Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Shri Anuttroppatikdasha Sutra
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नहीं होसकती, किन्तु तपश्चर्या से ही सफलता होगी; अतएव आप अपनी कृतार्थता के लिये यथाशाक्त तपश्चर्या कर उन तपोधन महापुरुषों का अनुकरण करें ॐ शान्तिः !! SEXEEN अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ ६३ ॥ अनुवा प्रशस्ति प्रशस्तिका शासनपति के पाट पर । हुवे सुधर्म गणीन्द्र ॥ सढसटवे पट पर हुवे । श्री जिन भक्ति मुनींद्र ॥१॥ क्षमा कल्याण पाठक गुरु । सुखसागर भगवान् ॥ त्रैलोक्य गुरु गणनाथ से। पाया निर्मल ज्ञान ॥२॥ वीरपुत्र आनन्द ने । ज्ञान भक्ति सुविचार ॥ भारत-भाषा में लिखा । अङ्ग नवा विस्तार ॥ ३ ॥ मालव देशे दीपता । सैलाना श्रीकार ॥ चौमासा सुख से रहे । वार्ता जय-जय कार ॥ ४ ॥ विक्रम नेत्राङ्कतत्वभू (१९९२) । भाद्रव पूनम जान ॥ गुरुवार यह सूत्र हम । पूर्ण किया गुणखान ॥५॥ * श्रीअनुत्तरोपपातिकदशा सूत्र सम्पूर्ण * Veerputra Anand Sagar HAR Sailana-C.I.
अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥६२॥ हिन्दी अनुवा अथका उपसंहा प्रत्यक्षरं निरूप्यास्य । ग्रन्थमानं विनिश्चितं ॥ द्वाविंशतिशतमिति । चतुर्णा वृत्तिसंख्यया ॥ २ ॥ भावार्थ-भगवान् श्री अभयदेष सूरीश्वरजी महाराज अपनी लघुता प्रदर्शित करते हुवे फरमाते हैं संभव है कि इस सूत्र में कितनेक शब्दों का अर्थ मुझे ज्ञात नहीं हुवा हो तथा कितनेक शब्द के पर्याय मालूम नहीं हुवे हों तथापि सूत्र और अर्थ के अनुसार जो मैंने अर्थ किया है यानी टीका रची है उसमें जो अपराधपद (भूल का स्थान) बना हो उस को जिनेश्वर भगवन्त के वचन की भाषा में आदर करने वाले पांडतजन संशोधन कर लें; कारण कि जिनेश्वर के मत की उपेक्षा करना योग्य नहीं-इस ग्रन्थ की टीका के प्रत्येक अक्षर गिनने से १२२ एक सौ बावसि श्लोक जितना ग्रन्थ का (टीका का) प्रमाण है; ऐसा निश्चय किया है. ग्रन्थ का उपसहार यह अनुत्तरोपपातिक दशा सूत्र तीन वर्ग में तेतसि अध्ययनों से भूषित है; अर्थात् तेतीस महापुरुषों के उद्दाम जीवन से आदर्श बन गया है, इस सारे ग्रन्थ में तपश्चर्या की महेक छारही है, इससे अनहारिक पद का प्रकाश जगत को आसक्ति तिमिर से मुक्त कराता है, इसमें महात्माओं की तपश्चर्या का विविध वर्णन अशक्तों को शक्ति प्रदान करता है और सशक्तों को आगे बढ़ाता है-महानुभावो! जीवन की सार्थकता खान-पान से ॥६॥ १
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥६१॥
उपसंहार
इस तीसरे वर्ग में धन्यअनगार (धन्नाजी अनगार ) बगैरः दस महामुनीश्वरों के आदर्श चरित्र तपश्चर्या
से मार्तण्ड (सूर्य) के समान संसार पर प्रकाश डाल रहे हैं-तपोधन के तप से शरीर का मूल्य हीरों के मूल्य
से भी अधिक बन कर जगत के लिये प्रेरणात्मक एक दिव्य दृष्टान्त बन गया है; जगद्वंद्य उन महात्माओं का चरित्र
वंदनीय और स्तवनीय सीमा का उल्लंघन कर अनुकरणीय क्षेत्र में प्राप्त होगया है-महानुभावो ! इन उत्तम
पुरुषों के चरित्रों पर पूर्ण मनन कर अखादबत को अङ्गीकार करना और क्रमशः खाने का मोह छोड़कर श्रेयपद
प्राप्ति के लिये आदर्श तपस्वी बनने का पूर्ण प्रयत्न करना.
अनुवा
उपमह
टीव
24...
टीकाकार महाराज का वक्तव्य
SONGS
शब्दाः केचन नार्थताऽत्र विदिताः केचित्तु पर्यायतः। सूत्रार्थानुगतेः समूह्य भणतो यज्जातमागः पदम् ॥
वृत्तावत्र तज्जिनेश्वरवचोभाषाविधौ कोविदः । संशोध्य विहितादरैर्जितमतोपेक्षा यतो न क्षमा ॥१॥
द अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥६०॥ , ३ व भावार्थ-इस प्रकार निश्चय हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त महावीर देव जो कि धर्म के आदि कर्ता हैं (अपने शासन में आदि कर्ता समझना) तीर्थ (साधु-साध्वी-श्रावक श्राविकारूप चतुर्विध संघ) के संस्थापक हैं, स्वयं बोध को प्राप्त हुवे हैं यानी उनका कोई गुरु नहीं, लोक के नाथ हैं, कारण कि संसार के योग-क्षेम (हित सम्बंध- कल्याण, करने वाले हैं, लोकके अन्दर दीपक समान हैं अर्थात् मिथ्यात्व अंधकार को नाश कर सम्यत्वरूप प्रकाश करने वाले हैं, लोक में उद्योत करने वाले हैं यानी अज्ञान को हटाकर ज्ञान का उद्योत करने वाले हैं, अभयदान (निर्भयता) देनेवाले हैं, अशरपा को शरण देनेवाले हैं, ज्ञानरूप चक्षु के दातार हैं, 'मार्ग देनवाले “यानी श्रेय मार्ग दर्शक हैं धर्म को देनेवाले हैं यानी पापों से मुक्त कराने वाले हैं, 'धर्म देशना देने वाले हैं, धर्म के श्रेष्ठ चार दिशाओं के अन्तपर्यन्त चक्रवर्ती हैं अर्थात् धर्मोपदेश से चारगतियों का अन्त कराने वाले हैं, किसी से प्रतिघात न होसके ऐसे श्रेष्ठ ज्ञान-दर्शन को धारण करने वाले हैं, खुद राग-द्वेष पर विजय किया है, दूसरे को राग-द्वेष जिताने वाले हैं, स्वयं बोध को प्राप्त हुवे, दूसरो को बोध प्राप्त कराते हैं, खुद कर्मों से मुक्त हुवे हैं, दूसरों को कर्मों से मुक्त कराते हैं, स्वयं संसार समुद्र से तिरगये हैं, दूसरों को भवसागर से तिराते हैं तथा वे भगवन्त निरु- पद्रव-अचल-रोगरहित-अनन्त- अक्षय-बाधा रहित-पुनरावृत्ति न हो ऐसे सिद्धिगति नाम स्थान को प्राप्त किया हैं; उन परमात्माने अणुत्तरोपपातिकदशा के तीसरे वर्ग का यह अर्थ फरमाया है. तीसरे वर्ग का भावार्थ पूर्ण हुवा-अणुत्तरोपपातिकदशा का भावार्थ सम्पूर्ण हुवा. - . , 1 , - ॥६० अनुत्तरी- पपातिक दशा सूत्र ॥ ५९॥ ध्यान में रखकर इस व्यवस्था को समझना- धन्य हो! महा तपस्वी अनगारों को धन्य हो ! इन पुरुषोत्तमों को पुनः २ अभिवन्दन हो. हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग RADELEDKIKALED 2 2209. सुधर्म गणधर से परमात्मा का गुणानुवाद *SAECORPORDERS मूल- एवं खलु जम्बू ! समणणं भगवता महावीरेणं आइगरेणं तित्थगरेणं सयंसंबुद्धणं लोगना- हेणं लोगप्पदीवेणं लोगपज्जोयगरेणं अभयदएणं सरणदएणं चक्खुदएणं मग्गदएणंधम्मदएणं धम्मदेसएणं धम्मवरचाउरंतचकवट्टिणा अप्पडिहयवरनाणदंसणधरेणं जिणेणं जाणएणं बुद्धेणं बोहएणं मोकेणं मोयएणं तिनेणं तारएणं सिवमयलमरुयंमणतमक्खयमव्वाबाहमपुणरावत्तयं सिद्धिगतिनामधेयं ठाणं संपत्तेणं अणु- त्तरोववाइयदसाणं तच्चस्स वग्गस्स अयम? पण्णत्ते. (सूत्रं ६) तइयं वग्गं सम्मत्तं - अणुत्तरावेवाइयद- सातो समत्तातो. ॥ ५९ L
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ ५८॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग.
साएए, दोन्नी वाणियग्गामे, नवमो हत्थिणापुरे, दसमो रायगिहे, नवण्हं भद्दाओ जणणीओ, नवण्हं वि
बत्तीसओदाओ, नवण्हं निक्खमणं थावच्चापुत्तस्स सरिसं वेहल्लस्स पिया करेति छम्मासा वेहल्लते नव धण्णे
सेसाणं बहुवासा, मास लिहणा, सव्वदृसिद्धे महाविदेहे सिज्झणा ।
भावार्थ- इस ही प्रकार सुनक्षत्र कुमार के आलावे से शेष आठों कुमारों का बयान करना; विशेषता
म- अनुक्रम से दो कुमार राजगृही नगरी में हुवे, दो साकेत नगर में हुवे, दो वाणिज्य ग्राम में हुवे, नवें हस्ति-
नापुर में हुवे, और दसवें राजगृही नगर में हुवे; नवों कुमारों की माताएँ भद्रा नाम की थी, नवों को यत्तीस २
कन्याओं के साथ विवाह कराया गया था और बत्तीस २ महल बगैरः तमाम वस्तुओं की प्रीतिदान दिया गया
था, नवों का दीक्षा-महोत्सव थावचापुत्र की तरह हुवा था और दसवें वेहल्ल कुमार का दीक्षा महोत्सव उसके
पिता ने किया था, पहिले धन्य अनगार ने नौ मास चारित्र पाला और दसवें वेहल्ल कुमार ने छ: मास चारित्र
पाला, शेष आठ अनगारों ने बहुत वर्षों तक चारित्र पर्याय पाला, दसों मुनीश्वरों ने एक २ मास का अनशन तप
किया, सर्व सवार्थसिद्ध नामक विमान में उत्पन्न हुवे; वहां से महाविदेह क्षेत्र में जन्म लेकर, पारमेश्वरी प्रव्रज्या
ग्रहण कर मोक्ष पद को प्राप्त करेंगे-इस में दस अनगारों का अवशेष क्रमबद्ध नहीं है; अतः पूर्व आख्यान को
,
MAS
॥ ५८ ॥
ATI अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥५७॥ उत्पन्न हुवा, तेतीस सागरोपम की स्थिति फरमाई-गौतम स्वामी ने प्रभु से पुनः पूछा, हे भगवन्त ! सुनक्षत्र अनगार देवलोक से च्यवकर कहां उत्पन्न होंगे ? परमात्मा ने उत्तर बक्षा-हे गौतम ! महाविदेह क्षेत्र में जन्म लेकर, चारित्र ग्रहण कर यावत् मोक्ष पद को प्राप्त करेगा- दूसरे अध्ययन का भावार्थ सम्पूर्ण हुवा. तीसरे वर्ग का दूसरा अध्ययन मूल और भावार्थ सहित सम्पूर्ण. हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग * तीसरा अध्ययन यावत् दसवां अध्ययन * (ऋषिदास कुमार यावत् वेहल्ल कुमार) B0- . दस अनगारों की सामान्य व्यवस्था 3--- <t... ८ मूल-- एवं सुणक्खत्तगमेणं सेसावि अट्ठ भाणियव्वा णवरं - आणुपुवीए दोन्नी रायगिहे, दोन्नी है
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ ५६ ॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
.
परिसा -णिग्गता; राया-णिग्गतो. धम्म कहा, राया. पंडिंग्गओं परिसा पंडिगता, ततेणं तस्स सुक्खत्तस्स
अन्नया कयाति पुव्वरत्तावरत्तकालसमयांस धम्मजागरियं जागरमाणस्स जहा खंदयस्त बहुवासा परियातो,
गोतम पुच्छा, तहेव कहेति, जाव सव्वट्ठसिद्धे विमाणे देवे उबवण्णे तेत्तीसं सागरोवमई ठिति पण्णता
से णं भंते ! माहाविदेहे सिज्झिहीति- बितियं अज्झयंण. सम्मत्तं ॥ २ ॥
भावार्थ-चौथे आरे में भगवन्त प्रधारे, उस समय राज़गृह नाम का नगर था; उसके इशान कोण में
गुणशील संज्ञक उद्यान-था, उस नगर में श्रेणिक नाम का राजा राज्य करता था, वहां पर किसी एक वक्त भग-
वन्त महावीर देव पधारे, प्रजापर्षदा और नृपेन्द्र अपने स्थान से प्रस्थान कर प्रभु को वन्दन करने आया, प्रभुः
ने धर्म दर्शना-दी, श्रवण कर राजा और पर्षदा-वापिस चली गई - यहां पर महाराजा श्रेणिक ने दुष्कर कार्य को
कौन है इत्यादि भगवन्त से,प्रश्न, किया ? सर्व, पूर्ववत् जानना - तदनन्तर किसी एक वक्त मध्यरात्री के
समय धर्मजागरण (धर्मध्यान) करता हुवा सुनक्षत्र अनगार ने खंदक अनगार की तरह अनशन करने का विचार
किया, यावत्' परमात्मा की आज्ञा लेकर पूर्ववत् सर्व किया, बहुत वर्षों तक चारित्र पर्याय पाला;
गौतम गणधरःने इनके बारे में पूछा तब भगवन्त ने सर्व हकीक़त कही, यावत् सर्वार्थसिद्ध विमान में देव पने
,
॥ ५६॥
अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥५५॥ PRE हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग जाव पव्वतिते तं चेव दिवसं अभिग्गहं तहेव जाव बिलमिव आहारेति संजमेण जाव विहरति, वहिया जणवयविहारं विहरति, एकारस अंगाई अहिज्जति संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरति, तते णं से सुणक्खत्ते अणगारे ओरालेणं जहा खंदतो । तत्पश्चात् उस सुनक्षत्र अनगार ने जिस दिन से श्रमण भगवन्त महावीर देव के पास मस्तक मुंडाकर दीक्षा अङ्गीकार की उसही दिन से (धन्य अनगार की तरह) अभिग्रह धारण किया, यावत् 'सर्प बिलवत्' पारणे के दिन आहार करने लगा यावत् संयम सहित विचरने लगा, याहार देशों में विहार करने लगा, ग्यारह अङ्गों का अभ्यास किया, इस तरह संयम-तप द्वारा आत्म-भावना करता हुवा रहने लगा, तब वह सुन- क्षत्र अनगार खंदक मुनि के समान उदार तपश्चर्या करता हुवा आनंदपूर्वक निवास करने लगा. भावाथ , 0 kSHESARIES सुनक्षत्र अनगार का सफल मनोरथ और अन्तिम अवस्था 0-5 ॥ ५५ ॥ मूल-- तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे गुणसिलए चतिए, सेणिए राया, सामी समोसढे - अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ ५४॥ हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग. काकन्दी नाम की नगरी में भद्रा सार्थवाहिनी निवास करती थी, वह समृद्धिशालिनी थी, उस भद्रा सार्थवाहिनी के 'सुनक्षत्र कुमार' नाम का पुत्र था, उसके अङ्गोपाङ्ग अहीन पूर्ण पंचेन्द्रीय वाले थे, यावत् वह कुमार खरूप- वान् - कान्तिवान् और दिखनोटा था, पंच धायमाताओं से उसका सम्यक् पालन होता था, जब वह युवा अवस्था में प्रवेश हुआ तब धन्यकुमार के मुआफिक बत्तीस कन्याओं से विवाह कराकर बत्तीस महल बगैरः का प्रीतिदान दिया यावत् वह कुमार महल के ऊपर उन ललनाओं के साथ क्रीड़ा करता हुआ रहता था, उस काल उस समय के अन्दर श्रमण भगवन्त महावीर देव नगर के उद्यान में समवसरे, उस वक्त धन्यकुमार के सदृश सुनक्षत्र कुमार भी प्रभु को वन्दनार्थ घर से निकला, धर्मदेशना सुनकर प्रतिषोध को प्राप्त हुवा, थावच्चापुत्र की तरह दीक्षा महोत्सव हुवा यावत् मुनिपद को प्राप्त हुवा, इर्यासमिति आदि का यथार्थ पालन करता हुवा यावत् गुप्त ब्रह्मचारी यानी ब्रह्मचर्य की नौ गुप्ति (वाड़) का पालक हुवा. , SO सुनक्षत्र अनगार का तप वर्णन ॥ ५४॥ मूल-तते णं से सुणवखते अणगारे जं चेव दिवसं समणस्स भगवतो महावीरस्स अंतिते मुंडे अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥५३॥ दूसरा अध्ययन (सुनक्षत्र कुमार) हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग R है - मूल-जति.णं भंते ! उक्खेवओ.- एवं खलु जम्बू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं काकंदीए णग- रीए भद्दा णामं सत्थवाही परिवसति अड्ढा, तीसेणं भद्दाए सत्थवाहीए पुत्ते सुणक्खत्ते णामं दारए होत्था अहीण जाव सुरूवे पंचधातिपरिविखते जहा धण्णो-तहा बत्तीसदाओ जाव उप्पिं पासाएवडेंसए विहरति; तेणं कालेणं तेणं समएणं समोसरणं जहा धन्नो तहा सुणक्खत्ते वि णिग्गते जहा थावच्चा पुत्तस्स तहा णिक्खमणं जाव अणगारे. जाते जाव बंभयारी । भावार्थ:- जम्बू, स्वामी सुधर्म स्वामी के प्रति प्रार्थना करते हैं - हे भगवन्त ! पहिले अध्ययन का अर्थ आपने जो इस प्रकार प्रकाशित किया तो हे पूज्य ! अब दूसरे अध्ययन का उत्क्षेप (प्रस्तावना -घयान) फर- माने की कृपा करो! तब. सुधर्म स्वामी ने फरमाया-निश्चय इस कदर हे जम्बू! उस काल उस समय में SHES RESSES ५३ ॥
अनुत्तरो- पपातक- दशा सूत्र ॥ ५२ ॥ हिन्दा अनुवाद ३वर्ग. णेणं जाव सम्पत्तेणं पढमस्स अज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते। ( सूत्रं ५) पढमं अज्झयणं सम्मत्तं भावार्थ-परमात्माः महावीर देव को गौतम. स्वामी ने खंदक की पृच्छा की तरह पृच्छा की-इस पर प्रभु ने फरमाया धन्य अनगार यावत् सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुवा, गौतम गणधर ने पूछा-हे देवाधि- देव ! धन्य देव की कितने काल की स्थिति फरमाई ? उत्तर:-हे गौतम ! तेतीस सागरोपम की स्थिति कही गई पुनः गौतम स्वामी ने पूछा-हे प्रभो ! वह धन्य अनगार देवलोक से च्यव कर कहां जायगा? कहां उत्पन्न होगा ? प्रभु ने फरमाया - महाविदेह क्षेत्र में उत्पन्न होकर, चारित्र ग्रहण कर सिद्ध होगा, बुद्ध होगा, सर्व कर्म से मुक्त होगा, निर्वाण पद प्राप्त करेगा, सर्व दुःखों का अन्त करेगा - सुधर्म स्वामी फरमाते हैं - हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष पधारे ने पहिले अध्ययन का इस प्रकार (ऊपर कहे मुजिय) अर्थ फरमाया पहिले अ ययन का भावार्थ सम्पूर्ण हुवा. , . तीसरे वर्ग का पहिला अध्ययन मूल और भावार्थ सहित सम्पूर्ण हुवा. ॥५२॥ - REC अनुसरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥५१॥ हिन्दी अनुवाद प्राप्तकर स्थविर मुनियों को साथ में लेकर विपुलगिरि पर चढे, वहां एक मास की संलेखना (आत्म शोधक तप) कर ना मास पर्यन्त उज्ज्वल चारित्र पालकर काल समय काल कर ऊँचे चन्द्रादि विमान को उल्लंघन कर यावत् ग्रवायक प्रतरों को घटाकर बहुत ऊँचे दूर सर्वार्थसिद्ध विमान में देवपने उत्पन्न हुवे - तय स्थविर मुनि पूर्व कथनानुसार कायोत्सर्ग करके धन्य अनगार के उपगरण लेकर पर्वत से नीचे उतरे यावत् उनके भांडोपगरण भगवन्त के पास रक्खे. ३ वग धन्य अनगार के लिये गौतम गणधर का आखीरी प्रश्न परमात्मा का खुलासा कमल . 39 - - , मूल- भंतेति भगवं गोतमे तहेव पुच्छति जहा खंदयस्स, भगवं वागरेति जाव सव्वट्ठसिद्धे विमाणे उववण्णे; धण्णस्सणं भंते ! देवस्स केवतियं कालं ठिति पण्णत्ता ? गोयमा ! तेत्तीसं सागरोवमाइं ठिति पन्नत्ता, सेणं भंते ! ततो देवलोगाओ कहिं गच्छिहिति ? कहिं उववज्जिहिति ? गोयमा ! महाविदेहे वासे सिज्झिहिति बुज्झिहिति मुञ्चिहिति परिणिव्वाहिति सव्वदुखाणमंतं करेहिति - एवं खलु जंबू ! सम- १ 4 L अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ ५० ॥ हिन्दी अनुवाद धन्य अनगार का मनोरथ और उसका पूर्णपालन ३ वर्ग F . मूल-तएणं तस्स धण्णस्स अणगारस्स अन्नया कयाति पुव्वरत्तावरत्तकाले धम्मजागरियं जाग- रमाणस्स इमेयारूवे अब्भत्थिते चिंतिते मणोगते संकप्पे समुप्पज्जित्था - एवं खलु अहं इमेणं ओरालेणं जहा खंदओ तहेव चिन्ता, आपुच्छणं थेरेहिं सद्धिं विउलं दुरूहंति मासिया संलेहणा नवमास परियातो जाव कालमासे कालं किच्चा उड्ढं चंदिम जाव णव य गेविज्जविमाणपत्थडे उड्ढं दूरं वीतीवतित्ता सव्व- ट्ठसिद्धे विमाणे देवत्ताए उववन्ने, थेरा तहेव उयरंति जाव इमे से आयार भंडए । भावार्थ- उसके बाद किसी एक दिन अर्धरात्री के समय धर्म जागरण में जगते हुवे उग्र तपस्वी धन्य अनगार को इस प्रकार का प्रार्थित, चिन्तित, मनोगत विचार उत्पन्न हुवा निश्चय इस प्रकार मैं इस उदार इत्यादि स्कन्दक मुनि की तरह विचार हुवा, पश्चात् प्रातः काल में भगवन्त महावीर की आज्ञा ॥ ५० ॥ तप द्वारा अनुत्तरी पपातिक दशा सूत्र ॥४९॥ वंदित्ता णमंसित्ता जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवगच्छति उवागच्छित्ता समणं भगवं महावीर तिक्खुत्तो वंदति णमंसति वंदित्ता णमंसित्ता जामेव दिसिं पाउन्भूते तामेव दिसिं पडिगए. (सूत्रं ४) अनुवाद ३ बगे 56 भावार्थ- तत्पश्चात् वे.श्रेणिक राजा श्रमण भगवन्त महावीर देव के पास से यह घृतान्त सुनकर हृदय में धारण कर हर्षित हुवे; आनन्दित हुवे, श्रमण भगवन्त महावीर देव को तीन वार आदक्षिणा प्रदक्षिणा की करके वन्दन - नमस्कार किया, वन्दन नमस्कार करके जहां पर धन्य अनगार हैं वहां पर महाराजा श्रेणिक आते आकर तपोधन धन्य अनगार को तीन वार आदक्षिणा प्रदक्षिणा करते हैं, करके वन्दन - नमस्कार किया, वन्दन - नमस्कार करके इस प्रकार निवेदन किया-हे देवों के वल्लभ ! आप धन्य हैं, कृत पुण्य हैं; सुकृतार्थ हैं, कृत लक्षण हैं; अहो देवों के प्यारे ! आपको सुप्राप्त मनुष्य-जीवन सफल है, ऐसा कहकर तपस्वी महात्मा को वंदन - नमस्कार किया, वन्दन-नमस्कार करके जहां श्रमण भगवन्त महावीर देव हैं वहां नरेन्द्र श्रेणिक आता है, आकर परमात्मा का तीन वार आदक्षिणा - प्रदक्षिणा करके वन्दन- नमस्कार करता है, वंदन - नमस्कार करके जिस दिशा से आया था उसही दिशा में वापिस चला गया. 1 १ ४ RRC ॥४९॥ । - . हिन्दी अनुवाद अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥४८॥ आत्म भावना करते हुवे रहे, पर्षदा देशना सुनने आई, उसही प्रकार (पूर्व कथानुसार ) यावत् धन्यकुमार ने दीक्षा अंगीकार की; 'दिल सर्पवत् ' यावत् आहार करता है, धन्य अनगार का पग से शरीर तक का सर्व वर्णन यावत् अतिशय शोभता हुवा रहता है - ऐसा परमात्मा ने फरमाया- इसलिये हे श्रेणिक ! वह धन्य अन- गार चौदह हज़ार साधुओं में महा दुष्कर कार्य करने वाला और महा निर्जरा करने वाला है। ऐसा कहा गया. ३ वर्ग . RECENES SEEDS SEX श्रेणिक नरेश से धन्य अनगार की स्तुति EKKEEEEEEK है * [' मूल-तते णं से सणिये राया समणस्स भगवतो महावीरस्स अंतिए एयमह सोचा णिसम्म हट्ठ तुट्ठ (जाव) समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेति करित्ता वंदति नमंसति वंदित्ता नमंसित्ता जेणेव धन्ने अणगारे तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता धन्नं अणगारं तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेति करित्ता वंदति णमंसति वंदित्ता णमसित्ता एवं वयासी - धण्णेसिणं तुमं देवाण्णुप्पिया ! सुपुषणे सुकयत्थे कयलक्खणे सुलद्धणं देवाण्णुप्पिया ! तव माणुस्सए जम्म जीवियफल्लेतिकटु वंदति णमंसति ॥४८॥ -
RSE
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥४७॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
4
फरमाना है कि इन यावत् चौदह हज़ार साधुओं में धन्य अनगार महा दुष्कर कार्य करने वाले और महा निर्जरा
करने वाले हैं ? इस पर देवाधिदेव ने जयाय बक्षा-
मूल- एवं खलु सेणिया! तेणं कालेणं तेणं समएणं काकंदी नामं नगरी होत्था, उप्पि पासाए-
वडिंसए विहरति, तते णं अहं अन्नया कदाति पुवाणुपुवीए चरमाणे गामाणुगामं दुत्तिज्जमाणे जेणेव
काकंदी णगरी जणेव सहसंबवणे उज्जाणे तेणेव उवागते अहापडिरूवं उग्गहं उगिणित्ता संजमेणं तवसा
जाव विहरामि, परिसा निग्गता, तहेव जाव पव्वइते जाव बिलमिव जाव आहारेति, धन्नस्सणं अणगारस्स
पादाणं सरीरवन्नओ सव्वो जाव उवसोभेमाणे उवसोभेमाणे चिट्ठति से तेणटेणं सेणिया! एवं वुच्चति-
इमासिं चउद्दसण्हं साहस्सीणं धपणे अणगारे महादुक्करकारए महानिज्जरतराए चेव ।
भावाथ-निश्चय करके इस प्रकार हे श्रेणिक ! उस काल उस समय में काकन्दी नामकी एक नगरी थी,
उसमें यावत् ( पूर्ववत् सब हकीकृत कहकर ) धन्य कुमार भव्य महलों पर रहता था, उस समय हम किसी एक
वक्त अनुक्रम से विहार करते हुवे ग्रामानुग्राम विचरते हुवे जहां काकंदी नगरी है, जहां उसके बाहर सहस्रानवन
है, वहां प्राप्त हुवे, यथाप्रतिरूप (मुनियों के योग्य ) अवग्रह ( रहने का स्थान ) ग्रहण करके संयप - तप द्वारा
,
॥४७॥
अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥४६॥ हिन्दी अनुवाद ३वर्ग. , धर्म देशना दी, पर्षदा वापिस चली गई-तदन्तर श्रेणिक नृपेन्द्र ने श्रमण भगवन्त महावीर देव के पास धर्म सुनकर हृदय में धारण करके प्रभु को (श्रमण भगवन्त महावीर को) वन्दन - नमस्कार किया, वन्दन, नम- स्कार करके इस प्रकार प्रार्थना की- मूल-इमासि णं भंते ! इंदभूतिपामोक्खाणं चोदस्सण्हं समणसाहस्सीणं कतिरे अणगारे महा- दुक्करकारए चेव ? महाणिज्जरतराए चेव ? एवं खलू सेणिया ! इमासिं इंदभूतिपामोक्खाणं चोदसण्हं समणसाहस्सीणं धन्ने अणगारे महादुक्करकारए चेव महाणिज्जरतराए चेव, से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चति इमासिं जाव साहस्सीणं धन्ने अणगारे महादुकरकारए चेव महाणिज्जरकारए. चेव ? भावार्थ-हे भगवन्त ! आपके इन्द्रभूति (गौतम गणधर) आदि १४ हज़ार मुनियों में दुष्कर कार्य करने वाले और महा निर्जरा करने वाले कौनसे महात्मा हैं ? इस पर परमात्मा ने उत्तर बक्षा-निश्चय इस प्रकार हे श्रेणिक ! इन इन्द्रभूति बगरः चौदह हज़ार मुनियों में 'धन्य अनगार' महा दुष्कर कार्य करने वाला और महा निर्जरा करने वाला है ॐ श्रेणिक नरेन्द्र ने पुनः प्रार्थना की-हे प्रभो ! किस हेतु से आप का यह धन्य हो ! धन्य अनगार- जिसके लिये परमात्मा महावीर देव श्रीमुख से. गौरवपूर्ण प्रशंसा करते हैं. , ॥४६॥ भ अनुत्तरी- पपातिक- दशा सूत्र ॥४५॥ हुवे वे उग्र तपस्वी धन्य अनगार रहते थे -" धन्य हो ! तपोधन महातपस्वी धन्य अनगार को कोटिशः नम- स्कार हो - ऐसे महात्मा की पुनः २ जय हो." RSex. हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग श्रेणिक नृपेन्द्र का नमूनेदार प्रश्न-भगवन्त का स्पष्टीकरण MORECASSESCRECORK मूल- तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे गुणसिलए चेतिते, सणिए राया; तेणं कालेणं तेणं समएणं भगवं महावीरे समोसढे, परिसा णिग्गया, सेणिते निग्गए, धम्मकहा परिसा पडिगया, तते णं से सेणिए रांया समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए धम्म सोच्चा निसम्म समणं भगवं महावीरं वंदति णमंसति, वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी- भावार्थ- उस काल उस समय में राजग्रही नामकी नगरी थी, उसके याहार गुणशील नामका उद्यान था, इस नगरी में महाराजा श्रेणिक राज्य करते थे, उस वक्त उस टाइम पर अमण भगवन्त महाषीर देव उद्यान में समवसरे, नगर से प्रजा पर्षदा दर्शनार्थ रवाना हुई, राजा श्रेणिक भी राजमहल से निकला, प्रभु ने , ॥४५॥ ,
+
है
।
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥४४॥
हिन्दी
अनुवाद
३वर्ग
मध्य में दुर्यल होने से पीठ से लगा हुवा था, कारण कि पेट के अन्दर की ‘यकृत और प्लीहा' नाम की गांठे
क्षय होगई थीं उनकी पांसलियों की श्रेणियां मांस रहित होनेसे स्पष्टतः वलयाकार (गोलाकार) दिखाई देती थीं
उनकीपीठ रूपी करंडिये की संधियां (सांधे) कमजोरी के कारण अति स्पष्ट होने से सृत की माला की तरह गिनी
जासकती थीं; उनका पेट गंगा नदी क तरंगों जैसा था; यानी तरंगों जैसे ऊपराऊपरी चड़ती ह उस तरह
हाइयां उपराऊपरी चड़ी हुई नजर आती थीं उनके पीठ के दो भाग बांस के टुकड़े जैसे थे, उनकी दोनों भुजाएं
सूखे सर्प जैसी मालूम होती थीं, उनके हाथके पंजे घोड़े के ढीले चोकडों की तरह लटकते थे, उनकी मस्तकरूपी
घड़ी कंपवायु के रोगी के समान कंपती थी, उनका मुखकमल कुमलाया हुवा (मुरझाया हुआ)था - होठों की अत्यंत
क्षीणता होने से उनका मुख घडे के सदृश विकराल नज़र आता था उनके दोनों नेत्ररूपी कोस ऊंडे उतर गए थे.
शरीर की ऐसी गंभीर स्थिती में - वे महात्मा मात्र आत्मयल से ही चलते थे; कारण की शरीर बलसे चलने म
वे पूर्ण असक्त थे, आत्मबल से ही वे खड़े रह सकते थे, 'मैं कुछ बोलूं' ऐसा विचार होते ही ग्लानि (अशक्ति
का प्रभाव ) उप्तन्न हो जाती थी, उनके शरीर की ऐसी परिस्थिति हो गई थी कि चलते समय कोयलों की भरी
हुईगाड़ी के समान उनके हाड खड़खड़ आवाज़ करते थे-भगवती सूत्र में स्कन्दक मुनि के वर्णन के मुआफिक यहां
जानना-राख के गले से ढकी हुई अग्नि की तरह तप से, तेज से और तपतेज की समृद्धि से अत्यत शोभते
-
॥४४॥
अनुत्तरा-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ ४३॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
मूल-धन्ने णं अणगारे णं सुक्केणं भुक्खेणं पातजंघोरुणा विगत तडिकरालेणं कडिकडाहेणं, पिट्ट-
मविस्सिएणं उदरभायणेणं, जोइज्जमाणोहिं पांसुलिकडएहिं अक्खसुत्तमालाति वा [गणिज्जमालाति वा]
गणेज्जमाणेहिं पिट्टिकरंडगसंधीहिं गंगातरंगभूएणं उरकडगदेसभाएणं, सुक्कसप्पसमाणाहिं वाहाहिं सिढि-
लकडाली विव चलंतेहि (लंबतेहि) य अग्गहत्थेहिं, कंपणवातिओ विव वेवमाणीए सीसघडीए, पव्वादव-
दणकमले, उब्भडघडामुहे, उब्बुडणयणकोसे, जीवंजीवेणं गच्छति, जीवंजीवेणं चिट्ठति, भासं भासिस्सा-
मीति गिलाति, ३ से जहा णामते इंगालसगडियाति वा जहा खंदओ तहा जाव हुयासणे इव भासरासि-
पलिच्छन्ने तवेणं तेएणं तवतेयसिरीए उवसोभेमाणे उवसोभेमाणे चिट्ठति.
RRENESRK-
.
भावाथ-मागधी भाषा क नियमानुसार 'णं' वाक्यालंकार के लिये सर्वत्र जानना - तपोधन धन्य
अनगार के पैर, पिंडियां और जंघाएँ मांस रहित होने से शुष्क थीं और क्षुधा के कारण रुक्ष थी, उनकी
कमर रूप कड़ाह ( कडायला अथवा काचवे की पीठ) मांस के अभाव से और हड्डियां ऊंची निकली हुई
होने से अशोभनिक ,मालूम होती थीं - इसके आसपास का हिस्सा उँचा था, उनका उदररूप भाजन
॥४३॥
Aar
17
अत्तनुरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ ४२ ॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
,
भावार्थ-तपश्चर्या के प्रभाव से धन्य अनगार के मस्तक का ऐसा सौंदर्य था जैसे कोमल तुम्या, कोमल
आलू का फल (कन्दविशेष - यह अनेक प्रकार का होता है मगर विशेष काम में आता हुवा जान कर इसका
नाम दिया ) अथवा कोमल सिस्तालक यानी सेफालक (संभवतः सीताफल) लोक प्रसिद्ध फल, यावत् शब्द से
इन कोमल फलों को काटकर धूप में सुखाये हों उससे शुष्क और सुकड़े हुवे हों वैसा धन्य अनगार का मस्तक
शुष्क, रूक्ष, मांस रहित था, मान हड्डियां, चमड़ी और नसों से मस्तक है ऐसा मालूम होता था; परन्तु “ मांस
रुधिर उसमें नज़र नहीं आता था" यह आलाप प्रत्येक अंग के वर्णन में जानना; विशेष यह है कि उदररूपी
भाजन, कान, जबान और होठ के वर्णन में 'अस्थि' यानी हड्डी शब्द नहीं कहना, मगर मात्र चर्म और नसों
से ही दिखाई देता है, ऐसा कहना चाहिये - इस तरह पैर से लेकर मस्तक तक धन्य अनगार के शरीर की
सुंदरता का वर्णन किया.
अब पुनः दूसरी तरह धन्य अनगार मुनिसत्तम के शरीर का वर्णन करते हैं।
*
धन्य अनगार तपस्वी के शरीर का रूपान्तर से वर्णन
ܚܙ
।
॥ ४२ ॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥४१॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
छिड्डेति वा बद्धीसगछिड्डेति वा पाभातियतारिगाइ वा, एवामेव० - धन्नस्स अणगारस्स कण्णाणं अयमे-
यारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते मूलाछल्लियाति वा वालुकच्छल्लियाति वा कारेल्लयच्छल्लिया-
ति वा- एवामेव०।
भावार्थ-धन्य अनगार के नेत्र की तपश्चर्या के प्रभाव से ऐसी सुन्दरता थी जैसे वीणा के छिद्र, बद्धी-
सक (एक जाति का वाजिन्त्र ) के छिद्र वा प्रभात कालके सितारे हों वैसे ऊँडे और तेजोहीन नेत्र थे - धन्य
अनगार के कान की तप के कारण ऐसी मनोरमता थी जैसे मूले की छाल, ककड़ी की छाल वा कारेले की छाल
हो वैसे उस धन्य अनगार के पतले कान थे.
मूल--- धन्नस्स अणगारस्स सीसस्स अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते तरुणग-
लाउएति वा तरुणगएलालुयत्ति वा सिण्हालएति वा तरुणए जाव चिट्ठति, एवामेव० धन्नस्स अणगा-
रस्स सीसं सुकं लुक्खं णिम्मंसं अट्टिचम्मच्छिरत्ताए पन्नायति, नो चेवणं मंस सोणियत्ताए एवं सव्वत्थ,
णवरं उदरभायणकन्नंजीहाउट्टा एएसि अट्ठी ण भन्नति चम्मच्छिरत्ताए पण्णाइत्ति भन्नति ।
,
4
॥४१॥
-
,
हिन्दी
अनुवाद
अत्तनुरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ ४० ॥
३ वर्ग
155
भावाथ--धन्य अनगार की दाढी का तपश्चर्या के प्रभाव से ऐसा सौंदर्य था जैसे तुबे का फल, हकुवी
[वनस्पति विशेष ] का फल अथवा आम की गुठली धूप में सूखी हुई हो वैसी उन की डाढी थी-धन्य
अनगार के होठ का तप के प्रताप से ऐसा सौंदर्य था जैसे सूखी जलोख [जल का दो इंद्री वाला जीव ] कफ
की सूखी गोली अथवा लाख की सूखी गोली हो वैसा धन्य अनगार का सुकड़ा हुवा और निस्तेज होठ था. '
मूल-धन्नस्स अणगारस्स जिब्भाए अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते वडपत्ते
इवा पलासपत्तेइ वा सागपत्तेइ वा, एवामेव० - धन्नस्स अणगारस्स नासाए अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे
होत्था, से जहाणामते अंबगपेसियाति वा अंबागडपसियाति वा मातुलूंगपेसियाति वा तरुणिया, एवामेव०
भवार्थ-
-धन्य अनगार की जबान तपस्या के कारण ऐसी सुन्दर होगई थी जैसे बड़का पत्ता, खांखरे का
पत्ता या साग का पत्ता हो वैसी जवान मुंह में हिलहिलती थी-धन्य अनगार की नासिका (नाक) का तप
के हेतु ऐसा मनोरम्य था जैसे केरी की पेशी (टुकड़ा) अंबालंक फल की पेशी हो अथवा बीजोरे की पेशी हो
वैसी उनकी कोमल (निःसत्व) नासिका थी.
मूल-धन्नस्स अणगारस्स अच्छीणं अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते वीणा-
॥४०॥
RKS अनुवाद , अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ ३९ ॥ ३ वर्ग मूल-- धन्नस्स अणगारस्स हत्थंगुलियाणं अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते कलायसंगलियाति वा मुग्गसंगलियाति वा माससंगलियाति वा तरुणियाछिन्ना आयवे दिन्नासुका समाणी, एवामेव० - धन्नस्स अणगारस्स गीवाए अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते करगगीवाति वा कुंडियागीवाति वा उच्चट्ठवणतेति वा, एवामेव० । भावार्थ- तपश्चर्या के कारण धन्य अनगार की हस्तांगुलियों की मनोहरता इस प्रकार थी जैसे तुवर की फली, मूंग की फली अथवा उड़द की कोमल फली काटकर धूप में सुखाई गई हो उस तरह धन्य अनगार के हाथ की अंगुलियां मालूम होती थीं - तप की वज़ह धन्य अनगार की ग्रीवा [गरदन ] की शोभा ऐसी थी जैसे घड़े का गला कमण्डलु का गला अथवा ऊंचे मुँहवाली कोथली जैसी कमजोर हो वैसी उनकी ग्रीवा थी. मूल-- धन्नस्स अणगारस्स हणुआए अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते-लाउय फलेति वा हकुवफलेति वा अंवगठियाति वा, एवामेव० - धन्नस्स अणगारस्स उट्ठाणं अयमेयारूवे तव- रूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते सुक्कज्जलोयाति वा सिलेसगुलियाति वा अलत्तगलियाति वा, एवामेव० ,
---------
हिन्दी
अनुवाद
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ ३८॥
था
३ वर्ग.
KRIES
भावार्थ-तप के प्रभाव से धन्य अनगार के पीठ करंडक ( पीठ का उठा हुवा प्रदेश) ऐसा दिखनोटा
जैसे कर्णावली, गोलावली और वर्तकावली हो (मुकुट की श्रेणी, गोल पत्थर की श्रेणी, लाख वगैरः के
बनाये हुवे बालक के खिलोने हों) वैसा पीठ करंडक मालूम होता था-तपस्या से बना हुआ धन्य अनगार का
वक्षस्थल (छाती) की ऐसी सुंदरता थी जैसे चित्त नामक वृक्ष की बनी हुई चटाई, पवन डालने को बांस का
बनाया हुवा पंखा, ताड़ के पत्तों का बनाया हुआ पंखा हो वैसा उनका वक्षस्थल पतला हो गया था.
मूल-- धन्नस्स अणगारस्स वाहाणं अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते समिसं-
गलियाति वा वाहायासंगलियाति वा अगत्थियसंगलियाति वा एवामेव० - धन्नस्स अणगारस्स हत्थाणं
अयमेयारूवेतवरूपलावण्णे होत्था, सेजहाणामते सुक्कछगणियाति वा वडपत्तेत्ति वा पलासपत्तेति वा, एवामेव०
भावार्थ- तप के प्रताप से धन्य अनगार के भुजा का इस प्रकार सौंदर्य था जिस तरह खेजड़े की फली
वाहाया वृक्ष की फली अथवा अगथिया वृक्ष की फली हो उसी तरह धन्य अनगार की भुजा पतली और
लंबी दिखाई देती थी- तपश्चर्या के प्रभाव से धन्य अनगार के हाथ [पंजा] का सौंदर्य ऐसा था कि जैसे
सूखा हुवा कंडा [छाना] बड़ का पत्ता वा खांखरे का पत्र हो वैसा शुष्क हाथ नज़र आता था.
A
॥ ३८॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा मूत्र
॥ ३७॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
n
भावार्थ-तपस्या से धन्य अनगार क उदररूप भाजन (पेटरूप पात्र) का ऐसा सौंदर्य
था,
जैसे
सूखी हुई चमड़े की मसक (मसक के जसे सल पड़े हुवे ) चने बगैरा भुंजने का ढीय (दीय जैसा ऊंडा) वृक्ष
की शाखा का झुका हुआ अग्रभाग, अथवा काष्ट की कथरोट ( लकड़ी की परात) हो इस मुआफिक उनका
उदर ऊंडा, सलवाला नमा हुआ और पतला शुष्क-रूक्ष मांस रहित दिखाई देता था-तपस्या के हेतु से धन्य
अनगार की पसलियों के मंडल का ऐसा सौंदर्य था कि जिस तरह स्थासकावली, पाणावली, मुडावली हो
(स्फुरकादि के विषे दर्पण की आकृति वाले स्थासक कहलाते हैं उसके ऊपराऊपरी जो श्रेणी वह स्थासकावली)
वदी जाती है; अर्थात् देव मंदिर के ऊपर स्थित आमलसार जैसी आकृति. गोलाकार भाजन की श्रेणी पाणायली
कहलाती है. भैसों के बाड़े में परिघ याने लोहे की लकड़ी रक्खी जाती है उसे मुंडावली कहते है. टव्यार्थ में
इनका ऐसा अर्थ है-- बांस का करंडिया, बांस की टोकरी, बांस का टोकरा उस तरह पांसलियों की श्रेणी
दिखाई देती थी.
मूल-धन्नस्स अणगारस्स पिट्टिकरंडयाणं अयमेयारूवे तवरूव लावण्णे होत्था, से जहाणामते रुवे
कन्नावलीति वा गोलावलीति वा वयावलीति वा, एवामेव०-धन्नस्स अणगारस्स उरकडयस्स अयमेयारूवे
तवरूव लावण्णे होत्था, से जहा णामते चित्तकदृरेति वा वियणपत्तेति वा तालियंटपत्तेति वा, एवामेव
॥३७॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
अनुवाद
३ वर्ग.
,
देणिकालिक पक्षी का पर्व अथवा ढोणकालिक यानी तीड़ की जंघा का पर्व हो उस मुआफिक उनके घुटने
शुष्क और कठिन होगये थे, यावत् मांस-रुधिर युक्त नज़र नहीं आते थे तपस्या के प्रभाव से धन्य अनगार
की सांथल ऐसी खूबसूरत थी कि जैसे प्रियंगु वृक्ष की नवीन शाखा, बोरड़ी की नवीन शाखा, शल्ल दरख्त की
नई डाली, शाल्मली रूख की नूतन शाखा हो और उसको धूप में रखकर सुखाई गई हो वह जैसी निसत्व हो जाती
है वैसी धन्य अनगार की सांथल मांस-रुधिर रहित शुष्क दिखाई देती थी-तपस्या के प्रताप से धन्य अनगार
का कटिप्रदेश (कमर) की सुन्दरता ऐसी नज़र आती थी जैसे ऊँट का पग, बुढ़े बैल का पग, (अथवा भैंस
का पग) हो वैसे मांस-रुधिर सहित उनकी कमर मालूम नहीं होती थी- “ यहां पर पत्र शह से पतलापन
और सर्गादि वृक्ष के पत्ते दो दलपना जानना; पाठान्तर से कमररूप पट्ट भी कहा है एवं कमर को ऊँट वगैरः
के पग की उपमा दी गई है उसका मतलब यह है कि ऊँट आदि के पग के दो विभाग होते हैं और नीचे से
अति पतले होते हैं इससे उनके गुदा प्रदेश की समता होती है.
मूल-धन्नस्स अणगारस्स उदरभायणस्स इमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था,से जहा नामते सुकदि-
एति वा भज्जणयकभल्लेति वा कट्ठकोलंवएति वा, एवामेव उदरं सुकं-धन्नस्स अणगारस्स पांसुलियकड-
याणं इमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते थासयावलीति वा पाणावलीति वा मुंडावलीति वा।
.
॥३६॥
अनुत्तरो- पपातिक दशा मूत्र ॥ ३५ ॥ दिन्दी अनुवाद ३ वर्ग मूल-धन्नस्स अणगारस्स जंघाणं अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते काकजं- घात्ति वा कंक जंघाति वा ढेणियालियाजंघाति वा जाव णो सोणियत्ताए-धन्नस्स अणगारस्स जाणूणं अय- मेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते कालीपोरेति वा मयूरपोरेति वा ढेणियालियापोरेति वा एवं जाव सोणियत्ताए -धन्नस्स अणगारस्स उरुस्स अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते सामकरेल्लोत वा बोरीकरील्लेति वा सल्लतिकरील्लेति वा सामलीकरील्लेति वा तरुणिते उण्हे जाव चिट्ठति, एवामेव धन्नस्स अणगारस्स उरू जाव सोणियत्ताए - धन्नस अणगारस्स कडियत्तस्स इमेयारूवे तवरूव- लावण्णे होत्था, से जहा णामते उट्ठपादेति वा जरग्गपादेति वा (महिसपादेति वा) जाव सोणियत्ताए। RAN भावार्थ-तपस्या के प्रताप से धन्य अनगार की पिंडियों का ऐसा सौंदर्य बना था जैसा काकजंघा नाम की वनस्पति जिस की नसें दिखाती हों और संधी का भाग मोटा (जाडा) हो, अथवा कागले की जंघा (पिंडी) कक पक्षी की जंघा,णिकालिक नामक पक्षी की जंघा जो स्वाभाविक ही मांस-रुधिर रहित होती है,उसके समान धन्य अनगार की पिंडियाँ मांस-रुधिर रहित ज्ञात होती थीं-तपस्या के कारण धन्य अनगार के घुटनों का (गोड़ों) सौंदर्य इस प्रकार था जैसे काकजंघा नामक वनस्पति की गांठ, मोर की जंघा का पर्व (घुटने की गांठ) ॥३५॥ है अत्तनुरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥३४॥ रूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते कलसंगलियाति वामुग्गसंगलियाति वा मांससंगलियाति वा तरुणिया छिन्ना उण्हे दिन्ना सुक्का समाणी मिलायमाणी मिलायमाणी चिट्टति, एवामेव धन्नस्स पायंगुलि- यातो सुक्कातो जाव सोणियत्ताते । हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग भावाथ प्रभाव से धन्य अनगार के पैर की आकृति का ऐसा सौन्दर्य था कि जिस सूखी हुई छाल वा काष्ट पादुका (पावडी) अथवा पुराना पाउंपोष हो उस तरह उन महात्मा के पैर शुष्क मांस रहित यानी मात्र हड्डियाँ- चमड़ी तथा नसें रहजाने से पैर हैं ऐसा मालूम होता था; परंतु मांस रुधिर की क्षाणता से इनका सद्भाव नहीं दिखाई देता था-तपस्या के प्रभाव से धन्य अनगार की पैर की अंगुलियों का सौन्दर्य इस प्रकार था कि जिस तरह तुवर की फली-मूंग की फली अथवा उड़द की फली कोमल अवस्था में छेदकर उसको सुखाई गई हो और वह सूख जाने पर करमा गई हो, अत्यंत करमा गई हो वैसी मांस-रुधिर रहित अति शुष्क सलवाली धन्य अनगार की अंगुलियां दिखाई देती थी. ॥ ३४॥ तपस्या से रूप की सुन्दरता तो हीनता को प्राप्त होगई थी; परन्तु यहां पर सर्वत्र भाव से सौंदर्य माना गया है.
4 R 54 अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥३३॥ हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग + 1 ・女でダメなSE ARE XL WEARLS ANIE दिव्य तपश्चर्या से धन्य अनगार के शरीर की अवर्णनीय शोभा Arr DESHI MAKARTA मूल-ततेणं से धन्ने अणगारे तेणं ओरालेणं जहा खंदतो जाव सुहुयहुयासणे इव तेयसा जलते उवसोभेमाणे चिट्ठति । भावार्थ-तत्पश्चात् वह धन्य अनगार उदार तप से स्कंदक मुनि के मुआफिक x यावत् अच्छी तरह धी से होमी हुई अग्नि की तरह तप-तेज से दैदिप्यमान् होकर अत्यंत शोभते हुवे विचरने लगे-अब क्रमशः तपोधन धन्य अनगार की शारीरिक परिस्थिति दिखलाते है। मूल-धन्नस्स णं अणगारस्स पादाणं अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते सुक्क- छल्लीति वा कट्टपाउयाति वा जरग्गओवाहणाति वा, एवामेव धन्नस्स अणगारस्स पाया सुका णिम्मंसा अहिचम्मछिरत्ताए पण्णायंति णो चेव णं मंससोणियत्ताए, धन्नस्स णं अणगारस्स पायंगुलियाणं अयमेया- स्कन्दक मुनि का बयान भगवती सूत्र शतक २ उद्देशा १ मे है। है x - 5 अनुत्तरों- पपातिक- दशा सूत्र ॥ २८ ॥ हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग. भावार्थ-पारमेश्वरी प्रव्रज्या ग्रहण करने के पश्चात् उस धन्य ( धन्ना) अनगार ने जिस दिन मुंडित होकर दीक्षा ली उस ही दिन श्रमण भगवन्त महावीर देव को वंदन-नमस्कार किया, करके इस प्रकार प्रार्थना की-हे प्रभो! आपकी आज्ञा प्राप्त करके जीवन पर्यन्त छट २ यानी बेले २ की तपस्या कर पारणे में आयबिलक तप द्वारा मैं आत्म भावना भाता हुवा विचरूं ! ऐसी मेरी इच्छा है; अर्थात् छट के पारणे भी आयबिल (शुद्ध चावलादि ) करना कल्पे; परन्तु आयबिल बिना की कोई वस्तु लेना कल्पे नहीं, वह आयबिल की वस्तु भी संसृष्ट हो (खरड़े हुवे हाथ बगैरः से जो वस्तु दी जाय ) वही कल्पे, किन्तु असंसृष्ट कल्पे नहीं, व संसृष्ट आहार भी उज्झित धर्मवाला (गृहस्थों के खाने याद बचा बचाया फैंक देने के लायक) आहार कल्पे, मगर अनुज्झित आहार कल्पे नहीं, उज्झित होने पर भी जिस आहार को श्रमण-माहण- अतिथि-कृपण-वनीपक (साधु ब्राह्मण-पाहूना- कंजूस-भिखारी ) इच्छते न हों वह आहार बहेरना कल्पे; इस कदर तपस्या करने की आज्ञा बक्षो ! ज्ञानवन्त प्रभु ने फरमाया-हे देवों के प्यारे ! तुझे सुख हो वैसा कर, इसमें विलम्ब मत कर, यह तेरे लिये श्रेयस्कर है. . ॥२८॥ आपॅबिल में मात्र एक प्रकार का अनाज व दूमरा अचित्त जल; ये दो द्रव्य ग्रहण करना उचित है, कारण कि यह तप सर्व रसों से मुक्त रहने को ही किया जाता है, G उपयोगवन्त होते हुवे यावत् गुप्तब्रह्मचारी यानी ब्रह्मचर्य की नौवाड़ * पालने वाले हुवे. अनुत्तरो- पपातिक दशा सूत्र ॥२७॥ हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग. तपश्चर्या के लिये उग्रप्रतिज्ञ धन्य अनगार की प्रार्थना भगवन्त का आदेश मूल- तते णं से धन्ने अणगारे जं चेव दिवसं मुंडे भवित्ता जाव पव्वतिते तं चेव दिवसं समणं भगवं महावीरं वंदति णमंसति वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी-इच्छामि णं भंते ! तुन्भेणं अब्भणुपणाते समाणे जावज्जीवाए छठं छटेणं अणिक्खित्तेणं आयंबिलपरिग्गहिएणं तवोकम्मेणं अप्पाणं भावेमाणे विह- रित्तते छट्ठस्स वि य णं पारणयंसि कप्पति आयंबिलं पडिग्गहित्तते नो चेव णं अणायंबिलं तं पि य संसह णो चेव णं असंसट्टं तं पि य णं उज्झिय धम्मियं नो चेव णं अणुज्झिय धम्मियं तं पि यजं अन्ने बहवे समणमाहणआतिहिकिवणवणीमगाणवखंति, अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंध करेह । * ब्रह्मचर्य की नौवाड़ का बयान हमारे बनाये हुवे 'सुखचरित्र' से जान लेना ॥२७॥ । NEE हिन्दी अनुवाद अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥२६॥ ३ वर्ग , दर्शनार्थ निकली, कोणिक राजा की तरह ऋद्धिपूर्ण जितशत्रु राजा भी प्रभु के दर्शनार्थ घरसे निकला, तदन्तर उस धन्यकुमार ने नागरिकों के कोलाहल से प्रभु का पदार्पण जाना, तब यह जमाली की तरह दर्शनार्थ रवाना हुवा, विशेषता यह थी कि कुमार पैर पैदल वंदनार्थ गया, यावत् परमात्मा की देशना सुनकर वैराग्य रंग रंगित हुआ, विशिष्ट बात यह है कि धन्यकुमार ने प्रभु से प्रार्थना की कि मैं मेरी माता भद्रा सार्थ- वाहिनी से आज्ञा प्राप्त कर बाद आप प्रभु के पास यावत् मैं भवतापहारिणी दीक्षा अंगीकार करूंगा ! ऐसा निवेदन कर यावत् घर पर जाकर जमाली की तरह माता से आज्ञा मांगी, सुनते ही मोहमथिल. माता मूर्छित होगई, सावधान होने पर माता और पुत्र के परस्पर युक्ति-प्रत्युक्ति रूप सुन्दर संवाद हुवा; अर्थात् माता ने दीक्षा निषेध का पक्ष सिद्ध करने का प्रयत्न किया और पुत्र ने दीक्षा समर्थन का पक्ष सिद्ध करने का प्रयास किया, श्री भगवती सूत्र में कथित महाबल की तरह माता-पुत्र के प्रश्नोत्तर जान लेना यावत् (आखीर ) जब माता पुत्र को समझाने म असक्त हुई तब थावच्चा पुत्र के समान (ज्ञाताधर्मकथा के पाँचवें अध्ययन में कथित) धन्यकुमार की माताने जितशत्रु राजा के पास से अपने पुत्र के दीक्षा महोत्सव के लिये छत्र-चामरादि की याचना की, तब जिस तरह थावच्चा पुत्र का दीक्षा महोत्सव श्रीकृष्ण ने किया था उस ही तरह जितशत्रु राजा ने धन्यकुमार का स्वयं दीक्षा महोत्सव किया, यावत् कुमार अनगार पद को प्राप्त हुवे, इर्यासमिति आदि में
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ २५ ॥
H
ESE H-1BISES प
प्रभु का पदार्पण-धन्यकुमार वैराग्य रंग रंगित
भागवती दीक्षा का ग्रहण
EEG-F-BE
हिन्दी
अनुवाद
३ बगे
.
मूलं- तेणं कालेणं तेणं' समएणं समणे भगवं महावीरे समोसढे, परिसा निग्गया राया जहा
कोणितो तहा जियसत्तु णिग्गतो, तते णं तस्स धन्नस्स तं महता जहा जमाली तहा णिग्गतो, नवरं पाय-
चारेणं जाव जं नवरं अम्मयं भदं सत्थवाहिं आपुच्छामि, तते णं अहं देवाणुप्पियाणं अंतिते जाव पव्व-
यामि जाव जहा जमाली तहा आपुच्छइ मुच्छिया वृत्तपडिवुत्तया जहा महब्बले जाव जाहे णो संचाएति
जहा थावच्चापुत्तो जियस आपुच्छति छत्तचामरातो सयमेव जियसत्तु णिक्खमणं करेति जहा थावच्या
पुतस्स कण्हो जाव पव्वतिते अणगारे जाते इरियासमिते जाव बंभयारी ।
भावार्थ- उस काल उस समय में श्रमण भगवन्त महावीर देव समवसरे, नगरी से प्रजा पर्षदा प्रभु
के
॥२५॥
। हिन्दी अनुवाद अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ २४ ॥ ३ वर्ग. , कुमार नामका पुत्र था; अहीन यानी पूर्ण पंचेन्द्री शरीर वाला यावत् स्वरूपवान् था, पाँच धाय माताओं से इस का पालन-पोषण होता था, वे धाय माताएँ ये हैं-१ दूध पिलाने वाली यानी स्तन पान कराने वाली २ स्नान कराने वाली ३ वस्त्रा-भूषण पहनाने वाली ४ गोद में लेकर फिराने वाली ५ क्रीड़ा कराने वाली, इत्यादि महाबल कुमार के मुआफिक जानना, यावत् धन्यकुमार बहत्तर कला कुशल हुवा यावत् पूर्ण भोग समर्थ हुवा यानी युवा अवस्था को प्राप्त हुवा तत्पश्चात् उस भद्रा सार्थवाहिनी ने धन्यकुमार को मुक्तबालभाव यावत् भोग समर्थ जानकर बत्तीस प्रासादावतंसक (सुन्दर महल) तैयार कराये, व बहुत ऊँच थे, उनके बीचों बीच हजारों स्तम्भ से शोभित एक सुन्दर भवन कराया; यावत् श्रीमन्तो की श्रेष्ट बत्तीस कन्याओं के साथ एक दिनमें विवाह कराया, कराकर बत्तीस २ दास-दासी बगैर का दायजा दिया, यावत् वह धन्यकुमार बत्तीस ललनाओं के साथ महलों के ऊपर नाच-गान वाजिन्त्री सहित यावत् वैषयिक सुख (सांसारिक सुख ) में लीन होकर रहने लगा प्रासाद स्त्रियों के लिये और भुवन कुमार के लिये बनाया गया था, प्रासाद और भुवन की बिल्डिंग ( इमारत ) का अन्तर हमारा बनाया हुआ विपाक सूत्र का हिन्दी अनुवाद पृष्ठ ३३५ के टीकार्थ मे खुलाशा किया है, वहां से जान लेना. ॥२४॥ ASTRO .
अनुतरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥२३॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग.
-
महब्बले जाव बावत्तरि कलातो अहीए जाव अलं भोगसमत्थे जाते यावि होत्था, तते णं सा भद्दा सस्थ-
वाही धन्नं दारयं उम्मुक्कबालभावं जाव भोगसमत्थं यावि जाणेत्ता बत्तीसं पासायवडिंसते कारेति अन्भु-
ग्गतमूसिते जाव तेसिं मज्झे भवणं अणेगखंभसयसन्निविटुं जाव बत्तिसाए इब्भवरकन्नगाणं एगदिवसेणं
पाणिं गेण्हावेति:२त्ता बत्तीसओ दाओ जाव उप्पिंपासायवडिंसते फुट्टतेहिं जाव विहरति ।
भावार्थ-जम्बू खामी गुरु महाराज से पूछते हैं-हे पूज्यवर्य ! श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत्
मोक्ष को पधारे ने जो तीसरे वर्ग के दस अध्ययन प्रदर्शित किये हैं तो हे भगवन् ! पहिले अध्ययन का श्रमण भगवन्त
यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या अर्थ प्रकाशित किया ? इस.पर सुधर्म स्वामी फरमाते हैं-हे जम्बू ! निश्चय इस
प्रकार चतुर्थ काल में (चौथे आरे में ) आख्यान प्रसङ्ग के समय में काकंदी नामकी ऋद्धिपूर्णा-निर्भया और
समृद्धिशालिनी एक नगरी थी, उसके बाहर सहस्राम्रन ( हज़ार आम के वृक्षों वाला वन ) नामक उद्यान
(नगर के समीप का जंगल) था, वह सर्व ऋतुओं में फल-फूल से सुशोभित था, उस काकंदी नगरी में जित-
शत्रु नामका राजा राज्य शासन पर विराजित था, उस काकंदी नगरी में भद्रा नामकी सार्थवाहिनी रहती थी,
वह ऋद्धिमति थी यावत् अन्य से अपरास्त (. पराभव नहीं होने वाली) थी, उस भद्रा सार्थवाहिनी के धन्य-
॥२३॥
२६ अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥२२।। * पहिला अध्ययन (धन्य कुमार) हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग सशसम्राटसर630 REGERED धन्यकुमार का गृहस्थाश्रम HERERE JALAEAEAEREFERECEREREAEAEAEROREPARADOS मूल-जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं तच्चस्स वग्गस्स दस अज्झ- यणा पन्नत्ता, पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पन्नते ? एवं खल्लु जम्बू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं कागंदीणामणगरी होत्था रिद्धस्थिमियसमिद्धा सहसंबणे उज्जाणे सव्वोदुए जिअसत्तु राया, तत्थ णं कागंदीए णगरीए भद्दा णामं सत्थवाही परिवसइ अडढा जाव अपरिभूआ, तीसेणं भद्दाए सत्यवाहीए. पुत्ते धन्ने नामं दारए होत्था अहीण जाव सुरूवे पंच धातीपरिग्गहिते तंजहा- खीरधाती जहा ॥२२॥ A 7 HWAR अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥२१॥ हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग. ALSORKSRECESSARKESKY धपणे य सुणक्खत्ते । इसिदासे अ आहिते ॥ पेल्लए रामपुत्ते य । चंदिमा पिढिमाइया ॥ १ ॥ पेढालपुत्ते अणगारे । नवमे पुट्ठिले इ य ॥ वेहल्ले दसमे वुत्ते । इमे ते दस आहिते ॥ २॥ भावार्थ-भगवान् सुधर्म गणधर को जम्बू अनगार विनय पूर्वक पूछते हैं-हे पूज्य गुरुदेव ! श्रमण भग- वन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने अनुत्तरोपपातिकदशा के द्वीतीय वर्ग को यह (उपरोक्त) ययान फरमाया तो हे प्रभो ! अणुत्तरोपपातिकादशा के तीसरे वर्ग का श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या अर्थ प्रकाशित किया ? इस पर सुधर्म स्वामी फरमाते हैं-निश्चय इस प्रकार हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने अणुत्तरोपपातिकदशा के तीसरे वर्ग के दस अध्ययन जाहिर किये हैं. वे ये हैं:- १ धन्यकुमार २ सुनक्षत्र कुमार ३ ऋषिदास कुमार ४ पेल्लक कुमार ५ रामपुत्र कुमार .६ चन्द्र कुमार ७ पृष्ट कुमार ८ पेढाल पुत्र अनगार ९ पोट्ठिल कुमार १० वेहल्ल कुमार. इन दस कुमारों के नाम से दस अध्ययन कहे जाते हैं. 4RRS- -- ।। २१ ॥
ॐ नमः ॐ RA RESORN श्री अनुत्तरोपपातिकदशा सूत्र * हिन्दी अनुवाद Com १ EOSC 0DC अनुवादक- पूज्यपाद प्रखरवक्ता वीरपुत्र श्री आनन्दसागरजी महाराज, ( मङ्गलाचरण ) वीतराग को नमन कर । गुरुपुङ्गव आधार ॥ अनुत्तरोपपातिकदशा । हिन्दीरचना सार ॥ १॥ विश्वतारक, जगद्वन्द्य, शासनपति, भगवन्त महावीर देव को अभिवन्दन कर एवं जैनशासन-दीपक, शासनसम्राट , श्री जिनदत्त-कुशल सूरीश्वरादि गुरुदेवों को नमन कर नौवें अङ्ग " श्री अनुत्तरोपपातिकदशा ARH अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ २१॥ RECENG हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग. क धण्णे य सुणक्खत्ते । इसिदासे अ आहिते ॥ पेल्लए रामपुत्ते य । चंदिमा पिढिमाइया ॥ १॥ पेढालपुत्ते अणगारे । नवमे पुट्ठिले इ य ॥ वेहल्ले दसमे वुत्ते । इमे ते दस आहिते ॥ २ ॥ भावार्थ-भगवान् सुधर्म गणधर को जम्बू अनगार विनय पूर्वक पूछते हैं-हे पूज्य गुरुदेव ! श्रमण भग- वन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने अनुत्तरोपपातिकदशा के द्वीतीय वर्ग को यह (उपरोक्त) बयान फरमाया तो हे प्रभो ! अणुत्तरोपपातिकादशा के तीसरे वर्ग का श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या अर्थ प्रकाशित किया ? इस पर सुधर्म स्वामी फरमाते हैं-निश्चय इस प्रकार हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने अणुत्तरोपपातिकदशा के तीसरे वर्ग के दस अध्ययन जाहिर किये हैं. वे ये हैं:- १ धन्यकुमार २ सुनक्षत्र कुमार ३ ऋषिदास कुमार ४ पेल्लक कुमार ५ रामपुत्र कुमार ६ चन्द्र कुमार ७ पृष्ट कुमार ८ पेढाल पुत्र अनगार ९ पोटिल कुमार १० वेहल्ल कुमार. इन दस कुमारों के नाम से दस अध्ययन कहे जाते हैं. RSS ॥ २१ ॥ .
44 30 नमः WALLY श्री अनुत्तरोपपातिकदशा सूत्र हिन्दी अनुवाद E091CODEO अनुवादक- पूज्यपाद प्रखरवक्ता वीरपुत्र श्री आनन्दसागरजी महाराज, ' ( मङ्गलाचरण ) वीतराग को नमन कर । गुरुपुङ्गव आधार ॥ अनुत्तरोपपातिकदशा । हिन्दीरचना सार ॥ १॥ विश्वातारक, जगद्वन्द्य, शासनपति, भगवन्त महावीर देव को अभिवन्दन कर एवं जैनशासन-दीपक, शासनसम्राट, श्री जिनदत्त-कुशल सूरीश्वरादि गुरुदेवों को नमन कर नौवें अङ्ग " श्री अनुत्तरोपपातिकदशा 6136
Rog
अनुत्तरी
सूत्र" (अणुत्तरोववाइय सूत्र) का भारतीय भाषा में (हिन्दी भाषा में) मैं अनुवाद करता हूँ; आत्मार्थी जन
इसका लक्षपूर्वक अध्ययन कर आत्मश्रेय करें।
हिन्दी
अनुवाद
प्रारम्भ
पपातिक-
दशा मूत्र
॥ २i
* प्रारम्भ *
प्रारम्भ में ही हमें यह अभिलाषा होती है कि " अनुत्तरोपपातिकदशा” का अर्थ क्या है ? टीकाकार
महाराज भगवान् श्री अभयदेव सूरीश्वरजी इसका इस प्रकार खुलासा फरमाते हैं- अनुत्तर नाम के सर्वोत्तम
विमानों में जिनका जन्म हुवा है ऐसे दस जीवों का बयान दस अध्ययनों द्वारा कथन करने वाला सूत्र “ अनु-
त्तरोपपातिकदशा" कहा जाता है- यहां पर पहिले वर्ग में दस अध्ययन कहे जायंगे; उनका सम्बन्धसूत्र तथा
उसकी व्याख्या ज्ञाताधर्मकथा सूत्र के पहिले अध्ययन में बताये हुवे के समान है ; शेष सूत्र प्रायः सुगम हैं।
ले पीठिका
ॐ पूज्य गुरुदेव से शिष्यरत्न की पृच्छा- गुरुवर्य का प्रत्युत्तर के
।
K
HIRA
॥ २॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥३॥
हिन्दी
अनुवाद
पीठिका
मूल- तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे अजसुहम्मस्स समोसरणं परिसा णिग्गया जाव
जंबू पज्जुवासति, एवं वयासी- जतिणं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं
अयमढे पण्णत्ते, नवमस्स णं भंते ! अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं जाव संपतेणं के अटे पण्णते? ततेणं
से सुधम्मे अणगारे जंबू अणगारं एवं वयासी-एवं खलु जंबू! समणेणं जाव संपत्तेणं नवमस्स अंगस्स
अणुत्तरोववाइयदसाणं तिण्णि वग्गा पण्णत्ता, जतिणं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं नवमस्स अंगस्स
अणुत्तरोववाइयदसाणं तिण्णि वग्गा पण्णत्ता, पढमस्सणं भंते ! वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं कइ अज्झ-
यणा पण्णत्ता ? एवं खल्लु जंबू! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुतरोववाइयदसाणं पढमस्स वग्गस्स दस अज्झ-
यणा पण्णत्ता. तंजहा-
RESENSE
जाली १ मयाली २ उवयाली ३। पुरिससेणे य ४ वारिसेणे य ५॥
दीहदंते य ६ लंठदंते य ७ । वेहल्ले ८ वेहासे ९ अभये १० ति य कुमारे ॥ १॥
॥३॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
हिन्दी
अनुवाद
पीठिका
भावार्थ- चतुर्थ काल के समय क्षेत्रस्पर्शना के अवसर में वीरप्रभु के पटोधर पंचम गणधर श्री आर्य
सुधर्म खामी राजगृही नगरी के उद्यान में समवसरे यानी पधारे; वनपालक द्वारा खबर मिलने पर नगरी से
प्रजापर्षदा वन्दनार्थ निकली, धर्मदेशना श्रवण के पश्चात् पर्षदा के लोग अपने २ स्थान पर वापिस चले गये
यावत् जम्बू स्वामी गुरु महाराज की सेवा करने लगे; तय वे विनयपूर्वक इस प्रकार बोले-हे पूज्यवर्य !
श्रमण भगवन्त'महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारेने आठवें अङ्ग अन्तगडदशा का यह अर्थ (जो आपने पूर्व में
फरमाया है ) प्रकाशित किया है, तो हे स्वामिन् ! परमात्मा ने यावत् मोक्ष को पधारेने नौवें अङ्ग अणुत्तरोप-
पातिकदशा का क्या अर्थ फरमाया ?. इस पर उन सुधर्म अनगार ने जम्बू अनगार को इस कदर कथन किया-
निश्चय इस प्रकार हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारेने नौवें अङ्ग अणुरोपपातिकदशा के तीन
वर्ग यताये हैं. जम्बू स्वामी ने पुनः प्रश्न किया- हे भगवन्त ! श्रमण महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारेने
नौवें अङ्ग अणुत्तरोपपातिकदशा के तीन वर्ग बताये तो हे पूज्यवर्य ! अणुत्तरोपपातिकदशान्तरंगत प्रथम वर्ग
के कितने अध्ययन दिखलाये ? इस पर गुरु महाराज ने उत्तर दिया-इस तरह निश्चय हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त
यावत् मोक्ष को पधारेने अणुत्तरोपपातिकदशान्तरगत पहिले वर्ग के दस अध्ययन फरमाये. वे ये हैं:-
१ जाली कुमार २ मयाली कुमार ३ उपजाली कुमार ४ पुरुषसेन कुमार ५ वारिसेन कुमार
VE
॥ ४ ॥
६ दीर्घदन्त कुमार ७ लष्टदन्त कुमार ८ वेहल्ल कुमार ९ वेहास कुमार १० अभय कुमार
इस प्रकार दस अध्ययनों के नाम बताये गये.
हिन्दी
अनुवाद
अनुसरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥५॥
80
१ वर्ग.
प्रथम वर्ग
-
.
* पहिला अध्ययन
(जाली कुमार)
मूल-जइणं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं पढमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पन्नत्ता; पढमस्सणं
भंते ! अज्झयणस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्ते ?
भावार्थ-जंबू स्वामी ने पुनः प्रश्न किया-हे भदन्त ! श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने पहिले
वर्ग के यदि दस अध्ययन जाहिर किये हैं तो हे पूज्य भगवन् ! अणुत्तरोपपातिक के पहिले अध्ययन का श्रमण
महावीर प्रभू यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या अर्थ प्रकाशित किया ? इस पर सुर्धमस्वामी गणधर महाराज ने इस
प्रकार बयान किया-
॥५॥
MOR अनुत्तरो- पपातिक- दशा मूत्र ॥६॥ हिन्दी अनुवाद १ वर्ग. BIDA जाली कुमार ने प्रभू की धर्मदेशना सुनी वैराग्य उत्पन्न और दीक्षा ग्रहण %3308 30 मूल-एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे रिद्धस्थिमियसमिद्धे गुणसिलए चेतिए सेणिए राया धारिणी देवी सीहो सुमिणे जाली कुमारो जहा मेहो अट्ठट्ठओ दाओ जाव उपिंपासाए जाव विहरति, सामी समोसढे सेणिओ णिग्गओ जहा मेहो तहा जाली वि णिग्गतो तहेव णिक्खंतो जहा मेहो, एकारस अंगाई अहिज्जति, गुणरयणं तवोकम्मं । भावार्थ- इस प्रकार निश्चय हे जंबू ! चतुर्थ आरे में जाली कुमार के समय ऋद्धिपूर्ण-निर्भय और समृद्धिशाली राजगृह नाम का नगर था. नगर के बाहर गुणशील नामक उपवन था, उस नगर में श्रोणिक नामक राजा राज्य करता था, उसके धारिणी नामकी रानी थी, उसने एकदा खम में सिंह देखा, इसके प्रभाव से पूर्ण मास होने पर पुन का जन्म हुवा, उसका 'जाली कुमार' नाम रक्खा-यहां पर 'मेघकुमारवत्' सब वर्णन करना.
हिन्दी अनुवाद अनुत्तरो. पपातिक- दशा सूत्र ॥ ७ ॥ १ वर्ग. युवा अवस्था होने पर मात-पिता ने आठ राजकन्याओं के साथ विवाह कराया, आठ २ महल बगैरः प्रीतिदान दिया, यावत् उन आठ रमणियों के साथ आनन्द पूर्वक क्रीड़ा करता हुवा रहता था- एक वक्त गुणशील चेत्य में भगवन्त महापरि देव समवसरे,उनको वन्दन करने के लिये महाराजा श्रोणिक और प्रजा के लोग नगर से रवाना हुवे, यह सुनकर मेघकुमार की तरह जाली कुमार भी नगर से निकला, धर्मदेशना श्रवण की, मेघकुमार के मुआफिक जाली कुमार ने पूर्ण वैराग्य से भवतापहरणी दीक्षा अंगीकार की, क्रमशः ग्यारह अङ्गों का अध्ययन किया तथा गुणरत्न नामक तपश्चर्या की. इसका वर्णन हस्तलिखित प्रति से यहां पर उद्धृत करते हैं- गुणरत्न तपश्चर्या का विधान पन्द्रह मास की मर्यादा वाला यह 'गुणरत्न' तप है. देखिये-पहिले मास में एक दिन उपवास और एक दिन पारणा यानी एकान्तर उपवास करे, दिनको उत्कट आसन से सूर्य के सन्मुख रहकर आतापना सहन करे रात्री में वस्त्ररहित यानी नग्न होकर वीरासन से रहे-दूसरे मासमें अन्तर रहित बेले २ पारणा करे ; दिन-रात्री की चर्या प्रथम मासवत् करे-तीसरे मासमें अन्तर रहित तेले २ पारणा करे; दिन रात्री की चर्या पथन माप्तवत्- ॥७॥ R ----- -
अनुत्तरो-
हिन्दी
अनुवाद
१ वर्ग.
पपातिक-
दशा सूत्र
॥८॥
चौधे मास में अन्तर रहित चोले २ पारणा करे; क्रिया पूर्ववत्- पांचवें मास में पंचोले २ पारणा करे; क्रिया
पूर्ववत्- इसही प्रकार प्रत्येक मास में एक २ उपवास की क्रमशः वृद्धि करते जाना, यावत् पन्द्रहवें मास में
अन्तर रहित पक्षक्षमण २ (पन्द्रह २ दिन ) में पारणा करे; दिन को उत्कट आसन से सूर्य के सामने रहकर
आतापना सहन करे और रात्री में वस्त्र रहित यानी नग्न होकर वीरासन से रहे- इस कदर का यह 'गुणरत्न तप'
जाली कुमार ने किया था.
TARमर
जाली कुमार का अनुत्तर वर्गवास
मूल-एवं जा चेव खंदगवत्तव्वया सा चेव चिंतणा आपुच्छणा थेरेहिं सद्धिं विपुलं तहेव दुरुहति,
नवरं सोलस वासाइं सामन्नपरियागं पाउणित्ता कालमासे कालं किच्चा उड्ढं चंदिमाइ सोहम्मीसाण जाव
आरणच्चुए कप्पे नव य गेवेज्जे विमाणपत्थडे ऊड्ढं दूरं वीतीवतित्ता विजयविमाणे देवत्ताए उववण्णे ।
भावार्थ- इस प्रकार याषत् खंदक के घृतान्त में कहा गया है उसही तरह जानना, उसही मुआफिक
॥८॥
अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥९॥ अनशन के लिये विचारना, भगवन्त को पूछना और स्थविर मुनियों के साथ विपुलगिरी पर चढकर अनशन करना, इत्यादि समझना चाहिये; विशेष बात यह है कि अर्थात् अन्तर मात्र यह है कि सोलह वर्ष पर्यन्त चारित्र पर्याय (संयम काल) पालकर काल समय यानी आयुष्य पूर्ण होने पर कालकर चन्द्रादि के विमानों से ऊपर सौधर्म-इशानादि यावत् आरण्य-अच्युत कल्प को टपकर नवग्रैवेयक विमान के प्रतरों से भी ऊपर अति दूर जाकर विजय नाम के अनुत्तर विमान में देवपने उत्पन्न हुवे. हिन्दी अनुवाद १ वगे. sayaasma asanajatas 2CBSE ॐarashaswaalaa स्वर्गवास के पीछे मुनियों का क्रिया कर्म गौतम गणधर की प्रश्नावली-प्रभुका प्रत्युत्तर avita मूल-तते णं ते थेरा भगवंतो जाली अणगारं कालगयं जाणेत्ता परिनिव्वाणवत्तियं काउसग्गं करेंति २ त्ता पत्तचिवराइं गेण्हति तहेव ओयरंति जाव इमे से आयार भंडए , भंते! त्ति भगवं गोयमे जाव एवं वयासि- एवं खल्लु देवाणुप्पियाणं अंतेवासी जाली नाम अणगारे पगति भदए से णं जाली अणगारे ॥ ९॥ -- ..
--
-
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सत्र
॥ १० ॥
हिन्दी
अनुवाद
१ बगे.
कालगते कहिं गते ? कहिं उववज्जे ? एवं खलु गोयमा! ममं अंतेवासी तहेव जहा खंदयस्स जाव
कालगए उड्ढं चंदिम जाव विजए विमाणे देवत्ताए उववण्णे।
भावार्थ- तदन्तर उन स्थविर ज्ञानियों ने जाली अनगार को कालधर्म प्राप्त हुवे जानकर कालधर्म सम्बंधी
काउसग्ग किया करके उनके वस्त्र-पात्र आदि (धर्मोपगरण) ग्रहण किये, तथैव (जिस तरह गये थे उसही
तरह ) पर्वत पर से नीचे उतरे, यावत् (भगवन्त के पास जाकर सर्व वृतान्त कहकर) कहा कि 'ये उनके
आचार भंड-यानी धर्मोपगरण' यह कहते हुवे सर्व धर्मापैगरण भगवन्त के सामने रक्खे-इस समय गणधर
गौतम ने भगवन्त महावीर देव से पूछा-हे प्रभो ? निश्चय इस प्रकार देवों के वल्लभ ऐसे आपके शिष्य जाली-
कुमार नाम के अनगार प्रकृतिभद्र गुणवाले जाली अनगार काल करके कहां गये? कहां उत्पन्न हुवे? परमात्मा
* इस से यह स्पष्ट है कि मुनि के कालधर्म के पश्चात् पासवाले मुनिजन मात्र महापारिहावणियं का तथा असज्झाय उडावनार्थ"
का काउसग्ग करते थे; यह उचित, इष्ट और पर्याप्त था, पिछले आचार्यों ने अन्तक्रिया इतनी लम्बी-चौडी कर दी है कि जो निवृत्ति मार्ग को
धका लगानेवाली और प्रवृत्ति मार्ग की वृद्धि करने वाली है। निवृत्ति मार्ग के उपासकों को इसम संशोधन करने का प्रयात्न करना चाहिये ।
४ स्वाभाविक सरल को 'प्रकृतिभद्र' कहते हैं, अर्थात् स्वार्थवश वा भयवश, वा मोहवशादि कारणो से कल्पित सरलता वाला सरल
नहीं कहा जाता.
STEGORRORS
'
*s
॥ १० ॥
बसस ने उत्तर दिया-निश्चय इस प्रकार हे गौतम ! मेरा शिष्य जाली अनगार उसही तरह यानी खंदक अनगार के मुआफिक यावत् कालधर्म प्राप्त कर चन्द्रविमान के ऊपर यावत् विजय नाम विमान में देवपने उत्पन्न हुवा है. अनुत्तरो- हिन्दी अनुवाद १ वर्ग पपातिक- दशा सूत्र ॥ ११॥ BIERTENSERIERRIERIEMBERNE जाली कुमार के लिये भाविपृच्छा प्रभु का प्रत्युत्तर. ERIERIERIETIETIERIE मूल- जालिस्स णं भंते ! देवस्स केवतियं कालं ठिती पण्णत्ता ? गोयमा ! बत्तीसं सागरोवमाई ठिती पण्णत्ता, सेणं भंते ! ताओ देवलोयाओ आउक्खएणं ३ (भवक्खएणं ठिइक्खएणं) कहिं गच्छि- हिति ? कहिं उववजिहिति ? गोयमा! महाविदेह वासे सिज्झिहिति, ता एवं जंबू ! समणेणं जाव संप- तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं पढमबग्गस्स पढमज्झयणस्स अयम? पपणत्ते-पढममज्झयणं सम्मत्तं.॥१॥ ॥११॥ L ।
... - हिन्दी अनुवाद अनुत्तरो- पपातिक- दशा मूत्र ॥१२॥ १ वर्ग. भावार्थ- गौतम स्वामी पूछते हैं- हे भगवन्त ! जाली देव की कितने काल की स्थिति बताई ? परमात्मा ने उत्तर दिया- हे गौतम ! बत्तीस सागरीपम की स्थिति कही गई, गौतम गणधर ने पुनः प्रश्न किया-हे भग- वन्त ! वह जाली नामक देव देवलोक की आयुष्य क्षय कर ३ (भव क्षय कर-स्थिति क्षयकर) कहां जावेंगे? कहां उत्पन्न होंगे ? प्रभु ने फरमाया- गौतम ! वह जाली देव देवलोक से'च्यबकर महाविदेह क्षेत्र में उच्चकुल में उत्पन्न हो चारित्र ग्रहण कर मोक्षपद प्राप्त करेगा-सुधर्म स्वामी फरमाते हैं- हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने अनुत्तरोपपातिकदशा के प्रथम वर्ग के पहिले अध्ययन का इस प्रकार अर्थ यानी बयान फरमाया है-पहिले अध्ययन का भावार्थ पूर्ण हुवा. प्रथम वर्ग का पहिला अध्ययन मूल और भावार्थ सहित सम्पूर्ण. ॥१२॥ .
* दूसरा अध्ययन यावत् दसवाँ अध्ययन *
(मयाली कुमार यावत् अभय कुमार )
हिन्दी
अनुवाद
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ १३ ॥
१ वर्ग.
नौ कुमारों का संक्षिप्त आख्यान
.
मूल- एवं सेसाणवि अट्ठण्हं भाणियव्वं, नवरं सत्त धारिणी सुआ वेहल्लवेहासा चेल्लणाए, आइ-
ल्लाणं पंचण्हं सोलस वासातिं सामन्नपरियातो तिण्हं बारस वासातिं दोण्हं पंच वासाति, आइल्लाणं पचण्हं
आणुपुवीए उववायो विजये वेजयंते जयंते अपराजिते सव्वट्ठसिद्धे, दिहदंते सव्वट्ठसिद्धे, उक्कमेणं सेसा
अभओ विजए, सेसं जहा पढमे, अभयस्स णाणत्तं, रायगिहे नगरे सेणिए राया नंदादेवी माया सेसं तहेव,
एवं खल्ल जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं पढमस्स वग्गस्स अयमढे पन्नत्ते. (सूत्र १)
॥१३॥
~ - अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ १४ ॥ हिन्दी अनुवाद १ वर्ग है भावार्थ- इस ही प्रकार शेष आठ कुमारों के आठ अध्ययन कहना; विशेष बात यह है कि-पहिले सात कुमार (१ जाली २ मयाली ३ उपजाली ४ पुरुषसेन ५ वारिसेन ६ दीर्घदन्त ७ लष्टदन्त) धारिणी माता के थे तथा वेहल्ल और वेहास; ये दो चेल्लणा रानी के पुत्र थे; आदि के पांच कुमारों का सोलह वर्ष का चारित्र पर्याय था, इनके बाद के तीन कुमारों का बारह वर्ष का चारित्र पर्याय था, और आखिरी दो का पाँच वर्ष का चारित्र पर्याय था-सब जन यहां से कालधर्म पाकर अनुत्तर विमानों में उत्पन्न हुवे, उनमें से पहिले के पांच क्रमशः विजय-विजयन्त-जयन्त-अपराजित और सर्वार्थसिद्ध में उत्पन्न हुवे; छठे दीर्घदन्त सर्वार्थसिद्ध में उत्पन्न हुवे, याकी तीन कुमार उत्क्रम से यानी अपराजित-जयन्त और वैजयंत में जन्म पाये, अभय कुमार यानी आखरी दसवें कुमार की विजय विमान में उत्पत्ती हुई है। बाकी सब वृत्तान्त पहिले अध्ययन के समान जान लेना- अभय कुमार के लिये इतना विशेष है कि-राजगृही नगर में श्रेणिक राजा की नन्दा नामकी रानी अभय की माता थी शेष अधिकार पूर्ववत् जानना. सुधर्म खामी फरमाते हैं-हे जंबू ! इस प्रकार निश्चय श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने अनुत्तरोपपातिकदशा सूत्र के पहिले वर्ग का इस प्रकार अर्थ यानी बयान फरमाया है. ( सूत्र १) प्रथम वर्ग का भावार्थ सम्पूर्ण हुवा. ॥ १४ ॥ -<IABIEB>- NE उपसंहार हिन्दी अनुवाद अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ १५ ॥ २ वर्ग. इस प्रथम वर्ग में दस महा पुरुषों की तपश्चर्या का भव्य उल्लेख है, तप विना दैहिक और मानसिक शुद्धि संभव नहीं; अतएव पतितपावनकर्तृ तपश्चर्या की अवश्य आचरणा करके आत्मोन्नति करें. दूसरा अध्ययन यावत् दसवां अध्ययन मूल और भावार्थ सहित सम्पूर्ण ॐ प्रथम वर्ग समाप्त ARE RENERE ARE ARE CARE द्वितीय वर्ग (बीजक) मूल-जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं पढमस्स वग्गस्स अयमठे पन्नत्ते दोच्चणस्सं णं भंते ! वग्गस्स अणुत्तरोववाईयदसाणं समणेणं जाव सपत्तेणं के अटे पन्नत्ते? एवं खलु जम्बू! RS १५॥
1 r MORE हिन्दी अनुवाद त्तरो- तिक- ॥ सूत्र २ वर्ग. संमणेणं जाव संपत्तेणं दोच्चस्स वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तेरस अज्झयणा पन्नत्ताः तंजहा- दीहसेणे १ महासेणे २। लट्ठदंते य ३ गूढदंते य ४॥ सुद्धदंते ५ हल्ले ६ । दुमे ७ दुमसेणे ८ महादुमसेणे य ९॥१॥ आहिते सीहे य१०। सीहसेणे य ११ महासीहसेणे य १२॥आहिते पुग्नसेणे य १३ बोधव्वे तेरसमे होति अज्झयणे॥२॥ भावार्थ- सुधर्म गणधर महाराज को जम्बू अनगार पूछते हैं-हे पूज्य ! श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने यदि अणुत्तरोपपातिकदशा के पहिले वर्ग का इस तरह (ऊपर कहा गया) अर्थ ययान किया तो हे भदन्त ! अणुत्तरोपपातिकदशा के दूसरे वर्ग का श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या अर्थ फरमाया ? इस पर सुधर्म स्वामी फरमान करते हैं-इस प्रकार निश्चय हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने अनुत्तरोपपातिकदशा के दूसरे वर्ग के तेरह अध्ययन फरमाये हैं. वे इस तरह . . दीर्घसेन २ महासेन ३ लष्टदन्त ४ गूढदन्त ५ शुद्धदन्त ६ हल्ल ७ द्रुम ८ द्रुमसेन ९ महाद्रुमसेन १० सिंह ११ सिंहसेन १२ महासिंहसेन तथा १३ पुण्यसेन इस तरह तेरह कुमारों के नामसे १३ अध्ययन विख्यात ॥१६॥ , * पहिला अध्ययन [ दीर्घसेन ] हिन्दी अनुवाद अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥१७॥ . २ वर्ग. , मूल-जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं दोच्चस्स वग्गस्स तेरस अज्झ- यणा पन्नत्ता, दोच्चस्स णं भंते ! वग्सस्स पढमज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अट्टे पन्नत्ते ? एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे गुणसिलते चेतिते सेणिए राया धारिणीदेवी सीहो सुमिणे जहा जाली तहा जम्मं बालत्तणं कलातो, नवरं दीहसेणे कुमारे सच्चेव वत्तव्वया जहाजालिस्सजाव अंतं काहिती। भावार्थ-जम्बू स्वामी ने पुनः प्रश्न किया-हे भगवन्त ! यदि श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने अनुत्तरोपपातिकदशा के दूसरे वर्ग के तेरह अध्ययन बताये हैं तो हे पूज्य ! दूसरे वर्ग के पहिले अध्ययन का श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या बयान फरमाया है ? सुधर्म स्वामी उत्तर देते हैं-इस कदर निश्चय करके हे जम्बू ! उस काल उस समय में राजगृह नाम का नगर था, उसके बाहर गुणशील नामक उद्यान था, वहां पर महाराजा श्रेणिक राज्य करते थे, उनकी धारिणी संज्ञिका पट्टरानी थी, उसने एक वख्त स्वम *- ॥ १७॥ स । हिन्दी अनुवाद रो- क. सूत्र २ वर्ग. 1 संमणेणं जाव संपत्तेणं दोच्चस्स वग्गेस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तेरस अज्झयणा पन्नत्ताः तंजहा. दीहसेणे १ महासेणे २। लट्ठदंते य ३ गूढदंते य ४॥ सुद्धदंते ५ हल्ले ६ । दुमे ७ दुमसेणे ८ महादुमसेणे य ९॥१॥ आहिते सीहे य १० । सीहसेणे य ११ महासीहसेणे य १२॥माहिते पुग्नसेणे य १३ बोधव्वे तेरसमे होति अज्झयणे॥२॥ भावार्थ- सुधर्म गणधर महाराज को जम्बू अनगार पूछते हैं- हे पूज्य ! श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने यदि अणुत्तरोपपातिकदशा के पहिले वर्ग का इस तरह (ऊपर कहा गया) अर्थ बयान किया तो हे भदन्त ! अणुत्तरोपपातिकदशा के दूसरे वर्ग का श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या अर्थ फरमाया ? इस पर सुधर्म स्वामी फरमान करते हैं-इस प्रकार निश्चय हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने अनुत्तरोपपातिकदशा के दूसरे वर्ग के तेरह अध्ययन फरमाये हैं. वे इस तरह हैं:- दीर्घसेन २ महासेन ३ लष्टदन्त ४ गूढदन्त ५ शुद्धदन्त ६ हल्ल ७ द्रुम ८ द्रुमसेन ९ महाद्रुमसेन १० सिंह ११ सिंहसेन १२ महासिंहसेन तथा १३ पुण्यसेन इस तरह तेरह कुमारों के नामसे १३ अध्ययन विख्यात हैं. - । ॥१६॥ . 2
अनुत्तरो-
* पहिला अध्ययन के
[ दीर्घसेन]
हिन्दी
अनुवाद
२ वर्ग.
-
M
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ १७॥
ORN
मूल-जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं दोच्चस्स वग्गस्स तेरस अज्झ-
यणा पन्नत्ता, दोच्चस्स णं भंते ! वग्सस्स पढमज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अढे पन्नत्ते ? एवं खल्लु
जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे गुणसिलते चेतिते सेणिए राया धारिणीदेवी सीहो सुमिणे जहा
जाली तहा जम्मं बालत्तणं कलातो, नवरं दीहसेणे कुमारे सच्चेव वत्तव्वया जहाजालिस्स जाव अंतं काहिती।
भावार्थ-जम्बू स्वामी ने पुनः प्रश्न किया-हे भगवन्त ! यदि श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने
अनुत्तरोपपातिकदशा के दूसरे वर्ग के तेरह अध्ययन बताये हैं तो हे पूज्य ! दूसरे वर्ग के पहिले अध्ययन का
श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या बयान फरमाया है ? सुधर्म स्वामी उत्तर देते हैं-इस
कदर निश्चय करके हे जम्बू ! उस काल उस समय में राजगृह नाम का नगर था, उसके बाहर गुणशील नामक
उद्यान था, वहां पर महाराजा श्रेणिक राज्य करते थे, उनकी धारिणी संज्ञिका पदरानी थी, उसने एक वख्त स्वम
॥ १७॥
हिन्दी
अनुवाद
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥१८॥
..
२ वर्ग
में सिंह देवा; जाली कुमार के समान जन्म-बाल्यावस्था-कलाग्रहणादि जानना, विशेषता यह थी कि उनका
नाम 'दीर्घसेन' था ; दीक्षा वगैरः सर्व अधिकार जाली कुमारवत् समझना यावत् देवलोक से च्यवकर महा-
विदेह क्षेत्र में मोक्षपद प्राप्त करेंगे।
® दूसरा अध्ययन यावत् तेरहवां अध्ययन ®
[ महासेन यावत् पुण्यसेन ]
WERRIERRERE ARE ARE ARE ARE REME
बारह कुमारों का संक्षेप वृत्तान्त
मूल- एवं तेरस वि रायगिहे सेणिओ पिता धारिणी माता तेरसण्हवि सोलसवासा परियातो
आणुपुवीए विजए दोन्नि वेजयन्ते दोन्नी जयन्ते दोन्नी अपराजिते दोन्नी, सेसा महादुमसेगमाती पंच
॥१८॥
हिन्दी अनुवाद २ वर्ग अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ १९ ॥ सव्वट्ठसिद्धे, एवं खलु जम्बू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं दोच्चस्स वग्गस्स अयमढे पन्नत्ते, मासियाए संलेहणाए दोसुवि वग्गेसु. [ सूत्रं २] भावार्थ- इस ही प्रकार तेरह कुमारों के अध्ययन कहना-राजगृही नगरी, श्रेणिक पिता, धारिणी माता वगैरः सब कुमारों के लिये जानना. तेरह ही कुमारों ने सोलह २ वर्ष पर्यन्त चारित्र पर्याय पालन किया, अन्त में अनशन तप धारण कर मरण-शरण होकर अनुक्रम से दो कुमार विजय विमान में-दो कुमार विजयंत विमान में-दो कुमार जयन्त विमान में-दो कुमार अपराजित विमान में उत्पन्न हुवे; बाकी के महाद्रुमसेन आदि पाँच कुमार सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुवे . सुधर्म खामी ने फरमाया-हे जम्बू ! निश्चय इस तरह श्रमण भगवन्त महावीर देव ने अनुत्तरोपपातिकदशा के दूसरे वर्ग का यह बयान किया-दोनों वर्ग के उत्तम पुरुषों का संलेखना तप एक २ मास का समझ लेना. ( सूत्र २) दूसरे वर्ग का भावार्थ सम्पूर्ण हुवा. उपसंहार 7 इस दूसरे वर्ग में तेरह उत्तम पुरुषों की उज्ज्वल तपश्चर्या का संक्षिप्त बयान है, तप बिना खान-पानादि ॥१९॥ RECE
--
नुत्तरो-
पातिक-
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग.
शा सूत्र
२० ॥
की आसक्ति मिट नहीं सकती और सबसे अधिक दुस्त्याज्य भोजनासक्ति ही है ; इस वास्ते आत्माहतार्थ तप-
श्वर्या अवश्य करनी चाहिये.
दूसरा अध्ययन यावत् तेरहवां अध्ययन मूल और भावार्थ सहित सम्पूर्ण.
वर्ग समाप्त ॥
: जय
॥ दूसरा
togaN5
तृतीय वर्ग
जय
I
CHE
-
[प्राग्वक्तव्य ]
मूल--जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं दोच्चस्स वग्गस्स अयमहे
पन्नत्ते, तच्चस्स णं भंते ! वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अढे पन्नत्ते ? एवं खल्लु
जम्बू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं तच्चस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पन्नत्ता. तंजहा-
॥ २० ॥
ॐ । अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥८॥ समर्पण हिन्दी अनुवाद समर्पण RESS . शान्ति के अवतार ! चारित्रचुडामणे ! शास्त्रवेत्ता ! उपकारकशिरोमणे ! गणाधीश्वर ! पूज्यपाद गुरुदेव श्रीमान् त्रैलोक्यसागर जी महाराज साहब ! आपके उच्चतम त्याग की स्मृतिमात्र से हृदय पवित्र बन जाता है और अनुपम उपकार के प्रति सहसा शिर झुक जाता है - भगवन् ! इस ही लिए नतमस्तक होकर यह अनुत्तरोपपातिक सूत्र हिन्दी अनुवादः” सादर सविनय समर्पण करता हूँ. शान्तिः - आपका चरणरज- । । ॥८॥ वीरपुत्र आनन्दसागर.
ॐनमः अनुत्तरोप- पपातिक दशा सूत्र हिन्दी अनुवाद क खुश-खबर ॥ ७॥ सर्व सज्जनों से निवेदन है कि पूज्यपाद प्रखरवक्ता विद्वदत्न वीरपुत्र श्री आनन्दसागरजी महाराज सा. की औजस्विनी लेखनी से संशोधित-अनुवादित और रचित निम्नाङ्कित अपूर्व ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं:- १ पंच प्रतिक्रमण सूत्र-रु. सवा २ श्रीपाल चरित्र-रु. एक ३ जावाजविराशी प्रकाश-२ आना १ आदर्श धर्म-एक आना. २ अहिंसा-एक आना. सत्य-एक आना. अस्तेय-एक आना. ५ ब्रह्मचर्य-एक आना. अपरिग्रह-एक आना. ग्रंथ मिलने का पताः-वीरपुत्र श्री आनन्दसागर ज्ञानभण्डार. ठिः-शेरसिंह महेन्द्रसिंह कोठारी-कोटा ( राजपूताना ). ॐॐ ३ ४ ६ डाक खर्च अलग लगेगा.
अनुत्तरोप- पपातिक दशा सूत्र. ५३ हिन्दी अनवाद अनु- क्रमणिका. - 896 नम्बर विषय पृष्टाक २१ धन्य अनगार की आर्दश गौचरी २२ धन्य अनगार का शास्त्राभ्यास ३२ २३ दिव्य तपश्चर्या से धन्य अनगार के शरीर की अवर्णनीय शोभा ३३ २४ धन्यं अनगार तपस्वी के शरीर का रूपांतर से वर्णन ४२ २५ श्रेणिक नृपेन्द्र का नमूनेदार प्रश्न-भगवन्त का स्पष्टीकरण ४५ २६ श्रेणिक नरेश से धन्य अनगार की स्तुति ४८ २७ धन्य अनगार का मनोरथ और उसका पूर्णपालन५० २८ धन्य अनगार के लिये गौतम गणधरका आखीरी प्रश्न - परमात्मा का खुलासा दूसरा अध्ययन नम्बर विषय पृष्टाङ्क २९ सुनक्षत्र कुमार ३० सुनक्षत्र अनगार का तपोवर्णन ५४ ३१ सुनक्षत्र अनगार का सफल मनोरथ और अन्तिम अवस्था ५५ तीसरा अध्ययन यावत् दसवाँ अध्ययन HD ३२ ऋषीदास कुमार यावत् वेहल्ल कुमार - दस अनगारों की सामान्य व्यवस्था ५७ ३३ सुधर्म गणधर से परमात्मा का गुणानुवाद ५९ ३४ उपसंहार ३५ टीकाकार महाराज का वक्तव्य ३६ ग्रंथ का उपसंहार ३७ प्रशस्तिका ६३ w w ॥६॥ HESAR
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥५॥
८
हिन्दी
अनुवाद
अनु-
क्रमणिका
नम्बर
विषय
पृष्टाङ्क
७ जाली कुमार का अनुत्तर स्वर्गवास
८ स्वर्गवास के पीछे मुनियों का क्रियाकर्म-गौतम
गणधर की प्रश्नावली-प्रभु का प्रत्युत्तर
९ जाली कुमार के लिये भावि पृच्छा-प्रभु का
प्रत्युत्तर
११
8 दूसरा अध्ययन यावत् दसवाँ अध्ययन ®
१० मयाली कुमार यावत् अभय कुमार - नव
कुमारों का संक्षिप्त आख्यान
१३
११ उपसंहार
१५
॥ द्वितीय वर्ग ॥
१२बीजक
8 पहिला अध्ययन ॐ
नम्बर
विषय
पृष्टाक
- दूसरा अध्ययन यावत् तेरहवाँ अध्ययन
१४ महासेन यावत् पुण्यसेन - यारह कुमारों का
संक्षेप वृतान्त
१८
१५ उपसंहार
१९
॥ तृतीय वर्ग ॥
२६ प्रागवक्तव्य
२०
पहिला अध्ययन
१७ धन्यकुमार-धन्यकुमार का गृहस्थाश्रम २२
१८ प्रभु पदार्पण-धन्यकुमार वैराग्य रंगरंगित-
भागवती दीक्षा का ग्रहण
२५
१९ तपश्चर्या के लिये उग्रप्रतिज्ञ धन्य अनगार
की प्रार्थना- भगवन्त का आदेश २७
२० धन्य अनगार का घोर तप
२९
ves
।
१५
१३ दीर्घसेन
१७
॥ ५ ॥
पर ॐ ~ अनुत्तरो- पपातिक दशा सूत्र श्री अनुत्तरोपपातिकदशा-हिन्दी अनुवाद * हिन्दी- अनुवाद अनु- क्रमणिका. ॥४॥ अनुक्रमणिका SS नम्बर विषय पृष्टाङ्क | नम्बर पृष्टाक विषय पहिला अध्ययन २ -- " १ मङ्गलाचरण २ प्रारम्भ ३ पीठिका:- पूज्य गुरुदेव से शिष्य रत्न की पृच्छा-गुरुवय्ये का प्रत्युत्तर ॥प्रथम वर्ग। ४ जाली कुमार ८ जाली कुमार ने 5 ॥४॥ प्रभु की धर्म देशना सुनी- वैराग्य उत्पन्न और दीक्षा ग्रहण ६ गुणरत्न तपश्चर्या का विधान L " -
७०
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
हिन्दी
अनुवाद
प्राकथन.
55
प्राक्कथन
मुमुक्षो !
अनासक्त योगकी त्यागरूप अनेक पुष्पलताएँ हैं, जिसमें तपश्चर्या संज्ञिका कुसुमलता की परिमल (सुगन्ध)
विशेष आनन्दप्रदा है-सब व्रतों में अस्वाद व्रत (रूखा-सूखा आहार करना) का पालन कठिन समस्या है, परन्तु
इससे भी अधिक क्लिष्टतर व्रत तपश्चर्या (आहार त्याग) है; कारण कि अनाहारिक पदं सर्वश्रेष्ठ पद है-यह
"अनुत्तरोपपातिक दशा सूत्र” नामक नवाँ अंग तपश्चर्या की महक से महक रहा है।
यह सूत्र तीन वर्ग के तेंतीस अध्ययनों से भूषित है, इसमें धन्य अनगार की कुछ विस्तृत जीवनी उपलब्ध
होती है। इन महापुरुष ने तो संसार की तपश्चर्या का रेकार्ड (पुराना इतिहास) तोड़ दिया है। इस तरह करीय
२ तेंतीस ही महापुरुष समान कोटि के हैं; ये पुरुषोत्तम मात्र श्लाघा करने योग्य ही नहीं हैं; किन्तु वन्दनयि
स्तवनीय और आदरणीय हैं, इनके जीवन भव्यात्माओं को समाचरणीय हैं।
मैं अपना बड़ा भारी सौभाग्य समझता हूँ कि इस उत्तमांग का राष्ट्रीय भाषा में (हिन्दी भाषा में) अनुवाद
करने का मुझे अलभ्य लाभ प्राप्त हुआ है। महानुभावो! इस आदर्श ग्रंथ का अद्योपान्त मननपूर्वक अध्ययन
करें; यह मेरा नम्र निवेदन है।
सैलाना-सी. आई.
शान्तिः
विनीत-
शरत्पूर्णिमा- १९९२
वीरपुत्र आनन्द सागर.
RE
॥३॥
।
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ २॥
Photos
हिन्दी
अनुवाद
निवेदन
निवेदन
बा
मुनिवर्य श्रीमान् मंगलसागर जी महाराज के उपदेश से रतलाम ( मालवा ) निवासी मुनिम साहब
श्री पन्नालाल जी दासोत की तर्फ से २०० प्रतियाँ भेटः ।
-
श्रीमती प्रवर्तिनीजी साहबा श्री प्रतापश्रीजी सौभाग्यश्रीजी महाराज के उपदेश से फलोदी ( मारवाड़)
निवासी लछमीलालजी जीवनचंदजी तथा चुन्निलालजी मिश्रीलालजी नाहटा की तर्फ से ६०० प्रतियाँ भेट.
SARALSORIES
इसकी प्रथमावृत्ति श्री हिंदी जैनागम प्रकाशक
सुमति कार्यालय-कोटा की ओर से छपी है.
विनीत,
शेरसिंह महेन्द्रसिंह कोठारी.
कोटा-राजपूताना.
॥ २ ॥
RRI
* ॐ श्रीपञ्चपरमष्ठिभ्यो नमः *
श्री अनुत्तरोपपातिकदशा सूत्र
(हिन्दी अनुवाद)
( अनुवादक)
पूज्यपाद प्रखरवक्ता विद्वद्वर्य मुनिवर्य वीरपुत्र श्री आनन्द सागरजी महाराज.
(प्रकाशक)
वीरपुत्र श्री आनन्दसागर ज्ञान भण्डार. कोटा-राजपूताना.
वीर सम्बत् २४६३
विक्रम सम्वत् १९९३
सन् १९३७.
द्वितीयावृत्ति ८०० ]
सर्व हक स्वाधीन
[ मूल्य-पठन-पाठन
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- शेठ दे० ला० श्रीमती आगमोदयसमितिः आनंद काव्य म० मौ० . ... निरयावली मूत्र.... १.37 आगमोदय समितिना ग्रंथो श्रीमज्जैनसिद्धान्तवाचनाप्रकाशनकारिका जै० ० पु० फंडना ग्रंथो. नंदीमत्र... २-४-० आनंद काव्य म० मौ. ४ ) ०-१२-० अनुयोगद्धार २-८-. स्थानांग उत्तराध ५९०-१०-० ४-०-० भगवतीमत्र तृतीयभाग.... ३-४- स्थापनाः-श्रीमल्लीतीर्थे वीर सं० २४४१ माघ शुक्लदशम्याम् ६,०-१२-० विचारसागर प्रकरण श्राद्ध प्रतिक्रमण सूत्र .. २-०-० ०-८-० ०-१२-० सेन प्रश्न (प्रश्नोत्तर रत्नाकर.).... १-०-० विशेषावश्यक गाथा आवश्यक टीप्पण .. १-१२-० ०-५-० विषयाकारादि क्रम जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सटीक उत्तराध... २-०-० गच्छाचार पयन्नो .. ०-६-० श्रीपालचरित्र संस्कृत.. ०-१४-० धर्मबिंदु प्रकरण ०-१२-० सूक्त मुक्तातली २-०-० विशेपावश्यक भाष्य मूल प्रवचन सारोद्धार सटीक पूर्वार्ध .. ३-०-० स्था टिकानुं गुजराती २-०-० तंदुल वैयालीय पयन्नो सटीक .'१-८-० भाषान्तर भा. १ लो. ( वाइन्दर भीकुजी बाबाजी. ) विशति स्थानक पधबद्ध १-०-० रायपसेणी १-८-० प्राप्तिस्थान:- कल्पसूत्र सुबोधिका.... २-०-० जैन फीलोसोफी १-०-० मास्तर विजयचद मोहनलाल. योग सुवोधा समाचारी ... -१४-० कर्म २० दे० ला० धर्मशाळा. गोपीपुरा-सुरत. श्रीपाल चरित्र प्राकृत सावचुणिक १-४-० प्रति ६००० स० १९८२ . ..