Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Granthratnapanchakam
Front matter
कृतज्ञतास्कीकार [१] बीकानेर के सेठ, कलकत्तानिवासी, गौरगनजीवन, श्रीमान् हनुमानदास जी राठी तथा श्रीमान् गोपालदास जी । आप दानों की हार्दिक सौहार्द्वता और परम आग्रहता से हम इस मन्थ- रत्नपञ्चक के प्रकाशन में समर्थ हुए। [+] श्रीमान् मुरलीवरआइदान जी । आप ने इन ग्रन्थों का प्रकाशन में सम्पूर्ण अर्थ सहायता देकर चिरवाचित किया । [३] श्रीहरिदासदासजी महोदय । श्राप प्राचीन गोस्वामि- आचार्यों के द्वारा विरचित अनंक ( लगभग शताधिक ) प्रन्यों के प्रकाशक हैं । श्राप ने "श्रीकृष्णलीलास्तव" का निजकृत टीका तथा पगानुवाद के साथ प्रथम वार प्रकाशन किया है। [४] श्रीयुक्त परमपूज्य गोस्वामी रासबिहारी जी शास्त्री। पाप ने गौरगणोद्देशदीपिका, संकल्पकल्पद्रुम तथा ब्रजविलासम्नव का अनुवाद संशोधन कार्य में सहाय देकर परम उपकार किया। [५] पं० श्रीनारायणदेव कौशिक जी, मथुरा गौघाट के निवासी। श्राप ने श्रीकृष्णलीलास्तय तथा राधाकृष्णगगां देशदीपिका के अनुयाद मंशोधन पार्य में सहायता दी। [६] श्रीगुरु-गौरांगगण-जिन की कृपाणिया से हम इन प्रन्यों के प्राशन में समर्थ हुए। मुद्राः-रमनलाल यंमल, पुष्पराज प्रेस, गथुरा।
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श्रीगुरुपरम्परा
श्रीश्रीकृष्ण चैतन्यमहाप्रभुनी
श्रीश्रीनित्यानन्दप्रभुजी
श्रीश्रीजान्हवाठाकुराणीजी
श्रीश्रीवीरचन्द्रप्रभुजी
श्रीश्रीरामचन्द्रगोस्वामी
श्रीश्रीकिशोरीमोहनगोस्वामी
श्रीश्रीराधावल्लभगोस्वामी
श्रीश्रीराधारमगागोस्वामी
श्रीश्रीराधामाधवगांस्वामी
श्रीश्रीसत्यानन्दगोस्वामी
श्रीश्रीराधिकाप्रसादगोस्वामी
श्रीश्रीकृष्णचैतन्यगोस्वामी
श्रीश्रीनित्यराधागोस्वामी
श्रीश्रीशंकरारण्यगोस्वामी
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श्रीश्रीराधारमणचरणदासजी (घाबाजीमहाराज)
श्रीश्रीरामदासबायाजीमहाराज
( गौरगुणगायक तथा संकीर्तन प्रचारक)
(प्रकाशक)
श्रीश्रीगौरगदाधरी विजयताम् चन्द्रावलीप्रभूति-नव्यलतावलीपु वृन्दावनेऽनवरतं विहरन् समन्तात् । राधा-सुवर्णनलिनी-गुणगन्धलेश- माद्यन्मना विजयतामिह कृष्णभृङ्गः ॥ १ ॥ कृष्णाकीर्तन-गान-नर्तनपरौ प्रेममृताम्भोनिधी धीराधीरजनप्रिया प्रियकरौ निर्मत्सरौ पूजिती । श्रीचैतन्यकृपाभरौ भुवि भुवा भारावहतारको वन्दे रूपसनातनी रघुयुगौ श्रीजीवगांपालको ॥२॥ श्रीरूपेण प्रचलकरुणाशालिना दर्शितं यम्- मारडमुग्धप्रकृति-जनता श्रेयसे रागवर्म । तस्मिन् पा रतिरतितरां वर्तते सारभाजां तेपां पादाम्युजनतिमती कोटिशः स्यान्जनिर्मे ।।३।। हरिदासदास बाबा, हरिवोलकुटीर, 31480 नवद्वीप। VIDYA यह पुस्तक तथा प्रकाशित अन्य पुस्तकें मिलने का पता- १-श्रीरामनिवाससेवान की दृवान, सयामनशालग्राम जी मन्दिर के नीचे (लोईयाचार) वृन्दावन । अनुपस्थिति में-मन्दिर के भीतर । २-मानीरामगुप्ता भगवानभजनाश्रम, वल्लीगंज, पृन्दावन । --राधेश्यामगुमा युफसेलर, पुरानासहर, पृन्दावन । जारीलाल बुक्सेलर, असकुंडापाट, मथुरा। m
= समर्पण-पत्र =-
"हा यत्स केवलचन्द"
तुम्हारी प्रेरणा का फल यह
"ग्रंथरलपंचक" अथवा "दिव्यपंचामृत"
रमिकों को अानन्द देता हुअा तुम्हारी
ग्रात्मा को प्रेम प्राप्त करावे ।
ग्रंथ
संग्रहः
श्री मुनशी
प्रमांक
दनमानदास राठी
मा. वि. भवनः
OF-CE
OX
श्रीश्रीरूपसनातन की जीवनी कर्णाटकदेश के अधीश्वर, भारद्वाज गोत्रीय, यजुर्वेदीय ब्राह्मण "सर्वज्ञ" जी के अनिरुद्ध हुए । उन के रूपेश्वर और हरिहर नाम के दो पुत्र थे । हरिहर जी के राज्यलालसा के इच्छुक होकर रूपेश्वर जी ने नीलाचल की यात्रा की तथा वर्द्धमान के निकटवर्ती शिख- रदेश के राजा महेन्द्रसिंह के साथ परिचय-बन्धुत्व की स्थापना की । पश्चात् वे वहाँ के मन्त्री हुए। वहाँ रूपेश्वर जी का पद्मनाभ नामक पुत्र हुआ। पद्मनाभ की पत्नी का नाम रमादेवी था। पद्म- नाम जी श्वशुर और पिता जी का परलोक हो जाने पर शिखरदेश त्याग कर नवहट्ट (नेहाटि) प्राम में आकर वास करने लगे। वहाँ उन के पाँच पुत्र और १८ कन्या हुई। सब से कनिष्ठ पुत्र का नाम मुकुन्द था । उन मुकुन्ददेव के पुत्र कुमारदेव है । हरिना- रायण विशारद महाशय की कन्या रेवती के साथ कुमारदेव का विवाह हुआ था । कुमारदेव के श्रीसनातन-श्रीरूप-श्रीअनुपम तीन पुत्र हुए। श्रीसनातन जी का आविर्भाव काल श्रानुमानिक १४१० शकान्द तथा श्रीरूप जी का १४११ मतान्तर में १४१५ श- काब्द है । श्रीसनातन जी अल्पावस्था में ही अध्यापक शिरोमणि विद्यावाचस्पति के निकट सर्वशास्त्र का अध्ययन कर व्युत्पन्न हुए । उस समय गौडनगर हुसेनसाह पातसाह की राजधानी थी। अनेक देशों से कृतविद्यगण का यहाँ आगमन रहा । अतः तीनों भ्राता अनायास सर्व विद्या में पारदर्शी हो उठे। एक दिवस कथा प्रसंग वश हुसेनसाह ने मुरसीद को मेरा गौडराजत्व कब तक रहेगा यह यात पूछी। उस समय सिद्ध फकीर साहन्यामतुल्ला अली ने कहा वत्स ! हुसेन ! जब तक सनातन-रूप मन्त्रित्व पद में नियुक्त रहेंगे, तब तक तुम्हारा नृपासन रहेगा। पीछे ये चैतन्यदेव का दर्शन लाभ कर विषय से वीतश्रद्ध हो - न्यत्र चले जाने पर तुम्हारे गौडराजस्व की अवनति होगी। हुसेन- शाह श्रीसनातन-रूप के अनुसन्धान के लिये उत्सुक होकर इधर उधर लोगों को भेजने लगा। इस से पहले उसने हिंगा नामक पदा- ति को माधाइपुर नामक स्थान में बिना कुछ कह कर भेजा था। हिंगा माधाइपुर जाकर इधर उधर घूमने लगा। उस समय श्रीसना- तन जी ने अपने घर में बैठ कर श्रीरूप के साथ शास्त्रालाप करते थे। उन्होंने उस को देखा तथा इस प्रकार घूमने का कारण पूछा। हिंगा किस कारण से घूमता था, उस का उत्तर नहीं दे सका। सनातन ने फिर हिंगा से पूछा कि जब तुम को बादसाह ने भेजा, तब वे कहाँ थे। उस ने कहा एक मन्दिरा का उपरि भाग बनने में बाकी पड़ा है । उसे देख कर उतरते हुए मुझे भेजा । परन्तु भेजने के समय किस लिये भेजता हूँ, उसे नहीं कहा। तब श्रीरूप ने दो- चार-राजमिस्त्री देकर हिंगा को बादशाह के निकट भेजा । बादशाह राज मिस्त्री के साथ हिंगा को देख कर आश्चर्य हुआ तथा दोन भ्राता के परामर्श से यह कार्य हुआ है इस का अयगत किया। बादशाह ने केशव छत्रि नामक कोतवाल को भेज कर शिविका (पालकी) द्वारा दोनों भ्राता को राजदरवार में लाकर तथा दोनों का परिचय प्राप्त से मुग्ध हो सनातन को मन्त्रित्व तथा श्रीरूप को उपमन्त्रित्व पद में नियुक्त किया। दोनों बाहर राजकार्य की परि- चालना करने लगे तथापि अन्तर में वैष्णव पण्डितों के साथ भाग- पतादि भक्तिशास्त्र की आलोचना करते थे । श्रीगोविन्दसेया में उन का सुसमय जीवन बीतता था। सनातन के सेवा-विग्रह श्रीराधा मदनमोहन मूर्ती अभी भी रामकेलि प्राम में विराजमान है । वे दोनों निज आंगन में ब्रजभाव उद्दीपन के लिये राधाकुण्ड-श्याम- कुण्ड-अष्टससियों का कुण्ड, कुञ्ज-निकुञ्ज, गोवर्द्धनादि का नि- र्माण करा कर भाव प्रास्वादन के द्वारा समय बिताते थे। अभी भी वहाँ राधाकुण्ड-श्यामकुण्डादि मौजूद हैं । एक दिवस रात्रि में स्वप्नयोग में श्रीगोरागदेव ने दर्शन देकर प्रज्ञा की, सनातन ! श्रय विलम्ब की आवश्यकता नहीं है । तुम सब ब्रज की मञ्जरी हो । जीव उद्धार के लिये मनुष्य देह में अवतीर्ण हुए हो। शीघ्र ही दोनों व्रज के लिये गमन करो। वहाँ लुप्त तीर्थों का उद्धार तथा भक्ति शास्त्रों का प्रणयन करो । महाप्रभु के अन्तर्धान हो जाने पर सनातन जी विपरण चित्त से अष्ट सात्त्विक भावों से विभावित होकर स्वप्न वृत्तान्त के सोच में बैठे हुए, उस समय श्रीरूप प्राकर उन से मिले । दोनों ने परामर्श कर श्रीनवद्वीप में महाप्रभु के निकट दैन्यपत्र भेजा। श्रीमन् महाप्रभु वृन्दावन गमन का छल कर रामकेलि में प्रा. कर केलिकदम्ब तल में बैठे हैं । उस समय श्रीरूप-सनातन दोनों दीनातिदीन वेप मे आकर प्रभु के चरण में गिर गये । प्रभु ने उठा कर आलिङ्गन दिया तथा दोनों से भिक्षा की। बड़ा भारी उत्सव हुआ। भक्तगण प्रभु के अवरामृत महाप्रसाद का ग्रहण कर परम आनन्दित हुए । प्रभु का आगमन हुसेनशाह ने भी सुना । श्रीरूप. सनातन से परिचय पाकर महाप्रभु के स्वच्छन्द विहार के लिये सर्व प्रकार की व्यवस्था कर दी। अब तक यहाँ गौरागदेव के आगमन उपलक्ष्य में ज्येष्ठ संक्रान्ति के दिन महोत्सव होता है। श्रीमन् महाप्रभु के दर्शनावधि श्रीरुप-सनातन की विपय में विशेष वितृष्णा हो गई । निरन्तर दोनों भ्राता श्री गौराङ्गदेव के रूप-गुण में विभोर होकर झरने लगे। लोगों के मुख से श्रीमन्म. हाप्रभु का वृन्दावन में गमन सुन कर उन का चित्त चञ्चल हो ठा। श्रीरूप गोरागदेव के दर्शन की लालसा से श्रवीर होकर 'कनिष्ठ भ्राता अनुपम के साथ गृह त्याग कर प्रयाग में महाप्रभु से मिले । प्रभु ने प्रेमालिङ्गन के द्वारा दोनों को कृतार्थ कर सनातन की वार्त्ता पूछी तथा श्रीरूप जी को निज शक्ति सञ्चारित कर वृन्दावन जाने के लिये आदेश दिया। श्रीरूप तथा अनुपम के गृहत्याग के उपरान्त सनातन जी वि- तिप्त चित्त होकर दिन रात हा गौराग ! ऐसा कह कर काँदने(रोने) लगे। राजकार्य परिचालना उस से शिथिल हो उठी। हुसेनशाह के गौडदेश में राजा होने के पहले अलाउद्दीन हुसेन- शाह गौड का अधीश्वर रहा । उस के आधीन में सुबुद्धिराय नामक जागीरदार रहते थे। सैयद वंशजात हुसेन ग्याँ उस समय उन की नौकरी करता था। सुबुद्धिराय ने किसी जलाशय खनन करने का भार उसे दिया था, परन्तु उस में हुसेन खाँ की त्रुटि देख कर उस के उरुदेश में कठोर चायुक का प्रहार किया । पश्चात् जब हुसेनशाह राजा हुश्रा, तब उस की रानी ने उस चिन्ह को देख कर सुबुद्धिराय को प्राणवध के लिये राजा से अनुरोध किया। हुसेनशाह निज पोष्टा सुबुद्धिराय के प्राणवध के लिये नहीं सम्मत हुआ। उधर रानी ने भी अपने हठ में आकर अपने प्राण त्याग का भय दिखाया। हुसेन शाह दोनों संकट में उपाय शून्य होकर केशव छनि को दविरसास (सनातन) को बुलाने के लिये आदेश दिया। उस समय अन्धकार पनि थी, प्राकारा घनघटा में छा गया था। मार्ग बड़ा दुष्कर था। सनातन जी गोराङ्ग विरह में व्याकुल हो कर हाय हताश कर रहे थे। उस में फिर दोनों भ्राता का विरह आग से हृदय जलता जा रहा था। राजा की आज्ञा सुन कर शिविका योग से राजदरवार में उपस्थित हुए। आपाततः समस्त विपय सुन कर नाना कौशल तथा विनती के साथ रानी को सममाया । परन्तु उस का हठ परिवर्तन नहीं हुथा। परचात् मुधुद्धिराय की जाति नाश कर देने फी सम्मति रखी गई। सनातन जी मन में विचार करने लगे-ग्राह्मण जाति च्युत होकर पश्यात् प्रायश्चित्त कर शुद्ध हो सकता है।
रानी को प्रबोधित कर सनातन जी अपने घर फिरते थे। उस समय मार्ग में वृतमूल के पर्णकुटीर से एक फकीर तथा उस की पत्नी का कथालाप उन ने सुना । पत्नी फकीर से पूछने लगी इस दुःसमय घोर अन्धकार में कौन जा रहा है । फिर कहती है बोध होता है, एक कुक्कुर जा रहा है । फकीर ने कहा उस की क्या गरज पड़ी है। वह तो किसी गृहस्य के घर सोता रहा होगा। पलि ने फिर भी पूछा ? तो कौन जा रहा है। फकीर ने कहा-निश्चय कोई पराधीन जा रहा है। उन के वार्तालाप का श्रवण कर सनातन जी लजित हुए तथा रूप, अनुपम की प्रशंसा करते हुए अपने को शत धिक्कार देने लगे। अब सनातन जी महाप्रभु के लिये अधीर हो गये। उन का चित्त व्याकुल हो उठा । उस समय श्रीरुप गोस्वामी का एक पत्र उन्हें मिला। वह पत्र गुप्त भाव से लिग्या गया था। पत्र में इस प्रकार श्लोक था “यदुपतेः क्व गता मथुरापुरी, रघुपतेः क्व गतोत्तरकौशला" इत्यादि । कोई कोई कहते हैं कि श्रीरूप ने आठ अक्षर लिख कर विषय त्याग करने के लिये सूचना की। यथा "शु, हि, रा, सू, य, पा, कु, कम् । इस का अर्थ सनातन ने इस प्रकार किया, शु-शुम्भनामक दैत्यराज, हि-हिरण्यकशिपु नामक दुर्दान्त दैन्येन्द्र, रा-लंकेश्वर रावण, सू-सूर्यवंश, य-यदुवंश, पा- पाण्डवगण, कु-कुरुपति दुर्योधन, कं-कंसराजा । इन प्रत्येक के प्र- ताप से एक दिन पृथिवी कम्पायमान होती थी । किन्तु वर्तमानमें ये सब कहाँ चल दिये । अतएव अविलम्ब से विषय त्याग उचित है। पत्र पाठ से उन की मानसिक माला अधिक पढ़ने लगी। विपय परित्याग का सङ्कल्प कर राजदरवार में गमन विरत होकर घर में बैठ भागवतगणों के साथ भागवत प्रसंग में समय बिताने लगे । सनाउन जी को राजदरवार में अनुपस्थित देस कर पातसाह ने वार्ता जानने के लिये पदातिक भेज कर सुना कि वे अस्वस्य है। क्योंकि सनातन ने उस को अस्वस्थता का बहाना दिखाया। जब पातसाह ने वैद्य भेज कर उस के द्वारा सुना कि सनातन जी के शरीरमें कोई अस्वस्थता नहीं है,वे राजकार्य चलानेमें अपने को श्र- क्षम कह रहे हैं,तब वह स्वयं उपस्थित होकर सनातन से कहा-दवि. रखास ! तुम्हारे तीन दिन की अनुपस्थिति में हमारे राजकार्य में महान विशृङ्खलता हो गई है। अतःशीच चल कर कार्य समाधान कीजिये । सनातन ने कहा अब मेरी राजकार्य में क्षमता नहीं रही। आप तो दूसरा मन्त्री रय लीजिये। पातसाह ने बहुत कुछ अनुरोध किया । परन्तु उन्होंने उपेक्षा की। उस से पातसाह कोषित होकर कहने लगा-तुम्हारे भैया रूप साफरमल्लिक मेरा चाकला (प्रदेश) नष्ट कर दरवेश होकर पलायन किया । तुम भी ऐसा करना चाहते हो । अस्तु ! ऐसा कह कर उसने सनातन को वन्दी कर “सेख धु" नामक जमादार को रक्षा के लिये नियुक्त किया । उस समय पुरन्दरवसु मन्त्री आसन में संरूढ़ हुए । उधर पुरन्दरवसु के कनिष्ठ भ्राता श्रीकान्तवसु उड़ीसा से कर संग्रह कर गौड़देश को मेजते थे । यहाँ से ऐसा संयाद आया कि उस के दुर्व्यवहार से प्रनागण कर न देकर उसे विताड़ित किया है। गौड़पति ने इस संवाद को सुन कर क्रोधित हो पुरन्दरवसु की प्ररोचना से युद्ध के लिये उड़ीसा यात्रा की । अब सनातन जी कारागार में रुद्ध होकर दुःसह यन्त्रणा को गोराङ्ग अनुराग से मुसमय मान कर अन्तर में गौराद्ग संग मुस पा प्रास्वादन करने लगे। ये युक्तिवलसे महसू सुवर्ण मुद्रा प्रदान के द्वारा सेस वु को पश में कर रतल से मुक्त हुए । गुरुलामण, फुटुम्ब, अनिधियों में धन या विभाग कर प्रातःकाल भृत्य ईशान के साथ गोराङ्गदर्शन के लिये यात्रा पर हावाससाना घाट में उपस्थित हुए । श्रावण का मास था। गंगा में भरपूर जल रहा । पाप ने गंगा को प्रणाम कर पार हो वृन्दावन के उद्देश्य में यात्रा की । पातोड़ा पर्वत में पार्वतीय अॅश्रा जाति की यस्ती में पहुँचे । उन में से कोई गणक अपनो भा- पा में निज गण के लिये कहने लगा कि इन के पास अष्ट सुवर्ण मुद्रा हैं। इन को कपट प्रेम दिग्या कर प्रातिथ्य करा कर एकान्त में माण वध करके मुद्राओं को लेना है। सनातन ने उन मे वृन्दावन का मार्ग पूछा । उन सब ने बड़ा सन्मान दिवाकर रानि वास करने को कहा । राजमन्त्री सनातन जी बड़े चतुर थे। उन के मन में कुछ सन्देह हुश्रा । वे ईशान से पूछने लगे। तुम्हारे साथ कुछ पाथेय है क्या ? ईशान ने एक मुद्रा का गोपन कर सात सुवर्ण मुद्रा दिग्याई । सनातन ने उन मुद्रा को लेकर मुंआ के अधिपति को दे दिया । उन सब ने विस्मय प्राप्त तथा कुछ सनातन जी के स्वभाव से आई हृदय होकर पड्यन्त्र की कथा सुनाई । सनातन जी वहाँ रात्रि निवास कर मुंआ गणों के निर्देश मार्ग से चलने लगे। आप ने ईशान से और कुछ पाथेय रखने का प्रश्न किया। फिर भी ईशान ने मार्ग सम्बल के लिये एक मुद्रा दिसाई । इस से जी व्यथित होकर ईशान को गृह के लिये विदाई देकर अकेले गौ. रांगानुराग के द्वारा घृन्दावन के लिये चलने लगे। पार्वत्य हिंस्रजन्तु समाकुल मार्ग में सनातन जी निर्भय होकर हा गोराङ्ग ! कहते हुए चल रहे थे। उन के कुसुम सुकोमल चरण दोनों से रक्त श्राव हो रहा था। परन्तु उस का कोई भ्रक्षेप नहीं । वे तो निज प्राणवल्लभ महाप्रभु गौराङ्गदेव के दर्शनार्थ चले जा रहे हैं । इस प्रकार गमन करते हुए दशम दिवस के सायरान्ह में जीपुर नामक ग्राम में पहुंचे तथा वहाँ एक तमालतला में बैठ कर गौरगुरणानुवाद करते रहे। चहाँ उन के ग्राम्य सम्बन्धी श्रीकान्तसेन नामक भग्नीपति ने जो कि पातसाह के लिये घोटक फ्रय करने के लिये वहाँ नियुक्त थे, उन को देखा। सनातन का वेश मलिन था । वे निरन्तर गोराङ्ग गुण- सनातन - सुना कि गान में विभोर थे। पश्चात् परिचय पाकर श्रीकान्त ने उनको अपने घर जाने के लिये बहुत कुछ आग्रह किया । परन्तु सनातन जी किसी भी प्रकार सम्मत नहीं हुए । श्रीकान्त ने एक भोट कम्बल लाकर सनातन जी को दिया । वे उस कम्वल को लेकर काशी अभिमुख में गमन करने लगे। काशी में उपस्थित होकर सनातन ने महाप्रभु वहाँ चन्द्रशेखर जी के गृह में विराजमान हैं। सनातन जी पुलकित होकर चन्द्रशेखर जी के बहिर के एक प्राचीर में पीठ लगा कर बैठे रहे । उधर महाप्रभु ने चन्द्रशेखर को कहा तुम्हारे द्वारदेश में एक वैष्णव का आगमन हुआ है । तुम उन को ले श्राओ। चन्द्रशेखर जी ने प्रभु की आज्ञा से बाहिर जाकर किसी वैष्णव को नहीं देख प्रमु से कहा । पश्चात् प्रभु का इङ्गित से दर वेश रूपी सनातन को प्रभु के निकट लाया। महाप्रभु सनातन को प्रांगन में देसते हुए बाहु प्रसार कर आलिङ्गन करने के लिये धा- वित हुए । सनातन जी संकोचित होकर पीछे को भागने लगे। पश्चात् महाप्रभु जी वल पूर्वक उन को आलिंगन कर निज पार्श्व में यैठा कर अंगमार्जन करते हुए रूप-अनुपम की कथा कहने लगे। तपनभित्र जी ने मध्यान्हभिक्षा के लिये प्रभु का निमन्त्रण किया। महाप्रभु जी सनातन को भद्र कराने के लिये इङ्गित करने लगे। सनातन जी भद्र होकर गंगास्नान कर प्रभु के समक्ष आये। प्रभु ने निज हस्त से सनातन जी को तुलसी मालादि पहराय दिया। महाप्रभु जी मध्यान्ह क्रिया के लिये विष्णुमन्दिर में प्रविष्ट हुए। सनातन जी तपनमिश्र जी से एक जीर्ण वस्त्र लेकर कोपीन-पहि- वीस रूप से पहरने लगे । प्रभु सनातन का वेशावलोकन कर ईपत हास्य करते हुए भोट-कम्बल की तरफ वार मार दृष्टिपात करने लगे । सनातन जी प्रभु का मनोभाव जान कर एक गौड़ीया को भोट कम्बल दे उस से जीर्ण पन्या लेकर पहरने लगे। उस से प्रमु ने प्रसन्न होकर कहा-श्रीकृष्ण प्रभु ने तुम्हारे विषय-व्याधि को दूर किया। वे अवशेष व्याधि क्यों रखेंगे, अच्छा ही हुआ । इस से सब कोई परिहास कर सकते हैं कि "भोट कम्बल शरीर में उस में फिर माधुकरी भिक्षा ।" मिश्र गृह में प्रभु ने भोजन किया तथा शेप अधरामृत सनातन को दिलाये। उस के उपरान्त महाप्रभु जी ने श्रीप्रकाशानन्द-सरस्वती को स्वप्रभाव से मायावाद से उद्धार कर वैष्णव किया । उस समय काशीवासी सकल महाप्रभु का गुणानुवाद करने लगे। महाप्रभु जी दो मास पर्यन्त काशी में रह कर श्रीसनातन जी को जीवतत्त्व, ईश्वरतत्त्व, भक्तितत्व, प्रेमतत्त्व, व्रजतत्त्व, रसतत्त्व प्रभृति शिक्षा देकर सुदृढ़ किया तथा निज शक्ति सञ्चार कर वैष्णवस्मृति करने के लिये आदेश देकर उस का सूत्र निर्देश किया। ये सब कथा श्रीचै- तन्यचरितामृत में सविस्तार वर्णित हैं । पश्चात् प्रभु ने सनातन जी को सर्वशक्ति सञ्चार कर योग्यपात्र बनाय, वृन्दावन में जाकर लुप्रतीर्थो का उद्धार और भक्ति शास्त्रों के प्रणयन के लिये आदेश दिया । श्रीप्रभु की आज्ञा पाकर सनातन जी प्रयाग तथा आगरा होकर वृन्दावन में पहुँचे तथा वहाँ कुछ दिन निवास कर फिर महाप्रभु की दर्शन लालसा से नीलाचल के लिये यात्रा की । मार्ग में झारिखण्ड के दूषित जल से ज के शरीर में करडू ( खुजली) हो गई। वे श्रीकृष्ण प्राप्ति न होने के दुःख से जगन्नाथदेव का रथारोहण दर्शन कर रथचक्र के नीचे दब कर प्राणत्याग करने के लिये मन में विचार कर नीलाचल में उपस्थित हुए तथा भुवन- पावन श्रीहरिदास ठाकुर के निकट रहने लगे। सनातन जी दीनता से अपने को नीच जाती, नीचसंगी मानते हुए जगन्नाथ जी के म- न्दिर में नहीं आते थे। उन के देहत्याग का संकल्प जान कर एक दिवस महाप्रभु ने उस से उन को समझाय कर विरत किया तथा सनातन जी को आलिंगन कर निज देह कर के अङ्गीकार किया। प्रभु स्पर्श से उन की कण्डू ( साज) चली गई तथा परम तेज शाली हुए । एक समय ज्येष्ठ मास का मध्यान्ह काल में टोटा-यमेश्वर से तप्त वालुका के ऊपर देकर सनातन जी प्रभु दर्शन में पहुँचे । पाँव मे बडे बडे फफोले हो गये। परन्तु सनातन का भ्रक्षेप नहीं । प्रभु ने उन की आत्मदीनता सुन कर प्रसन्न हुए तथा प्रेमालिंगन के द्वारा सम्पूर्ण स्वस्थ क्यिा । नीलाचल में कुछ दिवस रह कर सन- भक्त का आशीर्वाद ले प्रभु आज्ञा से वृन्दावन के लिये चल दिये । वृन्दावन में श्रीरूपगोस्वामी जी से मिल कर लुपतीर्थों के उद्धार की चेष्टा में निरन्तर व्यस्त रहे । एक दिवस शृङ्गारवट में महाप्रभु के द्वारा उपदिष्ट लुप्त-तीयों की उद्धारचेष्टा मे चिन्तित होकर शयन कर रहे थे । किसी ने स्वप्न छल मे आकर कहा- सनातन ! तुम लुप्ततीर्थो के उद्धार की चिन्ता मत करो। यह सब पार्य धीरे धीरे होगा। मेरा कार्य में क्रूँगा, तुम केरल उपलन मार हो । स्वप्न प्राप्त होकर सनातन जी प्रसन्न हुए । याराहपुराण, स्कन्दपुराणादि अशेष शास्त्रा का समन्वय कर मथुरा-महिमा नामक एक अन्य का सङ्कलन क्यिा । तीथों की खोज होने लगी। साथ ही साथ असल्य भक्ति प्रन्यों की रचना हुई। उन के कुछ समय पश्चात् जब कि महाप्रभु की अन्तर्धान लीला हुई उस समय ॐ गोस्वामी जी के साथ महामहिम श्रीमन्नारायणभट्ट जी का भी ससर्ग हुा । ये गदाधर पण्डित गोस्वामी जी के शिष्य कृष्णदास भ्रहाचारी जी के प्रिय शिष्य है। प्रज तीर्थ उद्धार के विषय में उन पी भी महान महत्ता है। नि सन्देह श्रीस्प-सनातन-श्रीनारायण भट्ट अादिर गौडीय श्राचार्यों ने प्रगतीर्थो का उद्धार पर प्रज की परम महत्ता चारों ओर फैलाई तया असरय प्रजसम्बन्धी प्रन्या की रचना कर प्रज का रहस्य सयो दिसलाया है। सनातनजी फल- - ।
( ११ ) मूल-शाक इत्यादि से यथा लाभ से सन्तुष्ट हो कर कभी वा चर्वण, कभी वा विप्रगृह से माधुकरी भिक्षा करते हुए वृन्दावन में मन- टेर नामक स्थान में मौनी हो कर सदा सर्वदा भजन करने लगे। वंगभापा के भक्तमाल में कथन है कि-दिल्लीश्वर आकवरसाह सनातन की गुणगरिमा श्रवण से मुग्ध हो कर वहाँ शिविर स्थापन कर सनातन जी के दर्शन के लिये उन के निकट उपस्थित हुए। सनातन ने अपना मौन भंग नहीं किया। पश्चात् बादशाह के यत्- किश्चित् अर्थ अंगीकार करने के लिये चार बार आग्रह से इगित किया कि अपने कुटीर यमुना तरंग से भग्न प्राय हो गया है। इस का संस्कार कर दीजिये । जमुना की घाट के ऊपर यह कुटीर था। बादशाह ने देखा घाट समूह स्पर्शमणि समूह से विरचित है। बादशाह लज्जित हो कर "सनातन जी जिस अतुल वैभव के अधि- कारी हैं। उस की प्रशंसा करता हुआ तथा सनातन जी की स्तुति कर प्रार्थित सम्पादन में असामर्थ्य जनाता हुआ दिल्ली के लिये प्रत्यावर्तन किया। श्रीरूप ने “चाटुपुष्पाञ्जलि" नामक निज स्तोत्र में वेणी व्यालाङ्गनाफणा की उपमा देकर श्रीराधिका की वेणी का वर्णन किया है । सनातन जी सर्पिणी के साथ वेणी की उपमा देख कर अति दुःखित हुए । एक समय वे राधाकुण्ड के अग्निकोण में मदनान्दोलन नामक नित्य-विलासकुञ्ज के दर्शनार्थ पहुँचे । उस समय उन्होंने वहाँ देखा कि श्रीमती राधा श्याम-रसाल वृक्ष के भूलना में मल रही हैं । उन की पृष्ठ वेणी लम्वायमान होकर ठीक नागनी के प्रति रूप धारण कर रही है । वेणी फणिनी के दर्शन से सनातन जी आश्चर्य हो कर श्रीरूप की कविता की भूयसी प्रशंसा करने लगे तथा प्रेमप्रातिशय्य से सात्त्विक भावावली में विभूपित हो कर भूतल में लुण्ठित हुए। सनातन जी वृन्दावन से भिक्षा के लिये मथुरा में जाते थे।
। ( १२ ) वहाँ एक चौवे की ब्राह्मणी जो कि वात्सल्यरस की मूर्ति थी उसके वात्सल्य भाव से आकृष्ट होकर मदनमोहन जी-पञ्चवर्षीय पालक के साथ क्रीड़ा करते थे तथा दोनों मा सम्बोधन करते थे। एक दिन मदनमोहन जी बालक के साथ क्रीड़ा कर रहे थे। सना- तन जी माधुकरी के लिये जा रहे थे। उन्होंने उन बालक मदनमो- हन जी को देख कर कुछ आश्चर्य हो परिचय पूछा । बालक ने कहा हम ब्रजवासी वालक हैं। हमारा नाम मदनमोहन है । श्रागे उस मौहल्ला के उस मकान में हमारा वास है । सनातन जी ने उस प्राहाणी के घर पर जाकर देखा कि ब्राह्मणी पाक कर रही तथा दन्त धावन करती हुई उस दन्त काप्ठ से भात चलाने लगी। इस प्रकार अवैध सदाचार देख कर सनातन ने पूछा, ब्रजमाई ! आप किस के लिये रमोई कर रही हो । ब्राह्मणी ने उत्तर दिया । मेरे दो बालक हैं, उन के लिये वालभोग की रसोई कर रही हूँ। सनातन ने कहा माता ! यह रन्धन तुम्हारा अवैध हो रहा है, इस से अपराध हो सकता है । अागामी कल से स्नानादि कर पवित्र हो कर पालक दोनों के लिये रमाई करना । दूमरे दिन ग्नानादि सदाचार करती हुई रमोई फरने लगी। उम से अपरान्द हो गया। सुधा से पीड़ित होकर मदनमोहन जी ने सनातन से कहा गोसाई जी ! तुमने माना को सदाचार उपदेश दे मुझे तुया से कातर किया। में तो प्रजा पामियों के अच्छिष्ट से परिपालित हूँ। क्या तुम इस यात को नहीं जानने हो । मनातन ने विस्मित होकर गाता मे फहा-माता जी ! अप नो पार पहले की तरह रधनादि कर यालक दोनों को रवाना । स्नानादि मदाचार की प्रापश्याना नहीं है। ऐमा कर फर सनातन जी पलने लगे। मार्ग में मदनमोहन जी ने कहा, गोसाई जी ! में नो भार के मंग में चलूँगा और पार के पास रहूंगा। सनातन ने पहा में सो पृशनल नियामी, कंगाल, माधुपरी जीयी ।
हूँ 1 मैं किस प्रकार आप की सेवा कर प्रसन्न क्रूँगा। मा यशोदा नवलन धेनु के दुग्ध, सर, नवनीत से तृप्त नहीं कर सकी। ऐसा कह कर सनातन जी वृन्दावन चल दिये। उधर ब्राह्मणी को सप्न में मदनमोहन जी ने कहा-मा। मैं कल से भितुक गोसाई जी के साथ वृन्दापन मे रहूँगा । ऐसा सुन कर ब्राह्मणी न्याकुल होकर रोटन करने लगी। पर दिन सनातन जी का आगमन होने पर मद- नमोहन जी उन के साथ वृन्दावन चलने लगे तथा उन को कहा-मैं विग्रहरूप से आप के पास अप्रस्थान करूँगा और भोग के लिये तुम जो कुछ दोगे उसे भोजन कर तृप्त होऊँगा । इस से सनातन जी ने स्वीकृत होकर माधवीलता के कुज मे उन को स्थापन किया तथा प्रत्यह अँगाकडी (याटी ) का भोग धरा । एक समय अलवण वनशाग भोग धरने पर मदनमोहन जी ने कहा-गोसाई जी 'कि- चित् लरण नहीं होने पर मैं भोजन नहीं कर सकता। सनातन ने कहा-मैंने पहले से ही कहा था कि तुम्हारा उपद्रन नहीं सह सकता हूँ। मैं वनवासी हूँ लपण कहाँ से प्राप्त करूँगा। मदनमोहन जी ने कहा-तुम्हारी सम्मति प्राप्त होने पर मैं अपनी प्रयोजनीय सामग्री आहरण कर लूंगा। सनातन ने कहा-जैसी तुम्हारी इच्छा है सो कीजिये । उस समय ऐसा हुआ कि-मुलतान देश का एक सौदा. गर बहुमूल्य व्यवसाय ग नौका मे चढा कर मथुरा जा रहा था। मदनटेर के निकट यमुना की चडा में उस की ग्यारह नौकाएं रुक गई । उसने सब कुछ युक्ति कौशल कर लिये । किन्तु समस्त चेष्टा वृथा हो गई। वह बड़ी विपद मे पड़ गया । अव मदनमोहन जी ने पालकरूप बन कर सौदागर को बुला कर कहा यहाँ मदनटेर पर सनातन गोस्वामी जी हैं। उन की कृपा से तुम्हारी नौकायें चल सकती हैं। ऐसा कह कर अन्तर्धन हो गये । सौदागर ने सनातन जी के निकट आकर सकल वृत्तान्त सुनाया। सनातन ने कहा-इस ।
अर्थ लाभ ( १४ ) माधवीकुञ्ज के मध्य में वह वालक विराजमान है । उस ने अपने मन्दिर तथा सेवा परिचर्या बढ़ाने के लिये इस प्रकार भंगी की है। सौदागर ने मदनमोहन के निकट मूलधन तथा लाभ से अधिक धन सब का उपहार देने के लिये संकल्प किया। उस समय नौका- गण मुक्त हो गई। उस व्यवसाय में सौदागर ने प्रचुर किया । पश्चात् उन अर्थों के द्वारा सनातन जी के आदेशानुसार म. न्दिर निर्माण तथा सेवा की व्यवस्था कर दी। वीरभूम जिला के एक दरिद्र ब्राह्मण कन्यादायमस्त हो कर काशीधाम में शिव की उपासना करता था। एक समय देववाणी हुई कि तुम शीघ्र वृन्दावन में सनातन गोस्वामी जी के पास गमन करो यहाँ तुम्हारी सव्वार्थ सिद्धि होगी । ब्राह्मण देववाणी का श्र- वण कर काशी से वृन्दावन आकर सनातन जी के पास निज प्रा. थित विपय का निवेदन करने लगा। सनातन जी ने कहा-मेरा एक शत गाँठ युक्त फन्धा तथा रज के करुवा मात्र सम्बल (धन) है। मैं अर्थ कहाँ से प्राप्त करूँगा । ब्राह्मण सनातन जी के वचन सुन कर तथा उन की अवस्था देख कर शिर में करायात करता हुआ रोदन करने लगा। उस समय सनातन जी का स्मरण हुआ कि उन ने वहुदिवस पहले यमुना में स्नान करने के समय एक स्पर्शमणि (पारस) को प्राप्त की थी। उसे वामहस्त से वालुका-पत्रों के द्वारा ढक कर रख आये थे। पश्चात् उन ने ब्राह्मण को लेकर तर्जनी सं. केत के द्वारा स्थान को दिखाया । ब्राह्मण स्पर्शमणि प्राप्त होकर परमानन्द के साथ देश के लिये गमन कर रहा था, सनातन का प्र. भाव उस के कार इस प्रकार पड़ा कि मार्ग में उस ने सोचा गो- साई जी के निकट अवश्य इम से कोई उत्कृष्ट द्रव्य है, जिससे कि इस स्पर्शमणि का परस करने को भी नहीं चाहते हैं । अस्तु वह क्या यस्तु है ? उसे अवश्य ज्ञात करना चाहिये। ऐसा विचार कर , ( १५ ) उसने सनातन जी के पास आ कर उत्कृष्ट मणि की प्राथना की। सनातन जी के इङ्गित से स्पर्शमणि को जल में फेंक कर मदनमोहन जी का चरण दर्शन किया । सनातन जी ने उस को शिक्षादि देकर आत्मसात् किया। सनातन जी का चरित्र अगाध असीम सागर रूप है । ग्रन्थ वृद्धि के भय से हम यहाँ से विरत होते हैं। नन्दग्राम में स्थिति के समय एक दिवस श्रीरूप गोस्वामी जी श्रीसनातनगोस्वामी जी के पास आये। सनातन जी की इच्छा हुई युगल सरकार की भोग लगाकर श्रीरूप को पावै । इधर उस इच्छा की पूर्ति के लिये स्वयं श्री राधिका जी ने एक मनोहर बालिका रूप धारण कर खीर भोग की समग्र सामग्री ला कर उन्हें दी। दो. नों अधरामृत पाये । खीर का स्वाद बहुत कुछ अद्भुत देख कर भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए इस का रहस्य श्रीरूप ने पूछा । श्री सनातन जी ने उत्तर में समस्त सुनाया। श्रीरूप ने गोस्वामी जी से कहा कि फिर कभी ऐसान हो। इस से स्वामिनि जू का दुःख हुआ है। वे स्वयं परिश्रम उठाकर सामग्री लाई। हमारे सुख के लिये उन को दुःख उठाना पड़ा है। एक समय श्रीरुपगोस्वामी जी का समाज में हरि गुण यश का गान हो रहा था। सब कोई भाव में डूब कर वेसुध हो कर गुञ्छित होने लगे परन्तु श्रीरूप धीर-स्थिर ऐसे ही बैठे रहे । इस से सब कोई उन को प्रेम विकार नही होने के कारण आश्चर्या- वित हुए। श्री कर्णपूरगोस्वामि जी ने उन के पास में जा कर देखा कि आप का श्वास अति तपायमान था। उस से कविकर्णपूर का शरीर में आग लग कर फफोले पड़ आये। इस प्रकार प्रेम रीति देख कर सब कोई आश्चर्यान्वित हुए। श्रीरूपगोस्वामी जी ने नन्दगाँव के पास टेरकदम्ब में कुछ दिन भजन किया । वहाँ आपकी भजन कुटी मौजूद है । उस समय श्रीसनातन जी पानसरोवर के निकट एक वृक्ष के नीचे रहते थे। वहाँ भी उनकी भजन कुटी मौजूद है। उनकी अयाचित वृत्ति थी। कोई आकर कुछ दूध दे जाये तो उसे ले लेते थे। एक समस ऐसा हुआ कि तीन चार दिन पर्यन्त दूध मिला नही। चौथे दिवस एक सावले किशार रूप वनार श्रीहरि नसीर प्रसाद लाकर उन्हें दिया । आप ने उस बालक की सुन्दरता देख पूरा लाला 'तुम वहाँ रहते हो। आपने उत्तर दिया कि मै चार भाई हूँ। अमूक मेरा प्राम है । सनातन जी ने उस गान में जाकर उन का घर लोगा को ढूँढा परन्तु उस का पता नहीं पाया। वे चारों दिशाये दृढन लगे तथा नेत्रों से आसू बहाने लगे। श्रीसनातनजी कमी वृन्दावन,कभी गोवर्द्धन,कभी घा राधाकुण्ड, कभी वा महापन, कभी ननग्राम में रहते थे। इन स्थानों में उन का भजन कुटोर मौजूद है । वे प्रतिदिन गौनर्द्धन की परिक्रमा करते थे। वृद्धययस मै जत्र सात कोस परिक्रमा करने में असमर्थ हुए तर एक दिवस एक सुन्दर रूप-नाला बालक पावर टन को एक श्रीकृष्ण पदाकित गोरनशिला दे कर उस की परि- प्रमा करने का उपदेश कर अन्तान हुए । सनातन जी शेष जी. वन मे उस शिला की परिक्रमा करते थे। यह शिला वर्तमान भीराधादामोदर मन्दिर वृन्दावन में विराजमान है । सनातन जी ने अपनी मदनमोहनजी की मेगा का भार गदाधर पण्डित गोस्वामी जी के शिष्य श्रीकृष्णदास ब्रह्मचारी जी ने दिया था। उन्हीं के शि प्य महामहिम श्रीनारायणभट्ट जी है। श्रीसनातन जी बडे श्रमायिक प्रति के लोग थे । वे प्रजमा- सियों के साथ सूर मिलते थे। ननवासिगण उनको यथेष्ट भक्ति भद्धा करते थे। सनातन जी एक बार जिस ग्राम यो जाते थे, यहाँ के लोग दहे. सहर मे नही छोड़ने को चाहते थे। ब्रजमएडल में अनेक प्राम में उन का वैठक तथा भजन स्थान मौजूद है। - ( १७ ) उन के द्वारा विरचित ग्रन्यावली-(१) "बृहद्भागवतामृत", (२) हरिभक्तिविलास की "दिक्पदर्शनी" टीका,(३) "वैष्णव । तोपणी"नामक दशमस्कन्ध की टिप्पनी, (४) लीलास्तव वा दश- । मचरित । इस के अतिरिक्त लघुहरिनामामृतव्याकरण " नाम- क एक व्याकरण उन के द्वारा विरचित है । वर्तमान प्रकाशित हरि- नामामृत व्याकरण का वह संक्षेप ऐसा निश्चय किया जाता है। महा- प्रभु ने जिस प्रकार सूचना की थी उन्हीं सूत्रके अनुसार श्रीपाद सना- तन जी ने पहले लघुरिभक्तिविलास की रचना की । यह प्रन्य अभी भी वृन्दावन श्रीराधारमण जी के गोस्वामिपादों के घर में, अन्यत्र भी विराजमान है । इस ग्रन्थ को लेकर श्रीयुक्त गोपालभट्टगोस्वामी जी ने उनकी आज्ञा तथा सहायता से परिवर्तन-परिवर्द्धन कर वृहद्- आकार में हरिभक्तिविलास नाम से प्रणयन किया। यह अन्य श्रीसनातनगोस्वामी जी को “ दिक्प्रदर्शिनी " टीका के साथ तथा बंगानुवाद के साथ बंगाक्षर में अनेक संस्करणों में प्रकाशित हो चुका है । महाराज छत्रपुर के द्वारा भी यह हिन्दी अनु- वाद के साथ देवनागरी अक्षर में दो भाग में प्रकाशित हुआ में। वैष्णवों का महान धर्मग्रन्थ इस की महिमा वर्णन करना पृष्ठपे- शण मात्र है। यह ग्रंथ अति विशाल है । वैष्णवतोपणी नामक दशमस्कन्ध की टीका अति सरस गाम्भीर्य्य भावमयव्याख्या से विरचित है । वाडाशयाली वगीची वृन्दावन से अप्टटीका के साथ देवातरम तथा त्रिपुराधिपति मणीन्द्रनन्दीराय वहादुरके द्वारा अनेक टीकाओं के साथ बंगाक्षर में और श्रीरामनारायणविद्यारत्न "वहर- मपुर" के द्वारा चार टीका के साथ बंगाक्षर में, अन्यत्र भी यह ग्रंथ प्रकाशित हुआ है । वृहद्भागवतामृत" ग्रन्थ भी उक्त ताडाशवाली वगीची से स्वकृत टीका के साथ देवनागरी अक्षर में पहले प्रकाशित है। यह अन्य अति सरस परमचतुरता के साथ रचित हो चुका - किया गया है । इस की महिमा वैष्णवसमाज में परम प्रसिद्धि है। सिद्धान्तिक सरसता के साथ ब्रज व श्रीकृष्ण का तत्व जानने में यह अद्वितीय ग्रन्थ है । इस की रचनापरिपाटी में वृहस्पति की भी बुद्धि वृत्ति कुण्ठित हो गई है । ग्रन्थकार ने स्वयं ही इस की टीका की । इस लिये मूल श्लोकों का भाव परिस्फुट हो रहा है। हाल में श्रीनिम्बार्कवीथि पथिक, उदारचेता,सेठ रतनलाल जी के द्वारा हिन्दी- अनुवाद के साथ इस का प्रकाशन हुआ है । वैष्णवसमाज इन महानुभाव के ऋणी हैं तथा हार्दिक धन्यवाद भी देते हैं । वंगाक्षर में भी कई संस्करण से इस का प्रकाशन हो चुका है। " लीलास्तव व दशमचरित " में स्तवात्मक दशम स्कन्धीय लीलाओं का क्रम से वर्णन हैं। श्रीगोस्वामिचरन ने इसमें १०८ नमस्कार के द्वारा दशम लीलाओं का स्तवाकार में संक्षेपरूप से प्रन्यन किया है । श्रीनवद्वीपधामनिवासी श्रीहरिदासदास महोदय के द्वारा यह ग्रंथ वैष्णवसमाज को प्राप्त हुआ है । आप ने निज कृत टीका तथा सरस चंगानुवाद के साथ गाक्षरमें इसका प्रकाशन कर वैष्णव समाज का महान उपकार किया । उक्त महोदय ने गौडेश्वर- सम्प्रदाय के प्राचीन ग्राचार्यों के द्वारा विरचित अनेकानेक अप्र. काशित प्रथोंका प्रकाशन कर वैष्णवसमाजका जो महान् उपकार किया है, उस से वैपाय समाज विशेषत: गौड़ीयवैष्णवगण उन का चिर ऋणी रहेगा। कलिकत्ता नियासी बीकानेरके सेठ श्रीमान् हनुमानदास जी राठे तथा श्रीगोपालदास जी इन दोनों सजनों की परम प्राग्रहता से हम उत्सुक होकर इस प्रन्थ को हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित करने में समर्थ हुए। श्रीयुक्त हरिदासदासमहोदय के द्वारा विरचित टीका तया यंगानुवाद का अाधार लेकर इस का हिन्दी अनुयाद किया गया है। उक्त महोदय ने इस में श्रीयुक्त सनातन जी की वि. स्तून जीवनी देकर यड़ा भारी प्रभाव डाला है। उसी जीवनी की ( १६ ) छाया का अवलम्बन कर हम भी यहाँ पर विस्तृत जीवनी लिखने में समर्थ हुए। अवशेप में हम उन महोदय को विशेष हार्दिक ध. न्यवाद देकर उन गोस्वामिचरण के चरित्र लिखने में विरत होते हैं। क्योंकि श्रीयुक्त सनातन गोस्वामी के चरित्र अति अगाध समुद्ररूप हैं। उन का पार कौन पा सकता है। श्रीरूपगोस्वामी जी श्रीविग्रहों का प्रकाशन के लिये वृन्दावन के वन वन में नाना प्रकार अनुसन्धान करते हुए एक समय अति विपरण वदन में यमुना के तट पर बैठ कर अश्रुपात कर रहे थे। उस समय एक परम सुन्दर भ्रजवासी ने आकर उन को स्नेह पूर्वक रोदन का कारण पूछा। श्रीरूप जी ने उसे समस्त कारण कहा। वह गोस्वामी जी को गोमाटीला के पास ले कर कहने लगा कि यहाँ एक गौ पाकर नित्य पूर्वान्ह में दुग्धम्राय करती है । तुम जैसा वि- वेचन हो वैसा विधान करो । उस की बात सुन कर तथा मधुरमूर्ति दर्शन कर श्रीरूप मूर्छित हो गये तथा चेतना पा कर वहाँ किसी को नहीं देखा । वे ब्रज वासियों को बुला कर कहने लगे यहाँ श्री गोविन्द जी विराजमान हैं। पश्चात् चालक-वृद्ध सब के द्वारा उस स्थान का खनन कर योगपीठ के मध्यगत कोटी मन्मथमोहन श्री- गोविन्द जी का विग्रह प्राप्त किये । श्रीगोविन्ददेव का प्राकट्य वा. र्ता सुन कर असंख्य लोग उल्लासित होकर उपस्थित हुए। बड़ा स- मारोह के साथ "गोविन्दजी" का अभिषेक हुआ। उस के पश्चात् नीलाचल से काशीश्वरब्रह्मचारी नामक महाप्रभु के पार्षद ने गौर- गोविन्द नामक दूसरा विग्रह भेजा। श्रीरूप उस "चैतन्यदेव" का विग्रह को लेकर महान् भक्ति के साथ गोविन्ददेव के दक्षिणपार्श्व में स्थापना कर सेवा करने लगे। उस समय वृन्दावन में केवल कृष्णमूर्ति समूह प्रकटित हुए, परन्तु राधामूर्ति आविष्कार का विशेष उल्लेख नहीं है। पुरीधाम से जगन्नाथदेव के मन्दिर में चक्रवेड ना.
( २० )
मक स्थान में श्रीराधिकाविग्रह रहा । स्वप्नादेश के अनुसार पुरी के
राजा श्रीप्रतापरुद्र के पुत्र पुरुषोत्तमजानाके द्वारा वह भेजा गया तथा
श्रीगोविन्द जी के वामभाग में सिंहासन पर वह राधामूर्ति विरा-
जमान हुई । श्रीरूप के "श्रीगोविन्द" श्रीसनातन के"श्रीमदनमोहन"
तथा श्रीमधुपण्डित के "गोपीनाथ” आदिक विग्रह समूह श्रीकृष्ण के
प्रपौत्र वनाभ जी के द्वारा निम्मित किये गये हैं जो कि इन महा-
नुभावों से प्रकटित हुए । वर्तमान श्रीगोविन्द तथा श्रीगोपीनाथ जी
जयपुर में और श्रीमदनमोहन जी करोली में विराजमान हैं।
श्रीरूप-सनातन जी की वृन्दावन मे स्थिति इस प्रकार की थी-
अनिकेतन हुँहे वने यत वृक्षगण ।
एक एक वृक्षतले एक रात्रि शयन ।।
विप्रगृहे स्थूल भिक्षा काँहा माधुकरी ।
शुष्क रुटि चाना चावाय भोग परिहरि ॥
फरोया मात्र हाते कन्या ठिंडा वाहिास ।
कृष्णनाम कृष्ण कथा नर्त्तन उल्लास ॥
सार्द्ध सप्त प्रहर कृष्णभजन चारिदण्ड शयन ।
नाम संकीर्तन प्रेमे सेहो नहे कोन दिन ॥
कमु भक्तिरस शास्त्र करये लिखन ।
चैतन्य क्था शुने करे चैतन्य चिन्तन ।
(श्रीचैतन्यचरितामृते)
श्रीरूप-सनातन जी के बारे में भक्तमाल के टीकाकार श्री.
प्रियादास जी ने कहा है कि-
वृन्दावन प्रजभूमि जानत न कोऊ प्राय,
दरसाय जैसी शुक मुम गाई है।
रीति हूँ उपासना की भागवत अनुसार,
लियो रससार सो रसिक सुखदाई है।
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( २१ ) , आज्ञा प्रभु पाय पुनि “गोपीश्वर" लगे पाय, क्येि ग्रन्थ भाय भक्ति भॉति सन पाई है। एक एक बात में समात मन बुद्धि जन, पुलकित गात दृग मरी सी लगाई है ॥(३५८ क०) अर्थात-श्रीननभूमि वृन्दावन को उस समय प्राय कोई नहीं जानता था । श्री स्प-सनातन दोनों भ्रता ने श्रीकृष्णचैतन्यमहाप्रभु जी के अनुशासन से वहाँ आकर वैसा ही दिखा दिया कि जैसा श्रीशुदेव जी ने वर्णन किया है । आप दोनों ने उपासना की रस- राशि रीति भी श्रीभागवत के अनुसार प्रकाश की। जो रसिकजनों को अति सुसढाई है । उन्हीं की ही कृपाकटाक्ष से आज प्रेम की पोथी पढी जाती है। श्रीरूपगोस्वामी जी के द्वारा विरचित ग्रन्थावली-(१) भक्ति- रसामृतसिन्धु, (, उज्जलनीलमणी, (३) दानपेलिकौमुदी, (४) श्रीलधुभागनतामृत, (५) श्रीह सदूत, (६) उद्धवसन्देश, (७) विदग्बमाधरनाटक, (८) ललितमाधवनाटक, (६) नाटकच. न्द्रिका, (१०) पद्यावली, (१५) स्तवमाला, (१२) सामान्य- विस्टारलीलक्षण, (१३ ) श्रीकृष्णाभिषेक, १४) मथुरामाहात्म्य, (१५) निकुञ्जरहस्यस्तर,(१६) श्रीराधाकृष्णगणोद्देशटीपिका (प्रस्तुत) (१) भक्तिरसामृतसिन्धु-१४६३ शाक में इसका प्रणयन हुआ था। इस में पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तया उत्तर चार विभाग हैं। पूर्वविभाग में स्थायिभाव-उत्पादक सामान्यभक्ति, साधनभक्ति, भार तथा प्रेमभक्ति भेट से चारि लहरी, दक्षिणविभाग में विभाव, अनुभाष, सात्त्विक, व्यभिचारी तथा स्थायिभाव भेद से पाँच लहरी, पश्चिमविभाग में मुरयभक्तिरसनिस्पण नामक शान्तरस, प्रीति वा दास्यभनिरस, प्रेयो वा सरयभक्तिरस, वात्सल्यभक्ति रस तथा मधुरभक्तिरस भेद से पॉच लहरी, उत्तरविभाग में गोण- । ( २२ ) हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक, वीभत्स भक्तिरस,रसो की मैत्रबैरस्थिति तथा रसामास ये नौ लहरी है । इस मे सर्व समेत २१४१ श्लोक हैं । इस की श्रीपाद जीवगोस्वामी जी विरचित "दुर्गमसगमनी" श्रीमन् मुकुन्ददासगोस्वामित "अर्थरत्नाल्प- दीपिका' तथा श्रीलविश्वनाथचक्रवर्तिजी कृत "भक्तिसारप्रदर्शिनी" ये तीन टीका हैं । "श्रीरामनारायणविद्यारत्न के द्वारा वहरमपुर से जीनगोस्वामित टीका तथा वंगानुवाद के साथ,श्रीयुक्तदामोदरलाल जी शास्त्री महोदय के द्वारा काशी से उक्त टीका के साथ देवाक्षर में, श्रीयुक्त हरिदासदास महोदय के द्वारा उक्त तीन टीका तथा प्राचीन छन्दवद्ध वंगभापा पयार के साथ वृहदाकार में वंगाक्षर में प्रकाशित हुआ है । श्रीराधागोविंद के अप्राकृत रसपरिपाटी जानने के लिये यह अन्य सर्वोपरि प्राथमिक ग्रन्थ है । इस प्रन्य को बिना देसे कोई वृ- न्दावन का मधुमय रसराज्य में प्रवेश नहीं कर सकता है। (२) उज्वलनीलमणि-वास्तविक यह ग्रंथ भक्तिरसामृतसिन्धु का उत्तराश है । भक्तिरसामृतसिन्धु में जिस शृङ्गाररस का अगाध, अपाररूप से उद्देश्य किया गया है, इस में उस का विशालरूप से वर्णन है । इस में राधागोविन्द के शृगाररस का परिपाटी के साथ सविस्तर वर्णन है । इस मे नायम्भेद, सहायभेद, श्रीहरिप्रिया, श्रीराधा, नायिकाभेद, यूथेश्वरीभेद, दृतीभेद, ससीभेद, हरिवल्लभा, उद्दीपनविभाग, अनुभाव, सात्तिक, व्यभिचारी, स्थायिभाव, शृङ्गारभेद, ये पन्द्रह प्रकरण हैं । श्लोक संख्या १४५३ हैं । इस की श्रीजीवकृत "लोचनरोचनी" तथा श्रीविश्वनाथचक्रवर्ती जी न 'माननचन्द्रिका टीका है । इस वा श्रीशचीनन्दनविद्यानिधि.के द्वारा विरचित'उनलचन्द्रिका' नामक चंगपयार में पद्यानुवाद है। यह प्रय मूल तथा दोनो टीका के माय सानुवाद वंगाक्षर में श्रीरामनारायणु विद्यारत्न के द्वारा,यम्बई निर्णयसागर प्रेस से मूल तथा दोनों टीका । ( २३ ) के साथ देवाक्षर में प्रकाशित हुआ है । राधागोविन्द के दिव्य शृ; झाररस को अवगत करने के लिये यदि हृदय में इच्छा है तो इस का सरस अबलोकन अवश्य करें। (३) दानकेलिकौमुदी-यह उपरूपक भेद के अन्तर्गत "भाणिका" नामक एकांक नाटक है तथा १४७१ शाक में इस की रचना हुई है । ललितमाधव नाटक का पाठ से जब श्रीदासगोस्वामी जी की प्रबल विरहदशा अत्यन्त बढ़ गई थी उस समय उनका शरीर धारण असम्भव हो उठा तब उन को सुस्थ करने के तथा रसान्तर में प्रवेश कराने के लिये हास्यपूर्ण दानलीलात्मक इस की रचना की गई थी। यह ग्रन्थ बहरमपुर से टीका तथा अनुवाद के साथ वंगा- क्षर में प्रकाशित हुआ है। (४) लघुभागवतामृत - इस में दो खण्ड हैं। पूर्वखण्ड का नाम कृष्णामृत और उत्तरखण्ड का नाम भत्तामृत है। कृष्णामृत में श्रीकृष्ण के विविध स्वरूपों का सविस्तार निरूपण है । स्वयंरूप, तदेकात्मरूप के विलास तथा स्वांश रूप से दो भेद, आवेश, प्रकाश, अवतारतत्त्व, अवतारलक्षण, प्रथम द्वितीय-तृतीय भेद से विविध पुरुपावतार, त्रिविध गुणावतार, पच्चीस लीलावतार, चौदह मन्नन्तरावतार, चार युगावतार,अन्य प्रकार से फिर श्रावेश-प्राभव. वैभवावस्थ तथा परावस्थ भेद से चार प्रकार अवतार,ग्यारह प्राभव अवतार, एक्कीस वैभवावस्थ अवतार,नृसिंह-दाशरथीराम-श्रीकृष्ण भेद से तीन प्रकार परावस्थ अवतार, श्रीकृष्ण का पूर्णतमत्व, उन के व्रज - मधुपुरी-द्वारका-गोलोक चार धाम का विचार, समस्त अवतारों से श्रीकृष्ण का माहात्म्य अधिक, अवतारों का देह देहि भेद निरासन, लीलानित्यता, लीलाओं का भेद विचार ये सब विशेष रूप से विवेचित हुए हैं । द्वितीयग्वएड में भक्तों का श्रेणी विभाग, श्रीराधिका का सर्वश्रेष्ठत्व ये सब विचार सन्निवेशित है । वस्तुतः श्रीपादसनातनगोस्वामि ने " वृहद्भागवतामृत" ग्रन्थ में कथाच्छल से जिन सिद्धान्तों का लिपिवद्ध किया है उन्हीं को ही श्रीरूपगोस्वामि चरण ने इस ग्रंथ में प्रमाणे के द्वारा सुदृढ़ किया है। इस की श्रीलवलदेवविद्याभूपणकृत 'सारगरगदा" तथा श्रीवृन्दावनतर्का- लङ्कार कृत "रसिकरगदा"नामक दो टीका प्राप्त होती हैं। यह ग्रंथ विद्याभूपण कृत टीका के साथ वेङ्कटेश्वर प्रेस बम्बई से देवनाग- राक्षर में, विद्याभूपण कृत टीका के साथ सानुवाद वंगाक्षर में श्री अतुलकृष्णगोस्वामि के द्वारा, वृन्दावनचक्रवर्ती कृत टीका के साथ सानुवाद पंगाक्षर में श्रीरामनारायणविद्यारत्न के द्वारा, दोनों टीका के साथ सानुवाद वंगाक्षर में श्रीगौरसुन्दरभागवतदर्शनाचर्य्य के द्वारा प्रकाशित हुआ है । साङ्गोपाङ्ग श्रीकृष्ण तत्व जानने के लिये यह सर्वोपरि प्रन्य है। (५)हसदूत-यह कविवर कालिदास जी कृत "मेघदूत"की भाँति अति अद्भुत दृतकाव्य है । इस में विशेषता यह है कि यह श्री- राधागोविन्द के अप्राकृत विप्रलम्भरस का उदकण किया गया है। श्रीललिता जी, विरहविधुरा श्रीराधिका की दशाओं का वर्णन करती हुई एक हंस के लिये मथुरापुरी में श्रीकृष्ण के पास भेज रही हैं। यदि विरहरस का अनुभव करने में इच्छा है तो इस अन्य को अयश्य देखें । इसका अवलोकन करने पर प्राकृतरस से चित्रित मेघ- दत फीका पड़ जायेगा। इस में १४२ श्लोक हैं। शिखरिणी छन्द से इस की रचना की गई। यह अन्य जीवानन्दविद्यासागर के द्वारा सम्पादित नागराक्षर में, मूल तथा टीका के साथ श्रीराधाचरणगो- स्वामि वृन्दावनके द्वारा नागराक्षर में,श्रीविभासप्रकाशगांगुलीमहाशय जी के द्वारा मुल-टीका तथा सानुबाद बंगातर में प्रकाशित हुआ है । (६) उद्धवसन्देश-इम में मन्दाक्रान्ता छन्द से विरचित १३१ श्लोक हैं । नायक शिरोमणि श्रीकृष्ण मथुरा से उद्धव जी को दून बनाकर विरहविधुरा गोपाङ्गनाओं को सान्त्वना देने के लिये भेज रहे हैं । भागवत जी में इस का सामान्य रूप से निर्देश है। उसी को स्फुट कराने के लिये श्रीरूप ने इस की रचना की । किस को किस प्रकार संवाद देकर सान्त्वना देना है तथा किस मार्ग में किस प्रकार जाना है इन सब बातों को श्रीकृष्ण ने उद्धव जी को समझाया था इस में इस का सरस वर्णन है । यह अन्य श्रीजीवानन्दविद्यासागर के द्वारा नागरातर में, श्री. मधुसुदन तत्त्ववाचस्पति के द्वारा "भक्तिप्रभाकार्यालय" आलाटी से टीका तथा अनुवाद के साथ वंगाक्षर में प्रकाशित हुआ है। (७)विदग्धमाधवनाटक-इस की, रचना-समाप्ति-५४५५ शकाब्द में है तथा इस में सात अंक हैं। प्रथमांक में वेणुवादन विलास, द्वितीय में मन्मथलेख, तृतीय में राधिकासंगम, चतुर्थ में वेणुहरण, पञ्चम में श्रीराधिकाप्रसादन, पष्ठ में शरदविहार तथा सप्तम में गौरीतीर्थ में दोनों का विहार वर्णित हैं । ऐसे ही तो श्री. रूप का कवित्वमाधुर्य समस्त दिशाओं में फैला हुआ है, उस में फिर श्रीराधाकृष्ण के अनन्त सौन्दर्य माधुर्य्यमय रससागर की अनन्त तरंगावली से परियुक्त हो रहा है । प्रायिक और कादाचि- स्किलीला का समावेश कर एक नाटक रचना करने की इच्छा प्रन्यकार की पहले रही । पश्चात् सत्यभामादेवी तथा श्रीमन् महा- प्रभु की आज्ञा से दोनों नाटक की रचना की। विदग्धमाधय में बजलीला का वर्णन है । इस में धीरोदात्त तथा लालित्यगुण युक्त श्रीब्रजेन्दनन्दन नायक और श्रीकृषभानुनन्दिनी श्रीराधा प्रधान ना. यिका हैं । स्वयं महाप्रभु ने इस के श्लोकों का आस्वादन किया तथा श्रीरामानन्दराय, श्रीस्वरूपगोस्वामि आदिक भक्तों को श्रास्वा- दन कराया। यदि अमिमय रूप से श्रीराधाकृष्ण लीलाका आस्वादन करने की इच्छा है तो श्रीरूपगोस्वामी के द्वारा विरचित इस विद- (६ ) ग्यमापस नामक नाटक का अवलोकन कीजिये । यह ग्रन्थ श्रीराम- नारायणविद्यारत्न के द्वारा टीका तथा अनुवाद के साथ वंगाक्षर मे, नागराक्षर मे निर्णयसागरप्रेस बम्बई से, श्रीसत्येन्द्रनाथरसु के द्वारा वसुमती आफिस से वगातर में प्रकाशित हुआ है । यह अन्य प्रेमानन्दरस का अत्युच्च तरगमय महासागररूप है । इसमें ६४ कलाधारी श्रीविदग्धमाधव नायक रूपसे निर्णीत हुए हैं। इसका श्रीविश्वनाथचक्रवर्तीजी के शिष्य श्रीकृष्णदेवसार्वभौम द्वारा विरचित टीका तथा यदुनन्दनठाकुर विरचित"रसादम्ब" नामक पद्यानुवाद है। (८) ललितमावरनाटक-पुरलीला को ब्रजलीला के प्रापरण में रसने के लिये इस की रचना हुई है । यह आकार मे तथा घट- नासन्निरेश में विदग्धमाधन से वृहत् है । पान-पानी की सख्या भी इस में अविक है । इस मे विप्रलम्भरस का चूडन्त प्रतिपादन पिया गया है और चतुर्थाङ्क में गर्भाव का सन्निवेश है। पौर्णमासीदेवी ने भरतमुनि के निकट प्रार्थना कर एक अपूर्व रूपक नाटक की सृष्टि की। पश्चात् नारद जी ने उसे तुम्बुरु को दान किया और तुम्बुरु ने गन्धों को सिमाया । उद्धव जी तथा पौर्णमासी के प्रयत्न से मथुरा में उस का अभिनय हुआ है। इस मे बमलीला का अभि- नय है । विरहातुर स्वयं श्रीकृष्ण इस गर्भात के दर्शक हैं । उस में निज रूपमाधुर्य में विमोहित होकर उस का आस्वादनार्थ श्रीकृष्ण ने राधासारूप्य की वाञ्छा की। फलत: उन को गौरागरूप से अय. तीर्ण होना पड़ा। प्रयमाङ्क मे-सन्ध्याकालीन विहार-उत्सय, द्वितीय में शंग्यचूड- वघ, तृतीय में श्रीकृपा पा मयुरागमन, श्रीकृष्ण के लिये श्रीराधिका का विरह, श्रीराधिका के लिये सपियों का विरह, सपियों का पार• स्परिक यिरह, चतुर्थ में श्रीराधाभिसार, पश्चम में चन्द्रावलीलाम, पष्ठ में ललिताउपलब्धि, सप्तम में नववृन्दावनसंगम, अष्टम में नववृन्दावनविहार, नवम मे चित्रदर्शन, दशम में पूर्णमनोरथ व. र्णित है। इस की रचनाकाल १४५६ शमाद है। इस का श्रीनित्या- नन्दवंशोद्भव श्रीस्वरूपगोस्यामि विरचित "प्रेमकदम्ब"नामक पद्या- नुवाद है। श्रीजीवगोस्वामि जी के शिष्य श्रीराधाकृष्णदास जी टीकाकार है। कोई कोई इस के टीकाकार श्रीचक्रवर्ती जी हैं, ऐसा कहते हैं । यह अन्य मूल-टीका -अनुवाद के साथ श्रीरामनारायण- विद्यारल के द्वारा वंगाक्षर में, श्रीसत्येन्द्रनाथवसु के द्वारा बंगाक्षर में प्रकाशित हुआ है। (६) नाटकचन्द्रिका-विदग्धमाधव और ललितमाधव के लक्षण, उदाहरण तथा लक्ष्य विषयों का समन्वय के लिये इस की रचना हुई है । नाटकों का प्रत्येक (समस्त) लक्षण ललितमाधव में व्यक्त है । इसीलिये ग्रंथकार ने इस में प्रायः सर्वत्र ललितमा- धव का उदाहरण दिया है । यह अन्य भरत जी का नाट्यशास्त्र तथा शिंगभूपाल का रसार्णवसुधाकरादि प्राचीन नाटयशास्त्रों की वि. चारधारा से लिया गया है । भरतमुनि के साथ अमत होने के कारण साहित्यदर्पणीय प्रक्रिया प्रायः परित्याग की गई है । नाटकों के समस्त लक्षण इस मे सुन्दरता से सन्निवेश किये गये हैं। वैष्ण- पसमाज में नाटयरीति ज्ञात करने में यह सर्वोच्च ग्रंथ है । इसकी विद्याभूपण की टीका है ऐसा सुना जाताहै । यह अन्य श्रीरासविहारी- सांख्यतीर्थ, काशिमबाजार निवासी के द्वारा अनुवाद के साथ प्रकाशित हुआ है। (१०) पद्यावली-इस में प्राचीन तथा ग्रन्थकार के समसा- मयिक १२५ जन कवियों के द्वारा विरचित ३८६ श्लोकों का समा- हृत किया गया है । प्रन्यकार के निजरचित पद्य प्रायः ३४१३५ संग्या में हैं। श्रीरूपगोस्वामी ने निज इन्छा से पद्यों को अपीवद्ध ( ८ ) कर के प्रकरणरूप से सन्निवेश किया है। आप उपसंहार में स्वयं सूचित करते हैं कि प्रथाकारमे सनिवेश के कारण श्रीजयदेव अथवा विल्वमंगल आदि की कविताओं को वाद देकर, जिन के प्रन्यागार मे सन्निवेश नहीं हैं अथवा जो इतस्ततः विसर के पड़े हुए हैं अथच श्रुविधर भत्तों के मुख से जो सुने गये हैं, उन सब का एकत्र कर हम समावेश करते हैं । इस में श्रीराधागोविन्द के विभिन्न रस की उपासना रूप श्लोकों का समावेश है। यह- अन्य मूल, टीका तथा अनुवाद के साथ गाक्षर में श्रीरामनारायणविद्यारत्न जी के द्वारा, डाक्टर सुशीलकुमार दे, ढाका विश्वविद्यालय के द्वारा नागराक्षर में, यम्बई वेङ्कटेश्वरप्रेस से नागपक्षर में प्रकाशित हुआ है । (११) स्तवमाला--यह अन्य पहले इतस्ततः विक्षिप्त अवस्था मे रहा पश्चात् श्रीपादजीवगोस्वामी ने उन सब का एकत्र मालाकार में गूंथ कर स्तबमाला नाम धरा । पहले महाप्रभु के तीन अष्टक, पश्चात् श्रीकृष्ण के १५ स्तव, श्रीराविका के ६, श्रीयुगलकिशोर जी के ४, गोविन्दविरुदायली, नन्दोत्सव से लेकर कंसवध पर्यन्त अ- थादश छन्द, श्रीगोवद्ध नोद्धार, पुनः वस्त्रहरण, श्रीरासक्रीड़ा, स्वयमुत्प्रेक्षितलीला, सण्डिता, श्रीललितोक्त तोटवाष्टक, चक्रव- न्यादि चित्रकाव्य, गीतावली, लीलाष्टक, यमुनाष्टक, गोवद्धनाष्टक, दो वृन्दावनाष्टक, श्रीकृष्णनामाष्टक सन्निवेशित हैं। यह अन्य श्री- रामनारायणरिद्यारत्न के द्वारा मूल-टीका तथा अनुवाद के साथ वंगाक्षर में, बम्बई निर्णयसागरप्रेस से देवनागराक्षर में प्रकाशित हुआ। (१२) सामान्यविरुदारलीलक्षा-साहित्यदर्पणकार ने वि. रुद का लक्षण इस प्रगर किया है "गद्यपद्यमयी राजस्तुतिविरुद- मुच्यते । अर्थात् गध पयमयी राजम्तुति विरुद्ध है। जैसा कि रिदमणिमाला। श्रीगोस्वामिचरों ने भी राज राजेश्वर श्रीकृष्णा- - ( २६ ) चन्द्र अथवा भगवान् श्रीगौरचन्द्र को कान्य के नायक बनाकर विरु- दाद में अनेक नागरिमा वर्णनमय विरुदावली की रचना की। वे सब गोपिन्दविरुदारली, गौरागरिरुतायली, गोपालविरुदावली, निकुञ्ज केलिविरुदावली हैं। निरुह मे छन्दों का अनक प्रकार भेद है। उन सब लक्षणों को ज्ञात कराने के लिये श्रीपादरूपगोस्वामि जी ने सामान्यविरुदावलीलक्षण नामक अन्य लिखा है। श्रीहरि- दासदास महोदय के द्वारा यह अन्य वगाक्षर में प्रकाशित हुआ है। (१३) कृष्णाभिपेक-यह अन्य श्रीहरिदामदास जी के द्वारा देवनागराक्षर में प्रकाशित हुआ है । श्रीकृष्ण की अभिषेपविधि इस से भली भाँति जानी जाती है। यह रैदिकप्रयोग से अलक्त हो रहा है । वैष्णरमान के यह परम आवश्यकीय स्मृति प्रन्य है। (१४) मथुरामाहात्म्य - इम का उद्देश्य श्रीरूप सनातन जी की जीवनी में मैंने दिया है। सक्षेपत प्रजमाहात्म्य ज्ञात कराने में यह अत्युच्च प्रन्थ है । महाप्रभु के आदेश से इस प्रन्य का सकलन हुआ है । इममे अनेक शास्त्रप्रमागों के द्वारा प्रजमण्डल की महिमा दिखलाई गई है । श्रीहरिदासदास जी के द्वारा बगाक्षर में इस का प्रकाशन हुआ है। (१५) निकुञ्जरहस्यस्तव-निकुञ्जविलास वर्णनात्मक ३२ श्लोकों से यह स्तर सश्चित किया गया है। श्रीपादराधिकानाथ गो. धामि जी ने रहस्यार्थप्रकाशिरा नामक इस की टीका की । श्रीवं. शीपदनठाकुर महोदय के द्वारा वगभाषा मे निपढीछन्द मे इसका अनुवाद किया गया है । हाल में मैंने हिन्दी अनुगन के साथ देवा. क्षर में हस का प्रकाशन किया है । ताडाशयाली बगीची से वगा- नुवाद तथा वशीरहनठाकुर जी के पगार और श्रीराधिकानायगो- स्वामी जी की टीका के साथ बंगावर में बहुत पहले यह प्रकाशित हुआ था।
1 ( ३० ) (१६) प्रस्तुत) श्रीराधाकृष्णगणोशदीपिका-इस में दो खण्ड हैं। बृहत् और लघु । बृहत्खण्ड का रचनासमय १४७२ शकाब्द श्रावणमास है | ब्रजजनों के अनुसार श्रीकृष्ण की सेवा करने के लिये तथा प्रजजनों के यानुगत्य होकर सेवाप्राप्ति के लिये श्रीकृष्ण व उनके परिकरों के पावत्तीय तथ्य ज्ञात करना परम आवश्यक है । इसी लिये ही श्रीपादरूपगोस्वामी जी ने इस ग्रन्थ का निर्माण किया है। इस में सर्व समेत ४५८ श्लोक हैं। इस ग्रन्थ की महि- मी मादृश तुच्छ व्यक्ति क्या वर्णन कर सकता है । रसिकों के समक्ष यह अन्य प्रस्तुत होकर मौजूद है । प्रेमी पाठकगण इसे श्राप ही आप अवगत कर लेंगे। इस का हिन्दी अनुवाद के साथ देवा- तर में प्रकाशन की बहुत दिवस से इच्छा थी । आज गुरु गौरांग- गणों की पुनीत कृपा से यह आशा . फलवती हुई । इस समय इस का प्रकाशन करने का और एक प्रधान कारण यह है कि-यह ग्रंथ लक्ष्मीवंकटेश्वर कल्याण मुंबई में १८३८ शकालद, संवत् १६७३ में माथुरचातुर्वेदिपण्डित श्रीकीर्तिचन्द्रशर्मा जी के द्वारा विरचित भापानुबाद-अन्वय के साथ प्रकाशित हुआ है । बड़ी खेद की यात यह है कि प्रकाशक ने इस में से ३१६ श्लोकों को हटा कर केवल १३६ श्लोक से इस की पूर्ति की। दूसरी घात यह है कि इस के प्रारम्भ में श्रीकृष्णचैतन्यमहाप्रभु तथा नित्यानन्दप्रभु के वन्दनात्मक पहिला श्लोकों को उड़ाय दिया गया तथा श्रीराधागोविन्द के वन्द- नात्मक दूसरे श्लोक को अलग कर इस का प्रकाशन किया गया। सय से अधिक भूल यह है कि इस अन्य के प्रकाशन में प्रन्थकार श्रीरूपगोस्वामी जी के नाम का उल्लेख नहीं दिया गया, है । आशा है प्रकाशक महोदय इन त्रुटियों को सुधार कर शुद्ध रूप से प्रकाशन करें। इस प्रन्य का इस प्रकार भ्रमात्मक प्रकाशन से गौड़ीयवैष्णव. समाज का अान्तरिक दुःख रह गया है। इस में श्लोकों का प्रन्यन . :(३१.) .. भी अस्तव्यस्त किया गया है । ४५८ श्लोकों से ३१६ श्लोकों को पृथक् कर देने पर इस अन्य की महत्ता-चिलकुल उड़ गई। अस्तु पाठकगण इस का ध्यान पूर्वक अवलोकन करें। यह ग्रन्थ .' पहले चंगाक्षर में कई संस्करण में वंगानुवाद के साथ प्रकाशित हुआ है। श्रीपादजीवगोस्वामिकृत लघुतोपरणी का उपसंहार में श्रीरूपगोस्वामी की ग्रन्थतालिका में तथा भक्तिरत्नाकर में श्रीरूप की प्रन्यतालिका में, श्रीरूपगोस्वामी जी के द्वारा “प्रयुक्ताख्यातचन्द्रिका" ग्रंथ का निश देखा जाता है । अभी उस की उपलब्धि नहीं हुई है । श्रीयुक्त पुरी- दास जी ने भी प्रायशः श्रीरूपगोस्वामी जी के समस्त ग्रंथ पाठभेद के साथ बंगाक्षर में मूलमात्र प्रकाशित किया है । परिशेप में हम मथुरा, गोघाट ( लक्ष्मीगली) के निवासी पं। श्रीनारायादेवकौशिक जी को धन्यवाद देते हैं कि आपने "श्रीली. लास्तब" और " श्रीराधाकृष्णगणोद्देशदीपिका" इन दोनों अन्य के अनुबाद संशोधनकार्य में अपना अमूल्य समय लगाकर सहाय दे चिरवाधित किया । हम "श्रीसनातनगोस्वामिचरण के द्वारा विर- चित "श्रीकृष्णलीलास्तव व दशमचरित", श्रीपादरूपगोस्वामि महो- दय के द्वारा विरचित "श्रीराधाकृष्णगणोहेशदीपिका", (वृहत् तथा लघु दोनों भाग ), श्रीपाद श्रीकविकर्णपूर महाशय जी के द्वारा रचित "श्रीगौरगणोद्देशढीपिका", श्रीविश्वनाथचक्रवर्ती जी के द्वारा विरचित संकल्पकल्पद्रुम'तया श्रीपाद श्रीरघुनायदासगोस्वामिचरणके द्वारा मुरचित "श्रीब्रजविलासस्तव" इन पाँच प्रन्यों को एक ही साथ एक ही जिल्द में सम्चित कर दिव्य पञ्चामृत रस की भाँति सानुबाद प्रकाशित कर रसिक समाज में उपस्थित करते हैं। आशा हे प्रेमी रसिक समाज इस का सरस आस्वादन कर चिरवाधित करेंगे। विनीत-- कृष्णदास (प्रकाशक) :- गौडीयग्रन्थगौरव:- ब्रजभाषा में प्रकाशित प्राचीन पुस्तकें- १- गदाधरभट्टजी की वाणी २-सूरदास मदनमोहनजी की वाणी ३-माधुरीवाणी (माधुरी जी कृता) १४-वल्लभरसिकजी की वाणी •५-गीतगोविन्दपद (श्रीरामरायजी कृत) ६-गीतगोविन्द (रसजानिवैष्णवदासजीकृत ७-हरिलीला ब्रागोपालजीकृता -श्रीचैतन्यचरितामृत (श्रीसुयलश्यामजीकृत) - वैष्णववन्दना (भक्तनामावली) (वृन्दावनदासजीकृता) १०-विलापकुसुमाञ्जलि (वृन्दावनदासजीकृता) ११-प्रेमभक्तिचन्द्रिका (वृन्दावनदासजीकृता) १२-प्रियादासजी की ग्रन्थावली १३ -गौरागभूपणमञ्जावली (गीरगनदासजीकृता) १४- राधारमणरससागर (मनोहरजीकृत) १५–श्रीरामहरिग्रन्थावली ( श्रीरामहरिजीकृता) सानुवाद संस्कृतभाषा में १-अर्चाविधिः (संगृहित) २-प्रेमसम्पुटः (श्रीविश्वनाथचक्रवतीजीकृत ३-भक्तिरसतरङ्गिणी (श्रीनारायणभट्टजीकृता) ४-गोवद्धनशतक (विष्णुस्वामी सप्रदायाचार्य श्रीकेशवाचार्यकृत) ५-चैतन्यचन्द्रामृत और सङ्गीतमाधव (श्रीप्रवोधानन्दजीकृत --नित्यक्रियापद्धति (संगृहित ) ७--व्रजभत्तिविलास (श्रीनारायणभट्टजीकृत) ८-निकुञ्जरहस्यस्तव (श्रीमद्पगोस्वामिकृत) ६-महाप्रभुप्रन्थावली (श्रीमन्महाप्रभुमुखपद्मविनिर्गता) १०-स्मरणमङ्गलस्तो (श्रीमद्रूपगोस्वामिजीकृत) ११-नवरत्नं (श्रीहरिरामव्यासजीकृत) १२--श्रीगोविन्दभाप्यं (श्रीपादवलदेवजीकृत) श्रीगौरगणोद्देशदीपिका और श्रीकविकर्णपूर प्रस्तुत प्रन्यकार श्रीपाद कविकर्णपूर गोस्वामी जी का जन्म गदेश के काश्चनपल्ली (काचडापाडा ) नामक समृद्धिशाली प्राम मे १५ ४ सीप्टाद में हुआ था। पिता का नाम श्री शिवानन्दसेन था जो कि महाप्रभु गोरचन्द्र के परम अन्तरग भक्त हुए । कविकर्ण पुर का पहिला नाम पुरोदास था । उन के चैतन्यतास तथा रामदास नाम के दो भ्राता ओर थे । वे दोनों भी महाप्रभु के परिकर में हुए । पतितपावन श्री प्रभु ने जीव उद्धारार्थ सन्यासाश्रम का ग्रहण कर माता की आज्ञा और भक्तों की युक्ति से नीलाचल धाम में वास र परम मनोहर रावाभाव का आस्वादन किया । लास लास लोगों के साथ स्वीय श्रीकृष्ण नाम के सकीर्तन, उद्दण्डनृत्य, भक्त गाष्ठी एव श्रीनगन्नान दर्शनादि में वे दिन का समय यापन करते थे तथा रानिमें सरूप,श्रीरामराय आदि परम अन्तरग भत्तोंके द्वारा रागभार का पास्नादन करते थे। श्रीकृष्ण के मथुरा गमन म श्रीरा पिसानी की जागिरह दशा हातो थी आप निरन्तर उमी भार म आ. विष्ट रहते थे। आप के अरतीर्ण होने का प्रधान कारण तो इस राधा- भाव का आस्वादन करना था। आप निरन्तर हाय हताश करत हुए कह उठते थे कहाँ मेरे प्राणनाथ ? कहाँ श्रीव्रजेन्द्रनन्दन ? कहाँ जाऊँ कहाँ पाउँ,कौन उनका देश कहेगा। उनके बिना मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है,प्राण फठता जा रहा है ।"यह दशा अति चमसार थी। पाहार नहीं,निद्रा नहीं, निरन्तर व्याकुल रहतथे । कभी तो प्रेम चिकार से यूाकार हो जाते थे। कभी व तपायमान सुवर्णपिण्ड की भॉति श्रीश्रङ्ग बन जाता था। कभी ता हाथ पॉर के जाड (सन्धि)खुल जाने के कारण दीर्घावार हो जात थे। बलिहारी प्रेम की पराकाष्ठा, चलिहारी रावाभाव का आस्वादन, इसीलिये ही वे तो महाप्रभु नाम से प्रसिद्ध हुए । गुण्डिचायाना में जगन्नाथदेव के रान म श्राप ।
। परिकरो से वेष्टित होकर मधुर नृत्य विनोद करते थे। उनका रथा नर्तन अति अद्भुत था। रथ यात्रा उपलक्ष में प्रभु का दर्शन तथा नृत्य विहार देसन के लिये प्रति वर्ष गौढदेश से हजारों श्रद्ध तादि भक्त गण शिवानन्दसेन की अध्यक्षता में आते थे। उन सब का मार्ग समाधान का भार प्राय शिवानन्द के ऊपर रहता था। एक चार रथ-याना के समय शिवानन्दसेन ने गोडदेश से पाकर महा. प्रभु का दर्शन किया। संग में उनकी गर्भवती पत्नी भी थी । प्रभु ने कहा शिवानन्द । श्रव के तुम्हारा एक आश्चर्य पुन होगा। उस का नाम परमानन्ददास रसना । अत पुरी में जन्म होने के कारण उनको सर कोई पुरीठास भी कहा करते थे। कुछ काल प. श्चात् जन कर्णपूर ५ वर्ष वयस के थे उन के पिता ने हजारों भत्तों के बीच गोडदेश से आकर महाप्रभु का दर्शन किया । सग मे बा- लक पुरीदास रहे। बालक महाप्रभु का दर्शन कर खेलते हुए उनके चरण में गिर गया । प्रभु ने कहा-परमानन्द । हरिं यद अर्थात् हरि कहो । बालक ने कुछ नहीं बोला । प्रभु ने सरूप से कहा, हे स्वरूप मेंने जगत् मे हरिनाम की घोषणा की । सिंह व्यात्र को भी हरि कहला र नचाया। परन्तु घडी आश्चर्य की बात यह है कि यह शिवानन्द का पुन हरि नाम नहीं लेता। स्वरूप ने कहा-प्रभु इसने श्राप के नाम को मन्त्र रूप मान लिया है । इसलिये आप के कहने पर भी वह नहीं कहता । बालक देखते देखते प्रभु के चरण का अगुठा चूसने लगा। प्रभु उसके मुस मे अगूठा रख कर कहने लगे अब तो कुछ कहो । उस समय अपठित बालक ने कहा- अवसो कुवलयमदणोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम । वृन्दावनरमणीना मण्डनमखिल हरियति । अर्थात्-ब्रजरमणियों के अखिल भूपण स्वरूप श्रीहरि की जय हो ।जो उनके कर्णो में नीलकमल, नेत्रों में काजर एवं वक्षः में इन्द्र- नीलमणिहार स्वरूप हैं। बालक के मुख से इस प्रकार अद्भुत श्लोक सुन कर भक्तगण परम विस्मित हो गये । प्रभु ने परम प्रसन्न होकर तब से उनका नाम कविकर्णपुर रखा । अंगुष्ठ लेहन के छल से प्रभु ने उन्हें निज शक्ति सञ्चार कर कवि मुकुटमणि बना दिया। इसके पश्चात् पुरीदासजी प्रभु कृपा से उनके परिकरों में महान् पंडित कविमुकुटमणि हुए । इस विषय की साक्षी उन के द्वारा विरचित श्रीआनन्द वृन्दावन-चम्पू है । ये पहले ब्रज में गुणचूडा सखी रहे । इनके द्वारा विरचित अन्य सकल ये हैं-(१) श्रीचैतन्यचन्द्रोदय- नाटक, (२) आनन्दवृन्दावनचम्पू , (३) श्रीचैतन्य-चरितमहा- काव्य, (४) प्रस्तुत श्रीगौरगणोहेशदीपिका, (५) कृष्णान्हिकको- मुदी, (६) अलङ्कारकौस्तुभ, (७) आर्य्याशतक । (१)श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक-इस की रचना १४६४ श- फाद में हुई थी। महाप्रभु के अप्रकट होने के पश्चात् उनके विरह से पीड़ित उडिया के राजा श्रीप्रतापरुद्र जी की आज्ञा से इस नाटक का अभिनय हुआ था। इस में १० अङ्क हैं। अभिनय रूप से प्रभु- लीला का वर्णन होने का कारण यह अन्य सर्व चित्ताकर्षक हो रहा है। इस की परिपाटी अति मनोहर है। अभिनयरूप से प्रभु-लीला का आस्वादन करन वालों के लिये यह परम उपादेय प्रन्थ है । इस में फिर गर्भाङ्क अति उपादेय वस्तु है । तृतीयअङ्क में गर्भा का निवेरा है। उस में प्रभु ने अवतादि भक्तों के साथ ब्रजविहारी श्री. कृष्ण की दान-लीला का अनुकरण किया है । स्वयं श्राप राधिका बने, अद्वत प्राचार्य को श्रीकृष्ण तथा श्रीवासपंडित को नारद व. नाया अन्यान्य भक्तगणों ने अन्यान्यरूप धारण किये । यह प्रन्थ बम्बई से देवातर में प्रकाशित हो चुका है । सानुवाद वंगाक्षर में भी इस का प्रकाशन हो गया है।
( ४ ) (२) आनन्दवृन्दावनचम्पू-यह महाप्रभु की करुग्णशनि से उत्थित वाग्निभूती रूप है । इस मैगस्तयक हैं । जिन में श्रीकृष्ण जन्म से लेकर रासलीला पर्यन्त अधिकन्तु होरीलीला का वर्णन है । दश मस्कन्ध के पूर्वार्द्ध ब्रजलीला वा क्रम से यह अन्य निर्माण किया गया है । प्रथमस्तरक में श्रीवृन्दावन का वर्णन है। यह अन्य सं- स्कृत साहित्य भॉडार में सर्वोपरि है । पण्डित समाज में तथा भा. गवत वत्ताओं के समाज में इसकी परम प्रसिद्वि है। अधिक वो. लना पृष्ठपेशण मान है । बम्बई से देवातर मे यह अन्य पुस्तका कार मे तथा मथुरा से सोला पत्राकार में श्रीचक्रवती जी की सुख- वर्तिनी टीका के साथ प्रकाशिन हो चुका है। (३) श्रीचैतन्यचरितमहामा य-रिधि छन्दोबद्ध २० सों में इस की रचना की गई है । महाप्रभु के अन्तर्धान के ६ वत्सर प. श्चात् अर्थात् १४६४ शकाब्द में इस प्रन्य की समाप्ति हुई । प्रभु के पार्षद प्रपर, हनुमान जी के अवतार श्रीमुरारिगुप्त विरचित कडचा का आधार लेकर इस की रचना की गई है । महाप्रभु का चरित्र जानने मे यह अति अपूर्व प्रन्य है। इस का प्रकाशन घगा- क्षर में हो चुका है। (४) कृष्णान्हिक्कौमुदी-यह ग्रन्थ अष्टकालीन लीला स्मरण के लिये परम उपयोगी है। श्रीराधागोविन्द की अष्टकालीन दैनन्दिनी लीला इस मे सुन्दर रूप से वर्णन की गई है । इस की रचना परि- पाटी भी अति अद्भुत है । श्रीयुक्त हरिदास दास जी के द्वारा वगा- घर में इस का प्रकाशन हो गया है। (५) अलङ्कारकौस्तुभ-यह काव्यप्रकाश तथा साहित्यदर्पण की भॉति एक अलङ्कार प्रन्य है । इस में विशेपना यह है कि श्रीराधा गोविन्द सम्बन्धी अप्राकृत रस को लेकर चित्रण किया गया है । इस में १० किरण हैं । प्रथम किरण मे काय का सामान्य लक्षण और विचार, द्वितीय में शब्दशक्ति अभिधा-लक्षा-व्यञ्जनादि वृत्ति का वर्णन, तृतीय में ध्वनि का निर्णय, चतुर्थ में गुणीभूत- व्यगय का वर्णन, पञ्चम में रम परिपाटी, पप्ठ में गुण का विवे- चन, सप्तम में शब्दालङ्कार, अष्टम में अर्थालङ्कार समूह, नवम में रीति का वर्णन, दशमकिरण में काव्य के दोषों का कथन है। यह मन्य श्रीराधागोविन्द की रसरीति जानने में अति अद्भुत है । वंगावर में श्रीचक्रवर्ती कृत सुबोधिनी टीका तथा पंगानुवाद के साथ यह अन्य प्रकागिन हो चुका है । यम्बई निर्णयसागर से जो अलङ्कारकौस्तुभ छपा है वह दूसरा है तथा उस के रचयिता कोई विश्वेश्वर पण्डित है। (६) आ-शतक-यह मन्य भार्या नामक मात्रावृत्त के द्वारा ११६ श्लोको में विरचित है। इस में धीरललित श्रीकृष्ण की गुगावली का वर्णन है । इस को स्तुतिकाव्य भी कहा जा सकता है। नवद्वीय निवामी श्रीयुक्त हरिदासदास महाशय के द्वारा इसका प्रकाशन हो चुका है। (७) श्रीगौरगरणोदेशदीपिका-इस में ब्रज के परिकर महाप्रभु लीला में जिस जिस परिकर के रूप में अवतीर्ण हुए हैं,उन का उद्देश्य किया गया है। वंगाक्षर में यह अन्य कई संस्करणों में प्र. काशित हो चुका है । परन्तु एतद्देशवासी महाप्रभु के भक्त व प्रेमी- रसिकों के लिये यह विपय दुरुह रहा । बहुत दिन से इस को हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित करने की प्रवल इच्छा थी। गुरु- गौरागगणों की कृपा मे उस आशा की भी पूर्ति हुई।
श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुम तथा श्रीविश्वनाथचक्रवर्ती जी प्रस्तुत ग्रन्थकार महामहोपाध्याय श्रीविश्वनाथचक्रवर्ती जी का १५७६ शाक में मतान्तर १५८६ शाक में वंगदेश के मूर्शिदाबाद जेला सागरदीघि थाना के अधीन देवप्राम में जन्म हुआ था। उन के पिता का नाम श्रीनारायणचक्रवर्ती जी है। विश्वनाथ जी ने वाल्यकाल में प्राथमिक पाठ शेष कर सैदावाद में श्राकर भक्तिशास्त्र का अध्ययन किया। इस सङ्कल्पकल्पद्रुम नामक ग्रन्थ में आपने अपनी गुरु प्रणाली का इस प्रकार उद्देश्य किया कि-बालुचर गा. म्भीला निवासी श्रीनरोत्तमठाकुर जी की शाखा श्रीकृष्णचरणचक्र- वर्ती उन का परमगुरु तथा उनके पुत्र श्रीराधारमणचक्रवर्ती जी दीक्षागुरु हैं। श्रीकृष्णचरण, सैदावाद निवासी श्रीरामकृष्ण प्रा. चार्य के पुत्र वालुचर गंगानारायण चक्रवर्ती के दत्तपुत्र थे । वे परिणत धयस में सैदाबाद में वास कर भक्तिशास्त्र की अध्यापना कराते थे। इन्हीं के पास विश्वनाथ जी ने श्रीभागवतादि भक्ति मन्थों का अध्ययन किया । ऐसा कहा जाता है कि यहाँ ही बैठ कर उन्होंने विन्दु, किरण, कणा आदिक ग्रन्थ का तथा अलङ्कारकौस्तुभ की टीका का निर्माण किया । अप्राप्त वयस में यद्यपि उन ने दारपरि- प्रह किया था तो भी उस में वे विन्दुमात्र आकर्षित नहीं हुए। परि- शेष में सकत परित्याग कर घृन्दावन के पथिक बन। वृन्दावन में आकर तात्कालीन वैष्णवसमाज के कर्णधार हुए तथा बहुत वैष्णव- अन्यों का निर्माण और बहुत वैष्णवप्रन्यो की टीका कर वैष्णव समाज का प्रचुर कल्याण साधन किया । उन का वेशाश्रय का नाम हरिवल्लभ था। ये प्रगाद पण्डित, महादार्शनिक, परम भक्त, महान् रसवेत्ता, श्रेष्ठ कवि, वैष्णवचूणामणि, तात्कालीन गौडीय वैष्ण- वों के अध्यक्ष रूप रहे । उस समय उन के नाम से यह श्लोक प्रसिद्ध हुआ है कि- . विश्वस्य नाथरूपोऽसौ भक्तिवर्मप्रदर्शनात् । भक्तचक्र वत्तितत्वात् चक्रवारययाऽभवत् ।। अर्थात् भक्ति मार्ग दिग्पाने के कारण विश्व का नाय रूप तथा भक्तिचक में वर्तित रहने के कारण चक्रवर्ती उन का नाम पड़ा। ये जहाँ बैठ कर श्रीभागवत लिखते थे, वहाँ वर्पा जल नहीं पड़ता था । उन के उत्तर काल में गोवर्द्धन के सिद्ध कृष्णदास बाबाजी महाशय ने मानसगंगा में डूब कर-तीन-चार दिन पीछे श्रीचक्र. वर्तिपाद लिखित पुस्तक का जल स्पर्श रहित अवस्था में संग्रह किया था। श्रीचक्रवर्ती जी ने अनेकानेक वैष्णव प्रन्थ का निर्माण कर वैष्णव समाज का प्रचुर उपकार किया । वे श्रीरूपगोस्वामि जी के अवतार माने जाते हैं। उन के द्वारा रचित मूलप्रन्थ- १) श्रीकृष्ण- भावनामृत, (:) श्रीगौरागलीलामृत, (३) ऐश्वर्यकादम्विनी, (४) माधुर्यकादम्बिनी,(५) स्तवामृतलहरी,(६) भक्तिरसामृतसिन्धुविन्द, (७)उज्वलनीलमणिकिरण,(८)भागवतामृतकण,(E) रागवर्त्मचन्द्रिका, (१०) गौरगणचन्द्रिका, (११) चमत्कारचन्द्रिका, (१०) प्रेमसम्पूट, (१३)बजरीतिचिन्तामणि,(१४) क्षणदागीतचिन्तामणि । टीकापन्थ- (१) समस्त श्रीभागवत की "सारार्थदर्शिनी" (२) गीता की "सारार्थवपिणी" (३) उज्ज्वलनीलमणि की "अानन्द चन्द्रिका", (४) भक्तिरसामृतसिन्धु की "भक्तिसारप्रदर्शिनी", (५) गोपाल- तापनी की "भक्तहर्पिणी", (६) ब्रह्मसंहिता की टीका, (७) दानकेलिकौमुदी की "महतो"टीका, (८) आनन्दवृन्दावनचम्पू की "सुखर्तिनी", (.) अलङ्कारकौस्तुभ की "सुयोधिनी, (१०) हसदूत की टीका, (११) श्रीचैतन्यचरितामृत की टीका, (१२) प्रेमभक्ति-चन्द्रिका की टीका इत्यादि । (१) श्रीकृष्णभावनामृत-यह महाकाव्य मानस स्मरणोप- योगी श्रीराधागोविन्द का अष्टकालीय लीलात्मक है। इस मे २० सर्ग तथा सर्व ममेत १३२६ श्लोक हैं। १६०१ शाफ में इस महा- काव्य की रचना हुई थी। इस प्रन्य में श्लिष्ट शब्दों का प्रचुर प्रयोग रहने पर भी भीतर निगढ़ शृङ्गाररस कोन्यजिन दिया गया है। अष्टकाल स्मरगप चिसय में यह अद्वितीय :न्य है। ताडाशाधिपति भक्तप्रवर वनमाली रायबहादुर की सहायता से यह अन्य ताडाश• चगीचा वृन्दावन मे देवनागरी तथा गाक्षर में प्रकाशिन हो चुका है। (0) गौरागलीलामृत-महाप्रभु की अष्टकालीन लीलात्मक श्लोकों से विरचिन यह अति सुद्रापार ग्रन्थ है। (३) ऐश्वर्यादम्बिनी-इस का नाम पय प्रथयार ने निनरचित माधुर्यकादम्बिनी में छाया है । इम में तानबाट हा विचार है। अभी तक इस ग्रन्थ का अनुसन्धान नहीं प्राम है। (४) माधुर्यकादम्बिनी-इस में आठ परिच्छेद अर्थात आठ अमृतवृष्टि है । माधुर्यकादम्बिनी तो माधुर्यगदम्बिनी अर्थात माधुर्य की घनघटा है । वगाक्षर में सानुबाद कई सस्करण में यह प्रथ प्रकाशित हो चुका है । वृनापन चार सम्प्रदाय के श्रीरामदास शास्त्री जी के द्वारा देवातर म सानुनाद प्रकाशित भी हुआ है। इस में श्रीपादरूपगोस्वामि के द्वारा निरचित भक्तिरसामृतसिन्धु के अन्तर्गत् भक्तिभूमिका का सविशेष सुन्दर रूप से वर्णन है। प्रेमी रसिक इस प्रन्थ का अरश्य परलोकन करेंगे। (५) श्रीस्तवामृतलहरी- इस मे ८ स्तव का सञ्चय है । जो कि स्तवावली तथा स्तरमाला के अनुकरण मे विरचित हुई है। (१) श्रीगुरुतत्त्वाष्टक, (२) श्रीगुरुचरण स्मरणाटक, (३) श्रीपरमगुर्राष्टक, (४) परात्परगुर्गाष्टक, (५) श्रीनरोत्तम- ठाकुर महाशयाटक, (६) श्रीलोकनाथाष्टक,(७) श्रीशचीनन्दनाष्टक, (८) श्रीस्वरूपचरितामृत, (६) स्वप्नविलासामृत, (१०) श्री गोपालदेवाष्टक, (११) श्रीमदनगोपालदेवाष्टक (-१२) श्रीगोवि. न्दाष्टक, (१३) श्रीगोपीनाथाष्टक, (१४)श्रीगोकुलानन्दगोविन्दा- प्टक, (१५) स्वयभगवत्नाटक, (१६) जगन्मोहनाप्टक, (१७) अनुरागवल्ली, (१८) श्रीवृन्दाष्टक, (१६) श्रीराधाध्यान, (२०) श्रीरूपचिन्तामणि, (२१) सकल्पकल्पद्रुम, (प्रस्तुत) (२२) निकुञ्जफेलिविस्तावली, (२३) श्रीसुरतकथामृते, (२४) नन्दी- श्वराष्टक, (२५) वृन्दावनाष्टक, (२६) गोवर्द्धनाष्टक, (२७) श्रीकृष्णकुण्डाष्टक, (.८) गीतवली है । गाक्षर में इस का प्रका- शन हो गया है। (६) भक्तिरसामृतसिन्धुविन्दु-यह भक्तिरसामृतसिन्धु ग्रन्थ का सारगर्भ सक्षेप सरल सस्कृत गद्य में विरचित है। इस का दे. वाक्षर मे प्रकाशन चारसम्प्रदाय वृनारन में हो गया है। (७) उज्वलनीलमणिकिरण-यह भी उज्वलनीलमणि का सा- रगर्भ सक्षेप सरल गद्य प्रन्य है। (८) भागवतामृतकण-यह लघुभागवतामृत अन्य का सार- गर्भ सक्षेप सरल गद्य ग्रन्थ है । चार सम्प्रदाय वृन्दावन से सानु- वाद देवाक्षर म प्रकाशित हुआ (E) रागवर्त्मचन्द्रिका-रागमार्ग म जाने वाले रसिकसाधकों का यह ग्रन्थ अति सुन्दर तथा परमोपयोगी है । इस में रागमार्ग का सुन्दर सरल भाषा से विचार किया गया है । देवाक्षर में इस का प्रकाशन करने की इच्छा है। (१०) गौरगणचन्द्रिका-इस म पहले अहं ग्रहोपासना का निराकरण है। (११) चमत्कारचन्द्रिका-यद, श्रीराधागोविन्द को कौतुहल लीला रस से भरा हुआ है । श्रीकृष्ण विविध रूप धारण कर वि- विध छल से स्वामिनी जी से मिले है इस वा इस में सरस वर्णन - है। ताडाशमनिरोन्दामन से बंगाजर में यह छप चुका है। । (१२) प्रेमसम्पूट-इम में श्रीकृष्ण ने देयागना रूप बन कर प्रिया जी से प्रेमाकी शिक्षा ली। आज के रासमण्डलि इस लीला का अनुकरण करते हैं। इस का देन चक्रवती जी हैं । मैंने सानु- याद देवाधर में इसका प्राशन किया है। (१३)घ्रजरीतिचिन्तामणि-श्रानन्द-वृन्दाननचम्पू का भाव लेकर संक्षेप पद्याकार संस्कृत में रीतिगुण से इस की रचना की गई है। इस में नन्दीश्वर (नन्दप्राम) का सुन्दर वर्णन है । वंगाक्षर में प्रकाशन हो गया है। । “(१४) क्षणदांगीतिचिन्तामणि-इस में प्रतिपदा से लेकर प्रति- पढा पर्यन्त दोनों पक्ष की प्रत्येक तिथी में क्रम से अष्टकाल लीला का वर्णन है । यह वंगभापा के पद्यों में संगृहीत है। इस में चक्र- घर्तीजी के अधिकांश पद्य है । पर्यों में अपना नाम हरिवल्लभ रसा है। उन के द्वारा विरचित श्रीभागवत की टीका का नाम सारार्थ- दर्शिनी है । पण्डित समाज में इस की परम प्रसिद्धि है । चक्रवर्ती की टीका सब की आदरणीया इस लिये है कि यह परम रसमयी व्याख्या-अलङ्कार से सयुक्त है। इस से भागवतरस का भली भाँति अनुभव होता है। यह देवार्टर में अष्टटीका के साथ ताडारामन्दिर वृन्दावन से प्रकाशित हुआ है। वर्तमान इस का वितरण शेष प्राय हो गया है। गीता की सारार्थवपिरणी-टीका भी अति रसमयी भक्तिपक्षीय व्यारया के द्वारा अलकत की गई है। रसमयी व्याख्या में यह सर्वोपरि है। देवाक्षर मे इस ग प्रकाशन परम आवश्यक है । चक्रवर्ती नी की समस्त टीकाएँ प्राय गाक्षर मे प्रकाशित हो गई हैं। इन के द्वारा स्थापित विग्रह श्रीगोकुलानन्द जी वृन्दावन में विराजमान हैं। माथी शुक्ला पञ्चमी के दिवस श्रीराधाकुण्ड में 1- श्रीचक्रवर्ती जी अन्तर्हित हुए हैं । श्री वृन्दावन ,पाथरपुरा में इन की समाधि थी, जो वर्तमान गोकुलानन्द जी में अपसारित हुई है। बालुचर में इन के वशधर अभी भी मौजूद हैं -: चक्रवर्ती जी ने रसिक समाज-वैष्णव समाज का महान उपकार किया है । जीव- गोस्वामी जी के पश्चात् गौडीयसम्प्रदाय का जो पतनारम्भ हो उठा था उस का पुनः उद्धार चक्रवर्ती जी ने किया है। गौडीयवैष्णव समाज मे श्रीराधागोविन्द की परकीया उपासना की पद्धति महाप्रभु से लेकर अब तक चली आ रही है। पद्मपुराण के पातालखण्ड के वृन्दावनमाहात्म्य, सनतकुमार-सहिता के छत्ती- समाँ पटल, भागवतादि निखिल शास्त्रों से तथा रस के आदि आ- चार्य-जयदेव आदिक महानुभावों के साहित्य और चण्डीदास- विद्यापति आदिक प्राचीन रसिकों की वाणियों से यह सुसिद्ध है। श्रीजीव गोस्वामी जी के पश्चात् यह उपासना कुछ शिथिल ही पड़ गई थी। परन्तु श्रीचक्रवर्ती जी ने निज अकाट्य युक्ति व शास्त्र प्रमाणों से उस को सुदृढ़ कर दिया । महाप्रभु ने इस उपासना को परम स्थान दिया तथा श्रीरूप, सनातनादि गोस्वामियों के द्वारा उस का उद्घाटन करवाया । ऐसा कहा जाता है कि चक्रवर्ती के समय में कुछ पण्डितगणों ने परकीया उपासना के विषय को लेकर महान् वाद वितण्डा किया। परन्तु चक्रवर्ती जी ने निज प्रगाढ़ विद्वत्ता और अकाट्य युक्ति प्रमाणों के द्वारा उस को विचार के द्वारा परास्त कर सुदृढ़ कर दिया । पण्डितों ने वृन्दावन में एकान्त में भ्रमणकारी चक्राती के प्राणनाशार्थ उद्यत हुए। परन्तु उन्होंने देखा वहाँ पर चक्रवर्ती जी नहीं हैं। कोई एक ब्रजपालिका निज दो तीन-सहचरी के साथ पुण वीन रही थी। पण्डितों ने पूछा ! लाली! यहाँ चक्रवर्ती महात्मा को तुम ने देगा क्या ? बालिका ने कहा-देसा तो था, परन्तु कहाँ चल दिये होंगे । बालिका का कटाक्ष-भावभङ्गि-मन्दहास्य-
सौन्दर्य से पण्डितगण मुग्ध हो गये। उन सन का हृदय कोमल
हो गया । पण्डितों ने परिचय पूछने पर पालिका ने कहा
मैं
स्सा-
मिनी श्री राधिका की सहचरी हूँ। इस समय स्वामिनी जी निज
श्वसुरालय जावट में विराजमान हैं । उनने पुष्प चयनार्थ मुझे भेजी
है। ऐसी कहती रहती यह अन्तर्धान हो गई तथा निज पूर्वस्वरूप
चक्रवर्ती रूप में सडी हो गई। पण्डितों ने चक्रवर्ती के चरण में
गिर कर क्षमा प्रार्थना की। चनयती जी के पिपय में इस प्रकार
अनेक आश्चर्य बातें सुनने में आती हैं । उनके द्वारा विरचित यह
संकल्पकल्पद्रुम नामक प्रन्यरत्न रसिका के समक्ष सानुवाद उपस्थित
है। रसिक-समाज इसे कठहार कर ले तो मेरा यह परिश्रम सार्थक
हो जानें । अष्टकाल स्मरण की परिपाटी से यह अन्य लिया गया है ।
पूज्य गोस्वामी श्रीरासविहारी शास्त्री महोदय ने अनुवाद का सशो-
धन कर अत्यन्त उपकार क्यिा है।
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- श्रीव्रजविलासस्तव तथा श्रीदासगोस्वामी जी श्रानुमानिक १४१६ शकाब्दी में वंगदेश हुगलिजिला अन्तर्गत कृष्णपुरग्राम में हिरण्यमजुमदार के अनुज गोवद्धन के पुत्ररूप से प्रन्यकार श्रीपादरघुनाथदास जी का आविर्भाव हुआ था। इन के पिता-पित्य यद्यपि शुद्ध वैष्णव नहीं थे तो भी वैष्णव परायएए परम सज्जन रहे। वे सप्तप्राम तालुक के वारलक्ष रुपैया के जागीर. दार थे। श्रीरघुनाथ के दीक्षागुरु यदुनन्दन आचार्य हैं, जो कि श्रीअद्वैतप्रभु की शाग्या में हुए । अद्वैतप्रभु के वे अन्तरंग शिष्य होने के कारण श्रीचैतन्यगत प्राण रहै । श्रीरघुनाथ के वे कुलगुरु तया कुलपुरोहित थे । चैतन्यचरितामृत में कहा है श्रीरघुनाथ ने वाल्यकाल में श्रीहरिदासठाकुर का संग और कृपालाभ प्राप्ति की। परम पावन प्रेमावतार श्रीमन् महाप्रभु जब रामकलि होकर कानाइ. माटशाला से प्रत्यावर्तन कर शान्तिपुर श्रीअद्वैतप्रभु के घर पर 'आये, उस समय प्रभु के साथ रघु का साक्षात्कार हुआ। उन ने प्रभु का प्रेमावेश देख तप्तकाञ्चन की भाँति अङ्ग कान्ति वाले उन प्रभु के चरणों में ग्राम समर्पण किया तथा अद्वतप्रभु के द्वारा उच्छिष्ट प्राप्त होकर वे परम कृतार्थ हुए। उसी समय से उनका पूर्व भाव उच्छलित हो उठा । अब वे स्थिर न हो सके । नीलाचल जाकर प्रभु से मिलने के लिये व्याकुल हो गये। अब तो रघुनाथ अस्थिर होकर बार बार भागने लगे । पिता जी दूर से उन को धर लाते थे। इस प्रकार रघु का बार-बार पलायन देख कर एक दिवम उन की माता ने पिता से कहा-पुत्र को उन्माद हो गया है, उसे याँध कर रखना चाहिये । पिता जी खेद प्राप्त होकर कहने लगे जब इन्द्र सम ऐश्वर्य और अप्सरा सम नारी बाँध नहीं सके, तब रज्जु. बन्धन से किस प्रकार बंध सकता है । जन्मदाता पिता पुत्र का प्रार- ब्ध नहीं मिटा सकता है । इस के ऊपर चैतन्यचन्द्र की कृपा हुई है।
- चैतन्यचन्द्र के पागल को कौन रोक सकता है। उस के पश्चात् नित्यानन्द प्रभु के साथ पाणिहाटी में रघुनाथ का मिलन हुआ। प्रभु ने रघु को सान्त्वना दी और उन से चिडा महोत्सव कराया। रघुने राघव पण्डित के द्वारा निज भाव व्यक्त कराया। हे प्रभु ! मैं बार-बार महाप्रभु के पास जाने के लिये पलायन करता हूँ, परन्तु पिता माता घर लोटा लाते हैं । मैं कर्तव्य शून्य हो रहा हूँ, आप की कृपा ही एक मात्र गौरचन्द्र प्राप्ति का सम्वल है। आप कृपा की. जिये । जिस से शीघ्र ही गौरचन्द्र के चरण प्राप्त करूँ। नित्यानन्द प्रभु ने निकट बुला कर कहा--रघुनाथ ! तुम ने जो चिडा-महोत्सव कराया है, उसे महाप्रभु ने स्वयं श्राफर ग्रहण किया है । तुम पर कृपा करने के लिये ही उन का यहाँ आगमन हुआ है। जाा नि- श्चिन्त होकर घर में रहो । अचिरात् प्रभु के चरण प्राप्त करोगे । श्रीरघु नित्यानन्दप्रभु की कृपा आशीर्वाद लेकर घर आये । “किस प्रकार महाप्रभु से मिलूंगा" निरन्तर उसी की चेष्टा रही। उस दिन से रघुनाथ घर के बाहर दुर्गामण्डप में शयन करने लगे। चार ओर रक्षकगण । किस प्रकार पलायन कर सकूँ इस सोच में हैं । एक दिवस रघु के गुरुदेव यदुनन्दन श्राचार्य वहाँ आये। उन का ठाकुर सेवक सेवा छोड़ कर स्वतन्त्र हो गया था। उसी को वश में लाने के लिये रघु के पिता से निवेदन कर रघं को संग में लेकर चल दिये । रघु गुरुदेव के साथ कुछ दूर गये और "मैं उस भृत्य को वश मे करादूंगा । आप निश्चिन्त हो घर जाइये" इस प्रकार कह कर वहाँ से फिर आये । तव रघुनाथ ने मन में विचार किया-यह गृह छोड़ने का सुन्दर अवसर है। अयं वहाँ से पूर्व मुख होकर नीलाचल के लिये चल दिये। मार्ग में इधर उधर देखते हुए प्रसिद्ध मार्ग छोड़ वन पथ में पन्द्रह कोस चल कर किसी गोप की बगीची मे रहे । उस ने कुछ दूध पिलाया। इधर रघुनाथ के चले जानेका महान् कोलाहल उठा । पिता ने हुँढ़ने के लिये दश व्य- क्ति भेजे तथा शिवानन्द जी के निकट विनती के साथ पत्र दिया। शिवानन्द जी भत्तों के साथ नीलाचल जा रहे थे। रघु को ढूँढ़ने याले लोगों ने रघु को नहीं पाकर फिर श्राये। इधर रघु ने कभी चर्वण, कभी दुग्धपान, कभी रन्धन और कभी उपवास कर प्राण- मात्र धारण करते हुए बारह दिन में नीलाचल पहुँचे । मार्ग में तीन दिन मात्र भोजन किया था। नीलाचल में प्रभु भक्तगण के साथ विराजमान हैं। रघु दूर से प्रभु के चरण में गिरे । प्रभु प्रसन्न हुए। रघु से कहा अच्छा ही हुआ। समर्थ प्रभु ने तुम को विषय गर्त से निकाला है। रघुनाथ को मलिन देख कर प्रभु ने स्वरुप गोस्वामी से "स्वरूप! अव से रघु तुम्हारा हुआ । तुम इस को अपने पास रखो"ऐसा कह कर रबु का हाथ देकर स्वरूप गोस्वामी को सौंपा । तब से 'स्वरूप के रघु' ऐसी सब कोई कहने लगे। श्री- रघु पहले कुछ दिन सिंहद्वार में खड़े होकर जो कुछ भिक्षा मिलती थी, उस को गृहण करते थे । प्रभु ने सुन कर कहा अच्छा ही है, रघु वैराग्य धर्म का पालन करता है । कुछ दिन के पीछे उस वृत्ति को छोड़ कर छत्र में माधुकरी माँगने लगे। प्रमु ने निज गोवर्द्धन- शिला और गुञ्जमाला को रघु के लिये अर्पण किया। जिन्हें शङ्क- रानन्द सरस्वती जी ने वृन्दावन से लाकर प्रभु को दिया था। रघु- नाय जल, तुलसी देकर आदर के साथ सेवा करने लगे। उन का चरित्र अति विस्तृत है। विशेष जानने की इच्छा हो तो.चैतन्य- चरितामृत-भक्तमालादिक प्रन्य देख लें। उन्होंने नीलाचल में रहकर सोलह वर्ष पर्यन्त महाप्रभु की अन्तरंग सेवा की । जब महाप्रभु ने अन्तर्धान लीला की तथा उन के शिक्षागुरु श्रीस्वरुप गोस्वामीजी का अन्वर्द्धन हो गया,तब वे अत्यन्त आत्महारा होकर व्याकुल भाव से गोवर्द्धन में भृगुपात करने की इच्छा से वृन्दावन (४) आये । वृन्दावन में आकर उन्होंने श्रीरूप-सनातन की चरणवन्दना की। दोनों भ्राता ने उन को समझा कर शरीर त्याग नहीं करने दिया तथा अपने पास में रखा । दोनों ने महाप्रभु की यावतीय अ. न्तरंग-वहिरंग लीला का अवण उन के मुख से निरन्तर सुना। घृन्दाबन में दासगास्वामी की स्थिति व पैराग्यनिष्ठा इस प्रकार हुई । उन्होंने अन्न जल का त्याग पहले से ही तो किया था, अव केवल दो-तीन पल मात्र मट्ठा पान कर शरीर धारण करने लगे। नित्य वैष्णवों के लिये दो हजार प्रणाम,सहस्रदण्डयत्त,लक्ष नाम जप, रात्रि दिन राधाकृष्ण की मानससेवा, एक प्रहर महाप्रभु का चरित्र वर्णन, तीन सन्ध्या राधाकुण्ड में स्नान, ब्रजवासी वैष्णवों का प्रा- लिङ्गन, साढ़े सात प्रहर भक्ति का साधन, केवल चारिदण्ड शयन करते थे, और वह भी कदाचित् नहीं हो पाती थी। आप ने एक दिवस मानसिक सेवा में प्रियाप्रियतम को मान. सिक खीर भोग लगा कर स्वामिनी जो का अधरामृत प्राप्त किया। उस से उन का शरीर कुछ अस्वस्थ हो गया तथा नाड़ियाँ भारी हो गई। ऐसे दी तो ये पहले से रुग्ण रहते थे। श्रीविहल जी ने दो वैद्य लाकर उन्हें दिखाया । वैद्य ने कहा इन्होंने खीर खाई है, जिससे इन की नाड़ियाँ भारी हो रही है। सब कोई आश्चर्यान्वित हुए। विट्ठल जी ने एकान्त में इसका रहस्य पूछा । उन ने मानसिक सेवा की यात मुनाई । रघुनाय गोस्वामी जी ने जो उत्कट पैराग्य का याजन किया वह जगत् में परम श्रादरणीय महान् श्रादर्शरूप है। राधिकानिष्ठा में दास गोस्वामी जी का सर्मोच्चस्थान है। वे करुणरस का मूर्तिमान स्वरूप थे। धिरह की परमावस्या उन्हीं के द्वारा प्रस्ट हुई है। विधि मार्ग तया रागमार्ग में भगवान की दो प्रकार की प्राप्ति है। जिसमें शास्त्र-सद् अाचरणादियों का विधान है इस को विधि उपा- 1 सना और जिसमें केरल लोभ ही प्रवर्तित रहता है, से रागमार्ग की उपासना कहते हैं । परन्तु दोनों का परस्पर कुछ ससर्ग अवश्य रहता है । निधि एक ऐसी वस्तु है जो कि अन्य उच्छ मल मार्ग से साधकों के चित्त को सींच कर केरल भगवान् में लगा देती है, जिसे साचन भकि कहते हैं । दूसरी रागमार्ग की उपासना में रुचि ही प्रधान रहती है, जिसे प्रेमाभक्ति कहते हैं विधि भक्ति का याजन करते हुए साधको के चित्त मे फलरूपा प्रेमामक्ति का उदय होता है। पहिले मे ही कोई विधिमार्ग को छोड कर रागमार्ग में प्रवेश नहीं करता है । क्योंकि उस मे पतन का भय और प्रत्यगाय की सम्भावना अवश्य रहती है । पद पद में खलता भी आ जाती है । इस से इप्ट भगवत् वस्तु से श्रन्यत्र मनोऽभिनिवेश हो जाता है । इसी लिये सर कोई पहले शास्त्र मार्ग का अवलम्बन कर प्रभु की भक्ति साधना में प्रवर्तमान होते हैं । रागमार्ग म विधि की संकोचता हो जाती है। फ्लत भत्त विधिमार्ग की अयस्या को छोड कर रागमार्ग मे अपन को प्रार्त्तमान करता है । जब हृदय मे प्रचुर राग हो तो हम विधि को छोड सकते हैं । नहीं तो नहीं । राग भक्ति तो रानमल स्वरूपा है। दूसरी निधिभक्ति उस की सुन्ढ परकोटा अर्थात् गढ रुपा है । भक्ति कल्पवृक्ष के पत्तों का चि क्षण कोमल-सरस युक्त भीतर का अंश रागमार्ग है और कुछ श-रूसा बाहिर अरा विधिमार्ग है । जन तक रुचि उत्पादन नहीं होती है, तव तक सब के लिये विधिमार्ग की उपासना अवश्य क- व्य है । नित्य परिकर श्रीराधिकादि नज-गोपियों का प्रारम्भ से ही अनुराग रहता है, जिस को रागात्मिका भक्ति कहते हैं । इस में शास्त्रयुक्ति की अपेक्षा नहीं रहती है । गौडीय वैष्णवगण प्रायश विधिभक्ति का लेने हुए रागमार्ग में प्रवर्तित होते है। यहाँ प्रस्तुत विषय यह है कि ब्रज के रहस्य को अरगत करान के लिये श्रीरूप ।
है "ब्रजभूमि-रहसि राधाकृष्ण भक्त तोप हेतु उद्धार कियो"इत्यादि। सनाननादि गौड़ीय प्राचार्यो ने ब्रज-सम्बन्धि अनेकानेक अन्य की रचना की है। इस विषय में भक्तमालकार श्रीनाभा जी ने कहा श्रीरूपगोस्वामि चरण ने वाराहपुराण, श्रादिपुराण, स्कन्धपुरा गणादि समस्त शास्त्रों का आधार लेकर "मथुरामहिमा" नामक एक व्रज सम्बन्धि ग्रन्थ का आविष्कार किया है। श्रीनारायणभट्ट गोस्वा- मि चरण ने भी व्रजसम्बन्धी असंख्य ग्रन्थ लिखे हैं। उन के द्वारा विरचित "ब्रजभत्तिविलास" नामक ग्रन्थ व्रज माहात्म्य को अवगत कराने में अत्युच्च सर्वोपरि अन्य है। जो कि हाल में ही प्रकाशित हुआ है । साथ ही साथ श्रीरघनाथदास गोस्वामि चरण ने भी राग मार्ग प्रवर्तित भक्त-रसिकों के लिये "व्रजविलासस्तव" नामक इस ब्रज सम्बन्धिस्तय की रचना कर परम उपकार किया है। यह एक ऐसा ग्रन्थ है कि इसे रसिक प्रेमी कण्ठ कर लेवें तथा व्रज में उन्हीं स्थानों में जाकर “वस वास" प्रदक्षिणादि के साथ बिलाप करते हुए पाठ कर प्रणाम व वन्दना करते रहे। ग्रन्थकार ने इस स्तव के १०३ संख्यक श्लोक में ऐसा ही निर्देश किया है। उन्होंने "श्रीस्त- चावली" नामक वृहत् अन्य का सङ्कलन किया। उसी स्तवावली के अन्तर्गत १०७ श्लोकात्मक यह "जविलास" नामक , स्तवरत्न है, जो कि सानुवाद प्रेमी रसिकों के समक्ष उपस्थित है। पहले "स्तवा. वली" के अन्तर्गत "विलापकुमुमाञ्जली" भी श्रीवृन्दावनदास जी के द्वारा विरचित छन्दवद्ध प्रजभापा के साथ प्रकाशित हो गई है। "ब्रजविलासस्तव" ब्रजपरिक्रमा देने वाले निष्किचन रागमार्गीय वैष्णव प्रेमियों की परम उपादेय वस्तु है । मेरी आशा तो बहुत दिनों से थी कि यह सानुवाद प्रकाशित हो । आज गुरु-गौरांगगणों की पुनीत कृपा से मेरी श्राशालता फलवती हुई है। श्रीवृन्दाबन- निवासी पूज्य गोस्वामि श्रीरासविहारी शास्त्री महोदय ने अनुवाद का संशोधन कर परम उपकार किया है। श्रीदासगोस्वामि के द्वारा विरचित तीन ग्रन्य हैं । स्तवावली, मुक्ताचरित्र, दानकेलिचिन्ता- मणि हैं। स्तवावली में २६ स्तयों का प्रन्यन किया गया है । (१) श्रीशचीसून्यष्टक, (२) श्रीगोराङ्गस्तवकल्पतरु, (३) मनः शिक्षा, (४) प्रार्थना, (५) गोवर्द्धनाश्रयदशक, (६) गोवद्ध नवासपा- र्थनादशक, (७) श्रीराधाकुण्डाष्टक, (८) व्रजविलासस्तब, (६) विलापकुसुमाञ्जली, (१०) प्रेमपूराभिषस्तोत्र, (११) प्रार्थना, (१२) स्वनियमदशक, (१३) श्रीराधिका-अष्टोत्तरशतनामस्तोत्र, (१४) श्रीराधाप्टक, (१५) प्रेमाम्भोजमरन्दाख्यस्तवराज,(१६) स्वसङ्कल्पप्रकाश स्तोत्र, (१७) श्रीराधाकृष्णोज्ज्वलरसकेलि,(१८) प्रार्थनामृत, (१६) नवाष्टक, (२०) गोपालराजस्तोत्र,(२१) श्री- मदनगोपालस्तोत्र, (२२) श्रीविशाखानन्ददस्तोत्र, (२३) मुकु- न्दाष्टक, (२४) उत्कण्ठादशक, (२५) नवयुवद्वन्द्वदिदृक्षाप्टक, (२६) अभीष्टप्रार्थनाष्टक, (२७) दाननिर्वर्तनकुण्डाष्टक, (२८) प्रार्थनाश्रयचतुर्दशक, और (२६) अभीष्टसूचन है। यह ग्रन्थ सटीक वंगानुवाद के साथ श्रीरामनारायण विद्यारत्न के द्वारा वह- रमपुर से वंगाक्षर में प्रकाशित है। दूसरा मुक्ताचरित है । यह एक अद्भुत रसमय हास्य परिहासा. स्मक वागविलास वैभवरूप है । श्रीकृष्ण ने कृपक बनकर मुत्ताओं का रोपण किया इस का वर्णन है। इस प्रकार की रचना परिपाटी अन्यत्र साहित्य भण्डार में प्रभाव है । सानुवाद वंगाक्षर में यह मन्य देवकीनन्दन प्रेस वृन्दावन से प्रकाशित हो चुका है। तीसरा मन्थ दानकेलिचिन्तामणि है । यह भी हास्य परिहासमय श्रीराधागो. विन्द की दानलीला वर्णनमय परम अद्भुत अन्य है, श्रीनवद्वीपनि- वासी श्रीहरिदासदास महोदय के द्वारा यह ग्रंथ बंगाक्षरमें प्रकाशित हो गया है। श्रीचैतन्यचरितामृत में कविराज गोस्वामि ने ऐसा कहा है-श्रीचैतन्यलीला रत्नसार' का भांडार श्रीस्वरूप गोस्वामी है। उन्होंने उन लीला-रलों को श्रीरघुनाय के कण्ठ में रख दिया। उन के मुख से जो कुछ सुना है उसे विस्तार पूर्वक लिग्य कर भक्तगणों को भेट करता हूँ | श्रीचैतन्यचरितामृत की भित्ति नीदास गाम्यामि जी का उपदेशात्तथा उन के द्वारा प्रमुलीला का वर्णन है। महाप्रमु के द्वारा प्रदत्त श्रीगोवद्धन शिला पहिले राधाकुण्ड में पश्चात् वृ- न्दावन गोकुलानन्द जी में विराजमान रही। श्रय यह शिला विग्रह धृन्दावन भागवत निवास रमणरेती) पण्डित बाबा के आश्रम में विराजमान हैं । प्रभु प्रसन्न होकर दासगास्वामी नो का श्रादर कर के प्रदान किया था। उसे महाप्रभु हृदय में धारण करते थे तथा नयन जल से भिगोते थे, आज यह श्रीगोवर्द्ध नशीला रघुनाथ के राधा गिरधारी करके वैष्णव समाज में प्रसिद्ध है। श्रीराधाकुण्ड के मानसपावन घाट में दासगोस्वामी जी की समाधि है । प्रतिवर्ष श्राश्विनी शुक्ला द्वादशी निथी में वहाँ दास- गोस्वामी जी का तिरोधान उत्सव होता है । सेवा प्राकट्य और इ. लाभ का दिन निर्णय" नामक ग्रन्थ में लिखा है-सम्बत् १५६३ में दासगोस्वामी जी का जन्म, १६ वत्सर गृहस्थिति ८ वत्सर पुरी में स्थिति तथा श्रीराधाकण्ड में ४६ वत्सर अवस्थान है । अतः ७६ वत्सर वयस में १६३६ संवत् में उनका अन्तर्धान समय है। -कृष्णदास। . 1 श्री राधाकृष्णायशोद्देशदीपिका मङ्गलाचरणम् । वन्द गुरुपदद्वन्द्व भक्तवृन्दसमन्वितं । श्रीचैतन्यप्रभु वन्द नित्यानन्दसहोदितम् ॥ १॥ श्रीनन्दनन्दनं वन्द राधिकाचरणद्वयम् । गीपीजनसमायुक्त वृन्दाबनमनोहरम् ॥ २॥ ये सूत्रिताः सता रत्या प्रसिद्धाः शास्त्रलोकयोः । व्याक्रियन्ते परिवारास्ते वृन्दावननाथयोः ॥३॥ मथुरामण्डले लोके ग्रथेषु विविधेषु च । पुराणे चागमादौ च तद्भक्तेषु च साबुपु ॥ ४॥ ते समासाद्विलिख्यन्ते स्वसुहृत्परितुष्टये । आनुपी विधानेन रतिप्रथितवर्त्मनः ॥ ५ ॥ ग्रन्थारम्भः- भक्तगणों के साथ श्रीगुरुदेव के चरण कमल तथा नित्यानन्द प्रभु के साथ अवतीर्ण श्रीचैतन्यमहाप्रभु की वन्दना करता हूँ॥१॥ वृन्दावन में मनहरणकारी, गोपीजनों से वेष्टित, श्रीनन्दनन्दन तथा श्रीराधिका के चरणकमल की पन्दना करता हूँ॥२॥ जो माधुजनों के द्वारा अनुराग के साथ सत्रण किये हुए, जो लोकपरम्परा तथा शास्त्रों में प्रसिद्ध हैं, मैं उन वृन्दावन के दंश श्री- राधा-गोविन्द के परिवार-समूह का नाम प्रणाली बद्ध करके वर्णन करता हूँ॥३॥ मथुरामण्डल का लोक प्रवाद तथा विविध प्रन्य, पुराण, भाग- मादि मे से, फिर उनके भक्तसाधुगण के निकट जो जानकारी है, उसे श्री राधाप्रामणोदेशदीपिरा ते कृष्णस्य परीपारा ये जना प्रजवासिन । पशुपालास्तथा विप्रा वहिप्ठारचेति ते त्रिधा॥६॥ १। तत्र पशुपाला ॥ पशुपालास्त्रिधा वैश्या आभीरा गुजगस्तथा । गोप-वल्लव पर्याया यदवशसमुद्भना ॥७॥ (7) वेश्या ।। प्रायो गोवृत्तयो मुख्या वैश्या इति समीरिता । अन्येऽनुलोमजा केचिदाभीरा इति विश्रु ता ॥८॥ (ख) आभीरा ॥ आगनाद्यनु तत्साम्यादाभीराश्च स्मृता इमे । आभीरा शूटजातीया गोमहिप्यादिवृत्तय । घोपादिशब्दपाया पूर्वतो न्यनतां गता ॥६॥ निज सुहद्गण के प्रसन्नार्थ यथाम्म रागमार्ग के अनुकूल सक्षेप में वर्णन करता हूँ॥४॥५॥ कृारणसेवा परायण, व्रजमासिगण ही श्रीकृष्ण के परिवार हैं। यह परिवार पशुपाल, विप्र, वहिष्ट रूप से तीन प्रकार का है ॥६॥ पशुपाल भी फिर वेश्य, अहीर, गृजर भेद से तीन प्रकार के हैं। वे सब यदुरश मे उत्पन्न तथा गोप, और बल्लय पर्याय से भी रयात है ॥ ७॥ वैश्यगण प्राय गोरस के द्वारा जीवन निर्वाह करते हैं तथा घे सय श्रेष्ठ माने जाते है । कोई कोई इनका अहीर कह कर उल्लस करते हैं । और अन्य सत्र अनुलोम जात हैं अर्थात् जिनका पिता उच्चवर्ण है और माता हीनवर्ण है !! ८ ॥ अाभीरगण गोवत्सादिक की सेवा के द्वारा जीवन निर्वाह करने के कारण वैश्यों के समान तथा शूद्रजातीय है । गो-महिपादिको को
३
श्री राधाकृष्णगणोदेशीपिका
(ग) गुर्जरा ॥
विञ्चिदाभीरतो न्यनाश्यागादिपशवृत्तय ।
गोष्ठप्रान्तकृतानामा पुष्टागा गुज्जरा स्मृता ॥ १०॥
२१चिप्रा ॥
सर्ववेदनिदो विप्रा याजनाद्यधिमारिण ॥११॥
३। पहिष्ठा ॥
वहिष्ठा कारव प्रोत्ता नानाशिल्पोपजीनिन ॥१२॥
एभि पञ्चविधेरेन परीनारा हररिह।.
पूज्या भ्रातृभगिन्याद्या दुत्यो दासाश्च शिल्पिन ।
दासिकाश्च वयस्याश्च प्रेयस्यश्चेति तेऽटधा ।।
मान्या भ्रातादयस्तस्य वयस्या सेवफादय ।
श्रीगोष्ठयुवराजस्य प्रेयस्यश्च पुरक्रमात् ॥ १३ ॥
चराना इनका प्रधान काय्य है तथा घोप प्रभृति इनकी उपाधि है और
पेसन पहिले से कुछ हीन माने जात हे ॥६॥
गुर्जरगण अाभीर से कुछ हीन हैं तथा छागादि पशुआ का पा
लन करते हैं । ये सब गोप्ठ के वाहिर प्रान्तदेश मे वास करते हैं,
तथा कुछ हप्र पुष्ट होते हैं।॥ १० ॥
पिप्रगण समस्त वेद वेदान्त से जानने वाले तथा यनन याननादि
मार्य म निरत रहते हैं ॥ ११ ॥
नाना प्रकार के शिल्पोपनीची कारुगण को वहिष्ठ कहते हैं। श्री
कृष्ण
के
यह पाँच प्रकार के परिवार हैं॥१०॥
पूज्य भ्रातृभगिनी प्रभृति, दूतीवर्ग, दास,शिरपी, दासी, पयस्य
और प्रेयसी भेट मे वे सब परिवार फिर आठ प्रकार के हैं। श्रीन
रान नन के भ्रातृवर्ग,वयस्य, मेवक ओर प्रेयसीगण गोष्ठयुवरान
श्रीकृष्ण के मान्य हें ॥ १३ ॥
४
श्री राधाकृष्णगणोदेशदीपिका
पूज्याः ॥
पूज्याः पितामहाद्याश्र तथा ज्ञेया महीसुराः ॥ १४ ॥
पितामहो हरेगरिः सितकेशः सिताम्बरः ।
मङ्गलामृतपर्जन्यः पर्जन्यो नाम वल्लवः ।
यः सुर नि देशेन लक्ष्मीभत्त् रूपासनाम् ।
वरिष्ठो ब्रजगोष्ठीनां स कृष्णस्य पितामहः ।।
पुरा नन्दीश्वरे चक्र श्रेष्ठसन्ततिकाझ्या ।
वागमूर्ती तते व्याम्नि प्रादुरासीत् प्रियङ्करी ॥ १५ । १६ ॥
"तपसानेन धन्येन भाविनः पञ्च ते सुताः ।
वरीयान् मध्यमस्तेषां नन्दनाम्ना भविष्यति ॥ १७॥
नन्दनस्तस्य विजयी भविता ब्रजनन्दनः ।
सुरामुरशिखारत्न-नीराजितपदाम्बुजः" ।। १८ ॥
पितामह, मातामह प्रभृति तथा ब्राह्मणगण श्रीकृष्ण के पूय पद-
बान्य हैं ॥ १४॥
श्रीकृष्ण के पितामह का नाम पर्जन्य है । वे मंगलरूप सुधाव:
पण के कारण पर्जन्य अर्थात मेघ तुल्य हैं। इनका अंग गोरवर्ण
तथा केश शुभ्रवर्ण है । पहिले पर्जन्य ती ने नन्दीश्वरपर्वत में उत्तम
सन्तान कामना से देवर्षि नारदजी के उपदेशानुमार लक्ष्मीपति श्रीना-
रायण की उपामना की थी। पर्जन्यजी व्रज में सर्वमान्य तथा श्री
कृष्ा के पितामह थे । नपस्या करने में आकाशवाणी हुई कि "हे
पर्जन्य ! तुम्हारी इस पवित्र तपस्या के फल रूप पॉच पुन उत्पन्न
होगे। उनमें मे मध्यम पुत्र सर्वमान्य तथा नन्द नाम से विरयात
होगा। उस नन्द का व्रज आनन्दकारी ऐसा विजयी पुत्र होगा कि
समस्त सुर, अमुर अपने अपने मम्तक के रत्नममूह के द्वारा उनके
चरणकमल की आरती करेंगे।॥ १५॥ १८॥
श्री राधाकृष्णगणोद्देशढीपिका तुष्टस्तुत्र वसन्नत्र प्रेक्ष्म केशिनमागतम् । परीवारेः समं सर्वं ययौ भीतो बृहद्वनम् ॥ १६ ॥ पितामही महामान्या कुमुम्भाभा हरित्पटा । वरीयमीति विख्याता खा क्षीराभकुन्तला ॥२०॥ पितृव्यौ पितरूजन्यराजन्यौ बल्लवौ च यौ। नटी मुवेर्जनाख्यापि पितामहसहोदरा । गुणवोरः पतिर्यस्याः सूर्य्यस्यायपत्तनम् ।। २१ ॥ पिता ब्रजजनानन्दो नन्दो भुवनवन्दितः ।। २२ ॥ तुन्दिलचन्दनरुचिर्वन्धजीवनिभाम्बरः । तिलतण्डलितं कृर्च दधानो लम्बविग्रहः ॥ २३ ॥ पर्जन्यजी कुछ काल वहाँ निवास करते हुए फिर केशी नामक असुर के आगमन से भीत होकर समस्त परिवार के साथ महावन चल दिये ।। १६॥ श्रीकृष्ण की पितामही का नाम बरीयमी है । वे व्रजमण्डल में मान्यगण्या थीं। इनका अंग कुसुम्भपुष्प के तुल्य तथा वसन हरि- द्वर्ण था । वे आकार में ग्बा थीं तथा उनके केश दूध की तरह सफेद थे ॥२०॥ श्रीकृष्ण के पिता ब्रजराज के ऊर्जन्य और राजन्य दो पितृव्य (चाचा) थे तथा दोनों गोप ही कह कर माने जाते थे। नृत्यविद्या में चतुरा मुवेर्जना श्रीकृष्ण के पितामह पर्जन्य जी की सहोहरा भ- गिनी थी। इस सुवेर्जना के पति का नाम गुणवीर था। वे सूर्य- कुण्ड में वास करते थे ॥२१॥ श्रीकृष्ण के पिता का नाम नन्द है। वे भुवनवन्दित तथा ब्रजवा- मीगण के श्रानन्दरूप थे । उनका उदर स्थल, तथा अंगकान्ति बाँ. धुली पुष्प की तरह थी। तिल-तण्डुलित अर्थात् श्वेतकृष्णवर्ण मिश्रित दाढ़ी से युक्त लम्बायमान शरीर या ॥ २२ ॥ २३॥ 1 श्री राधाकृष्णगरणोद्देशनीपिका उपनन्दानुजो नन्दो वसुदेवमुहत्तमः । गोपराजयशोदे च कृपणतातो ब्रजेवरौ ॥ २४ ॥ वसुदेवोऽपि वमुभिर्दीव्यतीत्येप भएयते । यथा द्रोणस्वरूपश्च ख्यातश्चानम्टुन्दुभिः ॥ २५ ।। नामेद गारुडे प्राक्त मथुरामहिमक्रमे । वृषभानजे ख्यातो यस्य प्रियमुहृद्वर. ॥ २६ ॥ माता गोपयशोदात्री यशोदा श्यामलद्यति । मूत्ती वत्सलतेगासौ शक्रचापनिभाम्बरा ॥ २७ ॥ नातिस्थूलतनु. किञ्चिद्दीर्घमेचस्कुन्तला। ऐन्दवी-कार्तिदा यस्या प्रिया प्राणससी वरा ।। २८ ।। नन्द जी के बड़े भैया उपनन्द जी थे तथा वसुदेव जी इनके परम मित्र हुए । अज के ईश्वर अर्थात ब्रजेश्वर-व्रजेश्वरी कह कर ख्यात गोपराज यशोदा दोनों ही श्रीकृष्ण के पिता-माता हैं ।। ४ ।। वसु शब्द पुण्य, रल, धन, गुणवाची है। विशुद्ध सत्व गुण को पसु कहते हैं । वसु के द्वारा जो क्रीडाशील हैं वे वसुदेव हैं। वसुदेव जी शुद्ध सत्वगुण सम्पन्न थे। वे पहिले जन्म मे द्राणनामक वसु भी रहे । उनका एक नाम आनक्दुन्दुभि भी था । यह नाम गरुडपुराण में मथुरामाहात्म्य के प्रसग में कहा गया है। श्रीराधिका के पिता वृषभानु महाराज इनके परम सुहत् थे ॥ २५ ॥२६॥ श्रीकृष्ण की माता का नाम यशोठा है गोपगणो में यश को देने के कारण यशस्विनी अर्थात् यशोदा है। इनकी अमकान्ति श्यामल वर्ण है । वह वात्सल्यरस की मूर्ति है । इनका वसन इन्द्रधनुवर्ण की तरह है।॥७॥ इनका शरीर न अति स्थूल न अति कृश है। केशवलाप कुछ लम्चे मेचक (कृष्ण) वर्ण है । ऐन्दवी और कीर्तिदा इनकी प्राणु- तुल्य प्रियतमा एस श्रेष्ठा दो ससी थीं ॥ २६ ।।
७ श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका गोकुलाधीशगृहिणी यशोदा देवकी सखी। गोपेश्वरी गोष्ठराज्ञी कृष्णमातेति भण्यते ॥२६॥ तथा च आदिपुराणे- द्वे नाम्नी नन्दभा-या यशोदा देवकीति च । अतः सख्यमभूत्तस्या देवक्या: शौरिजायया ॥ ३०॥ राहिणी वृहदम्बास्य प्रहारोहिणी सदा। स्नेहं या कुस्ते रामस्नेहात् कोटिगुणं हगै॥ ३१ ।। उपनन्दोऽभिनन्दश्च पितृव्यौ पूर्वजो पितुः । पितृव्यौ त कनीयांसौ स्यातां सन्नन्दनन्दनी ॥ ३२ ॥ आद्यः सितारुणरुचिदर्घिकूच्! हरित्पटः । तुङ्गी प्रियास्य सारङ्गवर्णा सारङ्गशाटिका ॥ ३३ ॥ गोकुलाधीशगृहिणी, यशोदा, देवकीसग्बी, गोपेश्वरी, गोष्ठ- रानी, कृष्णमाता कह कर बोली जाती थीं ।। २६ ॥ आदिपुराण में कहा है कि-नन्दपत्नी के दो नाम हैं यशोदा ओर देवकी । इसीलिये वसुदेव की पत्नी देवकी के साथ यशोदा का वि शेष सम्यभाव था ॥ ३०॥ बलराम जी की माता रोहिणी अानन्द की मूर्ति थीं तथा श्री- कृष्ण की बड़ीमाता कह कर पुकारी जाती थीं और बलराम से भी श्रीकृष्ण के ऊपर कोटिगुण अधिक स्नेह करती थीं ॥३१॥ नन्द जी के उपनन्द और अभिनन्द दोनों बड़े भ्राता तथा स. नन्द और नन्दन दोनों कनिष्ठ भ्राता थे। वे सब श्रीकृष्ण के पितृ- व्य रहे ॥३२॥ उपनन्द जी की अंगकान्ति धवल और अरुणवर्ण थी। दाढ़ी दीर्घ तथा वस्त्र हरिद्वर्ण था । पत्नी का नाम तुगी था वह चातकवर्णा और चातकवर्ण की साड़ी पहिनने वाली थी॥३३ ।।
श्री राधाकृष्णगोटेशदीपिका द्वितीयः काम्बुरस्यश्री लम्बक)ऽसिताम् । भार्यास्य पीवरी नीलपटा पाठलविग्रहा ॥ ३४ ॥ सुनन्यापरपर्यायः सन्नन्तस्य च पाण्डरः । श्यामचेलः सितद्वित्रिशोऽयं केशवप्रियः ।। ३५ ।। भार्या कुवलयारक्ताचेला कुवलयच्छविः । नन्दनः शितिकाएठाभण्डातकामुमाम्बरः ।। ३६ ।। अपृथग्वरतिः पित्रा तरणप्राशी हो। असल्यास्य प्रिया विदयुत्कान्तिरभ्रनिमाम्बरा ।। ३७ ।। सानन्दा नन्दिनी चेति पितरते सहोदरे। कल्माषवसने रिकदन्ते च फेनरोचियी ॥ ३८ ॥ दूसरे अभिनन्द जी शंख के तुल्य गौरवर्ण तथा लम्यो दादी वाले और कृष्णरंग के वस्त्र पहिनने वाले थे। पत्नी का नाम पी- वरी था। पीवरी के वस्त्र नीलवर्ण तथा श्रग पाटलवर्ण था ॥३४॥ समन्द का दूसरा नाम मुनन्द है । इनका वर्ण पीला तथा श्याम वर्ण वस्त्र है। केवल दो तीन पेश सफेद हैं। वे कृष्ण के परम- प्रिय थे ।। ३५॥ भार्या का नाम कुवलया है । लाल वस्त्र को पहिनने वाली तथा कुवलय की तरह अंग कान्ति बाली थी। नन्दन का वर्ण मयूर- कंठ तुल्य तथा वसन चण्डात पुप्प के सदृश है ॥ ३६ ।। वे श्रीहरि के अत्यन्त प्रिय थे तथा पिताजी के साथ एकत्र वास करते थे। उनकी पत्नी अतुल्या नाम की थी वह विद्युत्त्व तथा मेघ की तरह वस्त्र पहिननं वाली थी ॥३७ ।। श्रीकृष्ण के पिता ब्रजराज को सानन्दा और नन्दिनी नाम वाली दो सहादरा भगिनी थी। वे विविध प्रकार के वर्ष वाले वस्त्र पहिन- ने वाली थीं। उनकी दन्तपंक्ति विरला थी थर्थात् वह दो चार दान श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका महानीलः सुनीलच रमणावेतयोः क्रमात् । पितुराद्यपितृव्यस्य पुत्री कण्डवदएडवौ। सुवले मुदमाप्ती यो ययोश्चारु मखाम्बुजम् ॥ ३६॥ राजन्यौ यो त दायादौ नाम्ना तो चाटवाटुको । दधिसारा-हविःसारे सम्मिण्यो क्रमात्तयोः ॥ ४०॥ मातामहो महोत्साहो स्यादस्य सुमुखाभिधः । लम्बकम्बुसमश्मश्रु : पक्रजम्बूफलच्छवि: ।। ४१ ॥ ख्याता मातामही गोष्ठे पाटला नामधेयतः। मातामही तु महिपी दधिपाण्डरकुन्तला। पाटला पाटलीपुप्पपटलाभा हरित्पटा ॥ ४२ ॥ प्रिया सहचरी तस्या मुखरा नाम वल्लवी। वाली थीं । फेन की तरह अंग शुभ्रवर्ण था । सानन्दा के पति का नाम महानील और नन्दिनी के पति का नाम सुनील था। दोनों श्री- कृष्ण के मौसा थे ॥३८॥ श्रीकृष्ण के आदि पितृव्य उफ्नन्द जी के कण्डव तथा दण्डव नामक दो पुत्र थे। दोनों सुवलजी से विशेष प्रामोद प्रमोद प्राप्त करते थे तथा दोनों का मुख कमल तुल्य सुन्दर था। चाटु वाटु नाम वाले नन्दजी के दो क्षत्रिय भ्राता थे । इनके पिता वसुदेवजी की ज्ञाति के थे। चाटु की दविसाय तथा याटु की हविःसारा नाम वाली पत्नीयाँ थीं॥३६॥ष्ट. श्रीकृष्ण के मातामह सुमुख विशेष उत्साही थे। वे लम्बे शंख की तरह सफेद बढ़ी वाले तथा पके जामुन के तुल्य अंग कान्ति वाले हुए ॥४१॥ श्रीकृष्ण की मातामही पाटला ब्रज में रानी कहकर प्रसिद्धा थी दही के तुल्य कुछ पीले नके केश थे । पाटली पुष्प की तरह पाटल- वर्ष तथा हरा बसन पहिनने वाली थीं ॥४२॥ मातामही पाटला की मुखय नामक एक प्रिय सहचरी गोपी थी १० श्री राधाहनणगणोदेशदीपिका ब्रजेश्वयं ददौ स्तन्य ससीस्नेहभरेण या ॥४३॥ सुमुसस्यानजश्चारमुसोऽञ्जननिभच्छवि । भार्यास्य कुन्लटीपर्णा वलाका नाम बल्लवी। गोलो मातामहीभ्राता धूमलायसनच्छति ॥४४॥ हसितो य स्वसुर्भा सुमसेन धोद्धर । दुर्वाससमुपास्यैव कुल लेभे बजाज्वलम् ॥ ४५ ॥ यस्य सा जटिला भार्या नांखनर्णा महोदरी। यशोधर-यशोदेव मुदेवाद्यास्तु मातुला ॥ ४६ ।। अतसीपुष्परचय पाण्डराम्बरसनृता. । येपा धूम्रपटा भाया काटीकुसुमत्विप ॥४७॥ रेमा रोमा सुरेमाख्या पाचनस्य पितृव्यजा । मातृष्वसु पतिमल्ल स्वसा मातुर्यशस्विनी। जो कि पाटला के स्नेह से ब्रजेश्वरी यशोदा को दूध पिनाया करती थी॥४३॥ सुमुस के छोटा भैया चारुमुस है । उसकी कान्ति अनन की तरह है। उसकी भार्या बलाका कुलटी वर्ण थी। मातामह के भैया का नाम गोल तथा वसन धूम्रवर्ण का था । भगिनीपति सुमुस जब हास्य करते थे तव गोल प्रोध के मारे व्यतिव्यस्त हो जाते थे। उन्हों ने पहले दुर्भासा जी की आसना कर ब्रज मे उज्वल वश मे जन्म लाम किया था ।।४४|४५॥ इनकी पत्नी जटिला काकवर्ण और स्थलोदरी थीं। यशोधर, यशोदेव,सुदेव आदिक श्रीकृष्ण के मामा थे ।। ४६॥ इन सरकी कान्ति अतसी पुष्प (अलसी के फूल) की तरह थी। वे सर पीले वस्त्र पहिनत थे । इन सबकी भार्या यूँ अाट वस्त्र पहनती थीं और कटी पुष्प की तरह कान्तिवाली थीं ।। ४७ ॥
श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका यशोदेवी यशस्विन्यावुभे मात : सहोदरे ।। ४८॥ दघिसारा-हविःसारे इत्यन्ये नामनी तयोः । ज्येष्ठा श्यामानुजा गौरी हिंगुलोपमवाससी ॥ ४६ ।। चाटवाटुकयोर्भार्ये ते राजन्यतनुजयोः । पुत्रश्चारमुखस्यैकः सुचारनामशोभनः ॥ ५० ॥ गोलभ्रातु सुता यस्य भार्या नाम्ना तुलावती। पितामहसमास्तुण्ड-कुटेरपुग्टादयः ।। ५१॥ किलाऽन्तकेल-तोलाट-कृपीट-पुरटादयः । गोएडकल्लोडकारण्ड-तरीपणवरीपणाः । वीरारोह-वरारोह-मख्या मातामहोपमाः ।। ५२॥ वृद्धाः पितामहीतल्याः शिलाभेरी शिखाम्बरा । भारुणी भंगुरा भली भारशाखा शिखादयः ॥ ५३॥ रेमा, रोमा, सुरेमा नामक पावन जी की तीन पितृव्यकन्या थीं। यशोदेवी और यशस्विनी श्रीकृष्ण की माता यशोदा जी की सहोदरा भगिनी हैं। यशस्विनी के पति का नाम मल्ल था ॥ ४ ॥ यशोदेवी और यशस्विनी का नामान्तर दधिसारा हविःसारा भी या । ज्येष्ठा यशोदेवी श्यामवर्ण तथा कनिष्ठा गौरवर्ण थी । हिंगुल के सदृश दोनों का वस्त्र था ॥४६॥ वे दोनों पहिले कहे हुए क्षत्रिय तनय चाटु और वाटुक की भा. या थीं। चारुमुख के सुचारु नामक एक सुन्दर पुत्र हुआ था ॥५०॥ पहिले कहे हुए गोल जी की जो भ्रातृकन्या तुलावती थी, वही सुचारु की भार्या थी । तुण्डु, कुटेर और पुरटदिफ सव श्रीकृष्ण के पितामह के तुल्य थे ।। ५१ ।। किल, अन्तकेल, तीलाट, कृपीट, पुरट, गोण्ड, कल्लोट्ट, तरी- पण, परीपण, घीगरोह, वरारोह आदिक श्रीकृष्ण के मातामह के तुल्य हैं ।। ५२ ॥
श्री राधासागरगोहेशदीपिग भारएडा जटिला भेला काला करवालिका घर्घरा मुसरा घोरा घण्टा घोणी सुघण्टिकाः ।। ध्याङ्करपाटी हाण्डी तुण्डी डिण्डिमा मजुयारिणका । चकिणी चोण्डिका चुण्डी डिण्डिमा पुण्डवाणिकाः । डामणी डामरी डुम्ली डडा मातामही समाः ।।५:४॥ मङ्गलः पिङ्गलः पिड़ो मारः पीठपटिशौ। शङ्करः सगरो भृङ्गो घृणिघाटिकसारधाः ॥ पटीर-दण्डिकेदारा सौरभेय कलाकुराः । धुरीण धुर्व चक्राडा मस्करोत्पल कम्बला ॥ सुपद सौध हारीत हरिकेश इरादयः । उपानन्दादयश्चान्ये सऽमी जनकोपमाः ॥ ५५-५८॥ पर्जन्य सुमुखश्चेमी मियः सख्यं परं गती। वाग्वन्धं वक्रतुः प्रोत्या कैशोरे तो सहृद्वरी । शिलाभेरी, शिग्वाम्बरा, भारुणी, भङ्गरा, भगी, मारशारसा त्रा- दिक वृद्धागण पितामही तुल्य हैं ।। ५३ ।। भारुण्डा, जटिला, भेला,कराला,करबालिका,घर्धरा,मुखरा,घोरा,घण्टा, घाणी, सुघण्टिका, ध्वाङ्करुण्टी, हाण्डी, तुण्डी, डिण्डिमा,मञ्जुवा- णिका, चक्किाणी, चोण्डिका, चुण्डी, डिण्डमा, पुण्डबाणिवा, डा. मणी, डामरी, डुम्बी, डडा आदिक सब वृद्धा श्रीकृष्ण की माता- मही सहशा हैं ॥ ५४॥ मगल, पिङ्गल, पिङ्ग, माठर, पीठ, पहिश, शंकर, संगर, भृग, घृणि, घाटिक, सारघ, पटीर, दण्डि, केदारा, सौरभेय, क्लाङ्कुर, धुरीण, धुर्च, चक्राङ्ग, मस्कर, उत्पल, कम्बल, सुपक्ष, सौध, हारीत, हरिकेश और हरादिक एवं उपनन्दादिक अन्यान्य गोपगण-समूह श्रीकृष्ण के पिता के तुल्य हैं ।। ५५-५८ ॥
श्री राधाकृष्णगणोद्देशढीपिका तेन नन्दादि नामानस्तिष्ठन्त्यन्येऽपि वल्हवा ॥ ५६ ॥ वत्सला कुशला ताली मेदरा मसृणा कृपा। शदिनी विम्बिनी मित्रा सुभगा भोगिनी प्रभा । शारिका हिङ्गला नीति कपिला धमनीधरा । पक्षति. पाटमा पुण्डी सुतुण्डा तुष्टिरञ्जना ।। तरङ्गाक्षी तरलिका शुभदा मालिकाङ्गदा।। वत्सला कुशला ताली मेदुरापि तथैव च । विशाला शल्लको वेणा वर्तिकाद्या प्रसुपसाः ॥ ६०६२ ।। अम्बिका च क्रिलिम्वा च धातृके स्तन्यदायिके । अम्बिकेय तयोर्म ख्या ब्रजेश्वर्याः प्रिया ससी ॥६३॥ अथ महीमुराः ।। महीमुरास्तु द्विविधा गोकुलान्तसन्ति ये। । पर्जन्य और सुमुस दोनों परस्पर प्रीति के साथ बन्धु सूत्र में बन्धे हुए थे। दोनों का शरीर हष्ट पुष्ट था। अपने पुत्र नन्द, उप- नन्दादिक के नाम के तुल्य और भी सर अपने पुत्री के नाम इसी प्रकार के रसेगे ऐसा एक परस्पर मे वाग्बन्ध अर्थात् मौग्निक नियम स्थिर हुआ था। इसी कारण से श्रीवृन्दावन मे नन्दादिक नाम धारी और और भी सर गोप देखने में आते थे॥५६ ।। वत्सला, कुशला, ताली,मेदुरा, मसृणा, कृपा, शक्निी, विम्बिनी मिना, सुभगा, भोगिनी, प्रभा, शारिका, हिग ला, नीति, कपिला, धमनीपरा, पक्षति, पाटका, पुण्डी, सुतुण्डा, तुष्टि, अञ्जना,तरङ्गाक्षी, तरलिका, शुभदा, मलिकागदा, वत्सला, कुशला, ताली, मेदुरा, विशाला, शल्लकी,वेणा और वर्तिका आदिक गोपाङ्ग नागण श्रीकृष्ण को मातृ तुल्या हैं ।। ६० । ६२ ॥ अम्बिका और किलिम्या दो श्रीकृष्ण की धानी तथा स्तन देने वाली १४ श्री राधाकृष्णगरणादेशदीपिका कुलमाश्रित्य वर्तन्ते केचिदन्ये पुरोहिताः ।। वेदगर्भो महायज्या भागाद्याः पुरोधसः । सामधेनी महारळ्या वेदिकाद्यास्तदङ्गनाः ॥ ६४ ॥ सुलभा गौतमी गार्गी चण्डिलाद्या द्विजस्त्रियः । कुञ्जिका बामनी स्वाहा सुलता शाण्डिली स्वधा !! भार्गवीत्यादयो वृद्धा ब्राह्मण्यो ब्रजपूजिताः ॥ ६५ ॥ पौर्णमासी भावती सर्वसिद्धिविधायिनी । कापायवसना गौरी काशकशीदरायता !! मान्या ब्रजेश्वरादीना सर्वेषा ब्रजवासिनां । देवर्षेः प्रियशिष्येयमुपदेशेन तस्य यो । हैं। दोनोंमे से अम्बिका बड़ी थी तथा ब्रजेश्वरीकी प्रियसखी है।।६।। अव महीसुरो का वर्णन करते हैं । गोकुल के बीच में बास करने वाले ब्राह्मण गण दो भागों में विभक्त हैं । एक तो श्रीकृष्ण के पितृकुलों के आश्रित है और दूसरे पुरोहितगण हैं । वेदगर्भ, महा- यचा, और भागुरि आदिक पुरोहित हैं जिनकी पत्नियों का नाम कम से सामधेनी, महारुया, और वेदिका है ॥ ६ ॥ मुलभा, गौतमी, गार्गी, चण्डिला, कुञ्जिका, यामनी, स्वाहा, मुलता, शाण्डिली,स्वधा, भार्गवी आदिक श्रेष्ठ स्त्रीगण ब्रजजण्डल मे पूज्या ब्राह्मणी हैं ।।६५ । ६६ ।। श्रीकृष्ण की समस्त लीलाओं के सकल विपयों का निर्वाह करने वाली योगमाया भगवती ही पौर्णमासी देवी हैं। इनका वस्त्र काय अर्थात् गैरिक वर्ण है। शरीर गौरवर्ण तथा काशपुप्प के स- दृश सफेद केश हैं । वे आकार में कुछ लम्बी थी । पौर्णमासी जी व्रज में नन्दादिक सकल ब्रजवासियों की पूज्या थी। श्राप नारद जी की प्रियशिघ्या थीं। उन्हीं के उपदेशानुसार श्रीकृष्ण और बलदेवजी १५ श्री राधाकृष्णगणोडेशदीपिका सान्दीपन सत प्रेष्ठ हित्वान्तीपुरीमपि । स्वाभीष्टदैवतप्रेम्ना व्याफला गोकुल गता।। ६७६६ ।। अथ यूथ ॥ यूथ परिजनाना स्यात् द्विविधाना महोच्चय । वयस्यो दासिका दूत्य इत्यसो त्रिकुलो मत ॥ ७० ॥ युथस्यानान्तरा भेदा कुल तस्य तु मण्डल। गणस्य समनाय स्यात् समवायस्य सञ्चय ।। सञ्चयस्य समाज स्यात् समाजस्य समन्वय । इति भेदा नव ज्ञेया लघर क्रमशो वुधै ।। ७१ । ७२ ॥ अथ सखीवर्ग। तत्रादौ कुलमालीना लिख्यते तत् त्रिमण्डल । तारतम्यात्तयो प्रेम्नां कुलस्यास्य त्रिरूपता। -- । के विद्यागुरु श्रीसान्दीपनि जी को जो कि उनके पुत्र हैं वे नन्हे अव- न्तिकापुरी मे छोडकर निज अभीष्टदेव श्रीकृष्ण के प्रेम में वशीभूत होकर गोकुल मे वास करने लगीं ॥ ६७ । ६६ ॥ दो प्रकार के परिजनों की महान् समष्टि को यूथ कहते हैं। क्य- स्यगण, दासीगण और दूतीगण भेद से यूथ तीन प्रकार के है।।७०॥ यूथ, कुल, मण्डल, वर्ग, गण, समवाय, सचय, समाज, सम- न्मय भेद से यूथ के और भी नौ प्रकार के भेद हैं । यूथ के छोटे छोटे विभाग कुल और उसके छोटे छोटे विभाग मण्डल, मण्डल के वर्ग, वर्ग के गण, गण के समाय,उसके सचय,सचय के समाज और समाज के समन्वय इत्यादि प्रकार से जानना चाहिए १७११७॥ पहिले ससियों का निमण्डल स्प कुल का विषय लिया जा रहा है। प्रेम के तारतम्य से कुल फिर समाज, मण्डल और गण भेद से तीन प्रकार का है । परम प्रियतम ससिया की समष्टि को समाज १६ श्री राधाकृष्णगरणोद्देशदीपिका समाजो मण्डलञ्चेति गणश्चेति तदुच्यते ॥ समाजः परमप्रेष्ठसखीनां प्रथमो मतः । वरिष्ठश्च वरश्चेति स समन्वययुग्मभान ।। ७३ । ७५ 1, तत्र वरिष्ठः। वरिष्ठः सर्वत: ख्यातः सदा सचिवतां गतः। तयोरेवासमोध्यो वा नासो प्रेग्नः समाश्रयः ।। ७६ ॥ प्रपन्नः सर्वसुहृदा परमादरणीयता । अपारगुरणरूपादि-माधुरोभिश्च भूषितः ।। ७७॥ अथ अष्टसख्यः।। खलिता च विशाखा च चित्रा चम्पकमल्लिका। तुविद्य न्दलेखा च रंगदेवी सुदेविका ।। ७८॥ ११॥ तत्र ललिता॥ तत्राद्या ललितादेवी स्यादष्टास वरीयसी । प्रियसख्या भवेज्ज्येष्ठा सप्तविंशतिवासरः ॥ ७९ ॥ कहते हैं, यह प्रथम गिना जाता है। यह समाज फिर दो-दो मिलकर वरिष्ठ और वर रूप से दो प्रकार का है ।। ७३ । ७५ ॥ वरिष्ठ नाम के यूथ मर्च प्रकार से विख्यात तथा श्रीराधाकृष्ण के सहायक रूप से प्राप्त हैं । प्रेम में न कोई इसके समान और न कोई इससे बढ़कर उपर है ।। ७६ ॥ यह समस्त सुहदों का परम आदरणीय तथा अपार गुण-रूप- माधुरियों से भूपित है ।। ७७ ॥ अब अष्टसखियों का वर्णन करते हैं 1 ललिता, विशाखा,चित्रा, चम्पकलता, तुगविद्या, इन्दुलेखा, रंगदेवी,सुदेवी अष्टसखी हैं। ७८।। इनमें से ललितादेवी सबसे श्रेष्टा हैं। प्रियसखी श्रीराधा से सत्ताईस दिन बड़ी हैं जो अनुराधा कह कर रयाता है तथा वामा- श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका अनुराधातया ख्याता वामप्रखरतां गता। गोरोचना-निभाडी सा शिखिपिच्छनिभाम्बरा ॥८०॥ जाता मातरि सारद्यां पितरेषा विशोक्तः । पतिभैरवनामास्या: सखा गोवर्द्धनस्य यः ॥ ८॥ २। विशाखा ॥ विशाखात्र द्वितीया स्यादेकाचारगुणवता । प्रियसख्या जनियत्र तत्रैपाभ्युदिता क्षणे ॥ तारावलिदुकूलेयं विदयुन्निभतनुयतिः । पितुः पावनतो जाता मुखरायाः स्वसुः सुतात् । जटिलायाः स्वसुः पुत्र्यां दक्षिणायान्तु मातरि । भवेद्विवाह कर्तास्याः वाहिको नाम वल्लवः ।।८२-८३ ।। ३ चम्पकलता ॥ तृतीया चम्पकलता फुल्लचम्पकदीधितिः । । के सग्या और प्रवरा नायिका के गुणों से भूपिता हैं । ललिता जी की अंग- कान्ति गोरोचना तुल्य है । वस्त्र मयूरपंख के सदृश हैं |७६ 100 ललिता जी पिता विशोक के द्वारा सारदी माता के गर्भ में से उत्पन्न हैं। इनके पति भैरव नाम से प्रसिद्ध हैं जो कि गोवर्द्धन गोप हैं ॥१॥ दूसरी विशाग्या जी हैं । भाव, रूप, गुणों से श्रीराधिका के तुल्य हैं । जिस समय श्रीराधिका का जन्म हुआ था ठीक उसी समय पि: शाखा का जन्म है । विशाखाजी का वस्त्र यूँ टेदार नीलाम्बरी है। अंगाान्ति सौदामिनी के सदृश है । पिता का नाम पावन तथा माता का नाम दक्षिणा है । यह दक्षिणा जटिला की भगिनीकन्या थी। पवन भी मुखरा की भगिनी के पुत्र थे। विशाखा के विवाहित पति वाहिक नामक गोप हैं ।।२।३॥::
श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका एकनान्हा कनिष्ठेयं चापपक्षनिभाम्वरा ॥ ८४॥ पितुरारामतो जाता वाटिकायान्तु मातरि । बोढा चण्डालनामास्या विशाखा सघशी गुणैः ॥ ८५ ॥ ४चित्रा। चित्रा चतुर्थी काश्मीरगौरी काचनिभाम्बरा । पड़विंशत्या कनिष्ठान्हा माधवामोदमेदुरा ।। ८६॥ चतुराख्यात् पितुर्जाता सूर्यमित्रपितृव्यजा। जनन्यां चिकाख्यायां पतिरस्यास्तु पीठरः ।। ८७॥ ५. तुंगविद्या॥ पञ्चमी तु विद्या स्याज्ज्यायसी पञ्चभिर्दिनः । चन्द्रचन्दनभूयिष्ठा कुङ्कुमद्युति शालिनी॥ ८८ ॥ पाण्डमण्डलवस्त्रेयं दक्षिणप्रखरोदिता। मेघायां पुष्कराजाता पतिरस्यास्तु वालिशः ॥ ८६ ।। तीसरी चम्पकलता की अंगकान्ति खिले हुए चम्पक पुष्पों के सदृश है। यह श्री राधा से एक दिन छोटी हैं तथा इनके वस्त्र चाप- पंग के तुल्य हैं ! इनके पिता का नाम श्राराम तया माता का नाम वाटिका है । चण्डाक्ष इनके विवाहित पति हैं। इनके विशागा के बराबर गुण समूह है।।४।८५ चौथी चित्रा की अंगकान्ति कुकुंम के तुल्य तथा काँच के स. मान यस्त्र हैं। श्रीराधा से छन्थीम दिन छोटी है। चित्रा श्रीकृष्ण के श्रानन्द मे आनन्दिता है। इनके पिता का नाम चतुर तथा माता का नाम घन्चिका है। पति का नाम पीठर है। चतुर सूर्यमित्र के कावा है ॥८६॥७॥ पाँची तुगविधा श्री राधिका जी से पाँच दिन यड़ी हैं। कपूर मिभिन चन्दन के तुल्य अंगगन्ध याली हैं। इनकी अंगरान्ति यु. " ।
श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका १६ ६। इन्दुरेखा ॥ इन्दुरेखा भवेत् पष्ठी हरितालोज्ज्वलद्युतिः । दाडिम्बपुष्पवसना कनिष्ठा वासरैस्त्रिभिः ॥१०॥ वेला-सागरसंज्ञाभ्यां पितृभ्यां जनिमीयुपी। वामप्रखरतां याता पतिरस्यास्तु दुर्बलः ॥ ११ ॥ ७। रङ्गदेवी ॥ सप्तमी रङ्गदेवीयं पद्मक्रिझुल्क क्रान्तिमाक् । जवारागिदुक्लेयं कनिष्ठा सप्तभिर्दिनैः ।।२।। प्रायेण चम्पकलतासदृशी गुणतो मता। करुणारङ्ग साराभ्यां पितृभ्यां जनिमीयुषी ।। ६३॥ ८।सुदेवी॥ अस्या रक्तक्षणो भर्ती कनीयान् भैरवस्य यः । सुदेवीरदेव्यास्तु यमजा मृदुरष्टमी ॥१४॥ 1 कुम के महश है । वसन पीला है । तुगविद्या दक्षिणा और प्रखरा नामक नायिका के गुणों से युक्त हैं । माता का नाम मेधा है। और पिता पुष्कर जी हैं। पति का नाम वालिश है ॥८८।८॥ छटवी इन्दुलेखा की अंगकान्ति हरिताल के बरावर उज्ज्वल है । इनका वसन अनार पुप्प के सदृश है । श्रीराधा से तीन दिन छोटी है । माता का नाम वेला तथा पिता का नाम सागर है । इन्दु- लेखा मामा और प्रखरा नायिका गुणों से युक्त हैं । इनके पति दुर्वल नामक हैं॥10॥१॥ सातवीं रंगदेवी की अंगकान्ति कमल केशर के समान है। वसन जवा पुप्प के तुल्य लाल हैं। श्रीराधा से सात दिन छोटी हैं तथा प्रायः चम्पकलता के वरावर गुणवाली हैं। पिता का नाम रंगसार माता का नाम कम है ।। ६२ । ६३ ।।
२२ श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका आगत्य तरसा तस्यालोकात् किञ्चिदभक्षयत् । पशुपाली हरिएयुभे ततो गर्भमवापतुः ॥१०६ ।। सुचन्द्रा सुषुवे पुत्रं स्तोककृष्णं वन्ति यम् । असोष्ट गोष्ठमध्ये सा हिरण्याड़ी कुरङ्गिका ॥ १०७॥ या सखी प्रियगान्धी गान्धर्वायाः प्रिया सदा । फुल्लापराजिता श्रेणोविराजिपटमण्डिता ॥ १०८ ॥ एता दारतयोदारां ददौ वृद्धाय गोदुहे। जरसा राज्यायोग्योऽसौ गिरा गौरवतः पिता ॥ १० ॥ (घ)रत्नलेखा। सुतो मातृप्वसुः सूर्यसायस्य पयोनिधिः । तस्य पुत्रवतः पत्नी मित्रा कन्याभिलापिणी ॥ ११०।। श्रद्धयाराधयाञ्चक्र भास्करं सुतवस्करा । प्रसादेन युरत्नस्य रत्नलेखामसूत सा ।। १११॥ के लिये प्रदान किया । उस चरु के भोजन के समय प्रांगन में रं. गिणी की माता ब्रज में विचरण करने वाली, सुरंगा नामक हरिणी ने पाकर उसके देखते-देखते उस चरु में से कुछ खा गई। दोनों के गर्भ हुआ । मुचन्द्रा ने एक पुत्र का प्रसव किया जिसे स्तोककृष्ण करके सब कोई कहते हैं । कुरभिका हरिणी ने गोष्ठ में हिरण्यागी का प्रसव किया, जो कि श्रीराधिका की सर्वदा अति प्रिया थीं तथा बिले हुए अपराजित पुप्पों के सदृश वस्त्रों को पहिनती थी। पिता ने उदार मति वाली इसका बड़े गौरव के साथ एक वृद्ध गोप के 'साथ विवाह कर दिया था ॥ १०१ ॥ १० ॥ (रत्नलेखा) सूर्य्यसा नामक माता की भगिनी का पयोनिधिनामक पुत्र था । पुत्रवती उसकी मित्रा नामक पत्नी ने कन्या की इच्छा से 'श्रद्धा के साथ सूर्य की आराधना की । सूर्य के प्रसाद से उनने रत्न- श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका मनःशिलारुचिरसौ रोलम्वरचिराम्बरा । वृषभानसुताप्रेष्ठा भानशुश्र पणे रता । चचारकेन भावेन माता यस्यार्द्धचारिका । घूर्णयन्ती दृशौ घोरे माधवं प्रेक्ष्य तर्जति ।। ११२ ।। . (ङ) शिखावती॥ धन्यधन्यादभूत कन्या सुशिखायां शिखाक्ती ॥ ११३ ॥ कर्णिकारयुतिः कुन्दलतिकायाः कनीयसी। जरत्तित्तिरकिम्मरपटा मूवि माधुरी। उढ़ा गरुडेनेयं गर्जरास्येन गोदहा ॥ ११४ ॥ (च) कन्दर्पमञ्जरी॥ कन्दर्पमञ्जरी नाम जाता पुष्पाक्राद् पितुः । जनन्यां कुरुविन्दायां यस्याः पित्रा हरिं वरम् ॥ ११५ ॥ हृदि कृत्य न कुत्रापि विवाहोऽन्यत्र कार्यते। किङ्गिरातोज्ज्वलरुचि विचित्रसिच्या वृता ।। ११६ ॥ लेखा का प्रसव किया । रत्नलेखा मनःशिला की तरह कान्ति वाली तथा भ्रमर के सदृश सुन्दर वस्त्र को पहिनती थीं। वह श्रीराधिका की परमप्रिया और वृपभानु जी की सेवा में अनुरता थीं। अर्द्ध: चारिका नाम वाली जिसकी माता नेत्रों को भयानक रूप से घुमाती हुई माधव को देख कर तर्जना किया करती थी ॥११०। ११२ ॥ शिखावती धन्यवन्या से सुशिखा गर्भ में शिखावती हुई थी। वह कर्णिकार की तरह अंगकान्तिवाली तथा कुन्दलता से कुछ छोटी थी। वृद्ध तित्तिर पति के सदृश वस्त्र को धारण करती थी। शिखा- यती मानों माधुरी की मूर्ति थी । गर्जर नामक गोप से उसका वि- वाह हुआ था ॥ ११३ । ११४॥ पिता पुष्पाकर तथा माता कुरुविन्दा से कन्दर्पमञ्जरी उत्पन्ना २२ श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका आगत्य तरसा तस्यालोकात् मिञ्चिदभक्षयत् । पशुपाली हरिएयुभे ततो गर्भमवापतु ॥ १०६॥ मुचन्द्रा सुने पुत्र स्तोकण वन्ति यम् । असोष्ट गोष्ठमध्ये सा हिरण्याङ्गी रङ्गिका ।। १०७ ।। या सखी प्रियगान्धी गान्धाया प्रिया सदा। फुल्लापराजिता श्रेगोविराजिपटमण्डिता ॥ १०८।। एता दारतयोदारा ददौ वृद्धाय गोदुहे। जरसा राज्यायोग्योऽसौ गिरा गोरवत पिता ॥ १० ॥ (घ) रत्नलेखा ।। सुतो मातृत्वसु सूर्यसाह्रयस्य पयोनिधि । तस्य पुत्रवत पनी मित्रा कन्याभिलापिणी ॥ ११० ॥ श्रद्धयाराधयाञ्चक्रे भास्कर सुतवस्करा । प्रसादेन द्यरत्नस्य रत्नलेखामसूत सा ॥ १११ ।। के लिये प्रदान किया । उस चरु के भोजन के समय प्रागन म र- गिणी की माता ब्रज में विचरण करने वाली, सुरगा नामक हरिणी ने आकर उसके देसते देखते उस चरु में से कुछ खा गई। दोनों के गर्भ हुआ । सुचन्द्रा ने एक पुत्र का प्रसर किया जिसे स्तोत्कृपा करके सब कोई कहते हैं । कुरङ्गिका हरिणी ने गोष्ठ में हिरण्याङ्गी का प्रसव किया, जो कि श्रीराधिका की सर्वदा अति प्रिया थी तथा खिले हुए अपराजित पुष्पों के सदृश वस्त्रों को पहिनती थीं। पिता ने उदार मति वाली इसका बडे गौरव के साथ एक वृद्ध गोप के साथ विवाह कर दिया था ॥ १०१।१०६॥ (रत्नलेखा) सूर्यसा नामक माता की भगिनी का पयोनिधिनामक पुत्र था । पुत्रपती उसमी मित्रा नामक पत्नी न कन्या की इच्छा से श्रद्धा के साथ सूर्य की आराधना की । सूर्य के प्रसाद से उनने रत्न- . . श्री राधाकृष्णगणेदेशदीपिका मन शिलारुचिरसौ रोलम्बरचिराम्बरा । वृषभानसताप्रेष्ठा भानुशुश्र पणे रता। चचारकेन भावेन माता यस्यार्द्धचारिका । घूर्णयन्ती दृशौ घोरे माधव प्रेक्ष्य तर्जति ॥ ११२॥ (ड)शिसावती॥ धन्यधन्यादभूतु कन्या सशिखाया शिखावती ।। ११३॥ कर्णिकारयुति. कुन्दलतिकाया कनीयसी । जरत्तित्तिरकिम्मरपटा मूर्तेन मापुरी। उढा गरुडेनेय गर्जराख्येन गोहा ।। ११४ ॥ (च) कन्दर्पमञ्जरी॥ कन्दर्पमञ्जरी नाम जाता पुष्पाझराद् पितः । जनन्या कुरुविन्दाया यस्या पित्रा हरिं वरम् ॥ ११५ ।। हृदि कृत्य न कुत्रापि विवाहोऽन्यत्र कार्य्यते। किङ्गिरातोज्ज्वलरुचि विचित्रसिच्या वृता ॥ ११६ ॥ लेखा का प्रसव क्यिा । रत्नलेखा मन.शिला की तरह कान्ति वाली तथा भ्रमर के मदृश सुन्दर वस्त्र को पहिनती थीं। वह श्रीराधिका की परमप्रिया और वृषभानु जी की सेवा में अनुरता थीं। अर्द्ध- चारिका नाम बाली जिसकी माता नेत्रों को भयानक रूप से घुमाती हुई माधव को देस र तर्जना क्यिा करती थी॥ ११० । ११२ ।। शियानती धन्यपन्या से सुशिला गर्भ में शिसावती हुई थी। वह कर्णिकार की तरह अंगकान्तिवाली तथा कुन्दलता से कुछ छोटी थी। वृद्ध तित्तिर पक्षि के सहश वस्त्र को धारण करती थी । शिसा- यती मानों माधुरी की मूर्ति थी । गर्जर नामक गोप से उसका वि- वाह हुआ था ।। ११३ । ११४॥ पिता पुप्पाकर तथा माता कुरुरिन्दा से कन्दर्पमञ्जरी उत्पन्ना २० श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका रूपादिभिः स्वसुः साम्यात् तद्भ्रान्तिभरकारिणी। भ्रात्रा वक्रेक्षणस्येयं परिणीता कनीयसा ॥६५॥ अथ वरः॥ एतदष्टककल्पाभिरष्टाभिः कथितो वरः । एता द्वादशवपायाश्चलद्वाल्या: कलावती ।। ६६॥ शुभाइदा हिरण्याङ्गी रत्नलेखा शिखावती । कन्दर्पमञ्जरी फल्लकलिकानगमञ्जरी ॥६७ ॥ (क) तत्र कलावती ॥ मातुलो योऽकमित्रस्य गोपो नाम्ना कलाङ्कुरः । कलावती सुता तस्य सिन्धुमत्यामजायत ।। हरिचन्दनवणेयं कारयतिपटावृता। कपोतः पति रेतस्य वाहिकस्यानजस्तु यः॥६८-६६ ॥ आठवीं सुदेवी रंगदेवी की यमजा (जोडली) भगिनी तथा मृदुस्वभाव वाली थीं । रुप, गुण, स्वभावादिकों से भगिनी रंग- देवी के साथ बराबर होने से इनको देखकर रंगदेवी का भ्रम होता था। रंगदेवी के पति रक्तक्षण के कनिष्ट भ्राता के साथ सुदेवी का विवाह हुआ था ।। ६४। ६५ ।। अब वर का वर्णन करते हैं । इन अष्टससियों के वरावर अन्य अष्ट सखियाँ वर नाम से कही जाती हैं। वे सब द्वादश वर्षीया अ. तीत बाल्यावस्था वाली हैं। उन सबके नाम कलावती, शुभागदा, हिरण्यागी, रत्नलेखा, शिसावती, कन्दर्पमञ्जरी, पुल्लकलिका, अन- द्गमञ्जरी हैं।। ६६1१७|| उनमे से कलावती अमित्र के मामा कलाकुर नामक गोप की कन्या तथा सिन्धुमती के गर्भ से उत्पन्न हुई हैं । यह हरिचन्दन के सदृश अंगकान्तिवाली तथा तोता के वर्ण तुल्य वस्त्र पहरने वाली यज्वा यशस्वी धर्मात्मा गोपो नाम्ना महावसुः। स मित्रं रविमित्रस्य विचित्रगुणभूपितः ।। १०२।। दृष्ट भागुरिणारेभे नियतात्मा पुगेधसा ॥१०३ ।। ततः सुधामयः कोऽपि सुचारुश्चरुत्थितः । तमश्नन्त्यां चरतस्यामलिन्दे सम्भ्रमोज्झितः। मुरडाख्या ब्रजचरी कुरङ्गी रङ्गिणीप्रसूः ॥ १०५ ॥ शुभाङ्गन्दा मंगलमय सुवर्ण के तुल्य अंगकान्ति बाली, तथा विशाखा से कुछ छोटी हैं। पीठर के अनुज पतत्रि के साथ इन का विवाह हुआ था ।। १००॥ हिरण्याक्षी हिरण्यकान्ति वाली तथा हिरणी-गर्भ से उत्पन्न हुई है। उनका शरीर इतना सुन्दर था मानो सौन्दर्य का मन्दिर है। महावसु नामक यजनशील, परम यशस्वी धमात्मा गोप रहे। चे विचित्र गुरणों में विभूपित तथा रविमित्र के मित्र थे। उन्होंने वीर. पुत्र तथा मनोरमा कन्या के अभिलापा से संयतात्मा पुरोहित भागुरि चरु उठा जिससे कि महावसु ने प्रसन्न होकर अपनी पत्नी सुचन्द्रा द्वारा यज्ञ का आरम्भ किया। उस यज्ञ से अमृतमय कोई श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका (ख) शुभाइदा (ग) हिरण्याक्षी। शुभावदांतवर्णेयं विशाखायाः कनीयमी। पीलस्यानुजेनेयं परिणीता पतत्रिणा ।। १०० ।। हिरण्याक्षी हिरण्याभा हरिणीगर्भसम्भवा । सर्वसौन्दर्यसन्दोह-मन्दिरी भूतविग्रहा ।। १०१।। अभिलप्यन् सुतं वीरं कन्याञ्चातिमनोरमाम् । नन्दितस्तं सुचन्द्राय समिण्य च दत्तवान् ॥ १०४ ।। हैं। वाहिक के अनुज कपोत इसके पति हैं ॥ ६८।६६ ।।
२४ श्री रागहमागणो देशदीपिरा (ब) पालकलिका। श्रोमसात् फुलकालिका कामलिन्याममूत् पितः । संयमिन्दीवरश्यामा शक्रचापनिमाम्बग ॥ ११७॥ सहजेनान्त्रिता पीततिलकनालिकास्थले। विदुराऽस्याः पतिरान्महिपीराइयत्यमा ।। ११८ ।। (ज) अनङ्गमञ्जरी॥ वसन्त केतकी कान्तिमञ्जुलानामञ्जरी। यथार्थाक्षरनामेयमिन्दीवरनिभाम्बरा ॥ ११९ ॥ दुर्मदो मदयानस्याः पति ये िदवरः स्त्रगुः । प्रियामी ललितादच्या विशाखाया विशेषतः ।। १२०।। ॥ श्रथ वयस्यानां सामान्यकर्माणि लिग्यन्ते ।। वेशः प्रियम्यस्याया गुरुपत्यादिवञ्चनम् हरिणा प्रेमरलहे तस्या एवानुयान्विता ।। १२१ ॥ हुई थी। उसके पिता ने हृदय में हरि को अपना वर मानकर अन्यत्र विवाह नहीं करवाया था। किकिरात के सहश उज्ज्वल कान्ति चाली तथा विचित्र वस्त्र को पहिनती थी।॥ ११५ १ १२६।। पिता श्रीमल्ल तथा माता कमलिनी से पुल्लकलिका हुई थी। वह नीलकमल के सदृश श्यामा तथा इन्द्रधनु के बराबर मनोहर', वस्त्र को पहिनती थी । फुल्लकलिका स्वभाव से कपाल में पीतवर्ण तिलक को धारण करती थी। विदुर उसका पति था जो कि उसको दूर से महिपी करके आह्वान करता था ॥ ५१७१ १२८ ।। अनङ्गमञ्जरी वसन्त कालीन केतकी की तरह मनोहर कान्ति वाली तथा नीलकमल के सदृश वस्त्र को पहिनती थी। जैसा इसका नाम था वैसी थी भी। उसका पति अभिमानी तथा दुर्मद नाम से ख्यात था जो बहिन का देवर था। अनङ्गमञ्जरी ललितादेवी और विशेष रूप से विशाखा जी की अति प्रिया थी ॥ ११६ । १२० ॥ - २५ श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका अभिसारे सहायत्वमन्नादिपरिवेशनम् । आस्वादनं सह क्रीडा रहस्यपरिगोपनम् ।। १२२ पवित्रचित्तचातुर्य परिचर्या यथोचितम् । उत्कर्पम्लानिकारित्वं स्वपक्षप्रतिपक्षयोः ॥ १२३ ॥ तौर्यत्रिककलोल्लासे उभयोः परितोपणम् । अवकाशोचिताचारसेवाप्रार्थनभाषणम् ॥ १२४ ॥ इत्यादि सुप्छु भूयिष्ठं ज्ञेयमासां विचक्षणैः । सवा एवाखिलं कर्म जानन्ति कुळ तेऽपि च ॥१२५ ॥ तत्र काश्चिन्नियुक्ताः स्युरनियुक्ताश्च काश्चन । नियुक्ताः सुप्छु या यत्र लिख्यन्ते ताः क्रमादिमाः॥१२६ ।। तथापि परमप्रेष्ठसख्यः श्रेष्टतयोदिताः । सर्वत्र ललितादेवी परमाध्यक्षतां गता ॥१२७ ।। - अब वयस्यों के सामान्य कर्म समूह लिखते हैं। प्रियवयस्या श्री राधिका की वेशरचना, गुरू-पत्यादिकों का वश्चन, हरि के साथ प्रेमकलह में श्रीराधिका की अनुगामिनी होना, अभिसार में सहाय करना, अन्नादिकों का परिवेशन, लीला प्रास्वादन, रहस्यों का परि- गोपन, यथोचित परिचर्या में चित्त में चतुराई रखना, अपने पक्ष में उत्कर्ष तथा प्रतिपक्ष में म्लान दिखाना, नृत्य गीत कलाओं के उल्लास से दोनों को प्रसन्न करना, यथाअवकाश चित प्राचार-सेवा प्रार्थना, भापण करना इत्यादिक अनेक कार्य इनके हैं। विचक्षणों से ऐसा जानना चाहिए । ऐसे ही तो समस्त सखियाँ समस्त कार्यों को जानती है और करती भी हैं । तो भी उन कार्यो में कोई नि- युक्ता हुई हैं कोई अनियुक्ता भी हैं । जिस कार्य मे जो नियुक्ता हैं' उसको क्रम से कहते हैं । उन सब वयस्यों में परमप्रेष्ठ सखियाँ पोष्ट करके मानी जाती हैं । सब से ललिवादेवी परम अध्यक्षता को प्राप्त श्री राधाकृष्णगणोदेशदीपिका स्वीकृतासिलभावेय सन्धिविग्रहिणी मता। अपराध्यति राधायै माधये कापि देवत ॥१२८॥ चण्डिग्ना कुञ्चितमुसी सखीदयुतिभिरामृता । विग्रहे प्रोढिवादे च प्रतिवाक्योपपत्तिषु ।। १२६ ॥ प्रतिभामुपलब्धाभिर्धरो निग्रहमाग्रहात् । आयाति सन्धिसमये तटस्थेत्र स्थिता स्वयम् ॥ १३०॥ भगात्यादिभिर्दा रेयुक्ता सन्धि करोत्यसौ । पोप्पाणा मण्डन छत्र शयनोत्थानश्मनाम् ॥ १३१ ।। मदनोन्मादिनी वाट्या या किलरक्रिशोरिका । प्रसून-वल्ली-ताम्बूलवल्ली पूगद्रुमेषु च ॥ १३२ ।। निम्मिताविन्द्रजाले च प्रटेल्याञ्चातिकोविदा। ताम्बूलेऽधिकृता या स्युरस्यास्तु दासिकाश्च या ।। १३३ ॥ सख्यश्च वलदेवस्य वरा मान्योपजीविनाम् । या कन्यका स्यु सासु तास्वाध्यक्षता गता ।। १३:४ ।। हुई है । वह सफल भावों की स्वीकृति की हुई है और दोनों के सन्धि- विग्रह कराने में परम चतुरा है । कभी श्रीमाधव में श्रीराधा के लिये अपराध दिखाती हैं। कभी रिसाय कर मुख कुश्चन के द्वारा चण्डिमा भाव को धारण करती हैं। कभी मरती श्री राधिया को अङ्गकान्ति को धर लेती हैं। विप्रह,(पिवाद)प्रौढिवाद,प्रतिगम्यादिकोंमें प्रतिभा के साथ ऐसी ही बन जाती हैं तथा मिलन समय पाने पर स्वय तटस्था हो जाती हैं । वह भगवती पौर्णमासी प्रभृति के द्वारा मिल- कर दोनों का मिलन कराती हैं। दोनों के शयन उत्थान गृहों मे पुष्पो के मण्डन में,छत्र के निर्माण करन म,मदनोन्मादिनी नामक वाटिका में नियुत्ता जो किन्नर किशोरिकायोंका गण है उनकी,पुप्पलता ताम्यू: लगल्ली-सुपारी वृक्षों की रक्षा मे,इन्द्रनालरचनामें,प्रहेलिकादिक विषय में अतिपण्डित तथा ताम्बूल-सेवा मै अधिकार प्राप्त करने वाली जो श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका रत्नलेखादयोऽष्टौ याः प्रियसख्योऽनुकीर्तिताः । सर्वत्र ललितादेव्या ज्ञेयाः प्रत्यन्तराः सदा ॥ १३५ ।। रत्नप्रभा रतिकले तत्राप्यष्टासु विश्रुते । गुणासौन्दर्य वैदग्धी माधुरीभिरुपागते ॥१३६ ॥ अथ पुष्पेषु मण्डनम् ॥ किरीटं वालपाश्या च कर्णपूरो ललाटिका । | वेयकाइदे काञ्चीकटके मणिवन्धनी ॥ १३७॥ हंसकः कञ्चीत्यादि विविधं पुष्पमण्डनम् । मणिस्वर्णादिवलुप्तस्य मण्डनस्यात्र यादृशः । आकारश्च प्रकारश्च कौसुमस्य च तादृशः ॥१३८॥ १। किरीटम् ॥ रङ्गिणी हेमयूथीभिर्नवमाली सुमालिभिः । धृतिमाणिक्यगोमेदमुक्त न्दुमरिणकान्तिभिः । विन्यस्ताभिर्यथाशोभमाभिः सुष्टु विनिम्मितम् ।। १३६-१४० ॥ जो दासियों का गण है उनकी,श्रीवलदेव जी की श्रेष्ठ सखीगण की और कन्यकागण सबकी अध्यक्षता को श्रीललिताजी प्राप्त हुई थीं। रस्नलेखादिक जो प्रियसखियाँ कीर्तिता हुई हैं,वे सब प्रकार से ललि- ताजी की प्रीति-अनुगता हैं । उन अष्ट प्रियससियों में गुण, सौन्दर्य वैदग्ध्य और माधुर्यादिक के द्वारा रत्नप्रभा और रत्नकला दोनों अति प्रसिद्ध हैं ॥ १२१ । १३६ ।। अब पुप्पों के मण्डन का वर्णन करते हैं । किरीट, चालपाश्या, कर्णपूर, ललाटिका, प्रेवैयक, अङ्गद, काञ्ची, कटक, मणिवन्धनी, हसक, कञ्चुली ये सब पुष्पों के मण्डन हैं । मणि, सुवर्णादिक के रचित मण्डनों के सदृश आकार-प्रकार में पुष्पों के भी मण्डन ठीक ऐसे ही हैं।॥ १३७ । १३८ ।।
श्री राधाकृष्णगोदेशदीपिका कृतसप्तशिसं हेमकेतकी कोरकन्दैः। चित्रातुभिश्चित्रचित्तहारिहरेरिदम् ॥ १४१ ।। किरीटं पुष्पपाराख्यं रत्नपारादपि प्रियम् । गान्धातः कृति यस्य ललिता समशिक्षत ।। १४२ ॥ तत्तु पञ्चशिरा पुष्पैः पञ्चवणैर्विनिम्भितम् । कोरकैरपि गान्धर्वाभूपणं मुकुटं भवेत् ॥ १४३ ॥ २ वालपाश्या ।। केशवन्धनडोरी च विचित्रैः कोरकादिभिः । श्रावलिगुम्फिता गाढं वालपाश्येति कीर्तिता ॥ १४४॥ ३। कर्णपूरः ॥ ताडङ्क कुण्डलं पुष्पी कर्णिका कपीवेष्टनम् । इति पञ्चविधः प्रोक्तः कर्यापूरोऽत्र शिल्पिभिः ॥ १४५ ।। किरीट-माणिस्य, गोमेद, ( लहसनिया) मुक्ता, चन्द्रकान्तमा णियों के समान वर्णवाले रगिणी, (नील ) हेमयूथी, ( सोनजुही ) नवमाली, (चमेली) सुमालि ( दुपहरिया ) पुप्पों के द्वारा जहाँ जैसा शोभित हो उसी प्रकार से बनाये हुए मस्तक के भूपण किरीट है। सुवर्ण केतकी के कोरक पत्र से तथा चित्र विचित्र धातुओं से विरचित, सप्तशिखा विशिष्ट होता है । यह श्रीहरि के चित्त को हरण करने वाला है। किरीट का नाम पुष्पपार है जो कि रत्नपार से भी प्रिय है,जिसकी रचना गान्धर्वा श्रीराधिका जी से ललिता भली भाँति सीसी थी । वह पाँच वर्ण के पुप्पों से अथवा कोरकों से पॉच शिसा. ओं से युक्त होने पर श्री राधिका जी का मुकुट होता है ॥१३६-१४३।। केशन्धनडोरी विचित्र कोरकादिको से गाद रूप प्रावलि के द्वारा गुथी जाने से बालपाश्या कही जाती है ॥ ५४४ ॥ ताटक, कुण्डल, पुष्पी, कर्णिका, कर्णवेष्टन रूप से कर्णपूर शि- श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका (क) ताडङ्कम् ॥ तालपत्राकृतिभूपा ताडङ्कः स द्विघोदितः । चित्रपुष्पकृतः स्वर्णकेतकीदलजस्तथा ॥ १४६ ॥ (ख) कुण्डलम् ॥ मयूरमाराम्भोज-शुशावादिसन्निभम् । स्वानुरूपैः कृतं पुष्पैः कुण्डलं बहुधोदितम् ।। १४७ ।। (ग) पुष्पी॥ चतुर्वणः क्रमात् पुष्पैश्चवालतया कृतः । मध्ये पर्याप्तगुञ्जोऽयं स्तवकैः पुष्पिकोच्यते ॥१४८ ॥ (घ) कर्णिका।। राजीवकर्णिकायाश्च पीतपुष्पैर्विनिर्मिता । भृङ्गिकादाडिमीपुष्पप्रोतमध्यात्र कर्णिका ।। १४६ ॥ (ड) कर्णवेष्टनम् ॥ यत्तु कर्ण वेष्टयति वृत्तं तत् कर्णवेष्टनं ॥ १५० ॥ लिययों के द्वारा पाँच प्रकार का है । तालपत्र के आकार का भूपण ताडङ्क दो प्रकार का है । विचित्र पुप्पों से निर्मित तथा सुवर्ण केत- कीपत्रों से जात । मयूर, मकर,अम्भोज,अर्द्धचन्द्रादिक के तुल्य तद्- नुरूप पुप्पों से निर्मित कुण्डल बहुत प्रकार के हैं ॥१४५ ॥ १४७॥ चक्रवाल रूप से रचित क्रम से चार वर्ण के पुष्पों के द्वारा स्त- वक के आकार वाला मध्य में पर्याप्त गुजा-युक्त पुष्पिका है । पद्म- कर्णिका के ( पीला) गौरवर्ण पुप्पों से विरचित वीच में भ्रमरी युक्त एक अनारपुष्प से गुथी हुई कर्णिका है । जो कुण्डल कर्णदेश को वेष्टन करके रहता है अर्थात् जो कुछ गोलाकार और बृहत् है उसे कर्णवेष्टन कहते है ।। १४८-१५० ।।
श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका ४। ललाटिका ॥ द्विवर्णपुष्परचिता द्विपाश्वी शोरणमध्यमा । अलकावलिमूलस्था पुष्पपाटी ललाटिका ॥ १५ ॥ ५। ग्रे बेयकम् ।। वत्त लाश्च चर्तुग्रीवा कोमुम्यो यत्र कोष्टिकाः । तद्वीपुषमध्यं ज्ञेयं गयेयवस्तु तत् ॥ १५२ ।। ६। अङ्गदम् ।। कप्त पुष्पलतातन्तु प्रोतैमण्डलतां गतः । त्रिवर्णोपर्युपय्युप्तत्रिपुप्पाननमा दम् ॥ १५ ॥ ७। कारची॥ क्षुद्रझल्लरिसंवीता चित्रगुस्पकरम्विता । पञ्चवर्णविरचिता कुसुमैः काञ्चिरुच्यते ॥ १५४ ।। ललाटिका दो वर्ण पुष्पों के द्वारा विरचित है। इसका मध्य- भाग रक्तवर्ण है । इसके दो पार्य हैं तथा जो कि अलकावली के मूलदेश में अर्थात् ललाट के ऊपर जुद्र केशों के मूलदेश में रहता है । यह पुष्पों की परिपाटी से युक्त होती है ।। १५१ ।। समष्टि में गोलाकार और मध्य में लतापताओं से शोभित, पुष्प रचित चतुष्कोण से युक्त, काञ्चिका वर्ण के तुल्य पुष्पों से मध्य भाग में अलंकृत गैवेयक अर्थात् कण्ठभूषा है ।। १५२ ।। लतातन्तु अर्थात् लता के सूत से गुंथे हुए पुप्पों के द्वारा जिस का 'मध्यभाग विरचित है, तीनों वर्ण के पुष्प जिसके ऊपरि भाग मे वि- न्यस्त हैं, जिसमें तीनों पुष्प मुख युक्त होकर वर्तमान हैं इस प्रकार के भूपण को अङ्गद अथवा ताड़ कहते हैं ।। १५३ ।। छोटे छोटे झालरों से वेष्टित, विचित्र गुम्फन से युक्त ओर प- श्री राधाकृष्णगणोहेशदीपिका ८।कटकः॥ कुड्यवृन्तै तातन्तौ प्रोतै रेकैकशस्त यः । कल्पितो विविधैः पुष्पैः कटका बहुधोदिताः ॥१५५ ॥ ६। मणिवन्धनी ॥ चतुर्वर्णप्रसूनाङ्ग गुच्छलम्वित्रिधारिका। करडोरी कुसुमजा कीर्तिता मरिणवन्धनी ।। १५६ ॥ १०। हंसकः॥ पृथुला व चतुः शृङ्गी पुष्पशृङ्गाटलम्विका पार्वे सौमनसा गुम्फाः स्फुरन्ति हंसको भवेत् ॥ १५७॥ ११ । कञ्चली। पड्वर्णपुष्प विन्यास सौष्ठवेनातिचित्रिता । कस्तुरीवासिता कण्ठलम्विगुच्छात्र कञ्चली ॥ १५८ ॥ । चवर्ण पुष्पों से विरचित भूपण काञ्ची-अर्थात् स्त्रियों का कटिभू- पण चन्द्रहार है ।। १५४ ॥ पुप्पों की कली और वृन्त (वोटा ) समूह को लतासूतों में एक एक करके गूंथने से कटक बनता है। इसमें नाना प्रकार के पुष्प रहते हैं तथा यह चरण का भूपण है । नामान्तर मल्ल है यह अनेक प्रकार का है। चार वर्ण के पुष्पों के द्वारा विरचित गुच्छ में लम्या- यमान तीन धार वाली पुप्पों से जात मणिबन्धनी अर्थात् हाथ की डोरी विशेप है ।। १५५-१५६ ॥ हंसक चरणों का भूपण है । यह अधिक रूप से चरणों को वेष्टन करके गौजूद रहता है तथा इसका आकार गोलाकार सींग के तुल्य है । प्रधान पुष्पों से लम्बमान होता है । इसके पार्श्वदेश में पुष्प रचना समूह वर्तमान रहता है ॥ १५७ ।। छ वर्ण के पुष्प विन्यास से जिसकी शोभा व्याप्त है तथा जो श्री राधारमणगसोद्देशद्दीपिका १२ । छत्रम् ।। शुक्लैः सूक्ष्मशलाकालिपर्युप्तः कुसुमैः कृतम् । स्वायूथीचितच्छत्रदण्डं छत्रमुदीर्य ते ॥ १५.६।। १३ | शयनम् ॥ चम्पमाशोकपर्याप्तमल्लीगुम्फितगण्डका । नवमालीकृता तूली विस्तीर्णा शयनं भवेत् ॥ १६०॥ १४। उल्लोचः ॥ सूचीवापसडक चित्रपुष्पविन्यासनिम्मितः । खण्डितैः केतकीपत्रैः पर्यावान् मल्लिलम्विभिः ॥ १६१ ॥ १५ चन्द्रातपः। पार्वे च सुफलन्मुक्तासिन्धुवार कलापमम् । मध्यलम्बिनवाम्भोजश्चन्द्रातप इतीर्यते ।। १६२।। कस्तूरी गन्ध से सुवासित है, कण्ठदेश मे जिसका गुच्छ लम्बाय- मान रहता है वह कलचुली अर्थात् ( कॉचोली ) है ॥ १५८ ।। सूदम-सूक्ष्म शलाका प्रस्तुत करके उसमें पुष्पों को गूंथे तथा सु- वर्णजुही पुष्पके द्वारा विचित्र दण्ड निर्माण कर छत्र बनावें ॥१५६॥ चम्पक, अशोक और प्रचुर परिमाण से मल्लिका पुष्पों के द्वारा [गेंडुया ] गेंद बनावें । नवमल्लिका पुप्पों से दीर्घाकार तकिया प्र- स्तुत कर शय्या को सजावे ।। १६० ।। उल्लोच एक प्रकार चन्द्रातप है । अल्प समय में पड़े हुए निर्मल जल की भॉति स्वच्छ और विचित्र पुप्पों के विन्यास से विरचित तथा सण्ड सण्ड के वडा पत्र के द्वारा पत्रयुक्त कुछ मलीन है।।१६।। जिसका पार्श्व भाग में मुक्ता के तुल्य सिन्धुवार पुष्प समूह दी- प्तिमान होता है तथा जिसके मध्यदेश में नवीन पद्म लम्बमान है उसे चन्द्रातप [चॉदोया] कहते है ।। १६२ ।।
श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका १६ वेश्म। शरकाण्डै कृतस्तम्भ चित्रपुष्पादिसन्ते । पुष्पै कृतचतु खरिड विविधर्वेश्म भएयते ।। १६३ ।। अथ दूत्य ॥ वृन्दा वृन्दारिका मेला मुरल्याद्यास्तु दूतिका. 1 कुआदिसंस्कृताभिशा वृक्षायुर्वेदकोविदा ।। वशीकृतस्थानचरा द्वयों स्नेहेन निर्भरा । गोरायश्चित्रासना वृन्दा तासु वरीयसी ।। १६४ ।। निशाना ॥ विशाखा नवतो भद्रा प्रेमनम्र्मसखी मता। असएडाऽक्षीणमन्त्रेय गोनिन्दे नर्मकर्मका।। परिज्ञातार्थहृदया बुद्धिदूत्यैककोविदा । साम्नि कान्दर्पिकोपाये दाने भेदे च पेशला ।। शरकण्डा तृण के दण्ड से जिसका स्तम्भ अर्थात् ठूटी रिचित है तथा खेटी-समृह विचित्र पुष्पों से प्रावृत हैं,इस प्रकार विविध पुप्पों से रचित चतुरश विशिष्ट स्थान को वेश्म अर्थात् गृह कहते हैं ।। १६३ ॥ अब दूतिओं का वर्णन करते हैं। वृन्दा, वृन्दारिका, मेला, मु. रली आदिक दूतिका हैं । वे सन कुञ्जादिको के संस्कार में परम अभिजा तथा जडी-यूदी को पहिचाननेवाली आयुर्वेद में परम पण्डि- ता, सरसो वश मे रचने वाली ओर दोनों के स्नेह मे निर्भर हदया, गौरागी और विचित्र वसन पहरने वाली हैं उनमे वृन्ना श्रेष्ठ है।॥ १६४ ॥ चिशासा जी सर से ही मगलरुपिणी, प्रेम-जर्मसखी मानी जाती हैं। वह अटूट श्रयर्थ मन्त्रण को देने वाली, क्या श्री गो- ३४ श्री राधाएगणोदेशदीपिका पनभड़ादिरचने माल्यापीडादिगुम्मने । विचित्रसर्वतोभद्रमण्डलादिनिनिम्मिती॥ नानाविचित्रसूत्रेण सुचिरप्रक्रियासु च । सूर्याराधनसामग्रीसाधने च विचक्षणा ॥ विचित्रदेशीयगीते सुदक्षा ८ पदादिषु । रङ्गापलिप्रभृतयो या सख्यश्चित्रकोनिदा ॥१६५-१६६ ।। वस्त्रदास्य ॥ माधवी मालती चन्द्ररेसाद्या पालयस्तथा । याश्च वस्त्राधिकारिण्य सख्यो दास्यश्च सम्मता ॥ १६७।। या वन्यदेव्यधिकृता सानन्दचमत्कृती। याश्च प्रसूनवृक्षेपु सख्योऽधिकृतिमाश्रिता ॥ १६८ ।। मालिकाद्याश्च यास्तासु सास्वध्यक्षतां गता । तृतीया चम्पफलता दृत्यतन्त्रप्रघट्टके ।। १६६ ।। बिन्द मे नम्र्म भाव को रखती हैं। जो हृदय में समस्त बातो को पहिचान लेती है और बुद्धि के द्वारा दूती क्रिया में परम पण्डिता हैं तथा साम, क - पं सम्बन्धी उपाय,दान और भेदी मे चतुरा हैं। पत्र-पुप्पों की रचना मे, माल्यादिक गूंथने म, सब से विचित्र मङ्गलमय मडलादि निर्माग मे, नाना प्रकार की विचित्र मन्त्रणाओं के द्वारा बडे २ कार्यों में, सूर्य प्राराधन की सामग्रियो के साधन में विचक्षण तथा विचिन नाना देशीय गीतों में [ ध्रुपनगरिकों में ] रत्नावलि प्रभृति परम अभिज्ञा जो सखियाँ हैं,माधवी,मालती,चन्द्र- रेसारिक जो आलीगण हैं,वस्त्राधिकारिणी जो सखी-दासीगण हैं, सक्ल प्रानद-चमत्कार-कृति मे अधिकार प्राप्त जो वनदेवियाँ हैं, पुष्प-वृक्षों मे अधिकार प्राप्त जो मालिकादि सखियाँ हैं, उन सब की अध्यक्षा ललिता जी हैं। तीसरी चम्पकलतानी दौत्य-मन्त्रणा में ३५ श्री राधाकृष्णगणोदेशदीपिका निगूढारम्भसम्भारा वाचोयुतिविशारदा । उपायेन पटिम्ना च प्रतिपक्षापापकृत् ॥ १७० । फलप्रसूनकन्दाना सन्धानप्रक्रियाविधौ । हस्तचातुर्यमात्रेण नानामृण्मयनिम्मितो ॥१७१ ।। पडसाना परीक्षाया शुद्धिशास्त्रे च मोविदा। मितोत्पलाकृतिपटु मिष्टहस्तेति विश्रुता ॥ पोरगव्यश्च पचने या सख्यो दासिमाश्च या । कुरङ्गाक्षी प्रभृतय सख्यो या अष्टसख्यका ।। १७३ ।। अष्टसखीचरितम् ॥ सकलेपु द्रुमलतागुल्मेप्वधिकृताश्च या । सखीप्रभृतय सवा सम्प्राप्ताध्यक्षतामसौ ॥ १७४॥ गुप्त रूप से कार्य कराने वाली तथा वचन युक्तियों में परम पण्डिता हे । पटु उपाय के द्वारा प्रतिपक्ष मे अपकर्य देने वाली भी हैं ॥ १६५-१७० ॥ फल, पुष्प, मूलों का सन्धान कार्य में, हाथों के चातुर्य्य मान से नाना प्रभार की मृण्मय वस्तुओं की रचना में, छ रसों की परीक्षा कारिणी शुद्धि शास्त्र में पण्डिता, मिसरी-सितोपलादि के बनान में चतुरा, मिष्टहस्ता नाम से प्रसिद्धा, दुग्धादि की साम मियों को बनाने वाली जो ससी-दासियाँ हैं तथा समस्तलता, गुल्म वृक्षारिका म अधिकार प्राप्त कुरङ्गाक्षी प्रभृति आठ ससियों हैं, उन सबकी अध्यक्षा चम्पकलना जी हे ।। १७१-९७३ ।। चित्रा जी सर्वत्र विचित्र विचित्र वाथ्यो में पहुँचने वाली हैं। अपनी विचित्र चातुरी से सर्वत्र उनका प्रवेश है । गमन अभिसार- ण म, के गुणों के लेस में, सङ्केत जानने मे, नाना देशीय भाषा चोलने मे, रधिमात्र से तीर मधु प्रभृति वस्तुओं के पहिचान ने मे, ३६ श्री रामायणगणोदेशीपिका प्रशनीया सर्वत्र चित्रादिपूनार्मम् । चित्रा विचित्रचातुर्या सत्रायो प्रवशिनी । यानेऽभिसरणाभिस्ये पड़ गुणस्य तृतीयक ।। १७५ ।। लेसेऽपीडितरिनाने नानादेशीयभापिते । दृष्टिमात्रात् परिचये मनुक्षीरादिबस्तुनः ।। १७६ ।। काचभाजननिमाणे तन्मध्याम्मिनिनिम्मिती। ज्योति शास्त्रे पशुवातविद्यार्या कार्मणेऽपि च ।। १७७ ।। वृक्षोपचारशास्त्रे च विशेपात पाटवं गता। रसाना पानकादीना सुप्छु निर्माणकर्मणि ।। १७८ ॥ अष्टो रसालिझायाः स्युः याः सत्यः परिकीर्तिताः । याश्च पेयाधिकारिण्यः सख्यो दास्यश्च सम्मता' ॥१७६ ।। दिव्यौषधीना प्रायेण होनाना कुसुमादिभिः । तथा वनस्थलीनाञ्च विरधाञ्चाधिकारिताम् ॥ १८०॥ लब्धा सख्यादयो याश्च तत्रैनाध्यक्षतां गता। तुङ्गविद्या तु विद्यानामष्टादशतयाशिता ॥ १८१॥ सन्धावतीवकुशला कृष्णनिश्रम्भशालिनी। रसशास्त्रे नये नाट्ये नाटकाख्यायिकादिषु ॥ १८२॥ काचों के बर्तनों की रचना में, उनमें ( काँच के वर्त्तनों में ) नाना चित्रों के निर्माण करने मे, ज्योतिषशास्त्र में, पशुविद्या मे, शरादिक निर्माण में, बृक्षोपचार शास्त्र में विशेष पटुता प्राप्त तथा रसाल- द्रव्य, पानीयद्रव्यों का निर्माण कार्य मे चतुर रसालिकादिक जो आठ सखियों कही गयी हैं, दुग्गाधिकारिणी जो ससी दासीगरण है दिव्य दिव्य औषधि, कुसुम, वनस्थली, लताओ की अधिकारिणी जो ससियाँ है उन सनकी अध्यक्षा चित्रा जी ॥ तुगविद्या जी अठारह विद्या मे पण्डिता है और श्रीकृष्ण के प्रति विश्वास पानी ३७ श्री राधाकृष्णगरणोद्देशनीपिका सर्चगान्धर्वविद्यायामाचार्यक्रमुपागता। विशेपान्मार्गगीतादौ वीणायन्त्रादिपण्डिता ॥ १८३॥ मञ्जमेधादय. सख्यो या अष्टो परिकीर्तिता । या दत्य कुशला सन्वौ पड़ गुणस्यादिमे गणे ॥ १८४ ॥ सातरङ्गशालाया या. सख्योऽधिकृति गता। मा शिक्य कलारत्यो नर्तकी प्रमुखाश्च या ॥ १८५ ।। वृन्दावनान्तरस्थेषु जलेप्युधिकृताश्च या । संख्यश्च जलदेव्यश्च तत्रैपाध्यक्षां गता ॥ १८६ ।। इन्दलेखा भोन्मल्ला नागतन्त्रोक्तमन्त्रके। विज्ञानस्य च मन्त्रेऽपि सामुद्रपिशेपवित् ॥ १८७ ॥ हारादिगुम्फने चिने दन्तरञ्जनकर्मणि । सर्वरत्नपरीक्षाया पट्टडोरादिगुम्फने ।। १८८ ॥ हैं। रसशास्त्र मे, नीति में, नाट्य में,नाटक प्रदेलिकादिकों में,समस्त गान्धर्वविद्या में, आचार्य पदवी प्राप्त और विशेष करके मार्गगी- तादिकों मे तथा वीणा-यन्त्रादिकों मे पण्डिता मञ्ज मेधादिक जो आठ ससियाँ है, सन्धि कराने मे अतिकुशल जो दूतियाँ हैं, सङ्गीत रङ्गशाला मे अधिकार प्राप्त जो सपियों हैं , नर्तकी प्रमुख क्ला- वती प्रभृति जो मृदंग बजाने वाली हैं, दाग्नस्थ जलो में अधिकार प्राप्त जो सनियाँ तथा जलदेवियाँ हैं उन सबकी अध्यक्षा तु गविद्या जी हैं ।। १७४-१८६ ॥ इन्दुलेसा जी नागतन्त्रोक्त मन्त्रों में और विज्ञान मन्त्र में वलि- टा तथा विशेष करके सामुद्रिकशास्त्र को जानने वाली हैं। हारादि Dथने में, चित्र कर्म मे, दन्तररूजन कार्य मे, समस्त रत्नों की प- रीक्षा में, पहडोगदि गूंथने में, सौभाग्यमन्त्र के लेस मे पारस्परिक अनुराग बढ़ाते हुए दोनों के भुजों में मन्त्र के धारण करने में कुशल ३८ श्री राधारागोदेशदीपिय लेये गौभाग्यमन्त्रस्य कौशल यह धृतम् । अन्योन्यगगमुन्पाय गाभाग्यं जनयद्वरम् mein तुगभद्रादयन्त्वम्या. मग्न्यः भ्यु प्रत्यनन्तगः । यास्तु साधारणा दूत्या द्वयोः पालिन्धिमादयः ॥१६॥ ताया रहस्यातानामियं माजनां गता। अलङ्कोग्य विशेष कोपरक्षाविधी च याः ॥ १.६१, 1 सख्यो दाम्येऽप्यधिरता याश्च वृन्दापनान्तं । स्वलनधिकता याश्च तास्वयदत्तया स्थिता ।। १६२॥ रहंदवी गदात्त का हाकिस्तारगिणी । कृष्णाग्रेऽपि प्रियमसीनामा तिलोत्पुमा ।। १८.३ ॥ पाडगुग्यस्य गुणे तय यत्तिर्वशिध्यमाश्रिता । करणस्यार्पण मन्त्र तपमा पूर्वमीयती ॥ १६४ ॥ विचिोप्य रागेषु गन्धयुक्तविधी च याः । कलकराठीप्रभृतयः गख्योऽष्टौ या. प्रार्तिताः ।। १६५.॥ तुंगभद्रादिक जो मपियों है, दोनों की पालिन्धिस्य प्रभृति जो सा. धारण दूतिका हैं, रहस्यवार्ताश्री की जो पात्री , अलवाररचना, बेशरचना, कोपरक्षा विषय में नियुक्ता जो मसि दासियाँ तथा घृन्दा यन में स्थानों का अधिकार प्राप्त जो सब ससिगण हैं उन सनको अभ्यता इन्दुलेग्या जी हैं ।। १८७-१९२६ रगदेवी जी सदा सर्वदा उत्तुगा, हार, भाव, इङ्गित की तर- गिणी रूपिणी हैं। श्रीकृष्ण के समक्ष में भी प्रियससी के साथ न. र्म-कौनृहल करने में असुका हे तथा छ गुणों मे तथा याद्याला में अति युक्ति रगने वाली हैं। पहले इनने श्रीकृष्ण के आकर्षण मन्त्र की तपस्य की थी । विचित्र अगरागों में, गन्ध वस्तु को लगाने में कलकराठी प्रभृति जो आठ सखियाँ कही गई हैं, धूपनकायं मे अ- ।
श्री राधाकृष्णगरणोदेशदीपिका ३६ सख्यो दास्येऽप्यधिकृता याश्च धूयनकर्मणि । शिशिरेऽङ्गारधारिण्यस्तपतविपि बीजने ॥ १६६॥ आरण्यकेषु पशुपु केशरिपु मृगादिप । सखीप्रभृतयो याथ तत्रैपाध्यक्षता गता ॥ १६७ ।। सुदेवी केशसंस्कार प्रियसख्यस्तथाञ्जनम् । अडसम्बाहनं चास्याः कुर्वती पार्श्वगा सदा ॥ १६८॥ शारिकाशकशिक्षायां नौकाकुक्कुटखेलने। भूरिशाकुनशारत्रे व पक्ष्यादिस्तवोधने ॥ १६६ ॥ चन्द्रोदयाद्रपुष्पादि वन्हिविद्याविधावपि । उद्वर्तनविशेषे च सुष्टु कौशलमागता ॥ २०० ।। गण्डूपक्षेपपात्रेषु गेण्डके शयनेऽपि च । या: कावेरीमसाः सख्यस्ता अस्याः प्रत्यनन्तगः ॥ २०१॥ धिकार प्राप्त जो ससी दासियाँ हैं, शीतकाल में जो अग्नि धरने वाली तथा प्रीष्म मे पंखा चलान चाली हैं,पारण्य पशु, सिंह मृगा- दिको का अधिकार प्राप्त जो सखीगण है उन सब की अध्यक्षा रंग- देवी जी हैं।। १३-१६७ ॥ सुदेवी जी निरन्तर प्रिया जी के पास में रहनी हैं तथा उनके केश संस्कार, अञ्जन प्रदान, तथा अंग-संवाहन का कार्य करती हैं। शारिका-शुक के सिग्पाने में, नौका चलाने मे, कुस्कुटों को सि- लाने में, शकुन शास्त्र में, पक्षियों के शब्द पहिचानने मे, चन्द्रोदय से आई पुष्पादिको को जानने में,अग्निविद्या विधि में, उद्धर्तनविशेष में विशेष कुशला हैं । गएडूप क्षेपणपात्रो में, मेंदी के सम्माल ने में, शयन कार्यो के समाधान में नियुक्ता कावेरी प्रमुग्न जो सखी गण हैं, आसन सम्भाल ने के कार्य मे अधिकार प्राप्त जो सम्पीदा सियाँ है, प्रतिपक्षों के भावो को जानने के लिये विचरण करने वाली श्री राधाकृष्णगणोदेशदीपिका मासनस्याधिकारे या. सरयो दास्यश्च सम्मता । प्रतिपक्षादिभाताना या ज्ञानाय चरन्ति च ॥२०२॥ धूर्ती प्रनिधिरूपेण नानानेशधरा स्त्रिय । याश्च पक्षिषु वन्येषु वेक अधिकृतास्तथा ॥ सख्यश्च वनदेव्यश्च तत्रै पाध्यक्षतां गता ॥ २०३ ।। सखीनां विभिन्नभाना ॥ अथ शिल्पनियोगादेर्विवृति क्रियतेऽधुना ॥ २०४॥ निग्रहे ग्रहिला सस्य पिण्डका निवितण्डिका । पुण्डरीका सिताखण्डी चारचएडी मुदन्तिका ।। २०५॥ अकुरिष्ठता कलारुएठी रामनी मेचिमादयः । ताम्राशुकापि शान्तभा पिण्डम निश्चितागमम् ॥ २०६ ।। शिलष्टेवचनशोटिफिलज्जयति मात्रम् । हरिद्राभा हरिच्चेला हरिमित्रापि या गिरा। वितरिडका वितण्डाभिर्निग्रहे. स्थानमानयेत् ।। २०७॥ तथा नाना वेश धारिणी जो स्त्रियाँ है, बन्य पक्षियों (कीरकोकिलादि) मे अधिकार प्राप्त जो सब सानी बनदेवियाँ हैं उन सबकी अध्यक्षा मुदेवी जी हैं ।। १६८-२०३ ।। अब ससियों के विभिन्न भार बतलाते है तथा शिल्प नियोगों का विवरण कहते है । विग्रह मे हा रसने वाली जो सखियाँ हैं उन में पिण्डका,निवितण्डिका, पुण्डरीका, सिताखण्डी, चारुचण्डी, सुदलिका, अकुण्ठिता, कलाकठी, रामची,मेचिकादिक ये सब हैं । पिण्डका मनोहर कान्तिवाली, नाम्ररर्ण वस्त्र को पहिनती है। वह निश्चिन्त हृदय से श्लिष्ट वचन परिपाटी के द्वारा माधव को लज्जित करती है । वितण्डिका हरिद्वर्ण तयारिद्वस्त्र को पहरने वाली हैं। जो वाणी से हरिमित्रा है। यह वितण्डा सवी निग्रह के द्वारा श्रीहरि श्री राधाकृष्णगणोदेशदीपिका : पुण्डरीका पटं धृत्वा पुण्डरीकाजिनच्छवि । पुण्डरीकाङ्गभा तज्जत पुण्डरीकाक्षमागसि ॥ २०८॥ शिरण्डिनीविपा गौरीनाम्ना सिताम्बरा सदा । वक्ति काठिन्यमाधुर्यात् सिताखण्डीति या हरेः ॥२०६ ।। चारुचण्डी भगिन्यस्या भृगश्यामा तडित्पटा । चारुचण्डतया वाचां चारुचएडीति भएयते ॥ २१०।। सुदण्डिका शिरीपाभा कुरूण्टकनिभाम्बरा । करोत्युज्ज्वलमप्येपा पाटवैरसमुज्ज्वलम् ॥ २११ ।। अकुण्ठिताजकाण्डाभा विसकाण्डसिताम्बरा । आग.कृष्णस्य या वष्टि स्वसमाज-समृद्धये ॥ २१२ ।। के स्थान पर लाती है । पुण्डरीका पुण्डरीक ( सफेद कमल) की त. । रह अंगकान्ति वाली तथा ऐसा ही वस्त्र पहिनती है। पुण्डरीका अपराधकारी पुण्डरीकाक्ष श्री हरि का पटाञ्चल धारण कर तर्जना करती है ।। २०८।। सिताखण्डी शिखण्डिनी की तरह अंगकान्ति वाली, शुभ्रवस्त्र धारिणी, गौरी नाम से ख्यात है। वह माधुर्य्य युक्त कठिन वचन बोलती है ।। २०६॥ चारुचण्डी सिताखण्डी की भगिनी, भ्रमर की तरह अंगकान्ति वाली,विद्युत्वस्त्रा है । मनोहर चण्ड वचन बोलने के कारण चारु- चण्डी नाम कही जाती हैं ।। २१०।। सुदण्डिका शिरीप पुष्प की तरह कान्ति बाली, कुरण्डक कान्ति के तुल्य वस्त्र पहिनती हैं । यह पाटव वचनों से उज्वलरस को उत्पन्न कराती है ।।२११ ॥ अबुण्ठिता कमलकांड की तरह कान्ति वाली तथा विपकाण्ड के तुल्य शुभ्रवस्त्र को पहिनती हैं । यह निज समाज की समृद्धि के लिये श्रीकृष्ण के अपराध को व्यक्त करती हैं ।। २१२ ।। . 1 ४२ श्री राधाकृष्णगोदेशदीपिका कलकाएठी कुलीपुष्पा क्षीरोदकाम्बरा ! वष्टि गान्धबिमामान या होचाटुकांचया ॥ २१३ ।। रामची ललिताधा-या पुत्री गौरी शुकशुका । यया हरिदुर्वचोभिरुद्धने परिहस्यते ।।२१४ ।। पिण्डपुष्परचि पाण्डुदुमूला मेचमा सदा। कृष्णस्य कुस्ते व्यक्तमागस्तस्येय या गिग ।। २१५ ।। अथ दूत्य ।। साग्रहा निग्रहादौ स्युर्दूत्य स्सलितयोरना । पेटरी चारुडी चारी कोटरा कालठिप्पनी ॥२१६॥ मरुएडा मोरटा चूड़ा चुण्डरी गोरिडकादय । पिण्डफेलि पुरोगानामेता स्युरनुगा सदा ।। २१७ ॥ विपक्राण्डोपमजटा पेटरी वृद्धगुज्जरी । वाडी गारुडीरेणीसहक चिकुरवेरिणका ।। २१८ ।। क्लकण्ठी कुलीपुष्प की तरह कान्ति वाली हैं तथा दुग्ध अल मिश्रित कान्ति के तुल्य वस्त्र को पहिनती हैं । जो चाटुनास्यों से श्री राधिका के मोन को श्रीहरि को सुनाती हैं ।। २१३ ।। रामची ललिताजी की धानीपुनी हें तथा गौरागी हैं। शुक्कान्ति वाले वस्त्रको पहिनती हैं। इन्होंने उद्धव जी के समक्ष दुर्वचनों से श्री हरि का परिहास किया था ॥ २१४ ॥ मेचका पिण्डपुप्पों की तरह का ितवाली हैं, सदा पीला वस्त्र पहिनती है। यह श्रीकृष्ण का उनके ही वचनों से अपराध यक्त क- राती हैं ।। २१५॥ निग्रहादिक में श्राग्रह रसने वाली,स्सलित यौवना दूतियाँ हैं । उनके नाम पेटरी,वारुडी, चारी,कोटरा, कालटिप्पनी,मरुण्डा, मोरटा, चूडा,चुण्डरी, गोण्डिकादिक हैं। ये सब पिण्डकलि की अग्रगामिनी वनचारिणी हैं।। २१६ । २१७ ।।
४३ श्री राधाकृष्णगणोद्देशीपिका सुचारीभगिनी चारी तप कात्यायनी स्मृता कठोरतपसा कात्यायनी देवी समाश्रिता। आमोरी कोटरा जात्या तिलतण्डलकेशभाक् ।। २१६ ।। पलिता पाण्डचिकरा रजनी कालटिप्पनी । मरुएडा मुण्डितशिरा पाण्डरभू कुलालिका ॥ २२० । जापाली मोरग काशसुमोपममूर्द्वजा । चूडालिदिग्धमुखा ललाटे पलितोज्ज्वला ॥ २२१ ॥ चण्डरी पुण्डरीकाक्षस्तताई जरती द्विजा । गोरिडकेय जरङ्गोण्डी मुण्डपाण्डुशिखोज्ज्वला ॥ २२२ ।। अथ सन्धिदत्य ॥ चार्यसन्धिकुशला शिनदा सोम्यदर्शना । सुप्रसादा सदाशान्ता शान्तिदा कान्तिदादय ॥ २२३ ॥ पेटरी बिपकाण्ड की तरह जटानाली, वृद्ध गूतरी हे। वारुडी गारुडी वेणी के तुल्य वेग्गी को धारण करने वाला हैं । कुचारी की भगिनी चारी हैं । निन्हान कठोर तपस्या से कात्यायनी देवी का भाश्रय प्राप्त कर लिया था । कोटरी जाति में अहिरिणी तथा तिल तण्डुल केशवाली हे । कालटिप्पनी वृद्धा, पीले केशवाली, रकिनी है। मरुण्डा मुण्डित मस्त तथा पीले भ्रू वाली है । मोरटा काम पुष्प की तरह केशवाली यमनी है। चूडा-रलि पलित मुग्य वाली उज्ज्वला है। चुण्डरी पुण्डरीक सदृश नेवाली, अर्द्धवृद्धा प्रा. ह्मणी है । गोण्डिरा रद्गोण्डी वाली है उसका मस्तक पीले केरा से उज्ज्वल है।॥२१% 1001 श्रय सथिदूतियों का वर्णन करते हैं। शिरना, सौम्य-र्शना, मुप्रमा-, सदाशाता, शान्तिदा, कान्तिनानिक सन्धि चातुर्य म कु- शल सन्धिदूतियाँ है। वे सर सर्व प्रकार से ललिवादेवी से वर्तती ४४ श्री राधाकृष्णगग्गोदेशदीपिका सर्वथा ललितादेवीजीविता वस्तुतस्त्विमाः । माधवस्य परीवारेस्तस्याप्ता इति मन्यते ॥ २२४ ।। गान्धवीयां प्रपन्नायां कलहान्तरितां दशाम् । ललितेहितमासाद्य हरे गणतया स्थिताः ।। २२५ ॥ स्त्रीया ज्ञति घिया तेन निसृष्टाः पृथयत्नतः । कृतितुष्टा निजाभीष्टं सन्धिमेव मुमन्त्रिताः ।। २२६ ।। विधाय सुष्ठ गोविन्दाद्विन्दन्त्यः पारितोपिकम् । यान्ति वृन्दावनेश्वर्याः प्रसादभरपात्रताम् ।। २२७॥ राघवी शिवदा सौम्यदर्शना सोमवंशजा। पौरवी मुप्रसादेयं सदा शान्ता तपस्विनी ॥ २२८॥ शान्तिदाकान्तिदे चेति भूमिदेवकुलोद्भवे । प्रसादादेव देवर्षे रेता वासं ब्रजे ययुः ॥ २२६ ॥ अथ द्वितीयमण्डलम् ॥ द्वितीयोऽस्मान्मनाइन्यूनप्रेमा स्यान्मएडलात् पुरः । समासमप्रेमरूपस्तद्वर्गोऽयं निगद्यते ॥ २३० ॥ हैं तथा श्रीमाधव के परिवार में गिनी जाती हैं। श्री-राधिका जी कलहान्तरिना दशा को जब प्राप्त होती हैं तब वे सब ललिताजी के इसारे से श्रीहरि के गण होकर ठहरती हैं । स्वीय बुद्धि से महान् यत्न के द्वारा निज अभीष्ट सन्धि का विधान कर श्रीगोविन्द से पा. रितोपिक चाहती हैं तथा श्रीवृन्दावनेश्वरी की करुणा पात्रता को प्राप्त होती हैं । शिक्दा रघुवंशी तथा सौम्यदर्शना चन्द्रवंशी हैं। सु. प्रसादा पुरवासिनी तथा सदाशान्ता तपस्विनी हैं। शान्तिदा, का- न्तिदा दोनों भूमिदेव (ब्राह्मण ) कुल में उत्पन्ना हैं । ये दोनों देवर्षि जी के प्रसाद से व्रज में वास करती हैं ॥ २२३ । २२६ ॥ अब दूसरे मण्डल का वर्णन करते हैं। दूसरा मण्डल पहिले .. श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका ४५ वर्ग: प्रियससीनां यः समप्रेमेत्यसो मतः । स द्विधा स्यान्नित्यसिद्धो भक्तिसिद्धस्तथा भवेत् ॥ २३ ॥ नित्यप्रियाणा तत्रापि दशकोटिमितो गणः । समवायो नियुताना लक्षरप्टाभिरेव च ॥ २३२ ॥ यदष्टकं परप्रेष्ठसखीरष्टानुगच्छति । वह्वः सञ्चयास्तत्र सहस्र: कोऽपि पञ्चपैः॥३३॥ भवेत् कश्चिच्चतु पञ्चैः कश्चिस्त्रिचतुरेरपि । कुतश्चिदिह साधात् प्राय: स्यात् सञ्चयकता ॥ २३४ ॥ समाज: सञ्चयोऽनेकै रेपाप्येकसमाजता। भवेत् स्नेहविशेपेण कश्चित् पोडशभागिह ।। २३५ ॥ मण्डल से प्रेम में कुछ न्यून है तथा समप्रेम असमप्रेम रूप से दो प्रकार का है । इसीलिये वह दूसरा मण्डल वर्ग नाम से कहा जाता है। प्रियससियों का वर्ग समप्रेम करके सम्मत है । वह नित्यसिद्ध तथा भक्तिसिद्ध करके दो प्रकार का है। इनके मध्य मे नित्यसिद्ध प्रियससियों का गण दश कोटि परिमित है । नियत काल के लिये श्रीराधाकृष्ण की सेवा मे आसत्ता ससियों का दल पाठ लक्ष हैं। ॥ २३०।२३२॥ पहले जो आठ और छ सखियों का उल्लेख किया गया है वे सब प्रधान श्रष्टसखियों की अनुगामिनी हैं। इनके मध्य में भी च- हुत प्रकार का सञ्चय अर्थात् दलभेद हैं ! उनमे से कोई सञ्चय पाँच हजार कोई छ हजार संख्या में हैं। फिर भी कोई चार-पाँच हजार कोई तीन-चार हजार मंग्या में हैं । वस्तुतः किसी प्रकार से परस्पर साधर्म्य रहने के कारण समस्न सञ्चयों की प्रायः एकता है। अनेक संरयक सखिमण्डल के द्वारा एक सञ्चय नामक गण की सृष्टि होती है परन्तु उनमे से प्रत्येक का एकमात्र समाज है । तो भी स्नेह के विशेष रहने के कारण कोई कोई समाज पोलह भाग मे विभक्त होता ४६ श्री राधाकरणगणोद्देशदीपिका विंशत्यापि तथा पञ्चविंशत्या त्रिंशता तथा। पष्ठया कश्चित् समाजः स्याच्चतुः पष्ठयादिभिस्तथा ॥ ३६॥ चतुपष्ठ्यादिभिस्तत्र समाजोऽयं प्रपञ्च्यते । द्वाभ्यां द्विस्त्रिचतरादिभिश्चालीजनै वेत् ॥ २३७ ।। चत्वारिंशयथः कश्चिदेवं पञ्चाशता भवेत् । सर्वमावेण साधये समाजोऽपि समन्वयः ।। २३८ ।। रत्नप्रभा रतिकला सुभद्रा रतिका तथा । सुमुखी च धनिष्ठा च कलहंसी कलापिनी ॥ २३६ ।। माधवी मालती चन्द्ररेखिका कुञ्जरी तथा । हरिणी चपलानाम्नी सुरभिश्च शुभानना ॥ २४०।। करडाक्षी सुचरिता डली मणिकुण्डला। चन्द्रिका चन्द्रलतिका पङ्कजाक्षी सुमन्दिरा ।। २४१. ।। रसालिका तिलकिनी शौरसेनी सुगन्धिका । रामिणी कामनगरी नागरी नागवेणिका ।। २४२ ।। है। कोई समाज विंशतिजन सखी का, कोई पञ्चविंशनि (२५) का, कोई तीस (३०) का,कोई साठ (६०)का,कोई समाज चौसठ (६४) जन सखी का गठन होता है। चौसठ सखी का समाज अब विस्तृत भाव से प्रदर्शित होरहा है । कोई दो जन,कोई दो-तीन जन,कोई तीन चार जन सखी के द्वारा गठित होता है। शेयोक्त समाज बहुविध सख्या विशिष्ट है । उल्लेखित समाज के मध्य में चत्वारिंशत् अर्थात् (४०) यूथ हैं । इस प्रकार समाज को भी ५०० भाग मे विभक्त किया जाता है । सर्वभाव से साधर्म्य अर्थात् समानधर्म रहने के कारण समाज समस्या से निर्दिष्ट होता है ऐसा जानना चाहिए । समसं. रया समाज के प्रधान सखियों के ६४ नाम उल्लेखित किये जाते हैं । इसे ६४ सखियों के समाज का विस्तार जालना चाहिए ॥२३३२३८।। रत्नप्रभा इत्यादि लेकर मनोहरा इति अन्त पर्यन्त मूलश्लोको ।
-- श्री राधाकृष्णगोटेशदीपिका मञ्जुमेधा सुमधुरा मुमध्या मयुरेक्षणा। तनुमध्या मस्पन्दा गुणचड़ा वराङ्गदा ||२४३।। तुङ्गभद्रा रसोत्तु हा रङ्गवाटी सुसङ्गता। चित्ररेखा विचित्राङ्गी मोदनी मदनालसा ॥ २४४ ॥ कलकष्ठी शशिकला क्रमला मधुरेन्दिरा । कन्दर्पसुन्दरी कामलतिका प्रेगमञ्जरी ।। २४५ ॥ कावेरी चारुकवरा सुकेशी मञ्जुकेशिका । हारहीरा महाहीरा हारक्रएठी मनोहरा ।। २४६ ॥ श्रीराधाया अष्टसख्यः सम्मोहनतन्त्रे- लीलावती साधिका च चन्द्रिका माधवी तथा। ललिता विजया गौरी तथा नन्दा प्रकीर्तिता ॥ २४७॥ अन्याश्चाष्टौ ।। कलावती रसवती श्रीमती च सुधामुखी। विशाखा कोगुदी माध्वी शारदा चाष्टमी स्मृता ॥२४८ ॥ तत्ररत्नभवाः ॥ एता नोपेक्षिता उक्ता नित्यानामबधारणे ॥ २४ ॥ इत्येतत्परिवाराणां श्रीवृन्दावननाथयोः । असंख्यानां गयितु दिग्मात्रमिह दर्शितम् ॥ २५० ॥ को देखें--अर्थ सरल है ॥ २३६१२४६ ।। श्री राधाकी अष्ट्रसस्त्रियाँ सम्मोहनतन्त्र में-लीलावती, साधिका, चन्द्रिका, माधयी, ललिता, विजया, गौरी, जन्दा हैं। अन्य अष्टस- खियाँ - कलावती, रसवती, श्रीमती, सुधामुखी, विशाखा, कौमुदी, माध्वी, शारदा हैं ॥४७॥२४॥ नियों के निर्णय में इन सब की उपेक्षा नहीं की गयी है ॥२३॥ यह श्रीवृन्दावननाथ राधाकृष्ण के असंख्य परिवारों की गणना करने में केवल दिङमात्र दिखाया गया है ।। २५० ।।
४८ श्री राधाकृष्णगगोदेशदीपिका तल्पान्नपानताम्बूलहिल्लोलस्थानकादय । अन्येऽपि ये निशेषा स्यु स्वयमूह्यास्तु ते बुधै ॥५१॥ लप्ततमामीतू कृपया ज्योतिर्घटयेर भानुमत्यामौ । रूपरिपयापि दृष्टि सरसान् शब्दानक्षिष्ट ॥५॥ शाके गश्वशक्रे, नभसि नभोमरिणदिने पट्याम् । ब्रजपतिसमनि राधाकृष्णगणोद्देशदीपिकादीपि ।। २५३॥ इति श्रीलरूपगोस्वामिपादविरचिनाया श्रीगधाकृष्णगणोद्देशदीपिकायां वृहद्भाग. सम्पूर्ण ॥ शर्य्या, अन्न, पान, ताम्बूल, दोला, भूलन, तिलरचनादिक अ- न्यलीला समूह का तथा उस उस लीला को अनुसारिणी अन्य अन्य सखियों के नाम इस अन्य मे उह्य है । रसिक पण्डितगण विभिन्न प्रन्थों से उद्धार कर समुझ लेवे ।।०५१ ॥ कालरूप अन्धकार से श्रीराधानाथ के परिवारवर्गों का नाम एक प्रकार से विलुप्त हो रहा था किन्तु श्रीरूप की दृष्टी भगवत्कृपा स्प ज्योतिघटा के द्वारा भानुमती अर्थात् सूर्यप्रकाशरूप लाभ कर सरस शब्दों के अवलोकन मे सक्षम हुई है । नात्पर्य यह है भीरूप गोस्वा- मी ने परिवारों के नाम का विविध शास्त्रों से भगवत् कृपा शक्ति के द्वारा उद्धार किया है। -५२॥ ह२ अश्व ७ शक १४ हैं। अको की गति वॉयदिशा में है इस नियम से १४७२ शाब्द श्रावणमास रविनार पष्ठि तिथी में श्री नन्दमहाराज के शोभायमान गृह मे अर्थात् महानन में श्रीरूपगो- सामि इस "श्रीराधाकृष्णगणोदेशदीपिका" ग्रन्थ का प्रणायन करते हैं ॥ २५३ ॥ इति श्रील श्रीपादरूपगोस्वामिविरचित श्रीराधाकृष्णगणोदेशदीपिका के वृहद्भाग सम्पूर्ण हुआ । अनुवाद भी सम्पूर्ण हुआ॥ ।
४६ श्रीराधाकृष्णगरणोद्देशदीपिका से परिशिष्टम् । (लघु) श्रीराधाकृष्णगणोद्देशदीपिका श्रीकृष्णस्य रूपादिकम् ॥ सुधालावण्यमाधुर्य्यदलिताञ्चनचिकरणः । इन्द्रनीलमणिः किंवा नीलोत्पलरुचिप्रभा॥१॥ किंवा नव्यतमालोऽपि मेघपुञ्जमनोहरः। प्रभा मारकती कान्तिः सुधालावण्यवारिधिः ॥२॥ पीतवस्त्रपरिधानो वनमालाविभूषितः । नानारत्नभूपिताको नानाकेलिरसाकरः ॥ ३॥ दीर्घकुञ्चितकेशोऽपि बहुगन्धसुगन्धितः । नानापुष्पमालया च चूड़ादीप्तिर्मनोहरा ॥ ४ श्रीमल्ललाटपाटीरस्तिलकालकशोभितः । लीलोन्नतभूविलास-कामिनीचित्तमोहनः ॥ ५॥ अव श्रीकृष्ण के रूपादिकों का वर्णन करते हैं । वे सुवा-लाव- एयता-माधुर्य से युक्त और दलिन काजर के तुल्य चिक्करण हैं। किम्वा इन्द्रनीलमणि अथवा नीलकमल कान्ति के सदृश श्यामल हैं तथा नवीनतमाल के तुल्य सुन्दर अयवा मेघपुब्ज के सदश मनोहर हैं। मारकतमणि की भॉति उनकी कान्ति थी । ये सुवा-लावण्यता के सागर रूप रहें । वे पीताम्बर धारण करने वाले, विविध वनमा- लाओं से विभूषित, नाना प्रकार के रत्नों से मण्डित अंगवाले, नाना प्रकार के केलिरस के सागर हैं। उनका केश लम्बायमान तथा पुचित हैं जो विविध गन्धों से सुवासित हो रहे हैं। चूडा की कान्ति नाना प्रकार के पुप्पों की माला से मनोहर है। शोभायमान ललाट देश तिलक और अलकावली से विशेष सुन्दर हो रहा है। वे लीला से उन्नत भूपिलाश के द्वारा कामिनी गणों के चित्त को मो- ५० श्रीराधाकृष्णगणोद्देशदीपिका घूर्यमान सुनयन रक्तनीलोत्पलप्रभम् । खगेन्द्रचञ्चुलाचण्य-सुनासाग्रजसुन्दर ॥६॥ मनोहारिफर्णयुग्म मणिकुण्डलशोभितम् । नानामणिकुण्डलाट्यगण्डस्थलविराजित ॥७॥ मुखपद्म सुलावण्य कोटिचन्द्रप्रभाकरम् । नानाहास्यसुमधुरश्चिवुको दीप्तिमान् भवेत् ॥८॥ कण्ठदेश सुलावण्यो मुक्तामाला विभूपित । त्रिमडो ललितस्निग्धग्रीवस्त्रैलोक्यमोहन ॥६॥ वक्ष स्थलञ्च लावण्यैरमणीरमरणोत्सुझम् । मणिकौस्तुभदियुद्धामुक्ताहारविभूषितम् ॥१०॥ आजानलम्विती भुजो केयुर्वलयान्वितौ । रक्तोत्पलहस्तपद्मौ नानाचिन्हसुशोभितौ ॥ ११ ॥ गदा शस-या-च्छन चन्द्रा कुशशोभितौ । यज-पद्म-यूप-हल घट-मीन विराजितौ ॥ १२ ॥ । हित करने वाले हैं। उनके नयन-युगल घृर्णयमान तथा रक्त-नील उत्पल की प्रभा के तुल्य हैं । गरुड चञ्चु के सदृश तथा लावण्यमय सुन्दर नासिका से वे शोभायमान है। मणि-कुण्डलों से शोभित मनोहरणकारी उनका कर्णयुगल हैं। वे नाना मणिकुण्डलों से युक्त गण्डस्थल के द्वारा विशेष शोभा युक्त हैं। उनका मुखकमल लाव- ण्यमय कोटि चन्द्रमा की कान्ति के तुल्य है। उनका नाना प्रकार के हास्य रस से सुमधुर, दीतिमान् चिवुक है। उनका कठदेश सुन्दर लारण्यमय तथा मुक्तामालाओं से विभूपित है । त्रिभगी से ललित, त्रैलोक्यमोहन स्निग्ध प्रीना तथा लावण्यों से रमणीगण के रमण मे उत्सुक वक्षस्थल है । जो कौस्तुभमणि और विद्युत्कान्ति वाले मुक्ता हारों से विभूपित है । केयूर तथा वलयादिक से युक्त ज्ञानुलम्बिभुन ११ 31480 श्रीराधाकृष्णगणोदेशदीपिका उदरञ्च सुमधुरं लावण्यकेलिसुन्दरम् । पृष्ठपार्श्व सुधारम्यं रमणीकेलिलालसम् ।। १३ ।। कटिविम्वं सुधाम्भोज कन्दर्पमोहनोत्सुकम् । रामरम्भे इवोरू द्वौ नारीमोहनकारकौ ॥१४॥ जान द्वौ च सुलावण्यौ मधुरौ परमोज्वलौ। पादपद्मौ सुमधुरौ रत्ननूपुरभूपितो॥ १५ ॥ जवापुष्पसमरुची नानाचिन्हसुशोभितौ । चक्राचन्द्राष्टकोण-त्रिकोण-यवशोभिती ॥१६॥ अम्बर-च्छत्र-कलस-शंख-गोप्पद-स्वस्तिकौ । अङ्कुशाम्भोज-धनुपा जाम्बवेन च शोभितौ ॥ १७ ॥ अंगुल्योऽरणभाः सम्यड्नखचन्द्रसमन्विताः । श्रीयुतौ चरणाम्भोजी नानाप्रेमसुखार्णवौ ॥ १८ ॥ मल युगल हैं । नाना चिन्हों से सुशोभित रक्त उत्पल की तरह हस्तक- है जो कि गटा, शंख, यव, छत्र, अचन्द्र, अंकुश से शोभा- यमान तथा ध्वजा, पद्म, यूप, हल, घट, मीन के चिन्हों से विराज- मान हैं । लावण्य क्रीड़ा से युक्त सुन्दर सुमधुर उदर है । रमणि- यों की कोलि में लालस, सुधा से भी सुन्दर पृष्ठ और पार्श्वदेश हैं। कन्दर्प मोहन में उत्सुक, सुधामय कमल की तरह पटिविम्ब है। नारीगण 'मोहनकारी, मनोहर रम्भा की भॉति अरु युगल हैं। मधुर, परमोज्ज्वल, सुन्दर लावण्यमय दोनों जंघा हैं। रत्न, नूपुरों से भूपित, नाना चिह्नों से सुशोभित, जवापुप्पों तरह कान्तिवाले महा सुमधुर युगल चरण कमल हैं । जो चक्र, श्रद्धचन्द्र, त्रिकोण, यव, अम्बर, छत्र, कलस, शंख, गोप्पट, स्वस्तिक, अंकुश, कमल, धनुप, जामन चिह्नों से शोभायमान हैं। अंगुलियाँ अरुण कान्ति के तुल्य तथा नसचन्द्रों से युक्त हैं । यह चरण युगल शोभायुक्त, म श्रीराधाकृष्णगोडेशदीपिका एतेषां कृष्णरूपाणां तुलना नहि विद्यते। किञ्चिदुद्दीपनार्थाय दिडमात्रमिह दर्शितम् ॥ १८ ॥ अथ वयस्याः ॥ अथ श्रीकृष्णचन्द्रस्य सखिवृन्दञ्च कथ्यते । अग्रगामी वयस्यानो प्रलम्बारातिरग्रजः ॥२०॥ वयस्यभेदाः॥ सुहृत्-सखि-प्रियसखा:-प्रियनर्मसखस्तथा। वयस्याः कृष्ण यन्द्रस्य स्फुटमत्र चतुर्विवाः ।। २१ ।। तत्र सुहृत् ॥ सुभद्रः कुण्डलो दण्डी मण्डलोऽमी पितृव्यजाः । सुनन्दो नन्दिरानन्दी इत्याद्या यातरः स्मृताः ॥ २२ ॥ शुभद्रो मण्डलीभद्र-भद्रवर्द्धन-गोभटाः । यक्षेद्र-भट-भद्राङ्ग-वीरभद्र महागुणाः ॥२३॥ कुलवीरो महाभीमो दिव्यशक्तिः सुरप्रभः । रणस्थिरादयो ज्येष्ठकल्पाः सरक्षणाय ये॥२४ ।। . नाना प्रेम सुस के सागर रूप हैं । इन सब श्रीकृष्ण के रूपों की ज. गत् में तुलना नहीं है । परन्तु चिचिन्मात्र उद्दीपन के लिये यहाँ दिड मात्र दिखाया गया है ॥१-१॥ श्रय श्रीकृष्णचन्द्र के सखावृन्दों को कहते हैं। वयस्यों में श्र- प्रज प्रलम्बारि बलदेव जी अग्रगामी हैं ।। २०॥ सुहृत् , सखा, प्रियससा, प्रियनमसखा के भेद से श्रीकृष्ण के चार प्रकार के क्यस्य हैं । पहिले सुहृत् का भेद कहते हैं। सुभद्र, पुण्डल, दण्डी, मण्डल ये सब चचेरे भाई तथा सुनन्द, नन्दि, श्रा- नन्दि ये सब यातर हैं। सुभद्र,मण्डलीभद्र,भद्रवद्धन,गोभट,यवेन्द्र, भट, भद्रांग, वीरभद्र, ये सब महान गुण वाले हैं। कुलवीर, महा- श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका पितृभ्यामभितो भीतचित्ताभ्यां दुष्टकंसतः । प्राणकोट्यधिकप्रेष्ठपुत्राभ्यां विनियोजिताः ॥ अत्राध्यक्षोऽम्विकासून विजयाक्षस्तपस्यया । यः किलाम्विस्या लेभे धात्र्योपास्य सदास्विकाम् ॥ २५ ॥ तत्र सुभद्रः॥ सुचिकरणो नीलवर्णः सुभद्रो दीप्तिमान् भवेत् । पीतवस्त्रपरिधानो नानाभरणशोभितः ॥ २६ ॥ उपनन्दः पिता तस्य तुला माता पतिव्रता। परमोज्वलकैशोरः पत्नी कुन्दलता भवेत् ॥२७॥ अथ सखायः॥ विशाल-वृपभौजस्वि देवप्रस्थ-वस्थपाः । मन्दार-कुसुमापीड-मणिवन्धकरास्तथा ॥२८॥ मन्दरश्चन्दनः कुन्दः कलिन्दकलिकादयः । कनिष्ठकल्पाः सेवायां सखायो विपुलाग्रहाः ।। २६ ॥ भीम, दिव्यशक्ति,सुरप्रभ,रणस्थिरादिक बलदेव जी के सदृश बड़े हैं तथा कंस से भयभीत पिता माता के द्वारा प्राणकोटि से अधिक प्रिय श्रीकृष्ण की संरक्षा के लिये नियुक्त किये हुए हैं । इन सबके अध्यक्ष अम्बिकापुत्र विजयाक्ष हैं । धात्री अम्विका ने निरन्तर अम्बिकादेवी की उपासना कर विजयाक्ष को पुत्ररूप से लाभ किया है ।।२१-२५।। इनमे से सुभद्र स्निग्ध-नीलवर्ण-कान्तिमान हैं तथा पीतवस्त्र- धारी-नाना आभरण से शोभित हैं। उनके पिता का नाम उपनन्द और माता पतिव्रता तुलादेवी हैं । सुभद्र परम उज्ज्वल कैशोर अव. स्था के हैं। उनकी पत्नी कुन्दलता है ॥ २६-२७॥ । अब सखाओं का वर्णन करते हैं-विशाल, वृपभ, ओजस्त्रि, देवप्रस्थ, वरूथप, मन्दार, कुसुमापीड, मणिबन्धकर, मन्दर, चन्दन, कुन्द, कलिन्द, कुलिकादिक सखा हैं । वे सब सखा सेवा में विपुल ।
श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका अथ प्रियसखाः॥ श्रीदामा दामा सुदामा वसुदामा तथैव च । मिड्डिणिभद्रसेनाशुस्तोमकृष्णा विलासिनः ॥३०॥ पुण्डरीक-विष्वाक्ष-कलविङ्क-प्रियङ्कराः । श्रीदामाद्याः समास्तत्र श्रीदामा पीठमईकः॥ ३१ ॥ समस्तमित्रसेनाना भद्रसेनश्चमूपतिः। स्तोककृष्णो यथार्थाख्यः कृष्णस्य प्रत्यनन्तरः ।। ३२॥ रमयन्ति प्रियसखाः केलिभिर्विविधैरमी । नियुद्धदण्डयुद्वादिकौतुकैरपि केशवम् ॥ ३३ ॥ एते प्रियसखाः शान्ताः कृष्णप्राणसमा मताः ॥ ३४॥ अथ प्रियनर्मसखाः ।। सुवलार्जुनर्गन्धर्चवसन्तोज्वलक्रोफिलाः। सनन्दनविदग्धाद्याः प्रियनर्मसखा मताः ॥ ३५ ॥ आग्रह रसने वाले कनिष्ठ कल्प है ॥ २८-६ ।। अब प्रिय सखाओं का वर्णन करते हैं । श्रीदाम, दाम, सुदाम, वसुदाम, किङ्किणि, भद्रसेन, अशुमान् , स्तोककृष्ण, विलासि,पुण्ड. रीक, विटकाक्ष, कलविव, प्रियङ्कर, ये सब प्रियसखा हैं । श्रीदामा- दिक समान वयः और रूप वाले हैं । श्रीदामा पीठमईक तथा भद्र सेन समस्त मित्रसेनाओं के सेनापति हैं। स्तोककृष्ण श्रीकृष्ण के प्रति अपने यथार्थ नाम से प्रसिद्ध हैं। प्रियससागण विविध क्रीड़ा- धों से तथा नियुद्ध-दण्डयुद्धादिक विविध कौतुकों से केशव को सुची करते हैं। ये सब शान्त प्रकृति के तथा कृष्ण के परम प्राण रूप हैं। अव प्रियनमससाओं का वर्णन करते हैं। -सुवल, अर्जुन, गन्धर्व, वसन्त, उज्ज्वल, कोकिल, सनन्दनादिक तथा विदग्वादिक । ॥३०-३४॥ .
५५ श्री राधाकृष्णगणोदेशदीपिका तदहस्यन्तु नास्त्येव यदमीयां न गोचरः । मधुमगलपुप्पाङ्क हासङ्काया विदूपका ।। श्रीमान् सनन्दनस्तत्र सौहदानन्दसुन्दरः । मुर्तिमानेव रसराडुज्ज्वला महोज्ज्वलः । विलासिशेखरो यस्य विलासेन वशीहतः ।। ३६ ॥ तत्रादौ श्रीदामा ॥ श्रीदामा श्यामलसंचरडकान्ति मनोहरा । पीतवस्त्रपरिधानो रत्नमालाविभूपितः ॥ ३७॥ क्यः पोडशवयंञ्च किशोरः परमोज्वलः । श्रीकृष्णस्य प्रियतमो बहुकेलिरसाम्रः ।। ३८ ॥ वृषभानुः पिता तस्य माता च कीर्तिदा सती। राधानगमञ्जरीच कनिया भगिनी भवेत् ॥ ३६॥ तत्र सुदामा॥ ईपटौरः सुदामा च देहकान्तिर्मनोहरा। नीलवस्त्रपरिधानो रत्नाभरणभूषितः ॥ ४० ॥ प्रियनमसखा है। ऐसा कुछ रहस्य नहीं था जो कि इनके गोचर न हो । मधुमङ्गल, पुप्पा, हासङ्कादिक विदूपक थे । उनमे से सनंदन परम श्रीमान सुहृदता के आनन्द मे सुन्दर था। उज्ज्वल तो मूत्ति- मान रसराज की तरह महान उज्ज्वल था। विलासि शेखर श्रीकृष्ण जिसके विलास से वशीभूत हो गये थे ।। ३५-३६ ।। पहिले श्रीदामा का वर्णन करते हैं। श्रीदामा श्यामलरुचि अग. कान्ति से मनोहर हैं । वे पीताम्बर धारण करने वाले तथा रत्नमाला- ओ से विभूषित हैं । पोडश वर्षीय कैशोर अवस्था से परम उज्ज्वल है जो कि श्रीकृष्ण के प्रियतम तथा बहु केलिरस के भांडार रूप हैं। उनके पिता वृपभानु जी और माता कीचिंदा सती हैं । श्रीराधा और अनङ्गमञ्जरी ये दोनों छोटी भगिनी हैं।। ३५-३६॥
। श्री राधाकृष्णगणोदेशदीपिका पिता च मटको नाम रोचना जननी भवेत् । सुकिशोरवयो वेशः नानाकेलिरसोत्करः ॥ ४१ ।। १। अथ सुक्लः ।। सुवलस्य गौरकान्ति लवस्त्रमनोहरः । नानारत्नभूपिताङ्गो नानापुष्पविभूपितः ।। १२ ॥ सार्द्धद्वादशवर्षीयः कैशोरवयसोज्ज्वलः । सखीभावं समाश्रित्य नानासेवापरिप्लुतः ।। ४३ ॥ द्वयोमिलन पुण्यो मधुरो भावभावितः । नानागुणसखापेतः कृष्णप्रियतमो भवेत् ॥ ४४ २। अज्जुनः ॥ रक्तोत्पलनिभा कान्तिरर्जुनो दीप्तिमान् भवेत् । वसन चन्द्रकान्तिश्च नानारत्नस्शोभितः ॥ ४५ ॥ पिता सुदक्षिणस्तस्य भद्रा च जननी भवेत् । ज्येष्ठो भ्राता वमुदामा द्वयोः प्रेमपरिप्लुतः ।। ४६ ।। सुदामा जी ईपत् गौरवर्ण हैं । उनकी अंगकान्ति परम मनोहर है। वे नीलाम्बर पहरने वाले तथा रलमय आभरणों से विभूषित हैं । पिता का नाम मटुक ओर रोचना जननी है । सुन्दर कैशोर वेयः वेश से युक्त तथा नाना केलिरस से उत्सुक हैं ।। ४०-४१ ।। सुबल जी की अंगकान्ति गौरवर्ण है । वे नीलाम्बर से मनो- हर तथा नाना रलों से भूपित अंग वाले हैं । नाना पुष्पों से विभू- पित हैं। साढ़े द्वादश वर्षीय कैशोर अवस्था से परम उज्ज्वल है। सुबल जी सखीभाव का आश्रय कर नाना प्रकार से सेवा करते हैं। दानों का मिलन कराने मे परम निपुन, मधुर, भावों से विभावित, नाना गुणों से अानन्दयुक्त, श्रीकृष्ण के प्रियतम हैं ॥ ४२-४४॥ अर्जुन जी की कान्ति रक्तोत्पल की तरह है। वे परम दीप्ति- मान हैं तथा चन्द्रमाकान्ति के तुल्य वस्त्र को पहरने वाले हैं। और । ॥ ।
श्रीराधाकृष्णगणोद्देशदीपिका सार्दाचतुर्दश समा वयः कैशोरकोज्ज्वलः। नानापुष्यभूपिताङ्गो वनमालाविभूषितः॥४७॥ ३१ गन्धवः ॥ निशाकरप्रभाकान्तिर्गन्धवों रूपवान् भवेत् । रक्तवस्त्रपरिधानो नानाभरणसंयुतः ॥४८॥ वयो द्वादशवर्पञ्च किशोरवयसोज्वलः । नानापुष्पभूपिताट्रो गन्धर्चश्व सुशोभितः ॥ ४६॥ माता मित्रा सुसाध्वी च विनाको जनको महान् । श्रीकृष्णस्य प्रियतमो नानाकेलिकुतुहलः ॥ ५० ॥ ४। वसन्तः।। ईपगौराङ्गकान्तिश्च वस्त्र चन्द्रसमोज्ज्वलम् । नानामणिभूषिताङ्गो वसन्त उज्ज्वलो भवेत् ।। ५१ ॥ नाना रत्नों से सुशोभित हैं । पिता सुदक्षिण और माता भद्राजी हैं। युड़े भ्राता वसुदामा जी हैं । अर्जुन जी दोनों के प्रेम से परिप्लुत हैं। साढ़े चौदह वर्प वाली कैशोर अवस्था से उज्ज्वल हैं। वे नाना पुष्पों से विभूषित अंग बाले तथा वनमालाओं से विभूपित हैं। ॥ ४५-४७॥ गन्धर्व परम रूपवान् है। उसकी कान्ति चन्द्रमा की तरह है। वह रक्तवस्त्र को पहरने वाला तथा नाना पाभरण से युक्त है। अ- वस्था द्वादश वर्ष की है तथा कैशोर अवस्था से उज्ज्वल है। गन्धर्च नाना पुष्पों से भूपित अंगवाला और परम शोभायमान है। माता मुसाध्वी मित्रा जी और पिता विनाक जी हैं । गन्धर्व श्रीकृष्ण के प्रियतम तथा नाना केलियों से कुतुहली है ॥४-५०॥ वमन्त की अंगकान्ति ईपद् गौरवर्ण है । उसका वस्त्र चन्द्रमा के तुल्य उज्वल है । वसन्त नाना मणियों से भूपित अंग वाला ५८ 4 श्री राधामणगोहेशदीपिका एकादशवर्पवया नानामाल्यविभूपितः। माता च शारदी साध्वी पिङ्गलो जनको महान् ॥५२॥ ५ उज्ज्वलः॥ रक्तवर्णप्रभा कान्तिज्ज्वलः परमोच्चलः । तारावलीसमं वस्त्रं मुक्तापुष्पविराजितः ।। ५३॥ सागराच्यः पिता तस्य माता वेणी पतिव्रता। त्रयोदशवर्षश्याः किशोरः परमोज्वलः ॥ ५४॥ ६। कोफिलः॥ शुभ्रान्तिः सुलावण्यः कोकिलः परमोचलः। नीलवस्त्रपरिधानो नानारत्नविभूपितः ॥ ५५ ॥ वकादशकं मासाश्चत्वारो यद्वयाक्रमः । जनकः पुष्को नाम मेधा माता यशस्विनी ॥५६॥ ७१ सनन्दनः।। ईपद्गौराङ्ग कान्तिश्च शोभितश्च सनन्दनः । नीलवनपरिधानो नानाभरणभूपितः ।। ५७॥ परम उज्ज्वल है। उसकी अवस्या एकादश वर्ष की है। वह नाना प्रकार मालाओं से विभूपित है । माता साध्वी शारदी और पिता पिङ्गल महान् हैं ॥ ५१-५२ ॥ उज्ज्वल की कान्ति रक्तवर्ण है तथा वह परम उज्ज्वल है । तारा समूह की तरह उसका वस्त्र है तथा मुत्ता पुष्पों से विराजमान है। पिता का नाम सागर है माता पतिव्रता वेणी जी हैं। त्रयोदश वर्षीय विशोर अवस्था से परम उज्जवल है ।। ५३-५४॥ कोक्लि शुभ्रवर्ण, लावण्यमय, परम उज्ज्वल है तथा नील वस्त्र पह- रने वाला और नाना रत्नों से विभूपित है । उसकी अवस्था ग्यारह वर्ष चार महीना है । पिता का नाम पुष्कर तथा माता यश को देने वाली मेधा जी हैं ।। ५५-५६ ॥
श्री राधाकृष्णगोद्देशदीपिका सार्दाश्चतुर्दश समा वयो माल्यविराजितः । अरुणानः पिता तस्य माता च मल्लिका भवत् ।। ५८॥ श्रीमान् सनन्दनस्तत्र सौहृदानन्दसुन्दरः । मूर्तिमानेव रसराडुज्ज्वलश्च महोवलः ॥ ५ ॥ ८। विदग्धः।। रूपं चम्पकवर्णाट्य विदग्धो दीप्तिमान् भवेत् । शिखिकण्ठवर्णवासा मुक्तामालाविमूपितः ।। ६० ॥ चतुर्दशवर्षपूर्णः किशोरः परमोज्वलः । पिता च मटुको नाम जननी रोचना भवेत् ॥ ६१ ॥ सुदामा चाग्रजभ्राता भगिनी सुशीलापि च । श्रीकृष्णस्य प्रियतमो युग्मभावविभावितः ।। ६२॥ तत्र श्रीमधुमङ्गलः॥ ईपच्छयामलवर्णोऽपि श्रीमधुमङ्गलो भवेत् । वसनं गौरवर्णाट्य वनमालाविराजितः ।। ६३ ॥ सनन्दन कुछ गौर अंग कान्ति बाला तथा परम शोभाशील है यह नीलवस्त्र का धारण करने वाला तथा नाना पाभरण्य से भूपित है। उसकी अवस्था साढ़े चौहह वर्प है तथा वह मालाओं से विरा- जमान है । पिता अरुणाक्ष तथा माता मल्लिका जी हैं। श्रीमान् सन- न्दन सौहृदता सुख में परम सुन्दर है और उज्ज्वल मूर्तिमान रस- राज के सदृश है ।। ५७-५८ ।। विदग्य की अंगकान्ति चम्पकवर्ण है । विदग्य परम दीमिमान तथा मयूरकंठ की तरह श्यामवस्त्र पहरने वाला है । अनेक प्रकारची मुक्ता- मालाओं से विभूपित है। उसकी चौदह वर्ष परिपूर्ण अवस्था है । प- रम उज्ज्वल किशार है । पिता का नाम मटुक तथा माना रोचना जी हैं। सुदामा जी उसके बड़े भ्राता तथा भगिनी सुशीला है । विदग्ध श्रीकृष्ण के प्रियतम और युगल भाव से विभाबिन है ।। ६०-६२ ।।
श्रीराधाकृष्णगणोदेशदीपिशा पिता मान्दीपनिदेवी माता च सुमुसी सती। नान्दीमुखी च भगिनी पौर्णमासी पितामही ।। ६४ ॥ चिदूपमः कृष्णसस श्रीमयमङ्गलः सदा ॥ ६५ ॥ अथ श्रीरलराम ॥ शुभ्र, स्फटिकवर्णाट्यो बलरामो महागलः । नीलवस्त्रपरिधानो बनमालाविरार्जितः ॥ ६६-६७॥ दीर्घकेशः सुलावग्यश्चडा चारु मनोहरा । रत्नकुण्डलयुग्मञ्च कर्णयुग्मे विराजितम् ॥ ६८ ॥ नानापुपमणेहोरः कण्ठदेशे सुशोभितः । केयवलयो युग्मौ वाहुयुग्मे निगजितौ ॥६६॥ रत्ननुपुरयुग्मच पादयुग्मे सुशोभितम् । बसुदेव पिता तस्य माता च रोहिणी भवेत् ।। ७० ।। - मधुमङ्गल ईपत् श्यामल वर्ण है। उस वसन गौरवर्ण है तथा वह वनमालाओ से विराजमान है। पिता सान्दीपनि ऋपिजी माता सुमुखी सती हैं। नान्दीमुनी उसकी भगिनी तथा पौर्णमामी जी पितामही (दाढी) है । मधुमङ्गल श्रीकृष्ण के सदा सर्वदा सखा और विदूपक भी है ।। ६३-६५ ।। श्रीवलदेव जी शुभ्रवर्ण तथा महान् वली हैं। ये नीलाम्बरधारी तथा विविध वनमालाओ से विराजमान हैं। दीर्य उनके केश हैं तथा मनोहर चूटा से परमसुन्दर, लावण्यमय हैं। दोनों कर्णो मे दो रल कुण्डल विराजमान हैं । कठदेश में नाना पुप्पो की माला तथा मणि- माला शोभायमान है । दोनों भुजाओं मे क्यूर, वलय, विराजमान हैं । चरण युगल में दो रत्ननूपुर शोभायमान हैं । पिना वसुदेव जी माता रोहिणी जी हैं। उनके पिता जी ब्रजराजनन्द जी के परममित्र और माता जी परम सती तथा यशोदा जी की मित्राणी हैं। छोटे श्री राधाकृष्णगणोदेशदीपिका नन्दो मित्रं पितृस्तस्य माता माध्वी यशोमती। भ्राता कनीयान् श्रीकृष्णः सुभद्रा भगिनी च सा ॥ ७१ ॥ वयः पोडश-वर्पञ्च किशोरः परमोज्ज्वलः । श्रीकृष्णस्य प्रियतमो नानाकेलिरसाकरः ॥ ७२ ।। अथ विटाः॥ कडार-भारतीवन्ध गन्धवेदादयो विटाः । विविधाः सेवकास्तस्य सेवासौख्यपरायणाः ॥ ७३ ।। अथ चेटाः ।। चेटा भंगुरभृङ्गारसान्धिकग्रहिलादयः । रत्तकः पत्रकः पत्री मधुकठो मवनतः । शालिकस्तालिको माली मानमालाधरादयः ॥ ७४।७५ ॥ तणुशृङ्ग मुरली यष्ठि-पाशादिधारिणः । अमीषां घटकावामी धातूनां चोपहारकाः ॥ ७६॥ तत्र ताम्बूलिकाः ॥ पृथुकाः पार्श्वगा: केलिकलालापकलाङ्कुराः पल्लवो मङ्गलः फुल्लः कोमलः कपिलादयः ।। ७७॥ भैय्या श्रीकृष्ण जी हैं तथा सुभद्राजी भगिनी हैं। पोलह वर्ष उनकी अवस्था है और वे किशोरता से परम उज्ज्वल है। वे श्रीकृष्ण के प्रियतम तथा नाना केलि रस के सागर रूप हैं ।।६-७२।। कडार, भारतीवन्ध, गन्धवेदादिक विट हैं। सेवासौख्य से रत विविध प्रकार से श्रीकृष्ण के सेवक हैं ॥७३॥ भङ्गुर, भृङ्गार, सान्धिक, पहिलादिक तथा रक्तक, पत्रक, पत्री, मधुकंठ, मधुव्रत, शालिक,तालिक,माली,मान,मालाधरादिक चेट हैं। वे सब श्रीकृष्ण के वेणु, शिंगा, मुरली,यष्टि, पाशादिक धारण करने वाले हैं। इनके घटकगण धातुओं के उपहार बनाने वाले हैं।७४-७६|| .
६२ श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका सुबिलास-बिलासाद रसाल रसशालिनः । जम्बुलाद्याश्च ताम्बूलपरिष्कारविचक्षणाः ॥ ७८ ॥ जलसेवकाः॥ पयोदवारिदाद्याश्च नीरसस्कारकारिणः । वस्त्रसेवकाः।। ( रजकाः ) वस्त्रोपचारनिपुणाः सारङ्गयफुलादयः ।। ७६ ।। वेशकारिणः॥ प्रेमकन्दो महागन्धः सैरिन्ध्रममुकन्दलाः । भकरन्दादयश्वामी सदा शृङ्गारकारिणः ॥ ८०) गान्धिकाः॥ सुमनः कुसुमोल्लास पुष्पहास हरादयः । गन्धाङ्गरागमाल्यादि पुष्पालंकृतकारिणः ।। दक्षाः सुवन्या रसुगन्धकुमुमादयः ॥ ८॥ नापिताः ॥ नापिता केशसंस्कारे मर्द ने दर्पणार्पणे। कोपाधिकारिणः स्वच्छ मुशीलप्रगुणादयः ।। पल्लव, मङ्गल, फुल्ल, कोमल, कपिलादिक और सुविलास, विला. साक्ष, रसाल,रमशालि,जम्बुलादिक ताम्बूल बनाने में विचक्षण हैं । वे सब बालक पास में रहने वाले तथा कैलिक्ला की आलापविदा मै चतुर हैं ।। ७७-७८ ॥ पयोद, पारिवाहिक जलसस्कार (अलवडिया) करने वाले तथा सारङ्ग, वकुलादिक वस्त्र संस्कार मे परम निपुण हैं ।। ७६ ॥ नेमकन्द, महागन्ध, सैरिन्ध्र, मधुकन्दल, मकरन्दादिक वेश ब- नाने वाले हैं ॥८॥ सुमन, कुसुमोल्लास, पुष्पहास, हरादिक, गन्ध अंगराग-माल्या- दिक तथा पुप्पो का अलङ्गार रचना करने वाले हैं । सुवन्ध, कपूर
६३
श्रीराधाकृष्णगणोहेशदीपिका
अपरा ॥
निमल कमलायाश्च स्थालीपीठादिधारका ॥८२ ।।
परिचारिका ॥
घनिष्ठा चन्दनकला गुणमाला रतिप्रभा ।
तरणीन्दुप्रभा शोमा रम्भाद्या परिचारिका ।
गृहमार्जनसरकारालेपक्षीरादिकोविदा ॥ ८३॥
अथ चेट्य ॥
चेट्य करङ्गी भृङ्गारी सुलम्मा लम्बिकादय ॥८४॥
अथ चग ॥
चतुरश्चारणो धीमान् पेशलाद्याश्चरोत्तमा ।
चरन्ति गोपगोपीपु नानावेशेन ये सदा॥८५.॥
अथ दुता ।।
दूता निशारदास्तु इवापदकमनोरमा ।
नीतिसारादय केलो कलो गोपीकुलेषु च ॥८६॥
सुगन्ध, कुमुमादिक इन पिपयों में परम दक्ष हैं ॥१॥
स्वच्छ, सुशील, प्रगुग्णादिक नापित हैं। वे सब केशसस्कार, मन,
दर्पण के समर्पण कार्य मे तथा कोपागार में नियुक्त रहते हैं। वि.
मल, कोमलाटिक थाली, पीढादिकों के रखने वाले हैं ॥२॥
धनिष्टा, चन्नकला, गुणमाला, रतिप्रभा, तरूणी, इन्दुप्रभा,
शोभारम्भादिक परिचारिका दासी हैं। वे सर गृहों के संस्कार मा-
र्जन, लेपन के कार्य मे तथा दुग्धादिकों के श्रापर्तनादि कार्य में
परम पण्डिता हैं ।।८३॥
कुरङ्गी, भृङ्गारी, सुलम्या, लम्बिादिक चेटी हैं॥४॥
चतुर, चारगा, धीमान् , पेशलादिक उत्तम चर हैं। वे सवना-
नावेश से गोप गोपिया मे विचरण करते हैं ॥५॥
श्रीराधाकृष्णगणोद्देशदीपिका अथ श्रीकृष्णस्य दूतीप्रकरणम् ।। पौर्णमासी वीरा वृन्दा वंशी नान्दीमुखी तथा । वृन्दारिका तथा मेला मुरलाद्याश्व दूतिकाः ।।८।। नानासन्धानकुशला तयोमिलनकारिणी। कन्चादिसंस्क्रियाभित्रा वृन्दा तासु वरीयसी ॥८८॥ तत्र पौर्णमासी॥ पौर्णमास्या मङ्गकान्तिस्तप्तकाञ्चनमन्निभा । शुक्लवस्त्रपरीधाना बहरत्नविभूपिता ॥ ८६ ॥ पिता सुरतदेवश्च माता चन्द्रकला सती । प्रवतस्तु पतिस्तस्या महाविद्या यशस्करी ॥ १० ॥ भ्रातापि देवप्रस्थश्च बजे सिद्धा शिरोमणिः । नानासन्धानक्रुशला द्वयोः सङ्गममारिणी ।। ६१ ॥ विशारद, तुङ्ग, वावदूक, मनोरम, नीतिसारादिक वैलि तथा बि- बाद में कुशल हैं और गोपीगणों मे दूत का कार्य करते हैं ॥८॥ अब श्रीकृष्ण के दूती प्रकरण वा वर्णन करते हैं । पौर्णमासी, वीरा, वृन्दा, वंशी, नान्दीमुखी, वृन्दारिका,मेला और मुरली प्रभृति दूतिका है। वे सब नाना सन्धान मे कुशल, दोनों के मिलन कराने वाली और कुञादि. संस्कार में अभिज्ञा है। उनमें से वृन्दा श्रेष्ठा है ।।८७-८८॥ पोर्णमामी जी की नंगकान्ति तपायमान सुवर्णकी तरह है । वे शुक्लवस्त्र पहरने वाली तथा नाना रत्नों से विभूपिता हैं। पिता सु. रतदेव तथा माता चन्द्रकला सती हैं । पति का नाम प्रवल है । भ्राता देवप्रस्य है । पौर्णमासी परम पण्डिता, यशस्करी, तथा प्रज में सिद्ध शिरोमणि है। नाना सन्धान कार्य में कुशल तथा दोनों का संगम कराने वाली हैं ।। ८६-६१ ॥
श्री राधाकृष्णगणोदेशदीपिका ६५ तत्र वीरा॥ वीरा नाम वरा दूती ख्यातान्या पूजिता बजे। वीरा प्रगल्भवचना वृन्दा चाटूक्तिपेशला ।। , एपा श्यामलकान्तिश्च शुक्लाभवसनोज्वला। नानारत्नपुष्पमाला भूपणे भूपितापि च ॥१२॥ कवल: पति रेतस्या माता च मोहिनी सती । तस्याः पिता विशालोऽपि भगिनी कवला भवेत् । जटिलाया: प्रियतमा जावटाख्यपुरस्थिता ।। ६३ ॥ नानासन्धाननिपुणा द्वयोर्मिलनचेष्टिता ॥१४॥ तत्र वृन्दाया विशेपः ॥ तप्तकाञ्चनवर्णाभा वृन्दा कान्तिर्मनोहरा । नालवस्त्रपरीधाना मुक्तापुष्पविराजिता ॥६५॥ चन्द्रभानः पिता तस्याः फल्लरा जननी तथा । पतिरस्या महीपालो मञ्जरी भगिनी च सा ॥१६॥ वीरा नामक और भी श्रेष्ठा दूती व्रज में पूजिता है । वीरा प्र- गल्भ वचन को बोलने वाली तथा वृन्दा चाटु वचन में अभिज्ञा है। वीरा श्यामल कान्तिघाली और शुक्ल कान्ति वसन से उज्ज्वल है । नाना रत्न-पुष्पमालाओं से भूपिता भी है । इसकी माता मोहिनी सती तथा पिता विशाल जी हैं । पति का नाम कवल और भगिनी कवला है । वीरा जटिला की प्रियतमा तथा जावट में रहने वाली है। नाना सन्धान कार्य में निपुण तथा दोनों के मिलन चेष्टा में नियुक्ता है।। ६२-६४॥ चुन्दा तपायमान काञ्चन वर्ण वाली तथा कान्ति से परग मनो- हरा है । नीलवस्न को पहरने वाली और मुत्य पुप्पों से घिराजमाना है। उसके पिता चन्द्रभानु जी और माता फुल्लरा हैं । पति का नाम .
६६ श्रीराधाकृमएगणोद्देशदीपिका वृन्दावन सदावासा नानाकेलीरसोत्सुका । उभयोमिलनाकाक्षी तयोः प्रेमपरिप्लुता ॥१७॥ तत्र नान्दीमखी।। नान्दीमखी गौरवर्णा पवस्त्रविधारिणी। सान्दीपनिः पिता तस्य माता च सुमखी सती ॥१८॥ भ्राता मधुमङ्गलोऽस्याः पौर्णमासी पितामही । नानारत्नभूपिताङ्गी कैशोरवयसोज्ज्वला ॥ ६ ॥ नानासन्धानकुशला नाना शिल्पविधायिनी। द्वयोर्मिलननैपुण्या सदा प्रेमयुता भवेत् ।। १०० ।। अथ साधारणभृत्याः ॥ शोभनदीपनाद्याश्च दीपिकाधारिणो मताः । सुधाकर सुधानाद सानन्दाद्या मृदगिनः ।। कलावन्तस्तु महतोत्रादिनो गुणशालिनः॥१०॥ महीपाल और भगिनी मञ्जरी है । वृन्दा सदा सर्वदा वृन्दावन में वास करती है । वह नाना केलिरस से उत्कण्ठिता तथा दोनों का मि- लन चाहने वाली और दोनों के प्रेम से परिप्लुता है ।। ६५-६७ ।। नान्दीमुखी गौरवर्णा तथा पदाम्बर धारण करने वाली है । उस के पिता सान्दीपनि जी माता सुमुखी सती है । भ्राता मधुमङ्गल तथा पौर्णमासी जी पितामही (दादी) हैं । नान्दीमुखी नाना रत्नों से भूपित अंगवाली तथा कैशोर अवस्था से उज्ज्वल हैं। वह नाना सन्धान कार्य मे कुशल तथा नाना शिल्प कार्य की रचना करने वाली और दोनों को मिलाने में निपुण तथा निरन्तर प्रेम युक्त है। ||६८-१००॥ अब साधारण भृत्यों का वर्णन करते हैं। शोभन, दीपन आ- दिक दीवट धारण करने वाले है । सुधाकर, सुधानाद, सानन्दादिक श्रीराधाकृष्णगोदेशदीपिका विचित्ररावमधुररावाद्यास्तस्य वन्दिनः । नर्तकाश्चन्द्रहासेन्दुहासचन्द्रमुखादयः ॥ १०२ ।। कलकण्ठः सुकण्ठश्च सुधाकण्ठादयोऽप्यमी। भारतः सारदो विद्याविलाससरसादयः । सर्वप्रवन्धनिपुणा रसज्ञास्तालधारिणः ।। १०३ ॥ कञ्चुकादिविनिर्माता रीचिको नाम सौचिक्रः । निणेजकास्तु सुमुखो दुर्लभो रञ्जनादयः ।। १०४ ।। पुण्यपुञ्जस्तथा भाग्यराशिरित्यस्य हड्डिपो ॥ १०५ ।। स्वर्णकारावलङ्कारकारी रङ्गनयनी । कुलालो मन्थनापारीकारौ पवनकर्मठौ ॥ १०६ ।। वर्द्ध की वर्द्धमानाख्यौ खट्टाशक्टकारको । सुचित्रश्च विचित्रश्च ख्याती चित्रकरावुभौ ॥ १०७।। दाममन्थानकुठारपेटीशिक्यादिकारिणः । कारवः कुण्ड कण्ठोल करण्ड कटुलादयः ।। १०८ ॥ मृदंगीया हैं । ये सब महनी वाने वाले, गुणशाली कलावन्त हैं। विचित्रराव, मधुरराव आदिक स्तुति गाने वाले वन्दिगण हैं। च- न्द्रहास, इन्दुहास, चन्द्रमुख आदिक नर्तकगण हैं । कलकंठ, सुकंठ, सुधाकंठ प्रादिक गायकवृन्द हैं। भारत, सारद, विद्याविलास, सरस यादिक समस्त प्रवन्ध में निपुण, रसज्ञ तालधारी हैं। काँचोली आदिक निर्माण करने वाला रौचिक नामक दी है । सुमुख,दुर्लभ, रूजनादिक धोबी (रजक) है। पुण्यपुंज तथा भाग्यराशि नामक दो मेहतर है । रङ्गन, टकन ये दोनों विविध अलङ्कार बनाने वाले सोनार हैं । पयन, कर्मठ ये दोनों मथनी आदिक बनाने वाले कुम्भ- कार हैं। वर्द्धक वर्द्धमान ये दोनों खाट, बैलगाड़ी आदिक बनाने पाले बढ़ई हैं। सुचित्र विचित्र दोनों चित्रकार हैं। कारव, कुण्ड, श्रीराधाकृष्णगणोरेशदीपिका मइला पिङ्गला गङ्गा पिशड़ी मणिकस्तनी। हंसी वंशीप्रित्येत्याद्या नैचिक्यस्तस्य सुप्रियाः ॥ १०६ ।। पद्मगन्धपिशङ्गाक्षी बलीवीवतिप्रियो । सुरडाख्यः कुरङ्गोऽस्य दधिलोभाभिधः कपि: ।। ११० ॥ व्याघ्रश्नमरको श्वानौ राजहंसः बलस्वनः । शिखी ताण्डविकामिख्यः शुकौ दक्षविचक्षणी ॥ १११ ॥ स्थानविवरणम्- वृन्दावन महोद्यानं श्रेयो निःश्रेयसादपि। क्रीडागिरियथार्थाख्यः श्रीमान् गोवर्द्धनो मतः ।। ११२ ॥ नीलमण्डपिका घट्टः कन्दरा मणिकन्दली। घट्टी मानसगङ्गायाः पारङ्गो नाम विश्रुतः ।। ११३ ।। सुविलासतरा नाम तरिर्यन्त्र विराजते । नाम्ना नन्दीश्वरः शैलो मन्दिरं स्फुरदिन्दिरम् ।। ११४ ।। कण्ठोल, करण्ड, कटुल आदिक जेवरी, मनिया, कुदार, पेटी, शि- क्का प्रभृति बनाने वाले है । मगला, पिगला, गङ्गा, पिशंगी, मणि- करतनी, हसी, वंशीप्रिया इत्यादिक गाभीगण श्रीकृष्ण के परमप्रिय हैं। पद्मगन्ध, पिशङ्गात ये दोनों विजार अतिप्रिय हैं। श्रीकृष्ण के हरिण का नाम सुरङ्ग है तथा बन्दर का नाम दविलोभ है। व्यान तथा भ्रमर मामक दो कुत्ते भी थे । राजहंस का नाम कलस्वन था। मयूर का नाम ताण्डविक है । दक्ष, विचक्षण नामक दो शुकपक्षी भी थे॥१०१-१११॥ अब श्रीकृष्ण के प्रिय स्थानों का वर्णन करते हैं।-सकल क- ल्याण से कल्याणरूप श्रीवृन्दावन महान् उद्यान (बाग) है । क्रीड़ा- पर्वत यथार्थ नाम से श्रीमान् गोवर्द्धन है। घाट नीलमण्डपिका नाम से विख्यात है । कन्दरा (निभृतगृहा) का नाम मणिकन्दली ६६ श्रीराधाकृष्णगोहेशदीपिका आस्थानीमण्डपः पाण्डगण्टशैलासनोज्वलः । आमोदवर्द्धनो नाम परमामोदवासितः॥ ११५॥ पावनाख्यं सरः क्रीडापुञ्जस्फरत्तटम् । कुञ्ज काममहातीर्थ मन्दारो मणिकुट्टिमः ॥ ११६ ।। न्यग्रोधराजो भाण्डीरः कदम्बस्तु कदम्बराट्। अनडरङ्गभूर्नाम लीलापलिनमव्यते ॥ ११७ ॥ यमनाया महातीर्थ खेलातीर्थं तदुच्यते । परमप्रेष्ठया सार्द्ध सदा यत्र स खेलति ॥ ११८।। अथ श्रीकृष्णस्य व्यवहार्यद्रव्याणि ॥ शरदिन्दुस्तु मुकुरो व्यजनं मधुमास्तम् । लीलापद्म सदास्मेरं गोण्डुकश्चित्रकोरकः ॥ ११६ ।। शिञ्जिनी मञ्जुलशरः मणिवन्धाटनीयुगम् । विलासकार्मणं नाम कामूकं स्वर्णचित्रितम् ॥१०॥ । है । मानसगङ्गा का घाट पारङ्ग नाम से प्रसिद्ध है । जहाँ सुविला- सतरा नामक नाव विराजमान है । पर्वत का नाम नन्दीश्वर तथा उ. समें स्फुरदिन्दिर नामक निज मन्दिर है । शुभ्र शिलाओं के टूकडे से उज्ज्वल तथा विविध सुगन्धियों से सुवासित श्रामोदवर्द्धन नामक मंडप है। सरोवर का नाम पावनसरोवर है । जिसका तट क्रीड़ाकुञ्ज- समूह से शोभायमान है । कुञ्ज का नाम काममहातीर्थ है । मणिमय कोठरी का नाम मन्दार है। घटराज का नाम भाण्डीर तथा कदम्ब का नाम कदम्बराज है । लीलापुलिन का नाम अनगरङ्ग भूमि है। यमुना जी के महातीर्थ रोलातीर्थ नाम से विख्यात है जहाँ परमप्रिया श्रीराधिका के साथ श्रीकृष्ण निरन्तर क्रीडाविलास करते हैं ॥११२- ११८॥ अब श्रीकृष्ण के व्यवहार द्रव्यों का वर्णन करते हैं।दर्पण का श्री रामाकृष्णगणोद्देशढीपिरा दिव्यरत्नस्फुरन्मष्टिस्तुष्टिदा नाम कर्तरी। मन्द्रघोपो रियाणोऽस्य वशी भुननमोहिनी ।। १२१ ।। राधाहृन्मीनरडिशी महानन्दाभिधापि च । पन्ध्रनन्धुरा वेणु ख्याता मदनम कृति ॥ १२२ ।। कामली मूक्तिपिका मुरली सरलाभिधा । गौडी च गुर्जरी चेति रागामत्यन्तमल्लभी ॥ १२३ ॥ जप्य साध्याङ्कित प्रेष्ठाभिधानी मनुस्मृतः । दण्डस्तु मण्डनो नाम वीणा नाम तरङ्गिणो। पाशी पशुवशीकारो दोहन्यमृतदोहनी ॥ १२४ ।। अथ भूषणानि॥ अम्पार्पिता महारक्षा नवरत्नाङ्किता भुजे ॥ १२५ ॥ नाम शरदिन्दु (शरचन्द्रमा ) तथा पसा का नाम वसन्तपरत है। लीलाकमल का नाम सदास्मेर तथा गेट का नाम चित्रकोरक है। विलासकामरण नामक स्वर्ण से चित्रित धनुप है जिसमे शिञ्जिनी नामक मनोहर वाण है जो दोनों तरफ मणि से बँधा हुआ है । मुंठी दिव्यरत्नोंसे जडित तुष्टिा नामक कैंचीहै । श्रीकृष्णके निपाण(सींगा) का नाम मन्द्रघोप है । वशी का नाम मुयनमोहिनी है। श्रीराधा के हृदय रूप मीन के कॉटे स्वरूप वह महानन्दा नाम से भी विख्यात है । मदनझङ्कार नाम से ख्यात छेदों से युक्त सुदर वेणु है । मनो- हर शब्द से कोकिलगण को चुप करने वाली सरला नामक मुरली है। गौडी तथा गुर्जरी ये दोनों राग श्रीकृष्ण को अतिप्रिय हैं। साध्य वस्तु नाम से युक्त प्रेष्ठ नामक अद्भुत नपने का मन्त्र है। अर्थात् रावामन्त्र जप्य है। नएड का नाम मण्डन और वीणा का नाम तरङ्गिणी है। पशुपशीकार नामक दो पाश हैं । दोहनी का नाम अ. मृत बोहनी है ॥ ११६-१-४॥
७१ श्री राधाकृष्णगणोद्देशहीपिका अङ्गदे रङ्गदाभिख्ये चङ्कने नाम कङ्कणे। मुद्रा रत्नमुखी पीत वासो निगमशोभनम् ॥ १६ ॥ किङ्किणी कलाकारा मञ्जीरी (सगजनौ । कुरङ्गनयनाचित्तकरहरशिञ्जितौ ॥१७॥ हारस्तारानली नाम मणिमाला तडित्प्रभा। रुद्धराधाप्रतिकृतिनिको हृदयमोटन ॥ १२८ ।। कौस्तुभाग्यमणियेन प्रविश्य हदमौरगम् । कालियप्रेयसीनृन्दहस्तरात्मोपहारित ॥ १.६ ॥ कुण्डले मकराझारे रतिरागाधिनते । किरीट रत्नपाराख्य चुडा चामरडामरी ।।१३०॥ नवरत्नविडम्बाख्य शिसएड मुकट विद । रागनल्ली तु गुञ्जाली तिलक दृष्टिमोहनम् ॥ १३१ ॥ अर श्रीकृष्ण के भूपणों का वर्णन करते हैं। नौ रत्नों से जडे हुग महारक्षा नामक रक्षायन्त्र हैं जिन्हें माता ने दोनों भुजाओं में वॉध दिये हैं। अगद का नाम रगद, कङ्कण का नाम चङ्कन है। मुद्रिका का नाम रत्नमुग्गी तथा पीताम्बर का नाम निगमशोभन है। उनकी विविणो का नाम क्लझङ्कारा और ह सगञ्जन नामके दो म- जीर हैं। जो कि कुरङ्गनयना ब्रजगोपिया के चित्त रूप पुरङ्ग के हर- णकारी तथा मनोहर शब्दायमान हैं । हार का नाम तारावली तथा मणिमाला का नाम तडित्प्रभा है । श्रीराधा के प्रतिविम्व से युक्त है- दयमोदन नामक पदक है । मणि का नाम कोस्तुभ है। जिसे कि कालियहद से उसकी प्रेयसियों के द्वारा स्वय लध किया था। रति- अधिदेव और रागाधिदेव नाम से रयात मकराकार टो कुण्डल हैं। किरीट का नाम रत्नपार और चूडा का नाम चामरडामरी है । नव- रत्नविटम्ब नामसे मयूरमुकुट प्रसिद्ध है। गुजालीका नाम रागवल्ली ।
श्री राधाकृष्णगणोद्देशदीपिका पत्रपुष्पमयी माला बनमाला पदावधिः । वैजयन्ती तु कुसुमैः पञ्चवर्ण विनिर्मिता ।। १३२ ।। जन्मनालंकृता पुण्या कृष्णा भाद्राष्टमी निशा। प्रेयस्या सह रोहिण्या शशी यस्यामुदयिवान् ।। १३३ ॥ अथ श्रीकृष्णस्य प्रेयस्यः॥ अथ तस्यानुकीय॑न्ते प्रेयस्यः परमाद्भुताः । रमादिम्योऽप्युरुप्रेमसौभाग्यवरभूपिताः ॥ १३४ }} • तत्र श्रीराधा। आभीरसुभ्र वा श्रेष्ठा राधा वृन्दावनेश्वरी । अस्याः सख्यश्च ललिताविशाखाद्याः मुवि ताः ॥ १३५ ।। चन्द्रावली च पद्मा च श्यामा शैव्या च भद्रिका । तारा विचित्रा गोपाली पालिका चन्द्रशालिका ।। १३६ ॥ मगला विमला लीला तरलाक्षी मनोरमा। कन्दर्पमञ्जरी मजुभापिणी खञ्जनेक्षणा ॥ १३७ ।। कुमुदा कैरवी शारी शारदाक्षि विशारदा । शङ्करी कुङ्कुमा कृष्णा शारङ्गीन्द्रावली शिवा ॥ १३८ ।। तारावली गुणवतो सुमखी केलिमञ्जरी । हारावली चकोराक्षी भारती कमलादयः ।।१३६ ।। तयां तिलक का नाम दृष्टिमोहन है। चरण पर्यन्त लम्बायमान पत्र पुष्पों से विरचित धनमाला है तथा पञ्चवर्ण पुष्पों से विरचित वैज- यन्तीमाला है । भाद्रकृष्णाष्टमी की रात्री जन्मका समय है । जिसमें चन्द्रमा स्व प्रेयसी रोहिणी नक्षत्र के साथ उदित हुए हैं।।१२४-१३३।। अव लदमी आदिक से भी अत्यन्त प्रेम-सौभाग्य के अतिशय से विभूपित परम अद्भुन श्रीकृष्ण की प्रेयसियों का वर्णन करते हैं- उन सब गोपांगनाओं में वृन्दावनेश्वरी श्रीराधिका श्रेष्ठा हैं। ल.
श्रीराधाकृष्णगणोद्देशदीपिका आसां यथानि शतशः ख्यातान्याभरिसुभ्र वाम् । लक्षसंख्यास्तु कथिता यथे.यूथे बराङ्गनाः ॥ १४० ॥ मुख्याः स्युस्तेषु यथेषु कान्ताः सर्वगुणोत्तमाः । राधा चन्द्रावली भद्रा श्यामला पालिकादयः ॥ १४१ ।। तत्रापि सर्वथा श्रेष्ठे राधाचन्द्रावलीत्युभ ?:: यूथयोस्तु तयोः सन्ति कोटिसंख्या मृगीदृशः ॥१४२ ॥ ।' तयोरप्युभयोर्मध्ये समावुर्यतोऽधिको 175 राधिका विश्रुति याता यहान्याख्यया | तौ ॥ १४३ ॥ असमानौद्ध माधुर्यधुर्यो गोपेन्द्रनन्दनः । यस्याः प्राणपरार्द्धानां परार्द्धादपि वल्लभागा१४४॥ श्रीराधारूपलावण्यं विशेषात् परिकीत्त्य ते।. नानावैदग्धीनपण्या सुधार्णवस्वरूपिणी ४ि५ ॥ , ToT" लिता, विशाखाटिक इनकी सखी भाव से सुप्रसिद्ध हैं। और सब का नाम मूल श्लोकों से बात करें अर्थ सरल है ।। १३४-१३६ ।। इन सब गोपाङ्गनाओं में एक के सौ-सौ यूथ हैं ! एक एक यूथ' में लक्षसंख्यक वरागना मोजूद हैं । उन सब यूथों में समस्त. गुणों से उत्तम राधा, चन्द्रापली भद्रा, श्यामला, पालिकादिक कान्तागण है। उनमें से सर्व प्रकार राधा, चन्द्रावली दोनी श्रेष्ठा. हैं । दोनों के कोटि संग्ख्यक मृगनयना यूथ है । दोनों में से भी संकल माधुर्य से अधिक श्रीराधिका जी हैं । जो कि श्रुति में गान्धा नाम से वि- ख्णत हैं । ममान ऊद्ध रहित महामाधुर्य के सागर रूप श्री ब्रज- राजगोपेन्द्रनन्दन जिनके परार्द्ध प्राणे के पराद्ध प्रारों से भी वल्लभ हैं ।। १४०-१४४॥ 'अन श्रीराधिका जी के रूप लावण्य को विशेप करके वर्णन कर. ते हैं। श्रीराधिका नाना वैदग्धी में परमं पण्डिता तया' सुधा की - * 7 יין श्री राधाकृष्णगणोदेशदीपित नवगोरोचनाभातिट तरेम समप्रभा । फिम्ना स्थिरा विदयुदिन रूपातिपरमोनला ॥ १४६ ।। विचित्र नीलवसन तस्याश्च परिशोभितम् । नानामुत्ताभूपिताजी नानापुरपनिराजिता ॥ १४७ ।। दीर्घ केशी सुलावण्य मुक्कामालासुशोभिता । पुष्पमाला सुविन्यासा सुवेणी परमोज्वला ।। १४८॥ सुभाल. परमोद्दीप्त सिन्दूरपरिभूपित । नाना चित्रालका भान्ति चित्रपत्रसुशोभिता ,॥१४६ ।। वाहुयुग्म सुलापण्य नीलकणशोभितम् । - अनङ्ग-दण्डलानएयमोहिनी परमा भवेत् ॥ १५०॥ नयनोत्पलयुग्मञ्च आकर्णपरिशोभितम् । कज्वलोज्वलदीप्तिशालोक्यजयिनी परा ॥ १५.१ ।। नासिका तिलपुष्पामा मुत्तानेशरशोभिता । नाना सुगन्धयुक्ता सा परा दीप्तिमती भनेत् ॥ १५२ ॥ - सागर रूपिणी हैं । वे नगीन गोरोचनाकी भाँति गोरागी हैं । उनकी प्रभा तपायमान सुवर्ण की तरह अथवा स्थिर-विद्युत् के सदृश रूप की अतिशयता से परम उज्ज्वला है । उनके विचित्र नीलवसन शोभायमान हैं । वे नाना प्रकार की मुत्ताओं से भूपित, अगवाली तथा नाना पुष्पो से विराजमाना हैं। उनके केश अति लम्बायमान है तथा ये लावण्यरूपिणी हैं। विविध मुक्ता मालाओं से सुशोभिता हैं तथा नाना पुष्पमालाओं से सजी हैं। उनकी वेणी परम उज्ज्वला हे तथा भालदेश सिन्दूर से परिमूपित दीप्तिमान । अलकावली चित्र पत्रों से सुशोभित नाना चित्रमयी है । नील कङ्का से शोभित सुन्दर लावण्यमय बाहुयुगल हैं । भुजलता अनङ्ग यष्टि की लापण्यता को मोहित करने वाली है । युगल नयनक्मल कर्णपर्यन्त शोभाय +- 1 + श्री राधाकृष्णगणोद्देशेदीपिका रलताडङ्कयुग्मञ्च नाना चित्रविनिम्मितम् । ओष्ठाघर सुधारम्यो रक्तोत्पलविनिर्जित. ॥ १५३ ।। मुक्तामाला दन्तपड्क्ती रसनापरिशोभिता । मुखपद्म सलावण्य कोटिचन्द्रप्रभाकरम् । विम्नमन्च सुधारम्यप्रेमहास्ययुत भवेत् ।। १५४ ॥ चिनुकस्य सलावण्य कन्दर्पमोहन परम् । मसिविन्दु सुलावण्यो हेमान्जे भ्रमरी यथा ।। १५५ ॥ कण्ठदेशे चित्ररेखा मुक्तामालोनिभूषिता ।। पृष्ठग्रीना सरम्या च 'पार्वेऽपि मोहिनी भरेत् ।। १५६ ।। वक्ष स्थल सुलानण्य हेमाम्भसुशोभितम् । कञ्चुल्याच्छादितं तस्या मक्ताहारविराजितम् ।। १५७ ॥ सुवायुगल तस्या लावण्यमोहारि च। रत्नागदे तयोर्मध्ये वलया परिशोभिते ॥ १८॥ मान हैं। जिसकी कान्ति काजर से उज्ज्वल तथा त्रैलोक्य विजयिनी हो रही है । मुक्तावेशर से शोभित, तिलपुष्प कान्ति के तुल्य नासिका है । वह नाना सुगन्धि से युक्त अति दीप्तिशालिनी है । नाना चिों से विनिम्मित हारत्न ताडक हे । रत्तोप्तल को जीतने वाला, सुवा सुन्दर प्रौप्ठावर है । जिह्वा से परिशोभित मुत्तामाला की तरह द न्तपत्ति है । कोटि चन्द्रमा प्रभा के तुल्य लावण्यमय मुसपद्म है । सुधा से भी सुन्दर, प्रेम रूप हास्य से युक्त, विम्ब की तरह चिबुक है, जि- समा सुलागण्य क्न्दर्प को मोहित करने वाला है । उसमें फिर स्व- र्णकमल में भ्रमरी की तरह लारण्यमय मसिनिन्दु है । कण्ठदेश में मुनामालाबा से विभूषित चित्ररेखा है। पीठ, ग्रीमा अति सुन्दर तथा दोनों पाव में माहिनी रूप है । सुवर्णमय स्तन कुम्भों से मानों सुशोभिरा, पाँचोली से आच्छादित, मुक्ताहारों से शोभायमान वक्ष -- ७६ श्रीराधाकृष्णागरगोशतीपिका रत्नकङ्गणदीप्ते च रत्नगुच्छविराजिते-17" रक्तोत्पलं हस्तयुग्मं नखचन्द्रसुदीप्तकम् ||:१५.६ ॥ ::- करचिन्हानि॥ भृङ्गाम्भोज शशिकला कण्डलच्छत्रयूपकः । शंखवृक्षकुममक, चामरस्वस्तिकादयः-१.२६०।- एते चिन्हाः शुभका-नानाचित्रविराजिताः । करांगुल्यः सुदीप्ताश्च रत्नागरीयभूपिताः।-१६१।। उदरं मधुलावण्यं निम्नताभिमुशोभितम् । सुधारसप्रपूर्णञ्च त्रैलोक्यमोहनं परम् ॥१६२-:- क्षीणमध्यं कटितटं लावण्यभरभंगुरम् |--- वलित्रयीलताबद्धा-किङ्किणीजालशोभिता ।। १६३. 18- उरू द्वौ रामरम्भेव मनोजचित्तमोहनौ । जान द्वौ च सुलावण्यौ नानाकेलिरसाकरी,॥ १६४ ॥ स्थल है। लावण्य मोहनकारी सुन्दर बाहुयुगल हैं, जो रत्नों के अ.. गंदों तथा वलयों से परिशोभित हैं तथा रक्तः कङ्कण से। दीप्तिमान और रत्नों के गुच्छ से विराजमान है। रक्तारपल की तरह हस्तयुगल है जो कि नख चन्द्रों से अति प्रकाशमान है ॥ १४५-२५६ ।। भृङ्ग, अम्भोज, चन्द्रकला, कुण्डल, छत्र, यूप,शंख, वृक्ष, पुप्प, चामर, स्वस्तिकादिक ये सब चिह्न शुभकारी तथा नाना चित्रों से: विराजमान हैं । करांगुलियाँ सुदीप्त तथा रत्न मुद्रिकाओं से विभू- पित हैं। उदर मधु से भी लावण्यमय तथा गम्भीर नाभि से सुशो- भित है । वह सुधारस से परिपूर्ण तथा तीन लोक को मोहन करने वाला है। मध्य में क्षीण, लावण्य के अतिशय से सुन्दर कटिदेश है। जो त्रिवलीलता से वेष्टित और किङ्कणी जालों से शोभित है। ऊरू युगल मनोहर रम्भा की तरह है तथा केन्दप चित्त का मोहन ७७ श्री राधाकृष्णगणेद्देशटीपिका श्रीपादपद्मयुग्मञ्च मणिनपुरभूपितम् । वङ्कराजसुलावण्य पदागुरीयशोभितम् ॥ १६५ ॥ अथ चरणचिन्हानि॥ शसेन्दुकुञ्जस्यपात्रकुशाच रथध्वजी। डोमरस्वस्तिमत्स्यादि शुभचिन्ही पदापि ॥ १६६ ।। आपञ्चदशवर्षञ्च वयः कैशोरकोन्ज्वलम् ॥ १६७ ॥ मातृमोटेरपि स्निग्धा यत्र गोपेन्द्रगेहिनी। वृषभानु पिता तस्या वृषभानुरिवोज्वल. ॥ १६८ ॥ रत्नगभीक्षितौ ख्याता कीर्तिदा जननी भवेत् । पितामहो महीभानुरिन्दुर्मातामहो मतः ।।१६६ ॥ मातामही-पितामह्यो मुसरा मुरादे उभे । रत्नभानु. शुभानुश्च भानुश्च भ्रातरः पितुः॥१७० ।। कारक है । दोनों जघा नाना केलि रम के पाकर सुन्दर लावण्य रूप हैं। दोनों श्रीचरणकमल मणिनूपुर से भूपित हैं तथा लावण्यमय अ गुरिया से शोभित हैं ।। १६०-१६५ ।। शंस, चन्द्र, हस्ति, दो यर, अंकुश,रथ, ध्वजा,डम्वर,स्वस्तिक, मत्स्यादिक शुभचिह्नों से युक्त दोनों चरण हैं ।। १६६ ।। कैशोरता से उज्ज्वल पञ्चदशवर्ष पर्यन्त अवस्था है। श्रीराविका में गोपेन्द्रगेहिनी श्रीयशोदा कोटिमाता के सदृश स्निग्या थीं। उनके पिता वृपभानु जी हैं जो कि पराशिस्थ सूर्य की तरह परम उज्ज्वल थे । पृथ्वी मे रत्नगर्भा नाम से रयाता कीर्तिदा जी माता हैं । पि. तामह महीभानु और मातामह इन्दु है । मुसरा मातामही और सु- सदा पितामही हैं । रत्नभानु, सुभानु, भानु, ये पिता के भैय्या हैं। भद्रकीर्ति, महाकीर्ति, कीर्तिचन्द्र ये मामा हैं । मेनका, पष्ठो, गौरी, धानी, धातकी, ये मामी हैं। माता की भगिनी कीर्तिमती तया पिता Arra ७८ श्रीराधाकृष्णगोद्देशदीपिका भद्रकीर्तिमहाकीर्तिः कीर्तिचन्द्रश्च मातुलाः । मातुल्यो मेनका पष्ठी गौरी धात्री च धातकी ।। १७१ ।। स्वसा कीर्तिमती मातु भीनुमुद्रा पितृस्वसा । पितृस्वसृपतिः काशो मातृस्वसृपतिः कुशः ॥ १७२ ।। श्रीदामा पूर्वजो भ्राता कनिष्ठानङ्गमञ्जरी। श्वशुरो वृकगोपश्च देवरो दुर्मदाभिधः ॥ १७३ श्वस्तु जटिलाख्याता पतिम्मन्योऽभिमन्युकः । ननन्दा कुटिलानाम्नी सदाच्छिद्रविधायिनी। परमप्रेष्ठसख्यस्तु ललिता सविशाखिका । सुचित्रा चम्पलता रङ्गादेवी सुदेविका। तुङ्गविद्ये न्दुलेखे ते अष्टौ सर्वगणाग्रिमाः ।। १७४।। (क) अंथ प्रियसख्यः।। प्रियसख्यः कुरङ्गाक्षी मण्डली मणिकॅण्डला। मालती चन्द्रलातका माधवी मदनालसा ।। -- मजुमेधा शशिकला सुमध्या मधुरेक्षणा। कमला कामलतिका गुणचूड़ा वराङ्गदा। । की भगिनी भानुमुद्रा हैं । कीर्तिमति का पति कुश और भानुमुद्रा का पति काश है। श्रीरावा के बड़े भ्राता श्रीदामा और कनिष्टा भ- गिनी अनङ्गमञ्जरी है । श्वसुर वृकगोप और देवर दुर्मद नाम से हैं । जटिला सास तथा अभिमन्यु पतिम्मन्य (अर्थात् अपने को पति का अभिमान रखने वाले है । ननन्द कुटिला है जो कि निरन्तर छि- न्द्रानुसन्धान रसने वाली थी । ललिता, विशाखा, सुचित्रा, चम्पक- लता, रङ्गदेवी, सुदेवी, तुगविद्या, इन्दुलेखा ये अष्टसखी समस्त गणों में अग्रिम, परमप्रेष्ठसखी है ।। १६७-१७४ ।। अंब प्रिय सखियों का नाम वर्णन करते है-ये सब कोटि कोटि ७६ श्रीराधाकृष्णगणोदेशदीपिका माधुरी चन्द्रिका प्रेममञ्जरी तनुमध्यमा । कन्दर्पसुन्दरी मजुकेशीत्याधास्तु कोटिशः॥ (सोअथ जीवितसख्यः ।। उक्ता जीवितसख्यस्तुलासिका केलिकन्दली। कादम्बरी शशिमुखी चन्द्ररेखा प्रियंवदा । मदोन्मदा मधुमती वासन्ती कलभापिणी। रत्नावली मणिमती कर्पूरलतिकादयः ।। (ग) अथ नित्यसख्यः॥ नित्यसख्यस्तु कस्तुरी मनोवा मणिमञ्जरी । सिन्दूरा चन्दनवती कौमुदी मदिरादयः ।। अथ श्रीराधाया मञ्जर्यः ।। अनङ्गमञ्जरी रूपमञ्जरी रतिमञ्जरी । लवङ्गमञ्जरी रागमञ्जरी रसमञ्जरी ॥ १७५ ॥ विलासमञ्जरी प्रेममञ्जरी मणिमञ्जरी। सुवर्णमञ्जरी काममजरो रत्नमञ्जरी ।। १७६ ।। कस्तुरीमञ्जरी गन्धमञ्जरी नेत्रमञ्जरी। श्रीपझमञ्जरी लीलामञ्जरी हेममजरी। भानुमत्यन्तपर्याया सुप्रेमा रतिमंजरी ॥ १७७॥ संग्या में हैं जिनके नाम कुरङ्गाक्षी इत्यादि हैं । मूल श्लोकों को देखें अर्थ सरल है। (क) अब जीवित सखियों का नाम-लसिका इत्यादि है। मूल श्लोकों को देखें। अर्थ सरल है। (स) अव नित्यसखियों का नाम कस्तूरी इत्यादि है । मूल देखें (ग) अव श्रीराधिका की मञ्जरियों का नाम दिखाते हैं। जिनके नाम अनद्गमञ्जरी इत्यादि है । मूल श्लोकों को देखें। श्रर्थ सरल है। ॥ १७५-१७७।। ।
८० श्री रामायणगगाद्देशठापिका । अथ श्रीराधाया उपास्य ।। उपास्यो जगतो चतुर्भगवान् पद्मगान्धर । जप्य स्वाभीष्टससर्गी कृपनाम महामनु । पौर्णमासी भगवती सळसोभाग्यर्द्धिनी ।। १७८।। अथ सख्यादिविशेपा ॥ ललिताधा अष्टसरयो मञ्जस्तद्गणश्च य । सर्वा वृन्दाग्नेश्वर्या प्राय सारूप्यमागता ॥ १७ ॥ काननादिगता सख्यो वृन्दाकुन्दलतादय । धनिष्ठा गुणमालाधा वल्लवेश्वरगेगा ॥ १८०।। कामदा नाम धायी सखीभावविशेषभाक् । रागलेखा कलामेली मजुलाद्यास्तु दासिको ॥१८१ ।। नान्दीमुखी विन्दुप्रतीत्याद्या सन्धिविधायिका । सुहृत्पक्षतया ख्याता श्यामला मगलादय ॥ १८२॥ अब श्रीराधिका जी के उपास्य का वर्णन करते हैं । जगवासियों के नेन रूप, भगवान पद्मबन्धु, सूय्यदेव उपास्य हैं । निज अभीष्ट ससर्गी कृष्णनाम महामन्त्र जप्य है। पौर्णमासी भगवतीजी समस्त सौभाग्यों को बढाने वाली हैं ।। १७८ ॥ अब ससियों की विशेषता का वर्णन करते हैं । ललितादि अष्ट सखियों, मजरियाँ, उनके समस्त गण ये सब प्राय घृन्दाननेश्वरी श्रीराधिका जी के सारूप्य (समान रूपता ) को प्राप्त हुए हैं।।१७६।। वृन्दा, कुन् लतादिक सखियाँ वनादिको में जान आन वाली तथा घनिष्ठा, गुणमालादिक ब्रजराज के घर पर रहने वाली हैं । का मदा नामक धानेयी विशेष करके सखी भाव से युक्ता है । रागलेसा, कलामेलि, मजुलादि दासिका है। नान्दीमुखी, विन्दुपत्ती प्रभृति वि वाद में सन्धि कराने वाली हैं । श्यामला,मगलादिक सुहृत्पक्षा तथा ८१ श्रीराधाकृष्णगणोद्देशटीपिका प्रतिपक्षतया ख्यातिं गताश्चन्द्रावली मुखाः ॥ १८३॥ कलावत्यो रसोल्लासा गुणतुझा स्मरोद्धरा । गन्धर्वास्तु कलाकण्ठा सुकराठी पिक्रकण्ठिका। या विशाखाकृतगीतीर्गीयन्त्यः सुखदा हरेः ॥ १८४ ॥ वादयन्त्यश्च शुपिरं ततानद्धघनान्यपि । माणिकी नर्मदा प्रेमवती कुमुमपेशलाः ।। १८५॥ सख्यश्च नित्यसख्यश्च प्राणसख्यश्च काश्चन। प्रियसख्यश्च परमप्रेष्ठसख्यः प्रकीर्तिताः ॥ अथ श्रीराधाभृत्याः ॥ रागलेखा कलाकेली भूरिदाद्यास्तु दासिकाः ।। दिवाकीर्तितनूजे तु सुगन्धा-नलिनीत्युभे । मञ्जिष्ठारङ्गरागाख्ये रजकस्य किशोरि के ॥ १८६ ।। पालिन्द्री नाम सैरिन्ध्री चित्रिणी चित्रकारिणी। मान्त्रिकी तान्त्रिकी नाम्ना दैवज्ञा देवतारिणी॥१८७॥ चन्द्रावली आदिक प्रमुख प्रतिपक्ष वाली प्रसिद्धा हैं। रसोल्लासा, गुणतुङ्गा, स्मरोद्धरा विविध कलावती हैं । कलाकंठी, सुकण्ठी,प्रिय. कण्ठिका गाने वाली हैं जो कि विशाखा रचित गानों को गा कर हरि को सुख देती हैं । ये सब शुपिर, तत, पानद्ध, धनादिकों को वजाती भी हैं। माणिकी, नर्मदा, प्रेमवती, ये सय पुप्पों की रचना करती हैं। इनमें से कोई कोई सखी, नित्यसखी, प्राणसखी, प्रिय- सखी, परमप्रेष्ठसखी करके कीर्तिता होती हैं । अव श्रीराधिका की दासियों का वर्णन करने हैं । रागलेखा, कलाकेली, भूरिदादिक दा- सिका हैं । सुगन्धा, नलिनी दोनों नापित की कन्या हैं। मंजिष्ठा, रङ्गरागा नामक दो रजककन्या । गन्धद्रव्यादिकों को लगाने वाली पालिन्द्री है तथा चित्रकारिणी चित्रिणी है । मान्त्रिकी, तान्त्रिकी दो देवज्ञा है । कात्यायनी आदिक वयोऽधिका दूतिका हैं । भाग्यवती, पुंजपुण्या नामक दो मेहतर की कन्या हैं । भृगी, मल्ली, मतल्ली ये २ श्रीराधाकृष्णगणोदेशढीपिका तथा कात्यायनोत्याद्या दुतिका वयसाधिकाः । उभे भाग्यवती पुञ्जपुण्ये हड्डिपान्यके ॥१८८॥ भूडी मल्ली मतल्ली च पुलिन्दफुलकन्यकाः । केचित् कृष्णगणाश्चास्या: परिवारतया मताः ॥ १८६ ।। गार्गी मुख्या महीपज्या चेट्यो भृङ्गारिकादयः । सुदलोज्वलगन्धर्वमघुमङ्गल रक्तकाः । विजयाद्या रसालाद्या पयोदाद्या विटादयः ॥ १६॥ आसन्ना सर्वदा तुझी पिशङ्गी कलकन्दला । मजुला विन्दुला संन्धा मृदुलाद्यास्तु बालिकाः ॥ ११ ॥ समांसमीना सुनदा यमुना बहुलादयः। पीना वत्सतरी तुझी काखटी वृद्धमझटी । कुरङ्गी रङ्गिणी ख्याता चकोरी चारुचन्द्रिका ।। १६२ । निजकुण्डचरी तुण्डीफेरी नाम मरालिका। मयरी तुण्डिका नाम्ना शारिके सुक्ष्मधी शुभे ।। १८३॥ वन्धानि ललितादेव्या ललितानि स्वनाथयो। पठन्त्यौ चित्रया वाचा ये चित्रीस्तः सखी. ॥ १६४ ।। सब पुलिन्द कन्यका हैं। इनमे से कोई तो कृष्णपदीया है और कोई राधिका के परिवारवाली मानी जाती हैं। गार्गी मुख्या ब्राह्मणीगण है। भृङ्गारिकादिक चेटियाँ हैं। सुवल, उज्ज्वल, गन्धर्व, मधुमङ्गल, रक्तक, विजयादिक, रसालादिक, पयोदादिक विटगण हैं। सदा सर्वदा निकट में रहने वाली तुङ्गी, पिशङ्गी, कलकन्दला, मंजुला, बिन्दुला, सन्धा, मृदुलादिक बालिकायें हैं । सुनन्दा, यमुना,बहुलादिक दूधेली गोए हैं। गोवत्सा का नाम तुङ्गो है । वृद्ध-मर्कटी के नाम क्क्सटी, हरिणी का नाम रङ्गिणी और चकोरी का नाम चारुचन्द्रिका था। अपने बुण्ड में ( श्रीराधाकुण्ड) मे चरने वाली हसिनी का नाम तुण्डीरी था। तुण्डिका नामक मयूरी और सूक्ष्मयुद्धि वाली दो म. गलरूपा शारिकाएँ थीं । शारिका युगल श्री ललिता के द्वारा सीये श्री राधाकृष्णगोहेशदीपिका ८३ अथ भूपणानि ।। तिलकं स्मरयन्त्राख्यं हारो हरिमनोहरः। रोचनो रत्नताडको घ्राणमुक्ता प्रभाकरी ॥ १६५ ॥ छन्नकृष्णप्रतिच्छायं पदकं मदनाभिधम् । स्यमन्तकान्यपर्यायः शंखचूडशिरोमणिः ॥ १६६ ॥ पुष्पवन्तौ क्षिपन् कान्त्या सौभाग्यमणिरुच्यते । काटकाचटकारावा: केयूरे मणिकर्बु रे ।। १६७॥ मुद्रा नामाङ्किता नाम्ना विपक्षमदमाईनी। काञ्ची काञ्चनचित्रागी नूपुरे रत्नगोपुरे । मधुसुदनमारद्धे ययो. शिञ्जितमञ्जरी ॥ १६८ ॥ चासो मेघाम्बरं नाम कुरुविन्दनिभं तथा । श्राद्य स्वप्रियमनाभं रक्तमन्त्यं हरेः प्रियम् ॥ १६ ॥ सुधांशुदर्पहरणो दर्पणो मरिणवान्धवः ।। २००॥ शलाका नर्मदा हैमी स्वस्तिदा रत्नकङ्कती। कन्दर्पटली नाम वाटिका पुष्पभूपिता ।। २०१ ।। हुए निजनाथ श्रीराधाकृष्ण सम्बन्धी विचित्र वचनों का पाठ कर सखियों को भी आश्चर्य युक्त करा देता था ॥ १८०-१६४ ॥ अव श्रीरावा के भूपणों का वर्णन करते हैं । तिलक का नाम स्मरयन्त्र, हार का नाम हरिमनोहर, दोनों रत्न-ताड़ का नाम रोचन तथा नासिका में विराजमान मुक्ता का नाम प्रभाकरी है। पदक का नाम मदन है जो कि श्रीकृष्ण की प्रतिच्छाया से ढका रहता था। शंखचूड से प्राप्त मणि का नाम सौभाग्यमणि है। जिसका दूसरा नाम स्यमन्तकमरिण भी था तथा जो अपनी कान्ति से एक ही साथ चन्द्र सूर्य की कान्ति को फेंकता था । कटक ( कला ) सब चट- नाम से कहे जाते थे। दोनों केयूरें (याजू) का नाम म. णिकवुर था । मुद्रिका का नाम विपक्षमद्मदिनी था। काञ्ची (को- धनी) का नाम काञ्चनचित्राङ्गी, तथा दोनों नूपुरी के नाम रत्नगोपुर कारावा के श्री राधागागरणोद्देशदीपिका स्वर्णयथी तडिदल्ली कुण्डं ख्यातं स्वनामतः । नोपवेदीतटे यस्य रहस्यकथनस्थली।। २०२।। मल्लारश धनाश्रीश्च रागौ हृदयमोदनी। बालिक्यं दयितं नृत्यं वल्लभा रुद्रवल्लकी ।। २०३।। जन्मना श्लाघ्यता नीता शुल्ला भाद्रपदाष्टमी। कान्ता पोडशभी रेमे यत्रालिनिलये शशी।। २०४ ।। इत्येतत् परिवाराणां श्रीवृन्दावननाथयोः । असख्यानां गणयितु दिडमात्रमिह दर्शितम् ॥ २०५॥ इति श्रीलश्रीपादरूपगोस्वामिविरचितायां श्रीराधाकृष्णगणोद्देशदीपिकायां लघुभाग: सम्पूर्णः (सम्पूर्णोध्यं ग्रन्थः) थे। जिनकी शब्द मञ्जरी मधुसूदन श्रीकृष्ण का रोध कर देती थी। मेघाम्बर तथा कुरुविन्दनिभ नाम से दो वस्त्र थे। पहिला तो अपना प्रिय तथा मेघकान्ति के तुल्य था और दूसरा रक्तवर्ण तथा श्रीहरि के प्रिय था। दर्पण का नाम मणिबान्धव था जो कि चन्द्रमा के दर्प को हरण करता था । सुवर्ण शलाका का नाम नर्मदा तथा रत्नककृती (कगा) का नाम स्वस्तिदा था । कन्दर्पकुहली नामक वाटिका थी जो कि पुष्पों से भरपूर थी। सुवर्णयूथी का नाम तडिद्वल्ली तथा अ- पने नाम से ख्यात कुड (रावाकुड) है । जिसके नीपवेदी तट में रहस्यकथनस्थली है । मल्लार और धनाश्री ये दोनों राग हृदय मोहन- कारी हैं। श्रीराधा को छालिस्य नामक नृत्य प्रिय था तथा रुद्रवल्लकी परम प्रिया थी। शुक्ला भाद्रपद की अष्टमी जन्म दिवस के कारण प्रशंसनीया है जहाँ अपनी पोलह भार्या (कला) के साथ चन्द्रमा रमण करता है । इति यह श्रीवृन्दायननाथ राधाकृष्ण के असंख्य प- रिवारों का गणना करने के लिये यहाँ दिइमात्र दिखलाया गया है इति श्रील श्रीपादरूपगोस्वामिविरचितं श्रीराधाकृष्णगणेद्देशटीपिका के लघुभाग का अनुवाद सम्पूर्ण हुआ । अनुवादक-कृष्णदास । । ॥ १६५-२०५॥
श्रीकृष्णालीलारतका
श्रीकृष्णाय नमो नमः।
श्रीकृष्णस्य कथासूत्रं यथाभागवतक्रमम् ।
लिप्यतेऽष्टोत्तरशतप्रणमानन्दसिद्धये ॥१॥
ब्रह्मब्रह्मन्नमामि त्वामात्मन्नन्दीश्वरेश्वर ।
नानावतारकृत् कृष्ण मधुरानन्दपूरद ॥२॥
[एवमादौ यथावदारम्भे नमस्कार एकः]
जय कृष्ण परब्रह्मन् जगत्वत्व जगन्मय ।
अद्वत सच्चिदानन्द स्वप्रकाशासिलाश्रय ॥३॥
* श्रीसनातनगोस्वामिने नमः *
एक सौ आठ प्रणाम कर आनन्दातिशय प्राप्ति के लिये श्रीमद्-
भागवत क्रम के अनुसार श्रीकृष्ण कथा के सूत्र अर्थात् वीज लिखे
आते हैं ॥१॥
हे ब्रह्मवहान अर्थात् ब्रह्मा के अधीश्वर अथवा वेद प्रतिपाद्य
परम ब्रह्म !, हे प्रात्मन् अर्थात् व्यापक अथवा प्रियतम !, हे नन्दी-
श्वर महादेव के ईश्वर अथवा नन्दग्राम के सर्वप्राधान्यरूप ब्रज-नव-
युवराज!, हे मत्स्य-कर्म-वराहादि नानावतारकारी !, हे सर्वचित्ताक
पंक नन्दनन्दन श्रीकृष्ण !, हे मधुरानन्द पूरद अर्थात् माधुर्य सुख-
सागर अथवा शृंगाररससर्चस्व ! आपको नमस्कार है ॥२॥
(यह प्रारम्भ में प्रथम नमस्कार है)
हे कृष्ण !, हे परब्रह्म अर्थात् सर्वाराध्य सर्वश्रेष्ठ!, हे अखिल
ब्रह्माण्ड के मूलकारण ! हे जगन्मय अर्थात् एकांश से जगत् स्थिति
के कारण जगप ! हे सर्वाधिक !, हे सच्चिदानन्द अर्थात् सन्धिनी-
सम्बित् ल्हादिनी शक्तिविशिष्ट !, हे स्वयं प्रकाश !,हे असिल आश्रय!
श्राप की जय हो ॥३॥
श्रीकृष्णालीलास्तवः निर्विकारापरिच्छिन्न निर्विशेष निरन्जन । अन्यक्त सत्य सन्मात्र परम ज्योति रक्षर ॥४॥ नमः २ ॥ परमात्मन् वासुदेव प्रधानपुरुपेश्वर । सर्वज्ञानक्रियाशक्तिदात्रे तुभ्यं नमो नमः ॥ ५॥ हृत्पद्मकर्णिकावास गोपाल पुरुषोत्तम । नारायण हपीकेश नमोऽन्तर्यामिणेऽस्तु ते ॥ ६॥ नमः ३ ।। हे निर्विकार ! हे अपरिच्छिन्न ! हे निविशेष! अर्थात प्राकृत हेयगुण वर्जित ! हे निरस्खन अर्थात् क्लेशरहित अथवा स्वरूपन्युति- शून्य ! हे अव्यक्त अर्थात् अस्फुट प्रकाश ! हे सत्य अर्थात यथार्थस्य- रूप में स्थित अथवा सदा सर्वदा अव्यभिचारिरूप से विराजमान ? हे सन्मान ! हे परम पुरुपोत्तम ! अथवा स्वरूपशक्ति के द्वारा नित्य आलिङ्गित ! हे परम ज्योतिस्वरुप ! हे अक्षर अर्थात् प्रणय स्वरूप ! अथवा जिनकी प्राप्ति होने पर पतन नहीं होता है एतादृश ! ॥ ४॥ (दूसरा प्रगाम) इसके पश्चात् भगवान के सर्वान्तयामित्व-हेतु परमात्म स्वरुप के आविर्भाव का स्तय करते हैं। हे परमात्मन् अर्थात हे सर्वान्तामिन, हे वासुदेव अर्थात् रोमकूप मे निसिल ब्रह्माण्डनिवासभूत प्रथमपुरुष के देवता !, हे प्रधान पुरुपेश्वर अर्थात् प्रकृतिपुरुष के नियन्ता ! श्राप समस्त ज्ञान क्रिया-शक्ति के प्रदाता हैं आपको नमस्कार है नमस्कार आप हृदयपद्म कर्णिमा में प्रात् अनाहतचक्र में निवास करते है, यास्य इन्द्रिय के द्वारा उपललित सपल इन्द्रियों के पालक होने के कारण गोपाल हैं, श्राप पुरुषोत्तम हैं । जीव-समूह के श्राश्रय होने के कारण अयमा अखिललाक के साती होने के यारण श्रापमा नाम नारायण है । आर शेतक्ष रूप से सकल इन्द्रियों के अधीश्वर विम्या अन्तःमरण के नियामक होने के कारण अन्तर्यामी हैं। आपको नम-
३
श्रीकृष्णलीलास्तवः
परमेश्वर लक्ष्मीश सच्चिदानन्दविग्रह ।
सर्वसल्लक्षणोपेत नित्यनूतनयौवन ॥ ७ ॥
सर्वाङ्गसुन्दर स्निग्धघनश्यामाचलोचन ।
पीताम्बर सदा स्मेरमुखपद्म नमोस्तु ते ॥८॥
परमाश्चर्य्यसौन्दर्य माधुर्यजितदृपण ।
सदा कृपास्निग्धदृष्टे जय भूपणभूपण ॥६॥
कन्दर्पकोटिलावण्य सूर्यकोटिमहाद्युते ।
कोटीन्दुजगदानन्दिन् श्रीमद्व कुण्ठनायक ॥१०॥
स्कार है ॥६॥
(तीसरा नमस्कार)
इसके अनन्तर विष्णुस्वरूप में प्राविभूत प्रभु का स्तव करते हैं-
हे परमेश्वर ? हे लक्ष्मीपति !हे सच्चिदानन्दविग्रह अर्थात् परि-
पूर्ण आविर्भाव के कारण सच्चिदानन्दघन विग्रहधारिन् ! आप
अत्युत्तम बत्तीस प्रकार के सल्लक्षण से युक्त हैं और नित्यनवयौवन
में स्थित हैं।॥७॥
हे सांगमनोहर ! स्निग्य जलधर की भाँति आपका वर्ण श्या-
मल है और आप कमलनयन पीताम्बरधारी हैं। आपका मुखकमल
सदा सर्वदा मन्दहास्य से शोभायमान है । आपको नमस्कार है ।।।।
आपका सौन्दर्य परम अद्भुत है तथा श्री अंग की 'माधुर्यता
मकल भूपों का पराभवकारी है अर्थात् भूषणों का भूपणरूप है।
है सदा सर्वदा करुणामृत यर्पण के द्वारा स्निग्ध-दृष्टिचाले ! हे भूपणों
के भूपण अर्थात् शोभा समुद्र ! आपकी जय हो ॥६॥
है कोटि कोटि काम ने भी समधिक लावण्यधारिन् !, हे कोटि
कोटि सूर्य से भी अधिकतर जाज्वल्यमांन कान्तिबाले !, हे कोटि
कोटि चन्द्र से भी अति सुन्दर रूपसे जगत् के आनन्द प्रदानकारिन् !
आप सर्व शोभा-सम्पत्ति निपेवित वैकुण्ठ के नायक हैं ॥१०॥
श्रीकृष्णलीलास्तय.
शद्धपद्मगदाचक्रविलसच्छीचतुर्भुज ।
शेपादिपाठोपास्य श्रीमद्गरुडवाहन ॥ ११ ॥
स्वानुरुपपरीवार सम्सद्गुणसेवित ।
भगवन् हद्वचोऽतीत महामहिमपूरित ॥ १॥
दीननाथैकशरण हीनार्थाधिकसाधक ।
ममस्तदुर्गतिनात वाञ्छातीतफलप्रद ।। १३ ।। नम ४ ॥
सर्वावतारपीजाय नमस्ते निगुणात्मने ।
ब्रह्मणे सृष्टिकर्नेऽथ सहर्ने शिवरूपिणे ॥ १४ ॥
हे शरस पद्म-गदा-चक्र विलासी सुन्दर चतुर्भुज विशिष्ट ', हे
शेषादि पार्षदों के उपास्य ', हे गरुडवाहन ॥११॥
हे स्वानुरुप परिकरो से परिसेवित हे निसिल कल्याणमयगुणे
के द्वारा अलकृत, हे ऐश्वर्य दीदि पहभागों से
युक्त
अर्थात
पद्धैश्वर्य परिपूर्ण स्थय भगवान् , हे त्रिपाट विभूति में अर्थात् दिव्य
चिन्मय धाम में नित्य विराजमान रहने के कारण वास्य-मन के अ.
गोचर । अतएव ब्रह्मादिदेवताओं को मोह के उत्पादक परम विस्मय
कारी महान ऐश्वर्य से परिपूर्ण ॥ १० ॥
हे निकिञ्चन जनों के प्रभु तथा एकमात्र आश्रय ! हे निष्कि-
'चन निन भत्ता में चतुर्वर्ग तिरस्कारकारी प्रेम महाधम का वितरण
परने वाले हे समस्त लोगों के नितापादि दुसों के बाणकारी तथा
उनको वा छातीत फल के दाता। आपको नमस्कार है ॥ १३ ॥
(चतुर्थ नमस्कार)
श्रव महाविष्णुस्प से स्तर करते हैं। हे मत्स्य-यादि स
मस्त अवतारों के मूलकारण अर्थात् सांवतार यीजम्प । श्राप से
ही गुणत्रय या प्रकाश होता है । श्राप सृष्टि के मूलारी होने के
पारण ब्रह्मास्प तया सदार के कारण शिवस्प है। आपको नमसार
हे॥१४॥
श्रीकृष्णलीलास्तवः भक्तेयापूरुणयन शुद्धसत्त्वधन प्रभो। वन्ने देवाधिदेवं त्यां कृपालो विश्वपालक ॥ १५॥ सर्वधर्मस्थापकाय साधर्मविनाशिने । सर्वासुरविनाशाय महाविष्णो नमोऽस्तु ते ॥ १६ ॥ गानामधुररुपाय नानामधुरवामिने । नानामधुरलीलाय नानासनाय ते नमः ॥ १७॥ नमः ५॥ श्रीचतु.सनरूपाय तुभ्यं श्रीनारदात्मने । श्रीवराहाय यज्ञाय कपिलाय नमो नमः॥१८॥ दत्तात्रेय नमस्तुभ्यं नरनारायणी भजे । हे हयग्रीव हे हंस ध्रुवप्रिय नमोऽस्तु ते ॥ १६ ॥ हे भक्तछा पूर्ति के लिये निरन्तर व्यप्रमानस तथा शुद्ध सत्व- गुण के आश्रय के द्वारा विष्णुस्वरूप में अवस्थित । आप देवादिदेव, कृपालु तथा विश्वपालक हैं । आपकी वन्दना करता हूँ ॥ १५ ॥ हे सम्लधर्म के स्थापक तथा सफल अधर्म नाशकारी ! हे स- मस्त असुरों के विवातक ! हे महाविष्णु आपके श्रीचरण में नम. स्कार है।॥१६॥ हे भत्तचित्त विनोदनाथ विविध माधुर्यमय रूप धारणकारी ! हे दास्य सरय-वात्सल्य मधुर रस के आस्वादक ! आप की लीला अनन्त तथा नाम भी अनन्त हैं । आपको नमस्कार है ॥ १७॥ (पञ्चम नमस्कार) अब चौदह मन्वन्तरावतार तथा लीलावतार रूप से स्तव करते हैं।-हे सनत्कुमार-सनातन-सनक सनन्दन स्वरुप ! हे नारदरूप ! वराह-यज्ञ-अपिल स्वरूप ! आपको नमस्कार है नमस्कार है ॥१८॥ हे दत्तात्रेय ! आपको नमस्कार है । हे नर नारायण ! आपका भजन करता हूँ। हे हयग्रीव ! हे हस! हे ध्रुवप्रिय ! आपके लिये नमस्कार है।॥ १६॥ 1 श्रीकृष्णलीलास्तवः पृथु त्वामृषभं चैव बन्दे स्वायंभुवेऽन्तरे । द्वितीये विमुनामानं तृतीये सत्यसेनकम् ।। २० ॥ चतुर्थे श्रीहरि वन्दे वैकुण्ठं पञ्चमे तथा । पप्ठेऽसितं महामीनं शेपं च धरणीधरम् ।। २१ ॥ श्रीनृसिंह च कूर्म च सवन्वन्तरिमोहिनीम्। सप्तमे वामनं धन्दे नमः परशुराम ते ॥ २२ ॥ श्रीरामचन्द्र हे व्यास नमस्ते श्रीहलायुध । हे युद्ध कल्किन् मां पाहि प्रपन्नाशनिपञ्जर ।। २३ ॥नमः ।। अष्टमे सार्वभौमस्त्वमृपभो नवमे भवान् । विश्वकसेनश्च दशमे धर्मसेतुस्ततःपरम् ।। २४ ।। हे पृथु ! तथा हे ऋषभ ! आपकी वन्दना करता हूँ। ये बारह स्वरूप स्वायम्भुव मन्वन्तर में अवतीर्ण हुए हैं । द्वितीय मन्वन्तर में अर्थात् स्वारोचिप में विभु, तृतीय श्रौत्तमीय में सत्यसेन, चतुर्थ तामसीयमें हरि,पञ्चम रैवतीय में चैकुण्ठ जी हैं। इन सबकी बन्दना फरता हूँ। पाठ चानुवीय में अजित, महामीन, शेप धरणीधर, श्री नृसिंह, कूर्म, धन्वन्तरि के साय मोहिनी जी हैं-इन सबकी वन्दना करता हूँ । सप्तम इस वैवस्वत मन्यन्तर में वामन हैं, उनकी वन्दना करता हूँ। परशुराम ! आपको नमस्कार है। हे श्रीरामचन्द्र ! हे व्यास ! हे श्रोहलायुध ! आप सबको नमस्कार है । हे बुद्ध ! ह शर- रागत जन के लिये वम की तरह मुदृढ़ शरीरधारी मल्कि! मेरी रक्षा कीजिये ॥२०॥ (पष्ट नमस्कार) अष्टम मायर्णय में आप मार्चभीम, नयम दक्षमावर्णीय शुपम, दशम प्रहासावर्णीय में वियफमेन, एकादश धर्ममावर्णीय में धर्मसंतु, द्वादश रुद्रमावर्गीय में सुधामा, प्रयोदश देवसावर्गीय में योगेश्वर तया चतुश हदमावर्गाय में पहभानु हैं। हम प्रार मसाईम कलावनार तथा चाँदद मन्यन्तरातार है। मप मिल कर .
श्रीकृष्णलीलास्तवः सुधामा द्वादशे भावी योगेशस्तु त्रयोदशे। चतुईशे वृहद्भानुः सप्तत्रिंशत्तनो जय ॥ २५॥ शुक्लः सत्ययुगे यः स्याद्रक्तस्त्रेतायुगे तथा । द्वापरे तु हरिद्वर्णः कली कृष्णे महाप्रभो ॥ २६ ॥ तं त्वां श्रीकृष्ण! वन्देऽहं जगदेकदयानिधे । निजभक्तविनोदार्यलीलानन्तावतारकृत् ।। २७ ॥ नमः ७।। प्रल्हादसंल्हादक भक्तवत्सल भनिप्रभावप्रकटिन् नृसिंह है। स्वद्वष्वक्षःस्थलपाटन प्रभो शिष्टेष्टमूर्ते जय दुष्टभीपण ॥२८॥ अन्तःकृपातिमृदुल वाहिराटोपसुन्दर । प्रल्हादागावलेहोक फुटब्रह्माण्डगर्जित ॥ २६ ॥नमः ॥ ३७ अवतार हुए हैं । हे इन सब स्वरूपों मे प्रकटशील श्रीप्रभु ! आप की जय हो । जो सत्ययुग में शुक्लवर्ण, त्रेता में रक्त तथा द्वापर में हरिद्वर्ण हैं, ये श्रीकृष्ण कलियुग में महाप्रभु हैं । हे जगत् में एक मात्र दयानिधान श्रीकृष्ण! आपकी वन्दना करता हूँ। आप अपने भक्तों के विनोदार्थ लीला के अनुसार अनन्त अवतारों के प्राकट्य- कारी हैं ॥२४-२७॥ (सप्तम नमस्कार) अव श्रीनृसिंह तथा श्रीरामचन्द्र इन परावस्थ स्वरूप दोनों का स्तव करते हैं-हे प्रल्हादके सम्यक् आनन्ददायक! हे भक्तवत्सल ! हे भक्ति- मभाव के द्वारा प्रकटनशील श्रीनृसिंह ! हे निज-शत्रु हिरण्यकशिपु के वक्षःस्थल-विदीर्णकारी ! हे प्रभु ! आप शिष्टों का अभीष्ट मूर्ति- स्वरूप और दुष्टों के भयप्रद हैं। आपकी जय हो। आप अन्तर में करुणाधिक्य से अत्यन्त स्निग्ध तथा वाहिर में आटोप गर्जना के द्वारा परम सुन्दर हैं । प्रल्हादजी के अंग अवलेहना करने में आप उत्कण्ठित है। आपके गर्जन में ब्रह्माण्ड छिन्न-भिन्न सा हुआ था। ॥२८-२६॥ (अष्टम नमस्कार) .. श्रीकृष्णलीलास्तवः सीतापते दाशरथे रघूद्रह श्रीराम हे कोशलजासुताजहक । श्रीलक्ष्मणज्येष्ठ हनूमदीश्वर सुग्रीवबन्धो भरतामन प्रभो।।३०।। हे दण्डकारण्यचरार्यशील हे कोदण्डाणे खरदूषणांतक! वद्धाब्धिसेतोऽयि विभीषणाश्रित लंकेशघातिन जय कोशलेन्द्र॥३१॥ नमः॥ श्रीकृष्ण जीया मथुरावतीर्ण स्वप्रेमदानकनितान्तकृत्य । नानासुमाधुर्य्यमहानिधान संव्यञ्जितैश्वर्य्यकृपामहत्त्व ।। ३२॥ । परीक्षित्पृष्टचरित सर्वसेव्यकथामृत । कृतपाण्डवनिस्तार-परीतिबेहगोपन ॥ ३३ ॥ हे सीतापति ! हे दाशरथि ! हे रघुकुल-मुकुट ! श्रीरामचन्द्र ! हे कौशल्यानन्दन ! हे पद्मपलाशलोचन ! हे लक्ष्मणज्येष्ट ! हे हनुमानके प्रभु ! हे सुप्रीववान्धव ! हे भरताग्रज ! हे प्रभु! हे दण्डकारण्यवि. हारी ! हे उत्तम चरित ! हे धनुर्वाण धारिन् ! हे सरदूपणनाशक ! हे समुद्रवन्धनकारी ! हे विभीषण के आश्रय अथवा विभीषण के शरण ! हे रावण विघातक ! हे कोशलेन्द्र! श्रापकी जय हो।३०-३१।। अब समस्त खांशावतार का स्तव कर पश्चात् स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण का स्तव करते हैं। हे श्रीकृष्ण ! हे मथुरा में अवतीर्ण ! श्राप सोन्कर्परूप से विराजमान है । निज प्रेमप्रदान ही श्राप का परम कर्तव्य है । श्राप नाना प्रकार से मुमाधुर्य के निधान हैं। आप के ऐश्वर्य कृया महत्तादिक मथुरा के अवतरण में मुन्दररूपसे अभि- 'व्यक्त हो रहा है।॥३२॥ अव श्रीमद् भागवत् दशमस्कन्ध के लीलासूत्र का वर्णन करते है-राजा परीक्षित ने श्रीशुकदेव के लिये श्रापकी चरित्रकथा का प्रश्न किया है। आपका चरित्रामृन सनमा मेयनीय है। भीष्म, द्रो रणादि महायोद्धाओं के साथ दुर्द्ध संग्राम से आपने ही पाण्डयों (नवम नमस्कार) ६ श्रीकृष्णलीलास्तवः वहिरन्त स्थताऽसाधुसाधुदुःससुसमट । शुभ्र पाष्टराजान्त नाशंकानुपृष्ट हे ॥३४॥ त्यत्तोदाननृपप्राण शुक्रोद्गीर्णकथामृत । नृपयाजासुरानीकभारातक्षितिरोदक ॥ ३५॥ धरातैनाददुग्धाविगतनह्माशुपस्थित । नहाध्यानश्रुतादेशकथाप्यायितभूसुर ।। ३६॥ नमः १०॥ शूरसेनमहाराजधानीश्रीमथुराप्रिय । देवकीसुदेकविवाहोत्सवकारण ॥ ३७ ॥ पा मृत्युमुस से निस्तार किया है । आप ने ही अश्वत्थामा के द्वारा चलाये हुए ब्रह्मास्त्र से मातृगर्भ में दग्ध परीक्षित की रक्षा की थी। पहिटि वाले असाधुओं के सम्बन्ध मे आप कालरुप से दु ग्यदान तथा अन्तर्दृष्टिले साधुओं को अन्तर्यामी स्वरुप से सुस प्रदान करते हैं । आपने ही निजवृत्तान्त सुनाने की इच्छा से परीक्षित् महा राज के चित्त का आकर्षण किया और उनके चित्त में नाना प्रकार की आशङ्का उठाकर उसका समाधान रूपा निज क्था की जिज्ञासा की थी। अन्न जल परित्याग गरी राजा के प्राणरूप से आप ही विराजमान हुए तथा शुरदेव के मुख से निज क्थामृत का पान क्रा कर कृतार्थ क्यिा था । आपने ही नृपति छल मे दुष्ट असुर सेनाओं के भार से प्रपीडिता पृथिवी का रोदन करवाया तथा पृथिवी के यातनाद से क्षीरोद-समुद्र के तट पर समागत ब्रह्मादिदेवगण के सान्निध्य मे श्राप ही उपस्थित हुए। ब्रह्मा के ध्यान में श्रुत निज प्र- त्यादेश वार्ता का प्रचार क्राफर अापने देवगण के सम्यक् सन्तोप का विधान किया था। २३ । ३६ ॥ (दशम नमस्कार) अन भोजेन्द्रवन्धनागार में अवतीर्ण होने का प्रसग उठाते हैं- यदुरान शूरसेन का महाराजधानी श्रीमथुरा आपको परमप्रिय है .
१० श्रीकृष्णलीलास्तवः वियद्वाग्वर्द्धितात्ताश्वपाशकंसातिदुर्नय । वसुदेववचोयुक्तिदेवकीप्राणरक्षक ॥ ३८ ॥ सत्यवाक् शौरिकंसापनीतपुत्रविमोचन । देवर्षिकथितोढन्तकंसज्ञातेहिताव माम् ॥ ३६॥ कंसद्धलितानेक-वसुदेवादिवान्धव । देवकीजातपड्गर्भतातकंसारिघातन ॥ ४०॥ नमः ११ ॥ * इतिदशमस्कन्धे प्रथमोऽध्याय * कंसासुरवलोद्विग्नस्वयादवकुलार्तिवित् । देवकीसप्तमभ्रणधामन्मायानियोजक ॥ ४ ॥ । थवा आप मथुरा के परमप्रिय है । देवकी वसुदेव दोनों का विवा- होत्सव का मुरय कारण आप ही हैं । वरवधू के गृह गमन के समय आकाशवाणी के द्वारा अश्वरज्जुधारी कंस की दुर्नीति को अधिक परिमाण से आपने ही वढाया था और देवकी के प्राणनाश के लिये उद्यत दुष्ट कंस के अत्याचार से वसुदेव के द्वारा युक्ति नैपुण्य से उस की स्तुति कराकर देवकी की प्राणरक्षा आपने ही की थी। सत्यपरा- यण वसुदेव के द्वारा कंस के सम्मुख में लाया हुआ प्रथम सन्तान का विमोचन आपने करवाया पश्चात् देवर्षि नारद जी के द्वारा श्राप का वृत्तान्त सुनाकर आपके वध के लिये देवकी पुत्रों की हत्या करना युक्तियुक्त है-इस प्रकार कम को उत्तेजित आपने ही कराया। आप ने ही कस के द्वारा वसुदेव देवकी प्रभृति अनेक यान्धयों को , सला के द्वारा बंधवा कर देवकी गर्भजात अग्रज छ जनों का वध कराया था क्योंकि उससे दुष्टनाशरूप तथा साधु संरक्षण स्वरुप पृ. थिवी-सरक्षा का निगूढ अभिप्राय सिद्ध हो सकता है । हे कृष्ण ! आपने सब कुछ क्यिा है, श्राप मेरी रक्षा कीजिये ।। ३७-४०॥ (एसटश नमवार) ११ श्रीकृष्णलीलास्तयः देवकीपुत्रतावाप्तिद्वारोत्साहितमाय हे । रोहिणीप्रापितस्वांश रौहिणेयप्रियाऽव माम् ॥ ४२ ॥ वसुदेयोल्लसच्छक्ते देवम्यष्टमगर्भग। स्वसचिनीलसज्योतिः कसनासविपादकृत् ॥४३॥ सदा कसमनोतिन् ब्रह्मरुद्राद्यभिष्टुत । सत्यात्मक जगन्नाय शुद्वसात्त्विकरूपभृत् ॥ ४४ ।। कस के प्रलम्ब, वक्र, चाणूरादि सैन्यगण के द्वारा उद्विग्न निज यादववश की आर्ति को जानने वाले आप ही हैं। आपने ही तो देवकी के सप्तम गर्भ में निज शेष नामक विग्रह का संस्थापन कर राहिणी के गर्भ में सन्निवेश करने के लिये योगमाया को नियोजित क्यिा है॥४१॥ स्वयं आप देवकी के पुनस्प मे जन्म धारण करेंगे-ऐसा कह पर योगमाया को उत्साहित किया था। इसके अनन्तर आपने योग- माया के द्वारा रोहिणीगर्भ में निजाश अनन्तजी की स्थापन करवाया। हे बलदेवप्रिय आप मेरी रक्षा कीजिये ॥४२॥ आप वसुदेव के मन में अपनी शक्ति को निहित कर प्रकाश- मान हुए हैं तथा उनके हृदय से देवकी के अष्टमगर्भ में विराजमान हुए है। आपने निज जननी देवकी के प्रकाशमान तेज के द्वारा कंस का भय और विपाट का उत्पादन करवाया ॥४३॥ फलत. शयन भोजन गमनादि सविस्था में श्रापने सर्वदा कंस के मनोमन्दिर मे निवास क्यिा है । उस समय ब्रह्मा रुद्रादि देवतागण ने आपकी सर्व प्रकार से स्तुति की थी। वह स्तुति इस प्रकार की थी। हे सत्यत्रत सत्यपर ! इत्यादि रूप से सर्वथा सत्यात्मक ! सकल सृष्टि के कारण के लिये आप चौदह भुवन के नाथ अर्थात् सर्वेश्वर हैं । आप शुद्धसात्त्विक सजन मुसवारी मायालेश से रहित सुन्दर रूप को धारण करते हैं ।। ४४ ॥
१२ श्रीकृष्णलीलास्तवः भक्तकलभ्यसर्वस्व सर्वसर्वार्थद्वपुः । रूपनामाश्रिताविष्ट जन्ममात्रधरातिहत् ॥ ४५ ॥ स्वभूभूपणपादाज विनोदैकार्थजात हे ! जय भूभारहरण देवाश्वासितमातृक ॥ ४६॥नमः १२ ।। के इति दशमस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः भाद्रकृष्णाष्टमीजात प्राजापत्यसम्भवः । महीमङ्गल-विस्तरिन् साधुचित्तप्रसादक ॥ ४७ ।। केवलमात्र भक्तगण ही आपके पादाश्रय रूप महान् धन के अ. धिकारी हैं। आपके श्रीविग्रह चारवर्ण, चार-पाश्रम प्रभृति के वेद- तपस्या-योग-समाधि आदि के द्वारा स्तुत्य सर्वपुरुषार्थ प्रदानकारी है । यद्यपि मन वाक्य के अगोचर होने के हेतु आपके नाम-रुप गुण-जन्म- कर्मादि निरूपण के विषय नहीं हैं तो भी भक्तों की उपा सना के समय साक्षात्कार होने के लिये नामरूपादि का आश्रय कर उसमें प्राविष्ट रहने के कारण आप रूपनामाश्रिताविष्ट हैं। अतः अापके प्राकट्यमात्र से ही पृथिवी का आर्तिभार हरण हो जाता हे।। ४५॥ आपके चरणकमल स्वर्ग:मर्त्य के भूपण स्वरूप हैं पाप का आविर्भाव केवल धरा का भारहरार्थ नहीं है परन्तु उसका मुख्य प्रयोजन क्रीडाविनोद है। मत्स्य-मादि विविध अवतारों के प्रा. कटय के द्वारा त्रिभुवन का पालन करने के कारण आप भूभार हरण कारी हैं । आपकी जय हो। “हे मातः भाग्यवश आपके उदर में पुरु- पोत्तम का प्रवेश दे" इस प्रकार के यास्य के द्वारा श्राप देवतागण से निज माता का आश्वासन देने वाले हैं। आपको नमस्कार है। ॥४६॥ (द्वादश नमवार) श्रय आविर्भाव होने का समय कहते हैं। भाद्रमास की कृष्णा- श्रीकृष्णलीलास्तवः महर्षिमानसोल्लास सन्तोपितमुरब्रज । निशीथ-समयोद्भूत वसुदेवप्रियात्मज || ४ ।। देवकीगर्भसदन वलभद्रपियानुज । गदाग्रज प्रसीदाशु सुभद्रापूर्वजाऽव माम् ॥ ४६॥ आश्चर्यवाल मां पाहि दिव्यरूप-प्रदर्शक । कारागारान्धकारघ्न सूतिकागृहभूपण ।। ५० ॥ नमः १३ ।। वसुदेवस्तुतं साक्षाददृश्यात्म-प्रदर्शकं । सत्प्रविष्टाप्रविष्ट त्वां वन्दे कारणकारणम् ॥ ५१ ।। प्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र में आपका प्रादुर्भाव है । उससे पृथिवी का मंगल विस्तार तथा साधुओं का चित्त प्रसन्न हुआ है ॥४७॥ हे महर्पियों के मानस-उल्लास कारी तथा देवताओं का सन्तोप करने वाले ! आप निशीथ में वसुदेव पत्नी देवकी के गर्भ से प्रकट हुए हैं।॥ ४॥ हे देवकी के उदरखनि के प्रति उत्कृष्ट इन्द्रनीलमणि ! हे बल- देव के प्रिय अनुज ! हे गदाग्रज ! आप मेरे लिये प्रसन्न होवें । हे सुभद्रा के पूर्वज ! हमें अपनी लीला की स्फूर्ति कराकर हमारी रक्षा कीजिये ॥४६॥ जन्म के समय पद्मपलाशलोचन आप शंख चक्रादियुक्त भुजच- तुष्टय तथा श्री वत्स-कौस्तुभादि धारण करके आश्चर्यान्वित बालक रूप से शोभित हुए थे और महामूल्य वैदूर्य किरीट तथा कुण्ड. लादि के द्वारा शोभित होकर वसुदेव को दिव्य रूप का दर्शन कराया था। आपने अपने तेज से कारागार के अन्धकार का नाश किया तथा सूतिकागृह में भूपण रूप से विराजमान रहे । अब मेरी रक्षा कीजिये (त्रयोदश नमस्कार)॥ ५० ।। ऐश्वर्य दर्शन से पुत्रघुद्धि के अपगत होने पर वसुदेव के द्वारा १४ श्रीकृष्णलीलास्तवः सिद्धाकर्तृत्वकर्तृत्वं जगक्षेमकरोदयम् । दैत्यमुक्तिदकारुण्य स्वजनप्रेमवर्द्धनम् ।। ५२ ॥ देवकीनयनानन्द जय भीतप्रसूम्तुत । निगुणाध्यात्मदीपातिलयकारक कालमृक् ।। ५३ ।। स्वपादाश्रित-मृत्युध्न मासहगदृष्ट्ययोग्य हे । लोकोपहास-भीताम्बावृतदिव्याङ्ग-सवृते ।। ५४ ॥नम. १४|| आप स्तुत हुए । आप प्रत्यक्ष रूप से अदृश्य हैं अर्थात् केवल अनु- भवसिद्ध स्वरूप के प्रदर्शक हैं । "ब्रह्मा ने जगत् की सृष्टि कर उसमें अन्त प्रवेश किया इस श्रुतिप्रमाणनल से निज प्रकृति के द्वारा सृष्ट सत् शब्द वाच्य विश्व के अन्तर में प्रविष्ट होने पर भी आप अप्र- विष्ट अर्थात् निजिप्त हैं । भावार्थ यह है कि आप उसमे सद् रूप से प्रविष्ट की भॉति प्रतीयमान होते है। आप जग के कारण ब्रह्मा के भी श्रादिकारण हैं। आपकी वन्दना करता हूँ ।। ५१ ॥ आप निष्क्रिय होने के कारण अकर्ता अथच ईश्वर होने के कारण कर्ता हैं । इस विरुद्ध धर्म का समावेश श्राप में ही है। साधुओं की रक्षा के लिये"नाममान से राजा तथा कार्य में अमुर" उन समूह की हत्या कर आप जगत्के मगल के लिये आविर्भूत होते हे श्राप दैत्योंका सहार करनेपर भी उनको मुक्ति प्रदान करने के का. रण कारुण्य का प्रकारा करते हैं। हे सजन प्रीतियद्धक । आपकी वन्दना करता हूँ॥ ५ ॥ अन देवकी स्तुति का वर्णन करते हैं। हे देवकी के नयना नन्द । श्रारकी जय हो । कस से भयभीत जननी देवी की पुनबुद्धि सकुचित हो जाने पर उसने श्राप स्तर किया है । हे गुणतीत ! हे निर्विशेष हे बुद्धयादिक इन्द्रिय समूह पे प्रकाशक ! श्राप म. छान प्रलयकारी तथा प्रलयकारी काल के भी सृष्टिकर्ता हैं। ५३ ।। आप निनचराश्रित भृत्या के मृत्युहारी तथा मासमय प्रायन श्रीकृष्णलीलास्तर. पितृप्रारजन्मकथक स्वदत्तवरयन्त्रित । महाराधनसन्तोप निसन्मात्मजतागत ॥ ५५ ।। महानन्दप्रसूतात लीलामानुपबालक । नराकृति परब्रह्मन् प्रकृष्टासर सुन्दर ।। ५६ ।। जनकोपायनिर्देष्ट यशोदाजातमाय है। शायितद्वा स्थपौरादे मोहितागाररक्षक ॥२७॥ चक्षुः से अदृश्य हैं। "प्रलयावसान मे निजदेह में समन विश्व व. ह्माण्ड के समावेशकारी आप मेरे उदर जात हैं" इस लोकापवाद से भयभीता देवकी के द्वारा प्रार्थित होकर आपने शंस-चमादि अ- लौकिक रूप का उपसंहार किया। आपको नमस्कार है ।। ५४ ।। (चतुर्दश नमस्कार) आपने माता पिता देवकी वमुदेव को पूर्वजन्म का वृत्तान्त सुनाया तथा निजहत्तवर मे वशीभूत रहे । वर्षा, वायु, धूप इत्यादि महान्कप्ट के सहन रुप आराधना मे प्रसन्न होकर उनके तीन जन्म मे पृश्निगर्भ-वामन-तथा वासुदेव रूप से पुनत्व को अगीकार क्यिा ॥ ५५॥ पिता माता को पूर्व जन्मों का स्मरण कराकर महान् आनन्दित उनके सम्मुस फिर लीला मनुष्य वालक रूप में अवस्थान हुए। इससे आप सर्वदा प्राकृत बालक सदृश नहीं हैं क्योंकि आप नरा. कृति होनेपर भी परब्रह्म हैं। आपका सर्न मनोहर श्राकार है। श्राप अभिनव रूप लागण्य के निधान हैं ॥५६॥ "यदि तुम कंस से भय करते हो तो मुझको गोकुल में ले चलो"-इस प्रकार पिता वसुदेव को गोकुल ले जाने का निर्देश किया है। आपने यशोदा गर्भ मे निजाश माया को प्रादुर्भूत कराया है । उस समम सच्छन्दगमन के लिये द्वारपालों को तथा पुरवा-
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श्रीकृष्णलीलास्तवः
सशक्तयुद्घाटिताशेपक्वाट पितृवाहक ।
शेपोरगफणाछत्र यमुनादत्तसत्पथ ।। ५८ ॥
व्रजमूर्तमहाभाग्य यशोदातल्पशायित ।
निद्रामाहितनन्दादि यशोदाऽविदितेहित ॥५६॥ नमः १५ ।।
* इति दशमस्कन्धे तृतीयोऽध्याय के
क्सघातितदुर्ग वा वन्दे दुर्गोंदितोद्भवम् ।
कसविस्मापक तात-मातृवन्धविमोचकम् ।। ६० ।।
सभयस्मृतिसशुद्धचित्तकस-विवेकदम् ।
कसात्मज्ञानसंश्लाघि-पितृमातृक्षमाप्रदम ।। ६१ ॥
सियों को निद्राभिभूत कराकर सृतिकागृह के रक्षकों को भी मोहित
क्यिा है ॥ ५७ ।।
अपनी शक्ति के प्राकट्य के द्वारा कपाट-समूह
स्मोचन
क्यिा । पिता को वाहक बनाकर गोकुल के लिये यात्रा की, उस समय
अनन्तदेव के फणसमूह ने छन होकर वर्षा का निवारण किया है ।
अगाधजलमयो-भयकर आवर्तन से युक्त श्रीयमुना ने आपके पिता
को गमनोपयोगी मार्ग का प्रदान किया ।। ५ ।।
हे व्रज के मूर्तिमान् महान् भाग्यस्वरुप
आप वसुदेव के द्वारा य.
शोदा की शयां म शयन करन लगे। निद्रा के द्वारा आपने नन्दादि
गोकुलवासियों को माहित रिया । उस समय यशोदा जी वसुदेव
द्वारा तुम्हारे पानयन कार्य का चिन्ह कुछ नहीं समझ सकी।
हे कृष्ण श्राप को नमस्कार है ।। ५६ ॥
(पञ्चदश नमस्कार)
आपके सम्बन्ध से कस के द्वारा दुर्गा को मारने के लिये पत्थर के
भर श्राघात करने पर दुर्गा ने उसके हाथ से उत्पतिय होगर आप
के श्रानिर्भार की कया कही थी। "पूर्वश्रुत आकाशवाणी क्सि
प्रकार मिथ्या हुई"-
"-इस भारना से आपने कंस को विस्मित क्यिा
सधा यमुदेव-देवको के यन्यन पिमोचन का कारण हुए ॥ ६ ॥
श्रीकृष्णलीलास्तवः दुर्मन्त्रिगण-पागजालक्सदुर्मानवर्द्धनम् । सहतिक्रमदुमन्त्र-क्षयितासुरजीवितम् ॥ ६२ ॥ नम १६ ॥ * इतिदशमस्कन्धे चतुर्थोऽध्याय * प्रदत्तपूर्वस्वपदा जसौहृद-प्रदान-दीक्षोचितदेशसगत । स्मसेवक-ब्रह्मसुसाधिकोत्सव प्रेमावर क्रीडनकृन्नमोऽस्तु ते ॥१३॥ नन्दनन्दन सञ्जात-नातकर्ममहोत्सव । नानादानीघकृत्तात श्रीमद्गोकुलमङ्गल ॥ ६४ ॥ कृतालवारगोपाल-गोपीगणकृतोत्सव । गोपीप्रेममुदाशीर्माक् व्रजगोरसकीर्ण हे ॥ ६५ ।। भय के साथ अपने शिशुहत्या रूप अर्म का स्मरण करा कर क्स के चित्त में विवेक का उत्पादन किया आिपने पिता माता के द्वारा कस के पात्मज्ञान की प्रशसा कराकर क्षमादान कराया ॥६॥ दुष्ट मन्त्रिगण के वाक्यजाल से फिर क्स की दुर्मति की आप ने वृद्धि की जिससे महत् अतिक्रमणात्मक असत् परामर्श के फल- रुप असुरों का आयु क्षय होने लगा। हे तपाविध कृष्ण | आपकी चन्दना करता हूँ ॥६॥ (पोडश नमस्कार) अर गोकुललीला का वर्णन करते हैं। पहले वसुदेव के द्वारा धाहित होकर जहाँ निनपादपद्म का प्रदान किया तथा जहाँ अवधि- रूप सुसदान करने के लिये स्वय दीक्षित हैं अर्थात् सुस दान रुप व्रत का ग्रहण क्यिा है, उस लीला के उपयोगी गोकुल मे सम्यक्प से आपका अवस्थान है । हे निजसेवक समाज को ब्रह्मानन्द से अ- त्यन्त उत्सरदायी प्रेम धन का सम्यक दान कारी, हे लीलाविनोदी। आपको नमस्कार है ।। ६३ ।। हे नन्दनन्दन आपके जन्म के समय जात कादिरूप महान् उत्सम हुआ है। आपके पिता नन्द ने आपके उत्सर्ग में अनेक वस्तु- ओं का दान किया है। आप गोकुल के मङ्गलरूप हे ।। ६४ ॥
१८ श्रीकृष्णलीलास्तवः नन्दब्रजजनानन्दिन् नन्दसन्मानितब्रज । दत्तव्रजमहाभूते श्रीयशोदास्तनन्धय ॥ ६६ ।। प्राप्तपुत्र-महारत्न-रक्षा-व्याकुलतात हे । करदानार्थमथुरागतनन्दगृहावित ॥ ६७ ॥ वसुदेव-शुभप्रश्न-समानन्दितनन्द मे। प्रसीद नन्दसवाक्यवसुदेवातिनन्दक ॥ ६८ ॥ नमः १७ ॥ * इति दशमस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः वसुदेवोदितोत्पात-शङ्कानन्दशुभाश्रित । ब्रजमोहन-सद्व प-विपस्तन-वकीक्षित ॥ ६ ॥ उस समय गोप गोपीगण विविध अलङ्कारों से भूपित होकर महान उत्सव करने लगे । गोपियाँ प्रेम के अतिशय से आनन्द के साथ विविध पाशिर्वाद दे रही थीं। हे व्रजगोरस से परिव्याप्त !॥६५॥ हे नन्दब्रजजन के आनन्ददायिन् ! अापने नन्द के द्वारा ब्रज का गौरव बढ़ाया तथा ब्रज में महावैभव का विकास किया। आप ने यशोदा का स्तन-पान किया है ।। ६६ ।। श्रापके पिता नन्द पुत्ररूप महारल आपको प्राप्त होकर रक्षा के लिये निरन्तर व्याकुल हुए। कंम को वार्पिककर देने के लिये मथुरा गमनकारी ब्रजराज के भवन में आप स्वयं रक्षित हुए हैं ।। ६७ ।। मथुरा में मङ्गलमय शुभ प्रश्नों के द्वारा वसुदेव ने आपके पिना नन्द का आनन्द-विधान किया है। नन्द जी भी सवाक्यों के द्वारा वमुदेव के आनन्द प्रदानकारी हुए। हे श्रीकृष्णा! आप प्रसन्न हो । ॥६६॥ (सप्तदश नमस्कार) "गोकुल में उत्पात की प्राशहा है अतः यहाँ अधिक दिवस र. हना उचित नहीं है। इस प्रकार वमुदेव से मुचित होकर नन्दमहा- राज ने मन में तुम्हारे मगल के लिये प्रार्थना की थी। हे मनोश श्रीकृष्णलीलास्तपः १६. लज्जामीलितनेत्राब्ज पूतनाकाधिरोपित । वकीप्राणपयःपायिन् पूतनास्तन-पीडन ॥ ७० ॥ पूतनाकोशजनक पूतनोप्राणशोपण । पटक्रोशीव्यापिभीदायि-पूतनादेहपातन ॥ ७१ ।। नानारक्षाविधानज्ञ-गोपस्त्रीकृतरक्षण। विन्यस्तरक्षागोधूले गोमूत्रशकृदाप्लुत ॥७२॥ गोपिकाविहिताजादि-बीजन्यासाभिमन्त्रित । दह्यमानवकीदेह-सौरभ्यव्यापितक्षिते ॥ ७३ ।। पूतनामोचन द्वदृराक्षसीसद्गतिप्रद । नन्दाबात-शिरोमध्य जय विस्मापितवज || ७४ ॥नमः १८।। की इतिदशमस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः * हास्य-कटाक्ष-विज्ञेपादि के द्वारा ब्रजवासियों के मनोमोहन ! विपस्त- नविशिष्टा सपा पूतना के द्वारा श्राप दृष्ट हुए हैं ॥ ६ ॥ आपने उस समय कुछ लज्जा से नयनपद्म का निमीलन कर पू. तना के कोड़देश में आरोहण किया है और प्राण के साथ उसका स्तनपानकर करयुगल से उसके स्तनयुगल का गाढ़निपीडन किया॥७॥ उस समय पूतना ने “छोड़ दो छोड़ दो" इस प्रकार चीत्कार किया था । परन्तु आपने उसका प्राणशोपण किया। और वह छ कोस तक विस्तृत भयानक शरीर धारण कर गिर गयी ॥७१ ।। तत्पश्चात् गोपीगण ने गोपुच्छ भ्रमण्मदि के द्वारा नाना प्रकार रक्षाबन्धन किया था । गोरजः के द्वारा रक्षावन्धन होने के पश्चात् गोमूत्र गोमयादि के द्वारा आपका शरीर व्याप्त किया गया । ७२ ।। गोपिकाओं ने वीजन्यासादिक मन्त्र उच्चारण कर विविध प्र- कार से रक्षाबन्धन किया। वकी पूतना का शरीर दग्ध होने पर उस समय उसके सौरभ से पृथिवी सुगन्धित हो गयी ।। ७३ ॥
२० श्रीकृष्णालीलास्तरः श्रोत्थानिकोत्सराम्याभिषिक्त सम्ञातनिद्रदृक् । महोच्चशकटाय स्थालपर्य्यवशायित ||७५॥ अञ्जनस्निग्धनयन पायाङ्कुरित-स्मित । लीलाततरलालोक मुम्मापितपढागुले ॥ ७६ ॥ जयोत्सर-नियासक्त-वानीस्तन्यार्थरोदन । उत्क्षिप्तचरणाम्भोन हेऽनो-विपरिवर्तक ।। ७७ ।। व्रजानिर्णेय चरित शाटासुरभञ्जन । द्विोदित-वस्त्ययन मन्त्रपूत-नलाप्लुत ॥ ७८ ॥नम. १६|| यशोदोत्सङ्गपर्याङ्क लीलानिष्कृतगौरवम् । मातृविस्मयकार तृणावर्त्तापनाहितम् ।। ७६ ।। (अष्टादश नमस्कार) हे पूतना मोचनकारी ' हे जिघासु राक्षसी के सद्गतिदायक नन्दमहारान ने आपके मस्तक का आघाण दिया है। आपने इस प्रकार की लीलाओं से समग्र ब्रजमण्टल को विस्मय अत्यन्त किया। आपकी जय हो ॥७४॥ हे औत्यानिक उत्सव में माता के द्वारा अभिपिक्त हे निद्रानि- मीलित नयनारविन्द हे महान् शकट के अधोभाग मे बालपर्यक के ऊपर शयनप्राप्त हे अञ्जन के द्वारा स्निग्य नेनाले हे लीला- परिपाटी के द्वारा मन्दस्मितकारी ' हे लीला के वश चञ्चल अवलो- कन वाले । हे मुखारविन्द मे चरणारविन्द की अगुलियों के अर्पण कारी । उत्सवक्रिया में आसक्तकारिणी माता के स्तन पानार्थ रोदन करने वाले ' हे चरणों को उत्क्षिप्त अर्थात् पार बार ऊपर उठाकर शक्ट के छिन्न-भिन्नकारी हे ब्रजवासिया के द्वारा अनिर्णीय चरित वाले हे शकटामुरभञ्जन ' हे ब्राह्मणगण के द्वारा स्वस्त्ययन के स. हित मन्त्रपूत जल से परिव्याप्त । आपकी जय हो ॥ ७५-७८ ॥ (उनविंश नमस्कार) श्रीकृष्णलीलास्तवः २१ जननी-मार्गितगतिं तृणावर्त्तातिदुर्वहम् । गलग्रहणनिश्चेष्ट-तृणावर्त्तनिपातनम् ।। ८० ।। तृणीकृततृणावर्त रुदद्गोपाङ्गनेक्षितम् । गोपीधान्यर्पितं वन्दे त्या व्रजानन्ददायकम् ।।१॥नमः २०।। यशोदास्तन्यमुदित यशोदामुखवीक्षक । यशोदानन्दनाह ते यशोदालालिताऽव माम् ।। ८२ ॥ जननीचुम्यमानास्य-मध्यदर्शितविश्व मे । प्रसीद परमाश्चर्य्यदर्शिन् विस्मृतमातृक ॥३॥ पूतनादिवधालोकि-मातृशदाशतप्रद । स्वभावविविधाश्चर्यमयता तन्निरासक ॥४॥ * इति दशमस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः यशोदा के क्रोडरूप पयंक मे सुलालित, लीला से गौरव के आ- विष्कारी, माता के विस्मयकारक, तृणावर्त के द्वारा आशश में अ- पवाहित, जननी के द्वारा अन्वेपण प्राप्त, तृणवर्त के दुर्वह, गलदेश धारण मे प्रयत्नवान् तृणावर्त के निपातनकारी, तृणावर्त को छिन्न- भिन्न करने वाले, रोदनकारिणी गोपांगनाओं के द्वारा दर्शित, गोपि- यों के द्वारा माता के लिये अर्पित, ब्रज के आनन्द दाता, आपकी चन्दना करता हूँ|| ७६-८१॥ (विशति नमस्कार ) हे यशोदा के स्तनपान से प्रसन्नता प्राप्त ! हे यशोदा के द्वारा द. शितमुस ! हे यशोदानन्दन ! हे यशोदा के द्वारा लालित ! मेरी रक्षा कीजिये । आपकी माता ने आपका मुस चुम्बन किया, उस समय आपने अपने मुख मे विश्व का दर्शन कराया । हे परमैश्चर्य को दिखाने वाले ! हे मातृविस्मृतिकारी ! पूतनादि के वध के हेतु माता के हृदय मे शत शत शड्दा के उत्पादन करने वाले ! आश्चर्यमय स्व. भाव के द्वारा उन सर शकाओं के निराकरणकारी ! मुमा पर प्रसन्न हों।।८२-८४॥ (एकविंश नमस्कार) २० -- श्रीकृष्णलीलास्तव गर्गवाकचातुरीहृष्ट-नन्दनीतरह स्थलम् । प्रशस्तनामकरण गर्गसुचितवैभवम् ।। ८५ ।। साधुरक्षाकर दुधमारक भत्तवत्सलम् । महानारायण वन्दे महानन्दनिवर्द्धनम् ।। ८६ ॥नम. २२॥ जय रिगणलीलाढय जानुचंक्रमणोत्सुक । घृष्टनानुकरद्वन्द्व मौग्ध्यलीलामनोहर ॥८७ ॥ किङ्किणी-नादसहृष्ट जनकर्दमविभ्रम । व्यालम्बिचूलिकारत्न प्रीवायाघ्रनखोज्जल ॥ ८ ॥ पवानुलेपरुचिर मासलोरुकटीतट । स्वमुसप्रतिविम्बार्थिन् प्रतिविम्वानुकारक || ८६ ॥ अयक्त्यल्गुवाग्वृत्ते स्मितलक्ष्यरदोद्गम । धानीकर-समालम्बिन प्रस्सलचित्रचक्रम॥ १० ॥नम २३।। गर्ग जी के वचन चातुरी से दृष्ट नन्द के द्वारा रहः स्थान म नीत, कृष्ण वासुदेव इत्यादि नामकरणों से युक्त, गर्ग के द्वारा सृचि. तवैभवशाली, साधुरक्षाकारी, दुष्ट नाशक, भक्तवत्सल,महानारायण, नन्द के आनट बढाने वाले श्रीकृष्ण आपकी वन्दना करता हूँ ।। 1८५-८६॥ (द्वाविंश नमस्कार) हे रिंगणलीला से युक्त अर्थात् हस्तपादों से चलनरूप निनाद से पूर्ण , हे जानुचक्रमण म व्यन, हे जानु हस्तों को धरती म घि- सकर चलने वाले', हे मोहनकारिणी लालाओं से मनोहर,हे किं किणी नालों से सप्रसन्न , हे नईम विलासकारी । हे लम्बमान चूडारनधारी तथा गले म न्यानरस से उज्ज्वल ', हे श्री श्रग में पकलपन से रुचिर , हे स्थूल उदर-कटि वाले , हे नित मुग प्रति. रिम्य दर्शन म इन्युक है प्रतिपिम्प के अनुकरणकारी ,हे अन्य त मनाहर पालन वाले, श्राप जन मन्द मन्द हसते थे तय प्रा २३ श्रीकृष्णलीलास्तवः जयाङ्गनागणप्रेसवाल्यलीलानुकारक । प्रारिष्कृताल्पसामर्थ्य पादरिक्षेपसुन्दर ।। ६१ ॥ वत्सपुच्छसमाकृष्ट वत्सपुन्छविकर्पण । विस्मारितान्यव्यापार-गोपगोपीप्रमोदन ॥ १२ ॥ गृहकृत्यसमासक्त-मात्यायकारक । ब्रह्मादिकाम्यलालित्य जगताश्चर्यशैशन || ६३ ॥नम. २४|| प्रसीद बालगोपाल गोपीगणमुदायह । अनुरुपययस्याप्त चारुकौमारचापल ॥ ४॥ अकालमत्स-निर्मोक्तजयाक्रोशसुस्मित । नरनीतमहाचोर वानराहारदायक ।। ६५ ।। धात पके श्रीमुस में विश्चित् दाँतो का उद्गम होना दीस जाता था। हे के कर धारण कर चलने वाले । हे गिरते हुए मनोहर चलने वाले । आपकी जय हो ॥८७-६० ।। (योविंश नमस्कार) हे अंगनागण के द्वारा दृष्ट ' हे पाल्यलीला अनुकरणकारी ! हे अल्प सामर्थ्य आविष्कृतगरक । हे चरण क्षप मे सुन्दर ! हे गो- वत्सगण के पुच्छ सींचने वाले हे उनके पुन्छ धारणकारी । हे अन्य सकल क्रियाकलाप के निस्मारक ' हे गोप-गोपी प्रमोटकारी! हे गृहकार्य मे पासत्ता माता के न्यप्रकारक हे ब्रह्मादि देवता के वाञ्छनीय, लालित्य जगढारचर्य शैशन वाले आपकी जय हो। ॥११-१३॥ (चतुर्दिश नमस्कार) हे बालगोपाल ! हे गोपियों के आनन्दवाहक ' हे निजानुरुप शिशु वयस्यों से युक्त । हे मनोहर कौमार अवस्था से चपल | हे विना का- रण असमय वत्सगण के मोचनकारी, हे व्रजनासियों के आक्रोश से मुस्मित!हे नवनीत के महान्चौर । हे बन्दरो को आहार फेंकने वाले, हे हाथ से अप्राप्य शिस्वाभाण्डों मे पीठ व उसल से श्रा- २४ श्रीकृष्णलीलास्तवः पीठोलसलसोपान क्षीरभाण्ड-विभेदक । शिक्यभाण्डसमाकपिन् ध्वान्तागारप्रवेशकृत् ।। ६६ ।। स्वागरत्नप्रदीपाढय गौपीधाप्टयांतिवादक । गोपीनातोक्तिभीभ्राम्यन्नेन मातृ-प्रहर्पण ॥ ६७॥ नमः २५|| भत्तोपालम्भनानन्द वान्छाभक्षितमृत्तिक । रामादिप्रोक्तमृद्वारी हितैष्यम्बातिभर्सित ।। ६ ॥ कृतकवासलोनाक्ष मितान्त ढविग्रह । बलादिवचनाक्षेप्तजननी-प्रत्ययावह ॥ ६ ॥ व्यात्तस्वल्पाननाजान्त र्मातृदर्शितविश्व हे। यशोदाविदितैश्वर्य जय स्वान्छन्दयमोहन ॥ १०० ॥ रोहणकारो , हे दुग्धभाण्ड को फोडने वाले , हे शिकामाण्ड को सींचने वाले , हे अन्धकार गृह में प्रवेशकारी, हे निजाग रत्न रूप प्रदीप से युक्त ', हे गोपियों के द्वारा निज धृष्टता वर्णन करने पर तुम सब ही चोर हो, मैं तो बड़े घर का लाला हूँ" इस प्रकार प्रतिवाद करने वाले, गोपियों की निन्दा के भय से तथा माता के मोध होने के भय से नेन फिराकर माता को हँसाने घाले , श्राप प्रसन्न हों ।। ६४-६७ ।। (पश्चशि नमस्कार) हे निज भक्तों के प्रेम गर्भतिरस्कार से आनन्दित !हे. मृत्तिका भक्षण में इन्चा रसने वाले ! आप के मृत्तिका भक्षण का वृत्तान्त सपादिक ने माता मे कहा था। उस समय हितैषी माता ने आप को भर्सन किया । हे निमरूप भयानुपरण से चञ्चल नेत्र बाले ! हे. मित्र बालकों के मध्य में गुम बिहारी ! हे रामादि के प्राइप वचन के प्रतिवादी । रामादिक मिथ्या पहने वाले हैं, मैं सन्चा हूँ-इस प्रकार के वचनों मे जननी को विधाम दिलाने वाले ! हे मुम कमल पा स्वल्प व्यादन पर उम में माता के लिये विश्व निपाने घाले!
२५.
श्रीकृष्णलीलास्तवः
सवित्रीस्नेहसंश्लिष्ट यशोदा-स्नेहवर्द्धन ।
स्वभक्तब्रह्मसन्दत्तधराद्रोणवरार्थकृत् ॥ १०१ ॥नमः २६।।
* इतिदशमस्कन्धेऽटमोऽध्यायः *
दधिनिर्मन्यनारम्भि-सवित्रीस्तन्यलोलुप ।
जननीगीतचरित दधिमन्यनदण्डधृक् ।। १०२ ।।
मातृस्तन्यामृतातृप्त क्षीरोत्तारगताम्यिक ।
मृपाकोप-प्रकम्पोष्ठ दधिभाजनभजन ॥ १०३॥
शिस्यहैयङ्गावस्तेन नवनीतमहाशन ।
हैयङ्गवीनरसिक नवनीतावकीर्णक ॥ १०४ ।।
नवनीतविलिप्तांग किङ्किणीक्वणसूचित ।
नवनीतमहादातम पाश्रो चौर्यशङ्कित ॥ १०५॥
हे यशोदा को अपने ऐश्वर्य अनुभव कराने वाले ! हे स्वेच्छाचरण
से गोहन ! हे माता के स्नेह से व्याप्त ! हे यशोदा के स्नेह को बढ़ाने
वाले, हे निज भक्त ब्रह्मा के द्वारा दिये हुए, धरा-द्रोण के लिये जो
पर है, उसकी पूर्ति के लिये व्यग्र ! आप की जय हो ।।६८-१०१।।
(पड्विंशनमस्कार)
हे दधि निर्मन्यन में नियुक्ता जननी के स्तनपान में लुब्ध !, ज-
ननी ने तुम्हारी चरितावली का गान किया, तुमने बाल्यचापल से
मन्थनदण्ड को धारण किया था। ।।१०२।।
माता के द्वारा स्तन्य प्रदान करने पर भी श्राप तृप्त नहीं हुए।
माता चुल्ली के उपरिस्थित दुग्ध के उछलने को देखकर उसके उत्ता-
रण के लिये गयीं । उस समय मिथ्या क्रोध से तुम्हारा श्रोष्ठ कम्पा.
यमान हुआ और तुमने दधिपात्र को तोड़ दिया ।। १०३ ॥
हे शिस्का में स्थित सद्योत्पन्न नवनीत के चोर ! हे नवनीत भ-
क्षण में अतिशय लोलुप ! आप नवनीत के रसिक हैं। आपने चायें
ओर नवनीत का विकीरण किया है॥१०४ ॥
२६
श्रीकृष्णालीलास्तवः
मातृभीधावनपर गोप्ठाइनविनोदन ।
जननीश्रमविज्ञातर्दामोदर नमोऽस्तु ते ॥ १०६॥
दामाकल्पचलापाङ्ग गाढ़ोलखल-बन्धन ।-
यशोदा-वत्सलानन्तदामबन्धनियन्त्रित ।। १०७ ॥नमः २७।।
* इतिदशमस्कन्धे नवमोऽध्यायः *
दृष्टार्जुनतरुद्वन्द्व कुवेरसुतशापभित् ।
अपराधिसमुद्धारदयानारदगीतवित् ॥ १०८ ॥
तुम्हारे किंकिणीशब्द से माता ने तुमको जान लिया कि तुम क-
हाँ थे ! उस समय तुमने नवनीत का साग में लेपन किया था।
हे बन्दरों को भी नवनीत वितरण करने वाले ! उस समय तुमने
माता के भय से कपट-अनु का त्याग किया तथा चोरी के भय से
शङ्कित हुए ॥ १०५॥
माना के भय से तुमने पलायन किया तथा गोष्ठांगन में इधर-
उधर भागने लगे । वार वार तुमको रज्जु के द्वारा बाँधने के लिये य-
लवती माता के परिश्रम को जानकर दामवन्धन को अंगीकार किया
तथा दामोदर नाम से ख्यात हुए। हे एतादृश तुमको नमस्कार॥१०६।।
उस समय दाम ही तुम्हारा भूपण बना था । तुम्हारे दोनों नेत्र-
प्रान्त चञ्चल हो गये और तुम ऊखल में बँध गये । हे यशोदान-
न्दन ! तुमने यशोदा जी को वात्सल्यरस का दान अर्थात् प्रास्वादन
कराया । श्रार अनन्त होकर भी आज दामबन्धन में नियन्त्रित हुए।
आपको नमस्कार है ॥ १७॥
(सप्तविंश नमसार)
थापने दोनों अर्जुनवृक्ष को देखा तथा उनका शापमोचन किया।
वे दोनों पूर्वजन्म में नलकुवर और मणिप्रीव नामक कुबेर जी के
पुत्र थे । उनसे श्रीमन्नारद जी का अपराध हो गया था। उस समय
या परवश नारदजी के द्वारा उनके उद्धारार्थ जो वचन दिया गया
था उसको थाप जानते थे।॥ १०८॥
श्रीकृष्णलीलास्तव अकिञ्चनजनप्राप्य श्रीमदान्धाद्यगोचर । आकृष्टोलूसलालान जय श्रीनारदप्रिय ॥ १०६ ।। कृतदेवर्पिगीतार्थ-यमलार्जुनभजन । धनदात्मज-सस्तोत्र-स्तुत सर्वेश्वरेश्वर ॥११॥ जीव-दुज्ञेयमहिमन् सदा भत्तचित्तभाक् । असाधारणलीलोह्य विश्वमङ्गलमङ्गल ॥ १११ ।। स्वदासदासताप्रीत भक्तभनातिवत्सल । गुह्यकार्थित-सर्नाङ्ग-हृपीक-भजनामृत ॥ ११२ ।। शिवामित्र-सूनस्तोत्र सन्तोपामृतवर्पिवाक् । स्वभक्तपीतामाहात्म्यपादिन् प्रेमवरप्रद ॥ ११३ ॥नम ॥ के इतिदशमस्कन्धे दशमोऽध्याय 2 आप निष्किञ्चनी के प्राप्य और धनादि मदचितजनों के अ- गोचर हैं। आपकी जय हो । २०६॥ देवपि जी की वाक्यरक्षा के लिये आपने यमलार्जुन का निपात क्यिा । उस समय उन दोनो कुवेरपुन ने अत्युत्तम स्तबके द्वारा आ पकी इस प्रकार स्तुति की थी-हे सर्वेश्वर ।।। ११०॥ जीवगण आपकी महिमा को नहीं जानते है। आप सर्वदा भत्तों का चित्तविनोट करते रहते हैं । असाधारण अर्थात् असमोर्खली- लावलि के द्वारा आप युक्त हैं । अजजन उसके आशय को न जान पर नाना प्रकार के कुतर्क वितर्क किया करते हैं। आप सगस्तमगल के निधान हैं ॥ १११ ॥ निन दास्यगण के दास्य मे आप अधिक प्रीति लाभ करते हैं। और भक्त के भक्तों के लिये अतिवत्सल हैं । गुह्यक दोनों ने आपके निकट सांग व सन्यि के द्वारा भजन करने की प्रार्थना की||११२॥ उनके स्तोत्र से प्रसन्न होकर आपने सन्तोपामृत वर्पिणी वाणी का उच्चारण रिया तथा निन भक्तदर्शन की महिमा का वर्णन कर २८ श्रीकृष्णलीलास्तरः गोपविस्मापनक्रीड वालसकथितेहित । सम्भ्रान्त-नन्दसदृष्ट स्मितभिन्नौप्टसंपुट ।। ११४ ।। पतितार्जुनमध्यस्थ महोलखल-वर्पक । गोपाशालि-लसन्मध्य नन्दमोचित-वन्धन ॥ ११५ ॥ स्वभक्तनश्यतादर्शिन् वल्नगीस्तोभ-नर्तित । बालकोगीति-निरत वाहुक्षेपमनोरम ॥ ११६ ॥ गोप्याज्ञाधृतपीठाद नननीतार्थनापटो। जनमोहबरक्रीडासुवासिन्यो नमोऽस्तु ते ॥ ११७ ॥नम •६|| उपनन्दाहितप्रीते वृन्दावनरसोत्सुक । प्रस्थानशकटारूढ गोपिकागीतचेष्टित ॥ ११८ ।। उनको प्रेम वर का ही प्रदान किया। आपको नमस्कार है ॥ ११३ ॥ (अष्टारिश नमस्कार) हे गोपगण की विस्मयकारिणी क्रीडा करने वाले, बालकों ने ब्रजवासियों से उस समय श्रापकी चेष्टा का वर्णन किया है। ब्रज राज ने भय-आदर से आपनो देसा। आपका श्रोष्ट स्मित से विर- सित हो रहा था। आप अर्जुनयुगल के बीच मे पड़े हुए थे तथा महान उलूसल के कर्यकारी थे। उस समय गो रज्जु से आपस मध्यदेश शोभायमान था। नन्द महाराज न उस मोचन किया। श्राप निज भक्तपश्यता सभाव को दिग्पाने वाले हैं। अापने गोपि- यो से करतालि प्रभृति के द्वारा प्रोत्साहित होमर नृत्य किया है । वा- लकों की भाँति प्राप उच्चस्तर से बोलने में निरन्तर चेष्टा करते हैं। याहुक्षेप में आप परम मनोहर है। गोपियों के सङ्केत से अममर्थ होने पर भी पीठादिधारण में चेष्टा रसते थे। आप नवनीत माँगने मे यटे चतुर हैं। हे प्रजमोहारी क्रीडा के मुपामागर! आपको नमवार दे।। १२४-११७ ॥ (उननिश नमस्कार) हे अनन्त जी के प्रेम पराया ! हे वृन्दावन-रसस्वादन में श्रीपालीलास्तर हृदावृन्दावनारास श्रीवृन्दारनचन्द्र हे। वृन्दावनप्रिय श्रीमयुनावननिभूपा ॥ ११६ ॥ व्याघ्रादिहिन-सहजरहतं प्रसीद मे। श्रीगोपन-वालिन्दी-पुलिनालोकहपित ॥१०॥नमः ३०॥ प्रजानन्दाकरनीड मनोज्ञकलभाषण । वत्सपालनसञ्चारिन बनादूर-चराचर ॥ १.१॥ रामाटिवालकाराम नानाकीडापरिन्छन् । वशीगढन ससक्त घेणुचित्रस्वनाकर ॥ १० ॥ मुरलीनदन श्रीमत्तिभगीमधुराकृते । क्षेपणीक्षेपणप्रीत क दुक्क्रीडनोत्सुक ॥ १३ ॥ वृपवत्सानुकरण वृपध्वानरिडम्बन । जयान्योन्यरणप्रीत सर्वनन्तुरुतानुकृत् ।। १४ ॥ नम ३१ ॥ स्वष्ठित हे उपनन्द जी की मन्त्रणानुसार वृन्दावन गमनार्थ प्रस्तुत शक्ट मे आरोहगाकारी गोपियों ने आपकी लीला का गान किया है। हे मनोहर वृन्दावन निवासी हे वृन्दावन के चन्द्रमा 'हे - न्टागन के प्रिय हे श्रीमद् वृन्दावन के निभूपण, हे व्यापाटि हिंस्त्र जन्तु के निज सौन्दर्य माधुर्य से स्वाभाविक पैर मान के हरणका- री | मेरे लिये प्रसन्न हों। आप श्री गोवर्द्धन यमुना पुलिन का अव- लोकन कर परम हर्पित हुए ॥ ११०-१२० ॥ (निश नमस्कार) हे ब्रज आनन्ददायिनी-क्रीडा परायण हे मनोहर अयक्त बो- लने वाले हे वत्स पालनार्थ इतस्तत विचरण कारी हे व्रज की निकट भूमि मे विचरणशाली हे रामादि बालकों से मनोहर । हे नाना प्रकार के क्रीडापरिच्छेदधारी हे वशीवादनरत ' हे वेणु से मनोहर विचित्र शद्ध करने चाले । हे वशीवदन हे निमगी-भगी से मधुर हे बिलल-आधादि फलों के क्षेपण में प्रीत' हे कदुक- कीड़ा में उत्कण्ठित हे खूप वत्सों के अनुसरणकारी हे वृपध्वनी श्रीकृष्णलीलास्तवः जय वत्सासुरध्वंसिन् कपित्यत्रातपातन । बालप्रशंसासंहृष्ट पुप्पवय॑मरार्चित ॥ १२५ ।। गोवत्सपालनकाध्य बालवृन्दाद्भुतावह । विकालागारगामिन् मां पाहि गोधूलिधूसर ।। १२६ ।। सुमनोऽलंकृतशिरो गुजामालम्बनावृत । पुष्पकुण्डलवह सक पत्रवाद्यविनोदक ।। १२७॥ मनोन्नपल्लवोत्तंस वनमालाविभूपित । बनधातुविचित्राङ्ग बर्हिवर्हावतंसक ॥ १२८ ॥ नमः ३२ ॥ प्रातर्भोजनसंयुक्त वत्सनात-पुरःसर। गिरिशृङ्गमहाकाय-बकासुरगतेक्षण ॥ १२६ ।। को अनुकरण द्वारा विडम्बना करने वाले ! हे सखाओं के साथ पारस्परिक रणक्रीड़ा में प्रसन्नता प्राप्त ! हे सकल जन्तुओं के रोदना. नुकरणकारी! आपकी जय हो ॥ १२१-१२४॥ (एकत्रिंशनमस्कार) हे वत्सासुर ध्वंसी ! हे उसके प्रहार से कपित्य वृक्षों को गिराने वाले ! उस समय चालकों ने साधु साधु इस प्रकार प्रशंसा की थी। देवताओं ने पुष्पों से आपकी अर्चना की। हे गोवत्सपालन में ए- काप्रचित्त ! हे वालकगरण के आश्चर्यकारी ! आप अपरान्ह के उप- रान्त नित्य नन्दब्रज के लिये गमन करने हैं। श्राप गोधूलि मे धू- सासंग हैं। मेरी रक्षा कीजिये ॥ १२५-१२६ ॥ यारका मस्तक पुप्पों से अलंकृत है । गुञ्जा निम्मित लम्याय. मान माला से पारका गलदेश श्राच्छादित है। हे पुप्पों से विरचित कुण्डलधारी ! हे मयूर-विच्छ की माला से शोभित ! हे पनादि के द्वारा निम्मिन याद्यों के वादन में विनोदशील !हे मनोहर पल्लवों से रचित शिरोभूषण के धारणकारी ! हे वनमाला से विभूषित ! हे धनः धातुओं से विचित्र अंगाले ! हे मस्तक में मयूर-पुन्छ धारिन् ! पार रक्षा कीजिये ।। १२७-१२८॥ [द्वात्रिंश नमस्कार ३१ श्रीकृष्णलीलास्तवः तीक्ष्णतुण्डवकग्रस्त-माविष्टसुहृद्गण । महावक्मसाकीड वकतालुप्रटाहक ॥ १३० ॥ जय दुष्टचकोद्गीर्ण वकचञ्चुरिदारण । चलादि-यालमाश्लिष्ट पुष्पपर्षि-सुरेडित ॥१३१शानमः ३३।। ॐ इतिदशमसन्धे एकादशोऽध्याय. प्रातःन्याशनावादिन् शृङ्गाकारितवत्सप । असग्यवरससञ्चारिन् श्रमस्याक्सङ्गत ॥ १३ ॥ शिक्यचौर्यादिविविध-बालमीडातितोपित । स्वपादस्पर्शकक्रीडापटुवालक्हपित ।। १३३ ।। वयस्याशस्यसहन-क्षण्मानाविलोकन । शुकगीतमहाभाग्य प्रजवालक वेष्टित ॥ १३४ ॥ नमः ३४॥ हे वनभोजनार्थ माता से प्रात.कालीन भोजन की इच्छा करने थाले । हे वत्सगण के अग्रगामी । हे पर्वत शृगाकार महाकाय बकासुर को देसने वाले ! उस समय उसने अापको तीक्ष्णमुस से निगल लिया था। आपके ससागरण मून्छित हो गये । आपने महान् वकासुर के मुसको क्रीडागृह बना लिया। उसका तालु जलने लगा। श्राप फिर उसके मुससे निकल आये तथा उसके मुसको फाड़ दिया। हे पलादि बालगो से आलिगित ' आपकी जय हो । उस समय दे- पताओं ने पुष्पों के वर्पण के द्वारा आपकी स्तुति की थी ।। १४- १३१॥ [त्रयोनिश नमस्कार] अब वनभोजन लीला का प्रारम्भ करते हैं-हे प्रात माता से वनभोजन के लिये अभिलापी हे शंगवाद्य के द्वारा सलाओं के श्राहानकारी हे असरय गोवत्स सञ्चारणशील । हे असख्यस- खाओके साथी हे शिश्यचौयादि विविध यालक्रीडामे प्रसन्नचित्त वाले ह निजचरणस्पर्शरूप क्रीडा में चतुर वालकों से हर्ष प्राप्त ! आप का अनवलोकन क्षणमान भी वयस्यगणों के लिये सहन ३२ श्रीकृष्णलीलास्तवः (नमः ३४) दुर्बुद्धिसुमपीनाहीतरथोत्प्रेक्षकानुग । दुश्चेष्टायासुराभिज्ञ मुग्याकरिरक्षिषो ।। १३५ ॥ कृत्यचिन्ता-महालील सर्पस्यान्तःप्रवेशकृत् । अवदानवसंहतवत्सवत्सप-जीवन ॥ १३६ ।। अमरानन्दविस्तारिन् निन्द्यदानवमुक्तिद । विस्मापितागतब्रह्मन्नाश्चर्याब्धे नमोऽस्तु ते ॥१३७ानमः३।। * इतिदशमस्कन्धे द्वादशोऽध्यायः * पोगण्डाख्यातकौमार महाश्चर्यचरित हे । परीक्षिच्छुकदेवातिविमोहन कथामृत ॥ १३८ ।। होता था। आप श्रीशुकदेव के द्वारा प्रगीत महान् भाग्यशील प्रज- वालकों से वेष्टित हैं । १३२-१३४ ।। अब अघासुर-वय लीला का वर्णन करते हैं-आपकी सुखमयी क्रीडा दर्शन में अक्षम, आप को मारने के लिये इच्छुक, दुष्टयुद्धि से युक्त, शयनकारी, स्थूल काय सर्प का दर्शन कर आपके सहचरों ने विचार किया था कि यह कोई वृन्दावन की गुहा विशेष होगी। किन्तु श्राप उस को विशेष रूप से जानते थे। फलतः उसके मुख- विवर में प्रवेश के लिये इच्छुक गोप चालकों की रक्षा के इच्छुक हुए। उस समय यालकों ने उसके मुख में प्रवेश किया । वह दुष्ट आपकी प्रतीक्षा में था। आपने करणीय विषय की चिन्ता कर उसके पुदर में प्रवेश किया और श्राने शरीर की वृद्धिरूप लीला का वि. स्तार कर अघासुर का विनाश किया। जिससे गोवत्स-समागण जीवित हुए तथा देवगण ने आनन्द लाभ किया। आपने इस प्रकार के निन्दनीय दानव को मुक्ति दी। इन सब लीलाओं का दर्शन कर विस्मय प्रात प्रझा श्राप निकट आये। हे श्राश्चय्य के सागर ! प्रारको नमस्कार ।। १३५-१३७ ।। (नमः ३५) अय प्रझा के द्वारा गोयत्म-हरण लीला का यर्णन करते ई- M श्रीकृष्णलीलास्तवः स्तुतरम्यसरस्तीराहतशाद्वल-जेमन । सर.सुपुलिनासीन वालमण्डलमण्डित ।। १३६ ॥ सखिश्रेण्यन्तरस्थात जाक-महाशन । पीतवस्त्रोदरन्यस्तो वन्यविभूषण ॥ १४० ।। वामकक्षान्तरन्यस्तशृङ्गवत्र प्रसीद मे। वामपाणिस्यध्यन्न कवलाशनसुन्दर ।। १४१ ॥ अंगुलीसन्धिविन्यस्त-फल वालालिचित्तहृत् । स्वनमहास्यमानार्भ स्वर्गाश्चर्यकराशन ॥ १४२॥नमः ३६।। अदृश्यतर्णकान्वेपिन् वल्लभार्भकभीतिहन् । अदृष्टवत्सप-बात वत्सवत्सपमार्गग ॥१४३॥ हे पोगण्ड अवस्था में कौमारलीला के आचरणबारी!, हे महान् आश्चर्य चरित्र वाले !, आप का कथामृत परीक्षित् तथा शुकदेव जी को भी विमोहनकारी है । स्तुतियोग्य, रमणीय,सरोवर के निकट नवीन तृग्गों से शोभायमान देश में सखाओं के साथ आपने भोजन लीला की । सरोवर के सुन्दर पुलिन में यालमण्डल से मण्डित हो कर विराजमान हुए । सखाओं के बीच में आपने रहकर उनके साथ पनभोजन किया । उदर के पीतवस्त्र में वंशी को निहित किया । हे वन्यविभूषण ! वामकक्ष के मध्य में शृङ्ग-येत्रधारी ! मेरे ऊपर प्रसन्न हो । उस समय यामहस्त में दृधि-अन्न मौजूद था। आप अन्न-प्रास में शोभायमान थे। अंगुलियों के सन्धिस्थल में फल-समूह विन्य- स्त था । आप वालों के चित्त को हरण करते थे तथा नर्म परिहास से उनको हँसाते थे। वह भोजन देवताओं के चित्त मे चमत्कार था ॥ १३८-१४२॥ (नमः ३६) हे अदृश्यमान, दूरप्रचारी,यत्सों को हूँडने वाले ! हे गोपघाल- कों के भयहारी ! उस समय गोवत्स गोपवालकगण अदृश्य होगये थे, उन्हें आप ढूदने लगे, और यह सब ब्रह्मा की कृति है-ऐसा ३४ श्रीकृष्णलीलास्तवः विदितब्रह्मचरित वत्सवत्सपरूपवृक् । वत्सपालहरब्रह्म-तत्तन्मातृमुदिच्छक ॥ १४४ ॥ यथावजार्भकाकार यथावत्सपचेष्टित । यथावत्सक्रियारूप यथास्थाननिवेशन ॥ १४५ ॥ नमः ३७ ।। गोगोपीस्तन्यपाहन्त गोगोपीप्रीतिवद्धन । बलरामोहितोदन्त पितामहविमोहन ।। १४६ ॥ शुद्धसत्त्वधन-स्वीयवहुस्प-प्रदर्शक । अत्याश्चर्येक्षरणाशक्त-ब्रह्म-ज्युत्थानकारक ।। १४७ ।। स्वान्तई प्ठ्यतिदीनाज-बहि टिसुसप्रद । गोपार्भवश रुचिर सपाणिवलाय माम् ॥ १४० ।। जान लिया । आपने वत्स-गोपवालों का रूप का धारण किया क्योंकि वत्स-वत्सपालकहारी ब्रह्मा के अभिमान नाश के लिये तथा उन उन घरस-घरसपालमों की माताओं को आनन्द देने के लिये श्रापकी इच्छा हुई। ठीक जिस प्रकार के वत्स व यसपालक थे उनकी जैसी चेष्टा थी तथा जिस प्रकार क्रिया थी उसी प्रकार के श्राप हुए । ऐसी चेष्टा फरने लगे तथा ऐमी क्रिया की थी कि ये सन जहाँ जैसे रहते थे ठीक यहाँ ही वैसे श्राप रहने लगे ॥ १४३-१४५ ॥ (नमः ३६) हे गोप-गोपियों का स्तन्यप अर्थात् पुनाभिमानी ! हे गो गोपियो के प्रेमवद्ध फ! श्री यत्तराम के द्वारा इमका रहस्य ज्ञात हुया था। आप प्रक्षा के विमोहनमारी हुए। यह सव (गोवत्स तथा यानस्प) थापा ही विशुद्ध सत्वधनमय असंन्यरूप था। 'मापके उन सन अनि आश्चर्ययर रसमय विशुद्ध सत्त्ययन स्वरूपों का दर्शन कर प्रदा जी पिटल हो गये। पारने उनका प्रमोधन रिया। उम समय सयंत्र आपके दर्शन के इंतु ये अतिदीन हो गये । आपने उनयो या. दिर दृष्टि में मृदारनादियों का दर्शन परायर मुग्न प्रदान दिया । हे. गोपयालयों के यशी! । मुन्दर! हाय में दधि-मम माम से शा. - श्रीकृष्णलीलास्तवः व्यालीनसृष्टवत्सार्भगण ब्रह्मत्रपाकर । बहानन्दाश्रुधौताछे दृष्टतत्त्वविधिस्तुत ॥१४ानमः ३८॥ इति दशमस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः * विधिवास्यामृताधीन्दु गोपवालकवेश हे। ब्रह्मावतार-दिव्यागाचिन्त्यमाहात्म्यरूपभृत् ।। १५० ॥ मृपाज्ञानश्रमास्पर्शि-भक्त्य कसुखनिर्जित । अयःसारात्युदासीन-दुर्बुद्विक्लेशशेपक ।। १५१ ।। पूर्वपूर्वधिमुत्तीयाश्रितभक्तिसुमार्ग है। नैगुण्याधिक-दुर्जेयाश्चर्यानन्तमहागुण ।। १५२ ।। फेवलात्मकृपापांगवीक्षापेक्षकमोचक । निवदितापरावातिभीत पुत्रार्थितक्षम ॥ १५३ ।। भायमान ! मेरी रक्षा कीजिये । आपने उसी समय फिर वत्सवालकों को निज विग्रह मे समावेश कर ब्रह्मा को लज्जित किया। ब्रह्मा ने भी श्रानन्दवारि सिम्बन से आपके चरण युगल का प्रक्षालन किया तथा आपका तत्त्व-समूह को अवगत कर आपकी स्तुति करने लगे। ।। १४६-१४६ ॥ (नमः ३८) अव ब्रह्मस्तुति का वर्णन करते हैं-हे ब्रह्मा के वाक्यामृतसागर के चन्द्रमा ! हे गोपबालकवेशधारी ! हे ब्रह्मा के लिये अवतीर्ण दि- व्यांग अचिन्त्यमहिमा चाले ! हे मिथ्या ज्ञान श्रम से रहित एकमात्र मुख्यभक्ति के द्वारा वशीभूत ! परम मङ्गल के अभ्युदयरूप अपवर्गों के साररूप भक्तिमार्ग में उदासीन केवल वोध प्रार्थी दुर्बुद्धि जनों का क्लेश ही सार है। आपकी भक्ति सर्वोपरि है। पहले योगिगण ज्ञानाश्रयी थे पश्चात् उसे परित्याग कर भक्तिमार्ग में प्रवेश किया। गुणातीत स्वरुप से भी अधिक दुर्जेय,आश्चर्यकर, अनन्त, महान धापके गुण मकल हैं । केवल निज कृषारूपी अपांगदृष्टि की अपेक्षा करने वाले व्यक्तियों के द्वारा आपके स्वरूप का वोध होता है । निज 'श्रीकृष्णलीलास्तवः रोमकृपभ्रमकोटिकोम्ब्रिह्माण्डमण्डल । प्रसूबदागःसहन जगन्मात जगत्पितः ।। १५४ ॥ नाभ्यनजनितब्रह्मनारायण निरावृते । स्वगर्भाम्बाप्रपञ्चेक्षा-तदसत्यत्वदर्शक ।। १५५ ।। सत्यलीलावतारौघाचिन्त्यलीलातिवैभव । मिथ्यासत्यत्वसंपादिन् सदा परमसत्य हे ।। १५६ ॥ गुरुप्रसादसंदृश्य प्रपञ्चजनकास्मृते । वन्धमोक्षादि-मिथ्यात्वकृद् विचारणमात्रक ।। १५७ ।। अपराध को जानकर अति भयभीत निज नाभिकमलजात पुत्र ब्रह्मा के ( मेरे ) अपराधादिकों को सहने वाले हे कृष्ण ! आपके रोमकूप में कोटि कोटि ब्रह्माण्ड सकल परमाणु की तरह घूमते हैं। चालक के पादप्रहार को सहने वाली माता की तरह आपने मेरे अपराध का सहन किया है । श्राप जगत् की माता हैं अर्थात् श्रापके पुति में अ. नन्त कोटि ब्रह्माण्ड मौजूद रहते हैं । हे जगत् के पिता ! आपके नाभि कमल से मेरा जन्म है । थाप मूलनारायण हैं तथा देश-कालादिकों से अपरिच्छिन्न हैं। आपने निज जननी यशोदा को निज उदर में प्र. पञ्च दिसाकर जगत् का अनित्यत्न तथा मायाकृतत्व का प्रतिपादन किया है । गुणावतार तथा लीलावतार प्रभृति में आपका मूलत्व वि. यमान रहने के कारण वे सब ययार्थ सत्य हैं। आपकी लीला की म- हामहिमा मन के अगोचर है। इससे आप अचिन्त्य हैं। प्रपञ्चसकल मिथ्याभूत होने पर भी आपके सम्बन्ध में आकर सत्ययत् प्रतीयमान दोता है। श्राप सर्वदा परममत्य अर्यात् निधिमार है। आप इस प्रकार होने पर भी गुरक्षा से सम्यक् रूप से दर्शन के विषय होते है। श्रारका विस्मरण ही प्रभाव का कारण है । बन्ध-मोनादि अज्ञान युक्त हैं। मस्यज्ञान से थे मय विनाश को प्राप्त होते हैं। आप ज्ञाना- लोक प्रालित पर उनके मिथ्यात्व का सम्पादन करते हैं। अन्धकार श्रीकृष्णालीलास्तवः असत्यागि-स्वभक्तान्तर्वहिरात्माधिकस्फुट । स्यपाद-महिमज्ञापि-स्वपादाञ्जप्रसाद हे ॥ १५८ ॥ विधातृभूरिभाग्यैक-पार्यदासानुदास्यक । चतुर्मुखमुहुर्गीत-भक्तिमाहात्म्य पाहि माम् ॥१५६||नमः३६॥ धन्यधन्यत्रजवध-धेनुतर्पित-मोदित । नित्यपूर्ण-महाभाग्य ब्रजौकोमित्रतां गत ॥ १६० ।। ब्रजवासिप्रसङ्गान्तर्देवतावहुसौरयट । ब्रजजाताडिवरेणुस्पृकतणजन्मेप्सु-पद्मज ।। १६१ ॥ नाशक मूर्य की भाँति नित्यज्ञानरुप विशुद्ध आत्मतत्त्व के द्वारा आप बन्ध मोक्ष के तुच्छत्व का प्रतिपादन कराते हैं। असत् शब्दवाच्य मिथ्या-अवस्तु का परित्याग कराकर भक्तों के भीतर-बाहिर में व्यापक प्रियस्वरूप में समविक रूप से अभिव्यक्त होने हैं। आपके चरण की कृपा ही आपके चरण की महिमा को जनाती है । अनन्तर वि. धाता ने इस प्रकार की स्तुति कर परिशेप मे प्रचुरभाग्य के वश केवल आपके दास के अनुदास होने की प्रार्थना की । चतुम्मुख ब्रह्माजी ने घार यार आपकी भक्ति की महिमा का कीर्तन किया है । हे कृष्ण ! मेरी रक्षा कीजिये ॥ १५०-१५६ ॥ (नमः ३६) हे परमधन्या प्रजवधूगण और धेनुगण के द्वारा स्तन्यदान में तृप्त तथा परमप्रसन्न ! नित्य परिपूर्ण महा-भाग्यशाली ब्रज-चालकों के साथ आपकी मित्रता है। ब्रजवासियों के मनो-बुद्धि-अहकारादिकों के अविष्ठाता रुप से स्थित होकर चन्द्रादि देवतागण प्रकारान्तरमें इन के संग कर पृथक् पृथक् इन्द्रिय के द्वारा आपके सौन्दर्य यशः सौग- गन्ध्य प्रभृति के पृथक् पृथक रस आस्वादन करते हैं। ब्रह्माजी ने भी व्रज में जात किसी व्यक्ति का भी चरणरेणु स्पर्शशील तृणजन्म की प्रार्थना की है। प्रेमीभक्तगण ने आपको प्राणादि समस्त समर्पण किया है । अथवा आप भी उनके लिये निज आत्मा पर्यन्त सर्वस्व . श्रीकृष्णलीलास्तवः प्रेमभक्तापिताशेर घोरवासिमहामणिन् । सद्धेशमात्रसंज्ञात-पूतनात्म-प्रदायक ।। १६२ ।। विरक्तप्राप्यदानानुरक्तापर्याप्ति-यन्त्रित । पुत्रत्वायनुकारातिसुहृदानृण्य-लज्जित ।। १६३ ॥ अविद्वन्मानि-सच्चित्तवागगोचर-वैभव । अत्यानन्द-मुहर्नामकीर्तनब्रह्मवन्दित ॥ १६४ ॥ नमः ४० ॥ ब्रह्मप्रसाद-सुमुख भक्तवत्सल वाप्रिय । स्मितेक्षाहर्पितब्रह्मन् ब्रह्मानुज्ञाप्रदायक ॥ १६५ ।। दान कर देते हैं । ब्रजवासियों के निकट आप महान ऋणी हैं क्यों कि उनकी प्रीति के विनिमय में कोई वस्तु प्रत्यर्पण के योग्य नहीं ठहरती है । सद्भावना युक्त ब्रजवासिनी धात्रीजन के वेश मात्र को ही देखकर आपने पूतना के स्वभाव को जानने पर भी उसके निकट अपने को स्तन्यपायी शिशुरूप से न्यस्त किया। विरक्त सन्यासियों को आप अपने से अन्य कुछ प्रदान नहीं करते हैं । तुममे एकनिष्ठ व्यापार सम्पन्न ब्रजवासिगण उनसे समधिक भजनशील हैं अतएव ब्रजवासियों को आप किसी फल का प्रदान कर कृतार्थना का लाभ नहीं करते हैं । अतः उनके पुत्रत्यादि का अनुकरण करके भी प्रत्यु: पकार सावन नहीं कर सकते हैं। इस कारण से श्राप लजित रहते हैं। श्रापका विचित्र अनन्त-महान् वैभव पण्डितमानी साधुओं के चित्त और वाणी का अगोचर है । इस प्रकार स्तुति करते हुए भ- गवत् कृपा से निसिल अभिमान दूर हो जाने पर परम दैन्यता के यश ब्रह्मा जी अति आनन्द के साथ आपका नाम कीर्तन कर आप की वन्दना करने लगे ।। १६०-१६४ ॥ (नमः०४० हे प्रदा को कृपा करने में प्रमन्न-मुस ! हे भक्तवत्सल ! हे म्नुतिप्रिय ! हे स्मितनिरीक्षण के द्वारा मा जी को प्रसन्नकारी ! हे निजकार्य साधनार्थ प्रहा जी को प्राक्षा देने वाले है यरस-यत्मरों श्रीकृष्णलीलास्तयः वत्स-वत्सप-मोहन यथापूर्भितर्णक । पुलिनानीच-वत्सोध नम स्तेऽद्भुतकर्मणे ॥ १६६ ।। मुन्धवालालिबागजातहास बजगृहोत्सव । विचित्र-वेशचरित गोपीहृदयमोहन ।। १६७ ।। आत्माधिकप्रियतम सर्वभूतसुहद्धर । परिक्षिच्छुकसंवाद-निश्चित-प्रेमसागर ।। १६८।। विचित्रलील मां पाहि निलायनविहारवित् । क्रीडासेतुविधानज प्लवङ्गप्लबनोद्धत ।। १६६ ।। नमः ४१।। ॐ इतिदशमस्कन्ये चतुर्दशोऽध्यायः ।। पोगण्डागम गोपाल वृन्दाविपिनमङ्गल । वृन्दावनान्तःसञ्चारिन् सम्मानितनिजाग्रज ॥ १७० ॥ वृन्दाबन-गुणाख्यान-मिप-दत्तमहावर । अतिवृन्दावनप्रीत नानारतिविचक्षण || १७१ ।। के मोहहरणकारी! हे पहले की भाँति उनको बनाकर पुलिन में लाने वाले ! हे अद्भुत कर्मकारी ! आप को नमस्कार है । मोहित वालकों के वचन से जात प्रसन्न ! हे ब्रजगृह के उस्मवरूप ! हे वि. चित्र बेश-चरित्र याले ! हे गोपियों के हृदयमोहन ! हे गोपियों के प्रात्मा से भी प्रियतम! हे समस्त-भूतों के श्रेष्ठयान्धय ! हे परी. क्षित और शुकदेव के संवाद के द्वारा प्रेम-सागर करके निश्चय प्राप्त ! हे विचित्र लीलाकारी ! मेरी रक्षा कीजिये । आप पलापन क्रीडा में पारदर्शी हैं। आपने सरोवरादिक में सेतु वाँध कर लंका- गमन का अनुकरण किया है तथा चान्दरों की भाँति लम्फ मदानादि रूप विविध वाल्यचाश्चल्य का प्रकाश किया है।।१६५-१६६॥ (नम:४१) हे पौगएड अवस्थाशाली ! हे गोपाल ! हे वृन्दावन के मङ्गल ! हे वृन्दावन के मध्य विहारकारी ! हे निज अग्रज के सम्मानदायक ! हे वृन्दावन के गुणों के वर्णन के छल से महान् वर देने वाले ! हे श्रीकृष्णलीलास्तवः भृङ्गानुकारिन् मां पाहि कूजनिर्जित-कोकिल । उपात्तहंसगमन शिखिनृत्यानुकारक ॥ १७२ ॥ प्रतिध्वानप्रमुदित शाखाकूर्दन-कोविद । नामाकारितगोवृन्द रजुयज्ञोपवीतभृत् ॥ १७३ ।। नियुद्धलीलासंहृष्ट बलभद्रामापनुत् । मोपप्रशंसानिपुण वृक्षच्छायाहृतश्रम ।। १७४ ।। पुप्पपल्लवतल्पाढय गोपोत्संगोपवण। गोपसंवाहितपद गोपन्यजनबीजित ॥ १७५ ॥ गोपगान-मुखस्वप्न जितेश्य-प्राम्यचेष्टित । रमालालित-पादाब्जावित वृन्दावनस्थल || १७६ ॥नमः ४२॥ वृन्दावन के लिये अति प्रसन्न ! हे नाना क्रीड़ा में विचक्षण ! हे भ्र- मरशब्दानुकारी ! हे निज कंठ ध्वनिसे कोफिल जयशील ! मेरी रक्षा कीजिये । हे हस की भॉति गमनानुकारी ! हे मयूर-नृत्य के अनु कारक! हे प्रतिध्वनि श्रवण से प्रसन्न प्राप्त ! हे वृत्तों के शाखा से कृदने में पण्डित ! हे गोवृन्द का नाम लेकर अाह्वान करने वाले ! हे गोरज्जु तथा यज्ञसूत्र के धारणकारी ! हे सग्वाओं के साथ याहु- युद्ध में प्रसन्न ! हे यलदय के श्रमदारक ! हे गांपों की प्रशंसा करन में निपुग्ण ! हे वृक्षों की छाया में बैठ कर श्रम दूर करने वाले ! हे पुष्पों के पल्लय से शय्या बनवाकर उसमें विराजमान् ! हे गोपया- लकों के प्रोडदेश में मस्तक रखकर शयन करने वाल! हे गोपवा. लकों के द्वारा चरण-कमल संवाहित ! हे उनके द्वारा व्यजन से घोजित ! हे गोपय लकों के गान सुस शयनकारी!हे निज. श्वर्य को दवाकर ग्राम्य चेष्टा को करन याले ! हे रमा-लालित धरण कमलों से पृन्दावन को अहितकारी श्री रक्षा कीजिये ।। १७२० (नमः१२) .
'श्रीकृष्णलीलास्तवः जय श्रीदामसुवल-स्तोककृष्णेकवान्धव । वृपाल-पभौजस्वि-देवप्रस्थ-ययस्य हे ।। १७७॥ वरूथपार्जुनसख भद्रसेनांशुवल्लभ। तालीवनकृतकीड बलपातितधेनुक ।। १७८ ।, - उत्ताल-ताल-राजीभिद् रासभासुरनाशन। गोपवृन्द-स्तवानन्दिन् पुण्यश्रवणकीर्तन ॥१७॥नमः ४३॥ गोपीसौभाग्य-संभाव्यं गोधूलिच्छुरितालको अलकावद्धसुमनःशिखण्डं रुचिरेक्षणम् ।। १८० ॥ सबीडहास-विनयकटाक्षाक्षेप-सुन्दरम् ।। गोपीलोभनवेशं त्वां वन्दे गोपीरतिप्रदम् ॥१८॥ जयाम्बा कोरितस्नान पुण्डरीकार्यतंसक। मुक्ताहार-लसत्कएँठ करकङ्कणसुन्दर । हे.श्रीदाम-सुबल-स्तोककृष्ण के एक मात्र यान्धव ! हे वृपाल- धृपम-ओजस्वी और देवप्रस्थं के वयस्य ! हे वरूथप और अर्जुन के सखा! हे भद्रसेन तथा अंशुमान् के बल्लभ ! हे तालवन में क्रीडाकारी ! हे बलदेवं के द्वारा धेनुकासुर को मारने वाले! ऊँचे वृक्षों से तालफलों को गिराने वाले ! हे गई भासुर-नाशन ! हे गोपवृन्द के स्तब से प्रसन्न ! आपकी जय हो। आपका कीर्तन . चणं परमेपुण्य रूप है ।। १७७-१७६ ॥ (नमः ४३) गोपियों के सौभाग्य से 'चिन्तनीय, गोधूलियों से रन्जित कु. टिल कुन्तल, अलकावलि में पुप्प और मयूरपुच्छ धारणकारी, म. नोहरनयन, किञ्चित् लज्जा के द्वारा हास्य युक्त और विनययुक्त कटाक्षपात में सुन्दर ! गोपियों के लोभनीय वेशंधारी ! गोपियों के रतिदायक आपकी बन्दना करती हूँ।। १८०-१८१।।। हे माता के द्वारा कृतस्तान ! हे मस्तक में पुण्डरीकधारी ! हे कंठ में मुक्ताहार के धारक ! हे हाथों में कंकणधारणं से सुन्दर हे P . -म ४२ श्रीकृष्णलीलास्तवः म शिञ्जितमभीर स्वर्णालङ्कारभूपण दिव्यनग् गन्धवासोभृजनन्युपहृतान्नभुक् ॥ १८३॥ विलासललितस्मेर गर्वलीलावलोक्न ! सुसपल्यवसंविष्ट राधासंलापनिवृत्त ।।१८४॥ नमः ४४ ॥ यमुनातटसञ्चारिन् कालियहूदतीरंग । ---!. नमस्तेऽतिसुपादृष्टे विपातंत्रजजीवन ॥ १८५॥". अतिविस्मितगोपाल-कुलानुमितचेष्टित ।" "ii जय सजन-रक्षार्थ-निगूढेश्वर्यदर्शक ।। १८६ ॥ नमः ४५ ॥ * इति दशमस्कन्धे पचदशाऽध्यायः तुङ्गनीप-समारूढ सर्पदविहारिणम् । "}, !!!! कालियनोधजनकं कु द्धाहिकुलवेष्टितम् ।। १८७ ॥ - मोहमग्नसुहृद्वर्ग साश्रुगोकुलवीक्षितम् । महोत्पात-समुद्विग्नतजान्विष्टगति भजे ॥ १३॥ मनोहर श दकारी मञ्जीर के धारक ! हे सुवर्ण अलङ्कारी से विभू. पित ! हे दिव्य माला-गन्ध-वस्त्रादि धारण करने वाले । हे माता के द्वारा दत्त अन्नादि के भोजनकारी हे विलास से ललित, मन्द- हास्य से युक्त यौवनोत्थित मत्तता से युक्त लीलावलोक्कारी । हे सुग्नमय पलंक मे शयन करने वाले ! हे राधिका, के वार्तालाप में परम पानन्दित ! आपकी जय हो ॥१८२-१८४|| (नमः ४४) हे यमुना के तट में सञ्चारणशील ! हे कालियम्सद के तीरगामी! हे अति अमृतमय दृष्टि वाले ! हे निप से पीडित ब्रज-जन के जी. वन "श्राप कालियनाग यो कृतार्थ करेंगे" ऐसी श्रापकी चेष्टा या अनुमान सग्गाओं ने किया था 1 श्राप स्वजन रक्षा के लिये निगढ़ ऐश्वयं को दियाये हैं। आपकी जय हो ॥१५-१८६।। (नम. ४५) अत्युच्चनीप वृक्ष में प्रारोहणारी, मर्प के हद में विहारशील, मालिय के मोघ वदाटय, मोपित सपों से परियेष्टित, समाओं के - 4 2 य श्रीकृष्णलीलास्तव पदचिन्दाप्तमार्ग त्या मृतप्रायस्ववान्ध। रामरक्षितनन्दादिमुमूर्षुव्रजशोचितम् ॥ १८६॥ नमः ४६ ॥ नमस्ते स्वीयदुःखप्न सर्पक्रीडाविशारद कालियाहि-फणारङ्ग-नट कालियमईन ।। १६० ॥ कालिय-फर्णमाणिक्य-रजित-श्रीपदाम्बुज । निजगन्धर्व-सिद्धादि-गीतवाद्यादिनर्तित ।। १६१॥ पादाम्बुज-विमतिनमिताहीन्द्र-मस्तक । रनोद्गारि-विभिन्नाङ्ग-दीनकालिय-संस्मृत ॥१६२ानमः ४७॥ नागपत्नीस्तुति-प्रीत हितार्थोचितदण्डकृत् । ') ": क्रोधप्रसाद-गाम्भीर्य महापुण्यैकतोप्य हे ॥ १६३ ।। मोहितकारी, गोकुलवासियों के द्वारा अश्रु-नयन से दृष्ट, महा उत्पात से सम्यक् उद्विग्न ब्रजवासियों की गति,आपका हम भजन करते हैं। उस समय आपको ब्रजवासियों ने न देखकर ध्वजे चिन्हादि युक्त चरण चिन्ह देख आपकी खोज की 1 वे सत्र मृतप्राय हो गये थे। बलदेव जी ने उनको प्राश्वासनी देकर जीवितं किया । वे सब बड़े, सोच में पड़ गये ॥ १८५-१६ ॥ (नमः ४६.) हे निज जनों के दुखःनाशन ! हे सर्प के साथ क्रीड़ा करने में पण्डित ! हे कालिनाग के फणरूप रङ्गमञ्च में नृत्य करने वाले ! हे. फालिय-मद्देन ! हे कालिनाग के फरणे में स्थित मणि-माणिक्यों से रजित चरणकमल पोले ! उस समय गन्धर्वसिद्धादिकों ने गोन-बांद्य किया और आपने नृत्य किया। आपके चरण प्रहार से उसके फणा:- गण मदित होकर नीचे को अवनंत हो गये । उसने रक्त का उद्गार किया तथा उसका अंग समूह छिन्न भिन्न हो गया । वह दीन होकर आपको स्मरण करने लगा। १६२-१६२ ।। (नमः ४७). " हे नागपत्नियों की स्तुति से प्रीत ! हे हित के लिये उचित दण्ड कारी! आप क्रोध करने पर भी भीतर में प्रसाद रखते हैं,अतः यह -- -- M र N 7 T -- श्रीकृष्णलीलास्तव, निरुपाचिकृपाकारिन् सर्पस्त्रीप्राय॑नायक ! सवार्थत्यागिभक्तार्थ्य-स्वामिरेसाचितोरग ॥ १६४॥ अचिन्त्यैश्वर्यमहिमन्नानानीरस्वभारमा । नानाकोडनक्क्रीडिन् स्वप्रनाग क्षमोचित ॥ १६५|| नागस्त्री-पतिभिक्षाद जय कालिग्रभापित । अग्राह्य-सृष्टदुष्टागोऽयोग्यमोहितनिग्रह ॥ १६६ ॥ स्वाङ्कमुद्राङ्किताहीन्द्र-मूर्द्धन कालियशासन । पूर्वस्थानापिताहीन्द्र सुपर्णजभयापहृत् ॥ १७ ॥ नागोपायनहष्णात्मन् कालियातिप्रसारित । यमुनाइद-सशोधिन् हनोत्सारितकालिय | १६८ नमः। 8 इति दशमस्कन्धे पोडशोऽध्याय * आपका गम्भीरभाव है । श्राप महान् पुण्यों से प्रसन्न होते हैं। हे निरुपाधि कृपाकारी नागपत्नियों की प्रार्थना को पूत्ति करने वाले । उस समय आप ने कालिय के मस्तक म निज चरणचिह्न रख दिया है। जिसे कि सत्यागी भक्तगण निरन्तर चाहते हैं। हे अचिन्त्य ऐश्वर्य्य महिमा वाले ' हे नाना प्रकार के जीवो के नाना विध स्वभाव के सृष्टिकारी । हे नानाविध क्रीडोपकरण से क्रीडित । निन प्रनाओं के अपराध क्षमावारी नागपत्नियों को पतिरूप भिक्षाको देने वाले । हे कालियनाग से स्तुत। आपकी जय हो । दुराग्रह के कारण आप द्वारा ही यह दु स्वभाव सृष्ट हुआ है । कार्यत. इस प्रकार माया मोहित जीव को निग्रह करना उचित नहीं है। आपने उसके मस्तक मे निज पदचिह का स्थापन किया तथा उसके पश्चात् 'हे कालिय ! तुम अव यहाँ नहीं रह सकते हो हस प्रकार कह कर, रमणक द्वीप जाने के लिये आज्ञा दी। आपन उसको, पूर्व स्थान म भेगा और उसको गरुड से जो भय था उसे निजपदचिह्न क द्वारा दूर कर निरा- पद् किया । नाग के द्वारा प्रदत्त, दिव्य वस्त्र मणिमाल्यादि उपायन ।
श्रीकृष्णलीलास्तवः स्ववल्यशनकालीय-दर्पमर्दनवाहन । सौभयुक्ति-स्वकागम्य-सर्पावास-हदोद्धर ॥ १६ ॥ दिव्यनग्गन्धवस्त्राढय दिव्याभरणभूपित । महामणिगणाकीर्ण ब्रजजीवनदर्शन ॥ २००॥ सहास-श्रीवलाश्लिष्ट गोपालिङ्गननिवृत। प्रसीद पीतदावाग्न स्वजनाति-विनाशन ॥२०१॥नमः५६॥ 8 इति दशमस्कन्धे सप्तदशोऽध्यायः काकपक्षधर श्रीमद्वसन्तित-निदाघ हे । नयनाच्छादनक्रीड राजलीलानुकारक ।। २०२।। मृगादिचेष्टा-क्रीडादोलानोका-विनोदक । नानालौकिकलीलाभृन्नाना-स्थान-विहारकृत् ॥ २०३ ।। प्रान होकर आप प्रसन्न हुए और कालिय को अति भक्त बनाया। पश्चात् यमुना हद को अमृतमय कर अपने आपको सबका प्रिय व. नाया । हे सपरिवार कालियनाग को दूरीकृत करने वाले ! श्राप की जय हो ।। १६३-१९८॥ (नम० ४६) है निज पार्पद (वाहन ) गरुड़ जी के उपहार भोजनरूप कालियनाग का दर्प नाशन ! सौभरिसपि के निषेध से सर्पपूर्ण यह हद गरुडजी का अगम्य था । आपने उसका उद्धार किया । हे दिव्य-माल्य-गन्ध से युक्त ! हे. दिव्याभरण से भूपित ! हे महामणियों से व्याप्त ! हे दर्शनामृत दान से ब्रज के जीवन ! हे हास्य के साथ बलदेव से प्रा. लिसित ! हे गोपों के आलिङ्गन से परम प्रसन्न ! हे दावाग्नि के पान- कारी, हे निजजनों के पार्त्तिनाशन ! आप प्रसन्न हो ॥ १६६।२०१॥ (नमः ४६) हे काकंपक्षधारी ! आपके लिये निदायतु सर्वशोभायुक्त वस- न्तऋतु की तरह हो जाता था। हे सखाओं के साथ आँस मीचनी कीड़ा खेलने वाले ! हे रामलीला के अनुकरणकारी ! हे मृगादिकों '--11- .
श्रीकृष्णलीलास्तर. 7 क्रीडासप्राप्तभाण्डीर जय भाएडीरमण्डन । गोपरपिप्रलम्रज्ञ द्वन्द्वक्रीडाप्रवर्तक । २०४॥ बाह्यवाहककेलीमन् जय श्रीदामवाहक । वलपातित-दुद्ध-प्रलम्ब बलवत्सल || २०५॥ नम ५० ।। * इति दशमस्कन्धेऽष्टादशोऽध्याय * जय मुचाटवीभ्रष्टमार्ग-परनातिनाशक | दावाग्निभीतगोपालदृनिमीलन-देशक ॥ २०६ ।। मुजाटव्याग्निशमन पीतोल्वणन यानल । भाण्डीरापित-गो-गोप-योगाधीश नमोऽस्तु ते ॥२०७नम ५१|| * इति शमस्कन्धे एकोनविंशोऽध्याय 2 प्राशीभूषितारण्य वृष्टिकाल-विनोदकृत् । गुहा-वनस्पति-क्रोडसेविन मूलफलान ।। २०८ ॥ की चेष्टा के अनुकारक । हे दोलाखेल तथा नौकाविहार में विनोदी! हे नाना प्रकार की लौकिकलीला के करने वाले । हे नाना स्थान में बिहारकारी ' हे क्रीडा करते हुए भाण्डीर वट मे उपस्थित । हे भा. एडीरवट के मण्डन आपकी जय हो। हे गोप रूपधारी प्रलम्बासुर को जानने वाले । हे द्वन्द्वगोडा मे प्रवर्तक हे वाह्य वाहक रूप क्रीडा परायण । हे दाम के वाहक हे बलदेव के द्वारा प्रलम्बासुर का नाश कराने वाले । आपकी जय हो ।। 020-२०५।। (नम ५०) हे. मुञ्जाटवी म मार्ग भूलने वाले पशुओं की प्राप्ति के नाशक आपन उस समय नावाग्नि से भीत गोपालो को नत्र मूंदन के लिये कहा । हे मुजाटवी अग्नि के शमनकारी | हे प्रचलित अग्नि के भक्षक हे भाण्डीरवट के निकट गो-गोपों के सञ्चारशील । हे योगाधीश ! आपको नमस्कार है ।। २६-२०७॥ आपन वर्षाऋतु में शोभा समृद्धि से यारण्य को भूपित किया तथा वर्धाकाल में विविध क्रीडा-विनोद किया । पर्वतों की गुहा में । - - श्रीकृष्णलीलास्तर पापाणन्यस्त-दध्यन्नभुग वर्गादर्पितत्रज। शाद्वलाशन-वर्षाश्री-सम्मानक नमोऽस्तु ते ॥६॥ हे शरनिर्मल योमचारुकान्ते प्रसीद मे। शरच्चन्द्र-लसद्वक्त कृतगोपीमहास्मर ॥१०॥नम ५२|| ॐ इति दशमस्कन्धे विंशोऽध्याय * शरद्विहार-मधुर शरत्पुप्पनिभूपण । पर्णिकारामतस ला नवेपधर भजे ॥ ११ ॥ विन्यस्त-बदनाम्भोज-लोचन-प्रान्तनर्तक । पिम्वाधरार्पितोदारवणो जय सुगायन ॥१०॥ नमो बनावलोकाय निभगललिताय ते । वेणुमोहित-विश्वाय गोपिकोद्गीव-कीर्तये ॥ १३॥नम ५३।। तथा वृक्षोंके नीचे क्रीडास्थान बनाया और फल मूल का भोजन किया। प्रस्थर में दधि अन्न रसकर भोनन किया था। आपने वर्षाकाल मेनन को प्रसन किया। तृण भोनी वृपादि को तथा वर्पा-श्री को सम्मान दिया। आपको नमस्कार है । हे शरत्कालीन मेघशून्य आकाश की भॉति मनोहर कान्ति वाले । हे शरच्चन्द्रमा की तरह शोभायमान मुप । हे गोपियो को महाकन्दर्प दायिन् ' मुझ पर प्रसन्न हों। ॥२०८-२१०।। (नम ५२) हे शरत्कालीन विहार से मधुर हे शरत्ऋतु के पुष्पो से वि- भूपित हे अपतस मे कणिकार के धारी ' नटवेश से विभूपिन श्राप का भजन करता हूँ । हे [ मुग्पकमल में ] अपागभगी के द्वारा सु. तर नेत्र वाले ' हे अधर विग्न मे उनार बसी निहितकारी हे सु. ग्दर गायक ! आपकी जय हो । वन अबलोकनकारी,निभगसे ललित, वेणुध्वनि से विश्व मोहित करने वाले, गोपियों के द्वारा उद्गीत को त्तिशाली आपको नमस्कार है ॥ ११ ॥ २१३ ।। [नम ५३ ] - -- ।
४- श्रीपालीलास्तर - चतु साफल्य-सम्पादि-श्रीमद्वकना-पीक्षण। नानामाला-लमद्वेश गोपालसभ-शोभन ॥ १४ ॥ सदातिपुण्यपद्वेगु-पीयमानाधरामृत । वृन्दारनातिकीत्तिश्रीपद-पदान्जलक्षण 1 २१५ ।। अपूर्वमुरलीगीतनादनर्तित पहिंग। शासोत्कीर्ण-शकुन्तीय सर्गप्राणिमनोहर ।। १२६ ॥ विस्मारिततृणपास-मृगीकुलविलोमित । मुशीलरूपसङ्गीत-देवीगण-निमोहन ॥१७॥ गाढरोहितगोवृन्द प्रेमोत्वर्णित-तर्णक । निर्यापारीकृताशेप-मुनितुल्यविहङ्गम ॥२१८ ।। गीतस्तब्धसरित्पूर च्छनायितवलाहक । पुलिन्दीप्रेमकृद्घासलग्नपाढाटन-कुङ्कुम ।। २१६ 11- हे नेन साफ्ल्यकारी शोभायमान मुख कमल वाले। हे नाना अकार मालाआ से परिभपित । हे गोपालसभा में शोभन । यशी ने बडा भारी पुण्य क्यिा निससे यह निरन्तर अवरामृत का पान करती है | आपके चरणकमल वृन्दावन की कीत्ति श्री को देने वाले हैं। आपके अपूर्व वेणुनाट का श्रवणकर मयूरगण नृत्य करने थे। वृ चों की शाखा में पक्षिगण चित्र की भॉति हो जाते थे। श्राप सकल जीवों के मनोहर हैं । आपकी वशीध्वनि से मृगीगण तृण ग्रास भूल कर. विलाभित हो जाते थे। आप मुशीलता रुप सौन्दर्य सगीतादि से देवीगण के विमोहक हैं । गोगण गाढरूप से आपका वशीनाद श्रवण से व्याकुल होकर रोदन करते हैं। गोवरसगणं प्रेमसे ऊपर की तरफ कानों को उठाकर घेणुध्वनि का श्रवण करते थे। आपकी वशी ध्वनि पक्षियों को अशेप व्यापार से हटाकर मुनिगण की भाँति मौनि बना देती थी। यमुना का प्रवाह स्थगित हो जाता था। मेघ छना- कार बन कर आपके अग में सूर्य्यताप को ढक देता था। आप के - श्रीकृष्पालीलास्तवः ४६ हरिसेवकवर्यत्वसम्पद्गोवर्द्धनाञ्चित । स्वप्रेमपरमानन्द-चित्रायित चराचर ॥ २२०॥ रागपल्लवितस्यारो गीतानमिवपादप । गोपालविलसःश गोपीमारविवर्द्धन ।। २२१ ।। अशेषजङ्गमस्याणु-स्वभाव-परिवर्तक । आर्द्राकृत-शिलाकाष्ठ निर्जीवोजीवनाव नः ॥२२२शानमः५४॥ 2 इति दशमस्कन्धे एकविंशोऽध्यायः * गोपकन्यानतप्रीत प्रसीद वरदेश्वर । जलक्रीडा-समाशक्त-गोपीवस्त्रापहारक ॥ २२३ ।। कदम्बारूढ़ वन्दे त्वां चित्रनम्र्मोक्तिकोविद । गोपीस्तवविलुब्धात्मन गोपिका-याचितांशुक ॥ २२४ ॥ चरणकमल का कुकुम तृण से लग कर पुलिन्दकन्याओं के वक्षः में संलग्न हो जाता था । आप हरिसेवकों में श्रेष्ठ परम प्रसिद्ध श्रीगोय- द्धन पर्वत से सेवित है। आपने निज प्रेमदान से चराचर सवको परमानन्द तथा चित्र की भॉति मुग्ध बनाया। वंशीध्वनि के द्वारा आपने शासारहित वृक्षों को भी पल्लवित किया तथा फल फूलों से नीचे को मुकाया । हे गोपालवेश से विलासी ! हे गोपियों के स्गर विवद्धक ! हे अशेप स्थावर जङ्गम का स्वभाव के परिवर्तक ! हे प्रस्थर काष्ठ को पियलाने वाले ! हे निर्जीव के जीवनदाता ! हम सब की रक्षा कीजिये ।। २१४ ॥ २२२॥ [नम०५४] हे गोपकन्याओं के व्रत से प्रसन्न ! हे वरदेश्वर ! हे जलक्रीड़ा में सम्यक् आसक्त ! हे गोपियो के वस्त्रापहारी ! आप प्रसन्न हों। हे कदम्बारद ! हे मनोहर नम्मोक्ति में पण्डित ! आपकी वन्दना क- रता हूँ। हे गोपियों के स्तव से आत्मविस्मरणकारी ! गोपियों ने उस समय आपको वस्त्र की याचना की थी। हे यमुना का स्रोत ही जि नका वस्त्र है ऐसी अर्थात् नग्मा, जलमग्ना, शोभायमाना गोपकन्या श्रीकृष्णलीलालयः सोतोवासःशुरद्गोपपन्याकर्षण-लालम। शीतार्तयमुनोत्तीर्ण-गोपीभाय-प्रमादित ॥ २५॥ स्कन्धारोपिनगीपस्त्रीवस्त्र मम्मितभापगा। गोपीनमस्कियादेष्ट गोन्येककरवन्दिन ॥ २२६॥ गोप्यञ्जलिविशेगर्थिन् गोपान्यानमस्कृत | गोपीयन्यद हे गोपीकामिताकामितपद ॥ २२७ ।। गोपीचित्तमाचोर गोपकन्याभुजद्गम । देहि स्वगोपिकादास्यं गोपीभावविमोहित रमा नमः ५। श्रीवृन्दावन-दूरस्थायिमा-मायाभिकर्पित । प्रातपत्रायिताशेपतरुदर्शनर्पित ॥२२॥ परोपरारनिरत-वरुजम्माभिनन्दक। यमुनामृतमंतृप्त गो-गोपगणसेवित ।। २३० ॥ नमः ५६ ॥ इति दशमस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः के आकर्षण में लालस ! हे शीतार्त यमुना से उस्थित उनके भाव से प्रसन्नताप्राप्त ! हे स्कन्ध में उनके वस्त्र के धारणकारी ! हे स्मित- भाषी ! हे गोपियों को नमस्कार के लिये प्रादेशकारी ! हे उनसे हाथों के द्वारा वन्दित ! हे गोपियों को अञ्जलि जोड़ने के लिये प्रार्थी ! हे गोपकन्याओं से नमस्कृत ! हे गोपियों को वस्त्र दायक! हे गोपियों की कामना और कामनातीत वस्तु को देने वाले ! हे गोपियों के चित्त के महान् पोर!हे उनके कामविप का उद्गारकारी सर्परूप! हे गोपियों के भाव से विभावित! आप मुझे निज गोपीदास्य दीजिये ॥२३॥२२८ (नमः५५) हे वृन्दावन से दूरस्थिता विग्रपत्नियों का भाव में आकर्पित ! आप छत्राकार अशेष वृक्षों के दर्शन से हर्प प्राप्त हुए हैं । आपने प. रोपकारी वृक्ष जन्म का अभिनन्दन किया है। आप यमुना के अमृत- - -- श्रीकृष्णलीलास्तवः ५१ यज्ञपत्नीप्रसादार्य-गोपक्षुद्रतिवद्धन सुधार्त-गोपवागध्यम जय यज्वानयाचक ।। २३१ ॥ टुप्प्रन-यन्वायज्ञात भत्तविप्रा-दिक्षित । ब्राह्मण्याकर्पकोदन्त यज्ञपलीमनोहर ।। २३२ ।। ब्राह्मणीतापभिच्चित्रवेशावस्थानभूषण । जय द्विजसतीश्लापिन् यनपत्नीष्टदायक ॥ २३३॥ ब्राहाणीकाकुसन्तुष्ट ब्राह्मणीप्रेमभक्तिद । पतिरुद्धसतीसद्योविमुक्तिद नमोऽस्तु ते ॥ २३४ ॥ यजमानीवितीर्णान्नतृप्त विप्रानुतापद । स्वीयसगद्विजज्ञानप्रद ब्रह्मण्यदेव हे ॥२३॥ नमः ५७ ।। इति दशमस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्यायः मय जल से सिक्त हैं ओर गो-गोपों से परिसेवित हैं ।।६।२३०॥ (नमः ५६) हे श्रीकृष्ण ! आपने यज्ञ पत्नियों को कृपा करने के लिये ही सखाओं की क्षुधा की वृद्धि की तथा सुधार्त ससाओं के वचन से व्यम हुए । आपने उनके द्वारा याज्ञिको के यज्ञान की याचना की थी। आपकी जय हो । दुर्बुद्धि उन्होंने मनुष्यज्ञान से आपका अ- नादर किया था । पश्चात् निजभक्त यज्ञ-पत्नियों को देखने के लिये आपकी इच्छा हुई । आपने वार्ता के द्वारा उनका आकर्पण किया तथा उनसे शोभायमान हुए । हे यज्ञपत्नियों के तापहारी ! हे मनो- हर बेप-भूपण वाले ! हे द्विजपलियों के प्रशंसाकारी! हे उनके इष्ट- दायक ! है उनके विनय वचन से सन्तुष्ट ! हे उनके प्रेम भक्ति के प्रदायक ! हे निज पति के द्वारा रुद्ध सती का सद्यःमोचनकारी ! आप को नमस्कार है । आप द्विजपत्नियों के अन्न के द्वारा तृप्त हुए थे। आपन विप्रों को अनुताप दान किया । निज २ पत्नियों के संग से उ- नका निज स्वरूप का ज्ञान हुआ। हे ब्रह्मण्यदेव ! आपकी जय हो। .
५० श्रीकृष्णलीलास्तर --- जय वासवयागज्ञ पितृप्रष्टमसार्थक। श्रुततातोक्त यज्ञार्थ कर्मवाटायतारक ।। ०३६ ।। नानापन्यायपाटोघ-शम्यागनिधारक । गोवद्धनादि-गोयज्ञप्रवर्तक नमोऽस्तु ते ॥ २३७ ॥ प्रोत्ताद्रि-गो-ममनिधे यन्त्रदत्तोपहारभुक् । गोपरिश्वासनार्थादिन्छलस्थूलान्यरूपधृक् ।। २३८ ।। गोवनशिरोरत्न गोवर्द्धनमहत्त्व । कृतभूपाशनामीर-कारिताद्रि-परिक्रम ||२३|| नम ५८ ।। * इति दशमसधे चतुर्विंशोऽध्याय * जनितेन्द्रम्प शक्रमवृष्टि-शमोन्मुसम् । गोवर्द्धनाचलोद्धतस्त्वा वन्देऽद्भुतविनमम् ॥ २४० ॥ लीलागोपद्धनधर वनरक्षापरायण । भुनानन्तोपरि यस्त-क्ष्मानिभक्ष्माभ्दुत्तम ।। २४१ ॥ ॥ २३१॥ ३५॥ (नम ५७) । हे इद्रयज्ञ के ज्ञाता आपने अपने पिता को यज्ञ का उद्देश्य पूछा तथा उनसे यज्ञका तात्पर्य अवगत हुए। आपने कर्मवार की असतारणा की। नाना प्रकार के अपवाद देकर इन्द्रयन का सण्डन किया। आपने गोवर्द्धन पर्वत की पूना के द्वारा गायज्ञ का प्रवर्तन कराया। आपको नमस्कार है । गो गोवन यज्ञ की विधि आपने यतलाई । नापने सेव्य स्वरूप से यज्ञदत्त उपहार का भोजन किया। गोपों के विश्वासार्थ पर्वत छल से स्थूलकाय धारण कर सब को उत्साहित किया।हे गोरर्द्धन के मस्तवरत्न हे गोवर्द्धन के महत्त्व दाता | आपने गोपो से भूपित हो तथा नाना प्रकार भोजन कर पर्वत की परिक्रमा की।।०३६ ॥ २३६ ॥ (नम ५८) आपने इन्द्र का क्रोध उपाटन किया तथा इन्द्र ने अभिमान से जो वृष्टि की उसका उपराम करने म उमुस हुए। उस समय आपने - श्रीकृष्णलीलास्तवः गोवर्द्धनच्छत्रदण्डभुजार्गल महावल । सप्ताहविधृताद्रीन्द्र मेघवाहनगर्वभित् ॥ २४२ ॥- सप्ताहैकपदस्थायिन् व्रजनुत्तृड्नुदीक्षण । जय भग्नेन्द्रसङ्कल्प महावर्षनिवारण ॥२४३।। स्वस्थानस्थापितगिरे गोपीदध्यक्षतार्चित । देवता-सुमनोवृष्टिसिक्त वासवभीपण ॥ २४४ ॥नमः ५६॥ इति दशमस्कन्धे पञ्चविंशोऽध्यायः जयाद्भुतमहाचेष्ठा-विस्मितव्रजशङ्कित । गोपानुपृष्टजनक गोपोगीताखिलेहित ॥ २४५ ॥ गोवर्द्धन पर्वत का धारण किया । हे अद्भुत पराक्रम-बाले ! आप की वन्दना करते हैं । हे नीलामात्र से गोवर्द्धनधारणकारी! हे व्रज के रक्षापरायण ! अनन्त देवके ऊपर न्यस्त पृथ्वी की तरह एक ही हस्त की एक ही अंगुलि में गिरिराज गोवर्द्धनधारी ! उस समय गोवर्द्ध- न छत्र रूप से विराजमान रहा था । आपके भुज मानों छत्रदण्ड की भॉति हुआ। हे महान् बलवान् ! आपने एक सप्ताह पर्यन्त पर्वतराज को धारण किया और उससे मेघवाहन इन्द्र का अभिमान दूर किया। आप सप्ताह पर्यन्त एक चरण में अवस्थित रहे । आपने दृष्टिपात से ही ब्रजवासियों की तुधा-पिपासा को दूर किया । उससे इन्द्र का सङ्कल्प टूट गया । हे महायर्पा के निवारक ! आप की जय हो । अ- नन्तर आपने गोवर्धन पर्वत को पहले की भॉति निजस्थान में रखा। गोपियों ने दधि-अक्षतों से आपकी पूजा की । देवताओं की सुमन- वृष्टि से आप सिक्त हुए तथा इन्द्र के लिये भयानक हुए ॥२४०।२४४॥ (नमः०५६) हे अद्भुत महान् चेष्टा के द्वारा प्रजवासियों को विस्मय तथा श- का उत्पादन करने वाले ! उस समय गोपों से श्रापके पिता को परिः चय पूछा गया था और गोपों के द्वारा आपकी अस्टिलचेष्टा का गान ५४ श्रीकृष्णलीलास्तयः नन्दोक्तगर्गसद्वास्य-गोपाशवानिरासक । गोप्टरक्षक मां रक्ष गोपालानन्दवर्द्धन ॥ २४६ नमः ६०॥ के इति दशमस्कन्धे पड्विंशोऽध्यायः १ भीतलज्जितदेवेश-किरीटस्पृष्टपाद है। वामवस्तुत सर्वश जितमायास्तदूपण ।। २४७ ॥ धर्मपाल खलध्वंसिन दुष्टमाननचेष्टित । स्वीयापराधक्षमण शरणागतवत्सल ॥ २४०।। शकशिक्षक शक्रत्वप्रद हे सुरभीडित । सुरभीप्रार्थितेन्द्रव श्रीगोविन्द नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥ कामधेनुपय.पूरामिपितामरपूजित । ऐरावत-करानीत-वियद्गगाजलाप्लुत ।। २५० ।। गागोप-गोपिकानन्दिन् सर्वलोकशुभका। हर्षपूरितदेवेन्द्र जगदानन्दवर्द्धन ॥ २५१ ॥ नमः ६१ ॥ * इति दशमस्कन्धे सप्तविंशोऽध्यायः ~ किया गया। नन्द ने गर्ग का सहास्य,का अनुस्मरण कराकर उनकी शङ्का को दूर किया । हे गोष्ठरक्षक ! हे गोपों के आनन्द-पद्धक ! मेरी रक्षा कीजिये ।। २४५। ०४६ ।। (नमः ६०) हे भीत और लजित देवेश इन्द्र के मस्तक किरीट से स्पर्शप्राप्त चरण कमल वाले ! हे वासव के द्वारा स्तुत ! हे सर्वज्ञ ! हे माया- दूपण से रहित ! हे धर्मपालक ! हे खलध्वंसिन् ! हे निज चेष्टा के द्वारा सलोंके अमिमान नाशक ! हे निज मे इन्द्रापराध के क्षमाकारी! हे शरणागत वत्सल ! हे इन्द्र को शिक्षा देने वाले ! हे इन्द्राधिकार प्रदायक ! हे मुरभि के द्वारा स्तुत ! हे सुरभी के द्वारा इन्द्रत्व के लिये प्रार्थित हे श्रीगोविन्द ! आपको नमस्कार है । हे कामधेनु की दुग्धंधारा से अभिपिक्त ! हे देवपूजित ! हे ऐरावत हस्ति के द्वारा श्रीकृष्णलीलास्तवः प्रसीद मे पयोमग्न-नन्दान्वेपिन पितृप्रिय । वरुणालयसंप्राप्त वरुणाभीष्टदर्शन ।। २५२।। वरुणश्चितपादाज वरुणातिप्रसादित । वरुणागतमाकारिन् नन्दवन्धविमोचन !! २५३ ॥ नन्दावितमाहास्य गोपज्ञानातिवैभव । गोपसंकल्पविज्ञातः करुणाकुलमानस २५४॥ स्वलोकालोकसंहृष्ट-गोपवर्गार्थवर्गद। अहाहदोद्धृताभीराभीष्टब्रह्मपदप्रद ॥ २५५ ।। नमः ६२ ॥ * इति दशमस्कन्धेऽप्टाविंशोऽध्यायः के जय जय निजपादाम्भोजसत्प्रेमदायिन रसिकजन-मनोहद् रासलीलाविनोदिन् । विवृतमधुरकैशोरातिलीलाप्रभाव प्रियजनयशवर्तिन् व्यक्त-सत्यस्वभाव ।। २५६ ।। श्रानीत आकाशगंगा के जल से स्नात! हे गो-गोप गोपियों के प्रा. नन्दकारी ! हे समस्त लोक के मङ्गलकर ! हे इन्द्र को प्रसन्नकारी। आप जगत् के अानन्द वर्द्धक है ।। २४७ ॥ २५१ ॥ [ नमः ६१ ] हे जलमग्न नन्द के अन्वेपणारी ! हे पितृप्रिय ! हे वरुणालय गमनकारक ! हे वरुण के अभीष्टदर्शक ! हे वरुण के द्वारा अञ्चित चरणकमल! हे वरुण को अति प्रसादित करने वाले ! हे वरुग्ण का अपराध के क्षमाकारी ! हे पिता के बन्धविमोचन ! उस समय नन्द ने ब्रजवासियों को श्रापकी महिमा सुनाई तथा गोपों ने आपके अत्य- न्त वैभव को जाना। उस समय गोपों ने महा वैकुण्ठ का दर्शन कर- ने का संकल्प किया । आप करुणा से व्याकुल मन होकर उन्हें निज लोक वैकुण्ठ का दर्शन कराकर प्रसन्न करने लगे तथा उनकी कामना को आपने पूरण किया । ब्रह्महद में पहले उन्हें मग्न कराकर पश्चात् उन्हों को उठाया तथा उनको अभीष्ट ब्रह्मपद वैकुण्ठ का अनुभव क- श्रीकृष्णलीलास्तरः त्यतात्मरामतामाय तुन्दीकृतनिजागम। भक्तमार्थ्यनिजप्रेमधारादानार्थरासान् ॥२५७ ।। शरन्निशा-रिहारोत चन्द्रोदयरताशय । गोपी-रिमोहनोद्गीत परमावर्षपण्डित ॥ २५८ ।। अनाहतनिपेधौधी-कृतगोपसतीगण । -सरियापेक्ष-गोपस्त्रीप्राप्तसङ्गम ॥२५६॥ नमः ६३ ।। प्रसीद भर्तृ सरुद्धगोपी-प्रेमाग्नि वर्द्धन । • सकामोन्मत्तगोपस्त्रीदेहवन्धविमोचन ॥२६० ॥ त्यक्त- राया। हे एतारश श्राप प्रसन्न हो॥५२॥५५॥ (नम ६२) हे निज-चरणामलों के सत् प्रेम के दाता । हे रसिकननों के मन-हरणकारो | हे रासलीला के विनोदी ! आपने मधुर नवकैशोर का प्राकट्य कर अति लीला प्रभार का विस्तार किया। श्राप प्रिय- जन के वशर्ती हैं। आपका सत्य स्वभाव जगत् में व्यक्त है। आप ने आत्माराम के अभिमान का त्याग र भगवत्ता के आविष्कार के द्वारा परतारा के साथ रिनाद किया। क्योंकि रासप्रसगमे आत्मा- रामता आवश्यक नहीं थी । प्रतीप पाचरण के द्वारा यह दिखाया कि मैं वेद विधि से पर हूँ। भक्तों के प्रार्थनीय निज प्रेमामृतधारा के प्रदानार्थ आपने रासलीला की । शरत्कालीन रानि का अवलोकन कर श्राप निहारार्थ उत्सुक हुए । उस समय पूर्ण चन्द्रमा का उदय था । गापियों को मोहित करने के लिये आप वशी बनाने लगे। उन के प्रारर्पण विद्या को आप भली भांति जानते थे । गोपसतियों सब का अनार कर वाचा निघ्नों का उलघन करती हुई आपके पास आई थीं। उस समय उन्होंने सकल क्रिया को तिलाञ्जलि दे आपकी प्राप्त की। हे एतादृश आपकी जय हो जय हो ॥ ०५६ ॥ ५४॥ [नम० ६३] श्रीकृष्णलीलास्तवः शुकलोधोक्तिनिर्णीत-महामहिमसागर । क्रोधादिभजमानार्थप्रहस्मरण मा स्मर ॥ २६१ ॥नमः ६४॥ गोपिकानयनास्वाद्य गोपीनञ्चनवाक्पटो। गोपीमिष्टोक्तिशुभपा-स्वधर्मभयदर्शक || ०६ ॥ गोपीमहाधिविस्तारिन् गोपीरोदनवर्द्धन । गोप्यर्थिताङ्गससग गोपीकाक्ति निवृत ॥ २६३ ॥ अवहित्या परित्यक्त प्रोद्यन्मानस पिनिय । धूर्ताग्रगण्य मा पाहि काममुग्म स्मितानन ॥२६४ ॥ व्यक्तभारमधुर स्मरलोलितलोचन । गोपीमनोहरापाग गोपिकाशतयूथप ॥ २६५ ॥ हे पति के द्वारा निरोधित गोपियों के प्रेमाग्नि वर्तनशील हे निज कामोन्मत्त गोपस्त्रियों का देहबन्ध के रिमोचक शुक्देव ने आक्षेप के माथ आपके महिमा सागर का निर्णय क्यिा है। आपका स्मरण काम मोवादि भाव से भजनकारियों को भी पुरुपार्थदायक है । आप मेरा स्मरण रसे ॥६० ॥२६१ ।। [नम ६४] हे गोपिया के नयन के द्वारा प्रास्वाद्यमान ! हे गोपियों के पश्च- नार्थ वागविलास मे चतुर हे गोपियों के परिहास गर्भ मधुरवचन सुनने के लिये धर्मभय के दर्शक ' हे गोपियों को उस समय महान् पीडा विस्तारकारी हे गोपियों के रोदन की वृद्धि करने वाले । उस समय उन्होंने आपके अग सग की प्रार्थना की । उनके विनय युक्त वचनों से आप परमसुसी हुए और निज भाव गोपन नहीं कर सके। आपकी मन की इच्छा उछल उठी । हे धूर्तशिरोमणि हे काम- मोहित । हे स्मितवदन ! मेरी रक्षा कीजिये । श्रापका भीतरका भाव व्यक्त हा जाने पर ग्राप परम मधुर हुए । स्मरचेष्टा से आपके नयन युगल लोलायमान हो गये । आपकी अपागदृष्टि गोपिया के लिये मनोहर थी । शत शव गोपियूथों के आप रक्षक हुए । हे वैजयन्ती- - ।
'श्रीकृणलीलास्तवः वैजयन्तीमगारल्प शरच्चन्द्रनिभानन । यमुनापुलिनासीन गोपीरमण पाहि माम् ॥ २६६ ॥ जितमन्मय सन्त्रज्ञ गोपीमानविवद्धन । गोपिकातिप्रसादार्थकतान्तर्धान विभ्रम ॥२३७ ॥ नमः ६५॥ * इति दशमस्कन्धे ऊनविंशोऽध्यायः जय गोपीगणान्विप्ट वृक्षसंपृष्टदर्शन । तुलसी-मालती-मल्ली-यूधिकापृष्ट-वीक्षण ॥ २६ ।। नित्युत्सव-समालोज-मम्भावित-समागम । पाणीपृष्पानिपाटलतोयुतक-मुचित ।। २६६ ।। उन्मत्तीकनगो योघ गोपिकानुकृतेहिन । जय गोपीगरणाविष्ट स्वभावापितगोपिक ॥७॥ माला से विभूपित ! हे शरच्चन्द्रमा की भॉति सुन्दर बढन थाले ! हे यमुना की पुलिनावली में विराजमान ! हे गोपीरमण ! हे मन्मथ- रीति को जानने वाले ! हे गोपियों के मान यर्द्धक! हे गोपियो का सौभाग्य जगत् में दिखाने के लिये अन्तर्धानकारी ! मेरी रक्षा की जिये ।। २६२ २६७ ।। (नम०६५) हे गोपियों के द्वारा अन्वेपित ! उस समय उन सबने उन्मत्त हो कर आपके दर्शन के लिये वृक्षों से पूछा । तुलसी, मालती, मल्ली,यू. थिकादि लताओं के लिये भी आपके दर्शन की वार्ता पूछने लगी। पृथिकी में उत्सव दायक आपके ध्वज वज्रादि अक्ति चरणचिह्नों का अवलोकन कर जन सक्ने आपके आगमन की सम्भावना की। उन्होंने हरिणियों के दर्शन अभिनिवेश से,वृक्षों के फल-पुष्पा से नन- ताभाव के द्वारा तथा लताओं का पुलकांकुर दर्शन से आपके श्रागमन का निर्धारण किया था। आपने गोपियों को उन्मादिन किया। वे सन श्रापका अनुकरण करने लगी। हे एतादृश! श्रापकी जय हो। है गोपिगण में आविष्ट! गोपियों के द्वारा,आपने अपने भाव का कि ५६ श्रीकृष्णलीलास्तवः गोपीलक्षितपादाम-लक्ष्ममार्गित-पद्धते । अन्यस्त्रीयुक्तपादाब्जचिन्हेक्षा-गोपिकार्तिद ॥२७१शानमः६६।। राबाराधित राधेश राधिका-प्राणवल्लभ । राधारमण वन्दे त्वां राधिकाप्रेमनिर्जित ॥ २७२ ।। राधासंन्यस्तसर्वस्व स्त्रीस्त्रैणगतिदर्शक । रावानुतापसंमोहकरान्तर्धान-कौतुक ॥२७३ ।। ससीगणापराधोक्त तद्विस्मापनचेष्टित । राधासहितगोपस्त्री-मुहुर्मार्गित पाहि माम् ।। २७४ ॥नमः ६७॥ * इति दशमस्कन्धे त्रिंशोऽध्यायः पुनःपुलिनसंप्राप्त गोपीगीतार्थितोदय । जन्ममानवजश्रीद स्वजनान्येपणार्तिद ॥ २७५ ॥ ञ्चित् अनुभव प्राप्त किया। गोपियाँ आपके चरणचिह्न से अङ्कित मार्ग का अनुसन्धान करने लगी। अन्य कोई स्त्री से युक्त चरण- चिह्न का अवलोकन कर उनकी अत्यधिक आत्ति बढ़ने लगी। हे एतादृश । आपकी जय हो ।। २६८ । २७१ ।। (नम०६६) हे राधिका के द्वारा भारावित ! हे राधापति ! हे राधिका के प्रा- णवल्लभ ! हे राधारमण ! राधिका के प्रेम से पराजित आपकी वन्दना करता हूँ। हे राविका में सर्वस्व अर्पित ! हे लोकशिक्षा के लिये स्त्री और कामियों की यथाक्रम से दुरात्मता और दैन्यरूप मति के दर्शक ! उस समय आपने राधिका को अनुतापित और माहित करते हुए अन्तर्धान कौतुक का अवलम्बन किया। श्री राधा ने ससियों से प्राप्ता होकर समस्त बात सुनाई। आपकी चेष्टा उन सबका विस्मा- पक है । उस समय राधिका जी गोपस्त्रियों से मिलकर आपका बार वोर मार्गानुसन्धान करने लगी । हे एतादृश ! मेरी रक्षा कीजिये। ॥ ०७२-७४॥ (नम०६७) हे पुनार पुलिन में उपस्थित गोपियों के गान द्वारा आगमन .... श्रीकृष्णलीलास्तवः गजन्यमानस्त्रीवध-निःशङ्कहृदय । विपादिनानादुःखघ्न स्त्रीयातिज्ञाऽन्तरात्मदृक् ।।२७६।। विश्वरक्षार्थसञ्जात भत्ताभयद-हस्त है। स्वजनप्रार्थ्यसंस्पर्श नानागुणपदाम्बुज ॥ २७७ ।। मनोज्ञ-मधुरालाप दासीगणविमोहन । श्रुतिमङ्गलसन्तप्तप्राणार्थदकथामृत ॥ २७८ ॥ मनःक्षोभकमाधुर्य मृदुलाडिभवनाटक । युगायितयियोगाणो मनोहधरामृत ।। २७६ ।। सर्वत्यागार्थितगते महामोहनरूप है। ब्रजमङ्गलकृव्यक्ते स्वजन-प्रार्थ्यपूरक ॥२०॥ के लिये प्रार्थित ! हे जन्ममात्र से ही ब्रज मे श्री के दाता! हे निज- जनों को आर्ति को बढ़ाने वाले! आप नयनकमल से हन्यमानास्त्रियो के बध मे निशङ्क हृदय वाले हैं तथा विपादि नाना प्रकारके दुसों के नाशकारी हैं। आप निजजनों की आर्ति को जान लेते हैं क्यों कि आप सबके अन्तरात्मा को जानते हैं। आपने विश्व की रक्षा के लि- ये अवतार लिया है। आपके हस्तकमल भत्तों को अभय देने वाला है । निज जन गोपियों ने आपका संस्पर्श की प्रार्थना की है। आपके चरणकमल नाना गुणे की सान है। हे मनोहर मधुर आलापकारा! हे निजदासियोंके विमोहित कारक! आपका कथामृत श्रवण मङ्गलरूप तथा प्राण-अर्थ को देने वाला है । आपका माधुर्य्य जगमन का क्षोभ कारक है ।आप कोमलचरणों से वृन्दावन मे विचरण करने वाले हैं। आपका निमेपमात्र विरह गोपियों के लिये युग की भॉति प्रतीयमान होता है । आपका अपरामृत मन हरणकारी है । जो सर्वस्व परित्याग कर आपके शरण में आता है उसे श्राप रसादिक के लिये रवत हो जाते हैं । हे महामोहन रूपधारी ! हे ब्रजमङ्गल के लिये अभिव्यक्त ! दे निजजन की प्रार्थना के पूरणकारी! हे वृन्दावन के कण्टकमय श्रीकृष्णलीलास्तवः अतिकोमलपादा-न-कण्टकारण्यसञ्चर। गोपस्त्रीजीविताकर्पि-दुर्गभूभ्रमणान माम् ॥८शानम ६८॥ * इति दशमस्कन्धे एकत्रिंशोऽध्याय. अत्युच्चगोपिकादुःस-रोदनोन्मथितेन्द्रिय । जय गोपीपुनदृ ष्ट-स्मयमान-मुसाम्युज ॥ २॥ श्रीमन्मदनगोपाल पीतकौशेयास्त्रधृक् । प्रीत्युत्फुल्लाक्ष-गोपस्त्री-वेष्टित प्राणदायक ॥ १३ ॥ यल्लगीस्तनसनाडिव गोपीनेनाजपट्पद । गोपस्त्रीविरहार्तिघ्न वल्लगीकामपूरक ॥ २८४॥ गोपीचेलाञ्चलासीन गोपीगण-सभाजित । जय गोपीसदोजाताधिक-श्रीरानमान है शानम.६६।। अरण्य में अति कोमल चरणों से सश्चरण शील । गोपियाँ आप के अरण्य प्रदेश में इस प्रकार विचरण देसकर मृतप्राया हो जाती थीं। हे एतादश श्राप मेरी रक्षा कीजिये ।। १७५-८१॥ [नम०६-]] अत्यन्त उच्च सर से गोपियों ने जो दु समय रोदन किया है उससे आपके इन्द्रियगण व्याकुल हो गया था। आप नहीं रह सके। हँसते हुए उनके बीच में उपस्थित हुए। हे श्रीमन् मदन-गोपाल । हे पीत-कौशेय वस्त्रधारी । हे प्रीति से परिपुल्ल नेन वाली गोपस्त्रियों से वेष्टित ' हे उनके प्राणदायक ! हे गोपियों के उत्तप्त स्तनकमल मे चरणकमल के अर्पक । हे गोपियों के नेत्ररूप कमलों के भ्रमर । हे गोपस्त्रियों के विरह नाशक हे उनके काम पूरक । उस समय गोपि- यों ने निज निन वस्त्राचल को विद्या कर उस आसन पर आपको बैठाया । श्राप उनकी सभा में विराजमान हुए । हे गोपियों की सभा मे सर्पविलक्षण श्री के प्रकाश के द्वारा राजमान ! आपकी जय हो। 10॥८५॥ (नम०६९) श्रीकृष्णलीलास्तवः विदग्धगोपिकागाढ-निप्रश्नोत्तरदायक । विज्ञातगाप्यभिप्राय महाचतुर-सिंह हे ॥ १८६॥ स्ववानवाप्ताकृतज्ञत्यादिदोष-परिहारक । निजासाधारणप्रेम-कारुण्यस्थापकाऽव माम् ॥ २८७ ॥. स्वीयसङ्गापरित्यागिन् स्वदानातृप्तमानस । 'प्रियोपकार-संव्यग्र विरहप्रेमवर्द्धन ॥२८॥ नमः ७० ।। ॐ इति दशमस्कन्धे द्वात्रिंशोऽध्यायः * गोपीविरह-सन्तापहरालिङ्गन-कोविद । रासनीडारसाकृष्ट जय गोपीप्रियवर ॥ २८६ || रासोत्सर-समारन्भिन् गोपीमण्डल-मण्डित । गोपीहेममणिश्रेणी-मध्यमध्य-हरिन्मणि || २६० ॥ विदग्धा गोपियों ने गाढ रूप से तीन प्रश्न किये थे। श्राप ने उन के प्रश्नों का स्पर्श नहीं कर चतुराई से उत्तर दिया । आपने गोपियों का अभिप्राय जान लिया क्योकि श्राप चतुरशिरोमणि हैं । आपने अपनी क्था से अकृतनत्यादि दोप का परिहार कर अपने असाधा. रण प्रेमकारुण्य की स्थापना की । आप के लिये जो लौकिक-वैदिक सकल मर्यादा का लघन करते हैं, आप उनके निजविषयक श्रानु- गत्य बढाने के लिये यापि क्षण भर के लिये विरह प्रदान करते हैं तो भी कदापि उनके मग का नहीं परित्याग करते हैं। आप उनके लिये अपने को दान करने पर भी उममे तृप्र नहीं होने हैं। प्रेयसियों फे उपकार के लिये अाप निनर न्यप्रचित्त रहते हैं हम लिये उनको रिरह देवर प्रेम की वृद्धि करते हैं। हे एतादृश! आप मेरी रक्षा पीजिये।1८६॥८॥ (नमः-७०) हे गोपियों के विरह मन्ताप हरारी हे गोपियों को आलि. गन परने में कोविद ! हे रासनीडारस में प्रारष्ट ! गोपियों के नियगरी! प्रापरी जय हो। रासोत्सव आरम्भकारी !हे गोपि- श्रीकृष्णलीलास्तवः ६३ स्वस्वपार्श्वस्थितिज्ञानानन्दितस्त्रीगणावृत । देवतागणगीतादिसुसेवित नमोऽस्तु ते ॥ २६१ ॥ गोपिकोद्गीत-सुप्रीत नृत्यगीत-विचक्षण । स्वात्मास्यदत्तताम्बूल आन्तगोपीधृतांसा ।। २६२ ॥ स्वानुरूप-व्रजवधू-नृत्य-गीतादि-हर्पित । विमोहितशशाङ्कादि-स्थैर्य-राध्यति_कृत्।।२६॥नमः७१॥ विदग्धवल्लवीवृन्द-रतिचिन्हाकितांग हे । रतिश्रान्तबजवधूमुसमार्जन-तत्पर ॥ २६४॥ जलक्रीडातिकुशल स्वमालालिबुलावृत। सहासगोपिकाबात-सिच्यमान नमोऽस्तु ते ॥ २५॥ यमुनाजललीनाग कालिन्दीकलिलोलित । यमुनातीरसञ्चारिन् कृष्णाकुञ्जरतिप्रिय ।। २६६ ॥ मण्डल से मरिडत ! हे गोपीरूप सुवर्ण-मणियों के मध्य मध्य में इन्द्र- नीलमणि स्वरूप ! उस समय गोपियों में प्रत्येक ने ऐसा समझा कि हमारे पास ही श्रीकृष्ण विराजमान हैं। उन सब गोपियों ने आन- न्दित होकर आपको वीच मे रस नृत्यगान किया था । देवताओं ने भी गीतादि के द्वारा आपकी सेवा की । हे एतादृश ! आपको नम- स्कार है । हे गोपियों के गान में सुप्रीत : हे नृत्य गीतमें विचक्षण! हे ताम्बूलचळण कर निज मुख से गोपियों को प्रदान करने वाले ! हे रासपरिश्चन्ता राधिका के स्कन्ध धारणकारी ! हे निजानुरूप ब्रज- चधुओ के नृत्य-गोवादिकों में हर्ष प्राप्त ! उस समय आकाश में च- न्द्रमादि विमोहित होकर स्थिर होगये तथा रात्रि अति दीर्घ हो गई। हे विदग्ध गोपियों के रतिचिह्न से अङ्कित सांग! हे रति परिश्रान्त ब्रजवधुओं के मुसमार्जन में तत्पर ! आपको नमस्कार है।।२८८- (नमः ७१) है जलक्रीड़ा में अतिकुशल ! हे भ्रमरों से वेष्टित पुष्प वनमालाधारी!
६४ श्रीकृष्णलीलास्तवः जय श्रीराधिकासक्त जय चन्द्रावलीरत । पद्मास्यपद्मपानाले ललितापाइलालित ॥ २६७ ॥ विशाखार्थविशेषार्थिन श्यामलारतिनिर्मल । भद्राभदरसाधीन धन्या-प्राण-धनेश्वर ॥ २६ ॥ गोपजन्मागतस्वस्त्रीनिरन्तरविलासकृत् । गोपीलम्पट हे गोपीसन-कुङ्कुममण्डित ॥ २६६ ॥नमः ७२।। परीक्षित्पृष्टरासार्थ शुकोक्तैश्वर्यसञ्चय । मुमुक्षु-मुक्त-भक्तार्थ-सच्चिदानन्दचेष्टित ॥३०॥ गोपीमहामहिमद गोपासूयाद्यनास्पद । गोपापितगृहापरय-पत्नीप्राण प्रसीद मे ॥३०॥ नमः ७३ ।। * इति दशमस्कन्धे प्रयस्त्रिंशोऽध्यायः हे हास्यसुधा से गोपियों के सिञ्चनकारी ! आपको नमस्कार है। यमुनाजल में उन्मजित ! हे यमुना में केलि करन के लिये लोला- यमान ! हे यमुना के तार सञ्चरणशील ! हे यमुना के पुञ्ज में रात- प्रिय ! हे राधिका मे आसक्त !हे चन्द्रावली मे रत! आपकी जय हो । हे पद्मा के मुसकमल के पान के लिये भ्रमररूप! हे ललि- ता के फटाक्षदृष्टि से लालित ! हे विशासा के प्रेमधन के लुब्धचित्त- वाले !हे श्यामला की विशुद्ध रति से निर्मल ! हे भद्रा के श्रेष्ठ शृंगार रस के अधीन !हे धन्या के प्राणधन के ईश्वर !हे गोपज. न्म प्राप्त नित्यप्रियागण के साथ निरन्तर विलासकारी!हे गोपील- म्पट ! हे गोपियों के स्तन कुंकुम से रञ्जित ! आपकी जय हो।।२६५- (नमः ७२) महाराज परीक्षित् ने शुकदेव जी के लिये श्राप रास का तात्पर्य पूछा था । शुकदेव जी ने आपना परम ऐश्वर्य का वर्णन फर परी- तित् का सन्देह दूर किया । श्राप मुमुक्षु-मुक्त और भक्त के लिये नित्य सच्चिदानन्दमयी चेष्टा करते हैं। हे गोपियों को महामहिमा श्रीकृष्णलीलास्तषः ६५ जयाम्बिकावनप्राप्त सारस्वतजलाप्लुत । निजपादाम्बुअस्पृष्टनन्दग्राहिमहोरग ।। ३०२ ।। विद्याधरेन्द्र-शापघ्न जय नन्दविमुक्तिद। आयिताहि-पुरावृत्त सुदर्शनविमोचन ॥३०॥नमः ७४॥ कामपालसहक्रीडा-सम्मानितनिशामुस । मनाहरमहागीत-मोहित-स्त्रीगरणवृत ।। ३०४ ॥ शवचूड-परित्रस्त-गोपिकाकोशधावित । स्त्रीरक्षास्थापितबल शखचूड-शिरोहर ॥ ३०५ ।। शाचूड-शिरोरत्न-प्रीणिताग्रज पाहि माम् । अन्योन्य-गोपीसापत्न्यानुत्पादक नमोऽस्तु ते ॥३०६ानमः७|| इति दशमस्कन्धे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः के दिखाने वाले ! आप गोपों के द्वारा जो असूयादिक हैं उनके विषय नहीं रहे । अर्थात् परम साधुवाद के योग्य हुए । इसलिये गोपों ने गृह-पुत्र-स्त्री-प्राणादिक आपको अर्पण कर दिये । हे एतादृश आप प्रसन्न हो ।। ३०० ।। ३०१॥ (नम०७३) हे अम्बिकावन में उपस्थित ! हे सरस्वती के जल में स्नात ! पहाँ अजगर सर्प ने श्रापके पिता को मास क्यिा । वह सर्प आपके चरणस्पर्श पाकर शाप मुक्त हो अपने पहला विद्याधर रूप का धारण करन लगा । हे नन्द के विमोचनकारी! आपने उस अजगर से पूर्व- जन्म की वार्ता ब्रजवासियों को मुनाया । हे सुदर्शन-विमोचन ! श्रा. पकी जय हो ।। ३०२।।३०३॥ (नम०७४) हे वलदेव के साथ होरीक्रीड़ा के द्वारा दिवस का शेपमाग फो सम्मानन देने वाले ! मनोहर गानो से मोहित स्त्रीगण के द्वारा परि- येष्टित ! हे शंखचूड से भयभीत गोपिय श्रीराधिका के क्रन्दन से धावित ! हे गोपियों के रक्षार्थ वलदेव जी का नियोग करने वाले ! हे शंखचूड के शिरोरत्न के हरणकारी ! हे शंखचूड़ के मस्तकरत्न प्र.
दान । श्रीकृष्णलीलास्तव' अहविरह-सन्तप्त गोपी-गीतगुणोदय । जय शोकाविनिस्तार-प्रकारात्युच्चकीर्तन ॥ ३०७ ।। साचीकृताननाम्भोज व्यत्यस्त-पदपल्लव । नर्तितघ्रयुगापाग वेणुवाद्यविशारद ।। ३०८ ॥ विश्वमोहनस्प त्वा सिद्धस्त्रीकामवर्द्धनम् । वन्दे चित्रायिताशेष-नजारण्यपशुनजम् ।। ३०६ ।। अनाहितप्रमाहौष लतादिमधुवर्षक। सपा पितह सादे पर्नन्यन्छनसेवित ।। ३१० ॥ ब्रह्माद्यतर्कसगीत कामापक-समीक्षण । स्वपदोघृतभूताप वनितातरुमारकृत् ॥ ३११ ।। द्वारा वलदेवजी के प्रसन्नकारक ! मेरी रक्षा कीजिये । इससे गोपियों का परस्पर सापल्य नहीं हुआ । क्सिी गोपी को देते तो अ. वश्य असूया उत्पन्न होती । इसलिये वलदेव जी को आपने उस रत्न को दिया। हे एताटश । आपको नमस्कार है ।। ३०४ ॥ ३०६ ॥ [नम०७५] दिवस मे श्रापमा वनगमन से विरहातुर होकर गोपियाँ श्रा- पका गुणगान करती थीं क्योंकि श्रापका उच्च स्वर से गुण-कीर्तन उनके शोष सागर वा निकारक होता था। श्राप वाम याहु के ऊपर याम यपोल रख चरण के उपर चरण घर भिगी भगी से सडे होते थे। भ्रयुगल यो नचार अपाङ्गाष्टिको छोडते थे। श्रार येणु- पाय मे परम पण्डित हैं । हे विश्वमोहनम्र वाले! हे सिद्धस्त्रिया के पामयद्धय मन में माल पशुओं को चित्र की भाँति कर मेने वाले प्रापकी पन्ना करता हूँ। आप यंशीध्यनि मे नरिया के प्रयाद को रोध परने वाले हैं तया लतानों में मधुरा पो याने याले हैं। यशीध्यनि से मुग्य होपर हमग मे श्राप पारी और से घिर जाते थे। मेर पनपी भोयनार यापकी मया परना था। भारी श्रीकृष्णलीलास्तवः हृतचित्तमृगीप्राप्त-दिनान्तश्रान्तिकान्तित । यमुनास्नानरभ्याग सुसवायु-प्रपूजित ॥ ३१२ ।। ब्रह्मादिवन्द्यमानांचे सुहृदानन्द बद्धन । मदच्छुरितलोलाक्ष मुदिताननपङ्कज ।। ३१३ ।। वनमालापरीताङ्ग गजेन्द्रगतिसुन्दर । गोपिकासावितोत्कर्प हष्टमातृक पाहि माम् ॥३१४ानमः ७६|| * इति दशमस्कन्धे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः * अरिपत्रासिताशेप-बजाश्वासक रक्ष माम् । स्वभुजास्फोटनाहान वृषभासुरकोपन ।। ३१५ ॥ उत्पाटितविपाणाम घातितोप्रवृपासुर । गोकुलारिष्टविध्वंसिन् अरिष्टासुरभजन ।। ३१६ ॥नमः ७७॥ गानाला ब्रह्मादिक के लिये भी दुर्जेय थी। आप ईक्षणमात्र से ना- रियों के हृदय में काम उत्पन्न कर देते थे। आपने निज-चरण से पृथिवी का ताप दूर किया । वनिताये भाव से स्तब्ध हो जाती थीं। हरिणीगण हृतचित्त होकर अापका संग नही छोड़ते थे । जब आप सायाह में गौओं का सम्भाल करते थे तब उनकी विश्रान्ति होती थी। हे यमुना के स्नान से रम्यांग ! हे सुसमय वायु से सेवित ! हे ब्रह्मादि के द्वारा वन्द्यमान चरण ! हे सुहदों के आनन्द बद्धक! हे मद-विवृणितलोचन ! हे प्रसन्नवदन वाले हे वनमाला से चेष्टित ! हे गजेन्द्र गमन से सुन्दर ! हे यशोदा के द्वारा उत्प श्रावित ! हे माता के प्रसन्नकारी ! मेरी रक्षा कीजिये ।। ३०७ । ३१४ ॥ (नम०७६) हे अरिष्टासुर के द्वारा भयभीत समस्त व्रजवासियो को अाश्वा- सन देने वाले ! हे निजभुजों के प्रास्फाटन के द्वारा उसको आह्वान कारो! हे वृपमासुर के कोपकारक ! हे उसके सींग के उत्पाटनकारी! हे वृषभासुर के नाशक ! हे ब्रज में अरिष्टों के विधंसकारी! हे श्र- श्रीकृष्णालीलास्तवः नारदज्ञापितोदन्त-कस-दुर्मन्त्र-वर्द्धन । कंससंप्रार्थिताक र-पुरानयन पाहि माम् ॥ ३१७ ॥ दुष्टोपाय-दुरोद्योग-शताकुलित-कंसराट् । राजाज्ञानन्दिताक र जय दानपतिप्रिय ॥३१८॥ नमः ७८ ।। : इति दशमस्कन्धे पत्रिंशोऽध्यायः * जय गोकुलसंत्रासि-फेशि-विक्षेपण प्रभो । हयासुरमहास्यान्तःप्रवेशितमहाभुज ।। ३१६ ।। हेलाहतमहादैत्य जय केशिनिसूदन । केशवं केशिमथनं वन्दे त्वां देवताचितम् ॥३२०॥नमः ७|| जय भागवतश्रेष्ठश्रीनारद-समीडित । अपरिच्छिन्नसन्मूर्ते सर्वजीवेश्वरेश्वर ॥ ३२१ ।। रिष्टासुरनाशन ! मेरी रक्षा कीजिये ॥३१५ । ३१६ ॥ [नमः ७७] अब ब्रजलीला की समाप्ति कर मथुरा गमन लीला का उद्घा- टन करते हैं-नारद जी के द्वारा आपने कंस को समस्त रहस्य मुना कर उसकी दुर्मन्त्रणा की वृद्धि करायी । कंस ने अकर से आपको मथुरा ले जाने के लिये प्रार्थना की। आपने सब कुछ कराया । आप मेरी रक्षा कीजिये। कंस ने आपको मारने के लिये शत शत मन्द उ. पायों का उद्योग किया। कम की आज्ञा प्राप्त होकर अकर जी बड़े प्रसन्न हुए। हे दानपति श्रक र के प्रिय ! श्रापकी जय हो।।३१७३१८।। [ नम०७] हे गोकुल में भय उत्पादन करने वाले कशी दैत्य को शत धनु परिमित दूरस्थान में फेंक देने वाले ! हे प्रचुरशक्तिमान् ! आपने - यामुर के बदन में अपने विशाल भुजा का प्रवेश कराया तथा हेला मान मे उसे मार डाला। हे फेशीनाशन ! फेशिमयन, देयनामों से अञ्चित पंशय थापकी यन्दना करना हूँ ।।१६।। ३२०॥ [नमः श्रीकृपालीलास्तरः सृष्टिस्थित्यन्तकृन्मायागुणसृक् सत्यवाञ्छित । ऋषिवाक्स्मृतदेवार्थ-स-संहरणादिक ।। ३२० ॥ नारदज्ञापिताशेपवार्य-सीकारकोविद । दर्शनोत्सव-सह-श्रीनारद-नमस्कृत ॥३२३॥ नमः २० ॥ है मेपायितगोपाल-पालन-स्तेयविभ्रम । गोपनेशधर-न्योमचौर्यनीत-मुहद्गण ॥३४॥ दुष्ठयोमासुरग्राहिन् जय ब्योमनिपातन । मयपुनगुहारुद्ध-गोपवर्गविमोक्षक ॥३०॥ नमः ८१॥ * इति दशमस्कन्धे सप्तत्रिंशोऽध्याय. जय धानपतिध्यात-महामहिमसञ्चय ! सल्लक्षणार्थसद्भाग्यान रसम्भावितक्षण ।। ३२६ ।। हे भागवत श्रेष्ठ श्रीनारद जी से सम्यक् स्तुत्य हे अपरिच्छिन्न मूर्ति स्वरूप हे सर्व जीरो के ईश्वर के ईश्वर | श्राप सृष्टि स्थिति अन्तकारिणो माया के द्वारा गुणों का सृजन करते है । हे सत्यस- कल्प | आपने नारद जी के वचन से देवताओं का कार्य-साधन तथा कस के यादि को स्मरण किया । नारद जी के द्वारा कहे गये अशेष काग्यों को परम चतुरता से स्वीकार किया। आपके दर्शन उत्सब से प्रसन्न होकर श्रीनारद जी ने श्रापको नमस्कार किया । हे एतादृश ! आपकी जय हो ॥ ३.२ । ३२३॥ [नम० ८०] हे मेप के आचरणारी गोपालों के पालन में तथा चौर्यली- ला में रिभ्रम यिहारशाली ! उम ममय व्योमासुर गोप वेश धारण कर आपके सस्याओं को चोरी करने लगा। आपने उसे जान लिया तथा उसको पकड लिया । हे न्योमामुर विघातन 'हे मयपुन व्यो- मासुर के द्वारा गुहा मे रुद्ध मनाओं के मोक्षणकारी । अापकी जय हो ।। ३२४१३२५॥ [नम० ८१] दान-पति अक्र र ने आपकी महिमाओं का ध्य न दिया था । शुभल- .
श्रीकृष्णलीलास्तव पादाब्जध्यायकाऽकरलालसानन्दवद्धन । अक्ररथसप्राप्त गोष्ठगोदोहनागत ॥ ३२७ ।। जय दानपतीक्षाप्त क्षितिकौतुकृत्पद । घाफल्फिलुठनाधानपादाम्बुज-रजोनज ।। ३८ ॥ जय वफलकतनय-जयनानन्द-बर्द्धन । रथाप्लापिताक र जयान राभिवन्दित ॥ ३२६ ।। सुप्रीत्यालिङ्गिताक र जय प्रपतवत्सल । गान्दिनी-नन्दनाशेप-मनोगाञ्छित- -पूरक ॥३३०ानम || 8 इति दशमस्कन्धे अधारिंशोऽध्याय 2 अक्र पर्णिताशेषकसदुर्वृत्तिकोपित । देवकीवसुदेवादि-दुस-अपणदु सित ।। ३११ ।। यानामन्त्रितगोपेश मथुरागमनोन्मुस । प्रातमधुपुरीयानभवणाकुलगोकुल ॥ ३३२ ।। के सद्भाग्य से युक्त अकर के सम्भावना हुई । हे आपके चरणा के ध्यानमारी अकर की लालसा प्रसनता के बढाने वाले । श्रार न रथ में बैठ कर आपको देखा । आप गोष्ठम गोनाहनाथ विराजमान थे। हे प्रकार के द्वारा दर्शन प्राप्त ' हे वनपरिती के अलकृतरूप चरण कमल बाले । उस समय अगर जी आपके चरण की रक म लुण्ठित होने लगे। श्रा. पने उन नयनानन्द के पर्द्धक रूप हो फूट कर उन्हे ठाया तथा उन के द्वारा नन्दित हुए । अाप प्रीति के माय न्हें प्रालिद्गन करन लगे। हे प्रणतवत्सल श्रापरी जय हो । इम प्रभार आप अकर जी की अशेष मनोगामना के पूर्णकारी हैं ॥ ३२६ ॥ ३३ ॥ [नम०२] श्रम र जी ने क्म के अशेप मन्द फर्म का वर्णन रिया, श्राप मुन कर प्रोधित हुए । देयकी-यमुदेवादि के दुय या प्रणा कर आप दुषित हुए प्रपनन मथुरा जाने यी मन्त्रग्या की। क्षण रूप धन द्वारा आपके दर्शन की से श्रीकृष्णलीलास्तवः ७१ यशोदाहृदयाशङ्काचिन्ताम्बरशतप्रद । शोकाब्धिपातिताशेषनजयोपिद्गणाऽव माम् ।। ३३३ ॥ शून्यायमानजगतीगोपीजीवन-तापन । गोपीरोदनवार्द्धारासंवर्द्धितनढीगण ॥ ३३४ ।। नमः २३ ।। जयान ररथारूढ़ गोपीरोदनकातर । शकटारूदनन्दादि-गोपालगणवेष्टित ॥ ३३५ ।। गोपीवियोगसन्तप्त राधिकाविरहासह । स्वदूतप्रेममिष्टोक्ति-गोपिकाश्वासनाकुल ॥ ३३६ ।। गोपीहाहामहारावरोदनार्ति-निवतित । मृतप्रायनजवधू-चुम्बनालिङ्गनासुद ॥३३७ ।। प्रसीद सान्ननाभिज्ञ नानाशपथ-कारक । कृतावधिदिनो जीया आशाप्राणप्रदायक ।। ३३८ नमः-४|| आप मथुरा जाने के लिये उन्मुस हुए। थाप प्रभात ऐसा सुनकर समस्त गांकुल व्याकुल होने लगा। उस गमनने यशोदा के हृदय मे शत शत शवाओं का उत्पादन कर दिया। यशोदा चिन्ता- ज्वर मे डूब गयी । समस्त ब्रज की रमणियाँ शोक सागर में डूब गयीं । हे श्रीहरि ! मेरी रक्षा कीजिये । उस समय गोपियों के लिये निजगत् शून्यमय हो गया। उनका हृदय आपकी विरहाग्नि से तपा- यमान होने लगा। उनकी रोदनधारा से ब्रज की नदियाँ बढ़ने लगी ॥३३१ । ३३४॥ [नम० ८३] हे अकर के रथ में पारद ! हे गोपियो के रोदन से कातर! हे शकटारुढ नन्दादि गोपालों से वेष्टित ' हे गोपियों के वियोग से तपायमान ! हे राधिका के विरह से असह्य ! आप उस समय दूता- दि के द्वारा मधुर वचन से गोपियों को आश्वासन देने के लिये व्या. कुल हो गये। गोपिया के हाहाकार महारोदनाति से आप रथ से चूद कर उनसे मिले । मृतप्राय व्रज-वधुओ को चुम्वना- लिंगन के मथुरा जायेगे ७० श्रीकृष्णलीलास्तर श्वाफल्कि सञ्चालितयानवाह गोप गनासवृत-यानमार्गम् । धानीमहारोदनदु सित ला निर्वाक्यनन्दादिधृत नमामि ।। ३३६ ।। मारितस्त्रीकतिपय कतिस्त्रीमूर्छ नाकर । उन्मादितैक्तयथ रोदितस्त्रीसहस्रक ।। ३४० ॥ महार्तस्वरसभग्नकण्ठीकृतमधूशत । प्रसीद रथमार्गाव-पातितैगरलागण ॥ ३४१ ॥ जयाशातन्तुनद्धामु कतिस्त्री-कीर्तनप्रद । मथुरापदवी वीक्षाधुलितेकागनायुत ॥३४२||नम ८५ ।। यमुनामज्जिताक र जयाक ररथस्थित । श्वाफल्लिनलसनष्ट परमाश्वर्यदर्शक ॥ ३४३ ।। * इति दशमस्कन्वे एकोनचत्वारिंशोऽध्याय 8 द्वारा प्राणदायर हुए । हे सान्त्वना देने में परमचतुर हे नाना शपथकारी । आप प्रसन्न हों। हम"परश्व अवश्य आवेगे" इस प्रकार शत-शत शरय के द्वारा उनको कुछ आशा देकर उनके प्राण प्रदायक हए ।। ३३५-३३८ ।। (नम ८४) अन र के द्वारा शीत्र गति से चलायमान रय के उपर बैठने वाले, गोपागनाओं से रथ के मार्ग में घेरे हुए, माता यशोदा के म. हान् रोदन से दुग्वित, वचनशून्य नन्दादिकों से धृत श्राप को नमस्कार करता हूँ। ३३६ ।। उस समय बहुत गोपियाँ मृनप्राया हो गई । कुछ तो मूळ को प्राप्त हो गई । हे गापीयूथ के उन्मानकारी हे हतारों स्त्रियों को रोदन कराने वाले हे मगन् आतनाह मे युक्त शन शत प्रज: वधुओं के कठरोध कराने वाले श्रार प्रसन्न हों। अापके रथ-मार्ग मे श्ररलागण गिरे हुए थे। श्रापसी श्राशाम्प सून के द्वारा उनका प्राण पॅच पाया, वे मन केवल आपका कीर्तन परन लगी। मथुरा मार्ग में पानी देन पर शत शत अगना व्याकुल हो गई। 1 श्रीकृष्णलीलास्तवः ७३ अकरसंस्तुतानादे पद्मनाभादिकारण । जगदुर्विज्ञेयगते भजमानैकगम्य हे ॥ ३४४ ॥ नानायज्ञार्चनीयाने नानाख्यारूपमार्गभाक् । सर्वगत्यापगाम्भोधे सर्वदेवमयेश्वर ॥ ३४५ ॥ जगदाश्रयसवान ब्रह्माण्डालिगुहोदर। शोकनानन्दद श्रीमढवतारावलीयशः ॥ ३४६ ।। नानाकार्पण्यविज्ञापि-मुमुक्ष्वक रयाचित । स्वप्रेमभक्तिसत्संगदायिस्वैककृपाभर ॥ ३४७ ।। गोप्यवज्ञाहताक रशुष्क्स्तोत्राभिवन्दित । पितृव्य-विस्मयोदन्तप्रच्छकाद्भुतसागर ॥ ३४८ नमः ८६|| * इति दशमस्कन्धे चत्वारिंशोऽध्यायः १ एतादृश! आप की जय हो ।। ३४०-३४२ ॥ आपने अक्र र जी को यमुना मे मजन कराया। हे अकर स्थ में स्थित ! आपको अक्र र जी ने जल मे भी देखा । आपका द. र्शन परमाश्चर्य पूर्ण है । आपकी जय हो । ३४३ ॥ हे अकर के द्वारा संस्तुत ! हे अनादि ! हे कमलनाभ ! हे श्रा- दिकारण ! हे जगत् के दुविज्ञेय गति वाले ! हे भक्तगम्य ! हे नाना प्रकार यज्ञादि के द्वारा अञ्चितचरण । हे नाना प्रकार नाम रूप-मार्ग विशिष्ट ! हे नदियों के समुद्र की भॉति विविध उपासकों के परम आश्रय ! हे सर्व देनमय । हे ईश्वर ! हे सांग रूप से जगत् के आश्रय स्वस्प ! हे ब्रह्माण्ड समूहके स्थित गुहा की भाँति उदरवाले। आपके सक्ल अवतार शोकनाशक आनन्दप्रद श्रीयुक्त होकर घोपित हैं । नाना प्रकार के दैन्य से युक्त अक्र र के द्वारा आपकी मुक्ति प्रा- थित है। आपकी कृपा निज प्रेमभक्ति और सत्संग का दायक है। हे गोपियों के द्वारा अरज्ञा पूर्वक पाहत प्राप्त सम्यग अपराधी श्र- कर के द्वारा भक्तिरहित स्तोत्र से अभिवन्दित ! हे पितृव्य अक्र अकर श्रीकृष्णलीलास्तवः मथुरोपवनप्राप्त-नन्दादि-स्वजनावृत । व्रजात्र्तिकारणाक रगृह्यानार्थनाकर ॥ ३४६ ।। स्वलंकृतमहाश्चर्यपुरीदर्शन-हर्पित । पुरस्त्रीवृन्द-नयन-मनोहर नमोऽस्तु ते ॥ ३५० ॥ दध्यादिमङ्गलद्रव्यद्विजातिकृतपूजन । पुरस्त्रीकृत-गोपस्त्रीपुण्यश्लाघातिनिवृत ॥३५॥नमः २७॥ मथुराजनसंवीक्ष्य रजकांशुकयाचक । दुर्मुखाक्षेपसंक्रुद्ध रङ्गकार-शिरोहर ॥ ३५२ ॥ निजप्रियाम्बरद्वन्द्व-परिधान-विभूपित । अभीष्टवस्त्र-संहष्टरामगोपालिसंयुत ॥ ३५३ ॥ प्रसीद वायकोन्नीतचैलेयाकल्पभूषित । नानालक्षणवेशादय हे वायकवरप्रद ।। ३५४ ॥ नमः ८८ ॥ जी के लिये विस्मय से वार्ता के पूछने वाले ! हे अद्भुतता के सागर! आपकी जय हो ॥ ३४४ । ३४॥ (नम०८६) हे मथुरा के उपवन में प्राप्त नन्दादिक स्वजन से परिवृत ! हे प्रज की आत्ति के कारणस्वरुप अक्र र के द्वारा निज गृह में गमन के लिये प्रार्थित !हे नाना प्रकार से अलंकृत महान् आश्चर्य्य युक्त म- थुरापुरी दर्शन से परम प्रसन्न ! हे मथुरापुरी की रमणीगणके नयनों में मनोहर ! हे दध्यादि मङ्गलद्रव्य से ब्राह्मणों के द्वारा परिपूजित ! हे पुरस्त्रीगण के द्वारा गोपस्त्रियों की प्रशंसा से अत्यन्त आनन्दित ! आपको नमस्कार है॥३४६।३५१ ।। (नम००७) हे मथुरावासियों के द्वारा दर्शनीय ! हे रजक के निकट वस्त्रया. चक ! हे दुर्मुस रजक के पाक्षेप वचन से युद्ध ! हे रजक के शि. रोन्छेदक ! हे निज प्रिय वन्न युगल के परिधान से शोभायमान ! हे पान्छनीय वस्त्र प्राप्ति से संहष्ट राम-गोपालों से युक्त ! हे यायक के द्वारा नीन यन्त्र भूपण, विविध अलंकार से भूपित ! हे नाना प्रकार श्रीकृष्णलीलास्तवः ७५ प्रसीद हे सुदामाण्यमालाकारगृहागत । मालिकप्रीतिपूजाप्तमाल्यवद्भनिसंस्तुत ॥ ३५५ ।। सुगन्धिनानामालालिस्वलंकृत नमोऽस्तु ते । सुदामाभीप्सितवरवाञ्छातीतवरप्रद ।। ३५६ ॥ नमः ८६ ॥ * इति दशमस्कन्धे एकचत्वारिंशोऽध्यायः सहासनर्मसंप्रश्नार्थितकुन्जानुलेपन । कुठजादत्तागरागाढय सैरिन्ध्रीचित्तमोहन ॥ ३५७ ॥ कुन्जानुलिप्तसाग हेऽङ्गरागानुरञ्जित । त्रिवक्रावक्रताहतः कुब्जासोन्दर्यदायक ।। ३५८ ।। कुब्जाकृष्टाम्बरधर कुजाचेप्टातिहासित । कृतकुजासमाश्वास जय कुब्जावरप्रद ।। ३५६ ।। नमः १०॥ नानोपायन-नाव्बूल-गन्धादि-वणिगचित । जब चित्रायिताशेषपुरस्त्रीगणवीक्षक ॥३६० ॥ वेप से युक्त ! हे वायक के वरदाता ! आप प्रसन्न हों ॥३५२-३५४।। (नम०८८) हे सुदामा नामक मालाकार के गृह मे स्वयं उपस्थित ! हे उसके द्वारा परिपूजित ! हे माल्यधारी ! हे भक्ति के द्वारा संस्तुत ! हे सुगन्धि नाना माला से अलंकृत ! हे सुदामा को वाञ्छातीत इप्सित वर के देने वाले ! आपको नमस्कार है ।। ३५५ । ३५६ ॥ (नम० ८६) हे हास्य-परिहास-प्रश्नो के द्वारा कुञा से अनुलेपन याचना बाले ! हे कुब्जा के द्वारा प्रदत्त राग से युक्त ! हे सैरिन्ध्री के चित्तमोहन ! हे उसके द्वारा सर्वागलिप्त ! हे अंगराग से अनुरञ्जित !हे विवका के वक्रताहारी ! हे उसके लिये सौन्दर्य्यदायक ! हे कुब्जा के द्वारा वस्त्राञ्चलधृत ! हे उसकी चेष्टा से अत्यन्त हास्ययुक्त ! हे कुब्जा को आश्वासन देन वाले । हे कुजा के वरदावा ! आपकी जय हो।॥३५७- ३५६ ॥ (नमः ६०) ७६ श्रीकृष्णलीलास्तवः जय प्रफुल्लनयन लीलाहसितलोचन । मत्तनागेन्द्रगमन नागरीगणमोहन ।। ३६१ ॥ धनुःस्थानप्रश्नकर जयाद्भुतधनुर्धर । लीलासजीकृतेष्वास कंसकोदण्डखण्डन ॥ ३६२ ॥ धनूरक्षकवृन्दघ्न कंसप्रेपितमैन्यहन् । कंसातित्रासजनक शकटावाससंगत ॥ ३६३ ॥ नमः ६१ ॥ 8 इति दशमस्कन्धे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ।। कंसकारितमञ्चौघ रंगभूगमनोत्सुक । जीयात् कुवलयापीडगजरुद्धपथो भवान् ॥ ३६४ ॥ संक्र द्धाम्बष्ठनिद्दिष्ट करीन्द्रक्रीडिताऽव माम् । सद्यः कुवलयापीडघातिन सिंहपराक्रम ॥ ३६५ ॥ समुत्पाटितनागेन्द्र महादन्त-वरायुधम् । वन्दे कुवलयापीडमई हतहस्तिपम् ।। ३६६ ॥ नमः ६२ ।। हे वणिक के द्वारा नानोपहार-ताम्बूल-गन्धादि से अञ्चित ! उस समय श्रापका दर्शन कर पुरस्त्रियाँ चित्र की भाँति हो गयी थीं । हे एतादृश : श्रापकी जय हो। हे प्रफुल्लनयन ! हे लीलाओं से हसित कटाक्ष दृष्टि-पातकारी! हे मत्त गजराज की भाँति गमन करने पाले ! हे नागरीगग के मोहन ! श्राप ने उस समय धनुः स्थल का प्रश्न किया । है अद्भुत धनुर्धारी ! हे लीलामात्र से धनुः को गींचने वाले ! हे फंस कोदण्ड के खण्डनहारी ! हे धनुप के रक्षकवृन्द को मारने थाले ! हे फंस के द्वारा प्रेपित सैन्य के नाशक ! हे फंस को अति भ. यभीत करने वाले ! हे शकटावास में गमनकारी ! आपकी जय हो ॥३६०-३६३ ॥ (नमः ६१) हे कंम के द्वारा कृत मच्चों में तथा रंगभूमि में गमनोत्सुफ ! हे यु- पनयारी नामक गज के द्वारा रुद्ध ! थापकी जय हो। जिम समय इतिर ने इस्ति की पालना को थी,आप उस समय उससे क्रीड़ा करने श्रीकृष्णलीलास्तवः रंगप्रवेशमुभगीरश्रीपरिभूपित । स्कन्वन्यस्त-महाहन्त मदरक्तकणाङ्कित ॥ ३६७ ॥ प्रसीट स्वेटकणिकालकृताननपड्वज । रङ्गस्थलोकाभिप्रायभाताशेपरसात्मक ॥ ३६० ।। महावीर महारम्य महास्मर महासुहत । महेश्वर महाग्निग्ध महाकाल महागुरो ॥ ३६६ ।। महानत्त्व महासेव्य सर्बलोर-मनोहर । मप्रेमेक्षकमञ्चस्य-लोकगीत-महायशः ॥ ३७० ॥नमः शा चाणूरभापितं वन्दे चारोत्तरदायरम् । चाणूरातिपराक्रान्त मल्लयुद्धविशारदम् ॥ ३७१ ॥नमः ६४|| इति दशमस्कन्धे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः लगे। शीघ्र ही आपने उसको मार डाला । हे सिंहपराक्रम ! मेरी रक्षा कीजिये । आपने उसके दोनों दॉतों को उग्याड़ कर आयुध व. नाया। हे कुवलयापीट के नाशक । हे हस्तिप के घातक! आपकी वन्दना करता हूँ। ३६४-३६६ ॥ ( नमः ६२) हे रंगमञ्च मे प्रवेशयोग्य सुन्दर वीरश्री से परिभूपित ! आ. पने उन दाँतों को अपने कन्धे मे रय लिया। आप मदधर्म और रक्तकणों से अपित हो गये । आपका मुसकमल स्वेद-कणिका से अलंकृत हो गया था । रंगस्थल में लोकों के अभिरुचि के अनुसार उस ही प्रकार आप अनुभूत होने लगे। क्योंकि आप अशेष रसा- स्मक स्वरूप हैं। हे महान वीर ! हे परमकमनीय ! हे अप्राकृत महान् कन्दर्प ! हे महासुद्धत् ! हे महान ईश्वर हे महान् कोमल ! हे महान् कालरूप ! हे महान गुरुस्वरूप हे महान तत्त्व ! हे परमसेव्य ! हे सर्वलोक के मनोहर ! हे मञ्चभूमि में स्थित दर्शकों से प्रेम के माय गीयमान महायश! आप प्रसन्न हों ॥३६७-३७०।। (नमः६३) हे चाणूरमल्ल से भापित ! हे उसको उत्तर देने वाले ! हे उसको ७ श्रीकृष्णलीलास्तवः (नमः ६४) सहजप्रेममृदुल पुरस्त्रीगणशोचित । पुरस्त्रीनिन्दिताशेपसभ्यलजातिलज्जित ।। ३७२ ।। स्त्रीगणोद्गीतमहिम-नजस्त्रीश्रुतिहर्पित । पितृमातृमहात्तिज्ञ जय चाणूरमईन ।। ३७३ ।। शलतोपलसंहर्त लघातिकमुष्टिक। विद्रावितान्यमल्लौघ राम-पातितकूटक ।। ३७४ नमः ६ उच्चमञ्चस्थदुर्घत्तकसदुर्वाक्यकोपित । आत्तासिचर्म-सञ्चारिकंसकेशग्रहोद्धत ॥३७५ ।। भूमिपातितभोजेन्द्र कंसोपरिविकूदित । कंसध्वंसन कंसारे जय कसनिसूदन ।। ३७६ ।। निज विक्रम प्रकाशकारी! हे मल्लयुद्ध में विशारद ! आपकी बन्दना करता हूँ॥ ३७१ ॥ सहज प्रीति से मृदुल पुरस्त्रियों के द्वारा "क्या होगा दुष्ट कंस क्या करेगा" इस प्रकार विचार किया गया था। पुरस्त्रियों ने अशे- प सभासदों की निन्दा की। उससे आप लज्जित हो गये । पुररम. णियों ने ब्रजस्त्रियों की महिमा का गान किया। आप उसे सुन कर बड़े प्रसन्न हुए। हे पिता-माता के महान् प्राति को जानने वाले ! हे चाणूरमर्दन ! हे शल-तोपल को मारने वाले ! हे वलराम जी के द्वारा मुष्ट्रिक को मारने वाले ! उस समय अन्य अन्य मल्लगण श्रापको मारने के लिये दौड़े। राम ने कूटक को मारा। हे एता- दृश ! आपकी जय हो ॥ ३७२-३७४ ॥ (नमः ६५) हे उच्च मञ्च में स्थित दुष्ट कंस के दुर्वाश्य से क्रोधप्राप्त ! हे असिचर्मधारी चलायमान कंस के केश पहा में उद्धत ! हे फम को पृथ्वीम गिराने पाले !हे उसके ऊपर कूदने वाले ! हे कंसध्वंमोन् ! हे कसारे ! हे फंस निसूदन ! आपकी जय हो । आप ने पृथिवी के भय, भार तथा प्राप्ति का दूर किया ! है जग में दुष्यों के विनाशक !
श्रीकृष्णलीलास्तरः ७६ हतोऊभयभारात जगच्छल्यविनाशक । पितृमातृप्रहार्थ-मृतकस-विकर्षक ।। ३७७ ।। ब्रह्म शादिसुरानन्दिन् कालनेमिविमुक्तिद । चलघातितदुप्राप्टक्स-सोदर पाहि माम् ।।३७८|| नम ६६|| कसयोपित्समाश्वासिन्नादिप्रमृतसक्रिय । पितृमातृपदानम्र पितृ पन्ध-विमोक्षक ॥ ३७६ ।। नम. १७ ॥ के इति दशमस्कन्धे चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय * ईशजानाकृतारलेपजननीतातभाववित् । स्नेहार्द्धन-मिष्टोक्ति-पितृमाप्रमोटकृत् ।। ३८० ॥ प्राप्तालिङ्गनमुन्मातृतात-कोडाधिरोपित । स्नेहयापितृमानश्रुधारा-स्नापितमस्तक ।। ३८१ ।। परमानन्दित श्रीमद्देवक्यानक्दुन्दुभे । जय प्रेमसुसान्छादि है-ज्ञान दु सनिमारक ॥३८॥नम ६८।। हे पिता माता के हर्प के लिये मृत कस को सींचने वाले हे ब्रह्म- शिवादि देवताश्रा को आनन्दित करने वाले ' हे कालनेमि के मुक्ति हे पलदेव के द्वारा क्स के पाठों भ्राताओं को मारने वाले। मेरी रक्षा कीजिये ।। ३७५-३५८॥ (नम ६६) हे क्स की स्त्रियों को आश्वासन देने वाले ' हे मृत क्स की सत- क्रिया के लिये आदेशकारी ' हे पिता माताके चरणोंमे नमस्कार करने वाले हे पिता के वन्धन के विमोचक ! आप रक्षा कीजिये ॥३७६!! (नम ६७) ईशता ज्ञान से माता पिता ने आप का आलिङ्गन नहीं किया। आप भी उनके भार को जान गये । हे स्नेहवर्द्धन तथा मधुर वचनों से पिता माता के प्रमोदकारी हे स्नेह के वश श्रालिङ्गन प्राप्त होकर उनके प्रोडदेश मे प्रारोहण करने वाले स्नेह वचन के साथ पिता माता की धारा से प्रापका मस्तक धौत हो गया।हे देवकी और दाता
श्रीकृष्णलीलास्तवः
सद्वाक्यानन्दित-श्रीमदुप्रसेनाधिपत्यद ।
दत्तोग्रसेनराज्यश्रीरुप्रसेननिदेशकृत् ।। ३८३ ।।
प्रसीदतान् मे भगवन् भक्तवत्सलनामधृक् ।
उग्रसेन-वशानीत-त्रिलोकीरत्न सञ्चय ॥ ३८४ ॥नमः ६६]
पानीतकंससन्त्रास-प्रोपितज्ञातिवान्यव ।
जय सम्मानिताशेप-यादवावासदायक ।। ३८५।।
सदा दयास्मितालोकानन्दिताखिलयादव ।
जय रोगजराग्लानिहारि-सन्दर्शनामृत ।। ३८६ ।।
प्रसीद सात्वतश्रेष्ठ यादवेन्द्र प्रसीद मे।
वृष्णिपुङ्गव मां पाहि दाशार्हाधिप माधव ॥ ३८७ ।।
कुकुरान्धकवंशेन्द्र भैमान्वयविवर्द्धन ।
ययातिकुलपद्मार्क चन्द्रवंशाब्धिचन्द्रमः ।।३८८ानमः १००॥
आनकदुन्दुभि यमुदेव के परमानन्दकारी! आपने प्रेमसुख के द्वारा
उन के ज्ञान का आच्छादन किया । हे दुःखनिवारक ! श्राप की जय
हो ॥ ३८०-३८२॥
(नमः १८)
हे सद्वचनों से आनन्दित उपसेन के लिये प्राविपत्य (राज.
पद) को देने वाले ! हे उग्रसेन के लिये राजलक्ष्मी के प्रदाता! हे
उपसेन के आज्ञावह ! हे भगयान ! हे भक्तवत्मल नामधारी ! श्राप
ने उग्रसेन के वश में तीनों जगत् के रत्नों का सञ्चयन किया। श्राप
मेरे लिये प्रसन्न हों ।।३-३-३८४ ॥
(नमः ६६)
कंस से भयभीत होकर इधर-उधर चले जाने वाले वन्धुओं को
श्रापन बुलाया तथा सकल यादयों को मम्मानित कर वाम कराया।
थापको जय हो । निरन्तर दया स्मितावलोकन के द्वारा सफल यादयों
यो आनन्दित किया । श्रापका दर्शन रोग-जरा-ग्लानि का नारा करने
पाला है। आपकी जय हो। हे सात्वत! आप प्रमन्न हो । हे
यादयेन्द्र ! मेरे ऊपर प्रमन्न हो। हे वृष्णि! हे दाराई के अधिप !
१ श्रीकृष्णलीलास्तवः जय श्रीमथुरानाथ मथुरामङ्गल प्रभो। मधुरामूर्तमाधुर्य्य मथुरामण्डलेश्वर ।। ३८६ ।। नित्यत्रीमथुरावासिन् मधुरामाधुरीप्रद । हे माथुरगहाभाग्य नमस्त मथुरापते ॥ ३६० ।। नमः १०१॥ अद्यश्वोगमनव्याज-रादेतब्रजनायक । प्रसीद मुहुराश्लेपनन्दसम्भापणाकुल ।। ३६१ ।। नानावाक्चातुरीदीन-नन्दरोदनवर्द्धन । अत्यालिङ्गनगोपालकुलदुःसाश्रुवाहक ॥ ३६२॥ मुहुमु ह्यत्पतवृद्ध-नन्दसान्त्वनकातर । वासोऽलङ्कारकुप्यादिदान-मारितनन्द हे ।। ३६३ ॥ हे माधव ! हे कुक्कुर और अन्धक वंश के इन्द्र! हे भैमवंश के व. द्धक ! हे ययातिवंश पद्म के सूर्य्यरुप ! हे चन्द्रवंश सागर के च- न्द्रमा ! मेरी रक्षा कीजिये । (सात्त्वत-यदु-वृष्णि दाशाह -मधु-कुक्कुर- अन्धक भोज ये आठ यदुवंश के भेद है) ॥३८५-३८८(नमः १००) हे मथुरानाथ ! हे मथुरामङ्गल ! हे प्रभो ! हे मथुरा में विग्रहधारी माधुर्य ! हे मथुरामण्डल के ईश्वर ! हे नित्य मथुराविहारी ! हे म. थुरा के माधुर्य को बढ़ाने वाले ! हे माथुरों के महान् भाग्य ! हे मथुरापति ! आपकी जय हो । ३८६-३६० ॥ (नमः १०१) हे आज कल आऊँगा इस प्रकार की प्राश्वासन से ब्रजेश्वर के प्राणरक्षक! हे यार वार आलिङ्गन प्राप्त होकर नन्द के साथ सम्भा- पण में व्याकुल ! आप प्रसन्न हों । नाना प्रकार की वाकचातुरी कर- ने (दिखाने) पर भी श्रीनन्द दीनता के साथ रोदन करने लगे। गोपालों को श्रापने आलिङ्गन किया। उनकी दुःखमय अश्रुधारा बहने लगी । ब्रजराज वार वार मूर्छित होकर गिरने लगे। आप उनको सान्त्वना देने में कातर हो गये। आपने वस्त्र, अलार, पात्रादि का प्रदान किया परन्तु उससे उनको अधिक मनःसन्ताप बढ़ने लगा। वे 'श्रीकृष्णलीलास्तवः -- . हाहा-महारवान्दि गोपवृन्दात्मशोकद । जलसेकाापानीत-नन्दप्राण प्रसीद मे ॥ ३६४ ॥ वरागमनसोक्तिविश्वस्तीकृतनन्द माम् । पार्वे रक्ष सुसन्देशयशोदादेन्यवद्धन ॥ ३६५ ॥ मुहुमुहुः परावर्तमाननन्दाश्रुसंप्लुत । नन्दानुप्रजनंव्याज ब्रजदीनजनामुद ।। ३६६ ॥ गोप्यर्थप्रेपितस्वीयभूपा-शपथवाचिक । निरुध्यमाननेत्राज-वारिधार प्रसीद मे ।। ३६७ नमः१०२॥ ॐ इति श्री भागवनम् 88 श्रीजगन्नाथ नीलाद्विशिरोमुकुटरत्न है। दारुब्रह्मन् घनश्याम प्रसीद पुरुषोत्तम । ३६८।। प्रफुल्लपुण्डरीकाक्ष लयसाधितटामृत! गुटिकोदर मां पाहि नानाभोगपुरन्दर ॥ ३६६ ।। मृतवत् हो गये। गोपवृन्द ने हा हा महारव से क्रन्दन किया । श्राप उन सबके विरह दानके भागी हुए । आपने जलादि लेकर सेवासे नन्द के प्राण को फिराया । आप प्रसन्न हो । "मैं शीघ्र आऊँगा" "सत्य करता हूँ" इस प्रकार यचनों मे नन्द के लिये विश्वसित किया । हे मुग्यमय सन्देश के द्वारा यशोदा के दैन्य को बढ़ाने वाले ! आप मुझे अपने पास रसिये । ह यार यार परावर्तमान नन्द के अनुजल से सिञ्चित ! हे नन्द के अनुगमन के छल से प्रज के दीन-जन के मुग्नदाता! पाप गोपियों के लिये शपथ देकर निज भूपा-अलद्वार को भेजने लगे। पाप मड़े यल से नयन-कमलों के यारि-धारा को रोकने लगे। आप प्रसन्न हो ॥ ३६१-३१७॥ (नमः १०२) श्रय नीलाचलनाय की स्तुति करते है-हे श्रीजगन्नाय ! हे नीलाद्रि शिवर के मुकुटरत्न!हे दारुसंधा! हे घनश्याम ! हे पुरु. पोसम ! श्रार प्रसन्न हो । हे प्राल्न कमलनयन! है लपण समुद्र श्रीकृष्णलीलास्तयः ५३ - निजावरसुवादायिन्निन्द्रद्युम्न-प्रसादित । सुभद्रालालनव्यग्र रामानुज नमोऽस्तु ते ॥ ४०॥ गुण्डियारथयात्रादिमहोत्मवविवद्धन । भक्तवत्सल वन्दे त्वां गुण्डिचारथमण्डनम् ॥ ४०१॥ दीनहीनमहानीच-दयार्दीकृतमानस । नित्यनृतनमाहात्म्यदर्शिन चैतन्यवल्लभ ।।४०२॥नमः१०३।। श्रीमच्चैतन्यदेव त्यां वन्दे गौराङ्गसुन्दर । शचीनन्दन मा प्राहि यतिचूडामणे प्रभो ॥ ४०३ ।। श्राजानुवाहो स्मेरास्य नीलाचलविभूषण । जगत्प्रवर्तित-स्वादुभगवन्नामकीर्तन ॥ ४०४ ।। के तट में मुबास्वरूप ! हे नाना भोगविलासी ! श्रापके नाभिकमल में शालग्राम शिला मौजूद है । आप मेरी रक्षा कीजिये । ह निज- अवरामृत महाप्रसाद के दाता ! हे इन्द्रद्युम्न राजा के प्रसन्नकारी ! हे सुभद्रा जी के लालन में व्यप्र ! हे बलदेव के अनुज ! आपको नमस्कार है । हे गुण्डिचा-रथयात्रादि महोत्सव के वर्द्धक ! हे भक्तवत्सल ! गुण्टिचा रथ के मण्डन! आपकी वन्दना करता हूँ। आप दीन-हीन-महान् नीचों पर दया करने में स्निग्ध हृदय वाले हैं । नित्य नवीन महिमा के दिखाने वाले हैं। आप निज स्वरुप श्रीचैतन्यमहाप्रभु के वल्लभ अर्थात् प्रास्वाद्य विपय हुए थे ४०१-४०२॥ ( नमः १०३) हे श्रीचैतन्यदेव ! हे गौरांगसुन्दर ! हे शचीनन्दन ! हे स. न्यासिचूडामणि ! हे प्रभो ! मेरा प्राण कीजिये । हे आजानुलम्बित भुज वाले ! हे मन्दहास्य से युक्त ! ह नीलाचल क्षेत्र के विभूपण हे जगत् में मधुर निज नाम कीर्तन के प्रवर्तक ! हे अवताचा. र्य से प्रशंसित !हे वासुदेव-सार्वभौम को निरन्तर प्रसन्न करने बाले !हे रायरामानन्द मे प्रीतिकारी! हे सकल वैष्णवजन के वा- ॥ . .
1 RA- श्रीकृष्णालीलास्तवः अवताचार्य-संश्लाघिन सार्वभौमाभिनन्दक। रामानन्दकृतप्रीत सर्ववैष्णववान्धव ॥ ४०५ ॥ श्रीकृष्णचरणम्भोज-प्रेमामृत-महाम्बुधे । नमस्ते दीनदीनं मां कदाचित् किं स्मरिष्यसि ॥४०६ानमः१०४।। नमो ब्राहाणरूपाय निजभक्तस्वरूपिणे। नमः पिप्पलरूपाय गोरूपाय नमोऽस्तु ते ।। ४०७ ।। नानातीर्थस्वरूपाय नमो नन्दकिशोर ते । सर्वदा लोकरक्षार्थरूप-पञ्चकधारिणे ॥ ४०८ निमः १०।। पापागधातुमृद्दारुसिकतामणिलेखजा । सप्तधा ते प्रतिकृतिरचला वा चला प्रभो ॥ ४०६ ।। शालग्रामशिला चाथ यत्र कुत्राप्यवस्थिता। यादशी तादृशी वापि भक्तैर्भक्त्याभिपूजिता ।। ४१० ।। न्धव ! निज रूप श्रीकृष्ण के चरणाम्भोज प्रेमामृत के महान् सागर आपको नमस्कार है। दीनातिदीन सुझे क्या कभी श्राप स्मरण .क. रेंगे?॥४०३-४०६ ।। (नमः १०४) हे ब्राह्मण रूप ! हे निज भक स्वरूप ! हे पिप्पल रूप ! हे गो- स्वरूप श्रापको नमस्कार है । इन चारों स्वरूपों में भगवान विराज- मान रहते हैं । इन्हें भगवत् रूप से पूजा करें। हे नाना तीर्थस्वरूप नन्दनन्दन ! सदा सर्वदा लोकरक्षार्थ ये पञ्च स्वरूप धारी श्राप को नमस्कार है॥४०७-४०८॥ (नमः १०५) हे प्रभो ! पापाणमयी-यातुमयो मृण्मयी दारुमयी सिकतामयी-मणि- मयी-चित्रमयी ये मातों चल-अचल आपकी प्रतिमा है । जिम प्रभार शालप्रामशिला जिस किसी भी स्थान में क्यों नहीं हो, ग्यपिटता या अरएिटता क्यों न हों, मतगण उसकी भक्तिभाव से पूजा करते हैं, ठीक उसी प्रकार इन पाठ प्रकार के अनचा-विग्रह में मतगण या पके स्वरूप पा निर्देश कर पूजा करते हैं। ये सब प्रत्येक मचिदा.
श्रीकृष्णालीलास्तवः भवताधिष्ठिता सा सच्चिदानन्दरूपिणी । त्वमेव कथ्यसे सद्भिस्तस्मै तुभ्यं नमो नमः ॥४१शानमः१०६।। सर्वशास्त्राब्धिपीयूष सर्ववेदैकसफल । सर्वसिद्धान्तरत्नाढय सर्वलोकैकहकप्रद ।। ४१२ ॥ सर्वभागयतप्राण श्रीमद्भागवतप्रभो । वलिध्वान्तोदितादित्य श्रीकृष्णपरिवर्तित ॥४१३ ॥ परमानन्दपाठाय प्रेमवर्घ्यक्षराय ते । सर्वदा सर्बसेव्याय श्रीकृष्णाय नमोऽस्तु मे ॥ ४१४ ॥ मदेकवन्धो मत्सगिन् मद्गुरो मन्महाधन । मन्निस्तारक मद्भाग्य-महानन्द नमोऽस्तु ते ॥ ४१५ ।। असाधुसाधुतादायिन्नतिनीचोच्चताकर । हा न मुञ्च कदाचिन्मां प्रेग्ना हृत्कण्ठयोः स्फुर।।४१६॥नमः१०७।। नन्द रुप हैं । इन सब में आप अधिष्ठित हैं । अतएव ह समस्त अचर्चाविग्रहगय! आपको नमस्कार है नमस्कार है ॥४०६-४११।। (नमः १०६) अव श्रीभागवत की स्तुति करने हैं-हे सकल शास्त्र सागर अमृत स्वरूप ! हे समस्त वेद के सत्फल ! हे सर्व सिद्धान्तरत्नों से युक्त ! हे समस्त लोगों की दृष्टि के दाता ! हे समस्त सजनों के प्राण ! हे भागवत प्रभु ! हे कलि अन्धकार में उदय प्राप्त सूर्य स्वरुप !हे श्रीकृष्ण के प्रतिरूप ! हे परम आनन्दमय पाठ स्वरूप ! हे अक्षर अक्षर में प्रेम वर्पाने वाले ! हे निरन्तर सबके सेवनीय है भागवतरूप श्रीकृष्ण ! मेरा तुमको नमस्कार है । हे मेरे एक मात्र यन्धु ! हे मेरे साथी ! हे मेरे गुरु ! हे मेरे महान धन स्वरूप ! हे मेरे निस्तारक ! हे मेरे भाग्यरुप ! हे मेरे आनन्द स्वरूप तुम को नमस्कार है । तुम असाधु को साधु तथा अतिनीच को ऊँचा बनाने वाले हो । मुझको कभी त्याग मत करना । प्रेम से मेरे हृदय-कण्ठ में ।
. श्रीकृष्णलीलास्तवः श्रीकृष्ण तव कारुण्य-महिम्ने मे नमो नमः । यो मां नीचं दुराचार नित्यपाएरतं शठम् ।।.४१७।। अहो तस्या अवस्थायाः सतामिव दशामिमाम् । तस्मात् स्थानादिदं स्थानं मथुरामण्डलं शुभम् ।। ४१८।। यस्मिन् नानकृतं वापि सर्वपापं न तिष्ठति । चतुर्दा यत्र मुक्तिः स्यात्त्वं च सन्निहितः सदा ॥ ४१६ ।। यस्मिन् स्वसन्महिम्नेवार्थितो वससि नित्यदा। निजमाधुर्यसम्पत्त्या मधुरेति यदुच्यते ।। ४२० ।। तथा तस्माच्च दुःसङ्गाद् यस्त्वप्रियतमस्य हि । श्रीमच्चैतन्यदेवस्य सङ्ग नीलाचले तथा ।। ४२१॥ रथोपरि तव श्रीमन्मुखदर्शन-कौतुकम् । पुनर्वृन्दावन ह्य तत् तत्ताक्रीडास्पदं तव ॥ ४२२॥ . । स्फूर्ति वाले हो ।। ४१२-४१६ ॥ (नमः १०७) हे श्रीकृष्ण ! आपकी कृपा महिमा को मेरा बार बार प्रणाम है। जो आपकी करुणा ने नीच-दुराचारी-नित्य पापाचारी- -शठ मेरा उस महाजघन्य राजसेवक अवस्था से उद्धार कर मुझे सदाचारयुक्त इस साधु अवस्था का दान किया है । तात्पर्य यह है कि मैं विषयीजनों से कलुपित राजदरबार में निमग्न था। उस पद से मुमको निकाल कर समस्त मङ्गल के निधान मथुरा मण्डल में वास दिया। उस मथुरा में अज्ञान कृत पापों की वार्ता तो दूर रही, ज्ञान कृत सफल पाप भी जहाँ नहीं ठहर सकते हैं । जहाँ सालोस्यादि चार प्रकार की मुक्ति स्वयं प्राप्त हो जाती है अथवा जहाँ जन्म, उपनयन, मृत्यु, प्राप्त होने पर मनुष्यों की मुक्ति होती है । जहाँ श्राप निरन्तर विरा- जमान हैं । जहाँ आप अपनी प्रत्युत्कृष्ट महिमा का सार प्रकट कर सर्वदा विलास करते हैं और जो स्थान अपने माधुर्य सम्पत्ति के भाववश "मघुरा" करके कहा जाता है। आपकी उस फर ने दु:- श्रीकृष्णलीलास्तवः गोपिका यस्य सत्कीर्ति भवांश्चावर्णयन् गुंणान् । दूरम्याः श्रवणद् यस्य लभन्ते प्रेम ते शुभाः।। ४२३ ।। चराचरं प्राणिनातं यस्य त्वत्प्रेमसंप्लुतम् । नित्यमद्यापि यस्मिस्त्वपूर्ववत् क्रीडसि स्फुटम् ।। ४२४ ॥ अत्रैव त्वत्प्रियं यश्च मेदकधनजीवनम् । प्रापयन् मे पुनः सङ्ग तस्मै नित्यं नमो नमः ।। ४२५ ॥ अधुना यो मम मुखान्निःसारयति नाम ते कदाचिच्चरणाम्भोज हदि मे स्मारयत्यपि ॥ ४२६ ।। मत्कायनाचमेनापि नमस्ते कारयेदयम् । सर्यापद्धयोऽपि मां रक्षेद् दद्यात्ते भक्तिसम्पदम् ।। ४२७ ।। संग से मुझे निकाल कर श्रीनीला चलक्षेत्र में प्रारके अधिक प्रिततम स्वरूप ( जिस स्वरूप से आपका रावाभाव आस्वादन की पूर्ति हुई है ) उस श्रीकृष्णचैतन्यदेव विग्रह का संगलाभ दिया । मैंने रथ के ऊपर आपके मुखदर्शन के कौतुक का अवलोकन किया फिर भी उस करुणा ने आपकी उन-उन क्रीड़ाओं के अास्पद इस वृन्दावन में सं. गत कराया, जिसकी कीर्ति को गोपिगण तथा स्वयं आप ही वर्णन करते है। जिसके प्रवण से दूरस्थ भी विशुद्ध होकर आपके प्रेम का लाभ करते हैं । जहाँ के चराचर सकल प्राणी आपके प्रेम से परि- प्लुत हैं । जहाँ नित्य श्रय तक भी पहले की तरह थाप क्रीड़ा करते हैं। आपकी उम करुणा ने फिर आपके परमप्रिय, मेरे एक मान प्राण और धन,महाभागवत, रसिकबर श्रीरूप का संगदान दिया है। उस आपकी करुणा को नित्य नमस्कार है नमस्कार है ।।४१७-४२५।। जो आपकी यह करुणा अभी मेरे मुख से आप का नाम का निःसरण कराती है, जो कभी कभी थापके चरणों को मेरे हृदय में स्कृर्ति कराती है, जो इस अधम शरीर से भी आपके इस नमस्कार को कराती है, जो समस्त पाप से मुम्को रक्षा करती है, जो आपको ।
- श्रीकृष्णलीलास्तवः दातुं शक्नोति मेऽजस्र प्रेमस्मरणकीर्तनम् । तव प्रेमकटाक्षाच मयि प्राययितु क्षमः ।। ४८ ॥ गोगोपगोपिकासक्तं त्वां च दर्शयितु प्रभुः । एवं यो मम हीनस्य सर्वाशालम्बनं परम ।। ४२६ ।। महाकारुण्यमहिमा पुराणो नित्यनूतनः । त्वदीयः सच्चिदानन्दस्तस्मै नित्यं नमो नमः ।। ४३०॥ एतल्लीलास्तवं नाम स्तोत्रं श्रीकृष्ण! तारकम् । प्रणामाप्टनरशते योऽर्थायगमपूर्वकम् ।। ४३१ ॥ कीर्तयेत् सोऽचिराद् भनो लभतां कृपया तव । रूपे नामनि लीलायामाक्रीड़ेऽपि परा रतिम् ॥४३२शानमः१०८।। * इति श्रीकृष्णलीलास्तवनाम स्तोत्रं समाप्तम् भक्ति सम्पत्ति के प्रदान में परम समर्था है,जो निरन्तर आपके प्रेम- स्मरण-कीर्तन के दात्री है-जो मुझ को भी श्राप के प्रेमकटाक्ष की प्राप्ति करा सकती है, जो गो गोप-गोपीजन से वेष्टित श्रापका दर्शन कराने में सक्षम है, इस प्रकार दुर्गतजन की समस्त प्राशा का लो परम अवलम्बन है, बहुत पहिले जिसकी प्राप्ति होने पर भी नित्य नूतन की भॉति प्रतीयमान होती है, आपकी उस सच्चिदानन्दर- पिणी महामारुण्य महिमा को यार वार नित्य नमस्कार है नमस्कार है।॥ ४२६-४३०॥ अव अन्य का फल कहते हैं- श्रीकृष्ण! जो व्यनि अर्थ- के साय भवमागर के कर्णधार स्वरूप इस लीलास्तव नामक मात्र का अष्टोत्तर शन प्रणाम करके कीर्तन करेगा यह भक्त शीतही आपकी कृपा मे आपके स्प-नाम-लीला-लीलाभूमि में परारतिया लाभ फरेगा ॥४३१-४३३॥ ( नमः १०८) इति श्रीमानीलाम्नय का अनुघाट ममात दुया ।। ॥ स्थान-मधुण समय-पापमंत्रान्ति ॥ (सं० २०१०) .
. मोरगणोद्देशदीपिका श्रीश्रीकृष्णचैतन्यचन्द्राय नमः ॥ यः श्रीवृन्दावनभुवि पुरा सच्चिदानन्दसान्द्रो गौराङ्गीभिः सदृशरुचिभिः श्यामधामा ननर्त। तासां शश्वदृढतरपरीरम्भसम्भेदतः किं गौराङ्गः सन् जयति स नवद्वीपमालम्बमानः ॥१॥ नमस्यामोऽस्यैव प्रियपरिजनान् वत्सलदः प्रभोरद्वतादीनपि जगदपोधक्षयकृतः । समानप्रेमाणः समगुणगणास्तुल्यकरुणाः स्वरुपाद्या येऽमी सरसमधुरास्तानपि नुमः ॥२॥ गुरु नः श्रीनाथाभिधमवनिदेवान्वयविधु नुमो भूपारत्नं भुव इव विभोरस्य दयितम् । यदास्यादुन्मीलन्निरवकरवृन्दावनरहः कथास्वादं लब्ध्वा जगति न जनः कोऽपि रमते ॥३॥ जो सच्चिदानन्दमय, श्यामकान्ति श्रीहरि ने पहले श्रीवृन्दावन भूमि में समान कान्तिमती गौरांगियों के साथ नृत्य विलास किया है यह श्रीहरि उनके निरन्तर गाढ़ालिंगन भेद से गौरांग स्वरूप हो कर श्री नयद्वीप श्राश्रय के द्वारा जय प्राप्त हो रहे है॥१॥ जगत् के पाप समूह का नाश कारी, वत्सल हृदय प्रतादिक प्रिय परिकरों को तथा समान प्रीतियाले, समान गुणशाली, समान करुण हृदय, सरस मधुर स्वरूपादिक प्रभु के गण को नमस्कार क- रते हैं ॥२॥ प्रभु के परमप्रिय, ब्राह्मण पुल में चन्द्ररूप, जगत् के भूपण रत्न
गौरगणोद्देशदीपिका
पितर श्रीशिवानन्द सेनवंशप्रटीपकम् ।
वन्देऽह परया भक्त्या पार्षदाश्य महाप्रभाः॥४॥
ये विख्याता. परीवारा. श्रीचैतन्यमहाप्रभाः।
नित्यानन्दातयोश्च तेपामपि महीयसाम् ।
गोपालानाञ्च पूर्वाणि नामानि यानि कानिचित् ।
स्वस्वग्रन्थे सरूपाद्यैर्दर्शितान्यादिसृरिभिः।
विलोक्यान्यानि साधूना मथुरोड्रनिवासिनाम् ।
गौडीयानामपि मुसान्निशम्य स्वमनीपया ।
निविच्याम्रोडितः कैश्चित् कैश्चित्तानि लिसाम्यहम् ।
नाम्ना श्रीपरमानन्ददासः सेवितशासनः ।।५।।
यद्वत्पुरा कृष्णचन्द्रः पञ्चतत्त्वात्मकोऽपि सन् ।
यातः प्रकटता तद्वद्गौरः प्रकटतामियात् ॥६॥
उन श्रीनाथ नामक गुरुदेव को नमस्कार ! जिनके मुम्म नि स्मृत श्री.
कृष्ण का मधुर वृन्दावन सम्बन्धी निर्जन केलि क्थामाद का लाभ
कर जगत् में कौन व्यक्ति आनन्द को प्राप्त नहीं हुआ है। अर्थात्
सभी श्रानन्द को प्राप्त हुए है ॥३॥
महाप्रभु के पार्पदप्रवर, सेनवश के प्रदीप, पिता श्रीशिवानन्दसेन
की परम भक्ति के साथ चन्दना करता हूँ॥४॥
श्रीचैतन्य
महाप्रभु
के तथा श्रीनित्यानन्द और अतिप्रभु के जो
सकल विख्यात परिवार है महानुभाव गोपशियों का जो नामसमूह
प्रसिद्ध है उन सवना आदि विद्वान् स्वरूपादि महात्मागरा ने निज
निज ग्रन्थ मे प्रमाश किया है। उन प्रन्यों का अवलोकन कर तथा
मथुरा-जल-गोड निवासी साधु वैधावों का मुख से मुन कर निज
बुद्धि के द्वारा विवेचना पर महानुभार कुछ साधु यति के यार पार
अनुरोप में प्रभुपरिषरों से शामन प्राप्त, परमानन्ददास नामक में
इस प्रथ को लिखता हूँ॥५॥
३
गोरगणोदेशदीपिका
स्वाभिन्नेन युतः तत्वं पञ्चतत्त्वमिहोच्यते ।
अन्यथा तदसम्बन्धात्तत्तत्त्वं स्याच्चतुष्टयम् ॥७॥
तद्भिनं यत्तदेवात्र तदभिन्न विभाव्यताम् ।
यतः स्वयेच्छया शक्तया कृष्णस्तादृशतां गतः ॥८॥
अतः स्वरूपचरणैरुक्तं तत्त्वनिरूपणे ।
उपाधिभेदात् पञ्चत्वं तत्त्वस्येह प्रदर्श्यते ॥ ॥
“पञ्चतत्त्वात्मकं कृपणं भक्तरूपस्वरूपकम् ।
भक्तावतारं भत्ताख्यं नमामि भक्तशक्तिकम्" ॥१०॥
अस्यार्थो विवृतस्तैर्यः स संक्षिप्य विलिस्यते ।
भक्तरूपो गौरचन्द्रो यतोऽसौ नन्दनन्दनः ।
भक्तस्वस्पो नित्यानन्दो बजे यः हलायुधः।
भक्तावतार प्राचार्योऽद्वतो यः श्रीसदाशिवः ।
जिस प्रकार पहले श्रीकृष्णचन्द्र ने पञ्चतत्वात्मक स्वरूप से श्र-
वतार लिया था ठीक उसी प्रकार गौरचन्द्र ने पञ्चतत्व स्वरूप से
अवतार लिया ॥६॥
यहाँ निज से अभिन्न युक्त तत्व पञ्चतत्व करके कहा जाता है । नहीं
तो पञ्चतत्त्व सम्बन्धी के प्रभावसे चार ही तत्व रह जायगें अर्थात्
असम्भव के वश चार तत्व की आपत्ति उठ सकती है ॥७॥
श्रीकृष्ण से जो भिन्न है यहाँ वह अभिन्न करके माना जायगा।
क्योंकि श्रीकृष्ण ही निज इन्छा शक्ति के अनुसार उस प्रकार प्राप्त
होते हैं ।।८।।
इस लिये स्वरूपगोम्वामि चरण ने तत्त्वनिरूपण में कहा है कि
ज्याधिभेद से तत्व का पॉच प्रमार है । उन्हें यहॉ दिखाते है । "भ-
तस्प, भत्तस्वरूप, भक्तावतार, भत्तात्य, भक्तशक्तिक रूप से पञ्च-
तत्वात्मक श्रीकृष्ण का नमस्कार करता हूँ" ॥१०॥
४
गौरगणोद्देशदीपिका
भत्ताख्याः श्रीनिवासाद्या यतस्ले भक्तरूपिणः ।
भक्तशक्तिर्द्विजाग्रण्यः श्रीगदाधरपण्डितः ।। ११ ॥
श्रीमद्विश्वम्भराद्वःतनित्यानन्दावधूतकाः ।
अत्र प्रयः समुन्नेया विग्रहाः प्रभवश्च ते ।
एको महाप्रभुज्ञेयः श्रीचैतन्यो दयाम्बुधिः ।
प्रभू द्वौ श्रीयुतौ नित्यानन्दाद्व तो महाशयौ ।
गोस्वामिनो विग्रहाश्च ते द्विजाच गदाधरः ।
पञ्चतत्त्वात्मका एते श्रीनिवासश्च पण्डितः ॥ १२॥
यदुक्तं तत्र गोस्वामिश्रीस्वरूपपदाम्बुजैः।
त्रयोऽत्र विग्रहा ज्ञेयाः प्रभवश्चात्र ते त्रयः।
एको महाप्रभु यो द्वौ प्रभू सम्मती सताम् ॥ १३ ॥
उनने इस का अर्थ विस्तार करके कहा है। उसका संक्षेप हम
लिखते हैं । जो नन्दनन्दन हैं वे भक्तरूप मे श्रीगीरचन्द्र हैं। ब्रज
में जो बलदेव जी हैं वे भत्तस्वरूप नित्यानन्दचन्द्र हैं। जो सदा-
शिव हैं वे भत्तावतार अद्वत प्राचार्य हुए । श्रीनिवासादि भत्ताश्य
करके प्रसिद्ध हैं,क्योंकि वे सय भक्तरुप हैं । द्विजश्रेष्ठ श्रीगदाधर-
पण्डित भक्तशक्ति रूप हैं ॥ ११ ॥
श्रीमानविश्वम्भर, अद्वताचार्य और अवधूत-नित्यानन्द ये तीनो
भगवद् विग्रह प्रभु नाम से ख्यात हैं । इन तीनों में से करण के
समुद्र श्रीचैतन्य महाप्रभु" तथा श्रीनित्यानन्द, अद्धत महाशय दोनों
"प्रभु" हैं ऐसा जानना । सब गोस्वामि विग्रह हैं । द्विज गदाधर
श्री निवास पण्डित ये सब पचतत्वात्मक है ॥१२॥
इम विषय में स्वरूप गोस्वामि चरण ने कहा है-ये तीनों भग.
पविग्रह तथा प्रभु करके रयात हैं। उनमें से एक तो "महाप्रभु"
अन्य दोनों प्रभु हैं। यह साधुओं का सम्मत है ॥ १३॥
गौरगणोदेशदीपिका
एपा पार्पटवर्गा ये महान्तः परिकीर्तिताः।
नित्यानन्दगणाः सर्वे गोपाला गोपवेशिनः ।
एषा सम्बन्धसम्पर्कादुपगोपालसत्तमाः ।। १४ ।।
तत्र श्रीमन्नद्वीपे विश्वम्भरसमीपतः ।
विलसन्ति स्म ते ज्ञेया वैष्णवा हि महत्तमाः ॥ १५ ॥
नीलाचले ये ये ख्यातास्ते हि ज्ञेया महत्तराः।
दक्षिणादिदिशा याने य॒र्यः सङ्गो महाप्रभोः ।
ते ते महान्तो मन्तव्याः परे ज्ञेयाः स्वयोग्यतः ॥१६॥
अतः स्वरूपचरणैरुक्तं गोरनिरूपणे।
पञ्चतत्त्वस्य सर्पकात् ये ये ख्याता महत्तमाः।
ते ते महान्तो गोपालाः स्थानान्छु प्ठ्यादिवाचकाः ॥ १७ ॥
रमजाः श्रीवृन्दावनमिति यमाहु वहुविदो
यमेतं गोलोक कतिपयजनाः प्राहुरपरे ।
इनके पार्षदगण महान्त कहलाते हैं । नित्यानन्द प्रभु के गण स
मूह गोपवेशी गोपाल हैं । इनके सम्पर्क से कतिपय उपगोपाल करके
कहलाते हैं ॥ १४॥
श्रीमन्नवद्वीप धाम में विश्वम्भर के निकट जो बिलास करते है
उन्हें महत्तम वैष्णव, नीलाचलधाम में जो विराजमान हैं उन्हें मह-
त्तर वैष्णव जानना । महाप्रभु के दक्षिण गमन में जिन महात्माओं
के साथ उनका सम्पर्क हुआ है वे सब महान्त हैं। अन्यान्यन्यक्ति
निज निज योग्यता के अनुसार पीछे महान्त नाम से अभिहित हुए
हैं। १५-१६॥
इसलिये स्वरूप चरण ने गौरनिरूपण में कहा है । पञ्चतत्व के
सम्पर्क से जो जो महत्तम करके रयात हैं वे सब विख्यात गोपाल
महान्त हैं । स्थान के अनुसार उन सबका श्रेष्ठत्व निरूपण किया
आता है ॥ १७॥
गौरगणदेशदीपिका सितद्वीपं प्राहुः परमपि परव्योम जगदु नवद्वीपः सोऽयं जयति परमाश्चर्यमहिमा ।। १८ ।। तस्मिन् वासमुरीचकार नृहरि विश्वम्भराख्यां दध- त्तच्चेष्टावशतः समस्तमहतां चासोऽपि तत्राभवत् । तैः साकं महती हरेनुगुणाकारापि लीलाभयद यत्रासीत् जगतां मनोऽपि परमानन्दाय मग्नं यतः ॥ २६॥ यः सत्ये सितवर्णमादधदसौ श्रीशुक्लनामाभव- त्रेतायो मखभुङमखाख्य उचितोऽभूद्रक्तवर्ण द्धन् । यः श्यामो दधदास वर्णकममुश्याम युगे द्वापरे सोऽयं गौरविधुर्विभाति कलयन्नामावतारं कली ॥ २० ॥ प्रादुर्भूताः कलियुगे चत्वारः साम्प्रदायिकाः । श्री-ब्रह्म-रुद्र-सनकाहयाः पाझे यथा स्मृताः। रसिकगण जिसको वृन्दावन,यहुवेत्ता साधुगण जिसको गोलोक, कुछ व्यक्ति जिसे श्वेतद्वीप अपर कोई कोई परव्यामधाम कहते हैं,वह श्रीनवद्वीपधाम परम आश्चर्यशाली होकर जय को प्राप्त हो रहा है।।१८।। जहाँ विश्वम्भर पुरुषोत्तम ने वास किया है । जहाँ उनकी लीला- चेष्टा से समस्त महान्त गण का क्रमशः वास हुअा था तथा उन्हीं के माथ प्रभु की श्रीकृष्ण का गुणानुरूप लीला का अनुकरण जहाँ हुआ। जिससे जगजीवों का मन परमानन्द मे मग्न हो जाता है वह श्रीन- बद्वीप धाम है ॥ १६॥ जो वे सत्ययुग में शुभ्रवर्ण तथा शुक्ल नाम का धारण करते हैं, जिसने त्रेतायुग में रक्तवर्ण होकर मखमुक् नाम का धारण किया है, जो द्वापर में श्याम होकर श्याम नाम से कहे गये हैं वे ही भगवान् गौर रूप से श्रीगौरांग नाम से कलिकाल में अवतीर्ण हुए गौरगरगोहेशठीपिका अतः कली भरिप्यन्ति चत्वारः सम्प्रदायिनः। श्रीब्रह्म रुद्र-सनका वैष्णया तितिपावनाः ॥२१॥ तर माध्धीसम्प्रदाय. प्रस्तापाटन लिरयते । परयोमेश्वरस्यासीन्द्रिप्यो ब्रह्मा जगत्पति.। तस्य शिष्यो नारदोऽभूद्यासस्तस्याप शिप्यता। शुको व्यामस्य शिष्य प्राप्तो ज्ञानावरोधतात् । तस्य शिष्यः प्रशिघ्याश्च वह भूतले स्थिना.। व्यासाल्लन्धकृष्णदीक्षो मध्वाचार्यो महायशा । चक्र वेदान् विभाज्यासी सहिता शतदूपणीम् । निगु गाद् नमरणो यन सगुणस्य परिनिया ॥ तस्य शिष्योऽभवत् पद्मनाभाचार्यमहाशयः । तस्य शिष्यो नरहरिस्तन्छिप्यो माववद्विज । कलिकाल मे श्री, ब्रह्मा, रुद्र और सनक नाम से चार सम्प्रदाय प्रादुर्भूत होंगे ऐसा पद्मपुगण में लिया है। "प्रत. कलिकाल में वैवाव सम्प्रदाय चार होंगे। श्री, ब्रह्म, रुद्र और सनक ये परम पानन चतु सम्प्रदाय के आचार्य है " । यहाँ प्रस्तार कम से मा ध्वीसम्प्रदाय की परम्परा वर्णन करते है । परन्योमेश्वर श्रीहरि के शिष्य जगसति ब्रह्मा जी,ब्रह्मा के नारद,नारद जी के व्यासजी शिष्य हए । ज्ञान के अरमोध के कारण श्रीशुक व्यास देवजी के शिष्यत्व प्राप्त हुए। शुक्देव के जगत् में यहु शिष्य प्रशिष्य हुए । महायशरवी मध्वाचार्य ने व्यासदेव के निकट कृष्णमन्त्र की दीक्षा ली। उन्होंने वेदो का निभाग वर शतदृपणी नामक संहिता की रचना की जि- समे निगुण ब्रह्म से सगुणब्रह्म की परिष्कृत मीमासा की गयी है। उनके शिष्य महाराय पद्मनाभाचार्य हुए हैं। पद्मनाभ के नरहरि, उनके माधद्विजोत्तम, माधव के अक्षोभ, अक्षोभ के जयतीर्थ,ज.
गौरगणोदेशदीपिका अक्षोभस्तस्य शिष्योऽमूत्तच्छिप्यो जयतीर्थकः । तस्य शिष्यो ज्ञानसिन्धुस्तस्य शिप्यो महानिधिः। विद्यानिधिस्तस्य शिष्यो राजेन्द्रस्तस्य सेवकः । जयधर्म निम्तस्य शिप्यो यद्गगणमध्यतः। श्रीमद्विष्णुपुरी यस्तु भक्तिरत्नावलीकृतिः अयधर्मस्य शिष्योऽभूद्ब्रह्मण: पुरुषोत्तमः । व्यासतीर्थस्तस्य शिप्यो यश्चक विष्णुसंहिताम् । श्रीमाल्लक्ष्मीपतिस्तस्य शिष्यो भक्तिरमाश्रयः। तस्य शिष्यो माधवेन्द्रो यद्धर्मोऽयं प्रयत्तितः । कल्पवृक्षस्यावतारो ब्रजधामनि तिष्ठतः । प्रीतप्रेयोक्त्सलतोज्ज्वलाख्यफलधारिणः ॥ २२ ॥ तस्य शिप्योऽभवच्छ्रीमानीश्वराज्यपुरी यतिः । कलयामास शृङ्गारं यः शृङ्गारफलात्मकः ॥ २३ ।। अतः कलयामास दास्यसख्ये फले उभे । श्रीमानरगपुरी ोप वात्सल्ये यः समाश्रितः ॥ २४ ॥ यतीर्थ के ज्ञानसिन्धु, उनके महानिधि, महानिधि के विद्यानिधि, उन के राजेन्द्र, उनके जयधर्ममुनि हुए । उन जयधर्ममुनि के शिष्य विष्णुपुरी जी हैं। जिन्होंने भक्तिरत्नावली की रचना की। ब्राह्माण जयधर्म के दूसरे शिप्य पुरुपोत्तम हुए। उनके शिष्य व्यासतीर्थ हुए जिन्होंने विष्णुसंहिता की रचना की। उनके शिष्य भक्तिरस के प्रा. श्रय श्रीमान् लक्ष्मीपति हुए । उन्हीं लक्ष्मीपति के शिष्य माधवेन्द्र यति हुए । जिनसे प्रेमभक्ति का प्रवर्तन हुआ । और भी जो वृन्दा. वन में कल्पवृक्ष स्वरूप हैं, जो प्रीत-प्रेय-वत्सल तथा उज्वल नामक फल का धारण करने वाले हैं, माधवेन्द्रजी उनका अवतार हैं। उनके श्रीयति ईश्वरपुरी नामक शिष्य हुए। उन्होंने शृंगार फल स्वरूप हो कर शृंगाररस का विस्तार किया। श्रद्वतप्रभु ने दास्य-सख्य उभय ।
६ गौरंगणोद्देशंदीपिका ईश्वराज्यपुरी गोर उररीकृत्य गोरवे। जगदाप्लाययामास प्राकृताप्राकृतात्मकम् ।। २५ ॥ स्वीकृत्य राविकाभावकान्ती पूर्वसुदुष्करे। अन्तर्वहिरसाम्भोधिः श्रीनन्दनन्दनोऽपि सन् ॥ २६ ॥ आद्यन्यूहोऽपि चैतन्यमविशत् यः पुरे पुरा । विचुक्षोभ मनस्तस्य दृष्ट्वा गन्धर्वनर्त्तनम् ॥ २७ ॥ द्वारकास्थोऽपि भगवानविशत् श्रीशचीसुतम् । नानावतारः सुतरामेककालप्रभावतः ।। २८ ॥ यथा श्यामोऽविशत् कृष्णं भगवन्तं पुरा स्वयम् ॥ २६ ॥ योगमायायलादेते तिष्ठन्तोऽन्यत्र यद्यपि । तथापि प्रावीशन् गोरेऽचिन्त्यलक्षणलक्षिताः ।। ३०॥ यथोक्त व्यासचरणैः प्रभासखण्डमध्यतः अचिन्त्याः सलु ये भावा न तांस्तर्केन योजयेति ॥३१।। फल का तथा रंगपुरी ने वात्सल्य का प्रकाश किया है । श्रीगौरचन्द्र भगवान ने उन ईश्वरपुरी को गुरुत्य रूप से वरण किया तथा प्रा. कृग-अप्राकृतमय जगत् को प्रेम की याद में वहाया । रस सागर श्री. नन्दनन्दन पहिले सुदुष्कर राधिका की भाव कान्ति को अन्तर तथा बाहिर में स्वीकार कर अब गौरांगरूप में अवतीर्ण हुए। आद्य- व्यूह वासुदेव पहले द्वारकापुरी मे गन्धर्चनृत्य का अवलोकन कर क्षुब्ध हो गये थे 1 अब वे श्रीचैतन्य विग्रह में प्रवेश हुए। एक ही समय नाना स्वरूप का प्राकट्य होने के कारण महाप्रभु का नानाव- तार कहा जाता है। जिस प्रकार श्याम अवतार पहले भगवान् कृष्ण में प्रवेश हुए हैं । यह सब प्रभु को अघटन घटनापटीयसी योगमाया शक्ति के प्रभाव से होता है । यद्यपि युगावतारादि अन्यत्र वर्तमान रहते हैं तो भी श्रीचैतन्य स्वरूप में उनका प्रवेश अचिन्त्य शक्ति योग के हेतु जानना उचित है । श्रीन्यासचरण ने प्रभाससण्ड १० गौरगमोहेशदीपिका रघुनाथं प्रविश्यापि यथा मिष्ठति भार्ग.। एवं श्रीनारदमुग्नास्तिप्ठन्त्यन्येषु धामसु । तथैव प्रभुना साढे दीव्यन्ति श्रुतिदेवत् ॥३२॥ किन्तु यद्यद्भक्तगणा यद्यद्भारविलासिनः । तत्तभावानुमारेण बजे तेषामभूद्गतिः ॥ ३३ ॥ गोरचन्द्रोदयेऽद्वत प्रति गौरवची यथा। दास्ये केचन केचन प्रायिनः सम्यक ण्योभये राधामाधवष्ठियाः कतिपये श्रीद्वारवायीशितुः ॥ सख्यादावुभयन केचन परे ये वावतारान्तरे । मय्यायद्धहदोऽखिलान वितन वृन्दावनासगिनः ॥ ३४॥ पर्जन्यो नाम गोपाल आसीत् कृष्णपितामहः । उपेन्द्र मिश्र. सन् जात. श्रीहट्टे सप्तपुरमान् ॥ ३५॥ में कहा है-"अचिन्त्यभाव सकल तर्क के द्वारा योजित नहीं होते हैं ।। ३१॥ जिस प्रकार परशुराम जी रघुनायस्वरूप में प्रवेश होकर अन्य स्वरूप में विराजमान रहे ठीक उसी प्रकार जानना चाहिए। नारदादिक ऋषिगण अन्य धाम में रह कर भी उसी प्रकार श्रुति- विग्रह की भॉति श्रीमहाप्रभु के साथ क्रीडा करते हैं। जो-जो भक्त- गण जिस जिस भाव के विलासी हैं, उन सब की उस उस भा- वानुसार ब्रज में गति होती है। गौरचन्द्रोदय मे अद्वैत प्रमु के लिये महाप्रभु का वचन है । हे अद्वत कोई दास्य मे, कोई प्रणा- यिजन मेरे सख्य मे, कोई दास्य-सख्य के मिश्रणभाव में, कोई रा. धामाधवनिष्ठा मे, कोई द्वारकानाथ के सख्य में विराजित है । अ- धिक जिन जिन अवतारों में जिन जिन भाव के साथ जो जो भक्त वर्तमान हैं वे सब वृन्दायनविलासकारी मुझ मे वद्ध हृदय हैं । अतएव मैं सबको उसी प्रकार उन्हीं भावों का प्रदान क्रूँगा।॥३२-३४|| गौरगणोद्देशदीपिका ११ महामान्याभिधा गोपी व्रजे यासीद्वरीयसी । कृष्णपितामही सैव नाम्नात्र कमलावती ।। ३६ ।। पुरा यशोदाब्रजराजनन्दो वृन्दावने प्रेमरसाकरौ यो। शची-जगन्नाथपुरन्दरामियो बभूवतुस्तौ न च संशयोऽत्र ॥३७|| अमू अविशतामेव देवावदितिकश्यपो। श्रीकौशल्यादशरथौ तथा श्रीपृश्नितत्पती ॥ ३८ ॥ देवकीवसुदेवौ यौ पितरौ रामकृष्णयोः । तावप्यमु अविशतामिति जल्पन्ति केचन । अन्यथा राममूतः श्रीविश्वरूपस्य नोद्भवः ।। ३६ ॥ रोहिणीवमुदेवौ यो पितरौ रामकृष्णयोः । पद्मावतीमुकुन्दौ तौ सन्तो जातौ द्विजोत्तमौ । श्रीमुमित्रादशरथौ तावप्यविशताममु ॥ ४० ॥ पहले जो श्रीकृष्ण के पितामह पर्जन्य नामक गोप थे, उनने अब उपेन्द्रमिश्र नाम से श्रीहट्ट में जन्म लिया। उनके सात पुत्र थे। जो वृन्दावन में महामान्या वरीयसी नामक श्रीकृष्णा की पितामही थी, अब वह उपेन्द्रमिश्र की पत्नी कमलावती नाम से हुई हैं।॥३॥ : पहले वृन्दावन में प्रेमरस के आकर श्रीकृष्ण के माता पिता य- शोदा ब्रजराज हुए हैं, अय वे शची तथा जगन्नाथ मिश्र पुरन्दर रूप से प्रकट हुए हैं। इसमें कोई संशय नहीं है । अदिति कश्यप, को- शल्या-दशरथ. श्रीपृश्नि-उनके पति सुतपा इन शची-जगन्नाथ पुरन्दर में प्रवेश हुए हैं । कोई कोई कहते हैं, श्री रामकृष्ण के माता-पिता देवकी-वसुदेव भी इनमें प्रवेश हुए हैं। नहीं तो रामविग्रह विश्वरूप का जन्म नहीं हो सकता था॥३६-३६॥ 'पहिले रोहिणी-वसुदेव जो कि श्रीकृष्ण के माता-पिता थे, उन्होंने पद्मावती तथा मुकुन्द होकर ब्राह्मण कुल में जन्म लिया। सु-' अय -- गौरगणोद्देशदीपिका पोर्णमासी बजे ग्रासीद्गोविन्दानन्दकारिणी । श्राचार्य श्रीलगोविन्दो गीतपयादिकारकः ॥४१॥ नाम्नाधिका बजे धानी स्तन्यदाती स्थिता पुरा । सैवेयं मालिनीनाम्नी श्रीव्यासगृहिणी मता ॥ ४२ ॥ अम्बिकायाः स्वमा यासीन्नाम्नी श्रीलविलिम्बिका। कृणोन्टिष्ट प्रभुजाना सेयं नारायणी मता ॥ ४३ ।। पुरासीजनको राजा मिथिलाधिपतिर्महान् । अधुना पल्लभाचार्यो भीप्मकोऽपि च सम्मतः ।। ४४॥ श्रीजानकी रुक्मिणी च लक्ष्मीनाम्नी च तत्सुता । चैतन्यचरिते व्यक्ता लक्ष्मीनाम्नी च सा यथा ॥ ४५ ॥ सा बल्लभाचार्यसुता चलन्ती स्नातु ससीभिः सुरदीपिकायाम् । लक्ष्मीरनेनैव कृतावतारा प्रभोर्ययो लोचनवमं तत्र ॥४६॥ मित्रा तथा दशरथ जी का इन में प्रवेश माना गया है। ब्रज में जो गोबिन्द की आनन्दकारिणी पोर्णमासी जी रहीं, वह अब गीत-पद्यों की रचना करने वाले श्रीगोविन्द आचार्य हुई। पहले जो अम्विका नाम्नी श्रीकृष्ण की स्तन्यदात्री थीं वे अब मालिनी नामक श्री- यासपण्डित की गृहिणी हुई। उस अम्बिका की भगिनी किलि- म्बिका जो कि श्रीकृष्ण का उन्छिष्ट साती थी, वे अब नारायणी नाम से प्रसिद्ध हुई। पहले जो मिथिला के अधिपति राजा जनकजी थे वे अब वल्लभाचार्य हुए। कोई कोई इनको भीष्मक भी कहते है ॥४०-५४॥ श्री जानकी तथा रुक्मिणी जी ये दोनों ने मिल कर वल्लभा- चार्य की कन्या रूप से जन्म लिया तथा लक्ष्मी नाम से व्यक्त हुई । इनकी लक्ष्मी नाम से प्रसिद्धि चैतन्यचरित में व्यक्त है।।४।। वह वल्लभाचार्य की कन्या लक्ष्मी उस समय ससियों के साथ गंगा स्नान करने के लिये जा रही थी। अकस्मात् महाप्रभु के नयन:-
गौरगणोद्देशदीपिका
१३
श्रीसनातन मिश्रोऽयं पुरा सत्राजितो नृपः ।
विष्णुप्रिया जगन्माता यत्कन्या भस्वरूपिणी ॥४७॥
उक्ता प्रसंगात् कलिना श्रीचैतन्यविधूदये ।
भुवोऽशरुपां परमाञ्च विष्णुप्रिया विदित्वा परिणीय
कान्तामित्यादि ॥४८॥
विश्वामित्रोऽपि घटकः श्रीरामोद्वाहकर्मणि ।
रुक्मिण्या प्रेषितो निप्रो यश्च श्रीकेशव प्रति ।
तानरं वनमाली यत्कर्मणाचार्य्यता गतः ॥ ४६॥
यश्च सत्राजिता विप्र प्रहितो माधवं प्रति ।
सत्योद्वाहाय कुलकः श्रीकाशीनाथ एव सः ।।५० ॥
केनावान्तरभेदेन भेदं कुर्वन्ति सात्त्वताः ।
सत्यभामाप्रकाशोऽपि जगदानन्दपण्डितः ।। ५१ ।।
.
पथ मे पड़ीं। वह लक्ष्मी का अवतार थीं ॥४६॥
पहले सत्राजित् राजा थे, वे अव सनातनमिश्र हुए । भूस्वरूपि.
णी, जगन्माता विष्णुप्रिया उन की कन्या है ॥ ४७ ॥
चैतन्यचन्द्रोदय नाटक मे कलिप्रसंग पर ऐसा कहा गया है-
उन देव-देव महाप्रभु ने पृथिवी अंशरूपा, विष्णुप्रिया के साथ वि-
वाह किया इत्यादि ॥४॥
पहले श्रीरामचन्द्र के विवाह कर्म मे जो विश्वामित्र घटक हुए
थे वे तथा रुम्मिपी के द्वारा केशव के लिए जो विप्र भेजा गया था
वह दोनों मिलकर बनमाली नाम से जन्म लेकर कर्म के द्वारा प्रा-
चार्यत्व को प्राप्त हुए।।४६ ।।
सत्राजित् राजा ने सत्यभामा का वाह के लिये फुलक नामक
जिस विप्र को माधव के लिये भेजा था वह श्रीगौरांग अवतार में
काशीनाथ हुए।॥५०॥
" * गौरगणोद्देशदीपिका मथुरायां यज्ञसूत्रं पुरा कृष्णाय यो मुनिः । ददौ सान्दीपनिः सोऽभूदद्य केशवभारती ॥ ५२।। पुरासीद्रघुनाथस्य यो वशिष्ठमुनिगुरुः। स प्रकाशविशेपेण गंगादाससुदर्शनी ।। ५३ ॥ 'वृषभानुतया ख्यातः पुरा यो ब्रजमण्डले। अधुना पुण्डरीकाक्षं विद्यानिधिमहारायः॥ ५४॥ स्वकीयभावमासाद्य राधाविरहकातरः। चैतन्यः पुण्डरीकाक्षाहये तातावदत् स्वयम् ॥ ५५ ॥ प्रेमनिधितया ख्याति गोरो यस्मै ददौ सुखी। माधवेन्द्रस्य शिष्यत्वाद्गौरवञ्च सदा करोत् ।। ५६ ।। तत्प्रकाशविशेषोऽपि मिश्रः श्रीमाधवो मतः । रत्नावती तु तत्पत्नी कीर्तिदा कीर्तिता बुधैः॥ ५७ ॥ भगवद्भक्तगण किसी अवतार भेद से भेद को प्राप्त होते हैं । सत्य- भामा का प्रकाश भी जगदानन्द पण्डित को जानना चाहिये ।।५।। पहले मथुरा में जिन सान्दीपनि मुनि ने श्रीकृष्ण को यज्ञसूत्र दिया था, चे अव केशवभारती हुए ॥ ५२ ।। -पहले रामचन्द्र जी के जो गुरु वशिष्ठ जी थे, वे अव प्रकाश भेद से गंगादास और सुदर्शन हुए ।। ५३ ॥ .. पहले ब्रजमएडल में वृषभानु राजा थे, वे अब महाशय पुण्ड- रीकाक्ष विद्यानिधि हुए।। ५४ ।। । निज भाव का आस्वादन करते हुए राधाविरह से कातर श्रीचै- तन्य पुण्डरीकाक्ष के लिये "तान" करके बोलने थे ॥ ५५ ॥ श्रीप्रभु ने सुग्वी होकर जिन को प्रेमनिधि की उपाधि दी है और जिन- को माधवेन्द्रजी के शिष्य के कारण आप गौरव करते थे, माधव- मिश्र उनके प्रकाश विशेष करके सम्मत हैं। इन की भार्या का नाम रत्नावती है । पण्डितगण उन्हें वृषभानु पत्नी कीर्तिदा कहके गौरगणोद्देशदीपिका “१५ Tr अंशांशिनोरभेदेन व्यूह आद्यः शचीसुतः । बलदेवो विश्वरूपो व्यूहः संकपणो मतः ॥ ५८ ॥ नित्यानन्दावधूतश्च प्रकाशन स उच्यते । गौरचन्द्रोदये धम्म प्रतिवाम्यं कलेर्यथा ॥ ५६ ।। अस्याप्रजरस्वकृतदारपरिग्रहः सन् सङ्कर्पणः स भगवान् भुवि विश्वरूपः । स्वीयं महः किल पुरीश्वरमापयित्वा पूर्वं परिव्रजित एव तिरोवभूव इति ॥ ६० ॥ नित्यानन्दावधूतो मह इति महितं हन्त संकर्षणं यः । इति च।।६।। यदा श्रीविश्वरूपोऽयं तिरोभूतः सनातनः । नित्यानन्दावधूतेन मिलित्यापि तदा स्थितः ।। ६२ ।। ततोऽवधूतो भगवान वलात्मा भवन् सदा वैष्णववर्गमध्ये । जज्याल तिग्मांशुसहस्रतेजा इति ब्रुवन् मे अनको ननत ॥ ६३ ।। कीर्तन करते हैं ॥ ५६-५७ ॥ अंश-अशी अभेद के कारण शचीनन्दन श्राद्यव्यूह वासुदेव तथा बलदेव और विश्वरूप द्वितीयव्यूह संकर्षरण स्वरूप ॥५५॥ वे संकर्पण नित्यानन्द अवधूत कहे जाते हैं । चैतन्यचन्द्रोदय में धर्म के प्रति कलि का प्रवचन यह है-इन (प्रभु) के अग्रज जो जगत् में विश्वरूप करके विरयात हैं तथा जो साक्षात् भगवान् सं. कर्पण के अवतार हैं, वे पहले से ही द्वार परिग्रह न कर संन्यास धर्म का अवलम्बन करते हुए अपनी ज्योति को ईश्वरपुरी में स्था- पित कर अन्तर्धान हो गये हैं ।। ६०॥ अवधत नित्यानन्द करके ख्यात हैं। साक्षात् संकर्पण जिन का तेजः स्वरूप ॥६१॥ जिस समय सनातन विश्वरूप तिरोहित हुए उस समय चे अव- धूत नित्यानन्द के साथ मिलित होकर अवस्थिति हुए। ६२ ।। हैं १६ गौरगणोद्देशदीपिका स्वांशेन शेपेण य एव शय्या विष्णोश्च कृष्णस्य च वासभूपा। स्वांगस्य भूपावलयादिरूपैौलाख्यया : वेद निगढलीलाम् ।। ६४ ।। श्रीवारुणीरेवतवंशसम्भवे तस्य प्रिये द्वे वसुधा च जान्हवी । श्रीसूर्यदासस्य महात्मनः सुते ककुद्मिरूपस्य च सूर्यतेजसः ।।६।। केचित् श्रीवसुबादेवीं कलावपि विवृण्वते । अनङ्गमञ्जरी केचिजान्हवीञ्च प्रचक्षते । उभयन्तु समीचीनं पूर्वन्यायात् सतां मतम् ॥ ६६ ।। सङ्कर्पणस्य यो व्यूहः पयोग्विशायिनामकः । स एव वीरचन्द्रोऽभूच्चैतन्याभिन्नविग्रहः ।। ६७ ॥ अमु प्राविशता कार्यात् सहजी निशठोल्मुको । मीनकेतनरामादिव्यूहः संकर्पणोऽपरः ।। ६८ ॥ - । "उसके अनन्तर बलदेव स्वरूप भगवान् अवधत वैष्णववर्ग में सहस्र सूर्य की भाँति तेजः विशिष्ट होकर देदीप्यमान हुए" इस प्रकार कह कर मेरे पिता शिवानन्द ने नृत्य किया था ।। ६३ ।। । जिन नित्यानन्द बलदेव के अंशरूप शेपदेव विष्णु की शर्या; वस्त्र, भूपण स्वरूप हैं । उनने अपने अड्ग के वलयादि भूपणरूप से लीला शक्तिके द्वारा श्रीकृष्ण की निगूढलीलाको अवगत कियाहै।।६४॥ • : “पहले वाहाणी और रेवतवंशोत्पन्ना रेवती बलदेव की दो पत्नी थीं, अब वे दोनों वसुधा-जान्हवी नाम से नित्यानन्द की दो पत्नी हुई। वे दोनों सूर्य के तुल्य तेजस्वी सूर्यदास की कन्या थीं । वे सूर्यदास पहले रेवती के पिता ककुद्मी थे ।। ६५ ।। कोई कोई वसुधादेवी को अनङ्गमञ्जरी तथा कोई कोई जान्हवी कहते हैं । माधुओं के मन में पूर्वन्याय से उभय समीचीन है।।६।। - संकर्पण का व्यूह पयोधिशायी चैतन्य के अभिन्न विप्र वीर- चन्द्र गोस्वामी हुए। वे नित्यानन्द प्रभु के पुत्र थे ।। ६७ ॥
गौरगणोद्देशदीपिका विष्णुपादोद्या गंगा यासीत् सा निजनामतः । नित्यानन्दात्मजा जाता माधवः शान्तनुपः ॥ ६ ॥ व्यूहस्तृतीयः प्रद्युम्नः प्रियनमसखोऽभवत् । चक्र लीलासहाय यो राधामाधवयोव्रजे । श्रीचैतन्यावततनुः स एव रघुनन्दनः ॥ ७॥ व्यूहस्तुर्योऽनिरुद्धो यः स वक्रेश्वरपण्डितः । कृष्णवेशजनृत्येन प्रभोः सुखमजीजनत् ।। ७१ ।। सहस्रगायकान्मह्यं देहि त्वं करुणामय । इति चैतन्यपादे य उवाच मधुरं वचः ॥७२॥ स्वप्रकाशविभेदेन शशिरेखा तमाविशत् । आविर्भावो गौरहरेनकुलब्रह्मचारिणि ।। ७३ ।। श्रावेशश्च तथा ज्ञेयो मिश्र प्रद्युम्नसङ्गके । आचार्यो भगवान् खजः कला गौरस्य कथ्यते ।। ७४ ॥ निशठ और उल्मुक दोनों सहोदर नित्यानन्दव्यूह वीरचन्द्र में प्रवेश हुए थे । अय इनका नाम मीनकेतन-रामदास है ।। ६ ।। विष्णुचरणोद्भवा गङ्गा निज नाम से ही अर्थात् गङ्गा नाम से नित्यानन्द प्रभु की कन्या है । माधव पहले शान्तनु राजा थे॥६६॥ तृतीय व्यूह प्रद्युम्न की जो कि ब्रज में राधामाधव की लीला के सहायकारी प्रियनमसखा थे वे अब श्रीचैतन्य तथा अद्वत्तविग्रह के अभिन्न रघुनन्दन हुए ॥ ७० ॥ चतुर्थ व्यूह अनिरुद्ध यकश्वर पण्डित हुए। जो श्रीकृष्णावेश से नृत्य के द्वारा महाप्रभु को सुख देते थे। उन्होंने महाप्रभु को मधु- रवचन से कहा था-हे करुणामय ! मुझे सहस्र गायकत्व प्रदान की. जिये । निज प्रकाश विशेष से शशिरेसा ने इनमें प्रवेश किया था। नबुल ब्रह्मचारी में गौरहरि का आविर्भाव तथा प्रद्युम्नमित्र में उन गोरगयोद्देशदीपिका गोपीनाथाचाय॑नाम्ना ब्रह्मा ज्ञेयो जगत्पतिः। नवव्यूहे तु गणितो यस्तन्त्रे तन्त्रयेदिभिः ।। ७५ ॥ ब्रजे आवेशरूपत्वाद्व्यूहो योऽपि सदाशिवः । स एवातगोस्वामी चैतन्याभिन्नविप्रहः ॥७६ ।। यश्च गोपालदेहः सन् बजे कृष्णस्य सन्निधौ । ननर्त श्रीशिवातन्त्रे भैरवस्य वचो यथा ।। ७७ ॥ एकदा कात्तिकमासि दीपयात्रामहोत्सवे। सरामः सह गोपालः कृणो नृत्यति यत्नवान् ॥ ४८ ।। निरीक्ष्य मद्गुरुर्देवो गोपभावाभिलापवान् । प्रिये नर्तितुमारब्धश्चक्रभ्रमणलीलया ॥ ७६ ।। श्रीकृष्णस्य प्रसादेन द्विविधोऽभूत् सदाशिवः । एकस्तत्र शिवः साक्षादन्यो गोपालविग्रहः ॥८॥ का आवेश जानना चाहिए । भगवान् श्राचार्यखञ्ज गौरहरि की कला है ।। ७१-७४ ।। जगत्पति ब्रह्मा जो कि तन्त्रवेदियों के द्वारा नवव्यूह के मध्य में गिने गये हैं वे आज गोपीनाथाचार्य हुए ॥ ७५ ॥ ब्रज में श्रावेश रूप जो सदाशिव व्यूह है वे अव श्रीचैतन्य के अभिन्न चिप्रह अवताचार्य गोस्वामी हुए हैं ।।७६ ।। जिनने गोपालविग्रह होकर ब्रज में श्रीकृष्णा के निकट रह कर नृत्य किया था। इस विपय में शिवातन्त्र में भैरव का वचन यथा "एक समय कार्तिक मास में दीपयात्रा महोत्सव पर राम तथा गो- पाल के साथ श्रीकृष्ण ने यत्न से नृत्य किया। उसको देखकर गुरु शंकर जी गोपीभावाभिलापी हो चक्रभ्रमण लीला से श्रीकृष्ण के निकट नाचने लगे। श्रीकृष्ण के प्रसाद मे सदाशिव दो स्वरूप हो गये । एक साक्षात् शिव जी दूसरे गोपालविग्रह हैं" || ७७-८० ॥
१६ गौरगोदेशदीपिका महादेवस्य मित्रं यः कुवेरो गुह्यकेश्वरः। कुवेरपण्डितः सोऽद्य जनकोऽस्य विदाम्बरः ॥ १॥ पुरा कुवेरः कैलासे सिद्धसाध्यनिपेविते । जजाप परगं मन्त्र शैवं श्री शिववल्लभः ।।५२॥ ततो दयालुर्भगवान् वरं वृणिवति सोऽत्रवीत् । तदा कुवेरो वरयामास त्वं मे सुतो भव ॥ ३ ॥ प्रार्थितस्तेन देवेशो घरदेशः सदाशिवः । जन्मन्यनन्तरे पुत्र प्राप्स्यामि पुत्रतां तप ।। ८४ ॥ इति प्राप्य वरं कष्टं कियन्तं कालमास्थितः । कार्यादीशवशात् सोऽद्या तस्य जनकोऽभवत् ॥५॥ योगमाया भगवती गृहिणी तस्य साम्प्रतम् । सीतारूपेणायतीर्ण श्रीनाम्ना तत्प्रकाशतः ।। ८६ ।। तस्य पुत्रोऽच्युतानन्दः कृष्णचैतन्यबल्लभः । श्रीमत्पण्डितगोस्वामिशिष्यः प्रिय इति श्रुतम् ।। ८७॥ महादेव जी के मित्र विदाम्बर गुह्यकेश्वर जी आज अद्वत श्रा- चार्य के पिता कुवेर पण्डित हुए ।। ८१॥ शिववल्लम कुबेर ने पहले सिद्ध-साध्य जनों से परिसेवित कै. लास में शिय सम्बन्धी मन्त्र का जप किया। उससे दयालु भगवान् शिव जी ने प्रसन्न होकर “वर माँगो" ऐसा कहा । कुबेर ने "तुम मेरे पुत्र हो" ऐसा वर माँगा । उनसे प्रार्थित होकर सदाशिव ने कहा कि इस जन्म के अनन्तर में तुम्हारा पुत्र होऊँगा । इस प्रकार वर प्राप्त होकर कुवेर जी ने कुछ काल दुःख से बिताया। पश्चात् ईश के कार्याधीन के यश अद्वैताचार्य के जनक हुए ॥२-८५ ॥ योगमाया भगवती वर्तमान उनकी गृहिणी होकर सीतादेवी नाम से प्रकट हुई । उनका प्रकाश रूप भी नाम करके हुई। सीता- २० गौरगणोद्देशदीपिका यः कार्तिकेयः प्रागासीदिति जल्पन्ति केचन । केचिदाहू रसविदोऽच्युतानाम्नी तु गोपिका ॥ उभयन्तु समीचीनं द्वयोरेकन सङ्गतात् । कार्तिकेयः कृष्णमिश्रस्तत् साम्यादिति केचन ॥८॥ नन्दिनी जङ्गली ज्ञेया जया च विजया क्रमात् ॥ ८६ ।। श्रीवासपण्डितो धीमान् यः पुरा नारदो मुनिः । पर्वताख्यो मुनिघरो य आसीन्नारदप्रियः । स रामपण्डितः श्रीमांस्तत्कनिष्ठसहोदरः ।। ६०॥ मुरारिगुप्तो हनुमानन्दः श्रीपुरन्दरः । यः श्रीसुप्रीवनामासीद्गोविन्दानन्द एव सः ॥ ११ ॥ विभीपणो यः प्रागासीद्रामचन्द्रपुरी स्मृतः ॥१२॥ उवाचातो गौरहरिनँतद्रामस्य कारणम् । जटिला राधिकाश्वभू: कार्यतोऽविशदेव तम् । देवी के पुत्र अच्युदानन्द हुए। जो महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य के प्रिय तथा पण्डित गोस्वामी के शिष्य थे। कोई कोई रसवेत्ता कहते हैं कि वे पहले कार्तिकेय थे। कोई कोई रसिक ऐसा कहते हैं कि वे पहले अच्युना नामक गोपी थे । उभय समीचीन है। दोनों का मिल कर प्रकट होना संगत है । किसी के मत में कार्तिकेय कृष्णमिश्र हुए। क्योंकि दोनों में समान काय्ये देखा गया है ।1८६-८९ ॥ जो पहले नारद जी थे वे अब बुद्धिमान श्रीवास पण्डित हुए। पहले नारदप्रिय पर्वत नामक जो मुनिश्रेष्ठ हुए वे अब श्रीवास प- ण्डित के कनिष्ठ सहोदर श्रीमान् रामपण्डित हैं ।। ६०॥ पहले जो हनुमान थे वे अब मुरारिगुप्त हुए । सुप्रीय के साथ अंगद जी भी महाप्रभु की लीला में प्रकट हुए थे। अंगद श्रीपुरः न्दर नथा सुप्रीव गोविन्दाननः हुए । पहले जो विभीपण थे घेराम- चन्द्रपुरी हुए हैं ।। ६१-१२॥ .
२१ गौरगणोद्देशदीपिका अतो महाप्रभुभिक्षासंकोचादि ततोऽकरोत् ।। ऋचीकस्य मुनेः पुत्रो नाम्ना ब्रह्मा महातपाः । प्रल्हादेन समं जातो हरिदासाख्यकोऽपि सन् ॥ ३॥ मुरारिगुप्तचरणैश्चैतन्यचरितामृते । उत्तो मुनिसुतः प्रातम्तुलसीपत्रमाहरन् ॥ ६४ ॥ अधौतमभिशप्तस्तं पिता यवनतां गतः । स एव हरिदासः सन् जात: परमभक्तिमान् ॥ १५ ॥ वृन्दायने याः प्रागासन्नणिमाद्यष्टसिद्धयः। ता एवाप्टी भक्तरूपा भूता गौडे च ते यथा ।। ६६ ।। अनन्तश्च सुखानन्दो गोविन्दो रघुनाथकः । कृष्णानन्दः केशवश्च श्रीदामोदरराघचौ ।। पुर्युपाधिक्रमाजज्ञेया अणिमाद्यष्टसिद्धयः ।। ६७ ।। इसीलिये ही महाप्रभु ने उनको लक्ष्य करके कहा था वह राम का कारण नहीं है । राधिका की सास जटिला ने कार्यवश रामचन्द्र- पुरी में प्रवेश किया है । इसलिये महाप्रभु उनमे भिक्षादि ग्रहण के विषय में संकोच रखते थे। ऋचकमुनि के पुत्र जिनका नाम महा- तपा ब्रह्मा है उनने भी प्रल्हाद जी के साथ जन्म लिया है। वे अब हरिदास हुए ।। ६३॥ मुरारिगुप्तचरण ने चैतन्यचरित नामक प्रन्थ में कहा है-मुनि- सुत महातपा ब्रह्मा ने एक समय प्रातःकाल में तुलसीपत्र का आहरण कर बिना धोय पिता को अर्पण किया । पिता के द्वारा अभिशाप प्राप्त होकर यवन हुए। वे ही यवनकुल के उत्पन्न परमभक्तिमान् हरिदास जी हैं ||६४-६५॥ वृन्दावन में पहले अणिमादि जो अष्टसिद्धियाँ थीं उन सब का अब गौड़देश में महाप्रभु के भक्त होकर जन्म हुआ । क्रम से उनका ૨૨ गौरगणोदेशदीपिका जायन्तेयाः स्थिता अध्वरेतसः समदर्शिनः । नव भागवताः पूर्य श्रीभागवतसंहिताः ॥ १॥ प्रत्यूचुर्जनकं तेऽद्य भूत्वा सन्न्यासिनः सदा । प्रभुणा गौरहरिणा विहरन्ति स्म ते यथा ॥ LL II श्रीनृसिंहानन्दतीर्थः श्रीसत्यानन्दभारती। श्रीनृसिंह-चिदानन्द-जगन्नाथा हि तीर्थकाः ।। १०० ।। तीर्थाभिधो वासुदेवः श्रीरामः पुरुषोत्तमः । गरुडाख्यावधूतश्च श्रीगोपेन्द्राख्य आश्रमः ।। १०१।। लोके ये निधयः ख्याताः पद्म-शंखादयो नव । अत्रैव निधिरत्नाख्य गर्भ जाताः प्रभोः प्रियाः॥ १०२॥ श्रीश्रीनिधिश्च श्रीगर्भः कविरत्नः सुधानिधिः । विद्यानिधिगुणनिधि-रत्नवाहुर्द्विजामणीः । श्रीमानाचार्यरत्नश्च श्रीरत्नाकरपण्डितः ।। १०३ ।। नाम-अनन्त, सुखानन्द, गोविन्द, रघुनाथ,कृष्णानन्दु, केशव, दामो- दर तथा राघव हैं। ये आठों पुरी उपाधी से युक्त ||१६-१७॥ ऊर्द्धरेता, समदर्शी, भगवद्भक्त जो नौ जन जयन्ती पुत्र थे, जि- न्होंने पहले जनक ऋपि को भागवतसंहिता सुनाई थी उन ने सब अब सन्यासग्रहण पूर्वक गौरहरि के साथ बिहार किया। उनका नाम श्रीनृसिंहानन्दतीर्थ, श्रीसत्यानन्दभारती, श्रीनृसिंहतीर्थ, श्रीचिदान- न्दतीर्थ, श्रीजगन्नाथतीर्थ, वासुदेवतीर्थ. श्रीरामतीर्थ, पुरुषोत्तमतीर्थ है। गरुड़अवधूत तथा गोपेन्द्र ये आश्रम उपाधि से युक्त हैं।।१८-१०१।। लोक में पद्मा-शंखादि जो नौ निधियाँ हैं उनने अब प्रभु के प्रिय हो कर मनुष्य देह से जन्म लिया । उनका नाम श्रीनिधि, श्रीगर्भ, कविरत्न, सुधानिधि, विद्यानिधि, गुणनिधि, रानबाहु, प्राचार्यरत्न, रत्नाकरपण्डित है ।। १०२-१०३ ।।..
२३ गौरगणोद्देशदीपिका नीलाम्बरश्चक्रवर्ती-गोरस्य भावि जन्म यत् । सभायां कथयामास तेनासौ गर्ग उच्यते ॥ १०४॥ श्रीशन्या जनकत्वेन सुमुग्यो वल्लबो मतः । पाटला या ब्रजे स्याता ज्ञेया तस्य सम्मिणी ॥ १०५ ।। पुराणानामर्थवत्ता श्रीदेवानन्दपण्डितः । पुरासीन्नन्दपरिपत्पण्डितो भागुरिमुनिः ॥ १०६ ॥ काशीनाथो लोकनाथः श्रीनाथो रामनाथकः । चत्वारोऽमी ज्ञानिभक्ताः सनकाद्या न संशयः ॥ १०७॥ चतुर्तीप्येषु शब्देषु नायशब्दस्य कीर्तनात् । चतु सनवदेवात्र चतुर्नाथ उदीरितः॥ १०८ ॥ वेदव्यासो य एवासीदासो वृन्दारनोऽधुना । सखा यः कुसुमापीडः कार्यतस्तं समाविशत् ।। १०६ ।। भट्टो वल्लभनामाभूच्छुको द्वैपायनात्मजः ।। ११० ।। नीलाम्बर चक्रवर्ती जी पहले गर्ग थे। उन्होने मिश्र जगन्नाथ जी की सभा में पहले से ही गौरागदव के जन्म की भावी सूचना दी थी॥ १०४॥ वृन्दावन मे यशोदा जी के पिता सुमुखनामक गोप अव शची- माता के जनक हुए । उनकी सम्मिणी व्रज में पाटला नामक गोपी थी। पहले नन्द की परिपद् के पण्डित भागुरिमुनि नामक जो पुरो- हित थे वे अब पुराण के अर्थजाता देवानन्द पण्डित हुए। काशी- नाथ,लोकनाथ,श्रीनाथ,रामनाथ ये चार ज्ञानीभक्त सनकादि चार थे। इसमें कोई सन्देह नहीं है । इन चारों में नाथ शब्द का प्रयोग है। इसलिये चतुः सन की तरह ये चारो नाथ कहे जाते हैं ॥१०॥१०॥ पहले वेदव्यास जी अब वृन्दारनदास जी हुए । वृन्दावन में जो पहले कुसुमापीड नामक ससा थे अब उनने कार्यवश इनमें प्रवेश -- गोरगणोद्देशदीपिका आचार्यः श्रीजगन्नाथो गगाढासः प्रभुप्रियः। आसीनिधुबने प्राग यो दुासा गोपिकाप्रियः ॥ १११ ॥ चन्द्रशेखर आचार्यश्चन्द्रो ज्ञेयो विचक्षणः। श्रीमानुद्धवदासोऽपि चन्द्रायेशावतारकः ॥ ११२॥ अतश्चैतन्यहरिणा कथितोऽयं निशापतिः । श्रीद्विश्वेश्वराचार्यो यः प्रागासीदिवाकरः ॥ ११३ ॥ विश्वकर्मा पुरा योऽभूदय भास्करठक्कुरः । भिक्षुको वनमाली यः सुदामासीद्विजः पुरा धनं प्राप्य प्रभोः सङ्ग दुःखं मत्वाभ्रमद्यतः ।। ११४॥ वैकुण्ठे द्वारपालौ यो जयाद्यविजयान्नको । तावाद्य जातो स्वेच्छातः श्रीजगन्नाथमाधवी ॥ ११५॥ पुण्डरीकाक्षकुमुदौ ख्याती वैकुण्ठमण्डले । गोविन्दगरुडाख्यौ तौ जाती गोडे प्रभोः प्रियो ॥ ११६॥ किया है । द्वैपायन के आत्मज शुकदेव जी अब वल्लभभट्ट करके प्र. सिद्ध है ।। १०६-११० ॥ प्राचार्य जगन्नाथ और प्रभु के प्रिय गंगादास ये दोनों पहले निधुवन में गोपिकाप्रिय दुर्वासा थे । चन्द्रशेखर आचार्य को वि- चक्षण जनों को चन्द्र जानना चाहिये । श्रीमान् उद्धवदास जी भी चन्द्र के आवेश अवतार हैं । इसलिये चैतन्यप्रभु इनको निशापति कहते थे । श्रीविश्वेश्वराचार्य पहले दिवाकर थे ॥ १११-~११३ ।। पहले जो विश्वकर्मा थे वे अब भास्कर ठाकुर हैं। पहले जो सुदामा जी थे अब वे भिक्षुकवनमाली हुए। सुदामा जी प्रभु से धन प्राप्त होकर दुःखी हो गये थे। अब केवल प्रभु का सग पाकर सुरा पूर्वक विहार करने लगे। ११४ ।। वैकुण्ठ के जय विजय नामक दोनों द्वारपाल अब निज इच्छा से जगन्नाथ माधव हुए। वैकुण्ठ मे जो पुण्डरीकाक्ष-कुमुद प्रसिद्ध हैं 1 गोरगणोद्देशदीपिका २५ गरुडः पण्डितः सोऽद्य गरुडो यः पुरा श्रुतः । पुरा योऽकरनामासीत् स गोपीनाथसिंहकः । इति केचित् प्रभापन्तेऽकर: केशवभारती ॥ ११७ ।। पुरी श्रीपरमानन्दो य आसीदुद्वयः पुरा । इन्द्रद्युम्नो महाराजो जगन्नाथार्चकः पुरा । जात: प्रतापरुद्रः सन् सम इन्द्रेण सोऽधुना ।। ११८ ।। भट्टाचार्यः सार्वभौमः पुरासीद्गीप्पतिर्दिवि ।। ११६ ।। प्रियनर्मससः कश्चिदर्जुनः पाण्डवोऽर्जुनः । मिलित्वा समभूद्रामानन्दरायः प्रभोः प्रियः ।। १२० ।। अतो राधाकृष्णभक्तिप्रेमतत्त्वादिकं कृती। रामानन्दो गौरचन्द्र प्रत्यवर्णयदन्यहम् ॥ १२१ ॥ ललितेत्याहुरेके यत्तदेक्नानुमन्यते । भवानन्दं प्रति माह गोरो यत्त्वं पृथापतिः ।। १२२ ।। वे दोनों प्रत्र गौड़देश में प्रभु के प्रिय गोविन्द तथा गरुड़ नाम से हुए है॥ ११५-११६ ॥ पहले जो गरुड़ थे अव वे गरुड पण्डित हुए। पहले प्रकार नाम से जो प्रसिद्ध हुए अन पे गोपीनाथसिंह हुए। कोई कोई केशव- भारती को अकर जी का अवतार मानते हैं ॥ ११७ ॥ पहले जो उद्धव जी थे ये अब परमानन्दपुरी हुए हैं। पहले जो जगन्नाथ जी के अर्चक इन्द्रधुम्न महाराज हुए उनने अब इन्द्र के साथ प्रतापरुद्र होकर जन्म लिया ॥ ११८ ॥ सार्वभौम भट्टाचार्य पहले देवलोक मे वृहस्पति थे। श्रीकृष्ण के प्रिय नर्मससा अर्जुन तथा पाण्डव अर्जुन दोनों मिलकर प्रभु के प्रिय रामानन्दराय हुए । इसलिये ये गौरचन्द्र के निकट राधाकृष्ण के भक्ति-प्रेमतत्व का वर्णन करते थे। कोई कोई महा- -- गौरगम्पोद्देशीपिना गोप्यऽर्जुनीयया साद्धमेकीभूयापि पाण्डर । अर्जुनो यद्रायरामानन्द इत्याहुरुत्तमा ।। १२३ ।। अर्जुनीयाभवत्तुर्णमर्जुनोऽपि च पाण्ड्य । इति पाद्मोत्तरे साडे व्यक्तमेव विरानते । तस्मादेतलय रामानन् रायमहाशय ॥ १४ ॥ व्रजे भत्ता समासेन ध्यन्तेऽथ यथामति ॥ १२५ ॥ पुरा श्रीनामनामासीदभिरामोऽधुना महीन् । द्वात्रिंशता जनरेव बाह्य काष्ठमुवाह य ॥ १२६ ।। पुरा सुदाम नामासीदद्य ठकुरसुन्दर । वसुदामससा'यश्च पण्डित श्रीधननय । १७ ।। सुवलो य प्रियश्रेष्ठ स गौरीदासपण्डित । कमलाकर पिप्पलाइ नाम्नासीद्यो महावल ॥१.८॥ नुभाव इनको ललिता जी का अवतार मानते हैं। कार्ड कोई ऐसा स्वीकार नहीं करते हैं। क्योंकि गौरचन्द्र भवानन्द के लिय कहते थे, तुम पृथापति पाण्डुराज है । विज्ञगण कहते हैं कि पाण्डुपुत्र अर्जुन अर्जुनीया नाम्मी किसी गोपा के साथ मिल कर रामान द का जन्म हुआ है । पाझोत्तर सण्ड म स्पष्ट ही देखा जाता कि अ र्जुन अर्जुनीया हुए हैं । अतएर ललिता अर्जुनीया-गोपी और पाण्डव ये तीनों मिलकर रामान दराय नामसे कहे गये हैं।।११६ १५४॥ अव ब्रज भक्त गणों का वणन करते हैं-पहले जो श्रीदाम ना मक गोपाल हुए वे अब अभिराम ठाकुर हैं । ये वीस व्यक्तियों द्वारा उठाने योग्य काष्ठ को वशी करके उठाया ॥ १२५-१२६ ।। पहले जो सुदाम नामक गोपाल थे अब वे सुन्दरठक्कुर हुए। वसुदाम ससा धनञ्जय पण्डित हुए । प्रियतम सुवल गौरीदास प- डित तथा महारल क्मलाकर पिप्पलाई हे॥१७-१९८॥
गौरगणोदेशदीपिका सुमाहुर्यो बजे गोपो दत्त उद्धारणाख्यक. महेशपण्डित. श्रीमान्महावाहुर्नजे ससा ॥ १२६ ॥ स्तोककृष्ण. ससा प्राग्यो दासः श्रीपुरुषोत्तमः ।। १३० ॥ सदाशिनसुतो नाम्ना नागरः पुरुषोत्तमः । वैद्ययशोद्भवो दामा यो वल्लो ससा बजे ॥ १३१ ।। नाम्नार्जुनः ससा प्राग् यो दासः श्रीपरमेश्वरः । काल. श्रीकृष्णदासः स यो लरङ्गः ससा नजे ॥ १३२ ॥ सोलावेचातया रयात' पण्डितः श्रीधरो द्विज । आसीद्बजे हास्यकारी यो नाम्ना कुसुमासवः ।। १३३ ।। वलरामसस. कश्चित् प्रवलो गोपालकः । आसीद्बजे पुरा योऽडा स हलायुधठाकुर. ॥ १३४ ॥ वरुथपः ससा नाम्ना कृष्णचन्द्रस्य जो ब्रजे। आसीत् स एव गोरागवल्लभो रुद्रपण्डित. ॥ १३५ ।। नज मे जो सुबाहु करके गोप थे वे अब उद्धारणदत्त करके रयात हुए हैं । महानाहु सया महेश पंडित हैं ॥ १६ ॥ पहले जो स्तोककृष्ण ससा रहे वे पुरुषोत्तमदास हुए । व्रज में जो दाम नामक गोप रहे वे अव वैद्यवंश उत्पन्न सदाशिव के पुत्र नागर पुरुषोत्तम हैं ॥ १३०-१३१ ।। प्रज में जो अर्जुन नामक ससा रहे वे परमेश्वरदास तथा लन गससा कालाकृष्णदास हुए ॥ १३२ ।। व्रज मे हास्यकारी जो कुसुमासव सखा थे वे अब सोलावेचा नाम से प्रसिद्ध ब्राह्मणवंश में उत्पन्न पंडित श्रीवर हैं । व्रज में जो वलदेव के ससा प्रवल नामक गोपचालक थे वे अब हलायुध ठाकुर हैं।। १३३-१३४॥ प्रजम वरूथप नामक कृष्णा के ससा अब गौरागप्रिय रुद्रप- गौरगणोद्देशहीपिका गन्धो यो बजे गोप. कुमुदानन्दपण्डितः ॥ १३६ ।। पुरा वृन्दारने चेटी स्थिती भृङ्गारभंगुरी। श्रीकाशीश्वरगोविन्दौ तौ जाती प्रभुसेवको ।। १३७ ।। वृन्दामने स्थिती प्राग् यो भृत्यो रक्तकपनमो। गौरागसेवकापद्य हरिदास वृहन्दिशू ।। १३८ । पयोदवारिटौ प्राग् यो नीरससारकारिगणे । तापद्य भृत्यौ रामायिनन्दायिश्चेति विश्रुतौ ॥ १३६ ।। बजे स्थितौ गायको यो मधुकण्ठमधुनती । मुकुन्दवासुदेवो तो दत्तो गौराङ्गगायकौ ॥ १४ ॥ नटश्चन्द्रमुखः प्राग य स करो मकरध्वज.॥ १४१ ॥ पुरासीद् यो व्रजे नाम्ना मृदङ्गी श्रीसुधाकर. । स श्रीशंकरघोपोऽद्य डम्फवायविशारदः ।। १४२।। आसीद्बजे चन्द्रहासा नर्तको रसकोविद । सोऽयं नृत्यविनोदी श्रीजगदीशारय-पण्डित ॥ १४३ ।। ण्डित हैं । गन्धर्वनामक गोप कुमुदानन्द पडित हैं ॥१३५-१३६।। पहले वृन्दावन मे भृङ्गार तथा भगुर नामक दो कृष्ण के भृत्य थे वे अब काशीश्वर गोविन्द नाम से प्रभु सेवर होकर प्रकट हुए । पहले ब्रज में रक्तक-पत्रक करके जो दो भृत्य थे अब वे गौर सेवक हरिदास वृहच्छिशु हुए। पहले ब्रज मे जलसस्कारकारी पयोद तथा वारिद नामक जो दो सेवक थे अब वे रामायी-नन्दायी नाम से ख्यात हुए।। १३५-१३६ ।। ब्रज के मधुकठ और मधुव्रत नामक दोनो गायक मुकुन्द तथा वासुदेवदत्त नाम से महाप्रभु के सेवक हुए ॥ १४० ॥ पहले जो चन्द्रमुख नट थे अब वे मकरध्वजकर हैं। मृदंगिया सुधाकर गौरलीला मे डफवाद्य में विशारद शकरघोप हुए। ब्रज ६ गौरगरणोद्देशदीपिका वेगुञ्च मुरली योऽयान्नाम्ना मालावरो बजे । सोऽधुना वनमालारयः पण्डितो गौरवल्लभः ॥ १४४ ।। वृन्दाबने यो विख्याती शुकौ दक्षविचक्षणी । तावध जातौ मज्येष्ठौ चैतन्यरामदासको ।। १४५ ॥ अधुना वल्लवीवर्गा ये ये भूताः प्रभुप्रियाः । ते त एव प्रकाश्यने यथामति यथाश्रुतम् ।। १४६ ।। श्रीराधा प्रेमरूपा या पुरा वृन्दावनेश्वरी । स श्रीगदाधरो गौरवल्लभः पण्डितास्यकः ।। १४७ ॥ निर्णीतः श्रीस्वरूपैर्या मजलक्ष्मीतया यथा ॥ १४ ॥ पुरा वृन्दाबने लक्ष्मीः श्यामसुन्दरवल्लभा । साय गौरप्रेमलक्ष्मीः श्रीगदायरपण्डितः॥ १४ ॥ में चन्द्रहास नामक जो रसज्ञ नर्तक हुए ये अव नृत्यविलासी जग- दीश पंडित हैं । व्रज मे कृष्ण के वेणु-मुरली धारणकारी मालावर ये अय चे गौरप्रिय वनमाली पंडित हुए ॥१४१-१५४|| वृन्दावन मे दक्ष विचक्षण नामक जो दोनों शुक पक्षि थे प्रय वे चैतन्य-रामदास रूप से प्रकट हुए । ये दोनों मेरे बड़े भाई हैं ।। १४५॥ अब प्रभु की प्रेयसी गोपियों ने जहाँ जन्म लिया उसका यथामति जैसा सुना है वर्णन करते हैं ।। १४६ ॥ पहले वृन्दावनेश्वरी प्रेमस्वरूपिणी श्रीकृष्ण की कान्ता श्रीराधिका जी है वे अब गौरवल्लभ गदाधरपण्डितगोस्वामी हैं । स्वरूपगोस्वामि ने जिनको ब्रज की लक्ष्मी रूप से निर्णय किया है। पहले वृन्दावन में श्यामसुन्दर की प्रिया लक्ष्मी अब गौराष्ट्रप्रेमलक्ष्मी गदाधरपडित है । जव ललिता राधा की अनुगता है तब वह अनुरावा करके रयात है। अतः ललिता जी का गदाधरपंडित गोस्वामि में प्रवेश है। यह गौरगणोद्देशीपिका राधामनुगता यत्तल्ललिताप्यनुराधिका। अत प्राविशदेपा त गौरचन्द्रोदये यथा ॥ १५० ।। इयमपि ललितैन राधिकाली न खलु गदाधर एष भूसुरेन्द्र । हरिरयमथ वा स्नयैव शक्त्या नितयमभूत् स ससी च राधिका च ॥ १५१ ॥ ध्रुनानन्दब्रह्मचारी ललितेत्यपरे जग । स्वप्रकाशविभेदेन समीचीन मनन्तु तत् ॥ १५२ ।। अथवा भगवान् गौर. स्वेच्छयागानिरूपताम् । अत श्रीराधिकारूप श्रीगदाधरपण्डित ॥ १५३ ।। राधाविभूतिरूपा या चन्द्रकान्ति पुरा स्थिता । साद्य गौरागनिकटे दासवश-गदाधर ॥ १५४ ॥ पूर्णानन्दा व्रने यासीद्वलदेवप्रियामणी । सापि कार्यशादेव प्राविशत्तं गदावरम् ।। १५५ ॥ पुरा चन्द्रावली यार्स बजे कृष्णप्रिया परा। अधुना गोडदेशे सा कविराज सदाशिव ॥ १५६ ।। कथा चैतन्यचन्द्रोदय मे वणित है । “यह भूसुर श्रीगदाधर राधिका की प्रियससी ललिताकी भॉति प्रतीयमान हो रहे हैं। भावार्थ है यह गावर नहीं है यह तो ललिता हैं । अथवा श्रीहरि ही निजशक्ति के द्वारा स्वय, राधिका तथा ललिता इन निविध प्रकार से प्रतीयमान हो रहे हैं। काई कोई कहते हैं कि धुवानन्दब्रह्मचारी ललिता जी हैं। निन प्रकाशभेद के हेतु यह मत समीचीन है । किम्बा भगवान् गो- रचन्द्र निज इच्छा से निरूप हुए है । अतएव गदाधर पडित राधिका स्वरूप है ।। १४७-१५३ ।। पहले राधिका की भूपणरूपा जो चन्द्रकान्ता थी वह अब गौराङ्ग के निकट दासवश गदावर हुई । व्रज में बलराम की प्रियतमा जो गौरगणोदेशदीपिका यस्या वक्षसि सुप्पाप करणे वृन्दावने पुरा । सा श्रीभद्राद्य गोरागप्रिय शङ्करपण्डित ॥ १५७ ॥ पुरा श्रीतारकापाल्यौ ये स्थिते वनमण्डले । ते साम्प्रतं जगन्नायत्रीगोसानो प्रभो प्रियौ ।। १५८ ।। शैया यासीगजे चण्डी स दामोदरपण्डित । कुतश्चित् कार्यतो देवी प्रातिशत सरस्वती ।। १५६ ।। कलामशिक्षयद्राधा या विशासा व्रजे पुरा । साद्य स्वरूपगोस्वामी तत्तद्भापग्लिासपान् ।। १६० ।। केशविन्यासमकरोंद्राधा चित्रा नजे पुरा । सेदानी कनिराज श्रीवनमाली प्रभो प्रिय ॥ १२१ ।। श्रीराधाप्राणरूपा या श्रीचम्पकलता नजे । साद्य राघवगोस्वामी गोपद्धनकृनस्थिति । भक्तिरत्नप्रकाशारयमथो येन विनिम्मित ॥ १६० ।। पूर्णानन्दा थी वह अय कार्यार्थ गदाधर मे प्रविष्ट हुई । पहले ब्रजमे श्रीकृष्ण की परमप्रिया चन्द्रारली नाम्नी नो ससी थी अब वह गौ डदशम सताशिव पिरान हुई ॥ १५४-१५६ ।। पहले श्रीकृष्ण ने निसके वक्ष मे शयन क्यिा वह श्रीभद्रा आन गौरागप्रिय शकर पण्डित है ।। १५७ ॥ पहले ब्रजमडल मे तारका पाली नामक जो दो गापी थीं वह दोनो गोपी अब प्रभुप्रिय जगन्नाथ गोपाल हुई । प्रज की च डी शैया सरसी दामोदर पडित है । किसी काग्य के वश सरस्वतीदेवी ने उसमे प्रवेश किया है । पहले ब्रज म जो श्रीपिशासा राधिका जी को कला मिसाती थी वह अब उस उस भाव के गिलासी स्वस्प गोस्वामी जी है । चित्रा नाम सग्गी जो कि ब्रज म पहले राधिका का वेशविन्यास करती थी वह अव प्रभुप्रिय वनमाली कविरान हैं।
३२ - गौरगणोद्देशदीपिका तुङ्गविद्या ब्रजे यासीस सर्वशास्त्रे विशारदा। सा प्रवोवानन्दयतिौरोद्गानसरस्वती ।। १६३ ।। इन्दुलेसा बजे यासीन्छीराबायाः सरपी पुरा। कृष्णदासब्रह्मचारी कृतवृन्दावनस्थितिः ॥ १६४ ।। रङ्गदेवी पुरा यासीदद्य भट्टो गढायरः । अनन्ताचार्यगोस्वामी या सुदेवी पुरा ब्रजे ॥ १६५ ।। श्रीकाशीश्वरगोस्वामी शशिरेखा पुरा ब्रजे । धनिष्ठा भक्ष्यसामग्री कृष्णायादाद्ब्रजेऽमिताम् । सैव सम्प्रति गौरागप्रियो राघवपण्डितः ॥ १६६ ।। गुणमाला व्रजे यासीद्दमयन्ती तु तत्स्वसा। रत्नरेखा कृष्णदासः कृष्णानन्दः क्लावती ॥ १६७ ॥ गौरसेनी पुरा नारायणपाचस्पतिः कृती। पीताम्वरस्तु कावेरी सुकेशी मकरध्वजः ॥ १६८ ॥ ॥ श्री राधिका की प्रारणस्वरूपा ब्रज की चम्पकलता सखी आज गोव- द्धन निवासी राघवगोस्वामी है । राघवपंडित ने भक्तिरत्नप्रकाश नामक प्रथ की रचना की थी।। १५८-१६२।। ब्रज में सर्वशास्त्र विशारदा पहले जो तुङ्गविद्या सखी थी वह अब गौर गुणगान में सरस्वती प्रबोवानन्द सरस्वती है । पहले ब्रज मे इन्दुलेसा राधिका की सखी थी वह अवकृष्णदासब्रह्मचारी हैं। इन्होंने बृन्दावन में वास लिया है। रङ्गदेवी सखी अव भगदाधर । ब्रज की सुदेवी ससी अब अनन्ताचार्य गोस्वामी है। पहले ब्रज में शशिरसा जी अब श्रीकाशीश्वर गोस्वामी है। ब्रज में पहले धनिष्ठा नामक जो सखी रही जो कि श्रीकृष्ण के लिये अपरिमित खाद्य सामग्री प्रदान करती थी वह अव गौरादप्रिय राववपडित है । गुणमाला नामक ब्रज मे जो रही यह अब उनकी भगिनी दमयन्ती गौरगणोदेशीपिका माधवी माधवाचार्य इन्दिरा जीवपण्डितः ॥ १६६ ।। ब्रजे यासीत सुमधुरा तुझरिया प्रिया पुरा । विद्यावाचस्पतिगरिप्रियो ब्रजजनप्रियः॥ १७० ।। चलभद्रारयको भट्टाचार्यः श्रीमधुरेक्षा । श्रीनाथमिश्रश्चित्रागी कविचन्द्रो मनोहरा ॥ १७१ ।। ब्रजे नान्दीमुनी यासीन साग मागठम्युरः । प्रल्हादो मन्यते कैश्चिन्मपिना सन मन्यते ॥ १०॥ फ्लक्एठीमुफराठ्यो ये नजे गान्धर्चनाटिके। रामानन्द नमु. सत्यराजश्चापि यथायर्यम् ।। १७३॥ बजे कात्यायनी यासीदद्य श्रीकान्तसेनकः ॥ १७४ ।। ब्रजाधिकारिणी यासीन्दादेवी तु नामत.। सा श्रीमुकुन्ददासोऽग सण्डरासः प्रभुप्रियः ।। १७५ ॥ । है । रत्नरेखा-कृष्णदास,क्लारती कृष्णानन्द हैं । प-ले जो शौरसेनी है वह अन नारायण वाचसति है । कावेरी पीताम्बर नथा सुरेशी मकरपज है।। १३३-१६८।। माधवी मारवाचार्य तथा इन्दिरा जीरगोस्वामी हैं। पहले नज में जो सुमधुरा नामक तुगविद्या की ससी रही वह अव गोर- प्रियपान विद्यावाचस्पति है । वे ब्रजजन के प्रिय पान हुए ॥ १७ ॥ जज मे जो मधुरेक्षणा है वह वलभद्र भट्टाचार्य हुई । चित्रागी श्रीनाथमिश्र ओर मनोहरा विचन्द्र है । व्रज में जो नान्दीमुसी थी यह अन सारठाकुर है । कोई कोई उन को प्ररहाद मानते हैं। मेरे पिता का यह मत नहीं है ।। १७ -१७२।। वज में पहले कलकण्ठी तथा सुक्ठी नामक गान्धर्व नटिनी थी घे दोनो अव रामानन्दवसु और सत्यराज हुई ।ज की कात्यायनी देवी श्रीकान्तसेन है । मज की अधिकारिणी वृन्दादेवी श्रव प्रभु के ३४ गौरगरणोद्देशदीपिका पुरा वृन्दावने वीरादूती साश्च गोपिकाः । निनाय कृष्णनिकटं सेदानी जनको मम । बजे विन्दुमती यासीदद्य सा जननी मम ।। १७६ ।। पुरा मधुमती प्राणससी वृन्दावने स्थिता । अधुना नराख्यः सरकार प्रभोः प्रियः ।। १७७ ।। पुरा प्राणससी यासीन्नाम्ना रत्नावली व्रजे । गोपीनाथाल्यकाचार्यो निर्मलत्वेन विश्रुतः ॥ १७८ ।। वंशी कृष्णप्रिया यासीत् सा वशीदासठाकुरः ॥ १७ ॥ श्रीरूपमञ्जरी ख्याता यासीवृन्दाबने पुरा। साद्य रूपाख्यगोस्वामी भूत्वा प्रकटतामियात् ॥ १८० ॥ या रूपमञ्जरी प्रेप्ठा पुरासीद्रतिमञ्जरी। सोच्यते नामभेदेन लवङ्गमञ्जरी बुधैः ॥ १८१ ।। साद्य गौराभिन्नतनुः सर्वाराध्यः सनातनः । तमेव प्राविशत् कार्यान्मुनिरत्नः सनातनः ।। १८२ ।। प्रिय, श्रीखंड प्राम निवासी मुकुन्ददास है। पहले वृन्दावन मे जो वीरा नामक दूती रही जो कि गोपियों को कृष्ण के निकट ले जाती थी वह अब मेरे पिता शिवानन्दसेन है । ब्रज में जो विन्दुमती थी वह श्रय मेरी माता है ।। १७३-१७६ ।। पहले ब्रज मे मधुमती नामक जो प्राणसपी थी यह अब प्रभु के प्रियपान नरहरि सरवार ठाकुर है । पहले व्रज में रत्नावली नामक जो प्राणसखी थी यह अव परम पवित्र गोपीनाथाचार्य हैं। श्रीकृष्ण की प्रिया बंशी अर यशीदास ठाकुर हुई। पहले ब्रज में जो रूपमं- जरी थीं यह अय रूपगोस्वामी होकर प्राट हुई। रूपमजरो की प्रिया रतिमंजरी जो कि नाम भेद से पण्डितगण के द्वारा लवङ्गमंजरी पदी जाती है यह अव गौर के अभिन्नतनु, साराभ्यसनातन गोस्वामी ३५ गौरगणोदेशदीपिका श्रीमल्लवगमञ्जाः प्रकाशत्वेन विश्नुतः। शिवानन्दश्चक्रवर्ती कृतवृन्दावनस्थितिः ।। १८३ ।। अनङ्गमञ्जरी यासीत् साद्य गोपालभट्टकः । भट्टगोस्वामिनं केचिदाहुः श्रीगुणमञ्जरी ।। १८४ ।। रघुनाथाल्यको भट्टः पुरा या रागमञ्जरी। कृतश्रीराधिकाकुण्ड-कुटीरवसतिः स तु ॥ १८५ ॥ दासश्रीरघुनाथस्य पूर्याख्या रसमञ्जरी। अमुकेचित प्रभाषन्ते श्रीमती रतिमञ्जरीम् । भानुमत्याख्यया कचिदाहुस्तं नामभेदतः ॥ १८६ ।। भूगर्भठक्कुरस्यासीत् पूर्वाख्या प्रेममञ्जरो। लोकनाथाख्यगोस्वामी श्रीलीलामन्जरी पुरा ॥ १७ ॥ कलावती रसोल्लासा गुणतुङ्गा बजे स्थिता। श्रीविशालाकृतं गीतं गायन्ति स्माद्य ता मताः । गोविन्द-माधवानन्द-वासुदेवा यथाक्रमम् ॥ १८ ॥ . । हैं । कार्य के लिये मुनिरत्न सनातन का भी इनमें प्रवेश है। शि. घानन्द चक्रवर्ती लवङ्गमंजरी का प्रकाश करके प्रसिद्ध तथा वृन्दावन- वासी हैं ।। १७७-१-३॥ अनगमंजरी श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी हैं । इनको कोई कोई गु- णमंजरी कहते हैं। पहले जो रागमंजरी है वह अव रघुनाथभट्ट है। जो कि राधकुण्ड के तट मे कुटीर पर वास करते थे। रघुनाथदास जी का पहिला नाम रसमंजरी है । उनको कोई कोई श्रीमती रतिमंजरी कहते हैं । कोई कोई नामभेद से भानुमती कहते हैं। भूगर्भटाकुर का पहला नाम प्रेममंजरी है । लोकनाथ गोस्वामी पहले लीलामंजरी थे॥१८४-१८७॥ कलावती-रसोल्लासा-गुणतुगा नामक यो व्रज में रहकर विशासा ।
गौरगणोदेशदीपिका . - रागलेखा-कलाकेल्यौ रावादास्यो पुरा स्थिते । ते ये शिखिमाहाती तत्स्यसा माववी क्रमात् ॥ १८६ ।। पुलिन्दतनया मल्ली कालिदासोऽधुनाभवत् ।। १६० ।। शुक्लाम्बरो ब्रह्मचारी पुरासीदद्यज्ञपलिका। प्रार्थयित्वा यदन्न श्रीगौराको भुक्तवान् प्रभुः । केचिदाहुब्रह्मचारी याज्ञिकब्राह्मणः पुरा॥ १६१ ॥ अपरे यज्ञपल्यौ श्रीजगदीश-हिरण्यको । एकादश्यां ययोरन्न प्रार्थयित्वाऽप्सत् प्रभुः ॥ १२ ॥ मथुरायां पुरा यासीत् सैरन्ध्री कृष्णवल्लभा । साद्य नीलाचलावासः काशीमिशः प्रभोः प्रियः ।। १६३ ॥ मालनी-चन्द्रलतिका-मञ्जुमेधा-घरागदा :: रत्नावली च कमला-गुणचूडा-मुकेशिनी ॥ १६४ ॥ कर्पूरमञ्जरी-श्याममजरी-श्वेतमञ्जरी। बिलाममजरी-कामलेग्या च मौनमञ्जरी ॥ १५॥ गन्धोन्मादा-रसोन्मादा-चन्द्रिका कलभापिणी । गोपाली-हरिणी-काली-कालाक्षी-नित्यमञ्जरी।। १६६॥ कलकण्ठी-कुरङ्गाक्षी-चन्द्रिका-चन्द्रशेखरा । या याः स्वयोग्यसेवायां नियुक्ताः सन्ति रचिया ॥ १७ ॥ रचित गीत को गाती थीं श्रय ये तीनों यथाक्रम मे गोविन्द,माध- वानन्द,वासुदेव नाम से ग्यात हैं। रागरेग्या क्लालि नामक दोनों राधादासी "प्रय शिग्निमाहानी तथा उनकी भगिनी माधव हुई। पु. लिन्दयन्या मल्ली प्रय यालिदास है। पहले जो यनपत्नी थी यह श्रय शुक्लाम्यर प्रमचारी हु जिनमे अन्न की प्रार्थना कर गौराम- प्रगु भोजन परते थे। कोई कोई पाते हैं कि प्राचारी जी पहले यानिक प्राधा रदे । अन्य दो यज्ञपली श्रीजगदीश हिरण्यम हैं।
गौरगणोदेशदीपिका गौरेण तत्प्रियः सा धृतपुमपविग्रहाः । सेलन्ति स्म स्वभावानुसारात्ताः क्रमशो यथा ॥ १६ ॥ शुभानन्दो द्विजो ब्रह्मचारी श्रीवरनामकः । परमानन्दगुणो यकृता कृपणास्तवावली ॥ १६६ ।। रघुनायो द्विजः कश्चिद्गीराङ्गानन्यसेवकः । कसारिसेनः सेनः श्रीजगन्नाथा महाशयः ।। २००॥ सुबुद्धिमिश: श्रीदो रघुगियो द्विजोत्तमः ।। २०१॥ रिपयः पट काममुरया जिता येन यशीकृताः । यथार्थनामा गौरेगा जितामित्रः स निम्मितः ॥ २०२॥ निम्मिता पुस्तिका येन कृष्णप्रेमतरङ्गिणी । प्रभु ने एकादशी के दिवस जिन दोनों से अन्न प्रार्थना कर भोजन किया। पहले मथुरा में कृष्णवल्लभा जो सैरिन्ध्री (कुञा ) थी वह अब नीलाचलवासी, प्रभुप्रिय वाशीमिश्र हैं ॥ १८८-१६७ ॥ मालती, चन्द्रलतिका, मजुमेवा, बराङ्गदा, रत्नायली, कमला, गुणचूडा, सुमेशिनी, कर्पूरमंजरी, श्याममंजरी, श्वेतमजरी, विला. समंजरी, कामलेसा, मीनमंजरी, गन्धोन्मादा, रसोन्मादा, चन्द्रिका, कलभापिणी, गोपाली, हरिणी, काली, कालाक्षी, नित्यमंजरी, फल- कंठी, कुरंगाक्षी, चन्द्रिका, चन्द्रशेसरा जो ये सब राधिका के द्वारा निज निज योग्यसेना में नियुत्ता है वे सब प्रिय पुरुष शरीर धारण कर निज निज भावानुसार गौरचन्द्र के साथ कोड़ा करती है। उन सनमा नाम यथाक्रम से यह है-शुभानन्दद्विज, श्रीधरब्रह्मचारी, कृ. पणास्तवानली रचयिता परमानन्दगुप्त, गौराग के अनन्य सेवक रघु- नाय नामक कोई ब्राह्मण, कंसारिसेन, जगन्नाथसेनमहाशय, सुवुद्धि- मित्र, श्रीहर्ष, द्विजष्ठरघुमित्र, कामादिपरिपु जयकारी श्रीगौराग के द्वारा जितामित्र करके बोले हुए, कृष्णप्रेमतरङ्गिणी के रचयिता ३८ गौरगणोदेशदीपिका श्रीमद्भागवताचार्यो गौराङ्गात्यन्तवल्लभः। सुशीलः पण्डितः श्रीमान् जीवः श्रीवल्लभात्मजः॥ २०३ ॥ वाणीनाथद्विजश्चम्पहवासी प्रभोः प्रियः ।। २०४।। ईशानाचार्यकमलौ लक्ष्मीनाथाल्य-पण्डितः । गङ्गामन्त्री जगन्नाथो मामुपाधिर्द्विजोत्तमः ।। २०५।। श्रीकण्ठाभरणोपाधिरनन्तश्चदृवंशजः । हस्तिगोपालनामा च रङ्गवासी च वल्लभः ।। २०६॥ ह-चार्यो गौरसङ्गी मिश्रः श्रीनयनस्तथा । कविदत्तो रामदासश्चिरञ्जीव-सुलोचनौ ।। २०७ ।। केचिन्महान्तः केचित्स्युर्महान्तश्चोपपूर्वकाः । उभयेपां गुणास्तुल्यास्तेनामी गणिता मया ।। २०८ ।। खण्डवासी नरहरेः साहचर्यान्महत्तरौ। गौराङ्ग कान्तशरणौ चिरजीव-सुलोचनौ ।। २०६ ॥ गुरोर्नाम न गृन्हीयादिति शास्त्रानुसारतः । श्रीश्रीनाथस्य पूर्वाख्या मया न प्रकटीकृता ।। २२० ।। गौरवल्लभ श्रीमद्भागवताचार्य, सच्चरित्र श्रीवल्लभात्मज पंडित श्रीजीव,प्रभुप्रिय चम्पाहाट निवासी वाणीनाथद्विज,ईशानाचार्य,कमः ल,लक्ष्मीनाथपण्डित,गद्गामन्त्री,द्विजोत्तमजगन्नाथ मामुपाधि, चट्टव शजात कण्ठाभरण उपाधिवाले अनन्त,हस्तिगोपाल,रङ्गवासी वल्लभ, हरि प्राचार्य, गौरांगसंगी श्रीनयनमिश्र, कविदत्त, रामदास, चि. रखीय, सुलोचन है।। २०७ ।। इनमें से काई कोई महान्त कोई काई उपमहान्त थे । उभय का समान गुण होने के कारण पृथक्प से गणना नहीं की गई है।।२०८॥ खएडवासी नरहरि के सहायक के कारण चिरजीव और मु. लोचन महत्तर हैं और गोराग फे एकान्त प्राधित है। २०६ ।।
गोरगणोद्देशदीपिका ३६ व्याचकार परिपाटयाद्यो भागवत-सहिताम् । कुमारहट्टे यत्कीर्ति कृष्णदेवो पिराजते ।। २११ ।। ये ये महान्त क्रमभङ्गभूतास्ते मेऽपराध कृपया क्षमन्तम् । गुणान् पिनिर्णीय सता समस्तान ब्रह्मेशशेपाः कथितुन शना ॥१२ मीमासकेभ्य शठताविकेभ्यो विशेपतो हेतुरतेभ्य एप । गोग्य प्रयत्नाद्रसशास्त्रविद्भयो देय' सदा गौरपदाश्रयेभ्यः ॥१३॥ श्रीगौरागगणोद्देशदीपिका रचिता मया । दीप्यता परमानन्दसन्दोहभक्त्वेश्मनि ।। २१४ ।। शाके वसुग्रहमिते मनुनैव युक्त प्रन्योऽयमागिरभवत् क्तमस्य घस्रात् । "शास्त्र के अनुसार आदि मे गुरु का नाम उल्लेस नहीं करना चाहिये” इसलिये मैंने गुरु श्रीनाथ का पहला नाम नहीं प्रकाश किया है ।।१०।। जिनने परिपाटी के साथ भागवतसंहिता की व्यारया की जिन की कीर्ति कुमारहट्ट मे कृष्णदेवपिमह रूप से विराजमान हैं। जिन जिन महान्तो का नमभग हुआ है वे सब कृपा कर मेरा अप. राप क्षमा करें। क्योंकि ब्रह्मा ईश और शेष भी साधुआ की गुणा बली वर्णन करने में असमर्थ हैं ॥१२॥ मीमासक, शठ, तार्किक, विशेप करके हेतुरादी इन सब के नि- फ्ट यत्न से इस प्रन्य का गोपन रसें। गौरपदाश्रयो रसशास्त्रवेत्ताओं को इसे प्रदान करना चाहिये ।। २१३ ।। परमानन्द सनि भचों के गृह मे हमसे विरचित यह श्रीगौरग- पोद्देशदीपिका देदीप्यमान होवें ॥ १४ ॥ वसु (2) प्रह (६) मनु (१४ ) से युक्त शकाद में अर्थात् १४६ शाक मे किसी एक दिवस मैंने इस ग्रन्थ की रचना की।
४०
गौरगणोदेशदीपिका
चैतन्यचन्द्रचरितामृतमग्नचित्तः
शोध्य. समाकलितगौरगणान्य एपः ।। २१५ ॥
इति श्रीपुरीदासपरमानन्ददासापरनामधेय
कनिकर्णपूरविरचिता श्रीगोरगणा शदीपिका
समाप्ता॥
महाप्रभु श्रीचैतन्यचन्द्र के चरितामृत मे मग्न चित्त विज्ञगण मेर।
इस गोरगण नामक ग्रन्थ का सशाधन करेंगे।। १५ ।।
इति गौरगणोद्देशढीपिका का अनुवाद समान हुआ।
मङ्गलबार-सप्तमी माघ वदी सम्वत् २०१० स्थान-मथुरा मदनमोहन
जी का मन्दिर में (चक्रतीर्थ)
अनुनादक-कृष्णदास ॥
भज-निनाइ गौर राधेश्याम
अप-हरेकृष्ण हरे राम ॥
श्रीसंकल्पकल्पद्रुमः वृन्दावनेश्वरि ! वयो-गुण-रुप-लीला- सौभाग्य कलि-करुणाजलधे! ऽवधेहि । दामीभवानि सुखयानि सदा सकान्तां त्वामालीभिः परिवृतामिदमेव याचे ॥१॥ शृगारयानि भवतीमभिसारयानि पीक्ष्यैव कान्तवदनं परिवृत्य यान्तीम् । धृत्वाञ्चलेन हरिसन्निधिमानयानि संप्राप्य तर्जनसुधां हपिता भवानि ॥२॥ पादे निपत्य शिरसानुनयानि रुष्टां तं प्रत्यपाङ्ग-कलिकामपि चालयानि । तद्दो येन सहसा परिरम्भयानि रोमाञ्चकञ्चुकवतीमवलोकयानि ॥ ३ ॥ हे वृन्दावनेश्वरि ! हे वयः, गुण, रूप, लीला, सौभाग्य, केलि, करुणा की समुद्र ! अवधान कीजिये । कुछ निवेदन करता हूँ। मैं आपकी दासी बनूँगा । कान्त के साथ सम्खीमण्डल से परिवृता श्राप की सेवा कर सुखी करूँगा ।। १ ॥ मैं आपको विविध विभूरण से भूपित कराकर अभिसार करा- ऊँगा । जब आप वाम्यता के वश कान्तवदन का अवलोकन कर फिर जाएंगी तब मैं वस्त्राञ्चल धारण कर श्रीहरि के निकट आपको लाऊँगा तथा श्राप की तर्ज ना को सुधा की भॉति प्राप्त होकर प्रसन्न प्राप्त करूँगा ॥२॥ आपको रुष्ठा देख चरण में पतित होकर अनुनय करूँगा तथा श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः प्राणप्रिये ! कुसुमतल्पमलङ्कुरु त्व मित्यच्युतात्मिकरन्द-रसं धयानि । मा मुञ्च माधव ! सतीमिति गद्गदार्द्ध- वाचस्तवैत्य निकटं हरिमाक्षिपानि ।।४।। बामामुदस्य निजवक्षसि तेन रुद्धा- मानन्दनाप्पतिमिता मुहुरुन्द्रलन्तीम् । व्यस्तालका सपलितवेणीमवद्धनीवी त्वा वीक्ष्य साधु जनुरेच कृतार्थयानि ।। ५ ।। तल्पे मयैव रचिते बहुशिल्पभाजि पोप्ये निवेश्य भनती नननेति वाचम् । कृष्ण सुरसेन रमयन्तमनन्तलीलं चातायनात्तनयनैव निभालयानि ॥६॥ आपका अलक्ष्य में अपाङ्ग चालना सकेत कर श्रीहरि के विशाल भुजों के द्वारा आपको परिरम्भित क्राउँगा। उमसे श्राप रोमाञ्च कञ्चलिका से युक्त हो जायगें। उसे देखकर आनन्दित हो जाऊँगा|३|| आपका हस्नधारण कर “हे प्राणप्रिये इम कुमुमशग्या को अ- लंकृत कीजिये" इस प्रकार जब श्रीहरि कहेंगे तव में उस मकरन्दरम या पान करूंगा। फिर जब आप गद् गद् श्रद्ध वचन मे बहेगी कि "हे माघर ! मैं सती हूँ मुझे छोड दीजिये" तय मैं श्रार प्राप के समक्ष श्रीहरि का तिरस्कार करूँगा ॥ ४॥ वाम्य स्वभाववनी श्राप हस्तयुगल में उटा पर जन श्रीकृष्ण निज यत्न.स्थल में रोध करेंगे नय प्राप श्रानन्द मेलित होरर पुछ नहीं कह सकेंगी। उस समय श्रापकी अलवायला यिपर जा- पगी, येग्गी का यन्धन टूट जाएगा, नीयीनन्धन मुल जाएगा। माप की इम प्रकार मधुर भवस्था देय पर जन्म यो माल पगाशा गुममे विरचित यद् शिल्पाला विशिष्ट पुष्पशन्या में नही नहीं ३ श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुम स्थित्वा वाहिय॑जनयन्त्र-निवद्धडोरी- पानिमिर्पणवशान्मृदु बीनयानि । उत्तुङ्ग केलिकलिन-अमपिन्दुजाल- मालोपयानि मणि स्मितमुद्गीरानि ॥७॥ श्रीरूपमञ्जरि-मुसप्रियकिङ्करीणामादेशमेव सतत शिरसा यहानि । तेनैव हन्त तुलसी परमानुकम्पापात्रीभवानि करवारिग सुरसेन संपाम्।। माल्यानि हारकरवानिमृजा पिचित्र- वर्ति शिताशुघुमृणागुरुचन्दनानि । चीटीर्लनड ग्यपुरादियुता ससीभि मार्द्ध मुदा पिरचयानि कला प्रमाश्य ॥ ६ ॥ इस प्रकार बोलने वाली आपको बैठाकर अनन्त लीलापरायण श्री कृष्ण जन आपके साथ विलास क्रेगे तव में गवाक्षरध्र म नयन द कर दर्शन करूँगा॥६॥ श्राप दोना जन विलास से विभ्रान्त होकर अत्युच्च फेलिक्रीडा से अमित हागे तब मैं वाहिर रह कर व्यनन यन्त्र होरी का याक- पण कर मृदु मृदु व्यनन क्रूँगा तथा धर्म क्ण दृर कराकर मन्द- हास्य के साथ रतिकूनन अपण करूँगा ॥७॥ उस समय श्रीरूपम नरी प्रमुख प्रिय विङ्करीगण आदेश करेंगी कि "तुम अब डोरि परित्याग कर पुष्पानयन चन्नघर्पणादि परि- चार्या म जाओ" । उनका आदेश सर्पना मस्ता मे धारण कर त दानीन्तन सेवा में नियुक्त हाऊँगा तथा आता प्रतिपालन करने के कारण तुलसीम जरी की परम अनुकम्पा पात्र बनूंगा । | में माला का प्रथन, हार केयूराति अलङ्कार का मानन, मकरी- भगी प्रारिक निर्माणार्थ निचित्र पाती की रचना, कपूर कु कुम- अगुरु-चन्दनादि से अनुलेपन का प्रस्तुत, लन, सुपारि आदि से ताम्बूल निर्माण करूँगा, निनसे सखिया के बीच मेरी कला कौशन श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः त्वां सस्तबेपवसनाभरणां सकान्तां वीक्ष्य प्रसाधनविधी द्रुतमुद्यताभिः । श्रीरूप-रङ्ग-तुलसी-रतिमञ्जरीभिः दृष्टानयानि तव सम्मुखमेव तानि ॥ १० ॥ त्वामाशिखाचरणमूढविचित्रवेपां स्प्रष्टुपुनश्च धृततृष्णमवेक्ष्य कृष्णम् । आयान्तमेव विकट-भ्रकुटीविभङ्ग- हृड कृत्युदञ्चितमुसी विनिवर्त्तयानि ॥ ११ ॥ तत्य विस्मयनती ललितां प्रतीह साधी वकण्टकविनिष्क्रमनार्थमस्याः। प्राप्त न्यसिद्धदयि ! मामियमेव धूर्ते त्युक्ति हरेः स्वदलि रसयानि नित्यम् ॥ १२ ॥ निष्क्रम्य कुञ्जभवनाद्विपिने विहत्त कान्तकबाटु परिरब्धतनुप्रयान्तीम् । का प्रकाश होगा ॥६॥ केलिविलास से कान्त के साथ श्रापका प्रस्त वेश भूपादि देखकर श्रीरूपम जरी-तुलसी-रतिम जरीश्रादिक सखियाँ आपको सजाने के लिये उद्यत होंगी, उनकी दृष्टि निक्षेप से मैं उन सब वस्तुओं को आपके सन्मुस लाऊँगा।॥ १०॥ हे राधिके ! म- स्तक से चरण पर्यन्त विचित्र वेपों से भूपित आपको सतृष्ण श्री- कृपए स्पर्श करने के लिये जब आगे तय उस समय में मिश्यारोप के घश विकट भृकुटी नचा कर हुकार के द्वारा ऊपर मुग्म का कर उन या तिरस्कार करूँगा ॥११॥ वहाँ श्रीकृष्ण श्रा कर विस्मययती ललिता जी को कांगे कि ललिते ! यह मैं राधिका या साध्यीत्व फएटक दूर करने के लिये पाया हूँ। परन्तु धूर्ता तुम्हारी यह सनी निषेध करती है। इस प्र. कार मनोहर श्रीहए की उक्ति रूप मधुधारा का में निजहदय म.
श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः खामालीभिः सह कथोपकथा प्रफुल्ल- वक्तामह व्यजनपाणिरनुप्रयानि ॥ १३ ॥ गायनि ते गुणगणास्तववार्मगम्य पुप्पास्तरै दुलयानि मुगन्धयानि । सालीतति. प्रतिपद सुमनोऽतिवृष्टिं स्वामीन्यह प्रतिदिश तनवानि वाढम् ॥ १४ ॥ प्रेष्ठ-स्वपानिकृतकौसुम-हारकाची- केयूरकुण्डलकिरीटविराजिताङ्गीम् । ला भूषयानि पुनरात्मकरित्व-पुष्पै- रास्वादयानि रसिवालिततीरिमानि ।। १५ ।। चन्द्राशुरुज्य-सलिलैरवनितरोध- स्यञ्चकम्बसुरभावलिगीतकीत्तौ । धुकर द्वारा आस्वादन करूंगा ॥ १०॥ हे वृन्दावनेश्वरि ! कुञ्ज भवन से वाहिर होकर विपिन बिहार के लिये गमनोटात, श्रीकृष्ण के बाहु से पालिङ्गित, ससियों के साथ कथोपक्थन मे प्रफुल्ल हदया था- पके पीछे पीछे व्यजन हाथ में लेकर मैं गमन करूँगा ॥ १३॥ हे स्वामिनि मैं निजरचित पटनों से आपके गुणगण का गान करूँगा और जिस मार्ग मे आप जायेंगे उस मार्ग मे पुष्प विछाकर कोमल तथा मुगन्धित करुंगा । सखियों के साथ पद पद मे चारों दिशा में पुष्पों का वर्पण करूंगा ॥ १४ ॥ हे वृन्दावनेश्वरि । वनविहार स. मय जर प्रियनम अपने हाथों से कुसुम चयन कर उसके द्वारा हार, काश्त्री, केयूर, कुण्डल, किरीटादि बनाकर आपको भूपित करेगे तव मैं भी कविता कुसुमों से आपको भूपित करूँगा अर्थात् कविता के द्वारा इसका वर्णन कर उस कविता कुसुम रस से रसिक सखीसमूह का आनन्द विधान करुंगा ॥ १५ ॥ हे श्रीराधे ! कदम्बो के सुगन्ध से सुगन्धित, भ्रमरों से गीत कीर्ति, चन्द्रकिरण स्परोप्य जल से ६ श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः पारस्व-रासरमसां हरिना सह त्वां त्वत्पाठितैव विदुपी कलयानि वीनाम् ।। १६ ।। रासं समाप्य दयितेन समं सम्बीभि विआन्तिभाजि नवमालतिकानिकुञ्ज। स्वय्यानयानि रसपत् करकाम्ररम्मा- द्राक्षादिकानि सरसं परिवषयानि ।। १७ ।। तल्पं सरोजदलक्लुप्तमनलि- पर्याप्तमात्मकलया रचितं तुलस्याम् । त्यां प्रेयसा सह रसाठविशाययानि ताम्वुलमाराायितुमुल्यन मुल्लसानि ॥ १८ ॥ मम्बाहयानि चरगावलकैः स्पृशानि जिवानि मौरभ-समृड्चमक्रियान्धिः । अदोईधान्युरसिजौ परिरम्भयानि चुम्बान्यलक्षितमवेक्षित सीकुमार्याः ॥ १६ ॥ मानों धीत उम यमुना पुलिन में जय भार श्रीहरि के साथ रासारम्भ परेंगी तब उस समय अापकी शिक्षिता, वीणावाद्य में पण्टिता में धीरा लेकर वादन करेगा ॥ १६ ॥ मग्नियों के सह प्राणवल्लभ के माय जर श्राप रामबिहार ममापन कर नवीन मालतीकुलमें विश्राम फरेंगे तब मैं सरम श्रनार, आम्र, फेला,अंगूरादिक फल लाकर परि- वेषण फऊँगा ।। ७॥ हे राधे! तुनमी के द्वारा निज मला प्रकाशन पूर्वक कमलदलों से विरचित अनगमोड़ा युक्त शय्या में प्रियतम फे माय पासो शयन कराऊँगा तथा परमानन्द में मरम ताम्ल प्रानि के लिये उन्नमित होऊँगा ।। १८ ॥ हुवरि ! में श्राप का चरणकमल युगन दी मंबाहन ( मेया) काँगा तथा संचालन करना दृया मौरभ का प्रामाण कर माभयं समुद्र का लाभ पहँगा और भी नयनयुगल में लगा कर ननों में परिरम्भन कराऊँगा तथा अ.
७ श्रीसङ्घल्पकल्पद्रुम निशस्तनुअन्तेतरप्रसृतालकाल्या ताडङ्क-हारततिगन्यनहाप्रमुत्ता । प्रेप्ठस्य ते तव च समथिता निभाल्य तत्रानयानि परमाप्तसती प्रयोध्य ॥२०॥ ता दर्शयानि सुरपसिन्धुपु मज्नयानि ताभ्य प्रसादमतुल सहसा नुवानि । तन्नूपुरादिरणितैर्गतसान्द्रनिद्रा शायोस्थिता सचकिता भवती भजानि ॥२१॥ हे स्वामिनि प्रियससीत्रपयाकुलाया कान्ताङ्गतस्तव नियोस्तुमपारयन्न्या । न्टप्रन्ययान्यलक्युण्डलमाल्यमुत्ता- प्रन्थि विचक्षणतयागुलिऔर लेन ॥७॥ नाशाग्रत श्रुतियुगान्च रियाजयानि तद्भपण मणिसरास्तु निसूत्रयानि । लक्षित रूप से चुम्बन कर उसका सौकुमार्य का आस्वादन करूँगा ॥ १६ ॥ हे देनि रानि शेप मे आपका और आपके प्रियतम का प्रसरगशील अलक, ताटक, हार, वेसर का ग्रन्थन शेष देस कर प. रमप्रिय मरिचयो को जागर्तित कर वहाँ उन देशों का आनयन पूर्वक आपको दिखाऊँगा ।। २० ॥ ससियों को उन्हे दिग्पाकर सुखसागर में निमजित करूँगा तथा उनके अतुलनीय प्रसाद का लाभ करूंगा। सखियों के नूपुर शनों से निविड निद्रा प्राप्त अथच चक्ति होकर जागरण कारी श्रापमा भजन करूँगा 11 २१॥ हे स्वामिनि | आप प्रियससिया को दस कर लज्जायुक्त हो उठने की चेष्टा करेंगी ! परन्तु हार कुण्डलादि से ग्रन्थित हो जाने के कारण कान्त के अग से आप वियुक्त होने में असमर्था होंगी उस समय में विचक्षणता से अगुली कौशल दिसावर प्रन्थि विमोचन करूँगा ॥ २२॥ में आपके ना. ।
श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः प्राणार्बुदादधिकमेव सदा तवैक रोमापे देनि! कलयानि कृतावधाना ॥ ३ ॥ त्वा सालिमात्मसदनं निभृतं व्रजन्ती व्यक्त्या हरेरनुपथं तलक्षितेत्य । तं खण्डितामनुनयन्तमवेक्षच्चन्द्रा तवृत्तमालिततिसंसदि वर्णयानि ॥ ४ ॥ प्रक्षालयानि वदनं मलिलै सुगन्यै दन्तान् रसालजलैस्तव धापयानि । निन्जयानि रसना तनुहमपत्र्या सन्दर्शयानि मुपुरं निपुणं प्रमृज्य ॥ २५॥ स्नानाय सूक्ष्मवसन परिधाययानि हारागदाद्यपान्यनादवतारयानि । अभ्यजयाण्यरुणसौरभहृद्यतैले रुद्वर्त्तयानि नवकुंकुमचन्द्रचूर्णः ॥२६॥ साम से सर, वर्णयुगल मे कुण्डल को उन्मुक्त करेगा। निज श्र. चुदप्राण से भी अधिक आपका एक एक तनुरह को सारधानता के साथ परलोकन करुंगा।।२३ ॥ हे स्वामिनि ! सचियों के साय जर श्राप निभृत मार्ग में निज गृह को गमन करेंगे उस समय में प्रापका संग त्याग कर अलक्षितम्प में श्रीकृष्ण के पश्चात् गमन क. रँगा तथा पण्डिता चन्द्रायली के अनुनय पारी उनपो देग्यरर इस पृत्तान्न का मपियों की मभा में यर्णन फगा||४|| हे देनि ! मैं मुगन्ध नली मे श्राप गुग का प्रक्षालन, पान- दलों मे इन्नों का धापन, मूत्म मुवर्ण जिभी मे जीभ पा मम्मार्जन पराऊँगा । उत्तम रूप मे मुग्म का मार्जन करा पर आप फे ममत दर्पण रम देगा। नान वराने के लिये प्रामोसूपमश्वे. सपात्र पदिना पर भीथर मार-प्रमादि अनार का प्रसारण श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः ह नीरैर्थहासुरभिभिः स्नपयानि गात्रा- दम्भांसि सूक्ष्मवसनैरपसारयानि । केशान् जवादगुरुधूम-कुलेन यत्ता- दाशोपयानि रभसेन सुगन्धयानि ॥ २७ ॥ वासो मनोभिरुचितं परिधापयानि सौवर्णकङ्कतिकया चिकुरान विशोध्य । गुम्फानि येणीममलैः कुसुमैचिंचित्रा मोलसच्चमरिकामनिजातभाताम् ।। २८ ।। चूडामणि शिरसि मौक्तिकपत्रपास्यां भाले विचित्रतिलकं च मुदारचय्य । अत्याक्षिणी श्रुतियुगं मणिकुण्डलाढय नासामलंकृतवती करवानि देवि ! ॥२६॥ गण्डद्वये मकरिके चिवुके विलिख्य कस्तुरिकेटपृषतं कुचयोश्च चित्रम् । करूँगा तथा अरुणवर्ण मनोहर सुगन्धित तैल से श्रीअङ्ग का उद- र्तन कर पीछे कुंकुम-कर्पूरचूर्ण से भूपित कराऊँगा ॥ २६ ॥ . उसके अनन्तर महान सुगन्धि जल के द्वारा स्नान कराकर सूक्ष्म वस्त्र के द्वारा श्रीअंग से जल का अपसारण करूँगा । यत्न के साथ केश कलाप अगुरुधूम्र से सुसा कर प्रानन्द के द्वारा सुगन्धित क. रुंगा ॥ २७ ॥ आपके मनो अभिरुचित वस्त्र को पहिनाय कर पीछे मुवर्ण रचित कंघा के द्वारा केशकलाप का संस्कार कर चमरी स्थित मणि के द्वारा शोभित येणी को सुगन्धि पुप्पों से भूपित परूँगा। हे श्रीराधे! आपके ललाट में आनन्द के साथ विचित्र तिलक की रचना कर तथा मस्तक में मुत्ता निम्मित ललाटिका और चूड़ामणि को धारण कराऊँगा। हे देवि! श्रापके नेत्रों को काजल से रजित तथा कर्गों में मणि कुण्डल का अर्पण कर पश्चात् मुच्यफल से नासा . श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः वाह्वोस्तवाङ्गदयुगं मनिवन्धयुग्मे चुडामसारकलिताः कलयानि यत्नात् ॥ ३० ।। पान्यंगुलीः कनकरत्नमयोम्मिकाभि रभ्यर्चयानि हृदयं पदकोत्तमेन । मुक्तोत कञ्चुलिकयोरसिजौ विचित्र- माल्येन हारनिचयेन च कण्ठदेशम् ॥ ३१ ॥ काञ्च्या नितम्बमथ हसकनृपुराभ्यां पादाम्बुजे दलतति रणदंगुरीयैः। लाक्षारसैररुणमप्यनुरज्जयानि हे देवि ! तत्तलयुगं कृतपुण्यपुजा ॥३२॥ अङ्गानि साहजिकसौरभयन्त्यथापि देव्यर्चयानि नवकुङ्कुमचर्चयैव । लीलाम्बुजं करतले तव धारयानि त्वां दर्शयानि मणिदर्पणमर्पयित्वा ॥ ३३ ॥ को अलंकृत करूँगा ।। २६ ॥ हे श्रीराधे आपके गण्डयुगल में मक रिका, चिबुक में कस्तूरीविन्दु तथा कुचयुग्म में विचित्र चित्र का श्रङ्कन फरूँगा । और भी बाहु दोनों में अङ्गद तथा मणिबन्ध में इन्द्रनीलमणि के द्वारा चूड़ा का परिधान कराऊँगा ॥ ३० ॥ आपकी हस्तांगुलि ममूह मणिमय मुद्रिका के द्वारा, वक्षोदेश उत्तम पदक के द्वारा स्तन युगल मुक्ता प्रथित कंचुकी के द्वारा, कण्ठदेश विचित्र मा. ला-हारों से विभूपित करूंगा ॥ ३१ ॥ नितम्वदेश कांची के द्वारा, पादपा दोनों पादकटक तथा नूपुर के द्वारा, अंगुलिममूह शब्दाय. मान विछिया के द्वारा मजाकर हे देवि ! कृत पुण्यपुजा मैं पादपदा का तलदेश शायर्ण लातारम के द्वारा अनुजित कराऊँगा।३।। हे देवि ! आपके श्रीअंग स्वाभाविक मुगन्धमय है। तो भी नवीन बुकुम से मैं उसको पञ्चित फहँगा आपके हस्तारबिन्द में लीला- ११ श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः सौन्दर्य्यमद्भुतमवेक्ष्य निजं स्यकान्त- नेत्रालिलोभनमवेत्य विलोलगानीम् । प्राणाय्देन विधुवर्तिकदीपकैश्च निर्मछयानि नयनाम्युनिमज्जिताङ्गी ॥ ३४॥ गोष्ठेश्वरी प्रहितया सह कुन्दवल्ल्या प्रामातिकप्रियतमाशनसाधनाय । यान्ती समं प्रियसखीभिरनुप्रयानि ताम्बूलसम्पुटमणिव्यजनादि पारिणः ।। ३५ ।। गोप्ठेश्वरी-सदनमेत्य पदे प्रणम्य तस्यास्तदातभविकां पयावृताङ्गीम् । घ्राता तया शिरसि तन्नयनाम्बुसिक्तां त्वां वीदय तामहमपि प्रणमामि भक्तया ॥ ३६॥ कमल धारण करा कर मणिदर्पण का अर्पण कराऊँगा ।। ३३॥निज अद्भुत सौन्दर्य दर्शन कर यह प्राणवल्लभ के नयन भ्रमरो का लोभ- नीय है ऐसा बोध कर आप चंचलगात्री होंगी तव उस समय मैं अ- श्रुवारि से सिंचिता होकर अर्बुद प्राण के द्वारा कपूर-बत्ती लेकर निर्मब्छन (भारती) करूँगा ।। ३४ ॥ हे देवि ! आप यशोदा प्रेरित कुन्दलता के साथ श्रीहरि का प्रातःकालीन भोजन साधनार्थ प्रियस- ग्गियों के सह जय नन्दालय गमन करेंगे तब उस समय मैं हाथों में ता- म्यूलपात्र और मणि वीजना लेकर आपका अनुगमन करूँगा।।३।। गोप्ठेश्वरी के गृह में उपस्थित होकर आर उनके चरण मे भूपतित दण्डवत कर कुशल लाभ करेंगी। यशोदा नयन जल से आपको सिंचित कर मस्तक का याघ्राण करेंगी। उस समय आप लजिता हो नीचे बदन कर खड़ी रहेगी। मैं इस प्रकार आपको दर्शन करता हुआ गोप्ठेश्वरी को भक्ति के साथ प्रणाम करूंगा ।। ३६ ।। हे मुन्दरि . . १२ श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः मूतं तयोऽसि वृषभानुकुलस्य भाग्य गेहस्य मेऽसि तनयस्य च मे वरानि !। नैरूज्यदास्यमृतपाणिरभूर्वरेण दुर्वाससो यदिति तद्वचसाहसानि ॥ ३७ ।। स्नातानुलिप्तवपुपो दयितस्य तस्य तात्कालिके मधुरिमन्यति लोलितातीम् । स्वामिन्यवेत्य भवती क्वचन प्रदेशे तत्रैव केन च भिपेण समानयानि ॥ ३८ ॥ प्रक्षालयानि चरणौ भवदङ्गतः सङ् माल्यादिपाकरचनानुपयोगि यत्तत् । उत्तारयानि तदिदं तु तवाऽस्त्विति त्व- द्वाचोल्लसानि विकसन्मधुमाधवीव ।। ३६।। राधिके ! तुम वृपभानु वंश की मूर्तिमती तपस्या स्वरूपा है। मेरा गृह तथा तनय का मूर्तिमान सौभाग्य है । क्योंकि दुर्वासा जी के वर से तुम अमृत-हस्ता हो । मेरे पुत्र को निरुज्यकारिणी हो" । इस प्रकार आपके प्रति यशोदा जी का वचन सुनकर मैं हास्य करूंगा। ३७ ॥ हे स्वामिनि ! स्नानानुलेपनादि के अनन्तर प्रियतम के त. कालिक माधुर्य आस्वादन से आपको चंचल नयना जान कर यहाँ कोई कृष्णदर्शनोपयोगी स्थान में किसी छल से निमिपमात्र के लिये आपको लाऊँगा ॥ ३ ॥ उसके अनन्तर श्रापके चरण युगल का प्रक्षालन कर पाक समय उचित मणि-पुप्पों की मालाओं को श्रीश्रण से उत्तोलन करूँगा । उस समय पूर्वकन मेरी चतुराई के वश श्राप श्रीकृष्णा माधुर्म्य दर्शनानन्द से विभोर होकर "हे दासि ! ये सब था- भरण तुम्हारे हो तुम इनका ग्रहण करो" इस प्रकार पहेंगी । मैं उसे सुनकर बसन्तकाल में विकसित माधयीलता की भाँति व्लसित हो. ऊँगा ॥ ३६॥ पाक के अनन्तर सुमिष्ट पायस, अन्न, दाल, साग .
श्रीसङ्कल्पक्ल्द्रुमः परत्वास्थितां मधुरपायसशाक्सूप- भाजिप्रभृत्यमृतनिन्दि चतुबिधान्नम् । स्वां लोकयानि नननेति मुहुर्बदन्ती गोप्ठेशयापि परिवेशयितुं निदिष्टाम् ॥ ४॥ तृप्त्युत्थितां प्रियतमागरुचिंधयन्त्या वातायनापितहशः सहसोल्लसन्त्याः । आनन्दजातितरङ्गभरे मनोज- मन्जुकृते तव मनो मम मजयानि ।। ४१ ।। राधे ! तवैव गृहमेतदह च जाते ! सूनोः शुभे ! किमपरां भवतीमवैमि । तद्भुत सम्मुसमिति व्रजपागिरा त्वत् वक्त स्मितं स्वहृदयं रसयानि नित्यम् ॥ ४ ॥ यान्तं बनाय सखिभिः सममात्मान्तं पित्रादिभिः सरुदितैरनुगम्यमानम्। प्रभृति अमृतनिन्दी चार प्रकार के अन्न के परिवेशनार्थ यशोदा के द्वारा आदिष्ठा होकर आप बार बार नहीं नहीं ऐसा कहेगी। मैं इस प्रकार आपका दर्शन करूँगा ॥४०॥ हे श्रीराधिके ! आप भोजन से तृप्त प्रियतम की अङ्गकान्ति का दर्शन करते हुए उल्लसिता होकर गवाक्ष में नेत्रार्पण करेंगे। मैं आपके कन्दर्पकृत आनन्द जनित कान्ति तरङ्ग मे मन को निमग्न करूँगा॥४१॥ "हे राधे ! हे पुनि ! हे मगलरूपे ! यह घर तुम्हारा है । मैं अपने पुत्र से तुमको भिन्न नहीं जानती हूँ"। इस प्रकार ब्रजरानी का बचन सुनकर आपके श्रीमुस में मन्दहास्य उत्पन्न होगा। मैं चित्त में उसका श्रास्वादन करूंगा ॥ ४२ ॥ उसके अनन्तर अापके प्राणवल्लभ ससानों के साथ पूर्वाह्न समय में धन के लिये गमन करेंगे । पित्रादि गुरुजन रोदन करते हुए उना अनुगमन करेंगे । उसे देखकर आप अपने घर पर प्राय c . श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः वीक्ष्याप्तगौरवगेहां दिननाथपूजा- व्याजेन लब्धगहनां भवती भजानि ॥४३॥ कान्तं विलोक्य कुसुमाश्चये प्रवृत्ता- मादाय पत्रपूटीकामनुयान्यह त्वाम् । का तस्करीयमिति तद्वचसा न कापी त्युक्ता सहार्पित दृशं भवती स्मराणि ४४॥ पुप्पाणि दर्शय कियन्ति हृतानि चौरी ! त्युक्त्यैव पुष्पपुटिकामपि गोपयानि । तद्वीक्ष्य हन्त मम कक्षतले क्षिपन्तं पानि वलात्तमभिमृश्य भवानि दूना ॥ ४५ ॥ रक्षाद्य देवि ! कृपया निजदासिकां मा- मित्युच्चकातरगिरा शरणं व्रजानि । किं धूर्त ! दुःखयसि मज्जनमित्यमूष्य वाहु करेण तुदती मयती श्रयानि ॥ ४६॥ कर सूर्यपूजा छल से वन गमन करेंगी। मैं भी श्रापका भजन क. सँगा अर्थात् अापके साथ यन में गमन करूँगा॥४३वनमें जाकर श्राप कान्त का अवलोकन कर पुप्पचयन में प्रवृत्ता होगी। में भी उस समय पत्र निम्मित पुप्पाधार (फूलदानी ) लेकर आपका अनुः गमन करूँगा। श्रीकृष्ण जब मुझसे पूछेगें हे सखि ! “यह चोरी (पुष्पचौरी) कौन है" तय मैं कोई नहीं है"कह कर कृष्णार्पितनयना आपका स्मरण कराऊँगा ॥४५॥ चौरि !कितने पुष्पों की चोरी की मुझे दिखाया इस प्रकार श्रीकृष्ण के योलने पर मैं पुष्पाधार का गोपन करूंगा। उसे देखकर श्रीकृष्ण यल प्रकाश के माय मेरे कत में हन्तार्पण करेंगे। मैं उममे व्यथित हो जाऊँगा ॥ ४५ ॥ हे देवि! मैं तुम्हारी दामी हूँ। आज मेरी रक्षा कीजिय" । इस प्रकार कातर यास्य से आपके आश्रय की प्रार्थना करूँगा। आप उस समय " । 1
श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः
त्यक्त्वैव मा भवदुरक्यचं विसण्ड्य
प्राप्ता अज तर गलात् स्वगले निधाय ।
पुष्पानि चौरि । मम किं तन क्ण्ठहेतो
स्तकण्ठमेव सुभृश परिपीडयानि ।। ४७ ॥
राजास्ति क्न्दरतले चल तन धृत्त ।
तस्याज्ञयैव सहसा च विवस्त्रयिष्ये ।
ता वीक्ष्य हृप्यति सचेन्निजदिव्यमुक्ता-
माला प्रदास्यति ललाटतट मढीये ।।४।।
टोपो न ते जपतेस्तनयोऽसि तस्य
दुष्टस्य यन्नरपतेः सलु सेवकोऽभू ।
तबुद्धिरीगभवन्मम चान साध्या
भाले विमेतदभवल्लिखित पिधाना ।। ४६ ।।
धूर्त क्या मेरे जन को दु.स देते हो ? इस प्रकार कह कर निज
हस्त से श्रीकृष्ण हस्त का पीडन रेगे । मैं भी आपका पाश्रय लूंगा
॥४६॥ श्रीकृष्ण मेरा परित्याग कर आपके वक्ष स्थल पिराजित क.
चुक्र का सण्डन कर आपकी क्ण्ठस्थ पुष्पमाला को अपने गले में
धारण कर कहेंगे "हे चौरि । हमारे ये पुप्पसमूह क्या तुम्हारी माला
के लिये हैं । अत उसमा परिवर्त मे हम तुम्हारा क्ण्ठदेश का पीडन
करेंगे॥४७॥ हे धूर्ते ! इस पर्पत कन्दरा मे कन्दर्पराजा विराजमान
हैं। यहाँ चलो । उनकी आज्ञा से मैं तुमको विवस्त्रा करूँगा। पु.
प्पचौरी तुमको देसार वह प्रसन्न हो मेरे ललाट में अपनी दिव्य
मुक्तामाला का प्रदान करेगा ।। ४८ ॥ हे राधे | आप उस समय
श्रीकृष्ण को प्रत्युत्तर इस प्रकार करेंगी। हे कृष्णा । तुम ब्रजरान के
पुन होकर उस दुष्ट राजा के सेवक बन रहे हो । इस प्रकार जो तु.
म्हारी बुद्धि हो गई है उसमे तुम्हारी दोप नहीं है । परन्तु उस दुष्ट
सग का ढोप है । हाय साध्वी मेरे ललाट में क्या विधाता ने ऐसा
।
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श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः इत्यादि वाङ्मयसुधामहह श्रुतिभ्यां स्वाभ्यां धयान्युदरपूरमथेक्षणभ्याम् । रूपामृतं तव सकान्ततया विलास- सीधुन्च देवि! वितरान्यऽथमादयानि ॥ ५० ॥ प्रेष्ठ-सरस्यभिनवां कुसुमै विचित्रां हिन्दोलिकां प्रियतमेन सहाधिरूढाम् । त्वां दोलयान्यऽथकिराणि परागराजि- यानि चारुमहतीमपि वादयानि ।। ५१ ।। वृन्दावने सुरमहीरुहयोगपीठ- सिंहासने स्वरमणेन विराजमानाम् । पाद्यार्घधूपविधुदीपचतुबिधान्न- स्रग्भूपनादिभिरह परिपूजयानि ॥५२॥ गोवद्ध ने मधुवनेषु मधत्सवेन विद्रावितात्रपसखी शतवाहिनीकाम् । पिष्टातयुद्धमनुकान्तजयाय यान्ती त्वां ग्राहयानि नव-जातुपकूपिकालीः ।। ५३ ।। ही लिसा है ॥ ४६॥ हे देवि ! मैं अानन्द के साथ उस प्रकार वचन मुधा से निज कर्णयुगल को पान करा कर पश्चात् नयन दोनों के द्वारा कान्त के साथ आपकी विलासमुधा का पान कर आनन्द उन्मत्त हो जाऊँगा ॥ ५० ॥ हे देवि ! आप प्रिय सरोवर (राधाकुण्ट) में पुष्पनिम्मित अभिनव विचित्र हिन्दोलिका (भूला) में प्रियतम के माय थारोहण करेंगी। मैं आपको मुलाऊँगा, परागों का वर्पण क रूँगा, गान फगा, वीणा यजाऊँगा ॥५शा हे देवि ! पृन्दायन में कल्यवृत्त के मूल में योगपीठस्य मिहासन पर प्राणवल्लभ के साथ आप विराजमान होने पर मैं पाद्य, अर्घ्य, कपूर, दीप, पतुर्विध अन्न, माला, भूपणादि के द्वारा मर्य प्रकार आपकी सेवा करूंगा॥५॥ ।
श्रीसङ्कल्पकल्द्रुमः अग्रे स्थितोऽस्मि तव निश्चल एव वन उद्घाटप कन्दुकचयं तिपचेद्वलिष्ठा । उद्घाटय कञ्चुकमुरः किल दर्शयन्ती विश्वापि तिष्ठ यदि ते हृदि वीरतास्ति ॥ ५४॥ यत्कथ्यसे तदयमेव तव स्वभावो यत्पूर्वजन्मनि भवानजितः किलासीत् । मिध्येव तत् यदिह भोः कतिशो जितोभू न्मतकिङ्करीभिरपि तद्विगतत्रपोऽसि ॥ ५५ ॥ इत्येवमुत्पुलकिनी कलयानि वाचः सिजानकङ्कणमनत्कृतदुन्दुभीकम् । युद्ध मुसामुसि रदारदि चारुपाहु पाहव्यमन्द नसरानखरिस्तवानि ॥ ५६ ।। हे राधे! आप श्रीगोवर्द्धन में पसन्तकान्त-यन प्रदेश में हो- लिका उत्सव के द्वारा लज्जारहित होकर ससी सेना के साथ गुलाल युद्ध मे कान्त की जय करने के लिये गमन करेंगी उस समय मैं आपको नवीन कुकुम कुप्पाओं का ग्रहण कराऊँगा ॥ ५३॥ उस समय श्रीकृष्ण कहेगे-मैं वक्ष उद्घाटन कर निश्चलभाव से तुम्हारे आगे खड़ा हूँ यदि तुम बलवती हो तब मेरा वक्षः में कन्दुकों का क्षपण करो । यदि तुम्हारे हृदय मे वीरत्व है तर काँचोली (ऑगिया) उद्घाटन पूर्वक वक्षः दिया कर मेरे आगे अवस्थित करो ॥५४॥ श्रीकृष्ण के इस प्रकार घचन सुनकर आप कहने लगेंगी कि हे श्रीकृष्ण ! तुम जो आत्मप्रशंसा करते हो यह तुम्हारा स्वभाव है। हम सबने पौर्णमासी जी के मुख से जो सुना है कि-तुम पूर्वजन्म में अजित थे यह मिथ्या है । क्योंकि हमारी दासियों से तुम कितनी चार पराजित हो गये हो अतएव तुम निर्लज्ज हो ।। ५५11 मे तुम दोनों के इस प्रकार वचन सुनकर अत्यन्त पुलकायमान हो जाऊँगा १८ श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः कस्याश्चिदद्रि नृपदिव्यदुपत्यकायां सप्रेयसि त्ययि सखीशतवेष्टितायाम् । विन्तिभाजि वनदेवतयोपनिता- नीष्टानि सीधु चपकानि पुयो दधानि ।। ५७ ।। हा किं-कि-किं ध धरणी घु-घु घुगणतीयं धा-धा-ध धावति भयात् वि-वि वृक्षपुजः। भी-भी-भि भीरुरहमत्र कथं जि-जीवा- न्येवं लगिप्यसि यदा दयितस्य कण्ठे। ५८ ।। वत्स्वामिनी प्रलपतीयमिमां गदेन हीनां करोमि कलयात्र निरोहिनेतः । इत्युक्तिसीधुरसतपित हृत्तदेव निष्कम्य जालवितती विदधानि नेने ॥ ५६) और कङ्कण की झङ्कार के साथ दुन्दुभिवाद्य से युक्त मुसामुखि- दन्तादन्ति-हाथाहथि तथा नसानसि युद्ध की स्तुति करूँगा ।। ५६ ।। आप इस गिरिराज की किसी उपत्यका में प्राणवल्लभ के साय शत- शत ससियों से परिवेष्टिता होकर विश्राम करेंगी। मैं उस समय घः नदेवी के द्वारा पानीत मधुपान समूह को आपके आगे धरूँगा॥३७॥ उस समय मधुपान से आपका वचन स्पलित हो जाएगा। आप कहने लगेगी हाय यह धधरणी क्या क्या क्या धु-घु घूर्णयमान हो रही है । भय से वि-यि वृक्षसमूह धा धा धाबमान हो रहा है । भि. भि-भि भीरु मैं किस प्रकार जि-जीवन धारण करूँगी । इस प्रकार पढ़ती हुई आप प्रियतम के कपठलग्ना हो जायेंगी ।।५८ ।। उस स. मय श्रीकृष्ण हमें यह तुम्हारी स्वामिनि राधा प्रलाप कर रहीं हैं। मैं उनको आरोग्य पर रहा हूँ। तुम यहाँ से मत चली जाओ। उन का इस प्रकार कथामृत रस से मृप्त हृदय हो यहाँ से निर्गत होकर मताजाल में नयन अर्पण करूँगा अर्थात् आप दोनों का वियाह 3.
१६ श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः घोणाक्षिकर्णवदने जलसेकतत्या कृष्णस्तया जित इतः सहसा निमभ्य । माहो भवन स खलु यत्कुरुते स्म तत्तत् वेदान्यह तव मुखाम्बुजमेव वीक्ष्य ।। ६० ।। अभ्यञ्जयानि ससखीदायितां सहालि स्त्वां स्नापयानि वसनामरणविचित्रम्। शृङ्गारयानि मणिमन्दिरपुष्पत्तल्पे संभोजयानि करकाद्यथ शार्ययानि ॥६१॥ घाणीर कुञ्ज इह तिष्ठति कृष्ण! देवी निन्हुल्य मृग्यसि कथं तदितः परत्र । सत्यामिमां मम गिरं तमविश्वसन्तं यान्तं मति प्रय॑ भवती हर्पयानि ॥ १२ ॥ त्सब देखूगा ।। ५६ ॥ जलबिहार के समय नासिका-कर्ण-नेत्र और मुग्न में जलसींचन के द्वारा आपके द्वारा पराजित श्रीकृष्णा हठात् वहाँ से जल में निमग्न हो जाएगें । पश्चात् प्राह बन कर जो करेंगे उसे मैं आपका मुखपद्म देखकर जान लूंगा।।६०॥ कान्त और स- खियों के साथ आपको मैं अभ्यञ्जन तथा स्नान करा कर विचित्र - सन-श्राभरण के द्वारा विभूषित कराऊँगा । पश्चात् दाडिम (अनार) फलादि भोजन करा कर मणिमन्दिर में पुष्पशय्या पर शयन करा- ऊँगा ॥ ६१ ।। हे राधे! आप शयन करते हुए वहाँ उठकर कौतुक घश वानीरकुंज (क्षेत्र निकुंज ) में छिप जाएगी। श्रीकृष्ण आपको ढढने लगेगे । में परिहास कर उनसे कहूँगा। हे श्रीकृष्ण ! देवी राधिका इस वानीर कुल में छुपे हैं । अतएव अन्यत्र क्यों हूद रहे हैं। परन्तु श्रीकृष्ण मेरे इस सत्य वचन में अविश्वास कर अन्यत्र गमन करेंगे। मैं आपको उसे दिखा कर प्रसन्न करूँगा ॥ तदा . ।
२० -1 श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः स्वामिन्यसूत्र हरिरस्ति कदम्बकुञ्ज निन्हुत्य मृग्यसि कथं तदितः परत्र । सत्यामिमां मम गिरं स्खलु विश्वसत्याः पानी जयं तव नयानि तमाप्तवत्याः।। ६३ ।। राधे ! जिता च जयिनी च पर्ण न दातु मादातुमप्यहह चुम्वनमीशिपे त्वम् । नाश्लेषचुम्बमधुराधरपानतोऽन्यं द्युते ग्लह रसविदः प्रवरं वदन्ति ॥ ६४ ।। गोवर्द्ध नेऽत्र मम कापि सखी पुलिन्द- कन्यास्ति भृगयतितरां निपुणेघशेऽर्थे । मग्राह्यदेय-पणवस्तुनि मन्नियुक्ता सा ते गृहीष्यति च दास्यति चोपगृहम् ॥ ६५॥ उक्तवेत्थमात्मदयितं प्रतिवक्षसे मां याहीत्यथोत्पुलकिनी द्रुतपादपाता । नन्तर आपसे कहूँगा हे स्वामिनि ! श्रीहरि कदम्बकुज में छिपे हुए हैं अतः अन्यस्थान में क्यों अन्वेपण करती हो । मेरे इम वचन का विश्वास कर श्रीकृष्ण को प्राप्त होने पर आपके हस्त में जय समर्पण करूँगा ।। ६३ ॥ उसके अनन्तर पाशक्रीड़ा में श्रीकृष्ण पहंगे-हे. राधे ! तुम पराजित अथवा जय युक्ता हो चुम्बनपण का दान किया प्रहण नहीं करती हो । परन्तु रसिकगण पाशक क्रीड़ा में आलिङ्गन- धुम्बन और अधर पान के भिन्न अन्य किसी पण को श्रेष्ठ नहीं मानते हैं ।। ६४ ॥ श्रीकृष्ण को आप उसके उत्तर में कहेंगी-इस गोवर्द्धन में भृङ्गी नामक मेरी एक ससी पुलिन्दकन्या है। वह मेरे पन में नियुक्ता होकर मेरा प्राह किम्या देय प्रालिद्गनादिपण (शत) प्रहण-प्रदान करेगी ॥ ६५ ॥ श्राप निज यान्त को इस प्रकार कह पर मुगे उसको लाने के लिये श्राशा करेंगी। में द्रुतगति से आकर ।
श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः तामानयान्युपमुकुन्दमथासयानि तं लज्जयानि सुमुग्वीरतिहासयानि ।। ६६ ॥ स्वीया किलं व्रजपूरे मुरली तवैका प्राभून्नतामपि भवानवित्तं समाऱ्याम् । सा लम्पटापि भवदाधरसीधुसिक्ताऽ- प्यन्यं पुमांसमिह मृग्यति चित्रमेतत् ।। ६७ ॥ वंशी सती गुणवती सुभगां द्विपत्योs- साध्यो भवत्य इह तत् समतामलब्धाः। तो क्यापि वन्धमनयंस्तदह भुजाभ्यां ववव वः शिखरि गहर गाः करोमि ॥ ६८ ।। इत्यागतं हरिमवेक्ष्य रहस्तदीय- कक्षादह मुरलिकां सहसा गृहीत्वा । उसको लाऊँगा तथा श्रीकृष्ण के समीप बैठाऊँगा। उससे वह ल. जिता होगी और सखिगण हास्य करेंगी ।। ६६॥ भृङ्गी दर्शन के पश्चात् श्रीकृष्ण चुम्ननादि पण को त्याग कर मुरली का पण करेंगे। जब वे हार कर मुरली प्रदान करेंगे अथवा सखियाँ बलपूर्वक मुरली ले लेंगी उस समय उनको मुरली अप्राप्त जनित विपाद उपस्थित होगा। उसे देखकर सखीगण परिहास करते हुए कहंगे हाय वृन्दावन में एक मात्र मुरली श्रापका धन था श्राप उस निज भार्या को वश में नहीं कर सके । और भी यह लम्पटा मुरली आपके अधरामृत से सिक्ता होकर भी पर पुरुष का अन्वेषण करती है । यह अति आश्चर्य की बात है ।। ६७ ।। सखियों का इस प्रकार वचन सुन कर श्रीकृष्ण कहेंगे-सती, गुणवती, सुभगा वंशी के लिये द्वप वश उसको तुम सबने श्राबद्ध कर रखा है । क्योंकि उसकी समता को तुम सब लाभ नहीं कर सकते हो । अंतः मैं भुजयुगल से तुम सबको बाँध कर गिरि-गहर में ले जाऊँगा ।। ६८ ॥ श्रीकृष्ण इस प्रकार कहकर जब -- २५ श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः तां गोपयानि तदलक्षितमात्तचित्र- पुष्पेषु सङ्गररसां कलयानि च त्वाम् ।। ६६ ॥ ब्रह्मन्निमामनुगृहाण भवन्तमेव भास्वन्तमर्चयितुमिच्छति मे स्नुपेयम् । इत्याNया प्रणमितां धृत-विप्रवेशे कृपणेऽपितां च भवती स्मितभाग भजानि ॥ ७ ॥ यान्ती गृह स्वगुरुनिघ्नतयाति लौल्यात् कान्तावलोकनकृते मिषमामृशन्तीम् । दूरेऽनुयानि यदतोऽनुविवर्तितास्य मेहीति वक्ष्यसि तदास्य-रुचो धयन्ती ॥७१।। गेहागतां विरहिनी नवपुष्पतरूपे स्वां शाययानि परतः किलमूमुगभाम् । आलिङ्गन के लिये उद्यत होंगे तब मैं उनके अलक्ष्य निर्जन में आप के कक्ष से हठात् मुरली लेकर गोपन (चोरी) करूँगा। आप काम- फ्रीड़ा में उल्लास लाभ करेंगी। मैं आपका दशन करूँगा ।। ६६ ॥ सूर्य की पूजा के उपलक्ष्य में आगत विप्रवेशी श्रीकृष्ण को देखकर जटिला कहेगी-हे ब्राह्मण ! वधू पर अनुप्रद करो, मेरी वधू सूर्य की भाँति तेजस्वी तुमको पुरोहित करने की ईच्छ का है । वह सूर्य की पूजा करेगी। इस प्रकार कह कर जटिला आपको विप्रवेशीकृष्ण के पास लेकर प्रणाम करायेगी तथा समर्पण करेगी। उससे आप हास्ययुक्ता होंगी। मैं आपका भजन फरूँगा ॥७॥श्राप गुरु था. देश प्राप्त होकर गृह गमन के समय श्री कृष्ण के दर्शन तृष्णा में चिन्तायुक्त हो जाएगी। मैं आपके पीछे पीछे गमन करूंगा। आप मुगर फिरा कर श्रीहरि की मुम्वकान्ति पान करती हुई मुझको कहेगी समिस्किी ! चली आओ।।७१ ॥ विरह कातरा आप जय श्रः पराह में गृह में श्रागमन करेंगी तब मैं नवीन पुष्पशव्या में आप १३ श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः तस्मात् परन शयनं विसपुञ्जक्लुप्त- मध्याशयानि विधुचन्दनपङ्कलिप्ताम् ।। ७२ ।। आकरर्यचन्दन-कलाकथितं व्रजेशा- सन्देशमुत्सुकमतेः सहसा सहाल्याः । सायन्तनाशनकृते दयितस्य नव्य- कपूरकेलि-बटकादिविनिम्मिती ते ॥ ७३ ।। लिम्पानि चुल्लिमथ तत्र कटाहमच्छ- मारोहयानि दहन रचयानि दीप्तम् । निराज्य खण्डकदलीमरिचेन्दुसीरि गोधूमचूर्णमुखवस्तु ममानयानि ॥ ७४ ॥ अत्यद्भुतं मलयजद्रवसेकतत्या वृद्धि जगाम यदिदं विरहानलौजः । करकेलीवटकावलि साधकाऽग्नि- ज्यालेन स्वस्तिमनयत्तदिति बुवानि ॥ ७ ॥ को सुख शयन कराऊँगा! आप कुछ काल शयन करेंगी। पश्चात् प्रियविरह से जब यह शU तुपाराग्नि तुल्य हो उठेगी तब मैं मृणाल रचित कर्पूर चन्दन लिप्त अन्य शय्या में आपको शयन कराऊँगा। ॥७२॥ हे सखि ! आप चन्दनकला के द्वारा कथित ब्रजेश्वरी का आदेश मुन कर प्रियतम के सायंकालीन नव कपूरकेलि आदिक भोजन निर्माण के लिये सखियों के साथ उत्सुकता हो जायेंगी। मैं उस समय आपका (चूल्हे) का विलेपन करूंगा। उसमें पवित्र का डाही धर दूंगा तथा अग्नि प्रज्वलित करूंगा। और भी जल, घृत, शर्करा, केला, मिर्च, कपूर, नारियल, गोधूमचूर्णादिक सामग्री का प्रानयन काँगा ।। ७३-७४ ।। मैं उस समय परिहास करके कहूँगा- चन्दनादि द्रवसमूह के सिंचन से जो विरहानल प्रबल हो - उठा था वह अब लड्डूआदि साधनकारी अग्निबाला से किस प्रकार शान्त हो
२४
श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः
धूलिर्गयां दिशमरुद्ध हर: सहाम्वा
रावत्युदन्तमतुलं मधु पाययानि ।
तत्पानसन्मदनिरस्त-समस्तकृत्यां
समुत्थिता सहगणमभिसारयानि ।। ७६ ॥
तत्कृष्णपर्म निकटस्थलमानयानि
निर्धापयानि विरहानलमुन्नतं ते ।
आयात एप इति चल्लिनिगूढगात्री-
माकृष्य मह्यमहहेश्वरि ! कापयानि ॥ ७ ॥
श्रीकृष्णदिडमधुलिहौ भवदास्यपद्म
मावापयान्यति तृपं तब एक चकोरीम् ।
तद्वक्तचन्द्र-विकसन्मितधारयेय
संजीवयानि मधुरिम्नि निमज्जयानि || ७८ ।।
वैवश्यमस्य तव चाद्भुतमीक्षयानि
त्वमानयानि सदनं ललिता निदेशात् ।
गया है । ७५ ॥ हे स्वामिनि ! हम्बारव करते हुए श्रीकृष्ण की गौएँ
आ रही हैं। उनकी धूल दश दिशा में छा गई है। आप देखिये।
इस प्रकार वृत्तान्तरुप मधुपान करा कर उस भानन्द से समस्त कार्य
से आपको विरत करा कर सखियों के साथ आपका अभिसार करा:
ऊँगा ॥७६ ॥ जिस मार्ग में श्रीकृष्ण का श्रागमन होगा उस मार्ग
के किसी स्थान में प्रापको लाकर विरहानल का निर्मापन (शान्ति)
परूँगा। हे इंश्वरि ! जन श्रीकृष्ण आगे तो मैं आप यो दिसाने
के लिये आकर्षित करूँगा । श्राप मेरे प्रति कोपयुक्ता होंगी ।।७।।
हे देवि ! श्रीकृष्ण के नयन भ्रमरों के द्वारा आपस मुसपन का श्रा
स्वादन कराऊँगा । अति मृप्णयुक्त श्रारपी नेत्र चकोरी को भीकृष्ण
मुपचन्द्र पी दास्यम्प मुधा के द्वारा भली भाँति जीवित पराउँगा
सया भीषण माधुर्य्य में मजिन पराउँगा ॥७॥
२५ श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः कपूरकेल्यमृतकलिततीः प्रदात्तं गोप्ठेश्वरीमनुसरानि समं सखीभिः ॥ ७ ॥ गत्वा प्रणम्य तव संकथयानि देवि ! पृष्टा तयाथ घटकावलिमीक्षायित्या। तां हर्पयानि भवदद्भुत सद्गुणली स्तत्कीर्तिता स्ववयसे शृणवानि हृष्टा ॥ २० ॥ चीक्ष्यागतं तनयमुन्नतसम्भ्रमोम्मि- मग्नां स्तनाति-पयसामभिपिच्य पूरैः । अभ्यजनादिकृतये निजदासिकास्ता माश्चापि तां निदिशती मनसा स्तवानि ॥८१ ।। स्नानानुलेपवसनाभरणैर्विचित्र- शोभस्य मित्रसहितस्य तया जनन्या । स्नेहेन साधु वहुभोजितपायितस्य तस्यावशेशितमलक्षितमाददानि ।।२।। श्रीकृष्ण तथा आपकी अद्भुत विवशता का दर्शन करूंगा। मैं ललिता के आदेश से आपको गृहमें लाऊँगा और करिकेलि तथा अमृतकेलि समूह को दिखाने के लिये सखियों के साथ गोप्ठेश्वरी के निकट ग- मन करूँगा ||७६ || सायकाल में गोप्ठेश्वरी के सदन में गमन कर उनके द्वारा प्रालिगिता हो उनसे आपका मङ्गल कहूँगा। उसके पश्चात् लड्डू समूह का दर्शन कराकर उन्हें आनन्दित कराऊँगा। यशोदा के द्वारा कीर्तित तुम्हारे अद्भुत गुणवली का सखीसमाज में कीर्तन करूँगा ।। ८० ॥ गोप्ठ से समागत पुत्र को देखकर अति सम्भ्रम तरङ्ग में निमजिता गोष्ठेश्वरी श्रीकृष्ण को नयन जल तया स्तन दुग्यधारा से अभिषिक्त कर पश्चात् अभ्यञ्जनादि के लिये निज दासियों को और मुझको आदेश करेंगी। इस समय मैं ब्रजेश्वरी का मन-मन में स्तव करूँगा।। ८१ ।। श्रीकृष्ण जननी के द्वारा स्नेह .
२६ श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः तेनैवकान्तविरहज्वर-भेपजेन तत्कालिकेन तदुदन्तरसेन चापि । आगत्य साधु शिशिरीकरवाणि शीघ्र', स्वन्नेत्रकर्णरसना हृदयानि देवि!॥८३ ॥ स्नानाय पावनतडागजले निमग्नां तीर्थान्तरे तु निजवन्धुवृतो जलस्थः । संमज्य तत्र जलमध्यत एत्य स त्वा- मालिङ्गय तत्र गत एव समुत्थितः स्यात् ।। ४ ।। तन्ना विदुर्निकटगा अपि ते ननन्द प्वस्रादयो न किल तस्य सहोदराद्याः। ज्ञात्वाहमुत्पुलकितैव सहालिरेत- चातुर्य्यमेत्य ललितां प्रति वर्णयामि ॥५॥ उद्यानमध्य बलभीमधिरुह्य तत्र वातायनार्पित दृशं भवती विधाय। से मित्रमण्डल के साथ स्नान, अनुलेपन, वस्त्र, प्राभरणादि से वि. चित्र शोभायमान होकर भोजन-पान कर शयन (किंचित विश्राम ) करेंगे। उस समय मैं अलक्षित रूप से श्रीकृष्ण का अवशेष ग्रहण फरूँगा ।।२॥ हे देवि उस अधरामृत के द्वारा जो कि आपके विरह ज्वर का प्रशमन करने वाला है उससे तथा श्रीकृष्ण की स्नान भोजन वार्तादि से मैं आपके रसना कर्ण हृदय की शीतल फरूंगा।। ८३ ।। हे देवि! ग्रीष्मकाल में पावनसरोवर में स्नानार्थ किसी घाट में निज यन्धुवर्ग के साय जलविहार करते करते श्रीकृष्ण अलक्षितमाय से डूयकर अन्यघाट में उठ आपको आलिगित कर फिर पहले के घाट में यन्धुवर्ग में उपस्थित होंगे ॥८॥ इस विषय को निकटस्था आपकी ननन्दी आदि कोई नहीं जानेंगी अथच श्रीकृष्णके सहोदरा- दिफ भी कोई नहीं जानेंगे। परन्तु मैं उस कृष्ण की घानुरी यारी श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः २७ संदर्य तत्प्रियतमं सुरभीवुहान- मानन्दवारिधिमहोम्मिपु मन्चयानि ॥८६॥ गत्या मुकुन्दमथ भोजितपायितं तं गोप्ठेशया तव दशां निभृतं निवेद्य । सङ्केतकुजमधिगत्य पुनः समेत्य त्यां ज्ञापयान्ययि ! तदुत्कलिकाकुलानि ।। ८७ ।। त्वां शुक्लकृष्णरजनीसरसाभिसार- योग्यविचित्रवसनाभरणे विभूष्य । प्रापय्य कल्पतरुकुञ्जमनङ्गसिन्धी कान्तेन तेन सह ते कलयानि केलीः॥८॥ हे श्रीतुलस्युरुकृपाद्युतरङ्गिनीस्त्वं यन्मूर्दिन मे चरणपङ्कजमादधास्वम् । यच्चाहमप्यपिवमम्बु मनाक तदीयं तन्मे मनस्युदयमेति मनोरयोऽयम् ॥ ८६ ।। को जानकर घर आकर ललिता को सुनाऊँगा ॥८५ ॥ उसके अन- न्तर पुष्पोद्यान में चन्द्रशाला के ऊपर आपको अारोहित करा कर प्रियतम का दर्शन कराऊँगा। आप गवाक्षद्वार में नयन अर्पण कर गोदोहनकारी श्रीकृष्ण का दर्शन करेंगी तथा आनन्द सागर की म- हान् तरङ्गों में मग्न हो जायेंगी॥८६॥ अनन्तर श्रीकृष्ण गोप्ठेश्वरी के द्वारा स्नेह के साथ भोजन कर शयन करेंगे । मैं उस समय उनके पास निभृत में जाकर आपकी दशा का निवेदन कर संकेतस्थान जान आपके निकट आकर श्रीकृष्ण की उत्कएठा का वर्णन करूँगा।|| उसके अनन्तर ज्योत्स्ना, या अन्धकार रजनी के सरस अभिसार योग्य उचित वस्त्राभरण के द्वारा आपको विभूपित कर कल्पवृक्ष के पुंज में लेकर कान्त के साथ अनङ्गसमुद्र में क्रीड़ा कराऊँगा है अत्यधिक कृपातरङ्गिणी रूपा श्रीतुलसि ! आपने मेरे मस्तफ में २८ श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः क्वाह परश्शतनिकृत्यनुविद्धचेताः सङ्कल्प एप सहसा क्व सुदुर्लभेऽर्थे । एकां कृपैव तव मामजहायुपाधि- शून्येव मन्तुमदधत्यगते गति में ।। ६० ॥ हे रङ्गमञ्जरि ! कुरुस्व मयि प्रसाई हे प्रेममञ्जरि ! किरात्र कृपादृशं स्वाम् । मामानय स्वपदमेव विलासमज- र्यालीजनैः सममुरीकुरु दास्यदाने ।। ६१ ।। हे मञ्जुलालि ! निजनाथपदाजसेवा- सातत्य सम्पदतुलासि मयि प्रसीद। तुभ्यं नमोऽस्तु गुणमञ्जरि ! मा दयस्व मामुद्धरस्व रसिके ! रसमरि त्वम् ॥१२॥ चरणपद्म का अर्पण किया है । मैंने भी उस पादपद्म धौत जल का अल्पमान पान किया । उससे ही मेरा यह मनोरथ उदय हो रहा है। "हे तुलसी!" यह ग्रंथकार के निज मन्त्रदाता गुरु का सिद्ध देहप्राप्त नाम का सम्बोधन है || ८ || शताधिक्य शाध्यता में अनुबद्धचित्त वाला मैं कहाँ हूँ ? और हठात् सुदुल्लभ श्रर्थ मे यह मेरा मङ्कल्प या कहाँ है ? परन्तु श्रापकी उपाधिशून्य कृपा ही मेरी भॉति श्रगति की गति है । जो कि अपराध नहीं देखती हुई इस प्रकार सङ्कल्प करा रही है ॥१०॥ हे रङ्गमंजरि ! मेरे लिये प्रसन्नता प्रदान कीजिये। हे प्रेममंजरि ! इस दुर्गत जन में कृपा दृष्टि का क्षपण कीजिये । हे विलासमंजरि ! निज चरणपद्म में रस कर सरियो के साथ दास्य में अधिकार दीजिये। यहाँ रङ्गमंजरि !"यह ग्रंथकार के परमगुरू का सिद्धस्वरूप सम्बोधन हे तया"प्रेममरि!"परापर गुरू का सम्योधन है। विलासमंजरी"श्रीनरोत्तमठाकुर महाशय के सिद्धदेह का सम्यो धन है ॥ ११॥ हे मंजुलालि ! निजनाय की पादपद्म सेना में श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः हे भानुमत्य ! नुपम प्रणयाधिमग्ना स्वस्वामिनोस्त्वमसि मां पदवीं जय स्वाम् । प्रेमप्रवाह पतितासि लयद्गगज- य्यात्मीयतामृतमयीं मयि धेयि दृष्टिम् ।। ६३ ॥ हे रुपमञ्जरि ! सदासि निकुञ्जयूनोः केलिकलारसपिचित्रितचित्तवृत्तिः । स्वदत्तदधिरपि यत् समकल्पयं तत् सिद्धी तवैव करुणा प्रभुतामुपेतु ।। ६४ ॥ राधागशश्वदुपगृहनतस्तदात- धर्मद्वयेन तनुचित्तधृतेन देव ! अतुलनीय ममत्ति स्वरूपा हैं । मेरे लिये प्रसन्न हो । हे गुणमंजरि! प्रापको प्रणाम करता हूँ। आप दया कीजिये । हे रसिके रसमजरि! मेरा उद्धार करो। यहाँ "मजुनालि!" श्री लोकनाथ गोस्वामी के "गुणमञ्जरि !" श्री गोपालभट्ट गोस्वामी जी के "रसमञ्जरि !" श्री रघुनाथगोस्वामी जी के सिद्ध मञ्जरी देह का सम्वोधन है ।। १२॥ हे भानुमति ! आप स्वामिनी जी के अनुपम प्रणय समुद्र मे निरन्तर मग्ना हैं । आप मुझे अपनी पदवी को प्राप्त कराइये । हे लवगमञ्जरि ! आप प्रेम-प्रगह में पतिता हैं एक बार मेरे प्रति आत्मीयता अमृतमयी दृष्टि को प्रदान कीजिये । यहाँ 'भानुमति !" जीव गोस्वामी के "लवद्गमञ्जरि!" श्री सनातन गोस्वामी जी के सिद्ध मजरीदेह का सम्बोधन है ।। ६३ ॥ हे रूपमञ्जरि ! आप निरन्तर श्री राधागोविन्द के केलिकला रस मे विचित्रित चित्तवृत्ति वाली हैं। मैंने आप के द्वारा दत्त दृष्टि होकर जो जो संकल्प किया है, उस की सिद्धि करने में आप की करुण प्रभुत्व प्राप्त हों ।। ६४॥ हे देव नन्दनन्दन ! निरन्तर श्री रा. धिका के श्री अंग का आलिङ्गन के वश प्राप्त धर्म दोनों अर्थात् श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः गौरदयानिधिरभूरयि ! नन्दसूनो ! तन्मे मनोरथलतां सफलीकुरु त्वम् ॥६५॥ श्रीराधिकागिरिभृती ललिताप्रसाद- लभ्याविति व्रजवने महती प्रसिद्धिम् । श्रुत्वाश्रयानि ललिते ! तव पादप- कारुण्यरञ्जितदृशं मयि हा !! निधेहि ।। ६६ ।। स्वं नाम-रूप-गुण-शील-वयोभिर क्या द्राधेव भासि सुदृशां सदसि प्रसिद्धा । आगः शतान्यगणयन्नुररीकुरुष्य तन्मां वरानि ! निरुपाधिकृपे ! विशारसे ! ॥ ७ ॥ हे प्रेम सम्पहतुला प्रजनन्ययूनोः प्राग्गाधिकाः प्रियसपाः ! प्रियनमसम्न्यः । युप्माकमेव चरणब्जरजोभिपेक साक्षादयाप्य सफलोऽस्तु ममैव मु| ॥ ८॥ तनु और चित्त का धारण में गौर दयानिधि हो रहे हैं। निष्कर्ष यह है कि श्री राधिका के तनु धर्म गौरवर्ण के धारण में गौर तथा चित्त धर्म दया की धारण में दयानिधि, अर्थात् दोनों के धारण में गौरदयानिधि हुए हैं । अतः मेरी मनोरथ लता को सफल कीजिये ।। ६५ ॥ श्री ब्रजवन में ऐसी प्रसिद्धि है कि ललिता जी की अनुक म्पा से सपा गिरिधारी की प्राप्ति होती है। हे ललिते ! मैंने इसे मुन र श्राप के चरण-कमल का आभय ले लिया है। आप मेरे उपर कृपादृष्टि कीजिये ॥ १६ ॥ हे रिशासे! रमणी-समाज में "श्राप रूप-गुण-नाम और स्वभाव में राधिका की सदृशा हैं" ऐमी परम प्रमिति । अनः हे अहेतुकृपामयि! हे श्रेष्ठागि ! शन अपयप पा प्रदान कर मुम को अगीकार पीजिये ।। १७॥हे. असून प्रेम सम्पत्ति के अधिकारी प्रज्ञ नर-युयफ दोनों के प्राण्याधिक भीसङ्कल्पकल्दुमः वृन्दावनीयमुकुट ! ब्रजलोकसेव्य ! गोवर्द्धनाचलगुरो ! हरिदासवर्य !! तत्सन्निधिस्थितियुपो मम हृशिलास्त्र प्येता मनोरथलताः सहसोद्भवन्तु || ६ || श्रीराधया सम ! त्वदीय सरोवर ! त्व- त्तीरे यसानि समये च मजानि संस्थाम् । स्वन्नीरपानजनिता मम तपवल्ल्यः पाल्यास्त्वया कुसुमिता पलिताश्वः कार्या ॥ १०॥ बृन्दावनीयसुरपादपयोगपीठ स्वस्मिन् वलादिह निवासयसि स्वयं यत् । तन्मे त्वदीय तलतस्थूप एव सर्व- सङ्कल्पसिद्धिमपि साधु कुरुष्व शीघ्रम् ।। १०१ ॥ वृन्दावनस्थिरचरान् परिपालयित्रि! वृन्दे ! तयोरसिकयोरतिसौभगेन । प्रिय सखागण ! और प्रिय नर्म सखीगण ! आप सब के पादपद्म रजों से अभिषिक्त होकर मेरा मस्तक सफल हो || ६ || हे वृन्दा- बन के मुकुट स्वरूप ! हे व्रजजन सेव्य ! हे गोवर्द्धन ! हे पर्वतगुरो ! हे हरिदास श्रेष्ठ! आप के निकट वास करने के कारण प्रस्तर स- दृश मेरे इस चित्त में भी यह मनोरथ लता हठात् उठी है || ६ ॥ हे राधिका के तुल्य उनके सरोवर श्रीराधाकुण्ड ! मैं तुम्हारे तीर मैं वास कर रहा हूँ। समय आने पर प्राण त्याग भी करूंगा। तुम्हारे जल-पान से मेरा हृदय में जो आशालता उठी है यह तुम्हारे द्वारा पालनीया पुष्पिता और फलवती हो ।। १०० ।। हे वृन्दावन के कल्प- वृक्ष सम्बन्धी योगपीठ ! तुमने अपने स्थान में बल-पूर्वक गुझे वास कराया है । अतः तुम्हारे तल स्थित मेरे इस संकल्प का शीघ्र सिद्ध कराओ ।। १०१ ॥ हे वृन्दावन के स्थिर-चर सब की पालयित्रि !
३२ श्रीसङ्कल्पकल्पद्रुमः आढयासि तत्कुरु कृपां गणना यथैव श्रीराधिकापरिजनेषु ममापि सिद्धत् ॥ १०२ ॥ वृन्दावनावनिपते ! जय सोम ! सोम- मौले ! सनन्दन-सनातन-नारदेड्य !। गोपीश्वर ! ब्रजविलासियोगाङ्घ्रिपद्मे प्रेम प्रयच्छ निरुपाधि नमो नमस्ते ॥ १०३ ।। हित्वान्याः किलवासना भजत रे वृन्दावनं तत्रतं राधाकृष्णविलामवारिविरसास्वादं न चेत् विन्दथ । त्यक्तुं शक्नुथ न स्पृहामपि पुनस्तत्रैव हृवृत्तयो ! विश्रद्धाः अयत ममैव सततं सङ्कल्पकल्पद्रुमम् ॥ १०४ ।। इति श्रीविश्वनाथचक्रवर्तीठक्कुरविरचितः श्रीसंकल्पकल्पद्रुमः सम्पूर्णः॥ हे श्रीवृन्दे ! तुम रसिक दोनों के प्रति सौभाग्य से युक्ता हो। तुम कृपा करी | जिससे कि श्रीराधिका के परिकर में मेरी गणना सिद्धि हो ॥ १०२ ॥ हे वृन्दावनधरित्रि के पालक ! हे सोम रूप! हे चन्द्र- मोले ! हे सनन्दन सनातन-नारद पूज्य ! हे गोपीश्वर! आप जय- युक्त हो । प्रजविहारी दोनों के चरण कमल में मेरा निरूपाधि प्रेम का प्रदान कीजिये । आप को नमस्कार ! नमस्कार है ॥१०॥ हे, मेरी चित्तवृत्तियों ! तुम सय एकान्त रूप से-अन्य वासनाओं का त्याग कर श्रीवृन्दावन का भजन करो। यदि पृन्दावन में श्रीराधा. गोविन्द के. विलास समुद्र का रमास्वाद नहीं मान हुआ हो अथया यदि उम लोभ का परित्याग नही करना चाहते हो, तव विशेष श्रद्धा के माय मेरा इम मशल्पकल्पवृक्ष का श्राश्रय लेभो ॥ १०४॥ • श्रीमंगल्ययान्पद्रुम का अनुवाद ममान 3. अनुपादक प्रदास ।
* श्रीश्रीराधाकृष्णपादाम्बुजेम्यो नमः .
श्रीवजक्लिासस्तका
प्रतिष्ठारज्जुभिर्वद्ध कामाद्यै वर्मपातिभिः ।
छित्त्वा ताः संहरन्तस्तान्नधारः पान्तुमा भटाः ॥ १ ॥
दग्धं वार्द्ध कवन्यतिभिरलं दष्ट दुरान्ध्याहिना
विद्ध मामतिपारवश्यविशिखैः क्रोधादिसिंहेवृतम् ।
स्वामिन् प्रेमसुधाद्रवं करुणया द्राक्पायय श्रीहरे
येनैतानवधीय॑ सन्ततमहं धीरो भवन्तं भजे ॥२॥
यन्माधुरी दिव्यसुधारसान्चेः स्मृतेः करणेनाप्यतिलोलितात्मा ।
पद्य ब्रजस्थानखिलान् ब्रजञ्च नत्वा स्वनाथौ वत तौ दिदृक्षे ॥३॥
कामादि लुटेरों के द्वारा प्रतिष्ठारूप रज्जू से मैं बन्धा पड़ा हूँ।
अब अघनाशन श्रीहरि के मार्गरक्षक वीर सेनागण उस बन्धन का
छेदन तथा उन लुटेरों का संहार कर मेरी रक्षा करें ॥१॥
वाक्यरूप वनाग्नि में जलता जा रहा हूँ । उसमें फिर दुरान्ध्य
सर्प मुझको देशन कर रहा है । परवशतारूप बाणसमूह चारों ओर
से मुझे वींध डारते हैं । क्रोधादि सिंहों से मैं घिरा हुआ हूँ। हे स्वा.
मिन् ! हे श्रीहरे ! आप शीघ्र निज कारुण्य गुण से प्रेम सुवाद्रव
का वर्पण कर मुझे पान कराईये । जिससे कि मैं इन संयका निवा-
रण करता हुआ धीर होकर आपका भजन करूँगा ॥२॥
जिनके माधुरी दिव्य सुधारस समुद्र का कणमात्र स्मरण कर मैं
लोलायमान हो रहा हूँ उन निजनाथ श्रीराधा गोविन्द का व्रज के
समस्त और व्रज को पद्यों के द्वारा नमस्कार करता हुआ सरसाव.
लोकन करना चाहता हूँ ॥३॥
श्रीवजविलासस्तवः
प्रादुर्भावसुधाद्रवेण नितरामगित्वमाप्त्या ययो
गोष्ठेऽभीदणमनङ्ग एप परितः क्रीडाविनोदं रसैः ।
प्रीत्योल्लासयतीह मुग्धमिथुनश्रेणीवतंसाविमौ
गान्धा-गिरिधारिणी वत कदा द्रक्ष्यामि रागेण तो॥४॥
वैकुण्ठादपि सोदरात्मजवृता द्वारावती सा प्रिया
यत्र श्रीशतनिन्दिपट्टमहिपीवृन्दैः प्रभुः खेलति।
प्रेमक्षेत्रमसौ ततोऽपि मथुरा प्रेष्ठा हरेर्जन्मतो
यत्र श्रीब्रज एव राजतितरां तामेव नित्यं भजे ॥ ५ ॥
यत्र क्रीड़ति माधवः प्रियतमैः स्निग्धः सखीनां कुलै
नित्यं गादरसेन रामसहितोऽप्यद्यापि गोचारणैः ।
यस्याप्यद्भुत-माधुरी रसविदा हृद्ये व कापि स्फुरेत्
प्रेष्ठ तन्मथुरापुरादपि हरेगोष्ठि तदेवाश्रये ॥ ६ ॥
जिनके प्रादुर्भावरूप सुधाद्रव से निरन्तर सिंचित होकर अनङ्ग
मानो दिव्य अंग का धारण कर लिया है तथा क्रीड़ाविनोद रसों से
उन मुग्ध मिथुन श्रेणी के अवतंस श्रीगान्धर्वा गिरिधारी की प्रीति
के साथ उल्लासित कर रहा है । मैं कब उन दोनों का अनुराग के साथ
दर्शन करूँगा ॥४॥
वैकुण्ठ से सहोदर तथा पुत्रादिकों से परिवृत द्वारकापुरी परम-
प्रिय है। जहाँ प्रभु श्रीहरि लक्ष्मीशत तिरस्कारी पटरानियों के
साथ क्रीड़ा करते हैं। उस द्वारकापुरी से प्रेम का क्षेत्ररूप श्रीमथुरा
प्रभु की जन्मभूमि के कारण परमप्रिय है । उस मथुरापुरी में श्रीन-
जमण्डल विशेष भाव से विराजमान है । हम उस मथुरा का नित्य
जहाँ श्रीवलदेव के साथ श्रीमाधव निज प्रियतम सखात्रों के स.
हित गाइरस प्रकट से गोचारणादि के द्वारा नित्य क्रीड़ा करते हैं।
और जिसकी कोई अद्भुमारी रसिकों के हृदय में स्फूर्तिशील है
.
भजन करते हैं ॥५॥
श्रीव्रजविलासस्तवः वैदग्ध्योत्तर-नर्म-कर्मठसखीवृन्दैः परीतं रसैः प्रत्येक तस्कुजवल्लरिगिरिद्रोणीपु रात्रिन्दिवम् । नाना केलिभरेण यत्र रमते तन्नव्ययुनोयुगं तत्पादाम्बजगन्धवन्धुरतरं वृन्दावनं तगजे ।। ७॥ यत्र श्रीपरितो भ्रमत्यविरतं तास्ता महसिद्धयः स्फीताः सृष्टिरलं गवामुदयनी वासोऽपि गोष्टौकसाम् । वात्सल्यात् परिपालिता विहरते कृष्णः पितृभ्यां सुखै स्तन्नन्दीश्वरमालयं ब्रजपतेगठिोत्तमाई भजे ॥८॥ पुत्रस्याभ्युदयार्थमादरभरै मिष्टान्नपानोत्करे दिव्यानाञ्च गवां मणिबजयुजा दानैरिह प्रत्यहं । यो विप्रान् गणशः प्रतोषयति तद्भव्यस्य वात्ती मुहुः स्नेहात् पृच्छति यश्च तहतमनास्तं गोकुलेन्द्र मजे MEIN उस मथुरा से भी श्रेष्ठ श्रीहरि का गोष्ट है । मैं उस गोष्ठ का आ- श्रय करता हूँ॥६॥ वे नवीन युवा दोनों जहाँ वैदग्ध्यादिक नर्म फर्म में चतुर स- खियों के साथ प्रत्येक वृक्ष, कुञ्ज, लता, पर्वतकन्दरा में रात्रि-दिन नाना फेलिपरायण हो रसमय विहार करते हैं तथा उनके चरणकमलों की गन्ध द्वारा जो अति सुन्दरतर है हम उस वृन्दावन का भजन करते हैं ॥७॥ जहाँ सदा सर्वदा लक्ष्मीदेवी चार ओर फिरती रहती है,वे सव महा-सिद्धियाँ जहाँ मौजूद रहती हैं, जहाँ गो प्रचार सेवा की सृष्टि है तथा जो ब्रजवासियों का निवासस्थान है, जहाँ श्रीकृष्ण पिता-माता के द्वारा वात्सल्य सुख से परिपालित होकर विहार करते हैं, गोष्टराज श्रीनन्द जी के गोष्ट से उत्तम उस नन्दीश्वर गृह का हम भजन करते हैं ॥८॥ पुत्र श्रीकृष्ण अभ्युदय ( मङ्गल) के लिये जो श्रादर के साथ ।
४ श्रीब्रजविलासस्तवः पुत्रस्नेहभरैः सदास्नुतकुचद्वन्द्वा तदीयोच्छल- घर्मस्यापि लवस्य रक्षणविधौ स्वप्राणदेहाय् दैः। आसक्ता क्षणमात्रमप्यकलनात् सद्य: प्रसूतेव गौ व्यंग्रा या विलपत्यलं बहुभयात् सा पातु गोष्टेश्वरी ॥१०॥ पुत्रादुच्चैरपि हलधरात् सिञ्चति स्नेहपुरे गोविन्दं याऽद्भुतरसवतीप्रक्रियासु प्रवीणा । सख्यश्रीभिजपुरमहाराजराज्ञी नयैस्तद् गोपेन्द्र या सुखयति भजे रोहिणीमीश्वरी ताम् ॥ ११ ॥ उद्यच्छु भ्रांशुकोटियुतिनिकरतिरस्कारकायुज्ज्वलश्री- हूँारोदाम-धाम-प्रकररिपुघटोन्मादविध्वसिगन्धः । दिव्य मिष्टान-पान तथा मणियों से भूपित गौओं का दान से प्रतिदि- वस गणसह चित्रों को प्रसन्न करते हैं और कृष्णगत प्राण जो स्नेह से उनको पुत्र की मङ्गलवार्ता वार वार पूछते रहते हैं उन गोकुलेन्द्र श्रीनन्द का हम भजन करते हैं। पुत्रस्नेहातिशय के वश जिनके स्तनयुगल निरन्तर क्षरण होते रहते हैं जो श्रीकृष्ण के अंगों का उच्छलित धर्म लय का भी रजण में निज अर्बुद प्राण-देहों के द्वारा मानो निरन्तर व्यग्र रहती हैं, जो श्रीकृष्ण के क्षणमात्र अनवलोकन से सद्यः प्रसूता गी की तरह उत्कण्ठित हो जाती हैं तथा बहु भय की शङ्का से विलाप करती हैं ये गोप्ठेश्वरी श्रीयशोदा रक्षा करें ॥१०॥ जो निज पुत्र हलघर मे भी अधिक स्नेहधारा के द्वारा श्रीगोविन्द का मिञ्चन करती हैं तथा अद्भुत रन्धन परिपाटी में प्रवीण हैं, जो सग्न्यनानियों के द्वारा प्रज-महाराज की रानी यशोदा जी पो तथा नीति के द्वारा श्रीग्रजराज पो मुख देती हैं उन ईश्वरी रोहिणी माता पाहम भजन करने हैं ॥१॥ जो उदयशील शुभांशु चन्द्रमा कोटि को पान्तिसमूह तिरस्कार- श्रीनजपिलासस्तव ५ स्नेहादप्युन्निमेप निजमनुजमितोऽरण्यभुमी स्ववीत तीर्यज्ञोपि यो न क्षणमपनयते स्तौमि तं धेनुमारिम् ॥१२॥ पज्जेन्यनामा निजनप्तृगवे पर्जन्य्लक्षारयभितो विनिन्दन् । यो नर्मतन्वन् रमतेऽस्य कर्णे नमाम्यहो कृष्णपितामह तम्||१३|| प्रियस्य नप्तु सुखतोऽतिगात् पादौ न यस्या पतत पृथिव्याम् । नमामि नौर्चितनप्तृचन्द्र बरायसी कृष्णपितामही ताम् ॥१४॥ श्वेतश्मथ भरेण सुन्दरमुख श्याम कृती मन्त्रणा- भिन ससादि सन्तत प्रजपते कुर्वन् स्थितिं योऽचित । स्वप्राणाय्दखण्डनमुरभिट भ्रातु सुत तोषयेत् साहारे निवसन् स गोष्ठमवतान्नाम्नोपनन्द सदा॥१५ ।। कारी अत्युज्वल श्रीविशिष्ट हैं,जो हेला मान से दुर्वार अति पराक्रम- शाली रिपुओं का उन्माद विध्वस करने वाले हैं, निज अनुज श्री. कृष्ण का पराम्म जानते हुए भी जो अत्यन्त स्नह से अरण्य-भूमि मे निमेपकाल के लिये उनका पारत्याग नहीं करते उन धेनुकारि श्रीवलदेव की स्तुति करता हूँ॥ १० ॥ पर्जन्य नामक जो श्रीकृष्ण के पितामह निज नाती के गर्भ से मानो पर्जन्यलक्ष (मेघलक्ष) का तिरस्कार करते हैं तथा जो श्रीकृष्ण के साथ नर्म परिहास करने वाले हैं उन श्रीकृष्ण के पितामह रोन- मस्कार है।॥१३॥ प्रिय नाती श्रीकृष्ण के सुस के द्वारा अतिगर्व से जिनके चरण युगल पृथ्वी में नहीं पड़ते थे, नाती श्रीकृष्ण को नर्मकारिणी उन वरीयसी नाम्नी श्रीकृष्ण की पितामही को नमस्कार करता हूँ ॥१४॥ जो शुभ्र दाढीसे मुदर मुस वाले तथा श्यामवर्ण हैं,जो मन्त्रणादि म परम चतुर हैं, जो ब्रजराज की सभा मे रह कर पृजित हैं, जो भ्राता के पुत्र श्रीकृष्ण को निज अर्बुद प्राण से भी सुख देने वाले हैं तथा जिनका वासस्थान साहार में है वे उपनन्द जी सर्वदा गोष्ठ की रक्षा ६ श्रीब्रजविलामस्तवः गौरः कोमलधीदारचरित: स्निग्धो ब्रजेन्द्रानुजः श्यामश्मश्रु रलं तदीयचरणे भक्तः सुनन्दापिता। यः प्राणैः परिमञ्छय माधवसुखं दध्ना महिप्याः परं । सन्नन्दस्तनुते स पातु नितरां नः कासरीणां पतिः ॥ १६ ॥ श्यामः सूक्ष्ममतियुवातिमधुरो ज्योतिर्विदामग्रणीः पाण्डित्यैर्जितगीस्पतिजपतेः सव्ये कृतावस्थितिः । कृष्णं पालयतीह य: प्रियतया प्राणावू दरप्यल मन्त्रेणाप्युपनन्दसूनमिह तं प्रीत्या सुभद्रनमः ।। १७ ॥ दैत्याद्भीतेरतिविकलघी: कोमलाङ्गस्य सूनोः कृष्णस्योच्चैः सततमवने वत्सला व्यग्रचित्ता। कृच्छ रम्बा बहुभिरभितो हन्त सन्तोष्य शूर दैत्यनं या सुतमजनयत् साम्बिका पातु धात्री ॥ १८ ॥ करें॥ १५ ॥ जो गौरवर्ण हैं, जिनकी बुद्धि अति कोमल है तथा जो उदार- चरित्र वाले और स्निग्ध हैं, जिनकी श्यामवर्ण दाढ़ी है, ये ब्रजराज के भक्त अनुज सन्नन्द हम मवकी रक्षा करें। सनन्द जी कासरियों के पति हैं। उन्होंने माधव के सुख के लिये प्राण का निर्मच्छन किया है ॥ १६ ॥ श्यामवर्ण, सूक्ष्मघुद्धि वाले, अतिमधुर, ज्योतिर्विदों के अग्रगामी, पाण्डित्य से वृहस्पति को जीतने वाले तथा ब्रजराज के वाम भाग में रहने वाले, उपनन्द के पुत्र सुभद्र जी को प्रीति के साथ हम नमस्कार करते हैं । जो मन्त्रणादि के द्वारा परम प्रीति के साथ निज अर्बुद मारण से भी श्रीकृष्ण का पालन करते थे ।। १७ ।। वह धात्री साम्बिका रक्षा करें । वत्सला जो दैत्यों से भयभीत होकर अतिव्याकुल हो जाती थीं तथा कामलांग पुत्र श्रीकृष्ण की रक्षा करने में सर्वदा व्यग्रचित्ता रहती थीं। जिसने अनेक कठिन प्र.
० श्रीवजविलासस्तवः नादर्यस्य स्फुटति परितो दिव्यविध्यण्डकोटिः के ते तावत् किल दितिसुताः क्षुद्रकात् क्षुद्रजीवाः । स्नेहान्मात्रा विजयमभितो रक्षणे सन्नियुक्त कृष्णस्यारात् परमिह भजे हन्त घात्रीसुत तम् ॥ १६ ॥ मन्त्रन्यासैरिह मररिपोस्तत्पुरोधाः पुरस्तात् साङ्गानि प्रकटनिगमो भागुरियोऽभिरक्ष्य । आशीर्भिश्च प्रतिदिनमहो तच्छिरो जिघ्रतीदं वन्दे तावन्मुनिसुरपतेस्तस्य पादब्जयुग्मम् ॥२०॥ कृष्णस्योच्चैः प्रणयवसतिः संप्रवीणः सखीनां श्यामागस्तत् समगुणवयो-वेश-सौन्दर्य-दर्पः। स्नेहाद्वन्धोः क्षणमकलनाज्जायते योऽवधूत: श्रीदामानं हरिसहचरं सदा तं प्रपद्ये ॥ २१ ॥ तादि के द्वारा देवता को प्रसन्न कर देत्यनाश कारी सुत श्रीकृष्ण का अन्म कराया।।१८।। माता के द्वारा श्रीकृष्ण के निकट में रक्षा के लिये नियुक्त, उस धात्रीसुत विजय का हम विशेष रूप से भजन करते हैं। जिसके शब्द से मानों दिव्य ब्रह्माण्ड कोटि छिन्न भिन्न भयभीत हो जाते थे। तुद्र से क्षुद्र जीव दैत्यगण कौन हो सकते हैं ॥ १६ ॥ उन सुरपति मुनि भागुरि नामक पुरोहित जी के चरण दोनों की वन्दना करते हैं । जो मन्त्रों के न्यास के द्वारा श्रीकृष्ण के प्रागे आगे रह कर समस्त अगों का रक्षण करते थे तथा प्रतिदिन आशिर्वादों के द्वारा श्रीकृष्ण के मस्तक का आघ्राण करते थे ॥ २०॥ श्रीकृष्णा के अत्यन्त प्रणयपात्र, सखाओं में अतिप्रवीण, श्याम- वर्ण, श्रीकृष्ण के समान गुण, वयः, वेश, सौन्दर्य, अभिमान वाले उनके सहचर श्रीदामा के सर्वदा हम शरण में हैं । जो स्नेह के वश प्रिय श्रीकृष्ण के क्षणमात्र अनवलोकन से अवधूत की भाँति हो जाते श्रीनजविलासस्तयः गादानुरागभरतो विरहस्य भीत्या स्वप्ने:पि गोकुलविधोर्न जहाति हस्तम् । यो राधिकाप्रणपनिरसित्तचेतास्तं प्रेमविह्वलतनु मुबलं नमामि।।२२।। कृत्यैकत्र गवा कुलानि परितः कृष्णेन सार्द्ध मदा हस्ताहस्ति विनोदननकथनैः खेलन्ति मित्रोत्कराः । प्रेमाम्भोधिविधौतगौरवमहापडास्तदकाञ्चिता स्तत्पादार्पित-चित्तजीवितकला ये तान् प्रपद्यामहे ।। २३ ।। मूर्ते हास्यरसः सदैव सुमनाः कामं बुभुक्षातुरः प्राणप्रेष्ठवयस्ययोरनदिनं वाग्दहभंग्युत्करैः । हास्यं यो मधुमहलः प्रकटयन् संभ्राजते कौतकी तं वृन्दावनचन्द्रनम॑सचिवं प्रीत्या सुवन्दामहे ॥ २४ ॥ थे॥२१॥ जो गादानुराग के वश विरहमय से स्वप्न में भी श्रीकृष्णचन्द्र का हस्त को नहीं छोड़ते थे तथा जो श्रीराधिका के प्रणय निर्भर से निरन्तर सिञ्चित रहते है उन प्रेम से विह्वल अङ्ग वाले मुवलजी को हम नमस्कार करते हैं ॥२॥ जो सब सखागण गौ ओं को एकत्र कर श्रीकृष्ण के साथ आन- न्दातिशय से हस्ताहस्ति (हाथापाई) विनोद-नर्म वचनों से क्रीड़ा क- रते हैं, जिन्होंने प्रेमसागर में गौरव महापंक को धो डाला है तथा श्रीकृष्ण के चरणों में चित्त-जीवन-विद्या को अर्पण कर दिया है, उन सब सखागण के हम शरण में आ रहे हैं ॥ २३ ॥ उन बृन्दाबनचन्द्र के नर्मसखा प्रिय मधुमङ्गल जी की हम सु. वन्दना करते हैं । जो मानो मूर्तिमान् हास्यरस स्वरूप तथा सदा सर्चदा निर्मल हृदय वाले हैं। वे भोजन में परम पटु हैं जो वाणी- देह की अति भङ्गि के द्वारा निरन्तरं प्राण प्रिय वयस्य श्रीकृष्ण-बल- देव को हँसाते रहते हैं तथा परम कौतुकी हैं ।। २४ ।। ।
श्रीब्रजविलासस्तवः गढ़ तत्सुविदग्धताञ्चितसखीद्वारोन्नयन्ती तयोः प्रेम्णा सुष्टु विदग्धयोरनुदिनं मानाभिसारोत्सवम् । राधामाधवयोः सुखामृतरसं यैवोपभुडक्ते मुहु- गोष्ठे भव्यविधायनी भगवतीं तां पौर्णमासी भजे ॥२५॥ खर्चश्मश्रु मुदारमज्जलकुलं गौर समानं स्फुरत् पञ्चाशत्तमत्रपवन्दितवयः क्रान्ति प्रवीणं ब्रजे। गोष्ठेशस्य सखायमन्नततर-श्रीदामतोऽपि प्रिय- श्रीराधं वृषभानमुद्र-यशोबातं सदा तं भजे ॥ २६ ॥ अनुदिनमिहमात्रा राधिकामव्यवार्ताः, कलयितुमतियत्नात् प्रेप्यते धात्रिकायाः । दुहितयुगलमच्चैः प्रेमपूरप्रपञ्चै विकलमति ययाऽसौ कीर्तिदा साऽवतान्नः ॥ २७॥ गोष्ठ में मङ्गलविधायनी उन पोर्णमासी भगवती जी का हम भजन करते हैं । जो गृढभाव से प्रीति के साथ विदग्धा सखियों के द्वारा प्रतिदिन विदग्व श्रीराधा-माधव का मिलन कराकर दोनों का मान-अभिसारादि अानन्द उत्सव के सुखामृत रस का उपभोग क- रती हैं ।। २५॥ उद्भट यश वाले श्रीकृष्ण के सखा श्रीदाम से भी श्रीराधिका को प्रीति करने वाले पिता श्री वृपमान जी का सदा सर्वदा हम भ- जन करते हैं । जो सर्लायमान दाढ़ी विशिष्ट तथा गौरवर्ण हैं जिन का कुल परम उज्ज्वल है । उनका वयःक्रम पचास वर्ष का है, तथा जो ब्रज में प्रवीण हैं ॥२६॥ यह राधिका की माता श्रीकीर्तिदा देवी हम सब की रक्षा करें। जो प्रतिदिन अत्यन्त यत्न के साथ राविका की कुशलया" को जानने के लिये धातृ की दुहित दोनों को भेजती थीं तथा प्रेम प्रवाह विस्तार के द्वारा विकल बुद्धि हो ज्यती थीं ॥२७॥ ।
श्रीवजविलासस्तवः
प्रथमरसविलासे हन्त रोपेण तावत् ,
प्रकटमिव विरोधं सन्दधानापि भङ्गया।
प्रवलयति सुखं या नव्ययूनोः स्वनप्लोः,
परमिह मुखरी तां मुनि वृद्धां वहामि ॥ २८ ॥
सान्द्रप्रेमरसै: प्लुता प्रियतया प्रागल्भ्यमाप्ता तयोः
प्राणप्रेष्ठवयस्ययोरनुदिनं लीलाभिसारं क्रमैः ।
वैदग्ध्येन तथा सखी प्रति सदा मानस्य शिक्षा रस
र्येयं कारयतीह हन्त ललिता गृह्णातु सा मां गणैः ॥ २६ ॥
प्रण्यललितनर्मस्फारभूमिस्तयोर्या
ब्रजपुरनवयुनोर्या च कराठान् पिकानाम् ।
नयति परमवस्ताद्दिव्यगानेन तुष्ट्या
प्रथयतु मम दीक्षां हन्त सेयं विशाखा ॥३०॥
हम केवल मस्तक के द्वारा उन वृद्धा मातामही मुखरा का वहन
करते हैं । जो पहले रसविलास में रोप दिखा कर विरोध करती हुई
पश्चात् भङ्गि के द्वारा निज नप्त नवीन युवा राधा माधव के अति
सुख का विस्तार करती थीं ॥२८॥
वह श्री ललिता मुझे अपने गण में रखें। जो निविड़ प्रेमरसों
के द्वारा परिप्लुता हैं तथा जो दोनों की अत्यधिक प्रियता के कारण
प्रगल्भता को प्राप्त हुई हैं। जो निज वैदग्ध्य दक्षता के साथ प्राणप्रेष्ठ
वयस्य दोनों का लीला-भिसारादिक क्रम से कराती रहती हैं तथा
जो रम के साथ निज सखी राधिका को मान की शिक्षा देती हैं|२६||
हाय ! वह श्रीविशाखा मेरी दास्य दीक्षा का विस्तार करें। जो
ब्रज नवीनयुवा दोनों की प्रणय ललित-नर्मविस्तार की भूमी स्वरूपा
हैं। जो दिव्यातिदिव्य गान से कोकिलों का कंठ को तिरस्कार करती
॥३०॥
श्रीव्रजविलासस्तवः
११
प्रतिनवनवकुटज प्रेमपुरेण पूर्णा
प्रचुरसुरभिपुष्पभूपयित्वा क्रमेण ।
प्रणयति वत वृन्दा तत्र लीलोत्सवं या
प्रियगणवृत-राधाकृष्णयोस्तां प्रपद्ये ॥ ३१ ।।
सख्येनाल परमरुचिरा नर्मभव्यन राधा
पाकार्य या अजपतिमहिष्यातया सन्नयन्ती।
प्रेम्णा शश्वत् पथिपथि हरेर्वार्त्तया तर्पयन्ती
तुष्यत्वेता परमिह भजे कुन्दपूवी लतां ताम् ॥ ३२ ।।
ब्रजेश्व-नीतां वत रसवतीकृत्यविधये
मुदा काम नन्दीश्वरगिरिनिकुञ्ज प्रणयिनी ।
बलैः कृष्णं राधां दयितमभि तां सारयति या
धनिष्ठां तत्प्राणप्रियतरसखीं तां किल भजे ॥३३॥
अवन्तीतः कीर्तेः श्रवणभरतो मुग्धहृदया
प्रगाढ़ोत्कण्ठाभिजभुवमरीकृत्य किल या ।
जो श्रीवृन्दा प्रचुर कल्पवृक्षों के पुष्पों से प्रत्येक नवीन कुञ्ज को
सजाती हैं तथा जो प्रेमधारा से परिपूर्ण है । जो प्रियगण से परिवृत
श्रीराधा-कृष्ण की लीला उत्सव का विधात्री हैं, उनकी हम शरण
लेते हैं ॥३१॥
हम केवल कुन्दलता का भजन करते हैं । चे प्रसन्न होवें। जो
नर्म,परिहास सख्य में परम रुचिरा हैं तथा जो पाक करने के लिये
ब्रजरानी यशोदा की आज्ञा से श्रीराधा को नित्य नन्दालय में लाती
थी। मार्ग में श्रीहरि की वार्ता से श्रीराधिका को प्रसन्ना करती हैं।॥३२॥
राधिका की प्राणप्रियसखी धनिष्ठा का हम भजन करते हैं। प्रीतिपा-
त्री वह धनिष्ठा जबरल्धनकार्य विधि में ब्रजेश्वरी के द्वारा आनीता
राधिका लग जाती थों तव नाना छल दिखा कर नन्दीश्वर पर्वत के
निकुञ्ज में राधिका जी को श्रीकृष्ण के निकट पहुँचाती थीं ॥ ३३ ॥
१२ श्रीमजविलासस्तयः मुदा राधाकृष्णोज्ज्वलरसमुखं वद्धयति ता मुखीं नान्दीपूर्वी सततमभिवन्दे प्रण्यतः ॥ ३४ ॥ मुदा राधाकृष्ण-प्रचुर-जलकेली-सभर- स्खलत्कस्तुरीत सृण-घनचच्चाञ्चितजला। प्रमोदात्ती फेनस्मितमुदितमूमिस्फुटकर- श्रिया सिञ्चन्तीव प्रथयतु सुखं नस्तरणिजा ॥ ३५ ॥ सुर्लानन्दकदम्बकेन हरिणा प्रागयाचिता अप्यमः स्वैरं चारु रिरंसया रहसि या: क्रोधादनादृत्य ताम् । प्राणप्रेठसखी निजामनुदिनं तेनेव सार्द्ध मुदा राधां संरमयन्ति ताः प्रियसखीमूर्ना प्रपद्येतराम् ।। ३६ ॥ प्रेम्णा ये परिवएटनेन कलिताः सेवाः सदैवोत्सुकाः कुाणा: परमादरेण सततं दासा वयस्योपमाः । हुम प्रीति के साथ निरन्तर उन नान्दीमुखी की अभिवन्दना क- रते हैं । जो यश श्रवण से मोहित होकर प्रगाढ़ उत्कण्ठा के द्वारा अ. वन्ती को छोड़कर ब्रजभूमि में वास करने लगी तथा जो श्रीराधा. कृष्ण के उज्ज्वलरस सुख को बढ़ाने वाली हैं ॥ ३४ ॥ श्रीराधा कृष्ण की अत्यधिक जलक्रीड़ा रसभर से पतित कस्तूरी कुंकुम-चन्दनादि रज से व्याप्त जलवाली वह यमुना सबका सुख विधाक करें। जो अत्यन्त प्रमोद से मानो फेन रूप स्मितं के साथ तरंगरूप हस्तलक्ष्मी के द्वारा दोनों का सिञ्चन करती हैं ।। ३५ ।। उन सब प्रियसखियों का मस्तक नम्रता के साथ हम शरण लेते हैं । जो सब सर्वानन्द कदम्ब स्वरूप श्रीहरि के द्वारा पहले प्रार्थित होकर भी स्वच्छन्द मनोहर रमण करने में इच्छुका निज प्राण प्रेष्ठ सखी राधिका को अनुदिन उन श्रीहरि के साथ रमण कराती है।३६।। वयस्य तुल्य पत्रिमुख्यादि दासगण का हम भजन करते हैं । जो सब निरन्तर उत्सुक होकर प्रेम के साथ बाँट कर परम आदरता से श्रीब्रजविलासस्तवः १३ वंशी-दर्पणदत्यवारि-लिलसत्ताम्बूलवीणादिभिः प्राणेश परितोषयन्ति परितस्तान् पत्रिमख्यान् भजे ॥ ३७॥ ताम्बूलार्पण-पादमदन-पयोदानाभिसारादिभि वृन्दारण्यमहेश्वरी प्रियतया यास्तोषयन्ति प्रिया । प्राणप्रेष्ठसखीफुलादपि फिलासडोचिता भूमिकाः लीभूमिघु रूपमञ्जरिमुखास्ता दासिकाः सश्रये ॥ ३८ ॥ तणीकृत्य स्फार सुसजलधिसारं स्फटमपि स्वकीयं प्रेम्णा ये भर-निफग्नम्रा मुररिपोः । सुखाभासं शश्वत् प्रथयितुमल प्रौढतकाद यतस्ते तान् धन्यान् परमिह भजे माधवगणान् ॥ ३६॥ तस्याः क्षणादर्शनतो नियन्ते सुखेन तस्याः सुखिनो भवन्ति । स्निग्धाः परं ये वृतपुन्यपुञ्जाः प्राणेश्वरीप्रे ठगणान् भजे तान्॥४०॥ सेया करते हैं। ये सब वंशी, दर्पण, दीत्य, जल, ताम्वृल, वीणादि के द्वारा प्राणेश का परितोप करते हैं ॥ ३७ ।। अब हम रूपमञ्जरी प्रमुस उन प्राणेश्वरी की दासियों का श्रा- श्रय करते हैं । जो सब ताम्बूल-प्रदान, पादमन, जलप्रदान, अभि- सारादि के द्वारा प्रियता के साथ वृन्दावनेश्वरी राधिका की प्राणप्रेष्ठ सखियों से भी असंकोचित होकर क्रीडाभूमि मे प्रसन्नता विधान करती हैं ॥ ३ ॥ हम केरल उन माधव के गणों का भजन करते हैं। जो सब निज सुससागर को भी तृण की भॉति देखते हैं तथा जो श्रीकृष्ण के प्रेमभर से नम्र हैं । निरन्तर प्रोढ कौतुक के द्वारा यह दिसाते है कि जगत में सब कुछ सुसाभास से युक्त है केवल कृष्णप्रेम ही सुग्न समुद्र स्वरूप है ।। ३६॥ अब प्राणेश्वरी के उन प्रियगणों का हम भजन करते हैं। माणे- श्वरी राधिका के क्षणकाल श्रदर्शन से जो मृतप्राय हो जाते हैं तथा श्रीवजबिलामस्नयः साफ्न्योच्चपरज्यदुज्यलरसस्योच्चैः समुहृद्धये मौभाग्योद्गटग-विभ्रमभृतः श्रीराधिकायाः स्फुटम् । गोविन्दः स्मरफुल्लबल्लवधूचनर्गेण येन चणं क्रीडत्येष तमत्र विस्तृतमहापुण्यं च वन्दामहे ॥ ११ ॥ ब्रह्माण्डात् परमुच्चलत् मुखमर तत्कोटिसंख्यादपि प्रेम्णा कृष्णमुरक्षिताः प्रतिमहः प्राप्ताः परं निर्वृताः । कामं तत्पदपद्मसुन्दरनखप्रान्तस्सलदेणुका- रक्षाव्यग्रधियः स्मरन्ति फिल ये तान् गापवान् भने ||४|| प्राणेभ्योऽप्यधिः प्रियरपि परं पुत्रैमुकुन्दस्य याः स्नेहात् पादसरोजयुग्मविगलद्धम्मस्य विन्दोः कणम् । निर्मन्छयोरुशिखण्ड सुन्दरशिरश्चुम्बति गोप्यरिश्वरं तास पादरजासि सन्ततमह निर्मच्छयामि स्फुटम् ॥४३॥ उनके सुख से सुसी होते हैं । वे सय परम स्निग्ध कृत-पुण्यपुज- शाली हैं ॥ ४०॥ उन विस्तृत महापुण्यशाली गोपवधूवर्ग की हम वन्दना करते हैं । कन्दर्परस से उत्फुल्लित जिनके साथ श्रीगोविन्द क्षणकाल क्रीड़ा करते हैं। उसे सौभाग्य से उद्भट गर्च विभ्रम धारणकारी श्रीराधिका के स्पष्टतारूप से सापल्य से उत्कर्ष प्राप्त उज्ज्वल रस की अत्यन्त बुद्धि के लिये जानना चाहिये ॥४१॥ हम उन गोपश्रेष्ठों का भजन करते हैं। वे सब ब्रह्माण्ड सुख से कोटि संख्या में अधिक परम महासुस से सुखी हैं तथा श्रीकृष्ण के द्वारा रक्षित परम निवृतशील हैं। फिर भी वे सब श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सुन्दर नख प्रान्त के स्खलित रजकण की संरक्षा में व्यग्रचित्त रहते हैं ॥ ४२ ॥ उन गोपियों के चरण रजों का हम निरन्तर निर्मान देते हैं। जो सब प्राणों से अधिक प्रिय निज पुत्रों से भी अत्यधिक श्रीकृष्ण ।
श्रीवजविलामस्तवः १५ इन्द्रनीलखुरराजिताः पर स्वर्णवद्धवरशृङ्गरन्जिताः । पाण्डगण्डगिरिगर्वखबिकाः पान्तु न सपदि कृष्णधेनवः ॥४४॥ यासा पालनदोहनोत्सवरतः साई बयस्योत्करैः कामं रामविराजितः प्रतिदिनं तत्पादरेणूज्ज्वलः । प्रीत्या स्फीतबनोरुपर्वतनदीकच्छेपु वद्धस्पृहो गोठाखण्डलनन्दनो विहरते ताः सौरमेयोर्भजे ॥ ४५ ॥ मणिसचितसुवर्णश्लिष्ट-शृङ्गद्वयश्री- रसितमणि-मनोज्ञ-ज्योतिरूयतखुराट्यः । स्फुरदरणिमगुच्चान्दोल-विद्योतिकण्ठः स जयति वक्ररात्रोः पद्मगन्धः कुकुमी ।। ४६ ॥ मृदु-नवतृणमल्पं सस्पृह वक्तमध्ये दिपति परमयत्नादलपकरच गात्रे। में प्रेम करती थीं। जो चरण कमल युग्म से विगलित धर्मकण का- निर्माञ्छन देकर प्रचुर मयूरपंख से मुन्दर श्रीकृष्णा का मस्तक चु- म्बन करती हैं।। ४३ ॥ बे सब श्रीकृष्ण की धेनुगरण हम सबकी रक्षा करें। जिनके बुर इन्द्रनीलमणि से जड़ित हैं तथा जो सुवर्ण से संयुक्त शृङ्गों से रंजित ॥४४॥ वयस्यों के साथ श्रीबलदेव जी से विराजमान होकर जिनके च. रण रज से उज्वल प्राप्त ब्रजराज नन्दन श्रीकृष्ण पालन-दोहनादि उत्सव में रत रहते हैं तथा वन, पर्वत, नदीतटादि में बद्धस्पृह ही कर बिहार करते हैं उन सब गौयां का हम भजन करते हैं ।। ४५ ।। यकारि श्रीकृष्ण के वह पदागन्ध नामक वृपभ जययुक्त हों। जो मणि खचित सुवर्ण से युक्त शृङ्ग दोनों की शोभा से मनोहर हैं तथा असितमणि की भॉति मनोक्षकान्ति विशेष है। जिसका खुर उठा हुआ है तथा कंठदेश अरुणिम गुछ से दोलायमान है ।। ४६ ॥ ।
श्रीवाजविलामस्तयः प्रथयति मुरवैरी हन्त यद्वत्समाना सपदि किल दिने तत्तदाटीफनानि ॥१७॥ नक्तन्दिवं मुररिपोरधरामृत या स्फीता पिवत्यलमत्राधमहो मुमाग्या । श्रीराधिकाप्रथितमानमपीह दिव्यनादरघो नयति ता मुरली नमामि॥४८॥ दूतीभिर्वहुचाटुभिः सखिकुलेनालं वचोनिभिः पादान्ते पतनै जेन्द्रतनयेनापि ऋ धालिगणोः । राधाया सहि शक्यते दवयितु यो नैव मानो यया फुरकृत्यैव निरस्यते सुकृतिनीं वंशी सखी तो नुमः ॥ ४६ ।। स्फीतस्ताएडविको हरेम रलिकानादन नृत्योत्सर्व पूर्सच्चारशिखरएडवल्गु सरसोतोरे नि आग्रतः । तन्वन् कुअविहारिणोः सुखभरं सम्पादयेद् यस्तयोः स्मृत्वा तं शिखिराजमुत्सुकतया वाढं दिदृक्षामहे ।। ५.० ॥ जिनके मुख में श्रीमुरारि स्पृहा युक्त होकर अल्प अल्प मृदुल नवीन तृष्णग्रास का अर्पण करते हैं तथा परम श्रादर से शरीर का कण्डूयन करते है उन गो वत्सों का कूदना-उछलना लीला को हम कब देखेंगे ।। ४७॥ जो दिनरात श्रीमुरारि के अधरामृत को बाधा रहित होकर पान करती है तथा जो अति भाग्यवती है, जो अपने नादों से श्रीराधिका के उच्चतर मान को नीचे दवा देती है उस मुरली को हम नमस्कार करते हैं ॥ ४॥ जो मान चाटुयास्यों से दूतियों के द्वारा, सखियों के वचन परिपाटी के द्वारा, ब्रजराजतनय के चरण पतन के द्वारा, क्रोधित प्रालीगण के द्वारा भी नहीं प्रशम होता था राधिका के उस मान को जो सुकृतिनी वंशीसखी फूत्कारमात्र से ही नाश कर देती थी उस वंशी को हम नमस्कार करते हैं ॥४६॥ उस ताण्डविक नामक शिसिराज मसूर का हम कव उत्मुकता श्रीनजविलासस्तव. सप्ताह मुरमईन प्रणयतो गोष्ठ करक्षोत्सुको विभ्रन्मानमुदारपारिणरमणैर्यस्मै सलिल ददौ । गान्ध मुरभिद्विलासविगलत्-काश्मीररज्यद्गुह- स्तुत्सट्टायितरत्नसुन्दरशिलो गोबर्द्धन पातु व ॥५१॥ नोपैश्चम्पकपालिभिर्ननगराशोके रसालोत्करे. पुन्नागेवकुलेर्लवङ्गलतिकानासन्तिकाभिते । हृय तप्रियकुण्डयोस्तटमिलन्मध्यप्रदेश पर राधामाधत्रयो प्रियस्थलमिद केल्यास्तदेनाश्रये ॥ ५२ ।। श्रीनृन्दानिपिन सुरम्यमपि तच्छ्रीमान् स गोवर्द्धन सा रासस्थलिकाप्यल रसमयी कि तापदन्यत् स्थलम् । के साथ युगल दोना का स्मरण कर अवलोकन करेंगे। जो राधाकुण्ड के तट पर निकु ज के आगे श्रीहरि के मुरलीशद से प्रफुल्ल होकर मनोहर पस को घुमाता हुआ कु जबिहारी विहारिणी के परमसुख का निधान करता है ॥५०॥ चार और साट की भॉति रत्नमय सुन्दर शिला विशिष्ट श्रीगो- वर्द्धन हम सबकी रक्षा करें। श्रीमुरारि ने गोष्ठरक्षामे अति उत्सुक होकर प्रणय के साथ उतार हस्तक्मल मे एक सप्ताह पर्यन्त धारण पर निसमा मान बढाया है तथा जो श्रीगान्ध र्वा गिरिधारी के वि- लासों से विगलित काश्मीरादि से शोभायमान गुहा वाला है ॥५॥ श्रीराधा माधव का उस केलि प्रियस्थल नामक परम स्थल का हम श्राश्रय करते हैं । जो नीप चम्पका से,नसीन श्रेष्ठ अशोकवृक्षों से, श्रान्त्र समूह से, पुन्नाग, वकुल, लयनलता, वासन्तिकादियों से परम मनोहर है तथा राधामाधन के प्रिययुण्ड श्रीरामायुएन श्यामकुएड के मिलन स्थल मध्य प्रदेश में हैं ॥५॥ वह श्रीवृन्दाविपिन तथा वह श्रीमान गोबर्द्धन परम सुन्दर है। यह रसमयी रासस्थली भी ऐसी परम सुदर ही है। अन्यान्य सहल ।
श्रीमजविलासस्तवः यस्याप्यंशलवेन नार्हति मनाक माभ्यं मुकुन्दस्य तत् प्राणेभ्योऽप्यधिकप्रियेव दयितं तत्कुण्डमेवाश्रये ॥ ५३॥ स्फीते रत्नसुवर्णमौक्तिकमरैः सन्निम्मिते मण्डपे थुत्कारं विनिधाय यत्र रभसात्ती दम्पती निर्भरम् । तन्वाते रतिनाथनर्म-सचिवौ तद्राज्यचच्ची मुदा त राधासरसीतटोज्ज्वलमहाकुजं सदाहं भजे ॥ ५४॥ कान्त्या हन्त मिथः स्फुटं हदितटे सम्विम्वितं द्योतते प्रीत्या तन्मिथुनं मुदा पदकवद्रागेण निध्ययोः । धात्रा भाग्यभैरण निर्मिमततरे त्रैलोक्यलक्ष्म्यास्पदे गौरश्यामतमे इमे प्रियतमे रूपे कदाहं भजे ॥ ५५॥ नेत्रोपान्त-विघूर्णनैरलघु तद्योल-सञ्चालन रीपद्धास्यरसः सुधाधरधयश्चम्बैट दालिङ्गनैः । स्थान सुन्दर है । परन्तु वे सव श्री मुकुन्द के प्राणों से भी अधिक प्रिया श्रीराविका की तरह परम प्रिय श्रीकुण्ड अर्थात् राधाकुण्ड का लव अश का साम्य नहीं प्राप्त हो सकते हैं उस राधाकृण्ड का हम श्राश्रय लेते हैं ।। ५३ ।। रावाकुण्ड के तट पर उस उज्वल महाकुज का हम निरन्तर भ- जन करते हैं । रत्न, सुवर्ण, मौक्तिकों से विनिम्मित विस्तृत मडप में अन्य सबका थूकार करते हुए कन्दर्पनर्म सचिव दम्पती दोनों जहाँ कन्दर्पराज्य चर्चा का विस्तार करते हैं ॥ ५४ ।। गौर-श्याम इन प्रियतम रूप का हम कब भजन करेंगे। कान्ति के द्वारा दोनों दोनों के हृदयतट में प्रतिविम्बित हो रहे हैं। मानो पदक की भाँति अथवा पदक के छल से दोनों दोनों को धारण कर रहे हैं। दोनों विधाता के भाग्य के वश निम्मित हुए हैं तथा त्रैलोक्यलक्ष्मी के प्रास्पद स्वरूप हैं ॥ ५५॥ उस उज्वल महाराज की अर्थात् दिव्य शृङ्गार रसराज की हम श्रीनजविलासस्तरः एतैरिष्टगहोपचारनिचयैस्तकत्र्ययुनोयुगं प्रीत्या य भजते तमुज्चलमहाराज प्रान्दामहे ॥५६॥ नेत्रे दर्घामपाङ्गयो कुटिलता वदोज-वन स्थले स्थौल्य तन्मृदु वाचि वक्रिमनुरा श्रोणी पृथुस्फारता । सर्लाङ्ग वरमाधुरी स्फुटमभूयनेह लोफत्तरा राधामावश्योरल नवयसन्धि सदा तं भजे ॥ ५७॥ दृष्टारिष्टपथे स्वय समुदभूत् कृष्णाघ्रिपद्मादिद स्फीत यन्मकरन्दनिस्तृतिरिनारिष्टाख्यमिष्ट' सर. । सोपान परिरञ्जित प्रियतया श्रीराधया कारितेः प्रेम्णालिगदिव प्रियासर इद तन्नीत्य नित्यं भजे ॥ ५८॥ वन्दना करते हैं । जो नेत्रोपान्त का विघूर्णनो से,विशाल भुजामूल मञ्चालनों से, ईपत् हास्य रसों से, अधरसुवा का पानों से, चुम्बनी से, दृढ़ आलिङ्गनों से, इन सय इष्ट महोपचार से उन नवीन युवा युगल का प्रीति के साथ भजन करना है ।।५६ ॥ श्री राधा माधव की उस नवीन घय सन्धि का हम भजन क- रते हैं । जिसमे नेत्र मे दीर्घता, अपाङ्ग मे कुटिलता, वक्षोज तथा वक्षः स्थल में स्थूलता, मृदुवचन में वक्रिम की अतिशयता, शोणि मे विस्तारता, साग में वरमाधुरी ये सब अलौकिक भान स्फुट रूप से प्रकाशित होते हैं ।। ५७ ।। उस श्यामकुण्ड का हम नित्य भजन करते हैं ।जो दुष्ट अरिष्टा- सुर का वध के समय श्रीकृष्ण के चरण कमलों से उत्पन्न हुआ है। मानो श्रीकृष्ण के चरणकमलों का मकरन्द रस का विस्तार होकर अरिष्टकण्ड नाम से प्रसिद्ध हो गया है। श्रीराधिका के द्वारा प्रीति के साथ परिनिम्मित सोपानी से जो परिरजित हो रहा है तथा प्रियता से राधाकुण्ड का आलिङ्गन कर रखा है ।। ५ ।।
२०
श्रीवजविलासस्तयः
कदम्बानां प्रातैर्मधुपकुलझद्वार-ललितः
परीते यत्रैव प्रिय-सलिललीलाहतिमिपैः ।
मह पेन्द्रस्यात्मजमभिसरन्त्यम्बुजशो
विनोदेन प्रीत्या तदिदमवतात् पावनसरः ॥५६॥
पर्जन्येन पितामहेन नितरामाराध्य नारायणं
त्यक्त वाहारमभूदपुत्ररु इह स्वीयात्मजे गोष्ठपे।
यत्रावापि सुरारिहा गिरिधरः पौत्रो गुणकाकरः
क्षुण्णाहारतया प्रसिद्धमवनी तन्मे तडागं गतिः ॥ ६०॥
सार्द्ध मानसजाह्नवीमुरवनदी-वर्गः सरडोत्करः
सावित्र्यादि-सुरीकुलैश्च नितरामाकाशवाण्या विधेः ।
वृन्दारण्यवरेण्यराज्यविषये श्रीपौर्णमासी मुदा
राधा यत्र सिपेच सिञ्चतु सुख सोन्मत्तराधास्थलो ॥६१ ॥
वह पावनसरोवर हम सबकी रक्षा करे । जो मधुप भ्रमरों के झ-
द्वार से ललित कदम्बों का समूह से परिव्याप्त है । जहाँ अभ्युजनयना
गोपियाँ जल नयन छल से बार वार विनोद के साथ श्रीकृष्ण का
अभिसार करती हैं अर्थात् उनसे मिलती हैं ।। ५६ ।।
पृथिवी मे तुण्गाहार नाम से प्रसिद्ध वह सरोबर मेरी गति हो।
जहाँ पर पितामह पर्जन्य ने "निज आत्मज, अपुत्रक,ब्रजराज का स-
न्तान की कामना से आहारादि परित्याग कर नारायणा की नित्य प्रा.
रावना की थी तथा गुणों के सान, सुरों का शत्रुनाशन, पौत्र गिरि-
घर को प्राप्त हुए थे ।। ६० ।।
वह उन्मत्त राधास्थली सुख कासिञ्चन करे । जहाँ श्रीपौर्णमासी
भगवती ने मानसगङ्गा प्रमुख नदियों के जल से तथा सरस्वति आ.
दिक तीर्थों से अत्यन्त उत्सुकरंग से निरन्तर ब्रह्मा की आकाशवाणी
के साथ वृन्दावन के श्रेष्ठ राज्याधिकार विषय मे राधिका का अभि-
पेक सिञ्चन किया है ॥ ६१॥
श्रीनजनिलामस्तव २१ प्रीत्या नन्दीश्वरगिरितटे सारपापाणन्द श्चातुष्कोएयेऽनुकृतिगुरभिनिम्मिता या विदग्धै । रेमे कृष्ण ससिपरिवृतो यत्र नम्र्माणि तन्त्र- नास्थानी ता हरिपदलसत् सौरभाक्ता प्रपद्य ॥६२ ।। पैदग्ध्योज्ज्वलाल्गुगल्लवधूपर्गेण नृत्यन्नसौ हित्वा तं मरजिद्रसेन रहसि श्रीराधिका मण्डयन् । पुष्पालकृतिसञ्चयेन रमते यत्र प्रमदोत्करे प्रलोक्यातमाधुरी परिवृता सा पातु रासस्थली ।। ६३ ॥ गान्धर्विकामरविमर्दननाविहार-लीला विनोदरस निर्भर भोगिनीयम् । गोवर्द्धनोज्ज्वलशिलाफुलमुन्नयन्ती वीचीभरेरवतु मानसजाह्नवी माम्।६४ येपा क्वापि च माधयो विहरते स्निग्धेयस्योत्करे स्तद्धातुद्रवपुञ्जचित्रिततरैस्तैस्तै स्त्रय चित्रित । हम श्रीहरि के परकमल सौरभ से रनित आस्थानी नामक मनो- हर स्थल का शरण म आ रहे है । जो नन्दीश्वर पर्वत के तट पर है तथा विस्तार पापाण समूह से चतुष्कोण आकार निशिए है। जहाँ श्रीकृष्ण सग्वियों से परिवृत होकर विदग्धता से नर्म परिहास करते हुए मीटा करते हैं ।। ६२ ॥ वह राधास्थली सरकी रक्षा करे । जहाँ श्रीमुरारि रस दग्ध्य परमोनल मनोहर गोपनधूवर्ग के साथ नृत्य करते हुए उसका प- रित्याग कर रहस्यस्थल पर पुष्पों के अलङ्कार समूह से श्रीराधिका को भूपित कर रमण करते हैं ॥ ३ ॥ वह मानसगङ्गा मेरी रक्षा करें । जो गान्धर्चा मुरनाशन के नौ. काबिहार रुप लीलाविनोद रसाधिस्य का भोग करने वाली है तथा जो तरगों से गोवर्धन के अत्युचल शिलासमूह को उन्मजित करती है।६४॥ उन पर्वतराज श्रीगोबर्द्धन का हम भजन करते हैं। जहाँ राधिका के साथ भीमाधव उसके गैरिकादिधातुओं से चित्रित स्निग्ध . श्रीवजविलासस्तवः खेलाभिः किल पालनरपि गर्वा श्रुत्रापि नम्मोत्सवैः श्रीराधासहितो गुहासु रमते तान् शैलवान भजे ॥ ६५ ।। स्फीते यत्र सरित्सरोवरकुले गा: पालयन्निवृतो ग्रीष्मे वारिविहार केलिनिवहै गो पेन्द्रदिव्यात्मजः । प्रीत्या सिञ्चति मुग्धमित्रनिकरान् हर्पण मुग्धः स्वयं काङ्क्षन् स्वीयजयं जयार्थिन इमान्नित्यं तदेतद्जे ॥६६॥ येषां कच्छपिकालसन्मुरलिकानादेन हर्पोत्करः स्रस्तार्द्धस्तृणगुच्छ एप नितरां वक्तं पु संस्तम्भते । सख्येनापि तयोः परं परिवृता राधा-चकद्वे पिणो स्ते हृद्या मृगयथपा: प्रतिदिनं मां तोषयन्तु स्फुटम् ॥६७॥ गुञ्जभृङ्ग कुलेन जुष्टकुसुमैः सन्नद्ध-मश्रिया कुञ्जानां निकरेषु येप रमते सौरभ्यविस्तारिणाम् । उद्यत् कामतरङ्ग-रङ्गितमनुस्तन्नव्ययनोयुगं तेषां विस्तृतकेशपाशनिकरैः कुर्यामहो माजनम् ॥ ६८ ॥ वयस्यों के द्वारा स्वय चित्रित होकर विविध क्रीड़ा तथा गौओं का के द्वारा, कहीं वा नर्म उत्सव के द्वारा विहार करते हैं ॥६५।। जहाँ ब्रजराजतन्दन ग्रीष्मकाल में विस्तृत नदी तथा सरोवर स. मूह में गौओं का पालन करते हुए उससे निवृत होकर जल विहार क्रीड़ा से स्वयं मुम्ब हो अपने जय की इच्छा करते हुए जयार्थी इन मुग्धमित्रसमूह को सिञ्चन करते है उन श्रीगोवर्द्धन का हम भजन पालन करते हैं ।। ६६ ॥ श्रीराधा-वकारि के वे मनोहर मृगयृथप प्रतिदिन मुझे स्पष्ट रूप से प्रसन्न करें। वीणा और मुरलीनाद से परम हर्पित जिनके मुखों में पतित श्रद्धचवित तृण गुच्छ गले के नीचे नहीं जाता है तथा जो सब तृणप्रास भूलकर परम सख्यता से उन दोनों को घिर जाते थे।। ६७॥
श्रीनजविलासस्तव येपा चारतलेषु शीतनिविडन्छायेषु रात्रिन्दिव पुष्पाणां विगलत्पराग-विलमत्तल्पेषु क्लुप्ताश्रयम् । प्रीत्या स्निग्धमत्रवतर्मधुकणे ससेरित तन्ना यूनोर्यग्मतर मदा विहरते ते पान्तु मा भुरहा ॥ ६॥ गान्धामररिणो प्रणयिणो पुष्पाणि सचिन्वतो स्वैर स्मेरसखीकलेन वृतयोरीपस्मितेन द्वयो । दृष्ट्या केलिकलिं तयोर्नगनव हास्येन पुष्पन्छले काम या ग्लिसन्ति ता फिल लता सेव्या पर प्रेमभ ॥७॥ परिचयरसमग्ना काममारात्तयोर्ये मधुरतररनेनोल्लासमुल्लासयन्ति । प्रजभुवि नायूनो सुप्रिया पक्षिणस्ते विदधतु मम सौख्य स्फारमालोकनेन ॥ ७॥ अहो । उन सब कुजों का विस्तृत केश कलाप से में मार्जन क- सँगा । गुञ्जित भृङ्गसमूह से युक्त पुप्पों से परम मनोहर,शोभाप्राप्त, सुगन्ध विस्तारकारी निन कु जों के समूह में उन्धलित कामतरङ्ग से अनुरक्त चित्त वे नगीन युना दोनों रमण करते हैं ।। ६ ।। वे सन वृक्षगण मेरी रक्षा करें। मनोहर शीतल घनदाया वाले जिन वृक्षों के नीचे गिलित पराग पुप्पों के तल्पों में दिन रात वि. राजमान करते हुए स्निग्ध मधुकरों के मधुकरणों से ससेरित वे नवीन युवक दोनों श्रानन्द के साथ विहार करते हैं ।। ६६॥ वे सब लतायें परम प्रेम से मेरी सेचनीया है। ना पत् हास्य से ससियों के साथ स्वेच्छा पूर्वक पुष्प चयनकारी, प्रणयी, गान्धर्वा. मुरारी दोनों का नवीन-नवीन केलिकलह देख पुष्पों के छल से हँसती हुई पिलाम करती हैं।। ७ ।। वे पक्षिगण विस्तार दर्शन दान से मेरा मुस विधान करें। जो प्रजभूमि में उन नवीन युवा दोनों के परिचय रस में मग्न रहते है तथा मधुरतर शब्द से दोनों को उल्लासित करते हैं ।। ७१॥
श्रीव्रजचिलामस्तरः
चतप्येषु कदम्केषु वफुलेपन्येषु चोपल
प्रीत्या माधविकादिल्लिपु तथा भाइरिनादेयो ।
ये भृङ्गा परितस्तयो मुसभर विस्तारयन्ति स्फुट
गुञ्जन्तो वत निभ्रमण नितरा तानेव बन्दामहे ।। ७२ ।।
पुर्यस्य मुद्रा स्स्य गिरिधर स्वैर निकुजेश्वरी
फुल्ला फुल्लतौरमण्डयदल फुल्लो निमुजेश्वर ।
ईन्नेन निधूणनेन कलितस्त्राधीन उच्चस्तया
श्रीमान् स प्रथयत्नहो मम दृशाः सौख्य कदम्वेश्वरः ।। ७३ ।।
नीचे प्रौदभयात् स्वय सुरपति पादौ विकृत्येह यै.
वर्गहासलिलेशकार सुरभिद्वाराभिषेशोत्सवम् ।
गोविन्दस्य नव गामधिपता राज्ये स्फुटं कौतुमा-
तैर्यप्रादुरभूत् सदा स्फुरतु तगोविन्दकुण्ड दृशो ॥ ७ ॥
उन भृङ्गों की हम वन्दना करते हैं । जो आम्र-कदम्ब पफुल तथा
अन्यान्य वृक्षों में और मावविकादि लताओं में प्रीतिवश गु जनकारी
भवार नादों से उन युगल दोनों का सर्वप्रकार सुस विस्तार करते
हैं ।। ७२ ॥
अहो । वह अति उच्चता से श्रीमान् कदम्पराज मेरे नेनों का सुरन
विस्तार करें। निकुन्जेश्वर स्वाधीन श्री गिरिधर प्रफुल्ल होकर स्त्र-
न्छन्द मे जिसके पुष्पों के द्वारा प्रसन्ना नि जेश्वरी श्रीराधिका को
उत्सुक से ईपत् नेत्र घूर्णन के द्वारा मण्डित करते हैं ॥ ७३ ॥
वह श्री गोरिन्दकुण्ड मेरे नेत्रों में सर्वदा स्फूर्त हो। अत्यन्त
भयभीत सय इन्द्र ने नम्र होकर चरण धर सुरभि के द्वारा मुरधुनी
के जली से गौओं का प्राधिपत्य राज्य में गोविन्द का नवीन 'अभि-
पेक उत्सव क्यिा था ! उस समय कौतुक से गाविन्दकुण्ड का
प्रादुर्भाव हुआ है।॥ ७४॥
श्रीव्रजविलासस्तवः अजेन्द्रवार्पितभोगमुच्चै त्वा वृहत्कायमघारिस्त्कः । वरेण राधा छलयन् विमुक्त यत्रान्नकूटं तदहं प्रपद्ये ॥७५।। गिरीन्द्रवोपरि हारिरूपी हरिः स्वयं यत्र विहारकारी । सदा मुदा राजति राजभोगै हरिस्थलं तत्तु भजेऽनुरागैः ॥७॥ घट्टक्रीडाकुतुक्तिमना नागरेन्द्रो नवीनो दानी भूत्वा मदननृपतेर्गव्यदानच्छलेन । यत्र प्रातः सखिभिरभितो वेष्टितः संरोध श्रीगान्धर्वा निजगणवृतां नौमि तां कृष्णवेदीम् ।। ७७॥ निभृतमजनि यस्माद्दाननिवृत्तिरस्मि तन्न इदमभिधानं प्रापयत् तत्सभायाम् । रसविमुखनिगूढे तत्र तज्ज्ञ कवेद्य सरसि भवतु वासो दाननिर्वर्तनेन ॥ ७८॥ उस अन्नकूट स्थान के हम शरण जाते हैं। जहाँ अघारि ने उ- स्कण्ठित हो वृहत् शरीर धारण के द्वारा घर से राधिका को छलना क- रते हुए व्रजराज के द्वारा अर्पित भोग उपहार का धारण कर अन्नकूट का भोजन किया है।। ७५॥ उस हरिस्थल का अनुराग के साथ हम भजन करते हैं। जिस श्री गिरिराज के ऊपर हाररूप होकर स्वयं श्रीहरि विहार करते हैं तथा सदा सर्वदा विविध राजभोगों से विराजमान रहते हैं ॥ ७६ ॥ उस कृष्णवेदी को हम नमस्कार करते हैं। जहाँ घाटीक्रीडा में कौतुम्मना होकर नव-नागरेन्द्र ने दानी बन कर काम नृपति का गव्यदान के छल से प्रातःकाल सखायों से परिवेष्टित होकर निज गणों से परिवृत राधिका का संरोध किया है ।।७।। उस दान निर्वर्तन नामक सरोवर में मेरा वास हो। वहाँ नि- भृत में दान निर्वत्तन लीला हुई थी, अतः सखी समाज में ऐसा ही नाम पड़ गया । वह स्थान अरसिकों के लिये परम निगूढ तथा ६ श्रीव्रजविलासस्तवः सीरिब्रह्म-कदम्बखएड-सुमनोरुद्राप्सरोगौरिका ज्योत्स्नामोक्षण-माल्यहार-विवुधारीन्द्रध्वजाद्याख्यया। यानि श्रेष्टसरासि भान्ति परितो गोवर्द्धनादरमू नीडे चक्रतीर्थ देवतगिरि-श्रीरत्नपीठान्यपि ।। ७६ ॥ अहो दोलाखेला रसबरभरोत्फुल्लवदनी मुहुः श्रीगान्धर्वागिरिवरघरौ तौ प्रतिमधु । सखीवृन्दं यत्र प्रकटितमुदान्दोलयति तत् प्रसिद्ध गोविन्दस्थलमिदमुदारं वत भजे ॥८॥ प्रियाप्रियप्राणवयस्यवर्गे धृतापराधं किल कालिय तम् । यत्राई यत् पादतलेन नृत्यन् हरिभजे तं किल कालियं हदम्।।८।। सूर्यदिशभिः परं मधुरिपुः शीतात्त उग्रातपै भक्तिप्रेमभरैरुदारचरितः श्रीमान्मुदा सेवितः । - रसिकों के लिये वेद्य है ।। ७८ ॥ श्रीगोवद्धन के चार ओर ये सब श्रेष्ठ मरोवर विराजमान हैं। जिनके नाम-सीरि (बलदेवकुण्ड ) ब्रह्मकुण्ड, कदम्बखण्डी, कुसुमसरोवर, रुद्रकुएड, अप्सराकुण्ड, गौरीकुण्ड, ज्योत्स्नामोचन- कुण्ड, मालहारकुण्ड, विवुधारिकुण्ड, इन्द्रध्वजादि है। इन सब की तथा चक्रतीर्थ,देवतगिरि,श्रीरत्नपीठ की भी हम स्तुति करते हैं।।७।। उस प्रसिद्ध उदार गोविन्दस्यल का हम अवश्य भजन करते हैं। अहो ! सम्बीगण दोलाखेल (भूला) के रसवश से उफुल्ल मुख श्रीगान्धा-गिरिधारी को प्रति दिन बार-बार आनन्द प्रकाश करते हुए मुलाते हैं ॥५०॥ उस कालियहद का हम भजन करते हैं । जहाँ श्रीहरि ने प्रिय से प्रियं प्राणवयस्य वर्ग में अपराधकारी उस कालियनाग को नृत्य करते करते चरणों से दमन किया है ।।८१॥
श्रीवजविलासस्तवः
यत्र स्त्रीपुरुपैः क्वणत्पशुकुलरावेष्टितो राजते
स्नेहैदशसूर्यनाम तदिदं तीर्थ सदा संश्रये ॥ ८२॥
अत्यन्तातपसेवनेन परितः सञ्जातघम्मोत्कर
गविन्दस्य शरीरतो निपतितैर्यत्तीर्थमुच्चैरभूत् ।
तत्तत् कोमलसान्द्रसुन्दरतर-श्रीमत् सदगोच्छल-
गन्धैहारि सुवारि सुद्युति भजे प्रस्क्न्दनं वन्दनैः॥ ८३॥
कात्यायन्यतलार्चनार्थममले कृष्णाजले मज्जतः
कन्यानां प्रकरस्य चीरनिकरं संरक्षितं तीरतः ।
हृत्वाह्य कदम्बमुज्ज्वल-परिहासेन तं लज्जयन्
स्मेरस्तं प्रददौ सुभगिमुरजित्त चीरघट्ट श्रये ।। ८४ ॥
उस द्वादश श्रादित्य स्थल का हम आश्रय करते हैं । जहाँ शी-
तात होकर उदारचरित श्रीमान् गोविन्द ब्रज के स्त्री-पुरुप गौओं से
परिवेष्टित हो भक्ति प्रेम के साथ द्वादश सूर्यो के उग्र ताप के द्वारा
सेवित होकर विराजमान हुए थे। उसी कारण से यह स्थान द्वादश
आदित्य टीला नाम से प्रसिद्ध हो गया है ॥२॥
उस प्रस्कन्दन नामक तीर्थ का वन्दनाओं के द्वारा भजन क-
रते हैं। अत्यन्त धूप का सेवन से घम उत्पन्न होकर श्रीगोविन्द का
श्रीयंग से श्रमजल वह्न लगा। उससे वह सुन्दर तीर्थ बन गया ।
श्रीगोविन्द के शोभायमान सुन्दरतर कोमल श्रीअंग के उच्छलित
गन्धी से उस का जल मनोहर हो रहा है ॥८३ ।।
उस चीरघाट का हम आश्रय करते हैं । जहाँ जमुना के पवित्र
जल में कात्यायनी देवी की अर्चना करने वाली कन्याओं का वस्त्र
समूह तीर से लेकर मुरारी ने परिहास करते हुए कदम्यवृक्ष मे प्रा.
रोहण कर उन को लज्जित किया तथा रंग परिहास के द्वारा वर
प्रदान किया था।॥४॥
२६
भीनजविलासस्तवः
सीरिब्रह्म-कदम्बखएड-सुमनोरदाप्सरो-गौरिका
ज्योत्स्नामोक्षण-माल्यहार-वियुधारीन्द्रध्वजाद्याख्यया।
यानि श्रेष्टसरासि भान्ति परितो गोवर्द्धनारमू
नीडे चक्रतीर्थ देवतगिरि-श्रीरत्नपीठान्यपि ॥ ७६ ।।
अहो दोलाखेला रसबरभरोत्फुल्लवदनी
मुहुः श्रीगान्धगिरिवरघरी ती प्रतिमधु ।
सखीवृन्दं यत्र प्रकटितमुदान्दोलयति तत्
प्रसिद्ध गोविन्दस्थलमिदमुदारं यत भजे ॥८॥
प्रिया प्रियप्राणक्यस्यवर्ग धृतापराधं किल कालिय तम् ।
यत्राई यत् पादतलेन नृत्यन् हरिर्भजे तं किल कालियं हदम्।।८।।
सू_ीदशभिः परं मधुरिपुः शीतात उग्रातपै
भक्तिप्रेमभरेदारचरितः श्रीमान्मदा सेवितः ।
रसिकों के लिये वेद्य है ।। ७ ।।
श्रीगोवद्धन के चार ओर ये सब श्रेष्ठ मरोवर विराजमान
हैं। जिनके नाम-सीरि (बलदेवकुण्ड ) ब्रह्मकुण्ड, कदम्बखएडी,
कुसुमसरोवर, रुद्रकुण्ड, अप्सराकुण्ड, गौरीकुण्ड, ज्योत्स्नामोचन-
कुण्ड, मालहारकुण्ड, विवुधारिकुण्ड, इन्द्रध्वजादि है । इन सब की
तथा चक्रतीर्थ,देवतगिरि,श्रीरत्नपीठ की भी हम स्तुति करते हैं।।७।।
उस प्रसिद्ध उदार गोविन्दस्यल का हम अवश्य भजन करते
हैं । अहो ! सखीगण दोलाखेल (भूला ) के रसवश से उत्फुल्ल
मुख श्रीगान्धा-गिरिधारी को प्रति दिन बार-बार अानन्द प्रकाश
करते हुए मुलाते हैं ॥२०॥
उस कालिग्रहद का हम भजन करते हैं। जहाँ श्रीहरि ने प्रिय
से प्रिय प्राणवयस्य वर्ग में अपराधकारी उस कालियनाग को नृत्य
करते करते चरणों से दमन क्रिया है ॥१॥
श्रीव्रजविलासस्तवः
यत्र स्त्रीपुस्पैः क्वणत्पशुफुलेरावेष्टितो राजते
स्नेहैदशसूर्य्यनाम तदिदं तीर्थ सदा संश्रये ॥२॥
अत्यन्तातपसेवनेन परितः सञ्जातघम्मोत्कर
गोविन्दस्य शरीरतो निपतितैर्यत्तीर्थमुच्चैरभूत् ।
तत्तत् कोमलसान्द्रसुन्दरतर-श्रीमत् सदगोच्छल-
द्गन्धैारि सुवारि सुधु ति भजे प्रस्कन्दनं वन्दनैः॥८३॥
कात्यायन्यतुलाचनार्थममले कृष्णाजले मज्जतः
कन्यानो प्रकरस्य चीरनिकर सरक्षितं तीरतः ।
हृत्वारा कदम्बमुज्ज्वल-परिहासेन तं लज्जयन्
स्मेरस्त प्रददौ सुभगिमुरजित्तं चीरघट्ट श्रये ॥ ८४॥
उस द्वादश आदित्य स्थल का हम आश्रय करते हैं । जहाँ शी-
तात होकर उदारचरित श्रीमान् गोविन्द ब्रज के स्त्री पुरुष गौओं से
परिवेष्टित हो भक्ति प्रेम के साथ द्वादश सूर्यों के उग्र ताप के द्वारा
सेवित होकर विराजमान हुए थे। उसी कारण से वह स्थान द्वादश
श्रादित्य टीला नाम से प्रसिद्ध हो गया है ।। २ ।।
उस प्रस्कन्दन नामक तीर्थ का वन्दनाओं के द्वारा भजन क-
रते हैं । अत्यन्त धूप का सेवन से धर्म उत्पन्न होकर श्रीगोविन्द का
श्रीग से अमजल यहने लगा। उससे यह सुन्दर तीर्थ बन गया।
श्रीगोविन्द के शोभायमान सुन्दरतर कोमल श्रीअंग के उच्चलित
गन्धा से उस का जल मनोहर हो रहा है ।। ८३॥
उस चीरघाट का हम आश्रय करते है । जहाँ जमुना के पवित्र
जल मे कात्यायनी देवी की अर्चना करने वाली कन्याओं का वस्त्र
समूह तीर से लेकर मुरारी ने परिहास करते हुए कदम्बवृक्ष मे आ-
रोहण कर उन को लजित किया तथा रंग परिहास के द्वारा वर
प्रदान किया था ॥४॥
२८
श्रीब्रजविलासस्तवः
हेपाभिर्जगतीत्रयं मदभरैरकम्पयन्तं परैः
फुल्लन्नेत्रविघूर्णनेन परितः पूर्ण दहन्तं जगत् ।
तं तावत्तृ णवद्विदीयं वक्रभिद्विवे पिणं केशिनं
यत्र क्षालितवान् करौ स रुधिरी तत् केशितीर्थ भजे ॥ ८५ ॥
अन्नयंत्रचतुर्विधैः पृथुगुणैः स्वैर सुधानिन्दिभिः
कामं रामसमेतमच्युतमहो स्निग्धैर्वयस्यैर्वृतम् ।
श्रीमान् याज्ञिकविज्ञसुन्दरवधूवर्ग: स्वयं यो मुदा
भक्त्या भोजितवान् स्थल च तदिदं तञ्चापि वन्दामहे ॥८६॥
मदा गोपेन्द्रस्यात्मज-भुजपरिष्वड-निधये
स्फुरद्गोपीवृन्दैर्यमिह भगवन्तं प्रणयिभिः ।
भुजद्भिस्तैर्भक्त्या स्वमभिलपितं प्राप्तमचिराद्
यमीती रे गोपीश्वरमनुदिनं तं किल भजे ॥२७॥
उस केशितीर्थ का हम भजन करते हैं । जहाँ अति मत्तता से
हेला के द्वारा तीन जगत् को पाता हुआ तथा बड़े बड़े नेत्रों के
विपूर्णन से जगत् का मानो दहन करता हुआ विद्वपि केशि दैत्य
आया । वकारि श्रीकृष्ण ने उस को तृण की भाँति विदीर्ण कर
सरुधिर हस्त कमल का वहाँ धीत किया था ॥५॥
हम उस याज्ञिकस्थल तथा उन यज्ञपलियों की वन्दना करते हैं।
जहाँ श्रीमान् यज्ञपनिवर्ग ने गुग्ण से सुधा निन्दि चार प्रकार के
अन्न के द्वारा स्निग्ध वयस्यों से वेष्टित श्रीराम के साथ श्रीगोविन्द
को प्रीति से भोजन कराया है।८६ ।।
यमुना के तीर में विराजमान उन श्रीगोपीश्वर महादेव का हम
निश्चय भजन करते हैं। गोपीयन्दों ने भी प्रजराजनन्दन के भुज
थालिङ्गन रूप धन की प्राप्ति के लिये भक्ति के द्वारा जिन का भजन
कर निज अभिलापित धस्तु का प्राप्त किया ॥७॥
श्रीब्रजविलासस्तवः २६ भयातू कंसस्यारात् सदयमचिराच्छन्तनुपदे "विनिक्षिप्ता राधा रहसि किल पित्रा प्रकृतितः । स्फरन्तं तं दृष्ट्वा कमपि धनपुजाकृतिवरं तमेवाप्त यनादयमभजत सूर्योऽवतु स नः ।। ८८॥ आविर्मात्रमहोत्सवे मुररिपोः स्वर्णोरुमुक्ताफल- श्रेणीविभ्रममण्डिते नवगवीलचे ददौ द्वे मदा। दिव्यालंकृतिरनपर्वततिल-प्रस्थादिकञ्चादरा द्विप्रेभ्यः किल यत्र स ब्रजपतिर्वन्दे वृहत्काननम् ।। ८६ ॥ गान्धर्वाया जनिमणिरभूत् यत्र सङ्कीर्तिताया- मानन्दोत्कैः सुरमुनिनरैः कीर्तिदागर्भखन्याम् । गोपीगोपैः सुरभिनिकरैः संपरीतेऽत्रमख्ये रावलाख्ये वृपरविपुरे प्रीतिपुरो ममास्ताम् ॥ १०॥ यस्य श्रीमच्चरणकमले कोमले कोमलापि श्रीराधोच्चैर्निजसुखकृते सन्नयन्ती कुचाग्रे । वह सूर्यदेव हम सब की रक्षा करें। कंस के भय से पिता ने रहस्य स्थल पर श्रीराविका को रखा था । क्योंकि स्वमाव से वे रा- विकावत्सल थे। श्री राधिका ने उस सूर्यदेव को मेघपुञ्चाकार देख कर श्रीकृष्ण ज्ञान से उसकी प्राप्ति के लिये भजन किया है।।८८|| उस वृहद्वन (महावन ) की हम वन्दना करते हैं । जहाँ ब्रज- राज ने मुरारि के आविर्भाव महोत्सव में स्वर्ण मुक्ताओं से मण्डित नवीन दो लक्ष गौत्रों का तथा दिव्यातिदिव्य अलंकार-रत्न पर्चत- तिलप्रस्थादि का आदर से विनों को दान दिगा था || ८ || रावल नामक वृषभानुपुर में मेरी परम प्रीति हो । जहाँ श्रा- नन्दित सुर-मुनि-नरों से कीर्तित कीर्तिदा के गर्भरूप खनि से श्रीराधिका की जन्मरूप मणि हुई है। जो स्थान गोपी-गोप-धेनुओं से परिपूर्ण है ।। १० ॥
३० श्रीब्रजविलासस्तवः भीताऽप्यारादथ नहि दधात्यस्य कार्कश्य-दोपात् स श्रीगोष्ठे प्रथयतु सदा शेपशायी स्थितिं नः ।। ६१॥ यत्र कामसरः साक्षागोपिकारमणं सरः। राधामाधवयोः प्रेष्ठं तद्वनं काम्यकं भजे ॥२॥ मल्लीकृत्य निजा: सखी: प्रियतमा गर्वेण सम्भाविता मल्लीभूय मदोश्वरी रसमयी मल्लत्वमत्कण्ठ्या। यस्मिन् सम्यगुपेयुपा वकभिदा राधा नियुद्ध मुदा । कुर्वाणा मदनस्य तोपमतनोद्धाण्डीरकं तं भजे ॥ ३ ॥ आकृष्टा या कुपितहलिना लागलाण कृष्णा धीरा यान्ती लवणजलधौ कृष्णसम्बन्धहीना । अयापीत्थं सकलमनुज दृश्यते सैव यस्मिन् भक्त्या वन्देऽद्भुतमिदमहो रामघट्टप्रदेशम् ।।६४ ॥ वे शेपशायी श्रीगोप्ठ में हम सब की स्थिति प्रदान करें । को. मलाङ्गी श्रीराधिका अपने सुग्व के लिये स्तनाम में जिन के चरण- कमल का धारण कर फिर परम आदरता से स्तनों में काठिन्यता समझ कर भीना हो परित्याग करने की इच्छा करती हैं ॥ ११ ॥ उहाँ साक्षात् कामसरोवर तथा गोपिकारमण सरोयर विराज- मान् है । उस राधामाधव के परम प्रिय काम्यकवन का हम भजन करते हैं ।। ६२॥ उस भाण्डीरवट का हम भजन करते हैं। जहाँ रसमयी मेरी ईश्वरी श्रीराधिका ने गर्व के साथ निज प्रियतम सखियों को मल्ली (योद्धा)यना कर स्वयं मल्ली ( योद्धा) मन कर यकारि के साय युर कर अतनु मदन का तोप विधान किया है ॥३॥ अहो परम अन इस रामघाट प्रदेश की भक्ति के साथ पन्दना करते हैं। कृपया सम्बन्ध से रहित धीरनदियाँ लपण-सागर में मिलती है। परन्तु "कृष्णप्राण जमुना एसा क्यों करेगी। इस श्रीघ्रजविलासस्तकः प्राणप्रेष्ठवयस्य-वर्गमुदरे पापीयसोऽघासुर- स्यारण्योट-पावकोत्कट-विपैर्दुष्टे प्रविष्ट पुरः । व्यग्रः प्रेक्ष्य रुपा प्रविश्य सहसा हत्वा खलं तं वली यत्रैनं निजमाररक्ष मुरजित् सा पातु सर्पस्थली ॥६५॥ द्रष्टु साक्षात् स्वपतिमहिमोद्रे कमत्केन धात्रा वत्मवाते द्रुतमपहृते वत्सपालोत्करे च । तत्तद्र पो हरिरथ भवन् यत्र तत्तत् प्रसूना मोदं चक्रशनमपि भजे वत्सहारस्थली ताम् ॥६६॥ वाढ़ वत्सझवत्सपालहृतितो जातापराधाद्भये ब्रह्मा सास्त्रमपूर्वपद्यनिवहैर्यस्मिन्निपत्यावना। तुष्टावाद्भतवत्सपं ब्रजपतेः पुत्र' मुकुन्दं मनाक् स्मेरं भीरुचतुर्मुखाख्यमनिशं सेशं प्रदेशं नुमः ।। १७॥ 1 कारण से मानो हलधर ने कुपित होकर हलाप्र से यमुना का आक- पण किया है । यहाँ यमुना जी उलटी बहती हैं । अभी भी सकल लोक-भक्ति दृष्टि से उसे देखते हैं ॥ ४ ॥ यह सर्पस्थली मेरी रक्षा करें । जहाँ पापी अघासुर का उद्भट अग्नि की भाँति उत्कट विर्षों से दूपित उदर में प्राणप्रिय वयस्यों का प्रवेश देख कर अत्यन्त व्यम मुरारि ने क्रोधित हो स्वयं उस में प्रवेश किया तथा उस दुष्ट को मार कर निज गण की रक्षा की।शा उस वत्सहार स्थल का हम भजन करते हैं। जहाँ ब्रह्मा जी ने निज पति श्रीहरि की महिमा-उद्रेक को देखने के लिये उत्सुक होकर वरससमूह तथा वत्सपालक समूह का अपहरण किया था । पश्चात् श्रीहरि उन उन स्वरूपों का धारण कर उन उन माताओं को प्रान- न्दित देने लगे तथा उसी प्रकार भोजनादि किये थे|EET वह चतुर्मुस प्रदेश (चौमुहा ) को नमस्कार करते हैं । जहाँ ३२ श्रीब्रजविलासस्तवः गन्धव्याकुलभृङ्गसञ्चयचमूसंघृष्टपुष्पोत्करै- भ्रीजकल्पलतापलाशि-निकरैविभ्राजितानि स्फुटम् । यानि स्फारतड़ाग-पर्वतनदीवृन्देन राजन्त्यहो कृष्ण प्रेठवनानि तानि नितरां वन्दे मुहुर्दादश ।।२८॥ पूर्ण: प्रेमरसैः सदा मुररिपोर्दासः सखा च प्रियं स्वप्राणाय्दतोऽपि तत्पदयुगं हित्वेह मासान् दश । प्रीत्या यो निवसस्तदीयकथया गोष्ठं महुर्जीवय- त्यायातं किल पश्य कृष्णमिति तं मूर्नी वहाम्युद्धवम् ।। ६६ ॥ मुदा यत्र ब्रह्मा तृणनिकर-गुल्मादिपु पर सदा काड्झन् जन्मार्पितविविधकम्मोप्यनुदिनम् । - यार-बार वत्स-वत्सपालों का हरण के जात अपराव से भयभीत ब्रह्मा ने रोदन करते हुए पृथ्वी में पतित होकर अपूर्व पद्यों से अद्भुः त वत्सप,बजरानके पुत्र,ईपत् हास्ययुक्त मुकुन्द की स्तुति की थी॥१७॥ उन श्रीकृष्ण के प्रिय द्वादश वनों की निरन्तर वन्दना करते हैं । जो गन्ध से व्याकुल भृङ्गों से संसर्गित पुष्पों से परिव्यात कल्पलता और पलासादि वृक्षों से शोभायमान हैं नया जो विस्तार तडाग-पर्वत- नदीगण से विराजमान है ||६८॥ उन उद्धव जी को हम मस्तक में धारण करते हैं। जो सर्वदा प्रेम-रसों से परिपूर्ण हैं तथा जो श्रीकृष्ण के सेवक, सखा भी हैं। जिन्होंने निज अर्बुद प्राणों से भी परम प्रिय श्रीकृष्ण के चरण- युगल का त्याग कर दश मास पर्यन्त प्रज में नियास किया तथा श्रीकृष्ण की यात्ता से "श्रीकृष्ण पा रहे हैं उन का दर्शन करो" इत्यादि प्रयोधन के द्वारा गोप्ठ को जीवित रसा ॥ ६॥ जहाँ प्रदा जी ने आनन्दातिशय के कारण तृण गुल्मादिकों में जन्म सेन को रच्या फी। उस प्रज में जो प्रियजन समूह यास क.
१३ श्रीब्रजविलासस्तयः क्रमाचे तत्रैव ब्रजभूवि वसन्ति प्रियजना मया ते ते वन्याः परमविनयात् पुण्यखचिताः ॥ १०० ॥ पुरा प्रेमोद्रे कैः प्रतिपदनवानन्दमधुरैः कृत श्रीगान्धाच्युतचरणव-नवलात् । निकामं स्वामिन्याः प्रियतरसरस्तीरभुवने वसन्ति स्फीता ये त इह मम जीवातव इमे ॥ १०१ ।। यत्किञ्चित्त णगुल्मकीकटमुखं गोष्ठे समस्तं हि तत् सानन्दमयं मुकुन्ददयितं लीलानुकूलं परम् । शास्त्र रैव महुर्मुहुः स्फुटमिदं निङ्कितं याच्या ब्रह्मादेरपि सस्पृहेण तदिदं सर्व मया बन्यते ॥ १०२ ।। भ्रमन् कच्छे कच्छे क्षितिधरपतेर्वक्रिमगतै लपन राधे कृष्णेत्यनवरतमुन्मत्तवदहम् । पतन् क्यापि क्याप्युच्चलितनयनद्वन्द्वसलिलैः कदा केलिस्थानं सकलमपि सिञ्चामि विकलः ॥ १०३॥ . रते हैं मैं क्रम से परम नम्रता के द्वारा उन सब की वन्दना करता हूँ। ये सब परम वन्दनीय, महान् पुण्यशाली हैं ।। १००। श्रीगान्धर्वा-गिरिधारी के चरण-कमलों की श्रेष्ठ उपासना के यल से प्रतिपद में नयायमान आनन्द मधुर प्रेमोद्रेक के द्वारा पहले से जो सव स्वामिनी जी के परमप्रिय सरोवर ( श्रीराधाकुएंड ) के तट भूमी में निवास कर रहे हैं, वे सब मेरे जीवनाधार हैं ॥१०॥ गोष्ठ में तृण गुल्म-कीटादिक जो कुछ हैं, वे सय सानन्द स्वरूप, मुकुन्दप्रिय केवल लीलानुकूल विशिष्ट हैं । समस्त शास्त्र में चार-चार इस का निर्णय हो रहा है । जिन को वाञ्छा ब्रह्मादि देव- तानाने रहा के साथ की है । उन सब की मैं वन्दना करता हूँ||१०२ हाय ! कव में गोवर्धन पर्वत के तट ( तरहटी) में इधर-उधर ३४ श्रीनजविलासस्तवः न ब्रह्मा न च नारदो न हि हरोन प्रेमभक्तोत्तमाः सम्यग् ज्ञातुमिहाञ्जसार्हति तथा यस्योच्छलन्माधुरीम् । किन्त्वेको वलदेव एव परितः सार्द्ध स्वमात्रा स्फुर प्रेम्णाप्युद्धत एप वेत्ति नितरों किं स ब्रजो वरयंत ।। १०४।। अन्यत्र क्षणमात्रमच्युतपुरे प्रेमामृताम्भोनिधि- स्नातोऽप्यच्युतसज्जनैरपि समं नाहं वसामि क्वचित् । किन्त्वत्र ब्रजवासिनामपि समं येनापि केनाप्यलं संलापैर्मम निर्भरः प्रतिमुहुर्वासोऽस्तु नित्यं मम ।। १०५ ॥ रागेण रूपमञ्ज- रक्तीकृतमुरद्विपः । गुणाराधितराधायाः पादयुग्मं गतिर्मम ॥ १०६ ॥ make दौड़ता हुमा उन्मत्त की भॉत्ति "श्रीराधे कृष्ण" ऐसा पत्त्यरल क- हता हुआ कहीं मूर्छित होकर गिर जाऊँगा तथा कहीं वा उच्छलित नेत्र दोनों की धाराओं से विकल होकर केलिस्थान समूह का सिञ्चन करूँगा ।। १०३॥ जिस की उच्चलितमाधुरी को न ब्रह्मा न नारद न हर न उत्तम प्रेमीभक्त सम्यग प्रकार जानने में समर्थ होते हैं । परन्तु निज माता जी के साथ एक मात्र बलदेव जी सर्व प्रकार से जानते हैं । प्रेम से उद्धत इस जन के द्वारा वह व्रज क्या वर्णित हो सकताहै।।१०४ अन्यत्र कहीं अच्युतधाम मे अच्युत सजनों के साथ प्रेमामृत सागर मे निमजित होकर भी क्षण काल के लिये वास नहीं करूं. गा। परन्तु इस व्रज में ब्रजवासियो के साथ येन केन प्रकार से आ- लापादि करता हुआ नित्य प्रतिमुहुः वास करूँगा। अर्थात् ब्रज में मेरा वास क्षण भर के लिये विच्युति नहीं होवे ॥ १०५ ।। गुणों से श्राराधित श्रीराधिका के चरण-युगल मेरी गति हों।. जो रूपमञ्जरी के द्वारा अनुराग से रञ्जित है ॥ १०६ ।।
श्रीब्रजविलासस्तकः ३५ इमं नियतमादराद् अजविलासनाम स्तवं सदा ब्रजजनोल्लसन्मधुरमाधुरी-वन्धुरम् । महुक्तकासम्भृताः परिपठन्ति ये वल्ग तत् समं परिकरढे मिथुनमत्र पश्यन्ति ते ॥ १०७॥ * इति श्री श्री ब्रजविलासस्तवः ||समाप्तः॥ जो व्यक्ति कौतुहल से निरन्तर आदर के साथ इस "व्रजवि. लास नामक स्तव का जो कि ब्रजजनों की उल्लसित मधुर-माधुरी है उसका बार-बार पाठ करते हैं, वे मनोहर परिकरों के .साथ उन मिथुन युगल का दर्शन करेंगे । १०७ ॥ अनुवादक-कृष्णदास । अथ राधाविरहः ।। श्रीकृष्णविरहाविष्टा श्रीराधा प्रियवल्लभा। कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति महानन्दावदद्रहः ॥१॥ सुन्दरास्य कमलासितेक्षण कासि भासि मम वल्लभ प्रिय । दर्शनीयमुखचन्द्रशोभया शीतल कुरु महोणलोचनम् ॥ २॥ प्राणप्रियः कासि मत्प्राणनाथः कृत्तवणवणुरानन्दमूर्तिः । पीताम्वरः सुन्दराडाङ्गदीप्तिः श्रीसागरोऽलौक्यशोभाभरश्च ॥ ३॥ लसन्मौलिमालालिराजानुबाहुर्मदोन्मत्तगत्यद्भुतश्रीधश्च । चलन्नपुरै ममणत्कारयुक्तो जयज्जानुजंघोल्लसद्यौवनश्च ॥ ४ ॥ त्वदर्शनेनैव मे जीवन स्याद्वाक्यामृतेनैव कर्णातितृप्तिः । एवं वदन्ती चरन्ती च कृष्णे रतिविहलासील्लसन्ती वने सा॥५॥ प्राणनाथ मधुरानन माधव माधुरीधुर धराद्भुत माघव । श्यामसुन्दर मदोन्मद माधव पश्य मा मदनमोहन माधव ॥६॥ माधवस्य विरहव्यथातुरा माधवेति मुहुराह राधिका। तन्मनस्कमहमेव माधत्रो राधिकैकविरहातगेऽभवत् ।। ७॥