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Puranvilas Tathach Gopechandrvinod
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LALJALA श्रीवृन्दावनविहारिणे नमः। पूर्णविलास। तथाच- गोपीचन्द्रविनोद +ODike- श्रीमत्परमहंसोदासीन शिरोवतंस- स्वामि ज्ञानदासजी के शिष्य गोपालदासनेनिनिमित किसी IUM उसी शिवलाल गणेशीलाल अपने लक्ष्मीनारायण यन्त्रीत मुरादाबाद में छपाकर प्रकाशित किया दोहा। गाथा पूरण भक्त की, अवश देखने योग ।। अङ्ग कटाये धर्म हित,त्याग सकल सुखभोग।। प्रथमवार १५०० संवत् १९६२ इसके सम्पूर्ण अधिकार अन्य कर्ता ने स्वाधीन रक्खे हैं,
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हरिजोरम्। विज्ञापन. सर्व महाशयों को विदित हो कि १८२४ वर्ष हुए हैं श्रीयुत महाराजराजा. शालिवाहन जी को भये तिनके पुत्र श्रीमत्पूर्णजी परमधर्मज्ञ धर्मधुरंधर हुए हैं जिनके जीवनचरित्र के सुनने से अत्यंत अधर्मस्थ पामर मूढ पुरुषों को भी स्वधर्म में रुचि उत्पन्न होवे है तिन दोनों पिता पुत्रकी धर्मनिष्ठत्ता द्योतन करनेवास्ते दोहा चौपाई सवैया कवित्त आदिक भाषा छंदोंकरके श्रीयुत पूर्णजी का चरित्र पूर्णविलासनाम' यह ग्रंथ रचा है करुणा शृंगारादिक विविध रसों करके भूपित है. ऐसा यह मनोरंजक काव्य है कि जहां से आप देखेंगे वहांसे ही आपको मिय लगेगी जबतक दो चार पाठ नहीं करचुकोगे तबतक आपको संतोष नहीं आवेगा यद्यपि इसका चरित्र पंजावदेश में अत्यंत प्रसिद्ध है वहुत कवियों ने अनेकप्रकार से काव्य करा है परंतु वे सर्वकाव्य पंजावी वोली में हैं और पंजावी गुरुमुखी अक्षरों में ही प्राय: छपे हैं सर्वदेशकै उपयोगी नहीं हैं किंचश्रुतिस्मृति पुराण इतिहास पिङ्गलकाव्य अलङ्कार से भी वे ग्रंथ बहुत विरुद्ध हैं पंजावीलोक भी जो साक्षर हैं उनको वो ग्रंथ प्रिय नहीं लगते हैं किंतु केवलं कहानी किस्सा के समान बालक वांचे हैं तिनमें से विरुद्ध अंश निकासके योग्य अंश का ग्रहण करकेश्रुतिस्मृति पुराण इतिहास पिङ्गलकाव्य अलङ्कारों के अनुकूल..सर्वदेश के उपयोगी सरल व्रज भाषा में यह पूर्णविलास ग्रंथ रचा है इसमें जो कोई संस्कृत कठिन शब्द थे उनकी टिप्पणि भी करदी है नाटक की रीति (१) से इसका कान्य है नाटक करनेवालों को बहुत उपयोगी है हरतरह के पुरुषों के मनको प्रसन्न करनेवाला है धर्मशास्त्र भक्ति ज्ञान वैराग्य शृङ्गारानिक अनेक विषय इसमें आवे हैं सर्व कवि- जन पाठकगणों से सविनय मार्थना है कि जीवभाव से जो कुछ इसमें मेरी भूल होवे सो शास्त्रानुसार शोधलीजिये परंतु तिस तिस छंद के शानविना दीर्घ को इस्व इस्वको दीर्य नहीं करिये यदि काव्य कोश अलङ्कार छंदोमान आपको यथावत् है तो आप मालिक हैं अविवेषु । किंच इसके आगे गोपीचंद्रविनोद है सो भी अद्भुत अलौकिक चरित्र है माता ने स्वयं उपदेश करके अपने पुत्र श्रीयुतगोपीचंद्र राजा को फकीर करा है तथाच वराग्यभास्कर तो आपने सुना होगा जिस में संन्यास का अधिकारी तथा काल धादिक वर्णन करे हैं मूल संस्कृत श्लोक भाषाटीका सहित है संवत् १९५२ में श्रीकृष्णदास क्षेमराज के श्रीवेंकटेश्वर छापाखाना में छपा है । तथाच भक्तिप्रकाश अब छपने को तैयार है जिस में नवधाभक्ति पराभक्ति का वर्णन है मूल संस्कृत श्लोक भाषा टीका सहित है। और गोपालविलास ग्रंथ अब रचके तैयार करा है दोहा चौपाई कवित्त सवैया हरिगीतिका आदिक, नाना भाषा छंदों करके भूषित है जिसमें आनंद कंद श्रीकृष्णचंद्रजी के चरित्र हैं प्रमाण ग्रंथ का ४०० पृष्ठ हैं भगवत् की इच्छा अनुसार समय पाकै वह भी उपजायगा। शुभंभूयात् हरिश्म्। .
18. श्रीकृष्टगमगवते नमः पूर्णविलासर कविवचन दोहा। पूरण जाको भक्त है,जो सब पूरण वास ॥ सोई प्रभु पूरण करे ,पूरणभक्तविलास ॥१॥ विक्रमजीत सुवंशमें, शालीवाहनभूप । भये देश पञ्जाबमें,स्यालकोट आनूप ॥२॥ भूपतिकी दोभारया, बड़ी इच्छराजान ॥ छोटीलूणा जासने वशराखा सलवान ॥३॥ बडीनारिके उदरसे,भया पुत्र गुणखान ॥ सुनकर भूपति ज्योतिषी,बोले कर सन्मान॥४॥ जातकर्मकर लगनलख,रच टेवा मतिमान॥ लगेसुनावन दोषगुण,पण्डितकर व्याख्यान पण्डितवचन झूलना-छन्द । सुनो भूपजी पुत्र है भागशाली, हरीभक्त वीरक्त १ शालिवाहन । २ नांदीमुख श्राद्धादिक । ३ पञ्जाव में झूलना छन्दको वैत कहिते हैं।
(४) पूर्णविलास । . ओदार भारा । गुणज्ञान से पूरण है नामपूरण, भक्त- राखिये धर्मको जानवारा ॥ प्रकट होयगा लोक में तनुजतेरा, इसे वंदना करेगा जगत् सारा । नहीं दे- खना पुत्रको वर्पवारां, पुत्र हर्प अरुशोक का देनहारा भवचन-सवैया। जयहो नरनाह उदारमते. तुमरे यशकी धवला जग- छाई। हरि क्षीरपयोधर खोजत हैं,नहि पावत हैं तिसको जलशाई । शिवखोज़त हैं रजताचलको कैरिको सुर- राजदशोदिशजाई । अवराड्ड विलोकत है शशिको कमलासन देखत हंसप्रधाई ॥७॥ कवि वचन दोहा। पण्डितनाई भाट पुन विदा करें अवनीश । भूषण भोजन वस्त्र धन,देकर बहुवखशीशा॥८॥ पांच वर्ष के भये जब, पूरणभक्त सुजान। पण्डित से पढनेलगे, भक्तिकर्म विज्ञानः ॥९॥ पण्डित वचन भूलना-छन्दः । प्रथम पहिर उपवीत.शुभकर्म करना,करो संधियो- पासना होम प्यारे । भजन पाठ अरु गायत्री जाप AAAANI १ समुद्र२ कैलास । ३ ऐरावत इस्ती।,४'ब्रह्मा।
प्रथमोऽङ्का (५) करिये, शस्त्र अस्त्रको सीखिये धनुषधारे । सत्य बोलना पाप नहि भूल करना, मातंतात को कीजिये नमस्कारे । सदा कालको जानना सीस ऊपर, राम देखना सर्वमें नाहि न्यारे॥१० कवि वचन दोहा। भये युगल दशवर्ष ज़ब, वचन भूपका मान। गयाराजदरबार में, पूरणधर्मनिधान॥११॥ नमस्कार कर भूपको, सबको कीन जुहार ।। अतिप्रसन्न होनृपतिने,पूरणको उरधार॥१२॥ दिये दान बहुभूपने,हर्ष न हृदय समातः॥ पुत्रसगाई कारणे, कहत सचिवसों बात॥१३॥ राजा वचन झूलना। सुनों तात वाज़ीर मैं धन्य जगमें, बडे भागसें ईश ने तनुज दीया । पुत्रदूध सामान्यं नहिं लोकमाहीं, जिने तनुज़ जायातास सफलजीया ॥ पुत्रजन्म उ- त्साह सब देखिया में, चित्तं चाहता पुत्रवीवाह कीया। सोंप राज्यका भार अब तनुजताहीं, करूं भजन मैं जास से मिलत पीया ॥१४॥. पूर्ण वचन झूलना। सुनो तात अपराधमम माफकरिये, वचन फेरना ,..
(६) पूर्णविलास धर्म नहि पुत्र केरा। करो जिकर ना तात उदाहकाजी, नारिनागिनी से डरेचित्त मेरा ।। नारि नाहिरी जासके धाममांहीं नहीं पुत्रसोमित्रनहि दासचेरा।मुझेबांधके बेडियां डालनाही,हाथजोडके भाषता पुत्रतेरा ॥१५॥ कवि वचन दोहा। दुखितभयानृपवचन सुन,जिममधरी बिननीर। नृप समुभावन कारणे, बोले चतुर वजीर॥१६॥ मन्त्रीवचन झूलना। करो सोच नहि वालका दोषकोई, सुनो राज महा- राजजी चित्तलाई । नारि संगके सूखका ज्ञान नाही, अवीवालको भोग का ख्याल काई । मरे भेके जिम जीवते लोकमाही, भाद्रमास में जवी वरसात आई। दिवसरात चाहे मनुज नारिकोजी जवी आय जुवानी ने जोरपाई ॥ १७॥ कवि वचन दोहा। सुनकर वचन वज़ीरके, भूपति उर हर्षात ॥ पूरणको आज्ञा करी, दर्सहेत युगमात॥१८॥ राजा वचन झूलना। नमस्कार करिये जाय मातरां को, पुत्र धर्म को १ विवाह । २ मेंडका : प्रथमोऽig (५) सर्वदा पालताता। जास वासते पुत्रको लोकचाहे, सुखी कीजिये बंधुजन तात माता।।पढो शास्त्रको चित्त लागाय के जी , उभय लोक में होय गो कूशलाता। जवी चाहगा आप वीवाह को जी, तवी करेंगेलाल जी साकनाता ॥ १६ ॥ कवि वचन दोहा। लघु माता के मान हित, लगा के शुभद्वार।। बाहिर मत वैठाय के,पूरण गया कुमारा॥२०॥ पूर्णवचन झूलना। पूर्णनाम में पुत्र सलवान का हूं; करूं.मात जी आपको नमस्कारा। कृष्णराधिका रूप हैं तात माता, बडे भागसे करा है.दर्स थारा॥दयामात अरु तात की पुत्र को जी, उभे लोक कल्याण. है वट चारा । माथ. हाथ धर मात आसीस देवो; पांउ भक्त गोपाल की धर्म सारा ॥ २१ ॥ कवि वचन दोहा। देख पुत्रके रूप को, मोहित हो नृपनारि ॥ बोली लूणा पापिनी, मान पुत्र को जार ॥२२॥ लूणा वचन झूलना। वृथा झूर की मात बानावना है, पियादूध कब बैठ १ सेवक ।
TITIVY पूर्णविलास के गोदमेरे । जना औरने और को मातभावं सोच समुझ नहिं आवती चित्ततरें। उमरएक तेरी मोरदेख प्यारे, मौजमाणिये पलंग में बैठकरें । वलिंहार जावू तर रूप सों मैं, मुंजा सोहिनी मेला कंठ मेरे। २३॥ पूर्ण वचन झूलना जासनारितू सोउ है तात मेरा,गुरू दौर तू पूज्य हैं समुझ माई । पुत्र जानके प्यार तुम देवनाथा, पापं वाक्य वोलें किधों भागखाई ॥ धोड अप- धर्मको करें हैं तू , पाप बुद्धि.तैने कहो कहां पाई । बुरे कर्म जंब मात से पुत्र करसी, तवी मेदिनी उलट पातालजाई ॥ २४ ॥ लणा वचन भूलना। रची नारिनर हेत: करतार ने जी, भोगभोगने में नहीं पाप काई। वामशास्त्र में शंभु ने आप भाखाः | सर्व नारि भोगो तजो एक माई ॥ देवलोक माहीं एक नारि को जी, पिता पुत्र भोगे गुरू शिष्य भाई । नारि संगसों पाप दिज झूठ बोलें, भरम त्याग वैो पलँग हर्ष पाई ॥२५॥ पूर्ण बचन झूलना। करें नरक में वास गुरु नारि भोगी, शशी सूरजौंलो १ पिवा । २ स्त्री। N प्रथमोऽg रहें व्योम माई । कहा आप करतार ने वेद माही, नहीं ब्राह्मणाकहा है झूठकाई। किसी मुढ ने भाखिया वाममारग, कहें रुद्रका झूठही नामलाई । पाप पुण्य लागे सदा भूमिमाहीं, नहीं नाक में पाप अरु पुण्य राई ॥ २६ ॥ लूणा बचन भूलना। राजपुत्र सुंदर सुनो वात प्यारे, मुझे ज्ञान उपदेश कर बंचनाहीं । तुझे कंठ लावू हृदय शीत होवे, फसा चित्त मेरा तोर रूपमाहीं। कहा मान मेरा अभी भूप सुन्, यदी जीवनेकी तुझे आसकाई । तोर रुधिर से हस्त प्रक्षाले करके,अन्नखाउँगीनाहि तो मानजाई २७ पूर्ण बचन झूलना। सुनो मात ओठाय के हस्त भाखू, तोरि सेजपर पैर ना भूल धरना । गैरल खावना मुझे मनजूर माई, खडे शूल में चढन काबूलकरना ॥ नहीं दाग लागांउँ गा वाप दादे, अनलकुंड में कूदके आप जरना। टूक टूक कर शस्त्रसे काट डारो, सुनो धर्म को त्याग के नाहि मरना ॥२८॥ कविवचन दोहा। पूरण लूणा सदन तज,गया मातके द्वार । १ स्वर्ग । : धोयके । ३ जहर। tim aantar (१०) 48पूर्णविलास करी वंदना मात ने, लिया गोद बैठार ॥२९॥ इच्छरा वचन झूलना। चिरंजीवातूं मांत वलिहारजायें,उदासीन क्यों तात मुखचंद्रथारा। यदी घाम का देह में दुःख कोई,कर सना- न अरुपीजिये शीतवारा।यदी भूख लागी तुझे लाल मेरे, खावपूपका चौरियांक्षीर थारा।कहों तात संकोच को त्यागकरके, करूं दूर तेरा अबी दुःख सारा॥३०॥ पूर्णवचन भूलना। नहीं घाम लागी तनु मातम रे, नहींभूख पुनप्यास कीवात कोई । गया आज लघुमातके गेहमाहीं, मुझे देख लूणा बुरी आंखहोई ॥धुरी दृष्टि. देखी ज़वी तास कीमैं, तवी भागिया मात अपधर्म जोई। करूंसोच मैं मातजी भूपताहीं, कहाबात. सीखायगी मातसोई ३१ इच्छंरावचन भूलना. रहो नित्य आनंद मैं लाल मेरे, सुनो सोचना की- जियेतात कोई। हरिश्चंद्र भूपाल रौतास का वा, भया पांडों का प्रतीपाल जोई ॥ नहीं धर्मको त्यागना लोकमाही,तुझं होयगाधर्म साहायसोई। नहीं सांचको लागतीआंचबेटा, नही धर्मसामान्य है मित्रकोई३२॥ LAAAAAAAA मंथमोऽङ्का कविवचन दोहा । :: :: गया रातको भूमिपति, लूणा केराहमाहि ।। भूषण वसन तयागके, पंडी भूमि में जाहि ३३ देख दशा नृप नारि की, भया भूप उरदाह । मन प्रसन्नहित तासके,तब बोला नरनाह३४॥ राजा वचन झुलंना। . कहो भामिनी गेह है शून्य कैसे नहीं जागता है श- मादान कोई।कहो हार श्रृंगार को त्याग कैसे, वस्त्र जे- वरोत्तारके भूमि सोई।। फटेचीर पहिरे चित्तखिन्न कैसे, प्रिये खोलके सीस को काहि रोई।अबी बोलती क्यों न- ही साथ मेरे, कहो कौनसीआजतक सीर होई ॥३५॥ लूणा वचन झूलना। नहीं भुलहै आपकी प्राणप्यार बुरे भागमेरे मुझेदुःख- होई । उसे आपने दुःखका हाल नाखे, कहा नीतिमेबां- टके लेतजोई॥ नहीं दीसता लोक में जीव ऐसा, दुः खा जीवके जौनसा दुःख खोई । लगादुःख जैसा मुझे आजराजा, नहीं औषधी है विनाकाल कोई ॥३६॥ राजावचन-भूलना। करूं भूप कंगालको भाख जोतू,महीपालकोदेश नी. १ दीपक।
(१२) पूर्णविलास कास देवू । बुराजासने आपका कीन प्यारी, अभी ता- सके प्राणं नीकासलेबू ॥ प्रिये भाख जोत करूं हाल- सोई, करे बाजे प्यारी नहीं अन्न जेवू । करुं पुत्रकील- क्ष.सौगदराणी, कहूं सत्यदेवी नहीं भूठ सेवू ॥३७॥ लूणावचन भूलना। तोरपुत्रआया आज धाममेरे, पुत्रजान में गोद वै- अन लागी। सुनो भूपजी देखके रूप मेरा, जली रणे के हृदय कामआगी॥ हृदयसाथ लानेलगा पुत्र मोको, बुरी दृष्टि से दुष्टकी बुद्धिभागी । लगी करन पोकार तो भाग गेया, करें पूरणेने उभे वंशदागी३८॥ उसे देखके लगतहै आग्निमोको, खान पान लागें सवी- भोगखारो। यही चाहती हूं अवीपूरणे के, हस्त पाद को काटके कृपडारो॥ तासरुधिरसे पाणि प्रक्षाल पानी, पिवू पूरणेने मेरा चित्तजारो । नहीं दोप दुपुत्र के मा- रने का बुराआदमी मारना धर्मथारो ।। ३६ ॥ कविवंच दोहा। लगाके सुन वचन नृप,धरणि पड़ा मुरछात॥ जिमकिरातकेवाण से,मृगशावक गिरजात४० रुदनकरत पिलभूपको, पुनबोली नृपनारि ॥ १-बिना भील ३वच्चा४िदेखके ।
५. मानो लवणं बरूर है,प्रथममारतरवार॥४॥ प्रथमोऽङ्का (' १३) लूणा वचन झूलना। पडे भमि क्यों भपजी गेह जाबो, संबी देख ली- नाअवीं ज़ोर तरा।इसी वदन से हालतूं भाखता था, करें कौन से ज़ोर दुख दूर मेरा॥रखो पुत्र प्यारा नहीं दुःख पावो,धर्मत्याग के कीजिये नरक डेरा। मरूंमारतरवार मैं पास तेरे; अयश होयगालोक में भूप तेरा ॥ ४२ ॥ कवि वचन दोहा। व्यथित सर्पपद पर्ससम, करके क्रोध नरेशः॥ लूणा सें बोलत भया, प्रलये यथा महेश४३ राजावचन चौपाई। सुनो पापिनी नारिअभागी। तुमें कुमति यह कैसी लागीं। पूरण वाल बुद्धि अति भोरा । यह परपंच सकल है तोराः॥४४॥ नहि देवे हरि तोसम नारी। कुलचंदनातरु भयी कुआरी ॥ पाप विचारत भयीन पीडा । वचन कहत मुख पडेंन कीडा॥४५॥कैकेयी सम तूं भइ नारी। चौदें लोक भयी तव स्वारीनारि घात अघ डरूं न जोही। कार्टू सीस तोर सुतद्रोही ४६. अवी समुझ नहि फिर पछतावे। नरक समानं सदा दुखं १-फजीता।
पूर्णविलास पावे ॥जाविध धर्म पुत्र नहि जाई । सोच हृदय सो करो उपाई ॥४७॥. लूणावचन चौपाई। धर्मराख चाहे सुत राखो। दो नहि होत तथा क्यों भाखो ॥जो पूरण कल नहि मरवावू सुन नृप गरल खाय मरजावू ॥ ४॥ कवि वचन दोहा। अतिकठोर सुनवचननृप, पडाभूमि मुरछाय॥ हायपुत्रहापुत्रकह, तडफत राबविहाय॥४६॥ भयाभार जब सचिववर,गया भूप के द्वार ।। लूणाको पूछतभया, नपकीदशानिहार॥५०॥ मन्त्री वचन झूलना। भया आजके मातजी धाम तेरे, हरीयान भीताफपी फूर्तकारे शशी सूर आकांश सें भूमिमाही, गिरेदी- सते राहु के भीतिमारे.॥ डरा सिंह सेवा करी राजराः पी, बली नसें वा डरेदान वारे । डरे पापवाझंडके बोलनेसें,गिरे नाथ. मेरेमहीपाल प्यारे ॥५१॥ लूणावचन.चौपाई। पूरण पूरण भूप पुकारी । करी वितीत शर्वरी सारी॥ जावो तिसें बुलावो लाई। पूछे भूपति को सोआई५ २ १ गरुह । २ वासलेवे है । ३ भय । ४ इंद्र। ५ रात्रि.।
RAA प्रथमोऽign (१५) कविवचन दोहा। सुनकर वचन बज़ीर तब, गमना पूरण द्वार॥ समाचार सब भूपका, भाखा तिर्से उचार५३ मंत्रीवचन झुलना। सुनो राजसुकुमार उोदार भाई, पडे भूमि में भूप जीतात थोरे । पुत्र पुत्र पोकारते रातकाटी, करे रुदन अरु धरणि में सीस मारे॥चलो देखिये भूप को पूछिये जी, विना पुत्र को तात के दुःख टारे। पड़ी कोप आ- लय सुनो मात लूणा, नहीं जात जाने नारि चरितसारे कवि वचन दोहा। सुनकर वचन वजीर के, समुझमातकीचाल॥ चले इच्छरासहितदो,जहांपडे भूपाल॥५५॥ करप्रणाम पूरण नृपहि, पूछत है कुशलात॥ देख पुत्रको भूमिपति, वारवारउरलात॥५६॥ पूर्ण वचन चौपाई। कहो तातक्यों भये दुखारे. तवहित त्यागू प्राणपियारे। जिससुतजियतजनकदुखपाई,सोमुततातमूत्रश्श्रुतिगाई लूणा वचन चौपाई। भूलगया कलकीतूंवाता। पूछत भोले भावद जाता ॥ - १-भवन ।
(१६) पूर्णविलास जैसी तुम कीनी ममसाथा।अबही सोफलपावोहाथा५८ अनुज-बधू भगिनी सुत नारी।यह समान कन्यामहतारी इनें कुदृष्टि न देखे कोही। बिन तुमरे पापी गुरुद्रोही पूर्ण वंचन चौपाई। जो.अघ मातपितागुरुमारे।मोवधसों भूसुरपुर-ज़ारे । अघलागो सोमोको ताता।जो कुदृष्टि देखी मैं माता६० तप्त तेल में हाथ गिरावू. गरम लोह को सीस उठावें ॥ दग्ध होय जोएको वारो दंड दीजिये नयननिकारो॥६१ राजावचन चौपाई। सुनो तात नहिपातके तेरा । यह अभाग सबजानो मेरा । तो समपुत्र ईशने दीनाः । वैरिणि नारी ने हर लीना॥ ६२ ॥ जो नरनारिविवश जग होई । चार पदारथ खोवत सोई॥जोजन करत युवति विश्वासा! सो.मूरखपावत दुखरासा ॥ १३ ॥ :: कविवचन दोहा। सुनकरवचन नरेशके, तमक उठी नृपनारि ।। सबके उरघायल करत,जीवलियेतरवार६४॥ लूणा वचन चौपाई। तुम धर्मज्ञ पुत्रं तवसाधू। झूठ बोल पडनरक अगाधू ॥ चारचमार वेगवुलवावो] कूप समीप पुत्र लेजावो॥ १ ब्राह्मण।
प्रथमोऽg+ (१७)
करपद विनकर सुतको गेरो।तब दुख दूर होयगोमेरो६५
राजा वचन चौपाई।
सुन वज़ीर यह भाखतजोई। धरधीरज करियेतुम सोई॥
तनधन सुतनारी सबजावो। सुनधर्मज्ञनसत्यनसावो
इच्छस वचन चौपाई।
युवतिहेतजोसुतमरवावो। चौदहलोकअयशतुमपावो
सुतयुत प्राणजायँगेमेरे। यहसचकौन कामहै तेरे ६७
मंत्री वचन चौपाई।
सुनोनाथयहसाँचीभाखता क्योंकुलनाशकरोसचराखत
निष्कलंक सुतजोमवावोतोतुमउभयलोकदुखपाचोइ..
राजावचन चौपाई।
शिविदधीचहरिचंद्रनरेशा। सत्यहेत बहुसहे कलेशा॥
दशरथ पाणप्रियेघनश्यामा। सत्यहेत त्यागे सुतरामा॥
सत्यरहा रहिया सबकोई । उभयलोक सतकी जयहोई।।
जातसाथ नहिसुतपितुमाता।सत्यधर्मएकासँगजाता।
कविवचन दोहा।
नृप मरज़ी लखसचिवने, बोले चार चमार ॥
हाथ पकड़कर लेचले, पूरणभक्त कुमार ७१
नमस्कार कर भूपको, पुनप्रणाम कर मात.॥
(१८) 48पूर्णविलास गमने पूरणमात पितु, वारवार उर लात ७२ फणीतजतज़िमशिरोमणि,जीवतजतजिमप्रान। तिमपूरणके त्यागमें, नृप राणीको जान ॥७३॥ रुदन करत पूरण भगत, देख सर्वकी ओर ॥ पुनप्रणामकर सकलको, कहत वचन करजोरा। पूर्ण वचन चौपाई। करूं प्रणाम युगलकरजोरी ! करनीमाफभूलजोमोरी। जबतक लिखा ईश संयोगा। तबतक तुमरेयुतसुखभोगा भयासमय अवविछरन केरा। चलत न जोर तुमारामेरा सुनो सर्व जो मोरसंचाई। तो तुमको पुन मिलहूँआई७६ कविवचन दोहा। पूरण के सुनवचन सब,रुदन करत दुखपात।। हाय पुत्रहापुत्र कह, नृपं राणी उरलात ७७ करेजुदा जल्लादने, पुत्र मात जब तात ॥ मात पिता तब रुदन कर,गिरेभूमि मुरवात७८ रुदनकरत सब लोकके,चले चमार उजार॥ हस्तपाद सब काटके, डारा कूप मझार ॥७॥ पूरण का ले रुधिरते, गंमने लूणाद्वार ॥ जबंकर धोये रुधिरसे, तबभा हाहाकारा।८०॥
प्रथमोऽang
(१९)
इच्छरा विलाप रेखता।
कहांजा पूत को देखू,दशो दिश में अँधेरी है ।
जहां मम लालजी खेलें, तहां होगी उजेरी हैं
लगी होगी क्षुधा वेटा, भयी रोटी अवेरी है ।
खिले मत दूररे ललना, दुती मात तेरी है ।
विना तव भुप रासोई, करेना कहि घनेरी है ।
लगी होनींद आसोवो, सुनीसी खाट तेरी है ॥
तुझे देखें सखातेरे उठो क्यों कीन देरी है ।।
विना गोपाल को मेरो, सुने पोकार मेरीहै ॥८॥
कवि वचन दोहा।
कर विलाप राणी गिरी, तात काल वाजीर ॥
पकड भुजा यह लेगये, बहुविध देकर धीर८२
मंत्री वचन झूलना।
सुनोभूपराणीकरोशोकनाही, यही लोकव्यवहार
है सर्वकेरा। कवीहोय संयोग वीयोग होवे,सदासाथना
ही पतीपुत्र चेरा ॥रथा रोयके देह का नाशकरना,
तजो मोहमाई कहा मान मेरा । सबी आसरे और तूं
त्यागराणी, भजो ईशको जोकरे मोक्षतेग ॥८३॥
(२०) पूर्णविलास कवि वचन दोहा। तास दिवससे नृपति नहि, वैठे तखत मझार॥ राज्यसौंपसबसचिवको,आपभजें कतीरा८४॥ इति प्रथमोऽङ्कः अथ दृश्यस्थान पूर्णकूप। गमने द्वादश वर्ष जब, श्रीगुरुगोरखनाथ ॥ आये पूरण कूपमें, शिष्य लिये बहुसाथ।।८५॥ जल कारण इक.साधुने, देखा कूप मझार ॥ पूरणको लख कूप में, गुरुपै करी पुकार॥८६॥ सुरतनाथ वचन झूलना। सुनो नाथ जी वात आश्चर्य की है, जबी नीर नी- कासनेध्यान कीता । तबी कूप के बीच में नज़र आ- या, किसी आदमी का गुरो देह जीता ॥ डरा देख मैं ना रहा होश कोई, लिया पात्र नीकाल मैं नाथ रीता। चलो देखिये भूत वा प्रेत कोई, किसी साधु नाही अवी नीर पीता ।।७।। कविवचन दोहा। सुनकर अद्भुत वारता, गुरू मंडली साथ ॥ ..
AALTRA. २१ ॥ द्वितीयोऽका देख कूप के बीच में, पूछतगोरखनाथा|| गोरक्ष वचन चौपाई। कहो कौन तू कृप मझारी । भूत प्रेत वा देव सुरारी। कंह तू हाल आपना जोई। तबवाहिर हम काटें तोई८९ पूर्ण वचन चौपाई। नहिमैं भूतप्रेतनहि दानव । तुमनिश्चय जानो मैंमानव । ईश्वरहेत नाथ नीकारो। कहूंहाल मैं तुमसों साये॥९० कवि वचन दोहा। साधु उतारा कूपमें, पूरण को लेसाथ ॥ हस्तपाद लेतासके, बाहिर आये नाथ ॥१॥ पूरणके कर जोर पद, ऊपर चादर डार ॥ गुरुगोरखजीजोरकर,हरिसोंकरतपुकारा॥१२॥ गोरक्ष वचन मत्तगयंद छंद । कृष्णहरे रघुवंशमणेहर, माधव वामन राम मुरारे । संकट दूरकरोजनके तुम, वेद पुराण कहें युग चारे ।। राघवमैं शरणागतहूँ तक,बाले पडा.तुमरे प्रभु दारे। हाथनसोंपयपानकरेयह,पादनसोमगमाहिपधारे॥६३॥ मांगतहूँ करजोर यही वर, होय दयालु दिहो सुखकारे जेकरमैं शिव बालयती जग, योषितसे नहि वाकउचारे।। १-यदि।
२२ LAAAAAAA पूर्णविलास तोकरपाद जुरें इसके अवजेकर प्रीति सची पद थारे नाहितुभोजनकोतजकेअब जावतप्रभुप्राणहमारे ६४ कवि वचन दोहा। मृत-संजीवन मंत्रको, पढकर गोरखनाथ ॥ पूरणके सब देहमें, जल सींचा कुशसाथ ९५ रामराम जप उठ खडा; पूरण भक्त सुजान। गोरखके पद वंदना, कीनी दंड समान ॥१६॥ पूर्णवचन चंद्रकला छंद। शुभवार मुहूरत आजघडी, गुरुभागनसें तुम दर्सदिया। नहिसतसमानदयालुदिसे, मुझसेनरकादुखदूरकिया । भवकूपगिरेनरतारण कों, जगसंतन नेअवतार लिया। तुमरेपदपंकजकोप्रणमो,जिनकीकरुणामृतदेहजिया९० गोरक्षवचन मत्तगयंद छंद। नामकहा तवगेहकहांकिस; मातसुभागिनिनेतुमजाया सौम्यतुमेवदकोनसुयोपित वृधदियाअरुंगोदखिलाया। कौन पितातेवभूपतिभूसुर, वासुरालय सेतुमआया। कौनकठोरमतीजननेंकट, हस्तपदांबुजकूपंगिराया ४८ कविवचन दोहा।। पूरण ने संब भाखिया, जो कुछ वत्ती साथ। १ घडे । २ ब्राह्मण | ३ स्वर्ग ।
२३ द्वितीयोऽङ्का सुनकर अद्भुत वारता, पुन पूछत हे नाथहह गोरक्षवचन सवैया। : नरभूषण राजकुमार रहा, किम संवत दादश कूपे मझारी । विन भोजन छादन शौच विना, किम कूप, भयी गुजरान तुमारी॥ विन शैन करे परयंकविना, हिम काल रहा किम-शीतल वारी । तुम सत्य कहो सुविशाल मते, सुन संशय लागत बुद्धि हमारी १० पूर्णवचन मदिराछंद। ब्रह्मशानल में जिस माधव, भूप परीक्षत राख लिया। नाग अघासुर के मुखमें ब्रज, बालन को जिस जीव दिया। भ्रात वडे गुरुके सुतको जिस, यादव नाथ सजीव किया । पत्थर में कृमि को.प्रतिपालत, तास कृपाकर नाथ जिया ॥.१०१ ॥ गोरक्षवचन सवैया। सुन सुंदर सौम्य सुजान मते, बहु काल भया तुम को दुख भारी। तव तात पुकारत है घरमें, जननी तव रोवत आंख विगारी॥ अब जातिनके दुख दूर करो, उर शीतल हो उनका सुखकारी । घर जा शुभ नारि विवाह करो, सुख सों गृह वैठ जपो असुरारी ।१०२। १ ब्रह्मास्त्र की अमि से २ देवकी के पुन षट् । :
२४ पूर्णविलास पूर्णवचन सवैया। अब और भये नहि मात पिता, वहही मुझको जिन कूप गिराया । इस योषित नागिनिसें हमने विन प्रीतिकरे इतना दुख पायाजव नाथ विवाह करूं इस सें, तब और कहा करसी मम जाया। सबसों मन मोर निरास भंया, तुमरे पदकी शरणागत आया ॥१०३॥ गोरक्षवचन सवैया। धरमज्ञ अदोष पिता तब है, वर पंडित वीर उदार अमाया। नहि नारि अधीन भया स्वपने,सत में फंसके तुमको मरवाया। उसको जन दोप लगावत जो, वह सूरख है तिस भेद न पाया। तव हेत महा दुख पावत है, रंजके जननी तव अन्न न खाया ॥ १०४ ॥ पूर्णवचन सवैया। अपने अपने सव स्वास्थ के,सुत मात पिता अरु. वांधव जाया । दुख पावत मोह समुद्र पडे, नहिं को किस काजग होत सहाया।इसहत उदास भया सवसें,गृह जावन को मम ना मन भाया । मम मात पिता तुम हो गुरु जी, मुझको तुम शिष्य करो कर दाया१०५ गोरक्षवचन.सबैया। सुन वालंक ख्याल करो मन में,दुखसों जग योग १ स्त्री।। २ तृप्तहोयके।
KA द्वितीयोऽङ्का २५ कमावन प्यारे। क्षिति शैन घरोघर मांगन है, मिलते नहि दूध दधी घृतथारे॥नहि भीख कदाचित पावत है, तव देह दुखी जठरानल जारे। पद त्राण बिना सिरछत्र बिना, चलना मग कोमल गात तुमारे ॥१०६ ॥ सहना जगमान निरादर को, तज क्रोध मनोभवे को मनमारे । जिननाहि विवाह करा तिनके, तन मानस को मदनानल जारे॥ वयोपित को नित ध्यावत हैं, विशवास नहीं तव पूछकुवारें। घरजाकर भोगविलास करो, नहि योग करो सुनरे मतिवारे ।। १०७॥ पूर्णवचन सवैया। दुखयावतआपकहेयतिमें,ममनाथ यथावतमैं सवजाने। पर स्वामिन् वातकहूंसुनिये,नहिकूपनिवाससमानबखाने नहिदूधदधी घृतचाहतहूं, करभीख स्वपेट भरूं चुनदाने नहिभीखमिलेतवतोषकरूं.विनरावरपादनऔरसुहाने बहुभागनसें नहितोपकिसें,जवलाभभये तवलोभवढाने। जिमईंधनसेंअनलाधिकहोनरत्यागविनासुखकोनहिंजाने जिनको वहुभोगनकी तृशना नरमूढवहीदुखपकसमाने। जिसऊपरआपदयालुभये,तिसकोनहिनाथकुभोगसुहाने गोरक्षवचन सवैया। जननीतवधन्यपितातुमरा,जिननेहरिभक्तयतीसुतजाया तुमधन्यमहीपतिभोगीवषे,जिसकालवमानसनाभरमाया १ जूती । २ काम । ३ काम अग्नि ।
२१ +पूर्णविलास क्षितिराजकरोयतियोग करो, युगमेंकरजोतुमरेमनभाया इकवारमिलोपरमातपिते,दुखदूरकरोउनकेसुखदाया११० पूर्णवचन सवैया। गुरुजी दुख कूप निकार पुंना; अब गेरत हो दुख सिंधु मझारी । जग में अस कोन सुना हमने, अपने पद में जिस शृंखेल डारी ॥ इकवार जहां दुखपावत है, मंतिमान तिसें फिरदेत विसारी। करुणा करके सिर हाथ धरो, शरणागत जान मुझे भयहारी ॥१११॥ कविवचन दोहा। पूरणभक्त सुजानको, विरति शिरोमणिजान। शिखाकाटि पढप्रेषपुन,नाथदिया विज्ञान ११२ डार कान में मुंदिरा, भगवा कीना वेस। पूरणने सब संतको, कहा नाथ आदेस ११३ गोरक्षवचन सवैया। त्रयदेह तथा शेरकोशन से, मिनः आतम एक सदा सब जाई। सतचेतन नाहि अकार जिसें, मुख रूप स्व संतन होत सहाई ॥ तुम बैठ इकांत निरोध करो, मनको तब आतम देत दिखाई । विन आतम ज्ञान न छूटतहै, नरकाभव बंधन कोटि उपाई ॥११॥ पूर्णबचन संवैया। संत वांक उचार करे तुमने, उर धारालिये उपदेश १ बेड़ी। विरक्त। AAAAAAALAAAAAAAAL .
२७ -शद्वतीयोऽङ्क: तुमारे । नहि योग्य यहांपर वास गुरो, मममात पिता प्रिय बंधु हमारे ॥ सुन के सब रोवहिगे मुझको, दुख- देवहिगे नहि छोडन वारे । कर सैलदंशोदिश तीरथ में, फिर आय करूं शुभ दर्शन थारे ॥ ११५ ॥ गोरक्ष वचन सवैया। पदसों अटना शुभ तीरथ मे, गंमनो शिव मारग होवहि थारे। मुखसें. भजना जगदीश्वरको, मन जोड सदापर ब्रह्म विचारे ॥ सुनतात असंग रहो सब से, यति पंडितको दुरसंगतमारे। परयोषितको जननी ल- खना, सवजीवनमांहि दया करप्यारे ॥११६॥ कवि वचन दोहा। नमस्कार कर नाथको, बचन तासकामान ॥ गमना गंगातीर में, पूरण भक्तसुजान १.१७॥ गुरुने जिमिउपदेशिया, तैसेही तिस कीन । संवत द्वादश योग में, पूरण होये लीन ११८ कठिन तपस्या देखके, इंद्र हृदय घवराय ॥ मंत्र हेत सुरनाथने, मंत्री लिये बुलाय ११६ इंद्र वचन सवैया। यह राजकुमार उदारमती, वर धर्मधुरंधर पंडित १ वेदमंत्र पांच किल्याण २८ ATV पूर्णविलासह ज्ञानी । अधुना इसके सम नातपसी, नहि भोगन में इसकी मति सानी। इस के तप.तेज दिवाकर सें, जर है मम धाम दशोदिश प्रानी । तपखंड न हेत उपाय रचो, नहि तो जगकी अब होवत हानी ॥ १२० ॥ देवमंत्री वचन संवेया। प्रमदा सम अन्य नदीसत है, तप खंड न हेत त्रिलोक मझारी । तर हैं सरिता बहु साग़र को, नहि योषित की भग अंगुलिंचारी॥ कलिकाल विपेनहि जावत है, महिं मंडल में त्रिदर्शालय नारी । तुमरे इस कारज को करसी, क्षिति में इक सुंदर राजकुमारी १२१ जिसका तनु गौर मनोहर है, जलफांगल में जिमिना. गिनिकारी। युगंगोल कपोलन की उपमा, लवभाषण में कवि की मतिहारी ।। कुच कुंभ समान कठोर गुरूं, भृकुटी जिसकी तरवार दिधारी।मुख सुंदर सुंदरि नाम मुनी, मन काम कुमोदिनिचंद्र उजारी ॥ १२२ ।। कविवचन दोहा। सुरपति प्रेरी संदरी, तीरथ हेत विचार ॥ गयी गंगके तीर में, करके विविध श्रृंगार १२३ बनशोभाको देखके हो प्रसन्ननृपनारि ॥ निज़दासी को बोलके,बोलीवचन उदार१२४ १ अव । २ सूर्य । ३ स्त्री । ४ स्वर्ग की। ५ भारे ।
२९ द्वितीयोऽङ्क: सुंदरीवचन कवित्त । धेनु सृगराज चरें, एक महीखंड विषे, नवलाख संगचलें, भय नहीं गने हैं। सहज वैरकोत्याग, करें मिल अनुराग,सवी वन मृग पक्षी, बंधु सम जाने हैं। किस मुनितापसके, तपपरभावकर, विधिगति वाम भयी, भेद नहीं माने हैं। भुजगोरि अहिमोर, खकरें धनघोर, खवर ले आवो मम, मनहरषाने हैं।।१२.५।। कविवचन दोहा। सत्यवचन कह अनुचरी,गयी विपिनमंझारा। देखत देखत गहेन को, देखेराजकुमार १२६ देख अलौकिक वस्तु को, हर्षितभयी सुजान॥ राणी के ढिगायके, मुनिका कराबखान.१२७ दासीवचन चंद्रकला छंद।। जसव्योममणी सम तेज महा, तनुछादित सौभंग काम छटा । वररूपनि पम कौन कहे, कुसुमायुधने निज हाथ ठटा। असमानव देव न कान सुना, मुख. कंज प्रफुल्लित देह लटो। नहि भाखसकू महिमासकली, सिरपीत जय जिमि सिंह सटी॥१२॥ १ मुसा । गरुड । ई सर्प । ४ शब्द । ५. वनः । ६ सूर्य । सुंदर । ८ कामदेव । ९ दुर्वल । १० ग्रीवा के वाल। INAAAAAAAAAAA 48पूर्णविलास मम नेत्रन माहि समाय गया,लखके तिस से नहि चित्त हटा ।जग के अवरूप कुरूपलगें, पय पान किये जिम छाछ खटा ॥ अवरूप गुमान करे मतको, इस रूप अगे सब रूप फटा । इस से जिस नारिन संग किया, तिसने विश्था जग धूरचटा ॥ १२६ ॥ कविवचन दोहा। दासी के सुन वचनतव,गमनी गहनमझार॥ देखनाथ के रूपको, मोहित होई नारि १३० योवन पुन तप तेज युत, रूपवान नृप वीर ॥ पुन प्रेरी सुरराज की, किसविध बांधेधीर१३६ सुंदरीवचन किरीट छन्द । नाथसुनो तुम भूपति दीसत, सुंदर देह कहो किम खोवत । हाथ न आवत है फिर योवन, योवन बीत गये नर सेवन ॥ है सफला तिसका जगजीवन, जो युक्ती युत आसनं सोवत । दूध दधी घृत-सों तनु- पोषित, नारिमुखांबुज को नित जोवत ।। १३२ ॥ पुर्णवचन किरीटछन्द । रीतनु शोषण से मनशोषण,क्षीण भया मना ईश्वर होवत । देह सुपोषण से मन पोषण, पुष्ट मया मन AAAAAAL www १ अहंकार। २ वन।
BHADANANE अदितीयो योषित जोवत ॥ योषित भोगित रोग भयोजब, रात दिने तव मूरख रोवत । है तिसको धिक जो युवती युत, मानुप देह वृथा जग खोवत ॥ १३३ ।। संदरीवचन मत्तगयंदछंद । मंदिर मंदिर में अतिसुंदर नूतन मंच सतुल सुहावे मंचन मंचन में वरयोपित, द्वादशे भूषण धार दिखावें॥ षोडश देह श्रृंगार करें नित, देख जिनेशत कामल जावें । त्याग तिनें विस्था नरमूरख, रात दिने वन में दुखपावें ॥ १३४॥ पूर्णवचन मत्तगयंदछन्द । जंगल जंगल में सतसंगति, संगति संगति कीरति गावें । कीरति कीरति में हरिके पद, पंकज बंद हृदे दरसावें ॥ तापद पंकज से उरशीतल, तो मम मीन सुखांबुसमावें । तासुखको तजके नरमूरख, योषित से मिलके दुखपावें । १३५ ॥ सुंदरीवचन मत्तगयंदछन्द। जो सुखयोषित संगति होवत, सो सुखा और कहां- १ तोपक, तकिया । २.नूपुर, कौंपनी, हार, चूड़ी, अंगूठी, कंकण, बाजूबंध, कंगभरण, सर, मस्तकांभरण, टीका, सीसफल,। ३ अङ्गशुची, मज्जन, स्वच्छचत्र,माहावर (लाखी. रंग,.) केश.सुधारना, मांग में सिंदूर भरना,. माथे पर तिछक, ठोडीपर तिल, मेहंदी, सुगन्धित द्रव्य लेप, भूषण, मुगन्ध, मुख राग, दन्त राग, अधरराग, काजल 1.
जो पूर्णविलास नरपावें । नाम सुससुर खेचर भूचर, योपित हेत सुरेश मनावें ॥ इंद्रपुरी अरु ब्रह्यपुरी पर, भूमिः पताल रसाः तलं धावें। जो नहि नारि मिले हरिपद, तो तिस में नहि कोनर जावें ॥ १३६ ॥ पूर्णवचन मत्तगयंदछन्द । सुखब्रह्म विचार कियेपर सो सुख और कहाँ नपावें । तासुख की. इकलेश मिले जग, भोगन में इम आगम गावें ।। आनंद रूप.स्व आतम है नर, ज्ञान विना भ्रमत दुखपावें । नाभि विषे मृग के कस तरिक, हेत सुगंध दशो दिशि धावें ॥१३७ ॥ सुंदरीवचन सवैया सिर सूक्षम श्यामलं चिकनवा, कच कोमल कुंचित की छबिछाई । मुखशारद पूरण चंद्र समं युग नेत्र सरोज खिले सुखदाई ॥नके वेसर कान सुकुंडल हैं, अधरोंपरशोभित पानललाई । असनारि नहीं जिसके घरमें, विस्था तिसका जगजीवन जाई ।.१३८ ।। पर्णवचनसवैया। निगमागम नाहिपढा जिसने, जिससेनरकी जडता सयजाई ।गुरू से नहि ज्ञानलिया जिसने, जिससे भव- बंधन से छुटकाई ।। नगुरू वचनामृतः पानकिये, तिन: १ सिद्ध २ मनुष्य । ३ केश.! .४ टेडे ।
LAALAAAAAAA TWITTIVITY. द्वितीयोऽrg के पद सेवन नामतिलाई। धनयोवन में गलतानरहा, विस्था तिसका जग जीवन जाई ॥ १.३६ ॥ सुंदरीवचन सवैया। रैद कुंदकली गल शंखसम, नवकोकिल के समवा- कसुहाई । सुपसूनन के गजमौक्तिन के, उरहार पडे मणिकी झलकाई ॥धनपान पयोधर भारनती, कुच कुंकुम लेप सुगंध प्रछाई । तिससे नहि जो अनुराग करा, विस्था तिसका जगजीवन जाई ॥१४॥ पूर्णवचन सवैया। नहिव्याकरणादि अधेनकिया, जिससे जनके मन का तमजाई। नहि कोशपढा वर पंडित से, जिससे छुटती मनकी वधराई ॥ नहि साहितन्यायपढा जिससे सवजावत मूकत पिंगलताई । भर पेटपशु समसोवत है, विस्था तिसका जंगजीवन जाई ॥ १४१ ॥ सुदरी वचन संवैया। युगीन भुजंगसमानं भुजा, हिम अंगद हीर जडे चमकाई । करकांचन कंकण शोभित हैं, नख लाल- मणी समदेत दिखाई ॥ कर अंगुलि में सुंदरी झल के, युगपाणिविपे नवयाकलाई निहि भेटभयी असयो- पित से, विस्था तिसका जगजीवन जाई ॥ १४२॥ १ दांत २ सघन ३ कठोर ४ कुच ५नम्र ६ पुष्ट ७ सुवर्ण.८ मैहिदी पूर्णविलास पूर्णवचन सवैया। सतसंगति कीननहीं क्षण में, तिनकी नहि सेवकरी मातलाई । नहि विश्न गोकरदानदिया, तिनकोनहि श्रावण क्षीर खवाई ॥ नहि तीरथ दान सनान किये, जिससे जनमांतर पापनसाई।धनगाड़ महीपर राखत जो, विस्था तिसका जगजीवन जाई॥ १४३ ॥ सुंदरीवचन सवैया। किहरी कटि विवे नितंवे विषे,माण हेमैजडी रशनों छनकाई । विधियान करी समचालत है, पदपंकज नू- पुरकी धनि छाई हँसके शुभ गोल कपोलन से मुनि लोगन के मनमोह कराई । स्वपने नहिजो असनारि लखी, विश्था तिसका जगजीवन जाई॥१४४ ॥ पूर्णवचन सवैया। घनश्याम स्वरूप अनूपहरी, श्रुतिकुंडल सीस किरी- ट सुहाई। करमें मुरली पदनपुर हैं, पटपीत पुशाक नवीन पिराई ॥ नहि ध्यानकिया हरिका जिससे मन की सब छूटत चंचलताई । नहि प्रीतिकरी शिवसे जि- सने, विरथा तिसका जगजीवन जाई ॥ १४५॥ सुंदीवचन सवैया। तनु गौर किशोर मनो हरमें,शुभ चंदन चर्चितकी १ लालफलके समानर चूतड़३ सुवर्ण कौदनी हंसस्कान ३५ द्वितीयोऽ छविछाई । आसितांवरमें अरुणांवर में, हरितावरमें जरचारु लगाई । कसतूरि कपूर सुगंध रचे, विजली सम अंबर देतदिखाई। प्रिय लागतना असनारि जिसे विस्था तिसका जगजीवन जाई ।।१४६ ।। पूर्णवचन सवैया। रघुनंदन माधव कृष्ण हरे,यदुनंदन देवपते जनत्रा- ता। नरकांतक वामन रामाविभो, रघुवंशमणे जनवां- छितदाता ॥ ब्रजपालक हेजगदीशप्रभो, पुरुषोत्तम केशव हेबलभ्राता। इति आदिकना हरिनाम जपे, विस्था तिसका जगजीवन जाता ॥ १४७॥ मुंदरीवचन सवैया। उशनानलके समशीत समे, हिमके सम ग्रीषम मांहि सुहाई । जननी सम भोजन काल विषे, गणि का सम भोग समे सुखदाई ॥शुभ मंत्र विषे सम मं: त्रिनके, हित में सम मित्रन के जगगाई । वरसेक्नमें सम सेवक के, असनारि कहो किसको न सुहाई १४८ पूर्णवचन सवैया मल मूत्र भरी जिम गेह देरी, अपवित्र सदा दुर- गंध प्रछाई । नित क्रोध कृशानु जलावत है, उवेधत १ नीलेवस्त्रारआनके समगर्म शरीर ३वर्फ४घरकीमोरी ५ अग्नि ३६ umin पूर्णविलास वाक नराच चलाई। धनप्राक्रम पुण्य सुकीरति को, मनरूपमनोहर को हरलाई। इक देवत मूत्र पुरीषघडी, असनारि कहो किसके मनभाई ॥ १४६ ॥ सुंदरीवचन सवैया। प्रियवाक प्रसन्न मुखांबुज है, सुसनेह विलोकत हैं हरपाई । नरकी मंदनानेल शांतविषे, सुमुधा वरषा समदंत दिखाई ।। संवयोपित लक्षण जासविपे, मृदुदे- हविषे शुभसौरभ आई । विनंपौरुष आपहिं आय मि. ले, असनारि कहाँ किसको नसुहाई ।। १५०॥ पूर्णवचन सवैया। छलकी गठरी कपटार है, जगरौरव दारनभूउहराई। नहिं पुण्यकरे अघसे नडरे, जन चातुरको जग लेत ठंगाई । अहिकारत से विषदेहंचढे, जिसके निरखे विषदेह चढाई स्वपने नदया जिसके मनमें, असना- रि कहो किसके मनभाई ।। १५१ ॥ सुत भ्रात पिता युवती जननी; धन धाम विषे सुखमान वडाई । तजके इनको वनवास करे, हरिके पद पंकज प्रीतिःलगाई ।। नरधन्य वही जिन भोग 'वाण-२ विष्ट ३ कामकी अग्नि- कोमल ५ सुगंध ६ प्रयत्न ७ खानी ८ सर्प। १ MARAMMAR तृतीयोऽङ्कः तजे, तिनकी निगमागम कीरति गाई। जग. जीवन मुक्त भये जनते, तजके तनुको हरिमांहि समाई १५२ कविवचन-दोहा। लख योगी के योग को, रांणी मनघबराय ।। शाप भीतिसें नाथके,चरणपड़ी लिपटाय१५३ सुंदरीवचन तोटक छन्द । कर माफ कसूर क्षमाकरिये, मम सीस विषे करको धरिये ॥ तप तेज तुमार न जानतंथी सबको अपने सम मानत थी ॥ १५ ॥ पूर्णवचन तोटक छन्द। निरभै घरजाव विशालमती, किसिको नहि शापत साधुयती॥ तुमने कुछना तकलीफ दिया। यह काम सबी मुरनाथ किया ॥ १५५ ॥ कविवचन दोहा। गयी सुंदरी धाम मे, नाथ चरण धरमाथ ॥ तीरथदर्ससनानहित,गमने पूरणनाथ १५६ इति द्वितीयोऽङ्कः। अथ दृश्यस्थान स्यालकोटबाग। आपहुँचे निज देश में, विचरत विचरतनाथ॥ स्यालकोटके बाग में,वासकरासुखसाथ १५७ AAAAAAA Samosas ३८ पूर्णविलास बहुत वर्षका बाग यह, शुष्करहां बिन पात ॥ हरित भया यतिवास से,फैलगईसबबाता१५८) करामात लखनाथ की, तहां आत नरनारि॥ तनुरोगसुत कामना,पूरणहोतअपार १५६ सुनकर लूणानाथ पै, आईबाग मझार ॥ हाल सुनाया आपना, सकलाखेदपसार १६० लूणावचन चौपाई। सुनोनाथ मैं परम दुखारी।आईहूंप्रभु शरण तुमारी॥ संतदयालुसर्व सुखदाता | होवोदुःखसिंधुसेत्राता १६१ मैं हूँ भूपति की लघुरानी ।लूणानाम सर्वजनजानी। चतुर्विशती गमनेसाला निहि वोलेमोसेंभूपाला१६२ नहिसुतभयामोरगृहमाही । मोसमऔरदुखीजगनाहीं याविधमुझेबुला वेभूपा। पुत्रहोयममपरमअनूपा १६३ कविवचन दोहा। पुत्र शोक संतपत नित, आये तहां नृपाल ॥ करप्रणाम वैठेनृपति, बोलेनाथदयाल॥१६४॥ पूर्णवचन चौपाई। कहो भूप है क्षेम तुमोर। प्रजा सुखी तव राज्य मझारे ।। किसकारणतूंतेजविहीनाचिंतातुरउरदुखमनदीना१६५ क्यापरयोषितसोरतिकीनी।नबज़ज्ञानविनऔषधदीनी AAAA.
तृतीयोऽg
शूद्रसदनक्याभोजनकीनादिजकोकहकरनहिपुनदीना
दिजसुरसाधूनृपतिअगारी।क्यातुमनेनृपभूठउचारी।।
क्यातुमधर्मन्यायनहिकीना। किंचकिसीसेरिशवतलीना
कन्या पैवा कुछधनलीना। नीरपान कीना बिनचीना।
क्यातुमअमलकरतहोराजा।क्याअर्थीकाकीननकाजा
क्यातवहारभयासंग्रामादिजसुरकोनहिकीनप्रणामा।
क्यामूदातुमनेसरकूआ।क्यातुमनेनृपखेलाजूआ १६६
क्यातवपत्नीकरानिरांदराद्विजकोदानदियानहिसादर।
तोरदेशक्यागोवधहूआक्यिाहरिभक्तपुत्रंतवमूआ १७०
राजावचन चौपाई।
नाथअंत में भाखी जोई।दुखकारणं जानो प्रभुसोई ॥
भयापुत्रममएकसुजाना।जाकेगुणनहिजातबखाना७१
सुंदर धर्मधुरंधर बीरा । गुरुहरिभक्त शिरोमणि धीरा ॥
कुलनभपूरणचंद्रसमाना|जननीराहुप्रसासबजानां ७२
नहिलूटाअवलोशशिसाही नहिरविउदयभयातमद्रोही
रातदिवसयाहेतअँधेराातवमुखशशिलखकुछकउजेरा ।
संतसमाननाहिउपकारी सुरनरनागत्रिलोकमँझारी॥
करोकृपाजिसविधतमंजाई।देखूविधुवारविदर्साई १७४
पूर्णवचन चौपाई।
हेनरनाह. धीर. उरधारो। होवो सतसंकल्प तुमारो॥
तुमधर्मज्ञअदोषविचारी।कर्म रेखजगटरतनंटारी १७५॥
४०
पूर्णविलास
कहोभूप क्यों पुत्रतुमारा। मरवाया राणी आतिप्यारा।
असनसुनादेखाहमकोई मारेसुतकोजननीजोई १७६
राजावचन चौपाई।
यह सब पूछो इस से सांई। बैठी है तुमरे पदमाई ।।
कुलिश समान कठिनउरजोईीपूरण का मरणा कहसोई
ऐसी तो है यह मम राणी। छाती वन वाण सम वाणी।
पूर्णवचन चौपाई।
पूरण से वस्ती है जोई। मात भाखिये साँची सोई॥
जो अव भूठकहा तुममाई शाप अनल से देहु जराई।।
भाखें जो नृप पैसचमाता|तव कसूर अब माफ कराता।
प्रीति करेगा तुम से भूपा। होवेगा तव तनुज सुरूपा ।।
लूणावचन चौपाई।
त्राहि त्राहिमोको तुम स्वामी।तुम योगीश्वर अंतर्यामी
जानत हो क्या भाखू साईमोसम पापिनिनहिजगमाई
मात मात कर मोको नाथा । मम पद पूरण धरियामाथा.
रूपदेख कर पूरण केरा तब मन मोहित हूआमेरा१८१
जब पूरण नहि पाप कमाया।तब मैं मूठभाख मरवाया
शरणागत तव पद जलजाता।नृपकोपानलसेंहोत्राता
कविवचन दोहा।
लूणा के सुन वचन नृप,क्रोध जलत शारीर ।
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तृतीयोऽङ्का
हाथ मारकर भूमि में,रुदन करत बेधीर१८३
पूर्णवचन चौपाई।
शांतकरो उरको नरनाहू। जीत क्रोध थिर करोस्वभाहू॥
परमशत्रुयहक्रोधकृशान हृदय दहतिजिमदादशभानू
चतुर्वर्ग कानाशक जोई। ताकर लाभ कहो क्या होई।।
गयी वात पुन लौट नआवाकर अतिक्रोधं वृथा दुखपाव
लूणा को राखो घरमांई । करो प्रीति पूरवकी न्याई ॥
जो तुम कहा मान हो मेरो।जीवित पुत्र मिलावू तेरो॥
कविवचन दोहा।
सुनकर वचन यतीश के, हर्षित हो भूपाल ।
कर प्रणाम योगीशपद, बोलावचन रसाल ॥
राजावचन चौपाई।
यद्यपिलूणा लवण समानादुखित घावमें सुनोमुजाना
इसे देख मम लागत आगी। उभेवंश इसकीनादागी॥
परजो जीवत पूरण पावू । हुकम आपका सीस उठावू
ऋणीरहूं शतजन्म गुसांई। करूं सेव सेवक की न्यांई।
पूर्णवचन चौपाई।
जावो भूप मात तुम दोऊ। सत्य करूंगा भाखा जोऊ॥
प्राता भूप दंपती आवो । युगल मनोरथ निश्चय पावो
१ धर्म अर्थ काम मोक्ष । २ स्त्री पति दोनो।
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४२
पूविलास
कविवचन दोहा।
नमस्कार कर दंपती, गमने गेह मँझार ॥
दासी एक सुजान अति,गयी इच्छराद्वार १६१
दासीवचन चौपाई।
सुनो मात इकसाधू आया|अतिसुंदर जिम तुमराजाया
योगीश्वर पंडित ज्ञानी। मानें भूपलोगअरुरानी १६
धार मनोरथ जावत जोऊ। पूरणं होत कामनासोऊ ॥
काणे अंधे बहुत दुखारे । गयेनाथ पै होय सुखारे १६३
पुत्रशोकसोभयीदुखारी। रोरोके तुंम.आंख विगारी॥
तापै चलो आपजोमाई । मिल,नयनयुग्मसुखपाई१९४
कविवचन दोहा।
दासीके सुनि वचन तब, उपजा उर संताप ॥
करकेयादतनूज को करहै विविधविलाप १६५
इच्छरा विलाप रेखता।
कृपण अतिदेव क्याकीना। प्रथम इकन्यनही दीना
शशी सम तासकीशोभा । देखमन दैवका लोभा ।।
नयन कोदे पछों ताया । बहुतविधतिसकरी माया।
अखी. तिस छीनके लेई । अहो हादेव निर्देई॥
अरे यम नारि तूहोवो। तनुज तव गोदमें सोवो
मरेवो देखते ते रे । दिसेंगे दुख तवी मेरे ॥
१ पुत्र । २ बडाकष्टहै।
ए XIAAAAA 1144 ४ ३ तृतीयोऽङ्का शोक तव चित्त को जारे । नहींपुनऔर के मारे ॥ करेवो ईरपा मोको । नयन की आस किम तोको । गया सोदूर के राही । नहीं कोपत्रका आई ॥ विना प्रिय पूरणे भैना। नहींहै नयन में चैना ॥१६॥ कविवचन दोहा कर विलाप रानीगिरी,विधिहिविविध देशाप॥ मानो डसीभुजंगकी, पुन पुन करत विलाप ॥ पुनः इच्छरा विलाप रेखता। चलोरी देखिये तां को, मती वो होय गो बांको। नयन विन देख के माई, दया उस के हृदय आई। कि होकर नाथ का चेरा, करा तिस लौट के फेरा ।। करेगोपाल जो दाया,मिलूं सुतको गलेलाया॥१९८॥ कविवचन दोहा। रुदन करत राणी गिरी, तबी इच्छरा द्वार ॥ गया भूमि पति तास को,दीनीधीर अपार १६६ राजा वचन चौपाई॥ मुंनोप्रियेइकयोगीआयाशरदचंद्रसमसब सुखदाया।। शुष्कबागजिसहरिताकीना। बहुतनताइनयनजिनदीना चलो तासकोहालसुनावो । देवेनयनपरमसुखपावो ।। जोदयालुहूए यति ज्ञानी सुतदुखमिटहैगोतवरानी २.०१ ४४ पूर्णविलास इच्छरा वचन वार्तिक हेमहाराज ऐसे मेरे भाग्य कहहिँ जोपाणप्रिय पुत्रके विरहका दुःखमिटे तथापि जोआपकी आज्ञा ॥ २०२॥ .. कविवचन दोहा। उभयनारिको साथले, गये नाथके द्वार । सहितदासियांदासनृप, कीनीजायजुहार२ राजा वचन चौपाई। यह मम जेष्ठ नारियतिराया। पूरण चंद्र पुत्र जिसजाया यहममलघुराणीहेसाईनिजकुलघातिनिनागिनिन्याई पूर्णवचन चौपाई। सुनो मात तुम क्यों दुखपावोरोरोके क्योंनयन दुखावो मरे पुत्र फिर हाथ न आवत । चाहे कोटिक यत्न करावत पती पुत्र नारी पितु माता कौन किसी की करे सहाता कर्म एक सबकेयुतजावताकर जन मोहपरम दुखपावत मोहहि सर्व शोक का हेतू। निर्मोहहि दुख जलधरसेतू ताते तजो मोह सुनमाता। भजो ईश को जो दुखत्राता कविवचन दोहा। पूरण केसुन वचन तब, मातापटन समात॥ दूधपडाकुचयुगलमें,आनँदकहानजाता२०८।
४५ । तृतीयोऽङ्कः होवत है रोमांचतनु, फरकत वाम सुगात ॥ जानपुत्रकेबोलसम, बोलीगद्गदबात॥२०६॥ इच्छरा वचन चौपाई वचनतुमारे नाथसुजाना जलतधामआसारसमाना॥ सत्यकहोतुमकोहोसाईदीसततुमममसुतकीन्याई २१ क्या ईश्वरने कीनीदाया। रूपधारपूरण का आया ।। मरेपुत्रनहिमिलतसुखा।उदयभयेहभागहमारे ।२११॥ वचनआप के लागत ऐसे । ममतनूजपूरण के जैसे.॥ तुमरावदनचंद्रद्युतिजोहालियोपछाननयनजोहोई२१२ पूर्णवचन चौपाई। लेवोमात औषधी मेरो। युगल नयन पंकज़ में फेरो ॥ खुलेनेत्र युगतुमरेमाई। अल्पवस्तुसवपडे दिखाई २१.३ जो तवमन चाहत हैमाता । सोसवपूरणकरे विधाता । सत्यसनेहजहाँपरहोई । निश्चयजानोमिल हैसोई२१४ कविवचन दोहा। लेकर औषध नाथ से, करसे नयन लगाय॥ खुलेनेत्रलखपुत्रको, मिलीकंठमेधाय ॥२१५॥ जान पुत्र को भूपमणि, हर्ष न हृदय समात॥ गिराप्रथमसुतकेचरण,उठकरपुनगललात२१६ १ वर्षा । २ कांति ।
४६ पूर्णविलास लजितहो तब चित्त में, लूणामन घबराय ।। तातकालनृपपुत्रके, चरणरही लिपटाय २१७ पूरण का सुन नारिनर, सचिव सेठ सौकार ॥ विविधभेटलेनाथ,आयेवागमभार॥२१८॥ देन वधाई लोग सब, आये नापित नाट। दियेदानवहुमातनृप,स्तवनकरततबभाट२१६ भट्टवचन कवित्त। सुनो नरनाह प्यारे तव सत तेजमारे, दशोदिशि देवीछपे, तीनलोक जानिये । तव सत तेजजरा, कंज मध्य वासकरा, विधिकी कुगति भयी,औरकी भी भा- निये ॥ सत्यलोक त्यागहरी, क्षीरसिंधु वासकरी, हिम गिरि धामकरा, धरमजमानिये।शीतलता हेतहर,भा- लचंद्रगंगधर, तैसेभयेऔरसुर, भूपक्यावखानिये २२० कविवचन दोहा। हाथ जोडकर नाथ पै, उठकर कहत वज़ीर ॥ सर्वलोगके चित्तकी,जानचतुरमणिधीर २२१ मंत्रिवचन भूलना। करोमाफकासूर तोवातमाखू,वडे भागसे आपका द- सपाया।रहेनाथजी कूपके बीच कैसे कहो कौन छोपा- AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA - १ नरनारायण।
KE NAL KAAAAL *तृतीयोऽ यसे अन्नखाया ॥ कढा कौनने कूपसे आपको जी, प्रजा भूपपै तासने कीनदाया। सबी जानना चाहिते बातथारी, कहोकौनने आपका अंगलाया॥२२२॥ पूर्णवचन चंद्रकला छंद। जननी जनकादिक को तज के, मुझने जिसकान- हित्याग किया। जिसमाधव लाख रचे गृह में, जननी युत पांडव राखलिया ॥ तिसकी करुणाकर कूपरहा, जिस द्रौपदि को बहुचीरदिया। भवकूपपडे मुझको ल- खके, गुरुगोरखनाथ निकास लिया ॥ २२३ ॥ राजा वचन मूलना। सुनोपुत्र दोहाथ को जोडभाखू, चलो धाम वैठो करो राज्यसाई । अवी कालनाहीं यती होवनेका,नहीं भो- गभोगे कछूलोक माई ॥ मुझे योगका साधना योग्य हैजी, भयावृद्ध मैं भोगकी आसनाई । रखोतालियांधा- मखाज़ानियोंकी, करोशासनातात आरण्यलाई २२४ पूर्णवचन भूलना। सुनोतात भूपालजी बातमेरी, नहीं थूक के चाटता लोग कोई । किये त्यागपूरीष को मेललेवे, कहें लोग सारे महामूढ सोई । करेभोग जो योग को धारके जी, तिसें रोरवागारमें वास होई। करोआप वा राज्य को बां- १विधा।
LAAA ४८ LAAUTATAA पूर्णविलास टदेवो, नहींहोयगा भाखते आप जोई॥ २२५ ॥ इच्छरावचन भूलना। सुनो तातमै जोरके हाथ भाखू, नहीं भावतातो करो राज्य नाहीं।जवी जीवती लोक में मात तेरी, करो वास ऐसे इसी वागमाहीं। मुझे आसरा होयगो आपका जी,तुझे देखके चित्त में शांत पांई । यदी त्याग के जा- यगो पुत्र प्यारे. पुना होयगो हाल सो मोरसांई २२६ पूर्णवचनं झूलना। यतीपान पानी गुरू चोर डाकी, इने वासनायोग्य है एक जाई । करे भेड़ की मेड नापालना जी, पशूपाल. आधीन सव भेड माईनहीं आसराजीव का जीव तैसे, हरीआसरे सर्व संसारं आई। विना भक्ति भगवान की शांति नाही. सवीशोकदातापती पुत्र माई ॥२२७॥ लूणावचन झूलना। सुनो तात मैं आपने पाप मारी, करूं अर्जना नाथ जी आपत्तांई।यदी करोगे ख्याल में पाप मेरे, मुझे मि- लेगी नरक.में और नाई।करो माफ कासूर मैं शरण तेरी, रची नारिकारने मूढसाई ।दया कीजिये नाथजी पुत्र देवो, चले वंशभूपाल का लोक माई ॥ २२८ ॥ पूर्णवचन भूलना। सुनो मात नाकीजिये सोचराई, कहूं सत्य तेरा नहीं १.एक स्थान में।
S4AAAAAAA तृतीयोऽङ्कः दोष कोई। लिखा लेखक स्ने भाल मेरे, कहो कौन मेटे विधी अंक जोहवरोधीर यह लीजिये लोगखात्री- गुणी पुत्र तेरा रूपवान होई । बलीवीरगंभीर औदार होगा, महीपाल विख्यात भूलोक सोई ।। ३२६ ।। राजावचन झूलना। कहा कहूं मैं आपने भागकी जी नहीं मार सामान्य है और कोई । मरे पुत्र किम कौन के हाथ आवें,तुमें देख के चित्त में शांति होई॥ रहो वाग में भयानाभ्रात जो लौ, सचा कीजिये जी कहा वाक जोई । लघू भ्रातके जन्म को देखके जी,लगे ठीकजो कीजिये फेर सोई ३० पूर्णवचनभूलना। भयी ईशकी प्रेरणाभूपजोलौ करूंबासतोलौ प्रजा लोग त्राता । सदायोगवीयोगवाहोतनाही, मिलेवी: छडे मेलताआपधाता । प्रजासेवकोंराणियां साथलेके चलोगेहं में होयगोकूशलाता । उभेनारिको एकसा. जाननाजी, नहींराखनाचित्तमें भेदताता ॥ २३१ ॥ कविवचन दोहा। नमस्कार कर नाथ को, नपतिं गये निजधाम॥ सहित राणियां लोग सब,गये गेह लखशाम॥ अर्द्धरात्रि में नाथ ने, सोचा चित्त मझार ॥ AAMAANAA
पूर्णविलास
यहां लोग की भीड में, होत न भजन विचार॥
ताते जाना ठीक है, यहां न रहिना योग ।
सन्मुख जानन देहिगे,मात पिता सबलोग।
यह विचार कर रात्रि में, गमने पूरण नाथ ॥
विचरत विचरत देश में, भेट भयी गुरुसाथ ॥
गुरुपद कीन प्रणाम तब, पूरण दंड समान ॥
श्रीमद्गोरखनाथ ने, पूछा क्षेम धयान २३६
गोरक्षवचन चौपाई।
कहोसौम्य रहा क्षेम तुमारे, लागत है मन ब्रह्म विचारे।
भजन ध्यान होवेहताता। कवीआपको मिलीस्वमाता
पूर्ण वचन चौपाई
तवकरुणासों सबकुछ नाथा|विचरादेशदेश सुखसाथा
कृपा आपकी जापर होई । नहि देखत दुख स्वपनेसोई
तवआज्ञाको सिरधरसाई। गमनानाथ जनक पुरमाई
दयाआपकी सवपरिवारा! शोकत्याग के भयासुखारा
कवि वचन दोहा।
इत्यादिक संवाद कर, श्रीमत् पूरण नाथ ॥
गुरु गोरख के पाद में, वास करा सुखसाथ४०
पिताक।
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तृतीयोऽङ्का
उत नृप राणी आदिसब, आयेवागमझार॥
पूरण के देखे विना, सब उरभये दुखार २४१
रुदन करत अति शोक से,नृप राणी दुखपात।
पुत्र विरह संतप्त उर, सुत गुण गावत माल
इच्छरावचन सारछन्द
घरआवो पूत पियारो ॥ टेक ॥
सूनोनगर पूतबिन दासे,सूनो सदन बारो
सूनी गोद तनुजविन लागे, सूनो चौक पोरगर
रससों रहित रसोई लागत, पानीलागत खारो।
जो पूरण की खबर सुनावे, तांपै जांबलिहारो।
बिनप्रिय तनयदर्श हूं आंधी, जननी नाहि सहारो।
ज्यहिज्यहिजातपूतममललना, त्यहित्यहिकरतउजारो
बिन प्रियलाल दर्श नहि सूझत,रातदिवस अधिहारो
दर्शन देवेगो जबपूरण, तबहोगाभिनसारो। २४३ ।
कवि वचन दोहा।
दुखित देखकर भूपको, राणी का सुनगान ।
बोलेधीरजहेततब,सचिवमणीमतिमान२४४
मंत्रि वचन चौपाई।
जाकृपालु नेहेनराया । मृतसुतं तुमको फेरमिलाया
५२
पूर्णविलास
पुननिय पूरण को सुनसोई । कबीमिलावेगानृपतोई
धरधीरजगमनोगृहमाहीं । भूपतिशोककालअबनाहीं
यहवंडभाग जानियेभूपा।जीवतहतवपुत्र अनूपा२४६
जीवत है जगमें जनजोई।मिल हैं कवीनृपतिप्रियसोई
तुमसमानजंगकोबडमांगी।जिनकेसुतउरहरिरतिलागी
हरिशरणागत है. जनजोई। एकोत्तर शतकुलकोसोई
हेनृप जगत् सिंधुसें तारे । वासकरेंतेस्वर्गमझारे २४८
कवि वचन दोहा।
सुनकरवचन वजीरके; राणी अरुनरनाथः ।।
अतिप्रसन्नहोशोकतज,गृहगममेसुखसाथ।
उदासीनगोपालभृत, मथुरापुरीनिवास। .
कराधोणबाणांकमा पूरणभक्तविलास।२५०
इति श्रीमत्परमहंसोदासीन शिरोवतंस स्वामिज्ञानदास शिष्य
गोपालदासन विरचितः पूर्णविलासः समाप्तः॥
शुभंभूयात् ।
RAL Annar AAAAAK. डोयम् श्रीकृष्ण भगवते नमः गोपीचंद्र बिनोद । कविवचन दोहा। गोपीचंद्र महीप वर, अतिसुंदर बलधाम ।। भया रूपजाका निरख, मोहित हैं सुर वाम॥१॥ मैनावंती मात तस, कृष्णावंती नारि ।। माता परम सुजान सो,सुतको कहत विचार ॥ मैनावंती वचन झूलना। सुनो चित्त देतात बलिहार जावू, गरल तुल्य जानो राज्य भोग सारे।तपो राज्य है राज्य सों नरक होवे,कहें संत पोराण अरु वेदचारे॥राज्यभोगको त्यागके योग लेवो, अमर होव जासो नहीं कालमारे । सुनोतात गोपालकी शरण होवो , जगत सिंधुसे भक्त जिन बहुत तारे ॥ ३॥ गोपीचंद्र वचन झूलना। राज्यत्याग के करूं मैं योगकैसे, भोग भोगने को करे चित्त मेरायहां पलँगशय्या धामसोवने को, वहां खा- कमेंलोटनाविपिन डेरा ।। यहां बहुतपरकारके गर्म भो- :- ५४ गोपीचन्द्रविनोद जन,वहां दूकहें घरोघर पायफेरा राज्यभोगको भोगके वर्षबारां, सीसधरूंगा मातमैं वाकतेरा ॥४॥ मैनावती वचन झूलना। घडीएकका नैक विश्वास नाही, मासवर्षकी कहोको तात जाने। बाल वृद्धजोवानको नाहिछोडे, कालवली ने बहुत बलवानखाने॥गये राज्यको भोग बहुभूपपूता, तोर बापदादा सबी खाकसाने। सीसआपके रातदिन कालनाचे, राज्यभोगमें मत्ततू नाहिजाने॥५॥ गोपीचंद्र वचन भूलना। राज्यहेत योगीयोग करनमाता,यज्ञजाप करते राज्य हेत सारे। दयादान अरु धर्मसे राज्यकरना, क्षत्रधर्मको भासते वेदचारे॥धर्मयुद्ध से मारकर वैरियोंको,पाउँ लो- कमें कीरती भोगसारे। प्राण रहेतो करूंगा राज्यमाई, यदीमरातोजाउँगा स्वर्गद्वारे.॥ ६ ॥ मैनावती वचन भूलना। बहुतवार तू भयाहँ भूपपूता, बहुतबार हुआ इंद्र स्वर्ग दारे। कईवार तू पुरुष अरुनारि हुआ.तृसहुए ना आ- जलौ करणथारे ॥ भोगभोग के तृप्त नहि होत कोई, तेलधारसेअग्निजिमि अधिक जारे। जहिरयुक्त जिमि क्षीरतिमभोगजानो.तिनेत्यागगोपालकीशरणधारे १ इंद्रिय।
RABAL ५५ गोपीचन्द्रविनोद गोपीचंद्र वचन भूलना। भया पुत्रनहि धाममें एककोई.कौन करेगाराज्यको समुझमाई। पित्र गिरेंगे स्वर्गसे भूमि माहीं; जबी पिंड नीरांजली नाहि पाई॥शापदेंइगी राणियां मातमो. को, चोरजारसबलोकको लूटखाई । सुनोमात जिसभू. पके राज्यमाही, प्रजादुःखपाये सोइनरकजाई ॥८॥ मैनावंती वचन भूलना। माततात नानारियां पुत्रकोई, लेनदेन का बांधिया लोकसारा। चिदानंद तू सत्य विभुरूप बेटा सुक्ख और से चाहसो अज्ञभारा कर्मआपने आपसब भोगते हैं, नको स्वर्गदेवे नको नरकडारा । पती पुत्रको काउना रोवताहै,रोय आपने सुःखकोजगत्सारा ॥६॥ कविवचन दोहा। जननी के उपदेश को, धार हृदय में भूप ॥ हाथ जोड बोलत भया, जान गुरू का रूप १० गोपीचंद्र वचन झूलना। धन्य धन्य तू मात जी मात तू ही, करूं वंदना आप को कोटिवारा। फसा जगत् जंजाल में देख मोको,आ- प ज्ञान उपदेश कर पुत्रतारा॥ नहीं लोक में और की मात ऐसी, यथा आपने मोर अज्ञानजारा। दया आप गोपीचन्द्रविनोद कीभोगसवरोगजाने,करूंयोगकोत्यागकेराज्यसारा ११ सुनोतात वाजीर दिलगीरहो ना,राज्यआपकीसर्वसा पुरदभाई। प्रजापालनी धर्मसें राज्य करना, यथा पुत्रको पाल है वापमाई॥धीर देवनी राणियांसारियां को, हु: कम मानना मात का हर्ष पाई । साधु विप्र को सेवना सर्वदाजी, अन्य नारिको जानना बहिन माई॥१२॥ कवि वचन दोहा। वचन सुनत भूपाल के, दुखित भये वाजीर ॥ बोले चतुर विचार कर,रुदन करत बेधीर१३ मंत्रि वचन भूलना। महाराज यह आप क्या सोच लीना,वचन आप का आग्नि सामान्य जारे । वैठतखत में शोभिते आप राजे, सचिव दास हम हुकम के मनन वारे॥ हुकम करा जो आपने करूंगा सो,सदा करूंगा वंदना तखत थारावचन कहेगी दासको मातजोऊ,सोउकरूंगा नाथमैं सीसधारे गोपीचंद्र वचन भूलना। सुनो चित्त देवाक मम लोग सारे, मोरजगेवाज़ीर कोजानिये जी।चोर जार बदमास के कर्म जोऊ, उने त्याग के वेदको मानिये जी. हक औरका धेनु अरु सूर जानो, सत्य बोलना झूठ नहि सानिये जी। दान पुण्य अरु ईश का भजनकरना.गुरू पीरको वंदना गनियेजी XAAAALAAAALAA. गोपीचन्द्रविनोद कविवचन दोहा। भूषण वसन समेत महि, डारे सकल नरेशः ॥ तृणसमान वैभवतजा,जिसकोमोह न लेश१६ श्रीमत्गोरखनाथ पद, करी दंडवत् जाय । कर परिक्रमा हाल सब,भूपति दिया सुनाय१७ गोपीचंद्र वचन झूलना। सुनो नाथ निनाथ के नाथ हो तुम,दास शरण आया तोर पाद सांई। दया कीजिये दीजिये योग मोको, भजूं ईश को और नहि काम काई ।। सेव करूंगा सर्वदा आप की जी, वचन करूंगा आपका हर्ष पाई। करो ज्ञान उप- देश जो मुक्त होवू, राज्य भोग से नाथ कुछ काम नाई। गोरक्ष वचन झूलना। नहीं राज्य को त्यागना भूमि स्वामी,समुझ योग का पालना कठिन प्यारे । भूमि सोवना मांग के खावना है, नहीं मिलेहैं अन्न घृत खांड वारेखाक लावनी खंदीका त्याग करना।काम क्रोधअरु लोभको मारडारो सुनोभूप जीजातमृतरूपहोना , कबीमिलेनहिभीखउरअग्निजारे गोपीचंद्र वचन भूलना। जोउ होयगा सहूंगा सोउ.स्वामी,लोट जावना मरद . AAAAAAAAAAA १ अहङ्कार।
५८ AAAAAAAAMAAAAAAAM गोपीचन्द्रविनोद का काम नाहीं। बहुत भोग भोगे अर्थ तृप्त हुआ, कोउ हिरेस नारही है चित्तमाहींनारिनाहिरी भोग सबरोग दीसें, तखत वखत है कहो किम धाम जाई, कान फाडके मुंदरां डारिये जी, मेरवानगी के गेहे आवसाई ॥२०॥ कविवचन दोहा। कानफाड मुंडित किया, दिया ज्ञान उपदेश। खाकलगाई अगमें, भगवाकीनावेश ॥२१॥ गोरक्षवचन भूलना। सुनो तात जगस्वप्न सामान्य झूठा, सर्व आतमाईश है सत्यभाई। चिदानंद सारूप आखंड हैं तू, विभू शुद्ध सारूप नहि मैल काई । हेमताम्र चांदी मणी धूडजानो, सर्व नारिको जानिये बहिनमाई। समुझ सोच के देश परदेश फिरना.मती दाग फाकीरिको पर्स जाई॥२२॥ कविवचनदोहा रुदन करत राणी सबी, आई भूपति पास । मैनावंती सास सह, सहित दासियां दास २३ कृष्णावती वचन भूलना। हाथपकड फिर छोड के भागआया, करा क्या महीं- नाथ तुम साथ मेरे । तुझे छोड के रहूं ना धाममाहीं, जहां जांयगा चलूंगी संगतरे। कौन मरद ऐसा छोड १ अब ।२ इच्छा ।३ घर । ४ सुवर्ण ।
गोपीचन्द्रविनोद भारयाको.त्यागहार श्रृंगार सिर खाकगेरे।तुझे दया नाआवती देखमोको,मात तातने सौंपियां हाथ तेरे २४ गोपीचंद्रवचन झूलना। संग लिखाथा काल जोसाथ तेरे,सोउ वर्तिया कर्म को कौन फेरे। कोउ किसी के साथ ना जात जग में, तुझे त्याग के गये मा बापतेरे।। जासईशने करी पैदा श तेरी, तोर साथ सोई वचन मान मेरे।पती पुत्र की आस को छोडराषी, करोयादकारको बैठडे रे॥२५॥ कविवचन दोहा। याविध सब समुझाय के, गोपीचंद्र नरेश । गये उत्तराखंडको, दर्शन हेत सुरेश ॥ २६ भूपति की तरवार को, धरकर तखत वजीर ॥ आज्ञा मांगत मात पै, रुदन करत भरनार२७ मंत्रिवचन झूलना। सुनो मात यह तालियांकोशवाली, तोप ढाल तल- वारियांशस्त्रसारे। कमर कस्सके बाण कोदंडलेके,सवी फौज गडी मात हुकमथारे॥हाय हाय भूपाल का खेद भारी, मंदभाग में मुझे ना कालमारे । विना भूपसे नगरसब शूनदीसे, बली ईशसें चलेंनाउजर चारे २८ १ धनुष ।
. AAAAAAÁLLALALALAL! ६० AAAAAAAAL ΠΑΛΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑ και गोपीचन्द्रविनोद मैनावतीवचन झूलना। सुनो तात वाज़ीरना सोच करिये, वडे पुण्य से भूप- ने योग पाया। करें राज्य साहस्र शतवर्प कोई, अंत छोडनी होयहै झूठंमाया। धन्य धन्य है मातसों जग- त् माही. जिने भक्त-विश्वेश का पुत्रजाया।खुशीहोय के बैठ तू तखत ऊपर,करोराज्य अविशंक जिमवेदगाया कविवचनदोहा। नमस्कार कर तखतको, बैठे जाय वजीर । करे अदालत धर्म वित् , झूठ सत्य को चीर३० संवत् हादश योगकर, गोपीचंद्रयतीश ॥ फिरतफिरतअपनेनगर,आपहुँचेअवनीश३१ घरघर मांगत भीखको, देखभूपकी नारि ॥ जानापने नाहको, लेआईमणियार ॥३२॥ गोपीचंद्र वचन झुलना। मणीमोतियां साथना कामकोई मुझे अन्नकीभीख तू- डालमाईमोहिर मोतियों से चरवेनअच्छा,जिसेखायके संतकी भूखजाई । जिसेखाय के ईशको यादकारये, जिसेखायके देह आराम पाई । द्रव्यलेवना साधुका धर्मनाहीं, देहि अन्नंतो नाहि चलनांव माई ॥३३॥ AAAAAAAAALAAL .. HAMARI सततर AAAAAAAA गोपीचन्द्रविनोद ६१ कृष्णावंती वचन झूलना। समुझ सोचके बोलना नाथ प्यारे, आप भूप मैं आप कीनारि आई । तोरिइस जोवान को काटडारूं, कहत भारया को जोउ बहिन माई। सोउ समय अवनाथ जी याद नाही,अनल साक्षि से सेहिरे बांधव्याही।सचे ईश के धाम में न्याय होगा.वहां देनगेसूर अरु चंद्र ग्वाही३४ गोपीचंद्र वचन झूलना। पती भारया साक सवतोड दीया.सचे ईश के साथ मैं प्रीति लाईफकर धर्म यह संतगुरु वेद भाखा,सर्व नारि को जानना बहिन माई।जबी भूपथेतबी तूं होत राणी, भये फकर तब रहाना साक काई । दयादृष्टि जव कृष्ण ब्रजराज कीनी, विविध दृष्टि भइ नष्ट इक दृष्टि पाई३५ कृष्णावंती वचन भूलना। हुकमकरो तो अरज़मैं करूंसाई, यतीयोगियों साथ नाजोरकोई। विनापुत्र क्या जीवना लोकमाही,मैंनि. रासरीका कौन टेकहोई। दयाकरोतो एक प्रियपुत्र देवो नतोजीवती को मुझे जानमोई। कहा हालमैं आपना आपताही, मनोभावती है करोबातसोई ॥३६ ॥ गोपीचंद्र वचन झूलना। जमाकरत धननारिसेप्रीतिकरते, भोगभोगते भेख- कोधारजोई। साधुसंत आदरं तिनें करतनाही पित्रपु- ALAALA ६२ mi गोपीचन्द्रविनोद के सहित तिननरक होई॥मनुजपुत्र की आसको त्यागदेवो, वासुदेव घनश्याम वजनाथ जोई।करोप्रीति शियिहिमानकरी,तोरिकरेगामुक्ति गोपालसोई३७ कविवचन दोहा। उनी है प्रयकर उपदेश नृप,राणी का कर तोष। विचरत जीवन्मुक्त भू,जीत काम मद दोष ३८ साधुदास गोपाल ने, गोपीचंद्र विनोद ॥ करा बाणे बाणोंके में, ज्यहि सुन होवत मोद। रामकृष्ण पद वंदना, करहूं वारंवार । जिनकी करुणाकर यती, निजधर्मन को धार ।। प्रथमवासथामधुपुरी,अवगर्गालय वास पोष्ट फरह मथुरा जिला, गोकुलजी के पास४१ समाप्तीचं ग्रन्थः। आवश्यक-सूचना। पृष्ठमें "प्रेषऔर शर" शब्दकी टिप्पणी "वदमंत्र" हैं सो २७ पृष्ठ में भूल से छपगई है। प्रथ-शुद्धाशुद्धपत्रम् शुद्ध : पृष्ठ . पं० अशुद्ध शुद्ध : पृष्ठ भक्त भक्ति १४ सतुल सतूल ३१: तनु तनू . १० 8 ब्रह्म ब्रह्म नाख. भाख: ११ १४ पिगल पिंगल ३३ तव. १६ : १६ जुबारे चुबारो ५१ मया भया ६० . १९ गममे गमन ६२ १ गया। । और नगर. " ७
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