Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Hindi Bhasha Vikas Ke Ayaam
Front matter
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हिन्दी भाषा:
विकास के आयाम
लेखिका
डॉ (श्रीमती) आभा त्रिवेदी
एम ए (स्वरण पदव) पी एच डी
प्रकाशक
तुक लैण्ड पब्लिशर्स
लालजो साड का रास्ता, जयुपर-3
प्रकाशक
राजेश अग्रवाल
बुक लण्ड पग्लिशस
प्रथम सस्करण 1990
मूल्य 20/- मात्र
मुद्रक
राजेंद्र प्रिटस
एन वी एस कालेज के सामने,
शापिंग सेटर, तिलक नगर
जयपुर-4
अपने पूज्य श्वसुर
स्वर्गीय पण्डित रामनारायण त्रिवेदी एडवोकेट
की
पावन स्मृति मे
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दो शब्द बहुत समय से स्नातक कक्षाआ के लिए एक ऐसी पुस्तक की आवश्यकता अनुभव की जाती रही है जिसम "हिदी' के विकास क्रम को समझाते हुए उसको उपभाषाओं बालिया आदि का इस प्रकार वणन किया गया हो, जिससे उसका राष्ट्रीय स्वरूप स्पष्ट हो सके तथा राष्ट्रभाषा एवं राजमापा के रूप मे उसके विकास क्रम एव व्यवहार की स्थिति भी समझी जा सके । प्रस्तुत पुस्तक इसी अमाव की पूर्ति के लिए लिखी गई है। इसमे उन सब विषयो का समावेश किया गया है जिनसे हिदी तथा उसकी वोलियो के सम्बध को समझ कर उसरे व्यावहारिक स्वरूप की पहचान करने मे छात्रो को सहायता मिलेगी। फलत वे सरकारी गैर सरकारी नौकरियो के लिए आयाजित होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं में भी सफलता प्राप्त कर सकेंगे तथा विभिन्न पदो पर नियुक्त होने पर हिन्दी में सरकारी कामकाज भी सफलता पूर्वक चला सकेंगे। जाशा है, मापा-विज्ञान और माषा ज्ञान के अभ्यासी छात्रो के लिए यह पुस्तक पर्याप्त लाभदायक सिद्ध होगी। मामा त्रिवेदी
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विषय-सूची
क
प्रध्याय
पृष्ठ सख्या
हिदी व्युत्पत्ति और विकास
1-10
2
हिदी की बोलियां और शेलियां
11-31
3
मानक हिदी वतनी की समस्या एव शब्द प्रयोग
32-73
4
राष्ट्र भाषा और राज भाषा हिदी
74-114
5
व्यावहारिक हिदी
115-124
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प्रथम अध्याय हिन्दी व्युत्पत्ति और विकास भारतीय भाषाओ में हिंदी का प्रत्य त महत्वपूर्ण स्थान है । वैदिक भाषा मे प्रारम्भ होकर भारतीय भाषा धारा का जो विकास हुमा, उमी का नवीन स्वरूप हि दी है । इस अध्याय मे "हिदी" शब्द की व्युत्पत्ति, उसके विविध अथ और परिभाषाएँ अपभ्र श, अवहट्ठ, शौरसेनी, अधमागधी, पुरानी हिदी आदि पर विचार किया जाएगा। "हिंदी" शब्द को व्युत्पत्ति और विविध अर्थ "हिदी' शब्त "सिंधी" शब्द का बिगडा हुआ रूप है । अरब और ईरान के आक्रमणकारियो से जब भारत का सम्बघ हुमा पौर सवसे पहले सिधु प्रान्त मे अरबी फारसी बोलने वाले कुछ लोग पाकर बसे, तब उहोने “सि घ" को 'हिद' तथा यहां की भाषा को 'हिदी" नाम दिया । धीरे-धीरे - मस्त भारत के लिए हिंद या हिंदुस्तान तथा यहां के निवासियो के लिए "हिंदू" शब्द का प्रयोग चल पडा । जिस प्रकार कुछ देशो की मापा और निवासियो के लिए एक ही शब्द का प्रयोग होता है, जसे चीन की भाषा "चीनी" और निवासी मी "चीनी" कहलाते हैं उसी प्रकार हिद या हिन्दुस्तान की माषा को "हिदी" तथा निवासियो को भी "हिदी" कहा गया । . उदाहरणाय, प्रसिद्ध शायर इकबाल ने कहा है- "हि दी हैं हम, वतन है हि दोस्ता हमारा।"
2 यहाँ “हिन्दी" शब्द का प्रयोग भारतवासिया के लिए किया गया है। "हिदी" मापा के लिए "हिदी" शब्द के अलावा फारमी भापा मापियो ने "हि दुई" और "हिदवी" शब्दो का प्रयाग भी किया है । माषाविज्ञान के निणय के अनुसार फारसी मे 'स" का "ह" और "," का "द" हो जाता है । इसी नियम के अनुसार "सि धु' से 'हिदुहुना है । आरम्म में "सिधु' प्रश को हिदु" प्रदेश कहा गया और कालार में सम्पूण देश को ही हिदु हिद और हि दुस्तान कहने लग । अत उमी से बने "हिंदी' शबन को विदेशियो स भाषा का प्रथ मिला है । खुसरो ने भी "हिटी' शब्द को भारतवासी के प्रथ में प्रयुक्त किया था । उहोने लिखा है-- 'बादशाह ने हि दुनो को तो हाथो से कुचलवा डाला, किन्तु मुसलमान जो 'हिदी" थे, सुरक्षित रहे । इसी आधार पर "हिदी" शब्द का उहा मापा के लिए भी प्रयोग किया है । सन् 1424 ई० मे शरफुद्दीन ने तैमूरलग और उसके परिवार के विषय म जफरनामा लिम्बा है, जिसमे उल्लेख है कि राव हि दी' शब्द है । इसम भी सिद्ध है कि भारत की माषा के लिए 'हिंदी शब्द का प्रयाग हुअा है । वस्तुत सस्कृत भाषा से प्राकृत, पाली और अपभ्र श होती हुई जब भारतीय भाषा धारा ने पाठवी शती में प्रवेश किया तो बहुत ममय तक उस केवल "मापा' कहा जाता रहा। केशवदास हिदी वे एक ऐस कवि हुए है जिनके परिवार में सस्कृत ही बोली जाती थी, किन्तु उ होने हि दी म कविता की थी और वे भी उस समय हि दी का नाम स ही पुकारते हैं। कहते है- "माषा' बोलि 7 जानही जिसके कुल के दास । और क्वीर भी उनसे पूर्व 'हिटी' के लिए 'मापा" शब्द का ही प्रयाग कर रहे थे- सस्कृत खारी कूप जल भाषा बहता नीर। जायसी और तुलसीदास भो "हिंदी शब्द का प्रयाग न करके "मापा' पाद का ही प्रयोग कर रहे थे। यथा वे कहत हैं-" भापा निव धमति मजुल मातनोनि मोर जायसी "लिसि मापा चौपाई कहै ' कहकर हिदी के लिए 3 'मापा" शब्द का प्रयोग करते हैं । वस्तुत "हिदी" शब्द का भारतीय भाषा के लिए सव प्रथम प्रयोग विदेशी मुसलमाना ने ही किया था और वे उसे "हि दुई" तथा "हिंदवी भी कहते थे। हिदी का विकास क्रम "हिटी" नाम किसने दिया और कब दिया, यह प्रसग अधिक महत्त्वपूण नहीं है । जो बात अधिक महत्त्वपूर्ण है वह यह है कि 'हिंदी' उस मारतीय मापा का नाम है, जिसका विकास वैदिक काल से चली आती हुई भारतीय भाषा के विकाम कम मे हुआ है। प्रारम्भ मे जिसे वैदिक भाषा और फिर सस्कृत भापा कहा गया, उसी का लोक प्रचलित प्रवाह प्राकृत और फिर अपभ्र श बना । अपभ श के ही नये रूप को बाद में अवहटठ और फिर पुरानी हिदी" कहा गया तथा काला तर मे नया स्प धारण कर वही "भाषा' या हिन्दी कहलाई विमी भी मापा का विकास-नम उसके लिपित अर्थात् साहित्य में प्रयुक्त रूप से ही समझा जा मक्ता है, क्योकि लोक-प्रचलित रूप समय के साथ समाप्त हो जाते हैं । अत हिदो के विकास म को समझने के लिए अपभ्र श विशेपत शौरसनी अपभ श अधमागधी, अवहट पोर "पुरानी हिंदी' को समझ लेना बहुत आवश्यक है, क्योकि हि दी के मूल रूप वा सूनपात शौरसेनी अपभ्रश से ही हो गया था। अपभ्रश लगमग 500 ई० से 1000 ई० तक अपभ्रश भापा लोक जीवन और साहित्य में "यवहृत होती रही । इस अवधि मे प्राकृतो के अनुसार इसके भी अनेक भेद हो गए थे । सस्कृत भाषा मे रूद्रट न "का यालकार" मथ की रचना की है जिसकी टीका नमिसाधु ने लिखी है। उहोन अपभ्रश के तीन भेद माने हैं-उपनागर पामीर और ग्राम्य । एक अय विद्वान माकण्डेय ने पहले तो अपभ्र श के तीन भेद स्वीकार किए ह-नागर उपनागर और वाचड किन्तु बाद में उसकी 27 बोलियां बताई है, जो इस प्रकार है- नागर उपनागर वाचड लाट, वैदम ववर, मावन्त्य, मागध, पाचाल्य, टाक्क, मालव, काय गौड ओढ, वैधपाश्चात्य, पाण्डय कौन्तल महत, कानिंग, प्राच्य, कारणोटि, काच्य, द्राविड गोजर, भाभीर मध्यदेशीय और वैताल । वस्तुत ये बोलियां बोलचाल म ही प्रयुक्त हाती थी, इनम माहित्य रचना नहीं होती थी। इन बोलियो का क्षेत्रीय उच्चारण आदि से सम्बन्धित अतर था, वितु मूल विशेषातएं समान थी । घोरे धीरे इन बालियो का एक साहित्यिक रूप उमरा, जिस ही वास्तविक "अपभ्र श'भापा माना जाता है । प्राचाय हमचद्र ने 4 इही बोलियो को मूलभूत एकता को आधार बनाकर "हेमशब्दानुशासन" नामक व्यापारण मे "अपभ्रश' का स्वरूप निर्धारित किया है । - पाश्चात्य विद्वान डॉ याकोबी ने 'अपभ्रश" भाषा के चार भे-माने हैं- पूर्वी पश्चिमी दक्षिणी, उत्तरी । वस्तुत ये नए भेद विशेष महत्व नहीं रखते । क्षेत्रीय बोली-गत अतर होते हुए भी साहित्य में जिस परिनिष्ठित अपभश का प्रमाग हो रहा था, वही सही "अपभ्र श" है । मितु याधुनिक भारतीय भाषामा और विशेपत हिदी के विकास-बम को ध्यान म रखा जाए तो परिनिन्ठित अपभ्रश की बजाय क्षेत्रीय अपभ्र श बोलिया का अधिक महत्व है । अत विद्वानो ने उस समय लोक्प्रचलित अपभ्र शोम से उन सात को छोटकर अलग किया है, जिनसे आधुनिक भारतीय अपभ्र शाबा ज म हुआ ये हैं- शोरसेनी, पेशाची, प्राचड, खस, महाराष्ट्री, अधमागधी, और मागधी। अपभ्र श के उक्त प्रमुख म्पो के आधार पर उसकी पमुख विशेषताओं का यहाँ उल्लेख मावश्यक है- अपभ्रश मे म, प्रा इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, मो, तया प्रौ नामक 10 स्वर. ध्वनियाँ प्रयुक्त मिलती है। 2 इस मापा म उकारान्त शब्द अधिक मिलते हैं। यथा कारण प्रगु 1 3 इम भाषा में सस्त शा में प्रत्यस्वर इस्व हो गए हैं । यथा-हरीतकी माहीउई, गर्भिणी पा गाम्मिणि। 4 इम मापा मे प्रादि प्रक्षर पर प्राय स्वरापात रहता है। पनत सस्कृत शकेप्रादि महार मे स्वर या साप नही मिलता । यथा--माणिक्य का मारिया पोटव का पोरन । 5 मत जिन पनों माहित था, वे ममोगरण में कारण एक अजन पाले हो गए हैं तथा पूवस्ती स्पर दीप हो गया है । यमा-तम का तासु कमामामुप 6 इगम सराता"'महार' हो गया है। सपा-मामलद पापावलप धमतावम। . है 5 7 इसम सस्कृत क्ष" ध्वनि 'च्छ" हो गई है । यथा-पक्षी का पच्छी । इसी प्रकार "व" ध्वनि "ब" हो गई तथा मध्य वण से व्यजन गायब हो गया है । यथा-वचन का बनण । 'न तो रण हो ही गया है । 'य" ध्वनि "ज' बन गई है। 8 सस्कृत की 'ड"""'न" तथा 'र" ध्वनियो के स्थान पर "ल" हो गया है । यथा-प्रदीप का पलि त । संस्कृत "श" तथा "प" ध्वनियां गायब हो गई हैं और उनके स्थान पर 'स" ध्वनि प्रा गई है। 9 अपभ्र श मापा मे संस्कृत के नाम तथा धातु प भी कम हो गए हैं, जिससे बहुत सरलता प्रा गई है । नपु सक लिंग नही रहा तथा 24 बारको के स्थान पर 6 कारक ही रह गए हैं । द्विवचन मी नहीं रहा । 10 सस्कृत की योगात्मक विशेषता छोडकर अपभ्र श वियोगात्मक हो गई है । पलत विभक्तियां अलग लगन लगी है । 11 स्त्रीलिंग तथा पुल्लिग की पहचान भी सरल हो गई है । प्राय स्त्रीलिंग के लिए शब्द के अत म इ' तथा पुल्लिग शब्द वे अन्त मे "आ' लगने लगा है। 12 तत्सम शब्द बहुत कम रह गए है तथा तद्भव शब्द का प्रयोग अधिक होने लगा है । देशज विदेशी शब्दो के प्रयोग की प्रवृत्ति बढी है। उपयुक्त कतिपय विशेषताओं के आधार पर ही आरम मे संस्कृत के विद्वानो ने 'अपभ्रश शब्द का प्रयोग किया था जिसका अथ है भष्ट (मापाएँ या बोलियां)। यह भ्रष्टता क्या है? मस्कृत के अनुशासन का त्याग, जिसका सभी अपभ्र श बोलियो मे बाहुल्य मिलता है । विश्वकोश मे अपभ्र श उन भाषाओं का नाम माना गया है जो प्राकृत के पश्चात् लगभग छठी शताब्दी से बारहवी शती तक उत्तरी भारत मे साहित्य तथा बोलचाल में प्रयुक्त होती थी। सस्कृत ग्रन्थो मे भी अपभ्रष्ट तथा अपभ्र श शब्दो का प्रयोग समान अथ मे हुआ है। यह मी उल्लेख मिलता है कि प्रारम्भ मे "अपभ श" शब्द का प्रयोग केवल "पामीर" जाति की बोलचाल की भाषा के लिए किया जाता था। धीरे-धीरे यह शब्द शिष्ट भाषा के लिए प्रयुक्त होने लगा । लगभग सम्पूण उत्तरी भारत इस भाषा का क्षेत्र था। उत्तरी भारत की आधुनिक भाषानो का विकास अपभ्र श के ही क्षेत्रीय रूपों से हुमा माना जाता है ।
6 शौरसेनी अपन श- अपभ्र श भाषा के विकास से पूर्व प्राकृत के क्षेत्रानुमार पांच प्रमुख भेद हो चके थे । इनके नाम है- 1- शौरमेनी प्राकृत 2- मागधी प्राकृत 3- अध मागधी प्राकृत 4- महाराष्ट्री प्राकत 5- पैशाची प्राकत इन भेदो के अनुसार ही अपभ्र शा का विकास मानने वाले विद्वानो ने अपभ्र श के भी उक्त पांच भेद किए हैं। यद्यपि इन भेदो का पहले बताए हुए भेदो मे समाहार है, तथापि यहाँ इनमें से शौरसेनी अपभ्र श पर विशेष रूप से विचार करना आवश्यक है, क्योकि इसी अाधुनिक भारत की राष्ट्रमापा "हिदी" का विकास हुआ है। शोरसनी प्राकृत का क्षेत्र शूरसेन या मथरा माना जाता है । इसी प्राकृत से शौरसेनी अपभ्रश का विकास ईसा को छठी शताब्दी के लगभग हुआ । मथुरा इस भापा का केद्र था कि तु गुजरात तक इसका प्रसार हो चला था जहाँ नागर अपभ्र श स्थानीय बोली थी। प्रावृत और पाली का प्रचार प्रसार हो जाने पर भी मध्य देश मे सस्कृत भाषा जमी हुई थी। अत उसका शौरसेनी अपभ्रश पर भी बहुत प्रभाव पड़ा। सस्कृन नाटको मे शौरसेनी प्राकृत मे स्त्री पात्रो के मम्वादा को बहुलता के कारण आगे चलकर शौरसेनी अपभ्र श मी साहित्य म विशेष समादर पाती गई। विद्वानो यो मा यता है कि गुजराती और पश्चिमी हिदी का विकास शौरमेनी अपभ्र श से ही हुआ है। हिदी का मध्यकाल तक का अधिकाश साहित्य इसी अपभ्र श से विकसित हिदी मे मिलता है । इस मापा से हि दो को प्रज, सडी बोली, बागरू वुदेलखण्डो कनोगी और निमाडी बोलियो का विवाहमा । इनम से ब्रजमापा रीतिकाल तक हिन्दी का प्रधान रूप बन पर साहित्य की मशक्न अभिव्यक्ति का माध्यम रही । सूरदास, मीरा, विहारी, देय मतिराम भादि श्रेष्ठ हिती कवियो की रचनाएँ इसो योती म मिलती हैं । प्रथमागधी प्रपश- इस पापा का पूर्व स्प या विकास-योत प्रधमागधी प्राकृत मे मिलता है। शूरमेन प्रदन ये पूर्वी माग एवं मगध के पश्चिम म मधमागधी प्राकृत प्रचलित 7 थी। माधुनिक लेखक बनारस क्षेत्र के आसपास यह बोली समझी जाती थी । इसीलिए इमे पुरानी कौशली भी कहा जाता है। महावीर स्वामी एव महात्मा गौतम बुद्ध की यह मातृ भाषा थी। इसी प्राकृत से अधमागधी अपभ्र श का विकास हुप्रा । पूर्वी हि दी प्रथात् अवधी बघली और छत्तीसगढ़ी योलियो की जननी प्रघमागधी अपभ्रश ही मानी जाती है । डॉ धीरेद्र वर्मा ने भाजपुरी को भी अधमागधी अपभ्रश की ही एक बाली माना है । अवधी अधमागधी अपभ्र श से विमित स स अधिक समद्ध बोली है, जिसम तुलसीदास और मलिक मुहम्मद जायसी जसे महान् कविया ने काव्य रचना की है। प्रवहठ- "अवठ' अपभ्र श का ही पुराना नाम है कि तु कालान्तर मे यह एक पथक मापा रूप बन गया, जिसे हिंदी का ही प्रारम्भिक रूप माना जाता है । इस नाम का सव प्रथम प्रयोग अब्दुरहमान कवि ने अपनी- सदेश-रासक" वाव्य मे किया है। प्राकत गलम के टीकाकार लक्ष्मीधर ने भी अवहटठ को एक अपभ्र श भाषा ही माना है । ज्योतिरीश्वर ठाकुर ने 'वरण रत्नाकार" प्रथ की रचना की थी। इस न थ मे जो मापा प्रयुक्त मिलती है उम अपभ्रश का "अपहट्ठ" नामक रूप माना जाता है । वस्तुत यह मशान्ति काल की वह भाषा है, जिसके पीछे अपभ्र श जा रही थी और मागे पुरानी हिनी पा रही थी। हिदी के महाकवि मैथिल-कोक्लि विद्यापति की "कीर्तिलता' नामक कति इसी भाषा मे मिलती है । इन पयो के अध्ययन से पता चलता है कि अवहट्ठ एक स्वतत्र मापा थी, जिसका विवास अपभ्र श से अवश्य हुआ था कि तु उसकी प्रकति अपभ्र श से बहुत कुछ मिन हो चुकी थी। पुरानी हिदी- अपन श के विकास-काल में बोलचाल की भापा एक नया मोड ले रही थी। सिद्धो और नाथों के सम्प्रदाय सम्बधी विचारो के प्रचार के लिए एक ऐसी भापा की आवश्यकता थी, जो देश के अधिकाश भाग मे समझी जा सके । यद्यपि अपभ्र श ने साहित्य-रचना का माध्यम बनकर एक ऐसा रूप भी ग्रहण कर लिया था, जिसम क्षेत्रीय बोलियो का भेद भाव मूल कर साहित्य रचना हो सकती थी, वितु वह साहित्यिक रूप पूर्व से पश्चिम तक तथा सुदूर उत्तर से दक्षिण तक सामा य जन की पहुँच के बाहर होता जा रहा था । दक्षिण भारत म सस्कृत अब मी समझी जा सकती थी उत्तर मे मी अन क्षेत्रा में सम्वृत की तत्सम शब्दा- वली सामाय व्यवहार म समझने याग्य थी, कि तु अपन श के तदभव एव देशज 8 रूपो का प्रयोग सवसामा य के लिए सवत्र बाघ-गम्य नही रह गया था । ऐमी स्थिति मे डॉ राम गोपाल शर्मा "दिनश' के मतानुमार एक ऐसी भाषा की आवश्यकता सिद्धो और नाथपथी साधुग्रो ने अनुभव की, जो सस्कृत की तत्सम शब्दावली से अधिक दूर न जाए । अत अपभ्र श को विकास का एक नया मोड मिला और उसके फलस्वरूप शौरसेनी अपभ्रश ने जो नया रूप धारण किया, उसी को 'पुरानी हि दी' कहते हैं। इस भाषा का प्रारम्भिक प्रयोग सिद्धो की वाणियो मे मिलता है । प्राचाय रामचद्र शुक्ल ने ता अपभ्र श को प्राकृतामास हिदी कह कर उसी को "पुरानी हिनी' बताया है । यथा वे कहते हैं अपभ्र श या प्राकृतामास हि दी के पद्या का सबसे पुराना पता तात्रिक और योगमार्गी बौद्धो की साम्प्रदायिक रचनामो के भीतर विक्रम की सातवी शताब्दी के प्रतिम चरण से लगता है । मुज और भाज के समय (सवत 1050 के लगभग) मे तो एसी अपभ्र श या पुरानो हि दी का पूरा प्रचार शुद्ध साहित्य या काव्य रचनायो मे भी पाया जाता है।" वस्तुत यह एक विवाद का विषय है कि अपभ्र श को पुरानो हिदी कहा जाए या उससे विकसित उत्तरवर्ती स्वरूप का पुरानी हिंदी कहा जाए । इस विषय पर बहुत समय पूव ही पर्याप्त विवाद हो चुका है। शुक्ल जी ने एक स्पष्टीकरण मोर दिया है । वे कहते हैं कि 'असदिग्ध सामग्री जो पुछ प्राप्त है, उसकी भाषा अपभ श अर्थात प्राकृनामाम (प्राकृत की ढिया से बहुत कुछ बद्ध) हदी है। इस अपभ्रश या प्राकृतामास हि का अभिप्राय यह है कि यह उस समय की ठोक बोल चाल की भाषा ही है जिस समय की इसकी रचनाएं मिलती हैं । यह उस समय के ववियों की भाषा है।' इसस मागे शुक्ल जी ने विद्यापति का उदाहरण देकर पुरानी मपन श मापा का मोर दोलचाल की देशी भाषा का मन्तर भी स्पष्ट किया है देमिल पाना सब जन मिटठा। ते तसन अपमो अवहटठा । अर्थात् देशी भाषा (बोलचाल की मापा) राय को मोटी लगती है। इसम भी हो अपभ्रश (देगी भाषा मिला हुमा स्प) में कहा है।'
9 शुक्ल जी के इस स्पष्टीकरण से यह सिद्ध है कि वे जिस अपभ्रश को वात कर रहे हैं, वह अवहट्ट है, जो पुरानी हिदी और अपभ्रश के बीच की कडी है। शुक्ल जी ने अपने इतिहास म पागे चलकर पृष्ठ 19 पर फिर लिखा है कि "सिद्धो को उद्धृत रचनामो की भाषा देश माषा, मिश्रित प्रपध्रपा अर्थात् "पुरानी हिन्दी" की काव्य-मापा है, यह तो स्पष्ट है । उहोने भरसक उसी भाव्य भाषा मे लिखा है, जो उस समय गुजरात, राजपूताने, और ब्रजमण्डल से लेकर बिहार तक लिखने पढने की शिष्ट भाषा थी।' इस प्रकार शुक्ल जी ने पुरानी हिदी को देशमापा~-मिथित अपभ्र श बतलाया है । अत मे उहोने यह स्वीकार किया है कि पुरानी हिंदी में धीरे- धीरे सस्क्त तत्सम शब रखने की प्रवत्ति बढती गई। वे कहते हैं- "ज्यो ज्यो काय मापा देश की ओर अधिक प्रवृत्त होती गई, त्यो त्यो सस्कृत तत्सम शब्द रखन मे सकोच भी घटता गया।" जैसा कि पहले कहा जा चुका है, अपभ्रश से अवहट्ट और फिर पुरानी हिदी का जब विकास हुआ तो उसमे सस्क्त के तत्सम शब्दो के तद्भव रूप रखने के स्थान पर तत्सम रूप रखने की प्रवति ही बढी। डा नगेन्द्र द्वारा सम्पादित 'हिदी साहित्य का इतिहास" ग्रथ मे आदिकाल का इतिहास प्रस्तुत करते हुए प्रसिद्ध विद्वान डॉ रामगोपाल शर्मा 'दिनेश' ने इसी तथ्य को सप्रमाण सिद्ध किया है कि अपभ्रश और अवहट्ट के पश्चात् पुरानी हिदी का जो विकास हुना, उसम सस्कत शब्दो के तद्भव रूप त्याग कर तत्सम शब्दों के प्रयोग की प्रवत्ति विकसित हुई । इसी प्रवत्ति ने हिन्दी के भावी स्वरूप का निर्धारित किया, जिसके प्रमाण हमें प्रजमाषा, अवधी और खडी बोली मे रचित समस्त हिंदी साहित्य मे मिलते हैं । हिदी का विकास मोर क्षेत्र वैदिक सस्कृत से सस्कृत फिर प्राकृत, पाली प्रपन श, प्रवहठ और पुरानी हि दी तक मारतोय मापा धारा का जो विकास हुआ, उसमे वैदिक काल से चली मान वाली और भारतीय जीवन पद्धति तथा सस्कति को अभिव्यक्ति देने वाली शब्दावली भौगोलिक परिस्थितियो और ऐतिहासिक परिवतनो वे कारण विभिन्न रूप धारण करती रही । रूपातर के साथ-साथ कही म कही अधिक भय परिवतन भी हुए, पर विकाम-श्रम न रुका। जन-मस्या में वृद्धि के 10 साथ-माथ स्थानीय प्रयोगो व शब्दो तथा बाहर से पाने वाली जातियो की भाषाम्रो के प्रभावो से शब्द भण्डार एव अर्थों में भी वृद्धि हुई । इस प्रक र पुरानी हिदी उत्तर भारत के अधिकाश क्षेत्र म फ्लती फलती एक नए रूप मे उस समय तक पा चुकी थी, जब यहाँ इस्लाम शासन स्थापित हुआ । इस समय तक इसकी कई बोलियां और राजस्थानो तथा विहारी उपभापाएं समृद्ध होने लगी थी। राजस्थान में डिंगल ब्रजक्षेत्र म अजमापा, अवध मे अवघी तथा बिहार में मैथिली वोनियां साहित्य रचना के लिए हिदी का समृद्ध प धारण कर चुकी थी। दिल्ली तथा मेरठ के अासपास की खड़ी बोली भी यदा कदा अपना प्रभाव दिखा जाती थी । मध्यकाल तक इन सब बालियो मे लिखे जाने वाले साहित्य की विशेष शैलियाँ बन चुकी थी जिनका प्रयोग साहित्य रचना के लिए अपने- अपने क्षेत्र मे हो रहा था। उत्तर भारत की साहित्यिक भाषा के रूप मे पूर्वोक्त कई शैलिया मे विकसित हिदी दक्षिण भारत मे व्रजमापा के रूप में लोक प्रिय हो रही थी। गुजरात महाराष्ट्र से तमिल प्रदेश तक उम काल की ब्रजभाषा-रचनाएँ मिलती है। नई खोजो ने यह सिद्ध कर दिया है कि मध्यकाल मे इस्लाम शासन होत हुए भी सम्पूर्ण भारत मे साहित्य रचना एव सास्कृतिक आदान प्रदान के लिए अजमापा हि दी ही राष्ट्रभाषा का काम कर रही थी । डा अम्बाशकर नागर ने गुजरात मे अनेक ऐम ग्रन्थ खाजे हैं जो उपयुक्त तथ्य को प्रमाणित करते हैं। इस प्रकार दक्षिण तक अपना राष्ट्रीय स्वरूप बनाने वाली हिन्दी का मुख्य क्षेत्र उत्तर मे वतमान हिमाचल प्रदेश से मयप्रदेश के रायगढ नगर तक तथा पूर्व में बिहार से पश्चिम मे सम्पूण राजस्थान तक था और भाधुनिक काल म इसी क्षेत्र म उसका राष्ट्रीय स्वरूप समृद्ध एव सम्पन हुआ है। पहाडी बालियाँ भी इसी के अतगत विकसित हुई हैं तथा विहारी बोलियो-मगही मैथिली और भोजपुरी का समस्त साहित्य मी हिदी का ही साहित्य है । राजस्थान मे हि दी साहित्य के मानिकाल मे डिंगल शली में हिंदी विकसित हुई, मध्यकाल म वहाँ की बोलियो ने ब्रजभाषा को अपने अपने क्षेत्र सौप दिए थे और उनसे मिलकर एक नयी हिदी शैली पिंगल विकसित हो रही थी। मारवाडी मेवाडी टूढाढी, हाडौती मेवाती आदि राजस्थानी बालियो का विकास आज भी हिंदी की शाखा प्रशाखाग्रो के रूप में ही हो रहा है। आज खडी वोली हिदी को साहित्य मे प्रमुखता अवश्य प्राप्त है कि तु अय पूर्वोक्त सभी बालिया को समृद्धि मो सडी बोती की तुलना में कम महत्त्व नहीं रसती । ब्रज भाषा का साहित्य तो आज भी खड़ी बोनी के साहित्य से अधिक गरिमाशाली माना जाता है यद्यपि माजक्ल उसमे साहित्य रचना नाम मात्र को ही होती है।
द्वितीय अध्याय
हिन्दी की बोलियाँ और शैलियाँ
--
हिदी भाषा को उसकी उपभाषामो के अतिरिक्त दो अय भेदो मे भी
विमाजित किया गया है । ये भेद हैं-~(1) पूर्वी हिरी
(2) पश्चिमी हिदी
1-पूर्वो हिन्दी को बोलियापूर्वी हिदी के मतगत निम्नाकित तीन
बोलियों आती हैं-
(क) अवधी
(स) बघली
(ग) छत्तीसगढी
यहाँ इन बोलियो का सक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है-
(1) अवधी-यह अवध क्षेत्र की बोली
सीतापुर, खोरी फैजाबाद, बहराइच गोडा, प्रतापगढ सुल्तानपुर एव बारावकी
जिलो मे पह भाषा बोली जाती है । इलाहाबाद, कानपुर, फतहपुर जौनपुर तथा
मिर्जापुर जिलो पे झुछ भाग भी इस बोली के क्षेत्र मे पहने है। बिहार मे
रहने वाले मुसलमानों को भी यही बाली है। इस बोली में पर्याप्त माहित्य
लिखा गया है । गोस्वामी तुलसीदास ने "रामचरितमानस" लिख कर इस वाली
को मापा के पद तक पहुंचा दिया था। जापसी का "पद्मावत", गौरीनाथ शर्मा
पा "शिवपुराण" तपासारिका प्रसाद मिश्र के "कृष्णायन" इस मापा के प्रसिद्ध
तपा उच्च कोटि के महाकाव्य । इस बोली की पतिपय विशेषताएं इस
प्रकार है-
। लखनऊ
भाव, रायबरेली
12 1- कर्ता कारक एक वचन की व्यजनात्मक सज्ञाओ म प्रवधी मे "' का योग हो जाता है । यथा- घर-घर तनम्न - तनु वन-बनु मन-मनु 2- अवघी मे सवनामो के अन्त का "आ" हस्व रूप धारण कर लेता' तथा प्रथम वरण मे ओ' का योग हो जाता है यथा-- मेरा= मोर तेरा तोर 3- अवधी मे सज्ञापो के हस्व, दीघ तथा दीपतर-तीन रूप मिलते हैं यथा- हृस्व घोड दोघ-घोडवा दीघतर-घोडीना 4- अब्धी के कारको मे निम्नाकित रूप बनते हैं- कर्ता-वे, वने या वन लगता है। (घोडवे) (घोडवने), (घोडवन्) करण- "अन् ' का प्रयोग होता है कम सम्प्रदान-का, का, आदि चिह लगते हैं । करण, अपादान-सेनी, सेन, से, लगते हैं। सम्बध-कर, के, केर का प्रयोग होता है। अधिकरण-इसके चिह मे म, पर है। 5-- अवधी सवनाम इस प्रकार चलते हैं- मैं-मो, मोर तू-तौ, तो, तोर, तुमरे तोहार हम हमरे, हम, हमार वह =वं, मोहि, ओकर, मानकर, उनकर 6- अवधो मे सहायक क्रियाओं के रूप मी भिन्न प्रकार के मिलते हैं। यथा-
13
रहेउ, रहेस्, रहे
है-अही, न्-है
7-अवधी मे क्रिया का वतमान कृदन्त रूप प्राय लघु अत हाता है
यथा-
जाता-जात
रहतारहत
सहता-सहत
मरता मरत
8-अवधी मे बहुवचन का कारक-चिह ग्रहण करने वाला रूप नही
मिलता है । यथा-
(1) घोवन को
(2) छोडन को
(3) छोरन को
9- अवधी मे "इकार" की प्रधानता रहती है। प्राय भविष्य-काल की
क्रिया का तिड्त रूप ही बनता है । यथा--
रहिहइ, जइहा, मरिहइ ।
10-अवधी के पदो मे "ऐ" का "अई' तथा भो" का "पउ" हो जाता
है। यथा-
ऐसा-मइमा
कोवा-कउवा
11- अवधी मे लिंग-सम्बधी एक विशेषता भी पाई जाती है। हिंदी
मे क्रिया का लिंग अन्तिम सज्ञा के अनुसार बदलता है, कि तु अवघी मे प्रथम
सना अनुसार बदलता है । यथा--
"मरम पचन सीता जब बोला।"
प्रवधी एक बहुत बड़े क्षेत्र की भाषा है । इसके तीन रूप पाए जाते हैं-
(1) पूर्वी अवधी
14 (2) पश्चिमी अवधी (3) बैसवाडी अवधी ये तीनो रूप परम्पर बहुत सूक्ष्म विशेषताओं के प्राधार पर मिग्न हैं। (ख) वपेली यह बोली वघेलखण्ड क्षत्र मे बोली जाती है। यह क्षेत्र अवध क दक्षिण में पड़ता है। रीवा इसका केद्र है। मध्य क्षेत्र के जबलपुर, दमोह माडला, बालाघाट आदि जिले इस क्षेत्र में सम्मिलित है । फतहपुर, बादा हमीरपुर मिर्जापुर तथा छोटा नागपुर वे कुछ क्षेत्र भी इम बाली की सीमा में पड़ते हैं । अवधी, भोजपुरी, वुदेली, तथा मराठी इस बोली की सीमाओं पर बोली जाती हैं। इन सब बालिया के शब्दो का क्षेत्री मे मिश्रण हो गया है। अवघी का बघेली पर बहुत प्रभाव पड़ा है । इमलिए कुछ विद्वान् तो उसे अवधी का ही एक स्प मानते हैं । डॉ श्यामसुदरदास ने लिखा है- "अवधी के प्रतगत तीन मुख्य वोनिया हैं-~अवधी, बघेली और छत्तीस गढी । अवधी और बधेली में बाई अतर नहीं है । बघेलखण्ड मे बोले जाने के धारण वहाँ अवधी का नाम बघेली पड गया। अधेली बोनी मे माहित्य का अभाव है । उसके क्षेत्र में अवधी ही साहित्यिक भाषा रही। लोग-साहित्य अवश्य उमकी स्प रक्षा में सहायक हुपा है। बोली की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार है---- . 1- ग्वडी बाली हिदी के शब्द वघेली मे पहुंचकर पर्याप्त रूप में बदल जाते हैं । सजाओ मे प्राय दो व्यजनो के मध्य का "वा" तथा दोष स्वरात शब्द का कारक मे हृस्वात हो जात हैं। यथा-- घोडावाड 2-बधेली के सवनाम इस प्रकार हाते हैं.... मै-मय हम-तुम्ह वहारवाह 1- अवधी भौर उसका साहित्य, डा त्रिलोकीनारायण दीक्षित, पृष्ठ 11 से ६ 15 वे-ओ कौन उन् 3- बघेली मे सहायर क्रियानो के रूप मे भी कुछ अतर मिलता है। यथा- -श्रा, है-पा ऊगा= ऊ • रहेन 4-क्रियाओ मे भविष्यकाल मूचक "गा' प्राय हट जाता है तथा एउ से काम जाता है। यथा- देखू गा% देखब्येउ 5- क्रिया मे भूतकाल में "मा' के स्थान पर 'एह" आ जाता है। यथा- =देखेह पढा -पढेह (ग) छत्तीसगढी-समस्त रायपुर, विलासपुर तथा सम्मलपुर का पश्चिमी भाग इस बोली के मूल के द्र हैं । काकेर, नदगाव, खैरागढ, चुइखदान, कवर्धा एव चादा जिले के उत्तर पूर्व मे तथा बालाघाट के पूर्व मे इसी बोली का क्षेत्र है । रायगढ, सारगगढ, सरगुजा, उदयपुर (मप्र) तथा जशपुर के कुछ क्षेत्र भी इसी मे सम्मिलित है । इस बोली मे भी साहित्य नहीं मिलता। जगली जातियो की बोलियो का भी इस पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। इस बोली की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं- 1- सज्ञामो मे बहुवचन बनाने के लिए "मन' अश जोडा जाता है देखा यथा- मनुष्योः मनुखमन पुत्र-पुतोमन 2- सनामा को अकारात कर देने की प्रवृत्ति भी मिलती है । यया- बैल बइला छल-छहला 16 3- बहुवचन बनाने के लिए 'मन" जोड देते हैं । यथा- बैल-बइलन 4- कारको मे निम्नाक्ति चिहा का प्रयोग किया जाता है- कम-सम्प्रदानम्बर, ला, का करण-अपादान=से, ले अधिकरणमा 5- "मन" प्रत्यय भी करण कारक को व्यक्त करते हैं । यथा- मूख भूखन 6- माकारान्त विशेषण के स्प स्त्रीलिंग में ईवारात हो जाते हैं। यथा- छोटवा- छोटकी 7- निश्चय ये भय म सना के साथ "हर" जोड दिया जाता है। यथा- गर-हर छत्तीसगढ़ी का प भी समस्त क्षेत्र में एक-सा नहीं है। विभिन्न जातियों की बोलियो के रूप मे इसका विकास हुमा है तथा माय मौर अनाय दोनों प्रकार की पड़ौसी मापामओ ने इसे प्रभावित किया है। 2 पश्चिमी दिदी बोलिया-पश्चिमी हिदी मे मतगत निम्नापित पांच बोलियां सम्मिलित है- (२) सही बोली (रा) यांग (ग) पजमापा (4) रोजी (1) बुदेसी यहाँ इन बोमियोंग गलिप्त परिचय प्रस्तुत है (1) गरी गोमो-दिस्मी (गहर), रामपुर, मुराबा", चिनार मेरठ, मुगानगर गारनपुर तथा देहरादून रे त्रोंम पर मोमो जाती है। पगार मामा रिमे दो मोगा और म माना जाता है। गोयामीमा पहा पायो मापा तपाहिजे कीरावापानी र उपमापामों में जा - N 17 हुआ है । प्रत इन तीनो के विभिन्न प्रभाव इस बोली पर पडे हैं । बागरू नाम की बोली मी इसके क्षेत्र के बीच-बीच में करनाल और दिल्ली के देहात मे बाली जाती है । उससे भी इसकी प्रवृत्तियां प्रभावित हुई हैं। सक्षेप में इसकी निजी विशेषताएं इस प्रकार है- 1- खडी बोली मे क्रिया के रूप हिदी की अय बोलियो के समान तद्भव होकर मोकारात या प्रोकारान्त नही होते । विशेषण तथा सनाएं भी ओका- रान्त या प्रौकारात नहीं होती । प्राय एकवचन मे क्रिया (भूत काल मे), सज्ञा एक विशेषण प्रादि आकारात रहते हैं । यथा- " " घोडो' या घोडी के स्थान पर घोडा भलो या भलो के भला मारयो या मारी के मारा दौड यो या दौडी के दौडा गयौ या गपी के गया 2 माहित्यिक हिदी मे जहाँ "ऐ' और "औ" ध्वनियो का प्रयोग होता है, वहां खडी बोनी मे "ए' भोर “मो" हो जाते हैं । यथा- खैरखेर पैर-पेर पोर-मोर कौल '-कोल 3-खडीबोली (ग्रामीण) मे मूध य घ्यजनो के प्रयोग की अधिकता पाई जाती है। व्यजनो के द्वित्व की प्रवृत्ति भी मिलती है, पर उच्चारण मे ही यद प्रवृत्ति देखी जाती है, लिखने मे उच्चारण के अनुसार ध्वनियों का भवन नहीं करते । यथा- पातापात्ता - वेट्टा रोटी रोटटी छोटा-छोटा 4- "पो', "ओ" के लिये 'ऊ" कर देने की प्रवृत्ति भी मिलती है- मदा काम्मरदू मा राम का राम कू बेटा 18 5- सवनामो मे भी साहित्यिक हिदी से सडी बोली कुछ भिन्न है । यथा-- तून तेने यहळया किससे-विम यह पोली तुमने-तम ने हमाराम म्हारा (ख) बागरू- करनाल, रोहतक तथा दिल्ली (जिला) प्रयोग की जाती है। दक्षिणी पूर्वी पटियाला नामा, झीद तथा पूर्वी हिसार के क्षेत्र भी सी बोली की सीमा मे सम्मिलित हैं। इसी वोली को हरियाणा प्रदेश में हरियाणी या देसडी कहते हैं तथा रोहतक ने प्राम-पास जाटू नाम से अभिहित करते हैं। यह लगभग 23 लाख लोगो को मापा है । खडी चोली, राजस्थानी और पजाबी स यह बोली बहुत प्रभावित है। वेत- विशेषताएं-(1) इस बोली मे खडी बोली के समान ही सज्ञा के रूप मिलत हैं, पर तु बहुवचन मे कुछ रूप बदल जाते है । यथा- घोडघोडा दिन-दिना नाम-नामा खेता (11) खडी बोली के समान उच्चारण की एकरूपता का सयम इममे अधिक नहीं है । प्राय प्रथम हस्व स्वर को ओकारात या एकारा त कर देने की प्रवृत्ति पाई जाती है । यथा- बहुत-बोहत रहा=रेह्या (ut) द्वित्व की प्रवृत्ति भी मिलती है और उसके साथ प्रथम अक्षर को दीघ से हस्व बना देने को इसकी अपनी मौलिक विशेषता है । यथा- तितर-तित्तर थूकायुक्का (iv) कारक चिहो के प्रयोग में अनिश्चितता पाई जाती है तथा प्राय' "को" के स्थान पर 'ने" का प्रयोग किया जाता है । यथा-घर को घर नै ।
19 (v) क्रिया पदो मे "या" स्वर के स्थान पर "इय" जोडने की प्रवृत्ति भी मिलती है । यथा- हाराहार्या दुलारा-दुलार्या (vi) सवनामो मे भी प्रयोगवैचित्र्य मिलता है । यथा- तू-थू तू, तो तुम =थम, तम्ह तूने त ने, तन्न मेरानम्हारा तेरा 'थारा यह-यू योह वह ओह (ग) अजमापा-खडी बोली के समान ग्रजमापा के भी दो रूप मिलते हैं। साहित्यिक रूम का विस्तार बहुत बडे क्षेत्र मे है, कि तु ग्रामीण व्रजभाषा उसकी अपेक्षा सीमित क्षेत्र मे बोली जाती है। देहातो मे इसको व्रजभाषा यहा जाता है । डॉ उदयनारायण तिवारी ने इसको "अतर्वेदी' कहा है। मथुरा जिला इस बोली का केन्द्र है । कहा जाता है कि उसके चारो ओर 84 कोस के घेरे मे अज मण्डल पड़ता है, उसी घेरे की यह भापा है। प्रागरा, एटा, मैनपुरी, फरु - खाबाद, भरतपुर का दक्षिणी पूर्वी अधिकाश भाग, धोलपुर, करौली ग्वालियर का पश्चिमी भाग, गुडगाव का पश्चिमी माग गुडगाव का पूर्वी भाग, बुलदशहर, बदायू अलीगढ, बरेली तथा नैनीताल की तराई-ये क्षेत्र ब्रजमापा की सीमा मे पाते हैं । इस बोली के बोलने वालो की सस्या 80 लाख स अधिक है। इस बोली के क्षेत्रा के अनुसार कई रूप हो गए हैं, पर उन रूपो में अधिक मन्तर नही है । हा प्रियसन के मतानुसार यह बोली निम्नाक्ति 8 रूपो मे विभाजित हो गई है- 1- मथुरा-अलीगढ-पश्चिमी मागरा की ब्रजभाषा 2-- बुलदशहर की ब्रजभाषा 3-मादश प्रजमापा 4-मनौजी प्रभावित ब्रजमापा 1- देसिए, हिदी भाषा का उद्गम और विकास, पृष्ठ 318 20 5- मदौरी या भदावरी ब्रजभाषा 6- जयपुरी प्रमावित ब्रजमापा 1- मेवाता-प्रभावित प्रजमापा 8- पहाडी प्रभावित अजमापा यही कारण है कि इस बोली मे क्रिया के ग्रामीण प्रयोग ही नही, सज्ञा सवनाम विशेपण उपसग, प्रत्यय आदि भी एकरुपता रक्षित नहीं रख सके । क्रिया के रूप की मिन्नता का एक उदाहरण लीजिए- प्रथम रूप गयी द्वितीय रूप गयो तृतीय रूप-गो चतुथ रूप गयो पचम पगौ पष्ठ स्प-ग्यो सप्तम रूप गयो अष्टम रूप-अनिश्चित रहता है। कतिपय विशेषताएँ-1) इस बोली में क्रियात मे दीघ स्वरो के लिए प्राय हस्व स्वरो का प्रयोग होता है । यथा जाओ -जाउ खामो-खाउ गाओ=गाउ क्रिया के मत मे भोकारान्त को उकारात करने मे वचन का काई श्रम नहीं चलता । उपयुक्त उदाहरणा मे प्रथम दो क्रियाएँ बहुवचन मे हैं, जबकि तोसरी प्रिया का प्रयोग एकवचन मे ही होता है । यथा- (1) तुम लोग जाउ । (बहुवचन) (2) तुम लोग खाऊ ।। (3) राम ' तू गाउ ।। यदि "तुम लोग" के साथ गाने की क्रिया लगानी हो तो "गामो" लगाना होगा। (v) सज्ञामो मे कही साहित्यिक हिदी का रूप ही रहता है और कहीं "पो' या "यो" मी लगाते हैं । यया- (1) घोडा ले आमो।
21 (2) घोडा ल्याम्रो। (3) घोडी लामो। (1) कम कारक के लिए 'को" के स्थान पर "को" चिह का प्रयोग करते हैं तथा सज्ञा के रूप को प्राय अपरिवर्तित रखते हैं । यथा- घोडा कों (घोडे को) लडका वो (लडके का) (v) क्रियामो मे "ता है" के लिए "त है" या "तु है" का प्रयोग करते हैं । यथा- (1) राम मारत है। (राम मारता है।) (2) श्याम जात । (श्याम जाता है।) (५) भविष्य काल के लिए क्रियामो मे "योगो" "उ गो" "एगो" मोगे" मादि का प्रयोग करते हैं । यथा- (1) राम को मारूगाराम को मारोगो । (2) मैं जाऊ गा=मैं जाउंगो। (3) तुम मानोगे - तुम भाउगे। पही-कहीं "ग" के स्थान पर "६ है" के रूप भी चलते है । यथा--- (1) वह जाएगा-बुजइ है। (2) वह खाएगा-बु सइ है। (v) प्राप कारक चि हो मे अनुस्वार का प्रयोग मिलता है तथा चिह का रूप भी विकृत हो जाता है । यथा- का-(ने) ने,ने कम -(को) कुक, कों, के, के, सम्प्रदान को, के लिए परण(मे) मो, सू, ते ते अपादा-से सम्बय-का-को अधिकरण-मैं, परमे, मैं, पें, जो (Vu) भवनामो में भी पर्याप्त परिवर्तन हो जाता है । यथा-- मैं, मुझ मादि-हो मोको, मोहि. मोय मेरा-मेरो या मेर्यो, - है 22 तुझे-तोय, तोको तेरा-तेरी, तेरयो उसे-वाहि, वाकों, वाय तुमको-तोको तोय इसको या को, याहि (घ) कनोजीफर साबाद जिले के कन्नौज नगर के नाम पर कन्नौजी बोली प्रसिद्ध हुई है । प्राचीन काल में यह नगर का यकुब्ज के नाम से विख्यात था। इस जनपद की अपनी एक विशेष सस्कति थी। अत यहाँ की बोली ने अपना एक क्षेत्र बना लिया था । अब उस क्षेत्र का विस्तार इटावा, पर साबाद, शाहजहापुर तथा कानपुर एव हरदोई जिलों के कुछ भागो तक है। इस बोली के पश्चिम मे व्रजभाषा पूर्व मे अवधी तथा दक्षिण मे बुदेली पे क्षेत्र पडते हैं। अत इन तीनो बोलियो से यह बोली बहुत प्रभावित हुई है । वनौजी बोली के विभिन्न रूप मिलते हैं । इसकी सामाय विशेषताएं इस प्रकार हैं- 1- ब्रजभाषा का 'ओ" प्रत्यय कन्नौजी मे "प्रो' हो जाता है । 2-- कन्नौजी मे हि दी व्यजना त पदो के प्रत में 'उ" प्रत्यय का प्रयोग होता है। 3- हिंदी के आकारात पुरिलग विशेषण शब्दो को कनोजी म ओकारात कर दिया जाता है । कुछ उदाहरण देखिए--- खोटा-खोटो मोटा-मोटो छोटा-छोटो 4- कतीजी मे दो स्वरो के बीच आने वाले 'ह' व्यजन का लोप हो जाता है । यथा- कहिहीं = वह यों रहिहीं = रह यौं जहिहो = जेह यो 5- कनौजी म "वह तथा "यह" सवनाम प्राय 'बह, बौ, एव यहु, जो के रूप में प्रयुक्त होते हैं। 6- कनौजी मे कर्ता और क्रिया का प्रयोग भी एक विशेष रूप मे होता J T यथा- घोडा गया-घोडा ने चलो गयो । 7- क्रियाओ के लिंग भी कही-कही लुप्त कम के आधार पर चलते हैं । यथा- खडी वोली-राम ने बात कही। 11,312 कन्नौजी-राम ने कही। खड़ी बोली-मोहन ने बात पूछी। JUSTA2- कन्नौजी -मोहन ने पूछी। खडी बोली-तुमने राटा खाई। वनौजी-तुमने खाई। 8- कन्नौजी मे क्रिया के व्यजन के स्थान पर भूतकाल मे "ओ' हो जाता है तथा प्रथम वण दीघ से हस्व कर दिया जाता है । यथा- देना का दमो जाना का गयो होना का भयो इस प्रकार कही कही प्रथम वरण मे परिवतन भी हो जाता है। 9- कनोजी मे करण कारक मे 'का" के स्थान पर 'का" का भी प्रयोग होता है । करण एव अपादान कारक मे ' सेती", 'सन्', "ते" "करि' मादि चिह प्रयुक्त किये जाते है । अधिकरण कारक मे 'मा' "मो" तथा "लो" के प्रयोग की भी प्रथा है। 10- कन्नौजी मे सवनामो मे भी कुछ परिवतन मिलता है । यथा- "मैं ' से = मोहि, मेरो "तू" से = तोहि, तेरी "हम' से = हमे, हमारो "उन" से - उह, उहो, "वे" से-वै, बे, -आदि रूप बन जाते है । वास्तव मे कनौजी बोली ब्रजभाषा का ही एक रूप है। इसकी अधिकाश विशेषताएं ब्रजभाषा को ही स्थानीयता प्रकट करती है। इसीलिए कई विद्वानो ने कन्नौजी को अलग बोली स्वीकार करन मे सकोच प्रकट किया है। डॉ उदय नारायण तिवारी उनमे प्रमुख हैं। 1- देखिए हिदी भापा का उद्गम और विकास, पृष्ठ 249 * - 24 (ड) बुदेली-बुदेलखण्ड क्षेत्र की बोली को बुदेली या बुदेलखण्डी कहा जाता है । इसका क्षेत्र उत्तर मे आगरा, मैनपुरी एव इटावा के दक्षिणी भागो तक फैला हुआ है । दक्षिण मे यह बोली सागर, दमोह, भोपाल का पूर्वी माग, हाशगाबाद सिवनी आदि स्थानो तक बोली जाती है। झासी, जालौन तथा हमीरपुर जिले भी बुदेली के क्षेत्र मे पड़ते हैं । इस बोली की पूर्वी सीमा बधली से, उत्तरी एव उत्तरी पश्चिमी सीमा कन्नौजी एव ब्रज-माषा से, दक्षिणी सीमा मराठी से एव पश्चिमी सीमा राजस्थानी बोलियो से मिली हुई हैं। अत इस बोली पर इन सबका सम्मिलित प्रभाव पाया जाता है । फिर भी इस बोली की अपनी कतिपय विशेषताएं हैं, जिनका यहाँ उल्लेख किया जाता है- 1- बुदेली का शब्द-कोप अनेक मौलिक शब्दो से सम्पन है। यया, निम्नाकित शब्द उसकी अपनी सम्पत्ति हैं- भानेज - भगिनी पुत्र खगोरिया= गले का एक आभूपण खदरा चरागाह जडड टक्कर मकूटा = छोटी झाडी दीची धक्के बिलिया- कटोरी भटारि-गुफा लेजु = रस्सी कोपरी-परात लुगाई-पत्नी 2- "ए" एव "मो" स्वर प्राय हस्व "इ", "उ" में परिवर्तित हो जाते हैं तथा ईकारान्त या आकारान्त मे 'इया" लगा दिया जाता है । यषा- बेटी-बिटिया घोडी-घुडिया लोटा-लुटिया 3- 'ऐ" मोर "मो" को प्रमश "ए" तथा 'मो" कर दिया जाता है। यथा- ऐसा- एसो प्रौर मोर 4-" के स्थान पर सवत्र "र'का प्रयोग किया जाता है । यथा- .
25 खडा खरो दौडादौरो पडा-परी लडका-लरका घोडाघोरा 5- "या' के पश्चात् पाने वाला "ह' लुप्त होकर प्रागे के "" को उ" बना देता है । यया- चाहत - चाउत भवगाहत- अवगाउत 6- प्राकारान्त शब्द प्राय बुदेली मे प्रकारात हो जाते हैं । यथा- घोडा घोरो छोरा-छोरो घडा-घरो 7- "इन" प्रत्यय के लिए बु देली में 'नो' हो जाता है । यथा-~- घोबिन-घोबिनी पनिहारिन पनिहारिनी 8- वुदेली कारको म चिह भी कुछ बदल जाते हैं । यथा- क्र्ता में कम सम्प्रदान को, खो अपादान -सै सो अधिकरण-मैं 9- विशेषणो मे "रो" "2", 'री" लगाने को भी प्रवृत्ति मिलती है। यथा- सब-सबरो सबरे सबरी 10- सवनामो में ब्रज से अधिक भतर नहीं हैं। कुछ उदाहरण देखिए मैं से- मेरा, मोरा, मोय तू से-तेरो, तोरो तोय वह से- उसको, बाको 11- क्रिया पदो का रूप बु देली मे ब्रजभाषा की तरह ही बदल जाता है । सहायक क्रियाओ के लिए प्रयुक्त रूपी के उदाहरण देखिए-
26
था-
-हतो
धी-हती
थे-हते
गो-गो
बुदेली बोली की इन विशेषताना वा दखा से स्पष्ट हो जाता है कि
उमरा जमापा से बहुत साम्य है। यही कारण है कि मध्यकाल मे बुदेलखण्ड
म जो साहित्य लिखा गया, उसके लिए कवियो ने ब्रजभाषा वो ही माध्यम
बनाया था।
उपभाषाओं की बोलिया-
हि दी की दो उपभापाएं हैं--(1) राजस्थानी (2) बिहारी। यहां इन
दोनो की बोलियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है--
(1) राजस्थानी-
राजस्थानी उपभापा का प्रारम्भिक रूप हिदी की डिंगल शैली है जिसमे
मध्यकाल तक पर्याप्त साहित्य लिखा गया । चारण साहित्य इसी शैली में मिलता
है । क्षेनानुसार बोलचाल मे इस उपभापा के निम्नाकित स्प हो गए, जो देहाती
क्षेत्र मे अव भी मिलते है, यद्यपि नगरो मे खड़ी बोली हिदी का प्रचार बढ
रहा है।
मारवाडी-
यह बोली जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर पाली, सिरोही के क्षेत्र मे बोली
जाती है ।
मेवाडी--
मेवाड इस बोली का मुख्य क्षेत्र है जिसका केद्र उदयपुर जिला है।
हाडौती-
इस बोली के कद्र व दी तथा कोटा नामक जिले हैं ।
दूदाढ़ी-
इसका केद्र जयपुर जिला माना जाता है।
27 मेवाती- इसे अहीरवाटी भी कहते हैं । अलवर का पुराना राज्य-क्षेत्र इसका के द्र है। इस बोली पर खड़ी बोली और प्रजभाषा का प्रभाव बहुत पाया जाता है । मालवी- यह मी हिती को उपभाषा राजस्थानी के प्रतर्गत ही माती है, यद्यपि इसका क्षेत्र राजस्थान के बाहर वतमान मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र म पटता है । इसमें मेवाडी का प्रभाव अधिक पाया जाता है। भोली- दक्षिणी पूर्वी राजस्थान के पहाडी क्षेत्र मे बसे आदिवासियो मे इस बोली का प्रचलन है । पुरान मेरवाडा से मेवाड, डू गपुर, बासवाडा, प्रतापगढ और रतलाम आदि तक इस बोली में बोलने वाले पाए जाते हैं । म य राजस्थानी बोलियो के कई प्रभाव इस वाली पर पहे है और गुजराती भापा ने भी इसे प्रभावित किया है। राजस्थानी का भापा-रूप में विवास- मध्यकाल तब राजस्थानी बोलियो का साहित्य हिदी का ही साहित्य रहा है । आधुनिक काल मे राजस्थानी ने एक स्वतत्र भाषा के रूप मे विकास किया है। मारवाडी बोली इस क्षेत्र में अग्रणी है । हाडौती, जयपुरी और मेवाडी मारवाडी को एक समृद्ध भापा का रूप दे रही हैं और इस प्रकार राजस्थानी भाषा हिदी से पृथक्-एव साहित्यिक भाषा के रूप म विकसित हो रही है | हिंदी भाषा के लिए यह मौमाग्य का ही विषय है कि उसकी एक शाखा अपना स्वतत्र विकास कर रही है । इमसे हिदी वे राष्ट्रीय स्वरूप के विकास मे पर्याप्त योग मिलेगा। -- बिहारी- बिहार क्षेत्र में तीन बोलियाँ प्रचलित हैं-भोजपुरी, मगधी और मैथिली । इन वोतियो का क्षेत्र उत्तरप्रदेश के गोरखपुर और वाराणसी जिलो से प्रारम्भ होकर बिहार को अन्तिम सीमा तक जाता है ! दक्षिणी सीमा छोटा नागपुर तक तथा उत्तरी सीमा हिमालय की तराई तक मानी जाती है । इन बोलियों से व्रजमाषा की बहुत बातो मे समानता मिलती है । यथा, कुछ शब्द देखिये-- - 28 ग्रजभाषा बिहारी सडी बोली गारी गारी गाली बिटिया बेटिया बटी बुलावत् योलावत् बुलाते और और मलो मल मला रह्यो रहल एक प्रय बोली पहाडी बोली- हिदी की ही एक बोली के रूप म वतमान हिमाचल प्रदेश तथा उत्तरप्रदेश कुमायू एव गढवाल क्षेत्रो मे वस पहाडी लोगा की बोली 'पहाडी" कहलाती है । इसका शब्द-बाप बहुत सीमित है । हिदी को विविध शलियां- हिदी भाषा एक बहत्तर क्षेत्र की साहित्यिक सास्कतिक और राष्ट्रीय भाषा है । इसको अनेक बोलियां और दो प्रमुख उपभाषाएँ हैं, जिनकी चर्चा पीछे की जा चुकी है । साहित्य रचना, लोक व्यवहार, एव राजकाज मे इसका प्रयोग होता है । अत इसकी कतिपय विशेष शैलियाँ बन गई है जिन पर यहाँ विचार किया जाएगा। हिदी शैली- यह इस भाषा की अपनी शब्दावली और व्यावहारिक प्रयोगों की शैली है । इस शैली में खड़ी बोली का प्राधा य है कि तु लोक यवहार में विहारी और राजस्थानी बोलियो की व्याकरणिक विशेषताएं भी प्रयुक्त होती हैं । - उदू शली- यद्यपि मध्यकाल मे उदू हिदी के ही एक रूप में विकसित हुई थी। उस समय यह लश्करी हिदी मानी जाती थी, कि तु धीरे-धीरे इसम अरबी फारसी का प्रभाव बढा तथा इसकी लिपि भी भिन्न हो गई । प्रत उद् एक स्वतत्र भाषा बन गई। कि तु, अब भी उदू की कोई त्रिया अपनी नहीं है, सभी हिदी त्रियाएं हैं। हिदी भाषा ने अभी भी उसको एक शली के रूप में अपने साथ लगा रखा है । हिदी के लेखक अभी भी उदू शब्दावली ही नही, वाक्य रचना तक वा अपनी कृतियो मे दिल खोलकर प्रयोग करते हैं। हिदी के उपन्यास सम्राट प्रेमचद ने अपने उपयासो और कहानिया मे उद को हिदी की एक शेती के रूप में प्रयुक्त किया है ।
29 हिदुस्तानी शैली- भारत में अगरेजी भाषा का प्रसार बढने के कारण इस शैली का विकास हुमा । अगरेजी की शब्दावली का हिंदी में इतना प्रयोग बढा कि कुछ विद्वानो ने उसे हिदुस्तानी भाषा ही कहना प्रारम्भ कर दिया था। इसमे अगरेजी के साथ साथ भारत की अय मापाओ की शब्दावली भी ली जा सकती थी। आज मी जव अगरजी शब्दावली मिश्रित हिदी का कोई प्रयोग करता है, तो उसे 'हि दुस्तानी" बोलने वाला कहा जाता है । - . दकनी (दक्षिणी) हिदी शलो- दक्षिण भारत मे मध्यकाल मे ही वहा की मापामो से प्रभावित हिदी 'दकनी हिनी' कहलाने लगी थी। बीजापुर, गोलकुण्डा अहमदनगर, बरार, बम्बई तथा मध्यप्रदेश के दक्षिणी भाग म इसका प्रचार रहा। कुछ लोग इसे हि दुस्तानी का ही दूसरा रूप मानते हैं तथा कुछ विद्वान इसे खडी बोली का रूपान्तर बतलाते है । मराठी और गुजराती का भी इस पर प्रभाव पाया जाता है । हिटी की यह एक ऐमी महत्त्वपूण शंली है जिसमे -क्षिण भारतीय लेखको और कविया की पर्याप्त गद्य एव पद्य रचनाएँ मिलती हैं । रेख्ता शैली- "रेरता" शब्द फारसी के "रेखतम्" से बना है । इस शब्द का अर्थ है- बनाना मिलाना, तोडना, रचना । सस्कृत की "रिच' धातु और "रेखतम्' में धातु गत साम्य लगता है । प्रारम्भ मे "रेख्ता" शब्द का प्रयोग छद और सगीत के क्षेत्र में होता था। भारतीय तथा फारसी पद्धतियो के मेल से बने छद "रेख्ता" कहताते थे। अमीर खुसरो ने सबसे पहते "रेख्ता" शैली का प्रयोग परके हि दी मे कविताएं लिखी । जैसे- "जेहाल मस्की मकुन तगाफुल दुराय नेना बनाए बतियाँ।' फारसी हिदी का मिलाजुला यह प्रयोग बोलचाल मे भी चलने लगा या तथा इस प्रारम्भ मे अपभ्रश की तरह गिरी हुई या भ्रष्ट भाषा कहा जाता या । अगरेजो के आगमन तक रेख्ता शैली" जीवित रही और बाद में उसके स्थान पर "हिदुस्तानी' का प्रचार हो गया। मानक हिदी और उसको विशेषताएं- प्रत्येक भाषा का एक व्यावहारिक स्वरूप होता है और एक ऐसा परि- निष्ठित स्वरूप होता है, जिसे मानक स्वस्प कहते हैं । हिदी के व्यावहारिक रूप 30 तो अनेक है वितु टक्सा नी स्वरप पर ही है । यह स्प पूणत व्यापरण से अनुमोदित हाता है । इसका प्रयोग शिष्ट व्यवहार और साहित्य रचना में किया जाता है । समाचार पत्रा तथा विभिन्न विषयो वे हि दी ग्र था म मानक हि दी का ही प्रयोग किया जाता है । शिक्षा के माध्यम के रूप म भी इसका ही व्यवहार होता है । राज्यो वे प्रा तरिख सम्म धा म एक सम्पक भाषा के रूप मे मानक हिदी का ही प्रयोग किया जाता है। यह भाषा का वह स्वरूप है, जिसकी शब्दावली प्राय बहुप्रयुक्त तथा तत्सम एव व्याकरण सम्मत होती है। दाशनिक, राजनैतिक, वनानिक तया साम्तिक विचारो की अभिव्यक्ति म मानव हिदी हो समथ होती है। शब्द समूह- मानक हि दी का शब्द सम्ह अधिकाशत तत्सम है। तद्भव शब्गवली भी ऐमी है जो उसकी बहुप्रचलित तया व्याकरण आदि के नियमा से पूरगत स्थिर हो चुकी है । देशज तथा अ य भापामो के शब्द भी मानक हिंदी मे ग्रहण किए जाते हैं, किंतु उनका व्याकरणिक स्वरूप पूणत तत्सम प्रयोगो के अनुकूल होता है । सामा यत व श ही बाहर से मानक हिदी मे प्रवेश पात हैं जिनके पर्याय हि दी म या तो हाते नही या उनकी पूण अथवत्ता सिद्ध नहीं करते । अनेक विषयो के भापगो, प्रवचना, गाष्ठिया प्राति म विद्वान लोग जिस हिदी शगवली का प्रयोग करते हैं उसे 'मानक हिदी' की ही शब्दावली कहा जाता है। अगरेजी मे 'स्टैण्ट हिदी" इसी प्रकार के हिदी प्रयाग में कहते हैं। ध्वनिगत विशेषताएं मानक हि दी मे हि दी ध्वनिया के शुद्ध उच्चारण एव शुद्ध लेखन का बहुत महत्त्व है । स्वर व्यजन अनुस्वार विसग आदि का शुद्ध प्रयोग मानक हिदी की बहुत बड़ी विशेषता है। छद-रचना में जिस प्रकार ध्वनियो का परिवर्तित रूप चल जाता है, वसा रूप मानक हि दी में नहीं चल पाता। कारव चिहो आदि के प्रयोग मे एव किया पदो की रचना मे ध्वनियों का शुद्ध प्रयोग हिदी को मानक रूप देना है । उपसग एव प्रत्यया के प्रयोग में माना हि ी की ध्वनिगत विशेषता सुरक्षित रखी जाती व्याकरणिक विशेषता- मानक हिदी का एक निश्चित व्याकरण है। अभी तक स्व कामता प्रसाद गुरु द्वारा निर्धारित व्याकरणिक नियम सव स्वीकाय रहे हैं । रामचद्र वर्मा तथा किशोरीदास वाजपेयी ने भी मानक हिदी के स्वरूप निर्धारण में बहुत योग दिया है । इहोने हिदी के “याकरणिक प्रयोगो के 31 विषय मे पर्याप्न दिशा-निर्देश दिए है । सज्ञा, सवनाम, विशेषण क्रिया, अव्यय आदि के शिष्ट और शुद्ध प्रयोग इहोने निर्धारित किये हैं । यद्यपि विकासशील भाषा के व्याकरणिक प्रयोगो म कुछ समय बाद कुछ अन्तर आने लगता है, किन्तु उसके मानक स्वरुप की रक्षा के लिए उस अतर को समझना और पूवर्ती व्याकरणिक नियमा की कसौटी पर कसना आवश्यक होता है । हिदी के विषय मे भी यह बात लागू होती है । हिन्दी व्याकरण मे भी धीर धीर कुछ परिवतन लक्षित हुए हैं, किंतु व सवनाह्य हो जाने पर ही मानक हिदी ने स्वीकार किए हैं। लिपि सम्बन्धी विशेषता- हिदी भाषा देवनागरी (या नागरी) लिपि मे लिखी जाती है। यह लिपि पूणत नानिक लिपि है । प्रत्येक उच्चारण को पूणत शुद्ध रूप में प्रस्तुत करन की इस लिपि म बहुत बडी क्षमता है । मानक हिदी की यह विशेषता है कि वह लिपि की वैज्ञानिकता के अनुरूप शुद्ध उच्चारण तथा शुद्ध लेखन पर निभर है। उसके प्रत्येक प्रयाग में लिपि का अनुसरण होता है । समी स्वर- व्य जन विसग तथा अगुस्वार ध्वनिया का शुद्ध रूप मे लेखनकाय इस लिपि मे सपादित होता है । अत मानक हिंदी का लिपिबद्ध स्वरूप उसके उच्चरित स्वरूप से भिन्नता नही रखता । टकए तथा मुद्रण का बहाना करके कुछ विद्वानो ने देवनागरी लिपि मे परिवतन सुझाए और उनके प्रयोग भी होने प्रारम्भ हुए तथा यदा कदा पाठय पुस्तयो मे भी किए जाने लगे है, किंतु उनसे मानक हि दी का स्वरूप विकृत होता है तथा शब्दो के अथ भी बदल जाते हैं। प्रत लिपि में परिवतन करता याय-सगत नहीं है ।
ततीय अध्याय मानक हिन्दी वर्तनी की समस्या एव शब्द-प्रयोग माना हिंदी वतनी की समस्या -जैसाकि पहले कहा जा चुका है, हिदी एक विशाल क्षेत्र की भाषा है । इस क्षेत्र मे बिहार उत्तरप्रदश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ती मोर हिमाचल प्रदेश सम्मिलित है । इन राज्यो मे अनेक बोलिणं पाई जाती है, जिनस हि दी का विकास हुमा है। अपभ्र श की तदभव-प्रवृत्ति को धीरे धीरे कम करती हुई हिदी मापा सस्कृन की तत्सम प्रवृत्ति से समृद्ध हुई है। इसके विकाम का इतिहास लगमग चौदह शताब्दियो तक फैला हुपा है । इस प्रकार क्षेत्र की विशालता तयो काल-ऋम की दीयता के कारण हिन्दी की एकरूपता एव वतनी पर अनक प्रकार के प्रभाव पड़े है । फलत कुछ ऐसी समस्याए उत्पन हो गई है, जिनके समाधान खोजना प्रावश्यक हो गया है । ये समाधान हिदी मापियो एव माषाविदो से पर्याप्त सावधानी की अपेक्षा रखते हैं। प्रत्येक भाषा शब्द भण्डार एव सुस्थिर घ्यावरण से समृद्धि प्राप्त करती है। हिन्दी भाषा के पास इतना शब्द भण्डार है कि वह विश्व की किसी भी समद्ध भापा की तुलना म श्रेष्ठ सिद्ध हो सकती है। उसका व्याकरण भी पर्याप्त सुस्थिर है । यह सब होते हुए भी उसकी एकरूपता प्रभावित हो रही है और वतनी की समस्याए भी बढती जा रही हैं । मुझे यह कहने म तनिक भी सोच नही कि जब हिदी का शिक्षण हिदी प्रदेशा में अनिवाय नहीं था, तब उसकी एकरूपता और वतनी की उतनी समस्याए नही थी, जितनी समस्याए उनकी अनिवाय शिक्षा के प्रसार के बाद बढी हैं। इसके कई कारण हैं ।
33 राजनैतिक कारणा से भाजादी के बाद यह प्रचार हर प्रात मे बराबर किया जा रहा है कि हि दी हमारी मातृमापा है । यह प्रचार गलत नहीं है । हिंदी-प्रदेशो की मातृभाषा हि दी है, विन्तु वह मातृ-बोली नहीं है । बोली के उच्चारण मे हम अपनी क्षेत्रीयता सुरक्षित रखने के लिए स्वतत्र हैं, कि तु जव बोली भाषा बनती है, तब उसको एक सुस्थिर व्यावरण का आधार लेना पड़ता है तथा क्षेत्रीय बाली गत विभिनताएं त्यागनी पडती हैं। यह त्याग किए बिना कोई भी भाषा समद्ध नही हो सकती। हिदी की समद्धि के पीछ यही त्याग रहा है । हिदी प्रदेशो की सभी वालियो ने क्षेत्रीयता अपन तक सीमित रखकर अपनी शब्द-सम्पदा तथा व्याकरणिक निष्ठता का हिदी को प्रवदान लिया है। शिक्षा के प्रचार प्रसार के साथ राजनैतिक पारणा से आजादी के बाद जब से यह धारणा फैलाई गई कि हि दी हमारी मातृभाषा है अत हम उसे चाहे जैसे बोलें लिखें, तब से हि दी की एकरूपता को खतरा पैदा हुआ है और वतनी की समस्याएं बढ़ गई हैं। जब किसी का हिन्दी शब्दो और वाक्यो की एकरूपता या वतनी के विषय म सचेत किया जाता है तब यह विराधी स्वर तेज हो जाता है कि हिदी हमारी मातृभाषा है, तो हम जैसे बोलते हैं वही शुद्ध है। एक अन्य कारण यह नारा भी है कि हिन्दी में जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है । वस्तुत यह नारा उल्टा बना दिया गया है । सही स्थिति यह है कि हिंदी में जो लिखा जाता ह वही पढ़ा जाता है। इसका कारण यह है कि हिदी की लिपि 'देवनागरी' बहुत वैनानिक लिपि है । इस निपि मे जितनी ध्वनियो को अकित करने के लिए वश हैं उतने ससार की किसी अन्य लिपि म नहीं हैं । ससार की सभी भाषाएँ मारत की उन भापाया से ईया करती हैं जिनम नागरी लिपि का प्रयोग होता है । यत्र-युग की सभ्यता ने जहाँ भाषाम्रो को बिगाडा है, वही लिपियो को बिगाडना मी प्रारम्भ कर दिया है । जो देश अंगरेजो के उपनिवश रहे है वहाँ- वहाँ को भाषाएँ भी अंगरेजी भाषा का उपनिवेश बन गई हैं और जैसा तथा जिस दिशा मे अंगरेजी भाषियो ने चाहा है उन देशो की मापाआ और उनकी लिपिया को नवाया है । यह ठीन है कि भारत राजनैतिक दृष्टि स हजार वर्षों तक गुलाम रहा कितु उसकी भाषाएँ और लिपियां इस दीर्घावधि म भी स्वतम रही थी। किन्तु माजादी के बाद भारत की सभी भाषाएँ और लिपियां अंगरेजो की गुलाम बन गई हैं । यह क्थन विचित्र अवश्य लगता होगा, रितु एक ऐतिहासिक सत्य है । इसी सत्य ने हिदी की एकरूपता और वतनी को प्रभावित दिया है तथा देवनागरी लिपि को प्रवनानिक बनाने की कोशिश की है । कहा 34 जाता रहा है कि देवनागरी लिपि टकरण के अनुकूल बनाई जा रही है, मुद्रण मे सुविधाएं पैदा की जा रही हैं । वि तु परिणाम बहुत घातक हुए हैं। ये सभी परिणाम हिदी भाषा की एकरूपता के निरतर ह्रास तथा वतनी की वढती हुई समस्यामा के रूप मे प्रतिफलित हो रह हैं । मैंने आरम्भ में बताया है कि हिंदी क्षेत्र की बोलियो के आधार पर विकसित हिदी उही वोलियों की ओर लौटाई जा रही है, जो घातक स्थिति है । क्सिी शब्द का उच्चारण सभी बोलियो म समान नहीं हो मक्ता । यदि समान होने लगे ता फिर वे बोलियां ही क्या रहीं फिर तो वे एक भाषा ही बन गई । कि तु जब वह शब्द उन बानियो से विकसित मापा मे पाता है, तब उसे क्षेत्रीय प्रभाव छोट देने पड़ते हैं। 'तम वो किसी हि दी बोली मे 'तम" वोल सकते हैं किन्तु हि दी भाषा मे उस बोली वाले व्यक्ति को "तुम' बोलने का अभ्यास करना ही पडेगा । इमी अभ्यास का नाम शिक्षा | अगर 'शर्मा जी" को समर्माजी' या 'सरमा जी बोलने की छूट यह क्हर दी जाए कि हि दी हमारी मातृमापा है, इमलिए हम जो बोल रहे हैं वही शुद्ध हि दी है तो यह आत्मघाती प्रयास होगा । दुख है कि ऐसे प्रयास बहुत हा रहे हैं । हम शब्द के स्रोत को मूल कर स्थानीय उच्चारण को ही प्रमाण मानकर हठ करते हैं कि 'मजलि' नहीं 'अजलो' शुद्ध है । 'म तर्धान को 'अनान बना देते हैं । रचयिता रचियता' हो जाता है और स्वर्गीय महादेवीजी' 'सरगीय महादेवी हाकर कवयित्री से 'कवियत्री' बन जाती है । कोई पाश्चय नहीं कि कोई अपनी नासिका पर भी योडा ज्यादा बल देकर उहे 'कवियत्री बना डाल । बहुवचन के बधुप्रो और "मित्रो को हटा ही चुके है । 'शाप को 'श्राप बना दिया गया है और रखा चवा' जैसे शब्द 'रक्षा' और चक्खा' बन गए हैं। इस प्रकार प्रातीय उच्चारणो की स्वतत्रता इतनी बढती जा रही है कि आज यह कहना एक खतरा उठाना वन गया है कि अमुक शब्द शुद्ध नही, अमुक शुद्ध है । टकरण यत्र की सुविधा के लिए लिपि की जो काट छाँट हुई है तथा मुद्रण मे उसका जो अनुकरण आया है, उसमे सुविधावाद इतना बढ़ गया है कि अंगरेजी की तरह शब्द की वतनी कुछ होती जा रही है और उच्चारण कुछ होता जा रहा है । अब आप पिसी तारघर मे बाबू को 'हस मुख' नही हस मुख' देखते हैं क्योकि उसके पीछे दीवार पर ऐसी ही तस्तो लटक रही होती है। समस्या शब्दों को ही नही वाक्यों की रचना पर भी अनेक प्रभाव पड़े हैं मोर गुलाम रहे देश की प्राजाद हिदी ने विहार से जैसलमेर तक तथा शिमला 35 से रायपुर तक वाक्यों के स्वरूप मे इतने अतर पैदा कर दिये हैं कि अहि। भाषी की समझ मे ही नहीं आ पाता कि वह हिदी के नाम पर किस वाक्य को किस प्रकार लिखे और क्सि प्रकार पढ । चलचित्र और दूरदशन की मेहरबानी इतनी बढ़ गई है कि हि दी हिंदी न रह कर या तो अंग्रेजी बनती जा रही है या वह वगला और पजाबी की खिचडी हो गई है । कोई 'तुमने यहां जाना है पूछता है तो कोई "हमने उत्तर नहीं देना मांगता ।' कह कर पीठ फेर लेता है। यदि इन महाशयो से कहिये कि कपा करके हि ती भापा को मत बिगाडिय, ता व अपने बहुमत की घगको दिखाते है और यह कह कर माखे तरर लेस है कि "मो बाबू । हि दी तम्हारी ही जबान नही है । प्रश्न यह रह गया है कि हि नी वा भाषी स्वरूप क्या होगा ? क्या वह एक भापा के रूप में जीवित रह पायगी या कभी बालियो की कबडडी म और कमी अ य प्रदेशा की भाषामा म घुतमिल कर अपना अस्तित्व ही सा देगी? सबसे बडा खतरा उमकी एकरपता और वतनी के लिए अंग्रेजी की छाया म दिखाई देता है । गुप्तजी गुप्ताजी हुए, मिश्र मिश्रा, अशोक अशोका और रामजी- रामाजी ता क्यो हुए ? जी ने चाहा इसीलिए तो । पिता जाने थे अब पिता जाता है और मा अम्मा तो थी, पर अब मम्मा हो गई है । ऐसी जो भीपण स्थितियां हिन्दी भाषा की एक्स्पता और वतनी वे माग मे आ रही हैं, उन पर सावधानीपूर्वक विचार करने की भावश्यकता है और यह देखने की स्थिति पाती जा रही है कि कही ज्ञान की खिडक्यिा सारत-खोलते हम बुद्धि के दरवाजे ही बन्द न कर डालें। मानक हिदी के ज्ञान के लिए इस प्रकार की समस्याओ को समझ लेना बहुत आवश्यक है । यहाँ कुछ ऐसे शब्द दिए जा रहे है, जिनसे उनके शुद्ध रूपा को पहचान का अभ्यास हो सके । पद या वाक्य के लिए एक शब्द का प्रयोग, समान लगने वाले शब्दो वे भर्या तर पर्याय, विलोम प्रादि का ज्ञान हो जाने पर भाषा प्रयोग सम्बधी अनेक समस्याएं दूर हो सकती हैं। आगे के कुछ पृष्ठो मे इही विपयो के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं ।
36 शब्दो के शुद्ध स्पो को पहचान अशुद्ध शब्द शुद्ध शब्द अशुद्ध शस्त शुद्ध शब्द छमा जेष्ट अनधिकार आध्यात्मिक अनिष्ट प्रध्ययन अनुयायी स्थान अनुगृहीत अन्तर्धान प्राकाक्षा ई- जोतसना दाइत्व पृष्ठ प्रप्ट प्रसशा पूज्यनीय মহাবিব प्रथक प्रदशिनी फाल्गुण उपयुक्त वज अनाधिकार अध्यात्मक प्रनिष्ठ मध्यन अनुयाई अस्यान अनुग्रहीत अत्तान भावाचा ईर्पा उपरोक्त उश्र खन ऋपा ऐक्यता मवियत्री कैलाश वनिष्ट कृत्यकृत्य क्षत्र क्षात्र छत्रिय गरु गरिष्ट गोड घनिष्ट चिह स्थाई सप्ताहिक समुद्रिक सयास थगार उच्छखल कृपा एकता, ऐक्य कवयित्री क्लास वनिष्ठ कृतकृत्य छत्र छात्र क्षत्रिय गरुड गरिष्ठ गौण घनिष्ठ बजभाषा महत्व महात्म महगा यथेष्ठ लच्छन व्योहार वागमय वास्तविक मे स तुष्ठ सग्रहित क्षमा ज्येष्ठ ज्योत्स्ना दायित्व पुष्ट पृष्ठ प्रशसा पूजनीय प्रसाद पृथक प्रदशनी फाल्गुन ग्रज ब्रजभापा महत्त्व माहात्म्य महगा यथेष्ट लक्षण व्यवहार वाड्मय वास्तव में स तुष्ट सगृहीत सम्मान सिंह पष्ठ स्वयवर हस्तक्षेप हितषी हितच्छु स्थायी साप्ताहिक सामुद्रिक सयास शृगार सिंघ पष्ठम स्ययवर हस्ताक्षेप हितशी हितेच्छुक 37 मानक हि दी में पद या वाक्य के लिए एक शब्द का प्रयोग यहां कुछ ऐसे पद या वाक्य प्रस्तुत हैं जिनके लिए एक शब्द का प्रयोग किया जा सकता है आलोचक आश्वस्त प्राथिक मारोही प्राततायी प्रालोचना करने वाला जिसको आश्वासन दिया जा चुका है स्पये पैसे से सम्बन्धित ऊपर चढ़ने वाला अत्याचार करने वाला जिसकी इच्छा की जाय किसी वस्तु से परे इतिहास जानने वाला जिसने इन्द्रियो को जीत लिया है इन्द्रियो से परे जिससे ईर्षा की गयी हो ईया के योग्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील जिस पर उपकार किया गया हो उत्तजित कर देने वाला स्मतिस्वरूप दी जाने वाली मेंट उदाहरण के रूप मे रखा हुआ जिसका चरित्र उदार है ऊपर लिखा हुआ किसी की हंसी उडाना जिसकी उन्नति हो चुकी हो ऊपर कहा हुमा प्रमश अधिक होता है जिसकी उपेक्षा की गयी हो वह पुरुष जिसकी उपेक्षा की गमी हो वह स्त्री घडे वश मे उत्पन उल्लेख के योग्य अत्यत रूपवती स्त्री रूप से पैसा कमाने वाली स्त्री इतर इतिहासज्ञ इद्रियजित जितेन्द्रिय इद्रियातीत ईपित ईष्य ईहार्थी उपकृत उत्तेजक उपायन उदाहरणाथ उदारचरित उपरिलिखित उपहास उनत उपयुक्त उत्तरोत्तर उपेक्षित, उपेक्षिता उच्चकुलोद्भव उल्लेख्य उल्लेखनीय रूपसी रूपाजीवा 38 रचयिता रचयित्री रचनात्मक कायम रचना करने वाला रचना करने याली निर्माण प्रधान यामम जिस स्त्री को मामिय घम हो जिसको देसवर या मुनकर रागट पडे हो जायें सून मी तरह लाल जो साली हो चुका हो सस्तार और परम्परा द्वारा प्राप्त जिसकी रक्षा की जानी चाहिय जो रूपये प्रति प्रासवत हो जो नया-नया भरती हुया हा राष्ट्रसम्बन्धी राष्ट्र की उन्नति क्सिी वस्तु को अपने भीतर से निकाल फेंना अभिनय द्वारा जीविया प्राप्त करने वाला हिसाब किताब लिखने वाला जो लिखना चाहिए लोक से सम्बघित लोहे के समान क्टोर और दद पुरप चेहर की लुनाई जिसका पट लम्बा हो पाने की इच्छा ग्रामीण जनता के बीच गाया जाने वाला गीत बडे को छोटा करना जिसकी बुद्धि छोटी हो उपयास लिखने वाला ऊपर की ओर जाने वाला या मुखवाला जिस घरती में कुछ नही उपजे दिन भर म एक बार भोजन करने वाला इस प्रकार की जिसमे किसी एक ही प्रग पर जोर दिया गया हो जिसका ध्यान एक ही वस्तु पर लगा हो भौतिक सुख सुविधा, समृद्धि से युक्त रोमांचकारी रक्तिम रिक्त परम्परागत रक्षणीय पासवत २गस्ट राष्ट्रीय राष्ट्रो नति रेचन रगोपजीवी लखापाल लेख्य लौकिक लौह पुग्प लावण्य लम्बादर लिप्मा जोकगीत लध्वीकरण लघु बुद्धि, क्षुद्र बुद्धि उपन्यासकार उध्वमुसी ऊमर (अनुवर) एकाहारी एतादशी एकागी एकाग्र ऐश्वयशाली 39 कुतूहल, जिज्ञासा मोग विलास करने वाला ऐय्यास, भोगी एकता की भावना ऐक्य इच्छा पर निभर ऐच्छिक वहुत अधिक दान देने वाला औढरदानी उद्योग से सम्बध रखने वाला प्रौद्योगिक जो पसा खच करने में कजूसी कर कृपण जो किसी काय म लगा हुअा हो दत्तव्यरत याम करने वाला सक्रिय, क्मशील थाडासा किंचित क्सिी काय में प्रवीण मुशल, दक्ष किसी वस्तु को जानने की इच्छा कण्टका से घिरा हुमा कण्टकाकीरण कासे का बना हुआ बतन कास्य लकडी की सुन्दर वस्तुएं बनाने की कला कातला पष्ट देने वाला कष्टप्रद जो यह निणय नहीं कर पाया कि क्या करना चाहिए किंक्त्तव्यविमूढ जिस पर सवारी की जाय वाहन बहुत अधिक खच होन पर जो हो सके ध्ययसाध्य व्यथ की बहस वितडावाद बहस करने वाला विवादो वद जानने वाला वेदज्ञ बहुत पढी लिखी स्त्री विदुषी जो डिग चुका हो विचलित बिल्कुल भटका हुआ पागल जसा विभ्रात दूसरी जाति का विजातीय बहुत अधिक घृणा वितृष्णा जो बांट दिया जा चुका हो वितरित बहुत अधिक फैला हुआ विस्तृत जिसके हाथ में वज हो वज्रपाणि जिसके हाथ मे वीणाहो वीणापाणि जो बहुत अधिक प्रसिद्ध हो विख्यात जिसका कोई प्रग टेढा मेढा या कटा हुआ हो विकलाग जिसका वर्णन नहीं किया जा सके वरनावीत 40 जो वचन से परे हो जो व्यापर जाता हो जिसकी नजर सीपी न हो ध्यास्थान परने वाला प्याम्यागोयासा ध्ययमाय से सम्बपित जो किमी रिपप या विशेष नान रमता हा जिसरे रघे वेस की तरह मजबूत हो विद्या हो जिसमा ग्यसन हो जिराम यस्तु पी ही प्रधानता हो जो बालिग हो चुका हो जिमा विनापन प्रकाशित हो चया हो जो गाया नहीं गया हो बेचैनी का भाव चाहा नहीं गया हा जो बातें कही नही गयी हैं जो सय सहा नही जा सके जो गिना नही जा सके जिसया पार नही पाया जा सके क्सिी आधार पर टिसा हुमा नीचे की ओर जिसका मुह है वचनातीत येयापरण याप्टि व्यापाता व्यावमायिक विशेषग यषमस्वप विद्याथ्यसनी वस्तुनिष्ठ वयस्प विगापित प्रगीत प्रबुनाहट मनचाहा मनर ही पसहय भगणित, पनगिनत अपार अवलम्बित अधोमुख अधोमुसी अतिशय अभिभावक प्रथुतपूर्व प्रजमा अज्ञात प्रसाद्य अजातशत्रु अग्रसर अग्रसोची अदूरदर्शी माकठनिमग्न पापादमस्तक बहुत अधिक लालन पालन देखभाल करने वाला जो पहले कभी सुना नहीं गया जिसका जम नहीं हुमा जिसको नहीं खाना चाहिये जिसका शत्रु उत्पन नही हुआ आगे-आगे चलने वाला आगे पागे सोचने वाला बहुत दूर तक नहीं देखने वाला कठ तक डूबा हुमा सिर से पैर तक हिमालय से सेतुबघ (रामेश्वरम) तक जो ईश्वर के अस्तित्व मे विश्वास रखता है प्रसतु हिमालय मास्तिक 41 प्रातिथ्य आघृत आध्यात्मिक प्रवृत्ति आंग्ल प्रभाव पालोच्य पालोचित अनजान अपरिचित अस्थिर अतिथि सत्कार की भावना किरी माघार पर निमित ईश्वर, घम दशन, प्रात्मा में रुचि रखने की प्रवत्ति अंग्रेजी भाषा या अंग्रेजो की सभ्यता का प्रभाव जिसकी आलोचना की जाय जिसकी आलोचना की जा चुकी है जो नहीं जानता है जो परिचित नहीं है जो स्थिर नहीं है जिसके शरीर पर मांस है ही नही केवल हडडी ही बच गयी है जिसे देखा नही जा सकता, नहीं देखा गया जो पूरा नहीं हुआ है जिसके हाथ मे अधिकार है जिस पर अधिकार प्राप्त किया जा चुका है बहुत अधिक परिश्रमी और लगनशील व्यक्ति जिसका अपमान हो चुका है जिसका प्रादर नही हुमा जो प्रकाशित नहीं हुआ है हिसाब किताब को जांच करना जिसको पार किया जा चुका है जिसको जीता नहीं जा सकता जिसको पार करना प्राय असम्भव हा जो तप्त नही हुअा हो जो किसी सभा या संस्था का प्रवान हो जो डिग नहीं सकता जिसको थाह लगाना कठिन है जिसका मूल्य नहीं दिया जा सकता जिसको तुलना नही की जा सकती "हाँ-ना' का निणय नही हो पाना जिसका निणय नहीं हुमा हो कड़वी बातें बोलने वाला मुनियो द्वारा पहनी जाने वाली लंगोटी अस्थिशेप, ककाल अदृश्य, अदष्ट अपूरण अधूरा अधिकारी अधिकृत अध्यवसायी अपमानित अनादत अप्रकाशित अकेक्षण प्रतिकात अजेय असम्भवप्राय अतृप्त अध्यक्ष प्रडिग अथाह अमूल्य अतुलनीय प्रसमजस अनिरगीत कटुभापी कोपीन 42 जिसका स्वाद कमला हा मलग मलग पोटियो म हासन पी प्रिया विवाह में पूय की अवस्था जो राग मोग में मस्त रहता हो जो पुगपत्य-हीन हो जो पुशल की अभिलाषा परता हा अघिय सच परो याला भामाश म उहने वाला सडग धारण बरन वाली स्त्री सोश परने याला सान योग्य दूर देखने का यत्र अपना हो साथ देखन याला जो गुप्त रखना चाहिए गाय की पूंछ की तरह गायो नी जमाव या बैठन की जगह जो गलत रास्ते पर चल रहा हा गांजा पीने का मम्यस्त बहुत अधिक गप्पं करने वाला जिसकी भीख पडी तेज हो, जो छाटी छोटी वस्तुमा को भी शीघ्रता से देस लेता हा गाने वाला गर्मी की छुट्टियां किसी ध्वनि से गूजा हुमा समुद्र मे गोता लगाने वाला जिसकी निदा की जाती हो घरबार की चिन्ता और परिवारो के सदस्यों के उचित कत्तव्य का भाव षणा के योग्य चलने-फिरने वाला जल में चलने वाला वीभत्सता का भाव जानने की इच्छा रखन वाला बापाय कोटिरए मोमाविस्पा पामी वतीय पुगसामिलापी पीला सेपर सहगधारिणी पोजी साध दुरून स्वार्थी गोपनीय, गोप्य गापुच्छवत् गोष्ठी, गोष्ठ गुमराह गजेडी गप्पी गृद्ध दृष्टि गायव ग्रीष्मावकाश गुंजायमान गोताखोर गहित गाहस्थ्य जषय जगम जलचर जुगुप्सा जिज्ञासु 43 जिगीपा जितेन्द्रिय जामाता झगडालू झमेलिया टकण टकक जीतने की इच्छा जिसन इद्रियो को जीत लिया है बेटी का पति झगडा करने वाला झमेला करन वाला टाइप करने की निया टाइप करने वाला चाल-ढाल का बनावगैपन जिपसे रूप-धन प्रादि का गव सूचित हो ठेके का काम करने वाला जिसको देखकर डर लगे व्यथ का प्रपच किसी काय को मुस्तैदी के साथ करने वाला ऐसी फसल जिससे तेल निकाला जाता है तरने की कला में निपुण किसी नदी या सागर के तट पर स्थित जो किसी का पक्ष न ले तप करने वाला जो सब कुछ छोड दे छोड देन याग्य जिसको छोड दिया गया हो ठसक ठेकेदार हरावना, भयानक खाखला तत्पर तिलहन तैराक तटवर्ती तटस्थ तपस्वी त्यागी त्याज्य स्यक्त तेजस्वी तुरपाई, तुरपन तीर दाज तितीर्ण चौथ चिन्तित चत्रपाणि चाचल्य चापल्य तेज से युक्त हाथ की सिलाई तीर चलाने मे कुशल तरने की इच्छा क्सिी वस्तु का चौथा हिस्सा चिता मे डूबा हुमा जिसके हाथ मे चक्र हो चचल होने का भाव चपलता का भाव राजामो और साम तो के पीछे चलने वाला पौर उनका गुणगान करने वाला चरित्र की उच्चता . चारण चारित्र्य
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45 धुएं से भरा हुआ मटमैले रग का बाडी सिगरेट, तम्बाकू आदि पीना धारण करने वाली असली का उल्टा जो नकल करता है नगर में रहने वाला नरक सम्बधी तत्व जानने वाला जिसमे कोई सार न हो खूब मोटा आदमी जिसका बदन खूब मुलायम हो बड़े लोगो को मेंट में दी जाने वाली धनराशि जो दूसरो को रुपया पैसा देता हो सकीर्ण विचारो का व्यक्ति दोगे वाला जानवर दस मुंह वाला रावण जिसको दबाना कठिन हो जिसको लांघना कठिन हो जिसका दो बार जम हुमा हो जिसका दमन किया गया हो जिसको रौंदा गया हो जिसको समझने में कठिनाई हो जिसको करने में कठिनाई हो रोज-रोज के जीवन से सम्बद्ध प्रतिदिन प्रकाशित होने वाला समाचार चित्र देह से सम्बद्ध देवतालो से सम्बद्ध एक विशेष प्रकार से देखना आंख की बीमारी धमक्ता हुमा जिसे दुहा जा चुका हो जिसको दण्ड दिया जा चुका हो जिस काय मे सफलता पाना कठिन हो घूमाच्छादित घूसर घम्रपान धारयित्री नकली नकलची नागरिक नारकीय तत्वज्ञ थोथा, निस्सार थुलथुल, मोटू थली दानी, दाता दक्यिानूस द्विपद दसानन दशमुख दुदम्य दुलंध्य द्विज दमित दलित दुर्बोध दैनन्दिन दैनिक दैहिक दैविक दृष्टिकोण दृष्टिदोप दीप्त दोहित दण्डित दुसाध्य
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47 जो बहुत बड़ा नहीं है जो आसानी से मुकाया जा सके सुबह शाम किया जाने वाला हल्ला भोजन जो किसी से डरता नहीं है जिस ईश्वर पर विश्वास नही है जो अमी-अभी आया है जो तुरत उत्पन हुआ है जिसका तुरन्त उदय हुआ है रात में चलने वाला राक्षस पाकाश मे चलने वाता जो निर्देश देता है जिसकी जड नहीं है जिसकी उपमा न हो बिना पलक गिराये, जो नीति जानता है मनुष्यो मे नीच जो वस्तु देवता पर चढ चुकी है नवविवाहिता स्त्री जिसको पीने की इच्छा हो जो पिया जा सके जो पचा दे जिस पक्ष या भवन मे भोजन बनता हो जिसके आर पार दिखाई दे जो स्वीकृत किया जा चुका हो केवल पल खाकर रहने वाला जिस भादमी के कपडे फटे-चिथे हो परिणाम का मोह रखने वाला जिसकी किस्मत खराब हो जिसे कोई तमीज न हो जोरो की भूख बहुत जानने वाला बहुत प्रकार के रूप धारण करने वाला बहुत से लोगो की एक राय नातिदीघ नमनीय नाश्ता, कलेऊ, बियालु निर्भीक नास्तिक नवागतुक नवजात नवोदित निशाचर नभचर, नमचारी निर्देशक, निमूल अनुपम निनिमेप नीतिज्ञ नराधम निर्माल्य नवोढा पिपासु पेय पाचक पाकशाला पारदर्शी पारित फलाहारी दरिद्र, फटेहाल फलासक्त बदकिस्मत, बदनसीव बदतमीज पुमुक्षा बहुज्ञ, बहुविद बहुरूपिया बहुमत 48 वन का पशु नि सन्तान स्त्री बहुत अधिक बोलने वाला वहुत सी भाषायें जानने वाला समुद्र की प्राग जिस समाज मे बहुत सी पत्नियां रखी जाती हैं वध करने वाला कायदे के साथ जिसने बहुत सुन रखा है जो एक ही साथ बहुत काम करता हो वहुत अधिक मूल्य वाली वस्तु बाधा डालने वाला वच्चा के काम की वस्तु नहीं पचने की बीमारी बाप द्वारा अजित अपनी सम्पत्ति बहुत अधिक जिसकी चर्चा हुई हो विचित्र भाकार-प्रकार का क्सिी विशेष अवसर पर या विशिष्ट सामग्री वे साथ प्रकाशित क्सिी पत्रिका का अक एक स्थान पर पेद्रित शक्तिया और अधिकारीको प्रमश वांट देना जो बिल्कुल विस्सर गया हो जिमको ग्रहण करना अपने मन पर हो बिल्युल प्रतिक्त होने का भाव जिसकी किरणें फैल घुगी हो जो पार कर पा हो रिमो विषय पी पूरी छानबीन करना जिसरा मातार बिगर घुमा हो जिरामा रप बिमा गुमा हो वो सपन नही हो सराहो रिसी विषय नागर अध्ययन जो मन प्रपिर परा हो को रितुन मुग्प हो पुमा हो बनला वध्या बातूनी बहुमापादि बड़वाग्नि बहुपत्नीसम बधिक बाकायदा बहुश्रुत बहुधधी बहुमूल्य बाघक बालोपयोगी बदहजमी बपौती बहुचर्चित बेडोल विशपा विपयस्त विपयस्त वैकल्पिक यंपत्य विकीरण पारगत मीमांगा विकृत पिम्प विपस विश्लेपण বিশ্বাস विम 49 जो काम वासना में लिप्त रहता हो जो अपने स्थान से हटा दिया गया हो जो सदा रहे सोने का कमरा शिक्षा से सम्बघित बचपन की अवस्था पवत की बेटी पवतो की कतार शास्त्र से सम्बघित जिसको शाप दिया जा चुका हो शरण में प्राया हुमा जो दूसरो से आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है एक प्रायोजित वाजार जहाँ विभिन्न प्रकार की वस्तुप्रो का प्रदशन और क्रय विक्य होता है कालेज का प्रधान प्राथना करने वाला जो दूसरो पर प्राधित हो जो दूसरो के अन्न पर पलता हो विपयो विस्थापित शाश्वत शयनागार शैक्षणिक शैशव शैत-सुता शैल-श्रेणी, शैलमाला शास्त्रीय शापग्रस्त शरणागत प्रतिस्पर्धी गिरा हुआ जो दूसरो की भलाई चाहता है दूसरे लाक का जो पार जा चुका है जो प्रांखो के सामने है जा आँखो से पोझल है पिता का भाई प्रकृति सम्बधी पुरप का गुरण विशेष रूप से उन्नीत प्राप्त करने की इच्छा देखने योग्य प्रसन्न करने के लिए वेमतलव का खच करने वाला बेमतलव का, असगत प्रदशनी प्राचाय प्रार्थी पराश्रित परान्नभोजी पतित परमार्थी पारलौकिक पारगत प्रत्यक्ष अपरोक्ष परीक्ष पितृव्य प्राकृतिक पुरुषत्व प्रोनीत प्राप्ति लालसा प्रेक्षणीय प्रीत्यथ फिजूलखच फालतू 50 फला हुप्रा फेन से भरा हुमा गदन म फदा डाल लटकाए जाने वाली सजा भूखे रह कर मी मस्त रहना जो सिर पर धारण करने याग्य हो शक्ति का उपासक फलित फेनिल फासी फाकामस्तो शिरोधाय शाक शाति का दूत शातिदूत शत्रुमो का नाश करने वाला वह कमल जिसम सौ दल हो पवत का शीपभाग जिसका आचार-विचार शीलयुक्त हो जो कल्याणकारी नही है जा दूसरो पर सन्देह करता है जो हो सके जो किया जा सके जिसके पास बहुत अधिक शक्ति हो जिस पर शासन किया जा चुका हो दो विद्वानो के बीच गम्भीर विवाद शास्त्र जिसका समथन करे चीड फाड द्वारा की जाने वाली चिकित्सा जहां न अधिक ठड लगे न अधिक गर्मी जाडे की धूप शत्रुघ्न शतदल शिखर शीलवान शिवेतर शकालु, शक्की शक्य सम्भव शक्तिपुज शासित शास्त्राथ शास्त्र-सम्मत शल्य चिकित्सा शीत-साप नियत्रित शीतातप शब्न-वेधी शौचालय यद्धय, श्रद्धास्पद सकर सग्निक्ट सहिष्णु, सहनशील सतत, निरन्तर सधि-स्थल सघिवाल शब्द को लक्ष्य बनाकर बेचने वाला मल मूत्र त्यागने का स्थान श्रद्धा के योग्य जिसके मां-बाप विभिन्न जातियों के हों जो विल्कुल निक्ट हो जो सह समे जिसका प्रम न टूटे जहां कई पदायों की सघि हो विभिन्न कालों की सघि जहां एक ही शव के मनर रूप विमिन प्रतिलिपियो म पाये जायें अधिकार प्राप्त वक्ता पाठान्तर प्रवक्ता 51 पिता की हत्या करने वाला कीचड से उत्पन कमल प्रिय बोलने वाली स्त्री पितृह ता पकज प्रियम्वदा पृष्टव्य पाशविक पूछने योग्य पशु सम्बधी तुरन्त उत्पन होने वाली सूझ बूझ प्रत्युत्प नमति प्रोपितपतिका प्रतिवादी प्रत्युत्तर पिण्डज पार्थिव परीक्षित पदच्युत पदोनति जिस स्त्री का पति विदेश मे रहता हो जो अभियोग का विरोध करता हो उत्तर का उत्तर जिसका जम पिण्ड से हो पृथ्वी का जिसकी परीक्षा ली जा चुकी हो जो पद से हटा दिया गया है एक पद से दूसरे पद पर उनति ऐतिहासिक युग के पूव का ऐसा दृश्य जिसे देखकर हसा जाय जिसका हल जल्दी मालूम न हो एक ही बात को बार-बार कहना जिसको पुरस्कार प्राप्त हुना है प्रयोग करने वाला जिसका प्रतिपादन किया जाय जिसके आधार पर दूसरो को नापा जाय पति को छोड़कर दूसरे से प्रेम करने वाली जिसे प्राप्त करना चाहिये पथिक द्वारा माग मे व्यवहार के लिए ली जाने वाली सामग्री पत्नी के साथ स्त्री के मन मे सौत के प्रति ईर्या का माव जहाँ सीमा का मत होता हो जिराको सीमा ज्ञात हो जिसका मन्त साथ हो परिवार के साथ प्रसनता के साथ प्रहसन प्रहेलिका पुनरूक्ति पुरस्कृत प्रयोक्ता प्रतिपाद्य प्रतिमान परकीया प्राप्तव्य पाथेय सपत्नीक सापत्य/सापत्य सीमान्त ससीम सपरिवार सहप 12 दुख के साथ वरुणा के साथ अपना अभिमान जो स्वय भोजन बनाकर खाता हो अच्छी तरह शिक्षा प्राप्त सुख देने वाला माहित्य के गुण दोषा की विवेचना करने वाला शास्त्र जो अच्छी तरह पका हुआ हो एक मां के पेट से उत्पन जो रचनाओ म सशोधन कर उसे प्रकाशन के योग्य बनाता है पसीने से उत्पन जा स्वय पैदा हुमा जिसम कामना मौजूद है जिसमे दोष हो नहाने का स्थान स्वभाव से उत्पन अपनी इच्छा से चलने वाला एक स्थान से हटकर दूसरे स्थान पर जाना जो स्थिर रहता हो वेवार अधिक बोलने वाला सखेद सकरुण स्वाभिमान स्वयपाकी सुशिक्षित सुखद साहित्य शास्त्र/ समीक्षा शास्त्र सुपक्व/परिपक्व सहोदर खूब चटकीला भटका हुमा मांग खाने वाला मजन कीतन करने वाला भोग के योग्य खाने के योग्य मारतवप का जो मार-जसा लगता हो हरामा जिस दसबर भय हो भ्रम पैदा करने वाला म्म्पादक स्वेदज स्वयम् सकाम सदोष स्नानागार स्वभावज स्वेच्छाचारी स्थानातरण स्थावर वक्ती घटकदार भ्रान्त मगही भजनीक मोग्य मोज्य मारतीय भारस्वरस भीत भयानक भयावह भ्रमोत्पादक 53 किसी बडे नगर या भवन का टूटकर बचा हुप्रा माग भग्नावशेष माग्य का उदय भाग्योदय तोड़ने वाला मजक जो हो चुका हो भूतपूर्व जहाँ भूत रहते हो मुतहा जमीन वालो से दान के रूप में जमीन लेने का आदोलन मूदानयज्ञ जो प्रकाश युक्त है भास्कर भारत और यूरोप की मूलभाषा भारोपीय भाषा भार से दबा हुमा माराकान्त दीवार पर बनायी हुई तस्वीर मिति चित्र भाषा का अध्ययन करने वाला विज्ञान मापा विज्ञान भाषा-सम्बन्धी माषिक जो अपनी हो मलाई सोचता हो स्वार्थी अपने पर ही अवलम्बित रहने वाला स्वावलम्बी स्त्री के समान स्वभाव और आचरण बाला स्त्रण जो दोनो हाथ से तीर चलाता है सव्यसाची जो सफल हो चुका हो फतीभूत उगा-सा रह जाना स्तम्भित किसी की स्तुति करना स्तवन सच के लिए सघष सत्याग्रह अपनी जाति का सजातीय, स्वजातीय कारण के साथ सकारण स्पष्टता के साथ स्पष्टत' विमिन वस्तुमो का सगृहीत रूप स्तवक जो सभी शक्तियो से युक्त हो सवशक्तिमान जो सब कुछ जानता हो सवज्ञ जिसका पति जीवित है सघवा जो पास ही स्थित है समीपवर्ती जो पढना लिखना जानता है साक्षर स्वास्थ्य बढ़ाने वाला स्वास्थ्यवधक एक ही उम्र का समवयस्क अपने भाप सेवा करने वाला स्वयंसेवक जिसने ससार छोड दिया है सन्यासी 54 जो बराबर ठडा और गम हो अपने अनुकल समशीतोष्ण स्वानुकूल सदावत स्मरणीय समदर्शी समकालोन जहाँ नि शुल्क भोजन मिलता हो स्मरण करने योग्य सबको एक समान देसने वाला एक ही समय म वतमान जो दूसरे के स्थान पर अस्थायी स्प से काय करता हो बहुत अधिक और जल्दी खाना भूगोल सम्बधी भाई भाई जैसा व्यवहार सौतेला माई भीख मागने क लिए घूमना धातु पत्थर भादि की मूर्ति बनान की क्ला- जो भण्डार का रक्षक हो मछली वेचकर जीने वाला महान् आत्मा माता की हत्या करने वाला मनन करने की इच्छा, मनन के साथ विवेचन- क्सिी मत को मानने वाला निर्वाचन म की जाने वाली मतो की गणना मांस पाने वाला मम (हृदय) को छूने वाला कम बोलने वाला जो मात्ररणा देता है जिस मे अधिक मास हो महीने में एक बार प्रकाशित होने वाली पत्रिका मनुष्य को छोडकर मुक्ति की इच्छा रखने वाला मदिरा पीने वाला मरने की इच्छा करने वाला मरता हुआ मूर्ति की पूजा करने वाला स्थानापन भकोसना भौगोलिक भाईचारा मिनोदर मिक्षाटन भास्वय मण्डारी मत्स्यजीवी महात्मा मातृहता मीमासा मतानुयायी मतगणना मांसाहारी ममस्पर्शी, मार्मिक मितमापी मत्री मांसल मासिक मनुष्यतर मुमुक्षु मद्यप मरण मुख नियमारण मूर्ति-पूजक 55 नस्ती से भरा हुआ महान् स्त्री मस्त महीयसी हास्यास्पद हास्यजनक हथसार हँसमुख हृदयहारिणी हव्य त्याज्य हाय जिसे देखकर या सुनकर हंसी आये हसी उत्पन्न करने वाला हाथी बांधने की जगह जिसके मुख पर सदा हसी रहे हृदय को हरने वाली यज्ञ मे माहुति के रूप म छाडे जाने योग्य त्याग करने योग्य जो हरण किया जाने योग्य हो मलाई चाहने वाला धुला हुमा जो क्षति से रक्षा करता है छोटा मोटा राजा या साम त बहुत दुबले शरीर का आदमी जो क्षमा के योग्य हो क्षमा किया हुआ जिसका क्षय हो रहा हो, होने वाला हो क्षमा चाहने वाला जो किसी काम को करने में समय हो जिसका हाथ तेजी से चले तीन व्यक्तियो का समूह रक्षा करने वाला, वारण देने वाला भूत, भविष्य, वतमान देखने वाला दैहिक, द विक और भौतिक सताप जो हवा शीतल, मद और सुगधित हो आकाश, घरती मोर पाताल गलतियो से भरा हुमा ब्रह्मा, विष्णु और महेश ऐसा नाटक जो दुसान्त हो बहुत बडा मूल्यवान् महिलाओं के उपयोग की वस्तु खुले हापो देने वाला हितेच्छु, हितपी प्रक्षालित क्षत्रिय क्षत्रप क्षीणकाय क्षम्य क्षात क्षयिष्णु, क्षीयनाम क्षमार्थी सक्षम क्षिप्रहस्त त्रयी भाता त्रिकालदर्शी त्रिताप त्रिविध वायु त्रिलोक चुटिपूर्ण त्रिमूर्ति या त्रिदेव त्रासदी महाप महिलोपयोगी मुक्तहस्त 56 झूठ बोलने वाला मन वचन और कम से कम खाने वाला वह स्त्री या गाय जिसका बच्चा मर गया है दो दलो के बीच स्थित रहने वाला माता का कुल मन की दशा मृग की आंखो की तरह प्रांखो वाली स्त्री मछली की तरह प्रांखो वाली स्त्री घूसे द्वारा होने वाली लडाई बिल्कुल नयी या आधारभूत बात जो कोई बात जल्दी से न कह सके शिकार के जानवरा से भरा हुआ वन मूर्तियो को तोडने वाला किसी बात के लिए दूसरे पर आश्रित वह फूल जो पूरी तरह न खिला हो दोपहर का समय दोपहर के बाद का समय मद से अलसाई हुई स्त्री मछली का भोजन मछली का भोजन वह लडकी जिसकी किसी के साथ मंगनी हुई हो यश ही जिसकी सम्पत्ति जहाँ तक शक्ति हो जहां तक सम्भव हो जो उचित हा जिसका अनुमव स्वय किया गया हो विभिन्न वस्तुमो को एक साथ मिना देना जिसका हृदय पत्थर के समान हो साथ-साथ रहना सदेश वह्न करने वाला अच्छी भोसो वाली स्त्री अपनी आयो से दखा हुआ प्रत्यक्षा मिथ्यावादी मनसा वाचा मरण मिताहारी मृतवत्सा मध्यस्थ मातृकुल मन स्थिति मृगनयनी मीनाक्षी मुष्टि-युद्ध मौलिक मुहंदूवर मृगकानन मूर्तिमजक मुहताज मुकुलित मध्याह अपराह मदालसा मत्स्याशन मत्स्याशन मगेतर यशोधन यथाशक्ति यथासम्मव यथोचित स्वानुभूत सश्लपण सगदिल सहमस्तित्व स देशवाहम सुलोचना साक्षाद 57 स्पृहणीय मनापति सय शक्ति सैधव स्वातनयात्तर स्वात सुखाय स्वनिर्मित स्वागत गान सुपुप्सा सुश्रुत सुवक्ता सुपाठय हस्तलाघव हस्तातरित हृदय विदारक जिसकी अभिलाषा की जा सके सेना का संचालक सेना की शक्ति सिधु प्रदेश का घोडा या नमक स्वतत्रता के बाद वाला अपने ही सुख के लिए अपना ही बनाया हुआ किसी के स्वागत में गाया हुअा गीत सोने की इच्छा अच्छी तरह सुना हुभा अच्छा बोलने वाला जो आसानी से पढा जा सके हाथ का कौशल एक हाथ से जो दूसरे हाथ में चला गया हो हृदय फाड देने वाला हिंसा करने वाला हृदय की वीणा जो अधिक स्वस्थ हो हृदय को प्रसन करने वाला हप से फूला हुआ हाथ का लिखा हुमा सदा घूमते रहने वाला मांगने वाला यत्र-सम्बधी यज्ञकरने वाला जो यश का स्तम्म हो यश प्राप्त पुरुष यश को धारण करने वाला युद्ध मे स्थिर रहने वाला युवको के लिए जो उचित हो क्रम वे मनुसार जब तर जीवन है तब तक युवको के लिए उपयोगी हसक हृत्त त्री हृष्ट पुष्ट हृदयरजक हर्षोत्फुल्ल हस्तलिखित यायावर याचक यात्रि यानिक यशोस्तम्म यशस्वी यशोधर युधिष्ठिर युवकोचित यथाक्रम यावज्जीवन युवकोपयोगी 58 चाहे जिस प्रकार से भी हो युद्ध की इच्छा जितना चाहिये या जितना इप्ट हा उपयुक्त तकसगत युग का प्रवतन करने वाला युग की धारा विवाह में मिला हुआ धन ऐसा मृत व्यक्ति जिसका यश रह गया हो जो बात जल्टी समझ मे न पाये जो रस का मानद लेता है वह सुदर स्थान जहाँ घूमा जा सके खून से रंगा हुआ राजा के प्रति भक्ति राज-काय में भाग लेने वाला पुरप राजाओ के हाथ में रहने वाला दण्ड राजनीति जानने वाला सतोगुण, तमोगुण और रजोगुण येन-बन प्रकारे युयुत्सा यथेप्ट युक्तिसगत युग प्रवतक युगधारा दहेज यश शेष, कीतिशेप रहस्य रसिक रम्य रक्तरजित राजमक्ति राजपुरुष राजदण्ड राजनीतिज्ञ त्रिगुण प्रस्त सताया हुमा नानी बहुन बहुत अधिक जानने वाला जो बताया जा चुका हो ज्ञान की गरिमा जानने योग्य शान देने वाली जो जाना जा चुका है जो जाना जा सके जो पान मे बडे, ज्येष्ठ हा जो मर गया हो युद्ध से डर जाए जो किसी अच्छे पाय के लिए अपनी जान देदे जो इघर को वात उधर करता हो छोटे पन या भाव जो गायब हो चुरा हो नापित मान-गरिमा ज्ञातव्य ज्ञान-वरक पात मय मान-ज्येष्ठ मान-वृद्ध स्वगवासी कायर शहीद नारद सधुता सुप्त 7 59 लिपि शास्त्र लक्ष्मीपुत्र बौना लघुतम लौरी लोकलाज लोकमा य लोकसम्मत विभिन्न प्रकार के प्रक्षरो का अध्ययन करने वाला शास्त्र जो बहुत धनी हो, जिस पर लक्ष्मी की कृपा हो छोटे शरीर वाला, दुबला पतला सबसे छोटा बच्चो को सुलाने के लिए माताओ द्वारा गाया जाने वाला गीत दुनिया की लाज या समाज वालो को शम ससार जिसे माने लोग जिससे सहमत हो सामान्य जनता के बीच प्रचलित मनोरजक कहानियां जो वर देने वाला सौतेली मां जो विश्वास के योग्य हो जिस पर विश्वास किया जा चुका हो जिसकी पत्नी मर गयी हो जिसका पति मर गया हो बिना पत्नी के साथ विपत्ति से उत्पन्न विज्ञान जानने वाला विदेश सम्बधी वन में उत्पन वहुत बोलने वाला बोलने की शक्ति चुना जा सके लोककथाएँ वरेण्य वरद विमाता विश्वसनीय विश्वस्त विधुर विधवा विपत्नीक विपत्तिजय वैज्ञानिक वैदेशिक वनज वाचाल वाक् शक्ति 60 शब्द समूह प्रर्यातर मय अधूत अवधूत अभय प्रथ उभय अमित अमात्य प्रमीत अमित निमय, अकपित सयासी निमय दोना अत्यधिक मत्री आँसू हथियार काला मोथरा मूल्य पूजा सामग्री अनुचित शत्र अपार अब्द अश्रु अस्त्र प्रमित अशित प्रघ प्रष्य प्रविहित अमिहित प्रथक आकार प्राभरण आमरण माहरण मायत आयात कमल बादल वप जो कहा नही जाय पढना पढाना मनोयाग प्रशसित काय की देन प्रवथ अध्ययन प्रध्यापन अवधान प्रवदान अलक अलिक अलीक उक्त बिना थके हुए रूप सूरत गहना मरण तक हरना, लम्बा चौडा बाहर स माना बाल ललाट प्रात इति भयश दुखी माद्र इन इतर प्रयस प्राय अमिन भनमिन अधम দুদ मधम अक्ष अपकीर्ति लाहा प्राज्ञा जानन वाला अनजान नीच बिना धुएं का पाप धुरी, माख एक देव जाति ईशा ईपा अन्त गीला सुगध दूसरा चन्द्रमा चूहा ऐश्श्य हल की लकही एक घम प्रचारक उद्दण्ड उदासीन भोग विलास म मीन मानसिक रोग ईसा यक्ष उपरत उपरक्त प्रति मोरा पली प्राषि आरति विरक्ति दुस 61 प्रथ शब्द प्रथ उत्पल कमल अवधि अवधी माल समय अवध देश की भाषा आहुति यज्ञ मे हवन की गई वस्तु भारम्म, इत्यादि अभ्यस्त पत्थर ण्डा आहूत मत ऋतु कुल कल कश प्रादि मादी उपल उपला परति भारती अपकार उपकार आहूति मासन प्रासन मावास कप शत्रु देवता को धूप दीप बुराई मलाई होम बैठने की कोई वस्तु निकट आया हुमा बासस्थान क्स नादी आभास नमित निमित्त निगुत नियुक्त झलक आकर दशन खान दात दांत से काटना निमत्रित सत्य मौसम वश किनारा चाबु कसौटी दवाव, बल मगलाचरण (नाटक का) भुका हुमा हेतु लाख, दस लाख लगाया हुआ, स्थापित या निश्चित क्यिा हुमा बादल कमल प्राप्त व्यवहार की पद्धति न इति, जिसका छोर ही न हो मथानी की रस्सी देवता झरना चद्रमा राक्षस स्त्री दशन दाह दिवा देव देव द्रव द्रव्य दश जलन नीग्द दिन नीरज देवता नीन भाग्य नीति रस, पिघला हुआ नति पदाथ, धन डक, काट नेति दस (गिनती का प्रक) निजर निझर निशाकर निशाचर नारी हर दिन दश नित नीत निहत निहित लाया हुआ मरा हुमा छिपा हुमा 62 शब्द प्रय शब्द प्रथ झण्डा मुख्य पोशाक वस्त्र नर कठोर दीपक उलटा कृपा, मोग नीर नीड नियत नियति नीयत नगर नागर नशा निशा निशित निशीथ निवार नीवार नदी परिणय प्रवल प्रवर परिणाम परिमाण पास पाश पानी पाणि पिक पीक प्रकार प्राकार प्रणाम प्रमाण पुष्कर पुष्पल परमिति जल घोराला निश्चित भाग्य मशा इरादा शहर शहरी, चतुर व्यक्ति बेहोशी, म' रात्रि तीक्ष्ण माधी रात रोक्ना घान शिव का बैल विवाह शक्तिशाली श्रेष्ठ नतीजा, फल मात्रा नजदीन, निकट बधन जल हाथ कोयल पान मादि की थूक विस्म, तरह, भेद घेरा, चहारदीवारी नमस्कार नाही निशान निसान प्रधान परिधान पुरुप परुप प्रदीप प्रतीप प्रसाद प्रासाद प्रणय प्रद्वप प्रहार परिहार परिक्षा परीक्षा प्रतिशोध प्रतिषेध पथ पथ्य परिच्छद महल प्रेम शत्रुता वार, मापात परित्याग, रोकना कीचड इम्तहान बदला मनाही, निषेध रास्ता रोगी का भोजन पोशाक, ढकने की वस्तु अध्याय विभाग नौकर चाकर घर के लोग बादल नगर परिच्छेद परिजन बाढ, माधिक्य सबूत, नाप पजाय पुर पूर पाश पाश्व पलटी जलाशय पवित्र, बहुत मान मर्यादा, तौल बन्धन बगल बदली, वापसी - 63 प्रथ शब्द अथ पय प्रिय, सासारिक पीने योग्य ऐश्वय, पराक्रम दुख, सन्ताप पत्थर फैलाव पलथी पौत्र पोत प्रण प्राण भेजा हुआ प्रताप परिताप प्रस्तर प्रस्तार प्रषित प्रोपित पवन पावन परवाण पशु पाशु पाश पयत पपक प्रदेश बैठने का एक ढग पोता जहाज प्रतिज्ञा जान पत्थर पवित्र मेहमान चिता धारा परकोटा प्रत्यधिक क्रोध विदेश जाना मूगा पाहन पावन पाहुन परवाह प्रवाह प्रकोट प्रकोप प्रवासी वायु पवित्र जूता जानवर धूल, बालू बघन प्रवास प्रवाल मीत तक डरा हुआ पण महल ससार भारत के वासी सरस्वती, वाणी बलि बली बाम बोस कीमत किरण सूय चद्र पलग प्रात साप का फन क्ला, कारीगरी बलिदान वीर महक, ग घ एक वनस्पति बहिन ढोना ताक्त मेष, वलाहक भाट चारण वदी जो खुला हुम्रा नही है बुरा वर्षा भवन भुवन भारतीय भारती मूल मूल्य मरीचि मरीची मरिच मद मद्य मनुज मनोज मेध मेघ मरिण मणी वहन बल मिच (काली) अहवार, नशा शराब मनुष्य कामदेव बादल पल वादी बदी यन रत्न बद बारिश सर्व 64 प्रथ मथ वारीश बात वात पुरा पूरा बहु समुद्र वचन हवा सराव शवर चूरा बहुत गोश्त महीना मनु से उत्पन्न नरभक्षक दरिद्र मांस माम मनुजात मनुजाद रक रग रग राग रत रति वर्ण नस लय बहू पुत्रवधु, व्याही स्त्री बंधा हुमा छेदा हुमा दफा विद्ध बार वार बिना बान रोचक रेचक लीन कामदेव की पत्नी, प्रेम रुचने वाला दस्तावर उद्देश्य लाख नमक विधान, कानून लक्ष्य लक्ष बाण वर्ण व्रण वरण भट लवण विधेयक व्यग व्यग्य भाट भित्ति लवान चोट, दिन अमाव आदत चमक तीर रग घाव चुनाव सिपाही पारण दीवार, आधार खेत की कटाई पावती द्वारा प्रावि प्कृत एक नृत्य शव नृत्य कपडा प्रादत लत जहर कमल का डठल वर देने वाला समूह भुण्ड विकलाग ताना, उपालम्म, वाच्य से अलग प्रथ वप सदावत यज्ञ दुश्मन महादेव मिश्रित, दोगला तालाब सिर लास्य सत्र शत्रु शवर सकर वाण तीर शर लाश लास वसन व्यसन विष विस वरद वीर देवता लय मघा, सूय बरद 65 प्रथ शब्द प्रथ यश विरद विस्मृत विस्मित वित्त सुत सूत मूची सूचि भूला हुमा चषित धन गोलाकार छद या वृतात क्था ऐश्वय वृत्त विभूति विभीति वाद शुचि शची सम হাম सुअन सुमन सग वाद्य तक विचार बाज चीज मकान जगल विपत्तिग्रस्त कामना सुगधित करना, वस्तु वास्तु विपिन विपन्न वासना बासना स्वग बेटा सारथी धागा विषयत्रम पहरिस्त सुर्द, सूचना करने वाला पवित्र इन्द्राणी समान मयम इद्रियनिग्रह पुन फूल अध्याय तीसरा लोक सब शिव अच्छी उक्ति सीप लीला के साथ पानी पतिव्रता स्त्री सैक्डा सार माग देने वाली सरस्वती समिति माथ सव महकना शव सूक्ति शुक्ति सलील सलिल विक्ट विक्च विक्रीत वित्रात विधायक कठिन खिलाना खिला हुआ जो बेचा गया है सती शूर, वीर, तेजस्वी शती सारदा शारदा सागर सध सग सदेह के साथ सागुर सिर सीर सुधि सुधी सुपर शूकर रचने वाला, विधान बनाने वाला समुद्र प्याला मस्तक हल, हल की लकीर स्मरण विद्वान, बुद्धिमान आसानी से होने वाला सूअर सात सकल शकल शक्ल शक मम्पूण टुकड़ा, पण्ड चेहरा पुण्य सुकृत शकृत मैला, विष्ठा 66 शब्द अथ शब्द अथ शप्त सुकृती स्वच्छ पुण्यवान् साफ सबस शबल स्वक्ष सुदर प्रांख सहर स्वपच स्वयपाकी शहर श्वपच चाण्डाल साला स्वजन अपना आदमी शाल श्वजन सज्जा शाप पाया हुआ ताकतवर चितकबरा, रगबिरगा सवेरा नगर पत्नी का भाई घर, मकान वेसन का एक पक्वान एक फल जानकी चीनी एक धातु काच सरश तरह सामग्री मुंह स हवा लेना पति या पत्नीकीमा पमीना सेव सेब सीता सिता सीमा शीशा शय्या कुत्ते सजावट बिद्यावन फीस चदा स्वच्छ उज्जवन शुल शुक्ल शव लाश शव रात समान श्रवण सुनना कान सामान थमप सोम स्त्रवण सास धोत स्वद स्रोत श्वेत सलिल उजला पानी हरि हरी हंसी हमी वौद्ध स यासी मिक्ष टपरना चू पडना पान पारा उद्गम विष्णु हरे रंग की हंसने की रिया हरा यी मादा हपियार सदाति प्रप शशधर पदमा शशिपर महादेव धरित्र, चाल चला महर, टपा सताट पारी मील शेखर शिमर शास्त्र शपथ घमथु दाढ़ी मूछ 67 शब्द पर्याय एय शब्द विलोम हिंदी शब्द-समूह की यह विशेषता है कि एक शब्द के प्रथ का प्रकट करने वाले कई शब्द होते हैं । यहाँ कुछ शब्द दिए जा रहे ह । इसी प्रकार कुछ ऐसे शब्द भी हैं, जिनके विपरीत अथ वाले शब्द प्रचुरता से प्रयोग म पात हैं । "शब्द विलोम" शीपक से एमे भी कुछ शब्द दिए जा रहे हैं । शब्द-पर्याय ईश्वर-- परमात्मा, परमेश्वर, परमेश पारबह म, प्रम, जगतपिता जगदीश, जगनाथ । कमल- जलज, वारिज, नीरज, अम्बुज, सरोज, पक्ज, पक रूह, मरसिज, नलिन, कुवलय, अरविंद, पद्म, उत्पल, पुण्डरीक, वज राजीव आदि । अग्नि- वहि, अनल, पावक, हुताशन, वश्वानर कृशानु, ज्वलन प्राग जातदेव, हव्यवाहन आदि । माकाश- नभ गगन, अम्बर, तारापथ व्योम, अतरिक्ष, अनत, शूय, अभ्र प्रादि। अमृत- सोम अभी अमिय, सुघा मधु, सुरभोग पीयूष ! तुरग संघव बाजि घाटक, हय, घोडा आदि । राक्षस, निशाचर निशिचर, दानव, दनुज सुरारि दैत्य । लोचन चक्षु दृग नेत्र, नयन, अक्ष । कामदेव मदन मनसिज मामथ, अनग मार काम, मनोज, कप, पधशर स्मर पुष्पध वा, मनिकेतु रतिपति । सदन अलय, प्रागार, निलय निपेतन निकैत, भुवन, भवन मन्दिर प्रावास घाम आयतन प्रादि । शत्र, पुर दर सुरपति देवद्र महे द्र, शचीपति देवराज, मघवा आदि। सुरसरि मदाकिनी, भागीरथी दवन दो देवापगा सुर- सरिता ब्रह्मदेव, विपथगा जाहवी विष्णुपदी आदि । चद्रमा- शशि, सुधाकर, राकापति रजनीपति, अवनीश, निशाकर, सुघाशु, हिमाशु मृगाव, द्विअराज शशाक हिमकर, कताधर क्षमाकर, इदु सोम, विष्णु चन्द्र चांद आदि । सरस्वती- भारती, शारदा, वाणी, वीणपाणि, वीणावादिनी, महा- श्वेता, गिरा, वास, प्रादि । अश्व- असुर- पाख- गगा- 68 रामचद्र- अप, पप, जीवन उदय नीर, वारि, प्राध, मलिल, ताय मादि। रघुपति रघुनाथ दशरयन दन, कौशल्यान दन, जानकी यस्लम, मीतापति, अवधेश, रघुनन । वामन, भरपय वन विपित। शिव शमु पशुपति शर चन्द्रशेपर महश्वर भूतेश नौलवाठ, त्रिलोचन, कैलाशनाथ, गिरीश गिरिजापति महादेव- आदि । तालाब- देवता-- नदी-- पवन- पृथ्वी- मर, सरोवर जलाशय सरसरि हुन, तडाग पुस्कर प्रादि । दिवस वासर, दिवा, अहा, मह आदि । सुर, अमर देव, विवुध, विश दिवोक्स वृदाकारक, स तिनदन प्रादि। सरिता नद, तटिनी, तरगिनी, निम्नगा निभरिणी मादि । गिरि, भूघर भूमिधर, धगधर महीधर अद्रि, नग, शैल अचला वात, वायु, अनिल. समीर मस्त । भू, भूमि धरा मही अवनि, अचला, धात्री धरणी वसुघरा परिणी, उर्चा रत्नगर्भा, अनता वसुधा । गज, कु जर, नाग मतग, वाण, द्विरद्व, करो। नृप नरेश नरपति, भूपत्ति, भप, महीप । वस्त्र पट, चीर अम्बर, वसन । माग राह, रास्ता। जनक, बाप, तात्त, पितृ अनुज वधु अग्रज, तात, भ्रात। वैकुण्ठ, देवलोक, नाक, सुरलोक । हस्त, पाणि कर भुजा बाहु । पीडा वेदना वष्ट, विषाद, सक्द, मताप क्लेश शोक । कालिटी, कलि दना, तरणि तनजा रविमुता तरमिजा। मयूर देसी, क्लापी, शिखण्डी। कपि, वानर मकट, हरि शाखामृग । मत्स्य, भव मीन सफरी जलजीवन । कपडा- पिता- भाई- दुस- यमुना- मछत्री- है 69 पत्नी- तलवार-- गरुड- . धन-- हिमालय- बडा- उद्यान- प्रेम- पैर- पुत्र- पुत्री प्रमा - बहिन- बाज- बिजली- अर्धागिनी, भार्या, कलत्र, गृहिणी, वामा, जाया, दारा, सहमिणी। खडग, करवाल, चद्रहास, कृपारण, प्रसि, शमशीर । खगेश, वैनतय, पक्षिराज, हरियान, उरगारि । सम्पत्ति, द्रव्य, विभूति, पवतराज हिमानी। नगपति हिमाद्रि, पवतराज हिमानी। विशाल, दीप, बृहत् महाविराट् । बाग, उपवन वाटिका। रति, अनुराग स्नेह राग, प्रणय । चरण, पाद, पद। बेटा तनय सुत भात्मज, नदन । बेटी तनया, प्रात्मजा, सुता अपत्या, क या तनूजा । माभा, छवि, दीप्ति द्युति । पुष्प, कुसुम पहुप सुमन प्रसून । भगिनी, सहोदरी, स्वसा। क्पातारि, करग, श्येन, शशादन । चपला, दामिनी सौदामिनी, चचला, विद्युत, शपा, क्षणप्रभा धनवाम । सारिका, सारी, चित्रलोचना कलहप्रिया, मधुरालापा । निर्वाण, केवल्य, मुक्ति। मृत, मृतक, शव। मुख, प्रानन, वदन । दादुर ददु र, शालूर भेक । भास भीति डर। पिशित, आमिष पलल । माथा, ललाट, भाल कपाल । सखा, दोस्त, सहचर सुहृद । मो, अम्बा, मैया माई अम्बिका, जमदात्री। विप्र द्विज, अग्रजमा, भूदेव, भूसुर । रजत, रूपा, रूपक रौप्य । पोत, जलयान, वोहित । गोदी प्रक। मलयज, मगल्य, श्रीखण्ड । मैना- माक्ष- मुर्ग- मेढक- मस्तक- मित्र- माता- ब्राह्मण- चांदी- जहाज- गोद- चदन- 70 ठग- पूत, छली, पचम। प्रयीण, नागर, कुशल, पटु निपुण, विदग्ध । असत्य, मिष्या। तारा- जीम- सद्योत- तोगा- दीप- दूध- धनुप- पत्थर- नरक- पक्षी- पत्ता- पा-- पावती- बालक- मोती- मनुष्य- वृक्ष- तारस, उह, नान । रसना, रसा, जिह्वा । जगुन, प्रमाणीट, पटवोजना । तान, ताग्रम, तामा, रक्तधातु दीप, प्रदीप, गृहमणि । पय, दुग्धं, स्त य पीयूप अमृत । चाप धनु, कोदण्ड, सरामन, कामुक प्रस्तर पापारण, उपल पाहन । यमपुर यमालय, यमलोक विहग, पतग नभचर खग । पर नव पण दल, पर क्सिलय । बाबदल ताम्बूल, नागल। उमा, गिरिजा भवानी गौरी अम्बिका शिवा । शिशु अमक, किशोर शावक, बेटा, लडा कुमार । सोपिज मुक्ता मोक्तिक । मानव नर जन, मनुज मानुष । पैड शाखी पादप द्रम, विटप बिरवा । मदिरा, हाला पासव हलप्रिया मद्य । मकरद मधु पुष्परस पुष्पास्य । गणनायक लम्बोदर गजबदन एकदत । वारिद, जलघर नीरद, पयोधर । निशा यामिनी, निशि, रात्रि 1 गरिधि, नीरघि रत्नाकर जलधि सि धु । व्यान नाग, मुजग, विषधर, अहि । कोकिला सारग, वसततिका । मधुप भ्रमर अलि मधुकर । जनादन, माधव केशव । इदिरा चचला कमला सम्पदा, श्री -- शहद- गणेश- बादल- रात- समुद्र- सप- कोयल-- कृष्ण- 71 शब्द-विलोम शब्द विलोम शब्द परतत्र कोमल भेद दुलभ पित देव पराजय दोष धनी धम मूख पतन विपक्ष यून अध्याय कृत्रिम थोडा त्याज्य घरा नख नगर नर प्रकाश सात्विर वृद्ध स्वतन परप जय पण्डित उत्थान पक्ष अधिक याय नसगिक बहुत ग्राह तीन तिमिर तामसिक तरुण सच जगम ज्योति जीवन जागत थल चेतन मूक मुख्य जीवित मिलन मानव मान माता महात्मा मनुज विलोम अभेद सुलभ स्वच्छ दानव मुग निधन अघम गगन शिख ग्राम नारी प्राचीन शाश्वत ग्रामीण आस्तिक सदोप श्रुटि निषेध गौण निवति निदा प्रच्चन्न भाग पुण्य पौर्वात्य अर्वाचीन नवीन घरा बुढा मुक्ति स्थावर तम नवीन नश्वर नागरिक नास्तिक निर्दोष निदा विधि प्रधान प्रवृत्ति प्रशसा प्रगट पानी पाप पाश्चात्य प्राचीन पुरातन प्रेम मरण सुपुप्त जल जह वाचाल गौण मृत विरह दानव प्रपमान पिता दुरात्मा दनुज बच्चा बघन बदर 72 विलोम विलोम भौतिक निपिद्ध निर्जीव निमल निरप निरक्षर नेता मला आध्यात्मिक लिहित सजीव मलिा साथ साधार पुरातन गुरा भभद्र सगोल भविष्य बहिरग बाह्य याद वद्ध वृहत विपत्ति विषया विधि विपन्न विमुस प्राम्पतर অবিবা बालक लघु सम्पत्ति राघवा निषेध भूगोल मोक्ष मगल यश प्रत्यक्ष प्राधित अपेक्षा मास्तिक अमृत अनाथ मनुकूल प्रथ इहलोक उमुख चढाव परोक्ष अनाथित उपक्षा नास्तिक विप सनाथ प्रतिकूल अनथ परलोक विमुख उतार भाटा वितृष्णा प्रकाल निर्दोप ध्वस घात परकीय प्रधान परमाथ विरत वैतनिक वैमनस्य शकुन श्वेत शोक श्रय सकी। साकार लिप्त विशिष्ट सम्पन्न आमुस वपन प्रमगल अपयश सुवाल सदोप निर्माण प्रतिघात स्वकीय गौरण स्वाथ निरत भवतनिक सौमनस्य अपशकुन स्याम हर्ष दृश्य विकीरण निराकार प्रलिप्त साधारण ज्वार तृष्णा अनाच्छादित पाच्छादित कनिष्ट क्लुप माकपण पूर्ववर्ती निष्कलुष विकषण परवर्ती 73 शब्द भौतिक लौकिक गरीव निमय विलोम अभौतिक अलौकिक अमीर सदय लघु अपेय अनश्वर निजल सघटन स्वकीया हस्व हार हास्य क्षणिक ज्ञानी सुगम विलोम विघटन परकीया दीप जीत रूदन शाश्वत मूख दुगम पेय नश्वर सजल घतथ अध्याय राष्ट्रभापा और राजभाषा हिन्दी I राष्ट्रभाषा का प्रथ और अवधारणा- किसी राष्ट्र की सामा य व्यवहार की भाषा को राष्ट्रमापा कहते हैं। "राष्ट्रभाषा के लिए एक राष्ट्र की स्थिति अत्यन्त आवश्यक है, जो प्रधानत जन-समुदाय पर निमर है, देश और राज्य का राष्ट्र में प्रताव रहता है । राज- काज की दष्टि से कोई देश या राज्य एक हो सकता है, किन्तु जब तक राष्ट्रीयता एक न हो तब तक राष्ट्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारत एक देश है और शासन की दृष्टि से यह एक सघीय गणराज्य है, जिसमे प्रत्येक प्रदेश एक राज्य है । प्राजादी के बाद शासन की दष्टि से भारत के सभी राज्य एक राष्ट्र के रूप में संघटित हुए विन्तु सास्कृतिक दृष्टि से भारत भाजादी के पूर्व भी एक राष्ट्र था। शासन की भाषा प्रर्थात् राजमापा उस समय अंगरेजी अवश्य थी पितु सास्कृतिक प्रादान प्रदान और व्यवहार की भाषा अंगरेजी नही यो । उत्तर से सुद्गर दक्षिण तक तथा पूर्व मे पश्चिम तक जिस मापा का सामा- “यत व्यवहार होता था, वही उस समय की राष्ट्रभाषा थी । वह हि दी ही थी। इस्लाम शासन काल मे भी हिदी ही राष्ट्रभाषा के स्थान पर प्रतिष्ठित थी, यद्यपि राजकाज मा सचालन उसमे नहीं होता था। मत राष्ट्रमापा का मय किसी दश की राजभाषा होना नहीं है । राष्ट्र- भाषा वह भाषा है, जिसे किसी देश का माम मादमी समझ सके, जिसमे सुदूर क्षेत्रों तक अपना सामाजिक, सास्कृतिक और व्यापारिक व्यवहार कर सकें। ऐसी भापा जिसमे समस्त देश की संस्कृति की अभिव्यक्ति होती हो, जो उस देश की जातीय एकता की अभिव्यक्ति में समय हो, जिसमे प्रशों को क्षेत्रीय मापामों के 75 मदो मोर प्रयोगो का प्रवेश निर्वाप रूप से होता हो सपा जिसमे देश के साथ- जनीन साहित्य की सरचना होती हो-उम देश की राष्ट्रमापा पही जा सकती है । वस्तुत राष्ट्रमापा का समृद यतमान ही नहीं एक समृद्ध परम्परागत अतीत मी होता है । य सभी विशेषताएं रखने वाली मापा मारत मे हिन्दी ही है । मत यही भारत राष्ट्र की राष्ट्रभाषा है । ॥ राष्ट्रभाषा भौर राजभाषा का अन्तर- जैसा कि हम पहले यता पसे हैं, राजभाषा वह भापा है, जिसमे राजकाज चलता है, जबकि राष्ट्रमापा सपूण राष्ट्र में सापजनिक व्यवहार की भाषा होती है। मत राष्ट्रभाषा को हम सीमित अथ म सम्पन भाषा भी कह सकते हैं, जवपि राजभाषा के लिए यह मावश्यक नहीं है कि वह सम्पप मापा भी हो। इसी प्रकार यह भी मावश्यर नहीं है कि राजमापा पिसी राष्ट्र की सास्कृतिय अभिव्यक्ति की भाषा हो या उममै उस देश का साहित्य भी लिखा जाए । स्वा- धीनता से पूर्व अंगरेजी भारत की राजमापा थी, मि तु वह न तो भारत की राष्ट्र- माषा थी, न सम्पक मापा । जहाँ-जहाँ मंगरेजों का शासन रहा, वहाँ-वहां भंगरेजी राजभाषा बन कर पहुंची और स्थानीय राष्ट्रभाषा, सम्पक भाषा, क्षेत्रीय भाषा तथा चोलियो को उसन दवाया, कुचला उनरा विकास प्रवस्त किया । जब वे देश माजाद हुए तो उहोंने अपनी भाषामो को राजभाषा बनाया तया अंगरजी को अपने अपने देश से निकाल बाहर किया । भारत में स्वाधीनता के पश्चात् सविधान में हिंदी को राजभाषा को स्थान दिया गया, किन्तु साप में कुछ समय के लिए अंगरेजी को भी रखा गया, जिसके मयवर परिणाम हमारे सामने हैं । आज 42 वर्षों से अधिक का समय हो चुका है कि तु अंगरेजी को हटाकर हिदी को राजभाषा का पूर्ण स्थान देने की स्थिति नही मा पाई है । राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का विकास- प्राचीन काल मे समस्त भारत की राष्ट्रभाषा सस्कृत थी । भारतीय संस्कृति के मादि अथ 'वेद' सस्कृत मे ही रचे गए । वेदों के पश्चात् रचित भारत का विशाल साहित्य भी सस्कृत में ही मिलता है तथा धार्मिक प्रपा की भाषा भी सस्कृत हो रही मौर आज भी है । आयुर्वेद सगीत, शिल्प मादि विभि न कलामो की भाषा भी प्राचीन काल मे सस्कृत ही थी। व्यावरण दशन, पुराण प्रादि का सस्कृत मे पूण विकास मिलता है । कश्मीर से असम तथा सुदूर तमिलनाडु तक सस्कृत का अध्ययन और व्यवहार गौरव का विषय माना जाता रहा है । धीरे-धीर सस्कृत का स्थान प्राकृत भाषा ने लिया और समस्त देश में सास्कृ- तिक आदान प्रदान की भाषा के रूप मे सस्कृत का प्रयोग होते हुए II A * 76 छठी शताब्दी ईस्वी तक भारत की जन मापा रही एव उसमे साहित्य भी लिखा गया, कि तु इस समय भी राष्ट्रमापा का गौरव सस्कृत को ही प्राप्त रहा । छठी शताब्दी से पूर्व प्राकृत कई रूपों मे क्षेत्रानुमार बंट चुकी थी । इसलिए धीरे धीरे उससे विभिन्न अपभ्र शो का उदय हुमा, जो अपने प्राकृत रूपो के अनुसार मागधी अपभ्र श, अद्ध मागधी अपभ्र श, शौरसेनी अपभ्र श, महाराष्ट्री अपभ्र श, नागर अपभ्र श, उपनागर अपभ्रश, बाचड अपने श, तथा पंशाची अपभ्र श बहलाई । इन अपभ्र शो से उत्तर भारत की विभिन आधुनिक भापानी और बोलियो का धीरे-धीरे विकास प्रा । शौरसेनी अपभ्र श मे अवहटट जिस "पुरानी हि दी भी कहा जाता है विकसित हुई, जो काला तर मे हिदी के रूप में स्थापित हुई । इस प्रकार सस्कृन से हिदी तक एक ही भाषापारा का एक अखण्ड प्रम मिलता है, जिसमे विशाल भारत देश के राष्ट्रीय व्यवहार व्यापार एव सास्कृतिक विकास काय चले। यद्यपि दक्षिण भारत की क्षेत्रीय भाषाएं प्राचीन काल से मिन रूपो म विकसित हो रही थी, कि तु राष्ट्रभाषा के रूप में वहा भी सस्कृत का ही व्यवहार होता था और बौद्ध जैन धर्मों के प्रचार के लिए प्राकृत, पाली, अपन श का प्रयोग होने पर भी सस्कृत ही राष्ट्रीय कार्यों में अपनाई जाती थी। मुस्लिम शासन काल मे देश के जिन क्षेत्रो म इस्लामी राज रहा, वहाँ फारसी राजमापा हो गई, वितु वह जन सम्पक की भाषा नहीं वन सरी । यद्यपि इस काल में सस्कृत की महिमा घट रही थी और बालचाल म भी प्राकृतो तथा अपभ्र शो का प्रभाव बढ रहा था, दि तु पिर भी धार्मिक व्यवहारो मे समस्त देश मे सस्कृत का ही प्रयोग होता था और पाज भी होता है । मत उसस विकसित कोई भाषा ही जन जीवन मे जीवित रह सकती थी और माा भी रह सकती है न कि विदेशो से आयातित-कोई मापा-चाहे वह फारसी हो चाह अंगरेजी। ग्यारहवी शताब्दी से अंगरेजो के प्रागमन और अंगरजी शासन की स्थापना समय तक इस्लाम शासित क्षेत्र म फारसी राजभाषा रही, कि तु वह राष्ट्र- भाषा नहीं बन सकी । अंगरेजी मी उनीसवी शती के आरम्भ से ही भारत में प्राई नई गुलामी के साथ राजमापा के पद पर या बठी थी, वितु वह भी यहाँ की राष्ट्रभाषा नहीं बन सको। समस्त दश की प्रादेशिक भाषाम्रो ने जमकर उसका मुकाबला किया मौर अपने अपने अस्तित्व की रक्षा के साथ साप सस्पत की अपण्ड धारा के बदलते हुए रूपों का पोषण दिया । जिसका फल यह हुमा कि फारसी के राजभाषा-काल म हिदी राष्ट्रभाषा के रूप में मारतीय अस्मिता की रक्षा के लिए जमकर खडी ही नहीं रही, बल्कि अपना सवतोमुखी विकास भी परती रही।
77 जसा कि हम पहले वह आए हैं, अपभ्र शो के विकास काल मे हिदी को अपना स्वरूप मिलने लगा था । शौरसेनी अपभ्रश से व्रज क्षेत्र में प्रजमापा का विकास हो चला था। इसमे विभिन प्रदेशो की शब्दावली को मिलाकर साधु स यासी देश भर मे दानिक और सास्कृतिक मत-वादो का प्रचार करते हुए घूमते थे । इस प्रकार प्रारम्भ मे शौरसनी अपभ्रश से सधुक्कडी भापा या सत भाषा जन सम्पक के लिए विकसित हुई थी जिस “मापा' नाम देकर जनता ने अपने व्यवहार के लिए स्वीकार किया था । ग्यारहवी शती मे गोरख पथ चलाने वाले गुरू "गोरसनाथ ने इसके विकास का माग खोल दिया था और बाद म महाराष्ट्र के सत नामदेव ने भी मराठी भाषी हाते हुए भी इस हिदी मे ही अपने पदो की रचना की थी। बिहार के विद्यापति और गुजरात के नरसी मेहता तथा राजस्थान की मीरा ने इसी भाषा म अपने भक्तिपूण पदो की रचना की थी । देशी राजाओ के दरवारो मे तो साहित्य-रचना करने वाल चदवरदाई, जैसे अनक कवि शरण पात ही रहे, राजकाज की भाषा भी प्राय हि दी ही रही जो उस समय व्रज अवधी डिंगल आदि नामो से स्थान भे- के अनुसार जानी जाती थी। पद्रहवी स सत्रहवी शताब्दी तक इस्लाम शासन का अत्यधिक विस्तार हो जाने और फारसी का प्रभाव बढ़ जान पर भी राष्ट्रीय सम्पक के लिए हि दी के ही विपी न किसी रूप का व्यवहार होता रहा । यह अवश्य है कि इस समय हिंदी न फारसी के अनेक शब्दो को भी अपना लिया था और उन्हे पचाने की प्रक्रिया मे थी । इस्ताम शासन के दक्षिण भारत तक विस्तृत हो जान पर इस्लाम शासका को सामाय व्यवहार के लिए जब मापा की आवश्यक्ता पडी, तब भी वे उत्तर से ब्रजमाषा को ही दक्षिण तक फारसी मिलाकर ले गए, जिसे बाट म "दक्निी हिदी' कहा गया। उत्तर भारत में दिल्ली के आसपास की बोली म जिसे खड़ी बोली कहा जाता था, फारसी शब्दो को मिलाकर जन-सम्पन की एक नई माषा बनाने की चेष्टा की गई, जिसे उद् ' कहा गया । कि तु अंगरेजो के आगमन तक य दोनों नव विकसित रूप भी हिदी के बृहत्तर स्वरूप मे ही समा गए और उसकी दो भिन शलियो मात्र बन कर रह गए । हिवी को सावर्देशिक स्वीकति हिदी का विकास सस्कृत को सुदीप परम्परा मे हुमा और पालन पोषण विभिन प्रान्तीय भाषामो ने किया । वस्तुत हिन्दी कोई क्षेत्रीय भाषा नहीं है, बल्कि एव सावदेशिक भाषा के रूप में विकसित होकर इतिहास की दीघ परम्परा मे राष्ट्रमापा बनी है । प्रा तर प्रादेशिक विभिन्न भाषा भापियो ने अपनी सामाय 78 सम्प मापा के प मे इसे विवामित किया है । मध्यकाल में धम दशन, व्यापार, ला पवहार, मादि में एक यागिन मापा मी मावश्यकता थी, जिसकी पूर्ति इस भाषा ने की है। मुमलमान वियों ने भी इस सावदेशिय महत्त्व की भाषा को ही गौरव दिया, ममीर खुसरो, नवीर, मालिक मुहम्मद जायसी उस्मान पालम, मुल्ला दाद, कुतुबन, रहीम, रससान आदि व महान कवि हैं, जिहाने हिदी मे अपनी श्रेष्ठ माव्य कनियो भी रचना की। जंसा कि पहले उरलेख किया जा चुका है, हिदी का राष्ट्रभाषा के रूप मे विकास करने में विभिन्न प्राता का भी विशेष योगदान रहा । महाराष्ट्र में नामदेव के अलावा भी अनेक पवि हुए जिहोंने हिंदी मै अपने विचार और माव ध्यक्त किए। सत नानेश्वर ने नाय पथ-सम्बधी अपने विचारो को इसी मापा में व्यक्त किया । नामदेव तो महाराष्ट्र से बाहर पजाय तब इसी मापा मे अपने पदो का गायन परते हुए पहुंचे थे। महाराष्ट्र के प्रय हिदी प्रेमी महान् सतो म एकनाथ तुकाराम एव रामदास प्रसिद्ध हैं। महाराष्ट्र के राजदरवारो मे हि दी कवियो को प्रश्रय मिलता था तथा कुछ राजा भी हिदी मे कविता करते थे। महाराज शिवाजी के राजनवि भूषण उस युग के सवश्रेष्ठ राष्ट्रकवि थे, जिनकी समी रचनाएं हिंदी मे लिखी गई । शिवाजी के पिता शाहजी के दरबार मे 12 हिदी कवि थे, केवल कवि ही नहीं, मराठी फौजें भी हिदी का व्यवहार करती मध्यकाल मे हिंदी के प्रमुख क्षेत्र की सीमा से लगे पश्चिमी प्रदेश पजाब मे सस्कृत प्राकृत अपभ्र श की परम्परा में पजाबी भाषा का विकास हो रहा था, कितु वहाँ भी धार्मिक दाशनिक व्यवहार की भाषा हिंदी ही थी। महान् सात नानकदेव ने अपनी वाणिया की इसी भाषा के तत्कालीन रूप मे रचना की थी। उनके बाद भी गुरू अगदेव गुरु अमरदास, गुरू रामदास, गुरू अजुन देव, एव गुरू गोविन्द सिंह ने भी अपनी 'बानी' हिदी में ही व्यक्त की थी। बगाल और असम म भी हिदी "वृजलि के नाम से पहुंची और इसमे अनेक कवियो ने रचनाएं लिखी। चत य महाप्रमु चडीदास, माधव बदलि, माधवदेव मानिने ब्रजमापा मे अनेक पद लिखे । दक्षिण भारत से अनेक शनिक व घम प्रचारक उत्तर मे हिदी का प्रचार करते हुए पहुंचे । बगाल और असम मे भी अनेक दाशनिको का प्रभाव पहुंचा तथा तीर्थयात्री हिदी का झण्डा लिए गगासागर तक अपनी धार्मिक भावनाएं 79 छोडकर पाए । उत्तर में बद्रीनाथ केारनाथ और अमरनाथ तक सुदूर दक्षिण से तीथ-यात्री अपनी लम्बी यात्रामा मे हिंदी के माध्यम से ही पहुंचे और कश्मीर से सतुव व रामेश्वरम् तक की तीथ यात्रानो में भी हिदी ही जन-सम्पक भाषा रही। अंगरेजो के आगमन के पश्चात् हि दी को सावजनिक व्यवहार नी अखिल भारतीय भाषा के रूप में विकसित होने की उतनी ही शक्ति मिलती गई, जितनी तेजी से अंगरेजी उसके माग मे राडे अटकाती गई। अंगरेजो ने धीरे-धीरे देशी राज्यो को येन केन प्रकारेण या तो समाप्त विया या अपने अधीन किया, तब हिदी के देशी राज दरबारो के के द्र समाप्त होने लगे, कि तु शासन चलाने के लिए अंगरेजो को हि दी के व्यवहार की आवश्यकता का भी उसी के साथ-साथ अनुभव होता गया। फलत कलकत्ता के फोट विलियम बॉलज के माध्यम से हिदी के अध्ययन अध्यापन की नीव भी उहान ही रखी। अंगरजी शासन में विशाल देश भारत को एक महान् राष्ट्र के रूप में समझने की धारणा ने बल पक्डा और तव विचारको का ध्यान इस ओर गया कि किस प्रकार स्वाधीनता प्राप्त की जाए। फलत समस्त राष्ट्र मे वैचारिक क्राति लाने के लिए हिन्दी भाषा का ही प्रयाग किया गया। अंगरेजी शासन और अंगरेजी सम्कृति से भारतीय स्वाधीनता सनानिया व भारतीय सस्कृति की जो टकराहट प्रारम्भ हुई उसमे हि दी ही सबसे अधिक सफल हथियार सिद्ध हुई । इसी के माध्यम से क्रान्ति की आवाज गांव गांव और गली गली तर पहुंची। देश के बडे-बडे नेताप्रो ने हिन्दी का पक्ष लिया और उसमे अपने विचार व्यक्त करन प्रारम्भ क्यि। सन् 1885 मे राष्ट्रीय महासभा (नशनल कायस) की स्थापना हुई । इस मच पर देश के विभिन्न भागों से एकत्र होने वाले नेतानो ने राष्ट्रीय चेतना फैलाने के लिए हिदी मापा के प्रयोग का समर्थन किया । धुलिया के श्रीनरहरि प्रकाश ने 'राजकीय प्रकाश' नामक पुस्तक हि दी भाषा मे लिखी । इस पुस्तक की भूमिका मे यह प्रतिपादित किया गया कि अखिल भारतीय व्यवहार के लिए हिदी सर्वाधिक उपयुक्त भाषा है । पूना के केशव वामन पठे ने 1883 ई में मराठी मे "राष्ट्रभाषा' नामक पुस्तक की रचना की और उसमे हिंदी को भारत को 'राष्ट्रमापा" मानने पर बल दिया गया। लोकमा य बाल गंगाधर तिलक ने हिदी को राष्ट्रभाषा माना और अपने मराठी प्रखबार "केसरी' मे हिदी का एष विभाग भारम्भ किया। महात्मा गाधी, राजगोपालाचाय मादि सभी बडे 80 नेतामा ने हि दी को ही राष्ट्रमापा माना । गागी ने तो दक्षिण भारत में हि दी को अधिक लोक प्रिय बनान के लिए सन् 1918 ई म दक्षिण भारत हि दी प्रचार सभा की स्थापना की थी, जो आज तक काय कर रही है । हि दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करते हुए अ य नेतानो ने भी अनेक प्रयत्न किए । काशी नागरी प्रचारणी सभा, हिपी साहित्य सम्मेलन राष्ट्रप्रचार समिति वधा, महाराष्ट्र राष्ट्र भाषा प्रचार ममा पूना, गुजराज हि टी विद्यापीठ राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर आदि अनेक मस्थाएँ स्थापित हुई और राष्ट्रभाषा के प्रचार प्रसार के अनेक प्रयास किए । "प्राय समाज" के संस्थापक स्वामी दयानद सरस्वती जैसे महापुस्प तो हिदी को समस्त राष्ट्र की मापा मान ही चुके थे। स्वामी जी ने अपने "सत्याथ प्रकाश" य य की रचना हिदी मे की । विदशो म भी इन सस्थाआ के मा यम से हि दो पहुँगी और वहा भी उसको भारत की राष्ट्रभाषा के रूप मे मा यता मिली । इस प्रकार आजादी से पूर्व ही हिनी का राष्ट्रभाषा के रूप में विकास हो चुका था तथा सवत्र उसे इस रूप म मा यता भी मिल चुकी थी । म्वाधीनता आदोलन मे समस्त देश के बडे बडे नेता तथा सास्कृतिक-धार्मिक प्रचारक हि दी को ही राष्ट्रमाषा मानकर उसमे अपने विचार प्रकट कर रहे थे। राष्ट्रभाषा के रूप में सवधानिक स्वीकति की स्थिति स्वाधीनता के पश्चात् हिदी को राजभाषा के रूप मे सवधानिक स्वीकृति मिली और राष्ट्रभाषा का भी उपी से अथ लगा लिया गया, क्योकि राजमापा पर विचार करते समय राष्ट्रभाषा की स्थिति का विचार ही बहस का विषय बना हुमा था। हिदी का समथन राजमापा के रूप मे इसी माघार पर हुमा था कि वह जन स्वीकृति से राष्ट्रमाषा है । कन्नड भाषी निजलिंगप्पा जसे महान् व्यक्ति ने 21 जून, 1949 को अपने एक लेख मे लिखा कि "हिंदी प्रकृति से हो और सहज रूप से राष्ट्रमापा हो सकती है । अंग्रेजी भाषा को और रोमन लिपि को राष्ट्रमापा और राष्ट्रलिपि के नाते इस देश मे चलाना लामदायक नहीं होगा । भारत की अन्य प्रातीय मापामओ से सम्म रखने वाली भाषा का ही राष्ट्रभाषा के रूप मे अपनाया जा सक्ता । देवनागरी लिपि ही मैं रोमन लिपि को तुलना मे सवश्रेष्ठ मानता हूँ। इसलिए स्वामाविक रूप से हमारी राष्ट्रमाषा की लिपि देवनागरी ही होगी। बंगलामापी विद्वान क्षेमचद चट्टोपाध्याय न 24 दिसम्बर 1949 को हैदराबाद में राष्ट्रभाषा परिषद के अध्यक्षा पद से भापण करते हुए कहा ६प इस बात पर है पि हिदी राष्ट्रमापा के रूप में विधान परिषद द्वारा 81 स्वागतम स्वीकृत हुई है और ऐद इस कारण से कि इस स्वीकृति म पेंच है। इस प्रभाग देश मे उचित बात पर लोगों में एक्मत नहीं होता है । राष्ट्रमापा जिस प्रकार का उत्साह देशप्रेमियो मे उचित है, विधान परिषद मे वह उत्माह नहीं दिख रहा है। मंग्रेजी एक अच्छी मापा है। अग्रेजी से देश का सम्बध टूट जाने पर भी, इसका प्रयोग शिक्षित समाज मे मावश्यक है परतु पद्रह वर्षों तक हमारे राष्ट्रीय व्यवहार म इसका अक्षुण्ण अधिकार और उसके बाद भी उसके प्रयोग की सम्भावना हमारी राष्ट्रीयता के लिए घातक है । सदियो की परत यता ने हमारी जातीयता की बुद्धि को मद कर दिया है, मत हम लज्जा की बात पर भी लज्जित नही होते । हिदी वा वतमान साहित्यिक रूप सब व्यवहागे के योग्य मार सकल प्रान्तो म स्वीकार के योग्य है । मेरा यह कथन अनुभव पर प्राधारित है, अयाय पक्षपात पर नही। हिदी की शक्ति का हिदी प्राता के बाहर रहने वाले पई विशिष्ट विद्वानो ने भाप लिया है, जिसके पारण वे हिदी का पक्ष लेते मा रहे हैं । मैं पुन कहना चाहता हूँ कि हिंदी राष्ट्रभाषा बन चुकी है उसको बनान को व्यथ चेष्टा न की जाए। देश का कल्याण इस बात पर है कि सिद्ध वस्तु को लेकर चले । भारत वष के बाहर भतर्जातीय व्यवहार के लिए हम तुरत राष्ट्रभाषा काम मे ला सकते हैं, अगर राजदूतो ये कार्यालया मे हि दी जानने वाले पर्याप्त नहीं हैं, तो प्रत्येक दूतावास मे एक हिदी जानकार नियुक्त करके और अवशिष्ट व्यक्तियो की हिंदी शिक्षा-व्यवस्था करके हम एक वप के भीतर हिदी के द्वारा काय कर सकेंगे।" उडिया भाषी तथा सविधान-सभा के सदस्य लक्ष्मीनारायण साहू ने "राष्ट्रभाषा' नामक अंगरेजी पत्रिका के 12 मई, 1949 के प्रक मे अंग्रेजी मे अपने विचार राष्ट्रमापा के विषय मे इस प्रकार व्यक्त किए थे- "सब लोगो के लिए कौन सी भाषा भारतवष में प्रयुक्त हो सकती है ? मारतवर्ष के कोने कोने मे यहां से वहां तक बोली जाने वाली सवसाधारण भाषा एक हि दी ही हो सकती है, जिसे सिद्ध करने की कोई भावश्यक्ता नहीं है क्योकि कई वर्षों से सब प्रातो वे सब धर्मों के तथा सव देशो के सयासी इसी भाषा का प्रयोग करते माये हैं। चाहे वह सयासी बौद्ध धर्मी रहा हो अथवा जैन धर्मी अथवा हिन्दू धम का भी क्यो न हो वह हिदी के ही माध्यम से अपना काम चलाता आया है। अपनी धार्मिक परम्परामो को सब हि दो माध्यम से व्यक्त करते रहे हैं । इस काय मे उहोने अपने बगालीपल उडियापन, 80 नेतानो ने हि दी को ही राष्ट्रभाषा माना । गामी ने तो दक्षिण भारत मे हि दो को अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए सन् 1918 ई मे दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना की थी, जो आज तक काय कर रही है । हिदी को राष्ट्रमापा के रूप में स्वीकार करते हुए प्रय नेताग्रा ने भी अनेक प्रयत्न किए। काशी नागरी प्रचारणी सभा, हिरो साहित्य मम्मलन राष्ट्रप्रचार समिति वर्धा, महाराष्ट्र राष्ट्र मापा प्रचार समा पूना, गुजराज हिदी विद्यापीठ राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर आदि अनेक सस्थाएँ स्थापित हुई और राष्ट्रभाषा के प्रचार प्रसार के अनेक प्रयास किए । “प्राय समाज" के संस्थापक स्वामी दयानद सरस्वती जैसे महापुस्प तो हिदी को समस्त राप्ट की माषा मान हो चुके थे। स्वामी जी ने अपने "सत्याथ प्रकाश' ग्र य की रचना हिदी मे की । विदेशो मे भी इन सस्थाआ के माध्यम से हिदी पहुंची और वहा मी उसको भारत की राष्ट्रमापा के रूप म मा यता मिली । इस प्रकार आजादी से पूर्व ही हिंदी का राष्ट्रभाषा के रूप में विकास हो चुका था तथा सवत्र उस इस रूप में मान्यता मी मिल चुकी थी । स्वाधीनता आदोलन मे समस्त देश के बडे-बडे नेता तथा सास्कृतिक धार्मिक प्रचारक हि दी को ही राष्ट्रभाषा मानकर उसमे अपने विचार प्रकट कर रहे थे। राष्ट्रभाषा के रूप में सवैधानिक स्वीकति की स्थिति स्वाधीनता के पश्चात् हिदी को राजमाषा के रूप मे सवधानिक स्वीकृति मिली और राष्ट्रमापा का भी उपी से अथ लगा लिया गया, क्याकि राजमापा पर विचार करते समय राष्ट्रभाषा की स्थिति का विचार ही बहस का विषय बना हुमा था । हिदी का समथन राजमापा के रूप में इसी आधार पर हुमा था कि वह जन स्वीकृति से राष्ट्रमापा है । कभड भाषी निजलिंगप्पा जैसे महान् व्यक्ति ने 21 जून, 1949 को अपने एक लेख मे लिखा कि हि दो प्रकृति से हो और सहज रूप से राष्ट्रभाषा हो सकती है । अंग्रेजी भाषा को और रोमन लिपि को राष्ट्रभाषा और राष्ट्रलिपि के नाते इस देश में चलाना लाभदायक नहीं होगा । भारत की अय प्रातीय मापाओ से सम्बध रखने वाली भाषा को ही राष्ट्रभाषा के रूप मे अपनाया जा सकता है। देवनागरी लिपि ही मैं रोमन लिपि की तुलना मे सवश्रेष्ठ मानता हूँ। इसलिए स्वाभाविक रूप से हमारी राष्ट्रभाषा की सिपि दवनागरी ही होगी। बंगलामापी विद्वान क्षेमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने 24 दिसम्बर 1949 को हैदरायाद में राष्ट्रभाषा परिषद के अध्यक्ष पद से मापण करते हुए कहा हप इस बात पर है कि हिदी राष्ट्रमापा के रूप में विधान परिषद द्वारा 81 स्वीकृत हुई है और खेद इस कारण से कि इस स्वीकृति म पेंच है । इस अभागे देश मे उचित बात पर लोगो मे एकमत नही होता है । राष्ट्रभाषा के स्वागत मे जिस प्रकार का उत्साह देशप्रेमियो मे उचित है, विधान परिषद मे वह उत्माह नहीं दिख रहा है । अंग्रेजी एक अच्छी भाषा है । अग्रेजी से देश का सम्बघ टूट जाने पर भी, इसका प्रयोग शिक्षित समाज मे प्रावश्यक है परतु पद्रह वर्षों तक हमारे राष्ट्रीय व्यवहार मे इसका अक्षुण्ण अधिकार और उसके बाद भी उसके प्रयोग की सम्भावना हमारी राष्ट्रीयता के लिए घातक है । सदिया की परत यता ने हमारी जातीयता की बुद्धि को मद कर दिया है, प्रत हम लज्जा की बात पर भी लज्जित नहीं होते । हि दी का वतमान साहित्यिक रूप सब व्यवहारो वे योग्य और सक्ल प्रातो में स्वीकार के योग्य है । मेरा यह कथन अनुभव पर आधारित है अयाय पक्षपात पर नही । हिदी की शक्ति को हिदी प्राता के बाहर रहने वाले कई विशिष्ट विद्वानो ने भाग लिया है, जिसके कारण वे हिंदी का पक्ष लेते आ रहे हैं । मैं पुन कहना चाहता हूँ कि हि दी राष्ट्रभाषा बन चुकी है उसको बनाने की व्यथ चेष्टा न की जाए। देश का कल्याण इस बात पर है कि सिद्ध वस्तु को लेकर चले । भारत वर्ष के बाहर अतर्जातीय व्यवहार के लिए हम तुरत राष्ट्रभाषा काम मे ला सकते हैं, अगर राजदूतो के कार्यालयो मे हि दी जानन वाले पर्याप्त नहीं हैं, तो प्रत्येक दूतावास मे एक हि दी जानकार नियुक्त करने और प्रयशिष्ट व्यक्तियो को हिदी शिक्षा-व्यवस्था करके हम एक वष के भीतर हिदी के द्वारा काय कर सकेंगे।" उडिया मापी तथा सविधान सभा के सदस्य लक्ष्मीनारायण साहू "राष्ट्रमापा' नामक अंगरेजी पत्रिका के 12 मई, 1949 के अक मे अंग्रेजी मे अपने विचार राष्ट्रभाषा के विषय में इस प्रकार व्यक्त दिए थे-- "सघ लागा के लिए कौन सी भाषा भारतवर्ष में प्रयुक्त हो सकती है ? भारतवष के कोने-कोने मे यहाँ से वहां तक बोली जाने वाली सवसाधारण भापा एक हि दी ही हो सकती है, जिसे सिद्ध करने की कोई पावश्यक्ता नहीं है क्योदि कई वर्षों से सब प्रातो के सब धर्मों के तथा सव देशों के सयासी इसी भाषा का प्रयोग करते भाये हैं। चाह वह सयासी बौद्ध धर्मी रहा हो भयवा जैन धर्मी अथवा हिन्दू धर्म का भी क्यों न हो वह हिदी के ही माध्यम से अपना काम चलाता आया है। अपनी धार्मिक परम्परामा को सब हि दी माध्यम से व्यक्त करते रहे हैं । इस काय मे रहोंने अपने वगालीपल उडियापन, ने 82 तमिलपन या तेलगूपन आदि का कोई विचार ध्यान म न लेते हुए हिंदी का ही माश्रय लिया ।" तमिल मापी अनत शयनम प्रायगर ने भी स्पष्ट शब्दा मे कहा कि 'हिदी ही हमारी राष्ट्रमापा है।" इस प्रकार उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक सभी क्षेत्री के प्रमुख विद्वानो और नेतामोधा एक स्वर से यह मत था कि हिदी ही भारत की राष्ट्रभाषा है कि तु फिर भी सविधान में हिंदी के साथ अग्रेजी को प्रारम्भ मे 15 वर्षों के लिए राजभाषा मानते हुए राष्ट्रमापा जैसी स्थिति में भी ला दिया गया। भारतीय सविधान के माग 17-राजभापा अध्याय 1,2 व 3 म राजमाषा के रूप मे अंग्रेजी के साथ हिदी की स्वीकृति ऐसे रूप में की गई, जिससे राजभाषा का अथ राष्ट्रभाषा" मी निक्लता था। फलत राजमापा सम्बधी सविधान की व्यवस्थामो ने हि दी से उसका वह "राष्ट्रमापा" पद मी अप्रत्यक्ष रूप से प्रारम्मम 15 वर्षों के लिए और फिर तब तक के लिए धोन लिया, जब तक राष्ट्रभाषा सम्बधी चेतना समस्त देश मे दुबारा नहीं लौटती। अभी तक तो वह चेतना लौटने के लक्षण नहीं दिखाई दिए अंग्रेजी राजभाषा के आसन पर तो जमी बठी ही है तथा हिदी को घकिया रही है राष्ट्रभाषा के पद को भी उसने शूय बनाने की सतत चेष्टा की है तथा शहर से गावो तक छोटे- बडे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलो के द्वारा अपने पर फैलाती जा रही है । आश्चय यह है कि देश के कोने कोने तक बोली या समझी जाने वाली, सामाजिक सास्कृतिक स्वीकृति वाली एव सस्कृत की उत्तराधिकारिणी राष्ट्रमाषा हिंदी अपने ही लोगों के द्वारा घोर उपेक्षा का पात्र बन गई है। उसके समी समथक या तो मौन हैं या स्वगवासी हो चुके है, या दुसियो के मानद भोग मे ध्यानावस्थित हैं। राष्ट्रमाषा हिंदी को इस दयनीय स्थिति तक पहुंचाने वाले देश के सविधान की उन व्यवस्थानो को समझना यहाँ आवश्यक है, जिनके अनुसार देश की राजभाषा का निर्णय किया गया था। हिदी राजभाषा विषयक सवैधानिक मायता सन् 1946 मे सविधान सभा बनाई गई । इसमे भारतीय राष्ट्रीय काप्रेस के सदस्य अधिक थे । इस सभा की पहली बैठक दिसम्बर 1946 को हुई । दो दिन पश्चात डॉ राजेद्र प्रसाद इसके अध्यक्ष चुने गये । जब 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वाधीन हुआ और पाकिस्तान का अलग निर्माण हो गया, तो मुस्लिम लीग के सदस्य इससे हट गए। सविधान सभा को नियम समिति ने 83 1946 मे ही डॉ राजेद्र प्रसाद की अध्यक्षता में यह निणय कर लिया था कि सभा को कामकाज की मापा हिन्दुस्तानी या अंग्रेजी होगी तथा अध्यक्ष से अनुमति लेकर कोई भी सदस्य अपनी मातृभाषा में अपनी बात कह सकेगा। सविधान सभा के चौथे सत्र के दूसरे दिन 14 जुलाई 1947 को सशोधन प्रस्तुत करके "हि दुस्तानी" की जगह 'हिदी' शब्द कर दिया गया। फरवरी 1948 मे सविधान का एक प्रारूप प्रस्तुत किया गया। इसमे 'राजमापा" सम्बधी कोई व्यवस्था नही थी, केवल "ससद पी मापा अंग्रजी या हि दी होगी यह उल्लेख या। तत्पश्चाद हिंदी के सम्बध म पक्ष-विपक्ष मे अनेक मत व्यक्त हुए । पण्डित जवाहर लाल नेहरू चाहते थे कि राजभाषा एक एसी भाषा हो जो सम्पूर्ण देश की मापायी प्रावश्यक्ता की पूर्ति कर सके । उन्होने यह भी स्पष्ट किया कि स्वतत्र देश को अपनी ही भाषा मे कामकाज चलाना चाहिए । सविधान सभा के 8 नवम्बर 1948 के कायवाही विवरण मे यह उल्लेख मिलता है कि पण्डित जवाहर लार नेहरू मारत के लिए एक ऐसी मापा चाहते थे जो जनता के मध्य से ही विकसित हो । तत्पश्चात् 10 नवम्बर, 1948 को स्टीयरिंग समिति की बैठक म यह निश्चय किया गया कि देश का सविधान हिन्दी मे भी तैयार किया जाना चाहिए। अगस्त से सितम्बर 1948 तक इस विषय पर विस्तार से बहस हुई थी। पसिल भारतीय काग्रेस कमिटी की कायकारिणी ने भी भाषा को एक विवाद के रूप मे लिया और यह प्रस्ताव स्वीकृत किया कि हिंदी और अंग्रेजी दोनो भाषाएं राजकाज में प्रयुक्त हो । अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मलन ने भी 6-7 अगस्त 1949 को राष्ट्रीय भाषा सम्मेलन मे नागरी लिपि में लिखी 'हिदी" को सव सम्मति से राष्ट्रभाषा स्वीकार करने का सुझाव दिया । 8 अगस्त, 1949 को पर्याप्त विवाद के पश्चात् सविधान सभा में अंग्रेजी को हिदी के साथ 10 वर्षों तक चलाते रहने का निश्चय किया गया । यहाँ हिदी के स्वरूप का मुद्दा भी उठा जिसके लिए एक प्रारूप समिति बनाई गई। 10 से 17 अगस्त तक बैठकें होती रही । सोलह अगस्त को प्रारूप समिति ने अपनी रपट प्रस्तुत की, जिसमे 10 वर्ष तक हिंदी के साथ अंग्रजी चलाने की शत थी, जिसे दो तिहाई बहुमत से ससद ने पाच वष कर दिया और अतर्राष्ट्रीय अक स्वीकार किए गए। बाईस अगस्त को हॉ भीमराव अम्बेडकर ने एक नया फामू ला रसा, जिसमे अंग्रेजी के लिए 15 वप की अवधि का प्रस्ताव था । जिसे भी दाद मे ससद बढा सक्ती थी । अन्तर्राष्ट्रीय अको का मी सुझाव उ होने दिया तथा उच्च न्यायालयो मे अंग्रेजी प्रावश्यक मानी । प्रादेशिक भाषामों की अनुसूची बनाने तथा मापा प्रायोग ३ गटन का प्रस्ताव मी उही का था।
84 26 अगस्त, 1949 को काप्रेस पार्टी ने फिर इस विषय पर पर्याप्त विचार दिया। जब मतदान हुआ तो समान मत पडे । प्रत पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने यह राय दी कि हर सदस्य स्वतत्र रूप से अपना मत प्रकट करे । उसके बाद कई बार विचार विमश चला और यह निष्कप पण्डित नेहरू ने प्रस्तुत किया कि हि दी का ऐसा स्वरूप स्वीकार किया जाए जो परित्यागमूलक न होकर समावेश मूलक हो और उसमे भारत की सभी मापायी तत्त्वो को शामिल किया जाए तथा उसमे हुई एव हिदुस्तानी शब्द भी लिए जाएं। प्रको के विषय में यह राय बनी कि उन अतर्राष्ट्रीय अको को सघ के कामकाज के लिए स्वीबार किया जाए जो बहुत पहले भारतीय प्रका से ही विकमित हुए थे। इस प्रकार आगे मो अनेक बार विचार विमश और मतदान हुए। अन्त मे राजमापा के विषय मे जो निणय लिए गए उनकी जानकारी के लिए "सघ को राजभापा नीति" सम्बधी सवैधानिक व्यवस्थापो को यहाँ प्रस्तुत किया जाता है । संघ की राजभाषा नीति संसद में प्रयुक्त होने वाली भाषा 120 (1) भाग 17 में किसी बात के होते हुए भी, कि तु अनुच्छेद 348 के उपवघो के अधीन रहते हुए ससद में काय हिदी मे या अंग्रेजी में किया जाएगा। परतु, यथास्थिति, राज्यसमा का सभापति या लोकसभा का अध्यक्ष भयवा ऐसे रूप मे पाय करने वाला व्यक्ति किसी सदस्य को जो हिदी या अंग्रेजी में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता, अपनी मातृभाषा मे सदन को सम्बोधित करने की अनुना दे सकेगा। (2) जब तक ससद विधि द्वारा-मयथा उपद प न करे तब तक इस सविधान के प्रारम्भ से 15 वर्ष की कालावधि की समाप्ति के पश्चात् यह मनुच्छे ऐसे प्रभावी होगा मानो कि "या मंग्रेजी में" ये शब्द उसमे से लुप्त कर दिये गये हों। विधान-मण्डल में प्रयुक्त होने वाली मापा 210 (1) भाग 17 मे पिसी बात के होते हुए भी, रितु मनुच्छेद 348 के उपक्षों के अधीन रहते हुए, राज्य के विधान मण्डन मे पाय राज्य की राजमापा या मापामों म या हिंदो में दिया जाएगा।
85 परतु यथास्थिति विधान सभा का अध्यक्ष या विधान परिषद का सभापति अथवा ऐमे रूप मे काय करने वाला व्यक्ति किसी सदस्य को, जो उपयुक्त मापात्रो में से किसी में अपनी पयाप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता अपनी मातृभाषा मे सदन को सम्बोधित करने की अनुज्ञा दे सकेगा। (यह अनुच्छेद जम्मू कश्मीर पर लागू नही) । (2) जब तक राज्य का विधान मण्डल विधि द्वारा अन्यथा उपब घ न करे तब तक इस सविधान के प्रारम्म से पद्रह वप की कालावधि की समाप्ति के पश्चात यह मनुच्छेद ऐसे प्रभावी होगा मानो कि "या अंग्रेजी मे" ये शब्द उसमे से गुप्त कर दिये गए हो । परतु हिमाचल प्रदेश मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा के राज्य विधान मण्डलो के सम्बध में यह खण्ड इस प्रकार प्रभावी होगा मानो कि उसमें आने वाले "पद्रह वष' शब्दो के स्थान पर पच्चीस वप" शब्द रख दिये गये हो । सघ को राजभाषा 343 (1) सघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी । सघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले प्रको का रूप भारतीय कों का मतर्राष्ट्रीय रूप होगा । (2) खण्ड (1) से किसी बात के होते हुए भी इस सविधान के प्रारम्भ से पन्द्रह वप की कालावधि के लिए सघ के उन सब राजकीय प्रयोजनो के लिए भग्रेजी भाषा प्रयोग की जाती रहेगी, जिनके लिए एसे प्रारम्म के ठीक पहले ये प्रयोग की जाती थी। पर तु राष्ट्रपति उक्त कालावधि मे, मादेश द्वारा सघ के राजकीय प्रयोजनो में से किसी के लिए अंग्रेजी भापा के साथ-साय हिदी मापा का तथा भारतीय प्रका के अतर्राष्ट्रीय रूप के साथ-साथ देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा। (3) इस अनुच्छेद मे किसी बात के होते हुए भी ससद उक्त पन्द्रह साल की कालावधि के पश्चात् विधि द्वारा- (1) प्रये जी भाषा का प्रयवा (ख) भको के देवनागरी रूप का ऐसे प्रयोजनो के लिए प्रयोग उपषित कर सकेगी जैसे कि ऐसे विधि में उल्लिखित हो। ।
86 राजभाषा के लिए ससद का प्रायोग मोर समिति 344 (1) राष्ट्रपति इस मविधान के प्रारम्म म पांच वप की ममाप्ति पर तथा तत्पश्चात् ऐसे प्रारम्भ से दस वष की ममाप्ति पर मादेश द्वारा एक पायोग गठित करेगा, जो एक सभापति और अष्टम अनुसूची मे उल्लिखित विभिन्न भापामो का प्रतिनिधित्य करन वाले अन्य सदस्यो से मिलकर वनेगा, जैस कि राष्ट्रपति नियुक्त करे, तथा आयोग द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया का मादेश परिमापित करेगा। (2) राष्ट्रपति को- (क) सघ के राजकीय प्रयोजना मे सब या किसी के लिए हिंदी भाषा के लिए उत्तरोत्तर अधिक प्रयोग के, (ख) सघ के राजकीय प्रयोजनो मे से सब या किसी के लिए अंग्रेजी मापा के प्रयोग पर निव घनो के, (ग) अनुच्छेद 348 मे वरिणत प्रयोजनो मे से सब या किसी के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा के (घ) सघ के किसी एक या अधिक उल्लिखित प्रयोजनो के लिए प्रयोग किए जाने वाले प्रको के रूप के, (ड) सघ की राजभाषा तथा सघ और किसी राज्य के वीच पथवा एक राज्य और दूसरे के बीच सचार की भाषा तथा उनके प्रयोग के बारे में राष्ट्रपति द्वारा प्रायोग से पृच्छा किए हुए किसी अन्य विषय के बारे मे सिफारिश करने का प्रयोग का क्त्तव्य होगा। (3) खण्ड (2) के अधीन अपनी सिफारिशो को करने म आयोग भारत की प्रौद्योगिक सास्कृतिक और वैज्ञानिक उन्नति का तथा लोक सेवाप्रो के बारे मे यहि दी भाषा मापी क्षेत्रो के लोगो के यायपूण दावो और हितो का सम्यक ध्यान रखेगा। (4) तीस सदस्यो की एक समिति गठित की जायेगी, जिनमे से बीस लोक सभा के सदस्य होग तथा दस राज्य सभा के सदस्य होगे, जो कि क्रमश लोक समा के सदस्यो तथा राज्य समा के सदस्यो द्वारा अनुपाती प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एक्ल सक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित होगे।
87 (5) खण्ड (1) के अधीन गठित आयोग की सिफारिशो की परीक्षा करना तथा उन पर अपनी राय का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को प्रस्तुत करना समिति का कत्तव्य होगा। (6) अनुच्छेद 343 में किसी बात के होते हुए भी राष्ट्रपति खण्ड (5) मे निर्दिष्ट प्रतिवेदन पर विचार करने के पश्चात् उसे सारे प्रति- वेदन के या उसके किसी भाग के अनुसार निदश निकाल सकेगा। 2 प्रादेशिक भाषाएँ राज्य की राजभाषा या राजमापाएँ 345 अनुच्छेद 346 और 347 के उपबधा के अधीन रहते हुए राज्य का विधान मण्डल विधि द्वारा उस राज्य के राजकीय प्रयोजनो में से सब या किसी के लिए प्रयोग के अथ उस राज्य में प्रयुक्त होने वाली भाषाओ मे से किसी एक या अनेर को या हिंदी को अगीकार कर सकेगा- परतु जब तक राज्य का विधान मण्डल विधि द्वारा इसे अयथा उपम प न करे तब तक राज्य के भीतर उन राजकीय प्रयोजनो के लिए अंग्रेजी भाषा प्रयोग की जाती रहेगी, जिनके लिए सविधान के प्रारम्भ से ठीकपहले वह प्रयोग की जाती थी। एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच में अथवा राज्य और सघ के बीच में सचार के लिए राजभाषा 346 सप मे राजकीय प्रयोजनो के लिए प्रयुक्त होने के लिए तत्समय प्राधिकृत भाषा, एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच मे तथा विसी राज्य और सप के बीच मे सचार के लिए राजभाषा होगी, पर तु यदि दो या अधिक राज्य करार करते है कि ऐसे राज्यों के बीच में सचार के लिए राजभाषा हिदी भाषा होगी, तो ऐसे सचार के लिए वह मापा प्रयोग की जा सकेगा। 347 तद् विषयक माँग को जाने पर यदि राष्ट्रपति का समाधान हो जाए कि किसी राज्य के जन समुदाय का पर्याप्त अनुपात चाहता है कि उसके द्वारा बोली जाने वाली कोई भाषा राज्य द्वारा अभिज्ञात की जाए, तो वह निदेश दे सकेगा कि ऐसी भाषा को उस राज्य मे सवत्र भयवा उसके क्सिी भाग मे ऐसे प्रयोजन के लिए जैसा कि वह उल्लिखित करे राजकीय ममिना दी जाए।
88 3 उच्चतम न्यायालय और उच्च थापालयो में तया अधिनियमों विधेयकों मादि में प्रयोग की जाने वाली भाषा- 348 (1) इस भाग ये पूर्ववर्ती उपवयो मे किसी बात के होते हुए भी जब तक ससद विधि द्वारा भयपा उपबंधन पर, तब तक- (प) उच्चतम ‘यायालय म तया प्रत्येक उच्च न्यायालय म मब पायवाहिया, (स) जो- (प्र) विधेयक, अथवा उन पर प्रस्तावित किये जाने वाले जो सशोधन ससद के प्रत्येक सदन मे पुन स्यापित किए जाएं, उन सब के प्राधि वृत पाठ, (घ) मधिनियम ससद द्वारा या राज्य के विधान मण्डल द्वारा पारित किए जाएं, तथा जो अध्यादेश राष्ट्रपति या राज्यपाल या राजप्रमुख द्वारा प्राख्यापित किए आएँ, उन सबके प्राधिकत पाठ, तथा (स) भादेश, नियम विनियम और उपविधि इस सविधान के अधीन अथवा ससद या राज्यो के विधान मण्डल द्वारा निर्मित किसी विधि के अधीन निकाले जाएं, उन सब प्राधिकत पाठ, अंग्रेजी भाषा में (1) खण्ड (1) के उपखण्ड (क) मे किसी बात के होते हुए भी किसी राज्य के राज्यपाल या राजप्रमुख राष्ट्रपति को पूर्व सम्मति से हिंदी भाषा का या उस राज्य में राजकीय प्रयोजनी के लिए प्रयोग होने वाली किसी अन्य भाषा का प्रयोग उस राज्य में मुख्य स्थान रखने वाले उच्च यायालय की कायवाहियो के लिए प्राधिकत कर सकेगा, पर तु इस खण्ड की कोई बात वैसे उच्च न्यायालय द्वारा दिए निणय, आज्ञप्ति अथवा आदेश को नागू न होगी। (3) खण्ड (1) के उपखण्ड (ख) मे किसी बात के होते हुए भी, जहाँ किसी राज्य के विधान मण्डल ने, उस विधान मण्डल मे पुन स्थापित विधेयको का उसके द्वारा पारित अधिनियमो मे अथवा उस राज्य के राज्य पाल या राजप्रमुख द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशो म अथवा उस उपखण्ड की कण्डिका मे निर्दिष्ट पिसी आदेश नियम विनियम या उपविधि में प्रयोग के लिए अंग्रेजी भाषा से प्राय किसी मापा के प्रयोग को विहित किया है, 89 वहां उस राज्य के राजकीय सूचना-पत्र मे उस राज्य के राज्यपाल या राजप्रमुख के प्राधिकार से प्रकाशित अंग्रेजी भाषा मे उसका अनुवाद उस खण्ड के अभिप्रायो के लिये उसका अंग्रेजी भाषा मे प्राधिकत पाठ समझा जायेगा। भाषा सम्बधी कुछ विधियों के अधिनियमित करने के लिए विशेष प्रक्रिया 349 इस सविधान के प्रारम्भ से 15 वर्षों की कालावधि तक अनुच्छेद 348 के खण्ड (1) मे बरिणत प्रयोजनो मे से किसी के लिए प्रयोग की जाने वाली माषा के लिए उपबघ करने वाला को विधेयक या सशोधन ससद के किसी सदन मे राष्ट्रपति की पूर्व मजूरी के बिना न तो पुन स्थापित और न प्रस्तावित किया जायेगा तथा एसे किसी विधेयक के पुन स्थापित अथवा ऐसे किसी सशोधन के प्रस्तावित किए जाने की मजूरी अनुच्छद 344 के खण्ड (1) के अधीन गठित आयोग की सिफारिशो पर तथा उस अनुच्छेद के खण्ड (4) के अधीन गठित समिति के प्रतिवेदन पर विचार करने के पश्चात् ही राष्ट्रपति देगा। 4 विशेष निर्देश 350 किसी व्यथा के निवारण के लिए सघ या राज्य के किसी पदाधिकारी या प्राधिकारी को यथास्थिति सघ मे प्रयोग होने वाली किसी भाषा मे अभि- वेदन देने का प्रत्येक व्यक्ति को हर होगा। 350 ए तथा 350 बी सविधान संशोधन स 7, 1956 के अनुसार जोड दी गई है जिनमे मातृ- भाषा के माध्यम मे शिक्षण तथा मापिक अल्पसख्यको के हिता की रक्षा के लिए व्यवस्था की गई है। हिदी भाषा के विकास के लिए निर्देश 351 हिदी भाषा की प्रसार-वृद्धि करना, उसका विकास करना ताकि वह भारत को सामाजिक सस्कृति के सब तत्त्वो को अभिव्यक्ति को माध्यम हो सके, तथा उमकी आत्मीयता मे हस्तक्षेप दिए बिना हिदुस्तानी पोर अष्टम अनुसूची म उल्लिखित मय भारतीय भाषाओं के स्प शली, और पदा- वली को प्रात्मसात करते हुए तथा जहाँ प्रावश्यक या वाछनीय हो यहाँ उसके शब्द मण्डार के लिए मुख्यत सस्कत से तथा गोरगत वैसी उल्लिखित 90 भापामओ से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समद्धि सुनिश्चित करना सघ का पत्तव्य होगा। राजभाषा प्रायोग सिफारिश और राय के स राजभापा पायोग की सिफारिशें राजमापा पर ससदीय समिति की राय 5 प्रशासन की भाषा बदलने के लिए कुछ प्रारम्भिक आवश्यकताएं इस प्रकार हैं (1) प्रशासनिक क्षेत्रो में प्रयुक्त होने वाली आवश्यक विशिष्ट परिभाषाएँ तैयार करना और उनका प्रमाणीकरण । (2) प्रशासन के दैनिक कायकलाप से सम्बन्धित सरकारी प्रकाशनो जिनमे नियम निनियम दिये रहते है, हस्त पुस्तिकामा तथा अय काय विधिक साहित्य का हि दी में अनुवाद । (3) विभिन्न वर्गों के प्रशामनिक क्मचारियो को इस ढग से ट्रेनिंग देना कि वे मापा की योग्यता इस उपयुक्त स्तर की प्राप्त कर लें जिससे वे नये भाषा माध्यम का प्रयोग आव- श्यक कायक्षमता के साथ कर सकें और सुविधानुसार अपने आपको उस भाषा मे ध्यक्त कर सके। (4) सरकारी कार्यों को सुविधा और उहें दतगति से कर सकने की दष्टि से जिन यात्रिक तथा अन्य सहायक साधनो को जरूरत होती है उनका नये भाषा माध्यम के अनुकूल विकास कसा तया उन्हें प्यार करना उदाहरणाय टाइपराइटरो और टाइपिस्टा शीघ्रलिपि 91 अस राजमापा प्रायोग की सिफारिश राजमापा पर ससदीय समिति की राय और शोनलिपिको, मुद्रण और प्रतिलिपिन यत्रो, टलीप्रिंटरो और मय सवार साधनो को नये माध्यम के अनुकूल बनाना आदि । इसमे प्रावश्यक्ता (1) तो अध्याय 5 मे वणित पारिमापिक शब्दावली को सामाय समस्या का अग है। इसे स्वीकार किया जा सकता है। 6 जहाँ तक मावश्यकता (2) का प्रश्न है इस बात का पूरण रूप से निश्चय कर लेना आवश्यक होगा कि इस प्रकार से सारे काय विधिक साहित्य के अनुवाद में मापा की एकरूपता हो । इस प्रयोजन के लिए यह अधिक उचित होगा कि इस काय के निर्देशन और अधीक्षण का सम्पूरण दायित्व के द्रीय सरकार की एक ही सस्था को सौंप दिया - सरकारी कमचारी अपने प्रापका हिदी मे योग्य बनायें इसके लिए सर- कार उन पर कुछ जिम्मे दारियां डाल सकती है। 7 जहाँ तक (प्रशासनाधिकारियो के प्रशिक्षण) की आवश्यकता स (3) का प्रश्न है भारत सरकार द्वारा अपने कमचारिया को हिन्दी भाषा मे स्वच्छिक आधार पर प्रशिक्षण देने की जो वतमान व्यवस्था की गई है उस पर पुनर्विचार किया गया है । यदि । अनुवाद से यह प्रतीत होता है कि इस प्रकार की चक ल्पिक व्यवस्था से उपयुक्त परिणाम सामने नहीं पा रहे हैं तो सरकार के लिए उचित और आवश्यक होगा कि वह अपनी भाषा नीति को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक सरकारी कमचारी के लिए अनिवार्य कर दे कि वे 1 अपने क्त्तव्य मर को ठीक प्रकार से निभा 92 राजमापा पर ससदीय समिति की राय क्र स राजमापा प्रायोग की सिफारिशें सकने के लिए उचित कार्यावधि मे हिदी का उचित ज्ञान प्राप्त कर लें। इसे स्वीकार किया जा सकता है। 8 आवश्यक्ता (4) की पूर्ति के लिए इस प्रकार का कायक्रम अपनाया जाना चाहिए, जिसके अनुसार शीघ्रलिपिको और टाइ- पिस्टो को नये मापा माध्यम मे शीघ्रलिपि और टाइप ट्रेनिंग और सघीय भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त करने के लिए विशेष छुट्टियां तथा विशेष सुविधाएं प्रदान की जाएँ। सिद्धात रूप से इसे स्वी कार दिया जा सकता है परतु परिवतन की दशाम्रो मे कुछ हलका स्तर काफी रहता। 9 विभिन वर्गों के पदो और सेवाओं की भरती मे निर्दिष्ट योग्यता की दृष्टि से अंग्रेजी भाषा मे योग्यता के जिस स्तर सामायत इसका सम्बध विश्वविद्यालय की उपाधियो से है, को मा यता प्राप्त है वही स्तर हिदी की मापाई योग्यता के लिए भी एक मानदड निश्चित किया जा सकता है। प्रारम्भिक स्थिति में कुछ नीचे स्तर का मी स्वीकार किया जा सकता है। । यह सिफारिश छोडी जा सकती है। 10 सामाय रूप से कहना चाहिए कि नियत स्तर तक योग्यता न प्राप्त करने पर दण्ड की व्यवस्था करना ठीक होगा। यूनतम स्तर से अधिक योग्यता प्राप्त करने पर प्रोत्साहन भोर पुरस्कार देना उपयुक्त प्रतीत होगा। मा इसे स्वीकार पिया जा सकता है सिवाय इस किसमिति का विचार सप सरकार के कुछ प्रशासन के खण्डों म मविष्य में भनिश्चित काल तक उन स्तरों तर अंग्रेजीनी तकनीकी परिभाषाओं का 93 क्रस राजमापा आयोग की सिफारिश प्रयोग जारी रखा जा सकता है जिसके लिए भारतीय परिमापाम्रो का तैयार करना भावश्यक न समझा जाए इसी प्रकार उन खण्डो म पत्र व्यवहार भी अंग्रेजी में जारी रखा जा सकता है जहाँ उस माध्यम के द्वारा विदेशो से निरतर सम्पक बनाये रखना भावश्यक हो। राजमापा पर संसदीय समिति की राय है कि भविष्य में जब तक भारतीय पारिमापिक शब्दावली का विकास करना मावश्यक नहीं समझा जाता जब तक अंग्रेजी पारिभाषिक शब्द प्रयोग यिये जाते रहना काफी रहता न कि हमेशा के लिए जैसा प्रायोग ने सिफारिश की है। 12 इसे स्वीकार किया जा सकता है। भारत सरकार के मत्रालयो और विभागो के अलावा प्रशासनिक सस्थामो और सग- ठनो म मापा माध्यम को बदलना होगा, जैसा कि रेलवे डाक और तार विमाग उत्पादन कर सीमा शुल्क, प्रायकर विभाग मादि । इन संगठनो की अनेक इकाइयां और शाखाएं देश के विमिन भागो मे स्थित हैं, इसलिए इहे ध्यान में रखते हुए भाषा- समस्या के कुछ विशेष पहलू सामने प्रात हैं । इन प्रशासनिक संगठनो के लिए यह भाव- श्यक है कि वे दो भापामो के प्रयोग का एक स्थायी उपाय ढूंढ निकालें, मर्थात् जहाँ तक आतरिफ काय का सम्बध है, ये हिदी का प्रयोग करेंगे और जहाँ तक जनता से व्यव- हार का प्रश्न है वे उन क्षेत्रो मे वहाँ की प्रादेशिक भाषाओ मे काय करेंगे । 13 यह आवश्यक है कि भारत सरकार के इन प्रशासनिक सगठनो और विभागो के वतमान पमचारी-वृद के ढांचे को दो भाषाभो इसे स्वीकार किया जा सकता है।
94 क्रस राजमापा मायोग मी सिफारिश राजमापा पर ससदीय समिति की राय प्रयोग की सुविधा के अनुरूप पुन परीक्षा मौर विवंद्रीकरण किया जाए। इसी प्रकार भर्ती परन यी पद्धति मे भी और भर्ती व लिए पावश्यक योग्यताओ के निर्धारण म तदनुसार परिवतन करना होगा। इसे स्वीकार किया जा सकता है। 1 14 सेवा नियोजक के रूप में इन असिल भार- तीय विभागों और सगठनो को अधिकार है कि वे अपने विमिन बों के प्रतिष्ठानो मे भर्ती करने के उद्देश्य से हिदी की योग्यता के स्तर मी नियत कर दें (जहाँ प्रावश्यकता हो वे प्रादेशिक मापामो की योग्यता का स्तर भी नियत कर सक्त है) यह भी हो सकता है कि क्षेत्रीय या प्रादेशिक आवश्य कतामो के अनुसार हिदी योग्यता का स्तर उस स्तर से कुछ नीचा रखा जाए जो इन दफ्तरों के प्रधान कार्यालय के लिए प्राव. श्यक हो क्योकि प्रधान कार्यालय में तो सारा काय ही हिदी म किया जाना होगा जबकि क्षेत्रीय या प्रादेशिक कार्यालय मे स्थानीय भाषामों का भी प्रयोग होगा। इस स्वीकार किया जा सकता है। 15 सक्रमण काल मे विभिन्न क्षेत्रो के निवासियो के लिए रोजगार के अवसर कम न हो जाएं इसलिए स्थानीय शिक्षण पद्धति मे हि दी को प्रगति को ध्यान में रखते हुए ऐसा अपे- क्षित होगा कि शुरू शुरू मे हिदी की योग्यता का स्तर कुछ कम रखा जाए और उस कमी की पूर्ति मर्ती के बाद सेवा काल में पूरी कर ली जाए । जैस-जैसे विशिष्ट क्षेत्रो में हिदी भाषा शिक्षण की सुविणएं उत्तरोत्तर 95 क्र स राजमापा आयोग की सिफारिशें राजभाषा पर ससदीय समिति की राय बढती जाएं वैसे वैसे ही योग्यता स्तर ऊंचा किया जा सकता है। इसे स्वीकार किया जा सकता है। 16 वेद्रीय सरकार की रेलवे डाक और तारजसी अखिल भारतीय प्रशासनिक सस्थाओ की मापा-नीति मुख्य रूप से इस प्रकार बनायी जानी चाहिए जिससे जनता को सुविधा हो क्योकि जनता की सुविधा के लिए ही उस नीति को बनाया जाना है। इन विभागा की भाषा-नीति का सचालन इस प्रकार नही होना चाहिए कि सुविधामो की उपेक्षा परके हिदी के काय को मागे बढाया जाए । जहां इन बोडों, फार्मों आदि पर हिंदी परिमापामो और पदावलियो का प्रयोग फरना हो वहाँ उहे जनता मे प्रचारित करने के लिए तथा जनता की सुविधा का ध्यान में रखते हुए उनका पाठ प्रादेशिक भाषामो (जहाँ जरूरत हो, अंग्रेजी) म दे दिया जाना चाहिए। 17 इसे स्वीकार किया जा मकता है। यह आवश्यक है कि उन सभी हिदी परि- भाषामो और पदावलियो की विशेषरूप से उनकी जो कि जनता के निकट सम्पक मे आने वाली अखिल भारतीय प्रशासनिक सस्थामो द्वारा प्रयुक्त होती हैं पूर्व परीक्षा की जानी चाहिए कि वे स्थानीय भाषा के रूपो और विचारो के प्रतिकूल तो नहीं हैं। जहां कुछ सस्कृत शब्दो के विभिन्न भाषामा मे विमिन विशिष्ट अथ प्रचलित हो गये हो, वहां उनकी उपेक्षा करके अनुपयुक्त शब्दों के प्रयोग, माध्यम के 'मारतीयकरण" के 1 96 राजमापा पर ससदीय समिति की राय क्र स राजमापा प्रायोग की सिफारिशें प्रयत्नो वा उपहास और तिरस्कार करना होगा। इसे स्वीकार किया जा सकता है। 18 यह उपयुक्त नहीं होगा कि सरकारी कम- चारियो को नये माध्यम में प्रशिक्षित करने के स्थान पर मूल रूप से अंग्रेजी में किया जाए और फिर उसे अनूदित क्यिा जाए और इस प्रकार अलग अनुवाद इकाइयां अथवा न्यूरो स्थापित करके सरकारी कोष पर अतिरिक्त व्यय बढाया जाए यद्यपि प्रशासनिक काय स्थायी रूप से और सक्रमण काल मे सहायक रूप से महत्त्वपूण काय है, परतु अधिकारियो को हिदी में प्रशिक्षित करके उनसे हिदी मे पहले से ही काय कराना अनुवाद कराने से कही अच्छा है । हमारे विचार से सविधान के सघ के कार्यों के लिए मापा माध्यम के परिवतन का जो निर्देश है उसका यह अभिप्राय कदापि नही कि मूलत काय अंग्रेजी मे ही जारी रखा जाए भोर पुन विमिन स्थितियों में सरकारी कोप पर बोझ डालकर उसे हिंदी में अनू- दित कराया जाए। इसे स्वीकार किया जा सकता है। 19 सघ सरकार का यह कदम बहुत उचित होगा यदि वह अपनी सेवामो में भाने वाले नये लोगो के लिए उचित हिदी ज्ञान की मत लगाए । निसदेह इस बात की सूचना बहुत पहले से दे दी जानी चाहिए। मापा की योग्यता का मावश्यक स्तर यूनतम होना चाहिए और इसमें जो कभी हो उसे बाद में 97'. क्र स राजमापा प्रायोग की सिफारिशें राजभाषा पर ससदीय- समिति की राय नौकरी करते समय उचित प्रशिक्षण द्वारा पूरा कर लिया जाना चाहिए । 20 जिन कमचारियो की प्रायु 45 वप या इससे अधिक हो गयी है उनके लिए उतनी ही योग्यता पर्याप्त समझी जानी चाहिए कि वे हिदी समझ सके । इसके लिये इस बात पर जोर नही दिया जाना चाहिए कि जिस योग्यता के साथ वे अपने आपको अग्रेजी में अभिव्यक्त करते हैं उसी योग्यता के साथ वे हिदी म काय कर सकें। यदि आवश्यक हो तो इस प्रयोजन के लिए पृथर परीक्षाप्रो की व्यवस्था की जाए। समिति का विचार है कि 45 वर्ष या अधिक आयु पाले अधिकारिया के लिए हिदी सीखना पावश्यक नहीं होना चाहिए। 21 हम इस बात की सिफारिश नहीं करते कि इस समय सघ के किसी भी काय के लिए अग्रेजी भाषा के प्रयोग पर प्रतिबध लगा दिया जाए। इसे स्वीकार किया जा सकता है। 22 हमारे लिए यह सम्भव नही हो सका है कि सविधान द्वारा नियत अवधि मे सरकारी वायों मे इस परिवतन को पूरा करने के लिए तया हि दो को स्थान देने के लिए तिथिवार एक अमिर समय-सूची तैयार करने दे सक्ते । क्योकि भारत सरकार के विभिन मनालय एक ही शरीर के मिन्न मिन प्रग हैं। इसलिये सामा य रुप से विभिन्न मत्रा- सया और विभागो म हिदी का प्रयोग अभिव पौर सम्बद्ध दग से होना चाहिए। हमे मारत सरकार द्वारा तपार या परिकल्पित ऐसी प्रस्थायी या अर्कालीन कायम की योजना समिति चाहती है कि आयोग की सिफारिशों पर दी गई राय वे मनु- सार सघीय सरकार संघ वी राजमापा के रूप हिदी के अधिकाधिक प्रयोग बनाये मोर उसे अमल म लाये।
98 क्र स राजभाषा आयोग की सिफारिशें राजभाषा पर ससदीय समिति की राय देखने का अवसर नहीं हुमा जिसके अनुसार उसके सभी मधालयो और विभागो मे परिवतन करने का कायम बनाया गया है और उनकी विशेष कठिनाइयो पर ध्यान दिया गया हो, प्राधार तैयारियो के काम का कितना बोझ बढ जाएगा उसका अनुमान किया गया हो, वतमान सरकारी क्मचारी वृद की भाषा योग्यता का लेखा-जोखा हो और उहे ये भाषा माध्यम मे प्रशिक्षित कर सकने की कोई लगभग तिथि नियत कर दी गयी हो। इसलिए हमने प्रारम्मिक आवश्यकतामो को अोरता निर्देश कर दिया है, पर तु परिवतन के सामाय परिकल्पी और सम्बद्ध विमिन प्रश्नों को व्याप्त करने वाले सिद्धात का निणय करना तथा काय करने के लिए योजना तैयार करने और तदुनुमार समय-अनुसूची तयार करने का काम स्वय भारत सरकार पर ही छोड दिया जाना चाहिए, जिससे यह सम्बद्ध परिस्थितियों को पान में रसार कदम उठा सके। 23 इसे स्वीपर किया जा सकता है। भारत के नियत्रर भोर महालेखा परीक्षक के नियंत्रण में काय परने वाले भारतीय सेसा परीदाण और लेसा विभाग के मामले पर विधार दिया गया। जब कोई भी राज्य प्रादेशिक मापाका स्वीकार कर लेगा तो यह व्यवस्था करना अनिवार्य होगा कि मार. तोप मेगा परीक्षण मोर लेता विभाग दे कमचारी जो निराग्यों के साप व्यवहार करते है समद राम की भाषा पर प्रधि.
99 क स राजमापा मायोग की सिफारिशें राजमापा पर ससदीय समिति की राय कार प्राप्त कर लें, जिससे वे लेसे तैयार करने और लेखा परीक्षा करने के अपने फत्त व्यो को निभा सकें । इसका प्रथ यह निकलता है कि किसी राज्य में स्थित लेखा महापरीक्षक नियत्रण के दफ्तर को इस योग्य होना चाहिए कि वह प्रादेशिक भाषा मे प्राप्त लेखो के विवरणो को सकलित करने और प्रादेशिक मापाप्रो मे अक्ति टिप्परिणयो और प्रशासनिक निणयो के अनुसार लेखा- परीक्षा कर सक्ने मे समय हो । 24 इसे स्वीकार किया जा सक्ता है। इस कठिनाई का यह भी हल सुझाया गया है कि लेखा परीक्षा का "प्रातीयकरण" कर दिया जाए ऐसे किसी विकल्प पर विचार करने की आवश्यकता नहीं जिसके कारण इस समय चाल सवैधानिक व्यवस्था मे कोई मुख्य-परिवतन करना पडे । हमारा विचार है कि चाल व्यवस्था के ढांचे के भीतर ही कोई हल ढूंढ लिया जाना चाहिए जिससे एक पोर तो लेखा महापरीक्षा नियत्रण के कार्या लय का प्रतिष्ठान प्रत्येक राज्य में राजभाषा में अक्ति लेनदेन की परीक्षा के कत्तं व्यमारो को निभाने मे समथ हो सके और दूसरी मोर यतमान व्यवस्था जिसके अनुसार संघ एव राज्यो के लेखो और लेखा-परीक्षणी का उत्तरदायित्व भारतीय लेखा-परीक्षण और लेखा विभाग के माध्यम से महानियत्रक अथवा महालेखा परीक्षक मे केद्रित हैं,- बनी रहे । भारतीय लेखा परीक्षण और लेखा विभाग का सगठन और उसमें कर्मचारी नियुक्त करने की पद्धति पर पुनर्विचार
100
क्र स राजभापा आयोग की सिफारियों
राजमापा पर ससदीय समिति
की राय
करना होगा और लगभग इसे उसी प्रकार
से सगठित करना होगा जैसा कि हमने उन
केद्रीय विभागो के बार मे सुझाया जिनका
बाय देश भर में फैला हुआ है ।
राजभाषा अधिनियम 1963 (यथासशोधित
1967) (1963 का अधिनियम सख्याक
19)
(10 मई 1963)
उन भाषामो का, जो सघ के राजकीय प्रयोजनो, ससद मे काय के व्यवहार
केद्रीय और राज्य अधिनियमी और उच्च यायालयो मे कतिपय प्रयोजनो के
लिए प्रयोग में लाई जा सकेंगी उपलब्ध करने के लिए अधिनियम
मारत गणराज्य के चौदहवें वप म मसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह
अधिनियमित हो-~-
1 सक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) यह अधिनियम राजभाषा अधिनियम
1963 कहा जा सकेगा।
(2) धारा 3, जनवरी 1965 + 262 दिन को प्रवृत्त होगी और इस
अधिनियम के शेष उपबध उस तारीख को प्रवृत्त होगे जिसे केद्रीय सरकार
शासकीय राजपत्र मे अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के
विभिन्न उपब घो के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी।
2 परिभाषाए~इस अधिनियम में जब सब कि सदम मे अ यया अपेक्षित
न हो-
(क) 'नियत दिन से धारा 3 के सम्बध मे, जनवरी 1965 को
26वा दिन अभिप्रेत है और इस अधिनियम के किसी माय उपवय
के सम्बघ म यह दिन अभिप्रेत है जिस दिन को वह उपवध प्रवृत
होता है,
(स) "हिदी' से वह हिदी भभिप्रेत है जिसको लिपि देवनागरी है।
101 3 सघ के राजकीय प्रयोजनो के लिए और ससद में प्रयोग के लिए अप्रेजी भाषा का बना रहना-(1) सविधान के प्रारम्भ मे पन्द्रह वर्ष की कालावधि की समाप्ति हो जाने पर भी हिदी के अतिरिक्त भग्ग्रेजी भाषा, नियत दिन से हो- (क) सघ के उन सब राजकीय प्रयोजनो के लिए जिनके लिए वह उस दिन से ठीक पहले प्रयोग में लाई जाती थी, तथा (ख) ससद मे काय के सव्यवहार के लिए, प्रयोग में लाई जाती रह सकेगी परतु सघ और किसी ऐसे राज्य के वीच जिसने हिदी को अपनी राज- मापा के रूप मे नही अपनाया है, पत्रादि के प्रयोजनो के लिए अग्रेजी भाषा प्रयोग में लाई जाएगी परतु यह मौर कि जहां किसी ऐसे राज्य के जिसने हिदी को अपनी राजभाषा के रूप म नहीं अपनाया है और किसी अय गज्य के, जिसने हि दी को अपनी राजमापा के रूप मे नही अपनाया है बीच पत्रादि के प्रयोजनो के लिए हिदी को प्रयोग में लाया जाता है, वहाँ हिदी मे ऐसे पत्रादि के साथ साथ उसका अनुवाद अग्रेजी भाषा म भेजा जायगा परन्तु यह और भी इस उपधारा को किसी भी बात का यह प्रय नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी ऐसे राज्य की जिसने हिदी को अपनी राजमापा के रूप मे नही अपनाया है, सघ के साथ या किसी ऐसे राज्य के साथ, जिसने हिदी को अपनी राजभाषा के रूप मे अपनाया है, या किसी अय राज्य के साथ उसकी सहमति से पत्रादि के प्रयोजनो के लिए हिदी को प्रयोग में लाने से निवारित करती है, और किसी मामले मे उस राज्य के साथ पत्रादि के प्रयोजनो पे लिए अग्रेजी भाषा का प्रयोग बाध्यकर न होगा। (2) उपधारा (1) मे अतविष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहाँ पत्रादि के प्रयोजनो के लिए हिदी या अग्रेजी भाषा- । (1) के द्रीय सरकार के एक मत्रालय या विभाग का कार्यालय के मौर दूमरे मत्रालय या विभाग या कार्यालय के बीच 102 (2) केन्द्रीय सरकार के एक मत्रालय या विभाग या कार्यालय के और पेद्रीय सरकार के स्वामित्व मे के या नियत्रण में के किसी निगम या कम्पनी या उसके किसी कार्यालय पे बीच , (3) के द्रीय सरकार के स्वामित्व में के या नियत्रण मे के किसी निगम या कम्पनी या उसके किसी कार्यालय के और किसी अन्य ऐसे निगम या कम्पनी या कार्यालय के बीच , प्रयोग में लाई जाती है वहां उस तारीख तक, जब तक पूर्वोक्त सम्बधित मधालय विभाग, कार्यालय या निगम या कम्पनी का कमचारिवृद हिदी का कायसाधक ज्ञान प्राप्त नही कर लेता, ऐसे पत्रादि का अनुवाद, अग्रेजी भाषा या हिदी मे भी दिया जाएगा। (3) उपधारा (1) मे अतविष्ट किसी बात के होते हुए भी हिदी भोर मग्रेजी भापा दोनो ही-- - (३) सकल्पों, साधारण प्रादेशो नियमों, अधिसूचनामो प्रशासनिक या अय प्रतिवेदनो या प्रेस विज्ञप्तिया के लिए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके क्सिी मनालय, विभाग या कार्यालय द्वारा या केन्द्रीय सरकार के स्वामित्व में के नियंत्रण मे के या किसी निगम या कम्पनी द्वारा या ऐसे निगम या मम्पनी के किसी कार्यालय द्वारा निकाले जाते हैं, (1) ससद पे किसी सदन या सदनों के समक्ष रखे गये प्रशासनिक तथा प्रय प्रतिवेदनी और राजकीय वागज-पत्रा के लिए (1) केद्रीय सरकार या उसके किसी मत्रालय, विभाग या कार्यालय द्वारा या उसकी मोर से या देदीय सरकार के स्वामित्व मे के पा नियत्रण मे में पिसी निगम या कम्पनी द्वारा या ऐसे निगम या कम्पनी के किसी कार्यालय द्वारा निष्पादित मविदामों पोर कराग पे लिए तथा निकासी गई अनुप्तिमा मनुज्ञापत्रो, मूचनामों पौर निविदा प्ररूपों के लिए प्रयोग में लाई जाएगी। (4) उपधारा (1) या उपधारा (2) या उपधारा (3) के उपवधा पर प्रतिपल प्रभाव से बिना यह है कि ये द्रीय सरकार धारा 8 के प्राधीन बनाए गए नियमों द्वारा उस मापा या उन मापामों का उपाय कर सकेगी जिस या जिहें सुमन रावरीय प्रयारन लिए, रिस मतगत रिसी मनामम, दिमाग 103 अनुभाग या कार्यालय का काय करण है, प्रयोग में लाया जाना है और ऐसे नियम बनाने में राजकीय काय के शीघ्रता और दक्षता के साथ निपटारे का तथा जन साधारण के हितो का सम्यक् ध्यान रखा जाएगा और इस प्रकार बनाए गए नियम विशिष्टतया यह सुनिश्चित करेंगे कि जो व्यक्ति सघ के कायकलाप के सम्बघ मे सेवा कर रहे हैं और जो या तो हिदी मे या अग्रेजी भाषा मे प्रवीण हैं वे प्रभावी रूप से अपना काम कर सके और यह भी कि केवल इस आधार पर कि वे दोनो ही मापामो मे प्रवीण नहीं है, उनका कोई अहित नही होता है। (5) उपधारा (1) के खण्ड (क) के उपबघ और उपधारा (2) उप- पारा (3) मोर उपधारा (4) के उपर घ तब तक प्रवृत्त बने रहेगे जब तक उनमें वर्णित प्रयोजनो के लिए अग्रजी भाषा समाप्त कर देने के लिए ऐसे सभी राज्यो के विधानमण्डली द्वारा, जिहोने हिन्दी को अपनी राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है सकल्प पारित नही कर दिए जाते और जब तक पूर्वोक्त सकल्पो पर विचार कर लेने के पश्चात् ऐसी समाप्ति के लिए ससद के हर एक सदन द्वारा सकल्प पारित नही कर दिया जाता। 4 राजभाषा के सम्बन्ध में समिति-(1) जिस तारीख को धारा 3 प्रवृत्त होती है उससे दस वष की समाप्ति के पश्चात्, राजभाषा के सम्बध में एक समिति इस विषय का सकल्प ससद के किसी भी सदन मे राष्ट्रपति की पूर्व मजूरी से प्रस्तावित मौर दोनों सदनों द्वारा पारित किए जाने पर, गठित की जाएगी। (2) इस समिति मे तीस सदस्य होगे जिनमे से बीस लोक सभा के सदस्य होगे तथा दस राज्य सभा के सदस्य होगे, जो क्रमश लोक सभा के सदस्यो तथा राज्य सभा के सदस्यो द्वारा मानुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल सक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित होगे। (3) इस समिति का कत्तव्य होगा कि वह सघ के राजकीय प्रयोजनो के लिए हिंदी के प्रयोग मे की गई प्रगति का पुनर्विलोकन करे और सिफारिशें करते हुए राष्ट्रपति को प्रतिवेदन करें और राष्ट्रपति उस प्रतिवेदन को ससद के हर एक सदन के समक्ष रखवाएगा और सभी राज्य सरकारो को भिजवाएगा। (4) राष्ट्रपति उपधारा (3) मे निर्दिष्ट प्रतिवेदन पर और उस पर राज्य सरकारो ने यदि कोई मत मिव्यक्त किए हो तो उन पर विचार करने के 104 पश्चात उस समस्त प्रतिवेदा के या उसके किसी भाग के अनुसार निदेश निकाल सपेगा (परतु इस प्रकार निकाले गए निदेश धारा ३ के उपर पो से प्रसगत नहीं होंगे।) 5 के द्रोप मधिनियमों प्रादिपा प्राधिकृत हि दो मनयाद-(1) नियत दिन को और उसके पश्चात् शासकीय राजपत्र के प्राधिकार से प्रकाशित- (५) विमी केद्रीय अधिनियम का या राष्ट्रपति द्वारा प्रस्थापित क्सिी अध्यादेश का, अथवा (ख) सविधान के अधीन या किसी के द्रीय अधिनियम के अधीन निकाले गए किसी प्रादेश, नियम, विनिमय या उपविधि का हिंदी में अनुवाद उसका हिदी म प्राधिकृत पाठ ममझा जायेगा। (2) नियत दिन से ही उन सब विधयको क, जो ससद में किसी भी सदन में पुन स्थापित किए जाने हो और उन सब सशोधनो के, जा उनके सम्बघ में मसद के क्मिी भी सदन में प्रस्तावित किए जाने हो, अ ग्रेजी भाषा के प्राधिकृत पाठ के साथ-साथ उनका हिंदी में अनुवाद भी होगा जो ऐमी रीत से प्राधिकृत किया जाएगा जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमो द्वारा विहित की जाए। 6 कतिपय दशामों में राज्य अधिनियमों का प्राधिक्त हिंदी अनुवाद- जहा किसी राज्य के विधान मडल ने उस राज्य के विधान मडल द्वारा पारित अधिनियमों में अथवा उस राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रस्थापित अध्यादशो में प्रयोग के लिए हिदी से मि न कोई भाषा विहित की है वहीं, मविधान के अनुच्छेद 348 के खण्ड (3) द्वारा अपेक्षित अग्रेजी भाषा मे उसके अनुवाद के अतिरिक, उसका हि दो म मनुवाद उस राज्य के शासकीय राजपत्र मे, उस राज्य के राज्य पाल के प्राधिकार से नियत दिन को या उसके पश्चात प्रकाशित किया जा सकेगा और ऐसी दशा में ऐसे किसी अधिनियम या अध्यादेश का हिंदी में मनु- वाद हिदी भाषा में उसका प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा। 7 उच्च यायालयों के निएपो मादि में हिन्दी या अय राजभाषा का बंकल्पिक प्रयोग-नियत दिन से ही या तत्पश्चाद किसी भी दिन से किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सम्मति से, म ग्रेजी भाषा ये मतिरिवत हिदी 105 या उस राज्य को राजमापा का प्रयाग, उस राज्य के उच्च यायालय द्वारा पारित या दिए गए किमी निरणय डिक्री या प्रादेश के प्रयोजनों के लिए प्राधि कृत कर सकेगा और जहा कोई निर्णय, डिग्री या आदेश (अ ग्रेजी मापा से मिन) ऐसी किसी भाषा में पारित क्यिा या दिया जाता है वहा उसके साथ- साथ उच्च न्यायालय के प्राधिकार से निकाला गया अग्रेजी भाषा मे उसका अनुवाद भी होगा। 8 नियम मनाने की शक्ति-(1) के द्रीय मरकार इस अधिनियम के प्रयोजनो को कार्यान्वित करने के लिए नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी। (2) इस धारा के अधीन बनाया गया हर नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, ससद के हर एक सदन के समक्ष, उस समय जब वह सत्र मे हो, कुल मिलाकर तीस दिन की कालावधि के लिए, जो एक सत्र मे या दो मवर्ती सत्रा म समाविष्ट हो सकेगी रखा जायेगा और यदि उस सत्र के, जिसम वह ऐस रखा गया हा, या ठीक पश्चातवी सन के अवसान के पूर्व दोनो सदन उस नियम मे कोई अन्तर करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनो सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नही बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात, यथास्थिति, वह नियम ऐसे उपातरित रूप मे ही प्रभावशील होगा या उसको कोई भी प्रभाव न होगा किन्तु इस प्रकार कि ऐमा काई उपातर या बातिलकरण उस नियम अधीन पहले की गई किसी बात की विधि मा यता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगा। 9 कतिपय उपयधों का जम्मू कश्मीर को लागू न होना-धारा 6 और धारा 7 के उपब घ जम्मू कश्मीर राज्य को लागू न होग । राजभाषा सम्बधी सकल्प ससद के दोना सदना द्वारा पारित निम्नलिखित सरकारी सकल्प गृह मत्रा लय से 18 जनवरी 1968 को प्रमारित किया गया 1 "जबकि सविधान के अनुच्छेद 343 के अनुमार सघ की राजमापा हिदी रहगी और उसके अनुच्छेद 351 के अनुसार हिदी भाषा को प्रसार-बति करना और उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामाजिक सस्कृति के सब तत्वों को अभिव्यक्ति का माध्यम हा सके, सघ का कत्तव्य है, 106 यह सभा सकल्प करती है कि हिंदी के प्रसार एव विकास की गति वडाने के हेतु तथा सघ के विमिन राजकीय प्रयोजनो के लिए उत्तरोत्तर इसके प्रयोग हेतु भारत सरकार द्वारा एक अधिक गहन एवं व्यापक कायम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यावित किया जाएगा और किए जाने वाले उपायो एव की जाने वाली प्रगति की विस्तृत वार्षिक मूल्यापन रिपोट सपद की दोनो समानो के पटल पर रखी जायेगी और सब राज्य सरकारो को भेजी जायेगी, 2 जबकि सविधान की पाठवी अनुसूची मे हि दी के अतिरिक्त भारत की 14 मुख्य भाषाओ का उल्लेख किया गया है, और देश की शक्षणिक व सास्कृतिक उनति के लिय यह आवश्यक है कि इन भाषामो क पूर्ण विकास के हेतु सामूहिक उपाय किये जाने चाहिये, यह समा सकल्प करती है कि हिंदी के साथ-साथ इन सब मापात्रो के समवित विकास के हतु भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारो के सहयोग से एक कायम तैयार किया जायेगा और उसको कार्यान्वित किया जायगा ताकि वे शीघ्र समृद्ध हो और थाधुनिक नान के सचार का प्रभावी माध्यम बने, 3 जबकि एकता की भावना के सवधन तथा देश के विभिन्न भागो म जनता मे सचार की सुविधा के हेतु यह मावश्यक है कि भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारो के परामश स तयार किये गये त्रि मापा सूत्र यो समी राज्यो म पूणत कार्यान्वित करने के लिए प्रभावी किया जाना चाहिए, यह समा सकल्प करती है कि हिदी भाषी क्षेत्रो मे हिंदी सपा अग्रेजी में अतिरिक्त एक माधुनिक भारतीय भाषा के दक्षिण भारत की मापामो में किसी एक को तरजीह देते हुए और महिदी मापी क्षेत्रो में प्रादशिक मापापो एव पग्रेजी के साथ साय हिंदी में अध्ययन के लिए उस मूत्र क अनुसार प्रयास किया जाना चाहिए । मौर जवपि यह सुनिश्चित करना मावश्यप है कि सप की लोक सेवामों के विषय मे देश के विभिन्न भागों में लोगा के न्यायोचित दावा और हितो का पूण परिवाण दिया जाए पह समा सास करती है- 4 107 (क) कि उन विशेष सेवाप्रो अथवा पदा को छोडकर जिनके लिये ऐसी क्सिी सेवा अथवा पद के कत्तव्यो के सतोपजनक निष्पादन के हेतु केवल अग्रेजी अथवा केवल हिदी अथवा दोनो जसी कि स्थिति हो का उच्च स्तर का ज्ञान प्रावश्यक समझा जाये, संघ सेवाप्रो अथवा पदा के लिए भर्ती करन के हेतु उम्मीदवारो के चयन के समय हिंदी अथवा अग्रेजी मे से किसी एक का ज्ञान अनिवायत अपेक्षित होगा, और (ख) कि परीक्षामो की भावी योजना प्रक्रिया सम्बधी पहलुप्रो एव समय के विषय मे सघ लोक सेवा आयोग के विचार जानने के पश्चात् अखिल भारतीय एव उच्चतर के द्रीय सेवाग्रो सम्ब घी परीक्षाओ के लिये सविधान की आठवी असूसूची में सम्मिलित सभी भापायो तथा अग्रेजी को वैकल्पिक माध्यम के रूप मे रखने की अनुमति होगी।" राजभाषा-नियम 1976 राजभाषा (संघ के प्रशासकीय प्रयोजनो के लिए प्रयोग) नियम, 1976 भारत के राजपत्र मे 17-7-1976 का प्रकाशित किया गया, जिसकी प्रमुख बातें इस प्रकार है- 1 ये सभी केन्द्रीय सरकारी कार्यालया पर जिनमे वेद्रीय सरकार के स्वामित्व मे, या उसके नियत्रण मे निगम या कम्पनी के कार्यालय आदि भी सम्मिलित है, लागू होते हैं (नियम-2) । 2 केद्रीय सरकार के कार्यालयो से पत्रादि (1) हिदी भाषी राज्यो को (जिह "क क्षेत्र" के राज्य कहा गया है) अर्थात् हिमाचल प्रदेश हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार उत्तर प्रदेश और सघ शासित क्षेत्र दिल्ली को अथवा (2) किसी अय कार्यालय को (केद्रीय कार्यालय से मिन) अथवा (3) "क क्षेत्र के किसी व्यक्ति को अनिवायत हिंदी मे ही भेजे जायेंगे और यदि कि ही असाधारण दशामो मे कोई पत्रादि उनम से किसी को अग्रेजी मे भेजा जाता है तो उसके साथ साथ उसका हिंदी अनुवाद मी भेजना अनिवाय है) नियम-3(1) । ३ केद्रीय सरकार के कार्यालयो म पत्रादि (1) पजाब, महाराष्ट्र गुजरात पण्डीगढ सघ शासित क्षेत्र और प्रडमान-निकोबार द्वीप समूह को (जिहे
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107 (4) कि उन विशेप सेवामो अथवा पदो को छोडकर जिनके लिये ऐसी किमी सेवा अथवा पद के कत्तव्यो के सतोपजनक निष्पादन के हेतु केवल अंग्रेजी अथवा केवल हि दी अथवा दोनो जैसी कि स्थिति हो का उच्च स्तर का ज्ञान आवश्यक समझा जाय, सघ सेवामो अथवा पदा के लिए भर्ती करने के हेतु उम्मीदवारो के चयन के समय हिदी अथवा अंग्रेजी मे से किसी एक का ज्ञान अनिवायत अपेक्षित होगा, और (ब) कि परीक्षामो की भावी योजना प्रक्रिया सम्बधी पहलुप्रो एव समय के विषय मे सघ लोक सेवा आयाग के विचार जानने के पश्चात् अखिल भारतीय एव उच्चतर केद्रीय सेवाग्रो सम्ब घी परीक्षाओ के लिय सविधान की पाठवी असूसूची में सम्मिलित समी भापामा तथा अग्रेजी को वैकल्पिक माध्यम के रूप मे रखने की अनुमति होगी।" राजभाषा-नियम 1976 राजमापा (सघ के प्रशासकीय प्रयोजनो के लिए प्रयोग) नियम, 1976 भारत के राजपत्र में 17-7-1976 को प्रकाशित किया गया, जिसकी प्रमुख बातें इस प्रकार हैं- 1 ये सभी केद्रीय सरकारी कार्यालयो पर जिनमे केद्रीय सरकार के स्वामित्व म, या उसके नियत्रण मे निगम या कम्पनी के कार्यालय प्रादि भी सम्मिलित है, लागू होते हैं (नियम-2) । 2 के द्रीय सरकार के कार्यालयो से पत्रादि (1) हिदी मापी राज्यो को (जिह "क क्षेत्र" के राज्य कहा गया है) अर्थात हिमाचल प्रदेश हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार उत्तर प्रदेश और सघ शासित क्षेत्र दिल्ली को अथवा (2) किसी प्रय कार्यालय को (के द्रीय कार्यालय से मिन्न) अथवा (3) "क क्षेत्र के किसी व्यक्ति को अनिवायत हि दी मे ही भेजे जायेंगे और यदि किही असाधारण दशाओ मे कोई पत्रादि उनम से किसी को अग्रेजी मे भेजा जाता है तो उसके साथ-साथ उसका हिंदी अनुवाद भी भेजना अनिवाय है) नियम-3(1) । 3 के द्रीय सरकार के कार्यालयो मे पत्रादि (1) पजाब, महाराष्ट्र गुजरात पण्डीगढ सघ शासित क्षेत्र और अडमान-निकोबार द्वीप समूह को (जि हे 106 यह समा सक्ल्प करती है कि हिंदी के प्रसार एव विकास की गति बढाने के हेतु तथा सघ के विभिन्न राजकीय प्रयोजनो के लिए उत्तरोत्तर इसके प्रयोग हेतु भारत सरकार द्वारा एक अधिक गहा एव व्यापक कायक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यावित किया जाएगा और किए जाने वाले उपायो एव की जाने वाली प्रगति की विस्तृत वार्षिक मूल्याक्न रिपोट ससद की दोना समाप्रो के पटल पर रसी जायगी और सब राज्य सरकारो को भेजी जायेगी, . 2 जबकि सविधान की पाठवी अनुसूची मे हि दी के अतिरिक्त भारत की 14 मुख्य मापाओ का उल्लेख किया गया है, और देश की शक्षणिक एव सास्कृतिक उन्नति के लिये यह आवश्यक है कि इन भाषामा के पूरा विकास के हेतु सामूहिक उपाय किये जाने चाहिय, यह समा सकल्प करती है कि हिंदी के साथ-साथ इन सब मापाप्रो के समन्वित विकास के हेतु भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारी के सहयोग से एक कायक्रम तैयार किया जायेगा और उसको कार्यान्वित किया जायेगा ताकि वे शीघ्र समृद्ध हो और आधुनिक ज्ञान के सचार का प्रभावी माध्यम बने, 3 जबकि एकता की भावना के सवधन तथा देश के विभिन्न भागो म जनता मे सचार की सुविधा के हेतु यह भावण्यक है कि भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारा के परामश से तैयार किये गये नि माया सूत्र को समी गज्यो में पूणत कार्यावित करने के लिए प्रभावी किया जाना चाहिए, यह ममा सकल्प करती है कि हिदी मापी क्षेत्रों मे, हिदी तथा अग्रेजी के अतिरिक्त एक माधुनिक भारतीय भाषा के दक्षिण भारत की भाषामो म किसी एक को तरजीह देते हुए मोर महिदी भाषी क्षेत्रा में प्रादशिव भाषामो एव पग्रेजी के साथ साथ हिदी के मध्ययन के लिए उस मूत्र में अनुमार प्रयप दिया जाना चाहिए । भौर जवकि यह सुनिश्चित करना मावश्यर है कि सघ की लोक सेवायो के विषय में देश के विभिन्न भागो के लोगो के यायोचित दावो और हितो का पूण परित्राण दिया जाए यह समा सास करती है- 4 107 (क) कि उन विशेष सेवाग्रो अथवा पदो को छोडकर जिनके लिये ऐसी क्सिी सेवा अथवा पद के कत्तव्या के सतोपजनक निष्पादन के हेतु केवल अग्रेजी अथवा केवल हिदी अथवा दोना जैसी कि स्थिति हो का उच्च स्तर का ज्ञान आवश्यक समझा जाये, सघ सेवायो अथवा पदा के लिए भर्ती करने के हेतु उम्मीदवारों के चयन के समय हिदी अथवा अग्रेजी में से किसी एक का ज्ञान अनिवायत अपेक्षित होगा, और (ख) कि परीक्षामो की भावी योजना, प्ररिया सम्बधी पहलुप्रो एव समय के विषय मे सघ लोक सेवा आयोग के विचार जानने के पश्चात् अखिल भारतीय एवं उच्चतर केद्रीय सेवाप्रो सम्बधी परीक्षाओ के लिये सविधान को आठवी असूसुनी मे सम्मिलित सभी मापामा तथा अग्रेजी को वैकल्पिक माध्यम के रूप मे रम्बने की अनुमति होगी।" राजभाषा-नियम 1976 राजमापा (सप के प्रशासकीय प्रयोजनो के लिए प्रयोग) नियम, 1976 भारत के राजपत्र मे 17 7-1976 को प्रकाशित किया गया, जिसकी प्रमुख बात इस प्रकार हैं- 1 ये सभी केन्द्रीय सरकारी कार्यालयो पर जिनमे केन्द्रीय सरकार के स्वामित्व मे, या उसके नियत्रण में निगम या कम्पनी के कार्यालय आदि भी सम्मिलित है, लागू होते हैं (नियम-2)। 2 के द्रीय सरकार के कार्यालयो से पत्रादि (1) हिदी भाषी राज्यो को (जिहे "क क्षेत्र के राज्य कहा गया है) अर्थात् हिमाचल प्रदेश हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार उत्तर प्रदेश और सघ शासित क्षेत्र दिल्ली को अथवा (2) किसी अन्य कार्यालय को (केन्द्रीय कार्यालय मे भिन्न) अथवा (3) "क क्षेत्र के किसी व्यक्ति को अनिवायत हिंदी म ही भेजे जायेंगे और यदि कि ही असाधारण दशानो मे कोई पत्रादि उनमें से किसी को प्रग्नेजी मे भेजा जाता है तो उसके साथ-साथ उसका हिंदी अनुवाद भी भेजना अनिवाय है) नियम-3(1) । 3 केद्रीय सरकार के कार्यालयो मे पत्रादि (1) पजाब, महाराष्ट्र गुजरात चण्डीगढ़ सघ शासित क्षेत्र और प्रडमान-निकोबार द्वीप समूह को (जिह 108 ख क्षेत्र के राज्य कहा गया है) अथवा (2) उपयुक्त क्षेत्र में स्थित किसी कार्यालय को (जो केन्द्रीय सरकार के कार्यालय से भिन हो सामा यतया हि दो मे होग और यदि कोई पत्रादि उनमे से किसी को अग्रेगे मे भेजा जाता है तो उमके साय साथ उसका हिंदी अनुवाद भी भेजना अनिवाय होगा । तथापि इन राज्यो मे किसी व्यक्ति को भेजे जान वाल पत्रादि हि दी या अंग्रेजी मे भेजे जा सकते है (नियम-3(2)। अय क्षेत्रा (जिह ग क्षेत्र" कहा गया है के राज्य को या कार्यालय का केन्द्रीय सरकार के कार्यालय से मिन) या व्यक्ति को पनादि अग्रेजी में भेजे जायगे (नियय-3 (3))। 4 केद्रीय सरकार के एक मत्रालय या विभाग और दूसरे मत्रालय या विमाग बीच पत्रादि हिदी अग्रेजी में हो सकत हो । केद्रीय सरकार के एक मत्रालय/विभाग और 'क क्षेत्र" म स्थित सलग्न/अधीनस्थ कार्यालय के बीच पत्रादि हि दी म ऐसे अनुपात मे भेजन पडेंग जिस सरकार निर्धारित करेगी (नियम-4(क) और (ख)। 5 क क्षेत्र' म स्थित अय केन्द्रीय सरकार के कार्यालया के बीच पत्रादि हिन्दी में भेजने जरूरी है (नियम-4 (ग)। 6 केद्रीय सरकार के कार्यालयो और 'ख" तथा 'ग क्षेत्रा में स्थित कार्यालयो म पत्रादि हि दो अथवा अग्रेजी मे हो सक्त हैं (किही मामलो म अनुवाद भी देने हाग) (नियम 4(घ))। 7 हिंदी में प्राप्त पत्रादि के उत्तर मनिवायत हिंदी में दिए जाएगें (नियम-5) कोई प्रावेदन, अपील या अभिवेदन जब मी हिंदी म किया जाए या उसमे हिदी मे हस्ताक्षर किए जाए तो उसका उत्तर हिंदी में ही दिया जाएगा (नियम 7 (2))। 8 सकल्प अधिमूचना, सामा य मादेश लाइसस परमिट, निविदा नोटिस, रिपोट मादि पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति का उत्तरदायित्व होगा कि वह यह सुनिश्चित कर ले वि ऐस दस्तावेज हिदी और अग्रेजी दोना मे ही तैयार किए जाते हैं, निष्पादित किए जाते हैं या पारी किए जात हैं (नियम 6)। १ कोई कमचारी विसी फाईल पर टिप्पणी हिदी या प्रग्रेजी म लिस साता 109 है और उसमे यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह उसका अनुवाद दूसरी मापा मे प्रस्तुत करे (नियम 8 (1)) : 10 केद्रीय सरकार का कमचारी जिसे हिंदी का कायसाधन ज्ञान प्राप्त है, किसी हि दी दस्तावेज के अग्रेजी अनुवाद की माग तब ही कर सकता है जबकि वह दस्तावेज विधिक या तकनीकी प्रकृति का हो (नियम (2))। किसी कमचारी के बारे में उस समय यह समझा जाएगा कि उसने हि दी का काय साधक ज्ञान प्राप्त कर लिया है यदि उसने मैटिक परीक्षा या उसके समतुल्य परीक्षा हि दी विषय के साथ उत्तीण कर ली है अथवा प्राज्ञ परीक्षा आदि उत्तीण कर ली है अथवा वह यह घोषणा कर चुका है कि उसने ऐसा नान प्राप्त कर लिया है (नियम 10)। 11 केद्रीय सरकार के कार्यालयो से सम्बंधित सभी मै युअल, सहिताएं और अय प्रक्रिया सम्बन्धी साहित्य हि दी और अग्रेजी दोनो मे द्विमापिक रूप मे मुद्रित या साइक्लोस्टाइल और प्रकाशित करना अनिवाय होगा। सभी फाम और रजिस्टरो के शीप नामपटट सूचनापटट तथा स्टेशनरी आदि की मदें हिंदी और अ ग्रेजी म होगी (नियम 11)। 12 प्रत्यक कार्यालय के प्रशासनिक प्रधान का यह उत्तरदायित्व होगा कि वह यह सुनिश्चित कर कि राजभाषा अधिनियम और इन नियमो का समुचित रूप से अनुपालन किया जाता है और इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त और प्रमावकारी जाप पडताल के उपाय करें (नियम 12)। सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग के लिए माग निर्देशन निम्नलिखित के लिए हिदी का ही प्रयोग किया जाए कही से भी प्राप्त हिंदी पत्र प्रयवा हिदी मे हस्ताक्षरित पत्र का उत्तर देने मे । 2 (1) "क' तथा 'स" क्षेत्र के राज्या/संघ राज्य क्षेत्रो को मूल पत्र भेजने (n) हिदी मापी क्षेत्रो में (क) पेन्द्रीय सरकारी कार्यालयो म काम करन वाले समूह "ग" तथा "घ कमचारिया की सेवा पजियों में प्रविष्टिया ।
110 (ख) केद्रीय सरकारी कार्यालयो द्वारा भारत सरकार के मत्रालयो/विभागो और राज्य सरकारो को भेजे जान वाले तार । - (ग) केद्रीय सरकारी कार्यालयो और जनता के बीच पत्र-व्यवहार (m) "क" तथा "ख" शेषो में स्थित कार्यालया और व्यक्तियो का भेजे जाने वाले लिफाफो पर पत लिखना। 3 निम्नलिखित कार्यों के लिए हिदी का प्रयोग किया जा सकता है (6) फाइलो प्रादि पर विषय लिखना, (1) टिप्पणिया और मसौद तैयार करना। निम्नलिखित के लिए हि दी और अग्रेजी दोनो का प्रयोग अनिवाय है (1) सामा य प्रादेश, (2) निमय, विनियम, अधिसूचनाएं सकल्प, (3) प्रशासनिक तथा प्रय रिपोर्ट, (4) सविदाएं करार, लाइसेंस परमिट, टेण्डर के नोटिस और फाम (5) ससद के समक्ष रखे जाने वाले कागजात (6) प्रेस विज्ञप्तिया, (7) सभी राज्य सरकारो को भेजे जाने वाले परिपत्र। 2 इनके लिए हिदी और अग्रेजी दोनो का प्रयोग किया जाए (1) सरकारी समारोह के लिये निमत्रण-पत्र, फाम, सील, रबड की मोहर, नाम ट्ट और लैटरहह । (2) क मत्रालयो, विभागो द्वारा प्रायोजित सम्मेलनों, बठको मे लगाए जाने वाले साइनबोड, ख इमारतो, समिति और सम्मेलन कक्षो मादि मे स्थायी साइनबोड। 3 अखिल भारतीय स्तर के लिए अथवा हिदी भापी क्षेत्रो के लिए जारी किये जाने वाले सरकारी विज्ञापन । 4 कोड मैनुअल, प्रक्रिया साहित्य तया नियमो/विनियमो प्रादि के सकलन । 5 क अखिल भारतीय सम्मेलन तथा जिन सम्मेलनो मे हिदी मापी राज्यों के मत्री मोर गैर-सरकारी सदस्य भी भाग ले रह हो और ख हिदी से सम्बंधित मामलो पर होने वाले जिन सम्मेलनो मे गैर सरकारी व्यक्ति भात्रित हा उनकी कायसूची की टिप्पणिया और कायवृत्त परामश समितियो के लिए साराश तथा मन्त्रिमण्डल के लिय टिप्पणिया। 6 नाट अग्रेजी का ही प्रयाग करें केन्द्रीय सरकार के कार्यालय से 'ग" क्षेत्र के निसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्र को अथवा ऐसे राज्य/संघ राज्य क्षेत्र मे (के द्रीय सरकार के कार्यालय से मिन) किसी कायालय या व्यक्ति को पत्रादि में केवल अग्रेजी का प्रयोग किया जाये। राजभाषा विषयक विविध प्रायोग सविधान के अनुसार भारत सरकार की राजमापा-नीति के सम्बध में जो कानूनी स्थिति है, वह पीछे बताई जा चुकी है । भारतीय सविधान लागू होने पर 27 मई 1952 को हिदी के प्रयोग के सम्बध मे एक प्रादेश निकाला गया था, जिसके अनुसार अगरजी भाषा के अतिरिक्त हि दी और अतर्राष्ट्रीय प्रको के आतरिक देवनागरी के प्रको के प्रयोग को प्राधिकृत किया गया था। 3 दिसम्बर 1955 को राष्ट्रपति ने राजमापा सम्बधी फिर एक मादेश निकाला, जिसम सघ के निम्नाक्ति सरकारी प्रयोजनो के लिए अगरेजी भाषा के अतिरिक्त हिदी के प्रयोग को प्राधिकृत दिया गया- 1- जनता के साथ पत्र-व्यवहार 2- प्रशासनिक रपटें सरकारी पत्रिकाए, ससद में की जाने वाली रपटें। 3- सरकारी सकल्प और विधायी अधिनियम 4- हिदी अपना लेने वाली राज्य सरकारो से पत्र-व्यवहार । 5- सघिया एव करार । 6- मय देशो की सरकारो उनके दूतो तथा मतर्राष्ट्रीय संगठनो के साथ पत्र-व्यवहार । 7- राजनायिक, कौंसिला के पदाधिकारियो तथा अतर्राष्ट्रीय संगठनो म भारतीय प्रतिनिधियों के नाम जारी किए जाने वाले मोपचारिक दस्तावेज ।
112 यहां उल्लेखनीय है कि 7 जून 1955 को राजभाषा प्रायोग गठित क्यिा जा चुका था, जिसका प्रतिवेदन 1957 में ससदीय समिति के सामने प्रस्तुत हुआ पौर उसमे समिति की जो सिफारिशें थी वे पीछे प्रतिवेदन के साथ दी जा चुकी है । समिति ने अपनी प्रतिम रिपोट 8 फरवरी 1959 को दी थी । समिति की रिपोट मे यह स्पष्टत उल्लेख था कि किसी प्रजातात्रिक सरकार के लिए अने श्चित काल तक अपना काम-काज ऐसी मापा से चलाना सभव नहीं है जिसे देश कुछ लोग ही समझते हो।" समिति की रिपोट पर लोकसभा मे 2-4 सितम्बर 1959 को तथा राज्य समा मे 8 9 सितम्बर 1959 को चर्चा हुई । तत्कालीन प्रधानमत्री प जवाहर लाल नेहरू ने अगरेजी की पर्याप्त प्रशसा करते हुए भी यह मत व्यक्त किया कि अगरेजी निश्चय ही एक थोपी हुई माषा है । इसने हमारे लिए मान-विनान की खिडकिया जरूर खोली एव हम पर्याप्त नान भी दिया, पर इस पर एक ऐसी भाषा होने का लाछन भी है जो हमारी अपनी मापात्रो और हमारी साम्नतिक परम्परामो के ऊपर जमकर बैठ गई है।' अन्त मे 29 अप्रेल 1960 को राष्ट्रपति ने सविधान के अनुच्छेद 344 खण्ड (6) द्वारा प्रदत्त शक्तियो का प्रयोग करते हुए एक मादेश निकाला जिसमे अनेक बिदुओं पर स्पष्ट निणय थे और हिंदी को राजभाषा के रूप म प्रयुक्त करने के लिए अनेक प्रयत्न स्पष्टत उल्लिखित किए गए । इससे हिदी के प्रयोग में सक्रियता आई । इसी के अनुसार सन 1961 मे वनानिक तथा तक- नीकी शब्दावली आयोग" गठित किया गया । इस प्रायोग ने हि दो वे प्रयोग के लिए अनेक प्रयत्न किए। इसके अलावा एक 'राजभाषा विधायी प्रायोग' मी गठित किया गया जिसके कई वाय भी सराहनीय हैं । भनेर अधिनियमो का हिंदी में अनुवाद कराया गया है तथा "विपि श दावली" का भी प्रकाशन हो चुका है। सरकारी तथा गर-सरकारी स्तर पर हिली के विकास के लिए अन्य प्रयत्न 29 माच 1961 को सरकार ने हिदी र उत्तरोत्तर प्रयाग के लिए योजनावद स्पष्ट गायत्रम प्रस्तुत किया । गृह मत्रालय 215 1960 को ही एक पार्यालय पापन प्रसारित पर सभी समारोहो के लिए निमत्रए-पत्र हिदी तथा .
T13 "1" अगरेजी दोनो मे जारी करने की पद्धति अपना चुका था। चतुर्थ श्रेणी कर्म चारियों की सेवा पजिवामा मे प्रविष्टिया हि दी मे करने का आदेश भी बहुत पहले 1957 मे ही जारी हो का था। 19-8 68, 19-5-70, तथा 10-6-74 के कार्यालय तापनो मे फिर इन आदेशो का स्मरण कराया गया । - सी सन् 1962 63 में यह व्यवस्था भी की गई थी कि भारत सरकार का रा-पत्र, (गजट) अगरेजी के अतिरिक्त हिन्दी में भी प्राशित हो यद्यपि उसके लिए कुछ विशेष क्षेत्र निर्घारित कर दिए गए थे। कि तु उन निर्धारित क्षेत्रो मे मी हिदी मे राजपत्र नियमित रूप से प्रकाशित नही हुआ । इस संबंध मे सरकारी स्तर पर प्रयत्न भी दिए गए कि तु कुछ सम्बधित विभागो ने नियम का पालन नही किया । 1970 में स्पष्टत आदेश लिए गए कि सभी हिन्दी पत्रो के उत्तर हिदी म ही दिए जाए 'कतु उसका भी पूणत पालन नहीं हुआ । यह मी माज्ञा दी गई कि पत्र मूले रूप में हिन्दी म लिखे जाए और उसका अनुवाद अगरेजी मे हो, पर तु यह आदेश भी प्रभावी सिद्ध न हुआ । गृह सचिव की अध्यक्षता मे हिदी कायक्रम कार्या वयन समिति" का गठन भी किया गया । इसकी सफलता को देखते हुए अ य अनेक कार्या वयन समितिया भी गठित की गई तथा हि दी सलाहकार समितिया मी विभिन्न विभागो गठित की गई । कमचारियों को हिदी का प्रशिक्षण देने के लिये गहन हि दी शिक्षण योजना भी प्रारम्भ की गई, जिसके अनुसार सन 1972 से केद्रीय हिंदी सस्थान प्रागरा के दिल्ली में द्र से हिदी शिक्षण कायक्रम चलाए जाते है। प्रशासनिन प्रशिक्षण की अकादमी मसूरी मे भी हिन्दी के प्रशिक्षण की व्यवस्था है । सन् 1969 मे कोठारी समिति ने सघीय लोक सेवा प्रायोग की परिक्षाआ मे या हिदी को मय भारतीय भाषाओं के साथ परीक्षा का माध्यम बनाने की सिफारिश की थी जो लागू हो चुकी है। - कतिपय अय गैर सरकारी प्रयत्न स्वाधीनता के पश्चात् राष्ट्रमापा के रूप मे हि दो के विकास के लिए व्यक्तियो और सस्थामा द्वारा अनेक प्रयत्न किए जा रहे है । आगरा का केंद्रीय हिन्दी सस्थान आरम्भ में एक गर' सरकारी सस्था के रूप में ही स्थापित किया गया था, जिसने दक्षिण भारत के प्रत्याशियो का हिदी का प्रशिक्षण देना भारम किया था। हिंदी साहित्य सम्मेलन नागरी प्रचारिणी सभा तथा कई राज्यो मे स्थापित भय सामाजिक साहित्यिक सस्भाए हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए प्रयत्नशील है । दक्षिण भारत के सभी राज्यो मे विसी न किसी नाम से हिन्दी 114 का प्रचार करने वाली संस्थाए संचालित हो रही है। इन सस्थाओ ने उत्तर- दक्षिण मे सेतु का काय किया है तथा हिदी को वहा लोकप्रिय बनाया है । कई सस्याए अहिदी भापियो को हिन्दी मे लेखनकाय के लिए पुरस्कार एव अय सम्मान देती है। कई प्रकाशनो ने भी हिदी के प्रचार प्रसार के लिए पुरस्कार देना प्रारम्भ किया है । इस प्रकार हर स्तर पर गैर सरकारी प्रयत्न चल रह है। माशा है एक दिन हिदी को अगरेजी के चगुल से छुडाया जा सकेगा तथा वह व्यावहारिक रूप में राष्ट्रभाषा तो है हो, राजमापा भी बन कर रहेगा।
पचम प्रध्याय व्यावहारिक हिन्दी . हिदी" भापा का राष्ट्रभाषा और राजभाषा तो स्वीकार पर लिया गया है, किंतु अभी तक उसका यवहार पूणत नहीं हो पा रहा है । कि तु इसका तात्पय यह नहीं है कि राष्ट्रभाषा हि दो राजभाषा हि दी एव व्यावहारिक हिदी बाई अलग अलग स्वरूप है। प्यावहारिक हिदी से तात्पय - हिदी का वह स्वरूप जो प्राय व्यवहार मे पाता है ध्यावहारिक हिदी कहलाता है । राष्ट्रभाषा और राजभाषा को इससे अलग नही किया जा सकता। व्यावहारिक हिदी से प्रगर उसके किसी नाम की स्वरूप गत भिन्नता है, तो वह साहित्यिक और वैज्ञानिक हि दी है । व्यावहारिक हिदी की सरचना में उसकी बोलियो का अधिक योगदान रहता है । सामाय जन ही नहीं विशिष्ट जन भी व्यावहारिक हिंदी का ही प्रयोग करते हैं । हिदी भापी राज्यो मे बोलचाल मे इसी का प्रयोग होता है । सिनेमा, रेडियो दूरदशन, कारखानो, कार्यालयो आदि मे व्यावहारिक हिन्दी का ही प्रयोग होता है। नगरवासी प्राय व्यावहारिक हिदी का ही प्रयोग करते हैं । पत्र व्यवहार करने के लिए व्यावहारिक हि दी ही काम पाती है । लोक प्रचलित शब्दावली को ग्रहण करने के लिए व्यावहारिक हिदी का द्वार कभी बाद नहीं होता। भारतवप की अधिकाश जन-सख्या व्यावहारिक हिदी को समझती है तथा अपना काम चलाती है । भले ही नगरा मे भोर कुछ ग्रामीण कस्बो मे भी गली गली मे अगरजी स्कूल खुल गए हो, कि तु रोजमर्रा का काम काज हिदी म ही चलता है । नेता लोग शहर मे या संसद में बैठकर भले ही अंग्रेजी बोलते हो, किंतु वे भी वोट, व्यावहारिक हिदी 116 । म ही मागते हैं। बाजारो, रेल्वे स्टेशना बस अडडो होटलो तक उसका शासन फैला हुमा है । अपने इसी गुण के कारण वह देश को राष्ट्रभाषा भी है । । भावश्यकता और उपादेयता-- भारत की राष्ट्रमापा और गजभाषा बन जान का गौरव पाने वाली हिंदी विशाल जन समाज के लिए जीवन की एक बहुत बड़ी प्रावश्यक्ता भी है। दो प्रतिशत से अधिक लोग अगरेजी नहीं समझ सक्त । ऐसे लोगो को छोड देतो शेप 98 प्रतिशत लोगो के पारस्परिक सम्ब धो क लिए हिदी तथा प्रय मारतीय मापात्रो के प्रयोग की आवश्यकता है। भय मारतीय भाषाओ की तुलना में हिंदी बोलने वाले लोग कई गुना अधिक है। ये लोग दैनिक व्यवहार हिदी मे ही चलाते हैं । अगरेजी पढे लिखे लोग भी मदिरों मस्जिदो-गुरुद्वारा मे हिदी ही बोलते हैं, हिदी मे ही पूजा पाठ करते हैं । जिस प्रकार वोटो के लिए जनता तक पहुँचने के लिए नेतामा के लिए व्यावहारिक हि दी प्रावश्यक है, उसी प्रकार भगवान तक पहुंचने का कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूरण करने के लिए भी सामाय जनो को ही नहीं, विशिष्ट जनो के लिए भी व्यावहारिक हिंदी आवश्यक है। हिदी के द्वारा हम अपने परिवार समाज, घम, राजनीति और मांस्कृतिक सम्बन्धों को समझ पाते हैं । राष्ट्र के अधिकाश लोकन्यवहारो मे इसकी बहुत उपयोगिता है । राष्ट्र की एकता और अखण्डता की रक्षा के लिए राष्ट्रभापा हिदी के व्यावहारिक स्वरूप की सर्वाधिक उपयोगिता है। शिक्षा के माध्यम के रूप में हिंदी का व्यवहार शिक्षा का माध्यम राष्ट्रभाषा या मातृभाषा ही होनी चाहिए । बालय अपनी भाषा मे दिए हुए ज्ञान को बहुत जल्दी समझ लेते हैं तथा मली प्रकार स्मरण भी रख पात हैं। स्वाधीनता के पश्चात् उत्तर भारत के कई राज्पा म शिक्षा का माध्यम 'हिदी' को बनाया गया। विमान और वाणिज्य के विषय भी हिदी मे पढाने की व्यवस्था आरम्भ मे माध्यमिक स्तर तक की गई। वैज्ञानिक तथा तकनीकी श दावली आयाग ने इस दिशा में बहुत प्रयास किए विविध शब्दकोपो का सम्पादन मोर प्रकाशन एक महत्वपूण काय था, जो सरकारी प्रयत्नो सम्भव हुमा । एसे अध्यापको की नियुक्तिया तथा पदोन्नतियां की गई, जो हिंदी माध्यम से शिक्षा दे सके । फ्लत उत्तरप्रदेश, बिहार राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचलप्रदेश तथा मध्यप्रदेश में हिंदी माध्यम सफल सिद्ध हुमा।
117 महाविद्यालया एव विश्वविद्यालयो में भी हिदी मा यम से शिक्षा देने की व्यवस्था हुई तथा छात्रो एव अध्यापको में भी हिदी म शिक्षा के आदान प्रदान की अभिरूचि बढती गई । केद्र सरकार ने सभी विषय की पाठयपुस्तकें हि दी म तैयार कराने के लिए इन राज्यो मे हि दी ग्रय अकादमिया की स्थापना की। इन अकादमियो ने विज्ञान, कृपि चिकित्सा अभियानिकी, वाणिज्य आदि विषयो के ग्रथ हिदी मे तैयार कराए। प्रारम्भ में इन विषयों की महत्वपूण अगरेजी पाठ्यपुस्तको का हिंदी में अनुवाद कराया गया । धीर धीरे हिदी में समी विषया के मौलिक लेखन और प्रकाशन की भी व्यवस्था हुई। कई बडे प्रकाशका ने भी हिन्दी को शिक्षा का माध्यम बनान के लिए अच्छे हि दी प्रथा का प्रकाशन करके प्रशसनीय योग दिया। भारत सरकार के अलावा प्रातीय मरकारो ने भी हि दी म पाठ्यपुस्तकें तैयार करने के लिए अनक प्रयास किए । कई विपया को हिदी मे लिखित मौलिक पाठ्यपुस्तका पर पुरस्कार देन को योजनाए भी चलाई गई । इस प्रकार के प्रयास अनेक दिशानो मे हो रहे है । फ्लत उच्च स्तर पर भी हि दी शिक्षा का माध्यम बन चुकी है और कई प्रतियोगिता परीक्षाए भी अब हि दी म होो लगी है। निश्चय ही हिदी को शिक्षा का माध्यम बनाने से देश के कई राज्यो म शिक्षा का स्तर ऊंचा उठा है तथा देश को पहचानने की क्षमता तया विवक का विकास भी हुआ है। प्राजकल राजकाय के सम्पादन हेतु प्रशासनिक कार्यालयीय विधि व्यापारिक एव वैज्ञानिक प्रादि विषयक शब्दावली प्रमुख अंग्रेजी शब्दो के साथ उनके हि दी पर्याय यहा वर्णमाला नम से दिए जा Accountant Account Clerk Accounts Comiler Accounts Controller Accounts Inspector Accounts Officer Addl Advocate General-cum Government Advocate Addl Asstt Commissioner रेखाकार लेखा लिपिक लेखा-सक्लक लखा-नियत्रक लेखा निरीक्षक लेखा अधिकारी अपर महाधिवत्ता एव सरकारी अधिवक्ता अपर सहायक मायुक्त 118 Addl Chief Secretary अपर मुरय सचिव Add District Animal अपर जिला पशुपालन अधिकार Husbandry Officer Addl District Judge अपर जिला यायाधीश Addl Health Officer अपर स्वास्थ्य अधिकारी Addl Inspector General अपर महानिरीक्षक Addl Suptd of Police अपर पुलिस अधीक्षक Adult Education Officer प्रौढ शिक्षा अधिकारी Advocate General महाधिवक्ता/एडवोकेट जनरल Agricultural Assistant कृपि सहायक Agriculture Chemist कपि रसायनन Agriculture Engineer कृषि प्रमियता Agriculture Engineer cum कृषि-अमियता एव सचिव Secretary Agriculture Extension Officer कृषि प्रसार अधिकारी Agriculture Information Officer कृपि-सूचना अधिकारी Agronomist वृपि विज्ञानी Animal Husbandıy Officer पशुपालन-अधिकारी Announcer उदघोषक Assistant Accounts Officer सहायक लेखा अधिकारी Asstt Agriculture Engineer सहायक कृषि अभियता Assistant Attendant सहायक परिचारक Assistant Cashier Assistant Commissioner सहायक आयुक्त Assistant Conservator सहायक वन रक्षक Asstt Director Assistant Employment Officer सहायक रोजगार अधिकारी Assistant Enforcement Officer सहायक प्रवतन अधिकारी Assistant Engineer सहायक अभियन्ता Assistant Engineer (Survey) सहायक अभियंता (सर्वेक्षण) Assistant Entomologist सहायक कीट विनानी Assistant Geologist सहायक भू-बनानिक Assistant Incharge Store सहायक प्रभारी (भण्डारी) सहायक खजाची सहायक निदेशक 119 सहायक सचिव Assistant Information Officer सहायक सूचना अधिकारी Assistant Librarian सहायक पुस्तकालयाध्यक्ष Assistant Manager, Salt महायक व्यवस्थापक (लवण) Assistant Matron सहायक मातृका Assistant Operator सहायक प्रचालक Assistant Probation Officer सहायक परिवीक्षा अधिकारी Assistant Record Keeper सहायक प्रमिलेखपाल Assistant Research Officer सहायक अनुमधान-अधिकारी Assistant Revenue Officer सहायक राजस्व अधिकारी Assistant Secretary Assistant Sub-Inspector सहायक उप निरीक्षक Baeter elogist जीवाणु विज्ञानी Cultural Officer सास्कृतिक अधिकारी Chairman, State Transport मध्यक्ष, राज्य परिवहन प्राधिकारी Authority Chairman, Urban Improvement अध्यक्ष, नगर-विकास यास Trust Chief Engineer Chief Engineer, Public Works मुख्य अभियंता लोक निर्माण Department (B & R) मुख्य (भवन एव पथ) Chief Engineer, (Irrigation) मुख्य अभियन्ता (सिंचाई) Chief Ground Water Engineer मुख्य भू जल अमिमता Chief Justice मुग्य यायाधीश Chief Probation Officer मुख्य परिवीक्षा अधिकारी Commercial Accountant वाणिज्यिक लेखाकार Commercial Taxes Officer वाणिज्यिक कर अधिकारी Commissioner, Departmental मायुक्त, विमागीय जाच Enquiry Commissioner, Davasthan आयुक्त देवस्थान विभाग Department Commissioner, Excise and मायुक्त, आबकारी एवं करारोपण Taxation Commissioner, Sales Tax मुख्य अभियाता . मयुक्त विक्री कर 120 उपमत्री Conservator of Forests वन संरक्षक Controller of Stores भण्डार नियश्रय Consolidation Officer चरर दी अधिकारी Craftsman शिल्पकार Dairy Engineer दुग्धशाला अभियाता Demonstrator (Agriculture सिदशव (पि तूचना) Information) Dental Surgeon दत चिकित्सक Daputy Conservator उप सरक्षर वन विभाग Deputy Director Livestock उप निदेशक पशुधन शाखा Section Deputy Director of Education & उप-निदेशक, शिक्षा एवं रोजगार Employment Deputy Minister Deputy Registrar उप पजीयक D puty Town Planner उप नगर प्रायोजक Despatch Clerk प्रेषण लिपिक Development Commissioner Director of Agriculture निदेशक, कृषि विभाग Director of Animal Husbandry निदेशक, पशुपालन विभाग Director of Archives, Rajasthan निदेशक, पुरालख (राजस्थान) Director of Civil Defence निदेशक, नागरिक सुरक्षा Director of Colonsisation निदेशक, उपनिवेशन Director of Economic and निदेशक माथिक एव जौद्योगिक सर्वेक्षण Industrial Survey Director of Economics and निदेशक माथिको एव साख्यिकी Statistics Director of Forensic Laboratory निदेशक, विधि चिकित्सा-विज्ञान प्रयोग- शाला Director of General Branch निदेशक, सामा य शाखा Director of Jail Iodustries निदेशक, कारागार उद्याग Director of Local Bodies निदेशक, स्थानीय निकाय Director of Medical and Health निदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा Services विकास आयुक्त 121 Director of Mines and Geology निदेशक, खान एव भू गम विमाग Director of P F Department निदेशक, भविष्य निधि विभाग Director of Public Relations निदेशक जन सपर कार्यालय Director of Social Welfare निदेशक समाज कल्याण विभाग Department Director of Transport निदेशक, परिवहन विभाग District Employm nt Oni er जिला नियोजन अधिकारी District Industries Officer जिला-उद्योग अधिकारी District Judge जिला यायाधीश D strict Public Relation Officer जिला जन-सपक अधिकारी District Revenue Accountant जिला राजस्व लेखाकार District Sheep and Wool Officer जिला भड व ऊन अधिकारी District Social Welfare Officer for TATJ FCOTT STEFTTT Education Officer शिक्षा अधिकारी Enforcement Officer प्रवतन अधिकारी Engineering Assistant अभियात्रिकी सहायक Excise Clerk प्रावकारी लिपिक Excise Magistrate आवकारी दण्डनायक Executive Engineer PWD अधिशासी अभियंता, लोक निर्माण (B&R) विमाग (भवन एण्ड पथ) Executive Engineer Survery and अधिशासी अभिय ता, Investigation Project सर्वेक्षण एव मवेपण परियोजना Finance Commissioner Food Assistant खाद्य सहायक Food Inspector खाद्य निरीक्षक Forest guard वन-रक्षक Gate Keeper द्वारपाल Govt Advocate सरकारी अधिवक्ता Head Master, Deaf and Dump प्रधानाध्यापक, मूक एव बधिर विद्यालय School Horticulturist उद्यान विशेषज्ञ Inspector General of Police महानिरीक्षक, पुलिस Iaspector General of Prisons महानिरीक्षक कारागार वित्त प्रायुक्त 122 गाना निगर Inspector, land Recon Inirxctor, or Stores and FuTमहामना daoints Inspector Welshis and Meature fprint #3 T4 217 Joint Duyclopment मनुमति प्रात Commissioner Joint Director Junior Accountant मिनाकार Junior D-monieator Efter frutar Junior Engineer' प्रिमियता Junior Specialist Affam Junior Instructor मटि Laboratory Assistant प्रपोगगामा गायर Laboratory Incharge प्रयोगामारी Labour Inspectos धम निरी Labour officer थम अधिरारी Labour Welfare offeer, Health धम-मस्याण अधिकारी, स्वास्थ्य Engin-crins प्रमियोतिषी Lady Mutron मारा Lady Supervisor पय पहिया Land Supervisor भू-गर्वेशन Legal Assistant विपि-सहापर Legal Draftsman विधि प्राम्पकार Legal Editor विधि सम्पादन Linuson Officer सम्पर अधिकारी Legal Remembrances विधि परामर्शी Library Assistant पुस्तकालय सहायक Loan Inspector Loan Officer Lower Division Clerk पनिष्ठ लिपिक Manager, Incharge of स्यवस्थापक प्रभारी, मोपथ निर्माण Pharmacies शाला Medical Attendant चिकित्सा परिचालक भाप निरीदार ऋण मधिकारी 123 , प्रेक्षक . Music and Dance Teacher सगीत एव नृत्य-अध्यापन Musician संगीतकार Nursing Superintendent उपचर्या अधीक्षक Nutrition Assistant पोपण सहायक Observer Officer Incharge Junior Staff प्रभारी अधिकारी, कनिष्ठ समचारी Training प्रशिक्षण Officer Incharge, Livestock प्रभार अधिकारी, पशुधन शोध केन्द्र Research Station Officer Incharge, Museum प्रमारी अधिकारी, संग्रहालय Opthalmologist नेत्र चिकित्सक Packer वेष्टक Pay Clerk वेतन लिपिक Peon चपरासी Physical Training Instructor व्यायाम प्रशिक्षक Physician Specialist चिकित्साविशेषज्ञ Planning cum Survey Officer आयोजना एव सर्वेक्षण अधिकारी Plant Breeder पौध उत्पादक Plant Protection Supervisor पौध सरक्षण पयवेक्षक Printer मुद्रक Private Secretary to Governor निजी सहायक राज्यपाल Professor आचाय Professor, Anatomy प्राचाय शरीर-रचना विज्ञान Professor, Pharmacology प्राचाय, औषध निर्माण विज्ञान Professor, Physiology माचाय शरीरी किया विज्ञान Public Prosecutor सरकारी अमियोजक Public Relations Officer जन-सपक अधिकारी Receipt Clerk प्राप्ति-लिपिक Receptionist स्वागतकर्ता Registrar, Cooperative Societies पजीयक, सहकारी समितिया Research Scholar Section Incharge Seed Development Officer बीज विकास अधिकारी शोध छात्र मनुमाग अधिकारी का 124 Seed Distribution Officer Seed Production Officer Seed Testiag Officer Social Education Officer Social Eduction Organisor Speaker, Legislative Assembly Special Accounts Officer Special Audit Officer State Minister Station Officer Stenography Instructor Store Controller Store Incharge Sub Editor Sub-Registrar Superintendent Handicrafts Board Superintendent of Garden Superintending Engineer Survey Inspector Survey Officer Tourist Officer Training Officer Traffic Inspector Treasurer Wholetime Public Prosecutor Workshop Addendant Workshop Instructor Worksfhp Supervisor बीज वितरक अधिकारी बीज उत्पादन अधिकारी वीज जाच-अधिकारी समाज-शिक्षा अधिकारी समाज शिक्षा प्रापाजक अध्यक्ष विधान-सभा विशप लेखा अधिकारी विशेष अपेक्षा अधिकारी राज्य मनी पानेदार शीभलिपिक प्रशिक्षक मडार-यित्रक भडार प्रभारी उप सपादर्द उपपजीयन अधीक्षक हस्तकला मडल उद्यान अधीक्षक अधीक्षण अभियता सर्वेक्षण निरीक्षक सर्वेक्षण अधिकारी पयटन अधिकारी प्रशिक्षण अधिकारी परिवहन निरीक्षक कोपाध्यक्ष पूर्णकालिक सरकारी पैरोकार कमशाला परिचर मशाला प्रशिक्षक वमशाला पयवक्षक