Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Rahim-satsai

Arun Visvmbhr · 2010/12

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रहीम-सतसई
[ मूल, टीका व मालोचना ]]
विश्वम्भर 'अवम' एम.ए.
विनोद पुस्तक मन्दिर, आगरा

प्रशाचा
पिनो पुस्तक मरियर
हॉम्पिटम रोर मागरा
प्रथम संस्करण
सन् १९९२
मूल्य
माश प्रिरिम प्रेस
बाग मुअपफर या पागरा

सेही बम्पुबर
रामकृष्ण प्रप्रवाल एम० ए०
को सप्रम

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भूमिका कबीर सूर मौर वृतगी के बार हिन्दी भापा मापी सम में रहीम ही सब पथिक मोर- प्रिय मिपीम भी मोकप्रियता का कारण बीवन के प्यावहारिक पस पीपारी, मचा एवं मामिल अनुमति है । तुमसी सूर मारिनी महत्ता रम्प सांसाविक मान्यतामा तपा काय को रच स्वम मनुभूति पर मषिष्टित है इसके लिए उक्त समितिमपि एप कमा अवता की पपेक्षा है । बमसापा रण में गर्मम वस्तु बना हम को वो प्यबहार की प्रति रिनी पनुभूतियां व परिस स्पा कर पाती है सही कारण है कि मोति सम्बापो सूक्तिमा बार सामाग्य का मनोरबम भी करती। पौर-मार्प प्रदर्शन भी। सीम की नायिका और पारि की चमार्य पम महत्वपूर्ण नही पर पानाप में दो पोम अपनी मोति-सम्मापी मूस्तिों के माप्पम प पैठ पाये। मुझे पाया है कि मेरे मित्र मम्ण पीस सत्य का साया तार किया है। चीम नीति पाश्यों में निहित बीपन की मारी एए मार्षिक प्रगति को पासीपना टीका बाप सामाम्म साहित्य के रसिकों पा विधापिमों लिए मुतधारने का उनका यह प्रयास स्तुए। इसमें रम्हान अनेक परपष्ट वमो की मंगठि गार पानी मूम का भी परिषय दिम।। पासोचना शाम पीने पनेक महत्त्वपूर्ण पों पर शिवापूर्ण प्रकार समा। पीम सतसई सटीक एवं विद्यापीपयोनी पसल बीमार अमरतापी दी। गती प्रभारी प्रति यह अन्य राय निवास पहिली-साहित्य तमा विपन विपापी समान इससे भाभाम्बित होपा । हिली माग पापरा प्रमेव मागरा सा० भगपतस्वस्प मिम AC

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जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्य जीवन परिचय मुपत पम्राट प्रकार के नगरनों में से एक प्लस में हीम में ममम मुगल दरबार में स्पाति मनित की प्रपितु बनवापारण में मारे पिपेप प्रसिद्धि प्राप्त करने में समर्थ हए । मुसम सम्राट पीर सामन्तों के बीच यदि ये अपने पासकीय प्रतिमा और पूर्ण कार्यकतार्पो से प्रिय हुए तो पर साधारण में सरचित नीतिपूर्ण रोहों पर पुटीमेबपों के कारण लोकप्रिय हए । मप्पास की समितियों में पीम भी एक गिम्हें इतिहास के पाठकों के प्रतिरिक्त ग्रापारण बनता मी बमूगी ही मानती है । हिन्दी साहिएप में वीर मुर पौर तुमची मे कम मोकप्रिय कवि मही। नमी कविता तो निरपर पार पामीण जनता में मी मोकप्रिय है। पाये हम पम्ही मोकप्रिय का बीवन-परिचय प्रस्तुत करें। माता पिता-पीप का पूरा नाम पमुपीन बानमाना पा । ये तुई मान (साधार) पाति करे। इसके पूर्वजों का पारि निवास स्थान स्पियन नागर पा परम को मारी में काम पिस्तान के पासपास पा । रमके पिता का नाम रमता पा ।परमों में पानी से पार होनार पो उम्र भारत के प्रपम मन गायक बाबर के पहा नौकरी की। बाकी

मोषणा पीर रुप से बराबर यह पदोपति करता या बाबर के पत्तरा
पिपरोहमा एमय भी सपा का विमापा सहायक पा मोर राम
के महत्वपूर्ण कार्यों में सा माम देवा पाहुनाको मृत्यु होने पर रनमा
पोरीय रामकुमार प्रभार को मुगम सिंहासन पर बैठामा पार सय सका
परवान पर कार्य को नुषार कप पापा । पीम की मात्रा मेवात के
बमाचपा की पुत्री थी । बमासमा पूबर रासपूरे पार पहनि कामावर में
स्माम पर्म स्वीकार कर लिया बाबमानो की बी माफी मेहमाप
विवाद हपापा भोर पोरी नामो का पावन से हुमा। रहीम का
पिता सफल रानीतिम पार पटु मेनानायक तोगा ही साल ही माप्रेमी
पौर कवि मीमा । रहीम के माप्रिया मा पराकम दरमपिता पारि
गुरु प्रपन तिवारी सम्पत्ति के रूप में मिले थे। हिन्दू धर्म के प्रति प्रय,
पवियोरित साहस पारि मुण माता से प्राप्त हुए।
मन्म-पररमा पारिनपादहिन नापति हेमू से मुठ मारने
लिये पानीपत की भोरमका पाठो मान में उसगी माविसरिता ममती
पानी भी दी। मेरिन पार्य में ही पपनी पत्नी को रखने लाहोरोपमा
मिये भय रिवा । पानीपत हितोष पुर में को पराजित करने बार
पारि र उपर दबाने मिरे परबर साप पंगा पी
मोर प्रस्पान रहावो राती बीप काहौर में परमानी १५
रिसमा कोहीम दो पण रिपामुसि पात्रा बाप
परमापार र समागमों ने पत्पन्न पुप समय। रस को
मम्मी प्रतीमा पापा मगरका में पुर की प्राप्ति की प्रा. रमो
एलोम्नाप सोपारही पापीमबम पर मुगमों में पूरा समय
मनाये गरे । दीमारम्भिक बारात पार पौरप
पिसा-परिणयरममा पोए प्रभार) पम परमेश
वापर जमने सौर व पारी मार्गति एभमागका
एमन पर्या परती पली मोर पार पीप पि दीप पोनार

-- - - हरमिये मक्का की पोर पप्त पा लेकिन मार्य में पाटम में एक पठान उसका पर कर गमगा इस प्रकार पीम पार वर्ष की उम्र में ही पिता के समान में मनापित हो मरे । पकार मे १९५१ . में पाम को अपने पार बुनया मिया पौर प्रसकी पिसा-पीसा का राग्य की पौर से प्रबन्ध किया । प्रपिवान के मामली मुस्मा मुहम्मद प्रमौन रहीम के शिक्षक पे उममे हीम मे परपी पारसी पोर तुर्की की मिमा प्राप्त की। इसके अतिरिक्त रहीम मे सात वमा हिन्दी सामान भी प्राप्त किया। मकबर के दरबार में राणा टोरमस बीरबम कवि मंच से हिन्दी के कवि और ममा भीमके प्रतिरित संगत पनेक विद्वान थी उसके दरबार की पोमा बढ़ाते पत' बनके साय में रहीम का सात तपा हिम्पी की पोर मुमार होना सामाविक ही था। अपनी प्रतिमा पौर योम्पदा के बल पर रहीम ने बल परती फारसी में प्रवाह मान प्राप्त नहीं किया पा प्रपितु उसका संपवावादीयमान मी किसी संसव के पपित से कम पारियम के मुसिर पनि सम्पपम मे पपने प्राव पंप भाकर' में रहीम के समय के भान भी प्रसंसा करते गए उसे मोर के ममान बताया है। रहीम पुणे धर्मपोंगा परापस भी ममी मावि पिया पा । यही पारण है कि उनकी पितापों में न पूरी फपि पायसी की मांति नहीं पौराणिक धुटि नहीं मिसती । हिरी ऐसे प्रथम मसनमाम पिये गिन लिबर्म पौर संरकृति का ए हिन की मौति माना। पारिवारिक जीवन-पीम ने अपने प्रमापारण पुखों से पास में ही पुषप्त म्रप्राट पकार को प्रमाबित कर दिया । प्रायर पहले ही राम पितापी योग्यता को देख पुका पा पतः उम पुष रहीम को योग्यता के सम्बन्ध में यह बात पुप विश्वस्त पा । मेकिन परममा का पुराना पतु दन पीम की इस प्रति पर पमता पापपरमेसकीय को समाप्त करने के निये सलमत्त प्रमौर मिर्गा प्रसार कोरा पी एन माहबानो बेगम से रहीम रिपाट पर दिया । पनीर को बारचा मी पापा बेटा होने के कारण बार में मरमन्त प्रभावपाती पा। माइगनो गम परपम्त मीम मोर मारनी की। पीम पी से पौर भी परें पी मेकिन प्रधान पर - माहमानो हो हो। माहबानो से होम को तीन पृ रन और रो पुधि प्राप्त हुई। पुष बीर और राराप पपने पौर्य प्रौर पपम से पापों पर प्रिपपात्र बने हैं। मैकिन ये रोनों ही पुत्र असमय ही पिता के सामने काम पमित हो गये। बा पुष तीस वर्ष की पबरपा में प्रत्यधिक मदिरापान से मर गया पौर दूसरा पुष महावी नारा पाप गपा। तीसरा पुष करत मी पर्प की पासा में ही मरपु को प्राप्त (पा । पीन की पक मापी पाना बेगम पायर के पुत्र रानियाल को प्पाही मई पर दूसरी का विवाद भएप पहावीरी मेपक के पुत्र पीर ममीनुरीन सहपापा। प्ति होनों ही पुत्रिमा परेको समम पापाव विमा हो पई । रहीम की माप पलियों + भी तीन पुषसे विनमे से एक बचपन मही मर गया था। कुम निसार रहीम का पारिवारिक पीबन पत्परत मुगर पार सफम बा। मेशिन बाद में पुत्रों के नियम और पुत्रियों के सम्म से उपे का भी कम महीमा राजनीतिक जीवन-हीम पा सारा बीवन रानीति में ही बीवा । भराम में ही रहीम को एनीति की भी मिटा दी थी। पर पार में रहीम को पाप साप रसताना पोर बाहर जाते समय भी पसे अपने हेपबाया पापपराहीमसेवबसे पास स १५१५ में पुनराव म पाबरगडी के पास के पुर में मना + सम्म भाग का मापा मापा पा । देना सम्पनानायक होगा प्रात्यात पौरपसाबाट पी। पपह वर्ष की पलापु ही होम में हम महापपूर्ण पर को पड़ी पोम्पदा पौर पुगमता से सिमानानपुर में मुगलों की ही विजय हुई। बीस वर्ष की परस्था में राप्रपामा बना दिया । यह भीम पौरर पौरसम्पान *महा की। पीपीपार प्रतिमा पर पार पौम्यताम पर रममपूर्ण र पागमा मरेपारो हीन अनेक बार सागर महावीर मर सिण पपा पौर मी माता के प्रपान TORमाता पुगे मेनापति भी बने। पाने पीपन नीतिगृप सागरनारीप्रमानीपप्पता, .

पाया सैन्य संचालन को कुसमता मौर पबनीतिक पता का नोहा तत्कालीन बड़े यो सामन्त पौर स्वयं मुगल शासक प्रकार और बहाँपीर मी मानते थे। मृत्यु-पीम ने विवना सुरा सम्मान और मन पपने यौवन काल में बीवन के अन्तिम दिनों में उससे कम कष्ट मही पाया। उसकी प्रपान बगम माहबानों में उत्तर पुष करन वो नौ वर्ष की प्रस्पायु में पहले ही मर पया पा पम्प पत्नी से सत्ता उसका प्रिय पुष परी मी पुर्पटना पस्त हो असमय ही मर मया । उसकी बीवन संमिनी प्रधान बेवम माहबानो मी हरी की मृत्यु के तीन दिन पानात् पन बसौ । रोनों पुधियां भी असमय ही विषया हो मई । पणा पुष अत्यधिक मरिरापान से सपा फोटा पुष मानवमा पप से पसमय ही काम कपमित हो गये। बीच-बीष में परच्युत होने वा पागौर पिन जाने के कारण उसे मुमत पासक बागीर पारा पपमानित भी होना पड़ा । इन सब प्रसार माघावों ने उसके पर को पौर भी पषिक पर बना रिमा । यपि मन्त्र में पहोमीर ने उस ममा कर पिया मोर एक मात्र सपा तना कमाय मे नागौर दी लेकिन उसका रिस तो टूट पुमा बा । फात बब नरवहाँ ने महापत मां के गिरोह के बमम के बिये पीम को सिन्दु पार भेषा तो बीच में माहौर में ही बीमार पा ममा । बीमारी की पण सुषणे न रेब उसे पिली माया पया। पौर रिल्ली में से सन् १९२० में ४२ वर्ष की उम्र में उसका रेहावसान हो मया । रहीम ने पहले सेमामू के मारे के पास अपने लिये मनरा बनवा रखा था उसी में पसे पफना पिया पपा । दिल्ली में बचापि यह मपरा प्रब बरोका। मकिन अपने साहित्यिक तितके कारण उसकी कीर्ति अजय है। - ध्यक्तित्व अपने समय में पोम बहुत प्रभाषपानी पत्तियों में एक माने जाते थे। प्रसापारस राजनीतिक समता पौर प्रतिमा के कारन उन्होंने अपने ममिव को प्रत्यषित पारपाती बना लिया पार बहुमुखी प्रतिमा पीप पे। एक साप की ये दुसन राजनीविन मोम प्रसाएक और बीर सेनापति वो

-
पम पाप ही मामि गम्भीर पाला कुशन अनुसारक बहुमापा विर
पौर साहिरप मानी पे। इतना होने पर भी ये शर हवसान ।
रीम-गुचिमों का दुख एवं उनसे नहीं देखा गाता पा फसव माषकों को किसी
मी पणा में मापस मही मोटाते पे । पुगी होने के साप-साथ ये गुणी पों का
पार करने पाने भी पे । पप पिके एकही बम पर उप होकर गोन
सात नाम पये पुरस्कार मेरे रिसेपे।
राजनीति में उनकी पाक Bा समय बोबो मामलों पर पयकुमारी,
प्राबर वा पापीर बापगाह मानी। सैम्प चामन उनकी
पोम्पका पूर्व पी हमाम्लो के पालन में पधिपति केस में भी नि
अपनी पसाभारण योग्यता का परिषप दिया । दुगरात पा भिण काका
पार प्रास्तपति तथा पीपक में नियुक्त हुए ।
-
मुमन पाम परिवार में गर्ग र सम्मान रिण । भनेक पुमार पोर
बड़ी गागीरे हो गर्दै पिनी ही-वाहिक मामाको कारण भी गुमन
पासपरिवार कानिए ऐ । उनकी मौसी मुगल बादशाहपायू
को प्पाही पी। प रमतरी प्रधान वैपम परवा पाप पुष कामासी बी
सनिपान उनकी एक पुत्री माही। ममीम एक पुष
मग से नीमनीबीमा पर पुष तुरंम (बार में बाहमहाँ) मे उसकी
पौत्री का विवाह-मायाप हुपा । पावरपुष सनीम के मेलामा
मुरली पे। म प्रकार पर trगत परिवार उनका प्रमा,
मापाप मौरन मरा कारण उसकी प्रमापारण पोवता पौरमानणाली
म्पतिवदीवा।
सीप पापा सा और प्राइप ! उना मल पौर परिषद
कामरी मारना रनावर बरी की। मपापी मी र मेनी गब
पारली में ये पाने जीवन मे पापा 31 । पजनीति को
पतिको मापने परम में मान मनी ।सोम की गवनीविनी गगी से
भराप्रपणे वीरम में भी परमपरागण धीम्भी मैना
-

७ पहा यपि इसके लिये टनरी पारमा विकारती पी।पीवन पतिम दिनों में तो ये कुराम को सामी मानकर मि को रिये पये पचन तक का निर्वाहन पर सरे फमत पा स्वार्थ से प्रेरित होकर भीवन के महान प्राप्पारिमक मूल्यों, को दुकरा रिया । पर परली पार पुत्रों के सामयिक निबन के मामात कठिन पौर विषम परिस्थितियों और बर्बर रावस्था से उनका पठित्व पन्त में टूट पर बिखरा मया पा। फसत उसमें पाठेबस्विता नाहीएमईपी जिसके पागे अनेक विभूतिमा मत मस्तक हा गावी पी। समप या प्रवस पाकिसे महीं तोड़ देता पाकिसे नही भुजा देता । समय का यही प्रहार रहीम पर भी पड़ा था। फिर मोहीम का पतिल मम्पकाम पास से इतर म्पत्तियों से कम प्रसर पर प्रभावशाली नहीं था। साहित्य साधना पीय का बीवन परिकांपत राजनीतिक पतनों और पुरों में बीता था। पत साहित्यसेवा के लिय उनके पास भवनम बहुत कम था फिर भी अपने प्रस्परिक पस्त बीवन में से भी में साहित्य के लिये पर्यात समय निकास मेटे थे। पन्य कर्मियों मौर मबों की रचनाए पो प्पान से सुनते एवं पाते के तमा कषियों को खूब सम्मान देते थे। गंग एक बप्पय पर मार ऐना हो प्रसिटीही अपने समय के समी प्रसिस फपियों पौर शिानों से उनके मधुर सम्बन्ध । इसके सार ही स्पर्म रहीम ने पति परिमाण में साहित्य का मूजन किया है। शिों के अनुसार रहीम चित प्रमों की सूची इस प्रकार है- (१) दोहावनी प्रवा सतसई (२) मगर भोमा (1) पर मापिका मेर (४) पर (२) मानाप्टक (१) भङ्गार सोरा (.) पोम काम्य (ब) बेट कौतुकम् पौर (९) फुटकर हम। इनके पतिरिक्त पुप विधानों के मतानुसार "रामपंचाम्पाचौं मामक काम्प प्रम्प के रचयिता भी रहीम थे किन्तु यह ति पभी तक पता नहीं हो सकी है । फारसी में भी पीम ने रोमान मिला था पो पक्षम्म नहीं हो सका है। -

पारसी महीमाय पिय पुष पर पवार प्रात
होमको फारसी में
रषित पनामोप मारली बहानोरी" "त-सीम" मा
“मपादिरे रहोमा पंथा ये बिमठे तुर्की में लिक्षित वापर की पारमाया
'तुर बारी" का रहोम में भरती में पनुवार किया पानिपत समाट
भाबर बड़ा प्रसन हमापा और पीम को एक पामीर दो बीस प्रकार
मा पकिरीम मपने व्यस्त बनीति में भी समय निकालकर
पिपुप परिमास में पहत्वपूर्ण साहिरियों की रमाकरमी ली।

रहीम का नीति काव्य मोतिकाम्प का स्वरूप-मीति' सम्मकी सत्पत्ति संसात्त की ली पातु से सम्बन्धित मानी पई है । "णी का पर्व । प्रामे के बाना' “प्रत नीति पम का पुत्पत्तिमूमक प्रर्ष ही है 'माये में बाना' अषमा “प्रमति"। सृष्टि के इतिहास में "विकास' का बड़ा महत्व रहा है। मानब का इतिहास सो प्राविकाम से विकासबाट गापार यह विकास पागे की पोर मा प्रगति सूचीमा। पाकचन परिमपम होगा कि मानव-बीवन में प्रगतिका पड़ा महत्व मोरकि मानव समाबत 'प्रपति' का प्रेमी प्रत नीति" का रस मिये सर्वाधिक महत्व है। समस्त धमाब नीति' का पालम्बन लेकर प्रयत्ति कर सका पार भी कर रहा है और मणिम्म में भी करता येगा। नीति स विीन मानव-समाव का संचालन कम्पमातीत । मुस्ताविसार' नामक नीतिमास प्रसिव प्रब में नीति की महत्ता के बारे मे स्पष्ट लिखा -पिस प्रकार मोबन के बिना प्राणियों की बस्मिात मही होती उसी प्रकार मीति के बिना मोक की पबहार स्थिति नहीं होती।" प्रत विध "नीति" का मावब-बीवन में इतना महत्वपूर्ण स्थान । ममा पससे मानव मावनामों का प्रतिनिधित्व करने वाला काम से मना सकता था? बहुत मोड़ पाचार्यों और कमियों को बोरकर समी काम में नीति" को प्रास्वत मावश्यक मामा है। यही कारण है विषय में प्राय समौ महाम् १ करियों के काम में मीति के सर मुमति हुए हैं। प्राप्त महाकवि एवमर्ष मे वो स्पष्ट ही प्ररपेक महाइकपिको नीति का शिक्षा माना है-- "Every grat poet a teacher I wb to be either cond dered as a teacher or as nothing at al पारवास्प साहित्य शास्त्री पाय का प्राण "सौर्य को मानवे पर Murrey सौमर्य-गलको गीति पर प्राधारित मानते है- Moral nihilism in Literature involves 10 cmtbetle thi Than हिसी के करियर मैपिभीएरण गुप्त से भी एक स्थान पर निणा- "केबस मनोरंजन न पविका कर्म होना चाहिये। उसमें रचित उपरेशका भी मम होमा पाहिले ।' फिस्नु कप ऐस भी कवि पर प्राचार्य एषो काम्प पा साहित्य में मीतिमा होमा पारस्पकमही मानत । इस मत प्रबम समर्षक पी प्रमिदमपाकार पॉस्मर बाराप्रपने उपन्यास The Picture of Doran Grey" की भूमिका मसिनो - साहित्य पपया बना में मैतिकता पपया पनैतिकता का ज्ञान ही नही रख्खा नमक हम रोना का दोष एक दूसरे से सर्वपा पूषा।' पारपारप समीयकोष मीरा भीसी मत के बम पर पाप पपावारी समौराक भी इस मत की पुष्टि करो इए पाहित्प को बम धमार का पमा चित्रपरने पासा ही मानते कितु या मत पाम्प मही दो साता। यही हिसाकार पषमा साहित्यकार मतिपता बारी बार प्रेरित होकर उतर कसा पक्षमा साहित्य सुगम नही कर सपना । जब उखा हरप मावादम को समान नही पाता तो पम मिका स्वर मारि बाप्पम 8 प्रस्ट करता पौर मा उतम कमा का मृग्न होता है। मेकिन यहाँ प्यान देन योग्य तप्प महरिकमा प्रषा सारण दापयनित गारों का पुरण होते हुए भी गामायिक नीति अपना सरापार पारिपेषीही ला पोंपिनापारमा साहित्पार का पतिल समार के तारो से ही संपरित दावा-समार पर उसके व्यक्ति के निर्माण कोपमा प्रमागरमोर मा पपा हादरयताकार पथरा साहित्यकार - कम्पत्तिस्य काही प्रतिफलन हो। उसको इति में बम या पत्रिक नन सामाजिक नियमों नीतियों एवं समाचारों का रिमन पपाप मिलेगा जिनके बीच इसका बीवन व्यतीत पा है और उसका पक्तित रहा है। इवना बायकोई साहित्यकार पपने साहित्य में प्रवेष्ट होकर भीति का पर्यन रखा है कि मम्य साहित्यकार मीति-वर्सन की पोर नग्मुश नही होता कमत सहा साहित्य स्पून स से देखने पर विसुर साहित्य मानता किमु सूपम म्प से उसका पर्यवेक्षस करने पर ऐसे साहित्य में भी नीति का पर्मन पाय मिल पाता है पाहे पर कमा के प्रावरण में ही क्यों न हो। साहित्य को समाज का पण कहा जाता है मेकिन साहित्य समाज का प्रतिविम्म दिखाने पाना पण मात्र ही नही है अपितु यह समाष का मार्म पर्मम कराने वाला प्रकाए सम्म प्रीप मौ । । साहित्यकार फोटोग्राफर की मोति केपन समाष की तस्वीर बीप कर ही नहीं रह पाता प्रपितु बह यह भी बताया कि समार की एक अन्धी तस्वीर से बन सकती है।पा दूसरा सम्म ही साहित्य को नीति के निकट मा रेता इस तप्प को ध्याम में रनवे ही एक पापचाप निशान से काम्प में नीति को अनिवार्य माना है- The essential them of poetry bo moral order फोटो ने नीति से मिजान कला को निन्दा की है और मैथ्यू पनि पो काम्य मनीति का होना परमायस्पक मानता था। सुप्रसिस पाचार मस्ताम वो मीविबुळ मा प्रबल समर्थक थे। पाश्चात्य पमीक्षक रस्किम भी मीवियुल कमाई मारा पक्षपाती ये नननि एक स्थान पर स्पष्ट निवा- 'मसाए मान के लिये उपोधात्मक होनी चाहिये पयोधि उपदेश ही उनका परम लक्ष्य होता है। मितु सा किम्मर समेत घ्यिा गा चुका साहित्य में सर्वत्र स्पष्ट ससे नीति का वर्णन नहीं मिक्षता । ऐसा साहिल प्रपुर मात्रा म पनपीबो नीति को कता के प्रययुष्ठम में निहित साता है। साहित्य नीतिमात्र मरणा धर्म मास्त्र महायो मात्र नाति परदा उपदेश का पान करे पपितु साहित्य तोल सबको मेहर भी एक पुष बस्तु है । प्रत मौसि या उपरेच ऐसी काम्पोधित सभी में - प्रमिय्यत मिया ना हो यो सरस एवं मामिड हो तो ऐठी सति ही काम की परिधि में पा सकेपी । इध प्रहार यह स्पप्रकि काम का नम्प मानक- बीपन का चिन्तम परला तो है ही साप में मानव-वीबम की प्रगति मिये रसदा मार्ग-नन करता भी उसका मस्म है। पुप काम्पों में या नीति-तत्व मा तोधिपा रहता है या नौण स्स में पता । मेकिन कुछ काम्पों में नीति वत्व सप्ट होता है और ऐसे कामों के रचयितापों का पभिप्रेत हो नीतिया उपरेप को काम्प के मामय से परमाना होता है। इस प्रकार के काम्य को 'नीतिकाम्प' की संज्ञा ईसा किम्मर प्रतिपापित किया जा का कि नीतिकाम्प मे मीति का प्रतिपादन होने पर भी इसमें काम्पोषित सर बता सरसता पोर मार्मिकता होनी चाहिए। मतपय मीविकाम्प में निम्न दुखों का होना मानायक- उसमें किसी नीतिया उपका बर्णम हो २ कपन में विधिप्रता हो पर्वाद मीति या उपदेश इस घमरकार पूर्व अंग परिगत लियाबारे कि मन पर ग्रा प्रभाव पड़ सके पापा सरल स्वाभाविक मार मारपूर्ण होता ४ पण में स्पष्टता तथा प्रमानोपारम्ता माने के लिये पनूठेप्टात पा रहाणाप्रपोप होना बाहिये । हिन्दी में मोतिकाम्प-भारत सब वे नीति को महत्व प्रदान करने पासा रेप रहा। भारत में विकास का इतना सम्मान पामीति पंपों को गाव की समाई। प्रम्य पाम तो पिसी विशेष तत्व काही अविपारन करने रस प्रत्येक मनुप्प निये ग्ने नाममर नहीं होते मिना सिमीतिणामा धमिये 'गुमीवितार'मरस पम्पाप सत्य aftert-नीतिमाम सब मनुप्पो लिये उपपापी, मर्यात शिपाव पर्म-प्राम-बम परी हेतु नून एवं मोचार।" यही वारणार जीप मनीशिपीकाप्ट मनीतिपरक ही है। यहाँ काम मीमिये बरामीति-मत प्रधानता ही है। भारत का प्रायनायक महान किन बत महान नाभर पा भपितु पारपं मना निर्माण मिरे मार तक नियमों का प्रतिपक मी पा । यहाँ के कार्यों के मूम मतो नीतिया परेमा सजियेश वो होता ही है साप में नीति का स्पष्ट प्रतिपारन करने वाले सवल नीति काप्प पलों की रचना श्री प्रधुर परिमाण में हुई। पारवारय द्विान WIntermlz इसीलिये मारतीय नीतिकाव्यको नीतिकाम्प की गप्टि विसका सर्वश्रेष्ठ काम्प माना है- "In one departmont of Iltonture, that of the aphorso (momle poctry) the Indians baro uttalaod mastery which bu never been gaiaed by any other pation." संस्मत का मीतिकाम्य इस एप्टि मे बिसेष समृड।ससव में मोति सम्मम्मी प्रपैक प्रत्यानिममें से प्रमुख प्रयों के माम इस प्रकार : (१) पुक मीधि, (२) चाणक्य नीति (३) नीति पतक (1) सोकोक्ति मुक्ताबसी (२) उपरे पता (६) सूक्ति संपहा (0) मीति मगरी (8) नीतिवाक्यामृत (९) मोतिसार (१०) मीविप्राय (११) मीवि पन्द्रिका (१२) मीवि फ्लार, (११) गप्टान्त पतर (१४) मीवि प्रदीप (१२) नीतिमाता (११) मीत कमताकद (१०) मीविप्रकाधिका (१८) मौटि एमाकर (१९) नीति पिचास (२) नीति नियक पारि । उपक प्रबों में कुछ यो विपुट नीति के प्रपौर म पन्ध कापत से पुत। संमत में विपुल पग्मिाण में पायोकियों की रचना भी हुई। मिनमे मीति और पविता का सुन्दर सम्मिमहापा। सोमनाप बीमार बिगपपरिण मामूरन नीलकण्ठ पपन्नाच पणपति प्रारि कवियों ने पपने पपरे पतकों में पम्पोक्तियों का पह किया है। इनके पतिरिक्त सरत में मुमापितों की रचना की। "मुभाषित एनाबर "सुमापिवानी' मुमापित कौस्तुम' 'भुमापित विपदा कयौन मन समुन्नव भारि प्रन्यों में मुमापितों का संग्रह प्रा।। या कि संसस समान हिनी में मीतिकाम्-प्रबों की रचना नहीं है फिर भी हिरवी नीति काम्य परिमाण और पुण की ष्टि से मपम्प नहीं है । चारपाची असनिक पीर बायसी मुफ तुमती देपर गिरी, भाजेन्द्र प्रसाद पंग, मैमितीचरण पुर पारि ऐसे अनेक कपिए बिनके कामों में मोवि मुन्दर उगाल स्थान-स्थान पर मिन है । अपरेस पीचिन्होंने मीति पर सवार भी लिया हिन्दी मीविकाम्य को हतियाको नारकोटिपों में निपारित कर - (१) सतसईम में (२) कम (३) मीधि विषय पितापों सम्म संग्रहों और (1) मन्म रिषर से सम्बन्धित मुणों संपात माविकी रविवाए । १- सतसईप में पवना से प्रहार की एक प्रकार की बात व निममें मौषि सम्मन्बी धन्दों ने ही सहीत किया गया है। में से प्रमुख तपसाइयों बाम इस प्रकार- (१) पीम सतसई (२) दुमी सवरा (१) पम्प ससई (पिरस नीति at () रिचार तसई भार। दूसरे प्रकार बतायो पाती! शिप पम्प विपमयों के पाप नीति बम पी पति वामा में संग्रहीत इस प्रकार की वायों पप्रमुक बार इस प्रकार - (१) बिहारी सत्का, () मदिराव पवई, () पठि सतसई, (v) पति सवसई (१) बन्न तता, ()यम हवा, (७)मि स्मा (हरिमौष Hant (8) साल मई (१.) सतसई (११) सोय पमा, (१२) बार मतमा मारि। २-मतककेस में-नौषि समाली पदों का संग्रह किमा पाई। प्रमुख पक्षों में माम इस प्रकार -1) पग्मन पुष पतक (२) पनाति पटक (1) अपदेष एक (1) मोकोधि पक्षक, (५) सपब नीति पतक(१) र म (0) मोवि पवा () पापोष्ठि पाक पारि नीति विषमक कवितामों के सम्म संपहों के रूप में-सतमा मामक पतिरितकारियों पपनी बौद्धि समाली कवितामाको भन्न सभी सेहोस भिाव मे माहा मान र मभर है- (१) प्रबोध बावनी (२) मसीहत मामा (8) सोल पचीसी (४) पान बायनी () विरिपरस्त पुपसिया (१) भन्योक्ति मत्रपा (.) पोस मेबरी (4) पीति सपा. (8) नीति प्रष्टक (१०) मीति मुकाबनी (११) मीति मुषा मम्माफिनी (१२) मीति मुनवमी (१३) हित वावमदास व पमिमा (१४) अमिरप पम्पीसिका (१३) सुनीति एनाकर (१५) उत्तम नीति पनिका (१०) मुनीति पाम प्रकाण (१८) पन्योक्ति कम्पा म (१९) पीनबी स पम्पोक्किमपूपा (.) पम्पोक्ति प्रकार पावि । ४-प्रम्य विषयों से सम्बन्धित मुक्तकों के सतह में संग्रहीत मोति की कविताएँ-कुष एसे भी सपा जिनमें पम्प विपन से सम्बन्धित पनों के साथ मीति सम्बन्धी परमी संग्रहीत है। प्राय प्रत्येक भाष्ठ भय के कविता संग्रह में एषन एक मीति निपा कविताए मी मिम हो पाती है। फिर भी पुष गुण संपों के माम उम्मेखनीय -(१) पाटन व 'भान सरोवर (२) पयामाई रषित बसायोच' (१) रसनिधि कव रतनाबाप' (४) बनारसी रास रचित 'बागबामनी (3) दुनारेमाम त दुतारे दोहापपी' (६) हरि पोप त 'पिम्प रोहापनी , (0) मैथिमीपरण मुठ 'भारतमारती' पारि । निष्कर्ष स से कमा बासमता है कि हिन्दी का मीति साम्प परिमाण और पता की दृष्टि से संसातको पोकर किसी भी भाषा के मोतिकाम्प से म्यून नही है। होम का मोतिकाम्प से हो रहीम ने प्रेम सौधर्म माविका भेद प्रापि पर शहारिक कवितापो की रपना मी पूब की । मेकिम नीतिप्प के प्रणेता म्प में समा हिन्दी साहित्य में वियप मान है। नीति काम्प भारम्प में हिसी बनता में विप मोकप्रिय है। रहीम की 'सतसईया पोहावनी में उनके मोतिपरको सिक्षित और प्रतिक्षित दोनों ही प्रकार मोगों में कापतों के रुप में प्रमुख होते है। उनकी इस मोकप्रियता का कारण उनके मोतिकाम्प का परह सरम पौर प्रभावोत्पादक होना। महा पीन नाविकाम का विरेचन करना पपेक्षित होगा। पासे बताया ही पा चुका है कि सम्म पीविकाम्प में निम्न पार पुणों का होना पावस्या -

(१) माविकाम में किसी मोतिया उपवेध का पालन होना चाहिये
(२) नीति मा उपदेश के मन में ऐसी विपिप्टता होनी चाहिये ता
प्रतिपावनीतिमा सवरेप का मन पर प्रभार पास
(१) मापा सरम बाविक और प्रसाधर्ण होनी चाहिये तमा-
(४) स्पष्टता और प्रभागोलापकता नाने के लिये पटना
इप्टाग्व या पसहरसों का नियम होना चाहिये।
पीन मोविकाण में इन पुती म धमावेश पत्वात शाक और तुम
कप में।
(१) हीम ने बीबी झेर पीयन बोया ज्वार-बारी
रेखा पार वर्ष की भानु में पिता के बाद प्रमर के राज में निर्वाधि
हर या प्रासामु मे ही पिता की मृतु का प्रसाद च वहन करवा पा
पुरमपनी प्रबर मतिश भार बोम्पा पाकमकोबीता और
पर्म पति-पथ पर पापर होकर एक दिन मपये परवारकारली
एकदो परे । भवारी एकनापति भी बनाये गये पाक
मे बिजय प्राप्त कर समय में प्रभार में प्रमेश बापी उपहारमा
सपा प्रान्तो सूबेदार भी बरे। मगर इस पराकम प्रतिमा
प्रसन्न होकर मार मार बमरामि भी हर पुम पारिमा
रष्टि में सी से परामस्था में विशेष सुसरी हे। भगवान बबी सुन्दर पी
सुधौम पली बार इस पुर मार को पुत्रियों को पारिवारिक
पौर परीष पेमकिन हम्मान मुख और सबके मन ।
मार-बार बीमा प्रतिम रिनो पार विपत्तियों को भी कर
पका। पार र पुरी की मृत्युसमा रोनो पुषियों का प्रक्षम विषणा
बाबा पारिवारिक पकी परम पीमा दी। रामबह का नम्बौर पाणे
समाकर मकबरा मातमारपसाबापीर बीममी
कहने का तात्पर्य यह है कि पोवन में
बोवार भान पुण्डरीका
। पर बीपी शापिसारे मिस्ट का परिपाको पता
प्रग गलामोधों का माना पावापा। बा दरबार में पर

पों के पहियों से सम्पर्क होने के कारण समके प्रमुभव का क्षेत्र प्रस्पात ध्यापक हो गया पा । यही कारण है कि पपने बोही मैं बीवन को प्राधिका पिक गलत मनाने के लिये मुम्बर नीति का प्रतिपारन करने में समर्थ हो सकें। जीवन की गाय धरना समके पास पी पौर विज्ञाम भनुभव भी पा भत उनके मीति कपन सोपों पर पधिक प्रभाव राह सके। पौर इसीलिए उनके दोहों में मामब-बीवन के विविध पता का गपाटन पा है। (२) कविवर रहीम के नीतिकाम्प की एक बड़ी निपेपता यानी कि उनके नीति या आपरेप कपन पुष नहीं है अपितु वन पेसा शिष्टप है पो परने बामे मार मुनमै बाने पर गोपित प्रमाण हामता है। पीम में अपने पीपल के अनुभवों को पेये मार्मिक रंग से रोहों में रखा कि पाठक मीर मोता पभिमूव हो पाते । प्राय यह देखने में पाता कि या मनुष्य विपति में हावा है वो रसके सम्मापी भी मुह पर मते है और ऐसे पुरे दिनों में मिनको सहायता रीबी भी कष्ट देने बामे हो पाते ।। पीम ने बीवन सो पार सत्य को निम्म दोहे में कितने सुन्दर रंग से कहा है- मिहि मंचस रोपड़ पुरपो हो सो सही यात । रहिमन प्रसमय के परे मित्र शत्रु बनात. पर ही मनुष्य को मान रेता विपत्ति में पहायर होता है। यदि पास में बन नही है। अपने भी कष्ट देने सगते है। हीम मे मीति की इस बात को ऐसे हसे कहा है कि उसमें एक विषेप पाता और मामिकता पा गई:- 'जब मगि विस म मापने तब लगि मित्र मकोय । रहिमन प्रमुख मा दिनु रवि माहिम हित होय है" सभी बिना पैसे कौन रिएका साप देता है- कमतपय पानी मे पृषक हो जाता है तो उसका हिक-बिम्तक सूर्य भी उसे दाप करने ममता है। रहीम प्राप' समी हे करम की ची मामिरता पार पिपिटवा कारण बनता में परमात मोरप्रिय पार पारिस्व की अनुपम निधि बन (३) रहीम दोहों की भाषा व सरम गुपोष पोर लामाविक। होशिका माति सम्शे की होड़-मरोग और पापा कम कृत्रिम सप रेखने को नही पिनता । पापा को परमता और सारसी कारण हो पाम निरपर मनुष्यों को बबाम पर मी वा पसे। पीम की नोक प्रियता का एक कारण उनको मामा का पिन पीर सरन होना () अपने बाहों में होम मे म र सानुभूति पहलमान किचन सरम र नारी भाषा को अपनाया अपितु मुम्मर र सार्थक दृष्टाम्हों की भाषामना से उन्हें बिसेप प्रमावोत्पादक श्री बमा रिसानयाँ एव" की भूमिरा रा. स्पाममुदाय माविकाम के तिने अनूठे राय का नियोजन होना माया माना है। रोहों को कार पर होम में ऐसे नगर मोर साकपटान्ती पौर पमाणो का विधान मा किसते ही बनतापाता पार पापों पुनार में उनकी मौखिक दूम्स को बार लीपावी है। अनुप को दोष समारोप करणी पाहिये पार पहार करना चाहिये कि किसी कारणव परि मान लिया राती है कि उसका बनाना सम्भव नहीं हो पाया। जैसे कि मरि एक बार पर या तो फिर मारोपिस करने पर भी सेवा कर मकान नही रिचना का सम्मा । हीमा पर की पुष्टि समुप बोदी सुन्दर और साकप्यात की मासोमना:- "गिरी बात नहीं सार करो किम कोय । रहिमम पाटे एप को ममे म मामन होप ।" पनूठे सम्म प्रयोग और भी माहास एम- (१) रहिमम माम माली करो, प्रमुनो मानन गाय । राग तुमत पप पिमई साप सहन परिवाय" (२) रहिमन पापा प्रेम का मत तोड़ो काप । दृष्टे से फिर ना मिले मिमे पाठ पर माय:'

"रहिमम बेनि बीम को, मधु म बीनिये गरि।
बहाँ काम पाये सुई, कहा करे तरवारि"
(४) 'रहिमन मोघे मरन खो बैर मसो म प्रीति ।
काटे बादे स्थान के दोऊ मांति विपरीति"
(५) "यसि कुसंग वाहत कुसस, यह रहीम निय सोस ।
महिमा घटो समुद्र को रावस बसे परोस।"
इस प्रकार यह कहा बा बरक्षा है कि रहीम के दोहे हिन्दी की प्रमूस्य
निमिमप विपिट पुणों के कारण उनके दोहे हिन्दी मीविकसम्मकी
बमे देन माने या सख्ते यही कारण है कि यीम हिन्दी के नीति
कारपियों सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रप्रसा।।

हिन्दी सतसई-परम्परा में रहीम का स्थान
।
मतसई का महस्व-भारतीय काम पारियों में समा कति
काम्पो प्रमुख र बिरे!-- काम्म मार -मुन काम।
मजाव काम में किसी काम से पर्गन होचा कि मुख्य
पाप में किसी पपा का बबन नही देता। मुख्य काम्या प्रमाण
सन्न होता है बाब प्रम घों ही होता । मृतक काम की
रमा राम की पपेसा पति निपुन परिपाल में हुई। पर इसका
बारर मी पर मुख्य कामयदेवा और पाक सैनों को मुविधा
पाती है। कवि सरमामा प्रतिक मम किो मुकाम की रचना
कामेवा पार पाठक भी मिला कि ममम मप्र बिरे मुळ काप का
रसास्वारन पर मेवा है । मुतह काम में एक पद रे छम से उम्मक
नहाँ होलात्क कर बाब पार दिपप हो दृष्टि प्रबों से सम्म
martीति कि मुक्तक 8 मैं रोमनों का मा rem
पर
कलाको सात सौ सौ पचास पच्चीस मारिकी
ईसा में अहीत पर रिया बम्ता है। और इस प्रगर इन हों के राम
यारा सा बलक पचासा पन्नोती पाहावे प्रकार 'सत
पई नाम भी मुमतकम परे पदों के सम्मान के लिये प्रयोग होवा
२.
-

है। सस सस सम सप्तपती से बना है जिसका पर्व है "Bात सो प्रतएन जिस काम्प मे सात सौ पदों का सामन हो उस सवसई कहते है। 'सर्मा में दो पठियों याने मन्दों-विशेषकर दोहों का समान एता है। मुक्तक काम्प में सवसायों की रचमा विपुल परिमाण में और हिन्दी में पो फरापित सतपाइयों के स में ही मुख्मों का सबसे अधिक संपर किया गया है। 'सतसा महत्व सम्बग्न में Encyclopedh of Prithunika" में मिसाई- The Satui is perhaps tho most celebrated work of poe. tlo art u datingolshed bron narrative and simpler styles Each conplet is dependent and complect In luell and to trtwmp of skill in companion of language felici ty of deaxritplon and rhetorical anifdee." माति-"विवरणात्महतमा मग्म परत नियों को छोड़कर काम्य में 'सतसई' सम्मबत सब भष्ठ बना है। इसका प्रत्येक हा स्वतन्त्र तथा सय में पूर्व होता है और मापा त बर्मन-ौमता तपा मनकार चातुर्य में प्रत्पात कापन सम्बित होता है।" हिन्दी-सतसई परम्परा-भारतीय साहित्य में सर्मप्रथम सताई के रूप में रचना संस की पुससमती ।।दुर्गासप्तडती' एक धार्मिक विमो 'माकोम्प पुराण का एक माग है। इसमें सात सौ लोक कि यह बार्मिक विषय को लेकर मिली मदत इसम्म प्रचार-प्रसार पार्मिक प्टि सेही हपा-साहित्यिक मि से इसका महत्व विष नही रहा । साहित्यिक रष्टि से सर्वप्रथम महत्व की मतगत बाचा पससता' मानी पाठी है। यह प्राव-मापा के महामपि हाम रा रची गई है। संसकषि बोपनाचार्य ने इसी के प्रनुपरख पर 'मार्पसती' की रचना दी। हिन्दी सतसई कारों पर न दोनों सतायों का का प्रभाव पड़ा है। इन दोनों सातवार्यो के पारित हिन्दी सवसईकारों पर पदहरि "मोतिपतक",

-
"हार पत', और सम्पयतक' प्रम को 'मस पर
बिमण और पंचाक्षिा पारिकाम्प इक्षियों , बी पर्याप्त प्रभाव
पर है। संत के न मुक्त कार्यों के प्रतिपात गार वा नीति-ये
यो विषय हो ममुम रहे। दिल्ली की सतसाचो रे मुक्म विषय गमार पौर
मीवि हो यो । हिन्दी की पोनों प्रारम्भिक मतसई-'तुमसी पता और
होम मतमई मीतिविपया ही है सबा इस बार 'गिारी सतसई का मुख्य
विषय पार है पपि उसमें कुम मुम्बर मोतिविषयावी बंदीत।
बिहारी सतसई को प्रसाधारण प्रसिरिमिती पौर उसकी प्रसिरिसेप्रमा
वित होकर अनेक हिम्मी पबियों में पपनी-अपनी समईयों की रचना कर
सनी । बसा कि बताया कि मुख्यत इन पो के विपरमबार और
मोति ही रहे। से होम सक्षमई पार तुमसी सदसई पाबा की पर
सतसई' प्रापि नीति विषयक सतताओं को कोटि में पाती है और "बिहारी
सवसहि पाचात् की 'मतिराम सतसई विमसतसई पारिपार विषयक
सवसायों की कोटि में पाती। लेकिन पानिक काल में रेप प्रेम, समाज
मुसार पारि विविध विषयों पर भी पनवायी मिनदी।
"बिहारी सतसई" के परचात् निती नई प्रमुस सतसा नाम इस
प्रभार ।-(१) रसनिधि सतसई (२) मतिराम सतपई () सतर्ग,
(") पुणपति स्वयई (३) भूपति सततई (१) पारन सवा (.) रयाराम
पवता () पर सवस (6) विम सता (१०) पन पतसई, (११)
हरिपोष स (११) बसता (११) सप पवई, (१४) करण
सत (१३) मीर सततई पारि ।
उपमानोपों का मानना है कि विमोपी हरि पीररत हिन्दी
प्रवपरम्परा की पटिय कमी। इसके सार बदा लिखने काम टूट
मया । परि मतदई निजी बी गई तो एक हो । पल पवसई-गरम्पप
कापने कारस भी बिना रियाकिम प्रमुख पातीषकों का
पह कपन पडामता का परिचायक वसा की परपरा को नही है-
मनवणम से पम पी। हाँ यह पाच इतरी कि बिहारी बार

- विकास में रिस देवी से सवसायी मिती पर उसमें मंद पति प्रयाप प्रा गई है। से पता की परम्परा पाम तक जीवित पौर प्रत्येक वर्ष एक- हो सतसई का प्रकाशन होता पता है ।बीर सतई के पाषात तो अनेक सवसायाँ पब तक बप की। जिनमें से कुछ मुस्प सतसइयों के नाम नीचे जिबाते- (१) पल्पतसिंह निर्मय' स्त "किसान सवसई (२) रोहनसिंह की 'रोहन सतसई (१) "टेरचम सतसई" (1) मित्ररस गुम सिरसस्त "सिरप नीति सतमई () अम्बिकायत पित "सुक सतसई" (१) बममासिंह मर की किसाम सवई' (७) रामसाप मिस की सुविचार सतसई" (८) राबेस मत "रानेस सवसई पादि। इनके पतिरिक पनी एफ्नो वर्ष पूर राजेन सर्मा बारा चिठमान सतसई वा मापन विमूति तपई का प्राइन हो पुका है। टम्स पालोषक रा. सुरेसपन पुप्त की "पाधुनिक सतसई प्रमी मप्रकासित है । स या स्पष्ट है कि पीम पौर तुमसी से मेकर पार तक हिन्दी में पठसई की परम्परा पाम्य रही। होम सससई का स्थान-हिन्दी को मतसई परम्परा में सबसे अधिक सम्बन एन परियोगा पाये वो मिषित रूप से ये 'बिहापै सतसई कम्प में ही होगा । 'रिझरी व निर्विवार स से हिन्दी पी सम्सों में सबसे प्रपिक मोनिष पार । बिहारी सतसई बार प्रमाण हो कुम सवमार्यो का महल है। ऐसी पतसहयों में रहीम सवर्ण का स्थान प्राणी है। 'रहीम सतसई ममी पपूण रूप में ही उपमम्प हो पुसी।फिम मपूर्ण सम वो सही इसका महत्व हमें पन्नेह नहीं किया बिहारी मता में पूर्व की सपा इस एप्टि घे इतन्न मात्व है ही। पम्प रटियों से भी हिन्दी सतसई-साहित्य में इसका महत्वपुर स्थान है। सवसई परम्परा में 'हीम सतसई का महत्व पनि पाने मिम्न तम्प म्यातम्य- (१) "दीम सतसई को हिन्दी सबसई-साहित्य की सर्वप्रपम रुति मानी या सम्ती । ऐषा मानने के कारण यह है कि 'होम सतसई से पूर्व प्रम्म किसी हिली कवि की सवई उपमण नही होती। समकालीन

। २४
कवि तुतवीधान को 'तुममी सतत प्रवास प्राप्त होती है तु सो सम्म
में यह निरव पूर्वक मही यहा मा सस्ता कि यह 'हीम रावसई से पूर्ण।
ही लो। तुमसी सतसईबायेवो यह विचार भी प्रचलित है।
यह तुलसी नही है। रामवृत्ताम हिसी मा महामहोपाम्माम मुबार
हिरी पनुसार ती तुनमी उत्सई पोस्वामी तुलसीराम रषित म हो
मागोपुर में किसी तुती कापरम की रपमा । Farm पर
'तुमसी सतह को तुमसी म मानना त मल नही । बरि लोहा
तुमसीहत है वो सतया मी तुलनयोरि 'सतत बोहारी'
मममम दो सौदोहे मिमते कि रन स्वमा महापूर
को तुमसीस्व मामले का ठोस प्रमाल नही पता | इस सम्मान
मे
पाहिल मझग. माताप्रसाद गुप्त का कसम विशेष रूप से पम्प है.
"सता' का गी एक मुसोश हपनी, में बिता है । इस मंधप्राम
सिक होने में शिनही है। रष मतको मोहमा विचारमा
धम्बम्प में ही शे चोहावी' में नहीं पित्तता मह बात कहीवा मरती
PM उसका पत्रिका मिyिa से नसीरास की पनामा
बादाम के भिरे ग.गुप्त ने 'सक्षसई बार होगा
किया बोगहरवानी में नहीं मिल रही है पुष्पात्री ने
पिर किया कपिरमही हो भने योरि पनसे ऐसे पों
कमौन प्रमान गुप्ता के साथ मारो काम की रपनापो में पम्
नहीं मिला।
फिर रिसोई में जब का रखना बरिया हमा प्रति
मोकि रिष प्रसानी पर मसना करने पर कवि को पार लिपिम मुर उवर
है, उस पक्षाती परत बोहे में दो विवि कमही परती। सोनि
ranोप्रामाणिकता मात्र में भी सम्म मिमा पाखापट
पपसाव है।
परी बारी सवईमामालिका सम्बन्ध मे.दुष्य
माये मी Merta मोर बोहापसीम में कवि बड़ी
एक ऐठा करताना विषको हावसान के बाप पक्ष महर न

- । २५) कर इस प्रकार के एक दूसरे से मिचि मिन्न संघहों के म मे पपस्पिट किया गया। विषम-नियहि सपा सैनी के प्रापार पर भी उपर विचार करते हुए प्रब रक्त मंच की प्रामाणिकता के सम्बन्ध मे सन्देह प्रकट किया बापुका है पो कि 'बोहागी' में नही मिलता है। इसभिये या पसम्मब नहीं कि कपि के रेहापसान के अनम्तर किसी सत मई के अनुकरण पर कविकिसी भक्त ने उसके मुख दोहों साप साथ स्वरचित पुष पोहे मिनाकर प्रस्तुत सहा पार कर दिया हो पौर उपर्नु विवि सम्मम्मी पोहा भी रचकर उसमें रख दिया हो। -तुमसीपास इस प्रकार परि 'तुलसी सतई प्रामाणिक नही है तो 'पीम सतसा ही हिन्दी की प्रथम 'सत मरती है। और यदि 'तुमोस सतसई को तुमसी स्त मान भी में वो भी एसिव नहीं होता कि तुमसो मे उसे टीम को सतसई से पहने ही रच सिया सेमा । बहुत सम्भव है कि तुमसी मिस प्रकार रहीम द्वारा पापिषत 'बरम पर मुग्ध होकर "बर पमापए की रचना कर माती उसी प्रकार रहीम की सतसई से पाहष्ट होकर मपनी सतसा का निर्मास भी कर लिया हो। मूर के गीविकाम से प्रारुष्ट होकर वो कवि भाषीवारनी और नीतापसी' की रचना कर सब्ता हो उससे ऐसी प्राधा कप्ता मसम्मम नहीं । तुलसी की वृत्ति प्रकार कामों को रखना मे पमिक रमती बी-'सतसई को जोरपर उनके प्रत्येक काम में प्रसम्म के प्रति कपि मोह को रेखा वा सकता है। जबकि सोम प्रारम्म से ही मुक काम्प रचना की भोर प्रथत थे। उनके प्रात्यधिक पस्त जीवन में मुठक काम्प रपमा कोही पविक बाप बी। प्रव' या पात्र सम्भव कि प्रबन्ध काम्प के प्रेमी तुमसी ने सीम की मुहल काम्प रचना से प्रभावित होकर मोहापती की रचना का गनी हो और बार में धोहे झवती' मोर मानस' से लेकर पौर कुछ बोरे पोर पर 'पता मे संमित कर दिये हो। ममा तुलसी के किसी बल कवि ने तुमसौषपाही को मेकर तमा स्वरविष्ट होको पिनाकर 'सा' के म मे सात सौ की संख्या पूरी कर दी हो । गभी हो तप पौर अनुपान से यही निणर्ष रिम्मता ।

किसी को सवा हमीभी पहमी सतसा और इस प्रकार ने पिी के प्रथम सत्कार (२) रहीम सतसई हेमोकप्रियता की प्टि सबसे वा स्थान पाने पिकारी। उनके रोहे सामर पौर निरसार बनवा में परवधिक अपमित हिसी में बप किसी कवि के दोहे इसमे मोकप्रिय नहीप जितने पीम के । यह ठीक कि बिहारी पक्षको सबसे अधिक प्रसिरिमिती किन्तु रसको प्रसिमि और प्रचार साहित्विक और पिषित समुराम व सौमित पा। पीम एक ऐसे कमि है बिगाने बीवन के विषिष अनुभवों को उपरों को सने सुन्दर सरस पर मामिक से दोहों मे रसा कि सामा रए से साधारण व्यक्ति उससे प्रभावित मा । इसीलिये परि बिहारी सत सर साहित्यिक बमव में सर्वाधिक प्रसिदोरहीम सतसई' सामाम्ब बनवा मे पाविक मोकप्रिय है। नवाबोही के कारण ही रहीम बन-बन की पारसी कार बने हुए कबीर सूर ममी के समान ही होम हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियो। (३) 'दीम सतसई मे बीवन के विविध प्रौर की अनुमयों पौष पारी वगना के प्रमाण मिबते है पम्प सहनों में ग्ध परिमाख उपसम्पमहीपम पम्प पतसकारों की बावित समसमा सेत में विचरण करने बाने महीये अपितु भीषन की सवार्यता से उनका प्रत्यार निकट का परिचय पा । स्थानुभूति के इसी प्रकार के कारण समले में साधारण बनता हम पर भी अपना पूर्ण प्रभाव डालो मे सताए। (४) बीम की सर्ग हिम्दी नीतिकामको प्रथम भेष्ठ इति कही बा की। मपपि गौम से पहले और प्रारि संत पियों मीति में सम्बन्धित कविता कहीtify विदुर नीतिकाम्प की जातियों में पोम की सवई' प्रबम मिळविपीर की सभी साबिमा बिदुर नीतिकाम से सम्बन्धित महो। तुमसी प्रारिके काम में मातम मौति सम्मानी र मित बाते | भिारी को बता दिपार विषयक समायों में सबसे पापी और परमी करियों के प्रेरणामोद पोtो पीम को पानी ( २४ ) मोति विषयक पातपायों में सबसे पहनी पौर परवर्ती कमियों की प्रेरक पो।। मोति विषयक म सतसई 'सिरस नीति सतसई पारि पर हीम सतसई का पर्यात प्रभाव समित होता है । गिारी मौपदीम की सतसई से पत्र भाषित नप सके।गार में पहरी अनियपि होने पर भी रोने इसीलिये मीति के रोहे मी मिसकेप रोहों पर तो पीम के रोहों की स्पष्ट (२) रहीम सवसई' भाषा की पिसे मी मप्रतिम है । पप भ पा का या सीमा पार सरन म मिलता है सा भय नवमपों में पुभ है। गारीकी सतसई में भी भाषा सुष्ठ पाप । मेकिन उसमें सरमता का प्रमाव मिलता है। उसमें सरमवा के स्थान पर सजावट पौर सों की तोड़ मरोड। मापा की सो पारमर मुम्बदा सारमी मौरसरतता के कारण पाय हे समता में इतने प्रा हो सके। 'बिहारी सतसई पापा में सुप्या दो है किन्तु या सरममा तपा मारपी महोबो 'पौम सतसई में है। मविराम की मतसई में भाषा की परमता मी पौर तुप्ठता मी लेकिन एमके हे ममता में इतने प्रचमित न हो सके। पर सतसई में पापाबत पुरसता पौर सुप्ता रोमों विद्यमान है मौर सो दोरे बनवा में लोकप्रिय मोहए किन्तु सनदोहों में जीवन के पन विवि मौर कोर्ष अनुभषों का पभाष प्राय है वो पीम के दोही की प्रमुख रिसेपवा।। इसीलिए पं. राममन मुफ्त में मस्प ही मिखा-"पीमोहे बन पौर पिपरपचों के समान कोप मीति के पच नही। उनमें मामिकता ! उनके भीतर एक सवाइप क पा है।" इस प्रकार स्पष्ट ही कहा बा सकता है कि 'पीम सवाहिली की सतसई-परम्परा में पिपिए और महत्वपूर्ण सान पर सबसे अधिक पोकप्रिय पौर प्रथम सवार होने माते रहीम हिन्दी साहित्य में गौरव पीम पर पर प्रविष्टिय। -- रहीम के दोहों में अनुभूति प्राव काम्प के सम्म सम्बम्ब में विद्वानों में विभिन्न मप्रक्षित। मेदिन पहतो प्राय सभी विद्वान मान कि काम में कुप ऐसा होना चाहिये बो मालप-बीवनको उपज बनाने की प्रेरणा सके। साहित्य समाजका पणी मही पपिदु प्रदीप भी । साहित्य समारको पालन होतात काम मे धमार का माप-रघन करने वामी नीतिमा गत महत्व है। लेकिन काम्म म पुषमीति का कान सवा मे माता भी हो सकता है। पत्र काम्य मे नीति कपन लिये पावरमा किया मौतिकरि पक्तिमतमनुमन पौर विनाका परिणाम हो । पापाय शिान सन मे काम के सम्बन्ध में लिया -MIt is fundamentally an expere nion of life through the mediura of language प्रति काम भूमत भाषा के माध्यम से बीबम की पमिम्पति है। पतएव विध कवि ने बीवन के पवारपसाब जितने अधिक होने तमा बीवन विविध पक्षों का बिना पषिक पमुभव किया होगा मह उतना ही अधिक एफा और में पनि होगा। बो करिया कवि की सानुमति के बिनी पपिक निकर होगी बह ग्वनी हो पषित पाओं पर प्रभागने में समर्ष होगी। पीप ही कविता इसलिये अपनी प्रषिक मोकप्रिय पप समझी गई मोंकि मम पिक अनुभ! २८ । २१ ) मी म्यापकता एवं गहराई ममित होती है। रहीम को अपने जीवन में सब प्रकार की परिस्थितियों से पुररमा पदावा पत पम्हें बीवन का विशाल एवं पार पनुभव था । अपने बीवन में उमौने बैब के स्वसिम निदेखे तो विषम परिस्थितियों के कारेपूट मी पीने पीये। बबये चार-पांच वर्ष सोपे तो इनके पिता का रेहान्त हो नपा पा प्रत घोटी सी प्रास्मा में ही नितम्य का बहादुम सहन करना पड़ा। इसके साप ही नहेगीबम की पटीनी रणों में बसना पड़ास प्रसार जीवन पर काम से ही पमार पपौर निराधामों से परिचित हो गये । मेकिन अपने अपार बुटि बम पराम और कोयम से पर्याप्त सम्पत्ति और सम्मान पगित किया। पौवन काल में पारिवारिक इष्टि घे भी परम सुसी थे क्योंकि माहबानु पसी सुन्दर और मुपौल पत्नी के पुत्र राल पौर रो पुत्रियों का पाना निश्चय हो पारिवारिक मुखकी परमसीमा बी। किन्तु जीवन के इस तर्प के साप अपने रखते बीवन में ऐप और सूख को भी मते वा । मुख और मम के राग्य के विवरण करने वाम पीम को पपने जीवन की सरप्पा में अपमान एच पौर पिप तथा बार-बार पुर्षों की मसामयिक मृत्यु का प्रपार दुस पौर रोगों ही पुत्रियों को पठमय में ही प्राप्त पम्प से मसह एच को भी सहन करना पापीयन के मुत-ज की इस प्रारमिचौनी ने उनके पादुक कवि-हाय को मपित कर दिया था मत पह मंबन से उत्पम अनुभूति ही मामों में साकार होकर पारिता बन गई। हरप की अनुभूति से उत्साह होने के कारण ही होम पी कविता पाठकों केहप पर बाधित प्रभार गलने में प्रापर का पानाम्प बात विणात बा। उस विपामतम सामाम्य मबालों में है रहीम भी एक थे। राम दरबार में पने के कारण देने से पोटे उपाय पति से मिलते पे तमा प्रभेक रेयों में पुर एवम् गग्य का चिबाने है मो मनुमा का घेष पात पापा हो गया था। पत पनी कविता में बीवन के इस विधात अनुभव की प्रमिपक्तिमा सपपा सामाविक वा । पपित रामवन पुस्म में एक स्पान पर लिया है- "नारस की मन्त्री परिवतियों पामिक सको बहए कले मेंसमवा के समय दो मिज भी पके समान महार जाने नमते है और उसी प्रकार जैसे कोई स्त्री अपने प्रावन से मार्ग में बीपा की रक्षा परती बाती है लेकिन रोपक उसी को बता डामा:- 'बिहि मचिम दीपक पुरयो हम्पो सोताही गात' । रहिमम समय के परे मित्र सह मास " प्रायः यह रेबमे म पाता है कि प्रस्सम मनुष्य भी नुमर पौरम पालों से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो जाते और पुण्यात मनु न हीन को को करन में असमर्थ होने के कारण परम पवावे - समय मेरे पापा सन लोप पुखी पविमों पर कम्तिमा कसते ताने मारते। उसरी सफलता का चिरा पीटते रहर उपाय से नेमीचा रिमाने का प्रपरन करते है। ऐम समय में गुणी पीर पुतिमान मनुप का मौन एबामाही पेयपर गवाहोकि विरोध करने पर ही की हानि सम्भव है। कपिपर रहीम को इस परिस्थिति का पपने बीवन में पमुगा कर बुरे - इसीनियर से पम्पोक्ति पत्ति पर बड़े मार्मिक रंग से रखने को मसमर्ष होस:- पावस देसि होम मन कोन साथै मोम । प्रब चार बक्ता मये हमको पूछ कौन ॥" दिन परि बुरे है तो कुप होकर बैठना ही प्रयकर होता है किन्तु फिर भी सीम एक भाषावारीको मांति पुन मध्ये दिन पाने की कामना 'रहिमम चुप है बैठिए, रेमि दिनन के फर। नब मीके रिन पाहें बनत न सगिह पर" पोकि विपत्ति अधिक समय तक नहीं रहती। जिस प्रकार पार पूर्ण पनि समाप्ति मारप्रपात का पापमय होता है उसी प्रकार बार मुख और रस्लाम का प्रायमन होता है- - विपति भए पन मा रहे ऐबो सास करोर। नम तारे चिपि बात है ज्यों होम मय मोर । रहीम की पिता से सभी रामर पर नियार परिसि।पो उसका कारण पही है कि उन्होंने बीवन पनुभवों को सहरम में प्पस कर दिया । इसीलिय दो पापा एपपत्र पुराम ने इनके सम्बन्ध में मिला है- संसार का गहरा भनुनकपा ऐके भनुमय के मार्मिक पक्ष को प्रहस करने की मापुस्ता इममे परिधीय पौ। अपने पार पोर हाय को संसार वास्तविक पयहारों के बीच रहकर यो सम्बेडमा म्होंने प्राप्त की। उसी की बबना अपने रोहों में की।तुमसी के पपी के समान पोप के वचन भी हिन्दी मापी भू माष में सबसाधारण के मुह पर पते । इसका काण है बीवन की सच्ची परिस्पितियों का अनुबर। यही कार उनके दोहे परे निसों में जितने प्रिय उतने ही प्रिय बन सापारण में हमार उनमें कहाबों के रूप में प्रयोग किये गते । इन मीतिक पोहों को ठो प्रामीण बम भी बावसात में प्रयोग करते पाहीम पी लोकप्रियता का यह समंत प्रमाण । पपनी सामर्ष के भनुसार ही म्पत्ति कार्य कर पता है। पोटा पक्ति को पत्तियों का कार्य कोषित करने पर भी नही कर सकता से किसी बाम ममारे को नहीं मड़ा पाहता- 'रहिमन छोटे मरम सौ होस बड़ो महि काम । मदो मामो म बने सोहे के नाम " मेफिम घोटे बिस्कुनको मस्यहोम ही ऐसी बात भी नही पोकि वहाँ एक पोटी वस्तु मे कार्य सिहोता है की वस्तु भी कुछ नहीं कर सकती। पहाईकी परख यहाँ बड़ी तसबार से भी कार्य सिरमो समया- रहिमन रेसिबन को स म रोबिए गरि । महाँ काम प्रापे मुइ कहा कर तरबारि" नौवन की पहप में गहरी पनभूति को पीम में इतनी मामिन्ता पौर सरलता से दिया कि पापित एपाना पकणा बोरा का सरसेगा सीमाप प्रेमीनन विरमे हो मिलते मौर रनसे पी मेम सम्बम बनाये रखने में बात बिरसे ही समर्थ हो पावे।। प्रत परि प्रय सम्बाद किसी प्रकार दरबावा वो फिर प्रेम सम्बन्ध मोड़ने में पानी वैती मधुरता नहीं मा पानी से कि गेरेट पाने के बाद फिर पोर मवाने से बाठ मय हो बाती है-रहीम ने इसी बात को बड़ी मामिया और सुदरता से निम्न दोहे में म्यक्त किया है- हिमम पागा प्रेम का मत तोड़ो छिटफाय । टूटे से फिर ना मिमे मिसे गांठ पर माप ॥" इस प्रकार हम पते कि पीम हमें पच्ची मिलनी बौने की। सी सी कविता के माध्यम से बरीषमता से दे देते।की उनके म्यापक पनुमों की प्रतिफलन होगी। प्रत रमका प्रभाव पीस पार निश्चित होता है।सा कि में हमारीप्रसाद दियरी मिया-यो साहित्य केवल प्रपना पितास बो समय काटने के मिये निशा पाताह बनी पीर नहीं है। गोबीर बाबो मनुष्य को पाहार निद्रा प्रादि पपु सामाम्प परातम से पर रठाता । मनुष्य का परीर सन बस्तु रिसे पाना ही कम तप का फल नहीं है पर उसे महान सम्म की पोर उग्मुख करना और भीष्ठ कार्य है। रहीम का काम हमें पतु सामान्य बीमन से सम्म उठाने की प्ररखा वा-मा मात्र विमास वा मनोरंजन का सापक मही बनता। पामे जीवन पर उठाकर किसी प्रतीनिरस्पना सोक में भी नहीं जाता प्रपितु परतो हम इसी बीवन के सहा सस्यों को हमारे समम प्रस्तुत करता है ताकि हम अपने जीवन को प्रषित मुबी पविक उस परिक सुन्दर बना सक। रा रामकुमार वर्मा ने उनके समय में पूर्वीच सत्य ही मिला हैनरी मापा के पीछे दो बार ये एकान्त सरल होकर तबीच बिससे पानम-बीवन का अटूट सम्बन्ध है। मर्म की बात करने में रहीम पो पटु । रनकी रचना पीधे एक ऐसा इपय बिनमें पनुमय प्राप्टि पर पता है। इसी कारण उनकी कविता नोप्रिम पार पमर है। इसकी पगिता एवमी पेष्ठ कि इसमें स्पिना पिए भी घरपता है और ना हमारे बीवन के लिए है।"

रहीम पर पूर्ववर्ती साहित्य का प्रभाव पीम ने संकठ परपी फारसी तुर्की हिन्दी प्रावि बापामों के सिर पन्चों का पप्पयन किया था फसतारे प्रमेक भाषामों के साहित्य और पात्रों क पौर परित हो ममे पे । राम्प रखार में निरन्तर रहने के कारण अनेक प्रकार के विद्वान पोर मामाम्प पनों के सम्पर्क में भी पाये में फास्म स्प पेट पास्मों मतिरिक राजनीति और पबहारिक पान में भी निष्णात हो गये । रहीम इस गम्भीर पम्पपन को पाप उनकी पिता मैं-मिसेपार पोहों में-पत्र-तत्र बड़ी स्पष्टता के साप में मसाठी है। संत माहित्यपान के परित होने के कारण ही में हिन्दी में पति परम्पप का पीपलेप मा करते रिवाई परते । नायिका मेरका सष्ट पर्पन नमनि प्रपनी कविता में किया है। हिन्दी में यह मारपीन पी जिसका विमान में रिऐप प्रथमम हमा। समका मर पिन-वर्णन और भिमसम्म गा सम्मोप महार का पर्णम भी मारे पाने पासी रीतिकालीन परिपाटीका पूर्वमास वा । संसार काम्पा के मनुधीधम फारमही या सम्भव हो सका। पपने पूर्ववर्ती साहित्य प्यापक प्रम्पयन कारणही पहीम के काम्प में पत्र पुप कपिपों माबों की पर वाया रिवाती है । उनके बोहों में ही संसहक पंचन पाणक्य नीति पापर, प्रमास प्रारिपत्वों पर दिया है मार को पाया सप्ट ममितपेटी । है। किन्तु इसना पहात्पर्य समापि नही रहीय मे पपीमिया इस भायों मारपरही की है। वास्तव में बात प्रत्येक साहित्य कार पपने पूर्ववर्ती साहित्यकारों में प्रभावित होता है। प्रत्येक प्रवाहित्य कार का साहित्य नतो नितान्त वन प्रयोग होता है और न ही निवास परम्परा का पासर मार । संसार के रहनो समय परियों से परे पूरती कषिरों के भाषों को निस्संकोच अपना है। विष प्रमिस साहित्यकार कानिरास परहीर पोर तुमठी का साहित्य भी पतप्रतिधत पौतिक मही-म पर भी पूर्ववर्ती प्राहिम का प्रसार है। पंपनी सिम प्रमावोषक म ऐक्सपीयर के समारों की पतिमा निर मारि विमा किये पूर्ववर्ती साहित्य मनुकाए पर मिची नो पो हेनरी पप्ठ' मारक की कुल .तियों में बा ११ पत्तियों की मौमिक मिला। पेच पत्तियों पर पाम पाहिस्कारी का प्रमाय है। महाकवि नीयत सिस रिट काम 'पमचरिय मानर पर माम्मीरिकी रामाषए 'श्री मदमामयत 'प्रपा प्रमापस प्रमाण' हनुवधाटक प्रादि पर सोमाय मित होता है। वापर' पर दो "भावपत्का प्वना प्रसार किमीच नसे मायरा अनुरस मात्र कहते है। किया कि तारा बा दुका! हवविध मॉमिक साहित्य की रखमा निनना कम है इसीलिये एक भातोष मिशा --'मपने से पूर्ण होने माने परिमों बाब परनाने का विशिर किया जाय तो हिलो कोई भी करारोप में पाया कविता पाम सूर्य पौर चममा को पी गए बम पायेगा । बारे मी निधो सपोव की पॉति रियाटिमा ब पी। पूर्व विमार नामारियाना गोप नही 1-पितु मात्र हा मावों पर अपना कविता- मान बहारमा रोय है। बोधिभामातीकरि वा बह गमगा प्रापकांपरों से प्रभावित होता हमा जी अपनी मौरिस्ता को कायम पता सम्म कपि भार को यह एल की बति सौमे पर इछ तह पर देता है कि रसको पामार मुनीर जाती है। संस्कृत के प्रसिर पन्च 'पम्पासोई में इस सम्बन्ध में मेक ही 'मरपि तदापि रम्यं तब सोकस्म फिक्ति । स्फुरितमिरमितीयं दुखि रमपुस्विगाते । अनुगतमपि पूर्वश्यायया वस्तुताट्टक। सुकषि समनिवप्नन् निन्यानोपयाति ॥" पति-"विस कविता में सहाय मानुष को या प्रतीत हो कि इसमें कुछ मगीन चमत्कार ! फिर पारे नसमे पूष कपियों की पाया है क्यों म रिखताई पड़े -भाव प्रपनाने में कोई हानि नहाउस कविता का सम्टा सुकवि अपनी बाया से पुराने मार को नवीन स्म देने के कारण, निबनीयमही समा बा सकता । को कमि पार पौर बहुमत होना उनके काम में तो उसके सम्पयन की छाया रिवाई पड़ेगी ही। तुमसौ ऐसे में बह शिान पे मत उनके काम्प में प्रम्प प्रबों और कषिर्यों का प्रभाव समित होता है और अपने 'मानस' के प्रारम्भ में वो ननोमि नाना पुषण निगम पारि माघार पर प्रत्य-रचना की बात को स्वीकृति भी प्रदान की। योम मी बहुपापानिज मौर भनेक सामों के पगित मतपम उनके काम्प में पूर्णपर्वी साहित्यमा प्रभार नभित हो तो इसमें प्राश्चर्य की क्या बात है। प्रेमी के प्रसिठ साहि स्पकार इमर्सन का इस सम्बन्ध में कपन विष रचित ही है-“साहिप में मा एक नियम ता हो गया है कि बार एक पि पारिखना सकिपसमें मौलिक रचना करने की प्रतिमा है तो उसे पविमर है हि पौरोकी रचनामों को न्यानुसार प्रपये स्वार में मारे । विचार रसीको सम्पत्ति हैबो रतका पावर-सत्कार कर सके-सही रेप से उसकी मापना कर । गा हमने रहीम के कतिपय दोहों को मेहर मा रिखाने की चेष्टा की किन पर अपने पूर्वी साश्मि का प्रमाव किया और सा पड़ा है। निश्चय ही पीम अपने पूर्ववर्ती कपियों के पामारी। किन्तु उनके

महतो
।
परपती कवि भी पीम म मामारी बही कि भनेक पावती कवियों
में उनके भाषो को निस्संकोच अपनाया । रहीम के समाप
में
समीकमनि पूरबी पियों के भार का प्रभाव हमा
है-उसका ग्यो र त्यो पनुरल पात्र नहीं किया है। यही कारस है कि
पीन दोहों पर रेपपदेपन की बात है और इसीमिरे में गोहिली में
पिन लोकप्रिय हो सके । भय इम सारख बतौर इन पे बात पर
हिन्दी को जिनकी छामा यौम रोहों में गति होती है।
ते समय भी यह प्रश्न किया गया है यहाँ सम्म कायों में भाग
साप सभित हो -उसका पोतकर दिवा पाये।
चितिका बीपितो पश्य को मनो मपैक्स।
मिश्तिया तु मा प्रोतिम सा मेहेनते।'
x
रहिमन पाया प्रेम का मत तोड़ो मिरिकाप ।
टूटे से फिर मा मिने मिसे गोठ पर वाय.'
x
'मापस्काने तु सम्प्राप्त मम्मिन मित्रमेव तत् ।
धि काले तु सम्प्राप्ते दुर्वनोऽपि तुहर भवेत् '
"कीम सम्पति समे बनत बहुत बह रीत ।
विपति कसोटी पसे, सो हो सदिमीत"
प्यानमवादिसवते बनमहीन पटकावृतम् ।
तुलानि ममा परिपाल बल्वस, म पु मम्मे पाहीन बीवितम् ।"
-पान
बह रहीम बामन मसो, बास करिम फम मोप।
पन्यु मम्म धनहीन हसिको रपितन होय"
-
x

(t) "बये सविता रक्तो रस्तश्चास्समवेतपा। सम्पत्तो प विपतो ष महतामेकरूपता -पंचसम्म 'गत नाही किरन सो प्रपबत ताही कौति । त्यों रहीम सुख दुख सब बात एक ही भांति" x हाता मधुरपि सम्यो भवति म रुपसो महानपि समृरम्या। कुपोऽन्त' स्थाबस प्रीत्यै सोकस्य म समुद्र ।।" -पंचतन्त्र "पनि हीम बस पक को, सपु गिय पियत प्रषाय । बपि बड़ाई कौन है नगत पिपासोमाय ।' - x x 'पिबन्ति नय स्वयमेव नाम्म स्पयन स्वादम्ति फसामि वृक्षा 'पयोमुवाम्म बबिस्ति पास्प परोपकारम्य सतो विभूतप । "तार फम महि सात ई सरवर पियहि म पान । कहि रहीम परकाम हित संपत्ति संचहि सुबान " x 'येपनि पिया सपोमवान। मान न शीर्सन गुणोम धर्म । ते मर्यतोके भुवि मारसूता। मनुभ्यम्पेण मृगाधरन्ति ।" -पाएषयमाधि "रहिमन विद्या बुपि नहीं नहीं भरम बस दान । भू पर बनम वृपा परे, पसु बिनु पुपविषान।" x x

*यापनाहि पुरुषस्य महत्व नामयत्यलिममेव तपाहि ।
सत्र एप भगवानपि पिम्नुमिनो मति पावितुमिछन् ।
रहिमम माचता पहे वो घोटणात ।
मारायस को भयो बावन घंगुर मात"
-पीय
X
"मिति मैव पञ्चम्ति सहयोपेण सामय ।
प्रावेष्टित महातपसम न विधामते।'
बो परम पत्तम प्रकृति का करि सक्त संग।
बरन विष प्यास नहीं लिपटे रहत सुमग
>
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सपिानिपटे पासो म कम्पबाम ।
घरी पिवति पानीमे तापम्तेमारी मथा।"
रहिमम मीच प्रामसे नित प्रति माम विकार ।
मीर पुरावे सम्पुटी मार सहत परिमार।
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'यारम्ति अपमेस्यपबाई नव उपसमिर कमसम्पा।
उपप बामनियहि मवेतवत्पुरासयुस्याप बसताम् ।"
"ममता पिएमपीम कहि मह बानत सबकोय ।
पुरव
पुरातन की पप, क्यों न पचमा होय."
x
x
X
पुर्बमम समं समं प्रोति चापि म कारयेत ।
पम्पो रहति चामरा सीव कृष्णायते परम् ।"

"भोपे को सतसंप रहिमम तबह भंगार प्यों।
तातो बार प्रय सोरी 4 कारो म॥"
+
+
मान मवन अंतरा मान नवन बरदान ।
ये तीनों एते मरे, चौता बोर कमान "
-पीम
+
“नयमि मीप के प्रति गुहायो । बिमि प्रकुस पमु उरण बिसाई।"
तुतसो
"यह पीम माने नहीं रिस से मदाग होय।
पोता मोर कमाल के मए ते भवगुम होय "
+
+
+
'मोन काटि बस बोइये, साये प्रषिक पियास ।
तुमसो प्रोत सराहिये मुए मोत की मास ।"
-तुषसी
"बाम परे मम मात बहि तबि मीनन को मोह।
रहिमन मनमो मोर को तम मयास्त योह ।।"
हीम
+
"कुसमय मौत काको सबन ।
प्याप मिरया बाप म्या कोटि कानन पवन ।
प्रंग मोरिक्त भयो री, मोर बीमो तवन ।'
'रहिमन प्रसमम के परे हित मनहित ईजाय।
वर्षिक बपे मृम दान सों पिर देत बताय ॥"

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रहीम सतसई की टीका

महारष स हो पाता है। पपनी शर्मा प्रापपा स्तुति
पर यह दोहा मनप्तापरक स्वरूप मा।
मिहिरहीम मम प्रापनो, बीन्हो मार कोर ।
मिसि वासर साग्यो रहे, हम्पाकी भोर ।
पर्ष-विध प्रकार समोर एकटक पम्मा कोरवासी प्रकार
पीम को मेरा मान्पी चकोर मी पौरस मी पापा को हमा
पारा पता है।
निरोप-पकीरत विक प्रति भावना का मा पोहा तुमर गरि
रहिमम कोस का कर, पारो, चोर मबार।
बो पर रामनहार है, मासम-वासन हार :
पर्ष-रहीम परिपारी पोर पोरममा ससा भी मही
रिवार सारे शिवको बाब रखने वाले वाहन को पाने माने भरण
श्री र
निमपस दोहे में भी कमपि को भागात मोकप्त विपास्या का
परिषर मिनवा है । अपात् पोहा ने पुपारी एकुनि में पामों की रमा
कोपीमाबर मात-बाओं की पापों को धारा बानो माम-बालों
की एमा महाकवी भोरपने पुशन से डोपडी की या को दी।
कपि का हिन्दुर्यों का पौराणिक मल भी गव पापक है।
रहिमम ममी है साबरी पूजो महाहि ।
मापु महै तो हरि महीं, हरि तो मापुम माहि।
ई-रीम मोकिमन की पड़ी देरी होती है ये रोबो एक
भाप महा बा सम्सी । परि इसमें पहारो भगवान को पाने
पौर पर पारपारको साम नहीं मिव एम्या ।

. 'मी मार साम्प पर कहा है- पर नही पर हरि मनादि। किता में से समाहि हो पाय- प्रसिदोय। वायोताहे गर्यो माये कोय।।" (1) नहीं, मई पूजा में हानि नि है, नमकिकर कानि । रहोम सतना त पूजा मनी नापि नहीं हो ममा यमदूतक प्रतिष्ठा सकते है। परन वना हरि नामो मग तो सनम गंपापो बापि । बान्यो समा उपापित हीं और पर्व की बावास में पित्त सपा होम मते नो मागयों में पर्व ही अपना पीन पार मौर महारेर कामा| क्योकि विष्णु स माने पर तुम विरहीम की मास्पा का चौका है। मौर बोषित किया पाम्प पर लिखा है- पु पार तामसरमाण। पायो विषम सपार । विमप-1) + बनम बाबो बाद ।। अति भाव प्रकट किया। मन होता है । मुसलमान ऐवज इत विषय सपटाय । में एक बाहरण है। र गुलिपाए साप (२) पुषसों में यह माम मन में नहीं रखा पौर विपर्यो पौर महादेवजी की बरामों में पानी तो बाना पर करते। समाब में भी बिना 4

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रहीम सतसई-मूल व टोका प्रभ्युत परन सरगिमी, बिसिर-मासति-मात। हरिन बनायो सुरसरो, की इम्पब मान । ~पया की स्तुति से प्रपनी 'सतसई का प्रारम्भ करते हए कवियर पाम पडते !! तुम्हारी महिमा से अयन परने के बार विष्णु पौर महादेव का पर प्रातकरते। मेकिन तुम मुझे विमा मन बनाना मोकि पिप बनाने पर तुम परणों से निमने पाती मरी कामामोपी मौर को उचित नहीं है पाएन तुम मुझे महारेग सही बनाना ताकि मैं तुम्हें पाररताप मस्तक पर भारप कर सकू। विमेष-(१) पंपा के प्रति पनि मे रिस सम्मयता पौर परा पपना भक्ति भाव प्रकट किया है उससे करिका हितधर्म की पोर स्माम हप्टि गठहोता है । मुसनमान बोए भी उनकी यह बामिक पाखा पपने पाप में एक पगार। (२) पुराणों में पारितोकिमा विप्पु के पारों पे निस्सी मौर महादेवी की बटामों में रही।।पुरासों में इसके नाम की महिमा के सम्बाद में भी मिखा कि इसके स्नान बार मनुष्य विष्णम और TH

महादेव बप हो पाता है । कपि में अपनी 'सतसई के प्रारम्भ में मेगा स्तुति
परक यह बोझ ममताचरह स्वस रखा है।
मिहि होम मम पापमो, कीरहो पार चकोर।
मिसि वासर नाम्यो रहे हम्म चम की पोर।
पर्द-गिस प्रकार पोरकटपममा कोरेगा करता है उसी प्रकार
पाम करते है कि मेरा मन पी बोर भी पौर मी पणना को मया
पार रेनवा पाई।
विधाय -कवि कीम्स विषयक पति मावना का पायोहा तुमर परि
रहिमन कोक का कर, बारो, घोर, मबार।
जो पत रामनहार है मावन वासन हार।
प्र-रहीम करते र पुपारी पोर पोर मया उसका कुछ भी नहीं
विवार सको चिसकी बाध रखने वाले मावन को बबने बाने मगवान्
मौकप्त स्वयं है।
विशेष-नस मोहे में बीकषि को मपमा घोहम्ण के प्रति पास्मा का
परिचय मिमता है । पपान मीडाण पुपारी शकुनि से पापों की रक्षा
की पीपमा मे पर पानबातों की गायों को प्रापा पा पो म्यान-ती
की रक्षा प्रभा से की पी पीर नपे पासन से जोपरी की रक्षा की थी।
कपि का हिन्दूपों का पौराणिक मान भी बहुत म्यापक है।
(४)
रहिमन गती है सांकरी गो म ठहराहि ।
मापु प्रहै तो हरि नहीं, हरि तो मापुन नाहिम
पर्ष-गौम करने कि मन की बसी सकरी होती है धमें दो पी एफ
वाष नही पमा सस्तो । यदि इसमें पारो भगवान नहीं पा सचे
और बनवान् + पाने पर पहारो स्थान नही मिल पाया ।

माहिं।
विशेष-बीर बी सी भाष साम्प पर कहा है-
"बर में पाठो हरि नहीं पब हरि।
प्रेम गमी पति पाकरी ता में हो न समाहि ।'
मारतेन्दुका भी लबमष यही माष 1-
'चे क्यों एक म्यान प्रसि दोय ।
चिम नमन में हरि रस बाबो ताहे पयों मारे कोय ।।"
राम-माम बाम्यो नहीं, मा पूजा में हानि ।
कहि रहीम पर्यो मानि है, बम के विकर कामि।
मर्च-राम-नाम परिषय नही पा पात पूजा मनी गांति नही हो
पाई, पीमापिककिपिर मना यमात से प्रतिष्ठा रख सकते हैं।
राममाम बाप्पो नहीं माम्यो सरा उपापि।
कहि व्हीम तिहि मापुनो बनम गंवायो बापि।
-राम नाम को पाना नहीं प्रौर म्पर्ष की बरबान में वित्त ममा
पा पोम कमि कहते कि ऐसे मनुष्यों में पर्यही प्रपना बीरन बार
पिया।
विप्रेष—यह दोहा राम-नाम के प्रति पीम की प्रास्वा का पोतक।
महावि तुनीवास में भी इसी भाव के साम्य पर मिला-
रामनाम पाम्यो नहीं पाम्यो विषय बाद ।
तुमसी मरबपु पार बनम गंवायो बार ॥
रहिमन राम म उर पर एत विषय सपटाय ।
पसुपर मात सवार सों पुर गुसियाए लाया
प्रर्व-रहीम का किराम का प्यार मन में नहीं रखा पौर विषयों
म मिपटना पर किया वैसे हि पम्मी बसी दो साना पर करते है
मगिन मौठा गावपरत पसे में गलने पर ही बावे ।।

(6)
समय बसा कुल मिलोप करत सम्मान ।
रहिमन पाम भनाय को, तुम बिन को मगवाम
भ-मोप भक्ति का समय मा पोर गुम थर सम्मान करे
मकिन हम कवि गो। मरोग पार पमाष पति का तो एकमात्र ।
सम्मश्रीभगवान ही होते है।
१)
प्रमरति वितु मूम की प्रतिपामत हैवाहि।
रहिमम ऐसे प्रभू तमि सोजत फिरिए काहि
पर्व-बिमा पारीपयरतको पोषित बालेरकोटल
किसके पापर कीबोर rarपति ऐसे सक्तिवान् प्रपूको घोर
कौन ऐसाबो रमी बराबरी कर सके।
गहि सरमागति रामो मबसागर की मार।
रहिमम बगत रसार कर और मकर उपाय ।
प्र--राम की परराले मब-सापर येनार पार होगामेदी-
जपत से पार होने का मी पाप है।
मुम मारी पाषाम ही कपि पसु मुह मातंग।
वीमों तारे राम
तीमो मेरे अंग।
-ौवम भूमि की स्त्री पपरी गमर रसुवे पौर निपार पाम
पाकिम मीलों को ही प्रापने तार (ग्यार कर) रिया । मुम
लवी मुष मौर। प्रदर्शद मेराय पापाप पोर पर
के मार मे पूबा में मधिदबा मेरे पापरछ बागान मान ।
पर से पापने इन द्वीलों का सार किया। मेरा भी मारकर
कमोकि मेरे को सानो पियार

( १ )
भनी तोकाको मैं भगा तभी तोकाको मान ।
भमन तमम हे विसग है तेहि रहीम तू नाम ।
पर्प-सिको मधु और विधा पार कर बो पासपित उषा
विगित से पृषक याम कपिको किसी उत्तम है।
भावी काहू म यही मापी ह भगवान् ।
मावी ऐसी प्रबल है काहिहीम यह बान ।।
पर्व-होनहर में बिसे प्रभावित नहीं किया होनहार से तो भीममवान्
स्वम प्रभावित । प्रत रहोम कवि पते कि होनहार (मावी) से
प्रवास कुछ नहीं।
विपसि भए पन मा रहे रहेनो मासकरोर।
मम तारे पिपि बात है न्यो रहीम मय भोर।
पर्ष-विपति बारम पपिक दिन तक नहीं प पाते बो नाम पर
करोग की सम्पा में बाये रहते थे। जैसे प्राकार में पारे दिम के परय होने से
किस बावे १ से ही युधबारम भी घटना है।
रहिमन धागा प्रेम का मत सोडो सिटकाय।
टूटे से फिर मा मिसे मिले तो गांठ पर माय ।
पर्व-पीम पाते है कि प्रम का धामा नागुरु होगा पे भरका
करोड़ना रचित नहीं होता कि पापागा एकबार टूट पाने के पापात्
फिर मिम नहीं सकता और परि मिलाया भी बाये वो टूटे हुए बामों के बीच
में पाठ पर बाती।।
(१६)
रहिमन प्रीति सराहिपे मिमे होत रंग दून।
ज्यों परयो हरी तवे वर्ष सफेदी चून ॥

मर्य-पोम कवि कहते है कि पौर हदी से मेन पावे प्रेम की सणना करनी चाहिए क्योंकि हसी पोर ना दोनों ही मिचकर अपना पीना पौर सफेर रेप घोर कर मात रंग हो पाते है। ऐसे ही प्रेम में से प्रेमी इय मपना अस्तित्व भूनकर एकाकार हो जाये है पास्तव में ऐसा ही में म सराहनीय है। (१७) बाल परे बस बास बहि, तमि मीनन को मोह । रहिमन मघरी मीर को तमनारत छोह, मर्ष महनी के पास में फेस पाने से तो बन मछली का मोह कोरकर पास में से बह जाता है मेगिम मममी बम का प्रेम फिर भी नहीं पाती भौर पर वियोह म तप-अप कर अपनी बानी। भाषाम्प- (१) मौन काट बम मोदये बाये प्रषिक पियास । तुमसी प्रीत सणी मुमे मीत की प्रास ।। -तुमसी (२) प्रेमी प्रीति म चाडही होत न प्रनते हीम । मरे परे चरर में ज्यों बम चाहत मीन ।। पनि रहीम गति मीन को, बस बिपुरत निय चाय । बियत कम तमि ममत रसि कहाँ भोर को भाप । पर्षकमि रहीम काठेहै कि मपनी की पापाय है जो पप प्रिय बन से विझतेही प्रपनी बान देती है मैफिल भ्रमर की पचि साहनीप नहीं को अपने प्रिय मत को मोड़ कर मम स्थान पर पमा बावा है। मपत मक्त माखन रहे वही मही बिलगाय। रहिमम सोई मौत है मौर परे हाम । मर-मरते-मरते मावान तो ह पाता है और कही से मदम पनन हो

( १ )
जाता है, रहीम कषिपाते है कि यही मिनो विपत्ति के समय भी साप
देता है।
(२०)
रहिमन पड़ा प्रेम को मिपट सिमसिसी गल।
विषमत पांग पिपीमि को सोग सबाबत पैस।
मर्प-रहीम कषि काकि प्रेम का मार्य एकसम फिसहना जिस
पर बीटी तक के पार पिसम पाते । पर वोग उस पर समाप कर परत
है पद प्रेम के मात्र पर पानना मत्यम्त ही पुष्कर है।
(२१)
कहा करों वैकुष्ठ ले कस्पदृक्ष को घांह ।
रहिमन डाक सुहावनो नो गस पोतम बोहर
पर-होम मते है कि यदि प्रिय पपने समीप न हो यो स्वर्ग प्राप्त
करके नया कपम की बाया में बैठकर गया करमा पौर यदि पमे में प्रिय
पम की मोह पड़ी हो तो हार का वृक्ष मी मुहावना मवेमा ।
असहि मिताप रहीम ज्यो, फियो पाप सम र ।
भगवहि पापुदि माप स्पों सकस पांच को मीर ।
पर्प-दीम दी मते हि पिस प्रकार जब में पन के मिमाने पर
इप बम को अपने ही समान बना देता है उसी प्रकार भाप पर पाए जाने
पर मित्रता के कारण बम पाप की सारी तपन को सर्व प्रवीकार कर लेता
हैपौर बाप रेस में गमाता!
(२३)
वहीं गांठ हे रस म्हों यह पहीम मग मोय ।
माए तर की गांठ में गांठ गांठ रस होय ।
प्र-रहीम पी कहते है कि सपार पानता किमही पाठ (माने पारि
की गांठ, मनोमामिम्प) होती है वहाँ रख नही पता परन्तु विवाह मगप

(१२)
नीचे पर-पू को परस्पर बाबने बानी पांडपो प्रम-ग में रस मरा
होता है।
(२४)
बिहि प्हीम तन मन मियों रियो हिए विष मौन ।
तासो हुस सुख कहन की रही पात प्रब कोम ।
म-रहीम बी करते । किविस प्रिय मे मेरा पर पौर मन सब पुप
में लिया है और जिसने मेरे हाय में अपना निवास स्थान बना लिया है उस
प्रिय से पब मुखपौर दुसकाने की कौन सी बात ऐष पनी है। मानो
पर मुझसे एकाकार हो पमा है।
(२५)
मे सुसगे ते दुम गए गुम ते सुमगे माहि।
रहिमन वाहे प्रेम के, पुमि पुझि के मुतगाहि ।
पर्व-कवि दीम कहते हैं कितनी मारियो बस्तु भी सुनपणी है या
पुलप कर गुम पाती है और अब मुमय कर बुझ पाती है वो पुम नहीं
सुनपती । परन्तु प्रेम में बो मोप पाप हो । या दुम्बुकर पी मुममते
पोप्राद प्रेम की पगिन पर बनती रहती है।
(२३)
भो होम तम हाम है मनप्ता कई किन बाहि।
बस में बो छाया पकाया मोगति माहि ।
पर्प-रहीम कपि सरीर की माता प्रतिपारित करो हुए सपा मन को
गौण बताते हुए का है कि परिहरीर पापो कोर चिन्ता मही मन
वो ही मी वा समापसे कि परिपत में शरीर की साया पहले हए मौ
पर उस बालीबता नहीं है।
वो रहोम मन हाथ है तो तन कहूँ किम नाहि।
बस में दो पाया परे, काया मीमति नाहि
मर्ष-पीमधीहते है कि परि मन अपने बा मे हो तो परीरकही की

।
पता नाय कोई मन्तर महीं पड़ता 1 से यदि पर बस में नही है और
परीर की पाया गम में पड़ती है वो भी धरौर सससे मीपता नहीं।
(२८)
टूटे सुबम मनाए, जो टूटे सौ बार।
रहिमम फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्काहार।
पर्ष-यदि अपना प्रिय सो बार मीठे तो पस हुए प्रिय को
मनाना चाहिए । फोदि बषि मोविमो का हर टूट बाय दो मोतियों को
बारबारमाने में पिरो मेना चाहिए ।
(२६)
पसरि पत्र मपहि पितहि सकुषित ससि सीत ।
का रहीम कुस कमाल के को परी को मीत ।
प्रसमस बमम का पिता है और सूर्य कमम को बिमाता है पर बल
बच को मोड मेता । दूसरी पोर बनमा के लिए वो हितकारी पर
कमन को मषित कर देता है। प्रत पीम भी कहते है-
प्रर्पर सूर्य चषित होता है तो कमा अपनी बुनियां ना कर अपने
पिता बन को बिमानता है पौर चषकी रमा करता है। बापनमा निकलता
वो कमाल अपनी परियों को समेट नेवा। भोर ममा की सौतनवा बम
तक पाने देता है । इस प्रकार सूर्य ममत का मित्र और बम का हब
किचममा कमल का गौरबम का मित्र पर कमल और बम प्रेम
के कारण यह मही बात होता कि सूर्य और चममा में से कौन फमम
का मापौर कौन मित्र है।
-
पह न हीम सराहिये ऐन सेन को प्रीति ।
प्रानन बाबी रानिये हार होय के भीत।
पर्व-पीम भी कि वन मेन देन से सम्माब रखने पामे प्रेम
को प्रसंसा न कीमिए । प्रेम में तो पासों को श्री व पालमा रेना चाहिए
फिर चाहे पीठ हो वा हाप पारे सफलता मिसे ना असफलता ।

( ४ )
रहिमन इक दिन ये रहे बीच म सोहत हार ।
पायु नो ऐसी बह गई बोधम पड़े पहार।
प्रर्ष-हीम की यह है कि एक समय था जब प्रेमी और प्रिय का
हम मिमाते समय बीच में हार मी नहीं मुहावा पा । पर प्रम हमा ऐसी
बरब गई हि प्रेमी पौर प्रियकबीच पहाड़ों की पूरीमा पई है। अब दोनों
विपुल होकर दो स्थानों पर हुए है।
(१२)
रहिमन तीर की बोट ते भोट परे पपि बाय ।
मन पाम को पोट ते पोट परे मरि जाय।
पर्ष-रहीम बी करते है कि मनुष्य पर बाण के प्रहार का पापात
हावा है वो यह चिकित्सा करने से बच भी जाता है पर नेग पी वालों
प्रहार की पोट से मनुष्य माहत होकर उबर महीं सता मर ही जाता है।
मत साधारण पाणों से मपन-बाण की चोट पथिक कोर होती है।
रहिमम मनहिं समाय के वेषि सेह किन कोय ।
मर को इस परियो कहा मारायन बस होय ।
पर्व-रीम बीमा किम मी काम करना मनप्य के दाम में नहीं
है परन् भगवान कापमा पवि विस्वास न हो और पाहो तो किया से
मनबमा परमो।
(१४)
रहिमन मारण प्रेम को मत मति हीम मभाव ।
को रिगिहै तो फिर ई महिपरमे को पार
पर्च-पाम भी कामे ! कि बुनिहाल नोर्गों को प्रेम के मार्ग मे परमी
रखना चाहिए । परिमेम पार्म से एक बार शिक्षित हो पए तो फिर
संसार में कोई ठिकाना नहीं रहता ।
-

रहिमम मैन तुरंम बदि चमियो पावक माहि। प्रेम पंच ऐसा कठिन सब कोर निबहत माहिम धर्म-पीम बी कहते ६ प्रेम के मार्म का निर्वाह प्रत्येक पक्ति नही कर सकता। म मा पर बसमा ऐसा कठिम है मे मोम के बोरे पर बहकर मामपरपसगा। रहिमन सो न कम गर्ने बासों ला नैन । सहि रे सोच साहियो गयो हाम को चैन । प्रष-रहीम भी कहते है कि जिससे प्रेम हो पाता है फिर पौर किसी वस्तु पर प्यान नही देता । सब कुछ सहन करणे वा चिन्ता मोन से देवा और साप पाराम उसके हाथ से निकल जाता है। उसे फिर मैम हो बाने पर फिर पैन नहीं मिलता बम बिन्ता ही पती है। रिस प्रकार कोई बस्तु मोल मेने के लिए कोई प्रश्य बस्तु ऐनी होती है उसी प्रकार चिन्ता को मोन मेने के लिए पपने हाथ में पाए इए पैन को देना परवा। रौस बिगारे राज मौस विगारे माम । सेन सर्व सरकार की, बुगत बिपारे बाल। पर्व-पाम्पोसम या हुस्सा राज्य को बिमारताबमोवार सम्पत्ति को एस्सपाम करके समाप्त कर देता है और मनोर मूठी मन्त्री मिया करके और धीरे सवार को पान (रीति) को हो विपार रेता है। (15) बह प्रीति नहिं रीति यह मही पाधिसो हेत । पटत घटत रहिमन घटे, क्यों कर सीन्हे रेत: पर्व-रहीम भी करते हैं कि मिस प्रहार हाम में सिपाहुमा त बीरे और एक पन कर गिर पाता है उसी प्रकार प्रेम धीरे धीरे बट बाय यह प्रेम की पति नही है और न पहोमिया हुमा मेमहीबारे पीर पटवा ।।

विपास पन तम भयो, प्रवधि मास उद्योत ।
ज्यों रहीम भावों मिसा पमहिनास प्रोत
पर्व--सीम भी कहते है कि मिस प्रकार भारों की रात में गुमन बमक
बाते सी प्रकार मियपी पने प्रपहार में पषि की प्रामा सीमाक्ष
यहि होम नग मारियो, मैन-बान की चोट ।
भमत भगत फोमबपि गये परम कमल की मोटा
मर्च-पीम भी कहते है कि सम्पूर्ण संसार स्त्री पी पापों की
बोट से पर पपा करम एप भगवान के भक्त ही बरस मिन्हनि भगरान
पण मी कमौकी पोट से मी पी।
कह रहीम केतिक ही केतिक गई विहाय ।
माया ममता मोह परि प्रत बसे पहिताय ।
पर्व-रहीम जी कहते है बवामो तो दुमहारा कितना बीवन रहा है और
किवना समाव हो पा है । मावा और ममता के मोह में पावर सर का
प्यान मरने पर बीष पम्स में पाठा पा इस संसार मा पाता है।
(४२)
परम पुए मस्तक पुए हम पांति पान ।
हिमो पुषत प्रमु पोषि कर रहीम का मानि
मार्च--पीम पी करो । कि बिच म्पत्ति के बरण बाते । (जिसकी
परण में बाबा पाता 1) प्रपा को मस्तप पर हाप रख देता है (किसी को
पापय रेता है) परम्पति मी फिर हाप नही मोगवा माप से प्रको
बार करने पर प्रमु तुम्हारा रमाव करणे यह से मम ।।
८
८
चिनकूट म रमि ऐ रहिमन प्रबप मरेन ।
मा पर विपरा पति है सो प्रावति य है देश

मई-पीम पी पहले कि माया (राम) मिनट में निवास
कर रहे हैं। विस म्पक्ति पर विपत्ति पाती मही परण मेमे के लिए रस
स्थान पर पाता।।
विष-कहा जाता हैहीम पर स्थप निर्णन हो गए पौर बापक की
महायता नही कर सके तो निनि पापा को यह रोहा मिष कर रीवा नरप
के पास भेगा। रीवा-नरेश ने उस याचा को एक नाम पयारे रिया ।
भो रहीम करियो हुतो सम को इहै हमास ।
तो काहे फर पर पर्यो गोवर्मन गोपाम ॥
पर्व -रहीम बी का कि हम्स ! यपि प्रापको पन को स्पाम कर
पसकी ऐची ही अवस्था करनी पी तोप से परकी रक्षा करने के लिए हाथ
पर गोवन पर्व कोनों पारण किया था?
.
मो रहोम होतो कह प्रभु गति प्रपने हाप ।
सो कार्यो केहि मानतो पाप बढ़ाई साप ।
पाई-पीममी कह कि यदि प्रमुसीमा मनप्प के प्रथीन होती
पो पपने बाप्पन के वर्ग में काई मगप्प किसी दूसरे को कोई महत्व ही
नहीं देता।
(५)
म्पो नापत ठपूसरो करम मनावत पात ।
पपने हाम रहीम क्यों नहीं प्रापुने हाप ।
पर्व-जिस प्रकार छपवनी नपाने बामा कम्मुतनी को नाता है उसी
प्रकार कम (प्रारम) मनुम्म सरीर को मपाता है। प्रवीत तो ऐसा होता
कि सब काम हमारे ही हापों सेहो पेपर पस्तुत भपने हाथ में (बम
मे) Tप भी नही।
(४७)
तन होम हैकर्म बस मन राखो प्रोहि पोर ।
मन में रमटो नाब ग्यौं, बत मुन के बोर ।
।

प्र-बित प्रकार बम में बहती ईमाव को महाप की विपरीत एका मैं मेगाने के लिए पुण (रस्सी) बोर से सीधा पाता है उसी प्रकार अपपि पर तो कर्म कप में होता है पर मन का रियर की मार दबाए रखना पाहिए । विस प्रपर नाब हाव की पोर बहती। उसी प्रकार पर भी कर्म के बस में होकर संसार की मोर प्रवृत्त होता है पर जिस प्रकार माप को बहाव के विपरीत में जाने के लिए रस्सी से सीबते । पसी प्रकार मनुष्य को भी अपने मन को इण सहारे ईश्वर की पोर नग्मुस रखना चाहिए । - विप्प बीनता रसहित बाबामे बगषु। मतो विचारी बीमता पीम षु से बंषु । पर्ष-यह पन्या संसार निर्धनता , मनीषिक स्पार को पया समझ सकता है। यह बेचारी बीनता (निर्धनता) ही मती बिस बीमबन्नु मगवाद से बम्बु (भा) है। विपत्ति पाने पर ही मनुष्य प्रवर को मार करता है पौरतब पिपर सनकी रमा करता है। (ve) दुब मर मुनि हाँसी कर बरत रहोम म धीर । कही सुनै मुनि सुनि करे, ऐसे थे रघुवीर। मर्च-मोग होम के दुकको मुम कर उपहास करने पर पाम को 4 महीपता । मेवान भगवान राम ही ऐसे हैवा विपत्ति कहे पाने पर उसे सुनते । पौर सुनकर सहायता करते है। प्रीतम पवि नमनि बप्ती, पर पनि कहा समाय । भरी हरायहीम मति पपिक पाय फिर गाय पर्ष-पाम बी मोकप्रियतम पण को मोहिनी भूचि मों में बसी हो है मब ग्यौ मम्प पिसी देवता मावि की पिसे पा सकती।। मिस की पदि से परिपूर्ण मेष परी सपम के समान है। परि अन्य किसी की मपि राभिमान पाती है तो वही नीट पाती है। यहां से पने को स्थान मिल ही मही पाता।

मार मोकिमार में, रहिमन पतरे पार। पर ममपार में मिनके सिर पर मार ॥ प्रर्व-पीम बीबरोकियो संसारभार को स्याम देते है। इस संसार के पार उतर पावे पर जिनके सिर पर ससार का मार मदामा बीच में ही इन पाते है। (५२) मगि मुशरिन को गयो केहि म त्यागियो साप । मोगत मागे पुष मझो ते एहीम रघुनाथ र प्रर्ष-ऐसा कौन सा मनुम्पबो मपि गाने पर अपनी बात से मर बमा हो ? किस पति ने मरि पाने पर साब महीं पोर रिया ? पर हम अपने प्राधियों से मापना पारम्म कर देते है तो वे हमारा साप पोड़ देते है। किन्तु भगवान राम के मायने के पूर्व ही सुख मिल पाता है। (4से विमीपण को मापने से पूर्व ही पम मछका पम्प दिया था ) भाषतपाप-तुलना कीधिए- 'तब प्रसारस्म पुरस्तु सम्पर ।' रहिमन तुम हम सौ करी, करी-करीबो तीर । बा दिन के मीत हो पाहे दिम रघुबीर । पर्य-पीम की कप कि जिस प्रकार विपत्ति के दिनों में हापियों में अपने पवार को घोरिया पा उसी प्रकार मापने मी विपत्ति में मेरा साप घोर दिया। पाप मी पो रिलों केही मित्र ।। () रहिमन पोचे भाव से मुझसे मिकसे राम । पावत पूरम परम गति, कामाविक को पाम: पर्ष-पीम बीते। किबो मनुष्य काम प्रादि सब पार्यों का पर सके मुख से परि बोबे से श्री राम का नाम निका बाय पो पर पूर्ण परम पति को पा देता।

(११) सवा नगारा कूप का, यावत माठौं भाम । रहिमम या मग माइक, को करि हा मुकाम : पर्प-दीम बी का किमाठो बाम (रात-रिन) इस संसार से बनने का नगास बता रहता है हर समय मृत्यु की सम्भावना बनी रहती है। इस प्रसार में पार कौन सा प्राणी स्पायौ स ह सका ? मनी को मुलु पाने पर महाँ से परलोक को प्रस्थान कर देना पड़ता है। सौगाकरो सो करि चसो, रहिमन पाही पाट । फिर सौरा पहो महीं, इरिबान है माट। पर्म-हीम बी कहते है कि यह संसार एक वागार समान । यहाँ इसी बग्म 4 बो एप सौरा करना हो कर मो, पुष मावि पबित करमा हो पबित करमो । यहाँ से जाने के पाचात् फिर मसिम का पसर माी मिनेमा पोंकि मृत्यु के परमाद मिस मार्ग पर चलना होपा ना मार्ग बहुत लम्बा है। सतत सपति नानि के सप को सब का देत । बीम बन्धु बिन बोन की, को होम सुपि मेत। पर्व-रहीम बीमा किरीन बनुभयपान के प्रतिरिक्त पाप कीन गरीबों का प्यान रख सकता है ? पर्यो इस संसार में एक मोम एम सर को ही सब सुपर गिमके पाए सम्पत्ति है । पर मोग समझ मेत। कि समुह प्पति पास तो स्थायी सम्पत्ति बरती सम्पत्तिमासी व्यक्ति को भोग सब पते 1 मिनों को कोई कुछ नहीं देता। . हरि होम ऐसी करी ज्यों कमान पर पूर । चिपापनी मोर को, गरि दियो पुनि पुर। पर्ष-पीम भी कहते कि बिस प्रकार मनुष पर बहार हर भाग को

पाहो पपनी पारी और फिर बोर कर बात र कर देते है
उसी प्रकार है मपान् ! मापने मुमको पहने अब तो कृपा करके अपनी पोर
मापा पर पुन पाने से दूर कर दिया ।
विष-मुक्तमाम
मे
अनुमार श्रीमाप पीके मदिर में प्रवेश करने में
एकापट होने पूर्व पर पीमन मह दोहा लिया था।
(११)
रहिमन कीम्ही प्रीति साहब को भाव माहीं।
मिमके प्रमनित मीत हम गरीवन को गन ।
पर्प-पीम भी कहो कि मने प्रा से प्र म किया पर प्रभु फोग
अच्छा महौलमा । ठीक भी।मैं तो गरीबोर प्रमु प्रसप मित्र है।
मौर मिनो अमम मित्र या हम गरीबों को मोर क्यों मान रेषा ।
बिम् मी सिन्यु समान को पराम कासौ कह ।
हेरम हार, हैरान, रहिमम भपुने मापते ।
प्रम-रहीम भी कहते हिरनी समु के समान होती है मह पारधर्म
टीम किससे कहे। रेखने माता अपने पापको देख कर ही प्रापर्य म पर
पाता है । मात्र पाहिपारमा मी परमात्मा के समान ही है और सिर
को कोरने पामा उसको अपने पाप में ही पाबर पादचर्य में पाबाता है।
.
रनबन व्यापि विपत्ति में रहिमन मरे म रोप ।
बोधक बननी नठर, सोहरि गये हिमोय।
पर्व-रहीम बी को किस में (मर गाने पर) बा में रोग में और
प्रापत्ति में बहुत रोना नहीं चाहिए क्योंकि वो इसपर माता के पर्म में स्मित
पिए की रमा कणा यह मा सो पमा ? या पपाय ही रक्षा करेगा।
जो पर हो में पुसि रहे, कपसी सुपत मुरील ।
तो होम तिमते मले पप के प्रपात करो।
प्र-कोपर में ही मुनापते बामे पौर मुरोध को पुषकर ऐं

तो उनसे पन्धे तो रास्ते के बिना पत्त मान करीत दी।
मो पुम्बारप ते कई संपति मिसत रहीम ।
पेट मागि बैराट पर, तपत रसोई मीम।
प्रर्व-केवस पुम्याई (योग) मार पर ही सम्पत्ति प्राप्त नहीं होती-
परि पुस्पा से ही सम्पत्ति मिल पाती तो महापुरपापा भीम वन प्रपना पेट
करने के लिये विराटपरबाना बनानेबामा रसोइया न बनता ।
विमेपर्योधन ने पापों को १५ का बनमास रिया पातमा
उसको मंतिम एक वर्ष का प्रज्ञातवास भी दिया था। ज्ञातवास के लिये ही
पार पुत्र बीम विराट पर रसोइया बन कर येथे तपा पुषिष्ठिर बाह्मण
बने थे प्राईम नृत्यकार महल बासा मौर सहदेव ससि बन थे।
बो मरणार बत्ती सरा सोई तो ठहराम ।
जो नम उमगै पार ते सोहीम बहिबाय।
पर्य-यो मारा सब होगी तक माना बफ पता है। पानी बरि
किनारे को पारखा वो बह जाता है।
रहिमन कठिम पिताम ते. पिता को चित घेत ।
चिता रहति निर्जीव को, पिम्ता भीम समेत
पर्ष-रहीम कहते कि पिता से भी प्रषिक विम्ता कठिन होती है
क्योंकि पिता तो मृवक को बनाती किन बिन्ता बीवे वो बनाती है।
॥
बोबडेम को मपु कहें नहिं पोम पटि माहि ।
गिरपर मुरलीपर कहे पुस मानत माहि
पर्व-हीर पाकिबो को चोरा कहने बो का मापन नहीं
पटणा पयोकि रिसर को मुरलीपर कहने । एमकी महिमा कमी नहीं होगा।

- बो रहीम करिबो हतो बन को है हवात । तो काहे कर पर परयो गोषवन मोपाप्त है मर्च-एम निकहते हरिभाषा भीष को प्रब की यही) रमा पानी पी र मासियों को पोरकर उन्हें देना पा तो फिर क्यों गोवर्धन पर्वत मंबुसी पर धारण करके उनकी रक्षा की पी। (६८) पंजन रियो तो किरकिरी मुरमा रियो जाय। बिन मालिन सो हरि लस्यो रहिमन बसि बप्ति माय । मर्थ-चिन पारों से ममबार का पुष्प वर्णन किया है और जिनमें उमका पास है न पा में कापस नहानमाया पा सकता क्योंकि वे फिर किरकिरी हो पाएँगी । सन सुरमा पीनही सपापा ना सकता पीकि समाई ममने का मप रहता है। ऐसी पांचों पर पीम कपि पनि होते। (१६) प्रतर गाव सगी रहे, पुमान प्रगट सोय । *मिय बानि प्रापनो हब सिर बीती होय । मर्च- -हाय के भीतर मवान के प्रति प्रेम की मग्नि प्रग्नमित रहती लेकिन यह पति ऐसी विचित्र है कि इसका पूर्णा बाहर नहीं रिवाई पड़ता । इस प्रनिता पनुमब तो या मन ही कर पता जिसके सिर पर यह बी पी है। (७०) मोपो काम बरे करें तो न-बड़ाई होप । ज्यो रहोम छमस को, मिरपर कहे न कोय । पब-यदि बोट पछिका काम करते तो चमको पहाई नहीं मिमती पॐ हनुमान के पार नठा करने बाने पर भी उमें मिरिसर की परवी से कोई विभूपित महीं रखा। पिमेष-सी मामय का पोहा बीरे।

(61)
के सार्प सप सप सब सार्प सब माय ।
रहिमम भूतहि सोधियो फुसहि फसहि माय ।
पष-एक को ही मायने से सब कार्य सिहो पाते। पर सरको
मापने से कोई मार्य सिर मही होता । म पनि हो कि पी
मारने से सारा मने पलने सपना है उसी प्रकार मस्स म्पत्ति को पत्र
7 में कर सारी कार्य सिरियाको मादी ।
(०२)
अमृत ऐसे पवन में रहिमन रिस को गाँस ।
जैसे मिमिरिह में मिली मिरस मास की कांस
-अमृत मे मीठे बचनामा परि मन की पमितता विपी पती है
वो पीस पाते कि यह ऐषीदी मालूम पड़ती' से मीठी मिश्री मे बरस
जसकी पोस।
परम गरम मा मही रहिमन ए बम धारि।
रिमिमा राजा मांगता काम पातुरि भारि
पर्व-रहीम कवि कह दि रपार मै बासा मा मिचारी पोर
कामारी पार प्रति मान मनौवन को भी मार मामते मोर अपना
प्रभित्र पूरा करने की निरंतर कोषिष करते है।
कहिएीम मा भगत से, प्रीति गई है।
रहिहीम मर बीच में स्वाप स्वार हरि
मन-हीम कहो कि इस बात से प्रीति पार पती प।
कि प्राइन बमत में ग्रीष मनुष्यों संम मे पार पायें भोर साही
स्वामें दिखाया।
मगम बोर रहीम कहि देखि सपिलम पान ।
इस्ती- कुलहलिम माँ ते तवर मात
पई- होम कहते है कि एक (ही) 1 अपने किले पत्तों को

देखकर मोरे में मत पाप्रपने को तसर समझने की भूम मत कर।
योकि वापर वो दूसरे ही होते है बो हापियों के पाषास प्रौर पुम्हाड़ियों की
पोट सहन करते है।
(७६)
करत निपुनई गुन बिना रहिमन निपुन हसूर ।
मानह टेरत पिटप बढ़ि यहि प्रकार हम कर ।
पर्व-बो मनुप्प बिना किसी पुस के बुद्धिमान पत्तियों के समक्ष अपनी
गाई करता है पेसा पति विरहीम कहते है कि स्वयं ही मानो वृत्त पर
पाकर अपनी मूर्षता की भोषणा करता है।
(७)
कहिहीम संपति सगे, बनत बहुत बह रीत।
विपति कसौटी कसे सोही सधि मीत ॥
प्रर्य-रहीम कषि कहते है कि सम्पत्ति के साथी तो बहुत से हो पाते।
पास्तविक मामी को पहिचान तो विपत्ति के समय ही होती। बसे कि स्वर्ण के
बरेपन को पहिचान सौटी पर कसने पर होती है ऐसे ही सच्चे मापी (मिम)
की परिचात पिपत्ति की कसौटी पर हो पाती है।
(७८)
कहि फीम बन बनि घटे, नात पनिन की बात।
घट बढ़ उनको कहा घास धिमेवात ॥
पर्व-पीम कषि कहते है कि बन के पटये बहने से बनिर्यों की बात
पान भी पाती है किनको पास बेचार पुवारा करते है नमको बनो
घटने पाने की चिन्ता नहीं होती।
कममा पिरम रहीम कहि मर मानत सब कोय ।
पुष्प पुरातन की पपू गर्यो म धसा होय ?
पर्प-पियर होम करते है कि कमला (मम्मी) कमी स्थिर नही पती

प्रति धन कहीं भी स्थापी नहीं होवा या कमी किसी के पास पता
कभी किसी अन्य स्थान पर । पूर विष्णु की पत्नी होने के कारण ममा कमाना
पयाँ न पचता होगी ! पर्वात विध प्रकार पर की पत्नी बचत समान है
होती । रसी प्रकार मामी भी रचत समाव की होती है।
(८०)
कममा पिरम रहीम कहि महत प्रपम मे कोय ।
प्रभू की सो प्रपनी को क्यों न फमीहत होय :
पर्ष-कममा (मम्मी) कभी कही स्विर टिक नहीं पाती ऐसा पीम
फपिकहते हैं। पौर बोम्पत्ति पसे स्पिर समझते है प्रथम है। क्योंकि
पिप्पु षान् की भी कोनो अपना समम है अपनी ही फलीहत करा
है क्योंकि विपण की पत्नी को अपनी मानना मनुचित है। वात्पर्य यह है कि
मामी किसी भी कमी नहीं होती। इसीलिये उसे पद स्वमार का कहा
पया है।
(१)
जैसी पर सो सहि हे कहि रहीम यह ह ।
परती ही पर परत है, सीस घाम प्रो मेह।
मर्ष-पीम फपिका किसी एसप पर पड़ती है-सान करनी
चाहिये पयोंकि इसी परती पर ही शीत पूप और पर्पा पाती है प्रति विस
प्रकार बरणी पीत वर्मी पौर बर्पा सहम करती है उसी प्रकार परीर को मुख
पुषहम करना चाहिम ।
(९५)
रहिमम मास ममी करो, मगुनी प्रगुम म जाय।
राण सुमत पय पिपत हूँ, सपि सहन परि याय।
पर्प-विमर रहोम कहो कि नास मनाई करो किन्तु पुष्ट अपनी
पुरता नहीं पड़ता । जिस प्रकार मार मीत सुनकर भौर पर पीकर भी
चापका मारने का समाव नहीं पाता।
प्रनकार-प्रान्त।

- कह रहीम कैसे मिम और केरकर सप । थे गेमत रस पापुने उनके फाठत प्रगम पर्व-रहीम कवि कहते ना मोर बेर का एक स्थान पर कैसे निर्वाह हो सकता है क्योकि देर के साधारण स से हिलने डुलने में ही मेने के कोमप्त पत्ते फट बार्यये प्रति पुष्ट और सम्मन का एक माप निर्वाह कठिन है क्योंकि पुष्ट की सापारस हरकतें ही सच्चन को करबारक हो सकती है। माणसाम्प- पुष्ट निकट बसिए नही बस न कीलिए मात । बरसी बेर प्रसंग से सिरे टकम पात।। दुख सतसई (४) रहिमन मोघे मरन ते तनो पर मर प्रीति । काटे बाटे स्थाम के पुह मोति विपरोतिर पर्प-रहीम करि का किनीच मनुष्यों से प्रीति पौर और दोनों ही वमने चाहिये कोशिश की भाति उनका काटना पौर बाटना दोनों ही पनुषित मासूम पावे।। भावमाम्प- हिवर अतोम मीच को माहिन मनो प्रोत्र । बाट प्रपाबन उनको काटि स्थान पुसदेत॥ तप सतसई पड़े बड़ाई ना करे बोम बोसें बोस । रहिमम हीरा कब कहे साच टका मेरो मोस ।। पर्ष-बड़े पपने बनाई मही पर पौरन में कमी की बातें करते है। रहीम फपि कहते है कि ही थी पपपी या बाई नहीं करवा कि मैग साप का मूम्म ।

बोरीन को पुन सुने, मेत दया र प्रानि ।
हरि हापी तो कब हुती का हीम पहचानि ।
पर्वबोम्पत्ति रीना काम मुमते । धौर ससकेप से अपने मन
मैं क्या का भाव भी नात रहीम कपि ते कि भगवान् विष्णु की
गग से का की पहचान भी वो उसे प्राह से मुक्ति दिलाई भात् भगवान् का
बरप्पन पा को नोवे रोम पर की परवा करणे बिना पहचान के
उसे दुध से मुक्ति दिलाई।
प्रकार--प्रन्तिएम्पास ।
(८७)
मरन मुनत सरख तुरत गरज मिटा मानि।
कहि होम का दिन हती हरि हापी पहचानि ।।
पर्व-पर्व (फरिवार) को सुनते ही पित होकर तुरन्त ही उसका
निबारह पिया । रहीम का कि किस दिन हामी पौर हरि की पहचान
ही पर्वाद नहीं हुई थी।
से परीब सौ हित करे पनि रहीम ते मोग ।
कहा सुरामा बापुरो पुष्प मित्ताई लोग।
पर्व-पो परीयों से प्रम करते है हम कपि पाते कि ऐसे सोग
बाप । कहाँ वो चाप सुरामा और हारिला पपिपति भगवान
पौरुष्ण प्रसा सुगामा उनकी मिठा बोम्प पा मेकिन फिर भी मममान में
सुरामा को मिष मान से अपनाया।
विष-मुबामा नाम गरीष बामण से मोडप्य की बचपन में मिलता
की। मित्रता को भगवान् पड़ी निपारा । बा भीरपण रिका
प्रपिपति तब सूधामा का बड़ा मादर सलार बिया बापौर न्ये या
सम्पराबान में बीपी।

(८१) रहिमन बगत बाई की पूकर को पहिवानि । प्रीति कर मुख बार्दा और कर तम हानि । पर्व- याम कपि को किपट में अपना इत्त की पापान जैसी होती है जो मौधि होने पर मुख से वाटार परीर प्रपरिण करता है पर और होने से परीर को हानि पहुंचाता है। विशेष--मास भगि के नाम से भी मह बोहा इस प्रकार निमवाt- ध्यास बाई बपत की कर की पहिचान । प्रीति करे मुख पार्टी और को तरहण ॥ (१०) रहिमन पोछे मरन ते होत बड़े महि काम । महौ रमामो न बने सौ हे के वाम ॥ पर्व-रहीम कपि कहते कि भोधे पारमियों से बड़े मारमिपो के काम से ही सफल नही हो पावे बित प्रकार नमारेको सो होम से बनाने में सफलता प्राप्त नहींनीबासमती। बावसाम्प-कैसे घोटे नरन ते परत बोनाई काम। मम्मो मामो बातो मेरे पाम ॥ -बिहारी सतर्ग (e) बोगमाई महि तने न होम इतराई। रारा करौरा होत है मरहर होत न राह पर्वको पपना बड़प्पन कमी नहीं पते पाहेोटे ममे ही वराने समें । रासा बसा बीन दो पृतका कौंरा हो पाता है मेमिकटान कमी पाहमान घोटा नहीं होता। प्रसार-प्टान्त । - पसि कुर्सम शाहत कुसम यह होम प्रदोस । महिमा घटी समुद्र को सबन वो परोस।

।
प्रर्प-रहीम कवि को किया और की बात करे ग में
यार मनुष्य भरना बता पाहता यो परे पति मग
मे पार पाकी भी पहिया पर ईवी।
विशेष-समय भीमका मुरतर पर बीईपी पत बबराब
सीता को लेने के लिये राषण की शदीपोर पभियान हरमे समेतो
समान समुद्र पर पुम बापका रसे पर लिया। सभा को कमी बाबा
नही गया मेलि में उसकी इस महिमा को पुकापकर कम कर दिया।
प्रकार-अन्तरपार ।
भावसाम्प पुर्वगरे पंधर्म सम्मा महत कोस ।
प्पो बसमुख पपरा सनमलो बनेस ॥
र सत्त
रोन सबम को ससत है महिनमकोय ।
मोहीम बनहिं सीमबापु सम होय ।
भ-पीन पति पत्रको प्रोर विहारका मेकिन उसकी और कोई नहीं
Na पदि रखकी पपा नही । पाम कवि कहते किमी
का पान को ये बीमबाबु भात पिता के समान होते है।
रहिमन पाचक्ता पहेको पोट मात ।
मारायनको भयो बान पावर गात ।
मई-पौर श्री याने पर पति भी मोटे से
मरते है कि भार विप्म मति से पृषी मापने पर पापन पंगुष के बरा
पर को पवे।
मेष-प्रया पनि ममुरी का प्रतापी पमा बा । सवे पपने पराम
हे माउन कोकीनना चाहा। पाद पिप्पू ने इन को पचाने के लिये
बामन का भोग म्प बाण च्या और पनि डोम पर चीन में
मोपी । बलिबान ना स्वीकार कर लिया पार पपान विष्णु में तीन हो
पर सम्पूर्स एम्प को नाम लिया ।

रहिमम मांगत बड़ेन की सपुता होत पनूप ।
बसि मा मांगन को गपे परिबामन को प॥
पर्व-कपिपर रहीम का किस म्पत्तियों के मापने से उनकी
जबुता मी विराप्ती हो पाती है। पति के यश मे बिष्णु मापसे पसे तो वामन
का मिरामा सवारण किया।
मपि पटत रहीम पर, कितो करोरडिकाम।
तीन पैय बसुषा करो तम बामनो नाम ।
भ-मापने से सम्मान सा पता ही। फिर चाहे कितना हो बरा
काम क्यों न च्यिा पाये । सबवाम् विम्ण ने बपि तीन ही पन में पसुपा को
माप मिया पालेकिन फिर भी पति से बौख मांगने के कारण उनका नाम
सरा के लिये बामन (भिखारी) ही प पवा।
भावसाम्पसबते ना मापियो बामे हेर न सार।
बधियांबतही पवे पावन मरतार ।।
द वर्मा
रहिमम कई बड़ेन के माहि पर्ष कर मेस ।
मार भरे संसार को तम कहावत सेस ।
पर्व-पहीम का किबो मोर्मों को बप भी पटनहीं होता।
सम्पूर्ण पृषी का भार उठाने पाते पेपनाय मी अपना पाम ष प्रर्षाव बारा
पा रखते।।
पर्मबार-पान्तरयास ।
(३८)
रहिमन रेमि बड़ेन को मधु नदीमिए गरि।
काम मा सुई कहा कर तरपारि
पर्प-पान मते (किपड़ी वस्तु के पीछे चोरी वस्तु को नहीं

मा बाहि ए महियहाँ छोटी सी सुई काम पाती। यह वमबार बेचारी
या कर सकती।
प्रकार शम्त ।
पाप म काहू काम के गर पात फार मूर।
मौरन को रोकत फिरें रहिमन कूर बर।।
पाई-रहीम कवि काशिए पति पयूस पेड़ की भांति होते
बोन तो स्वयं किसी काम का होता है पौरन ही अपने पास के पड़ों का
रमा करता है कि अपने पास के पैरों को भी कारों से बेर कर एच
हनावा।
सीराको सिर काटिके, मसियत मौन लगाय।
रहिमम कल्पे मुखन की बहिए यही समाय ।
मई-जीरे का का.मापन दूर करने के सिके रसके उसके ऊपरी सिरे
से काटकर नमक नमाया पाया है। पीम कहते कि मुहमानों के
भये यही सबा की।
घर परत नित सीस 4, कर हीम हि काम।
बेहि रब मुमि पानी तरी, सो मत गणराय ।।।
पर्व-पपी तरंग ही पपने सिर पर चूम नामता पाएन पाम करते
किमा पैसा क्यों करता फिर पा सका उत्तर मी ते एकहो कि
नयम पा र मोजता है जिससे गौतम मुनि की स्त्री पहिबा तर मई पी-
इस प्रकार हमी पपने पार की कामना रखको अपने सिर पर समता
पा।
विशेष-पहिल्या गौतम ऋषि की पली।सके परिष पर पर
होने के कारण बौतम बसे भाप रिवा पा कि पापाप हो वा । साप
दीया भी कर दिया पाकिमयान एमपठों की एक स्पर्षी

वेरी मुक्ति होगी । पहिल्या पापयए पत्पर हो पई पौर बब भपमान राम
बनकपुरी बा तो राम के चरणों की पूजा सर्व पाकर उसकी मुक्ति
गई पी।
मो रहीम भावी कस्तो होति मापने हाप ।
राम न माते हरिम सप सोयम राबन माय ॥
मर्म-रहीम पि कहो । माषी (होनहार) नहीं अपने एप म होती
है पति नहीं होती। राम परिहरिन के पीछे बात पौरन ही माता सीपा
रापस पाषा पाठी।
सब को सबसों करें राम दुहार ससाम।
हित पहिव तब बानिये बा दिन पटके हाम।
प-सर लोप या प्रापस में मिमवे तो मोहमान के लिये राम
राम नाम पर गुहार करते भकिन मित्र और 40 का पता तो वग
बचता है पर कोई काम पा प्रटकता है प्रताबो उस काम में भाकर हाप
बटामे-ही मित्र कहा जाता है।
(१०४)
दुरदिन परे रहीम कहि मूसत सब पहिवामि ।
सोच नहीं बित हानि को, बोन होय हिव हानि ।
प्रर्ष-पीस कमि कहाकिमुरे दिनों में बाम पहचान याने मोग मी
दून बाने-मा बाझरका कारण है। बन की पनि तो
मनुष्य
पुदीनही करती बरि उसके दित की हानि न हो।
शिव-पापाता है कि उपहुँच रोहा पीम में मंग करि विम
दोरे रत्तर में विय भेगा पा-
सोचेको नवाब
ऐसी ने ना
माँ मोहर दो करो पावों मीरेन।

(४)
(१०)
रहिमम मौष मसम ते नित प्रति माम विकार ।
नीर बोरावित सपुटी मार सहत परिपार ।।
प्रब-रहीम करि कहते कि मीयों के पास से झमि रखनी पाती
पर्योकि पानी तोकुराता है बड़ी का पात्र भित्र मार सहन करनी पड़ती
पारे परियान (पष्टा) को।
संत हरत तम हरत नित भुवन भरत महिएक।
रहिमन तेहि रवि को कहा बो पटि सर्व पत्रक ।।
म - मर्मसीव का निवारण करता है पापकार को दूर करता है और
पत्तका प्रकास सब बानो मे सदासे पपस्वी मूर्य को परि पा कम
करता है जो समय पूर्व की महत्ता कम नहीं हो पाती।
बालसाम्प- मूरत बन सममें नहीं तो पुनी में पूछ।
कहा भयो दिन को बिगी, खोबो म उफ।।
(१००)
रहिमम वहाँ म बाइये जहाँ कपर को हेत।
हम तन भारत रेहुली सींचत अपमो पेत।
प्रर्प-हीम कपि करते किमानही पाना चाहिए यहाँ कपट म्पय
हार हो गर्योकि हम वो मेहनत करकर से मुनी गए पानी और
कपटी मनुष्य बिमा प्रम मपना देवीचमा।
रग तुरंग मारी, नृपति, नीष पाति इपियार।
रहिमम इन्हें सम्हारिये, पसरत त म बार।
पर्व- पोका यी रागा नाच के मनुष्य पौर हषिपार को परा
समाम कर रखना चाहिये क्याकि पोपी पी मी रोम देने पर इतं पनवे र
मही धपती।

बो होम प्रोपो या तो मति ही इतराप ।
प्यार से फरबी भयो टेडो टेडो नाय ।
सब-पीम कवि कहाकि भोपा पछि परिठिकर बापाको
धर्मर में दुरी नए फला-फुमा फिरता से कि पवरष में पारा फरबी
बनने पर मचान पबने भवता है।
रहिमम मीचन संग बसि, लगत कम म काहि।
रूप कमारिण हाप मलि, सब समुहि मा ताहि ।।
पर्ष-हीम काठे (किमीच म्पत्तियों का सप करने से मना किसे
कषक नहीं गया। सराप चने बानी के हाल में पूरी कर सब मोम
ठो पराब ही समझते है।
प्रकारनष्टान्त।
रहिमन सती प्रकृति को नहीं मोच को संग।
करिया बासन कर गहे कासिम मागत प्रेम ।
प्रर्प-पीम कषि कहते । कि उम्बर प्राति के मनुष्यों के सिय मौष
पक्तियों का सम रचित नहीं होता क्योंकि काले बनों को हाप में मेने से
कानिक प्रवास प्रेम को ना माती है।
भारसाम्य- पामर तम्मो बार म्यों घोटेको म साप ।
सीरों पर कारो को वापो बारे हाम।
(१९२)
रहिमन बो तुम कहत हो संपति ही गुन होय ।
बीच उसारी रसभरा, रस काहे ना होय
पर्द-गि पौन वे है कि मरि सपति मात्र परने हेही मुश मा
पाता वो मर्जी के बीच रपने माने रसमरी पौर्षों में रसों नहीं होता-बहू
क्यों पर भुख रस से बिहीम य बाता है।

( १
७४)
(११५)
रहिमन परिया रहेटको, स्यों भोधे की गठ।
रोतिहि सनमुश होत है मरी रिसावे पीठ ॥
प्र-रहीम का है कि जिस प्रकार पटका पड़ा पानी होकर सामने
भाता है और भरा होने पर पीठ रिवा देता है उसी प्रकार पोबा पारमी मी
मरीबी होने पर ही सामने प्राता | मेकित बनी हो बाने पर हमपा पीठही
पिलाता है मदि बात भी नहीं करता।
माव ताम्य-रिस प्रपरकी परी ग्यों पुमीत की ।
बब बानी तब सममुखी बब समर तब पीठ ।।
घोटिन सों सोहें बके, कहि रहीम यह रेख
सहसन को हय बापियत में मरो की मेन।
मई-घोटाबो मी मोभित होते-पह पत्लर पर सिपी मा
पमान निषित बात है क्योकि हमारी सरे की कीमत का बड़ा मही (रस
कोसी) कीटी से पा रहता है।
एहीम पर पर फिरहि, मागि मकरोसाहि।
पारों पारी घोरिए, येहीम अब माहि।
मई-विपत्ति में प्रब बाबानेशबारे बोनम की शिरमा
पाया है। रहीम कवि कहते है कि अब दोस्ती का भरोसा मत करो कोकि
पुरे वक्त में काम प्राने पामे दोस्त पर नही पे।
पाप पानी हो सकता है-
पई-पीम कविमविपत्तिकाल होने के कारण पब में परमार
पर भटकना पापा भार मिया बीवनयापन करमा पर पाय
मियों को हमारी मित्रता को और देना चाहिए क्योंकि अब हम पाने से
शामवाद नही को किसी मित्र को महापता कर ।

मपम बचन ते को फस्यो, पेठि सारकी पाह।
रहिमन काम न प्राय है ये मीरस जग माह ।
पर्ष-रेबम बोलने माया ऐसा कौन है वो उमति करता है। मायके
पैर के समान होते विसकी माया का कोई मुख मही मे पाता । ऐसे व्यक्ति
वाद के बम की मावि किसी काम नहीं पा पाठे, जो उनकी पाया का कोई
नाम उठा पाता है और न ही उसके फन होते । बिससे किसी प्रासी भी
सुवा वृत हो सके।
मसमय पर होम कहि, माप बात सनि लाज ।
ज्यों मचमन मांगम पए पारासर के नाम ।
अप-रे रिमों में पीम कापि कहते है भाग्या को स्माम हर किसी के
पर मसिना पावार से सम्मण को पुरिनों में पारासर अपि पर मान
मांगने बाबा पापा।
पनि होम बम पक्षको, मपु बिय पियत प्रथाय ।
उरपि बड़ाई कौन है गत पिप्राप्तो नाप
मा--कामा बलवार का पान बिस बोटे बीच पेट
पार पाते। पना उस साकी नया बाईबही है सारा संसार प्यासा
नोट कर पाता है।
बापहाम्प राण मधुरपि पेम्पो मबति मापसी महामपि ।
सोन्त समागम पौत्य लोकस्य न समा॥
(११९)
हौन बड़ाई बसधि मिलि, गैंग नाम मो भोम ।
देहि की प्रमुता नहीं पड़ी पर घर गए हीम
मर्थ-डोम कपिपवे कौन ऐसा विसका इसरे परमाने

पर बाप्पन न पा हो । गंगा इतनी बड़ी और महिमामाती नये है लेकिन
सापर में पाने पर उसकी महिमा भी पर बाती। प्रात सापर में मिल
कर उसका अस्तित्व समाप्त हो पाता है।
(१२.)
सरप बन्यो प्रथम पट्यो, मृपति निठर मन कीन ।
कह रहीम कैसे लिए, पोरे पत की मीन ।
मई-म्पय बढ़ गया है और बम बट गमा पा राना मी निष्ठुर
मन कर मिरा । रहीम फपि कहते है कि ऐसी स्थिति में बीमा रमी प्रकार
कठिन पिस प्रकार पोरे है बा में मछली का बीमा कठिन होता है।
(१२१)
बैंसी जाको बुद्धि है, वैसी को बनाय ।
ताको पुरा म मामिये, सैन कहाँबाय
पर्ष-4सी विसकी बुद्धि होती।सा हो वह बनता है। पम्प
बुनि बातों की बात का पूरा नहीं मानना चाहिए क्योकि छमसे ना हो या
होता है।
(१२२)
बिहिचान बोपक गुरपो, हम्पो सो ताही पात।
रहिमन प्रसमय के परे मित्र सब भात ।
पर्व-मित सादी पक्ष की पोट में दीपक को छिपाकर स्त्री पवन
से रसकी रामा करती। सौ पचव को पीपक पवा देता है। हम कपि
कहो कि पुरे दिनों में तो मित्र भी इसी प्रकार सा हो बावे ।।
दोमा रहिमन एक से, बो मौ बोमत माहि।
बान परत है काळ पिक तु वसंत के माहिर
पर्व-ौमा पौर कोमन रोनों एक समान होते-बब तक माही
बोलते तब काफी पीपान नहीं हो पाती लेकिन बसंत ऋतु पर पाती।
ठो कोसन की मधुर पावाप से रोनों में प्रेतर स्पष्ट हो पाता है।

(१)
पावसाम्प-भमे बुरे सब एक से ज्यानो दोसत माहि ।
बान पख है कार पिक, बतु बसत के माहिर सतसई
(१२४)-/
पम पोरोग्यत बड़ी, कहि रहीम का बात ।
जैसे कुम को कुम ब विपड़न माहि समात ॥
पर्ष-बम वि योग मेकिन इखत बहुत है तो रहीम कपि रहते है
मोरे हेम बात नहीं है। सम्मानित स की मग पपने मान की
'मा सोचिषरों में मौकर मेठी है।
१२)
देनर कोर पोर है मेवात सो रिण रन।
मोग मरम हम पपरे, पाते मीचे नेम।
प्रम-प्रस्तुत पोहा कपिपीम में प्रारी परमार के पम्ब प्रसिर कपि
पर इस हे उत्तर में मिला था-
“सीये कहाँ नबाब , ऐसी बेनी देन ।
माँ-नयों कर करो यारों मीरेनन ।
पर्व-देने मामा तो कोई और है (पाद भगवान ) बो दिन रात देने
के लिये मेगा करता है मेकिन भोग भ्रम बप मुझे देने वाला सममी
ही मुझे देले बाना का पावापत मैरी इष्टि संकोवषय नाचे मुत्री
पी।
रहिमन प्रसुवा भयन हरि, मिय दुत प्रगट करेइ ।
नाहि निकारौ गेह ते पस , मेव कहि ।
पर्द-हीम कषि कारकि पासू नयों से पककर मन का युग
प्रष्ट करते। विसको पी पर से निकालते वह पर कार दूसरों से
काही देवा।
(१२०)
रहिमन अपने पोत को सबै पहत उत्साह ।
मृग ग्यरत माकास को, भूमी ममत पराहम

।
सर्व-पीम पि कहते (पिपने पेट की दृष्टि को होगा।
भूम पाहमा के वाहन इति । पृप्पी पर गते हुए पी मापाप को
उपनते है। और कि भगवान गण रिपाम को मारकर पाबाबतौर
पृप्पीनोक को लाये थे इसीनिय सूमर (बाण! भूमि को सोते । तर
महम प्रत्येक प्राणी अपने-अपने पस पोर बाति के अनुसार काम ।
(१२)
रहिमन प्रवने बिरयकर, जिनकी बाद मीर।
मामन विवरच रेमिप्रत सरकरीर ।
पर्ष-दीम कादि साह (भा में पैर नहीं होते निमरी पायाला
होती पी पब वो हर बाप में ष्टीने र कटिबार माड़ी पौर
हो रेसने को मिसवे ।।
(१२९)
मगत बाही किरन सौ पपवत ताही काति।
स्पो रहीम सुन म सबै, बड़त एक ही भाति ।
अष-बिन बिरलो मर्म पीर बन उपते ही किरणों से प्रस्त
होमातेशीम मिहो। किसी प्रकार मुक एकही मात्र
याँ रहीम सुम एम सहत बो भोप सह भाति ।
पचत प्रम देहि मस्ति नों, अपवत ताही भौतिक
-पीम कि किसोए एसौ प्रकार समान मात्र है
को सहन करते विष प्रकार पार से नवा सधी माति प्रस्ती
बाता।
यह बीम माने नहीं दिल से मवा महोय।
बता पोर कमान के नए अवगुन होय ।
मर्षजहीम परिका किसा चोर कमान मम होने पर भी

विनम्र नहीं होते कौकिपीता म मम होकर माता है पो यह पाक- मस करने के लिये उपलता है चोर मी नम्र होकर बनहानि करता है पौर कमान मी मुकने पर ही धीर फेंक कर प्रारस हानि करती पव इन ती! का मम होना (झुकना) पिचापटी होता है पौर हानिप्रय होता है। मापसाम्प-नमन नमन या प्रेतरा ममन-मन बाबान । ये तीनों गते नई चीठा पो, कमान ॥ पौर मी- सग्यन मबते पनि गना बो र सुरन होई। पीता पोर कमान सौ म मापनी गोई ।। (१५२) याते बायों मन मयो, बरिबरि भस्म वसाय । रहिमन बाहि लगाइए सो म्यो प्र-मेरा मन शायद इसीलिये बात कर सम्म हो बाईपोंकि बिसे बोससे समातामही ससा हो जाता है। व माय॥ रहिमन मिता वाबरी कहिग सरग पतात । पापु तो कहि मीतर रही सूती साप्त कपाल । प्रब-कपिपर रहीम कठे कि यह मिला (गवान) वो पावनी होती है । यह तो स्पर्म और पाताल तक की उल्टी सीधी बाते बह बाठी भकिन पाप तो परकर मुख भीवर हो जाती है मार पो गाने पर सिर को। प्रय- रहिमम बो रहियो बहै, कह पाहि के गाव । बो पासर को निसि कहै, तो कचपची रिक्षाव -पीम को विपरिन से पदना चाहते हो तो मासिक की मह मिमामो। बवि मासिक रिसको पक्ष बसाये तो तुम उसके समर्पन में पापाप वारे और खिादो। भाषसाम्प-पाट पो मूनि बामी यही पौष में पो। कर बिना मैग, हो होगी-हाँगी मो॥ ६

( २ )
रहिमन तब मगि ठहरिए, बाब मान सनमाम ।
परत मानविय महि, तुरतहि कारिप पयान:
पर्व-पीम करे कि उमी समम क रहना चाहिये पब तक कि
राम माम पौर सम्माम ऐ । पौर पर भी मान पटवा परे तो तुरन्त ही
ही से चम देना चाहिये।
रहिमन रहियो बा मसो बौनों सीम समूच ।
सीस टीस सब देखिए, तुरत मीनिए ।
प्र-हीम पाहते हैं कि पना पसी समय तक उचित है बब तक
पूरा सम्मान बना पे पार बब सम्मान पर पांच माये तो यहाँ से तुरन्त
ही प्रस्थान कर देना चाहिये।
रहिमन पानी रालिये, बिन पानी सब सून ।
पामी गये म यो मोती मानुस पून.
अर्प-गीम कवि कहते कि पानी प्रयम्स ही रखना चाहिये पोंकि
पानी बिना स्व सूना हो पाता है अर्थात् म हो भाता है। पानी परी पाने
से पुन मूम्प नहीं ५ बावा क्योंकि बाद मोती का पानी (उसकी माप या
कान्ति) पनी पर वो माशार हो पाता है। इसी प्रकार मनुष्य में पानी
(भारम-सम्मान) बना नया तो मा प्रतिष्ठाहीन मनुष्ण मौ दो कोसी का ह
पापा । पौर ऐम है यदि गाने में से पानी (बम) पाता है तो पूना कार
हो पाता है।
(१३८)
मंगन के मारिए गए, प्रौपुम पुन न सराहि ।
ज्यों हीम बाय? बमे मरहा ह प्रपिकाहि ।
मर्षीच मधियों के मरने पर भी उनके अवगुणों का रसात कम
मही होता । विस प्रकार किया ए मारे गये मनुष्य को प्रारमा मनुम्प
सभी बाप का स्मबाररा कर पश्मि उत्तरात मचाती।

विमेवल्यो मनुष बाप हारा मारा पाता है उसके लिये एक पतप
निमित कर सकी पारमा की पूनानीबाती है कि उसकी धारमा दूसरे
भहीबारकास्प धारण कर प्रषिक रत्पात मचाती।
रहिमन होटी पारि को सौ परिनाम मनाम।
#से रीपक तम भो, कस्बम वमन कराय.
पर्व-पीम कहते कि परि प्रारम पुरा है वो पन्त में उसका मातीमा
दुरा होता है दीपक सुर में प्रापकार का पक्षण करता है तो मात
में बाकाम काही नमन करता है मर्मान् कागन ही घोड़ा ।।
(१४०)
मुफ्ता करपारपूर कर, चावल बीवन मोप।
ये तो बोरहीम नत प्यान-बरन विष होय।
प्र-स्वाति नमन का जन महत्वपूर्ण होता है पौकिसीपी मैं मोती
पनता ने मेरपुर बनता है बात का पीरमरायम होतामपिन सर्प
मुख में परकर रिप हो पाता है।
करसी सीप भुग-मुन स्वाति एक गुण तीन ।
नसो संगति बैठिये, तैसोई फल बीन।
मोति ममा पानी तो एक ही होता है मेग्नि तीन स्पानों
पर अपने तीन मुख प्रन्ट कला है। पते पर स्वाति नक्षत्र का
पल कपूर बनवा है. सीप के मुख में पहले से मोती बनता है तो सर्प । में
पाने से जी बिष बन पाता है। तो हमति में 4 पाता है वाही न
मिलता है।
विप-10 ऐवा प्रमिस कि स्वाति माना जसले पर पिरने
में कपूर बीपी मुक में पिरने से मोठी पीर सपै मुख में सिरने है पर
बन याया।
(२) मूरपास में भी भाव के साम्य पर निया -

'सौप भयो मुठा यो कयनी ममो कपूर ।
पहिमुन पयो तो पिप भयो प्रयत पम मूर।।
मूक मसी में सुमन, ठहरत महीं बिसेनि ।
स्याम कंचम में सेतो पूरि कीजियत रेपि
प्रर्प-मुखोकी मगनी में सम्मान नहीं टिकणारे जैसे कि काले बाता में
से सफर बाम को निकास यिा बावा ।।
(१४)
भतो भयो परते एरयो हस्पो सीस परि हेत।
कारे काके मवत हम, प्रपन पेट के देत ।
मर--पुर भूमिमा पटकर पिराहमा सिर मामो इसनिये सिता
कि पानो हो मिली पर पेटसातिर पो सामने मुकना तो म पोपा ।
(१४)
मौत गिरी पचान फी पररामो वहि ठाम ।
मब रहीम बोलो यह को ला केहि काम ।
प्रब-पत्परों को मार गिरी तो परनि की प्राचार में गिरा हुमा पत्थर
रहता है कि परम सा परवर कहाँ काम मायेगा। पोंकि सभी पत्थर तो
पद पनग होगा।
भूप पमत सपु गुनिन को, गुनी नमत मधु भूप ।
रहिमन गिरि भूमि मो मो तो एक पर
पर्प-रारा गुणवान मनुषों को अपने समम दोटा मानता है कि
पुणवान मनुष्य रामा का छोटा पमम ।। पीम पिकावे कि पर्वत से
परती तक कोई भी बड़ा-मोटा नही है-पभी को समान एमभमा पाहिये ।
बिगरी मात धनं नहीं माम करो किम कोम।
रहिमन फाटे आपका मन मानहोगा

। ५)
प्रब-बात पर एक बार बिमा बावीtो फिर नहीं बनती बाहे ना
पाय बार में किये बायें । यीम कषि कहते है कि पूष के एक बार फट गाने
में फिर कितना मौ उसे मपा बाये उससे मक्खन मही निकामा वा सकता ।
(१४७)
पपि अपनि प्रमेक है कूपर्वत सरितास ।
रहिमम मानसरोवरहि मनसा करत मराम ॥
पर्षपपि पृषी पर अनेक गहरे जम के कुण पोर मोमें मेक्नि
सो मानसरोवर में ही अपनी मासे का करना पसंद करता है।
बपि पनेक मुख तोय तामु रसवाम ।
पंतत तुबसी मानसर, तापिन सहि मराम ।।
तुलसी
मानसरोबर हो मिले हसनि मुक्ता भोग ।
सफरिम भरे रहीम सर वक-बाम काहि बोम ।
पर्व-मानसरोवर मे ही इसों को मुक्ता गुपने को मिलते -पर्वाद
मानस में हो संत मोग मुक्ति को बोते। सरोवरों में तो छोटी मप्तियां
मी पतीबो गर्मों के बच्चों के खाने के लिये ही पतीपत मांसा
रिमपियों में तो तुम एरिके मोप ही निप्प पते ।
रहिमम निज मन की विपा ममहो राम्रो गोय ।
मुनि पठिमई मोग सब बोटि माई कोय ।
पर्म-पौम कहो किप्रपने मन को प्ममा को मन के भीतर ही पिपा
कर रखना नाहिसे क्योंकि म्पका को मुनकर लोप मा मोहीमेसे
पारकर कम करने वाला कोई नहीं होता।
रहिमम निज सम्पत्ति बिना डोर म विपति सहाय ।
बिनु पानी को बसन को, महि रवि सक बनाया।

म-रहीप पिकापास साम एमे पर कोई भी विपत्ति
में सहायता नहीं करता । सूर्य बोकसम को बिमाता है-पानी न होने पर
पीकममको मुबा गतता है।
(१५१)
नब मगि वित्त म मापुने तब समि मिा म कोय।
रहिमन प्रबुन बिन, रवि माहिन हित होय ।
परब ४० पपने पास बन नीब तक कोई पिन नही होता
नयाँडि फमम को विकसित कर पाना सूर्य भी पानी के जमाने पर पर्ने
मुबा ममता।
कुसमय मीठकाको काम।
कमन को रविपरम हित है मुति प्रधबयन ।
पर बारिष भयो बामए करत पार गन।
(११२)
बोरहीम उत्तम प्रकृति का करि सात कुसग ।
बम्बम विष व्यापत नहीं मपटे हत मुग
धर्म-रहीम काते ! कि पो प्रचे सगाव के यमुप्प हो । उनको
दुप पति भी बिमार नही पाठी गाकि पारीमे सर्प बाल मा
चिपटे पहने पर भी पद पर कोई मारीमा प्रभाव नहीं राम पाते ।
नो रहीम गति बीप की कुन कपूत पति सोय । /
बारे रमियारो लपे, बड़े अंबरो होस ।
प्र-~होम पहो । कि दीपक पौरा में एक ही रण होती है।
दीपक पनता है और पुष वामावस्था में होता है प्रभास फैलाता है
(पास्पायस्पा में पुष मी प्रसमा प्ररान करता ) मेकिन त होरीपक
पता (पुस्ता) पौर व पाता है (ना होता ) तो पन्धकार
फनाताई मति पयप पलाता है मत माता पिता को निराप होना

--
हो रहीम गति दीप की, सुत सपूत की सोम ।
बड़े उमेरो तेहि हे, गए ममेरो होय ॥
पर-बपि रहीम पवेपि की भांति ही सपूत की भी स्थिति होती
हाकिसे दीपक मन्वनित होने पर माहारामक होता है से ही पुत्र
पहा होने के साथ-साथ माता-पिता के बिये प्रथा का कारण होता है।
मौरीप मोर सुपुत्र गोहीको बाने से (समाप्त
कामे से) प्राव
कार पार पपा बाता है।
रहिमम हरि सम बस नहीं मानत प्रमू की पाक।
बांत रिचायत बीम बसत मिसाबत माफ
पर्व-पीम कहते है कि हाथी के पमाम पत्तिसाली मार कोई मही
मेकिन मावळियासी हापी भी प्रमूका सम्मान करता है। इसीलिए यह
मम सभा व दिखा कर अपनी बीमवा का प्रपन कौर
परती से मथकर पबने पानो माफ रमता पा पवा।।
रहिमन कहत सुपेर सों, कर्यो म भयो टू पीठ ।
रीते प्रमरोते करें, मरे बिगारत पीठ
अर्थ -पीम कपि पेट को सम्बोषित कर कहो कि यह पौरपदों
मोपमा क्योंकि जाती होने पर ना यह पाप करपाने को प्रामारा पपा
पौर पेठ परा होने पर मनर को बिगाड़ने बाता मात् परमासी करने
पर पसारोपया।
रहिमन प्रपमै पेठ सों, बपत कयौ समुम्प ।
दो अनलाए रहे, सो सों को प्रमग्राम ।।
प्रर्व-होम फपि का कि अपने पेट से मने पल पमा कर कहा
कि यदि बिना पोवन को पेगा तो तू मनमायेया।

-
(१८)
कैसे मिबह मिबस जन, करि सबसन सों बर।
रहिमन बसि सामर पिणे, भरत मगर सों और।
भई-मिम मनुष्य सबम मनुष्यों से समता नहीं करनी चाहिये पयोकि
होम पनि कहते कि मागर मे रहर मगर र मिल नहीं पाता ।
(१६)
कान परे का पोर है, काब सरे का और।
रहिमम मेवरी के भए नदी सिराबत मौर।
पर्पकाम पड़ने पर वस्तु का मूम्प प्रपित होता है और काम निकम
बामे पर उसी वस्तु का मूल्य एप पौर हो वा पहीम कवि काtin
विवाहपी भावरों के समय को पार को सिर पर पर पारर रिया बाधा
हैपौर काम निकन बाम पर उसे मपी में बहा दिया जाता है।
काह कामरी पामी, मार पाए से काब।
रहिमन भूम पुताइये, स्पो मिमै प्रनाम
प्र-कमान हो पा रेपमी मामूम पड़ा--इससे क्या बनता-बिगावा
काय तो जा मिकामने से।। होम विपकिनारीमती
हो या सस्ता इससे का ? मुरूम बात तो भूख का प्राप्त करना है। सूब
किसी भी प्रकार वाम मिट सकती है।
धिमा बाम को चाहिए, घोहिन को उत्पात ।
का रहीम हरि को पट्यो, बो मृगु मारी भाप्त ।
मलाको धमाकरला घोमा देता और पोरों को पाठ
मचाना । पोम विकले कि मपमान विष्णु का हमें क्या बट गया को
नामापस ने उमरखपत परसाठ मारी।
दिऐसा पौयपि सामान कि एक बार मानसमा रिप्यु

( a )
पौर महेस की सापकता पौर पैर्य की परीक्षा सेनी पाही। इसी ठप से
डॉकहोकर उननि मोर धाम में सेवनाग को शम्मा पर सोये हुए ममदार
रिप्यु के प्रती पर लात मार कर बमाना बाहा । ममपान पात वगने से जप
पो और मनु की इस वेगा हरकत पर पवाय मुस्सा होने के बही विनम्रता
पौर परिवाप से मधुपरसों को दबाते हुए मामे-ममबन् मेरे कठोर
बबालत से पापके कोमल चरणों में चोट पागई होमी प्रत में इसे बा ।
पाको भगवान की सीमा तया परप्पन का पूर्ण परिषम मिस मया ।
(१६२)
र, पुन, हांसी, सुसी, बर प्रीति मवपाम ।
रहिमन रावेर बब, बानत सकल बहान।
अपनवा नून बौसी प्रसन्नता वा प्रेम और सराब का
पीना पाने में भी नहीं पता है पर्वात प्रकट हो हो बाता है पीर प्रसार के
मी बोलबान मेते है।
रहिमम पुरविन के परे, बडेम किए घटि काम।
पॉप प पांडव भए रपवाहक मसराब।
प्रर्म-पोम कवि करते है कि पुरे दिनों में बसे पक्तियों ने भी पाटे काम
किये। पांच पौरों में अपने पुरे दिनों में पृषक-पृषकप पारस करणा
निपट यही नौकरी की तमा राजा मान ने पवा तुपर्ण के पारपी बने ।
विशेष-पापों परिव पए में हार बाने पर प्रहात बास बिपा पा मोर
पचा विराट ममग-प्रतग पवारण करके नौकरी की बौ। इसी
प्रसार मा नम एप में सब कुछ र बये और अपनी पत्नी बमवी को और
पर पमा तुपर्ण के बहाने माने सारवी, यने ।
/
-
घोर पहोम प्रतिकार के द्वार गए पदिताय ।
संपत्ति के सब बात है विपति सबै में बाम
पर्व-पीम कवि कहते कि किसी के आर पर पाने है पकाना नहीं

चाहिये क्योंकि धमकान के पास तो सभी पाते है पौर मनुप को विपति कहाँ नही है बाठी प्रति विपत्ति में तो भटकना ही पड़ता है। होय म बाकी थाह विग फम होम प्रति एर। बरिर सो बिनु कान हो बसे तार जदूर। प्र-गिसकी पामा पास में नहीं होची पौर फन भी बहुत दूर होते। ऐसे वार पोरनपुर के पूषों का पड़ना म्यर्थ ही होण है क्योकि वासीन तो रसको बाया से पीतलता पाय कर पाते है और न ही उसकेकों से खुषा की तृपित कर पाते है । पहीम का तात्पर्य ऐसे मनुषों से वो पारेको बरले बाते । मकिन उनसे किसी भी मनुष्य को नाम मा सहायता प्राप्त नहीं होती इसलिए उनका कोई महत्व नही होता। प्रतार-पम्बोक्ति ममसिन मानी की सपम कही होम महिमाय । फस स्यामा के उरगे, फूल श्याम र माय । पर्व-पौम कपिकाते है कामरेष म्पी मामी को उपन से बारे में पुछ कहना कठिन वापि न हो याम केहप में उपते है पद काम का पानम्र बाम सप मै समाता और फल मामय पर भगवा पति काम को परीप्त करने वाले स्तनों का परम प्यामा (नायिका) के पक्षस्थम पर होता है। पेमावमिकोमा सता माबी विपकेबाट । अषमान बन पाय पंच मत बाट । अपवंत ति भापहाम्म- रहिमम प्रीति म कौथिए, बस बीरा ने कीन । म्पर से तो रिस मिमा भीतर फमितीन। मई-पीम कहते है ऐसी प्रीति भव कोमिए सी किसीप की विका रिच (सिरा) वो मर से मिना मा बता ( मेडिम भीतर तीन प्रीष्टौती। प्रनकीम्ही बावेकर, सोबत बागै भोय। ताहि सिखाप बगायबो रहिमम पचित महोय । पर्व-बोमकाने योग्य बात करें तमा बो भापते हुए भी सोवे एते। पर्याद बानमार पमान में पो पना चाहते है रहीम का है कि ऐसे पक्षियों को पौवना हवा बयाना उचित नहीं रहना। मावसाम्प- (१) समुभि सुति रीति एव बागवी पोय । रूपरेवियो बसाइयो तुबसी उचित न होय ।। --तुमठी (२) पापक प्रयुक्त को वासों का बसार । बापत ही सोमत पे, ताहि बमाय ॥ मनुचित पपन न मानिए, पापि गुरापसु गादि। है रहीम पुनाव ते सुमस मरत को बादि। प-रहीम पनि महते कि प्रतुरित दात को कमी स्वीकार मही कणा चाहिये पाहेपा पुरारा री कठिन पाशा पर्यो म हो। श्री रामचमा बी।पिता काम पाहन पर बनवास मिया मिकिन उनके छोटे भाई परत से गुम्बनों की पाशा न मानकर पम्य पारण नहीं किया तो पण केस त्याग एमवाय कय नही बताया जाता। प्रब होम मुसहित पड़ी, गाड़े रोड काम । सधि से तो मग मही मुझे मिले न राम। पर्व-हीम मषि का कि पब सी कठिन परिस्थिति हो । कोहिदोनों ही काम कठिन । क्योकि यदि मन पर पता

बीना मलि पर मरम का सहारा देता तो तो राम की प्राप्ति
(पपति) कठिन है।
मनुचित पबित हीम स करहि पाल के पोर।
पों सासिहयोग से पचवत प्राग बफोरम
म-रहीम कहते । कि परिदोई मनुषि कोनों का
सहारा करही। पयोकि पोर (बोबोटापा (मोबास
पर भुष सेकर ही अंगारे पापाता है।
मावत काम रहीम कहि गाड़े बापु सनेह ।
गोरल होत म पेय पणे, पामे वा बह ।
पर्व-पीम कहते है कि समय पर पुराने मित्रों को स्मोही पाम पाता
से पिट वृक्ष की पासा पूमि मेंस कर सकी बबन बाठी ।
पौर इस प्रकार उसकी खा कवी रहती है।
(१७३)
सर पूरे पम्पो र मोरे सरन समाहि ।
दोन मोन रिन पच्छ के कह रहीम कहे माहि।
पर्म-रहीम की कहते हैं कि एक परोबर का बस मूब बाता (ो
पी मरपूसरे सरोवर को पग में वर्षे ते! तुरी महमियों
कतोब नहीं होते बवामो बाबा ?
(१७४)
हिव फीम इतम कर बाकी वहाँ बिसात ।
नहि यह हैमबह है बइम को पात
मई-पोम बोका बि मनुष्य की कितनी पति सो पाठवा
हो परोपकार करना चाहिए क्योंकि संसार में पापा का कोई बात नहीं प
बाटी बन करने के लिए बात ए बाती है कि अमुक कितना सपकार
किया पाविना प्रपकार भिमा पादि।

पो रहीम गति बहन की क्यों तुरंग म्पबहार।
बागृ विशाबत मापु तन सही होत प्रसमार।
पर्व-हीम बी को । किमोड़ा अपने परम मोहे से पक गया मेवा
और मबारका चित्र बन पाता ।बिस प्रकार मोडेमा या व्यवहार
। उसी प्रकारामबहार बरे धाम कर। दूसरों का पकार करने
लिए सपट महन कर मेरे।।
विशेष-कहा जाता है कि पपरसासन काम में एक प्रथा बसाई पाँ
पी।पुरासमार सेना मे समार का मो नंबर होता था यह मोहा गरम करो मोई
हरीर पर नाम दिया जाता था। इस प्रकार बानो सवार का पड़ता पा
पर पर बोरे को सहन परमा होता था।
(१७६)
रहिमम मातीमकीचिये, गहि रहिए मिम कानि ।
सेबन पति फूले तक गार पात की हानि ।
पर्ष-पीम भी कहो कि विधी मी काम में सीमा से अधिक नही पाना
पाहिए अपनी मर्वाश का पालन करणे आना चाहिए से सहनी के दृक्ष में
पा मोठी प्रत्यधिक मात्रा में सबसे है और इससे रसे पों और
गामियों की हानि पहली पाती है और फिर उपरे पाणी पावावे।
करम हीन रहिमन लसो पस्यों पड़े पर बोर।
चितम ही मा लाभ के नागतहबो भोर.
प्र-कवि रहीम बालेकिलो नाग्म-हीन चोर पनी पर में चोरी
निए इना पर बह इस विचार में ही पड़ा पाहि किस वस्तु की बोरी से
बा साम होगा। यह विचार करते करते ही प्रातः काम हो गया।
रिप-मूर में बी पन प्रकार का मार मारे समाज में मात
किया-

पॉलीयों चोर म घर चोरी निधि नरें। परमोर भयो पछिकात्री करी॥ (१७ काहि रहीम कबीप में प्रकट सब दुति होय । तन समेह से पुरे हग दीपक ना पोय। पर्ष-रहीम पी पाकिएकहोरोपक से सब पोर प्रकापमा पाता है। तब घर में प्रेम से मिपा रा सकता है पोकि यहाँ तो मेक कपी पो बताय। - भारताम्प-तुममा कीजिए "प्रेम दुराये ना मैना रे (१७t) कह रहीम कसे बमै मनहोनी है वाय । मिमा दमो मा मिस तासों कहा वसाय । पर्व-रहीम पीते का कोई पनहोनी घटना घटित हो दावी tो विधी कार्य से सिर हो सकता है कोई प्रभीष्ट बस्तु हमको प्राप्त हो पपरानो होली पर हमारा बस नही बनता । भावताम्प-स्त को भी एक पति- प्रायम्भाबिनो बाबा परन्ति मलामपि । (१०) कागज को सो पूतरा सहहि में पुत जाय । रहिमन यह प्रघरमलो सोर बत बाय । पर्वबह मयेर कागज बने हुए पुतले के समान है बो सीम होम पाता । रहीम पी पहते कि एक पारपर्यो कि कागर पुरावे समान होने पर मौ मा पर बसा मेवा ।। बायसाम्प-गुनमा काबिए- कौन मसा का पारह बन उपाय !

(१५१)
से मिबह निवस मन करि सबमन सौ वैर।
रहिमन बसि सागर विषे करत मगर सों और
पर्व-नियम पति यदि सतिसामी पति से माता सेतो से निभाष
में सस्ता है। हम करि कहते कि सामर में पर पुस्ति मगर से और
दी किवा पा समाज परिणाम प्रावावर हो सकता है।
(१८२)
काम न कर पापी मोत रहीम से।
बारटे बाद को साहब चारा ।
मर्म-कपि यो में बताया है कि जिसका कोई मही होता उसका
स्पासिर होता है पाकिवा बार का पंच टूट जाता है हो। किसी
काम का नही पवा । यस अबस्था में उसको कोई महीसरीरसा फिर भी
(सर ही रसको मोवन प्रदान करता है।
-
कुटिमन संग होम कवि सामू बचत नाहि ।
ज्यो नैना सैमा करें उरब उमेठी माहि
प्रर्ष-गीमीयते बिताए दुष्ट पुष्पों के साथ रहकर सरगम
पुस्प भीसे बच सकते हैं मी कष्ट भाषा ही पड़ता है। वैसे मेरठो
विधी निया मे प्रहार करते और फन रोगों को भोयना पड़ता है कि
चनको मिप मसलकर कर देता है।
बापताम्पसका भावसाम्य निम्न दोहे में देखा जा सकता
बों मषिए क्यों निवाीय नीति र पुर नाहि ।
नपा अपोलोमना करें नाहर मनाई।
मैघि पानि ढीली हरनि हा कौन यह प्रोति।
मात्र काल मोहन गहो, वंस रिया की रीति ।
प्र-प्रारजमीहएकाविक बात में बौर पर टायपासे

-
(१९२)
नो फीम पहा, विय राबत पट-मोव।
समय परे से होता है वाही पट ही पोट ।
मर्प-दीप बी कहते है कि मोरोपकको पपने पापा की पोट रिजवी
पर समय पाकर पही पावन पररावा व ममा देवा।।
एर पुस्मों का भी पहो स्वभाव होता है।
विहि चल पा पुमो यो हो नाही पाठ।
हिमन प्रसमय परे, मित्र भराव।
कोहीम पणतर परो, गरिमाम प्रासी ।
निरा पागे रोयवो, मासु मारियो बीस
पर्प-पीन पीसो निष्ठुर व्यक्तिरे सामने अपना एक रोमा
पौर भादूगामा प्प होता है मने ही तुम ना पाकर मोर तिरमा
र उपपड़ो।
तरहीनी बीबी मसो बीबो होय मीम ।
बाग में रहियो पति मति अवितम होय रहीम.
पर कवियर पीप परिबीवित पना भी करना
तक पान की पति कम महो। संसार में प्रभुषित पति पना
(१२५)
तवर फम नदिबाव सरबर पिहिम पान।
कहि रहीम पर काम हित मपति संचाहि मुबान ।
पर्वल स्वयं परमही सादे पार उपेपर बलमही बीते। मपी
पहले सम्म कोप पहिलो पपेपकार लिए।

(५)
भावहाम्य-संसम्वनिम्न मोड से इस दोहे भाव की पूर्ण समता है।
पिबम्ति अप स्वयमेव माम्म
स्वर्व नबारम्ति फमानि मा
पयोमुवाम्म परिस्ति पास्म
परोपकाराम मका निभूवन ।
तेहीम प्रब कौन है एती मैचत बाय ।
बस कापर को पूतरा नमी माहि पुम पाय ।
पर्व-हीम पी कहते है कि पा सरीर तृस पौर कापम से बने पूतमे
समान बोनमी पाते ही चुनकर मम्ट हो पाता है लेकिन मा स्वास मेने
माला पीप मामिर कौन है ? समझ में नहीं पाता ।
(१९०)
पोषे बाबर चार, यॊ रहीम घहरात ।
पनी पुष्प मिर्पन भए, करें पाधिसी बात ॥
प-सीम बीका! कि बार मासबासी बादल पिस प्रकार
पुमड़ते । उसी प्रकार बनी मनुष्य निर्षन होने पर अपने पिपने दिनों की हो
करो।
पोरो कियो बड़ेन की बड़ी बड़ाई होप ।
ग्यों रहीम हनुमत को, गिरधर कहत मकोय ।
पर्व-चोड़ापा भी बाप्पन का कार्य करने पर बों की प्रसाबादी
12 पौरुष्ण ने तो पर्वतको केवल चारण ही किया पा को भी समका
नाम पिरिषर हो गया और हनुमान पर्वत को बात दूर तक उठा कर मे पए
फिर भी उनको कोई पिरिबर महीनावा।
(१६६)
रापुर मोर किसान मन, मग्यो है पम माहि।
रहिमन पातक रटनिहू सरवर को कोर माहित
पर्प-मका पूर पौर किमान इन सभी का मन बारनी भोर मया

पवा किया हो। पाठक भी मैच का नाम रटता। पर बाता की समानता करले पाला कोई नही । भावहाम्प-गुमना कौषिए- 'मुख मोठे मानस मसिन कोमिन मोर पोर । मुषस परम पावक भवन रामौ भुवन मरि जोर ।। -नसी (२.) पीएष दोहा भरप के प्रावर बोरे माहि। क्यों रहीम मट मुरली समिटि पिपरिजोहि । पर्व-रहीम भी करते किबोहे में पर्पो पर्याप्त सम्बादेता है पर पर पोरेसीहोरी पूरे माकार का मट पपने सरीर को समेट कर फिर पूष कर पोटे से गोने में से मिकत बाता है । विमेप--(१) मनेक नट इस प्रकार का बेत बिचाया करते है। उनके पास एक तरे की पती प्रापि का बोटा सा होता है । उसको व चार पर बामा कर दिया जाता है और पूरे पाकार का नट तस में होकर इमरी मोरपूर (२) बोहे के पास नापब की बात बिहारी के बारे में भी इसी प्रकार कही बाती - देखन में पोटो को बायकोनभीर । (२०१) परती की सी रीति है सीत घाम मो मेह । पेप्सी पर सो सहि रहै स्यों रहोम यह रेह। पर्व-पृषी की यह पति है कि यह सीप पौर वर्पा बो भी पाती है उसे पान कर मेवी।। चीम बी बात है कि उसी प्रकार इस प्रकार इस पौर को नौ को मुर दुख पाए पसे पहन कर देना चाहिए । विमेष-योम बौने मम्बा मी भिवाई- पी परे हो यदिएकहिदीम बाब।

(२०२)
महिपीम कुप कप गुन नहीं मृगया प्रनुराग ।
हेमी स्वान भो रानिये प्रमत भूल हो नाग ।।
प्र-पीम पी कर है कि यदि देखी कुत्ता पाना माय तो बसमें न हो
कोई सुम्बा समयमा पुरा ही होता और म से सिकार करने से ही
कोई समान होता है। बहवो बस पूमते हुए मोक्ता हो इता है।
(२०)
मात नेह पूरी मसी, तो होम बिम बानि ।
निकट मिरापर होत है ज्यो गाहो को पानि ।
प्रर्ष-पीम बी कहता कि इस बात को हरम में नमी भांति समझ
भेना चाहिए कि सम्पम्पिों तथा स्नेहियों से घर पर पना हो पन्या ।
पास पने पर समका काहीबत के समान ही निपर होने लगता है।
(२०४)
माग रीमि तन देत मुग मर पन हेत समेत।
ते हीम पशु ते अपिक, रीमेड कप म त
पर्ष-संपीत पर मुग्ध होकर हरिस प्रपना अपर मर्पित कर देता
मुन्ध होकर मनुम्प अपना मन पौर ममत म्पोचावर कर देता है। लोग तो
पमु से भी बहार बोरीमने पर भी मुख माही देते।
(२१)
निन कर लिया हीम कहि सिपि माषी के हाप।
पसेि अपने हाथ में रोष म प्रपने हाप।
मई-पम पीक कि पपमे हाल में तो बस कर्म करणाही
होता है महिना १ मधीन है। बीग पारि सवे समर परिती
मपने हाल में पहले पर बार या पाएमा प्रपने हाथ में नहीं होता।
विप्रेष-सरोहे में सष्ट रूप से गीता ज्ञान का उपरेप रिका पया
हैसा पगबएपीवा में सा है-
कमपेवाधिकारस्ते मा फमेषु मापन ।'

(२०)
मैम सप्तौमे अपर मपु कहि रहोम पति कौन ।
मीठो माय मौन पर पर मीठे पर मौन
पर्वमेघ सनीने (नावम्पपुछ नमकीन) पोर पर मपुर (मी
है। फीम भी कहो कि इनमें ममा कौन या कम है ? क्योंकि ममकीन
पापात मीनपासमता और मोठे पापा ममीन ।
(५०.)
पतग मि पतिता रिति सम सुनो सुमान ।
हिम हीम सी बहो सत बोबन पहिमान।
प्रसग्मनो सुनो पान की बेन पोर पविता स्त्री हम दोनों की
रीति समान होती। पान कीस को पाना बना देता है औरर पर पति
बियोग पवित्रता मारी बन पाती।
(२)
परि रहियो मरियो मतो सहिबो कठिन कमेश ।
बामन बसि को पस्यो मसो विपी उपरेन ।
पर्व-पोम बी कहते है कि दुसरे महाँ रहकर दुध सहन करने के
तो बसका परला ही प्रथा है। भगवान ने पति को वामन काम
धारण कर, बन करणे काही उपरेप दिया।
(२०)
पात-पात को सोधियो बरी-धरी को लोम।
रहिमन ऐसी बुधि को कहो बरंगो कोम ।
पर्व-म की पति के लिए बर को पापना चाहिए पौर रामको
कर बनाई याने बानी परियों को नमकीर बनाने के लिए पिसी राम
नक मिनामा पाहिए। कितु दोपछि पर स्थान पर पतंको
पौर राम स्थान पर प्रकड़ी में नमक मिलाता उसकी
की प्रपता कौन करेगा।

पावस रेमि रहीम मन, मोहन सापै मौन ।
प्रब रादुर बस्ता मए, हमको पूफ्त कौम ।
- बतु को पकर कोयत तथा होम मन में मौन बाप
लिया है। अब तो माफ ही बोलने वाले । हमारी पो कोई बात नहीं
पूठा । प्रमिमाम यह कि कुछ परसर ऐसे पाते। बब अभिगों को पुप
रह पाना परतापनका कोई पाबर नहीं करता पौर पुणहीन वाचाल
व्यक्तियों काही पोचबाबा हो जाता है।
(२११)
पूष्प पूर्व देवरों, तिय पूर्व पुनाप।
कहि रहीम पोऊन बने पड़ोस के साप,
पर्षकपि रहीम को कि पुरुष तो भूत-मतों की पूगा करणे। पौर
स्त्रिया भगवान राम को पूती ।। पुष्पों पौर स्त्रियों का पाप ऐसा मयता
है 47 पड़ा (सबन्नों) बाबमों का पाप हो।
(२१२)
फरणी साहनसके पति दी तासीर ।
रहिमन सीपे बालों प्यारो होत बबीर ।
प्रर्ष-रीम भी कहते है कि पतवम में पनीर का मोह पार
पाहनही बन सकता क्योंकि उसरा टेवा पनने का स्वभाव होता है। परन्तु
सिपाही का मोहरा सीधा नमते चमते पनीर घर में पहुंच पाताचो
बगीर बाबाता।
विप्रेष-(१) पत्र में रबीर की बात ऐसी होती है । सिपाही पापा
चलता हैपर अपनी पोरका बबीर पिट पाता है और सिपाही पीपा पमते
बनते दूसरी पोर पनीर पर में पहुंच पाता है तो बगीर बन पाता है।
(२) यहाँ पीम बी में ही बात को शनि पा सीपी पदिका
साम बताया।

(१४)
(२१३)
बा माया को दोष यह मो कब घट माय ।
तो रहीम मरिपो मसौ दुप सहि लिए बसायम
पर्व-रहीम पी कपिन का यह एक बहुत बगा रोप है कि
जब या कम हो जाता है तो बीवन से मृत्यु पञ्धी पटी है। एमों को सहले
हुए बौषित पने मे गरी प्रापति होठी।
मानमाम्म - मृपर टिक मारक का पामत भी यही करता है-
मुखान्तु यो याति नरो रयिता।
पूव परीरेण मृव स बीवति ।।
(२१४)
दुरबिन परे रहीम कहि पुरपल बयत मागि।
ठादे मत पूर पर जब पर लागत मागि
पर्व- रहीम कवि का है कि दुरे दिनो में तो किसी पुरे स्थान में
पाकर मी पापम मिया बा सकता है क्योंकि बार में प्राप मग पाती।
मान से मरने के लियसा पर में जाकर बचाव करमा पुरिमानी ही
सममी पाती।
म पेट के भरम को है रहीम एम बाहि।
पाते हापिहि हहरि करिये बांत कादि ।
पर्यापी बाहर बोलने बामे बातों को देख रहीम की कहवे
बिरे पेट को भरने में भी होता है। इसीलिए हामी गिविका कर
से निकाल लिए।
बिप-बीच विशामा या रात निपोरना बीमा प्रवर्मन के लिए
प्रयोग किया जाता है।
-
(२१॥
बड़त रहीम पमान्य पम पमै पनी माप ।
पट पड़ वाको कहा भीम मांग बो बाप ।
पर्व-पाम बी को हिमनवान मनुप्पो का ही पन वा पार

(१.५)
पमपाल मामों का ही पर घटता है।बो नित्य प्रति माम कर माता है
रिपके पास बन ही नहीं उसका क्या घटेवा बगा?
(२१७)
भाषी या रनमान की पौरव बाहिहीम ।
तरपि गौरि सुन बाम है पर है समु मनोम म
प्रर्व-पीम भी मीकि होनहार बनी प्रबल होती है कि उसने
पापा को भी मन में मेष दिया। पचपि महाष पार्वती थी पति फिर
श्री पार्वती मान्म्या ही . ऐसा सुना जाता है।
विमेप-बब युधिष्ठर हुए में अपने सम्पूर्ण राम्पको अपने पारों भाइयों
यहाँ तक कि अपनी पत्नी दोपहरी को भी हार गए तो उनको एक और पासा
भने का प्रबसर दिया गया बिसमे पर्त रखी गई कि यदि पुषिष्ठिर हार माते
वो पपी तमा चारों भाइयों सहित उनको पारा वर्ष पन मे रला होमा
मौर पर एक वर्ष प्रामात बास करना होगा। परियाबीत पाते तो नम्
पलाम का सम्पूर्ण राम दिया वायमा । किन्तु इस गांव को मी युधिष्ठिर
हार गए । फलस्वस गन्हान बाप पर्व बन में सपा एक पप प्रशात पास
में म्पतीत किए।
(२१८)
मन सों कहा रहीम प्रमु हग सो कहा बिवाम ।
रेविहगम नो पावर, मन तेहि हाप विहान ।
पर्व-पीमबी कहाकि मम पमान राणा प्रौर मेत्रों क समान
मम्मी औरणा मिल सकत । बिस प्रकार रामा मंत्री की समाह से कार्य
करता है पपी प्रकार मे बिसको देवकर पार ! मन भी उसी झप
बिक बाता है।
(२११)
महिमम सर मर फियो रहिमन बस भयमेष ।
सो पर्नुम पैराट घर रहे भारि के भेष ।
पर्व-दीम बी कहते कि विठ पपार बमपाती प्रापरवाह

समय पुप्पी और पाकाप को मादी से सरिमा का बही को
एषा विराट् के पहा स्त्री वेष मे रहना पड़ा।
विमेप-(१)बा पीरुप्स की अनुमति पनि-रेव सागर पर को
बना पा बा तो इम मे उसको गुमाने के लिए पर्या की। परन्तु परमे
बाणों से पप्पी और पापार को इस प्रकार प्रान्चारित कर दिया कि इसमें
से पानी प्रवेश नहीं कर सका पार पनि पपमा कार्य पूर्ण कर लिया।
(२) पर पुए में हारने के पाचात पापरवापर्व पर मैं मकर
पुरे तो रनोने एक वर्ष का प्रभाव बास का समय बिताने के लिए विपद् के
पर पने का निाम किया । युधिष्ठिर ने रामा को कुए में हारा देने
पामा कार्य सिमा भीमसेन ने रसोइये का सपारण किमा पमपूर
मला केस मे विराटी कम्मा को मुश्य मिशाने का कार्य बार विमा ।
एक बार की सभा में उर्वशी को निराध कर कारगी से
पयुमको एक वर्ष पुरपस्थ के गुणों से छम होने का माप मिला था। पनुन
मे सभापीही पति से एक बर्ष मिए भारीका पधारण किया
पौर विराट के महा थे।
(२२)
मान सहित विमाइ संस भए बगवीन ।
बिना मान अमृत पिर्म, राह करायो सीस ।
पर्व-सापर-मवन से निम्मे ए विष को भी सम्मान सीव पोका
मिबीबमरीनाम से विस्माताए पर बिमा सम्मान के अमृत पीने पर
मोणको अपना सिर माना पड़ा।
निमेष--(२) समुद्र में देवता और बालों सम्मिक्षित प्रयास
ममा गया। इस बारह रल वि।सनमें लिपपीपा।
विशारा
संसारमने सवारपता को प्रार्थना पर मपबाम पिप बत
मपासो लिए विपको पीकर काठ में धारण कर लिया। पतएमा
बपीपकरमाए।
(२) जग प्रमृत लिए रेस-वामन पाइने सपे तो भान विषय
मोहिनी का पारण करवा और पानी

को पाने प्रपृष्ठ पिनाया । पप देवता का म चारण करते देवतामों की पक्ति
में मिला ।पा। पूर्व तया पापा मेबो पवन पपस में थे पुनमी को दो
निम्युमे पक से पहाविर काट दिया। अमृत पी लेने पर भमर हो
पुगपा। प्रतः परया नषा सिर केतु कामाया ।
(२२)
यापान नियसंगनममत बगतककोप ।
बैर, प्रीत पम्पास बस होत होत ही होम।
मर्च-पीम पीछे कि पत्रता प्रेम प्रयास पौर कीति इनको
पाप कर कोई प्रासी बवार में उत्सम नहीं होता । ये पब तो पौरे धीरे ही
-
(२२२)
रहिमन प्रप्तमय परे, हित मनहित जाय ।
पषिक बये मृग बाम सों पपिर रेत बनाय ।
पर्ष-पीम पी करते है कि बुरा समय प्राने पर हितकर पस्तु मी
पतिकर हो पाती है । सगोनिया पाण से हरिषको मारता है, तो उसके
बाग पाने पर पाबाने पाते हरिस स्वयं के रह से हरिणका
स्वान पवाबबावा
(२२५)
रहिमन मोटा मगे बाबत है दिन राति ।
पिक पाकर पात है। तिनको कहा बिसात
पर्व-रहीम भी करते कि पब मुझ पर पारा मने जाने पर नियोग
पृषङ्ग पा रोनक रात-दिन बरती गती बी पौर पर जाने माने
मनुष्य की वो बात ही पया है । उसको तो चिलाने पामे की प्रसंसा करती
हो पाती।
(२२४)
रहिमन कुष्टिम भाग्यो, रिगरत दक।
चतुरल सकत है समय फ की एक ॥
पर्व-पीम भी करते । विस सभा मेरमाही नत्री मोदी

)
रमती है पसी प्रकार अवसर मिडम बाने का पतामा चतुर मनुप्पों
हम को परेवा रहा।
(२२५)
रहिमन पुपर बैठिये रेसि रिममि को फेर।
बबनीके दिम माबमति म ममि है और
म-पाम बी करते हैं कि पुरे दिनों का बकर पाने पर हुप होकर
पेठ पना चाहिए क्योंकि जब प्रच्छ दिन पाएँ तो बिसरे काम बनने में"
महौ भयो।
(२२६)
रहिमन मग नीवन बरे कान बेटे मैन ।
बाय बसानम प्रपत हो कपि मागे गप सेन
पर्व-रहीम पी कहते है कि इस संसार में किसी मतिमेमपने ही
जीवन में बाप्पम प्राप्त नही दिया।से राव के बीते बीजमरों ने उसकी
सम्पत्ति (मका) को सूट लिया।
(२२०)
रहिमम पाने बाप को पानी पिप्रतम कोम।
तासी गैस प्रकास माँ क्यों मालिमा होय ।
अर्ष-समासर धाए काले काले बालों को देखार पीमनी
कहते-बारन का पिटा समासा का कोई पानी मी नाही पीता वर
मला मादलका मार्य भी पाकाय तक कामा क्यो नही हो बापया । पित
व्यक्ति के पिता कालोप तिरस्कार करते बिसके यहाँका पामी भी माही
पौठे रस म्मठिका माम् (बीवन) को पन्धकारपूर्ण हो ही जाता है।
(२२८)
रहिमम ठरी पूरि को रही पवन ते पूरि।
मोठ पुक्ति को पुति गई ही पूरि की पूरि
भ-रहीम
बौकिमा पर भूमि की मठरी समान।
हमा परब ईसारा बांधी हुई मास की पौठना

गपुन म केस में पीएचपी है। प्रासहीन हो पाने
पषिक महाँ पवा
(२२६)
रहिमन तीन प्रकार ते हित-अनहित पहिचानि ।
परबस पर परोस बस परे मामिसा शानि
मर्ष-गाम भी कहा कि हमारे वि चिन्तकों पार पहित चिवको
पहिचान दीन परस्पामों में होती है-पूसरों के रस में पाबाने १५
प में इने पर पार कोई काम पड़ने पर (प्रबना मुस्लमा प्रापि मनाने
।। इन टीन प्रस्थापों में हमारे सपने शिकारी ही प्राय सहायत
(२५)
रहिमम मोरे रिमनि को कौन कर मुख स्याह ।
नहीं घनन को पर सिया महीं करम को प्याह
महीम पी करते। कि यह बीमन मोरे दिन का पोर है।म बाणे
मोनिप सकेर गावों में विवाय पाहि नमाकर कौन मुहकाना करे,
बन वो किसी दूसरे को भी दो बमना ही है और मप भपना विवाह
करना है। पर सभी को पाने के लिए प्रपवा बिगाह करने के लिए है।
लों का फामा होना पापसा होता है।
(२११)
रहिमन रानि पितर, तऊ मीचिये भोग ।
ग्यों परिवन सूसा पर हुमा बनावत सोम ।।
पर्ष-रहीम पीपोरानी बाहे पर रपि ही यों नहो
पससे मांगना सवित ही होता है। जैसे यपि मी प्रौर मुभा दोनों बन
काराम कमी पड़ी होती है पौरपा घोटा होता है फिर भी म
के मूड पाने पर मोगमा दुरवाते हैं।
४
रहिमन पररूपकार के करत न मारी बीच।
मांस रियो मिवि भूपी, मल्हो र बोधि।

पर्व-हार पोको परोपकारी पति पर-पार करते समय
मोह मापा नही करताबा शियि में कार लिए मरने पर
का मांस रिवा पा प्रौर महपि पीच ने रेवदायों के उपचार के लिए अपने
घऔर हदिनों तकरी।
रिप--(1) भब पवा शिवि वामदे या करो हम भरने मा
सम के लिए सरंक हो सका । अनि पूवर साइन बाराम
भारत मा मौर पिपि मह पए । भरमीत पावर गिरि की बोर
बा पिण। बार अपने पापको मोटा का पारा शिशा पगावर
बराबर मा मादले मनिार किया और अपना बरकार-नाटबर
बारा पर पड़ा ममे । म पो पर तुना पर पाए और पालना
मिर कार ने नो कमी भवमान सहए पौर रहोने कि काममा वाम
(२) र भामर को बता मोष किसी प्रकार काबीच सो विप्यु
रेमोन पर प्राप्त किया किबीर की हतियों से बने पचमुर को
माप वा पहेवा । बीच में मपने परीर को हरियो बाप देताको
२। सेबमे बचातुरको बारा पा सका।
(२)
रहिमन बह मेषण करत म्याधिन बारत साम ।
सप भूम बसत मरोप बम हरि मनाप के भाव
पर्व-पीमा गोहते है कि सिरोपायों के स्वामी मनुष्य हो
प्रनेक प्रकार की मिसा fer मी रोग रखा बाप महागते
परन्तु मे पा पार पक्षी पीरोष बा कर निवास करो।
रहिमन बात प्रगम्म की कलि सुमनि को माहि।
पातिते कहति महि कहत वे वानति माहि।
पर्प-पौन पिपान पए की वोपीवा सम्मी।
पौर मीना सीमो मोब रसको
पासका सामनहीं
करते परिवार का पानी नही।
-

(२३)
रहिमन विगरी प्रावि को बने नसरचे बाम ।
हरि बामाकाश तों तऊ बापने माम ।
प्रर्ष-रहीम पी पते किवो बात पारम्न में बिग बाती है, यह
किरन व्यय करणे मी नहीं बन सकती। रामा बमि को पाने के लिए
शायम कामगार काले बामे भववान वद्यपि म समय पाडापतक
सपए वापि सनको पावन नाम से पुकारा जाता है।
पिटेप-यय पग पात प्रनेक पाकर दुके तो न बिन्तित इमा।
अपमान विप्लू उसकी चिन्ता र परमे के लिए पौने सन्यासी के बेम में
पास के समीप गए और तीन पर पृमी मोदी । बमि देने के लिए तत्पर
होने पर होने पपना साकार गत बड़ा किया । ग्लोने एक पैर से पृथ्वी
पौर पूसरे से पाकाप नाप लिया। तीसरे और में बलि के सरीर को नाप कर
से पावाला मा बना दिया। इस प्रकार विठाम पाकार पारण कर
लेने पर भी 'बावन' नाम से प्रसिदए।
रहिमन मेपन के लिए काम बाति जो बात।
बोबो समरप भपे तो म को मरि मातम
पर्ष-सीय श्रीकाकिमपि चिकित्सा करने से ही मृत्यु पर विजय
प्राप्त की जा सकती हो बो बड़े समर्ष व्यक्ति एपो नही मर
साफिरों पर।
(२१७)
रहिमन यह वन सूप है मोर मगत पछोर ।
हतुम्न को हिमानरे पऐ राशि बटोर:
धर्म-सीम पी कहते है कि मानव मरीर सूप के समान है। इससे
संसार बीमति फटाकर मेमा पाहिए। जिस प्रकार मप मूसा पारि
हती पस्तुपों को पेग देता है पोर मन पापि पारी पत्तों को पता ।

( ११२)
उसी प्रकार मनुषको मौ पधार में प्रसार भावों को पोर ना बाहिर पी
दत्तकी बातों का संहकरमेना चाहिए।
-
रहिमम यों सुन होत है गत देसि निज गोत।
क्यों पारी सियां निरक्ष प्रांजन को सुन होत ।
पर्ष-रहीम बी पाते कि चित प्रकार बरी की मांगों को देखकर
मायों को सुबका पनुमय होता है रती प्रकार अपने पोत्र को पहले गएर
कर मनुम्म को मुख प्रतीत होता है।
(२१७)
रहिमम रबमीही ममी पिय सों होय मिसाप ।
मरो दिवस किहि काम को रहियों मापुहि मापन
--सीम जी कहते है मिही प्रची होती. बिहमे अपने प्रिय
मिलन होता है। मह दिन किम काम का मिसम प्रमे पपने पाप को
गमा परवा
(२४०)
रहिमन रहिमा की भलो नो परस चित माप ।
परसत मम मैला र सो मैया मरि जाय।
पर्व-रहीम बी कहते है पवि बने की रोटी भी प्रसन पित्त होकर को
योग मन्त्री किन्तु मैया की बनी हुई वस्तु जिसको देते समय लिएको
को किसी प्रकार भी नही मही। उसको तो पान मय बाम तो पञ्चा।
(२४१)
रहिमम राम सराहिये ससि सम सुखद बो होय।
पहा यापुरी मातु है तप्यो तरयन सोय ।
:-रहीम जी का कि उस पग्म की ही प्रमंसा करनी चाहिए को
लिए पर समान मुबरामक हो। उस बेचारे सूर्य का क्या ना
को समाप्त कर एकाकीही पवा।।
:बाता कि इस दोहे की रपमा रहीम की समय
हांगीर ने राम प्राप्त करने के लिए भाइयों का किया पा।
-

(४२)
रहिमन रिसि को पौरिके, करौ गरीबी मेस ।
मीठा बोनो मे सो सबै तुम्हारी रेस ।
मर्म-पाम बी पाकिमोष को त्याग कर परोष पक्तियों के
समान पाचरस करो। सबसे मपुर माणी पे बोलो । बिनम्र होकर चमो तर
तो सनी स्पान तुमारे अपने हो पाए।
रहिमम रिसि सहितमत महिं बड़े प्रीति की पौरि।
मुफनि मारति प्राईभीर विचारी पौरि।
महीम बी कहते । बड़े मोन कोष को सावे। पौर प्रेम की
मारा को महाँ बोड़ते । बब पर पाने के पहने पैरों पर मुक्के मारे जाते
तर मी बेचारी नार र कर पा ही जाती है।
(m)
रहिमन रीति सराहिमे मो पट गुम सम होय ।
मोति पाप पैगरि सबै पिया तोय,
पर्ष- होम बी कहते कि उस प्यबहार की सपना को पानी चाहिए
गोपौर रस्सी म्पपहर के समान हो । पड़ा और रस्सी स्वयं बोखिम
ग्य कर पूसरों की बात पिताते हैं । बब पाइए में पाता है पो रस्सी के
टूटने पर पोष्टने का रो रहता ही है।
(२)
रहिमन वित्त प्रपर्म को परत सागै वार ।
चोरी करि होरी रखी, मई तनिक में पार॥
पर्ष-पीम बी बह कि अपर्म का बल समाप्त होठे (बबवे) पर
महाँ ममती । चोरी करके वस्तुए होली में राम पर पोड़ी ही देर में
सर कप बार हो पाता।

( ११४)
(२१)
रहिमन विद्या पुम्द महीं, नहीं परम बस न ।
मू पर बनम वृपा पर पसु बिनु पूष विषाम।
पर्ष-विपर हीम कहते है कि जिनके पास न तो विधान मुनि
बिहनि न तो धर्म किया । म बस पनित ख्यिा है और म सान रिया ।
समका पृथ्वी पर जाम मेना म्पर्ष है। लोप तो बिना पंप पौर सीप के
(२४)
रहिमन विपना हू मतो जो बोरे रिम होय ।
हित प्रनहित या जमत में नानि परत सब कोम।
मर्ष-पीमबीपही कि यदि मापत्ति पुष सपप की हो तो या
पापत्ति श्री मम्मी है, क्योंक प्रापत्ति में ही सब विषय में पाना पा सकत
कि ससार में काम हिन्दू और कौन परिकारी है।
(१४)
रहिमन बेनर मर पुढे मापन बाहि ।
विम से पहिले मरे, निम्ह मुन्न निकसत माहि।
प्र-रहीम बीते कि मापना पुरा किन्तु मांगने वाले को
अपना उससे भी
पुको मयुप्प किसी से मांग बाते हो
मुवा समान है किन्तु बो वाचक को पुष भी देने से साफ मना कर दे
सनको हमसे भी पाने मरा हुप्रा समझना चाहिए ।
(२४)
रहिमन सुपि सबसे भली, सगी बो वारंवार।
बिपुरे मानुप फिर मिन यह भाम अवतार ।
पर्व-पीन भी कहते है कि स्मृति परिबार बार पाती बह
सबसे पच्ची बस्तु है । विठो हए मनुप्प पुन भिमते (ो इस मिमन को ही
अबतार पमना पाहिए।
-

राम न पाते हरिम सम सीय न रापन साप। मो प्हीम माबी कतई, पोर मापने हाप। पर्ष-रहीम पी मोकि यदि होनहार अपने ही हाप में होती तो म पो म सर्व मूषके पौधे बाते और पावन पीता ही रावण के साथ रंग पायो । म राम राबणार भी नहीं होता। (२१) रोति प्रीति सबसौं भती विहित मित गोत । रहिमन याही बनम की बहुरिम संपति होत । प्रगनिहाम करने कि सबसे प्रेम का प्यपहार ही पन्या गुणा हिवार नही। इस बम की मित्रता पौर पर तो इसी बन्म में पो। मामे बमों में पुनर मित्रों और संबधियों मिलन नहीं हो पाता । (२५२) रूप कपा पर बाद पट, चम बोहा लाल । म्योपयों मिरमति सम्म गति मोस फीम विसात पर्व-पीनी का किम कमा पर तुमार बस्न सोना दोहा पौर मासिषप-इनको गिनी सम्माdि सनी होना भूत्व गावा पाता है। पभिप्राय किन एका पास्तविक भूस्व सम्म प्टि पने पर ही बात हवा की निगाह से देखने पर नहीं। (२३) सिसीहीम तिमार में मई मान ही मान । परकर काटि बमारसी, पहुं मगर-पान । मई-एमपी को हर माग्य में शिक्षा होता तो कृष का अप हो बाबा से बनारस का पने पासा हर पर कार मने पर भी मायु के समय मपार हर मा पा । विच-ऐसा कहा जाता है शिकामी में मृत्यु पर मुठिहोती भोर मप- एर में परने पे मी । भकमान' में इन पावर की एक पाक -

। १५६)
मनुष्य राखीवास करने लगा पार ने अपने 47 लिए कार
बिससे पन्त समय पर कामी से बाहर कार दुर्गम
एक घोड़ा पसको मयार मे पया पार नहीं रखको पाई।
पोर ठहै।
(२४
पाफीम कामम मतो बात करिम मा भोग।
पु-मम्म पन होनई बसियो तषित म योम।
ot--होम बी ये है कि यु पापों के बीच मनिन शेष
पहना चरित महसमे तो मन में निवाम कामा पौरोको कोष
करना प्रषिक पन्ध।
(२५५)
होम मर पम्य है पर उपकारी अंग ।
गौतन बारे को गर्म, पों मेहनी हो रप.
भाई-फीम कीमते कि मनुष्प बम बिनम पर।
अपकार में समा पाई। जिस प्रकार मेहही बाटने मासे के पपरमें भी महर
कापसातही प्रकार पपेपकारीका पर भी सुपोषित होता।
सबै कहानै सकरी, सब सकर कहें बाय ।
रहिमन सेरह बोई सई सोई बगीर साय ।
पर्व-पीग बी करत हो समी मैनिक निक नाम से
पुकाराने पर सभी पांच में धीमाते है, पर मो भानीकोट सह
पखासीको पामीर पुकार में मिमी।।
(२५७)
समय परे पोधे मवन, सबके महे होम ।
समा सासन पर गहे गरा लिए हे भीम
पर्ष-रहीम मी का है कि भामर भाने पर इसकी म बाहों में
भी जमेना वाहिए । दुबोधन को पड़ा भावनोदी बाण क
सपास किया मिनु बनमाली भौम प्रपनी परा सिए पाप।

विशेष- - पुषिपिर बुर में अपने सारे एग्प पारों भाइयों पर गोपी को हार पए तब पुर्जेपन को पुटिलता सूमो । दुर्योधन के पास से पुसासन होपरी को पात पम पर सभा में बसीट नापा और उसको मम करने के लिए इसका बस्न सीपने लगा। पांचों पापर बैठे थे। भीम सब में प्रषिक बनपानी बा फिर मी पुए में मरा होने से पूछन कर सका। उप मेष पीकर पाना पड़ा । तब भगवान ने द्रोपदी का चौर बड़ा कर उसकी जान रखी। (२५८) समय पाय फल होत है समय पाइ मरिबात । सराई नहि एक सी का रहीम परितात । पर्प-रहीम बी कहते है कि उपयुक्त समय माने पर चूम में फस ममता पौर माने का प्रयकर माने पर मर पाता है । सका किसी को प्रस्वा एक सी नहीं रहती इसलिए इस समय पमतामा म्पर्ष । (२५६) समय साम सम माम महि, समय पूकि सम पूक। चतुरन चित रहिमन मगी समय पूक की हुक । प्रर्व- उपयुक्त प्रमतर का नाम उनने + समान कोई माम नहीं। पौर उपयुक्त परसर को खो देने के समान को गलती नहीं है। हीम की कहते है चतुर सोयाँ साब में उपमुठ प्रबसर निकस पाने पर उसका पमताबा बना ही पवाद। (२६) सरबर के पग एक से, बात प्रीति कपीम । पे मराम को मानसर एकै ठौर रहीम। पर्ष-रहीम काते कि बनावप पर या मामे पमी पब समान होते । उनका प्रेम न तो बढ़तामौर म पटता है परन्तु इसका निवास स्थान दोबत मानसरोवर ही होता है । पम्प पक्षी तो विभिन्न बनापों पर पाठे है पर ईट का प्रेम एक मान मानमरोबर से होता है।

(11) पूत परा स्वारग रचत होम सब, मो गुनह जग माहि । परे बड़े बैठे ससो, पप रप कुवर पाहि । अप-रहीम काते कि संसार में सब लोप पबमुणों से भी स्वार्थ सिरि र मेते हैं । मार्ग में पार की पाया में बोपो होब ठे रिनाते है । प्राय धूप से बचने के लिए मार्ग में मोहप रप रस माम मौष मोग बैठ पाते। वहाँ इमा पोका पाता है। (२९२) स्थासह तुरिय दो उम्परं तिय है निहत बित मानिये रहिमन तीम परित्तम पर्व-मोम की अवस्था ने पामे ' सोकी पनि का सच्चारण करने प्रबास स्पिर वित्त पाप्ती स्त्री सपा घर में सपूत बेटा ये तीनों परिष होते है। (२१) सापु सराहे सापुता ती बोहिता बान । रहिमन सघि पूर को बरी कर मर्ष-पीम कहते है-बात को समझनो कि सरवन पुरुष सम्बनता की असा काही गोषीपन को प्रसंसा परता और सन्चे बीर सौर्य की प्रसंसा उपकाबा मी कप्ता। (२२४) संपति मरम पंवाहक हाप रहत का माह। ज्यों हीम ससि पत है, जिस प्रकासहि माहि ॥ प्रर्वरहीम बी पी कि बिए प्रकार दिन में चन्द्रमा प्रामाहीन हो पाता। पपी प्रकार मोहमति पिसी म्पहन में पाकर अपना बन गैषा और ये नियम हो जाते है। (२५) ससि की प्रीतम परिनी, सुपर सबहि महाय । समे घोर पित में नटी, पटिहीम मन प्राय ॥ बमान।

पर्व-रहीम वापरते किममा को जीवन चरिती मुखर होती है
मोर सभी को मषिकर मनवी। परन्तु पोर चित्त बोबा पुरी चपाती।
और उसके मन में पूरी मावनाए प्रावी ।।
(२११)
ससि, सकोष साहस, सतित, माम समेह पहीम ।
बात परत यदि बात है, पति पति परिसीम।
मर्ष-रहीम बी कहते है कि धममा संकोच साहस बम (लरी भाषि
का) सम्मान पौर प्रेग ये सब बहते बसे गत बर पाते है।पर पाये
घटते तो पटते बटो सीमा तक पहुंच बाते सुप्त हो जाते है।
होत कृपा मो बोन को, सो कापि षटि नाय ।
तो रहोम मरिबौ भतो यह तुम्न सहोम बाय
प्रर्व-रहीन भी कहते है कि यो नोपों की पोपा हम पर होती है
परिपाकम हो पाय पोसख को साने की अपेमा भर पाना परिक
प्रभासयोकि यह महामही या समता है।
मोघे दो सतसंग रहिमन सबई अंगार ब्यो।
तातो बारे अंग सीरे का स
पर्व-दीम बी कहते है कि मुा मनुष्य का साथ प्रपार के साप समान
होवा पर सपको पोड़ देना चाहिए । अंगार पब तक गरम पवाब
परपरको बताता है और बबाहो पाता है तो घरीर को मनाकर
देता है इस सामों ही अपवार्मों में उसे हानि होगी।
रहिमम बग की रीति में रेस्पो रस जस में।
ताहू में परतोति बहाँ गोठ तह रस नहीं ।
प्रर्ष-रहीम बी हटे । कि यहां पर पाठ (मनोवामिय) होठीtal

१२.
से मूरम
रस (प्रेम) मही पता है। यहीं सार की रीति है। मने बि (मम )
पर यहाँ भी वही विश्वास हो गया कियाठ मे रस नहीं होता।
(२०)
रहिमन मीर पमान, र पै सोम नहीं
मान, प पू नहीं।
पई-सीम बी पाहते है कि जिस प्रकार बम पड़ा होने पर भी पत्पर
मरम मही होता उसी प्रकार मुन म्यक्ति की प्रवस्या होती मान दिए
बाने पर भी मूर्म की समझ में कुछ नही माता ।
भारताम्प- मूरख हरान रेत बोपुर मिनाहि विवि सम ।
(२०१)
रहिमन बहरा बाम गगन को फिर बों तिर।
पेर प्रथम के काम फेर प्राय बपन परे।
प-रहीम बीकहते कि पेट लिए व्यक्ति को क्या नही करना
पड़ता बार पर एक बार मुक्त होकर पाकाय मे पर बाता है (पमियो
शिकार के लिए) को फिर ग पृथ्वी पर परों उतरे ? किन्तु नीष पेट को
मरने के लिए वह पुन शिकारीपात भाकर बबन में पर बाता है।
(२०२)
रहिमम मोहिन सुहाय प्रमी पिमा मान बिमु ।
बरु विप देय दुताप मान सहित मरियो मसौ.
पर्व-रहीम दो बोकि यदि मुमको कोई सम्मान के बिना अमृत
मी पिनाये वो मुझे पता नहीं बनेपा पौर परि कोई सम्मानपूर्वक युनाकर
भी दो प्रयासमोवि सम्मानहीन बीवन सम्मान सम्मान पहिव
मुस्यु भती।
(२०)
माह मास सहि टेसुमा मीन परे बस पोर।
स्पी होम मग बानिए, पुढे प्रापुमे ठोर।
पर्व-माष मास माने पर टेसू का म पोर पुप्पी पर पड़ने पर अपनी

गरमा बरत नावी सभी प्रकार पधार में अपने स्थान पाने पर
संसार की प्रम्य बस्तुों की रक्षा होती है। जिस प्रकार मबनी बात से पृणी
पर पाबाने पर पर बाती १ ती प्रकार प्रन्य बस्तुमों की हालत होती है।
(२४४)
बाँकी चितवन बित गड़ी थी तो कछुपीम।
मांसी से बरि होत दुस, मादि म सकतडीम।
पर्षकमि रहीम को किटेपन बड़ा पुरावापी होता है । टेडी
हव में गा पातीसीधी उतनी नही गाती । यो बात (उपने
पाली बात) मे एप को गहा गुम होता है। और बब देशी पितरन प्रया
भटिम बाव मन में पुम बाती है तो निकालने पर भी नहीं मिल पाती।
-
मार घटेनरेस डिग बसे रहे का नाहि ।
न्यो रहीम कोटित मिले बिक जीबन बय माहि।
प्र-गरेप के पास में जाने से प्रारर पटवा से पास में बसे रहो
वो कुछ नही है । मेकिन अनेक बार मिन कर अपना पपमान करना तो निश्चय
पिसार योग है।
(२७)
रहिमन पाक कुम्हार को मांग पिया मोर।
देश में ग गरि हे नांव में मा
पर्ष-हीम फपि कहो कि महार को बार अनुमय से मारने पर
पीपक भी बनाकर नही देता मेकिन बब कुम्हार
बार में अपना ना
हामार माता वो रीपक तो बोटी सी पीच 1-4ह बड़ी नार (मिट्टी
का पड़ा पात्र) तक बनाता है। भावार्य या कि सीपी तरा
मारने पर कोई भी पोरी सी बीम तक देने को हैपार नहीं होता पोर पोर
जबरन फले पर ममयूरी बस बड़ी-बड़ी बात ये देनी पड़ती है।
विशेष-"श में रंगारिके"
पर्य प्रस्तीमता का भी पोतका यहाँ प्रामीमत पोच पा
पमा।

(१२५ )
(२७७)
यहरहीम निब संग से बनमत बगत मकोय ।
और प्रीति अभ्यास बस होत होत की होय ।
पर्व-पविबर हीम कहते है कि यता प्रीति अभ्यास प्रौर पपलको
कोई भी पति बम्म से बयत में पाप नहीं माता पपितु धीरे-बोरे ही ये बारें
प्राप्त होती।से बीरे-बीर परिपाकर ही पाता पौर प्रेम होता है।
प्रम्पास और पप भी एकदम प्राप्त नही होता पपितु इसके लिये भी एप समय
की अपेक्षा होती।
(२५८)
ये रहीम फीके दुषौ, बानि महा सतापु।
यो तिय कुबमापम गहे प्राप बनाई माप:
पर्व-सष्ट नही।
(२७१)
रहिमन कठिन पिसान ते पिता को चित देत ।
बिता बहति निर्गीय को, चिता बीब समेत।
पर्व-कवियर पहीम कहते है कि पिता से अधिक कारपर बिम्ता होती
हैबो चित्त को बकरती रहती है। पिता निर्जीव (ब) कोही बनाती।
मेकिन पिता दो सग (बिन्दा) मनुष्य को बिमाती रहती है।
भारताम्य-पिता पिम्ता समासाता विन्दुमात्र विशेषत।
पिता पति निबार्य चिन्ता पति सीप ।
रूप पितोकि होम तहे बहे बह मन मगि बाय।
पाके ताहि माप बह, मेत छोड़ाप छोडाय।।
मई-सको रेखकर बही यहां मनसप बाताबही मन को हटाने
की बार-बार दोषियको बाटोमकिन मन रेखते-देखते पता नहीं है।

(१२)
(२५१)
रहिमनमा र निसि पर ता दिन पर कर सोय ।
पम-पत कर लागते कहाँ पो होय ।
मर्य-अस्पष्ट।
(२८२)
बाह गई चिन्ता मिटी मनुमा बेपरवाह ।
मिनको कम्न चाहिए, वे साहन के माह।
पर्व-किसी प्रकार की इच्छा म होने पर चिम्ता पो समाव हो गई फात
मन पर परवाह हो मपा । किसी वस्तु को पार होने पर ही बसको प्रास
करणे तिमे चिन्ता सत्ता होती है और चिन्ता हो ममुष्ण को सबभनों मे
गये रमती प्रत चिन्ता के समाप्त होने पर मनुष्य मी बेफिकहो पाता है।
पौर विस मनुष्य को किसी वस्तु की कामना नही पती बासिर के ध्यान में
मन हे पाया है।
बिता दि परेहिए, टोरे परव नियाहि ।
सगे दुबैमा परखिए, ठाकुर गुनो कि माहि
पर्व-विन्या के समय युरिकी परख की पा सकती है पोंकि चिन्ता
अस्व मधिको दुरि राही मार्च-ईम मिलता है। बन कपाटे रक्त
स्त्री की परख होती है पोंकि पनाभाष में भी स्त्री साप रे ठो पसका प्रेम
परका समपना वाहिये।दुरे समय में सपे-सम्बधियों की परख होती पौर
बार की परम कर्म से होती है।
तासों ही कछु पाइये कोडे बाकी प्रास ।
रोते सरबर पर पर कैसे मुझे पियास है
प्र-विस कुन प्राप्ति हो उससे किसी वस्तु की पाबा करता
रचित योकि पानी से रित तालाब से प्यास की तृतिकरला पर्व ही
होपा।

(२७७)
यह फीम निम संग मे, बनमत बगतमकोय ।
और, प्रीति अभ्यास अस होत होत की होय।
पपियर होम करता प्रीति प्रम्पा और मप इनको
को भी बति बम्म से बयत में गार नही माता पपितु वारे-वारे ही में पारे
प्राप्त होती है। धीरे-धीर कृषि पाकर ही पाता और प्रेम होता है।
प्रम्मास पोर मर भी पपरम प्राप्त नहीं होता पपितु इसके लिपे मी व समर
की प्रपेक्षा होती है।
पे रहोम फीकेमो गामि महा सताए ।
यो तिय कुच प्रापम गई पाप बाई प्राप:
रहिमन कठिन विसाम से बिता को चित रेत।
पिता इति निर्जीव को, रिता बीब समेत
बरिषर रहीम कहते है कि पिता हे पपिक कार चिन्ता होती
पोपित कोण करती पोविका मिष (पम) को ही बताती है
मेकिन पिता तो रह (विम्बा) मनुष्य को है बमाती इतीहै।
भारताम्प-विधा चिन्ता समापावा मिनुपात्र विशेषतः ।
पिता पति निजी चिन्ता पति सबीप।
सपरितोदि रहीम तई बड़े बड़े मन ममि बाय।
पाये ताकाहि भाप यह मेत पोडाय घोडाय ।
पर्व-सको रेखकर वहाँही मन भरवावा यहाँ मन को हराने
को बार-बार काधिप की बाती सकिन मान देखते-देखते पता नहीं है।

-
(२८१)
रहिमन मा र निसि पर ता दिन उर कर सोय ।
पस-पस कर ते सागते बेतु कहाँ पो होय ।
पर्प-प्रस्पष्ट है।
(२८२)
बाह पई पिम्ता मिठी मनुमा बेपरवाह ।
बिनको कसू न पाहिए, ये साहन के माह ।
पष-किसी प्रकार की इम्यान होने पर चिम्ता भी समातहो पई फात
पर पर बेपरवाह हो गया । किसी वस्तु की चार होने पर ही उसको प्रात
करने के लिये चिन्ता ग्पन्न होती है और चिन्ता ही मनुष्य को ग्मनों में
गये रखती है चिन्ता समाप्त होने पर मनुप्स भी बेफिको पाता है।
पौर वित मनुष्य को किसी वस्तु की कामना नहीं हती पावर पान में
मन पाता।
(२९३)
चिन्ता पुद्धि परेहिए, टोटे परत त्रियाहि ।
सगे गुबेसा परलिए, ठाकुर गुमो कि पाहि।
प्रर्प-चिन्ता के समय पुरिकी परख की पा सकती है क्योंकि चिन्ता
वस्त म्पतिको पुरिराही मार्ग-पर्यन मिलता है । बन के पाटे पठ
चौकी परख होती है कि पनामाव में भी स्त्री पाच रे तो उसका प्रेम
पक्का समझना चाहिये । पुरे समय में सपे-सम्पषियों की परख होती है और
यहरको पाकर्म होती है।
(२८४)
तासों ही कछु पाइपे कोने बाकी प्रास ।
रीते सरपर पर गए, कैसे मे पिपास
प्र-विपसे कुप प्राप्ति हो सके उससे किसी वस्तु की भाषा करला
गचित क्योकि पानी रित तालाब से प्यास भी वृत्ति करमा पर्ष हो

(२५५) मोहे को मनोहार की रहिमन कही विचार। मा हनि मारे सोस पै, ताही की तमनार म प्रर्प-चीम विचार करके कहा कि हमवार को मोहे को कही बायेगी पौरन जोहार की मपितु समगार सस पीर की कही पापी बो वीणा से सिर पर मारकर प्रासाका पन्त कर देता है। (२८६) मनि मामिक महगे किये, सहमे तुम बस नाम । रहिमन पाते कहत है राम गरीब मेवाब पर्व-मणि-मारिएक्स सी प्रमी पिनास की वस्तुपों को तो समगाव में महमा कर दिया है मार दीन प्राणियो पौर सब मनुष्यों के काम में पाने बासी बस्तुएं- :-बाप बम और प्रन को सस्ता ही रहा है ताकि प्रासानी के प्रपनी दुपा तृप्ति कर बीवन-निर्वाह कर सके। कवियर पोम इस बात को प्टिपत करते हुए कहते है कि इसीलिए ठीक हो भगवान को बरोषों का ध्यान रखने वाले बीमवायु माम से सम्बोधित किया जाता है। 'तुलसी बाने मुनि समुझि, पासिन्दु पुष । मही मान बचन किए, सौ वग मम नाप ।। (२८७) मन रारा प्रद सुतन सों समा ऐमित चित्त । महि रहीम को मस्यौ मा बिम को मित्त । मर्च-सम्पति श्री भोर सन्तानों में ही मनुपका मन सब रमा पता लेकिन विपत्ति काल मे काम इममें से प्राने वाला कोई भी हष्टिगोचर मही होता। (२८०) रहिमन विप्राह बिमाधि है साह तो बार चाय । पापन बड़ो पता है रोल बनाय बनाय।- भावसाम्य-

( १२५)
मर्य-पिवर पाम या कि विमा एक म्पाधि के समान है-स
पाधि बच सकते हो तो प्रयत्य चोरोत बबा-चबाकर पौर पानन्दित
कर मनुष्य के रों में बेड़ियो चरी पाती है और यह प्रायम बबात में
पाया है।
(२८९)
रहिमन सभी बाम ते प्यारा होत रखीर।
फरनी मीरम सक, टे की तासीर ।
पर्ष-रहीम कवि पाते कि सीपी चाल ही भयकर होती है क्योकि
पवमरेन में पानी पान बनकर ही प्यारा बगौर तक हो जाता है और
करपा ऐन वमने के कारण मौर भी नहीं बन पाता।
(२१०)
रहिमन सोबे मम बहा रसन की सामि।
वही गांठ तहे रस महीं, यहीं प्रीति में हानि ।
पर्व-पीन पाते कि मचा रस को बान किन्तु उसकी गांठ में
पहा कि रस पषिक होना चाहिये यहाँ पर रस नहीं होता । ऐस ही प्रीति में
मोठ परवाने पर प्रेमही पता।
बो विषया संतम तबी मूब वाहि सिपटात ।
क्यों मरगलतबममकर,स्वानस्वार सोबातम
पर्व-मन्त मनुप्पो बिन विषय वासमायों का स्वाम कर दिया है
रमी विषम्-मासनामों में पूर्व मनुष्य लिप्त होते है। जैसे कि मनुष्य मिसे
पपन करणे त्याय रेखा है-त्त पये बरे हो स्वादा करो।
(२९२)
हरी हरी करना करी सुमी मो सबमा रे।
उग उप मरी उताबरी, हरी भरी।

प्र-करियर दीम भगवान की पतयस्तमा र परिचय देते हुए कारे
हिरिने प्रार्पना सुन कम्पा करके दुकाइरस म्यिा । बर पर
पर प्राणों का संकट पा सका था तो उसकी कम्णा पुकार को नुनकर में उता
बमे होकर मापे ये पौर बगराम के पुख
को हर लिया का प्रति पसबाट
का निवारण कर दिया था।
विशेष-पौरासिक वा कि गवराव मानक समय मपासुन
में पस पवा बा पौर उसके प्राणी पर बोर संकपा मया पा। इस समय
बीन होकर मनराम पवार को पुकारा पा पौर मपान रिमा बती
कातर पुकार सुनकर ताण पराब का स्टर करने गये।
मानदार-अनुप्रास, पुनातिपकार मोर पमक।

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Rahim-satsai

Author
Arun Visvmbhr
Title
Rahim-satsai
File name
Rahim-satsai
Text
OCR done
Citation
1962
Published
2010/12
Publisher
Agra,vinod Pustak Mandir
Language
Sanskrit
Pages
134
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514656
Barcode
4990010022353.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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