Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Yog Marg Prakashika

Yougal Das · 2012/08

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CARA, LIBRARON Sacoccountanaauvacocc MOTORomxzoocorumurt.. ॥ श्रीः ॥ श्रीमते रामानुजाय नमः। श्रीमहान्तयुगलदासनिर्मित- योगमार्गप्रकाशिका अर्थात् योगरहस्यग्रन्थ। भाषाटीकासमेव । LeuccoocumaruanwLaunau गिरधरशास्त्रिसंशोधित. जिसको खेमराज श्रीकृष्णदासने बंबई निज "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम् ) यन्त्रालयमें मुद्रितकर प्रसिद्धकिपा । माघ संवत् १९६१, शके १८२६. पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार "श्रीवेङ्कटेश्वर" मेसपक्षने स्वाधीन रखा है।

... SN. भूमिका। इस संसारराव मोक्षके हेतु अनेक उपाय हैं परंच समस्त साम्यतालीकर, मूल योगाभ्यासहै क्योंकि विना चित्तकी एकायता हुये कोई साधन ठीक नहीं सो चित्तकी एकाग्रता विना योगाभ्यासके नहीं हेविहै सो वार्ता गीताजीम कहींहै "चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि घलवदृढम्" अर्थ-हे श्रीकृष्ण हीति निश्रय करके मन अत्यंत चंचल वा बलवान है तिस कारण मनके निरोध करने में केवल एक योगही श्रेष्ठतर उपाय है अन्य नहीं सो वार्ता योगसूत्रमें फथन करी है"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" चित्तकी वृत्तियोंका निरोध होना यही मुख्य योगका लक्षण तथा श्रीकृष्ण भगवान्ने गीतामें मर्जुनके प्रति कहा है"तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ॥ कर्मिभ्यश्चाधिको योगीतस्माद्योगी भवार्जुन"अर्थ-हे अर्जुन तपस्वीते वा ज्ञानीते वा कम्मोते योगाभ्यासी सवरो ही श्रेष्ठ है ताते तू योग कर, योगके सदृश अन्य नहीं । इति इससे योग सदैव सेवन करने योग्य है ब्रह्मा विष्णु महेशादिक जो बड़े बड़े महापुरुप हुँ वा अन्य ऋषि लोग सो सब केरल योगके द्वारा सिद्धिकुं प्राप्त हुये हैं सो वार्ता वेद शास्त्र वा पुराणोंमें प्रसिद्ध है हम कहांतक वर्णन करें । अब आजकल प्रायः मनुष्य केवल नाकपर हाथ छूदेनेकोही योग वा प्राणायाम समझते हैं इससे जप तप आसन प्राणायाम सिद्धि कहाँसे प्राप्ति हो और ब्राह्मण- त्व क्षत्रियत्व होना तो बहुतही मुशकिल है इसी हेतु नास्तिक लोग असिद्ध क्था पोप ऐसे निंद्य वचन कहते हैं यदि जाने तो प्रत्यक्ष सिद्धि द्वारा उनके मुखकू तोड आप अपनेईं कृतार्थ समझे और योगके ग्रंथ तो बहुत हैं परंच उन सबोंका सार सार श्रीमन्महाराजाधिराजश्रीसवाई महेंद्रप्रतापसिंह बहादुर टीकम गढ़की आज्ञानुसार श्रीमत्परमहंस परिव्रा- जकाचार्य श्री १०८ नृहसिंहदासजी वा श्रीमन्महंत वेदांतवर्य श्री १०८ स्वामी अयोध्यादासजीकी शिक्षानुसार योगक्रिया सीखकर यह योग ग्रंथ श्रीमत्परमहंस श्रीमहान् जुगलदासजीने बनाकर प्रकाशित किया भाषानुवाद सहित जो इसमें भूल वा अशुद्धि हो सो सब सज्जन जनो• निवेदन है कि कृपाकर सुधार देवें । आपका-कृपापात्र श्रीमत्परमहंस श्रीयुत जुगलदास स्थान टीकमगढ़जुगल निवास वाग मंदिर.

BHARAT YA BAA SN ......- LIBRARY ॥ श्रीः ॥ श्रीमते रामानुजाय नमः योगमार्गप्रकाशिका अर्थात् योगरहस्य ग्रन्थ । भाषाटीकासमेत । ॐतत्सहह्मणे नमः। सच्चिदानंदरूपाय रामायाक्लिष्टकर्मणे ॥ संसारध्वांतनाशाय राधवाय नमोनमः ॥१॥ तत् कहैं तौन सत् कहैं सो जो अविनाशी ब्रह्म है ताके अर्थ नमस्कार करेंहै सच्चिदेति । सत् चित् आनंद सत् कहैं जो तीनकालविपे एकरस वर्तमान है चित कहैं जो साक्षात् ज्ञानस्वरूप आनंद जो सुखस्वरूप एवंभूत जो अक्लिष्टकर्म श्रीरामचंद्र तिनके अर्थ नमस्कार फेरि कैसे हैं संसारको जो मायामोहरूपी अंधकार ताके नाशकर्ता है॥१॥ रामानुजाय शांताय गुरुवे परमात्मने ॥यो- गेश्वरायशेषाय भूयोभूयो नमाम्यहम् ॥२॥ १ नमोनम. इति पाठः साधुः।

(६) योगरहस्य । रामानुज जो साक्षात् शेपभगवान् शांतस्वरूप पर- मात्मा योगेश्वर अर्थात् योग जो ब्रह्मविद्या ताके परंपराके आचार्य तिनके अर्थ वारंवार नमस्कार करौं हौं ॥२॥ प्रणम्य स्वामिनं देवं शरण्यं दीनवत्स- लम् ॥ मुमुक्षूणां हितार्थाय योगमार्गोऽ- भिधीयते ॥३॥ फेरि अपने जो गुरु स्वामी शरण्य दीन वत्सल अर्थात् दीनजनोंके हितकारक तिनहिं प्रणामकारकै मुमुक्षु जो मोक्षकी इच्छा करनहारे जन तिनके हितके अर्थ योगको जो मार्ग अर्थात् आसनप्राणायामादि जो राजजोग सो वर्णन करौंहौं ॥३॥ संसारार्णवमग्नानां ज्ञानं नौका हि विद्यते ॥ योगिनां सुलभं तत्र दुर्लभं विपयैपि- णाम् ॥४॥ संसाररूपी समुद्रके विपे मन अर्थात् डूबनेवारे जो मनुष्य तिनको एक ज्ञानही नौकारूप उपाय है सो ज्ञान योगीजनोंकारकै योगद्वारा शीघ्रही प्राप्त होवैहै विपयैपी अर्थात् विषयी जीव करिके दुर्लभ है सो वार्ता ब्रह्मानं- भापाटीकासमेत । (७) दजीने योगकल्पद्रुमग्रंथमें कथन करीहै ॥ यथा-ज्ञानं वदंतीह विमोक्षकारणं तज्जायते नैव विलोलचेतसा ॥ लौल्यं न योगेन विना प्रणश्यति तस्मात्तदर्थ हि यतेत साधकः ॥१॥अर्थ-यद्यपि ब्रह्मज्ञानही मोक्षकी प्राप्तिका कारण है तथापि चित्तकी एकाग्रता हुयेविना सो ज्ञान नहीं संभवहै सो चित्तकी एकाग्रता विनायोगाभ्यासके नहीं होवैहै तासे सदैव योग साधकपुरुपको करना उचि- तहै ॥४॥ ज्ञानाहते न मुक्तिस्स्याद्यद्योगेन विना नहि ॥ स च योगः पुरा प्रोक्तो ह्यभ्यासादेव सि- द्वयति ॥५॥ ज्ञानते रहित मोक्ष नहीं अर्थात् नित्य नैमित्तिक जो कर्म सो केवल ज्ञानहीके अवांतर हैं सो वार्ता श्रीमत् शंकराचार्य्यने वेदांतसारविषे कथन करी है ॥ यथा-- नित्यनैमित्तिकप्रायश्चित्तोपासनानुष्ठानेनांतःकरणशुद्धिः॥ नित्य नैमित्तिकप्रायश्चित्त उपासना इनके अनुष्ठान कर- ने” मन बुद्धि चित्त अहंकाररूपीजो अंतःकरण सोशुद्धिकू प्राप्त होवैहै । मोक्ष केवल ज्ञानही द्वारा प्राप्त है सो ज्ञान विनायोगाभ्यास नहीं संभवै काहेरौं कि, चित्तकी वृत्तियां बहुत चंचल हैं तातैं बुद्धिकी एकाग्रता नहीं होवैहै यद्यपि .

(८) योगरहस्य । जपतपादिशुभकर्मकरिकै बुद्धिकी एकाग्रता होवेहे तथापि जिसप्रकार योगाभ्याससे बुद्धि शुद्धिताकू प्राप्त होवैहै तैसी अन्य उपायोंकरिके नहीं काहेते कि जप, तप, उपवास, उपासनादिक कर्मोंसे योगाभ्यासका अधिक फल है सो वार्ता अथर्वणवेद उपनिपमैं कहींहै यथा-क्षणमेकमास्थाय क्रतुशतस्य फलमवाप्नोति ॥ अर्थ--एकक्षणमात्र भी समाधिमें स्थित योगीकू सौ यज्ञको फल प्राप्त होतेहै तथा अत्रिसंहितामें कथनकि- याहै ॥ यथा--योगात्संप्राप्यते ज्ञान योगो धर्मस्य लक्ष- णम् ॥ योगः परं तपो ज्ञेयः तस्माद्युक्तस्समभ्यसेत् ॥१॥ न च तीवेण तपसा न स्वाध्यायैर्न चेज्यया ॥ गति गंतुं द्विजाः शक्ताः योगात्संप्राप्नुवंति याम् ॥ २ ॥ अर्थ- योगतै ज्ञानकी प्राप्ति होवै है योगही धर्मप्राप्तिका लक्षण है तथा योगही श्रेष्ठ तप है तातें सर्वदाही योगसाधन करना चाहिये । तथा योगाभ्यासकारकै जो गति प्राप्त होवैहै सो तीव्र तप जप वा वेदपाठ वा यज्ञादि शुभकर्मके करने” नहीं सो वार्ता याज्ञवल्क्यसंहिताविषै कथन करीहै। यथा-इज्याचारदमाहिंसातपःस्वाध्यायकर्मणाम् ॥ अयं तु परमो धर्मों यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥ १ ॥ अर्थ- पूजा आचार इंद्रियोंका दमन तप वा वेदाध्ययनादि सर्व- भापाटीकासमेत । (९) कर्मोंसे जो योगाभ्यास करिकै आत्माका साक्षात्कारक- रना सो परम धर्म है ॥ तथा दक्षस्मृतौ-सुसंवेद्यं हि तद्रह्म स्त्री कुमारीसुखं यथा॥अयोगी नैवजानाति जात्यंधो हि यथा घटम् ॥ १॥ अर्थ-जैसे यौवनअवस्थाकी स्त्री पतिसंभोगजन्य सुखकू आपहीं अनुभव करैहै तैसे ब्रह्मानंदसुखकू स्वयं योगीही अनुभव करतेहैं अन्य नहीं जैसे जन्मांधपुरुपकू घटके स्वरूपका वोध नहीं तैसेही अयोगी उस ब्रह्मको नहीं जानतेहैं तथा सांख्यसूत्रमें कपिलाचार्य्यनेभी कहाहै ॥ यथा-नोपदेशश्रवणेपि कृतकृत्यता परामर्शाहते विरोचनवत् ॥ अर्थ-विना योगाभ्यास केवल वेदांतश्रवणमात्रसेही कृतकृत्यता नहीं जैसे दैत्योंके पति विरोचनकू ब्रह्मासे उपदेशश्रवण होने- परभी ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होतीभई तथा श्रुतिमेंभी कहाहै ॥ यथा-अथ तदर्शनमुपायो योगः ॥ अर्थ-तिस आत्माके साक्षात्करणेमें एक योगही उपाय है । तथा कूर्मपुराणमें महादेवजीने कहाहै ॥ यथा-योगाग्निर्दहः ति क्षिप्रमशेष पाययंजरम् ॥ प्रसन्नं जायते ज्ञानं ज्ञानानि- णमृच्छति ॥१॥अर्थ-प्रथम योगरूपानिकारकै सम- स्तपापोंका नाश करिकै अंतकरणशुद्धिद्वारा स्वच्छ ज्ञान प्राप्तहोवैहै ज्ञान प्राप्त भये कैवल्यपद अर्थात् मोक्षपद प्राप्त (१०) योगरहस्य । होवैहै ॥ तथा-शिवसंहितामें शिवजीनेभी कहाहै ॥ यथा-आलोक्य सर्वशास्त्राणिं सुविचार्य पुनः पुनः ॥ इदमेवं समुत्पन्नं योगशास्त्रं परं मतम्॥ १॥ अर्थ-श्रीम- हादेवजी कहतेहैं कि, हे प्रिये मैंने सर्वशास्त्रको देखि वा विचार करि वारंवार यह निश्चित किया कि एक योग शास्त्र परममतहै इसके समान कोई अन्य मत नहीं ॥ तथा गोरक्षसंहितामें कहाहै ॥ यथा-एतद्विमुक्तिसोपान- मेतत्कालस्य वचनम् ॥ यद्यावृतं मनो भोगादासक्तं पर- मात्मनि ॥ १॥ अर्थ-जव योगाभ्याससे मन विषयोंसे इटिजाता तव ईश्वर में प्राप्त होवैहै तव मृत्यु जराकोभी जीतकरि कालके मुखकी वंचना करैहै तिससे अवश्य मुक्तिका सोपान यही कर्म है इसकारण योग सर्वत्र सर्व वेद वा महात्माओंका मत है किसीने खंडन नहीं किया तिससे योग परम सेवनीय है सो योग पूर्वकालसे प्रसिद्ध है केवल अभ्यासमात्रसेही सिद्ध होवैहै ॥५॥ शक्रादिस्वर्गलोकेषु पुत्रदारागृहादिपु ॥ विर- तस्यैव योगस्य सिद्धिर्भवति नान्यथा ॥६॥ इंद्रपदको आदिलेकरि सुरलोक कहैं जो देवलोक है तथा पुत्र दारागृहादिविपे जो पुरुप विरक्त है तिस पुरुपकोही सम्यक प्रकारसे योगकी सिद्धि होवैहै अन्यकू नहीं सो भापाटीकासमेत। (१३) वार्ता योगसूत्रमें कथनकरी है ॥ यथा-विरक्तस्यैव तसिद्धिः ॥ अर्थ-विरक्तपुरुषहीको तिस परमत्माकी प्राप्ति होवैहै ॥६॥ प्रशांतचित्तस्य जितेंद्रियस्य गुणान्वितस्या- गुरुसेविनश्च ॥ नूनं भवेद्योगसमस्तसिद्धि- नान्येतरासक्तजनस्य कस्मै ॥७॥ प्रशांतचित्त जितेंद्री विद्वान सब प्रकारसे गुरुसेवी नूनं कहैं निश्चय करिकै तिस पुरुषहीको योगकी संपूर्ण सिद्धि प्राप्त होवैहै इतरजो विपयादिकोंमें आसक्त तिनको नहीं ७ एकांते विजने देशे शोभिते वहुपादपैः ॥ कुर्य्याद्योगमठं धीमान सर्वतो भयवजि- तम् ॥८॥ एकांत जो विजन देश अर्थात् बहुतसे मनुष्योंकरिक रहित देश और वृक्षादिकनकारकै शोभायमान ताविपे योगमठ अर्थात् कुटी वा गुफा वनावै और वनमें नहीं वनावै काहेरौं कि, अन्नादिकोंकेवास्ते आनेजानेपडेगा आश्रम ग्रामके नजदीक होना चाहिये सो वार्ता मनुस्मृ- तिमें कथन करी, यथा-ग्राममन्नार्थमाश्रमेत् ॥ अर्थ- १ आसमंतात् गुरुसेवितस्य । २ एकावीतिपाठः-साधुः। --

(१२)
योगरहस्य ।
अन्ननिमित्त ग्रामके नजीक आश्रम करै जामें कोई सिंह
व्याघ्र सर्प वायु इत्यादिकोंका भय न होवै ऐसा सुंदर
स्वच्छ आश्रम वनावै ॥८॥
स्वधर्मनिरतः शांतःसर्वशौचसमन्वितः॥
विध्युक्तकर्मसंयुक्तो भोगसंकल्पवर्जितः॥९॥
अपने आश्रमके धर्मविषे निरत शांत अर्थात् नहींहै
चलायमान बुद्धि कहे प्रेमी हो जाकी संपूर्ण शौचकरिकै
युक्त विधिपूर्वक कर्मसंयुक्त भोगादिकोंकी इच्छाकरिकै
रहित ॥९॥
यमैश्च नियमैर्युक्तः सत्यधर्मपरायणः ॥
सुशोभने मठे योगी योगाभ्यासं समाच-
रते ॥१०॥
यमनियमसंयुक्त सत्यधर्म जो आत्मनिरूपण अर्थात्
वेदांतश्रवणादि ताविपे परायण सो सुंदर मठके विषे
योगी जो है सो योगाभ्यास करै॥ १०॥
॥ अथ योगभेदनिरूपणम् ।।
मंत्रयोगो लयश्चापि हठयोगस्तथैव च ॥
राजयोगोपि वै तत्र चतुर्दा संप्रकी-
र्तितः॥११॥

भाषाटीकासमेत । (१३)
अव आगे चारिप्रकारके भेद वर्णन करैहैं प्रथम मंत्र-
योग १ तथा लययोग २ हठयोग ३ तथा राजयोग ४
इन भेदनसे चारिप्रकारका योग पूर्वाचार्योंने कथन
कियाहे सो वार्ता खेचरीपटल विषै कथनकरीहै ।यथा-
मंत्रो हठो लयो राजयोगोयं भूमिकाक्रमात् ॥ १ ॥
॥अर्थ-मंत्रयोग हठयोग लययोग राजयोग इसतरह
चारिप्रकारकी योगभूमिका है तहां प्रथम मंत्रयोग वर्णन
करौंहौं ॥११॥
॥ मंत्रयोगनिरूपणम् ॥
श्वासनिष्कासकाले हिहकारंपरिकीर्त्यते ॥
पुनः प्रवेशकाले च सकारः प्रोच्यते
बुधैः ।। १२ ॥
जव श्वास वाहर निष्कासर्व प्राप्त हो अर्थात् वाहर
निकलै तव हकार शब्द उच्चारण करै और जब फेरि
भीतरको जावै तव सकार उच्चारण करै सोई वार्ता अनन्य-
जीने कथन करीहै ॥ यथा - जव श्वासा वाहर
लैआवै । तव हकारशब्द उपजावै । जव श्वासा भीतर
संचरै तव सकार शब्दहि उच्चरै ॥ १२ ॥
प्रातरुत्थाय मेधावी संकल्पविधिपूर्वकम् ॥
गुरूपदेशतो योगी मंत्रयोगं समाचरेत् ॥१३॥

(१४) योगरहस्य । बुद्धिमान् प्रातःकाल उठिकरिकै गुरुके उपदेशतें विधिपूर्वक संकल्प करिक मंत्रयोग जो है ताको सम्यक् प्रकार आचरण करै॥ १३॥ एवं क्रमेण कर्तव्यमहोरात्रमविस्मरेत् ॥ सोहमात्मेति विज्ञाय न किंचिदपि चिंत- येत् ॥ १४॥ एवं कहै यहीप्रकार रात्रिदिवसविपे जप करै अर्थात स्मरण करतारहै अभ्यास नहीं छोडै सो वार्ता खेचरीप- टलविपे कथन करीहै ॥ यथा- “वैठत चालत डोलत वोलत, श्वासा शब्द हृदय खोलत" इसप्रकार सदैव अभ्यास करना योग्यहै दोहा-जो पूरो सतगुरुमिले, ज्ञान युक्ति सव देय ॥ भवसागरके जीवको, पार लगावै सोय ॥ हंस हंस इस मंत्रका सर्वदाही जप करेंहैं परंतु जानते नहीं सो गुरुमुखद्वारा जानना सुपुम्नानाडीविपे हंसहंसके उलटा- नेसे सोहं सोहं जप होवैहै तिसका नाम मंत्रयोगहै जव सोहं नाम सो परमात्मा मैं हौं ऐसी जाने तव कोई चिंत- वन नहीं रहैहै ॥ १४॥ गणेशं च विधि विष्णुं शिवं जीवं तथैव च ॥ स्वामिनं सच्चिदानंदंक्रमाच्चक्रेषु चिं- तयेत् ॥ १५॥ "

भापाटीकासमेत ।
जपको विधान कहेहैं गणेशंचेति। गणेशब्रह्मा विष्णुशिव
जीव (गुरु) और सच्चिदानंदब्रह्म ऋमतें चक्रनविपे चितवन
अर्थात् ध्यान करना चाहिये सो ध्यान वर्णन करैहैं आगे
चकनको विधान केहहैं ॥१६॥
॥ अथ चक्राणि ॥
मूलाधारे गणेशोस्ति स्वाधिष्टाने प्रजापतिः ॥
मणिपूरे तथा विष्णुरनाहंते तथा शिवः॥१६॥
चक नाम तथा देवता अधिष्ठाता.कहैंहैं प्रथम आधार-
चक है नाम जाको ताविषे गणेशदेव विराजमान हैं॥१॥
दूसरा स्वाधिष्ठान नाम चक्र ताविपे चतुर्मुखब्रह्मा विराज-
मान हैं तथैव तीसरे मणिपूरक नाम चक्रविपे साक्षात्
विष्णु विराजमान हैं चौथे अनाहत चक्रवि शिव विराज-
मान हैं॥१६॥
कंठकूपे वसेज्जीव आज्ञाचक्रे ततो गुरुः॥
ततश्च सच्चिदानंदः शून्ये व्योनिहितिष्ट-
ति॥ १७॥
पाँचवा विशुद्धनाम चक तथा कंठकूपभी नामधेय है,
ताविप जीव तिष्टहै छठवां आज्ञाचक ताविपे गुरु तताक
ताके अनंतर सच्चिदानंद साक्षात् सवते परे जो आकाश
ताके विप विराजमान है॥ १७॥

(१६) योगरहस्य । ॥ अथ ध्यानस्वरूपमाह ॥. मूले चतुर्दलोपेते वसांताक्षरसंश्रये ॥ च- तुर्भुजमुदारांगं पूर्णचंद्रसमप्रभम् ॥ १८ ॥ अब ध्यानका स्वरूप वर्णन करैं हैं कि, मूल जो आधारचक ताविप चतुर्दलयुक्त कमल चारिअक्षर वका- रसे लेकर सकारपर्यंत व्श्प्स् इनकरिके शोभायमान तहाँ चतुर्भुज चारिभुजनकरिकै उदार है अंग जाको पूर्ण जो चंद्र ताकेसोशोभायमान स्वरूप इसप्रकारका ध्यान करे ॥ १८॥ सोहमस्मीति विज्ञाय गणेशं शक्तिसंयुतम् ॥ द्वितीये पड्दलयुते पडक्षरसमन्विते॥१९॥ शक्ति जो देवी ताकरिके सहित जो गणेश सो मैं हूं इसप्रकार जपध्यान प्रथमचक्रमें करने योग्य है द्वितीय करें दूसरा चक्र अर्थात् कमल है सो पट् दल कहैं छैदलों- करिक तथा पटू अक्षर वकारसे लेकरि लकारतक व भं संयंरं लं इन अक्षरोंसे युक्त है ॥ १९॥ चतुर्मुखं चतुर्वाहुं सुप्रसन्नंशुचिस्मितम् ॥ कमंडलुधरं देवं धातारं शक्तिसंयुत- म् ॥ २०॥ १ ध्यायेदितिशेषः । २ भ्यायेदितिगवेनान्वयः ।

भाषाटीकासमेत ।
(१७)
चतुर्मुख कहैं चारिमुख चारिवाहु सुप्रसन्न शुचिस्मित
कमंडलुकूधारनकरे देव धाताहैं शक्ति जो सावित्री देती
ताकरिकै सहित शोभायमान हैं ॥२०॥
सोहमात्मेति विज्ञायतद्धयानं हि जगत्प्र-
भुम् ॥ २१॥
सो आत्मा मैं हूँ अर्थात् सो ब्रह्मा मैं हूँ इसप्रकार अभेद
चितवनकरना सोई ध्यानरूप है ॥ २१ ॥
मणिपूरे दशदले कंदमध्यात्समुत्थिते ॥
द्वादशांगुलनालेस्मिनक्ता केशराऽन्वि-
ते ॥ २२॥
मणिपूरकनाम जो चतुर्थ कमल है सो दश दलकार के
तथा दशअक्षरोंकरिकै युक्त है डं ढंणं तं थं दं धं नं पं
फं इनकारकै युक्त कंदमध्यतै समुत्थित अर्थात् उत्पन्न है
द्वादशांगुल है नाल जाकी रक्तआभा केशरान्वित है ताके
विपे ॥२२॥
वासुदेवं जगद्योनि पद्मपत्रनिभेक्षणम् ॥ चतु-
(जमुदारांगं शंखचक्रगदाभृतम् ॥ २३॥
वासुदेवभगवान् जगद्योनि पद्मपत्रनिभेक्षण चतुर्भुज
उदार अंग हैं शंखचक्रगदाको धारण करेहैं ॥२३॥

(१८)
योगरहस्य ।
नीलोत्पलदलाभासं रमया परिसेवित-
म् ॥ प्रभाभिर्भासयद्रूपं भक्तानामभयं-
करम् ॥२४॥
नीलोत्पल जोनीलकमलहै ताके दलकी नाई आभास
कहैं शोभा है जिनकी, रमा जो लक्ष्मी हैं तिनकरिकै सेवित
हैं प्रभाजो कांति ताकरिकै प्रकाशमान हैं स्वरूप जिनको
भक्त जे हैं तिनको अभय अर्थात् मोक्षके देनेवाले हैं॥२४॥
मनसालोक्य देवेशं सर्वदेववरं हरिम् ॥
सोहमस्मीति तं मत्वा ध्यानयोगविदो
विदुः ॥२५॥
एवंभूत जे देवेश विष्णु हैं सर्व जे देव तिनकेविषे वरिष्ठ
हे तिनहीको मनकरिक चिंतमनकरै सो विष्णु मैंहौं ऐसा
मानि योगीजन ध्यान कहै ॥ २५ ॥
अतः परे ह्यनाहते पद्मेद्वादशपत्रके ॥ व्याघ्र-
चर्माबरधरं शशीव प्रियदर्शनम् ॥ २६॥
अतः कहैं मणिपूरकतै परे जो अनाहतचक्र पद्म है
सो द्वादशपत्रकारकै शोभायमान द्वादशअक्षरोंकरिकै
युक्त है ताविषे व्याघ्रचर्माम्बर धारण करे शशी जो चंद्रमा
ताके न्याई हैं प्रियदर्शन जाके ॥२६॥

भापाटीकासमेव । पद्मासनसमासीनं देवेशं गिरिजायुवम् ॥ ज- गत्संहारकर्तारमनंतबलपौरुषम् ॥२७॥ पद्मासनकरिकै विराजमान देवेश गिरिजायुक्त जगत्सं- हार करनेवाले अनंत है बल पौरुष जिनको ॥२७॥ अहमेवेति या बुद्धिः सा ध्यानेषु सम- ततः॥२८॥ एवंभूत जो शिव सो मैं हूं इसप्रकार जो बुद्धि सो ध्यानके विपे संमत है ॥२८॥ विशुद्ध षोडशदले षोडशाक्षरसंयुते ॥ जगत्कारणकर्तारं जीवात्मानं सनातनम् ॥२९॥ सोहमात्मेति या बुद्धिःसाध्या- नेपु समंततः ॥ ३० ॥ विशुद्धनाम जो चक्र अर्थात् पद्म पोडशपत्र तथा पोड- शअक्षरोंकरिकै संयुक्त ताविपेजगत्कारणको कर्ता जीवात्मा सनातन ॥२९॥ सो आत्मा मैं हूं या बुद्धि ध्यानके विपे संमत है ॥३०॥ भ्रुवोर्मध्येऽतरात्मानं गुरुं परमभास्वर- म् ॥ अहमेवेति तं मत्वा हंसमित्यक्षरद्ध- यम् ॥३१॥ १ - (२०) योगरहस्य । आज्ञाचक्र भुवनके मध्यविपे अंतरात्मा कहैं व्याप्त है एवं भूत जो गुरु परमभास्वर प्रकाशमान सो मै हूं ऐसा तं कहैं तोन गुरु हैं हंस ये दो अक्षर ताकेविपे हैं ॥३१॥ अतः परं निजं नित्यं विशुद्धं व्योमवह- ढम् ॥ एकं ज्योतिर्मयं शांतमनंतमचलं विभुम् ॥ ३२॥ अतःपरं यातै परे निज करें निजस्वरूप नित्य कहैं सर्वदा एकरस विशुद्ध आकाशकीनाई दृढ एक ज्योति- मय शांत अनंत कहैं नहीं है अंत जाको अचल विभु कहैं देदीप्यमान ॥ ३२॥ सर्वगं सर्वकर्तारममूर्तिमजमव्ययम् ॥ अह- मेव परं ब्रह्म सच्चिदानंदलक्षणम् ॥ ३३ ॥ सर्वग अर्थात् सर्वांतर्यामी सर्वकर्ता अर्थात् उद्भव स्थिति संहारकर्ता, अमूर्त अर्थात् नहीं हैताहश मूर्ति अज कहैं जन्मरहित अव्यय नाशरहित एवंभूत जो परब्रह्म है सो एव कहैं निश्चयकारकै सच्चिदानंदलक्षण मैं हूं ॥३३॥ पट्शतं च गणेशाय पटसहस्रं च ब्रह्मणे॥ पट्सहस्रं च प्रभवे पट्सहस्रं शिवाय

भाषाटीकासमेत ।
(२१)
च ॥३४॥ जीवात्मने सहस्रं च सहस्रं
स्वामिने तथा ॥ परमात्मने सहस्रं च जपं
नित्यं समर्पयेत् ॥ ३५॥
पट्शत अर्थात् छै सौ ६०० गणेशजीके अर्थ तथा
छै हजार ६००० ब्रह्माजीके अर्थ तथा छ हजार ६००
श्रीविष्णुभगवानके अर्थ तथा छ हजार ६००० शिवजीके
अर्थ पुनः ॥ ३४ ॥ एकसहस्र १००० जीवात्माके अर्थ
तथैव एक सहस्र १००० स्वामीजे श्रीगुरुजी तिनके अर्थ
तथा एक हजार १००० परमात्मा जो ब्रह्म हैं तिनके अर्थ
जप नित्यप्रति समर्पण करना चाहिये ॥३५॥
एकविंशतिसाहस्रं षट्शताधिकमेव च ॥
साधकस्य भवेन्नित्यं जंपसंख्या हि मो-
क्षदा॥३६॥
इक्कीसहजार छै सौ २१६०० इस साधकपुरुपकी
जपसंख्या नित्यही होवै है सो संख्या मोक्षके देनेवाली
होवैहै ॥ ३६॥
यदा सोहं सुषुम्नायां भासते हि स्वभा-
वतः ॥ सर्वकर्माणि संत्यक्त्वा जीवन्मु-
तो भवेत्तदा ॥ ३७॥

(२२)
योगरहस्य ।
यदा कहैं जिसकालमें इस साधकपुरुपके स्वभावतेही
सोहं शब्द सुपुम्ना ब्रह्मनाडीविपे उत्पन्न होते है उसकाल-
विपही सर्व कर्मनको त्यागकरि जीवन्मुक्त होवै है अर्थात्
देहाध्यासरहित होवैहै ॥ ३७॥
न क्षुधा न तृपा निद्रा शीतोष्णं न तथैव
च ॥ न मृत्युनातकः क्रुद्धो बाधते तं च
योगिनम् ॥ ३८॥
न क्षुधा न पिपासा न निद्रा तथा न शीत उष्ण न
मृत्यु न अंतक जो काल भगवान तिस योगीको कोई
वाधक नहीं अर्थात् कोई वाधा नहीं करैहै ॥ ३८ ॥
येन दृष्टं परं ब्रह्म सोहं ब्रह्मेति मन्यते ।
किं चिंतयति निश्चिंतो निर्विकारोऽतिनि-
मलः ॥ ३९॥
जापुरुषकरिकै परं ब्रह्म अर्थात् परमात्मा दृष्ट है
सो ब्रह्म मैं हूँ या बुद्धिविपे स्थित है किंचिंतयति सो कुछभी
चिंतमन नहीं करैहै अर्थात निश्चित है निर्विकारी अत्यंत
निर्मल है ॥ ३९॥
यदज्ञानाजगज्जातं सदासत्येनभासते॥सोहं
ब्रह्मेति विज्ञाय न कांक्षतिनशोचति ॥४०॥

भाषाटीकासमेव ।
(२३)
जिस अज्ञानकरिकै जगत् उत्पन्न है सो जगत् सर्वदा
सत्यकरिकै नाशमान है सो ब्रह्म मैं हूं एवंभूत ज्ञानी 'न
कांक्षति न शोचति' न कोई वांच्छा न शोच करै।। ४० ॥
तदा बद्धो यदा जीवों किंचिद्वाञ्छति
शोचति ॥ तदा मोक्षो यदा चित्ते न
शोचति न वाञ्छति ॥४१॥
तिसकालविपे ही जीव वद्ध है जिसकालमें कुछभी
वांछा वा शोच है तदा कहैं तिसकालविषही मोक्ष है यदा
जिसकालमैं चित्तविषेशोच वा वांछा कुछ नहीं है ॥४१॥
मंत्रयोगो मया चोक्तः प्रोक्तश्च मुनिभिः
पुरा॥ योगस्य च फलं किंतु ब्रह्मतुल्यं प्र-
कीर्तितम् ॥४२॥
मंत्रयोग जो है सो हमकारकै कहा जोकि पूर्वकालविप
मुनीननेभी कहाहै सो इस मंत्रयोगके फलकू कहा वर्णन
करूं यह साक्षात् ब्रह्मतुल्य है ॥४२॥
इति श्रीयोगमार्गप्रकाशिकायां मंत्रयोगवर्णनं नाम
प्रथमोपदेशः ॥ १॥

(२४) योगरहस्य । ॥ अथ लययोगः॥ दृष्टिः स्थिरा यस्य विनैव दृश्याद् वायुः स्थिरो यस्य विना निरोधात् ॥ चित्तं स्थिरं यस्य विनावलंवात् स एव योगीस गुरुः स सेव्यः॥१॥ अव लययोगके लक्षण कहहैं विनाही नासिकाका अग्र- भाग देखनेसे जाकी दृष्टि स्थिर है विनाही प्राणायामोंके वायु स्थिर है, विनाही अवलंवके अर्थात् पट्चक्रके ध्यान करे विनाही जिस पुरुपका चित्त स्थिर है सोई योगी वा गुरु वा सेवनीय है ॥१॥ अथासनं दृढं बद्धा मुद्रां विधाय शांभ- वीम् ॥ सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नादं सुषुम्नायां परामृशेत् ॥२॥ लययोगकांसाधन कहैं अथ कहैं जा मंत्रयोगके अनं- तर आसन जो सिद्धासन तथा पद्मासन है ताहि दृढ बांधि- कार शांभवी जो खेचरीमुद्रा है सो धारनकरि सुषुम्ना ब्रह्म- नाडीविपे सूक्ष्मतें सूक्ष्म जो नाद ताहि श्रवण करै ॥२॥ चिणीति प्रथमे नादं चिंचिणीति द्वितीय- के ॥ घंटानादस्तृतीये च शंखनादश्च- -

भापाटीकासमेत । (२५)
तुर्थके ॥ ३ ॥ तंत्री पंचमेके नादे पष्टे
तालं प्रचक्षते ॥ वंशीवाद्यस्तथा चान्यो
मृदंगस्तदनंतरम् ॥ ४ ॥ भेरीनादस्तथा
तत्र दशमेऽभ्रसमो भवेत्॥ नवमं च परि-
त्यज्य दशमं यः समभ्यसेत् ॥५॥
भित्त्वा सर्वाणि कर्माणि चिदानंदायते
ततः ॥६॥
ता नादक चिंतमनविषे प्रथम चिणी ऐसा शब्द होवेहै
दूसरे चिंचिणी तीसरे घंटा चौथे शंखनाद ॥३॥ पांचवें
वीणा छठवां ताल कथन कन्योहै तथा सातवां वंशीवाद्य
-मृदंग ताके अनंतर है ॥४॥ तत्र नवमा भेरीशब्द तथ
दशमें अभ्रक, मेघसमान शब्द होवैहै नवम जो भेरी
ताहि परित्यज्य अर्थात अभ्यासकरि दशम जो नाद ताहि
अभ्यास करै ।।५।। सो संपूर्ण कर्मग्रंथि ताहि भेदनकरि
ब्रह्मानंदकू प्राप्त होवैहै ।। ६ ।।
।। अथ नादस्य फलम् ।।
चिंचिणी प्रथमंदेहं द्वितीयं गात्रभंजनम् ॥
तृतीयं खेदनं यातिचतुर्थे कंपते शिरः॥ ७॥

(२६)
योगरहस्य।
पंचमे स्रवते तालुरमृतं दिव्यरूपिणम् ॥
भुत्त्कामृतं तथा पष्ठे . वृद्धोपि तरुणो
भवेत् ॥ ८॥
अव नादके फलकू वर्णन करहैं प्रथम देहवि-
चिंचिणी होवेहै तथा दूसरे गात्रटूटवेकी न्याई
प्राप्त होवै तीसरे खेदकू प्राप्त होवै तथा चतुर्थ नादविपे
शिरकंपन होवैहै ॥७॥ पंचमनादविषे तालु स्त्रवह
अर्थात् तालुविपे चंद्रमा तातें अमृत दिव्यरूप सवैहै पष्ट
नादविपे वा अमृतकू पान करि वृद्धपुरुपभी तरुण
होजाताहै ॥८॥
सप्तमे चास्ति विज्ञानं परावाचाष्टमंतथा॥
नवमं योगिनो देहे पुण्यो गंधो भवेद् ध्रु-
वम् ॥९॥ दशमं ब्रह्म संप्राप्य निर्वाण-
मधिगच्छति ॥ १०॥
सप्तम नादविपे विज्ञान अर्थात् त्रैलोकज्ञता होवेहै तथा
आठमें परावाचा अर्थात् पशुपक्षियोंकीमापा जानिवेकू
समर्थ होवैहे नवेंयोगाभ्यासीकी देहविषे पुण्यगंध अर्थात्
अच्छी सुगंध उत्पन्न होवैहै ॥ दशमें ब्रम्हपदकू प्राप्तहो
कर मोक्षकू प्राप्तहोवै है ॥ ९ ॥१०॥

भाषाटीकासमेव ।
(२७)
सदा नादानुसंधानात्क्षीयंते पापसंच-
याः॥निरंजने विलीयेते निश्चितं चित्त-
मारुतौ ॥११॥
सदा सर्वदा नादके अनुसंधानतें पापनके समूह नाशकू
प्राप्त होय. निर्गुण चैतन्यविपे निश्चयही चित्त और वायु
लीन होय है ॥ ११॥
यथा निरिंधनो दीपो स्वयमेवोपशाम्य-
ति ॥ तथा वृत्तिक्षयाञ्चित्तं स्वयमेवोपशा-
म्यति ॥ १२॥
जिसप्रकार निरिंधन अर्थात् तैलवर्ति विना दीपक
आपही आप शांत हो है तैसैही गुणदोपरूप वृत्ति क्षय
होने चित्त आपही आप शांतताकू प्राप्त होयहै ॥ १२॥
निरंतरकृताभ्यासाद्योगी विगतकल्मषः॥स-
वैदेहादि विस्मृत्य तदभिन्नःस्वयंगतः॥१३॥
निरंतर शुद्धचित्त होकै जो योगी नादका अनुसंधान
करैगा वह देहादिकर्मसे रहित आत्मासे आभिन्न होजायगा
अर्थात् आत्मस्वरूप होजायगा॥१३॥
यःकरोति सदाभ्यासं गुप्ताचारेण मान-
वः॥ स वै ब्रह्मविलीनं स्यात् पापकर्मर-
तो यदि ॥१४॥

.
(२८) योगरहस्य ।
जो मनुष्य गुप्ताचारकरिकै इसका अभ्यास करैगा वह
यदि.पापकर्मरतभी होवै तौ उसकी मोक्ष होवैहै ॥ १४ ॥
बद्धं तु नादबंधेन मनः संत्यज्य चापल-
म्॥प्रयाति सुतरां स्थैर्य छिन्नपक्षः खगो
यथा॥ १५॥
नादरूपी बंधनकारकै बधो भयो मन अपनी चंचलता
छोडिदईहै जानै सो निश्चयकार स्थिरताकू पावै है जैसे
पक्षहीन पक्षी आपही स्थिर हावै है ॥१९॥
मकरंदं पिवन्मँगो गंधं न त्यजते यथा॥
शब्दासक्तं तथा चित्तं विषयान्न हि कां-
क्षति ॥ १६॥
जैसे भ्रमर पुष्परसको पानकरते हुए गंधको नहीं
छोडै है तैसेही नादमें आसक्त चित्त विपयनको नहीं
कांक्षा करैहै ॥ १६॥
नरूपंनचसंस्पर्श न गंधं न च वैरसम्॥
नात्मानं चापरं वापि योगी मुक्तः समा-
धिना ॥१७॥
न रूप है न स्पर्श है न गंध है न रस है न अपनी वा
पराई आत्मा है केवल योगी समाधिकरिकै मुक्तहै॥१७॥

भाषारीकासमेत । (२९) अभेद्यः सर्वशस्त्राणामशक्यः सर्वदेहि- नाम् ॥ प्रनष्टश्वासनिश्वासो योगी मुक्तः समाधिना ॥ १८॥ सर्वशस्त्रनकरिकै अभेद्य अर्थात् वध्य नहींहैं संपूर्ण प्राणीनकारकै अशक्य अर्थात् पराक्रमः रहित है प्रकर्प- करिकै नष्ट है श्वासनिश्वास जाकी ऐसो योगी समाधि- करिकै मोक्षरूप है ॥ १८॥ गोपनीयं प्रयत्नेन सद्यः प्रत्युपकारकः॥ निर्वाणदायको लोके योगोऽयं मम वल्ल- भः॥ १९ ॥ यह जो लययोग है सो प्रयत्नकरिकै गोपनीय है निश्चयकरिकै चित्तवृत्तियोंको नाशकारक है लोकविषे मोक्षको देनेवारो है इसहेतु यह लययोग हमको अत्यंत प्रिय है ॥ १९॥ लययोगोऽयमित्युक्तःसद्यो वैमोक्षदो नृ- णाम् ॥ यो योगेऽस्मिन्समारूढः पुरुषः कालवंचकः॥२०॥ लययोगनाम जो योग हमने कहाहै सो निश्चयकरि -

(३०)
योगरहस्य ।
मनुष्योंको शीघ्रही मोक्षदाता है इस योगविषे समारूढपु-
रुप कालवंचक अर्थात् कालकी वंचनकरवेवारो होय
है ॥२०॥
इति श्रीयोगमार्गप्रकाशिकायां लययोगवर्णनं
नाम द्विवीयोपदेशः ॥२॥
॥ अथ हठयोगवर्णनम् ॥
जगुस्तदंगाष्टकमुत्तमाशयं यमादिसंज्ञं
मुनिवयंसेवितम् ॥ समासतस्तस्य फलं
चलक्षणं वदामिवृद्धर्षिमतानुरोधतः॥१॥
अव हठयोग कथन करेंहैं जिस हठयोग वा राजयोगकी
परंपरातें यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा
ध्यान समाधि इसभेदसे ऋपिलोगोंने गान करैहै तथा
याज्ञवल्क्यादिकरिकै सेवित हैं ता योगके समासफलफू
वा लक्षणकू वृद्धक्रपिअर्थात् याज्ञवलयवशिष्ठादिकोंके
मतके अनुसार वर्णन करौंहौं ॥१॥
प्रात्याहारासनध्यानप्राणायामास्तथैव च ॥
धारणाऽथ समाधिश्च हठयोगेति गद्यते ॥२॥

भाषाटीकासमेत । (३१)
आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि
इसप्रकार पडंग हठयोगकेविषे कथन करेहैं तथा
अष्टांगभी हैं ॥२॥
यमश्च नियमश्चैव प्राणायामश्चतुर्थकम् ॥
तृतीयं चासनं पूर्व प्रत्याहारस्तु पंचम-
म् ॥३॥ धारणाथ समाधिश्च त्यष्टकं
सौख्यदायकम् ॥तत्रैवदशधांगानि यम-
स्य नियमस्य च ॥४॥
यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान
समाधि इसप्रकार अष्टांगभी सौख्यदायक हठयोग है
तहांहीकेविपे यम वा नियमके दश दश प्रकारके अंग
वर्णन करे ॥३॥४॥
॥ अथ यमलक्षणम् ॥
सत्यमार्जवमास्तेयमहिंसा च मिताश-
नम् ॥ क्षमा दया धृतिः शौचं ब्रह्मचर्य
परिग्रहः ॥५॥ एते चमुनिभिः पूर्वैः क-
थितास्तु यमा दश॥६॥
यम निरूपण करें। सत्य आर्जव अस्तेय अहिंसा
मिताशन क्षमा दया धृतिः शौच ब्रह्मचर्यधारण इनक-
रिके पूर्वकालविषे यम कहाहै ॥५॥६॥

(३२) योगरहस्य । ॥ अथ नियमलक्षणम् ॥ जपस्तपो दानमथागमश्रुतिस्तथास्तिक- त्वं व्रतमीश्वरार्चनम् ॥तथाप्तितोषो मति- रप्यपत्रपा बुधैर्दशैते नियमाः समीरि- ताः॥७॥ ॥ अथ आसनानि ॥ तथा नियमलक्षण कहैं जप, तप, दान, वेदांतश्रवण, आस्तिक्य, व्रत, ईश्वरपूजन, यथालाभसंतोप, मति, लज्जा, बुध कहैं योगवेत्ता तिनने ये दश नियम कथन कर तथा यमनियमके . फलकू योगसूत्रमें कथनकरैहैं सत्यप्रतिष्ठायां कियाफलाश्रयत्वम्" चिरकालपर्यंत सत्यवाक्य पालनकरनेसे तिसपुरुषका वाक्य सत्यही- होवहैं "अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरनोपस्थानम् जिसकालदिपे अस्तेयवृत्तकी दृढता होवैहै तौ सर्वदिशाओंसे मणिमुक्ता- फलादि आनिकर प्राप्तहोवेहैं"अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्संनिधौ वैरत्यागः चिरकालपर्यंत अहिंसाव्रतपालनकरनेतें ही तिसपुरुपके समीपवैरत्यागकर नकुलसर्प मृगसिंह आनंद- पूर्वक विचरतेहैं "ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः"ब्रह्मचर्य वृत्तके स्थिर होनेते जो जप तप व्रतादिकरूपक्रिया सो सव वीर्यवती होतीहैं तथा आप सिद्धभया पुरुप अन्य .

भापाटीकासमेत ।
साधकोंको ज्ञानोपदेश देवहै "संतोषावनुत्तमसुख-
लाभः" चिरकाल संतोप धारणकरने” अनुत्तम सुखका
लाभ होवेहै ।। ७॥
॥ भथासनानि ।।
सिद्धं च पद्मं च सिंहासनं च भद्रासनं
कूर्ममयूरपीठम् ॥ एतानि सर्वाणि भया-
पहानि सर्वेषु मुख्यानि विवर्णितानि ॥८॥
आगे हठयोगका तृतीय अंग जो आसन है सो वर्णन
करेंहैं सिद्धासन, पद्मासन, सिंहासन भद्रासन, कूर्मासन,
मयूरासन जो हैं सो संपूर्ण जो राजस तामसधर्मसे वात;
पित्तकफादिकोंकी वाधा ताहि दूरिकरिवेवारे हैं तथा
संपूर्ण योगमंत्रादि तिनकेविषे येही आसन मुख्य हैं
वैसे आसन तो बहुत हैं सो वार्ता गोरक्षशतकवि कथन-
करीहै ॥ यथा-आसनानि च तावंति यावंत्यो
जीवजातयः ॥ एतेपामखिलान्भेदान्विजानाति महेश्वरः।।
१॥ अर्थ-आसन तहतिकहैं जहांतक जीवजाति हैं
इनके संपूर्ण भेदनको केवल शिवजीही जानतेहैं यात
मुख्य मुख्य आसन कहैंहैं. तथा साधनांशमुख
जानलेनो॥८॥

(३४) योगरहस्य । चतुराशीतिपीठेषु चतुष्कं योगिनो मतम्।। सिद्धं पद्मं तथा भद्रं सिंहासनमितीरितम्॥९॥ चौरासी आसन श्रीशिवजीने मुख्य वर्णन करे तिनमें चारि आसन योगीजनोंके संमत हैं सिद्धासन १ पद्मा- सन २ भद्रासन ३ सिंहासन ४ सोई वार्ता योगप्रदीपि- काविपे कथनकरीहै ॥ यथा-चतुराशीत्यासनानि शिवेन कथितानि च ॥ तेभ्यश्चतुष्कमादाय सारभूतं ब्रवी- म्यहम् ॥ १ ॥ अर्थ-चौरासी आसन शिवजीने पूर्वका- कालमें कथन करे, तिनमें चारि आसन सारभूत ग्रहण- करि कहाँहौं "सिद्धं पद्म तथा सिंह भद्रंचेति चतुष्टयम्" सिद्धासन पद्मासन सिंहासन भद्रासन ये चारि आसन मुख्य हैं साधनांश गुरुमुखतै जानलेनो॥९॥ योनिमूले वामपादं दक्षपादं तथोपरि ।। अवारंतर्गता दृष्टिः पवनाभ्यासं समाच- रेत् ॥ १० ॥ एतत्सिद्धासनं प्राहुः केचि- द्वज्रासनं विदुः॥ सिद्धासनमिदं श्रेष्टं पू- जितं योगिपुंगवः ॥ ११ ॥ "

भाषाटीकासमेत। (३५)
योनिस्थान कहैं लिंग और गुदाके मध्य अर्थात् लिंगरौं
नीचे और गुदाते उंचे जो योनिस्थान है, ताविप वाम-
पाद अर्थात् वामपादको लगावै तिस वामपादके ऊपर
दक्षिणचरण स्थापित करिकै दोनों भूके मध्यमें दृष्टि स्था-
पितकार पवनका अभ्यास करै ॥१०॥ इसको सिद्धलोग
सिद्धासन कथन करैहैं और कोई कोई वज्रासन तथा
मुक्तासनभी कहते हैं यह जो सिद्धासन है सो संपूर्ण
आसनकोविपे श्रेष्ठ है और संपूर्ण योगीजनकरिकै पूजित
अर्थात् अभ्यास करयो जाइ है ॥ ११॥
॥ अथ पपासनम् ॥
ऊर्वोपरि सुसंस्थाप्य शुभे पादतले उभे॥
ऋजुकायः समासीन इति पद्मासनं भ-
वेत् ॥ १२ ॥
दोनों जंघानके ऊपर दोनों पाव धारनकरिके ऋजु कहैं
सीधाशरीरसै वैठिजावे इसप्रकार पद्मासन कहावै॥१२॥
॥ अथ कुक्कुटासनलक्षणम् ॥
पद्मासनसमं बध्वा जानोरभ्यंतरे करौ॥
उत्थाप्य वासनादूर्वकुझुटंतद्रदेदुधः॥१३॥

(३६) योगरहस्य । कुकुटासनबंधस्थो वायुसाधनमाचरेत् ॥ निहंति सकलान्रोगानंधकारं यथा र- विः॥१४॥ पूर्वोक्त जो पद्मासन ताहि समान वांधिकरि दोनों हाथ जानूनके भीतर करिकै आसनतें ऊपर उठै अर्थात् पृथ्वीछोडदे आसन वधेिरहै इसको कुक्कटासन कहते हैं,१३ कुकुट आसन वांधिकार जो पुरुष वायुका साधन करै सो संपूर्ण रोगनकू दूरि करैहै जैसे सूर्य अंधकारकू नाशक: रैहै ॥१४॥ ॥ अथ भद्रासनलक्षणम् ॥ सीवन्या दक्षिणे भागे दक्षगुल्फं तु धार- येत् ॥ वामभागे वामगुल्फमिति भद्रा- सनं भवेत् ।। १५॥ सीवनीके दक्षिणभागविपे दक्षिणगुल्फ अर्थात् दहिने पावका टकना स्थापित करि वामभागविषे वामगुल्फ अर्थात् वामपावका टकना धारण करे इसको भद्रासन कह ॥ १५॥ ॥ अथ सिंहासनलक्षणम् ॥ गुदं निरुध्य पादाभ्यां हस्तौ जान्वोस्तु धार- येत्। मुखं विदायें नासाग्रं निरीक्षेत्सुसमा ।

भाषाटीकासमेत।
हितः॥१६॥ोतत्सिंहासनं प्रोक्तं योगशास्त्र
विशारदैः॥१७॥
गुदा जो ताहि दोनों पावनकरिकै रोके दोनों हाथ
घुटुवनपर धरै और मुख फैलाय नासिकाके अग्रभागकू
अच्छीतरहसे देखे ॥ १६॥ इसको योगशास्त्रवारसिंहासन
कथन करें यह बहुतही अच्छा आसन है ॥ १७॥
॥ अथ कूर्मासनलक्षणम् ॥
पद्मासनं समं स्थाप्य जान्वीरभ्यंतरे करौ॥
ताभ्यो शिरः समाकृष्य एवं कूर्मासनं
भवेत् ॥ १८॥कूर्मों यथा निजस्थाने अंगं
संकोचयेद्धवम् ॥ तद्वत्संकोचयेद्योगी
कूर्मासनमतांतरे ॥ १९॥
पद्मासनसमान स्थापितकार धुटुवनके अनंतर जो
हात तिनकरिके अपना जो शिर ताहि ग्रहणकरे सो कू-
मासन होवे है॥१८॥ जैसे कूर्म अपने स्थानविषे अपने
अंगका संकोचन करहै तिसप्रकार योगी अपने अंगका
संकोचन करै यह मतांतरकोविपे कूर्मासन होवैहै ॥१९॥
॥ अथ मयूरासनलक्षणम् ॥
हस्तौ धरामभिस्पर्ध्य नाभिपार्श्वे तथोपरि।
दंडवच्च समासीनो मयूरं च प्रकीर्तितम्॥२०॥

(३०) योगरहस्य। दोनों हाथ पृथ्वीमें धारिकार तिसके टिहुनीनके ऊपर नाभिपार्थ अर्थात् पेट धारिकार दंडवत् अर्थात् सीधा शरीरकार स्थित होवे इसको मयूरासन कहैहैं जो जठरामिको वर्द्धनकरैहै ॥२०॥ ॥ अथ शवासनलक्षणम् ॥ मृतवच्छयनीभूमौ श्रमे जातेशवासनम्॥ एतत सुखकरं नित्यं श्रमाभावे न चाभ्य- सेत् ॥२१॥ मृतककी तरह पृथ्वीमें शयनकरना इसको शवासन कहैं यह जो आसन सो सुखकारक है जब श्रम न हो तव इसका अभ्यास नहीं करना चाहिये और आसनोंके लक्षण वा साधनांशगुरुमुखः जानिवेके योग्य है ॥२१॥ अनलसत्वमुपस्थवलक्षयोऽनिलनिरोध पटुत्वमर्मिता॥ पवनमंथरताप्युपजायते स्थिरमतेरिह पीठजयात् किल ॥ २२॥ चिरकालके अभ्यासकरनेसे जिसकालविपे आसन, का जय होवे तिसकालविषे अनलसत्व कदिये योगाभ्या सविपे महाविनरूप जो आलस्य ताकी निवृत्ति होवे है, और उपस्थवलक्षय कहिये लिंगेंद्रियके बलकाभी क्षय होवेद अनिल जो प्राणवायु है तिसके निरोधकरनेमें

भाषाटोकासमेत ।
(३९)
सामर्थ्य होवैहै तथा अमिताकहिये क्षुधा,पिपासा,शीत
उष्ण, राग, द्वेप येषट् म्मियां हैं सो विनाशकू प्राप्त होवैहैं
पवनमंथरता कहिये प्राणवायुकी गतिभी मंद मंद होवेहे
काहसे कि कोई श्रममें तथा गमनमें जैसी शीघ्रता
तैसी वैठनेसमयमें नहीं होती तातै स्थिरमति जो साध-
कपुरुप वो आसनके जय होनेसेही संपूर्ण सिद्धिको
प्राप्त होवेहै ॥२२॥
अथ नादानुसंधानेवाय्वभ्यासपरायणः।।
ब्रह्मचारी जितक्रोधी त्यागी योगरतःसदा
॥ २३ ॥ मिताहारी भवेत्सिद्धो ह्यब्दादूर्व
न सशयः॥२४॥
अथ जाके अनंतर नादके अनुसंधानविषे पवनके
अभ्यासविपे परायण ब्रह्मचारी जितक्रोधी त्यागी कांक्षा
रहित योगका प्रेमी निरंतर ॥ २३ ॥ प्रमाणका भोजन
कर इस प्रकार एकवर्पते ऊपर सिद्ध होतेहै संशय नहीं
है ॥२४॥ आगे प्राणायामके निमित्त प्रथम क्रिया
निरूपण करें।
॥ अथ क्रियानिरूपणम् ॥
त्राटकं नौलिक नेतिधौतिर्वस्तिस्तथैव
च ॥ कपालभातिविख्याता पट्र कर्माणि
प्रचक्षते ॥२५॥

(४०)
योगरहस्य।
त्राटक १ नौलि २ नेति ३ धौति ४ वस्ति ५ और
कपालभाति ६ये पट्कर्म महात्माओंने कहेहैं इनकरिकै
शरीरकी शुद्धि होवहै ।। २५॥
॥ त्राटकलक्षणम् ॥
समीपमपि दूरस्थं सूक्ष्म लक्ष्यं विलो-
कयेत् ॥ अश्रुसंपातनं यावत्तावन्मुद्रा
समाचरेत् ॥ २६॥
समीप वा दूर जो कुछ सूक्ष्म लक्ष्य उसको इकटक जव
तक अश्रुपात न होवै तवतक देखै इसकर्मको योगीजन
त्राटककर्म कहैं यह संपूर्ण रोगनेत्रके विनाशकरे ॥२६॥
॥ नौलिलक्षणम् ॥
यथा नदीनां बहुतोंबुवेगादावर्त्तवेगे हाद-
रं प्रचाल्यते । मंदाग्निसंदीपनका सदैव
हठक्रिया मुख्यतमा च नौलिः ॥२७॥
जैसे नदीनमें बहुतसे जलके वेगरौं भ्रमर उत्पन्न होवैहै
तैसेही वडे वेगकारकै उदर वाम दक्षिण भ्रमावै यह क्रिया
सदैव काल मंदामिकू वढावनेवारी है यह संपूर्ण हठयोगविषे
नोलिकर्म मुख्य है ॥२७॥

भापाटीकासमेत। (४) यावन्न प्राप्यते नौलिः सदैवानंददायिनी।। तावत्क्रियायां पट्कर्म निष्फलं नैवका- रयेत् ॥२८॥ सदैव काल आनंदके देनेवारी जवतक नोलिक्रिया न करना हो तवतक और संपूर्ण पद कर्म अर्थात् क्रिया प्राप्त निष्फल है नहीं करना चाहिये काहेत कि इसविना कोई ठीक नहीं होते है ॥२८॥ । नेतिलक्षणम् ॥ सूत्रं वितस्तिमात्रंतुसुस्निग्धं ग्रंथिवर्जितम्।। गुरूपदिष्टमार्गेणनासारंधे प्रवेशयेत् ॥ २९॥ मुखान्निष्कासयेच्चापि नेति सिद्धाः प्रचक्षते ।। निहंति मांस्तकान्रोगान् दिव्यदृष्टिकरी सदा ॥३०॥ अच्छासूत्र वितस्तिमात्र अंथिरहित मौममें भिगोइ गुरुके वताये मार्गकरिकै नासिकामें प्रवेशकरै फिरि मुखसे वाहर निकारै इसक्रियाको सिद्धलोग नेति कहते हैं सो क्रिया मस्तकके रोगोंको दूरिकरनेवारी है और नेत्रनकू दिव्यदृष्टि करनेवारीहै ॥२९॥३०॥ १मस्तकभवान् ।

(४२)
योगरहस्य ।
॥ अथधौतिलक्षणम् ॥
सूक्ष्मवस्त्रं समानीय हस्तविंशप्रमाणतः॥
चतुरंगुलविस्तारं ग्रसेदुष्णेनवारिणा३१॥
भ्रामयित्वा जलेनव वस्त्रं निष्कासये-
च्छनैः॥ युक्तंयुक्तंचगृह्णीयात्युक्तं युक्तं
पुनस्त्यजेत् ॥३२॥ अभ्यसेोजनादूर्व
भोजनांते नचाभ्यसेत्॥श्वासकासादिका
रोगाः कफवातसमुद्भवाः॥३३॥ कुष्ठप्लीहा
तृषा मूर्छा भ्रमदाहज्वरामयाः कर्मणा-
नेन शुद्धन क्षीयंते सकला मलाः॥ ३४ ॥
अच्छा सूक्ष्म कहै महीन वस्त्रवीस हाथ लांमा चारि अं-
गुल चौडा पगडीके सो टूक ग्रहण करिकै उष्णजलतें
धीरे धीरे निगले ॥३१॥ और नौलिकर्मकारकै उदरमें
भ्रमावै फेर धीरे धीरे वाहर निकालै युक्ति युक्तिसों तौ ग्रहण
करें और युक्ति युक्तिसों फेरि छोडै इसप्रकार धौतीकर्म
होतेहै ॥ ३२॥ और भोजनसे पहिले इसका अभ्यास करें
भोजनकारक नहीं श्वास कास आदिसे कफवात उत्पन्न
जे रोग ॥३॥ वा कुष्ठ प्लीहा तृपा मूर्छा भ्रम दाह ज्वर
आमय और संपूर्ण जे मल ते यह धौतिकर्मकरिकै नाशकू
प्राप्त होवैहैं ॥३४॥

भाषाटीकासमेत । (४३) ॥ अथ बस्तिलक्षणम् ॥ नाभिमात्रेजले स्थित्वा गुदेनाकुंचयेज्जल म्॥ पुनः प्रचालनं कुर्यात् बस्तिर्दोषवि- नाशनी ॥ ३५॥ अशेषदोषामयशोषिणी यामंदाग्निसंदीपनिकासदैव ॥आरोग्यता बिंदुजयप्रदायिनी बस्तिक्रिया योगमते प्रसिद्धा ॥ ३६॥ नाभिमान जलके विपे स्थित होकर गुदाके आकुंचन कारकै जलकू आकर्षण करै फेरि पूर्वोक्त जलकरिके भ्रमण कराय परित्याग कर यह वस्तिकर्म संपूर्ण दोषके नाशक- रनेवारो है ॥ ३५॥ संपूर्ण दोपते उत्पन्नभयो जो आमय अर्थात् आमाशय ताके शोषण करनेबारी और मंदाग्निको | वढावनेवारी और आरोग्यताको देवेवारी विंदुको जयकी देनेवारी ऐसी वस्ति क्रिया योगमतमें प्रसिद्ध है ॥३६॥ ॥ अथ कपालभातिलक्षणम् ॥ रेचकं पूरकं चैव द्रुतं पूरकरेचकौ कपाल भातिर्विख्याता लोहकारस्य चर्मवत् ।। ३७ ।। मंदाग्निदीपनी चैव कफदोष विशोपणी ।। ३८ ॥

(४४) योगरहस्य ।
रेचक और पूरक शीघ्रकरिके फिरि पूरकरेचक कपा-
लभाति है नाम जाको जैसे लुहारकी धौंकनीसे वारंवार
वायु आवे जावैदे तिसप्रकारही कपालभातिकिया होवेहै ।।
॥ ३७॥ सो कैसीहै कि मंदाग्निके वढावनेवारी संपूर्ण
कफक दोपोंकू नाशकरे है ॥ ३८॥
॥ अथ नजकांक्रियालक्षणम् ।।
अपानमूर्द्धमुत्थाप्य यद्भुक्तं तत्परित्यजेत्॥
॥ ३१॥ गजकर्णी समाख्याता वश्या
नाड्यो भवेद्धवम् ।।४०॥
अपानवायु जो अधोगतिवायु है ताहि उपर कंठना-
लमैं खींच जो कुछ भुक्त अर्थात् खट्टा मीठा पदार्थ खाया
हुवा है ताहि परित्यजेत् नाम बाहर निकालदेय इसको
कपिलाचार्यादिने गजकरणीक्रियाकहाहै इसक्रिया कर्मत
संपूर्ण नाडी वशीभूत होवैहैं यह षट्कर्म कारकै पृथक है
परंतु पटूकमहीके अंतर्गत कोऊ मानें हैं ॥३९॥४॥
षट्कर्मप्रभावेण क्षीयंते सकला मलाः॥
ब्रह्मरंध्रे ततो वायुरनायासेन गच्छति
॥४१ ॥ गुह्याद्ह्यतरं दिव्यं घटशोधन-
कारकम् ॥ सामान्यमानुषस्यैव न देयं
यस्य कस्यचित् ॥ ४२ ॥

भापाटीकासमत। (४५) इस पट्रकमके प्रभावकरिक संपूर्ण मलनका नाश होवैदे तदनंतर वायु अनायास विनाश्रमकरिक ब्रह्मरंध्र जो सुषुमामार्गताविषे गमनकरदे ॥४१॥ ये षट्र कर्म गुह्यते 'गुल हैं और दिव्य हैं घट जो शरीर ताके शोधनकारक हैं य किसी सामान्यमनुष्यको न देना उचित है ॥४२॥ ॥ अथ समाधिवर्णनम् ॥ चित्तं न साध्यं विविधैर्विचारैर्वितर्कवादै- रपि वेदवादिभिः ॥ तस्मात्तु तस्यैव हि केवलंजयःप्राणो हि विद्यत न चान्यक- श्चित् ॥४३॥ नानाप्रकारके विचार तथा शास्त्रार्थादि तथा वेदश्रुति कथन करना इसकरके मनसाध्य नहीं होवैई तिसके जय करनेमें अर्थात् वश करने में केवल एक प्राणवायुही समर्थ है अन्य कोई उपाय नहीं ॥ यथा-भर्तृहरिकृत ॥ भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनीचंचला आयुर्वा- युविघट्टिताम्रपटलीलीनांबुवद्भगुरम् ॥ लोलायौवनलालना तनुभृतामित्याकलय्यद्भुतं योगे धैर्यसमाधिसिद्धिसुलभे बुद्धिं विधत्ते बुधाः ॥१॥ अर्थ-विस्तृत मेघमें चमक- तीहुई विजुलीसमान देहधारियोंका भोग चंचल है वायुसे (४६) योगरहस्य । छिन्न भिन्न मेघजलके समान आयुभी नाशमान है और यौवनका उमंगभी स्थिर नहीं है ताते हे पंडितो ऐसा समझिकार समाधिकी सिद्धिसे सुलभजो योग तिसमें बुद्धि धारण करौ ॥४३॥ ॥ अथ समाधिकालः॥ एकश्वासमयी मात्राप्राणायामे निगद्यते॥ अधमे द्वादश प्रोक्ता मध्यमे द्विगुणाः स्मृताः॥४४॥ उत्तमे त्रिगुणा मात्राः प्राणायामे प्रचक्षते॥प्राणायामद्विषट्कन प्रत्याहार उदाहृतः॥४५॥ प्रत्यहारद्वि- पदकेन धारणा परिकीर्तिता ॥ भवेदी- श्वरसान्निध्यं ध्यानं द्वादश धारणाः ॥ ध्यानं द्वादशकं यत्स्यात्सा समाधिर्वि- धीयते ॥४६॥ सोवतपुरुषकी एकश्वासकू एकमात्रा प्राणायाममें कथन करें, सो प्राणायाम १२ मावासे अधम और चौवीस २४ सेमध्यम ॥४४॥ और छत्तीस ३६ से उत्तम प्राणा- याम होवहे और १२ प्राणायामसे १ प्रत्याहार होताद ॥ ४५ ॥ और १२ प्रत्याहारसे धारणा तथा १२

भाषाटीकासमेत।
(४७)
धारणासे १ ध्यान और १२ ध्यानसे एक समाधि
वह अपूर्व आनंददेवेवारी है सो वार्ता गीताजीमें
कहींहै ॥ यथा-यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिक
ततः॥ अर्थ-जिससमाधि• प्राप्त हो पुरुप और लाभ
अधिक नहीं माने इससमाधिमुखकू मैं कहां वर्णन करूं
इसकू तौ कोई महात्मा सम्यक् प्रकार वर्णन नहीं करिस-
कते जो करता वही जानता अन्य नहीं सो वार्ता दक्षस्मृ-
तिमें कहीहै।यथा-स्वसंबंधे हितद्ब्रह्मनीकुमारीसुखंयथा
अयोगी नैव जानाति जात्यंधो हि यथा घटम् ॥ १ ॥
अर्थ-सोई उसब्रह्मकू सम्यक् प्रकार जानहै जैसे यौवन
अवस्थाकी स्त्री पतिसंभोगजन्य सुखकू आपही अनुभव
करे तैसे अयोगी उस ब्रह्मकू नहीं जानसकते जैसे जन्मां-
धपुरुपकुंघटके स्वरूपका वोध प्रतीत नहीं होता।दोहा-
अज्ञानीकों जगलटौ ज्ञानवानकू ऐन ॥अंधेकों जिमि अंध-
ग्रह हगवारेकों चैन ॥४६॥
॥ थअ पाण्यायामः॥
अथासने दृढीभूते सुशोभनमठे यदा ॥
गुरुं नत्वा शिवं चैव प्राणायामस्ततो-
भ्यसेत् ॥४७॥

(४८)
योगरहस्य ।
प्राणायामनिरूपण कथन करै, सुंदर जो मठ तामें
आसन वांधिकरि अपने गुरु वा योगाचार्य शिव जो
तिनहि प्रणाम करिके अनंतर शिक्षापूर्वक प्राणायाम
करे ॥१७॥
समकायः प्राञ्जलिश्च प्रणम्य च गुरून
सुधीः ॥दक्षे वामे च विघ्नेशं क्षेत्रपालांबि-
का पुनः॥४८॥
समकाय हाथ जोडिकर गुरु जो हैं वा वाम दक्षिण
विनेश गणेश वा क्षेत्रपाल तथा जगन्माता पृथ्वीकू प्रणाम
करें॥४८॥
प्राणायामशरीरस्य वायोस्तद्रन्निरोधन-
म् ॥ आचार्याणां तु केषांचिद्रेचकपूर-
ककुंभकैः॥४९॥
अव प्राणायामको लक्षण कहैं हैं शरीरके भीतर भरेहुए
वायुके निरोधकू प्राणायाम कहैं हैं तथा कोई आचार्य
रेचक पूरक कुंभक इनकरिकै प्राणायाम के हैं ।।१९।।
रेचकाद्रेचकश्चैकः पूरकात्पूरको मतः॥
सहितः केवलश्चेति कुंभकोपि द्विधा
भवेत् ॥५०॥

भापाटीकासमेव । (४९) रेचक कर्मकारकै रेचकपूर्वक प्राणायाम, पूरक कर्म- करिकै पूरकपूर्वक प्राणायाम सहितकुंभक तथा केवल कुंभक इसप्रकार कुंभककेभी दो भेद हैं ॥५०॥ रेचकात् पूरकाच्चैव सहितः कुंभकः स्मृतः।। आभ्यां विरहितः कुंभः केवलस्योपजा- यते ॥५१॥ रेचक वा पूरक कर्मकरिकै जो प्राणायाम है सो सहित कुंभक जानियेरेचक वा पूरक इनकरिकै रहित जो कुंभक सो केवलकू प्राप्त करेंहै अर्थात् यहीसों केवलकुंभक करें हैं ॥५१॥ ॥ अथ कुंभकाष्टभेदाः ॥ उज्जायी शीतली भस्रा सीत्करी भेदनी तथा॥प्लावनी मूर्छिका चैते भ्रामरीत्यष्ट- नामकाः॥५२॥ अव अष्टप्रकारके कुंभकभेद वर्णनकरैं हैं उज्जायी, शीतली, भस्रा, सीत्करी, भेदनी, प्लावनी, मूर्छिका, भ्रामरी ये अष्टनामकी कुंभकक्रियाके अष्टभेदहैं ॥ १२ ॥ ॥ उज्जायीलक्षणम् ॥ वायुमाकृष्य नाडीभ्यां पूरयेदुदरंद्रुतम्॥ अत्यंतकुंभकं कृत्वा रेचनं तु शनैः ४ (५०) योगरहस्य । शनैः ॥५३॥ गुल्मप्लीहोदरान रोगान् वातपित्तकफोद्भवान्।उज्जायीभस्त्रिकादो च कुंभकेमे निहंति हि ॥५४॥ वायु जो है ताहि दोनों नाडिनकारकै शीघ्रतासे उद- रको पूर्ण करै अत्यंत कुंभक अर्थात् वडी देरतक कुंभक करैफिरशनैः शनैः रेचक करै यह उज्जायीकुंभक है।।५३॥ यह उज्जायी कुंभक तथा भस्त्रिका कुंभक ये दोनों गुल्म तथाप्लीहा और वात पितोद्भव उदरके जे रोग हैं तिनको निश्चय हनन करते हैं ॥५४॥ ॥ अथ शोवलीलक्षणम् ॥ काकचंच्चा पिवेद्रायुमेकदेशे विचक्षणः॥ इशवं प्राप्य तं योगी अन्दादूर्द्ध न संश- यः ॥५५॥ एक स्थानके विपे विचक्षण जो योगी सो जिह्वाको काकचंचुकी नाई करिकै वायुको पान करै यह शीतली कुंभक है यात येगी एक वर्षते ऊर्च ईशत्वको प्राप्त होवै है यामें कोई संशय नहीं ॥५५॥ ॥ अय भस्त्रिकालक्षणम् ॥ चर्मवल्लोहकारस्यवायुवेगेन पूरयेत्॥पु- नर्विरेचयेत्तद्वत् पूरयेच्च तथाविधि ॥५६॥ .

सर्वदा पूज्या
भापाटीकासमेत। (५१)
लोहकारके चर्मकीनाई वेगकरिके वायुको पूरण करे
फिरि तिसी तरह छोडै फिरि प्रथमवत् पूरण करै ।।५६॥
आपूर्यपदरं पश्चात् कुंभकंकारयेवुधः॥
सीत्करीत्युष्णसमये शीतली च तदै-
वहि ॥ ५७ ॥ भस्त्रिका
ब्रह्मरंध्रविभेदनी ॥ ५८॥
पीछे उदरको पूरण करै प्रातः बुध कुंभकको करै सो
भस्त्रिका है सीत्करी और शीतली कुंभक उष्णसमयमें
करीजाय है ॥१७॥ ब्रह्मरंध्रके भेदन करिवेवारी जो
भस्त्रिका सो सर्वदा नाम सव समयमें पूज्य है अर्थात् सव
समयमें करी जावै है ॥५८॥
जिह्वया वायुमाकृष्य कुंभकं कारये
त्सुधीः ॥ कुंभयित्वा यथाशक्ति भूयो
घ्राणेन रेचयेत् ॥ ५९॥
जिह्वाकरिकै वायुको खींचकरि बुद्धिमान योगी कुंभक
कों करै यथाशक्ति कुंभक करिक नासिकातें रेचन करें
अर्थात् वायुकू छोडे ॥ ५९॥
॥ अथ सीत्करीलक्षणम् ॥
रूपलावण्यसंपन्नो योगी भवति भूतले ॥
न निद्रान क्षुधा तस्य योगिनो वाधते
भृशम् ॥६०॥

(५२)
योगरहस्य ।
यह सीत्करी कुंभक करते रूप लावण्य करिकै
संपन्न योगी भूतलके विषे होवैहै ताको निद्रा वा क्षुधाकी.
बाधा नहीं होते है ॥६॥
॥ अथ भेदनीलक्षणम् ॥
आकेशपादपर्यंतं कुंभक रोचयेत्खगम्॥
सूर्यनाड्या समाहृत्य बहिःस्थं पवनं
'सुधीः॥६॥
बुद्धिमानयोगी सूर्य्यनाडी करिके वाहिरके वायुकों
शीशत पादपर्यंत कुंभकरूपी जो पक्षी ताहि रोचयेत
नाम धारणकरै ॥६॥
यदा श्रमो भवेदेहे ततो चंद्रेण रेचनम्॥
अमशीतहरी पुंसां जठराग्निविवर्द्धनी ॥६२॥
देहमें जो श्रम होयतौ चंद्रनाडीकरिकै वह वायुको
रेचन करिदेवै सो भेदनी कुंभक है यह श्रम और शीतके
हरनकरिवेवारी और जठराग्निको वढावनेवारी पुरुपनके
हेतु जाननी ॥ ६२॥
॥अथ पावनीलक्षणम् ॥
उद्गाररूपिणं प्राणं पूरयेदुदरं प्रति॥तदा जले
प्यगांधे हि तिष्ठते पद्मपत्रवत् ॥६३ ॥

भाषाटीकासमेत । (५३)
: उद्गाररूपी प्राण जो पवन ताहि उदर में पूरित करे तो
अगाध जो जल ताके विपे निश्चयकारकै पद्मपत्रकी नाई
स्थित होवैयाको प्लावनी कहैं हैं ॥१३॥
॥ अथ मूर्छिकालक्षणम् ॥
प्राणमाकृष्य नाडीभ्यां स्थापयेच्चुबुकू
हदि ॥ मूर्छिकाकुंभकेयं तु मनोमूर्छा
सुखप्रदा ॥६४॥
नाडीनकरिकै प्राणवायुको आकर्षणकरिकै चिबुकको
हृदयके ऊपर स्थापित करै यह मूच्छिका कुंभक मनको
मूछितकारवेवारी और सुखप्रदा नाम सुखकी देवे-
वारी है ॥६४॥
॥ अथ भामरीलक्षणम् ॥
पूरके ,गवन्नादं भृङ्गीनादं विरेचने।
आनंदो जायते चात्र योगिनः कामरू-
पिणः ॥६५॥
पूरकके विषे भंगनाद और विरेचनके विपे भंगीनाद
कामरूपी योगीको आनंद जब उत्पन्न करै तव भ्रामरी
कुंभक होवैहै ॥६५॥
कामचारित्वमीशत्वं खेचरत्वं प्रयत्नतः॥
अनेन विधिना योगी लभते वाञ्छितं
फलम् ॥६६॥

(५६) योगरहस्य । ग्रहणे क्षमः ॥ ७२ ॥ उत्कृष्टा खेचरी मुद्रा अवस्थायां मनोन्मनी ॥ कुंभकः केवलः श्रेष्ठो धन्यः पुण्यश्च मोक्षदः ॥७३॥ जा नाडीतैं रेचन करै ताकारकैही पूरक करें और अतिरोधतें धारण करे फेरि अन्यनाडीत रेचन करै वेगरौं नहीं करै जा कालविषे योगीकी नाडीशुद्धि अच्छीतर- हसे होवैहै ताकालविही योगी प्राणसंग्रहणकरिवेमें समर्थ होवैहै ॥ ७२ ॥ जिसप्रकारसे संपूर्ण मुद्रानविषे खेचरी श्रेष्ठ है, अवस्थानमें मनोन्मनी श्रेष्ठ है तिसप्र- कार संपूर्ण कुंभक सूर्य भेदनादिकनमें केवल कुंभक श्रेष्ठ है, सो कुंभक सुद्रा धन्य है, तथा पुण्य है और मोक्षके देनेवारी है ॥७३॥ एवं क्रमेण पण्मासे केवलं प्रामुयाच्छुभम् ॥ कुंभके केवले प्राप्ते उपतिष्टंति सिद्धयः॥७४॥ पूर्व कहेहुए प्रकार रेचक पूरक, कुंभक क्रमकरिकै पट्- मासविर्षे आपही आप केवल कुंभक प्राप्त होवैहै ॥ ७४ ॥ ॥ अथ केवलकुंभकलक्षणम् ॥ रेचनाद्रेचकश्चैव पूरकात् पूरको भवेत् ॥ आभ्यां विरहितः कुंभः केवलश्चेति कथ्य भाषाटीकासमेत । (५७) ते ॥७५॥ ॐमित्येकाक्षरं मात्रा प्रवदंति मनीपिणः॥ तालत्रयं तथा केचिन्मात्रा- संज्ञा प्रचक्षते ॥ ७६॥ केवलकुंभकके लक्षण कहै कि रेचक करनेसे रेचक पाणायाम और पूरक करनेसे पूरकप्राणायाम होवेहै रेचक. वा पूरक इन करिकै रहित जो कुंभक सो केवल. कुंभक कहावैहै सो जवतक केवल कुंभक प्राप्त न हो तबतक रेचकपूर्वक तथा पूरकपूर्वकही अभ्यास करना चाहिये सो अभ्यास मात्राके स्मरणपूर्वक करना योग्य? ॥ ७९ ॥ मात्रा कहैं ओं यहही एक प्रणवको योगीजन मात्रासंज्ञा कथन करैहैं तथा कोई आचार्य तीनतालको भी कहैं ।। ७६॥ नीचो द्वादशकं मात्रा मध्यमो द्विगुणा- स्तथा।उत्तमो त्रिगुणा मात्राः प्राणायाम निगद्यते ।। ७७॥ कनिष्टे जायते स्वेदः मध्यमे कंपते शिरः॥ उत्तमे चास्ति चोत्थानं धूमानंदस्तथैव च ॥ ७८॥ सो प्राणायाम वारहमात्राको कनिष्ठ तथा चौवीसमा- त्राको मध्यम व छत्तीसमात्राको उत्तम होवैहै ॥ ७७॥ कनिष्ट प्राणायामविपे पसीना उत्पन्न होवैहै तथा मध्यममें (५४) योगरहस्य। याकरिके कामचारित्व और ईशत्व तथा खेचरत्व और वांछितफल प्रयत्नपूर्वक योगीको प्राप्तहोवें हैं ॥ ६६ ॥ इदानी कथयिष्यामि मुक्तस्यानुभव प्रियम् ॥ यल्लब्ध्वा लभते मुक्तिं पापयु- क्तोऽपि मानवः ॥ ६७॥ इसकालविषे मुक्तपुरुष जे हैं तिनका जो प्रिय अनुभव तिसका वर्णन करें हैं जिसको प्राप्तहोकार पापयुक्त मनु ष्यभी मुक्तिको प्राप्त होताहै ॥ ६७॥ वपुःसमत्वं दहनप्रदीप्तिः नादस्फुरत्वं वदने सुकांतिः॥ प्रशांतचित्तत्वजितेंद्रिय- त्वमेतानि सर्वाणि ततो भवंति ॥ ६८॥ शरीरकी समता अर्थात् कृशता स्थूलताते रहित जठ रानिकी प्रदीप्ति, नादका स्फुटभाव अर्थात् प्रकाशहोन मुखकेविपे सुकांति प्रशान्तचित्त होना वा जितेंद्रिय ये संपूर्ण वायुके साधनतें प्राप्त होवे हैं ।। ६८॥ चंद्रनाड्या समाकृष्य वहिस्थं पवनं शनैः ॥ कुंभयित्वा यथाशक्ति रविणा रेचयेत्ततः ॥ ६९ ॥ भूयः सूर्येण भाषाटीकासमेत । (५५) चाकृष्य पूरयेदुदरं तथा ॥ विधिना कुंभकं कृत्वा ततश्चंद्रेण रेचयेत् ॥७० ॥ प्राणायाम कहिकरि मलशोधक प्राणायाम वर्णन करें चंद्रनाडी जो वामनाडी है ताकारकै वायुकू सम्यकप्रकार आकर्षण करै फेरि यथाशक्ति कुंभक करै ततः ताके अनं- तर सूर्य जो दक्षिणनाडी है ताकारकै रेचन करें ॥६९ ।। भूयः कहै फेरि सूर्य जो पिंगला नाडी है ताकरिकै वायुसे उदर पूर्ण करै फेरि विधिपूर्वक अर्थात् उज्यान जालंधर मूलबंध इनकरिके कुंभककार फेरि इडानाडीकरिकै रेचन करै ॥७०॥ इडया पूरयेद्वायुं यथाशक्त्या तु कुंभ- येत् ।। ततस्त्यागः पिंगलया शनैरेव न वेगतः ॥७१॥ इडा जो वामनाडी ताकरिकै वायुको पूरणकरिकै यथाशक्ति कुंभक करै फेरि पिंगला जो दक्षिण नाडी ताकरिकै शनैः शनैः त्यजेत् वेगकरिके नहीं छोडे वेगसे छोडनेमें वलहानि होवैहै ॥७१ ॥ यदा नाडी विशुद्धा स्यान्मलाः शुद्धिं प्रयांति च ॥तदैव जायतेयोगी प्राणसं- -- आभ्यां विरहितः कुंभः केवल श्चेति कथ्य योगरहस्य। ग्रहणे क्षमः ॥ ७२ ।। उत्कृष्टा खेचरी मुद्रा अवस्थायां मनोन्मनी ॥ कुंभकः केवलः श्रेष्ठो धन्यः पुण्यश्च मोक्षदः ॥ ७३ ॥ जा नाडीतें रेचन करै ताकारकैही पूरक करें और अतिरोधतें धारण करे फेरि अन्यनाडीत रेचन करै वेगते नहीं कर जा कालविणे योगीकी नाडीशुद्धि अच्छीतर- इसे होवैहै ताकालविपेही योगी प्राणसंग्रहणकरिवेमें समर्थ होवैहै ॥ ७२ ॥ जिसप्रकारसे संपूर्ण मुद्रानविषे खेचरी श्रेष्ठ है, अवस्थानमें मनोन्मनी श्रेष्ठ है तिसप्र- कार संपूर्ण कुंभक सूर्य्य भेदनादिकनमें केवल कुंभक श्रेष्ठ है, सो कुंभक सुद्रा धन्य है, तथा पुण्य है और मोक्षके देनेवारी है ।। ७३ ॥ एवं क्रमेण पण्मासे केवलं प्रामुयाच्छुभम् ॥ कुंभके केवले प्राप्ते उपतिष्टंति सिद्धयः ॥७४॥ पूर्व कहेहुए प्रकार रेचक पूरक, कुंभक कमकरिकै पट्- मासविपैं आपही आप केवल कुंभक प्राप्त होवैहै ॥ ७ ॥ ॥ अथ केवलकुंभकलक्षणम् ॥ रेचनाद्रेचकश्चैव पूरकात् पूरको भवेत् ॥

भाषाटीकासमेत । (५७) ते ॥७५॥ ॐमित्येकाक्षरं मात्रा प्रवदंति मनीपिणः। तालत्रयं तथा केचिन्मात्रा- संज्ञा प्रचक्षते ॥ ७६॥ केवलकुंभकके लक्षण कहें कि रेचक करनेसे रेचक प्राणायाम और पूरक करनेसे पूरकप्राणायाम होवहै रेचक वा पूरक इन करिकै रहित जो कुंभक सो केवल- कुंभक कहावैहै सो जवतक केवलकुंभक प्राप्त न हो तवतक रेचकपूर्वक तथा पूरकपूर्वकही अभ्यास करना चाहिये सो अभ्यास मात्राके स्मरणपूर्वक करना योग्यहै ॥ ७५ ॥ मात्रा कहैं ओं यहही एक प्रणवको योगीजन मात्रासंज्ञा कथन करेंहैं तथा कोई आचार्य तीनतालको भी कहैहैं ॥७६॥ नीचो द्वादशकं मात्रा मध्यमो द्विगुणा- स्तथा।उत्तमो त्रिगुणा मात्राः प्राणायामे निगद्यते ॥७७॥ कनिष्ठे जायते स्वेदः मध्यमे कंपते शिरः॥ उत्तमे चास्ति चोत्थानं धूमानंदस्तथैव च ॥ ७८॥ सो प्राणायाम वारहमात्राको कनिष्ठ तथा चौवीसमा- त्राको मध्यम व छत्तीसमात्राको उत्तम होवैहे ॥ ७७॥ कनिष्ठ प्राणायामविपे पसीना उत्पन्न होवैहै तथा मध्यममें - अव जाके अनंतर वर्जनीय वर्णन करें हैं जाके सेवन- (५८) योगरहस्य । शिर कांहे और उत्तममें आसन भूमिसे थोड़ा ऊपर उठेहै तथा मस्तकमें धूम वा चित्तको आनंद प्राप्त होतेहै ।।७८।' प्रातःकाले च मध्याह्ने सायंकाले च कुंभकान् ॥ कुर्यादेवं चतुर्वारं तथैव चा- ईरात्रके ॥ ७९ ॥ यदा संजायते स्वेदः मर्दनं कारयेत्सुधीः ॥ दृढता लघुता चैव तेन गात्रस्य जायते ॥ ८० ॥ प्रातःकाल अरुणोदयसे लेकर सूर्योदयपर्यंत मध्या- ह्नकालमें तथा सायंकाल और अर्द्धरात्र इन चारों समय विपे कुंभकप्राणायाम करना योग्य है ।। ७९ ॥ कनिष्ठप्रा. णायामविपे जो पसीना उत्पन्न होवै है ताकारकै शरीरको मर्दन करे तासे गात्रकी दृढता वा लघुता प्राप्त होवे है ८० वयं चाथ प्रवक्ष्यामि योगे विघ्नकरं परम्॥ यस्य सेवनमात्रेण योगो नश्यति योगिनाम् ॥ ८१ ॥ कदम्लं लवणं रूक्षं तीक्ष्णं सार्पपकुघृतम् ॥ प्रातःस्नानं जन द्वेपं मोहं च प्राणिपीडनम् ॥ ८२॥ मात्रसे योगीनको योग नष्ट होवे है ।। ८३ ॥ कटु अम्ल

भाषाटीकासमेत । (५९)
इमली इत्यादि अति लवण रूखो तीक्ष्ण सरसों पुराना
घृत प्राप्तःकाल स्नान करना मनुष्योंसे वैरभाव रखना वा
किसीस मोह करना वा हिंसा करना ॥ ८२ ॥
सेवनं पथि अग्निस्त्रीवह्वालापं प्रिया-
प्रियम् ॥ अतीव भोजनं त्याज्यं योगिभि-
स्तत्त्वदर्शिभिः॥८३॥
मार्गका चलना आनिका सेवन और स्त्रीका सवन
करना प्रिय तथा अप्रिय बहुत बोलना अत्यंत अधिक
आहार करना तत्वदर्शी योगीको अवश्य इतनी वस्तु
त्यागना योग्य हैं ॥ ८३॥
अथोपायं प्रवक्ष्यामि क्षिप्रं योगस्य
सिद्धये ।। सुस्निग्धं मधुराहारं मिष्टान्न
तैलवर्जितम् ।। ८४ ॥ घृतं क्षीरं मधुयुतं
गव्यं धातोश्च पोषणम् ॥ मनोभिलषितं
योग्यं ताम्बूलं चूर्णवर्जितम् ॥८५॥ वेदां-
तश्रवणं नित्यमेकांतगृहसेवनम् ॥नामसं-
कीर्तनं विष्णोनियमानि समाचरेत् ॥८६॥
धृतिःक्षमा दयाशौचंसुस्निग्धं सूक्ष्मवस्त्र
कम् ॥ इत्येतानि सदा योगी नियमानि
समाचरेत् ॥ ८७॥

(६०) योगरहस्य । अव योगके शीघ्र सिद्धिके अर्थ उपाय कहहैं मुस्निग्ध कहैं सचिकन मधुर कहैं कोमल अशन जो बहुत सूक्ष्म ऐसा आहार करै मिष्टान्न तैलकारकै रहित अर्थात तैलको न होय ॥ ८४ ॥ घी दूध मधुयुक्त अर्थात् मेपरकरिक सहित चावलको भात गव्य नैनू तथा अन्य पथ्य धातुः पोपनकरनेवारो पदार्थ रुचिपूर्वक योग्य तथा चूर्णवर्जित ताम्बूल ॥ ८५॥ वेदान्तश्रवण नित्य एकांतगृहसेवन ईश्वरनामसंकीर्तन इसप्रकार नेमसे रहै।। ८६॥ धैर्य क्षमा दया शौच सुस्निग्ध अर्थात् अच्छा सूक्ष्म कहैं थोडासा वस्त्र धारणकरे इतने कहे जो नियम हैं सो सदैव काल योगी- नकों आचारण करना योग्य है ।। ८७ ॥ सद्यो भुक्तेऽपि नाभ्यासेः क्षुधितेऽपि न चाभ्यसेत् ॥, अनिलेऽर्कप्रवेशे च भोक्तव्यं सर्वसौख्यदम् ॥ ८८ ॥ वायौ प्रविष्टे शशिनि शयनं साधकोत्तमैः ॥ अयुक्ताभ्यासयोगेन स्वरोगसमुद्भवः ॥ ८९ ॥ सुयुक्ताभ्यासयोगेन सर्वरो- गक्षयो भवेत् ॥ तस्माद्युक्तेन कर्तव्यं साधकेन समासतः॥ ९० ॥ ॥ सद्य कहैं भोजन करिकै तुरंत तथा जव क्षुधित हो तव कदापि अभ्यास न करना चाहिये जित भाषाटीकासमेत। (६१) समय अनिल जो वायु अर्क जो दक्षिण इवासामें प्रवेश करै तिससमय संपूर्ण सुखके देवेवारो भोजन करै।।८८॥ जिससमय वायु शशि जो वामश्वासा तिसमें प्रविष्ट हो तिससमयही साधकको शयन करना चाहिये अयुक्त योगाभ्यास करिकै संपूर्ण रोग उत्पन्न होवे हैं ॥ ८९ ॥ तथा युक्तिसैंयोगाभ्यास करनेसे संपूर्ण रोगोंका नाश होवेह तस्मात्क ताते साधककारकै युक्तिसूं सम्यक्- प्रकार योग कर्त्तव्य है ॥ ९०॥ इत्थं मासत्रयं कुर्यादनालस्यो दिनेदिने । तस्य नाडी विशुद्धिस्स्याद्योगिनस्तत्त्व- दर्शिनः ॥९१॥ इसप्रकार पूर्वोक्त साधन रेचक पूरक कुंभक अनालस्य कहैं आलसरहित होकर तीन महीना अभ्यास करें तिस तत्वदर्शी योगीकी नाडी विशेषकरिकै शुद्धि होवैहै ॥९॥ देहस्य कांतिर्जठरानलोन्नतिः सुशक्ति- बोधो मनसश्च योग्यता ॥ नादस्फुटत्वं नयने सुनिर्मले ह्येतानि चिह्नानि ततो भवन्ति ।। ९२॥

(६२) योगरहस्य । अव नाडीके शुद्धिताके लक्षण वर्णन करहैं नाडी शुद्धिके अनंतर देहकी कांति जठराग्निकू दीपनशक्ति कुंडली है ताको वोध उत्थान होवह मनसः योग्यता कई मनको आरंभविपे विश्वास प्राप्त होवैहै नादकी प्रगटता निर्मल नेत्र ततः कहैं नाडीशुद्धिते इतने चिह्न अवश्य होवह ॥ ९२॥ उड्यानजालंधरमूलबंधैरनिद्रतायामुरगां- गनायाम्॥प्रत्यङ्मुखेन प्रविशन सुषुम्नां गमागमौ मुंचति गंधवाहः ॥ ९३ ॥ उज्यान जालंधर मूलबंध मुद्रनकारकै उरगांगना जो सर्पिणी है सो निद्राछोडि पूरवको मुख कारकै सुषुम्ना जोब्रह्मनाडी तामैं प्रवेश करि गमन आगमनजोवायुमार्ग सो परित्याग करि समाधिस्थ होवे हैं ॥ ९३॥ प्राणाभ्यासे क्रमेणैव घटिकात्रितयं यदा ॥ तदा स्यात्सकला सिद्धियोगिन- स्तत्वदर्शिनः ॥९४॥ सूक्ष्मदृष्टिः खेचरत्वं दिव्यकायस्तथैव च ॥ दूरश्रुतिः सत्य- वाक्यं परकायप्रवेशनम् ॥ ९५ ॥ अदृश्यं कामचारित्वंभवत्येतानि सर्वतः।

भाषाटीकासमेत। (६३)
भवेद्वीर्यवती गुप्ता गुरुवक्रसमुद्भवा ॥
अन्यथा फलहीना स्यान्निर्वीर्य्याप्यतिदुः-
खदा ।। ९६॥
क्रम करिकै प्राणायामके अभ्यासविषे जिसकाल प्राण-
वायु तीन घडी स्थिर होवे है तिसकालविषे संपूर्ण योग-
सिद्धि प्राप्त होते है तत्वदर्शीपुरुषको ॥ ९४ ॥ सूक्ष्मदृष्टि
खेचरत्व कहै आकाशविपे गमन दिव्यशरीर परशरीर विषे
प्रवेश करना ॥९॥ अदृश्य कहैं अंत नत्व कामचारी
कहैं इच्छापूर्वक विचारना इतनी संपूर्ण सिद्धियां होवैहैं
गुरुके मुखकरिके जो विद्या प्राप्त होवैहे वा गुप्त है सो
विद्याही मोक्ष वा सिद्धिकी करनेवारी होवैहै नहीं तो
फलहीन निर्वीर्य अतिदुःखदेनेवारी होवैहै ॥ ९६ ॥
पवनाभ्यासने योगी घटावस्थां यदा व्रजेत् ॥
तदा संसारचक्रेऽस्मिन् यन्नास्ति तन्न
प्रामुयात् ॥ ९७॥
साधक पुरुप जिसकालविपे घटावस्थाको प्राप्तहो-
वैहै तिसकालमें इस संसारचकविपे ऐसी कोई वस्तु नहीं
जो प्राप्त न हो ॥१७॥

(६४)
योगरहस्य।
प्राणापानौ नादविंदू जीवात्मपरमा-
त्मनौ ॥एकत्र घटते यस्मात् तस्माद्वै घट
उच्यते ॥ ९८॥
प्राण और अपान नादविंदु जीवात्मा और परमात्मा
यात एकस्थानकी घटना सो घटावस्थालक्षण होवैहे॥९८॥
याममात्रं यदा धतु शक्तिस्स्याद्वायुसा-
धने ॥ प्रत्याहारस्तदा प्रोक्तः साधकस्य
महात्मनः॥९९॥
एकप्रहरपर्यंत वायुसाधनविषे शक्ति होय जिसकाल-
विषे तिससमयही महात्मासाधकपुरुषका प्रत्याहार होवै है
सो वार्ता अन्यग्रथमेंभी लिखा है-प्राणायामद्विषटकेन
प्रत्याहारउदाहृतः।।प्रत्याहारद्विषट्केन धारणा परिकीर्तिता
॥१॥भवेदीश्वरसंगत्यै ध्यानं द्वादशधारणा ध्यानद्वादशके
यत्स्यात् समाधिस्साऽभिधीयते ॥२॥ अर्थ-बारह
प्राणायाम करिकै १ एक प्रत्याहार होतेहै और वारह प्रत्या-
हारसे एक धारणा और वारह धारणासै ध्यान १ एक,
तथा वारह ध्यान होनेसे समाधि होवे है तथा प्रत्याहार
वर्णन करें हैं ॥ ९९ ॥

भाषाटीकासमेत । (६५) ॥ अथ प्रत्याहारवर्णनम् ॥ रूप रस तथा स्पर्श शुभं वा यदि वाशु- भम् ।। सर्वमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहारेति योगवित् ॥ १०० ॥ सुगंधमथवा गंधं मेध्यामेध्यं तथैव च ॥ सर्वमात्मेति त मत्वा प्रत्याहारेति योगवित् ॥ १०१॥ रूपादिविपयाः पंच मनश्चैवाति चंचलम् ॥ सवमात्मति विज्ञाय प्रत्याहरेति योगवित् ॥ १०२ ॥ इंद्रियाणां विचरतां विपयेषु स्वभावतः ॥ वलादाकर्पणं तेषां प्रत्याहारः स उच्यते ॥१०३॥ रूप रस स्पर्श अच्छा तथा बुरा सो सवको अपनी आत्मा मान योगवेत्ता प्रत्याहार करें हैं॥१०॥ सुगंध तथा दुर्गध पक तथा अपक सर्वको अपनी आत्मा मानि प्रत्या- हार हो। अर्थात् योगवेत्ता प्रत्याहारकरें हैं ॥ १०१ ॥ रूपआदिलेकार पांच रूप रसगंध स्पर्शशन्द और चंचल मन सब अपनी अपनी आत्मा जानि योगवेत्ता प्रत्याहार (६६) योगरहस्य । करें ॥ १०२॥ संपूर्ण इंद्री स्वभातेही विषयके विषे विच रतीहैं तिनको वलत आहरण करना अर्थात विषयतें हटा- ना प्रत्याहार होवह ॥ १०३॥ तपःप्रवृद्धिः मनसः प्रसन्नता सुरप्रसादो- पि हि दैन्यसंक्षयः॥ द्रुतं प्रवशश्च तथैव संयमे जितेंद्रियस्येहकिलोपजायते।।१०४॥ प्रत्याहारतें जिसकालविणे इंद्रियजित होवैहै तिस- कालविपेही संपूर्ण सिद्धि प्राप्त होवह तपःप्रवृद्धिः कहिये तपकी वृद्धि होवैहे काहेते कि, इंद्रियजित पुरुष हीको तपकी सिद्धि होवहै सो वार्ता अन्यस्मृतिमें कथन करी है यथा-मनसश्चेद्रियाणां च निग्रहं परमं तपः ॥ तज्जायः सर्वधर्मभ्यः स धर्मः पर उच्यते॥अर्थ-मन और इंद्रीनकी जो स्वस्वविषयोंसे निग्रह करना परम तप है और सोई सर्व सधर्मोंसे श्रेष्ठ धर्म है तथा मनसःप्रसन्नता कहिये मनकू प्रसन्नता प्राप्त होवै है औ सुरप्रसाद अर्थात् संपूर्ण देवता उसके ऊपर प्रसादकहै प्रसन्न होवें हैं दैन्यसंक्षय जितेंद्रीपुरुपकी दीनताकाभी अभाव होवै है काहे कि अजितेंद्रीपुरुपहो सर्वदा स्त्रीपुत्रादिकोंके पोपण करनेके निमित्त याचना करै है सो वार्ता भागवतमें कही है यथा- भापाटीकासमेत। (६७) जिह्वोपस्थादिकार्पण्याद्गृहपालयते जनः॥यह पुरुप सर्वदा जिह्वा और उपस्थादि इंद्रियोंके विपयमें लोलुप भया श्वा- नकीनाई डोल है तथा भर्तृहरिशतकमें भी कहा है। यथा को देहीति वदेत्स्वदग्धजठरस्यार्थे मनस्वीजनः ॥ बुद्धिमा- न पुरुषकोईभी अपने एक उदरके वास्ते यांचा करै अर्थात् कोई नहीं द्रुतं प्रवेशश्चतथैव संयमे ' इंद्रियोंके जय होनेसे- साधक पुरुपको योगका जो मुख्य साधन धारणाध्यानस- माधिरूप सो शीघ्र प्राप्त होवे है यह संपूर्णवाती जितेंद्री पुरुषको निश्चयं करिकै प्राप्त होवै है॥१०४॥ ॥ अथधारणालक्षणम् ॥ भूमिरापस्तथा तेजो वायुराकाश वै क्रमात्॥ एतेषुपंचभूतेषुधारणा पंच कारयेत् ॥१०५॥ पृथ्वी १ जल २ अग्नि ३ वायु ४ आकाश ५ इनपांच महाभूतोंमें पांचप्रकार धारणा होवै है सो करें इसप्रकार धारणाद्वारा पांच महाभूतोंकी जयहोनेसे योगी अमरभा- वकू प्राप्त होवै है तथा स्वरूपवर्णन सो वार्ता शिवसंहिता कथन करी है यथा-मेधावी पंचभूतानां धारणां यः सम- भ्यसेत् ॥ ब्रह्मशतगतेनापि मृत्युस्तस्य न विद्यते॥अर्थ जो मेधावी योगी पुरुप पूर्वोक्तप्रकारसे पांच महाभूतोंकी (६८) योगरहस्य । धारणाका अभ्यास करता है सो पांचमहाभूतोंकी जय होनेत सौ ब्रह्माके चले जानेसेभी तिसकी मृत्यु नहीं होवै है ॥ १०५॥ ॥ अथ ध्यानम् ॥ विष्णुं वैश्वानरं देवं भास्करंच तथा शिवम्॥ परम पुरुषंदिव्यं सगुणंध्यानमुच्यते १०६ विष्णुभगवान् वैश्वानर जो अग्नि भास्कर जे सूर्य तथा शिवजी परम पुरुप इसको सगुण ध्यान वर्णन करें ॥१०६॥ अतः परंपरं ब्रह्म अनंतवलपौरुषम् ॥सर्वा- धारं जगद्रूपमव्यक्तं पुरुषोत्तमम् ॥१०७॥ सर्वकारणकर्तारं निर्गुणं गुणसंयुतम् ॥ सोहं ब्रह्मेति विज्ञाय निर्गुणं परिचक्षते ॥ १०८॥ अतःपरंकहिये सगुणध्यानः परे परब्रह्म अनंत है वलपो- रुप जाको सर्वको आधार जगत्स्वरूप अव्ययनाम नाश: रहित पुरुषोत्तम ।।१०७॥ संपूर्ण कारणके करनेवारे निर्गुण और गुणन करिके संयुक्त सो ब्रह्म मैं हूं ऐसा जानि निर्गुण ध्यान कहैं हैं ॥ १०८॥ ॥ अथ विष्णुध्यानम् ॥ हृत्पद्मेष्टदलोपेते नारायणमजं विभुम् ॥

4 भाषाटीकासमेत। (६९) चतुर्भुजमुदारागं पद्मपत्रनिभेक्षणंम् ॥ ॥ १०९॥ नीलोत्पलदलाभासं शंखच- क्रगदाभृतम् ॥श्रीवत्सवक्षसंश्रीशं शशि- कोटिसमप्रभम् ॥ ११० ॥ मनसालोक्य देवेशंसगुणं ध्यानमुच्यते ॥ प्रभाभिर्भा- सयद्रूपं वासुदेवं सनातनम् ॥१११ ॥ हृदयपन अष्टदल कारकै युक्त ता पद्मविषे नारायण साक्षात् अज कहैं जन्मकरिकैरहित विभु कहैं समर्थ चारिभुजान करिकै युक्त उदार है अंग जिनको कमल पत्रसदृश है ईक्षण नेत्र जिनके ॥१०९॥ नील जो कमल ताकेसी है शरीरकी शोभा जिनकी शंख चक्र गदाको धा- रण करनेवारे श्रीवत्स है वक्षसके विषे जिनके लक्ष्मीजीके ईशअर्थात् स्वामी,कोटिचंद्रमासमान प्रभाजाकी॥११०॥ देवतनके ईश जो विभु हैं तिनका मनकरिकै ध्यान करना सोई सगुणध्यान होवै है प्रभा जो कांति है ताकारकै देदी- प्यमान वासुदेव जो सनातन विष्णु हैं सोई . परम ध्यान है ॥ १११॥ ॥ अथानिध्यानम् ॥ हृत्सरोरुहमध्ये तु तथैवाष्टदले युते ॥ वैश्वानरं महावह्नि ज्वलंतं सर्वतोमुखम् (७०) योगरहस्य । ॥ ११२ ॥ प्रभाभिर्भासयपं पीतामं सर्वकारणम् ॥ सोहमात्मेति तं ज्ञात्वा ध्यानं योगविदो विदुः ॥ ११३ ॥ तैसेही हृदयकमलविषे वैश्वानर जो महावह्नि है सो कैसा है कि, सर्वतरफसे ज्वलरहाहै मुखारविंद जाको प्रभाकरिकै भासमान है स्वरूप जाको पीतवर्ण संपूर्ण जगत्का कारण अर्थात् उत्पत्तिस्थितिलयका कारण है सो अग्निरूप आत्मा जानकरि योगीजन अग्निध्यान कहह ॥ ११२॥ ११३॥ ॥ अथ सूर्यध्यानम् ॥ अथवा मंडले तत्र भास्करस्य महात्मनः॥ पद्मासनस्थितं देवं निर्मलं पावकोपमम् ॥ ११४ ॥ भासयंतं जगत्सर्वं सृष्टिस्थि- त्यंतकारणम् ॥ सोहमात्मेति तद्वयानं विद्रद्भिः परिकीर्तितम् ॥ ११५॥ अथवा ताही कमलविपे भास्कर जो श्रीसूर्य्यनारायण तिनका जो मंडल है सो देखे सो सूर्यनारायण केसे हैं पद्मासनस्थ हैं निर्मल पावककी सदृश है तेज जिनको संपूर्ण जगत्को प्रकाश करनेहारे सृष्टिक स्थिति

.
भाषाटीकासमेत। (७१)
उत्पत्ति तथा अंतके करनेवारे एवंभूत जो श्रीसूर्यनारायण
सा आत्मा मैं हूं इसको सूर्यध्यान करें हैं ११४॥११६!!
॥ अथ शिवध्यानम् ॥
भ्रवोर्मध्ये शिवं ध्यायेद्भारूपं सर्वकारणम् ॥
शुद्धिस्फटिकसंकाशमुमया परिसेवितम्
॥११६॥ व्याघ्रचीवरधर शशीव प्रिय
दर्शनम् ॥ पद्मासनस्थितं देवं चिंतयेच्च
सदाविभुम् ॥ ११७॥
भूके मध्यकमलविपे भारूप अर्थात् देदीप्यमान सर्व-
जगतका कारण शुद्ध जो स्फटिकमणि है ताके सदृश
उमादेवीकरिके सेवित॥११६॥व्याघ्रचर्माम्बरको धारण
करै चंद्रमाकी नाई प्रियदर्शन पद्मासनकरिकै विराजमान
एवंभूत जो देव ताहि चिंतमन करें सो शिवध्यान अत्यंत
उत्तम है॥ ११७॥
भ्रध्यानादपरं नित्यं सोममंडलमध्यमम् ॥
स्वात्मानं मंडलाकारं चिंतयेच्च विच-
क्षणः॥ अहमेव परं ब्रह्म सच्चिदानंदल-
क्षणम् ॥११८॥

(७२) योगरहस्य । भ्रूध्याननै परे अपर नित्यही चंद्रमंडलविपे अपनी जो आत्मा चंद्रमंडलाकार है सो विचक्षणचिंतमन करैवह पर- ब्रह्म सच्चिदानंदलक्षण मैं हूँ यही प्रकारध्यान है॥ ११८॥ एव ध्यानामृतं पीत्वा मृत्युं जयति योग- वित् ॥ वत्सरान्मुक्त एवासौ जीवन्नपि न जीवति ॥ ११९॥ यहीप्रकार ध्यानरूप अमृत अर्थात् तिसध्यानसे पतित जो अमृत सो पानकार मृत्युको जीत है एकसंवत्स- रविपे मोक्ष होतेहै जीवितभी नहीं जीवता अर्थात् जीवितही मोक्षहै ।। ११९॥ ध्यानान्यपि बहून्याहुर्योगिनो मुनि पुंगवाः ॥ मुख्यान्येतानि चैतेभ्यो नान्यच्च भुवि विद्यते ॥ १२०॥ एतद्धया- नस्य माहात्म्यमृषिभिस्तत्वदर्शिभिः । शास्त्रेषु बहुधा प्रेक्त परं तत्वं सुभा- पितम् ॥ १२१ ॥ पूर्वकालविपे मुनिनमें श्रेष्ठ जो योगीजन हैं सो वहुतसे प्रकार ध्यान वर्णन करें हैं तथापि सर्वोत्कृष्ट यही ध्यान मुख्य हैं इनतें अन्य संसारमें कोई नहीं हैं । १२० ॥

भापाटीकासमेत । (७३) इतनेही ध्यानका माहात्म्य तत्त्ववेत्ता ऋपिनने शास्त्रनके विषे बहुतसे प्रकारकरि कहाहै सोई परमतत्व मैंने वर्णन कियाहै ॥ १२॥ अथवा यादृशी बुद्धी रामे कृष्णे तथा शिवाकर्तव्यमिति तयानंया मतिःसा गतिभवेत् ॥ १२२॥ यदि शैलसमं पापं विस्तीर्ण योजनान् बहून् ॥ तत्सव ध्यान- योगेन क्षणेनैव विनश्यति ॥ १२३ ॥ अथवा जिस प्रकार राम कृष्ण तथा शिव इनके विषे बुद्धि होय सोई ध्यान करना योग्य है काहेत कि जिस प्रकार मति होवै है सोई फलीभूत होवै है ॥ १२२ ॥ जो कि पर्वतके समान वडा भारी विस्तीर्ण वहुत योजनप- य्यत पाप हो तोमी ध्यानयोगके एक क्षणमात्र साधन करिकै नाशकू प्राप्त होवै है ॥ १२३॥ अथ बंधत्रयनिरूपणम् ॥ पद्मासनं समं चद्धा स्थापयेच्चुवुकंहदि । जालंधरामिमं बंध मृत्युमातंगनाशनम् ॥ १२४ ॥ पादमूलेन वामेन योनिसंपी-

(७४) योगरहस्य ।
ड्यते बलात्॥ अपानमूर्द्धमुत्थाप्य मूल-
बंधं प्रशस्यते ॥ १२५॥ उड्डीनं कुरुते
यस्मादविश्रातं महाखगः ॥ उड्यानं त-
मिमं बंधं सर्वदुःखहर नृणाम् ॥ १२६ ॥
मुद्रा दशप्रकारके पूर्वाचार्यों ने कथन करी, तिनमेंसे
मुख्य २ वर्णन करौं हौं पद्मासन जो सब सुखके देवेवारी
आसन है ताहि वांधिकरि ठोढी हृदयमें लगावै यह
जालंधरबंध नाम मुद्रा होवै है सो कैसी है मृत्युरूप
मातंग जो हाथी ताकू नाश करनेहारी है ॥ १२४ ॥
वामपादकी एडी करिकै लिंग और गुदा दोनोंके मध्य में
जो योनिस्थान है ताहि वलकरिकै संपीडन करै अर्थात्
दाविकार स्थितहो और अपान जो नीचेके गमन करि-
वेवारो वायु ताहि ऊपर उठावै इस मुद्राको मूलबंध कहते
हैं ॥ १२५ ॥ महाखग जो प्राण अपान वायु सो
जाते उड्डीन नाम है सो पश्चिममार्ग जो सुपुम्ना नाडी तामें
किया जाय अन्यत्र कहीं विश्राम न पावै संपूर्ण दुःखोंको
नाश करनेहारोतिसको उड्यान बंध कहते हैं ॥ १२६॥
वंधत्रयेण पवने प्रयाति गगने लयम् ॥ ततो
न जायते मृत्युर्जरारोगादिकं तथा ॥ १२७॥

भाषाटीकासमेत। (७५) इस प्रकार जो यह बंधत्रय अर्थात् तीन बंध हैं तिन करिकै पवन गगन जो ब्रह्मरंध्र हैताविपे लयकू प्राप्त होवैहै तातें मृत्यु तथा बुढापा आदि रोग नहीं होवे हैं ॥ १२७॥ ॥ अथ खेचरीमुद्रालक्षणम् ॥ एकं सृष्टिमयं देवमेका सुद्रा च खेचरी ॥ कुंभकः केवलः श्रेष्ठः धन्यः पुण्यश्च मोक्षदः ॥ १२८॥ गुरुवाक्याल्लभते जिह्वा सद्य- स्त्रिपथगामिनीम् ॥ ध्रुवारतर्गता द्दीष्टमुद्रा भवति खेचरी॥ १२९॥ जिस प्रकार सृष्टिरूप एक परमेश्वर देव है तैसेही सव मुद्रनविपे एक खेचरी मुद्रा है तथा सब कुंभकनविपे एक केवल कुंभकमुद्रा श्रेष्ट है सो धन्य तथा पुण्य तथा मोक्षकी देनहारी है ।।-१२८ ।। गुरुके वाक्यतै प्राप्त होत जो जिह्वा त्रिपथ जो ब्रह्मरंध्र है ताके विषे. शीघ्र गमन करनेहारी तथा भृकुटीके अंतर्गत जो दृष्टि सो खेचरी मुद्रा होवै है ॥ १२९॥ चंद्रात्सारः प्रस्रवति ह्यमृतं दिव्यरूपिणः॥ खेचर्या मुद्रितं येन मृत्युं जयति लीलया (७६) योगरहस्य । ॥ १३० ॥ उर्द्धजिबः स्थिरो भूत्वा क्षणार्धमपि तिष्ठिति ॥विपैर्विमुच्यते सवै- व्याधिमृत्युजरादिभिः ॥१३१॥ न रोगो मरणं तस्य नैवालस्यं प्रजायेत ॥ क्षुधा मूर्छा तृषा नैव मुद्रांयो वेत्तिखेचरीम्१३२॥ चंद्रमाते जो सार दिव्यरूप अमृतको प्रस्ताव होवेहे सो जिस साधक पुरुपने खेचरीमुद्रा करिकै ढकदीनो अर्थात् पान करिलीनोहै जाने सो पुरुप लीलाकरिके ही मृत्युको जीतवेवारो होवे है ॥ १३० ॥ ऊपर करी है जिह्वाजाने एवंभूत जो पुरुप यदि एक क्षणमात्रभी स्थित होवै ती संपूर्ण सर्प विच्छू आदिक तिनके विपकारकै छूट हैं जो पुरुप खेचरीमुद्रा भलीप्रकार जाने ताळून रोग न मृत्यु न आलस्य न क्षुधा पिपासा मृर्छा होवे है और कोई प्रकारकी वाधा नहीं होते है ॥ १३॥ १३२॥ वलीपलितवेपनी मुद्रेयं खेचरी सदा ॥ न तस्य क्षरत बिंदुमुद्रा यो वेत्ति खेच- रीम् ॥ १३३॥ घलीपलित जो मुढापेको देदका चर्म तथा कंपन ताक भापाटीकासमेत। (७७) यह खेचरी मुद्रा सदैव नाशकरनेवारी है जो पुरुष खेचरी मुद्राकू जानै ताको बिंदु जो कामदेव सों कोई कालविषे. पतित नहीं होवै है ॥ १३३॥ चालनादोहनाच्चैव च्छेदनाच्च तथैवच ॥यावत स्पृशतिभ्रूमध्ये खेचरी सिद्धितांतदा ॥१३४॥ प्रथम एक चोखा और महीन वस्त्र तासों जिह्वाकू पकडि कर चालन करै अर्थात् दोनों तरफहिलावे पुनः गोके थनके सहश दोहन करै पुनः छेदन करें फेरि तीक्ष्ण शस्त्रसूं जिह्वाके नीचेकी नसकू छेदन करै सो जबतक जिह्वा वढिकरि वाहिर भृकुटीपय्यत न पहुँचे तवतक अभ्यास करै जव पहुँच जाय तब खेचरी सिद्धि होय है कुछ वार्ता गुरुवाक्यसे समझलेना ॥१३॥ जायते म्रियतेलोके विंदुना नात्र कारणम्॥ तस्मादति प्रयत्नेन विदुधारणमाचरे- त् ॥ १३५ ॥ मरणं विंदुपतनं जीवनं विदुधारणम्॥शिवोबिंदुरजःशक्तिःशाश- सूर्यमयस्तथा ॥ उभयोर्मेलनं कार्य खशरीरे प्रवेशयेत् ॥ १३६ ॥ जन्म मरण लोकविपे केवल विंदु करिकही होवैहे और कुछभी कारण नहीं ताते सदेवकाल अतियनसे

।
(७८)
योगरहस्य।
विदुको धारण करै ।। १३५ ॥ विंदुका पतन होनाही
जीवका मरण होवैहै तथा विदुका धारण करनाही जीवन
होवे हे शिवरूप विंदु रजरूंप शक्ति सो शशिसूर्यमय
अर्थात् चंद्रमारूप विदु सूर्य्यरूप रज होवै है सो दोनों
को संमेलन कारकै अपने शरीरविषे प्रवेश करै सोही
निश्चय करिकै मोक्षको देवेवारो होवैहै ।। १३६ ॥
हकारः शंकरः प्रोक्तप्टकारः शक्तिरीश्वरी॥
उभायोर्मेलनं यस्मिन हठयोगो निगद्यते १३७
तथा हठयोग लक्षण कथन करैं हैं, कि हकार करिकै
शिव ठकार करिकै ईश्वरी पार्वती दोनोंनको संमेलन
जाके विष हो सोई हठयोग होवे है ॥ १३७ ॥
॥ अथ वज्रोलीमुद्रानिरूपणम् ॥
आदा रजः स्त्रियो योन्याः यत्नेनविधिव-
सुधीः ॥ आकृष्य लिंगनालेन स्वशरीरे
प्रवेशयेत् ॥ १३८॥ वाच्चलति चेदी-
यंमूर्द्धमाकृष्य रक्षयेत्॥क्षणमात्रं योनि-
तो यो लिंगनालं निवारयेत् ॥ १३९ ॥
पुनश्च चालनं कुर्यात्तस्यां योन्यां शनैः
शनैः ॥ १४ ॥

. भापाटीकासमेत । (७९) वज्रोलीमुद्रा साधन कहैं आदिके विपे विधिपूर्वक स्त्रीकी योनीत रजकू लिंगनालकरिकै आकृष्य नाम. बँचकरिकै अपने शरीरविषे प्रवेश करै॥१३८॥ कदाचित अपना वीर्य चलायमान होयं तो ऊपरकू बैंचकरि रक्षण करै अर्थात् गिरनै न पावै गिरा हो तो क्षणमात्र लिंग योनितें वाहिर निकाललेय ॥ १३९॥ फिरि कुछ देर । पीछे तिस योनिमें शनैः शनैः कहै धीरे धीरे चालन करै ॥ १४॥ गुरूपदेशतो योगी बलादाकृष्य तद्रूजः ॥ उभयोर्मेलनं कृत्वा स्वशरीरे प्रवेशयेत् ॥ : ॥१४१॥अनेनैव विधानेन सिद्धो भवति भूतले ॥ वज्रोल्यभ्यासयोगोयं भोगयु- क्तेपि मोक्षदः ॥ १४२॥अयं तु शांकरो योगो धीराणां वत्वदर्शिनाम् ॥गोपनीयः प्रयत्नेन न देयो यस्य कस्यचित् ॥ १४३ ॥ गुरुके उपदेश” योगी वल तौन जो रज ताहि आक- र्पण करै दोनों जो रजबिंदु हैं तिनको एकत्र करिकै अपने शरीरविपे प्रवेश करै ।। १४१॥ यही विधान कारकै योगाभ्यासी भूतलविषे सिद्ध हो¥है वज्रोलीके अभ्यासक- रिक जो योग भोगयुक्त आपिनाम निश्चय मोक्षको देवेवारो (८०) योगरहस्य । है ।। १४२ ॥ यह योग साक्षात् शिवजीने कथनकरयोहै सो योग धीर तथा तत्वदर्शी पुरुषनके वास्ते देय है नहीं तो विशेषकरिकै सामान्यमनुष्यनको नहीं देना चाहिये ॥ १४३॥ सहजोल्यमरोली च वज्रोली भेदतो भवेत्।। योगशास्त्रानुसारेण उभेअपिनिगद्यते १४४ सहजोली अमरोली ये जोदोई मुद्रा ते वज्रोलीके भेद हैं योगशास्त्रके अनुसारतें उभेअपि कहैं दोऊ निश्चय- कारक निगद्यते नाम वर्णन कर हैं ॥ १४४॥ ॥ अथ सहजोलीमुद्रालक्षणम् ॥ दैवाञ्चलति चेद्रीय्य संप्राप्तं योनिमंडलें ॥ उभयोःशोपण येन सयोगी सिद्धिभाजनम् ॥१४५॥ सहजोलीति मुद्रेयं ज्ञातव्या योगिभिःसदा॥येन केन प्रकारणे विंदुधा: रणमाचरेत् ॥ १४६॥ जो कदाचित् स्थानतें वीर्य चलिजावै और स्त्रीकी योनिमंडलमें प्राप्त होजावे तो लिंगकरिके दोनोंको शोप- णकरै जाकी किया इसप्रकार है कि पूर्वमें सीसकी शलाका १४ चौदह अंगुल बनावै वह नित्य लिंगमें चालनकरें जब भाषाटीकासमेत (८१) १२ वारह अंगुल प्रवेश होनेलगिजाय तव चांदीकी शलाका सच्छिद्र वनवावेताको प्रवेशकर और फूत्कारक. रिक वायुसंचार करै फिर तिस लिंगनालकरिकै जल तथा दूध आकर्पण करै तदनंतर रजको और वीर्यको आकर्षण करे सो योगी संपूर्णसिद्धीनको पात्र है ॥ १४५ ॥ इसण- कार इस मुद्राका नाम सहजोली है सो मुद्रा योगीजन जानें हैं जिसकिसीप्रकार करिक विंदु जो कामदेव तिसका धा- रण करना ॥ १४६॥ ॥ अथ अमरोलीमुद्रालक्षणम् ॥ स्वमूत्रोत्सर्गसमय मुख्यां धारां परित्यजेत्॥ बलादाकर्षयेन्मध्यां धाराममृतरूपिणीम् ॥ ॥ १४७ ॥ स्तोकं स्तोकं त्यजेत्पश्चादुप- दिष्टगुरुशिक्षया ॥ एवं योगविधानेन बिंदुर्ग- च्छति मंडले ॥ १४८ ॥ षण्मासमभ्यसे- नित्यं साधकः संयतेंद्रियः ॥ शतांगनाऽपि भोगेऽपि विंदुस्तस्य न क्षुभ्यति ॥ १४९ ॥ विदुसिद्धिर्भवेत्तस्य जितश्वासस्य योगिनः॥ वहुना किं प्रलापेन घुपतिष्टंति सि- द्वयः ॥ १५० ॥ संसारिणां विमू- ढानां मायामोहितचेतसाम् ॥ विंदुर्ददाति ६

(८२) योगरहस्य ।
सर्वेषां सुखदुःखमुदारधीः ॥ १५१ ॥ अयं
तु शांकरो योगो योगिनां चात्मदर्शिनाम् ॥
रागग्रस्तमनुष्याणां न तु विषयंशालिं-
नाम् ॥ १५२॥
निजमूत्रोत्सर्गसयमें मुख्यधाराको त्याग करिदेवे फेरि
वलकरिके अमृतरूपिणी जो मध्यधारा ताको आक-
र्पण करै ॥ १४७॥ गुरूपदिष्ट शिक्षाकरिकै ताहि धीरे
धीरे कुछ थोडी थोडी त्याग करै याप्रकार योगविधान
करिकै विदु जो है सो मंडलके विष प्राप्त होवै है ॥१४८॥
इंद्रियनको जीतलियो है जाने ऐसे जो साधक सो नित्य
ही क्रमपूर्वक प्रकार छै महीनापर्यंत अभ्यास करें तौ सौ
स्त्रीके साथ भोगकरनेपरभी ताको विंदु क्षोभित नहीं होवै
है ॥ १४९॥ यह जो जितश्वास योगी जाकी विंदुसिद्धि
होयगई ताको बहुत प्रलाप कारकै क्याहै संपूर्ण जो सिद्धि
यह निश्चयकारकै समीपमें स्थित होवैहैं ॥ १६० ॥ संसा-
रीजे मनुष्य मायाकरिकै मोहित हैं चित्त जिनके तिनको
उदारधी विंदु जो काम है सो सुखदुःखको प्राप्त करै है
॥ १५१॥ यह जो अम्रोलीयोग सो साक्षात् श्रीशिवजी-
ने प्रकाशित कियोहै सो केवल आत्मदर्शी योगीजनोंके
वास्ते सुखप्राप्तकरैहै रागकारिकै ग्रस्त जे मनुष्य तिनको
नहीं कैसे हैं वे मनुष्य अर्थात् विपययुक्त हैं ॥ १२ ॥

भाषाटीकासमेव । (८३) अमरोलीत्वियं प्रोक्ता महासिद्धिप्रदायिका॥ विदुधारणरक्षार्थ मुद्रानैवच यादृशी॥१५३॥ यह महासिद्धिकी देवेवारी अमरोली मुद्रा कहींहै जाके सदृश अन्य मुद्रा विदुधारणकी रक्षाके अर्थ एवं नाम निश्चय करिकै नहीं है अर्थात् सर्वदा इसके समान कोई अन्य नहीं योग जप तप सक्का मूल यह है ॥ १५३॥. गुह्याद्गुह्यतमोलोके न भूतो न भविष्यति॥ ईशत्वं यत्प्रसादेन दुर्लभं प्राप्यते भुवि ॥ १५४ ॥ इस विंदुरक्षारूप योगके समान अन्य कोई जप तप भक्ति योग नहीं संसारमें यह योग गुप्तसे गुप्त है, अर्थात हरेकको देना उचित नहीं इस विंदुरक्षारूप योगप्रसादसे इस संसारविपे जो दुर्लभ ईशत्व है सो प्राप्त होता है इसमें संशय नहीं॥ १५४॥ ॥ अथ शक्तिचालनीमुद्रालक्षणम् ॥ अपानवायुमाकृष्य चालयेत्कुंडली दृढाम् निद्रां विहाय भुजगी स्वयमूर्द्ध व्रजेत्ख- लु ॥ १५५ ॥ गुरूपदेशतो नित्यं श- क्तिचालनमाचरेत् ॥ आयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य सिद्धो भवति भृतले ॥१५६॥ पण्मासम- (८४) योगरहस्य । भ्यसेद्योगी प्रत्यहं गुरुशिक्षया ॥ बहुना किं प्रलापेन मुक्तो भवति बंध- नात् ॥१५७॥ अपानवायु जो गुदाद्वारा नीचेगमन करैहै ताहि उप- रको संचिकार दृढ जो कंडली अर्थात् सात लपेटे देकार पूर्ण निद्राके विषे जो होरही ताहि चालयेत् अर्थात् चलावै सो निद्रा छोडि आपही ऊर्द्ध जो ब्रह्मरंध्रस्थान तामें निश्चयकरि गमन करैहै॥१६॥जो पुरुष गुरुके उपदेश” नित्यही शक्तिचालन मुद्राभ्यास करैहै ता पुरुषकी आयु वृद्धि निश्चयकरिकै होती है और संपूर्ण अणिमादिक सिद्धियां प्राप्त होकर पृथ्वीविषे सिद्धरूपहोता है ।।१५६॥ जो पुरुष इस सुद्राअभ्यासकोछै महीना गुरुकी शिक्षापूर्वक निशिदिन करहै ताकू बहुत प्रलाप करनेसे क्या सर्व सिद्धि प्राप्त हो संसाररूप वंधनसे छूटिजावैहै ॥ १६७ ॥ ॥ अथ विपरीतकरणीमुद्रालक्षणम् ॥ अधःशिरश्चोर्द्धपादमभ्यसेच दिनदिने । मुद्रेयं विपरीतारव्या जठराग्निविवर्द्धनी ॥ १५८ ॥ नित्यमभ्यासयुक्तस्यात्या- हारो वहुलोच्यते ॥ सूक्ष्माहारो यदि भवेदग्निर्दहति निश्चितम्॥१५९॥तस्माद- भाषाटीकासमेत। (८५) तिप्रयत्नेन साध्यते योगिना सदा ॥ व- लितंपलितंचैवषण्मासोर्द्ध न दृश्यते॥१६०॥ अधः कहैं नीचेकू शिर ऊंचेकू पांव करै अर्थात् पृथ्वी- में मस्तक रखकर अंतरिक्षमें पांव करे इसतरह दिन प्रति अभ्यास करै याको विपरीतकरणीमुद्रा नाम है सो मुद्रा जठराग्निकू अत्यंत वृद्धि करैहै ।। १५८ ॥ जो पुरुष या मुद्राको नित्य अभ्यास करै तिस साधकपुरुपकू बहुत आहार करना योग्य है जो कदाचित् आहार कम करे तौ जठराग्नि शरीरकू शीघ्रही भस्म करैगा ॥ १५९ ॥ तातें अतिप्रयत्नकरिकै यह मुद्रा योगीकरिकै साधनीय होवैहै जो इसमुद्राका अभ्यास नित्य करै ताके वली प- लित चर्म केश छै महीनामें नाश होवे हैं अर्थात् तरुणकेसे हो तथा जराका अभाव होवहे ॥ १६ ॥ याममा यदाक्र्तसमर्थः स्यादिनदिने॥ तदैव कुरुते योगी कालस्य मुखवंचनम् ॥ ॥१६१ ॥ गुरुप्रसादाल्लभते मुद्रेयं पाप- नाशनी ॥ गोपनीया विशेषेण न देया यस्य कस्यचित् ॥ १६२ ॥ अभ्यासके साधन जो नित्यप्रति एकप्रहर करिवे लगिजाय सो तेहीसमयसे कालके मुखकी वंचना कर ॥ १६१॥ यह मुद्रा केवल गुरुकी प्रसन्नता सिद्ध होवेहे

(८६)
योगरहस्य ।
यह मुद्रा पापको नाश करिवेवारी है यह विशेषकरि गोप-
नीय है अर्थात् अनधिकारीकू देना योग्य नहीं ॥१६२॥
॥ अथ समाधिनिरूपणम् ॥
ध्येयस्वरूपोपगतो यदा सुधीविस्मृत्य
चात्मानमथावतिष्ठते ॥ योगी विलूनाखि-
लकर्मबंधनैर्योगस्य तच्चाष्टकमंगमी-
रितम् ॥ १६३॥
जिसकालविप सुधी कहैं सुंदरबुद्धिमान जो साधक
पुरुष हे ध्येयवस्तु जो परमात्मा है तास्वरूपकू प्राप्त
होतेहै अपनी जोदेह तथा आत्माका पृथक्भाव ताहि भूलि-
करि स्थित होवैहै सो योगी कैसो है कि,संपूर्ण जन्मांतरके
संचित तथा वर्तमान आगामि तिनकरिक छूटि जावह
सो योगका अष्टम अंग जो समाधि सो हो ॥ १६३॥
सरित्पतौ यथा चापः कर्पूरमनिले यथा॥
सलिले लवणं यद्वत्समाधिः प्राणसंय
मात्॥१६४॥घृते घृतं यथा क्षिप्तं वह्नौ व-
हिरवार्पितः॥तथा भवति चैकत्वं जीवा-
त्मपरमात्मनोः॥१६॥अच्छेद्यः सर्वश-
राणामवध्यः सर्वदेहिनाम् ॥ अशक्यो
यक्षगंधर्योगीमुक्तस्समाधिना ॥१६६॥

भापाटीकासमेत । (८७)
जिसप्रकार सरित्पति जो समुद्र ताविषे आप जोजल
और अग्निमें कर्पूर जलमें लवण एकरूप होवे तैसेही
प्राणसंयम अर्थात् प्राणवायुके संयम कहैं निरोध कर-
नेसे समाधि होवेहे ॥ १६४॥ जिसतरह घीके विपे घी
अग्निके विषे अग्नि छोडै तेही प्रकार जीवात्मा और पर-
मात्मा एकताकू प्राप्त होतेहैं ॥ १६५ ॥ समाधिकारकै
मुक्तरूप जो योगी सो संपूर्ण शस्त्र जे हथियार तिनतें
अच्छेद्य अर्थात् छेदो नहीं जावैहै और सर्वदेही जो जीवा-
त्मा हैं तिनकरिके अवध्य है तथा यक्ष गंधर्वादिक जो हैं
तिनकरिकै अशक्य अर्थात् पकडिनहींसके भावार्थ यह
है कि सर्व बंधनतें मुक्त है ॥ १६६॥
भित्त्वा सर्वणि पद्मानि कुंडली वायुना
हता ॥ सुखतो ब्रह्मविवर गत्वा सुखमवा-
नयात् ॥ १६७॥
जिसकालमें वायु जो उड्यान जालंधर मूलबंध मुद्रा
इनके करनेसे वायुकरिकै पीडित जो कुंडली सो संपूर्ण पद्म
तिनही भेदकरि सुखपूर्वक ब्रह्मरंध्र जो है ताकू प्राप्त होकरि
सुखको अर्थात् ब्रह्मानंदको प्राप्त होवैहै ॥ १६७ ॥
भक्त्यात्मका शुभा ह्येका पुनर्ज्ञानात्म-
कापरा ॥ ध्यानात्मका तृतीया च समा-
धिर्वर्ण्यतेबुधैः ॥ १६८॥

(८८) योगरहस्य ।
अव समाधिभेद वर्णन करै बुद्धिमान् कारकै समाधि
तीन प्रकार वर्णन करीजावैहै एक शुभ स्वरूपकहै कल्पा:
नुरूपा भत्त्यात्मका अर्थात् सभक्ता भक्तिकरिकै युक्त
उपासना ध्यानपूर्वक । तथा अपरा कहैं दूसरी ज्ञानात्मका
अर्थात् निर्गुणध्यान पूर्वक । तृतीया कहैं तीसरी प्राणाया-
मकरिकै सो ध्यानात्मका है ॥ १६८॥
संनियम्येंद्रियग्रामं ध्यायेद्विष्णुं सनात-
नम् ॥ धातारं चापि विस्मृत्य समाधि-
स्साभिधीयते ॥ १६९॥
समाधि प्राणायामद्वारा तथा केवल प्रेमपूर्वक इंद्रि-
यनको रोकिकार सनातन जो विष्णुपरमात्मा है तिनहि
ध्यायेत् नाम ध्यानकर सो जा काल ध्यान करते करते
धातार जो ईश्वर है ताहि विस्मरण होजावै सा कहैं सो
समाधिलक्षण होवैहै ॥ १६९॥
यदि देहं पृथकृत्य चित्तं विश्रम्य तिष्ठति।
तदैव तु सुखी शांतो समाधि सोऽपि
गच्छति ॥ १७०॥
पूर्व भक्तिसमाधि निरूपणकार ज्ञानसमाधि वर्णन
करह जा कालमें देहकू पृथक्मानिकार चित्तमें विश्राम
पाकार स्थित हो ताकालविषे सुखी और शांत समाधिप-
दकुं चहुँहै ॥ १७०॥

प्रकार मानिकरि ज्ञानी शीघ्रही समाधिर्व प्राप्त होते है भाषाटीकासमेत । (८९) नाहं विप्रादिको वर्णो नाश्रमीनजितेंद्रियः ॥ असंगो निर्विकारोऽहं विश्वसाक्षी सदा विभुः ॥ १७१ ॥ नाह कत्ता न वा भोक्ता स्वप्रकाशो निरंजनः ॥ अयमेव न मे बंधः समाधिमनुगच्छति ॥ १७२ ॥ विप्रकू आदि लेकर कोई वर्ण नहीं हूं न कोई आश्रमी अर्थात् ब्रह्मचारी गृहस्थ वानप्रस्थ संन्यासी तथा जितेंद्री अजितेंद्री नहीं हूं, असंग निर्विकार विश्वसाक्षी सर्व ऐश्व- र्यमान मैं हूं ॥ १७ ॥ न भोक्ता न कर्ता स्वप्रकाश निरंजन मैं ही हूं जो बंधमोक्ष मेरे कोई बंधन नहीं है सो समाधिकू प्राप्त होते है ।। १७२॥ अहो निरंजनःशांतो बोधोह प्रकृतेः परः ॥ इति मत्वा यदा ज्ञानी समाधिमनुग- च्छति ॥ १७३ ॥ बद्धो वडाभिमानी यो मुक्तो मुक्ताभिमान्यपि ॥ वहुन च कि- मुक्तेन स्वमतिं चानुगच्छति ॥ १७४ ॥ अहो निरंजन शांत प्रकृतितें परेवोधरूप मैं ही हौं इस- ॥ १७३ ॥ जो पुरुप अपनी इच्छाकरिक वद्ध है सो वद्ध (९०) योगरहस्य । होवेहै जो अपनी इच्छाके अभिमानतें मुक्त है सो मुक्त है बहुत कथनकरनेसे क्या है यह जीव अपने मतके अनुसार गमन करहै ॥ १७४॥ मुमुक्षुरिह संसारे बुभुक्षुरपि दृश्यते ॥ मोक्षभोगनिराकांक्षी विरलो हि महाशयः ॥१७५॥ इस संसारमें मोक्षकी तथा भोगकी इच्छावाले जन बहुत हैं तथा मोक्ष वा भोगकी इच्छा रहित कोई महाशय विरलाही होवैहै ॥ १७५॥ स्खलत्यसौ नैव यदा कथंचिदभ्यासतो धारणध्यानतुर्यैः ॥ तदैव तज्जानि फलानि संयमेऽविरोधमुख्याँल्लभते जि- वासुः ॥ १७६ ॥ समाधिर्धारणा ध्यानं स्त्रयमेकत्र संयमः ॥ जितश्वासस्य युक्त- स्य छुपतिष्ठति सिद्धयः ॥ १७७॥ आसन प्राणायाम मुद्रादिकनकारकै जीतलियो है प्राणवायु जाने सो जाकालकेविषे धारणा ध्यान समा: धिके अभ्यासतें कोई समय स्खलित नहीं होवै है तेही समय संयमके जो जो फल आनंदके देवेवारे सो संपूर्ण आनकर प्राप्त होवहैं ।। १७६ ।। संयमलक्षण कन्हैं जिस भापाटीकासमेत । (९१) कालमें धारणा ध्यान समाधि एकत्र अर्थात् एकपदार्थमैं आरूढ होवें हैं सोई संयमलक्षण होवैहै अर्थात् धारणा ध्यान समाधि इन तीनोंका एक होना संयम है सो वार्ता योगसूत्रमें कथन करी है, यथा “त्रयमेकत्र संयमः तथा त्रयमंतरंगं पूर्वेभ्यः" जितश्वासपुरुषकू संपूर्ण सिद्धि प्राप्त होतीहैं ॥ १७७॥ जितेंद्रियमनुष्यस्य सिद्धिः प्राप्नोति निश्चितम् ॥ नैवाजितेंद्रियस्येव वेदवा- दरतस्य च ॥ १७८॥ जितेंद्री मनुष्य सिद्धिकू निश्चय पहुँचेहै तथा अजितेंद्री विद्वानभी होय तो भी नहीं पहुँचे ॥ १७८॥ अतीतानागतं ज्ञानं परिणामश्च संयमात् ॥ कूर्मनाड्यां भवेत् स्थैर्य मूर्द्धनि सिद्धि- दर्शनम् ॥ १७९॥ अतीत जो काल पूर्व में होचुका अनागत जो जो आने- वाला है इनविपे संयमकरनेसे सर्वकर्मोंका ज्ञान होवेहे कि मैं कौन था क्याकरता रहा और आगे क्या होगा कूर्म- रूपा जो नाडी ताविपे संयमकरनेसे स्थिरता प्राप्त होवैहे अर्थात् कोईभी हिला नहींसक्ता मूकविषे संयमकरनेसे संपूर्ण सिद्धीनके दर्शन तथा वातालाभ होवैहै ॥ १७९ ॥ ।

(९२) योगरहस्य।
ज्ञानं समस्तजगतां संयमे सूर्यमंडले ॥
रेचकाभ्यासयुक्तेन प्रविशत्यपरां पुरीम्
॥ १८० ॥ समानवाय्वा ज्वलनमुदाने
गमने गतिः ॥ लावण्यं च बलं रूपं
यस्मिंस्तस्मिन् सुसंयमे ॥ १८१ ॥
सूर्यके विपे संयमकरनेसे संपूर्ण जगत् तथा तीनों
लोकका ज्ञान होवैहै रेचक प्राणायामके अभ्यास संयम-
करनेपर परकायप्रवेश अर्थात् पराई देहमें प्रवेश होनेकी
शक्ति होवैहै ॥ १८॥ समाननामकरिकै जो वायु तामें
संयमकरनेसे ज्वलन अर्थात् जलतेहुएकी नाई प्रतीति
होवै इच्छा हो तो जलभी जावै इसीको योगाग्नि कहतेहैं
उदानवायुकेविषे संयमकरनेसे गमन विपे गति अर्थात
जलमें न डूवै कंटक नलगे और आकाशमार्गमें भीगमन
की शक्ति हो जिस जिस पदाथके विपे संयम करैहै सोई
पदार्थरूप स्वयं आप होवैहै कामदेवविपे रूप तथा श्री
हनुमान भीमादिकनविषेवल संपूर्ण सोई रूप प्राप्त होवैहै
सो वार्ता अमृतविंदु उपनिपतविपे कथन करी है ॥१८॥
इति श्रीयोगमार्गप्रकाशिकायां हठयोगवर्णनं नाम
तृतीयोपदेशः॥ ३ ॥

भाषाटीकासमेत । (९३) ॥ अथ राजयोगवर्णनम् ॥ मंत्रो लयो हठोपायो राजयोगाय कल्पते ॥ योयं योगं विजानाति ह्युत्तमः सर्वयोगिनाम् ॥ १॥ वज्रासने स्थितो योगी मुद्रां विधाय शांभवीम् ॥ शृणुया- दक्षिणे श्रोत्रे सूक्ष्मात्सुक्ष्मतरं ध्वनिम् ॥२॥ इसके अनंतर राजयोग वर्णन करैंहैं कि, संपूर्ण मंत्रयोग, लययोग, हठयोग इनके जो उपाय अर्थात् साधन हैं सो केवल राजयोगके अर्थ होतेहैं जो योगी राजयोगकू अच्छी तरहसे जानै सो संपूर्ण योगिनके विपे उत्तम है ॥ १ ॥ वज्रासन जो सिद्धासन ताहि वांधिकार शांभवीमुद्रा जो खेचरीमुद्रा ताहि धारणकरिकै दक्षिणश्रोत्र जो दक्षिण कर्ण तामें सूक्ष्मतें सूक्ष्म ध्वनिहोवैहै ताहि श्रवण करै ॥२॥ आरंभा प्रथमावस्था घटाऽवस्था द्विती- यिका ॥ तृतीया परिचर्या च निष्पत्ति- श्च चतुर्थिका ॥ ३ ॥ चतुष्टयं सर्वयोगे महासिद्धिप्रदायकम् ॥ कथितुं कस्स- मर्थः स्यान्महासिद्धश्च सेवितम् ॥ ४ ॥ तहां प्रथम आरंभा दूसरी घटार तीसरी परिचर्या ३ चतुर्थ निष्पत्ति ४ यह जो अवस्थाचतुष्टय है सो महान (९४) योगरहस्य । सिद्धि जो अणिमा महिमाकू आदिलेकरि तिनकू देवेवा- रोहै ताके वर्णन करिवेम कौन समर्थ है सो महासिद्ध जो कपिलाचार्यकू आदिलेकरि श्रीशिवजी तथा मच्छंद्रना- थादिक तिनने सेवन कन्यो है ॥४॥ ब्रह्मग्रंथर्यदा भेदोऽनाहतःश्रूयते ध्वनिः॥ दिव्यदेहश्च तेजस्वी ह्यानंदं परमं व्रजेत् ॥५॥ संपूर्णहृदयः शून्यः आरंभा सा प्र- कीर्तिता॥ द्वितीयघटवन्नादे ज्ञानी दे- वसमो भवेत् ॥६॥ विष्णुग्रंथिर्यदा भेदे परमानंदसूचके॥७॥ जिसकालविषे ब्रह्मग्रंथिका भेदन तथा अनाहत जो ध्वनि है सो जिस यागीकरिकै सुनीजाय सो दिव्यदेह तथा तेजवान् परम आनंदको प्राप्त होवैहै ॥५॥ संपूर्ण हृदय आनंदकारकै शून्य होवै जाविपे सोआरंभ अवस्था कहावैहै ॥६॥जा कालमें विष्णुग्रंथिको भेदन होवैहै तासमय घटकेसा शब्द होवैहै ता नाद श्रवण करेते ज्ञानी देवता समान होवेहै सो नाद परम आनंदकू देवेवोरो है॥७॥ रुद्रग्रथिं यदा भित्त्वा सुखाद्विशति मारु- तः॥ सर्वदुःखजराव्याधिक्षुधानिद्रा वि- नश्यति॥८॥निष्पत्तौ वेणुसदृशो नादश्च

भाषाटीकासमेत।
(९५)
परमो महान्।यदा संजायते तत्र योगी-
श्वरसमस्तदा ॥ ९ ॥ सृष्टिसंहारकर्तासी
सत्यं सत्यं न संशयः॥राजयोगप्रभावेण
न किंचिदुर्लभं जगत् ॥ १०॥
जिससमय रुद्रग्रंथि जो है ताहि भेदनकारि वायु सुखपू-
र्वक ब्रह्मरंध्रको प्राप्तहोवै तासमय संपूर्ण दुःख राग द्वेपा-
दिकन करिकै उत्पत्ति तथा जरा जो बुढापा तथा व्याधि
और क्षुधा निद्रा इत्यादि इन सबको नाशभाव प्राप्त होवै
है ॥ ८॥ चौथे तहां निष्पत्ति अवस्थाविपे वेणुसदृश
जो परममहान् नाद सो प्राप्त हो वाही समय योगी ईश्व-
रके सदृश अर्थात् रचना करनेमें तथा लयकरने में समर्थ
हो ॥ ९॥ सृष्टि के संहार तथा उत्पन्न करिवेमें अर्थात् रचि-
वेमें कोई योगी समर्थ होवैहै यह सत्य है सत्य है यामें कोई
संशय नहीं राजयोगके प्रभावकरिकै संसारमें किंचित
मात्र दुर्लभ नहीं अर्थात् कोई पदार्थकी प्राप्ति दुर्लभ
नहीं आपहीतें संपूर्ण पदार्थ सिद्धिताको प्राप्त हों ॥ १०॥
राजयोगस्य माहात्म्यं को वा. शक्नोति
वर्णितुम् ॥ योगस्यास्य च कर्त्तारो विशे-
यास्ते महेश्वराः ॥११॥
इस राजयोगका माहत्म्य कोई कहने नहीं सकै जो
योगाभ्यासी इसको जानते तथा करते वे महेश्वर अर्थात्
ब्रह्मा विष्णु महेशके समान समझना चाहिये ॥११॥

(९६) योगरहस्य । एवं नानाविधा मागा राजयोगपथा- यते ॥ क्रियते राजयोगेन कालस्य- मुखवंचनम् ॥ १२ ॥ राजयोगमजानंतः केवलं हठधर्मिणः ॥ तेपामभ्यासिनां मन्ये श्रमो हि केवलं फलम् ॥ १३॥ नानाप्रकारके जे संपूर्ण मार्ग अर्थात् मोक्षके मार्ग ते सव राजयोगके अर्थ हो काल जो है ताके मुखकी वंचना केवल राजयोगही करिके होर्वहै ॥ १२॥ जो पुरुष राजयोग जो केवल निश्चयताहि नहीं जानते केवल जप- तपादिक हठधम्मी हैं तिन अभ्यासीनकू केवल श्रमही फल प्राप्तहोगा॥ १३॥ केचिदानं प्रशंसंति केचिद्धर्म तथापरे ॥ केचिद्गृहस्थकर्माणि केचिद्वैराग्यमुत्त- मम् ॥ १४ ॥अग्निहोत्रादिकं केचित् तपः शौचं क्षमाजवम् ॥ एवं वदंति मुनयो छुपायांस्तु विमुक्तये ॥ १५॥ कोई कोई दानकी प्रशंसा करते तैसेही कोई कर्मकी प्रशंसा करतेहैं, कोई गृहस्थ कर्मळू अच्छा मानतेहें कोई वैराग्यको उत्तम कहतेहैं ॥ १४ ॥ कोई अग्निहोत्रादिक , भाषाटोकासमेत। (९७) जे यज्ञादिशुभकर्मोंको तथा कोई तप शौच क्षमा आज- वकू अच्छा कहतेहैं येही प्रकार मुनिजनोंने मोक्षके अर्थ बहुत उपाय कहेहैं ॥ १५॥ एवं विवादकर्तृणां मतं वक्तुं न शक्यते ॥ इदमेकं मया प्रोक्तं योगशास्त्रं स्वभाव- तुः ॥ १६ ॥ भक्तियोगोऽथवा ज्ञानं तपः शौचादिकं तथा।।न ज्ञायतेऽस्मिन संसारे पृथगष्टांगयोगता ॥ १७॥ तथापि इनमें जो वादविवादके करवेवारे हैं तिनके मत वर्णन करिवेकू हम समर्थ नहीं हम तो अपने अनुभवतें एक योगशास्त्रही परम मत मानते हैं सोवर्णन करौ हौं १६॥ भक्तियोग ज्ञान तपशौचादिक जो हैं सो इस संसारके विपे कोई अष्टांगयोग” वाहिर नहीं सो वार्ता वर्णनकरैहैं कि भगवानकी जो नवधा भक्ति है यथा"श्रीमद्भागवते-श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ॥ अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥१॥"अर्थ-कथाश्रवणकरनानामसं कीर्तन २ स्मरण ३ चरणसेवा ४ पूजन करना ५ वंदना करना ६दास्यपन७ सख्यभाव ८आत्मनिवेदन ९ अर्थात आत्मसमर्पणकरना सो इस नियमके अंगविपेअंतर्भाव है तथा समाधी योगसूत्र पतंजलिने कहाहै "ईश्वरप्रणिधा- नादा" कि ईश्वरके प्रेमपूर्वक प्रणिधान अर्थात् पूजन सो ७ (९८) योगरहस्य। समाधि होवैहै तथा नारायणतीर्थने"प्रेमभक्तियोगस्तु ईश्व- रचरणारविंदयो प्रेमप्रवाहो अविच्छन्नस्समाधिः” अर्थ ईश्वरके चरणारविंदविषे प्रेमप्रवाह जो है सो समाधि तव प्रेमभक्तियोग होवैहै तातैसर्वकाल समाधि तीनप्रकार वर्णन करिचुके हैं ज्ञानसमाधि १ भक्तिसमाधि २ तथा कर्म- समाधि ३ याहीको ध्यानसमाधि वर्णनकरअर्थात् योगसे समाधिहोवेहै विना इसके अन्यप्रकार नहीं ॥१७॥ चित्तस्थैर्ये स्थिरो वायुस्ततो बिंदुःस्थिरो भवेत् ॥ जायते सहजावस्थायमिनां मो- क्षदायिनी ॥ १८॥यावन्न गच्छेदनिल- स्तदात्मकं तावन्न बिंदुःस्थिरतां प्रपद्यते। तावन्न ध्यानं न च रागसंक्षयस्तावन्न ज्ञानं लभते विरागवान् ॥ १९॥ जिसकालमें चित्त स्थिर होवैहै तव चित्तके स्थिर होनेसे वायभी स्थिर होवैहै वायु स्थिर होनेसे सहजावस्था अर्थात् समाधि जो है सो प्राप्त होवहै सो समाधि योगीज- नोंको मोक्षकी देनेवारीहै ।।१८॥ जवतक अनिल जोवायु सो ब्रह्मरंध्र जो है ताहिको प्राप्त न हो तबतक कोई उपा- यसे विंदु स्थिरताकू प्राप्त नहीं होता जबतक विंदु स्थिर नहीं होता तवतक रागध्यान तथा राग जो शीतोष्णादि- भापाटीकासमेत । (९९) कोंकी बाधा तिसका संक्षय नहीं होता और जबतक शीतोष्णादिकोंकी वाधा रहती तबतक ज्ञानकी प्राप्ति नहीं यद्यपि वैराग्यवानभी हो तौभी क्या ॥१९॥ नास्ति योगसमा विद्या न नादसदृशो लयः मनोन्मनी ह्यवस्थासु यथा - मुद्रासु शांभ- वी ॥२०॥ योगविद्याके समान कोई विद्या इस संसारमें नहीं नादके सदृश कोई लय नहीं अवस्थामें मनोन्मनीके समान कोई अवस्था नहीं तैसेही शांभवीमुद्राके समान कोई मुद्रा नहीं॥२०॥ योगाऽनुसन्धानसमाधिपात्रं योगेश्वराणां हृदि वर्तमानम्॥आनंदपूर्ण वचसाह्यगम्यं जानाति तत् श्रीगुरुनाथ एकः ॥२१॥ योगका जो अनुसंधानरूपी समाधिका पात्र है सो योगेश्वर जो पूर्ण योग कर्ता हैं तिनके हृदयमें वर्तमान कहै प्राप्त हो रहा है आनंद करिके पूर्ण हि कहैं निश्चयकरि वाणीसे अगम्य उसको केवल एक गुरुनाथही जानते हैं दोहा-अज्ञानीको जगलटो, ज्ञानवानको ऐन । अंधेको जिमि अंधगृह दृगवारेको चैन ॥२१॥ रूपलावण्यसंपन्ना यथा स्त्री पुरुपं विना ॥ तथा योगेन रहितो ब्रह्मज्ञानरतोऽपि वा ॥२२॥ - (१००) योगरहस्य । जैसे रूप और लावण्यता करिकै युक्त जो स्त्री सो पुरुषविना व्यर्थ होती है तैसेही योगाभ्यास करिकै रहित मनुष्य ब्रह्मज्ञानीभी होय तौभी व्यर्थ होवहै ॥ २२॥ इति श्रीयोगमार्गप्रकाशिकायो राजयोग वर्णनं नाम चतुर्थोपदेशः॥४॥ ॥ अथ प्राणायामक्रम निरूप्यते ॥. अथाभ्यासक्रमं वक्ष्ये योगिनां सिद्धिदा- यकम्॥प्रातःकाले समुत्थाय प्रणम्य स्व- गुरून सुधीः ॥ १॥ विधिवच्छौचादिकं कृत्वा एकांते च मठं विशेत् ॥ सूक्ष्मरंधे मठे रम्ये प्रतिष्ठाप्यासनं मृदु ॥२॥ गु- सं संस्मृत्य हृदये विघ्नेशं स्वेष्टदेवताम् ॥ ततस्संकल्पकं कृत्वा प्राणायामन्ततोऽ- भ्यसेत् ॥३॥ अव प्राणायामका क्रम निरूपण करैं हैं जाके अनंतर अर्थात् चारि प्रकार योगके अनंतर प्राणायाम अभ्यास- क्रम जो है सो कहाँ हौं सो क्रम योगीनकू सिद्धिदायक है कि, प्रातःकाल अरुणोदयसे लेकरि सूर्योदयपर्यंत होवे है तामैं उठिकार अपने गुरु जो आचार्य और माहात्मा तिनहि प्रणाम कारकै ॥ १॥ विधिपूर्वक शौचादिक जो क्रिया ताहि कारकै एकांतस्थानविपे जो मठ तामें प्रवेश । भापाटीकासमेत। (१०१) करे सो मठ सूक्ष्मरंध्र अर्थात् छोटासा द्वारहो और रमणी- क हो तामें मृदुक, कोमल आसन विछावे ॥२॥ और गुरु जो है तथा गणेश देव जो है तथा इष्टदेव जो हैं तिनही हृदय विषे स्मरण कारकै ताके अनंतर संकल्प उच्चारण करिकै प्राणायाम अभ्यास करै ॥३॥ मुद्रां च विपरीताख्यां कुंभकात्पूर्वमभ्य- सेत् ॥ कुंभका दशकर्तव्याः पंच वृद्धा दिनेदिने ॥४॥ और जो विपरीत करणीमुद्रा है ताहि कुंभकतै पूर्वही करने योग्य है कुंभकर्ते पश्चात् योग्य नहीं कुंभक अभ्यास कालके प्रथम दशकुंभक करना योग्य हैं फिर दिन दिन विपे पांच पांच वृद्धि करना योग्य हैं ॥४॥ सहितमभ्यसेत्तावत् यावत्कुंभ न केवल- म् ॥ केवलानंतरं चैव कुर्याद्दश ।। विशतिः॥५॥ अभ्यासं सकलं कुय्या' .. दीश्वरार्पणमादृतः ॥ मध्याह्ने च तथा भ्यासं कृत्वा भोजनमाचरेत् ॥६॥ रेचक पूरक करिकै युक्त जोसहितकुंभक जवतक केवल कुंभक प्राप्त न होय तव तक सहितकुंभकका अभ्यास कर और जवतक केवलकुंभक सिद्धहोजाय तबतक दश वा वीस LIBRARY -

(१०२) योगरहस्य ।
सहित कुंभक करै ॥ ५॥ अभ्यास संपूर्ण ईश्वरकू आदरपू-
र्वक अर्पण कर इसी प्रकार मध्याह्नकाल विपे अभ्यास
करै और अभ्यासकू करिके फिरि भोजन करे॥६॥
कुर्वीत भोजनं पथ्यमपथ्यं न कदाचन ॥
भोजनानंतरं किंचिच्छयनं सौख्यदाय-
कम् ॥ ७॥ सायं संध्याविधिं कृत्वा
योगं पूर्ववदाचरेत् ॥ अर्द्धरात्रे हठाभ्यास
श्रद्धाचेद्यदि धीमतः ॥८॥
भोजन पथ्यकर अपथ्य कोई समय न कर सो पथ्या-
पथ्य विचार पूर्वही कहिचुके हैं भोजन करिकै सौख्यदा-
यक जो शयन है सो थोडासा करै ॥ ७ ॥ सायंकाल-
विपे संध्यावंदन करिकै जैसे पूर्वकालविणे कहि आये
तैसेही फिर अभ्यास करे और धीमान् जो साधकपुर-
पकी श्रद्धा होय तो अईरात्र समय हठ अभ्यास कर
इस प्रकार योगाभ्यास क्रम है सो जानना ॥८॥
॥ अथ छायापुरुपस्य विधानम् ॥
शुद्धातपे स्वदेहस्य प्रतिक्विं विलोकयेत्॥
भूमौ दृष्ट्वा तथा खे च प्रतीकोपासना
चरेत् ॥ ९॥ योगी समभ्यसेन्नित्यं
स्वप्रतीकं यथाविधि ॥ तेन विज्ञायते सर्व
लाभालाभौ भवाभवौ ॥१०॥

भापाटीकासमेत । (१०३) शुद्ध आतप जो स्वच्छ धर्म वा स्वच्छ चांदनी हो तब अपनी देहका जो प्रतिबिंब अर्थात् छाया ताहि विलोकयेत् करें देखें गर्दनविषे इस प्रकार पृथिवीमें देखि आकाशमें देखै तो जरूर छायाधुरुप दर्शन होगा इसमें संशय नहीं ऐसी प्रतीकउपासना करे इसको प्रतीक उपासना कहते हैं ॥ ९॥ अपना जो स्वप्रतीक अर्थात् छायापुरुप दर्शन सो योगी नित्यही देखनेका अभ्यास करै तिस छायापुरुष दर्शनसे संपूर्ण लाभ हानि होनी अनहोनी संपूर्ण मालूम होजाती है ॥ १० ॥ शिरश्छिन्नं तथा कंपस्तदा मृत्युभवेद्धवम् ॥ यदा न दृश्यते वाहुतहानिस्तु जायते ॥ ११ ॥ समस्तानि च, गंगानि स्वप्रतीकेन पश्यति॥ तत्सर्वं च विजानी- यात्तस्य हानिन संशयः ॥ १२ ॥ जो छायापुरुपका शिर न दिखाय तथा कांपता दीखे तो अवश्य मृत्यु होती है और जो दक्षिण भुजा न दि- खाय तौ वधुकी हानि होय वाम भुजा न दिखाय तो स्त्रीकी हानि होय ॥११॥ समस्त जो संपूर्ण अंग छायापुरुपके हैं तिनमेंसे जो न दिखाय तो जानना चाहिये कि तिसी अंगकी हानि होगी इसमें संशय नहीं ।। १२ ।।

(१०४) योगरहस्य । यःकरोति सदाभ्यासं गुप्ताचारेण मानुपः ॥ ईशत्वं नात्र संदेहः पण्मासेन च लभ्यते ॥ १३॥ विवाहे गमने चैव काले चमरणे तथा॥अवश्यमेव कर्त्तव्यं योगि- भिस्तदुपासनम् ॥ १४ ॥ जो साधक सदेवकाल छायापुरुप दर्शनका अभ्यास करता है वह छै महीनोंमें ईश्वर अर्थात् महादेवके सदृश समर्थ होजायगा ॥ १३ ॥ विवाहकाल तथा यात्राकाल तथा मरणकाल इन कालनमें योगीनकरिक तौन उपा- सना अवश्य कर्तव्य है इससे सर्ववार्ता पूर्वपर जानी जाती हैं॥१४॥ सकलयोगरहस्यमितीरितं युगलदासज- नेन समासतः ॥ पठति यश्चसमाचरतीह वै पतति जातु स नोहि भवार्णवे ॥१५॥ संपूर्ण जो योगशास्त्रका रहस्य अर्थात् सार२सोसमास पूर्वक सम्यक् प्रकारसे युगलदास जो हैं तिन करिकै वर्णन कन्यौ है ताहि जो मनुष्य प वा आचरण करेंगा सो भवार्णव जो संसारसागर है तामैं पतित नहीं होगा इसमें संशय नहीं ॥१५॥ इति प्राणायामक्रमः ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः। खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस-वंबई. - - --

Yog Marg Prakashika

Author
Yougal Das
Title
Yog Marg Prakashika
File name
Yog Marg Prakashika
Text
OCR done
Citation
1961
Published
2012/08
Publisher
Bombai.,shrivankteshwar Stem
Language
Sanskrit
Pages
105
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405359
Barcode
99999990292438.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
p3CJIS9PgWj
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