Sanmati Library, Jaipur
Anubhavananadlahari
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श्रीमद्भागवत । सान्वय भाषाटीका सहित । मूल अन्वयांक, विस्तार के साथ भाषाटीका, टिप्पणी, माहात्म्य, चित्र और सूची सहित अत्युत्तम । श्रीमद्भागवत जैसा ग्रन्थ है उसको कौन नहीं जानता है ? इसकारण उसकी तारीफ करना सूर्य को दीपक दिखाना है परन्तु इतना अवश्य कहेंगे कि-इस पुस्तक को हमने बहुत कुछ रुपया खर्चकर और परिश्रम उठाकर जैसी उत्तमता से.. सर्वसाधारण को लाभकारी करदिया है, सो देखने से ही प्र- तीत होगा, छापा उत्तपंचम्बई टाइप , सफेद चिकना मोटा कागज, भाषानुवाद तो ऐसा ठीक और सरल आजतक भा- रतवर्ष में कहीं छपाही नहीं,पुस्तक बहुत बड़ी होजाने के कारण उत्तम विलायती कपडे की दो जिल्दें बनाईगई हैं दोनों जि- ल्दों की पृष्ठसंख्या नीचे लिखे अनुसार है तोल में पक्की तीन सेर है, इतनेपर भी कीमत ५) पाँचरुपयाही रक्खी है डाक में मँगवानेवालों को एकरुपयाडाकमहसूल का अलग देनाहोगा दश पुस्तकें एकसाथ खरीदनेवालों को एक पुस्तक मुफ्त मि- लेगी। समस्त पुस्तक की पृष्ठसंख्या २१७६ है। गौरीदिगम्बर प्रहसन-सटीक महामहोपाध्याय श्रीशङ्कर मिश्र विरचित दाम केवल गोपालतापनीउपनिषद्-अथर्ववेदान्तर्गत-संस्कृत व्याख्या और भा० टी० स० मूल्य ।।) डाकखर्च माफ. विज्ञाननाटकहिन्दी-श्री:०८स्वामिशङ्करानन्दकृता, जाननाटकउर्दू-भी १०८ स्वामिशङ्करानन्दकृत ।।। रामायण-श्री १०८ स्वामिशङ्करानन्दकृत ॥ . .
। सञ्चिदोनदात्मनमः ॥ अथानुभवानन्दलहरी या द्वयरूपकं पुनरहो ईशश्च माया तनु सूक्ष्मा सृष्टिकलां विधाय विधिवढेरण्य गर्माख्यकम् ॥ स्थूलं स्थावर जंगमंचरचयबैराजरूपात्मकं दृष्टिं व्यष्टि सयौं विलंब्य विलसच्चा- स्वेपि तस्मै नमः॥१॥ अन्वय प्रदार्थ-हरिः ॐाश्रीगुरुपरमात्मनेनमः। (यत्ब्रह्म अद्वयरूपक)जो ब्रह्म अद्वयरूप है अर्थात् सजातिय बिजातिय सुगत भेदरहित है (अहो पुनः माया तनुईशः) बड़ा आश्चर्य है कि-फिर वही माया मय शरीरको धारण करने से ईश्वर नामवाला है (सूक्ष्मा सृष्टिकला विधिवत् वि- विधाय हैरण्यगर्भारख्यकम् ) सूक्ष्मसृष्टि की वि. धिवत रचना करने से जो हिरण्यगर्भ नामचाला हैं (चस्थलं स्थावर जङ्गस रचायत् वैराज रुपा- त्मकम् )और जो पुन:स्थूलस्थावरजङ्गम सृष्टि : " t २ अनुभवानन्दलहरी। रचने से विराट् नामवाला है (च व्यष्टिमयीं दृष्टिं अवलंव्य विलसत आस्तेऽपि तस्मै ब्रह्मणे नमः)फिर जो व्यष्टिमयी दृष्टिकोआश्रय करके अर्थात् केवल देहमात्रमें हीअभिमान करके वि. लास करताहुआजीवरूप से स्थितहै ऐसा अद्भुत विलासहै जिसब्रह्म कातिसके अर्थ मै नमस्कार करता हूँ॥१॥ इस प्रकार स्पंद निस्पंद रूप पवन वत् अक्रियरूप क्रियरूप अद्वयब्रह्म को नमस्कार करके अब ग्रन्थकारगुरु शिष्यके सम्बाद से ग्रंथ का आरम्भ करते हैं। शिष्यउवाच-विविधदोषदशादलि तमनोमम ननितिमेति मनागपि॥ ननु च तस्य पराक्रमणक्रमं करुणया वद हे करुणाकर ॥२॥ अन्वय पदार्थ-(हे करुणाकर मम मनः विविध दोषदशा दलितं) हे करुणाके स्थान श्रीगुरोमेरा मन नानाप्रकार की दोष दशा [रागद्वेष ] करके दला हुआ है अर्थात् महापीडित है (मनागपि निवृति न एति.)क्षणमात्र भी अखण्डानन्दको नहींप्राप्त होता है(ननुचतस्य पराक्रमण क्रमम- ३ अन्वयपदार्य सहित । करुणयावद)मेरी आपसे यह प्रार्थना है कि तिस मनकेनिग्रहके प्रकारको कृपा करके कहो॥२॥ इसप्रकार रागद्वेष रूपी अग्नि में जलते हुए शिष्य के व्याकुल वचन को श्रवण करके दयाके समुद्र श्रीगुरु शिष्य के मन को शान्त करते हुए उत्तर कहें हैं ॥ : श्रीगुरुरुवाच-विवेकं वैराग्यं शम दम समाधानवितति मुमुक्षा चासा- धावगत वपुषं श्रोत्रियगुरुम् ॥ समि- त्पाणिः मृप्त्वा विगतमलता श्रुत्यसु- गुरोः परब्रह्मानन्दं श्रुति- शिखर वेद्यं वितनुषे ॥३॥ अन्वय पदार्थ-श्रीगुरु कहते हैं । हे शिष्य ! (विवेकं प्रासाद्य) प्रथम विवेक को सम्पादन कर ( वैराग्यं आसाद्य)पुनः वैग्य को सम्पा- दन कर (शमदम समाधानवितति असाद्य ) फिर शम,दम,उपरमा,तितिक्षा श्रद्धा, समाधान इनको सम्पादन कर । यहां शम दम के साथ में जो समाधान का सम्बन्ध है सो उपरमाति- तिआ श्रद्धा का उपलक्षक जानना और वितति ४ अनुभवानंन्दलहरी। का जो विस्तार अर्थ है सो भी उपरमा प्रा. दिका बोधकहै (चमुमुक्षा आसाय).पुनः मु. मुक्षता को सम्पादन कर (अवगत वपुषं श्रो- त्रियगुरुं समित्पाणि: सृप्त्वा सुगुरोविगतमलं आश्रुत्य श्रुतिशिख़रवेद्यं परब्रह्मानन्दं वितनुषे.) हस्तविल्ववत् साक्षात्कार किया है स्वरूप का जिन्होंने ऐसे जो वेदशास्त्र के ज्ञाता अर्थात् श्रो- त्रिय ब्रह्मनिष्ठगुरु तिनको दातुनादि काष्ठ लिये हुए प्राप्त होके तिन गुरुओं से शुद्ध ब्रह्मको श्रवण करके वेदान्तशास्त्र करके जानने योग्य जो परब्रह्मानन्द है, तिसको विस्तार पूर्वक[भ- लीप्रकार ] से जानेगा ॥३॥ इस प्रकार श्रवण करके वेदान्तं शास्त्रकी प्रक्रिया के संस्कार से रहित परम श्रद्धालु शिष्य विवेकादि साधनों के जानने की इच्छा करता हुआ शिष्य पुनः प्रश्न करै है । शिष्यउवाच-विवेकःकाप्रोक्तःकथ- मपिचलभ्यःसुललितःकथं चायं स्वा- न्तेप्रभवति विभो भो दृढतरः॥ इमं मेसंदेहं त्रिषविटपिनं छिंडिकृपया .. अन्वयपदार्थ सहित । गुरुं हि त्वां हित्वा कथय कथमेष्या- म्यचलनम् ॥ ४॥ अन्वय पदार्थ-(भो विभो विवेकाकः प्रोक्तः) हे अंतर्यामि रूपसे व्यापक ! विवेक क्या वस्तु है (च सुललितःविवेकःकथं अपिलभ्यः) फिर यह सुन्दर विवेक किस प्रकार प्राप्तहोता है (च अयं विवेकःस्वान्ते कथं दृढतरःप्रभवति)फिर यह विवेक अन्तःकरण में कैसे दृढतर होता है (इमं मे विष विटपिनं संदेहं कृपया छिद्धि) यह जो मेरा विषवृक्ष रूप संशयह तिसको कृपा करके छेदन करो ( हित्वांगुरूंहित्वा अचलनम् कथंएष्यामिकथय) तुम गुरुओं को त्याग करके में निश्चय की कहां से इच्छा करूं सो कहो अर्थात् सिवाय आपके कोई भी मेरे इस संशय करने को समर्थ नहीं है ॥४॥ इसप्रकार कर्मादि वहिरंग साधन सम्पन्न और विवेकादिक तथा श्रवणादिक अंतरंग सा धनों से रहित शिष्यको देख और संसाररूपी अग्नि से पीडित शिष्य के दीन वचन को श्रवण कर परमरुपालु श्रीगुरु प्रसन्नता को प्राप्त हुए सत्शास्त्रके श्रवणरूप प्रथम साधनमें शिष्य को के.दूर २ . .
अनुभवानन्दलहरी। प्रवृत्त करत सते विचेक का वर्णन करे हैं। श्रीगुरुरुवाच-परात्मैको नित्यो नि- खिलमति बोडातिविमलः परानन्दः पूर्णः स्थिर चर गणे चिद्घन तनुः ॥ अनित्यं तद्भिन्नं सकल मपि दृश्य प- रिमितं विवेकोयं वोधो गत हृदय मोहैः समुदितः ॥५॥ अन्वयपदार्थ-श्रीगुरु कहते हैं (एकः परा- स्मानित्यः) एक परमात्माही नित्य है (तद्भिन्नं परिमितं दृश्यं सकलं अपि अनित्यम्) तिस से भिन्न जो परिच्छिन्न दृश्य प्रपंच है सो सब अ- नित्य है (गतहृदय मोहैः स उदितः अयं बोधः विवेकः ) जिनके हृदय में से मोह निवृत्त हो- गया हैं ऐसे विद्वानो करके भली प्रकार कथन कियाहुआ यह बोध विवेक है अर्थात् केवल एक परमात्माही नित्य है उससे भिन्न सम्पूर्ण अ. नित्य है यह विवेक का स्वरूप है॥५॥ इसप्रकार - विवेक के स्वरूप को वर्णन करके विवेकरूप अमृत की स्थिति योग्य जि- जासु के हृदयरूप. स्वच्छ पात्र का निरूपण करे हैं।
1 अन्वंयपदार्थ सहितः। यथा पांशु व्याप्ते मलिन मुकुरे श्वेत कपिशी विविक्तौ दृश्येते कथ- मपि न चालोकशततः तथात्माना- त्मानौ मल मति विविक्तौ न भवत- स्ततस्त्यक्त्वा कामं यजन भजनादि कुरु हरेः॥६॥ अन्वय पदार्थ-( यथा पांशु व्याप्तेमलिन मु. कुरे आलोकशततःश्वतकपिशौविविक्तौ कथं अपि न दृश्येते) जैसे मल करके व्याप्त दर्पण में सै- कड़ों प्रकाशों करके भी श्वेत भूसर रंगकां विवे. चन किसी भांति नहीं होतक्ता (तथा मलमति आत्मा अनात्मा नःविविक्ता नभवतः) तिसी- प्रकार से मलिन बुद्धि में प्रात्मा अनात्मा का विवेचन नहीं होता(ततः कामं त्यक्त्वा हरे यज- नभजनार्दिकुरु) तिस कारणसे बुद्धि की शुद्धि वास्ते हरिके यजन,भजनादिकों को.कर॥६॥ :- इस प्रकार श्रवण करके श्रीगुरु के वाक्य में परम श्रद्धावान शिष्य गुरु के वाक्यद्वारा सम्पूर्ण जगत् को मिथ्या जानकरःगलानी को प्राप्त हुवा तिससे वैराग्य को प्राप्त होने हेतु अनुभवानन्दसहरी। वैराग्य के स्वरूप कारण तथा कार्य और तिसको अविक के जानने वास्ते पुनःप्रसन्न करै है। शिष्यउवाच-स्वरूपं हेतुंचावधि मपिचकार्य सुविमलं गुरो वैराग्यस्य प्रवद वदतां श्रेष्ठ भगवन् । मुमुक्षां जि- ज्ञासे शमदम समाधान सुधनं परान- न्दंजानेन च वरद तस्यापिविततिम् अन्वय पदार्थ-(हेगुरो वदतां श्रेष्ट! वैराग्यस्य स्वरूपं प्रवद) हे गुरो कहने वालों मे श्रेष्ठ! प्रथम वैराग्य के स्वरूप को भली प्रकार से कहो (च वैराग्यस्य हेतुं प्रवद)पुनःवैराग्यके कारण को कहो) (च दैराग्यस्य सुविमलं कार्य प्रवद) फिर वैराग्य के सुन्दर कार्य को कहो (च वै- राग्यस्य अवधि अपि प्रवद) फिर वैराग्य की अवधि [ सीमा ] को भी कहो (हे भगवन् मुमुक्षा अहं जिज्ञासे) हे भगवन् मुमुक्षता के भी जानने की मैं इच्छा करता हूं (शम दम- समाधान सुधनं अहं जिज्ञासे) शमदमउपरमा तितिक्षा,श्रद्धा, समाधान रूप श्रेष्ठ धन के भी जानने की मैं इच्छा करता हूं (हे वरद परा- .
. ९ ॥ ७॥ अन्षयपदार्थ सहित । नन्दं अहं न जाने च तस्य अपि वितति अहं न.जाने)हे मोक्ष रूपी वरके देनेवाले श्री गुरु! परमानन्द को मैं नहीं जानता हूँ फिर तिसके विस्तार को भी नहीं जानता इसप्रकार शिष्य के प्रश्न को श्रवण कर. क श्रीगुरु वैराग्य के स्वरूप हेतु और आदि. कों का वर्णन करें हैं। श्रीगुरुरुवाच-ब्रह्मेन्द्रादि समस्त- भोगविभवास्त्याज्या मया सर्वदा वैराग्यस्य वपुर्मनीडिति मतिर्दुष्टा इ- मे कारणम् ॥ भोगे लंपटतानि वर्तन मिदं कार्यंच तस्यामलं भोगानां तृ- णतुल्यबुद्धि दृढता सीमेति सकीर्ति- ता॥८॥ अन्वयपदार्थ-श्रीगुरु कहते हैं। हे शिष्य ! (ब्रझेन्द्रादि समस्त भोग विभवा मयासर्वदा- त्याज्या मनीटिति वैराग्यस्य वपुः) ब्रह्म इन्द्रा- दिकों के जो सम्पूर्ण भोग ऐश्वर्य हैं सो मेरे करके सर्वकाल में त्यागने योग्य हैं इसप्रकार की जो वृत्ति है सो वैराग्य का स्वरूप है (इ.
१० अनुभवानन्दकारी। मेदुष्टामति वैराग्यस्य कारणम् ) यह दुखरूप होने से दुखदाई है ऐसी जो बुद्धि है सो वै. राग्य का हेतु है (च भोगेलपटतानिवर्तनंइदं तस्य वैराग्यस्य अमलं कार्य) भोगों में लम्प- टता की जो निवृत्ति है सो वैराग्य का निर्मल कार्य है (भोगांनां तुणतुल्य बुद्धिदृढताइति सी. मा संकीर्तिता) भोगों में तृणतुल्यता की जो दृढ वुद्धि है अर्थात् कभी भूलकेभी उनको सुख रूप समझकर फिर उनकी इच्छा न होना यह वैराग्य अंवधि [ सीमा] कही है ॥८। अब त्यागने योग्य पदार्थों की दुःख रूपता को पृथक् २ वर्णन करते हैं ॥: लक्ष्मी मत्तमनोरमां मृतिफलां रू- पादि पुष्पाततां नानानर्थकदर्थ सा- ध्य सवलां व्याला वली संकुलां ॥ वि- युद्धत् क्षणभंगुरां विषलतां श्वभ्रंश- रीरं श्रितांत्वं चेदाश्रयसे विवेक मति मन् मृत्युस्तदाते ध्रुवम् ॥९॥ अन्वय पदार्थ-(हे विवेक मतिमन् चेल. क्ष्मीत्वं आश्रयसेतदाते ध्रुवम् मृत्युःभविष्यास) अन्नपदार्थ सहित। हे.विवेक बुद्धिमान शिष्य यदि लक्ष्मी को तू.आ- श्रय करेगा तो निश्चय मृत्यु को प्राप्त होगा। यहां भविष्यसि.क्रिया का ऊपर से अध्याहार करना। फिर कैसी है लक्ष्मी (विषलतां).विष की लताकी समानदेखनेमात्रही सुन्दर है (मत्त मनोरमां) मोहरूपी मदिराको पियेहुए जो उ- न्मत्त पुरुषहैं उनके मनको प्रसन्न करनेवाली है (रूपादि पुष्पांततां ) शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धादि हैं पुष्प जिसके (मृतफलां) मृत्युरूप है फल जिसका जैसे पुष्पसे फल होता है इसी प्रकार लक्ष्मीरूपी विषलता के शब्दादिरूप पु- ष्पों से मृत्युरूप फल होता है । तिसको दृष्टान्त करके स्पष्ट करें हैं दृष्टान्त-जिस मृगकी नाभि में से कस्तूरी होती है उसको वधिक वीणा का मधुर शब्द सुनाकर मोहितकरके मारकर उसकी नाभिमें से कस्तूरी कोनिकाललेता है जैसे मृग केवल एक शब्दमात्र केही विषय से मृत्युको प्रा- सहोता है, इसी प्रकार हस्तियों को पकड़नेवाले काग़ज़ की हथिनीवनाकर किसी.गड्ढे के ऊपर स्थित करदेते हैं जव हस्ती उसको सच्ची हथिनी जानकर उससे स्पर्श करने को.आता है तव
१२
अनुमानन्दलहरी।
गड्ढे में गिरकर अवस्थाभर पराधीन रहकर
प्राणत्याग करताहै पराधीनता मृत्यु सेभी अधिक
दुखरूप है इसी प्रकार.पतंग रूपमें आसक्त हो
दीपक जलमरताहै और मछली रसके लोभसे
काँटे में फंसकर मृत्यु को प्राप्तहोतीहै तथा भ्रमर
गंध आसक्त हो कमल में मुदकर मरजाता है
इसप्रकार ये सव मूढजन्तु एक २ विषयरूपी
फूल
से. मृत्युरूप फल को प्राप्तहोते हैं परन्तु
बड़ा आश्चर्य है. कि यह पुरुष ज्ञान विचार की
निधि होकर भी लक्ष्मी रूपी विषलता से पाँचो
विषय रूप पुष्पों की इच्छा करते हैं और विषय
रूप पुष्प में जो स्थित मृत्यु रूप.फल है उसकी
और दृष्टि भी नहीं देते।.फिर कैसी है लक्ष्मी
(नानाऽनर्थकदर्थ साध्य )नानाप्रकार के अनर्थ
और दुखरूप जल के सींचने से, उत्पत्ति, वृद्धि
और स्थित को प्राप्त होनेवाली है (सवलां)
महाबलवान है अर्थात् जिसको प्राप्तहोती है।
उसको अपने वशमें करलेतीहै (व्यालावली-
संकुलां) कामाक्रोधरूपासर्पो की पंक्ति से शाखा
शारवालिसकी घिररही है फिर कैसी है (विद्युद्ध
तक्षणभंगुरां (बिजली कौनाई क्षणभर मेंनष्ट
. अन्वंयपदार्थ सहित । होनेवाली है (शरीरं श्वनं श्रता) शरीररूप गड्ढे के आश्रय है स्थिति जिसकी ऐसीजो विषलता की समान अपांत रमणीयरूप [ देखनेमात्रही सुन्दर ] लक्ष्मी है हे शिष्य ! तिलको तू आश्रय' करेगा तो अवश्य मृत्युको प्राप्त होवैगा ॥ ६ ॥ अब बाल्यावस्था की दुखरूपताका निरूपण. करें हैं। बाल्यरोग शताकुलं हितहरं शान्तेः कुठारं परंयुक्तायुक्त विवेकशून्यहृदयं मूर्खादि संघाश्रयम् ॥ नानादोषदशा विलुब्धमनसा मातंगवच्चञ्चलं त्वं चे- दाश्रयसे विवेक मतिमन मृत्युस्तदा तेध्रुवम् ॥१०॥ अन्वय पदार्थ-हे विवेकमतिमन (चेत बाल्यं त्वं आश्रय से तदा ते ध्रुवं मृत्युः भविष्यसि ) हे शिष्य ! यदि बाल्यावस्था कोतू आश्रय करेगा तो अवश्य मृत्युको प्राप्त होगा कैसी है बाल्या- वस्था (रोगशताकुलं) लैकड़ों रोगों करके व्या- कुल है ( हितहरं ) कल्याण में प्रतिबंधकरूप- शत्रु है (शान्तेः कुठारं परं)शान्तिरूपी अमृत- १.४ अनुभवानन्दलहरी। लता के काटने को परमकुठार है ( युक्तायुक्त विवेकशून्यहृदयं) ये मेरे को करने योग्य है यह नहीं करने योग्य है इस विवेक से शून्य है हृदय जिसका (मूर्खादिसंघाश्रयम् )मूल्[.वालकों] के संग का आश्रय है (नाना दोषदशा विलुब्ध मनसा मातङ्गवत्चञ्चलम्)चन्द्रप्राप्तिप्रार्थनाऽदि नानाप्रकार की दोषदशा करके विलुब्ध जो मन तिससे हस्तीकी नाई चंचलहै ऐसी दुरवरूप बाल्यावस्था में हे शिष्य ! तू ममत्व करेगा तो अवश्य मृत्युको प्राप्त होवेगा॥ १० ॥ अब युवावस्था की दुर्दशा को निरूपण करैं हैं। आधिव्याधितरंग जालजटिलंतृ- ष्णानदीनां गृहं हेयाहय विकल्पक- ल्पनमहावत विवेकाहितं ॥ कामक्रो- धमहाझपंजलनिधिमान्यामतंयौवनं त्वंचेदाश्रयसे विवेकमतिमन् मृत्युस्त- दाते ध्रुवम् ॥ ११॥ (हे विवेकमतिमन् ! चेत् मान्यामतं यौ- वन जलनिधि त्वं आश्रयसें.तदा ते ध्रुवम् मृत्युः भविष्यसि) हे शिष्य! यदि विद्वानों करके अ- .
अन्वयपदार्थ सहित ।
स्वीकृत जो युवावस्थारूप समुद्र है तिसको तू
आश्रय करेगा तो निश्चय मृत्यु को प्राप्त हो-
वैगा कैसा है युवावस्थारूप समुद्र (आधिव्या-
धि तरङ्गजालजटिलं) आधि [ मनके दुख ]
और व्याधि [शरीरके दुखरूप तरंगों के जाल
से व्याप्त है (तृष्णा नदीनां गृहम) और तृष्णा
रूपी नदी का गृह है (हेयाय विकल्प कल्पन
महा आवर्त ये मेरेको गृहण करने योग्य है यह
त्यागने योग्य है यही कठिन भँवर है जिसमें
(विवेकअहितं).विवेक से रहित है (कामक्रो-
धमहाभ) और कामक्रोधरूप महा भयङ्कर
मगर मच्छ जन्तु हैं जिसमें इसप्रकार दुख के
सिंधुरूप युवा अवस्था में हे शिष्य ! तूं ममत्व क-
रेंगा। तो निश्चय मृत्यु को प्राप्त होवेगा।
अव वृद्धावस्था की अधमताको निरूपण करें।
व्याधिव्यालगृहविवेकविकलंह्याशा
पिशाच्याश्रयं चिंताजर्जरितांगलोभ
दलितं कांतादि हासास्पदम् ॥आल-
स्यादि जलेन पूर्णमभितो जीर्णजरा
कूपकं त्वं चेदाश्रयसे विवेक मतिमन्
मृत्युस्तदा ते ध्रुम्व ॥ १२॥
१६ अनुभवानन्दलहरी। :: अन्वयपदार्थ-(हे विवेक मतिमन् चेत् जरा- जीर्ण कूपक त्वं आश्रयसे तदा ते ध्रुवं मृत्युःभवि- व्यति) हे शिष्य ! यदि वृद्धावस्था रूप अंधकूप को तूं आश्रय करेगा तो निश्चय मृत्यु को प्राप्त होगा कैसा है जरारूपजीर्णकूप (व्याधि व्याल- गृह.) दुःख रूप सोका गृह हैं. (विवेक विकल) और विवेक से रहित है (हि आशा पिशाच्या श्रयं) और निश्चय आशा रूपी पिशाचीका गृह (चिन्ताज़र्जरि ताङ्ग) और चिंता करके जीर्ण हैं अङ्ग जिसके (लोभ दलितं) लोभ करके द- लाहुआ है चित्त जिसका (कान्तादिहासास्पद) स्त्री आदिकों के हँसनेका स्थान है (आलस्यादि जलेन अभितःपूर्ण)आलस्यादि रूप जल करके चारों ओर से पूर्ण है ऐसा जो जरारूप अंधंकूप है तिसमें तू ममत्व करेगा तो अवश्य मृत्यु.को प्राप्त होवैगा ॥ १२ ॥ अब कान्ति कुंठार रूप कान्ता का निरूपण भोगान् भोगि समान् कुरोग विष- दान देहगुमं संश्रितान् कान्तां कान्ति कुठारिकां कतिपयैर्मू-समालविताम्।।
२७ को. अन्वयपदार्थ सहित । एवं स्वर्गरसातलादि विभवान् कष्टं कदर्थ प्रदान त्वं चेदाश्रयसे विवेकम- तिमन् मृत्युस्तदाते ध्रुवम् ॥१३॥ अन्वयपदार्थ-(हे विवेक-मतिमन् चेतुभोगान् त्वं आश्रयसे तदा ते ध्रुवम् मृत्युः भविष्यसि) हे शिष्य! यदि भोगों को तू आश्रय करैगा. तो नि- श्चय मृत्यु को प्राप्त होवैगा पुनः जन्म को प्राप्त होवैगा और फिर मृत्यु प्राप्त होवैगा इस प्रकार जन्म मृत्युरूप महाभयङ्कर चक्र में ही पड़ाहुआ दुर्दशा को प्राप्त होवैगा अर्थात् विना इनके त्यागके जन्म मृत्यु में घड़ी यंत्र की नाई भ्रमण कियाकरैगा । श्रीमद्भगवद्गीता ॥[जा. तस्य हि ध्रुवो मृत्यु (वं जन्म मृतस्य च ] अर्थ स्पष्ट है और पूर्व कह भी दिया है कि मृत्यु का और जन्म का सम्बन्ध है सो [लक्ष्मीमत्तमनो- रमां] इस श्लोक से और [भोगान् भोगी स- मान् ] इस श्लोक पर्यन्त पांच श्लोकों में जा. नना। फिर कैसे हैं भोग (भोगि समान् कु- रोग विषदान्) सर्प की समान कुरोगरूपी विष कोदेनेवाले हैं (देह दुर्म संश्रितान्) देहरूप.वृक्ष के आश्रय हैं (हे शिष्य चेत् कान्तां त्वं आश्रयः , अनुभवानन्दलहरी। से तदा ते ध्रुवं मृत्युः भविष्यसि)यदि स्त्री कातूं आश्रय करेगा तो अवश्य मृत्यु को प्राप्त होवैगा कैसी है स्त्री (कान्ति कुठारिकां) कान्तिरूपी लताके काटने को कुठारी है (कतिपयैः मूरैः स- मालम्बिताम) किन्हीं भोगलम्पट मूढ पुरुपों करके सेवित है अर्थात् विद्वान् नहीं सेवन क- रते हैं जिसको (एवं स्वर्ग रसातलादि विभ- वान कदर्थप्रदान् कष्टं ) इसी.प्रकार इस लोक परलोक के भोग ऐश्वर्य दुखरूप होने से दुखके देनेवाले हैं बडे शोक का विषय है कि यह पु. रुष उनकू सुख का हेतु जानकर प्रवृत्त हो दुख पाता है और प्रवृत्ति भी नहीं त्यागता प. रन्तु इस लोक परलोक के भोग से त्यागने. ही योग्य हैं ॥१३॥ इसप्रकार मृत्यु का भय दिलातेहुए वैराग्य का भलीप्रकार लक्षण वर्णन करके अव मुक्ति में रुचि दिलातेहुये शमादि षट् सम्पत्ति का नि- रूपण करें हैं। चेतश्चचलतानिवर्तनमल प्रोक्तं शमः सज्जनैर्नेबादींद्रियनिग्रहंदमपदेनो- दुखरूप होने अन्वयपदार्थ सहित । क्तं मुनीनां मतम्॥ वेदान्तादि गुरूक्त वाक्यविततिः सत्येति श्रद्धांमति त्वं चेदाश्रयसे विवेकमतिमन मुक्तिस्त- दा ते ध्रुवम् ॥ १४॥ अन्वयपदार्थ-(चेतःचंचलता निवर्तनं अलं सजनैः शमं प्राक्त) चिच की चंचलता की जो अत्यंत निवृत्ति है तिसको सजन पुरुष शम कहते हैं (नेत्रादि इन्द्रिय निग्रहं दम पदेन उक्तं मुनी नां मतम) नेत्रादिक इन्द्रियों को जो रूपादिक विषयों से रोकना उसको दम कहते हैं ऐसा'मु- नियों का मत है ( वेदान्तादि गुरूक्त वाक्य- विततिः सत्य इतिमति श्रद्धां) वेदान्तादि और गुरुं के जो वाक्यं हैं सो सत्यं हैं ऐसी बुद्धि को श्रद्धा कहते हैं (हे विवेक मतिमन् चेत् त्वं प्राः श्रेयसे तदा ते ध्रुवं मुक्तिःभविष्यसि ) हे सत्य असत्य विवेक बुद्धिवान् शिष्य ! इन शुम दम श्रद्धा कू यदि त आश्रय करैगा तो निश्चय मुक्ति को प्राप्त होवैगा ॥ १४॥ योगप्रोक्तयमादिकारणवती स्वा- न्ते निरोधस्थितिं विक्षेपादि निवृत्ति
२०
अनुभवानन्दलहरी।
कार्यनिपुणांशान्तात्मभिः सेविताम्।
निद्रावद्विषयक्षया मुपरति मान्यैर्मुनी-
न्ट्रैर्नुतां त्वं.चेदाश्रयसे विवेक मति-
मन मुक्तिस्तदा ते ध्रुवम् ॥१५॥
- अन्वयपदार्थ-(योग प्रोक्त यमादिकारण वती)
योग में कथन कियेहुए यम नियम आसन प्रा.
णायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि ये अष्ट
अङ्ग हैं कारण जिसके (स्वान्तनिराधस्थितिम्)
अन्तःकरणकीनिरोधरूंपी स्थितिहै स्वरूप जिस
का (विक्षेपादि निवृत्ति कार्य निपुणाम् )विक्षेपादि
की निवृत्ति रूप कार्य्यमें जो निपुण है (शान्ता
त्मभिःसेविताम् ) शान्त आत्मा विद्वज्जनों
करके सेवित है (निद्रावत् विषय क्षयाम)
सुसुप्ति की. समान विषयों को नाश करना यह
जिस की अवधि है (मान्यैःमुनीन्द्रनुतां) और
जो मानने योग्य मुनियों करके स्तति की हुई
है (हे. विवेक मतिमन् चेत् उपरति त्वं आश्रय-
से तदा ते ध्रुवं मुक्तिः भविष्यास) हे शिष्य!
यदि इस उपरतिकोतूपाश्रय करैगा तो निश्चय
अनर्थ की निवृत्ति परमानन्द की प्राप्ति रूप
मोक्षको प्राप्त होवैगा ॥ १५॥
अन्वयपदार्थ सहित।
निद्रान्तं विषये चलंत मपिवा सं-
रोध्य चित्तं रिपुं सच्छास्त्र श्रवणेऽस्य
योजन मिदं साध्यं समाधानकम् ॥
शीतोष्णादि सहिष्णुतां प्रतिदिनं दि-
व्यां तितिक्षामिधां वं चेदाश्रयसे वि-
वेक मतिमंन्मुक्तिस्तदा ते धुवम् ॥१६॥
अन्वयपदार्थ-(चित्तरिपुं निद्रान्तं संरोध्य वा
विषये चलंतं अपि संरोध्य अस्य चित्तस्य सत्
शास्त्र श्रवणे योजनं इदं साध्यं समाधानकम्)
शत्रु जो चित्त है तिस को निद्रा [आलस्य ]
से रोककरके अथवा विषयों में चलने से रोकके
इस चित्त को वेदान्तशास्त्र के श्रवण में जोडना
है तिसको समाधान कहते हैं (प्रतिदिनं शी.
तोष्णादि सहिष्णुतां दिव्यां तितिक्षाभिधां) प्र-
तिदिन शीतोष्णादि को जो सहना है तिसको
सुन्दर तितिक्षा कहते हैं (हे विवेक मतिमन्
चेत् समाधानम्-तितिक्षां च त्वं आश्रयसे तदा
ते ध्रुवं मुक्तिः भविष्यसि) हे शिष्य ! यदि इस
समाधान कोतू आश्रय करैगा तो निश्चय मुक्ति
को प्राप्त होवैगा ॥ १६ ॥
अनुभवानन्दलहरी। इसप्रकार तृतीय साधन समाधि पट् स- म्पत्ति का वर्णन करके अब चतुर्थ साधन मुः मुक्षता का निरूपण करें हैं। भ्रान्तोऽनेक शरीर वृक्षविततेजीणे जगज्जंगले नानादुःख दरिद्र दावजटि- ले मुक्तः कदा स्यां ततः॥ इत्येवं परि चिंतनात्समुदितामिच्छां मुमुक्षा मि- मां वं चेदाश्रयसे विवेक मतिमन्मु- क्तिस्तदा ते ध्रुवम् ॥ १७॥ अन्वयपदार्थ-(जीर्णजंगजंगले अहं भ्रांतः) जीर्ण कहिये अनादि जो जगत् जङ्गलहै अथवा जीर्ण कहिये विचार मात्र ही से छिन्न भिन्न होने वाला ऐसे जगत् रूप जङ्गल में मैं भ्रमण करता हूँ । कैसा है जगत् जङ्गल (अनेक शरीर वृक्षवितते) अनेक शरीररूप वृक्षों करके जो विस्तृत है (नानादुःस्वदरिद्रदावजटिले) नाना प्रकार के दुख दरिद्र रूपी दावानल [अग्नि ] करके युक्त है (ततः अहं कदामुक्तःस्यां ) तिस से मैं कबे मुक्तहूंगा अर्थात् शीघ्र मुक्त होंऊँ (इ- स्येवं परिचंतनात् समुदितां इच्छा मुमुक्षां) इस अन्वयपदार्थ सहित। प्रकार चिंतवन करने से उत्पन्न हुई जो इच्छा है तिसको मुमुक्षता कहते हैं ( हे विवेकमति मन चेत् इमां मुमुक्षा त्वं आश्रय से तदातेध्रुवम् मुक्तिः भविष्यसि) हे शिष्य ! यदि इस मुमुक्ष- ता को तू आश्रय करेगा तो निश्चय मुक्ति को प्राप्त होवैगा ॥ १७॥ इसंप्रकार पृथक् चारों साधनों का विस्तार पूर्वक निरूपण करके अब चारों की महिमा का वर्णन करते हैं। वैराग्यादि मुमुक्षतांतविततिं प्रोक्ता न्मयाज्ञानदाञ्छास्त्राभ्यासविवर्द्धिता- न्प्रतिदिनं सद्भिःसमालवितान्॥आ- त्मज्ञान समाधिनिष्ठकथितान्वेदादि सम्बोधितान त्वं चेदाश्रयसे विवेकम- तिमन्मुक्तिस्तदाते ध्रुवम् ॥ १८॥ (वैराग्यादि मुमुक्षतांत वितर्ति ज्ञानदान् मया प्रोक्तान)वैराग्यआदि मुमुक्षतापर्यंत अर्थात् विवेक वैराग्य शमादिषट्सम्पत्ति और मुमुक्षता ये जो अन्तःकरण शुद्धिद्वारा.ज्ञानके देनेवाले साधन मैंने तुम्हारे प्रति कहे हैं। हे विवेकमतिमन् चेत् २४. अनुभवानन्दलहरी। साधनचतुष्टयं त्वं आश्रयसे तदा ते ध्रुवं मुक्तिः भविष्यसि) हे शिष्य ! यदि इस साधन च: तुष्टय को तू आश्रय करेगा तो निश्चय मक्ति को प्राप्त होवैगा कैसे हैं यह साधन (प्रतिदिनं शा. स्वाभ्यास विवर्द्धितान् ) दिन दिन प्रति शास्त्र के अभ्यास करके वृद्धि को प्राप्त होनेवाले हैं (सद्भिःसमालंवितान् ) सत्पुरुष भी आश्रय करते हैं जिनका (आत्मज्ञान समाधिनिष्ट. कथितान् )आत्मज्ञानी समाधि निष्ठों करके जो कथन कियेगये हैं (वेदादि सम्बोधितान्)वेदा- दिक भीभलीप्रकार वोधन)करते हैं जिनको हे शिष्य ! ऐसे साधन चतुष्टय को तू आश्रय करैगा तो निश्चय मक्तिको प्राप्त होगा यहां लक्ष्मीमत्त- मनोरमां] इस श्लोक से और [वैराग्यादि मुमुक्षतांतवितति ] इन दश इलोकों पर्यन्त [भविष्यसि] इंस क्रिया का अध्याहार करना अर्थात् [तदाते ध्रुबम् मृत्युः भविष्यासि वा मु- तिः भविष्यति ]॥ १८॥ श्रवणादिकों की अपेक्षासे विवेकादि जो व- हिरङ्ग साधन हैं तिन में शिष्य की दृढताको देखकर अब श्रीगुरु श्रवणरूप अंतरंग साधन में जिस को प्राप्त करे हैं।
२६. .. .. अन्वयपदार्थ संहित। इमानुपायान्परिपाल्यशान्तधीशा- स्त्राब्धिपारावरगामि गुरुं। संप्राप्य भक्त्या परिष्टच्छ्ययत्नतस्ततोऽद्वयंभा: वयभव्यभावनम् ॥ १९ ॥ अन्वयपदार्थ-(इमान् उपायान्परिपाल्य)इन पूर्वोक्त विवेकादिक उपायों को सम्पादन करके (शान्तधीः) शान्ति बुद्धि शिष्य (शास्त्राधि- पारावरगामिनं गुरुं संप्राप्य भत्यापरिष्ट्रच्छ्य) शास्त्र रूप समुद्र के पारावार जाने में समर्थ श्रीगुरुको प्राप्तहोके भक्ति पूर्वक अर्थात् साष्टाङ्ग प्रणाम करके नम्रता पूर्वक प्रश्नकरै (ततःअद्वयं. भव्यभावनं यत्नतः भावय) तिससे उपरान्त अर्थात् तिनसे पूछकर भव्य[ कल्याण.] है भा- बनाजिसकी अर्थात जिसकेचिंतन करने से कै- वल्य मुक्ति प्राप्तहोती है। हे. शिष्य ! ऐसा जों अद्वय रूप भव्य भावन ब्रह्म है तिसको यत्न पूर्वक चिंतन करै ॥१६॥ नाज्ञाननाशो नचरागभंजनं नचा- पिजतोर्जननादिसंक्षयाभवत्यपि ज्ञा- नसुधानिधि विनाततोऽवयंभावयभ- व्यभावनम् ॥२०॥ - २६ अनुभवानन्दलहरी.. • अन्वयपदार्थ-(जान सुधा निधिं विना अज्ञान- नाशः न) जान रूप अमृत सिंधुके विना अज्ञान का नाश नहीं होता (राग भंजनं चअंपिन) और राग भी नष्ट नहीं होता ( अपिजतो:- जननादि संक्षयश्च न भवति)और जीवों के जन्म मृत्यु भी भली प्रकार क्षय नहीं होते (तत:- अद्वयं भव्य भावनं भावय) है शिष्य!तिस कारण अद्वय रूप भव्यभावन ब्रह्मका चिंतनकर ॥२॥ यदाहि पंचात्मककोशभिन्नतास्व- केस्वरूपेऽधिगतादृढाभवेत् । तदात्म तत्वं विमलं विकाशतततोऽद्वयंभावय भव्यभावनम् ॥२१॥ अन्वयपदार्थ-(यदाहि स्वके स्वरूपे पंचात्मक कोश भिन्नता दृढाऽधिगता भवेत्) जिस काल में स्वस्वरूप से पंचकोशों की भिन्नता दृढ निश्चय होती है (तदा विमलं आत्मतत्वं विकाशते)तिस काल में निर्मल आत्मतत्व [सूर्यवत् ] प्रकाश करताहै अर्थात जैसे शुद्धस्फटिकका नीलपीतादि रूपों के साथ सम्बन्ध होने से स्फटिक नील पीतादि रूपवान प्रतीत होता है इसीप्रकार अन्वयपदार्थ सहित । '२७ शुद्ध प्रात्मा का जब अन्नमय कोश के साथ सम्बन्ध होता है. तब मैं दुबला हूँ मोटा हूँ इस प्रकार अजानी कल्पना करता है अन्नरस वीर्य से जो उत्पन्न होवै 'अन्नरस से वृद्धि को प्राप्त होवें और अन्नरूप पृथ्वी में जो लीन होजाचे उसको अन्नमय कोश कहते हैं, सो स्थूल श- सर है।और प्राण-अपान-व्यान-उदान-समान- यह पाँच प्राण.और बाक्-पाणि-पाद-पायु-उप- स्थ-यह पाँच कर्मेन्द्रिय इनदशोंके समूहको प्रा- णमय कोश कहते हैं। इस प्राणमय कोश के साथ तादात्म्य भाव कल्पना करके अज्ञानी ऐसा मानता है कि मैं भूखा हूँ. प्यासा हूँ और श्रोत्र त्वक-चक्षु-रसना-घाण-यह पाँचज्ञानेन्द्रिय और एक मन इन छैओं के समूह को मनोमय कोश कहते हैं तिसके साथ तादात्म्य भाव कल्पना करके मूढ पुरुष अपने में संकल्प विकल्प मान- ताहै और श्रोत्रादि पाँच ज्ञानेन्द्रिय और एक बुद्धि इन छैओं के समूह को विज्ञानमय कोश कहते हैं तिसके साथ तादात्म्यभाव कल्पना करके अज पुरुषः अपने में निश्चय करना मानता है और इन चारों कोशों का जो कारणरूप स्वस्वरूप.
अनुभवानन्दकारी। का मजान प्रिय-मोद-प्रमोद वृत्ति सहित जो है तिस को आनन्दमय कोश कहते हैं तिसके साथ तादात्म्यभाव कल्पना करके मूर्खपुरुष अपने को सुखी दुखी मानता है इसप्रकार जडात्मक अ. ध्यास निवृत्त होगया है जिसका अर्थात् जिस काल में पंचकोशों का दृष्टारूप प्रारमा कोहद निश्चय करता है, तिस काल में सर्व.उपाधि शून्य शुद्ध आत्म तत्व प्रकाश करता है (ततः अद्वयं भव्यभावनं भावय)तिसकारण हे शिष्य! अद्वयरूप भव्यभावन ब्रह्म का चिन्तन कर २91 त्रिधाह्यवस्था श्चितिनैवचित्तगास्ता- सां तुरीयोस्मि दृगेवकेवलः ॥ अयं विशुद्धोऽनुभवोभवापहस्ततोऽद्वयंभा- वय भव्यभावनम् ॥२२॥ अन्वयपदार्थ-(त्रिधाहि अवस्थाः चितिनैव चित्तगाः तासां केवलः दृगेव तुरीयः अस्मि) जागृत स्वप्न सुसुप्तिं ये तीन अवस्था आत्मा की करते हैं चित्त की हैं तिन तीनों अवस्थाओं से परे रूपों कष्टातुरीयरूप मैं हूँ (अयं विशुद्धः अनुभव: पीतादि ततः अद्वयं भव्यभावनं भावय)यह वि. :
अन्वयपदार्थ सहित। शुद्ध अनुभव संसाररूप भय को नष्ट करनेवाला हैतिस कारण हे शिष्य ! अद्वयरूप भव्यभावन ब्रह्म का चिन्तन कर ॥ २२ ॥ शिवोस्मि शान्तोस्मि निरंजनो- स्म्यहं सत्योस्मि नित्योस्मि निरन्त- रोस्म्यहम्।।अयं हि बोधो भवपाशना- शकस्ततोऽद्वयं भावयभव्यभावनम्॥ अन्वयपदार्थ-(शिवोस्मि)मैं कल्याणस्वरूप हूँ (शान्तोस्मि)शान्तरूप हूँ(निरञ्जनास्म्यह)माया से रहित हूँ (सत्योस्मि )त्रिकालावाद्य हूँ अर्थात् मेरा नाश न हुआ न है नहोगा (नित्योस्मि) भावाभाव रहित हूँ (अयं हि वोधः भवपाश ना- शकः ततः अद्वयं भव्य भावनम् भावय)यही बोधे संसाररूपी फाँसी के काटनेवाला है तिसकारण हे शिष्य ! अद्वयरूप भव्यभावन ब्रह्म का चिं- तन कर ॥ २३॥ अनाद्यनन्तोसम्यणुतोप्यणुमहास्थू- लादपि स्थूलतरोस्मि सर्वतः॥अयं हि बोधोंभवपास्तारकस्ततोऽद्वयं भावय भव्यभावनम् ।। २४॥
. हूँ अनुभवानन्दलहरी । अन्वयपदार्थ-(अनादि अनन्तःअस्मि)अनादि हूँ अनन्त हूँ(अणुतःअपि महाअणुअस्मि)सूक्ष्मसे भी महा सूक्ष्महूँ(सर्वतः स्थूलात् अपि स्थूलतरः अस्मि) सर्व वस्तुओं में स्थूल से भी स्थूलतर हूँ (अयं हि वोधः भवपारतारकः ततः अद्वयं भ- व्यभावनं भावय) यही बोध निश्चय करके संसा- ररूप समुद्र से पार करनेवाला है तिसकारण हेशिष्य ! अद्वयरूप भव्यभावन[कल्याणदायक] ब्रह्मका चितवन कर ॥ २४ ॥ स्वतःप्रकाशोस्म्य जडोस्मि सर्वदा विशुद्धविज्ञान घनोस्मि सर्वथा ॥अयं च बोधो बुधवर्यसंमतस्ततोऽद्वयंभाव- यभव्यभावनम् ॥२५॥ अन्वयपदार्थ-(सर्वदा स्वतःप्रकाश अस्मि) सर्वकाल में स्वतःप्रकाशरूप हूँ (अजडः अस्मि) चैतन्यरूप हूँ (च सर्वथा विशुद्धिविज्ञानघनो. स्मि) फिर निरन्तर विशुद्धविज्ञान घनरूप हूँ (अयं वोधः बुधवयंसंमतः ततः अंद्रयं भव्य- भावनं भावय) यह बोध अद्वैत निष्ठ[श्रीशङ्क:- राचार्यादिमहात्माओं करके समतहै तिसका- अन्वयपदार्थ सहित- २१ रणहे शिष्य ! अद्वयरूप भव्यभावन[कल्याण- दायक ] ब्रह्मका चिन्तन कर ॥ २५ ॥ अचिंत्यरूपोस्मि विमुक्तवंधन:शुद्धो- स्मिबुद्धोस्मि कलादि वर्जितः।अयंहि वोधोरविवद्विराजते ततोऽवयंभावय भव्य सावनम् ॥२६॥ अन्वयपदार्थ-(अचिंत्य रूपः अस्मि) अचिंत्य रूप हूँ (विमुक्त बंधनः ) सम्पूर्ण वंधनो से वि- मुक्त हूँ (शुद्धोस्मि) शुद्ध स्वरूप हूँ (बुद्धोस्मि) ज्ञान स्वरूप हूँ (कलादि वर्जितः) अवयवादिकों से रहित हूँ अर्थात् निराकार हूँ (अयं हि वोधः रविवत् विराजते ततःअद्वयं भव्य भावनं भावय) यही बोधसूर्य की नाई प्रकाश करता है तिस कारण हे शिष्य ! अद्वय रूप भव्य भावन [क: ल्याण दायक.] ब्रह्म का चिंतनकर ॥ २६ ॥ इमं हि बोधंपरिचिंतयज्जनो विशुद्ध चित्तश्चितिचिंतनैकधीभवभ्रमनैति- विनष्टवंधनस्ततोऽद्वयं भावय भव्य 'भावनम् ॥२७॥ अन्वयपदार्थ-(योजनाइम हि वोधंपरिचिंत- ३१ अनुभवानन्दलहरी । यत् विशुद्ध चित्तचिति चिंतने एकधी)जो पुरुष इस वोधको परिचिंतन करताहै विशुद्ध चित्त और चैतन्य के चिन्तन में अद्वैत बुद्धि है अर्थात् अभेद चिंतन करता है (भवभ्रमंनैति-विनष्टः बंधनः)तिसको संसार के सत्यत्वका भ्रम नहीं होता। और उसके सम्पूर्ण वन्धन नष्ट होजाते हैं (ततःअद्वयंभव्यभावनंभावय)तिस कारण हे शिष्य ! अद्वय रूप भव्य भावन [कल्याण- दायक] ब्रह्मका चिन्तन कर ॥२७॥ इस प्रकार वर्णन करके शिष्य की सत्शास्त्र के श्रवण में रुचि की परीक्षा के निमित्त अपने कथनको विश्राम दियाहै जिन्हों ने तिनगुरुओं से परम उत्साह को प्राप्त हुआर श्रद्धालु शिष्य विशेष श्रवण के निमित्त पुनः प्रश्न करै है। शिष्यउवाच-शुद्धबुद्धशांतिविशेषा करमेकं ब्रह्मानन्दे मग्नमनोभिर्भज- नीयं वंदे वंद्यत्वांपरमेशं रमणीय जि- ज्ञासेऽहंभावनयोग्याहयरूपम् ॥२८॥ अन्वयपदार्थ-शिष्य कहता है (वयं स्वां परमेशं गरुं अहं वंदे) वन्दना करने योग्य जो अन्वयपदार्थ सहित । तुम परमेश्वररूप गुरुहो सोतुम्हारेताई मैं वन्दना करता हूँ फिर कैसे हो (रमणीयं) दर्शनमात्र से ही मन को मोहनेवाले परमसुन्दर हो (शु- ई-बुद्ध-शान्तिविशेषाकरं एकम) शुद्ध हो-ज्ञान स्वरूप हो-समस्त शान्ति के स्थान हो-अद्वैत रूप हो (ब्रह्मानन्दे मन मनोभिः भजनीयं) ब्रह्मानन्द में है मग्न मन जिन का ऐसे जी- वन मुक्त शिष्यों की मंडली करके सेवित हो (भावन योग्याद्वयरूपं अहं जिज्ञासे)हे नाथ! भावना करने योग्य जो अद्वयरूप है तिसके जानने की मैं इच्छा करता हूँ ॥ २८ ॥ इसप्रकार जीवन्मुक्ति प्राप्ति की इच्छारंप शिष्य के गढ़ आशय को जानकर अन्तर्यामी श्रीगुरु शिष्य के प्रति उत्तर कहते हैं। यहां [ब्र. झानन्दे मनमनोभिः भजनीयं] इस विशेषण करके शिष्य ने जीवन मुक्ति की इच्छा प्रगट की है अर्थात् जैसे और बहुत से जीवन्मुक्त शिष्य आप का भजन करते हैं इसीप्रकार मैं भी करूँ। श्रीगुरुरुवाच-यस्माज्जातं दृश्यम- शेषस्थितिहेतोर्यस्मिन्नन्ते लीनमशेष जगदेतत् ॥ यस्मिन् शुद्धे दृश्य शतां- 1 अनुभवानन्दलहरी। शो नचभातो ब्रह्माद्वैतं भावय सत्यं विततंभोः॥२९॥ अन्वयंपदार्थ-श्रीगुरु कहते हैं (भो शिष्य ! यस्मात् अशेप दृष्यं जातं) हे शिष्य ! जिस से सम्पूर्ण दृश्य उत्पन्न हुआ है (यः स्थितिहेतोः) जो सम्पूर्णदृष्टा की स्थितिका हेतुहै अर्थात् जिस में सम्पूर्ण स्थिति है ( अन्ते यस्मिन् एतत् अ- शेषं जगत्लीनम् ) अन्तमें जिस में यह सम्पूर्ण जगत्! लीन होता है (यस्मिन् शुद्धे दृश्यशतांश- श्च न भातः) जिस शुद्धब्रह्म में दृश्य का सौवाँ अंश भी नहीं प्रतीत होताहै(सत्यं विततं अद्वैतं ब्रह्म भावय) हे शिष्य ! ऐसे सत्यरूप व्यापक अद्वैत ब्रह्म का चिन्तन कर ।। २६ ॥ सच्चिद्रूपं लोकपतीनामपिभूपं मा- यातीतं मानविहीनं मुनिमान्यम् ॥ यज्ञैर्दानर्योगविधानैर्गमनीयं ब्रह्माद्वैतं भावयसत्य विततं भोः॥ ३० ॥ अन्वयपदार्थ-(सत् चित्रपं) जो सचित रूप है ( लोकपतीनां अपिभूपं ) जो इन्द्र कु- वरादि लोकपतियों का भी राजा है (मायातीतं) अन्वयपदार्य सहित। ३६ माया से रहित है (मानविहीनं) जो प्रमाण का विषय नहीं है (मुनिमान्य ) जो मुनियों करके मान्य है (यजनोगविधानैर्गमनीय) जो यज्ञों करके दानों करके समाधि साधनरूप योग करके प्राप्त होने वाला है (भो शिष्य सत्य विततं अद्वैतं ब्रह्मभावय) हे शिष्य ! सत्यरूप व्यापक अद्वैत ब्रह्मका चिन्तनकर ॥ ३ ॥.. भोगासक्तैर्भावविहानैर्न च लभ्यं भावाभावप्रत्ययहीनं प्रणवाख्यम् ॥ नानावेदैःशास्त्रकदम्बैरधिगम्यं ब्रह्मा- द्वैतं भावय सत्यं विततंभोः ॥३१॥. अन्वयपदार्थ-(भोगासक्तैः भावविहीनैःनेच- लभ्यं) भोगों में आसक्तों को और भाव करके हीनों को अर्थात् भेद बुद्धिवालों को नहीं प्रा- प्तहोता हूँ (भावाभाव प्रत्ययहीनं ) अस्ति नास्ति प्रत्यय से रहित है (. प्रणवारव्यम् ) ॐ है नाम जिसका (नानानेदैः शास्त्र कदम्बै रधिगम्यं ) नाना वेदों करके तथा शास्त्र समूहों करके जो जानने योग्य है (भो शिष्य सत्यं- पिततम अद्वैतं ब्रह्मभाय) हेशिष्याऐसे सत्यरूप ६६ अनुभवानन्दलहरी। व्यापक अद्वैत ब्रह्म का तू चिंतनकर ॥३१॥ इष्टानिष्टहंदविहीनं पुरुषाख्यं नि- त्यानन्तानंदनिधानं नमनीयम्।भेदा- भेदभ्रांतिकलंकैर्न चलिप्तंब्रह्माढतंभा- वय सत्यं विततं भोः॥३२॥ अन्वयपदार्थ-(इष्टानिष्ट द्वंद्व विहीनं ) यह. वस्तु ग्रहण करने योग्य है यह त्यागने योग्य हैं इत्यादि-वंद से जो रहित है (पुरुषारख्यं) पु. रुष है नाम जिसका ( नित्यानंतानंद नि- धानम्) नित्य है अनन्त है आनन्द की निधि है (नमनीयम्) नमस्कार करने योग्य है (भेदा भेद भ्रांति कलंकैः न च लिप्तं ) भेद अभेद भ्रांतिरूप कलंक से लिप्त नहीं होता है.( भा शिष्य सत्यं विततं अद्वैतं ब्रह्मभावय ). हे शिष्य ! ऐसे सत्यरूप व्यापक अद्वैत. ब्रह्म का चिंतनकर ॥ ३२॥ इसप्रकार श्रवण करके जीवनमुक्त महा- त्माओं के लक्षण जानने की इच्छा करके शिष्य' पुनः प्रश्न करै है। शिष्यउवाच-ब्रह्माद्वैतनिरूपणेन- भवतोबोधोमयासादितोजीवन्मुक्ति अन्वयपदार्थ सहित । महाफूलोबुधवोहर्निशंधार्यतेजी- वन्मुक्ति मिता विशुद्धमनसो ब्रह्मैक- निष्ठात्मकाः केते ब्रह्मविदा वरिष्ठ वद मे शंका यथाशाम्यतु ॥३३॥ अन्वयपदार्थ-(भद्वैत ब्रह्म निरूपणेनभवतः बोधः मया सावितः) अद्वैत ब्रह्म के निरूपण करने से आपके सकाश से मैंने बोध प्राप्त किया है कैसा है बोध (जीवन्मुक्त महाफलः) जी- वन्मुक्त है महाफल जिसका ) यः बुधवरैः अहः निशंधार्यते (जो विद्वद् बर्यों करके स- देवकाल धारण करने योग्य है) भो ब्रह्मविदां व- रिष्ठं! जीवन्मुक्तिं इताः विशुद्ध मनसः ब्रट्रैक निष्ठात्मकः ते के वद । यथा मेशंका शाम्यतुं) हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ श्रीगुरु ! जीवन्मुक्ति को जो प्राप्त हैं और विशुद्ध है मन जिनका और एक ब्रह्म में ही स्थित है आत्मा [चित्त] जिनका सों कौन है तिन केलक्षण मेरे प्रति कहो जिस से मेरी शङ्का शान्ति को प्राप्त हो ॥३३॥ इसप्रकार शिष्य के वचन को श्रवण करके अन्तर्यामी श्रीगुरुं ने जाना कि वासनाक्षयतं- स्वज्ञान विदेह कैवल्य मुक्ति का हेतु तो इसकों ३८. अनुभवानन्दलहरी प्राप्त है परंतु जीवन्मुक्त के हेतु मनोनाश यहः और चाहता है क्योंकि मनोनाश वासनाक्षय युक्त ही तत्वज्ञान जीवन्मुक्त का हेतु है इस वास्ते मनोनाश की युक्ति को निरूपण क- रतेहुए जीवन्मुक्तों के लक्षण वर्णन करते हैं श्रीगुरुरुवाच-ब्रह्माकारमनोमति~- वहरन्नात्मैकदृष्टिस्सदामानामानवि- हीनबुद्धिविमल शान्ति परामाश्रितः।। दुःखादुःखदशासु यस्यचमनो नास्त भवेन्नोल्लसे. ज्जीवन्मुक्ति मितः सएव मुनिभिर्मान्यो मुनीन्द्रो महान् ॥३४॥ अन्वयपदार्थ-श्रीगुरु कहते हैं (ब्रह्माकार मनः ब्रह्माकार मतिः) ब्रह्मांकार है संकल्प जिसका पुनः ब्रह्माकार है निश्चय जिस का (व्यवहरन्नात्मक दृष्टिः सदा) व्यवहार को कर रतेहुए भी एक आत्मा ही में है सदा दृष्टि जि. सकी (मानामानविहीन) मानामान से जो रहित है (वुद्धिविमलः).निर्मल है वुद्धि जिस की (परांशांति आश्रितः) परम शान्ति को जो प्राप्त है (दुःख दशासु यस्य मनः न अस्तंभ- .
. 'अन्नयपदार्थ सहित । वेत् च अदुःख दशासु यस्य मनः न उल्लसेत्) 'दुःख को प्राप्त होकरके जिसका मन नहीं शोक को प्राप्त होता और सुख को प्राप्त होकर जिस का मन नहीं हर्ष को प्राप्त होता है (साएव जी. वन्मुक्ति इतः मुनिभिः मान्यः मुनीन्द्रः महान्) सोई जीवन्मुक्ति को प्राप्त है मुनियों करके मान्य हैं मुनीन्द्र है और महात्मा है.॥ ३४ ॥ : यो जागर्ति सुषुप्ततां परिभवन् य- स्याति जाग्रन्नवैयो बोधेन विदग्धवा- सनतया जन्मादिनाऽनाकुलः।योऽहं- कार कुपाश मुक्तमतिमाल्लाभेऽप्य- लिप्तोऽचलोजीवन्मुक्ति मितःसएवं मु- 'निभिर्मान्यो मुनीन्द्रोमहान् ॥३५॥ अन्वयपदार्थ-(यःसुषुप्ततां परिभवन् जागति) जोसुषुप्तिकातिरस्कार करके सुषुप्तिसे अधिकपर- मानन्दको.जाग्रत में ही प्राप्तहोता है(यस्यास्ति जाग्रन्नवै) और जिसकी दृष्टि में जाग्रत नहीं है अर्थात् शब्दादिक विषयाकार वृत्ति में अभिमान से रहित है (याबोधेन विदग्ध वासन तयाज- न्मादिनाऽनाकुलः).जो ज्ञान. करके विदग्ध वा- , अनुभवानन्दलारी। सना होने से.जन्मादिभय से रहित है (यः- हंकार कुपाश मुक्तिमतिमान् ) जो अहंकार रूप कुपाश से मुक्ति बुद्धिवाला है (लाभपि अलिप्तः अचलः) लाभ में जो लिप्त नहीं होता है और अचल है अर्थात् स्व स्वरूप से चलायमान नहीं होता है (सएव जीवन्मुक्तिं इतः मुनिभिः- मान्यः मुनीन्द्रःमहान् .) सोई जीवन्मुक्ति को प्राप्त है और मुनियों करके मानने योग्य है मु- नींद्र है और महात्मा है ॥ ३५ ॥ रागद्वेषभयादिभिः परिरमन रागा- द्यसत्तात्मकोयोस्तोमवदच्छताम- नुभवन् कामाद्यलिप्तात्मकः शान्ता- सारकलामलो गतकलश्वेतश्चमत्कार- का जीवन्मुक्ति मितः सएंव मुनिभि मन्यिो मुनीन्द्रो महान् ॥३६॥ अन्वयपदार्थ-(यः रागद्वेषभयादिभिः परि- रमन् रागादि असक्तात्मकः ) जो रागद्वेष भ. यादिकों में रमण करता हुआ भी रागादिकों में नहीं आसक्त होता (यःअन्तः व्योमवत् अच्छता अनुभवन्) जो अन्तःकरण में आकाश की नाई । अन्वयपदार्थ संहित। व्यापक स्वच्छ आत्मको अनुभव करताहै (का- मादि अलिप्तात्मकः ') कामादि कों में अंलिप्त है मन जिसका (असार कलामलः शान्तः) विषयाकार वृत्तिरूप मन जिसका शान्त होगया है: (गतकलः) परि छिन्नता से जो रहित है अर्थात् परिपूर्ण एक रस आत्मा का साक्षात्कार किया है जिसने (चेतःचमत्कारकः) दर्शन मात्र हीसे जो चित्त को परम आल्हाद करनेवाला है. (सएव जीवन्मुक्तिंइतःमुनिभिःमान्य मुनीन्द्रः महान्) सोई जीवनन्मुक्ति को प्राप्त है मुनियों करके मान्य है मुनीन्द्र है महान् है ॥ ३६ ॥ नाना चारविचारनीतिनिपुणोधैर्य धुरं धारयन् अन्तस्त्यक्तकुभोगरोग- कलनोभोगादिभोक्ता बहिः। आत्मी- यादि. कुदृष्टिकालविकलोऽकर्तृत्वसं- कल्पकः जीवन्मुक्ति मितः सएवमुनि- मिर्मान्यो मुनीन्द्रो महान् ॥३७॥ अन्वयपदार्थ-(..यः नानाचार. विचार नि- पुणः) जो.वशिष्ठ जी की समान, नाना प्रकार के आचार और विचार. में निपुण है (यावि:
अनुभवानन्दलहरी। चार नीति निपुणः) और जो राजा जनक के समान विचार और नीति में निपुण है ( यः- धैर्य धुरंधारयन्) और जो रघुनाथजी की स. मान धैर्य की धुर [ गद्दी] को धारण करने. वाला है ( यःअंतः त्यक्तकुभोगरोगकलनःबहिः भोगादि भोक्ता) और जो श्रीकृष्णजी कीसमान अन्तःकरण में से त्याग दी है खोटेभोगों की रोगरूपी कलना [इच्छा] जिसने और वाहर से भोगों को निरासक्त होकर भोगता है (आत्मी- यादि कुदृष्टि काल विकलः) श्रीशुकदेवजी की समान यह मेरा है यह तेरा है इत्यादि खोटी दृष्टिके काल से जो रहित है (अकर्तृत्व सं- कल्पकः) किसी प्रकार काभी जो संकल्प नहीं उठाना (सएव जीवन्मुक्तिं इतः मुनिभिःमान्यः मुनीन्द्रःमहान् ) सोई जीवन् मुक्तिको प्राप्त है मुनियों करके मान्य हैं मुनीन्द्र है महान है ॥३७॥ संसारे सरणोन्मुखे विरसदेहित्वाम- हारण्यके ह्याशापाशशताकुलात्मज- मतामेकान्तभूमौ स्थितः॥आत्माना त्मविवेकवृत्तिमभितःसम्पादयन्.या - अन्वयंपदार्थ सहित । स्वयं जीवन्मुक्तिमितः संएव मुनिभि- ान्यो मुनीन्द्रो महान् ॥३८॥ अन्वयपदार्थ-(हि आशापाश शताकुलात्म- जनतां संसारे हित्वा एकान्तभूमौ स्थितः) आशा रूपी सैकडों फांसियों करके व्याकुल जो पु- त्रादिक देहसम्बन्धीहैं उनको संसारमें त्यागकरके एकान्तभूमि में स्थितहै कैसे संसारमें (सरणो- न्मुखें)कालके मुख के जो सन्मुख स्थित है अर्थात् क्षणभर भी स्थितिका विश्वास नहीं है जिस का (विरसदे) परमार्थ प्रयोजन शून्य ना. नाप्रपलानर्थ और केश को जो देनेवाला है (महारण्यके ) महाभयङ्कर वन है ऐसे संसार में देह सम्वन्धियों को त्यागकर एकान्तभूमि में स्थित (आत्म अनात्म विवेकवृत्तिं अभितः यः स्वयं सम्पादयन् )आत्मा अनात्मा की विवेचन- रूप वृत्तिको जो चारों तरफसे चित्तको निग्रह करके स्वयं संम्पादन करता है (सएवं जीवन्मु- क्तिं इतःमुनिभिःमान्यःमुनीन्द्रः महान्)सोई जीवन्मुक्ति को प्राप्त है-मुनियों करके मान्य है. मुनीन्द्र है और महान् है ॥ ३८॥ शुद्धांशान्तमतिमदादिविकलां प्रा- अनुभवानन्दलहरी।। प्यांशुमैः कर्मभिदृश्याकार विकार- कान्तिविधुरांब्रह्मैकनिष्ठांनयन् ॥ व्र- मानन्दसमुद्रमग्नमतितो भोगेषु नास ज्जते जीवन्मुक्तिमितःसएव मुनिभि- न्यिो मुनीन्द्रो महान् ॥ ३९ ॥ अन्वयपदार्थ-(यः शुद्धां शान्तमतिं ब्रह्मैक निष्ठांनयन् ) जो शुद्ध शान्त मति को एक ब्रह्म में स्थित करता है कैसी मति है (मदादिवि. कला) मदादिकों से रहित हैं (शुभैः कर्म भिः (प्राप्यां) शुभ कर्मों करके प्राप्तपदे गाली है (दृश्याकारविकार कांतिविधुरां ) दृश्य आ- काररूप संसार विकार की इच्छा से जो रहित है ऐसी बुद्धि को ब्रह्म में जो स्थित करता है (ब्रह्मानन्द समुद्र मग्न मतितो भोगेषु ना स. जते) ब्रह्मानन्दरूप समुद्र में जो मग्नमति है और भोगों में जो नहीं आसक्त होता है (स एंव जीवन्मुक्तिं इतः । मुनिभिः मान्यः मुनी- न्द्रःमहान्)सोई जीवन्मुक्ति को प्राप्त है । मु- नियों करके मान्य है। मुनीन्द्र है और महान् है ।। ३६ ॥
अन्वयपदार्य सहित ।
भेदालोक कलंक पंक पतन हित्वा
विशुद्धा मतिर्व्यर्थानर्थ कदर्थनादि
रहिता यस्यातुलानिश्चला ॥ सच्चि-
च्छुद्ध विवुद्धरूप ललिते लीनापरे ब्र-
ह्मणि जीवन्मुक्ति मितः स एव मुनि-
भिर्मान्यो मुनीन्द्रो महान् ॥ ४०॥
अन्वयपदार्थ-(भेदालोक कलंक पंक पतनं
हित्वा ) भेददृष्टिरूप कलंकपङ्क में गिरनाजि.
सने त्याग दिया है ( व्यानर्थ कदर्थनादि
रहिता.) परमार्थ शून्य अनर्थ कष्टादिकों से
जो रहित है अर्थात् कष्टरूप भोगों की इच्छा
नहीं है जिस को (यस्य माति विशुद्धा) और
जिस की बुद्धि शुद्ध है (अतुला ) अतुल्य है
(निश्चला) निश्चल है (सत् चित् शुद्ध विशुद्ध
रूप ललिते परब्रह्मणिलीना) सत् चित् शुद्ध
जानस्वरूप सुन्दर परब्रह्म में जिसकी बुद्धि लीन
है (स एव जीवन्मुक्तिं इतः । मुनिभिः मान्यः।
मुनीन्द्रः महात्) सोई जीवन्मुक्ति को प्राप्त है
मुनियों करके मान्य है मुनीन्द्र है और म-
हान है॥४०॥
अनुभवानन्दलहरी।
जीवन्मुक्ति विचारणेयसमला कैव-
ल्यमुक्तिप्रदा रूढायस्यविचारलम्पट
शश्चित्तस्थले निर्मले ॥अभ्यासाम-
तसेचनादुपचिता मन्दारशाखाशुभा
जीवन्मुक्तिमितःसएवमुनिभिर्मान्यो-
मुनीन्द्रोमहान् ॥४१॥ ..
अन्वयपदार्थ-(इयं जीवन्मुक्तिविचारणा शु-
भा मन्दारशाखा यस्यविचारलम्पटदृशः निर्मले
चित्तस्थलेरूढा) ये जीवन्मुक्ति विचाररूप श्रेष्ठ
मन्दारशाखा [कल्पवृक्ष ] जिस विचारलम्पट
दृष्टि पुरुषके निर्मल चित्तरूप स्थानमें लगी है
कैसी है जीवन्मुक्ति विचाररूप.मन्दारशाखा
(अमला) मल से रहित है (कैवल्यमुक्तिप्रदा)
कैवल्यमुक्तिरूप फल के देनेवाली है (अभ्यासा-
मृत सेचनात् उपचिता) अभ्यासरूप अमृतके
सींचने से उत्पन्न होती है ऐसी मन्दार. शारखा
जिसके चित्तमें स्थितहुई (सएव जीवन्मुक्ति
इंतः मुनिभिः मान्यः मुनीन्द्रः महान्.) सोई
जीवन्मुक्ति को प्राप्त होताहै मुनियों करके मान्य
है मुनीन्द्र है और महान है ॥ ४१०॥
४७ अन्वयपदार्थ सहित । श्रीगुरुमुख से विवेकवैराग्यादिकोंके श्रवणसे निवृत्तिको प्रधान जानाहै जिसने सो शिष्य नि- वृत्ति प्रवृत्तिवाले दोनों प्रकार के जीवन्मुक्तों के लक्षण सुनके अति विस्मयको प्राप्त हुआ शिष्य पुनः प्रश्न करे है। शिष्य उवाच गुरोज्ञानमूर्ते नमस्ते- ऽस्तु नित्यसमाधिस्थितो वाविहर्ताज- गत्याम्॥प्रबुद्धात्मतत्त्वावुभावेववयों तयोः कोधिको बहिमे ब्रह्मनिष्ठ॥४२॥ अन्वयपदार्थ-हे गुरोजानमर्ते! ते नित्यं नमः अस्तु) हेज्ञानमूर्ति श्रीगुरो ! तुम्हारे ताई मेरा नित्य ही नमस्कार हो ( प्रबुद्धात्मतत्वाल- माधिस्थितः वा जगत्यां विहर्ता उभावेवक्यौं तयो को ऽधिक मे बहि) आत्मतत्व भलीप्र- कार जानाहै जिसने सो समाधि में स्थित है अथवाजगत् में बिहार करता है यद्यपि वह दोनों श्रेष्ठ हैं तथापितिन दोनों में से कौन अधिक है सो मेरे प्रति कहो हे ब्रह्यमें स्थितिबालें ॥ ४२॥ इस प्रकार शिष्य के संशय से व्याकुल वचन को श्रवणकरके श्रीगुरु वचनामृतकी दृष्टिकरतेहैं. - अनुभवानन्दलहरी । श्रीगुरुरुवाच-प्रबुद्धोवनेसंस्थितःशां तचित्तःप्रवुद्धश्चयों वा प्रवृत्तीनिमग्नः। अनासक्तचित्तौ चिरंचिनिमग्नौ समौ- मुक्तिमंतौ परब्रह्मनिष्ठौ ॥४३॥ अन्वयपदार्थ-(यःप्रवुद्धशांतचित्तःवने संस्थितः वा यःप्रवुद्धः प्रवृत्तौ निमग्नः) जो जानी शान्त चित्त वनमें स्थित है अथवा जो जानी प्रवृत्ति में निमन हैं (अनासक्तचित्तौ) और दोनों अनासक्त चित्त हैं अर्थात् श्रीशुकदेवजी.की भाँति निवृत्ति में अनासक्त चित्त है और राजा जनक.की नई प्रवृत्ति में अनासक्त चित्त है (चिरंचिन्निमग्गो) चैतन्य में हरवक्त दोनों निमग्न हैं (तौद्वोपर- ब्रह्मनिष्ठौसमौ मुक्तिमतौ).सो दोनों परब्रह्म में निष्ठापाले समान मुक्तिमान है अर्थात् जो ज्ञानी निवृत्ति में अनासक्त को देहपात के पश्चात् वा देह की स्थिति में सुख है सोई पामर सुख प्रवृत्ति में निरासक्त ज्ञानी कोभी है ॥४३॥ -- मनोमत्त मातुंगमारोध्यशुद्धे परा- नन्दकन्दे यतीन्द्रैः प्रबुद्धे ॥ परब्रह्म- णीशे सदाधारयेते समौ मुक्तिमन्तौ परब्रह्मनिष्ठौ ॥४४॥ ..
अन्वयपदार्थ सहित । :४९ अन्वयपदार्थ-(मनःमत्तमातंग आरोध्यशुद्ध- परानन्दकन्दे परब्रह्मणीशे सदाधारयेते)उन्मत्त हस्तीवत मनको रोक करके शुद्ध परमानन्द के कारण रूप परब्रह्म ईश में जो सदाधारण करते हैं कैसाहै परब्रह्मईश (यतीन्द्रैःप्रबुद्धे) यतीन्द्रियों करके जो जानने योग्य है (तौ परब्रह्मनिष्ठौसमौ मुक्तिमन्तौ)सो दोनों परब्रह्मनिष्ठ समान मुक्ति- 'मान हैं ॥४४॥ नकर्तास्मिभोक्तानगन्तास्मिमंता जंडासंगसंगेन सक्तो नचाहम्॥जगत् सारकर्तेलियौ भावयेते समौ मुक्तिम- न्तौ परब्रह्मनिष्ठौ ॥४५॥ .: अन्वयपदार्थ-(न कास्मिन मैं काहूँ (न भोक्तास्मि)नमें भोक्ताहूँ (न गन्तास्मिन में गमन करता हूँ (नमन्तास्मि)न में मनन करता हूँ(च जडासंगसंगेन अहं न सक्तः) और न मैं वि- षयासक्त अन्तःकरणके संगसे आसक्त हूँ (जंग- स्सार कर्ता इति यौभावयेते).जगतुमें साररूप हूँ अर्थात् सत्ता स्फूर्तिरूपसे सर्व में पूर्ण हूँ और जगत् का अभिन्न निमित्तोपादान कारण हूँ इस प्रकारका भाव जिनदोनोंका है अर्थात् इसप्रकार अनुभवानन्दलहरी । के भाववाला प्रवृत्ति में हो,चाहे. निवृत्ति में हो (तौ परब्रह्मनिष्ठौ समौ मुक्तिमन्तौ )सो दोनों पं- रब्रह्मनिष्ठ समान मुक्तिमानहैं ॥४५॥ नभूम्यादिविश्वंमनो बुद्धिमत्ता ज- निर्नो मृतिर्नोन जिज्ञासुतेति॥न बद्धो नमुक्तो दृढंभावयेते समौ मुक्तिमन्तौ परब्रह्मनिष्ठौ ॥४६॥ ' अन्वयपदार्थ-(न भम्यादि विश्व) न भूमि- आदि जगत् हूँ (नमनः)नमन हूँ (न बुद्धिमत्ता न बुद्धिमान हूँ (जनिों ) न जन्मवाला (मृतिनों)न मृत्युवाला हूँ (न जिज्ञासुतेति) न जिज्ञासूहूँ (न बद्धः)नबद्ध हूँ (न मुक्तः)नमुक्त हूँ (दृढंभावयेते)ऐसी दृढभावनाहैं जिनकी(तो परब्रह्मनिष्ठौ समौ मुक्तिमन्तौ)सोदोनों परब्रह्म निष्ठ समान मुक्तिमानहै ॥ ४६ ॥ ...मया पूर्वगीतं द्वयोर्यद्धिसाम्यं प्रबु- डानुभूतं वसिष्ठादिमान्यं ॥ तदादाय संसारपारं गतौ यौ समौ मुक्तिमन्तौ परब्रह्मनिष्ठौ॥४७॥ अन्वयपदार्थ-(द्वयोर्यद्विसाम्यमयापूर्वगीतं) १ ६२ अन्यपदार्य सहित दानों की समानताजो मैंने पूर्वकही है (प्रवुद्धा नुभूतं ) ज्ञानी जिसको अनुभव करतें हैं ( वसि- धादिमान्य)वसिष्ठादिक महर्षि जिसको मानते हैं (तदादाय संसार पारंगतौ यो परब्रह्म निष्ठौ समो मुक्तिमन्तौ) यह दोनों की समानता को जोधारण करता है सो संसार से पारहोता है सो दोनों परब्रह्म निष्ट समान मुक्तिमान हैं ॥४७॥ इसप्रकार श्रवण करके भी जो संशय की नि- वृत्ति भली प्रकार नहीं हुई इस हेतु से शिष्य अपने संशय को पुनः स्पष्टकरके निवेदन करें ।। शिष्यउवाच-गुरोशुद्धबुद्धे परमवि- मले मग्नमतिमन् कथं पंकेमग्ना विम- लतनुकामुक्तजनता।ततोजीवन्मुक्तों विहरति कथं मे वदविभो द्रुतं मे संदे- हानलजटिलचित्तं शमय भो॥४८॥ अन्वयपदार्थ-(भोगुरो-शुद्दे बुद्धे-परमविमले. मनमतिमन्) हे गुरो ! शुद्ध.जान स्वरूपं परम विमल ब्रह्म में मन बुद्धिवाले (मुक्त,जनतापंके. मना कथं विमल तनुका)मुक्त पुरुष प्रवृत्ति रूप चिकड़ में मन हुआ २:कैसे विमलतनु होसक्ताः . २ १२ अनुभवानन्दलहरी। है( हे विभो ततः जीवन्मुक्तःकथं विहरति मे वद.)हे गुरो ! तिस कारण से जीवन्मुक्त किस प्रकार विचरता है मेरेप्रति कहिये (सदेहानल- जटिल मेचितं द्रुतं शमय) यह संशय रूपीअग्नि करके व्याकुल जो मेरा चित्त है तिसको शीघ्र शान्तारिये ॥४८॥ इसप्रकार पुनः२ प्रश्नकोश्रवण करके भी नहीं उद्विग्न मन हुए २ करुणासिंधु श्रीगुरुपरमानन्द दरसाते मधुरवाणी से इसप्रकार उत्तर कहते हैं कि जिससे शिव्यको पुनः शंका न हो। श्रीगुरुरुवाच-परिक्षीणेऽज्ञानेविग- लतिसतिभ्रांतिजलदेनिरायासस्था- ने समधिगत आत्मन्यतितते। विक- ल्पौघे लूने ललितसुखदे सैंधवघने प- रिज्ञातेतत्वेजगतिरविभाविहरणम्।। अन्वयपदार्थ-श्रीगुरुं कहते हैं (अज्ञाने प- रिक्षीणे सति)अज्ञान के भली प्रकार क्षीणभए हुए.(भ्रान्ति-जलदे विगलति-सति)भ्रान्तिरूपी मेघ के गलित सत्ते. (आत्मनि अतितते निराया सस्थाने समधिगते सति) व्यापक आत्मा नि- अन्वयपदार्य सहित। रायास स्थान में भलीप्रकार प्राप्त हुआ.२ (विक- ल्पौघेलने सति) विकल्पों के समूह के नष्ट हुए २ (ललित सुखदे सैंधव घने तत्वे परिजाते सति जगति रविभाभं विहरणम्) सुन्दर मुख को दें- नेवाले सैंधवधन. [स्वरूप] तत्त्व का भली प्र. कार ज्ञान हुआहुआ सूर्य की किरणों के समान जीवन्मुक्त का जग में विचरना है अर्थात् जैसे सूर्य की किरणें मलिन पदार्थ और शुद्ध पदार्थ दोनों पर पड़ती हैं परंतु लिपायमान नहीं होती इसीप्रकार प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों के संग से जी. वन्मुक्त भी निर्दोष है ॥ ४६॥ विभिन्ने दुर्भेदे सततमृति जन्मादि भयदे चिदानन्दाद्वैते कतिविध परि- च्छेदविधुरे॥मनोवाचातीते श्रुतिवि- विधगीतेति विमले परिज्ञाते तत्त्वेज- गति रविभामं विहरणम् ॥ ५० ॥ 'अन्वयपदार्थ-(सततमृति जन्मादिभयदे दु- मेंदे विभन्ने सति) निरन्तर जन्म मृत्युरूप भयं का देनेवाला जो भेदरूप दुष्ट है तिसके भली प्रकार भेदन हुएसते ( चिदानन्दाद्वैते कति विष परिच्छेदविधुरे.) चिदानन्द अद्वैत देशकाल अनुभवानन्दबहरी। वस्तु परिच्छेद से रहित (मनोवाचातीते श्रुति विविधगीते अति विमले तत्त्वे परिजाते संति जगति रवि भाभं बिहरणम्) मनवाणी से र- हित वेद करके विविध प्रकार से जो गान किया हुंआ है ऐसे तत्त्व का भली प्रकार ज्ञान होते सते सूर्य की किरणों के समान जीवन्मुक्त का संसार में विचरना है ॥ ५० ॥ प्रसन्ने चित्तत्त्वे पर रससमा स्वाद भरिते भवांतीते भव्ये भव मुखसुरेशै- रधिगते ॥ शुणातीते सत्ये सकल वि- कले मायिक परे परिज्ञाते तत्त्वेजगति रवि भामं विहरणम् ॥ ५१ ॥ • अन्वयपदार्थ-(पररस समास्वाद भरिते चित्तत्त्वे प्रसन्ने सति) परमरतरूप आस्वाद के परिपूर्ण और चैतन्य तत्त्व के प्रसन्न होते सते (भवातीते भव्य भवमुखतुरेशैरधिगते) संसार से रहित है दिव्यरूप है महादेव हे मुख्य ज़िन में ऐसे सम्पूर्ण देवताओं कोजो प्राप्त होने योग्य है (गुणातीते) सत रज तम गुणों से र- हित है (सत्ये) सत्यरूप है (सकल विकले.)
अन्चयपदार्थ सहित ।
५५:
स्थूल सूक्ष्मादि अवयवों से रहित है (मायिक.
परे) मायिक पदार्थों से परे है (तत्त्वे परिजाते.
सति जगति रवि भाभं विहरणम् ) ऐसे तत्व
का भली प्रकार ज्ञान होते सतें जीवन्मुक्त का
सूर्य की किरणों की समान संसार विचरताहै।
रंथोऽस्थायी देहश्चपलतुरगाश्चेन्द्रि-
यगणो महाबुद्धिः सूतः परमसुखधा-
म्न्यद्य निविशे॥ रथारूढोहं नो ज-
ननमरणानर्थगइतिपरिज्ञाते तत्त्वे ज-
गति रविभासविहरणम् ॥५२॥ .
... 'अन्वयपदार्थ--(अस्थायी देहः रथः) नहीं
स्थिर रहनेवाला देहरूपी रथ (च इन्द्रियगणः
चपल तुरगाः) और इन्द्रियों के समहरूप जिस
रथ के चंचल घोड़े हैं (महाबुद्धिःसूतः) शुद्ध
बुद्धिरूपी सारथी है (अहंरथारूढःपरमसुखधा-
निअद्य निविशे) मैं ऐसे रथ में आरूढ हुआ २
परम सुरवरूप धाममें अभी से निवास करता हूँ
(जनन मरणानर्थग इति न) जन्म मरण रूप
अनर्थ भी मेरेको नहीं है ऐसेभली प्रकार तत्त्व
के ज्ञान होएसतें जीवन्मुक्तका सूर्य की किरणों
के.समान संसार में विचरना है ॥५२ ॥
१६ . अनुभवानन्दलहरी इदं जीवन्मुक्तव्यवहरणमासाद्य म- तिमान य आधत्ते स्वान्ते शमदमस- माध्याद्युपचित परब्रह्मानन्द समनुभ- वृति भ्रान्तिरहितो भवेत् कैवल्यात्मा विधिहरिहरप्राप्यमहिमा॥५३॥ अन्वयपदार्थ-यःमतिमान इदं जीवन्मुक्त व्य- वहरणं आसाद्यशम, दम,समाधि मादि उपचिते स्वान्ते प्राधत्ते )जोबुद्धिमान् पुरुष इस जीवन्मुः क्तोंके व्यवहार को भलीप्रकार जान करकें शम, दम,समाधि आदि साधन करके सम्पन्न अन्तःक- रणमें श्रद्धापूर्वक धारण करता है (भ्रान्तिरहितः परब्रह्मानन्दं समनुभवति.) भ्रान्तिसे रहित हो- कर परब्रह्मानन्द को भलीप्रकार अनुभव करता है (विधिहरिहर प्राप्यमहिमा कैवल्यारमा भ- वेत् ) ब्रह्माविष्णु और शिवकोहोनेवालीमहि- मारूप कैवल्य आत्मा होजाता है । ५३ ॥ आनन्दकारी लहरीमिमांशुभां, श्री केशवानन्द यतीन्द्र निर्मितां । गायन्ति शृण्वन्ति विचारयन्तिये, कैवल्यमुक्ति परियन्ति ते ध्रुवम्॥ "इतिश्रीमदंदासीन परमहंस पण्डित श्रीगौरदेव शिष्य परमहंस स्वामिकेवानन्दनिर्मिताऽनुभत्रानन्दलहरी समाता...
अन्वयंपदार्य सहित । अन्वयपदार्थ-(इमाशुभालहरी श्रीकेशवानन्द यतीन्द्र निर्मितांआनन्द कारी) यह शुभलहरी श्रीकेशवानन्द यतिराज की निर्माण की हुई आनन्द करनेवाली है। (येजना गायान्त शृण्व- न्ति विचारयन्ति तेधुवं कैवल्य मुक्ति परियंति) जो मनुष्य गान करते हैं श्रवण करते हैं विचार करते हैं सो निश्चय करके कैवल्य मुक्ति को प्रा- प्तहोते हैं ॥ ५४॥ इति श्रीस्वामिकेशवानन्दशिघ्य श्रीखामिप्रकाशानन्दशिष्येण शकरानन्दा- बघूतेनविरचिता शंकरदीपिकामापाटीका समाप्ता ॥ 660 m . . श्रीशंकराचार्यजी रचित. प्रबोध सुधांकर. : ग्रन्थ । मल और भाषानुवाद सहित । यद्यपि स्वामी - शङ्कराचार्यजी के अनेकों पुस्तक छपकर; प्रकाशित होचुके हैं परन्तु यह पुस्तक आजतक कहीं नहीं छपा २ वर्षहुए एक वृन्दावन के वृद्ध पण्डित, इस पुस्तक की अति पुरानी हाथ की लिखी मूलप्रति देगये थे,परन्तु अन्य मूलमात्र छपने से सर्वसाधारण को इसका आनन्द नहीं मिलता अतः हम ने इसका भाषानुवाद कराकर छपवाया है, इस पुस्तक में इतने विषय है देहनिन्दा, विषयंनिन्दा, गनोनिन्दा, दि. पयनिग्रह, वैराग्य, आत्मसिद्धि,मायासिद्धि लिङ्गशरीरवर्णन, अद्वैतवर्णन, कर्तृत्वभोकृत्ववर्णन, स्वप्रकाशता वर्णन, नादा- नुसन्धान, मनोजय वर्णन, प्रबोध, दोमकार की भक्ति, ध्या- नावधि, सगुणनिर्गुण की एकता, भगवदनुग्रह, सुंदर कागज पर वम्बई टाइप से छापा है कीमत कपडे की जिल्द ८ आना सादा 1) डाकखर्च सहित । मनुस्मृति। मूल अन्वयाङ्क और मेधातिथि-सर्वश नारायण-कुल्लूक राघवा नन्द-नन्दन और रामचन्द्रकृत संस्कृत व्याख्या - परोक्त छ टीकों के अनुसार भाषाटीका सहित चिकने का- गजपर छपी है कपड़े की जिल्द सहित का दाग १) डा.खर्च। योगवाशिष्ठसार भाषाटीका सहित । अति उत्तम चैराग्य आत्मविचार का ग्रंथ है कपड़े की ||, आना. सव पुस्तकें इन दोनों ठिकानों पर मिलेंगी- शिवलाल गणेशीलाल श्यामलाल-बुकसेलर लक्ष्मीनारायणछापारवाना। मेनेजर-लक्ष्मीनारायण मुरादाबाद. पुस्तकालय हरद्वार जिल्द का मू१ "J" ....