Adarsh Library, Jaipur

Patrani

Mitra Vimal · 2011/03

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पटरानी विमल मित्र

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'नदी पेयन यही पता है कि मैं गमुद्र यनूगी। पर
उगराह नहीं है.नि एर गया है, इगलिए
पर सपन उसको विनय पा ही मूबर है। यह गमः
पं माप मिनार मा समर बनती जा रही
है-पोर उमरा ममः यनना भी मंप नहीं
-रपीट माप

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इस कहानी को लिखने का मेरा कोई खाम उद्देश्य नहीं था। यद्यपि पहले मेरी ऐसी धारणा थी कि दुनिया में उद्देश्य ही सब कुछ है, पर अब नही । इसके अलावा, उद्देश्य और निरुद्देश्य दोनों की तुलना करने की कोशिश में मैंने न जाने कितनी ही गलतिया भी की हैं । अव उनका लेखा-जोखा करना चाहूं, तो भी नहीं कर सकता; हां, अगर कर सकता तो देखता कि उन गलतियो का अम्बार लगते-लगते पवंत बन गया है और उम पर्वत ने न सिर्फ हानि की पीडा को बल्कि लाभ की खुशी को भी अपने पीछे छिपा लिया है। सिर्फ इतना ही नहीं, संभवतः यह भी हो सकता है कि किसी दिन मुझे पता चलता कि हानि-लाभ के अको को उलझन मे उलझकर मेरा असली जीवन ही न जाने कब का खो गया है । अतः येहतर यही है कि उद्देश्य-निरुद्देश्य की बात यही खत्म कर दी जाए और कहानी को शुरू किया जाए। पर ठहरिए, कहानी शुरू करने से पहले एक गौरचन्द्रिका से परिचय प्राप्त कीजिए। महाकवि कालिदास ने 'रघुवंशम्' के शुरू में लिया है, 'क्व मूर्य प्रभवो वंशः क्व चाल्प विषया मति...। कहा तो ऐमा बृहद् मूर्यवश और कहां मेरी यह मन्द बुद्धि; मानो में अज्ञानतावश एक तिनके के सहारे अथाह समुद्र पार करना चाहता हूं!' उसी तरह बाज कांचन कामिनी के बारे मे लिखते हुए मेरी भी वही दगा हो रही है। वही कांचन कामिनी, जिसने कितने ही राजा-महाराजाओं एव कितने ही जमीदारों के दिलों पर राज किया है। कितने ही राज्यों के उत्थान व पतन का कारण बनी है। क्या मैं उसका विवरण सहित ठीक- टीक वर्णन कर सकूँगा? जिसके जीवन का कुछ अन्तिम अंश ही मुझे मालूम हो, जिसका पूर्व-परिचय मेरे लिए विलकुल अज्ञात हो, जिसे मैंने कभी देवा ही न हो, जिसकी परिणति, वियोगान्त या मिलनान्त कुछ भी मैं आज तक नहीं जान पाया, उसके बारे में कुछ कहना क्या सहज है ? इसके अलावा एक वात और है। मुझे याद है कि एक बार मेरा छोटा लड़का एक काबुलीवाले को रोते देखकर हंस पड़ा था। यह भी याद है कि बचपन में मैं भी एक चीनी का गाना सुनकर हंस दिया था। हमारी भाषा और व्यवहार प्रचलित चीनी-जगत् के साथ मेल नहीं खाती, शायद इसीलिए विजातीय दुःख-सुख हमारे रस-बोध को स्पर्श नहीं करता। अगर यह सच नहीं, तो फिर जो बात औरों को रुला देती है, वही हमें हंसाती क्यों है ? किसीको अभिभूत कर देती है और किसीको स्पर्ण तक नहीं करती, ऐसा क्यों ? वादल देख- कर सभीके मन-मयूर नाच उठते हों, ऐसी बात नहीं है। या सूर्य के उदय होते ही सवका जागना आवश्यक हो, ऐसा नियम भी नहीं है। गर्मियों के मौसम में और लोग जब पसीने से सराबोर हो घबराए-से रहते हैं, तब ऐसे ही मौसम की एक दोपहर को मैंने एक साहव को कोट-पैण्ट पहने हुए बड़े इत्मीनान से टहलते देखा है। मैं चाय कभी नहीं पीता, पर मेरी पत्नी चाय बिना एक दिन भी नहीं रह सकती । यद्यपि हम दोनों एक ही घर में एक साथ रहते हैं। परमहंस देव ने कहा भी है कि, "किसी एक की घड़ी किसी दूसरे की घड़ी से मेल नहीं खाती। पर इससे क्या समय कहीं अटक जाता है?" फिर भी मुझे शक होता है, क्योंकि मैं सोचता हूं, जो कुछ मुझे अच्छा लगता है, वह अगर औरों को ठीक न लगा, तो? जो सुर मेरे सितार में मजते हैं, वे सुर अगर किसीके मन में कोई अनुभूति न जगा सके, तो? या मैं ६ पटरानी जिसको लेकर इस कहानी को रचना करूंगा, बाप अगर उमे पहचान ही नहीं सके या उसके मुय-दुःख में आप लोगों के दिल में खुशी या दुख का कोई भाव जाग्रत् न हो, तब फिर? कितने ही दिनों के सोच-विचार के चाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि माज तक कभी किमान भी इस विषय पर नहीं लिखा है। जिस किमीने भी लिखा है, वम तुम्हारी-मेरी बात, या तुम्हारे-मेरे गुण-दोषो की आलोचना, या तुम्हारे-मेरे पड़ौसी-पडोसिनों के गुण-दोषों की ही चर्चा की है । या फिर किसी राजा, महाराजा, राजा- धिराज और रानी, पटरानी या महारानी आदि के बारे में, अथवा जनता, पाटक, कर्जदार, किसान, मजदूर, कुली आदि के बारे में ही सबने लिषा है । या फिर लड़को-दामाद, सास-समुर, घर-बाहर, देश-विदेश के वारे में भी लोगो ने लिखा है, पर किसीने भी ऐसी कहानी कभी नहीं लिखी। जय बंगला-साहित्य में ही आज तक ऐसी कहानी किसीने नहीं लिखी है, तो फिर में ही लिखू, ऐसा कौन-सा मैं महान् लेखक बन गया हूं. यही सोचकर बहुत बार लिखना चाहकर भी नहीं लिख सका। मैंने सोचा कि जिस देश के व्यक्ति के बारे में मैं लिखना चाहता हू, उसके बारे मे वहा के लोगों को ही लियने दो। मैं तो अपने देश के लोगो पर ही लिखूगा । क्या मैं कभी उनके देश गया है ? और फिर क्या किसी देश में सिर्फ जाने- आने-भर से ही वहा के लोगों पर कहानी लिसना सम्भव है ? किसी भी देश से पून या नाडी के रिश्ते विना क्या उस देश को समझ लेने का दावा किया जा सकता है ? पचासो बरस तक एकसाथ एक ही सेज पर सोकर भी तो बहुत से लोग अपनी स्त्री को पूर्णतया नहीं समझ पाते। सिर्फ समझना ही बडी बात नहीं है, बल्कि उसके साथ-साथ अपने को किसीसे परिचित कराना, या अपने परिचित से तुम्हारे परिचित को एकाकार कराना भी जुडा हुआ है । तुम्हें न पहचानने पर भी ऐसा लगेगा कि पहचान लिया है, तब तुम्हारे परिचित और हमारे परिचित में कोई भेद नहीं रहेगा । और इतना कर पाना क्या मुझसे सम्भव होगा? मैं अलकेश दा को जानता था और अलकेश दा के पिता को भी। पटरानी ७ - । बलकेश दा की मां को भी जानता था। लेकिन अलकेश दा की पत्नी को? हां, उसी कांचन कामिनी को ? वही जो मेमसाव कहलाती है। वह साड़ी पहनकर भी मेमसाव कहलाती है, मांग में सिन्दूर भरकर भी मेमसाब, और पैरों में महावर रचाकर भी मेमसाव । असली विलायती मेमसाव है। जिन मेमसाहिवाओं को हमने ग्रैंड होटल और चौरंगी पर उस दिन देखा था और जिनको देखते ही दूर खिसक गए थे, जिनके विजातीयत्व को हम उपेक्षा करते आए हैं। यह भी उसी जाति की मेमसाहव थी। क्या उसको मैं शब्दों के माध्यम से आपके सामने प्रस्तुत कर सकूँगा? हमारे स्कूल के मास्टर रोहिणी बाबू कहा करते थे, 'अच्छा, बताओ तो, बंगाल के किस जिले में रेलवे लाइन नहीं है ?' रोहिणी वाबू भूगोल के मास्टर थे। वे नक्शे की ओर इशारा करके पूछते, 'वताओ तो, कृष्ण नगर कहां है ?" मैं समूचा नक्शा छान मारता, पर नक्शे का कहीं ठौर-ठिकाना भी नहीं मिलता मुझे। लाल, नीले, पीले रंगों की तरंगों से मेरी नज़रें धुंधली और कमज़ोर-सी हो जाती और मैं परेशानी के अथाह सागर में डूबने-उतराने लगता। लेकिन जब वे यह पूछते, 'अच्छा बताओ, इंग्लैण्ड की राजधानी का नाम क्या है ? या लन्दन के किस हिस्से में विन्सेंट स्क्वायर है ? या वहां जाड़े को रातों में कितनी वरफ गिरती है ? अथवा वहां के लिस्टर स्क्वायर में कौन लोग रहते हैं ? लिस्टर स्क्वायर की चौतल्ला बिल्डिंग में कौन रहते हैं ? उनका नाम क्या है ? और वे कितने भाई-बहन हैं ? उनकी दीदी नोरा स्मिथ के साथ कलकते के निवासी अलकेश मित्र का क्या सम्पर्क है ?' तो इन प्रश्नों का मैं फटा-फट जवाब दे सकता था। विन्सेंट स्वायर की वस्ती में जो लड़के-लड़कियां रहते थे वे सब कैसे कपड़े-लत्ते पहनते थे, यह भी मुझे मालूम था। बड़े रास्ते के शो-केश में टंगे मोज़े, गाउन आदि की क्या कीमत है, यह भी मुझे कंठस्थ था। जवकि मैं विन्सेंट स्क्वायर कभी नहीं गया हूं। विन्सेंट स्क्वायर तो दूर, मैं तो बंगाल से ही बाहर कहीं नहीं गया हूं। हमारे दूर के रिश्ते में ताऊ के लड़के अलकेश दा ८ पटरानी को छोड़कर विलायत भी कभी कोई नहीं गया। फिर भी में वहां के दारे में सब-कुछ जानता था और यह मव मुझे मुंहजवानी याद या। पर उम्र बढ़ने के साथ-माय मय कुछ बदल जाना है। इन दिनों में मैं अलकेश दा की पत्नी की बात भी प्रायः भूल ही बैठा था। इस बीच कांग्रेस, पाकिस्तान और हडतालों से सम्बन्धित कितनी ही घटनाएं इस पृथ्वी पर घट चुकी । इन वडी-बड़ी घटनाओं के दवाव से दुनिया की छोटी- मोटी घटनाएं न जाने कहां दव-चिंधकर गायब हो गई, किसीके पास इमका कोई हिसाव नहीं है। मेरे पास भी नही । और लोगो की तरह मैं भी इस दुनिया के पंच तत्त्वों द्वारा यदल दिया गया । मैं भी बड़ा हुआ। मेरी भी गृहस्थी हुई। और उसके बाद एक दिन...। एक दिन में राजस्थान की भोर घूमने गया था। अजमेर से आबू रोड का एक रात का सफर है । रात को खा-पीकर ट्रेन में बैठो और रात भर वढे आराम से सोओ। सुबह आठ-नौ बजते न बजते आबू रोड स्टेशन पहुंच जाओगे। ऐमा लगेगा, जैसे हम मफर में आनेवाले मरुभूमि के पहाड यादि भवको पीछे छोडकर बिलकुल हरियाली के कुज में पहुच गए हैं। कहा जाळगा या यहा ठहरूंगा, कुछ भी तय नहीं या। इसीलिए आबू रोड स्टेशन पर उतरने से पहले मैंने इस बारे में तय कर लिया था। लेकिन जब ट्रेन से उतरा तो सब गड़बड़ हो गया। लगा, किसी राजा- महाराजा के बड़े-बड़े माल-अमवाव उसी गाडी मे उतारे जा रहे हैं। प्लेटफार्म के सारे वुली उनीमे व्यस्त थे। आखिर मैंने अपना मूटकम और बिछोने का बडल स्वयं ही धमीटकर प्लेटफॉर्म पर उतारा, और फिर बड़े धमहाय भाव से एक कुली की उम्मीद में इधर-उधर चारो ओर नजरें पटरानी - १ दौड़ाई। पर मेरी ओर किसीका ध्यान ही नहीं था। तब तक उधर सोने- चांदी से जड़ित एक पालकी आ चुकी थी। इसके अलावा, बहुत-सा लाव- लश्कर और सिपाही-प्यादे भी थे। सबके हाथ में मोटे-मोटे लट्ठ थे। लाल- नीले, रंग-बिरंगे धोती-घाघरे की अनोखी राजपूती पोशाकों से सज्जित स्त्री- पुरुपों से पूरा प्लेटफॉर्म भरा पड़ा था। पीछे के लगेज़-वैन से बड़े-बड़े सन्दूक उतारे जा रहे थे। और उनकी साइज ? तीवा! लोग ट्रेन में सफर करने के लिए हल्की चीजें साथ लेना पसन्द करते हैं। पर इनका ढंग अनोखा ही था। पीतल के चार पिंजरों में पक्षी, तीन में दिल्ली तथा दो में कुत्ते थे। मैंने एक टिकट-चेकर को पुकारा, 'सुनिए, चेकर जी ! ...' पर उस वक्त किसको मेरी बात सुनने की फुरसत थी ! स्टेशन- मास्टर स्वयं वहां खड़े होकर यह सारा नजारा देख रहे थे । उधर गार्ड लाल झंडी ऊंची किए खड़ा था। मुझे लगा कि यहां किसीसे सहायता चाहना एक बहुत बड़ी विडम्बना है। कलकत्ते में एक मित्र ने कहा था, 'आबू रोड पहुंचकर स्टेशन के बाहर वस की टिकट ले लेना । उसके बाद तुम होटल या धर्मशाला जहां जाना चाहोगे वे तुमको वहां पहुंचा देंगे। एक अच्छा-सा गाइड साथ ले लेना; वस, फिर कोई चिन्ता नहीं।' मैं सोच रहा था, कहीं ऐसा न हो कि आखिर में वस भी यथासमय छूट जाए, और मुझे दिन-भर यहीं रहना पड़े। अचानक हाथ में लट्ठ लिए एक पगड़ीधारी व्यक्ति मेरे सामने आ खड़ा हुमा और बहुत ही सम्मान सहित मुझे सलाम किया। फिर एक मुड़ा हुआ कागज़ मेरी ओर बढ़ाकर बोला, 'मुझे हुजूराइन ने भेजा है।' 'हुजूराइन ?' मैं एकदम हक्का-बक्का-सा हो गया। यह हुजू राइन भला कौन है ? किस बात की उसने चिट्टी भेजी है ? आखिर मैंने पूछ ही लिया, 'हुजूराइन कोन है, भाई ?' पत्र पढ़कर मेरी समस्या का समाधान हो गया। पत्र में लिखा था, 'देवर जी, तुम यहां भाए हो, यह मैं देख चुकी हूं १० पटरानी मैं भी अभी इमी गाड़ी से यहां पहुंची हूं। तुम्हें होटल में रहने की जरूरत नहीं है। मेरी गाड़ी आई है। इस आदमी के साथ चले याओ। उसके बाद मेरे हवामहल में रहने का इन्तजाम हो जाएगा। वहीं मुलाकात होगी। तुम्हारी मेम भाभी। उस व्यक्ति ने कहा, 'राजा साहब नहीं मा सके, हर।' मैने पूछा, 'अच्छा, पर राजा साहब हैं कहा ?' 'फतेहगढ में।' उसके बाद फिर बोला, 'चलिए हुजूर, हुजूराइन ची गाड़ी दाहर तैयार पड़ी है।' फिर न जाने कहां से दो व्यक्तियों को बुलाकर उनके सिर पर मेरा मामान उठवा दिया। मैंने प्लेटफॉर्म पर चारो ओर नजर दौडाई तो देवा कि इस बीच बड़े-बड़े वक्म-सन्दूक, कुत्ते-दिल्ली सब नदारद हो गए है। पालकी के चारो तरफ झालरें पड़ चुकी थी और उसे आठ मजदूर अपने कंधे पर रखकर चल पड़े थे। वाहर यस, मोटर और तांगे का बडा था। यहां की सारी भीड़ से बच-बचाकर उस व्यक्ति ने मुझे एक बहुत बड़ी मोटर मे बैटा दिया। सामान कहा रपा गया, यह सब मुझे देखने की जरूरत नहीं थी। मैंने देखा कि युछ दूर पर एयः और बटी गाड़ीसदी है। उसीके सामने बड़े-बडे पदों की ओट में सलमे-सितारो का ओटना ओटे एक नारी-मूर्ति पालको से उतरी। उसके पावों में सुनहरी चप्पलें थी। बारीक बोडनी पर धूप परने से हीरे पन्ने के गहने चमचमा रहे थे । एक के बाद एक करके चार गाटिया स्टार्ट हुई । आगे-पीछे अन्य दो गाड़िया, और बीच मे हुजूराइन की गाड़ी; फिर मेरी गाडी। में मोच भी नहीं सकता था कि इतने दिनों बाद, करीब एक साल के बाद, अचानक इस तरह मेम भाभी से मुलाकान हो जाएगी। वह दृश्य आज भी मेरी यासों के सामने स्पष्ट झिलमिला उठता है और इसके साथ ही मेम भाभी का वह चेहरा भी तैर जाता है। लम्बाई पटरानी ११ 1 साढ़े पांच फुट 1 दूध की तरह उजला बदन । गाल पर कहीं कोई फुसी या निल तक भी नहीं । मोटे फूले-फूले-से होंठ। आंखों को कमल सदृश पंखु- ड़ियां और हाथों की वे नरम-नाजुक अंगुलियां! और उन अंगुलियों के छोरों पर पॉलिश किए हुए लम्वे-लम्बे नाखून । मक्खन सरीखे हसीन चेहरे पर एक छोटा-सा सिर । सिर पर सुनहरे बालों का एक गुच्छा, जिनमें बंगाली लड़कियों जैसी मांग निकाली गई थी। मांग में छोटी-सी सिंदूर की रेखा। यह चेहरा और यह रूप, मेरे मन-प्राण में इस कदर घुल-मिल गया है कि इसे मैं कभी भूल सकूँगा, ऐसी वात मैं सोच भी नहीं सकता। कालिदास सौन्दर्य-वर्णन में इतने पटु थे, लेकिन 'रघुवंशम्' के पन्नों में जनकदुलारी के रूप का वर्णन करने में इतने कृपण क्यों बन गए, पता नहीं। हो सकता है, सीता के चरित्र में ही इतना सौन्दर्य भरा पड़ा था कि उनका शारीरिक सौन्दर्य वहां गौण हो जाता हो। अगर ऐसा न होता तो 'वराहरूपी भगवान विष्णु द्वारा प्रलय पयोधि से उद्भूत धरित्री देवी की तरह' या 'फिर वर्षा ऋतु के अन्त में मेघपुंज से सुक्त शरत् की ज्योत्स्ना- सी' वस, इतना ही कहकर क्यों अन्त कर दिया ? मानो अधिक न कहने से भी उनके सौन्दर्य का वर्णन हो गया हो। मानो अधिक कहना ही अनुपयुक्त हो जाता। जब अलकेश दा मेम भाभी से शादी करने के पश्चात् सर्वप्रथम घर लौटे थे, तव मेम भाभी को देखकर मुझे भी ऐसा ही लगा था। इससे पहले मैंने किसी भी मेमसाहब को हमारे घर की बहुओं जैसी पोशाक पहने नहीं देखा था। बल्कि वह भी उस समय तक ठीक तरह से साड़ी पहनना नहीं सीख पाई थी। उसे ठीक तरह से चूंघट भी निकालना नहीं जाता था। पर उस दिन तो एक और ही पोशाक में देखा था उसे । सचमुच बिलकुल अनोखी पोशाक थी उसकी। भाभी को मैंने कितनी बार कितनी पोशाकों में देखा है, इसका कोई हिसाव नहीं। और पोशाक बदलने के माथ-साथ मनुष्य में भी कितना मामूल परिवर्तन आ जाता है, इसका भी १२ पटरानी और तुम कोई हिसाव नही। तो अब असली घटना की चर्चा करूं। मुझे याद है, मेम भाभी कहा करती थी, 'लन्दन में मेरे पिताजी के पास दो-दो कारें हैं । पिताजी रोज सुवह मुझे कार में बैठाकर घुमाने ले जाते । मेरी एक बगल पिताजी वैठते और दूसरी वगल मां।' ?' मैम भाभी से विन्सेंट स्क्वायर की और भी बहुत-मी कहानियां मैंने मुनी थी, जैसे जिस दिन बहुत बरफ गिरती, उस दिन घर से बाहर निकलना नहीं होता था। उस दिन तो बस घर में बैठकर कॉफी पीना और मा से कहानिया सुनना ही होता। मा का शरीर स्थूल या । अतः सारे भाई-बहन मिलकर भी मां को चारो ओर से घेरकर पकड़ नहीं सकते थे। मैम भाभी के घर पर कितने ही लड़के आते थे। बहुत दूर-दूर से याते वे सद। सभी कहते कि अगर मेम भाभी से उनकी शादी नहीं हुई, तो धे भात्म-हत्या कर लेंगे। भादि-आदि। मैं पूछता, तो फिर भैया से तुम्हारी मुलाकात किस तरह हुई, भाभी?' तब मैं बहुत छोटा था। अलकेश भैया की बहू को देखकर मेरी छोटी मौसी की आखें विस्मय से फैल गई थी। ये वोली थी, 'छोटी दीदी, गात उसके ऐसे गोरे हैं कि क्या बताऊ; बिलकुल जैसे मापेल । देखते ही मन करता है, टीप दें।' बड़ी ताई कहती, 'वहू देख आए भई; आहा ! ...' मां ने तब तक मेम भाभी को नहीं देखा था। अत. पूछ बैठी, देखने में कैसी है, बड़ी दीदी? माग में सिंदूर लगाती है ?' रगा चाची ने कहा, 'उइ दया! उसके हाथ में शस की चूड़िया भी थी। जैसा बदन का रम है, वैसे ही गहने पहनती है । कच्चे केले के रग की बनारसी साडी में वह ऐसी फब रही थी कि वस, पूछो मत । और सुनो, सबका चरण-स्पर्श करके प्रणाम भी किया !'

बड़ी ताई ने कहा, 'ठीक ऐसी लग रही थी मानो अन्नपूर्णा की तस्वीर हो। मोह क्या रूप था! ठीक वैसी ही, जिसे कांचन कामिनी कहते हैं।' मा ने कहा, 'हे भी तो सचमुच में मेमसाहव ही न! फिर गोरी नहीं नो क्या काली होगी?' रंगा चाची ने कहा, 'पर मेमसाहब होने से ही क्या कोई इतना गोरा होता है ? मेरे घर के बगल वाले मकान में रहने वाले एक व्यक्ति का छोटा लड़का विलायत से मेम ब्याह लाया है । वाह, जैसा रंग है, वैसी ही शरीर की गदन है। एक पैर पर दूसरा पैर रखकर चाय पीती है। अन्त में सास की हालत इतनी खराव हुई, पर बहू के हाथों से सेवा करवाना तकदीर में नहीं लिखा था। एक साल पूरा होते न होते वेचारी चल बसी।' रंगा चाची के पिता के घर के बगलवाले मकान के छोटे लड़के की बहू के बारे में न जाने मुझे क्यों उत्सुकता पैदा हो गई ! मैं भी मां के पास ही बैठा सारी बातें ध्यान से सुन रहा था। मैंने पूछा, "फिर क्या हुमा, रंगा चाची?' मेरी ओर अब तक किसीका ध्यान नहीं था। अव मेरी ओर देखकर रंगा चाची ने कहा, 'हाय अम्मां, तू शायद सब बातें सुन रहा था। शैतान कहीं का, नारी बातों में कान देता है !' अब तो मेरी उत्सुकता और भी बढ़ गई। मैंने कहा, 'वताओ न रंगा पाची, उसके बाद क्या हुमा ?' पर तब तक रंगा चाची यह प्रसंग भूल चुकी थी। वोली, "किसका पया हुआ, रे?' मैंने कहा, 'तुम्हारे पिता के घर के बगलवाली उस मेम बहू का?' बड़ी ताई ने कहा, 'तो तू वही बात मन ही मन सोच रहा है अब तक ? देख रही हो न अपने लड़के की बुद्धि ! यह बड़ा होकर सचमुच ही भग बाहकर लाएगा। देख लेना तुम ?' मां ने कहा, 'ढुंह, मेम लाएगा! अगर मेम-वेम लाया तो भोटा पकड़ बाहर न निकाल दूंगी? मैं अपने चौके में भला मुरगी-गाय का गोश्त १४ पटरानी , !

लाने दूंगी?' 'अगर लड़के को वही पसन्द हो, तो तुम क्या करोगी?' मां ने कहा, 'ऐमे लड़के को चीरकर नहीं रम दूगी ? मान जन्म तक चांश होना मजूर है, पर विलायती बहू की जी-हुजूरी करना मेरे वग का रोग नहीं । देवी दुर्गे, रक्षा करना मा!' रंगा चाची कहने लगी, और फिर विलायती बहू का वह सिंगार-पटार, वाप रे बाप ! अपनी उस पडोसिन विलायती बहू के बारे में मैं क्या बताऊँ ? अब तो वे मव अलग हो गए हैं । विलायती बहू प्यार में डूबकर, उसकी वाहिगें पूरी करते-करते उस लड़के ने मकान भी गिरवी रख दिया। मैं पिछले दिनों अपनी मां के यहां गई थी तो मुना कि मेम साह्विा मार के मुंह पर लात मारकर विलायत चली गई है।' मा ने कहा, 'देख लेना, अलकेश की बहू भी एक दिन विलायत चली जाएगी। मेरी याज की कही बात याद रखना। काला सांप भी भला कही दूध-केले खिलाकर पाला जाता है ?' बड़ी ताई ने कहा, 'अच्छा तो अब चलूँ । सादी-ब्लाउज धोकर सुखा दूं। उमने चरण स्पर्श करके प्रणाम जो किया है ! वहुत घृणा हो रही है । चाहे जो भी हो, है तो वह आखिर मलेच्छ ही न !' लेकिन अलकेश भयाकी तकदीर अच्छी थी। मझले ताऊजी तब जिंदा थे। किसी ज़माने मे वे बहुत शौकीन व्यवित थे। नुकीली मूंछ रखते थे। यह भी सुना है कि जब वह जवान थे, तब तबला बहुत अच्छा बना लेते थे। फिर वडे बाजार की भोर चपनी बैठक जमाते-जमाते न जाने की रूई के कारोबार की ओर नजर पड़ गई। बम, मई के व्यापार में योड़े-से रुपये लगाकर प्रथम महायुद्ध के समय उन्होंने यहुन रुपये कमा लिए । फिर तो अपना मकान बनवा लिया, कार खरीद ली। चूंकि रूई ने उनको उन्नति की ओर अग्रसर किया था, इसलिए उन्हे अधिक सम्मान नहीं मिला। ई के व्यापार की बात मुनकर लोग-बाग नाक-भौं सिकोड़ने लगते । कोई अगर पूछे, 'माप क्या काम करते हैं ?" तो । पटरानी १५ - यही न बताना पड़ेगा कि रूई का व्यापार ! वे बेटे से कहा करते, 'सारी ज़िन्दगी रूई का कारोबार करना पड़ेगा, ऐसा कोई आवश्यक तो नहीं है।' लोग-बाग कहते, 'देखो, रूई इतनी तुच्छ वस्तु है। लेकिन उसीमें इनके पास इतना अधिक पैसा हो गया !' स्कूल में पीठ पीछे से अलकेश को दिखाकर लड़के आपस में कहते, 'वह देखो, वह रहा रूईवाले का लड़का !' ऊपर से मंझले चाचा, पिताजी और चाचाजी आदि से वे कहा करते, 'तुम लोग सिर्फ नौकरी ही करते रह गए, पर व्यापार का मर्म नहीं समझ सके। अरे, चाहे रूई हो या और कोई चीज़, पैसा होने से ही प्रेस्टिज बढ़ती है। मंझले ताऊजी कहते, 'तुम्हारी इन बातों में आकर मैं अपने लड़के को इस रूई के कारोबार में नहीं घुसने दूंगा।' मंझली ताई के बस एक ही लड़का था-अलकेश । उन्होंने अपने पति को वेटे का नाम रखने की आजादी नहीं दी। उन्होंने कहा था, 'अगर तुम नाम रखोगे तो लोग नाम सुनकर ही समझ जाएंगे कि यह रूईवाले का बेटा है।' अपने पिता के घर जाकर मंझली ताई ने किसी साहित्यिक या कवि को पत्र देकर बुलाया था, तब जाकर लड़के का नामकरण किया गया था। वही लड़का बड़ा हुआ। हां, वही अलकेश! एक दिन आई० ए०, वी० ए० पास भी हो गया। फिर मंझली ताई ने उसे बैरिस्टरी पढ़ने के लिए विला- यत भेज दिया। अगर सच कहा जाए तो यह सब जो कुछ हुआ, मंझली ताई के कहने-सुनने से ही हुआ। एक साल निकल गया, भी निकल गया; लेकिन लड़का नहीं लौटा। रास्ते में किसीसे मुलाकात होने पर वह पूछ लेता, 'मित्तर साहब, अलकेश कब लौट रहा है ?' फिर दूसरा १६ पटरानी मंझले ताऊजी जवाब देते, 'यही, इमी जनवरी महीने में ।' फिर भी एक के बाद एक कई जनवरी महीने निकल गए। तब ताऊजी यों कहने लगे, 'जितने दिन वहां रहेगा उतना अच्छा ही तो है । कुछ सीखेगा। समझेगा। आदमी बन जाएगा। यहा आते ही तो घर-गृहस्थी का चक्कर लग जाएगा। मैं स्वयं भी तो शादी करके अनुभव कर चुका हूं। शादी हुई और बाल-बच्चे हुए; उसके बाद तो बहुत-से झमेले है ही।' फिर न जाने रूई के कारोबार में कुछ ऐसी बात हुई या उनके शरीर ने इतनी मेहनत करने मे इकार कर दिया कि अचानक उन्होंने रूई की दूकान उठा दी । गाडी भी वेच दी। दिन-भर तो घर के भीतर रहते और शाम को लाठी टेकते हुए घूमने निकल जाते । रात दस बजते न बजते पर की सारी वत्तियां वन्द हो जाती । स्वास्थ्य भी दिन पर दिन सराव होता गया। मूछों के सूई जैसे दोनो नुकीले छोर झूल पाए। रात को कभी नीद गुल जाती तो आहे भरते । अगर बाहर निकलना बहुत ही आवश्यक हो जाता तो हाफने हुए-से पोस्ट ऑफिस की तरफ चले जाते, और लड़के के नाम लन्दन मनीआर्डर लगा पाते। सतीविलास बाबू नाक पर चश्मा चढ़ाकर प्रश्न करते, 'लड़का कव लौट रहा है, मित्तर साहब ?' मंझले ताऊजी कहते, 'यही अगस्त के अन्त तक।' और आखिर लड़का लौट भी आया, पर अगस्त के अन्त में नहीं। जनवरी में भी नहीं । एकदम से तीन साल बाद, और वह भी बहू लेकर। बिलकुल मेम पत्नी! पर तब तक मझले ताउजी गुजर चुके थे। हा, ताई अवश्य जीवित थी, पर मर जाना ही उनके हक में शायद बेहतर होता। मुहल्ले की लड़कियां कहती, 'लो, अव बहू आकर तुम्हारी सेवा करेगी।' मंझली ताई कहती, 'अब क्या हमारा जमाना रहा है, वेटा! अब " पटरानी १७ - ही देखो कि बहू मेरी सेवा करती है, या बहू की सेवा कोई करता है।' वात बड़े ही मान के साथ कही गई थी, पर मेम बहू को देखते ही के जितने से प्राण बचे थे, वे भी डूब गए। अलकेश भैया समझदार व्यक्ति थे। हावड़ा स्टेशन से वाहर निकल होंने एक बनारसी साड़ी, शंख की चूड़ियां, सिंदूर आदि सव खरीद ए। विलकुल बंगाली परम्परा के अनुसार पत्नी को सजा-संवारकर घर चे। वहू-बेटियों का दल एकदम से अकचका गया। इस घर, उस घर, स मुहल्ले, उस मुहल्ले, सब जगह यह खवर फैल गई। सब मुंह वाए म बहू की ओर देख रहे थे। बंगला वोली ही नहीं समझती तो बात कोई कैसे करे? मेम भाभी ने बिलकुल हतप्रभ होकर जव सास के पांव छूकर प्रणाम किया, तो देखती है कि सभी की हंसी रोके नहीं रुक रही है। मंझली ताई आंसू बहातीं और कहतीं, 'मेरी सेवा क्या करेगी, वह तो मेरी बात ही नहीं समझती। पानी का लोटा मांगू तो चाय का कप ला देती है। मेरी अच्छी मौत है।' मंझली ताई का तो मरण था, पर पड़ोसियों को चर्चा की अच्छी खुराक मिल गई थी। कोई कहता, 'उनकी मेम वहू की नई खवर क्या है, भई ?' कोई कहता, 'सुना है, मेमसा हिवा बंगला सीख रही हैं ?' एक कहता, 'रंगा दीदी से सुना है कि मेमसाहिवा छिप-छिपकर सिगरेट पीती हैं ?' तो दूसरा कहता, 'मैंने सुना है कि अलकेश भैया बाजार से गुप-चुप टिन के डिब्बे में गाय का गोश्त लाकर खिलाता है।' कोई कहता, 'तो करे भी क्या, भई ? अगर किसीको सिगरेट पीने की आदत हो, तो क्या नहीं पीएगी? यही, जैसे हमें चाय पीने का नगा है।' एक दिन मेरे बड़े भाई अलकेश भैया के घर गए थे। वापस आए तं १८ पटरानी बोले, 'यह देस, चॉकलेट!' मैंने पूछा, 'किमने दी ?' भैया ने कहा, 'मेम भाभी ने। मेम भाभी ने ? मेरी भी बहुत इच्छा हुई मेम भाभी को देगने की। सबके मुंह से मेम भाभी के बारे में सुन-गुनकर अपनी नजरों में स्वयही मैंने उनका पाका सीच रमा था। मुझे ऐमा लगता, मरसन-मा मुलायम शरीर, दूध-मा उजला रंग, बनारमी माड़ी पहने हुए, माये पर सिंदूर की विन्दी! और ताई का दिया हुआ नाम, काचन कामिनी ! यानी गोने के ग की देहवाली! पर मुझे बहुत शर्म नातो मेम भाभी के पास जाने में। जिस दिन मंझली ताई मरी थी, उस दिन सिर्फ दूर से देखा था मैंने मेम भाभो को। अलकेश भैया ने तो रो-रोकर समुन्दर भर दिया। देमा, मेम भाभी भी स्तब्ध, काठ के पुतले-मी एक कोने में सही है। ऐमी घटना समने याज तक तो कभी देयो नही थी न ! एक महीने तक शोक मनाया गया। पलकेगा भैया का कोर्ट जाना भी बन्द हो गया। पर लोगों का ध्यान उस ओर नहीं था। सबको मेम भाभी के प्रति उत्सुकता थी। मय कहते, 'शायद मेमसाहिबा भी अलकेश के सारा शोक मना रही हैं ! बड़ी ताई पहतो, 'हां भई, दिपता तो यही है। स्वय बनाकर मिट्टी के सकोरे में मदर की दाल, भात और ज्वला हुवा कच्चा केला गाती है । नौकर-चाकर को भी नहीं छूने देती।' चहृत लोग इस बात का विश्वास नहीं करते । बहते, 'यह मद लोर- दिपावा है। सच बात तो यह है कि कमरे में भीतर मे माकल लगाकर टिन में से माम निकालकर पाती है।' रंगा चाची कहती, 'अगर यह सच नहीं, तो शाम को मोटर मे बैठकर कहा जाती है, जरा में भी तो गर्ने ? अवश्य ही होटल में माम निगलवर पटरानी १६ - आती है। पिताजी कहते, 'कहा नहीं जा सकता, कोई-कोई मेमसाहब भली भी होती है । हमारे ऑफिस के डिकिन्सन साहव की पत्नी काली-पूजा का प्रसाद खाया करती थी।' मां कहती, तब तो लड़की के रूप में यह मेम प्रह्लाद का ही अवतार है, दैत्य-कुल में प्रह्लाद ने ही लड़की के रूप में जन्म लिया है।' । । अलकेश भैया तब कोर्ट गए हुए थे। मेरे स्कूल की छुट्टी थी। मां को भी किताब पढ़ते-पढ़ते नींद आ गई थी। खिड़की की राह बाहर निकलकर मैं सीधा मेम भाभी के घर जा पहुंचा। सदर दरवाजा खुला ही था। सीढ़ियों से होकर मैं सीधा ऊपर पहुंच गया। कहीं कोई नहीं था। अलकेश भैया के कमरे का दरवाजा उढ़काया हुआ था। मुझे न जाने कैसा डर-सा लगने लगा। धीरे-धीरे दरवाजे में फांक करके भीतर झांकने ही जा रहा था कि अचानक पीछे से न जाने किसने पकड़ लिया। बोली, 'व्हाट ? नाऊ?' पीछे मुड़कर चेहरा देखते ही मेरा समूचा बदन ठण्डा पड़ गया। मेम भाभी सामने खड़ी थी। वही फिर मुझसे बोली, 'कम इन !' मैंने कहा, 'मैं अंग्रेजी नहीं जानता।' लेकिन मेम भाभी मेरा हाथ पकड़कर सीधे कमरे में ले गई । स्वयं एक चेयर पर बैठ गई, और मुझे भी अपने सामने एक चेयर पर बैठा लिया। मेम भाभी ने कहा, 'अच्छा, तो मैं बंगला वोलू, सुनोगे ?' मैंने कहा, 'शायद अलकेश भैया ने तुम्हें बंगला सिखा दी है ?' मेम भाभी ने कहा, 'तुम्हारा नाम क्या है ?' २० पटरानी ! मेरा नाम सुनकर मामी ने कहा, 'वैरी गुह, बहुत अच्छा ! फिर बोली, 'तुम भी मित्र, मैं भी मित्र । मेरा नाम है श्रीमती नोरा मित्र ।' इतना कहकर वह उठी और एक इजी चेयर से पीट टिकाकर बैठ गर्द। फिर मुझन बोली, 'भई, तुम्हारी चेयर मेरी चेयर के नजदीक खिमका लो। मैंने कहा, 'मुझे चॉकलेट नहीं दोगी, मेम भाभी? मेरे मंझले भाई को तो दी थी? मेम भाभी ने कहा, 'चॉकलेट तो सारी खत्म हो गई, भाई । न्यू मार्केट में और चॉकलेट गरीदकर लाऊंगी। तुम कन फिर बाना।' उसके बाद मेम भानी ने कहा, 'मैं तो तुम्हें चॉकलेट दूंगी, और तुम मुझे क्या दोगे, जरा में भी तो मुनू ?' में मेम भाभी से बहुन हो मटकर बैठा था। मेम भाभी की देह से एक विचित्र-मी महक निकल रही थी। बाहा, कितनी मोटी महक थी वह चॉकलेट में भी पयादा मीटी । हायों की चमड़ी स्तिनो मुलायम थी! उम ममय उमने एक फाक पहन रखी थी, जो घुटनो तक झूल रही थी । फाक तो मझली दीदी भी पहनती है, पर वह तो देखने में इतनी अच्छी नहीं लगती। मेम भाभी ने कहा, 'इम तरह क्या देख रहा है, रे?' शमं से मैं धरती में गड़ गया; मैंने नजर झुका ली। मेम भाभी ने फिर पूछा, 'दोल न, क्या देख रहा या?' मैंने कहा, 'सभी मेमसाविाए शायद तुम्हारी तरह ही मुन्दर होती हैं, भामी!' मेरो वान मुनकर मेम भाभी खूब हसने लगी। फिर बोली, 'तुमने कितनी मेमो को देखा है, रे?' मैंने कहा, 'एक को भी नहीं; सिर्फ तुम्हें ही देखा है। क्या सभी मेम इमी तरह मार पहनती हैं ?' मैम भाभी और ज्यादा हमने लगी। बोली, 'फाक पहनकर शायद मैं पटरानी मुन्दर दीखती हैं?' मैंने कहा, 'तुम मां की तरह साड़ी मत पहना करो, मेम भाभी.! हरदम फ्राक ही पहना करो।' मेम भाभी ने जवाब दिया, 'वाह रे, पहनूं कैसे नहीं; अलक जो मुझे साड़ी पहनने को कहता है । वह कहता है कि इस देश में लड़कियां बड़ी होकर फ्राक नहीं पहनतीं। मैंने कहा, 'लेकिन साड़ी पहनकर तुम मां की तरह भद्दी जो लगोगी।' मेम भाभी ने कहा, 'शायद तुम्हारी मां देखने में भद्दी लगती है ?' मैंने कहा, 'मां तुम जैसी गोरी जो नहीं है। वह बस मामूली-सी गोरी है।' मेम भाभी ने कहा, 'मां के बारे में कहीं ऐसी बात कही जाती है, पगले ? छी: !' फिर बोली, 'यह देख, क्या मेरी मां की फोटो देखेगा?' कहकर उठी और टेबिल से दो फोटो निकाल लाई । वोली, 'यह देख, यह मेरे मां-पिताजी की फोटो है । जब मैंने अलक से शादी की थी, तो मेरे पिताजी नाराज हो गए थे; क्योंकि हमारी फैमिली में किसीने भी इण्डियन से शादी नहीं की थी। पर मेरी मां ने मेरा चुम्बन लेकर मुझे बहुत प्यार किया था। इण्डिया आने के समय में बहुत रोई थी, भई । क्योंकि मां मुझे बहुत चाहती थी न।' मैंने पूछा, 'मां के लिए तुम्हारा जी कैसा कैसा नहीं होता, मेम भाभी?' - मेम भाभी ने कहा, 'करे भी तो ज़ोर क्या? अलक ने कहा, उसके मां- बाप उसे इण्डिया लौट आने के लिए बार-बार पत्र लिख रहे हैं। अलक यहां आखिर कितने दिन रहता? और वहां रहने के लिए उसे भला रुपये भी कौन भेजता?' मैंने कहा, 'अलकेश भैया तुम्हें शायद बहुत चाहते थे ?' मेम भाभी ने जवाब दिया, 'बहुत । मैं भी अलक को बहुत चाहती थी। अलक शैतान जो था।' २२ पटरानी मैंने पूछा, 'मैम मामी, गंतान लइके क्या अच्छे होते हैं ? पर मैं जय शैतानी करता हूं, तो मा मुझे बहुन डांटती है ?' मेम मामी ने कहा, 'जैतान लड़के मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।' मैंने कहा, 'मैं इतनी तानी करता हूं, इसीलिए तो मा मुझे शैतान कहकर पुकारती है । तव तो मुझे भी तुम प्यार करोगी?' मेम भाभी ने कहा, 'हां, देव, मैं तुम्हें इस प्रकार स्नेह किया करूंगी। यह देस!" कहकर मेम भाभी ने मुझे पास खीच लिया और मेरे गाल पर एक दीर्घ चुम्बन कर दिया। माहा, क्या ही आश्चर्यजनक लगा या मुझे ! मेम भाभी के होठ बहुत कोमल थे। लाल-लाल होंठ। बगल के शीशे में देखा कि मेरे गाल पर मेम भाभी के होठो पर लगे रंग का निशान पड़ गया था। मुझे याद है, मुबह कोर्ट जाने से पहले अलकेश भैया रोज मैम भाभी का चुम्बन लेते थे। मैं सामने रहता तव भी शर्म नहीं आती थी उन्हें । अलकेश भैया कहते, 'अरे, वह तो बच्चा है अभी वह कुछ नही समझता।' मंझली ताई के मरने पर उसी अलकेश भैया ने शोक मनाया। गजे में कोरा कपड़ा, माली पाव, हाथ में भासन । विलायत-रिटन होने के बावजूद इस अनुष्ठान में उन्होंने कोई त्रुटि नहीं आने दी। बड़े ताऊजी, रगा चाची, पिताजी सभी दग रह गए। यहा तक कि पर के पुरोहित ने भी 'मैम ब्याह लाए तो क्या हुआ, लालाजी के मन में देवी-देवताओ के प्रति आस्था और भले-बुरे का ज्ञान है, भैया! पाच सौ रुपये तो सिर्फ ब्राह्मण-दक्षिणा में पर्च किए है।' सब जगह अलकेश मंया के गुण-गान की पर्चा फैल गई। फिर भी किमी-किमोने कहा, 'चाहे जो भी हो पंडितजी, पाप पर जाकर कपड़े बदल डालिए। म्लेच्छ को छुआ है न ! तीन जन्म धारण करेंगे तब भी शुरू नहीं होगे।' कहा, पटरानी १३ - भी पंडितजी ने कहा, 'हां, कपड़े तो अवश्य बदलूंगा। घर जाते ही ये कपड़े धो डालूंगा।' पंडितजी ने यह कहा, 'मैंने भी क्या सहज ही में हाथ फैलाकर दक्षिणा ली है, भैया? पहले गाय का गोवर खिलाकर मेमसाहिबा को जात में मिलाया, तब जाकर पैर छूने दिया है।' मैंने एक दिन भाभी से पूछा भी, 'क्या तुमने गोबर खाया था, मेम भाभी?' मेम भाभी ने पूछा, 'क्यों रे ? किसने कहा तुमसे ?' मैंने कहा, 'रंगा चाची ने।' मेम भाभी ने हंसकर कहा, 'खा लिया तो क्या हुआ ? अगर गोबर खाने से ही कोई मुझे छूने दे, तो गोवर भी खा लूंगी। मुझे कोई भी छूना जो नहीं चाहता, क्योंकि मैं मेमसाव हूं न ।' फिर कुछ रुककर बोली, 'हां रे, यहां से जाने के बाद तू अपने पैण्ट- कमीज़ तो धो लेता है न ?' मैंने पूछा, 'क्यों? पैण्ट-कमीज़ क्यों धोऊं?' 'विना धोए तेरी मां तुझे घर में घुसने देती है ?' मैंने कहा, 'मां को तो मालूम ही नहीं है कि मैं तुम्हारे घर आता हूं। मैं पार्क जाने का नाम लेकर तुम्हारे यहां चला आता हूं।' मेम भाभी ने पूछा, 'अगर तेरी मां को पता चल गया, तो ?' 'मां को कैसे पता चलेगा?' मांग में सिन्दूर भरते हुए मेम भाभी बोली, 'मैं तुम्हें इतनी अच्छी क्यों लगती हूं रे? मैं चॉकलेट देती हूं, इसलिए?' मैंने कहा, 'चॉकलेट तो तुम सभीको देती हो, लेकिन क्या सभीको तुम इतनी अच्छी लगती हो ?' भेम भाभी ने पूछा, 'तव फिर क्या बात है ?' मैं चुप रहा । मुझे सच्ची बात बताने में शर्म महसूस हुई। मेम भाभी ने कहा, 'जब मैं अलक के साथ इण्डिया में आई थी, तो - २४ पटरानी पहले-पहल मुझे कैसा डर लगा था, जानते हो?' मैंने पूछा, 'कमा डर लगा या ?' मेम भाभी ने बताया, 'यह देश मैंने पहले कभी देगा तो था नहीं इमलिए विन्सेंट स्वायर में सबने मुझे डराना शुरू किया कि इण्डियन लोग बहुत गन्दे होते हैं । चार-पाच शादिया करते हैं। राम्तो मे ही गैर- चीने आदि घूमते रहते हैं। और बहू को गर नौकर-चाकर की तरह गटाते हैं।' फिर बोली, 'अलक ने मुझे सब कुछ समझा-बुझा दिया था, पर मेरा डर कम नहीं हुआ। फिर जहाज में एक बगाली बहू से मेरी मुलाकात हुई । उसने मुझे सिखाया कि किस तरह प्रणाम करना चाहिए। विम तरह मास का कहना मानना पड़ता है। सब कुछ सिखाकर यह बोली, बहा किसी के सामने सिगरेट नहीं पीना। लोग पुराई करेंगे। "फिर उमी बहू ने बताया, सास की चरण धूलि लेकर माये में हाथ छुआना । सास-ससुर के मामने पति से बात मत करना, और रात को जय मर खा-पी चुके, तव कमरे में सोने जाना।' मैम भाभी ने अपनी पतली-लम्बी अंगुलियों की चोर देखते हुए कहा, 'उमोसे तो मैंने हाय से याना सोया। उमीसे दाल-भात और मछली राधना सीखा। बहुत ही अच्छी लड़की थी भई, सब कुछ सिया दिया मुझे।' फिर माथे पर मिदूर को एक विन्दी लगाकर बोली, 'पर यहा माकर तो मैंने देखा कि सब कुछ उससे उल्टा निकला।' 'उल्टा कैसे?' 'और नही तो क्या? पर छूकर प्रणाम करने जामो, तो सभी पाय पोछे यीच लेते है । छू देती हूं, तो सब अपने कपड़े धोते हैं । मेरे हाय का बनाया गाना कोई नहीं पाता। घर में मेरे लिए रमोइया नहीं रहना चाहता। कोई भी हिन्दू नौकर मेरे घर में काम करने को तैयार नहीं।' मेम भाभी ने फिर पहा, 'इमीलिए जिम दिन रमोइया भाग जाता है, पटरानी २५

उस दिन हम लोग होटल जाकर खाना खा आते हैं।'
मैंने पूछा, 'अच्छा मेम भाभी, तुम तो गाय का मांस खाती हो न?'
प्रश्न सुनकर मानो मेम भाभी हतवाक्-सी हो गई । बोली, 'शायद
किसोने यह पूछने को कहा है तुम्हें ?'
मैंने कहा, 'तुम खाती हो कि नहीं, यह वताओ न ?'
'किसने पूछा है, वताओ तो? तुम्हारी मां ने ?'
मैंने कहा, 'गाय तो भगवती का रूप होती है। गाय खाना क्या अच्छी
बात है ? तुम्ही वताओ।'
मेम भाभी की आंखें छलछला आई।
मैंने कहा, 'मेम भाभी, अब कभी गाय मत खाना। भैया कहते हैं कि
जो गाय खाते हैं, उन्हें बहुत पाप लगता है।'
मेम भाभी ने कहा, 'अच्छा, मुझे पाप ही लगने दो। इससे अगर
तकलीफ होगी तो मुझे, तुम्हें क्या ?'
पता नहीं, मुझे उस समय क्या सूझी, मैंने कह दिया, 'अगर तुम्हें
तकलीफ हुई, तो मुझे भी तो होगी न !'
सहसा ही मेम भाभी ने मुझे बाहों में भींचते हुए मेरे दोनों गालों का
चुम्बन ले लिया और बोली, 'अय-हय, शैतान लड़के ! अच्छा, अब मैं
गाय नहीं खाऊंगी, बस न?'
फिर बोली, 'पर अव तो मैं गोवर खा चुकी हूं, क्या उससे भी
नहीं हुई ?'
!
इसके बाद तो, पता नहीं क्यों, नशा जैसे और भी तेज़ हो उठा। मेम
भाभी को जव तक रोज एक बार देख नहीं लेता, तब तक मुझे नींद ही
नहीं आती थी। सुबह जब अांखें खोलता, तो सबसे पहले मेम भाभी की
याद आती और पढ़ने वैठता तो सिर्फ मेम भाभी की ही तस्वीर आंखों के
२६ पटरानी

मामने नाचती रहती। स्वप्न में भी मेम मामी ही दिखाई देनी हतो। मेम भाभी बार मुझसे प्यार में बात नहीं करती, तो मुझे रोना आ जाता। में धाना गेल- कूद मब भूल गया । अपने यार-दोस्तों को भी भूल गया। इसके पहले मेलने के लिए मैंने कितने ही लइका थे. पर जा-जाकर उनकी युगामद की है। उनके मां-बाप में कितनी फटकारें मुनी हैं। वे लोग कहले, 'जा, जा, अपने घर जा ! दोपहर को भी गैल ही मूक्षता है ! तुम्हे लिगमा गदना बुध नहीं है क्या रे ? तेरी मां क्या तुम्हें कुछ नहीं रहती?' मैं दरकर वहां से भाग आता। फिर दूमरे लड़के के पर जाकर बने चुलाता । पर वहां भी वही डाट-फटकार सुनकर अपने घर लौट माना। उसके बाद दोपहर के समय अल-अवेले ही छत पर जाकर मिट्टी नाता, ने भिगोकर किमी देवता की मूर्ति बनाता और फिर मन ही मन अपने से ही उनकी पूजा करता। रास्ते में मेलते-सेलने कितनी ही चार गाभियो में झगड़ा हो जाने पर वे मार-मारकर मेरी पीठ टेट्टी कर देल, पर पर भाकर मैं रोता नहीं था, इमलिए कि किमी मालूम न पड़ जाए । जहा-जहा भी जाता, यही परिणाम निकलता । विलामपुर, जबलपुर, सभी जगह एक ही यान । सभीने मुझे अकेला छोड दिया। इसीलिए मैं अपने मन से ही मिट्टी और कीचड से देवता की मूर्ति बनाना। लाल, नीली मिल से तस्वीर बनाना और जय मला होता, पाम कोई नहीं होता, तो चुपचाप मिनेमा के गाने गाता। मा को मुनाई पट जाता तो वह महतो, 'छोमर को पटना-लिगना तो कुछ है नहीं । बम, गाने गाता रहता है।' माम को मास्टरजी या पकडने पाने के लिए, और पहले, 'दमे कभी कुष्ट नहीं आएगा। घर में जरा भी नहीं पता।' मा कहती, 'मेरा नो यही एक महका देवकर निकल गया। हाय की पांचों अंगुलिया वरावर भी तो नहीं होती। मेर, जैमा मेरी स्मित में पटरानी २७ लिखा है, वही तो होगा।' चारों तरफ से जव इसी प्रकार के इल्ज़ाम और सितम मुझ पर ढाए जा रहे थे और प्यार व दिलासा की कोई किरण भी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी, ठीक उसी समय मेम भाभी मेरे जीवन में आई। मेम भाभी भी मेरी ही तरह विल्कुल अकेली थी। अलकेश भैया सुवह ही हाईकोर्ट चले जाते । उसके बाद घर में विलकुल सूनापन छा जाता। तव मेम भाभी को कोई काम नहीं रहता। शुरू-शुरू में तो मुहल्ले की बहू-बेटियों के मन में उसके प्रति उत्सुकता थी कि किस तरह वह गाऊन पहनती है, किस तरह साड़ी पहनती है, हाथ से किस तरह खाना खाती है, और किस तरह बात करती है? बड़ी ताई कहतीं, 'तुम्हारे देश में चम्मच से किस तरह खाते हैं, ज़रा खाकर दिखाओ न?' और जव खाते हुए देखतीं, तो देखकर दंग रह जातीं। कहतीं, 'अरे तुम्हारा बायां हाथ भी जूठा हो गया ! अब इसी जूठे हाथ से चौके की सव चीजें छूओगी? ओह, कितनी गन्दी हो तुम, हमें तो घृणा होती है !' रंगा चाची पूछती, 'अच्छा वहन, यह छोटी लड़कियों की तरह फ्राक पहनने में शर्म नहीं भाती तुम्हें ?' मेम भाभी कहती, 'शर्म क्यों आएगो ? वहां सभी तो फ्राक पहनते हैं।' 'किस उम्र तक फ्राक पहनते हैं, तुम्हारे वहां ?' 'उम्र चाहे जो हो, वहां तो सभी फ्राक ही पहनते हैं और फ्राक पहनकर ही बाहर भी निकलते हैं।' रंगा चाची का चेहरा घृणा एवं शर्म से लाल हो उठता। फिर वह खिलखिलाकर हंस पड़ती और कहतो, 'जवान लड़कियां भी पहनती हैं ? हे भगवान, बड़ी-बूढ़ी औरतें फ्राक पहनकर भला सड़क पर कैसे निकल पाती होंगी? एक हम लोग भी हैं, जो ग्यारह हाथ की साड़ी में भी अपनी शर्म नहीं ढंक पातीं, और तुम लोग? म्लेच्छों के देश में सारे काम ही म्लेच्छता से भरे होते हैं।' - - २८ पटरानी में देयता, तब भी मेम भाभी के चेहरे पर शिकन नहीं आती। किसी भी आक्षेप का उमपर अमर नहीं होता था। सबके प्रश्नों का उत्तर देती रहती वह् । । पर मुझे बड़ा क्रोध आता। जब सब चले जाते, तब मेरी आँखों में टप-टप मामू गिरने शुरू हो जाने । मैं कहता, 'तुम उन लोगों में क्यो यात करती हो, मेम भाभी? तुम उन लोगों से कुट्टी क्यों नहीं कर लेती ?' मेम भाभी स्माल से मेरी आयें पोछ देती । कहती, 'बोलने दो, मेरा तो इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं।' मैं कहता, 'वे सब तुम्हें ऐसी बात कहते ही क्यों है ?' मेम भाभी कहती, 'उनके कहने से मेरा क्या बिगड़ता है, भइया? मैं उन लोगो मे जितनी बातें सीख सकू, उतना ही अच्छा है।' क्षण भर बाद वह फिर कहने लगती, 'उन्ही लोगों से तो मैंने गोवर में पर लोपना सीखा है, खाना पाकर जूठे हाथ धोना सोसा है, पैरों में महावर रचाना सीखा है। अगर वे लोग नहीं होते, तो मुझे कौन सिखाता यह सव; बताओ तो?' मैं जवाब देता, 'यह सब मैं भी मिखा मक्ता हूं तुम्हें ।' 'तुम सिया सकते हो, यह मैं जानती हूं। पर जब तुम बड़े हो जाओगे, तव देयूगो कि कैसे गुण भरे हैं तुममें ?' मैं कहता, 'तुम अलकेश भैया को क्यों नहीं कह देती यह सब ?' मेम भाभी कहती, 'जो व्यक्ति दिन-भर ऑफिम में इतना सटकर थका-मादा घर आता है, उसे यह सय बगर कहने बैठ जाऊ, तो क्या उमे बुरा नहीं लगेगा?' फिर वहती, 'मेम से शादी करने को वजह से एक तो यों ही अलक को कोई सहन नहीं कर पाता है, उमपर अगर मैं भी यह सब कहना मुनना शुरू कर दू, तो फिर कोई आग उठाकर भी हमारे पर की तरफ नहीं देखेगा।' पटरानी २६ मैं कहता, 'फिर तुमने अलकेश भैया से शादी क्यों की? यह शादी नहीं होती, तो तुम्हारी यह दुर्दशा तो न होती। तुम कितने बड़े आदमी की बेटी हो, विलायत में ही किसी बड़े आदमी से तुम्हारी शादी हो जाती।' मेरी बातें सुनते-सुनते मेम भाभी अचानक उदास हो जाती, मानो सहसा ही उसे सब कुछ याद हो आया हो। और मैं देखता, पलंग पर लेटी हुई मेम भाभी विन्सेंट स्क्वायर के एक आलीशान मकान में निनिमेप नजरों से आसमान की ओर देख रही है। मानो वे सारे दृश्य मेम भाभी की मांखों के सामने तेर उठे हों। वे पाइन और पॉपलर के पेड़ ! ठण्डी वर्फ पर सुनहरी धूप-सी फिसलनेवाली स्लेज गाड़ी और नाइटिंगल ! विन्सेंट स्क्वायर के मकानों को खपरैल की ढालू छत पर सफेद-सफेद धुनी हुई रूई के ढेर ! वर्फ और ओक के पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट और सुबह डाइनिंग-हॉल से आती ब्रेकफास्ट की महक से नींद का टूटना, ब्रेकफास्ट- टेविल पर फूलों का गुलदस्ता और फिर सामने लॉन से लेकर मकान के दरवाजे तक फूलों के पौधों की पंक्तियां ! वहां का टहलना ! आदि सव कुछ मानो साक्षात् हो उठा हो। मैं स्वयं कभी विलायत नहीं गया। कभी वहां जाने की इच्छा भी नहीं हुई। पर मेम भाभी की आंखों की ओर देखकर मैं अपने मन में विलायत के विन्सेंट स्क्वायर की एक मनगढंत तस्वीर बना लेता था। मैं पूछता, 'तुम्हारे पिताजी बहुत बड़े आदमी हैं न, मेम भाभी ?' इसी तरह एक ही विछौने पर लेटे-लेटे हम देवर-भाभी कभी खत्म न होनेवाली बहुत-सी बातें करते रहते। जव मेम भाभी उत्तर नहीं देती, तो मैं दुवारा पूछता, 'तुम्हारे पिताजी क्या वहुत बड़े आदमी हैं, मेम भाभी?' मेम भाभी अन्यमनस्कता से कहती, 'हां, बहुत बड़े ।' मैं पूछता, 'तुम्हारे यहां मोटरगाड़ी थी ?' मेम भाभी कहती, 'हो । मैं फिर पूछता, 'कितनी?' पटरानी

मेम भाभी रहती, 'दो। एक पुरानी और एक नई।'
'तुम हमेशा कार में बंटकर घूमने जाती थी?'
'हो।'
पूछता, 'कहां घूमने जाया करती यो तुम?'
मैम भाभी कहती, कितनी ही जगह घूमने जानौं।'
फिर भी मैं पूछता, "किस-किस जगह जाती?'
मेम भाभी कितनी ही जगहों के नाम गिनाती । वे नाम कितने गुन्दर
होते थे! आज ये सब नाम मुझे याद नहीं हैं। पर वे नाम गुनकर ऐमा
लगता था, मानो ये राब स्थान बहुत ही खूबसूरत होंगे। हमारे मुहल्ले से
बहुत अधिक सुन्दर । वहां ऐसो धूल, धूआ, बालू वगैरह नहीं होगी। मभी
लड़के-लड़किया उजले-गोरे चेहरेवाले होंगे, जो माफ-सुथरे यपड़े पहनने
होगे । चारो ओर फूल और पक्षी, खेलना और गाना ही होता होगा। कोई
किमीको डाटता नहीं, कोई किसीको मारता नहीं, कोई किसीको रुलाता
नहीं। स्कूल के मास्टर बच्चों को बहुत प्यार करते है और हिमाय गलत
होने की वजह से बच्चों को बैंच पर सहा नहीं करते।
मैं पूरता, 'तुम दोपहर के वक्त क्या करती थी, मेम-भाभी?'
भेम भाभी जवाब देती, 'स्कूल जाती थी।'
मैं फिर पूछना, 'क्या तुम स्कूल में सवाल भी बना पाती थी ?'
मेम भाभी कहती, 'हा।
'और जिस दिन सवाल नही बना पाती थी...'
मेम भाभी मेरा प्रश्न मुनकर हस देनी। बहली, 'मैं रोज रायाल
बनाती थी, और मेरा सवाल कभी गलत नहीं होता था।'
मैं पूछता, 'क्या तुम्हें घर पर मास्टर पहाता था?'
मम भाभी महती, 'हा।
मैं फिर पूछना, 'क्या मास्टर भी अंग्रेज या?'
मेम भाभी बहती, 'हा।
तव में यहत छोटा था और मेरे प्रश्न यहत ही विविध होते थे। पर
पटगनी ३१

. . नवरत जवाब देते रहने पर भी मेम भाभी ऊवती नहीं थी। कहती, 'मेरे दिन कितने सुख में गुजरे, इसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। सिर्फ मेरे लिए घर में अलग से आया थी, जो मुझे खिलाया करती, मेरे साथ खेलती, मुझे कपड़ा पहना देती, जूते-मोजे पहना देती तथा रात को लोरी गाकर मुझे सुला देती। मुझ अकेली के पास सात जोड़े जूते-चप्पल थे। हमारा घर इस मकान से चार गुना वड़ा था, जिसमें सामने बहुत बड़ा लॉन और पिछवाड़े फल-फूलों का बगीचा था।' पता नहीं, इतनी हसीन जिन्दगी को छोड़कर ऐसा दुःख उठाने के लिए क्यों मेम भाभी ने अलकेश भैया के साथ शादी की? मैं कहता, 'अच्छा, अलकेश भैया से अगर तुम शादी नहीं करतीं, तब तो तुम्हें यह नरक भोगना नहीं पड़ता।' मेम भाभी कहती, 'कहां, मुझे तो कोई तकलीफ नहीं है यहां । तुमने कौन-सी कमी देखी यहां, जिसकी मुझे तकलीफ होती ?' मैं कहता, 'अरे वाह, तुम कितने बड़े वाप की बेटी हो ! कितने लाड़- प्यार से पाली हुई ! भला यहां आकर तुम्हें तकलीफ नहीं होगी ? सारा काम तुम्हें स्वयं करना पड़ता है यहां।' मेम भाभी कहती, 'तो क्या हुआ? अलक मुझे चाहता भी तो है।' 'पर मैं तुम्हें बता दूं मेम भाभी, कि मैं भी तुम्हें बहुन चाहता हूं।' मेरी बात सुनकर मेम भाभी ने मुझे बाहों में जकड़ लिया था में वोली थी, 'इसीलिए तो तुम्हारा नाम शैतान बाबू रखा है !' पर अलकेश भैया के कोर्ट से लौटने के कुछ देर पहले से मेम भा वहुत व्यस्त हो जाती । बाथरूम में जाकर नहाती, फिर सिल्क की साड़ी पहनती; चेहरे पर पाउडर-स्नो लगाकर तैयार होती। मुझसे कहती, 'अपनी अनामिका से ज़रा मेरे माथे पर गोल विन्द लगा दे। दोनों भौंहों के विलकुल बीच में ।' मेम भाभी ने बंगालिनों की तरह अपने बाल लम्बे वढ़ा लिए मैं कहता, - I ३२ पटरानी मैं वहता. अपने-आप जड़ा ठीक से नहीं बना पाती थी। कभी-कभी मैं रहता, 'लामो मेम भाभी, मैं तुम्हारी चोटी गूय दूं।' मेंम भाभी दाण-भर मोचकर महती, 'तू बना सकेमा मेरी चोटी?' 'जिम प्रकार रंगा चाची मां का जूदा बना देती है, उमी तरह में भी बना दगा; तुम देगी तो सही।' पर जड़ा बनाना इतना आसान नहीं था। फिर भी मेम भाभी के रंगम-से वालों में मैं बहुत देर तक उलझता रहता। बहुत देर तक मेरी ओर पीट किए-किए वह कहती, 'वयों, वना कि नही ?' मैं कहना, 'अम, जरा-सा वाकी है।' पर मैम भाभी के रेशम जैसे लम्बे-लम्बे बालों को साय कोगियों के यावजूद मैं अपनी गिरफ्त में नहीं कर पाता था। जैसे ही चोटी बनाकर मांट लगाने की कोशिश करता वैसे ही मेरे हाथों से सारे बाल फिमल जाते । पर फिर भी छोड़ने की इच्छा नहीं होती थी। मैम भाभी के बालों से अकारण ही मैं मैलता रहता। जब मेम भाभी का धीरज टूट जाता तव वह करतो, 'अरे, बना कि नहीं तुम्हारा जूहा मैं कहता, 'यस, जरा-मा और टहर जाओ, मैम भाभी।' और मेरा फिर यही देश-विन्यास का दौर चाल हो जाता। मेम मामी के बालों को मैं बार-बार मुट्ठी में भर लेता, और फिर छोड़ देता। छोड़ते ही रेशम के गुच्छे की तरह वे सारी पीठ पर वियर जारे। मेम भाभी के यालधे भी मिलने लम्बे-लम्बे ! मेरी मा से भी ज्यादा लम्चे थे मैम भाभी के बाल । रंगा चाची से भी अधिक लम्य । यगर मुला छोट दें, तो पीठ से भूलते हुए जमीन पर लोट जाते । मेम भाभी के गोरे पायों की एड़ियों तक। जब मेम भाभी का धीरज जवाव दे जाता, तब वह पहली, 'चल हर यस बहुत हो धुपा! तुझे जूड़ा बनाना आता ही नहीं। मेरी तो गर्दन भी दुगने लगी। पटरानी 1 पर महावर रचाने में मैं बहुत पटु था। मेम भाभी को जमीन पर बैठने की आदत नहीं थी। अगर काफी देर उसे जमीन पर बैठना पड़ता, तो बाद में उसे बहुत तकलीफ होती थी। इसीलिए मेम भाभी चेयर पर बैठ जाती और घुटनों तक साड़ी ऊंची कर लेती। मैं ज़मीन पर उसके परों के नजदीक वैठकर दोनों पांव अपनी गोद में रख लेता। फिर तूलिका ले, मोम-से उजले उसके पांवों के किनारे-किनारे महावर लगा देता। कभी-कभी मेम भाभी अपने पैर बीच में ही हटा लेने का प्रयत्न - करती। मैं कहता, 'यह क्या, ऐसे क्यों करती हो? सारा महावर घुल-मिल जाएगा।' - मेम भाभी खिलखिलाकर हंस पड़ती। कहती, 'मुझे गुदगुदी लग रही है।' मैं गुस्सा हो जाता और कहता, 'ऐसे करोगी तो मैं तुम्हारे महावर नहीं लगा सकता।' मेम भाभी कहती, 'अच्छा-अच्छा, अव पैर नहीं हिलाऊंगी।' और स्थिर होकर बैठने की कोशिश करती । पर फिर भी पांव बार-बार हिल हो जाते । मेम भाभी के उन कमल जैसे चरणों का भी क्या कहना था ! दोनों पांवों को पकड़कर महावर रचाने के बहाने कितनी ही बार मैं टीप देता। मैं चाहता कि मेरा यह महावर रचाना कभी खत्म न हो। मैं चाहता कि इसी तरह दोनों पैर गोद में रखे जिन्दगी-भर मेम भाभी के पैरों में महावर रचाता रहूं। अलकेश भैया जब कोर्ट से लौटते तो पूछते, 'अरे, तुम्हारे महावर किसने लगा दी?' मेम भाभी मुस्कराते हुए कहती, 'भोर, कौन ? इन्हीं नठखट देवरजी मैं डर के मारे काठ हो जाता। मगर अलकेश भैया विगड़ उठे, और आने को ही मना कर दें! ३४ पटरानी मेम भाभी फिर कहती, 'जानते हो यह बिन्दी भी इगीने मगा दी वम, इसके बाद मेरा वहां टिकना गम्भव नहीं होता। अलकेग भंया मेम भाभी के साथ कार में यंठकर घूमने चले जाने और मैं धीरे-धीरे कदम बढ़ाता अपने घर चला आता और पर आकर मैम भाभी को बात मोचते-सोचते ही सो जाता। मेम भाभी पूछनी, 'एक दिन तू भी चलेगा हमारे माय घूमने ?' मैं पूछता, 'कहा?' 'जहा हम जाते हैं। किमी दिन तुम्हें भी ले चलेंगे। तुम्हे आइस्त्रीम पिलाएगे । तुम अपनी मा से बोल आना, हो ?' मैं कहता, 'मां तुम्हारे साथ थोड़े ही जाने देंगी। तुमको छूने से तो कपड़े बदलने और धोने को कहती हैं।' पर आखिर में अपना लालच नहीं रोक पाया। मेम भाभी और अलकेश भैया उस समय मन-सवरकर एकदम तैयार । मेम भाभी ने पूछा, 'क्यों रे नटसट, चलेगा हमारे साप?' मैंने यहा, 'हा, चलूगा।' फिर अलकेश भैया तो सामने बैठकर कार चलाने लगे और मेम भाभी उनके बगल में बैठ गई। मैं बैठा पीछे की सीट पर। मुझे यह अच्छा नहीं लगा । भला मेम भामो बगल में न वटी हो, तो अच्छा लगे भी फैस! मेम भाभी ने मुझसे बात भी नहीं की। पूरे रास्ते मिर्फ मलकेश भैया से ही यान करती रही। दोनो बिलकुल मटकर बंठ गए पे और न जाने वहां-वहाँ की कितनी बातें कर रहे थे! मेम भाभी को बंगला मिलाने के उद्देश्य से अलकेश भैया हरदम वगला में ही बोलते और मेम भाभी भी वगला मे ही बात करती। इस समय दोनो अपने में ही मग्न थे धौर मेरी ओर किसीका भी घ्नान नहीं था। इसके याद में फिर कभी उनके साथ नहीं गया। घर में बैठे-बेटे मम भाभी पर मान करके मुह फुलाए रहा। पटरानी मनुष्य की उन बढ़ने के साथ-साथ उसके मन में भी बुजुर्गी आने लगती है। कभी जिस मेम भाभी को मैंने सिर्फ अपना बना लेना चाहा था और जव अलकेश भैया उसमें हिस्सा बंटा लेते थे, तो मेरा मन उदास हो जाया करता था; माज उन दिनों की बातें याद आने पर हंसी आती है। स्कूल से लौटते समय कितनी बार सोचा कि आज जाकर जरूर देख आऊंगा कि मेम भाभी कैसी है ? लेकिन तब तक अपने मन में आहिस्ता- आहिस्ता मैं अपराध-बोध महसूस करने लगा था। मैंने मन में समझना सीख लिया था कि मैं मेम भाभी का कोई सगा नहीं, बल्कि पराया हूं और मेम भाभी मेरी परायी है। अब पहले की तरह एक ही विस्तर पर मेम भाभी के पास सोकर लाड़ करवाने की उम्र नहीं रही मेरी। इसके अलावा, अव मेम भामी के दोनों पैरों को गोद में रखकर महावर लगाना न तो सम्भव है और न ही यह सब उचित है। यह सब समझते हुए भी अपना लोभ संवरण नहीं कर पाता। अचानक किसी दिन जा पहुंचता तो मेम भाभी दंग रह जाती। फहती, 'इतने दिन कहां था रे? उसके बाद अपने शयन-कक्ष में ले जाकर चाय पिलाती। पिछली रात को होटल से लाए केक-पेस्ट्री खाने को देती। मेम भाभी और अधिक बंगालिन बनती जा रही थी। साड़ी के पल्लू में चाबी का गुच्छा बांध रखा था। भीगे वालों को पीठ पर फैला रखा था। लेकिन सुले बालों को यो ही नहीं रखना चाहिए, इसलिए बीच के कुछ वाल लेकर एक गिरह वांधी हुई थी। माथे पर सिंदूर की एक विंदी लगा रखी थी और पैरों में महावर। मैंने पूछा, 'मेम भाभी, तुम्हारे पांवों में महावर कौन रचा देता है ?' मेम भाभी ने मुस्कराते हुए कहा, 'तुम क्या समझते हो कि तुम्हारे ३६ पटरानी

मैंने कहा,
सिवाय मुझे और कोई महावर लगानेवाला है ही नहीं ?'
'मैं तो अब बड़ा हो गया हूं न, इसलिए नहीं लगा पाना।
पया यय भी मुझमे महावर लगवाना पसन्द करोगो ?'
'मोह, यह बात है ! जरा में भी तो दे, तुम कितने बड़े हो गए
आ
कहकर हंसते-हंसने मेरे गामने या सही हुई। फिर बोली, 'जरा ग?
हो तो नापकर दे कि कितना बड़ा हो गया है?'
मेम भाभी की छाती से सटकर बिलकुल दसके सामने खड़ा हो गया
में।
मेम भाभी ने कहा, 'और पास पिसक प्रायो।'
फिर मुझे हाय से नापते हुए कहा, 'यह देश, अभी मेरे सीने तक
भी नहीं पहुंचा है।
पर उस वक्त ऐमा लग रहा था, मानो तेज
मेरे मांध, कान, नाक, मुह मानो उत्तेजनायश गरम हो उठे हो। मैं मिर
सुवाकर धापम घेयर पर आ बैटा।
मेम भाभी ने मेरे पास आकर पूछा, 'यो रे, इतना हांफ क्यों रहा
है ? प्यास लगी है क्या? पानी लाक?'
मेम मामी पानी ले आई।
फिर बोली, 'कल भलक को क्या हुमा, जानते हो?'
मैंने पूछा, 'क्या हुआ
मेम भाभी ने कहा ऐक्सीडेण्ट को दगला में क्या कहते हैं. रे'
मैंने कहा, 'दुपंटना।'
मैम भाभी ने कहा, 'दुपंटना' इसका मतलब?'
'इसका मतलब ऐक्सीडेण्ट ।'
और दोनों एक माप हंस पड़े।
मेम भाभी ने कहा, 'चत हट, ऐश्मीरेण्ट का मतलब दुपंटना नहीं
होता । मेरा मतलब यह था कि जैसे आज अचानक दोपहर को तू मेरे पर
पटरानी

आया तथा मैंने तुम्हें नापकर देखा और तुम्हें पानी की प्यास लग आई इसे भी तो ऐक्सीडेण्ट ही कहते हैं।' मैंने कहा, 'यह भला क्यों ऐक्सीडेण्ट होने लगा? और अगर है भ तो इसका पर्यायवाची बंगला शब्द कुछ नहीं होता।' मेम भाभी ने कहा, 'पर कल का ऐक्सीडेण्ट तो सचमुच ही दुर्घटन थी, भई ! अलक कार चला रहा था और उसी हालत में मैं उसक चुम्बन लेने लगी थी। ठीक उसी वक्त सामने एक कार आ पहुंची।' मैंने कहा, 'ओह, गजव हो गया ! फिर क्या हुआ ?' समसामयिक साधारण घटनाओं से ही मनुप्य का जीवन बनता विगड़ता रहता है। मैं बहुत बार सोचता रहा हूं कि आदमी शादी क्य करता है ? एकदम अकेला रहने में उसे आराम में उसे आराम ही तो है। किसी तर की ज़िम्मेदारी नहीं रहती। इसी तरह अगर अलकेश भैया शादी नह करते तो किसका क्या बिगड़ जाता? मंझली ताई इस तरह बेमौत नह मरती और मंझले ताऊजी भी कुछ और दिन जिन्दा रह सकते थे। कहां के कौन तो मेम भाभी! और किस देश की बेटी!! जहां पैदा हुई, वड़ी हुई वहीं अपना बाकी जीवन भी विता सकती थी। क्यों वह सात समुन्दर पा फरके इस समस्या की सृष्टि करने आई यहां? यह समस्या और य परेशानी सिर्फ मेम भाभी और अलकेश भैया के लिए ही नहीं थी, बल्ि मेरे लिए भी थी। वह नहीं आती तो मुझे भी लड़कियों के चरित्र का ए और पहलू देखने को नहीं मिलता! मैंने कितने ही तरह के चरित्र की लड़कियां देखी हैं। पर स एक-दूसरी से भिन्न थीं। किसीसे भी किसीका सामंजस्य नहीं था । प क्या एक ही नियम के अन्तर्गत सभीको आवद्ध करना संभव है ? कर एक ही साने में सभीको ढाला जा सकता है ? जो लड़कियां पत्र-व्यवहा ३८ पटरानी द्वारा अपने-अपने जीवन की समस्या से मुझे परिचित करवाती हैं, जो मुझसे अपने जीवन की कहानी गुनाने को मिलना चाहती हैं। उनमें से कोई यादवपुर रहती है, तो कोई बेलपडिया, तो कोई शिवपुर । लेकिन अन्दर से सभी तो एक-दूमरी से भिन्न होती हैं, यद्यपि वाहर से सभी महज लड़कियां रहती हैं । साड़ी और गहनों से सजी-संवरी, पर भीतर से सब मनुप्य ही है न । मैं सभीका सम्मान करता हूं। उन सबको प्यार भी करता हूं तथा मन ही मन यह कामना भी करता हूं कि सभी सुपी रहे, सबके मन को शान्ति मिले । सब मानो अपने मन की बात अपने- अपने अन्तर्यामी को सुलकर कह सके कि, 'मैं बहुत सुखी हूं, बहुत शान्ति मिली है मुझे जीवन में; मुझे किसी प्रकार का अभाव नहीं, न किसीसे किसी प्रकार की शिकायत ही है।' आज मैं अपने कमरे के एक कोने में बैठा लिखता हूं और अपने अतीत पो पटनायों की सिर्फ जुगाली करता हूं। जीवन-पथ पर चलते-चलते जिन-जिन से मेरा साक्षात्कार हुआ पा; किसीसे कुछ समय के लिए या किसीरो लम्बे अरसे के लिए; उन सभीको मन ही मन प्रणाम करता हूं। कहता हू 'तुममे से जो जहां रहे, सुखी रहे।' इससे बड़ी प्रार्थना और इससे बडी कामना मेरे पास नहीं है। मेरे बचपन के समय जब मेम भाभी और अलकेश भैया के जीवन में परम दुर्घटना आई थी, तब भी मैंने उन दोनो को मगल-कामना ही की थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि हमारे स्कूल के गेट के पास दरवान का घर था, जहा पीपल के पेड़ के नीचे एक शिवलिंग या। स्कूल से लौटने ममय उसकी सीमेट मे बनी पक्की वेदी पर बहुत देर तक माया टेककर प्रणाम किया था मैंने और कहा था, "हे शिवजी, अगर आप सच्चे हैं तो मेरी मेम भाभी के मन को शान्ति दें!' उसके बाद कहा था, 'हे शिवजी, मेरी मेम भाभी हिन्दू नहीं है, इसलिए आप विचार मत करिएगा। मेम भाभी ने गाय का मास साना छोड दिया है। वह गोबर पाकर गुरु हो घुकी है। एक अलकेश भैया को छोड़कर मेम भाभी का अपना और कोई पटरानी भी इस देश में नहीं है, अतः उसे शान्ति देना, भगवान् ! पर आखिर उससे भी कुछ नहीं हुआ। कालीघाट के ट्राम-डिपो के पास एक क्रिश्चियन गिर्जाघर था। एक दिन पैदल चलते-चलते वहां गया और चर्च के खंभों के सामने हाथ जोड़कर मैंने प्रार्थना की थी, 'मेम भाभी के मन को शान्ति दो, ईशू ! मेम भाभी का मंगल करना। तुम्हारे देश की लड़की इस देश में वहू वनकर बहुत मुसीबतें झेल रही है प्रभु, उसे अब और मुसीवत में मत डालना।' लौटते समय कालीघाट के मन्दिर में सवा पांच आने का प्रसाद चढ़ाकर मैंने मिट्टी के चपटे सकोरे में प्रसाद और जवा फूल लाकर मेम भाभी को दिया था और कहा था, 'यह फूल लेकर माथे से छुआओ और प्रसाद खा लो।' और सावधान भी कर दिया था कि, 'प्रसाद खाकर हाथ धो डालना मेम भाभी, नहीं तो पाप लगेगा।' मेम भाभी ने पूछा, 'क्या हिन्दू भगवान् का प्रसाद मैं खा लूं ?' मैंने कहा, ? फिर तुम तो गोवर खाकर शुद्ध भी हो चुकी हो।' पर मेरी इतनी प्रार्थना, इतनी पूजा, इतनी मन्नत आदि से भी कुछ फायदा नहीं हुआ। मैं रात-दिन प्रार्थना करता कि मेम भाभी का कुछ भी अनिष्ट न हो, लेकिन अन्त में अलकेश भैया के चचेरे भाइयों ने मामला-मुकदमा दायर कर ही दिया । पर उस बात को अभी रहने ही दूं। अभी तो अलकेश भैया की और दूसरी बातें कहूं । अलकेश भैया सुवह कोर्ट चले जाते और एकदम शाम को ही लौटते। इसके बाद एटर्नी और मुवक्किल घर पर आने शुरू हो जाते। अलकेश भैया की प्रैक्टिस दिन पर दिन बढ़ने लगी थी। यहां तक कि खाने और सोने का वक्त भी नहीं मिलता उन्हें। रात को भी कागज-पत्र लिए बैठे रहते । 'तो क्या हुआ पटरानी यहां तक कि रविवार को भी मेम भाभी को अकेली छोड़कर कार्यवश कलकत्ते से बाहर चले जाते। में पूछता, 'अलकेश भैया कहा गए हैं, भाभी?' उस वक्त मेम भाभी सज-संवरकर माथे पर विन्दी, पांवो में महावर लगाए दालान में बैठी रहती। कहती, 'बलक नगर से बाहर गया है।' कभी-कभी देवता कि हमारे घर के सामने से मैम भाभी की कार मरं मे निकल जाती । क्षण भर के लिए अलकेश भैया की एक झलक दिखलाई पडती कि वे स्टीयरिंग पर हाय रमे कार चला रहे हैं। मुंह में सिगरेट और बगल में छोटा-सा घूघट काड़े मेम भाभी बैठी होती। जाते भाम को और लौटते बहुत रात गए। दूसरे दिन में पूछता, 'कल तुम लोग किलनी रात गए लौटे, मेम भाभी? मेम भाभी चकिन होकर पूरती, 'हाय राम! तुमने देना या क्या हमें ? कहां या तू?' मैं पूछता, 'तुम लोगों ने खाना-पीना कब किया ?' मेम भाभी कहती, 'होटल में पा लिया था।' महीने में प्राय पन्द्रह दिन मेम भाभी और अलकेश भैया होटल में हो पाना खाते थे। मैं पूछता, 'क्या साया है ? मेम भामी हंस देती। कहती, 'गाय नहीं खाई है, रे! तू हर मन । अब तो मैं सो प्रतिशत हिन्दू हो गई हूं, रे! बिलकुल तुम लोगो की तरह । यह देश न, घर में खाना खाने के बाद जूठे बरतन मांज लेती हूं। काटे- चम्मच सब छोडकर हाथ से ही भात साती हूं, और पाने के बाद मायुन से जूठे हाथ धो लेती है।' सचमुच, मेम भाभी जी-जान से हिन्दू बनने की कोशिश कर रही थी, नाकि किसी भी तरह वह आत्मीय स्वजनो को सहानभूति प्राप्त कर गरे । हरदम यही सोचती रहनी कि क्या करे जिससे वे मेम भाभी में पटर मैं कहता, जलना शुरू कर दें। रात-दिन इसी चिन्ता में रहती, तब भी किसीका दिल नहीं जीत पाती। मैं कहता, 'तुम्हें क्या ज़रूरत है, मेम भाभी? अगर वे लोग न मिलना चाहें, तो अच्छा ही है। झंझट मिटा! तुम अकेली ही अलकेश भैया के साथ मौज से कार में घूमो। और फिर मैं तो आता ही हूं तुम्हारे पास।' मेम भाभी हंस देती। कहती, 'अलक तो मर्द है न । किसी मर्द का चौबीस घंटे पत्नी के ही पास बैठे रहना क्या अच्छा लगता है !' मैं कहता, ‘पर मेरा तो चौबीस घंटे क्या दिन के अड़तालीस घंटे हों, तब भी तुमसे जुदा होने का मन नहीं करता।' मेम भाभी मुस्करा देती। कहती, 'अभी ऐसा कहते हो, पर जब बड़े हो जाओगे तब तुम्हारी भी ऐसी इच्छा नहीं होगी।' 'क्यों नहीं होगी ? ज़रूर होगी। मुझे तुम चिरकाल तक अच्छी लगोगी। मेरे लिए तुम कभी पुरानी नहीं होगी।' मेम भाभी तव भी सिर्फ मुस्कराकर रह जाती। कहती, 'अच्छा, तेरी शादी होने दे। फिर देखूगी कि पत्नी के पास चौबीस घंटे वैठे रहते हो क्या? फिर तुम्हें भी अच्छा नहीं लगेगा।' फिर क्षण-भर चुप रहकर मेम भाभी कहती, 'जैसे कि शादी से पहले यह अलक भी मुझसे इसी तरह कहता था, नोरा, तुमसे एक पल भी जुदा होना मुझे बहुत नागवार गुज़रता है। एक घण्टा भी तुम मेरी नज़रों से ओझल रहती हो, तो मैं पागल हो जाता हूं।' मैं पूछता, 'और तुम ?' 'मैं ?' मेम भामी न जाने क्यों अन्यमनस्क हो उठती। मेम भाभी की आंखों को ध्यान से देखता तो लगता मानो वह यहां से कहीं बहुत दूर किसी अदृश्य लोक में विचरण कर रही हो । मानो मेम भाभी की मन-धारा किसी अतल गहराई में डूबकर दव गई हो। ४२ पटरानी मैं पूछता, 'क्या सोच रही हो, मेम मामी ?' मैम भाभी वहतो, 'कुछ नहीं रे, तू बात कर । हां, क्या बह रहा यातू?' पर मैं यही कहता, 'नहीं, पहले तुम बताओ, तुम क्या मोच रही थी?' क्योंकि मेम भाभी की भावना को न समझ पाकर भी, पता नहीं क्यों, मेरा मन एक्दम से फैसा हो गया था। मानो मेम भाभी की भावना पर भी मेरा अस्वीकृत अधिकार हो । मेम भाभी को भावना, स्वप्न, चिन्ता, भविष्य आदि ममस्न चीजों के साथ उन दिनों मैंने स्वयं को जोड़ लिया था। मैंने मेम भाभी को अपनी कल्पना, अपने स्थान और अपने मानस के साथ बागिर कुछ दिनों तक तो यपिच्छेद्य भाव से एकाकार कर ही लिया था, मोकि मेरा स्वभाव ही ऐसा है। मैं जिसके पास रहा, उसे यही लगता कि मुगपर मिर्फ उसीका अधिकार है। नितान्त ऐकान्तिक प्यार ! ऐसा प्यार कि उसमें किगीका भी हिस्सा घराना मुझे सब नहीं होता था। मलिए जव मलकेम भंया मेम भाभी का धुम्बन लेते, तो मुझे एक प्रकार की ईप्यासी होती थी। आज में बड़ा हो गया है और इन बातों के सम्बन्ध में सोचते हुए मुझे शर्म आती है। साथ ही हमी भी आती है। पर उन दिनों तो यही मोचता था कि लोग आसिर शादी करते ही क्यों है ? ऐसी कौन-सी अनिवार्यता है शादी करने के पीछे अकेला आदमी तो और भी मजे में रह गाता है। जिसको चाहे प्यार कर सकता है । तब मुझे यह नहीं मालूम पा कि स्त्री और पुरुष दोनों को जिन्दगी भर के लिए एक बन्धन में बधार एक होना जरूरी होता है। मुझे नहीं मालूम था कि एक हाथ से दी हुई पुष्पाजलि देवता भी ग्रहण नहीं करले। मुझे नहीं मालूम था कि नारायण और ब्रह्मा ने मवंयम अपने शरीर के दो पण्ड करके स्त्री-पुरप की गष्टि की धौ धौर यही दोनों शरीर शादी के बाद पुनः एक हो जाते हैं। अप्रेजो का जो एकल लिरिक है, हमारा वही एकत्व ड्रामेटिक है। नाटक में गाने रहते हैं पर गानों में नाटक नहीं होता। हम लोगों में दूल्हे को मन पटरानी ।

पढ़ाकर कन्या को आकाश में अरुन्धती नक्षत्र दिखाने की परम्परा है। फिर यह कहा जाता है, 'ओम् अरुन्धत्यसि रुद्धहमस्मि ।' हे अरुन्धति, मैं भी तुम्हारी तरह हरदम अपने पति में निमग्न रहूं। उसके बाद दूल्हा दुल्हन की ओर देखकर कहता है, 'यह आकाश ध्रुव है, यह विश्व-ब्रह्माण्ड ध्रुव है, समस्त पर्वत ध्रुव हैं, इसी तरह मेरी यह पत्नी भी ध्रुव है।' हम हिन्दू कहते हैं, 'हम पति-पत्नी में अगर कभी वैमनस्य उत्पन्न हो जाए, जो आज हो या कल, तो हम फिर से आपस में प्रेम कर सकें। हे सर्वदोपहरण करनेवाले अग्निदेव, आप देवलोक तक के दोप हरण करते हैं, इसीलिए हम आपकी शरण आए हैं । आप इस कन्या के पति-विरोधक अंश को विनष्ट कीजिए। हे सर्वदोप हरण करनेवाले सूर्य देवता, आप भी देवलोक के दोपहरण करते हैं, इसलिए हम आपकी शरण में आए हैं। बाप इस कन्या के गृह-धर्म-विरोधक अंश का विनाश कीथिए।' पर मेम भाभी जिस देश की है, उस देश के लोग कहते हैं, 'आज हमलोगों में प्रेम है यह सच है, पर कल को अगर आपस में वैमनस्य स्थापित हो जाए, तो हम इस दाम्पत्य बन्धन से मुक्त हो सके, कानून में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।' कहां तो हम सृजन और पालन के पक्षपाती और कहां मेम भाभी के देश के लोग प्रलय के पक्षपाती! हम दूल्हे-दुल्हन के आपसी विरोधाभास को मिटाकर उन्हें दाम्पत्य-प्रेम की डोरी में गूंथ देना चाहते हैं, और मेम भाभी के देशवाले वर-कन्या के विरोधाभास को और बढ़ाकर उन्हें दाम्पत्य-डोरी से अलग कर देना चाहते हैं। पर यह सब बातें तो अव, जव मैं बड़ा हो गया हूं तव, समझ में आई हैं । इसीलिए उस दिन जब आबू पहाड़ के हवा-महल में बैठे-बैठे मैंने मेम भाभी से पूछा था, 'तो वह सब क्या झूठ था, मेम भाभी? तुम्हारा वह मांग में सिन्दूर लगाना, पैरों से महावर रचाना, पांवों से हाथ लगाकर प्रणाम करना, तुम्हारा वह निरामिष भोजन करना; क्या सव - ४४ पटरानी

दिखावा ही था ?'
मलमे-मितारोवाली चुनरी से अपना चेहरा ढंककर मेम भाभी रोने
लगी। मामुओं में उसकी चुनरी भीग गई । इस तरह से आज तक मैंने
किमी मेम को रोते नहीं देखा। मेम भी रोती है तो इतनी करुण लगती है,
यह बात मेम भाभी का रोना देखने से पहले मुझे मालूम नहीं थी।
मेम भाभी ने कहा, 'मैं झूठ नहीं कहती, मेरे नटखट देवर ! यह
गचमुच एक एक्सोडेण्ट ही हुआ है।'
मैं और भी हैरान हुआ, 'एक्सीडेण्ट ?'
मुझे अच्छी तरह याद है कि एक दिन मेम भाभी ने मुझसे एक्सीडेण्ट
का अयं पूछा था । इस शब्द का बगला पर्यायवाची नहीं होता। उस दिन
इसलिए मैं इस शब्द का अर्थ नहीं बता पाया था। और आज भी मानो
यह बात सुनकर
मुन्न हो गया।
मेम भाभी ने कहा, 'क्या मेरी तरह कभी कोई मेम बंगालिन बन
मकी है ? क्या कोई भी मेम कभी हिन्दू घर की बहू बन सकी है ?'
मैंने कहा, 'यह मैंने तो नहीं देगा है, मेम भाभी।'
'कभी नही, ऐना हो ही नहीं सकता। मन मे उपलती घृणा
पर माम के गन्दे पैरों को घूल लेकर अपने साफ-गुयरे वालो में कोई मेम
नहीं लगा माती। पर क्या नहीं लगा सकती, जानते हो?'
मैंने कहा, 'नहीं।'
मेम भाभी ने कहा, 'यह भी वही एवमीडेण्ट ही है।'
मैंने पूछा, 'इसका मतलब
मेम भाभी ने कहा, 'तो फिर मन ।'
और जरा-मा रुककर फिर बोली, 'मेरे पिताजी एक मुबह पश्चिम के
एक बड़े रास्ते से ला रहे थे और मेरी मा ठीक उमी समय उत्तर दिशा की
एक गती के मोड पर पड़ी हुई थी। दोनों की वही प्रयम भेंट हुई, और
भेंट के परिणामस्वरूप एक एक्मीडेण्ट हो गया।'
मेरी कुछ समझ में नहीं पाया, अतःपूछ बैठा, 'वह कैसे ?'
को दवा.
पटरानी

- . मेम भाभी ने चूनर का बूंघट सरकाकर कहा, 'अगर वह मुलाकात नहीं हुई होती, तो मेरा जन्म भी नहीं होता।' मैंने पूछा, 'उसके वाद ?' मेम भाभी ने कहा, 'वस, उसके बाद और कुछ नहीं। उसके बाद मैं वड़ी हुई । मुहल्ले के लड़कों के साथ खेलती रहती। धीरे-धीरे उम्र बढ़ती गई । उस वक्त मैं अपने ही यौवन के भार से झुकी रहती थी। दुनिया में किसीकी भी मैं केयर नहीं करती थी। मेरे लिए सारी चीजें मात्र खेल थीं। जिन्दगी भी खिलवाड़, मौत भी खिलवाड़, यौवन भी खिलवाड़, प्रेम भी खिलवाड़ । उस वक्त खिलवाड़ के अलावा मैं और कुछ सोच भी नहीं सकती थी। मैंने पूछा, 'फिर ?' मेम भाभी कहने लगी, 'फिर एक दिन विन्सेंट स्क्वायर की सड़क पर मैं और मेरी सहेली डोरा दोनों दूकानों के सामने से जा रही थीं। हम दोनों में बहुत अधिक प्रेम था । मेरा नाम नोरा था और उसका नाम डोरा। दोनों ही हमउम्र थीं। हमें देख-देखकर मुहल्ले के लड़के ताने कसते । वे व्यंग्य और ताने कितनी ही तरह के होते थे। लेकिन हमें देखकर अगर लड़के ताने नहीं कसते तो शायद हमें बुरा ही लगता। दरअसल,हमें लड़कों का वह अत्याचार अच्छा ही लगता था। उस वक्त मेरे लिए अपना यौवन संभालना एक मुसीवत ही थी। न रात को सोते समय चैन था, न दिन में जागते समय; न खाकर चैन था, न भूखे रहकर । किसी तरह भी चैन और सुख नहीं मिलता था मुझे । रास्ते में उछलती-कूदती हुई चलती। कपड़ों की दुकानों में शो-केश में लगी सुन्दर-सुन्दर सिल्क की फाकों का बारीकी से मुआयना करती । उनकी कीमत लिखी रहती, वह भी पढ़ती। एक दिन अचानक मेरी सहेली डोरा ने एक खूबसूरत चेहरेवाले इटालियन युवक को दिखाकर कहा, 'उस व्यक्ति का अचानक एक चुम्बन लेकर क्या तुम उसे चौंका सकती हो ?' मेम भाभी रुक गई। ४६ पटरानी मैंने पूछा, 'उसके बाद?' मेम भाभी ने कहा, 'तुममे तो मैने पहले ही बता दिया पान, मेरे नटखट देवर, कि उस वक्त मेरे लिए सब कुछ खिलवाड़ था। जिन्दगीबोर मौत, यौवन और प्रेम सब कुछ। सब मेरे लड़कपन के खेल मात्र थे। मैं मर्द को मन मे मर्द नहीं समझती थी और औरत को औरत नहीं। हमारा दंश तुम्हारे देश की तरह तो है नही । जवान हो जाने पर भी हम लड़के- मटकियां एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं तथा साथ खेलते हैं। एक साथ डांस करते हैं । एक साथ पढते हैं । एक लडकी एक साथ दस लड़कों से प्रेम कर मकती है, और दूसरी ओर एक ही लड़के को दस लड़कियां भी एक साथ प्यार कर सकती हैं। मैने पूछा, "फिर?' मेम भाभी ने कहा, 'एक दूकान से एक इटालियन युवक को निकलते देखकर डोरा ने मुझसे कहा, अगर तुम उस इटालियन युवक का चुम्वन लेकर भाग आयो,तो...' मैने बीच में ही पूछा, 'कितने की शर्त लगाई उसने ?' डोरा ने कहा, 'एक शिलिंग की।' मैने पूछा, 'तो क्या तुमने शर्त पूरी की थी, मेम भाभी?' 'हा ! ऐसी शते तो हम प्रायः लगाया करती थी। हमारा मुख्य मेल हो यही था। मैंने फिर पूछा, 'उसके बाद क्या हुआ ?' मेम भाभी ने फिर कहना शुरू किया, 'इटालियन युवक का वह खब- भूरत चेहरा और जॉन गिलबर्ट टाइप की मूछे, सुनहरे घुघराले बाल और माहे छह फुट लम्बाई ।.."अब अगर मै उसका चुम्वन लेने जाऊं, तो उछलकर उसकी गर्दन से लटकना पडता मुझे। पर उससे क्या हुआ, शर्त तो आखिर शतं ही थी। और उसी वाजी को जीतने की कोशिश मे एक भयानक एक्सीडेण्ट हो गया।' मैं अवाक रह गया, 'क्या कहा, एक्सीडेण्ट ?' पटरानी - ? वह बाजी मेम भाभी ने कहा, 'हां, उस शर्त को जीतने में एक दुर्घटना घट गई। वरना न तो मुझे तुम्हारी इस इण्डिया में आना पड़ता और न ही आज राजपुतानी वेश-भूपा में इस आबू पहाड़ पर तुम मुझे पाते।' मैंने पूछा, 'पर उस शर्त का क्या हुआ क्या तुमने जीत ली थी, मेम भाभी?" मेम भाभी की आंखों में फिर झर-झर आंसू बहने लगे। आंसुओं की चमक से उसके गले में पहने हुए हीरे के गहने झिलमिला उठे । जरी के काम की वनारसी चुनरी आंसुओं मे भीग गई। और आंखों से निकले आंसू टप-टप करके ह्विस्की के पेग पर गिरने लगे। आंखें पोंछकर मेम भाभी ने कहा, 'तू सुनना ही चाहता है तो ले, सुन । जव कहने ही बैठी हूं तो आज सब कुछ कह ही डालूं ।' . पर मेम भाभी की कहानी लिखने बैठा हूं तो लगता है कि सब कुछ गड़बड़ हो गया है । शुरू की पंक्ति पढ़ने लगा तो देखता हूं गलती से अन्त की वात पहले ही कह डाली है। कहानी को शुरू से अन्त तक नियम के अनुसार सिलसिलेवार लिखूगा, तभी तो आप कहानी ठीक से समझ पाएंगे। अच्छा तो अब शुरू से ही शुरू करता हूं। अलकेश भैया कोर्ट जाते और अपने काम में डूब जाते। इधर घर में मेम भाभी भी हिन्दू घरों की बहुओं की तरह काम-काज में व्यस्त रहती। इसी ढर्रे से संव कुछ चल रहा था कि एक दिन अचानक हमारे घर में हो-हल्ला मच गया। रंगा चाची ने कहा, 'हाय ! यह कैसे हो गया? वड़ी ताई ने कहा, 'पता नहीं, शायद शराब-वराब पी होगी।' मां ने कहा, 'लेकिन अलकेश शराब पीता ही कहां है, बड़ी जीजी ?' बड़ी ताई ने कहा, 'पीता है, तुझे क्या मालूम ? मेमसाव ही जव , ४८ पटरानी सिगरेट और गराध पीनी है तो फिर उसकी भली यही तुमने ! देवी पीती है और देवा नहीं पीता, यह भला मुमकिन है ? fPy-fटाकर ये लोग पा. पया साने हैं, यह पिगे मानूम है ? यताओ भला, जो गाय तक साते है उनसी कमी तो जानि और कंगा धर्म?' दूगर दिन मुो गबर मिली कि अलफेश भया की नवियन टोक नहीं धीमारी कोई साधारण नहीं पी। हॉस्टरों में घर भर गया। रामो में मोटरों को पतार लग गई। पिताजी, रगा चाची, बड़े ताऊजी गद उसे देगने गए थे। धीरे-धीरे मैं भी गया। पता नहीं क्यों, मुझे कुछ हर-मा लग रहा था। ममचे घर में एक निःशब्द यानंक अपने पैर जमा-जमाकर घूम रहा था। लग रहा था, मानो लोग यच्छी तरह पैर रगने में डरते हों या अच्छी तरह बात करने में भी डरते हो। गिर्फ दूर से ही मैंने देखा कि मेम भाभी अलकेश भया के मिरहाने एक प्रेयर पर बैठी थी। उसकी नजरें मिमी ओर भी नहीं पलटती पी। मावित्रीन्मत्यवान की फोटो देयो पी मैने, उग समय मेम भाभी भी पिल. कुन सनी सावित्री-गी लग रही थी। ईडनूम को लाल रिनारीवानी गफेद सादी पहने हुए और बालों को पीठ पर फैलाए हा! मांग में मुरां लाल गिदूर और माधे पर बड़ी-मी बिन्दी ! क्या ही ज्योतिर्मयो प्रतिमा-सी संग रही थी यह ! एक के बाद एक शिनने ही दिनों से यह उपवाग किए हए अलफेश भया के पास बैठी थी। पल भर को भी उसका सामीप्य नहीं छादनी। उगको साने के लिए पहनेवाला भी पर में कोई नहीं था। गया-गुथूपा करने वाला भी कोई नहीं था। फिर भी उमः पारे पर ज्वेग पी परधाई तक नही थी। धीरज एव पिरता की मूर्ति बनी हुई बंटी पी यह । डॉक्टर आते थे, पले नाते पे। मगेड का निरीक्षण होता पादियाइयो मी गध, पेनिमिनिन, यरफ, मादिपुछ भी यायो नही रहा। पर मैम भाभी कामो और भी ध्यान नहीं बदना था। मानो मेम भाभी मन हो मन अनरेश भैया का ध्यान लगाए बंटी हो। मुद्दा देपर भी এৰে। - मानो उसने नहीं देखा। मुझे याद है कि हमारे स्कूल के दरवान के घर के पास पीपल के पेड़ के नीचे शिवजी के चबूतरे पर सिर टेककर मैंने प्रणाम किया था और प्रार्थना की थी। मैंने भगवान् से प्रार्थना की थी कि, 'हे प्रभु ! मेरी मेम भाभी को हिन्दू मान लो, प्रभु! वह हमारे देश की लड़की नहीं है, इसलिए तुम्हें उसकी चिन्ता नहीं है, यह मैं मानता हूं; लेकिन फिर भी कृपा करके उसको शान्ति दो, प्रभु! अलकेश भैया को ठीक कर दो।' उसके बाद कालीघाट के ट्राम-डिपो के सामनेवाले गिर्जाघर के पास भी सड़क पर खड़े होकर प्रार्थना की थी मैंने । मुझे पता नहीं कि भीतर मूर्ति थी या नहीं, फिर भी उस अदृश्य देवता को सम्बोधित कर मैंने कहा था, 'मेम भाभी तुम्हारे ही देश की लड़की है, प्रभु ! वह यहां आकर मुसीवत में फंस गई है। उसका पति बहुत बीमार होकर अचेत पड़ा. है और अब गया, तब गया की-सी हालत हो रही है। उसको आप अवश्य ठीक कर दीजिए, जिससे मेरी मेम भाभी को राहत मिले, हे ईश्वर !' और लौटते वक्त कालीघाट के मन्दिर में काली मैया से भी प्रार्थना की थी। एक मिट्टी के सकोरे में प्रसाद ले आया था, जिसको मेम भाभी ने बड़े ही भक्ति-भाव के साथ खाया था और खाकर हाथ धो लिए थे। पत्ते पर लगे कालीजी के सिन्दूर से माथे पर विन्दी भी लगाई थी। इतने कष्ट में भी मेम भाभी के धैर्य और सहनशीलता को देखकर मैं दंग रह गया। मेरी मां, रंगा चाची या बड़ी ताई किसी में भी मैंने ऐसी भक्ति नहीं देखी थी। अलकेश भैया के लिए क्या नहीं कर सकती थी मेम भाभी! मंत्रित जल पिलाने से अगर अलकेश भैया की बीमारी ठीक हो सके तो वह भी पिलाने को तैयार ! काली मैया का प्रसाद खाने से अगर ठीक हो तो वह भी खा लेगी! दिन पर दिन मेम भाभी की सिर्फ सेवा और उत्कंठा ही बढ़ती जा रही थी। पर ऊपर से किसीको भी उसकी उत्कंठा का आभास नहीं मिलता था। आखिर बड़ी ताई को मजबूर होकर यह कहना ही पड़ा, 'अलकेश पटरानी तो मेम से शादी करके निहाल हो गया!' रंगा चाची ने कहा, 'हां रो, अलकन के विस्तर में लगी रहती है वह । पल-भर के लिए भी नहीं उम्ती। भला कोई मम भी इतना कर सकती है, यहन !' पिताजी ने कहा, 'क्यों नहीं, जरूर कर सकती है। हमारे बॉफिम के डिकिन्सन साहब की पत्नी भी काली-पूजा का प्रमाद पाती थी। मेम भाभी को लड़वी के रूप में प्रह्लाद का अवतार कहकर कोई अतिशयोक्ति नहीं की थी। मुझे ऐसा लगा कि इतने दिनों में आज पहली बार मेम भाभी का अमली रूप देखा है मैंने । सिर्फ मेम नहीं, सिर्फ हिन्दू भी नहीं, मिर्फ मुमलमान भी नहीं । नारी और पुरुष के बाहरी रूप ओट में छिपा असली व्यक्तित्व तो हरदम सामने आता नहीं। ड्राइंग-रूम का व्यक्तित्व ही तो घ्यक्ति का असली रूप नहीं होता । मुझे महमूम हुआ कि इतने दिनो तक मैंने मेम भाभी के जिस रूप को देसा था या उससे सम्बन्धित जैसी भावनाएं मन में रसी थी, वही सब पुछ नहीं थी; यल्कि अलकेश भैया की बीमारी के दौर में ही असली रूप पहचान पाया हूं। पर हायरी किम्मत ! मनुष्य को पहचान पाना श्या इतना सहज है ? मैने कपड़े और गोरे रंग से ही क्या व्यक्ति के बारे में सही राय वनाई जा मरती है ? दरअसल मेरे लिए उस वक्त तक और भी बहुत कुछ जानना वारी जिम दिन अलकेश भया की मृत्यु हुई थी, उम दिन भी मैंने मेम भाभी मा अपूर्व मौन्दर्य देया था। जिम मेम भाभी की आयो में इतने दिनों तर इतना पानी देखा था, उस दिन मानो शोकवश उमवी मागो वा वह पानी भी मूग गया था। पिसोर शोक में मनुष्य इतना गुदमूरत लग पररानी । सकता है, इतना पवित्र दिख सकता है, इतना स्निग्ध लग सकता है। यह उस दिन पहली बार जाना था मैंने। मैंने जाना कि दुनिया में किसीका शोक सुनने का किसीके पास समय नहीं है। यह दुनिया कहती है, जो गया उसको जाने दो; जो बचा है उसकी बात करो। जो गया, वह तो गया ही। पर तुम तो मौजूद हो । अतः मै तुम्हें ही स्वीकार करता हूं। मेरा विवाद, प्रणय, परिणय, प्रतियोगिता आदि जो भी है, वह सिर्फ. तुमसे ही है। मुझे याद है कि इस निर्जन घर में चुपचाप अकेला गया था कि मेम भाभी को धीरज बंधाऊंगा। पर मैं उसे क्या धीरज बंधाता, बल्कि मेम भाभी को मुझे ही धीरज बंधाना पड़ा। मेम भाभी ने कहा, 'छी:, छीः, यह क्या ? चुप हो जाओ। ऐसे भी कहीं रोया जाता है !' मेम भाभी के इस ढाढ़स बंधाने से मेरा रोना और भी बढ़ गया। मेम भाभी ने मेरे वालों में हाथ फिराते हुए कहा, 'सभी क्या हमेशा जीवित रहते हैं, पगले ? एक न एक दिन तो सभीको मरना होगा। तुम, मैं या कोई भी दुनिया में हमेशा के लिए जिन्दा नहीं रहेगा। सभी- को जाना है। किसीको पहले और किसीको पीछे।' मेम भाभी की बातें कौन नहीं जानता और भला किसने नहीं सुनी, फिर भी अद्भुत । मेम भाभी के मुंह से ये सव बातें सुनकर सचमुच बड़ा ही आश्चर्य हुमा । मैंने कहा, 'इतने दिनों बाद मैंने आज समझा है तुम्हें ! तुम बिलकुल पाखण्डी हो, मेम भाभी। तुम अलकेश भैया को विलकुल प्यार नहीं करती थीं।' इतने शोक में भी मेम भाभी हंसने लगी थी। वहुत ही मधुर लगी थी वह हंसी। बोली, 'प्यार और चाहत को तू भला क्या जानता है, रे! वित्ते-भर के छोकरे हो तुम अभी !' मैंने कहा, 'मैं सब जानता हूं। तुम मेम सहिवाएं प्यार कर ही नहीं सकतीं। आश्चर्य-सा हुमा मुझे ५२ पटरानी - मेम भाभी ने कहा, - मम भाभी वही मधुर हंगी हाती रही। बोली, 'एकदम मे ममूनी पर ही लांछन लगा दिया, रे?' मैंने कहा, 'तो फिर यह क्या बात हुई कि अलग भैया मर गए र तुम रोयी भी नहीं ?' 'मायद रोने में ही प्रेम का पता चलता है ?' मैंने कहा, 'जो प्यार करती है, यह मला रोए विना रह सकती है ?' मेम भाभी पता नहीं क्या वहने जा रही थी, पर एराएर गुदगो मंभाल लिया और बोली, 'गर, जाने भी दी; मैं तुमगे दम विषय पर तर्फ नहीं करूंगी। तुम पुछ गमारते तो ही नहीं।' 'यह कहकर तुमने तो फिनारा कर लिया, पर लोग तो तुम्हारी निन्दा कर रहे हैं। उसका क्या करोगी?' मेम भाभी ने कहा, 'मेरी निन्दा पर हैं तो तेरा पा जाता है, जग मुनं तो?' मैंने कहा, 'यरे वाह, तुम्हारी बुराई करने का क्या अधिकार है उनको?' मम भाभी ने कहा, 'करने दो, भली तो मैं पहले भी नहीं यही गई पी और भय भी नहीं कही जानी है। इसके अलावा...!' बहते-पहले पल भर वो वह चुप रहकर फिर बोली, 'इसके अलावा, जिसके कारण इतने दूर आई, इतनी मुश्किल से अपने देश को मुलाया, साड़ी पहनना मर रिया, चिन्दी, सिन्दूर, महावर आदियो क्तिनी तकलीफ, महार ग्वीर किया पा, जव यही नहीं रहा तो अव कौन क्या कहता है, यह मोच मैं अपना दिमाग क्यो परायबर 'ये मय पहले है कि तुम वापम विलापन चनी जाओगी मेम भाभी उमी तरह मुम्कराकर बोली, 'मन?' मभी यही रहते है। तुम्हें क्या चिन्ता है, मैम तुम लोग रित सेवाले हो । अगर तुम अपने देश सोट गान विना आनन्द मिलेगा! तुम अपने मा-बार में फिर मिल गरोगी वहा, मने वहा, पहरा मेम भाभी ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। मेरी बात सुनकर न जाने वह क्या सोचने लगी । लगा, वह अधिक गंभीर हो गई है। कुछ देर चुप रहकर मैंने कहा, 'क्या सचमुच तुम चली जाओगी, मेम भाभी?' अचानक मेम भाभी बोली, 'तू घर जा, पगले! इस वक्त मुझे एकदम अकेले रहने की इच्छा हो रही है। मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करती हूं, अभी तू घर चला जा। मैं अचंभित-सा रह गया। बोला, 'क्यों, मैम भाभी ? मैंने क्या किया - मेम भाभी ने कहा, 'यह सव वाद में बताऊंगी। अभी तू जा, भाई।' कहकर उसने वाहर की ओर आहिस्ता से धकेल दिया और मेरे खड़े-खड़े ही दरवाज़ा बन्द कर लिया। लेकिन दिन पर दिन मेम भाभी का रूप मेरे लिए अबूझ होता गया। अब मेम भाभी को पहचानना भी दूभर हो गया था। अलकेश भैया के घर में मेम भाभी का जो रूप मैंने देखा था, चाहे वह अलकेश भैया के साथ कार में घूमने जाते समय का हो या किसी आत्मीय- स्वजन से मेल-मुलाकात करते समय का हो, अब लगता है, उससे इसका मानो कोई सम्बन्ध ही न हो। हम सभीको यह उम्मीद थी कि अब मेम- भाभी सीधी विलायत चली जाएगी। क्योंकि कितनी ही मेम साहिवाएं पति के मरने के पहले ही सब छोड़-छाड़कर विलायत चली गई थीं। फिर इसका तो पति ही मर गया है, इसलिए इसमें शक की गुंजाइश ही नहीं थी। अलकेश के अलावा मंझली ताई के और कोई नहीं था। पर अलकेश भैया के मरने के बाद एक चचेरा भाई पता नहीं कहां से आ टपका! मेम भाभी तब तक पूर्ण रूप से हिन्दू विधवा बन चुकी थी। सिर के बाल उसने फिर से छोटे-छोटे छंटवा डाले। सिंदूर पोंछ डाला । कोरे सफेद वस्त्र पहनने शुरू कर दिए। एक टाइम उपवास शुरू कर दिया। निरामिष भोजन खाने लगी। प्याज, लहसून की तो बात ही दूर रहो, उसने मसूर ५४ पटरानी ल भी पानी छोड़ दी। एकादगी, पूर्णिमा यादि ममी यत भी करने थी यह। रंगा चाची ने कहा, 'भई, मेम तो बहुत देखी, पर ऐमो नहीं देगी।' बड़ी ताई ने कहा, 'मैंने तो सुना है कि यह परयर की पाली में पाना जाती है।' मां ने कहा, 'पहले तोसयने यह पहार उमको पुराई शुरू कर दी पी कि वह सिगरेट पीती है, अब कहो ?' पिताजी ने कहा, 'देय लेना, या मेम यह दीक्षा लेगी। प्रायः ऐमा ही होता है। हमारे डिकिन्सन साहब की यहू ने भी अंत में मास-मछली पाना छोट दिया था।' सचमुच मेम भाभी को अब पहचानना भी मुश्किल या। एक तो याही उसके बाल गुनहरे थे, अब विधवा होने के बाद वे और भी हगे हो गए थे। गुबह उठकर पूजा करने बैठ जाती। फिर अपने लिए पायल की दो मुट्टियों का भात स्वयं ही राध लेती । बम, उमके बाद और उसे कोई काम नही रहता। अलकेश भैया का मकान सुनसान पड़ा रहता। कहीं किसी प्राणी मात्र को यावाज भी सुनाई नहीं पड़ती। कहीं कोई भी आहट नहीं। सिर्फ एक नौकर था, जो बाजार का सौदा-मुल्फ परीद साता या परपा कोई काम कर देना। उग दिन मेम भाभी के पास गया तो देखा कि वहा पूजा को तैयार हो रही थी। मुझे देसकर यह बोली, आ गया? अच्छा ही हुआ। माज पुरोहि जो भागरत को कथा पढने बाएगे।' मैंने पूछा, 'तुम इन सबमे विश्वास करती हो, मेम भाभी?' मम भाभी मुस्कराई। बोली, 'क्यो, इनमे विश्वाग रापना भी पिसी एक का ही एकमात्र अधिकार है ?' मैंने कहा, 'हा, यह भी टोक है; अविश्वास से तो विधानमा करना ही बेहतर है।

- मेम भाभी ने कहा, 'अगर मेरा किया सब कुछ ढोंग और दिखाया ही लगता है, तो मैं क्या करूं? मेरी किस्मत ही ऐसी है।' मैंने पूछा, 'तो क्या तुम्हारे इन सव ढकोसलों पर मैं विश्वास करूं ? यही चाहती हो न तुम ?' मेम भाभी ने कहा, 'तुम्हें विश्वास करने को कहता ही कौन है ? और किसीके विश्वास करने न करने से भला मेरा क्या बनता-बिगड़ता है, यह भी तो सुनूं ज़रा ?' मैंने कहा, 'पर मेरे दिल पर चोट लगती है, मेम भाभी। शायद तुम्हें याद नहीं होगा, पर कभी मैंने ही कितने प्रयत्नों से तुम्हारे पैरों में महावर रचाया है, माथे पर विन्दी लगाई है। वह मैं कभी नहीं भूल सकता।' मेम भाभी हौले से हंसी । बोली, 'अलक कहा करता था कि उससे शादी करके मैंने बहुत-सी मुसीबतें झेली हैं, जब कि तुम्हीं बताओ, भला किसीको मुसीबत में डाल सकना क्या किसीके हाथ की बात है ? उस पर भी अगर कोई दुःख उठाए या आफत में फंस जाए, तो उसकी जिम्मे- दारी किसी पर नहीं होती; न अलक पर, न तुम पर, और न मुझ पर ही।' कहते-कहते मेम भाभी फिर मुझे उतनी ही खूबसूरत लगी। लगा, जैसे बाहरी वैधव्य के अन्तराल में फिर से मानो मन का वही रंग प्रस्फुटित हो उठा हो। मेम भाभी ने फिर कहना शुरू किया, 'मां कहा करती थी, तुम्हारा यह खिलवाड़ किसी दिन तुम्हारा काल सावित होगा। पर तब तो मुझे यही लगता था कि जिन्दगी में खेल के सिवाय और कुछ है ही नहीं। मैं सोचती थी, सब कुछ एक फूंक मारकर उड़ा सकती हूं। जीवन, जवानी, स्वास्थ्य, सम्मान सभी कुछ मेरे लिए खिलवाड़ की सामग्री-भर थे। सो सचमुच भई, आखिर यह खिलवाड़ मेरे लिए काल ही सिद्ध हो गया।' मैंने पूछा, 'सो कैसे ?' मेम भाभी ने कहा, 'उस समय मैं किसीका भी कहना सुनती थी भला? जो मन में ठीक जंचता, वही करती । मुहल्ले के लोग हम दोनों - ५६ पटरानी वानी की आंच में झुलसकर वैन रहते। हम दोनों से मतलब है मैं होगा पर हम दोनों में भूल मैने की।' मैंने पूछा, 'कमी भूल?' मेम भाभी ने कहा, 'यह तो तुम्हें मालूम ही है कि एक भूल को हिपाने निए व्यक्ति दम भूलें और करता है। उन दम भूलों द्वारा अपनी एक मूल को ढकना चाहता है। एक छोटी-नी भूल के एवज में दम भलों का च्याज देकर मूल यो मुक्त करवाना पड़ता है, बतः मैंने भी यही किया।' मैंने पूछा, 'पर तुम्हारी भूल क्या थी ?' मेम भाभी ने कहा, 'दरसमल उसे भूल नहीं वह मकते।' मने पूटा, "भूल नहीं तो फिर और क्या वह मरते हैं।' मेम भाभी ने कहा, 'एक्सीडेण्ट, यानी दुर्घटना।' फिर कुछ देर चुप रहकर बोली, 'मारी बातें तुम्हारे मुनने की नहीं है, बगर मन भी लोगे तो समझोगे नहीं । योड़े और बड़े हो जाओ, तब यताऊंगी।' मैंने कहा, 'उम ममय तक क्या तुमने मेरी मुलाकात फिर होगी? तद तक क्या तुम यहीं रहोगी?' मेम भाभी ने कहा, 'मैं यहां नहीं रहूंगी तो जाऊगी कहां?' यह वात मुनकर मानो मैंने राहत की माम नी । फिर भी इतनी देर में जीवात लाख कोगियों के बावजूद मुह में नहीं निकल रही यो, बव महम ही यह बैठा । मैंने मेम भाभी मे पूछा, 'क्या उन लोगों ने तुम्हारे मुकदमा दायर कर दिया है, मैम भाभी? इस बात को मनकर भी मेम भाभी के चेहरे पर कोई भाव-परिक नहीं हुया! जिम ढग से वह पहले बैठी थी, अब भी उसी तरह बैठी र बोली, 'तो तुम्हारे कानोतक भी सबर पट्टच ही गई?' मैंने कहा, 'अनकंग भंया तो रहे नहीं। उनके अलावा इस है तुम्हारा और था ही कौन' बय मामले मुकदमे के लिए दौड़-धूप भाल कौन करेगा?' ना पटरा - . । क्षण भर मेम भाभी चुप बैठी रही। कोई जवाब नहीं दिया। उसके बाद वोली, 'देख, अलक तो बहुत. भला और सीधे-सरल स्वभाव का था । हम जिस देश की लड़कियां हैं, उस देश में बचपन से ही हमारा कई पुरुषों से सावका पड़ता रहता है। उनके होंठों एवं अंगुलियों की हर- कत देखकर ही हम बता सकती हैं कि वे क्या चाहते हैं। इस देश की लड़कियों की तरह प्रायः हम मर्दो को समझने-पहचानने में गलती नहीं करतीं। मैं अनगिनत लोगों से घर में, घर के बाहर, डांस में, समाज में, गिर्जाघर आदि में मिलती रही हूं; इस आधार पर यह मानना पड़ेगा कि अलक बहुत अच्छा आदमी था।' मैं चुपचाप सुनता रहा। मेम भाभी बोली, 'यहां के कितने ही छोकरे हमारे देश में जाकर अपनी स्थिति बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं। जिसकी आर्थिक अवस्था यहां बहुत ही संगीन है, वह भी वहां जाकर अपने को प्रिंस वनकर दिखाने की कोशिश करता है और रुपये-मोहरों का प्रलोभन दिखाता है; पर अलक ने यह सब कुछ नहीं किया।' मैंने पूछा, 'अलकेश भैया के साथ तुम्हारा परिचय किस तरह हुआ, मेम भाभी?' मेम भाभी इस बात का कोई जवाब न देकर दूसरी ही बात कहने लगी, 'जितने दिनों तक मैं लड़कों के साथ प्रेम या यारी किए घूमती-फिरती रही, उतने दिनों तक मुझे यही लगता रहा कि यही सब कुछ है, यही ठीक है। जिन्दगी में यारी-दोस्ती के अलावा और कुछ भी नहीं है। मैं सोचती, पति रुपये कमाकर लाएगा ओर मुझे अच्छे ढंग से खिला-पहनाकर सुख से रखेगा । मुझे सुख से रखने की जिम्मेदारी मानो उस अकेले की ही हो और मेरा उसके प्रति कोई कर्तव्य ही नहीं हो । जैसे मेरा काम सिर्फ खिल- वाड़ करना ही हो। मेम भाभी चुप हो गई। थोड़ा समय यों ही मौन वातावरण में बीत गया। फिर उसने कहना शुरू किया, 'मैं सोचती, जो मुझे चाहत-भरी । पटाराती नजरों से देखेंगा, में उसके लिए गंगार करूंगी। जो मेरा गोत मुनकर प्रगंमा करेगा, उसके लिए गीत गाऊंगी । जो मेरे साथ डांस करके अपने को धन्य मानेगा, उत्तेजित होगा; उसके साथ डांस करूंगी । बम, इसके अलावा मानो मेरा कोई काम हो न था।' थोड़ी देर चुप्पी साधकर मेम भाभी ने फिर कहना शुरू किया, 'पर मेरा यह भ्रम टूट गया, भई। जब मलक से शादी करके यहां आई, तब मेरा मह भ्रम टूट गया। अलक से शादी न करके किसी और से शादी करती, तब भी मेरा वह भ्रम अवश्य टूटता । और यह जरूरी भी था कि मैरा वह भ्रम टूटे। मैने पूछा, 'क्यों ? मेम भाभी ने जवाब दिया, 'तुम्हारे देश के लड़के-लड़कियों की तो शादी की जाती है, पर हमलोग खुद करते हैं।' मैम भाभी ने कहना जारी रसा, 'भई, हमारे समाज को लड़कियों में मंयम की आवश्यकता है। हम अपनी पसन्द में जरा भी चुके कि बस मारे गए। प्रेम में जरा-सी भूल हुई कि सब खत्म। हमलोगों में कानून माना जाता है और तुमलोगों में नियम । कानून बदला जा सकता है यानी पति को छोड़कर भी जाया जा मकता है। पर पूर्व दिशा में सूर्य उदय होने जैसे नियम को नहीं बदला जा सकता।' मैंने कहा, 'वह तो ठीक है, पर तुमने अलकैश भैया से कानून-बद्ध होकर शादी की थी। इसलिए उसे छोड़कर भी तो जा सकती थी तुम ?" मेम भाभी ने कहा, 'कहा जानी ?' मैंने कहा, 'तुम्हारे लिए जाने की जगह का भी अभाव है क्या ? अलकेश भैया के सारे रुपये तो तुम्हे ही मिले हैं न ? फिर तुम इतनी मुसीबतें क्यो झेल रही हो?' मेम भाभी ने पूछा, 'सभीको बहुत आश्चर्य हो रहा है न ?' मैंने कहा, 'आश्चर्य होने की तो बात ही है। इस देश में जितनी भी मेमें व्याहकर आई, उनमें से पति के मरने के बाद इस देश में पटरानी - कोई नहीं टिकी।' पता नहीं मेम भाभी क्या सोचने लगी। पल-भर वाद बोली, 'पर मेरे जैसी दुर्घटना भी तो किसीके जीवन में नहीं घटी।' मैंने पूछा, 'एक्सीडेण्ट ?' 'हां, एक्सीडेण्ट ।' जो लोग लड़कियों को रहस्यमयी समझते हैं, मैं उनमें से नहीं हूं। अगर लड़कियां रहस्यमयी हैं, तो पुरुप भी रहस्यमय होते हैं। मनुष्य मात्र ही रहस्यमय है। जितनी देर तक हम किसी दूसरे के मन की बात न जान लें, उतनी देर तक वह हमारे लिए रहस्य ही बना रहता है । पर मेम भाभी मुझे किसी दिन भी रहस्यमयी नहीं लगी। हम दोनों की उम्र में काफी अन्तर था। मैं मेम भाभी के बेटे की उम्र का था। यद्यपि मम भाभी के कोई लड़का नहीं हुआ, पर उसे लड़का होता तो वह मेरा हमउम्र ही होता । मेम भाभी लगभग अलकेश भैया की हमउम्र थी। इसलिए मैंने सोचा, उक्त दुर्घटना शायद ऐसी कोई बात होगी जो मुझे बताने लायक नहीं है; या वह इतनी दुःखपूर्ण होगी, जिसे मैं रोना-धोना न शुरू कर दूं, इसलिए वह नहीं बताना चाहती। बाद में ज्यों-ज्यों मेरी उम्र बढ़नी शुरू हुई, त्यों-त्यों हर चीज़ बहुत ही हृदयस्पर्शी ढंग से मुझे ज्ञात होने लगी। जैसे-जैसे मुझपर से शासन का दवाव कम होता गया और आजादी की मात्रा बढ़ती गई, वैसे-वैसे सभी परिचित और घनिष्ठ व्यक्ति मुझसे दूर खिसकते गए। पहले जो लड़कियां विल्कुल मुझे पास बुलाकर मेरे साथ वात करती थीं, वे अब मुझे देखते ही कुछ सतर्क हो जाती । मंझले भैया ने दाढ़ी बनानी शुरू कर दी तथा धोती के नीचे अण्डर वीयर भी पहनने लगे थे। मौसेरी बहन ने मुझे बहुत दिनों वाद देखा था, अतः बोली, 'तेरी आवाज इतनी मोटी क्यों हो गई है, रे?' मैं छिपा-छिपाकर कई तरह की किताबें पढ़ता, फलस्वरूप मुझे बहुत- सी बातों का पता चल गया था। कॉलेज के मित्र कोर्स की कितावों में ६० पटरानी दवाकर अन्य तरह की किताबें भी साथ लाया करते और अपने जीवन की बहुत-सी कहानियां मुनाते । मैं सबसे छिपकर पिक्चर भी देख नाता। पिताजी पूछते, 'इतना दुबला क्यों हुया जा रहा है, रे?' मेरे पास जब करने को कोई काम नहीं होता, तब मैं मैम भाभी के पास जाता। यद्यपि पहले का-सा वह सान्निध्य मुझे नहीं मिलता था, पर अपने मन को नई अभिज्ञता के साथ मेम माभी को में मिला-जुला लेता। मैं और भी पैनी नजरों से मेम भाभी को घूरता। जिन पावो को बचपन में अपनी गोद में रखकर अपने हार्यो से महावर लगाया था, उन्ही पैरो को बडी ललचाई नजरो से देखा करता। अव मैं बड़ा हो गया तो मेरा वह अधिकार भी छिन गया। अब मुझे मेम भाभी के नजदीक बैठने को भी नहीं मिलता। अयर मैं कभी पाम बैठने की कोशिश भी करता तो मेम भाभी दूर खिसक जाती थी। हमलोग पहले की तरह बातचीत अवश्य करते, पर पहले का-सा वह अपनत्व अब नही मिलता था मुझे। सिर्फ मैम- भाभी ही नहीं, बल्कि समूची पृथ्वी ही मानो मुझसे दूर खिसक गई और मैं अकेला रह गया था। अब पहले की तरह घड़ी-घड़ी मा व पिताजी के पाम भी नहीं जाता था। इसके अलावा मैम भाभी के पास भी हरदम नही जा पाता । अव तो भीतर से दरवाजा वन्द किए कमरे मे अकेले पड़े रहना ही मुझे अधिक अच्छा लगता था । इसी बीच एक दिन मैंने सुना कि मेम भाभी मुकदमा हार गई । यह खबर कानो मे पडते ही मैं भागा-दौडा मेम भाभी के यहा पहुंचा। मेम भाभी कुछ काम कर रही थी। मैंने कहा, 'अव तुम कहा जाओगी, मेम भाभी?' मेम भाभी ने उमी मधुर मुस्कराहट के साथ मेरी ओर देखा और बोली, 'मेरे कारण शायद तुम्हे रात को नीद भी नहीं आती होगी?' मैंने कहा, 'मजाक छोडो। मुझे सचमुच ही नीद नहीं आती, मेम भाभी।' मेम भाभी ने कहा, 'मेरे पास नीद की दवाई है।' पटरानी ६१ - मैंने पूछा, 'क्या तुम्हें भी नींद नहीं आती, मेम भाभी ?' ओह, कितने अचरज की बात है ! सचमुच मुझे सुनकर वहुत आश्चर्य हुआ कि मेम भाभी कोर्ट में जाकर वोल आई है कि वह मकान छोड़ देगी। वह सिर्फ दो-एक महीने का समय चाहती है। दो-एक महीने में कोई न कोई इन्तजाम कर ही लेगी। और अगर न भी कर सकी तो घर यकीनन खाली कर देगी। मैंने कहा, 'तुमने अपील क्यों नहीं की, मेम भाभी ! यह तुम्हारा ही तो मकान है। अलकेश भैया का चचेरा भाई कहां से बीच में आ टपका इस मकान पर अपना हक जमाने के लिए ! तुमने हामी भरी ही क्यों मकान छोड़ने की!' मेम भाभी फिर मुस्कराई । बोली, 'उन्होंने यह अच्छा ही किया है, रे।' मैंने कहा, 'अव शायद तुम विलायत चली जाओगी?' मेम भाभी ने कहा, 'जिस देश से एक बार चेहरे पर कालिख पोतकर चली आई, वहां अव दुवारा लौटकर नहीं जाऊंगी।' पूछा, 'क्या अलकेश भैया से शादी करने से सचमुच ही तुम्हारे चेहरे पर कालिख पुत गई ?' मेम भाभी ने कहा, 'क्या सिर्फ चेहरे पर ही ? सच तो यह है कि अब वाकी ही क्या रह गया है ? अब अगर अपना यह जला मुंह लेकर वहां जाऊंगी तो सब मेरे चेहरे पर थूकेंगे, क्योंकि उस वक्त सभीने मुझे मना किया था।' मैंने कहा, 'तव फिर क्यों तुमने अलकेश भैया से शादी की ? इसके अलावा इस भारत के और भी तो बहुत-से लोगों ने मेमों से शादी की है, पर उनमें से तो किसी मेम को अपने पर इस कदर शर्म नहीं आई; उनके तो चेहरों पर कालिख नहीं पुती । वे तो जरा-सी अनबन होते ही अपने बच्चों को लेकर वापस अपने देश लौट जाती हैं।' मेम भाभी ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। ६२ पटरानी मैंने कहा, 'तुम्हारे पास इतना रुपया है । तुम्हारा खुद का मकान है। तुम्हें क्या चिन्ता है, मेम भाभी? तुम यहा रहकर क्यों यह कोरा पान पहनकर विधवा का जीवन व्यतीत कर रही हो? तुम्हे किसकी गरज पड़ी है ?' पल-भर चुप रहकर मैंने फिर कहा, 'इसके अलावा अलकेश भैया भी तो बहुत रुपया कमाते थे, हजारों रुपये की मासिक बामदनी थी उनकी; अतः इतने दिनों में तो तुमने काफी रुपये इकट्ठे कर लिए होंगे, उन्हीं रुपयों में यह मकान क्यों नहीं खरीद लेती? जवकि वे लोग तुम्हारे हाथों इस बेचने को तैयार भी हैं।' मेम भाभी उसी तरह मुस्कराती रही। बोली, 'अरे नहीं भई, मेरे पास अब कुछ भी नहीं है । कल के लिए साने तक को पैसे नहीं हैं।' मेम भाभी ने आगे कहना शुरू किया, 'रुपये नहीं हैं, इसीलिए तो एटर्नी वकील को ज्यादा रुपये नहीं दे पाई। विदेशी लड़की हू, इसीलिए यहां किसीने मेरी सहायता भी नहीं की। कितने ही दिनों तक कोर्ट की दोट-धूप कर चुकी, पर कोई फायदा नहीं निकला।' सुनकर मैं स्तंभित हो गया, क्योंकि मैंने मुन रखा था कि अलकेश भैया की एक महीने की आमदनी पांच हजार रुपये थी। इतने साली में तो कितने ही रुपये इकट्ठे हो जाने चाहिए थे ! सब कहा गए ? किस तरह उड़ गए ? प्रेम भाभी तो इतनी खर्चीली भी नहीं है । अब मेरी समझ में आया कि वो मेम भाभी ने कार बेच दी। क्यो नौकरों की छुट्टी कर दी। क्यो एक टाइम साना खाती है। इन सभी दातों की ओर मेरा ध्यान गया और सहसा मेम भाभी को दरिद्रता मेरी नजरों के सामने प्रसर होकर मेरे दिल को कचोटने लगी। जिसको मैं इतने दिनी से मैम भाभी का शोक प्रतीक समझता था, जिस बात को श्रद्धा से देखता था; आज उस मवको दरिद्रता महसूस कर मन करुणा से भर उटा । मुझे लगा कि मैंने आज मैम भाभी का आरमीय वनकर सचमुच ही फिर से उनका सान्निध्य पा लिया है। जिस नि.सगता को मन ही मन इतने दिनो से मैने पाल रखा पटरानी ६३ . - ! था, वह आज विलकुल खत्म हो गई । मेम भाभी मानो चन्द लमहों में ही मुझे अपनी अत्यन्त आत्मीय महसूस हुई। मैंने कहा, 'तुम चिन्ता मत करो, मेम भाभी । एक चीज़ तुम्हें मुझसे लेनी ही पड़ेगी।' कहकर पॉकेट में पड़े दो रुपये निकालकर मैंने मेम भाभी के हाय में ढूंस देने चाहे । साथ ही साथ मैंने कहा, साथ मैंने कहा, 'मेरे पास और कुछ तो है नहीं...' लेकिन कुछ और कह पाता, इससे पहले ही मेम भाभी खिलखिलाकर हंस पड़ी। उस हंसी से मेम भाभी का सर्वाग नाच उठा। बोली, 'पगला कहीं का ! मैंने तुम्हें सब कुछ झूठ कहा और तुमने इतनी जल्दी विश्वास भी कर लिया ! चल हट, मेरे पिताजी के पास बहुत रुपये हैं।' मैं चकित-सा रह गया । मेम भाभी की यह कैसी रसिकता है, यही सोचकर मैं गूंगा-सा मेम भाभी के चेहरे को एकटक देखता रहा। मेम भाभी उसी तरह हंसते-हंसते वोली, 'मैं अपने माता-पिता की एकलौती दुलारी लड़की हूं। आज अगर मैं एक खत लिख दूं, तो उसी क्षण यहां के बैकों में मेरे नाम हजारों रुपये आ सकते हैं, मालूम है तुझे ?' मैंने कहा, 'तो फिर तुम पत्र लिख दो न, मेम भाभी! रुपये देकर यह मकान खरीद लोन !' मेम भाभी ने कहा, 'अरे, बस रहने भी दे । ऐसा करने से अलक की स्मृति का अपमान होगा। अलक स्वर्ग गया है और वहां बैठा सव देख - रहा है।' मैं पहले ही कह चुका हूं कि जो लोग लड़कियों को रहस्यमयी मानते हैं, मैं उनमें से नहीं हूं। अगर लड़कियां रहस्यमयी होती हैं, तो पुरुप भी कम रहस्यमय नहीं होते । फिर भी बहुत लोग यह प्रश्न करते हैं कि मैं पुरुपों पर न लिखकर लड़कियों पर ही क्यों लिखता हूं ? उनका कहना ६४ पटरानी है कि लडकियों पर व्याय-भरे माक्षेप लगाकर मुझे क्या मिलता है ? इसका जवाब मैने किसीको दिया है, वो किसीको नहीं। मेरा जैसा स्वभाव था, वह लड़कियों से घनिष्टता करने के अनुकूल था। लजीती प्रकृति का होने के फलस्वरूप लड़किया भी मुझसे स्नेह करती थी। और रही कटाक्ष की बात? सो अगर मैं कटाक्ष करता हूं तो उनके लिए असूि भी बहाता हूं। जो कुछ आंसुओ में मैंने पाया है, उसे सारी व्यंग्यों से हमेशा हक देना उदाहरण के तौर पर मेम भाभी को लीजिए । उक्त घटना के बाद मेम भाभी ने दो महीने उसी मकान मे बातीत किए, पर कभी भी उसके मुखडे की मुस्कराहट लुप्त नहीं होती थी। उस वक्त युद्ध का समय था । कलकत्ता महानगर में चावन, कपड़े, किरामिन तेल मभी चीजें दुर्लभ थीं । साधारण लोगों की तो बात ही छोडिए, बड़े-बड़े पैसेवाले भी इसकी चपेट में आए बिना नहीं रहे । मैं कभी-कभार मेम भाभी के घर भी गया था, पर देखा कि ताला बन्द है। यह कब कहां निकल पड़ती, कोई नहीं जानता। थककर अपने-आप वापस पर लोट आता और सोचता, मेम भाभी किसके पास किस तरह आश्रय लेगी? सिर्फ दो महीने तो हाथ मे बचे है। एक-एक करके कितने दिन तो निकल भी गए। सुबह गया तो मेम भाभी नही थी; दोपहर गया तो देखा, नहीं है; शाम को गया तो भी नही थी और रात को गया तब भी नहीं थी। तो फिर मैम भाभी आखिर जाती कहा है ? कौन राशन परीदकर लाता है, कोन तेल वगैरह लाता है और कौन खाना बनाता है ? काफी सोचने के वाद भी कुछ परिणाम नहीं निकाल पाया। रगा चाची कहती, 'अब देखूगी, सतवती का सतीपना बहा रहता बडी ताई कहती, 'सब देख लेना, भीतर ही भीतर इन्तजाम करके बिलायत चली जाएगी! पटरानी ६५ मां कहती, 'ओह, संचमुच वेचारी मेमसाब को बहुत तकलीफ है !' एक दिन जब किसी तरह भी मन को वश में नहीं रख सका तो मैं रात-भर जागता रहा । घर में सब सो गए थे और मैं खिड़की की राह से सड़क की ओर देखता रहा । अगर मेम भाभी घर लौटेगी तो हमारे घर के सामने से ही गुजरेगी। धीरे-धीरे रात और गहरी हुई। दस बज गए, ग्यारह बज गए, घर के सभी प्राणी सो गए। एक-एक कर दूर और आस- पास के घरों की सारी बत्तियां गुल हो गई। रास्ते में लोगों का आवा- गमन कम हो गया। रास्ता सुनसान हो गया। सड़क का यह स्वरूपं मैंने आज तक नहीं देखा था। पल-भर बाद ही मुझे ऐसा लगा मानो एक विधवा रास्ते से गुजर रही है। चेहरे पर बूंघट डाल रखा था। पास आने पर देखा, मैले कपड़े पहने और हाथ में गमछे से ढका खाने का बरतन लिए बह कोई नौकरानी थी, जो अपना काम-काज खत्म करके अपने घर जा रही थी। उसके बाद एक पर्दा लगा रिक्शा टुनटुनाते हुए गुजरने लगा। शायद मेम भाभी के घर के सामने वह रुकेगा। उत्सुकता से मैंने सोचा, देखू, कौन उतरता है ? पर नहीं, वह रिक्शा तो मेम भाभी का घर छोड़कर गली में मुड़कर आगे निकल गया। उसके बाद बहुत रात बीती। धीरे-धीरे रात के बाहर बज गए । गली के उस पार सड़क के कुत्ते बीच-बीच में भौंक-भौंककर रात के शांत वाता- वरण को चीरकर टुकड़े-टुकड़े किए देते थे । आंखें नींद से भारी हो गई और आंखों में पानी-सा भर आया, जिससे प्रायः सब कुछ धुंधला हो आया। मुझे चिन्ता हुई कि इतने बड़े शहर में मेम भाभी को रहने का ठोर- ठिकाना कहां मिलेगा? उसका यहां कोई है भी नहीं । इस शहर में जव सभी निश्चिन्त होकर आराम से बिछौने पर शरीर को ढीला छोड़कर सोए हैं, उस वक्त शायद मेम भाभी जिन्दा रहने की आप्राण चेष्टा में क्षत-विक्षत हो छटपटाती हुई कहीं भटक रह होगी। मेम भाभी के लिए कहीं भी कोई आश्वासन या माश्रय नहीं है । एक विदेशी लड़की के लिए ६६ पटरानी यहां सभी के दरवाजे बन्द हो चुके हैं। अलकेश भमा की मौत के माय- साय मेम भाभी भी मानो खत्म हो गई। पिताजी, चाचाजी भी चकित से हो गए थे। पिताजी बोले, 'हमारे डिकिन्मन साहब की वाइफ ने भी बासिरपार्क स्ट्रीट में बाल बनाने की दुकान सोल ली धी; क्योंकि टिकिन्मान साहब बहुत रुपये मिले ये से।' चाचाजी ने कहा, 'अलकेश ने लाइफ इन्स्योरेन्स भी नहीं करवाया था क्या?' बड़े ताऊजी ने कहा 'उन्होंने क्या कभी कुछ इसहा किमा भी था? मेम पलों को पालना क्या इतना सहज है ? इससे तो हाथी पालना अधिक सरल है। मैं सबकी बातें और आलोचनाएं मुनता और मन ही मन बहुत-सी बातें सोचता रहता। युद्ध के धक्के से उन दिनो समूचे शहर का ढाचा ही बदल गया था। रात के समय लेक-आउट रहता। दिन के समय मबके ऊपर दहशत-सी सवार रहती । शहर छोड़ने की तैयारिया हो रही थी। मिनिट्री की झुण्ड की झुण्ड गाड़िया सडक को दहलाकर सर्राटे से निकल जाती। रास्ते में जगह-जगह मिलिट्री के सैनिक घूमते-फिरते थे। उनको पोशाक भी कई तरह की होती थी। और उनके पहरे कितने विचित्र ये! पहले के कसाते को उस समय पहबानना मुश्किल था। किमी भी रेस्तरा में जाओ, मरमे सारी टेबिल कुक्षियो पर वही दखल किए बैठे मिलने । गाने गाते हुए तया सीटी बजाते हुए वे हुदा मचाते घूमते रहते । लडकियो को इग्जत लूटने और भिखारिनों की झोली में रुपये हाल जाने । दूकानो के मोशे तोडकर, शराब पीकर, वे पागलपन करते और नर्म में धुत हो रिक्शेवाले को रिवरे में मैठाकर खुद रिवमा चलाने लगते । सारे कलकत्त में विलल मराजकता का मामाग्य था। इस हालत में मेम भाभी कहा मिलती मुझे? पता नही मेम भाभी - पटरानी ६७ कहां दव-चिथकर खत्म हो गई होगी, यह किसे खवर है ? इतना वक्त ही भला किसके पास है और एक विदेशी लड़की के लिए इतना सिर-दर्द होगा भी किसे ? किसी दिन जिसके पांव में महावर लगाया था, किसी दिन जिसके पास जाकर अपने मन की निस्संगता दूर की थी और जिसके सामीप्य के लिए सुबह से लेकर शाम तक क्षण गिनता रहता था; उस मेम भाभी को मेरी तरह किसने इतना चाहा था? किसने उसे इस तरह अपना बना लिया था ? एक पोस्ट-कार्ड लिखते ही विलायत के विन्सेंट स्क्वायर से जिसके नाम हज़ारों रुपये यहां आ सकते हैं, उसीको यहां शायद पैसों के अभाव में उपवास करना पड़ता होगा । या हो सकता है, कहीं आत्म-हत्या करके उसने मुक्ति पा ली हो। यह विचार मन में आते ही न जाने क्यों कंपकंपी-सी छूटती है। शायद अलकेश भैया के लिए ही मेम भाभी ऐसी शोकाकुल तपस्या कर रही है । अलकेश भैया की स्मृति के भार से वह लाचार है, इसीलिए ऐसी कठिन तपस्या कर रही है। यह सफेद परिधान और विधवा का वेश तथा विलासविहीन जीवन-यात्रा की यह कष्टदायक तपस्या, ओह ! पर अंग्रेज बहू के इस वैधव्य की कहानी क्या किसीने भी कभी सुनी है ? इससे पहले मैंने भी नहीं सुनी थी। मैंने कभी नहीं सुना था कि किसी मेम बहू ने अपना देश छोड़कर और इस देश में रहकर अपने पति के लिए जीवन न्यौछावर किया हो; पति और ससुर की ज़मीन-जायदाद के लिए इतनी अधिक दौड़-धूप की हो। यह बात किसीके यकीन करने लायक थी भी नहीं। अच्छी तरह जानता हूं कि इस बात पर किसीको विश्वास होगा भी नहीं, लेकिन लोगों के विश्वास-अविश्वास के चक्कर में पड़ने से कहानी लिखना संभव नहीं होता। पर इसके बाद जो बात मेरी आंखों के आगे आई, वह तो और भी अविश्वसनीय और करुण थी। सुना है कि वाल्मीकि रामायण में कहीं भी रत्नाकर का जिक्र नहीं ६८ पटरानी है। लगता है, ग्रंथकार ने रलाकर की कहानी की कल्पना करके या कहीं से लेकर इसमें जोड़ दी है। चाहे जो भी हो, पर रत्नाकर की कहानी में हमारा विश्वास पक्का है। इसके अलावा, राम, सीता और गवण में भी हम विश्वास रखते है। पर यह तव की बात है, जव युद्ध जोरों पर था। दिन में जिस आतंक से लोगों के दिलों पर दहशत-सी छाई रहती, वही आतंक और दहशत गाम होते-होते और भी भयानक हो जाती। जिगरी दोस्त पर यकीन करने में हर लगता था। आसपास के लोगों पर दुश्मनों का जासूस समझकर शक होता। यहां तक कि मां अपनी बेटी पर अविश्वास करने लगी थी। अनाज के लिए चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था। एक-एक दाने अनाज के लिए दोस्त- दोस्त में यात्मीय-आत्मीय में गहरी दुश्मनी टन गई थी इम कलकत्ते शहर मे। यह सब अधिक दिनों की बातें नहीं हैं। मव हमारी-आपकी आखो देखी घटना है। उन दिनों मेम भाभी के घर के सामने से अमले आते-जाते मन में एक टोस-सी उठती। घर रात-दिन वीरान पड़ा रहता। खिड़की-दरवाजे सब बन्द । घर के सामने लगा लैदर-बॉक्स पाली पड़ा रहता, मानो वहा जीवन का कोई नामो-निशान ही न हो। अनाश भैया जिन्दा थे, तब मकान मे रग करवाया गया था। सामने लोहे का गेट लगवाया गया था। वर्दी पहने चपरासी, पानसामा, दरबान, नौकर-चाकर सब थे। शाम के वक्त रोशनी से मकान जगमगाता रहता । गेट पर पर्दे लगे रहते, रेडियो बजता रहता, मोटर एव मुवक्किलों का मजमा लगा रहता। अलकेश भैया की मौत के कुछ दिनों बाद तक बाहर की शान-शौकत कायम रही। मैम भाभी ने नौकर-चाकर किसीको भी नहीं छोडा था। पर अचानक ही मेंम भाभो के वघम की तरह एक दिन सब कुछ मरणासन्न हो चला। सबसे पहले एक दिन कार विकी। उसके बाद धीरे-धीरे नौकर-चाकर सब बरखास्त होने गए।बाहर की दीवारें सीवाल से मैली होग, भीतर की दीवारें भी बिलकुल सफेद हो गई। टोक मेम भाभी के उदाम सफेद कपडो की तरह। पटराती ६६ कभी-कभी दोपहर के वक्त उधर जाता, तो देखता कि मेम भाभी पूजा कर रही है। फिर पूजा खत्म कर मुझे देखकर मुस्कराती। बोलती, 'वैठ नटखट, मैं गंगाजल से हाथ धोकर आती हूं।' वह सफेद पत्थर की थाली में खाना लेकर आती तो मैं दूर खिसककर बैठ जाता। , मेम भाभी पूछती, 'तुम्हारा खाना-पीना हो गया?' मैं पूछता, 'तुमने खाना खाने में इतनी देर क्यों कर दी ?' उसी दौरान अदालत में मुकदमा शुरू हो गया। तव रिक्शे में बैठकर मेम भाभी वकील के यहां जाने लगी। मैं कहता, 'जब भी तुम्हें किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो, मुझसे कह देना, मेम भाभी !' मेम भाभी तपती धूप में झुलसकर काफी देर से घर लौटती और शाम को फिर निकल जाती। पहले जव अलकेश भैया के साथ कार में बैठकर वह न्यू मार्केट घूमने जाती या मैदान में हवा खाने जाती, तब का रूप भी मुहल्ले के लोगों ने देखा था; और अब जब वह विल्कुल निस्संग हालत में मामले-मुकद्दमे में जकड़कर पर्दे से ढंके रिक्शे में बैठती, बह रूप भी देखा। सब कुछ देख-सुनकर मेरी तरह वे भी दंग रह गए । अचरज, उत्सुकता एवं विचित्रता से मानो वे विमूढ़-से हो गए थे। जिस-जिसने अलकेश भैया की मेम पत्नी को देखकर कटु व्यंग्य-बाण छोड़े थे, अब वे सभी अपनी आंखों से यह सब देखकर मेम भाभी के व्यक्तित्व से दिग्भ्रमित एवं विमूढ़ हो गए थे। मेम भाभी के साथ मुहल्ले के लोगों की वोल-चाल नहीं थी तो वैसी कोई असद्भावना भी नहीं थी। जैसे कोई भी यह पूछने नहीं आता था कि मेम भाभी के पास खाने को है या नहीं, उसी तरह मेम भाभी भी खुद जाकर अपनी दुर्दशा से किसीको परिचित नहीं करवाती थी। सिर्फ उस दिन पहली बार वह मेरे सामने बोली थी, 'कल क्या खाऊंगी, खाना भी नसीब होगा या नहीं; कौन जाने !' यह भी उसने मुझसे किसी प्रकार की सहायता की उम्मीद से नहीं कहा था। ७० पटरानी मेरे देखते ही देखते मेम भाभी का नरम-नाजुक चेहरा इन कुछ दिनों में ही कैसा कठोर और कर्कश होता जा रहा था! मैं देख रहा था कि सिर्फ चेहरा ही नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उसकी पोशाक पहनावे मे भी दरिद्रता की छाप पडने लगी थी । बल्कि आंखो पर, चेहरे पर, यहां तक कि शरीर की प्रत्येक रेखा पर छाप पड़ चुकी थी। विधवा होते ही शरीर के समूचे गहने सोलकर उसने चक्स में रख दिए थे। धीरे-धीरे वे गहने बक्से से भी हमेशा के लिए गायव होते जा रहे हैं, यह मुझे पता नहीं चला। एक दिन अपनी घडी उसने मुझे ही दी थी, 'यह तू ले ले।' पर मैंने ली नही। मुझे याद है उसे चेचकर मैंने तीन सौ रुपये ले जाकर मेम भाभी के हाथ मे रख दिए थे। मेम भाभी नाराज नहीं हुई, सिर्फ एक म्लान-सी हसी उसके होंठों तक आई थी। मुझे सब कुछ मालूम है; मुझसे उसकी हालत छिपी नहीं, यह सोचकर शायद उसके चेहरे पर उस दिन फोकी मुस्कराहट तर गई थी। पर इतना सब होने के बावजूद मन की कोई ऐसी गुप्त बात थी, जो मेम भाभी ने मुझे भी कभी नहीं बताई। और यहीं पर मैं मान कर बैठता। कई दिन तक केस चलता रहा। महीने पर महीने बीतते रहे; शायद इसी तरह कई सालो तक यह केस चलता, पर एक दिन अचानक मेम भाभी के वकील ने अदालत में जाकर कहा, 'मेरी मुवक्किल श्रीमती नोरा मिम इस केस को चलाने में अममध होने के कारण मकान स्वयं ही छोडने को तैयार है। वह अपने प्रतियोगी से आगे मुकदमा लड़ने को राजी नहीं है।' हमें दृढ निश्चय हो गया कि अन्ततः मेम भाभी जरूर विलायत पली जाएगी। लेकिन वास्तविकता क्या है। इसका मुझे पता नहीं था। मुझे यह भी नहीं मालूम था कि आबू रोड जाने पर मेम भाभी से दुवारा भेंट होगी। उस समय तक मैं यह भी नहीं जानता था कि फतेहगढ़ के बडे महाराजा के साथ मेम भाभी का क्या सम्बन्ध है ? सिर्फ यही नहीं, मेम भाभी के कोई भाई-बहन भी है, यह भी नहीं मालूम पटरानी । - , था। मुझे नहीं मालूम था कि मेम भाभी के मंझले भाई का नाम विली है अभी तक विली के साथ मेरी भेंट नहीं हो पाई थी। युद्ध के समय अगर सेना में भर्ती होकर वह कलकत्ते न आया होता, तो उसके बारे में यह सव मुझे मालूम ही नहीं चलता। मेम भाभी लापता थी। चौरंगी पर चलते-चलते बहुत-से विचित्र विदेशी चेहरे और अनोखी पोशाकें देख-देखकर मैंने उनमें अपनी मेम भाभी को ढूंढने की कोशिश की थी। जव बहुत ढूढ़ने पर भी उसका कोई अता-पता नहीं मिला, तो मैंने आखिर यही सोचा कि किसी प्लेन या जहाज पर आश्रय पाकर वह स्वदेश लौट गई होगी। मैं सोचता, एक विदेशी बंगाली से शादी करके उसने जो बड़ी भूल की थी, उसीका प्रायश्चित करने वह अपने पैसे- वाले मां-बाप के पास लौट गई होगी और वहां बरफ से ढकी अपने देश की मिट्टी में पांव रखते ही उसकी सारी जलन और पीड़ा शान्त हो गई होगी। ... और तभी अचानक एक अनोखे परिवेश और पोशाक में मेम भाभी के साथ मेरी मुलाकात हो गई। सच कहूं तो यह मुलाकात मेरी कल्पना के विलकुल परे की चीज़ थी। यह तव की बात है,जव अपने कॉलेज के एक मिशनरी प्रोफेसर से पत्र लेकर मुझे स्ट्रेण्ड होटल में एक व्यक्ति से नौकरी के सिलसिले में मिलना पड़ा। पहले कभी भी मुझे इस होटल में जाने का मौका नहीं मिला था। सिर्फ बाहर से ही होटल को ताक-झांककर देख लेता था। इधर-उधर गोरी चमड़ीवाले लड़के-लड़कियां आते-जाते दिखाई देते थे। होटल केआगे से गुजरते वक्त पता नहीं कैसी एक मीठी खुशबू रंधों में भर जाती ! पता नहीं, कैसा एक रोमांच-सा हो आता! ब्रिटिश शासन के समय उस होटल में हमलोगों का प्रवेश प्रायः निषिद्ध ही था। खासकर देशी धोती-कुर्ता तो पहनकर एकदम ही नहीं। उस समय गोरी चमड़ी का शासन था और उसपर युद्ध का सुअवसर ! होटल के मालिक होटल में पूरा खाना देने का इन्तजाम कर पाने में असमर्थ थे और न ही इस ओर वे ध्यान देते थे; च्यों कि दिन में अगर वे पचास हजार रुपयों की शराव खरीदकर रख लेते तो . ७२ पटरानी -रात उसमे तीन लाय रुपयो का फायदा उठा लेते थे। सोना, रुपया, व, लहकियां, सम्मान, मर्यादा और मौन सभी में उस समय एक प्रति- गिता-सी चल रही थी। पता नही, कहा-कहा से दूर-दूर के अनजाने देशो लोग जल-पय और वायु-पथ से हजारो की संख्या में इस देश से उम देश ना-जा रहे थे। यहां आकर दो मिनट के लिए होटल में लाते, पर होटल में जगह मिलनी मुश्किल होती। कलकत्ता के सभी मंदानों में मैनिको के तम्बू वध गए थे। वे झुण्ड बनाकर आते और पल भर मे छू-मन्तर हो जाते । धूल और आधी की तरह मनुष्य का जीवन भी एक पल में उड़ जाता। एक फूक मे रातो-रात मानव का समूचे का समूचा यौवन खत्म हो जाता । मान-मर्यादा निष्ठुर पावो के तले पिसकर धूल मे मिल जाती। पर अचरज की बात तो यह थी कि होटल के एकान्त कोनों में न कहीं रपयों का अभाव था और न शराब की कमी। ऐसे वक्त में पढाई खत्म करने के बाद नौकरी के सिलसिले में मेरा भी उस होटल में जाना अनिवार्य हो गया। यद्यपि नौकरियो का कही अभाव नहीं था, लेकिन अपनी पसन्द की नौकरी मिलनी मुश्किल थी। होटल पहुचा तो मेरे अचरज का ठिकाना न रहा । वही शराब के एक काउटर पर मेम भाभी से मेरी भेंट हो गई ! चौरंगो की सड़क से होटल के गेट मे घुमते समय मैं बहुत ही डर-ड- कर कदम बढ़ा रहा था। चारो ओर सगमरमर की सजावट थी। गिनत लोगों का माना-जाना चालू था। कार्पेट बिछे फर्श पर हौले-ह कदम रखता हुआ मैं आगे वढा जा रहा था । जरा-सी दूर चलते ही मैं नये वातावरण में पहुच गया। एक तरफ सीढी थी और दूसरी तरफ कमरे थे, जिनमे कोच-मोफा वगैरह सजे हुए थे। चारो ओर गलियों शक्त की राहे बनी हुई थी। किस रास्ते से जाने पर मैं कहा पहचूग पता नही था। पृथ्वी पर मनुष्यो मे जो आपमी कालरूपी युद्ध छि पा, उसकी इम वातावरण में बात तक याद रहनी समभव थी। के दोनो बगल में लाल रेक्सिन लगी नोची-नीची चेयरें पड़ी थी। पटरा ! और मर्दो का झंड का झुंड जाम पी रहा था। बीच-बीच में खानसामे इधर- उधर दौड़ रहे थे । बोतल से सजी ट्रे! पीठ खुली मेम साहिवाएं ! डिनर सूट में सजे तया हाथ में सिगरेट लिए गोरे साहव ! इसके अलावा नाक में टकराती हुई एक रहस्यमय मीठी-मधुर खुशबू का असर ! मेरा पहला और विल्कुल नया-नया आना हुआ था यहां । चारों ओर एकटक देखते रहने पर भी जैसे मेरा मन नहीं भर रहा था। एक साथ इतनी सारी सुन्दरियों का एक जगह समावेश अपनी जिन्दगी में मैंने इससे पहले कभी देखा हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता। इतने गाऊन, इतनी लिपस्टिके, इतने सुनहरे बाल, इतनी सिगरेटें, और इन सब पर उनका वह समादर ! प्रत्येक सुन्दरी के पास ललचाई नजरोंवाले पुरुपों का झुंड ! और उन सुन्दरियों के एक-एक कटाक्ष से त्रिभुवन में प्रलय मच जाने की- सी उन पुरुपों की हालत ! अधिक देर उधर देखते रहने से मुझे न जाने कैसी शर्मिन्दगी-सी महसूस हो रही थी धीरे-धीरे सीढ़ी से होकर ऊपर गया और बताए गए ठिकाने के अनु- सार ढूंढ-ढांढ़कर किसी तरह गन्तव्य स्थान तक पहुंच गया। एक साहब को बस एक मामूली-सा पत्र-भर देना था । लेकिन साहब उस वक्त अपने कमरे में नहीं थे। इसलिए पत्र लेकर मैं वापस लौट आया। सीढ़ियों से वापस नीचे उतर रहा था कि नीचे से किसीकी हंसी मेरे कानों में पड़ी। ऊपर से गर्दन वढ़ाकर नीचे झुकाई तो देखा कि हॉल के कोने में एक सुन्दरी को वहुत-से मदों ने घेरकर हुड़दंग मचा रखा है। उनकी हंसी गूंज रही है। उनके अगल-बगल के वातावरण में सिगरेट का धुआं जमा हो रहा है। वहां मैंने जो कुछ देखा, उसे देखकर मैं स्तब्ध रह गया। अचानक मुझे खयाल माया कि मुझे देखकर एकाएक सबकी हंसी थम गई है और सारा कोलाहल स्तब्ध हो गया है। ७४ पटरानी मुझे सामने देखते ही मेम भाभी उम कार्पेट पर तेज डग भरते हुए रो ओर चली आई। उम समय की मैम भाभी को क्या मैं ठोक में पहचान पाया था? मुझे याद है कि सिर के बाल उमने छोटे और हल्लेदार बनवा लिए थे। पलकों एव होंठों को रंग रखा था। गालों के डिम्पल, कानों के ईयरिंग और खुली पीटवाले गाऊन में अग्निनिवा-सी जो औरत पास बढ़ आई थी, वही मेरी मेम भाभी है, इमपर मैं एकाएक विश्वास नहीं कर सका। मेम भाभी लिपट से पता नहीं कहा और किस तल्ले पर मुझे ले गई, यह मेरी समझ मे नही वाया। इस दौरान मैं वरावर चुप रहा, मानो मुझे बात करने का भी होश नहीं हो। एक एकान्त जगह बैटते ही मैंने कहा, 'मेम भाभी मेम भाभी ने कहा, 'तो तुमने मुझे पहचान लिया?' मेरे मुह से बहुत देर तक कोई आवाज नहीं निकली। मैम भाभी ने पूछा, 'तू यहा क्या करने आया या ?' मुझे लगा, जो प्रश्न मुझे करना चाहिए था, ठीक वही प्रश्न में भाभी ने मुझसे किया है। मैंने कहा, 'मेम भाभी, मैं तुम्हे यहा इस रूप में देगा, यह मैंने में भी नहीं सोचा था।' मेम भाभी के मूने मकान की ओर निहारते समय उन दिनों कि विचित्र धारणाए बनती थी मेरे मन में वितनी ही बार सोच शायद मेम भाभी विलायत चली गई होगी या कहीं पर मनातवास अपने दुःख से थककर धैर्य की अन्तिम सीमा पर पहुच चुकी अपने हाथो से अपना घोर अपमान करके सारे दुःनो और अपमानो क कर दिया होगा या सुद पर गहरा आघात करके उसने अपने स और मर्दो का झंड का झुंड जाम पी रहा था। बीच-बीच में खानसामे इधर- उधर दौड़ रहे थे । बोतल से सजी ट्रे! पीठ सुली मेम साहिवाएं ! डिनर सूट में सजे तथा हाथ में सिगरेट लिए गोरे साहब ! इसके अलावा नाक में टकराती हुई एक रहस्यमय मीठी-मधुर खुशबू का असर! मेरा पहला और विल्कुल नया-नया आना हुआ था यहां । चारों ओर एकटक देखते रहने पर भी जैसे मेरा मन नहीं भर रहा था। एक साथ इतनी सारी सुन्दरियों का एक जगह समावेश अपनी जिन्दगी में मैंने इससे पहले कभी देखा हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता। इतने गाऊन, इतनी लिपस्टिकें, इतने सुनहरे बाल, इतनी सिगरेटें, और इन सब पर उनका वह समादर! प्रत्येक सुन्दरी के पास ललचाई नज़रोंवाले पुरुषों का झुंड ! और उन सुन्दरियों के एक-एक कटाक्ष से त्रिभुवन में प्रलय मच जाने की- सी उन पुरुपों की हालत ! अधिक देर उधर देखते रहने से मुझे न जाने कैसी मिन्दगी-सी महसूस हो रही थी। धीरे-धीरे सीढ़ी से होकर ऊपर गया और बताए गए ठिकाने के अनु- सार ढूंढ-ढांढ़कर किसी तरह गन्तव्य स्थान तक पहुंच गया। एक साहब को बस एक मामूली-सा पत्र-भर देना था। लेकिन साहव उस वक्त अपने कमरे में नहीं थे। इसलिए पत्र लेकर मैं वापस लौट आया। सीढ़ियों से वापस नीचे उतर रहा था कि नीचे से किसीकी हंसी मेरे कानों में पड़ी। ऊपर से गर्दन बढ़ाकर नीचे झुकाई तो देखा कि हॉल के कोने में एक सुन्दरी को बहुत-से मर्दो ने घेरकर हुड़दंग मचा रखा है। उनकी हंसी गूंज रही है। उनके अगल-बगल के वातावरण में सिगरेट का धुआं जमा हो रहा है। वहां मैंने जो कुछ देखा, उसे देखकर मैं स्तब्ध रह गया। अचानक मुझे खयाल आया कि मुझे देखकर एकाएक सवकी हंसी थम गई है और सारा कोलाहल स्तब्ध हो गया है । ७४ पटरानी मुझे मामने देगते ही मेम भाभी उस कार्पेट पर तेज डग भरते हुए और चली याई। उम समय की मम भाभी को क्या मैं ठीक में पहचान पाया था? - मुझे याद है कि सिर के बाल उसने छोटे और हल्लेदार बनवा लिए थे । पलकों एवं होंठों को रंग रखा या। गालों के डिम्पल, कानों के ईयरिंग और मुली पीटवाले गाऊन में अग्निशिया-मी जो औरत मेरे पाम बढ़ आई थी, वही मेरी मैम भाभी है, इमपर मैं एकाएक विश्वाम नहीं कर सका। मेम भाभी लिफ्ट से पता नहीं कहां और किम तल्ले पर मुझे ले गई, यह मेरी समझ में नहीं आया। इस दौरान मैं वरावर चुप रहा, मानो मुझे वात करने का भी होश नहीं हो एक एकान्त जगह बैठते ही मैंने कहा, 'मैम भाभी !' मेम भाभी ने कहा, 'तो तुमने मुझे पहचान लिया?' मेरे मुह से बहुत देर तक कोई आवाज नहीं निकली। मेम भाभी ने पूछा, 'तू यहा क्या करने आया या? मुझे लगा, जो प्रश्न मुझे करना चाहिए था, ठीक वही प्रश्न में भाभी ने मुझमे किया है। 'मेम भाभी, मैं तुम्हें यहा इस रूप में देगा, यह मैंने म में भी नहीं सोचा था।' मेम भाभी के सूने मकान की ओर निहारते समय उन दिनों कि विचित्र धारणाएं बनती यी मेरे मन में कितनी ही बार सोच शायद मेम भाभी विलायत चली गई होगी या कहीं पर अनातवास अपने दु.म से थककर धेयं की अन्तिम सीमा पर पहुंच चुकी है अपने हाथों से अपना घोर अपमान करके मारे दुयो और अपमानों क कर दिया होगा या युद पर गहरा आघात करके उसने अपने म मैंने कहा, पटर मानों का बदला ले लिया होगा। उक्त सारी धारणाओं का आज होटल की वास्तविकता से जब कोई सामंजस्य नहीं मिला तो यह मेरे लिए सचमुच आश्चर्यचकित होने की वात थी। मेम भाभी की ओर गौर से देखकर भी मानो मैं उसे पहचान नहीं पाया। मैंने कहा, 'तुम्हें यह क्या हो गया है, मेम भाभी ?' मेम भाभी ने पूछा, 'क्या हुआ है मुझे, ज़रा वता तो?' यह बात भी क्या मुझे मेंम भाभी को समझाकर कहनी पड़ेगी कि उसके उस चेहरे का कहीं कोई मेल नहीं। कहां गया वह सिन्दूर, महावर, विदी, साड़ी, पूजा, एकादशी-व्रत और सफेद थान पहनकर पवित्र विधवा जीवन ? आज इस रूज, पाउडर, लिपस्टिक, कुत्सित हंसी-मजाक,अश्लील पोशाक और होटल के भीतर के इस दूषित वातावरण आदि के वीच में मानो मैं उन दिनों की अपनी मेम भाभी को ढूंढने पर भी कहीं नहीं पा सका। मैंने कहा, 'क्या सचमुच ही तुम मेरी वही मेम भाभी हो? मैं तो तुम्हें ठीक से पहचान भी नहीं पा रहा हूं।' मेम भाभी हंसने लगी । वोली, 'तुम्हारी इतनी उम्र हो गई, फिर भी तुम ऐसी वात पूछते हो ?' मैंने कहा, 'मेम भाभी, पर मैं तुम्हें प्यार जो करता था ?' मेम भाभी फिर हंसी । बोली, 'तुम भूल कर रहे हो, नटखट ! मू भूल जाओ, भाई।' मैंने पूछा, 'पर यह सब हुआ कैसे?' मेम भाभी ने कहा, 'एक्सीडेंट । वस, और कुछ नहीं।' मैंने कहा, 'सब झूठ ! तुम जिस देश की लड़की हो, ठीक उ उपयुक्त ही काम कर रही हो। तुमपर यकीन करके मैंने गलती की। भाभी, क्या अलकेश भैया के चेहरे पर कालिख पोतते समय तुमने ज़र आगा-पीछा नहीं सोचा? क्या तुम इतनी नीच और स्वार्थी हो ?' . ७६ पटरानी मग मामी चुप रहकर एकटक मेरी ओर देखती रही। पता नहीं मुझे काहुना किना, गर्म और समान में भरकर में वहाँ में भागकर बाहर निकल आपामने नांवाया, गावद मे मामी मुझे रोकेगी या पोछने पुकारेगी और अन्त में एक दार बानी बहार बदल्या के बारे में मुझे समझाने की कोगिन करेला । दिन परिस्थितियों में पड़कर यह पुष्टि काम करके बीदन-पान करने को दह नरवर हुई, सारी चा मोलकर मुझे माशाली। मनुष्य की कामानित माना की विवाह अपमृत्यु होती है, वह मुझे यह मी नाणी । पर मेरी सारी धारमाएं माट निकाली। मचमुन मम भाभी को पहचानने में मैंने उस दिन गली ही की थी। सोही से नीचे उतरने समय चारों नरक के उस भोग-विलास एवं अनिमय वर्ष के बीच मानां मन-बाप से मेरी आमा वार्तनाद करती। शराव, विभ्रम, होहला एवं ममता के नाम पर कलंक के उन नानाम्य वो पारकर बाहर निकलते समय भी मेरे मन पर मन मामी की बाद ही दार-बार हयौ कौ-नौ चोट कर रही थी। मेन मामी वहां की रहेगी? की वह वहां रहकर अपने दिन बिहानी ? क्या इस सलादा और कोई शिल नहीं था दमक पार? समी समय मिलिट्री के मनिकों का एक झुण्ड हुल्लड़ मचाताया होटल के गेट में भीतर धुमा। मैं उनमे पन्नो बाटकर दाहर की मूनी हवा में निकल आया। मुझे डर लगने लगा कि हो सकता है, ये लोग मेन मामी पर अत्याचार करें या उसका अपमान करें। दो जून की रोटियों के लिए वह मारा सामान भी गमदनः मम भाभी को हमने-हमने सहन करना पड़ेगा...दर के मारे मरा माग बदन मिहर उया। मदिन पर लौटकर भी मेरे मन को मान्ति नहीं मिली यो। हर रोड नाम के समय होटल वे विपरीत दिगावाले फुटपाथ पर अंधेरे में सहा एक्टक होटल की और देखता रहता। होटल के भीतर की वह तुम मेरे नार तक नरकर आती रहती। भीतर से एकाध ठहाके बाहर माकर लिल पटरानी रहते । होटल के बाहर जव अकाल और दुभिक्ष से अनगिनत लोग त्रस्त होकर शहर का वातावरण गम्भीर बना रहे थे, उस समय भीतर से नाच- गाने और वाद्य की आवाज़ एवं शराव की गन्ध बाहर की ओर तैरकर आ रही थी। रुपयों की खनखनाहट और रूप की झुलसाहट से कितनी गगन- चुम्बी कल्पनाएं फर्श पर विछे कार्पेट पर लुढ़ककर खत्म हो गई, जीवन के कितने गिरि-शृंग पद-दलित हुए और कितनी निष्पाप अभिलापाओं और अरमानों का खून हुआ, यह इतिहास में नहीं लिखा गया । होटल के गेट में एक के बाद एक झुंड भीतर घुसता और न जाने कितनी निराशाओं के दीर्घ निःश्वास को ईथर में मिलाकर, नारीत्व के गौरव को कलंकित करके वह वाहर निकलता इसका लेखा-जोखा या नामोनिशान तक भी याद रखना कोई नहीं चाहता। कलकत्ते से सिंगापुर, सिंगापुर से मलाया और मलाया से फिलिपाइन्स; कहीं भी इसका व्यतिक्रम नहीं घटता; एक ही इतिहास की सभी जगह पुनरावृत्ति होती है। मैं उन दिनों का सिर्फ मौन साक्षी बनकर एकदम अकेला चौरंगी के निर्जन फुटपाथ पर एक मद्धिम से गैस-पोस्ट के नीचे खड़ा रहता और तीखी नजरों से हर सुन्दरी के चेहरे को गौर से देखता। सोचता, शायद मेम भाभी जैसी कोई सूरत नजर आ जाए; महज एक मुहूर्त के भग्नावशेप के लिए ही शायद उसकी झलक मिल जाए ! मैं मेम भाभी के कलंक का साक्षी बनकर वहां नहीं खड़ा रहता था और न ही उसको अपमानित होने से बचाने के लिए; वल्कि किसी दिन मेम भाभी को मैंने प्यार किया था, शायद यह उसीका असर था, जिसके कारण मैं उसे सिर्फ एक नजर देखने- भर के उद्देश्य से वहां खड़ा रहता था। एक दिन मुझे वह सुअवसर मिल गया। उस समय रात बहुत हो चुकी थी। जब बहुत दिनों तक काफी-काफी पटरानी देर वहां खड़े रहकर भी वह मुझे दिखाई नहीं पड़ी तो उस दिन धीरे-धीरे मैंने होटल के गेट में कदम रखा। मुझे ऐसा लग रहा था, मानो मौत के गह्वर मे प्रवेश कर रहा हूं। बगल में वही शो-केश था। परो तले कार्पेट को रौंदकर आगे खिसकती हुई वही भीड़, परिचित गन्ध और तंग पोशाकें! इसके अलावा उस दिन की तरह गोरे शरीरों की भरमार, विलियर्ड-टेवल और शराब का काउन्टर ! सबसे अन्त मे सीढी के नीचे रेक्सिन मढे हुए सोफा-कोच आदि ! और नीची-नीची टेबिलो पर बोतल, गिलास और डिकेन्टर! मेरी नजरें घूम-फिरकर सिर्फ एक ही मनुष्य को एक जोड़ी काली आंखों को ढूंढ रही थीं। अचानक मेम भाभी को देखा । उद्धत और उत्ताल होकर जो लडकी बहुत-से मदों को उन्मत्त बनाए दे रही थी, वही मेरी उन दिनों की मेम भाभी है; यह मुझे समझने की जरूरत नहीं पड़ी। एक बार तो मैंने मन में सोचा कि मैं क्यों आया यहा ? लौट जाऊं ? चारों ओर गूंजती हुई-सी मॉर्केस्ट्रा की आवाज़ मानो समूचे वातावरण को नशीला बना देना चाहती थी। जो भी यहा आता है, वह अपनी स्वस्थ जागृत चेतना को खो बैठता है । लाज-शरम, पवित्रता सब कुछ मानो गेट के बाहर ही त्याग कर लोग निराकरण हो यहा घूमते है। मानो समूचे सम्मान और शालीनता को बाहर तिलाजलि देकर ही यहां प्रवेश करने का अधिकार पाया जा सकता है। लेकिन फिर भी मेम भाभी मुझे नहीं देख पाई। मैंने देखा कि मेम भाभी हाथ के पेग को ऊचा किए पता नहीं क्या बोल रही थी। उसके बाद सिगरेट का एक लम्बा-सा कश लेकर उसने धुआं उगल दिया और फिर अचानक ही सारे लोग धड़धडाते हुए मेम भाभी के इर्द-गिर्द इकट्ठे हो गए। मेम भाभी की पीठ का समूचा हिस्सा दिखाई दे रहा था। पीठ का मेरुदण्ड भी स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। लगता था, मानो उसका रोम-रोम नशे की उत्तेजना से काप रहा हो। पटरानी । वारीक सिल्क के आवरण को भेदकर मानो मेम भाभी का समस्त उच्छ- वास प्रत्यक्ष दीख रहा था। उसने एक हाथ ज़रा-सा ऊंचा क्या कर लिया, मानो उसकी प्रत्येक शिरा के रक्त के प्रवाह में दुगुनी गति आ गई हो और इसके साथ ही वहां उपस्थित प्रत्येक मर्द के रक्त-प्रवाह में भी उस अदा ने प्रलय मचा दी हो। मनुष्य, धन, वैभव, भोग, विलास, सम्मान, आदि सब मानो चंचल हो उठे। गोया मेम भाभी के एक इशारे से मनुष्य के चेहरे पर से मनुष्यता का मुखोटा हट गया हो। बस, इससे अधिक सहन करना मेरे लिए संभव नहीं रहा । अतः पास जाकर मैंने पुकारा, 'मेम भाभी!' वहां उपस्थित समस्त लोग जैसे विस्मित-से रह गए। मेम भाभी भी कम विस्मित नहीं हुई। मुझे अचानक वहां देखकर उसने पास पड़ी एक चुनरी से अपने शरीर को लपेट लिया और फुर्ती से मेरा हाथ पकड़कर उस दिन की तरह मुझे खींचते हुए बाहर निकल आई। 'मैं फिर आ गया हूं, मेम भाभी !' मेम भाभी हंसने लगी। वोली, 'मैं जानती थी कि तुम फिर आओगे।' मैंने कहा, 'बिना आए रहा भी तो नहीं गया।' मेम भाभी ने कहा, 'एक रिक्शा तो ले आ ज़रा।' 'रिक्शा!' मेम भाभी ने कहा, 'तुमसे मुझे बहुत बातें करनी हैं।' मुझे याद है कि उस दिन मैं मेम भाभी के साथ एक ही रिक्शे पर बैठा था-उसकी बहुत-सी वातें सुनने के लालच से नहीं, बल्कि इतने दिनों बाद मेम भाभी के पास बैठ पाने के लालच से। और उस लालच का आकर्षण कोई कम नहीं था। उस होटल से मेम भाभी को मेरे साथ जाते · देखकर उस दिन जो लोग अचरज में डूब गए थे, वही लोग आज मेम भाभी को मेरे साथ एक ही रिक्शे में बैठते देखकर और भी आश्चर्यचकित हो गए। होटल का वह परिच्छन्न वातावरण छोड़कर रिक्शा बगल के रास्ते मैंने कहा, पटरानी मे मुड गया । फिर वह रास्ता भी पार करके एक गली में घुस गया। वह गली ऐसी थी, जहा दुपहरी में भी जाने में डर लगे। मैंने पूछा, 'यह तुम कहां चल रही हो, मेम भाभी?' मैम भाभी ने कोई जवाब नहीं दिया। उसके इतने नजदीक बैठकर भी ऐसा लगा, मानो होटल के भीतर इतनी देर तक उद्दण्ड-उद्धल अवस्या में जिसको देखा था, वह यह नही थी। पास बैठने से उसके यदन से रॉट की सुगवू और मुंह से शराव की गन्ध आ रही थी। चुनरी से घिरे और मिल्क के गाऊन से ढके शरीर में में अपनी पहले की मेम भाभी को टूडने लगा। एक बार तो महमूस हुआ कि ढूंढ लिया है, पर उसके चेहरे की ओर देखकर लगा कि यह तो मेरे लिए विलकुल अपरचित है। अगर पहले कभी इसे पहनानने की बात सोचकर मन में गर्व महसूस किया भी हो तो वह मेरी सरामर भूल थी। मनुष्य को पहचानने की क्षमता मुझमे है ही नहीं। मैं कहानियां जरूर लिखता हू, पर यह तो मात्र मेरी सनक रहा था, तो बहुत-भे रास्तों को तय करते हुए जहां से रिक्शा चल रहा था, वह बहुत ही तग गली थी। एक गन्दै-से होटल के सामने लुंगी पहने मर्दो की भीड खडी थी। रास्ते में ही वेंच पर बैठा कोई हुक्का कोई चाय पी रहा था और कोई एल्यूमीनियम के बर्तन में मांस-रोटी खा रहा था। उनके सामने कुत्ते मुह सोले खड़े थे । यदि कोई एक-आध टुकडा उनके मामने ढाल देता तो चारों तरफ से छीना-झपटी शुरू हो जाती। ऐसा लगा, मानो यहा अभी-अभी शाम हुई है । कई दूकानें लाल-नीले कागज के फूलों से सजी हुई थी, जो शायद ईद या रमजान के वक्त सजाई गई थी। गरम मास और भुने मसाले की गन्ध वहा की याबोहवा मे समाई हुई थी । सभी जगह मविषयां भनभना रही थी। यह भी कलकत्ते का ही एक अंचल है, इसपर यकीन करने की इच्छा नहीं हुई। चोरगी के राज- कीय माहौस के टीक पीछे यह एक ऐमा उवा देनेवाला अचल था, जिमसे मुझे बेहद घृणा-सी महमूम हुई। पटरान इस बीच मेम भाभी ने मुझसे कोई बात नहीं की। उसके गले में पड़ी मोतियों की माला चक-चक चमक रही थी। हाथों में हीरों की चुड़ियां, बदन पर कीमती सिल्क का गाऊन और पांव की लाल-पालिश की गई अंगुलियां सुनहरे सेण्डिलों में से मानो अपना आत्म-प्रकाश कर रही थीं। इतनी देर से मैं यही सब देख रहा था। रिक्शा एक पुराने से मकान के सामने रुका। मेम भाभी रिक्शे से उतर पड़ी और बोली, 'आ, मेरे साथ चल ।' मैं साथ चल पड़ा। वह एक कांपता हुमा-सा मकान था, जिसमें अनगिनत रास्ते थे और उसी तरह अनगिनत कमरे भी। सहन में वाड़ लगाकर बहुत-सी मुर्गियां पाली हुई थीं। मनुष्य की आवाज़ पाकर एक बार तो वे सब कचर- पचर की आवाज करने लगी और सहन को सर पर उठा लिया । गमलों में सिर्फ पत्तोंवाले कई पौधे लगे हुए थे। नंगे पैरों के नीचे अंडों के छिलकों के टूटने की कड़मड़ आवाज़ हो रही थी। सामने के कमरों में बहुत भड़कीले वस्त्रों में कई मेमसाहिवाएं सज-धजकर बैठी पाइह पी रही थीं । लुंगी पहने हुए मर्द इधर से उधर आ-जा रहे थे। मकान के अन्दर आने-जाने की कहीं कोई अड़चन या रुकावट नहीं थी, हालांकि वहां पर्दो, गाऊनों, पार्टीशनों की कहीं कोई कमी नहीं थी। वगल में एक काठ की सीढ़ी थी। मेम भाभी सीढ़ियों से ऊपर जाने लगी। सीढ़ी पर बिछा कार्पेट फटा हुआ था और मैल के कारण बहुत भद्दा लग रहा था। दीवार के डिस्टेम्पर पर असंख्य दाग पड़े हुए थे। कांच के केस में लाल-नीली मछलियां तैर रही थीं। सीढ़ी के मोड़ पर दीवार में एक शीशा लगा था । तार के पिंजरे में कनेर चिड़ियों का झुण्ड था। शीशे में मेम भाभी की छाया पड़ते ही उसके बगल में मुझे अपनी प्रतिच्छवि भी दिखाई पड़ी। मैंने अपना चेहरा देखा तो मुझे पता चला कि डर और उत्सुकतावश मेरा मुंह विलकुल सूख गया है। मैंने कहा, 'यह कहां ले आई हो मुझे, मेम भाभी?' मेम भाभी ने कहा, 'तुझे डरने की कोई जरूरत नहीं है, मैं । ८२ पटरानी जो साथ हूं।' मेम भाभी का उत्तर सुनकर में कुछ आश्वस्त हुआ। एक मकरी गली से गुजरकर मेम भाभी ने एक विलकुल अंधेरे कमरे के ताले में चावी घुमाई । वोली, 'आ, मैं यही रहती हूं। यही मेरा घर है।' इतने दिनों बाद आज भी उस दिन की बात सोचकर रोमांच हो माता है। कलकत्ते के जिस समाज के हम प्राणी हैं, उममे रहते हुए ऐसा वाता- वरण देखने का अवसर हमें बहुत ही कम मिलता है । हम जब छोटे होते हैं तव स्कूल जाते हैं, स्कूल के बाद मैदान मे सेलने चले जाते हैं और उस- के बाद घर आकर पढ़ने बैठते हैं । रोजमरें का यही इतिहास है हमारा। बहुत हुआ तो कभी-कभार किसी धात्मीय के यहां शादी-ब्याह या याद जैसे अनुष्ठान में जाकर कुछ विशेष जानकारी हमे मिल जाती है। यार- दोस्तो के नाम पर जो भी परिचित होते हैं वे सब स्कूल और पेल के मैदान की परिधि तक ही सीमित रहते हैं। दरअसल, बगल के मकान के लड़के-लड़कियों से ही व्यावहारिक शिक्षा की जानकारी होती है हमे । इम पृथ्वी के बारे में विशेष जानकारी इन्ही लोगों से सीखते हैं हम । इन सव के अलावा, अगर हम कभी अन्य शहरो मे घूमने-फिरने भी जाते हैं तो मा- वाप के शासन मे दवकर ही रहना पड़ता है हमे । जो कुछ देखते हैं, बस आपों से हो देखते हैं और जो कुछ सीखते हैं, सिर्फ मन से ही सीखते है । इन सबकी उपेक्षा करके कुछ और सोचना हम सीप ही नहीं पाते । मोच पाने की शिक्षा भी नहीं मिलती। बल्कि ऐसा सोचना भी हमारे लिए अपराध समझा जाता है। पर मेरा मामला कुछ अलग ही था। मैंने बडे-बूढी की बात कभी नही मानी और दूसरे की नज़रो से देखी हुई बात को खुद की देवी हुई सोचने की गलती भी मैंने कभी नहीं की। लजोला-सा बना अपने मन की गलियो मे सुद ही साक छानता फिरता रहा। सभी चीजो का अर्थ मैंने अपनी समय के अनुसार समझा । नियित के चक्र के साथ-माय बहुत-से लड़के- लड़कियों से घनिष्ठ होकर मिलने-जुलने का मुअवसर भो मुझे मिला। वे पटरानी । लोग विना किसी तकल्लुफ के मुझसे मिले। किसी-किसीने तो अपना दिल ही दे दिया मुझे। मैं भी उनसे खुश हुआ और उनके दुःख में रो-रोकर अपने दिल को दुःखित भी किया। इसका उदारहण थी मेम भाभी । मेम भाभी अगर उस दिन मुझे अपने साथ नहीं ले जाती तो क्या मैं कभी वहां जाता? किसको पता चलता कि कलकत्ते में ही एक ऐसा स्थान भी है ? किसे मालूम होता कि कल- कत्ते जैसे शहर में चार रुपये किराये में भी कमरा पाया जा सकता है ? किसे पता था कि हीरे की चूड़ियां, मुक्तों की माला, कीमती सिल्क का गाऊन, सुनहरे सैण्डिल और मामूली भोजन की थाली इत्यादि सब कुछ दैनिक रेट के अनुसार भाड़े पर मिल सकता है ? सुना है कि झांकी, नाटक वगैरह की ड्रेस तो किराये पर मिलती है और शादी-विवाह के अवसर पर चेयर, टेवुल, शमियाने, तकिये, हुक्के, कप-डिश वगैरह भी, लेकिन... मेम भाभी ने कहा, 'तुम एक मिनट वैठो, नटखट । मैं अभी आई।' मुझे डर लगने लगा, 'क्यों? तुम कहां जा रही हो?' मेम भाभी ने कहा, 'अभी आती हूं। तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं ।' कहकर मेम भाभी अंधेरे में गायब हो गई। मैं एक टूटी चारपाई पर बैठा हुआ था और चुपचाप चारों ओर नज़रें दौड़ा रहा था। फटी चादर पर कुछ मैले-कुचैले कपड़े पड़े हुए थे। मेम भाभी के कपड़े इतने मैले हो सकते हैं, मैं सोच भी नहीं सका । मुझे लगा, शायद समय के अभाव में ये कपड़े धोबी को नहीं दिए गए हैं। बाहर सहन में कुछ बत्तखें पुकार उठीं । नीचे सड़क पर भी क्षण-भर के लिए कुछ शोर- सा उठा। बहुत-से लोगों के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ सुनाई पड़ी। यहां भी नाक में मांस भुनने की गंध आ रही थी। अचानक ही पैर के पास एक विलाव जैसा मोटा चूहा दिखाई पड़ा, जो मुझे देखकर वापस दरवाजे की तरफ भाग गया। मैं चौंक पड़ा। वगलवाले कमरे में ग्रामोफोन बज उठा। साथ में कई मेम साहिवाओं के गले का स्वर भी सुनाई पड़ रहा था। ६४ पटरानी कुछ हंसी-मजाक के टुकड़े और सस्त्र सिगरेटों का धुआं तभी सीढी पर धम-धम को आवाज हुई। मेम भाभी ने कमरे में प्रवेश किया। हाथ में पता नही क्या लाई थी। उसका चेहरा देखकर मैं चौंक पड़ा। पूछा, 'यह क्या है ?' मेम भाभी ने कहा, 'आज मैंने कुछ भी नही साया, इमलिए तुम्हारे लिए भी ले आई हूं।' वह एक कागज के ठोगे में बहुत सारे तले हुए अंडे और एक जग में दो व्यक्तियों के लिए चाय लाई थी। मैंने पूछा, 'लेकिन तुम्हारा वह सिल्क का गाऊन कहां गया?' मेम भाभी ने कहा, 'दूकान को चीज थी। वही वापस लौटा दी।' मैंने अचरज से पूछा, 'दुकान की चीज थी ?' मेम भाभी ने कहा, 'गहने, गाऊन और सैण्डिल वगैरह का दैनिक किराया साढे पाच रुपया होता है । आज किराये के लिए मेरे पास नवाद रुपये नहीं थे, इसलिए कह दिया कि कल दूगी। अब तो उसके साथ जान- पहचान हो गई है ना, इसलिए जो मागतो हूं, उधार दे देता है।' मेरे मुह से कोई आवाज नहीं निकली। मैं यक्ति-सा मेम भाभी के चेहरे की ओर देखता रहा । शरीर पर मैला गाऊन पा और पैरों मे चप्पल, पर गले में नेकलेस और हापों में चूड़िया आदि कुछ भी नहीं थी। मेम भाभी मेरे जग मे चाय ढालते हुए कहने लगी, "किसी जमाने में मेरे पास पुद का मकान था, खुद की कार थी; इस बात पर किसीको यकीन ही नहीं माता । अलक मेरे हाथों मे हजारो रुपगे लाकर रख देता था। मैंने सोचा था, शायद अब जिन्दगी में सुख-शाति मिलेगी। सोचा पा, होरा से मेरा शतं लगाना सार्थक हो गया।' फिर बोली, 'अय यहा मैं जूठा-ऊरा कुछ नहीं मानती । एकादशी, पूर्णिमा में भी विश्वास नहीं करती। एक बात और बताऊ? मैं विधवा हूं, यह भी अब मुझे याद नहीं रहता।' कुछ रककर फिर वोली, 'गोचर मे पागन भी नहीं लीपती अब मैं । - कि तुम र पर भांचल लेकर तुलसी को प्रणाम भी नहीं करती। मैं अपने पूर्व- वन को बिलकुल भूल चुकी हूं।' मेरे चेहरे की तरफ देखे विना मेम भाभी आगे कहने लगी, 'मैं जानती नटखट, फिर आओगे; लेकिन तुम आए किसलिए हो ?' चाय के जग में एक चुस्की लगाते हुए वह वोलती गई, 'यहां सबको यही मालूम है कि छह महीने हुए मैं वेल्स से आई हूं। मेरे कारण ही होटल के ग्राहक बढ़ गए हैं । एक दिन तो मेरे चलते शराब पीकर सबने मार-पीट भी कर ली। सुलतानगंज के प्रिंस...।' मैंने कहा, 'यह सब बातें मुझे सुनाते हुए तुम्हें ज़रा भी शर्म नहीं आती?' मेम भाभी पहले जैसी मधुर हंसी में हंस पड़ी । बोली, शर्म भला क्यों आने लगी ? जब इकत्तीस रुपये छह आने साथ लेकर अपना वह घर और मोहल्ला छोड़कर मैं यहां आई थी, उस दिन क्या मुझे या मेरी इज्जत को बचाने के लिए कोई आगे बढ़ा था? फिर आज मुझे शर्म क्यों आएगी?' उसने चाय की और एक चुस्की ली और बोली, 'यह सच है कि मैं मेमसाव हूं, लेकिन थी तो अलक की बहू न ! जब रिश्तेदारों ने जबरदस्ती मेरा मकान मुझसे छीन लिया, तब मैं कहां और कैसे रहूंगी; यह पूछने क्या मेरे पास कोई भी आया था ?' कुछ चुप रहकर वह फिर बोली, 'मैं अंग्रेज़ भले ही हूं, लेकिन हूं एक लड़की ही न । क्या मेरी कोई इज्जत नहीं थी, शर्म नहीं थी या आ नहीं थी? वताओ।' मेम भाभी हंसने लगी। बोली, 'इसीलिए तो तुम्हें यहां ले आई हूं अपनी आंखों से ही देख जा। जिनको तुम लोग निम्नकोटि के कहते उन्हीं लोगों ने बुरे दिनों में मुझे सहारा दिया। इन लोगों ने सभी मुझे उधार दीं। मुहल्ले के सबसे बड़े गुण्डे अब्दुल मियां ने मुझे अभय दिया। मुझे कपड़े-लत्ते किराये पर मिल जाएं, उसीने इसका इ. किया। उसने वह सब कुछ किया जो तुमलोग नहीं कर सके। पटरानी मेरी थोर देवकर वह एकाएक बोली, 'मुझे यहा ऐमा गाना गाने देखकर तुम्हें शायद घृणा हो रही है ? क्यों ?' मेरे मुंह से कोई बात नही निकली। मम भाभी ने मागे कहा, 'तो टीक है। मैं फेंक आती हूं।' वह साने की डिश लेकर जंगले की तरफ जाने लगी। उसे उधर जाते देखकर मैं लपककर उठा और मेम भाभी का हाय कमकर पकड़ लिया। मैंने कहा, 'मुझपर क्या तुम्हे जरा भी दया नहीं आती, मेम भाभी। तुम्हारे पांव पड़ता हूं, फेंकना मत।' मेम भाभी ने कहा, 'मेरे लिए क्या कभी किमीको दया आई थी ?' यह कहकर वह बिस्तर पर आ बैठी। फिर बोली, 'तुम अपनी आंखों से देख आए हो कि मैं होटल के 'वार' में क्या कर रही थी ? अव इसके बारे मे तुमसे झूठ क्या कहूं ? पर मुझे भी तो अपना पेट पालना पड़ता है। मुझे भी तो कमरे का किराया देना पडता है। चावल-दाल गरीदने के लिए पंसो का जुगाड़ करना पड़ता है। रात का खाना-पीना तो वहीं पर उनके पसी से हो जाता है, लेकिन सुबह का ? सुबह भी तो कुछ साना ही पड़ता है। मैंने कहा, 'तुमसे इतनी कैफियत कौन चाहता है, मेम मामी ?' मेम भाभी ने मेरी बात नहीं सुनी और अपनी धुन मे कहती गई, 'इम मुहल्ले मे अन्दुल मिया जैसे गुण्डे का दल है, इसीलिए किसी तरह वच पाई हूं। पर तुम्ही बतावो, क्या इसीको जीना कहते हैं ?' मैंने पूछा, 'अच्छा, विलापत लौट जाने में तुम्हारे कितने रुपये पर्व होग?' मैम भाभी हसी के मारे दुहरी हो गई। बोली, 'तो तू रुपये देगा मुझे ? अब शायद बहुत पैसे हो गए हैं तुम्हारे पाम ?' 'मैं अपना सोने का बटन, घडी आदि मय बेचकर तुम्हारे लिए रुपयों का इन्तजाम कर दूंगा, तुम चली जाओ। इन मवको बेचकर तीन सौ रुपये तो मिलेंगे ही?' मैंने कहा, पटरानी

मेन भाभी ने कहा, 'इतने रुपये मेरी एक रात की कमाई है, यह पता
न्हें ?'
मैंने नजरें उठाकर गौर से मेम भाभी की ओर देखा।
मेन भानी ने कहा, 'हां, भाई। मेरी एक रात की आमदनी तीन सौ
पये है। कभी किसी राजा-महाराजा से पाला पड़ जाता है तो हजार तक
तो कमा लेती हूं। पर इतने से भी मुझे पूरा नहीं पड़ता । मेरा मासिक
वत्रं बहुत अधिक है । एक दिन में साढ़े पांच रुपये तो गाऊन का ही किराया
लगता है, फिर तीन-चार सौ से भला क्या होगा?'
नुझे महसूस हुआ, मानो मेम भाभी शराव पीकर वहक रही है। मुझे
शक हुआ कि इतनी देर से में किसी पगली से बात नहा हूं और वह
जो कुछ कह रही है, वह सब निराधार है। मैंने में
गौर से.
देखा तो महसूस हुआ कि सारी-सारी रात जागने
भाभी

1 मम भाभी का स्वर सप्तम पर पहुंच गया। बोली, 'छोटे मुंह बसी वात करता है? दरवाजे की ओर कदम बहाते हुए मैंने कहा, 'मैं तुम्हारा वान भार करता था, इसीलिए तुम इतना सब कह सकती हो। परना...!' मेम भाभी गुस्से के मारे कांपने सगी । चिल्लाकर पोती, निरसना, तू इसी वक्त मेरे कमरे से निकल जा!' में धीरे-धीरे दरवाजे से निकल रहा पाफि गेम भाभी ने पीगो पुकारा, 'सुन !' और वह स्वप मेरी तरफ यह आई। यौली, तरी क्या है ? मुझे भी गुस्मा आ गया था। मैंने कहा, 'पराध गोगों से भगर तुम अंधी न हुई होती तो गुद ही समझ लेती fr तुम्हारे गा मगर मोकर रान बिनाने लायक उम्र नहीं हुगेगे।'

मेम भाभी का रोना थम गया, लेकिन उसने पीछे मुड़कर देखा नहीं। उस व्यक्ति ने फिर पुकारा, 'मेम दीदी, सुलतानगंज के छोटे कुमार- साहब आए हैं।' अव की वार मेम भाभी उठी और चुपचाप आंखें पोछ ली। उस व्यक्ति की ओर मुंह करके उसने पूछा, 'कौन ? यूसुफ ? क्या वात है ?' यूसुफ ने कहा, 'सुलतानगंज के छोटे कुमारसाहब बड़ी-सी कार लेकर आए हैं। नीचे खड़े हैं।' मेम भाभी ने हठात् मेरी ओर देखा। मैं उसी जगह खड़ा था। मैंने मन ही मन कसम खाई कि अब चाहे मेम भाभी कितना भी जाने को कहे, मैं यहां से हगिज नहीं जाऊंगा। मेम भाभी ने यूसुफ से कहा, 'तू जाकर कुमारसाहब से कह दे कि आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है।' यूसुफ ने कहा, 'वे वहुत बड़े आसामी हैं, मेम दीदी; कहीं नाराज हो गए तो?' मेम भाभी ने कहा, 'यूसुफ, मैं तुम्हें जैसा कहती हूं, वैसा करो।' यूसुफ ने कहा, 'वे होटल भी गए थे, पर वहां आप नहीं मिलीं; इसी- लिए यहां तुला लाया हूं। कुमारसाहब ने नई कार खरीदी है।' पता नहीं मेम भाभी ने क्या सोचा, फिर मेरी ओर मुड़कर बोली, 'इतनी रात हो गई, क्या तू घर नहीं जाएगा?' मैंने तटस्थ नज़रों से मेम भाभी की ओर देखते हुए कहा, 'नहीं।' मेरा जवाब सुनकर मेम भाभी चकित रह गई। बोली, 'नहीं जाएगा?' - मैंने भी उसी तरह जवाब दिया, 'नहीं।' मेम भाभी ने कहा, 'मेरे रुपयों का नुकसान करवाकर तुझे क्या मिलेगा?' मैंने कहा, 'तुम्हें कितने रुपये चाहिए, मैं दूंगा। मेरी घड़ी, सोने का बटन, मेरे जन्म-दिन पर मिले चालीस रुपये, तीन मोहरें, पांच अंगूठियां - - १० पटरानी मादि जो कुछ मेरे पास है, सब कुछ तुम्हें दे दूगा।' प्रमुफ बेचन-सा हो उठा। वोला, 'क्यों बात बढ़ा रहे है, बाबू ! मुलतानगंज के छोटे कुमारसाह्य मेम दीदी के लिए हजारों रुपये खर्च करेंगे। ऐसी पार्टी हाथ से निकल गई तो बाद में अफसोस होगा।' मेम भाभी ने बीच में उमे रोकते हुए कहा, 'यूसुफ, तुम चुप रहो।' उसके बाद मेरो ओर मुखातिब होकर वह बोली, 'तो तू मचमुच नहीं जाएगा?' मैंने कहा, 'नहीं।' मेम भाभी ने कहा, "किसी तरह भी नहीं जाएगान?' तब भी मैंने यही कहा, 'नहीं, मैंने तुम्हारे माथे पर सिंदूर की बिन्दी लगाई है। तुम्हारे दोनों पांवो मे अपने हाथों से महावर रचाया है । कालीघाट से एक दिन तुम्हारे लिए शंख की चूड़ियां खरीद लाया था। इसके अलावा अलकेश भैया की बीमारी के वक्त तुम्हारे गिर्जावाल देवता के मामने मन्नत मानो यी, कालीजी की पूजा को थी। तुम्हारे लिए मैंने क्या नहीं किया, जरा बतायो तो!" मेम भाभी हमने लगी । बोली, "उससे क्या फायदा हुआ ? मलक के मरते हो शख की चूडो, सिन्दूर, महावर आदि सभी तो उतारकर फेंकना पड़ा। तुम्हारे या मेरे देवता में से किसोने भी तुम्हारी विनती सुनी ?" मैंने कहा, "तो क्या रुपये ही तुम्हारी नजर में अधिक महत्व रखते हैं ? रुपये होने से ही क्या तुम्हारे तमाम दुःख खत्म हो जाएंगे? इतने रुपये तुम्हें किसलिए चाहिए, बतायो तो? क्या तुम चाहती हो कि रुपये के लिए तुम अपनी बलि दे दोगी?' मेम भाभी ने परेशान होते हुए कहा, 'योडा-सा और धीरज रख, बडा होकर मेगा कि रुपयों का पा महत्त्व है ?' मैंने कहा, 'अब मैं पहले जैसी कच्ची उम्रवाला लडका नही रहा, मेम भाभी । हां, अब मैं वह कच्ची उम्रवाला लड़का नहीं हूं!' मेम भाभी ने कहा, 'बस-बस, रहने दे। अगर मेरे कोई बेटा होता ती न तुमसे भी बड़ा होता । तब मेरे लिए तुम बच्चे नहीं तो और क्या हो, रासुनूं तो?' मैंने कहा, - 'फिर भी मैं सब कुछ समझता हूं, मेम भाभी। तुम होटल सलिए जाती हो, सुलतानगंज के छोटे कुमारसाहब रात के समय किस- नए तुम्हारी खोज में यहां आए हैं; वह सब मैं समझता हूं।' मेम भाभी ने कहा, 'अव तुम्हें और कुछ भी समझने की जरूरत नहीं। मैं कहती हूं, तू यहां से बाहर निकल जा।' फिर यूसुफ की ओर मुखातिब होकर वोली, 'यूसुफ, तू जा और दूकान से सैंडिल, गहने, गाऊन आदि सब कुछ ले आ । उससे कह देना कि रुपये सुबह मिलेंगे।' यूसुफ जाते-जाते मेरी ओर व्यंग्य-भरी नज़रों से देखता हुआ कह गया, 'क्यों वेकार ही गड़बड़ करते हो भाई, अव खिसक जाओ।' मुझे आज भी वह रात अच्छी तरह याद है, जव मैं उस अपरिचित गंदी वस्ती में मेम भाभी के गन्दे कमरे अपनी समस्त चेतना खोकर अचेत-सा बैठा था। पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगा कि कुछ देर बाद मेरे देखते-देखते ही एक प्राणी रसातल की गहराइयों में डूब जाएगा। एक प्राणी मेरी ही नज़रों के सामने आत्महत्या कर लेगा और मैं अपंग की तरह आंख फाड़े सिर्फ देखता रह जाऊंगा । मेरे किए कुछ भी नहीं होगा। मेम भाभी की तमाम शिक्षा, सतीत्व और संयम आदि सिर्फ रुपयों की बाढ़ में बहकर मिट्टी में मिल जाएंगे। यह भी याद है कि उस दिन मेम भाभी मेरे सामने सिर्फ चुपचाप खड़ी रही थी। वहुत देर तक खड़े रहने के बाद मेम भाभी ने कहा था, 'अव तो जाएगा न, भइया! सच, तू बहुत सयाना है ! मेरी आंखें भला सूखी कहां थीं ! मैंने कहा, 'नहीं जाऊंगा। देखत हूं, तुम कैसे आत्मघाती बनती हो ?' मेम भाभी हंस पड़ी। बोली, 'अगर मैं आत्मघाती होती भी हूं तो ते क्या जाता है ? तू क्या लगता है मेरा?' मैंने कहा, 'यह जानता हूं कि मैं तुम्हारा कुछ नहीं लगता, पर अ ! १२ पटरानी तुम्हारा कोई बेटा होता तो?' मेरी बात सुनकर मेम भाभो निमिप-भर को अन्यमनस्क हो गई। उसके मुंह से कोई जवाब नहीं निकला। मैंने फिर कहा, 'अपने बेटे के सामने ऐसा करते तुम्हें शर्म नही याती?' मेम भाभी क्षण-भर गुमसुम पडी रही। फिर विस्तर पर बंट गई। में मेम भाभी के नजदीक चला गया । तब भी वह उसी तरह बैठी रही। फिर धीरे-धीरे उसने कहना शुरू किया, 'हां रे, क्या तू मुझे यहाँ से निकालकर कहीं ले जा सकता है ?' मैंने कहा, 'क्यों नहीं, बताओ कहां जाओगो तुम?' 'जहा भी चाहो।' पता नहीं मुझे क्या हुआ कि म पूछ बैठा, 'हमारे घर चलोगी, मेम भाभी?' मेम भाभी ने कहा, 'चाहे जहा भी ले चल; वस, अब इस मुहल्ले में नहीं रहूंगी। फिर न जाने मेम भाभी ने क्या सोचा । बोली, 'तुम्हारे घर? तेरी मां क्या मुझे बहा रहने देगी ?' फिर अपनी ही धुन मे वह बडबड़ाने गगी, 'मैं फिर से अच्छी हो जाऊगी। फिर से सफेद वस्त्र पहनना शुरू कर दूगी। निरामिप भोजन करना शुरू कर दूगी। तुम्हारी गृहस्थी का सारा काम कर दूगी।' मैंने मम भाभो को सब कुछ कहने दिया, रोका नहीं। मुझे उसपर बहुत दया आई । उसकी हालत देखकर मुझे उसपर बहुत तरस आया । मेम भाभी ने आगे कहना शुरू किया, "किसी-किसी दिन तो मुझे बहुत ही खराब लगता है यह सव। जानते हो. रात के तीन बजे से पहले मुझे कभी नहीं छोड़ते वे लोग। उन लोगो के सामने उनके बरावर स्फूति दियानी पड़ती है, उन लोगो के बराबर ही शराय पीनी पड़ती है। अगर आपो में नीद पुल आए, तब भी वे नहीं छोड़ते । अगर तवियत सराव लगे, तब भी रिहाई नहीं देते।'

, . मैंने कहा, 'लेकिन तुम्हें भी तो वही सब अच्छा लगता है !' 'क्या खाक अच्छा लगता है ! रोने का मन हो तो रो नहीं सकती, नींद आए तो सो नहीं सकती। मन नहीं हो, तब भी शराब पीनी पड़ती है । यह मेरा बहुत सुखी जीवन है न ! मैंने कहा, 'तुम्हें खुद ही जब मरने का इतना शौक है तो कौन बचाने आएगा तुम्हें, तुम्हीं बताओ !' मेम भाभी ने कहा, मैं तो जिन्दा रहने की ख्वाहिश लेकर ही यहां आई थी, इसीलिए तो अलक से शादी की थी।' मैंने कहा, 'पर सच्चे दिल से कभी तुमने ज़िन्दा रहने की कोशिश की otic मेम भाभी ने कहा, 'मालूम है, कभी-कभी तो इन लोगों के अत्याचारों से ऊवकर आत्महत्या कर लेने की इच्छा होती है मेरी।' मैंने कहा, 'लेकिन अभी तो तुम कह रही थीं कि इन्हीं लोगों ने, मतलव यहां के अब्दुला और यूसुफ मियां ने ही तुम्हें बचाया है ?' मेम भाभी ने कहा, 'इन लोगों ने मुझे बचाया है, यह सच है । पर उस वक्त मुझे क्या मालूम था कि ये लोग लड़कियों के दलाल हैं। मेरी आय के हर पैसे में इन लोगों का भी हिस्सा होता है। मेरे रक्त के कतरे तक क' ये व्यापार करते हैं।' मेम भाभी की बातें सुनकर मेरा दिल डर के मारे दहल उठा। मैंने कहा, 'मैं सिर्फ यही सोच रहा हूं मेम भाभी, कि इतने जुल्मों में भी तुम अब तक जिन्दा कैसे हो ?' मेम भाभी ने कहा, 'मैं क्या जीने में जीती हूं रे, इधर देख !' अं उसने दाहिने हाथ की अंगुली से अपनी आंख की पलक ऊंची करके दिख और बोली, 'खून की. एक बूंद तक भी नहीं है मेरे शरीर में। डॉ वैसाख का कहना है कि अगर यही रवैया चला तो. मैं अधिक दिन जी नहीं रह पाऊंगी।' कुछ देर चुप रहकर वह फिर कहने लगी, 'एक दिन तो होट सहते हुए १४ पटरानी हड़दंग मचाते-मचावे एकदम वेहोश होकर गिर पड़ी थी। बहन रात गए यूमुफ ने यहां से उठाकर डॉटर वैशाख के पास ले जाफर मुझे दिमाया पा और दवा वगैरह दिलाकर बचाया था।' हटात् गाऊन का एक हिस्सा जरा-मा ऊंचा करके अपने पांच दिखाते हुए यह बोली, 'यह देश, यहा से कट गया था उस दिन । अभी तक निशान भी है। रपये ब्रहर कमा लेती हूं, लेकिन दवाइया भी थमा कम सानी पटनी हैं ! डॉक्टर साय को भी यमी कितने ही रुपये देने वाकी हैं । मुझे तो हमेगा यही डर लगता है कि ऐमो हालत रही तो किसी दिन पदमा का शिकार बन जाऊंगी और पांसते-पासते पून यो उल्टियां करते हुए ही मर जाळगी।' मैं मला क्या कहता? मेरे पहने-सुनने को बाकी ही क्या रह गया था। नजर उठाकर देखा तो पता चला कि मीट-मेफ पर गाली गोशी-बोतली का अम्बार लगा हुवा है। मेम भाभी ने फिर कहना शुरू किया, 'जिस दिन मोचती हूं कि भाज होटल बिलकुल नहीं जाऊंगी, उस दिन यही अब्दुल आता है, या कभी- कभी यूमुफ आता है, और जवरन गाऊन-गहने वगैरह लाकर सामने रण देता है और रिवगा बुलाकर उममें बैठा देता है। रिवना भी इन्हीं लोगों के दल का है। यह मुझे सीधा होटल तक पहुंचाकर ही दम लेता है । बस, यहां पहुंचकर से क्या होता है, मुझे कुछ भी पता नहीं रहता।' मैं अब भी कुछ नहीं कह सका। मेम भाभी को आमों से सावन-भादी कीमही लग गई। मेम भाभी ने कहा, 'गालो पर रग मतकर, आखो में सुर्मा याजकर, भोही को पेन्सिल से नुकोली बनाकर, होठों पर लिपस्टिक रगइकर बहुत ही मुश्किल में मुझे जवान युवती का रूप धारण करना पड़ता है। एंड लगी येमियर पह्नकर रात के अधेरे में कुमारी जमी सजकर राजा- महाराजा, कैप्टन और मेजर वगैरह का दिल बहलाना पड़ता है। यह एक ऐमा पाप है, जिसे तू भला क्या समझेगा? बता !'

. फिर हठात् मेरी ओर मुखातिब होकर वोली, 'क्यों रे, तू तो कुछ बोल ही नहीं रहा है ?' मेरे मुंह से तव भी कोई आवाज़ नहीं निकली। मेम भाभी ने अपने हाथों से मेरी ठुड्डी को ऊपर उठाया और बोली, 'तुम्हें भी मुझपर घृणा हो रही है न ?' इसके जवाब में मैं क्या बोलूं, क्या न बोलू, मेरी कुछ समझ में नहीं आया। मेम भाभी ने कहा, 'जब मुझे ही स्वयं से वेहद वितृष्णा होती है तो तुम्हें तो होनी स्वाभाविक ही है।' इतनी देर बाद अब मेरी जवान खुली। मैंने कहा, 'मेम भाभी, तुम फिर से ज़िन्दा रहना चाहती हो न?' मेम भाभी ने कहा, 'तू मुझे इस अब्दुल और यूसुफ के हाथों से वचा, भाई।' पूछा, 'क्या तुम आज ही मेरे साथ चलोगी?' मैम भाभी ने कहा, 'चलूंगी, तू जहां ले जाएगा, वहीं चलूंगी।' 'पर तुम्हें ऐसे जीवन का मोह छोड़ना पड़ेगा।' मेम भाभी ने कहा, 'अगर छोड़ सकी तो समझो मैं जी ही जाऊंगी।' मैंने कहा, 'और तुम्हें यह रुपयों का जो नशा है, वह भी छोड़ना पड़ेगा।' पता नहीं यह सुनकर मेम भाभी क्या सोचने लगी। कुछ देर तक उसके मुंह से कोई आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ सूनी निगाहों से अंधेरे को धूरती रही। फिर बोली, 'पर रुपये तो मुझे चाहिए हो।' मैंने कहा, 'मेम भाभी, मैं तुम्हें अपनी मां की तरह आदरपूर्वक रखूगा, किसी तरह की भी तुम्हें चिन्ता नहीं होने दूंगा। खाना, कपड़ा, सुख, शान्ति सभी कुछ तुम्हें देने की कोशिश करूंगा। जो कुछ में खाऊंगा, तुम्हें भी वही खिलाऊंगा। मेम भाभी ने कहा, 'अपने घर में रखोगे मुझे ?' . - -- ६६ पटरानी मैंने कहा, 'मुझे एक नौकरी मिल गई है। उन्हीं रपयों मैं तुम्हारे लिए एक कमरा किराये पर ले दूंगा। तुम्हारे लिए दायी-नौकर सब रहेंगे। उन सबके विषय में तुम्हें कुछ भी नहीं सोचना पड़ेगा। पया मेरे साथ चलोगी, मेम भाभी?' मेम भाभी ने कहा, 'लेकिन...!' मैंने कहा, 'सगी मां को तरह तुम्हारी सेवा करूंगा। बतायो मम भाभी, चलोगी मेरे साथ ?' मेम भाभी ने बहुत निरीह नजरें से मेरी ओर देखा । बोली, लेकिन रुपये?' मैंने कहा, 'रुपये तुम्हें किसलिए पाहिए, बढामो? तुम्हारे हाथ-सचं के लिए? वह मैं दूंगा तुम्हें !' मेम भाभी ने कहा, 'पर मुझे हाय-पत्र के लिए रुपये नहीं चाहिए।' 'तब?' मेम भाभी ने कहा, 'रूपये मुझे बहुत जरूरी चाहिए, रे।' 'पर किसलिए, यह तो बताओगी !' मेम भाभी ने कहा, 'वस, मुझे रुपये चाहिए। रुपये के बिना मेरा काम चल नहीं सकता। मुझे बहुत रुपये पाहिए । बहुत का मतलब, हजारो रुपये की आवश्यकता है मुझे।' मैंने कहा, 'इतने रुपयो का क्या करोगी? क्या गहने बनवामोगी?' मेम भाभी ने कहा, 'नही रे, गहने बनवाने का शौक तो मेरा मिट ही गया है। 'तव ? क्या मकान बनवाओगी?' मेम भाभी बोली, 'मकान ? मकान का क्या करूगी ?' 'तो क्या कार यरीदोगी?' मग भाभी ने जवाब दिया, 'गहने, मकान, कार, किसी चीज का [भी अब मुझे शौक नहीं रहा। इनमे से मुझे कुछ नही चाहिए। लेकिन फिर भी मुझे रुपयो की जरूरत है। मुझे सिर्फ रुपये चाहिए, और हर पटरानी हालत में चाहिए।' जैसे वह पागल हो गई हो, इस तरह मेम भाभी प्रलाप करने लगी। मेम भाभी का चेहरा देखकर मुझे डर-सा लगने लगा। थोड़ी देर पहले वह शराब पीकर आई है शायद उसका नशा अभी तक उतरा नहीं है। इतनी देर में पसीने के मारे और रोने से चेहरे, होंठ, आंखों के काजल का रंग धुल-पुंछ गया था। मैले फटे गाऊन की ओट में मेम भाभी के बदन की दुर्वलता मानो स्पष्ट दीख रही थी। मुझे ऐसा लगा, मानो मेम भाभी को किसी बड़ी बीमारी ने आ घेरा है और अगर अधिक दिनों तक यही हालत रही तो वह मर जाएगी। मैं अभिभूत मन से मेम भाभी का वह उन्मादित रूप देखता रहा। अचानक बाहर से यूसुफ की आवाज सुनाई पड़ी, 'मेम दीदी!' निमिप-भर में मेम भाभी चकित होकर उठ खड़ी हुई और दरवाजे की ओर कदम बढ़ाती हुई बोली, 'कोन, यूसुफ मियां ?' यूसुफ कमरे के भीतर चला माया। उसके एक हाथ में हैंगर में झूलता हुआ एक नया गाऊन था और दूसरे हाथ में गत्ते के डिब्बे में नये जूते थे। उसने अपनी जेब से एक नकली मोतियों का हार, नकली हीरे की चूड़ियां और पाउडर, पामेड, हेयरपिन वगैरह कई चीजें निकालकर मेम भाभी के सामने रखीं। अभी तक मुझे वहीं देखकर यूसुफ दंग रह गया। बहुत ही हिंसक नज़रों से मुझे घूरते हुए बोला, 'छोटे कुमार साहब बहुत गुस्सा हो रहे हैं, मेम दीदी, जरा फुर्ती कीजिए । माल-ताल सब तय कर रखा है।'' पता नहीं क्यों मुझे उस व्यक्ति पर वहुत घृणा हो आई । उसका जघन्य गन्दा चेहरा मुझे अपनी नज़रों में जहर के समान लगा । मैंने मह- सूस किया कि अभी इसी वक्त अगर इस व्यक्ति के चंगुल से छुटकारा पा सका तो जान बचेगी, साथ-साथ मेम भाभी को भी मुक्ति मिलेगी। मैंने कहा, 'यूसुफ, तुम चले जाओ। तुम्हारी मेम दीदी नहीं जाएगी।' मेरी बात सुनकर यूसुफ जैसे चकित हो गया। वोला, 'नहीं जाएगी?' १८ पटरानी

फिर उसने मेम भाभी की ओर माश्चर्य से देया।
मैंने फिर कहा, 'हां-हो, नहीं जाएगी।'
मेम भाभी ने तड़पकर मेरी ओर देसा, फिर एकाएक यूमुफ की ओर।
मानो उसको समझ में नहीं आ रहा था क्या कहे, भीतर ही भीतर मानो
किसी गहरी पीड़ा से उसका दिल छटपटा रहा था।
मैंने कहा, 'मेम भाभी, तुम नहीं जा सकती। मैं तुम्हें किसी हालत मे
भीनही जाने दूंगा, मेम भाभी।'
मेम भाभी युद्ध नागिन के फन की तरह फत्कार उठी । बोली, 'हा,
मैं अवश्य जाऊगी।'
मैं
यह सुनकर अवाक रह गया । योड़ी देर पहले ही जो इस कदर
रोई थी, जिसने यहा से छुटकारा पाने के लिए इतनी अनुनय-विनय की
थी, जिसने इस नरक-कुण्ड से मुक्तिपाने के लिए अभी हा हाकार मचाया
था; उसका यह व्यवहार देखकर मेरी बुद्धि जबाव दे गई।
उस वक्त मुझे क्या पता था कि अचभित और परित होना मेरा यहीं
खत्म नहीं होगा, बल्कि अभी बहुत कुछ वाकी है।
मेम भाभी ने यूसुफ के हाथ से गाऊन-जूते वगैरह सब लेते हुए मुझसे
कहा, 'अच्छा, अब तू जा।'
मुझे मानो जिद पड़ गई, अतः कहा, 'नहीं, मैं नहीं जाउगा।'
मेम भाभी ने कहा, 'बहुत रात हो चुकी है।'
मैंने कहा, 'होने दो।'
मेम भाभी ने कहा, 'तरी मा तुझे हाटेगी, तू पर चला जा।'
मैंने कहा, 'नहीं, मैं किसी तरह भी नही जाऊगा।'
भेम भाभी ने कहा, 'जरा सुनू तो, मैं तेरी लगती षया हू ?'
यूसुफ इतनी देर से हमारी बात तो सुन रहा था, पर हमारा मापग
में सम्पर्क गया है। यह मूत्र उसकी पहच से बाहर या । उसने मेरे यदन
पर हाथ डालने के मतलय से जैसे ही कदम बढ़ाया किमायें सास फरके
मेम भाभी गरज पडो, 'यूमुफ, पयरदार ! सयरदार!'
पटरानी

- - यूसुफ चुपचाप जहां का तहां खड़ा रह गया। मेम भाभी ने कहा, कपड़े बदलूंगी, अव तू जा यहां से ।' मैंने कहा, 'नहीं।' मेम भाभी ने कहा, 'मेरे पास और कोई दूसरा कमरा नहीं है, तू बाहर जाकर खड़ा हो।' तब भी मैंने यही कहा, 'नहीं, मैं बाहर हगिज़ नहीं जाऊंगा। और न ही तुम्हें जाने दूंगा।' अब की बार मेम भाभी ने मेरा हाथ पकड़कर मुझे बाहर धकेल दिया। बोली, 'मैं कहती हूं, तू चला जा यहां से।' मैंने बाधा डालने की कोशिश की। लेकिन मेम भाभी के हाथ का स्पर्श पाते ही महसूस हुआ, मानो मेरे शरीर में विजली दौड़ गई हो । मेम भाभी क्या सचमुच इतनी कमज़ोर हो गई है ? क्या उसका शरीर इतना क्षय हो चुका है ? लगा, मानो एक फूंक मारने से ही उड़ जाएगी, इतनी हल्की हो चुकी है वह । मानो ज़रा-सी ठेस लगते ही जमीन पर गिर पड़ेग और फिर उठ नहीं सकेगी। मुझे बहुत दया और करुणा आई उसपर ऐसा लगा, जैसे मेम भाभी को बहुत दिनों से खाना नहीं मिला हो। पे भरकर मानो भोजन नहीं खाती, सिर्फ शराव गटकती रहती हो। अतः उसे बाहर जाने से रोकने की अब मेरी इच्छा न रही । अपमान होकर धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतर आया। मेम भाभी ने फटाक दरवाज़ा बन्द कर लिया। सहन में पिंजरे में बैठी वत्तखें पीक-पीक उठीं । बगल के कमरे में बैठी लड़कियों ने कदमों की आहट सुनकर वार बाहर झांककर देखा, उसके बाद फिर से सिगरेट पीने लगीं। मैं बाहर सड़क पर निकलकर, मकान की रोशनी और साज-स को पारकर, गैस की रोशनी के नीचे अंधेरे की ओट में खड़ा रहा। मेम भाभी के मकान के सामने बहुत बड़ी कार खड़ी थी। मैं उस एकटक क्षण-भर वाद देखा, अंधेरे में एक भौतिक नारी-मूर्ति मानो में देखता रहा। पटरानी निकली हो। मैंने तीधी नजरों से देया कि गैस की रोशनी के पढ़ते ही नकली हीरे चमचम कर उठे। सिल्क का गाऊन भी जैसे चमक उठा। मेम भाभी फिर से बसी ही मोहिनी मूर्ति बन गई थी। रंग, लिपस्टिया, पाउहर वगैरह से वह दुवारा वही सुन्दर-स्वस्य युवती बन गई थी। पल-भर बाद कार के पौधे की दोनो लाल पत्तियां जल उठीं। एक सरं की आवाज हुई और गाड़ी धुआं उगलती हुई पूर्व दिशा की भोर चल दी। सड़क की हो सकता है, मेम भाभी मेरे जीवन का एक साधारण-सा प्रश्नांश ही हो। इतने सम्पर्को, इतनी चिन्ताओं और इतनी समस्याओं से भरे मेरे जीवन में मम भामो का क्या महत्त्व है, यह मैंने सहज ही अनुमान लगा लिया पा। मेरे जीवन में एक आया, एक गया । इसी तरह अनगिनत पदध्वनियो ने मुझे आकर्षित किया है । पर जिस वक्त जिसके पास रहा, जिसको पाहा, उसके बारे में ऐसा लगा मानो वह चली गई तो मेरा जीवन गूना हो जाएगा। लेकिन दरअगल हुआ कुछ नहीं । सचमुच गे मैंने कुछ भी नहीं खोया। बलि सभीसे मिली तमाम संचित सामग्री मेरे जीवन का ध्रुव बन गई । और यही मेरे जीवन को चरम सत्य रहा। बार-बार जिस 'तरह किसी चीज को योने के गम में पागल हुआ हूं, उसी तरह कुछ पाने की मुशी में उमंग एवं उल्लास भी पाया है। जब लोग पढाई-लिखाई, राजनीति, साहित्य और सिनेमा के पीछे अपना दिमाग यपा रहे होते हैं, उस वरत में कुछ भी नहीं करता । मैं मिर्फ मनुप्य के पीछे हो दिमाग यपाता रहता है। मैं जीवन के पीछे ही मारा-मारा फिरता रहा हूं। उस जीवन के पोधे, जो जिन्दगी के साथ शुरू होता है और मौत के साप जिसका अन्त है। उन बीवन के पीछे, जो किमी समोर निर्देश से निर्मित होता है और टूट भी जाता है। रम जीवन केसांचे अनुकूल अवस्था पाकर भी व्यर्थ चला जाता है, जबकि प्रतिकूल अवस्था होने पर भी ध्रुव बन जाता है । हमारे ऑफिस के भवनाथ वाबू कहा करते थे, 'कलयुग में मालिक ही सार है और सब असार ।' मेरी दीदी की बहुत ही गरीव घर में शादी हुई थी, अतः वह कहा करती, 'मैं अच्छी तरह देख चुकी हूं कि कलियुग में पैसा ही सार है।' मेरे पिताजी कहा करते , 'हमारे डिकिन्सन साहव, गाय और सूअर का मांस खाकर हजम कर जाते हैं, उन्हें कभी भी अनपच नहीं होता, अतः वही लोग सतयुगी व्यक्ति हैं।' और हमारे घर में भागवत-पाठ करनेवाला वह बूढ़ा पंडित वसंत कहा करता, 'श्रीकृष्ण के वैकुण्ठ गमन के बाद से ही कलियुग शुरू हो गया है। मैं पूछता, 'कलियुग के कौन-कौन-से लक्षण होते हैं, पंडितजी ?' बसंत पंडित कहता, 'श्रीमद्भागवत में शुकदेवजी ने कहा है कि अपनी इच्छानुसार पति-पली का आपस में सम्बन्ध होना, धोखेबाजी से व्यापार करना, रतिकौशल से स्त्री-पुरुपों के गुण जांचना और जनेऊ देखकर ब्राह्मणों का परिचय प्राप्त करना, चापलूसी-भरी बातों से विद्वत्ता एवं दांत देखकर साधुता का विचार करना आदि लक्षण कलियुग की निशानियां हैं।' सुनकर मैं सोच में पड़ जाता। यही सोच-सोचकर मुझे अचरज होता कि इतने युग की सब बातें ये पंडित लोग किस तरह जान जाते हैं ? शुकदेवजी ने किस तरह जान लिया कि कलकत्ते की एक गली में मेम भाभी को लेकर यह कहानी लिखने का मसाला तैयार होगा किसी दिन ? यह कैसे जान लिया था उन्होंने कि एक आधुनिक कहानीकार एक भ्रप्ट चरित्र की नारी के पास, उसपर कहानी लिखने का विषय ढूंढ़ने जाएगा? जिस समय समूचा बंगाल चावल-दाल का फाटका खेल रहा था, उस वक्त लोगों की नज़रों की ओट में ही एक भावी कहानीकार सब कुछ त्यागकर एक कांचन- कामिनी के मोहजाल में फंसकर एक नये जगत की सृष्टि करेगा? १०२ पटरानी मुकदेवजी पंडित थे, पानी ये और त्रिगुणातीत पुरुष थे। पर एक चीज उनको भी नहीं मालूम थी। और यही चीज मेम भाभी ने मुझे बता दी। वे नहीं जानते थे कि.. पर अभी वह बात जाने हो दें। उस दिन मेम भाभी के पर से मैं निकल तो आया पर मेम भाभी को भूल नहीं सकूगा, यह मुझे मालूम था। पूम-फिरकर रोज शाम के अंधेरे में उसो गली के मोड़ पर जा सड़ा होता और दूर से उस तिमंजिले मकान को टकटकी लगाए देखता रहता । शायद कहीं कोई आभास ही मिल जाए ! या कोई इशारा, या कोई इगित ! मेम भाभी के पुराने मकान के सामने से गुजरता तो बार-चार मुडकर उसे देयता रहता। मानो उम बिल्डिंग के सर्वांग में मेम भाभी के स्पर्श की सुगंध अभी तक बसी हुई हो। मानो उस मकान के पास जाने से मेम भाभी का सान्निध्य मिल जाएगा। जिन्होंने केस करके मकान पर अधिकार जमाया है, उन्होंने उस मकान को कभी हाथ तक नहीं लगाया। जैसा था, वैसा ही पड़ा है। पता नही मेरठ या दरभंगा में, कहां तो रहते हैं वे लोग । हो सकता है, वे इसे पेचना चाहते हों। उधर देखते-देखते मैं अपने मन में सोचता कि किसका घर है और कौन भोगेगा, पता नहीं । मंझले ताऊजी ने कितने अरमानों से बनाया था यह मकान । मुद अपनी देख-रेप में मकान बनयाया था। मंझली ताईमहा करती, 'हमने यह मकान बनवा दिया, अब अगर लड़के में गोग्यता होगी तो वह एक मकान और बनवा लेगा।' मंझले ताऊी कहते, 'हुह, तुम्हारा लड़का यकील बनकर सौटेगा। तुम क्या सोचती हो कि वह इस गलीवाले मकान में रहना पसन्द करेगा? नामुमकिन !' तय मंडाली ताई वहती, 'देसोजी, सहका और बहू रहेगी इस कमरे में, और हम दोनो युढे-युढ़िया रह लेंगे इसमें ।' समूची योजना पहले से ही पुख्ता बनाई गई थी। मझले ताऊजी स्वयं चतुर व्यक्ति थे, अतः कहीं कोई कसर नहीं रपी थी। पोते-पोतियों का पटरानी १०३ . कोई ठोर-ठिकाना नहीं था, पर पोते-पोतियों के लिए कमरा पहले से ही तैयार हो गया था। यहां तक कि जच्चा-घर भी बनवा लिया था। बेटे की बहू के लिए उसके शयन-कक्ष में संलग्न वाथरूम भी वनवा दिया था। इटालियन कम्पनी द्वारा मकान का फर्श बनवाया था। बेटे की बहू यहां बैठकर महावर रचाएगी, यहां बैठकर धूप में बाल सुखाएगी और यहां बैठकर अपनी सास को रामायण, महाभारत पढ़कर सुनाएगी आदि-आदि वातों में वहू को किसी बात का कष्ट न हो, ऐसा सोच-सोचकर उसकी सुविधा के लिए उनकी कल्पना-शक्ति ने कोई कसर नहीं रखी थी। अहीरी टोले के वोस बाबू स्वयं सम्बन्ध लेकर उनके पास आए थे। पर मंझले ताऊजी तो वस हंसी के मारे ही दुहरे हुए जा रहे थे। वोले, 'जव बेटा ही विदेश में है, तो उसकी शादी का सम्बन्ध कैसा? पहले लड़के को तो आने दीजिए।' वोस साहब ने कहा, 'उससे क्या आता-जाता है, मित्तिर साहब ! लड़के को मजे से अपनी पढ़ाई पूरी करके आने दीजिए न ! पर सगाई पक्की करने में हर्ज ही क्या है ?' चन्दन नगर के मशहूर दत्त घराने के मंझले वादू हाजिर हुए। बोले, 'आप मेरे बड़े भाई के श्वसुर के सगे मामा के लड़के के...!' • पर मंझले ताऊजी सभीको वही एक-सा जवाब देते । कहते, 'पहले लड़के को तो आने दीजिए।' मंझली ताई जव भी दुकानों में कपड़ा, गहना वगैरह खरीदने जाती, तो वहू के लिए भी साड़ी-ब्लाउज पसन्द कर आतीं। वे कहा करतीं, 'वहू के लिए वैसी ही साड़ी खरीदेंगे, वहुत सुन्दर है।' इसी तरह के कितने ही स्वप्न एवं अरमान थे दोनों के । और आखिर उनके अरमानों की बहूरानी भी आ गई। बहू के बदन का रंग रोज-मिल्क जैसा था ! खिची हुई दोनों भौंहें। ठीक वैसी ही बहू, जैसी सास-श्वसुर चाहते थे। पर मंझली ताई की तकदीर में जिन्दा रहना नहीं लिखा था। मरकर ही मानो उन्हें नया जीवन मिला। १०४ पटरानी रंगा चाची ने कहा, 'मैंने तो पहले ही कह दिया था कि वह मुस बने चिड़िया है, किसीको कैद में नहीं रहेगी।' रंगा चाची की यात शायद सब थी और में हो शायद गलती पर पा। पिताजी डिकिन्सन साहब की बहू का उदाहरण दिया परते थे, मासिरकार ये भी अचंभित रह गए थे। पर बीच में हमारे घर में मेम भाभी की आलोचना होनी कम हो गई थी। एक ही वस्तु भला जिन्दगी. भर के लिए जीभ को स्वादिष्ट लगती है ? कभी-कभी स्वाद बदलने की इच्छा होने लगती तो पर्चाओं का विषय भी बदल जाता। जैसे, वगत के मकान की बहू कसे बेहयापन करती है ! किसी एक पर को कुंभारी जवान लड़की को सिनेमा देखने के लिए नहीं जाने दिया गया, इसलिए उसने कसे टिपर आयोहिन पाकर आत्महत्या करने की कोधिग की थी। अयवा बुढ़ापे में सास-बहू दोनों को एक ही उच्चाघर में कैसे एक साप महके हुए थे आदि-आदि सवरें विल्कुल ताजी और बहुत रोचक होती थीं। अगर यह पहूं कि मेम भाभी की बात सिर्फ में ही नहीं भूल पाया था तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। एक दिन अचानक ऐसा हुआ कि मैं मेम भाभी के पुराने मकान के सामने से उसे देखते हुए गुजर रहा था, मेरी नजर लेटर-बपरा पर पड़ी। पता नहीं क्यों मुझे बहुत ही उत्सुकता हुई । उसकी फाक मे से देखा तो पता चला कि उसमे कितनी ही चिट्टियां पड़ी हुई हैं । जाने पव के पाए हुए पेचे पत्र ? मेम भाभी को यह मकान छोडकर गए हुए कई दिन, यस्कि महीने हो गए थे। पर अभी तक किसीने, इनको हाय नही लगाया और न कोई देख पाया । ये पर सेनेवाला वहा कोई पा भी तो नहीं। उसी दिन रात में मैंने एक लोहे की संडासी लाकर सेटर-यस्म का ताला तोडा और समूची चिट्टियां निकाल ली। एक-दो नहीं, बलि ढेरो पर थे और सब विलायन से आए थे। उस दिन सारी रात मुझे नीद नहीं आई। रात के दो-तीन बजे तक कुछ का कुछ सोच-सोचकर मैं माकाश-पाताल एक दिए दे रहा पारि यह पटरानी कैसे हो सकता है ? यह भला क्योंकर संभव होगा? अभी तक मुझे यही पता था कि मेम भाभी अपने मां-बाप की बहुत लाड़ली इकलौती लड़की है । मेम भाभी के मां-बाप पैसे वाले बड़े आदमी हैं। उनके यहां बहुत ऐश्वर्य और आराम है । वह सवको ठुकराकर, अपनी जन्मभूमि की ममता छोड़कर सिर्फ अलकेश भैया के प्रेम के चलते ही वंगाल देश की बहू बनकर आ गई है। आज तक मैंने यही सब सुना था। पर अब मेरा सव सोचा हुआ गड़- वड़ हो गया । मन ही मन सोचा, तो इतने दिनों से मेम भाभी ने क्या मुझे सब कुछ झूठ कहा था? उसकी तमाम बातें धोखे से परिपूर्ण थीं ? क्या उनमें कुछ भी सार नहीं था? पलक झपकते ही मेम भाभी के प्रति मेरा प्रेम मूल्यहीन हो गया। वह ऐसी झूठी है ! हां, अब पता चला कि मेम भाभी सिर्फ धोखेबाज ही नहीं, बल्कि झूठी भी है। क्षण-भर में ही मेरा दिल सूना हो गया। मेम भाभी की धोखेबाज़ी के कारण आत्मीय स्वजन, यार-दोस्त सभी मानो मुझे जहर के समान लगे। उस दिन मैं ऑफिस भी नहीं गया और डलहौसी स्क्वायर की बेंच पर बैठे-बैठे समूचा दिन विता दिया। तालाब के पानी के ऊपर बहुत-से मच्छर इस पार से चक्कर काट रहे थे। मैं सारे दिन चुपचाप वहीं बैठा रहा। मेम भाभी के नाम आई चिट्ठियां मेरी पॉकेट में कांटे की तरह चुभने लगीं। एक बार तो गुस्से के मारे सोचा, सारे पत्र टुकड़े-टुकड़े कर पानी में फेंक दूं। अगर सारे सम्बन्ध टूटने हैं तो भले ही टूटें ! जब मेम भाभी खुद ही मेरे साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहती, तो फिर मैं ही उससे कैसे सम्बन्ध रखू ? किसी दिन वह अलकेश भैया के घर में विदेश से उसकी बहू वनकर आई थी, बस, इससे अधिक और कुछ नहीं हुआ था। यों भी कितने लोग मे में व्याह कर लाते हैं, लेकिन इस देश में आकर बंगा- लिन कोई नहीं बन सकी। सिर्फ कुछ दिनों तक उन मेमों ने मिल-जुलकर रहने की कोशिश जरूर को थी लेकिन फिर जव मन हुआ, तभी वापस . १०६ पटरानी अपने देश लौट गई। इसी तरह मेम भाभी भी हमारे परिवेश में नहीं रह मकी और उसने अपनी राह चुन ली। वहीं मेरी पसन्द-मापमन्द, अच्छा लगना, बुरा लगना यादि कोई महत्त्व नहीं रखता। पहाड़ के समान वह दिन मैंने किस तरह गुजारा, यह मेरा दिल ही जानना है। समूचे कलकत्ते को मैंने छान मारा। पर किम रास्ते से जाकर विम रास्ते पर निकला, यह याद नहीं है । ऐमा लगता है, मानो मैंने बार-बार मेम भामी के घर के चारों ओर ही परिक्रमा की हो । मैम भाभी को मैं जितना भुलाने की कोशिश करता, मुझे लगता वह उतनी अधिक याद आती है। वह दिन कितना भयानक गुजरा, यह मुझे आज भी अच्छी तरह याद है । अब उस बात पर जरूर हंसी आती है । हसी याना गलत नहीं है, यह वात आज मैं समझता हूं । लेकिन उस समय उन कुछ बड़ी होते हुए भी शायद बुद्धि मेम भाभी के प्रभाव से आच्छादित पी। रात हो गई, तव में हारकर थकावट से चूर-बलांत-सा अपने घर लौट आया। ऐसा क्या एक ही दिन हुआ था मेरे साथ ? नहीं। एक दिन, दो दिन, बल्कि कई दिन, कई शामे पागल की-मो हालत में गुजरी हैं । कलकत्ते में सर कुछ पहले की तरह हो ज्यों का त्यो या। कहीं कोई व्यवधान नही आया था। ट्राम-बसें अपने नियमानुसार चल रही थीं। लोगों की भीड भी फुटपाथ पर रोज की तरह चल रही थी। रात का अधियारा फैलने के साथ-साय शहर हल्का और पृथ्वी संकीर्ण होती जा रही थी। जिसका जहां आश्रय और और-ठिकाना था, वह वही निश्चित होकर विधाम कर रहा था। पर मोह, मुझे उस वक्त कैसी जानलेवा पौड़ा थी, मेरे दिल की कैसी भयंकर हालत हो रही थी ! लग रहा था मानो कोई मुझपर जबर्दस्त प्रहार कर रहा हो । मानो दिगोने मुझमे विश्वासपात किया हो पा किमी. ने मेरा सर्वस्व अपहरण कर लिया हो। मुझे लगा कि मुलतानगज के छोटे कुमार साहब मानो मेरे दुश्मन हों, हालाकि छोटे दुमार माहब को मैंने कभी देखा नहीं था। उनके पास अपार धनराशि है और मुझे लगता उसी दौलत का प्रलोभन देकर मानो किसीने मेरी अन्तरात्मा निकाल ली हो। अनेक प्रकार के लोगों की भीड़ में शाम के समय मेम भाभी के मोहल्ले में खड़ा-खड़ा मैं देखता रहता। मुझे इतनी भीड़ में कोई देख नहीं सकता था। मैं देखता कि एक कोमा उड़कर आया और मेम भाभी के मकान की मुंडेर पर बैठ गया है। पल-भर उसने इधर-उधर देखा और उसके वाद उड़कर एक दूसरी छत पर चला गया। दीवार की दरार में एक छोटा-सा पौधा उग आया है। इंट, चूना और बालू की दरार से दो-चार हरी पत्तियां सिर निकाल रही हैं। छत पर बंधे वांस में एक लाल पतंग आकर अटक गई है। पश्चिम दिशावाली रेलिंग पर एक मैला-सा गाऊन, समीज और पेटीकोट- सा कुछ सूखने को डाला हुआ है आदि-आदि । मुझे यह सब इतना लुभावना लगता, मानो सामने बहुत ही सुन्दर और आश्चर्यजनक दृश्य हो । कौआ, पतंग, पीपल का पौधा, समीज, पेटीकोट-ये तमाम चीजें मेरी नज़रों में अपूर्व-सी हो उठी थीं। मैं वहां चिलचिलाती धूप या घनघोर बरसात में सड़क पर एक जगह खड़ा होकर यह सब देखता रहता। मैं पत्रों का पुलिन्दा वार-वार पॉकेट से निकालकर देखता और वहीं सड़क पर खड़े-खड़े पढ़े हुए उन पत्रों को फिर से पढ़ता। लेकिन पत्र भी कोई एक-दो तो थे नहीं ! मोहल्ले के डाकिये से भेंट होती तो मैं पूछता, 'मिसेज नोरा स्मिथ के नाम से कोई पत्र आया है क्या ?' डाकिया अपना वग टटोलकर कहता, 'नहीं।' मुझे लगता, अगर और पत्र मिलते तो और अच्छा होता। इन कुछ पत्रों ने ही मानो मुझे मेम भाभी के अधिक नज़दीक ला दिया और धनिष्ठ बना दिया। मेम भाभी के नन्हे-मुन्ने भाई-बहनों के लिखे वे पत्र, जिनमें नन्हे-नन्हे हाथों से लिखे टेढ़े-मेढ़े प्यारे-प्यारे अक्षर थे ! मेम भाभी के बहुत-से भाई-बहन हैं। मेम भाभी के इतने सारे भाई- वहन हैं, यह क्या पहले मुझे मालूम था? वे खत पढ़ते-पढ़ते मुझे महसूस होता कि मैं मेम भाभी को और भी नज़दीक पा रहा हूं। ऐसा लगता मानो १०८ पटरानी मेम भाभी अपनी कोई सगी हो । मम मामी ने मुमसे जो इतनी झूठी बार्ने कही थीं, उनपर अब न मुझे श्रोध याता था औरन दुस होता पानि मुझे मेम भाभी के अभाव के वे दिन याद माने लगते जब जाड़े के दिनों में उसे पहनने को गरम कपड़े नहीं मिलते थे, पीने को पाय नहीं मिलती पी एवं हाय-पैर सेकने को कोपले तक नहीं जुटे थे। मेम भाभी ने अपने जीवन में क्या कम दुःस सहे हैं ? विन्सेंट वायर को एक अधकचरी गली मे एक बीस वर्षीया लड़की तेरह भाई-बहनों को लेकर एक हाथ से साना पकाती है और दूसरे हाथ में कपड़ों में साबुन घिसती है 1 छोटे बच्चो को नोरी गाकर मुलाती है। किसी दिन जब देखती कि घर में खाने को कुछ नहीं तो ला मेकर दावार जाती और बीन,आलू, टमाटर, सेम वगैरह चुनकर ले आती। जो सड़ी-गली,कोई- पड़ी चीजें फेंक दी जाती, वही मव उठा लाती। आग बन्द करते ही मेरी कल्पनाशक्ति मानो देखने लगती कि एक सड़की यंता लेकर पर में बाजार के लिए निकली है । जव और लोग बाजार कर रहे हैं, उस वक्त उमरी नजर सड़क पर जमी हुई है। किसीकी डलिया से न जाने कब एक बैंगन गिर गया है, दूकानदार ने पता नहीं देखा है या नहीं; पर उस सड़की की दृष्टि उसीपर है। उसने भीड़-भाड में लोगों की नजरें बचाकर चुपचाप उसे पले में डाल लिया। इस तरह पूरी गृहस्पोपा भार उन छोटी-मी लड़की पर ही मा गिरा पा। एक रात में विली ने लिया था, 'दीदी, अव में पब्लिक स्कूल में पास हो गया हूं। हेढ मो पाउण्ड और भेज देना। अन्यमा परी पाई आगे नहीं चलेगो मिटिल्ड के जन्मदिन पर तुमने जो वीम शिलिंग में पे, उनमें उसके लिए एक ओवरकोट गरीद लिया है। मानोरी हालत वैमी ही है। आंखों से बिलकुन दिखाई नहीं पड़ता। मारे दिन पप-चरा करती रहती है। उसे अस्पताल से घर भेज दिया गया है। हर महीने उसकी ददा-दार में तीस-चालीस पाउण्डप पड़ जाता है । मनु मान भेजे गए तुम्हारे पाच को पाउन्ड एवं हो चुके हैं । अव रीवार कुछ सादानाबरी विसनम पटरानं दौलत का प्रलोभन देकर मानो किसीने मेरी अन्तरात्मा निकाल ली हो अनेक प्रकार के लोगों की भीड़ में शाम के समय मेम भाभी के मोहल्ले में खड़ा-खड़ा मैं देखता रहता। मुझे इतनी भीड़ में कोई देख नहीं सकता था। मैं देखता कि एक कौआ उड़कर आया और मेम भाभी के मकान की मुंडेर पर बैठ गया है। पल-भर उसने इधर-उधर देखा और उसके बाद उड़कर एक दूसरी छत पर चला गया। दीवार की दरार में एक छोटा-सा पौधा उग आया है । ईंट, चूना और वालू की दरार से दो-चार हरी पत्तियां सिर निकाल रही हैं। छत पर बंधे वांस में एक लाल पतंग आकर अटक गई है। पश्चिम दिशावाली रेलिंग पर एक मैला-सा गाऊन, समीज और पेटीकोट- सा कुछ सूखने को डाला हुआ है आदि-आदि। मुझे यह सव इतना लुभावना लगता, मानो सामने वहुत ही सुन्दर और आश्चर्यजनक दृश्य हो। कौआ, पतंग, पीपल का पौधा, समीज, पेटीकोट-ये तमाम चीजें मेरी नज़रों में अपूर्व-सी हो उठी थीं। मैं वहां चिलचिलाती धूप या घनघोर वरसात में सड़क पर एक जगह खड़ा होकर यह सब देखता रहता। में पत्रों का पुलिन्दा बार-बार पॉकेट से निकालकर देखता और वहीं सड़क पर खड़े-खड़े पढ़े हुए उन पत्रों को फिर से पढ़ता। लेकिन पत्र भी कोई एक-दो तो थे नहीं! मोहल्ले के डाकिये से भेंट होती तो मैं पूछता, 'मिसेज नोरा स्मिथ के नाम से कोई पत्र आया है क्या ?' डाकिया अपना वग टटोलकर कहता, 'नहीं।' मुझे लगता, अगर और पत्र मिलते तो और अच्छा होता। इन कुछ पत्रों ने ही मानो मुझे मेम भाभी के अधिक नज़दीक ला दिया और घनिष्ठ बना दिया। मेम भाभी के नन्हे-मुन्ने भाई-बहनों के लिखे वे पत्र, जिनमें नन्हे-नन्हे हाथों से लिखे टेढ़े-मेढ़े प्यारे-प्यारे अक्षर थे ! मेम भाभी के बहुत-से भाई-बहन हैं। मेम भाभी के इतने सारे भाई- वहन हैं, यह क्या पहले मुझे मालूम था? वे खत पढ़ते-पढ़ते मुझे महसूस होता कि मैं मेम भाभी को और भी नजदीक पा रहा हूं। ऐसा लगता मानो - १०८ पटरानी मेम भाभी अपनी कोई मगो हो । मेम भाभी ने मुझसे जो इतनी झूठी बातें कही थीं, उनपर यब न मुझे क्रोध याता था और न दुःस होता था। न मुझे मेम भाभी के अभाव के वे दिन याद आने लगते जब जाड़े के दिनों में उसे पहनने को गरम कपड़े नहीं मिलते थे, पोने को पाय नहीं मिलती थी एवं हायर सेकने को कोपले तक नहीं जुटे थे। मेम भाभी ने अपने जीवन में क्या कम दुःख सहे हैं ? विन्सेंट स्क्वायर को एक अधकचरी गली में एक बीस वर्षीया लड़की तेरह भाई-बहनों को लेकर एक हाथ से खाना पकाती है और दूसरे हाथ से कपड़ों मे साबुन घिसती है। छोटे बच्चों को लोरी गाकर सुलाती है। किसी दिन जब देखती कि घर में खाने को कुछ नहीं तो थैला लेकर बाजार जाती और वीन, आलू, टमाटर, सेम वगैरह चुनकर ले आती। जोसड़ी-गली, कीड़े. पड़ी चीजें फेंक दी जाती, वही सब उठा लाती। पाखें बन्द करते ही मेरी कल्पनाशक्ति मानो देखने लगती कि एक लड़की फैला लेकर घर से बाजार के लिए निकली है । जव और लोग बाजार कर रहे हैं, उस वक्त उसकी नजर सड़क पर जमी हुई है। किसीको डलिया से न जाने कब एक बैगन गिर गया है, दूकानदार ने पता नहीं देखा है या नहीं; पर उस लडकी की दृष्टि उसीपर है । उसने भीड़-भाड़ में लोगों की नजरें बचाकर चुपचाप उसे थैले में डाल लिया। इस तरह पूरी गृहस्थी का भार उस छोटी-सी लड़की पर ही आ गिरा था। एक यत में विली ने लिखा था, 'दीदी, अब मैं पब्लिक स्कूल में पास हो गया हूं। हेढ सौ पाउण्ड और भेज देना। अन्यथा मेरो पढ़ाई आगे नही चलेगी। मैटिल्ड के जन्मदिन पर तुमने जो तीस शिलिंग भेजे थे, उनसे उसके लिए एक ओवरकोट खरीद लिया है । मम्मी की हालत वैसी ही है। मांसों मे बिलकुन दिखाई नहीं पड़ता। सारे दिन चस-चख करती रहती है। उसे अस्पताल से घर भेज दिया गया है। हर महीने उसकी दवा-दारू में तीस-चालीम पाउण्ड खचं पड़ जाता है । गत मास भेजे गए तुम्हारे पाच सौ पाउण्ड सर्च हो नुके हैं । अव को बार कुछ ज्यादा भेजना । अव को क्रिसमस . पर सभीको खिलौने, फाक और सूट वगैरह खरीदकर देने ही पड़ेंगे।' बूढ़ी अम्मा बगल के कमरे में पड़ी-पड़ो चिल्लाती रहती है। गले की आवाज ऐसी हो गई है, मानो उल्लू चीख रहा हो । किसी ज़माने में मिसेज़ स्मिय पर भी यौवन का खुमार था। दिमाग काम करता था। बुद्धि थी। शायद रूप भी बेशुमार था। लेकिन उसपर पूरी तरह से जवानी आने से पहले ही गांव में एक दिन शोर-गुल मच गया। ऐसे वक्त में कौन डॉक्टर को बुलाता और कौन दाई को बुलाता। शहर जाने के बड़े रास्ते में जो सेतु पड़ता है, उसीके नीचे सबकी नजरों की ओट में जो कुछ घटित होना था, वह घट गया। पर तव तक मिसेज़ स्मिथ का विवाह नहीं हुआ था। शाम का वक्त था, वह धीरे-धीरे चलकर उस सेतु के नीचे पहुंची और एक ईंट का सिरहाना बनाकर लेटी रही। एक गिरगिट बहुत देर से देख रही थी कि एक औरत पड़ी हुई कराह रही है। गिरगिट डर के मारे पीछे खिसक गई और वहीं से देखने लगी। वह औरत कभी इधर, कभी उधर करवटें बदल रही थी। लग रहा था, मानो अगर वह जोर से चीख सके, तभी उसे सुकून मिल सकेगा। पर उसके बाद तो उस गिरगिट को भी वहुत अचरज हुआ। खून से लथपथ और कीचड़ एवं मिट्टी से सना हुआ गाऊन! और एक छोटी-सी नवजात लड़की, जो उस सेतु के नीचे निर्जीव-सी पड़ी थी ! गिरगिट डर से कांप उठी । अतः उसने और भी दूर के एक गड्ढे में घुसकर पनाह ली। वहां से वह अपनी आंखें फाड़-फाड़कर देखने लगी। मां ने उस लड़की का नाम रखा, 'नोरा!' और उस दिन से नोरा की जीवन-कहानी शुरू होती है । पत्थर के एक छोटे-से मेहराब के नीचे जन्म लेकर आज वह को स्कूल स्ट्रीट के एक फ्लैट में रहती है। पर उसके जन्म से लेकर अब तक के बीच का जीवन बड़ा ही विचित्र है। एक दिन एक पुलिस कांस्टेबल ने अचानक एक लड़की को लाकर कोर्ट में पेश किया। न्यायाधीश ने प्रश्न किया, 'किस बात का चार्ज है?' ११० पटरानी पुलिस ने कहा था, 'धर्मावतार, यह बाजार से साग-सब्जी चुरा रही थी।' जज ने पूछा, 'इमको गोद में यह कौन है ?' आसामी ने जवाब दिया, 'हूजूर, यह मेरी लड़की है, पर इसका बाप नहीं है, हुजूर !' आसामी उस दिन रिहा तो कर दी गई थी, लेकिन कोर्ट को चार- दीवारी पार करके बाहर निकलते-निकलते ही नोरा के लिए एक वाप तयार मिला। वह सड़क पर जूते सिलाई का काम करता था। मा-बेटी को देखकर पता नही उसके मन में क्या भाया कि आसामी को अपने झोले मे से एक जोड़ा पुराना जूता निकालकर दे दिया। फिर वह उन दोनों को अपने घर ले गया और कहा, 'यह हमारा रसोईघर है, यह डाइनिंग टेविल और यह है बेडरूम। कहने का मतलब यह है कि एक कमरे के तीन हिस्से करके तीन कमरों का काम लिया जाता था। उस समय नोरा का नाम पडा नोरा असगुड और मां का नाम मिसेज असगुड । फिर एक के बाद एक करके दो भाइयो और एक बहन का और मागमन हुआ। उन तीन भाई-बहनों का बोझ नोरा के ऊपर ही पड़ा। मिसेज असगुड की शादी का सिलसिला क्या सिर्फ एक बार की बात थी? कई पतियों को छोड़कर मां ने दूसरे-दूमरे से शादी की और दार- यार नोरा के नाम के साथ अलग उपनाम जुड़ता गया। सिर्फ उपनाम ही पयो, हर बार पर भी बदलते गए, देश भी बदलते गए। इन सबके अलावा भाई-बहनों की सख्या भी बढ़ती गई। अन्त में उपस्थित हुए मिस्टर स्मिय । नोरा का यह बाप बण्डवाले दल मे ढोलक बजाने का काम करता था। नोरा ने छोटे भाई-बहनों को गोद और पीठ पर लाद-लादकर कुछ वडा किया नही कि एक और आकर हाजिर हो जाता। नोरा रहती, 'मुझमे और ताक्त नहीं, वादा !'

मां भड़क उठती। कहती, 'फिर तू कर क्या सकती है, ज़रा बता ? कहो तो मैं गले में फन्दा डालकर मर जाऊं।' मेम भाभी ने बताया था, 'वच्चा हुआ मां को और हर बार दशा मोगी मैंने । न मुझे सोने को मिलता, न भूख लगने पर खाना मिलता। जव से मैं जन्मी, तब से मैंने भाई-बहिनों को जच्चा-घर से ही दूध पिला- पिलाकर बड़ा किया है।' छोटी वहिन मिनी में एक खत में लिखा है, 'पिछली बार मेरे जन्म- दिन पर मुझे कुछ भी नहीं मिला, अब की बार मुझे एक ट्राइ-साइकिल खरीदकर देनी ही पड़ेगी। मेरे पास तेरह शिलिंग इकट्ठे हो गए हैं । अगर तुम मेरे पास और रुपये भेजो तो मां के नाम से मत भेजना, नहीं तो मां सव ले लेगी।' मंझले भाई हेनरी ने लिखा है, 'दीदी, दर्जी की दुकान में मेरे तीन पाउण्ड का उधार चल रहा है। अब और उधार नहीं देता वह । क्रिस- मस पर गवरडिन का नया सूट वनवाऊंगा। रुपये ज़रूर भेजना, लेकिन भेजना मेरे नाम से । रुपये आते ही सबके सब भैया ले लेते हैं । हमलोगों को कुछ भी नहीं देते।' मां कहती, 'इतनी बड़ी धींगड़ी हो गई है, लेकिन एक पैसा भी कमाने का शऊर नहीं है।' वहुत रात गए जव वैण्ड-मास्टर डगमगाते कदमों से घर लौटता सभी तव तक सो चुके होते । मां की भी नींद के मारे नाक बजने लगती लेकिन नोरा वाप के इन्तजार में जागती रहती। कभी-कभी शराब के नशे में होश खो देने पर वाप चीख उठ 'शुगर नहीं है ?' नोरा कहती, 'नहीं।' वस, तव तो खाना-वाना सव इधर-उधर फेंककर बैण्ड मास्टर महाभारत ही मचा देता। चूंकि वह चौथा पति था, अतः नोरा को सभी चीजें स्वयं इन्तज़ाम करके रखनी पड़ती थी। डर ११२ पटरानी 1 उसका दिल घर-यन करने नगता, वह पोधेकी छिड़को से भाग जाती। उस वक्त विन्सेंट स्क्वायर का मुद्दक पर यादमापा नामोनिशान नहीं रहता 1 सफेद-मद मई जैसी वरफ पट्टी पर जमी रहती। गाड़े के मारे परयराती हुई वह एक धोबी के भट्टे के पास छिप जाती। मां वहती, 'तुमसे कौन मादी करेगा?ई नहीं करेगा। इतनी बड़ी धिंगड़ी जवान ब्याह लापक सड़की होकर भी माकों पर भारी-मारी फिरती रहती है । तेरो वरदीर में यही लिखा है।' होरा कहती, 'मैं तो इटालियन से गादी करूंगी। वे नोग पत्नी को यहुत प्यार करते हैं । वे साह करना जानते हैं।' नोरा की इच्छा होती, काग, वह भी इटालियन से शादी कर माती। पति के बारे में की गई कल्पनाओं को कभी-कमी वह साकार करने का प्रयत्न किया करती । सड़क पर पता मगर एकाएक मगर मोई मुनहरे बालों वाला युवक दिखाई दे जाता तो वह वहीं गड़ी रह जाती कि शायर यह इटालियन ही हो । रोम से माया होगा या मिमनी से। वह उसका ध्यान अपनी ओर याकपित करने के विविध प्रयत्न करती। नीचे गलेवाला स्नान पहनती। मॉक को घुटनों के कपर सक उठा लेती। पब रात को गमी सो जाते तो वह छोटा गोगा बाहर निकालकर बपना मैकमप करती। होटों को रंग नेवी। माहाको कलम में और नुकीला करती। फिर फे-पाउहरमल-कलकर चेहरे को और अधिक सान कर लेती। वह अपना चेहरा पद ही वार-चार गोगे में देयती दौर सपनी मुन्दरता पर आप ही मुग्ध हो जाती। एकाध बार देवर मानो उनका मन ही नहीं भरता और वह इसी तरह से देम-देसर मुश होती रहती। अन्त में एक फटे कपड़े से सब कुछ पीछकर वह दिस्तर के एक कोने में पड़ जाती। फिर उगे गहरी नोंद या जाती। रोरा वहनी, उन घोड़े के सिर पर अगर एक परपर मार सको तो एक मिलिंग की जनं रहो।' बूदा कमाई इन दोनों नड़कियों को दूर से देगते ही दरकारने सरता।

कहता, 'चलो, भागो यहां से । हुंह, फिर मांस चुराने आई।' लेकिन एक दिन उसी लड़की के शरीर की हड्डियों पर मांस उभर माया, गालों पर लाली खिल आई और आंखों ने इशारेबाजी सीख ली। सड़क चलते लड़के उसपरतानाकशी करते। बाप शराब के नशे में गलती कर बैठता और मां उसे टेढ़ी नजर से देखती। धीरे-धीरे उसकी कमर मोटी होने लगी, पीठ पर मांस चढ़ा और बीचोंबीच एक दरार-सी बन गई । वह चटपट ही एक चंचल चुलबुली किशोरी में बदल गई। एक दिन मां-बाप दोनों के बीच घमासान शगड़ा हो गया। मां ने कहा, 'जाओ, निकलो मेरे घर से निकल जाओ।' और बाप कह रहा था, 'तुम निकल जाओ।' यह भी किसी महाभारत से कम नहीं था। नोरा ने छिपकर सब कुछ सुना । लेकिन डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसमें । वाप के सामने निकलने में भी उसे डर लगता था। वह कहीं मार बैठे या किसी तरह की ज्यादती अथवा अत्याचार करे तो...! इन्हीं हालतों में एक दिन अलक से मुठभेड़ हो गई। अलकेश मित्र ! लन्दन में वकालत पढ़ने गया था। पिता रूई के व्यापारी थे । इण्डिया में बड़ा-सा अपना मकान था। उनके यहां चार कारें थीं। अगर उसकी पत्नी बनकर वह इण्डिया चली जाए तो बस, फिर उसे किसी बात की तकलीफ नहीं रहेगी। कोई भी कुछ काम करने को नहीं कहेगा। सिर्फ बैठे-बठे आराम करो। पैरों पर पैर रखकर किताब पढ़ो।.. लेकिन भाई-बहनों को कौन संभालेगा?, अंधी मां की देख-भाल कौन करेगा? बाप के बारे में तो कोई चिन्ता ही नहीं। उस वक्त बैण्ड मास्टर स्मिथ जेल में था। अलकेश भैया ने सभीसे कहा, 'मेरे पिता के पास चार लाख रुपये हैं। रूई के व्यापार में मेरे पिताजी ने बहुत रुपये कमा लिए हैं। मेरे पिताजी इण्डिया के कॉटन-किंग हैं।' ११४ पटरानी आया, कहता, 'चलो, भागो यहां से। हुंह, फिर मांस चुराने आई।' लेकिन एक दिन उसी लड़की के शरीर की हड्डियों पर मांस उभर गालों पर लाली खिल आई और आंखों ने इशारेवाजी सीख ली। सड़क चलते लड़के उसपरतानाकशी करते। वाप शराब के नशे में गलती कर बैठता और मां उसे टेढ़ी नज़र से देखती। धीरे-धीरे उसकी कमर मोटी होने लगी, पीठ पर मांस चढ़ा और बीचोंबीच एक दरार-सी वन गई। वह चटपट ही एक चंचल चुलबुली किशोरी में बदल गई। एक दिन मां-बाप दोनों के बीच घमासान झगड़ा हो गया। मां ने कहा, 'जामो, निकलो मेरे घर से निकल जाओ।' और वाप कह रहा था, 'तुम निकल जाओ।' यह भी किसी महाभारत से कम नहीं था। नोरा ने छिपकर सब कुछ सुना । लेकिन डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसमें। वाप के सामने निकलने में भी उसे डर लगता था। वह कहीं मार बैठे या किसी तरह की ज्यादती अथवा अत्याचार करे तो...! इन्हीं हालतों में एक दिन अलक से मुठभेड़ हो गई। अलकेश मित्र ! लन्दन में वकालत पढ़ने गया था। पिता रूई के व्यापारी थे । इण्डिया में बड़ा-सा अपना मकान था। उनके यहां चार कारें थीं। अगर उसकी पत्नी बनकर वह इण्डिया चली जाए तो वस, फिर उसे किसी बात की तकलीफ नहीं रहेगी। कोई भी कुछ काम करने को नहीं कहेगा। सिर्फ बैठे-बैठे आराम करो। पैरों पर पैर रखकर किताब पढ़ो। लेकिन भाई-बहनों को कौन संभालेगा? अंधी मां की देख-भाल कौन करेगा? वाप के बारे में तो कोई चिन्ता ही नहीं। उस वक्त बैण्ड मास्टर स्मिथ जेल में था। अलकेश भैया ने सभीसे कहा, 'मेरे पिता के पास चार लाख रुपये हैं। रूई के व्यापार में मेरे पिताजी ने बहुत रुपये कमा लिए हैं। मेरे पिताजी इण्डिया के कॉटन-किंग हैं।' ११४ पटरानी - कहता, 'चलो, भागो यहां से । हुंह, फिर मांस चुराने आई।' लेकिन एक दिन उसी लड़की के शरीर की हड्डियों पर मांस उभर आया, गालों पर लाली खिल आई और आंखों ने इशारेवाजी सीख ली। सड़क चलते लड़के उसपर तानाकशी करते। बाप शराब के नशे में गलती कर वैठता और मां उसे टेढ़ी नजर से देखती। धीरे-धीरे उसकी कमर मोटी होने लगी, पीठ पर मांस चढ़ा और वीचोंबीच एक दरार-सी बन गई। वह चटपट ही एक चंचल चुलबुली किशोरी में वदल गई। एक दिन मां-बाप दोनों के बीच घमासान झगड़ा हो गया। मां ने कहा, 'जामो, निकलो मेरे घर से निकल जाओ।' और वाप कह रहा था, 'तुम निकल जाओ।' यह भी किसी महाभारत से कम नहीं था। नोरा ने छिपकर सब कुछ सुना । लेकिन डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसमें। बाप के सामने निकलने में भी उसे डर लगता था। वह कहीं मार बैठे या किसी तरह की ज्यादती अथवा अत्याचार करे तो...! इन्हीं हालतों में एक दिन अलक से मुठभेड़ हो गई। अलकेश मित्र ! लन्दन में वकालत पढ़ने गया था। पिता रूई के व्यापारी थे । इण्डिया में बड़ा-सा अपना मकान था। उनके यहां चार कारें थीं। अगर उसकी पत्नी वनकर वह इण्डिया चली जाए तो बस, फिर उसे किसी बात की तकलीफ नहीं रहेगी। कोई भी कुछ काम करने को नहीं कहेगा। सिर्फ बैठे-बठे आराम करो। पैरों पर पैर रखकर किताव पढ़ो। लेकिन भाई-बहनों को कौन संभालेगा? अंधी मां की देख-भाल कौन करेगा? बाप के वारे में तो कोई चिन्ता ही नहीं। उस वक्त वैण्ड मास्टर स्मिथ जेल में था। अलकेश भैया ने सभीसे कहा, 'मेरे पिता के पास चार लाख रुपये हैं। रूई के व्यापार में मेरे पिताजी ने वहुत रुपये कमा लिए हैं। मेरे पिताजी इण्डिया के कॉटन-किंग हैं।' ११४ पटरानी कहता, 'चलो, भागो यहां से । हुंह, फिर मांस चुराने आई।' लेकिन एक दिन उसी लड़की के शरीर की हड्डियों पर मांस उभर माया, गालों पर लाली खिल आई और आंखों ने इशारेवाजी सीख ली। सड़क चलते लड़के उसपर तानाकशी करते। वाप शराब के नशे में गलती कर वैठता और मां उसे टेढ़ी नजर से देखती। धीरे-धीरे उसकी कमर मोटी होने लगी, पीठ पर मांस चढ़ा और वीचोंबीच एक दरार-सी बन गई। वह चटपट ही एक चंचल चुलबुली किशोरी में बदल गई। एक दिन मां-बाप दोनों के बीच घमासान झगड़ा हो गया। मां ने कहा, 'जाओ, निकलो मेरे घर से निकल जाओ।' और वाप कह रहा था, 'तुम निकल जाओ।' यह भी किसी महाभारत से कम नहीं था। नोरा ने छिपकर सब कुछ सुना । लेकिन डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसमें। बाप के सामने निकलने में भी उसे डर लगता था। वह कहीं मार बैठे या किसी तरह की ज्यादती अथवा अत्याचार करे तो...! इन्हीं हालतों में एक दिन अलक से मुठभेड़ हो गई। अलकेश मित्र ! लन्दन में वकालत पढ़ने गया था। पिता रूई के व्यापारी थे । इण्डिया में वड़ा-सा अपना मकान था। उनके यहां चार कारें थीं। अगर उसकी पत्नी बनकर वह इण्डिया चली जाए तो बस, फिर उसे किसी बात की तकलीफ नहीं रहेगी। कोई भी कुछ काम करने को नहीं कहेगा। सिर्फ बैठे-वठे आराम करो। पैरों पर पैर रखकर किताव पढ़ो। लेकिन भाई-बहनों को कौन संभालेगा? अंधी मां की देख-भाल कौन करेगा? बाप के वारे में तो कोई चिन्ता ही नहीं। उस वक्त बैण्ड मास्टर स्मिथ जेल में था। अलकेश भैया ने सभीसे कहा, 'मेरे पिता के पास चार लाख रुपये हैं। रूई के व्यापार में मेरे पिताजी ने बहुत रुपये कमा लिए हैं। मेरे पिताजी इण्डिया के कॉटन-किंग हैं।' ११४ पटरानी - कहता, 'चलो, भागो यहां से । हुंह, फिर मांस चुराने आई।' लेकिन एक दिन उसी लड़की के शरीर की हड्डियों पर मांस उभर माया, गालों पर लाली खिल आई और आंखों ने इशारेवाजी सीख ली। सड़क चलते लड़के उसपर तानाकशी करते। वाप शराब के नशे में गलती कर बैठता और मां उसे टेढ़ी नजर से देखती। धीरे-धीरे उसकी कमर मोटी होने लगी, पीठ पर मांस चढ़ा और वीचोंबीच एक दरार-सी बन गई । वह चटपट ही एक चंचल चुलबुली किशोरी में बदल गई। एक दिन मां-बाप दोनों के बीच घमासान झगड़ा हो गया। मां ने कहा, 'जाओ, निकलो मेरे घर से निकल जाओ।' और बाप कह रहा था, 'तुम निकल जाओ।' यह भी किसी महाभारत से कम नहीं था। नोरा ने छिपकर सव कुछ सुना । लेकिन डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसमें। बाप के सामने निकलने में भी उसे डर लगता था। वह कहीं मार बैठे या किसी तरह की ज्यादती अथवा अत्याचार करे तो...! इन्हीं हालतों में एक दिन अलक से मुठभेड़ हो गई। अलकेश मित्र ! लन्दन में वकालत पढ़ने गया था। पिता रूई के व्यापारी थे । इण्डिया में वड़ा-सा अपना मकान था। उनके यहां चार कारें थीं। अगर उसकी पली बनकर वह इण्डिया चली जाए तो बस, फिर उसे किसी बात की तकलीफ नहीं रहेगी। कोई भी कुछ काम करने को नहीं कहेगा। सिर्फ बैठे-बठे आराम करो। पैरों पर पैर रखकर किताव पढ़ो। लेकिन भाई-बहनों को कौन संभालेगा? अंधी मां की देख-भाल कौन करेगा? बाप के वारे में तो कोई चिन्ता ही नहीं। उस वक्त बैण्ड मास्टर स्मिथ जेल में था। अलकेश भैया ने सभीसे कहा, 'मेरे पिता के पास चार लाख रुपये हैं। रूई के व्यापार में मेरे पिताजी ने बहुत रुपये कमा लिए हैं। मेरे पिताजी इण्डिया के कॉटन-किंग हैं। ११४ पटरानी कहता, 'चलो, भागो यहां से । हुंह, फिर मांस चुराने आई।' लेकिन एक दिन उसी लड़की के शरीर की हड्डियों पर मांस उभर आया, गालों पर लाली खिल आई और आंखों ने इशारेबाजी सीख ली। सड़क चलते लड़के उसपर तानाकशी करते। वाप शराब के नशे में गलती कर वैठता और मां उसे टेढ़ी नजर से देखती। धीरे-धीरे उसकी कमर मोटी होने लगी, पीठ पर मांस चढ़ा और वीचोंबीच एक दरार-सी बन गई । वह चटपट ही एक चंचल चुलबुली किशोरी में बदल गई। एक दिन मां-बाप दोनों के बीच घमासान झगड़ा हो गया। मां ने कहा, 'जाओ, निकलो मेरे घर से निकल जाओ।' और बाप कह रहा था, 'तुम निकल जाओ।' यह भी किसी महाभारत से कम नहीं था। नोरा ने छिपकर सब कुछ सुना । लेकिन डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसमें । वाप के सामने निकलने में भी उसे डर लगता था । वह कहीं मार बैठे या किसी तरह की ज्यादती अथवा अत्याचार करे तो...! इन्हीं हालतों में एक दिन अलक से मुठभेड़ हो गई। अलकेश मित्र ! लन्दन में वकालत पढ़ने गया था। पिता रूई के व्यापारी थे। इण्डिया में बड़ा-सा अपना मकान था। उनके यहां चार कारें थीं। अगर उसकी पत्नी बनकर वह इण्डिया चली जाए तो बस, फिर उसे किसी बात की तकलीफ नहीं रहेगी। कोई भी कुछ काम करने को नहीं कहेगा। सिर्फ बैठे-बठे आराम करो। पैरों पर पैर रखकर किताव पढ़ो। लेकिन भाई-बहनों को कौन संभालेगा? अंधी मां की देख-भाल कौन करेगा? बाप के वारे में तो कोई चिन्ता ही नहीं। उस वक्त वैण्ड मास्टर स्मिथ जेल में था। अलकेश भैया ने सभीसे कहा, 'मेरे पिता के पास चार लाख रुपये हैं। रूई के व्यापार में मेरे पिताजी ने बहुत रुपये कमा लिए हैं। मेरे पिताजी इण्डिया के कॉटन-किंग हैं।' ११४ पटरानी । कहता, 'चलो, भागो यहां से । हुंह, फिर मांस चुराने आई।' लेकिन एक दिन उसी लड़की के शरीर की हड्डियों पर मांस उभर माया, गालों पर लाली खिल आई और आंखों ने इशारेवाजी सीख ली। सड़क चलते लड़के उसपर तानाकशी करते । बाप शराब के नशे में गलती कर वैठता और मां उसे टेढ़ी नज़र से देखती। धीरे-धीरे उसकी कमर मोटी होने लगी, पीठ पर मांस चढ़ा और वीचोंबीच एक दरार-सी बन गई । वह चटपट ही एक चंचल चुलबुली किशोरी में बदल गई। एक दिन मां-बाप दोनों के बीच घमासान झगड़ा हो गया। मां ने कहा, 'जाओ, निकलो मेरे घर से निकल जाओ।'. और बाप कह रहा था, 'तुम निकल जाओ।' यह भी किसी महाभारत से कम नहीं था। नोरा ने छिपकर सब कुछ सुना । लेकिन डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसमें। बाप के सामने निकलने में भी उसे डर लगता था। वह कहीं मार बैठे या किसी तरह की ज्यादती अथवा अत्याचार करे तो...! इन्हीं हालतों में एक दिन अलक से मुठभेड़ हो गई। अलकेश मित्र ! लन्दन में वकालत पढ़ने गया था। पिता रूई के व्यापारी थे। इण्डिया में बड़ा-सा अपना मकान था। उनके यहां चार कारें थीं। अगर उसकी पत्नी बनकर वह इण्डिया चली जाए तो बस, फिर उसे किसी बात की तकलीफ नहीं रहेगी। कोई भी कुछ काम करने को नहीं कहेगा। सिर्फ बैठे-बठे आराम करो। पैरों पर पैर रखकर किताब पढ़ो। लेकिन भाई-बहनों को कौन संभालेगा?, अंधी मां की देख-भाल कौन करेगा? बाप के वारे में तो कोई चिन्ता ही नहीं। उस वक्त बैण्ड मास्टर स्मिथ जेल में था। अलकेश भैया ने सभीसे कहा, 'मेरे पिता के पास चार लाख रुपये हैं। रूई के व्यापार में मेरे पिताजी ने बहुत रुपये कमा लिए हैं । मेरे पिताजी इण्डिया के कॉटन-किंग हैं।' ११४ पटरानी कहता, 'चलो, भागो यहां से । हुंह, फिर मांस चुराने आई।' लेकिन एक दिन उसी लड़की के शरीर की हड्डियों पर मांस उभर आया, गालों पर लाली खिल आई और आंखों ने इशारेवाजी सीख ली। सड़क चलते लड़के उसपर तानाकशी करते । बाप शराब के नशे में गलती कर वैठता और मां उसे टेढ़ी नजर से देखती। धीरे-धीरे उसकी कमर मोटी. होने लगी, पीठ पर मांस चढ़ा और वीचोंबीच एक दरार-सी बन गई । वह चटपट ही एक चंचल चुलबुली किशोरी में बदल गई। एक दिन मां-बाप दोनों के बीच घमासान झगड़ा हो गया। मां ने कहा, 'जाभो, निकलो मेरे घर से निकल जाओ।' और बाप कह रहा था, 'तुम निकल जाओ।' यह भी किसी महाभारत से कम नहीं था। नोरा ने छिपकर सब कुछ सुना । लेकिन डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसमें । बाप के सामने निकलने में भी उसे डर लगता था । वह कहीं मार बैठे या किसी तरह की ज्यादती अथवा अत्याचार करे तो...! इन्हीं हालतों में एक दिन अलक से मुठभेड़ हो गई। अलकेश मित्र ! लन्दन में वकालत पढ़ने गया था। पिता रूई के व्यापारी थे । इण्डिया में बड़ा-सा अपना मकान था। उनके यहां चार कारें थीं। अगर उसकी पत्नी वनकर वह इण्डिया चली जाए तो वस, फिर उसे किसी बात की तकलीफ नहीं रहेगी। कोई भी कुछ काम करने को नहीं कहेगा। सिर्फ बैठे-बठे आराम करो। पैरों पर पैर रखकर किताव पढ़ो।.. लेकिन भाई-बहनों को कौन संभालेगा? अंधी मां की देख-भाल कौन करेगा? बाप के वारे में तो कोई चिन्ता ही नहीं। उस वक्त वैण्ड मास्टर स्मिथ जेल में था। अलकेश भैया ने सभीसे कहा, 'मेरे पिता के पास चार लाख रुपये हैं। रुई के व्यापार में मेरे पिताजी ने बहुत रुपये कमा लिए हैं । मेरे पिताजी इण्डिया के कॉटन-किंग हैं।' ११४ पटरानी ये सब बातें आज से बहुत साल पहले की है, हालाकि ये सब मेरे जानने की बातें नहीं थी। मेम भाभी का ऐसा रूप मैं जानता भी नहीं था। लेकिन मेम भाभी के नाम उन कुछ पत्रो को पढ़कर मैं मेम भाभी को नई तरह से देखने लगा था। उसने कितनी तरह से मुझम झूठ कहा है और कितनी सारी बातें उल्टी बताई हैं। जेब में वे सारे खत ठूसे में पागलों की तरह मैम भाभी से मुलाकात करने को घूम रहा था। बौर इसी बीच उस दिन यूमुफ से मेरी भेंट हो गई। शायद उसने मुझे पहचाना नहीं । मैं सड़क पर जा रहा था । अचानक लगा कि पीछेवाला लुंगी पहने आदमी पता नहीं क्या बड़बड़ाता हुवा मेरे पोछे से आ रहा है। पलटकर देखा तो यूसुफ था। यूसुफ ने कहा, 'यसली विलापती चीज़ है, बाबूजी। खास लन्दन से बाई है । बिलकुल अनछुई है।' मुझे उस व्यक्ति पर बहुत ही घृणा आई। पहले तो सोचा कि उसे अधिक छूट नहीं दूं। उन लोगों का वही घृणित पेशा है। लेकिन पॉकिट में हाय जाते ही उन चिट्ठियों को याद आई। मुझे याद आया कि विली ने लिखा है, 'दीदी, इस बार क्रिसमस पर पांच सो पाउण्ड और भेजना। इस बार मैटिल्ड के जन्म-दिन पर एक बोवरकोट खरीद लिया है । मम्मी की हालत वैसी ही है । एकदम से अधो हो गई है। कुछ भी दियाई नही पड़ता। सारे दिन चख-चख करती रहती है । तुम रुपये जरूर भेजना।' यूसुफ ने फिर कहा, 'असली विलायती चीज है, बाबूजी। खास विला- यत से आई है।' मैंने जब अच्छी तरह परख लिया कि वह मुझे नहीं पहचान पाया है और मुझे शिकार समझकर फास रहा है तो फिर मैंने भी उसकी गलती मुधारने की कोई कोशिश नहीं की । वह नई चीज़ के गुणो का बहुत बखान करता हुआ मेरे साथ-साथ चलने लगा। बहुत-सी सडक पार करके हम उस गली मे पहुच गए, जिसमे मेम भाभी रहती थी। मैंने देखा, हम दोनों . पटरानी ११५ कहता, 'चलो, भागो यहां से । हुंह, फिर मांस चुराने आई।' लेकिन एक दिन उसी लड़की के शरीर की हड्डियों पर मांस उभर आया, गालों पर लाली खिल आई और आंखों ने इशारेवाजी सीख ली। सड़क चलते लड़के उसपर तानाकशी करते। वाप शराब के नशे में गलती कर वैठता और मां उसे टेढ़ी नजर से देखती । धीरे-धीरे उसकी कमर मोटी होने लगी, पीठ पर मांस चढ़ा और वीचोंबीच एक दरार-सी बन गई। वह चटपट ही एक चंचल चुलबुली किशोरी में बदल गई। एक दिन मां-बाप दोनों के बीच घमासान झगड़ा हो गया। मां ने कहा, 'जाओ, निकलो मेरे घर से निकल जाओ।' और बाप कह रहा था, 'तुम निकल जाओ।' यह भी किसी महाभारत से कम नहीं था। नोरा ने छिपकर सब कुछ सुना । लेकिन डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसमें। बाप के सामने निकलने में भी उसे डर लगता था । वह कहीं मार बैठे या किसी तरह की ज्यादती अथवा अत्याचार करे तो...! इन्हीं हालतों में एक दिन अलक से मुठभेड़ हो गई। अलकेश मित्र! लन्दन में वकालत पढ़ने गया था। पिता रूई के व्यापारी थे । इण्डिया में वड़ा-सा अपना मकान था। उनके यहां चार कारें थीं। अगर उसकी पत्नी वनकर वह इण्डिया चली जाए तो बस, फिर उसे किसी बात की तकलीफ नहीं रहेगी । कोई भी कुछ काम करने को नहीं कहेगा। सिर्फ बैठे-बठे आराम करो। पैरों पर पैर रखकर किताब पढ़ो। लेकिन भाई-बहनों को कौन संभालेगा? अंधी मां की देख-भाल कौन करेगा? बाप के बारे में तो कोई चिन्ता ही नहीं। उस वक्त वैण्ड मास्टर स्मिथ जेल में था। अलकेश भैया ने सभीसे कहा, 'मेरे पिता के पास चार लाख रुपये हैं। लई के व्यापार में मेरे पिताजी ने बहुत रुपये कमा लिए हैं। मेरे पिताजी इण्डिया के कॉटन-किंग हैं।' ११४ पटरानी , कहता, 'चलो, भागो यहां से । हुंह, फिर मांस चुराने आई। लेकिन एक दिन उसी लड़की के शरीर की हड्डियों पर मांस उभर आया, गालों पर लाली खिल आई और आंखों ने इशारेवाजी सीख ली। सड़क चलते लड़के उसपर तानाकशी करते । बाप शराब के नशे में गलती कर वैठता और मां उसे टेढ़ी नजर से देखती। धीरे-धीरे उसकी कमर मोटी होने लगी, पीठ पर मांस चढ़ा और बीचोंबीच एक दरार-सी बन गई । वह चटपट ही एक चंचल चुलबुली किशोरी में बदल गई। एक दिन मां-बाप दोनों के बीच घमासान झगड़ा हो गया। मां ने कहा, 'जामो, निकलो मेरे घर से निकल जाओ।' और बाप कह रहा था, 'तुम निकल जाओ।' यह भी किसी महाभारत से कम नहीं था। नोरा ने छिपकर सब कुछ सुना। लेकिन डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसमें। बाप के सामने निकलने में भी उसे डर लगता था । वह कहीं मार बैठे या किसी तरह की ज्यादती अथवा अत्याचार करे तो...! इन्हीं हालतों में एक दिन अलक से मुठभेड़ हो गई। अलकेश मित्र! लन्दन में वकालत पढ़ने गया था। पिता रूई के व्यापारी थे । इण्डिया में वड़ा-सा अपना मकान था। उनके यहां चार कारें थीं। अगर उसकी पत्नी बनकर वह इण्डिया चली जाए तो बस, फिर उसे किसी बात की तकलीफ नहीं रहेगी। कोई भी कुछ काम करने को नहीं कहेगा। सिर्फ बैठे-बठे आराम करो। पैरों पर पैर रखकर किताव पढ़ो। लेकिन भाई-बहनों को कौन संभालेगा? अंधी मां की देख-भाल कौन करेगा? वाप के बारे में तो कोई चिन्ता ही नहीं। उस वक्त वैण्ड मास्टर स्मिथ जेल में था। अलकेश भैया ने सभीसे कहा, 'मेरे पिता के पास चार लाख रुपये हैं। रूई के व्यापार में मेरे पिताजी ने वहुत रुपये कमा लिए हैं। मेरे पिताजी इण्डिया के कॉटन-किंग हैं।' ११४ पटरानी कहता, 'चलो, भागो यहां से । हुंह, फिर मांस चुराने आई। लेकिन एक दिन उसी लड़की के शरीर की हड्डियों पर मांस उभर आया, गालों पर लाली खिल आई और आंखों ने इशारेवाजी सीख ली। सड़क चलते लड़के उसपर तानाकशी करते । वाप शराब के नशे में गलती कर बैठता और मां उसे टेढ़ी नजर से देखती। धीरे-धीरे उसकी कमर मोटी होने लगी, पीठ पर मांस चढ़ा और बीचोंबीच एक दरार-सी बन गई। वह चटपट ही एक चंचल चुलबुली किशोरी में बदल गई। एक दिन मां-बाप दोनों के बीच घमासान झगड़ा हो गया। मां ने कहा, 'जामो, निकलो मेरे घर से निकल जाओ।' और बाप कह रहा था, 'तुम निकल जाओ। यह भी किसी महाभारत से कम नहीं था। नोरा ने छिपकर सब कुछ सुना । लेकिन डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसमें । बाप के सामने निकलने में भी उसे डर लगता था। वह कहीं मार बैठे या किसी तरह की ज्यादती अथवा अत्याचार करे तो...! इन्हीं हालतों में एक दिन अलक से मुठभेड़ हो गई। अलकेश मित्र! लन्दन में वकालत पढ़ने गया था। पिता रूई के व्यापारी थे । इण्डिया में वड़ा-सा अपना मकान था। उनके यहां चार कारें थीं। अगर उसकी पत्नी बनकर वह इण्डिया चली जाए तो वस, फिर उसे किसी बात की तकलीफ नहीं रहेगी। कोई भी कुछ काम करने को नहीं कहेगा। सिर्फ बैठे-बठे आराम करो। पैरों पर पैर रखकर किताब पढ़ो। लेकिन भाई-बहनों को कौन संभालेगा? अंधी मां की देख-भाल कौन करेगा? बाप के वारे में तो कोई चिन्ता ही नहीं। उस वक्त बैण्ड मास्टर स्मिथ जेल में था। अलकेश भैया ने सभीसे कहा, 'मेरे पिता के पास चार लाख रुपये हैं। रूई के व्यापार में मेरे पिताजी ने बहुत रुपये कमा लिए हैं। मेरे पिताजी इण्डिया के कॉटन-किंग हैं।' ११४ पटरानी या, इता, 'चलो, भागो यहां से । हुंह, फिर मांस चुराने आई।' लेकिन एक दिन उसी लड़की के शरीर की हड्डियों पर मांस उभर गालों पर लाली खिल नाई और आंखों ने इशारेवाजी सीख ली। ड़क चलते लड़के उसपर तानाकशी करते। वाप शराब के नशे में गलती कर बैठता और मां उसे टेढ़ी नजर से देखती। धीरे-धीरे उसकी कमर मोटी होने लगी, पीठ पर मांस चढ़ा और वीचोंबीच एक दरार-सी बन गई। वह वटपट ही एक चंचल चुलबुली किशोरी में बदल गई। एक दिन मां-बाप दोनों के बीच घमासान झगड़ा हो गया। मां ने कहा, 'जामो, निकलो मेरे घर से निकल जाओ।' और वाप कह रहा था, 'तुम निकल जाओ।' यह भी किसी महाभारत से कम नहीं था। नोरा ने छिपकर सब कुछ सुना । लेकिन डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसमें। बाप के सामने निकलने में भी उसे डर लगता था। वह कहीं मार बैठे या किसी तरह की ज्यादती अथवा अत्याचार करे तो...! इन्हीं हालतों में एक दिन अलक से मुठभेड़ हो गई। अलकेश मित्र ! लन्दन में वकालत पढ़ने गया था। पिता रूई के व्यापारी थे । इण्डिया में वड़ा-सा अपना मकान था। उनके यहां चार कारें थीं। मगर उसकी पत्नी बनकर वह इण्डिया चली जाए तो वस, फिर उसे किसी बात की तकलीफ नहीं रहेगी। कोई भी कुछ काम करने को नहीं कहेगा। सिर्फ बैठे-बठे आराम करो। पैरों पर पैर रखकर किताव पढ़ो। लेकिन भाई-बहनों को कौन संभालेगा? संधी मां की देख-भाल कौन करेगा? वाप के वारे में तो कोई चिन्ता ही नहीं। उस वक्त बैण्ड मास्टर स्मिथ जेल में था। अलकेश भैया ने सभीसे कहा, 'मेरे पिता के पास चार लाख रुपये हैं। रूई के व्यापार में मेरे पिताजी ने वहुत रुपये कमा लिए हैं। मेरे पिताजी इण्डिया के कॉटन-किंग हैं।' ११४ पटरानी ये सब बातें आज से बहन साल पहले की हैं, हालांकि ये सब मेरे जानने की यातें नहीं थीं । मेम भाभी का ऐसा रूप मैं जानता भी नहीं था। लेकिन मेम भाभी के नाम उन कुछ पत्रों को पढ़कर में मेम भाभी को नई तरह से देखने लगा था। उसने कितनी तरह से मुझसे झूठ कहा है और कितनी सारी धातें उल्टी बताई हैं। जेब में वे सारे खत ढूंसे में पागलों की तरह मैम भाभी से मुलाकात करने को घूम रहा था। और इसी बीच उस दिन यूमुफ से मेरी भेंट हो गई। शायद उसने मुझे पहचाना नहीं। मैं सड़क पर जा रहा था। अचानक लगा कि पीछेवाला लुंगी पहने आदमी पता नहीं क्या बड़बड़ाता हुया मेरे पीछे से आ रहा है। पलटकर देखा तो पूसुफ था। यूसुफ ने कहा, 'असली विलायती चीज है, वादूजी । खास लन्दन से माई है । बिलकुल अनछुई है। मुझे उस व्यक्ति पर बहुत ही घृणा बाई 1 पहले तो सोचा कि उसे यधिक छूट नहीं हूं। उन लोगों का वही घृणित पेशा है । लेकिन पाकिट में हाथ जाते ही उन चिट्टियों की याद आई। मुझे याद पाया कि विली ने लिखा है, 'दीदी, इस बार क्रिसमस पर पांच सो पाउण्ड और भेजना। इस बार मैटिल्ड के जन्म दिन पर एक ओवरकोट खरीद लिया है । मम्मी को हालत वैसी ही है। एकदम से अधी हो गई है । कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। सारे दिन चस-चख करती रहती है । नुम रुपये जरूर भेजना।' यूमुफ ने फिर कहा, 'असली विलायती चीज़ है, बाबूजी। खास विला- यत से पाई है। मैंने जब अच्छी तरह परख लिया कि वह मुझे नहीं पहचान पाया है और मुझे शिकार समझकर फांस रहा है तो फिर मैंने भी उसकी गलती मुधारने की कोई कोशिश नहीं की। वह नई चीज के गुणों का बहुत बखान करता हुआ मेरे साथ-साथ चलने लगा। वहुत-सी सड़कें पार करके हम उस गली में पहुंच गए, जिसमे मेम भाभी रहती थी। मैंने देखा, हम दोनों काः म भाभी के मकान के सामने खड़े हैं। भाभी ने कहा था, 'ये लोग मेरे खून के एक-एक कतरे तक ते हैं, मालूम है तुझे? तू मुझे इनके हाथों से बचा ले, भई। र बोली थी, 'यह देख, मेरे शरीर में अब कहीं भी खून नहीं बचा : ॉक्टर वैसाख का कहना है कि अगर यही सिलसिला चालू रहा तों धिक नहीं जिऊंगी।' नशे में चूर होकर होशोहवाश खो देनेवाले आदमी की क्या हाल ती है, यह मुझे नहीं मालूम, क्योंकि, मैंने कभी नशा नहीं किया, लेकिन फर भी मैंने महसूस किया कि मेम भाभी को शायद किसी प्रकार का नशा करने की आदत है और वह उसी नशे में चारों ओर से बुरी तरह घिर चुकी है। शायद लौकिक सम्पर्क द्वारा उस नशे के चंगुल से उसे मुक्त कराना सम्भव नहीं। कितने ही दिनों तक मैं अपना लिखना-पढ़ना छोड़कर, अपने आत्मीय स्वजनों को भूलकर, एक अनात्मीया और विदेशी नारी के मोह में, जिससे मेरा कोई सम्पर्क नहीं था, रात-दिन चक्कर काटता रहा। यों मैंने अपने मन को समझाने की बहुत कोशिश की है कि मेम भाभी मेरी कुछ नहीं लगती; माना कि अलकेश भैया के मरने से पहले वह मेरी कुछ लगती थी, पर अब उससे मेरा कोई नाता नहीं; मेम भाभी ने अपने-आप अपना स्वाभाविक पथ ढूंढ निकाला है; यही स्वाभाविक है और यही मेम: भाभी का असली रूप है। लेकिन मानव-मन को समझा लेना यदि इतना ही सहज होता तो फिर चिन्ता किस बात की थी? यही कारण था कि अपनी आंखों को बन्द करते ही मेरे मन की आप स्पष्ट देख लेतीं कि जिन्दगी की समस्याओं का समाधान खोजने के ि लन्दन की सड़क पर दो लड़कियां घूम रही हैं। सड़क पर चलते- उन्हें कैसी पोशाकें पसन्द हैं, कैसा पति पसन्द है, कैसे जूते पसन्द हैं यही बातें उनके दिमाग में चक्कर काटती रहतीं। डोरा कहती, 'वह देख, वे जूते मुझे बहुत पसन्द हैं।' नोरा कहती, 'धत्, उसका स्ट्रेप तो बहुत मोटा है !' ११६ पटरानी मेरा प्रध्यो, 'तुम मोटर में बैठना अच्छा लगता है या मोटर सा रिस पर गोराही, 'घर देस, इस मोजे पर कोमन लिया है, सात मिलिंग कोई भला मामी यापरीद सरता है इतना मंहगा ?' बग, दुनियाभर मी चोजें देवने फिरना और पसन्द करना, यही उन कामयाा पाहे मुट्ठी में कुछ रहे या न रहे, अपने पास पैसा हो या न हो; मेकिन पगाद-नापसन्द करने का अधिकार तो एक भिखारी को भी है। पाच गो पाउण भला तुम्हें कौन दे रहा है ? कौन ऐसा राजकुमार तुम्हारे मलबार में पैदा है, जो देखते ही तुम्हारे गले में वरमाला डाल देगा? मुम्हारे तेरह भाई-बहन है, जिनके फटे कपड़ों में गायुन घिसते-पिसते मुम्हारे हाथों मे पाने भले ही पड़ जाएं, लेकिन स्वप्न ही देखना है तो फिर एक पैसे का यों देय, साख रुपयों का स्वप्न ही देखेंगे न! अगर सपने में खाना ही साना है तो फिर नमकवाला बासी भात भला क्यो गाएंगे, साना तो पुसाववाला ही पाएंगे न ! मैम भाभी ने बताया था, और जब बालक को मैंने देखा तो सोचा, इटालियन पति न सही इण्डियन कॉटन-प्रिंस तो पा ही लिया।' मेम भाभी ने आगे बताया था, 'जब मैं जहान पर चढ़ने लगी कोरा आई पी हमे विदा करने । तब तक उसकी शादी नहीं हुई थी। ने अपने मन में सोचा कि बाजी मेरे हाय ही रही । इण्डिया पहुंचते ही रानी बन जाऊंगी। रानी साहिया बनूगी।' मेम भाभी ने यह भी कहा था, 'मैंने इण्डिया पहुंचते ही डोरा को खत खा था। मैंने उसमे लिखा था कि यहां सभी मुझे रानी साहिया कहकर करते हैं । मैं बहुत बड़े पैलेस में रहती हूं और हर रोज पार्टी देती है। पार्टी में सोने-चांदी के काम की पोशाक पहने राजा-महाराजा आते जो मेरे सामने घुटनों के बल बैठकर मेरा हाथ चूमते है।' अब इतने दिनों के बाद ये सब बातें सोचकर मुझे अच्छा नहीं लगता क्योकि अब कभी भी और कही भी मैम भाभी से साक्षात्कार होने का "10 बिलकुल मेम भाभी के मकान के सामने खड़े हैं। मेम भाभी ने कहा था, 'ये लोग मेरे खून के एक-एक कतरे तक का सौदा करते हैं, मालूम है तुझे? तू मुझे इनके हाथों से बचा ले, भई।' फिर बोली थी, 'यह देख, मेरे शरीर में अब कहीं भी खून नहीं बचा है। डॉक्टर वैसाख का कहना है कि अगर यही सिलसिला चालू रहा तो मैं अधिक नहीं जिऊंगी।' नशे में चूर होकर होशोहवाश खो देनेवाले आदमी की क्या हालत होती है, यह मुझे नहीं मालूम, क्योंकि मैंने कभी नशा नहीं किया; लेकिन फिर भी मैंने महसूस किया कि मेम भाभी को शायद किसी प्रकार का नशा करने की आदत है और वह उसी नशे में चारों ओर से बुरी तरह घिर चुकी है। शायद लौकिक सम्पर्क द्वारा उस नशे के चंगुल से उसे मुक्त कराना सम्भव नहीं। कितने ही दिनों तक मैं अपना लिखना-पढ़ना छोड़कर, अपने आत्मीय स्वजनों को भूलकर, एक अनात्मीया और विदेशी नारी के मोह में, जिससे मेरा कोई सम्पर्क नहीं था, रात-दिन चक्कर काटता रहा । यों मैंने अपने मन को समझाने की बहुत कोशिश की है कि मेम भाभी मेरी कुछ नहीं लगती; माना कि अलकेश भैया के मरने से पहले वह मेरी कुछ लगती थी, पर अब उससे मेरा कोई नाता नहीं; मेम भाभी ने अपने-आप अपना स्वाभाविक पथ ढूंढ निकाला है। यही स्वाभाविक है और यही मेम भाभी का असली रूप है; लेकिन मानव-मन को समझा लेना यदि इतना ही सहज होता तो फिर चिन्ता किस बात की थी? यही कारण था कि अपनी आंखों को बन्द करते ही मेरे मन की आंखें स्पष्ट देख लेतीं कि जिन्दगी की समस्याओं का समाधान खोजने के लिए लन्दन को सड़क पर दो लड़कियां घूम रही हैं। सड़क पर चलते-चलते उन्हें कैसी पोशाकें पसन्द हैं, कैसा पति पसन्द है, कैसे जूते पसन्द हैं, बस, यही बातें उनके दिमाग में चक्कर काटती रहतीं। डोरा कहती, 'वह देख, वे जूते मुझे बहुत पसन्द हैं।' नोरा कहती, 'धत्, उसका स्ट्रेप तो बहुत मोटा है !' . ११६ पटरानी डोरा पूछती, 'तुझे मोटर में बैठना अच्छा लगता है या मोटर साइ- किल पर?' नोरा कहती, 'इधर देख, इस मोजे पर कीमत लिखी है, सात शिलिंग। कोई भला आदमी क्या खरीद सकता है इतना मंहगा ?' बस, दुनिया भर को चीजें देखते फिरना और पसन्द करना, यही उन- का खेल था। चाहे मुट्ठी में कुछ रहे या न रहे, अपने पास पैसा हो या न हो; लेकिन पसन्द-नापसन्द करने का अधिकार तो एक भिखारी को भी है। पांच सौ पाउण्ड भला तुम्हें कौन दे रहा है ? कौन ऐसा राजकुमार तुम्हारे इन्तजार में बैठा है, जो देखते ही तुम्हारे गले में वरमाला डाल देगा? तुम्हारे तेरह भाई-बहन हैं, जिनके फटे कपड़ों में साबुन घिसते-घिसते तुम्हारे हाथो मे छाले भले ही पड़ जाए, लेकिन स्वप्न ही देखना है तो फिर एक पैसे का क्यों देखें, लाख रुपयों का स्वप्न ही देखेंगे न ! अगर सपने मे खाना ही खाना है तो फिर नमकवाला बासी भात भला क्यो खाएंगे, साना तो पुलाववाला ही खाएंगे न ! मेम भाभी ने बताया था, और जव अलक को मैंने देखा तो सोचा, इटालियन पति न सही इण्डियन कॉटन-प्रिंस तो पा ही लिया।' मेम भाभी ने आगे बताया था, 'जब मैं जहाज़ पर चढ़ने लगी तो होरा आई पो हमे विदा करने । तब तक उसकी शादी नहीं हुई थी। मैंने अपने मन में सोचा कि बाजी मेरे हाथ ही रही । इण्डिया पहुचते ही मैं रानी बन जाऊगी। रानी साहिवा बनूगी।' मेम भाभी ने यह भी कहा था, 'मैंने इण्डिया पहुंचते ही डोरा को खत लिखा था। मैंने उसमे लिखा था कि यहां सभी मुझे रानी साहिबा कहकर पुकारते है । मैं बहुत बड़े पैलेस में रहती हूं और हर रोज़ पार्टी देती हूं। उस पार्टी में सोने-चादी के काम की पोशाक पहने राजा-महाराजा याते हैं, जो मेरे सामने घुटनों के बल बैठकर मेरा हाथ चूमते है ।' अब इतने दिनों के बाद ये सब बातें सोचकर मुझे अच्छा नहीं लगता है, क्योकि अब कभी भी और कहीं भी मेम भाभी से साक्षात्कार होने का पटरानी मुझे डर नहीं है। लेकिन एक लड़की के बड़े-बड़े अरमान कितनी दूर तक और किस कदर नीचे उतर सकते हैं, इसका उदाहरण मेम भाभी थी। उससे सभी कहा करते थे, 'इतना घमंड अच्छा नहीं।' जिसके पास पहनने को सिल्क का एक गाऊन तक नहीं है, उसका दिमाग ! मोहल्ले के जो लड़के उसपर व्यंग्य कसते, जो चोरी-छिपे उससे मिलना चाहते, जो उससे शादी करने को उत्सुक रहते; उन्हीं की इतनी उपेक्षा करना क्या उचित था ? जॉर्जी ड्राइ क्लीनिंग में धोवी का काम किया करता था। उससे अगर वह शादी कर लेती तो शायद मां की तरह उसे भी लड़के बच्चों की एक गृहस्थी चलानी पड़ती। और एक था मार्टिन। वह मछली का व्यापार करता था। पर उससे तो उसके अरमान पूरे नहीं होते। मुझे अच्छी तरह याद है कि आवू पहाड़ पर ऊंचे पैलेस में बैठकर मेम भाभी ने कहा था, 'मुझे कोई भी पसन्द नहीं आता था, भई । मैं हमेशा यही सोचती कि मैं जिस स्तर की हूं, उससे ऊंची उडूं। मां की हालत मैं देख चुकी थी। एक के बाद एक शादियां की और अन्त में सिर धुनकर रोती रही। इसीलिए मुझे लगता, अगर मेरी भी यही हालत हुई तो...!' कहते-कहते मेम भाभी की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। वह आगे बोली थी, 'अलक ने मुझे जो कुछ दिया, उसने जितने भी रुपये मेरे हाथ में रखे; मैंने सब अपने देश भेज दिए। उन्हें लिखा कि मेरे पास रुपयों की कोई कमी नहीं । तुमलोगों को जितने रुपयों की ज़रूरत है, सब मैं भेज दूंगी। अव मैं रानी साहिवा वन गई हूं। मैं बहुत ठाट से रहती हूं। मेरे पास अगाध ऐश्वर्य है, किसी तरह का अभाव नहीं। अब मैं सोने के थाल में डिनर खाती हूं और चांदी की कटोरी में करी।' मैंने पूछा, 'इतने रुपयों की उन्हें आवश्यकता किसलिए पड़ती थी ?' मेम भाभी ने बायें हाथ की उंगलियों से बूंघट को थोड़ा-सा सरका- कर मुझे बताया था, 'मेरे तेरह भाई-बहन थे। उनको क्या लायक नहीं वनाना था? मुझे हमेशा यही चिन्ता रहती कि कहीं वे भी मेरी ही तरह ११८ पटरानी । मुसीवतों में न फंसें । मैं चाहती थी कि उन्हे गरम खाना मिले, आलू की सब्जी खाने को मिले। उन लोगों को गन्दी बस्ती में नहीं रहना पड़े, बल्कि वे किसी आलीशान बंगले के शीतताप-नियत्रित कमरे की गरमायी फिजां मे बैठकर अपना शरीर गर्म रख सकें और जाड़े के दिनों में पांव में गर्म मोजे पहन सके। बस, मुझे हमेशा यही चिन्ताएं रहती थी। मेम भाभी ने आगे बताया था, 'मेरे रुपयों के सहारे ही उन लोगों ने एक बड़ा-सा मकान किराये पर ले लिया है। सभी बहन-भाइयों का स्कूल में दाखिला हो गया है । मंझले भाई हेनरी ने साइकिल खरीद ली। क्रिसमस के दिनों में सभोको केक मयस्सर हुआ और मां का शरीर नये तौर पर फिर से स्वस्थ हो गया। भाई-बहन आवारा होने से बच गए।' मैंने कहा, 'मेम भाभी, यह सब तुम्हारी मनगढंत कहानी तो नहीं ?' मेम भाभी ने कहा, 'मैंने जो कुछ किया, सब उन्ही लोगों की सुख- सुविधा को ध्यान में रखते हुए किया था। उस वक्त मेरे हाथ में एक भी पैसा नहीं था और मै फ्री स्कूल स्ट्रीट को गन्दी बस्ती में एक गन्दा-सा फ्लंट लेकर रहती थी, और सुद को यूसुफ एव अब्दुल के हाथों में सौंप दिया था। डॉक्टर वैसाख के काफी कहने पर भी लैने अपने लिए दवा खरीदकर एक पैसा भी व्यर्थ नहीं गंवाया। यहा तक कि मैंने अपने लिए गाऊन तक नहीं खरीदा और किराये पर लेकर काम चलाती रही। यह सब मैंने किसके लिए किया, जरा बताओ तो? उन्ही लोगों की भलाई की चिन्ता के मारे न?' मैंने कहा, 'नही उन लोगों को चिन्ता के कारण नहीं, बल्कि...।' मोटे गद्देदार सोफे पर अपने गहने, साडी और चुनरी के भार से दबी मेम भाभी मेरी बात सुनकर अचरज मे डूब गई। बोली, 'उनके लिए यह सब नहीं किया तो और भला किसके लिए किया? मैंने कहा, 'तुमने सब कुछ खुद अपने लिए किया है । तुम स्वार्थी हो। तुमने अपनी ही स्वार्थपरतावश यह सब किया है।' मेम भाभी को बहुत ताज्जुब हुआ, मानो उसने ऐसी असम्भव बात पटरानी - आज तक नहीं सुनी थी। मानो अपने मन के अन्दर उसने कभी भी झांक- कर नहीं देखा था । सचमुच ऐसा लगा मानो मेम भाभी अपने जीवन में अभी ही ठहरी हो, स्थिर हो सकी हो। मानो यही पहला मौका है, जव उसके दिल को सुकून मिला है, अन्यथा इतने दिनों तक वह वस, मृगतृष्णा के पीछे दौड़ती रही है। पत्थरों के मेहराव के नीचे अपना घृणित जन्म लेकर उसने उसी दिन से दौड़ना शुरू किया था। उसे मोची की सड़की, धोबी की लड़की, फेरीवाले की लड़की और कभी वैण्ड-मास्टर की लड़की बनकर पता नहीं कहां-कहां दौड़ना पड़ा है ! कितना लम्वा सफर! यहां भी नहीं, वहां भी नहीं ! चलो, कहीं दूसरी जगह, जहां सुख-शान्ति से भरपूर स्वाभाविक वातावरण मिले । जहां जाने पर कोई अस्वाभाविक मृत्यु पीछे से काट खाने को न दौड़े। एक ऐसी गृहस्थी की चाह, जहां पत्नी पति पर श्रद्धा करती है और पति पत्नी को प्यार। एक ऐसे परिवेश की कामना, जहां संतान का जन्म अभिशाप न वनकार उत्सव एवं मानन्द से भरा-पूरा हो; जहां बेटे-बेटी को ईश्वर का आशी- यदि मानकर ग्रहण किया जाता हो । इसीलिए तो शो-केश में रखे मोजे देखकर उसके दिल ने एक ठण्डी सांस ली थी, कीमती कार के मालिकों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश की थी और रूप एवं यौवन द्वारा दौलतमंद पुरुपों को प्रलोभित करना चाहा था । वह दिन पर दिन अपने से ही घृणा करना सीखती रही । धोबी का लड़का जॉर्जी या मछली के दुकानदार का लड़का मार्टिन, वे सब उसीके समगोत्री थे। उनसे भला यह गाव तक पीछा छुड़ाती ? इसीलिए तो लन्दन की सड़कों पर कपोल- कल्पित कहानियों के राजकुमार की तलाश में वह भटकती रहती और मन ही मन कल्पित पैलेस के स्वप्न देखती रहती। मैंने कहा, 'तुमने भाई-बहनों के लिए जो रुपये भेजे, वह भी एक तरह से तुम्हारी स्वार्थपरता ही थी।' मेम भाभी ने कहना शुरू किया, 'भरे, मैंने सिर्फ थोड़े-से रुपये ही उन्हें भेजे हैं, भला? अलफ मुझे जितने भी रुपये देता था, उनमें से मैं १२० पटरानी बने लिए कुछ भी बचाकर नहीं रखती थी। अलक मुझे कुछ नहीं कहता था। वह मुझे इतना चाहता था कि क्या बताऊं? परस्ति पता था कि बचानक एक दिन ऐमो दुर्घटना घट बाएमो?' सम-मर स्ककर वह फिर बोली, 'और जब मैने होटल के बार में पहुंचकर अपने शरीर का कारोबार शुरू किया, तब तो पपों का बम्बार लग गया था । 'नेवी एवं 'मामी के लोगों ने मुझे रुपयों में दुवो दिया था। पर उन रुपयों में से अपने लिए कुछ खर्च करने की सोचते हो मेरे दिल पर धुरियांनी चरठीं।' मैंने कहा, 'लेक्नि तुमने यह सब किसके लिए किया मेम भाभी, सच. मच बताना; नहीं तो तुम्हें पार लगेगा?' मेम भाभी चकित-सी रह गई। बोली, "तो क्या इसे भी तुम मेरी स्वार्थपरता ही कहना चाहते हो?" मैंने कहा, 'अवश्य ! तुमने अपने भाई-बहनों, पास-पड़ोसियों, बन्धु- वान्धवों को यह जताना चाहा है कि तुम बहुत पैसेवाली हो । तुम्हारे पास पार धन है । तुम रानी हो, नहीं रानीसाहिया हो।' मेरी बात सुनकर मेम भाभी गुमसुम होकर बैठ गई। बहुत देर तक वह कुछ भी नहीं बोल सकी। बाहर से सन-सेट पॉयंट से सूर्य की रोशनी सोधी बाकर हवामहल पर पड़ रही थी। मैम भाभी ने कहा, 'मेरे सारे गुण भी अब तो अवगुण वन गए-से दीखते हैं । मैंने रातों जग-जगकर अपने शरीर पर कितना अत्याचार किया है ! मेरे पास जो भी माया, मैंने किसीको निराश नहीं लौटाया। बाधी रात के समय भी यगर यूसुफ ने आकर मुझसे कहा कि कोई महाराजा भाए हैं तो मैं उसी वक्त हसमुख चेहरा लिए उनकी कार में जा बैठी हूँ। मैं सोचती कि यह मैं अपने स्वार्थ के लिए तो कर नही रही हूं, बल्कि भाई-बहनों की सुख-सुविधा के लिए ही कर रही हूं: अतः इसमें कोई हर्ज नहीं है। मैंने कहा, 'यह मुझे पता है, मैम भाभी।' met . मेम भाभी ने कहा, 'तू भला क्या जानता है ? और जितना जानता है, उससे अधिक जानना तेरे लिए संभव भी कैसे होता?' मैंने कहा, 'फिर भी मुझे जो कुछ मालूम है, वह शायद तुम्हें भी पता नहीं । जैसे, मैं कितने ही दिनों तक तुम्हारे मकान के सामने चक्कर लगाता रहा हूं। तुम्हारे फ्लैट की इंटों में एक पीपल का पौधा उग आया है। एक बार फ्लैट की छत पर एक कौआ उड़कर आ बैठा था। तुम्हारे मकान की रेलिंग पर भीगा पेटीकोट सूख रहा था। मैं ऑफिस की छुट्टी लेकर सिर्फ उस तरफ मुंह बाए खड़ा एकटक देखता रहता।' मेम भाभी ने कहा, 'मुझे क्यों नहीं बताया ?' मैंने कहा, 'तब क्या तुम्हारा स्वभाव ऐसा था, मेम भाभी? एक दिन तो तुम्हारे यूसुफ ने मुझे रास्ते में पकड़ लिया और 'नई चीज़ है, विलायत से ताज़ा आई है' कहते-कहते मेरे पीछे चलने लगा।' मेम भाभी को बहुत हंसी आई। बोली, "फिर ?' 'मुझे शक हुआ कि वह शायद तुम्हारे बारे में ही कह रहा है, तुम्हारी ही खूबसूरती का वर्णन कर रहा है। यानी वह तुम्हारा दलाल है। तुम्हें देखने का लालच हो आया मन में । उन दिनों पता नहीं क्यों तुम्हें देखने को इतनी लालसा रहती थी मेरे मन में कि क्या बताऊ!' मेम भाभी को मेरी बातों पर शायद यकीन नहीं आया। बोली, 'सच, मुझे देखने को तुम्हें इतनी इच्छा रहती थी ? पर अगर तुम्हें सचमुच इतनी इच्छा होती थी, तो मेरे पास तुम आ भी तो सकते थे। कौन रोक रहा था तुम्हें ?" मैंने कहा, 'यह समझना तुम्हारे वश की बात नहीं है, मेम भाभी। तुम मध्यवर्गीय परिवार में एक लजीला लड़का बनकर तो जन्मी नहीं हो ! मुझे अपने मन की बात कह पाने के लिए कोई नहीं मिलता । अपनी बात मैं पिताजी से भी नहीं कह सकता । उन दिनों मेरे खास यार-दोस्त भी नहीं थे। जिस वक्त अलकेश भैया तुम्हें व्याह कर लाए, उस वक्त सभी- ने तुमपर कितने व्यंग्य करो थे; वे शायद आज भी तुम्हारे कानों तक १२२ पटरानी नहीं पहुंचे। वे सब शूल की तरह मेरे दिल में चुभ हुए हैं। लडकपन की उस उम्र में मैने जी-जान से किसीको चाहा है तो वह सिर्फ तुम्हें ।' लगा कि मेम भाभी को मानो यह नई यात मालूम हुई हो । अचरज भी उसे कम नहीं हुआ। बोली, 'सच ! यह बात थी ! मुझसे तो कभी नहीं कहा तूने ?' मैंने कहा, 'किसीसे प्रेम करना क्या जवान से कहने की चीज है ?' फिर मैंने पूछा, 'मैं तुम्हारे पैरों में महावर रचाया करता था, याद है तुम्हें ?' मेम भाभी को कुछ भी याद नही था । वोली, 'कब ?' मैंने कहा, 'हां, यह बात तो तुम्हारे याद रहने लायक है नहीं, मेम भाभी ! कितनी ही देर तक तुम्हारे युगल चरणो को मैं गोद मे रखे बैठा रहता था । वस, में हरदम सोचता रहता था कि यह महावर लगाना मेरे जीवन में कभी खत्म न हो।' मैंने फिर कहा, 'मेम भाभी, मुझे वे सारी बातें अच्छी तरह याद हैं । मैं कुछ भी नहीं भूला हूं।' मेम भाभी ने कहा, 'मुझे क्योंकर याद रहती, तू ही वता! इण्डिया में तो उस वक्त सभी से यही कहती थी कि लन्दन में हमलोग पैसेवाले हैं। हमारे यहां कार है । और लन्दन भेजे गए पत्रों में मैं यही लिखती कि यहा मैं बहुत ही सुप में हूं। फिर ऐसे मे तेरी बात सोचने की भला मुझे फुरसत ही कैसे होती?' "जिस दिन तुम घर छोड़कर चली गई, तो किसीसे कहकर भी नहीं गई! उस दिन मैं क्या कम रोया था?" मेम भाभी ने पूछा, 'रोया था? पर उस समय तो तू बहुत छोटा था, रे!' मैंने कहा, 'छोटा था तो क्या हुआ ? मैं तुम्हे अपनी मा से भी अधिक प्यार करता था। मैं सोचता कि जिस तरह मेरी मा मुझे लाड़-प्यार करती है, मगर उसी तरह तुम भी लाड़ से मेरे गाल चूमती तो मुझे कितना पटरानी १२३ मच्छा लगता!' मेम भाभी ने एक सिगरेट सुलगाई। सोने की पाइप में लगी सफेद सिगरेट के मुंह पर आग चमक उठी। वह आग मेम भाभी के कानों के हीरे के झुमकों और नाक की हीरे की कील में भी जगमगा उठी। दूर किसी गिर्जाघर की घड़ी में टन्-टन करके कई बार घण्टे वज उठे। सामने रखे पेग में से मेम भाभी ने एक बूंट लिया। सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए वह वोली, 'तूने तो मुझे अचरज में डाल दिया । तू मुझे इतना चाहता था? पर उस वक्त तेरी उम्र ही क्या थी?' मैंने कहा, 'क्या तुम सोचती हो कि छोटे बच्चे कुछ समसते ही नहीं ? तुम समझती हो कि अलकेश भैया जब तुम्हारा चुम्बन लेते थे तो मैं कुछ समझता ही नहीं था ?' मेम भाभी ने कहा, 'ताज्जुब है !' मैंने कहा, 'तुम भले ही चकित हो मेम भाभी, पर मैं चकित नहीं होता। मैं सिर्फ उस दिन चकित हुआ था, जव अलकेश भैया के मर जाने पर तुम विलायत नहीं लौट गई थीं और कलकत्ते में उसी मकान से चिपकी पड़ी रहीं। विधवा का परिवेश ओढ़ा और एकादशी एवं पूर्णिमा के व्रत रखने लगीं। कोरे सफेद वस्त्र पहने, मांग का सिंदूर पोंछ डाला और वाल छोटे-छोटे छंटवा डाले।' मेम भाभी ने पेग में से फिर एक बूंट लिया और बोली, 'जानते हो, उस वक्त मेरे मन में बहुत अहंकार था।' मुझे बहुत अचरज हुआ। मैंने पूछा, 'अहंकार था !' मेम भाभी ने कहा, 'हां, और अव भी है। अभी भी किसीसे हार मान लेने में मेरा सिर फट जाता है। इसीलिए तो लन्दन में डोरा से सिर्फ शर्ते लगाया करती थी । पास-पड़ोसियों के सामने अपनी गरीबी की हालत प्रकट हो जाने से उस लज्जा को मैं वरदाश्त नहीं कर पाती थी। यही कारण है कि मैं अपनी मर्जी से इण्डिया चली आई ।' मैंने पूछा, 'पर अलकेश भैया को तुम कैसे वरदास्त कर सकीं, मेम १२४ पटरानी भामी ? जब कि अलकेश भया ने तुम्हें घोसा दिया था।' मेम भाभी ने कहा, 'नहीं रे, अलक ने मुझे धोखा नहीं दिया, बल्कि मैने ही अलक को घोसा दिया था। मुझे आश्चर्य हुआ ! मैने पूछा, 'यह क्या कहती हो तुम? अलकेग भैया ने ही तो अपना परिचय एक बहुत बड़े बादमी के रूप में दिया था। उसने तुमसे कहा था कि उसके वाप को बहुत बड़ी जमींदारी चलती है, और यह भी कि उसके पिता कॉटन-किंग हैं।' मेम भाभी ने कहा, 'नहीं।' मैंने पूछा, 'तो फिर?' मेम भाभी ने कहा, 'अलक ने मुमसे अपनी असली हालत हो वताई थी कि वह नितान्त मध्यवर्गीय परिवार का लडका है और वकालत पास करके अगर अच्छी नौकरी नहीं मिली तो उसे बहुत तकलीफ होगी। उसने यह भी कहा था कि मेम व्याहकर ले जाने से उसके मां-बाप के मन में बहुत तकलीफ होगी । बलक बहुत सीधा लड़का या। मुझसे उसने कोई वात छिपाकर नहीं रखी थी।' मैंने पूछा, 'यह क्या कह रही हो, मेम भामो ? क्या सचमुच ही अलकेश भैया ने तुम्हें नहीं ठगा था ?' मेम भाभी ने सिगरेट का एक कश योर लगाते हुए कहा, 'हां, सचमुच उसने मुझे नहीं ठगा, दरमसल मैने ही उसे ठग लिया था। सच्ची बात तो यह है कि मैं मुद सभी के सामने उसको मूब पैसेवाले के रूप में प्रमा- णित करना चाहती थी। मैने ही सबसे पहा था कि उसके पिता कॉटन- किंग हैं और वह कॉटन-प्रिंस है। मैंने ही सबसे कहा था कि मैं इण्डिया में जाकर रानी बनूंगी। मेम भाभी की बातें मुझे दुनिया का सातवां आचर्य-सी लग रही थीं। मैंने पूछा, पर यह क्यों किया तुमने ?' मेम भाभी ने कहा, 'बताया न कि मैं सभीसे घृणा करती थी। मेरे चारों मोर जो भी दीखते रहते उन सबसे मुझे बेहद घृणा थी। अपनी मां, पटरानी १२५ ? और भाई-बहन सभीसे।' ई-बहनों से भी ? जिनको तुम इतने रुपये भजती रही हो अव पम भाभी ने कहा, 'हां । उनका कसूर था कि वे गरीव क्यों हुए पास रुपये क्यों नहीं हैं ? वे किसलिए पढ़ना-लिखना नहीं सीख ते और बस्ती में इतने गन्दे होकर क्यों पड़े हैं ? और मैं...? अपने- से भी मैंने कम घृणा नहीं की है।' मैं चुपचाप बैठा रहा। आवू पहाड़ की ठंडी हवा शरीर को छू रही ।। फतेहगढ़ के बड़े महाराज के प्रासाद-प्रांगण में बैठकर सुनी हुई वे बातें मानो आज भी मेरे कान सुन रहे हैं । जिस मनुष्य को वचपन ही से सबसे घृणा मिली हो और जिसने स्वयं भी सबसे घृणा की हो, उसका ऐसा घृणित जीवन-यापन करना अव मेरे लिए कोई अचरज की बात नहीं रही। उस दिन मानो पहली वार मेम भाभी को मन से क्षमा कर पाया। मेम भाभी जल्दी-जल्दी पेग से छूट भर रही थी और ऐसा लगता था, मानो अपनी समस्त पीड़ा और यंत्रणा की माग को जला-भुनाकर राख कर देना चाहती थी। मेम भाभी ने आगे कहना शुरू किया, 'मेरे मन की जव ऐसी हालत थी, तभी मेरे जीवन में अलक आया। इटालियन नहीं, इण्डियन ! अलक ने मुझसे कहा भा, 'नोरा, तुम्हें मुझसे शादी करके बहुत मुसीवतों का सामना करना पड़ेगा।' मैंने कहा था, 'अलक, अगर तुमसे शादी नहीं की तो मुझे और अधिक मुसीबतें उठानी पड़ेंगी। मैं लन्दन छोड़कर बहुत दूर चली जाना चाहती हूं। मुझे तुम खाना मत देना, पहनने को मत देना, लेकिन सिर्फ अपने साथ ले चलो।' अलक ने कहा था, "पिताजी के मन में बहुत दुःख होगा। मुझपर उनकी बहुत बड़ी-बड़ी उम्मीदें बंधी हैं।' 'मैंने कहा था, 'तुम मुझे जो कुछ करने को कहोगे, मैं वही करूंगी मैं हिन्दू घराने की बहू बनकर रह लूंगी। जिस तरह तुम लोगों के घर . । १२६ पटरानी बहुएं रहती हैं, मैं भी वैसे ही रहूंगी। लेकिन यहा मैं अब अधिक नहीं रह पाऊंगी। किसी तरह मुझे बचा लो तुम ।" 'पार्क की बेंच पर बैठकर मैंने अलक को बहुत तरह से समझाया था। मेरे घर का वातावरण मुझे जहर-सा लगता। घर की बात याद भाते ही मन-प्राण एकदम विपले-से हो उठते । भाई चोर बन गए थे। बहनें बड़ी होकर मुझ जैसी बन जाएगो, सोचकर रातो को नीद नही आती थी। इन सबके बावजूद, मैं वही सड़कों पर मारी-मारी फिरती और शो-केस की चीजे देखती रहती एव रात को सोने से पहले इटालियन युवक का सपना देखती। यही मेरी रोजमरे को रूटीन थी।' मैं बहुत देर से मेम भाभी की बातें सुन रहा था। मैंने अब मुंह खोला और कहा, 'तुम तो सुन्दर लड़की थी ! तुम्हे शादी की इतनी क्या फिक थी?' मेम भाभी ने कहा, 'हमारे देश में गरीव का कोई मोल नही, चाहे वह कितना ही खूबसूरत क्यो न हो। मैने मलक से कहा था कि मैं धनी आदमी के रूप में तुम्हारा प्रचार करूंगी, इससे तुम इन्कार मत करना। अलक ने कहा था, 'पर मैं सचमुच पसेवाला नहीं हूं। मेरे पास एक भी मोटरकार नहीं है। रहने लायक सिर्फ एक मकान है, वह भी एक गली में।' मेम भाभी ने कहा था, 'ठीक है, गली में है तो रहने दो; पर मेरी चात तुम टाल नहीं सकते।' 'और तभी से अलक प्रिंस बन गया, जमीदार का बेटा। और उसके पिता बन गए कॉटन-किंग । अलक की चार-चार गाड़िया हो गई । इण्डिया मैं बहुत बड़ा पैलेस बन गया। मैने अलक के साथ नाटक, सिनेमा और हासो में जाना शुरू कर दिया। मेरे शरीर पर सिल्क का गाऊन सुशोभित रहने लगा। मैं इण्डिया की रानी यानी कि रानीसाहिबा बन गई। सभी मुझसे ईयां करने लगे। मेरे मा-पिताजी, पास-पडोसियों को, उनसे भी पटरानी - बढ़कर डोरा को बड़ी ईर्ष्या होती थी। ओह, उस समय मुझे कितना आनन्द आता था, तुम्हें क्या बताऊं?' मैंने कहा, 'यह सब मुझे मालूम है।' मेम भाभी ने पेग को मेज़ पर रखा और वोली, 'तू सब कुछ जानता है ? लेकिन तुझे कैसे मालूम हुआ ?' मैंने कहा, 'ये लो तुम्हारे पत्र ।' 'ये पत्र तुम्हें कहां से मिले ?' मैंने कहा, 'मैने सारे पत्र पढ़ लिए हैं। इतने दिनों तक तुमने मुझसे झूठ कहा, मुझे धोखा दिया; यह सब मैंने ये पत्र पढ़कर ही जाना है । मुझे मन में कितना दुःख हुआ है मेम भाभी, यह तुम नहीं समझोगी। ये पत्र लेकर मैं दिन-दिन-भर घूमता रहता था। जहां भी तुम्हारा नाम लिखा मिलता, उस जगह को बार-बार चूमता रहता। बहुत बार इच्छा हुई कि तुमसे मुलाकात करूं और तुम्हें ये पत्र देकर कैफियत मांगू कि क्यों तुमने इतने दिनों तक इस तरह मुझसे झूठी बातें कहीं ?' मेम भाभी क्षण-भर को चुप रह गई। 'मैंने क्या सिर्फ तुमसे ही झूठ कहा है ? समूचे विन्सेंट स्क्वायर के लोगों को मैंने धोखा दिया है । सभी लोगों को यही बताया है कि इण्डिया आकर मैं रानी वन गई हूं। मेरे पास दस आयाएं चालीस खानसामे और एक बहुत विराट पैलेस है । मैं ऐसी स्वार्थी, झूठी एवं पाखण्डी हूं कि क्या वताऊं? अंत में जब अलक मर गया तो मैं उसके लिए भी कभी नहीं रोई। रोई तो सिर्फ इसलिए कि मेरा छल-प्रपंच मेरे देश के लोगों के सामने प्रकट हो जाएगा। यही कारण है कि मैं वापस विलायत भी नहीं लौट सकी और अपना बड़प्पन दिखाने के लिए हजारों रुपये अपने देश भेजती रही। मैंने कहा, 'यह भी मुझे मालूम है।' मेम भाभी ने पूछा, 'तूने कैसे जाना?' मंने कहा, 'तुम्हारे भाई से मेरी भेंट हुई थी।' १२८ पटरानी 'ओह, यह क्या कहते हो ?' मेम भाभी हिस्को का चूंट भरना चाहकर भी मानो नहीं भर सकी। उस समय फिर गिर्जाघर की घड़ी ने टन-टन कर बहुत-से घण्टे बजाए। सारी बातें आज भी मुझे ज्यों की त्यो याद हैं। यूसुफ लम्बे-लम्बे डग भरता मेम भाभी के कमरे के सामने ले गया, पर वहा पहुंचकर देखा कि मेम भाभी के कमरे में ताला वन्द था। यूसुफ तो शायद चकित हुआ था, पर मुझे किसी तरह का अचरज नहीं हुआ था। जिसको विविध उपायों से रुपये बटोरने का रास्ता चुनना पड़ता है, उसके लिए कोई भी वक्त निश्चित नहीं रहता; यह मैं जानता था । मैं जानता था कि मैम भाभी मजबूर होकर धन-ऐश्वर्य निगल रही है । पत्रों में इसका प्रमाण भी मिल गया था मुझे । मैं जानता था कि रुपयों की खुद उसको कोई खास आवश्यकता नहीं थी, पर उसके देश के भाई-बहन मुह वाए उसके रुपयो की उम्मीद लगाए बैठे थे। उनकी दीदी का विवाह इण्डियन प्रिंस के साथ हुआ था, अतः रुपयो की भाग करना उनका अधिकार था। उनकी दीदी ने भी यहा से उनको पत्र लिखा था, 'मैं और रुपये भेज रही हूं। तुम लोग विन्सेंट स्क्वायर छोड़कर लिस्टर स्क्वायर में कोई मकान किराये पर ले लेना । इन रुपयों से हेनरी के लिए गैवहिन का सूट सिलवा देना । मार्टिन के लिए ट्राइ साइकिल खरीदना, विली के लिए स्कूल की फीस जमा करना और मिनी की फ्रॉक-सुट बनवा देना । मा के लिए दवाई और नेकलेस खरीद देना । लेनी के लिए पराम्बूलेटर और केटी के लिए गुडिया भी लेना।' आदि-आदि । एक सुबह जव नौद खुली तो विन्सेंट स्क्वायर के लोगो को पता चला कि शरावी वैण्ड-मास्टर की बड़ी लड़की नीरा स्मिथ एक इण्डियन प्रिंस के साथ एन्गेज्ड हो चुकी है। बूढ़ी धोविन मार्गरेट एक दिन आकर कहने लगी, 'अरी, जो कुछ सुन रही हूं, क्या वह सब सच है ? भगवान करे, तुम्हारी लड़की जुग-जुग जिए।' बूढ़ी मछुमारिन मिसेज़ हडसन ने आकर कहा, 'तो आखिर तुम लोगों की भी दशा पलटी?' मोदी फिर से उधार देने लगा। मांसवाला अव भेंट होने पर 'गुड मॉनिंग मिसेज़' कहता । भाई-बहनों को बगल के घरों से पार्टियों में शरीक होने के लिए फिर से निमंत्रण आने लगे। पर सभी एक ही बात पूछते कि उसने प्रिंस को आखिर फांसा कैसे ? नोरा के पास रूप है। गालों पर रंग चढ़ा हुआ है। शरीर में मांस है। कमर में लचक है । माथे पर सुनहरे बाल हैं । उसमें पुरुपों को रिझाने के सभी गुण हैं । पर फिर भी उसने जिसको फांसा है, वह है तो आखिर प्रिंस ही न, और बहुत रुपयों का मालिक भी ! पर असली वात डोरा के सिवाय और किसीको मालूम नहीं थी। वे दोनों रास्ते में शो-केस में लगे कपड़े, मोज़, गाऊन वगैरह देखते हुए साथ-साथ चल रही थीं। अचानक एक बहुत बड़ी कार आकर एक बहुत बड़ी दूकान के सामने खड़ी हुई। उसमें एक इटालियन बैठा था। ओर अद्भुत खूबसूरत जवान चेहरा था उसका ! ऊपरी होंठ के अगल- बगल पतली-सी सुन्दर-सी मूंछ थी । इटालियन कार का दरवाजा खोल- कर उतरा। डोरा ने कहा, तू उस व्यक्ति का अचानक एक चुम्बन लेकर उसे चौंका सकती है ?' जान न पहचान, नाम-पता कुछ मालूम नहीं, यह कैसा मज़ाक है ? पर उससे क्या फर्क पड़ता था। उन दिनों की तो बात ही निराली थी। उन दिनों नोरा इटालियनों के स्वप्न देखा करती थी। उस समय स्वयं । 'नोरा, १३० पटरानी से और अन्यान्य सभी लोगों से वह घृणा करती। उसे लगता कि अपने अगल-बगल वह जो कुछ देख रही है, सब पाप है। भाई-बहन पंसों के कारण पढ़ाई-लिखाई नहीं कर पा रहे थे। वैष्ट-मास्टर शराब पीकर घर लौटता और शराव पोन को नहीं मिलती तो महाभारत मचा देता। वह यही सब सोचती कि इन सब कलंकों एवं घिनौने जीवन से से किस प्रकार मुक्ति मिल सकती है ? नौरा ने कहा, 'हां, चुम्वन ले सकती हूं। कितने की शर्त रही ?' डोरा ने कहा, 'एक शिलिंग की।' खैर, एक मिलिग ही सही। पर इस बीच इटालियन दूकान में घुस गया था। अव दूकान से बाहर थाने पर ही उसका चुम्बन लेना सम्भव था। नोरा और डोरा दोनो दूकान के बड़े गेट के पीछे छुप गई। कभी- कभी भीतर झाककर देख लेतीं। अव शायद भा रहा है ! अगर वह दूकान से निकल, फुटपाय पारकर फिर कार में बैठ या तो, कुछ नहीं हो सकेगा। चुपचाप खड़े-खड़े उन्हें लगा कि इस बार इटालियन बाहर आ रहा है। नोरा रेटी हो गई। वह जैसे ही दुकान से बाहर निकला कि नोरा ने उछलकर उसका चुम्बन ले लिया। वह आदमी कम चकित नहीं हुआ था। पर उससे भी अधिक विस्मय नोरा को हुआ। क्योंकि वह इटालियन नहीं, बल्कि एक इण्डियन था। अलक मित्र ! पिता के इकट्ठे किए रुपयो को खचं करके वह वकालत पढने विलायत आया था। खर, इण्डियन ही सही। गरीब का लड़का है तो क्या हुया? उसी दिन से उन दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई। दोनों ने रेस्तरा में बैठकर कॉफी पी। नोरा ने कहा, 'याज मे तुम प्रिंस और मैं प्रिंसस !' बलक लजीला लड़का था। बोला, 'पर में तो गरीव लड़का हू। पिता के पास मामूली-सी जायदाद है। किसी तरह विलायत चला पाया हूं।' पटरानी मैंने कहा, नोरा ने कहा, 'नहीं, तुम यह बात किसीसे नहीं कहोगे । मैं सभी. को तुम्हारा दूसरा ही परिचय दूंगी।' और नोरा जहां भी जाती, उसका परिचय करा देती, 'कॉटन प्रिंस ऑफ इण्डिया।' मेम भाभी ने कहा था कि, 'तुम लोगों में एक कहावत है न कि मन की चाह कभी न कभी पूरी होती ही है। सो एक दिन मैंने सुल्तानगंज के छोटे प्रिंस को भी पा लिया। सचमुच का प्रिंस ! चेहरे पर जैसी प्रिंसियन कट थी, वैसे ही उसके पास रुपया-धन-दौलत भी अपार था। तुमने उसे देखा नहीं है ?' 'देख चुका हूँ!' मुझे याद है कि मेम भाभी के फ्री स्कूल स्ट्रीट वाले फ्लैट के गेट पर ताला देखकर मैं धीरे-धीरे वापस आ रहा था। शाम घिर आई थी। पिंजरे के कनेर पक्षी चहचहा रहे थे। सहन में वतखों का झुण्ड 'पीक-पीक' करके पुकार रहा था। यूसुफ ने कहा, 'आप थोड़ी देर ठहर जाइए, बाबूजी। मेम दीदी बस अभी आती हैं। लेकिन काफी देर तक खड़े रहने पर भी जब मेम भाभी नहीं आई तो मैं चल पड़ा। हठात् वाहर मोटर की आवाज सुनाई दी। मैं ओट में छुपने ही जा रहा था कि सामने मेम भाभी आ खड़ी हुई। मेम भाभी की पोशाक देखकर मैं चौंक उठा। उसने पुरुषों की तरह टाइट ट्राउज़र और सिल्क की ढीली शर्ट पहन रखी थी। गले के कॉलरों को एकदम सीधा खड़ा कर रखा था। बाल पुरुषों की तरह छोटे-छोटे छंटवा रखे थे । भेम भाभी ने बताया कि छोटे कुमार साहब से वात यह हुई थी कि वे मुझे अपने घर ले जाएंगे। पर उन्होंने मुझे अपने वागवाले मकान में ले जाकर रखा। सारी रात उनकी मोटर दौड़ती रही। कलकत्ता पार- कर जैशोर रोड से कार सीधी चलती रही। आसमान में चांद निकल आया था। मेरा शरीर अलसाता जा रहा था। छोटे कुमार साहब ने १३२ पटरानी कार चलाते-चलाते हठात् एक पेड़ के नीचे लाकर उसे रोक दिया। मेरे सामने सिगरेट बढाते हुए बोले, 'लो नोरा, सिगरेट पियो।' मैंने कहा था कि मेरा सिगरेट से पेट नहीं भरेगा। कुमार साहब ने पूछा, 'जरा में भी तो सुनूं भला, किस चीज़ से तुम्हारा पेट भरेगा?' मैंने कहा, 'रुपयों से।' 'कितने रुपयों से?' मैंने कहा, 'महीने में दस हजार रुपये । कुल मिलाकर।' कुमार साहब सहमत हो गए। कुमार को जमीदारी की आय सात लाख रुपये थी, जिसमें उनका हाथ खर्च तीन लाख रुपया सालाना था। बाकी रुपये किस सुराख से होकर कैसे निकल जाते, यह पता ही नहीं चलता। आज पार्टी है तो कल डांस और परसो पिकनिक । अब मुझे होटल के वार में नाचना नहीं पड़ता। उपवास भी नहीं करना पड़ता। न मुझे जूते, गहने एवं गाऊन किराए पर ले-लेकर रुपये इकट्ठे करने पडते हैं। यूसुफ और अब्दुल मिया के अत्याचार भी सहन नही करने पड़ते। मेरे शरीर मे मांस भरने लगा। पीठ पर परत जमने लगी। जब भी छोटे कुमार साहब के साथ मैं बाहर निकलती, होटलों में लंच लेती या पार्टियों में डिनर लेती तो सभी गौर से मेरी ओर देखने लगते । और मैं अपने लन्दन के दिनो के बारे में सोचती, केटी, मार्गी, मा एवं भाई- बहिनों के बारे मे सोचती; डोरा एवं मोहल्ले के लोगों के बारे में सोचती। सभीको बुलाकर अपना यह रूप दिखाने की इच्छा होती कि देखो, अव मैं सचमुच की रानी बन गई हूं। सचमुच को पटरानी वन गई हूं । प्रिंसेस बन गई हूं।...और वुड स्ट्रीट में छोटे कुमार साहब के आते ही रुपये और शराब का फुहारा-सा खुल जाता। पटरानी १३३ मुझे याद है कि मेम भाभी को देखकर मैं एक ओट में छिप गया था। वह जल्दी से सीढ़ियों से होती हुई ऊपर चली गई थी। सुल्तानगंज के छोटे कुमार साहव गाड़ी में बैठे थे। क्या सूबसूरत चेहरा था उनका ! सचमुच ही मानो इटालियन प्रिंस हों! कार एक मधुर-सी चीख मारकर चली गई। मैं यूसुफ के आह्वान की उपेक्षा करके चला आया। उस दिन की स्कूल स्ट्रीट में मैंने मेम भाभी से मुलाकात क्यों नहीं की? गुस्से से या ईष्या से ? अगर गुस्से से तो आखिर क्यों, यह भी पता नहीं था। मेम भाभी ने मुझसे झूठ कहा था, क्या इसलिए उसपर नाराज होने का मुझे अधिकार था ? मेम भाभी ने मुझसे झूठ कहा, इसमें विस्मित होने की क्या बात है ? और रही ईर्ष्या की वात ! सो सुल्तानगंज के छोटे कुमार साहब से मैं ईर्ष्या करूं, इतनी भला मेरी सामर्थ्य कहां? एक बार तो मैंने सोचा, सारे पत्र फाड़कर फेंक दूं । हर किसी दिन मेम भाभी ने मेरा लाड़ किया था और स्नेह से चॉकलेट लाकर दिया था, यह बात में कैसे भूल जाता? तव तक मैंने अपने पर काबू पा लिया था। धीरे-धीरे मैं अपने घर की ओर अकेला लौट रहा था कि अचानक एक नजारा देखकर मैं चकित रह गया। मिलिट्री की पोशाक में पता नहीं कौन एक व्यक्ति हमारे बंगाली मुहल्ले में चहलकदमी कर रहा था। आमना-सामना होते ही उसने मुझसे पूछा, 'बाबूजी, प्रिंसेस नोरा मित्र किस घर में रहती हैं, बता सकते हैं आप?' मैंने पूछा, 'तुम कौन हो? कहां से आए हो?' उसने कहा, 'प्रिंसेस मेरी बड़ी बहन है । मैं युद्ध में डॉक्टर बनकर आया हूं। यहां के एक प्रिंस के साथ मेरी दीदी की शादी हुई है।' पूछा, 'प्रिंस के साथ ?' एक बार तो मैं कहने जा रहा था कि यह सब झूठी बात है। सुल्तानगंज की बात भी बताना चाहता था। पर मुझे तीन उत्सुकता ने आ घेरा। उस व्यक्ति को मैंने सिर से पैर तक गौर से देखा। उसका - १३४ पटरानी नाफ-नका बिल्कुल मेम भाभी की तरह या । अगर वह लड़की होता तव तो शायद उसे मेम भाभी समझने में भूल न होती। वैसा ही मधुर और वैसा ही नाजुक ! उम्र में भी वह अधिक नहीं था। मैंने कहा, 'नोरा मित्र मेरी भाभी लगती हैं। उनकी शादी वैरिस्टर अलकेश मित्र के साथ हुई थी। मैं उन्हें मेम भाभी के नाम से पुकारता या। वो देखो, वह मकान है उसका। लेकिन...' मैंने फिर कहा, 'तुम्हारा नाम क्या है ?' उसने कहा, "विलियम कार्लाइल स्मिय । लेकिन मभी मुझे विली कहते हैं।' मैं मम भाभी के भाई को लेकर चाय को एक दुकान पर जाकर बैठ गया। मुझे याद है कि वहां बैठकर मैने मेम भाभी के घर को बहुत-सी बातें मुनी थी। जैसे उनके कितने भाई हैं, कितनी दहनें हैं ? मां अन्धी हो गई है। वाप मून के जुर्म में जेल चला गया है। उन्होंने विन्सेंट स्क्वायर वाला मकान छोड़कर लिस्टर स्ववायर में बहुत बड़ा मकान खरीद लिया है। और यह सब मेम भाभी के पैसों से हुआ है। दीदी के पास बहुत पैसा है, अत: वह हर महीने बहुत रपये पर भेजा करती है। उन्ही रुपयों से वहन-भाई लायक बन पाए हैं। लिखना-पढ़ना सीख लिया है। मार्गी की एक कर्नल के साथ शादी हुई है । केटी की इंगेजमेट एक डॉक्टर के साथ हुई है। मिनो वायलिन वजाने में ग्रासी निपुण हो गई है। वायलिन बजाने में उसे सर्टीफिकेट भी मिला है। सभी अगर किसी योग्य बने हैं तो सिर्फ दीदी के रुपयों से । क्योंकि दीदी के पास बहुत रुपये हैं न ! मेम भाभी के भाई ने कहा था, 'उसके पास अगर इतने रुपये नहीं होते तो वह हर महीने इतने रुपये क्योकर भेजती? हमारे पडौस में जो लोग हमें देखकर दूर से कतराया करते थे, वे बव हमारी बहुत खातिर करते हैं। बड़ी-बड़ी फैमिली के लड़के मैटिल्ट से शादी करना चाहते हैं।' मैंने सोचा, तो यह बात है। दीदी ने खून का पानी बनाकर इतने पटरानी, - रे लड़के-लड़कियों को योग्य बनाया। खैर, एक गृहस्थी में तो सुख- न्ति हुई; चाहे मेम भाभी को यक्ष्मा ही क्यों न हो जाए ! डॉ० बैसाखं. दवाई की खुराक कंजूसी के मारे न भी ली तो क्या हुआ, पर वह सुल्तानगंज के छोटे कुमार साहब के नशे की खुराक रातों-रात अवश्य जुटाती रहती होगी। जिसने हरदम घृणा ही करनी सीखी हो, जिसने समूचे वातावरण, अपने सगे भाई-बहनों, मां-बाप, पास-पड़ोसियों, यहां तक कि खुद से भी घृणा ही की हो; आज अगर वह उस घृणा के द्वारा ही कुछ लोगों का उपकार करना चाहती है तो यही क्या कम बड़ी वात है ? रात जब नशे में चूर होकर सुल्तानगंज के छोटे कुमार साहब के भुज-बन्धन में कसी रहकर वह प्रश्न करती है, 'तुम मुझसे शादी करोगे न? मुझे रानी बनाओगे न ?' तब छोटे कुमार शायद यही जवाब देते होंगे, 'मान लो, तुम मेरे स्टेट की प्रिंसेस नहीं बन सकी, पर मेरे हृदय- साम्राज्य की प्रिंसेस तो हो ही । मेरे दिल की रानी!' मेम भाभी ने कहा होगा, 'लेकिन मैं तो तुम्हारे हरम की प्रिंसेस बनना चाहती हूं। वुड स्ट्रीट की नहीं।' छोटे कुमार ने कहा होगा, 'पर वहां तो पहले से ही चार मौजूद हैं मेम भाभी ने कहा होगा, 'होंगी, मेरे जाने से पांच हो जाएंगी ६ उसमें हर्ज ही क्या है ?' छोटे कुमार साहब ने जवाब दिया होगा, 'नहीं, ऐसा नहीं सकता।' 'क्यों नहीं हो सकता?' छोटे कुमार साहब ने कहा होगा, क्योंकि अगर तुम्हें लड़क तो वह स्टेट की जायदाद में हिस्सा चाहेगा? तुम मेरे दिल की 'भ बनना चाहो तो वह हिस्सा मैं तुम्हें दे सकता हूं। लेकिन स्टेट ज्वाइन्ट प्रॉपर्टी है, वह तुम चाहोगी तो मैं नहीं दे सकता।' मेम भामी ने कहा होगा, 'मेरी सुख-सुविधा से तुम्हारी स्वे १३६ पटरानी महत्वपूर्ण है। क्या यही है तुम्हारा प्रेम?' छोटे कुमार साहब ने कहा होगा, 'लो, थोड़ी-सी डिस्को और पियो । बभी तुम्हें नगा नहीं हुआ है । नशा हो जाने पर देखना, यह मव याद नहीं रहेगा। मेम भाभी ने जवाब दिया होगा, 'तुम नगे के जोर से मुझे फुसला लोग, में ऐसे देश को लड़की नहीं हूं। अपना देश छोडकर इण्डिया मे नमा करने नहीं आई हूं मैं। हमारे देश में नशा करने के लायक बहुत मी चीजें हैं। छोटे कुमार माहब ने कहा होगा, तो फिर किसलिए माई हो?' मैम भाभी ने कहा होगा, "मैं प्रिसेस बनने आई हूं। रानी बनने भाई छोट कुमार साहब सुनकर चकित रह गए होंगे, 'रानी बनने ? तब तो तुम्हें किसी प्रिंस से ही शादी करनी चाहिए थी।' मैम भाभी ने कहा होगा, 'मैंने प्रिंस मे ही शादी की थी।' छोटे कुमार माहय ने पूछा होगा, 'कहां के प्रिंस से ? उनको स्टेट कहां है?' मेम भाभी ने बताया होगा, 'वह न तो प्रिम था और न उसकी कोई स्टेट ही थी। लेकिन मैंने म8 से ही दूध का स्वाद पा लिया था। सभी लोगों से उसका परिचय प्रिंस के रूप में ही करवाया था। लेकिन वह मेरी किस्मत में कायम रहना नहीं वदा था। पर में हार नही मान सकती थी, अतः होटल के वार में जाकर नाचना शुरू किया । अन्त में तुम मचमुच के प्रिंस आए। मुल्तानगज के प्रिंस, छोटे कुमार साहब।' छोटे कुमार साहव मानो वोर हो उठे। उनके पास हरम मे बहुत-सी औरतें है, बाहर भी बहुत मी नारियों के सम्पर्क में आने का अवमर मिला; लेकिन ऐसा प्रश्न किसीने उनसे आज तक नहीं किया होगा। मेम भाभी की वाहियात बातें मुनते-सुनते उनका बहुत-मा कोमती नशा बेकार चला गया होगा।

- म भाभी ने कहा, 'अन्त में मेर जावन में असली प्रिंस भी आया, सचमुच की प्रिंसेस नहीं बन सकी।' मेम भाभी ने फिर सिगरेट पीना शुरू कर दिया। उसने कहा, 'एक में मेरी फतेहगढ़ के बड़े महाराज से भेंट हुई। बड़े महाराज की हो रानियां मर चुकी थीं, सिर के बाल सफेद हो गए थे; लेकिन रसि- ता खत्म नहीं हुई थी। उनके पास अपार खजाना, बड़ी ज़मींदारी, हाथी- गोड़े-ऊंट, लाव-लश्कर, पियादे-पालकी हैं । यह जो कुछ यहां तुम देख रहे हो न, सब उसीका है। कलकत्ते में वह पैसे उड़ाने आया था और वहीं उससे मेरी बातचीत हो गई। महाराज ने कहा, 'मैं तुम्हें रानी वनाऊंगा।' मेम भाभी ने कहा, 'कितने देंगे आप मुझे? सुल्तानगंज के छोटे कुमार मुझे दस हज़ार देते हैं । कुल मिलाकर !' बड़े महाराज ने कहा, 'मेरा तो सर्वस्व तुम्हीं हो। सव कुछ तुम्हारा है । मैं भी तुम्हारा हूं।' आधी रात को छोटे कुमार साहब के यहां से भागने का इन्तज़ाम हुआ। आधी रात के वक्त एक गाड़ी वुड स्ट्रीट वाले मकान के सामने भाकर खड़ी हुई। दरवान, खानसामा और आसपास के सभी लोगों को मोटी रकम बतौर घूस के दी गई। वे सब जवाब-तलब के वक्त यही कहेंगे कि, 'हमें पता नहीं।' सभी नींद में सोए रहने का बहाना करेंगे। इंग्लैंड के एक गांव में एक पत्थर के मेहराव के नीचे जन्मी मेम भाभी की जन्मकथा भी एक गिरगिट के सिवाय और कोई नहीं जानता। उस दिन गिर्जा की घड़ी के घंटे की ध्वनि के साथ ईशु की कौन-सी वाप उच्चरित हुई थी, यह भी किसीको मालूम नहीं है । किसे पता था उसका जीवन-चक्र किस विचित्र गति से राहें अतिक्रमण करता हुआ समुद्र तेरह नदियां पारकर किस देश में जाएगा और उसकी नियति कहां ला पटकेगी? मेम भाभी के जीवन में ईसा, बुद्ध, मुहम्मद सन हो चुके हैं । घृणा और संदेह, पाप और नफरत के वातावरण से - . पटरानी पाने की आपाप कोशिश में वह किन यतन गहराइयों में डूबती जा रही है, यह भी किमीको पता नहीं था। सिर्फ मुझे जितना-मा मालूम था, उतने के लिए में गवाह था। वह भी बहुत साधारण-सी जानकारी थी मरी। उस दिन चाय की दुकान के एक कोने में वैटकर बव मैम भाभी के भाई ने मेरी दातें मुनी, तो वह स्तम्भित रह गया या। दोला था, तो क्या मेरी दीदी की शादी प्रिंस से नहीं हुई थी ?' मैने उत्तर में कहा था, 'नहीं।' उसने पूठा था, तो फिर वह हर महीने हजारों पावण्ड किस तरह भेजती है हमें?' मैंने कहा, 'बुद साती नहीं, दुद की दवा-पानी नहीं करवाती एवं अपने खून का पानी दनाकर तुम लोगों को रुपये भेजती रहती है।' उसे और भी अचरज हुआ । वोला, 'लेकिन बव तो हमें रुपये भेजने की कोई जरूरत नहीं। सभी भाइयों को नौकरी मिल चुकी है। सभी वहनों की शादी हो चुरी है। मां मर चुकी है। पिताजी जेल में ही मर गए। मैंने तो एक बार ये बातें एक खत में से लिसी भी थीं। क्या वह पत्र उसे नहीं मिला?' उस लड़के का चेहरा लाल बौर पमीना-पनीना हो गया। उसने मुझसे पूछा, 'वह इतने रुपये कहा से लाती थी, आप बता सकते है ?' मैने कहा, 'नहीं।' उसने पूटा, 'बब कहां है वह, बता सकते हैं मन अपने मन को कठोर बनाते हुए दृढ मन से जवाब दिया, 'मर चुकी है।' सुनते ही उसका चेहरा बर्फ की तरह सफेद पड गया। वोला, "मर गई ? कब?' मैंने कहा, 'कल ।'

कल का दृश्य मेरी आंखों में फिर से तैर उठा । मैं फ्री स्कूल स्ट्रीट क खम्भे के पीछे छिपा हुमा था । मैंने देखा कि सुल्तानागंज के छोटे र साहव की नई कार से मेम भाभी उतरी। मैंने गौर से देखा तो हसूस किया, मानो उसके बदन का समूचा खून किसीने निचोड़ लिया ।। लम्बा टाइट ट्राउज़र ! सिल्क की ढीली शर्ट ! गले पर खड़े किए हुए कालर ! मेम भाभी खट-खट सीढ़ियां चढ़ने लगी। पर फिर भी ऐसा लगता था कि उसका पेट कई दिनों का भूखा है, आंखों में कई रातों की नींद भरी है और पैरों में बहुत लम्बा सफर तय कर लेने के बाद की थकावट है। शायद कमरे में जाते ही वह इस कीमती पोशाक को उतार कर मैला गाऊन पहन लेगी और ये कपड़े-लने, गहने-जूते वगैरह सभी चीजें वापस दूकान में लौटा आएगी। तिस पर भी उस दिन की तरह साढ़े पांच रुपया किराया उधार ही रह जाएगा। इधर डाक्टर वैसाख कहेगा, 'लेकिन मिस स्मिथ, इसी तरह चला तो तुम अधिक दिन तक नहीं जिओगी!' लेकिन यह भी एक प्रकार की मौत हो है । वल्कि इसे अकाल-मृत्यु कहना अधिक उपयुक्त होगा। मेम भाभी के भाई को पता नहीं क्या हो गया कि मेरी बात सुनकर वह क्षण-भर चुप बैठा रहा । आंखों में घनी उदासी छा गई, मानो आंख से अव-तव में वरसात होने वाली हो । अचानक वह उठ खड़ा हुआ औ छाती पर दोनों हाथों से क्रॉस का निशान बनाते हुए क्षण-भर आंखें : रहा । उसके बाद पॉकेट से छोटी वाइविल निकालकर वीच में से ही पर शुरू किया--- "But love ye your enemies and do good, and hoping for nothing again ; and your reward sha great and ye shall be the children of the Highest. can forgive sins but God only... पटरानी १४० और माज इस बाइबिल को देखकर मुझे मेम भाभी याद आई। आज से कई साल पहले आवू पहाड़ गया था। उसके बाद कई साल बीत गए। इतने सालों में मैंने कितना-कुछ लिख डाला है । यह वह, देर-सा! बचपन को स्मृति मे से उभारकर सब कुछ नई दृष्टि और नये तरीके से देखा और लिसा है । नई दृष्टि से मैंने जो कुछ लिखा, उस विषय-सूची मे से मैंने मेम भाभी को विलकुल अलग कर दिया था। मैंने सोच लिया था कि मेम भाभी हमारे देश की वगालिन लड़की थोड़े ही थी, अंग्रेज़ देश की एक गरीव लड़की की कहानी भला सुनेगा भी कौन ? चाहे उससे मेरा कैसा भी सम्पर्क क्यों न रहा हो, पाठक-पाठिकाओं को उससे क्या मतलब है ? जिस कदर पागल बनकर मैंने मेम भाभी के लिए चक्कर काटे हैं, उसे भला मेरी तरह कोई अनुभव भी क्यों करेगा? मेरी मां, पिताजी, रंगा चाची, बड़ी ताई, चाचा, ताऊ कोई भी उस विदेशी लड़की को अपना नही वना सका । मेम भाभी के लिए मेरे मन में जो थोड़ा-बहुत दर्द छिपा हुआ है वही सिर्फ मेरे अकेले की साधारण-सी सम्पत्ति बनकर रह गया। पर मुझे भी अपना मत इस बाइबिल को देखकर बदलना पड़ा। कॉलिज में इन्टरमीडियेट पढ़ते समय हमलोगों को बाइविल पढनी पड़ी थी। आशुतोप कॉलेज के एक प्रोफेसर वाइविल पढाया करते थे। उसे अगर अब तक पढाया जाता तो शायद कुछ याद भी रहता, लेकिन याज कुछ भी याद नहीं है । और एक दिन... एक दिन ट्रेन से मैं कहीं से आ रहा था। शायद कटनी से लौट रहा था। ट्रेन सुबह नौ बजे रवाना हुई थी । गर्मियो के दिन थे । पसीना तो नहीं आ रहा था, लेकिन समूचा वदन जल रहा था। पॉकेट मे लहसुन और टोपी मे नीम के पत्ते रखकर किसी तरह गर्मी सही। दरवाजे-खिड़- कियां बन्द करके भी चैन नही, दीवार का सहारा लेकर भी आराम नहीं। एक के बाद एक स्टेशन आते और मुझे लगता मानो रास्ता और भी लम्दा हुया जा रहा है । इसी तरह उमरिया स्टेशन भी निकल गया। और फिर बड़ा स्टेशन अनूपपुर आया। अनूपपुर जकशन । चिरमिरी और महेन्द्रपड़ - से रेलवे लाइन आकर यहां मिलती है। विलासपुर के यात्री यहीं से गाड़ी बदलते हैं। इतनी देर से कम्पार्टमेन्ट में मैं अकेला ही था। और अव एक पादरी साहब चढ़े। बूढ़े आदमी थे वे । पूरा माथा गंजा। कंधे पर कैमरा झूल रहा था। कीमती ऊनी सूट पहन रखा था उन्होंने । कुछ नाटे-छोटे-से लग रहे थे। हंसी तो मानो उनके होंठों से फूटी पड़ती थी। मैं गर्मी के मारे साधारण धोती-कुरते में ही छटपटा रहा था, पर गरम कोट-पैट में भी ऐसा लगा, मानो वे बहुत आराम से बैठे हों। हंसते-हंसते वे खुद ही कहने लगे, 'मैं पेण्ड्रारोड जाऊंगा, और आप?' 'मैं बिलासपुर जाऊंगा।' इस हिसाब से वे पहले उतरेंगे। पर उनकी कार्य-क्षमता बहुत विचित्र थी। ट्रेन में बैठते ही टाइप- राइटर द्वारा पता नहीं क्या-क्या टाइप करने लगे। फिर एक स्टेशन आते ही कंधे पर से कैमरा उतारकर बाहर की भीड़ के नज़ारे का एक फोटो खींच लिया। कैमरा रखकर अव एक किताब उठा ली। थोड़ी-बहुत मुझसे बातचीत भी की। मैं कहानी लिखता हूं, यह सुनकर बोले, 'All Bengalces are Poet.' सभी बंगाली कवि होते हैं । और एक भरपूर ठहाका मारकर खुलकर हंसने लगे। उस हंसी में व्यंग्य या रोप की बू नहीं थी। उन्होंने बताया कि अट्ठारह साल से वे पेण्ड्रारोड के जंगलों में रह रहे हैं । उनका समूचा जीवन छत्तीसगढ़िया लोगों के बीच में व्यतीत हुआ है। अपने देश और लोगों को छोड़कर वे किस तरह वहां रह रहे हैं, यह सोच- कर सचमुच अचरज हुमा मुझे । रही जंगल की वात, सो क्या जंगल में और लोग नहीं रहते । वहां उन्होंने मकान और स्कूल बनवा दिए हैं। उन- के लिए वहां चर्च भी है । हॉस्पिटल है। लाइब्रेरी है। और इन सबके अलावा हैं विविध प्रकार के गेम्स । खेल-खाल में ही उनका किसी तरह समय कट जाता है। इसी तरह उन्होंने अपनी पत्नी के साथ वहां अट्ठारह वर्ष विता दिए हैं। बल्कि अभी और कितने वर्ष विता देंगे, इसका कोई - १४२ पटरानी - ठिकाना नहीं था। कुछ देर बाद पंड्रारोड स्टेशन का गया। यव उनकी वहां स्तरने की बारी थी।हमने-हंमत मुझमे विदा लेकर वे उतरने को हुए। पर लरने से पहले एक विचित्र काट कर बैठे। मम्मद है कि वह घटना न पटी होती तो इस कहानी का जन्म ही नहीं होता। उन्होंने कहा, 'नमस्ते, यच्छा तो अब में चलूं। अगर कभी पेस्ट्रारोड याएं तो एक बार हमारे घर में भी अपनी चरण-रज पहने दीजिएगा। हमारी ओर से बापको चाय का निमन्त्रण रहा।' उन्होंन बैंग में में चमड़े की जिल्द-मट्टी एक छोटी विनाय निकाली और बोले, 'यह पवित्र बाइबिल आपको उपहारस्वरूप देता हूं। अगर कभी ममय मिले तो जरूर पढ़िएगा।' मैंने देखा, वह स्तिाव माश्चर्यजनक मुनहरे बक्षरों में छपी थी। मैंने कहा, 'धन्यवाद। वे सड़े रहे। बोले, 'पढने ममय एक बात ध्यान में रखिएगा। कैलि- फोनिया के छात्रों ने ६ महीने तक बातून खाकर जो पैसे बचाए थे उन्हीं पंमों से यह किताब छपाई गई है। इमे उनकी धर्म-पिपामा का चिह्न समझकर अपने पाम रखेंगे तो मैं भी बहुत अनुगृहीत होऊंगा । अच्छा चलूं, नमस्ने।' ट्रेन छूट गई। कुछ देर मन ही मन में हंमा। धर्म प्रचार का यह भी एक रास्ता है। इसे अभिनव-पंय कहना बनुयुक्त नहीं होगा। मैं अन्यमनस्कता से वाइ- दिल के पन्ने उलट रहा था। जहां पहली बार नजर पड़ी, वहा से पहना मुरू किया तो मैं चक्ति रह गया। मानो मेरी बुद्धि शून्य हो गई हो। भला इमी लाइन पर नजर पड़ना क्या जरूरी था ? देखा कि लिखा हुआ था, "But love ye your enemies and do good, and lend hoping for nothing again; and your reward shall be great and ye shall be the children of the Highest...who can पटरानी४.

से रेलवे लाइन आकर यहां मिलती है। विलासपुर के यात्री यहीं से गाड़ी बदलते हैं। इतनी देर से कम्पार्टमेन्ट में मैं अकेला ही था। और भव एक पादरी साहब चढ़े। बूढ़े आदमी थे वे । पूरा माथा गंजा। कंधे पर कैमरा झूल रहा था। कीमती ऊनी सूट पहन रखा था उन्होंने । वे कुछ नाटे-छोटे-से लग रहे थे। हंसी तो मानो उनके होंठों से फूटी पड़ती थी। मैं गर्मी के मारे साधारण धोती-कुरते में ही छटपटा रहा था, पर गरम कोट-पैंट में भी ऐसा लगा, मानो वे बहुत आराम से बैठे हों। हंसते-हंसते वे खुद ही कहने लगे, 'मैं पेण्ड्रारोड जाऊंगा, और आप ?' 'मैं विलासपुर जाऊंगा।' इस हिसाब से वे पहले उतरेंगे। पर उनकी कार्य-क्षमता बहुत विचित्र थी। ट्रेन में बैठते ही टाइप- राइटर द्वारा पता नहीं क्या-क्या टाइप करने लगे। फिर एक स्टेशन आते ही कंधे पर से कैमरा उतारकर बाहर की भीड़ के नज़ारे का एक फोटो खींच लिया। कैमरा रखकर अब एक किताव उठा ली । थोड़ी-बहुत मुझसे बातचीत भी की। मैं कहानी लिखता हूं, यह सुनकर बोले, 'All Bengalees are Poet.' सभी बंगाली कवि होते हैं । और एक भरपूर व्हाका मारकर खुलकर हंसने लगे। उस हंसी में व्यंग्य या रोप की वू नहीं थी। उन्होंने बताया कि अट्ठारह साल से वे पेण्ड्रारोड के जंगलों में रह रहे हैं। उनका समूचा जीवन छत्तीसगढ़िया लोगों के बीच में व्यतीत हुआ है। अपने देश और लोगों को छोड़कर वे किस तरह वहां रह रहे हैं, यह सोच- कर सचमुच अचरज हुआ मुझे । रही जंगल की बात, सो क्या जंगल में और लोग नहीं रहते । वहां उन्होंने मकान और स्कूल बनवा दिए हैं। उन- के लिए वहां चर्च भी है । हॉस्पिटल है। लाइब्रेरी है। और इन सबके अलावा हैं विविध प्रकार के गेम्स । खेल-खाल में ही उनका किसी तरह समय कट जाता है। इसी तरह उन्होंने अपनी पत्नी के साथ वहां अट्ठारह वर्ष वित्ता दिए हैं। बल्कि अभी और कितने वर्ष विता देंगे, इसका कोई १४२ पटरानी ठिकाना नहीं था। कुछ देर बाद पेपड्रारोड स्टेशन आ गया। अव उनकी वहां उतरने को बारी थी । हसते-हंसते मुझसे विदा लेकर व उतरने को हुए। पर उतरने से पहले एक विचित्र काण्ड कर बैठे । सम्भव है कि वह पटना न पटी होती तो इस कहानी का जन्म ही नहीं होता। उन्होंने कहा, 'नमस्ते, अच्छा तो अव में चलूं । अगर कभी पेण्डारोह आएं तो एक बार हमारे घर में भी अपनी चरण रज पड़ने दीजिएगा। हमारी ओर से आपको चाय का निमन्त्रण रहा ।' उन्होंने बैग में से चमडे की जिल्द-मढी एक छोटी पिताच निकाली और बोले, 'यह पवित्र बाइबिल मापको उपहारस्वरूप देता हूं। अगर कभी समय मिले तो जरूर पढ़िएगा।' मैंने देखा, वह किताव याश्चर्यजनक सुनहरे अक्षरों में छपी थी। मैंने कहा, 'धन्यवाद। वे खड़े रहे । बोले, 'पढते समय एक बात ध्यान में रखिएगा। केलि- फोनिया के छात्रों ने ६ महीने तक आलू न खाकर जो पैसे बचाए थे उन्हीं किताव छपाई गई है। इसे उनकी धर्म-पिपामा का चिह्न समझकर अपने पास रखेंगे तो में भी यहुत अनुगृहीत होऊंगा । अच्छा चलूं, नमस्ते। ट्रेन छूट गई। कुछ देर मन ही मन मैं हंसा । धर्म-प्रचार का यह भी एक रास्ता है। इसे अभिनव-पंथ कहना अनुपयुक्त नहीं होगा। मैं अन्यमनस्कता से वाइ- बिल के पन्ने उलट रहा था। जहां पहली बार नजर पडी, वहा से पढना शुरू किया तो मैं चकित रह गया । मानो मेरी बुद्धि शून्य हो गई हो। भला इमो लाइन पर नजर पड़ना क्या जरूरी था ? देखा कि लिखा हुआ था, "But love ye your enemies and do good, and lend hopiog for nothing again; and your reward shall be great and y: shall be the children of the Highest...who can पैसों से यह 1 पटरानी ।' forgive sins but God only..." विना पैसों की मामूली-सी एक वाइविल, और साधरण-सी कुछ लाइने, पर इन्हें पढ़ने के साथ मुझे सब कुछ याद आ गया। हां, सारी बातें ! और साथ ही रोहिणी वाबू की बात भी याद आ गई। हमारे स्कूल के भूगोल के मास्टर महाशय रोहिणी बाबू ने एक दिन क्लास में पूछा था, 'अच्छा बताओ तो, महाभारत का सबसे बड़ा चरित्र कौन है ?' पंचा ने कहा था, 'अर्जुन, सर !' सुबोध ने कहा था, "भीम, सर!' फटिक ने कहा था, 'कर्ण, सर !' क्लास की सभी लाइनों से घूमते-घूमते आखिर यही प्रश्न मेरे सामने आकर ठहरा। मैं झटपट बोल उठा, 'युधिष्ठिर, सर !' 'शाबाश! बहुत अच्छा । मैं तुम्हारा जवाब सुनकर बहुत खुश हुआ क्लास-भर के लड़कों में मेरा माथा गर्व से ऊंचा हो गया था। मेरा ही उत्तर सही था और वाकी सवका गलत । पर आज इतने दिनों के बाद जव सोचता हूं तो शर्म से सिर झुक जाता है । उस दिन का वह सही उत्तर मेरे अनजाने में कब गलत हो जाएगा, यह मुझे कहां पता था। उस दिन बड़े गर्व से मैं सिर ऊंचा किए घर लौट आया था, वही गर्वपूर्ण मेरा सिर कभी शर्म से झुक भी जाएगा; क्या मुझे पता था ? दुनिया में क्या ऊपरी सफलता ही महत्त्वपूर्ण है ? अक्लांत निष्ठा आखिरी दम तक अगर सफलता के चरण न चूम पाए तो क्या सब कुछ व्यर्थ हो जाएगा? आज अगर मैं कहूं कि मेम भाभी का जीवन ही सार्थक था और उसकी निष्ठा ही सफलतापूर्ण रही तो क्या यह मेरी सुल्तानगंज के कुमार साहब के वुड स्ट्रीट वाले फ्लैट से जव मेम भाभी भागी थी, क्या वह भी एक उत्तरण था! उत्तरण की कोशिश करना भी एक प्रकार का उत्तरण ही है । अन्धकार से प्रकाश की ओर उत्तरण, साधा- भूल होगी? १४४ पटरानी रण से असाधारण को और उत्तरण । मृत्यु से जीवन की ओर उत्तरण । और जीवन से जीवनातीत की ओर। दस हजार से बीस हजार की ओर । फतेहगढ के बड़े महाराज राठौर वंश के कुलदीपक है । उन्हे रुपयों का कोई अभाव नहीं है। उनके यहा बड़ी रानी का पद खाली पड़ा था। फिर भला वीस हजार क्या चीज़ ये ? समूचा राज्य देने में भी उन्हें कौन रोकनेवाला था। जव होटल के खाने- वाले कमरे में उनकी मुलाकात मेम भाभी से हुई थी तो उन्होंने अपने ऐश्वयं एवं वंश-गौरव की फेहरिश्त भी दे दी थी उसको। और अपना गुणगान सविस्तार वखान किया था। वे वोले थे, 'सात बार मोन्टेकालॊ जा चुका हूं। तेरह बार मेरे घोडे ने डर्वी जीती है । एक टेबिल पर बैठकर एक बार में सत्रह बोतलें ह्विस्की पी सकता हूं।' फिर बोले, 'तुम्हे पता है, हैदराबाद के निजाम के पश्चात् इतना रेविन्यू और कोई भी नेटिव-प्रिंस दिल्ली-दरवार मे नही भेजता!' वहा के लोग कहते हैं, बडे महाराज दौलतमन्द होने के साथ-साथ दिल- दार व्यक्ति हैं। दौलत तो बहुतों के पास होती है, लेकिन दिलदार होना बहुत मुश्किल है। बाजार में कार का नया मॉडल आते ही उनके मन से पुरानी कार बिलकुल उतर जाती है । अपनी आत्मसन्तुष्टि के लिए उन्होने स्टेट मे बहुत-सी गाड़िया, बहुत-से राजप्रासाद, हवामहल एवं शीशमहल आदि बदले हैं। सिर्फ किसी बात की कमी है तो एक रानी की । सर्वप्रथम फतेहगढ में चौहान वंश को लडको राजवधू बनकर आई थी। फिर चौहान वंश की ही नहीं, तीन और खानदानी वश की लड़किया भी इस रईस व्यक्ति को अकशायिनी होने को आई थी। पर कोई टिकी नहीं। बच्चा होने के समय सभी मर गई। उसके बाद महाराज ने फिर शादी नहीं की । बाद में जो नारिया इनके सम्पर्क मे बाई, वे इस देश की नहीं थी। कोई जर्मन यी तो कोई इटालियन या फिर कोई जू थी। उनमें से भी कोई नही टिकी। यद्यपि राजवधू बनने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त नहीं हुमा, लेकिन फिर भी उनके लिए अलग राजप्रासाद थे। उनके लिए अलग लाव-लश्कर, खानसामा, बावर्ची, बॉय, वेयरा वगैरह सभी थे। महाराजा की जय जहां खुशी होती, जाते और रात विताकर आते; लेकिन फिर भी वे उनका मन नहीं जीत सके। उनमें से कोई भी महाराजा से संतुष्ट नहीं हुई और एक-एक करके सभी चली गई। लेकिन जाते-जाते वे मोटी रकम एवं जवाहरात भी अपने साथ लेती गई। और अब मेम भाभी की बारी आई थी। महाराजा ने पूछा, 'तुम्हें इण्डिया आए कितने दिन हुए हैं ?' उस वक्त तक मेम भाभी सुल्तानगंज के छोटे कुमार साहब के रुपयों के बल पर इस देश के बहुत से हाल-चाल सीख चुकी थी, इसीलिए वोली, सिर्फ तीन महीने।' सिर्फ तीन महीने ! तव तो बिलकुल ताजा चीज़ है । विलायत का एकदम नया ताज़ा आयांत भी उसे कहा जा सकता है। बड़े महाराजा उसका उत्तर सुनकर बड़े खुश हुए, क्योंकि उनके मन एवं नज़र दोनों की पसन्द के मुताविक वह फिट थी। वे बोले, मैं तुम्हें रानी बनाऊंगा। मेरी स्टेट की रानी साहिवा ! तुम्हारे नाम से एक स्टेट भी लिख दूंगा। उसके समस्त अधिकार तुम्हारे ही होंगे। मेम भाभी ने कहा, 'लेकिन मुझे खास रानी बनाना पड़ेगा, याद रहे?' बड़े महाराज ने कहा, 'हां-हां, खास रानी ही बनाऊंगा। पुरोहित चुलाकर, मन्त्र पढ़वाकर यथारीति तुम्हें अपनी जात में मिलाऊंगा। और क्या चाहिए? मेम भाभी ने कहा, 'एक बात और है।' बड़े महाराज ने कहा, 'क्या ?' 'मेरी जितनी इच्छा होगी, उतने ही रुपये मैं अपने देश भेजूंगी; मुझे कोई कुछ नहीं कह सकेगा। 'कहां भेजोगी?' - १४६ पटरानी - खैर, उसमें बड़े महाराज को कोई आपत्ति नहीं थी। वे दौलतमंद आदमी थे, दौलत के बारे मे कजूसी भी नहीं करते । मंम भाभी का वहा पर पक्का-पुख्ता इन्तजाम हो गया, और फिर वुड स्ट्रीट के पलंट से मेम भाभी गायब हो गई। सुल्तानगंज के छोटे कुमार साहब के साथ इस तरह की तीन घटनाए घट चुकी थी। मेम भाभी वाली घटना को लेकर उन्होंने अधिक दिमाग नहीं खपाया। और उसके बाद से मेम भाभी इस आवू पहाड़ पर है। उस दिन मेम भाभी की गाड़ी ने मुझे ठीक वक्त पर महाराज के हवामहल में उतार दिया था। दोपहर को पगडीवाला वही राजपूत हवामहल में आया और मुझे सलाम करके मेरे पास खड़ा रहा। बोला, 'हुजू राइन साहिबा को मैंने आपकी इत्तिला कर दी है।' पावू पहाड़ पर आने के अगले मुहूर्त से हुजूराइन द्वारा अतिथि- सत्कार के बहुत-से उदाहरण पा चुका हूं। चारो ओर ठडा वातावरण था। नकली लेक और टोड रॉक छोड़कर सनसेट प्वाइट की तरफ जाने- वाले मार्ग के इधर ही हवामहल में मेरे रहने की व्यवस्था की गई थी। रास्ते के उस पार कुछ आगे जाकर हुजूराइन का प्रासाद है। महाराज को उम्र पकने लगी है, पर उससे क्या फर्क पड़ता है। हराइन की भी उम्र कम नहीं है। लाव-लश्कर, पैदल-प्यादे, बरफ्न्दाज, चपरासी, खानसामा, बेयरा, वावर्ची, आया, पालकी, घोडा, ऊट नादि सब उनके साप आए हैं। क्योंकि उन सबके बाए बिना रानी साहिबा की इस्लत में दट्टा दर जाता है और बडे महाराज के सम्मान पर ठग पहुंचती है। मेरे यहा आने के बाद से हो बार-शर खाने का मानानमा रहा। कभी जलेबी, लड्डू, पेड़ा, पूरी, निाई दो कमी मात्र, मन करी वगैरह । नहाने और मुंह-हाय ने के लिए गरम पानी पा। मेहमानवाजी में दिको कारको कारभर नहीं रही।

त्र आया था। मैंने पूछा, 'हुजूराइन इस.वक्तं क्या कर रही हैं ?' उस आदमी ने जवाब दिया, 'अभी हुजूराइन का गुस्ल हुआ है, अभी बदन की मालिश-वालिस होगी; उसके बाद पोशाक पहनाई जाएगी।' मैंने पूछा, 'बड़े महाराज नहीं आएंगे।' वह व्यक्ति इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं दे सका। मकान के बाहर गाड़ी खड़ी थी। मैं उसीमें बैठकर मेम भाभी के मकान में जा पहुंचा। सामने खड़े भरी बंदूक कंधे पर रखे एवं वेल्ट कसे एक संतरी ने आकर मुझे सलाम किया और गाड़ी का दरवाज़ा खोल दिया। कड़कड़ाहट की आवाज़ करता लोहे का गेट भी खोल दिया। अन्दर शुरू से आखिर तक कार्पेट विछा हुआ था। काठ को सीढ़ियों से होता हुआ मैं ऊपर पहुंचा । चारों ओर बाघ एवं हाथियों के कंकाल बंधे हुए थे। तो क्या बड़े महाराज को शिकार का भी शौक है ? सिर्फ शिकार का ही नहीं, बल्कि उन्हें शराब का भी बहुत शौक है। राजपूताना की मरुभूमि में अगर उनको वह न मिले तो उनका बदन सूख जाता है । उन्हें फूलों और पक्षियों का भी शौक है और जीवित चिड़ियां और कबूतर पालने का भी। पर उन्हें लड़कियों का शौक है कि नहीं, इसका सबूत अभी तक नहीं मिला मुझ । कमरों के बाद कमरे ! इस महल को पार करके उस महल में गया ऐश्वर्य एवं आडम्बर में होड़-सी लगी हुई थी। चारों ओर बड़े- आइने लगे हुए थे, जिससे शीशमहल का भ्रम होता था। कमरे के में खड़ा होने से हजारों कोनों से हज़ारों चेहरे दिखाई पड़ते थे। महाराज समूचे कपड़े खुलवाकर यहां नर्तकियों का नाच देखा करते मैं आश्चर्यचकित होकर चारों तरफ देख रहा था। यहां प भाभी के लिए अपने फ्री स्कूल स्ट्रीट के टूटे फ्लैट की याद करना राध है। एक कमरा सफेद इटालियन-मार्बल पत्थरों का था, जिसके पटरानी • - १४८ छत से शुरू होती थी। यहां तक कि कमरे को टेबिल, पेपर, बेंच, सोफा सब इटालियन-माईल पत्यर के बने हुए थे। बल्ब की रोशनी पत्थर के शेड से ढकी हुई थी। और उसके बाद काली महोगनी काठ को सजावट थी। ऊपर से नीचे तक लकड़ी ही लकड़ी। कमरे की छत से शुरूहोकर दोवार, फर्नीचर, फर्श, टेविल, चेयर सब कुछ मानो एक ही काठ से तैयार किए गए थे। काठ में कही भी जोड़ का निशान नहीं था। पालिश भी ऐसी चमचम कर रही थी कि कोई चाहे उनमें अपना चेहरा भी देख ले। पता नहीं कहां से गाने की क्षीण आवाज आ रही थी। ऐसा लगता था, मानो मैं किसी स्वप्न प्रदेश में चला आया हूं। हुजूराइन ने स्वयं पसन्द करके खुद को देख-रेख में यह मकान बनवाया है । यहां जितना कुछ है, सब हुजूराइन का है। बड़े महाराज ने फतेहगढ़ में हुजूराइन के लिए एक बहुत बड़ा प्रासाद वनवा दिया था। उसके चारो तरफ एक मील की लम्बाई में लेक बनवाई गई थी। बगल में ही पहाड पहाड पर स्थित हर एक पेड़ पर बिजली के बल्व जगमगाते थे। वहीं पर हुजूराइन के लिए गिर्जाघर से घण्टे बजाए जाते थे, और घण्टै को वह प्वनि लेक के पानी की तरंगों से होती हुई हुजूराइन के प्रासाद तक पहुंच जाती थी। कभी-कभी ऐमा महसूस होता कि घण्टे का स्वर मुखरित होकर कहता है- And I, Jobn saw the holy city, new Jerusalem, coming down from God out of heaven, prepared as a bride adorned for her husband. And I heard a great voice out of heaven saying--- Behold, the tabernacle of God is with men and he will dwell with them, and they shall be his people and God himself shall be with them and be their God. And God shali wipe away all tears from their eyes ;

। 1 d there shall be no more death, neither sorrow, nor Tying., neither shall there be any morc pain...who can Corgive sins but God only. मुझे अच्छी तरह गाद, यह बाशित मुझे एक गामरे में बैठाकर गुद माझी गागय हो गया था। यारा देर बाद भेग भाभी आई, पर या पहरा देगकार गानो मैं पहलान नहीं पाया। आयू रोड यो स्टेशन पर भी सलगे-सितारे-जादित पट निकाले गा गुति देखी थी। पर यह तो उससे भी अधिक हसीन थी। भेग गाभी उस गानो पहले रोगी माग लगने लगी। बदन पर गौरा की परतें पद गई थीं। गाल पहले से भी अधिक मान गए थे। आंगे और अधिक नाटीली हो गई थी। पलगा-पंगुरिगा और भी रंगीग तथा नाजुक लग रही थी। पैरों में सुनहरी पारी गो काग गी पप्पस, देह पर पहली जाली की पुनरी; गानों में हीरे गये तणा गले में गोतियों की गाला! इन राय अलापा गांग में सिन्दूर भी था। शनरार मिलते ही मैंने भेग भाभी रो पूछा था, क्यों, अब तो राम- गुण रानी बन गई होग, मेग भागी ?' मैंने सोचा था कि जिस रांगुनित एवं पणित जीवन को यातायरण से गुनिता पाने गी मेग भागी गो जिन्दगीभर से पाहा रही है, आज वह साका रूपमण गार गुकी है। बहुत सी गे स्वगं रो गुद्ध करो-करते मानो अब यह गुपी हुई है और शुष गो प्रेम रो देखना सीय लिया है आज यह रागी बन गई है, प्रिरोज बन गई है, रानी साहिबा हो गई। गंग भागीगी भागाएगाने में गिलारा, पेग, बोतल, सिगरेट भी और माचिरा रणगई। रोग भाभी ने हाल मे इशारे से उराको जाने को गाहा और पारा एा सिगरेट जगाकार गुलगाई। मैंने मुबारा पूछा, 'भव तो तुग सुमी हो न, गेग भाभी?' मेग मे मेरी बातों को अगसुनी पर दिया और अपनी धुन में गिलास में रे - চী चूंट भरा। मैंने महसूस किया कि इतने दिनों से शान्ति के गहरे ममुद्र में डुबकी लगाकर मेम भाभी ने अब अपने को सफल बनाया है, क्योंकि सफलता को निशानी उसके बदन के पोर-पोर से छलक रही थी। वह अब अधिक सुन्दर और गोरी लग रही थी । मेम भाभी को अब सुबह से लेकर रात तक पुरुपो के लालच में खुद को पददलित नहीं करना पडता । अब तो उसे निर्वाध सुकून मिल रहा था। नींद टूटते न टूटते उसके अगल-बगल कई नोकरानिया आतीं और आकर उसके हुक्म का इन्तजार करती। रानी साहिवा के मोटर तक पहुंचने के रास्ते में मिलने वाले सब पथचारी माया जमीन से टेककर उसे अभिवादन करते तथा उसके दोघजीवन की कामना करते । बडे महाराज ने रानी साहिबा को खुश करने की गरज से फास से फर्नीचर और उनकी कलाई की शोभा के लिए स्वीट्जरलैंड से घड़ी मगावाई थी। इग्लैंड की बोण्ड स्ट्रीट से गाऊन तैयार होकर माते थे। गरज यह कि ऐशो-आराम और ऐश्वर्य में कुछ भी बाकी नहीं रहा । रानी साहिबा के हाथी ने उनके कदमों से सूद छुआकर सलाम करना सीख लिया था। रानी साहिवा के घोडे ने कलकते को घुडदौड़ मे बाज़ी जीती थी । संसारी मनुष्य को भला और क्या चाहिए! मेम भाभी ने मुझसे बहुत-सी वातें पूछी। शादी हुई या नहीं? कलकत्ते के क्या हालचाल है ? मैं नौकरी कहा करता हूं? मां, पिताजी, ताकजी, आदि सबके समाचार भी उसने पूछे । मैंने पूछा, 'इस तरह की पोशाक पहनने में तुम्हे तकलीफ नही होती?' फिर पूछा, 'हा, तो इतने दिनो के बाद अब तुम सचमुच रानी साहिवा बन गई हो?' रानी साहिबा को आंखों से आसू बहने लगे। मुझे क्या पता था कि मेम भाभी अभी तक रानी साहिबा नही बन सकी है। फतेहगड के नये प्रासाद से दूर से ही लेक के किनारेवाला गिर्जा दिखाई पड़ता है। इस प्रासाद में और भी बहुत नारियों ने आश्रय लिया - था। विविध प्रकार की गुड़ियों से बड़े महाराज ने अपना शोक पूरा किया था। जिधर नज़र जाती, उधर ही रानी साहिबा की स्टेट दिखाई पड़ती थी। स्टेट के दलील-दस्तावेज़ भी तैयार हो चुके थे। राज्य की प्रजा सम- सती थी कि इस वार जो आई है, वही उनकी भावी रानी है। भावी रानी साहिवा; छोटी नहीं, पटरानी। उन लोगों पर हुकूमत करनेवाली मालकिन.। उनकी हुजूराइन । बड़े महाराज नयी कार चलाकर बिल्कुल भीतरी बाल्कनी के नीचे उतरते । आज ही सारी बातें पक्की होने की बात है। मेम भाभी पूछती, 'महाराजा साहब, तारीख पक्की हो गई क्या?' बड़े महाराज जवाब देते, 'थोड़ा-सा बखेड़ा हो गया है।' 'कैसावखेड़ा?' 'स्टेट के पुरोहित का बड़ा लड़का अचानक मर गया है । अभी वे शोक में हैं । तुम्हें कुछ दिन तक सब करना पड़ेगा।' यह तो हुआ एक बहाना । पर ऐसे-ऐसे बहुत-से बखेड़े आए और चले गए। पर शादी किसी तरह भी न हो सकी। महाराज कहते, 'तुम इतनी उतावली क्यों होती हो ? ह्विस्की का नया चालान आया है, खोलूं ? सिर्फ ह्विस्की ही नहीं, नये गहने, नयी कार, नया गाऊन आदि भी बाते। इन्हीं सवमें देर हो जाती और असली बात उठती ही नहीं। कार में बैठकर दोनों घूमने निकलते । लेक के पार, पहाड़ पर से होती हुई, स्टेट की सीमा को छूकर गुजरती हुई कार से सूर्यास्त देखते-देखते अचानक मेम भाभी के कानों में गिर्जा के घण्टों की ध्वनि पड़ती । वहुत दूर से वे शब्द तैरकर माते और बहुत दिनों पहले की बातें याद दिलाते । गिर्जाघर में पहले भी कई वार उसने उत्सुकता-भरी नज़रों से मदर मेरी की मूत्ति को निहारा है । लेकिन मूत्ति में किसी तरह का भाव परिवर्तन नहीं हुआ। गिर्जाघर की मूत्ति उसे साधारण मूर्ति से अधिक कुछ नहीं लगी । पर अब ऐसा क्यों लगता है ? बड़े महाराज के रुपये माजकल उसके दिल पर - १५२ पटरानी ? ! बाघात क्यों करते हैं ? देश से पत्र आता । मेटिल्ड की शादी हो गई है। ये लोग बहुत मुखी हैं। लिस्टर स्वायर में नयी बिल्डिंग में रहना शुरू कर दिया है उन लोगों ने । और अब नये सिरे से जिन्दगी शुरू की है। मार्गी एक कर्नल से शादी करके सुखी है। केटी को शादी भी एक डॉक्टर से हो गई है। में मय न्यूजर्मी में हैं। मिनी को वालिन बनाने में सर्टिफिकेट मिला है। अब वह एक इन्जीनियर के साथ इंगड हो चुकी है। उसकी शादी भी इसी जून में होने वाली है। वह अपनी दीदी से कीमती उपहार की उम्मीद करती है। विली डॉक्टर बन गया है। आमों में भर्ती होकर इण्डिया बाएगा। और हेनरी? वह बचपन से ही बहुत अंतान था। पर अन्त में वह भी नेवी में फस्ट लैपिटीनेप्ट हो ही गया है। अब क्या बाकी रहा मेम भाभी ने और क्या चाहा पा? उसने जो कुछ चाहा था, सब कुछ पाया है । मव सपने पूरे हो गए। पर मैम मा वह मुद? अपनी बात सोचना शुरू करते ही अचानक बाधा पड़ी। टन-टन-टन करके घण्टे की ध्वनि शुरू हो गई। यह मंगीत कानों में पड़ते ही मन इतना अस्त-व्यस्त हो जाता है कि तमे सभालना मुश्किल हो जाता है । सब कुछ तितर-बितर हो जाता। यह स्टेट, ये बड़े महाराज, हाथी, घोड़े, कट, रेस की घोड़ी, जितनी जायदाद है। सव तुच्छ हो जाते। मेम भाभी ने कहा, 'राजा साहब, तुमने अपनी बात नहीं रमी !' 'कौन-सी बात? और वह बात याद करते-करते बड़े महाराज विभ्रान्त हो जाते। कौन-सी बात नहीं रखी उन्होंने ? इगलिशवाली में रैम की घोड़ी मांगी थी, वह दी है उन्होंने । उसने दुद को स्टेट चाही, वह भी रमे मिल गई। गाड़ी की माग की, तो वह भी दी गई। रुपयों में जो कुछ खरीदा जा सकता है, वे मब इच्छाएं करूगा। घूमने जाना चाहो तो वह भी मंजूर है । पैरिम, संदन, न्यूयार्क, मोण्टे कालो जहा बाहो, चलो ना 'पर रानी साहिवा की गद्दी !'

था। विविध प्रकार की गुड़ियों से बड़े महाराज ने अपना शौक पूरा कि था । जिधर नज़र जाती, उधर ही रानी साहिवा की स्टेट दिखाई पड़ा थी। स्टेट के दलील-दस्तावेज़ भी तैयार हो चुके थे। राज्य की प्रजा सम झती थी कि इस वार जो आई है, वही उनकी भावी रानी है। भावी रान" साहिवा; छोटी नहीं, पटरानी। उन लोगों पर हुकूमत करनेवाली मालकिन । उनकी हुजूराइन । वड़े महाराज नयी कार चलाकर बिल्कुल भीतरी वाल्कनी के नीचे उतरते । आज ही सारी बातें पक्की होने की बात है। मेम भाभी पूछती, 'महाराजा साहब, तारीख पक्की हो गई क्या ?' बड़े महाराज जवाब देते, 'थोड़ा-सा बखेड़ा हो गया है।' 'कैसावखेड़ा?' 'स्टेट के पुरोहित का वड़ा लड़का अचानक मर गया है। अभी वे शोक में हैं । तुम्हें कुछ दिन तक सब करना पड़ेगा।' यह तो हुमा एक वहाना । पर ऐसे-ऐसे बहुत-से बखेड़े आए और चले गए । पर शादी किसी तरह भी न हो सकी। महाराज कहते, 'तुम इतनी उतावली क्यों होती हो ? ह्विस्की का नया चालान आया है, खोलूं ? सिर्फ ह्विस्की ही नहीं, नये गहने, नयी कार, नया गाऊन आदि भी नाते। इन्हीं सवमें देर हो जाती और असली वात उठती ही नहीं। कार में बैठकर दोनों घूमने निकलते । लेक के पार, पहाड़ पर से होती हुई, स्टेट की सीमा को छूकर गुजरती हुई कार से सूर्यास्त देखते-देखते अचानक मेम भाभी के कानों में गिर्जा के घण्टों की ध्वनि पड़ती। बहुत दूर से वे शब्द तैरकर आते और बहुत दिनों पहले की बातें याद दिलाते । गिर्जाघर में पहले भी कई बार उसने उत्सुकता-भरी नज़रों से मदर मेरी की मूत्ति को निहारा है । लेकिन मूत्ति में किसी तरह का भाव परिवर्तन नहीं हुआ। गिर्जाघर की मूत्ति उसे साधारण मूत्ति से अधिक कुछ नहीं लगी। पर अव ऐसा क्यों लगता है ? बड़े महाराज के रुपये आजकल उसके दिल पर १५२ पटरानी 1 याधात क्यों करते हैं ? देग से पत्र आता । मेटिल्ड की शादी हो गई है । वे लोग बहुत सुखी हैं। लिस्टर स्क्वायर में नयी विल्डिंग में रहना शुरू कर दिया है उन लोगों ने । और अब नये सिरे से जिन्दगी शुरू की है। मार्गी एक कर्नल से शादी करके सुखी है। केटी की शादी भी एक डॉक्टर से हो गई है । वे मव न्यूजर्सी में है । मिनी को वायलिन वजाने में सर्टिफिकेट मिला है । अब वह एक इन्जीनियर के साथ इंगेज्ड हो चुकी है। उसकी शादी भी इसी जून में होने वाली है। वह अपनी दीदी से कीमती उपहार की उम्मीद करती है। विली डॉक्टर बन गया है । आर्मी में भर्ती होकर इण्डिया आएगा। और हेनरी? वह बचपन से ही बहुत शैतान था । पर अन्त में वह भी नेवी में फस्र्ट लेफ्टिीनेण्ट हो हो गया है। अब क्या बाकी रहा? मेम भाभी ने और क्या चाहा था? उसने जो कुछ चाहा था, सब कुछ पाया है । सब सपने पूरे हो गए। पर मेम भाभी ! वह सुद ? अपनी बात सोचना शुरू करते ही अचानक बाधा पडी। टन्-टन-टन् करके घण्टे की ध्वनि शुरू हो गई । यह संगीत कानों में पड़ते ही मन इतना अस्त-व्यस्त हो जाता है कि उसे संभालना मुश्किल हो जाता है । सब कुछ तितर-वितर हो जाता । यह स्टेट, ये बड़े महाराज, हाथी, घोडे, ऊंट, रेस की घोडी, जितनी जायदाद है। सब तुच्छ हो जाते । मेम भाभी ने कहा, 'राजा साहब, तुमने अपनी बात नहीं रखी !' 'कौन-सी बात?' और वह वात याद करते-करते बड़े महाराज विभ्रान्त हो जाते । कौन-सी बात नहीं रखी उन्होंने ? इंगलिशवाली ने रेस को घोडी मागी थी, वह दी है उन्होंने । उसने खुद को स्टेट चाही, वह भी उसे मिल गई। गाड़ी की माग की, तो वह भी दी गई। रुपयों से जो कुछ खरीदा जा सकता है, वे सब इच्छाएं पूरी करूंगा। घूमने जाना चाहो तो वह भी मजूर है । पेरिस, लंदन, न्यूयार्क, मोण्टे कालों जहां चाहो, चलो न । 'पर रानी साहिवा की गद्दी !'

'वह भी मिलेगी। दो दिन सब करो। रानी साहिबा बनने की भी एक पद्धति है। उसकी भी एक रीति है। यों ही रानी साहिबा नहीं बना जाता। चारों ओर नाते-रिश्तेदारों को निमन्त्रण देना पड़ेगा। नाच-गाना होगा, हवन होगा, दान-ध्यान होगा। भिखारी-भिखारिनों को भोजन दिया जाएगा। महल के भीतर-बाहर उत्सव-जश्न मनाया जाएगा। इतना सब क्या एक दिन में हो जाएगा? यह सव पूरा एक महीने तक चलेगा। रेजिडेगट साहब आएंगे। लालजी साहब, लालजी बाईसाहिवा; पर्दायतजी, पेशवानजी भी आएंगे। कोई वाकी नहीं रहेगा। यह इतना सरल काम तो है नहीं।' और धीरे-धीरे उसका लेखा-जोखा भी होने लगा। इंगलिशवाली के लिए रुपयों का झरना वह निकला। बड़े महाराज ने कड़ा आदेश दे दिया था कि इंगलिशवाली की कोई स्लिप मिले तो उसमें उसकी जैसी भी इच्छा लिखी हो, वह पूरी की जाए। अगर उसकी मांग यहां न मिले तो वम्बई ऑर्डर भेजो। बम्बई में भी न मिले तो कल- कत्ते ऑर्डर भेजो। और अगर इण्डिया में भी न मिले तो इंग्लैंड, फ्रांस, जमनी से मंगामओ । तमाम दुनिया में ढूंढ़ो। पर अचानक सव गड़बड़ हो गया। इण्डियन डोमीनियन के मंत्री सरदारजी की एक सील लगी चिट्ठी एक दिन सुबह-सुबह हाजिर हुई। उसके बाद से कानाफूसी और फुसफुसा- हट शुरू हो गई। चारों ओर नीरवता-सी छा गई। किसीने कहा, 'नेहरूजी महाराजा की गद्दी छिनवा लेंगे।' 'सुना है दिल्ली में बादशाही शुरू हो गई है, वादशाही फौज आ पहुंची है।' शहर भर में लोगों की जवान पर यही एक वात थी। कोतवाली में महाराज का फौजी सिपाही बन्दूक लिए पहरा देता रहता था। उत्सुक जनता के सामने इकट्ठी होते ही कहता, 'भागो, भाग जाओ यहां से!' १५४ पटरानी अचानक अपने देश लौटने से पहले विली राजपूताना के इस शहर में आ पहुचा। मेजर विलियम कार्लाइल स्मिथ । हिज मैजेस्टिव फोगं की फिफ्य ब्रिगेड का डॉक्टर । कई हाथों से होती हुई और अनेक देशो के डाकघरों की ठोकर खाती हुई मेम भाभी को एक चिट्ठी उसके हाय लगी थी। चिट्ठी ऐसे समय में उसके पास पहुंची थी, जब उसका अपने देश लौट जाने का समय हो गया था। देश लौटने से पहले एक बार वह अपनी बहन से मुलाकात करने आया। मेम भाभी ने पूछा, 'तू कहा ठहरा है, विली?' 'रेस्ट हाउस में ।' मेम भाभी ने कहा, "रस्ट हाउस में क्यो? तुम्हे मेरे महल में रहना पड़ेगा।' विली ने कहा, 'पर मैं तो आज ही दिल्ली लौट जाऊंगा । वहा से हेड क्वार्टर का आदेश मिलते ही देश रवाना हो जाऊगा।' अचानक मेम भाभी को पता नहीं क्या हुआ, वोली, 'तेरे साथ मैं भी चलूगी।' विली चकित रह गया। बोला, 'क्या मतलब ? कहां जाओगी तुम?' मेम भाभी ने कहा, 'अपने देश ।' 'यह क्या ?' विली ने कहा, 'बड़े महाराज से परमीशन नही लोगी?' मेम भाभी ने कहा, 'मैं किसीकी वादी नहीं है कि मुझे किसीसे परमी- शन लेनी पड़े । तू मेरे पासपोर्ट का इन्तजाम कर दे। मैं माउण्ट आबू में रहूंगी । वहा से जाऊंगी तो किसीको शक भी नही होगा।' विनी उसी दिन चला गया। लेकिन दूसरे दिन से पता नही क्यो दंगनिमवाली के प्रासाद के इर्द-गिर्द फौजी सिपाहियों का घूमना शुरू हो गया। मग भाभी ने बड़े महाराज के खास दफ्तर मे चिट्ठी भेजी, पर वहाँ से कई दिनों तक कोई जवाब नहीं आया। मेम भाभी ने खास मुशी को

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होश में नहीं थे। उस वक्त रूपये-पैम, मोहरें, हीरे-जवाहारात, जो इच्छा होती में मांग सकती थी। उस समय बड़े महाराज एक्दम पागल हो रहे ये मेरे लिए।' महाराज ने कहा, 'जो मुशी हो, वही मांग लो । गाड़ी, घोड़ा, प्लेन, हायो, मोहरें जो भी इच्छा हो...।' मेम भाभी ने कहा, 'तुमने मुझे जो कुछ भी दिया है, सब वापस ले लो। मुझे कुछ नहीं चाहिए ! मेहरबानी करके सब कुछ वापस ले लो।' 'क्यों ? तुम मुझपर नाराज हो?' 'नहीं ! मेरे गहने, गाड़ियां, हायी, सव ले लो। यह सब लेकर मैं क्या कहगी ? किसी दिन यह सव सचमुच मैंने चाहा था। लेकिन बव मुझे कुछ नहीं चाहिए।' 'क्यों, तुम्हारा दिमाग खराव हो गया है क्या ?' मैम भाभी ने कहा, 'नही, मैं रानी की गद्दी पाने के लिए फतेहगढ़ माई थी। और वह मुझे अभी तक नहीं मिली है।' हटात् बड़े महाराज का होश लौट आया। वोले, 'गद्दी ?" 'हा, गद्दी ! मैं रानीजी की गद्दी चाहती हूं। मैं फतेहगढ़ की रानी साहिवा की गद्दी चाहती हूं। मैं सुल्तानगंज की प्रिंसेस नहीं बन सकी, इसीलिए तुम्हारे माय भागी थी। और अब जब फतेहगढ़ की प्रिंसेस नहीं बन सकी तो फिर...!" महाराज ने कहा, 'फतेहगढ को प्रिंसेस नहीं बन सकी तो क्या करोगी? क्या फिर भागोगी?' मैम भाभी ने कहा, 'तो क्या तुम मुझे बांधकर रख सकोगे?' महाराज ने कहा, 'कहा भागोगी तुम ?' 'किसी और स्टेट की रानी बनने की कोशिश करूंगी। मेरी उम्र इतनी नहीं हुई है। अभी भी मुझमें यौवन वाकी है।' 'रानी बने विना तुम्हारा काम नहीं चल सकता ?' मेम भाभी रो पड़ी। बोली, 'जानते हो, मैं बहुत दूर से आई हूं पटरानी १ हजारों मील दूर से । वह भी सिर्फ रानी बनने के लिए। अगर रानी वन गई तो फिर मुझे रुपये नहीं चाहिए । मैं तुम्हारे महल के एक कोने में पड़ी रहूंगी। सिर्फ दो टाइम का खाना दे देना।' महाराज ने कहा, 'तुम थोड़ी ह्विस्की और पिओ।' मेम भाभी ने कहा, 'तुम ह्विस्की पिलाकर मुझे फुसला नहीं सकते । मैं ह्विस्की नहीं पिऊंगी।' 'क्यों?' मेम भाभी ने कहा, 'यह क्यों सुनना चाहते हो ?' महाराज ने कहा, 'हमारे फतेहगढ़ में तुम्हारे देश की बहुत-सी लड़- कियां आ चुकी हैं, पर उनमें से तो किसीने तुम्हारी तरह ह्विस्की पीने से इंकार नहीं किया ?' मेम भाभी ने कहा, 'मैं भी पहले पीती थी और अव भी पीती हूं, लेकिन तुम्हारे साथ रात को एक कमरे में बन्द होकर अब कभी नहीं पिऊंगी।' 'क्यों?' मेम भाभी ने कहा, 'जो गलती मेरी मां कर चुकी है, वही मैं नहीं करना चाहती।' महाराज ने पूछा, 'तुम्हारी मां ने क्या गलती की थी?' अचानक मेम भाभी तेज धारवाली तलवार की तरह पैनी हो गई। बड़े महाराज ने इंगलिशवाली का यह रूप कभी नहीं देखा था। उन्हें ऐसा लगा, मानो कोई जहरीला सांप अपनी पूंछ के वल पर उनके विस्तर पर तनकर खड़ा हो और अपना सिर हिला रहा हो । वह उनकी तरफ देखकर ज़ोर-ज़ोर से सांस ले रही थी। महाराज ने कहा, 'सो जाओ, सो सोओ तुम, मैं चला जाता हूं।' भेग भाभी ने झट-से बड़े महाराज का हाथ पकड़ लिया। बोली, 'तुम भाग नहीं सकते महाराज ने कहा, 'कल सुबह मैं फिर आऊंगा । अभी तुम गर्म हो रही १५८ पटरानी हो, अतः अकेली रहकर ठंडी होयो।' मेम भाभी ने कहा, 'मैं गर्म नहीं हुई, ठण्डी ही हूं। तुमसे पहले भी मैंने बहुत लोगो के माय रात विताई है। मैं इगलिशवाली हूं, मुझे कोई नही टग सकता। मैंने ही सवको ठगा है । पर तुम...' क्षण भर चुप रहकर वह फिर वोली, 'तुम सुल्तानगंज के प्रिम के यहा से मुझे क्यों से आए ? क्यों तुमने मुझे झूठा प्रलोभन दिया ?' महाराज ने कहा, 'मैं तुम्हें हर महीने दस हजार रुपये देता हूं। किसी प्रकार के अभाव में भी नही रसा तुम्हे मैंने ।' 'पर तुम तो अपनी गद्दी देने की बात कहकर मुझे यहां लाए थे । रानी की गद्दी । वह दो तुमने ?' कुछ देर महाराज के मुह से कोई जवाब नहीं निकला। फिर बोले, 'मुल्तानगंज के प्रिंस ने भी तो तुम्हें रानी साहिबा नही बनाया था।' मेम भाभी ने कहा, 'लेकिन कलकत्ते मे प्रिंसों की कमी तो नहीं थी। कइयों ने मुझे रानी बनाना चाहा था।' बड़े महाराज ने कहा, 'पर ये तुम्हें मेरी तरह इतने रुपये नहीं देते।' 'शायद नहीं देते, लेकिन रानो तो बनाते मुझे ।' 'लेकिन तुम्हें रानी बनने का इतना चार क्यों है ? रानी बनने का ऐसा कौन-सा लालच है तुम्हें ? सभी लड़कियां तो रुपये मिलते ही खुश हो जाती हैं।' मेम भाभी ने कहा,'तुमने जिन लडकियों को देखा है, वे शायद रुपयो से ही खुश हो जाती हैं। पर में लड़की होते हुए भी उनलोगों से भिन्न हूं। मैं इगलिशवाली जो है।' 'मैंने और भी इगलिशवाली देखी हैं।' मम भाभी ने जवाब दिया, 'पर उनको शायद मेहराव-तले नहीं जन्मना पड़ा था। उनके शायद वार-बार वाप नहीं बदले थे । उनको शायद तरह भाई-बहिनों को पाल-पोसकर बड़ा नहीं करना पड़ा था। उनको शायद बाजार जा-जाकर मांस, मछली, सब्जी वगैरह नहीं चुराने पटरानी १५६ । उन्ह शायद मां-बाप का प्यार मिला होगा। उन्होंने शायद रानी ने पर भी खुद को रानी बताकर अपना परिचय नहीं दिया होगा।' भाभी महाराज की छाती से लगकर सुवक-सुवककर ज़ोर-ज़ोर से ने लगी। महाराज उठ बैठे और धीरे-धीरे मेम भाभी की पीठ पर हाथ फिराने नगे। पहले भी बहुत पुरुषों ने इसी तरह उसकी पीठ पर हाथ फिराया था। ठीक उन्हीं लोगों जैसा ही यह हाथ था। विल्कुल वैसा ही लाड़-भरा। किसी प्रकार का फर्क नहीं। बहुत दिनों पहले अलक ने भी इसी तरह हा फेरा था और सुल्तानगंज के कुमार साहब ने भी। और भी कितने असंख्य हायों के स्पर्श से मेम भाभी की आत्मा कलंकित हुई है, इसका कोई हिसाब नहीं है । जिस तरह उसकी मां की देह कलंकित हुई थी. उसी तरह मेम भाभी की देह भी कलंकित हुई है। स्वदेश-विदेश, पूर्व-पश्चिम, सभी जगह एक ही हाल है!! अचानक मेम भाभी को महसूस हुआ कि महाराज उसकी पीठ पर से अपना हाथ खीच रहे हैं । मानो निश्शब्द भाग जाने की कोशिश में हैं। मेम भाभी ने कुछ नहीं कहा । वह नींद का बहाना किए पड़ी रही और अपना सिर तकिये मे धंसा लिया । तकिये में उसकी आंख, नाक, मुंह सब दव गए और वह पेट के बल पड़ी रही। लगा कि बड़े महाराज धीरे- धीरे उठे। विछौना छोड़कर दरवाजा पार किया। अंधेरी निस्तब्ध राव में उनके जूतों का ठक-ठक शब्द निस्तरंग हवा में मिल गया। कुछ देर वाद नीचे कॉरीडोर में महाराज की गाड़ी की एक मृदु-सी आवाज़ और फिर क्रमश: वह भी दूर जाकर थम गई। मेरे सामने मेम भाभी की आया कई बार आई और उसके चे अच्छी तरह पाउडर, रूज़ लगाकर आंखों और भोंहों को तीखा क पटरानी १६० सिर के जो बाल उड़े जा रहे थे, उनको संवारकर ठीक किया । बात- चीत के बीच में ही मेम भाभी को विल्ली आकर उसकी गोद में बैठ गई। कुत्ता आकर उसके पैरों में यपना सिर रगड़ने लगा। मैं सब कुछ गौर कर रहा था। अचानक मेम भाभी ने पूछा, 'तू आबू किसलिए आया है ?' मैने कहा, 'क्यो, यहां नहीं आना चाहिए या मुझे?' मुझे याद है कि उस निस्तन्ता मे मैने एक बार पूछा था, 'मेम भाभी, क्या तुम्हे कोई वच्चा-बच्चा नहीं हुआ?' मेरी वात का मेम भाभी ने कोई जवाब नहीं दिया। मैं सोच रहा था कि और क्या प्रश्न करूं कि एकाएक मेम भाभी ने कहा, 'तू यहा से बाज ही चला जा।' सुनकर मैं दग रह गया। पूछा, 'क्यों ?' मेम भाभी ने कहा, 'यहाँ तुझे क्या काम है ?' मैंने कहा, 'वैसे कोई खास काम नहीं है । योही घूमने आया था।' मेम भाभी ने कहा, 'तो फिर आज ही चला जा।' 'क्यों?' मेम भाभी ने कहा, 'यहां रहने पर तू मुसीबत में फंस सकता है।' 'मुसीवत ! मुसीबत कैसी ?' मेम भाभी ने ग्लास में से एक घूट शराव का लिया। बोली, 'मैं आज रात को यहां से भागूगी। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। मैंने पूछा, 'क्यो, कहाँ भागोगी? क्यो भागोगी? सिगरेट से गहरा कश लेकर खूब ढेर साराधुआ उगलकर मेम भाभी अपनी गोद में बैठी विल्ली के शरीर पर हाथ फेरने लगी! बोलो, 'यह देख, इन सबको छोड़कर चले जाना पड़ेगा मुझे। सुना है, मेरे हाथी को एक वच्चा हुवा है, पर अव तो उसे भी शायद विना देखे जाना पड़ेगा। मेरे घोड़े ने इस बार कलकत्ते मे वायसराय का कप जीता है, पता है तुझे?'

से गेम भाभी ने सिगरेट का एक और कश लगाकर धुआं छोड़ा । बोली, 'सैर, एक ही जीवन में मुझे इतनी तरह की जानकारियां तो हुई। बस्ती करके राजप्रासाद तक अब कुछ भी देखना बाकी नहीं रहा। वही एक प्रकार की घटना और एक ही तरह की जानकारी ! किसी प्रकार का फर नहीं। मैंने पूछा, 'कोई फर्क नहीं ? लेकिन फी स्कूल स्ट्रीट से तो अधिक सुख में हो यहां।' मेम भाभी ने गाहा, 'पर अभी भी रानी साहिबा कहां बन पाई ? ये तो सभी छद्मवेश थे। बड़े महाराज ने मुझसे शादी नहीं की।' 'यह गया कहती हो ? यह राजप्रासाद, ये लोग-बाग, हाथी-घोड़े, इतने साज-सरंजाम, सब झूठ हैं ?' मेम भाभी ने कहा, 'मेरी रानी बनने की इच्छा अन्त तक पूर्ण नहीं - - 'क्यों?' मेम भाभी ने कहा, 'एक दिन दिल्ली से बड़े महाराज के नाम एक पाम आया। मर्जर में राही करना था। पटेलजी ने उन्हें बुला भेजा था। महाराज की आमदनी कम हो गई । उनका मन बहुत खराब हो गया।' मेम भाभी ने ग्लास रो होंठ लगाए । सोने के पाइप में लगे सिगरेट का एक कश लेकर धुआं छोड़ा। बोली, 'इसीलिए मैं आज रात चली जा रही हूं।" मैने पूछा, 'इस बार यहां जानोगी?' मेम भाभी ने कहा, 'भई, अव तो विलायत ही चली जाऊंगी वापस।' अपने गानों पर विश्वास करने की इच्छा नहीं हुई। मैंने कहा, 'इतने दिनों बाद सचगुन लौट जाओगी?' भेम भाभी ने कहा, 'हां, अब भागने के सिवाय कोई चारा नहीं है । मैं इतने दिनों से विलायत रुपये भेजती रही हूं। वह भी महाराज ने गवर्नमेण्ट को बता दिया है। इन सबके अलावा अब मुझे यहां अच्छा भी - १६२ पटरानी नहीं लगता । अव तो विलायत मे मेरा खुद का मकान बन गया है। अब वापस अपने देश लौटकर वही दिन काढूंगी। बहुत देख लिया। बहुत कुछ सीख लिया। जिन लोगो से घृणा करके एक दिन उनसे दूर चली आई थी, यहां आकर भी उस घृणा के हाथों से मुक्ति नहीं मिली। यहां जो लोग मुझे रास्ते मे, बाजार में मिल जाने पर साप्टांग प्रणाम करते हैं, क्या तुम समझते हो कि वे सचमुच ही मेरी इज्जत करते है ?" मैंने पूछा, 'तो क्या नहीं करते ?' मेम भाभी ने कहा, 'नहीं। देखो न, मेरे पिताजी एक दिन सडक के पश्चिम की ओर से आ रहे थे और मेरी मा आ रही थी उत्तर की ओर से । मोड़ पर पहुंचते ही उनकी मुलाकात हो गई। उसी मुलाकात के फलस्वरूप मेरा जन्म हुआ । और यही दुर्घटना मैंने सर्वत्र देखी है। सडक पर किसी मेहराव के नीचे जन्म लेकर अपना जीवन शुरू करके राजप्रासाद के हरम तक, सभी जगह एक ही बात मैंने पूछा, 'बडे महाराज तुमको जाने देंगे?' मेम भाभी ने कहा, 'नही जाने देंगे, इसीलिए तो छिपकर जा ।" रही हूं।' क्षण-भर रुककर वह फिर वोली, 'तू आज ही चला जा। कल समूचे आबू में हो-हल्ला मच जाएगा। बडे महाराज कई महीनो से मुझ पर शक कर रहे है । यहा भी मेरे पीछे जासूस लगा रखे है। इसीलिए कह रही हूं कि तू चला जा यहा से।' मैंने कहा, 'पर जाऊं कैसे ?' मेम भाभी ने कहा, 'तुम्हारे हवामहल मे रात को कार भेज दूगी। तू तैयार रहना। कार तुम्हे यहा से बहुत दूर पहुचा देगी।' 'और ? तुम मेम भाभी ने कहा, 'मेरे बारे मे तुम्हें चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं।' मैंने पूछा, 'फिर भी, तुम्हारे जाने की क्या व्यवस्था होगी?' मेम भाभी ने सिगरेट का कश लेकर धुआ उगला। बोली, 'मेरे मैंने पूछा, पटर।

जाने की तुम्हें चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी। विली इण्डिया में है। वह मेरे लिए सारा इन्तजाम करके रखेगा। मुझे याद है, इस घटना के बहुत दिनों बाद एक दिन मैं रोहिणी बाबू से मेंट करने गया था। मैं महसूस कर रहा था कि किसी दिन जिस विजयोल्लास से फूलकर मैं घर लौटा था, उसको लज्जा दूर करनी पड़ेगी। पंचा ने कहा था, 'अर्जुन, सर !' सुबोध ने कहा था, "भीम, सर !' फटिक ने कहा था, 'कणं, सर !' और मैं ? मैंने कहा था, 'युधिष्ठिर !' यह सभीको मालूम है कि विजय की माला हमेशा युधिष्ठिर को ही मिली है। उस समय मुझे भी यही मालूम था। पर आज दूसरी ही बात मालूम हुई। बाज मुझे पता चला कि जय बोर पराजय में कोई फर्क नहीं है। अक्सर देखा गया है कि कई लोगों ने मनुष्य के सामने हार स्वीकार करके भी विधाता के हाथों जयमाला पाई है। लेकिन यह भी देखा गया है कि मनुष्य पर जयी होकर लोग जब विधाता ग सामने अपना हिसाब पेश करते हैं उस समय कितने ही लोगों के निर शर्म से झुक जान हैं। बाज जिनका हम विनय कही है, वहीं कल वानों-रात पराजय में बदल जाती है। क्या नायंक है और क्या नियंकामका फैसला कान कर सकता है? १६४ सगानी मुझे याद है, उस दिन रात को जब लौटकर आया तो न जाने मुझे कैसा डर-सा लग रहा था। आबू रोड को इतनी ठण्ड में भी मैं पसीने- पसीने हो गया था। दूर कहीं पन्द्रह मिनट के अन्तर से गिर्जाघर का घण्टा वरावर बज रहा था । उस आवाज को तरङ्गमानों समूचे पहाड पर तैरती हुई अनन्त में मिल रही थी। बाहर की साधारण-सी आवाज पर भी मैं चौंक उठता और मन ही मन यही दुआ करता कि मेम भाभी जहां कही भी जाए, सुख से रहे । दूर गगन में कही कोई पक्षी पुकार उठा । कूक- कूक को-सी आवाज थी वह । शायद किसी पहाड़ी पक्षी का आर्तनाद था। टप-टप करके खिडकी के टिन पर ओस की बूंदें पड़ रही थीं । किसी पेड़ की टहनी से एक सूखा पत्ता टूटकर निश्शब्द नीचे गिर पड़ा। घास में अंकुर फूट पड़े। मैं कान खडे किए हुए मेम भाभी की गाड़ी का इन्तजार कर रहा था। कल सुबह यहा पुलिस आएगी। पूरे शहर मे खोजवीन होगी। पर मेम भाभी कही नही मिलेगी। बहुत दिनो और रातों के बाद मेम भाभी अपने घर लौटेगी, और वहां पहुंचकर फिर से गृहस्थी वसाएगी। अब किसीसे भी उसे घृणा नहीं होगी। विली भी युद्ध से लौटकर शादी करेगा। मैटिल्ड की शादी हो चुकी है। उसके बाद मिनी की शादी होगी। फिर हेनरी, माटिन, सभी की गृहस्थी वसेगी। मैम भाभी उन्हीं लोगो को एक सहोदरा है, उनकी ही आत्मीया है। वह हम लोगों की कोई नही, कुछ नहीं लगती। वहा लम्बा गाऊन पहनकर वह गिर्जाघर जाकर प्रार्थना करेगी-"The time is fullllled, and the kingdom of God is at hand, repent ye..." और मुझे उस दिन को भी तमाम बातें याद है, जिस दिन हावडा स्टेशन, दमदम एयरोडम, खिदिरपुर के डेक से अग्रेज भारत छोडकर चले - . गी पर ट्रेन में या सिनेमाघरों में अब वे दिखाई नहीं पड़ते, स-चालीस साल पहले वही राह गुज़रते निरीह लोगों के सिर पर ते हुए चलते थे; फिर भी उन्हें कोई कुछ कहने-सुननेवाला नहीं मलोगों ने जी-जान से, बल्कि पूरी तरह से साहब बनने का प्रयत्न या । पर प्रयत्न करने के बावजूद हमलोग साहब लोगों की नज़र में तो नेटिव थे, फिर वाबू । हम लोग साहव नहीं बन सके, इसका हमें कम दुःख था ? पर आज वह सारा अतीत इतिहास बन गया है। कन आज के तुम सभी लोग याद रखो कि उस दिन तमाम अंग्रेज़ लड़के- ड़कियों के चले जाने के पश्चात् भी सिर्फ एक ऐसी लड़की थी, जो नहीं जा सकी थी। सिर्फ वही एक उन सबसे पिछड़ गई थी। वह आज भी आबू पहाड़ के पत्थरों में मिट्टी के नीचे बिल्कुल निश्चित अनन्त निर्भरता के साथ चिर-निद्रा में विश्राम कर रही है। वह हार चुकी है। दुनिया की भीड़ में परिश्रान्त होकर वह पथ खो बैठी है । अब वही कहानी सुनाऊं m जब मेरी नींद टूटी तो देखा, सुबह हो चुकी थी। गिर्जाघर की घड़ी में टन-टनकर घण्टे बज रहे थे। उस समय आबू पहाड़ के चारों ओर कुहासा फैला हुआ था। कुहासे से आच्छन्न सूर्य की किरणें पहाड़ की चोटी पर पड़ रही थीं। उधर सनसेट प्वाइण्ट पर अंधेरे का कुछ झुटपुटा-सा छाया था। मैं बिलकुल संनाहीन हो गया, मानो मेरी समूची चेतना ही लुप्त गई हो। तो क्या उसने गाड़ी नहीं भेजी ? नहीं, यह भला कैसे हो सक है ? शायद मुझे ही नींद आ गई हो और गाड़ी का हॉर्न सुनाई नहीं दि हो। मैं धोती-कुरता बदलकर सड़क पर निकल आया तो देखा कि से पर खासी भीड़ जमा है। अनगिनत सिपाही और कड़ा पहरा ! पटरानी net ओर गजब की सरगर्मी नजर आ रही थी। नौकर-चाकर, लाव-लस्कर समी व्यस्त ! तो क्या सब जाग पडे थे और उन्हें मेम भाभी के भागने की बात मालम हो गई थी? कुछ आगे बढ़ते ही मेरो समस्या का समा. धान हो गया। कल वाला वह आदमी, जिसने मुझसे स्टेशन पर बात की थी, मुझे देखते ही मेरे पास दौडा आया और पूर्ववत् सलाम करके खड़ा हो गया। 'मेम भाभी कहां है ? उस व्यक्ति ने कहा, 'हुजूराइन नहीं हैं, हुजूर।' मैंने पूछा, 'कहा गई। उस व्यक्ति ने कहा, 'मर गई, हुजूर ।' मैंने पूछा, और पादरी साहब की दी हुई वाइबिल के पन्ने उलटते पलटते मुझे ये तमाम बातें याद हो आई कि बडे महाराज ने मैम भाभी के पीछे गुप्तचर लगा दिए थे। उन्हें शायद शक हो गया था। हो सकता है, उन्हें सब कुछ मालूम चल गया हो और मेरे पास गाडी भेजने के पहले ही उन्होंने शायद सब कुछ खत्म कर दिया हो। शायद रात के पहले पहर में ही सारी घटना घट चुकी हो । मेम भाभी निश्चिन्त होकर कुछ देर के लिये सोई होगी । घोर अन्धेरी रात में शायद कोई पहले से ही मेम भाभी के कमरे में घुस-छिपकर बैठ गया होगा और मेम भाभी को उसका पता नहीं चल सका होगा । जव हवामहल में तमाम शोर गुल और चहल-पहल शान्त हो गई होगी तब वह अपनी ओट से निकला होगा और... उसके वाद मिट्टी को पृथ्वी पर सवेरा हुमा । एक के बाद एक सभी जाग पडे, पर मेम भाभी की नोदनहीं टूटी। उधर विली ने भी एरोड्रम पर खडे-खडे शायद उम्मीद छोड़ दो। अपनी दीदी को तो वह अच्छी तरह जानता था न! प्लेन की टिकट, पासपोर्ट सब बेकार हो गए। सारा प्लान ही नष्ट हो गया। गिर्जाघर की घड़ी में उस वक्त भी घण्टे टन-टन बज रहे थे-~"The time is fulfilled, and the kingdom of God is at hand..repent ye...Amen." आज भी आवू पहाड़ के गिर्जाघर के सहन में खड़े होकर देखें तो चारों तरफ समाधि-स्तम्भों की कतारें दिखाई पड़ेंगी। वहां बहुत-से लोगों की समाधियां हैं । उन्हीं में एक समाधि के ऊपर सफेद पत्थर पर सिर्फ इतना ही लिखा है : Here lies a lady who lived as she liked and died happy. एक विदेशी महिला के लिए मुझे खर्च करते देखकर गिर्जाघर के पादरी साहव उस दिन शायद चकित हो गए थे। उन्होंने मुझसे पूछा था, 'मिस नोरा आपकी क्या लगती थी ?' उनकी बात का कुछ जवाव न देकर मैं वहां से बहुत शीघ्रता से खिसक पड़ा था, क्योंकि बूढ़े पादरी साहब शायद मेरी बात नहीं समझ पाते । बल्कि कोई भी और व्यक्ति मेरी बातें भला क्या समझ पाता! मेम माभी के जीवन की सार्थकता समझने की सामर्थ्य किसमें थी भला? एक दिन नदी ने कहा था-मैं समुद्र बनूंगी। लगता है शायद इसी- लिए वह कहां और किस पहाड़ के शिखर से निकलकर चलती-चलती समुद्र में ना मिली थी। आज वही सचमुच समुद्र वन गई है, पर समुद्र बनने की उसकी लालसा आज भी नहीं मिटी है, क्या यही उसके लिए कम सुख की बात है ? 1270

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Patrani

Author
Mitra Vimal
Title
Patrani
File name
Patrani
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Delhi,atmaraj & Son's
Language
Sanskrit
Pages
192
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552233
Barcode
4990010032979.00
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