete avoidance) of Literary arutices-these are the ensentul requisite of the true billed (मपति, शब पिम्पास की सादगी, विम्यापक मर्मस्पी माविक मोर मादिम मनोरोग, म लिनु प्रायोपा परिवचित्रण, कापही अपना रेशनमधून प्रश्न साहिस्पिा कृत्रिमत्यमा मनाम्पिन प्रयोग पा सल्या परिम्मा तम्मे सागोरी निवास पामा विरोधाएँ हैं।) फ्रम्प निवान् मोशिए मोपर ने सन् १८५३-१४ में होगीतों के रामान्य लपसी पर सोनीव सेमारा समय अपने विचार प्रष्ट पिस ।मो अनुसार सोमतों प्रमुख समसनिम्नलिखित है- १ 'अस्पामुपासरे स्थान पर पनि साम्म प्रयोग २ पुनर्गफ (पोपकपन में जन, पाँच, सात प्रालि सेक्ष्यामी का बार बार प्रयोग नपा ४निक म्याही सभी प्रेसानेकोमा। मारतीय गीता मन परेप्रविरिक और मी लपल लेखनीय है, जिन पर मीचे प्रमा रातापाया। बामबान पावि-यह प्राधि पापीया की पोना। गानों काम, बिमाममिरा माम, रैनिक मार पीपली माम भादि पी में पार-र पाते हैं। इस मामा के पीव के पेवा सरबारे निपम नाम प्राय परम्पराय गीता में भारत होरपर बाते हैं, पर पे नामाप मी उनमें श्रेय स्मारिक है। । पनिर, होसमासास, पम" .
२० भारतीय लोक-साहित्य पाट पोहमा उसी प्ररारी पर पाबाट बोहना । पापि-सम्क्वा उस युग का संकेत है कि गाँव क्स पे थे। दूरी मस्तुओं को रेलने लिए पूछ गर प्रपा स्मृर प्रामों में भी प्रयपे पर माना नावा या। पाट चोदने की महशि भारतीय इतिहास में प्रसारमाणिों 4 प्रेरक रही है। ममोचर माधि-सीधे मना सीपे उपर । गीतों में पर प्रमोटर प्रत्यासी सारंगी और विकाररदिव सामाधिक भावना से सम्बन्धित है। सम्मा-सात, मो, पाँच, चार, प्रादि संस्थानों के अतिरिक्त वीस और पतीस सम्पानोप मरदीय गीता में अनेक पार यस मारा होता है। सबमान्य सिमान्ता अनुसार मोरगीता श्रीपम्प पिरोपवाएँ भी ₹ो सभी देशों के सभी गांवों पर सारा होती है। इस सम्बन्ध में सासे पहले हम लोगीत प्रेमागीठी से पृथक परमा रोगा। पसागीठ साहित्य अंग , अंग हैं, पर लोगीत अमुभुति से सम्बरियत है। लोक- पविता रसापुस्त काय सेमी वा भिन्न है। भारतीय गीत परम्परा में हमारे साहित्य रे नी पंग एक-दूसरे को स्पर्श करते हुए सीखते हैं। स्व साहिल म अभिनय परम्पपभुत र मी सोच से इस तप पुता मिला है उसे हम दावी पी में स्वर परवे हुए मी लोक ही सम्पत्ति र सकते हैं। पुष परबास रिशाम् भी मौलिक परम्परा से प्राप्त गीत-साहित्य को प्रापूर्ण साहित्य में नहीं मानते हैं। विपम मातीम विदामा की भी वही पारपारे। परमपित विचार ये पर स्टपर इस विषय में सोचना पाहिए। गाय सोडवी पस्तु है । सामाविक रूप से परम्पपयत प्रभया पैतृक सम्पति होवर पिणी अंगों में समा टम लेती है। उसी मस्ति पता-गीत अपने मूल रूप में सोप-मानामा परे । होनाबी समन्वित विही रस-सरि प्राणवा। सोरगीती की परम्परा मौतम अपित है। प्रामा
कोकगीत क्या है
में हमारी गीता पर निकले हुए हैं। शवो विपण, श्लेष समप से,
प्रत्येक भागोरेगाव उपसम्म है। मोरिपामा विदा
इस मौलिक साहिल शुरे। सम्पत उसे गति से यमनी है।
मी मक्ति अपना बाति मोह लिखना-पाना बाम एवी है वही या
अपनी परम्पपमत मपि को देस सममाने लगती है। स सन्देश सिधा और
सम्पदा भी दिखाप हम सोच-साहित्य को इसी कारण से गुण होठे
लोगीतों में पक्ति या महामारी हो । स्ने एमा प्रप निर्मित
माना बावा है। इसलिए विभप्रमार और सना सपना बातीय
विरोतामामय उममें मिस ।
पेपर में (१) मानिमा, (२) सामूहिक माप-मि (३) परम्परा-
स्मता अपरा मौखिक परम्परा राय, (४) मा प्रतियोस्थि, और (५)
समीतामाता मारि मीठी पिण्याएँ ।
एक दिन में दो में होगीत इस
(1) anonymour (2) famílur co every one, (3)
reflect the social value of the group (4) are learnt
u part of teaching
(मामरिक, सांस्नील, समूह सामायिक मूस म्प भने
शारे पोर उपरेपारमा।)
मारवीर मावों में इन सर रिशेपानी रे अतिरिक्व रस-रिप
शाप्य है। इसीलिए ये भाव भी सम्म तमाम यो सूने की
सामप्प रमले।
लागीतों का ऐतित
सानीत वे तो मालम्समारप्रसाद पनपने पाली मौलिक
सम्पधि, पर समो म अमराः समाम प पर पप है। सभी
गॉल १० एम्त्री, सातौड़ पीपर मामा, एक
६२ भारतीय लोक-साहित रेशी में लोमा र विकास समान रूप से मारे। म्याक्यो स्म में अमिम्पक्ति का प्रावा ग तोगीयम ऐमीत माणम रुमार भी मार-पारा प्रष्ट होती मई। प्राचीन प्रन्यों में इसके सिर पानी प्रापर कप में मिली है।वहाँ माळी मी मन सोमणीची गापेमाने भनेक मोल उम्मे पार पाये। मारतीम बम भी पतीप्रम्प यबसाय इस दिशा में बार सहयोगी रहा है, अपर उप समय इस पदारे में भुना नहीं सकते। परती परवागाँ मानव-समार संगरियार नहीं मोनीत पनपे और परम्परा की पानी पर पाये थे।मेर में 'गापित' राम पाने बारे में प्रमुस्व है। विकारमय गापेबाने पाले गया। मिर रेमो या पीसी पद परगस प्रकार उमस गावाए परम पर वामाथि भरम्प परमाईबाने गोम्प होती पाँ। समते में होगा पात्रहीन समप्रमितामामा भरएक प्रमों में भी अनेक समेत ठपसम्म। रेप काम्प मे शु और 'गाया' में मेहम्मा दिया है।'' मा 'रे है। गाया 'मानुपी' प्रतएव गावादी प्रति रोमसोगी निवरे। गाषामा भी इस पम्पए प्रस्प माप्तीय साहिस मरता मिलता है। महामास प्रादि- पीने मापार मा पूर्वको प्रदीप बीएसए खरेपणामय', 'मैवाफ्पी मरण', 'प सादर', 'भाश्रमात सक्ष', 'कामाचीप यमापथ', 'पाची बात, 'भीमदमापका', प्रारि पापील पम्पों में पायानो पाएम्पल मिलते हैं। ती 'पाया मराठी मेसोमावाम महार पाने लगा | धारिस ने मोर-माहित पापी प्रेमाचा पोपित की। मित्सर समय सोनीला प्रेमादिपिक मलमप मिला होगा। मापीन इयों में गीता मारे जाने नो यत्सेस मिलते हैं। ।
सोकगीत क्या है
मागकर ने लिखा है-
समित्यानिमोडका पर्व
बमई मोये समठपिताम् ।
पाधि गीवीर मंदार
रकार समोरमिऐवं सदी।
तो चमरिक्स के उपसत में गीचों मुणि पौनेच स्पर
अत। nिy माँ मैं-
नितमसम्बो यो।
परसापरिस्तपनि सारा ।
रवि स तिसमम्पियोर स्पा
भागमय सपम पानी गीवा।
संसाव की प्रत्रिी ने टक पंकिनी में पाप ने सीरियाँ
यसलग किया।अपने एप में भूसा भरपर बार
रकी मूल के कहने-मिरने लायपीया से पनि विक
सपी रे पोर भर से माम में गति मिली है।
परपरिष मनील ने भी वि पप गारेबाने बाले पीवी
म्न मिहै। इस प्रकार मोदी के गाने पाने रे संतरा दिल
२ उपसम। साधीस ने मीस्पानी एक्षिामांव-पालले
जी संग एमपी अपाती।
पर पीच मोहर पाती।
समाभों से सीख भरार मन प्रसप हो पायान्ति
गौद बोश मोर माने पविषियों पता नही पासवासास बसर
मोर मरासित लिये और पुरा रा गीत पाये गाते । पाने
पाते समा बासून मिस बाला सहन हो। परि पर पिसाह से मा
पापाबात माजी न्याब से सम्माची अनेक कामयी जनय
पर परिव रेटिव माटो मत्युक्ति नहोगी।
भारतीय सोक-साहिम गीतों के प्रकार लोगीता म सामान्य कारण (1) चातिरों की रिस, (२) मेस्मा और प्रपामा श्री हरि से (१) चामिक रिपाठी प्रीपरि से, (४) म सम्बाप की से, क्या () रस-सरि रिसे रियाका मनापाका मारतीय गवारेमाप प्रश्न है, इस बात मपरम पिमा ममा किशिमा में विमान मिपाम । पशित राम- मरेश बिपाठी ने गोवा को (१) स्वर-सम्मम्मी गौत, (२) पाम और परने के गीत, (१) पमगीत-सौहार्य पर मारे जाने वाले गीत, भजन, पारि, ()श्चत मापी गीत-वामन, भगुन और औरत, () सेती के गीत, (१) मिलमगोरेगी, (0) मेले के गीत (८) मिन-मिन बातियों के गीत, बेटे प्रदीप पमाप, पोपी, पासी, मार, महार, मुसा मादि, (५) बीर-माया-ते, मात, सारिक र-पमा पचा-मार, मावि, (१०) गोत-पा-धोनी-मोटी सानियों को गा-गावर दीपाची हैं और (११) प्रम समपर्म पाप, मार्ग प्रादि यिो में पिममत म्मिा। कुछ वर्ष पूर्व मप्पभारत के इतिहास-योषा भी मार पमपय माने ने गीत-समाको एक योजना बनार पी। उस समय रहने गीता एक सम्मो सूची मशिव की बिसे महा मा एमा मागिरे। सोमोती को पार मोती महीने पौगहै। पपि ऐसे पूरपोर मी प्रस्तुत पिसपासमते६, मिन्नु मन लगती सीपी प्रभम सतम्प होना अनिवासी एमपन मानेपानी हम मार:- पामगीतों के प्रकार 1 मम्बार पिपपर-) पम मोदः (३) मला के गोत, (३)मोर स, (७) मय गान, (५) बरोपनी-मोरापन गीत (1) इसम, (6) मनेर, (८) मामा रे पहा पहली बार शने गीत, (६) पहली बार
सोकयोत क्या है
रात में गाने के मीत, (१.) यैन, (१२) सिाह, (१२) शिपममन,
(१३) विपनमन मा पने में पीत, (१४) समषियों के पाने के गीत,
(१५) मौलान, देवस्थापन, पुण्य ठाने, इफ्लनन, पारस्म के गीत, (१५)
वीर्य-पापा मोर गमल-अमल गौत, (१७) अन्नशयन गीत, (१८)
पखने के गीत, (११) अपनी-गर्मठो सी विपक, (२०) माता पान के
पीच में, (२१) नार, (२२) पत्तम पापना व मांसना, (१५) मरनी या
बराक मीत ( साँप काटने पर) (२४) मेमे गीत, (२५) बमोट के
गीव, (२६) ची स्थापना गच
५ मारली मीत-(२)RE मासा,(२) मारता-पत्र-पत्र परिमन,
(१) रामनोमो, (४) मालवीय, (५) सारा (बट मासि), (२) र
रामनी, गटार, (७) सावन हिमा, (८) सामी, (मेमोरी गीत),
(1) मी, (१) रोबा-मिटी के मदरे, (११) समाधमी,
(१२) परवा योग, (१३) महालक्ष्मी (१४) बनाए, (१५) मोर
छ(१५) गोदुर्ग (१७) रावगौर, १९८) सर और माप-स्लाम के
गोत, (१६) होली, (२०) महोरी मार्ट प्रकि गत (२१) गरिया
सीम, भाश्य (२२) मुगरिया ।
। सम्मानि-विहासिक-(१) पनाल, (२) बेला सता, (१)
टोला मार, (४) हरहाल, () पागोत (५) परसोग के गोक,
(७)स गव, (८) यमन, (९)गय, (१०) मारेग, (११)
पर मेश्व५ (१२) पाइरा पोर (११) असत, (१४) बासी पर
मी, (१५) मा, (१५) सतमा माक (१०) गोरा पारस, (१८)
बाराम, (१५) पासीयम पण, (२०) पानी के मोव, (२२) पगा
रम, (२२) बोलायो, (२३) ठेवामी, (२४) गोएबी, (२५) माती।
• पिरिष-(१) खेती की माने, (२) मी फठह सम होने के
गीत (१) साप पूरने रे मीत, (४) बारपासी के गीय, (५)प्कामी,
(१) सिरा, (७) पाल, (८) उदय, (३) रो-माली, (१०) सारटे,
(११) नये, (१२) मान, (११) श्रीष, (१४) किम, (१५) पीन।
..
भारतीय कोक-साहित्प
सोमवार विपपामार वर्गीमा भी विस्तृव है। मायाम
से उसका पेर मारमहरोष मृत्यु परमावरोधा है। मा सरोजस्वी
मी पगाव मही है। इसमें अनेक मान्दार गाना नाम दूर गए हैं।
मनिशि से भारतीय सम्मानमा संलप गारदी से अधिक
स्पा हो सकेगा।
६
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ग्रामगीत : लोकगीत : जनगीत
-
पारिमापिक प्रयोग पर पिचार
राजस्थानी सोक-साहिस्प नायक स्पगीय भी सूर्यषरस पारीक ने
'पषस्थानी होगीत' (फत् १५५) स्तिथ भारम्मिा पठ
की पार टिप्पणी में होमगत' एवं प्रामगीत' राम्दारे मालाची प्रयोमा के
विषय में शिरते हुए हिन्दी में उस समय भी इस प्रचलित मान्यता
को पदाचित् प्रपम पार मग म्रने प्र प्रपन किया । मापने पिता है-
"कप जोगी ने गोमगीता को 'प्रामगति मी हारे। पला मारे
बयान सेतोगीतों को ग्राम की सेक्सि सीमा में पॉपना उनके पापकरण
प्रेम करना है। प्राम और नगर के मेद प्रयोग में परे।
गीता की रचना में ग्राम और नगर पतबा हाय नहीं दिया कि
सवापारा -लोक
इससे स्पट है कि नगमा दस वर्ष पूर्व हिन्दी में 'भाममीत' राम्द
मपार में भा गया था। इससे मय पहले पवित पमपम् एक्ल ने
, प्रामगीत' शदी प्रमोम छिया है। पितु पापच्ची ने सन् १८१८ में
एस्पान रिसर्च सोसासी, प्राधा रारा प्रशित स्थानी गीता
-
१
प्रमम सस्मय, पृष्ठ
१
भारतीय मोक-साहित्य
साद साह 'एस्पान लोगीत' शीर्षक ही प्रभिीत मिा।
यपि इस पार १५ पूर्ण एचस्पात मी अगदीग्रसित हसीताप
संक्षित मारवाड़ी गीताभ शीर्षक 'मारवाड़ी प्रामगीत' दीमा, स्परम
सन् १५.२ लगमग 'प्रामगीत' और 'धोनी' मा मात
प्रयोग-विषयक प्रश्मा छठ प्राला स्वाभाविक था। यह मन मस्ता
'शोर' द से सम्परिपाठ रहा। इसमें समा मा मेची
(Folk) शम के पर्यापस्वस्म हिन्दी में अन्य प्रान्तीय मापाभों की मौत
'कोई गम्द प्र महार भारम्ममा। अंग्रेजी में फोरम अधी
खोग, पा, पावि, सर्व-साधारण प्रपया वर्ग-पिरोप। सीएम से बने
'फोर-लिटरेचर', 'प्रेमजोर', 'फोकस', 'फोम्साग' पारि रास्टोरे
अनुरूप 'लोक-सादिस्प', 'सोप-वार्धा, सोपा', 'सोगीत' मामि
राम्द हिरी में गड़े गए। पंरित मानवार हिदी शमीमतोल
राम र प्रर्य नगरों और प्रामों में फैसी हर समूपी गया है, जिसम
प्रामार पोपिरीमही सी मापक अर्थ में गीत के साथ 'सो'
शम योहाबामा अमीर प्रतीत होगी।
पशित रामनरेश त्रिपाठी ने सन् १९२४२ पश्चात् उत्तर भारत में
मीव-सममम स ग्रामोशन किया। सम् १९२७ (८मरमर)को
प्रभाग से पाई पाए । गाँबाहर प्रापने गुगली और मानी
गीतों की पुस्तपदी। तब तक माटी और गुण्यती में 'सोध्योत'
राम का प्रयोग होने सगा पा 1 मिराफः एमक्सी में पाराम बहुत
परिचित-सा हो पुन पा, सरिभी मारेर पानी के समपानी ते
साक-साहिस्य को मोर सम् १५३ पाते ही एपण्णी शिलाशि
का पुर्व पी। ठास पन में प्रकाशित भी मेपायीची पुस्तक मौनी
पर प्रबरा मागी में प्रतिभी पानीको मतिरिक्त गर
राममिह पूर्व मरोचम सामी मी इसर सम्पा
'अमर' मासिक (प्रा), मोर-माया पप
पृष्ठ
सामगीत छोरगीत बनगीत
पार प्रबम माग बोस' (गे शम) मैं इम प्रमर के पूर्व
पानीघ क्षेत्र भिमा मपाई। सन् १. सामा रगीत
म मेहता लिखित प्रत्य 'सो-मादित्य' के नाम से ही प्राय मैं मा
तुपया। भी देवेन्द्र सत्या बो इन दिनों अपने लेखों मयि हो
ये, सन् १९वा 'मामपीत राम नदी प्रयोग करते थे। इस सन्
काफी पाते भी त्रिपाटीगी का गीच-सपा परिवा-गौमुदी' (५ यो
ग) प्रति प्रा मा ।' उसमै 'ग्रामगीत' रामरी प्रयुक्त हमा
२लोगोता तो सेव भी नही है। उसमें प्रयेची सांग'
म उम्सेव अवश्य है, जिसम हिम्टी अनुवार आपने 'प्रामगीत ही किया
है। भी पी ठाकुर द्वारा लिखित एक पत्र में प्रयुक्त 'स्पा सोग' (Rural
Son) और "शिरेचर' (Folk literature) २ पपाम भी
त्रिपाठीमी ने कमया 'प्रामावि' और 'प्राम-माहिस्म मिले हैं। प्रत
"धेसम्प' और 'म्या साग गेनो ही बिपाटीगी से अनुमार 'प्रामात
ही। ना ही मी, मापने भी शाबतपय द्वारा प्रयुक 'प्रेगोर'
(Folk lore) अनुवाद मी 'प्रामगीत किया है। से. सस्पेन्द्र
नधेषग' लिए 'समगीत' और 'मोर' लिए गीतमा
प प्रयोग किया है। इन शगै निश्चित प्रमोग की समस्या प्रमिय
में पार मी ती माय मी भूल से लोपोतो 'प्रामगोच और
हो-माहिस्पो जन-साहित्य प्रा बाता है। प्रस्तु, वहाँ वहिनी
खिए, 'इस रवरी १५१५) में माशित भी समाधी
बाल-मरे प्रामगीत
बम स्थिय संवत् १८९ में प्रकाशित
। देखिए शिपारीगीको बिते गए पर कविता कोमुरी, पाँ
.
घोष-साहित्य का अध्ययन, पृष्ठ
५ पिए, समाजम मिति 'मीवर विहार' (10) विमान
मोगीत (प्रामगीत) या (मसा पोत-साहित्य (ग-सारिएम)
भारतीय कोक-साहित्य पश्य मी त्रिपाठीवो म 'ग्रामगीत' प्रति मिप मोर है । समाने इस विषय पर च दिन पूर्व न विचार किया और 'प्रामगीत' राम्द से ही भपित उपयुक्त साया है। मापने लिखा है-मन गावी प नाममा 'मामगीत' शम से किया है, क्योंकि गीत तो प्राम की सम्पति है, पारी में वो मरे है, पम्मे नही फिर प्राों का यह गौरव उसे मोसीना बाप ! प्राममात तो शहरों में मी प्रत्येक संस्मर में, बावीस पोहा और सचनिक उसयों में गाये बाते । दमे में रवि एममता कि गागडी या यादगार 'प्रामावि राम बारा स्पापी हो पार" गागरे प्रति रिटेन मेमरा माना-बान होरामामी का माते कि "मेरी एप में 'प्राममौत हसी पुल मा स्त्री वियप में रपमाना, परिक सर्य प्रति च गान" और "श्री तर 'वामगीत मी प्रपौल्येय अपने इस भागग्री पन मागे की पंकिपा में म्पपस्थित रखे हुए शहरी बरवा दाप इस गौरव बम्पर्य चूय पाया मरें सीक्व मी, क्योकियोमी 'मोष संयोग से मारे और उसका तात्पम थारो और प्रमीय दोगीवनया। र कि पीसी रविवा गाँव वाले दो यारी भोगी मई मेयरमा दिया पार ! "भतएप में फिर मी या सचिव ममावि 'मोमीट' पी अपेक्षा सामगीत' एम पा उपपुर और म्पापपुरे पता-माम्प पूरा' (संव११) में होगी पग- पीपाया गया। ता ने 'यौवनाम) मी सी प्रेशिम गिमा । सिबसि मे अपनी डुचित रवि से दस सिप में मनी मौलिक परिमाराटी। उसमे प्रदी में 'सए सौर एप: रिसाग। रीरितारेर ।' (पा भाभुतिपय और समवाय सम्पति है।' ... 'पा' यामिर, 1, माम सारिप, पप" .मगरी प्रचारिणी ममा, री, मा प्रकाशित, प्रथमाधि, मामारा. प.
ग्रामगीत सोममीत जनगीत 'यमरपान सोनोव के सम्पादकी ने 'प्रारिम ममुयी है l गीता पनाम खोमगीता पताइए सितारे बोभाीव सम्मे पप्प २ रामनन शुक्स भी सम-विषयक मापा प्रमुखार उसके सरा ऐप सरि साप मनुपरे मान मन्त्री राहती।" सपा 'सरि मामा रूपाने साप म्युम्प मे मीतरी रागामिपति सामहापदरी प्रमिता का सप है। इस पारिमादिक अनुरण से सोध्मीत स्मात 'पम्प की सन पाने पिपरी हो पाते। स्पा उपाप्याम ने 'मामगीत और 'भागीत रोना रोमिन कादि में मानापार भनुमार फोम्मॉम प्रामगोवरे और 'पर 'सागर'। "प्रानगीत से मेरा भाशय उन गोवा सेरेबाय - सामगोतमोप्रामक और इन मा की प्रशानदार, गान 7 मही।" लाभा पाय प्रकार मफळी में 'सानी' 'मान- परपाव एवं सामगोश तीनों ही राम एका पापि होमगीच' राम तो मारा प्रयपात में सोनीव रामपि प्रचार-टमी म्पापस्ता में सर तर बस। मेरी ए फोर में 'फोमग मयारे-कोर मी गीत मा गीर-गीत बोसाकम हान्न हर परम्पप सप मो सोंग बाप, या पार पीव मो इस अनु कर लिया गय। पास मायापल ने भनी हाय में मवि एक पुवकोपर पापी' गए प्रयोग किया। मपठी 1 प्रबमाधिरा... पुपर २ बमपर सामिक, मोरपुरी पो पी. एफ. 1 माठो मार्पत होमीद, बामपा पाठ, प्रमोद शम एकमेबारे पाँवापरतार सरीरस्सी पोपीवापबास्त सपोगात येत (पेपरको पिने पए एक पप से गप्ठ) . रेम्पस पीपप सेम्पुरी पियनरी पर ५ 'भादि तिमो की भारिप और गीते (परवरी, १९१७) ૭ર मारतीय लोक-साहिल में मही राम बहुमरन में प्रयुक्त होता है और भने पुस्तके वीर मी रहर की माँति प्रमुफ मिा गया है, वैसे~को सोभात 'मानपद गीत', 'कुनी मपठी गीदे माटि। हिन्दी लिए यह प्रयो अस्य मया। मत मरण से पा प्रामक प्रवीव होता है दिनों प्रचलित मोकगीत, मामगीय, बगीय, भादि विभिन्न शमी प्रयोगतिमिस्तक लिये वाय। गीत राम्दम्पासाटो हिमरी में पच रो पुर। का सल इसके पशयों पर विचार करना है। 'सो पस्ता मामीण एवं नागरिक बबरे सामान्य प्रम देर भगत वा पाया है, प्रतएप 'लोगीता प्रयोग पिया पार कर सामान्य बनता एप उद्भूत मौलिक गीत में उसे मारा कि बार। इस पर सोम्नास्प, सोया, माल-सादिस्य, मादि शम्दारे मी म्याम्पित होबा।लो भावनामा प्रतिक्रिय मम्म-मार मही हो सस्वा । प्राम की घोमा कुस्ति है और प्राम एवं नगर के मेघे मिराने वाले ' सोशम परिधि दोनी को अपने में समेर रोती है। प्रामगीत (वैसा श्री पशित एमनरय रिपाठी ने क्वामा) प्राम की सम्पचि और लोमाचकेही प्राव मावे है। लोगीतका सगर जी मी दो सता, मिनु 'मामगीत' वो देश प्राम में ही बम देते है। 'भामगीत' सम्मान में निम्नलिखित परिमापार रिचारपीयर- १ 'भामगीत पार सम्पना (भुबि)।' स्यारीप्रसाद दी २ 'प्रामव मति उगार है।" , 'प्रामगोवबारे होवेभोर रजमानत भी रि से प्राधुनिए मी सप्ते" , 'पचीसपदी मोम्मीदों का परिपप' की भूमिका पर २ कविता-बोमडी को माग मामगीता का परिषष, प. . 'बाप-साहित्यामपपर, पार की बनता ग्रामगोव मोकगोस बनगीत ७३ ४ 'प्रामपीत बोगही महीना भी हो सका है।" ---. सत्येन्द्र, परिमापानी की बहसान खपि बारने में म सहा पर होती है। परिवर्तन का प्रमाप निश्चित रूप से मगर और प्राम भी सम्पदा एवं उसके सम्पम्प पर पड़ता है। मध्यप सोच-साहित्य मोर माम साहित्य की स्थिति परमानुसार पदसती राती है। मान-सम्पता के इपि-अपस्था में भाते ही प्रामी और भाभी सम्पता में भेद उपस्थित इए, मपपि टोनी पा सम्पन्न परावर परा रहा और दोनों एक-दूसरे को मापित भी करती थीं। नगर में ग्राम की अपेघा विचित् परिमन पनि पनपने हमी। परिप्पर की या स्पिति वा पी पी रुठ या तो ग्राम मौर मगर-संस्कृति का मे स्पट दौलने मगा। इससे प्रसस्त (सर्वसापा रण) और संस्कृत (परिफत बन) दोपर्य प्रगट ए। सोर-साहित्य इसी समय का मौलिक परम्परागत पाहिवरेबो सामाविक स्पिति के अनुसार परिवर्तित होता रहा है। सुम्पेदी ऋचाएँ किसी समय मौलिक थी। लिपिषट होकर ये इस मौलिक परम्पप से छूट गई। समय, पासी, अपय मादि प्रभपिश साहित्य परिकत, पवि-सम्पम्न बर के दाप पार विपिनय हा मोर इस प्रभर लोक-परम्परा रे पार से एक मोर बार सिपित होकर गया। वतासीन स्थिति में पहीचो- सादिस्य पा, भाव नही। योगीत सोम्पादिस्य भी गीत-पमान अगरे रिकम रुदमा मगर और प्राम + संयुक साधारण बन रे मप्प होता है। यही वर्ग 'तो' है। मिनी अंगों में सोकोन्मुखी प्रतिमा समस यम मो इस कार अंग बम बावा है। अतः मामगीव इस रपि स मोमीत के पूरक हो रें। एक 'प्रामगीत' 'होगीत' हो सकता है, कि 'सोनोवा 'पामगीय नहीं हो सका। प्रत्पनिक हिन्दी-साहित्य में पी-भी धनगीत एम्दप प्रपोप मोरगीत म म मा सारे पितु गीत' पिगि ना रे गीत प्र घोतक है। गोमगीत पिस मप्र प्रा मोर-साहित्य का अपपत्र , पृ. -
।
भारतीय सोकसाहित्य
लोक-साहित्य प्रभंगहै, उसी प्रचार पनगीठ मी बन-साहित्य के अन्त
गंत है। धन-धारिप मारमा करते हुए भी नामवर सिंह ने लिखा है-
"स-माहिस्प मोपोगिक शान्ति से प्रसन्म एमाव-म्पपस्या की भूमि में
प्रमेश पाने गाते सम्मान मघ माहिप है। इसशिर बम-साहिल
लो-साहित्य से इसी भय म मिन हैसोम्-मास परिवार
लिए पता हीरा पिठ साहिल, गोबर-मारिप बन्या के लिए
पक्ति द्वारा पिव पारित पडी मामा बमयी और सोनी
पर जाप होती है।
श्री नामवरसिंह ने अपनी म्पाम्पा में पा स्पर पतापासो-
पाहिस्सपरपरिवा लोक-समागम की प्रमिम्पति का मामा-मात्र
है। सभापति सोक-माया में विरोहिव होर लो-साम्पी हो माता
है। पम-माहिप के पिता व मकिस अपना शिप्प मी लोवा ।
उसघ साहिस्स सोक-साहित्य की सरा मौलिकमी हो कि वारा
मुदित और प्रकाशित होता है। देर में, 'बर-नाहिस्स' शिष्ट पतिाप
रामामा मालपोषो सह-भिना सतरूप सामान्य
लिए अमिम्मत होता है। आपने श्री पारसच्या मरीमरी मेर
"मोग'और 'मममीत पर परित होता है।
सोपीवासबन सेयोत माध्यम से मोखरेसोर परम्पयम
पम्मिलित होने में मति और मतिरे मेदोसर देवा।
पिठीम्पति-विशेषवारा निर्मित मीठ जा-मानस मामोशित
स्तर पम्दन रेतरों से मैन एम्ने हो और शान्तर में उमी मान
अपमा भो परम्ग साप बीति देता रिसर पयोमम माता
रोवो पागीच मोगीवी पसाएगा। उमे पास
इशिहारा और प्रयोग रेसदारे प्राप्त होगी। भूत में और मीत सागर
महीपापया । परिवति-परा समारमानुसारिकप्रपा मोस्पारिक
जसपर प्रेमामिल (भा) पप ५ ॥
१ चमार (दो), प.
ग्रामगीत तोकगोस जनगोव मुल्य पार विरोप संस्कृति की पटमि में ही पा लोपित बनता है। प्रत्येक गायक प्रपडा गीत-निर्माता के साप मती समाव होता है। समार मविकिमा गायक प्रपमा गीत- निर्माता पर होती है। या समाच माम अपना मगर बीच मी हो सकता है। यदि पक्ति-प्रमात ई गाव समाप के मारी को प्रान्दोधित र टिक गया वो प्रशान्तर में बही शोक गीत होगा, इसमें स्नेह नहीं। मस्त, सोमपीत' और 'बनगीत सम्ममा पारस्परिक भेर सोफ- साहित्य के प्रति रमतो मचि देखते हुए प्यान देने पोम्परे।
७
लोक-मानस की त्रिपाभिव्यक्ति
गीत मनोमानी प्रमिम्मकिनगामाप्म है, शिसमें संगीत पस्किन
पुनम में निहित होगा। 'सो सम्बन्वित होते ही रसपी
म्पतिसरत माता सामूहिक परे अनुरूप दल बातो मफिन भयो
मामास पता-गों में मिलना ताप मोर अनिवार्य है, वा सोक-जावा में
नहीं, पति सोरगीत म्पति-पाठ मही। उनमें मानव समुपगत भाषी
की प्रमिम्पति होती है।
लोकगीत का निर्माण
इसी पर प्रापार पर लोग-मिग्रेप मत : मन
निमापकोई ममिव मही, धन-समूह है। यह प्रश्न चित् निराः
पविषय मी पारे। मोपेम मिनी और स प्रिम भी पपये मही
किलोमीता प्रविमाया बनना होगा। रवा-शर एवं
समार मिन विमान्य ने इस मत पे अनेक प्रमादी किया है।
माटिम माना-समार प्रप्ता पर मानवे २६ मार ने अपन मूल
भाग श्री अमिम्पति हरेक ही सामूहिक पौा में भी है ! परमम्पा
ऐसी पीचरबिरी समरिनरी मापमा परमीत-म्पी भमि-
पवनारे सागर की ओर दौड़ी होगी, पर मनम्मरमही बात
सोक-मानस को विवाभिम्यक्ति ७७ मारेकमादिम अस्पा में मालय की सामाणिक प्रणा अपने सापारण म्म में थी, पोशमरा मावि के साप सपर्प रते हुए गहरी होती गई। माना और प्रति प्रयह संघर्ष सामूहिक पेठना भेगमाया गया । प्राति के विपक्ष स से मानव मपमीत मा और किसी पशु मारने पर अपनी पिबस में प्रशिकत भी । प्रकृति से उसम हान्निप उसके विकास के प्रारम्म से पना भा है। पशु-पक्षियों की शिकारियों और राम्दी का नयार उभारण मन की विमिन प्रस्पानी के अनुरूप पटिव होता सा प्रवा ममिम्पमित के क्षेत्र में मानव तत्पशीन मनोमाष, अपने मनमा रम , शापरिक मुद्रामों के साथ गोव, संगीत और नृस्प के बन्म पीपानी पने। मोगोठा निर्माण प्र सम्भव राम की उत्पति के साथ है। किसी म्पक्ति गवार मनोमान गरि बनायों के अनुरूप हुए, तो पासहब ही उ अपनाए उनमें अपने समाव और मुविधानुसार परिणतन कर सेवा। गीतापही स्परलोकगीत है। लोकगीत एवं लोक-संगीत लोकपीवी ताप लोम्संगीत रसेल प्रापरपा है। एक पारपास्प विशन् के अनुसार कासासर में साब संगीत (Spontaneous music) ही मोगात परमाया । लोम्पीत के लिए अंग्रेजी राम्द 'फोक-सांग' (बर्मन राम volkalied से उपदि) , बिसरे सिर कहा गया किया संगीत में सवार और पब माने अपना निरोप मास रस्ता है। इसमोमव नहीं 8 सोम्-सगीव तोगीतके भमा में पस 1 Folkson. rather uheud translation of German word Volkslied bat aevertheless 1 word which stands for a Yery definite fact in the realm of music -एम्माइस्मोपीडिया मिनिका (6) संस्मरण (141- १५) प. . .
भारतीय मोक-गाहित्य
अहीर कपाशार मात्र है। होम्मानस सपने मनोमायों की नौ में
रामों का प्रयोग सिसिए पकाउन भमिम्पति तिरमको।
पा याँ प्रहिए सार्प शोमाम से पुनों के सहारे सोक-मानों में
मैसर्गिक रिस मिलता है। वैसे दो मिनी अंगों में रिपक शम्भ-मरगा
मी गीतों में मिलती है, पर पुनों को समासे रमने में मध निरमा
साहो पाती है। विरोप कम से यह निर राम-मयमा पारिम
प्रमत्या की सारे बोअपनी परम्परामाच्या प्रपा मारकर
समाक्ता जोगीता में बनी है। प्राग मी भादिवासियार गीता में
अर्थहीन पदोभ बाहुल्य है। दो-दो-दो-दो-दो-म्तिम्-
चिम्नी-र-र-र-अया मा-मा-पा-मा-पा-३-२-४-बी
यीम्मीली, मारि ऐसी राम मनियों, निम्र वा यौवों के लिए
अप भनिया पर गया है।
सिमित समय में पदाप्रपामगही पनि और पर्व
से पारे। अप-तल पनियों (पुरी) 80ोप-ठा में अमिम्मति
पाया है। उसमें सम्मानसरे मनोगी और माँ का समावेश सामाक्ति
है, पाकिसोर माषामा राम्द इस से अपने भाप में मर।
उनमे एक वैशिष्ट्य होता है। प्रोपरा एवं उसने सुनने-समझने वाला
ही मर मिपा और परिपेयमुक अमिम्पत्ति पर सवाप्रवरय,
चिरपरिचित असारे में है, तो लोगोव एवं सास-गीय एक ही रप
को पहिये हैं-एकी अनुमति में दूसरा प्रायोगी है।
सामुदायिक गाम मति
पकि प्रारम्म से ही समूह में पने पीहा है। यही उमा
समार, प्राधि है। प्रवः इस प्रति पिरोपरे प्राय मामूहिक प्रमि-
म्माछिपी प्रभम मिता। संगीत मार रिमतयारीमाया में उसके
विपार, उपसात भारिपाम संगीत में निरपराग
देमाल से पा पारे धीरे वा पपा । ताहिक गात सापर होने लगे।
सोक-मानस की त्रिपाभिव्यक्ति ७६ । - पदोंम समभपवा भाविकरम होने पर भी पनमम सर में मुविधा बनाए पावर और स्मन राम्दी सामयोगासाप मानव समझने लगा। पर माना कोपा अस्पा थो, बर मपने पशुओं के शिर नपगारी बोध में या एक स्थान से दूसरे स्थान की मोरया पापा । कषिपान होने पर अपनी फसल की विधिर से उसकी पुसमा पि को पहली बार चोट पहुंची। उसके कदम र गॉर बसे और समी उतरेगीत और समीत भस्म मरमा बिसेदम माम-गीत अपया माम-समीतय | प्रता अपनी प्रादिम प्रथा से रस मनुप्प पूर्णरूपेण पि-प्रमाया र मम्म पहाने पोप्प मा समया पण उसमें एक विशेप प्रभारी संस्कृति और पुनि प रप हुमा, वो गीत भोर गीत रे साप व निश्चित हो पारे । माचीन माप्तीय बामग मापावशेषहम मिया है, को पा. परस्मित सामाधिसभामा सूबर। ये गापाएँ गीत अपना पच ही है, मो शुर में एक मिन जाहिस्स की पोवामी हैं। मामय प्रन्यों रे अगर मे गामा मानव-सवित ३, विवध रस लिया रिसी महान् पति के सोप बहान परना है। शवपय मामय में अब रेप में, महामाख में तमा भन्म समय माहव त्या में गापाएँ गाने की परम्पपामा प्रयापनेक उगारय उपलब। अपए, पम्मी प्रादि में भी मीचा की यह परम्पप भोर मेप पदविवाहित रिचमान पोरेपारोकि युग में भारी परम धर्म या, संगीत-शूम्प भी बरहा। पापही सगाव या गो पिने भागिम स्म हे प्रमशः विसिव हवामा सामुदायिक गान रेम्प प्रतिक्षित हुमा । परि मन्पी में उसे पार्मिक माना गया है, वापि सीरिक संगावधनुरूप रहा होगा, इसमें सामही प्राचीन स्न्या सामूहिक गान, वस्त, राणा प्रादि प्रअलेष पठि सोमजीत अपया मो-तोर सरस महीपते, तो दापनिक मी नहीं कहा सम्वा प्रत. शोमगार और संगीत सरने ही सत्प, मितने पॉर - मोरगा ८० । भारतीय मोक-साहित्य लोकगीतों के सामान्य लक्षण संस मिन्न-भिन्न देशों में बसनें मासे मानव अपने पर्ष-उत्सव प्रता पर गावे और नाचते हैं। उमग्री मापाएँ अपनी होती है, बिने पूर्वयों से सीलर पराबर मयुक्त मते रहते हैं और उनमें एक प्रभा श्री प्राम्मे स्वा होने के कारस दे अपनी सामाविक सगाई भौर सोमपा अमि म्पस्ति कीरत से एक्स्पशी होती है। इस प्रभर मापाएँ गीता की मौरी बन बासी है। गौतों में पाई पाने वाली एक सामान्य सम्पन्नता मधी सरी पिये पता है और प्रसिग रूप से इस समता में निहित संगीत भी पास उप मिला-मुसा हो परम्पपदित नहीं होता। जोगीत अपने भाप में घर प्रधान होते हैं। प्रप्तानो मापन है कि प्राप दुनिया के समी मोमोती दी हुर्ने भारतीय पुनी से मिलती है तथा उनके परिवर्तित स्म भी मिठे है। शास्त्रीय संगीत समोर मत में पीत 'लरममावतवासम्पपस्तु, पिसमें एक पति और समूह दोनों ही मारे जाने वाले पीय सम्मिलित। पाश्चास्मतमी- को प्रभनुमान है तोमनात यश अपनी सामूहिक विवादही १५/ राताम्मी पश्चात् रामदे। रिण माखीय गोटा में पार पाने वाली स्थिति से पा समोचीन मतीत नहीं होता। अलग प्रसग हिस्से सोनीठा म मिन्न-मिन पण पाए पाहिप म उनके स्पावित प्रषणा प्रस्थापित वाममारी प्राप्त करते। रिमी पारगाव सेला न दुनिया सोमवों समान पाते हुए लिया है-'पात पीत या तो सुमर (स्या) हो पा मारपीय बममी गाव पोमिस वर्ष हर-सी, सामान पपीय मोत गेब, पुषगुनाने योम्प, पुर एमपद, स्ती गौत्र उडान पोर प्रणा स्पेनी मन मोर स्पषित पारित गीत प्राप्पामि और प्रमागाशी होते हैं। अमरीजीमो गीत रिमपम, मुमर एवं गार पार्मिक हैं।"
सोफ-मानस भी निषामिम्पषित
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लोकगीत और मृत्य
संगीत रे साप स्पो हम भुक्षा मही सकते। वहाँ को-नाया
मालो गोदी से हुए हैं। योगी हो सादिम मानव की अमाप अमि-
मस्तियों रही। गीत में संगीत माव-प्रपाल शादिक अभिम्पतिमरुप
पारप वारे मोर नृत्य में माना अनियमित मागिय मुडामो
रेस में प्रकट होती है। एक मूत लप्रपान है और मय पाश-प्रभान ।
उम्प वासनिा सम्मा महीं, से ही बीताका मी तय नमार में सरम
रस्ता मसम्मत है। गीत मे एर पुर होती है किन्तु पुष माध्यम से मिी
एसीको एक ही रंग से अधिक समय तक गाया जाना प्राय पसन्द
यही पिया पावा। या माहि-परति पसाय बो प्राचीन मोठाम
विशेष रूप से पार है। शुक (Refraun) मी सालति ही है, पितु
मा सिी पिरोए पंकि दोधी है। भारदिपप्रमोग सामारूसी
गीव-श प्रयाही से एयर मोप-यम्प में विशेष परिलक्षित होता
है।बो गीत उस्म पति और पावरे, उनमें माहि प्रायः
वा सिदतीस वोएगीत ऐसे होते हैं, कि मिन्न-भिन्न
पुरी गापा बसता है, पर घर से सम्बग्मित होचे ही मयसप मी
मिशितोपाची है। पर लोनीव और को-स्व में प्रसग मतग
प्रय होने पर मी मनमान्तरिक मान्य होता है।
मीद और मुम्प सेना संगीतमा प्रमिम्पकिपा प्राव भीमाप्तीन
एवं परिपमी सोच-संगीत में समान रूम से लिहित है। सम्वाही मा,
रिचा, लगो, लोण, रोग, मारवाड़ी भसर मा मेवाड़ी एसपारी,
मिपिता के भरनी प्रथका मात्रा को साप्रादेषस्य मीठी रे मोती,
परपासो मादि पीतों से सम्मानित । परिचम भयो भस्पुलिए संगति
इतसे रचा मदी। पंपस' (Buch Suite) प्रामस्य और
प' (Hach Futue) पोनों प्रही विसिव साप है। बोलोगीठी
श्रीमन पनि सोमाता से संबंसिर और 'रोपे (Scherroid पीर रस
पत्रमार
त्यस प्रभार सरि-पार मॉकप्रिम प्रारम्म
८० भारतीय लोक-साहित्य लोकगीतों के सामाम्य लक्षण समार मिन्न-भिन्न देशों में बसने वाले मानर अपने पर्व-उत्सव मनार पर गावे और नापते हैं। ठाधी मापार अपनी होती है, दिन पूर्वनों से पीसर पर प्रमुस्त करते रहते हैं और उसमे एक मनर की मामी- एता होने के कारण वे अपनी स्पाम्प्रति सच और गोकस्वरुपा अमि म्पति की शि से दरम्पी दोती है। इस प्रकार मापा गीता सौरी बनी। गोवा में पाए जाने वाली एक सामान सपटता उनकी दूसरी निरो पता है और भमिण कम से इध लावा में शिव मंगच भी मुस- इच मिसा मा होफर परम्पपरहित नहीं होता। मोयीत पपने माप में सय प्रधान होते है। अमेवामा प्रम कि मायः दुनिरा रेसमी सोनगीतों की पूर्व भावीय पुगों से मिन्ती तमा उपके परिवटिव म मो मिलते हैं। पाली संगीत सामी के 12 में गत 'जसमावरवाल क्लु है जिसमें एकशि और समूा दोरी बापही गावे पाने वाले गीत सम्मिलित है। पारपाल संगी जीमान सोमीनल मनी सामूहिक प्रदिपाय हो १५ीं शताब्दी के पश्चात् करा सके। किन्तु मारतीय मात्रा में पार बाने पाशी पिसे यह समोरील प्रतीत नहीं बना। प्रतम मसग हिस्से मोमतों में मिन्न-मित्र समप पाए, बा, बिनाए एम के स्पापिस्व प्रपा प्रत्याक्तिीबानभरी याप्रस।विसी पारपास मेक ने दुनिया के लोगीता पत्तमान पता एसिसा -"प्रयत के गीत गा तो मुनर (पादु) होते या पारडीन, बर्मी गीत पोमिसाएर हाम-सी, सामान्य सऐपीय मीत गेर, गुनगुनाने मोम, अ एवं सम्प, म्सी गीत राम और प्रयाग स्पेनी मन्द और सप्पिस तपा दिन् गीत माप्पामिक और प्रमाणाधी रोममरीधी-पीसो गीध विशय, मुनर एवं गहरे धार्मिक होते फोक-मानसपी त्रिपाभिम्पक्ति मोमगीत और नृत्य संगीत के साप नृतप्रेहम मुशा यहीं सकते। यहाँ सोप-नृत्यों का प्रश्न है मोतों से जुड़े हुए हैं। रोना ही मादिम मानव की प्रथाम अमि- पस्तिमा रही है। गांव में संगीत माप प्रधान शाब्दिक अमिम्परित प्रारूप पारगमता है और मृत्य में मावनाएँ प्रमिम्पत्ति के हेतु प्रापिड मुनामों रेस में पर होती है। एक मूत लम्-प्रपान है और पूसप पाल-प्रभार। स्प बसविना सम्भव नही से ही मीवी का मी सयममार में समन होना असम्भव है । गीत में एक धुन होती है, किन्तु पुन के माप्प से किसी एसपी की एक हीटंग से अधिक समय तक गाया जाना प्राय पस्न महाँ किया बाता। यह प्राधि-पदवि लावी है,बो प्राचीन गीता में विशेष म्म से पार पाती है। भुगक (Refrain) भी प्रातति ही रे, पित पारसी विरोष पक्कि को होती है। भारतिय प्रयोग 'रोलामारु'सी गीतनपा अपना ही दे गुर गो-पम्प में विशेष परिचित होता को गीत नुस्म से सम्बन्धित होकर पलते हैं, उनमें प्राति प्रापक सहायक सिम होती है। वैसे वो कर गीत ऐसे होते है, मि मिन मिन्न पुना में गापा पा सकता है, पर वाल से सम्बरिषत होते ही उनकी शयी निरिक्त हो पाती है। पस्तुवा होगी और मो-नस्म में प्रथम अलग एप होने पर भी उमय मान्तरिम सम्पन्न होता है। गीत और बाप ये दोनों समीवारमा अमिम्पक्तियाँ मार भी भारतीय एवं परिपमो सोच-संगीत में समान रूप से निहित हैं। सन्यासी कर्मा, रिपरा, लगये, गोपा, दांग, मारवाड़ी भार मा मेवाड़ी एसबारी, मिपिता रे मरनी अपना मातमा सो या ग्रामस्प, भीनों रेमोनी, पुरापासी प्रादि दवा से समन्धित है। परिचम पता माधुनिक संगीत इससे पचा नहीं। और सूर' (Bach Suite) भारी नुस्म पर पंप पपग' (Bach Futur) गीताप्रती सिसित स्म है। पोरन गीतों श्रीमन्द्र पनि सोप्रीती से सक्ति और 'शेरो (Scherro) पीछे नस्प प्र ममान सर। इसमभर सारित की 'पाट मोफगामाराम ८२ भारतीय लोक-साहित्य मी एक गीत-वत पर प्राधारित है। पास्य मसेि पश्चिम में 'सिम्पो निक संगीतमा गाता है, समय प्रपिता मूल में नव और संगीत संयोग सही प्रतिमा है। भविश्य मानिध्यक्ति मोफेसर चारास इसे स्पाम्पा स्वीकार नहीं करते कि सोपात में उत्पति गीत और नस्य से होती है, निब म तिपय मंत्री धमाँ की उत्पति-विपत पर्चा परसे, वो इसम हमसन्यायहीं पता। ठा- हरपा अपनी (Balled) एस्ट उत्पति प म पैसे (Ballure) से, बिस्त्र वापय है स्म । ऐण वीव शेखा है सामूहिक स्पा मी तर सोमात की उत्पत्ति निरित और पीठ इससे निश्चय ही मतग नहीं। पर सामूहिष्ता केटी विपरीत 'इम्प्रा- विपरसबान्त प्रफेवामा समतोगीत अपित्य अमि- माफि है। किसी भबसर पिरोष पर समास और वर्ष मा एमा कम-मुगम फिसी एकनी मेरा से प्रपिम्प स्म से गीत- रग भने जगता है। प्रधामिमाप्ति दो हो, गीत, समीप और वृस्प तीनों हो सो-मानस श्री पूरक अमि मकियाँ वीनों ही एक-दूसरे से प्रपत्नी की पा सती । पाँो लास का सामूहिक म यहोवा यहाँ तीनों ही मुक मोर म्पक होती है। देश में हमें हम सोते-मानस की विधामिमकिने अनुपयुक्त परोया।
लोकगीतों में रग-वैचिम्य भारतीय सम्म एक साहित्य में गोप स्लेख प्रायः सौन्दर-सुधि निमित पर्व विविध पावर परिसर चित्रण में प्रारंपरिक योजना के गरम से किया गया है। बिम रगौ म असेल हमारे पूर्णता परिपत्र साहित्य में उपसम्म प्रारिम तियों के प्राकर्षय से कमर छठे हुए हैं। उनमें समय मना रंगते (गस) और मूस रंगा के अतिरिक सम्मिभित प्रमाप उत्पम्न होता गया है। यही कारण सो-सादिस्म म प्रयुक्त रंगोबा मौशिवा अवपात्व और परीक्षापन भगस्थित है पहा परिणय साहित्य में अमिमावबपीय पत्रि में परिणाप प्रगम करने पाले रंग विषयक विषय, चिम्प, क्ष्य भौर प्रभाव मिलते हैं। किन्तु रम, पति, पाप और स्पयुक्त पिता की मी भारतीय साहित्य में मी मही। या चित्रों में प्रकृति म प्रविषिष उही उपकरणों से व्यमस्ति हमारेको नी-माहित्य में अपनी सामाविक प्रसाद और सारे विप पोरना परात होते । प्राति से अपनाये गए रंग सवारी सम्म प्रतम्प सम्ी प्रपर रे मागण मानप्रे प्राति परते हैं। सल, इणि, यीश, पोत, वश्याम मादि मी प्रमर पे रंग हैं। पन्य, पनि भोर पण रे घी से पूरिख गावापरय मत परने वाले ग्रामिण उपनग साबी रंगों घमास ८४ भारतीय सोम साहित्य पन्न मठे हैं। किंचित् रूपों में रयों का अजेन अपरोदरीवि से होगा। रंय मत अन्तयत है। दार्शनिक हो से सस्पवारियों और बेदान्तियों लिए मा गौण सिर, कि प्रकृति की प्रसपा से उत्पन्न होने पाशे दिम तोमर पगों में शुम, स्परा, रस, रूम और यम्य श्री मूस पंचतन्मात्राएँ हैं, उममे बहु से रंगोंधप्रपान की है। रचपि मापी का विषय है पापि पश्य, स्पर्श और गन से मी उसन भामश्व स्सामा विकरे। मता रंग-विरोपाप्रमाव में मी प्रम्य सम्बन्धित उपरक आप निरिस्त रंगामास हो पाता है। जिस पर कुल स्मारक मान से पूर्व प्रतिविम्ब न पाता है, उसी प्रचार प्रतिपय सांटिक से (बिनके प्रति पूर्मापर सम्पन्न होता है) रूप और रंग का प्रभाव उत्पन्न हो पाता है। प्रकृति-पत्र में मेपो की खा से हममुप रे ग पर की पारितामा, सरितामा फेनिस बस, पदिनी विविध म्म पारि अम्मस्त प्रमाव उत्पन्न करते है। इसी मघर भने मता में रगों में सत्तारो भावनामा मुगों से प्रमुरत किसे सौन्दर्य एवं रंग जोगीता में रंगा पनि प्रस्थ मोसीपापि अपस्मत एम मोपना की मी ममें कमी नहीं को विकसित पारिरी पीवी में ठपसम्म सौन्दर्य की पर्ण पते पसा-मर्म यो बर्ष पर पहुंचते हैं बिसौन मारे सचम मास में माप होने वाले विमिन्धरल-सली भएभेरा है। प्रवरस प्रावध राम-मोबमा मी उक्त एषामय में पोग मानती है। पितु साधारणस्पति में सौनसंच भासद श्री ख। पारिमाणम से मनप्रे तृप्ति और मेरसा हा चित्राला में रेनाएँ क्सप्रेस देती और रेय उस सौन्दर्य प्रेठमारने हैं।पारा बनाए आने माझे पिता को देखने से मत होगा जिसमें पेड़ों का रंग एप, प्रकार का पीला, पुरष सास और पी सोकगीतों में रंग-वधिभ्य फाला होता है। रंगों के प्रयोग श्री पर सगिक इतिहै। सोम्मीदो में पही रवि अर्यरती है। उनमें मोहरे पेर, नी प्राममान और 'म्' (माल) सरस की प्रपना है। लोगोठारे रंग स्पिर है उनमें गस्या प्रया का प्रभाव है। पतः सोयीसा में रंगों के प्रति सनितिक निर्णय मिल्साबो संस्मर रूम में बनमानस की गरिने प्रमापित ने की क्षमता रखता है। रंगों की अपस्मा पर्ट पर ने पित्रमहा में प्रयुक्त होने वाले रगों में तीन अफ्स्पाय पवार है। प्रपमास्पा शि, सिीय को 'मोबिक भौर तृतीय को 'प्पमर' मारे। परित प्रस्था अत्यन्त प्राचीन सिमें रंगी काममा संकेवार्थी रहा है। मागैतिहासिक एवं पूर्व प्रागैतिहासिक पियों में यह समस्या नियमाव। पास भी इसी अवस्था के भन्तर्गत पाते हैं। मम्पकालीन कला में रयों के प्रयोग विषय में चित् परिवर्तन हए । प्रपोग निश्चित नियमों में थे। महोबाने से पिरोप पस्नुभौ के विरोप रंग मया निर्धारित हो गए—मूल में पारे पवार्य महो। पेपरूपनकि यह रेविस प्रयोगास्पा की शवाम्दी पर पलटी दी। सीकार करना हमा रिसोगीटों में यही अवस्था दम मिलती है। संसार के किसी मी माग गीत या महो, माअास्था उनमें निश्चित रूप से विद्यमान है। सोनावों की बर मुदूर काम में बमी है, इसलिए उनके शिनास, सप्रयोग, शैली और भापागात सय मीन मही हैं। उनमें परम्पप पोपण सोपरि है। यहाँ तक रंगों का मन २, सोमीधा में पहले से पले प्राते हुए रचा में परिमर्दन कम हुए है। 'रिमोनिए अपस्या रे गा महापा-ममरा (चार एक्स् ) मेनहमा और 'पर' म रंगों का मूल्य पर्यत पारगी पी से पाँच पण पितमें पगव पुरवा एवं बीन के मास की समिर । लोक गीतों में मोनित अम्मा काहीही मप्पाचीन प्रयोगों के सहारे - - भारतीय लोक साहित्य भारे भर' प्रपस्या की उनमें श्चित सम्माना मी नहीं है। पर परिमान रिपोल माहिस्य में खोबी वा सम्सी है। माफ-साहित्य अध्ययननीचस को देखने ए रया श्री से माप्तीब लोगीता परत एमा भपियार्य मतीत होता मागैतिहासिक मानव के एम त्रिों ने प्रापैतिहासिकमा सम्मान मे अनेक प्रकार अन्वेषयामर सोश दिया है। पारपात्य मिलों उपसम्म सा-पिनों से प्रारिम चियाँ पापा पम प्रधान किया। मागविहासिक मामय पपि, उसके पिय रंग, प्रयोग विधि, विविध मान्द मापंच प्रादिप विस्तारपूर्वक अप्पपन हमारे सम्मुख है। मित्र स्थापि स्थिर प्रमागरे, किन्तु व से लोगीता र महत्व मी कम नहीं। लोगीतों में पति उस्लेख, रोने रोग प्रभय, मानवीन गाणे की अमिम्पक्ति, माब-मिमास, प्रहरि प्रावि में कपिपर भारिम परिमारोप सि । पोतों में से प्रमया परिपतन होवे सते है, चिन्द्र मा में सम्हों की अपेक्ष परिक्सन कम होते। मप संगीत- काल मी भारिम प्रबरोपाप्रबाह है।सम्दी पुन, पगुमाशीपारिक की नस और विरशम-योचमा प्राचीन प्रमाबोवासो गीयौ रे ग मी इससी से अपरिवतंयग्रोश है। न मी मारिम पनि पोण ममाप पति होते है। प्रतिपय रंग मोर उदी अपस्या में प्राव होते भा है। मलि उपका परम्परा, धारपर्ग, धर्म-सम्मश्री भिमान और ममोपेशनिक रोमात ते सम्पन्न । माधि की तुबीई पुतिय सोपी लोक मागत अप्पन की सामग्री पीरे। विमिन्म सो करम, भार, और यमार सोक- गाने सोम-मीपे अपना शिपे। उन्हीं मारपर्य से उमाने पर दूसरे के प्रफ रंगो पौर मूस रंगों के प्रति अपनी विपकी। सोम्मीठा अप्पमत रोपाकिसोक-कवि मापाम से प्रति ग्य ३ मा आय सीमाएँ परिपत है।
कगीतों में रम-वैचित्र्य पापी रंग वीर योगीयों में कुछ ग म्मामी हैं । शाल ऐगी मीथिए । सास पन्म मे गुसारी, साखूनी मीठी, महावरी, मेहदिया, मिन्त्री, पदा, गसाय (हिंगल), प्रादि पदपरक रगत पोव। ये मेसोक घिी में बोवनी उपयोगी वस्तुमी से ही सास्य की भूमि पर अपनाने श₹। साप्त ग भन्न सभी रंगी की अपेक्षा भ्य कि असम्म समी मातिमी में विरोप प्रिय है। सभी युगों में यह पसन्द दिया जाता गाई, पौषि या काडीमा, प्ररसादासी, उसेवा है, मोर पर, पासा, पुषण, पनर, नागरिक, प्रादि सभी प्रकार के समीप्रामुमोमनिया विर समागासरे। साल मस्त्री से पानी को उसमित किया जाता साल रंग पति प्रोतकोनी मेगा में रक्त से सारस्म होने के परपसा माना की मूल पियों में कमल प्रमाक्ति वा है। भारिम अनन्या से होला रंग मन को प्रापित करता पाहै। मोवपुप, माती, पगस्पानी, मैपिली, इम्पदेशी, दतमाली, पानी, गुदेली, भापी, लिहाय, महाराष्ट्री, भारि सभी माप्तीप माषाओं के मीचों में सात और उसकी च मन्य ग्गी एवं पीबापन निरिव है। मोरी गीच मम समय बाप अमिमान से ग्रा-स्वामी को साच पार नाम माने प्रेमामवीरे। दुलित पुनरोता रमिपी को इस बात पर बीन में भी पास और पीता पत्र पारर पति के सामवेदी पर नहीं बेटी, प्रियठम की अनुपस्थिति में मापिता अपनी कुन सात स्म में रणने से मना करती है और मानवी गदा से जगदिनि दुपा अपछि बोल बोरी भमिमाए। मास पार बाशिम माँगडे, पोरी तोरी उसाब" --भोगपुरी मामगीत, (हि.सा.स.म.) प॥ "बाब पिपर ना पदाधीकामा पानी हो पुपर 'म मा गागा हानी पुनरिपा, पिया विपु सपरी प्रहार ।" -लही, प्रफ. . २ ३ ८८ भारतीय छोक-साहि पीचा की मारिन में युद्ध महमार रहै किभी उसपर कुम पीपा पर वाय।प्रसन्नता प्रेमस्पा में पिठमा , मियम लिए सामगही येती है और विस्प ही 'खा' सुपी होवे रेखी। एस्पानी मारिन अपने निम्म प मोशिमा म से मरे मालों में रंगने के सिप मातुर है। या प्रियन्म के संयोग हिंगा मोहिमा (पर्यय) पाती है या रेकी-पेक्वानों में पाल लिए बस्म से मुमम्बित बने श्रीममिक्षापा रही है। मैपित स्त्री अपने या बार रिमा लापता था नास पगेर पहनाम प पिलाने की रकती है (मैमिस होमगीत, .२) एक गीत में प्रियतम का प्रपा मिमा ने शाल पलंग पर डीड़ा भने का अनुरोप पारे (मैकि सोगांत, .)। परेशी नायिन सास मारी इसतिर पान नहीं चाहती कि उसके एवानी पशिला नाम है, (भारि हिन्दी । सानियों और गीत, पप्ठ १)चीसगी मचौरी में पिपरमा पा प्रमाब मे किसके लिए महती रचाप, परखी है। महाण पीकन म भनेम प्रसंगों में पाय पत्र सम्बन्ध रे (मपळ बीरारंग पौधोरंग मामी का पोर पोपीको -मा जो पूप "मना मनिपाए मरीजी म्हारा सामोरंग मोशिपो. मही दुस i R ३ "मम्मी समपानीसिन्दापूप ही गहराव पास गये वि सिर में पैग बरंग मामय गा" भगबान पर पहिनिबार बायको बना। बना हु पनि चामि पगिता हो पोसिब रे । प्रप हासयारी ममरा मे मा पेई बार मोरे रामाजी कालिया। 4
सोकगीता में रगचिम्प
मोम्पा, पाबत प्राटोस)। बुन्देली गोल-गाक इस वो सिन्दूर से
मी मांग पर मस्त होकर गा स्टचे हैं-
मोतिन माँग मरी पेन्दर मे
बादेवगार।
मीवी की मासे,
माग अपमे गरे।
मामी के गीतों में परदेश बाते हुए प्रियतम अपमी प्रिया को सिम्पूर
रेगावा है। इस प्रघर सात रंग भरुसेन अनेक प्रभर की तो
लिए मारतीय गांवों में भा है। एखाली, मालूनी, मादि अन्य हल्की
गावा रे मलेस बाम प्राप्त होते हैं। मासगी गीता में भारत मातुनी
प असेत मिलता है। प्रश्मीरी गीचा में गुहाली गाला की पर्मा मौगो-
शिक स्पिति के परस। ददिवाय गीता में वो हम यी रंगवाम
प्रायः प्रमाणगापमाश हो सर्वत्र म्माप्त है।
पति का अपना रंग है, वो पीच और बोल रे सम्मित से
तैयार होता है। पीताम्बरा उतरीय रेस्प में माप्तीम गोवा
मिस परे। पीव रंग सं मारावासोर पाला है और मीठ टाक
सीमामा रखवारे। भव हरे रंग में दोनों समावेश है। पपस्थान
मेसा प्रयोग भनेक पलमों को रंगत दिखाने लिए किया गया है।
'मुमा पंसी' मा एप रंग हीरो मुमा (पोवा) के पंखो की रगत
पापोवा । मैपित गोवा में हरे पास श्री यामुऐकाय के प्रबपीप
.
'म दिसते वायो बागीमती पार सीताबाई वाबस्तीशाधीचे
. इमरी को जागे .
। 'मेगा रे ग मान वरपरक गर' (मारा माल साहित्य
प)
भारतीय लोक-साहित
योमा पाथी', हरे गाँवरे माप बचाये बाते ,रेममा पोर ।
मन उसके सिर भाषच विश्य है। रामपा में मैषित बाहर
रंग कम प्रयुक्त हुमा । फिर मी पसन्देश्या की पूजा के समय पवस्वापार
हरे बॉस की खाड़ी में पमेशो पर रखना चाहती। प्रदेश
गीतों में पास उससे मोर ग सदैव हरे पतापे पर हैं। रामान
भी रंगत खिरे है। अनेरी बहार बीवन में उपयोगी है। माutta
पीवी में शाखबादाप रगही अधिक मात्रा ने की सामग
क्या है।
अम्ब रया के अनेक रस्तु-सास्य पीती सेर दिन पर प्रत्ये
विपार किया है।
है
।
रावस्थानी रग
रंगों की परमानी पोठों में राम मनोख और
रामपानी रंग सेब और परपर समय अनेकम्यता प्रान्त में
परम्परा के अनुरूप प्रसार किस-त्रियम मा सिम
। परस्थानी बीरम में से गहरे रग बल ही परम्पप गाया-नय
के योग्य रही है। पारंगी पतएँ 'सर' पने-माल से भनेक रयो की
मालित हावी है। राष्ट्र के प्रति इसी परिणाव प्रचलित है।
सरंग मारिया से गौ माता मुगड़ा पा रंग भर से की
समस्त क्याप मित्र मला है। इछी प्रकार मंग वाय, रंग रसिया,
रंग नधारा, भारि लाय प्रयोग हैं। 'रंगीला' एप मी अनेक
'बबना होकर पास बमुविण पर विच लोहार (मैपिच
लोकगीय पूप.)
। हरिगर सपा भाष मारब बापरे (बी)
। हरि बाँसारीपाली माप कमेडीरो पूर (रा.पा. 1)
। चिोरी से मेरी मोदी का मात, हो मंगल की पोईराम'
(भारि रिलीजीकानियों और गीत, १५)
लोकगीतो में रग-मैषिश्य मा प्रेमक का है। यीमा पंग माग में रंगीना पग' से वासर्य अध्यापको माला पंग है। 'रंगीला लापर' पर पिस्तम है बो शौधन, मीठे समय का, स्मित और पासपीव में पतुर हो। 'कस्तुप रंग की पावर माव', पचरंगी पाग, हावीदर्शव का उम्सा घा, मोर पसरपी एवं पम्पपरमी कामकी भी परोसनीय रयी भोर मन रते हैं। इस तापस्थान का रंग-किपास सास, मी, मसूपे, नीश, उबला (श्वेत, समभार ), पीला, सम्मि, मीठी, सॉरखा, कावा, पन्दनी, पादि रंगों में पुस्मिन है। अन्य ग्रेड्स मी कम से प्री-बही मित्त पाते हैं। गरदेशीय रंग इसमय गौ की से प्रमापास्त । मुख रस्तुमा लिए परयो के मसेल परम्परा या पिम्पक करते हैं। परनी (पन्दन किग्रा), मोतिपा (मोवीचा म्), एप (हरे मुंगव भोर रात), पीला (सीला पोहा चोखाचोड़ा), रुपा (रूपे के देनडिया ) सोना (सोने की दिसी), प्रगती (अपत की रेत), मादि परम्परा से प्रचलित रम है। साम रम (परशा ) माप अपोयरे गीतों में नहीं है। मैथिली रंग मैपित माता प्रेमिका ने सदेव शा मिस्तम पद रिया, पाकि पस्मार, मालवा, एमपत, और मप्पती मात दे गीतों में गोप मिपदम प्रिम सगरे। महापन मी सॉफ्ते सौन्दप में अपना विश्वास पारे। पो कुममा पुम्य पापाया था मजा माम्मा सारखीचा बाहेमोद मैपिप्ती गीता में सम्पपले बाल पाले माये पर मनी प्रत, पापा परने वाली विधी माल पास पन्दन का सेप मिस मत्ता पर रो, ऐसेतोबासकी ममता श्रीगा। साल पहंग और सास रयी पायल मारेरोष टीम माराम पोम्या, पृष्ठ २६ भारतीय छोक-साहिरप पूरीका सामेव मीमा है, पर राजस्थानी, मासी और मोचपुरी गीता परम। पीले और पीसे रंग म प्रयोग हो बाम-माग रेप एमा है। ऐश प्रवच होचा कि रंग मैपिटलमानों को पसन्द । । मोबफी रंग मोबपुरी गीत की प्राधि पाम मैपिटमा निम्न बमे मैषित दीपेश कतिपय हलके रंग दिपायोग मी मोरे यो सम्पमा अपने मामले में रस्ती है। हमी चुनरी से की ममा उती है। पास की पाली में मोचन पपेती है पर से बीमन पाता परेराम रेतीक्षार पारी २ पिपोग विध प्रले प्रमा, मय, पोत पा मम्प सराणाक पधी सोहै। कमी-कमी क्यिोक्सिी मौसी में पारस मी होवा और एमपीरिवारपोरेशी मे सिर पीला नही दीखत्री । प्रयुक्त संकेतों से रंग के साथ सिन्दूर प्रमोम राम है। स्किीम को समाप्ने लिए प्रकृति बटकीले रम पियोगियी मी और प्रावधान है। वो प्रभास देते विलोम के मोती में कम है। परदेश बाट एए अपने पति से एक स्त्री करती है- वो वाम गुप दिन विति, अपनी पुरविपा मोरे परिपा पर बिलाये नाम (बरि बम निशमें भषिक दिन शाम को मे कार पर अपना पिन मवर) शिकार, सामाविषयसपने-आप में विभिन्न रगापामास से मत होते हैं, पर स्पमें उमरा रोजामोप पदारे मियामो सास और मम्मी रम से मषिक प्रेम है। कमी रमपानर प्रियतमा पौवापरबारी मिटम से मिलने के लिए मटार रा है। पावर अमाप पारी मित्र मोरी . मोरपुरी मामागीय प॥ - सोकगीतों में रंग-वैचित्र्य और सर्व कप मारो। मैपित माँति 'मायसे-गोरे प्रयोग मोरपुरी गीता में नहीं हुमा है। सुम्पी साकी, साल पर, पीच और सचिम पस्तुमा म त पर्व रंग की मियता असक्स दी वही मपित प्रेम का मो मारे। पत्यार प्रयया माझमा प्रदेश से बार मोरपुर बसाने वाले मेमो पबपूत की कृपा से पदि माशा के ग यहाँ मिय हो गए गे वो प्रारचर्य पही। पंजाबी रंग पंचायो गोता में प्रम्प रंगों की अपेचा पासमानी रंग के प्रति प्रेम मात उभा है। नायिन इसो शिविधा में किया भासमानी रंग का पापप किस सूरी पर सरकाए- प्रासमाबी मेरा पगर, मेसी पिची टंगा।' यही प्रासमानी अधिक गहरा होर राबत्पान का पिय रग पर पना है। 'नीला पोहा ये अपार' (प्रताप ) वषों से राजस्थान का मिग मायक है। इस प्ररेय मी परे पोरे की रंगत थे मुसा नहीं सका। पिरोपी रंग मावोय पोतों में प्रीही एपम दो रंग मिलते हैं (गोरा बदन स्थमसी सारी)। मैपित मोती म साँक्ने र ग रे साप मोर (मेत) कामपोग ठीक यस्पायरे मशागोप सारे। पहा स्तुत रसमस रेप ही है। स्त्र रंग गीतों में प्रायः असेख नहीं मिलता। बोगियों के गौती में प्रश्य ही कपड़ा श्री पुलाइ बालों के परके समान समय सार बाती है- 'पके मोच रंग मेरा पाषरा सिगै पर परम।' वेन्द्र परमार्थी पासत पारेर प.. इमरीकी धणे, स - २ દર भारतीय कोक-साहित्य कोकासदेत मी हमारे पर रावस्थामी, मासयो मोबपुरी 3 पाम। मासे और पीले रंग मम्मोप हो बाम- मारे लिए प्रा है। रेखा मी मी दोनों रंय मैथित सामाचे पद मोरपूरी रंग मोचपुरी गीता को प्राति परम पिता की मास, मित उममें मैथिल की अपेक्षा तिपय स ग टिबायोमुनी मोरे पोषक सम्पमा अपने माय में मस्ती है। उस पुरा से रंगको मात रस्ती पापयाही मोबन परोसती है परहेजीमने माता परपे में है। प्रतीक्षारत मागियोग पित्रले मम, का, बोक्स बा पम्प सन्देशवाहक पदी है। कमी-कमी मिगिनीसोय भामरापही होता और रेप परिवारले देशों में हिन्दूर कोरेका वही दोलवी । ममुक्त संवा में पो रंगला भिर पस्योग सम्म है। कियोग को उभारने के लिए प्रति शेरम बिशेगिमी पशि में पाये और मारपीन । मायामास पैसे वियोग हे गीतों यम वा है। परवेय बाते हुए अपने पति से एक स्त्री पाती है- बोपसम्म त दिन विति, अपनी पुरतिमा मीरे बरियों पर विचाबाव। (मदिम विदेश में प्रति दिन पामे वो मेरीकी पर प्रसा पिशायर दो।" रेकरमा बिपने प्राविमिन रोपात से मुमत होते पर थम उभार बही दो। मोरी पारपितामाकोसान और मम्मी प से पशि प्रेमी पिणी परम प्रियामा पौवापरपा मियाम से मिलने के लिए महर राय। पीताम्बर सोमाम प्रापिम गोरी मोमपुरी मामागीच, पण - - सोकगीतों में रंग-पिम्प ३ और सर व सबिने। मैपित भै मादि पॉश-गोरे प्रयोग मोपुरी गीतों में नहीं हुआ है। समुन्नी सास, साल पर, पीय और समिम पस्तुमा पसंदत पर्व रंग की प्रिया समय ही नहीं अपितु पेमा मो सुपारे। पास्वान प्रयदा माथा प्ररेण सेवाम मोरम पसाने पाले मौनी रायपू की हासे यदि मासका रंग यहाँ प्रियो गए ही वो पाप नही। पंचदी रंग मागो मोवा में अन्य रंगों को प्रमेया मालमानी गरे प्रति प्रेम म्पात हमारे। मारिप इसी हिविषा में किया प्राममानी रम पारप लिस सूय पर पर- पासमानी मेरा पम्परा, मेली तिरंगा नही प्रासमायो प्रषित गाएर बस्वास पविय रंग पर मच है। पीसा बोहारो असवार' (प्रार) बसे पास्मान मपि ना है। मरेप मो सोदिको प्रेमक्षा नहीं सका। विरोधी रंग मारतोय गांवों में प्री-भी एम दो रंग EST(गोप बन स्पामसी भी)। मैपिह गोठों में सक्नेि र गाय और (सर) का प्रयोग क यथार रे 'मागोग देसाय। प्रय रसमान रंगी। रफ रंगना मोगों में प्रायः सटेल नहीं | विपारेगोनों में प्रापी मुकर गएर - मोरे गमेरा बापरा, पि! नरेण सपा, ध, Rit हमरीकी पाएँ । २
भारतीय मोक-साहित्य
प्रपा
पोविमानपीक बारी,
मैपिस गांव में पी अपेक्षा 'हाममिक मस्या प्रकि।
ममें समवस्थित सम्मिमम को मा है। मत दिनों पक्षणापति सहर
प्रमरा मैपित और अरवि पास। मौकले रेय
पद परमी मत कारय। मोरंग पर पीवार को गोमा
पातासात मोष्ट श्यामल और पीवाम रंयव में
पालिका
मध्य रठ सपाधि अपरी निराली रमन से समो बोषणालो
मौरती है।
-
गामास
सिम और ममप सभी मातीय गीतों में है। पर स्पर्तन
रंबामात कसे वक्लवीय है। समर गीतों में भूमने पाँ
मान होता है या वियत अनुपम परि और गरमी रयामा अपन्न
परने में पोम देते हैं। सोसाहायशप ही पीवी में भनेर
रंगों मास्ति है। सर्यमापन सोरे बी और रमव श्वेत में
बामा देवे , मटी, पैर, पोपे, भर पर, प्रम, भय पदि उप
परब रंगारते हैं। दस सोने केला पागम देखो
मोपेपित मीचमक। बौवामा-पिप को मारने में
मोमीतापमान उपमुक है।
'मल' परस्थान में एक प्रमात पौव है। मुमत अमरपेट के एक
मनावर की प्रेमिय पी। मह सोमवार में प्रमुक्त उपादान की
पगाए प्रामाचति । गीतमा पस्तिकातीमोरम
और उसकी रमा एक साम मलम गो-
बागीरपती भवधिये रेकोरे
बारामागेधप"
रविर, माम साहित्य, पण माप, श
मोकगीतों में रंग-पिश्य होमी रे, गोमती मांगी सारी मूमन रात्री बीरेभावरेसा (यो करारे बस की पती-सौ रेता मूमय की मरमाता में ऐसी योग दे यी है मानो मूरे मूरे पाता की सदूर मेमो में पिवली धमा सीहो।) गोपसमेत सधी' नाम बम्पाचौ गीत में विशेष रम्य ₹। उममें घरे (पोसा), BAT, NEPा, पीसा, रामादि रंगो भएक ताप सारे। गौवधर ने बह रहाः (बनी दी, पूर्व की पत्मी) रे और ठम्य पूरब सफेद, यूरेकी मबीट और वह रैना नेत्र सात, पब के प्रप और रेसाद देश को पन की और बाद नपीर पीसा, तपा बनीष और रक्षा श्रेलरी साई । किन्तु बम पो बारी-बारी से उस धमी सामवाण (वं में तादी गा र समावेश है) होल-पीतपर भी से समय रूप से उगवा हम उबले रंग घ और इम्य मिन है- रागपो रमास परयो माममा सिन्दूर भयो' रसी पर पीपल के पते से मारिमा पाप की पिनारयसुपारी से एगी प्रसाश्य, सम से सापकीपरपपार, बी की पाक से मेकी भरमार, मापक (रेशम) से सदरी की पोट, पातु माग से पछी परमी-सम से कमा श्रीमानामा पैर की सूर्य प्रपा से पर मुख पौरनी मित्ररे इस सीजन BP 1 उपमा सोमप मग कसाय ही अपरोद प से गौमामान सम्मुत ली है। इमा पी मल, चिर पे पूर्णता पम्पक मने के लिए मापियरे पोरन प समय प सेवा शरीर २ मुमन और ताप्य प्रेममे हुए सी उस्मानों से विरार (हो, पर २९८)। me पानी मप (11) पा १ स्पा होगीत सूरगती (IR) ५॥ - t २
१४
भारतीय मोक-साहित्य
प्रपा पोषिपापी माने
बोलापमा
मैपिल गीताम पर अपेक्षा रामविल अस्मा अधिक है।
सनम सम्पपस्थित सम्मिमय की मला है। मक-परिया एक विद्यापति ठाकुर
के प्रमप्रसय मैगिस और प्रबरे प्रिय पात्र है। सॉपले रंग की
पसन पगामी प्रमुख कारण है। साँले रम पर पीवाम्मर ही गोमा
पाता है। सास मोष्ट मामल और पीवाम रमत में पाटवियो
मप्य र ल पाँति अपनी निराखी रंगत से तमो सोमायने
मोहती है।
रंगामास
रेसम एमालेल सभी मारतीय गीतों में मिला है। मास्पबन्य
रंगामास की दर से उत्तेललीय है। ममर गीतों में भूमने पहा
मान होता हो चित्रमा अनुपम पनि और मन्द मी माम्मत स्पन्न
करने में योग देते हैं। सोसार' प्रअलेख सार होगीयो म अनेक
रंगाचे मासित है। सच या पंचम सोने की और रणव रकेत में
मामा देते हैं। मबी, पे, पोपे पर पार, अटारी, प्रव्य प्रादि उप
करण रंग पैदा करते हैं। यमा पारप होनेरेमा पालमा
बीचे लदेसि पक्ष मी पन। पीतामास-पिनको उमारने में
सोमातीपपा पर्सम सपमुक
'ममत' परस्मान में एक प्रस्ताव गाव है। ममच अमरपस
महिना भित्र यो। 'भूमत के सौन्दर-सव में प्रयुक्त उपादान रंगों
प्रमाण मामास लिये है। मीत प्रथम वान पंक्तियों में दीपाय
और उसनरमा एक वाम पर दिया गया है-
प्रतीकात्रीमखिये वीरे
पाम भाग, पप
देखिए, प्रम पारित पावा भाग "
.
१
होकगीतों में रंग-चिश्य
हांगी, कालोपीठम में बम बीमती
म्हांची बरसायेरी ममबहादेवी पी भाषीबोस।'
(सखे परारे की पतासी-सी रेसा मूमश समर मौसा में
ऐसी ग्रोमा दे रही है मानो मरे मरे पर्वती की मुदूर मेरी म बसी चमक
उठी हो।)
रमा प्रमोश क्षाबी मामह रावस्थानी गीत में विशेष प्राम्प
है। उममें सफे (पोसा), सन्त, प्रता, पीशा, एरा आदि रंगों का एक
साप मसेस है। गीतसर ने परशा (पमी देवी, पूर्व की पत्नी)
दाँव और उपवा सूप सफेद, नोश्री मबीर भोर बहू रेपार के नेत्र
लास, पन रेसमा और रेगा देश कोबने की राह मौर रेपाः
का पीर पीला, तपास की पूष चौर रैगाद भी पोसहरी क्या है।
किन्तु सब भ पोहा पारी-बारी से एक एमी रमा म पवाया है (समें में
साता गोप समारेरा)। सोच-गतपर की दी से समम रूप से उगवा
सूरब सबसे रंग पोर इक्या सिन्दू है-
पपठो ग्यानबरबा
पापम को सिर परदो'
इसी प्रघर पीपक्ष पठे से माक्षिके पाप की रिझ्माइट, सुपारी
स एड़ी का सारय, सम से समाव की परपपाट, नी की पाक से
नेनी बनावट मयत (रेराम) से सुन्दरी श्री पीट, सही माग से पेपी
बी सम्बाह, सी-सम्म से बचा की दसना पा शरीर की पूर्व प्रमय से
पर मुख पारदी निसरे पर की उपास से उपमा मौन
स्पन रे भाप ही अपरोदम से रमा प्रभामा प्रस्ती ना
ही मरी, सि की पूर्व प्रेमकने सिर नापि पोरन से
उपनप से दवा परीर मटन और स्वात्य प्रेबमे हुए ही श्री
उपमानों से प्रसारिमा (प.ना., पुस २९८)।
स्मात बोगोट ममप (1), १५
१. रामस्थान के मोम्पीत प्रसी (IN), १९
1
भारतीय लोक-साहिरमः
बुन्देशलपाखोमाय ने भी अपने एक फाग-गत में अनेक रयाँ
ता दिखाई है। पूरा माग पहाँ दाव परमा उपयुक पेगा-
अमर चार पेण बारी, मुसमानी कर री
पैर पार माती।
का सुस्तई सरदर मन्ना
कर पिस्तई मामी बंगाली सुतीभ सुमारी
अगर अनारी। मोरे नाम हरी
पीरी म हरीरी नुकह।
सबरे रंगन सवारी।।
विसिव प्रकम्पारे पोक रंगों की जिसे मह पाग उत्सवीर है । मार
वीस गीतों में एकदम एक ही स्थान पर इसने रंग ठिगई से मिलते हैं।
वों से सम्बन्मित गीता में प्रकृति औरंगाकी मिची है।
उत्सया स्पोहाय अपना चिाह शरि अमर गीतों के रंग पर
होते हैं। मार्मिक एवं पूजा विधियों से सम्बन्धित योवा के रंग सालिक !
चमन चीफ, उपसे प्रस्त, गबमुक्कामों से हार, पीक्षा पदम और सर्व
प्रामा पानी पसोप उनमें सेस मिगहै। गीता में साक्न
और होली के मौत भी है। पाक्न म मामा पयामी का रय स्नेह की
यापर और चली' गीता म मेपाली गाना होती है। रोची के माता
भ रंग केसरिया प्रावि का है, साधि पसारा के फूलों (केसही) से
सरिया रंग उमाला पाता है। प्रवीरी लाती मी मम तस्वीर है।
पाहार के गौव लसाई, मम्प और स्पर्श सिने होते हैं। विभिन्न
पुन्या पर्यन तपा चन्द्र सूस, बल, भाग, प, पदी के प्रसारण और
बायु परिवार मादि म पु मापाप पसंत अनेक प्रभर से रमाँ
बोसमाते । मैपित बरगमती गीत भपिश में ऐसे हो।
विस्तारपूर्व भी प्रसव करने में प्रापि का मम्पमतीन
परम्पप से सम्बन्ध । पायसी ने 'पपावमें मोबय मादिरसन प
ऐसी भनेक मभरी वालियर प्रस्तुत की। अपी में 'सीमराव
गगार' की दर पाले एक प्रसि गीत में अनेक प्रभाव और
पुरी की प्रागें, पण.
लोकगीतों में रंग-पिश्म मारवष की प्रसिम् मंदियों के नाम गिना दिये है। सोय करने पर ऐसे पं गीत मिलते हैं। मामूपयों न पोरेवार पग मी मारतीय गीतों की एक माति है। इन प्रतियों में रंगारे प्रति रूविगत पम्प प्रनिर्वाह गीता में समस्यीय है। 'पचरंगी पुनरी', 'पपरगी पाय', साने की पाटी, पे भी मिली, मोतियो चौफ, पियरी (पीला वस्त्र) पराकुन, रह- पोये चीर, 'लोगो' पोड़ो, रेसम रोर, असी कोपस, खास पंसो, हरमा मग श्री दास, राम दाँत मादि प्रयोग सारस रंगवा रेम्पत करते हैं। सभी मारतीय गीतों में ऐसी म रंगों के पोतक उपरण माप्य है। रया भी यह मामा राम-पिता से मी मक होगये है। सनम अपना- बम्म इधि अपना परम्परा के सिवास ही रंगों ने पाते। बिन रंगों में गतिमा मामास हावारे से रंग मारतीय गीतों में परिवार से मिराते हैं। पूर्वग्रहों से पुक रग विषयमा मापस सोगीतों में विदित हैं। इससिप वहाँ हम प्रागैतिहासिक पिताश्री वर्षा या मारतीय मीता में म्पक होने वाली राशिस्था विचारणीय है। दम पर स्वीमर रना होगा कि सोफ-साहिल मचिन सैषा रणदी अदालेत प्राप्ठ, रेसमी सोगीता मनही मिस्ते । सोमपीतो' रंग सीमित, मरिचत और सूख रूप में चिटके हुए गिरका समम रूप से प्रभाव पाता है और बोरुपि-सम्मका विषस से सम्बद पित्रों ने प्रतिविम्बित परने में योग है। , कविता कोश
लोकगीतों में नई चेतना
प्रया, बीप, माचिया
गवरामा रस ।
(-मास)
सोति पियास सब-समूह प्रतिमा निचोर,भिम समी का
की अवधिया भावनामों की पोस्ता में से पाती है। बाबा में पर
पाला सिहर मात्र महिनी, अमावों और म्योग मशिन Tr
धीरे धीरे इस विवर्ष पर पहुंच गया कि 'प्राम, पीर और परिवारिक
गला रमाए सरही ते" पर एक पे बीकी सोच अप्रपा
रूप में पासा पाप है। पापा मी ठीक से समझने सना है।
दुनिया दो पर्यो मर गई और गोयले उसने पीता है-
शोपर किया प्रसिाथ उस सगटन और वा में निहित है। मनिष
पति से मिपास है।
ईपबारे मारा मनमाया,
सोमीवी पबिती देशी मति और उसके मालिम
बोक्म परिपय माप्त गरे। पति-शाय और पार्मिक प्रपन विशेष
मीनों से वहाँ एक सामारिक पर atयो समस्त होता ,
--
छोकगीतों में नई घेवमा हाँसप पद देखने और समझने लिए उन गीतों की बोब मारमा रेपो भापिकठिनाइयों और खिप भूमि पर पनपते हैं। गोध ने गोवा को सामूहिक प्रस्थाश्र प्रम मोत का है। उसने ममता की बनारमा शक्ति का सक्लेस ए लोगीत भान्दोसम मिशसिधे में पापा "चमा सपि प्रप्रपम टायनिक और मादि कवि है।" राम माफ पान विलियम्स ने सो माग धे दूसरे राम्दों में रखने का प्रयास किया है, बिसमै गोपीवो उस मूस पेड़ की पापा विसकी यो मूवमल में Reat और बिमम मिस्प मार-मर शालाएँ गेर गौरले टवी हैं। यही पेड़ पता क्-िम्प का परिपाया है। लोगीतों की परम्पप इन्तान के प्रादिम युग से पती मा पारे। पुगों की चप उसफे मानों पर पटरी और पाभपने बीवन को मामदारी से अपनी गोलियों में प्रभारित तामा भाष मी विपरीत परिस्थितियी 4 संपपरवा पला मा पारे। उख्ने समय-समय पर ग्रोपस के सिर गोवा में मानाय स्टार अपने मम प परिहार गौती के सहारे किग, मया उमार और जगम गीती दारा प्राप्त किये और इसना ही मही, मन की विपी र मीठी माता के मुत पोर दुल मोमी गीतों में गला । यो समी प्रभर पर्पो का सामना करते हुए मनुष्य कमरा अपने राज शकि पर पिशाम करने सगा वो उसके सिर प्रदिप ज्यान और स्पिषी शक्तियों से सोहा सेन पलपर सिर मा। मौर्य ने इसीलिए सोकगीतों की मंगाकोटी प्ररित कियटगनेस पिगे पीसार मुग बीपदी र परिस्थितियों में भाव गीता के भीतर एकमा प्रेगनी पिड प्रस्ट होने समे। उनमें सोने की माशी में मोपन परोसा श्री सम्मापित प्रमा, बीरीचे मनुस्य मान्ने प रिमाल, अबभा, सम, प्रादिमा पीपन रेष्टोर सस्प हे टापर न तो । पाती पो दूरी, पर्य और जीवन में शान्ति प्रान प्रातको स्टे। इस सेवा हम सन् समापम मिोही स्कर, पर माल भारतीय छोक-साहित्य अगा, भवारे प्रति पिपेष मकर रासामीता-जाम के माल पारित भने बाले मात्र, अन्तिम गाय 4 मौत पर भासों से भीगे योगी मी भषा नव और गणित से पीमित दर श्री प्रकार प्रपन को एक नया ही हिन्दुस्तान रीड पारे। और इसी परम्परा प्रामेबाने पाले मीवी में एक या स्मरणा पाने वाले मस्मि के प्रति नये रियासरे दर्शन होते हैं। प्रोपोमिक कठि ने समाज में परिमय उपस्मित किसी किसान मबार बने बगे। समृधि एक मोर मा गइ । गोरपा गवि पकाने सगा और मरीमा ने होगा महाराय मरम्म र दिया। पर से रेत बनी, बयन और पाए । बो पेशा था, उसे मैं सौप दिया और फैट जसे विपक गयर-ऐसे भाव होली में मस होने गये । पर बर माताएँ मेवार पर बनेकपा ऐसा लगा मालो सोमा पर संकट सपर्ट परम्ने बानी । प्राय माहो हो गए । माया के परम पारा प्रदीर गापा, ती और कीय गाला भूत पमा। मादो उसे मोर उन्ना न देखममी पप में पीछा नहीं छठी- मानी माते निसावितरिम, विपकी गार। देखिोलीमा पीपमा चमेशा में पीर । इस मामाईप्रपरेश प्रायः शिम्न और मपीय परिपाको इमाम विरोफ्ता निम्न-मपोप परम्पो पति पिया गह। से यम-कोटी बातों सिप परसदा पहा । माया भी स्थियों ने माम- बी रोमपीबोरंग मोगो परनिषा "कारियो की सोबास गपो माग भई रियो हमार से मारे बोरामराव व मामा श्री दियो पानरममावा ।
गीता में नई चेतना
भी हो तो भाव पाए दिपो
बोमा काम से बीमा।
(इस पुल ने रप और पीसा रग महमा पर दिया है या कम
पंधर दिया है। अपार मुरकी मर्पता से माँग म कम फोडा
पा गया है-मारा साग हॉप साहै। माखरंमप्र मात्र पड़ा रिमा
है। हम गरेपो से रंगे ? गड-पाव हा महगे र दिए, और
शर तो मिलता पुरमार है। भीममी माप पा दिया है, हम पारस
पाहे से ।
महगारी भनिम्पक्ति में प्रमालरेट लिया गया है, पिस्से
संगीपमाधिस्य प्रदीप से प्रमोस। बाराधी भए गोव
२ सिम एप रिमझिम फने समाया है। उस समय पर
हरिती से प्रवा-"प्रमापरमपीगी पागा, सोपा
समास यारसाएगा।"
मिनाकेबर पर पोरने
पंधि पाप मोर मांस
मूले मान मर गुपासा' की उक्ति प्राय समी ने मुगी है। बिना
पैर में चराने पर काम नहीं रोठा। इसी प्रथा भूला विपी भोर
से परिवा उत्पन्न कर सकता। रते अन्न पाहिए, वमी पर रपमा
प्रस्तुत र स्वारे। इस समारो निम्न पक्कियों में ही सारगी से मक
यिा गया है-
मा नियनको सेवी पानी, वा विरामको।
माही देर मे विरतारप गा वि मोराण।
(सिरहाँ खेती होती है, पिॉप म्यापार लिये इसी पेट
से पैदा हो र बिरें में परिव माता पिता)
एसपी लोगीत में पम मोर समय मिवारी बना दिये गए है।
भारमा सीमामा और संता अस्त पात्रा सस्स प्रदान गरेका
सोप-गीवभर की अपनी सामाफि तिरे। पापम-समयको मले में
मारतीय प्लोट- उदयप, अमेयों के प्रति विरोप प्रेमको सास वे मारे उद्घाटित भने बाले मात्र, बान्तिपदीय भाभी ते मीग मोटी गांव अपना भूल भोर साविषयी की पुकार अमान करते हैं वो एक बम ही हिन्दुस्तान दोस ५ और इसी परम्पपये मागे से जाने वाले गीचा में एक मम। भाने वाले मपियरे प्रति म भिवादन होते हैं। औधोमिक क्रान्ति ने समाज में परिमय उचित । मगर पपने सगे। समृदि एक मोर मुरमा । होय गति साने सगा और मरीम ने सोमौसममा पागा मरम्म का व से रेत पती, मत और पहावयए। बोवा मा, पैरी सौंप रिमा और प्रेम से चिपक गया-ऐसे भाग सही म्पक होने सो। परपुर माचार सार परासी । लगा मानो सोगी पर संकट सपरे रसने पास है। ममता पए । मामा पाप पाप भीर गाय लिया, धी याना भूल गरा। भरतोसते गोरी र रेखमम पीमा नहीं उठती- महती मरे नि सिरिम्प रवि गई सरी' सिनेमोरीकामाया प्रेमात इस मेरमाई परेशाय मि और मम्मी था विशेषता किस-ममापीर मा परि काटी-चोटी मालिश करवा 41 मासायर जीरोग पौखोरंग मोगी सादिया मदियो पौने बोबत रंगटो मारनहिती उगमाकाप मेरा बीपासवान सब मांगा दियो सन्ममोमुसहर
मोकगीतों में नई चेतना
को परमाता बाबो
बानो पोप पाना माप
गेबा पर सापड म्यो नाम
परिपा मूगा मरे।
(ने पर काम करने पामो, रोमाने मार खामो। प्रियतम, पर
अनाव समाप्त हो गया । पम्पे महमें मर है।)
पिहो तिने ही पाप ऐसा ही इतिहास मारतीय किसान का है।
रोयोगिक प्रगति की भा में बोवा ने उसकी ममी हा फि पर मारी
हार पिये है।
कविसाल की दूसरी समस्या है, परी समस्या से भुस्पतः
उम्पति है। पावा है, पर उसे पुका नहीं पाता । शापदमा
पनीर बास्तावित रम से र एमा अपितरे तुम्ने पर भी
मादा कम ही रोता । ग्रामों में देसेए सोर बाबरेशोपए से
पापम्प रो पुपरे। अपनी गाय, रेम, पचहा पारिप ने पर,
भीमा पर मही पाय । इसी अनुमा को कारकीरा पार
पर यिाम धीमता है-
ऐकायो सिर मकरियो, मो मन परिपा।
धमगो माउरो यो मन मरिया।
माळीय निम्ब-वर्ग के गीतों में परेशानियों से पीड़ित मानवता के मूत
में विनोदात्मक चिनगारियों मुशमने सगी हैं। महीरो, पा, पोषियी,
बमारी पोर मिसपरियो मोवों में गरीबी अमिम्पति अधिक तीवोपर
प्रा रही है। माही भार वो गोठों से ही मुलति होवे हैं। उनम
माना प्रस्तर में मम प्रयने पालामात्र है। उसमें ए अधिक
गापे पाये। ऐसे निराहामण्टोर मन में पत्त मातर साससाएँ अपने
मी कसममाती हरप्टो पर कापाठी । निश्चय ही उनमें चीन को
मबरियाँ होती हैं।
एसीसगदी मोवा म पास गीत में, बोपज बाति पापना गीत
।
૨૦૨
मारवीर को साहित्य
रानी पाटपये दर देश में मील मापते हुए रिवाया है। स्वीपरी
परिस्पितिमी भय है रिसीमा से पापपने प्रष्टिकर और
प्रादर्श
मापने रम प्रामकी से खारर अपने स्म!
मिसाना पाहता है। पर अपने से मिल भौर परापन का
पुकामहरी रेकना पाया। उसी सीता पपी मुमी मिसाल
मामाभूति भने प्रपास पहै।
प्रस्थ बीवन कठिनाइयों के सप्टोर मेवाड़ी मोर पर
स्पानी मीचा में बचे खरे हैं। सबस्तानी याद में मीर नेता
का सदायरेम थापाईदिन-मेहनत करने और उल्कर
फा तय भोगता है। इसी प्रकार किसान पाय-मर परिकम बळ
है, पर मासा अपने परिभम सही मोग पावा! ते मरने
अमाप पावन का मी मुरिस्तो माता।
दिन रातीमा
सुमसुदेब मोबा, मेरो स्वाम
पा परी पर चारो मोव पुरेखो
मेरो स्वाम बरारोबी
(R-एव भाम-रोमेट है। मुख से भी रोना नही हो, कम
मा पाठिन है। सामौ परवारी पोरेशी है।)
घोष पसरूपरे धीरे गीतों पर होने खया। पोस्व
परिक्षामस्वस्म कमी-कमी मूती माने गौत्तमाबारे। पाली
पन पति पती स्वामी, पर में अब समाप्त हो मम
पन्चे भूसी मर है। ये एवं खगवे ही अमेवा मॉमते हैं।
तासे सा! परम में उपरही। बागेर मनिस का
1
विवान पर मनमाने पाता है तो उसके पूर्व परी ka
उसे अपने परम्परागत पमे से विमुख मने में गेम देवी है। इस
पहियों में पली बार देती है-
१०३
को परमतामाबो
पामो दोम भावामान
गोखा पर पापम्पो पार
सामरिमा भूपा मरे।
(कने पर प्रमाने बामो, रोमाने कमार सामो। प्रियतम, पर
में प्रभाव समाप्त हो गया। पम्चे भूतो मर ।)
पिछले दिखने ही सपा का ऐसा ही विकास मातीय किसान का।
पौवोमिक प्रमवि की मा म र गोगाट ने उसकी कमी हर शक्ति पर मारी
महार से है।
किसान श्री दूसरी समस्या है, बोपरी समस्याओं से मुम्मत
सम्पत है। पाई मेटा है, पर म्मे पुष नहीं पाता | पापद पर
प्रथीमा पाता है कि मूल रामसेर एमा प्रपिक पुने पर मी
समकही होता । मामा में देखे हुए सूदखोर गोरे गोपन्य से
पापम्पत हो सुपर। अपनी गाय, रेल, चाँमादि में देखने पर
भी
दूर नहीं पाता । रवी अनुमा गोरवर वार
पर र मिान श्रीमता है-
पेपरजो सिर मत करियो पो मन मरिया।
प्रमो मायरो भो मन मरिपा.
मारतीय निम्न-वर्ग के गीतों में परेशानियों से पीड़ित मानवता के मूस
मग्रिोमपिनगारिया मुखाने मनी रें। महीय, पाय, बोलियाँ,
पमा भोर मिल्परिमारेगीवी में गरीबी अमिप्यकि प्रविण दीर
मा पोरे। प्रदीप पाप दो गोवा से ही मुखखि होते हैं। उनम
पामा वास्ता में मम को पाने पाता-मात्र है। उसमें लिपे प्रति
गाये जाते हैं। ऐसे रिपीमप्टोर मन पत्त मानव मालसाएँ अपने
में समसावी रपट पर काबाती। निश्पप ही टममें पीपर को
मारियों होती हैं।
दवीसगको गोटा में पास गीत' में, बोकि पप्त पाति अपना गीत
-
भारतीय ठोक-साहित्य
'प्रमाद विमा संप मठीतोता है। मबाट पदिक और
से ममा, बगरब, किसी को दी जाने वाली स्तमा, प्रबार मादि । र
पति मराठी रे मसिम परि (शाहीर) सारिसर वो कम से कम सीमा
बयो रे, पाहे और सीधर मते ही। महाराष्ट्रीय और
सेसक मा मत है 8 पाहायपरति । सर मा म है।
पुरानी मपटी पय-शाहिस्प में ए प्रयुक होता रहा है। मम
बरगद ऐतिासिकम्पति मिी परिण प्रम-बसेर ए शादी
सम-साहित्य (मपठी) में प्रबुल होता है। पवाड़ा साल सस्पी होता है।
उसमें मूस मास प्रमाण वा है। मह साहिल समय बचा के
लिए पोषमाम्म, सरस, विप पोखी बाने पाती लोर-मापा में रचा बाणा
है। सो उपमा, स्पेषा बादि सो प्रचलित होते हैं।" पाँ-
में मपठी सपा महास्यूरियेषवाएँ प्रविधिम्पित हर
'पास' अपमी विरोफ्लागारबाही 'पमा, मास"
पवादो', मप्प परेश और अपर प्रदेश में पंचाय' पर मोमयागा में
मामलिया इमार। . ने पमरे पिय मामि
प्रदान के रूप में है। प्रयोग से
परे महायरे में मा
मग मा पर्याय हो गया है। पेशवा में ही करवाये
पाली, बो ग्राम ही समाप्त न होती तो पति
समी उत्पति के सम्मान में सामनावी प्रपन है-बाप
सीमा ति मत रोवीन मोतीम पासे मार-परमार
पनियों की मापाएं गाइ बानी हॉमी। रेखमी होची हमी भोर साई
मग से परिपूर्ण होती होगी। पता परमारी मील होने के पार
मारे पसार हस्से सोचने के लिए समायर भएप मिस
बाला है। इसमें सन्तो वही कि परमात पनियही मापद में प्रकार हो
गए, रिबके या-पएम प्रशस्तियाँ 'पारेपसाठी दी।
महारादीप बासोप, विमा एम.
मोबसहियामा बीबर अम्पाय, 1
.
पाड़ा महाराष्ट्र का प्रसिद्ध होक-काव्य
१०७
माय-पास की ही है यह पारस महाद में 'गोपस' प्रपा से
प्रचलित मान्य बाता है। सरेक्या पूजा करते समय गोपस पास
स्थापी' प्रपा महायर में पूर्व प्ररक्षित है। सारित समय भीरमा
गान मामा समाप पाम बिवाह बा नामदेव
पूर्व पशिव दी। योबस प्रयारे पाप से मॉपही नामा एक अक्षम
समावि बन गई। प्राण मी गोपनी गापा के समय पाप रेवाराम
सर पार में पूर्व पुपारे परिण मी भाकाल में गाते हैं। मह ससे
पारेकी उत्पति वर्मश प्रतीत होती है।
महापर में वामन मोरपन्त र समय सम-साहित्य में शाहिरी सम्प्रदाय
प्रसार मा । पर यदि भरपी रे 'परी' म मण्ठी पावर है।
मण्टी रेपे शम (भी) पवित्र मा शास्वाम। हिम्ी मारा
सिसको मतिमी बहुस्सा में निम्नवीय बावियों से पाये थे। उन
चीन मनुमा और मोफ मापाप साप पा। शमी परियों द्वारा पाई।
पारित हुा। प्रारम्भ में पारे पर्ममूझ रहे, पर मफीम
मसा मानेसमी मोर उनष पराम बने तया, पर पीरा उत्पादित
करने के लिए और-बरियों भरान मुमने और तुमाने की याचिको
प्रोत्साहन मिला । स प्रभार पपगम और योनिसहमे सोपरिती
पारी महाल माघ दोवा ममा क्यामी परिण-पर्यन पर
पीप पम-वर्ष मरा परिका हो मर । पममा
चित् पवनीचित भी हो गया।
पापीर पगारे असा नहीं है। असम की शिक्षा स्मर केरो
सब पपा मिसबारे प्रकार ने सि पोचाकी
भूमिप में सब पर प्रमय सतारे। सन् १९५सयमा रमित प्रमि-
समरे एक पमरे से मरेनिस यस पाले पवाद सोपिम
पप्प रे रिपर पर यए थे। उनने को 'काम' गाए या (मिहास
मीरारा पाने प्रमाश्मिा')सा पास ही है। उसी रपना
और पूषा इस म निद भी सिरसी पड़ी माती र परम्परा
लोक-साहित्य में 'धारह-मासी' 'भारा-माली' गीता में प्रायः रिपसम्म-प्रसार की प्रषिक मात्य है। वही परम किसमे दुनि-सा की अपेक्षा रागामा ध्याना सम्पूर्व मामी सहित प्रकट होती है। 'मैमिली सो गीतमा ARE-मामा' को 'अनुभूयामा प्रमियमम्मना माहै। पाप-माट मैसर्गिक सौन्दर्य के सामने कीट्स के पैर, गहरे मील रंग और सी पान, काहेर पाल, मुलायम पतले बाप, रमेत कस्ट र मलाई पद प्रदेश पावी माविका मी पीभ पर बाती है। अपने पच प्रामी गेदर्य में सहेर पाए मासी गीत किसी भी प्रतिम सौनाकी पेर प्रमाणही सिद्ध होने में पीछे महीपते। साव और प्राकव विका ने लोकामिम्पतियों साराय से मि सन्देर साहित्य को प्रसय मिा है। विपापति और बायसी ने परम्परा या सोरगीतिमा से प्रभावित होकर हो अपने विमान में चीनी संचार मा। सबमें प्रतित माकी की सहारिता विना लोक-माया मापम रे माहो भोप-प्रचलित पाएमा प्रथया बाद मासी गीत प्रापाले प्रारम्भ होते हैं, सपि इस लिए परेशानीष लिम्म नहीं है। - रामप्यारामिह मेरा मैगिती योगी
मोक-साहित्य में बारह-मासी गीत
रम्परागत मान्यता मात्र ही माम देन पोम है। एसो मास पर
घर से भापम्मा पाए-मासे मी लोक-साहित्य के मसर में सपसम्म
ग. रमेश ने बारा-मासे प्रस्तुत पर थे तीन प्रमुख पतियों का
रोम मिाहै-'एक मर्मम ऐप से प्रारम्भ होता, तरी में
मापार से और तीसरी मे अबसर रेनुसार ।"
पपक्षित परम्परामार बारामासो प्रमोग टीपर विमारकर
ही होता पाया है। सेनापति के पार मासा (बो बन्द से प्रारम्म हो
में नही पात पार पाती है, पर कहीनी प्रारा प्रस्त स्थान
पिलर भाभी रे पिम्ब-प्राय मे पहुव सहास होवे है। बारामासौ की
पा शारिरिक परम्परा समय-साम्य मार्ग से होती र स्म-समय पर
मान्तीय मायनी रे साहित्याको प्ररित करवीर, प्राम-बम्प के क्षेत्र में
पार मी मिस विपयनी है। 'सारेवर बा-मासास सस से हिन्दी
देव नए गारगरे।
इस समोहमही निम्न प्राहि-साहित्य सोप-मापा की निधि
ममास्ति या महापाप-माली गीतो की परम्पराको-साहिप से
ममापित होना असम्भर नहीं मति होवा। अपनी भनेक रचनामा
मागास लोक-साहिम से प्रभावी पोपित किया गया ही भो
पसार सतत मुकणे प्रमाविठ रने में सन घाव इसम
मरेर यही विमाधुनिक बाप-मावो परम्परा शो-साहित्य की भूमि पर
मापारि र विसित है।
बारा-मामी मीठी में प्रत्येक मास का क्सब मते मिरबाता है।
र मात करता य में री बासी है, किन्तु इस पान मसएप
पान रक्षा पाठामि उपायों से -पवन पाबना श्रीमायो
१ प्रपति और गलभूत । विपीसी दी लेकर अपने प्राली
मियम को स्मारकरती है। इसी प्रकार अनमो पर मानकी मात्र
1 महति और हिमी काय ..
भारतीय लोक साहित्य
पूर्व प्रापेप होता है।
बीसे दो मालवी पाह-माखिमाँ दी जागीयम पारा-मारी
मपा-मीवी में गाई बाहै। सारा सम्स और पी पीने
हर मी पRE-मासों (सिया) प्रे गागबान है। वर्षों और वयात यौन
से मसिद श्रत है। इस लेप ही मसली विहिदि अपने
रियोग गा दी है।
गर्या की बारह-मासी
सविलो असारे मार, प्रमुबर मारे
चला पायारे दुबारकालावर भम्बर सूरे
ममा प्रमुखी मेरामा विमानसम्मपी रियारे
मपि, एक तो पासी साये, दूसरी बारे
मकि पागो मापद माम विराम
मीची मीमी र पुन साा मीरे
ससि जागा माम माम्स, पग पनपीर पई।
पोरे पोरे पुषी राव ही मन्दर मोरे
सनि बामो परे मास मेरो बाबो रे
मारा प्रमुखी पिवा पोम रस ममारे
मषि, बागी प्रतिक मास प्रवासी भाईरे
मसि, परे-बरे गोरेपय पुवाब'मदर मोरे
सविसमा प्रम मास, सिपाडो' पाया
.मरमर
पवमीसरे दिन मिया योन-गोरे। सो
मामकाहपोषन पर्वत पारसम्म
१
खोक-साहित्य में बारहमासी गीत
११३
मारा प्रमुखी बिना पा रुपे सोप' पधारे रे
समि, सम्मो पोसम मम्स, अंगिया काहीरे
मारा किमती विमा पोष्प अंगिया सिबारे
माथि बमो माबर मास असम रितु भईरे
मारा पमुखी बिना पो म बसन रमावे' रे
ममि बागो पागण माम होखी माई रे
मणि पर-पर पागे प्रेमाप हरि मम्बर सूनो रे
सवि यो तर माप्त गयेमोर' माईरे
ममि बापर गदगोर पुगपे हरि मगर एनोरे
सतिसागो पैसाम मास ग्बामो पापो रे
पर-पर पा होगप प्रभु मन्दर सूनो रे
सप्ति भागो मेस मास मम पर माया र
पापो भापो से गाती रोजोम कमा रेरे.
माया पाय-मासी में प्रस्पैक मारी सविस रूपरेला मे स्थप स्पौहारी
पप्रम मी मिला दिया है, भिम ऋतुओं का पारण शिम प्रस्पच हो
रुप और पपा सोच-विसी र मिप माप और नायिका
३
. गोर-पमा रामस्पान और मापा की स्त्रियों का प्रमुख स्यौहार
हैजिसे 'वीरमान से अपरा गोरो मा बाम से भी पुकमा
माता
५ परमी की
• सौ.हीरापी से मात्र
भारतीय लोक-साहित
माप्यम से अपने बीवन भी सापारय प्रसाधारण मेम सम्बन्धी का
भूतियों प्रेम करते हैं। मासम्म परें और मा पिप में
राधा के प्रतिरिक्त अनः गोपियाँ मी है। पूर ने अपने 'प्रमर-गीत'
पण शिए गोपिनीं ग्रे ही मसाया है। सब प्रसंग मी एक सोस
मीठ में प्रामा है। उसमें गोपियाँ या नाम शेकर प्रत्तेर मास
भपमा एनका वो है। प पमन्द्र गुमथ ने सच ही मारे सूरबा
में किसी पसी भातो र परम्परा प्रकिास मास्स होता है। या भिमान
संकलित मोमीनों में पर्गिय प्रसंग और परम्परामाय और में
प्रपिता वारे।
विप सम्पन्थी बारा-मासी गीत दो प्रचार के होते हैं--(१) पिमा
प्रादि से पन्त कमियोग ही हो, तपा (२) बिनम अन्तिम मास में गया
भावारे और विरगसी को उसके सयोग प्रम प्राप्त होता है।
म्मर यी गई मार-मासी दूसरे प्रकार को है।
पीचे दूसरे पचर की पारा-मासी दास की बारहोबो अपनी
त्रा के दौर में मारे निवासी (म• मा ) पीपची अनवास बामस्य ।
नम्र सहारा लिपिषस की गइ। भनमाल रेमण-मार्गी होते
गोन-येपी पानने भरपत्रमाश पामाइनिदि मामा
। मिवाति भौर हरिमबन पर होता है। पूसरा पाला-पासी गीत एव
रघर यस्ता है-
गिरपर बसी पाठ भाव गेरी भाषा पुनकर में एपी'
रममममम्म मेरा बरसे रुप्प पारप बागिम्मी
पेसा' मेमा प्रसागिता जप होई हरिमापी
पोरी' पब चार मत रही समसी पपमा मेला में
पौली
मैप
पामा
१
पपरी गान
सोर-साहित्य में 'वारह-मासी मीत
AR' मैना सवार पिया मेरो मब हो रसो बागी
और सेवामपनिमा में 1 रमता जोमी
मारो मेरा बगो बापी पम पई मेमो मबाहर
बमक पोखरने
एप मोरा पियों मन मोहन में मुखिया दुसरा
बार मैदा बगोमाजी माल मिझो ममा बासी
मम मान मिसोमवामी
समीमा दिमित यो माप मिमी वीमयको
कातिक मेला प्रश्न मम्मोहन गोर पो नामा
पास पोलाम्बर-मार मैरवा होम पार र साधा
भारती सूरव पै सुर मिारे सोरे मासिएम मात
मार मेगा बये बाबरी मलिएन में मारी
पुनो सत्ती री मरि मम की सी पी पीई
पागल सरम्यो मन भोमन बाट गुमास मई मेरी
मा भर मुठिया सप्प पे पपर-पार होती
Raबर मेरे मन की मो भाष प्रसनहीं सूझे
सुनो सवी मोरे भम् की मन वारंप पोहे
मात्र मेरो गो बानी पीपर पान में जामी
एमम को मारा इप्पी अपनी प्यासी
देर मेबो यो शबरी पर दया पबमरी
कारण मारनी
मत रमादा थे भारती पान nिा बसी
'सायाम प्रमु पो मिटम की परिचराने मिरमा
प्रयु परहा की मैं एसी
.
.
म
मार
भारतीय शोष
(माप), सवितु बसन्त प्रापेथे (मै )
'मा सति पासा पाती
बिन पिया मागोमाग (मो.)
गुन (फाएम): 'पपुवी बपार परबर पास
मरि जाय' (ब)
'सबरंगबलख पिया सग
फागुन । सखि होरि पापड (म.)
फागुन सति पाग देखत
पर पर उवा प्रवीर ।। (मो.)
१. (प) त फुरोवन मुख (प), (तीज)
'दिवा पुखिय गेर
मिड सबरगम (मैं)
सम्म (IN): 'पपपपत बस बरसत भाग (०)
बिरहकान्त मोर गात
से कम रखम धाम (मै )
'पइसाप ए सपिम्पम बाये
तब से गरेता नीर' (मो)
१२ (पेप): पवरती पो प्रममाव (.)
में मास मशिसूबबामे
सर सर पवेश समीर' (मो)
'बिन नाप बनवीतहादिक
पपरियारत देश पारे (म.)
म.-प्रमो में -मैथिली मो --भोगपुरी और
मामी के लिए प्रपुर संतरे
१२ सती प्रथा एव तत्सम्बन्धी लोकगीत मारकीप इतिहास के समस्त वालों में सवी प्रपा प्रत्यक्ष-अप्रत्मदम से निरन्तर पनी पी। 'ठी प्रथा' राम से यहाँ वापर स्त्री उस मुस्मु-उन्मय सेरेपिसमें पर अपने पति के शव साप अग्नि प्रमाण कमी अषमा उसकी मृत्यु होने पर लियोग में फिसी मी प्रप्पर अपने प्रादौ प्रे प्रसन्नता पूर्व पापोती। पपि अग्परिक सुग में स्त्री प्रपा के प्रमाण नहीं पाए पाये, किन्तु उसो परराव इस प्रपा प्रपतन अपएस मरने लगा। पति की मृत्यु पारामा' की सच मात करने पातीमारी पीरे धीरे अपने अधिकार सोने लगी। पस-मस्त प्रार्षिक प्रवस्था दयनीयता ने मारपोप मारी पर धन-मार बना दिया। देश की प्रामाकिस पम्नीकि समय मस्थाचम्प परिस्पतियों ने पाया राफियी से मारी श्री मुरवा के उसके प्रति विनर के समस्त पिसाठी प्रेदरा दिया। मारत में पान पासी अनेक प्रतियों अपनी लामो प्रकिया परळी यी। पूर्व प्रर- शिव स्वी-प्रपा इनके सम्पर्क यहाँ प्रादेशी से पनपने समी। मप्प प्रयोन मुग में उसने दर प्रपश्चपा। मारतीय पारी ने सवेरा सतारे कप में अपनाया। पति की मन्यु पश्चात् पीने १२० भारतीय लोक साहित्य अपमाय और पतिया होने की सम्भावना समथर पिरयो गमा । बिरेशियो प्रागमन से सगाकर मेगा उत्पार-पसाय सपा मारीमठ पशिठान की एकलपी मापीरमा मृत्यु सस्ते अपनाने की यह परम्पप अपने आप में एक पस्यमय इतिहार हो गर, क्सिम सासी पपा घर-पराबय एवं नारी रे प्रसस्स अपि मुम्बन लिरित। विलियम टिंक द्वारा सन् १८२६ .. म स्वी-मा प्रचारिक पोपित किये माने क्पा उमको रोकने खोर निकायों के बार मी एत रूप से पा पारस देश में बनी रही यहाँ तक किबीसी स्वामी मप्प तक वो होने में परमाएँ होठी रही। अपने शो गोषणखी बनाने अपना विरोप परिस्पतियों साल में प्रार अनेक प्रान्तों में, मुस स से यात म, ब परिवारी ने अपनी विषमाओं को पलपूर्वक अम्नि में स्वी भारतीय मारी लिए प्रदा और पस्प का विषय है। भारतीय प्रामीय समाज में प्रचलित भनेक मोगीती में इस पर परस्पी म्पयना पड़ी गाण से म्पक गरे। गीता में प्रमि प्रारोहय करने बामी पिपया उसमा परे परिवन भत्पन्त प्रसन्न पा पित-पत्र में माँ-बाप, माइ-पान प्राप्तेि विलसवे म्पक भिगए हैं। गांवों में निदिध सती प्रक्शन स्पेय प्रकृति के प्रारूप ही मिलता है। स्मराव-पच मे सास, समुए, रेकर, पेठ देवानी, पानी, पति और पुष-मुनियों वमा पिस-पच में माता-पिता और भार-पास वियप रूप में खोलनीय परिबन है। ख्ती पिता का भाग्रेस ने सोता रहार करती है। मारे पर 'मम्मर', येषा, पामों में पान मसाला में गबरे, ता, पै में पिया, नेवर, गले में हसतो मादन पर ठार पानर या वैयार होती है। पाम्पसा एवं अन्य TER श्रीभार मान बोक्षियों के अनुसार यपपि दास बावे वपापि अन्तगिरित मापा मगरिकन - सती-अपा एवं तत्समधी लोकगीत १२१ सरिता नहीं होता। मालपी का एक वीगीत मौलिए सिम 'सार' (मिकाम) से दूरी पाने की प्रणा राग पीलू के सणे में समान रूप से मामा-मर में गाई पाती है। सापन योगेयो.- माया मम्मर पालोरे बग' मा सागर को होलो पनर नीचे यो कमर नीचे नो, चमेसी पीयो साब से देगे मी पाहोरे सेवग मारा सावन का पेखो कमाए बीचे यो पप्पर पेशाबोभिबोरसेवगामा पालनकोदोबो भरिया रन पायो । सेपग मा सालकोगेखो. पागावा देबर बामोरे सेबग मा सावरको रोबो भार्ग में साबसो रगामोरे सेमग मला साताको यो पमप बी मो. (हे मेरे परिबन, मेरे माथे के लिए मम्मर पामो प्रियम का गला मग बरे बोरेगा। पापन्दन गप पीये सहा है, मेसी मोरे बारे। प्रियतम से मिग्रेम न होने रो, मेरे परि बम, प्रियतम परीक्षा पदरमीचे खारे। मेरो प्रसादसों के लिए पुरानो, ना देकर मो, भरिया में राम मो, पपाया एवं नेवर माामो सपा सा रंगार गारो, मेरे परिबन प्रिम परोता परिमन २ पियोग १ मा .पाबत यो - m 4 .
१२२ भारतीय सोक-साहित पमन परेमाने का है।) पितो-किसो गीत में प्रापय पहाने की यह माना समुर से की जाती है। इस ऐसे भो गीत उपसम्म सिम की अपने समस्त रेम्स को छोकर पाती है। उसन पारिपारिका से वियोग तो होता है, हेर पनिहान, पर-पार मादि सभी सामग्री इस पार्षिक समार में पर्याय वहाँप पाती है। समाहरणाप मोचेम गीत रेसिर- मविवारा रा हवाबाग में अधिपत सेवा' विगवाय' पाणबोने वीबो पान- कविपत मेरसा सासू-सूसरा पे मारी सविणार कतिपत मेला मापप-चाप, हो मोरा का बापा' बागबोने बीयो पाल को " हाँसब मेरपा पास्-पूसरा रोपत' मेवा मापक-बाप मोगबामा, पापा मोरे पीलो पार बो" कस्मिारी पसी मम्मरपाबर पै माती सरिपार बाताबोबीदो पात्रको सबमारी सी अम्मरपाल मोग पारोपीयो पास मे कविपत मेवारा भोवरा' कषिपत मेखी सुरम्पोप मोगका बाबाहो बाबा दीको पाय - विपत मेल्या रेपर र विपक्ष मेत्या पासा बाणा' सपनामा २ प्रणि ३ बोकी पुत्री . रोप अमर-पास मापपरीकमरे
स्वी प्रया एम सत्सम्बपी लोकगीत
२६
मोमबाला बाताबोये पीलो पानको
परे गोरेगी बाम मरोगी मनी सविवार
अधिपत सेवी हिंगबा मोटा मागावा,
बाबा बोरे बीको पानको
(सवी मम्मि-प्रत्यास परने के लिए प्रस्तुत है। उसने सास-सर को
इमा और माँ-बाप में ऐसा हुमा जरिया है। उसके सावन में
म्मरपाल' (अमर-पाच मर्यन प्रिस्कमा) स गर । उसने गहरे-चौरे
नारे के लिए, सम्पोष बोरो, उमा रेवर-बेठको मीरपणे
पापी ने अग्नि-माल करने के लिए पोड़े पर पाम पाम मगरी)
पिस्त मेनपा सत्यू-एमप
' पंबिवाही मी सती गीतों
मे प्रमुक है महाँ सामाविक रूप से स्वैस प्रावि भोय-पोय,
मां-पाप आदि साम्बिया एवं पे-बार पटापोंभ योगरने से नहीं
पूस्ती। अमिपंचना श्रीमा परम्पफमा एमापसी पिरोपका रास्पाती
मावों से प्रार। टक पात्र में पूरबपोश' प्रबखयो स्पद प्रम
प्रवाकिया मोव उदयपुर से गालामामामारा भूमि में पटा-
रोहित हमारे बारे मे से एक ऐसा गीत मिला है जिसमें दोबा,
मा भोर पोय वात वयो रे ख्वी होने के मन हैं। विपक्ष
मेल्याक्ति प्रयोग उस मीत में भी मारे। म निस्पन की
वीरेनीवापर परस्पाती प्रमाणिकरे।
प्रम मुनरसी (विधा गागार, मपमान) ठिबने के स. उम
को पाली पनी गोपालर पालीस-पचास वर्ष पूर्व मन्दरसी ही में स्त्री
रबी। इस पयाप असेल समापिसरूम स्थापित गद प्रस्तर
शिक्षा के अतिरिक माँ पुरना स्त्रिया में प्रचलित एस मोव में मी
अपिक एस्पी रम से प्रमाा। गीत रे-
मामी घी मात्रा से रख-बाप समा'
१
१२४ भारतीय छोक साहिल मामी पती मावा नबो दियो । मेगाव भो रामारावी रमण साव पैमानी सतमा म्हारी सती माता मबारमा पर बताया भारी पती माता सिन्दरती में रिषो मेवाण बाकी रापी भापकासापर' पैमानी स्वममा, पानि भागे की पंकियों परिपत मेमा पति से प्रारम्म हा मुखे ए पा-सार, रोते हुए माँ-पाप, सिंचित होवे ए माल और इमली के सिपाते-खाते प्रोषप-मोक्री, फरसात व्या पाने में सोते पाशक परे झरने के साथ प्रस्तुत भाती है। सिपिपर किये गए उस ख्ती के गीत बहुत पुम्ने है। विरामी से ये गीत मात्र दिने गए हैं, वे पचास-साठ वर्षों से मिर-तर मागी । बापी। एक- दोरानी ने अपनी आँधी से स्वीबो चिता पर को मी है। ORAT सूत्रपाबाने पर प्रबभिमानी पर मार मस्तिका बाप ती २ लिए स-सम्बनी अनेक विदन्तिमा मचलित जाती है। ऐसी सिदन्तियाँ पटना के प्रपनेपन को पनि साप और मम भफिक पती, तसे सप्पी लोग गा भागे पार एक समस्या पर पासी है। . २ रानी पीहर कालाव ३ स्थानी, मिषक्षम
१३
मारतीय लोकगीतों की नारी
मोमोटोप सुमन जिवना अधिक मारी ने किया है, पुरुप ने नहीं।
बीन प्रनेत्रनेक अवण्य पर मिला प्रेमश ठों ने अपने प्रमा
और माल्या की प्रमिम्पक्ति गीतों गारीकी। मारी पीस
की वेदना, बास, मंग, महार, प्रमिला पाचाय, पम्प, शन,
प्रथा भादि मा मीचा की जिलों में एक-एकर प्रसाए । विमा
अतिमागीयो हेम्प मामा टाना ही अधिक रसके बीवनमा
फ्या चित्र मीचों ने प्रस्तुस्मिा है। भारतीय मोगीवाने हो जाये
पीन पवित्र
प्रश्न गया। भारी ने रीति-
देवाची, समवयों, प्रयाओं और स्पोहायक सिमित यो माया है, उसमें
प्रमाने ही उसके मास विभिन्न भागों में गति मिल गई है। वैसे
मा परि मानसरे प्रतिविम्ति पनीरे से ही सोशीत समाग
पा-विपाचाप्रपा है।
मारतीय बापरे दोन समान मात्रा में चोमीयों ने प्रस्तुत रिश
है।मारी एक भोर अत्यन्त रोमपन्य-प्रमान, साप्पी, पनुर पदिली, माता-
साठ प्रामपरिवी पसी, शससे और पोम्प प्रिपत्रमावो
दूसरी मोरया, मिन्द, अपामा सास, सा पमी, पक्षने पाली
बगर मा मोष पस्नी है। मिोरेमी दो चित्र गीता में मिलते
१२६ भारतीय होक-साहित्य है, पितु प्रविश में स्मिाताएँ ही बुश और प्रामापारी चित्रित की है। सीव के त्रि मी गापूर्व और प्रायः एगी है । मुसी परिवारी संगीवी में सास पयोदा अपवा कोणत्या बैसी मुरादया एक शान्त समान की, मनर शमी-सी, तया देवसनियाँ, बेठानियाँ गनगौर के मुस-सी पवार गई। पापबीवन भी-कहीं पुलमय है, कि मार भने परिपारी में प्रमय भीम तीन करती है। समाज में यहाँ बीयन मये सिरे से मारम्म रोता है, बसाह और उमंगों की अपेक्षा उन विमुर-विमुरका बीना पाता है। एमाँ ने अनेक गीतों में अपनी माया से परेही दुम-मरे शब्दों में समुराण की शप्रयत की है। अपने समुफ्त दुखी बीयर की अपेक्षा पीहर में पमा अधिक पसन्द पनी रें। सम्म फोन स-सी रिम-मर प्रम पप्पी और भाव-बात पर सास-बार रेखाने सुमती अनियों इसम पनामा कमी और पानी की पनीमाभाबपाशन दी है। सास प्रजाना-मनाना पो रिस काम है। मोदगती ने सास भिखना पठोर शोर स्सा चित्र उपरिपत गिरे हा एपम महीं। परस्पान में दो साक्व ही हो यई-पोग मासोई म सार सीपी प्रमाद फोग गौवा हो वो मी पसवा मोर सास सोपीही वो मी जाती है। साथ अपनी शाम जिरा रापणास दी है पहनिम्न पक्षियों में रेगिए । एक महम अपने मई से पह- राजस्थान के मामगीत-सूर्यभरा पारिपारा समादित मी सालापी साम मी' पप गीव 'सासाबसोवा मिडी' । 'विमी मो पबधी रिपोरठाला मारी गण गोरपा रो ममको, पूप १८ रामस्पाल प्रामगीत प्रप १ R स
भारतीय सोकगीतों की भारी
१२७
समलिमाता मैमा मा पिमापीर।
भैपा पचिप पिडी किरिया रे का
भै मोह मार दरी पोवा रे वा।
भेपा भोर मी गोर परबाबा रे मा.
भैपा मोर मर रा पिकरिया रे मा।
भैया पोर मदिरा मोमा रे मा
मा भोकानी मैया सबा पीरातीमा।
4पा पति पाये मी हरिपारे भाव
मपा पाइ माहि बनड़ी भोमिपा रे मा।
भैगा पो मार देवरा घोरिया रे वा।
सा गांधी मरि पसना मगर मा।
सम्भू पचिया पता से मरा मा।'
सास ने भनेर पये मधुओं पपी अमियाप मारता है। बीपी
पातिमा मीता में सासरे अपार हो तुम पर गाये मर । पिरों
पकी पसाचे ए प्रपा लेत में अन्य काम करते अपने कुत्ती
कलमपाएँ गामा करती है। बमों ने सास बनद, मनियों अपना
नियाँ पपे अप्पयन अपनी बुद्धि और अनुमा से लिमा रे, या
पादपासूस होने पर मो पापी सीमा से परे नहीं हो पाया है। एक
ग ने पपरे परिवार में हीन मियों के समय में गाया है-
सास
सासू यो एमापा हरिपा रोगरिमारेमा।
माया सवा में मारगतिधारका
(मार, नवीमा मेरी, मेविन मरेम पर
, चैनपुर कि गीतही सिमा-मारा माम-साहित्य',
१२८
भारतीय लोक-साहिल
की गाँठहै।)
जेठानी
बेठानी तो प भाषापारी परिपारेपा।
भइमा विम परसे बिन भामरेमा
((मार, देठानी वो काली पय है। क्य-मर में परम्ती रेप-मर
4 पाम हो पाती है।)
देवरामी
बरामी मापा बो शिखरपा रेमा ।
मापा बिम विरै दिन परेमा ।
(माई, रेक्सनी कोने श्री विश्ली है। कमी पार किसी भी
मीवर बापैठती है।
ऐसा प्रतीत होवारे मानो पूवरों में मूक पशु भी माँति साथ
महल किसे पसीना सी।मो सामने पोती महो। मी अपने
गाँग का माते-पिवेम म्पति मा बाधा वो पापों से दामा
भपमा पुजना मना देती है। या एलड़ा पर अपयों की रकने के लिए
मामा दी है। मलय भवाँ प्रत माता है, पर अफरार
प्रकार होने देना अपना अपमान समझती है। वह मई में अपना दुध
मुमार उसे अपनी गाँठ में पॉप लेने की सलाह देती है। इसी प्रथर
भावग मी मनद से उधौ प्रकार पूर एना बारवी है। वहाँ एक मोर फार
पर की पोपला है, वही मोरा मानव पर शिमर भी है।
'सोर के गांवों में मवर-मौगाई वाने हैं और पुरसम्म श्री मा मेयर
अनेक प्रभर के पिथोराग रेपी ग्रेवत रना चाहती है। माया के एक
"मारा प्राम-साहित्य', पप
'हमारा माम-साहित्य
पप २.
। 'मारा माम-साहित्य', पण १९.
प
१२९
मारतीय छोकगीतों की नारी
'परी' गीत में मावन मापन को नगद पर पुपुरी न देने की माशा देती
है, किन्तु मापन मूस से अपुरी रे दुध थी। मानब अपने पति से पुरी
पापस लाने की प्रार्थना की है और पेचाप पति मगर होकरमान
पर भाषी पतपुरी मेने बाता है। 'मामेव अपना पापा' के गीती
में मारय माने पेपर अपमा सम्मान रखना पाहवी है-
प्रस लिन गावो मगदी कि मोदी दुषित भौ।
चित्तों में मानसरिया पिपरिपा पके भरवाई।
(हमद, ऐसा म सममना कि माम। मैं अपने माल की
मेसरबार मी पीसो छादी सेर माती है।'
हिन्दू परिवा में मेटी की विदाई गीतों द्वारा व्यापक एप उप
स्थित ए हैं। पालकपन से घर में रमी हो पय-मर में पूरे श्री
होर गिरा होने लगती है। लापीपसम मानो एक दुख का कारण
हो बाबा है। यौन भावे ही या अपने दो पिसारे पर पया-ती हो
जाती है। फिर मरे पर में माना पाते। माँ ने मामो पाश-पोसार इसी
र पापिया कि पूरे सालेर रिमा बाप ।
मैं पम्मा री गाय की दिना
शिश मोरे मुरम्पाप ।'
माप की पदिक्षाये यह उपमा दोशीपारी मारी सम्पूर्ण बीन
की उपमा पर पायो। मया पर की पाली-पोसी कोमल प्रयवा मिडिया
हावी, बोगी होने पर बाती है। पारेसम पदी कीवर,
चिसो माम्प में मी बम्मभूमि में राजा माही बदाम्पारने पर र
र मी लिहिलो पाने देने और उस पर मम्म करने से नहीं भूची ।
सीनती में गा देवी -
मारा माम-साहित्य' पट २६
. 'रामस्वामी प्राममीव, पर
३ रामगो परऐसा मेरा बास में परदेसो मेरा बास
-
१२८
भारतीय लोक साहित्य
की गाँठ है।"
पेटामी
बेगमी दो ए भापा कारीबवारिपारेमा।
मापा बिम बरसै दिन पाम रैमा
((माई, बेटामी पो काशी पय है। पह-मर में बरती है, य-मर
में पाम हो पायी है।
देवरामी
देवरामी भइपा कोने विजयामा।
भाषा विष मिन दिन परेर ना।
(हमाई, रेस्पनी मेने श्री मिली है कमी नार निवसती है, मी
मौतर पाठती है।
ऐसा प्रतीत होवारे माना परों में मुक पशुश्री मॉमिसन र
पान पिन बहीबारही। मो सामने पोरठी नहीं। माँ अपने
गाँव मनाते-रिश्ते का महिमा परेको पापों से मामा
अपना गुसहा मनाती है। यह दुपहा यह अपनी तकदीरको लिए
पामा मरती है। मापच पपहाँ मन पाठारे, वहाँगा अपना दुख
मकर होने देना अपना अपमान एमझती है। यह भार को अपना दुख
भार ते अपरी गाँठ में पाँच ने श्री मार देती है। इसी मगर
भाग भी पनर से सटी कर र राना पाती है। यहाँ एक ओर बला
कमी प्रेया है, वहाँ दूसरी ओर पर मारपरेप परिभर भी है।
'चोर' गीता में ननद-मीमावान और पुन-सम्ममा पर
अनेक प्रकार में पिछले एगोपी को तृप्स सना पाहती है। मारामा एक
इममा प्राम-माशिप
"मारा माम-सादिस्य, प्र.
.. 'मारा प्राम-साहित्प, पुष १
१
२
-
1
भारतीय लोकगीतों की नारी
" गीत में मानव मापन को मनद पर पुरी देने की प्रभावी
है, किन्तु नापब मूम से पुरी दे दी थी। माया अपने पति से पुपरी
अफ्स साने की प्रार्थना की है और स्वाप पति ममपूर होरपहन के
पर मापी सप्रे पुपुरी सेने बाता है। 'मामेन' अपवा 'पपाया गीता
में मारय माने पर अपना सम्मान रखना पाहती है--
भस दिन गानो पदी कि मोदी दुमित भरें।
र मे मा सरिपा पिपरिपाक पर
(मद, ऐसा सममना कि मानवश मे है। मैं अपने मालकी
तर चार मी पीली नाही देर माती).
हिन्दू परिवा में बेटी की विरागीता दारा दम-द्रामक रम उप
सिताए हैं। पासासन से घर में रमी हुई बेटी पर-मर में दूसरे की
हर पिराने समदी है। हाली बम मानो एक दुसपपरस
हो पाया है। मौसमावेही पर अपने दो पिता के पर पराई-सी हो
बाती है। फिर मे पर मना-मामा। माँ ने मानो पास-पोसार इसी
लिए पा विमा कि दूसरे के हवाले कर दिया जाय।
मे अम्मा हेरी माय की पविषा
शिमो मुम्माम।'
पार की बधियाकी पर उपमा तो पापी मारी सम्पूरा पीस
मी उपमा पर बातो। म्यापरी पाशी-पोसी प्रेक्स अपवा चिडिया
होती है, बोगी होने पर सपाधी है। यह संग पदी की दर,
पिस माम्म में मीसम्मममि में रामाही पराम्पोने पर गर के
पर मी स्त्रियों को खाने देने और उस पर मय परने से मही पूती ।
सारसी में गारंटी है-
मारा प्राम-साहित्य पृष्ठ २९
5. रामस्वामी प्रामगीत, पर
रसीदी मेरमी परदेसा मेरा बास परदेसी मेरा पास
-पंगावी गीत
4
मारतीय लोक साहित्य
पटरी पर एटी, पौदरी ऐशम् पती पेकी
(पिया ने पर विवाह इल्मी पड़ी को क्या दिया!) अपमा
पनरीपबम्म किसी अपरी राममाया' (पत् पर सवी पही
है। साथ ही अन्य गीता में पहुमा ने सात का मजा आने सर
मही रती । पंचानी शुमा ने अपनी प्रस्मातापूर्वक मारे-
कोठीवर पसेरा निम्न मस्सपिप पर मेरा
बाप क्या चमेरा पुरा गराएका मेरा
(कोटी रेमीचे पॉच सेर काबाट है । र सास, त् पार निपस, पर
या पर मेरा है। हमारा ला पुषी, प्रा पचा-बुपा मेरा है।)
मारतीय पारी २ मिन्ने मी मित्र तोगीता में पाये जाते हैं,
निस्सना माधुनिक प्रक्यिा अपना गम द्वाप प्रस्तुत पित्रों की अपेक्षा
कहीं अधिक समय हैं। राव ने मपवयीन पंगाप्ती परिवारों की बारियों
पित्रण में समस्ता पारन्तु उसी रेलगी मी मोल सोगावपरी
* गेप पलिमा के सीधे-सादे चित्रों के सामने हार मान यां।
मारतीय नाप सही प्रमस पही है। सोम्मीत सभी
म्मस्वताको उपाइने में पुप पही है। साराश पाठी प्य को विदा
कासे पुए माँ अनेक प्रायोगदारे साथ यह मी प्रती है-
पूरे री भाग पहिरो पाची पपई
पपोसमय री सीब म पोसार म बगामे
(वहाँ पूसरे की प्राग और पानी पर प्र पानी-कमी स्मात म
होने देमा । पड़ोसियों की मौसम मेवा, सात घाम मा ।)
गार-पप गीतों में नारी रे मायीसीएस-स्पी अमिम्ममा
प्पा, सी कम देखने में प्राती है। माम विरह स्वाम-स्पार
पर एप में प्रेस पैरा सा है। प्रियम्म उपध रामा है और यह पी,
पर रियोग की प्रस्मा में दोनों घुसी। प्रा में मास्त्रि मुली पर
। पंजाबी गाव,
. 'राजस्थानी प्रामगीत, पर
सम्मरम्म
भारतीय लोकगीतों की नारी
रुरुप पति र अपमा माहाका किसी के पास बनाम है, जो
सिरे माये की टिकली देख बल उठता है। और किसी प्रमालम ोग
है, रिसे ऊँगली पकान परली पाबार बाती है और चार विकले पुषा
होने के दिन गिब रही है। एक मोर मा दया रेपो दूसरी प्रोन विमोग
अपने भाप मिया ने साप है। देखिए बुलन्द पार चमारा
एक मीठ निम्न पंक्तियां जिना मन्दर माब है-
बो में ऐसा बार्नु मेरे बम बम बागे
पक्ती भवन का मुरमा र मेरे में बग रहती
एक नेपाली क्सिोमिन अपने मन की बात मन ही मन में रख
समरि मौवाम बारा
म गन्न एगदी
पेट बोरामुमा भाग
म मन्न अगदी
(माधरा पर मोबाव वारे मरे है, म ने मिन नहीं सनी । फेर
श्रीमान मुख पर भायो है, मैं उठे रहीं सकती।)
इससे इनकार नही किमाना सता कि बोणीच बीमारी अपनी
स्मपन्धि और मापनामा यसरप पर परिपूर्व है। इस और मुम्म दोनों
सीमा पर सही पर अपना पीवर भरोए रिवा पीहै।
उस प्ररमा सामिमान विना मापार, खमा ही समस्याग है।
उको मालिका, मुक्य, मला मोरपरारे विमित स्म अपनी-अपनी सीमामा
में पूरा । अन्य परिव पारीप्रसाद तिमी रेशमों में होगीता
भी एक-एक चित्र पर पतिकाल ग्रे सौ-सौ मुम्बा, परिवाएँ
'पुरा मोरे निषक बनिया, पिपी रेकरि बाप
हमारा प्राम साहित्य पूप
३. म माम साहिप प ५
• 'पारी मामी यसपाली |
१
२
भाखोम लो-सा
मोतीबई बमबा दाम्या
बागोजाको बी
सारे पापा मारा भाई मिरा से पार
मई मिरा की सार रावी
साठी कामय गावे बी (सम्मेब में पित
नर्मदा उपपत्र चोमगीत-साहित्य परिवार सोचनीय है।
मै । उसे निम्न रूम में विमाधिस र सस्ते हैं-
मम गीत-कप्पाक्वाप प्रमा, पयार कपा, प्रतिम
चन्द्रहास, नरसी मेहता, मंत्री पंगर (मप पार), मिना, भापत म
दामामगठ, का बाद, नामची, परस, प्रादि ।
मुफत गीत-मरवरी मेग, मृस्म गीत, सिंगा माता के गीत, गो
चन्द, सप्ताह गीत, पीय, तुलसी, मास, उमा, पात-रियेप
सम्बन्धित मीत, चावनिर्मा, गरबी, पंगारे, माविकों के गीय, भारि ।
स्त्रियों के गौवनोखी, गमगौर, रपाई, म के गीत, चिार
गीत, मग महाराष, सति गीत, पन्द्रसती के मार, मीरा की
गीत, दप, सास-मनर के गीत, गौना, विदाई, गरपी के गीत, म्यार
गीत, मादि।
पम्मी के गीत-साता मंगनी (मालवा करता), गोमो, संपा, से
माता, पदोन्।
मयमों में मंत्री पर भाप नगर थम सम्मन्पी पीर का
है। खडा गोग से मुख-मन विषम भौर अनेक परनामा से मुक TE
प्रय मापा परसात के दिनों में गापा बाता सिली स्पापी खो-
पर पा
भनरे पुरमा
पनवारी मात्रा दुषले
राषीको बापो पुगत
ज्योपादेवी मावा चोर बोम्बी
मैरव की भाषामा हिन्दु
नर्मदा उपस्पका के सोकगीत १३७ 'मिसमा गोपासक पातिया म गमगीतामा प्रमय है। एक माचे महाग की पा से मिला नाम पुत्र प्राप्त मा पा । सम्म क्षेचेही पवामगारे सोपे हो गए। बाश मिसना का बीन से भारम्म मा । या माशया में राम मोरपब हा अन्त में उसकी कन्या से विवाह र भपन कमस्या पर सौता । गती माम, गुबर प्रादि पातियों में मिलना का प्रचार बात है। एषर 'रीय (0) मी गाळे है। रापी' प्रप्रपार मी शेप पारे साप निमार में है। पार्मिक मान्यों में 'पास' मावा की पर समस्त उपलका में प्रचलित है। इसमै स्नामही कर्म-उपलकाबीन में हो समीच गर पा से समाया है। गाने प्रसिमवय 'चसो पाटो जमाने पर रिया बापरेपोपाय अपना स्वाई में मालियाँ बम पाती है। 'भाटा लगाने से तात्पर्य मुहम एस पोर पोत पुम्स्य पाने के लिए अन्टा 'पोयने से है। मृदंग बने से गीता प्र मुकर होगा सागरी सम्म रो पाता है। मुरम के अतिरिक टप, माम मोर दोश मोग पा-मालियों में किया पाता है। स्त्रियाँ बिना सावरे गाती है। कि उनके पीठी सम्पन्न रीति रिवाज से प्रति, रणविर के परम्परामा भी अपित हो। अर्मे निम्पर पवन होवा है। गौरा-उपस्पधारे मृत्युपीठ निराप मस्तीर है। भास्मा-परमारमा रग माया से बारे मृत्युमीत दिमागी पोखी में 'मसापा गौद प्रसाद है। मृत अपर के पास पेरन गाफ-दरा बार-संस्था एमाप्त होने का इर्द गावा पल है। मेरस युमा पुस्प अपना नारी श्री मुस्यु पर सही माया पाता । मृत्यु-गीत पाठः पाप्मानित, निपगी . मोर मांगारिको से ध्र उटाने पाले मार्ग से समृद्ध है। उ मदन साप सामूहिक रूम से गापा पाग है। उदाहरमा एक मुलगीत सीलिए- पापो मापोरे परिश्माको पो मारिया
मारतीय सोक-साहित्य
प्रायो पारो रे परिकाको
पा मम मात्र की सईब
भरे अपवादबाये
भोपा मन्दिर छिपा
पासोमामोरे परिणाको
पणे मार मौसमीत शेष
घरे पपरमायो गुबाबा
कमाईएको
मोठिम माग पुरा
भादा पातारे परिमो
बालो ममी मौत की मई होग
परेशासी बाग समई
पा मेची पोर मोगरा
परेबातो पायो
भादो भागोरे परिवारों
माधो गरी गत की सईद
मरेसची चोषी सियासी
कारे सीवाई सीपमा
भरे देवा मंग बगायो
पाचो मालो परिम्पो
मख-पीतामा ममाप्रतील असाप साहै।।
पम्बिरीशमाही प्रदेश इम पीठासमा वाम..
बारामा ! करीर में कप मी मुस-गोवाय मत आती है, dि
मीर मामा-मोह से कमर दर परिसपशोपीस पर प्रसार
मर्मदा-नपत्यका के छोकगीत
मात्र बारे।
उपपत्र में दूसप प्रमाव सन्त सिंगा का है। सिंपापी एक गवती
के पर पैदा हुए थे। अपने घर से बैराग्य की दीपा र वे अपनी अपक
गना से मिपा मए । सन्त ससीदास मोरगर वासीन
निष्ट पीपल्या प्रम में हिमाची से मिलने थिए मसे ये। भौतिया
पौर मी भिागी से ममावि र । सिंगाची की मृत्यु पाया के निष्ट
स। मर्मदा-उपस्वप्रारूप में सिंपाची प्र प्रमाण परत है। उसकी
रुति में गार पाने वाले गीतों के अतिरिक र भोर पाना मत कर
बाचे गोव परत गाए पाते हैं। स्वर सिंगापी बनाये पर पीव मौ प्री-
गों प्रचलित हैं। उन एक पीत है-
पेसा पर बया
निव बम को विवाद
पापा मोपा सब
दिन म लाई गई
जिन्याका मरी गया
पारदा म विदाई।
पामेसोमाभ
पातमागापा
भिवारिता मरी गपा
पाम इरल पार
विष सोपवा भये
प्रसबाबमा
भर सेवा
मा मगर म्याचे
विव साइम्मिा
१४०
भारतीय मोक-साहित्य
का मर हुण गाये।
(विरम पर, बोया से मात)
नर्मदा उपत्यका गीत में पार, पाचन मरणी, मामी और
पनका भी पुरे पुरपी में उल्लेखनीय है। पुरुषों के गीत प्रामा प्राधिक
या बैठका होवे, बो 'पविम्प में भारम्म रोर' या 'सम्म
मापावे हैं। 'मी' और 'पनाममात्र बायोग से और गरी
म एबयत से उपत्ता में प्रणारिखमा है। मवरों में नापी', 'पौवासा'
और 'वा' भमों की प्रसग मसग सा। अंगही रंगत, पड़ी
रगत, बोरी रंगत, माही और सी रंगवे प्रव-प्रसग सो संगीत
माने की परतिको म्पक पप्ती है। परसी रे मी विभिन्न पर दिन
पार पाई, दो पाई, गे पाई और एक पाईदी में बोय वा सश्या है।
"किलगी-तुरीम असेसरना प्रारक बी, स्पोकिमि
परमपम यो मगर ने एक ऐसा क्षेत्र सिमें दो बार
गीवर साम्दीप रम होती है। गीतरी शक्ति के उपासका
रत होठारे और 'तुप' शिव। विलगी-तुरी' तिमी मलाम
| विस्त हुमामा संगीत यो यस्थान और मालपा तक मिलता है।
उसे हम लोग-संगीत से पोहा क्या इमा माना पाहिए, क्योकि जाती,
अपर परी, सितारी, पोगप, पुमंग, भारसी, मा, माती, सिकती,
पाखपी, समत, पे, पूल, पारिद प्रकारका प्रवेश के विमान
पर प्रभा गया है।
नर्मा-उपत्यका की अब अम्बी है। मीन - मीरे और
भूग, पथपि पानी और पाही' ले यो कार राम माँ
पास सेती के पीबार पुराने देयक। मपम रेस 'सोन सारे
हो प्रात् सर्य और मजे सफेद रंग की मिसाल बा । बिमाकी
पुम हर रंग पसम है। यमपातार पा
सिर पर भास पा पीसी पगड़ी बाधा। बया पापय और महा
पाटी। पर कविता पाठी । मी, माप, पक्ष, मो,
नर्मदा-उपस्पका के होकगीत
महीर प्रादि मातियों की स्त्रियों का सगावीरे। नेसासम से
पिरोप पावरे। खपी परम्प, गाने और स्त्री परदेस गोवा में
बियप।
पर्मदा उपत्य माव-विपसरे इतिहास में सोलनीय स्पन
एसी प्रकार अपने सो-साहित्य, संगीत और सोनूस्या में मी या स्मर
एर परिपूर्व रे।
है
१५
मध्य-भारतीय मीलों के विवाह गीत
मप्प माप्त, लादेश, गुजफ्व, रामस्थान और मध्यप्रदेश नमो
पहाड़ों में बसने वाली भादिवासी जातियों में भीम एक साासी और प्रफ
दंगी मबाट कोम है। प्रसा रंग, इमप शफे और भीती नायक
तपा हाय में उप-पाय इसकी पिरोक्याएँ हैं। इसमें सतह महीं किया
पाति प्रणव माचीन है। महामाप्त, रामाश्य, वासरित्सागर एवं
पम्प मारतीय प्रन्यों में उपसब मिन' विषयक लेखन सपर।
ममापित करते हैं। पचपि कतिपर गिरामी ने इनें और सीरिक
गाति के मिमय से पनी बादि क्वागा, पर मनीपतम सोपानमा पारवा
निमू जो जी।
मौत पार्विस सपचातियों में विमल है। मन्म-पिपास मौरकामा
से ग्रस्त होकर मी पा निर्मप, स्वामिमालिनी और है। एक
मिप में विमिम पिरोपकानों प्रखणेशप प्रोए पल बिमा एक
विभागात काही पहा संप में परिषय लिया पापा है।
'या' (पिपाह)
मौलो मतीर प्रसारमा प्रचलित है-
(अ)र-पोयना-
पापा बार बार रिक्त मते
घ्य-भारतीय भीमों के विवाह गीत
१४३३
। रह सामय वमा मशित लस्म है।
आ) पारिखप रे पाप, प्राति सामर्स भभाव में रसीव च
कि मारेगामाते हैं या मामूसी रीतियों को सम्पन्न मरे उसे
चीन पत्र (पोवरया) पानार रन दोनों में सिना गावे। इसे
छगको प्रया मते
मगरहो
(1) तीसरी प्रपा मगहो हेणे' पासावी है। साथ यदि साग
मगार अपने परदे प्राप तो नापी पासे 'मगहाहा हैं। सस
समय पारेर पिठा जाली बाशे की माँगा ग्रे स्वीपर 'भगा'
माप्त पारे। 'मगा' मोड़ने की बिमा सामौर सापक पिता
एक सोपोरोगी भोर से पार उसे एक ही मारे में परम्मत
पर है। प्रापछौ भमा मात्र मा पारे।
की 'भगा' भने म वा प्रेमगाने वाला म्पति देगर कही
पोपरे को सामूहिक प्रयासों के बारे प्रेमाची पाप पीने लिए
मबार किया गातारे अर्मान् एम पीकर यह सिरेलिसि सहनीको
पर माया माँ के समान है। पर ऐसी स्थिति पर पम पाती है।
महा मात करने के लिए बो रकम मागी चावीरे यह 'विश्व'
(एव) परमाती है। रिक' देने पर भी स्तनपान रे सिर मक्ति पो
मबार किया पाता है जिससे साथ किसी सम्परे साप मारने
परमा प्र प्रमाण पनाए। ममा वोने राम ऐप सरी
माता, मप्पस्म जियाको 'मद' (एयर) पिसाता है और म्स 'रम में
साविर प्रामुपय सपा देता है।
'सेड़ा-देव की पूजा
तिम भापम 'सस (माम के सीमादी देस्स) श्री
भारतीय सोक-साहित्य
वारे। म पूज्य सौम के समय पर और भू-पद रे सोग मने अपने
स्पायों पर मानकर यों से सम्पन्न परते है। पूषा में पनामा
दलिया, भारत, 'भवनी' (ड़ियाँ), रोकी, पास श्री मायै पारि
प्रादि वटामा पाया है। पूजा 'मावर पावित्रफुप ही कला है, तो
नहीं। भारी मीना ममित्राने से क्षगार अम्प माप
सा है, बो साधारण मारतीय समाय में मारपरमा पाता
है।
मुगी की स्पीति
निमश्रित मीमा प्रेरिपाद मासे परों में भी सितार पाती है। मीट
और मिताला दोषीप मिरपासबिमुर्गे प्रपा झाँ उनको सी.
कति पिमा नहीं पाते। करने के पूर्व उनके मापे पर पानी श्री पार
हामी पाती है। पानी प्रेयने लिए मुर्गा प्रथा मुर्गा सामास्तिर
से अपनी गरदन दिलाते हैं। गाइन प्रबासमागत पापार ही माता
लिए स्वीकृति है। उसे 'हो' ममम ममन्यापूर्व पति
गपन पर पारम हैं।
देखत' (दापत)
यार कराने , सिर ले मदों की भापपा ही गिर
परी' या पेच (प) से बिबाह प्रारम्भ होता है। मड़िी
और शया श्री सत्याने पाही है। दो ARE पूर्ण साये और
गो किसी हाट-माबार में एमे से पाचपमा दिन पाया है।
सामोर से पक्रया प्रारम मा रिना पाता। म इम
ई मी ही निकाला। दोनों पक्ष लोग दो दिन पति ने
से दिख मुह मान लिया गया है।
मोहा में एक ही गोत्र म पिपरपसभाग-माम' पर योग में
म्मा है। मिसालों में दो बारमा गोरो है। मामले
1 R-परमोगपत से गाते समय पर मार रहार
मम्म-मारतीय भीमों के विवाह गीत मारिया हवे है। यदिई नदी पोप में आपाप सटे मी प्रमाम पारिपस पाते। - गाँव और नृत्य भीस-रिवार में गीत और नृव भागनोमास लिऐप सार । अपि प्रय गीत स्वर साप हो गाये गये है। तृस्प लिए 'मौरस' (मृग)बाद पाया है, किसे पसार पाते हैं। सेतो अनेक गीता म मद पीने पक्षपपर शराब के प्रमाण में अपनी पोड़ी और पन्नीने की सलाह दी जाती है। माल पर पार विसीम म पार पोपका अपना मनसा है। मोती सिार-मांची श्रीसमा प्रतिसरे। सनी में समन पीस म्पत होगा। एवं नामानिमिम्पक्ति पीठों में पुर। मप्यम्परत मागावीर गिर महानी दी है। पार- पेरकी मोर मोह अपने गीदाम पहली पारसलेश बखेरें- पाविपत समय पोरी पानी को बरी गतीबदीरासमार रपीचा पहा 'मौदह पनि रे साथ सामूहिक नृत्य प्रारम्भ होने हैं। 'मी' (बसेरे रपे पैता बाप पोकीमती छे पता है) और 'नाही' तक म योग देते हैं। पिणेप पीठी से मरे होते हैं। मोझी, नेवासी, पासी, परसय पासी, मोसी, प्रादि नल्प मीडिया से पनवे है। परेपर-सयासत गीतों की भी मनुसार रापुजम निसार से सम्बनित होते हैं। पीता तरी प्रापिस्तार भी सीमित रे,बो एवं हीमा में पस्य है। अधिक समयदेसिए सिर समीक- पोखी पुन निम्न सय में पन्दी है- भारतीय फोड़-साहित . ४ गरेग रेग रे ग रे सा ग ३सा साप मी मा ग रे हा सा ये- 5 नीचे शव गीत दिवे पापे, पो पापाप (म मा०)मा पास के माता में प्रचलित हैं। मापा श्रीन गीता भात मार पुर (म• मा ) प्राय असीसमानर बारे में पोसी पाने पानी हासी मीची पिसे पोहसम ने शिम्पिरिटम में ये पाप को भी करन्द्र-स्पा मामकर मान्यता दी है। गीत (गिरी समम दूसरे समय नलारे साप गाया माने असा गोव) मी' मदीना वा बीय हो बम्पी बादमी एमडी-पोस पर बिपो पापन विधायकोसाय पम्मी मार मी तुमहीनोम पाचे सपो मार नियमारपौवाब बम्मी मात्र मी प्रमहीनी पवनी तुमचीमा पारावी एमसी पा समेत पपि मरे, भिन्तु मारिवासियों के मोगा में से निरर्मक मग नौ को सहारा देते हैं। सफेद दमदी पुरमरिता
मम्प भारतीय भीमों के विवाह गीत
कपास की योरी' माटी गई
मारी परमो मम ५
उमी पामोसमी पोप्रो
तमो जीम और मोबा भावा'
मक
(मरो' मत करो हो--मी
चमी पैसो मारा पाल्पा पोरो
इम पैपो हो म बाई।
x
x
स्म मेयो देय गारे रेमो हो
माय पो र गोरो पारा
माएको पाइयोपोरेसो गेपो
बन्यो ए गोरक्ष पी गेरा।
x
x
यो गारी मा मोसमस्यो' समा
की हमारी रामी रमीला
इमस्यो दिपाली बीसी' -
.
मिपक्षम
मनबार
.
पुगी
१ संरदिपाये दावा
धोती
मारतीय छोक-साहित
जबाब घरे मे मीलीको
हमपास' पामो-चोरनी हो
माई मईका वा पापा
मामा परे मैडो-बीती हो
सासूगा पडूबा
सराव पांपाचो-बीनदी
यो मोमे-बीवादी हो।
मामो
पगली' मारो परियो
पाडा सा बेत बासी पार
गो-बाबरी
x
पासो पोको पार ग्पिा पई.
Onी होराणना-पापणी बोली
पापी पोया-पारयो बोलो
मावार को घोड़ो-मार को पोको
बानो बोली-पापको बोली।
परम
गरे बैठ गए
गोमा
पत्पा
पिरिपा
गे पाप
गीत नापत्र-पपी) समय (५५)परा साबित
लिये मए?
घुमन्तु कजरों के लोकगीत परिचम मायण में ऐती अनेक वासियों बिके इतिहास की भीगा बीते एए समय माणा मी गुप्त हो गई है। ऐसी स्पिति मरतनपाएँ अपना परम्परामत मौखिक वादिस्य एवं पवि रिपाची के सहारे सारे विचिन सम्पाभी-करीबोगर अनुमानित नियों पर पॉपने लिए रिपती प्रतापी राप्रपास पास रहे।वाधिों, विरता रविदास पाच महिन्धक पिन प पिपियामी और माचियोप मरस है, स्मार-पास्त्रियाँ दया मृवास्तविदा सिए पिरोप प्रप्यपन की सामग्री पर गई है। र इतिहास के गर्भ में मिली करवा से मिल पातियो म सम्पपने स्थान से दूर पपा भयवा बिनती बीरिया के सानमा गए मम भराषमतावादी गिरोहोरस्म में बगर पगा फिरने लगी। परिमपतिमी परिपाकम होने से उसमें पोरी, रची मार प्रादि अपराधी माहितीचा समावेश रोगमा । मातीप शासनश्रीपाति-सूरी में ऐसा पातिवी श्रेषपमरेणा मोस्ति पिया गया। बयपमरेशा पारियाँ समूनेमावर पार पायो । म मप्प- स्त भारत बंगा, साथिपे, मोपिये, साँसी, मौना, सर, मादि किना ही ऐसी बाठिया मिनपवीस सरकार प्रातियों से मत है।
१५० भारतीय लोक-साहिल्स संबर इनमें सबसे प्रति अपराधी प्रातियों वाली बात हैदोसार मारत में प्राग मी स्थान-स्थान पर भूमपी पाई पाती है। अपयन म का मूपण है। इसी बसेको विरोफ्ता यही है कि स्त्रिया पुगसानिया देसे वस्त्र पाती है और पुरुप मप्पा मारतीय मामीपी से गमाधि वर्षों से पुमन्त बोक्न व्यतीत कर दी है और प्रा पिको अपनाने गोगरे पास स्वागी मेरे गसर पस्ने भ प्रसस्त रही है। ऐसे मेरी पर शासन की भी मिाह एवी है। रेय भवसार प्रस्पानी सपने एए सिी गाँव से कम नहीं होती। बर रावस्थान, मेपार, मप्य प्रदेश भारि माया में स्रोिप मते मिस हैं। इसमभरए स्पा रूप से मीरे इस समय मेगा राबस्पान से बाहर नहीं है। इसके अनुसार प्रबरी के ये मंगत हैं। प्राप्त वन्तम्माओं से मनपिपडाक्त गण के माममा में पाने पर मओ साय रे सोग मी पले पाए । क्यपि इन गोत्र एक्पों से मिलते है, क्यापि इस एषा पूवरे यहाँ दोशक पाकर गाता और शारीरिक पर दिखना-मात्र था। इससे मामी अनुमान लगाया जाता है रापपूतो में परम्परा से प्रचलित विनास्विामी ने शिकार और फिर समी रफ से अपना सम्पन्य प्रम करने में अपना गौरव सममाने शगे। बो हो, पाष या पावि अपनी है। शारीरिक मा विवाप प्राक्त नाम मात्र के लिए इसमें शेष है। यानी शिमग्रा पाने के पश्चात् इस पातिप्रयोफ्ष मारम्म एमा। स्पपि शासन ने इसे पिको कई वर्षों पूर्व पाने का प्रकार पिया या, क्यापि च और वरी होने कारण किसी मी प्रान्तीय मार ने इस विचार को गम्भीरतापूरक प्रान्वित माने में योग नहीं दिया। ऐसी स्थिति में छोटी रिजान्तों और मित्रों ने इसे अपनी-अपनी सीमा में बसने-मात्र की सुविधाएँ दामो प्रारिक स्म से इस पर भी कि अपनी सीमा के बाहर पोरी में पाई, पर बोय लियत में उपमे कब माग गौमी प्रभाव पाती । अता प्रमत्तपम ते शासन - पुमन्त कबरों के लोकगीत ही इस बात की अपनी प्रवियों ने प्रोत्साहित किया। गरों के गीत परे गीता मोर नस्पों में सभी प्रातियों, मया, विश्वास और संस्मर परिलक्षित होते है सिधवीन से मिस्प सम्पद है। को मोरे याना और प्रेतबाही शप गरेमाश दिया पाया है, इसका पित विगार एक गीत में रेसिप- कौशल्पारे राई' पेश मातीपारा में पाया रे पाराराबाकायाकार महार मापारे पाराकाम्या कागदमम पापा पारामामा गरेमा कागद मरमापारे पारा महा पीरारामाप्रारमारमापारे पीरे गोपए पाक नदी--पीरे बोल सिमरसी को पालदार मुनेसीरे मिनरसीको मुम्मी सुदेरदेसीरे सागर को कोतवार मुसी' बीबीब ए बाबा सी-पीरे बोल (मोपले रे पपपदासाठी (वय) दुपारी में का पते रे ! तेरे सादा प्रतिक्षा हुमा पर भाप पा, हेरे भाका हिसा इमा पर मुझे भार सा, वेरे मामा का शिक्षा मा पत्र मुझे भाया था, रे परे मादपसिन मा पर मुझे पाया था। पीरे योग ए माता राय
भारतीय कोक-सादि
दुसान पोरे योगा सम्बरसीम पानेदार सुनेगा वो रोया, हमरस
मुग्री मनेगा दो दर सेगा, याबापर का विनाश मुनेया घोर
पीर मोघ ए मा दुलहा मीरे बोस !)
रक गीत मप्प मातशामापुर
विमाम पुनरमी सेम
पिसा गया है। सरसी में एक बाता है प्रवियत पाँच वर्ष से बर्ग
उममा परों को रोक दिया जाता है, जिससे प्रासपास किसी मघर
पारदात न होने पाए | प्रापये पोठिया बाग है। किस
करेलर ने मचा बबीन होगी में
मा है। दूसरा गीत है जिसमें किसी अन्य रेषा भार तर
कोम्पारसे पाता है। गत विदार के समय माया बाता है।
'जूला री सोमा'
पे वो पूणारी सीमा से गोरे बा'
परम पर चाक्योरेता
पे तो रेरारी सोमाली रे पता
पेठो पर भी री सोमा कोरेगा
परम पर चासोरेपला
है पारा मान से ममयो इम्पो
पारमिपारो' मनको हरमो'
पे तो रोगरी पोमा पारपोरे बापा
परमपरापोरेशाता
पूरी को सम्बोधित केलियों गाती है कि पूती पोमा हे।
हारे, समारे गरे श्री, हमारे भर मै शोमा सेवा गारे। देव मात्र
मावा
पिता
इपित मा।
.
सुमन्तु कमरों के सोकगीत
आया मेरे पिता पमा शक्ति हमारे, पर तू स्मारी रोटी की शोम से
पशा है, तू विमार अपने पर पारा)
सामाधों में पास (HI) और परे प्रेमका मामला
गया है। पाकिबीन में राम मरेनिक फेरी पर पर।
पक-समी और माँ तो ये पारते हैं। राप रे सा मांस प्र
सामातित पासी मस्तु रुपती रेसाती
की पुष्पान, शासन (मसन पासी), माठि यी उपादान को
परिकार बनाता में टपसम्परा एकस समधी गीत--
'दार
पार' मापापोरेवादारी वाया पीये
घोटी-मॉडी' माबोहोरेरा दारापुमा पीये
परी-मी मरमापारी पदमब' पीये
पारी एसपी' पौधे
पारस भर पार रे बा पारी पामा पीर
(
हरे, प्यासे मर सामो (पास),ठे प्रियतमा पीन पर
है। (एप के लिए) मारी मारिया नामोल रे भोरेपी सरें।
हे रहे, अपनी साड़ी (इसान)हिए मारी पर सामो, पर पीने की
पुराणे, अनी पिफमा के सिर पो म सामो)
एक दूसरे गाँव में पातम मास में स्पान-स्थान पर लिसमा पा
२ निपतमा
३ बामो
।
।
भारतीय लोकसाहित्य
है। पाप्रपने मोत क्त पहा मी रोया है वही रीमावा है।
सासी श्री पूनर पर दारू, मोगी औषम पर मोचिन, गबर की
पम्प, सुनार के यहाँ मुली (गसे प्रभामुपग), समुसा में मिलमा
पर्चग मोर पसी की पात, तसा अमार की पक्षियों में परियों रेसमा
पारीमा पापा है। सम्पूर्म गीत है--
नहो
मापारी गधिपा विडम रिपोमो
रह गयो मार रोड ग्बो बेवदो
अब तो हारी पाम पिपारी जागे देवरा
मोचीरा री गदिपा विमम रिपोधेनको
मोधीपी देव रीच ग्यो मारामा
अब जोतारी मोचड़ी पियानी बगे या
गुगरा के गांवपा विषम म्मो मो
बोरो देश र म्पा माराय या
अब हो दारोबोमो पियानो पागे सा
सुमारा री परिपा विधम म्यो महो
बी पी रीब मी मराय देना
अब तो पारी मुजी पियारी बागेमा
अमराबी गरिपा विषम यो बेहो
गोपियो' स न बोलो
प्रबहोदारा खोपो' पिधारो साधना
मारा री गविषा निमम म्पो पालो
चोरिया पैनी मो मारायला
प्रिपमा
पर्मग
३ मंापकीबाबरिया
.
भुमन्तु कंबरों के सोकगीत मा नो पारी चोरी पिपारी हो गया। सवाहित प्रथा हिमो से प्रमादित। सिार प्रक- सर पर परिवरे स्थान पर दूसरे पुमा ही समिसन ली है। पाय माती है। दहा वारय माया है। स्मो समय पाए गीत रेरो उसाल पक्ष की मार से मापा पाता है- "वारण' बरको वारे गुमादिरा' बेरपर्यो वायरे मारी बाबमा पर एसी मेडो महियो' बीबीकाम म गावमारे डेपो ताप रे गुमादिरा (मान म, सहरिया-बान । म शिरम वाले वागन्द और मपिसिठी प्रानकातिमसी की पम से मुझे नाग बाने घग सारिया तान २) पर अनेक पीता में प्रपामो समय तोकी, पर ऐसे प स्वय गीत रेसिम खोडसास, पगप और विरास की सामग्री प्पा योग विर पक्षा की अमिम्पति निहित है । परी का उपवेल भने गीती है। बा पर 'मोबा' और समये माया परस्पन र माती में मिला है। परों सा-मम्मी पपा ताप ही इस गीतों से रम्प बाती है। रिपोरों की ऐसी गायिका रे शिक पाये के सपने पेसाने में ये मौरस अनुमत्रते हैं। सर पमान समरे साप बोला किया और परमार मी गा। पीवी में पारिया गुमान मरे । इपाना पारका मानूपरा . भरिपों से यदिवपाटी 1 २
भारतीय छोक-साहित्य
रिबोरीपाद इसी घटना के साथ सम्मलित है। पर नामा रे
पमाप से दान लेना उत्तम नही सममये । उसके लिए गाठ
एचसापास ही पपेट है। पिचोरी एक परे गीत में
भारतमीप ताप गम्पा पाता है--
मीलोहाराहामको पार रागा
स्वारे चौबीस बात परालको पा
'बालाप
पाठी के विभिन्न स्पानी के तो-मिसालो की पृष्ठभूमि में माता के
मित माल और सामूहिक अनुभूति के सामान दय निहित हो
वों में प्राप्त मापासोनिक गरेसहारे बो भमिम्पकि परम्परामक
माय मी पहा माती, ममें मोदी सपुतम सस्प (री-
श्री) रो, पर म एम प्रसय नहीं है।
अनेक मारतीय सोगीत पति-रिवाया, पार्मिक अनुष्ठानी, येने
ये पर पिपरानों एवं अन्य प्रमाणारे साथ रेपा मी
पिता-पापा के साप मासे गाते हैं। परि इस प्रपरक योदा में प्राप
ही राम-सम्बन्धी परिवर्तन होना स्वारिक, पापि उम्मे भूस
मगीत एवं मूल माला में सिरे स्पापी एवमा पहीं हो पाये । इस
जगात प्रमेय-पाय दई सकी अमिम्पकिसी मोकमाता-दिल
म स्विप माम रहने हैं।
मरतीय सोपीव हिनी सोच-पा-सादिस्य उपयोगी पन है।
ममें निहित पिराप सरन, उपादान, पे-चपत पसन और मिही
पुरा मिति पवित्र सम्पावियत मनोमापौरे उपाय 4 सहारा
बि । पासा (पाप) यमक मासमी-पीत इसी गरम
से भागामी पक्रिया में प्रसव मितापा।
मारतीय सोक-साहित्य
पामागीच मामा मुसस्प मप्पमारवशावा
सास और उम्र शिपोवा में गाय पाया है। प्रापान में होने
में रिक्षम्य वा रेस स्त्रियों इसे मप्प-पशि के पूर्व एका कोप भए-०
में यात्री हैं। गीव के समय में पाविरमास है कि उसके गाने पर डांगी
पापाएम्म दो बाती है। इस विस्वास के पीछे भौशिक कम से कम
परवा परपस रिमा पाता है। शाबापुर
सिमाम सुन्दरसी के निर
पाच विसे पानामा पEN अपया पासोम(ग्राम
माम) म वासाप पाये है।हाबावा किपरक पुरमाया गया
तो उसमें बल नहीं पाया। यह सूधही हा एक प्रामसम्म
एर उसमें एक बाकी बलि दी गई और मारप बात रखने
पार ही उसमस हिलोरे सेने लगा।
इसके साप ही हम एक गीत की पानीमोर मिशारेमभाव
निमार बिसरे सेगार नीम में एन बिरसा मामः प्राम है। गाँ
६.मील २ पेरे में पानी से मरा हुमा एक तासान है। इस वासापरे
नाव पीनी पालापानी से धफी मिटरे। निमाड़ी
ग्वतिय पुसमची मरागत माया स्त्रियों माया मठी है।
करते निरसा प्राममित पानी प्रामा प्रभाव पास्ता मा।
हाँवाधान है किसी समय एक पावशी मी कितम पास कम पानी
रखा था। पूल मासपास के मामों में पानी भर नही पा रविर
पशोग सिमपर उस पानी पर एकत्र हो पाया मते 41 मीह-मा
और सभी को मापनमा पर मामले से ही भगो
यहाँ मी होने पते पे। एक दिन ग प्र पटेल ऐसे ही परेशर
पहा रिन्तित मा। उसने उनी एक कप रेखा कि देवी गीरें
कि यदि या अपने च और गवाही में समा देवो का प्रया
पूर हो गायगा । प्रात काम पटेश ने मापात अपने मातेभी। गेगी
जात तैयार हो गए और पूजा-पाठ करने के पश्चात् पाडौ २ सर
गए। उनके हमारे हीना मोर सीमा हो गयाप्रभार पाही
पासावक एका तार पर गा। इस कथा में प्रन्टिम बात या मी भी गई हरे प्रथप से पये प्रतिदिन पासा किनारे पातर मोपब माँगता बात की सदा पर दो धीरों मा हाय मोहन माली र प्रमर हो पाया । परमपम ही किसी पक्षि की पानी पमुषा मरें। प्रारिम बारिया मा सिर पिय मापोनों का पर्यन हमें बात १ उपमें पति परिप महणारे ।वामीच सम्पदा में यह मावि पास पिट की माँति दियमान है। सागौर में पतिया कहानी अपम मिमी परमा से भर गईना समय है, पापडी पारि पतिप्र सम्पत्य मानाय गो-पाता एक अंग पारे। पित को पता से पाव व प्रिये एरेस में प्रमुख प्रसार पीपा दरमस पर- मामरा में पा मोरये। सनी एनीमोरमी मपुरा थी। मासनी में प्रमीर खेत में पानी के लिए बदबाने माली मिट्टी की मोर को मी पोता। उस से समन्वित होमेमा 'मोर मान मरठ प्रतीत होता है। 'भोर' एक बादि भी मो मारी प्रती है। वैसे मोर बाबाई रोत मानिस में नहीं मिखता। गुजरात में बसमा बोगन की कन्या प्रति जिसे सी शवामी गुमात सिरा सकेस की पर्ग मुनम अपने राम्प में बाबा रामाचे लिए पामनित किया। मिस से मस करने लिए अनेक बाब दिए, पर बसमा अपने सत से रिणी मही। सम्ममता बममा मोदन और म्ममा पाया गुरागाने की या प्रस्तुत शाबालके प्रसग से सारी राघर रामघोषापाप्रयनिक पसार होगा। मास में परिमेय गादियों का माममय गुमाव भोर सही मारे पता गुरती सोसाय मारा पीर निमार में तो
मारतीय लोक साहित्य
एक समय मोर मोरनी गावोस प्राम की मोर माए । पसी ने नाता
बुदमार मोर राबा ने एक तामाल । रामी के गोदामही मस से ममय,
पर पासात्र में पारा नहीं पाया। माम्यम पुत्र पुतारा गया। उसने अपने
पोपी-पथ में ऐसबरपा, "राजा, वो हामी माता, मीना
सा नहीं पाता, सर पापको टेप मोय मागवा है।"
रापाली समसमीर मा गया। प्राममने अपने मेष्ट
पुम इस पर से या बात भी । पुत्र के काने पर अपनी परेपीहर
गये। बामा ने बल गरम परकामा मोर ठहम मोपर तैयार किया। तब
ने सनीभर न करते हुए वासा के भोग भी पात क्वाई । वामान बार
होकर एमपस भाइ । गाँव में पुलापा दिया गया। पौष पुण्या, भामा
और मीन रमादि भारत म दोनों ने प्रहार किया। इस प्रकार देकर
होकर गेमों हरोबर पर पाए।
पाशात-रकम माम्मा स्पेपर की एक-एक पेड़ी पर पैर रखते
पा-सा समें बस पड़ता बाता | बस माशाबा के वेश ने धमा । साथी
की पर घरय र क बाबा की देवी ठक मागा। ने
रा-"मुरबी, इस मोरो, सरोवर हिलोरे से पारे।
माँती म मीर मरफर सहर भोक ने मा--"मेरी पासाला बस
मारे नहेमा गमा, अपने बाप समेये।"
प्राचीर देत ए पाताह मकबर बस में मा गए ।
विनिम्नशिक्षित है-
गलापन
मा बाब' में पाया रोई मोर-भोपनी
मा भो मपरा से प्रापा मोती
कोई मारपर्य का विषय बनी है। (समा-और-सम्मम्मी बोर
गुजरात विधा समा मामाया दारा महाशिव समासा
दिषिप।)
यौपपरा क्या
पलायक
रामा मात्रा से प्रापा श्री मोर
काँप रा राम मोरे
राजा पसरा रानी पोरगी
मेखा' रारामा मोरये
राजा माग्मी प्रारबी
कोय बिमा राजा मोने
राजा कॉम सिमाधाराबी पोरमी
क्षिपदी बिमारने
राजा पापसी' निमाया रती पोषयी
बीसा' बोदाइमा स्माबाबदो
रामा सपरा पंपापा' समय बाब
प्रापी
राग मुह परपो ममम क्याप
दो-दो' पामय बोगतो"
-
मार
३ मोरया
पकप्रकारका रस पकबाप
राबी पारी बिएमपुरव (रायस्पामी माहोकर भापर-स्थय
प्रयोग)
बापा
समन के समायापार
A
२
1. पुपापो
१६२
भारतीय छोफ-साहित्य
पर्यो' सरबर को मोरव खादो
पोभी बाबामब माबो पेने
राजा मंगोगो मी बाप
राबा बेषों में पापा समापीर
को जो मांची रेमो बामय
नया साँची राणा, कपो मी बार
राया पदासाबरको माँगे सरबर भोग
" प पू मारा इसपर मेरा
सरबर मगि समारो भोम
पापीपारमा बीमा'
बीसा तमारा याबाबढ गईम जो
बोला बोरा भी पसरामीबीपरा
रामा दन हो रपे बाबावरकास
वाता' रे पावी बाबावर मेडिपो
ससरागी ईमारी मातारीख
मा' में मोबन ससरामी हंगामा
समागी होई मारी बीमचारी बेड
kटोपीमाती बाबा
पापाकम्मो मी गार
हैपी बीमू मारी बाबावर
बाबाल मनोकामोनी माप
1
३ वही पिठाप्र में प्रयोग
परम
२
ताब, गरम
मोबमका समय
/
जो सारी मोराबा करोगे
मसराबी मेगा सईदयो मागो
कोपा' चो सारी मोपासावर
बाबर सरवर माँगे समारो भोग
या बोबाएं मारा ससरानी
समराबी दमारारा से साप षो
भागे ससरासी पाम बाधा
राब न तोरणे सासरे इस
x
मसरानी दो-दो मावी रो पूल
राजा बपरी में रेपो देबागो
मसरामी परा'यापापी मेमोजी
समराठी वापससम्हादिया जी'
मसराबी सोगध्या वादा
समराबी बाबार सबर परतोनी
समरामी गरोगयो मगाइयो
समराबी पाबाबा सङ्कमा पेरामोजी
ममी पारीणीका गावर मंगाया
.
३
.
मागमापा
विकारो
.
२
.
गप कोनी
मारतीय छोक-साहित
x
ससराबी काँगयो सिपापो
मसरामी, गव-मोपा को चोर पुरायो
सायी, उपर पात्रोमो' मिलाइयो
सप्तरामी पावसमपर अंगाबो
x
मागे-मागे हंसकर पारे बाबावर
रम्बा, पारमयरी का योग
रामा, ईमा' सरबर पाब
पैसी भी प्रोसड़ पर पाबास पपपरवा
रामा, अंगूग पे पापो योनीर
तीसरी पैड़ी प्रोपावावरावर पाबरया
रामा पोषा प्रापोबो वीर
बातमी पेवी मोबावामामा पमबरका
राजा, कम्मर पेमापोपीर
पाँचमी पैनी मो मावा इस पर पमबापा
राश पाती प्रापी पो बीर
समी पैड़ी मो मामाबाईमड़ पर पगाया
रामा जौबा पैमापोबो मोर
सातमी पपी मोपासावसकर पपपh
राजा पोती'पेमाचो पोमीर
पीररी ससरावी बोली
१
पोपकर
भामम
३
.
बासाबक
पात्री परी मो ससराची देणगो
मसरामी सरबर समारो दियोमा पोवाम
मात मगो' म्हारी बाबा
बाबपकाबा' से भागो पोमीर
बाबो पौगोमो ससराची रामामो
ससराम जीरो मोर।
पाशाप' गीत पासपन मामत: पासाय ग्राम प्रयास मिट
पनी मामी में मारे। मदरसी माम मी इसकी उत्पति का दो तम्या
है, स्पोकि यहाँ पालोय की प्रथा मात्र मी कसास मीत बोपने गाली
मिरो की काली मौजूद है। दातारा या तासार भासपास रे मामालियों
थेरपि मै मरवपूर्ण स्थान है जिसकी मान-मनौतियों की पाती है।
पिकात प्रसिव रिपरिपाक माशी को भे प नही तरह से दो
सक तासापरूम उपस्वीबी पोसीमोर पहनाने और उसप पानी
पिलाने से म रवाने मरवारे।भी प्रपा मी उतने नीपेगी
पती।
पालोय च तासार समा, इस बात की जानकारी प्रापरे, पर
परम्परा से प्राप्ते पर विराट को पये पर अपना महम भाषा
माये हुए है। मिथित रूप से पानही कापासष्ठावामा चिना
पुपमा है। मीत सी मा ति पुरानी मानी है। उसके कतिपय
प्रयोग, सम-पोषना व्या वीस और श्रीपुर तक
बाली
पुर इस बात ये प्रश्न मा निर्माप वान को पप पूर्व
पातपा मारे।
J
समेरो
१८ कम-समृद्ध लोक-कथा पर रिचार इम्पस ने एष हिस्सप रे मेतो कामो मप्रभारत की प्रापिम पातियों के विषय में लिखे गए थे, सम्पादन करने वमम (१८५०) उपम भाइ एक सोफसपा प्रतापूर्वक मिशेषण र भावप में परम्परा प्रारम्मी पामयः पाशी गई। प्रपर 'भोर रेषा रेप मसराप के पश्चात् इस भोर गति से किया पाने सन्य। 'इपिडयन एम्यसरी' में रमेश ने निरन्तर माल भी सोमानाने प्रमपित किया । मातनिहारीमा म्परेस, नोसाम, भार• मुम, भीमती भैर, सी एच. बोम्पस, एम. कगोमा देवी, पंबर मादि किसानों ने मी पावसभर इस दिशा में किया है। किन्तु र न विशनों रेपो में इस बात का प्रमुख दोष निवाला बाग रेल मी ने सममें संग्रहीय प्रविषय पानी को अपनी मुविधामार फेर-माण पिमा । ठमें पाँकी भाषा का बयोपित सनम होने से और फिर रस सामग्री में अपनी भाषा में प्रदरित रने के प्रयास-स्वरूप उन या स्थामारिया और मूल प्रेरठ-गात प्रायः प्रमार हो गया है। रिक परिस, पिनहोंने अपनी पुस्म अप येस माफ माया' मोगर और मिस पपा रखा है, इस बात को स्वीकार हो पूर्मवी सेल में और संग्रहकार ने ऐमो अनेक भू है। नॉने एक नमसर छोककया १६७ प्रमुख दोष या मी पापा किमान कान में प्रप्यम और प्रन्येश्य की प्रति इस सादर मावो पापी हैरेपी सोमपात में विदित प्रामपंप मादाम न होबार्य । हिनो में सोनीमारे तो रसमा प्रचशित हुए है, पर तोर- पामा के संग्रह माम-मात्र रेसिए दो-तीन दी। पिरोप रूस से . सस्पेन्द्र और शिसार दो रे संग्राम 'यो सोमानियाँ और पुरेशवादी सोच-मारियाँ' या 'पायण नगरा उल्लेखनीय है। इस मभर मनेर संमहाभापश्यता है पारि सामानों प पेर पो सागर की दरारे। माप्तीय सोपमपामों का तो अपना विरोष मातहै। उनकी मा सिया के समाप में यह बात प्रसिपल उमफे प्रमुल सयों की पुरा वि माय प्रम्य पानी में होती है। वास्तव में यह एप स्पाई है। पेमार, गाश, बिहार, एमस्थान, महाड, मेवा प्रपा माया मारिस्पानी में पार पाने दाक्षी सोपामो में भनेकपाएँ, एक-दूसरे से । पम्, पार, त्रिय मोर गेलो में सापय रसदी । पर मात्र प्यान देने ये है कि दूर-दूर तक बाविया र फेसन, मने और सपाई स्पारित करने से पार एक स्थान पर ही सकी। दोन मी पात्राएँ, सरकार और प्रमुख स्थापित किये हैं। इस प्रभर पा पावसापानी, प्राचीन गरेमापान पपा तस्मिागर, 'देवालपरियति', हिवारण मारिम्पों में पार हानिमी के गिरे सोपानाम मिल पाता मा पारगा और मी पुरती है। ममतमा धमतरालम्बन तोपानी में पर मनपारे। पाक कि एलिन पनानमार पेपार शरम देय दासीमियमदी और मतावलम्बियों के गप रे मप्प एवं पूर्ण एरिपाक में परेपी हैं। मन घिसे हम मारतीस-पा-माहिम्य पते पर दादर में पगिपार पा-साहिल-विला, मेमोती, मार मारतीय प्रौर पौगो- पहिस्प है।
कम-सपुर
सर रिचार टेम्पा ने पस• हिस्सप खेलों का, को मप
मातियों के विषय में लिले गए 4, सम्पाउन परो समय
नम मा एक सोसपा का विज्ञतापूर्वक मिचेपण करके
रम्परा प्रारम्मकी बाकमरा ठी गई। फ्रसर रे
चप्रायन के पश्चात् इस प्रोर गति से धर्म
पियन एन्टोरी में रमेण्ट ने निरन्तर गास की र
प्रशित भिा। मामनिवारी, कुक, केम्परेल, मोलीय
नीमची एन, सी. एप बोम्पस, एम इसक, शोर
आदि विद्वानों ने मी पाव-विभय इस दिशा में किया
विरानों के प्रन्यों में इस बात प प्रमुख रोप रिकता।
'उनमें संग्रहीत भरिभरा मामी को अपनी सुविधा
सा। हमें यहाँ की भाषा प्रयोपित न होनेर
मग्री ने अपनी मापा में अदित करने के प्रयास-सम्म
सामाषिक्षा और मूल मर-क्ति का प्रायः प्रभाव होग
रिस, पिलाने प्रपनी पुस्तक प्रेस ऐस मोफ महामे
र मिल का प्राव रखा है, इस भाव में स्वीपर ।
वजी सेसकों और संग्रहका ने ऐसी अनेक मी
क्रम-सवृत होकाया
ने मापे निगाामो पो उपटू ।"
परेर
मुतार
का मोवामी
चिड़ी रोती रेनी।
चिड़ी यई राबायपास | "मा-बा, परेश रेगर " "पटेश ने
मापेर विगाइपो यो रोग"
पाया पवगरेमी
काग मोठी मी
शिी रोती रेनी।
मिली गई रानी पाए । “पमी-पनी, राधा से पस" माने
महानगापो बो"
रानी रामसे सभी
भाग मोतीमी,
चिलीरीती रेमी।
चिठी गा'का पास | "दप-उंदप, पनी धमाबार।'
"रानी ने म्हारो विगारपोधो पहा पाएँ ।"
बराकपा को मी
भाग मोतीमी,
पितरोती रेनो।
विही गर रिल' मपात । "पिता विसर, टरा मार।"
"रा ने महागे निगाहपो पो हूँ मा "
दिया रामारे थी-
काग मोती मी
चिड़ी रोवीरेमी।
चिो गर स्वरा पास । "कुलप-रा, पितरं ३ का सा
,
६. मिती
भारतीय लोक-सापिस
मारतापरायों में एक या अपने विभिन्न कपी में से
राती है इसका प्रप्यपन परमा हा मनोरथ पारे। पामिति
किमान पामों से जगाम अन्य धार्मिक, सामारिक, अनुन्धानिक
भास्परिक मादि सभी प्रकार की होमपाएँ एक दूसरे कम में पर
सीमाएँ सौर नीति है। सभी के लिए नीचे एक निरोप प्रभा
श्री मासगी माम मा (Accumulaave droll), बोबार
सित, दीपा की है। यह सालमा माममा में प्रासरी पर
मा परे-मार पा, पथपा मामा-मानी अपने पापो गरेका
सभामा रते हैं। समानी में पानी इस मभरो:
पिछी-काग की वार्ता
प्रगला रे पापो मोती मेरी पायोपोलो। पड़ी तो कई मांगोको
ने भागमा कोर्स पो मोती । दिरी ने कियो, "बाग, मोती है।
प्रयमोशीम पड़ो रेठी मो। पिडीमा बम प्रपाठ।
"सीम सीम, भग का नाम बोक्यो, "ग ने मालगाये
पोगापिही ती हुईपक्षी गई।
कीम काग गायबी,
काग मोटी थी,
चिनी रोवी पी।
विही गांवार ने मार-मार, सीमा सीम माणे
परिपाचो बोलीम का "
असार बीम करेगी,
भीमाग शादी
काग मोती मी
पिली बोडी ली।
की गई पये प्रपास 1 "पोर-पोस REP "र
1
गम-सपर मोक्नथा
ने हा निगापो भो सकेगा।"
परे सुतार के
का मोती दे मी,
विपी रोती रेनी।
चिकी गई पाप पास । "बाराचा, पटेल रेगर "पटेश ने
मारो पिगारपोपा उमर "
रागा परेशरेमी
काग मोती मी
चिनी रोवीपी।
चिडी गइ पनी का पाए । "एनी-एमी, राजा से रस।" "पचा
मारो निगाापो पोस्"
रानी रामसेसेपी
काग मोतीमी,
विसी रोती रेनी।
रिडीमा देएम पास | "एण्टरप, रामी प्रकपड़ा पार ।
"रानी ने म्हापेमलियाापी यो पटा पहूँ।"
बराकपाकारेमी
काग मोठी देवी
दी रोती रेनी।
पिलीमा तिर पास | "पिला पिता, उबरा मार ।'
"रा ने मार पिगारपोबोमा "
विर्या रामारे नी
काग मोतीनी
विली रोती रेमी।
रियो या वपापा "पप-वय, विस"विमा
१. चिरनी
भारतीय सोम-सा।
ने महाये बिगाइपोवा"
इमो बिमाबाप भी
काग मोतीदवी
चिली रोटी रेबी।
चिकी गह गंग1 पास । "f-य कुरुप मार ।' "
ने मारोई विगापो को उस माहे"
रोयरा मारे बी-
काय मोदी मी
त्रिी रवी ली।
पिकी गई रस्ते" पास [ "पस्ते पस्ते, गम पार" "५
ने मारो निगाायो बोपा'"
बस्ते रोगबानी.
का मोतीपी
चिको रोती रेगी।
शिकी गई समन्दर का पास | "समन्दर-समन्दर, पो पुन""
ने मापे विगारपोबाइमा"
समादर बस्तेमाय पी
काग मोवीबी
की रोपी रेगी।
शिकी गहराची पाव । "पती-ची, समन्दर के भूत।'
न मापे लिया पो बो से चू।"
रची पमपर सेमी
काम मोठी रे श्री
चिनी रोवी रेबी।
.
श्रम समृद्ध मोकळया १७१ सिी गा मन्चर पपा | "मर-मन्दर, दती चपन में मय" मोरो, "महारे, प्रमी श्रम में मई म।" इसी, "मापन में क्यों मपय, ममी सममा यूनी ब" समन्दर बोयो, महारे यापूसे, मी रस्ते दुमा ।' पस्ते मोती, "म्हारे पापुमाय, हूँ भनी म बान हूँ।" अंगरे, "भारे या बाले, जी कुलयमा ।" अनपे बोक्यो, "मदारेमा मारे, भी शिकई ब।" पिता के, "मारे क्यो माप, प्रवी रामा।" उपरो, "म्हारे क्यों मारे मत्री रली पाये।" गली मोमी, मारा करता क्यों है भी या हे रूई ।" पबारे "मार से क्यों स्त्री परेश गहूँ ।" पये पर रे "महार यो डायो, प्री क्षार है।" महार "मारे सौगयो, भभी सीम कार" मोम बोल्यो, "ER प्यो प्रगे भी प्रग सर।" प्रग पोल्यो, "हरे या मवाय, मत्री मोतीर।" पग ने मोदी रिमा । पिरोती पंगी। मिर पेन्द्र ने अपनी पुस्तक 'सी-शिप का प्रप्पपर' । मार कयामों पर एक मुनर रितस्य मम रिमा। ठग्दीन मानिदो कम-संबरपाली पारे। शहबन्द्र मित्र ली सो परिमारते हुए सिकरें Accumulative drolls ! cumulative folk tales are stories in which the tradre goes on by means of short and pitty sen inces, and, at every stepof whichalf the previous ips thereof are repeated hilatast therhole ities of steps thereat are recapitulated" सपारी में एरियर विम मार सिनामा लिएका दिव है । पूर परिक्षा प्रयाय नपानि पाल-तम मानिन - १७२ भारतीय नोक-साहित्य मगोपेशविक सामीप्य व प्रपास मा बार सो प्रत्युक्ति न होगी। इस प्रकार पानी मे मुस पात्र बारा किसी वस्तु की मासि पयोम, या पथी, माप, पाप्रपना तन पदार्थ से सहायता के लिए मार्यमा, समय- मापमा निम्फलवा, मतिहिंसा का अनुपेप और अन्म में प्राची प्र देगार हो पाना मयास्त के प्रमुख निर्माण-तल है ।पुर प्राचीतेगार हो पावे ही पहामी पीछे की ओर लौटती है।म-भरता इटवा पाती और मस्क मापी प्रपणा पदार्म अपनी रानि की प्रारमते मसमीत हो मुम पान कप के लिए तैयार होवा बावा है। अन्त में पाट प्रा प्राप्ति के साप पा समाप्त होती है। यही कहानी विहार में गोवा और मुगी के पोपी पानी, बगा की नमी पड़ी भोर मार की कहानी, सशोन की बटी प्रेमाला और अगए और दौज वाली प्रारी से मिलती है। प्रिय हो भन्न मान्चा में मी ऐसी ही भानि प्रचलित हैं। उनमें क्या उपचार और पात्र पदस बाते है, किन्तु प्यास्तु, स्व और गरम में अन्तरमही भावा। । धुर प्राणी की सहायता के लिए हैयार हो जाना एक ऐसा परेको लोक-मामों में प्रचलित है। रॉ० सस्पेन्द्र इस परमो मुर-पाती उप्रान्तरिक परयों में लिहित मानते हैं, यपि इस विश्व में विश्वका इस महीपा पा सकता । धुर बीय भवत्पर हो पाना अनुमनाम सस्म है। 'मसे मैंस पापा मापा पाशी पहात में समिति भयों में पह अनुमा मी पाकिपड़ो और मोसे दीपस्तु मी कमी को पेला संचाती है और विसभी अपना मोबाब ऐसी व काम रेवा है। को पड़ी पात निवज़ पाना सम्मथ नहीं। रिस्य मबाहर मचर-पैसा प्रायी पापी प्रेम रपये। पोमारियों में पाए और पास-ममोतिधीत सपकरय प्रस्थित महानदी और वियम्पन्न मौके ठीक सामने खेर और विवि मारियों की उदायापक सा मम्प भी खा है।
१६
लोक-नाध्य
सोमाय मोतपन म प्रापपीर मापन रेबो मागरिपार
नवे प्रवास निम्म स्वर ए, पर मिसाल बन के पासास से
पित है। प्रामीयता में इसी परम्पप पुगों से पसी भा रही
है। होर में प्रामाद व नागरिक बन सम्मिलित , प्रत सोल
गाय एक मिहे-युसे पन-मायमच है। परिपत रिमोशिए
दिम मार प्रविषाय रे उसले प्रापार भूमि यही सोनाप है।
पतिस्पति र प्रमायों ने परे विनस प्रे टस पपार भपय है, पर ये
मी गति को एकामष्ठित कर सके। देश श्री पटनाएं इने प्रमाक्ति
भवी , समावसबसिव भावनाएं इसमें रस संपार की और
सो मायर इसकी अभिम्पति में पारद नगा देती है।
मरदीप पाटी अप्पस से स्व रोपा किसके विपत पनीष
सामाया म विदित है। अपने अपरिमारित चिन्नु पम्-मापी टोक
रोगास प्ने बाले अमिलेम एवं पापि मिम्पति के पास सो-
माय माय बाकी परम्परा में अपने मुह प्रमाया-सहित प्रष्ट पर।
मत पाप ग्राम में मारप्रे पंपम ये पागसारेरोमा
मायकर मी परत सासरप मन ही हैं। माप-शास्त्र
यह प्रभर पा विधान है-विष्य, चन्द्र और अपना पक्ष
भारतीय लोक-साहित्य
बाप ने स्पानीय सामों को पीछे रातार पाश्चात्य प्रभुत्व प्रार
सपने सम्मारिवरसिया । इवा होने पर साधारण बम-समान
म्परामा मनोरकसमापन अपनी धीमी गति से प्रचशित रो। संक्षेप
पर विपना पहा ममी होगा।
-पीमी भागवत
मागपत के मोम्मद बिसे हम दुला मद मसच्छे हैं।
की शताब्दियों में पोपी मागनु का सूप प्रचार रहा । पाँचवा में
मचार पायहाँ हनी प्रशों में शासन ममात मी र मास
। 'चित जारमाशियाँ याना अपने प्रवेश पाया
पश्मिा करनी पी। गॉग की बनवा रेशिर हमी सोगी रा
रेत मनोरंजन मपानी मात्र मी विचमार है । मन्दिरी से भाग में
साधारण ऊँचाई पर मय पराम पानों द्वारा अभिनय किया जाता
उमूह-गास का इस अमिनो में पड़ा मशवरे।
पोम्लाट
पोम्सारच परे 'चम पिात्र खेल'। ये लेख प्ल
बारा उसी सवाशित होते है, वैसे पतालवीर पर।
से मपासमा मह पर इन पदे चित्रों को सूत्रधार वारणारे
पृष्ठ भाग सेवी पासव वा है। होनेशिया पोपाय
मे इस माप्तीय सोमपोरधन च ममाव स्पर लक्षित होता है।
दोनो मनोरचना श्रीक पौपदिक एवं एमापरा पा महामात
तिहै। मापीय पणि मारठीव प्रन्यों में इन प्रभाव अतिरिक
कोई स्पही मिनवे।
- मारी पृष्टभूमिमता में मपलिव शशिध, गोमय, तमाशा
सोक-नाटप पौर परुपि प्रादि नात्य प्रकार से सम्मानित है। इसमें प्रवियमोक्ति म होगी कि महापा के ये सोर-माप प्रघर नाटकीय सोपायों से पार-कुछ सम्बन्धित है वो भी उन्हें एकदम एकही रस्तुएँ स्वीपर करणा टिन। खलिस मराठी विज्ञानी में मक्षित की स्पति के सम्बन्ध में मतभेद है। रंग बाप यावे अनुसार दादापम्त नामक पति ने एसी शादी में मक्षित भ प्रथम बार पर्थन किया, पर तुमराम ( १भी वापी) मभेगा में पक्षित वा समेत ठपा माराट्रीम बार-शेप खेलक उसे अति प्राचीन मानवेत्। १भी शवामी म सहित में प्रयुक पप स्व-छ हिम्दी ही पा। रविण मातीय हिन्दी पारा की शि से मनिव परत-कुछ हिन्दी मारों के निपटारे। मप्पपुग में सहित अपनी पूर्षोम्नति पर था। इसके द्वारा प्यावार, पदेवयानी, मागीस्त मारियाएँ प्रमिनार की पाती है। माम्म में मान्दी और गणपति का प्रवेश रोता है। पानी में मोपम्परम और गीत मा प्रभिनय प्रमात अधिक। बारक मामिण उसको र प्रहर पर प्रपा मारिना में पति होते हैं। গণিত गावत मी मण्ठो नारे भारि-पी में अपना स्पान रखता है। गोपनप पाटिक दे गाए। दृस्प एवं मान २ मिमित प्रयोग पारा इनके माप्पम अम्बानी के प्रति सम्मान मत लिया बाठा है। पैसे गाँधत प्रमुख हास्य-अमिनवा हा पहा है। बाद पगारे पुन में पाये हैं। गौचन और पानीमा के बीच मारल्यान या पेशित करता है। गाँधत पर पार्मिक वस्त्रों के साथ वानिए मादी पममा मी पहारे, पाकिमी मी देवी भाग में प्रय, अभिनेता
१७८
भारतीय कोक-साहित
प्र धमला और मुस से अमवस्पित माया का बोलता इस प्रमालको प्रम
समाया
माया बस्न एक प्रकार न गीत-बाप है। दो-तीन पुरुषों के सा
एक नाचने वाली यास्मि पप गाती है। परयों के पास सफ, पोकर
पा और एपप पाच होता है। गापि सानियाँ गाती है और सब
सोमों के सामने प्राचीहै। माया प्रमाव महाण म पिक
साभारतवसा के सिर वामेश चिना मिली शर्मि माप
असर करने माता मनोरपन प्रधान, सोकि इतम पीपगिता
समाप यहीं अपितु सम्माविष, ऐशी मोर गंगारपर माक्नामों के पा
पूजा और पप-सपनों पमपार । मात्र मी मपठी मदों पर माग
परे पाप से मिा पाता है।
मपकी, पारूपिया और त्रिची भी माय भी बता रे मनोरंजन
के पान । पर मम सामूरिता प्र प्रमाण और न मान कम्पत्ति
घ मास प्रपिक है। इन प्रचारम।
गुजरात : मपाई
मनार एयरात में अस्पत ही पारस स्वरा प्रचलित मोक-परम
है। इसके लिए मप की प्रामसता ही दोधी । गाँव-गाँव मपाई
मानियाँ घूमती पनी है बिरामी परष परमामा का
भवाई में प्रदर्शन या बाता है। पुर गायक सम्मिलित होकर गाते हैं।
मरम्म में गपपति मोह होता है। अम्मा की स्तुति मी श्री पाती है।
तत्परतात कोर प्रास्माष्माया मम गाती है। मपाई Rimal
मी साप्ने मापाती।
होक-नाटप पंगामाया मार और पूर्ण महार में पाता (पात्रा) नो-मारप ग्र मटित रूप है। 'बाबा' है प्रबास मा मुलत । प्योपासकोंम स पर ससपी के अवसर पर प्राणशीलामी को संगीत-माटर माप्पम से मार्ग में प्रदर्शित पप गाता है। पापा ममया पिहोता की प्रारम भक्षारपरक गीत-अमिमय का प्रवेश मा । ममिरी मांगन में ये बीताएँ विशेष म्म से खेतीबाती रही। निस्सन्देह शोष-तियों ने पार्मिक माने पर पारी होकर उपहाता पारूप धारण लिया। तेजी एवामी अन्तिम वर्षों में प्रणमत गोस्वामी प्रयत्नी से इसमें अनियमिध्वा और पठनोन्मुली रिस्पति सुपरने लगी। प्रारम्भ में बाबा का संगीत-पद पम्प स्पिन भोर अभिनय साधारण मोटि पाहुमा बता पा । ठिपय र प्रयोगों ने पानी में शिपिशवा सासरी पी मम्मत गोस्वामी ने इस दिशा मेमा, विपकनास्त और मामा म्पी परिस रन प प्रसम्म गम्मीरा गम्भीप व महारपियो । मैच है। प्रापः समा के समय मुस पर प्रापरत पदमप्रकोप शिवीमाराना में मित्र-मिय प्रथा स्वाय बन-साधारण समय परसे है। इसमें मची पाररया नहीं होती । बमीन पर वापिका दिया बावार और साधारण-ना परतावानर पर मनारबन व्यापावा। सोक-मानों को बात पन का पर उनम माप्यम है। प्रमिता मृस्प प्रते हैं और सम्मिलित रूप से केपी भागाम में गाव है। ममिनप में गम्मीरखान मनपा प्रमाण रावा है। अभिनेताना होमवर सागों में बीच-बीच में पाठ प्रने या अपनी मुविणारे निए पररे पादे पाने माने की सहायता रहती है। गवस्यान । पाली कठपुतसी रेसप्रने यो परस्पान में मवे पिरते हैं। मार । ।
१८०
भारतीय लोक साहित्य
सही मागे माय मै रगतक्ल से पना परदा गेंग दिया जाता
है, बिसरे भागे स्वपार अवलिया स्वारमा एमपूती पीता को मार
करने माझे एगल-दरपार से सम्पम्पित किसी घटना को संचालित रखा।
एक म्परित पेशा पर मा भर्पर पता है। शिया परंम पमपीला
और पानी के अनुरूप होता है, बिमसे मतित म पूर्णमास होता है।
स्पात
मपाल राजस्थान लोक-मपत्र प्रमुख स्म है। पासप वापरय
मैच थापा बाता है, जिस पर पौराणिक तथा पार्मिक माना
अतिरिक्त बनभुति पर अपना ऐतिहासिक परनामों से सम्पमित मानो
को मिनीत विमा पाता है। गाँगी में सात का प्रचार प्रचिती। स्त्री
पानाम अमिनप पुस्प ही वे है। गीत पास भ माप, मत
मात गीव-नाय की भपी में भावे ।
पर एस साधारण बम्बा प्र प्रारम्पपीर और सा मंच है।
सपना के लिए मंच पर प्रासम होते है। गोपिनी पौर पत-मरा
लियों लिए भी स्थान होता है। मागत, रेप सम्मान गप्प मत
पिया, बलेव के पदों और अन्य मध्यनलीन साहिस्स-सामग्री ने यो
मारे इस चाय-प्रथर को उस्कप प्रयास किया। इसम मम पिस
हपदमीशा प्रदर्शित करमा। नृत्य और गीत-माया प्रमाणात्य तया
म्योपपरी म्यूपता इममें देखी जाती है।
रामलीला
पममीशा म प्राधार पम-काम्प , पर मोम-बाबरे स्म में या
उत्तम मारवीच पम्पप प्राव समस्त मारतवर्ष में विधमान है। प्रमशीसा
का प्रचार गोगा में भाव मी नप है। दशहरे मम पर पर परम्परा
इमे सबौम मासित होती है।
मोफमाटप मोटकी मोटी और ममास में बहुत समानता है। सम्म मोदी पर माद श्रीपत है और ऐतिहासील पमता के मनोरंजनार्य मंगारपरक मामा प्रेमिनीत करने के लिए वापपार हुमा। मालपा माप 'मा मप राम का मामयी उमा परे। मानवी में या राम मच पाँधने और उस पर अमितीत पिसे पाने पाले स्पासा (Mil) के अर्थ में मयुक्त होता है। माप प्राय पाम भया नगर के मुझे स्पाल में ऊँची भूमि पर अपना परिवार पा बाँपार माये हुए मेर पर से पाते हैं। इसके मारे लिए नैपप्प पवा रंगमंचीय भारम्बरों की प्रापरयन्ता मही होसी । प्रमिनेवा मरनिष्टलसी स्थान से अपने पस्त्र परसार प्रमि- बरेख मन पर पा पाते , जिनमें स्त्रियों का अभिनय मी पुरुपही कसेरको परस्पा इस प्रपरली पातील दमय ही सेमी पर देख सकते हैं। यात्राभूपय अपरा मिनर का मापन मापी में गीय विषय है। प्रधान रस्त संगीत है। उसमें भी हैपी प्रावास में मापा मिम्पकिरे लिए गार पाने माने बोस' प्ररित माता । मोवामय धोनी पपमा पात्रों के बादौरे पौराह पर पर मम स्टवेसीमयमरीजमाप करती। एक सिरोप भाग साप गेलपिमा रे पर पाप मारय मानों के महापपूर्ण प्रेस दो टलाई प्रदान है। गाने पाता टोइस समय 'टोसप वान फाले पनि का उपवारण पराएर मार 'सो-गीमि-बाध्य । सोनीति मार्य शिए शिव पुपों का होगा प्रापरक है। सभी मोप में निहित रातोषनीवायरयस्पर्धा शम्द-प्रेषया, गीति-तत्व और नाट्य चार- सपा सरस पीनामापेश न मांचा पोत बियेप रेणीक का मस्त रचिर समांचों में भेग रंगव, गवारपणे, गत रोए, रंगत मेला की, रंगत दादरा भादि गम्दो कप व पर
१८८
मारतीय लोक-साहिर
सोबोकियाँ दी।
समप्र स्म से कामयों प्रभप्पयन करने पर मतदोवाकिफ
और मर्प प्र प्रारम्पर उनमै महीं है। वे यथार्थ की भूमि पर बीस
लिए नीति-बायाँ भी मावि प्रचलित हैं। अन्योक्ति के रूप में प्रा.
पार परिक्ष होती है।
मोटे रूप में पहाता प्र निम्नसार पत्रण मिा का साया है-
१ विषयानुसार, २ स्पानानुसार, । भामाशवार, ४ बातीपापसार
मारतीय भापानामावों घ उक्त पा प्रकार से सीपरपति
पा सकता है। स्थानीय पोसियाँ और मापानी में अपार सामग्री उपक्षम
है। पाप और मरी के मामले पाई जाने वाली मात्रै रफ वापर
में सम्मिलित की जा सकती है, अपया उनै रमितामा बाम से मना
मी रमा पा सच्चा है। पं. रामनरेश त्रिपाठी ने परिभम रो र
जाहिस्प' माग ३, म पाप, मारी, सामझाम, माधोगम, हर
मादि म्पक्तिों द्वारा निमितमा समाहीत की हैं।
प्रसार के समय में पास हारा विख्यीकी पावतें प्रचलित की गई
यी। मौषरे पास को मामक एक गाँव मी पाते था। परन्तु प्रप
गाँव १ माम गे परत यया, तो मी उनहे व उसमें बीति । सागों
मानारे पाप से उसकी क्यो की सराही हा पदी वी
पाप गा पाते तो उसे समय पी। पाप ना किसानों को
अपुर मात्रा में पास हैं। उनकी हारठों में भीति भी पा इल्मी स्पाई से
मक कि मुझे नहीं भूल सवा-
प्राबसमीर बिमार्च पास चोरे मालेगांसी
मविप पीर सबै मासे, पापबासी।
।
x
सासम बोषी, मावा गाप माप मसबो मनिपाल
को माग यह साती पार, पापै मरे किमाविड वार ।
महरी उपम सम्मान में मिनी दी पिचिन मा पाइ बा।
सोकोक्सि-साहित्य १८९ परन्तु रे सहए, यहाँइए इस सम्न्य में पेई प्रमास प्राप्त यही । मोरतसर विले प्रासपा परी नामश्री एक वाठि पार पाती है दो पम्पब में मरी की पातौ रे भाषर पर मरिम्प भारि पवाया भी है। पवस्वान में महत्तो नाम की एक श्री की पावते मी प्रक्षित ।भारी और मइसी श्री प्रपिशपाते इस माम के झगड़े में मिल सी गई है। मापा की सम्मतवा अपवा उसकी रसात्मता में कहा बा सापीय देवी । सप्रेमपानी की ममी ने पो मापा माठी को पत्र-ठय ममुक्त पर हिन्दी को प्रदान करना पड़ी पाने पर एक मभर पमपुर रउपपरा रही है। बापू पर प्रसाद ने भी पी-मापासीको स्थान लिया है। उसने कहा पास चन्द्रपा रार्मा गुलेरीबी ने बो मी निसारे मावा प्रमुक पर सव बान सल दी है। जोकि नामक एक प्रसंगर मी पाहिप में विधमार पास पास सोकोकिया मात्र में प्रधर प्रधम परती है। मेपास्तव में 'सोने में मुहागा' पाली हात परिठार्य करती है। प्राय हमारी रेप पिसा बास गया है। वित्त प्रत्यर पिता में स्वास्मष्ठा साने के लिए मारिरिक रानीपुर रिया बाया है, उसी प्रपर प्रादेशिक मुरारी और पानी सपोग माषा में जान गह येता है। दुनिया बीमवार पाढे दौड़ती है। मामता प्राप्सिर पारे। अनुपात को पुनिया सदियों पती पा रही है। पहो पुने अनुमा और सही मारे स्पापी पर बबीन शैली या नवीन रंग से म्पक होवेवा में नवीनता का अनुमान दावारे । यतो पिरस्वामी है । म प्रप करने में नीता पारिए। सप्प स्पर। मिसावे पूर्ण सस्प तो होनी वा सही। पार्षबारे, प्रसती समावों में बन्द मही। उखा सम्व-मर पार प्रस्तुत प्रती हैं। एक स्पाल पिरोपका सस्प दूसरे स्थानीयप अपर सस्प पहीं होगा। प्ररने स्पान की सीमा भोर तासीर प्रमार उसयोमा ।
१९०
भारतीय छोक साहित्य
पातों में अपने देश-प्रस की विशेस्वार रिपमान सी है।
से-कम उनकारा उसके उद्गम स्थान और वस्तीन परिस्पिति र पर
कम तो लगायाहीना का है।
पोषाकीजीप गरेपो, देपुर कीबोष पायो
x
देम्पो रापानी भारा देश KE पर ही भैष
X
मात्री मे पुरणपो से सी म्पर प
भाषा 4 अपयो मे, पर माता मेवाण
का मेवाए सपथ या 'नो पेठा रागवाय, बोपती -
अंगो कोपाठी हाय एस्पानी, पापरलता से पाया जा
या।
रमात पत्र प्रपनापब उसषी पाया में मिलेमा। मम्मी
सामर से समी ने रन म सुरक्षित समारत अनुमान की निग
हैं। भनुमा सर्वप्रलीन और सागणिक है, अतः उस भाषा पर
निर्मित बातें प्राप्तग-अहम प्रमों में विभिन्न सम्मो मी मस्ती
हैं। धापने सुना होगा-
मम्मा परिवही अपने-अपये।
मह मोकि मेवाड़ी में इस प्रभर है-
माग्यो सीरमो मकर बर का।
इसी वप मेवाड़ी में-
करिबमारी पारपी नृप, रवा भर भा
पा से परनबीजिए पारा रम्बा पर।
साधारयम में-
कवि चिनी, पापी मंगा गाती
बम बारों में बानिय, समी पार।
रामस्थानी ममाप्त है-
मार
मोफोपित साहित्य
भूगबगाय कोनी बाद विधातरोनी है।
सीमो दूसरे स्थान पर पारा यया है-
मोबाने बसायभूख कमाने वाली माय,
मीद मारे हरी मार, प्यास म गाने बोली बार।
पायत पर कान्ति-पास से एबरती उनके पति हो
माता समपारे। परिस्थितियों पर बदसती है वो नितनी ही भारत
देस ऐतिहासिक मास की पन माती है। उस समय यदि शिपिचर
मदी की बाती वो स्पषवी माहो पाती हैं, क्योंकि समय का प्रभाव
सन पर विरोप वोर से पाहता है।
इस रिया में प्रपन पर मरे। फेशन ने हिमी भावों
पर फेसनस् दिक्शनरी मॉस दिनुस्तानी मोन' (१८) नामा
प्रम्प में मारवाड़ी, पापी, मोबरी और सिएहुती पापों पर प्रभरा
राता है। समीप सोप्रेजिया पर ये एच. बीक्यूस कर म
समस्लीम है। पंचाची, मगटी, अंगहा, उहिया पारि मापानी में माल
पूण संपर वैयार किये गए हैं। मेरठ पेन के मुहावरों पर सगमा १०१६
एप पमपमेमसिंह पर्मा ने 'मापरी प्रचारिणी परिका में विस्तारपूरक
(भक्ति सामग्री सीत) एक निकष प्रकाशित किया था। उवी प्रचार
ली दिवा सर पीवापरात पापवास की भूमिका सहित पागाती
मापाप पाते भी गालियाम पार र प्रफनी से पत्रिम (मद
१६६४) में प्रस्ति । गुजराती में 'गुषती प्रेत-संग्रह (एसीपन्द
यार) पासबो में 'मानवी पास' (सात मेहवा), पेवाड़ी में
मेपाली पहा माहि उपयोगी मा उपलब्ध है।
२१ प्रहेलिका-साहित्य प्रदेशिका (परेती) मुम्बल, पारसी (मालयी), प्यासी (मा.) या उखापा मी पणती हैं। समय में पोसी को 'प्रपोय पते हैं। में स्मरेद्र ने परेली-साहित्य मेमोक्सि साहित्य का ही एकग माना है, क्योकि शोकियों में गए-सोच पाय परिवार पायो तल निहित है, पापडेथी में पिम्मान है। पार्टी म्प पर उम्प कतिपय विशेषतामों सहित रित भर पतारे। रूप रंग, म्प और पाकर प्रकार मी सातम में म्पक पिणे पाते हैं। ठने ही प्रापार मागार उत्तर लिप पाते हैं। गांवों में प्राय श्यों में पोलियाँ गाली, डॉ और मोमबानो सभी के लिए मोरबम पसर साय हैं। स्त्रिय मी उन्हें अपना प्रस्त्र एममती है। समुफ्त में पामात्रा की परीक्षा मेने के लिए स्त्रियाँ पहेलियों की मीणा देती है। स्मृति पर भिमान ने पाते, अनुमपी और विमान मी कमी-कमी मरे बौतास मिमित प्रगौरव के सामने सिर झुका देते है। इसीलिए भी यमनरेश बिपाठी ने पोमियों को 'इमि पर ग्राम पाने सपा पा स्मरख-राति और मान-शान बनाने पाहै। भापका को मियासोबद में पाई जाने वाली परेमियों के मान से उसे पहेल्पिों पर मानाय तो ठीक है। अवेद का एक मात्र यहाँ सैमसहित सात परवा एपित होगा- १९२
.
पहेरिका-साहिप
बवारि पाप्रपो अस्प पाशा
रशीप समास्वा सो भस्म ।
त्रिपा यो पमो रोरवाति
महामेपो मयों प्रावियत ।
(विसले पर हींग है, तीन पैर, दो मिरे, लात हाप ,गे
पोल यही सेरा भारे, या मनुष्यों में प्रतिमा पम राम्द पराठा
हा महादेव है।)
साधारण प्रमही है, पर शार्य पर कियापम पदारे मिस
बार साँग पाराद, मास-पास, मप्यार और सायातील वैर,
सम्म और प्रत मिरे, साठ प्रभा के पद माताप हैं, या मन,
मामय और पप स्मी तीन पम्पमा शमा मडप्प में परित है।
"महामाप्पभर पारम्पति ने प्रारम्भ ही में हिलामा एम्प
है। पार सींग पार प्रथा रेशम (माम, माम्मा, उपसर्ग और लिपात्र),
वीन देर मूत, मरिण और तमान, टीम प्रस, गेसिप, प्रभारी निम्प
मोर प्रर्प मापा, सात पाप सात पिकियो, एम, गहा और मुस
पौंपने के स्पाय।
"दूसरों के मत से पास है। पारसींग पारों दिशाएँ, वीर पर
तीन रनिरपत और दिय, भाव दाप सात मि, पापने के पीर
स्थान पी, परिध और पुता"
पर रिय गप्प मात्र निषादी पहेलीको साभारय बामि से
बस्तर है। त्रिपुरा में प्रोग्य अनुप्टाविक नियामय सममा
बावामा। अन्य देशों में भी परेसियों अनुष्ठान मामात पी।
अमेर में प्रफुक मोटी हे मत होता है कि परसियाँ बम की मिस
अस्पालाप होम मिसिन । पूर्व वैरिकप मौलिक साहित्य
नेविामी प्रपनी मापासे मात दिसा, इस्पेलिए भार
हम साल में प्रवाहित इस रिपरक साहित्य विस्तार मा रापप्त
1 पिए, 'माम साहित्य भाग ३ प्रपश्य
१९४
भारतीय लोक-साहिए
पर वो कुतासोता है। प्रादिमासी गाविया मी पोसियों प्रम
करती है। बाहिक प्रासरी पर पहेशियों का परिचना की बुद्धि-परीक
समान रूप से समी प्रधर श्रीवादियों में विद्यमान है। दिन मंगा
प्रायतर पालियों में मी इसका प्रपतन यापहात्तर की भावर पाहियों
में पर प्रथा उसी तरह रिपमान पी सिहरमार्यवादिनों में है।
"पोसी सोफि है," सस्पेन्द्रका "सोक्ति रेल
पहाबादी महीरे, प्रत्येक प्रघरी उक्ति को फिर इसलिए पोशी
लोक्तिहै। लोमानम इसारा-गौरव पीरमा रता है और
ममोरपम प्राप्त करता है। पारि-परीक्षा पसाबन है। सबसे इतका
सम्भय महीं होता, प्राव को गोप करने की पेशगती है, दुदि कीया
पर निर्भर करती है।"
बम प्राव पोसियों के प्राबल पर मस्पेनबीने में सात पर्यो
१सेती सम्बन्धी
२ मीम सम्पन्धी
५ घरेलू वस्तु सम्बन्धी
४ प्रासी सम्बन्धी
५. प्रति हामी
अंग प्रत्यंग सम्बन्धी
टक बों अन्तयत बस्तुभी की सूपी में माय समी बीमा
वाती विपीन से रोममर्प समारो। साधारय--साधारण
मस्त मी परतो की पा से बचीनना है। निस्पती पक्षियों निर्माण
रोता है। गांव के बुनि रानी पर पाना मने वाली पल की है।
"गाँववासीको सूर मिले,
मुलमी, मोर,शर माने युगौं
हे पसी प्रारी दाशन श्री बुमावदार होगीमीप्रेमी तक सूने
२ प्रम-बोक-साहित्य का अपयन, पूप १२.
प्रहेसिका साहित्य १६५ नही दिया। मेरममा का देहावी रूप में प्राय मी हमारे सामने है।म और शिक्षित समाप लिए प्रामीमारे पास पर प्ररमोस मपि पिता परेलिया निष्क्षि परने पासी मुनि अपने रंग की ममय होमस्तु है। परम्परा अस्ति मोकसादिस्य भास्मीय पावावरण में उतम विकास होता है। उसके लिए शिव पैमापन और उकि-बैरिम्प पा विनोद भी म्याई प्राय। परेती से तो पस्तुपा बन होती है पर उपमानों के सहारे उसे मस्त किया जाता है। प्रत्पर मेरे सामने पाने से पस्नु ध वाम पक्षमा बस्दवः पुद्धि-परीक्षा के समान ही पार है साहिल में प्रति प्रसपर एक भेट रामप-बमकार से सम्पानिपत यह रिस्प मी प्रप्पयम प्रमाण में एक भोलि पर ₹न्दी मपटी या अन्य मापामों में पुरम से पाँ-बाब परेसी साहिल मिल बावा है। हिनी में पारिव' (भाग १) में विपाठीको मे इछ पोसियारी, पर स्वतन्त्र म र कोर पुस्ता उपहप नही है। मारतीय मापायो म मानिध-परिस्य प्रसमस और प्रप्पयन हो- तारिम्स अंग को पुरे भिम्पति-पास एवं पुति-पिनासको पसरे सगा, पर अपिलीय हीरे। - ! रामनरेश शिपारी २२ लोकवार्ता-शास्त्र-सम्बन्धी प्रकाशित सामग्री [मोक्याने शासनप्रयासरने के लिए प्रामायिक सामग्री की सूची प्रत्या- परक है। मी महान साहा 'लोक-साहिल सम्बन्धी मारताय माहिस्स की संक्षिप्य सूची' सम्मेशन पत्रिन (पोप शुफ्त प्रविपरा, सात् २०१० भाग ४., सम्पा १) में प्रस्तुत की गई है। इसके पूर्व हिन्दी में इस सरप मयन नही पा । गला में मनमुरगीन ने दायमाब (१६४२) प्रप में ऐसी ही खूपी दी थी। पमित रामनरेश त्रिपाठी ने पिता कौमुदी' (या भाग) में प्रची, हिन्दी, गुजराती और मराठी पुस्तकों की सूची दी है। किन्तु यह पर्व हिन्दी में प्रषिक विस्तार से नहीं दिया गया। इस प्रमान श्री प्रति रेलिर व्यर उस्सिसित स्त्रियों की पुस्सी को प्रसन्न सूची में सम्मिलित करते र भने नइ पुस्तकों और सामग्री पनिर्देश यहाँ किमा बा रहा है। प्रस्त सूची में दिन प्रस्ती प्रपया सामग्री का राजेश किया गया है या मुस्पत' मारतीय सोमाय शाम 8 सम्पति है जिनका सम्बन्ध प्रमारतीय कोमाता-गाल से है ममा अम्मि शित महीं दिया गया है। पा सूची पूर्ण नहीं है। मेरा अनुमान है कि भप्रेषी में और भी पुस्तमपश्य है बिना यहाँ किमही यामा सम। हिन्दी में रावस्थानी गीता एक पुस्तक मेरे देखने में भारी, चिन्नुस मामे-पीवेरे पप्ठम होने से योगा प्रभाव का पता पपस मोकमार्ग मास्त्र-सम्यम्मी प्रकाधित सामग्री ११७ समागासी पुस्तपी-महाग सामापार पर है। उनाने अमिजी की मेजस ११२ पुस्व प्रसिरिया है। यहाँ और मी पुस्ता सूनी में मिला भर है। बस्ती सूची भी है। पो मी ताम्मी शत मी, रमा उपयोग म्यिा बातम। वैसे अनेक मापामों की वाममो महा दूर गा, फिर भी मुविधा के लिए या सूपी उपयोगी है। इसे मागे पाया मा एकता।] १ मार्पर, रखप रे और समसार । मोरपुप माममील २ नमासान वास: परस्पानी पर्नु हपहरण उपाप्माय । मोबपुरी ग्रामगीत (२ माग), हि ठा.., प्रमाम, Y प्यानन गुरा। सुप को मार्गे (माग १), सोपा परिन्, यार। लंग पार मालन : मुपारा, पाँचपुर १४ लेतापम माती मारवाड़ी गीत-संग्रह • पदोनि गेसोत । मारवाड़ी मामगीत ८पराप प्रोमा मारवाड़ोसी-मीत र्समा दुपरावर प्रसिह । मोरपुरी मोगावा मपत्य रस, १५. १. रेग्न सस्थापती माती , विष्मय प्रकारान, दिवशी पोगंगा पेशा से भागी राय, परमारान, दिल्ली पाव भारे रोग, एशि प्रकारान, पर दिग्सी १. मरीतम स्वामी रामपान पा, १९५५ ८. मनसात पता: ममीर सोमय, १६५२ १५ सपन मा : मारपाङ्गी पीव, १९९२ " " "
१२८
भारतीय मोक-साहित्य
१० पपीनाप बटी और हीपनास मन्त: हमारे सोगीत, सखापर,
१८ मदवसात मेरस मारवाड़ी गीतमाला
२८. मन्मपराय : हमारे कुछ प्राचीन भोकोत्तय, इलाहाबाद, १९५१
२. मेनरिया। रावस्थानी मीशा की भारत
२१ रमनवास मेहवा : मासपी कार, यरस्पान योष सस्पान, उदयपुर
२२. रामाकाशसिंह 'ए' मैषित लोम्पीत, हिसा.स., स्वाग,
ऐकस् L
२३ रामनरेश त्रिपाठी क्विा मौमुदी (याँ माय), हिमी मतिर मगाम,
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,
८ रामनाएपस पाम्पाय निमाड़ी सोमपीतदि.सा...
५ एमसिंह, पारी, नरोत्तम सामी : बोला मारू या, योग
म स., १६u
• स साकस्पायर प्रादि हिन्दी की कहानियाँ मोर गीते, पण
११५२
२१ मारवाए 'उरगेय । पाषेती योगीत, परमा (पि प्र.), १४
२२ स बोयी : मेवारी हात, उपरपुर
२५ पामुदेषधरण मप्रबास : प्रमियी पुत्र, रिची, Rurn
१४ विपाती 'प्रेमि हामगीत, प्रयाग, १५५५
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३०. रसमापरयो पीसगी मोनीलीम परिपर, Hy.
१६ माम पामा : पासी बोगीर, मौर, २...
: मनशे और उपाहिस्य, रिसी, १५४
: मासमा दो को-पा, दिली, १९५४
४२ सत्तम बी ए.पंबाची गीत
४॥ उत्पेन : शानियाँ, १६m
रसोर-साहित्यप्रणयर, प्रापप
समार पगारे अन्त तिगामी, लारा, un
॥ पारण पापक २५ गयरति सामी पपाल प्रामगीप, माम
१,मो, Pt.
परम पारीक पचपनि सामी रागस्पामो होगीत, मगय,
"
भाष
पापमपति समी: पमपान सोशीत (माप
॥ परप पर एवं पहिलामा: पवस्थानी प्रास्ता
१. भाषा: विनयप्रदेध लोगीत, रिमी, १
1 किमोशपाएँ, तिमी, १५॥
१ प्रपतापुरमा समोहन
२ पासपोजनेर प्रापली
१.म्प, मदनम् रमा एमर (मादीत), ११५
४पाली, रस्पर समाहा रिचव, १११.
परासिमी
नाम हरिणाप याल
२०० भारतीय लोक-साहित्य • अंगारा हरिमाय बापमासेर पि हिन्दुस्थानी प्रामगोव । । हिन्दुस्पारी चोम्मीत १. हासान उस १५ कवितास, प्रनिशा बांगझार प्राचीन प्रम, १४५. १२ गुरापसाव : परमा संगीत १५ एस, रामप्राय (संधानां): तमासा, १५१४ १४ गोरच विषय, गीय साहित्य परिपत् १५. चहापा, काशीपरयः राषक रायमोहन १६ चौधरी लोकित पर्म प्रो सात्री १७ बासीमुदीन : मासी पार माठ रगसा मायरे मामि २६ ठाकुर, अमीम्बनाप : पंगसार व २ : मीनसन, गीच सा परिषद २१ ठाकुर, रसीवानाप । सो मारिस्प, १३१४ (मगाम) " " गिधा १४ तक पागीय, काशीनाप (भजु ) मावा, १७८५ (गम, २५. दच, मध्यमार । मारतीय प्रापण सम्प्रदाय, २ माग महानिर्माण पत्र, बंपवस्ती संसरप भोशानाब (प्रय ) गोरे या, सा, १२४ २८ मुशोहमारांगना प्रबार, १९५२ २६ नाथ, शरत् : पाम्स गाम, १३४१ (बंगाद) ३ माम, पयागोकिन पैतम्य पारितामह वारियर्पण ५२. पाशिव, हरिबात : प्राधेर गम्भीरा, १५१८ २५ प्रती पिर विवरण, गीर साहिल परिपन् " " .. मोकवार्ता-शास्त्र-सम्बन्धी प्रमाणित सामग्री १४ ममाचार्य, मामुपोप : गाला ममस पम्मेर इतिहास, १९५१ १. ममगार मोहिमाम : हेमन्त योनि १६. ममसूर गोर हापमपि सर १,११५. मक्षि (सोच-संगीत-संग्रह), ure २८ मारस्वी सीट मित्र, पियारंबर : ठाकुर साटार मुखि : ठाकुर मर मुक्ति ४१ मुोपाप्पाय, दुर्गामति (संप्रार्ता): गफ पुस्फे कमा, १५११ ४१ मदीममा समिण साहित्य ४३ स्योपाप्पाय, पारपन्द्र बमवीक्षा ४४ स्पोपाप्पान, यहासटाम : बोमबार विहास (१२ माग) ११२१२४ योपाप्पाय, मविलास उपापम, ११२२ पग मापा पोसादिस्य (परम सस्करण), १६५. ० मस्वती, बीरात पा सार सरप, पवित्र (प्रगिव) पाउस गाय सक्ष्मीवायफ्स रपवाय सामीविषी, पारा विश्वविधालय ११ सेन, सीनेशन : मम्मनविद गीविका (पूर्व ग मीविध) गोरोपन्देर गान ५ सेन समारगमा साहित्पेर विहान (प्रथम सरा) ५४ सेव, दिविमोहन मम्पयुगे भारतीय साकार पार (5.) दार (मिसमारती) और (सिमारती) १४. सेन, मिरीज्यम् : वारसमाला सा, एनामुमयिसूधप्रसार स " २०२ भारतीय सोप-साहित्य . ८ . " गुजराती १ प्राचार्य परीपय मा गया २ अन्तिधात शाह करमीर भी लोसपानी एबरावी पिया सभा राममाला, अहमदाबाद ४ प्रमाण (विवेचनामा) १. मरेपर मेघाखो।सो-वादिल ६ । रदिवासी ( . भाम) पुसडी (२ मग) सौपानी रसपार (५ माय) सोरठी मार दिया (भाग) १. रसात : माचीम पुर्जर मामा-संग्रह, १५२१ .. ममारकर शासन मागर सिमा मा गातापीत २ परमा (विपनामा) परिभ्रमण (विश्वनामक) ४ पारीयार पाविना सोसारिक रीतिरिवामो एभर : शिक्षामाल, फोदा .. पंप मानिक भी मादिगार परमार बागर द्वापर बसेका रोति रिवाय पुर: उदासी पंपमा नीतिपरको • मोर मगवतिा (प्राचीन काम्ममाझा), १८.. = रमबारक मेहबमोनीत शार, एस. एम.दशा मारुपमा २६१४ . पठी भश्पा भगबानपर गीते : महापार देशपारोः प्रपौरस मामय प्रात् स्त्री यीच, हरे, . २०३ मेवात पास्त्र-सम्बन्धी प्रकाशित सामग्री ३ पसेर चोरमारे साहित्वा मूलपन ४ मोरे, पा. . वही लोगीत, यात्मान १. माती परलोक साहित्याचे सेस, पुषार, सहारा, १५५ A.4ा बोगी: लोपा व लोणीत सानेगुरु स्त्री बोस (रो माम) उद् १दीन महम्मद पुरवा : मानदेहोरे २ पमयरस एपोप पंचाप रे गीत, लाहौर ५ होतराम : पित्तोचानाम, माहौर, १८८१ . पंगाली १ अमृता प्रीतम मापो प्रावास, बायुग, सिली, १९५२ २ सपद माँगा असली रंग-परंगे मोत, अमृक्म, १६ परेन्द्र सत्यापी : मा समराम ! रखधाम (गुरु), अमृतसर, १६.. परमवन गिमानी पंवार गीत (नागरी), अमृतसर पत्र-पत्रिकामों में विस्सरी सामग्री -अन्तिम (अगस्त, १९५१) हिन्दी साहिस दिन सोच-सादिस्प-शिवपादन प्रसार एमए -अगम्या (अगस्त, १८५१): 'पादिवामियों के प्रमगीव-भावा निरभूपर (पनगरी, १९५४), 'मातीय मोनालिस मिन- - " (पनवणे, १९५४)। 'मनरेश शापौर माता मे मरासियार पRITE भारतीय लोक-साहित्य २२० Road R V and Hiralal The Tribea and Casto o Central Province of India 1916 Rometti, D C Ballades of Fair Ladies Roth Sawyer The Way of Story Teller Sarat Chandra Mitra A Note on the Nepulae beliela Journal of B&ORS Vol XVIL Sarut Chandra Mitra Styapina Legends in Saathall Guise, do, Vol. XIIL Sapelar GG Marathi Proverbs Poona, 1872 Sen Garpta PP Dictionury of Proverbs Calcutta 1899 Sea, D. C Eastern Benal Ballads Mymen Sms (VOL I VI) Sen DC Folk literatore of Benal, 1920. Glimpies of Bengal Life, 1925 History of Bengal Language, cal Unte 1911 3bahidollab Les Chanter Myteques. Shakopbon Lasbel Kub Clan, 1912 Sun W Notes on tbe Thandon Kulds (I of A.S. VOL XXIV 1928, No L) Calcutta, 1929 SberredA G Hindi Folk Son Slator G Dravidian Element in Indian Cole 1924. Stack, E The Min 1908 Tample RC The Legends of the Punjab 1885 Tbooth, MA The Vaishnavn of Guranal, 100 Thtmlton Dyer: The Folklore of Plants, 1899 Thormaton, TS Handbook of Lahore Thantoa E Rannuchar, K Custer und Tri Southern Ladin Madru, 1909 Tod Annals and Antiqulties of Rajasthan,
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