Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Kavindrakalplata

Sarswati, Shrimad Kavindracharya · 2011/08

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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित सामान्यत. अखिल भारतीय तथा विशेपत. राजस्थान देशीय पुरातनकालीन संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, राजस्थानी, हिन्दी आदि भाषानिबद्ध विविधवाड मयप्रकाशिनी विशिए ग्रन्थावलि प्रधान संपादक पुरातचाचार्य, जिनविजय मुनि [ऑनररि मैंबर ऑफ जर्मन ओरिएन्टल सोसाइटी, जर्मनी ] सम्मान्य सदस्य भाण्डारकर प्राच्यविद्या सशोधन मन्दिर, पूना; गुजरात साहित्य-सभा, अहमदाबाद; विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोधनप्रतिष्ठान, होशियारपुर; निवृत्त सम्मान्य नियामक- (ऑनररि डायरेक्टर )-भारतीय विद्याभवन, बम्बई ग्रन्थाङ्क ३४ श्रीमद् कवीन्द्राचार्य सरस्वती सर्व विद्यानिधान विरचित कवीन्द्रकल्पलता प्रकाशक राजस्थान राज्याज्ञानुसार संचालक, राजस्थान पुरातत्त्वान्वेपण मन्दिर जयपुर (राजस्थान)

श्रीमद् कवीन्द्राचार्य सरस्वती सर्व विद्यानिधान सिरचित
कवीन्द्रकल्पलता
मंपादिका
श्रीमती रानी लक्ष्मीकुमारीजी चूण्डावत
रारतमर
प्रयाशनकत्ता
राजस्थान राबाशनुम्गर
संचालक, राजस्थान पुरातत्त्वान्वेपण मंदिर
जयपुर (राजस्थान)
विनमान्दभारतराष्ट्रीय गान १० [निग्नाद १४
अपमाति १०
मूल्य: २.००
मा-जयपुर प्रिन्टर्म, जयपुर

राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला के कुछ ग्रन्थ प्रकाशित ग्रन्थ संस्कृत भाण ग्रन्थ- १. प्रमाणमन्जरी-नार्किक चूडामणि सर्वदेवाचार्य, मूल्य ६.०० २. यन्त्रराज रचना-महाराजा सवाई जयसिंह मूल्य १.७५। ३. महपिकुलवैभवम्-स्व० श्री मधुसूदन अोझा मूल्य १०७५ । ४. तसग्रह-प० क्षमाकल्याण मूल्य ३.००। ५. कारकसवधोद्योत-प० रभसनन्दि मूल्य १७५३ ६. वृतिदीपिका-प० मोनिकृष्ण मूल्य २०० । ७ साब्दरत्नप्रदीप मूल्य २.००। ८. कृष्णगीति-कवि सोमनाथ मूल्य १७५। ६ शृङ्गारहा- रावलि-हर्ष कवि मूल्य २७५ । १०. चत्रपारिणविजयमहाकाव्यं-पं० लक्ष्मीधर भट्ट मूल्य ३५० । ११. राजविनोद- कवि उदयराज मू० २.२५ । १२. नृत्तसंग्रह मूल्य १.७५ । १३. नृत्यरत्नकोश, प्रथम भाग-महाराणा कुभा मूल्य ३७५ । १४. उक्तिरत्नाकर-पं० साधुमुन्दर गरिण मूल्य ४.७५ । १५. दुर्गापुष्पाजलि-प० दुर्गाप्रसाद द्विवेदी मूल्य ४.२५ । १६. कर्ण- कुतूहल तथा कृष्णलीलामृत-भोलानाथ मूल्य १५०। १७. ईश्वर विलास महाकाव्य, श्रीकृष्ण भट्ट, मूल्य ११.५०॥ राजस्थानी और हिन्दी भाषा ग्रन्थ -१. कान्हडदे प्रबन्ध-कवि पद्यनाभ मूल्य १२.२५। २. क्यामखारासा-कवि जान मूल्य ४.७५ । ३. लावारासा-गोपालदान मूल्य ३.७५ । ४. वाकोदासरी ख्यात-महाकवि वाकीदास मू० ५.५० । ५. राजस्थानी साहित्यसग्रह भाग १, मूल्य २२५ । ६. जुगल-विलास-कवि पीथल मूल्य १.७५। ७. कवीन्द्रकल्पलता- कवीन्द्राचार्य मूल्य २००१ प्रेसों में छप रहे ग्रन्थ संस्कृत भाषा ग्रन्थ--१. त्रिपुरा भारती लघुस्तव-लघुपडित । २ शकुनप्रदीप-- लावण्य शर्मा । ३. करुणामृतप्रपा-ठक्कुर सोमेश्वर । ४. बालशिक्षा व्याकरण-ठक्कुर सग्राम- सिंह । ५. पदार्थरत्नमञ्जूपा, १० कृष्णमिश्र । ६. काव्यप्रकाश सकेत-भट्ट सोमेश्वर । ७. बसन्त- विलास फागु । ८. नृत्यरत्नकोश भाग २। ६. नन्दोपाख्यान । १०. रलकोश । ११. चान्द्रव्या- करण । १२. स्वयभू छद-स्वयभू कवि । १३. प्राकृतानद-कवि रघुनाथ । १४. मुग्धावबोध आदि प्रौक्तिक संग्रह । १५. कविकौस्तुभ-प० रघुनाथ मनोहर । १६. दशकण्ठवधम्-प. दुर्गाप्रसाद । १७ पद्यमुक्तावली-कवि कृष्ण भट्ट । १८. रसदीधिका-विद्याराम भट्ट। राजस्थानी और हिन्दी भाषाग्रन्थ--१. मुहता नैणसीरी स्यात-मुंहता नैणसी। २. गोराबादल पदमिणी चऊपई-कवि हेमरतन । ३ राठोड वशरी विगत आदि वार्ताएँ । ४. मुजान सवन-कवि उदयराम। ५. चन्द्रवशावली-कवि मोतीराम । ६. राजस्थानी दूहासग्रह । ७. वीरवाण-दाढी बादर । इन ग्रन्थोके अतिरिक्त अनेकानेक सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश, प्राचीन राजस्थानी भोर हिन्दी भाषा मे रचे गये ग्रन्थोका सशोधन और सम्पादन किया जा रहा है ।

सञ्चालकीय वक्तव्य मर्वविद्यानिधान श्रीमद् क्वीन्द्राचार्य मरस्वती हमारे देश के एक महान् विद्वान हो गये हैं । कवीन्दाचार्य वाशी मे पण्डित-मण्डली के प्रमुख थे और प्रापने वाशी में एक पुस्तकालय स्थापित किया था। यह पुस्तकालय तो अब नही रहा विन्तु इसका महत्त्व इसके प्राप्त मूचिपत्र मे अंक्ति किया जा सकता है । यह मूचिपत्र वड़ोदा की "गायकवाड पोरिएण्टल सिरीज" में प्रकाशित भी हो चुका है । गाहजहां के समय में काशी और प्रयाग के यात्रियो पर कर लगा तो श्रीमद् क्वीन्द्राचार्य ही मुगल-दरवार में पहुंचे और कर की प्राज्ञा रद्द करवाई। इस घटना से गारे भारत में प्रसन्नता का संचार हुमा और विद्वानो ने अपने अभिनन्दन श्रीमद् क्वीन्द्राचार्य को भेजे । "ववीन्द्रचन्द्रोदय" के नाम से इन संस्कृत अभिनन्दनों का संग्रह प्रकाशित हो चुका है पौर भाषाभिनन्दन-मग्रह बीकानेर के अनूप सस्कृत पुस्तकालय में "क्वीन्द्रचन्द्रिका" के नाम से सुरक्षित है जिसको प्रकाशित करने का हमारा विचार है । क्वीन्द्राचार्य की एक सस्कृट कृति "क्वीन्द्रवल्पद्रुम" इडिया प्रापिम लायब्रेरी, लन्दन में है और दूसरी मापा कृति "क्वीन्द्रकल्पलता" राजस्थान में उपलब्ध हुई है । हमने रावतसर, बीकानेर की विदुषी रानी श्रीमती रानी लक्ष्मीकुमारीजी चूण्डावत के पास जय इस सरम भाषा कृति की प्रनि देखी तो तुरन्त ही प्रकाशन के लिये अपनी अनुमति प्रकट की। मुझे विशेष प्रसन्नता है कि श्रीमती रानी चूण्डावतजी के मौजन्य से अब यह कृति प्रकाशित होकर पाठकों के हाथो में पहुंच रही है। राजस्थान पुरातत्यान्वेषण मन्दिर जयपुर, ता. १८ नवम्बर, १९५८ई. मुनि जिनविजय समान्य सञ्चालक भूमिका मुगल सम्राट शाहजहा के राग्यकाल में श्रीमद् कवीन्दाचार्य सरस्वती एक प्रसिद्ध विद्वान् हो गये हैं । शाहजहा ने काशी और प्रयाग के हिन्दु-यात्रियो पर विगेप कर लगाया तो थी कवीन्द्रचार्य ही साहसपूर्वक मुगल-दरवार में पहुंचे और उसका युक्तिपूर्वक विरोध किया, जिसके फलस्वरूप शाहजहा ने कर-सम्बन्धी प्राज्ञा रद कर दी। महामहोपाध्याय श्री हरप्रसाद शास्त्री ने इस घटना के विषय मे लिखा है कि काशी और प्रयाग में हिन्दू तीर्थ- यानियो पर कर लगा तो क्वोन्द्राचार्य ने एक बडे जनसमूह के साथ प्रागरा की यात्रा की और शाहजहा के सन्मुख दीवान-ए-माम मे पहुंच कर हिन्दु-यात्रियो के पक्ष में अपना वक्तव्य दिया। कवीन्द्राचार्य के जोरदार वक्तव्य से मुगल-दरवार में इराक, इरान, बदस्शा और वलख प्रादि के सरदार स्तभित हो गये और शाहजहा तया दाराशिकोह ने उससे प्रभावित हो यात्रा-कर माफ कर दिया । समस्त भारतवर्ष के हिन्दुओ मे इस घटना से प्रसन्नता घ्याप्त हो गई। इसी समय कवीन्द्राचार्य सरस्वती को सर्वविद्यानिधान को उपाधि से मलकृत किया गया। काशी और प्रयाग के यात्रा-कर को निषेधाज्ञा से प्रभावित होकर देश के कई धर्मा- चार्यों, विद्वानो और कवियो ने कवीन्द्राचार्य को अपने अभिनन्दन भेजे । कवीन्द्राचार्य सरस्वती का इस अवसर पर अभिनन्दन करने वाले ६६ विद्वानो मे कुछ व्यक्ति इस प्रकार है- १. श्री कृष्ण उपाध्याय, जिन्होने "कवीन्द्रचन्द्रोदय" के नाम से सस्कृत अभिनन्दन का सकलन भी किया। २. थी जयराम भट्टाचार्य, न्यायमिद्धान्त-माला, पदार्थमणिमाला न्याय कुसुमाञ्जली, काव्य प्रकाश आदि के प्रसिद्ध टीकाकर । ३. क्षमानन्द बाजपेयी, न्यायरत्नाकर और साख्यतत्व विवेचन के प्रसिद्ध लेखक । ४ भैयाभट्ट, धर्मरन के लेखक भट्टारकभट्ट के पुत्र । ५. केशव मिश्र, कोट कांगडा के नरेश माणिक्यचन्द्र के प्राश्रित । ६. नागेश-सोमराज पण्डित के पुत्र, सभवत श्राद्धेन्दुश्वर के लेखक ही हैं । . १ देखिये-इडियन एण्टीक्वेरी, वर्ष १९१२ पृष्ठ ११ । इम यात्रा कर की निषेधाज्ञा के सम्बन्ध मे डॉ. हरदत्त शर्मा का "AForgotten Event of Shah Jahan's Reign" अर्थात् "शाहजहा के शासनकाल की एक विस्मृत घटना” नामक निबन्ध भी Kuppuswami Commemoration Volume मे द्रष्टव्य है ।

७. रामकृष्ण नागर संभवत दामोदर के पुत्र रामकृष्ण दीक्षित ही हैं जिन्होने बनारस मे सन् १६१६ ई० में विस्थलीसेतु की प्रतिलिपि को और कई ग्रन्यो की रचना की। ८. गौरीपति मिथ, सभवत. श्रीदत्त कृत आचार्यादर्श की टीका के लेखक है । ६. बालकृष्ण ज्योतिर्विद-जातक कौस्तुभ, जैमिनी सूनभाप्य और ताजिककौस्तुभ आदि के लेखक। १०. ब्रह्मेन्द्र सरस्वती-देवेन्द्र के शिष्य और वेदान्तपरिभाषा के लेखक । ११. भानुभट्ट-नीलकण्ठ भट्ट के पुत्र और व्रतनिर्णय सिद्धान्तसग्रह, होमनिर्णय आदि के लेखका। "कवीन्द्र-चन्द्रोदय" के नाम से इन अभिनन्दनो का सकलन श्रीकृष्ण उपाध्याय ने किया । एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता और वम्बई के पुस्तकालयो में "कवीन्द्र-चन्द्रोदय" की प्रतिया प्राप्त हुई है । इस महत्त्वपूर्ण कृति को प० हरदत्त शर्मा और एम. एम. पटकर ने सम्पादित कर प्रोरिएन्टल बुक एजेन्सी पूना की प्रोरिएन्टल सिरीज मे प्रकाशित किया है। "कवीन्द्र-चन्द्रोदय" नामक कृति से काशी और प्रयाग की यात्रा के लिये लगाये गये कर, कवीन्द्राचार्य की बहुमुखी प्रतिभा, विद्वत्ता और प्रशसनीय साहस का विस्तृत परिचय मिलता है। मुसलमान इनिहासकारो ने शाहजहा के शासनकाल की यानाकर सम्बन्धी उपरोक्त घटना का कोई वर्णन अपने ग्रयो में नहीं दिया है, जिसका कारण यही हो सकता है कि एक हिन्दु पण्डित के प्रयाम के फलस्वरूप मुगल शासक शाहजहा को अपनी पाशा लौटानी पड़ी। तत्कालीन इतिहास-प्रन्यो में यह अवश्य ही लिखा हुआ मिलता है कि शाहजहा ने अपने राज्य मे मन्दिरो के निर्माण का निषेध कर नवनिर्मित मन्दिरो को तोडने की प्राज्ञा प्रचारित की जिसके फलस्वरूप केवल बनारस मे ही ७६ मन्दिर तोड दिये गये । मन्दिरो को तोड़ने की प्राज्ञा के सामने तो हिन्दु तीर्थ यात्रियो पर कर लगाना सर्वथा सामान्य घटना ज्ञात होती है और इसलिये इसमे सन्देह का कोई कारण नहीं दिखाई देता। "कवीन्द्र-चन्द्रोदय" जिस प्रकार श्रीमद् कवीन्द्राचार्य सरस्वती के अभिनन्दन में लिखे गये सस्कृत छन्दो का सग्रह है उसी प्रकार "क्वीन्द्र-चन्द्रिका" नामक काव्यात्मक सग्रह क्वीन्द्राचार्य की प्रशसा में लिखे गये हिन्दी छन्दो का संग्रह है और यह अनूप सस्कृत पुस्तकालय बीकानेर मे सुरक्षित है । इस ग्रन्थ में अग्रलिखित कवियो के पद्यो का सग्रह है- १ विशेप देखिये-"क्वीन्द्र-चन्द्रोदय" (ोरिएन्टल बुक एजेन्सी, पूना) की अंग्रेजी भूमिका। २ देखिये-"इण्डिया इन दो मुहमहन पीरियड, स्मिय", पृष्ठ ३६६ । ३ राजस्थान में हिन्दी के हस्तलिखित ग्रन्यो की खोज, भाग २ थी अगरचन्द नाहटा, प्राचीन साहित्य शोघ-सस्थान. उदयपुर विद्यापीठ, उदयपुर, पृष्ठ १२ ।

( ३ ) संवलित पद्य-संस्था ४ १ ." " २ " " " " १ " ४ " ३ " १. सुखदेव २. नन्दलाल ३. भीख ४. पण्डितराम ५. रामचन्द्र ६. विराज ७, धर्मेश्वर ८. कस्यापि (मजात नाम) ६. हीराराम १०. रघुनाथ कवि ११. विश्वभर मैथिल १२. धर्मेश्वर १३. हावरोपाध्याय १४. रघुनाथ शास्त्री " " २ १ " १ " १ १ au " १५. भैरव २ २ १ " " १२ . " १ १ " " १७ " " " २ " १ १६. सीतापति त्रिपाठी पुत्र मणिकठ १७. मगराय १८. कस्यापि (अज्ञात नाम) १६ गोपाल त्रिपाठी पुत्र मरिणकठ २०. विश्वनाथ जीवन २१. नाना कवि २२. चिन्तामणि २३ देवराम २४. कुलमणि २५ त्वरित कविराज २६. गोविन्द भट्ट २७. जयराम २८ गोविन्द २९. बशीधर ३०. गोपीनाथ ३१ यादवराम ३२. जगतराम ३३ रामकवि की स्त्री २ " २ " " ५ २ " " १ " १ १ १ " " ३ .

( ४ ) इस प्रकार कवीन्द्राचार्य के प्रशसक कई हिन्दी-कवियो की सूचना भी प्राप्त होती है । प्रस्तुत कृति के दो उदाहरण निम्नलिखित हैं- [ सवैया ] तीरथि सबै अह्नाइ गाई नसताई, जाई कीन्हो काजु आजु देपो कैसो मुरसरीको। कहै सुपदेव सुर नर मुनि दस नाम धन्य धन्य है जंत वार बाजी परीको। नवो पड दमों दिसी दीप दोपमै सुजमु सोर भयो जगमै गहै या कोनु छरीको। कवि इन्द्र सरस्वती विद्या बुद्धि महावर कर यो छुडायो ज्यों छुडायो कर करीको।। x x X पत्र जगत सर भयो धर्म-जल पूरी रह्यो, तामे कमल कवि इन्द्र सोहे। भक्ति ज्ञान बीच कोस जय किंजलक सील रस मोहे । सबको बधन तीरथमें तीरयको बघन काट्यो सोहू मुवाम उपमाको को है। श्यामराम बानीवर हे निसि दिन प्रफुल्लित याते जु हरि रवि जोहे ।। कवीन्द्राचार्य का परिचय देते हुए श्री गगानाथ भा ने लिखा है कि वे एक सन्यासी ये और धनवान व्यक्ति थे। उनके एक भण्डारी था जिसका नाम कृष्णभट्ट था। वे एक विद्वान् व्यक्ति थे और बनारस के पण्डित-समुदाय के प्रमुख नेता थे। उनकी विद्वत्ता के कारण ही सम्राट शाहजहा द्वारा उनको "सर्वविद्यानिधान" की पदवी दी गई थी। कवीन्द्रा- चार्य की विविध विषयक रुचि की सूचना उनके पुस्तकालय के सूचि-पन से प्राप्त होती है । साथ ही श्री झा ने लिखा है कि बनारस मे उनके पास अध्ययन के लिये चारो ओर से छान पाते थे और इनकी सहायता के लिये कवीन्द्राचार्य ने बनारस में एक पुस्तकालय की स्थापना की थी । इस पुस्तकालय में कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्यो का सकलन किया गया था। दुख है कि अब पिछले वर्षों की उथल पुथल में इस पुस्तकालय की पुस्तकें इधर-उधर हो गई और अब बहुत कम पुस्तके विभिन्न संग्रहालयो में मुरक्षित रह सकी हैं । उपरोक्त पुस्तकालय के मूचिपत्र से ही विद्वत् जगत को सन्तोष करना पड़ रहा है। श्री गगानाथ भा ने लिखा है कि श्रीकवीन्द्राचार्य और कृष्ण भट्ट दोनो पहले गोदावरी तीर के किसी स्थान मे रहते थे और फिर वे वनारस में आकर रहने लगे। श्री कवीन्द्राचार्य के जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना उनके द्वारा मुगलदरबार मे प्रांगरा पहुंच कर काशी और प्रयाग मे हिन्दु-यात्रियो पर लगने वाला कर माफ करवाना है । क्वीन्द्राचार्य के जीवन के विषय मे अनूप मस्कृत पुस्तकालय बीकानेर मे मुरक्षित 'क्वीन्द्र चन्द्रिवा" नामक ग्रन्य से भी कुछ जानकारी उपलब्ध होती है । इसमे रिखा है- १ "क्वीन्द्राचार्य मूचिपत्र" के नाम से क्वीन्द्राचार्य द्वारा स्थापित पुस्तकालय का मूचिपत्र गायकवाड योरिएण्टल मिरीज, बडोदा द्वारा प्रकाशित हो चुका है। २ क्वीन्द्राचार्यमूचिषत्र, गायकवाड मोरिएण्टल मिरीज, बडौदा में प्रशशित श्री गगानाथ भा का प्राक्वयन ।

"कासी और प्रयागकी करकी पकर मिटाई। सवहीको सब सुप दिये, श्रीकवीन्द्र जग आई ॥२॥ सकल देसके कविनि मिली, कीन्हें कवित्त अपार । श्रीकवीन्द्र कीरति करन तिनमें लीने सार ॥३॥ श्रीकवीन्द्र द्विजराजको लपहु चन्द्रिका ज्योति 1, दुनि गुनिके दुप दहति, दिन-दिन दूनी होति ॥४॥ पहिले गोदातीर निवासी, पाछे प्राइ बसे श्री कासी ॥५॥ ऋग्वेदी असुलायन सापा, तिनको ग्रन्थ भयो है मापा ॥६॥ सब विषयनिसो भयो उदास, बालपनामें लयो सन्यास ॥७॥ उनि सब विद्या पढी पढाई, विद्यानिधि सुकवीन्द्र गुसाई ॥८॥" उपरोक्त कथन का समर्थन "कवीन्द्र-कल्पलता" से भी होता है । इसमें भी उपरोक्त छन्दो से मिलते हुए छन्द लिखे गये हैं [चौपाई] पहले गोदा तीर निवासी । पाछे प्राइ बसे है कासी ॥५॥ सब विषयनिते भये उदास । बाल दसामें लयो सन्यास ॥६॥ उनि सब विद्या पढी पढाई । विद्यानिधि सुकवीन्द्र गुसाई ॥७॥ ऋग्वेदी असुलायन सापा । तिन कोनी है कविता भाषा ॥ ६ ॥ कल्पलता है याको नाम । याते पावत कवि सुप-धाम ॥६॥ अलकार गुन रससी सनी । याते कल्पलता है बनी ॥१०॥ सबहीको वर्नन है जामें । सब कोऊ सुप पावन तामे ॥११॥ कीने ग्रन्थ न जात गनाए । सब वेदनिके अर्थ बनाए ॥१२॥ भापा करत प्रावति है लाज । कीने ग्रन्थ पराए काज ॥१३॥ [ दोहा ] कासीकी अरु प्रागकी, करको विपति मिटाइ। सबहीको सब सुप दिये, किये धर्म अधिकाइ ॥१४॥ इस प्रकार स्पष्ट है कि कवीन्द्राचार्य पहले गोदावरी नदी के किनारे रहते थे । फिर वे काशी आकर बसे । उन्होने बाल्यकाल में ही सन्यास ले लिया और ऋग्वेद की अाश्वलायन शाखा का विशेष अध्ययन किया। कवीन्द्राचार्य जैसे सस्कृत के महान् पण्डित के १ कवीन्द्राचार्य कृत कवीन्द्रकल्पलता के छन्द "माय शाहजहाके भाषा कवित्व लिप्यते" से ही प्रारभ होते हैं। इसके पूर्व के छन्द सकलन कर्ता की ओर से प्रारभिक परिचय के रूप में लिखे गये ज्ञात होते हैं। २ विद्वानों ने गोदावरी तीर स्थित नासिक नगर को कवीन्द्राचार्य की जन्मभूमि अनुमानित किया है-कवीन्द्र-चन्द्रोदय, भूमिका पृष्ठ ३।

लिये भाषा में काव्य-रचना करना लज्जा की बात माना गया है-"भाषा करत प्रावति लाज" और लिखा गया है-"कोने अन्य पराये काज" अर्थात् परोपकार के लिये ही भापा-ग्रन्य लिखा गया है। श्री क्वीन्द्राचार्य विरचित प्रमुख ग्रन्य "कवीन्द्रकल्पद्रुम" माना जाता है और यह लन्दन की "इण्डिया ऑफ्मि लायब्ररी" में सुरक्षित है । इस ग्रंथ से भी उपरोक्त कई विषयों का समर्थन होता है: :- x x x सर्वना । - . गोदातीरे प्रमोदावलिदलिततमे जन्मभापुप्यभूमाव । ऋग्वेदी वेदवेदी जगति विजयते थी कवीन्द्रोद्विजेन्द्रः॥ अधीत्य वेदवेदाङ्गवाव्यशास्त्राणि तत स्वीकृत्य सन्यास ब्रह्माम्यास समाथित.।। "क्वीन्द्र वल्पलता" नामक भापाराव्यकृति समवत कवीन्द्राचार्य को एक मात्र भाषा कृति है। इसकी एक प्रति उदयपुर के सरस्वती-भण्डार पुस्तकालय में और दूसरी प्रतिलिपि मेरे सग्रहालय मे है । क्वीन्द्र-कल्पलता मे निम्नलिखित विषयो का समावेश हुप्रा है १ माहजहाके भापा कवित्त, छन्द सग्या १०८, पृष्ठ स० २ से १६ । २ श्री साहिजहा जूके पुरपद, मस्या ५५, पृष्ठ सम्या २० मे ३४ । ३ विष्णु पद, सख्या १०, पृष्ठ ३५ । ४ तत्वज्ञान विषयानि भाषा पद्यानि, सम्या ६०, पृष्ठ ३६ से ४६ । ५ दारामाहिके ववित्त, सख्या २७, पृष्ट ४७ से ५५ । ६ वग माहिब के पवित्त,मस्या १, पृष्ठ ५६ । ७ नाना स्तुति विषयक प्रास्ताविर पवित्वानि', सम्या २, पृष्ठ ५७ । ८ पुन दारासाहि कवित्त, मस्या २ पृष्ठ ५८ ६ मिरजा मुराद शाम के ववित्त, मस्या २, पृष्ट ५६ १० प्रस्ताविवानेव पवित्व ध्रुपदानि, मस्या २, पृष्ट ६० "क्वीन्द्रवल्पलता" यजमापा वाध्य की एक पनूटी कृति है । इमरी रचना श्रीमद् रवीन्द्राचार्य द्वारा बासी भोर प्रयाग मे हिन्दु-यात्रियों पर लगाये गये पर के निवारण में सपाट पाहाहा की माता प्राप्त करने के लिये ही हुई जात होती है। १ रवीन्दचन्द्रोदय, मोरिन्टल र एजेन्मी, पूना भूमिरा पृष्ठ ३ । २ "धुरपदों" के बीच में बवित्त, मूलना प्रादि पद भी हैं । ३ "साहिब बैगमरी माहिती प्रचन रहो। सात ही मर्मत भ्राउ प्रीतिहि मर्मत है" से स्पष्ट होता है कि वित्त ममनार मन की प्रामा मे लिगा गया है। ४ मम्बन्धित विनों मे हमानिसा पोर मिपमानार मंपदसान की प्रांमा की गई है।

( ७ )
"कवीन्द्रकल्पलता" में मुगल-सम्राट को गोरव-गारिमा, वीरता, दान आदि का युग
के अनुकूल सरस चित्रण हुआ है । इस कृति मे सर्वथा शुद्ध व्रजभाषा का माधुर्य, भावो का
अनूठापन, अतकारो की छटा और कवि की अपूर्व क्षमता एव विविध विषयो की जानकारी
दिखाई देती है। "तत्व ज्ञान विषयानि भाषा पद्यानि" मे धर्म, दर्शन और वेदान के विविध
तत्वो को सरल और सरस भाषा मे व्यक्त किया गया है जिनसे कवि के महान् पाण्डित्य
का परिचय मिलता है।
वास्तव मे "क्वीन्द्रकल्पलता" हमारे साहित्य की एक विशेष काव्य कृति है, जिसका
प्रथम बार प्रकाशन राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिर की ओर से किया जा रहा है। इसका
प्रधान श्रेय परम आदरणीय मुनि श्री जिनविजय जी महाराज को है जिन्होंने मेरे सग्रह मे
इस कृति को देखते ही प्रकाशन की अभिलाषा प्रकट की और तुरन्त ही "राजस्थान पुरातन
अन्थ माला" में प्रकाशन का प्रबन्ध भी कर दिया । इस महत्त्वपूर्ण कृति के प्रकाशन के लिये
श्री मुनि जी महाराज वास्तव में समस्त साहित्य-जगत की ओर से विशष धन्यवाद के
अधिकारी हैं।
लक्ष्मी निवास कोटेज,
बनीपार्क, जयपुर।
दीपावलि पर्व २०१५ वि०स०
लक्ष्मीकुमारी चूण्डारत
विषय-सूची
१. सञ्चालकीय वक्तव्य
पृष्ठ
२. सम्पादकीय भूमिका
३ क्वीन्द्र-कल्पलता

कवीन्द्राचार्य-सरस्वती-विरचित
कवीन्द्र कल्पलता
?
२
a
४
॥ श्री बग्दमूर्तये गजाननाय नमः ।।
नवा वाणी भवानी च भवं गंभूद्भवं तथा ।
हृद्यानि भाषापद्यानि कवीन्द्रः कुरते कृती ॥
कवीन्द्र. कल्पलतिकामनल्पफलकल्पिकाम् ।
कवीनां कामनायाप्त्ये प्रवीणां कुरते कृति ॥
प्रनल्पकल्पनाकल्यां यल्पान्तस्थितिगालिनीम् ।
क्वीन्द्र कल्पनतिका मन्नो जन्मन्नु पल्पकाः ॥
गुर गनपति मंकर मिवा विष्णु दिनेगुर लेपि ।
मनमा वाचा यमंना प्रणवो मुरनि विमेपि ।।
[चौपाई
परिन गोदा नीर निवामी । पाये प्राइ यमे है नामी ।।
गय विषयनित भए उदाम । बाल दमाम लयो मन्याम ।।
अनि गय मिचा पढी पदाई । विद्यानिधि मुगीन्ट गुमाई ॥
अम्वेदी प्रमुगायन मापा । निन पानी है सविना भाषा ॥
गन्दनना है पारा नाम । याने पायन ययि गुण पाम ।।
पमार गुन मगो गनी । दनि मानना है यनी ॥ १०
महगो यनंग जाम । गर मोज गुप पावन नामे ॥ ११
पौने अपन जान गनाए । मय वेदनिए पयं बनाए ।
भादापन पापनि माघ । गानं प
पराग पार॥ १३
५.
८
है

२
रवीन्द्र-कल्पलता
१
[ दोहा]
कासीकी अरु प्रागकी, करको विपति मिटाइ ।
सबहीकों सव सुप दिये, किये धर्म अधिकाई ।।
अथ साहिजहांके भापा कवित्व लिप्यते
मूरज ससंक सुधा समर सुरेस,
सुरजौ लगि रसाके सातो सागरके फेर है।
संभु सिवा सुरसरी सुरग सलिल सिधु,
समीर स्वयंभु सैल वरुन कुवेर है।
व्यास वलि विभीपन वायुसुत अश्वत्थामा,
लोमस भुसुड सुड मारकंड से रहै ।
साहिजहां साहि सदा साहिब किरान,
सानी तो लौ रहे जो लगि फनीस सीसमै रहै ।
तियामें सिगार रस रन माह महावीर,
दीननिमें करना है अद्भुत करनी ।
हसौ और साहिनको डरु जगदीस हीते,
पापते घिनात अरि तम तेज तरनी ।
अति ही परम ज्ञान महा ज्ञान,
सत रस चिरजीवी हू जे तोलौ जोलो धुव धरनी।
धरनी ऐसी विधि नौ
रस मई रीति,
भाति-भाति साहीजहाँ साहजूकी कवि इन्द्र वरनी ।।
पलदल भंजन है भारी भीर भंजन है,
दोरमे प्रभजन ज्यो अजन लसत है ।
रन माझ रावत है वैरी निहरावत है,
अति ही डरावत ऐरावत ससत है।
धारा धर जीते रग धरा धर जीते,
अंग जंगवे जितया जोर जालिम रसत है ।

क्वीन्द्र-कल्पलता
३
कहै कविराज मृगराजनि मरोरि मारे,
ऐमे गजराज साहिजहां वकसत है ।
ar
विध गंध मादनके वधवसे सिंधुर,
जे सिंधुते निकारे देपि वैरी तरमत है ।
गाढे गढ मढनि ढकानि ढाह डारे,
टूढि फौजनि विडारे मदा मद वरसत है ।
सजल जलद हुर्ते गरजें लरजें,
घन घंटा घोर जंजीर जकरे दरमत है ।
ऐरावतके साथी पलदलके प्रमाथो,
ऐसे हायी माहिजहां देत सरसत है ।।
५
मेटी है जगतपति रापी है जगतपति,
मुनिये जगतपति जमु लीजियतु है ।
सिद्ध माधुकी असीम लेत मुद्ध मूधे मन,
मोधि साधि मुधानिधि सुधा पीजियतु है ।
चकवा विठुरे रात चकई विशुरि दुपी,
माहिजहा ताते इन्है दया कीजियतु है ।
राति हीमें चोरी होत अधेरो मिटायी चाहो,
ताहीते मुमेरु काढि वाटि दीजियतु है ।।
जमे एक्क करतार मबहीको भरतार,
तमे एवर छत्रपति माहिजहा छमामै ।
जाकि एक दग्वर जेर मर्व नरवर,
जाके डर वर्गवर भए मव तमामै ।
माती मिघु मातो लोक जते अघ ऊग्ध है,
नेते मय एक होत जाके देत दमामे ।
में एक मूवा यह कंपो सरखार लोग,
एहो दीप नागे ऐमें जेबू दीप जमा ।।

४
कवीन्द्र-कल्पलता
७
दलदल सूपि जाति.सूपि दलदल होति,
मेदिनी दहलि जाति जाकी भारी फौजते ।
साहिजहां भुजा लपि लाजत भुजंग राज,
भाजत है भारे भूप परताप अजतें।
अनगने गांउ देत परगने सूवा देत,
देसत देत दिसा देत निसा देत रोजतें।
हांसीहीमै कासी देत पलमे पयाग देत,
ऐसी ऐसी देनि कहो कहां भई भोजते ।
छत्रपति पति एई रतिपति पति एई,
पतिहूंकी पति ऐई साहिजहां साहि है ।
कुरान पुरान जाने वेदनिके भेद जाने,
एती रीझ एती बूझ और कहो काहि है।
सुमेरको सौनो देत दीन दुनी दोनो देत,
सबके दहे है दुप मेरे दुप दाहि है।
सबसों निवाही एही सवकों निवाहत है,
मौहू सो निवाही अरु मोहूंको निवाहि है ॥
वाजत निसान घमसान घमसान होत बैरिनके,
मदिर मसान होत जाकी एक दौरते ।
घोरे पुरथारनि पहार जरि छार होत,
मेर गिरि गिर जात दमामेकी घोरते ।
उलटि दिसानि धरें पव्वय पिसान करे,
जलसो कृसान भान परताप जोरते ।
तौसो न भयो है पाछे आगे हू न हहै और,
साहिजहा गाजी साहि साहि सिरमोरते ।।
[सबैया ]
वैरिनिको वनिता वनमै विललाइ वक जिनि बात कही हो ।
चीतेनिसो जुब चीति कहै इनिस्यारनि मांझ हु स्यार रहो हो ।

कवीन्द्र-कल्पलता
साहिजहानको दौरति फौज रहे गिरि क्यो गिरिराज गहो हौं,
वाहिर जाहु न जाहिर होहु न नाहर है चुप नाह रहो हो । १०
[कवित्त]
अचल विचलि जात चलाचल चलि जात,
पलदल दलि जात जाकी एक दौरते ।
मलि जाति मेदिनी औ हलि जात हेमगिरि,
लका ऊ पिघलि जाति परताप जोरते ।
डुलि जात तलातल गलि जात घन वन,
मिलि जात साती सिंधु दमामेकी घोरतें ।
दुज्जन भए है जेर लागी न तनक वेर,
साहिजहा गाजी साहिसाहि सिरमोरतें ॥
वह वलि वलि कीजै वन वेन सम,
करनके करनिते करनी सरस है।
मच नद धरमहीको वचन वचन है,
न रचन कठोर हीको कचन वरस है।
पा रस हू नेक जो कृपारस निरप्यो जाहि,
तिनते सुमेर होत पारस परस है ।
सवको विपति भाजी दुनी है निवाजी गजी,
साहिजहा साहि गाजी माहिव तरस है ।।
१२
चीरा होरा हय गय जर जरी साजि जिमी,
दिन दिन दूनो देइ कोत्ति लीजियति है।
साहिजहा राजनिकी गजधानि छानी,
छोनि साहिनिको साही लीनी और दीजियति है।
वाज वरी वारि वोरे वाजे वैगे वारि डारे,
प्यास लागे पिया पिय ग्रामू पौजियति है।

कवीन्द्र-कल्पलता
जो लो पाछिली फतूहको कवित्त करें,
नौ लगि फतूह और औरे कीजियति है ।।
१४
अरव परव ली दरव देयो जाही ताही,
गरव गवाये है कलप तरवरके ।
गुनी कविराज हस सेवत हे दरवार,
पोए है गुमान मान मानसर वरके ।
जसके निधान भान पंचवान उपवान,
साहिजहा साहि है मिटया कर वरक।
रूप रस जस दान ज्ञान ध्यान,
सनमान कहा लौ वपानिये गरीब परवरके ॥
उछरत छोनी पर छानन छुवत पग,
पछ बिनु पछिराज पछ गहि लेत है।
मनमे रतीक तेजु इनमे है मन,
मन तोरादार जोरावर तमासा निकेत है।
दारिद जरावने जराइनि जराए सब,
सौने हीके साज साजे जीननि समेत है।
मनके हिरोल मोल लाप लाप लहे गोन,
पोनते सवाए घोरे साहिजहा देत हे ।।
वेनी गहि पेचत है आचरको एचत है,
अधर कुचनि छत है दैवि हरत है ।
भौर-पुज गुजरत याही मिस बोलत है,
फूल फूले हसे मानौ नैकु न डरत है।
पौन डौले डार भुज पल्लव अंगुरी,
पॉनि बुलाइ समीप मानो अगिया हरत है ।
कामी से वै तरुवर साहिजहाँजूके डर,
वैरिनिकी कामिनी के हाल य्यो करत है ।।

कवीन्द्र-कल्पलता
७
[दोहा]
१८
करन भरन अरु संहरन, ब्रह्म हरि हर तीन ।
अलप पुरुष एक्के रच्यो, साहिजहां परवीन । १७
ज्यो वरिपा घन वूद अरु, सारे गने न जात ।
साहिजहा गुन गनत त्यौं, कविकुल अकुलात ॥
और भूप सव कूप, सर सरिता सम पान ।
साहिजहां साहिब, किरांसानी समुद समान ।।
पान करे कवि कहत है, उपमा बने न आन ।
रिपु जस उडुगन मानिये, साहिजहां दुति भान ।। २०
[सबैया]
दारिद पंडन वैरी विहंडन, साहिजहां सुजस सरसावै ।
ज्यो मघवा जलको वरिसावत, त्यों नित ही मुहरै वरसावे ।
भारथमे पुरुपारथ पारथ,
तेज दिनेस जगै दरसावै ।
चड अपंड प्रताप तपै, वर वैरिनिकी वनिता तरसावै ।। २१
साहिजहान जहानके साहि, भुवप्पति भाट भए गुन गावै ।
वार न लागति वारन पावत, जे कवि चारन वार न आवै ।
देस विदेस वजार वजार, हजारह जार हजार गनावे ।
लापनि नपनि लापनि देत, करोर करोर करोरनि पावै ॥२२
[कवित्त ]
ज्ञान गनपति जीत्यौ दानके करण जीत्यो,
पारथ कमान वान तो समान कीजिए।
नूप वर पचवान तेज दुत्ति इद भान,
सोधिक सुधा निधिते सुधापान कीजिए।
आन करे कहै पान सुरितान य्यो वपान,
दूसरो न आन उपमान जाहि दीजिए।

कवीन्द्र-कल्पलता
ज
जसके निधान महा जान मनि साहिजहां,
जीवन जहानके हौ जुग जुग जीजिए ।।
२३
सिधु मथि कादे जे वै विधिते अधिक,
वाढे धावत जिनके धराधर सकत है।
कोल कलमले दलमले दृगपाल दसो,
सेसके सहसौ सीस सर्व मसकत है ।
कमठकी पीठि फूटि टुटि कटि कटि जात,
काध कर करकत हाड हाड कसकत है।
साहिजहा मृगराज महाकवि राजनिको,
सोने साज ऐसे गजराज वकसत है ।।
कमठ पीठि कसमसति धरनि धसमसति चढत तव,
दिघ दुवन दलमलत दसौ दिगपाल डुलत भुव ।
अचल चलत दलत हलत चल दल दल पल दल [त]
सकल विकल रिपु पलक मिटिग छल वल वल भुज वलत।
साहानि साहि-साहि जहं नृपति सुनि ददुभि घनघोर धुनि,
फु फु फर्निद फनि फुकरत पुफटत फनावलि फुट्टि पुनि ॥ २५
शाहिजह साहि सव भुवन तुव सुजस हुव,
दुवन दल गजि रसु अमृत पीजे ।
भोजु वह कोजु हरिरोजु यह मौजु,
दिल सोज रस चोजु हरिपोजु कीजे ।
नित्त सतमग अग अगर सरगर पारग,
जुरि जग जप तुग लीजै ।
सब मुह मोरि सिर तोरि टक टोरि,
झकजोरि दह वोरि जुग कोरि जीजै ॥
दपट मृग राजकी झपट वर वाजकी,
लपट मनु दहनकी दौरि छीनी ।

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कवीन्द्र-कल्पलता ३० १६ ३२ गिरि हलत धर दलत फनि लजत कलमलत, दलमलत रिपु जलत तुव चलत फोजक [ हरिमोहन बुद्धि सदन चंद वदन रूप मदन पेपियें, दुवल दवन धरनि रवन ईस जवन लेपिये। कित्ति धवल लाल नवल वाह वल विसेपिये. जस निधान महाजानसाहि जहां देपियें । [प्रमाणिका] प्रचंड सत्रु पंडिके पसन्न जाहि चडिक, अडंड भूप दंडिक अपंड भूमि मंडिक । जहान साहि कामसों लसें अनंद वामसों, रच्यो अलेष नामसों सदा उदार दामसों ।। [कुण्डल] सदन हरि सवानी आई तोसो रवानी। वदन सति वानी वाहमें सों भवानी ॥ हहरति रिपु रानी छाडि ठौरे पुरानी । सघन वन दुरानी दूरि दौरे पुरानी ।। तुव लसति कृपानी साहिने जाहिमानी । रिपुजन सनमानी जे महा है गुमानी ।। करन अधिक दानी साहिजहां सुज्ञानी । दिन दिन अधिकानी राजधानी वषानी ।। [प्रमाणिक ] पयानके विचारमें दुवन्न हाल य्यौ धरै। भर भरे तरफर डरे गिरै मरै जरै ।। फनिंद फूलि फुकरै सहस्स सीस संकुरै। वराह घोरि घुकरै कुरम्म कूकि कुकरै । प्रताप तेज रावरै भए दुवन्न बावरे । ते डारि तीय डावर भये अकित्ति सांवरै।। १६ १७

पीनामा
-
॥
[मुगनि]
मटर गति, गुमट रजति । पटर पनि दिग्द गहि ॥ ४०
जनद नरनि, दुयन मरजहि पनि नरनिनियिन गरि॥४१
जनपि महि नहि गर्नाहा गगुरगुराति, धनि पुराहि॥४२
तर्गन माहिदुपन पाना मनि गरि मुतन मुराद
गरद यायिनि नुसहित विष मुग्धति, मुर लारा
(दोहा
मारिजहान नग, पतन यात ग्गवीर ।
मिति गिरि यन युरिगे, (ग) रिपु नन परें धीर ॥
[ मानि]
गापिका मोहिन गरम, बग्गा लिन नर सिदि
गमि, गैमि, मध्य परें, गपिति निरगिदि।।
अग्निट विरिति पाग, गायग्न मागणय ।
गि भग गरन ग्नग नग यज माग ।।
गम्न मन पन गरनिगमा पागल।
गप गाfraria ग्मियोगा पर lyrl
मापन पर पटना।
पसमा मा॥
पापा TT टा।
Traffar ॥
frnmriti imr REE I
PER Printar ॥
Rafter: Irry,
mfortant art. 11
।
-

१२ कवीन्द्र-कल्पलता ५५ ५७ अरु झग्गरि लटमझ ज्झटकत सज्ज--द्दल धन गज्ज [त] तुवरि पुकज्ज विन नर लज्ज जंभजत विरुज्झ गग टकत ॥ ५३ साहिजहा जीत्यो प्रवल, रन पंडित रवरंग । अंग अग पल पंडियो, सुजंगग्गति रिपुभंग ॥ ५४ सुजंगग्गति रिपुभंग ग्गदन मृदंग ग्गरज्जहिं अंग ग्गहत वरंग । गगनगुन गग द्धर सुपतंग, ग्गतिधर तुंग गलित तुरंग ॥ [करहस] बलित मतंग, गिरिसम पतंग । ग्गिरत तह जग, जुरत रिपु सग ।। मुरत सर वंग, दुरत रन रंग। फुरत चतुरंग, तुरत उतमंग ॥ कटत रिपुरंग, घटत सम चग । नटत विनु अग, लटत अरधंग ॥ फरित अतिवत, डरित वन जंत । चरित सव सत, हरित यह तंत ।। ५६ फरित रिपु मत, जरित हनि मंत । लरित चनु दंत ॥ झुटित झुटि मुड, मुटित भकरुंड । टुटित तर डुड, विकट मुटि मुड ॥ गिरित गिरि रुड, भिरित अरि झुड । मिटत भरि कुड, रुहिर निज टुड ।। पिवत हर पत्त, भरत रितु गत्त । भपत अकुलत, फिरत मय मत्त । गवरि गन तत्तु, उघटि रन नृत्त । तरित मय मत, - ॥

कवीन्द्र-कल्पलता ३ ६७ करति कवि सन्त, कहत विकसन्त । सकल तुष मित्त, सुपति ङ्गव नित्त । [छप्पय ] रहत वटत मठत परिताप चढत । गढपत्ति डरत दुख कलक आतंक अक संकत ।। निसि वासर पड पंड पल पंडि अवनि मडल कुल मंडन । वाहु दंड वरि वंड चंड अरि झुड विहंडन ।। साहानि शाहि शाहिजहं नृपति सु एक्क बार किरवार लिय । परचड तेज भुजदंड वल सु पलदलवल सब दल मिलिग्र ।। [दोहा] पूरव दिसि जय जीति के, मुनो अपूरव बात । तुव प्रताप रवि तेजतें, रिपु तम ज्यो मिटि जात ।। [ भुजंगप्रयात ] तुम्है राजकी जीतिकी जोति फावी। अकूपारके पारको भूमि दावी ।। गुमानी न मानी जिन्हो प्रान तेरी । करे तीयसो पीय चेरारु चेरी ॥ करे चूरबी बूरवी सव्वि सेते । जरे तेजके जोरसौ और केते ।। ७२ नदीम धन सिधुमे डारि वोरे । घने पग्गके अग्गसो मारि तोरे ॥ तुम्हे राजको जीतिकी जोति फावी । अकूपारके पारको भुम्मि दावी ॥ [दोहा ] दछिन दिसि तिय वस करो, दक्षिन लछिन ठानि । साहिजहान निवाहिक, करत पेमु यह जानि ।। ७५ ७० ७१ ७३ ७४

१४
कवीन्द्र-कल्पलता
७७
[ भुजंगप्रयात ]
घने दपिनी भपिनीके संघारे ।
सदा जीतिके जोर बाजे नगारे ।।
कहां लौ गनावी किते देस छीने ।
करौरै रुपैयारु दीनार दीन ।
भए दास वीजापुरी वाज आए।
तिहारै सवै वे भये चित्त भाए ।
सदा क गोलकुंडा महीपाल सेवे ।
हुकुमुतै सवै छाँडि दीनी कुटेवै ।।
सु हाथी सु हीरानिकी भेंट लीनी ।
जिमी जीतिके फैरिके ते न दीनी ॥
[दोहा]
तुम्है राजकी पछिम पतिन छिम, सकल सकत न तनै संभारि ।
सुनतहिं शाहिजहानके, धुनत नारि अरि नारि ।।
[ भुजंगप्रयात ]
हुते आपने देशमे जे सुपारी ।
किये कोपिके माहि तेते दुपारी ॥
८२
कृपाते किये किये है सुपारी ।
वुपारीनि कीनो ऊनीके उपारी ॥
८३
कहे तीयसो होइ सो जोत लिषारी ।
कह्यो राजु वै सो भए अभिषारी !
छोनिके छेहके छानिक राज छीन ।
पुराशान केते पिरेशान कीने ॥
अरबी सिधिवु गरब्बी जुन छोनि तोरे ।
घने रूमके सामके मारि मोरै ।।

कवीन्द्र कल्पलता १५ ८७ ८६ ९० [दोहा] उत्तर दिसि जय जीति के, उत्तर कहै वपानि । नौनि जोरतें जीति, लई सव पानि ।। [ भुजंग प्रयात ] किते उत्तरी तोरि कैते उतारै । उए मानके होत जैसें सु तारे ॥ सवै राजकों साजको छांडि भाजै । गुना ही हने फेरि बाजेति वाजे ॥ किते तेजके जोरिसो जारि डारे । किते सत्रु संसार हीत विडारे ।। असीसै सुधा सी सदा पान कीजै । पृथी साहिजाहा जुग कोरि जीजें । [दोहा] शाहिजहां दिल्लीस वर, विलसत सब सुष जीति । हरि रसतें हरितें सरस, पाए पेम प्रतीति ॥ [ कवित्त ] मडत धमडिकै अपंड नव पडनिमै, चड मारतड जोति लौ वपानियत है। प्रले पारावार पय पूरसे पसरि परे, पुहमीके ऊपर य्यों पहिचानियत है। पडवके दाह समे पडवके वान जिमि, मंडि महिमंडलकै अरि भातियत है । साहिजाहं शाहिजूकें फौजके फैलाइ देपो, जंबूदीप सीउ भरि तंबु तानि यत है । वरीको वहाइ वोरे गाढे गढ कोट तोरे, गिरि गहवर कौर ऐसेइ सुभाईकी। ६२ कवीन्द्र-कल्पलता ६४ ६५ धन वन चूरि डारै पलदल घेरि मारें, सत्रुके उजारे देस भांति प्रल वाइको । कंधार कहा है इसु पाह दहवट्ट ह है, रहै न निशानी जीति देपो इह दाइकी। अरिनिकी फौजेकू पनारे सीपनारे सी है, साहिजहाजूको फौजें मोज दरिआइकी । [ दोहा ] सपत दीप नव पंडमें, भुवन चतुर्दश मांहि । शाहिजहाना वाद सो, नगरु दूसरो नाहि ।। नहि उपमा को दूसरो, जामै छरि नु सवाद । शाहिजहांना वादसो, शाहिजहानावाद ॥ नैनरस न जाके सहस, सेस सुरेस समान । शाहिजहानावादको, निरपि सु करे वपान ।। [कवित्त ] मदिरतें ऊंचे मनि मंदिर ए सुदर है, मेदिनी पुरदरको पुर दरसतु है । हियेमे हुलास होत नगर विलास लपि, रूपक विलास हूते अति सरतु है । दुदुभि मृदग नाद विविध सवाद जहा, मु साहिजहानावाद सुप वरसतु है । छही ऋतु छाई छाजे पाछी छवि देपनको, मानव कहा कहै इन्द्र तरसतु है ।। अंगनिम जैसे नन बननिमे साचे वैन, ज्ञाननिम ब्रह्मज्ञान उत्तम वपानिये । नरनिमै मुरतर नरनि ज्यो गृहनिमें, मनिनमै चितामनि जमे महा मानिये । ६६ १७ ६८

कवीन्द्र-कल्पलता
88
सरनिमें मानसर सरिनमे मुरसरी,
गिरिनमें मेरगिरि वडे उर ग्रानिये।
दीपनिमें जंबूदीप साहिनमं साहिजहां.
नगरमें त्यो साहिजहांनावाद जानियें ।।
सुरगतें नीचे निकाईके निपट ऊंचें,
जाके आगे वैजयंत जोति न जगति हैं ।
साहिजहां शाहिजूके मंदिर सपेदी ग्रागें,
निपट अंधेरी राति चांदनी लगति है ।
लाल लाल लालनिकी लाली दौरे पासमान,
चांदनीमें दिन होत चादनी भगति है ।
नीले नीले मनिनकी नीली काति ही रात,
दिन होति राति भांति भातिनि जगति है ।
१००
[सवैया ]
नीरज तीरकी भीर गंभोर गत्यक समीरको जानि न जानी।
घरोमें घटा घुमड़े घन घोरि घरोकमे पोन घरोकमे पानी।
देपि अपार विचित्र चरित्र कहा वरने मतिहे मुरझानी।
साहिजहानके तेज प्रतापतें भाति कछूक कवीन्द्र वपानी। १०१
[कपिच ]
फूले फरे वाग देपि तन मन फूलत है,
हरित निहारे हार हियरा हरत हैं ।
लाल लाल लाला देपि लोल मन ललचात,
पीरे २ फूल मन पीरहि हरत है।
ऊपर अपार हेतु मार धनमार मम,
ऊजरे पहार मन कजगे करत है।
मीनल ममीर धीर मुपमीर पनीर,
नदी नीर तीर माहिजहा विहग्न है ।
१०१

१८
कवीन्द्र-कल्पलता
[सबैया ]
घरीकमें रैन घरीकमें द्यौस, घरीकमें सांझ, घरीमें सवारो।
घरीकमें घाम, घरीकमें छांह, छनौ ऋतु छाय रही दिन सारो ।
सीत हिमंत वसंत गिरीपम है, वरसा सरसाइतु सारो।
धीर उसीर सुगंध समीर, यहै कससीरकी रीति विचारो॥१०३
[कवित्त]
वाजे वाजे वहु अंग सेना सार्जे चतुरंग,
दिग्गजसे गजराज आगेही जियत हैं।
सातौ दीप सातौ सिंधु नवो पंड दसो दिशा,
लोकालोक तौ दुहाई देस लीजियत है।
साहिजहा साहि सोहें साहिब किरान शानी,
मवकी असीस ए अमृत पीजियत है ।
यामे नाही कळू फेर लागे न तनक वेर,
याकी समसेरि जग जेर कीजियत है।
अवर सी भई भूमि हयपुर थारनिसों,
छाई छिति अवरमें पव्वय पिसानको।
दिगपाल दलमले कछ कोल कलमलें,
झलहले सिंधु मुधी धूली है इशानकी ।
करि घमसान अरि नगर मसान कियें,
धाई है दिसानि धीर धमक निसानकी।
साहिजहाजूके पास वैरी वनवास गहै,
राइ राजा राना रीति गहत किसानकी ।।
१०५
गज्जत है गजराज बज्जत नगारे भारे,
लज्जत सघन धन भज्जत दुवन हैं।
धुक्रुत धरनि घर लुक्फत तरनि कर,
नुक्कत मतनि वैरी मुक्कत मुवन है ।
१०४

कवीन्द्र-कल्पलता
१६
१०६
छुट्टत कमान गढ गाढे कोट टुट्टत है,
फुट्टत है सातों सिंधु कंपत भुवन है।
ईस दस सीस सम सीसनिसो पाइ पाइ,
साहिजहाजूके पाइ लागत छुवन है ।
वाज जब बाजे वैरी एक मिले एक भाजे,
वाजे है निवाज वाज घेरि घेरि मारे है।
पर पुर परजारें सव देस है उजारे,
कहत हहारे हारे दुवन निहारे है ।
मंडियत नव पंड पडियत पल झुड,
दंडियत तेहै जै अडंडी भूप भारे है ।
शाहिजहांजूके डर डांग डाग डोलत है,
डारि डारि डावरनि वैरी जे विडारे है ।।
वाजत ही भेरी ढक्का ढहे गढ कोट पक्का,
चक्काचूर वैरी होत चक्काके संभारे है।
सातो दीप जाकी सत्ता रविते प्रताप तत्ता,
ऐसी है चकत्ता मदमत्ता वैरी जारे है ।
धनुपके टकारमे लंकापति शंका माने,
बसे है पलका बंका और को विचारे है।
साहिजहाजूके वैर भग्गत वचत कौन,
पग्गनिके प्रागसो समग्ग पडि टारे है ।
इति योमर्वविद्यानिधान बोन्द्राचायंसरस्वतीविरचिताया
पवीन्द्र-गल्ललताया माहिजहा विषयन भाषा पवित्वानि ।
१०७

१८
कवीन्द्र-कल्पलता
[ सवैया ]
घरीकमें रैन घरीकमे द्यौस, धरीकमें सांझ, धरीमें सवारो।
घरीकमें घाम, घरीकमे छाह, छनौ ऋतु छाय रही दिन सारो।
सीत हिमंत वसंत गिरीपम है, वरसा सरसाइतु सारो।
धीर उसीर सुगंध समीर, यहै कससीरकी रीति विचारो॥ १०३
[कवित्त]
वाजे वाजे वहु अंग सेना साजे चतुरंग,
दिग्गजसे गजराज आगेही जियत है ।
सातो दीप सातौ सिंधु नवो पंड दसो दिशा,
लोकालोक लौ दुहाई देस लीजियत है ।
साहिजहां साहि सोहें साहिब किरान शानी,
सबकी असीस ए अमृत पीजियत है।
यामें नाही कळू फेर लागे न तनक वेर,
याकी समसेरि जग जेर कीजियत है ॥
१०४
अंबर सी भई भूमि हयपुर थारनिसों,
छाई छिति अंवरमें पव्वय पिसानकी ।
दिगपाल दलमले कछ कोल कलमलें,
झलहलै सिंधु सुधी धूली है इशानकी।
करि घमसान अरि नगर मसान कियें,
धाई है दिसानि धीर धमक निसानकी ।
साहिजहांजू पास वैरी वनवास गहै,
राइ राजा राना रीति गहत किसानकी ।।
१०५
गज्जत है गजराज वज्जत नगारे भारे,
लज्जत मपन धन भज्जत दुवन हैं।
धुक्मत घरनि घर लुक्कत तरनि फर,
चुक्फत मतनि वैरी मुक्कत मुवन है ।

पोन्द्रमा
प. पटन बदनाबग्ग बग्ग गरम,
नही माना।
मान मानो पग्ना,
पर पटनरमी न जा।
गयाय का, किरात,
नहानि गर्ने गिरा।
मा पोरगा पर गए पाग,
का मा निर्म गगना।
मांगनमोतिगर्म जगमगान,
नामा मामार
मारा
५.
गग भगानी
घाम गामगि गाणे नियन
inframiमभा।
Tोगो
और दोनोगामागीना।
Fortant गरम ।
nirmire
Terrfarin
1

अथ श्रीसाहिजहांजूके धुरपद
लालन पग धारिये तिय तिहारो मगु चितवति ।
नेकके माहटु चोकि परति सुमिरनहीमै निसि दिनु चितवति ।
तिहारे रूप गुन चतुराईनि मन भरति और वातनिते मनु रितवति ।
साहिजहां पिय तिहारे मिलनको तिय तरसितवति ॥
१
२
तेरे री मुपको चंदकी उपमा देत,
अब लौ मन न आवति ही सु अब आई ।
तुव सुदर वदनमे अंकु न देप्यो हो सु देष्यो,
तासो पटतर दीवो यहै कलंक री माई।
चद जोति दिन दिन घटति,
तुव मुप जोतिकी दिन दिनकी अधिकाई ।
याहीते प्यारी तू साहिजहां प्यारेके मन भाई ।।
पाली री हौ चाहति ही,
भाति-भाति उराहनो देन ।
काहू सौ करत सेना ओरके करत सेन,
अरु काहू दीजे सुप सेन हम तरस न,
बलि वेनते अधिक मेरी कहा वह वेनको,
सुधि की जानती हौं तुम वैन ।
ऐनमेन मेन मूरति साहिजहाँ निरपत हो,
मैं न जानी मान कहा कहावत सुधि रही मनमै न ।
साहिजहांकी छविको कवि समुद्रकी उपमा देत बार वार उपमा वनति नाहीं।
-
वाम चौदह रतन तेऊ मथि लीने,
यामे गुन रतन जोति अपरंपार ।

कवीन्द्र कल्पलता २३ १२ यह अचिरजु मिलन समे उलटि घटुतु वाही क्रम । सोई सुभ सम प्रौज वही मिलें साहिजहां सुपदाई परम ॥ प्यारे कैसे कहो तुम मेरे प्राननिसौ तौ इतनौ हितु, नाही मानती तातें तुम प्रान प्रान । प्रान ऐसी ज्यो कहिये इनमें भेदु, नाही पाइयतु मेरे यहै ज्ञान । तातें मोहिं बताइए, कहा कही शाहिजहां महाजान ।। प्यारी लाजनि चित न सकति, प्यारेको पूंघट पट अौ निहारति । उपनन दिप ज्यौ अहिक देषियतु, जे चतुर तेयी उपमा विचारति । और चितन चितवत कर नैननि आगे, धरिये त्यों अंचर मुप पर डारति । इहि विधि शाहिजहा सुन्दरकी, मुप छवि निरपि आपुहि वारति ॥ दक्षिन नायकके लछनि जे कहियत, ते सब तुमहे अरु ग्रथनिमें जे गाई निकाई। कोउ छविसो छकाई, कोउ औधि दे मनसनाई । कोऊ नैन सैननि ललचाई, कोउ वननिमे न रस सरसाई । शाहिजहा मन भावन सवनि, परिझवनको ए चतुराई कहा पाई ।। तन मन फूलत नर नारी, ताते वसंतु वपानिये। प्रताप रवि ग्रीपम दान, झरु लग्यो रहतु तातै वरिपा मानियें । ३ १४ २२ कवीन्द्र-कल्पलता C याहीते ऐसी तिय साहिजहा, पिय तिहारे मन बसति । प्यारीको मानु प्यारेके हाथ, तामें प्रतिविवत प्यारो। दरपनमें तो समीप ही मूरति देपियति, पिय विछुरेहूंते न होत न्यारो। वामे तो सदा न दृष्टि परति, यामै सदाके द्रिष्टि परतिक सोऊ क्योन होइ ग्रंध्यारो। ताहीको भाग सुहाग अनुराग, धनि जाके हियें ऐसे वसे साहिजहां जगत उज्यारौ ।। वीरा वागे वने ठने, रतिपतिहूं ते अति सोहे। दिनपतिकी सी दीपति, चितयोन जात सोहें। इनसे एही दूजो न सवैय्यो, कहत करि सौहे। जाके आगे मति गनपतिकी कहा, सपति सुरपतिकी कहा ए साहिजहां पृथीपति सोहे ।। राग मलार जैसे ए तिहारे कर ऐसे काहूं के कर न । इन्द्र वरपत वरपामें जल ए वरपत ए सदाई सुवरन । कलप मिटी कहां कलप तरते ए सवही के दुप दारिद दरन । चिंतामनिते कौनको, चिंता मनकी मिटति गाहिजहा जग पोपन भरन ।। लालनके विधुरत रैनि ग्रीपम, दिन सीत पीत दिन रनि भ्रम । दिन दिन पगे महिना होत पहर एन वासर वरम सम । 8 १० कवीन्द्र-कल्पलता २५ . इहि विधि शाहिजहां पेलत होली, होत अति रस रंग। नवल वसंत नवल वनिता वनी, नवल लाल बने सब अंग। गायन गावत नृत्तक नृत्तत, तन मन बढत अनग । वीन रवाव तार डफ, बहु विधि वाजत सरस मृदंग । चोवा चंदन चन्द्र मृगमदके, उठत सुवास तरंग अभंग । साहिजहां चिरजीवे तो लो जो लौ जमुना गंग ।। १६ कनक महल मधि रितु वसंतम, पेलत शाहि इहि विधि की होरी। वसन अमोल आभूपन पहिरे, प्रौढा मुग्धा मध्या गौरी॥ उत्तिम गावति उत्तम नाचति, उत्तिम वाद वजावति । राग रस नूप परसपर, निरपि सुप पावति ।। चित्र विचित्र भयो अति सोहत, भू नभ मव्य विसात । उपवनके प्रतिविव हरयो है, अरु गुलाल रंगु लाल ।। चंदन चन्द्र कचूर चूरसो, अरु अवीरसो सेत । कृष्णागरके धूप धूमसौ स्याम वरन इहि हेत। छिति अंवरमे फैलि रही है अवरकी अति वास । तर कै रहै अतरसो आगन वाढत हिये हुलास ।। मृग मद आदि मिलाइ अरगजा पोर मची चोवाकी कीच। नृत्तत विछलत पाइ नृत्तकनिकै रग भूमिके बीच ।। वहु गुलावसो घोरि के केसरि, रतन जटित कनक पिचकारिनि । नवल लाल छवीलो छिरकात, रीझि रीझि वर नारिनि ।। अद्भुत पेल साहिजहाजूकें, को वरने कविराज । जुग जुग रहो अचल अचला पर, ग्रानद सहित समाज । २० औरनके गुन सर सरिता ज्यो, तेरो गुन अपरपार समुद्र समान। जिती कोऊ करे अलापचारी विस्तारसो, ताते सरस तेरी एक टीपकी तान । तेरे गावत और गाइन ऐसे छिपते, जैसे उडग उदै होत भान ।

२४ कवीन्द्र-कल्पलता १५ १६ जस निरमल चंद सरद सीलत, हेमंत अरि कंपत उर सिसिर ठानियें । विधी कीनै छ रितुवर समे, साहिजहां पृथ्वी पतिके सदाई छहो रितु जानिये ॥ सब विधि सरस वरस गाठि, विधिके वरसनिकी दीजै । पंचास कोटि जोजन, अचलाको अचल राज कीजे । ध्रुव धरनि चंद तरनिकी कहा, लोमस मार्कंडेयकी आयु लीजै । संसार साहिब शाहिजहा पृथीपति सुप समेत शंभु सम जीजै ॥ कचन वरसकी वरस गाठि देत, होत सुभ सगुन गन । उत्तिम गायन गावत नृत्तक नृत्त करत, वादक वजावत तत वित्तत सुपिरघन । लापनिके लाप लाप अभिलाप संपूरन होत, नर नारी पानदित तन मन । किरानसानी शाहिजहा छत्रपति, ती ली चिरजीउ रहो, जौ लौ मेर चद तरनि गगन पानी पवन ।। इहि विधिक वरसती वरस गाठि ही जै । विधिके दिनके छिन, तिन छेयुहु रत तिनके दिन महीना लीजै । तन मन पानदित नर नारी, आसीरवाद देत सोई सुधा रमु पीज। कचन वरस सरस, शाहिजहा कोटि जुग जीजे ।। १७ १८

कवीन्द्र-कल्पलता
२७
निसि दिन लगायो झर है महा,
इन्द्रनीलपद्म राग पुष्पराग हरित मनि मोंतिनि करि ।
सुरपति वरपतु वरसातु वरपा,
शाहिजहा नरपति वरपतु वरपो भरि ।।
२५
सर सरस वरस गांठि देत ही,
लापनिकी गाठि छोरि दीजियति है ।
राई किये राजा राजा महाराजा किये,
ऐसे रति लीजियति हैं।
चौदह रतन कनक रजत रागि तुलामै समता करति,
याते घर घरकी कीजियति है।
साहिजहा महा दानि देत ऐने प्रानदित होत,
जैसे पावत मुप पावत सर्व जगतकी नमीसें मुघा पीजियति है । २६
सरस वरम गाठि देत लह लदनिको,
लधनिकी गाठि छोरि लछ दीजियति है।
कनक रजत रासि तुलामै तुला करति,
ता पनहि यातें घर घर कीजियति है।
शाहिजहा मुपदाई मदाई विरानो ऐगी,
यमुपाकी मुधामी प्रगीस पीजियनि है।
गग टोडी
मनन रति मानि प्रान पाए प्यार प्यारी मागे घरी पारमी ।
ददिन सदिन दुरावत पं यंग दुरत छवि भई गारगी।
निय प्रपनो जानियो प्रपट न जनायो पागेनि प्रमुन पाग्मी ।
पाने रीमि. ग यग भाग माहिना मुन्दर माग्गी ॥२८
प्पागे गानो जब मानु नब गो पा गनुगः पीनी ।
पाईने पाग्मी मागे मरिनी।
निगाही मानु दि गयी गन मन में गभीनी ।

कवीन्द्र-कल्पलता
याहीतें रिझाई लीन सुरज्ञान,
साहिजहांन सानी साहिब किरान ।।
२१
आली री प्यारेको चितवनिप, होत चितवन पाऊं।
इत उत वहराइ जव ही चितकुं, तब चितवनिहीमै आऊ ।
रूप रस चतुराई सागर, सब विधि आगर कोन कोन गुन गाऊं।
साहिजहां सुन्दर मोहित तन मन भावत,होऊं उनको अति भाऊ॥२२
तिहारी सुन्दरताकी उपमाको और नहीं,
तिहारोइ प्रतिबिंव लहत ।
अनत कहां प्रतिविवहूंमै ऐसी छवि,
जो होइ यह जुगति गहत।
मेरे जान काम प्रतिबिंव सी हहै,
जाते वाहि अनंग कहत।
शाहिजहां छवीले छविवर जीत्यौ,
वह यातें छप्यो रहत ॥
वपत वली ऐसे तपत वैठे जाहि लागे,
रतन करोरिके करोरि करोरि ।
सप्त द्वीप नव पडनि ते जे मगाए आपु भुजवर,
अस जे रापे हे सव साहनि जोरि ।
जिनकी छवि आगे रवि दवि जाति,
रेनिमे द्वरि करत अध्यारेनि मोरि मोरि।
साहिनि मनि साहिजहा तापर अति ही विराजत,
और कचन बरसत झकोरि झकोरि ।।
मगन कीनै दानि दानी महादानी कीन,
जसु भयो पार समुद्र तरि ।
जाके आगे सुरतरकी सुरति काहि,
चितामनि चितमै न पावति ताकी को कहि सके सरि ।
१३
२४

पवीन्द्र-कल्पलता १६ ३ ३४ कौन चतुर अभाव कौन नी आतमा पर्म कौन विविध काल कौन एकादसौ दिसा, कौन सप्त रूप कौन कहिये रस द्विविध धर्म । इनके सब भेद जानत, माहिजहां महाजान मंसार मर्म । दोहा साहिजहां तुम आदि गुरु, अति ही हे सुरज्ञान । प्यारी नीकी यो लगे, जैसे नीकी तान । [कवित्त ] सकल कला निधान महाजान साहिजहां, मेरे जान तिय प्रतिबिंब सी लसति है । सुपके मलिन भए प्रापुन मलिन होति, आनंदमै पानंदत हसते हसति है । यह अधिकाई यामे झुक झुकति नाही, कर मनुहारि मनु रोसते कसति है। ऐसी नाइकाके हिये नित ही वसत तुम, तिहारे ऊ हिये तिय ऐसी ये वसति है ।। सारी शाल लाल लाल मनि साल मोती माल, लाल जाल हाल वाल पाल नित देत है । तोही दीवे काज अोर नायिकानि देत रहे, तेरो नाउ तीवे हीके ओरनिको लेत है । तेरे गुन गन्यो चाहे ताते और नाइकाके, गने गुन सुप शोभा बानुरी समेत है। मेरी आली मानु छाडि उठि चलि हिल मिल, शाहिजहां महाजान सुन्दर सुचेत है । लाल धन मोती माल, तोही दीवे काज और तियनि देत । तेरो ताऊ लीवे को और तिय को नाउ लेत। ३५

२८
कवीन्द्र-कल्पलता
शाहिजहां नवल लाल इहि विधि रस
वसकै ललना कंठ लगाइ लीनी ।।
२६
देसी
आलीरी काहेते तेरी थकित भई गति ।
सेद रोम हरपवानी भेद पंक अंगनि अति ।
और कांति अनिमिप नेननि चित्रकी उपमा लहति ।
ये जानी निरपेरी साहिजहां मोहन मूरति पति ।।
३०
राग मलार
१
साहिजहा जू को देपि थकित भई,
ये हे गति जोवनके भार मानो चलि न सकति है।
अग अंग सेद कन रोम रोम हरपी है,
वानो माझ भयो भेद छाती धरकति है।
औरें भाति और कांति अनिमिप नैननि सो,
चित्र हीकी उपमाको लहिके जकति है ।
यह तो अधीरा प्रौढा धीरा मुग्धा जे नवोढा,
तिनहूके ऐसे हाल काहे न तकति है ।
दिन पिनमे वीतत छिन दिनसे होत,
दरसन विन दरसन पियके ।
निसि दिन जो दरसन पावै, धनि सुहाग भाग तियके ।
अरु ए जव सुदृष्टि के चितवत, तप सर्व सुप होत जिपके।
साहिजहा सुपदाई सदाई चाहै जाहि,
ताके सपूरन मनोरथ हियके ।
कौन कहियत सप्त पदारथ कोन नोइव्यं,
कौन चौवीम गुन कौन पाच कर्म ।
कौन सामान्य विगेप कोन समयाय कोन पद्भाव,

कवोन्द्र-कल्पलता ११ - तर लता नरनारी तनमन फूलत रंग, विरंग कीनो जगत वाग। रोर पत झार केउ सुप चोंप कौप उलहत, रसाल कवि मोरे हिये अनुराग । गायन कोइल जस पंचमे गावत मंगन मधुप, कीरति सुवास माते इहि फाग। साहिजहां पृथीपतिको सुभावै सदा वसंत, धनि पृथीको सुहाग भाग ।। ४३ साहिजहां प्रत्यछ काम मूरति काम परिछाही, और न उपमान यह शवद प्रमान । उपाधि विनु व्यापति तिहारी ता ज्ञानते, होत कहा प्रभुको अनुमान । व्यधिकरन धर्माभाव, वपाने ताको वड़ो सयान । चारि अभावके जाने तापर रीझे, साहिजहा महाजान ।। कचन वरसकी वरस गाठि देत, होत सुभ सगुन । सुभ नपत वलीकों व्यास, साधि दीनी सुभ लगुन । सर्व सव पावत मगन भीर, ऐसी ज कोउ पावत सगुन । साहिजहां पृथीपति देत ऐसे सुप पावत, जेसे लेत सुप गुनी अगुन ।।४५ प्यारेको लपि प्यारी ऐसे हुलसति, ताहिको मवं वरनि । ज्यो चद देप कुमुदिनि, और कमलिनि जोहि तरनि । अरुप्यौं दुलहे ज्यो, कुमिलानी वेलि परे भरनि । तन मन अति प्रानदित सोई जापर, साहिजहाँ मुन्दरको होइ ढरनि ।। ४६ पाली री निसि दिन प्यारेको मूरति वसति जियमें । वाह रगनिसो लिपीनु काम चित हेरे यिमें । और तिय औरनि दिपावनको सवीह रापति वैमोन नेह पियमें। साहिजहा मुन्दर ऐसे जाके हिय वमें सो सराही तियमें । ४८ ४७

कवीन्द्र-कल्पलता
तेरो गुन गन्यो चोहे तो ते,
ओर तियनिके गुन गनत चतुराई समेत ।
यह सुनि समुझि मुसिक्याइ प्यारी कंठ लगाइ,
लीनी साहिजहां सुजान सुचेद ।।
वासो वैसी मया करत है, अवलासों अव लागे ऐसी करन ।
तिहारे विछुरत सर्व दुप आइ जुरत,
अब मिलि सुप दी कलि करन ।
दछिन नाइकके लछिन ऐसी ई गहे जु,
काहूसों करत नेन सेन काहूके लगत करन ।
जगत उज्यारे साहिजहा प्यारे,
प्यारीको ज्यों तिहारे करवाके करन ।।
३८
दल चढत धूरि पूरि रहति, चंद सो मंद रवि नाचत ।
मोर व्योम घटा जाति दुंदुभि धुनि गरज सुनि पपोहा बोलत,
यों कहत इन्द्र कवि तामें चंचल चौर वडा पाति ।
मानो कटि वर वरछी विजु छटा सी चमकत ।
रिपु रहत दवि चक्कवा बिछुरत, रेनि जाति सत्रु मुदत ॥
साहिजहांजूके पयानकी छवि
प्यारी प्यारेको चितवति, घूघट पट अोट दिये ।
लाजनि चितै न सकति अव, चितवति उपनैनकी उपमा लिये।
दपतिकी छवि कहालौ वपानिये, वर हुलास हिये ।
साहिजहा सुन्दरकी सोभा ज्यो सरसति पल पल,
त्यौ त्यो रूप रस प्यासे नैन पिये ||
दोहा
इते मानु पतिव्रतु धरै, सुतिय पतिव्रता जानि ।
तिय प्रतिबिब न चाहई, रूप दूसरो मानि ।। ४१
मुप सुन्दरता देषिके, विधिको भई जु भूल ।
फल ललनाके उर लगे, लालनके उर फूल ।।
४२

कवोन्द्र-कल्पलता
४३
तर लता नरनारी तनमन फूलत रंग,
विरंग कीनो जगत वाग।
रोर पत झार केउ सुप चोप कौप उलहत,
रसाल कवि मोरे हिये अनुराग ।
गायन कोइल जस पंचमे गावत मंगन मधुप,
कीरति सुवास माते इहि फाग ।
साहिजहा पृथीपतिको सुभाव सदा वसंत,
धनि पृथीको सुहाग भाग ।।
साहिजहा प्रत्यछ काम मूरति काम परिछाही,
और न उपमान यह शवद प्रमान ।
उपाधि विनु व्यापति तिहारी ता ज्ञानते,
होत कहा प्रभुको अनुमान ।
व्यधिकरन धर्माभाव, वपाने ताको वड़ो सयान ।
चारि अभावके जाने तापर रोझ, साहिजहां महाजान ।।
कचन वरमकी वरम गाठि देत, होत सुभ सगुन ।
सुभ नपत बलीकों व्यास, साधि दीनी सुभ लगुन ।
सर्व मव पावत मगन भोर, ऐसी ज कोउ पावत सगुन ।
साहिजहा पृथीपति देत ऐसे मुप पावत, जेमे लेत मुप गुनी अगुन ।।४५
प्यारेको लपि प्यारी ऐसे हुलसति, ताहिको सर्व वरनि ।
ज्यो देष कुमुदिनि, और कमलिनि जोहि तरनि ।
अरुप्यो दुलहे ज्यो, कुमिलानी वेलि परे भरनि ।
तन मन अति आनदित सोई जापर,
साहिजहां सुन्दरको होइ ढरनि ।
प्राली री निसि दिन प्यारेको मूरति वसति जियमें।
वाह रगनिमो लिपीनु काम चित हेरे हियमें ।
और तिय पोरनि दिपायनकों सवीह रापति वैमोन नेह पियमें।
साहिजहा मुन्दर ऐमे जाके हिय व मो सराही तियमें।
४७

३२
कवीन्द्र-वल्पलता
माई री प्यारेकी सूरति मन मुकुरमें सदा निहारति ।
औरति सीस धरति औरके दिपाइवेको यहै विचारति ।
निसि दिनु जागत सोवन नेकु न विसारति ।
साहिजहां मोहन मूरति पर ही मर्व सु वारति ।।
द्वितीय भूलना
४६
सुभ नपत रचि रपत नृप लसत वपत वर,
तपत पर वैठि छवि सिह छाजै ।
तेज दुति अक्क सम सक्क जिमि सक्क,
महि चक्कावति एक बहु चक्क गाजै ।
लक पति वंककी रंक तिय सकतें,
अक परजंक सुप छाडि भाजै ।
जीति नव पंड परचंड भुजदड वर,
साहिजहा साहि वलि वंड राज ।।
[ कवित्त ]
मुन्दर समत्थ मत्थ सिंदुरसों,
लत्थ पत्थ गहे रवि रत्थ मद वारि वरपे।
ऐसे हे उतग ए मतग साहिजहाजूके अगनि,
सुमेरहूके शृगनिसो घरेपे ।
ऐरावतके से वेटे दिग्गज लगत चेटे,
दूरसो घुरेटे देयि रोम रोम हरपे ।
चरयो चक्क चपै अरिचर डर कप,
वोह काज सिधु रूपैले कलपत्तर करपै ॥
दिन पिनसे वीलत पिनदिन से
होत दरसन विनु दरसन पियके ।
निसि दिन जो दरसन पावै,
धनि मुहाग भाग ता तियके ।

कवीन्द्र-कल्पलता
३३
विनु निरपे पल कलप होत कलप रहित,
मिलिवेकी होत न सुप जियके ।
परसन चितह साहिजहां सुन्दरको दरसन,
पाय पूरन होत मनोरथ हियके ।
प्यारेको मेरो एक मन एक्व तन होत विरह दुप काहे ।
परसपर वन सेन प्रालिंगन परसपर नैन चाहें ।
हो तो तन मन भेद न जानति रहरि अभेद अवगाहे ।
दछिन लछिनतें साहिजहां प्यारे प्यारीनि सौपे मनि वाहे ।। ५२
अरसोहै नैन लाल लाल अरु सोहे क्यो करत ।
और पेच पागहे छोडे पेच पागहे,
हम प्रान जे वनिता सो विहरत ।
साहिजहा पिय छवि मोहि भावति हो,
ऊन्हे भावति पै तुम अनत ढरत ।
आनन चाही कछू पै आनन चाहो हो,
आनन्दित जु इत ऐसे हूं पगु धरत ।।
सुन्दर तन भूमि हियो क्यारी चितवति जल सीचि वाह वयो।
उलही लहलही पेम वेलि तामे हू फूल फूल भयो ।
सो विरह तरनिसों कुमिलाति अवलो कछु न गयो।
साहिजहा पिय सोई कीजे जाते होइ रग रस नयो ।
सुगम नेह करिवो कठिन निवाहिवो सोई सके जो जाने रिस जीति ।
पेम भग डग धरि करिये सोई जाते दिन दिन वढे परतीति ।
ताते वित हित य्यो वढत य्यो पाछिले पहर परत छांह की रीति ।
यह जिय जानिये जासो भांवरितासों,
साहिजहा ऐसिये करत प्रीति ।।
मत्त सगीत लिये नृत्तक सब नृत्तत त्रिविध पंचग ।
उडत गुलाल केसरि जल छिरकत अरु फुलेल उतमंग ।

३४
धीन्द्र-वल्पलता
चोवा चन्दन चंद्र मृगमदके उत सुवास तरंग अभंग ।
मोहनकी छवि निरपि तियनके अंग अंग बढावत अनंग ।
सुप सवाद संपूरन तन मन साहिजहां सुन्दरके संग ।
यह राज समाज रहो थिरु तोलो जोली जमुना गंग ।।
इति श्रीसर्व विद्यानिधान क्वीन्द्राचार्य सरस्वती विरचिताया
क्वीन्द्र-कल्पलताया साहिजहा विषयव ध्रुवपदानि ।

?
३
अथ विष्णु पद
[ सरसी छन्द]
मै हूँ लियो वह मोहि कन्हैया, मोहि रही हो मोही ।
देपि सुंदर तन थकित भई मति, मुधि नही हो कोही ।।
वाट घाट बीथी गृह प्रांगन, पानि पर सब ठाउ ।
अव लों वची जैसे तैसे ही, अव कहा करां कित जाउं ।
निरपि रूप में चित दियो उत, इतहि सपी मुसिक्यानो।
ताहू गएँ तही दृग रापें, यह चतुराई ठानी ।।
हिये हो नेक हेरत ही, तन मन गई विकाइ ।
पुलक भई भर दृग उपजे, ... पाठो भाइ॥
पाउ मोहि मिलि कहि मोहीसो, लेत और को नांउ ।
अधर कपोल मीडि अपने ही, परत आपने पाउ ।।
तब मै रीझि सवारी विदुली, यह मिस कर्यो प्रनाम् ।
उनहू समूझि सवार्यो तुररा, मार्यो कुररा कामु ।।
और निपट चतुराई हो हूं, रही लुभाइ लुभाइ ।
मिलि न सक्ये या लोक लाजते, तीनी सरस मुभाइ ।।
चितं कुचनि तन कमल कटी हूँ, छाती धरि धरि ममक ।
मोहन गुपाल घल्ल छवील, लई अापने वमके ।।
फागुन माम ग्राव वहु वोरे, वन उपवन मब फूले।
हम दोऊ मिलि एक मने मनि, मुरति हिंडोरे भूले ।
जातिपाति कुल घरम गवायो, प्रान पियारो पायो।
कोज कटू रहोगे होगेम, कियो काजु मनभायो ।
५
६
द
१०

अथ तत्वज्ञान विषयानि भापा पद्यानि
[कवित्त]
एक कहो पुरुप प्रकृति जग कारन है,
निर्गुन पुरुप एक जीव जु दोजा नही ।
पशुपति जग हेतु चेत नये जीव जुदो,
और और वासुदेव भगवंत मान ही ।
ताते जीव संकर्षन मन परद्युम्न अहंकार,
अनिरुद्ध जीवजु दोके न जानही ।
एक कहै नित्य ज्ञान नित्य सुप नित्य इछा,
कृति जाके और चारि गुनके विधान ही ।।
सरवज्ञ जगतके उनमान न जान्यो जातु,
जीवते जुदो है प्रभु जीव कोनसा नही ।
ऑन कहे ऑन २ छन २ देही होत,
सरवज्ञताहीके हे निपट पपानही ।
एसे एसे मत कहे हमतो न एको गहे,
निज वेद तत्वको कहत है निदानही ।
उपादान कारन निमित्त फुनि कारन है,
जगको सु तारन तरन जिअ पानही ॥
निराकार निरजन केवल अनंद ज्ञान,
विभु अविनाशी प्रभु एक पहिचान ही।
जैसे लूता ततु प्रति उपादान निमित्त है,
एसे बूझि हियेके भरम भेद भान ही।
साप्य मत कह्यो आदि पाछे पाशुपत मत,
पुनि पचरात मत गुनिके गनायो है।

कवोन्द्र-कल्पलता ३७ ४ ५ ताके प्रागे जैन मत सोई है त्रिदंडिनिके, आगे नागामत मीमांसक आयो है। ताके आगे पातंजल मतिवंत जानो, मत बेदंत सिद्धत मत प्रतमें जनायो है ॥ [चौपाई] रंग रंगकी गाइनि लेपो, एक रंगपं दूर्धाह देपो । मत नाना विध तैसे जानौ, एक भातिको अलपु वपानो । जव जव जो जो जह कह्यो, तव तव तह सो सो सह्यो । करि इछाके पार न पावै, यह वात मुर नर मुनि गावै ।। [मया ] भूमि न तोइ न तेज न वायु, नभो नमनो न कहे हम तोई । चित्त न बुद्धि अहं कृति नाहि, समूह मिला पुन आपुन होई । इनते उवर्यो विभु एक अपंड, महा मुप रुप मु केवल सोई। देपतु है सब ही मब जानतु, ताहिन जानत देपतु कोई॥ [कवित्त ] नेननिको मैन जोहै काननिको कान सोहे, रमनाकी रसनो है मो के वताइए । नामिकाको नामिका हेतु चाहूकी तुचा कहे, मनहूको मन अनगन गुन गाइये । नैन कान रमनामो मनहूसो जान्यो नहीं, एमके कहतु ताहि कमे के जनाइये । धरमनि धोई बुद्धि ताहीमे ममोई, जव ऐमी बुद्धि होई तव मोई प्रभु पाइये ।। [मया] मिम्य गुरु न मिपावनि नाहि, न से नहिमें न यहो पुनि नाही। पार न वार न प्रादिन अन, न मध्य फुरत यहे मय पाही। ६

कोन्द्र-कल्पलता
न सुन्न न पूरन एकु अनेकु न, केवल मिश्रित ए गति नाही।
नाहीकी नाही फुवि नाहिन जाम, वस जगु सो जगु माही॥
जागरु नाहिन सोवत है, न जिये न मरे सु विपेक विचारो।
प्रावतु नाहि न जात कहूं न, सुपैन दुपैन सवार विगारी ।
जानि जनाइ विचार विवेकनि, आपु तरो अरु औरनि तारी ।
बंधन नाहि न मोपु नहीं, यह आत्तम तत्व हि क्यों न संभारो॥ ६
विप्र न छत्रिय वैसु न सुद्द, व्रती न गृहस्थ वनस्थ पती है ।
ताके अचारन धारन, धर्म अधर्म न कर्म गती है।
भोगु न जोगु न रोगु, अरोगुरु तमोगुन एको रती है ।
जारे जरे नहि सारे सरे नहि, जानतु कोइक शुद्ध मती है ।। १०
तातु न मातु न ज्ञाति न गोतु न है, उन लोकन वेद वतावै ।
तीरथ है न व्रती फुनि, नाहि सुपुप्ति दसा यह वात जनावै ।
अतर बीज रहे सव रुपु यहै, उपमा कछु मो मन आवै ।
छाडि मिलापु रहे सवको, जब आपुनको तब आपुहि पावै ॥ ११
लागनि सोचनि एको नही, न सुषुप्ति दसा न दिसा विदिसा है ।
लाबो नही चकरोउ नहीं है, न छोटो न मोटो न केसो कहा है।
जाहि मुनीमुर जानत नाहि सु कैसे, के ताहि गुनीसुर गाहै ।
जाने कछू न यहै हम जानत, एक वहै सब ही निरवाहै ।। १२
ऊरध है न अधो पुनि, मध्य न बाहर भीतर ज्यो कहिये।
पूरव पश्चिम उत्तर दछिन एकु न, लछिन क्यो लहिये ।
नसेत न पीतह रह्यो नहि, लालन स्याम सु नैननि क्यो गहिये ।
भेप अलेप हि पूछत ही, यह ऊत रहै चुपु जो रहिये ॥ १३
दोहा
ब्रह्म सहज जो सिद्ध तो, पहिली वने न वात ।
जो मानो दूजी जुगति, तो दूजो ठहरात ।।
.
१४

कवीन्द्र-करपलता
[ सर्वया ]
एक अनेकन संत्तन पूरन गुद्ध असुद्ध नीयों मन आने ।
अंजन है न निरंजन है सपंड अपंड नही परिमानें।
ईस नही अनईस नही पुनि है ऊ नही न नहीं यह जानें ।
एमे को जाहि वपानत है मुनि कैसे के ताहि वनाइ वपाने ॥ १५
[चौपाई ] -
नाही है यह कैसे कहिये, हैहुंको तह ठौर न लहिये ।
है नाही की नाही जहां, थकित भई मति मेरी तहां ।। १६
[वीर छन्द]
प्रादि ब्रह्म अनादि परम पुरुप अमूरति अम्प निरविकार ।
अविगति अपंड व्यापक केवल परम जोति निरहंकार ।
निरलेप निरगुन निरजन निरालंव व्यापक निराधार ।
परमेसुर परम गति महा प्रभु सपूरन परमानंद अपार ।
"सोई सगुन सकति धरि करे विस्तार ।। १७
[गीतिका ]
धर्म मर्म मुकर्मके, जल कीजिये तन मंजना ।
विपे रगनि फटिक ज्यो, मन नॅक हू नहिं रंजना ॥ १८
क्षोभ लोभ विरोध क्रोधु, कुवोधु प्रादिहि भंजना ।
दीप जोति दिपावई, इमि पापु जोति निरंजना ॥ १६
[कवित्त ]
जान ध्यान उनमान गुरुके वचन वान.
जियें पान उपमान एकु पहचानियें ।
जागनि सपनि मेटि तुरीय लपेटि,
चितु तव जाइ तामी नेटि और लेन मानिये ।

कवीन्द्र-कल्पलता
कहतु है निज वेदु रह नुनता सो भेदु,
यह है गुपित्त भेदु मनमै वपानिये ।
जान ह्रके हूजे अनजान जग जाननकों,
तव जाइ महाजान जीकी जोति जानिये ॥
२०
परिहरि विषे संग हरि रंग छाडि परि,
नर हरिरंग रंगु अंग अंग ठानिये ।
भर हरि भजे भय धरहरि वडी होति,
जरि जरि जात अघजोति पहिचानिये ।
डरि डरि जात दुप महा भवसागरको,
तरितरि जात तेई जिनि जिय आनिये ।
हरि हरि ठौरनिते मनिहीको हरि हरि,
हरि हरि वातनिको हरि हरि जानिये ।।
जोई जोई देषियतु जोई मु जोई सुनियतु,
तेई तेई देपी सुनी साचीकै वपानिये ।
यह सांचु वह झुठु वह साचु यह झूठ,
ऐसी वात कहे जोई ताही झूठो जानिये ।
जोपे साच झूठको विचार साचो चाहत तो,
सब साच सब झूठ ऐसी आनिए।
झूठो साचो जानो जगु सांचो झूठो आनो मत,
झूठो रूठो साचो करतार मन मानिये ॥
तिलमे ज्यो तेल रहे दूधमे ज्यों घीउ लहे,
ऊपमें ज्यों पांड ऐसे अापु हरि पापुमै ।
काठ हीम आगि जिमि आग सेत ताई इमि,
मुनिनि वताई हरि जगत कलापमे ।
और हीको और जानि और हीमै और मानि,
भ्रमहोते होत भय जेवरीके सांपमे ।
२२

गीत-मना
एग होने जानियही मानिरी,
गय निग मेटि पानीनो है. मिनागमें ।।
जोग जन मान जान जर धूमपान गर्न,
मीरान फि. परं पाले में गन्न ।
वय मांगनि प्रनेग गाने मानप,
मगर मग नए प्रगनि नग्न ।
नाना
मुनि गोगो माग,
पारन पगए जन मनमोहन ।।
जाजनितिनगमो पप जग,
गानिमाज गंजा गा पा ॥
[गाया ]
गारगो पःपायन न याम नार गोमा ।
पापु पाणु जगान गिर नाग नागारो।
गुफा ना गुमा पान पामरी निको ।
माग मार दो मा मागर नागर 11
परिवार पाताया।
मोमा मामा
मागीमा पानी।
गोमागो EिRITI गर्मिनोमानी ।
म. गा! 7 मोमा:
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.

४२
कवीन्द्र-कल्पलता
.
मिट जग नांउ रूप ताको नाउं रूप ताको,
ज्ञान हीके नैननिसौ क्यो न ताको ताहिये ।।
२७
[सवैया]
में ही महीप गरीव मेंही अरु, मेंही अंदेवरु में ही अंपाती।
में ही गुरु अरु में ही सिप्य, सु मै ही अंतीरथ मै जन जाती।
मे ही महीजल तेज प्रभंजन, मे ही अकास दिसा दिन राती।
में हिंऊं थावरु में हिंऊं जंगम, ज्ञान महामद मो मति माती ।। २८
[ कवित्त ]
एक कहे देपे आपु प्रापुको दिपावतु है,
जा देपतु है जासों ताहूं आपु कारि मान ही।
तीनों प्रापु एकु आपु है अनंत, एकु प्राप,
ऐसी जुगति के आपु पहचान ही ।
आप यापु आपु ही आन होत आपु नही,
आन कहूं पान वही एक मति ठानी ही।
आपुहीमे रहे आपु आपुहीको गहे आपु,
असी भाति आपुनते आपु न को जान ही ॥
२६
[ सबैया]
दर्पनमें प्रतिबिवित, आनन प्राननतें परि अानन होई ।
दर्पन पान सु ानन पान वने उपमान जु पै कहै जोई ।
विव वहै प्रतिविव वहै वह दर्पन है छवि देपतु सोई ।
भेदु नहीं निज वेदु कहै यह भेद विभेद हि जानन कोई ॥ ३०
अलेप एक जानिये सु दूसरो न मानिये ।
विचारि मूलि भानि ये न और बुद्धि ठानिये ।
कुबुद्धि डारि दीजिये विवेक बुद्धि भीजिये ।
जमाई एक कीजिये मय्याइ तत्त्व लीजिये।

पोन्द्र-पम्पटना
[मया]
मपन रेपे विमापन भेष प्रलेप, अगेप यह हरि को।
कमे बने प्रतिवियु रहे, रम प्रभू त में प्रति मोमनि माई ।
ज्यो यह अंबरको प्रनिविय नमें जलमै, प्रभु गोइ मिजोई।
जोई न मोई गहे र मुनै यह, जाहि भिदीजिय जानन मोई॥३२
[अनाग]
न मूर है न चंद है, न गह पेतु मंद है।
न युद्ध है गर न है न मुम्ग है. न दंद है ।।
न और मध्य छोर हैन गाउ नाउ टोर है।
न जोर है न तोर है न कोवगे पटोर है ।।
नमुन्न भूमि पाई, या भूरि नाप है।
न पुन । न पार , न मापन यार है ।।
नरंत न पतन देन न त है।
न जान है न गोन, न पीन है न गेन है ।।
हरगों नही न गौर. नाना न भौर है।
ग गार है न पार न पोर पोर पोर ।।
नपारयार,गहीन मान धार।
पसारनपामगार नो प्रपार॥
मपोगन गन मानिन पानि ।।
प्रमानातिनातिनादि,
नमो.नागिरी र मोट।
मनदी.मग मो.॥
[i]
ननि मानो।
in umr argin: ।।
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कविन्द्र-कल्पलता ४२ ४४ अंतर गतके नैनके, ए नंना उप नैन । नीके पिय-छवि देपियति, याहीते चित चैन !। जागत है ज्ञानी जहा, तहं सोवत सब कोइ । जहां जहां जागत रहे, सोइ रहे तह सोइ ।। ४३ सोइ रहा तस ज्ञान तह, जागत जहां जहान । जागत जहा जहान तहं, सोइ रहत सज्ञान ।। [चौपाई ] ब्रह्म ज्ञान अनुभवकों पावै, मोह अविद्या पास न पावै । अत कोल इक छिन जो होइ, ब्रह्म सरूप होत तव सोई॥ ४५ [दोहा] माया मोह सबै नसै, ब्रह्म ज्ञान विचार । अंत काल जो छिन रहै, (तो) होइसु ब्रह्माकार ।। ४६ [चौपाई ] मोह अविद्या निकट न पावै, ब्रह्म ज्ञान अनुभव जो पावै । अत समै जो पिन भरि रहै, परब्रह्म पद आपुहि लहै ।। ४७ [दोहा] माया मोह सबै नमै, ब्रह्मानुभव विलास, अत समै जो छिन रहै होइलु ब्रह्म प्रकाश ।। माया मोह रहै नही, ब्रह्म ज्ञान जव होइ । सो जो अत समै रहै, ब्रह्म निरजन सोइ ।। मूढ अविद्या रनिमें, मोवत विना विवेक । ब्रह्म ज्ञान परकास दिन, जागत ज्ञानी एक ।। जह सौवत है जगत सव, तह जागत सज्ञान । जागत जगत जहा तहाँ, सोवत सदा सुजान ।। ज्यो सूरज परकासमै, उल्लू निरपत नाहि । यौ न ब्रह्म प्रकाशकों, मूढ लपें मन माहि ।। ४८ ४६ ५० ५२ कवीन्द्र-कल्पलता ४५ ५४ ज्ञान भान परकाससो, मिटै तिमिर अज्ञान । हियो कमल हुलस तवै, एसे भये विहान ।। अज्ञानीको जागिवो, सपने कैसो जानि । ज्ञानीको तीनिहु दसा, एक तुरीया मानि ।। जाग्रत सपन सुपुप्तिमे, भ्रमत रहै अज्ञान । तीज्यौ छोडि तुरीयमै, आदित सम सज्ञान । सोनो भूपन होत ज्यो, फेरि भूपनै सोइ । त्यौही ब्रह्म होत सव, सर्व ब्रह्म फिरि होइ॥ [सपैया] औरनि औरनि ठौरनि ठौरनि, दौरति है मनसा सव घाही । कचन सचनके परपचन, रचन चैन धरै मन माही। भापत और करे कुछ और, मु रापत और कछू चित चाही। जाने सवै जिय माने नही, कहि आवत है कहि पावत नाही ।। ५७ अध ऊरध मध्य मु वाहिर भीतर, ब्रह्म वहै विलस सब घांही । थावर जगम जीउ जित, सु कितैक गने सब है परछांही। तेई दमा गहिये कहिये, जेही व्यास वसिप्ट मुनीनि सराही । नाहि तिहारि करौ मनुहारि, सुजामै जगै जगु सोऊ गमाही ।। ५८ [ कनित ] पगानसो लरिवेते, काटि सीम धरिवेते, ती धेत परिवेते कीनी वाह ठाढी है । सर्व विद्या पढिवेते आगढके गढिवेते, प्रासमान चढिवते वामे कला वाढी है । नौहू पड फिरिवेते गिरिहूते गिरिवेते, हाथी वाघ भिरिवंतं पौरो टूटि काही है। समुदके तरिवेते पालेमे गरिवेते, अगनिम जरिवेते ज्ञान गति गाढी है ॥ - -

४६
कवीन्द्र-कल्पलता
[दोहा]
और औरके लिपित है, आपुहि लिपत न कोइ ।
यांहीतें वहि लिपत है, लिपत हि दूजी होइ ।।
६०
इतिश्रीसर्व विद्यानिधानावीन्द्राचार्य सरस्वतीविरचिताया
क्वीन्द्ररस्पलताया तत्वज्ञानविषयकानि भाषापयानि ।

अथ दारासाहिके कवित्व
[कवित्त ]
तरु लता नरनारी तनमन फूलत है,
लाल चित चोंप कोप पतझार मानिये।
आम आम वास मोले सु नजरि होते होत,
अनुराग रंम्यो वाग जगु पहिचानिए ।
ज्ञानकी सुवास लेत ज्ञानी भोर मत्त होत,
जस गावें गायनते कोइल वपानियें।
और साहिजादे दूरि पातसे उडे फिरत,
दारासाहि साहि वसत रितु जानिये ।।
परम नरम चित्त धरम मरम जाने,
सरम समुद्र है निकाई बोल नांहकी ।
और छत्रधारी छत्र छाह नं वचन पावै,
तेरेई वचन छाह सवहींको छांहकी।
सारी महि मडलीमें कीरति पसारी भारी,
दारासाहि जोर जेव दिल्ली नरनाहकी।
पालम पनाहतें पनाह होत आलमको,
तोहीते पनाह होति पालम पनाहकी ।।
सौ है भुम्मि भरतार दारिदको हरतार,
दारासाह करतार अवतार मानिये ।
गुनि मन रंजन है भारी भय भंजन है,
प्रगट निरजन हैं यो ही पहचानिये ।
वरीके विहंडन है पुहमीके मंडन है,
दुप दोप पंडन है ऐसे के वपानिये।

४८ कवोन्द्र-कल्पलता ३ दछिन दिसामै देपो सूरज प्रताप छोजै, ताहू दिसि जाको तेज परतापु जानिये ।। इन्द्र सम चन्द्र सम योगमे मछिन्द्र सम, दिन इन्द्र उपइद्र सिंह सम गूजिये । भिपारीनि धूप करौ भुम्मि भार भुजा धरौ, भारे भारे रिपु भूप भार माझ भू जिये । मेरी जीकी चाह यहै जगदीसजीकी सौह, लोमसकी आउ लेले दारासाहि तू जिये । तो सो न भयो है पाछे अागे हू रहे हहै, और तुमसे हो तुम एक मेरे यह पूजिये ।। यह हम कीनी टेक अनेक विवेक पानि, नेक जाति एक तोही तन मन पूजिये । राइ राजा उमराइ पान पाना राना साहि, और साहिजादे साहि लागे सब मूजिये । सूर चन्द्र तेज जम जग जगमनि रह्यो, कविन्द्र के कहे गुण कहा लगि कूजिये । भूतलमै पोता पूत सवनि समेत मुपी, तौलो जिये दारासाहि जो लौ यह धू जिये ।। सूरति रावरी देपि देपि वावरी भई है मति, और और मूरतिको मनते न छूजिये । एक ही है भाँति ऐसी एक हिये जानत हो, एक ही है कमी वाते मेटी तुम दूजिये । ग्रानदनि उमही है देपियतु तुम ही है, तुमहीने पालम तुरक कहिये दूगिये । और और ठोगनियो गज कहू वाज कौन, दारामाहिजूके दर दरबान हृजिये ।। ५ ६

कवीन्द्र-कल्पलता
१६
७
सुन्दरता सागर है पूरताको आगर है,
नागर उजागर है दारासाहि सोहना ।
दीनको दयाल दोऊ दीनके दहत दुप,
दारिदके दावानल गुनी मनमोहना।
लप लाप लापनिको देदे अभिलाप पूरे,
कोरि कोरि कोरिनिको देत जाहि छोहना ।
सपूत सयाने सांचे सूरज ससीसे सोहे,
कैसेमें कवित्त किये मेरी और जोहना ॥
[सबैया ]
साहिव आलम दिल्लीको वालम, दाराशिकोह हरी दरसावें ।
असील सुसील रसीलो रसाल, विसाल सदा सुरसे सरसावै ।
वैरीकों वांधिक वारिधि वोरत, वाजे निवार वधू तरसावै ।
मसके ससके धसके रिपु वे, जसके वसके वसुकों वरिसावे ।।
[ कवित्त ]
अरि उर साल देत जरजरी साल देत,
घोरे चारि साल देत हाथी देत मदके ।
राइ राजा उमराइ और साहिजादे साहि,
गुन सुर मुनीसुर जाके जात सदके।
असीस सुधा सी पीज लोमसको पाउ जीज,
वैरिनिके पीस लीज देदे सलगदके।
साहिनके साहि गाजी महमद दारासाहि,
कहालौ बपान जस तो वली अहदके ।।
अगनिमैं जैसे नैन, बनिनम वेद वन,
ज्ञाननिमै ब्रह्म ज्ञान, उत्तम वपानियें ।
तरुनिमै सुर तर तरनि ज्यों ग्रहनमे,
मनिनिम चितामनि जैसे महा मानिये ।

५० कवीन्द्र-कल्पलता सरनिमै मानसर हृदनमें नीर निधि, गिरिनमै मेर गिरि उर माउ आनिये । देवनिमें महादेव काहू अवतारनिमै, साहिनिम तैसे साहि दारसाहि जानिये ॥ १० ११ कंचन वर संकी सरस वरस, गांठि देत होन सुभ सगुन सुभ नपत, वपत वलीको, व्यास दीनी साधि सुभ लगुन । देत सुप पावत ऐसे जैसे, लेत सुप पावत संवगुनी अगुन । सोई साहिव दारा शिकोह, सगुन हृ प्रगट भयो जु है ब्रह्म निरगुन ॥ कौन कहियत सप्त पदारथ कोन नव द्रव्य, कौन चौवीस गुन कौन पांच कर्म । कोन सामान्य विसेप कौन समवाय कौन, कोन चतुर अभाव कोन आतम पर्म । कौने विविध काल कौन एकादस दिसा, कोने सप्तरूप कौन कहिये रस द्विविध धर्म । इनके सब भेद जानत, साहिब दारा शिकोह संसार वर्म ।। पाली री दपतिके तन द्वै, मन एक जानियें । जमे नैन द्वै देपिवो, अरु मुनिको एक वपानिये । ज्यो दरपनमें विव प्रतिबिंव के, द्वै देहपं ज्यो एक मानियें। दारामाहि प्यारेमो प्यारीकी प्रकृति, गेमी मिली जु न्यारी न पहिचानियें । १२ ३

कवीन्द्र-कल्पलता
-
जानी है कृपानी कित्ति तीन्यो लोकम वपानी,
अधिकानी रहो आउ दारासाहि सुवकी ।
जौ लौ हरि रानी रुद्ररानी रहे तो लौ रहो,
देह ठहरानी सिपह सिकोहा जुवकी ।
जो लौ सभु जोग ध्यानी, जौ लौ वलि व्यास ज्ञानी,
जौ लौ हनुमान मानी जौ लौ भाति भुवकी।
जी लौ विद्या वेदवानी जौ लौ मेर गंगा वानी,
जौ लौ सिंधुपानी राजधानी जौ लौ ध्रुवकी ।।
लागत पतगसे मतंग और जिनि पागे,
मेरते उतग मद निर्भर झरत है।
सिंचत है अंग नभ गगके तरग जल,
संगर अभंग धन रंगको धरत है।
तोरि डारै डारै सुरतरकी प्रसग पेल,
पग करै सुरगजे कौतिक करत है।
अगमे न वगमे कलिंगमे न ऐसे गज,
जैसे गज दारासाहिजूके विहरत है ॥
१५
मूरज ससक सुधा समर सुरेश सुर,
जौ लगि रसाके सातो सागर फेर है।
मभु सिवा सुरसरी सुरग सलिल सिभु,
समीर सुयभु सैल वरुन कुवेर है।
व्यास बलि विभीपन हनुमान अश्वत्थामा,
कृप और परसराम सेस सीस मेर है।
तौलौ जिये महमद दारासाहि जौलौ,
ऋपि लोमस औ मारकड अौ भुसुड सेर है ॥
पेसकस देहै देस देसके नरेस सव,
ठौर ठौर जाइ चतुरग जव गाजि है।

५२ कवीन्द्र-कल्पलता १७ भाई छोडि भामा छोडि भूपन भुवन छोडि, भभरि भभरि भूप भारे भारे भाजि है। औरनि कहा कहै कवीन्द्र इन्द्र से सब, नरन तज को सुरेस गुरु लाजि है । राजी है जगत तोसों दारासाहि महागाजी, श्राजु कालिका जो मेरे चहू चकवाजि है । अदंडीनि दडन हो बैरीके विहंडन हो, दारासाहि मंडन जगत जस छाए है। तेज मारतंड महि मंडलके आपंडल, परचड भुजदंड गुनी गुन गाए है। पड पड कीने पंड पंडनिके पल झंड, रु ड मुड झुड पेंचि पेचरनि पाए है। सुडीनिके सुडनिसो शोन भरे कुंडनिसो, भारी भकु रुंडनिसो भैरव अघाए है ।। मईझर झरत जे वैरिनिके गज झंड, सिंहकेसी झपटते झुकि झुकि झोरे है । कहू रुंड कहूं भकरुंड मुंड, दारासाहि महावली ऐसे मारि मोरे है । तुरत ही तही तही तनक तनकही सौ, अरिनके सिर तरवारिनसों तोरे है। जरते उपारे पारे पानीमें पपारे बाजे, वाजे वरी वोरिवोर वाजे वारि वोरे है ।। [द्वितीय भूलना] गरम प्रताप रवि नरम चित कहत कवि, वरम समारके भरम भान । सरम सिंधु रहै करम जगदीसको, घरमके मरम मव परम जाने । १८ १६

कवोन्द्र-कल्पलता
५३
भुम्मि भरतार यह विष्णु अवतार है,
पापु करतार मत सत्य माने ।
ज्ञान धारा धरे साहिदारा नृपति,
नित्त नारायणहि चित्त पाने ।।
[कवित]
सातो पारावार पय पारा ज्यौं डुलाए डुले,
गारा होत नाग लोक धमक नगाराके ।
धराधर धसि जात धरनी धसमसाति,
अंग अग कप होति ध्रुवहूसे ताराके।
हय पुरथारनिसो छार उठी प्रांवरमे,
सोउ मिटी वरसत गज मद धाराके।
सेस सीस नए प्रो करक परी कूरमके,
कोलहूके कूले टूटै चढे साहिदाराके ।।
सुधाहूते मुद्ध बुद्धि आठों सिद्धि नवों निद्धि,
अधरनीको अधरम नस्यो अरु नसेगो।
ध्रुवते अधिक धीर धरम धुरधर हो,
अपड प्रताप तेरो पड पड लसेगो।
धौसाको धुकारहीको धुनिको धमकहीते,
सोनेहूको धराधर धुकि धुकि धसेंगो।
साहिनिके साहि महामद दारासाहि तोसौ,
वैरि वाधि वसुधामै कोउ नाहि बसेगो ।।
गाढे गढ भजन है धनगर्व गंजन है,
अजन से कारे है डरारे धराधरसें।
भूरि धूरि धुधुरहैसे डरसो वधु रहै,
मानो सुर सिंधुरके वधु रहै सरसें ।
बलको न पारावार पारावार पारगा है,
सुडनिसौ तोरे तारा तारापति तरसें।
२२

कवोन्द्र-कल्पलता
२३
२४
मदके वहे पनारा याते भरें नदी नारा,
दीरघ दुरद दारासाहिजूको दरसे ।।
प्रलैकालक से धूमे भूमै करें धामधूमे,
सदा मतवारै झूमै, चूमै चन्द्रमडले ।
भारे भारे भूधरनि धक्कानि धसाइ डारै,
फौजनि विडारे डरपावत अपंडलै ।
धौसि धराकरे घारा रिपुकै न रहै गारा,
वाजत नगारा भौर सवै वास गडलै ।
दारासाहिजूके सूडि पुडरीक सुडादंड,
वरिवंड वैरिनिके करत प्रचंडलै ।।
सार करि वार कर गहतही करवार,
अरि परिवार डोले अनुसार पाराकें ।
धावे सिधुनात धूरिधाम निधि धुधुरित,
धरनी धसमसाति धमक नगाराके ।
दिग्गजनिगस पव्वय पिसान पव्व,
कीच मचे चुवत दुरद्द मद्द दाराकें ।
विद्दलत सेसदल बद्दल अरिहमत,
छडत समुद्द हद्द, चढे साहिदाराके ।
[दोहा ]
दारा नादिर य्यो वने, जैसे सीतारामु ।
कीरति मूरति मति सुमति, परमानंदके धाम ॥
[द्वितीय झूलना]
पलक मह सोर है झलक सब ठौर है,
पलकम पलककी विपति भानै ।
मुजमु घनसार सम दुप हरता रहै,
धर्म प्रवनार मनमर्म जानें।
२५

कवीन्द्र-कल्पलता
५५
धनद नवनिद्धिको हर सकल सिद्धिको,
विनुध गुरु बुद्धिको सो न मान ।
वहु आजान है भाति आजानकी,
तो महाजानकीको वपाने ।।
२७
इति श्रीमर्व विद्यानिधान क्वीन्द्राचार्य सरस्वतीविरचितिया कल्पलताया
दारामाहि विषयक ध्रुपद दोहा कवित्वानि ।

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५७ चतुर्थः सर्गः केवलैव तु लक्षका योजनानां प्रकीर्तितः । अप्रतिष्ठान विस्तारो वस्तुविस्तरवेदिभिः ॥२१७॥ इन्द्रकेषु च बाहुल्यं धर्मायां क्रोश एव च । श्रेणिवेषु स सव्यंशो द्वौ सन्यंशी प्रकीर्णके ॥२८॥ कोशः सार्धस्तु वंशायामिन्द्रकेषु तदीरितम् । श्रेणीगतेषु तु क्रोशौ नयः सार्धाः प्रकीर्णके ॥२१॥ मेघायामिन्द्रकेपूक्तं बाहुल्यं क्रोशयोयम् । स द्विव्यंशं तु तच्छृण्यां संयुक्तं तत्प्रकीर्णके ॥२२०।। साधौ द्वाविन्द्रकेष्वेतौ चतुथ्यां व्यंशास्त्रयः। श्रेण्या प्रकीर्णकेवेते षट्भागैः पञ्च पञ्चभिः ॥२२॥ इन्दकेषु यः क्रोशाश्चत्वारः श्रेण्युपाश्रयः । सप्त प्रकीर्णकेप्वैते पञ्चम्यामुपवर्णिताः ॥२२२।। सार्याः पष्टयां यः क्रोशा इन्द्र के श्रेण्युपाश्रिताः । चत्वारस्यंशकावष्टौ ते पड्भागाः प्रकीर्णके ॥२२३।। सप्तम्यामप्रतिष्ठाने चत्वारस्ते समुच्छ्याः । श्रेणिबद्धेषु पञ्चैव सत्रिभागाः प्रकीर्तिताः ॥२२॥ योजनानां चतुःषष्टिः शतानि प्रथमक्षितौ । नवतिर्नवसंयुक्ता क्रोशयोश्च द्वयं तथा ॥२२५।। क्रोशद्वादशभागाश्च तथैवैकादशापरे । इन्द्रकाणामिदं ज्ञेयमेकैक्स्यान्तरं बुधैः ॥२२६।। चतुःपष्टिशतान्येव नवतिश्च नवोत्तरा । श्रेणीगतान्तरं क्रोशौ तथा पञ्चनवांशकाः ॥२२॥ नवतिनव चैतानि चतुःपष्टिशतानि तत् । क्रोशाः सप्तदशान्येपा पत्रिंशदंशकाः ॥२२॥ इन्द्रकाणां द्वितीयायां पृथिव्यां तु पृथुश्रुताः । तद्योजनशतान्याहुरेकाजत्रिंशदन्तरम् ॥२२६॥ नवभिश्च नवस्या च योजनैः सहितानि तु । चत्वारिंशच्छतैर्युक्ता तथा सप्तधनुःशती ॥२३०॥ तावन्त्येव च जायन्ते योजनान्यन्ययाऽनया । श्रेणिबद्धस्थितानां च या पनिशद्धनुःशी ॥२३॥ सातवीं पृथिवीमें केवल अप्रतिष्ठान नामका एक ही इन्द्रक है तथा वस्तुके विस्तारको जाननेवाले सर्वज्ञ देवने उसका विस्तार एक लाख योजन बतलाया है ।।२१७॥ घर्मा नामक पहली पृथिवीके इन्द्रक विलोंकी मुटाई एक कोश, श्रेणिबद्ध विलोंको एक कोश तथा एक कोशके तीन भागोंमें एक भाग और प्रकीर्णक विलोंकी दो कोश तथा एक कोशके तीन भागोमें एक भाग प्रमाण है ।।२१८॥ दूसरी वंशा पृथिवीके इन्द्रक विलोंकी मुटाई डेढ़ कोश, श्रेणिवद्धोंकी दो कोश और प्रकीर्णकोको साढ़े तीन कोश है ॥२१६।। तीसरी मेघा पृथिवीके इन्द्रकोंकी मुटाई दो कोश, श्रेणिवृद्धोंकी दो कोश और एक कोशके तीन भागोंमें दो भाग, तथा प्रकीर्णकोंकी चार कोश और एक कोशके तीन भागोंमें दो भाग है ॥२२०॥ चौथी अञ्जना पृथिवीके इन्द्रकोंको मुटाई अढ़ाई कोश, श्रेणियद्धोंकी तीन कोश और एक कोशके तीन भागों में एक भाग तथा प्रकीर्णकोंकी पाँच कोश और एक कोशके छह भागोमें पाँच भाग है ॥२२१॥ पाँचवीं अरिष्टा पृथिवीके इन्द्रकोंकी मुटाई तीन कोश, श्रेणिबद्धोंको चार और प्रकीर्णकोंको सात कोश है ॥२२२।। छठवीं मघवो पृथिवीके इन्द्रकोंको मुंटाई साढ़े तीस कोश, श्रेणिबद्धोंकी चार फोश और एक कोशके तीन भागों में दो भाग तथा प्रकीर्णकोंकी आठ कोश और एक कोशके आठ भागोंम छह भाग प्रमाण है ॥२२३।। एवं माधवी नामक सातवीं पृथियोंके अप्रतिष्ठान इन्द्रकको मुटाई चार कोश, श्रेणिबद्धोंकी पाँच कोश और एक कोशके तीन भागों में एक भाग है । सातवीं पृथिवीमें प्रकीर्णक विल नहीं है ।।२२४॥ अब विलोका परस्पर अन्तर कहते हैं-प्रथम पृथिवीके इन्द्रक विलोंका अन्तर बुद्धिमान् पुरुपोंको चौसठ सौ निन्यानवे योजन (छह हजार चार सौ निन्यानवे योजन) दो कोश और एक कोश बारह भागोमसे ग्यारह भाग जानना चाहिए ॥२५-२२६॥ श्रेणिवद्ध विलोंका चौसठ सौ निन्यानवे योजन दो कोश और एक कोशके नी भागोंमे पाँच भाग है ॥२२७॥ तथा प्रकीर्णक विलोंका अन्तर चौसठ सौ निन्यानवे योजन दो कोश और एक कोशके छत्तीस भागों. में सत्रह भाग प्रमाण है ॥२२८II द्वितीय पृथिवीके इन्द्रक विलीका अन्तर बहुश्रुत-विद्वानाने दो हजार नौ सौ निन्यानवे योजन और चार हजार सात सौ धनुष कहा है ॥२२१-२३॥ श्रेणिबद्ध विलीका अन्तर दो हजार नौ सौ निन्यानवे योजन और तीन हजार सौ धनुष ६ ५८ हरिवंशपुराणे नावन्स्येव पुनस्तानि योजनानि परस्परम् । प्रकीर्णकान्तरं तस्यां तृतीय तु धनुःशतम् ।।२३२।। विनैकेन तु पञ्चाशदिन्द्रकाणां शतान्यपि । द्वाग्निंशय तृतीयायां पञ्च_ग्रंशद्धनुःशतैः ॥२३३॥ योजनानि हि यान्ति द्विप्तहस्रधपि च । श्रेणीगतान्तर तस्यां लब्धवर्णः प्रवर्णितम् ॥२३॥ चवारिंशत्सहाष्टाभित्रिंशत् शतानि वै । धपि पञ्चपञ्चाशच्छतान्येतत्प्रकीर्णके 1॥२३५।। पञ्चपष्टिश्च पत्रिंशच्छतानीन्द्रकगोचरम् । धनु शतानि तवेद्यं चतुथ्यां पञ्चसप्ततिः ॥२३६॥ योजनानि हि तावन्ति श्रेण्या पानवांशकः । धनूपि पञ्चपञ्चाशत्तावत्येव शतानि तत् ।।२३०॥ चतु.पष्टिश्च पनिशद् योजनानां शतानि तु । सप्तसप्ततिपरयानैस्तथा चापरावैरपि ।।२३८।। द्वाविंशतिधनुर्मिश्च नवभागद्वयेन च । प्रकीर्णकान्तरं बौध्यं तस्यामेव प्रकीर्तितम् ॥२३॥ सहस्राणि तु चन्वारि तच्चत्वारि शतानि च । योजनानि समस्तानि नवतिश्च नबोत्तरा ॥२४॥ धनुःशतानि पञ्चैव पञ्चम्यामिन्द्रकेविदम् । भेदान्तरप्रपञ्चरन्तरं प्रतिपादितम् ॥२४॥ सहस्राणि च चत्वारि श्रेण्या तावच्छतानि च । अष्टानवति नन्वेतत् पट महस्रधनूंपि च ॥२२॥ तच्चत्वारि सहस्राणि शतान्यपि च सप्तभिः । नवतिः शेषके चापपञ्चपष्टिशतानि च ॥२४॥ सहस्राणि च पट्पट्यां शतानि नव चाष्टभिः । नवतिः पञ्चपञ्चाशद्धनुःशतवीन्दके ॥२४॥ तावन्येव भवन्त्यस्यां योजनानि तदन्तरम् । श्रेणीबद्धेषु वक्तव्यं द्विसहस्रधनुर्युतम् ॥२४५|| सहस्राणि पडेवास्यां नवतिश्च पडत्तरा । शतानि नव सप्तत्या शेपे पञ्चधनुःगती ॥२४॥ ऊर्वाधस्त्रिमहस्राणि नवतिश्च नवोत्तरा । शतानि नव गव्यूतिः सप्तम्यामिन्द्रकान्तरम् ।।२४७।। श्रेणीबद्धान्तर चास्यां योजनानि भवन्ति हि । गम्यूतेश्च त्रिभागेन तावत्येवेति निश्चयः ।।२४॥ दशवर्पसहस्राणि गार काणां लघुस्थितिः । सीमन्तके विनिर्दिष्टा नवतिस्तु परा स्थितिः ॥२४६।। है ॥२३१॥ एवं प्रकीर्णक विलोंका भी पारस्परिक अन्तर उतना ही अर्थात् दो हजार नौ सी निन्यानवे योजन और तीन सौ धनुप है ॥२३२।। तीसरी पृथिवीमें इन्द्रक विलोंका विस्तार बत्तीस सौ योजन और पैंतीस सौ धनुप प्रमाण है ।।२३३॥ श्रेणीगत विलोंका अन्तर विद्वानोने बत्तीस सौ योजन और दो हजार धनुप बतलाया है ॥२३॥ तथा प्रकीर्णकीका अन्तर बत्तोस सौ अड़तालीस योजन और पचपन सौ धनुप कहा है ॥२३शा चौथी पृथिवीमें इन्द्रकविलोंका विस्तार छत्तीस सौ पैंसठ योजन और पचहत्तर सौ धनुप प्रमाण है ॥२३६।। श्रेणिवद्ध विलोंका अन्तर छत्तीम सौ पैंसठ योजन, पचहत्तर सौ धनुप और एक धनुपके नौ भागोमेंसे पाँच भाग प्रमाण है ॥२३७॥ तथा प्रकीर्णक विलोका विस्तार छत्तीस सौ चौंसठ योजन, सतहत्तर सौ घाईस धनुष और एक धनुपके नौ भागोमें दो भाग प्रमाण है ॥२३८-२३।। पाँचवीं पृथिवीके इन्द्रक विलीका अन्तर भेद तथा अन्तरीका विस्तार जाननेवाले आचार्योने चार हजार चार. सौ निन्यानवे योजन और पाँच सौ धनुप बतलाया है ।।२४०-२४१॥ श्रेणिबद्ध चिलीका अन्तर चार हजार वार सौ अंठानवे योजन और छह हजार धनुष है ॥२४२|| तथा प्रकीर्णक विलोंका अन्तर चार हजार चार सौ संतानवे योजन और छह हजार पाँच सौ धनुप है ।।२४३|| छठवीं पृथिवीके इन्द्रक चिलीका अन्तर छह हजार नौ सौ अंठानवे योजन और पचपन सौ धनुप प्रमाण है ।।२४४|| श्रेणिवद्ध विलोका अन्तर छह हजार नौ सौ अंठानवे योजन और दो हजार धनुप है ॥२४५॥ तथा प्रकीर्णक विलोंका अन्तर छह हजार नौ सौ छियानवे योजन और सात हजार पाँच सौ धनुप है ॥२४६॥ सातवीं पृथिवीमे इन्द्रक विलका अन्तर ऊपर-नीचे तीन हजार नौ सौ निन्यानवे योजन और एक गव्यूति अर्थात् दो कोश प्रमाण है ।।२४७|| तथा इसी सातवीं पृथिवीम श्रेणिबद्ध विलोंका अन्तर तीन हजार नौ सौ निन्यानवे योजन और एक कोशके तीन भागोमे एक भाग प्रमाण है ऐसा निश्चय है ।।२४८॥ अब सातो पृथिवियोमे जघन्य तथा उत्कृष्ट आयुका वर्णन करते हैं-पहली पृथिवीके चतुर्यः सर्गः माधिका तु परे चामावरा स्थितिरिष्यते । इन्द्र के नारकाभिरये लक्षास्तु नवनिः परा ॥२५०।। इयमेव जघन्या स्यात् रौरवै समयाधिका । पूर्वकोट्यस्वमंग्येया परमा परिकीर्तिता ॥२५॥ एषा चैवापरा भ्रान्ते स्थितिः स्यात् समयोचरा । सागरस्य परो मागी दशमोऽत्र परा स्थितिः ॥२५२॥ इयमेव जघन्या स्यादुझान्ने परमा पुनः । द्वावेव दशमी मागाविति तत्त्वविदां मतम् ॥२५३॥ सम्भ्रान्ते तु जघन्येयं दशभागास्त्रयः परा । अवराऽपावसम्भ्रान्ते परा मागचनुयया ॥२५॥ भवराऽसौ च विम्रान्त परा सेकाशद्धिता । प्रस्ते खबरा सा स्यात् षट् परा तु दशांशका २५५॥ ऋमिते वपरा प्रोक्ता परा सप्त तदंशका | वक्रान्ते मारा प्रोक्ता परा चाप्टौ दशांशकाः ॥२५॥ एपंवाना विपश्चिदिरवक्रान्तेऽवरा स्थितिः । नवैते दशमा मागास्तत्रैव परमा स्थितिः ॥२५७।। इयमेव तु विक्रान्ते जघन्या परमा दश । दश मागा स्थितिः सपा धर्मायां सागरोपमा ॥२५॥ सातिरेकाऽवरा सेव स्तरके सागरोपमा । सागरकादशांशी च सागरस्य परा स्थितिः ॥२५॥ प्रथम सीमन्तक नामक प्रस्ताग्में नारकियोंकी जघन्य स्थिति दश हजार वर्षकी और उत्कृष्ट नब्बे हजार वर्पको कही गई है ॥२४६॥ दूसरे नारक नामक इन्द्रकमें कुछ अधिक नब्बे हजार वर्षकी जघन्य स्थिति और नन्चे लास वर्षकी उत्कृष्ट स्थिति है ॥२५०|| रौरव नामक तीसरे प्रस्तारमें एक समय अधिक नम्बे लाखको जघन्य स्थिति और असंख्यात करोड़ वर्षको उत्कृष्ट स्थिति है ॥२५१॥ भ्रान्त नामक चौथे प्रस्तारमें एक समय अधिक असंख्यात करोड़ वर्षकी जघन्य स्थिति और सागरके दसवें भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ॥२५२।। उद्भ्रान्त नामक पाँचवें प्रस्तारमें एक समय अधिक सागरका दसवाँ भाग जघन्य स्थिति है और एक सागरके दश भागाम दो भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति तत्त्वत पुरुषाने मानी है ॥२५३॥ संभ्रान्त नामक छठवें प्रस्तारमें एक सागरके दश भागों में दो भाग तथा एक समय लघन्य स्थिति है और उत्कृष्ट स्थिति सागरके दश भागों में तीन भाग प्रमाण है । असम्भ्रान्त नामक सातवें प्रस्तारमें जयन्य स्थिति सागरके दश भागों में समयाधिक तीन भाग है और उत्कृष्ट स्थिति सागरके दश भागों- में चार भाग प्रमाण है ॥२५४|| विभ्रान्त नामक आठवें प्रस्तारमें जयन्य स्थिति एक समय अधिक सागरके दश भागों में चार भाग प्रमाण है और उत्कृष्ट स्थिति सागरके दश भागोंमें पाँच भाग प्रमाण है । त्रस्त नामक नौवें प्रस्तारमे एक समय अधिक सागरके दश भागों में पाँच भाग प्रमाण जघन्य स्थिति है और सागरके दश भागांम छह भाग प्रमाग उत्कृष्ट स्थिति है. ॥२५॥ त्रसिन नामक दसवें प्रस्तार में जघन्य स्थिति एक समय अधिक सागरक दश भागाम छह भाग प्रमाण है और उत्कृष्ट स्थिति सागरके दश भागोंमें सात भाग प्रमाण है। चक्रान्त नामक ग्यारहवें प्रस्तारमें जघन्य स्थिति एक समय अधिक सागरके दश मागों में सात भाग प्रमाण है और उत्कृष्ट स्थिति सागरके दश भागोंमें आठ भाग प्रमाण है ॥२५६॥ भवक्रान्त नामक बारहवें प्रस्तारमं एक समय अधिक सागरके दश भागाम आठ भाग प्रमाण जघन्य स्थिति है और एक सागरके दश भागोंम नी भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति विद्वानांने कही है। विक्रान्त नामक तेरहवें प्रस्तारमै जघन्य स्थिति एक सागरके दश भागामें समयाधिक नो भाग प्रमाण है और उत्कृष्ट स्थिति सागरके दश भाग िदशों भाग अर्थात् एक मागर प्रमाण है। इम प्रकार घर्मा नामक पहली पृथिवीके तेरह प्रस्तागम जपन्य तथा उत्कृष्ट स्थितिका कथन किया अब दूसरी पृधिवीके ग्यारह प्रम्ता में स्थितिका वर्णन करते हैं ॥२५४-२५८।। दूसरी पृथिवीके स्तरक नामक प्रथम प्रस्तारमें नारकियोंकी जपन्य आयु एक ममय अधिक एक सागर और उत्कृष्ट स्थिति एक सागर तथा एक सागरके ग्यारह अंशाम दो अंश प्रमाण १ मः।

हरिवंशपुराणे स्थितिरेपैव विज्ञेया स्तनकेऽनन्तरावरा । चतुरेकादशांशाच सागरश्च परा तथा ॥२६॥ अनन्तरा विनिर्दिष्टा मुनिभिमनवेऽवरा । पकादशभागाश्च सागरश्च तथा परा ॥२६॥ एपेवावादि विद्वदिवन के चावरा स्थितिः । अष्टंकादशभागाश्व सागरश्च परा तथा ॥२२॥ सैपैवाद्या विघाटेऽपि षटुभिः प्रकटावरा । दशैकादशभागाश्च सागरश्च पर तथा १२६३॥ इन्द्र के स्वियमेव स्यात् सद्धाटेऽनन्तराऽवरा । तत्रैकादशभागश्च सागरौ च परा स्थितिः ॥२६॥ स्थितिरेपैव बोधव्या जिह्वाख्येऽपीन्द्रकेऽवरा । यस्त्वेकादशांशास्ते सागरौ च तथा परा ॥२६५।। असावेव समादिष्टा जिलिकाख्येन्द्रकेऽवरा । पञ्चैकादशभागाश्च सागरी च परा स्थितिः ॥२६६॥ एपैवानन्तरा वेधा लोलनामेन्द्रवरा । सप्तकादशभागाश्च सागरौ च परा तथा ॥२६॥ भवत्यनन्तरैवैपा लोलुपेऽपीन्द्रकेऽवरा । नवैकादशभागाश सागरी च परा तथा ॥२६॥ भवरैपा परापीटा स्तनलोलुपनामनि । सागरमयमेतेषु वशाया सागरास्त्रयः ॥२६॥ सागरत्रयमेवासाववरा तहनामनि । चत्वारो नवभागाश्च परमा सागरास्त्रयः ॥२७॥ इयमेवाऽवरा वर्या तपितेऽपीन्द्र के स्थितिः । तथाऽष्टौ नवभागाश्च परमा सागरास्त्रयः ॥२७॥ तपनेऽन्यवरैपैव नव भागास्त्रयोऽपि तु । चत्वारश्च समाविष्टा परमा सांगराः स्थितिः ॥२७२॥ इयमेवोपीता सा तापनेऽप्यवरा स्थितिः । सा सप्त नवभागास्तु चन्वारः सागराः परा ॥२७३।। है ।।२५६॥ स्तनक नामक दूसरे प्रस्तार में यही जघन्य स्थिति है तथा एक सागर पूर्ण और एक सागरके ग्यारह भागों में चार भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ॥२६०॥ मनक नामक तीसरे प्रस्तारमै यही जघन्य स्थिति है और एक सागर पूर्ण तथा एक सागरके ग्यारह भागोंमे छह भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ॥२६१।। वनक नामक चौथे प्रस्तारमें विद्वानोंने यही जघन्य स्थिति तथा एक सागर पूर्ण और एक सागरके ग्यारह भागों में आठ भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति कही है ॥२६२॥ विघाट नामक पॉच प्रस्तारमै यही जघन्य स्थिति तथा एक सागर पूर्ण और एक सागरके ग्यारह भागों में दश भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति विज्ञ पुरुषोंने प्रकट की है-बतलाई है ॥२६३।। संघाट नामक छठवें इन्द्रक अथवा प्रस्तारमैं यही जघन्य स्थिति है और दो सागर पूर्ण तथा एक सागरके ग्यारह भागोमे एक भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ॥२६४॥ जिव नामक सातवें प्रस्तारमे यही जघन्य स्थिति है और दो सागर पूर्ण तथा एक सागरके ग्यारह भागोम तीन भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ॥२६५॥ जिहिक नामक आठचे प्रस्तारमें यही जवन्य स्थिति है और दो सागर पूर्ण तथा एक सागरके ग्यारह भागोंमें पाँच भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ॥२६६॥ लोल नामक नौवें प्रस्तारमें यही जघन्य स्थिति तथा दो सागर पूर्ण और एक सागरके ग्यारह भागोंमे सात सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति जानना चाहिए ॥२६७।। लोलुप नामक दसवें प्रस्तारमै यही जघन्य स्थिति और दो सागर पूर्ण तथा एक सागरके म्यारह भागामे नौ भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ।।२६८।। एवं स्तनलोलुप नामक ग्यारवे प्रस्तारमे यही जघन्य स्थिति और तीन सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है। इस तरह वंशा नामक दूसरी पृथिवीमे सामान्य रूपसे तीन सागर प्रमाण स्थिति प्रसिद्ध है ॥२६॥ तीसरी पृथिवीके तप्त नामक प्रथम इन्द्रकमे तीन सागर जघन्य और तीन सागर पूर्ण तथा एक सागरके नौ भागामे चार भाग प्रमाण जघन्य स्थिति है ॥२७०।। तपित नामक दूसरे इन्द्रफमे यही जघन्य तथा तीन सागर पूर्ण और एक सागरके नौ भागोमें आठ भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति वर्णन करने योग्य है ॥२७१।। तपन नामक तीसरे इन्द्रको यही जघन्य और चार सागर पूर्ण तथा एक सागर के नौ भागोमें तीन भाग पूर्ण उत्कृष्ट स्थिति कही गई है ॥२७२॥ तापन नामक चौथे इन्द्रको यही जघन्य स्थिति और चार सागर पूर्ण तथा एक चतुर्थः सर्गः - निदाघेऽप्यवर पैव स्थितिः समुपवर्णिता । परा तु नवभागाभ्यां सागराः पञ्च सञ्चिताः ।।२७॥ अजघन्या निदाघे या सैव प्रज्वलितेऽन्यथा । पड्नवांशकसन्मिश्रा परा पञ्च पयोधयः ।।२०५।। परा प्रज्वलिते येयं सेव चोज्ज्वलितेऽपरा । तथा सनवभागास्ते पट्समुद्राः परा स्थितिः ॥२७६।। उत्कृष्टोज्ज्वलिते येयं सैव सम्वलितेऽवरा । सपञ्चनवभागास्ते परमा पट् पयोधयः ॥२७७॥ सा सम्प्रज्वलित होना परा मागरमतम् । तृतीयनरके तेऽमी प्रसिद्धाः सप्त सागराः ॥२७॥ या सम्प्रज्वलिते दीर्घा हस्वारे सा प्रकीर्तिता । दीर्घा सप्त समुद्रास्ते सप्तभागास्तथा त्रयः ॥२७॥ भारे या परमा प्रोक्ता तारे सेवापरा स्थितिः । परा सह समुद्रास्ते पड्भिः मतभागः ॥२०॥ तारे या परमा प्रोक्ता सैव मारेऽवरा स्थितिः । सह सहममागाभ्यां पराऽप्यप्टी पयोधयः ॥२५॥ मारे तु या परा सैव वर्चस्के वर्णिताऽवरा । पञ्चमप्तमभागैस्तु पराष्ट जलाशयः ॥२२॥ वर्चस्के परमा याऽमी तमोऽप्यवरा स्थितिः । परा सप्तममागेन संयुका नव सागराः ॥२३॥ परा तु तमके याऽपो जघन्या सा पडे मता । चतुर्भिः सप्तमैर्भागः पराऽपि नव सागराः ॥२८॥ पडे तु परमा याऽसौ हीना पडपढेऽप्यसौ । चनुा सुप्रसिद्धास्ते परा तु दश सागराः ॥२८५|| सागरके नौ भागों में सात भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बतलाई गई है ॥२७।। निदाय नामक पाँचवे इन्द्रकमें यही जघन्य और पाँच सागर पूर्ण तथा एक सागरके नौ भागोंमें दो भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति वर्णन की गई है ।।२७४।। प्रज्वलित नामक छठवें इन्द्ररमें यही जघन्य स्थिति तथा पाँच सागर पूर्ण और एक सागरके नौ भागामें छह भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ।।२७५।। प्रज्वलित इन्द्रककी जो उत्कृष्ट स्थिति है वही उज्ज्वलित नामक सातवें इन्द्रकको जघन्य स्थिति है तथा छह सागर पूर्ण और एक सागरके नौ भागोंमें एक भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ।।२७६|| उज्ज्वलित इन्द्र में जो उत्कृष्ट स्थिति है वही संज्वलित नामक आठवें इन्द्रकको जघन्य स्थिति है तथा छह सागर पूर्ण और एक सागरके नो भागोंमें पाँच भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ॥२७॥ संप्रज्वलित नामक नौवें इन्द्रकमें यही जघन्य स्थिति और सात सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है। इस तरह तीसरे नरफमें सामान्य रूपसे सात सागरकी स्थिति प्रसिद्ध है ॥२७॥ ऊपर संप्रज्वलित नामक इन्द्रकमें जो सात सागरकी उत्कृष्ट स्थिति यतलाई है वह चौथी पृथिवीके भार नामक प्रथम इन्द्रकर्म जघन्य स्थिति कही गई है तथा सात सागर पूर्ण और एक सागरके सात भागामसे तीन भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बतलाई गई है ॥२७॥ आर इन्द्रकम जो उत्कृष्ट स्थिति कही गई है वही तार नामक दूमरे इन्द्रकम जघन्य स्थिति बतलाई गई है, तथा सात सागर पूर्ण और एक सागरके सात भागीमसे छः भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति कही गई है | तार इन्द्रकमें जो उत्कृष्ट स्थिति कही गई है वही मार नामक तीसरे इन्द्रकमें जघन्य स्थिति यतलाई गई है और आठ सागर पूर्ण नथा एक सागर- सात भागोमे दो भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति कही गई है ॥२८१|| मार इन्दकर्म जो उत्कृष्ट स्थिति कही गई है वहीं वर्चरक नामक चौथे इन्द्रकम जघन्य स्थिति यतलाई गई है और आठ सागर पूर्ण तथा एक सागरके सात भागाम पाँच भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति कही गई है या वर्चस्क इन्द्रकमे जो उत्कृष्ट स्थिति कही गई है वही तमा नामक पाँचयें इन्द्रफर्म जपन्य स्थिति बतलाई गई है और नी सागर पूर्ण तथा एक सागरफे सान भागोंमें एक मागर प्रमाग उत्कृष्ट स्थिति कही गई है ।।२८३॥ तमक इन्द्रकमें जो उत्कृष्ट स्थिति कही गई है यही पह नामक छठ इन्द्रफमें जघन्य स्थिति यतलाई गई है और नौ मागर पूर्ण तथा एक सागर फे मात भागामें चार भाग प्रमाग उत्कृष्ट स्थिति प्रदर्शित की गई है 2n पड इन्द्रस्में जो उत्कृष्ट स्थिति यही गई है यही पडपड नामक सातवें इन्द्रको जपन्य स्थिति यतलाई गई है

६२
हरिवंशपुराणे
दशार्णवास्तमोनाम्नि जघन्या सा पडे मता । सह पञ्चमभागाभ्यामुत्कृष्टंकादशाणवाः ॥२६॥
इयमेव भ्रमे हस्त्रा स्थितिः सम्प्रतिपादिता । चतुर्भिः पञ्चमैर्भागः परा द्वादशसागराः ॥२७॥
एव हि झपे हीना स्थितिरु कपिणी पुनः । साकं पञ्चमभागेन चतुर्दशपयोधयः ॥२८॥
इयमेवाराऽन्धे सा सत्यसन्धेरुदीरिता । सविपञ्चमभागास्तु परा पजदशान्धयः ॥२८॥
एव च तमिस्रेऽपि जघन्या स्थितिरिष्यते । पञ्चम्यां सुप्रीतास्ते परा सप्तदशार्णवाः ॥२६॥
अवरा तु स्थितिः प्रोक्ता हिमे सप्तदशार्णवाः । पराऽपि द्विग्रिभागाभ्यामष्टादश पयोधयः ॥२६॥
बर्दले स्थिनिरपैव जघन्या समुदीरिता । परा त्रिभागसंमिश्राः विंशतिस्तु पयोधयः ॥२२॥
लल्लके तु जघन्येयमजघन्या स्थितिः पुनः । पठ्या प्रोक्ता मुनिश्रेष्ठद्वाविंशतिपयोधयः ॥२६॥
इयमेवाप्रतिष्टाने जघन्या स्थितिरुच्यते । योत्कृष्टा सा हि मप्तम्यां त्रयविंशत्पयोधयः ।।२६४॥
नारकाणां तनू सेधो हस्ताः सीमन्त के बयः । तस्के तु धनुर्हस्तः सार्धान्यष्टांगुलान्यसो ॥२३५॥
रौरुके धनुरुत्सेधस्त्रयो हस्ताः शरीरिणाम् । अङ्गुलान्यपि तत्रैव भवेत् सप्तदशैव सः ॥२६॥
और दश सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति कही गई है। इस प्रकार चौथी पृथिवीमें सामान्य रूपसे
दश सागर स्थिति प्रसिद्ध है ॥२८॥
ऊपर जो स्थिति कही गई है वही पाँचवीं पृथिवीके तम नामक प्रथम इन्द्रकमे जघन्य
स्थिति बतलाई गई है। और ग्यारह सागर पूर्ण एक सागरके पाँच भागांमें दो भाग प्रमाण
उत्कृष्ट स्थिति कही गई है. ॥२८६॥ भ्रम नामक दूसरे इन्द्रकर्म यही जघन्य स्थिति कही गई है
और बारह सागर पूर्ण तथा एक सागर के पाँच भागामे चार भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बतलाई
गई है ॥२८॥
झप नामक तीसरे इन्द्रकमें यही जघन्य स्थिति कही गई है और चौदह सागर पूर्ण
तथा एक सागर के पाँच भागोंमें एक भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बतलाई गई है ॥२८८।। अन्ध्र
नामक चौथे इन्द्रकमे सत्यवादी जिनेन्द्र भगवान्ने यही जघन्य स्थिति कही है और पन्द्रह
सागर पूर्ण तथा एक सागरके पाँच भागोमे तीन भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बतलाई हैर!
तमिस्र नामक पॉच इन्द्रकमें यही जघन्य स्थिति मानी जाती है और सत्रह सागर प्रमाण
उत्कृष्ट स्थिति यतलाई जाती है। इस प्रकार पॉचची पृथिवीमे सामान्य रूपसे सत्रह सागरको
आयु प्रसिद्ध है ॥२०॥
छठवीं पृथिवीके हिम नामक प्रथम इन्द्रकमे सत्रह सागर प्रमाण जघन्य स्थिति कही गई
है और अठारह सागर पूर्ण तथा एक सागरके तीन भागोमें दो भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति
चनलाई गई है ॥२६१॥ यदल नामक दूसरे इन्द्रक विलमें यही जघन्य स्थिति कही गई है और
बोस सागर पूर्ण तथा एक सागरके तीन भागोमे एक भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बतलाई
गई है ॥२२॥ मुनिया में श्रेष्ठ गणधरादि देवोने लल्लक नामक तीसरे इन्द्रकमे यही जघन्य स्थिति
कही है तथा वाईस सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बतलाई है। इस प्रकार छठवीं पृथिवीमें
सामान्य रूपसे बाईस सागर प्रमाण आयु कही गई है ॥२६३।।
सातवीं पृथिवीमें केवल एक अप्रतिष्ठान नामका इन्द्रक है सो उसमे यही जघन्य स्थिति
वतलाई गई है और जो उत्कृष्ट स्थिति है वह तैंतीस सागर प्रमाण है। इस प्रकार सातवीं
पृथिवीमें सामान्य रूपसे तैंतीस सागर प्रमाण आयु प्रसिद्ध है ॥२६४|| अब नारकियोके
शरीरकी ऊँचाईका वर्णन किया जाता है-
पहली पृथिवीके सीमन्तक नामक प्रथम प्रस्तारमै नारकियोके शरीरको ऊँचाई तीन
हाथ है। तरक नामक दूसरे प्रस्तारमें एक धनुप एक हाथ तथा साढ़े आठ अङ्गुल है ।।२६।।
रोरुक नामक तीसरे प्रस्तारमें एक धनुष तीन हाथ तथा सत्रह अङ्गुल है ॥२६॥

चतुर्थः सर्गः । भ्रान्ते द्वे धनुपी हस्ताव गुलं सार्द्धमप्यमौ । उद्भ्रान्ते तु ग्रयो दण्डाः मोऽगुलानि दशोदितः ॥२६॥ धपि प्रीणि सम्भ्रान्ते द्वौ हस्ताबगुलान्यपि । भष्टादशैव सार्दानि नारकोस्मेध ईरितः ॥२६८।। कार्मुकाणि तु चरवारि हस्तस्त्रीण्य गुलानि च । असम्भ्रान्तेऽ'यसम्भ्रान्तरुत्सेधः साधु वर्णितः ॥२६॥ घरवारः खलु कोदण्डास्त्रयो हस्तास्तथोदिताः । विभ्रान्तेऽपि विभ्रान्तः सा रेकादशाङ्गुलैः ॥३०॥ चापपञ्चकमुरुमेधः तथा हस्तश्च विंशतिः । भगुलानि समुद्दिष्टस्वस्तमामनि पेन्द्र के ॥३०॥ धपि च पदु सधस्वसिते प्रासितानिनि । साहुलचतुकं घ चतुरः प्रतिपादितः ।।३०२।। वक्रान्ते धनुषां पट्कं सहस्तद्वितयं तथा । कथितं कथक्रन्दैरहुलानि प्रयोदश ॥३०३।। धनुःमप्तकमुःसेधः सार्थम गुलेन च । भवान्ते बुधैठकः सोऽगुलान्येकविंशतिः ॥३०॥ विक्रान्ते सप्त चापानि यो हस्ताः पदहुली । म एष विहितः प्रारु सेधः प्रथमावनी ॥३०५।। स्तरकेऽप्टी धपि द्वौ हस्तावद्गुलयोद्धयोः । द्वावेकादशभागी च नारकोरसेव इप्यते ॥३०६।। स्तन के नवदण्डास्तु द्वाविशत्यहुलानि च । उरसेधो वर्णितो युनश्चनुरेसादशांशकः ॥३०७|| मनके नवदण्डाश्च प्रयो हस्ताः सहागुलैः । अष्टादशभिरुसेयः पभिरेकादशांशकः ॥३०॥ धमके दश दण्डाद्वी हस्तान्सेध इप्यते । साप्टकादशभागानि सोऽहुग्लानि चतुर्दश ॥३०॥ घाटे कादशप्रार्दण्डा हम्तो दशामुलैः । दशैकादशभागाश्च देहोरसेधः प्रकीर्तितः ॥३१०।। संघाटे द्वादशोत्सेधो दण्डाः मप्ता द्गुलान्यपि । तथैकादशभागाश्च नारकाणामुदाहृतः ।।३।। भ्रान्त नामक चौथे प्रस्तार में दो धनुप दो हाथ और डेढ़ अङ्गुल है। उद्भ्रान्त नामक पाँचवें प्रस्तार में तीन धनुप और दश अगुल है ॥२६॥ संभ्रान्त नामक छठवें प्रस्तारमै तीन धनुप दो हाथ और साढ़े अठारह अंगुल है ॥२६८॥ असंभ्रान्त नामक सातवे प्रस्तारमें विशद ज्ञानके धारी आचार्याने नारकियों के शरीरकी ऊँचाई चार धनुप, एक हाथ और तीन अङ्गुल वतलाई है ॥२६॥ भ्रान्ति रहित आचार्याने विभ्रान्त नामक आठवें प्रस्तारमें नारकियोंके शरीरका उत्सेध चार धनुष तीन हाथ और साढ़े ग्यारह अङ्गुल प्रमाण कहा है ॥३००॥ त्रस्त नामक नौवें प्रस्तारमे पाँच धनुप एक हाथ और वीस अड्गुल ऊँचाई कही गई है ॥३०१॥ जहाँ प्राणी भय- भीत हो रहे हैं ऐसे त्रसित नामक दसवें प्रस्तारमें नारकियों के शरीरकी ऊँचाई चतुर आचार्योंने छुह धनुप और साढ़े चार अङ्गुल प्रमाण बतलाई है ॥३०२॥ वक्रान्त नामक ग्यारहवें प्रस्तारमें श्रेष्ठ वक्ताओने नारकियोंका शरीर छः धनुष दो हाथ और तेरह अङ्गुल प्रमाण कहा है ।।३०३।। अवक्रान्त नामक बारहवें प्रस्ताग्मं विद्वान् आचार्याने नारकियोंकी ऊँचाई सात धनुप और साढ़े इकोस भङ्गुल कही है ॥३४॥ और विक्रान्त नामक सेरहवें प्रस्तारमे सात धनुष तीन हाथ तथा छः अङ्गल प्रमाण ऊँचाई है। इस प्रकार बुद्धिमान् आचार्याने प्रथम पृथियों में ऊँचाईका वर्णन किया है ॥३०।। दूसरी पृथिवी के स्तरक नामक पहले प्रस्तारमें नारकियोंकी ऊँचाई आठ धनुप, दो हाथ, दो अहुल और एक अगुलके ग्यारह भागामें दोभाग प्रमाण मानी जाती है।।३०६॥ तनक नामक दूसरे प्रस्तारमें नारियों का उत्सेघ नी धनुष वाईस अगुल और एक आगुलके ग्यारह भागीमें पार भाग प्रमाग कहा गया है ।।३०७॥ मनक नामक तीसरे प्रस्तारमै नौ धनुप तीन हाय अठारह अहुल तथा एक अहलके ग्यारह भागमि छह भाग प्रमाण ऊँचाई यतलाई है ॥३॥ पनक नामक धोये प्रस्ताग्में नागकियोंके शरीरकी ऊँचाई दश धनुष दो हाय चौदद आहुल और एक अहुलके ग्यारह भागमि आठ भाग ममाग मानी जाती है ॥३०॥ पाट नामक पाँचवें प्रस्तारमें ग्यारह धनुप, एक हाथ, दश भार और एक अहुल ग्यारह भागाम दश भाग शरीरको ऊँचाई कही गई है ।।३१०॥ मंघाट नामक एठयें प्रनामें नार- १. मुद्देशः म.1 - हरिवंशपुराणे जिहाल्ये द्वादशैवोक्ता दण्डा हस्तास्त्रयस्तथा । अगुलानि च सत्रीणि प्रयश्चैकादशांशकाः ॥३१२॥ दण्डा हस्तोऽङ्गुलान्येषु जितिकारये प्रयोदश । एक पञ्चोकभार्गश्च ग्रयोविंशतिरिप्यते ॥३१३॥ लोले चतुर्दशैवासौ दण्डास्वेकोनविंशतिः । अगुलानि विनिर्दिष्टा सप्तकादशभागः ॥२१॥ वयो हस्ता धनूष्येप लोलुपे च चतुर्दश । नवैकादशभागश्च तथा पञ्चदशागली ॥३:५।। दण्डाः पन्चदशैवासी हस्तौ च स्तनलोलुपे । द्वादशाङ्गुलमानं च द्वितीयायां च इप्यते ॥३१६॥ तप्ते सप्तदशोत्सेधो दण्डा हस्तो दशानुली । द्वित्रिभागसमेतोऽसौ नारका समारितः ॥३१॥ एकोनविंशतिर्दण्डास्तपितेऽपो जवाहुली । विभागश्च समादिष्टः स्पष्टज्ञानेष्ट प्टिभिः ॥३१८।। तपने विशतिदेण्डास्त्रयो हस्तास्तथैव सः । अगुलानि समुद्दिष्टः शिष्टैरप्टौ प्रकृष्टतः ॥३१॥ द्वाविंशतियपि द्वौ हस्तायुक्तः पद्गुलैः । उत्सेधस्तापने ध्यंशी नारकारसमुद्भवः ।।३२०॥ चतुर्विशतिचापानि हस्तः पन्चागुलानि च । विभागश्च निदाघेऽमायुग्मेधो बोधितो बुधः ॥३२॥ पविशतिधनूप्येष प्रोक्तः प्रोजवलितेन्द्र के । भगुलानि च चत्वारि ज्ञानप्रज्वलितारमभिः ।।३२२।। सप्तविंशतिचापानि यो हस्ता स वर्णितः । भागमोज्ज्वलितमास्ध्यिंशायुज्ज्वलितेऽगुली ॥३२३।। एकान्नत्रिशदुस्सेधः कोदण्डा हस्तयोयम् । अगुलं च विभाग योध्यः सज्वलिते बुधैः ॥३२॥ एकत्रिंशत्तु कोदण्डा हस्तश्चोत्सेध इष्यते । सम्प्रज्वलितसंज्ञे च तृतीये यः स भाप्यते ॥३२५।। कियोंकी ऊँचाई वारह धनुप सात अङ्गुल और एक अङ्गुलके ग्यारह भागोंमे एक भाग प्रमाण कही गई है 1॥३११॥ जिह्व नामक सातवें प्रस्तारमें बारह धनुप, तीन हाथ, तीन अङ्गुल और एक अङ्गुलके ग्यारह भागोम तीन भाग प्रमाण ऊँचाई है. ॥३१२।। जिह्वक नामक आठवें प्रस्तारमै तेरह धनुप, एक हाथ, तेईस अङ्गुल और एक अगुलके पाँच भागों में एक भाग प्रमाण ऊँचाई इष्ट है ॥३१३|| लोल नामक नौवे प्रस्तारमे चौदह धनुप, उन्नीस अङ्गुल और एक अङ्गुल के ग्यारह भागोमे सात भाग प्रमाण ऊँचाई है ॥३१४॥ लोलुप नामक दसवें प्रस्तारमैं चौदह धनुप तीन हाथ पन्द्रह अगल और एक अगुलके ग्यारह भागोमे नौ भाग प्रमाण ऊँचाई है ॥३१५|| और स्तनलोलुप नामक ग्यारह प्रस्तारमें पन्द्रह धनुप, दो हाथ और बारह अङ्गुल ऊँचाई इष्ट है । इस प्रकार दूसरी पृथिवीमें नारकियोंके शरीरको ऊँचाईका वर्णन किया ॥३१॥ तीसरी पृथिवीके तप्त नामक प्रथम प्रस्तारमें नारकियों के शरीरकी ऊँचाई सत्रह धनुष, एक हाथ, दश अडल और एक अङ्गुलके तीन भागोमें दो भाग प्रमाण कही गई है ॥३१७।। स्पष्ट ज्ञान रूपी इष्ट दृष्टिको धारण करनेवाले तपित नामक दूसरे प्रस्तारमें नारकियोंकी ऊँचाई उन्नीस धनुष नौ अङ्गुल और एक अङ्गुलके तीन भागोम एक भाग प्रमाण बत- लाई है ॥३१८॥ शिष्टजनोने तपन नामक तीसरे प्रस्तारमे नारकियोंके शरीरका उत्सेध घीस धनुप तीन हाथ और आठ अङ्गल प्रमाण बतलाया है ॥३१॥ तापन नामक चौथे प्रस्तारमै नारकियोके शरीरकी ऊँचाई बाईस धनुष दो हाथ छः अङ्गुल और एक अङ्गुलके तीन भागों दो भाग प्रमाण कही गयी है ॥३२०॥ निदाघ नामक पाँचवे प्रस्तारमे चौबीस धनुष, एक हाथ, पाँच अंगुल और एक अंगुलके तीन भागोमे एक भाग प्रमाण ऊँचाई विद्वानोने बतलाई है ।।३२१॥ जिनकी आत्मा ज्ञानके द्वारा देदीप्यमान है ऐसे आचार्योंने प्रोज्ज्वलिन नामक छठर्थ प्रस्नाग्मे नारकियोंकी ऊँचाई छब्बीस धनुप और चार अंगुल प्रमाण बतलाई है ॥३२२॥ आगम- ज्ञानसे सुशोभित विद्वज्जनोने उज्ज्वलित नामक सातवे प्रस्तारमे नारकियाका शरीर सत्ताईस धनुष, तीन हाथ, दो अंगुल और एक अंगुलके तीन भागोमं दो भाग प्रमाण ऊँचा कहा है ॥३२३॥ विद्वानोको संज्वलित नामक आठवें प्रस्तारमै नारकियोकी ऊँचाई उन्तीस धनुष, दो हाथ एक अंगुलके तीन भागोमे एक भाग प्रमाण जानना चाहिए ॥३२४|| और संप्रज्वलित चतुर्थः सर्गः 1 पञ्चत्रिंशद्धप्यारे द्वौ हस्ताबड्लान्यपि । विंशतिः सप्तभागाश्च चत्वारा सम्प्रकीर्तितः ॥३२६॥ चत्वारिंशत्तथा तारे दण्डा सप्तदशाङ्गुली । एकः सप्तममागः स्यादुत्सेधो नारकाश्रयः ॥३२७॥ चत्वारिंशचतुर्भिश्च दण्डा हस्ती त्रयोदश । भगुलानि मतो मारे सप्तभागः स पञ्चभिः ॥३२८|| धनूंध्येकोनपन्चाशदुरसेवः स दशाङ्गुली । द्वौ च सप्तममागौ तौ वर्चस्के वर्णितो वुधैः ॥३२६॥ धनूंपि सग्निपञ्चाशद्धस्तौ चापि पढङ्गुली । पट् च सप्तमभागास्ते तमके परिकीर्तितः ॥३३०॥ अष्टापञ्चाशदुरसेधो धनूंषि व्यगुलानि च । अयः सप्तमभागाश्च पडेऽपि प्रकटस्थितः ॥३३॥ द्विषष्टिस्तु धनूंपि द्वौ हस्ती घडपड़े मतः । उत्सेधः सुप्रसिद्धो यश्चतुर्थे नरके सताम् ॥३३२।। तमोनामनि चोरसेधः कोदण्डाः पञ्चसप्ततिः । सप्ताशीतिरसौ दण्डा द्वौ हस्ती भवति भ्रमे ॥३३३॥ वपुपो नारकीयस्य झषे शतधपि सः । अन्धे द्वादशमिश्राणि तानि हस्तद्वयं मतम् ॥३३४॥ तमिसेऽपि च तान्येव पञ्चविंशतिदण्डकैः । उत्सेधो वर्णितो योऽसौ पञ्चमे नरके वुधः ॥३३५॥ पटपष्टया शतकोदण्डा द्वौ हस्तौ पोहशाङ्गुली । उत्सेधो वर्णितः पूर्णो हिमनामनि चेन्द्र के ॥३३६।। द्विशत्यष्टौ च कोदण्डा हस्तोऽष्टावगुलान्यपि । उम्सेधः शास्त्रनेत्रायैर्वदलेऽपि विलोकितः ॥३३॥ शतदयं च पञ्चाशद्धध्येव स भासितः । लरलके नरके पष्टे निष्ठिताय इप्यते ॥३३८।। नामक नौवें प्रस्तारमें ऊँचाईका प्रमाण इकतीस धनुप तथा एक हाथ प्रमाण कहा जाता है। इस प्रकार तीसरी पृथिवी नारकियोंको ऊँचाईका वर्णन किया ॥३२॥ चौथी पृथिवीके आर नामक प्रथम प्रस्तारमें पैंतीस धनुप, दो हाथ, बीस अंगुल और एक अंगुलके सात भागोंमें चार भाग प्रमाण ऊँचाई कही गई है ॥३२६॥ तार नामक दूसरे प्रस्तारमें चालीस धनुष, सत्रह अंगुल और एक अंगुलके सात भागौम एक भाग प्रमाण नारकियों- की ऊँचाई है ॥३२७।। मार नामक तीसरे प्रस्तार में चवालीस धनुष, दो हाथ, तेरह अंगुल और एक अंगुलके सात भागोंमें पाँच भाग प्रमाण ऊँचाई मानी गई है ॥३२८॥ वर्चस्क नामक चौथे प्रस्तारमें विद्वानोंने शरीरकी ऊँचाई उनचास धनुप, दश अंगुल और एक अंगुलके सात भागोंमें दो भाग प्रमाण बतलाई है ॥३२६|| तमक नामक पॉचवें प्रस्तारमें वेपन धनुप, दो हाथ, छ: अंगुल और एक अंगुलके सात भागोंमें छः भाग प्रमाण ऊँचाई कही गई है ॥३३०।। पड नामक छठवें प्रस्तारमें अठावन धनुप, तीन अंगुल और एक अंगुलके सात भागोंमें तीन प्रमाण ऊँचाई प्रकट की गई है ॥३३१।। और पडपड नामक सातवें प्रस्तारमै बासठ धनुप, दो हाथ ऊँचाई प्रसिद्ध है । इस प्रकार चौथी पृथिवीमें विद्यमान नारकियोंकी ऊँचाईका वर्णन किया है ॥३३२।। पाँचवों पृथिवीके तम नामक प्रथम प्रस्तारमे नारकियोंके शरीरकी ऊँचाई पचहत्तर धनुप यतलाई है। भ्रम नामक दूसरे प्रस्तारमें सत्तासी धनुप और दो हाथ है ॥३३३॥ मार नामक तीसरे प्रस्तारमें नारकियोंके शरीरको ऊँचाई सौ धनुप कही गई है। अन्ध नामक चौथे प्रस्तारमें एक सौ बारह धनुप तथा दो हाथ है ।।३३४॥ और तमिस्र नामक पाँचवें प्रस्तार, एक सौ पचीस धनुप है। इस प्रकार पाँचवीं पृथिवीमें विद्वानोंने ऊँचाईका वर्णन किया है ।।३३।। छठवीं पृथियोके हिम नामक प्रथम प्रस्तारमै नारकियोंके शरीरकी ऊँचाई एक सी छयासठ धनुष, दो हाथ तथा सोलह अंगुल यतलाई है ॥३३६॥ वर्दल नामक दूसरे प्रस्तारमें शास्त्रम्पी नेत्रों के धारक विद्वानांने नारक्यिोंकी ऊँचाई दो सौ आठ धनुप, एक हाथ और छः अंगुल प्रमाण देसी है ॥३३७॥ और लल्लक नामक तीसरे प्रस्तारमें नारकियोंकी ऊँचाई दो सौ पचास धनुष यतलाई है। इस प्रकार कृतकृत्य सर्वश देवने छठवीं पृथिवीमें ऊँचाईका वर्णन किया ॥३३८।। १ शनी म०। ६ हरिवंशपुराणे उत्सेधश्चाप्रतिष्ठाने पञ्चचापशतानि सः । निश्चितो निश्चितज्ञानः सप्तमे नरके च यः ॥३३॥ सप्तसु प्रतिबोद्धव्यः प्रथितः प्रथमादिषु । अवधेर्विपयस्तामु पृथिवीषु यथाक्रमम् ॥३४०॥ योजनं तु नया नोशाः सार्धा क्रोशत्रयं तथा । साधौ तौ तवयं साधः क्रोशः क्रोशश्च निश्चितः ॥३४॥ क्रोशाई मृत्तिकागन्धः प्रथमे परले मजेत् । तदधोऽधः क्रोशस्याई वद्धते पटलं प्रति ।।३४२॥ पृथिव्योराद्ययोयुक्ता जीवाः कापोतलेश्यया । तृतीयायां तयैवोर्ध्वमधस्तानीललेश्यया ॥३४३।। अधश्चोवं च सम्बद्धाश्चतुयां नीललेश्यया । तयैवोपरि पञ्चम्यामधस्ते कृष्णलेश्यया ॥३४॥ पठ्यां च कृष्णयेवोऽवमधः परमकृष्णया । सप्तम्यामुभयत्रामी क्लिष्टाः परमकृष्णया ॥३४५।। स्पर्शेनोरणेन बाध्यन्ते नारका भूचतुष्टये । पञ्चम्यामुष्णशीताभ्यां शीतेनैवान्त्ययोभुवोः ॥३४६॥ भाकारेगोष्ट्रिकाकुम्भीकुस्थलीमुद्गरोपमाः । मृदङ्गनाडिकाकारा निगोदा' पृथिवीनये ॥३४७॥ गोगजाश्वादिभस्वाभाद्रोण्यजपुटसन्निभाः। ते चतुथ्यां च पञ्चम्यां नारकोत्पत्तिभूमयः ॥३४॥ केदाराकृतयः केचिल्मलरोमल्लकोपमाः । केचिन्मयूरकाकारा निगोदास्तेऽन्त्ययोभुवोः ॥३४६॥ एकद्वित्रिकगव्यूतियोजनव्याससङ्गताः । शतयोजनविस्तीर्णास्तेपूत्कृष्टास्तु वर्णिताः ॥३५०॥ उस्टायो वस्तुतस्तेषां विस्तारः पञ्चताडितः । निगोदानां समस्तानामिति वस्तुविदो विदुः ॥३५॥ सातवीं पृथिवीमें एक ही अप्रतिष्ठान नामका प्रस्तार है सो उममें सन्देहरहित ज्ञानके धारक आचार्योंने नारकियोंकी ऊँचाई पाँच सौ धनुप प्रमाण निश्चित की है ॥३३॥ प्रथम पृथिवीको आदि लेकर उन सातों पृथिवियोंमें यथाक्रमसे अवधिज्ञानका विषय इस प्रकार जानना चाहिए ॥३४॥ पहली पृथिवीमें अवधिज्ञानका विषय एक योजन अर्थात् चार कोश, दूसरीमै साढ़े तीन कोश, सोसरीमै तीन कोश, चौथीमे अढ़ाई कोश, पाँचवीं में दो कोश, छठवीं में डेढ़ कोश और सातवों में एक कोश प्रमाण है ॥३४१॥ प्रथम पृथिवी सम्बन्धी पहले पटलको मिट्टीको दुर्गन्ध आध कोश तक जाती है और उसके नीचे प्रत्येक पटलके प्रति आधा-आधा कोश अधिक बढ़ती जाती है ॥३४२॥ पहली और दूसरी पृथिवी में रहनेवाले नारकी कापोत लेश्यासे युक्त हैं । तीसरी पृथिवीके ऊर्ध्व भागमे रहनेवाले फापोत लेश्यासे और अधो- भागमे रहनेवाले नील लेश्यासे सहित हैं ॥३४३॥ चौथी पृथिवीके ऊपर-नीचे दोनों स्थानों पर तथा पॉचवीं पृथिवीके ऊपरी भागमें नील लेश्यासे युक्त हैं और अधोभागमें कृष्ण लेश्यासे सहित हैं ॥३४४॥ छठवीं पृथिवीके ऊर्चभागमें कृष्ण लेश्यासे, अधोभागमे परमकृष्ण लेश्यासे और सातवीं पृथिवीके ऊपर नीचे दोनो ही जगह रहनेवाले परमकृष्ण लेश्यासे संक्लिष्ट हैं अर्थात् संक्लेशको प्राप्त होते रहते हैं ॥३४५॥ प्रारम्भको चार भूमियोमे रहनेवाले नारकी उष्ण स्पर्शसे, पाँचवीं भूमिमें रहनेवाले उष्ण और शीत दोनों प से तथा अन्तकी दो भूमियोंमे रहनेवाले फेवल शीत स्पर्शसे ही पीड़ित रहते हैं ।।३४६।। प्रारम्भको तीन पृथिवियोम नारकियोके उत्पत्ति- स्थान कुछ तो उँटके आकार हैं कुछ कुम्भी ( घड़िया), कुछ कुस्थली, मुद्गर, मृदङ्ग और नाडीके आकार हैं ॥३४॥ चौथी और पॉचवीं पृथिवीम नारकियोके जन्मस्थान अनेक तो गोके आकार हैं, अनेक हाथी घोड़े आदि जन्तुओं तथा धौंकनी, नाय और कमलपुटके समान हैं ॥३४८॥ अन्तिम दो भूमियोंमें कितने ही खेतके समान, कितने ही झालर और कटोरीके समान, और कितने हो मयूरोके भाकारयाले हैं ॥३४६॥ वे जन्मस्थान एक कोश, दो कोश, तीन कोश और एक योजन विस्तारसे महिन हैं। उनमें जो उत्कृष्ट स्थान हैं वे सो योजन तक चौड़े कहे गये हैं ॥३५०|| उन समस्त उत्पत्ति स्थानों की ऊँचाई अपने विस्तारसे पंचगुनी है ऐमा यस्तु स्वरूपको जाननेवाले आचार्य जानते हैं ।।३५१॥ समरन इन्द्रक बिल तीन द्वागसे युक्त तथा तीन कोणों- याले हैं। इनके मिवाय जो श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक निगोद हैं उनमें कितने ही दो द्वारयाले १ मारकतानियानानि।

चतुर्थः सर्गः ४ सर्वेन्द्रकनिगोदास्ते त्रिद्वाराश्च त्रिकोणकाः । द्विध्येकपब्बसप्तामद्वारकोणास्ततः परे ॥३५२।। संख्येयव्यासयुक्तानां निगोदानां निजान्तरम् । गव्यूतयः पडल्पं स्यादनल्पं द्वादशैव ताः ॥३५३॥ भसंरयेयप्रमाणानामसंख्यं महदन्तरम् । योजनानां सहस्राणि सप्तवात्यल्पमन्तरम् ॥३५॥ निगन्यूतिश्चतुर्भागसप्तयोजनमानुकम् । धर्मानिगोदजा जीवा खमुत्पत्य पतन्त्यधः ॥३५५॥ *गन्यूतिद्वितयं साधं सपञ्चदशयोजनम् । वंशानिगोदजन्मानः खमुत्पत्य पतन्त्यधः ॥३५६॥ एकत्रिंशत्तु गव्यूत्या योजनानि नभस्तले । मेवानिगोदना जीवाः खमुल्लंध्य पतन्त्यधः ॥३५७॥ द्विषष्टियोजनान्यूवं गव्यूतिद्वयमुद्गताः । निपतन्युप्रदुःखास्तेिऽञ्जनाजनिगोदजाः ॥३५॥ पञ्चविंशतिसम्मिश्रशतयोजनमातुराः । खमुत्पत्य पतन्त्येव पञ्चमीस्था निगोदजाः ॥३५॥ पञ्चाशता विमिदं तु योजनानां शतद्वयम् । वियदुत्पत्य षष्टीस्थानिगोदोत्या. पतन्त्यधः ॥३६॥ सप्तमीस्थनिगोदोत्याः सपञ्चशतयोजनम् । अध्वानमूर्ध्वमुत्पत्य पतन्ति वसुधातले ॥३६१।। असुरा भातृतीयान्तं योधयन्ति परस्परम् । प्रयुध्यते स्वयं तेऽपि ज्ञात्वा वैरं पुरातनम् ॥३६२॥ कुन्तक्रकचशूलायेनानाशस्त्रैस्तनूदवैः । खण्डं खण्ई विधीयन्ते पीडयन्ति परस्परम् ।।३६३।। सूतकस्येव सङ्घातः शरीरस्य प्रजायते । यावदायुःस्थितिस्तेषां न तावन्मरणं भवेत् ॥३६॥ शारीरं मानसं दुःखमन्योऽन्योदारितं खलु । सहन्ते नारका नित्यं पूर्वपापविपाकतः ॥३६५।। दुकोने, कितने ही तीन द्वारवाले तिकोने, कितने ही पॉच द्वारवाले पंचकोने और कितने ही सात द्वारवाले सतकोने हैं ॥३५२॥ इनमें संख्यात योजन विस्तारवाले विलोंका अपना जघन्य अन्तर छः कोश और उत्कृष्ट अन्तर बारह कोश है ॥३५३।। एवं असंख्यात योजन विस्तारवाले विलोंका उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात योजन तथा जघन्य अन्तर सात हजार योजन है ॥३५४|| धर्मा नामक पहली पृथिवीके उत्पत्ति-स्थानों में उत्पन्न होनेवाले नारकी जीव जन्मकालमें जब नीचे गिरते हैं तब सात योजन सवा तीन कोश ऊपर आकाशमें उछलकर पुनः नीचे गिरते हैं ॥३५५॥ दूसरी वंशा पृथिवीके निगोदीमें जन्म लेनेवाले नारकी पन्द्रह योजन अढ़ाई कोश आकाशमें उछलकर नीचे गिरते हैं ॥३५६|| तीसरी मेघा पृथिवीमें जन्म लेनेवाले जीव इकतीस योजन एक कोश आकाशमें उछलकर नीचे गिरते हैं ॥३५७|| चौथी अञ्जना पृथिवीके निगोदामे जन्म लेनेवाले जीव वासठ योजन दो कोश उछलकर नीचे गिरते हैं और तीव्र दुःखसे दुःसी होते हैं ।।३५८।। पाँचवीं पृथिवीके निगोदोंमें जन्म लेनेवाले नारकी अत्यन्त दुःखी हो एकसौ पच्चीस योजन आकाशमै उछलकर नीचे गिरते हैं ॥३५६|| छठवीं पृथिवीमें स्थित निगोदामे जन्म लेनेवाले जीव दो सौ योजन आकाशमें उछलकर नीचे गिरते हैं ॥३६॥ और सप्तमी पृथिवीमे स्थित निगोदोंमें उत्पन्न हुए जीय पॉच सौ धनुप ऊँचे उछलकर पृथिवी तलपर नीचे गिरते हैं ॥३६१॥ तीसरी पृथिवी तक असुरकुमार देव नारकियोंको परस्पर लड़ाते हैं। इसके सिवाय वे नारकी पुराने वैर भावको जानकर स्वयं भी लड़ते रहते हैं ॥३६२|| विक्रिया शक्तिके द्वारा अपने शरीरसे ही उत्पन्न होनेवाले भाले, करीत तथा शूल आदि नाना शस्त्रोंसे उन नार- कियोके सण्ड-खण्ड कर दिये जाते है और परस्पर एक दूसरेको पीड़ा पहुंचाते हैं ।।३६३।। खण्ड- खण्ड होनेपर भी पारेके समान उनके शरीरके टुकड़ोंका पुनः समूह बन जाता है और जब तक उनकी आयुकी स्थिति रहती है तब तक उनका मरण नहीं होता ॥३६४॥ ये नारकी पूर्व कृत १. अतः परं म.ख. पुस्तस्योः अय श्लोकोऽधिकोऽस्ति-"मोशनयं सनुयाशं योजनानां च सप्तकम् । समुत्पतन्ति धर्माया शेषास्तु द्विगुणोचरम् ।" २ एए श्लोकः इ० पुस्तके नास्ति । ३ नपुस्तके एतस्य श्लोकस्य स्थाने निम्नाद्वितः श्लोकोऽस्ति-'यजिनं पञ्चदशकं साधनोराद्वयं तथा । समुन्छलन्ति वंशायां पतन्ति न निगोदजाः। ४ पारदस्येव ।

६८ हरिवंशपुराणे चारोणतीयसद्भावनदीवैतरणीजलात् । 'दुर्गन्धान्मन्मयाहोराददुःसं भुजनित दुःसहम ॥३६६॥ भक्षणोनिमीलनं यावनास्ति सौख्ये व जातुचिद् । नरके पश्यमानानो नारकागामहनिंशम् ।।३६७॥ म्युस्तेपामशुभतरा परिणामाः शरीरिणाम् । लि नपुंमकारनं स्पात् संस्थान हुण्डसंभकम् ॥३६॥ आगामितीर्थकतृणां तथैवोपशमनसाम् । उपसर्गाहति भन्या कुर्वन्यायायमै' सुराः ॥३६३० चत्वारिंशरसहाष्टाभिघंटिकाः प्रथमक्षितौ । अन्तरं नारकोस्पत्तेरन्तरः स्फुटीकृतम् ॥३०॥ सप्ताहश्चैव पक्षः स्यान्मासो मासौ यथाक्रमम् । चत्वारोऽपि च पण्मासा विरहः पटम् भूमिपु ॥३१॥ तीप्रमिथ्यात्वसम्बद्धा बहारम्मपरिग्रहाः । पृथिवीस्ता प्रपद्यन्ते तियंचो मानुपास्तथा ॥३७२॥ भाद्यामसंज्ञिनो यान्ति द्वितीयां च प्रसपिणः । पविणश्च मृतीयायां चतुष्यों च भुजामा १३७३।। पञ्चमीमपि सिहास्तु पष्टीमपि च योपितः । प्रयान्ति प्राणिनः पापा: सक्षमों मरस्यमानुपाः ॥३७॥ सप्तम्युर्तितो यायातामेवानन्तरं सकृत् । पष्ठीतो निर्गतो द्विस्तां पी प्रिवध प्रजेत् ॥३७५॥ चतुर्थी च चतुर्वारान् प्रपद्यत ततश्च्युतः। तृतीयां पचकृत्योऽपि तस्या एप समागतः ॥३७६॥ द्वितीयायां च पट्कृत्वः सहकृत्वस्तथाऽसुमान् । प्रथमाया विनिर्यात प्रथमा प्रजायते ॥३७७॥ सप्तमीतो विनिर्यातः संशितिर्यस्वभाक् पुनः । संरयेयायुर्वृतो याति नरकं तनुमद्गणः ॥३०॥ पष्ठीतस्तु विनिर्यातो लभते नैव संयमम् । तं लभेतापि पञ्चम्या निर्माणं न तु सद्भवे ॥३७॥ लभेतापि च निर्वाणं चतुर्थीनिःसृतः पुनः । निश्चयेनैव नैवाही तीर्थहरवं प्रपद्यते ॥३०॥ पाप कर्मके उदयसे निरन्तर एक दूसरेके द्वारा दिये हुए शारीरिक एवं मानसिक दुःसको सहते रहते हैं ॥३६॥ वे खारा गरम तथा अत्यन्त तीक्ष्ण वैतरणी नदीका जल पीते हैं और दुर्गन्धि युक्त मिट्टीका आहार करते हैं इसलिए निरन्तर असह्य दुःख भोगते रहते हैं ॥३६६।। रात. दिन नरकमें पचनेवाले नारकियोंको निमेष मात्र भी कभी सुस नहीं होता ॥३६॥ उन नारकियोके निरन्तर अत्यन्त अशुभ परिणाम रहते हैं। तथा नपुंसक लिङ्ग और हुण्डक संस्थान होता है ॥३६८।। जो आगामी कालमै तीर्थकर होनेवाले हैं तथा जिनके पापकर्मोंका उपशम हो चुका है । देय लोग भक्तिवश छः माह पहलेसे उनके उपसर्ग दूर कर देते हैं ।।३६।। अन्तरके जाननेवाले आचार्याने प्रथम पृथिवीमें नारकियोंकी उत्पत्तिका अन्तर अड़तालीस घड़ी बसलाया है ॥३७०॥ और नीचेकी छह भूमियोमे क्रमसे एक सप्ताह, एक पक्ष, एक मास, दो मास, चार मास और छह मासका विरह-अन्तरकाल कहा है ॥३७१॥ जो तीन मिथ्यात्वसे युक्त हैं तथा घहुत आरम्भ और बहुत परिग्रहके धारक हैं ऐसे तिर्यश्च और मनुष्य उन पृथिवियोको प्राप्त होते हैं अर्थात् उनमें उत्पन्न होते हैं ॥३७२॥ असंही पञ्चेन्द्रिय पहली पृथिवी तक जाते हैं, सरकने वाले दूसरी पृथिवी तक, पक्षी तीसगे तक, सर्प चौथी तक, सिंह पाँचवीं तक, त्रियाँ छठवीं धक और तीत्र पाप करनेवाले मत्स्य तथा मनुष्य सातवीं पृथिवी तक जाते हैं ॥३७३-३७४॥ सातवीं पृथिवीसे निम्ला हुआ जीव यदि पुनः अव्यवहित रूपसे सातवीमें जावे तो एक बार, छठवींसे निकला हुआ छठवीम दो बार, पाँचवींसे निकला हुआ पाँचवीमें तीन बार, चौथीसे निकला हुआ चौथीम चार बार, तीसरीसे निकला हुआ तीसरीमै पाँच चार, दूसरीसे निकला हुआ दूसरीमें छः बार और पहलीसे निकला हुआ पहलीमे सात बार तक उत्पन्न हो सकता है ।।३७५-३७७॥ सातवीं पृथिवीसे निकला हुआ प्राणी नियमसे संज्ञी विर्यञ्च होता है तथा संख्यात वर्षकी आयुका धारक हो फिरसे नरक जाता है ॥३७॥ छठवीं पृथिवीसे निकला हुआ जीव संयमको प्राप्त तो हो सकता है पर मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता ॥३७॥ चौथी पृथिवीसे निकला हुआ मोक्ष प्राप्त कर सकता है परन्तु निश्चयसे तीर्थङ्कर नहीं हो सकता ॥३८०।। १ दुर्गन्धा म०, २ मृन्मयाहाराः म० । ३. अन्तिमषण्मासेषु । ४. प्राणिसमूह ।

चतुर्थः सर्गः तृतीयायाः द्वितीयाया प्रथमायाश्च निःसृतः । तीर्थकृत्त्वं लभेतापि देही दर्शनशुद्धितः ॥३१॥ बलकेशवचरित्वं परिहृत्यैव जन्तवः । नरत्वं प्रतिपघेरन् नरकम्यो विनिर्गताः ॥३२॥ अधोलोकविभागस्ते संक्षेपेण मयोदितः । तियंग्लोकविभागस्य शृणु श्रेणिक ! संग्रहम् ॥३३॥ शार्दूलविक्रीडितम् सूर्याचन्द्रमसामगोचरमधोलोकान्धकारं बुधाः प्रध्वंस्याऽप्तवाप्रदीपविभवः सर्वत्रगैः सर्वदा। पश्यन्तः प्रभवन्ति तत्त्वमिति किं चित्रं त्रिलोक्योकृता- वालोके जिनभानुना विरचिते ध्वान्तस्य वाक स्थितिः ॥३८४|| इत्यरिएनेमिपुरासंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती अधोलोकसंस्थानवर्यानो नाम चतुर्थः सर्गः ॥४॥ तीसरी दूसरी और पहली पृथिवीसे निकला हुआ जीव सम्यग्दर्शनको शुद्धतासे तीर्थङ्कर पद प्राप्त कर सकता है ।।३८।। नरकासे निकले हुए जीव बलभद्र, नारायण और चक्रवर्ती पद छोड़कर ही मनुष्य पर्याप्त प्राप्त कर सकते हैं अर्थात् मनुष्य तो होते हैं पर वलभद्र नारायण और चक्रवर्ती नहीं हो सकते ॥३८॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इस प्रकार मैंने संक्षेपसे तेरे लिए अधो लोकके विभागका वर्णन किया। अब तू तिर्यग्लोक-मध्यम लोकके विभागका वर्णन सुन ॥३८३॥ बुद्धिमान् मनुष्य सब समय, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले, जिनेन्द्र भगवान्के वचन रूपी उत्तम दीपकोंकी सामर्थ्य से सूर्य और चन्द्रमाके अगोचर अधोलोकके अन्धकारको नष्टकर वस्तुके यथार्थ स्वरूपको देखते हुए प्रभुत्वको प्राप्त होते हैं इसमें क्या आश्चर्य है ? क्योंकि तीन लोकमें जिनेन्द्र रूपी सूर्यके द्वारा प्रकाशके उत्पन्न होनेपर अन्धकारका सद्भाव कहाँ रह सकता है ? ॥३४॥ इस प्रकार जिसमें अरिष्टनेमिके पुराणका संग्रह किया गया है ऐसे जिनसेनाचार्य प्रणीत हरिवंशपुराणमें अधोलोकका वर्णन करनेवाला चौथा सर्ग समाप्त हुआ |४|| १ बुधः म । २. प्रध्वस्ताप्त । ३. त्रिलोकाश्ता-म., विलोक्यावृता-स०, ५०, १०॥

पञ्चमः सर्गः तनुवातान्तपर्यन्तस्तिर्यग्लोको व्यवस्थितः । ललितावधिमाधो मेरुयोजनलपया ॥१॥ तत्रैवास्मिन्नसंरयेयसागरद्वीपवेष्टितः । जम्बद्वीपः स्थितो वृत्तो जम्यूपादपलक्षितः ॥२॥ विस्तारणार्णवस्पर्शी वनवेदिकयाऽऽमृतः। महामेरुमहानाभिलंध्ययोजनलच्या ॥३॥ 'तिम्रो लक्षाः परिक्षेपः स्या-सहस्राणि पोडश । योजनानि विगव्यूतिद्विशती सतविशतिः ॥४॥ भष्टविशतिमन्मिभं तथैवान्य धनुःशतम् । त्रयोदशांगुलानि म्युः साधिकार्थाद्लानि तु ॥५॥ कोटीशतानि सप्त स्युः कोटयो नवतिः स्फुटाः । पट्पञ्चाशत्तथा लशा नवतिश्चतुरुत्तरा ॥६॥ सहस्रगुणिता द्वीपे शतं पञ्चाशताधिकम् । योजनानि विभक्तेऽस्मिन् गगितस्य पदं विदुः ॥७॥ क्षेत्राणि सन्ति सप्तात्र मेहरेकः कुरुद्वयम् । जम्बूश्च शाल्मलीकृती पडव कुलपर्वताः ॥८॥ महामरामि पट् तेषु महानद्यश्चतुर्दश । द्विपविभङ्गनद्यश्च वधारागाश्च विंशतिः ॥६॥ राजधान्यश्चनुखिशद्रौप्यादिपमादयः । अष्टापष्टिगुहा वृत्तविजयादचतुष्टयम् ।।१०।। तथा त्रीणि सहस्राणि पुनः सप्तशतान्यपि । चत्वारिंशरपुराणि स्युर्विद्याधरमहीभृताम् ॥ एतैः सर्वैरय द्वीपो दीप्यते दिगुणैरिमैः । यथाऽमौ धातकीखण्डः पुष्करायश्च सर्वतः ॥१२॥ भारतं दक्षिण तत्र क्षेत्रं हैमवतं परम् । हरिक्षेत्रं विदेहं च रम्यकं च तथा परम् ॥१३॥ तनुवातयलयके अन्त भाग तक तिर्यग्लोक अर्थात् मध्यलोक स्थित है। मेरु पर्वत एक लाख योजन विस्तारवाला है । उसी मेरु पर्वत द्वारा ऊपर तथा नोचे इस तिर्यग्लोककी अवधि निश्चित है । भावार्थ- मेरु पर्वत कुल एक लाख योजन विस्तारवाला है। उसमें एक हजार योजन तो पृथितिलसे नीचे है और निन्यानवे हजार योजन पृथिवीतलसे ऊपर है । तियंग्लोक की सीमा इसी मेरु पर्वतसे निश्चित है अर्थात् तिर्यग्लो पृथिवीतलके एक हजार योजन नीचे- से लेकर निन्यानवे हजार योजन ऊँचाई तक है ॥१|| इसी मध्यम लोकमे असंख्यात द्वीप- समुद्रोसे चेष्टित गोल तथा जम्बू वृक्षसे युक्त जम्बू द्वीप स्थित है ॥२॥ यह जम्बू द्वीप लवण समुद्रका स्पर्श करनेवाला है, वमयी वेदिकासे घिरा हुआ है, महामेरु रूपी नाभिसे युक्त है अर्थात महामेरु इसके मध्यभागमें अवस्थित है तथा एक लाख योजन विस्तारवाला है ॥३॥ जम्बू द्वीपको परिधि तीन लाख सोलह हजार दो सौ सत्ताईस योजन तीन कोश एक सौ अट्ठाईस धनुप और साढ़े तेरह अंगुल है ॥४-५॥ विभाग करनेपर गणितज्ञ मनुष्य इस जम्बू: द्वीपका घनाकार क्षेत्र सात सौ नब्बे करोड़ छप्पन लाख, चौगनवे हजार एक सौ पचास योजन बतलाते हैं ॥६-७॥ इस जम्बू द्वीपमें सात क्षेत्र, एक मेरु, दो कुरु, जम्बू और शाल्मली नामक दो वृक्ष, छह कुलाचल, कुलाचलोंपर स्थित छह महासरोवर, चौदह महानदियाँ, बारह विभगा नदियाँ, चीस वक्षार गिरि, चौंतीस राजधानी, चौंतीस रुप्याचल, चौंतीस पभाचल, अहसठ गुहाएँ, चार गोलाकार नाभि गिरि और तीन हजार सात सौ चालीस विद्याधर राजाओंके नगर हैं। ऊपर कही हुई इन सभी चीजोसे यह जम्बू द्वीप अत्यधिक सुशोभित है ! जम्बू द्वीपसे दूने क्षेत्र तथा मेरु आदिसे दूसरा धातकोखण्ड द्वीप देदीप्यमान है और पुष्करार्ध भी धातकोसण्डके समान समस्त क्षेत्रों तथा पर्वती आदिसे युक्त है ॥८-१२॥ जम्बू द्वीपमें १. सधि म०। २ नाभिलक्षयोजन -म० । ३ जम्बूदीपस्य सूक्ष्मपरिधिः ३१६२२७ योजनाना कोशाः १२८ धषि १३३ अगुलानि च वर्तते । ४ वदागाराश्च म ।

पञ्चमः सर्गः ७१ हैरण्यवतमित्यन्यत् स्यादैरावतमुत्तरम् । विस्तारेणाविदेहान्त क्षेत्र क्षेत्राच्चतुर्गुणम् ||१|| प्रथमो हिमवानन्यो महाहिमवदाह्वयः । पर्वतो निषधो नीलो रकमी च शिखरी गिरिः ॥१५॥ पूर्वस्मादुत्तरो भूभृद् विस्तारेण चतुर्गुण: । निषधं यावदाख्याता दक्षिणरुत्तराः समाः ॥१६॥ क्षेत्रस्याद्यस्य विस्तारः सपञ्चशतयोजनः । पविशतिस्तथा भागः पद् चाप्येकोनविंशतः ॥७॥ जम्बूद्वीपस्य विष्कम्भे नवत्या च शतेन च । विभक्त भारतस्यायं विस्तारो भवति स्फुटः ॥१८॥ क्षेत्राद् द्विगुणविस्तारः पर्वतः क्षेत्रमप्यतः । आविदेहमतस्तस्य वृद्धिवच्च परिक्षयः ॥१६॥ मध्येभारतमन्योऽदिरन्तप्राप्ताम्बुधिद्वयः । भाति विद्याधरावासो विजयाच इति श्रुतः ॥२०॥ पञ्चविंशतिरुसेधः पट सपादान्यधः स्थितः । योजनान्यस्य पञ्चाशद्विस्तारो रजतात्मनः ॥२१॥ भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत ये सात क्षेत्र हैं। इनमें भरत क्षेत्र- सबसे दक्षिणमें है और ऐरावत क्षेत्र उत्तरमें है। प्रारम्भसे लेकर विदेह क्षेत्र तकके क्षेत्र विस्तारको अपेक्षा पूर्व क्षेत्रसे चौगुने-चौगुने विस्तारवाले हैं। भावार्थ-भरत क्षेत्रसे चौगुना विस्तार हेमवत क्षेत्रका है, हैमवत क्षेत्रसे चौगुना विस्तार हरि क्षेत्रका है और हरि क्षेत्रसे चौगुना विस्तार विदेह क्षेत्रका है। विदेह क्षेत्रसे आगेके क्षेत्रोंका विस्तार चौथा भाग है अर्थात् विदेह क्षेत्रके विस्तारसे चौथा भाग विस्तार रम्यक क्षेत्रका है, रम्यक क्षेत्रसे चौथा भाग विस्तार हैरण्यवतका है और उससे चौथा भाग विस्तार ऐरावत क्षेत्रका है ॥१३-१४॥ हिमवान् , महाहिमवान , निपध, नील, रुक्मी और शिखरी ये छह कुलाचल हैं। इनमें आगे- आगेका कुलाचल पूर्व-पूर्व कुलाचलसे चौगुने-चौगुने विस्तार वाला है। यह क्रम निषध कुलाचल तक ही चलता है। इसके आगे उत्तरके तीन कुलाचल दक्षिणके कुलाचलोके समान कहे गये हैं ॥१५-१६|| प्रथम भरत क्षेत्रका विस्तार पाँच सौ छब्बीस योजन तथा एक योजनके उन्नीस भागोंमें छह भाग प्रमाण है ॥२७॥ जम्बू द्वीपकी चौड़ाई-एक लाख योजनमें यदि एक सौ नब्वे योजनका भाग दिया जाय तो भरत क्षेत्रका उक्त विस्तार स्पष्ट हो जाता है। भावार्थ F-भरत क्षेत्रका जो विस्तार ५२६६६ योजन बतलाया है वह जम्बू द्वीपके विस्तारका एक सौ नब्बेवॉ भाग है ॥१८॥ क्षेत्रसे पर्वत दूने विस्तारवाला है और पर्वतसे क्षेत्र दूने विस्तारवाला है। दूने विस्तारका यह क्रम विदेह क्षेत्र तक चलता है उसके आगेके क्षेत्र और पर्वतोंका विस्तार ह्रासको लिये हुए है अर्थात् आगेके क्षेत्र और पर्वत अर्ध-अर्ध विस्तारवाले हैं ॥१६॥ॐ भरत क्षेत्रके ठीक मध्य भागमें विजया नामसे प्रसिद्ध एक दूसरा पर्वत सुशी- भित है। इसके दोनों अन्तभाग पूर्व और पश्चिमके दोनों समुद्रोंको प्राप्त हैं तथा इसपर विद्याधरोंका निवास है ॥२०॥ यह पर्वत पृथिवीसे पच्चीस योजन ऊँचा है सवा छह योजन पृथिवीके नीचे स्थित है, पचास योजन चौड़ा है और चाँदीके समान सफेद वर्णवाला है ॥२१॥ १ मुत्तमं म० । २ निषधो म । क्षेत्र और पर्वतीका विस्तार निम्नलिखित है- , भरत क्षेत्र ५२६ योजन हेमवन क्षेत्र २०५ योजन ५६रिक्षेत्र ८४२ योजन विदेश क्षेत्र ३३६८४ योजन है रम्यक क्षेत्र ८४३ योजन "हरण्यवन क्षेत्र २१०५४ योजन १३ ऐरावत क्षेत्र ५२६ योजन २ हिमवत् पर्वत १०.२१ योजन ४ महाहिमवत् पर्वत ४११०+ योजन ६ निषध पर्वत १६८४२ योजन मनील पर्वत १६८४२११ योजन 1. सर्मा पर्वत ४२.० योजन १२ शिम्बरी पर्वत १०५२१ योजन हरिवंशपुराणे योजनानि हितेवं दशोत्पत्य दशोपरि । विस्तीर्णे पर्वतायामे श्रेण्यौ विद्याधराश्रिते ॥२२॥ दक्षिणस्यां महाश्रेण्यां पञ्चाशनगराणि च । उत्तरस्यां पुरः पटिस्त्रिविष्टपपुरोपमाः ॥२३॥ योजनानि दशातीत्य पुनः सन्ति पुराग्यतः । सुराणामाभियोग्यानां क्रीडायोग्यान्यनेकशः ॥२४॥ पुनरुत्पत्य पञ्चावं दशयोजनविस्तृता । श्रेणी तु पूर्णमद्राख्या विजयाईसुराश्रिता ॥२५॥ मिद्धायतन फूटं प्राक् दक्षिणाद्धंकमेव च । खण्डकादिप्रपातं च पूर्णभद्रं ततः परम् ॥२६॥ विजयाद्धकुमाराख्यं मणिभद्र ततः परम् । तामिस्रगुहकं चान्यदुत्तराद्धं च नामतः ॥२७॥ अन्ते वैश्रवणायं तु भान्ति तानि दधन्ति तम् । नगाने नवकूटानि क्रोशषड्योजभोच्छितिम् ॥२८॥ मूले तन्मात्रमेवैषां मध्येऽन्यूनानि पञ्च तु । साधिकान्युपरि त्रीणि विस्तारस्तेषु भापितः ॥२६॥ सिद्धायतनकूटे च मिटमितीरितम् । पूर्वाभिमुखमामाति मिनायतनमुम्बलम् ॥३०॥ उच्छ्रायस्तस्य पादोनः क्रोशः क्रोशा विस्तृतिः । भायामः क्रोश एवं स्यात्प्रासादस्याविनाशिनः ॥३१॥ ज्याऽसौ नवसहखाणि सतशत्यपि चाष्टभिः । चत्वारिशद् कला द्विस्पट भारताद्धे तु दक्षिणा ॥३२॥ धनु-पृष्टं पुनस्तस्या पट्पष्टिः सप्तशत्यपि । सहस्राणि नव ज्यायाः साधिका च कलोदितम् ॥३३॥ योजनानां शते द्वे तु साटत्रिंशत्कलात्रयम् । धनुपोऽनन्तरस्येयमिपुभवति पुष्कला ॥३४॥ सहस्राणि दशाओषां ससशत्यपि विंशतिः । एकादशकला ज्यामौ विजयानगोत्तरा ॥३५॥ ज्याया दशसहस्राणि धनुःसप्तशतीरितम् । विचवारिंशदप्यस्याः कला: पञ्चदशाधिकाः ॥३६।। योजनानां प्रसिद्धपुरष्टाशीत शतद्वयम् । उत्तरा विजयादस्य तिस्रश्वापि कलाः कलाः ॥३७॥ चूलिका विजयाद्धस्य योजनानां चतुःशती । पडशीतिमनागूना जिनेशेन प्रकीर्तिता ॥३८॥ पृथिवीसे दश योजन ऊपर चलार इस पर्वतको दो श्रेणियाँ हैं जो पर्वतके ही समान लम्बी हैं तथा जिनमें अनेक विद्याधरोका निवास है ।।२२॥ दक्षिण महाश्रेणीमे पचास और उत्तर महा- श्रेणीमे साठ नगर है, ये सब नगर स्वर्गपुरीके समान हैं ॥२३॥ यहाँसे दश योजन और ऊपर चलकर आभियोग्य जातिके देवोंकी क्रीड़ाके योग्य अनेक नगर स्थित हैं ॥२४॥ यहाँसे पाँच योजन और ऊपर चढ़कर एक पूर्णभद्र नामकी श्रेणी है जो दश योजन चौड़ी है तथा विजयाध नामक देवसे आश्रित है अर्थात् जहाँ विजया देवका निवास है ॥२५॥ इस विजयाध पर्वत- पर नौ कूट हैं जिनमें पहला सिद्धायतन, दूसरा दक्षिणार्धक, सोस। खण्डकप्रपात, चौथा पूर्णभद्र, पाँचवाँ विजयार्धकुमार, छठवॉ मणिभद्र, सातवॉ तामिस्रगुहक, भाठवॉ उत्तरार्ध और नौवाँ वेश्रवण कूट है। ये नौ कूट पर्वतके अग्रभागपर सुशोभित हैं तथा सवा छह योजन ऊँचाईको धारण करते हैं ॥२६-२८॥ इन पर्वतोंका विस्तार मूलमें सवा छह योजन, मध्यमें कुछ कम पाँच योजन और ऊपर कुछ अधिक तीन योजन कहा गया है ॥२६॥ सिद्धायतन कूट- पर पूर्व दिशाकी ओर सिद्धकूट नामसे प्रसिद्ध अत्यन्त उज्ज्वल जिनमन्दिर सुशोभित है ॥३०॥ इस अविनाशी जिनमन्दिरकी ऊँचाई पौन कोश, चौड़ाई आध कोश और लम्बाई एक कोश है ॥३१॥ भरत क्षेत्रके अर्ध भागमे विजया पर्वतको दक्षिण प्रत्यञ्चा नौ हजार सात सौ अड़तालीस योजन और वारह कला प्रमाण विस्तृत है ॥३२॥ प्रत्यश्चाके धनुःपृष्ठका विस्तार नौ हजार सात सौ छयासठ योजन तथा कुछ अधिक एक कला प्रमाण कहा गया है ।॥३३॥ इस निकटस्थ धनुषका बाग दो सौ अड़तीस योजन और तीन कला प्रमाण है ॥३४॥ विजया पर्वतकी उत्तर प्रत्यञ्चा दश हजार सात सौ सत्ताईस योजन तथा ग्यारह कला प्रमाण है ॥३५।। इस उत्तर प्रत्यश्चाका धनुःपृष्ट दश हजार सात सौ तैंतालीस योजन तथा कुछ अधिक पन्द्रह फला प्रमाग है ॥३६॥ विजयाधके इस उत्तर धनुःपृष्ठका वाण दो सौ अठासी योजन नथा तीन कला प्रमाण है ॥३७॥ जिनेन्द्रदेवने विजया पर्वतको चूलिका कुछ कम चार सौ छयासी योजन १. पुनः म०, ०।२ वर्गपुरीसन्निमाः । ३. भागा द्वादश कीर्तिताःमः ।

पञ्चमः सर्गः पूर्वापरान्तयोर।रष्टाशीति चतुःशती । प्रमाणं भुजयोरस्य भागाः पोदश चाधिकाः ॥३६॥ पट्कला भरतज्योना सैका सप्ततिरीरिता । चतुःशतीविमिश्राणि सहस्राणि चतुर्दश ॥४०॥ चतुर्दशसहस्राणि पञ्चशस्या तु विंशतिः । भष्टाभिर्मारत भागा धनुरेकादशाधिका: naan शतानि पञ्चविंशन्या सह पट्भिश्च घट कलाः । प्रसिद्वैयमिपुर्माच्या धनुपस्तस्य भारती ॥४२॥ अष्टादशशती प्रोक्ता चूलिका पञ्चमततिः । मधंसप्तमभागाश्च साधिका भरतरितः ॥४३॥ सहस्रमेकमष्टौ च शतानि नवतियम् । साधिकार्धाष्टमांशाश्च पूर्वापरमुजप्रमा ॥४४॥ शतयोजनमानः स्मादुच्चायो हिमवगिरेः । अवगाहस्तु तस्यैव पञ्चविरातियोजनः ॥४५॥ योजनानां सहस्रं तु द्वापञ्चाशत्पमन्वितम् । द्वादशापि कलाः प्रोक्ता विस्तारो हिमवगिरेः ।।४६॥ चतुर्विंशतिरस्याः सहस्राणि शतान्यपि । नव द्वात्रिंशता ज्या स्यादीपदूनकलोतरा ॥४७॥ पञ्चशितिरम्यैव सहस्राणि शतद्वयम् । योजनानि धनुर्विंशच्चतस्रः साधिका कला ॥४॥ सहनं पञ्चशत्येकमष्टामतिरेव च । कला चाष्टादशैवारिपुरेपाऽस्य भापिता ॥४॥ योजनानां सहस्राणि पञ्च तानि शतद्वयम् । त्रिंशच्चूलिकाऽस्यादर्भागाः सप्त च साधिकाः ॥५०॥ पन्चैवास्य सहस्राणि पञ्चाशच्च शतत्रयम् । साधिकार्दैन तो बाहू भागाः पञ्चदशाधिकाः ॥५॥ भारत्येकाश फूटानि हैमस्य हिमवगिरेः । शिखरेऽस्य निविष्टानि पंक्त्या पूर्वपरान्मना ॥५२॥ सिद्धायतनकूटं प्राक् हिमवस्कूटमप्यतः । कूटं भरतसंझं स्यादिलाकूटं ततः परम् ।।५३।। गङ्गाकूट श्रियः कूर रोहितास्यारिक व तत् । मिन्धुकूट सुरादेवीकूटं हैमवतं च यत् ॥५४॥ कूट धैश्रवणायं तु पाश्चात्यं परिकीर्तितम् । पञ्चविंशतिरुच्छ्रायः सर्वेषां योजनानि तु ॥५५|| पञ्चविंशतिरेव स्याद् विस्तारो मूलगोचरः । अर्द्धत्रयोदशाग्रेऽन्तः पादोन कोनविंशतिः ॥५६॥ वतलाई है ॥३८॥ विजयार्ध पर्वतको पूर्व-पश्चिम भुजाओंका विस्तार चार सौ अठासी योजन तथा कुछ अधिक सोलह कला प्रमाण है ||३|| भरत क्षेत्रको प्रत्यञ्चा चौदह हजार चार सौ इकहत्तर योजन और कुछ कम छह कला है ॥४०॥ इसका धनुःपृष्ठ चौदह हजार पाँच सौ अट्ठाईस योजन तथा ग्यारह कला प्रमाण है ॥४१॥ भरतक्षेत्र सम्बन्धी धनुःपृष्ठके बाणका विस्तार पाँच सौ छब्बीस योजन और छह कला प्रमाण प्रसिद्ध है ॥४२॥ भरत क्षेत्रकी चूलिका अठारह सौ पचहत्तर योजन तथा कुछ अधिक साढ़े छह भाग यतलाई है ॥४३॥। इसको पूर्व-पश्चिम भुजाओंका विस्तार एक हजार आठ सौ बानवे योजन तथा कुछ अधिक साढ़े सात भाग है ॥४४॥ हिमवान् कुलाचलकी ऊँचाई सौ योजन, गहराई पच्चीस योजन और चौड़ाई एक हजार बावन योजन तथा वारह कला प्रमाण कही गई है ।।४५-४६॥ इस हिमवत् कुलाचल- की प्रत्यञ्चाका प्रमाण चौबीस हजार नौ सौ बत्तीस योजन तथा कुछ कम एक कला प्रमाण बतलाया है ॥४७-४८॥ इसका वाण एक हजार पाँच सौ अठहत्तर योजन तथा अठारह कला प्रमाण कहा है ॥४॥ हिमवत्सलाचलकी चूलिकाका विस्तार पाँच हजार दो सौ तीस योजन तथा कुछ अधिक सात कला है ॥५०॥ इसकी पूर्व-पश्चिम दोनों भुजाओंका विस्तार पाँच हजार तीन सौ पचास योजन साढ़े पन्द्रह भाग है ॥५१॥ इस सुवर्णमय हिमवत् कुलाचलकी शिसर- पर पूर्वसे पश्चिम तक पंक्ति रूपसे स्थित ग्यारह कूट सुशोभित हो रहे हैं ॥५२॥ उन फूटोंके नाम इस प्रकार हैं-१. सिद्धायतनकूट, २. हिमवत्तूट, ३. भरतकूट, ४. इलाफूद, ५. गगाकूर, ६. श्रीकूट, ७. गेहितकूट, ८. सिन्धुकूट, १. मुगदेवीकूट, १०. हैमवतकूट और ११. वैश्रवणकूट । इन सभी कूटोंकी ऊँचाई पचीस योजन प्रमाण है ॥५३-५५॥ इन सयका मूलमै पशीस योजन, मध्यमें पौने उन्नीस योजन और ऊपर साढ़े बारह योजन विस्तार है ।।१६।। १. दशाने तुम।

०१ । हरिवंशपुराणे दे सहने शतं पञ्च योजनानि तु पञ्चभिः । भागे हैमवतस्यापि विष्कम्भः पुष्कलो मतः ॥५॥ सप्तग्रिंशत्सहस्राणि चतुःसप्तति पदशती । ज्याऽपि हैमवतस्यान्ते न्यूनाः पोटश ताः कलाः ॥५८॥ साग्रिंशासहस्राणि सप्तशत्यपि नोदिता । चत्वारिंशद्धनाया दशास्याः साधिकाः केलाः ॥५६।। पनिंशश्च शतानि स्यादशीतिश्चतुरुत्तरा । योजनानि कलाश्चास्य चतस्रो धनुपस्त्विपुः ॥६०॥ चूलिका चैकमप्तम्या निपष्टिशतयोजना । साधिकः सप्तभिभांगः क्षेत्रस्यास्योपवर्णिता ॥६॥ मप्तपष्टिशतान्यस्याः पञ्चपञ्चाशता भुवः । योजनानि भुजामानं साधिकाश प्रयोऽशकाः ॥६२॥ सहस्राणि तु चवारि दशोत्तरशतद्वयम् । दशभागाश्व विस्तारो महाहिमवतो गिरेः ।।१३।। ऊवं च पुनस्यातो योजनानां शतद्वयम् । पञ्चाशतमधो यातो धरिण्यां धरिणीधरः ॥६॥ निपञ्चाशम्महस्राणि योजनानि शतानि च । नवैकत्रिशदेतस्य ज्या पट भागाश्च साधिकाः ॥६५॥ पम्बाराच महस्राणि सप्ताऽस्य द्विशी धनुः । ग्रिनवत्या सह ज्यायाः साधिकाच दशांशकाः ।।६।। धनुषोऽन्य सहस्राणि सप्त साप्टशतानि तु । धतुर्नवतियुक्तानि भागाचेपुश्चतुर्दश ॥६॥ एकाशीतिरातानि स्यादष्टाविंशतिरेव च । चत्वारोऽाधिका भागाश्चूलिकाऽस्य महीभृतः ॥६॥ महत्राणि नव द्वे तु राते पट महतिनंव । भागा भुजद्वयं तस्य साधिकाईकलाधिकाः ॥६६॥ भधार्जुनमयस्यास्य कूतानि शिखरे गिरेः । निरञ्जितमानुनि नित्यानि सन्ति भान्ति च ॥७०॥ मिदायननकूट स्यान्महाहिमयदादिकम् । फूटं हेमवत फूट रोहिता कूटमप्यतः ॥७॥ होटं हरिकान्तादि हरिवादिकं हि तत् । वैडूर्यफूटमप्येषां पञ्चाशद्योजनोरितिः ॥७२॥ पारायोजनो मौलो विश्काभो मध्यगोचरः । सप्तत्रिशतया च मस्तके पञ्चविंशतिः ॥७३॥ इसके आगे दूसग हेमवत क्षेत्र है इसका विस्तार दो हजार एक सौ पाँच योजन तथा पाँच फला प्रमाण माना गया है ।।५७। इसको प्रत्यच्चा सैंतीस हजार छह सौ चौहत्तर योजन तथा युट फम सोलह कला प्रमाण है ॥८॥ इस प्रत्यञ्चाका धनुपपृष्ट अहतीस हजार सात सी पालीस योजन तथा कुछ अधिक दश कला प्रमाण है ॥५६और इसका बाण तीन हजार वह मौ चौरासी योजन तथा चार फला है ।।६०॥ इसकी चूलिका छह हजार तीन सौ इकहत्तर योजन नया युछ अधिक सात फ्ला है ॥६१॥ पूर्व-पश्चिम भुजाओंका मान छह हजार सात सी पपपन योजन और कुछ अधिक तीन भाग है ॥२॥ इमफे भागे महामियान् कुलाचल है इसका विस्तार चार हजार दो सौ दश योजन तथा दश कला है ॥६३॥ यह पर्वत पृथियोसे दो सौ योजन ऊपर उठा है तथा पचास योजन धियोंके नीचे गया है ॥६४|| इसकी प्रत्यवाका विस्तार वेपन हजार नौ सौ इकतीस योजन नया गुप अधिक छह फला है ॥६५॥ इम प्रत्ययाके धनुःपृष्ठका विस्तार संतायन हजार दो सौ तिगनय योजन नया युछ अधिक दश अंश है ॥६६॥ इमके याणकी चौड़ाई सात हजार आठ मोपोगन योजन तथा चौदह भाग है. n६७|| इस महाहिमवान् पर्वनको चूलिका आठ हजार पक मी भहाईम योजना तथा माद पार फला है ॥८॥ इमकी दोनों भुजाएँ नौ हजार दो सौ विदार योजन सथा मादेनो कला प्रमाण है ॥६॥ घाँदोके समान श्वेतवर्णवाले इम पर्वतके शिमापर स्लीम शिपरीको अनुगंजिन करनेयाले उत्तम एवं स्थायी आठ फूट मुशोभित हो मे ॥३०॥ उन यूटीफे नाम इस प्रकार है-१. मिद्धायननयूट, २. महादिमयत्यूट, ३. हमयत पट, गेदिला गट, ५. ही यूट, ६. हरिकान्त फूट, ७. हरियप फूट और ८. येडूयं फूट । सप प्रटीकी रंगाई पाम योजन प्रमाग है ।।७१-5२॥ मूलमे इन फूटीफा विस्तार पगाम योजन, मप मा मनाम योजन भीर र पाम योजन है॥३॥ १ गरमाग.। २ गानाःR.11. मूले भो मोषः।

पज्ञमः सर्गः ७५ स्यादष्टौ हि सहस्राणि चतुःशत्येकविंशतिः । हरिवर्षस्य विस्तारो भागश्चैकोनविंशतः ॥७॥ शतानि नव सेकानि सहस्राणि त्रिसप्ततिः । ज्यापि चास्य विशेपेण भागाः सप्तदशाधिकाः ॥७५॥ भस्याश्चतुरशीतिश्च सहस्राणि पुनर्भवेत् । पोदशाऽपि धनुयायाश्चतस्रः साधिकाः कलाः ॥७६॥ पोडशाऽस्य सहस्राणि योजनानां शतप्रयम् । इपुः पशदश ज्ञेया सह पञ्चदशांशकैः ॥७॥ सहस्राणि नवान्यानि शतानि नव चूलिका । पञ्चाशीतिश्च पञ्चांशाः सहाईकलया तु सा ॥७॥ त्रयोदशसहस्राणि त्रिशती पष्टिरकाम् । साधिकार्धाधिकार्धाः पट् मागास्तत्र भुजप्रमा ॥७॥ द्वाचत्वारिंशदष्टौ च शतान्यन्यानि पोटश | सहस्राणि च भागो द्वौ विष्कम्भो निपधस्य च ॥८॥ उच्छ्रायः पुनरस्य स्थाद् योजनानां चतुःशी । अवगाहस्वयो भूमेः शतयोजनमायकः ॥ चनुवतिसंख्यानि सहस्राणि शतं तथा । पट्पञ्चाशद्विभागी च साधिको ज्याऽस्य भूभृतः ॥२॥ लकाऽत्र सहस्राणि चतुर्विशतिरंशकाः । साधिका नव चापं पट्चत्वारिंशच्छतत्रयम् ॥१३॥ धनुषोऽस्य प्रयस्त्रिंशसहस्राणि शतं तथा । सप्तपञ्चाशदेव स्यादिपुः सप्तदशांशकाः ॥८॥ तथा दशसहस्राणि शतं स्यारसप्तविंशतिः । साधिकौ च परी भागौ चूलिका निषधस्य सा ॥५॥ विंशतिश्च सहमाणि पश्चपष्टियुतं शतम् । साधिकार्धाधिको भागी प्रमाणं भुजयोरिह ॥८॥ तपनीयमयस्यास्य निपधस्यापि मूर्धनि । भासन्ते नवरानि सर्वरत्नमरीचिभिः ॥७॥ सिद्धायतनकूटं च फूट तसिपधादिकम् । हरिवदिकं पूर्वविदेहादिकमेव तत् ॥ हीकूटं तिकूटं च शीतोदाकूटमेव च । विदेहस्टमित्येकं रुचक नवमं मतम् ॥८॥ उच्छ्रायो योजनशतं विष्कम्भश्चापि मलजः । पञ्चाशन्मस्तकेऽमीप मध्येऽसौ परसप्ततिः ॥६॥ इसके आगे हरिवर्प क्षेत्र है इसका विस्तार आठ हजार चार सौ इक्कीस योजन तथा एक योजनके उन्नीस भागांमसे एक भाग प्रमाण है ||७४॥ इसकी प्रत्यश्चाका विस्तार तेहत्तर हजार नौ सी एक योजन और सत्रह कला है ॥७॥ इस प्रत्यञ्चाका धनुःपृष्ठ आठ हजार चार सौ सोलह योजन तथा कुछ अधिक चार कला है ॥७६॥ इसके याणका विस्तार सोलह हजार तीन सी पन्द्रह योजन तथा पन्द्रह कला है ॥५७॥ इसकी चूलिका नौ हजार नौ सौ पचासी योजन तथा साढे पाँच कला है ।।७८11 और इसकी भुजाओंका प्रमाण तेरह हजार तीन सौ इकसठ योजन साढ़े छह फला है || इसके आगे निपध पर्वत है इसका विस्तार सोलह हजार आठ सौ ययालिस योजन तथा एक योजनके उन्नीस भागों में दो भाग प्रमाण है ||२॥ इसको ऊँचाई घार मी योजन है और पृथिवीके नीचे गहराई सौ योजन प्रमाण है ॥८१|| इस पर्वतको प्रत्यश्चा चोरानवे हजार एक सौ छप्पन योजन तथा अधिक दो कला है ।।२। इसका धनुःपृष्ठ एक लास चौबीस हजार तीन सौ छियालीस योजन तथा कुछ अधिक नौ कला है ॥३॥ इस धनु:पृष्ठके बाणका विस्तार ततीस हजार एक सौ संतायन योजन तथा सत्रह कला है nxn इस निषध पुलाचलकी चूलिका दश हजार एक सी सत्ताईस योजन तथा कुछ अधिक दो कला है ॥in इमकी भुजाओं का प्रमाण बीस हजार एक सौ पैसठ योजन तथा कुछ अधिक अढ़ाई फला है ॥६॥ इस स्वर्णमय निपघाचलफे मस्तकपर नी फूट है जो कि सब प्रकारफे ग्लोकी किरणोंसे सुशोभित हो रहे हैं ।।८।। नन फूटांके नाम इस प्रकार हैं-१ सिद्धायतन फूद, २ निषध फूट, ३ हरिवर्ष फूट, ४ पूर्व विदेह पृट, ५ ही यूट, ६ धृति फूट, ७ सीनोदा फूट, विदेह फूट और उपक फूट 15- इन सयकी ऊंचाई और मूलकी पौड़ाई सो योजन है। पीचको चौड़ाई पचहत्तर योजन और मस्तक-ऊर्य भागको पौड़ाई पचास योजन है MEDIA १मात्रा:म..

हरिवंशपुराणे प्रयस्त्रिंशत्महस्राणि विदेहस्य च पटशती। तथा चतुरशीतिश्च विस्तारश्चनुरंशकाः ॥६॥ ज्या स्यातसहस्राणि योजनानि प्रमागतः । जाबू द्वीपप्रमाणेन कृतपढेंग साम्यतः ॥१२॥ अष्टापञ्चाशदिष्टानि सहस्राणि शतं धनुः । प्रयोदर्शकलशांशाः साधिकाधन पोटश ॥३३॥ पञ्चाशच सहस्राणि योजनानीपुरिष्यते । महतो धनुषस्तस्य महती युज्यते हि सा ॥१४॥ दे सहस्रशतैर्युक्ते नवभिश्चैकविंशतिः । साधिकाष्टादशांशाश्च विदेहास्य चूलिका ॥१५॥ ऽयशीतिश्च शतान्यष्टौ सहस्त्राणीह पोडश । प्रयोदशांशकाः पादः साधिकश्च भुजाद्वयम् ॥६६॥ प्रमाणं दक्षिणाई यद् द्वीपस्य प्रतिपादितम् । बोध्यं तदुत्तराऽपि क्षेत्रपतगोचरम् RESH ज्यायां ज्यायो विशुद्धायां शेषाई चूलिका स्मृता । चापे चापे विशुद्धेऽद्ध तथा पार्श्वभुजा हि सा HEELI वैडूर्यमयनीलस्य सिद्धायतननामम् । नीलकूटं च तत्पूर्व विदेहाघुपरि स्थितम् ॥६॥ सीताकूट चतुर्थ श्यारीतिकूटं च पश्चमम् । नरकान्तादिकं षष्ठं ततोऽपरविदेहकम् ।।१०।। रस्यकाधष्टमं कूदमपदर्शन; विह । उच्छ्रायमूलमध्यान्तविपरभो निपधेषु यः ।।१०।। रौक्मस्थ रुक्मिणोऽप्यग्रे सिद्धायतनमादितः । रविभकूट द्वितीय स्यात् तृतीयं रम्यकादिकम् 111०२॥ नारीकूट तुरीय तु वुद्धिकृट तु पञ्चमम् । रूयकूटं परं धूट हैरण्यवतपूर्वकम् ॥१०३॥ मणिकाञ्चनकूट च सामान्योच्छ्ायतस्तु ते । मूलमध्यानविस्तारैर्महाहिमवति स्थितैः ॥१०॥ फूटान्येकादशैवाने हैमस्य शिखरिश्रुतेः । सिद्धायतनमा स्यात् कूटं शिखरिपूर्वकम् ॥१०५॥ हैरण्यत्रतकूटं च मुरदेवीपुरःसरम् । रक्तालक्ष्मीसुवर्णादिक्दानि च यथारमम् ॥१०॥ तथा रक्तवती कुटे गन्धदेव्यास्ततः परम् । तथैरावतकूट च पाश्चात्यं मणिकाञ्चनम् ॥१०७॥ इसके आगे विदेह क्षेत्र है इसका विस्तार तैंतीस हजार छह सौ चौरासी योजन तथा एक योजनके उन्नीस भागामें चार भाग प्रमाण है ।शा इसको प्रत्यञ्चाका प्रमाण मानो समानताके कारण स्पर्धा करनेवाले जम्बू द्वीपके धरायर एक लाख योजन है ॥६२। इसके धनुः- पृष्टका विस्तार एक लाख अंठावन हजार एक सौ तेरह योजन तथा कुछ अधिक साढ़े सोलह कला है ॥३॥ बाणका विस्तार पचास हजार योजन है सो ठीक ही है क्योकि उतने बड़े धनुपका उतना बड़ा बाण होना उचित ही है ॥६४ा विदेहाईकी चूलिका दो हजार नौ सौ इक्कीस योजन तथा कुछ अधिक अठारह कला है ॥६५॥ इसकी दोनों भुजाओंका विस्तार सोलह हजार आठ सौ तेरासी योजन तथा सवा तेरह कलासे कुछ अधिक है ॥६६॥ जम्बू द्वीप- के दक्षिणार्ध भागमै क्षेत्र तथा पर्वत आदिका जो प्रमाण बतलाया है वहीं उत्तरार्ध भागमें भी जानना चाहिए ॥६७॥ प्रत्यञ्चा, धनुःपृष्ठ, बाण, भुजा तथा चूलिकाका जो विस्तार दक्षिणार्धमें बतलाया गया है वहीं शेपार्धमें भी है ॥८॥ उत्तरार्धके पर्वतोमें जो विशेषता है उसे बतलाते है--विदेह क्षेत्रके आगे जो वैडूर्यमणिमय नील पर्वत है उसके ऊपर निम्नलिखित नौ कूट है- १ सिद्धायतन फूट, २ नील कूट, ३ पूर्व विदेह कूट, ४ सीताकूट, ५ कीर्ति कूट, ६ नरकान्तककूट, ७ अपर विदेह कूट, ८ रम्यक कूट और ६ अपदर्शन कृट । इन सब कूटीकी ऊँचाई तथा मूल मध्य और ऊर्य भागको चौड़ाई निषधाचलके कूटोके समान है ||६-१०१॥ रुक्मी पर्वत चॉदीका है उसके अप्रभागपर निम्नलिखित आठ फूट है-पहला सिद्धायतन कूट, दूसरा रुक्मि फूट, तोसरा रम्यक कूट, चौथा नारी कूद, पॉचवॉ बुद्धि कूट, छठवाँ रूप्य कूट, सातवाँ हेरण्यवत कूट और आठवाँ मणिकाञ्चनकूट । इन सनकी सामान्य ऊँचाई मूल मध्य तथा अन भागका विस्तार महाहिमवान् पर्वतके कूटोंके समान जानना चाहिए ॥१०२-१०४॥ शिखरी पर्वत मुवर्णमय है उसके अमभागपर निम्नलिखित ग्यारह कूट हैं-१ सिद्धायतन कूट, २ शिखरी कूट, ३ हैरण्यवत कूट, ४ सुरदेवी कूट, ५ खत्ता कूट, ६ लक्ष्मी कूट, ७ सुवर्ण कूट, ८ रक्तवती १ महिती मा पञ्चमः सर्गः हिमवरकूटनुल्यानि तानि कूटानि शोभया । आदिमध्यान्तविस्तारैरुलायेण च चारुणा ॥१०॥ तथैरावतमध्यस्थविजयादस्य मुर्धनि । हेटन्ते नवकूटानि सुरत्नमणिमटः ॥१०॥ सिद्धायतनकूटं स्यादुत्तरार्धाभिधानकम् । तामिस्रगुहकूटं च मणिभद्मनः परम् ॥१०॥ विजयाकुमाराख्यं पूर्णभद्रारयमप्यतः । खण्डकादिप्रपातं च दक्षिणाधं च नामतः।।११॥ नवमं तु तथाख्यातं कूटं वैश्रवणश्रुतिः । तानि सर्वाणि तुल्यानि भारतीयः प्रमाणतः ।।११२॥ पूर्वापरायतानां हि पग्गा तन्कुलभूभृताम् । सप्तक्षेत्रविभक्तृणामेकैकस्योभयान्तयोः ॥१३॥ सर्वर्नुकुसुमाकोणफलभारनतद्रुमैः । हारिणी पदिसवातमधुकृन्मधुरस्वनैः ॥११॥ अद्धंयोजनविस्ताणी विचित्रमाणवेदिको । भवतो वनखण्डौ द्वौ पर्वतायामसम्मितौ ॥१५॥ अधंयोजनमानस्तु वेदिकोल्मेव इप्यते । वेदकासतत्त्वस्य व्यासः पञ्चधनुःशती ॥१६॥ सुरत्नपरिणामानि नानावर्णानि सर्वतः । वैदिकोचितदेशेषु तोरणानि भवन्ति च ॥१७॥ भूभृतामुपरि ज्ञेया सर्वतः पद्मवेदिका । मगिरत्नमयी दिव्या गन्यूनिद्वयमुस्ट्रिता ॥१८॥ गृहद्वीपसमुदाणां भूनदीहदभूभृताम् । वैदिकोत्सेधविस्तारी तिर्यग्ला स्थिताविमौ ॥१६॥ तेषां तु मध्यदेशेषु पूर्वापरसमायताः । पण्महाकुलशैलाना पड् महान्तो हृदाः स्थिताः ॥२०॥ पद्मश्चापि महापद्मस्तिगिञ्छः केसरी हृदः । सुमहापुण्डरीकश्च पुण्डरीकश्च नामतः ॥१२॥ चतुर्दश विनिर्गत्य मरितः पूर्वसागरम् । तेभ्यो विशन्ति सप्तव सप्तवापरसागरम् ।।१२२।। कूट, ६ गन्धदेवी कूट, १० ऐरावत कूट और ११ मणिकाञ्चन कूट । ये सब कूट शोभा, मूल- मध्य और अन्त सम्बन्धी विस्तार तथा सुन्दर ऊँचाईसे हिमवत् पर्वतके कूटोंके समान हैं ॥१०५-१०।। ऐरावत क्षेत्रके मध्यमें जो विजया पर्वत है उसके अग्रभागपर भी नी कूट हैं जो कि उत्तमोत्तम रत्न तथा मणियोंके समूहसे देदीप्यमान हो रहे हैं। उन कृटीके नाम इस प्रकार हैं-१ सिद्धायतन कूट, २ उत्तरार्ध कूट, ३ तामिस्रगुह कूट, ४ मणिभद्र कूट, ५ विजया कुमार कूट, ६ पूर्णभद्र कूट, ७ खण्डकप्रपात कूट, ८ दक्षिणार्ध कूट और ६ वैश्रवण 'सब कूट पमाणको अपेक्षा भरत क्षेत्र सम्बन्धी विजयापर स्थित कूटांके तुल्य हैं ।।१०६-११२॥ सोत क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले तथा पूर्वसे पश्चिम तक लम्बे जिन छह कुलाचलोका वर्णन पहले कर आये हैं उनमेसे प्रत्येकके दोनों अन्त भागमे वन खण्ड सुशोभित हैं। ये वन खण्ड समस्त ऋतुओंके फूलोंसे भरे तथा फलोंके भारसे नम्रीभूत वृक्षों और पक्षि- समूह तथा भ्रमरीके मधुर शब्दांसे मनोहर हैं, आधा योजन विस्तृत हैं, चित्र-विचित्र मणियों- की वेदिकाओसे सहित हैं और पर्वतके लम्बाईके बराबर हैं ॥११३-११शा व्यास-विस्तारके रहस्यको जाननेवाले आचार्यों ने इन वन खण्डोकी वेदिकाकी ऊँचाई आधा योजन और चौड़ाई पाँच सौ धनुष बनलाई है ॥११६॥ वेदिकाओके ऊपर योग्य स्थानोंपर चारों ओर उत्तमोत्तम रत्नांसे निर्मित नाना रंगके तोरण हैं ॥११७।। कुला वलोंके ऊपर चारों और मणि तथा रत्नोंसे वनी हुई दिव्य तथा दो कोश ऊँची पद्म-वेदिका है ॥११८॥ मध्य लोक गृह, द्वीप, समुद्र, पृथिवी, नदी, हद और पर्वतीकी जो वेदिकाएँ हैं उनको ऊँचाई और विस्तार भी इसी प्रकार समझना चाहिए अर्थात् सबकी ऊँचाई आधा योजन और चौड़ाई पाँच सौ धनुप हैं ॥११॥ उक्त छह महाकुलाचलोके मध्यभागमें पूर्व से पश्चिम तक लम्बे छह विशाल सरोवर हैं ॥१२०॥ उनके नाम इस प्रकार हैं-१ पद्म, २ महापद्म, ३ तिगिञ्छ, ४ केसरी, ५ महापुण्ड- रीक और ६ पुण्डरीक ॥१२१|| उन सरोवगेसे चौदह नदियाँ निम्ली हैं जिनमें सात तो पूर्व १. हठन्ति ख०, म । उत्तिष्ठन्ति इत्यर्थः, 'ठ' प्लुतिशटत्वयोः । २. मनोहरौ। ३ मधुपस्वनः म०। ४ उत्तमरत्ननिर्मितानि ।

७५ । हरिवंशपुराणे गङ्गा सिन्धुश्च रोझा व रोहितास्या हरित् सरित् । हरिकान्ता च सीता च सातोदाऽपि च नामतः ॥२३॥ नारी च नरकान्ता च तथैव परिवर्णिता । सुवर्णफूल या साकं रूप्यकला पराऽपगा ॥१२॥ रक्तया सह रक्तोदा ताश्च सर्वा यथायधम् । नदीबहुसहन स्तु भवन्ति सहिनाः क्षितौ ॥१२५॥ सहस्त्रयोजनायामः पद्मः पञ्चशतानि च । योजनानि स विस्तीर्णा दश स्यादवगाहतः॥२६॥ हिमववेदिकानुत्या परिधिपति वेरिका । समन्ततस्तमापूर्ण शुमशीतलवारिणा ॥२७॥ योजनानविष्कम्भं पुष्कर पुष्करेऽभिसः । निष्पग्य योजनाधं तु काशते क्रोशकर्णिकम् ॥१२॥ द्विगुणद्विगुणायामविष्कम्भादौ हदान्तरे । दक्षिणोत्तरभागस्थे पुष्कराणि चकासते ॥३२॥ पुष्करेषु वसन्युच्चैः प्रासादेषु यथाक्रमम् । श्रीहियो तिकीयौ च बुद्धिलम्यौ च देवताः ॥१३०॥ ताश्च पल्योपमायुष्काः सौवर्मेन्दस्य दक्षिणाः । ऐशानस्योत्तरा देव्यः ससामानिकसंसदः॥१३॥ गङ्गा पूर्वेग पद्मस्य द्वारेणानुनगं गता । सिन्धुरप्यपरेणास्य रोहितास्योत्तरेण तु ॥१३२॥ महापद्मावदात् रोया हरिकान्ता च निःसना । हरिता सह सीतोदा तिगि छहदतस्तथा ।।१३३॥ केशरीदतः सीता नरकान्ता च निर्गता । नारी च रूप्यफूला च सा महापुण्डरीकतः ॥१३॥ सुवर्णकूलथा रक्ता रक्तोदा पुण्डरीकतः । द्वारेण तोरणोझासा विनिःक्रान्ता महानदी ॥१३५॥ पड़ योजनानि गव्यूत व्यासो बज्रमुखस्य सः । भवगाहोऽर्द्धगव्यतं गङ्गाया निर्गमे स्मृतम् ॥१३६॥ योजनानि नवोद्विद्धमष्टांशत्रितयं तथा । तोरणं तत्र विज्ञेयं विचित्रमणिभास्वरम् ॥१३॥ सागरमें प्रवेश करती हैं और सात पश्चिम सागर में ॥१२२।। उन नदियोके नाम इस प्रकार हैं-१ गङ्गा, २ सिन्धु, ३ रोह्या (रोहित्), ४ रोहितास्या, ५ हरित्, ६ हरिकान्ता, ७ सीता, ८ सीतोदा, नारी, १० नरकान्ता, ११ सुवर्णकूला, १२ रूप्यकूला, १३ रक्ता और १४ रक्तोदा । ये सब नदियाँ पृथिवीतलपर हजारों सहायक नदियोंसे युक्त हैं ॥१२३-१२५।। पद्म सरोवर एक हजार योजन लम्बा, पाँच सौ योजन चौड़ा और दश योजन गहरा है ॥१२६॥ शुभ एवं शीतल जलसे भरे हुए इस सरोवरको हिमवत्कुलाचलकी वेदिकाके तुल्य एक वेदिका चारों ओरसे घेरे हुए है ॥१२७। इस पद्म सगेवरमे एक योजन विस्तारवाला कमल है। यह कमल पानीसे निकलकर आधा योजन ऊपर उठा हुआ है, तथा एक कोशकी उसकी कर्णिका सुशोभित है ॥१२८॥ दक्षिण तथा उत्तर भागमे जो अन्य सरोवर हैं उनकी लम्बाई चौड़ाई आदि पूर्व पूर्वके सरोवरांसे दुगुनी दुगुनी है तथा उन सब सरोवरों में कमल सुशोभित हैं ।।१२६|| कमलों- पर जो ऊँचे-ऊँचे भवन बने हुए हैं उनमे यथाक्रमसे श्री, ही, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नामकी देवियाँ निवास करती हैं ॥१३०॥ ये सब देवियों एक पल्यकी आयुवाली हैं। इनमे दक्षिण भागको देखियों सौधर्मेन्द्रकी और उत्तर भागको देवियों ऐशानेन्द्रकी आज्ञाकारिणी हैं। ये सब सामानिक देवाकी सभासे सहित हैं ॥१३१॥ पद्म सरोवरके पूर्व द्वारसे गहा, पश्चिम द्वारसे सिन्धु और उत्तर द्वारसे रोहिताश्या नदी निकली है । ये नदियाँ सरोवरसे निकलकर कुछ दूर तक पर्वतपर ही बहती हैं ।।१३२।। महापद्मसरोवरसे रोह्या और हरिकान्ता, तिगिछसे हरित् और सीतोदा, केशरी सरोवरसे सीता और नरकान्ता, महापुण्डरीक सरोवरसे नारी और रूप्यकूला और पुण्डरीक सरोवरसे मुवर्ण कुला, रक्ता और रक्तोदा नदी निकली हैं। इन नदियोंके निम्लनेके द्वार तोरणोंसे सुशोभित हैं ॥१३३-१३५॥ जिस पत्रमुख द्वारसे गङ्गा निकलती है उसका विस्तार छह योजन और एक कोश है तथा उसकी गहराई आवे कोशकी है ॥१३६॥ उस द्वारपर चित्र-विचित्र मणियोंसे देदीप्यमान एक तोरण बना हुआ है जो नौ योजन तथा एक योजनके आठ भागीम १. रोहिच ख., म० । २ योजनोच्छित म० ।

पञ्चमः सर्गः प्राप्य पञ्चशती प्राचीमावर्तेन निवयं च । गङ्गाकुटादपाची सा भारतव्यासमागता ॥१३८॥ शतयोजनमाकाशं चाधिकं चातिलध्य सा । न्यपतस्पर्वताद्रे पञ्चविंशतियोजने ॥१३॥ 'पड्योजनी सगव्यूता विस्तीर्णा वृषभाकृतिः । जिविका योजनार्दा तु बाहुल्यायामतो गिरौ ॥ १४०॥ तवैश्य पतिता गङ्गा गोशृङ्गाकारधारिणी । श्रीगृहानेऽभवद् भूमौ दशयोजनविस्तृता ॥१४॥ पष्टियोजनविस्तीर्ण वन्नकुण्डमुख भुवि । अवगाहो दशास्यापि मध्ये द्वीपो व्यवस्थितः ॥१४२॥ अष्टयोजनविष्कम्भः सोऽम्भसः क्रोशयोयम् । उस्थितस्तस्य चान्योऽस्ति मनि वनमयोऽचलः ॥१४३॥ चत्वारि च गिरिझै च तथैकं च दशोन्नतिः । योजनानि स विस्तीर्णो मूले मध्ये च मूर्धनि ॥१४॥ शिखरे च गिरेस्तस्य मूले मध्ये च मस्तके । श्रीणि द्वे च सहस्रच विस्तारेण धपि तु ॥१४५॥ अन्तः पञ्चशतायामं तदद्ध चापि विस्तृतम् । द्विसहस्रधनुस्तुङ्ग भाति पत्रमयं गृहम् ।।१४६॥ अशीतिधनुरुद्विद्ध चत्वारिंशच विस्तृतम् । तत्र वज्रकपाटारयं द्वारं वज्रमयं गृहे ।।१४७॥ याग्वा दक्षिणतः कुण्डात् कचित् कुण्डलगामिनी । गुहायां विजयादस्य विस्तृता साष्टयोजनीम् ।।१८।। चतुर्दशसहस्रस्नु प्रवेशे सरितामसी । सार्द्धद्विपष्टिविष्कम्भा प्रविष्टा पूर्वसागरम् ॥१४॥ तीन भाग प्रमाण ऊँचा है ॥१३७|| गङ्गा नदी अपने निर्गम स्थानसे निकलकर पाँच सौ योजन तो पूर्व दिशाकी ओर घही है फिर बलखाती हुई गङ्गा कूटसे लौटकर दक्षिणकी ओर भरत क्षेत्रमें आई है ॥१३॥ वह गङ्गा कुछ अधिक सी योजन आकाशसे उलंघकर पर्वतसे पच्चीस योजनकी दूरीपर गिरी है ॥१३॥ हिमवत् पर्वतके दक्षिण तटपर एक जिबिका नामकी प्रणाली है जो छह योजन तथा एक कोश चौड़ी है, दो कोश ऊँची तथा उतनी ही लम्बी है और वृषभाकार अर्थात गोमुखके आकारकी है ॥१४०।। इस प्रणाली द्वारा गडा, गोशृङ्गका आकार धारण करती हुई श्रीदेवोंके भवनके आगे गिरी है और यहाँ भूमिपर इसका विस्तार दश योजन हो गया है ।।१४१॥ भूमि- पर साठ योजन चौड़ा तथा दश योजन गहरा एक वरमुख नामका कुण्ड है इस कुण्डके मध्य- में एक द्वीप है जो आठ योजन चौड़ा है तथा पानीसे दो कोश ऊँचा है । इस द्वीपके आर एक वनमय पर्वत है जो मूलमें चार योजन, मध्यमें दो योजन, तथा अन्तमें एक योजन चौड़ा एवं दश योजन ऊंचा है ॥१४२-१४४॥ उस पर्वतके शिसरपर एक मुशोभित वनमय भवन है जो मूलमें तीन हजार, मध्यमें दो हजार और अन्तमें एक हजार धनुप विस्तृत है । तथा भीतर पाँच सौ धनुप लम्या, दो सौ पचास धनुप चौड़ा और दो हजार धनुप ऊँचा है ।।१४५- १४॥ उस भवनका अस्सी योजन ऊँचा तथा चालीस योजन चौड़ा वरुपाट नामका वनमय द्वार है ॥१४॥ पनमुख कुण्डसे दक्षिणको और लाकर कहीं कुण्डलके आकार गमन करती हुई गङ्गा विजया पर्वतको गुफामें आठ योजन चौड़ी हो गई है ॥१४८।। चौदह हजार नदियों के साथ जहाँ यह गङ्गा पूर्व लवण समुद्रमें प्रवेश करती है वहाँ इसकी चौड़ाई साढ़े वामठ योजन- -प्रिलोकमार १ षड्योजनी सगभूतां म० । २ योजनाधं । ३ फोमदुगडीहरहला यसहायारा य जिदिया संघ । छज्जोयणं सकोमं निस्से गण पडिटा सा ||५८॥ दिमयन्त अन्त मणिमय वरकुट मुहम्मि यमह स्वम्मि । पविमिच पदर धाग सय जोयग तुंग समि धरला ।।१४।। छज्जोयण सरकोशा पगालिया रित्यहा मुगेपया । अायामेण य रोगा ये कोमातेतिया पहला ॥१५॥ ऊर्जितः म०।५ यायोमनीक। -जम्यू०प्रशनि 50 हरिबंशपुराणे योजनानि निनवनि निगव्यूतानि चोच्छ्रितम् । गाधतो योजनाद्ध' स्यात् सरिद्विस्तारतोरणम् ।।१५०॥ सर्वप्रकारतः सिन्धुः समाना गया ततः । आविदेहाच्च सरितां द्विगुणं जितिपादिकम् ॥१५॥ तोरणान्यवगाहेन समस्तानि समानि तु । वसन्ति तेषु सर्वेपु दिक्कुमार्यों यथायथम् ।।१५२॥ पदमप्तति कलापटकं योजनानां शतद्वयम् । गत्वाऽदो रोहितास्यातो' निपत्य श्रीगृहेऽगमन् ॥१५३॥ शतानि पोडशादौ तु रोह्या पचयुतानि सा । कलाश्चागम्य पञ्चागाद् गिरेः पञ्चाशदन्तरम् ॥१५॥ तावदेव गता शैले हरिकान्नोत्तरां दिशम् । समुद्रं पश्चिमं याता प्राप्य कुण्डं शतान्तरम् ॥१५५।। चतुःसप्ततिसंरयानि शतानि कलया हरित् । एकविंशतिमागग्य निषधे ह्यपतछते ११५६॥ सीतोदाऽपि गिरि गरवा तावदेव चतुःशी । उन्लयापतदन्द्रेः सा योजनानां शतद्वये ॥१५७।। तावदेव समागस्य सीताऽसौ नीलपर्वते । तावत्येय समापत्य प्राग्विदेहान् विभेद च ॥१५॥ दक्षिणाभिः समा नद्यः षभिस्ताश्च पहुतराः । यथायोग्यं प्रपातायः प्रतिपाद्याः प्रतिद्विकम् ॥१५॥ गङ्गा चैत्र नदी रोया हरित् सीता च पूर्वगाः । नारी सुवर्णकूला च सरक्ताः परगाः पराः ॥१६॥ श्रद्धावान् विजयावधि पक्ष धापि गन्धवान् । मध्ये हैमवतादीनां विजया स्तु वर्तुलाः ॥१६॥ योजनानां सहस्त्रं स्यान्मूले विस्तृितिरुच्छ्रितिः । तदर्ध भरतके मध्ये पञ्चाशत् सप्तशत्यपि ॥१६२॥ योजनाईन न प्राप्ता नद्यो नाभिगिरीनिमान् । गता प्रदक्षिणा सीतासीतोदे मन्दरं यथा ॥१३॥ की हो गई है ॥१४६।। गङ्गा जिस तोरण द्वारसे लवण समुद्रमै प्रवेश करती है यह तेरानवे योजन तीन कोश ऊंचा है तथा आधा योजन गहरा है ॥१५०॥ सिन्धु नदी सब प्रकारसे गङ्गा नदीके समान है केवल विशेषता यह है कि यह पश्चिम लवण समुद्री मिली है । गङ्गा सिन्धुसे लेकर विदेह क्षेत्र तकको समस्त नदियोंकी जिविका आदि. का विस्तार दूना-दूना जानना चाहिए ॥१५१॥ समस्त नदियोके तोरण गहराईकी अपेक्षा समान हैं तथा उन समस्त तोरणोंमें यथायोग्य दिक्कुमारी देवियाँ निवास करती हैं ।।१५२॥ गेहितास्या नदी दो सौ छिहत्तर योजन छह कला पर्वतपर बहती है । तदनन्तर पर्वतसे गिरकर श्री देवीके भवनकी और गई है ॥१५३॥ रोह्या नदी एक हजार छह सौ पाँच योजन पाँच कला पर्वतपर वहकर उससे पचास योजन दूर गिरी है ।।१५४॥ इसी प्रकार हरिकान्ता नदी भी महा हिमवान् पर्वतपर एक हजार छह सौ पचास योजन पाँच कला उत्तर दिशाकी ओर बहकर मौ योजन दूर कुण्डम गिरी है और वहाँसे पश्चिम समुद्रकी ओर गई है ॥१५५॥ हरित् नदी सात हजार चार सौ इक्कीस योजन एक कला निषध पर्वतपर बहकर सौ योजन दूरपर गिरी है ॥१५६।। सीतोदा नदी भी इतनी ही दूर पर्वतपर बहती है। तदनन्तर चार सौ योजन ऊँचे आकाशको उल्लंघकर पर्वतसे दो सौ योजन दूर गिरती है ॥१५७|| सोता नदी भी इतनी ही दूर नील पर्वत. पर बहती है और इतनी ही दूर भाकाशम उछलकर पूर्व विदेह क्षेत्रको भेदन करती है ॥१५॥ उत्तर दिशाकी छह नदियाँ दक्षिण दिशाकी छह नदियों के समान हैं इसलिए उनके प्रपात आदिका वर्णन दो दो नदियोंके युगल रूपमे यथायोग्य करना चाहिए ।।१५६॥ गङ्गा, गया, हरित् , सीता, नारी, सुवर्णफूला और रक्ता ये सात नदियाँ पूर्व समुद्र की ओर जाती हैं और शेप सात नदियों पश्चिम समुद्रकी ओर ॥१६०॥ हैमवत्त आदि चार क्षेत्रोंके मध्यमे क्रमसे श्रद्धावान् , विजयावान् , पद्मवान् और गन्धवान नामके चार गोलाकार विजया पर्वत हैं ।।१६।। ये पर्वत मूलमें एक हजार योजन, मध्यमें सात सौ पचास योजन और मस्तकपर पाँच सौ योजन चौड़े हैं तथा एक हजार योजन ऊँचे हैं ॥१६२॥ इन पर्वनोका दूसरा नाम नाभि गिरि है जिस प्रकार सीता, सीतोदा नदी मेरु पर्वतको प्रदक्षिणा देती हुई गई है इसी प्रकार रोह्या, रोहितास्या आदि नदियाँ १ तस्यान्तो मा। २. शतयोजनानन्तरे ।

पञ्चमः सर्गः प्रासादेषु शिरस्येषां स्वातिरप्यरुणः परः । पद्मश्चापि प्रभामश्च व्यन्तरा निवसन्ति ते ॥१६॥ क्षेत्रपर्वतनद्याद्या येऽत्र द्वीपे प्रकीनिताः । दिगुणा धातकीखण्डे पुष्कराढ़े च ते स्थिताः ॥१६॥ दीपानतीत्य संरयानान् जम्बूद्वीपः परः स्थितः । सन्ति तत्र पुरोऽमीपामत्र ये गदिताः मुराः ॥६६॥ नीलमन्दरमध्यस्था उत्तराः कुरवो मताः । स्थितास्तु देवकुरवः सुमेरुनिषधान्तरे ॥१६॥ द्वाचवारिंशदष्टौ च शतानि व्यासतो मताः । एकादशमहस्राणि कुरवस्ते कलाद्वयम् ॥१६॥ ज्या च तेषां त्रिपञ्चाश सहस्रागि धनुः पुनः । पष्टिश्चतुःशती चाष्टौ दशांशा द्वादशाधिकाः ॥१६॥ विचवारिंशतं मैकमहस्राणि च सप्ततिः । चतुरंशा नवांशाश्च कुरुवृत्तं प्रकात्तितम् ॥१०॥ महस्राणि त्रयस्त्रिंशत् पट्शतो चतुरंशकाः । भशोनिश्चतुरमाऽसौ विदेहक्षेत्र विस्तृतिः ॥११॥ मेरोः पूर्वोत्तराशायां सीतायाः पूर्वतः स्थितम् । समीप नीलशैलस्य जम्बूस्थलमुर्दारितम् ॥१७२।। पञ्चचापशतव्यासा गन्यतिद्वयमुद्धता । स्थलस्योपरि गर्येति सर्वतो ररनवेदिका ॥१७३॥ तस्य पञ्चशनी व्यासो मध्ये वाहुल्यमष्ट तु । गव्यतिद्वितयं चान्ते स्थलस्य परिकीर्तितम् ॥१७४ ॥ दमये तत्र पीठिकाष्टोच्छ्रया स्थिता । मूलमध्यानविस्तारैदशाष्टचतुर्मिता ॥१५॥ भधोऽधोऽन्या पडेतस्याः परितो मणिवेदिकाः । प्रत्येकमुपरि द्वे द्वे तासां ता पद्मवैदिकाः ॥१७६॥ मूले गव्यूतिविस्तीर्णः स्कन्धोन्ड्रायद्वियोजनः । अवगाहृद्विगम्यूतिः शापाव्यासाष्टयोजनः ।।१७७॥ भी आधा योजन दूर रहकर इन पर्वतीको प्रदक्षिणा देती हुई गई हैं ॥१६३॥ इन पर्वतोंके शिखरोंपर निर्मित भवनों में क्रमसे स्वाति, अरुण, पद्म और प्रभास नामके व्यन्तर देव निवास करते हैं ॥१६॥ जम्बू द्वीपमै जिन क्षेत्र, पर्वत तथा नदी आदिका वर्णन किया है, धातकोखण्ड तथा पुप्फरार्धमें वे सब दूने-दृने हैं ॥१६५॥ संख्यात द्वीप समुद्रोंको उल्लंघकर एक दूसरा जम्बू द्वीप भी है । इस जम्बू द्वीपमें जिन देवोंका कथन किया है उस दूसरे जम्बू द्वीपमें भी इन देवों के नगर है ॥१६॥ नील कुलाचल और सुमेरु पर्वतके मध्यमें जो प्रदेश स्थित हैं वे उत्तरकुम माने जाते हैं और सुमेरु तथा निषध कुलाचलके वीचके प्रदेश देवकुरु कहे जाते हैं ॥१६॥ ये दोनों फुल विस्तारको अपेक्षा ग्यारह हजार आठ सौ योजन दो कला प्रमाण माने गये हैं ॥१६८।। इनकी प्रत्यञ्चा पन हजार और धनुःपृष्ठ छह हजार चार सी अठारह योजन बारह कला है ॥१६॥ इन कुन प्रदेशोका वृत्तक्षेत्र इकहत्तर हजार एक सौ तैंतालीस योजन तथा एक योजनके नी अंशाम चार अंश प्रमाण है ॥१७॥ विदेह क्षेत्रका समस्त विस्तार तैतीस हजार छह सौ चौरासी योजन चार कला है ॥१७॥ मेरु पर्वतकी पूर्वोत्तर (ऐशान ) दिशामें, सीता नदीके पूर्व तटपर नील फुलाचलके ममीप जम्बू स्थल कहा गया है ॥१७२॥ पाँच सी धनुष चौड़ी और दो कोश ऊँची ग्लमयी वेदिका इम स्थलको चारों ओरसे घेरे हुए है ॥१७३|| इस स्थलकी चौड़ाई मूलमें पाँच मी कोश, मध्यमें भाठ फोश और अन्त में दो कोश कही गई है ॥१७॥ इस स्वर्णमय ग्थलमें आठ कोश ऊँची एक पीठिका स्थित है जो मूलमें बारह कोश, मध्यमें आठ कोश और अन्त में चार कोश चौड़ी है ।।१७। इस पोठिकाके नीचे नीचे चारों ओर रत्ननिर्मित छह वेदिकाएँ और हैं तथा उन प्रत्येक वेदिकाीपर दो-दो रत्नमयो वेदिकाएँ हैं। उन छहों वेदिकाओंपर जो लघु वेदिकाएँ है ये पद्मवेदिका पहलाती हैं ॥१६॥ इम पूर्वोक्त पीठिकाके उपर जम्बू पृत मुशोभित है। वह जम्यू वृत्त मूलमें एक कोश चौड़ा है, उसका स्कन्ध दो योजन ऊँचा है, उसकी गहराई दो फोश है, उसकी शाम्पा आट १. दोगन तमंनान् म. १२. जम्मूतीरनामान्यो टोरः पितः ।

२ हरिवंशपुराणे भरमग महास्कन्धो वनशाखोपशोभितः । राजद्राजतपनात्यो मणिपुष्पफलाङ्करः ॥१८॥ रक्तपल्लवसन्तानरञ्जितान्तदिगन्तरः । पीठिकायां पुरोक्तायां जम्बूवृतः प्रकाशते ॥१७॥ पृथिवीपरिणामस्य नानाशाखोपशोभिनः । महादिक्षु चतस्रोऽस्य महाशाखा महातरोः ॥१०॥ तत्र चोत्तरशाखायां सिद्धायतनमद्भुतम् । आदरानादरावामाः प्रासादास्तिसृपु स्थिताः ॥११॥ जम्यूवृक्षस्य तस्यास्त्रिंशद्योजनविस्तृताः । पञ्चाशद्योजनोच्छ्रायाः प्रासादा देवयोस्तयोः ॥१२॥ वेदिकान्तरदेशेषु चावालेषु सप्तसु । प्रधानैकद्रुमोपेताः परिवारोऽस्य पादपाः ॥१३॥ च-बारोऽनन्तरं तस्य ततश्चाष्टोत्तरं शतम् । चत्वारि च सहस्राणि सहस्राणि च पोटश ॥१४॥ द्वात्रिशच सहस्राणि चत्वारिंशत्तु तान्यतः । चत्वारिंशत् सहाष्टाभिः प्रधानः सप्तभिर्युताः ।।१८५|| मिश्राः शतसहस्रं तु चत्वारिशरसहस्रकैः । सञ्जायन्ते समस्तास्ते शतमेकोनविंशतिः ॥१६॥ दक्षिणापरतो मेरोः सीतोदायास्तटे परे । निपधस्य समीपस्थं राजतं शाल्मलीस्थलम् ॥१८॥ जम्बूस्थलसमे तत्र शाल्मलीवृक्ष इष्यते । वक्तव्या तस्य निःशेपा जम्यूवृक्षस्य वर्णना ।।१८॥ तत्र दक्षिणशाखायां सिद्धायतनमक्षयम् । प्रासादास्तु विशाखासु तत्र देवाविमौ मतौ ॥१८॥ वेणुश्च वेणुदारी तावादरानादरौ यथा । उत्तरेषु कुरुविष्टी तथा देवकुरुविमौ ॥१०॥ नीलादेदक्षिणाशायां योजनैकसहस्रके । सीता पूर्वतटे चियं विचित्रं कूटमप्यतः ॥१६॥ निपधस्योत्तराशायां सीतोदातटयोस्तथा । यमकूट मतं पूर्व मेघकूटमतः परम् ॥ १९२॥ पोजन तक फैली हुई हैं, उसका महा स्कन्ध नीलमणिका बना हुआ है, वह हीराकी शाखाओंसे शोभित है, चाँदीके सुन्दर पत्तासे युक्त है, उसके फूल फल तथा अंकुर मणिमय हैं, और उसने अपने लाल-लाल पल्लयोंके समूहसे समस्त दिशाआके अन्तरालको लाल-लाल कर दिया है ॥१७७-१७६ ॥ पृथिवीकाय रूप तथा नाना शाखाओंसे सुशोभित इस महावृक्षको चारों दिशाओं- में चार महा शाखाएँ हैं ॥१८०॥ इनमें उत्तर दिशाको शाखापर आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला जिनमन्दिर है और शेष तीन दिशाओंकी शाखाओपर भवन बने हुए हैं जिनमे आदर अनादर- का निवास है ॥१८१॥ उस जम्बू वृक्षके नीचे उन दोनों देवोके तीस योजन चौड़े और पचास योजन ऊँचे अनेक भवन बने हुए हैं ॥१८२॥ वेदिकाओंके सात अन्तरालोंमें एक-एक प्रधान वृक्षसे सहित जो अनेक वृक्ष हैं वे ही इस जम्बू वृक्षके परिवार-वृक्ष कहलाते हैं ।।१८३॥ प्रथम वृक्षके परिचार-वृक्ष चार हैं, दूसरेके एक सौ आठ, तीसरेके चार हजार, चौथेके सोलह हजार, पाँचके बत्तीस हजार, छठवेंके चालीस हजार और सातवेंके अड़तालीस हजार हैं । सात प्रधान वृक्षोको साथ मिलानेपर इन समस्त वृक्षोंकी संख्या एक लाख चालीस हजार एक सौ उन्नीस होती है ॥१८४-१८६॥ मेरु पर्वतकी दक्षिण-पश्चिम (नैर्ऋत्य) दिशामें सीतोदा नदीके दूसरे तटपर निषधा- चलके समीप रजतमय एक शाल्मली स्थल है ॥१८॥ जम्बू स्थल की समानतो रखनेवाले इस शाल्मली स्थल में शाल्मली वृक्ष है। उसका सब वर्णन जम्बू वृक्षके वर्णनके समान जानना चाहिए ।।१८८॥ शाल्मली वृक्ष की दक्षिण शाखापर अविनाशी जिन-मन्दिर है और शेष तीन शाखाओपर जो भवन बने हुए हैं उनमें वेणु और वेणुदारी देव निवास करते हैं। जिस प्रकार उत्तरकुरुमं आदर और अनादर देव इष्ट मान गये हैं उसी प्रकार देवकुरुमें वेणुदारी देव इष्ट माने गये हैं ॥१८६-१६०॥ नील पर्वनकी दक्षिण दिशाम सीता नदीके पूर्व तटपर एक हजार योजन विस्तारवाले चित्र और विचित्र नामके दो कूट हैं ॥१६१|| इसी प्रकार निपध पर्वतकी उत्तर दिशामें सीतोदा १. नीलमणिमयमदास्कन्धः २. हीरकश ३. शोभमानरजतमयपत्रसहितः। ४ परिवारद्रुमाः मताः प० [५ सजायते म०।६ जम्बूस्थलसमस्तत्र म० । पशोभितः।

पञ्चमः सर्गः ३ नाभिपर्वतमानानि तानि कृटानि तेषु तु । देवाः स्वफूटनामानः क्रीढन्ति निजयेच्छया ॥१३॥ अध्यद्धे हि सहस्राः नीलतो नीलवान् हृदः । तथोत्तरकुरुनाम्ना चन्द्रश्रावणोऽपरः ॥१४॥ माल्यवांश्च नदीमध्ये सर्व पञ्चशतान्तराः । ते दक्षिणोत्तरायामाः पद्महदसमा मताः ॥१५॥ निपधादुत्तरो नद्यां निपधो नामतो हृदः । नाम्ना देवकुरुः सूर्यः सुलसश्च तडित्प्रभः ॥१६॥ रत्नचित्रतटाः सर्वे वनमूला महाहदाः । तेषु नागकुमाराः स्युः पमप्रासादवासिनः ॥१७॥ जलाद् द्विकोशमुद्विद्धं योजनोच्छूितिविस्तृतम् । पद्म प्रतिद्वदं क्रोशविस्तृतोच्छूितकर्णिकम् ॥१८॥ पद्माः शतसहनं हि चत्वारिंशत्सहस्रकैः । शतं सप्तदशाग्रं स्यात् प्रतिपद्म परिच्छदः ॥१६॥ एकैकस्य हदस्यात्र पर्वता दश समुताः । भान्ति काञ्चनकूटायाः सीतासोतोदयोस्तटे ४२००॥ उच्छ्रायमूलविस्तारैः शतयोजनकाः समाः । पञ्चसप्ततिका मध्ये पाशविस्तृतामकाः ॥२०॥ तेषामुपरि प्रत्येकमेकैका कृत्रिमाः शुभाः । प्रतिमाश्च निरालम्बाः मोक्षमार्गकदीपिकाः ॥२०२॥ धनुःपञ्चशतीनुङ्गा मणिकाञ्चनरस्नगाः । पञ्चमेरुपु विश्यातं सहस्रोत्तरकूटकम् ॥२०३॥ आक्रीडनगृहेष्वेषां शिवरेषु महाविपः । देवाः काञ्चनकाभिरयाः संक्रीडन्ते समन्ततः ॥२०४॥ सीतोत्तरतटे कुटं पद्मोत्तरमनुत्तरे । तटे तु नीलवस्कटं पूर्वतो मेरुपर्वतात् ॥२०५॥ शीतोपूर्वतीरे नु कूटं स्वस्तिकमस्ति तत् । तदअनगिरिप्रख्यं पश्चात्ते मेवनुत्तरे ॥२०६॥ तटे तु दक्षिणे तस्याः कुमुदं कूटमुत्तरे । पलाशमपराशायां ते तु मन्दरतो मते ॥२०७।। नदीके दोनों तटोंपर यम कूट और मेघ कूट नामके दो कूट हैं ॥१६२॥ ये कूट नाभि पर्वतों- के समान विस्तारवाले हैं तथा इन कूटोंपर कूटोंके ही समान नामयाले देव अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करते हैं ॥१६शा नील पर्वतसे साढ़े पाँच सौ योजन दूरीपर नदीके मध्यमें नीलवान , उत्तरकुरु, चन्द्र, ऐगवण और माल्यवान् नामके पाँच हद हैं। ये समस्त हद पॉच सौ पाँच सो योजनके अन्तरसे हैं तथा इनको दक्षिणोत्तर लम्बाई पद्म हृदके समान मानी गई है ॥१६४-१६५॥ इसी प्रकार निपध पर्वतसे उत्तरकी ओर नदीके वीच निपध, देवकुरु, सूर्य, सुलस और तडिलभ नामके पाँच महाहद हैं। इन सबके तट रत्नोंसे चित्र-विचित्र हैं तथा सबके मूल भाग वनमय हैं। इन महाहदोंमें कमलोंपर जो भवन बने हैं उनमें नागकुमार देव निवास करते हैं ॥१६६-१६७। प्रत्येक महाहदमें एक-एक प्रधान कमल है जो जलसे दो कोश ऊँचा है, एक योजन विस्तृत है और एक कोश विस्तृत कर्णिकासे युक्त है ॥१८॥ प्रत्येक प्रधान कमलके साथ परिवार रूपमें एक लाख चालीस हजार एक सौ सत्रह कमल और भी हैं ॥१६६।। तथा एक-एक महाहदके सम्मुस सीता, सीतोदा नदियोके तटपर काश्चन- कूट नामके दश-दश पर्वत हैं ॥२००॥ इन पर्वतोंकी ऊँचाई सो योजन है तथा विस्तार मूलमें सौ योजन, मध्यमै पचहत्तर योजन और अग्रभागमें पचास योजन है ॥२०११। उन काञ्चन- कूटोंमें प्रत्येकके ऊपर एक-एक अकृत्रिम शुभ जिन-प्रतिमाएँ हैं जो निराधार हैं, मोक्ष मार्गको प्रकाशित करनेवाली हैं, पाँच सौ धनुप ऊँची हैं, मणिमयो, सुवर्णमयी तथा रत्नमयी हैं । एक एक मेकपर दो-दो सौ कट हैं और पाँचों मेरुओके एक हजार कूट प्रसिद्ध हैं ।।२०२-२०३॥ इन पर्वतोके शिसरोंपर अनेक क्रीड़ागृह बने हुए हैं उनमें महाकान्तिके धारक काञ्चनक नामके देव सब ओर क्रीड़ा करते रहते हैं ॥२०४॥ मेरु पर्वतसे पूर्वको और सौता नदीके उत्तर तट- पर पद्मोत्तर और दक्षिण तट पर नीलवान नामका कूट है 10 मेरु पर्वतसे दक्षिणको भोर सीतोदा नदीके पूर्व तटपर स्वस्तिक और पश्चिम तटपर अञ्जनगिरि कुट है ।।२०६। इसी सोतोदा नदीके दक्षिण तटपर कुमुद कूट और उत्तर तटपर पलाश कुट है। ये दोनों ही कूट १ नामानि म.। २. मिताः म.। 4 ६४ हरिवंशपुराणे पश्चात्तटेऽस्ति सीताया वतंसं फूटमुकटम् । रोचनात्यं पुरस्तात्तु मेरोरुत्तरतश्च ते ॥२०॥ भदशालवने भान्ति समान्येनानि काञ्चनैः । वसन्ति तेषु देवास्ते दिग्गजेन्द्रा इति श्रुताः ॥२०॥ अपरोत्तरदिग्भागे मन्दराद् गन्धमादनः । ख्यातः काशनकायोऽसौ सर्वतः पर्वतः स्थितः ॥२०॥ मेरोः पूर्वोत्तराशायां माल्यवानिति विश्रुतः । वैदूर्यमयमूर्तिः 'स्यात् प्रियं भाति स्वयम्प्रभः ॥२१॥ मेरोः प्रादिक्षिणाशायां सौमनस्यस्तु राजतः । विद्यु'प्रमोऽपरे कोणे तपनीयमयः स्थितः ॥२१२॥ ते नीलनिपयप्राप्ती चतुःशत निजोच्छ्याः । मेरुपर्वतसरप्राप्ती प्रोक्ताः पाशतोस्टूयाः ॥॥२१३॥ निजोच्छिनचतुर्भागस्वोभयान्तावगाहनाः । देवोत्तरकुरुप्राप्ती स्युः पञ्चशतविस्तृताः ॥२१॥ सहस्राणि पुनस्त्रिशन्नवाधिकशतद्वयम् । भायामः पट कलाश्चैपां चतुपर्णामपि वर्णितः ॥२१॥ मेरो प्रभृति कटानि चनुर्धपि यथाक्रमम् । सन्ति सप्त नवैनेषु पुनः मत'नवादिषु ॥२१६॥ सिद्धायतनकट स्याद् गन्धमादननामकम् । तधोत्तरकुरुपण्यं गन्धमालिनिकायम् ॥२७॥ फ्ट च लोहिताक्षं च स्फुटिकानन्दनामनी । गन्धमादनशैलेषु सप्तैतानि भवन्ति तु ॥२१॥ सिद्धाण्यं माल्यवस्कूटं तथोत्तरकुरूक्तिकम् । कच्छाक्टं विनिर्दिष्टं तथा सागरकं परम् ॥२१६॥ रजत पूर्णभद्रात्य सीताफूटं ततः परम् । कूटं हरिसहाभियं नयम माल्यवरस्वपि ॥२२०॥ सिद्ध पौमनसाभिल्यं कूट देवकुरुध्वनि । मद्गल विमलं चैव काञ्चनारय विशिष्टकम् ॥२२॥ सिद्धं विद्युःप्रभाभिख्य पुनर्देवकुरुश्रुति । पद्मकं तपनं चैव स्वस्तिकं च शतज्वलम् ॥२२२॥ सीनोदाक्टमन्यत्तु कूटं हरिसहश्रुति । विद्युस्प्रभेश्वशेषेपु नवैतानि भवन्ति तु ॥२२३॥ मेरुसे पश्चिम दिशामे माने गये हैं ।।२०७॥ सीता नदीके पश्चिम तटपर वतंस कुट और पूर्व तटपर रोचन नामका विशाल कूट है । ये दोनों कूट मेरु पर्वतसे उत्तरकी ओर हैं। ये समस्त कुट भद्रशाल वनमे मुशोभित है, कांचन कूटोंके समान हैं तथा इनमें दिग्गजेन्द्र नामके देव निवास करते हैं ।।२०८-२०६॥ मेरु पर्वतकी पश्चिमोत्तर दिशामें गन्धमादन नामका प्रसिद्ध पर्वत है । यह पर्वत सब ओरसे सुवर्णमय है ॥२१०॥ मेरुकी पूर्वोत्तर दिशामें माल्यवान नामका प्रसिद्ध पर्वत है । यह पर्वत वैडूर्यमणिमय है तथा म्वयं देदीप्यमान होता हुआ अतिशय प्रिय मालूम होना है ॥२११॥ मेरुकी पूर्व दक्षिण दिशामे रजतमय सौमनस्य पर्वत और दक्षिण पश्चिम कोणमे सुवर्णमय विद्युत्प्रभ नामका पर्वत है ॥२१२॥ ये चारों पर्यत नील और निषध पर्वतके समीप चार सौ योजन तथा मेरु पर्वतके समीप पाँच सौ योजन ऊँचे कहे गये हैं ॥२१३॥ इनकी गहराई अपनी ऊँचाईसे चतुर्थभाग है, तथा देवकुरु और उत्तरकुरुके समीप इनकी चौड़ाई पाँच सौ योजन है ॥२१४॥ इन चारोंकी लम्बाई तीस हजार दो सौ नौ योजन तथा छह कला प्रमाण कही गई है ।।२१।। इन चारो पर्वतोपर मेरु पर्वतसे लेकर अन्त तक क्रमसे सात, नी, सान और नौ कूट है अर्थात् गन्धमादनपर सात, माल्यवान्पर नौ, सौमनस्यपर सात और विद्युत्प्रभपर नौ कूट हैं ।।२१६।। १ सिद्धायतन कूट, २ गन्धमादन कूट, ३ उत्तरकुरु कूट, ४ गन्धमालिनिका कूट, ५ लोहिताक्ष कट, ६ स्फटिक कूट और ७ आनन्द कूट ये सात कूट गन्धमादन पर्वतपर हैं ॥२१७-२१८।। १ सिद्ध कूट, २ माल्यवस्कूट, ३ उत्तरकुरु कूट, ४ कच्छा कूट, ५ सागर कूट, ६ रजत कूट, ७ पूर्णभद्र कुट, ८ सीता कूट और ६ हरिसह कूट ये नौ कूट माल्यवान् पर्वतपर हैं ॥२१६-२२०।। १ सिद्ध कूट, २ सौमनस कूट, ३ देवगुरु कट, ४ मंगल कूट, ५ विगल कट, ६ काञ्चन कूट और ७ विशिष्टक कूट ये सात कूट सौमनस्य पर्वतपर हैं ।।२२१॥ १ सिद्ध कूट, २ विद्युत्प्रभ कूट, ३ देवकुरु कूट, ४ पद्मक कूट, ५ तपन कूट, ६ स्वस्तिक कूट, ७ शतज्वल कूट, ८ सीतोदा कट, १ स प्रियं म० । २. -र्भागाः म० 1 ३ नवादिषु म०।

पञ्चमः सर्गः ५ उस्मायोऽपि सर्वेषां कुटानां च यथायथम् । भात्माधारावगाहस्य समानस्तु प्रभाषितः ॥२२॥ सिद्धायतनक्टेषु तेषु सर्वेषु ये गृहाः । मिबिम्बमनाथास्ते विभाजन्ते यथायथम ॥२२५॥ शेषोभयान्तकूटेषु रमन्ते व्यन्तरामराः । मध्ये दिक्कुमार्यस्तु क्रीडागारेषु चारुषु ॥२२६॥ भोगरा भोगवती मुभोगा भोगमालिनी । वरसमिश्रा मुमित्राऽन्या वारिपेणा चलावती ॥२२७॥ विदेहे चित्रपटास्यः पद्मकुटश्च पर्वतः । नलिनश्चैकशैलश्च नीलसीतान्तरायताः ॥२२॥ पूर्वाद्यास्नु त्रिकूटश्च शैलो वैश्रवणोऽक्षनः । भारमाननश्च सर्वेऽपि ते सीतानिपघस्पृशः ॥२२॥ श्रद्धावान् सुप्रसिद्धोऽदिजियावांस्तथैव च । आशीविपस्तदन्यस्तु सुखावह इतीरितः ॥२३०।। विदेहेप्वपरेवेते च वारो देशभेदकाः । स्वापामेन प्रसिद्धन सीतोदानिपरस्पृशः ॥२३॥ चन्द्रसूर्योच मालास्ती नागमालस्तथाचलः । मेघमालश्च ते मध्ये नालसीतोदयोः स्थिताः॥२३२॥ सरित्तटेषु चोरट्रायस्तेषां वक्षारभुमृताम् । शतानि पञ्चशेषं तु पूर्ववतारवगितम् ॥२३३॥ प्रत्येक पोडशस्वेषु मूनि कूटचतुष्टयम् । कुलाचलान्तकूटेषु दिक्कुमार्यो वसन्ति ताः ॥२३।। नदीममीपाटेपु जिनेन्द्रायतनानि तु । तथा मध्यमटेषु ध्यन्तराकीडनालयाः ।।२३५।। भदशालवमं मेरोः पूर्वापरदिगायतम् । नानादुमलताकीण वर्णनीयं यथाक्रमम् ॥२३६॥ मायामो भागयोस्तस्य द्वाविंशतिसदस्रकः । प्रत्येक द्विशती सा॰ दतिगोत्तरविस्तृतिः ।।२३७।। और ६ हरिसह कूट ये नौ कूट विद्युत्लभ पर्वतपर हैं ।।२२२-२२३॥ इन सब कूटोंकी ऊँचाई यथायोग्य अपनी-अपनी गहराईके समान कही गई है ।।२२४|| इन चारों पर्वतोंके सिद्धायतन कूटौंपर जो मन्दिर हैं वे श्री सिद्ध भगवान्की प्रतिमाओंसे सहित हैं तथा यथायोग्य सुशोभित हो रहे हैं ॥२२५॥ शेष तीन पर्वतोंके अन्तिम दो कूटोंम व्यन्तर देव क्रीड़ा करते हैं और मध्यमें बने हुए सुन्दर कोड़ा-भवनों में दिक्कुमारी देषियों रमण करती हैं ॥२२६|| चागें पर्वतांके चीच-बीचके दो-दो कुट मिलकर आठ फूट होते हैं उनमें क्रमसे १ भोगकरा, २ भोगवती, ३ सुभोगा, ४ भोगमालिनी, ५ वत्समिला, ६ सुमित्रा, ७ वारिपेणा और ८ अचलावती ये आठ देवियाँ क्रीड़ा करती हैं ।।२२।। विदेह क्षेत्रमें सोलह वक्षार गिरि हैं उनमें १ चित्रकूट, २ पद्मकूट, ३ नलिन और ४ एक- शैल ये चार पर्वत पूर्व विदेहमें है तथा नील पर्वत और सीता नदीके मध्य लम्बे हैं ॥२२॥ १ त्रिकूट, २ वैश्रवण, ३ अञ्जन और ४ आत्माञ्जन ये चार भी पूर्व विदहमें हैं तथा सीता नदी भोर निपध कुलाचलका स्पर्श करनेवाले हैं अर्थात् उनके मध्य लम्व है ॥२२॥ १ श्रद्धावान्, २ विजयावान, ३ आशीर्विप और ४ मुसावह ये चार पश्चिम विदेह क्षेत्रमे हैं । ये चारों देशों- का भेद करनेवाले हैं और अपनी प्रसिद्ध लम्बाईसे सीतीदा नदी तथा निषध पर्वतका स्पर्श करनेवाले हैं ॥२३०-२३१॥ १ चन्द्रमाल, सूर्यमाल,३ नागमाल भोर ४ मेप्रमाल ये चार पश्चिम विदइभेनम हैं तथा नील और सीतोदाके मध्यमे स्थित है ।।२३२॥ दन ममरत वक्षार पर्वतोंकी ऊँचाई नदी तदपर पाँच सौ योजनकी और अन्यन्न सब जगह पूर्व वर्णित वक्षागेके समान चार सौ योजन है ॥३३॥ दन सोलह वत्तार पर्वतोम प्रत्येकके शिमम्पर चार-चार कट है उनमें कुलाचलाके समीपवर्ती कटॉपर दिक्कुमारी देवियाँ रहती है। नदीके समीपवर्ती फटोपर जिनेन्द्र भगवानके चैत्यालय हैं और थोचके फूटापर व्यन्तर देवांके ग्रीडागृह बने हुए हैं ।।२३४-२३।। मेरकी पूर्व-पश्चिम दिशाम लम्या तथा नाना प्रकारफे वृनों और टवाभामे व्यान एक मुन्दर भद्रशाल वन है। यहाँ क्रममे उमका वर्णन किया जाता है ।॥३६॥ उसको पूर्व पशिम भागको लम्बाई पाईम हजार योजन और दक्षिण-उत्तर चौड़ाई ढाई सौ योजन है ॥२३७n १ मुरमान्या म। २ बसाचित म•| मन्नयः मीनालयाःमक.।

मानुपोत्तर पर्वत र ५६१० मानुषोत्तरके टूटपर रहने- ५.६१० धर्म स्वर्गका एक ७ ) जयकुमारकी । स्त्री १२१११ वि०० पेणी- धार और पृथिवी- १०७ । भगवान् मुनि- को स्त्री १६१५५ घातकोखण्ड द्वोप- देव ५।६३८ भगवान् महावीर- घर ३४३ एक वापिका शब्दानुक्रमणिका प्रमाणपद (पा) आठ अक्षरका प्राणायायपूर्व (पा) द्वादशाङ्गका एक प्रमाणपद होता है एक भेद २१९९ १०१२२ प्रातिहार्य (पा) तीर्थकरके समव- प्रमाणाहुल (पा) उत्सघाझुलसे सरणमें प्रकट होनेवाले पांच-सौ गुना बड़ा अगुल अशोक-वृक्ष आदि आठ ७.४२ प्रातिहार्य ३३३९ प्रमाद (पा) ४ कपाय, ४ विक्था, प्रायोतिप (भौ) एक देश ११:६८ ५ इन्द्रियोंके विषय, १ निद्रा, प्राभृत (पा) श्रुतज्ञानका भेद १ स्नेह ये १५ प्रमाद है १०११३ ५८/१९२ माभूतसमास (पा) श्रुतज्ञानका प्रमादाचरित (पा) अनर्थदण्डका भेद १०११३ एक भेद ५८४१४६ प्राभूतप्रामृत (पा) ध्रुतज्ञानका प्रमोद (पा) एक भावना भेद १०११३ ५८.१२५ प्राभूतप्राभृतसमाम (पा) श्रुत- प्रवाल (भौ) रलप्रभा पृथिवीके ज्ञानका भेद १०११३ खरमागके १६ पटलों में से प्रायोपगमन (पा) मन्यासमरण- माता पटल ४१५३ का एक भेद ३४।४२ प्रवीचार = मैथुन ३३१६२ प्रासाद = महल २३११ प्रवेशन (पा) तालगत गान्धर्व प्रास्थाल (भी) एक देश १।१७ का एक भेद १९४१५० प्रियकारिणी (व्य) राजा सिद्धार्थ- प्रशान्ति (व्य) एक राजा की स्त्री भगवान महावीरकी ४५।१९ माता २।२१ प्रश्नव्याकरणाग (पा) श्रुतज्ञान- प्रियद्गुलतिका (व्य) जिनदास मेठ का एक भेद १०1४३ की पनिहारिन ३३१५० प्रश्न कीर्ति (व्य) आगामी तीर्थ मियमुसुन्दरी (व्य) श्रावस्ती कर ६०१५५९ नगरोके राजा एणीपुत्रको प्रष्टक (मी) सौधर्मस्वर्गका वन्या २८॥६ एक पटल ६.४७ प्रियदर्शन (व्य) धातकोखण्ड प्रसेनजित् (व्य) एक वुलकर द्वीपका रक्षक देव ५/६३८ प्रियदर्शन (मी) मुमेरका एक प्रहारसंक्रामिणी (व्य) एक विद्या नाम ५।३७४ २२२७० प्रियंवद - मधुरमापो २१॥३१ प्रहलाद (व्य) उज्जयिनीके राजा प्रानि (भी) एक वापिका ५७१३६ श्रीधर्माका एक मन्त्री प्रीतिकर (व्य) एक राजा ४५।१३ २०१४ पीसिंग मीनिमद रानाका 1) भगवान्का एक ३१३४ ) वसुदेवको स्वी जाओको तीन मे एक शति 1) शशीका पुत्र । भविष्यत्काल- तीर्थकरका नाम १ पा) छटा गुण- निर्जन्नु स्थानमें हरिवंशपुराणे पूर्णप्रम (व्य) इक्षुवर द्वोपका पैशुन्यमापा (पा) एक भापाका मणिधान्या (व्य) एकदिवामारी रक्षक देव ५।६४३ भेद १०१९३ देवी ८१०८ पूर्णचन्द्र (व्य) रामदत्ताका पुत्र, पोदनपुर (भी) एकनार २७१५५ प्रणिधि (व्य) एक देवी ३८१३३ सिंहचन्द्रका अनुज २७।४७ पौण्डू (मी) एक देश ११३६८ प्रतिपत्तिसमाम (पा) श्रुत- पूर्णमद्रकूट (भौ) ऐरावतके पौण्ड (व्य) एक राजा ३११२८ मानका भेद १०११२ विजया पर्वतका एक कूट पाण्ड (व्य) वसुदेवका पुत्र प्रतिष्ठापनिका (पा) एक सीमित ५।१११ ४८।५९ मलमूत्र पूर्णमद्रकूट (भौं) माल्यवान् पौण्ड्रा (व्य) वमुदेवकी स्त्री छोड़ना २११२६ पर्वतका एक कूट ५।२२० ४८०५९ प्रतिष्टित (व्य) एक राजा पूर्ण (भी) एक वापिका ५८१७३ पौरवो (पा) एक मूर्च्छनाका ४५।१२ पूर्व (पा) श्रुतज्ञानका भेद भेद १९३१६३ प्रतिसर (व्य) एक राजा ४५।२९ १०११३ पालोम (व्य) राजा पुलोमका प्रतीहारी द्वारपालिनी २३१ पूर्व (पा) चौरासी लास पूर्वाङ्ग- पुत्र १७१२५ प्रतीत्य सत्य (पा) सत्यवचन- का एक पूर्व होता है ७।२५ प्रकाम (व्य) आगामी रुद्र का एक भेद १०१०१ पूर्वगत (पा) दृष्टिवाद नामक ६०१५७१ प्रत्याख्यान पूर्व (पा) द्वादशाङ्ग- बारहवे अङ्गका एक भेद प्रकीर्णक (पा) अङ्गाबह्यश्रुत. का एक भेद २१९९ २१९६ का भेद १०११२५ प्रत्येक (पा) नामकर्मका एक पूर्वविदेहकूट (भौ) नौल पर्वतका प्रकृतिद्युति (व्य) एक राजा भेद ५६।१०४ एक कूट ५।९९ ५०११२४ प्रथमानुयोग (पा) द्वादशाङ्गका पूर्वपक्ष = शङ्कापक्ष २१।१३६ प्रकृति (पा) आग्रायणीयपूर्वको एक भेद २।९६ पूर्वसमास (पा) शुनज्ञानका पञ्चमवस्तुके बीस प्राभृतो प्रदीपाङ्ग (भी) एक प्रकारका भेद १०११३ मे से कर्मप्रकृति प्राभूतके पूर्वाग (पा) चौरासी लाख चौबीस अनुयोग द्वारोमै एक प्रदेश (पा) आकाशद्रव्यका सब- वर्षोंका एक पूर्वाङ्ग होता अनुयोगद्वार १०१८२ से छोटा भाग ७१७ है ७।२४ प्रक्रम (पा) कर्मप्रकृति वस्तुका प्रदोष (पा) ज्ञानावरण और पूर्वान्त (पा) आग्रायणीय पूर्वको एक अनुयोगद्वार १०८३ दर्शनावरणका आस्रव एक वस्तु १०७८ प्रचण्डवाहन (व्य) त्रिशृङ्ग नगर- ५८।९२ पृथक्त्वविनकवीचार (पा) शुक्ल का राजा ४५/९६ ध्यानका एक भेद ५६१५४ प्रचला (पा) दर्शनावरणका भेद पृथिवी (व्य) एक दिक्कुमारी ५६।९७ देवी ८५११० प्रचला-प्रचला (पा) दर्शनावरण- का पुत्र ४३३६१ पृ.येवी (व्य) वि. द. घेणी कर्मका एक भेद ५६।९१ प्रबंध (भौ) एक स्तूपका नाम गान्धारदेशके गन्धसमृद्ध प्रच्छाल (भी) एक देश ३६ ५७११०६ नगरके राजा गन्धारकीस्त्री प्रजाग (प्रयाग) (भौ) भगवान् ३०७ ऋषभदेवका दीक्षास्थान एक पदल ६१४७ पृथिवीकाय (पा) एकेन्द्रियजीवो. ९९६ प्रमङ्करा (भौ) विदेहको एक का एक भेद, मिट्टी पाषाण प्रजापति (व्य) भगवान् ऋषभ- नगरी ५/२५९ भादि रूप ३।१२१ देवका एक गणधर १२२६५ प्रभजन (व्य) एक विद्याधर पृथु (व्य) एक राजा ४५।१४ प्रज्ञप्ति = एक विद्या २७।१३१ २२११०४ कल्पवृक्ष ७८० प्रद्युम्न (व्य) श्रीकृष्ण रुक्मिणी- का पुत्र १११०० प्रद्युम्न (व्य) श्रीकृष्ण रुक्मिणी प्रमङ्कर (भी) सौधर्मस्वर्गका १२१ शब्दानुक्रमणिका बोधचतुष्क (पा) मति, धृत, भद्र (भी) देशविशेप १११७५ अवधि और मनःपर्यय ये मट (च्य) शवका पुत्र १७:३५ चार ज्ञान ५५.१२५ महक (व्य) प्रावस्तीके कामदत्त बोधि (पा) रत्नत्रय-सम्यग्दर्शन, सेठके एक भंसेका नाम सम्यग्ज्ञान, सम्यक चारित्र २८/२५ मद्रकार (भी) देशविरोप ३३ अनमण्डर = मूर्यमण्डल २।१४५ भद्रकाली एक विद्या २२२६६ ब्रह्म (भी) पांचवां स्वर्ग ६३६ भद्रक्ट (भी) रुचिकगिरिका ब्रह्म (भी) ब्रह्मयुगल का तीसरा पश्चिम दिमासम्बन्धी फूट ५.७१४ इन्द्रक ६.४९ ब्रह्मदत्त (व्य) वारहवा चक्रवर्ती मद्रपुर (भी) एक नगर १७३० ६०१२८७ मद्रवाम (व्य) ऋषभदेवका महादत्त (व्य) गिरितटनगरका गणघर १२०६९ एक उपाध्याय २३१३३ भद्रवाह (ध्य) एक शुनदेवनी ब्रह्मचर्य महावत (पा) कृत, आचार्य वारित, अनुमोदनासे स्त्री मशाल वन (भी) मेपर्वतको पुरषक समागमका त्याग घेरसर स्थित एक वन २।१२० ५२०९ ब्रह्मलोक (भी) पाचदा स्वर्ग मद्रा (व्य) वाराणमोके मोमगर्मा १११२२ ब्राह्मणकी एक पुत्रो ग्रह्मगिरम् (व्य)एक शस्त्र ५२१५५ २२।१३२ ग्राहृदय (भी) लान्नव युगल मद्रा (व्य) विनमिको पुमो का प्रथम इन्द्र क६.५० २२११०६ महोत्तर (भी) छठा स्वर्ग मद्रा (व्य) समवसरणी एक ४॥२३ वापिका ५७१७३ ब्रह्मोत्तर (भी) ग्रह्मयुगलवा महारलि (व्य) पदेवा चौथा इन्द्रक ६।४९ गणघर १२०६८ माझी (व्य) भगवान् ऋषभदेव मद्रिका (व्य) रुपिगिरिव पी पुत्री ११ भद्रपूटपर रहने वाली देवी [भ] ५.०१४ मगदत्तक (व्य) एक राजा महिलपुर (भी) एक नगर, जहाँ ५०१८२ दमुदेव गये २४।११ मगीरय (व्य) प्रभावनीका दिना- भट्रिलमा (भी) एक नगरी मह एप पिशाधर ३०५२ मद (व्य) गागरका पुत्र १३९ मरत (व्य) कृष्णा पुष४८७१ मद (भी) मौगंयुगलका सी मरत (व्य) प्रथम नारी ६०२८६ मन (स्य) नन्दीश्वरवर मद्रा मरठ (य) आगामी चयन राम५.४५ मरन (व्य) भगवान् अपमदेव का पुन ९।२१ मरुकच्छ (भी) देशका नाम १११७२ मरनकूट (भी) हिमवत्कुलाचल का तीसरा कूट ५।५३ मय (व्य) र ६०१५७१ मयधारण (पा) प्राणायणी पूर्वक चतुर्थ प्राभूना योगद्वार १०१८४ भव्य (पा) जिने नम्यादर्शनादि गुण प्रकट होनेकी योग्यता हा १५ भव्यकूटस्तूप (पा) ममत्रमरगा- का स्तूप ५७११०४ मागदत्त (व्य) ऋषभदेवका गणधर १२१६४ मागफल्गु (व्य)पमदेवका गणधर १२२६४ माजना = एक पत्यका ७१८० मानु (व्य) एक राजा ५०१३० मानु (व्य) जरामसा पुत्र ५२।३१ मानु (व्य) श्रीकृष्ण मत्यमामा या पुत्र ४४०१ मानु (व्य) मथुगाय मेट ३३१९६ भानु (ग) कंगकी स्त्री जीवद्यगारा माई ३५१७५ मानु (व्य) पृयका ४८६९ मानु (67) मानर पार गामा श्रीरापुर ११०० भानु (व्य) सम्माभिमान पत्र १८।३ भानुनि (व्य) मथरा मान मौर मगरात्र ३३३९७ मानुहम (व्य) घना मगगता एक मेट, पाना पिता वाहुल्य = मोटाई ४।४९ बाह्यपरिग्रह (पा) धन-धान्यादि १० प्रकारका वाह्य परिग्रह २।१२१ बुद्धि (व्य) महापुण्डरीक सरोवर में रहनेवाली देवी ५:१३० बुद्धिकुट (भी) रुक्मिालाचलका पांचवां कूट ५।१०३ बुद्धिल (व्य) दशपूर्वके ज्ञाता एक आचार्य १२६३ ग्रीनिमती (व्य) अरिजयपुर के राजा अरिंजय और अजित. मेनाकी पुत्री ३४६१८ प्रेक्षागृह - नाटयगाला ५७१९३ प्रोटिल (व्य) ११ अङ्ग और दश पूर्वके ज्ञाता एक मुनि १।६२ प्रोप्टिल (व्य) भगवान् महावीरके पूर्वभवके गुरुका नाम ६०११६३ [व] पद्धप्रलाप (पा) सत्यप्रवाद पूर्व को १२ भाषाओमे एक मापा १०.९३ यन्ध (पा) मारमावा कर्मों के माथ एक क्षेत्रावगाह ५८।२०२ पन्ध (पा) हिंगाणुमतका अतिचार ५८.१६४ पन्धन = विद्यास्त्र २५ive बन्धन (पा) आग्रायणी पूर्व के चतुर्ष प्राभूनका योगद्वार १०१८२ यन्नुमती (य) यमुदेवकी स्त्री ११८५ बन्धुमती (व्य) अरिष्टपुरनिवामी रेयतरी पुत्री, यमदेवको घोर बन्धमनी (व्य) बन्धुपेनी स्त्री हरिवंशपुराणे वहुक्नु (भी) वि० उ० नगरी २२।९३ बहुशिलामय (भी) रत्नप्रभाके सरभागका सोलहवां पटल ४।५४ वहुध्रुतमक्ति = भावना ३४११४१ यह्नि (व्य) लौकान्तिक देवका एक भेद ५५६१०१ यल (व्य) स्मितयशका पुत्र १३३८ बलदेव (व्य) वमुदेव और रोहिणीका पुत्र ४८।६४ बलभद्र (भी) मानत्कुमार युगल का छठा इन्द्रक ६१४८ यलमद (व्य) आगामी नारायण ६०१५६६ पलभद्रकदेव (व्य) नन्दनवन के बलभद्र कूटपर रहनेवाला देव ५।३२८ यलमद्रक कृट (भी) नन्दनवनके मध्य में स्थित एक कूट ५१३२८ यलरिपु (व्य) इन्द्र ५५।१३ यलसिंह (भी) वैजयन्ती नगरी पा राजा ३०३३ बलि (य) विजयका पुत्र ४८०४८ याण (व्य) विजया के शोणित. पुर नगरपा निवामी विद्यापर बुद्धिर्मना (व्य) एक गणिका २७११०१ वृहद्गृह (भी) वि० द० नगरी २२।९५ गृहद्मज (व्य) राजा वसुका पुत्र १७:५९ पृहद्मज (व्य) एक राजा ५०११३० गृहध्वज (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५।१७ शृद्ध्यम (व्य) जरामन्धरा पुष ५२०३१ पृह्दय (व्य) कुञरावर्त (नाग- पुर-हस्तिनापुरमें) रहने वाले मुगुका पुत्र १८१७ पृमय (व्य) गतपतिका पत्र १८०२२ गृद्ध (व्य) Tणरापुर ४८/६९ पृहालि (प्य) जरामन्यमा पुष ५२।४० पारपनि (य) एर भारत पश्या३८ पारगति (प्य) पिनौके रामाधोपमासमायो परमती (व्य)यावती नाम. द मेटलीपुत्री 10 पाया (व्य) तर ग्या पालचन्द्र (व्य) आगामी पल. ६०५६ बाल पन्द्रा (व्य) वि०६.के गगनश्मा नगरसी राज. पग्या २६१५. बालुहारमा (भी) नरकारी दोगरी भूमि । बाई (य) वगुदेव और रा पग (ल्य) हेच भोर माण. मीरा Triti in (य) गया div=DTTE पापा पाषण (प) भगान पमin Tr:२३ पारण (म्य) मुरादा १२३ मणिप्रम (भी) रुचिक गिरिका नैऋत्य दिशासम्बन्धी कूट ५१७२३ मणि, मणिप्रभ (भौ) कुण्डल. गिरिके पश्चिम दिशासम्ब. न्धो कूट ५१६९३ मणिभद्र (भी) विजयाधका छठा कूट ५।२७ मणिभद्र (व्य) अयोध्याके सेठ समुद्रदत्तका छोटा पुत्र ४३३१४९ मणिभद्रकूट (भो) ऐरावतके विजयाधंका चौथा कूट शब्दानुक्रमणिका मोजकवृष्णि (व्य) यदुवंशी मङ्गल कूट (भी) सौमनस्य मथुराके राजा सुवीरका पुत्र पर्वतका एक कूट ५।२२१ १८।१० मगला=एक विद्या २२१७० भोजनाह एक कल्पवृक्ष मङ्गलावती (भी) घातकोखण्ड ७.८० पूर्वविदेहका एक देश भोजमुता (व्य) राजीमती ६०१५७ ५५।७२ मङ्गलावती (भौ) पूर्वविदेहका माम = व्यन्तर देव ३११६२ एक देश ५।२४७ माम - पृथिवीकायिक जीव मही (व्य) विमलचन्द्र राजाको १८५७० विमला रानीसे उत्पन्न पुत्री भौम (पा) अष्टाङ्ग निमित्त ज्ञान जो वज्रमुष्टिको दी गयी का एक अंग १०१११७ ३३११०४ मौमावय (पा) आग्रायणी पूर्वकी मङ्गी (य) एक भीलनी वस्तु १०७९ . २७११०७ अकुंश = नटवेषधारी नपुंसक मनपा (भी) विदेहको नगरी ५४|४८ ५।२५७ भ्रम (भौ) धूमप्रभा पृथिवीके मज्जोदरी (व्य) एक कलालिन द्वितीय प्रस्तारका इन्द्रक जिसके यहाँ कंस पला ४११३९ भ्रमरघोष (व्य) कुरुवसका एक मटम्ब (पा) पांच-सौ गांवोस राजा ४५.१४ घिरा नगर २१३ ग्रान्त (भी) रलप्रभा पृथिवीके मणिकाजन-विजयाको एक चतुर्थ प्रस्तारका इन्द्रक गुहा ४२११८ ४॥७६ मणिकाचन (भी) वि उ. नगरी [म] २२.८९ मकरमन (व्य) प्रद्युम्न ५५।३१ मणिकाचन कूट (भी) शिखरि- मकराकर-समुद्र ४१४ कुलाचलवा ग्यारहवां कूट मगध (भी) देशका नाम ५1१०७ (बिहारका एक भाग) मणिकाचन कृट (भी) रुक्मि- कुलाचलका आठवां फूट मगधामार मलक (भी) वि द. ५.१०४ मणिचूल-हिमधून (व्य) मगर (य) राजा श्रेणिक चित्रचूल और मनोहरोके ५०१२ युगल पुत्र ३३६१३३ मघवान् (व्य) तोगरा सक्रवर्ती मणिचूल (व्य) विनमिसरा पुत्र ६०१२८६ २२११०४ मपत्री (भी) तम.प्रभाका हदि मणिप्रम (भी) वि. द. नगरी नाम४|४६ २२।९६ मणिवत्र (भी) वि. उ. नगरी २२।८८ मण्डित (भी) शि. द. नगरी २२।९३ मण्डूक (भी) एक गांव ६०1३३ मण्डूको (व्य) एक धीवरी ६०1३२ मतगज (व्य) वसुदेव और नील. यशाका पुत्र ४८/५७ मत्तजला (भी) विदेहक्षेत्रको एक विमङ्गा नदी ५।२४० मरमरीता = पड्जस्वरको मूना १९६१६१ मत्स्य (भी) देशका नाम नगरी २२०९९ मत्स्य (भी) देगविशेप ३४ मत्स्य (व्य) राजा महोदत्तका पुष १७९ मधुरा - यमनातटपर स्थित प्रमिद नगरो १७१६२ मधुरा (व्य) दक्षिणममुदर सटार पाण्डवों द्वारा रमायो ? एर नमी ५४७३ मदन (1) कृष्णा पुत्र प्रयन हरिवंशपुराणे १२२ मानुमालिनी (व्य) समवमरण भीम (व्य) कृष्णका पुत्र के आम्रवनकी वापिका ४८१६९ मीम (व्य) पहला नारद मानुषेण (व्य) मथुराके भानु ६०१५४८ और यमुनाका पुत्र ३३१९७ मीमक (व्य) एक उद्दण्ड राजा मामा (व्य) सत्यभामा ४३१३ ४३।१६२ मार्गव (भौ) देशका नाम मीमसेन (व्य) पाण्डव ४५।२ भीर (भौ) देशविशेष ३५ भारत (भौ) जम्बूद्वीपका मीम (व्य) राजा शन्तनुके वंशमें दक्षिण दिशामे स्थित प्रथम राजा रुक्मण और रानी क्षेत्र ५१३ गङ्गासे उत्पन्न पुत्र ४५।३५ महिलपुर (भौं) एक नगर भीष्म (व्य) रुविमणीका पिता ६०११ ६०१३९ भीष्मज- भीष्मके पुत्र रुवमी भारद्वाज (भी) देशका नाम ४२१९३ १११६७ माव - पदार्थ ४२ भीमजा = रुक्मिणी ६०४१ भावादिविचय (पा) धर्मध्यानका भुज गवरद्वीप (भौ) चौदहवा एक भेद ५६१४७ द्वीप ५।६१९ भावन = अमुरकुमार आदि भुजगवरसागर (व्य) चौदहवा भवनवासी देव ३३१३५ सागर ५।६१९ मायनाधिधि = प्रतविशेष भुजबली (व्य) सुबलका पुत्र ३४।११२ १३११७ भावसस्य (पा) दश प्रकारके भुजिप्य = सेवक १११७८ सत्यों में से एक सत्य भुजिया = दासी ४०१३९ १०११०६ भूतरमण (भौ) मेरका एक चन भाषासमिति (पा) धर्मकार्योमें हित मित प्रिय वचन बोलना भूतरमण (भौ) एक अटवी २।१२३ २७१११९ मापासमितिव्रत-व्रतविशेष भूतवर (भौ) अन्तिम सोलह ३४।१०७ द्वीपोंमें बारहवा द्वीप ५।६२५ मामा (पा) ममवमरणके आन भूतारण्य (भौ) विदेहक्षेत्रमें वनको वापिका ५७/३५ स्थित बनविशेप ५।२८१ मास्कर (व्य) जरासंघका पुत्र भूति (व्य) भगवान् ऋषभदेवका ५२१३८ गणधर १२०५९ मास्वती (पा) समवसरणके भूभृत् % पर्वत ३१६० याम्रवनी वाविका भूमिकुण्डल कूट (भी) वि०६० ५७१३५ नगरी २२११०० भीम (व्य) सुभानुका पुत्र १८१५ भूमिलुण्ड = अदिति देवीके द्वारा भीम (व्य) मध्यग पाण्डव पत्त विद्याओकाएक निकाय ५०1७८ २३१५७ भूमिशययावत (पा) मुनियोका मूल गुण जमीनपर सोना २२१२९ भूरिभ्रवस् (व्य) महापुरके राजा सोमदत्तका पुत्र २४.५२ भूरिश्रवस (व्य) एक राजा ५०७९ भूषान - एक कल्पवृक्ष ७८१ भृङ्गानिमा (भो) मेरके नैऋत्यमें स्थित एक वापिका ५।३४३ भृगराक्षस (व्य) नरमांसभोजी राक्षस तुल्य एक दुष्ट मनुष्य ४५४९४ भृङ्गा (भौ) मेरुके नैऋत्यमें स्थित वापिका ५/३४३ भृगु = पहाइको चट्टान १।१२८ मोग (पा) चक्रवर्तीके दश भोग १ भाजन, २ भोजन, ३ शम्या, ४ सेना, ५ वाहन, ६ आसन, ७निधि,८ रत्न, ९नगर, १० नाट्य ११११३१ मोगरा (व्य) दिक्कुमारी देवी ५।२२७ मोगभूमि (भौ) वह भूमि-- जहाँ कल्पवृक्षासे १० प्रकार के भोग प्राप्त होते है १७७ मोगमालिनी (य) दिवकुमारी देवी ५।२२७ मोगवती (व्य) दिवकुमारी देवी ५।२२७ भोगवती (व्य) माकन्दीके राजा द्रुपदकी स्त्री ४५११२१ भोगवर्धन (भौ) देशका नाम ११०३० मोज (व्य) कृष्णका पक्षपाती एक राजा ५२।१५ शब्दानुक्रमणिका १२५ महाकाल (व्य) मधुपिङ्गल मुनि मरकर महाकाल देव हुआ २३।१२६ महाकाल (व्य) यालोदधिका रक्षक देव ५/६३८ महाकाल (व्य) एटा नारद महाकाली = एक विद्या २०६६ महागन्ध (व्य) इधुवर समुद्र का रक्षक देव ५४६४८ महागिरि (व्य) हरिया पुत्र मलय (भी) एक देश ३३३१५७ मलय (व्य) अचलका पुत्र ४८१४९ मलय (व्य) कालयवनका हाथी ५२।२९ मलयादि (भी) दक्षिणदिगारा एक पर्वत जिसपर चन्दन होता है ५४।७४ मल्ल (भी) देश का नाम १९१६८ मलिल (व्य) मुनिसुयन नामका प्रथम गणधर ६०१३४८ मल्लि (व्य) मल्लिनाथ नामक उन्नीसवें तीर्थर १२० मसारगल्य (भी) रत्नप्रभाके खरभागका पांचवा भेद ४/५३ मस्तक (भी) देशमा नाम ११॥६८ महाकक्ष (भी) वि, द नगरी २२१९७ महाकच्छ (व्य) अपभदेवका गणधर १२१६८ महाकच्छा (भी) पश्चिम विदेहका एक देश ५।२४५ महाकल्प (पा) अगवाह्य श्रुतका एक भेद २११०४ महाकाक्ष (भी) प्रथम पृथिवी- सम्बन्धी प्रथम प्रस्तारके सोमन्तक इन्द्रकी पश्चिम दिशाम स्थित महानरक ४।१५१ महाकाल (व्य) उज्जयिनीका एक वन ३३११०२ महाकाल (भी) मातवी पृथिवीके अप्रतिष्ठान इन्द्रको पश्चिम दिशामें स्थित महानरक ४११५८ महाकाल (पा) चक्रवर्तीको निधि १११११० महागौरी- एक विद्या २२१६२ महरचन्द्र (व्य) आमामी बलभद्र ६०१५६८ महाजय (व्य) जरामन्धका पुत्र ५२।३८ महावाल (भी) वि उ. नगरो २२।९० महादु स (भी) तीसरी पृथिवीके प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी तप्त नामक इन्द्रको पश्चिम दिशामें स्थित महानरक ४.१५४ दिवी - पट्टराज्ञो ११११५ महानि (व्य) यादव ५०।१२१ महाधि = भारी मानसिक दुःख महानिरोध (भी) चौथो पृथिवी- के प्रथम प्रस्तारगम्बन्धी आर इन्द्रककी उत्तर दिशाम स्थित महानरक ४।१५५ महानील (भी) छठी पृथिवी प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी हिम इन्द्रककी पश्चिम दिशाम स्थित महानरक ४११५७ महानुभाव (व्य) मपभदेवका गणधर १२१६९ महानेमि (व्य) यादव ५०।१२० महानेमि (व्य) एक यदुवंशी राजा ५०1८३ महानेमि (व्य) गमुद्र विजयका पुत्र ४८।४३ महानेमिकुमार (व्य) वृष्णके पक्षका योदा ५२।१४ महापका (भौ) छठी पृथिवीके प्रथम प्रस्तारगम्बन्धी हिम इन्द्रककी उत्तर दिशामे स्थित महानरक ४११५७ महापद्म (व्य) नवम चक्रवर्ती ६०१२८७ महापद्म (व्य) जरामधका पुत्र ५२।३८ महापड़ा (व्य) कुण्डलगिरिक सुप्रभ कूटका निवामी देव ५।६९२ महापद्म (भी) महाहिमवत् कुलाचलका हद ५११२१ महापद्म (व्य) आगामी चक्र- वर्ती ६०१५६५ महापग (व्य) आगामी तीर्थ- कर ६०१५५८ महापद्मा (भी) पूर्वविदेहका एक देश ५१२४९ महापुण्डरीक (भौ) रुक्मिकुला. चलका हद ५११२१ महापुण्डरीक (पा) अङ्गदाह्य- श्रुतका एक भेद २११०४ महाधनु (व्य) बलदेवका पुत्र ४८.६८ महानन्द (व्य) एक राजा महातमःप्रमा (भी) नरकोकी मानवी भूमि ४।४५ महानाग (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२०३८ महानाद (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२।३४ महानिच्छ (भौ) दूमरी पृथिवीके प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी तरक इन्द्रक विलकी पूर्वदिगामे स्थित महानरक ४१५३ १२४ हरिवंशपुराणे मदनवगा (व्य) एक कन्या जो मध्यन सिंह निष्क्रीडित = एक वसुदेवको विवाही गयी उपवामान ३४१७९ ૨૪૮૪ मध्यमांदीच्यवाः = मध्यम ग्रामके मद्ययान (व्य) जरामंधका पुत्र आश्रित जाति १९.१७७ ५२।३६ मध्यलोक स्तूर (पा) समवसरणके मद्यान एक कल्पवृक्ष ७८० स्तूप ५७१९७ मदन-प्रद्युम्न ४३३२४४ मनक (भौ) शर्कराप्रभा पृथिवी- मद्रक (भी) देशका नाम के तृतीय प्रस्तारका इन्द्रक विल ४१०७ मद्रकार (भी) देशका नाम मनःपर्यय (व्य) दूसरेके मनको १११६४ वातको जाननेवाला ज्ञान- मद्री (व्य) अन्धव वृष्णिकी पुत्री, विशेप २०५६ पाण्टुकी स्त्री १८1१५ मन.शिलद्वीप (भी) अन्तिम मधु (ध्य) हेमनाभ और धरा सोलह द्वीपोम पहला द्वीप वतीका पुत्र ४३।१६९ ५११२२ मथु = वसन्त ऋतु ५५२२९ मनु %कुलकर ८१ मधुकैटम (व्य) पांचवां प्रति- मनु = अदिति देवीके द्वारा नारायण ६०।२९१ विद्याओ एक निकाय मधुपिगल (व्य) राजा तण. २२१५७ बिन्दु और मर्वयाका पुत्र मनु (भी) वि. उ. नगरी २३०५२ २२।८८ मधुरा (व्य) वकि गांव मनुपुत्रक-विद्याधर जाति मृगायण ब्राह्मणकी म्बी २६९ २७१६२ मनांगति (व्य) मूर्याभ और मध्य देश (भी) मध्यवर्ती देश 'धारिणीका पुत्र ३४।१७ मनोमय (व्य) द्र ६०१५७१ मध्यम%3D एक म्वर १९।१५३ मनोभू = काम १७७ मध्य, मध्यम (व्य) वारणीवर मनोरमा (व्य) अमितगति विद्या- गमुद्रे रक्षा देर ५६४१ घरकी स्त्री मध्यमपद (पा) माला-मी २१।१२० चीनीगरोट तेरामी लाय मनोरमा (व्य) मेघपुरवे राजा माउबार पाठमोभटामी पवनग और मनोहरी जागामध्यम पद रान:की पुत्री, बनमालामा होता १०८ जीव १५१२७ मध्यमराय (पा) यागपत मनोहरी (व्य) निववृनको माया ७१० ग्त्री ३३७१३२ मध्यमा मण्यम दामो प्राधिन मनोहरी (व्य) मेघारके गना पवन गसी म्बी १५:२६ गपग सामगि मनोहरी (व्य) रामा था और की पुत्री १२३ मन्दर (भी) मेस्पवंत ४।११ मन्दरस्तूप (पा) समवसरण के स्तूप ५७१९८ मन्दर (व्य) मथुराके राजा रत्नवीर्यको अमिनप्रभा रानीसे उत्पन्न पुत्र, घरगेन्द्र- का जीव २७११३५ मन्दर (व्य) जरासंघका पुत्र ५२।३५ मन्दर (व्य) कुस्वशका एक राजा ४५।११ मन्दर (भी) नन्दनवन का एक कूट ५।३२९ मन्दर (भी) रुचिकगिरिका दक्षिण दियासम्बन्धी कूट ५७०८ मन्दोदरी (व्य) राजा सगरकी प्रतोहारी २३३५० मय (व्य) समुद्रविजयका पुत्र ४८/४४ मयूरग्रीय (व्य) आगामी प्रति- नारायण ६०१५७० मरक्त-हरे रंगका मणि २०१० मरीचि (व्य) सत्यभामाय भवा. न्तर वर्णनमें उल्लिविन एक ब्राह्मण ६०११ मरीचिकुमार (व्य) भगवान् ऋपभदेवया पोता ९।१२५ मरत- देव ९६११४ मरदेव (व्य) बमुदेव और सोम- श्रीवा पुत्र ४८०५४ माय (व्य) बारा कुलकर ७१६४ मरदवी (ध्य) नाभिराज दुर घी स्त्री८६ मारामार्ग-याका १२।४५ मरभनि (व्य) पारसका मिर माद (भौ) देशका नाम १९६९ शब्दानुक्रमणिका १२७ मानव (व्य) अदिति देवीके द्वारा दत्त विद्याओका एक निकाय २२०५७ मानत (भी) वि० ८० नगरी २२।९५ मानवपुत्रक % विद्याधरोंकी एक जाति २६८ महाहिमवत्कूट (भौ) महाहिम- बतूकुलाचलका दूसरा कूट ५.७१ महाहृदय (व्य) कुण्डलगिरिके अङ्कप्रभ कूटका निवासी देव ५।६९३ महीजय (व्य) समुद्रविजयका पुत्र ४८।४४ महीजय (व्य) जरासंघका पुत्र ५२।३० महीदत्त (व्य) पोलोमका पुत्र १७.२८ महीधर (व्य) भगवान् ऋपमदेव का गणधर १२१५८ महीपाल (व्य) जरासधका पुत्र ५।३१ महेन्द्र (भौ) कुण्डलगिरिका उत्तर दिशासम्बन्धी कूट महोदय (व्य) समवसरणका एक मण्डप ५७१८६ माकन्दी (भौ) एक नगरी ४५.१२० मागध (व्य) पूर्व लवणममुद्र- का वासी देव १११७ मागध (व्य) जरासंध १५१०८ मागध = राजा श्रेणिक ४५१३ मागधेशपुर (भी) नगरविशेष १८।१७ मातङ्ग-दिति देवीके द्वारा प्रदत्त विद्यानिकाय २२०५९ मातङ्ग (व्य) नमिका पुत्र २२११०८ माता विद्याधरोकी जाति २६.१५ मातङ्गपुर (भी) वि०६० नगरी २२।१०० मातरिश्वा = कुत्ता ४६।५३ मातलि (व्य) इन्द्र के द्वारा प्रेपित नेमिनाथके रथका सारथि ५१११ मातृवसा= मौसी १८४१२८ मात्रा - तालगत गान्धर्वका एक प्रकार १९११५१ माद्री (व्य) राजा पाण्डुको द्वितीय स्त्री ४५।३८ माधवी (भौ) महातम-प्रभाका रूढि नाम ४।४६ माणव (भौ) देशका नाम १९६६ माणब (पा) चक्रवर्तीको एक निधि १११११० माण्डव्य (व्य) भगवान् महा- वीरका छठा गणधर ३१४२ माधवमास = वसन्तका महीना ५५५४३ माधव - (व्य) श्रीकृष्ण ४२१६८ माधवी = एक लता ११११०० महेन्द्र (व्य) एक राजा ६०८१ महेन्द्र (भी) वि० उ० नगरी २२।९. महेन्द्र (व्य) अचलका पुत्र ४८१४९ महेन्द्रगिरि (व्य) घमुदेवको गन्धर्वसेना स्त्रीरो उत्पन्न पुत्र ४८१५५ महेन्द्रदत्त (व्य) ऋपभदेवका गणघर १२०६६ महेन्द्रजित् (व्य) इन्द्रद्युम्नका पुत्र १३३१० महंन्द्रविक्रम (व्य) नित्यालोक- पुरका राजा ६०।९. महेन्द्रविक्रम (व्य) उदितपरा- क्रमका पुत्र १३।१० महंन्द्रविक्रम (व्य) विजयाधंकी दक्षिण ग्रेणीके शिवमन्दिर नगरका राजा २११२२ महेन्द्रसेन = एक मुनि ४३३१५० मानवर्तिक (भी) देशका नाम ११६६८ मानसवेग (व्य) चित्तवेग विद्या- घरका पुत्र २४७० मानसवेग (व्य) वसुदेवका वैरी एक विद्याधर २६।२७ मानसर्वग (व्य) वसुदेवका सम्बन्धी एक विद्याधर ५११३ मानस्तम्म = समवसरणको चारो दिशाओमें स्थित महिमा- युक्त स्तम्भ २।७४ मानाणा (पा) समवमरणको एक भूमि ५७४९ मानुपोत्तरभूभृत् (भी) पुष्कर- द्वीपके मध्य में स्थित चूडीके आकारका पर्वत ५।५७७ मानुषोत्तर (भी) मेरू पर्वतका एक वन ५।३०७ मानुष (व्य) मानुपोत्तरके रजन- कूटपर रहने वाला एक देव ५१६०५ मायागता (पा) दृष्टिवाद अङ्ग के चूलिकाभेदका उपभेद १०११२३ मायाक्रिया (पा) एक क्रिया ५८.८० मायूरी = एक विद्या २०६३ मार (भी) पचप्रमापृथिवीके तृतीय प्रस्तारका इन्द्रक विल ४॥१३१ मार (व्य) रुद्र ६०१५७१ १२६ हरिवंशपुराणे महापुर (भौ) वि. उ. नगरी २२१९१ महापुर (भौ) एक नगर, जहाँ वसुदेव गये थे २४॥३७ महापुरी (भौ) विदेहको एक नगरी ५२६१ महाप्रम (व्य) क्षीरवर द्वीपका रक्षक देव ५।५४२ महाप्रम (भी) कुण्डलगिरिका दक्षिण दिशाका कूट ५।६९२ महाबल (व्य) एक विद्याधर ६०.१८ महाबल (व्य) भगवान् ऋपभ. देवका पूर्वभव ९५८ महायल (व्य) एक राजा ५०११२५ महायल (व्य) सोमयशका पुत्र महारथ (व्य) वसुदेव और अवन्तीका पुत्र ४८।६४ महारथ (व्य) ऋषभदेवका गणघर १२०६६ महाराज (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५1१५ महारुद्र (व्य) चौथा नारद ६०१५४८ महारौरव (भो) सातवी पृथिवी- के अप्रतिष्ठान इन्द्रकको उत्तरदिशामें स्थित महानरक ४१५८ महालता (पा) चौरासी लाख महालताङ्गोंको एक महालता होती है ७१२९ महालताङ्ग (पा) चौरासी लाख लताओका एक महालतान होता है ७।२९ महावरसा (भौ) पूर्वविदेहका एक देश ५।२४७ महावप्रा (भी) पश्चिम विदेहका एक देश ५।२५१ महावसु (व्य) जरासंघका पुत्र ५२१३२ महावमु (व्य) राजा वसुका पुत्र १७१५८ महाविम्य (भी) दूमरो पृथिवी- के प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी इन्द्रकी उत्तर दिशामें स्थित, महाभयानर नरक ४।१५३ महाविमन (भी) पांचवी पषियी प्रथम प्रस्तार. सम्बन्धीतम इन्द्रक्सी उत्तर दिधाम स्थित महानरक. ४.१५ महागर (व्य) अन्तिम तयार २०१८ महावेदन (भी) तीसरी पृथिवीके प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी तप्त नामक इन्द्रक विलको उत्तर दिशामें स्थित महानरक ४।१५४ महाग्रत (पा) हिंसा आदि पाच पापोका सर्वदेश त्याग करना, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्म- चयं और अपरिग्रह-ये पांच महावत है २।११७ महाशिरस् (व्य) कुण्डलगिरिक कनककूटपर रहनेवाला देव ५।६९० महाशुक्र (भी) दसवां स्वर्ग ४।२५ महाशुक्र (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२।३३ महाशुक्र (भी) दसवा स्वर्ग ६६३७ महाश्वेता--एक विद्या २२२६३ महासर (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५२९ महासर्वनामद - एक उपवास प्रत ३४।५७-५८ महासेन (च्य) भोजकष्णि थौर पनवतीका पुत्र १८१६ महासेन (व्य) जरासंधरा पुत्र ५।३८ महासन (व्य) कृष्णको लक्ष्मणा स्त्रोका भाई ४४०२५ महासेन (य) उग्रमेन वाया पान्तनका पुष ४८२४. महामन (व्य)-एप आचार्य महाबल (व्य) सुवलका पुत्र १३८ महावल (व्य) ऋपभदेवका गणधर १२।६६ महायल (व्य) आगामी नारायण ६०१५६६ महायाहु (व्य) दिनमिका पुत्र २२।१०५ महाशाहु (व्य) जरामधका पुत्र महामानु (व्य) कृष्णा पुष ४८।६. महाभुन (व्य) युगलगिरिक पनपत्रमानियागो देर महामीम (व्य) दूगरा नारद १.९४८ महामारिन (य) जरामा र ५२. महामन (स्य) कृष्णा पुत्र ४८1. महामन(व्य)कराअ५०१३१ महादिमयन् (भी) जापनीमा दूगरा पुरषा ५.१५ महारथ (म्प) मा एक गमा ४४२८ ८६ हरिवंशपुराणे वनात् पूर्वापरान्तस्था वेदिका योजनौच्छ्रितिः । क्रोशावगाहिनी ज्ञेया विस्तृता क्रोशयोयम् ॥२३॥ नीलात् ग्राहवती सीतां वाहिनी हृवत्यपि । पक्षवत्यपि यान्तीमा वक्षाराभ्यन्तरे स्थिताः ॥२३६।। नदी तप्तजला पूर्वा सीतामेवैति नैपर्धा । ततो मत्तजला नाम्ना तथोन्मत्तजराऽपरा ॥२४॥ तीरोदाऽन्या च सीतोदा स्रोतोऽन्तर्वाहिनी नदी । विशन्ति नैपधोत्पन्नाः सीनोदां सुमहानदीम् ॥२४॥ तामुत्तरविदेहेषु पश्चिमा गन्धमादिनी । सा फेनमालिनी नीलात् सम्प्राप्ता चोमिमालिनी ॥२४२॥ नाम्ना विभङ्गनद्यस्ताः प्रमाणे रोह्यया समाः । तोरणेषु वसन्यासां सङ्गमे दिक्कुमारिकाः २४३।। वहाराणां च तासां च मध्ये नद्योस्तटद्वये । स्युः पूर्वापरयोमरोविदेहाश्चतुरष्टकाः ॥२४४।। कच्छा मुकच्छा महाकच्छा चतुर्थी कच्छकावती । आवर्ता लागलावर्ता पुष्कला पुष्कलावती ॥२४॥ अपराद्यास्त्वमी वैद्याः पट खण्डा विषयाः स्थिताः । सीतानीलान्तराले स्युः प्रादक्षिण्येन वर्णिताः ॥२४६।। वत्सा सुवस्सा महावरमा चतुर्थी वरसकावती । रम्या रम्यका रमणीयाष्टमी मङ्गलावती ॥२४७।। पूर्वादयस्त्वमी वेद्या विषयाश्चक्रवर्तिनाम् । सीतानिपधयोमध्ये व्यायता दक्षिणोत्तराः ॥२४८।। पमा मुपद्मा महापद्मा चतुर्थी पद्मकावती । शङ्खा च नलिनी चैव कुमुदा सरिता तथा ॥२४॥ पूर्वतः प्रभृनि प्रोता: दक्षिणोत्तरमायताः । अष्टाविमे निविष्टास्तु सीतोदानिपधान्तरे ॥२५०॥ वमा सुवप्रा महावप्रा चतुर्थी वप्रकावती । गन्धा चापि सुगन्धा च गन्धिला गन्धमालिनी ॥२५॥ अपराद्यास्त्विमे प्रोक्ताः विषयाश्चक्रपाणिनाम् । नीलप्तीतोदयोमध्ये निविष्टास्ताव रायताः ॥२५२।। वनके पूर्व-पश्चिम भागमे एक वेदिका है। यह वैदिका एक योजन ऊँची, एक कोश गहरी और दो कोश चौड़ी जानना चाहिए ॥२३८॥ १ ग्रावती, २ ह्रदवती और ३ पङ्कवती ये तीन नदियाँ नील पर्वतसे निकलकर सीता नदीकी ओर जाती हैं तथा यक्षार पर्वतोके मध्यमें स्थित है ।।२३६।। १ तप्तजला, २ मत्तजला, ३ उन्मत्तजला ये तीन नदियाँ निषध पर्वतसे निकलकर सीता नदीकी ओर जाती हैं ।।२४०॥ १ क्षीरोदा, २ सीतोदा और ३ स्रोतोऽन्तर्वाहिनी ये तीन नदियों निपध पर्वतसे निकलकर सीतोदा नामक महानदीमे प्रवेश करती हैं ॥२४१॥ उत्तर विदेह क्षेत्रमे १ गन्धमादिनी, २ फेनमालिनी और ३ ऊर्मिमालिनी ये तीन नदियों नीलाचलसे निकलकर सीतोदा नदीमें मिली हैं ॥२४२॥ ऊपर कही हुई बारह नदियाँ विभंगा नदी कहलाती हैं। ये प्रमाणमें रोह्या नदी के समान हैं तथा इनके संगम स्थानोमें जो तोरण द्वार हैं उनमें दिक्कुमारी देवियों निवास करती हैं ।।२४३॥ वदारगिरि और विभगा नदियोंके मध्यम सीता-सीतोदा नदियोके दोनों तटोंपर मेरुकी पूर्व और पश्चिम दिशामे बत्तीस विदेह हैं ॥२४४॥ उनमें १ कक्षा, २ सुकच्छा, ३ महाकच्छा, ४ फटकायती, ५ आवर्ता, ६ लागलावर्ता, ७ पुष्कला और ८ पुष्पकलावती ये आठ देश पश्चिम विदेह क्षेत्रमें सीता नदी और नील कुलाचलके मध्य प्रदक्षिणा रूपसे स्थित हैं तथा प्रत्येक देशके छह सण्ड है ॥२५५-२४६॥ १ वत्सा, २ सुपत्सा, ३ महावत्सा, ४ वत्सकावती, ५ रण्या, ६ रम्यका, ७ रमणीया और ८ मङ्गलावती ये आठ देश पूर्व विदेह क्षेत्रमें सीता नदी और निषध पर्वतके मध्य स्थित है। ये चक्रवर्तियोंके देश हैं और दक्षिणोत्तर लम्वे हैं ॥२४७-२४८|| १ पभा, २ सुपद्मा, ३ महापद्मा, ४ पद्मकावती, ५ शहा, ६ नलिनी, ७ कुमुदा और ८ सरिता ये आठ देश पूर्व विदेह क्षेत्रगे सीतीदा नदी और निषध पर्वतके मध्य स्थित हैं तथा दक्षिणोत्तर लम्ये हैं ॥४-५०॥ १ यमा, २ मुवप्रा, ३ महावप्रा, ४ वप्रकावती, ५ गन्धा, ६ मुगन्धा, ७ गन्धिका और गन्धमालिनी ये आठ देश पश्चिम विदेह क्षेत्रमे नील पर्वत और सीतोदा नदीके मध्य स्थिन है तथा दक्षिणोत्तर सम्वे हैं। ये चक्रवतियोंके क्षेत्र कहे गये हैं अर्थात् इनमें १ चरगगिनामित प्रयोगभिन्त्यः 'चाणीना' मिति भस्तिव्यम् , तत्र च कृते छन्दोमनः स्यात् ।

हरिवंशपुराणे १२८ मारुन (भौ) सौधर्मयुगलका मांसल = पुष्ट ८।२६ वारहवाँ इन्द्रक ६।४५ मित्र (व्य) ऋषभदेवका गणधर मार्ग - तालगनगान्वर्वका प्रकार १२१६२ १९।१५१ मित्र (भौ) सौधर्मयुगलका तोमवा मागंणा (पा) गति आदि १४ इन्द्रक ६१४७ मार्गणाएँ जीवोको खोजके मित्रफल्गु (व्य) अपभदेवका स्थान २।१०७ गणधर १२।६५ मार्गप्रमावना- भावना ३४६१४७ मित्रवती (व्य) चारुदत्तके मामा- मार्गवी = मध्यमग्रामको मूच्र्छना को पुत्रो जिसे चारुदत्तने ११९।१६३ विवाहा २११३८ माल्य (भी) देशका नाम १११७१ मित्रसागर (व्य) एक मुनि माल्य (भौ) वि० उ० नगरी ६०१९७ २२।९० मित्रानुराग (पा) मल्लेखनावतका माल्याग-एक कल्पवृक्ष ७१८० अतिचार ५८।१८४ माल्ययाकूर (भौ) माल्यवान् मित्रा (व्य) अरिष्टपुरके राजा पर्वतका एक कूट ५।२१९ रुधिरको स्त्री ३१।१० माल्यवान् (भी) नोलपर्वतसे मित्रा (व्य) राजा सुदर्शनकी स्त्री साढे पांच-सौ योजन दूर नदी- अरनाथकी माता ४५।२१ के मध्य में स्थित एक हद मिथुन = दम्पती १५।१ मिथिला (भौ) एक नगरी २०१२५ माल्यगान (भौ) मेरुको पूर्वोत्तर मिथिलानाथ (व्य) देवदतका दिशाम स्थित बैंडूर्यमणिमय पुत्र १७३४ एक पर्वन ५२११ मिभ्यादर्शन भाषा (पा) सत्य- मात्यान् (व्य) जरासन्धका प्रवादपूर्वको १२ भाषाओ- पुत्र ५२१३७ मे-से एक भाषा १०१९७ मात्यवान् (व्य) हिमवन् का पुन मिथ्यादर्शनक्रिया (पा) एक क्रिया ४८।४७ ५८.८१ माम (पा) दो पक्षका एक मास मिथ्यात्यक्रिया (पा) एक क्रिपा होता है ७१२१ ५८२६२ माहनी = ब्राह्मणो २१११३१ मिथ्यादृष्टि (पा) पहला गुणस्थान माहिपक (भी) देशका नाम ३.८० ११७० मिथ्योपदेश (पा) मत्याणुयतका माहिष्मनी (भी) राजा ऐलय के अतिचार ५८।१६५ द्वारा नर्मदा तटार यसायी मिश्रोशी (व्य) रुचिागिरिक है नगरी ११२१ अव यूटपर रहलेवाली देवी गाहेम (भी) देगा नाम ११.७२ ५१७१५ माइन्द्र विद्याम्प २०४७ मुस्तापलोनिधि = एक उश्याम. मादेड (भी) चौगार्ग ६।३६ ग्रन ३४१६९-७० माहंन्द्र (व्य) भगवान् ऋषभ मुनि = प्रत्याज्ञानी मुनि गगणधर १२।१८ मुनिचन्द्र (व्य) एक जैनमुनि २७१८१ मुरजमध्यविधि = एक अवाम ३४।६६ मुण्डशलायन (व्य) एक ब्राह्मण ६०१११ मुनिसुव्रत (व्य) बोसवें तीर्थकर १६.१३ मुहूर्त (पा) सात लवोका एक मुहूर्त होता है । ७।२० मूल (व्य) राजा अयोयनका पुत्र १७१३२ मूलक (भौ) देशका नाम १११७० मूलवयंक = अदिति देवीके द्वारा दत्त विद्याओका एक निकाय २२१५८ मूलवीर्य विद्याधर - विद्याघरों- की एक जाति २६१० मूर्च्छनाः 3वैणस्वरका भेद १९.१४७ मृगध्वज (व्य) जितशत्रुका पुत्र २८।१७ मृग (व्य) समाली और कनवेशीका पुत्र २७॥१२० मृगहिणी (व्य) मिनको स्त्री तापसी ४६५४ मृगाइ (व्य) गरुडाइया पुष १३।११ मृगायण (व्य) वर्धकि गायका एक माहाण २७१६१ मृगावती (व्य) हरिपुरके राजा पवनगिरिपी स्त्री १५/२३ मृतसंजीवनी २२।७१ मृत्यु-आशंगा (पा) मल्लेबनाना अतिचार ५०1१८४ मृदामध्यविधि - एक नवाम - एक विद्या गृधरण ४०१ शब्दानुक्रमणिका १२९ - शुद्ध परिणति मेघ (व्य) मेघदलपुरका एक सेठ ४६।१५ मेघ (भौ) सौधर्मयुगलका बीसवां इन्द्रक ६.४५ मंघ (व्य) यादव ५०११२१ मंघ (व्य) समुद्रविजयका पुत्र ४८१४४ मंघा (भौ) बालुकाप्रभा पृथिवी ४।२२० मंघकूट (भौ) वि. द. नगरी २२१९६ मेघकूट (भी) विजयाका एक नगर ४३३४९ मंघकूट (भी) निपध पर्वतको उत्तर दिशाम सोतोदा नदी- के तटपर स्थित कूट ५।१९२ मेघरा (व्य) नन्दनवनमे रहने- वाली दिक्कुमारी ५।३३२ मेघधीप (व्य) मेघनादका पुत्र ६०१११८ मेघदल (भौ) एक नगर ४६।१४ मेघनाद (व्य) भद्रिलपुरका राजा ६०१११८ मेघनिनाद-रत्नायुधका एक हाथी २७५९६ मेघनाद (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२०३४ मेघपुर (भौ) एक नगर ३३३१३५ मेधपुर (भी) विजयाको उत्तर- श्रेणीका एक नगर १५।२५ मेषनाद (व्य) अरिजयपुरका स्वामी २५/२ मेघमाल (भी) पश्चिम विदेहका वहारगिरि ५६२३२ मेघमाल (भौ) वि० उ० नगरी २२।९१ मंघमाला (व्य) मथुराके राजा रनवीर्यको स्त्री २०१२५ मेघमालिनी (व्य) नन्दनवनमे मरुदत्त (व्य) नग्नजित्का पुत्र, रहनेवाली दिक्कुमारो कृष्णका पक्षपाती ५२।२१ ५।३३३ मरुनन्दना (व्य) व्यन्तरको स्त्री मेघमालिनी (व्य) नारद नामक ६०.४६ देवकी देवी ६०८० मरुपक्तिव्रत = एक प्रतविशेष मेघमुस (व्य) म्लेच्छोका कुल- ३४६८५ देवता ११३२ मंरुमती (व्य) गान्धारीको माता ६०९३ मेघवती (व्य) नन्दनवन में रहने- मरमती (व्य) गान्धारदेशको वाली दिवकुमारी देवो पुष्कलावती नगरोके राजा ५१३३२ इन्द्रगिरिको स्त्री ४४।४५ मंधानीक (व्य) विनमिका पुत्र मेदार्य (व्य) भगवान महावीरका २२।१०४ दशम गणधर ३.४३ मेघरथ (व्य) गिरिनगरके चित्र. मोक (भौ) देशका नाम ११॥६५ रथ राजाका पुत्र ३३११५२ मोक्ष (पा) अष्टकर्मसे रहित मेघरय (व्य) सद्भद्रिलपुरका आत्माको राजा १८।११२ २।१०९ मेघवाहन (व्य) भरतक्षेत्र चम्पा- मोभ (पा) भाग्रायणी पूर्वके पुरीका राजा ६४४४ चतुर्थप्राभृतका योगद्वार मेघवेग (व्य) त्रिकूटाचलका १०1८३ स्वामी ४५१११५ मोक्षण = विद्यास्त्र २५।४८ मेघेश्वर (व्य) ऋषभदेवका गण. मोघ य) मानुषोत्तरके अड्क घर, दूसरा नाम जयकुमार कूटपर रहनेवाला देव १२।६७ ५।६०६ मेरु (व्य) भगवान् ऋपभदेवका मोघ (मोष) भापा (पा) सत्य- गणधर १२०५९ प्रवाद पूर्वको १२ भाषाओमें- मेरु (भी) विदेहक्षेत्रमें स्थित सुद से एक भाषा १०१९६ शन मेह नामका पर्वत ११९७ मोहनः = विद्यास्त्र २५१४८ मेरु (व्य) सिन्धुदेशके वीतभय मोहनीय (पा) आत्माको स्वरूप- नगरका स्वामी ४४॥३३ से च्युत करनेवाला कर्म मेरु (व्य) मथुराके राजा रत्न- ५८।२१६ वीर्य और मेघमालाका पुत्र, मौक (भी) देशविशेष ३४ लान्तवेन्द्रका जीव २७४१३५ मौसयं (पा) अनर्थदण्डग्रतका मेरु (व्य) श्रीकृष्ण पक्षका राजा अतिचार ५८।१७९ ५०७० मौन - मुनियोका १२१८२ मेरक (व्य) तोमरा प्रतिनारायण मौलि = मुकुट २१८५ ६०.२९१ मौर्यपुत्र -(व्य) भगवान् महा• मरुचन्द्र (व्य) एक राजा वीरका सप्तम गणघर ६०११०३ ३।४२ हरिवंशपुराणे फूटपर रहनेवाला [य] यव (पा) आठ यूकाओका एक यव ७४० यक्षदेवी (व्य) यतिल और देव- सेनाकी पुत्री ६०६३ यवन (भी) देशका नाम १११६६ यक्षलिक (व्य) यज्ञदत्त और यवन (व्य) एक राजा ५०1८४ यक्षिलका पुत्र ३३३१५८ यवु (व्य) भानुका पुत्र १८३ यक्षवर (भी) अन्तिम सोलह यश कूट (भौ) रुचिक गिरिका द्वीपोमें तेरहवा द्वीप पश्चिम दिशा सम्बन्धी कूट ५।६२५ ५७१४ यक्षिल (व्य) एक वैश्य ६०३६३ यशःपाल (व्य) ग्यारह अगाके यति - कपायोका अन्त करनेवाले जाता एक आचार्य ११६४ विशिष्ट मुनि ३।६१ यशस्कान्त (व्य) मानुपोत्तरके यति = तालगत गान्धर्वका एक अश्मगर्भ प्रकार १९।१५१ देव ५/६०२ यथाख्यातचारित्र (पा) मोहके यशस्वान् (व्य) मानुषोत्तर पर्वत- अभावमे होनेवाला चारित्र के वैडूर्यकूटपर रहनेवाला ५६७८ देव ५।६०२ यज्ञ (व्य) भगवान् ऋषभदेवका यशस्विनी (व्य) धनदेवकी स्त्री गणधर १२।५९ ६०१९५ यज्ञगुप्त (व्य) ऋषभदेवका गण यशस्वी (व्य) नौवाँ कुलकर घर १२०६३ ७११६० यज्ञदत्त (व्य) ऋषभदेवका गण. यशोदा (व्य) सुनन्दगोपकी स्त्री घर १२१६४ ३५.३० यज्ञदत्त, यक्षिला (व्य) इस यशोदा (व्य) एक कन्या जिसका नामका दम्पती ३३३१५८ महावीरके साथ विवाह यशदेव (व्य) ऋषभदेवका गण. करनेकी जितशत्रुको इच्छा घर १२।६३ यज्ञमिन्न (व्य) ऋषभदेवका गण यशोदया (व्य) यशोदाको माता घर १२।६४ ६६८ यदु (व्य) हरिवशके अन्तर्गत यशोधन (व्य) एक राजा यदुवंशका स्थापक राजा ५०११२६ १८६ यशोधर (व्य) एक मुनिराज ३४।४५ यदुनन्दन = वसुदेव २८०१४ यम (व्य) देवविशेष (लोकपाल) यशोधर (भौ) मध्यम अवेयकका ५।३१७ प्रथम इन्द्रक ६.५२ यमकूट (भी) निषध पर्वतको यशोधर (व्य) मानुषोत्तर पर्वतके उत्तर दिशामें सीतोदा नदीके सौगन्धिक कूटपर रहनेवाला तटपर स्थित कूट ५।१९२ देव ५१६०२ यमदण्ड -विद्यास्त्र २५१४८ यशोधरा (व्य ) रुचिकगिरिके यमुना (व्य) मथुराके भान सेट विमलकूटपर रहनेवाली देवी की स्त्री ३३।९६ ५१७०९ यशोधरा (व्य)अलकाके राजा सुदर्शन और रुधिराको पुर्वी २७१७१ यशोभद्र (व्य) आचाराङ्गके साता एक आचार्य ११६५ यशोयाहु (व्य) भाचाराङ्गके शाता एक आचार्य १६५ यायलय (व्य) एक परिवाजक २१११३४ याम्य (पा) स्फटिक सालका दक्षिण गोपुर ५७।५८ यादव = वसुदेव १९।५७ यादवेन्द्र (व्य) समुद्रविजय नमि- नाथके पिता ५०१३ युक्तिक (व्य) राजा उग्रसेनका पुत्र ४८।३९ युक्त्यनुशासन (व्य) समन्तभद्र- द्वारा रचित युक्त्यनुशासन नामका ग्रन्थ और युक्ति युक्त अनुशासन११२९ युग (व्य) पांच वर्षका एक युग होता है ७।२२ युगन्त (व्य) विजयका पुत्र ४८/४८. युग्म - स्त्री-पुरुषाका युगल ७१९१ युग्य-बैल ४३०२ युगल (व्य) सहदेव और नकुल ५५/५ युधवरोधन (व्य) दुर्योधनका वशज ६५।१९ युधिष्ठिर (व्य) पाण्डव ४५।२ यूका (पा) आठ लिक्षाओकी एक यूका ७४० यूपकेसर (भी) लवणसमुद्रका उत्तर दिशास्थित पाताल ५।४४३ योग (पा) आत्मप्रदेशोका कम्पन ५८।५७ थी ६६८ शब्दानुक्रमणिका योगनिःप्रणिधान (पा) सामा- यिक व्रतके अतिचार, इसके तीन भेद है ५८।१८० योजन (पा) आठ हजार दण्डका एक योजन ७४६ योजन (पा) अकृत्रिम चीजोंके नापमें दो हजार कोशका एक योजन होता है और कृत्रिम चोजोके नापमें चार कोशका ४१३६ योजनगन्धा (व्य) शन्तनुको स्त्री ४५।३१ योनिनिकरूप = सचित्त, अचित्त, मचित्ताचित्त, शोत, उष्ण, दगीतोष्ण, संवृत, विवृत, संवृत, विवृत यै नौ योनियां २१११६ योपिन् = स्त्री २२८ [र] रक्तकम्बला (भी) पाण्डुक्वनके वायव्यमें स्थित शिला ५।३४७ रौरव (भी) मातवीं पृथिवीक अप्रतिष्ठान इन्द्रक्की दक्षिण दिशामें स्थित महानरक ४११५ रविम । कूट (भी) रुक्मिकुलाचल का दूसरा कूट ५.१०२ रुक्मिन् (भी) जम्बूद्वीपका छठा कुलाचल ५।१५ रवि (व्य) राजा वमुवा पुत्र २७१५९ रोहिणी (पा) पांच-सौ महाविद्या. ओम में एक १०१११५ रोहिणी (व्य) अरिष्टपुरके राजा रपिरकी पुत्री ३१११ संरक (भी) रत्नप्रभा पृथिवीके तृतीय प्रकारका इन्द्रक विल ४.७६ रूपगता (पा) दृष्टिवाद अङ्गके चूलिकाभेदका उपभेद १०११२३ रूपसत्य (पा) दश प्रकारके सत्योम-से एक सत्य १०.९९ रूपवर (भी) अन्तिम सोलह द्वीपों- में सातवां द्वीप ५।६२३ रोहितकूट (भौ) ह्मिवत् कुला- चलका सातवां कूट ५.५४ रोहिताकूट (भी) महा हिमवत् कुलाचलका चौथा कूट ५६७१ राजीमती (व्य) भगवान् नेमिनाय का जिसके साथ विवाह होने- वाला या ११११४ रम्या (भी) पूर्वविदेहका एक देश ५१२४७ रम्यक (भी) जम्बूद्वीपके नौल और रक्मिकुलाचलके मध्य- में स्थित पांचवा क्षेत्र ५।१३ रोहिणी (व्य) वमुदेवको स्त्री १२८६ रोहिणी=एक विद्या २७७१३१ रोहित, लोहिताङ्क, (व्य) लवण- समुद्रम उदक और उदवास पर्वतोके निवासी दो देव ५.४६३ गेहितारया (भी) एक महानदी ५।१२३ रोहया (रोहित्) (भी) चौदह महानदियों में एक नदी ५।१२३ स्वती (व्य) अरिष्टपुर निवासी रेवतकी पुत्री बलदेवरी स्त्री ४४४१ रवी (व्य) एक धाय ३३१४४ रवि (व्य) रविपणाचार्य रेवत (व्य) अरिष्टपुरके राजा हिरण्यनाभका बड़ा भाई ४४।४० रमणीया (भी) पूर्वविदेहका एक देश ५।२४७ रम्यकक्ट (भी) नीलडुलाचल का आठवां कूट ५:१०१ रम्यकक्ट (भी) रुक्मिकुलाचल का तीमरा कूट ५।१०२ रम्यका (भी) पूर्वविदेहका एक देश ५।२४७ रम्यपार्वतेय (भी) वि० उ० नगरी २२।९८ रश्मी (व्य) बुण्डिनपुरके राजा भीमरा पुत्र रुक्मिणीका भाई ४२११४ रकमी (व्य) एक राजा ५०७८ रुक्मिणी (व्य) कुण्डिनपुरके राजा भीमको पुत्री कृष्णकी पट्टराज्ञी ४२।३४ रजोबहुल = पापसे युक्त, पक्षमें घूलिसे परिपूर्ण रवतगिरि गिरनार पर्वत ४२१९६ रोचनकूट (भी) मेरसे उत्तर सौता नदोके पूर्व तटपर स्थित एक कूट ५५२०८ रजत, रजतप्रम (भौ) कुण्डल गिरिके दक्षिण दिशासम्बन्धी कूट ५/६९१ रजत (भी) नन्दनवनका एक कूट ५।३२९ रजन (भी) रुचिकगिरिका उत्तर दिशासम्बन्धी कुट ५.७१६ रततकर (भौ) मानुपोत्तरको पश्चिम दिशाका एक कूट ५।६०५ रजक (भी) नन्दनबनका एक बूट हरिवंशपुराणे रघूत्तम (व्य) रामचन्द्रजी लक्ष्मीकूट (भी) शिखरिकुला- ४६॥२२ चलका छठा कूट ५।१०६ रगसेना (व्य) चन्दनवन नगर लक्ष्मीग्राम (भौ) एक ग्राम को एक गणिका २९।२६ ६०१२६ रक्तोदा (भौ) एक महानदी लक्ष्मीमती (व्य) राजा सोमप्रभ- ५११२५ की स्त्री ९।१७९ रक्ताकूट (भौ) शिखरिकुलाबल लक्ष्मीमती (व्य) महापद्म चक्र- का पांचवां कूट ५।१०६ वर्तीकी स्त्री, पद्मको माता २०११४ रत्नगान्धारी = मध्यम ग्राम के आथित जाति १९।१७६ लक्ष्मीमती (व्य) सोमदेवकी स्त्री ब्राह्मणी ६०१२७ रमपञ्चमी = मध्यमग्रामक आधित जाति १९।१७६ लक्ष्मीमती (व्य) युधिष्ठिरकी स्त्री ४७११८ रावती कूट (भौं) शिखरि- लक्ष्मीमती (व्य) रुचिकगिरिके पुलाचलका आठवा कूट ५.१०७ रुचक कूटपर रहनेवाली देवी ५७०९ रमा (भौ) एक महानदी ५।१२५ लघु = शीघ्र ३८०२३ रजनी = षड्जस्वरको मृच्छना लता (पा) चौरासी लाख लताङ्गों- १९६१६१ की एक लता होती है ७१२९ रसवीर्य (य) बन्धक वृष्णिके पूर्वभवास सम्बन्ध रखने लतान (पा) चौरासी लाब ऊहों- याला एक राजा १८।९७ का एक लताङ्ग ७.३० रामशेरय (य) बलदेवका पुत्र लम्धाभिमान (व्य) वज्रवाहका पुत्र १८।३ ४८.६८ लब्धि (पा) योपशम, विशुदि, रंयत (भी) गिरनार पर्वत प्रायोग्य, देशना तथा करण ये पांच लब्धियर्या ३३१४१ रका (भी) पापक्वनके नत्य लब्धि (पा) मानावरण कर्मके में स्थित शिला ५/३४७ योपशममें प्रकट हुई देखने आदिको भावन्द्रिय पदाक्ति सक्षण (पा) मष्टान निमित्तका १८१८५ एकब १०११७ सम्युमा (व्य) चिकमिरिक सक्षपर्या - विद्या २२१६० स्फटिक यूटपर रहने वाली मामपा (प्य) मिनीरक देवो ५।०१५ दलणरोम राजानी पुत्री, एय-तालगत गान्धर्वका एक गणपीएम पट्टराशी प्रकार १९११५१ ४२. ललिता (य्य) भगवान् ऋष- एमी (प्य) शरीर मरोबर में भदेवका पूर्व मत्र ९।५८ पाणी देयी ५११३. RAP (भी) नम प्रभा दिवोके मामीपट (भी) नि. ६. नगगे अतीय नासा इन्टर दिल लव (पा) सात स्तोकोंका एक लव होता है ७१२० लवणार्णव (भी) लवणसमुद्र ५.४३० लागल (भौ) सानत्कुमार युगल- का पांचवा इन्द्रक ६१४८ लागलावर्ता (भी) पश्चिमविदेह- का एक देश ५।२४५ लान्तव (भी) सातवां स्वर्ग ६।३७ लान्तव (भी) लान्तव युगलका दूसरा इग्द्रक ६५० लिक्षा (पा) आठ वालाग्रोको एक लिक्षा ७४० लेण (भी) देवोका उत्पत्तिस्थान ५.४०३ लेश्या (पा) आग्रायणी पूर्वक चतुर्य प्राभूतका योगद्वार १०1८३ लेइया कर्म (पा) आग्रायणी पूर्व के चतुर्थ प्राभूतका योगद्वार १०1८३ टेश्या परिणाम (पा) मामायणी पूर्वके चतुर्थ प्राभूतका योग- द्वार १०1८४ लोक (पा) अनन्त आकाशके मध्यमें स्थित पुरुषाकार १४ राजुप्रमाण आकाश ४ लोक पूरण (पा) लोक पूरण ममुद्घासरा चौथा चरण ५६१७४ लोकयिन्दुमार (पा) पूर्वगन थुनमा एक भेद २।१०. सोफमस्थान-लोरा आगर ११ स्टोकरप (पा) समरसरपर रतूर ५७१९४ मोकाभिनन्दन (पि) जनसमूर दोभानन्दिन परमेषामे न शब्दानुक्रमणिका लोकोरसादन (व्य) विद्यास्त्र वक्रोस्ति (व्य) गन्तिपेण-द्वारा २५४४७ रचित ग्रन्यविशेष लोच (पा) मुनियोंका एक मूल. घल (भौ) देशका नाम ११.६८ गुण-श उसाड़ना वाहर = दूत ५०१४६ २।१२८ वज्र (भी) अनुदिव ६।६३ लोल (भी) शर्कराप्रभा पृथिवी- बन (य) वायुयका पुत्र के नवम प्रस्तारका इन्द्रक १३१२२ बिल ४११३ चन (भौ) सौधर्मयुगलका लोलुप (भौ) शराप्रभा पपिवो पच्चीसवा इन्द्रक ६४७ के दाम प्रस्तारका इन्द्रक वज्र (भी) कुण्डलगिरिका पूर्व विल ११४ दिशासम्बन्धी कूट ५।६९० लोहना (व्य) समुद्रविजयका वन (भी) सौमनस वनका एक दूत ५०५६ भवन ५।३१९ लोहाचार्य (व्य) आचाराङ्गके वन (व्य) अभिनन्दननाथका साता एक आचार्य १६५ प्रथम गणघर ६०1३४८ लोहित (भी) पाण्डुक वनका एक वज्र (व्य) ऋषभदेवका गणघर भवन ५१३२२ १२६७ लोहिताश (भी) सोधर्मयुगलका वन (व्य) एक राजा ५०८१ चोवोसो इन्दक ६।४७ वत्र हीरा २०१० सोहिताश कट (भी)मानुपोत्तरी वनक्कुट (भी) मानुपांतरकी दक्षिण दिशाका एक कूट ऐशान दिशाका एक बूट सोहिसार कूट (भी) गन्धरादन पनपार (भी) वयमय दुराडमें पर्वतका एक यूट ५६२१८ स्थित पर्वतपर बने गृहका लोहिना (भी) रत्नप्रभाक सर द्वार ५।१४० भागाधोया पटल ४.५२ वनकाट्नु - चक्रवर्तीरा रोहिताश्य (भी) रुचिकगिरिका धनुष ११३५ पश्चिम दिशामम्बन्धी सूट ५1०१२ यद्रकट (भी) मानुयौनर पर्वत. मोहिनासमय (भी) मेहको एक की ऐमान दिशाका एरपूर ५।६०१ लागान्त्रिक (व्य) पाचवे वर्गर पत्राट (मौ) नन्दन वनका एक भग्नमें रह-वाने देवविध पजानिक (भी) देवियर [व] (व्य) एक रारा ५०1८४ पनजह (व्य) बनरपरापुर परम (पा) अनिता एक भेर १६॥२१ ६.१५८ यधमर (स्य) पाया पान (भी) रत्नमापियो- मायानगराना परा (स्य)ममा ऋाम. काका ११८ घनाच (व्य) एक मुनि २७.९६ वज्रदंष्ट्र (व्य) वयसेनका पुत्र १३१२२ वज्रदंष्ट्र (व्य) एक विद्याधर २७११२१ वनदंष्ट्र (व्य) वसुदेव और बालचन्द्राका पुत्र ४८०६५ वनधर्म (य) सत्यक्का पुष ४८.४२ वचन (व्य) वचदंष्ट्रका पुत्र १३४२२ वज्रनाम (व्य) जरामन्धका पुत्र ५२१३४ बननामि (व्य) भगवान् रुपम- देवका पूर्वभव ९५९ वन्नपाणि (व्य) बचास्यका पुत्र १३३२३ घनपाणि (व्य) नभस्तिलक मगर. का राजा २५४ पनपुर (भी) राजा अमर के द्वारा बसाया मगर १७१३३ वनप्रम (भी) कुशलगिरिकों पूर्वदिशाका फूट ५१६९७ वनप्रम (भी) सौमनसवन का एक भवन ५१३१९ यवाहु (ध्य) श्यामका पुत्र पाशा (न्य) दिनमिका पुत्र परिधि ५।३०५ पूर ५५९३० पत्रबाहु (व्य) दोबारा पुत्र ૧૮ાર पत्रमानु (श्य) ययामिरापुर यामृत (व्य) मुक्या मापरिधि (ग्य) एम. पसमयपत्र (पा) ममामा पनिमितर५३. बि.

१३५ हरिवंशपुराणे वज्रमय (भी) मेरुको एक परिघि वरसकावती (भी) पूर्वविदेहका ५।३०५ एक देश ५।२४७ वज्रमुख (भौ) पद्मसरोवरका वरसदेश (भी) प्रयागका समोप- वह द्वार जिसमे गङ्गा वर्ती प्रदेश १४१ निकली है ५३१३६ वत्समिया (व्य) दिक्कुमारी देवी वज्रमुखकुण्ड (भौ) पृथिवीपर ५।२२७ स्थित एक कुण्ड जिसमें वरसा (भौ) पूर्वविदेहका एक गङ्गा गिरती है। ५।१४२ देश ५।२४७ वज्रमुष्टि (व्य) एक पुरुष ६०५१ वतंसकूट (भौ) मेरुसे उत्तर वन्त्रमुष्टि (व्य) दृढमुष्टि और सोता नदीके पश्चिम तटपर वप्रधीका पुत्र ३३३१०४ स्थित एक कूट ५।२०८ वज्रायुध (व्य) चक्रायुध और बदर = वेर ७१६९ चित्रमालाका पुत्र (राजा वध (पा) असातावेदनीयका सिंहसेनका जीव) आस्रव ५८१९३ वज्रायुध (व्य) वज्रध्वजका वनक (भी) शर्कराप्रभा पृथिवी पुत्र १३।२२ के चतुर्थप्रस्तारका इन्द्रका वज्रवर (भौ) अन्तिम सोलह दिल ४।१०८ द्वीपोमें नौवां द्वीप ५।६२४ वनमाला (व्य) कौशाम्बीको एक वनवान् (व्य) वज्रभानुका पुत्र स्त्री १४१५१ १३१२३ वनमाल (भौ) सानत्कुमार वज्रसुन्दर (व्य) वज्राङ्कका पुत्र युगलमें दूसरा इन्द्रक ६।४८ १३१२३ वनवास्य (भौ) चरमके द्वारा वज्रमूरि (व्य) एक प्राचीन बसाया हुआ एक नगर आचार्य १२३२ १७।२७ वज्रसेन (व्य) वज्रजवका पुत्र १३१२१ वन्दना - आवर्त तथा शिरोनमि वत्रा (भौ) रत्नप्रभाके खरभाग- आदिको क्रिया करना का दूसरा पटल ४.५२ ३४।१४४ वज्रा (व्य) वज्रबाहुका पुत्र वन्दना (पा) अङ्गबाह्य श्रुतका एक भेद २११०२ १३।२३ वज्राम (व्य) वनभूतका पुन वन्धुमती (व्य) हस्तिनापुरके सेठकी स्त्री ३३३१४१ १३।२३ वनास्य (व्य) वज्रसुन्दरका पुत्र वप्रश्री (व्य) दृढमुष्टिको स्त्री १३३२३ ३३११०३ वटपुर (भो) एक नगर ४३६१६३ वप्रा (भौ) पश्चिम विदेहका एक वढवामुप (भौ) लवणसमुद्रका देश ५।२५१ दक्षिण दिशास्थित पाताल वप्रकावती (भौ) पश्चिम विदेह- का एक देश ५।२५१ वणिज्या = व्यापार १८०९९ वप्रथु (व्य) सुमित्रका पुत्र वत्स (भो) देशविशेप ११७५ १८११९ घर (पा) स्फटिक सालका पूर्व गोपुर ५७१५७ वरकुमार (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५११७ वरदत्स (व्य) नेमिनाथ भगवान्- का प्रथम गणधर ५८ार यरामचरित (व्य) जटासिंह- नन्दोका एक काव्य ग्रन्थ ११३५ वराङ्गना = वेश्या ११३५ वर्चक (भी) रत्नप्रभाके खर भागका पन्द्रहवा पटल ४।५४ वर्चस्क (भौ) पङ्कप्रभा पृथिदीके चतुर्थ प्रस्तारका इन्द्रक विल ४।१३२ चराट (व्य) एक राजा ५०८३ वर्ण-पदगत गान्धर्वकी विधि १९।१४९ वर्ण - शारीरस्वरका भेद १९.१४८ वर्ण (व्य) कौशिका नगरीका राजा ४२१६१ वर्ण वैणस्वरका एक भेद १९/१४७ वर्णाश्रम = ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये चार वर्ण, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासी ये चार आश्रम वरुण (व्य) देवविशेष ( लोक- पाल) ५१३१७ वरुण (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२।३१ वरुण (व्य) ऋषभदेवका गणधर १२०६५ वरुण (व्य) वारणीवर द्वीपका रक्षक देव ५१६४० वरुण (व्य) कसका हितपो एक निमित्तज्ञ ३५।३७ शब्दानुक्रमणिका वरण (व्य) एक मुनि ६४४१२ वर्धमानपुराण = अन्नातकविका परण (पा) स्फटिक सालका एक अन्य ११४१ पश्चिम गोपुर ५७१५९ वराह (भी) वि० उ० नगरी वरण (भी) भरतक्षेत्रसम्बन्धी २२।८७ विजया दक्षिण मागके वराह (व्य) चारुदत्तका मित्र समीपमें स्थित एक पर्वत २७२ वराहक (व्य) वमुदैवका सम्बन्धी घरुणाम (व्य) वारुणीवर द्वीप- एक विद्याधर ५११२ का रक्षक देव ५।६४० वरिष्ट (पा) स्फटिक सालका दक्षिण गोपुर ५७१५८ घरणामिरय (य) जरासन्धका पुत्र ५२।३८ वर्ष (पा) दो अयनका एक वर्ष पर्तना (पा) पट्स्थानपतित होता है ७१२२ बलाहक (भी) राजगृहोका हानि वृद्धिरूप परिणमन एक पर्वत ३१५५ बलाहक (व्य) कृष्ण के सेनापति वरतनु (व्य) दक्षिण लवण. अनावृष्टिके शखका नाम ममुद्रका वासी देव ११११३ ५११२१ घरद (पा) स्फटिक सालका पश्चिम गोपुर ५७६५९ बलाहक (भी) वि० उ० नगरी २२।११ यरदा (मी) एक नदी १७१२३ बलि (व्य) मेघनादको छटो परदत्त (व्य) एक मुनि ६०.१०६ पीढीका एक राजाजी प्रति- परदत्त (व्य) नेमिनापका प्रपम नारायण या २५।३४ गणधर ६०३४९ यलि (य) सुपावनापका पदंल (भी) तम.प्रभा पृथिवोके गणघर ६०१३४७ द्वितीय प्रस्तारका इन्द्रबविल घसि (व्य) छठा प्रतिनारायण ४।१४६ घागु (भी) सौधर्म युगलका घोषा पकि (भी) भरतक्षेत्र कोदाल इन्द्रकः ६४ देशका एक गाव २४४६१ यस्णुप्रमविमान (भी) दुबैर परधर्म (स्य) एक मुनिराज लोकपालरा विमान ५१३२७ यसरी (व्य) एक भीलनी वर्धमान (मी) चिगिरिको उत्तर दिमाश एकपूर वशिष्ट (व्य) स्थरात एक ५५७०२ तापम, जोवादम दाराजगी पधमान (व्य) अन्तिम तोपर जागरजम मनि हो गया महावीर धमान जिनेन्द्र (स्य) मन्तिम दमन (व्य) मनोवंगरावरी मायबर एक विदापर. वरमान जिनगिम (पा) पोटोग. वमन्ममा उग: सीर १०२ वसन्तमुन्दरी (व्य) राजा विग्थ्यसेन और नर्मदाको पुत्री ४५६७० यमन्तमना (व्य) चम्पापुरीको कलिङ्गसना गणिकाको पुत्री २११४१ पसुकीर्ति (य) कुरुवंशका एक राजा ४१।२५ वसुकीर्ति (व्य) कुरवंशका एक राजा ४५।२५ चमुगिरि (व्य) हिमगिरिका पुत्र १५५ यमुगिरि (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२१३३ यमुदय (न्य) गिरितटनगरमें रहनेवाला एक ब्राह्मण २३।२९ वसुदेव (व्य) श्रीकृष्ण के पिता १६७९ यमुदय (व्य) भगवान् ऋषभदेव. का गणधर १२१५८ यसुदेव (व्य) अन्यकरिण और मुमद्रारा पुत्र १८।१४ वयुदेय विरोटिन - कृष्णके पिता- यो विविष चेष्टाएँ १७१ पमधर्म (व्य) एक राजा ५०1१३१ पमुधमा (व्य) कृष्णा पुत्र ४८.३० यमुधारतरलधारा ८३८ यमुधारा रनौरी धारा ঘমুখ (খ) শাখা ঃ ५२४ घमुपज (व्य) जरामारा यमगर (व्य) भगा ऋपान- यमुम्पर (स्य) देवी ५१७१० हरिवंशपुराणे वसुन्धरपुर (भौ) एक नगर वंशालय = विद्याधरोको एक वारिपेण (व्य) राजा श्रेणिकका ४५६७० जाति २६।२१ एक पुत्र २।१३९ वसुन्धरा (व्य) रुचिकगिरिके याग्यलि (व्य)पिप्पलादका मिष्य वारिपेणा (व्य) दिक्कुमारी देवी चन्द्रकूटपर रहनेवाली २११४७ ५।२२७ वाचाट = वकवादी ४३११२ वारुण=विद्यास्त्र २५।४७ वसुमती (व्य) राजा अभिचन्द्र- वाट्वान (भौ) देशका नाम वारुणी मदिरा ६११५१ की स्त्री १७१३७ १११६६ चारणी (व्य) रुचिकमिरिके वसुमान् (व्य) स्तिमितसागरका वाडयान (भौ) देशविशेष काञ्चनकूटपर रहनेवालो पुत्र ४८।४६ देवी ५७१६ वसुमित्र (व्य) भगवान् ऋषभ वाणमुक्त (भी) देशका नाम पाहणी (व्य) मगायण ब्राह्मणको देवक गणधरा १२१६१ पुत्री २७१६२ वमुरथ (व्य) कुम्वशका एक वादी = स्वरप्रयोगका एक प्रकार वारुणीवरद्वीप (भी) चौथा द्वीप राजा ४५।२७ १९१५४ ५.६१४ वसुवृष्टि = रत्नवृष्टि २०१९ वामदेव (व्य ) समुद्रविजयके वारुणीवरसमुद्र (भौ) घोषा वसु (व्य) राजा अभिचन्द्र और भाई अक्षोभ्यका पुत्र ४८१४५ समुद्र ५।६१४ रानी वसुमतीका पुत्र वामदेव (य) सितका पुत्र वाक्षमूलिक = विद्याधरोको एक १७१३७ ४५/४५ जाति २६१२२ वसु (व्य) कुरुवंशका एक राजा वायव्य - विद्यास्त्र २५।४८ वार्णय (व्य) अनावृष्टि नामक ४५।२६ वायु (व्य) जयन्तगिरिका राजा कृष्णका सेनापति ५११४१ वसु (व्य) राजा वसु ११७८ एक विद्याधर ४७१४३ वलि (व्य) उज्जयिनीक राजा वसुसेन (व्य) ऋषभदेवका वायुकुमार = भवनवासी देवीका श्रीधर्माका मन्त्री २०१४ गणधर १२०६१ एक भेद ३१२२ वालाग्र (पा) आठ रथरेणुओका वसुसेन (व्य) राजा वासवका वायुभूति (व्य) वैदिक विद्वान् एक उ० भो० मनुष्यका पुत्र ६०७७ २०६८ वालाग्र होता है ७१३९ वस्तु (पा) श्रुतज्ञानका भेद वायुभूति (व्य) भगवान् महावीर वासव = इन्द्र २१४४ १०११३ का तृतीय गणधर ३।४१ वासव (व्य) जरासन्धका पुत्र वस्तु (पा) श्रुता एक भेद वायुभूति (व्य) सोमदेव और ५२। ३८ २।१०० अग्निलाका पुत्र ४३३१०० वासव(व्य)कुरुवंशका एक राजा वस्तुसमास (पा) श्रुतज्ञानका ४५।२६ वायुवेग (व्य) वसुदेवको गन्धर्व- भेद १०१३ वासव (व्य) अरिष्टपुरका राजा ६०७५ घस्वाद = एक कल्पवृक्ष ७८० ४८।५५ वस्वीक (भौ) वि० उ० नगरी वासव (व्य) राजा वसुका पुत्र वायुवेग (व्य) वसुदेव और वेग- १७/५८ २२१८७ वतीका पुत्र ४८०६० घंशा (भौ) शकंराप्रभाका रूढि वासव (व्य) नमिका पुत्र वायुशर्मा (व्य) भगवान् ऋषभ २२।१०८ नाम ४।४६ देवका गणधर १२२५७ वासवीर्य (पा) स्फटिक सालका वंशारय = दिति देवीके द्वारा वाराणसी (भौ) बनारस ३३।५८ पूर्व गोपुर ५७४५७ प्रदत्त विद्यानिकाय २२२६० वाराणसी(भौ)बनारस १८३११८ वासुकि (व्य) कुण्डलगिरिके महा• घंशालय (भौ) वि० उ० नगरी वाराहग्रीव (व्य) अमितगति निवामी देव २२।९२ विद्याधरका पुत्र २१।१२१ ५।६९२ सेना स्त्रीसे उत्पन्न पुत्र प्रभ कूटका शब्दानुक्रमणिका वामुकि (व्य) जरासन्धका पुन विघ्न (पा) ज्ञाना० और दर्शना० ५२।३७ का आस्रव ५८१९२ वासुकि (व्य) कुरुवंशका एक विचित्र (भौ) नीलकुलाचलको राजा ४५।२६ दक्षिण दिशामें सीता नदी के वासुकि (व्य) घरणका पुत्र पूर्वतटपर स्थित एक कूट ४८१५० ५।१९१ वासुदेव (व्य) श्रीकृष्ण १९९१ विचित्र (व्य) कुरुवंशका एक- राजा ४५।२७ वासुपूज्य (व्य) बारहवें तीर्थकर विचित्रवीर्य (व्य) कुरुत्रशका एक राजा४५।२८ वासुवेग (व्य) जरासन्धका पुत्र विचित्रमति (व्य) चित्रत्रुद्धि ५२।३९ और कमलाका पुत्र २७१९८ वास्तुक्षेत्र प्रमाणातिकम (पा) विचित्रा (व्य) नन्दन वनमे रहने परिग्रहपरिमाणाणु व्रतका वाली दिक्कुमारी ५१३३३ अतिचार ५८११७६ विच्छुरित - व्याप्त १५३१६ वास्य = क्षेत्र १११५८ विजय (भी) वि० उ० नगरी वाह्नीक (भौ) देशविशेष ३५ २२।८६ वाह्रीक (व्य) एक राजा ५०८४ विजय (व्य) अन्धकवृष्णि और वाहिनी = सेना ५०१६६ सुभद्राका पुत्र १८।१३ वाहिनी नदी २०१६ विजय (व्य) नमिका पुत्र २२।१०८ विकचा (व्य) राजा चूलिककी विजय(व्य) द्वितीय जम्बूद्वीप- का रक्षक देव ५।३९७ विकचोत्पला (पा) समवसरणके विजय (पा) समवसरणके स्फ- चम्पक वनकी वापिका टिक शालके पूर्व गोपुरका ५७१३४ विक्रान्त (व्य) एक राजा नाम ५७०५७ विजय (व्य) वमुदेवका पुत्र ५०.१३२ ५०१११५ विक्रान्त (व्य) एक राजा विजय (भौ) अनुत्तर विमान ५०1८५ विक्रान्त (भी) रत्नप्रभा पृथिवीके विजय (व्य) कुवाका एक तेरहवें पटलके इन्द्रक दिल. राजा ४५।१५ का नाम ४।१०१ विजय (व्य) दशपूर्वके ज्ञाता विकृय (अ० क्रि०) विक्रिया- एक आचार्य ११६३ से बनाकर २।३० विजय (भी) जम्बूद्वीपको जगती- का पूर्व द्वार ५।३९. विक्षेप - तालगत गान्धर्वका एक विजय (व्य) विजयद्वारमें रहने- प्रकार १६।१५० वाला एक व्यन्तर ६०१६० विख्यातामृतधार (भौ) वि. विजय (च्य) जयकुमारपा छोटा ६. नगरी २२।१०० भाई १२१३२ विजय (व्य) पहला बलभद्र ६०१२९० विजय (व्य) भगवान् ऋपमदेव- का गणधर १२।६० विजया (पा) समवसरणके सप्त पर्णको वापिका ५७१३३ विजया (व्य) रुचिकगिरिक रत्नकूटपर रहनेवाली देवी ५७२५ विजया (भी) विदेहकी एक नगरी ५।२६३ विजया (व्य) अपराजितकी स्त्री ६०११०५ विजया (व्य) रुचिकगिरिक वैडूर्य कूटपर रहनेवाली दिवकुमारी देवो ५७०५ विजया (भौ) नन्दोश्वर द्वीपके दक्षिणदिशासम्बन्धी अजन- गिरिकी पूर्व दिशामें स्थित वापिका ५१६६० विजया (व्य) सहदेवकी स्त्री ४७११८ विजयखेट (भी) एक नगर १९१५३ विजयगुप्त (ख्य) भगवान् ऋषभ- देवका गणधर १२।६० विजयपर्वत (न्य) भरत चक्र- वर्तीका हाथी १११२५ विजयपुर (भौ) संख्येय द्वीपोके बाद दूसरे जम्बूद्वौपके रक्षक विजयदेवका निवास नगर ५६३९७ विजयमित्र (व्य) भगवान् वपम. देवका गणधर १२१६० विजयपुर (भी) जम्बूद्वीप ऐरा. वनक्षेत्रका एक नगर ६०४८ विजयश्री (व्य) भगवान् वृषभ- देवका गणधर १२१६१ स्त्री ४६।२६ विण = निर्दय ३५।३१ पचमः सर्गः ७ सहसद्वितयं तेषां द्विशती च प्रयोदश । योजनाएमभागोना सा पूर्वापरविस्तृतिः ॥२५३।। नदीविस्तारहीनस्य विदेहस्याधविस्तृतिः । मायामो देशवक्षारविमा मरितामसी ॥२५४।। तद्देशविस्तरायामास्तन्मध्ये रजतादयः । द्वात्रिंशद्धारतेनामा समाना नवकूटकाः ।।२५५।। श्रेण्योः स्युनगराण्येषां पापञ्चाशदेकशः । विद्याधराः वसन्त्येषु परे द्वीपढये यया ॥२५६।। क्षेमा क्षेमपुरी ख्याता रिटा रिष्टपुरी परा । बढ्गा मञ्जूपया साईमौषयों पुण्डरीकिणी ॥२५७।। कच्छादिषु अथासंध्यमष्टास्वष्टाविमाः पुरः । राजधान्यः समादिष्टाः शलाकापुरुषोद्भवाः ।।२५८॥ सुमीमा कुण्डलाभिरया पुरी चान्या पराजिता । प्रमहरा धतुर्थी तु 'पञ्चम्यशवतीरिता ॥२५६।। पद्मावती शुभाभिग्या साष्टमी रस्मसचया । राजधान्यस्त्रिमा मान्या वरसादिषु यथाक्रमम् ।।२६०।। तथैवाश्वपुरी ज्ञेया परा सिंहपुरीति च । महापुरी तान्या विजया च पुरी पुनः ॥२६॥ भरजा विरजा वासावशोका वीतशोकया । राजधान्यः प्रसिद्धास्ताः पद्मादिषु यथाक्रमम् ॥२२॥ विजया वैजयन्ती च जयन्ती चाऽपराजिता । चका सगा च वादिषयोध्यावध्यया समम् ॥२६३।। दक्षिणोत्तरतो देयात् पुर्या द्वादशयोजना: 1 नवयोजन विस्तारा हेमप्राकारतोरणाः ॥२६॥ भः पञ्चशतैरहनिम्ताः सहस्रकैः । रत्नचित्रपाटावेदः सप्तशतैयुनाः ॥२६५।। द्वादश स्युः सहस्राणि रथ्यानां तु यथाययम् । सहस्रं तु चतुष्काणां नगरीप्वच्यामसु ।।२६९।। चक्रवर्तियोंका निवास रहता है ।।२५१-२५२॥ इन सबका पूर्वापर विस्तार योजनके आठ भागाम- से एक भाग कम दो हजार दो सौ तेरह योजन है ॥२५३॥ समस्त विदह क्षेत्रके विस्तारमंसे नदीका विस्तार घटा देनेपर जो शेप रहे उसका आधा भाग किया जाय । यही देश, वक्षारगिरि और विभंगा नदियोंकी लम्बाई है । भावार्थ -समस्त विदेह क्षेत्रका विस्तार तैतीस हजार यह सो चौरासी योजन चार कला है उसमें सीता नदीका पाँच सौ योजनका विस्तार घटा देनेपर तैतीस हजार एक सौ चौगसी योजन चार कलाका विस्तार शेष रहता है । इसका आधा करनेपर सोलह हजार पाँच सौ यानये योजन दो कला क्षेत्र वचता है। यही कच्छा आदि देश वक्षार गिरि और विभंगा नदियोंकी लम्बाईका है ।।२५४॥ इन बत्तीस विदेहोंमें वत्तीम विजया पर्वत हैं। इनकी लम्बाई कन्यादि देशोंकी चौड़ाई के समान है अर्थात ये कुलाचलसे लेकर नदीतक लम्बे हैं। प्रत्येक विजयापर नौ-नौ कूट हैं और इन सबका वर्णन भग्त क्षेत्रके विजयाके समान है ॥५५॥ इन विजयाों को दो-दो श्रेणियों हैं प्रत्येक श्रेणीमें पचपन-पचपन नगर हैं और उन नगगेमें भरत तथा ऐगवत क्षेत्रके समान विद्याधर निवास करते हैं ।।२५६॥ १ क्षेमा, २ क्षेमपुरी, ३ रिष्टा, ४ रिटपुरी, ५ पगा, ६ मञ्जूषा, ७ औषधी और = पुण्डरीकिणी ये आठ नगरियाँ कमसे कच्छा आदि देशोंकी राजधानियों कही गई है। इनमें शलाका पुरुषोंकी उत्पत्ति होनी है ।।२५४-२५८।। १ मुमीमा, २ कुण्डला, ३ अपराजिता, ४ प्रभंकग, ५ भदायती, ६ पद्मावनी, ७ शुभा और ग्लसचया ये आठ क्रमसे बत्मा आदि देशोंकी राजधानियों जानना चाहिए ।।५-२६०n १ अरवपुगे, २ सिंहपुरी, ३ महापुरी, ४ विजयापुरी, अजा, ६ विरजा, ७ अशोका और वीतशोका ये आठ नगरियाँ कमसे पद्मा आदि देशांकी राजधानिया प्रसिद्ध है ॥६१-०६॥ १ विजया, २ धैजयन्ती, ३ जयन्ती, ४ अपगजिता, ५ चमा, ६ मगा, ७ अयोध्या और ८ अवध्या ये आठ यप्रा आदि देशांकी गजधानियों हैं। ये सभी नगरियों दत्तिणोत्तर दिशामें पारह योजन लम्पी है, पूर्व-पश्चिममें नो योजन चौड़ी हैं, सुवर्णमयो फोट और तोरणोंमे युक्त है। रत्नमयों चित्र विचित्र किंवाड़ाय युक्त पाच मी छोटे और एक हजार यहे दरयाजों नया मान मी मगेगांमे महित ६ ॥२१३-२६१। इन अविनाशी नगरियाम यारह हजार गलियाँ भीर एक हजार चौक है ॥२६॥ १ पदम्पतीमा। २ पराम। याः।

सन्दानुक्रमणिका विमल (पा) स्फटिकसालका पूर्व गोपुर ५७१५७ विमल (भी) वि. उ. नगरो २२।९० विमल (व्य) समुद्रविजयका मन्त्री ५०४९ विमल (भी) चिकगिरिका पूर्व- दिशासम्बन्धी एक विशिष्ट फूट ५१७१९ विद्युय्प्रभा (व्य) वज्रदंष्ट्रकी स्त्री विनय = शिष्य २०१०३ २७/१२१ विन्दुसार (व्य) वप्रयुका पुत्र विधुदाम (य) विद्युत्वान्का १८१२० पुत्र १३।२४ विन्ध्य (भौ) दूसरो पृथिवी- विद्यानुवाद (पा) पूर्वगत श्रुतका सम्बन्धी प्रथम प्रस्वारके एक भेद २।९९ इन्द्रक विलकी दक्षिण दिशा- विद्युन्मुख (व्य) वचवान्का पुत्र में स्थिर महा भयानक नरक १३।२४ ४।१५३ विद्युन्मति (व्य) विद्युद्वेगको विन्ध्यसन (व्य) वसुन्धरपुरका स्त्री ६०1८९ राजा ४५६७० विद्युत्वान् (व्य) विद्युदंष्ट्रका विपञ्ची -वीणा १९७७ पुत्र १३१२४ विपश्चित् =विद्वान् २२।१०९ विद्युन्माली (व्य) जरासन्धका विपाकविचय (पा) धम्यध्यान- का एक भेद ५६४५ पुत्र ५२।३५ विद्रावण (व्य) रावणका पुत्र विपाकसूत्राश (पा) द्वादशाङ्ग- ४५.४७ का एक भेद २२९४ विदुत - भाग गयों ५११४२ विपुल (व्य) आगामी तीर्थकर विदुम (व्य) वलदेवका पुत्र विपुल (भौ) राजगहोको एक ४८.६७ बिनमि (व्य) भगवान् वपभ- पहाड़ोका नाम ३१५४ देबके सालेका पुत्र ९।१२८ विपुलबुद्धि-विपुलमति मन.- पर्ययज्ञानी ३१४८ विनमि (व्य) ऋषभदेवका गण- विपुलमति (पा) मन पर्ययज्ञान- घर १२१६८ विनयदत्त (व्य) एक मुनि का एक भेद १०११५३ विपुलवाहन (व्य) सातवा विनयधी (य)अपराजितको कुलकर ७९५६ पुत्री ६०।१०५ विपृथु (व्य) एक राजा ५०११२६ विनयश्री (स्य) रुद्रदत्तकी स्त्री विप्रकृष्ट-दूरवी ११५४ ६०१८७ विमनिः= पदगत गान्धर्वशी विनयमम्पलता -भादना विधि १९१४९ ३४११३ विभीषण (व्य) नारायण (रला. विनया (व्य) सुराष्ट्र देशको युधरा जीव) २७११२ अआयुरी नगरीके राजा विभु (व्य) प्रमुरा पुत्र १६।११ राष्ट्रवपनको स्त्री २६ বিয়াল (দী) লেগ विनिहाय (भी) देशका नाम पपिवीके प्रस्तारका इन्द्रक १९७४ बिल 10 निीत (व्य) ऋषमदेवरा गग- रिमल (भा) रचिय मिरिका पर १२१६३ दक्षिण दिशामम्वन्धी पर पिनीता (मो) अयोध्या ११५६ ५1.8 विमल (भी) सौधर्म युगलका दूसरा इन्द्र कपटल ५६४ विमल (व्य) तेरहवें तीयंकर १.१५ विमलप्रम (व्य) परिवरसमुद्र- के रक्षक देव ५।६४२ विमल फूट (भी) सौमनस्म पर्वत- वा एक कूट ५२२१ विमानपमियत -एक प्रत. विशेप ३४१८६ विमलवाहन (व्य) आगामी चक्रवर्ती ६०१५६५ विमलवाहन (व्य) विदेहके एक तीर्थकर ३४१८ बिमलमंश (व्य) आगामी तीर्थ- कर ६०१५६२ विमलममा (व्य) विशनपुरके राजा प्रचण्डवाहनको स्त्री ४५१९६ विमली (व्य) श्रीधर और श्रीमतीवी पुत्री ६०११७ विमला (व्य) ज्वलनवावी म्त्री १९८३ विमदन (भी) पाचवों पृथियों के प्रथम प्रस्वारमानन्धी तम. इन्द्ररी दक्षिण दिशा में पिन महानरक४१५६ विमानमवैराग्य - प्राविप विमुनि मोर १५ विरजा (मौ) विदेसी एप नगरी हरिवंशपुराणे वीर (भी) सौधर्म युगलका पांचवां इन्द्रक ६४४ वीरसेन (व्य) वटपुरका राजा विजयश्रुति (व्य) ऋपमदेवका विदुर (व्य) राजा धृतराष्ट्रकी गणधर १२०६६ अम्बा नामक स्त्रीसे उत्पन्न विजयसेना (य) एक कन्या जो पुत्र ४५१३४ वसुदेवकी स्त्री हुई १८० विदूरथ (व्य) वसुदेव और विजयसेना (य) सुग्रीव गन्धर्वा रोहिणीका पुत्र ४८०६४ चार्यकी पुत्री १९।५५ विदूरथ (व्य) एक राजा ५०८१ विजयसेना (व्य) अमितगति विदेह (भी) देशविशेष १११७५ विद्याधरकी स्त्री २०१२० विदेह (भी) देशविशेष १११७५ विजयाङ्गण (पा) समवसरणी विदेहकूट (भौ) निपधाचलका एक भूमि ५७५२४ आठवां कूट ५६८९ विजयावत् (भौ) हरिक्षेत्रके विदेह (भी) जम्बूद्वीपके निषय मध्यमे स्थित एक गोलाकार और नोल कुलाचलके मध्य में पर्वत ५।१६१ स्थित चौथा क्षेत्र ५।१३ विजयावान् (भी) पश्चिम विदेह. विपाकजानिर्जरा (पा) निर्जराका का वक्षारगिरि ५।२३० भेद ५८।२९४ विजयापुरी (भौ) विदेहको एक विरुद्धराज्यातिक्रम (पा) अचौर्या- नगरी ५।२६१ णुव्रतका अतिचार ५८११७१ विजयाई (भी) विद्याधरीका वीचि- तरङ्ग ११४४ निवासभूत एक पर्वत, जो ९ वीतमय (व्य) बलभद्र (रत्नमाला- कि भरत, ऐरावत और का जीव) २७१११२ प्रत्येक विदेहक्षेत्रमे होता वीतमय (भी) सिन्धु देशका एक है । कुल १७० विजया नगर ४४।३३ पर्वत है । ५।२० वीतमी (व्य) अविध्वंसका पुत्र विजयार्धकुमार (भी) विजयाघ १३।११ का पांचवां कूट ५।२७ वीतशोका (भौ) विदेहकी एक विजयाधकुमार कृट (भौ) ऐरा. नगरी २७५ बतक विजयाका पांचवा वीर (भौ) वि० उ० नगरी कूट ५।१११ २२।८८ विजयार्द्धकुमार (व्य) विजया घोर (व्य) अन्तिम तीर्थकर महा- गिरिका वासा देव ११११९ चोर २०४७ विटीजस् = इन्द्र ११।१३५ वीरक (व्य) कौशाम्बीवासी एक वितता (भो) एक नदी १११७९ पुरष-वनमालाका पति वितस्ति (पा) दो पादोको एक १४॥६१ वितस्ति ७.४५ वीरमदगुरु (व्य) एक जैनमुनि विदग्ध%Dचतुर २०१८ ३३०५९ विदर्म (भी) एक देश आधुनिक घोर (व्य) वसुदेववा पुत्र नाम वरार १७२३ ५०११५ विदारणक्रिया (पा) एक क्रिया पीर (व्य) स्तिमितमागरका पुत्र ५८७६ ४८४६ वीरसेनगुरु (व्य) पट्खण्डागमके टोकाकार वीरसेनाचार्य ११३९ वीर्य (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५।२७ वीयंपुर (भी) यादयोको निवास- भूमिका एक नगर ४११४४ वीराख्य (व्य) जरागन्धका पुत्र ५२।३३ वीर्यप्रवादपूर्व (पा) पूर्वगत श्रुत- का एक भेद २।९८ विद्युत्कुमार भवनवासी देवीका एक भेद ४।६४ विद्युदंष्ट्र (व्य) विद्याधर वजदंष्ट्र और विद्युत्प्रभाका पुत्र २७४१२१ विद्युदंष्ट्र (व्य) सुवक्त्रका पुत्र १३।२४ विद्युदंष्ट्र (व्य) गगनवल्लभ नगरका विद्याधर २७१। विद्युद्वेग (व्य) विद्युद्दासका पुत्र १३।२४ विद्वेग (व्य) वसुदेवका श्वसुर ( मदनवेगाका पिता) २५।३७ विद्यरत्रम (भौ) मेरुमै दक्षिण पश्चिम कोणमें स्थित एक स्वर्गभय पर्वत ५।२१२ विद्युत्प्रम (व्य) हिमवत्का पुत्र ४८.४७ विद्युत्प्रमकूट (भौ) विद्युत्प्रम- पर्वतका एक बूट ५२२२ विद्युत्प्रम (भी) वि० उ० नगरी २२१९० शब्दानुक्रमणिका वेगवती (भौ) एक नदी ४६१४९ वैजयन्त (भी) जम्बूद्वीपको वेगवान् (व्य) वसुदेव और वैग जगतीका दक्षिण-द्वार वतीका पुत्र ४८।६० ५.३९० वेणु (व्य) मानुपोत्तरके पूर्वदक्षिण वैजयन्त (भौ) वि० उ० नगरी कोणमें स्थित रत्नकूटपर २२१८६ रहनेवाला देव ५।६०७ वैजयन्त (व्य) वीतशोका नगरी- वेणु (भौ) वि० उ० नगरी का राजा २७१५ २२।८९ वैजयन्त (भौ) अनुत्तर विमति घेणु (व्य) शाल्मली वृक्षपर रहने. वाला देव ५१९० बंजयन्त (पा) स्फटिकसालका वेणुदारी (व्य) एक राजा ५०1८५ दक्षिण गोपुर ५७१५८ वेणुदारी (व्य) जरासन्धका पुत्र वैजयन्ती (भौ) विजयाको एक ५२।३९ नगरी ३०१३३ वेणुदारी (व्य) मानुपोत्तरके सर्व वैजयन्ती (पा) समवसरणके रलकूटका निवासी देव सप्तपर्ण वनको वापिका ५७१३३ वेणुदारिन् (व्य) नाल्मली वृक्ष- वैजयन्ती (भी) विदेहको एक पर रहनेवाला देव ५।१९० नगरी ५।२६३ वेद = ऋवेद, यजुर्वेद, सामवेद, वैजयन्ती (भी) नन्दीश्वर द्वोपके दक्षिण दिशासम्बन्धी वेदन (भी) तीसरी पृथिवीके अजनगिरिको दक्षिण दिशा- प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी तप्त सम्बन्धी वापिका ५/६६० नामक इन्द्रक विलकी दक्षिण बैजयन्ती (व्य) रुचिकगिरिक दिगामें स्थित महानरक काञ्चनकूटपर रहनेवाली ४११५४ दिक्कुमारी देवी ५१७०५ वेदना (पा) आग्रायणी पूर्वके वैजयन्ती (व्य) रुचिकगिरिके चतुर्य प्रामृतका योगद्वार रत्नप्रभ कूटपर रहनेवाली २०१८२ देवी ५।७२५ वेदमामपुर (भी) एक नगर जहाँ बड्यं (भी) रलप्रमाके परभाग- वसुदेव गये २४।२५ का तीसरा पटल ४४५२ वैसम्बकूट (भी) मानुषोत्तर बंड्यं नील रंगरा मणि दक्षिण-पश्चिम वोणमें २०१० निषधाचलसे लगा एक सूट वैद्यं (भी) रुचिरगिरिका ऐगान दिशासम्बन्धी फूट ५।७२२ कुण्ठ (व्य) श्रीकृष्ण ५०।९२ बंड्यं (मी) सौपर्म पुगता चौदहवा इन्द्रक ६५ बइयंट (भौ) महाहिमवत् मंगारि (य) एक विद्याधर राजा दुलाचा वाटा यूट ५७२ बैडूर्यफूट ( भो ) रुचिकगिरिका पूर्व दिशासम्बन्धी एक कूट ५७०५ वैड्यंकूट (भी) मानुषोत्तर पर्वत- की पूर्व दिशाका एक कूट ५।६०२ वैदूर्यप्रम (भी) सहस्रार स्वर्गका एक विमान २७१७४ वैडूर्यमय (भी) मेरुको एक परिधि ५.३०५ वैडूर्यवर (भी) अन्तिम सोलह द्वीपोमें दसवा द्वीप ५।६२४ वैण-स्वरकाएक भेद १९:१४६ वैताट्य (भौ) विजयाधका दूसरा नाम ५२५८८ वैतात्य पर्वत (भी) विजयागिरि ४२११७ वैदर्भ (व्य) पुष्पदन्तका प्रथम गणधर ६०१३४७ चैदर्म (भी) देशका नाम १११६९ बंदी (व्य) रुक्मिणीके भाई रुक्मीकी पुत्री ४८.११ चैदग्ध्य - चतुराई १९६८ बंदिश (भी) देशविदोष ११७४ वैदिशपुर (भौ) एक मार ४५1१०७ बंद्युत (व्य) विद्युद्वेगवा पुत्र १३१२४ बनयिक (पा) अन्न वाहतका एक भेद २११०३ मार (भी) राजगृहीकी एक पहाडीरा नाम 1५४ वैयााय = वयायन्य नामका तर. सेवा (दुर्गम्यो प्यावृत्तिः प्रयोजनं पाय) ९८४१३९ याय - भावना ३४१४० घर (व्य) ऋपमदेवा गणपर १२६५ बरोधन (भी) अन्तिा ६६३ अथर्ववेद ११८३ पंकिर - विक्रियाटिके धारक पुष ४८।५६ हरिवंशपुराणे विरागविचय (पा) धय॑ध्यानका विश्यक (पा) स्फटिकमालका एक भेद ५६१४६ पूर्वगोपुर ५७५७ विराट (व्य) विराटनगरका विश्वभूति (व्य) राजा सगरका राजा ४६१२३ पुरोहित २३६५६ विराट नगर (भी) एक नगर विश्वसन (व्य) भगवान् शान्ति- ४६१२३ नायके पिता ४५६१८ विवर्द्धनकुमार (व्य) भरत- विश्वसेन(व्य) एक राजा ६०५८ चक्रवर्तीके ९२३ पुत्रो में से विश्वरूप (व्य) धरणका पुत्र एक पुत्र, जो अनादि मिय्या- ४८१५० दृष्टि थे १२६३ विश्वावसु (व्य) राजा वसुका विवादी - स्वरप्रयोगका एक पुत्र १७१५९ प्रकार १९१५४ विश्रुत (पा) समवसरणके स्फा. विबुध - देव २०४२ टिक सालके पूर्व गोपुरका विशल्यकारिणी - एक विद्या नाम ५६५७ २२१७१ विषद (व्य) उग्रसेनके चाचा विशल्यकरण -विद्यास्त्र २५।४९ शान्तनका पुत्र ४८।४० विशरारुता विषय= देश २।१४९ भगुरता अनित्यता विष्टप = लोक ३३३५ १६.३२ विशाखगणी (व्य) मुनि सुव्रत. विष्टरश्रयम् (व्य) कृष्ण ५४०४९ विष्णु (व्य) श्रीकृष्ण १९९८ नायका गणधर १६१६८ विशालाक्ष (व्य) कुण्डलगिरिके विष्णु (न्य) एक श्रुतकेवली आचार्य श६१ स्फटिकप्रभकूटका निवासी देव ५।६९४ विष्णु (व्य) एक राजा५०।१३० विशाख (व्य) दशपूर्वके ज्ञाता विष्णु (व्य) महापद्म चक्रवर्तीका एक आचार्य ११६२ पुन, जो कि मुनि होनेपर विक्रिया ऋद्धिका धारक विशाख (व्य) मल्लिनाथका प्रथम गणधर हुआ ४५।२४ विशिष्टक फूट (भौ) सौमनस्य विष्णुसञ्जय (व्य) कृष्णका पुत्र पर्वतपर स्थित एक क्रूट ४८१६९ ५२२१ विष्णुस्वामी (व्य) जरासन्धका विशेषत्रयवादिन् = विशेषत्रयके पुत्र ५२१३९ रचयिता १३७ विष्वक्सेन (व्य) जम्बूपुरके राजा विश्व समस्त २१९० जाम्बवका पुत्र ४४१५ विश्व (व्य) कुरुवंशका एक राजा वृक्षमूल = दितिदेवीके द्वारा ४५।१७ प्रदत्त विद्यानिकाय २२॥६० विश्वा (व्य) राजा प्रचण्डवाहन वृत्तरथ (व्य)कुरुवंशका एक राजा की पुत्री ४५।९८ ४५१२८ विश्वजनीन- सबका हित करने. वृत्त - पदगत गान्धर्वकी विधि वाले ३९।४ १९५१४९ वृत्तरतास्य (भो) नाभिगिरिपर्वत ५।५८८ वृत्ति- वणस्वरका एक भेद १९/१४७ कार्यक (भी) देगविशेष ३।४ वृकोदर (व्य) भीमसेन पाण्डव ५४।६६ वृत्त-गोल ३५५ वृन्दावन (भौ) मथुराके समीप- वर्ती एक उपनगर ३५।२८ वृपम (व्य) प्रथम तीर्थकर ३५ वृदार्थ (व्य) वसुदेवकी स्त्री पपावतीका वृषानन्त (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५।२८ वृषभध्वज (व्य) वीतभोका पुत्र १३।११ धृपमध्वज (व्य) उज्जयिनीका राजा ३३११०३ वृषध्वज (व्य) वैदिशपुरका राजा ४५।१०७ पमदत्त (व्य) कुशाग्रपुरनिवासी एक पुरुष मुनि, सुव्रतनाथको प्रथम आहार देनेवाला १६०५९ वृषमपर्वत (भी) चौतीस वृपभा. चल, भरत और ऐरावतम एक-एक तथा ਬਚੀ विदेहोम बत्तीस ५१२८. वृषमसेन (व्य) भगवान् वृषभ- देवका गणधर १२१५५ वृषमसेन (व्य) भगवान ऋषभ. देवके पुत्र ९।२३ वृषध्वज (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५/२८ वृष्णिपुन (व्य) अन्धकवृष्णिके दश पुत्र ११७८ वेगवती (व्य) वसुदेवकी एक विद्याधर स्त्री २६१३३ . शब्दानुक्रमणिका शत्रुमन (व्य) भगवान् ऋपम सम्मव (व्य) तृतीय तीर्थकर शान्ति (व्य) सोलहवें तीर्थकर देवा गणधर १२१५५ पञ्चम चक्रवर्ती ४५१८ वायुञ्जय (ध्य) विनामिका पुत्र शम्भु (च्य) नतीय तीर्थकर ११५ शान्ति (व्य) पञ्चम चत्र २२११०४ शम्यावाट - तालगत गारवा सालय (व्य) एक राजा एक प्रकार १९।१५० शान्ति (व्य) मोलहवें तीर्थकर ११८ ५०११३१ वात्य (व्य) एक राजा ५०७९ शत्रुभयगिरि (भो) पालोनायक सातबलि (ध्य) एक विद्याधर शान्तिचन्द्र (व्य) कुरुवंशका एकराजा ४५.९९ समीपवर्ती पर्वत ६५।१८ ६०१८ सञ्जय (ल्य) एक राजा ३१३९४ शाशरोमन् (व्य) दुर्योधनका एक शान्निमद्र (व्य) कुरवंशका एक राजा ४५.३० मित्र ४५१४१ शमुझय (मी) वि. ३० नगरी शान्तिवर्धन (स्य) दुरदंगका शताद (भी) वि. द. नगरी २२१८६ एक राजा ४५११९ २२।९५ युदमन (व्य) एक राजा शान्तिर्पण (व्य) पुर्वगना एक शाक (व्य) अभिचन्द्ररा पत्र राजा ४५/३० ५०११२४ ४८०५२ शत्रुमेन (व्य) जरत्कुमारी গাষ্ট (গ) বগিসমৰা सन्ततिका एक पुत्र ६६३५ शाहा (व्य) कुश्वारा एक मन्त्री ५०१४९ राजा ४५.१९ नाल (व्य) राजा मूलमा पुष दान्तनु (व्य) पुरुवंशका एक राजा १७३२ शशिप्रम (व्य) जरासन्धका पुत्र बालगुहा (भी) एक नगरी जही ५२२३९ गन्ननु (व्य) बलदेवका पुत्र शशिप्रम (भी) वि० स० नगरी वसुदेव गये २४०२९ ४८.६७ सारिग्राम (मी) मगपदेशा २।९१ सन्तनु (व्य) ए. राजा एक गांव ४३०९९ शिप्रम (व्य) वमुदेव और सोम- शालिग्राम (भी) दमुदेवकै भषा- ५०.१२५ सद (पा) एक नय ५८४१ इतको पुत्रीका पुत्र ४८०६० न्तरमे सम्माय रखनेवाला दासी (व्य) रवित जम्मा पुत्र एप ग्राम १८१२७ सदानुपात (पा) देशका अविचार ५८११७८ भारि माम (भी) एक गांवा भार (व्य) पुरुशा एक राजा शाशी (व्य) अभिपन्द्रा पुत्र नाम ६०६२ सामनी राणा (भी) एक दाम ४५।२९ शाद्वीप (व्य) दुवंशका एक शाक (व्य) नेमिनापरे गदरा राजा ४५३. नाम ५११२० पास्मती स्थल (भी) मैरकी पारधि-तररा ११ साई (व्य) धोरण ५५।६१ नैऋत्य दिशाम सीतोदा गरामन (व्य) सरवणापुर शा=ष्णाएक नाम ५११४ मी मरे हरर निपा- भातकुम्ममय (यि) स्वनिर्मित पर समीर पि. २४२ शाजापुत्री ३५३. विप,जो शामली गातागवानर २७१५६ का है ५५१८० गामा (भी) नरपो दूसरी शारदी (वि) परदऋतुमादम्पिनी शामत (पा) = 3, गिल १ दक्षिी २१७८ Fधाम (पा) निमे मनिता गम् -मुग १५ शारीर-राम ओलिगाम बार गम (व्य)मा और, से -गामारपोरmir-Prer भाम, मोगरोह पार उपनमा ४२॥२१८ पान (य) गागिमामा माय (ध्य)हर रारा ५.८९ हरिवंशपुराणे वैशाखस्थान - बराबरीपर पांव प्रतधर्मा (व्य) कुरुवंशका एक फैलाकर खडे होना ४८ राजा ४५।२९ वैष्णव -विद्यास्त्र २५१४७ व्याख्थामज्ञप्ति (पा) परिकर्म- वैश्रवण (भौ) पूर्वविदेहका श्रुतका भेद १०६२ वक्षारगिरि ५।२२९ ज्यास्याप्रज्ञप्ति अङ्ग (पा) द्वाद- चैश्रवण (व्य) कुबेर ६१११८ शाङ्गका एक भेद ११९३ वैश्रवणकूट (भौ) ऐरावतके विज व्यवहार (पा) एक नद याका नौवो कूट ५।११२ ५८.४१ वैश्रणकूट ( भौ) हिमवत् कुला व्रत्यनुरागिवा (पा) सातावैद. चलका ग्यारहवां कूट ५।५५ नीयका आस्रव ५८।९४ वैश्वकेतु (व्य) कुरुवंशका एक मात (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५।१७ राजा ४५.११ वैश्वानर (व्य) कुरुवशका एक मात% समूह १२२८० राजा ४५।१७ व्यास-विस्तार ४१२४ व्यय (पा)- पूर्वपर्यायका नाश वेदनीय (पा) सुख-दुःषका अनु। भव करानवाला एक कर्म भ्यजन (पा) शब्द ५६।६२ ५८।२१६ व्यञ्जन (पा) अष्टाङ्ग निमित्त चैनयिक (पा) मिथ्यात्वका एक ज्ञानका एक अग १०१११७ भेद ५८।१९४ व्यन्तर = किन्नर, किम्पुरुष आदि [श] व्यन्तर देव ३।१३५ व्यन्तर देव - किन्नर, किम्पुरुष, शकट (भौ) भरतक्षेत्रका एक गन्धर्व आदि देवोका एक देश २७.२० शकुनि (व्य) एक राजा ५०1८४ समूह २।८० व्यवहारपल्य (पा) कालका एक शकुनि (व्य) दुर्योधनका मन्त्री परिमाण ७१४७-४९ व्यसुमत ३५.५ शकटामुस (भौ) वि. उ. नगरी व्युच्छिन्न (वि) विच्छेदको प्राप्त २२१९३ हुए ११३ शक्रन्दमन (व्य) बलदेवका पुत्र व्योमचर-विद्यात निसायका ४८/६६ नामान्तर २०५८ शक्तितस्तप =भावना ३४११३८ प्रणसंरोहिणी एक विद्या शक्तितस्याग = भावना ३४।१३७ २२१७१ शकुक -अदिति देवीके द्वारा दत्त घ्रणमरोहण - विद्यास्त्र २५।४९ विद्याओंका एक निकाय व्रत (पा) हिंमादि पांच पापका २०५८ परित्याग १ अहिंसा, २ सत्य, शड्स (व्य) कृष्णका पुत्र ४८७१ ३ अचोयं, ४ ब्रह्मचर्य और शङ्ख (व्य) बन्धुमतीका पुत्र ५ अपरिग्रह ५६।१ ३३३१४१ पतधर (व्य) एक मुनिराज शड्ड (पा) चक्रवर्तीकी एक निधि ४९.१४ ११।११० सख (व्य) नमसेनका पुत्र १७५३५ शङ्जनाभ (भी) वि०६० नगरी २२१९६ रामवर द्वीप (भो) बारहवाँ द्वीप ५६१८ शश, महाराज (मी) लवणः समुद्र में पश्चिम दिशाके वहवामुख पातालको दोनों ओर स्थित दो पर्वत ५।४६२ रायर सागर (भौ) बारहवा सागर ५।६१८ शहा (भौ) पूर्वविदेहका एक देश ५१२४९ शतज्यलकूट (भौ) विद्युत्प्रभपर्वत- का एक कूट ५।२२२ शतद्रुत (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२२३५ शतधनु (व्य) देवगर्भका पुत्र १८१२० शतधनु (व्य) बलदेवका पुत्र ४८१६८ शतधनु (व्य) एक राजा ५०११२६ शतानीक (व्य) जरामन्धका पुत्र ५२१३८ शतानीक (व्य) विनमिका पुत्र २२।१०५ शतपति (व्य) निहतशत्रुका पुत्र १८।२१ शतपर्वा - एक विद्या २२।६७ शतमख - इन्द्र १६११८ शतमुख (व्य) घरणका पुत्र ४८/५० शतार (भी) ग्यारहवाँ स्वर्ग ६३७ गातारक (भी) सहस्रार स्वर्गका इन्द्रक ६५० शत्रुध्न (व्य) देवकीका पुत्र ३३११७० शन्दानुक्रमणिका १४५ जाति २६११९ श्यामलहाया (व्य) वसुदेवकी श्रीकान्ता (व्य) अरिएपुरके स्त्री श्यामाको दासी राजा हिरण्यनाभको स्त्री १९।११२ ४४३७ श्यामक (भौ) अन्तिम सोलह श्रीकान्ता (व्य) अशोक और द्वीपोमें चौया द्वीप ५।६२३ श्रीमतीकी पुत्री ६०/६९ इलक्ष्णरोम (व्य) सिंहलका राजा श्रीकान्ता (भौ) मेम्के वायव्यमे ४४२० स्थित वापी ५१३४४ इसक्ष्णरोमा (व्य) लक्ष्मणा रानी- श्रीकान्ता (व्य) शूरकी स्त्री का पिता ६०१८५ ३३३९९ इलेष्मान्तक (मौ) एक वन श्रीकूट (भी) हिमवत् कुलाचलका छठा कूट ५।५४ श्वपाकी-विद्याधरोकी एक श्रीक्ट (भौ) वि० द० नगरी २२।९७ श्वसन % वायु ५५६३५ श्रीचन्द्र (व्य) आगामी बलभद्र श्वेताम्बिका (भी) एक नगरी ६०१५६८ ३३११६१ श्रीचन्द्र (व्य) कुरुवंशका एक श्वेतमानु - सूर्य ९:१४६ राजा ४५1१२ श्रद्धावान् (भौ) पश्चिम विदेह- श्रीचन्द्र (व्य) नागपुरका राजा का वक्षारगिरि ५२३० ३४।४३ श्रद्धावत (भौ) हमवत क्षेत्रके श्रीचन्द्रा (भौ) मेरुके वायव्यमें मध्यमें स्थित एक गोलाकार स्थित वापी ५.३४४ पर्वत५।१६१ श्रीदत्ता (व्य) श्रीभूति-मत्य- श्रमजवारि = पमीना ५५:१२ घोषकी स्त्री २७४२२ अन्या-प्रवण करने योग्य-मनो. श्रीदत्ता (व्य) श्रीधर्म विद्याधर हर २०१२ राजाकी स्त्री २७.११७ श्रावक =देशवतके पालक ३१६३ श्रीदाम (व्य) योधर्म और श्रीदत्ता श्रावकाध्ययनाङ्ग (पा) द्वाद- का पुत्र २७१११६ शाङ्गका एक भेद, अपरनाम श्रीधर (व्य) भगवान् ऋपभदेव- उपामकाध्ययनाङ्ग २।९३ का पूर्वभव ९।५९ श्रावस्ती (भो) एक नगरी श्रीधर (व्य) महार स्वर्गका एक २८१५ देव २७१६८ श्री (व्य) रुचिकगिरिके चक श्रीधर (व्य) एक मुनि ६०1८७ कूटपर रहनेवाली देवी श्रीधर (व्य) जयन्त नगरका ५७१६ राजा ६०१११७ श्री (व्य) पद्मसरोवरमे रहने- श्रीधर (व्य) एक चारणाद्धसे वाली देवी ५११३० युक्त मुनि ६०१७ श्री (व्य) राजा प्रचण्डबाहनकी श्रीधर (व्य) एक मुनि ६०१९ पुत्री ४५१९८ श्रीधरा (व्य) अनिवल और श्रीकान्त (व्यआगामी चक्रवर्ती सुलक्षणाकी पुत्री रामदत्ता- ६०१५६५ का जीव २७१७८ श्रीधर्म (व्य) चारण मुनि ६०१२१ श्रीधर्म (व्य) एक विद्याधर राजा २७११६ श्रीधर्मा (व्य) उज्जयिनोका राजा २०१३ श्रीध्वज (व्य) बलदेवका पुत्र ४८।६७ श्रीध्वज (व्य) एक राजा ५०।१२४ श्रीनिकेतन (भौ) वि० उ०नगरी २२।८९ श्रीनिलया (भौ) मेरुके वायव्य- में स्थित एक वापी ५।३४४ श्रीपाल (व्य) सुलोचनाके द्वारा वणित श्रीपाल नामका चक्र- वर्ती १२ श्रीपुर (भी) वि० उ० नगरी २२१९४ श्रीप्रम (व्य) पृष्करवर दोपका रक्षक देव ५।६४० श्रीप्रम (भी) सहस्रार स्वर्गका एक विमान २७।६८ श्रीभूति (व्य) मिहपुरका एक ब्राह्मण,दूपरा नाम मत्यघोप २७१२२ श्रीभूति (व्य) यागामी चक्रवर्ती ६०१५६५ श्रीमती (व्य) राजा सिद्धार्थको स्त्री (भगवान महावीरको दादी) २०१३ श्रीमती (व्य) जयन्त नगरके राजा श्रीधरकी रानी ६०.११७ श्रीमती (व्य) राजा श्रेयान्मका पूर्वभव ९।१८३ श्रीमती (व्य) माकेत नगरके राजा अतिवलकी स्त्री २७.६३ भानुदत्तका पुत्र ३३३९७ १४४ हरिवंशपुराणे शिखण्डिन् (य) एक राजा शीरायुध = बलभद्र ३५१३९ शुर्पणखो (व्य) त्रिशिख विद्या- ५०१८४ शीरी (व्य) बलदेव ४२।९७ घरकी विधवा पत्नी शिसरिकूट (भौ) शिखरिकुला. शीलायुध (व्य) धावस्तीका २६।२६ चलका दूमरा कूट ५।१०५ एक राजा जो शान्तायुधका शूरदत्त (व्य) मथुराके भानु और शिखरिन् (भौ) जम्बू द्वीपका पुत्र था २९.३६ सातवां कुलाचल ५।१५ शीलायुध (व्य) वसुदेव और शूरसेन (व्य) मथुराके भानु और शिखिकण्ठ (व्य) आगामी प्रति प्रियङ्गसुन्दरीका पुत्र मथुराका पुत्र ३३।९८ नारायण ६०५७० ४८।६२ शूरसेन (व्य) मथुराका राजा शिर प्रकम्पित (पा) चौरासी बोलवतेवनतीचार= भावना ३३।९६ लाख महालताओंका एक ३४।१३४ शूरसेन (व्य) वसुदेवकी एक शिरप्रकम्पित ७।३० शुक्र (भौ) नौवां स्वर्ग ६।३७ स्त्री ३११७ शिखिन् = मयूर ३६१ शुक्र (भौ) महाशुक्र स्वर्गका शृगालदत्त (व्य) एक भोल शिव = कल्याण ३८।२ इन्द्रक ६५० २७१७० शिव (पा) स्फटिक सालका शुक्तिमती (भौ) शुक्तिमती शेषवती (व्य) भीमको स्त्री दक्षिण गोपुर ५७।५७ नदीके तटपर राजा अभि- ४७११८ शिव, शिवदेव (व्य) लवणसमुद्र- चन्द्र के द्वारा बसायो हुई शैल (व्य) अचलका पुत्र ४८१४९ में उदक और उदवास नगरी १७।३६ शौर्यपुर (भौ) बटेश्वरके पास पर्वतके निवासी देव ५।४६१ शुक्तिमती (भौ) एक नदी विद्यमान नगरविशेष १८०९ शिवचन्द्रा (व्य) वि० द० के शैलन्ध्री (व्य) द्रौपदी ४६।३२ जम्बूपुर नगरके राजा जाम्व- शुक्लध्यान (पा) प्रशस्तध्यानका शैवेय (व्य) नेमिनाथ ६१।१६ वकी स्त्री ४४।४ एक भेद ५३३५३ शोक (पा) असातावेदनीयका शिवनन्द (व्य) समुद्रविजयका शुक्लापाग:मयूर २३।१२ पुत्र ४८।४४ शुचिदत्त (व्य) भगवान महावीर- शिवमन्दिर (भौ) वि० द. का चतुर्थ गणधर ३।४२ शुद्धमध्यमा मध्यम ग्रामकी शिवमन्दिर (भौ) विजयाध. मूर्च्छना १९.१६३ गौच (पा) सातावेदनीयका को दक्षिण श्रेणीका एक शुद्धान्त =अन्त.पुर १९।३७ आसव ५८१९४ नगर २११२२ शुद्धपद्जा = पड्जस्वरको शिवा (व्य) राजा समुद्रविजय. शौरि (व्य) यादव-यदुवंशी मूछना १९।१६१ की स्त्री श९७ शुभकर (व्य) कुरुचन्द्रका पुत्र . शिवि (व्य) उग्रसेनके चाचा शौरि वसुदेव १९५९ ४५१९ शान्तनका पुत्र ४८/४० श्मशान निलय विद्याधरको शुभा (भी) विदेहको एक नगरी शिविका-पालकी २५० जाति २६।१६ शिशुपाल (य) चेदी देशका शुभ्रपुर (भौ) राजा सूर्य के द्वारा राजा ४२१५६ बसाया नगर १७१३२ शीता (व्य) रुविकगिरिके यश:- शूर (भी) देशका नाम ११३६६ बूटपर रहनेवाली देवो शूर (व्य) मयुराके भानु और श्यामा- यौवनवती १९७५ ५७१४ यमुनाना पुत्र ३३३९७ शीतल (भ्य) दाम तीर्थकर शूर (व्य) यदुवंशो राजा नरपति- घरको कन्या जिसे यमुदेवने १३१३२ का पुत्र १८१८ विवाहा १९७५ आस्रव ५८९३ शोणितपुर (भौ) विजयाका एक नगर, जहाँ वाण विद्या- घर रहता था ५५०१६ नगरी २२।९४ श्यामा (व्य) एक कन्या, जिसका वसुदेवके साथ सम्बन्ध हुआ १८० श्यामा (व्य) अशनिवेग विद्या- शब्दानुक्रमणिका १४. सायंक (व्य) शिविका पुत्र मनरकुमार (व्य) कुमवंग समन्तमद्र (व्य) समन्तभद्रनामक ४८.४१ उत्पन्न चौथा चक्रवर्ती याचार्य १२९ मरयमयाद (पा) पूर्वगत श्रुतका समन्तानुपातिनि (पा) एकक्रिया एक भेद २१९८ मनिकाचित (पा) आग्रायणी ૧૮૭૨ मस्यदेव (व्य) पमदेवका पूर्वके चतु प्राभूतका योग समयसत्य (पा) दर प्रकार गणपर १२२६२ द्वार १०८५ सरयोमे से एक सत्य सरयनेमि (व्य) यादव ५०।१२० मसिपात- तालगत गान्धर्वका १०११०७ सम्यनेमि (य) समुद्रविजयका एक प्रकार १९१५० समवसरण तोयंकरकीपर्ममभा पूत्र ४८।४३ सन्तान - कल्पवृक्ष विशेष २०६६ मरयमामा (य) कृष्णकी, स्त्रो ८1९८९ समवस्थान-समवसरण सन्दरायं (व्य) विमलनायका सत्यमहामत (पा) रागडेप मोह प्रथम गणधर ६१३४८ समय (पा) बालद्रश्यकी गयी पूर्वक परतापकारी वचनोरा सन्याकार (भी) विध्याचलका छोटी पर्याय ७१८ स्याग २।११८ एक नगर ४५११४ सममिल (पा) एक तप मग्यवान् (य्य) ऋषभदेवका सन्धि पदगत गान्धर्वशी विधि ५८४१ गणपर१२।६२ १९।१४९ समयापार (पा) दादाजमा माययेद (व्य) अपमदेवया सन्मति (व्य) प्रतियुनि कुलकर- एक भेद २०१२ गणधर १२१६२ का पुत्रगरा वुहार समादान क्रिया (पा) एक प्रिया मशाला-दानमाला २५२२१ ७१४८ ५८।१४ माममा - सज्जनौरा गमूह मनरेन्द्र - उत्तम विपर्वच, पक्षम समाधिगुप्त (व्य) मागामो तो. उत्तम राजा १४६ पर ६०५६१ सायमाप (व्य) जागा पुत्र माया - पूजा २२९७ ममाधियत (व्य) एक मुनि ५२१३२ मायादि (पा) मत, मस्या, মাহি - तासगा गान्या ६.२८ क्षेत्र, सन, पाल, मनर, एकप्रसार १९1१५१ ममरम्म (पा) के मापन भाव, मम्पर हाव ये आठ मसाथ-सानदार २५१५ जूदाना ५८५८५ मनुलोम-बार २१०८ ससपणपुर (भो) सया ममासम्मन-विन १९४१ नियामरमान ५१४७ ममात्रि मापार (न्य) ऋषमा = पारप रियर 1८1५४ गरपर १२१९५ मतमामात अविष १ ममाएर मापा (स्य) गायभामा ४१०१३ मतरगंपन (भी) रियो मनिमार (भी) र मगर नगरमे ५ पोमदर १८११२ दशिन दिन ममिति (पा) मतपति गिरा -Pret२२१७. मारामार (मी) संगस Ram (शि समा,४ान-fire म. और५दिसत मरमार (स्य) tri. माद (पा) परran, ममग -२. मwिare(ल. समामा-मानान गाना (स) पौर २०१२८१ ४८ हरिवंशपुराणे सकलभूतदया (पा) सातावेद- सगर (व्य) द्वितीय चक्रवर्ती ५२१३६ श्रीमती (व्य) रुक्मिणीकी माता श्रुतदेवी (व्य) प्रतिमाओके पास पोशाई -आठ २१८३ विद्यमान एक देवी ५।३६३ [स] श्रीमती (व्य) पद्मनाभको स्त्री श्रुतविधिः - व्रतविशेप ३४॥९७ सककापिर (भी) देशका नाम ६०११२१ श्रुतसागर (व्य) एक मुनि श्रीमती (य) अशोकको पत्नी २७१९९ सकन्दर्पप्रिय -कामीजनोंको ६०१६९ श्रुति = वैणस्वरका एक भंद प्रिय ४२०२१ श्रीमती = उज्जयिनीके राजा श्री- १९।१४७ धर्माको स्त्री २०१३ श्रेणिक (व्य) मगध देशके राजा नीयका आसव ५८१९४ श्रीमती (व्य) नागपुरके राजा अपर नाम विम्बसार ११७६ सक्ति लगाव ३२९ श्रीचन्द्रको स्त्री ३४॥४३ श्रेणिबद्ध (भौ) रत्नप्रभा आदि सङ्घ (व्य) एक मुनि १८०१३३ श्रीमती (व्य) राजा सूर्यकी स्त्री, पृथिवियोंके पटलोमें पंक्ति सगर (व्य) एक राजा २३१५० कुन्थुनाथकी माता ४५।२० बद्ध विल ४११०३ श्रीमहिता (भौ) मेरुके वायव्यमें [प] ६०.२८३ स्थित एक वापी ५.३४४ पर (भौ) पङ्कप्रभा पृथिवीके षष्ठ सगर (व्य) जरासन्धका पुत्र श्रीमान् (य) जरासन्धका पुर प्रस्तारका इन्द्रक विल ५२१३३ सङ्घ- भीड १९:११ ४११३४ श्रेयान् (व्य) हस्तिनापुरके राजा पापड (भौ) पङ्कप्रभा पृथिवीके सचित्तनिक्षेप (पा) अतिथिका सोमप्रभका छोटा भाई अतिचार ५८११८३ सप्तम प्रस्तारका इन्द्रक विल ९।१५८ सचित्तावरण (पा) अतिथिका ४१३५ श्रेयान (व्य) हस्तिनापुरके राजा अतिचार ५८११८३ पावश्यक (पा) मुनियोके मूल सोमप्रभका भाई ४५७ सचित्ताहार (पा) भोगोपभोग श्रीवर (य) पुष्करवर द्वीपका गुणः-समता, बन्दना, स्तुति, का अतिचार ५८.१८२ रक्षा देव ५/६४० प्रतिक्रमणं, स्वाध्याय और सचित्तसम्बन्धाहार (पा) भोगोप- श्रीपद्धमान (वि) अनन्त चतुष्टम• कायोत्सर्ग"ये छह माव-. मोगका अतिचार ५८०१८२ रूप लक्ष्मीसे वृद्धिको प्राप्त श्यक है २०१२८ मचित्तसन्मिश्राहार (पा) भौगोप- २२ - स्वरका एक भेद भोगवनका अतिचार धीवृक्ष (भी) एचकगिरिको १९१५३ ५८.१८२ पश्चिम दिशाका कूट पदजकैशिकी = पड्ज स्वरसे सञ्जयन्त (व्य) विदेहक्षेत्रके एक ५।७०२ सम्बद्ध जाति १९।१७४ मुनि २७।३ श्रीवृक्ष (य) कुण्डलगिरिक पड्जमध्या - षड्जस्वरसे सम्बद्ध सञ्जय (व्य) राजा चरमका पुत्र मार्ग बूटवा निवासी देव जाति १९1१७४ १७१२८ ५६९३ पजीव निकाय = पृथिवीकायि- श्रीवसु (व्य) कुरुवाका एक सञ्जय (व्य) एक राजा ५०।१३. कादिपांच स्थावर और एक- सभ्यलित (भी) वालुकाप्रमाके राजा ४५/२६ अस २०११७ अष्टम प्रस्तारका इन्द्रकविल श्रीपत (व्य) पुश्वशका एक पट-बेला-दो दिनका उपवास ४११२५ राजा ४५२९ धीयम् (व्य) लक्ष्योमे युक्त सरकल्याण= विवाह १९।२ पानी - पजम्वरसे सम्बद्ध ग्यारहवें तीर्यवर ११३ सत्यक (व्य) कृष्ण पक्षका एक जाति १९४१७४ योद्धा ५२०१४ श्रीपेण (व्य) मागामी पावती पार-चौदह मूछनाओका एक मायक (व्य) एक राजा स्वर १९१६९ ५०।१२४ पड्ज २०५८ ८८ हरिवंशपुराणे गङ्गासिन्धू प्रतिक्षेत्र कच्छादौ नीलतः सुते' । सीतां प्रविशतोऽतीत्य विजयाईगुहाद्वयम् ।।२६७॥ गिरिष्यामसमायामे योजनाष्टकमुच्छ्तेि । गुहे द्वादशविस्तारे द्वे द्वे स्यातां गिरी गिरी ॥२६८।। नद्यः पोदश गङ्गाद्याः समा भरतगङ्गया । ता रकारक्तवत्योस्तु तावत्यो निषधसुताः ॥२६६।। निषधधानीलतस्तावत्संख्यास्तन्नामिकाः श्रुताः । नद्योऽपरविदेहेषु सीतोदा तु व्रजन्ति ताः ॥२७॥ नाम्ना साधारणेनोक्तास्ता एता रतिनिम्नगाः । चतुर्दशसहस्त्रैस्तु प्रत्येकं सरितां युताः ॥२७॥ अशीतिश्चापि चत्वारि सहस्राणि कुरुद्वये । प्रत्येकं निम्नगा नद्योरर्धमर्धतटद्वये ॥२७२॥ पञ्चलक्षाः सहस्राणि द्वात्रिशस्त्रिशदष्टभिः । प्रत्येकमुभयोनद्यः सीतासीतोदयोर्युताः ॥२७३।। दशलता. चतुःपष्टिसहस्राण्यटसप्ततिः । सर्वा एवापगाः प्रोक्ता पूर्वापरविदेहयोः ॥२७॥ चतुर्दशसहस्राणि प्रत्येकं सरितो मताः । गङ्गासिन्भ्वोः पतन्स्यस्ताः रक्तारक्तोदयोश्च ताः ॥२७५॥ रोह्यायां रोहितास्यायां सहस्राणि पतन्ति ताः । सुवर्णरूप्यकूलयोरष्टाविंशतिरेकशः ॥२७६॥ पट्पञ्चाशत्महस्राणि ता हरिद्धरिकान्तयोः । पतन्ति सिन्धवो यद्वत् सनारीनरकान्तयोः ॥२७७।। सहताश्च ममस्तास्ता गङ्गासिन्ध्वादिसिन्धवः । तिम्रो लक्षा नवश्या वे सहस्र द्वादशापि च ॥२८॥ स्युचतुर्दशलक्षास्तु वैदेह्यस्ताश्च संख्यया । षट्पञ्जारात्सहस्राणि नवतिश्च समुद्रगाः ॥२७॥ द्वीपेऽस्मिन् काञ्चनैस्तुल्या वैदूर्यमयमूर्तयः । चतुस्विशासुरैः सेव्या वृपैवृषभपर्वताः ।।२८०॥ पूर्वापरविदेहान्ताः समुद्रतटसङ्गताः । देवारण्यवनाभोगाश्चत्वारः सरितोस्तटे ॥२८॥ कच्छा आदि प्रत्येक क्षेत्रमै गङ्गा सिन्धु नामकी दो नदियाँ हैं जो नील पर्वतसे निकल कर विजयाध पर्वतकी दोनों गुफाओको उल्लंघन करती हुई सीता नदीमें प्रवेश करती है ॥२६७॥ प्रत्येक विजया पर्वतम उसकी चौड़ाईके समान लम्बी, आठ योजन ऊँची और पारह योजन चौड़ी दो-दो गुफाएँ हैं ॥२६८॥ ये गङ्गा आदि सोलह नदियाँ, भरत क्षेत्रकी गद्गा नदीके समान हैं । इसी प्रकार निषधाचलसे निकली हुई सोलह रक्ता, रक्तोदा नदियों भी ऐरावत- को रक्ता-रक्तोदाके समान हैं ॥२६॥ पश्चिम विदेह क्षेत्रमें भी इसी प्रकार गङ्गा, सिन्धु और रक्ता-रक्तोदा नामको सोलह-सोलह नदियाँ निपधाचल और नीलाचलसे निकलकर सीतोदा नदीकी और जाती हैं ॥२७०॥ समान नामसे जिनका कथन किया गया है ऐसी ये समस्त नदियाँ अत्यन्त प्रीति को बढ़ानेवाली हैं तथा प्रत्येक नदियाँ चौदह हजार नदियोसे युक्त हैं ॥२७१॥ सीना और सीतीदा नदियोका परिवार देवकुरु और उत्तरकुरुमे चौरासी हजार नदियोंका है। दोनों नदियोमै प्रत्येक नदीके तटसे व्यालीस हजार नदियोका प्रवेश होता है ।।२७२।। सीता, सीतोदा नामक उक्त नदियोमेंसे प्रत्येक नदीमें पाँच लाख बत्तीस हजार अड़तीस नदियाँ मिली हैं ।।२७३|| पूर्व और पश्चिम विदेहम इन समस्त नदियोका प्रमाण दश लास चौंसठ हजार अठहत्तर कहा गया है ॥२७४॥ गङ्गा, सिन्धु एवं रक्ता-रक्तोदा नदियोमे प्रत्येकका परियार चौदह चौदह हजार नदियोका है ॥२७॥ रोह्या, रोहितास्या और सुवर्णकला, रूप्यकलाम प्रत्येकका अट्ठाईस अट्ठाईस हजार नदियोका परिवार है ॥२७६।। हरित्, हरिकान्ता और नारी, नरकान्नामें प्रत्येक नदीका परिवार छप्पन हजार नदियोंका है ॥२४७|| विदेह क्षेत्र को छोड़ अन्य क्षेत्रोंकी गद्गा, सिन्धु आदि नदियोको समस्त परिवार-नदियाँ मिलकर तीन लाग्य यानये हजार यारह है ॥२७८।। विदह क्षेत्रको समुदतक जानेवाली समस्त नदियोंकी संख्या चौदह लाग्य एप्पन हजार नये है ॥२७६।। जम्यू द्वीपमें काञ्चन यूटोके समान वैडूर्य मणिमय तथा श्रेष्ठ देवों के द्वाग सेवनीय चीनीम पृपमाचल हैं ॥२८॥ सीता और सौनोदा दोनों नदियोंके तटपर पूर्व-पश्चिम विदेह १ निगरे । श्रुते म. १२ एरागनि-म०, फ० । ३ मधानदेवः ।

सर्वार्थसिदाः -एक विद्या २२१७० सर्वार्धकल्पक ( पा) आग्रायणी पूर्वको वस्तु १०७९ सर्वार्थ सिदि (भौ) अनुत्तर- विमानोका इन्द्रक ६।५४ सर्वार्थ सिदि (भी) अनुत्तरविमान '- एक विद्या . १४८ हरिवंशपुराणे ममुद्रदत्त (व्य) एक मुनिराज सरागसंयम (पा) सातावेदनीय- १८।१०५ का आत्रव ५८।९४ समुद्र विजय (व्य) बाईसवें सरिता (भौ) पूर्वविदेहका एक तीर्थकर नेमिनाथके पिता देश ५२४९ १७९ मर्वाह्न (व्य) प्रतिमाओंरे समीप समुद्रविजय (व्य) बन्धकवृष्णि विद्यमान एक यक्ष ५।३६३ और मुभद्राके पुत्र, भगवान् सर्वगन्ध (व्य) अरुणवर दोपका नेमिनायक पिता १८।१३ रक्षक देव ५।६४५ समुद्वर्तन = उपटना ३८१५४ सर्वगुप्त (व्य) भगवान् ऋपमदेव- मम्फली = इती १४१७८ का गणधर १६५९ सम्मव (व्य) जरासन्धका पुत्र सर्वश्रय (व्य) विनमिका पुत्र ५२।३७ २२।१०५ सम्भवनाथ (व्य) तृतीय तीथंकर सर्वतोभद्र (व्य) नाभिराजके १६.३१ भवनका नाम ८/४ सम्भ्रान्त (भी) रत्नप्रभा पृथिवी. सर्वतोमद्र श्रीकृष्णका भवन जो के छठे प्रस्तारका इन्द्रक अठारह खण्डका था ४११२७ सर्वतोमद्र- एक उपवासव्रत मम्मद (व्य) रुद्र ६०१९७१ ३४५२-५५ मम्मदशैल (भी) मम्मेदशिखर मामभूत (व्य) आगामी तीर्थ- निर्वाणभूमि १६७५ कर ६०१५५९ सम्यक्त्वक्रिया (पा) एक क्रिया सर्वदेव (व्य) भगवान् ऋषभदेव- ५८०६१ का गणधर १२१६० सम्यग्मिध्याग (पा) तीसरा सर्वप्रिय (व्य) भगवान् ऋपम- गुणस्थान अपर नाम मिश्र देवका गणघर १२१६० ३१८० सर्वग्न (पा) चक्र की एक मम्यग्दर्शन (पा) जीवादि मात निधि १११११० तत्त्वोका पान करना सर्वन (भी) रुचिरगिरिको नेऋत्य दिशाम स्थित एक मम्यग्दर्शन माषा (पा) मत्य- फूट ५७२६ प्रवाद पूर्वको १२ भाषाओ सयरन कट (भी) मानुपोत्तरके में-मे एक भाषा १०९६ पूर्वोत्तर कोशमे निषधाचल. पयोगस्थली (पा) तेरहवा में लगा हुआ एर बूटा६०८ गुणम्पान ३३८३ मबरन्नमय (भी) मेरुको एक मरयर (व्य) जगाम्यामारा पुत्र मवाथ (व्य) राजा मिटाके मस्ती (व्य) जयन्नगिरिव पिता ( भगवान् महावीरके जरा वायुविधापरली म्बी याचा) २०१३ ४७४३ मर्याय (व्य) चारदत्तका मामा मरम्यत्री (म्य) देवी ५::२७ २११३८ सर्वार्थसिदि स्तूप (पा) समव. सरणके स्तूप ५७।१०२ सर्व विद्याप्रकर्षिणी = एक विद्या, २२१६२ सर्वविद्याविराजिता २०६४ सर्वयशा (व्य) राजा तणबिन्दुको स्त्री २३०५२ मर्वावधि (पा) अवधिज्ञानका एक भेद १०११५२ सर्वविद (वि) सर्वज्ञाय १३ सर्वसह (व्य) भगवान् ऋषभदेव- का गणधर १२०५९ सर्वास्त्रच्छादन-विद्यास्त्र २५४९ सर्वथ्री (व्य) मेघपुरके राजा धनंजयकी स्त्री ३३११३५ सर्वश्री (व्य) वीतशोका नगरीके वैजयन्त राजाको स्त्री २७।६ सल्लेसना (पा) कपायको कृश- कर पावितसे मरण करना ५८।१६० सवर्णकारिणी = एक विद्या २२१७१ मवस्तुकतालगत गान्धर्वका एक प्रकार १९१५० सवाच्यस्य =सापरापनिन्दनीय ५४७ सवित्री कृष्ण को माता देवको ३५।४९ सस्य (व्य) एक राजा ३१॥९८ ससारस्वत (भौ) देशका नाम ११।७२ परिधि ५५३०५ १४९ शन्दानुक्रमणिका सादेव (व्य) पाण्डव ४५।२ संप्रज्वलित (भी) वालुकाप्रमाके सहदेव (व्य) जरासन्धका पुत्र नवम प्रस्तारका इन्द्रक विल ५२।३० ४१२६ सहदेव (व्य) एक राजा ५०७९ संयम (पा) पांच इन्द्रियों और सहनीय (व्य) वलि प्रतिनारा मनको वा करना तथा छह यणके वंशका एक राजा कायके जीवोकी हिंमा न २५/३६ करना२।१२९ सहस्रार (वि) हजार भारोंवाला संयतासंयत (पा) पापोका एक ३।२९ देश करनेवाले थावक ३३१४८ सहसार (भी) बारहवा स्वर्ग संयतासंयत (पा) पाँचको गुण- स्थान ३१८१ सानार (भो) मारहवां स्वर्ण संयोग (पा) अजीवाधिकरण सहनदिक (व्य) जरासन्धका पुत्र भासवका भेद ५८1८६ ५२०३९ संयोजनासत्य (पा) दश प्रकारके सहस्रपर्वा एक विद्या २०६७ सत्योम-से एक सत्य सहस्रानीक (व्य) विनमिका पुत्र १०।१०३ २२११०५ संरम्म (पा) कार्य करनेका संकल्प বয়েসি () সামী करना ५८८८५ पुष ५२२४० संबर (व्य) ऋषभदेवका गणपर सद्य (व्य) अचलका पुत्र ४८१४९ १२०६३ संगम (पा) बागायणी पूर्वके संवादी - स्वरप्रयोगका एक चतुर्प प्राभूतका योगदार प्रकार १९.१५४ संवेग-भावना ३४॥१३६ मंगमक (व्य) पातालवासी एक संवृनिमत्य (पा) दा प्रचारकै दैव जिसको राजा पपनामने मत्योम मे एक मत्य १०११०२ धारापनाको ५४४१२ मंसद् समवसरण ममा मंग्रह (पा) एक नम ५८४१ मंघाट (भी) पाराप्रभा पपिवीके संस्थान = मानगर ३१९७ पष्ठ प्रस्तारमा इन्द्रक विल मंस्थानविषय (पा) पम्यंम्यानका ४।११० भंद५६४८ मंधान (पा) नभानरा भेट सिंह (भी) यि. उ० नगरी २०१२ २२१८७ मंजप (व्य) दिनपिका पुत्र सासारमन्त्रभेद (पा) गत्वापुरता २२।१०४ काशिनार ५८१६९ पंधवन (व्य)मेतका नगरी माग (भी) सामानगरी जपत राजारात २७१६ १८९७ मंहामंशा (पा)आठ प्रसंशात्री मागा (न्य) मुभरा १९ रोएक महासता होती है मागर (पा) मम्म्मान पराएक १८ गापर होता है ।२५२ सागर (व्य) राजा उप्रसेनका पुत्र ४८१३९ सागर (व्य) एक राजा ५०१११८ सागर कूट (भी) मात्यवान् पर्वतका एक कूट ५।२१९ सागरचन्द्र (व्य) मेघकूट नगरके जिनालयमें विद्यमान एक अवधिज्ञानी मुनि ४७.६० सागरचिनक (भौ) नन्दनवना एक कूट ५१३२९ मागरसेन (व्य) एक मुनि ६०७६ सागरमेन (व्य) दीपनका प्रभ १८०९ सातासात (पा) आग्रायणी पूर्वके चतुर्थ प्राभूता योगद्वार १०१८४ मात्या (व्य) एक मुनि४३।११० साधारण-वैणस्वरका भेद १९१४७ साधारणक्रिया शारीरस्वरका भेद १९११४८ माधारणकन = चौदह मूछनामों- का एक स्वर १९१६९ साधु-सज्जन ११४३ साधु (व्य) माधुपरमैप्टी १।२८ माधुममाधि-भावना ३२६१३९ माधुसेन (व्य) ऋषभदेवसरा गण- पर १२३६१ मानुकार (भी) अच्युत स्वर्गश प्रपमन्दर ६.५१ मानुभरी (व्य) महेन्द्रकी स्त्री ६०१८ मामायिक (पा) मनगटा एर भे॥१.२ मामाथिहमत मापदपोग. का रमादार दिर मामायिक पारित (पा) पारित. पाएर १५ . वस्तु १०८० १५० हरिवंशपुराणे साम्परायिक (पा) आस्रवका भेद सिद्ध (व्य) मानुषोत्तरके अञ्ज सिद्धिक्षेत्र - मुक्त जीवोके ठहरने. ५८/५८ नमूल कूटपर रहनेवाला का स्थान-तनुवातवलयका मारण (व्य) वसुदेव और रोहिणी- देव ५।६०४ अन्तिम ५२५ धनुष प्रमाण का पुत्र ४८।६४ सिद्धकूट (भौ) सौमनस्यपर्वतका स्थान ३१६७ सारण (व्य) एक राजा ५२।२० एक कूट ५।२२१ सिदि (पा) आग्रायणी पूर्वको सारनिवह (भौ) वि० उ० नगरी सिद्धकूट (भी) माल्यवान् पर्वत- २२।८७ का कूट ५।२१९ सिद्धेतर (पा) सिद्धोसे भिन्न सारमेय - कुत्ता ४३।१५१ सिद्धकूट (भौ) विद्युत्प्रभ पर्वतका संसारी जीव ३६६ सारस्वत (व्य) लौकान्तिक देवो- एक कूट ५।२२२ सिन्धुकक्ष (मो) वि० द० नगरी का एक भेद ९।६४ २२।९७ सिद्धायतन (भौ) शाल्मली वृक्ष- सालम्बप्रत्याख्यान - यदिजोवित सिन्धु (भी) देशका नाम ११६६७ को दक्षिण शाखापर स्थित रहे तो अन्न-पानी ग्रहण सिन्धु (भी) चौदह महानदियोंमें से करेंगे इस प्रकारको प्रतिज्ञा- चैत्यालय ५।१८९ एक नदी ५११२३ से युक्न संन्याम २०२४ सिद्धायतन (भी) जम्बू वृक्षकी मिन्धु (भी) देशविशेष ३१५ सालाभ्याशशिलावले - सागौन उत्तर दिशाको शाखापर वृक्षके निकटवर्ती शिलाल- 7 स्थित चैत्यालय ५:१८१ सिन्धुकूट (भौ) हिमवत्कला- चलका आठवा कूट ५/५४ पर २०५८ सिद्धायतनकूट (भी) गन्धमादन- साल्व (भी) देश-विशेष ३।३ सिन्धुदेवी (व्य) सिन्धुकूटपर पर स्थित एक कूट ५।२१७ बमनेवाली देवी ११५४० सासादन (पा) दूसरा गुणस्थान सिद्धायतमकूट (भी) ऐरावतके ३१८० सिंह (व्य) मेघदलपुरका रास विजयाका पहला कूट मित (व्य) अमरावर्तका शिल्प ४६।१४ ४५१४५ ५।११० सिन (व्य) एक तापम ४६।५४ सिद्धायतनकूट (भी) रुक्मिकुला. यशाका पुत्र ४८५७ मिता (व्य) विजयकी स्त्री १९।४ चलका पहला फूट ५।१०२ सिंहल (भौ) सिंहन्द्रोप ४।२० सिद (पा) बाट कमको मष्ट सिद्धायतनकूट (भो) शिबरि- सिंहकटि (व्य) जरासन्यका पुत्र करनेवाले मुक्त जीव ३०६६ कुलाचलका पहला कूट ५२१३३ मिद (पा) वादि-प्रनिवादियों- ५१०५ सिंहघोष (व्य) सन्ध्याकार नगर- केदारा निर्णीत १११ मिदापतनकूट (भी) हिसवत्- मिद (व्य) मिडारमेष्ठी ११२८ पुलाचलराप्रपम ट ५/५३ मिदगन (य) एक आघाय १।३० मिदायतनकूट (भी) निपघायल. ऋदिधारी मुनि २७.६० मिदादर (पा) गमवमरणो का प्रथम वूट ५।८८ स्तूप ५७॥१.३ मिझायानट (भी) विजया ६०१५६८ मिमूर (भी) अनिम मोल पर्वतरा प्रथम फूट ५।२६ सिंहचन्द्र (व्य) मुमित्रस्त होशंमतीमगर ५६२३ मिशा (व्य) निदेश मावि मिदायानाः (भी) नोलला. दसार सिंहपन्द्र पुत्र ही पलगा पहला फूट ५.९९ २७४६ पिया (य)गरमाता एप मिसापननार (भी) महाहिमस्तु मिट (व्य) प्रहगिन और मापनापूर ५७१ हिरण्ययतीकापुर २२६११३ गिरा (व्य) मरा नंदी मिसा (प) भगवान महावीर- देवगि ११२१ मिारंट (व्य) यमुसा सिंह (व्य) यसुदेव और नील. का राजा ४५११४ सिंहचन्द्र (व्य) एक पारण सिंहचन्द्र (व्य) आगामी बलभद्र वणिक मरकर रानी राम- भापा २ !ि २०१३ सम्बन्धी एमरियापर ५२ शन्दानुक्रमणिका सिंहनाद (व्य) जरासन्धका पुत्र सीता (भी) एक महानदी ५।१२३ ५२।३४ सीताफूट (भौ) माल्यवान् पर्वत- सिंहपुर (भौ) ज० वि० के सुपमा का एक कूट ५।२२० देशका एक नगर ३४॥३ सीताकूट (भौ) नोलकुलाचलका सिंहपुर (भौ) मरतक्षेत्रके शकट चौया कूट ५।१०० देशका एक नगर २७।२० सीतोदा ( भौ) एक महानदी सिंहपुगे (भी) विदेहकी एक ५।१२३ नगरी ५।२६१ सीतोदा (भी) विदेहकी एक सिंहवल (व्य) राजा पद्मका विभंगा नदी ५१२४१ विरोधी एक उद्दण्ड राजा सीतोदाकूट (भी) विद्युत्प्रभका २०१७ एक कूट ५।२२३ सिंहयश (व्य) अमितगति विद्या- सीतोदाकूट (भौ) निषघाचलका घरका पुत्र २१।१२१ सादवां कूट ५।८९ सिंहरय (व्य) राजगृहका राजा सीमकर (व्य) पाचवां कुलकर ६०।११३ ७.१५४ सिंहरय (व्य) कालमंदरका मीमन्तक (भी) रत्नप्रभा पृथिवी- विरोधो एक विद्याधर राजा के प्रथम प्रस्तारका इन्द्रक ४७/२६ नामक विल ४७६ सिंहरथ (व्य) मिहपुरका उद्दण्ड सोमन्धर (व्य) विदेहके तीयंकर राजा ३३१४ ४३१७९ सिंहवाहिनी नागशय्या- कृष्ण- सीमन्धर (व्य) छठा कुलकर को शम्या ३५।७२ ७१५५ सिंहविष्टर = सिंहासन २०४१ मीरिन् बलदेव १।१२० सिंहसन (व्य) भरतक्षेत्र स्थित मुकण्ठ (व्य) आगामी प्रति- शकट देशके सिंहपुरका नारायण ६०१५७० राजा २७४२० मुकच्छ (व्य)ऋषभदेवका गणघर सिंहसन (व्य) वसुदेव और बन्धु- १२।६८ मनोरा पुत्र ४८।६२ मुकम्मा (भी) पश्चिम विदेहका मिहर्मन व्य) अजितनायके एक देश ५।२४५ प्रथम गणधर ६०1३४६ सिंहाः (व्य ) जरासन्धरा पुत्र २२३९७ ५२।३१ सुकान्त (व्य) जयकुमारखा पूर्व- मीना (व्य) रामचन्द्रजीको भव १२०१८ सुकुमार (व्य) सनतुमार चक्र मीना (व्य) अरिष्टपरके निवामो वर्तीका पुत्र ४५१७ रेवतकी पुत्री बलदेवको स्त्री मुकभरिका (व्य) तापमनी कन्या ४४०४१ २१०२५ मीठा (भी) जम्वृद्वोर विदेव मुमारिका (व्य) घनदेव वश्यकी क्षेत्रका एक नदी ६०११२ स्त्री ४६५० सुकीनि (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५/२५ सुकेनु (व्य) विजयाघका निवासी एक विद्याधर ३६ सुखरथ (व्य) दृढ़रयका पुत्र १८०१९ सुसानुबन्ध (पा) सल्लेखना- व्रतका अविचार ५८१८४ मुखावह (भी) पश्चिम विदेहका वक्षारगिरि ५।२२० मुगन्ध (व्य) अरुणवर द्वीपका रक्षक देव ५।६४५ मुगन्धा (भी) पश्चिम विदेहका एक देश ५:२५१ मुगम (व्य) वमुदेव और रत्न- वतीका पुत्र ४८०५९ मुग्रीव (व्य) विजयसेट नगरम रहनेवाला एक गन्धर्वाचार्य १९५४ मुघोपबलदेवक शसका नाम ४२१७९ सुघोष = गन्धर्वसेनाके द्वारा वसुदेवको दी हुई वीणा १९६१३७ मुचक्षु (व्य) मानुपोतर पर्वतका रक्षक देव ५।६३९ सुचन्द्र (व्य) यागामी बलमद्र ६०१५६९ मुचारु (व्य) कृष्णका पुत्र ४८.७१ मुचारु (व्य) कुरुवंशी एक राजा मुकक्ष (भो) वि. द. नगरी स्त्री ४६२१ मुज्येष्टा (व्य) राष्ट्रवर्धनको स्त्री ६.198 मुग्यष्टा (ल्य) धनदत्त सेट और नन्दयायी पुत्री १८।११३ मुनार (व्य) प्राकामुरोरा पुत्र एक विद्याधर ४६८ मुतेजस (ध्य) पुरसंगरा एक राजा ४१४ १५२ मुदर्शन (व्य) एक या १८.३० सुदर्शन चक्रवर्तीका पकरल हरिवंशपुराणे मुष्टि (व्य) मदिरामा नगरीका सेट ३३११६७ मुधर्म (व्य) गुधर्माचार्य मेवलो मुनीता (व्य) हिमवान्को तो मुनमि (व्य) यादव ५०।१२० मुनमि (व्य) समुद्रविजया पुत्र ४८४३ सुदर्शन (व्य) अलका नगरोका राजा २७१७९ सुदर्शन (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२।३२ सुदर्शन (क्ष्य) पाचयाँ बलभद्र ६०१२९० मुदर्शनचक = कृष्णा एक रत्न मुनगम (व्य) एक देव ३५।४ मुपम (व्य) कुवाका एक राजा ४५/२५ सुपभा (भी) ३० वि० का एक देश ३४१३ मुपण (भी) पूर्व विदेहका एक देश ५।२४९ मुपर्णतनय - मयनवासी देवोगा एक भेद ४१६३ मुपाचं (व्य) = गप्तम तीर्यवर सुदर्शन (य) भगवान् अरनाथ- के पिता ४५४२१ मुदर्शन (भी) रुचिकगिरिका उत्तर दिशासम्बन्धी पूट ५७१६ मुदर्शन (भौ) अघोवेयकका पहला इन्द्रक ६.५२ सुदर्शन (व्य) मानुषोत्तरको उत्तर दिशामें स्थित स्फटिक कूटपर रहनेवाला देव गुधर्म (व्य) भगवान महावीरता पञ्चम गणधर ३४२ मुधर्म व्य) एक मुनिराम ३३।१५२ मुभमं (व्य) तोगरा बलभद्र ६०१२९० मुधर्मक (व्य) वासुपूज्यका गणधर ६०1३४७ मुधर्मा (भी) विजयदेवके भवनमे उत्तर दिशाम स्थित ममा ५४१७ मुपाम (पा) स्फटिकमालका पश्चिम गोपुर ५७३५९ सुनन्द, नन्दिपेण (व्य) मुगल पुत्र ३३३१४१ सुनन्दा (व्य) सुप्रसिष्ठकी स्त्री ३४०४७ मुनन्दा (व्य) ऋषभदेवकी स्त्री ९.१८ सुनन्द गोप (व्य) वृन्दावनमें रहनेवाला एक गोष ३५१२८ मुन्दर (न्य) कुण्डलगिरिके स्फ- टिक कूटका निवासी देव ५/६९४ सुन्दरी (व्य) भगवान् ऋषभदेव- की पुत्री ९.२२ सुन्दरी (व्य) चक्रपुरके राजा अपराजितको रत्री २७.८९ सुन्दरी (व्य) एक आयिका सुपा (व्य) आगामी तीर्थकर ६०१५५८ मुपावं (न्य) सप्तम तीर्थकर १३१३२ सुप्रणिधि (व्य) चिकगिरिक सुप्रबुद्ध कूटपर रहनेवाली देवी ५१७०८ मुप्रतिष्ठ (व्य) एक मुनिराज १८।३० सुप्रतिष्ठ (व्य) घोचन्द्र और श्रीमतीका पुत्र ३४४३ मुप्रतिष्ठ (व्य) एक मुनि ११७८ मुप्रतिष्ठ (व्य) शूर और सुवीरको दीक्षा देनेवाले एक मुनि १८।११ सुप्रतिष्ठ (व्य) कुरुवंशका एक राजा.४५/१२ सुप्रतिष्ठ (भौ) निकगिरिका दक्षिण दिशासम्बन्धी कूट ५१७१० सुप्रबुद्ध (भौ) अधोग्नवेयकका तीसरा इन्द्रक ६५२ सुप्रबुद्ध (भौ) रुचिकगिरिका दक्षिण दिशासम्बन्धी कूट ५।७०८ सुदर्शना (व्य) भगवान् ऋषभ- देवकी दीक्षाकालकी पाल- की ९७७ सुदर्शना (व्य) धनदत सेठ और नन्दयशाकी पुत्री १८०११३ सुदर्शना (ज्य) राजा विराट्को स्त्री ४६१२३ सुदर्शना (व्य) सध्याकार नगर- के राजा सिंघोषको स्त्रो ४५१११५ सुदर्शना (भी) नन्दीश्वर द्वीपके उत्तर दिशासम्बन्धी अजन- गिरिको उत्तर दिशामें स्थित वापिका ५१६६४ सुदर्शनार्यिका (व्य) एक आयिका १८।११७ सुदृष्टि (व्य) सुतिष्ठ और सुनन्दाका पुत्र ३४१४६ . सुन्दरी (व्य) सूरदेवकी स्त्री सुन्दरी (व्य) चित्रकारपुरके राजा प्रीतिभद्रकी स्त्री २७.९७ सन्दानुक्रमणिका सुभद्र (य) आचाराङ्गके ज्ञाता एक आचार्य १६५ सुभद्र (व्य) अमृतवलका पुत्र मुमबुद्धा (व्य) रुचिकगिरिके मन्दर क्टार रहनेवाली देवी ५१७०८ मुमबुद्धा (भी) नन्दीश्वर द्वीपके पश्चिम दिशासम्बन्धी अम्जनगिरिवी दक्षिण दिशा में स्थित वापिका ५४६६२ सुप्रम (पा) स्फटिक सालका पश्चिम गोपुर ५७४९५ मुग्रम (य) चौथा बलभद्र ६०१२९० मुग्रम (भी) कुण्डलगिरिका दक्षिण दिशाका कट ५१६९२ सुप्रम (व्य) पतवर द्वीपका रक्षक देव ५/६४२ मुभमंकरा (भो) नन्दीश्वर द्वीप- के उत्तर दिशासम्बन्धी अजनगिरिको पूर्व दिशामें स्थित वापिका ५।६६४ मुममा (व्य) मगनिवेगको स्त्री १९५८३ मुप्रमा (पा) समवसरणकै आग्न- बनको वापिका ५७६३५ सुममा (व्य) अमिचन्द्रकी स्त्री मुमद (व्य) एक मुनि ६०।१०० मुमद (व्य) एक सेट ६०१०१ मुमद्र (भी) मध्यम प्रवेयकका द्वितीय इन्द्रक ६५२ मुमद (व्य) नन्दीश्वरवर समुद्र- का रक्षक देव ५.६४५ सुभद्रा (व्य) अन्धकवृष्णिकी स्त्री १८११२ मुमदा (व्य) चारुदतको माता २११६ मुमदा (व्य) विनमिको पुत्री भरतकी पट्टराशी २२।१०६ मुभद्रा (व्य) राजा मेघरयकी स्त्री १८।११२ मुमदा (व्य) वज्रमुष्टिको स्त्री ६०.५१ मुमद्रा (व्य) अर्जुनको स्त्री ४७११८ सुभद्रा (व्य) भरत चक्रवर्तीको पट्टराज्ञी १२:४६ सुमानु (व्य) श्रीकृष्णको सत्य- भामा रानीमे उत्पन्न पुत्र ४८७ मुमानु (व्य) मनुका पुत्र १८३ मुमानु (व्य) मयुराके भान सेठ और उनको यमुना स्त्रीका एक पुत्र ३३३९७ सुमानु (व्य) कृष्णका पुत्र ४८/६९ मुमानुक (व्य) कृष्णका पुत्र ४८।६९ मुभूम (व्य) अष्टम चक्रवर्ती ६०१२८७ मुमोगा (व्य) दिवकुमारी देवी पा२२७ मुमोम (च्य) राजा कार्तवीर्यको स्त्रो ताराके गर्भसे उत्पन्न पुत्र जो चक्रवर्ती हुआ २५४१३ मुमीम (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५।२४ मुमति (वि) उत्तममति - ज्ञानसे युक्त १७ मुमनि (व्य) पांचवें तीर्थंकर १११ मुमति (व्य) पत्रमुष्टि योर सुभद्राको पुत्री ६०५१ सुमति (व्य) विश्वमेनका अमात्य ६०१५८ मुमनि (व्य) कौशाम्बीके राजा सुमुखका मन्त्री १४१५३ मुमतिनाथ (व्य) पञ्चम तीर्थंकर १३१३१ मुमनस (भी) उपरिम वेयक- का प्रथम इन्द्रक ६१५३ मुमनाः(सुमनम्) (भी) नन्दीश्वर द्वीपके उत्तर दिशासम्बन्धी अन्जन गिरिको दक्षिण दिशा- में स्थित वापिका ५/६६४ मुमन्दरगुरु (व्य) एक मुनि- राज १८।११६ मुमन्दिरगुरु (व्य) एक मुनि ३४१४४ मुमिदत्तिका (व्य) सुमित्रदत्त पणिक्की स्त्री २७४४५ मुमित्र (व्य) सागरमेनका पुत्र १८।१९ मुमित्र (व्य) एक तापम ४२०१५ सुमित्र (व्य) कुशाग्रपुरका राजा भगवान् मुनि सुव्रतनाथका पिता १५१६२ सुमित्र (व्य) एक मनुष्य ६०१४४ मुभित्र (व्य) वसुदेव और मित्र- धीर। पुत्र ४८५८ सुप्रमा (व्य) राजा प्रचण्डवाहन- को पुत्री ४५।९८ सुप्रवृद्ध (व्य) मानुषोतरके प्रवाल फूटपर रहनेवाला देव ५।६०६ मुफला (व्य) समुद्रविजयका पुत्र ४८.४४ मुबल (व्य) महावलका पुत्र सुबल (व्य) बलका पुत्र १३१८ मुबाई (व्य) राजा वमुके पुत्र बृहध्वजका लड़का १८१ सुबाहु (व्य) भगवान् ऋपमदेवका गणधर १२०५७ हरिवंदापुराणे सुमिया (व्य) चारुदत्तके मामा सर्वार्थकी स्त्री २११३८ सुमित्रा (व्य) दिकुिमारी देवी ५।२२७ सुमित्रा (व्य) सुमद्र सेठको स्त्री ६०।१०१ सुमित्रा (व्य) अरिष्टपुरके राजा वासवको स्त्री ६०७६ सुमुख (व्य) वसुदेवका पुत्र सुमुख (व्य) हयपुरीका राजा ४४।४७ सुमुख (व्य) वत्सदेश-कौशाम्बी नगरीका राजा १४॥६ सुमुख (व्य) वसुदेव और अवन्ती का पुत्र ४८५६४ सुमेघा (भौ) नन्दनवनम रहने- वाली दिक्कुमारी देवी ५.३३३ सुयोधन (व्य) कौरवाग्रज ५०1८१ सुरदत्त (व्य) भगवान ऋषभदेव का गणधर १२१५६ सुरदेव (व्य) ६०५५८ सुरदेवी कूट (भौ) शिखरिकुला- चलका चौथा कूट ५।१०६ सुरादेवी कूट (भौ) हिमवत् कुलाचलका नौवां कूट ५१५४ मुरमि- सुगन्धित १८।१६१ सुरा (व्य) रुचिकगिरिक जग- त्कुमुम कूटपर रहनेवाली सुरेन्द्रदत्त (व्य) एक सेठ १८४९८ सुरेन्द्रवर्धन (व्य) एक विद्याधर ४५1१२६ सुरेश्वर =इन्द्र २।२६ सुलक्षणा (व्य) धरणोतिलकके राजा अतिबलको स्त्री २७१७८ सुलस (भौ) निषघ पर्वतसे उत्तर- की ओर नदीके मध्य में स्थित एक हद ५।१९६ सुलसा (व्य) वाराणसीके सोम- शर्मा ब्राह्मणको एक पुत्रों थी २२।१३२ सुलपा (व्य) धारण युग्मके राजा अयोधन और दितिकी पुत्री २३१४८ सुलोचना (व्य) सुलोचना नामको कथा, और अच्छे नेत्रोवाली स्त्री ११३३ सुलोचना (व्य) वाराणसोके राजा यकम्पनको पुत्री, जो जयकुमारको विवाही गयो १२।८ सुवक्त्र (व्य) विद्युन्मुखका पुत्र १३।२४ सुवसु (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५।२६ मुवज्र (व्य) वनका पुत्र १३१२२ सुवत्सा (भौ) पूर्वविदेहका एक देश ५।२४७ सुवप्रा (भौ) पश्चिम विदेहका एक देश ५।२५१ सुवर्णकूट (मौ) शिखरिकुला- चलका सातवाँ कूट ५।१०६ सुवर्णकूला (भौ) एक महानदो ५।१२४ सुवर्णद्वीप (भौ) एक द्वीप जहाँ चारुदत्त व्यापारके लिए गया २२११०१ मुवर्णप्रम (भी) सौमनसवनका एक भवन ५/३१९ मुवर्णभवन (भी) सौमनसवनका एक भवन ५।३१९ मुवर्णरिक्षा- स्वर्णनिर्मित छोटी- छोटी घण्टियोकी माला २३५ सुवर्णवती (भौ) वरण पर्वतके ममीप पञ्चनद समागमको एक नदी २७।१४ मुवर्णवर (भी) अन्तिम सोलह द्वीपोमें आठवा द्वीप ५१६२४ मुवमु (व्य) राजा वसुका पुत्र १७१५९ मुविधि (व्य) भगवान् ऋषभ- देवका पूर्वभव ९५९ सुविशाल (व्य) ऋषभदेवका गणधर १२१६७ सुविशाल (भी) मध्यम ग्रेवेयक का तृतीय इन्द्रक ६५२ मुवीर (व्य) यदुवशी राजा नर- पतिका पुत्र १८८ सुवीर (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२।३२ मुवीयं (व्य) अतिवीर्यका पुत्र १३३१० सुपत (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५.११ सुबत (व्य) मुनिसुव्रतनाथका पुत्र १७११ सुबत (व्य) आगामी तीर्थकर ६०१५५९ सुधत (व्य) एक मुनि ४६।५१ सुचता (व्य) अर्हद्दाम राजाको स्त्री २७.११२ सुव्रता (व्य) एक आयिका ३३।१६४ मुव्रता (व्य) एक आयिका ४९।१४ देवी ५१७१२ मुराष्ट्र (मौ) सौराष्ट्र देश-काठिया वाड़ ४४।२६ सुराष्ट्र (भी) देशका नाम १९७२ मुराष्ट्र (मौ) सौराष्ट्र देश ६०१७१ सुरेन्द्रदत्त (व्य) चारुदत्तके पिताका मित्र २१७८ शब्दानुक्रमणिका १५५ सुशान्ति (व्य) कुरुवशका एक सूक्ष्मसाम्पराय (पा) चारित्र- राजा ४५/३० भेद ६४॥१८ सुपड्जा = पड्जस्वरसे सम्बद्ध सूक्ष्मसाम्पराय (पा) दसवां गुण- जाति १९१७४ स्थान ३१८२ सुपमा (पा) अवसर्पिणीका दूसरा सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति (पा) शुक्ल काल ७१५८ ध्यानका तीमरा भेद ५६१७१ मुपमादु.पमा (पा) अवसपिणी सूतक (सूदक) = पारा का चौथा काल ७१५८ ४॥३६५ मुषमादुःपमा (पा) अवसर्पिणी सूत्र (पा) दृष्टिवाद अङ्गका एक का तीसरा काल ७५८ भेद १०१६१ मुषमामुपमा (पा) अवसपिणी सूत्रकृताङ्ग (पा) द्वादशाङ्गका का पहला काल ७५८ एक भेद २१९२ सुपिर = छिद्रसहित वादिन सूत्रगत (पा) दृष्टिवाद अङ्गका बाँसुरी आदि १९३१४२ एक भेद २२९६ सुषेण (व्य) महासेनका पुत्र सूत्रामणि (व्य) रुचिकगिरिके ४८।४१ निद्योद्योतकूटपर रहनेवाली मुसीमा (व्य) अजाखुरीके राजा देवी ५।७२० राष्ट्रवर्धनकी पुत्री ४४।२७ सूपकार = रसोइया २४.१४ सुमीमा (भी) विदेहकी एक सूर (भी) देशविशेष ३५ नगरी ५।२५९ सूरदेव (व्य) मथुराके भानु मुस्थित (व्य) लवणसमुद्रका यमुनाका पुत्र ३३३९७ स्वामी देवविशेष ५४१३९ सूरसेन (भी) देशविशेष ३४ मुस्थित (व्य) लवणसमुद्रका सूरसेन (भी) देशका नाम देव ५।६३७ ११।६४ मुहिता - तृप्त १९।२० सूरि (व्य) आचार्यपरमेष्ठी ११२८ मूर्य (व्य) राजा शालका पुत्र मरिसूर्यकृतालोक-आचार्यस्पो १७१३२ सूर्यके द्वारा प्रकाशित ११५४ सूर्य (भी) वि० द० नगरी मूर (भौ) देशका नाम ११७१ २२१९५ सूर्य (व्य) महेन्द्रविक्रमका पुत्र सूर्य (व्य) राजा वमुत्रा पुत्र १७१५९ सूर्यघोष (व्य) कुरवंशका एक मूर्य (व्य) भगवान् कुन्युनायके राजा ४५।१४ पिता ४५०२० मूर्यपुर (भी) भगवान् नेमिनाथ- मूर्य (भी) निपघ पर्वतसे उत्तर का जन्मनगर ३८३३० की ओर नदी में स्थित एक मूर्यप्राप्ति (पा) परिक्र्मश्रुता भेद १०१६२ मयं (य) कृष्णा पुत्र ४८७१ सूर्यग्रम (व्य) रानो गमदत्तारा मयंक (व्य) प्रिमियरका पुत्र जीव महार स्वर्ग में देव २५४१ हमा २१७५ और सूर्यमाल (भी) पश्चिम विदेहका वद्यारगिरि ५।२३२ सूर्याम (व्य) गण्यपुरका राजा ३४।१६ सूर्यावर्त (व्य) वि० उ०के प्रभा- करपुरका स्वामी २७.८० सेन (व्य) यादव ५०११२१ संन्द्र देव २।२८ संतव (भौं) देशविशेष ११७५ सोपारक (भी) एक नगर ६०३६ सोम (व्य) देवविशेष (लोक- पाल) ५।३१७ सोम (व्य) अभिचन्द्रका पुत्र ४८।५२ सोमक (व्य) नेमिनाथका प्रथम गणधर ६०॥३४८ सोमदत्त (व्य) महापुरको राजा २४।५१ सोमदत्त (व्य) एक राजा ५०1८४ सोमदत्त (व्य) भगवान् ऋपम- देवका गणधर १२०५६ सोमदत्तमुता (व्य) सोमदत्तकी पुत्री वसुदेवको स्त्री ११८४ सोमदत्त (व्य) सोमदेव और सोमिलाका पुत्र ६५५ सोमदेव (व्य) एक ब्राह्मण ६४५ सोमप्रम (व्य) हस्तिनापुरका राजा४५७ सोमभूति (व्य) एक पुरुष ६४.५ सोमयशम्(व्य)मुमित्र तापसको स्त्री ४२१२५ मोमयशम् (च्य) वाहुबलीका पुत्र १३३१६ सोमधी (व्य) महापुरके राजा मोमदत्तकी पुत्री २४१५२ मोव (मी) देगानाम १११६५ मोमशर्मा (व्य) वागणमोका एक ब्राह्मण २१1१३१ हरिवंशपुराणे सोमश्री (व्य) स्त्री ६४६ सौमनस (भी) मेरुका एक वन सोमश्री (व्य) चारुदत्तको स्त्री ५.३०८ १२८२ सौमनसवन (भौ) मेरु पर्वतका सोमधी (व्य) गिरितटवासी एक बन ५।२९५ वसुदेव ब्राह्मणको पुत्री सौमनस्य(भी) मेरुको पूर्व दक्षिण २३।२९ दिदशामें स्थित एक रजतमय सोमा (व्य) एक कन्या जो वसुदेव पवत ५।२१२ की स्त्री हुई ११८० सौमनस्य (भी) उपरिमवेयक- सोमा (व्य) सोमशर्मा ब्राह्मणको का द्वितीय इन्द्रक ६१५३ पुत्री जिसे राजकुमारने सौमनस (भौ) वि० उ० नारी विवाहा ६०११२८ २२१९२ सोमा (व्य) सुग्रोव गन्धर्वाचार्य- सौराज्य - उत्तम राज्य ५४१३ की पुत्री १९१५५ सौरूप्य - मौन्दर्य २१॥४२ सोमिनी (व्य) त्रिशृङ्गपुरके सेठ सौम्य (भी) अनुदिश ६६३ प्रियमित्रकी स्त्री४५०१०१ सौम्यरूपक (भौ) अनुदिश६०६३ सोमिल (व्य) सोमदेवकी स्त्री सौवीर (भौ) देशविशेष ३५ ६४/५ सौवीर (भौ) देशका नाम११।६७ सोमिल (व्य) एक पुरुष ६४१५ सौवीरी-मध्यमको एक मूच्छंना सोमिला (व्य) दाराणसीके १९।१६३ सोमशर्मा ब्राह्मणको स्त्री सौर्पक (व्य) एक विद्याधर २१११३१ राजा २५१६३ सीकर (भौ) वि० उ० नगरी मौहित्य - तृप्ति-सुख १६४५ २२१८७ स्कन्धावार - सेनाका निवेश- सौगन्धिक कूट(भौ)मानुषोत्तरको पडाव १११२७ पूर्वदिशाका एक कूट ५।६०३ सौदास (व्य) एक राजा म्कन्ध(पा)आग्रायणी पूर्वके चतुर्थ १९८३ प्राभृतका योगद्वार १०१८६ सौदास (व्य) काञ्चनपुरके स्तनक (मी)शर्कराप्रभा पृथिवी- राजा जितशत्रुका पुत्र के द्वितीय प्रस्तारका इन्द्रक २४।१३ विल ४१०६ सौदामिनी - बिजली ५९।४. स्तनलोलुप (भी) शर्कराप्रभा सौधर्म (भो) पहला स्वर्ग ६६३६ पृथिवीके एकादश प्रस्तारका मोधर्म (भी) पहला स्वर्ग ८३१४८ इन्द्रक विल ४११५ सौनन्दक - कृष्णकी तलवार स्तनित - मेघकी गर्जना ३१२३ स्तनितकुमार = भवनवामी देवो- सीमनमकूर (भी) सौमनस्य का एक भेद ३२२३ पर्वतका एक कूट ५।२२१ म्तम्भन = विद्यास्त्र २५।४८ सौमनस (भी) रुचिकगिरिका स्तरक(भौ) शर्कराप्रभा पृषिदोके पश्चिम दिशासम्बन्धी बूट प्रथम प्रस्तारका इन्द्रक बिल ५1०१३ ४११०५ स्तिमितसागर(व्य)अन्यकणि धौर सुभद्राका पुत्र १८४१३ स्तुति = चौबीस तीर्थकरोका स्त. वन ३४।१४३ स्तेनप्रयोग (पा) अचौर्याणुनत- का अतिवार ५८.१७१ स्तेनाहृतादान(पा) अचोर्याणुव्रत- का अतिचार ५८।१७१ स्तोक (पा) सात प्राणोंका एक स्तोक होता है ७२० स्थलगता (पा) दृष्टिवाद अङ्ग- के चूलिकाभेदका उपभेद १०११२३ स्थापनासस्य (पा) दश प्रकारके सत्योम-से एक सत्य १०११०० स्थान-शारीरस्वरका भेद १९।१४८ स्थानाग(पा) द्वादशाङ्गका एक भेद २१९२ स्थाने (अ)युक्न-ठोक ३।१९६ स्थिति = ध्रौव्य-पूर्व और आगामी दोनों पर्यायोमें रहना ३९७ स्थितिबन्ध(पा)बन्धका एक भेद ५८।२०३ स्थितिभुक्ति (पा) मुनियोका एक मूल गुण, खड़े-खड़े आहार लेना २।१२८ स्थिरहृदय (व्य) कुण्डलगिरिके अङ्ककूटका निवासी देव ५।६६३ स्नातक (पा) मुनिका एक भेद ૬.૫૮ स्पर्श (पा) आमायणीके चतुर्थ प्राभूतका योगद्वार १०८२ स्पर्शनक्रिया (पा) एक क्रिया ५८.७० स्फटिक (भौ) सौधर्मयुगलका अठारहवां इन्द्रक ६:४६ स्फटिक (भौ) रत्नप्रभाके सर- भागका वैरहवा पटल ४।५४ शब्दानुक्रमणिका स्फटिक (भी) रुचिकगिरिका स्वयंप्रमा (व्य) स्तिमितसागर- उत्तर दिशासम्बन्धी कूट को स्त्रो १९।३ ५१७१५ स्वयंभू (व्य) कुन्युनायका प्रथम स्फटिककूट (भौ) भानुपोत्तरको गणधर ६०1३४८ उत्तर दिशाका कूट ५।६०५ स्वयंभू (व्य) पाश्वनाथका प्रथम स्फटिककूट (भी) गन्धमादन गणधर ६०१३४९ पर्वतका एक कूट ५।२१८ स्वयंभू (व्य) आगामी तीर्थकर स्फटिक, स्फटिकाम (भी) ६०५६१ कुण्डलगिरिको उत्तर दिशा- स्वयंभू (च्य) तोमरा नारायण सम्बन्धो कूट ५१६९४ ६०१२८८ स्फटिकसाल (पा) स्फटिकमणि- स्वयंभू (व्य) विदेहके एक तीर्थ- से बना हुआ समवसरणका इर २०१७ तीसरा कोट ५७४५६ स्वयंभूरमणद्वीप (भी) अन्तिम स्फुट (व्य) जरासन्धका पुत्र सोलह द्वीपोंमें सोलहवां द्वीप ५२०३३ ५।६२५ स्फुटिक (भौ) अनुदिश ६६६४ स्वयंभूरमणसमुद्र (भी) सबसे स्मितयशस् (व्य) अर्ककोतिका अन्तिम समुद्र ५५६२६ पुत्र १३७ स्वयंम (व्य) विदेहके एक स्मृत्यनुपस्थान (पा) सामायिक तीर्थकर ३४॥३६ व्रतके अतिचार ५८१८० स्वयंप्रभगिरि (भौ) स्वयम्भूरमण स्मृध्यन्नराधान (पा) दिग्गतका अतिचार ५८४१७७ द्वीपके मध्य में स्थित वलया. स्रोतोऽन्तर्वाहिनी (भी) विदेहको कार एक पर्वत ५१७३० एक विभंगा नदी ५२४१ स्वर-बैंगस्वरका एक भेद स्वपाक-दिति देवीके द्वारा प्रदत्त १९११४७ विद्यानिकाय २२१५९ स्वर गारीर स्वरका १९१४८ स्वप्न (पा) अष्टाङ्ग निमित्तशान- स्वर - पदगत गान्धवकी विधि का एक भेद ११११७ १९४१४९ स्वयंम (भी) रुचिकगिरिका स्वर (पा) अष्टाङ्गनिमित्त ज्ञान- पश्चिम दिसामम्बन्धी एक का एक बड्न१०१११७ विशिष्ट कूट ५/७२० स्वरित - बैदमें प्रयुक्त होनेवाला स्वयंप्रम (व्य) आगामो तीर्थकर स्वरविशेष ( समाहार. स्व. ६०५५८ रितः) १७२८७ स्वयंप्रभविमान (भी) सोमलोक- स्वगीदेव १८१७० पालका विमान ५।३२३ स्वर्णनाम (हिरण्यनाम ) (व्य) स्वयंप्रमा (व्य) धनद- स्त्री ६०१५० राजा कपिरवा पत्र ३११६२ स्वयंघमा (व्य) सत्यभामाको বগম (যত্রী বিশ माता ६०१२२ ६०११२१ स्वयंप्रमा (पा) समवमरपके स्वर्णनाम (भो) वि. ६०मगरी याप्रवनकी वारिता ५७३५ २२।१५ स्वर्णवाहु (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२।३६ स्वर्णाभपुर (व्य) विजयाको दक्षिण श्रेणीका एक नगर २४॥६९ स्वस्तिकनन्दन ( भौ) रुचिक- गिरिका कूट ५१७०६ स्वस्तिक (भो) रुचिकगिरिको दक्षिण दिशाका कुट ५५७०२ स्वस्तिक (भौ) मेरुसे दक्षिणको ओर सीतोदा नदीके पूर्वतट- पर स्थित एक कूट ५५२०६ स्वस्तिक (व्य) कुण्डलगिरिके मणिप्रम कूटका निवासी देव ५१६९३ स्वस्तिकफूट (भौ) विद्युत्प्रभ पर्वतका एक कूट ५।२२२ स्वस्तिमती (व्य) क्षीरकदम्ब. को स्त्री १७१३८ स्वस्थ (ध्य) उग्रसेनके चाचा शान्तनका पुत्र ४८/४० स्वस्रीय - बहनका लडका, भानजा ४८७३ स्वहस्तक्रिया (पा) एक क्रिया ५८५७४ स्वहस्तिन् (व्य) चिकगिरिक स्वस्तिक कूटपर रहनेवाला देव ५७०२ स्वहिण्डवाण्यानं - अपने परि- भ्रमणका वृत्तान्तर १०३ स्वास(पा) अपना-अपना अंगुल ७.४४ कुवेरको स्वानि (व्य) मानुपोतरके तप- नीयक टपर रहनेवाला स्वाति (व्य)हमवत क्षेत्र मामिल गिरिपर रहनेवामा मन्तर पञ्चमः सर्गः द्वाविंशति सहने द्वे शतानि नव विस्तृताः । योजनानि पुनस्तेषां वेदिका भद्रशालवत् ॥२८२।। विदेहक्षेत्रमध्यस्थः कुरुक्षेत्रद्वयावधिः । योजनानां सहस्राणि नवतिनव चोद्धृतः ॥२३॥ मेखलानयसंयुक्तः रयातो मेरुमहीधरः । ऊवं चूलिकयोद्राप्ती सचत्वारिंशदुच्चयः ॥२८॥ सहस्रमवगाहोऽस्य सहस्राणि दशाऽन च । विष्कम्मो नवतिश्च स्याद् दर्शकादशभागकाः ॥२८५|| सैकास्त्रिंशसहस्राणि शतानि नव वै दश । योजनानि तथा भागी साधिको परिधिगिरेः ।।२८६।। तलात् सहनमुद्गत्य सहस्राणि दशोपरि । योजनानि स विष्कम्मो भुमो भवति भूभृतः ॥२८॥ सैकस्विंशरसहस्राणि पट्शती विंशतिद्वयम् । योजनानि त्रयः क्रोशाः शते द्वादश दण्डकाः ॥२८॥ हस्तात्रयस्तथैव स्थादगुलानि त्रयोदश । साधिकानि परिक्षेपो भद्रशालेऽद्रिगोचरः ॥२८॥ गत्वा पञ्चशतीमूवं मेखलायां तु नन्दनः । स्यात्पञ्चशतविष्कम्भं मन्दरं परितो वनम् ॥२०॥ नव तत्र सहस्राणि शतानि नव पट्कलाः । चतुःपञ्चाशदप्यस्य विष्काभः पुष्कलो गिरेः ॥२६॥ एकत्रिंशत्सहस्राणि तथा तत्र चतुःशती । गिरेबाह्यपरिक्षेपः साधिका नवसप्ततिः ॥२६२।। स एव च सहस्रोनो विष्कम्भोऽभ्यन्तरः स्फुरः । नन्दने मन्दरस्थ स्यात् परिक्षेपोऽपि वक्ष्यते ।।२१३॥ अष्टाविंशतिरेप स्यात् सहस्राणि शतत्रयम् । पोडशाप्राः कलाश्चाटी परिधिः साधिका गिरेः ॥२६४।। सहस्राणि द्विपष्टिं च गन्धा पञ्चशती ततः । नन्दनेन समानं तद् वनं सौमनसं भवेत् ।।२३५।। चत्वारि च सहस्राणि शते द्वे च द्विमप्ततिः । भष्टी भागाश्च विष्कम्भो वाह्यस्तत्र मवेगिरेः ॥२६॥ परिक्षेपः पुनस्तस्य सहस्राणि प्रयोदश । शतं पञ्चतयं ज्ञेयमेकादश च पट कलाः ॥२७॥ वाह्यो यो गिरिविष्कम्भः सहस्रेण स वर्जितः । स्यादभ्यन्तर विष्कम्मस्तस्येति मुनयो विदुः ॥२८ पर्यन्त लम्बे तथा समुद्र तटसे मिले हुए चार देवारण्य [दो देवारण्य, दो भूतारण्य] वनके प्रदेश हैं २८१॥ इन यनोंकी वेदिकाएँ भद्रशाल वनके समान बाईस हजार दो सौ नी योजन विस्तृत हैं ॥२२॥ विदेह क्षेत्रके मध्यमे प्रसिद्ध मेरु पर्वत स्थित है, उसकी सीमा देवकुरु और उत्तर- कुरु तक फैली हुई है, वह निन्यानवे हजार योजन ऊँचा है, तीन मेखलाओंसे युक्त है, चालीस योजन ऊँची चलिकासे सुशोभित है, उसकी गहराई एक हजार योजन है और पृथिवी तल- पर चौड़ाई दश हजार नब्बे योजन तथा एक योजनके ग्यारह भागोंमें दश भाग प्रमाण है ॥२८३-२८५॥ उसकी परिधि इकतीस हजार नौ सौ दश योजन तथा कुछ अधिक दो भाग प्रमाण है ॥२८६|| तल भागसे एक हजार योजन ऊपर चलकर पृथिवीपर इस पर्वतकी चौड़ाई दश हजार योजन है ।।२८७॥ भद्रशाल वनके समीप इसकी परिधि इकतीस हजार छह सी वाईस योजन तीन कोश बारह धनुप तीन हाथ और कुछ अधिक तेरह अगुल है ॥२८५-८६ भद्रशाल वनसे पाँच सौ योजन ऊपर चलकर मेरु पर्वतकी चारों ओर मेसलापर पाँच सी योजन चौड़ा दूसरा नन्दन वन है ।।२६०॥ वहाँ इस पर्वतकी चौड़ाई नौ हजार नौ सौ चौवन योजन छह कला है ।।२६१॥ नन्दन वनके समीप इस पर्वतकी बाह्य परिधि इकतीस हजार चार सौ उन्यासी योजनसे कुछ अधिक है ॥२६२॥ भीतरी चौड़ाई आठ हजार नौ सौ चौवन योजन छह कला है। अब इसकी अभ्यन्तर परिधि कहते हैं । नन्दन बनके समीप मेस- की अभ्यन्तर परिधि अट्ठाईस हजार तीन सौ सोलह योजन तथा कुछ अधिक आठ कला है IR६४॥ नन्दन वनसे साढ़े बासठ हजार योजन पर चलकर तीसरा सौमनस बन है। यह चन नन्दन वनके ही समान है. ॥२१५सौमनस वनमें पर्वतको बाह्य चौड़ाई चार हजार दो सौ बहत्तर योजन आठ कला है ||२६|| और बाह्य परिधि तेरह हजार पाँच सौ ग्यारह योजन यह कला है ॥२६७॥ पर्वतकी जो याह्य चौड़ाई यतलाई है उसमें एक हजार योजन कम करने १ चोच्छिता म०। १२ १५७ स्वर्णबाहु (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२०३६ स्वर्णामपुर (व्य) विजयाको दक्षिण श्रेणीका एक नगर २४/६९ स्वस्तिकनन्दन (भौ) रुचिक- गिरिका कूट ५१७०६ स्वस्तिक (भी) रुचिकगिरिको दक्षिण दिशाका कूट ५१७०२ स्वस्तिक (भौ) मेरुसे दक्षिणको और सोतोदा नदीके पूर्वतट. पर स्थित एक कूट ५।२०६ स्वस्तिक (व्य) कुण्डलगिरिके मणिप्रभ कूटका निवासी देव दूर २०१७ शब्दानुक्रमणिका स्फटिक (भौ) रुचिकगिरिका स्वयंनमा (व्य) स्तिमितसागर- उत्तर दिशासम्बन्धी क्रूट को स्त्रो १९।३ ५७१५ स्वयंभू (व्य) कुन्थुनायका प्रथम स्फटिककूट (भौ) मानुपांतरकी गणघर ६०३४८ उत्तर दिशाका कूट ५०६०५ स्वयंभू (व्य) पावनायका प्रथम स्फटिककूट (भी) गन्धमादन मणघर ६१३४९ पर्वतका एक कूट ५।२१८ स्वयंभू (व्य) आगामी तीर्थकर स्फटिक, स्फटिंकप्रम (भी) ६०.५६१ कुण्डलगिरिको उत्तर दिशा- स्वयंभू (व्य) तोमरा नारायण सम्बन्धी कूट ५।६९४ ६०१२८८ स्फटिकमाल (पा) स्फटिकर्माण- स्वयंभू (व्य) विदेहके एक तीर्थ- से बना हुआ समवसरणका तीसरा कोट ५७४५६ स्वयंभूरमणद्वीप (भी) अन्तिम स्फुट (व्य) जरासन्धका पुत्र सोलह द्वीपोंमें सोलहवा द्वीप ५२०३३ ५.६२५ स्फुटिक (भी) अनुदिश ६।६४ स्वयंभूरमणसमुद्र (भी) सबसे स्मितयशम् (व्य) अर्ककोतिका अन्तिम समुद्र ५५६२६ पुत्र १३७ म्वयंप्रम (व्य) विदेहके एक स्मृस्यनुपस्थान (पा) सामायिक तीर्थकर ३४॥३६ व्रतके अतिचार ५८.१८० स्वयंप्रमगिरि (भी) स्वयम्भूरमण स्मृत्यन्तराधान (पा) दिग्यतका अतिचार ५८।१७७ दीपके मध्य में स्थित वलया. स्रोतोऽन्तर्वाहिनी (भौ)विदेहको कार एक पर्वत ५१७३० श्रणस्वरका भेद एक एक विभंगा नदो ५।२४१ ११।१४७ स्वपाक-दिति देवी के द्वारा प्रदत्त विद्यानिकाय २२२५९ स्वर -शारीर स्वरका १९११४८ स्वप्न (पा) बटाङ्ग निमित्तज्ञान- स्वर - पदगत गान्धर्वकी विधि का एक भेद १०१११७ १९।१४९ स्वयंप्रम (भी) चिकगिरिका स्वर (पा) अष्टाङ्गनिमित्त शान- पश्चिम दिशामभ्वन्धी एक का एक अङ्ग १०१११७ विशिष्ट कूट ५१७२० स्वरित - वेदमें प्रयुक्त होनेवाला सयंम (व्य) आगामी तीर्थकर स्वर विशेष ( ममाहारः स्व. ६०१५५८ स्वयंप्रभविमान (भी) मोमलोक- रितः ) १७५८७ स्वर्गादेव १८१७० पालका विमान ५।३२३ स्वर्णनाम (हिरण्यनाम ) (स्य) कुर्वरको राजा रुधिरका पत्र ३११६२ स्वयंशमा (व्य) मत्यमामाको स्वर्णनाम (न्य) पद्यावतीका पिता माता ६.१२२ ६०१२२ स्वयंप्रभा (पा) समवमरणके स्वर्णनाम (भी) दि. ८०नगरी नवनशे वापिका ५७।३५ २२।९५ लरका, स्वस्तिकफूट (भी) विद्युत्प्रभ पर्वतका एक कूट ५।२२२ स्वस्तिमती (व्य) क्षौरकदम्ब. को स्त्री १७७३८ स्वस्थ (व्य) उग्रसेनके चाचा शान्तनका पुत्र ४८।४० स्वस्नीयबहनका भानजा ४८७३ स्वहस्तक्रिया (पा) एक क्रिया ५८/७४ स्वहस्तिन् (व्य) रुचिकगिरिक स्वस्तिक कूटपर रहनेवाला देव ५७०२ स्त्रहिण्यवापानं - अपने परि- भ्रमणका वृत्तान्त १।१०३ स्वागुल (पा) अपना-अपना अंगुल ७४४ स्वाति (व्य) मानुपोत्तरके तप- नीयक घटपर रहनेवाला स्वयंप्रमा (व्य) धनद स्वाति ध्योहमवन क्षेत्र नामि. गिरिपर रहने वाला व्यन्तर २५१६४ १५६ हरिवंशपुराणे स्तिमितसागर(व्य)अन्धकणि और सुभद्राका पुत्र १८०१३ स्तुनि = चौबीस तीर्थकरोका स्त- वन ३४/१४३ स्तनप्रयोग (पा) अचौर्याणुव्रत- का अतिचार ५८१७१ स्तैनाहतादान(पा) अधौर्याणुव्रत- का अतिचार ५८१७१ स्तोफ (पा) सात प्राणोका एक स्तोक होता है ।२० स्थलगता (पा) दृष्टिवाद अन्न- के चूलिकाभेदका उपभेद १०११२३ स्थापनासत्य (पा) दश प्रकारके मत्योम-से एक सत्य१०।१०० स्थानदारीरस्वरका भेद १९1१४८ स्थानाङ्ग(पा) द्वादशाङ्गका एक भेद २।९२ सोमश्री (व्य) स्त्री ६४.६ सौमनस (मो) मैरुका एक वन सोमश्री (य) चारुदत्तकी स्त्री ११८२ सौमनसवन (भी) मेरु पर्वतका सोमश्री (व्य) गिरिलटवासो एक वन ५।२९५ वसुदेव ब्राह्मणको पुत्री सौमनस्य(भौ) मेरुको पूर्व दक्षिण २३१२९ दिशामें स्थित एक रजतमय सोमा (व्य) एक वन्या जो वसुदेव पवत ५।२१२ की स्त्री हुई १६८० सौमनस्य (भी) उपरिमाबेयक- सोमा (व्य) सोमार्मा ब्राह्मणकी का द्वितीय इन्द्रः ६१५३ पुत्री जिसे राजकुमारने सौमनस (भौ) वि० उ० नगरी विवाहा ६०११२८ २२३९२ सोमा (व्य) सुग्रीव गन्धर्वाचार्य- सौराज्य = उत्तम राज्य ५४१३ की पुषी १९५५ सारूप्य = मौन्दर्य २११४२ सौमिनी (व्य) त्रिशृङ्गपुरक सेठ सौम्य (भी) अनुदिश ६।६३ विपमित्रकीस्त्रो ४५।१०१ सौग्यरूपक (भौ) अनुदि।६।६३ सौमिल (व्य) सोमदेवकी स्त्री सौवीर (भी) देशविशेष ३.५ ६४.५ सौवीर (भी) देशका नाम११।६७ मोमिल (य) एक पुरुष ६४१५ सौवीरी=मध्यमको एक मूछना सोमिला (व्य) वाराणसी १९।१६३ सोमशर्मा ग्राह्मणकी स्त्री सर्पक (स्य) एक विद्याधर २१३१३१ राजा २५१६३ सोकर (भी) वि० उ० नगरी साहित्य = तृप्ति-मुख १९४५ २२१८७ स्कन्धावार - सनाका निवेश- मांगन्धिक कूट(भी)मानुषोत्तरको पड़ाव १११२७ पूर्वदिशाका एक बूट ५।६०३ सादाम (व्य) एक राजा स्कन्ध(पा)आग्रायणो पूर्वके चतुर्थ १५८३ प्रामृतका योगद्वार १०१८६ मौदास (य) काश्चनपुरके स्तनक (भी) शर्करानमा पषिवी. राजा जितका पुत्र के दिनो प्रस्तारका इन्द्रक २४॥१३ दिल ४।१०६ मौदामिनी-विलो ५९४४० स्तमलोलुप (भी) दाराप्रमा मोधर्म (भी) पदमा स्वर्ग ६१३६ पृथिवीके एकादश प्रस्तारका माधम (भी) पहला स्वर्ग ८३१४८ इन्द्रका विल ४११५ मानायक पृष्णकी तरवार स्तनित मश्की गर्जना दा२३ मनितकुमार - भवनवामी देवो. मामनपार (भी) गोमनाम पाएर भेट ३२३ पर्वतरा एकपूर ५१२२१ स्तम्भन - विद्यास्त्र २५४८ मोमना (भी) ािनिग्विा स्वर(मा) पराप्रमा पषियी परिमागासपोर प्रथम प्रस्तारसान्द्रकविन ४११०५ स्थाने (अ)युक्त-ठोक ३३१९६ स्थिति प्रोग्य--पूर्व और भागामी दोनो पर्यायाम रहना ३९७ स्थितियन्ध(पा)बन्धका एक भेट ५८।२०३ स्थितिभुक्ति (पा) मुनियोकर एक मूल गुण, खड़े-पड़े आहार लेना २०१२८ स्थिरहृदय (व्य) कुण्डलगिरिक अटवा निवासी देव ५१६६३ स्नातक (पा) मुनिका एक भेद ६०१५८ स्पर्ग (पा) आमायणी के पतुर्भ प्राभनका योगदार १.८२ सनक्रिया (पा) एक क्रिया ५८१७० स्फटिक (भी) गोधर्मगुगलका अटारहयो क४६ पटिक (भी) रत्नप्रभारे सर भागका तैरहवा पटल ४४५४ १५९ शब्दानुक्रमणिका हिममुष्टि (व्य) वसुदेव मदनवेगा हुण्डकसंस्थान (पा) एक संस्थान ४।३६८ का पुत्र ४८।६१ हिमवत् (व्य) एक राजा हुताशन = अग्नि १५॥३० ४८।४७ हृदिक (व्य) राजा वृपमित्रका हिमवान् (व्य) जरासन्धका पुत्र पुत्र ४८।४१ हृषीकेश (व्य) जरामन्चका एक ५२।३५ हिमशीकर-वरफके कण पुत्र ५२१३६ १५।३९ हृप्यका - स्वरग्रामको एक हिमवत कूट (भौ) हिमवत् कुला- मूर्च्छना १९३१६४ चलके ग्यारह कूटोंमें से एक हृष्यकान्ता-स्वरग्रामको एक मूच्छंना १९।१६७ कूट ५।५३ हिरण्यगर्म (व्य) हिरण्यं गर्भ हेतु- कारण ७.१४ यस्य सः = भगवान् ऋषभ- हला = क्रीडा ३६६३७ देवका एक नाम ८।२०६ हेमवेत्रकर = सोनेकी छड़ी हाथमें हिरण्यनाम (व्य) एक यादव लेकर ८५३ महारथी राजा ५०७९ हैदिम्ब =हिडम्ब वंशमम्वन्धी हिरण्यवती (न्य) हिडम्बवंशक ४५।११८ राजा सिंहघोष और रानी हम (पा) पांच वर्ण के मणियोमें- सुदर्शनाकी पुत्री ४५।११५ एक मणि ७७२ हिरण्यवती (व्य) राजा अतिबल हैमवत कूट (भी) महा हिमवान् और उसकी रानी धीमती पर्वतके बाठ कूटामें से एक की पुत्री २२।१३० हिरण्यवर्मा (व्य) जयकुमारके हेमामन -स्वर्णमय सिंहासन पूर्वभवका नाम १२:१३ हयद्रवीन = नवनीत १८।१६२ हरण्यवत कूट (भौ) शिखरी पर्वतके अग्रभागपर स्थित एक कूट ५।१०६ हरण्यवत कूट (भी) रुक्मी पर्वत- के अग्रभागमें स्थित एक फूट ५।१०३ हरण्यवत (भी) जम्बूद्वीपके सात क्षेत्रों में से एक क्षेत्र ५.१४ हेमवत (भी) जम्बूद्वीपके सात क्षेत्रोमें एक क्षेत्र ५।१३ हृदवी(व्य)नीलपर्वतसे निकली हुई एक नदी ५६२३९ ही (व्य) पद्मसरोवरको एक देवी ५.१३० ह्री (व्य) उत्तर दिशाके आठ कूटोंमें-से छठे कुण्डल बूटपर स्थित एक देवी ५७१६ होकूट (भौ) महाहिमवान् पर्वत. के आठ कूटोमें से एक कूट ५।७२ हीकूट (भी) निपघ पर्वतके नी कूटोम-से एक कूट ५।८९ हीमन्त (भी) एक पर्वत २२।१४३ बूट ५१७२ ८1० हरिवंशपुराणे देवी ५१७०८ स्वाध्याय शास्त्राच्ययन करते हरित (भी) जम्बूद्वीपको एक हुए अपनी आत्माका नदी ५।१२३ अध्ययन करना श६९ हरिवषं (भी) महाहिमवान्के स्वायम्भुव (व्य) ऋषभदेवका आठ कूटोम-से एक फूट गणघर १२०६४ ५।७२ स्वार्थसम्पन्न (वि) आत्महितसे हरिद्वती (भी) विजया दक्षिण युक्न ११९ श्रेणीको एक नदी २७।१३ स्वस्थिना (व्य) रुचिकगिरिके हरियप (भी) निपध पर्वतके नौ अमोघ कूटपर रहनेवाली कूटीम से एक कूट ५।८८ हरिपेण (व्य) मिथिलाके राजा [ह] देवदत्तका पुत्र १७३३४ हंस - बत्तखके आकारका एक हरिवंश= भगवान् नेमिनाथका वश ७१ जलपक्षी, जो बड़ी-बड़ी झीलोमें रहता है ८।१४४ हरिवंश = जैनपुराण ११५१ हंसगर्म (भी) विजयाचं उत्तर- हरिविष्टर - सिंहासन ३८॥१६ श्रेणोकी एक नगरी २२२९१ हरिशक्तिः= हरे. मिहस्येव शक्तिर्यस्य सः ३६।४३ हरि (व्य) राजा आर्य और मनोरमाका पुन १५१५७ हरिश्चन्द्र (व्य) आगामी नौ बलभद्रोमें से पांचवां वलभद्र हरि (व्य) कृष्ण ३५।२२ हरि-मट ५५३११७ ६०१५६८ हरि-मिह ५५।११७ हरिपेण (व्य) दमदा चक्रवर्ती ६०.५१२ हरि = विष्णु ५५.११७ हरिषेणा (व्य) अयोध्याके राजा हरि - इन्द्र ५५३११७ घोषेणकी श्रीकान्ता स्त्रीसे हरिस्पट (व्य) दूसरा प्रति- उत्पन्न कन्या ६४।१३० नारायण ६०१५६९ हरिदमच (व्य) राजा अश्वग्रीव- हरिचन्द्र (व्य) कृष्णचन्द्र का मन्त्री २८।३२ ५४७३ 'हरिश्मश्रु (व्य) राजा विनामिका इरिक्षेत्र (भौ) जम्बूद्रोपके सात पुत्र २२११०४ क्षेत्रोम एक क्षेत्र ५१३ हरिचन्द्र (व्य) एक मुनि हरिकण्ठ (व्य) हयग्रीवका दूसरा २७८३ मन्त्री २८५४३ हरिमह कूट (भौ) विद्युत्प्रभ हरिण = हिरनकी एक जाति पर्वतपर स्थित नो कूटोम- ८1१३७ से एक फूट ५।२२३ हरिमन्त (भी) महाहिमदानके हरिसह क्ट (भी) माल्यवान् आठ टीम-मे एक कूट पर्वतपर स्थित नो कूटोमे ५।२ एक कूट ५२२० हरिकान्ता (भी) महा पद्महदमे हस्तिनायक (भी) विजया निकली हुई एक नदी उत्तर श्रेणीको एक नगरी ५२१३३ २२३८७ हस्तन्यास - धरोहर १७७९ हस्तसंवाहन - हाथ दवाना ८।४६ हस्तमहलिका (मी) चौरासी लाख गिर:प्रकम्पितीको एक हस्तप्रहेलिका होती है ७.३० हलधर 3 बलभद्र २५१३५ हलभृद् (व्य) बलदेव ३६.१६ हलायुध (व्य) बलदेव ३५।६२. हली (व्य) वलभद्र १।१२७ हायन =वर्ष ५२।२० हार = एक आभूषण ७८९ हारिद्र (भी) इकतीस पटलोम-से एक पटल ६।४६ हारी (व्य) इन्द्रका आज्ञाकारी एक देव ३३.१६९ हारी =एक विद्या २२०६३ । हास्निन (भी) विजयाधं उत्तर श्रेणीको एक नगरी २२८७ हास्तिविजय (भौ) विजया उत्तर श्रेणीको एक नगरी २२१८६ हास्तिनपुराधीश - हस्तिनापुर- का राजा १२११० हिंसा प्रमत्तयोगात् प्राणव्य- परोपणं हिंसा (त० ० ७.१३) ५८।१२७ हिसान्युदाम- हिमाका त्याग १७११६४ हिडम्ब (व्य) विन्ध्याचलके सन्ध्याकार नामक नगरका एक वश ४५।११४ हिमवान् (व्य) अन्धक्वृष्णिका सुभद्रामे उत्पन्न पुत्र १८।१३ हिमपुर (भी) विजया दक्षिण श्रेणीको नगरी २२।९८ हिमवान् (भी) जम्बूद्वीपका एक पर्वन ५.१५ D शीतलनाथ बासुपूज्य रण कन्दी ग्रीव अच्युत भदिल हढ़रथ श्रेयांसनाथ पुष्पोत्तर सिंहपुर विष्णु वेणुदेवी फाल्गुन शु० २१ श्रवण मा महाशुक्र चम्पा वमुपूज्य विजया फाल्गुन शुक्ला १४ विशाखा इक्ष्वाकु इश्याकु मार्गशीर्ष शुक्ला १ माघ कृष्णा १२ पूर्वापाढ़ा इत्वाकु इक्ष्वाकु १२ लाख पूर्व १ लाख पूर्व ६३ लाख पूर्व १ लाख पूर्व न १०० धनुष ९. धनुप णे शक्लवर्ण मुवर्णवर्ण पूर ३ लाख पूर्व२८पूर्वाग १ लाख पूर्व म्वस्तिक ८१ लाख वर्ष २१ लाख वर्ष ७२ लाख वर्ष १८ लाख वर्ष ७० धनुष ८० धनुप मुवर्णवर्ण ४० लाख वर्ष गेंडा विद्र मवर्ण राज्य नहीं किया भंस TITETIT १मास पू १ मास पूर्व ५० ०००0 ४८ सम्मेदशिखर रेवती सम्मेदशिर पुप्य प्रत्यूप ज्येष्ट कृ०६ ४००००० १ मास पूर्व ६०० । सम्मेदशिखर | पूर्वाभाद्रपद प्रदोप आपाढ़ शु०८ योगनिवृत्ति सहमुक्त मोक्षस्थान मोक्षनक्षत्र मोक्षकाल मोनतिथि لغلط चैत्र कृ. १५ ४००००० ४००००० १२ आविका २००००० 21 मुत्रता पद्मा सर्वश्री *१०८००० ३२०० २०३००० ३६०८ ४५०० ८००० मुख्य आर्यिका आर्यिकासंख्या चादी विपुलमति २८ पिरियाधारी कंवली ३६ अधिज्ञानी शिक्षक ३४ पूर्वधर 40004

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हरिवंशपुराणे ईपदूनपरिक्षेपः सहस्राणि दश स्मृतः । विशत्येकोनपञ्चाशस्त्रयश्चैकादशांशकाः ॥२६॥ स्याद् पत्रिंशसहस्राणि गस्वादौ पाण्डुकं वनम् । चतुर्नवतिसंयुक्ता तद्विस्तारश्चतुःशती ॥३०॥ द्विष्टियोजनान्यत्र सहस्रत्रितयं शतम् । गव्यूतं साधिकं मेरोः परिधिः परिकीर्तितः ॥३०॥ चवारिशत्तमुद्विद्धा मूनि वैडूर्यचूलिका । मूलमध्यान्तविस्तारैदशाष्टचतुर्विधा ।।३०२॥ सप्तत्रिंशद् भवेन्मूले मध्ये स्यात् पञ्चविंशतिः । चूलिकायाः परिक्षेपो द्वादशाग्रे च साधिकाः ॥३०३॥ पार्थिवाः पटपरिक्षेपाश्चूलिकायाः प्रभृत्यधः । एकादशप्रकारोऽन्यः सप्तमोऽपि वनैः कृतः ॥३०॥ लोहिताक्षमयः पूर्वः पद्मरागमयः परः । तथा वनमयः सर्वरत्नो वैदूर्यविग्रहः ॥३०५॥ हरितालमयः पष्ठस्तेशं प्रत्येकमिप्यते । पञ्चशत्यपि विस्तारः सहस्राण्यपि पोडश ॥३०६॥ भद्रशालवन भूमौ मानुषोत्तरमेव च । सदेवनागभूतानां रमणानि वनानि च ॥३०७॥ परिक्षेपो वनं चान्यग्नन्दनं चोपनन्दनम् । वनं सौमनसं चान्यदुपसौमनसं तथा ॥३०॥ पाण्डुकं दशमं प्रोक्तमुपपाण्डकमन्स्यजम् । मेरोरेकादश ज्ञेयाः परिक्षेपाः परीक्षकैः ॥३०॥ देशेष्वेकादशानां तु पूरणेषु हि मन्दरः । मौलविष्फम्भमागानामेकैकेन प्रहीयते ॥३०॥ सर्वत्राकुलमानादौ यावद् योजनमानकम् । हानिवृद्धी इति ग्राह्ये मेरुविस्तारगोचरे ॥३१॥ पर भीतरी चौड़ाई निकलती है ऐसा मुनिगण कहते हैं ॥२८॥ पर्वतकी भीतरी परिधि दश हजार तीन सौ उनचास योजन तथा एक योजनके ग्यारह भागोंमें तीन भाग प्रमाण है ॥२६॥ यहाँसे छत्तीस हजार योजन ऊपर चलकर पर्वतके ऊपर चौथा पाण्डुक वन है, यहाँ पर्वत चार सौ चौरानवे योजन चौड़ा है ॥३०॥ यहाँ पर्वतकी परिधि तीन हजार एक सौ पासठ योजन कुछ अधिक एक कोश है ।।३०१॥ मेरु पर्वतके मस्तकपर चालीस योजन ऊँची वैडूर्य मणिमयी चूलिका है। यह चूलिका मूलमें बारह योजन, मध्यमें आठ योजन और अन्तमे चार योजन चौड़ी है ॥३०२|| चूलिकाको परिधि मूलमें सैंतीस योजन, मध्यमें पच्चीस योजन और अग्र भागमें कुछ अधिक बारह योजन है ।।३०३|| मेरु पर्वतकी चूलिकासे लेकर नीचे तक १ लोहि- ताक्षमय, २ पद्मरागमय, ३ वनमय, ४ सर्वरत्नमय, ५ वैडूर्यमय और ६ हरितालमय ये छह पृथिवीकाय रूप परिधियाँ हैं। इन परिधियों में प्रत्येकका विस्तार सोलह हजार पाँच सौ योजन है। इनके सिवाय वनोके द्वारा की हुई एक सातवीं परिधि और भी है। तथा उसके नीचे लिये अनुमार ग्यारह भाग परीक्षकोके द्वारा जानने योग्य हैं-१ भद्रशाल वन, २ मानुपोत्तर, ३ देयरमण, ४ नागरमण, ५ भूतरमण, ६ नन्दन, ७ उपनन्दन, ८ सौमनस, ६ उपसौमनस, १० पाण्डुक और ११३पपाण्डुक । इनमेसे पृथिवीपर जो भद्रशाल वन है उसमें भद्रशाल, मानुपो- त्ता, देवरमण, नागरमण और भूतरमण ये पाँच वन हैं। उससे ऊपर चलकर नन्दन वनमें नन्दन और उपनन्दन, सौमनस वनमें सौमनस और उपसौमनस तथा पाण्डुक वनमै पाण्डुक और उपपाण्डुक वन हैं ॥३०४-३०६४ा इन भागोंम यदि ग्यारह भाग मेरुपर चढ़ा जाय तो यहाँ मूल भागकी चौड़ाईसे एक भाग कम चौड़ाई हो जाती है। इसी प्रकार सब जगह योजन पर्यन्न अङ्गुल हाथ आदि प्रमाणोमें भी मेरुके विस्तारमै हानि तथा वृद्धि समझना चाहिए । भावार्थ- ऊपर जो ग्यारह भाग बतलाये हैं उनमें प्रथम भागसे यदि ग्यारह योजन ऊँचा चढ़ा जाय तो मेरुकी चौड़ाई मूलभागको चौड़ाईसे एक योजन कम हो जाती है और यदि ग्यारह हाथ या ग्यारह अगुल चढ़ा जाय तो यहॉकी चौड़ाई मूलभागकी चौड़ाईसे एक हाथ या एक - मेर पवंत निन्यानये हजार योजन ऊंचा है। उसके सोलह हजार पाँच सौ योजन २ विस्तार पाले वा चूलिकामे रेकर नीचे तक है। उनकी रचना रोहितार भादि मणियांकी है इसलिए उनके नाम भी उनके भनुमार प्रतिपादन किये गये हैं।

पञ्चमः सर्गः एकादश सहस्रागि योजनानि तु मन्दरः । समरुन्द्री नन्दनादृचं धनान्सीमनसात्तथा ॥३१२॥ पञ्चमेषु प्रदेशेषु चूलिकेन हीयते । तयाऽगुलादिमानेषु योजनान्तेष्वयं क्रमः ॥३१३॥ साधिकैकादशांशाभ्यां लक्षस्यास्त्युत्तरं शतम् । देयं योजनलवस्य मेरोः पार्श्वभुजाद्वयम् ॥३१॥ पण्यास्यं दिशि पूर्वस्या दक्षिणस्यां च चारणम् । गन्धर्वमपरस्यां स्यादुत्तरस्यां च चित्रकम् ॥३१५॥ भवनं नन्दने तेषां त्रिंशत्स्यान्मुखविस्तृतिः । पञ्चाशद्योजनोच्छ्रायः परिधिनवतिः स्मृता ॥३१६॥ पण्यारये रमते सोमश्चारणारये यमस्तथा । गान्धर्वे वरुणचित्रे कुवेरः सपरिच्छदः ॥३१॥ चरवारोऽपि ते दिक्षु लोकपालाः पृथक् पृथक् । मार्दाभिस्नु त्रिकोटीभिः स्त्रीणां फ्रीदन्ति सन्ततम् ॥३६॥ वज्र वज्रप्रभ नाम्ना सुवर्णमवनं भवेत् । सुवर्णप्रममायेकं दिक्षु सौमनसे वने ॥३१॥ भवनानां परिक्षेपमुम्वय्यासोच्छ्या इह । त एवार्धाकृता बोध्या नन्दनस्थितसमनाम् ॥३२०।। लोकपालास्त एवान देवाः सोमयमादयः । क्रोदन्ति स्वेच्छया स्त्रीभिस्तावती भिर्यथायथम् ॥३२॥ लोहिताजनहारिद्रपाण्डुरापयानि पाण्डुके । वेश्मान्यूर्वस्वनामानि तावरकन्यानि तान्यपि ॥३२२॥ स्वयम्प्रभविमानेशः सोमोऽसौ पूर्वदिवप्रमुः । रक्तवाहननेपथ्यः साईपल्यद्वयस्थितिः ॥३२३॥ स पट्पष्टिसहस्राणां विमानानां प्रभावताम् । पट्पष्टिपट्शतानां च पटलचागां च भोजकः ॥३२४॥ अङ्गुल कम हो जाती है। इसी प्रकार यदि ऊपरसे नोचेकी ओर आया जाय तो वहाँ उपकी चौड़ाई वृद्धिंगत हो जाती है ॥३१०-३११।। परन्तु विशेषता यह है कि यदि नन्दन वन और सौमनस वनसे ग्यारह योजन ऊँचा चढ़ा जाय तो वहाँकी चौड़ाई मूलभागकी चौड़ाईसे कम नहीं होती किन्तु बराबर रही आती है ॥३१२।। चूलिकासे पाँच योजन ऊपर चढ़नेपर एक योजन चौड़ाई कम हो जाती है और पाँच अङ्गुल अथवा पाँच हाथ चढ़नेपर एक अङ्गुल वा एक हाथ चौड़ाई घट जाती है ।।३१३॥ एक लास योजन विस्तारवाले मेरु पर्वतकी दोनों पार्श्व भुजाओंको लम्बाई एक लास सी योजन तथा ग्यारह भागों में दो भाग प्रमाण है ॥३१४॥ नन्दन पनकी पूर्व दिशामें पण्य नामका, दक्षिण दिशामें चारण नामका, पश्चिम दिशामें गन्धर्व नामका और उत्तर दिशामें चित्रक नामका भवन है। इन भवनोंकी चौड़ाई तीस योजन, ऊँचाई पचास योजन और परिधि नब्बे योजन है ॥३१५-३१६|| इनमें पण्य नामक भवनमे सोम, चारण नामक भवन में यम, गान्धर्व नामक भवनमें वरुण और चित्रक नामक भवन में कुबेर सपरिवार कोदा करता है ॥३१७॥ ये चारों लोकपाल पृथक्-पृथक् दिशाओम साढ़े तीन करोड़ सादे तीन करोड़ स्त्रियोंके साथ निरन्तर क्रीड़ा करते हैं । ३१८|| मोमनम बनकी चारो दिशाओंमें क्रमसे वय, वसप्रभ, सुवर्णभवन और मुवर्णप्रभ नाम के चार भवन है ॥३१॥ इन भवनोंकी परिधि तथा अप्रभागको चौड़ाई और ऊँचाई नन्दनवनके भयनामे आधी समझनी चाहिए ॥३०॥ इन भवनों में भी वे ही सोम, यम आदि लोकपाल अपनी इच्छानुसार उतनी ही स्त्रियों के साथ यथायोग्य क्रीडा करते हैं ॥३२॥ पाण्डक बनको चारों दिशाओम लोहित, अञ्जन, हारिद्र और पाण्डु नामके चार भयन हैं। इन भवनों की ऊँचाई भादि सोमनस बनके भयनाफे ममान है तथा इनमें वे ही लोकपाल उतनी ही स्त्रियांक साथ मोहा करते हैं ॥३२॥ इन लोकपालोंमें सोम नामका लोकपाल पूर्व दिशारा स्वामी तथा स्वयंभ विमानका भधिपति है। इमफे वाहन नथा पात्राभूपण आदि सय साल रंगके हैं और इमको भायु भदाई पल्य प्रमाण है। यह पद लास छयासठ हजार सह मी एयामठ देदीय- मान भयनीका भोग करनेवाला है अर्थात् इतने भवनोंका यह स्यामी है ॥३-३-३२|| १ यार।

१२ - हरिवंशपुराणे तथाऽरिएविमानेशो यमो दक्षिणदिक्प्रभुः । साईपल्ययायुःकः कृष्णनेपथ्यवाहमः ॥३२५।। जलप्रभविमानेशो वरुणो वारुणीप्रभुः । तथैव पीतनेपथ्यः त्रिभागोनत्रिपल्यकः ||३२६|| क्रगुप्रभविमानेशः कौबेरीप्रभुरिष्यते । कुवेरः शुरुनेपथ्यः सनिपल्योपमस्थितिः ॥३२॥ मेरोरुत्तरपूर्वस्यां नन्दने बलभदके । कूटे काजनकैस्तुल्ये फूटनाम्नामरो भवेत् ॥३२८।। नन्दन मन्दरं कूटं निषधं हिमवच तत् । रजतं रजकं नाम्ना तथा सागरचित्रकम् ॥३२॥ वनकूटं विनिर्दिष्टमष्टमं तु मनीषिभिः । दिशं दिशं प्रति द्वे द्वे स्याता कूटे यथाक्रमम् ॥३३०॥ उरटायो मूलविस्तारस्तेषां पञ्चशतानि तु । तदधं मस्तके मध्ये त्रिशती पचमप्ततिः ॥३३॥ दिवकुमार्यस्तु कूटेषु तेविमाः प्रतिपादिताः । मेघरातु पूर्वा स्यात् तथा मेघवती परा ॥३३२॥ ततः परं प्रसिद्धान्या सुमेधा मेघमालिनी । तोयधारा विचिना स्यात् पुष्पमाला स्वनिन्दिता ॥३३३॥ पूर्वदक्षिणदिग्भागे वाप्यो मेरुमहीभृतः । पूर्वा तू-पलगुल्माख्या नलिना चोरपला परा ||३३४॥ उत्पलोज्ज्वलसंज्ञा स्यात् तासां पञ्चाशदायतिः । अवगाहो दश ज्ञयो विस्तारः पविशतिः ॥३३५।। भासां मध्ये च शक्रस्य प्रासादः समवस्थितः । योजनान्यस्य गव्यूत्या सैकत्रिशत विस्तृतिः ।।३३६।। उच्छ्रायः पुनरुद्दिष्टो द्वापष्टिश्चाईयोजनः । अवगाहः प्रमागेन प्रासादस्यायोजनः ।।३३७।। सिंहासनं सुरेन्द्रस्य तस्य मध्येऽवतिष्ठते । स्वविक्षु लोकपालानामासनानि भवन्ति च ॥३३८।। तस्यैवोत्तरपूर्वस्यामपरोत्तरतोऽपि च । तत्र सामानिकानां तु मान्ति भद्रासनानि तु ॥३३६।। पुरोऽप्यष्टामदेवीनां तत्र भद्रासनानि हि । सासमा: परिषण्मुख्या: पूर्वदक्षिणतस्तथा ॥३४०॥ मध्यमा दक्षिणस्यां स्याद् बाह्याश्यापरदक्षिणा । नायस्त्रिंशाश्च तत्र स्युः पश्चात्सैन्यमहत्तराः ॥३४॥ चतसृष्वात्मरक्षाणां दिक्षु भद्रासनान्यपि । भासेव्यतेऽत्र वैरिन्द्रः पूर्वाभिमुखमास्थितः ।।३४२।। यम दक्षिण दिशाका राजा तथा अरिष्ट विमानका स्वामी है । इसके वाहन तथा वस्राभूपण आदि काले रगके हैं और इसकी आयु ढाई पल्य प्रमाण है ॥३२५॥ वरुण पश्चिम दिशाका राजा है तथा जलप्रभ विमानका स्वामी है। उसकी वेपभूपा पीले रङ्गकी है और वह तीन भाग कम तीन पल्यको आयुवाला है ॥३२६॥ कुवेर उत्तर दिशाका राज्य तथा वल्गुप्रभ विमानका स्वामी है । इसकी वेषभूषा शुक्ल रङ्गकी है तथा आयु तीन पल्य प्रमाण है ॥३२७|| मेरुकी पूर्वोत्तर दिशामें नन्दनवनके बीच काश्चन कूट के समान एक बलभद्रक नामका कूट है और उसमें नामधारी बलभद्रक देवका निवास है ॥३६॥ वहींपर १ नन्दन, २ मन्दर, ३ निपध, ४ हिमवत् , ५ रजत, ६ रजक, ७ सागर और चित्रक नामके आठ कट और हैं। ये प्रत्येक दिशाम क्रमसे दो-दो हैं ॥३२६-३३०॥ इन कूटोकी ऊँचाई पाँच सौ योजन है तथा मूल भागकी चौड़ाई पाँच सौ योजन, मध्यभागकी तीन सौ पचहत्तर योजन और ऊर्श्वभागकी ढाई सौ योजन है ॥३३१।। इन कूटोंमें कमसे १ मेघंकरा, २ मेघवती, ३ सुमेघा, ४ मेघमालिनी, ५ तोयधारा, ६ यिचित्रा, ७ पुष्पमाला और ८ अनिन्दिता ये आठ प्रसिद्ध दिक्कुमारी देवियाँ निवास करती हैं ॥३३२-३३३।। मेरु पर्वतको पूर्व-दक्षिण (आग्नेय ) दिशामें १ उत्पलगुल्मा, २ नलिना, ३ उत्पला और ४ उत्पलो- ज्ज्वला ये चार वापिकाएँ हैं। इनकी लम्बाई पचास योजन, गहराई दश योजन और चौड़ाई पच्चीस योजन है ।। ३३४-३३५॥ इन वापिकाओके मध्यमे इन्द्रका भवन स्थित है। इस भवनको चौड़ाई इकतीस योजन एक कोश, ऊँचाई साढ़े बासठ योजन और गहराई अर्धयोजन प्रमाण है ॥३३६-३३७॥ उस भवनके मध्यमें इन्द्रका सिंहासन है तथा चारों दिशा में चार लोक- पालोके आसन हैं ॥३३८॥ इन्द्रासनसे उत्तर-पूर्व तथा पश्चिमोत्तर दिशामें सामानिक देवीके भद्रासन हैं ॥३३॥ आगे आठ पट्टरानियोंके भद्रासन हैं, पूर्व-दक्षिण दिशामे सभाके मुख्य मुख्य अधिकारी देव बैठते हैं, दक्षिण मध्यम अधिकारी, दक्षिण-पश्चिममें सामान्य अधिकारी एवं त्रायत्रिश देव तथा उनके पीछे सैन्यके महत्तर देव आसन ग्रहण करते हैं ॥३४०-३४१॥ चार पञ्चमः सर्गः भृगाभृगनिभाप्यन्या कजला कमलप्रभा । पुष्करिण्यश्च वापीनां समास्त्वपरदक्षिणाः ॥३५३।। श्रीकान्ता प्रथमा वापी श्रीचन्दा चापरोत्तरा । तथा श्रीमहितेशानभोग्या श्रीनिलया ततः ॥३४॥ तथा चोत्तरपूर्वस्यां वापी तु नलिनाभिधा । ततो नलिमगुल्मापि कुमुदा कुमुदप्रभा ॥३४५।। प्रासादादिकमत्राऽपि पूर्ववत्सबमिप्यते । यथैतन्नन्दने वेद्यं तथा सौमनसे वने ॥३४६॥ दिशि चोत्तरपूर्वस्यां पाण्डुके पाण्डुका शिला। पाण्डुकम्बलया सार्द्ध रक्तया रक्तकम्बला ॥३४७॥ विदिक्षु सत्रमा हमी राजती सापनायिका । लोहितासमयी चार्द्धचन्द्राकाराश्च ताः शिलाः ॥३४॥ अष्टोच्छ्याः शतायामाः पञ्चाशद्विस्तृताश्च ताः । यताहन्तोऽभिपिश्यन्ते जम्बूद्वीपसमुद्भवाः ॥३४॥ रक्तापाण्डकयोदय दक्षिणोत्तरतः स्थितम् । तत्पूर्वापरतः शेषशिलयोस्तु विशालयोः ॥३५०।। चापं पञ्चशतोच्छ्रायं मूलव्यासोऽपि यस्य सः। प्रत्येकं तन्महारत्नं तत्र सिहासनत्रयम् ।।३५१ ।। ऐन्दं दक्षिणमैतेषामैशानं तूत्तरं मतम् । मध्यस्थितं तु जैनेन्द्र प्राङ्मुखानि च तान्यपि ॥३५२।। भारतापरवैदेहा ऐरावतविदेहनाः । जिना बाल्ये सुरस्नाप्यास्तासु तेषु यथाक्रमम् ॥३५३।। दिशाओंमें आत्मरक्ष देवोंके भद्रासन हैं। इन्द्र अपने आसनपर पूर्वाभिमुख बैठता है और आत्मरक्ष उसकी सेवा करते हैं ॥३४२॥ पश्चिम-दक्षिण (नैऋत्य) दिशामें उक्त वापिकाओंके समान १ श्रृंगा, २ भृगनिभा, ३ कञ्चला और ४ कजलप्रभा ये चार वापिकाएँ हैं ॥३४३।। पश्चि- मोत्तर (वायव्य) दिशामें १ श्रीकान्ता, २ श्रीचन्द्रा, ३ श्रीमहिता और ४ श्रीनिलया ये चार वापिकाएँ हैं ।* इनमें ऐशानेन्द्र क्रीड़ा करता है ॥३४४॥ उत्तर-पूर्व (ऐशान ) दिशामें १ नलिना, २ नलिनगुल्मा, ३ कुमुदा और ४ कुमुदप्रभा ये चार वापिकाएँ हैं । इनमें भवन आदिकी समस्त रचना पूर्ववत् जाननी चाहिए | जिस प्रकार नन्दन वनमें इन सबकी रचना है उसी प्रकार सौमनस वनमें भी जानना चाहिए ॥३४५-३४६॥ पाण्डुक वनको उत्तर-पूर्वादि दिशाओं में क्रमसे १ पाण्डुक, २ पाण्डुकम्बला, ३ रक्ता और ४ रक्तकम्बला ये चार शिलाएँ हैं। ये शिलाएँ विदिशाओं में हैं तथा क्रमसे सुवर्णमयी, रजतमयी, संतप्त स्वर्णमयी और लोहिताक्ष मणिमयी हैं। एवं इनका अर्ध चन्द्रके समान आकार है ।।३४७-३४८॥ ये शिलाएँ आठ योजन ऊँची, सौ योजन लम्बी और पचास योजन चौड़ी हैं तथा इनपर जम्बू द्वीपमें उत्पन्न हुए तीर्थकरोंका अभिषेक होता है ॥३४६। इनमें रक्ता और पाण्डक शिलाको लम्याई दक्षिणोत्तर दिशामें है तथा रक्ता और रक्तकम्बलाकी लम्बाई पूर्व-पश्चिम दिशामें है ॥३५०।। उन शिलाओंपर रत्नमयी तीन-तीन सिंहासन हैं जो पाँच सौ धनुप ऊँचे तथा उतने ही चौड़े हैं ॥३५१|| तीन सिंहासनाम दक्षिण सिंहासन सोधर्मेन्द्र- का, उत्तर सिंहासन ऐशानेन्द्रका तथा मध्य स्थित सिंहासन जिनेन्द्र देवका है। इन सब सिंहा- सनोंका मुख पूर्व दिशाकी ओर होता है। भावार्थ-मध्यके सिंहासनपर श्री जिनेन्द्र देव विराजमान होते हैं और दक्षिण तथा उत्तरके सिंहासनोंपर क्रमसे सौधर्मेन्द्र और ऐशानेन्द्र खड़े होकर उनका अभिषेक करते हैं ॥३५२॥ उन पाण्डुक आदि शिलाओके सिंहासनीपर क्रमसे १. ईसाण दिसाभागे भरह जिरिणदाण दिव्यदेहाणं । पंडुक सिलातले तह जम्मण महिमा समुद्दिा ॥१४८|| अवर निदेहाण तहा यरपंडुयक्बलम्मि धूमदिसे । वस्तबलम्मि दु ऐरदि एरामदाण तु ॥१४॥ वाऊदिसे रत्तसिला पुष्यविदेहाण जिएयरिंदाणं । जम्मण महिमा मेरुप्पदाहिणेण तु गतणं ॥१५०॥ ज०प्र० ४ उद्देश । • नैऋष्य और भाग्नेय दिशाका आठ वापिकानाम सौधर्म तथा वायव्य और ऐशान दिशाकी वापिकाभीमें ऐशानेन्द्र के भवन हैं।

हरिवंशपुराणे पाण्डके सन्ति चरवारो महादिक्षु जिनालयाः । सर्वनमेया दिग्या निया यकृमकावतः ॥३५॥ पञ्चविंशतिरायामः सार्धाः द्वादश विस्तृतिः । भद्धकोशोऽवगाहः स्यादुरट्रायोऽष्टादश त्रिपाद् ॥१५५॥ द्वारस्य चोच्छ्यस्तेषां चतुर्योजनसम्मितः। द्वे तु विस्तृतिरस्यामणुद्वारद्वयस्य हि ॥३५६॥ वने सौमनसे तेषां तदेव द्विगुणं भवेत् । कुलवहारशैलेषु मान सौमनसोदितम् ॥३५०॥ नन्दने भद्रशाले च निनायतनगोचरम् । प्रत्येकं द्विगुणं मानं तद् यासौमनसे वने ॥३५॥ विजयार्द्धषु सर्वेषु सिद्धायतनगोचरम् । मानं तदेव योद्धव्यं विजया भरते सु यत् ॥३५॥ अष्टायामो द्विविस्तारः सर्वेषु चतुरु स्मृतः । देवच्छन्दोऽवगादश्च गम्यूतिस्तेषु येश्मसु ॥३६०॥ शुम्भद्रनमहास्तम्भशातकुम्भारमभित्तिभिः । चन्द्रादिस्योरपतत्परिमृगयुग्माचल कृतः ॥२६॥ रत्नकाञ्चननिर्माणाः पञ्चचापशतोटूिनाः । भष्टोत्तरशतं तत्र जिनानां प्रतिमा मताः ॥३६२॥ नागययुगे तासां प्रत्येकं सप्रकीर्णके । सनत्कुमारमवाल्ल निवृत्तिश्रुतमूर्तिभिः ।।३६३॥ भरत, पश्चिम विदेह, ऐरावत और पूर्व विदेह क्षेत्र में उत्पन्न हुए तीर्थकर बाल्यकालमें देवोंके द्वारा अभिपेको प्राप्त होते हैं। भावार्थ-भरत क्षेत्रके तीर्थ करोंका पाण्डुक शिलापर, पश्चिम विदेह क्षेत्रके तीर्थकरोंका रक्तापर और पूर्व विदेहके तीर्थंकरोंका रक्तकम्बला शिलापर जन्मा- भिषेक होता है ।।३५३।। पाण्डुक यनकी चारों महा दिशाओंमें चार जिनालय हैं जो सर्वरत्नमय हैं, दिव्य है तथा अकृत्रिम होनेसे नित्य हैं ॥३५४॥ इनकी पच्चीस योजन लम्बाई, साढ़े बारह योजन चौड़ाई, आधा कोश गहराई और पौने उन्नीस योजन ऊँचाई है ॥३५॥ प्रत्येक मन्दिर में एक बड़ा तथा आजू-बाजूमें दो लघु द्वार हैं। इनमें बड़े द्वारकी ऊँचाई चार योजन और चौड़ाई दो योजन है। तथा लघु द्वारोंकी ऊँचाई और चौड़ाई इससे आधी है ॥३५६॥ पाण्डुक बनके समान सौमनस वनकी चारो दिशाओमें भी चार जिनालय हैं और उनके द्वारों की लम्बाई-चौड़ाई आदि पाण्डक वनके चैत्यालयोंसे दूनी है। कुलाचल तथा वक्षार गिरियापर जो जिनालय हैं उनकी लम्बाई- चौड़ाई आदि भी सौमनस वनके चैत्यालयोके समान कही गई है ॥२५७।। इसी प्रकार नन्दन वन और भद्रशाल वनमे भी चार-चार जिनालय हैं उनकी ऊँचाई तथा चौड़ाई आदिका प्रमाण सौमनस वनके जिनालयोसे दूना है ॥३५८।। समस्त विज पर्वतोपर जो सिद्धायतन-जिनमन्दिर हैं उनका प्रमाण वही जानना चाहिए जो कि भरत क्षेत्र सम्बन्धी विजयाधंके जिन-मन्दिरोंका है ॥३५६॥ उन समस्त जिनालयोंमे आठ योजन लम्बा, दो योजन चौड़ा, चार योजन ऊँचा और एक कोश गहरा देवच्छन्द नामका एक गर्भगृह है ॥३६०। वह गर्भगृह, देदीप्यमान रत्नोंसे बने हुए विशाल स्तम्भों, सुवर्णमयी दीवाली तथा उनमे खिंचे हुए चन्द्र, सूर्य, उड़ते हुए पक्षी एवं हरिण-हरिणियोके जोड़ासे अलंकृत है ॥३६१॥ उस गर्भगृहमे सुवर्ण तथा रत्नोंसे निर्मित पाँच सौ धनुष ऊँची एक सौ आठ जिन-प्रतिमाएं विद्यमान हैं ॥३६२॥ उन प्रतिमाओंके समीप १ सरस्नमहादिव्या म० १ २ तनुरुच्छितः म० । ३ त्रिलोकप्रशप्तौ देवच्छन्दस्य प्रमाण भिन्नप्रकार वर्तते-वसहीऐ गम्भगिहे देवच्छन्दो दुजोयणच्छेहो। इगिजोयणवित्थारो च उजायण दीह संजुत्तो ।।१८५५।। सोलस कोमुच्छेह समचउरस्सं तदद्धवित्थारं । लोयविणिच्छा यकत्ता देवच्छन्द परूवेई ॥१८६६॥ (पाठान्तरम् ) ४ सचामरे । ५ सदृशे म० । सर्वाणि ग०, ड०, ख. सर्वाण क० । सिरि सुददेवीण तहा सव्वाहं सणकुमार जक्खाण । रूवाणि पत्तेक पडि वररयणाह रइदाणिं ॥१८८१|| -त्रै० प्र० सिरिदेवी सुददेवी सव्वाण सणक्कुमार जबखाए । रूवाणि य जिणपासे मगलमडविहमवि होदि ॥१८८|| -त्रिलोकसार " पञ्चमः सर्गः भृङ्गारकलशादर्शपात्रीशङ्खा समुद्गकाः । पालिकाधूपनीदीपकूर्चाः पाटलिकादयः ॥३६॥ अष्टोत्तरशतं ते पि कंसतालनकादयः । परिवारोऽत्र विज्ञेयः प्रतिमानां यथायथम् ॥३६५।। गवाक्षगेहनालानि मुक्ताजालानि भान्ति वै । मणिविद्रुमरूपान्जकिंकिणीजालकानि च ॥३६६॥ पट् च चत्वारि च द्वच भूले मध्ये च मस्तके । विस्तृतश्चतुरुच्छ्रायः सौवर्णः क्रोशगाहकः ॥३६७।। भष्टोच्छायश्चतुर्यासश्चतुस्तोरणदिङ्मुसः । प्राकारः प्रतिवेश्म स्यात् पञ्चाशत्तुगगोपुरः ॥३६॥ सिंहहंसगजाम्भोजदुकूलवृषभध्वनः । मयूरगरुडाकीणश्चत्रमालामहावजैः ॥३६६।। दशाद्धवर्णमासद्भिदंशभेदैदिशो दश । साशीतिकमहस्तान्तान्ति पल्लविता इव ॥३७॥ उदनो मण्डपोऽप्यने ततः प्रेक्षागृहं बृहत् । स्तूपाश्चैत्यगुमाश्चान्ये पर्यप्रतिमोग्बलाः ॥३७॥ मास्यकूर्मविमुक्तश्च प्रसमसलिलः शुभः । दिशि नन्दो हदः प्राच्या सिद्धायतनतो मवेत् ॥३७२॥ वज्रमूलः सवैडूयंचूलिको मणिभिश्चितः । विचित्राश्चर्यसङ्कीर्णः स्वर्णमध्यः सुरालयः ॥३७३॥ मेरुश्चैव सुमेरुश्च महामेरुः सुदर्शनः । मन्दरः शैलराजश्व वसन्तः प्रियदर्शनः ॥३७॥ रस्नोञ्चयो दिशामादिौंकनाभिमनोरमः । लोकमध्यो दिशामन्यो दिशामुत्तर एव च ॥३७५॥ सूर्याचरणविख्यातिः सूर्यावर्तः स्वयम्प्रभः । इत्थं सुरगिरिश्चेति लन्धवर्णैः स वर्णितः ॥३०६ । इति व्यावणितं द्वीपं परिचिपति सर्वतः । पर्यन्तावयवत्वेन सास्यैव जगती स्थिता ॥३७७॥ चमर लिये हुए नागकुमार और यक्षांके युगल खड़े हुए हैं तथा समस्त प्रतिमाएँ सनत्कुमार और सर्वान यक्ष तथा निवृत्ति और श्रुत देवी की मूर्तियों से युक्त हैं ॥३६३|| मारी कलश दर्पण, पात्री, शङ्ख, सुप्रतिष्टक, ध्वजा, धूपनी, दीप, कूर्च, पाटलिका आदि तथा झॉम मंजीरा आदि एक सौ आठ एक सौ आठ उपकरण उन प्रतिमाओंके परिवार स्वरूप जानना चाहिए अर्थात् ये सब उनके समीप यथायोग्य विद्यमान रहते हैं ॥३६४-३६|| उन जिनालयोंमें झरोखे, गृह- जाली, मोतियोंकी झालर, रतन तथा मूंगा रूप कमल और छोटी-छोटी घण्टियोंके समूह सुशोभित रहते हैं ॥३६६॥ प्रत्येक जिनमन्दिर में एक-एक प्राकार-कोट है जो मूलमें छह योजन, मध्यमें चार योजन और मस्तकपर दो योजन चौड़ा है। चार योजन ऊँचा है, एक कोश गहरा है तथा सुवर्ण निर्मित है ॥३६७॥ इसकी चारों दिशाओमें आठ योजन ऊँचे, तथा चार योजन चौड़े चार तोरण द्वार है और पचास योजन ऊँचा इसका गोपुर है ॥३६८|| सिंह, हंस, गज, कमल, वस्त्र, वृषभ, मयूर, गरुड़, चक्र और मालाके चिह्नोंसे सुशोभित दश प्रकारको पञ्चवर्णी महाध्वजाओंसे बन चैत्यालयोंकी दशों दिशाएँ ऐसी जान पड़ती हैं मानो लहलहाते हुए नूतन पत्तोंसे ही युक्त हों। वे ध्वजाएँ एक-एक जातिको एक सौ आठ एक सौ आठ तथा दशों दिशाओं- को मिलाकर एक हजार अस्सी होती हैं ।।३६६-३७०।। चैत्यालयोके आगे विशाल सभामण्डप, उसके आगे लम्बा-चौड़ा प्रेक्षा-गृह, उसके आगे स्तूप और स्तूपोंके आगे पद्मासनसे विराजमान प्रतिमाओंसे सुशोभित चैत्यवृक्ष हैं ॥३७१।। जिनालयोंसे पूर्व दिशामें मच्छ तथा कछुआ आदि जल-जन्तुओंसे रहित, एवं स्वच्छ अलसे भरा हुआ नन्द नामका सरोवर है ॥३७२॥ वनमूक, सबैड्र्यचूलिक, मणिचित, विचित्राश्चर्य कीर्ण, स्वर्णमध्य, मुगलय, मेरु, सुमेरु, महामेरू, सुदर्शन, मन्दर, शैलगज, वसन्त, प्रियदर्शन, रत्नोच्चय, दिशामादि, लोकनाभि, मनोरम, लोकमध्य, दिशामन्त्य, दिशामुत्तर, सूर्याचरण, सुर्यावत, स्वयंप्रभ और सुरगिरि "इस प्रकार विद्वानोंने अनेक नामोके द्वारा सुमेरु पर्वतका वर्णन किया है ।।३७३-३७६।। इस प्रकारसे वर्णित जम्बू द्वीपको चारों ओरसे जगती घेरे हुए है। यह जगती इसी १. मेरुपर्वतस्य पयायनामानि ।

हरिवंशपुराणे मूले द्वादश मध्येऽष्टौ चरवायग्रे च विस्तृता । अष्टोच्छ्याऽवगाढा तु योजनाद्धंमधो भुवः ॥३७॥ सर्वरनाममध्या सा वैदूर्यमयमस्तका । मूले वनमयी भासा भासयन्तो दिशः स्थिता ॥३७६॥ पर चापरातव्याममूलाने चापि वेदिका । गन्यूतिद्वितयोछाया जगत्या मध्यमाश्रिता ॥३०॥ वेदिकाम्यन्तरे कान्तं देवारण्यं वनं यहिः । सरमौवर्णशिलापटं वापी प्रासादशोभितम् ॥३१॥ धनुःशनं शतं साद' विस्तृताश्व शतद्वयम् । न्यूनमध्योत्तमा धाप्यो गाधा स्व स्वं दशांशकम् ॥३८२॥ पचाराचापविस्ताराः शतचापममायताः । पञ्चसप्ततिमुच्चैस्तु प्रासादास्तत्र चाल्पकाः ॥३८३॥ पट चापविस्तृतान्येषां द्वादशोच्छायवन्ति च । वारि चापगाढानि द्वाराणि लघुवेश्मनाम् ॥३८॥ द्विगुणाग्निगुगारच स्युज्यांमायामोच्छौरतः । मध्यमाश्चोत्तमारतेषां द्विद्विारावगाहनम् ॥३८५॥ मालावलीकदल्याद्याः प्रेहासनसभागृहाः । वीणागभलताचित्रप्रसाधनमहागृहाः ॥३८६॥ मोहनास्थानमंज्ञाश्च रम्या रत्नमया गृहाः । सर्वतस्तत्र शोभन्ते व्यन्तरामरसेविताः ॥३७॥ 'हंसकौघापनेमुण्डमंगेन्द्रमकरासनैः । स्फाटिकैरुन्नतैनः प्रबालगरुडासनः ॥३॥ दीर्घस्वनिकत्तस्तैत्रिपुलेन्द्रासनैरपि । गन्धासनैश्च रनाव्यैर्युक्ताः सुरमनोरमः ॥३६॥ विजयं वैजयन्तं च जयन्तमपराजितम् । द्वाराण्यस्यां जगत्यां स्युः प्राच्यादौ दिक्चतुष्टये ॥३०॥ भष्टोट्रायं चनुयाम नानारत्नांशुरब्जिनम् । द्वारमेकैश्मन स्याद् भास्वद्वनवाटकम् ॥३९॥ दश मप्तशती चान्या सहस्राणि च सप्ततिः । प्रयः क्रोशाश्चतुविशाश्चतुर्दशशती युगैः ॥३६२।। जम्बू द्वीपका अन्तिम अवयय-भाग है ॥३७७|| वह मूलमे बारह योजन, मध्यमें आठ योजन, भीर अप्रमागमें चार योजन चौड़ी है, आठ योजन ऊँची है तथा पृथिवीके नीचे आधा योजन गहरी है ॥३७८|| उसका मूल भाग वनमय है, मध्य भाग सब प्रकारके रत्नोंसे निर्मित है और मग्नक-अप्रभाग वैडूर्य मणियोंका बना है । वह जगती अपनी कान्तिसे दशौं दिशाओंको देदीप्यमान करती हुई स्थित है ॥३७॥ जगतीके मध्यमें एक वेदिका है जो मूल और अम भागमें पाँच सौ धनुष चौड़ी है तथा दो कोश ऊँची है ॥३०॥ वेदिकाके आभ्यन्तर तथा पाग-दोनों भागमि सुवर्णमय उत्तम शिलापट्टोंसे युक्त, एवं वापिकाओं और भवनोंसे सुशोभित देयारण्य नाम का सुन्दर यन है ॥३८१॥ इनमें निम्न श्रेणीको वापियाँ सो धनुप, मध्यम श्रेणीको हेद मो धनुष और उत्तम श्रेणीको दो सौ धनुष चौड़ी हैं। इन सबको गहराई अपनी-अपनी पोदाई के दायें भाग है ॥३८॥ देवारण्य वनमें जो लघु प्रासाद हैं वे पचास धनुप चौड़े, सी धनुष लम्बे और पचहत्तर धनुप ऊँचे हैं ॥३३॥ इन प्रासादोंके द्वार छह धनुष चौड़े, बारह धनु ऊँचे भोर पार धनुष गहरे हैं ॥३८४|| मध्यम और उत्तम प्रासादों तथा उनके द्वागको सम्पाई-पौड़ाई एवं ऊँचाई लघु प्रामादोंसे क्रमशः दूनी और तिगुनी है। किन्तु द्वारोंकी गहराई दूनी-दूनी है ॥३४॥ उस यनमें मालाओंकी पक्ति कदली आदि वृक्ष, प्रेक्षागृह, सभागृह, यीणा- गृह, गर्भगृह, लनागृह, चित्रगृह, प्रमाधनगृह तथा मोहना स्थान नामफे अनेक रत्नमयी सुन्दर- मुन्दर गृह मय और मुशोभित है। ये मय स्थान व्यन्तर देयोंके द्वाग सेयित है ॥३८६-८७॥ ये भयन यो मनको दर्पित करनेयाले ग्न चित ईमामन, प्रोनासन, मुण्डासन, मृगेन्द्रासन, मरामन, प्रयालामन, गरदामन, विशारदामन और गन्धामन आदि अनेक आसनांसे युक्त हैं। ये मामन मटिक मनिक यने है, उनमें कितने ही मामन है, कितने ही नीचे है, कितने हो साये ३, किन ही स्थग्निको ममान हैं और कितने ही गोल है ॥३८२-८६॥ अगनीकी पूर्व आदि दिशाभीमें ममे विजय, वैजयन्न, जयन्त और भपजिन नामके पार द्वार॥३६॥ इनमे प्रत्येक द्वार भाट गोजन ऊँगा, पार योजन पौड़ा, नाना गलॉफी किरणोंसे भनुगति भोर यममयी देसीयमान रियाहांगे युग है ॥३६१|| जानीक अभ्यन्तर भागमें १ मनन नामाना २ दिन म.।

पश्चमः सर्गः १७ हस्तास्त्रयोऽगुलानि स्यादेकविंशतिरेकशः । तेषां दिशान्तरज्यासौ द्वाराणां तु प्रमाणतः ॥१३॥ अस्या ज्यायाः सहस्राणि सप्ततिनंव चोदितम् । सह पड्भिश्च पञ्चाशद् गम्यूति त्रितयं तथा ॥३९॥ धनुःसहस्रमेकं च पुनः पञ्चशतानि तु । द्वात्रिंशच्च धनुःपृष्ठमङ्गलानां च सप्तकम् ॥३१५॥ चतुर्योजनहीनं तु तदेव परिनिश्चितम् । द्वाराणामन्तरं तेषामन्तरज्ञः परस्परम् ॥३६॥ संख्येयद्वीपपर्यन्तो जम्बूद्वीपसमोऽपरः । विजयस्य पुरं तत्र पूर्वस्यां दिशि शोभते ॥३६॥ तद् द्वादशसहस्राणि विस्तृतं वेदिकायुतम् । चतुस्तोरणसंयुक्त रुचिरं सर्वतोऽन्द्रुतम् ॥३८॥ साष्टभागं त्रिकं चाग्रे मूले तत्तु चतुर्गुणम् । तत्प्राकारस्य विस्तारस्तस्य गाहोऽर्द्धयोजनम् ॥३३॥ प्राकारस्योच्छ्यस्तस्य सप्तत्रिंशत्तथाकम् । गोपुराणि चतुर्दिक्षु प्रत्येकं पञ्चविंशतिः ॥४०॥ एकत्रिंशासगम्यूतिविस्तारो गोपुरस्य च । उच्छायो द्विगुणस्तस्माद् गाहः स्यादर्धयोजनम् ॥४०॥ भूमिभिः सप्तदशभिः प्रासादा गोपुरेषु तु । सवरत्नसमाकीर्णा जाम्वूनदमयाश्च ते ॥४०२।। गोपुराणां तु मध्ये स्यादौपपादिकलेणकम् । गन्यूतिवहलं व्यासः शतानि द्वादशास्य च ॥४०३॥ पञ्चचापशतव्यासा गव्यूतिद्वयमुरिखता । चतुस्तोरणसंयुक्ता वेदिका तस्य सर्वतः ॥४०॥ गोपुरेण समो मानः प्रासादः पुरमध्यगः । अष्टोच्छ्रायश्चतुासो द्वारो विजयसेवितः ॥४०५॥ सवज्रद्वारवंशश्च हेमररनकपाटकः । चतुर्दिक्षु पुनस्तस्य प्रासादास्तरसमानकाः ॥४०६।। तेपामन्ये महादिक्षु चत्वारस्तरसमानकाः । द्वितीयमण्डले ज्ञेयाः प्रासादा रत्नभास्वराः ॥४०७॥ जन द्वारोंकी अन्तरज्याका प्रमाण सत्तर हजार सात सौ दश योजन, तीन कोश, चौदह सौ चौबीस धनुप, तीन हाथ और इक्कीस अंगुल है ॥३६२-३६३॥ इस ज्याके धनुप पृष्ठका परिमाण, उन्यासी हजार छप्पन योजन, तीन कोश, एक हजार पाँच सौ वत्तीस धनुप तथा सात अंगुल है.॥३६४-३६५॥ अन्तरके जाननेवाले आचार्योंने उन द्वारोंका पारस्परिक अन्तर धनुःपृष्टके प्रमाणसे चार योजन कम निश्चित किया है ॥३६॥ संख्यात द्वीपोंके अनन्तर जम्बू द्वीपके समान एक दूसरा जम्बू द्वीप है उसकी पूर्व दिशामें विजय द्वारके रक्षक विजय देवका नगर सुशोभित है ।।३६७॥ वेदिकासे युक्त वह नगर वारह योजन चौड़ा है, चारों दिशाओंके चार तोरणोंसे विभूपित, सब ओरसे सुन्दर और आश्चर्य उत्पन्न करने वाला है ॥३६८। उस नगरके चारों ओर एक प्राकार है, उसका विस्तार अम भागमें एक धनुपके आठ भागोंमें तीन भाग तथा मूलमें उससे चौगुना है। इस प्राकारको गहराई आधा योजन है ॥३६॥ ऊँचाई साढ़े सैंतीस योजन है और इसकी प्रत्येक दिशामें पचीस-पच्चीस गोपुर हैं ।।४००। प्रत्येक गोपुरकी ऊँचाई इकतीस योजन एक कोश है, चौड़ाई उससे दूनी है और गहराई आधा योजन प्रमाण है ॥४०१।। उन गोपुरोंपर सत्रह-सत्रह खण्डके भवन बने हुए हैं। ये भवन सब प्रकारके रत्नोंसे व्याप्त तथा स्वर्णमय हैं ॥४०२॥ गोपुरोके मध्यमें देवों के उत्पन्न होनेका स्थान है जो एक कोश मोटा और बारह योजन चौड़ा है॥४०३॥ उस उत्पत्ति स्थानके चारों ओर एक वेदिका है जो पाँच सौ धनुष चौड़ी, दो कोश ऊँची और चार तोरणोंसे युक्त है ॥४०४॥ उस नगरके मध्यमें एक विशाल भवन है जो प्रमाणमें गोपुरके समान है। और उसका दरवाजा आठ योजन ऊँचा, चार योजन चौड़ा तथा विजय नामक देवके द्वारा सेवित है ॥४०॥ उस भवनके द्वारका तोरण होरेका बना है तथा स्वर्ण और रत्नमय उसके किवाड़ हैं । उसको चारों दिशाओंमें उसीके समान विस्तारवाले और भी अनेक भवन बने हुए हैं ।।४०६॥ दूसरे मण्डलमे उन भवनोंको चारों दिशाओं में उन्हींके समान विस्तारवाले, रत्नोंके देदीप्यमान भवन बने हुए हैं ।।४०७॥ तीसरे मण्डलमें भी इसी प्रकार भवनोंको रचना है परन्तु उनका १. देवीनामुत्पादस्थानम् । २. तत्स्वामी देवः ।

हरिवंशपुराणे पूर्वमानाईमानाश्च तृतीये मण्डले स्थिताः । त समानाश्चतुर्थे तु प्रत्येकं दिक्यनुष्टये ॥४०॥ चतुर्थेभ्योऽर्द्धहीनाश्च पञ्चमे मण्डले स्थिताः । पष्टे तु तरसमानस्ते प्रत्येकं दिक्चतुष्टये ॥१०॥ लेणवेदिकया तुल्या वेदिका मण्डलद्वये । अधिमाना सा वेद्या मण्डलस्य हुये द्वये ।।४1010 प्रासादे विजयस्यात्र सिंहासनमनुत्तरम् । सचामरसितच्नं सत्र पूर्वमुखोऽपरः ॥१५॥ उत्तरस्यां सहस्राणि पट मामानिकपनिनः । 'चिदिशोश्च पुरः षट् स्युरप्रदेण्यश्च सोसना: ॥४१२॥ आसनष्टौ सहखाणि परिपत्पूर्वदक्षिणाः । मध्यमा दर्श योधम्या दक्षिणम्यां दिशि स्थिताः ॥४१३॥ द्वादशैव सहस्राणि बाह्या माऽपरदक्षिणा । भामनेष्वपरस्यां च सससैन्यमहत्तराः ॥१४॥ अष्टादश सहस्राणि चतुर्दिश्वात्मरक्षकाः । भद्रासनानि तेषां च दिक्षु तावन्ति सासु च ॥१५॥ अष्टादश सहस्त्राणि देवश्च परिचारिकाः । विजयः सेव्यमानस्तैः पल्यं जीवति साधिकम् ॥४१६॥ विजयादुत्तराशायां मुधर्मारया तु तत्समा । दीर्घा पट् विस्तृता प्रीणि नवोचः कोशगाहिनी ॥४॥ ततोऽप्युत्तरदिग्भागे तावन्मानो जिनालयः । अपरोत्तरतश्चास्मादुपपाश्वर्या सभा भवेत् ॥४८॥ अभिपेकसभा तत्प्रागलकारसभाप्यतः । व्यवसायसभा तम्मात् संसमानाः सुधर्मया ॥४१॥ पञ्चैव सहस्राणि च वारोऽपि शतानि च । सप्तपष्टिश्च ते सर्व प्रासादा विजयास्पदे ॥४२०॥ बहिर्विजयपुर्यास्तु पञ्चविशतियोजनीम् । गत्वा वनानि घरवारि स्युः प्राच्या दिक्चतुष्टये ॥४२॥ प्रमाण पूर्व प्रमाणसे आधा है। चौथे मण्डलको चारों दिशाओं में जो भवन-रचना है वह तीसरे मण्डल की भवन-रचनाके समान है ॥४०॥ पाँचवें मण्डल में लो भवन हैं वे चौथे मण्डलके भवनोसे अर्ध प्रमाग हैं और छठवें मण्डलके भवन पोचव मण्डलके भवनोंके समान हैं ॥४०६) आदिके दो मण्डलामे उत्पत्ति स्थानकी वेदिकाके तुल्य वेदिका है और उसके आगे दो-दो मण्डलोकी वेदिकाएं पूर्व-पूर्व वेदिकाके प्रमाणसे आधी-आधी विस्तारवाली जानना चाहिए ।।४१०॥ बीचके भवनमें चमर और सफेद छन्त्रोंसे युक्त विजयदेवका उत्तम सिंहासन है । उसपर वह विजयदेव पूर्वाभिमुख होकर बैठना है ॥४११॥ उसकी उत्तर दिशामें छह हजार सामानिक देव वैठते हैं। तथा आगे और दिशाओं मे छह पट्टदेवियों आसन ग्रहण करती हैं ॥४१२॥ पूर्व-दक्षिण-आग्नेय दिशाम आठ हजार उत्तम पारिपद व बैठते हैं । मध्यम परिषद्के दर्श हजार देव दक्षिण दिशामे स्थित होते हैं। बाह्य परिषद्के बारह हजार देव, पश्चिम दक्षिण- नैऋत्य दिशाम आसनारूढ़ होते हैं और सात सेनाओके महत्तर देव पश्चिम दिशामें आसन ग्रहण करते है ॥४१३-४१४|| चारो दिशाओम अठारह हजार अगरक्षक रहते हैं और चारी दिशाओमें उतने ही उनके भद्रासन हैं ।।४१५॥ विजयदेवकी अठारह हजार परिवार देवियाँ हैं । इन सबके द्वारा सेवित होता हुआ वह कुछ अधिक एक पल्य तक जीवित रहता है ॥४१६।। विजयदेवके भवनसे उत्तर दिशामे एक सुधर्मा नामकी सभा है जो छह योजन लम्बी, तीन योजन चौड़ी, नौ योजन ऊँची और एक कोश गहरी है ॥४१७|| सुधर्मा सभासे उत्तर दिशाम एक जिनालय है जिसकी लम्बाई-चौड़ाई आदिका विस्तार सुधर्मा सभाके समान है । पश्चिमो. त्तर दिशामे उपपार्श्व सभा है ॥४१८॥ उसके आगे अभिषेक सभा, उसके आगे अलंकार सभा, और उसके आगे व्यवसाय सभा है। ये सब सभाएँ सुधर्मा सभाके समान हैं ।।४१६|| विजय देवके नगरमै सब मिलाकर पाँच हजार चार सौ सड़सठ भवन है ॥४२०।। विजयदेवके नगरसे बाहर पञ्चीस योजन चलकर पूर्वादि दिशाओमें चार धन हैं ॥४२१।। १. विदिशोऽस्य म०।२ श्रासनैः सह विद्यमाना सासनाःम। विदिशि पट् महादेवीनामासनानि । ३ दशसहस्राणि । ४ मेव्यमानस्लैः म. 12. जीवन्ति म० । .

पञ्चमः सर्गः - अशोकवनमादौ च सप्तपर्णवनं ततः । स्याचम्पकत्रनं नाम्ना तथा चूनवनं ततः ॥४२२॥ योजनानां सहस्राणि द्वादशायाम इत्यते । शतानि पञ्चविस्तारास्तेषां मध्ये तु पादपाः ॥४२३॥ अशोकः सप्तपर्णश्च चम्पकाचूनपादपः । जम्बूगोठार्द्धमानाश्च पीठा जम्बर्द्धमानकाः ॥४२४॥ चततः प्रतिमास्तेषु चतुर्दिक्षु यथायथम् । अशोकादिमुरेरच्या जिनानां रत्नमयः ।।४२५|| वनस्योत्तरपूर्वस्यामशोकपुरमत्र च । मानेन विजयस्येव प्रापादोऽशोकनायकः ॥४२६।। सक्षपर्णपुरं पूर्वदक्षिणस्थां वनस्य तु । सप्तपर्णपुरस्थात्र प्रासादः पूर्वमानकः ॥२७॥ दक्षिणापरदिग्भागे चम्मकस्य पुरं वनात् । अपरोत्तरदिग्मागे पुरं चै तामरस्य च ॥४२८।। वैजयन्तादयो देवा विजयस्य समात्रयः । दक्षिणादिपुराधीशाः स्वालयायुःपरिच्छदैः ॥४२६ योजनानां तु लक्ष द्वे विस्ती! लवणार्णवः । परिक्षिप्य स्थिती द्वीपं परिक्षेत्र सवेदिकः ॥३०॥ लधाः पञ्चदशाशी या महतं च शतं तथा । त्रिशन्नव च देशोना परिधिलवणाम्बुधः ॥४३॥ अष्टादश सहस्राणि कोठ्या नवशतान्यपि । त्रिसप्ततिश्च निश्चैया लक्षाः पट्पष्टिरेव च ।।४३२।। सहस्राणि च पश्चाशनव तानि च पट शती । गणितस्य पदं वेद्यं प्रकोण लवणार्णवे ॥४३३॥ दशैवोपरि मूले च सहस्राणि दश स्मृतः । सहस्रमवगाडोऽधो ध्रुवाण्येकादशीट्रितः ।।४३४।। तटान्ता-पञ्चनवति देशान् गवाऽवगाहते । देशमैकमयश्चैवमद्गुलादि सयोजनम् ॥४३५।। स गत्वा पञ्चनवति देशान् देशांश्च पोटश । उरिठूतोऽगुलहस्तादीन् योजनानि च सागरः ।।४३६॥ उनमें पहला अशोकवन, दूसरा सप्तपर्णवन, तीसरा चम्पकवन और चौथा आम्रवन है ॥४ ये वन बारह योजन लम्बे और पाँच सौ योजन चौड़े हैं। इन वनोंके मध्यमें क्रमसे अशोक, सप्तपर्ण, चम्पक, और आमके प्रधान वृक्ष हैं। इन वृक्षोंकी पीठिका जम्बू वृक्षकी पीठिकासे आधी है तथा इनका निजका विस्तार जम्यू वृक्षसे आधा है ॥४२३-४२४|| उन चारो वनों की चारों दिशाओमे यथायोग्य अशोकादि देवोंके द्वारा पूजित जिनेन्द्र देवकी ग्रनमयी चार प्रतिमाएँ हैं ॥४२५॥ अशोक पनकी 'उत्तर-पूर्व दिशा में अशोकपुर नामका नगर है इसमें अशोक नामक देवका भवन है जिसका विस्तार विजयदेवके भवनके समान है ॥४२६।। समपर्ण वनकी पूर्व दक्षिण दिशाम सप्तपर्णपुर है उसमें पूर्व प्रमाणको धारण करनेवाला सप्त- पर्ण देवका भवन है ॥४२७॥ चम्पक वनको दक्षिण-पश्चिम दिशामें चम्पक देवका चम्मक- पुर और आम्रवनकी पश्चिमोत्तर दिशामें आम्रदेवया आम्र नगर है ।।४२८॥ वैजयन्त आदि तीन देव दक्षिणादि दिशाओं में बने हुए नगरीके स्वामी हैं तथा अपने भवन आयु और परि- वार आदिको अपेक्षा विजयदेयके समान हैं ॥४२६। इस प्रकार जम्बू द्वीपका वर्णन किया । अय लवणसमुद्रका वर्णन करते हैं- • वैदिकासे सहित लवण समुद्र, दो लास योजन विस्तारवाला है और वह परिसाके समान जम्बू द्वीपको घेरकर स्थित है ॥४३०॥ इसकी परिधि पन्द्रह लास इक्यासी हजार एक सी उनतालीस योजनम कुछ कम है ४ि३१॥ तथा सके गणितका प्रकीर्णक पद (क्षेत्रफल) भटाग्ह हजार नौ सो तिहत्तर करोड़, छयामठ लास, उनमठ हजार छह सौ योजन है ॥४३२-४५३।। इसकी ऊपर नीचे चौड़ाई दश हजार योजन, गहराई एक हजार योजन और अवस्थित रूपमे ऊँचाई ग्यारह योजन प्रमाण है ॥४३॥ यह लघगसमुद्र, तटान्तसे पंचानये हाथ जानेपर एक हाथ, पंचानवे अंगुल जानेर एक अंगुल और पंचानवे योजन जानेपर एक योजन गहग है ।।४३५॥ और पंचानचे अङ्गुल, पंचानवे हाथ या पंचानवे योजन जानेपर यह समुद्र सोलह अगुल, सोलह हाथ या सोयह योजन ऊँचा है अर्थान् वटान्नसे पंचानवे अहुल जानपर १ म्यूदं- म० । २. ननामरम्प च म । ३ १८६७३६६५९६७०।

१०० हरिवंशपुराणे शुक्ले पासहस्राणि यावत्तावत् प्रवर्धते । पक्षे महीयते कृष्णे यावदेकादशैव सः ॥३०॥ त्रिशती व प्रयस्त्रिंशद् योजनानि दिने दिने । विभागं वर्धते वाधिः शुक्ले कृष्णेच हीयते ॥४३८।। मक्षिकापचम सूक्ष्मान्तो वेदिकान्ते पयोनिधि । स चोच मानतोयस्तु योजनादं प्रबद्धते ॥४३॥ पट्पष्टि द्वे शते दण्डा द्वौ हस्तौ पोदशाङ्गुली । शुक्ले कृष्णे च ते स्पाता वृद्धिहानी दिने दिने ॥४४०॥ अधः संक्षेपणी द्रोणी विस्तीर्णो चितौ दिवि । अन्यथा नौपुटाम्भोधिः समो वा यवराशिना ॥४॥ जगत्याः पञ्जनयति सहस्राणि प्रविश्य तु । मध्ये स्युर्दिक्षु चरवारि पातालविवराण्यधः ।।४४२॥ प्राच्यां पातालमाशायां प्रतीच्यां बहवामुखम् । कदम्बकमपाच्यो स्यादुदी- यूपकेसरम् ।।४४३॥ तन्मूलमुखविस्तार: सहस्राणि दश स्मृतः । गाहस्वमभ्यविस्तारावेका लक्षेति लविती ॥५४॥ अलजलसमानानि पातालानि समन्ततः । बाहुल्यं पत्रकुटयानां तेषां पञ्च शतानि तु ॥४४५।। प्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि प्रयस्त्रिंशच्छ्तत्रयम् । एकैकोऽत्र विभागः स्याद् योजनानां तु भागवान् ।।४४६॥ ऊध्र्वभागे जलं तेषां नृतीये केवलं सदा । मूले च बलवान् घायुमध्यमागे क्रमेण तौ ॥४४७॥ वायोरुन्छासनिश्वासौ पातालेषु स्वभावजौ । तदशादुदक्स्यो मधश्व परिवर्तनम् ॥४४॥ भागः पञ्चदशः शुक्ले वायुभिः पूर्यते शनैः । पातालानां जलः कृष्णे स्थितिः स्थापनसन्धिषु ॥४४॥ सोलह अङ्गुल ऊँचा है, पंचानवे हाथ जानेपर सोलह हाथ ऊँचा है और पंचानवे योजन जाने- पर सोलह योजन ऊँचा है ॥४३६॥ शुक्ल पक्षमे समुद्रका जल पाँच हजार योजन तक ऊँचा बढ़ जाता है और कृष्ण पक्षमें स्वाभाविक ऊँचाई जो ग्यारह हजार योजन है वहाँ तक घट जाता है ।।४३७॥ शुक्ल पक्षमें समुद्र प्रतिदिन तीन सौ तैतीस योजन और एक योजनके तीन भाग बढ़ता है तथा कृष्ण पक्ष में उतना ही घटता है ॥४३८|| वेदिकाके अन्तमें समुद्र मक्षिकाके पसके समान अत्यन्त सूक्ष्म है परन्तु जब उसकी जलमें वृद्धि होती है तब आधा योजन तक बढ़ जाता है ॥४३॥ शुक्लपक्षमें वैदिकाके अन्तमें प्रतिदिन समुद्रकी वृद्धि दो सौ छयासठ धनुप, दो हाथ और सोलह अङ्गुल होती है और कृष्णपक्ष में प्रतिदिन उतनी ही हानि होती है ॥४४०॥ संकुचित होता हुआ समुद्र नीचे भागमें नावके समान रह जाता है और ऊपर पृथिवीपर विस्तीर्ण हो जाता है तथा आकाशमें इसके विपरीत जुड़ी हुई दो नौकाओके पुटके समान अथवा जौकी राशिके समान नीचे चौड़ा और ऊपर संकीर्ण हो जाता है ॥४४१॥ वेदीसे पंचानबे हजार योजन भीतर प्रवेश करनेपर चारों दिशाओम नीचे चार पाताल- विवर हैं ॥४४२।। उनमें पूर्व दिशाम पाताल, दक्षिणमे अडवामुख, पश्चिममें कदम्बुक और उत्तरमै यूपकेसर नामका पाताल है ।।४४३।। इन चारों पातालोंके मूल और अग्रभागका विस्तार दश हजार योजन हे तथा गहराई और अपने मध्य भागका विस्तार एक-एक लाख योजन प्रमाण माना गया है ॥४४४॥ ये पाताल-विवर गोलीके समान हैं अर्थात् इनका तल और ऊपरका विस्तार अल्प है तथा मध्यका अधिक है। इनकी वन्नमयी दीवालों की मोटाई सब भोरसे पाँच-पाँच सौ योजन है ॥४४५॥ इन विवरोके तीन-तीन भाग हैं उनमें से एक भाग ततीस हजार तीन सौ तैंतीस योजन और एक कला प्रमाण है ॥४४६॥ इनके तीसरे ऊर्ध्व भागमें केवल जल रहता है, नोचेके भागमें बलवान् वायु रहती है और बीचके भागमे क्रमसे जल तथा वायु दोनों रहते हैं ॥४४॥ पातालोमें जो वायु है उसका उच्छ्रास ऊँचा उठना और निश्वास-नीचे आना स्वाभाविक है उसीके कारण उनमे जलका ऊँचा-नीचा परिवर्तन होता रहता है अर्थात् जब वायु ऊपर उठती है. तब जल ऊपर उठ जाता है और जब वायु नीचे बैठती है तब जल नीचे बैठ जाता है ॥४४॥ पातालोंका पन्द्रहवाँ भाग शुक्लपक्षमें धीरे- धीरे वायुसे भरता रहता है और कृष्णपक्षमे जलसे । अमावस्या और पूर्णिमाके दिन उनकी १ स्थिति स्यात्पशसन्धिषु म ।

पञ्चमः सर्गः १०१ पद्वयं सहस्राणि सप्तविंशतिरन्तरम् । शतं सप्ततिरेषां' स्यात् पादोनं योजनं पृथक् ॥४५०॥ विदिक्षु क्षुद्रणतालचतुष्कं मुखमूलयोः । सहस्र विस्तृतं देयमध्यविस्तारतो दश ॥१५॥ चतुर्णामपि तेषां स्यात्पञ्चाशत्कुत्यविस्तृतिः । एकैकस्य त्रिमागेषु प्रागिवाम्भाप्रभजनी ॥४५२॥ त्रियोजनमहस्राणि प्रयस्त्रिंशं शतत्रयम् । सनिमार्ग त्रिमागानां प्रत्येक योजनस्थितिः ॥१५३।। एकलहा सहस्राणि त्रयोदश निजान्तरम् । पञ्चाशीति प्रयोऽष्टांशाः कुण्डानां दिग्विदिस्थितम् ।।४५४॥ मुक्तावलीवदेतेषामन्तरालेपु चाष्टम् । समुद्रे क्षुद्रपातालसहस्रमवतिष्ठते ॥४५५॥ सहस्रमवगाहश्च मध्यविष्काम एव च । योजनानां शतं तेषां विस्तारो मुखमूलयोः ॥४५६॥ पञ्चविंशशतं तानि प्रत्येकं चान्तरेऽन्तरे । विहींनाष्टशती क्रोशः सविशेपस्तदन्तरम् ॥१५॥ यथायोगपरावृत्तसलिलाप्लवविप्लवाः । पातालौघाः समस्तास्ते क्षुद्राश्च परिकीर्तिताः ॥४५८॥ तदाद्गरवा सहस्राणि द्वाचत्वारिंशतं समौ । चतुर्दिक्षु सहस्रोच्चैः द्वौ द्वौ स्यातां तु पर्वतौ ॥४५॥ कौस्तुभः कौस्तुभामश्र पातालस्योभयान्तयोः । राजतारदकुम्माभी तस्मुरौ विजयधियौ ॥४६॥ उदकरचोदवासश्च कदम्बुकसमीपगौ । शिवश्च शिवदेवश्च तयोदेवौ यथाक्रमम् ॥१६॥ नगो शवमहाशवी बहवामुखपाश्यगौ । शङ्खाभावुदकश्च स्यादुदवासश्च तरमुरौ ॥१२॥ उदकोऽप्युदवासोऽपि यूपकेसरपार्श्वगो । रोहितो लोहिताश्च तरसुरौ परिकीर्तितौ ॥४६३।। स्वाभाविक स्थिति हो जाती है ॥४४धा इन पाताल-विवरोंका पृथक्-पृथक् अन्तर दो लाख सत्ताईस हजार एक सौ पौने इकहत्तर योजन है ॥४५०॥ चारों विदिशाओं में चार तुद्र पाताल-विवर हैं इनका ऊपर और नीचे एक-एक हजार तथा मध्यमें दश हजार योजन विस्तार है एवं उनकी ऊँचाई भी दश हजार योजन है ॥४५१॥ इन चारोंफी दीवालोंकी चौड़ाई पचास योजन है तथा प्रत्येक तीन-तीन भाग हैं और उनमें पूर्वको भाँति जल तथा वायुका सद्भाव है ॥४५॥ तीनों भागोंमें प्रत्येक भाग तीन हजार तीन सौ तीस योजन नथा एक योजनके तीन भागों में एक भाग प्रमाण है ॥४५३।। दिशाओं और विदिशाओंके पाताल-विवरोंका परस्पर अन्तर एक लाख तेरह हजार पचासी योजन है ।।४५४॥ लवण समुद्रमें इन आठ पाताल-विवरोंके आठ अन्तरालोंमें एक हजार क्षुद्र पाताल और भी हैं जो मोतियोंकी मालाके समान सुन्दर जान पड़ते हैं ॥४५शा इन बुद्र पाताल विवरोकी गहराई एक हजार योजन है और विस्तार मध्यमें एक हजार योजन तथा ऊपर-नीचे सौ-सी योजन है ॥४५६॥ ये क्षुद्र पाताल-वियर एक-एक अन्तरालके वीचमें एक सौ पचीस एक सो पश्चीस हैं तथा इनका पारस्परिक अन्तर सात सौ अंठानवे योजन एवं कुछ अधिक एक कोश है ।४५७।। जिनमें यथायोग्य पानीका प्रवेश तथा निर्गम होता रहता है, ऐसे ये समस्त पाताल- विवरॉके समूह क्षुद्र पाताल कहे गये हैं ।।४५८|| तटसे ययालीस हजार योजन चलकर चारों दिशाओंमें एक-एक हजार योजन ऊँचे दो. दो पर्वत हैं ॥४५६॥ पूर्व दिशाके पाताल-विवरकी दोनों ओर कौस्तुभ और कौस्तुमास नामके अर्धकुम्भाकार चाँदीके दो पर्वत है दनके अधिष्ठाता (उदंग और उदयास) देव विजयदवफे समान वैभवको धारण करनेवाले हैं ॥४६॥ दक्षिण दिशाके पदम्युक पातालविवरफे समीप नदफ और उदवास नामके दो पर्यत है । क्रमसे शिव तथा शिषदेय उनके अधिष्ठाता देव है ।।४६१।। पश्चिम दिशाके यहवामुन्य पातालयिवरके समीप शद्ध और महाराह नामके दो पर्वत हैं तया शतके समान भाभावाले शिय और शिवदेव नामक देय अधिष्ठाता है ।।४६२।। उत्तर दिशाके भूपकमर पाताल-विवरफे समीप उदफ और उदयाम ये दो पर्वत हैं तथा रोहित और १ -रेव स.। २. बदनन्तरं म ।

हरिवंशपुराणे योजनानां तु लक्षका सहस्राणि च पोडश । अन्तरं पर्वतानां स्यानिजपातालमूर्तिभिः ।।४६॥ नागवेलन्धराधीशा गिरिमस्तकवर्तिपु । वसन्ति नगरेप्वेते नागैलन्धरैः सह ॥४६५|| नागानां च सहस्राणि द्विचत्वारिंशदम्बुधौ । लवणाभ्यन्तरां वेला धारयन्ति नियोगतः ॥४६६।। द्वासप्ततिसहस्राणि बाह्ये वेलां जलाकुलाम् । धारयन्ति सदा नागा जलक्रीटाढादराः ॥४६७॥ अष्टाविशतिसंख्यानि सहस्राणि यथायथम् । अमोदकमुदग्रं तु नागानां धारयन्ति च ॥४६८।। द्वादशैव सहस्राणि वारिधावपरोत्तरम् । तावत्येव सहस्राणि विस्तृतः सर्वतः समः ।।४६९।। गोतमो नामतो द्वीपो गोतमस्तस्य चामरः । सोऽपि कौस्तुभदेवेन परिवारादिभिः समः ।।४७०।। मास्त्वेकोरुकाः पूर्वे दक्षिणे तु विपाणिनः । लागूलिनोऽपरे च स्युरुत्तरेऽभापकास्तथा ॥३७१।। विदिक्षु शशकर्णास्तु चतसृष्वपि भापिताः । एकोहकोत्तरापाच्योरश्वसिंहमुखाः क्रमात् ।।४७२।। शकुलोकर्णनामानः पाचयोस्तु विषाणिनाम् । श्चमुखा वानरास्या ये ते लागूलिकपार्श्वयोः ॥४७३॥ अभापकान्तयोश्चापि शरकुलोकर्णमानुपाः । गोमुसा मेपवक्त्रा. स्युर्विजया?भयान्तयोः ॥४७४।। हिमवत्प्राक्प्रतीच्योः स्युरस्काफालमुखा नराः । मेघविद्युन्मुखाः प्राच्यप्रतीच्योः शिखरिश्रुतेः ॥४७५।। आदर्शगजवक्त्राख्या विजयान्तियोर्मताः । चतुर्विशतिरेव स्युर्तीपाश्चापि तदाश्रयाः ॥४७६।। गन्या पञ्चशती दिक्षु विदिश्वन्तरदिक्षु च । पञ्चाशतं च ते द्वीपाः पट्शती मुखपर्वताः ।।४७७।। लोहितान्तक उनके अधिष्ठाता देव हैं ।।४६३॥ इन पर्वतोंका अपने-अपने पाताल-विवरोंसे एक लाख सोलह हजार योजन अन्तर है ।।४६४॥ इन पर्वतोके ऊपर अनेक नगर बने हुए हैं. उनमे वेलंधर जातिके नागकुमार देवोके साथ उनके स्वामी निवास करते हैं ॥४६५॥ लवण समुद्र में बयालीस हजार नागकुमार अपने नियोगके अनुसार उसकी आभ्यन्तर वेलाको धारण करते हैं और बहत्तर हजार नागकुमार जलसे भरी वाह्य वेलाको सदा धारण करते हैं। ये नागकुमार जलक्रीडा करने में दृढ़ आदर रखते हैं ॥४६६-४६७॥ अट्ठाईस हजार नागकुमार लवण समुद्रकी उन्नत अप्रशिखाको धारण करते हैं ॥४६॥ लवण समुद्रकी पश्चिमोत्तर दिशामे बारह हजार योजन दूर चलकर बारह हजार योजन विस्तारवाला एक गोतम नामका द्वीप है । यह द्वीप सब ओरसे सम है तथा गोतम नामका देव उसका अधिष्ठाता है । परिवार आदिकी अपेक्षा गोतम देव कौस्तुभ देवके समान हैं ।।४६६-१७०।। लवण समुद्र की पूर्व दिशामें एक टॉगवाले, दक्षिणमे सींगवाले, पश्चिममे पूंछवाले और उत्तरमे गूंगे मनुष्य रहते हैं ॥४७१॥ चागे विदिशाओमे खरगोशके समान कानवाले मनुष्य कहे गये हैं। एक टॉगवालोंको उत्तर और दक्षिण दिशाम क्रमसे घोड़े और सिंहके समान मुखवाले मनुष्य रहते हैं ॥४७२।। सींगवाले मनुप्योकी दोनो ओर शष्फुलोके समान कानवाले और पूंछ- वालोको दोनो ओर क्रमसे कुत्ते और वानरके समान मुखवाले मनुष्य रहते हैं । ४७३|| गूंगे मनुष्योंकी दोनो ओर शप्कुलीके समान कानवाले रहते हैं। विजया पर्वतके दोनो किनारीपर जो कि पूर्व-पश्चिम समुद्रमे निकले हुए हैं क्रमसे गौ और भेड़के समान मुखयाले रहते हैं ॥४७४।। हिमवत् पर्वतके पूर्व और पश्चिम कोणोपर क्रमसे उल्कामुख और कृष्णमुख तथा शिखरी पर्वत- के पूर्व पश्चिम कोणोपर मेघमुख और विद्युन्मुख मनुष्य रहते हैं ।।४७शा और ऐगवत क्षेत्रमै जो विजयाध है उसके दोनों कोणापर दर्पण तथा हाथ के समान मुखवाले मनुष्य माने गये हैं। इस प्रकार उक्त चौबीस द्वीप ही ऊपर कहे हुए मनुष्योके आश्रय है ॥४७॥ दिशाओं और विदिशाओके अन्नरद्वीप समुद्रतटसे पाँच सौ योजन, अन्तरदिशाओके साढ़े पाँच सौ योजन और पर्वतांके कोणवर्ची द्वीप छह सौ योजन आगे चलकर हैं इन द्वीपोके अग्रभागमें एक-एक १. -मुद्रग्रेस पञ्चमः सर्गः १०३ दिग्गताः शतरुन्द्राः स्युः पञ्चविंशतिमद्विजाः । रुन्द्रा पञ्चशतं द्वीपा विदिच्छन्तरदिक्षु च ॥१७८।। ते पञ्चनवतं भागं'स्वप्रदेशस्य चाप्लुताः । जलायोजनमुद्विवेदिकापरिवारिताः ।।४७६।। तेनैव पोडशाभ्यस्तमुपरिष्टानलावृताः । मङ्कलय्याधरं वो, क्षेत्रं वाच्यं जलावृतम् ॥४८॥ जम्बू द्वीपस्य यावन्तो द्वीपा: निकटवर्तिनः । तावन्तो धातकीविण्ड-द्वीपस्य लवणोदजाः ॥४॥ अष्टादशकुलास्तेपु पत्यायुष्काः कुमानुपाः । एकोरुगाः गुहावासाः मृष्टमृदोजनास्तु ते ॥४२॥ शेपपुष्पफलाहाराः वृत्तमूलनिवासिनः । एकान्तराशना' मृत्वा जायन्ते भौमभावनाः ॥४८३ जम्मूद्वीपजगत्या च समुद्रजगती समा। अभ्यन्तरे शिलापट्ट बहिस्तु वनमालिका ॥१८॥ चतुर्गुणस्तु विस्तारो द्वीपस्य जलधेस्तथा । सूची भवेत्रिभिन्यूनः तदन्ते मण्डलेऽखिले ॥४८५|| विस्तारहिता सूची चतुर्यासगुणा तु या । तावन्तस्तु भवन्त्यस्य जम्बूद्वीपसमांशकाः ॥४८६॥ स्युश्चतुविशतिर्भागा लवणीपसम्मिताः । पड्गुणास्ते परद्वीपे काले सप्तचतुर्गुणाः ॥७॥ पर्वत हैं ।।४७७॥ दिशाओंके द्वीप सौ योजन, विदिशाओं तथा अन्तरदिशाओंके पाँच सौ योजन और पर्वतोके तटान्तवती द्वीप पच्चीस योजन विस्तारवाले हैं ॥४७८।। इनका पंचानवेवाँ भाग जलमे डूबा है तथा ये एक योजन जलसे ऊपर उठी हुई वेदिकाओंसे घिरे हुए हैं ॥४७६।। पंचानवे भागको सोलहसे गुणा करनेपर गुणित भागोके बराबर इनके ऊपर-नीचेका क्षेत्र जलसे आवृत कहना चाहिए ॥४८॥ लवण समुद्रके जितने अन्तर्वीर जम्बूद्वीपके निकटवर्ती हैं उतने ही धातकी खण्डके निकटवर्ती हैं । भावार्थ-दिशाम चार, विदिशाओंमें चार, अन्त- रालोम आठ और हिमवत् शिग्वरी तथा दोनों विजयाध पर्वताके आठ इस प्रकार चौबीस अन्तर्वीप जम्बूद्वीपके निकटवर्ती लवणसमुद्रमे हैं तथा चौवीस धातकीसण्डके निकटवर्ती लवण समुद्रमे । सब मिलाकर लवण समुद्रमें ४८ अन्तर्वीप हैं ॥४८१।। उनमें अठारह कुल कुभोग भूमिया जीवोंकी है और वे एक पल्यकी आयुवाले हैं। एक टॉगवाले मनुष्य गुफाओंमें रहते हैं तथा मधुर मिट्टीका भोजन करते हैं ।।४८२॥ शेप मनुष्य फूल और फलोंका आहार करते हैं तथा वृक्षोंके नीचे निवास करते हैं। ये सब एक दिनके अन्तरसे भोजन करते हैं और मरकर व्यन्तर तथा भवनवासी देव होते हैं ॥४८३|| लवण समुद्रकी जगती (वेदी) जम्बू द्वीपकी जगतीके समान हैं उसके भीतरी भागमें शिलापट्ट हैं और बाहरी भागमें वन-पंक्तियाँ हैं ॥४८॥ किसी भी द्वीप अथवा समुद्रका जितना विस्तार है उसे चौगुना कर उसमेंसे तीन घटा देनेपर उसके अन्तिम मण्डलकी सूचीका प्रमाण निकलता है ॥४८शा इस करणसूत्रके अनुसार लवण ममुद्रकी सूची पॉच लाख है उसमेंसे विस्तारके दो लास घटा देनेपर तीन लाख रहे । उसमे चारका गुणा करनेपर बारह लाख हुए और उसमें विस्तारका प्रमाण जो दो लाख है उसका गुणा करनेपर चौबीस लाख हुए | इस तरह लवण समुद्रके जम्बू द्वीपके वरावर चौबीस खण्ड --विलोक्सारस्य १ क्षप्रवेशस्य म०। २ इगिगमणे पण्णउदिग तुगो सोलगुणमुवरि किं पयदे। दुगजोगे दीउदयो सबेदिया जोयणुग्गया जलदो ||६१५।। ३ भरण वइवाण विन्तर जोदम भरणेमु ताण उप्पत्ती । ण य अण्णु त्थुपपत्ती बोधन्या होई णियमेण ॥८५|| सम्मद सणरयण जेहिं मुगहिय गरेहि जागैहिं। ते मब्बे मरिऊण सोहम्माईमु जायति ॥८६|| ४ टीरस्म समुद्दस्म य पिक्सम चदुहि संगुणं शियमा । तिहि सदमहस्स ऊणा सा सूची मन्चकरणेमु ॥९॥ ---जम्मू द्वीर प्रशति १० उद्देश -ब०प्र० १० उद्देश हरिवंशपुराणे व सहस्र शतान्यावातिरपि चोत्तराः । जम्बूद्वीपसमा भागाः पुष्करद्वीपभाविनः ॥४८॥ द्वीपोऽपि धातकीखण्डः पर्येति लवणोदधिम् । योजनानां चतुर्लहाविस्तीर्णो वलयाकृतिः ॥१८॥ सूचिरम्यन्तरा पञ्च लक्षा नव तु मध्यमा । बाह्या त्रयोदश द्वीपे धातकोखण्डमण्डिते ॥४६॥ परिधिः पूर्वसूच्यास्तु लक्षाः पञ्चदशोदिताः। एकाशीतिसहस्राणि शतं त्रिंशन्नवाधिकम् ।।४६१॥ स चाष्टाविंशतिलक्षाः मध्यायाः पट्सहस्रकैः । चत्वारिंशत्सहस्राणि पश्चाशद् योजनानि च ॥४२॥ बाह्यसूच्यावसौ लक्षाश्चत्वारिंशत्स हैकया । शतानि नव पट्यकं सहस्राणि दशापि च ॥४६३॥ पूर्वापरी महामेरोद्वा मेरू भवतोऽस्य च । इवाकारौ विभक्तारी पर्वतौ दक्षिणोत्तरी ॥४६॥ सहस्रयोजगव्यासो द्वीपच्याससमायतौ । उच्छायेणावगाहेन निषधेन समौ च तो ॥४६५।। क्षेत्राणि भरतादीनि सप्त पट् कुलपर्वताः । हिमवत्पूर्वका द्वीपे तत्रापि प्रतिमन्दरम् ॥१६६।। पूर्वः स हैकनामानः सर्वे नगनदोहदाः । समोच्छ्रायावगाहाः स्युस्तेभ्यो द्विगुणविस्तृताः ॥१७॥ अररन्ध्राकृतीन्यक्रम प्रभ्यन्तरे बहिः । क्षुरप्राकृतवन्नि स्युः शैलक्षेत्राणि तानि च ॥४९८।। लया पर्वते रुद्ध सहस्राण्यष्टसप्ततिः । द्विचत्वारिंशदधौ च शतानि क्षेत्रमत्र च ॥४१६॥ पट् योजनसहस्राणि पट शतानि चतुर्दश । भरतान्तरविष्कम्भः शतं विश नाशकाः ॥५००।। हैं। धातकी खण्डमें इससे छह गुने-एक सौ चालीस हैं । कालोदधिमें धातकीखण्डके खण्डोंसे सतगुने -छह सौ यहत्तर हैं और पुष्करार्धमें कालोदधिके खण्डोंसे चौगुने-दो हजार आठ सौ अस्सी हैं ॥४८६-४८८॥ इस प्रकार लवण समुद्रका वर्णन हुआ। अब धातकीखण्डका वर्णन फरते हैं- चार लाख योजन विस्तारवाला चूड़ोके आकार दूसरा धातकीखण्ड द्वोप भी चारों ओर- से लवणसमुद्रको घेरे हुए है ॥४८॥ धातकी अर्थात् आँवलेके वृक्षोंसे सुशोभित इस धातकी- खण्ड द्वीपको अभ्यन्तर सूची पाँच लाख, मध्यम सूची नौ लाख और बाह्य-सूची तेरह लाख योजनको है ॥४०॥ इनमे पूर्व-आभ्यन्तर सूचीकी परिधि पन्द्रह लाख इक्यासी हजार एक- सो उनतालीस योजन है ॥४६१॥ मध्यम सूचीकी परिधि अट्ठाईस लाख छियालीस हजार पचास योजनकी है ।।४६२॥ और बाह्य सूचीको परिधि इकनालीस लाख दश हजार नौ सी इकसठ योजनकी है ॥४६३|| इस द्वीपमें जम्बू द्वीपके महामेरुसे पूर्व और पश्चिम दिशामें दो मेरु पर्वत हैं तथा दक्षिण और उत्तरके भेदसे दो इक्ष्वाकार पर्वत इसका विभाग करनेवाले हैं ॥४६४n वे दोनों इध्याकार पर्वत एक हजार योजन चौड़े, द्वीपकी चौड़ाई बराबर पार लास योजन लम्बे तथा ऊँचाई और गहराईकी अपेक्षा निपध पर्वतके समान (चार सो योजन ऊँचे और सी योजन गहरे ) हैं ॥४६शा द्वीपके समान इस धातकीखण्डमें भी प्रत्येक मेगकी अपेक्षा भरतको आदि लेकर सात क्षेत्र तथा हिमवान् आदि छह फुलाचल है ॥४६॥ यदोंके समस्त पर्पत नदी और सरोवर जम्यू द्वीपके पर्वत, नदी और सरोवरके ममान नामघाले हैं तथा उन्हींके समान ऊँचाई और गहराईसे युक्त हैं केवल विस्तार उनका दूना दूना है etul rस द्वीपके पर्वत और क्षेत्र भीतरको और नी गाडीके पहियेमें लंगे भागे तथा उनके यीचके अन्तरके समान हैं और यादरकी ओर सुराके ममान है अर्थान् इनका आभ्यन्तर भाग संक्षिप्त और याह्य भाग विस्तृत है ॥४१८) इस पानकीमण्डमें एक लाख अठहत्तर हजार आठ सौ यियालीस योजन प्रमाण क्षेत्र पर्वतांसे मका हुभा है ॥४॥ भरत क्षेत्रका भाभ्यन्नर विस्तार छह हजार बह सौ चौदह योजन तथा १. स. १२ एप्प R1 पञ्चमः सर्गः १०५ क्षेत्राणां च भवेच्छेदो द्विशती द्वादशोत्तरा । एकोनविंशतिस्तत्र छेदः पर्वतगोचरः ॥५०॥ द्वादशव सहस्राणि तथा पञ्च शतानि च । एकाशीतिश्च पनिशरकला मध्यमविस्तृतिः ॥५०२॥ अष्टादश सहस्राणि पञ्चशत्यपि सप्त तु । चत्वारिंशद्वहिर्भागाः पञ्च पञ्चाशता शतम् ॥५०॥ विष्कम्भत्रितयं ज्ञेयमाविदेहं चतुर्गुणम् । क्रमेण परतो हानिर्यावदेरावतवितिः ॥५०॥ पूर्वस्माद् द्विगुणो व्यासो हिमवत्पूर्वकादिषु । द्वादशस्वपि च द्वीपे तेभ्यः पुष्करनामनि ॥५०५।। भूभृतोऽर्द्धतृतीयेषु वृक्षावधारवेदिकाः । मेरुवयं विगाहन्ते चतुर्भाग निजोच्छूितेः ॥५०६॥ पड्गुणः स्वावगाहस्तु कुण्डानां विस्तृतिर्भवेत् । नदोहदावगाहोऽपि पञ्चाशद्गुणितश्च सा ॥५०॥ उच्चायश्चैत्यगेहस्य साझे ज्ञेयः शताहतः । जम्बूप्रभृतयस्तुल्या महावृता दशापि ते ५०८।। नद्यः सर्रास्थरण्यानि कुण्डपद्मा नगा हृदाः । भवगाहैः समाः पूर्वविस्तारैद्विगुणाः परे ॥५०६।। चैत्यचैत्यालया ये ते वृपमा नाभिपर्वताः । चित्रकूटादयश्चापि तथा काञ्चनकादयः ।।५१०॥ दिशागजेन्द्रकूटानि यथास्वं वेदिकादयः । व्यासावगाहनोच्यायः सर्वे द्वीपश्ये समाः ॥५१॥ अर्धयोजनमुद्विद्धं व्यस्त ग्नुःशतीम् । प्रत्येकं सबकूटानां विदितं रत्नतोरणम् ॥५१२।। अशीतिश्च सहस्राणि चत्वारि च समुच्छ्यः । चतुर्णामपि मेरूणां परयोपयोर्भवेत् ।।५१३॥ सहस्रमवगाढाश्च मेदिनी ते तु मेरवः । सहस्राणि नवव्यस्ता मूले पञ्च शतानि च ॥५१॥ त्रिंशदेव सहस्राणि द्वाचस्वारिंशता सह । तेषामेव विनिर्दिष्टः परिधिमूलगोचरः ॥५१५।। एक योजनके दो सौ बारह भागों में एक सौ उनतीस भाग प्रमाण है ॥५००॥ धातकीखण्ड- द्वीपमें पर्वत रहित क्षेत्रोंके दो सौ बारह खण्ड और पर्वतावरुद्ध क्षेत्रके एक सौ उन्नीस खण्ड होते हैं ।।५०१॥ भरत क्षेत्रके मध्यम भागका विस्तार बारह हजार पाँच सौ इक्यासी योजन छत्तीस भाग है ।।५०२॥ और बाह्य विस्तार अठारह हजार पाँच सौ सैंतालीस योजन एक सौ पचपन भाग है ।।५०३।। यह तीनों प्रकारका विस्तार विदेह क्षेत्र तकके क्षेत्रोंमें भरत क्षेत्रके विस्तारसे आगे-आगे चौगुना चौगुना अधिक है और उसके आगे ऐरावत क्षेत्र तक क्रमसे चौगुना चौगुना कम होता गया है ।।५०४॥ धातकीखण्ड द्वीपमें हिमवान् आदि वारहों पर्वतों- का विस्तार जम्बू द्वीपके पर्वतोसे दूना-दूना है । इसी प्रकार पुष्करवर द्वीपमें भी उनसे दूना-दूना विस्तार है।।५०५।। अढाई द्वीपमें मेरुपर्वतको छोड़कर कुलाचल, वृक्ष, वक्षार पर्वत और येदिकाओं. की गहराई अपनी ऊँचाईसे चौथा भाग है ॥५०६॥ धातकोखण्डके कुण्डोंका विस्तार उनकी गहराईसे छह गुना, और नदो सरोयरीका विस्तार उनकी गहराईसे पचास गुना है ॥५०७॥ घातकीखण्डके चैत्यालयोंकी ऊँचाई डेढ़ सौ योजन है और जम्बू आदि दशों महायत एक समान विस्तारवाले हैं ॥५०॥ नदी, सरोवर, वन, कुण्ड, पद्म, पर्वत और सरोवर गहराईकी अपेक्षा जम्बू द्वीपकी नदी आदिके समान हैं तथा विस्तारको अपेक्षा दूनेदूने हैं ॥५०॥ चैत्य, चैत्यालय, वृपभाचल, नाभिपर्वत, चित्रकूट आदि कांचनगिरि आदि पर्वत, दिग्गजेन्द्रोंके फूट, तथा वेदिका आदि हैं वे सब विस्तार गहराई तथा ऊँचाईकी अपेक्षा तीनों द्वीपोंमें समान हैं ॥५१०-५११॥ धातकोखण्डमें समस्त कूटोके रत्नमयी तोरण आधा योजन ऊँचे और पांच सौ धनुप चौड़े हैं ।।५१२॥ घातकोखण्ड और पुष्कर इन दोनों द्वीपोंके चारों मेरु पर्वतोंकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है ।।५१३।। वे मेरु पर्वत एक हजार योजन नीचे तो पृथिवीमें गहरे हैं और नौ हजार पाँच सौ योजन उनके मूलका विस्तार है ॥५१४॥ उनके मूल भागको परिधि तीस हजार बियालीस योजन है ।।१५।। १ सघर रिदिदं स्खलु जं खेतं हवदि धातकोखण्डे । तस्म दु छेदाणियमा वे घेर सदाणि वाराणि ॥१४॥ ज० प्र०११ उद्देश्य २ -मेरं वय म./३ परैःमः।

१०६ हरिवंशपुराणे नव चैव सहस्राणि चतुःशतयुतानि तु । चतुर्णामपि मेरूणां भूमौ विष्कम्भ इष्यते ॥५१॥ एकोनविंशदेव स्युः सहस्राणि शतानि च । पञ्चविंशति सप्तव परिधिर्वसुधातले ॥५१७॥ सहस्रा च गत्वोचं नन्दनं त्वतिविस्तृतम् । पञ्च पञ्चाशतं पञ्चशती सौमनसं वनम् ॥५१८॥ पाण्डुकं च सहस्राणि गत्वाष्टाविंशतिः पृथु । चतुर्णवतिसंयुक्ता योजनानां चतुःशती ॥५१६। शतान्यर्द्धचतुर्थानि सहस्राणि नवापि च । नन्दने मन्दरस्यायं विष्कम्भः परिभाषितः ॥५२०॥ सप्तपष्टिसहस्रार्द्धमेकोनत्रिंशदेव च । सहस्राणि परिक्षेपो नन्दने मन्दराद् बहिः ॥५२॥ शतान्यद्धचतुर्थानि सहस्राण्यष्ट नन्दनात् । विना मन्दरविष्कम्भः स चाभ्यन्तर ईरितः ॥५२२।। पडविंशतिसहस्राणि पश्चामा च चतुःशती । परिधिर्मन्दरस्यैष नन्दनान्तरगोचरः ।।५२३।। बाह्यस्त्रीणि सहस्राणि विष्कम्भोऽष्टौ शतानि च । मेरोः सौमनसे सान्तः सहस्रेण विवर्जितः ॥५२४॥ बाह्यस्तस्य सहस्राणि द्वारशैव हि पोडश । मन्दरस्य परिक्षेपो वने सौमनसे स्थितः ॥५२५॥ भष्टौ चैव सहस्रागि तथैवाष्टौ शतानि च । चतुःपञ्चाशदप्यन्तः परिधिस्तस्य तद्वने ॥५२६॥ द्वापाट्य के शतं त्रीणि सहस्राणि च पाण्डुके । गव्यूत साधिक बोध्य परिधिरुभूभृतः ॥५२७॥ नन्दनात् समरुन्द्रोऽदिः सहस्राणि दशोपरि । हानिस्तत्र क्रमादेवं वनारसौमनसादपि ॥५२८॥ दशमो दशमो भागो मूलान्प्रभृति हीयते । प्रदेशाङ्गुलहस्तादिश्चतुर्णा मेरुभूभृताम् ॥५२६॥ पुष्करिण्यः शिकाकूटप्रासादाश्चैत्यचूलिकाः । समानाः पञ्चमेरूणां व्यासावगाहनोच्छ्रयः ॥५३०॥ शतानि द्वादशैव स्यात्पञ्चविंशति विस्तृतिः । भद्शालवनस्यैपा धातकीखण्डवर्तिनः ॥५३१॥ लक्षा सह सहस्राणि शतान्यष्टौ च दीर्घता । नवसप्ततिरप्यस्य भदशालवनस्य तु ॥५३२॥ तथा पृथिवीपरका विस्तार नौ हजार चार सौ योजन है ॥५१६॥ पृथिवी तलपर उनकी परिधि उनतीस हजार सात सौ पचीस योजन है ।।५१७॥ भूमितलसे पाँच सौ योजन ऊपर चलकर अत्यन्त विस्तृत नन्दन वन है तथा पचपन हजार पाँच सौ योजन ऊपर सौमनस वन है ॥५१८।। सौमनस वनसे अट्ठाईस हजार चार सौ चौरानबे योजनपर जाकर विशाल पाण्डुक वन है ॥५१६॥ नन्दन वनमे मेरुका विस्तार नौ हजार तीन सौ पचास योजन कहा गया है ॥५२०॥ इसी वनम मेरुकी बाह्य परिधिका विस्तार उनतीस हजार पाँच सौ सड़सठ योजन है ॥५२१।। मन्दन वनको छोड़कर मेरु पर्वतका भीतरी विस्तार आठ हजार तीन सौ पचास योजन है ॥५२॥ मेरु पर्वतकी नन्दन वन सम्बन्धी परिधि छब्बीस हजार चार सौ पाँच योजन है ॥५२३।। सौमनस वनमें मेरु पर्वतका बाह्य विस्तार तीन हजार आठ सौ योजन है और आभ्यन्तर विस्तार इससे एक हजार योजन कम है ॥५२४॥ सौमनस वनमें मेरु पर्वतकी याहा परिधि वारह हजार सोलह योजन है ॥५२५। और आभ्यन्तर परिधि आठ हजार माठ सौ चौबन योजन है ॥५२६।। पाण्डुक वनमें मेरु पर्वतकी परिधि तीन हजार एक सौ घासठ योजन तथा कुछ अधिक एक कोश जानना चाहिए ।।५२७ । ये चारों मेरु पर्वत नन्दन पनसे दश हजार ऊपर तक जो समझन्द्र हैं अर्थात् समान चौड़ाईवाले हैं और उसके बाद ममसे कम-कम होते जाते हैं। यही क्रम सोमनम बनके आगे भी जानना चाहिए । क्रम यह है कि मूलसे लेकर दश हजार योजनकी वृद्धि होनेपर अगुल इस्स तथा योजनका दसवाँ-दसयों माग कम होता जाता है। अर्थात् दश हजार योजन की ऊँचाई पर एक हजार योजन, दश हाथफी ऊँचाई पर एक हाथ और दश अगुलकी ऊँचाई पर एक अगुल विस्तार कम हो जाता है।।२८-५२ पाँचौ मेगाफी वापियो, शिला, फूट, प्रासाद, चैत्य और चूलिकाएँ, चौड़ाई, गहराई और ऊँचाईको अपेक्षा एक समान हैं ॥३०॥ थातकीखण्डके भद्रशाल वनको चौड़ाई पारह मी पशोम योजन हे ॥५३१।। और इसकी लम्बाई एक लाख सात हजार आठ सौ नन्यासी १ सी पिस्त म., १० भूमि- ग. १२ शिलाः कटः प्रासादा-म०।

पञ्चमः सर्गः पट्पञ्चाशत्सहस्राणि तिस्रो लक्षा शतद्वयम् । सप्तविंशतिरायामो गन्धमादनविद्युतोः ॥५३३।। नवषष्टिसहस्राणि लक्षाः पञ्च शतद्वयम् । एकोनषष्टिरायामो माल्यवरसौमनस्यगः ॥५३४॥ द्वे लक्षे च सहस्राणि त्रयोविंशतिरेव च । 'कुलाद्रयन्ते कुरुव्यासः शतं पञ्चाशदष्ट च ।।५३५।। तिसो लक्षाः सहस्राणि नवतिः सप्त चाट तु । शतानि सप्त नवतिर्भागा द्वानपतिस्त्वयम् ॥५३६।। वक्रायामः कुरूणां स्थादामेरोराकुलाचलात् । पूर्वार्धेऽपि च पश्चाई धातकीखण्डमण्डले ॥५३॥ तिम्रो लक्षाः सहस्राणि पट्पष्टिः पट शतान्ययम् | ऋग्वायामः कुरूणां स्यादीतिश्चोभयान्तयोः ।५३८। प्रतिमेरु विदेहाश्च द्वात्रिंशरपूर्ववन्मताः । पूर्व पूर्वविदेहाख्या अपरे स्वपरे स्थिताः ॥५३६।। पूर्वस्मान्मन्दरापूर्वः कच्छाजनपदोऽवधिः । अपरादपरः सूच्या विजयो गन्धमालिनी ॥५४०।। एकादशैव लक्षा हि सा सूचिः पञ्चविंशतिः । सहस्राणि शतं तस्मादष्टापञ्चाशता सह ॥५४१॥ लक्षाश्चास्याः परिक्षेपः पञ्चत्रिंशत्प्रकाशितः । द्वापष्टिश्चाष्टपञ्चाशत्सहस्राणि प्रमाणतः ॥५४२॥ पद्मादिह्यते सूीमङ्गलावस्यधिष्टिता । सा पूर्वापरयोमोरन्तराले तु या स्थिता ॥५४३॥ लक्षाः पट् च सहस्राणि चतुःसप्ततिरष्ट च । शतानि योजनानां सा द्वाचत्वारिंशता सह ।।५४४॥ एकविंशतिलक्षाश्च चतुस्त्रिंशत्सहस्रकैः । त्रिंशदष्टौ पुनस्तस्याः सूच्या परिधिरिप्यते ॥५४५॥ व्यापी विजयविस्तारः सहस्राणि नवान हि । पट्शती त्रितयं च स्यादष्टभागास्त्रयस्तथा ॥५५६।। स्वायामः क्षेत्रवधारविमङ्गसरितां विधा । सदेवरमणानां स्यादादिमध्यान्तभेदतः ॥५४७॥ कच्छाख्यविजयायामः पञ्चलमाः सहस्रके: । नवमिः पजशत्याद्यः सप्तत्या द्विशतांशकैः ॥५४॥ विजयायामवृद्धयाद्यो युक्तो मध्योऽस्य जायते । मध्येऽपि च तयायामो युक्तोऽन्रयोऽद्रयादिवेष्वपि ॥५४॥ योजन है ।।५३२॥ धातकीखण्डके गन्धमादन और विद्युद् गजदन्त पर्वतोकी लम्बाई तीन लाख छप्पन हजार दो सौ सत्ताईस योजन है ।।५३३॥ तथा माल्यवान् और सौमनस्य गज- दन्तोंकी लम्बाई पाँच लाख उनहत्तर हजार दो सौ उनसठ योजन है ।।५३४|| कुलाचलोंके समीप कुरुक्षेत्रका विस्तार दो लाख तेईस हजार एक सौ अंठावन योजन है ॥५३५|| धातकी खण्ड द्वीपके पूर्वार्ध और पश्चिमार्ध दोनों भागोंमें मेरु पर्वतसे लेकर फुलाचलों तक कुरु प्रदेशोकी वक्र लम्बाई तीन लाग्य सत्तानवे हजार आठ सौ सत्तानवे योजन और वानये भाग है ॥५३६-५३७।। और दोनो ओर सीधी लम्बाई तीन लाख छयासठ हजार छह सी अस्सी योजन है ॥५३८।। जिस प्रकार जम्बू द्वीपमे एक मेरु पर्वतके बत्तीस विदेह हैं उसी प्रकार धातकीखण्ड में भी प्रत्येक मेरुकी अपेक्षा वत्तीस-बत्तीस विदेह हैं। इनमें पूर्वकी ओर पूर्व विदेह और पश्चिमको ओर पश्चिम विदेह स्थित है ।।५३६॥ मेरु पर्वतसे पूर्व में कच्छा नामका देश है और पश्चिममे सूचीसे युक्त गन्धमालिनी देश है। वह सूची ग्यारह लाख पच्चीस हजार एक सौ अंठावन योजन है ।।५४०-५४१।। इस सूचीको परिधि पैंतीस लास अंठावन हजार यासठ योजन प्रमाण है ॥५४२।। पद्मा देशको आदि लेकर मगलावती देश तक वह सूची ली जाती है जो पूर्व पश्चिम मेरु पर्वताके अन्तरालमें स्थित है ॥५४३।। यह सूची छह लास चौहत्तर हजार आठ सौ बयालीस योजन प्रमाण है ।।५४४॥ इस सूचीकी परिधिका प्रमाण इक्कीस लास चौतीस हजार अड़तीस योजन है ॥५४॥ इसके देशका विस्तार नौ हजार यह सो तीस योजन तथा एक योजनके आठ भागाम तीन भाग प्रमाण हे ॥५४६।। क्षेत्र, वक्षारगिदि, विभगा नदी और देवारण्य इनकी लम्बाई आदि मध्य और अन्तके भेदसे तीन तीन प्रकारको है ॥५४७॥ कन्छा देशको आदि लम्बाई पाँच लास नी हजार पाँच सौ सत्तर योजन तथा एक योजनके सौ बारह भागों में दो सौ भाग है ॥५४८इसकी आदि लम्बाईमें देशको १ कुलायन्ते म.1 २. शते म ।

१०५ पूर्वस्य विजयस्यादेशयामः सरिती विजयायामवृद्धिश्च सहस्रं तु चतुर्गुण वक्षारायामवृद्धिस्तु सप्तसप्ततिसंयुता मा विभङ्गनदीवृद्धिः शतमेकोनविंशति सप्तशन्या सहने द्वे तथाशीतिनवाधि स्थानक्रमास्त्रिकं द्वच पट चत्वारि नव आद्यो यो वृद्धिहीनोऽसौ मध्यो मध्योऽन्त अन्योन्याभिमुखा देशा वधारनगसिन्धवः पूर्वान्मन्दरतः पूर्व विदेहरपरिमैः । पाश्चा चत्वारिंशच चरवारस्तद्वीपे शतमेव च । जर कोटीनामेकलक्षा स्यासहस्राणि प्रयोदश । मवभिनवतिलक्षा पञ्चाशत्सप्तभिः सह । सहस्र द्वीपं च धातकीखण्ड परिधिपति सर्वतः । द्वीप तस्यैकनवतिलंचा सहस्राणि च सप्ततिः । पटशा पट् शतानि च कालोदे द्वासप्ततिरितस्ततः । जम्य पस लक्षास्तु कोटीनामेकत्रिंशत्सहस्रकैः । शतद्वयं । लक्षाश्चैव चतुःषष्टिषष्टिसहस्रकैः । कालोदधावश लम्बाई मिला देनेपर मध्य लम्बाई हो जाती है। जानेपर अन्त लम्बाई हो जाती है। यही क्रम ५ देश, वक्षार पर्वत और विभङ्ग नदीकी जो अन्त्य । और विभङ्ग नदीकी आदि लम्बाई है. ॥५५०॥ देशर्क योजन कही गई है ॥५५१॥ वक्षार गिरियोंको आया कला है ॥५५२॥ विभङ्ग नदियोंकी आयामवृद्धि एक वृद्धिके जाननेवाले आचार्य कहते हैं ॥५५३।। और देव योजन यानवे कला है ५५४|| पद्मा देशकी लम्बाई दं योजन एक सौ छियानवे कला है ।।५५५।। यहाँ के वक्षार वृद्धि होन जो आदि लम्बाई है वही इनकी मध्य लम्बा लम्बाई है वही इनकी अन्य लम्बाई यथाक्रमसे जानने यो विभड्न नदियाँ सीता सीतोदा नदियोंके दोनों तटॉपर आम आयामके धारक हैं ॥५५७॥ पश्चिम मेरुसे पूर्व और पश्ि मेरसे पूर्य तथा पश्चिमके विदेहाके समान है ।।५५८।। इस एक-एक लास विस्तारवाले एक सौ चौवालीस सण्ड हैं और र फल एक लास तेरह हजार आठ सौ इकतालीस करोड़ निन्यान इकसठ योजन है ।।५५५-५६१।। इस प्रकार घातकोखण्डका व वर्णन करते हैं- धातकीरसण्ड द्वीपसे दूने विस्तारवाला काले रङ्गका ६ द्वीपको सब भारसे भरे हुए है ॥५६२।। इसकी परिधि एकानवे योजनसे कुछ अधिक मानी गई है ॥५६३॥ विद्वानोंने कालो द्वीपफे समान एक टाप योजन विस्तारयाले छह सौ यहत्तर खण्ट फालोदधि समुद्रका समस्त क्षेत्रफल पाँच लाख उनहत्तर हजार पञ्चमः सर्गः १०३ कालोदे दिशि निश्चेयाः प्राच्यामुदकमानुपाः । अपाच्यामश्वकर्जास्तु प्रतीच्या पधिमानुपाः ॥५६॥ उदीच्या गजकर्णाश्च शुकरास्या विदिक्ष तु । उष्ट्रकर्णाश्च गोकर्णाः प्राच्यम्यो दक्षिणोत्तराः ॥५६८।। गजकर्णाश्वकर्णानां मार्जारास्यास्नु पाश्वयोः । पक्षिणां गजवक्त्राश्च कर्णप्रावरणाः स्थिताः ॥५६॥ शिशुमारमुखाश्चैव मकराममुखास्तथा । विजयार्द्धद्वयोपान्त्ये कालोदजलधौ स्थिताः ॥५७०॥ मां हिमवतोरने युकव्याप्रमुखाः स्थिताः । शृंगालामुखाश्चाग्रे शिखरिश्रुतिभूभृतोः ॥५७१॥ स्थिता द्वीपिमुखाश्चाग्रे भृङ्गागराजतागयोः । बादाम्यन्तरयोरन्तजगत्योद्वैप्यमानवाः ॥५७२॥ आयुर्वर्णगृहाहारः समा गरयापि लावणः । सहस्रमवगाढास्ते द्वीपाश्छिन्नतटाम्बुधौ ॥५७३।। कालोदस्था: प्रवेशेन द्वीपाः पञ्चशताधिकाः । मता द्विगुणविस्तारा लारणेभ्यः कुमानुपैः ॥५७४॥ चनुर्विशतिरन्तःस्थास्तावन्तश्च बहिः स्थिताः । लवणोदस्थितैः सर्वैः द्वीपाः पण्णवतिस्तु ते ॥५७५।। कालोदं पुष्काद्वीपः परिष्कृय द्विमन्दरः 1 स्थितो द्विगुणविष्कम्भः पृथुपुष्करलाम्छमः ॥५७६॥ मानुपक्षेत्रमर्यादा मानुपोत्तरभूभृता । परिरिसस्तु तस्याद्धः पुष्कराद्धंस्ततो मतः ।।५७७॥ - - कालोदधि समुद्रकी पूर्व दिशामें पानीके समान मुखबाले, दक्षिण दिशामें घोड़ेके समान कान- वाले, पश्चिम दिशामें पक्षियों के समान मुखवाले और विदिशाओंमें शूकरके समान मुखवाले मनुष्य रहते हैं। पूर्व दिशामें जो पानीके समान मुखवाले मनुष्य रहते हैं उनके दक्षिण और उत्तरमें दोनों ओर क्रमसे ऊँट तथा गौके समान कानयाले मनुष्य रहते हैं। गजकर्ण और अश्वकर्ण मनुष्योंकी दोनों ओर बिल्लीके समान मुखवाले तथा पक्षियोंके समान मुखवालोंकी दोनों ओर हाथी के समान मुखवाले मनुष्य स्थित हैं । इन मनुष्यों के कान इतने लम्बे होते हैं कि ये उन्हींको ओढ़-बिछाकर सो जाते हैं ॥५६७-५६६॥ कालोदधि समुद्र में विजया पर्वतके जो दो छोर निकले हुए हैं उनपर शिशुमारके समान तथा मगरके समान मुखवाले मनुष्य रहते हैं ।।५७०॥ हिमवान् पर्वतके दोनों छोरोंपर भेड़िया और व्यानके समान मुखवाले तथा शिपरी पर्वतके दोनों भागोंपर शृगाल और भालूके समान मुग्यवाले मनुष्य स्थित हैं ॥५७१।। ऐगवत क्षेत्र सम्बन्धी विजया पर्वतके दोनों भागोंपर चीता तथा भृङ्गार (मारी) के समान मुखवाले और वाह्य एवं आभ्यन्तर जगतीपर चीते के समान मुखवाले मनुष्य निवास करते हैं। ये समस्त मनुष्य आयु, वर्ण, गृह, आहार और गतिकी अपेक्षा लवण समुद्रके मनुष्योंके समान हैं, ये द्वीप एक हजार योजन गहरे हैं तथा जहाँ स्थित है यहाँ समुद्रका तट कटा हुआ है ।।५७२- ५७३।। कालोदधिर्म स्थित रहनेवाले ये द्वीप प्रवेशकी अपेक्षा पांच सौ योजनसे अधिक है। अर्थात दिशाओके द्वीप समुद्र तटसे पाँच सौ योजन प्रवेश करनेपर, विदिशाओंके द्वीप पाँच सी पचास योजन प्रवेश करनेपर और अन्तर्दिशाओंके द्वीप छह सौ योजन प्रवेश करनेपर स्थित है। इन सभीका विस्तार लवण समुद्रके द्वीपांसे दूना माना गया है तथा कुमानुप कुभोग भूमिया जीव इनमें रहते हैं ।।५७ चौथीस द्वीप कालोदधिकी भाभ्यन्तर (धातकीग्यण्डकी समीपवर्ती) सीमा और चौवीस द्वीप पाह्य (पुष्करार्द्धको समीपवर्ती) सीमामें स्थित है। इम प्रकार कालोदधिमें अड़तालीस है। लवण समुदके अड़तालीस द्वीपांके माथ मिलकर सब अन्तद्वीप छियानवे हो जाते हैं ॥५७५। इस प्रकार कालोदधिका वर्णन किया। अब पुष्कर द्वीपका वर्णन करते हैं- जिसकी पूर्व-पश्चिम दिशाओंमें दो मेरु हैं, कालोदधिको अपेक्षा जिसका दूना विस्तार है और जो पुष्कर अर्थात् कमलके विशाल चिह्नमे युक्त है ऐमा पुकरवर द्वीप कालोदधि- को चारों भोरसे घेरकर स्थित है ॥५७६|| पुष्करवर द्वीपको अर्धभाग, मनुष्य क्षेत्री सीमा १. शृगालादम।

हरिवंशपुराणे पूर्वस्य विजयस्यादरायामः सरितोऽपि वा । भन्स्यो यः स परस्याचो विजयादेश्यवस्थितः ॥५५०॥ विजयायामवृद्धिश्च सहस्रं तु चतुर्गुणम् । शतानि पश चाशीतिश्चरवारि च सारिता :५५१ घसारायामवृद्धिस्तु सप्तसप्ततिसयुता । चतुःशतीतिसंख्याता पष्टिश्च सकला कलाः ॥५५२॥ सा विभङ्गनदीवृद्धिः शतमेकोनविंशतिः । कलाश्चैव द्विपञ्चाशदिति वृद्धि विदो विदुः ॥५५३॥ सप्तशन्या सहस्र द्वे तथाशीतिनवाधिका । देवारग्यायते वृद्धिवा दानवतिः कलाः ॥५५॥ स्थानक्रमास्त्रिकं द्वच पद चत्वारि नवद्विकम् । पद्माजनपदायामः शतं पण्णवतिः कलाः ॥५५५।। भाद्यो यो वृद्धिहीनोऽसौ मध्यो मध्योऽन्त एव हि । वक्षारक्षेननवादी वेद्यमेवं यथाक्रमम् ॥५५६।। अन्योन्याभिमुखा देशा वचारनगसिन्धवः । तटयोः सदृशायामाः सीतासोतोदयोः स्थिताः ॥५५७॥ पूर्वान्मन्दरतः पूर्व विदे हैरपरिमैः । पाश्चात्यादपरे पूर्वे ते समाः स्युर्यथाक्रमम् ॥५५॥ चत्वारिशच्च चत्वारस्तद्वीपे शतमेव च । जम्बू द्वीपसमाः सण्डा गणितस्य समं पुनः ॥५५॥ कोटीनामेकलक्षा म्यात्सहस्राणि त्रयोदश । शतान्यष्टौ तथैका सा चत्वारिंशच कोटयः ॥५६०॥ नवभिनवतिलंक्षा पञ्चाशरसप्तभिः सह । सहस्राणि शतैः पमिरेकषप्ट्युसरैस्तथा ॥५६॥ द्वीपं च धातकीखण्डं परिशिपति सर्वतः । द्वीपद्विगुणविस्तारः कालः कालो रमागरः ॥५६२॥ तस्यैकनवतिर्लक्षाः सहस्राणि च सप्ततिः । पटशती साधिका पञ्च पर्यन्तपरिधिर्मतः ॥५६३॥ फ्ट शतानि च कालोदे दाससतिरितस्ततः । जम्बूद्वीपसमाः खण्टाः पण्टितैरिह पिण्डिताः ॥५६॥ पञ्च लक्षास्तु कोटीनामेकत्रिंशत्सहस्त्रकैः । शतद्वयं द्विपष्टिश्च कोटयः प्रकटाः स्थिताः ॥५६५॥ लक्षाश्चैव चतुःषष्टिनवष्टिसहस्त्रकैः । कालोदधावीतिश्च गणितस्य पदं मतम् ॥५६॥ लम्बाई मिला देनेपर मध्य लम्बाई हो जाती है और मध्य लम्बाईमें देशको लम्बाई मिल जानेपर अन्त लम्बाई हो जाती है। यही क्रम पर्वतादिकमे जानना चाहिए ॥५४॥ पूर्वमें देश, वक्षार पर्वत और विभङ्ग नदीको जो अन्त्य लम्बाई है वही आगेके देश, वक्षार पर्वत और विभङ्ग नदीकी आदि लम्बाई है ।।५५०॥ देशकी आयामवृद्धि चार हजार पाँच सौ चौरासी योजन कही गई है ॥५५१॥ वक्षार गिरियोंकी आयाम वृद्धि चार सौ सतहत्तर योजन साठ कला है ॥५५२॥ विभङ्ग नदियोकी आयामवृद्धि एक सौ उन्तीस योजन घावन कला है ऐसा वृद्धिके जाननेवाले आचार्य कहते हैं ।।५५३।। और देवारण्यको वृद्धि दो हजार सात सौ नवासी योजन बानबे कला है ॥५५४|| पद्मा देशको लम्बाई दो लाख चौरानबे हजार छह सौ तेईस योजन एक सौ छियानवे कला है ॥५५५ ।। यहाँके वक्षार पर्वत, क्षेत्र तथा नदी आदिकी आयाम- वृद्धि हीन जो आदि लम्बाई है वही इनकी मध्य लम्बाई है और आयामवृद्धि हीन जो मध्य लम्बाई है वही इनकी अन्य लम्बाई यथाक्रमसे जानने योग्य है ॥५५६|| देश वक्षारगिरि और विभङ्ग नदियों सीता सीतोदा नदियों के दोनों तटोंपर आमने-सामने स्थित हैं तथा एक समान आयामके धारक हैं ॥५५७॥ पश्चिम मेरुसे पूर्व और पश्चिममें जो विदेह हैं वे क्रमशः पूर्व मेमसे पूर्व तथा पश्चिमके विदेहोके समान हैं ।।५५८|| इस धातकीखण्डगे जम्बूद्वीपके समान एक-एक लाख विस्तारवाले एक सौ चौयालीस खण्ड हैं और समस्त धातकीखण्ड द्वोपका क्षेत्र- फल एक लाख तेरह हजार आठ सौ इकतालीस करोड़ निन्यानबे लाख संतावन हजार छह सौ इकसठ योजन है ॥५५६-५६१॥ इस प्रकार धातकोखण्डका वर्णन किया। अब कालोदधिका वर्णन करते हैं- धातकीखण्ड द्वीपसे दूने विस्तारवाला काले रङ्गका कालोदधि सागर धातकीखण्ड द्वीपको सब ओरसे घेरे हुए है ॥५६२॥ इसकी परिधि एकानबे लाख सत्तर हजार छह सौ पॉच योजनसे कुछ अधिक मानी गई है ॥५६३॥ विद्वानोंने कालोदधि समुद्रमे हॉ-तहाँ जम्बू द्वीपके समान एक लाख योजन विस्तारवाले छह सौ बहत्तर खण्ड संकलित किये हैं ॥५६४॥ कालोदधि समुद्रका समस्त क्षेत्रफल पाँच लाख उनहत्तर हजार अस्सी योजन है ॥५६५-५६६।।

पञ्चमः सर्गः १०६ कालोदे दिशि निश्चेयाः प्राच्यामुदकमानुपाः । अपाच्यामश्वकर्णास्तु प्रतीच्या पधिमानुषाः ॥५६॥ उदीच्यां गजकर्णाश्च शुकरास्या विदिक्षु तु । उष्ट्रकर्णाश्च गोकर्णाः प्रात्येभ्यो दक्षिणोत्तराः ॥५६८।। गजकर्णाश्वकर्णानां मारािस्यास्तु पार्श्वयोः । पक्षिणां गजवनाश्च कर्णप्रावरणाः स्थिताः ॥५६॥ शिशुमारमुखाश्चैव मकराभमुस्खास्तथा । विजया द्वयोपान्त्ये कालोदजलधौ स्थिताः ॥५७०॥ मरयां हिमवतोरने वृकच्याघ्रमुखाः स्थिताः । गालईमुखाश्चाने शिखरिश्रुतिभूभृतोः ॥५७॥ स्थिता द्वीपिमुखाश्चाग्रे भृङ्गाराराजतागयोः । बाह्याम्यन्तरयोरन्तजंगन्योद्वैप्यमानवाः ॥५७२॥ आयुवर्णगृहाहारः समा गन्यापि लावणैः । सहन्नमवगाढास्ते द्वीपाश्विग्नतटाम्बुधौ ॥५७३।। कालोदस्याः प्रवेशेन द्वीपाः पञ्चशताधिकाः । मता द्विगुणविस्तारा लावणेभ्यः कुमानुः ॥५७॥ चतुर्विशतिरन्तःस्थास्तावन्तव्य बहिः स्थिताः । लवणोदस्थितैः सर्वः द्वीपाः पण्णवतिस्तु ते ॥५७५।। कालोदं पुष्काद्वीपः परिष्कृत्य द्विमन्दरः । स्थितो द्विगुणविष्कम्मः पृथुपुष्करलान्छनः ।।७६॥ मानुपक्षेत्रमर्यादा मानुपोत्तरभूभृता। परिशिष्ठस्तु तस्याः पुष्करार्द्धस्ततो मतः ।।५७७।। - कालोदधि समुद्रकी पूर्व दिशामें पानीके समान मुखवाले, दक्षिण दिशामें घोड़ेके समान कान- वाले, पश्चिम दिशामें पक्षियोंके समान मुखवाले और विदिशाओंमें शूकरके समान मुखयाले मनुष्य रहते हैं। पूर्व दिशाम जो पानीके समान मुखवाले मनुष्य रहते हैं उनके दक्षिण और उत्तरमे दोनों ओर क्रमसे ऊँट तथा गौके समान कानवाले मनुष्य रहते हैं । गजकर्ण और अश्वकर्ण मनुष्योंकी दोनों ओर बिल्लीके समान मुखवाले तथा पक्षियों के समान मुखयालोको दोनों ओर हाथोके समान मुखवाले मनुष्य स्थित हैं । इन मनुष्योंके कान इतने लम्बे होते हैं कि थे उन्हींको ओद-बिछाकर सो जाते हैं ॥५६७-५६६॥ कालोदधि समुद्र में विजयाध पर्वतके जो दो घोर निकले हुए हैं उनपर शिशुमारके समान तथा मगरके समान मुखवाले मनुष्य रहते हैं ।।५७७॥ हिमवान् पर्वतके दोनों छोरोंपर भेड़िया और व्याघ्रके समान मुसवाले तथा शिखरी पर्वतके दोनों भागोंपर शृगाल और भालूके समान मुग्ववाले मनुष्य स्थित हैं ।।५७१॥ ऐगवत क्षेत्र सम्बन्धी विजया, पर्वतके दोनों भागोंपर चीता तथा भृङ्गार (मारी) के समान मुसवाले और बाह्य एवं आभ्यन्तर जगतीपर पीतेके समान मुग्नयाले मनुष्य निवास करते हैं। ये समस्त मनुष्य आयु, वर्ण, गृह, आहार और गतिको अपेक्षा लवण समुद्रके मनुप्योंके समान है, ये द्वीप एक हजार योजन गहरे हैं तथा जहाँ स्थित हैं वहाँ समुद्रका तट कटा हुआ है ।।५७२- ५७३।। कालोदधिम स्थित रहनेवाले ये द्वीप प्रवेशकी अपेक्षा पाँच सौ योजनसे अधिक हैं अर्थात् दिशाओके द्वीप समुद्र तटसे पाँच सौ योजन प्रवेश करनेपर, विदिशाओंके द्वीप पाँच सौ पचास योजन प्रवेश करनेपर और भन्तर्दिशाओंके द्वीप छह सो योजन प्रवेश करनेपर स्थित है। इन सभीका विस्तार लवण समुद्र के द्वीपोंसे दूना माना गया है तथा कुमानुप कुभोग भूमिया जीव इनमें रहते हैं ॥५७१।। पीयोस द्वीप कालोदधिको भाभ्यन्तर (घातकोग्यण्डको समीपयर्ती) सीमा और धोयोस द्वीप पाठ (पुप्फरार्द्धको समीपवर्ती ) सीमामें स्थित है। इस प्रकार फालोदधिमें अड़तालीस है। लयण समुद्र के अड़तालीस द्वीपोफे माथ मिलकर सय भन्तदीप दियानये हो जाते हैं । इस प्रकार कालोदधिका वर्णन किया। भय पुष्कर द्वीपका वर्णन करते हैं- जिमफी पूर्व-पश्चिम दिशाओं में दो मेर है, कालोदधिको अपेक्षा जिमका दूना यिातार है और जो पुष्कर अर्थात् कमलके विशाल चिदमे युक्त है ऐमा पुष्करपर द्वीप कालोदधि- फो चारों भोरम परफर स्थित है ॥५७६॥ पुष्करयर दीपका अपंभाग, मनुष्य क्षेत्र १. शृगालाद म.। ८ हरिवंशपुराणे इलाकारादिणाप्येष दक्षिणेनोत्तरेण च । विभक्तो भिद्यते द्वेधा स पूर्वश्चापि पश्चिमः ॥५७।। प्रत्येक मेरुमध्यौ तौ धातकीखण्डखण्डवत् । क्षेत्रपर्वतमद्यायः पूर्वनामभिरन्वितौ ।।५७६।। चवारिशत्सहस्राणि सहस्र पञ्चशन्यपि 1 सतिनव चांशास्तु त्रिसप्तन्युत्तरं शतम् ॥५६०11 भरतान्तरविष्कम्भो मध्यो द्वादशयोजनैः । श्रिपञ्चाशत्सहस्राणि शतैः पञ्चभिरेव च ॥५८।। भागाश्चास्य शतं प्रोक्ता भवतिश्च नवापि च । बाघोऽपि भाप्यते तस्य विष्कम्भो भरतस्य तु ॥५२॥ पञ्चपष्टिसहस्राणि योजनानि चतुःशवैः । पट चत्वारिंशदेतानि भागाश्चासौ प्रयोदश ॥५८३॥ भाविदेहं च विष्कम्भाद् वर्षा वर्ष चतुर्गुणम् । गणितविनिर्दिष्टं पर्वतादपि पर्वतः ॥५८४॥ एका कोटि: पुनर्लक्षा द्वाचत्वारिंशदेव ताः । त्रिंशच्चापि सहस्राणि योजनानां शतद्वयम् ॥५५॥ साधिकैकासपचाराद योजनानि यहिर्भवः । पुष्कराधस्य सर्वस्य परिधिः परिभाषितः ॥५६॥ तिम्रो लक्षाः सहस्राणि पञ्च पञ्चाशददिभिः । रुवं क्षेत्रं शतैः पडिभरीत्या चतुरन्तया ॥५८७॥ वैताड्यवृत्त वैताड्यास्तथा वर्षधरादयः । निजोन्सेधावगाहाभ्यां तैर्जम्बूद्वीपः समाः ॥५॥ धातकीखण्डेजेभ्यस्तु विष्कम्मा द्विगुणा मताः । पुष्कररार्द्ध समौ प्रारभ्यामिष्वाक्रारौ च मन्दरी ॥५८६॥ मानुपक्षेत्रविष्कम्भश्चत्वारिशच पञ्च च । लक्ष्यास्त्व,तृतीयौ तौ द्वीपौ वार्धिद्वयान्धितौ ॥५६॥ योजनानां सहस्रं तु सप्तशत्येकविंशतिः । उच्छायः सच्छ्यिस्तस्य मानुषोत्तरभूभृतः ॥५६॥ सक्रोशोऽपि च सनिशदवगाहश्चतुःशती । द्वाविंशत्या सहस्र तु मूलविस्तार इष्यते ॥५६२॥ प्रयोविशतियुक्तानि मध्ये तु । विस्तारोऽस्योपरि मोक्तश्चतुर्विंशाश्चतुःशती ॥५॥३॥ कोटी तु परिधिलक्षा द्विचत्वारिंशदस्य च । पत्रिशच्च सहस्राणि सप्तशस्या त्रयोदश ॥५६४॥ सप्त शतानि निश्चित करनेवाले मानुषोत्तर पर्वतसे घिग हुआ है इसलिए पुष्कराध माना गया है ॥५७७।। द्वीप उत्तर और दक्षिण दिशामें पड़े हुए इध्याकार पर्वतोंसे विभक्त है इसलिए इसके पूर्व पुष्कराध और पश्चिम पुष्कराध इस प्रकार दो भेद हो जाते हैं ॥५७८॥ इन दोनों ही खण्डाके मध्यम धातकीखण्डके समान मेरु पर्वत है तथा पहलेके ही समान नामवाले क्षेत्र पर्वत तथा नदी आदिसे दोनों खण्ड युक्त हैं ॥५७६॥ पुष्कराधके भरत क्षेत्रका आभ्यन्तर विस्तार इकतालीस हजार पाँच सौ उन्यासो योजन तथा एक सौ सेहत्तर भाग है ! मध्य विस्तार वेपन हजार पाँच सौ बारह योजन एक सौ निन्यानवे भाग है और बाह्य विस्तार पैंसठ हजार चार सौ छियालीस योजन तेरह भाग कहा जाता है ।।५८०-५८३॥ गणितज्ञ आचार्योंने विदेह क्षेत्र तक पूर्व क्षेत्रसे आगेके क्षेत्रका और पूर्व भवनसे आगेके पर्वतका चौगुना विस्तार बतलाया है ॥५८४|| समस्त पुष्कराधको बाह्य परिधि एक करोड़ व्यालीस लाख तीस हजार दो सौ उनचास योजनसे कुछ अधिक कही गई है ।।५८५-५८६॥ पुष्कराधका तीन लाख पचपन हजार छह सौ चौरासी योजन प्रमाण क्षेत्र पर्वतोंसे रुका हुआ है ।।५८७॥ पुष्करार्धके विजया नाभिगिरि तथा कुलाचल आदि अपनी-अपनी ऊँचाई और गहराईको अपेक्षा जम्यू द्वीपके विजया आदिके समान हैं ॥५८८।। परन्तु विस्तारको अपेक्षा घातकोसण्डके विजया आदिके दूने-दूने है। पुष्करार्धके दोनों इवाकार तथा दोनों मेरु धातकीखण्डके इप्वाकार और मेरुओके समान हैं ॥५८६॥ अढ़ाई द्वीप तथा लवणोदधि और कालोदधि ये दो समुद्र मनुष्यक्षेत्र कहलाते हैं। इसका विस्तार पैंतालीस लास योजन है ||१०|| उत्तम शोभासे सम्पन्न मानुपोत्तर पर्वतकी ऊंचाई एक हजार मान सोहकीम योजन है ।।५६१।। गहराई चार सौ तीस योजन एक कोश है। मूल विस्तार एक हजार पाईम योजन, मध्य विस्तार सात सौ तेईस योजन और उपरितन भागका विस्तार पार सौ चोयीस योजन है ॥५६२-५६शा मानुपोत्तरकी परिधिका विस्तार एक करोड़ ययालीस १ वृत्ताच्या म.। २. बण्ड म्यानु क०, म.।

पञ्चमः सर्गः अन्तश्छिन्नतटो माति बहिबृद्धिक्रमोन्नतिः । सोऽभ्यन्तरमुखासीनमृगाधिपतिविक्रमः ॥५१५ चतुर्दशगुहाद्वारदत्तनिर्गमनो गिरिः । पुष्करोदं नयस्यैष पूर्वापरनदीवधूः ॥५६६।। पञ्चाशद्योजनायामास्तदर्द्धव्याससंगताः । अर्धयोजनसंवृद्धसप्तत्रिंशत्समुच्छ्रिताः ॥५६॥ भष्टोच्छ्रायचासगृहद्वारोपशोभिताः । चत्वारो मूनि तस्याद्रेश्चतुर्दिा जिनालयाः ॥५६॥ तत्प्रदक्षिणवृत्तानि प्राच्यादिपु दिशासु च । इष्टदेशनिविष्टानि कूटान्यष्टादशाचले ॥५६॥ तानि पञ्चशतोत्सेधमूल विस्तारवन्ति तु । शने चार्द्धतृतीये द्वे विस्तृतान्यपि चोपरि ॥६००॥ बीणि त्रीणि हि कूटानि चतुर्दिक्षु विदिक्षु तु । चत्वारि वनमैशान्यामाग्नेय्यां तपनीयकम् ॥६०१॥ प्राच्यां दिशि तु वैडूर्य यशस्वान् वमति प्रभुः । अश्मगर्भ यशस्कान्तः सुपर्णानां यशोधरः ॥६०२॥ सौगन्धिके ततोऽपाच्या रुचके नन्दनस्तथा । लोहिताक्षे पुनः कूटे नन्दोत्तर इतारितः ॥६०३॥ तस्यामशनिघोपोऽपि वसत्यञ्जनके दिशि । सिद्धश्चालनमूले तु प्रतीच्यां कनके पुनः॥१०॥ क्रमणे मानुपारयस्तु कूटे रजतनामनि । उदीच्या स्फटिके कूटे सुदर्शन इति श्रुतः ॥६०५॥ अङ्के मोघः प्रवालेऽस्यां सुप्रवृद्धो वसन्यसौ । तपनीये सुरः स्वातिवन्ने तु हनुमानपि ॥६०६।। निपघस्पृष्टभागस्थे रत्नाग्य पूर्वदक्षिणे । वेणुदेव इति ख्यातः पन्नगेन्द्रो वसत्यसो ॥६०७।। लास छत्तीस हजार सात सौ तेरह है ॥५६४|| यह मानुषोत्तर भीतरकी ओर छिन्नतट टाँकोसे कटे हुएके समान एक सदृश है और इसका वाह्य भाग पिछली ओरसे क्रमसे ऊँचा उठता गया है अतः भीतरकी ओर मुखकर बैठे हुए सिंहके समान उसका आकार जान पड़ता है ।।५६५।। यह पर्वत चौदह गुफा रूपी दरवाजोंके द्वारा निकलनेका मार्ग देकर पूर्व-पश्चिमकी नदी रूपी स्त्रियोंको पुष्करोदधिवे. पास भेजता रहता है ॥५६६|| जिन गुफाओंसे नदियाँ निकलती हैं वे पचास योजन लम्बी पचीस योजन चौड़ी और साढ़े सैंतीस योजन ऊँची हैं ॥५६७|| मानुपोत्तर पर्वतके उपरितन भागपर चारों दिशाओमें आठ योजन ऊँचे और चार योजन चौड़े गृह-द्वारोंसे मुशोभित चार जिनालय हैं ।।५६८॥ इसी मानुषोनर पर्वतकी पूर्वादि दिशाओं में प्रदक्षिणा रूपसे इष्ट स्थानोंपर बने हुए अठारह कूट हैं n५६६॥ ये कूट पाँच सौ योजन ऊँचे हैं । इनके मूल भागका विस्तार पाँच सौ योजन और अर्श्वभागका ढाई सो योजन है ॥६००॥ मानुपोत्तर पर्वतकी चारों दिशाओंमें नीन-तीन तथा विदिशाओंमें चार फूट हैं। इन चारके सिवाय ऐशान दिशामें वनकूट और आग्नेय दिशामें तपनीयक कूट और भी हैं ॥६०१॥ पूर्व दिशाके वैडूर्य नामक पहले कूटपर यशस्थान देव, दूसरे अश्मगर्भकूटपर यशस्कान्त और तीसरे सौगन्धिक कूटपर सुपर्ण- कुमारीका स्वामी यशोधर देव रहता है। तदनन्तर दक्षिण दिशाके रुचक कूटपर नन्दन, लोहिताक्ष कृटपर नन्दोत्तर और अंजन कूटपर अशनिघोष देव रहता है। पश्चिम दिशाके अञ्जनमूल कूटपर सिद्ध देव, कनक कूटपर क्रमण देव और रजत कूटपर मानुप नामका देव रहता है। उत्तर दिशाके स्फटिक कूटपर सुदर्शन, अङ्क फूटपर मोघ और प्रवाल नामक कूटपर सुप्रवृद्ध देव रहता है । आग्नेय थिदिशाके पूर्वोक्त तपनीयक कूटपर स्वाति देव तथा ऐशान दिशाके वयक कूटपर हनुमान नामका देय रहता है। मानुषोत्तर पर्वतके पूर्व-दक्षिण कोणमें निपधाचलसे स्पृष्ट भागमें रन नामका कूट है और उसपर नागकुमारोंका स्वामी वेणुदेव रहना १. मुखामीन म० । २. पुष्को नन्दयत्येप म । ॐ ऐशान और भाग्नेय विदिशामें दो-दो तथा नैन्य और वायग्यमें एक एक इस प्रकार विदि. शाभीमें ६ सथा दिशाभोंमें १२ कुल मिलाकर 15 फूट बनाये हैं। इनमें चार सिदायतन कट और मिला देनेपर २२ कट होने हैं।

११२ हरिवंशपुराणे नीलादिस्पृष्टभागस्थे पूर्वोत्तरदिगावृते । सर्वरत्ने सुपर्णेन्द्रो वेणुदारी वसत्यसौ ॥६०८।। निषधस्पृष्टभागस्थं दक्षिणापरदिग्गतम् । बेलम्त्रं चातिबेलम्बो वरुणोऽधिवसत्यसौ ॥६०६। नीलादिस्पृष्टभागस्थमपरोत्तरदिग्गतम् । प्रभञ्जनं तु तन्नामा वातेन्द्रोऽधिवसत्यसौ ॥६१०॥ इत्यनेका ताकीर्णः सौवर्णो मानुपतितेः । प्राकार इव भात्येप मानुषोत्तरपवंतः ॥११॥ विद्याधरा न गच्छन्ति नर्पयः प्राप्तलब्धयः । समुद्घातोपपाताभ्यां विनास्मादुत्तरं गिरेः ॥६१२।। जम्बूद्वीपं यथा चारः कालोदोऽब्धिः परं यथा । द्वोपं तथैव पर्येति पुष्करोदोऽपि पुष्करम् ॥६१३।। वारुणीवरनामानं वारुणीवरसागरः । ततः क्षीरवरद्वीपं ख्यातः क्षीरोदसागरः ॥६१४॥ ततो घृतवरद्वीपं पप्ठं घृतवरोदधिः । ततश्चक्षुवरद्वीप पर्येतीक्षुरसोदधिः ॥६१५॥ नन्दीश्वरवरद्वीपं नन्दीश्वरवरोदधिः । भष्टम चाष्टमः ख्यातः परिचिपति सर्वतः ॥६१६॥ भरणं नवमं द्वीपं सागरोऽरुणमंज्ञकः । अरुणोद्धासनामानमरुणोद्भाससागरः ॥६१७॥ द्वीपं तु कुण्डलवरं स कुण्डलवरोदधिः । ततः शङ्खवरद्वीपं स शङ्खवरसागरः ॥६१८।। स्चकादिवरद्वीपं रुचकादिवरोदधिः । भुजगादिवरद्वीप भुजगादिवरोदधिः ॥६१६।। द्वीपं कुशवरं नाम्ना ख्यात. कुशवरोदधिः । द्वीप क्रौञ्चवरं चापि स क्रौञ्चवरसागरः ॥२०॥ द्विगुणद्विगुणव्यासा यथैते द्वीपसागराः । नामभिः पोडश ख्याताः असंख्येयास्ततः परे ॥६२१॥ भाषोडशादतीत्यान्यानसस्यान् द्वीपसागरान् । द्वीपो मनःशिलाभिख्यो हरितालस्ततः परः ॥६२२॥ सिन्दूरः श्यामको द्वीपस्तथैवाचनसंज्ञकः । द्वीपो हिमुलकाभिख्यस्ततो रूपवरः परः ।।६२३॥ मुवर्णवरनामाऽतो द्वीपो वज्रवरस्ततः । वैदूर्यवरमंज्ञश्व परी नागवरस्तथा ॥६२४॥ है। पूर्वोत्तर कोणमें नीलाचलसे स्पृष्ट भागमें सर्वरत्न नामका कूट है उसपर गरडकुमारोंका इन्द्र घेणुदारी रहना है। दक्षिण-पश्चिम कोणमे निषधाचलसे स्पृष्ट भागमे वेलम्व नामका कूट है उसपर वरुणकुमारोंका अधिपति अतिवेलम्ब देव रहता है। तथा पश्चिमोत्तर दिशामें नोलाचलसे स्पृष्टभागमे प्रभजन नामका कूट है और उसके ऊपर वायुकुमारीका इन्द्र प्रभजन नामका देव रहता है ॥६०२-६१०। इस प्रकार अनेक आश्चर्यों से भरा हुआ यह सुवर्णमय मानुपोत्तर पर्वत मनुष्य क्षेत्रके कोटके समान जान पड़ता है ॥६११॥ समुद्धात और उपपादके सिवाय विद्याधर तथा ऋद्धि प्राप्त मुनि भी इस पर्वतके आगे नहीं जा सकते ॥६१२।। जिस प्रकार जम्बूद्वीपको लवण समुद्र घेरे हुए है उसी प्रकार पुष्करयर द्वीपको पुष्करवर समुद्र घेरे हुए है ।।६१३॥ उसके आगे वारुणीवर द्वीपको वारुणीवर सागर, क्षीरवर द्वोपको शोरोदसागर, घृतवर द्वीपको धृतवर सागर, इक्षुवर द्वीपको इक्षुवर सागर, आठवें नन्दीश्वर द्वीपको नन्दीश्वग्यर सागर, नौवें अरुण द्वीपको अरुणसागर, अरुणोद्भास द्वीपको अरुणोद्भास सागर, पुण्हलवर द्वीपको कुण्डलपर सागर, शवयर द्वीपको शङ्कवर सागर, रुचकवर द्वीपको रुचकवर सागर, भुजगवर द्वीपको भुजगवर सागर, कुशवर द्वीपको कुशवर सागर, और प्रौञ्चवर द्वीपको क्रौशवर सागर ये सब ओरसे घेरे हुए हैं। जिस प्रकार दूने-दूने विस्तारयाले इन सोलह द्वीप सागरोंका नामोल्लेख पूर्वक वर्णन किया है उसी प्रकार दूने-दूने विस्तारवाले असंख्यात द्वीप सागर इनके आगे और है ॥६१४-६२१॥ सोलहवें द्वोप मागरफे आगे असंख्यात द्वीप सागका उलहन कर १ मनःशिल नामका द्वीप है, उसके बाद २ हरिनाल, ३ सिन्दूर, ४ श्यामक, ५ अञ्जन, ६ हिगुलक, ७ रूपयर, मुपर्णयर, ६ यसयर, १० येडूर्यवर, ११ नागवर, १२ भूतवर, १३ यक्षवर, १४ देववर १. घरगेन्द्री यमत्यमा मः । २ मतः शिलो भिन्यो म ।

पञ्चमः सर्गः ११३ - द्वीपो भूतवरश्चान्यस्ततो यपवरस्ततः । ख्यातो देववरो द्वीपः परश्वेन्दुवरस्ततः ॥२५॥ स्वयम्भूरमणाभिख्यो सन्त्यिो द्वीपसागरी । पोडशेतेऽन्धिभिः साद स्वनामसमनामभिः ॥६२६॥ राशिद्वयान्तराले स्युरसंस्था द्वीपसागराः । अनादिशुभनामानः सान्तरस्थितमूर्तयः ॥२०॥ लवणो लवणस्वादस्तसामा वारुगीरसः । घृततीररसौ द्वौ च कालोदान्त्यो शुभोदकौ ॥२८॥ मधूदकोभयास्वादः पुष्करोदः स्वभावतः । शेपास्विक्षुरसास्वादाः सर्वेऽपि जलराशयः ॥२६॥ लवणोदे महामरस्याः सम्मूच्छंनजमूर्तयः । नवयोजनदीर्घाः स्युस्तीरे मध्ये द्विरायताः ॥६३०॥ नदीमुखेषु कालोदे ते स्वष्टादशयोजनाः । पत्रिंशयोजना मध्ये गर्भजास्तु तदर्धकाः ॥३॥ 'स्वयम्भूरमणेऽप्यादी ते पञ्चशतयोजनाः । सहस्रयोजना मध्ये मत्स्याद्या नान्यसिन्धुपु ॥६३२॥ मानुपौत्तरपर्यन्ता जन्तबो विकलेन्द्रियाः । अन्त्यद्वीपार्द्धतः सन्ति परस्तात्ते यथा परे ।।६३३॥ द्वीपो वापि समुद्रो वा विस्तारेणैकलपया । सम्यः समतोतेभ्यः परस्तेभ्योऽतिरिच्यते ॥६३४॥ अर्धमन्दरविष्कम्मात् स्वयम्भूरमणाम्बुधेः । अन्तः प्राप्य स्थितायास्तु रज्ज्या मध्यमिदं विदुः ॥६३५॥ गुणितं पञ्चसस या सहस्रमवगाध तु । स्वयम्भूरमगाम्भोधि रुजुमध्यमवस्थितम् ॥६३६॥ १५ इन्दुवर तथा सबसे अन्तिम स्वयंभूरमण द्वीप तथा स्वयंभूरमण सागर है। ये सभी द्वीप अपने समान नामवाले सागरोंसे वेष्टित हैं ॥६२२-६२६॥ आदिके सोलह और अन्तके सोलह इन दोनों राशियों के बीच अनादि कालिक शुभ नामोंको धारण करनेवाले असंख्यात द्वीप और असंख्यात सागर हैं। इनमें द्वीपोंके बीच सागरका और सागरोंके बीच द्वीपका अन्तर विद्यमान है अर्थात् द्वीपके बाद सागर और सागरके बाद द्वीप इस क्रमसे इनका सद्भाव है ॥६२७।। इन समुद्रोमें लवणसमुद्रके जलका स्वाद नमकके समान है, वारुणीवर समुद्रके जलका स्वाद वारुणी--शरायके तुल्य है, घृतवर और क्षीर समुद्रका जल क्रमसे धृत और दूधके समान है। कालोदधि और अन्तिम स्वयंभूरमणका जल पानीके समान है । पुष्करवर समुद्र मधु और पानी दोनोंके स्वादसे युक्त है तथा बाकी समस्त समुद्र इक्षुरसके समान स्वादवाले हैं ॥६२८-६२६।। लवण समुद्रके तौरपर सम्मूर्द्धन जन्मसे उत्पन्न हुए महामच्छ नौ योजन लम्बे हैं तथा मध्यमें इससे दूने अर्थात् अठारह योजन लम्बे हैं। कालोदधि समुद्र में नदियों के प्रवेश स्थानपर अठारह योजन और मध्यमें छत्तीस योजन लम्बे हैं। गर्भ जन्मसे उत्पन्न होनेवाले मच्छोंको लम्बाई संमूर्च्छनज मत्स्योंसे आधी है ॥६३०-६३१।। स्वयंभूरमण समुद्र के तीरपर मच्छोंकी लम्बाई पाँच मी योजन और मध्यमें एक हजार योजन है । लवण समुद्र कालोदधि और स्वयंभूरमण इन तीन समुद्रांके सिवाय अन्य समुद्रोंमें मच्छ आदि जलचर जीव नहीं है ।।६३२॥ इस और विकलेन्द्रिय जीव ( दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय) मानुपोत्तर पर्वत तक हो रहते हैं । उस ओर स्वयम्भूरमण द्वीपके अर्ध भागसे लेकर अन्त तक पाये जाते हैं ।।६३३॥ यदि किसी द्वीप या सागरका विस्तार जानना है तो उसके पहले जो भी द्वीप और सागर निकल चुके हैं उन सबके विस्तारको इकट्ठा कर लीजिए उससे एक लास योजन अधिक विस्तार उस विवक्षित द्वोप या सागरका होता है ।।६३४॥ मेरु पर्वतकी अर्ध चौड़ाईसे लेकर स्वयंभूरमण समुद्रके अन्त तक भाधी राजू होती है। इस आधी राजूका मध्य स्वयंभूरमण समुद्रमें पचहत्तर हजार योजन प्रवेश करनेपर होता है। भावार्थ-समस्त मध्यम लोकका विस्तार एक राजू है। मेरु पर्वतकी जो चौड़ाई है उसके अर्ध भागसे लेकर स्वयम्भूरमग समुद्रके अन्त तक आधी राजू होती है। आधी राजूके आधे भागमें आधा जम्बूद्वीप तथा असंरयात द्वीप सागर और अन्तिम स्वयम्भूः १. जलयर जीग स्पणे काले यंतिम सयभुरमणे य। कम्न मही पडियरे गरि सेसे जल्या जीरा ॥३२०॥ १५ -बिलोरमारम्य हरिवंशपुराणे अनावृत्तप्रभुर्यको जम्बूद्वीपस्य रक्षकः । मुस्थितो लवणास्भोधेरधिपः प्रतिपादितः ॥६३७॥ धातकीखण्डनायौ तु प्रभासप्रियदर्शनौ । कारश्चापि महाकालः कालोदजलधीश्वरी ॥६३८।। पद्मश्च पुण्डरीकश्च पुष्करद्वीपनामझौ । चतुष्मांश्च सुचक्षुश्च मानुयोत्तरशैलेपौ ॥६३६॥ श्रीप्रभश्रीवरी नाथौ पुष्करोदस्य वारिधेः । वारुणीवरभूमीशौ वरुणो वरुणप्रभः ॥६४०॥ वामणीवरवा(शौ मध्यमध्यमसंज्ञको । पाण्डुरः पुष्पदन्तश्च तौ तीरवरभूमिपौ ।।६४१॥ वाधः चारवरस्येशी विमलो विमला 1 प्रभू घृतवरद्वीपे सुप्रभश्च महाप्रभः ।।६४२॥ कनकः कनकामश्च नायौ घृतवरोदधेः । तथैवेश्चरसहीपे पूर्णपूर्णप्रभो सुरौ ॥६४३॥ देवो गन्धमहागन्धौ नाथाविक्षुरसोदधेः । नन्दीश्वरवरद्वीपे नन्दिनन्दिप्रभौ तथा ॥६४४॥ प्रभू भद्रसुभद्रौ तु नन्दीश्वरवरोदधेः । अरुणद्वीपपौ देवावरुणश्चारुणप्रभः ॥६४५॥ मुगन्धसर्वगन्धारयावरणाब्धेरधीश्वरौ । द्वौ द्वौ दीपाधिपावेवं परतो दक्षिणोत्तरी ॥६४६॥ कोटीशतं त्रिपष्ट सातिश्चनुरुत्तराः । लक्षा नन्दीश्वरीपो विस्तीर्णो वर्णितो जिनैः ॥६४७॥ पत्रिंशच सहस्र च कोटयो नियुतानि च । द्वादशैव सहस्र द्वे तथा सप्त शतानि च ॥६॥ योजनानि त्रिपञ्चाशदान्तरः परिधिः स च । नदीश्वरवरद्वीपसम्भवी परिभाषितः ॥६४६॥ द्वासप्त युत्तर कोटी सहसद्वितय तथा ! नियुतानि त्रयस्त्रिंशन्नवन्या सहितं शतम् ॥६५०॥ पञ्चाशच सहस्राणि चतुभिरधिकानि च । वहिः परि विरेष स्यादष्टमद्वीपसम्भवी ॥६५१॥ मध्ये तस्य चतुर्दिक्षु चत्वारोऽजनपर्वताः । तुद्गाश्चतुरशीति ते व्यस्ताश्चाधःसहस्रगाः ॥६५२॥ परहाकृतयश्चित्रा वज्रमूलाः प्रभोज्ज्वलाः । भ्राजन्ते पर्वताः सर्वे सर्वतस्ते मनोहराः ॥६५३॥ सुकृष्णशिखराः शैलास्ते जाम्बूनदमूर्तयः । विकिरन्ति परां कान्ति दिइमुखेषु यथायथम् ॥६५४॥ रमण समुद्रके पचहत्तर हजार योजन तकका प्रदेश आता है, बाकी आधी राजूमें स्वयम्भूग्मण समुद्रका अवशिष्ट भाग है ॥६३५-६३६॥ जम्बू द्वीपका रक्षक अनावृत्त यक्ष है, लवण समुद्रका स्वामी सुस्थित देव कहा गया है ।।६३७|| धातकीखण्डके स्वामी प्रभास और प्रियदर्शन, कालोदधिके काल और महाकाल, पुष्करवर द्वीपके पद्म और पुण्डरीक, मानुषोत्तर पर्वतके चतुप्मान् और मुचक्षु, पुष्करवर समुद्रके श्रीप्रभ और श्रीधर, वारुणीवर द्वीपके वरुण और वरुणप्रभ, वारुणीवर समुद्रके मध्य और मध्यम, क्षीरवर द्वीपके पाण्डुर और पुष्पदन्त, क्षीरवर समुद्रके विमल और विमलप्रभ, घृतवर द्वीपके सुप्रभ और महाप्रभ, घृतवर समुद्रके कनक और कनकाम, इतुवर द्वीपके पूर्ण और पूर्णप्रभ, इक्षुवर समुद्र के गन्ध और महागन्ध, नन्दीश्वर द्वीपके नन्दी और नन्दिषभ, नन्दीश्वर समुद्रके भद्र और सुभद्र, अरुणा द्वीपके अरुण और अरुण- प्रभ और अरुण समुद्रके सुगन्ध और सर्वगन्ध, देव स्वामी हैं। इसी प्रकार आगे भी प्रत्येक द्वीप और सागरके दो-दो देव स्वामी हैं। उनमें एक दक्षिणका और दूसरा उत्तरका स्वामी है ।।६३-६४६॥ जिनेन्द्र भगवान्ने आठवें नन्दीश्वर द्वीपका विस्तार एक सौ तिरसठ करोड़ चौरासी लाग्य योजन कहा है ॥६४॥ नन्दीश्वर द्वीपकी आभ्यन्तर परिधि एक हजार छत्तीस करोड़ घारह लाग्य दो हजार सात सौ योजन है तथा बाह्य परिधि दो हजार बहत्तर फरोड़ तैतीस लाख चीवन हजार एक सौ नम्वे योजन है ।।६४८-६५१॥ नन्दीश्वर द्वीपके मध्यमें चारों दिशाओं में चार अनगिरि है। ये पर्वत चौरासी हजार योजन ऊँचे, उतने ही चौड़े और एक हजार योजन गहरे हैं ॥५२॥ ये सभी पर्यत ढोलके आकार हैं, चित्र-विचित्र हैं, वसमय मूलके धारक है, प्रभामे उज्जवल है और मब भोरमे मन हरण करते हुए देदीप्यमान हैं ॥३५३॥ सुन्दर पाले शिनगमे युक्त वे मुवर्णमयी पर्वत, दिशाओं में सय ओर अपनी उत्तम फान्ति विग्रते १ नामको म० | २. शेलयोः म । ३ लक्षाणि । ४ सहसं द्विवय म।

पञ्चमः सर्गः १५ गत्वा योजनलक्षाः स्युमहादिक्षु महीभृताम् । चतस्रस्तु चतुष्कोणा वाप्यः प्रत्येकमध्याः ॥६५५|| सहस्रपत्रसन्छन्नाः स्फटिकस्वच्छवारयः । विचित्रमणिमोपाना'विनकाद्याः सवेदिकाः ॥६५६॥ अवगाहः पुनस्तासां योजनानां सहस्रकम् । आयामोऽपि च विष्कम्मो जम्बूद्वीपप्रमाणकः ॥६५॥ भन्दा नन्दवती चान्या वापी नन्दोत्तरा परा । नन्दीघोपा च पूर्वा दिक्षु प्राच्यादिपु स्थिताः ॥६५॥ सौधर्मेन्द्रस्य भोग्याद्या द्वितीयशानभोगिनः । तृतीया चमरेन्द्रस्य चतुर्थी तु बलेरसी ॥६५॥ विजया वैजयन्ती च जयन्ती चापराजिता । दक्षिणा जनशैलस्य विक्षु पूर्वादिषु प्रमात् ॥६६॥ शक्रस्य लोकपालानां पूर्वा तु वहगस्य सा । क्रमाद् यमस्य सोमस्य भोग्या वैश्रवणस्य च ॥६६१॥ पाश्चात्याअनशैलस्य पूर्वादिदिगवस्थिताः । भशीका सुप्रवुद्धा च कुमुदा पुण्डरीकिणी ॥६६२॥ भोग्याद्या वशुदेवस्य वेणुतालेरतः परा । धरणस्य तृतीया तु भूतानन्दस्य चोत्तरा ॥६२३॥ उदीच्याञ्जनशैलस्य प्राण्याचा सुप्रभङ्करा । समनाश्व दिशासु स्वादानन्दा च सुदर्शना ॥६६४॥ ऐशानलोकपालस्प वरुणस्य यमस्य च । सोमस्य च कुवेरस्य मोग्यास्तास्तु यथाक्रमम् ॥६६५॥ पञ्चषष्टिसहस्राणि चत्वारिंशच पञ्च च । अन्तरं षोडशानां स्याान्तरं योजनानि तु ॥६६६॥ मध्यान्तराणि लतका चरवारि च सहस्रकैः । द्वियोजनाधिकानि स्युस्वाप्सां वे पट्शतानि च ॥६६७॥ बाह्यान्तराणि लक्षे द्वे त्रयोविंशतिरेव च । सहस्राणि तथैव स्युरेकपष्टया च पट शती ।।६६८॥ तासां मध्येपु वातीनां जाम्बूनदमयाः स्थिताः । पोडशार्जुनमूर्धानो नाम्ना दधिमुखाद्यः ॥६६६॥ सहस्रमवगाहास्तु तदेव दशस गुणम् । पटहाकृतयो व्यस्ता व्यायताश्च समुच्छ्रिताः ॥६७०॥ परितस्ताश्चतस्रोऽपि वापीर्वनचतुष्टयम् । प्रत्येकं तत्पमायामं तदर्दव्यासमङ्गतम् ॥६७१॥ रहते हैं ॥६५४।। एक लाख योजन आगे चलकर इन पर्वतोंकी चारों दिशाओम चार चौकोर अविनाशी वापियाँ हैं ॥६५५।। ये वापियाँ कमलोंसे आच्छादित हैं, स्फटिकके समान स्वच्छ जलसे युक्त हैं, मगरमच्छादिसे रहित और वेदिकाओसे युक्त हैं ॥६५६॥ इनकी गहराई एक हजार योजन तथा लम्बाई और चौड़ाई जम्बू द्वीपके बराबर एक-एक लाख योजनकी है ॥६५॥ पूर्व दिशामें जो अञ्जनगिरि है उसकी पूर्वादि दिशाओम क्रमसे नन्दा, नन्दवती, नन्दोतरा और नन्दीघोपा नामकी वापिकाएँ स्थित हैं।६५८॥ इनमें पहली नन्दा नामकी वापी सौधर्मेन्द्रकी, दूसरी नन्दवती ऐशानेन्द्रकी, तीसरी नन्दोत्तरा चमरेन्द्रकी और चौथी नन्दीघापा वैरोचनको भोग्य है-क्रीड़ाका स्थान है ।।६५|| दक्षिण दिशामें जो अंजनगिरि है उसकी पूर्वादि दिशाओमें क्रमसे बिजया, वैजयन्ती, जयन्ती और अपराजिता ये चार वापिकाएँ हैं ॥६६०॥ इनमसे पहली वापिकामे वरुण, दूसरीम यम, तीसरीमें सोम, चौथीम वैश्रवण क्रीड़ा करता है। ये चारों सौधर्मेन्द्रके लोकपाल हैं ॥३६१॥ पश्चिम दिशामें जो अंजनगिरि है उसकी पूर्वादि दिशाओमे कमसे अशोका, सुप्रबुद्धा, कुमुदा और पुण्डरीकिणी ये चार वापि- काएँ हैं। इनमेसे पहली वापी वेणुदेवकी, दूसरी वेणुतालिकी, तोसरी धरणकी और चौथी भूतानन्दकी क्रीड़ा भूमि है ।।६६२-६६३।। उत्तर दिशामें जो अंजनगिरि है उसकी पूर्वादि दिशाओंमें क्रमसे सुप्रभंकरा, मुमना, आनन्दा और सुदर्शना ये चार वापिकाएँ हैं। इनमें ऐशानेन्द्र के लोकपाल, वरुण, यम, सोम और कुवेर क्रमसे क्रीड़ा करते हैं ॥६६४-६६शा इन सोलह वापिकाओंका भीतरी अन्तर पैंसठ हजार पैंतालीस योजन है । मध्य अन्तर एक लास चार हजार छह सौ दो योजन है और बाहरी अन्तर दो लास तेईस हजार छह सो इकसठ योजन है ॥६६६-६६८।। उन वापिकाओके मध्यमें रूपामयी सफेद शिसरोसे युक्त सुवर्णमय सोलह दधिमुस पर्वत हैं ॥६६॥ ये सभी पर्यत एस-एक हजार योजन गहरे, दश-दश हजार योजन चौड़े, लम्चे तथा ऊँचे एवं ढोलके आकार हैं।६७०॥ चारों यापिकाओको चारों और चार १. नामकरादिजन्तुरदिताः।

हरिवंशपुराणे प्रागशोकवनं तत्र सप्तपर्णवनं स्वधा । स्याश्चम्पकवनं प्रत्यक् चूतपयनं गुदक् ॥६७२॥ पापीकोणसमीपस्था नगा रतिकरामिधाः । स्युः प्रत्येकं तु घरवारः सौवर्गाः परहोपमाः ॥६७३॥ गादाश्चाद्धनृतीयं ते योजनानां शतदयम् । सहयोरमेधविस्तारम्यायामाप्ययवर्जिताः ॥६.४॥ 'तग्राम्यन्तरकोणस्था द्वात्रिंश सेविताः मुहै। द्वारिंशद्वाशकोणस्थाः प्रत्येकं त्येकचैन्यकाः ॥६७५॥ तथैवाञ्जनका ज्ञेया नगा दधिमुखास्तथा । एकैकजिनगेहेन पवित्रीकृतमस्तकाः ॥६७६॥ प्राइमुखास्ते शतायामा पचासद् ग्यासयोगिनः । उरसेधेन गृहा जैनाः पद्यमतियोजनाः ॥६॥ अष्टो से वचनुामगाहनिद्वारमास्वराः । ते द्विपारादाभान्ति नन्दीश्वरजिनालयाः ॥६॥ पचापशतोरसेधा रस्नकाशनमूर्तयः । प्रतिमास्तेपु राजन्ते जिनानां जितजन्मनाम् ॥६॥ फाल्गुनासादिकायेपु प्रतिवर्ष तु पर्वमु । शनाद्याः कुर्वते पूजा गीर्वाणास्तेपु वेश्ममु ॥१०॥ पूर्वाल्यातचनुपष्टिवनम्वण्टान्तरस्थिताः । प्रामादास्तु चतुःपरिधननाममुराधिताः ॥१८॥ द्विषष्टियोजनोग्सेधा एकग्निशतमायताः । विस्तृताश्च पुरोद्दिष्टप्रमाणद्वारकाः पुनः ॥६८२॥ परी नन्दीश्वराम्भोधेरणीपसागरी । अन्धकारः पुनः सिन्धोयझलोकान्तमाश्रितः॥६॥ मृदङ्गसदशाकाराः कृष्णराज्यो विजृम्भिताः । भष्टौ ताश्च घनाकारा यहिस्तस्य म्यवस्थिताः ॥६॥ वन हैं जो वापिकाओके समान एक लाख योजन लम्बे और उनसे आधे अर्थात् पचास हजार योजन चौड़े हैं ॥६७१।। उनमें पूर्व दिशामें अशोकवन है, दक्षिणमे सप्तपर्णवन है, पश्चिममें चम्पकवन है और उत्तरमें आम्रपन है ॥६७२॥ वापिकाओंके कोणोंके समीप रतिकर नामके पर्वत हैं। ये पर्यंत प्रत्येक वापिकाके प्रति चार-चार हैं, सुवर्णमय हैं तथा ढोलके आकार हैं ॥६७३|| ढाई सौ योजन गहरे हैं, एक हजार योजन ऊँचे-चौड़े तथा लम्बे हैं और विनाशसे रहित हैं ॥६७४। इनमें बत्तीस रतिकर आभ्यन्तर कोणाम हैं और बत्तीस बाह्य कोणोंमें । ये सभी देवोके द्वारा सेवित हैं तथा प्रत्येकपर एक-एक चैत्यालय है ॥६७५|| रतिकरोंकी भौति अंजनगिरि तथा दीर्घमुख पर्वतोके मस्तक भी एक-एक जिन-मन्दिरसे पवित्र हैं अर्थात् उन सब- पर एक-एक चैत्यालय है ॥६७६॥ ये समरत चैत्यालय पूर्वाभिमुख, सौ योजन लम्बे, पचास योजन चौड़े और पचहत्तर योजन ऊँचे हैं ।।६७७|| आठ योजन ऊँचे, चार योजन चौड़े तथा गहरे तीन-तीन द्वारोंसे देदीप्यमान नन्दीश्वर द्वीपके ये पावन चैत्यालय अतिशय शोभायमान हैं ॥६७८॥ उन चैत्यालयांम संसारको जीतनेवाले जिनेन्द्र भगवान्की पॉच सौ धनुप ऊँची रत्न एवं स्वर्ण निर्मित मूर्तियाँ विराजमान हैं ॥६७६। प्रतिवर्प फाल्गुन, आपाढ़ और कार्तिकके आप्टा- हिक पमि सौधर्मेन्द्र आदि देव उन चैत्यालयोमें पूजा करते हैं ॥६८०॥ पहले जिन चौंसठ वन- खण्डाका वर्णन किया गया है उनमें चौंसठ प्रासाद है तथा उन प्रासादोम वनोके नामवाले देव रहते हैं ॥६८१॥ वे प्रासाद बासठ योजन ऊँचे, अतीस योजन लम्के, इतने ही चौड़े तथा पूर्वोक्त प्रमाणवाले द्वारीसे सहित हैं ॥६८२।। नन्दीश्वर समुद्रसे आगे अरुण द्वीप तथा अरुण सागर है वहाँ समुद्रसे लेकर ब्रह्म- लोकके अन्त तक अन्धकार हो अन्धकार है।।६८३|| अरुण समुद्र के बाहर मृदङ्गके समान आकार: १ व्यायामैश्चाक्वर्णिताः ख० । २. अत्राभ्यन्तरकोणेषु रतिक्रवर्णनं चिन्त्यम् । ३. गृहमुखा म०। ४ तस्या म०। रतिकरीका यह वर्णन भ्रान्तिपूर्ण है क्योकि रतिकर वापिकाओके बाह्यकोगीपर है । आभ्यन्तर कोणोंपर नहीं। इस तरह एक दिशाकी चार बावड़ी सम्बन्धी आठ-आठ रतिकर होते हैं, चारों दिशाओंको मिलाकर बत्तीस होते हैं। यहाँ भाभ्यन्तर और बाह्य दोनों कोणोंमें बत्तीस बत्तीसका वर्णन किया है इससे चौसठ रतिकर हो जाते हैं। नन्दीश्वर द्वीपकी चारों दिशाओमें ४ अंजनगिरि, १६ दधिमुख भौर ३२ रतिकर इस तरह सब मिलकर ५२ चैत्यालय सर्वत्र प्रसिद्ध है।

पञ्चमः सर्गः भस्मिन्नपर्दयो देवा दिग्मूढाश्चिरमासते । महर्द्धिकसुरः साधं कुर्युस्तद्वाधिलकनम् ।।६८५|| यत्कृण्डलवरो द्वीपस्तन्मध्ये कुण्डलो गिरिः । वलयाकृतिराभाति सम्पूर्णयवराशिवत् ॥६८६॥ सहसमनगाहोऽस्य द्विचत्वारिंशदुििनः । योजनानां सहस्राणि मणिप्रकरमासिनः ।।६६७।। सहस्त्र विस्तृतिस्त्रेधा दशसप्तचतुर्गुणम् । द्वाविंशं च त्रयोविशं चतुर्विश प्रमृत्यधः ॥६८८ प्रत्येक तस्य चत्वारि पूर्वाद्याशासु मूर्धनि । मान्ति पोदश कूटानि सेवितानि सुरेः सदा ॥६॥ पूर्वस्यां त्रिशिरा वब्रे दिशि पञ्चशिराः सुरः । कुटे वनप्रमे ज्ञेयः कनके च महाशिराः ॥६६०॥ महाभुजोऽपि तस्यां स्यात् कूटे तु कनकप्रभे । पद्मपभोत्तरोऽपाच्यां रजते रजतप्रमे ॥६॥ सुप्रभे तु महापभो वासुकिश्व महाप्रभे । अपाच्यामेव वाच्यौ तौ प्रतीच्यां तु मुरा इमे ॥६६२॥ हृदयान्तस्थिरोऽप्यके महाननभेऽप्यसौ । श्रीवृक्षो मगिटे तु स्वस्तिकरच मणिप्रभे ।।६।३।। सुन्दरश्च विशालारः स्फटिके स्फटिकप्रभे । महेन्द्र पाण्डुकस्तुर्यः पाण्डुरो हिमवत्युदक् ॥६६॥ येऽमी पोदश नागेन्द्राः सर्वे पल्योपमायुपः । यथायथं स्वस्टेषु प्रासादेपु वसन्ति ते ॥६९५॥ दिशि प्राच्या प्रतीच्यां च कुण्डलाचलमस्तके । तवीपाधिपतेर्वासी द्वे कूटे प्रकटे तयोः ॥६६६॥ उच्छ्रायो मूलविस्तारो योजनानां सहस्रकम् । भने पञ्चशती मध्ये पञ्चाशत् सप्तशत्यपि ॥६६७।। तस्यैवोपरि शैलस्य महादिक्षु जिनालयाः । चत्वारः सदृशा मानरक्षनाद्विजिनालयः ॥६६८।। प्रयोदशस्नु यो द्वीपो रुचकादिवरोत्तरः । तन्नामा तस्य मध्यस्थः पर्वतो वलयाकृतिः ॥६१३॥ वाली घनाकार आठ काली पङ्क्तियाँ फैली हुई हैं ॥६८४॥ अल्प ऋद्धिके धारी देव इस अन्ध- कारमें दिशामूढ हो चिरकाल तक भटकते रहते हैं । वे बड़ी ऋद्धिके धारक देवों के साथ ही इस समुद्रको लाँध सकते हैं ॥६॥ कुण्डलवर द्वीपके मध्यमें चूड़ीके आकारका एक कुण्डलगिरि पर्वत है जो सम्पूर्ण यवोंकी राशिके समान सुशोभित है ॥६६॥ मणियोंके समूहसे सुशोभित रहनेवाले इस पर्वतकी गहराई एक हजार योजन और ऊँचाई वयालीस हजार योजन है ॥६८७|| उस पर्वतकी मूलमें दश हजार दो सौ वीस योजन, मध्यमें सात हजार एक सौ इकसठ योजन और अन्तमें चार हजार छियानवे योजन चौड़ाई है ॥६॥ उसके मूर्धभागपर पूर्वादि दिशाम चार-चार कूट हैं। चारों दिशाओंके ये सोलह कूट सदा देवोंके द्वारा सेवित हैं तथा अत्यन्त सुशोभित हैं ॥६८६॥ पूर्व दिशाके वन नामक पहले कूटपर त्रिशिरस् , वज्रप्रभ नामक दूसरे कूटपर पश्च. शिरस् कनक नामक तीसरे कूटपर महाशिरस् , और कनकप्रभ नामक चौथे फूटपर महाभुज नामका देव रहता है। दक्षिण दिशाके रजतकूटपर पद्म, रजतप्रभ कूटपर पद्मोत्तर, सुप्रभ कूट- पर महापद्म और महाप्रभ कूटपर वासुकि देव रहता है। पश्चिम दिशाके अङ्क कूटपर स्थिर. हृदय, अङ्कप्रभ कूटपर महाहृदय, मणि कूटपर श्रीवृक्ष और मणिप्रभ कूटपर स्वस्तिक देव रहता है। उत्तर दिशाके स्फटिक कूटपर सुन्दर, स्फटिंकप्रभ कूटपर विशालाक्ष, महेन्द्र कूटपर पाण्डुक और हिमवत कूटपर पाण्डुर देव रहता है ॥६६०-६६४ा ये सोलह देव नागकुमार देवोंके इन्द्र हैं, सबकी एक पल्य प्रमाण आयु है और सब यथायोग्य अपने-अपने कूटॉपर बने हुए प्रासादाम निवास करते हैं ॥६६५॥ कुण्डल गिरिके ऊपर पूर्व-पश्चिम दिशामें कुण्डलयर द्वीपके स्वामी- के दो कूट प्रकट हैं। उन कूटोंको ऊँचाई एक हजार योजन है, मूल विस्तार एक योजन, मध्य विस्तार सात सौ पचास योजन और उपरितन विस्तार पाँच सौ योजन है ॥६६६-६६७॥ उसी कुण्डलगिरिके ऊपर चारों महा दिशाओं में चार जिनालय है जो प्रमाणकी अपेक्षा अञ्जनगिरिफे जिनालयों के समान हैं ॥६॥ रुचकवर नामका जो तेरहवाँ द्वीप है उसके मध्यमें चूड़ोके आकार का लचकवर नामका १ मवगादोऽस्य म०, क. 1२ सर्वतो म ।

हरिवंशपुराणे सहसमवगाहः स्यादीतिश्चनुरुत्तरा । सहयाण्युरिट्रतियोमो द्विचावारिशदस्य तु 18001 सहस्रयोजनम्यासं दिक्षु पञ्चशतोचितम् । शिसरे तस्य शैलस्य भाति फूटचतुष्टयम् ॥७॥ नन्द्यावतऽमरः प्राच्या पभोत्तर इतारितः । स्वहस्ती स्वस्तिकेऽपाच्या धीवृक्षे नीलकोऽपरे ॥७०२॥ उत्तरे च सुरः प्रोक्तो वर्धमानेऽअनागिरिः । चत्वारो दिग्गजेन्दारयास्तेऽपि पत्योपमायुषः ।।७०३।। तस्यैवोपरि पूर्वस्यां फूटानामष्टकं दिशि । पूक्तिकूटतुल्यं तु दिवमारी पिराधितम् ।।७०।। वैडूये विजया देवी वैजयन्ती च काशने 1 जयन्ती कनके कूटे प्राग्यरिष्टेपराजिता ॥७०५|| नन्दा नन्दोत्तरा चोभे ते दिकस्वस्तिकनन्दने । आनन्दाप्याने नान्दीवर्धनाजनमूलके ।।७०६।। एतास्तीर्थकरोत्पत्ती दिक्कुमार्यः सायंया । मातुरन्तेऽवतिष्टन्ते भास्वद्भारपायः ॥७०७॥ अमोघे स्वस्थिनाऽराच्या सुप्रबुद्धे मुर्विका । प्रणिधिः सुप्रवुद्धाऽपि मन्दरे परिकीर्तिता ॥७०६॥ दिक्कुमारी तथा झेया विमलेऽपि यशोधरा । लक्ष्मीमाति सबके कीर्तिमन्यपि कीर्तिता ॥७०६॥ दिक्कुमारी प्रसिद्धाऽसौ रुचकोत्तरवासिनी । चन्द्रे वसुन्धरा चिया सुप्रतिष्टे प्रतिष्टिता ॥१०॥ अष्टौ तीर्थकरोस्पत्तावतास्तुष्टाः समागताः । मणिदर्पणधारिण्यस्तन्मातरमुपामते ॥१३॥ अपरस्यामिलादेवी लोहितास्ये सुरा पुनः । जगकुमुमफूट स्यात् पृथिवी नलिने तथा ॥१२॥ पद्म पद्मावती ज्ञेया कुमुदे काचनापि च । कूटे सौमनसाभिरये देवी नवमिका श्रुतिः ॥१३॥ शीतापि च यश फूटे भद्रकूटे च भद्रिका । इमा शुभ्रातपत्राणि धारयन्यशकासते ॥७१४॥ । पर्यत है ॥६६॥ इसकी गहराई एक हजार योजन, ऊँचाई चौरासी हजार योजन और चौड़ाई बयालीस हजार योजन है ||७००॥ उस पर्वतके शिखरपर चारों दिशाओं में एक हजार योजन चौड़े और पांच सौ योजन ऊँचे चार कूट सुशोभित हैं ॥७०१॥ उनमें पूर्व दिशाके नन्द्यावर्त फूटपर पद्मोत्तर देव रहता है, दक्षिण दिशाके स्वस्तिक कूटपर स्वहरती देव रहता है। पश्चिम दिशाके श्रीवृक्ष कूटपर नीलक देव रहता है. और उत्तर दिशाके वर्धमानक कूटपर अञ्जनागिरि देव रहता है। ये चारो देव दिग्गजेन्द्र के नामसे प्रसिद्ध है तथा एक पल्यकी आयुधाले हैं १७०२-७०३।। इसी पर्वतकी पूर्व दिशाम पहले कहे हुए अन्य कूटोके समान आठ कूट हैं और वे दिक्कुमारी देवियोके द्वारा सेवित हैं |७०४।। उनमें पहले वैडूर्य फूटपर विजया, दूसरे काश्चन कूटपर वैजयन्ती, तीसरे कनक कूटपर जयन्ती, चौथे अरिष्ट कूटपर अपराजिता, पाँचवें दिक्- नन्दन कूटपर नन्दा, छठचे स्वस्तिकनन्दन कूटपर नन्दोत्तरा, सातवें अंजनफूटपर आनन्दा और आठवें अञ्जनमूलक कूटपर नान्दोवर्धना देवी निवास करती हैं ॥७०५-७०६॥ ये दिक्कुमारियाँ तीर्थकरके जन्मकालमे पूजाके निमित्त हाथमें देदीप्यमान झारियॉ लिये हुए तीर्थकरकी माताके समीप रहती हैं ॥७०ा दक्षिण दिशामे भी आठ फूट हैं और उनमे पहले अमोघ कूटपर स्वस्थिता , दूसरे सुप्रबुद्ध कूटपर सुप्रणिधि, तीसरे मन्दर कूटपर सुप्रबुद्धा, चौथे विमल कूटपर यशोधरा, पाँच रुचक कूटपर लक्ष्मीमती, छठवें रुचकोत्तर कूटपर कीर्तिमी, सातवें चन्द्र कूटपर बसुन्धग और आठवें मुप्रतिष्ठ कूटपर चित्रादेवी निवास करती हैं ॥७०-७१०॥ ये देवियाँ तीर्थकरकी उत्पत्तिके समय संतुष्ट होकर आती है और मणिमय दर्पण धारण कर तीर्थकर- की माताकी सेवा करती हैं ॥७११॥ पश्चिम दिशाम भी आठ कूट हैं उनमें पहले लोहिताख्य कृटपर इलादेवी, दूसरे जगत्कुसुम कूटपर सुरा देवी, तीसरे नलिन कृटपर पृथिवी देवी, चौथे पद्मकूटपर पद्मावती देवी, पाँचवे कुमुद कूटपर काञ्चना देवी, छठवें सौमनस कूटपर नवमिका देवी, सातवें यशःकूटपर शीता देवी और आठव भद्र कूटपर भद्रिका देवोका निवास है। ये देवियाँ तीर्थकरकी उत्पत्तिके समय शुक्ल छत्र धारण करती हुई सुशोभित होती हैं ।।७१२-७१४॥ , १ नन्द्यावतामरः म०।२ हस्तिो म । ३ मुस्थिता म०। ४ नलिनी म ।

पञ्चमः सर्गः
स्फटिक लम्वुसा त्वङ्क मिश्रकेशी व्यवस्थिता । तथैवाञ्जनके शेया कुमारी पुण्डरीकियां ॥७९॥
वारुणी काञ्चनाख्ये स्यादाशाल्या रजते तथा । कुण्डले होरिति ज्ञाता रुचके धीरितीरिता ॥७१६॥
तिः सुदर्शने देवी दिक्कुमार्य इमाः पुनः । गृहीतचमरा जैनी मातरं पर्युपासते ॥७१७॥
दिक्षु चत्वारि कूटानि पुनरन्यानि दीप्तिभिः । दीपिताशान्तराणि स्युः पूर्वादिषु यथाक्रमम् ॥७१८॥
पूर्वस्यां विमले चिया दक्षिणस्यां तथा दिशि 1 देवी कनकचित्राल्या निस्यालोकेऽवतिष्ठते ॥७१३॥
विशिरा इति देवी स्यादपरस्यां स्वयम्प्रभे । सूत्रामणिरुदीच्यां च निस्योद्योवे वसत्यसौ ॥७२०॥
विद्युत्कुमायं एतास्तु जिनमातृममीपगा: । तिष्ठन्युद्योतकारिण्यो भानुदाधितयो तथा ॥७२१॥
पूर्वोत्तरस्यां वैडूर्य रुचका विदिशीरिता । तथा दक्षिणपूर्वस्यां रुचके रुचकोज्वला ॥७२२॥
दक्षिणापरदिश्यन्ते रुचकामा मणिप्रभे । रुचकोत्तमोऽन्यस्यां दिशि स्याद् रुचकप्रभा ॥७२३॥
एतास्तु दिककुमारीणां स्युमहत्तरिका वराः । विदिक्षु पुनरन्यानि चतु:क्टान्यमूनि च ॥७२४॥
पूर्वोत्तरे तु विजया रत्ने रत्नप्रभे पुनः । दिशि दक्षिणपूर्वस्यां वैजयन्ती प्रभापिता ॥७२५॥
जयन्ती सर्वरत्ने तु दक्षिणापरदिग्गते । रस्नोच्चयेऽपि शेषायां दिशि स्यादपराजिता ॥७२६॥
एता विद्युत्कुमारीणां स्युमहत्तरिका इमाः । तीर्थजातकर्माणि कुर्वन्त्यष्टाविहागताः ॥७२७॥
चतुर्दिन नगस्योद्धं चत्वार्यायतनानि च । अञ्जनालयतुल्यानि प्राङ्मुखानि जिनेशिनाम् ॥७२८॥
सविदिदिक्कुमारीणां वासकृष्ट जिनालयः । नित्यार कृतमूर्धासौ राजते रुचकालपः ॥७२६॥
इसी प्रकार उत्तर दिशामें भी आठ कूट हैं और उनमें पहले स्फटिक कृटपर लम्बुसा, दूसरे अङ्क
कूटपर मिश्रकेशी, तीसरे अञ्जनक कूटपर पुण्डरीकिणी, चौथे काश्चन कूटपर वारुणी, पाँचवे
रजत कूटपर आशा, छठवें कुण्डल कूटपर ही, सातवे रुचक फूटपर श्री और आठवें सुदर्शन
कूटपर धृति नामकी देवी रहती है। देवियाँ हाथमें चमर लेकर जिनमाताकी सेवा करती हैं
॥७१५-७१७।। इनके सिवाय पूर्वादि दिशाओंमें दीप्तिसे दिशाओंके अन्तरालको देदीप्यमान
करनेवाले चार फूट और हैं जो यथाक्रमसे इस प्रकार हैं-पूर्व दिशामें विमल नामका कूट है
और उसपर चित्रा देवी रहती है । दक्षिण दिशामें नित्यालोक नामका कूट है और उसपर कनक-
चित्रा देवीका निवास है। पश्चिम दिशामें स्वयंप्रभ नामका कूट है और उसपर त्रिशिरस् देवी
निवास करती है तथा उत्तर दिशामें नित्योद्योत नामका कूट है और उसपर सूत्रामणि देवी
रहती है । ये विद्युत्कुमारी देवियों सूर्यको किरणोके समान प्रकाश करती हुई जिनमाताके समीप
स्थिर रहती है ।।७१८-७२१॥ पूर्वोत्तर-ऐशान विदिशाम वैडूर्य नामका कूट है उसपर रुचका
देवी रहती है, दक्षिणपूर्वा-आग्नेय विदिशामें रुचक नामका कूट है उसपर रुचफोज्ज्वला देवी
रहती है, दक्षिण-पश्चिम-नैऋत्य विदिशामें मणिप्रभ कूट है उसपर रुचकामा देवी निवास
करती है और पश्चिमोत्तर-वायव्य दिशामें रुचकोत्तम कूट है उसपर रुचकप्रभा देवीका
निवास है ॥७२२-७२३।। ये चारों दिक्कुमारी देवियोंकी उत्कृष्ट महत्तरिका (प्रधान ) देवियाँ
हैं। इनके सिवाय विदिशाओंमें निम्नलिखित चार कूट और हैं ।।७२४। उनमें ऐशान दिशाम
रत्न कूटपर विजया देवीका निवास है, आग्नेय दिशामें रत्नप्रभ कूटपर वैजयन्ती देवी निवास
करती है। नैऋत्य दिशामें सर्वरत्न कूटपर जयन्ती देवी रहती है और वायव्य दिशाम रत्नोधय
कूटपर अपराजिता देवी निवास करती है। ये चार देवियाँ विद्युत्कुमारी देवियोंको महत्तरिका
हैं। पर कही हुई चार विद्युत्लुमारियों तथा चार ये इम प्रकार आठों देवियाँ यहाँ आकर
तीर्थकरका जातकर्म करती हैं ।।७२५-७२७ मचकगिरिके ऊपर चारों दिशाओम, चार जिन
मन्दिर हैं । ये अंजनगिरियोके समान विस्तारवाले हैं तथा पूर्व की ओर इनका मुख है ।।७२८॥
दिशाभा एवं विदिशामि रहनेवालो देवियोंके निवास-फूटों तथा जिनमन्दिरीसे जिसका मस्तक
सदा अलंकृत रहता है ऐसा यह रुचकगिरि अतिशय सुशोभित है ॥७२६॥

हरिवंशपुराणे स्वयम्भरमणद्वीपमध्यदेशस्थितो गिरिः । स्वयम्प्रम इति स्यातो घामते वलयाकृतः ॥३०॥ मानुपोत्तरशैलस्य मध्ये तस्य च भूभृतः । भोगभूमिप्रतीमागास्तिरश्चा द्वीपवासिनाम् ॥७३॥ परस्तात्तु गिरेस्तस्य तिर्यचः कर्मभूमिवत् । भसवय या यतस्तन संयतासंयताच ते ॥३२॥ उक्तद्वीपममुद्देपु पर्वते वपि हारिपु । वसन्ति ध्यन्तरा देवाः किन्नराधा यथायथम् ॥७३॥ प्रनप्तिः श्रेगिक ज्ञाता द्वीपसागरगोचरा । प्राप्तिं शृणु संक्षेपाग्ज्योतिलकोयलोकयोः ॥७३॥ शार्दूलविक्रीडितम् जम्बूद्वीपतदम्वुधिप्रभृतिसद्वीपावलीसागर. प्रज्ञप्तिस्फुटमप्रहं मुनिमतं भव्यस्य संशृण्वतः । मंशोतिः प्रलयं प्रयाति सकला भूलोकसम्बन्धिनी किं ध्वान्तस्य कृतोदये मुमिरवौ सन्तिष्टते संहतिः ॥७३॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती द्वीपसागरवर्णनो नाम पञ्चमः सर्गः समाप्तः। स्वयंभूग्मण द्वीपके मध्यमे स्थित, चूड़ीके आकारवाला एक स्वयंप्रभ नामका पर्वत सुशो. भित है ॥७३०॥ मानुपोत्तर और स्वयंप्रभ पर्वतके वीच असंख्यात द्वीपोंमें जो तिर्यश्च रहते हैं उनकी जघन्य भोगभूमि तिर्यचौकी सदृशता है ।।७३१॥ स्वयंप्रभ पर्वतके आगे जो तिर्यञ्च हैं वे कर्मभूमिज तिर्यञ्चोके समान हैं क्योंकि उनमें असंख्यात निर्यञ्च संयतासंयत-देशवती भी होते हैं ॥७३२।। ऊपर कहे हुए द्वीप समुद्रोंमें तथा मनोहारी पर्वतोपर किन्नर आदि व्यन्तर देव यथायोग्य निवास करते हैं ॥७३३॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इस प्रकार तूने द्वीप- सागर सम्बन्धी प्रज्ञप्ति जानी अब इसके आगे संक्षेपमै ज्योतिर्लोक तथा ऊर्ध्वलोक सम्बन्धी प्रज्ञप्तिका श्रवण कर ।।७३४॥ जम्बू द्वीप तथा लवणसमुद्रको आदि लेकर उत्तमोत्तम द्वीप तथा सागर सम्बन्धी प्रज्ञप्तिके इस मुनि सम्मत स्पष्ट संग्रहको जो भव्य सुनता है उसका पृथिवी लोक सम्बन्धी समस्त संशय नष्ट हो जाता है सो ठीक ही है क्योंकि मुनि रूपी सूर्यके उदित होनेपर क्या अन्धकारका समूह कहीं ठहर सकता है ? अर्थात् नहीं ॥७३५।। इस प्रकार जिसमें अरिष्टनेमि पुराणका संग्रह किया गया है ऐसे जिनसेनाचार्यरचित हरिवश पुराणमें द्वीप सागरोंका वर्णन करनेवाला पञ्चम सर्ग समाप्त हुआ।

षष्ठः सर्गः शतानि सप्त गत्वोय योजनानि भुवस्वलात् । नवति च स्थितास्ताराः सर्वाधस्तासभस्तले ॥१॥ शतानि नव गावोध योजनानि धरातलात् । स्थितं व्योमतले ज्योतिः सर्वेषामुपरि स्थितम् ॥२॥ ज्योतिःपटलमेतद्धि बहलं दशभिः सह । योजनानि शतं प्रारं सर्वतश्च घनोदधिम् ॥३॥ तारकापटलाद् गत्वा योजनानि दशोपरि । सूर्याणां पटलं तस्मादशोति शीतरोचिपाम् ॥४॥ चस्वारि च ततो गस्खा नक्षत्रपटलं स्थितम् । चत्वार्येव ततो गत्वा पटलं बुधगोचरम् ॥५॥ श्रीणि त्रीणि तु शुक्राणां गुङ्गारकसंझिनाम् । ग्रहाणां तद्यथासयं स्यात् शनैश्वरमङ्गिनाम् ॥६॥ सूर्याश्चन्द्राश्च तत्रस्था नक्षत्रप्रहतारकाः । ज्योतिष्काः पञ्चधा देवाः स्वस्थानसमनामकाः ॥७॥ पल्यं जीवन्ति चन्द्रायास्तेऽधिकं वर्षलक्षया । सूर्या वर्पसहस्रेण शुक्रदेवाः शतेन तत् ॥८॥ पल्यमूनं तु जीवन्ति गुरवोद्धं ग्रहाः परे । पल्यं पादं तु तारारयाः पादाचं ते जघन्यतः ॥३॥ एकपष्टिकृता भागा शुद्धया ये योजनस्य ते । पट्पञ्चाशत्तु विष्कम्भश्चन्द्रमण्डलगोचरः ॥१०॥ ते चत्वारिंशदष्टाभिः सूर्यमण्डल विस्तृतिः । क्रोशः शुक्रस्य विस्तारो देशोनः स वृहस्पतेः ॥११॥ अर्द्धगम्यूतिविस्तारः सर्वतः परिभाषितः । ग्रहाणां परिशेषाणां सर्वेषामपि मण्डलम् ॥१२॥ 'तारामण्डलमत्यल्पं पाद क्रोशस्य विस्तृतम् । मध्यमं साधिकं पादं क्रोधाद्धं तु वृहत्तरम् ।।१३।। पृथिवीतलसे सात सौ नब्वे योजन ऊपर चलकर आकाशमें सबसे नीचे दारा स्थित है ॥१॥ और पृथिवी तलसे नौ सौ योजन ऊपर चलकर आकाशमें सबसे ऊपर ज्योतिप्पटल स्थित है। भावार्थ-आकाशमें ज्योतिष्पटल सात सौ नब्बे योजनकी ऊँचाई में शुरू होकर नौ सौ योजन तक है ॥२॥ यह ज्योतिष्पटल एक सौ दश योजन मोटा है तथा आकाशमें धनोदधि- वातवलय पर्यन्त सब ओर फैला है ॥३॥ ताराओंके पटलसे दश योजन ऊपर जाकर सूर्योका पटल है और उससे अस्सी योजन ऊपर जाकर चन्द्रमाओंका पटल है ॥४॥ उससे चार योजन उपर जाकर नक्षत्रोंका पटल है और उससे चार योजन ऊपर चलकर बुधका पटल ॥५॥ उससे तीन-तीन योजन ऊपर चलकर क्रमसे शुक्र, गुरु, मङ्गल और शनैश्चर ग्रहोंके पटल हैं ।।६।। सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रह और तारा ये पाँच प्रकारके ज्योतिर्विमान हैं । इनमें रहनेवाले देव भी इन्हींके समान नामवाले हैं तथा इन्हींके समान पाँच प्रकारके हैं ॥७n इनमें चन्द्र एक लाख वर्प अधिक एक पल्य तक, सूर्य एक हजार वर्ष अधिक एक पल्य तक, शुक्र सौ वर्ष अधिक एक पल्य तक, बृहस्पति पौन पल्य तक, मद्गल, बुध और शनैश्चर आधा पल्य तक और तारा चौथाई पल्य तक जीवित रहते हैं । यह सबकी उत्कृष्ट आयु है । जघन्य आयु पल्यके आठवें भाग प्रमाण है ।। बुद्धि द्वारा योजनके जो इकसठ भाग किये जाते हैं उनमें छप्पन भाग प्रमाण चन्द्र मण्डलका विस्तार है ॥१०॥ और अड़तालोस भाग प्रमाण सूर्यका विस्तार है। शुक्रका विस्तार एक कोश, बृहस्पतिका कुछ कम एक कोश, और शेष समस्त ग्रहों का विस्तार आधा कोश प्रमाण है। जघन्य तारा मण्डल पाच कोश, मध्यम तारा मण्डल कुछ अधिक पाय कोश और उत्कृष्ट तारामण्डल १ उदुत्तर मत्चसए दम सीटी चदुदुगे तियचउक्के । तारिण ससि रिक्ख हा सुक्क गुरुंगार मन्दगदी ।।३३२॥ -रिलोकमारस्य २ ५६ - ६१ योजनप्रमाण चन्द्रविमानम् । ३ ४८ : ६१ योजनप्रमाणं सूर्यतिमानम् | ४. तारंतर जहएणं पायवा सत्त माग गाउटियं । पण्णासा मन्झिमया उदारसं जोयणसहस्सा ॥१०॥ --.प्र सौ. १६ ११२ हरिवंशपुराणे क्रोशस्य सप्तमो भागस्तारागामसमन्तरम् । पञ्चाशनमध्यम दूरं सहसं योजनानि तत् ॥१५॥ मान्ति सूर्यविमानानि लोहितारमयानि तु । अर्द्धगोलकवृत्तानि प्रतप्ततपनीयवत् ॥१५॥ तथामणिमूर्तीनि मृगालधवलानि तु । मान्ति चन्द्रविमानानि कान्तिसन्तानवन्ति वै ॥१६॥ अरिष्टमणिमूर्तीनि समान्यञ्जनपुनकैः । मान्ति राहुविमानानि चन्द्राधःस्थितानि तु ॥१७॥ एकयोजनविष्कामव्यायामानि तु तान्यपि । शते त्वद्धतृतीये द्वे धनुषी यहलानि च ॥१८॥ विपा राजतमूर्तीनि जयन्ति नवमालिकाम् । तथा शुक्रविमानानि प्रकाशन्ते समन्ततः॥१६ जायमुनाफलामानि विभान्त्यमणिरिवरा । वृहस्पतिविमानानि बुधानां कनकानि तु ॥२०॥ शनैश्चरविमानानि तपनीयमयानि तु । मङ्गारकविमानानि लोहितावमयानि हि ॥२॥ ज्योतिलोकविमानानामियं वर्णविकज्ञाना । अरणीपत्रार्धेस्तु केवलं कृष्णवर्णता ॥२२॥ मानुषोत्तरतः पूर्वमुदयास्तव्यवस्थितिः । परतस्तु समस्तानां स्थितिरेव नमस्थले ॥२३॥ सूर्याचन्द्रमसस्तेपां ज्योतिषां तु यथाययम् । सङ्घय यानामसहयानामिन्द्रास्तावाप्रमाणकाः ॥२४॥ तत्रैकादशमिमस्मेकविः शश्वलाः । ज्योतिष्कास्वनवाप्येव प्रभ्रमन्ति प्रदक्षिणम् ॥२५॥ द्वीपे तु द्वौ मतो सूर्या द्वौ न चन्द्रममाविह । चत्वारो लवणोदेऽमी द्वीपे द्वादश तत्परे ॥२६॥ द्वाचवारिंशदादिन्याः कालोदे शशिनस्तथा । पुष्कराद्धे तु विशेया द्वासप्ततिरमा पुनः ।।२७॥ पट व पष्टिमहलागि तथा नवशतानि च । कोटीकोट यस्तु ताः सर्वाः पञ्चसप्ततिरेव च ॥२८॥ एककस्यैव चन्द्रस्य परिवारस्तु तारकाः । अष्टाविशतिनक्षत्रास्तेऽष्टाशीतिमहामहाः ॥२६॥ परम्तारपुष्करा तु दासप्ततिरिति स्थिताः । निश्चलाः सर्वदादित्यास्तावन्तः शशिनस्तथा ॥३०॥ आधाकोश विस्तृत हे ॥११-१३॥ ताराआंका जवन्य अन्तर कोशका सातवाँ, मध्यम अन्तर पचास योजन और उत्कृष्ट अन्तर एक हजार योजन है ॥१४॥ सूर्यके विमान लोहिताक्षमणिके हैं, अर्ध गोलकके समान गोल तथा तपाये हुए सुवर्णके समान सुशोभित हैं ॥१५॥ चन्द्रमाके विमान स्फटिक मणिमय हैं, मृणाल के समान सफेद हैं तथा कान्तिके समूहसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त सुशोभित हैं।॥१६॥ राहुके विमान अरिप्टमणिमय हैं, अञ्जनको राशिके समान श्याम हैं तथा चन्द्रमाऔर सूर्य विमानके नीचे स्थित हैं ॥१७॥ राहुके विमान एक योजन चौड़े, एक योजन लम्वे, तथा ढाई सौ धनुष मोटे हैं ।।१८।। शुक्रके विमान रजतमय हैं, अपनी कान्तिसे नूतन मालतीको मालाको जीतते है तथा सब ओरसे प्रकाशमान हैं ।।१६।। जिनकी आभा उत्तम मुक्ताफलके समान है, ऐसे बृहस्पति- के विमान स्फटिक मणिसदृश कान्तिसे सुशोभित हैं। बुधके विमान सुवर्णमय हैं, शनैश्चरके विमान तप्त स्वर्णमय हैं, और अङ्गारक-मङ्गलके विमान लोहिताक्षमणिमय हैं ।।२०-२१॥ यह वोंकी विविधरूपता ज्योतिर्लोक गत विमानोंकी है किन्तु अरुण समुद्रके ऊपर जो ज्योतिर्विमान है उनका केवल श्यामवर्ण हो है ॥२२॥ ज्योतिर्विमानोंके उदय और अस्तकी व्यवस्था मानुषोत्तर पर्वतके इसी ओर है उसके आगेके समस्त विमान आकाशमं स्थित ही हैं उनमें संचार नहीं होता ||२३|| मानुपोत्तर पर्वत तकके ज्योतिषी सख्यात हैं और उसके आगेके असंख्यात । उन दोनों प्रकार के ज्योतिषियोंके इन्द्र, सूर्य और चन्द्रमा है । संख्यात ज्योतिपियोंके इन्द्र संख्यात सूर्य चन्द्रमा हैं और असंख्यात ज्योनिपियोंके इन्द्र असंख्यात सूर्य चन्द्रमा है ।।२४। उनमें जो गतिशील ज्योतिषी हैं ये ग्यारह सौ इकास योजन दूर हटकर मेरुकी प्रदक्षिणा देते हुए भ्रमण करते हैं ।।२।। जम्बू द्वीपमं दो सूर्य, दो चन्द्रमा, लवण समुद्रमे चार सूर्य, चार चन्द्रमा, धातकीखण्डमें बारह सूर्य, बारह चन्द्रमा, कालोदधिमें बयालीस सूर्य, बयालीस चन्द्रमा और पुष्करार्धमें बहत्तर सूर्य और यहत्तर चन्द्रमा है ।।२६-२७ाएक-एक चन्द्रमाके छयासठ हजार नौ सौ पचहत्तर कोड़ा-कोड़ी तारा, अट्ठाईस नक्षत्र और अठासी महाग्रह हैं ।।२८-२६|| मानुषोत्तरके आगे पुष्करार्धमें बहत्तर १ तथा म०, क.1 पष्टः सर्गः १२३ सहस्राणि तु पञ्चाशत् सर्वतो मानुषोत्तरात् । प्रगत्यादित्यचन्द्राद्याश्चक्रवालव्यवस्थिताः ॥३॥ नियुतं नियुतं गवा परितः परितः स्थिताः । चतुरभ्यधिकं शश्वदन्योन्योन्मश्ररश्मयः ॥३२॥ घातक्यादिषु चन्द्राः क्रमेण त्रिगुणाः पुनः । व्यतिक्रान्तयुतास्ते म्युपि च जलधौ परे ॥३३॥ ज्योतिर्लोकविभागस्य संक्षेपोऽयमुदीरितः । ऊम्वलोकविभागस्य संक्षेपः प्रतिपाद्यते ॥३४॥ मेरुचूलिकथा सादमूवलोकः समीरितः । उपर्युपरि तस्याः स्युः कल्पा अवेयकादयः ॥३५॥ भौधर्मः प्रथमः कल्पः परश्वैशाननामकः । सनत्कुमारमाहेन्द्री ब्रह्मब्रह्मोत्तरी ततः ॥३६॥ कल्पी लान्तवकापिष्टी तथैव कथितौ ततः । पुनः शुक्रमहाशुको दक्षिणोत्तरदिग्गतौ ॥३७॥ शतारश्च सहस्त्रार आनतः प्राणतस्ततः । भारणश्चाच्युतश्चेति कल्पाः पोदश भापिनाः ॥३॥ अवेयकास्विधैव स्युरधोमध्योपरि स्थिताः । प्रत्येकं त्रिविधास्ते स्युरधोमध्योध्यभेदतः ॥३॥ नवानुदिशनामानि ततोऽनुत्तरपञ्चकम् । ईपत्याग्भारभूम्यन्त अवलोकः प्रतिष्टितः ॥४०॥ सूर्य और बहत्तर चन्द्रमा है, ये सदा निश्चल रहते हैं ॥३०॥ मानुषोत्तर पर्वतसे पचास हजार योजन आगे चलकर सूर्य, चन्द्रमा आदि ज्योतिपो-वलयके रूप में स्थित हैं। भावार्थ-मानुपीत्तर- से पचास हजार योजन चलकर ज्योतिपियोंका पहला वलय है ॥३१॥ उसके आगे एक-एक लाख योजन चलकर ज्योतिपियों के वलय हैं। प्रत्येक वलयमें चार-चार सूर्य और चार-चार चन्द्रमा अधिक हैं एवं एक दूसरेकी किरणे निरन्तर परस्परमं मिली हुई हैं ॥३२॥ धातकीखण्ड आदि द्वीप समुद्रोंमे सूर्य, चन्द्रमा क्रमसे तिगुने तिगुने हैं । विशेषता यह है कि उनमें पिछले द्वीप समुद्रोंके सूर्य, चन्द्रमाओंकी संख्या भी मिलानी पड़ती है। जैसे, कालोदधि समुद्र के सूर्य, चन्द्रमाओंकी संख्या वयालीस है, यह इस प्रकार निकलती है कालोदधिसे पिछला द्वीप धातकीखण्ड है इसके । सूर्य, चन्द्रमाओंकी संख्या वारह है, इससे तिगुनी संख्या छत्तीस हुई,उसमें लवण समुद्र तथा जम्बू- द्वीपके सूर्य चन्द्रमामाकी छह संख्या जोड़ देनेसे कालोदधिके सूर्य चन्द्रमाओंकी संख्या वयालीस निकल आती है । पुष्करयर द्वीपके मानुपोत्तर तक बहत्तर और उसके आगे बहत्तर दोनों मिला- कर एक सौ चौवालीस सूर्य-चन्द्रमा है। उनके निकालनेकी विधि यह है कि पुष्कर द्वीपसे पूर्व- वर्ती कालोदधिकी संख्या वयालीसको तिगुना किया तो एक सौ छच्चीस हुए, उनमें कालोदधिके चारह लवण समुद्रके चार और जम्बूद्वीपके दो इस प्रकार अठारह और मिलाये जिससे एक सौ चौवालीस सिद्ध हुए। इसी प्रकार आगे-आगेके द्वीप-समुद्रीम जानना चाहिए ॥३३॥। इस प्रकार यह ज्योतिर्लोकके विभागका संक्षेपसे वर्णन किया। अब ऊलोकके विभागका संक्षेपसे वर्णन किया जाता है ॥३४॥ मेरु पर्वतकी चूलिकाके साथ ऊर्बलोक शुरू होता है अर्थात् चूलिकासे ऊपर ऊवलोक है। चूलिकाके ऊपर-ऊपर स्वर्ग तथा अवेयक आदि हैं ॥३५॥ १ सौधर्म, २ ऐशान, ३ सनकुमार, ४ माहेन्द्र, ५ ब्रह्म, ६ ब्रह्मोत्तर, ७ लान्तव, ८ कापिष्ठ, ६ शुक्र, १० महाशुक्र, ११ शतार, १२ सह- सार, १३ आनत, १४ प्राणत, १५ आरण और १६ अच्युत ये सोलह कल्प कहे गये हैं। इनकी रचना दक्षिण और उत्तरके भेदसे दो-दोके जोड़के रूप में है ॥३६-३॥ सनके ऊपर अधोवयक, मध्यमवेयक और उपरिम अवेयकके भेदसे तीन प्रकारके प्रैवैयक हैं। इन तीनों प्रवेयकोंके भी आदि मध्य और अध्यके भेदसे तीन-तीन भेद होते हैं। इन अवयकोंके नौ पटल हैं |॥३६॥ उसके लदम् । नव-नवेयक- मुदर्शन, २ अमोध, ३ मुप्रवुद्ध, ५ यशोधर, ५ मुभद्र, ६ विशाल, सुमन, ८ सौमनस, प्रीतिकर। १ १२४ हरिवंशपुराणे लता स्वर्गविमानानामशीतिश्चतुरुत्तरा । नवाया च सहस्राणि सप्त निविंशदेव च ॥४॥ विपष्टिपटलानि स्युः ग्रिपष्टीन्द्रकसंहतिः । पटलानां गु मध्येऽमायूर्वावल्या व्यवस्थिता ||१२|| ऋतुमादीन्द्रकं प्राहुखिपप्टिस्तस्य दिक्षु च । विमाना न्यूनता तेषामेकैकस्योत्तरेषु च ॥४३॥ तेषामृतुविमानं स्याद् विमलं चन्द्रनामकम् । वल्गुवीराभिधानं च तथैवारणसंज्ञकम् ॥४]] नन्दनं नलिनं चैव कामनं रोहितं ततः । चमारुतमृद्धीशे वैद्यं रुचकं तया ॥५॥ रुचिरं च तथाकं च स्फटिक तपनीयकम् । मेघ भद्रं च हारिद्रं पद्ममंझं ततः परम् ॥४६॥ लोहिताशं च चनं च नन्द्यावतं प्रभारम् । प्रष्टकं च जगनिम प्रभारयं चायकायोः ॥४७॥ अञ्जनं वनमालं च नागं गरुडसशकम् । लांगलं पलभद्रं च चक्रं च परकरपयोः ॥१८॥ अरिष्टदेवमम्मीतं ब्रह्मब्रह्मोत्तरद्वयम् । ब्रह्मलोऽपि चत्वारि लक्ष्यदिन्द्रकाणि तु ॥४॥ लान्तवे ब्रह्महृदयं लान्तवं च द्वयं विदुः । शुक्रमेकं महाशुझे सहमारे शतारकम् ॥५०॥ भानतं प्राणताख्यं च पुष्पकं चानते त्रयम् । अच्युते सानुकार स्यादारणं घायुतं अयम् ॥५॥ सुदर्शनममोघं च सुप्रबुद्धमधस्त्रयम् । यशोधरं सुभदं च मुविशालं.च मध्यमे ॥५२॥ सुमनः सौमनस्यं प्रीतिहरमितीरितम् । ऊर्ध्वग्रेवेयरेऽप्येवमिन्द्रकत्रितयं तथा ॥५३॥ मध्ये चानुदिशाल्यानामादिन्यमिति चेन्द्रकम् । सर्वार्थसिदिसंशं तु पशानुत्तरमभ्यमम् ।।५।। सौधौ च विमानानां लक्षा द्वात्रिंशदारिताः । अष्टाविंशतिरेशाने तृतीये द्वादशैव ताः ॥५५|| आगे नौ अनुदिश और अनुदिशोंके आगे पाँच अनुत्तरी विमान हैं। अनुदिश और अनुत्तर विमानोंका एक-एक पटल है। अन्तमे ईपत्प्राग्भार भूमि है। उसीके अन्त तक ऊर्चलोक कहलाता है ॥४०॥ स्वर्गाके समस्त विमान चौरासी लाख संत्तानवे हजार तेईस हैं ॥४१॥ इनमें वेशठ पटल और त्रेसठ ही इन्द्रक विमान हैं । इन्द्रक विमानोंका समूह पटलोके मध्यम ऊर्ध्व रूपसे स्थित है ॥४२॥ आदि इन्द्रकका नाम ऋतु है उसकी चारों दिशाओं में वेशठन्त्रेशठ श्रेणीबद्ध विमान हैं और आगे प्रत्येक इन्द्रकमे एक-एक विमान कम होता जाता है ॥४३॥ सौधर्म और ऐशान नामक प्रारम्भके दो स्वमि १ ऋतु, २ विमल, ३ चन्द्र, ४ वल्गु, ५ धीर, ६ अरुण, ७ नन्दन, ८ नलिन, ६ काञ्चन, १० रोहित, ११ चञ्चल, १२ मारुत, १३ ऋद्धीश, १४ वैडूर्य, १५ रुचक, १६ रुचिर, १७ अर्क, १८ स्फटिक, १६ तपनीयक, २० मेघ, २१ भद्र, २२ हारिद्र, २३ पद्म, २४ लोहिताक्ष, २५ वन, २६ नन्द्यावत, २७ प्रभंकर, २८ प्रष्टक, २६ गज, ३० मित्र और ३१ प्रभा ये इकतीस पटल हैं ॥४४-४७॥ सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्पमें १ अञ्जन, २ वनमाल, ३ नाग, ४ गरुड़, ५ लागल, ६ वलभद्र और ७ चक्र ये सात इन्द्रक विमान हैं ॥४८॥ ब्रह्म लोकम १ अरिष्ट, २ देवसंमीत, ३ ब्रह्म और ४ ग्रह्मोत्तर ये चार इन्द्रक विमान हैं ॥४६॥ लान्तवमै १ ब्रह्महृदय और २ लान्तव ये दो इन्द्रक विमान हैं। महाशुक्रमें १ शुक्र, सहस्रारमें १ शताख्य, आनतमें १ आनत, २ प्राणत और ३ पुष्पक ये तीन, अच्युतमें १ सानुकार, २ आरण और ३ अच्युत ये तीन इन्द्रक विमान हैं ||५०-५१॥ अधोद्मवेयकमे १ सुदर्शन, २ अमोघ और ३ सुप्रबुद्ध ये तोन, मध्य गैवेयकमें १ यशोधर, २ सुभद्र और ३ सुविशाल ये तीन और ऊर्च- प्रैवेयकमे १ सुमन, २ सौमनस्य और ३ प्रीतिकर ये तीन इन्द्रक विमान हैं ॥५२-५३।। नौ अनु दिशोके मध्यमे आदित्य नामका एक इन्द्रक विमान है और पाँच अनुत्तरोमे सर्वार्थ-सिद्धि नामका एक इन्द्रक विमान है ।।५४॥ सौधर्म स्वर्गमे बत्तीस लाख, ऐशानमें अट्ठाईस लाख, १.८४६७०२३ विमानानि । २. अतुम् + आदि + इन्द्रकम् इतिच्छेदः । * नव-अनुदिश- आदित्य, २ भवि, ३ अर्चिमाली, ४ वैरोचन, ५ प्रभास, ६ अचिं-प्रभ, • अचिमध्य, भचिरावत, भ िविशिष्ट । + अनुत्तर विमान- विजय, २ वैजयन्त, ३ जयन्त, ४ अपराजित, ५ सर्वार्थ सिद्धि । ८ पष्टः सर्गः १२५ । माहेन्द्रेऽष्टी तु लक्षे द्वे पण्गवत्या च पञ्चमे । ब्रह्मोत्तरे च लवेका सहस्रं च चतुर्गुणम् ।।५६|| पञ्चविंशतिसइयानि सहस्राणि भवन्ति नु । द्विचवारिंशता साकं विमानानि हि लान्तये ॥५७॥ चतुर्विशतिसयानि सहस्त्राणि शतान्यपि । नवपञ्चाशदष्टौ च कल्पे कापिटनामनि ॥५॥ शुक्रे विंशतियुक्तानि सहस्राणि तु विंशतिः । परेऽशातिर्नवशती तानि चैकानविंशतिः ॥५६॥ विसहस्री शतारे स्यात्तथैवैकानविंशतिः । त्रिसहस्री सहस्रारे वजितेकानविशतिः ॥६०॥ आनतप्राणतस्था च चत्वारिंशचतुःशती 1 दिवशी च विमानानां पष्टिः स्यादारणाच्युते ॥६॥ एकादश निके पूर्वे शतं सप्तोत्तरं परे । शुद्धकनवतिश्चोर्वे नवैवानुदिशेष्वपि ॥६२॥ भचिरायं परं रयातमचिमालिन्यभिरयया। वन वैरोचनं चैव सौम्यं स्यारसौम्यरूप्यकम् ॥१३॥ अहं च स्फुटिकं चेति दिशास्वनुदिशानि तु । आदित्यारयस्य वर्तन्ते प्रायाः प्रभृति सक्रमम् ॥६॥ विजयं वैजयन्तं च जयन्तमपराजितम् । दिनु मर्वार्थसिद्धेस्तु विमानानि स्थितानि वै ॥६५॥ शतेनाटसहस्राणि सप्तविंशतिरेव च । धेगोगतानि सर्वाणि विमानानि भवन्ति वै ॥६॥ चत्वारि स्युः सहस्राणि तावस्येव शतानि च । श्रेणीगतानि सौधर्मे नवतिः पञ्चभिस्तथा ॥६॥ अष्टाशीत्या स हैशाने सहसं तु चतु:शती । सनाकुमारकरपे तु पशती पोडशाधिका ॥६॥ आवलिस्थविमानानां माहेन्द्र युत्तरे शते । ब्रह्मलोकस्थितानां तु पडशीत्या शतद्वयम् ॥६६॥ चतुर्णवतिरेव म्युस्तानि ब्रह्मोत्तरेऽपि च । शतं लान्तवकल्पे च पञ्चविंशतिमिश्रितम् ॥७॥ चवारिंशत्तयकं च काविष्टे शुक्रनामनि । अष्टापञ्चाशदेकोना महाशुक्रे तु विंशतिः ॥७॥ शतारे पञ्चपञ्चाशत् सहस्रारे दशाष्टभिः । आनते शतमुद्दिष्टं चत्वारिंशच सप्तभिः ॥७२॥ प्राणते पुनरटाभिश्च वारिंशतयारणे । शतं दिशं ततविंशनिवभिः पुनरच्युते ॥७३॥ चत्वारिंशत्तु पञ्चामा सवैकामा प्रकर्णिके । सप्तनिशद् यथासदस्यमधोग्रेवेयकत्रिके ॥७॥ विमानानि त्रयस्त्रिंशदेकानत्रिशदेव च । पञ्चविंशतिरावल्यां मध्यप्रैवेयकनिक ॥७५।। सनत्कुमारमे वारह लाख, माहेन्द्र में आठ लाख, ब्रह्म-स्वर्गमे दो लाख छियानवे हजार, ब्रह्मोत्तर स्वर्गमे एक लास चार हजार, लान्तवमै पचीस हजार बयालीस, कापिष्ठमें चौबीस हजार नौ सौ अंठावन, शुक्रमें बीस हजार वीस, महाशुक्रमें उन्नीस हजार नौ सौ अस्सी, शतारमें तीन हजार उन्नीस, सहस्रारमे उन्नीस कम तीन हजार, आनत प्राणतमें चार सौ चालीस, तथा आरण अच्युतमें दो सौ साठ विमान हैं ॥५५-६१॥ अवेयकोंके पहले त्रिकमें एक सौ ग्यारह, दूसरे त्रिको एक सौ सात, तीसरे त्रिकमे एकानवे और अनुदिशामें नो विमान हैं ॥६२॥ अनुदिशा में आदित्य नामका विमान वीचमें है और उसकी पूर्व आदि दिशाभी तथा विदिशाओं में क्रमसे १ अर्चि, २ अर्चि-मालिनी, ३ वन, ४ वैगेचन, ५ सौम्य, ६ सौम्य रूपफ, ७ अङ्क और स्फुटिक ये आठ विमान हैं ॥६३-६४॥ अनुत्तर विमानों में सर्वार्थ सिद्धि विमान बीचमें है और उसकी पूर्वादि चार दिशाओंमें १ विजय, २ वैजयन्त, ३ जयन्त और ४ अपराजित ये चार विमान स्थित सम श्रेणी-यद विमान मिलकर आठ हजार एक सौ सत्ताईस हैं ॥६६॥ उनमें सौधर्म स्वर्ग- में श्रेणीबद्ध विमान चार हजार चार सौ पंचानवे, ऐशानमें एक हजार चार सी अट्टासी, सनत्कु. मारमें छह सौ सोलह, माहेन्द्र में दो सौ तीन, ब्रह्मलोकमें दो मी हियामी, ब्रह्मोत्तरमें धौरान, लान्तवमै एक सौ पचीस, कापिष्टमें इकतालीस, शुक्रमें अंठायन, महाशुक्रमें उन्नीम, शताग्में पचपन, सहस्रारमे अठारह, आनतमें एक सौ संतालीस, प्राणवमें भड़वालीस, आरपमें एक मौ घास और अच्युतम उनतालीस कहे जाते हैं ॥६७-७३|| अधोवेयकके तीन विमानों में क्रममे पैंतालीस, इफ्नालीस और सतीस, मध्यमपेयकके तीन विमानों कमसे तवीम, टननीस भीर पोस तथा ऊर्य-प्रययकके तीन विमानों में क्रमसे इडीम, सचरह और तेरह, अनुत्तरोम हरिवंशपुराणे । एकविंशतिरू तु बिके सप्तदशत्रिभिः । दशश्रेणीगतान्येव नवपशकतरपरम् ॥१६॥ एतेषु तु विशुद्धेषु यथास्वं मूलराशिषु । प्रकीर्णकविमानानि शेपाणीति बुधा विदुः ।।७।। तेषु संख्येयविस्तारा विमानव्यक्तयः पुनः । चत्वारिंशत्सहस्राणि सीधर्मे नियुतानि पट् ॥७॥ पञ्चैव नियुनानि स्युः कल्पे चैशाननामनि । सह पटिसहस्तु संयुतानि तु तानि धे॥७ सनरकुमारकल्पे तु नियतं नियुनद्वयम् । चत्वारिंशरसहस्त्र स्तु सहितं तदिति स्मृतिः ॥२०॥ 'माहेन्द्रे नियुतं प्रोक्तं सह पष्टिसहस्रकैः । ब्रह्मब्रह्मोत्तरेऽशीतिसहस्राणि सहैव तु ॥८॥ लान्तवेऽपि च कापिष्ठे सहस्राणि दशैव तु । चत्वारि नु सहस्राणि चतुर्भिः शुक्रनामनि ।।२।। पण्णवत्या नवशनी त्रिसहस्री महत्यपि । शतारें च सहस्रारे द्वादशव शतानि तु ॥३॥ भष्टाशीतिः सहैव स्यादानतप्राणतारययोः । द्विपञ्चाशत्स हैव स्यादारुणाच्युतकल्पयोः ।।८।। सर्वत्रैवान संख्येयविस्तारास्तु चतुर्गुणाः । असंख्येयारमविस्तारा विमामव्यक्तयः स्मृताः || यथास्वमिन्द्रहींना नववेयकादिषु । स्युरसंख्येयविस्तारा श्रेणोप्चन्यास्त ता द्विधा ।।६॥ लक्षाः पोडशसंख्येयविस्तृता नवतिनव । सहस्राणि सहाशीरया दिशती पिण्डितास्तु ताः ॥२७॥ पट्शतैकानपञ्चाशत् सप्तभिर्नवति" पुनः । सहस्राणोतरा लक्षाः समपष्टिरुदीरिताः ।।८।। प्राग्भारभूनरक्षेत्रमृतुः सीमन्तकः समम् । विस्तारेण तु सम्प्राप्तो बालमात्रेण चूलिकाम् ||६| जम्बुद्वोपाप्रतिष्ठानक्षेत्रसर्वार्थसिद्धयः । अयोऽपि समविस्ताराः प्रोक्ता विस्तारवेदिभिः ॥३०॥ पॉच श्रेणी-बद्ध विमान हैं। विमान संख्याको मूल राशिमसे इन इन्द्रक और श्रेणी-बद्ध विमानोकी संख्या घटा देनेपर जो शेष बचते हैं वे प्रकीर्णक विमान हैं ऐसा विद्वज्जन जानते हैं ।।७४-७७|| उन विमानों में संख्यात योजन विस्तारवाले विमानोंकी संख्या सौधर्म स्वर्गमें छह लाख चालीस हजार है । ऐशान स्वर्गमे पाँच लाख साठ हजार, सनत्कुमार स्वर्गमें दो लाख चालीस हजार, माहेन्द्र स्वर्ग में एक लाख साठ हजार, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर स्वर्गमें अस्सी हजार, लान्तव और कापिष्ठ स्वर्गमें दश हजार, शुक्र-स्वर्गमे चार हजार चार, महाशुक्र स्वर्गमें तीन हजार नौ सौ छियानवे, शतार सहस्रार-स्वर्गमें बारह सौ, आनत प्राणत स्वर्गमें अठासी, और आरण अच्युत स्वर्ग में पावन है ॥७८-८४|| इन सभी स्वर्गों में संख्यात योजन विस्तारवाले विमानोंकी जो संख्या है उससे चौगुने असंख्यात योजन विस्तारवाले विमान हैं ॥८५। नव-प्रैवेयकादिकर्म इन्द्रक विमानोंको छोड़कर श्रेणी-बद्ध विमानोमे संख्यात योजन विस्तारवाले और असंख्यात योजन विस्तारवाले-दोनों प्रकारके विमान हैं। इन्द्रक विमान संख्यात योजन विस्तारवाले ही है ।।८६|| संख्यात योजन विस्तारवाले सब विमान मिलाकर सोलह लाख निन्यानवे हजार तीन सौ अस्सी है और असंख्यात योजन विस्तारवाले विमान सड़सठ लाख सत्तानवे हजार, छह सौ उनचास कहे गये हैं ।।८७-८८प्राग्भार-भूमि (सिद्धशिला ) ढाई द्वीप, प्रथम स्वर्गका ऋतु विमान, प्रथम नरकका सीमन्तक इन्द्रक विल और सिद्धालय ये पाँच विस्तारकी अपेक्षा समान हैं अर्थात् सब पैंतालीस लाख योजन विस्ताग्याले हैं। इनमें ऋतु विमान थाल मात्रका अन्तर देकर मेरुकी चूलिकाको प्राप्त है अर्थात् चूलिका और ऋतु विमानमें बालमात्रका अन्तर है. || जम्बूद्वीप, सातवे नरकका अप्रतिष्ठान नामका इन्द्रक विल और सर्वार्थसिद्धि ये तीनों विस्तारके जाननेवाले भाचार्याने समान विस्तारसे युक्त फहे हैं अर्थात इन सबका एक-एक १ ६४०००० । २ ५६०००० १ ३ २४००००।४ १६००००।५८००००।६ १०००० । ७४.०४। ८. ३६६६ It 'श्रेणीष्वन्याकृता द्विधा म०।१० ६४६ । ११ ६७०००। १२ तु शब्दान् मुक्तालयोऽपि, दति क प्रतिटिप्पण्याम् ।

पष्टः सर्गः सर्वघेणीविमानानामर्द्धमूर्धमिनोऽपरम् । अन्येपां स्वविमाना, स्वयम्भूरमणोदधेः ॥११॥ वेश्ममूलशिलापीठबाहुल्यं पूर्वकल्पयोः । योजनान्येकविंशत्या कादश शतानि च ॥२॥ ऊचं नवनवस्यास्तु युग्मे युग्मे परिक्षयः । एकैकत्र टिके तुल्यश्चनुदंशसु वोपरि ॥१३॥ भाये विंशं शतं व्यासः कल्पयुग्मे तु वेश्मनाम् । परे शतं दशानोऽनश्चतुर्दशसु पातु ||१|| उच्छ्रायः पट् शतान्याये पत्र "कल्पयुगे परे । शतानोनमूनोऽस्मारपञ्चविंशतिमात्रकाः ॥१५॥ पष्टिरायेऽवगाहोऽपि पञ्चाशयुगले परे । पञ्चोनोऽस्मात्परेषु द्वे चतुर्दशसु सार्धके । १६॥ कृष्णा नीलाच रक्ताश्च पीताः श्वेताश्च वर्णिताः । प्रासादा: पञ्चवर्णास्ते सौधर्मशानकल्पयोः ॥१७॥ नीलाद्याः परयोश्चोध रकाद्यास्तु चतुर्वपि । सहस्राराबमानेषु पीताः श्वेताश्च नेतरे ॥८॥ भानतप्राणतादी च श्वेतवर्णाः प्रणिताः । वैमानिकविमानेषु प्रासादाः प्रस्फुरत्यभाः ॥६॥ द्वयोयोविमानानि कपाटकपरेपु च । जले वाते द्वयोयोग्नि संस्थितादि यथाक्रमम् ॥१०॥ पट्युगलेषु शेपेमु कल्पेषु चरमेन्द्रका । श्रेणीबद्ध निनावासे वसन्त्यष्टादशे तथा ॥१०॥ लाख योजन विस्तार है ||१०|| समस्त श्रणी बद्ध विमानोंको जो संख्या है उसका आधा भाग तो स्वय-भू-रमण समुद्रके ऊपर है और आधा अन्य समस्त द्वीप समुद्रोंके ऊपर फैला हुआ है ।।१।। सौधर्म और ऐशान स्वर्गमें भवनोंके मूल शिलापीठकी मोदाई ग्यारह सौ इक्कीस योजन है ॥२|| ऊपर प्रत्येक कल्प युगल में निन्यानवे-निन्यानवे योजन मोटाई कम होती है। अवेयकोंके तीनों त्रिक तथा अनुदिश और अनुत्तर विमानोंके चौदह विमानोंमें समान मोटाई होती है ॥१३॥ प्रथम कल्प युगल-सौधर्म ऐशान स्वर्गमें भवनोंकी चौड़ाई एक सी वीस योजन, दूसरे कल्प युगल-सानत्कुमार, माहेन्द्र स्वर्गमें सौ योजन और इसके आगे प्रत्येक कल्प युगल तथा ग्रेवेयकोंके प्रत्येक त्रिकोंमें दश-दश योजन कम होती जाती है । अनुदिशों और अनुत्तरोंके चौदह विमानाम केवल पाँच योजन चौड़ाई रह जाती है ।।६४॥ प्रथम कल्प युगलमें भवनोंकी ऊँचाई छह सी योजन है, दूसरे कल्प युगलमे पाँच सौ योजन है और आगेके युगलोंमें पचास-पचास योजन ऊँचाई कम होती जाती है । इसके आगे अनुदिश और अनुत्तरीके भवन मात्र पचीस योजन ऊँचे हैं ॥६५॥ प्रथम कल्प युगलमें भवनोंकी गहराई साठ योजन है, दूसरे कल्प युगलमें पचास योजन है और इसके आगेके कल्पॉम पाँच-पाँच योजन कम होती जाती । अनुदिश और अनुत्तर सम्बन्धी चौदह विमानोंमें मात्र ढाई योजन गहराई है ॥६६॥ सौधर्म और ऐशान म्वर्गके ये भवन काले, नीले, लाल, पीले और सफेदके भेदसे पाँच रग के कहे गये हैं l आगे युगल-सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गमें नोलेको आदि लेकर 'वार रह के हैं, उसके आगे चार स्वर्गाम लालको आदि लेकर तीन रङ्गके हैं, उसके आगे सहस्रार स्वर्ग तकके चार स्वाम पोले और सफेद दो रङ्गके हैं अन्य रगके नहीं हैं ।।६८|| उसके आगे आनत प्राणतको आदि लेकर समस्त स्वर्ग, नैवेयक, अनुदिश तथा अनुत्तरविमानोंके भवन मात्र सफेद वर्णके हैं। वैमानिक देवोंके ये भवन जगमगाती हुई प्रभासे युक्त हैं ॥६६॥ सौधर्म भोर ऐशान वर्गके विमान धनादधिके भाधार हैं, सानत्कुमार और माहेन्द्र के विमान घनवातवलयके आधार है, आगे आठ कल्प अर्थात् सहस्रार स्वर्ग तक विमान धनोदधि और घनयाव दोनों के आधार है और शेष विमान आकाशके आधार है ।।१०। छह युगलों तथा शेष कल्लों में अपने-अपने १ मौधिमयुग्मे ११२१, मानत्कुमारयुग्म १०२२, ब्रह्मयुग्मे १२३ इत्यादि नानानिहीनामम् । ० १२० १३१००, ९०,८०,०,६०, ५०, ४०, ३०, २०,१०४. अनुदिशानुत्तरेषु । ५ ५.०। ६ पवाराननमम् । चन्नुगर सेसम्प्पे अटारमाह मेटि यसम्मि। दोहीग कम दक्सिग उत्तर भागम्हि देविता ||३|| ---विनोममारस्य ८ चमरेन्द्रका मन १२८ हरिवंशपुराणे दिहानिक्रमतोऽतोऽग्रे दक्षिणोत्तरसम्भवाः । सुराधीशाः सुपाम्भोधिमभ्यगा गनचिद्विपः ॥१०२ आज्योतिर्लोकमुत्पादस्तापसाना तपस्विनाम् । ब्रह्मलोकावधिज्ञयः परिमाजयोगिनाम् ॥१०॥ सहगाजीगकानां च सहस्रारावधिर्भवः । न जिनेतरदृष्टेन लिन तु ततः परम् ॥१०॥ कल्पानच्युतपर्यन्तान् सौधर्मप्रभृतीन् पुनः । प्रजन्ति श्रावक्रास्तेभ्यः भ्रमणाः परतोऽपि च ॥१०५॥ उपपादोऽस्त्यभव्यानामग्रगवेयकेष्वपि । स च निग्रंन्यलिङ्गन सनतोग्रतपःश्रिया ॥१०॥ रत्ननयसमृद्धस्य भव्यस्यैव ततः परम् । यावत्सर्वार्थसिद्धि स्यादुपपादस्तपस्विनः ॥१०॥ कृष्णा नीला च कापोता लेश्याश्च द्रव्यभावतः । तेजोलेश्या जघन्या च ज्योतिषान्तपु भाषिताः ॥१०॥ सौधर्मशानदेवानां तेजोलेश्या तु मध्यमा । सैवोत्कृष्टोत्तरद्वन्द्व पारेश्या जघन्यतः ॥१०॥ मध्यमा पद्मलेश्या तु परस्मिन् युगलग्नये । उस्कृष्टा पमरेश्या च युग्मे शुक्लावरापरे 1210॥ भच्युतान्तचतुष्के च नवप्रैवेयकेषु च । सर्वेषामेव देवानां शुक्लश्या तु मध्यमा ॥११॥ अहमिन्द्रविमानेषु चतुर्दशसु संस्थिताः । लेश्या परमशुलो संक्लेशरहितारमनाम् ॥१२॥ निवासके योग्य अन्तिम इन्द्रकके श्रेणी-यद्ध विमानाम इन्द्रोंका निवास है। पहले युगलके अन्तिम इन्द्रक सम्बन्धी अठारहवें श्रेणीबद्ध विमानमें इन्द्रका निवास है और आगे दो-दो श्रेणिवद्ध विमानों की क्रमिक हानि है! १ सौधर्म, २ सनत्कुमार, ३ ब्रह्म, ४ शुक्र, ५ आनत भोर ६ आरण कल्पोमे रहनेवाले इन्द्र दक्षिण दिशामें रहते हैं और १ ऐशान, २ माहेन्द्र, ३ लान्तव, ४ शतार, ५ प्राणत और ६ अच्युत इन छह कल्पों में रहनेवाले उत्तर दिशामें रहते हैं। ये इन्द्र सुखरूपी सागरके मध्यमें स्थित हैं तथा प्रतिद्वन्द्वियाँसे रहित हैं-भावार्थ-सौधर्म स्वर्गके अन्तिम पटलके इन्द्रक विमानसे दक्षिण दिशामें जो अठारहवाँ श्रेणीबद्ध विमान है उसमें सौधर्मेन्द्र रहता है और उत्तर दिशामें जो अठारहवाँ श्रेणीबद्ध विमान है उसमें ऐशानेन्द्र रहता है। सनत्कुमार इन्द्र अपने स्वर्गके अन्तिम पटल सम्बन्धी इन्द्रकसे दक्षिण दिशा सम्बन्धी सोलहवें श्रेणीबद्ध विमानमें रहता है और माहेन्द्र उत्तर दिशा सम्बन्धी। इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिए ॥१०१-२०२॥ पञ्चाग्नि आदि तप तपनेवाले तपस्वियोंकी उत्पत्ति भवन- वासी, व्यन्तर और ज्योतिपी देवोंमे होती है, परिव्राजक-संन्यासियोंकी उत्पत्ति ब्रह्मलोक तक और सम्यग्दृष्टि आजीवकोकी उत्पत्ति सहस्रार स्वर्ग तक हो सकती है। जिन-लिङ्गके सिवाय अन्य लिङ्गके द्वारा जीव सहस्रार स्वर्गके आगे नहीं जा सकते यह नियम है ॥१०३-१०४।। श्रावक, सौधर्म स्वर्गसे लेकर अच्युत स्वर्ग तक जाते हैं और मुनि उसके आगे भी जा सकते हैं ॥१०५५। अभव्य जीवोंका उपपाद अप्रिम भैवेयक तक हो सकता है, परन्तु यह नियम है कि मैवेयकोमे उपपाद निन्थ लिगके द्वारा उग्र तपश्चरण करनेसे ही हो सकता है ॥१०६॥ इसके सर्वार्थ-सिद्धि तक रत्नत्रय तपस्वी भव्य जीवको ही उत्पत्ति होती है ॥२०७॥ भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवीमें द्रव्य तथा भावकी अपेक्षा कृष्ण नील और आपोतलेश्या तथा जघन्य पोत लेश्या होती है ॥१०८॥ सौधर्म और स्वर्गके देवोंके मध्यम पीत- लेश्या होती है। माहेन्द्र स्वर्गके देवोके उत्कृष्ट पीतलेश्या और जघन्य पद्मलेश्या होती है ॥१०६i इसके आगे तीन युगलोमे मध्यम पद्मलेश्या होती है। उसके आगे दो युगलामे उत्कृष्ट पद्मलेश्या और जघन्य शुक्ललेश्या होती है। तदनन्तर अच्युत म्वर्ग तकके चार स्वर्गा और नौ अवेयकोंके समस्त देवोके मध्यम शुक्ललेश्या होती है और उसके आगे अनुदिश और अनुत्तर सम्बन्धी अहमिन्द्रोके चौदह विमानोंमे परम शुक्ललेश्या होती है । यहाँके निवासी अहमिन्द्र संक्लेशसे रहित होने हैं ॥११०-११२॥ १ सर्वार्थसिद्धिः क०, ख०, ग०, इ०।

पष्टः सर्गः भाधर्मायास्तु देवानामाद्ययोपियोऽवधिः । कल्पयोः परयोश्वामावावंशाया व्यवस्थितः ॥१३॥ माऽपी मेधावनेरुनश्चतुःकरपे तु तत्परम् । आचतुर्थपृथिव्यास्नु परे कल्पचतुष्टये ||११॥ आनतादिचनुमावापञ्चम्याः समीरितः । नवप्रैवेयकस्थानामापटया विषयोऽवधिः ॥११५|| नवानुदिशदेवानामासप्तम्या: समाहितः । लोकनाहीसमस्तासु पञ्चानुत्तरवासिनाम् ॥१६॥ स्वविमानावधिस्तूवं विषयोऽवविचक्षुपः 1 विश्वेषामेव देवानामिति विश्वविदो विदुः ॥१७॥ स्थिरयुन्सेधप्रवीचारा जिनेन्द्रप्रतिभापिताः । चतुर्देवनिकायानां वेदितव्यं यथाययम् ||3101 दक्षिणाशाऽऽरणान्तानां देव्यः सौधर्म एव तु । निजागारेषु जायन्ते नीयन्ते व निजास्पदम् ।।११।। उत्तराशायनान्तानां देवानां दिव्यमूर्तयः । ऐशानकरपसम्भूता देण्यो यान्ति निजाश्रयम् ॥१२०॥ शुद्धदेवीयुतान्याहुविमानानि मुनीश्वराः । पट लपास्नु चतुलंसाः सौधर्मशानकल्पयोः ॥१२१|| दिव्यत्रमविभूषाभिः शुभत्रिक्रियमूर्तिभिः । 'चित्तने चहरोदाररूपविभ्रमवृत्तिभिः ॥१२२।। हावभावविदग्धाभिनिसर्गप्रेमभूमिभिः । नेकपल्योपमायुभिर्देवी भिर्बहुभिः मुखम् ।।१२३॥ इन्द्राः सामामिका देवाचायस्त्रिंशादयोऽखिलाः । कोपपनपर्यन्ताः श्रयन्ते दीर्घजीविनः ।।१२।। अहमिन्द्रास्ततोऽनन्तं भजन्ते भवजं सुखम् । तरसातावेदनीयोग्यमस्वीकं प्रशमात्मजम् ॥१२५।। सिद्धानां तु परं स्थानं परं द्वादशयोजनम् । सर्वार्थपिद्वितो गवा स्थितं त्रैलोक्यमूर्धनि ।।१२६॥ ईषन्प्राग्भारसंज्ञाऽसावटमा पृथिवी श्रुता । अष्ट्रयोजनबाहुल्या मध्ये होना क्रमात्ततः ।।१२७॥ प्रथम दो स्वर्गके देवोंके अवधिज्ञानका विषय धर्मा पृथिवी तक है, उसके आगेके दो स्वर्गी सम्बन्धी देवाका विषय वंशा पृथिवी तक है। उसके आगे चार स्वर्गो सम्बन्धी देवोंका विषय मेघा पृथिवी तक है, उसके आगे चार स्वर्गो' सम्बन्धी देवोंका विपय अञ्जना नामक चौथी पृथिवी तक है । उसके आगे आनतादि चार स्वर्गाके देवांका विषय अरिष्टा नामकी पाँचवीं पृथिवी तक है। नव प्रैवेयकवासियोंका छठवीं पृथियी तक है । नयानुदिशवामियोंका सातवीं पृथियोके अन्त तक है और पञ्चानुत्तरवासियोंका समस्त लोकनाडी तक है। समरत देवोंके अवधिज्ञान रूपी नेत्रका ऊपरको भोरका विषय अपने-अपने विमानके अन्त भाग तक है ऐमा सर्वज्ञ देव जानते हैं ॥११३-११७॥ चारों निकायके देवोकी स्थिति, ऊँचाई तथा प्रयीचार-काम- सेवनका वर्णन जैमा जिनेन्द्र भगवानने किया है वैसा यथायोग्य जानना चाहिए ॥११॥ आरण स्वर्ग पर्यन्त दक्षिण दिशाके देवोंकी देवियाँ सौधर्म स्वर्गमें ही अपने-अपने उपपाद स्थानों में उत्पन्न होती हैं और नियोगी दयोंके द्वारा यथास्थान ले जाई जाती हैं ॥११॥ तथा अच्युत स्वर्ग पर्यन्त उत्तर दिशाके देवाको सुन्दर देवियों ऐशान स्वर्ग में उत्पन्न होती हैं एवं अपने अपने नियोगी देवोंके स्थानपर जाती हैं ॥१२०॥ मुनियोंके ईश्वर गणधर देवने सौधर्म और ऐशान स्वर्गमें शुद्ध देवियाँसे युक्त विमानोंकी संख्या कमसे छह लाख और चार लाग्य यतलाई है अर्थात् सौधर्म- ऐशान स्वर्गम केवल देवियों के उत्पत्ति स्थान छह लास और चार लाम प्रमाण है ॥१२१॥ सोलहवें स्वर्ग तक उत्पन्न एवं दीर्प आयुको धारण करनेवाले इन्द्र, मामानिक, नायनिंश आदि देय, दिव्य वस्त्रालंकारों में विभूपित, शुभ विक्रिया करनेवाली हृदय तथा नेत्रोंको हरण करनेयाली उत्कृष्ट रूप और विभ्रमसे सहित, हाव-भाव दिखलानेमें चतुर स्वाभाविक प्रेमको भूमि एवं अनेक पल्य-प्रमाण आयुवाली भनेक देवियों के साथ मुखको प्राप्त होते हैं ॥१२-१२४॥ सोलहवें स्वर्गके आगेके अहमिन्द्र,माना वेदनीयके उदयसे उत्पन्न, स्त्री रहित, शान्तिरूप आत्मासे उत्पन्न होनेवाले, देव पर्यायजन्य अपरिमित मुम्बका उपभोग करते हैं ॥१२॥ सर्वार्थसिद्धिसे पारह योजन भागे आकर तीन लोकके मस्तकपर सिद्ध भगवानका उत्कृष्ट स्थान है ।।१२।। मिद्धीका यह स्थान .. १ रिसम्पत्तिभिः म०, २०१२ मयनं म०।३ स्तुना म.. १७ हरिवंशपुराणे पर्यन्तेऽङ्गुलसङ्ख्ययभागमायतनुस्थितिः । सोत्तानितमहावृत्तवेतनोपमाकृतिः ।।१२।। चत्वारिंशत्तु विस्तारो लक्षाः पञ्चभिरचिंताः । योजनानि तितेस्तस्या विद्वद्भिरभिधीयते ॥२६॥ कोटी तु परिधिलंक्षा द्विचत्वारिदिप्यते । द्विशत्येकासपञ्चाशत् त्रिसहस्री दशाहता ॥१०॥ ऊध्वं तस्या पुरा प्रोक्त यद्वातवलयत्रयम् । तम त्रिकोशबाहुल्यमतीत्य वलयद्वयम् ॥१३॥ धनुषा पञ्चशत्यामा पञ्चसप्ततियुक्तया । धनुः सहस्रमेकं हि यहलं धलयं तु यत् ।।१३२।। तनुवातस्य तस्यान्ते पञ्चविंशतिसंयुताम् । विगायोकर्पतः सिद्धाः स्थिताः पधनुःशतीम् ।।१३३॥ सार्द्धहस्तनयं पूर्व कृत्वान्तेऽनन्तरोच्छितिम् । सिद्धावगाहनाकाशदेशो देशोन इप्यते ॥१३॥ एकोऽवतिष्ठते यत्र सिद्धः सिद्धप्रयोजनः । तत्रानन्ताश्च तिष्ठन्ति सिद्धास्ते स्वावगाहतः ।।१३५॥ अशरीराः सुखात्मानः सिद्धा जीवधनायुताः । साकारेणोपयोगेन निराकारेण चारमनः ।।३३६॥ सर्वलोकमलोकं च सन्ततानन्तपर्ययम् । जानन्तः सह पश्यन्तस्तिष्ठन्ति सुखिनः सदा ।।१३७॥ सिद्धाः शुद्धाः प्रबुद्धार्था विजन्मानोजरामराः । शाश्वताः 'शाश्वतं स्थानमधितिष्ठन्त्य यन्धनाः ।।३।। मन्दाक्रान्ता ज्योतिलोकप्रकटपटलस्वर्गमोहोर्मलोक- प्रज्ञपयुक्तं नरवर मया संग्रहाक्षेत्रमेवम् । सम्प्रोक्तं ते श्रवणसुभगं श्रेणिक श्रेयसेऽत्तः शृण्वायुष्मन्नवहितमतिर्वरिम कालोपदेशम् ॥१३॥ (सिद्धशिला) ईपत्प्राग्भार नामकी आठवीं पृथिवी कहलाती है यह पृथिवी मध्यमें आठ योजन मोटी है उसके आगे क्रमसे कम-कम होती हुई अन्त भागमें अङ्गुलके असंख्यातवें भाग प्रमाण अत्यन्त सूक्ष्म रह जाती है, वह ऊपरकी ओर उठे हुए विशाल गोल सफेद छनके आकार है ॥१२७-१२८॥ विद्वज्जन उस पृथिवीका विस्तार पैंतालीस लाख योजन बतलाते हैं ॥१२६।। उसकी परिधि एक करोड़ बयालीस लाख तीस हजार दो सौ उनचास योजन है ।।१३०॥ उस पृथिवीके ऊपर पहले कहे हुए तीन वातवलय हैं, उनमें तीन कोश विस्तारवाले दो वलयोंका उलंघन कर एक हजार पाँच सौ पचहत्तर धनुप विस्तारवाला जो तीसरा तनुवातवलय है उसके पाँच सौ पच्चीस धनुप मोटे अन्तिम भागको अपनी उत्कृष्ट अवगाहनासे व्याप्तकर सिद्ध भगवान विराजमान हैं । जिन सिद्ध भगवान्का अनन्तर पूर्व शरीर साढ़े तीन हाथ ऊँचा रहता है उनकी अवगाहना सम्बन्धी आकाशका प्रदेश साढ़े तीन हाथसे कुछ कम माना जाता है ।।१३१-१३४।। जहाँ कृतकृत्य अवस्थाको प्राप्त हुए एक सिद्ध भगवान् विराजमान हैं वहाँ अपनी अवगाहनासे अनन्त सिद्ध परमेष्ठी स्थित है। भावार्थ-अवगाह दानकी सामर्थ्य होनेसे सिद्ध परमेष्ठी एक दूसरेको बाधा नहीं पहुँचाते इसलिए जहाँ एक सिद्ध है वहीं अनन्त सिद्ध विराजमान रहते हैं ॥१३५॥ ये सिद्ध परमेष्ठो शरीररहित हैं, मुख रूप हैं, जीवके धन प्रदेशोंसे युक्त हैं और अपने ज्ञानोपयोग तथा दर्शनोपयोगके द्वारा अनन्त पर्यायोसे युक्त समस्त लोक और अलोकको एक साथ जानते हुए सदा सुखसे स्थिर रहते हैं ॥१३६-१३७॥ जो कर्म कलंकसे रहित होनेके कारण शुद्ध हैं, अनन्त ज्ञान से सम्पन्न होनेके कारण जिन्होंने समरत पदार्थोंको जान लिया है, जो आयु- कमसे रहित होनेके कारण नूतन जन्मसे रहित हैं, शरीर रहित होनेके कारण अजर-अमर हैं, मोहजन्य विकारसे रहित होने के कारण ओ कर्मबन्धनसे दूर हैं और स्वाश्रित होनेसे शाश्वत हैं ऐसे सिद्ध परमेष्ठी उस शाश्वत-अविनश्वर स्थानपर सदा विद्यमान रहते हैं ॥१३८।। गौतम स्वामी कहते हैं कि हे वररत्न श्रेणिक ! इस प्रकार हमने तेरे कल्याणके लिए १ निश्चल ख० । २ ज्योतिर्लोकः प्रकटपटलस्वर्गमोक्षोललोकः म० १ ३ संग्रहाक्षेपमेव प० ।

पष्टः सर्गः धर्मध्यानं धवलमुदितं मोरहेनुजिनेन्द्र राज्ञापायप्रभृतिविचयश्चित्तवृत्चेनिरोधः । यत्त कार्या समितकरणलॊकसंस्थानचिन्ता मन्दाक्रान्ता न हृदयमदभेन्द्रिया वा विधेयाः ॥१४॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृतो ज्योतिलोको लोकवर्णनो नाम पष्ठः सर्गः ॥१॥ ज्योतिर्लोक और अनेक पटलोंसे युक्त स्वर्ग एवं मोक्षसे सहित अर्ध्व लोकका कथन करनेवाले इस क्षेत्रका संक्षेपसे कर्णप्रिय वर्णन किया है । अब हे आयुप्मन् ! हम कालद्रव्यका कथन करते हैं सो एकाग्रचित्तसे श्रवण कर ॥१३॥ श्रीजिनेन्द्र भगवान्ने आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाक विचय और संस्थान विचयके द्वारा चित्तवृत्तिके निरोध करनेको उज्ज्वल धर्मध्यान कहा है और चूंकि धर्मध्यान मोक्षका कारण है इसलिए इन्द्रियोंको वश करनेवाले पुरुषोंको लोकके संस्थान-आकारका चिन्तन करना चाहिए। आचार्योने ठीक ही कहा है कि इन्द्रिय रूपी मदोन्मत्त हाथी और इन्द्रिय रूपी घोड़े मन्द आक्रमण होनेपर वशमें नहीं रहते । भावार्थ- मोक्षाभिलापी पुरुपोंको मन और इन्द्रियोंको स्वतन्त्र नहीं छोड़ना चाहिए ॥१४०॥ इस प्रकार जिसमें श्रीअरिष्टनेमि जिनेन्द्रके पुराणका संग्रह किया गया है ऐसे जिनसेनाचार्यरचित हरिवंश पुराणमें ज्योतिलोंक तथा अर्ध्वलोकका वर्णन करनेवाला छठयाँ सर्ग समाप्त हुआ | १ मेदेन्द्रिास्वारिया:०,१०, ग., प० ।

सप्तमः सर्गः . वर्णगन्धरमरपशमुनोगौरवलाघवः । वर्तनालपणः कालो भुरयो गौणश्च स द्विधा ॥१॥ गतिम्थि यवगाहाना धर्माधर्माम्बराणि च । निमित्तं सर्वभागनां धर्तनस्यान निश्चयः ॥२॥ धर्माधर्मनभादव्यं यधैवागमष्टितः । तथा निश्चयकालोऽपि निश्वेतव्यो विपश्चिता ॥३॥ जीयानां पुद्गलानां व परिवृत्तिरनेऋथा। गौणकालप्रवृत्तिश्च मुस्थकालनियन्धना ॥४॥ मामेव भावाना परिणामादिवृत्तयः । स्वान्तहिनिमित्तेभ्यः प्रवर्तन्ते समन्ततः ॥५॥ निमित्तमान्तरं तर योग्यता वस्तुनि स्थिना । बहिनिश्चयकालस्तु निश्चितस्तत्त्वदर्शिभिः ॥६॥ अन्योन्यानुप्रवेशेन विना कालावः पृथक् । लोकामाशमशेपं तु व्याप्य तिन्ति सशिताः ॥७॥ दयार्थीसिविकारत्वादुदयन्ययवर्जिताः । नित्या एव कथञ्चित्ते स्वरूपसमवस्थिताः ॥८॥ भगुरुवलघुग्रामपरिगामसमन्विताः । परोपाधिविकारियादनित्यास्तु कथशन ॥६॥ विधा समयवृत्तीनां हेतु दाने त्रिधा स्मृताः । अनन्तसमयो पावादनन्तव्यपदेशिनः ton तेम्यः कारणभूतम्यः समयस्य ममुद्भवः । कारणेन विना कार्य न कदाचित् प्रजायते ॥११॥ म्यन एवाऽमतो सन्म कार्यस्य यदि जायने । स्वत एव हि किं न स्याद् सरङ्गस्य सम्भवः ॥२॥ न कागदन्यतो हेनोः काल कार्यममुद्भवः । न हि सजायते जातु शालियाजाद् यथाइ कुरः ॥१३॥ रूप, रस, गन्ध और स्पर्शसे रहित व हलका व भारी और वर्तना लक्षणसे युक्त कालद्रव्य है। यह मुम्य और गौणके भेदसे दो प्रकारका है ॥१॥ जिस प्रकार जीव और पुदलके गमन फरने में धर्म द्रव्य, ठहरनमें अधर्म द्रव्य और समस्त द्रव्योंको अवगाह देने में आकाश द्रव्य निमित्त है उमी प्रकार ममस्त द्रव्योंकी वर्तना-पड़ गुणी हानि वृद्धि रूप परिणमनमें निश्चय फालद्रव्य निमित्त है ॥२॥ जिम प्रकार धर्म-अधर्म और आकाशद्रश्यका भागमदृष्टिसे निश्चय फाल द्रव्यका भी निश्य करना चाहिए ॥३जीव और पुद्गलोंका परिणमन नाना प्रकारका होना है और गौण फालकी प्रवृत्ति मुख्य फालके कारण है ॥४ा समस्त पदामि जो परिणाम मिया पात्य और अपत्य रूप परिणमन होते हैं वे अपने अपने अन्तरद तथा पहिरन निमित्तोंसे ही मय भीर प्रवृत्त होते है ॥५उन अन्तरम, यहिद्ग निमित्ताम अन्तरग निमिर तो धातुकी अपनी योग्यता है जोमदा उमगे स्थित रहती है और या निमित्त निश्चय कालद्रव्य है ऐसा तत्यदी आपानि निशित किया है ।शा पारपरफे प्रवेशसे रहित कालाणु पृथक्-पृथक समस्त सोको च्याप्रकर गशि हग स्थित है 1sn द्रव्यार्थिक गयकी अपेता फालाणुमि विकार नहीं होमा मलिए उपाद व्ययमे रहित होने के कारण ये फयश्चित् नित्य है और अपने स्वरूप में स्थित ₹ 11 भगुर लगु गुगके कारण उन फालागुभीम प्रत्येक ममय परिणमन होता रहता है तथा परपदायक मम्पन्धमे ये विराग दो जाते है इमलिए पर्यायाथिक नयी अपेक्षा फन्ि भनिन्य भी हैभूत, भविष्य और यतमान मानीन प्रकार समयका कारण होनमे वे काटा मानामान गये। भोर भागात सगयोफे उत्पादक दोनमे अनन्त भी पर जाने ₹.१०॥ न पाणभून फाराभीमे ममगकी उत्पत्ति होनी मो टोक होगांकि कारण कमी कायं काम नही होना ॥१२॥ यदि भपद्मूग कार्यको शनि कारण पिना स्ययं ही दरमा गरमीगो पनि पयंदो क्यों नही दी जानी ? पाल मियाय भाय हाल बार 57 पंको पशगनदी होगी पारि पानी पीने कभी भीका भंपुर सतमः सर्गः । जायते मिन्नजातीयो हेनुयंत्राऽपि कार्यकृत् । तत्राऽसौ सहकारी स्यात् मुट्योपादानकारणः ॥१४॥ "युक् यागमबलादेवमनतीन्द्रियदर्शिनः । सद्भावं मुरयकालस्य प्रतिपद्य व्यवस्थितः ॥१५॥ समयावलिकोच्छोमप्राणस्तोकलवादिकः । व्यवहारस्तु विज्ञेयः कालः कालज्ञवर्णितः ॥१६॥ परिणाम प्रपन्नस्य गत्या सर्वजवन्यया । परमाणोनिजागाढस्वप्रदेशव्यतिरमः ॥१७॥ कालेन याववैव स्याइविभागः स भाषितः । समयः समयाभिज्ञनिरुद्ध परमान्यतः ॥१८॥ तैरेवावलिकामहरयः सइयाताभिस्तु भापिती । ताभिरुरासनिश्चासौ तावुमी प्राण इप्यते ॥११॥ प्राणाः मत पुनः स्तोकः सप्तस्तोका भवेल्लयः । ते सप्त सप्ततिः सन्तो मुहाखिशदेव ते ॥२०॥ भहोरानं भवेत्पक्षस्नानि पञ्चदशैव तौ । मासो मामावृतुस्तेषां त्रितयं त्वयनं तथा ॥२१॥ अयनद्वयमन्दं स्यात् पञ्चाब्दानि युगं पुनः । युगद्वयं दशान्दानि शतं तानि दशाहतौ ॥२२॥ भवेद्वपमहनतु शतं चापि दशाहतम् । दशवर्षसहस्राणि तदेव दशताडितम् ॥२३॥ संयं वर्षसहस्रं तु तच्चापि दशस गुणम् । पूर्वाङ्ग तु तदभ्यस्तमशीत्या चतुरप्रया ॥२४॥ तत्तद्गुणं च पूर्वाङ्ग पूर्व भवति निश्चितम् । पूर्वाह्न तद्गुणं तच्च पूर्वसं तु तद्गुणम् ॥२५।। नियुताद् परं तस्मानियुतं च ततः परम् । कुमुदान ततश्च स्याद् कुमुदं तु ततः परम् ।।१६।। पमान पममध्यस्मात् नलिना तथैव च । नलिनं कमलानं च कमलं चाप्यतः परम् ॥२७॥ तुम्याग तुटयमप्यस्मादाहं ततोऽपि न । म चाममाङ्गं स्यादममं चाप्यतः परम् ॥२८॥ उत्पन्न नहीं होता ॥१३॥ जहाँ कहीं भिन्न जातीय कारण कार्य उत्पादक होता है वहाँ वह सह- कारी कारण ही होता है। कार्यकी उत्पत्तिमें मुरय कारण उपादान है और सहकारी कारण उसका महायक होता है ॥१४॥ इस प्रकार जो अतीन्द्रियदर्शी नहीं है अर्थात् स्थूल पदार्थको ही जानते हैं उनके लिए युक्ति और आगमके वलसे मुख्यकालका सद्भाव बताकर उसे व्यवस्थित किया है ॥१५॥ समय, आवलि, उच्छ्रास, प्राण, स्तोक और लब आदिको व्यवहार-काल जानना चाहिए ऐसा समयके ज्ञाता आचार्योन वर्णन किया है ॥१६॥ सर्वजघन्य गतिसे परिणामको प्राम हुआ परमाणु जितने समयमें अपने द्वारा प्राप्त स्वर्गीय प्रदेशका उल्लंघन करता है उतने समयको समय-शात्रके ज्ञाता आचागाने समय कहा है। यह समय अविभागी होता है तथा परकी मान्यताको रोकनेवाला है ॥१७-१८॥ असंख्यात समयकी एक आवली होती है, संख्यात भावलियोंका एक उच्छास निश्वास होता है, दो उच्छ्रास निश्वासाका एक प्राण होता है। सात प्राणोंका एक स्तोक होता है, सात स्नोकोका एक लव होता है, सत्तर लयोंका एक मुहूर्त होता है, तीस मुहूर्ताका एक दिन-रात होता है, पन्द्रह दिन-रातका एक पक्ष होता है, दो पक्षका एक माम होता है, दो मासकी एक ऋतु होती है, तीन ऋतुओंका एक अयन होना है, दो अयनोंका एक वर्ष होता है, पाँच वर्षाका एक युग होता है, दो युगोके दश वर्प होते हैं, इसमें दशका गुणा करनेपर सौ वर्ष होते हैं, इसमें दशका गुणा करनेपर हजार वर्ष होते हैं, इसमें दशका गुणा करनेपर दश हजार वर्ष होते हैं, इसमे दशमा गुणा करनेपर एक लाग्य वर्ष होते हैं इसमें चोगसीका गुणा करनेपर एक पूर्वान होना है, चौरासी लाग्य पूर्वाहीका एक पूर्व, चोगसी लाय पूर्वाका एक नियुतान, चौरासी लास नियुतागोका एक नियुत, चौरासी लाग्य नियुतीका एक कुमुदाह, चौगसी लास पुमुदाद्गों- का एक कुमुद, चौरासी लाप कुमुदाँका एक पद्माह, चौरामी लाम्य पाहीका एक पद्म, चौरासी लाम्म पद्मोंका एक नलिनाग, चौरासी लाव नलिनाङ्गोंका एक नलिन, चौरासी लाम्य नलिनीका एक कमलाद्ग, चीगसी लाख कमलाद्गोंका एक मल, चौरासी लाग्य कमलोंका एक तुम्याग, चोरासो लाग्य तुटयागोंका एक तुट्य, चौरासी लाम्य तुरयांका एक अटटाग, पोगसी लाग्न १ युनागम म., ०।२ कोट्यामः प्राग म०।३ निरुतः परमास्थितः मः।

हरिवंशपुराणे उहाइमूहमप्यस्मालताझंच लताद्वयम् । महालतागसंझं स्यात् कालवस्तुमहालता ॥२६॥ शिरमकम्पितं प्रोक्तं ततो हस्तप्रहेलिका । चर्चिकेत्यादिकः कालः सहस्येयः परिमारितः ॥३०॥ वर्षसडल्याव्यतिकान्तः कालोऽमरयेय इष्यते । पत्यसागरसख्यानं कशानन्तादिभेदवान् ।।३।। 'आदिमध्यान्तनिमुन निविभागमतीन्द्रियम् । मूर्तमप्यप्रदेशं च परमाणुं प्रचक्षते ॥३२।। एकदैकं रसं वर्ण गन्धं स्पर्शायाधको । दधन स वनंते भेद्यः शब्दहेनुरशब्दकः ॥३३॥ आशया नार्थतत्त्वज्ञेनाऽशानां समन्ततः । पटकन युगपद्योगापरमाणोः पदंशता ॥३४॥ स्वल्पाकाशपदंशाच परमाणुश्च संहताः। मप्तांशाः स्युः कुतस्तु स्यात्परमाणोः पदंशता ॥३५॥ वर्णगन्धरसस्पर्शः पूरणं गलनं च यत् । कुर्वन्ति स्कन्धवत्तस्मात् पुद्गलाः परमाणवः ॥३६॥ 'अनन्तानन्तमद्ण्यानपरमाणुपमुच्चयः । भवसंज्ञादिकापंज्ञा स्कन्धजातिस्तु जायते ॥३०॥ वाभिरष्टाभिरप्युना संज्ञामंज्ञादिका तथा । ताभिरप्याट संज्ञाभिस्तुटिरेणुः स्फुटोकृतः ।।३।। अटटाहोंका एक अटट, चौरासी लाख अटटोका एक अममाङ्ग, चौरासी लाख अममाङ्गोका एक अमम, चौरासी लाख अममोंका एक उहाह, चौरासी लास उहाह्रींका एक ऊह, चौरासी लाख उहाँका एक लताङ्ग, चौरासी लाख लतागोंकी एक लता, चौरासी लास लतागीफा एक महा लता, चौगसी लास महालताहॉकी एक महालता, चौरासी लाख महालताओंका एक शिर प्रकम्पित, चौरासी लाख शिरःप्रकम्पितीको एक हस्त प्रहेलिका और चौरासी लाख प्रहेलिकाओंको एक चर्चिका होती है । इस प्रकार चर्चिका आदिको लेकर संख्यात काल कहा गया है ।।१९-३०॥ जो वाँकी संख्यासे रहित है वह असंख्येय काल माना जाता है इसके पल्य, सागर, कल्प तथा अनन्त आदि अनेक भेद हैं ॥३॥ जो आदि मध्य और अन्तसे रहित है, निर्विभाग है, अतीन्द्रिय है और मूर्त होनेपर भी अप्रदेश--द्वितीयादिक प्रदेशोंसे रहित है उसे परमाणु कहते हैं ॥३२॥ वह परमाणु एक कालमै ' एक रस, एक वर्ण, एक गन्ध और परस्परमे वाधा नहीं करनेवाले दो स्पर्शीको धारण करता है। अभेद्य है, शब्दका कारण है और स्वयं शब्दसे रहित है ।।३३शा पदार्थके स्वरूपको जाननेवाले लोगोको ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए कि सब ओरसे एक समय आकाशके छह अंशोके साथ सम्बन्ध होनेसे परमाणुमें पडंशता है ॥३॥ क्योंकि ऐसा माननेपर आकाशके छोटे छोटे छह अंश और एक परमाणु सब मिलकर सप्तमांश हो जाते हैं अब परमाणुमें पडशता कैसे हो सकती है ? ॥३५॥ क्योंकि परमाणु रूप, गन्ध, रस और स्पर्शके द्वारा पूरण तथा गलन करते रहते हैं इसलिए स्कन्धके समान परमाणु पुद्गल द्रव्य हैं ॥३६॥ अनन्तानन्त परमाणुओंके समूह को अवसंज्ञ कहते हैं। ये अवसंज्ञ आदि स्कन्धकी ही जातियाँ हैं ॥३७|| आठ अवसंज्ञाओंकी -०प्र० १ अतादिझन्झहीणं अपदेश इदियेष्टिं णहु गम्भ। ब दव्व अविभत्तं तं परमाणु वदति जिणा ॥९८|| २ परमाणूहिं श्रणताणतेहिं बहुविहेहिं दम्बेहि । अवसरणासएणोत्ति सो वधो होइ णामेण ॥१०२॥ उपसण्णासगणो दिय गुणिदो अछेहि होदि गामेण । सणासएणो ति तटो दु ददि पधो पमाणटठ् ।।१०३॥ अट्रेहिं गुणिदेहि सण्णासपणेहि होदि तुडिरेणु । तित्तियमेतदेहि नुदिरेणहि रि तसरेणु ॥१०४॥ तमरेण रयरेण उत्तमभोगावणीए बालग्गं । मझिमभोगविदोए घोल पि जइण्ण भोगखिम्बिाल ||१०|| इत्यादि -०प्र० सप्तमः सर्गः १३५ एतैरप्यष्टवालारेकमेकाग्रमानसः।। तैरष्टाभिभवेल्लिता ताभियूका तथाष्टा उस्सेधागुलमेतत्स्यादुरमेधोऽनेन देहिनाम् । अल्पावस्थितवस्तूनां प्रमाणं च प्रगृह्यते ॥४॥ प्रमाणागुलमेकं स्यात् तत्पञ्चशतसगुणम् । प्रथमस्यावसर्पिण्यामगुलं चक्रवर्तिनः ॥४२॥ चोध्यं यथास्वमु सेधव्यामादि महतः पुनः । द्वीपमागरशैलादेः प्रमाणा गुलसम्मितम् ॥४३॥ स्वे स्वे काले मनुष्याणाममुलं स्वागुल मतम् । मीयते तेन तच्छत्रमृङ्गारनगरादिकम् ।।४।। विविधाङ्गुलपटकः स्यात् पादः पादद्वयं पुनः । वितस्तिस्तद्वयं हस्तस्तवयं विष्कुरिष्यते ।।४।। दण्डः किकुद्वयं दण्डः धनुर्नाड्या समा मताः । अष्टी दण्डसहस्राणि योजनं परिभाषितम् ।।४६।। प्रमाणयोजनव्यासस्वावगाहं विशेषवत् । त्रिगुणं परिवेपेण क्षेत्र पर्यन्तमित्तिकम् ॥१७॥ सप्ताहान्ताविरोमात्रैरापूर्य कठिनीकृतम् । तदुद्धार्यमिदं पल्यं व्यवहाराख्यमिप्यते ॥४८॥ एकैकस्मिस्ततो रोम्नि प्रत्यन्दशतमुद्धते । यावताऽस्य चयः कालः पल्यं व्युत्पत्तिमात्रकृत् ॥४॥ असङ्घय याब्दकोटीनां समयै रोमखण्डितम् । प्रत्येक पूर्वकं तत्स्यात्पत्यमुद्धारसंज्ञकम् ॥५०॥ एक संज्ञा-संज्ञा कही गई है, आठ संज्ञा-संज्ञाओंका एक श्रुटिरेणु प्रकट किया गया है ॥३८॥ आठ* त्रुटिरेणुओं का एक त्रसरेणु, आठ त्रसरेणुओंका एक रथरेणु, आठ रथरेणुओका एक उत्तम भोगभूमिज मनुष्यके वालका अग्रभाग, उत्तमभोगभूमिज मनुष्य के आठ बालाग्रभागोंका एक मध्यमभोग भूमिज मनुष्यका बालाग्र और आठ मध्यमभोगभूमिज मनुष्यके वालाग्रीका एक जघन्य भोगभूमिज मनुष्यका बालाग्र होता है ] जघन्य भोगभूमिज मनुप्योके आठ बालाग्री- का एक कर्मभूमिज मनुष्यका वालाग्र होता है, इन आठ बालाग्राको एक लीख, आठ लोखोंका एक जूंआ, आठ जुओका एक जौ और आठ जौका एक उत्सेधाङ्गुल होता है । इस उत्सेधाकुल- से जीवों के शरीरकी ऊँचाई और छोटी वस्तुओंका प्रमाण ग्रहण किया जाता है ॥३६-४१॥ उत्सेधाङ्गुलमें पाँच सौका गुणा करनेपर एक प्रमाणाङ्गुल होता है । यह प्रमाणाङ्गुल अवसर्पिणीके प्रथम चक्रवर्तीका अङ्गुल है ॥४२॥ इस अङ्गुलसे बड़े-बड़े द्वीप समुद्र आदिकी ऊँचाई चौड़ाई आदि यथायोग्य जानी जाती है ॥४३॥ अपने-अपने समय में मनुष्योंका जो अङ्गुल है. यह स्वा. हुल माना गया है इसके द्वारा छत्र, कलश तथा नगर आदिका विस्तार नापा जाता है ॥४४॥ छह अङ्गुलोंका एक पाद होता है, दो पादोंकी एक वितस्ति, दो वितस्तियोंका एक हाथ और दो हाथोंका एक किप्पु होता है ॥४५॥ दो किप्फुओंका एक दण्ड, धनुप अथवा नाड़ी होती है, भाठ हजार दण्डीका एक योजन कहा गया है ॥४६॥ एक ऐसा क्षेत्र (गर्त बनाया जाय जो एक प्रमाण योजन बराबर लम्बा-चौड़ा तथा गहरा हो, जिसकी परिधि इससे कुछ अधिक तिगुनी हो तथा जिसके चारों तरफ दीवालें बनाई गई हो ॥४७॥ इस क्षेत्रको एकसे लेकर सात दिन तककी भेड़के वालोंके ऐसे टुकड़ोंसे जिनके कि दूसरे टुकड़े न हो सके ऊपर तक कूट-फूट कर भरा जाय । इस गर्तको व्यवहारपल्य कहते ॥४८॥ सौ-सौ वर्षके बाद एक-एक बालका टुकड़ा उम गर्तसे निकालनेपर जितने समयमै वह साली हो जाय उतने समयको व्यवहारपल्यापम काल कहते हैं ॥४६॥ तदनन्तर उन्हीं बालके टुकड़ों में प्रत्येक टुकड़ेके, असंख्यात करोड़ वर्षांम जितने समय हैं उतने टुकड़े बुद्धिसे कल्पित टुकड़ोसे पूर्वोक्त प्रमाणवाले गर्तको भग जाय । इस भरे हुए गर्वको उद्धारपल्य कहते हैं और १ गेमपण्डितः म०, गः । • कोरकान्तर्गत भावको सूचित करनेवाले श्लोक मम्पादन के लिए प्राप्त चारों हस्तलिखित तथा एक मुद्रित पाँची प्रतिम नहीं है परन्तु है भावश्यक । इमलिए उनका प्रामाणिक भनुवाद दिया गया है।

हरिवंशपुराणे कोटीकोटयो दशामीषा पल्याना सागरोपमा । ताभ्यामतृतीयाभ्यां द्वीपसागरसम्मितिः ॥५॥ सोऽध्वा द्विगुणितो रज्जुस्तनुवातोभयान्तभाग् । निष्पेंद्यते यो लोकाः प्रमीयन्ते वुधैस्तथा ॥५२॥ असङ्खयवर्षकोटीनां समय रोमरवण्डितैः । उद्धारपल्यमद्धाख्यं स्यात्कालोऽद्धाभिधीयते ॥५३॥ कालः पत्योपमाख्योऽसौ समय समय प्रति । क्षीयमाणः प्रमाणार्थमायुषो विनियुज्यते ॥५॥ कोटीकोटयो दशामीषां जायते सागरोपमा । मेया संसारिणां चाभिरायुःकर्मभवस्थितिः ॥५५॥ कोटीकोटयो दशैतासां प्रत्येकमवसपिणी । उत्सर्पिणी च कालाः पट् प्रत्येकमनयोः समाः ॥५६॥ भवसति वस्तूनां शक्तियंत्र क्रमेण सा। प्रोक्ताऽवसर्पिणी सार्था सान्यथोत्सर्पिणी तथा ॥५॥ मुपमासुपमाऽऽद्या स्यात् द्वितीया सुपमा समा । दुःपमासुपमाऽऽद्या स्यात् सुषमादुःपमादिका ॥५॥ दुःपमा चावसर्पिण्यामतिदुःपमया सह । ता एवं प्रतिलोमाः स्युरुसर्पिण्यां च पट् समा ॥५६॥ कोटीकोटयश्चतस्रश्च तिस्रो द्वे च यथाक्रमम् । भादितस्तिरमृणां तासां प्रमाण सागरोपमाः॥६०॥ द्वाचत्वारिंशदब्दानां सहस्रैः परिवर्जिता । कोटीकोटीसमुद्राणां तुरीयस्य यथाक्रमम् ॥६॥ तानि वर्षसहस्राणि विभक्कानि समं भवेत् । पञ्चमस्य च षष्ठस्य प्रमाणं कालवस्तुनः ॥६२॥ कल्पस्ते तथागां वृद्धिहानिमती स्थितिः । भरवैरावतक्षेत्रेवन्येष्वपि ततोऽन्यथा ॥६३॥ एक-एक समयमे एक-एक टुकड़ा निकालनेपर जितने समयमें वह गर्त खाली हो जाय उतने समयको उद्धारपल्यापम काल कहते हैं ॥५०॥ दश कोड़ाकोड़ी उद्धारपल्यौंका एक उद्धार सागर होता है और ढाई उद्धार सागरोपम काल अथवा पच्चीस कोड़ाकोड़ी उद्धारपल्याँके बालोके जितने टुकड़े हो उतने द्वीपसागरों का प्रमाण है ।।५॥ द्वीपसागरीका जो अध्चा अर्थात् एक दिशाका विस्तार है उसे दुगुना करनेपर रज्जुका प्रमाण निकलता है। यह रज्जु दोनों दिशाओंके तनुवातवलयके अन्त भागको स्पर्श करती है । विद्वान् लोग इसके द्वारा तीन लोकोका प्रमाण निकालते हैं ॥५२॥ उद्धार पल्यके रोम खण्डोंके असंख्यात करोड़ वर्षों के समय बराबर बुद्धि द्वारा सुण्ड कल्पित किये जावें और उनसे पूर्वोक्त गर्तको भरा जाय । इस गर्तको अद्धा पल्य कहते हैं। उनमें से एक-एक समयके बाद एक-एक टुकड़ाके निकालनेपर जितने समय में बह साली हो जाय उतने समयको अद्धापल्योपम काल कहते हैं। आयुका प्रमाण बतलाने के लिए इसका उपयोग होता है ॥५३-५४॥ दश कोड़ाकोड़ी भद्धापल्योंका एक अद्धासागर होता है, इसके द्वारा संसारी जीवोकी आयु, कर्म तथा संसारकी स्थिति जानी जाती है ।।५।। दश कोडाकोड़ी अद्धासागरोको एक अवसर्पिणी तथा उतने ही सागरोंको एक उत्सर्पिणी होती है । इनमे प्रत्येकके छह-यह भेद हैं ॥५६॥ जिसमें वस्तुओको शक्ति क्रमसे घटती जाती है उसे अवसर्पिगी और जिसमें बढ़ती जाती है उसे उत्सपिणी कहते हैं। इनका अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी नाम सार्थक है ।।५७॥ १ सुपमासुपमा, २ सुषमा, ३ मुपमादुःपमा, ४ दुःपमामुपमा, ५ दु.पमा और ६ दुःपमादुःपमा ये अवसर्पिणीके छह भेद हैं और इससे उल्टे अर्थात् १ दुःपमा• दुःपमा, २ दुपमा, ३ सुपमादुःपमा, ४ टुपमासुपमा, ५ सुपमा और ६ सुषमामुपमा ये छह उत्सर्पिणीके भेद हैं ।।५८-५६॥ प्रारम्भके तीन कालीका प्रमाण क्रमसे चार कोड़ाकोड़ी मागर, तीन कोड़ाकोड़ी सागर और दो कोडाकोड़ी सागर है ॥६०॥ चौथे कालका प्रमाण बयालीस हजार वर्ष फम एक कोडाकोड़ी सागर है और पाँचवें तथा छठये कालका प्रमाण इफीस-इकीस हजार वर्ष प्रमाण है ॥६१-६२॥ जिस प्रकार दश कोडाकोड़ी मागरका अवसर्पिणी काल है उमी प्रकार दश कोडाकोड़ी सागरका उत्सर्पिणी फाल है। अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी दोनों १ दशेनेश क.। २. दीरसागरप्रमाणम् । ३ दीरसागराणामेकस्मिन् दिशि मयांदामार्गः अध्या पप्यते । ४ निपन्ने म०, ग०, १०,०। ५ दाचतारिंशदर्पसहस्राणि कि विधाहतानि अर्थात् एकस्रािनिमहमाणि।६ उत्मविसमारण्यो ।

सतमः सर्गः भायेपु त्रिपु कालेषु कल्पवृक्षविभूषिता । भोगभूमिरियं भूमि गभूमिस्तु भारती ॥६॥ युग्मधर्मभुजो भूत्वा तेपामादौ जगप्रजाः । षट्चतुर्दिसहस्राणि धपि वपुपोष्ट्रिताः ॥६५।। भायुरिद्वय कपल्यैस्तु तुल्यं तासां यथाक्रमम् । देवोत्तरकुरुक्षेत्रहरिहैमवतेविव ।।६।। प्रोद्यदादित्यवर्णामाः पूर्णचन्द्रसमप्रभाः । प्रियङ्गुश्यामवर्णाश्च तेषु स्त्रीपुरुशलिपु ॥६॥ 'पृष्ठकाण्डकसङ्ख्यानं षट्पञ्चाशं शतद्वयम् । अष्टाविंशं शतं तेषां चतुःषष्टिययाक्रमम् ॥१८॥ दिव्यं बदरतन्मात्रमधमानं च भोजनम् । तथाऽमलकमानं च चतुनिद्विदिनैत्रिपु ॥६॥ तत्रिकालनियोगेन धरित्रीय नियन्त्रिता । प्रिभेदानां तदादत्ते नित्यभोंगभुवां स्थितिम् ।।७।। रत्नप्रभा यथा भाति पृथिवीयमवस्थितैः । एषा तथा स्फुरदलपटलैरुपरिस्थितैः ॥७॥ इन्द्रनीलादिमिनीलेः कृष्णैर्जात्यानादिभिः । पद्मरागादिकः रक्तः पीवेमादिभिः परैः ॥७२॥ श्वेवैमुक्तादिभिभूमिर्मयूखाक्रान्तदिङ्मुखैः । पञ्चवर्गश्चिता रत्नैः स्वगंभूरिव शोभते ॥७३॥ चन्द्रकान्तशिलाऽस्योर्वी विदुमाधरपल्लवा । ललनेव तदाऽऽभाति रत्नकाञ्चनकन्चुका ॥७४॥ चन्द्रकान्तांशवः शीताः सूर्यकान्तांशवोऽन्यथा । विश्लिप्यन्यत्र नाश्लिष्टाः शीतोष्णव्यथिता इव ।।७५॥ मिलकर कल्प काल कहलाते हैं। इन दोनों कालोंके समय भरत ऐरावत क्षेत्रमें पदार्थोकी स्थिति हानि और वृद्धिको लिये हुए होती है। इन दो क्षेत्रोंके सिवाय अन्य क्षेत्रोंमें पदार्थों की स्थिति हानिवृद्धिसे रहित-अवस्थित है ॥६॥ प्रारम्भके तीन कालोंमें भरत क्षेत्रको यह भूमि भोग- भूमि कहलाती है जो कि यथार्थमें नाना प्रकारके भोगों की भूमि-स्थान भी है ॥६४॥ उन तीनों कालोंके प्रारम्भमें मनुष्य क्रमसे छह हजार, चार हजार और दो हजार धनुप ऊँचे रहते थे तथा स्त्री-पुरुषोंकी उत्पत्ति युगल रूपमें साथ ही साथ होती थी ॥६५॥ उस समय उनकी आयु देवकुरु, उत्तरकुरु, हरिवर्प तथा हैमवत क्षेत्रके मनुष्योके समान क्रमसे तीन पल्य, दो पल्य और एक पल्यके तुल्य होती थी ॥६६॥ उन तीन कालोमें स्त्री-पुरुष क्रमसे उदित होते हुए सूर्यके समान, पूर्णचन्द्र के समान और प्रियङ्गु पुष्पके समान आभावाले होते थे ॥६७। उनकी पीठको हड्डियोंको संख्या पहले कालमें दो सौ छप्पन, दूसरे कालमें एक सौ अट्ठाईस और तीसरे कालमें चौंसठ थी ॥६८॥ उनका पहले कालमें चार दिनके अन्तरसे बेरके बराबर, दूसरे कालमें दो दिनके अन्तरसे बहेड़ाके बराबर और तीसरे कालमें दो दिनके अन्तरसे आँवलेके बराबर दिव्य- कल्पवृक्षोत्पन्न आहार होता था ॥६६॥ उन तीन कालोंके नियोगसे नियन्त्रित यह भारतवर्षकी भूमि उस समय क्रमशः तीन प्रकारको स्थायी भोगभूमियोंकी रीतिको ग्रहण करती थी अर्थात् उस समय यहाँको व्यवस्था शाश्वती उत्तम,मध्यम और जघन्य भोगभूमियों के समान थी ||७०|| जिस प्रकार रत्नप्रभा पृथिवी, स्थायी लगे हुए रत्नोंके पटलोंसे सुशोभित है उसी प्रकार भरत क्षेत्रकी यह भूमि भी उस समय ऊपर स्थित देदीप्यमान रत्नोंके पटलोंसे सुशोभित होती है ॥७२।। अपनी किरणोंसे दिशाओंको व्याप्त करनेवाले इन्द्रनील आदि नीलमणि, जात्यञ्जन आदि कृष्णमणि, पद्मराग आदि कालमणि, हैम आदि पीले मणि और मुक्ता आदि सफेद मगि इस प्रकार पाँच वर्णके मणियोंसे व्याप्त हुई यह भूमि उस समय स्वर्गभूमिके समान सुशोभित हो रही थी ।।७२-७३।। चन्द्रकान्तमणि जिसका मुख था, मूंगा जिसके ओठ थे तथा रत्न और म्वर्ण जिसकी चोली थे ऐसी यह भूमि उस समय किसी स्त्रीके समान सुशोभित होती थी ॥७४॥ चन्द्र- कान्त मणिकी किरणें शीतल होती हैं और सूर्यकान्त मणिको उष्ण । परन्तु यहाँ दोनों ही एक दूमरेसे मिलकर अलग-अलग नहीं होती थीं जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो चन्द्रकान्तको किरणें ठण्डसे पीड़ित थीं इसलिए सूर्यकान्तको उष्ण किरणोंको नहीं छोड़ना चाहती थीं और १ पृष्ठास्थिचयानां संख्या एनेन पदेन वेदितव्या ।

। हरिवंशपुराणे परस्परकराश्लेपरागमूच्छितमूर्तिभिः । मणिजातिविशेषभूभांति प्रेमवशैरिव ॥७६॥ पञ्चवर्णसुसस्पर्शसुगन्धरसशब्दकैः । संच्छन्ना राजते होगी तृणैश्च चतुरङ्गलः ॥७७॥ पूर्णर्दधिमधुत्तीरघृनेचरससनलः । रत्नरोधोभिरुयाऽभात् दिव्यवापीसरोवरैः ॥७॥ नानावर्णमणिच्छन्नः सौवर्णः प्राणिसौख्यदैः । रम्यैः क्षोणीधरैः सोणी भ्राजते नितरां सदा ॥७॥ ज्योतिर्गृहप्रदीपाङ्गस्तूर्यभोजनभाजनैः । वस्त्रमाल्यागभूषाङ्गमद्याश्च द्रुमैरभात् ॥२०॥ ज्योतिरगद्रुमा ज्योतिरछनचन्द्रार्कमण्डलाः । अहोरात्रकृतं भेदं भिन्दन्तो भान्ति सन्तत ॥८॥ सोद्यानभूमयश्चित्राः प्रासादाः बहुभूमयः । गृहाङ्गद्रुमखण्डोत्था मण्डयन्ति नभोऽङ्गणम् ॥१२॥ विशालायतशाखाभिः पद्मकुड्मलपल्लवान् । धारयन्ति प्रदीपाभान् प्रदीपाङ्गमहीरुहा ॥३॥ चतुर्विधं शुभं वाद्यं ततं च विततं धनम् । सुपिरं च सृजन्त्यत्र तूर्याङ्गदुमजातयः ॥८॥ पडुरसान्यतिमृष्टानि चतुर्भेदानि भोगिनाम् । भोजनाङ्गदुमा नानाभोजनानि सृजन्ति ते ॥८५॥ पात्राणि स्थालकं चोलसौवर्णादीन्यनेकशः । भाजनानि विचित्राणि भाजनाङ्गाः सृजन्त्यलम् ॥८६॥ पहचीनदुकूलानि वस्त्राणि विविधानि छ । बिभ्राणाः स्कन्धशाखासु भान्ति वस्त्रागपादपाः ॥८॥ सूर्यकान्तकी किरणें गर्मीसे पीड़ित हैं इसलिए चन्द्रकान्तकी शीतल किरणोंको नहीं छोड़ना चाहती थीं ।।७५।। जिस प्रकार प्रेमके वशीभूत हुए मनुष्य परस्पर कराश्लेप अर्थात् हाथोंका आलिङ्गन करते हैं और राग अर्थात् प्रेमसे उनके शरीर मृच्छित रहते हैं, उसी प्रकार यहाँके नाना प्रकारके मणि भी परस्पर कराश्लेप अर्थात् किरणोंका आलिङ्गन करते हैं और राग अर्थात् रङ्गसे उनकी आकृति मूलित-वृद्धिंगत होती रहती है। इस प्रकार जो प्रेमके वशीभूतके समान जान पड़ते थे ऐसे मणियोंसे यह भूमि अत्यधिक सुशोभित हो रही थी ॥७६|| जिनका वर्ण पाँच प्रकारका था, पर्श सुखकारी था तथा गन्ध, रस और शब्द जिनके उत्तम थे ऐसे चार अंगुल प्रमाण तृणांसे ढकी हुई यहाँकी भूमि सुशोभित हो रही थी ॥७॥ जो दही, मधु, दूध, घी और ईखके समान स्वादवाले उत्तम जलसे भरे हुए थे तथा जिनके तट रत्ननिर्मित थे ऐसी सुन्दर-सुन्दर बावड़ियों और सरोवरोंसे वह भूमि अत्यधिक मुशोभित थी ॥७८।। रङ्ग-विरङ्गे भणियोंसे आच्छादित एवं प्राणियोंको सुख देनेवाले सुवर्णमय सुन्दर पर्वतोंसे यह भूमि सदा अत्यधिक सुशोभित रहती थी ॥७॥ १ ज्योतिरङ्ग, २ गृहाग, ३ प्रदीपाङ्ग, ४ तूर्याङ्ग, ५ भोजनाङ्ग, ६ भाज- नाग, ७ वस्त्राग, ८ माल्याङ्ग, ६ भूपणा और १० मद्याङ्ग जातिके कल्पवृक्षासे वह भूमि सदा सुशोभित रहनी थी ८० जिन्होंने अपनी कान्तिसे चन्द्रमा और सूर्यके मण्डलको आच्छादित कर रखा था ऐसे ज्योतिरङ्ग जातिके कल्पवृक्ष दिन-रातका भेद दूर करते हुए सदा मुशोभित रहते थे ॥१॥ जो बाग-बगीचोंसे सहित थे तथा जिनमे अनेक खण्ड थे ऐसे गृहाइ जाति के फल्पतीसे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके वृक्ष आकाश रूपी आँगनको सुशोभित कर रहे थे ||२|| प्रदीपाङ्ग जातिके कल्पवृक्ष अपनी लम्बी-चौड़ी शासाओंसे दीपकके समान आमावाले कमलको घोड़ियोके भाकार नये नये पत्तोंको धारण कर रहे थे ॥८॥ यहाँ जो तूर्याङ्ग जातिके कल्पवृक्ष थे वे तन, वितत, धन और मुपिरके भेदसे चार प्रकारके शुभ वाजीको सदा उत्पन्न करते रहते धे ॥४॥ भोजनाङ्ग जातिके फल्पवृक्ष भोगी मनुष्यों के लिए छह प्रकारके रसोंसे परिपूर्ण, अत्यन्त स्वादिष्ट तथा अन्न, पान, साद्य और लेह्यके भेदसे चार भेवाले नाना प्रकारके भोजनको उत्पन्न फरते रहते थे |शा भाजनाग जातिके कल्पत मणि एवं सुवर्णादिसे निर्मित थाली, कटोरा आदि अनेक प्रकारके वर्तन उत्पन्न करते थे ।।६॥ वसाह जानिके कल्पवृक्ष अपनी पौंड तथा शासाक्षार पाट, चीनी तथा रेशम आदिके बने हुए नाना प्रकारके वस्त्र धारण करते हुए १.रत्नभानुः क..

सप्तमः सर्गः मालनीमल्लिकााधरकुमुमप्रथितानि तु । भान्ति माल्यानि विभ्राणा माल्यावरणीरुहाः ॥८॥ हारकुण्डलकेयूरकटिसूत्रादिभिश्चिताः । भूपणे पिताङ्गाश्च भान्ति स्त्रीपुरुपोचितः ।।६।। मद्यभेदाः प्रसन्नाद्या मदशक्तनिधायकाः । सम्पायन्ते नरस्त्रीणां हया मद्यागपादपैः ॥१०॥ दशधाकल्पवृक्षोन्यं भोगं युग्मानि भुञ्जते । दशागभोगचक्रेशभोगतोयधिकं तदा ॥१॥ तदा स्त्रीपुंसयुग्मानां गन्निटुंठितात्मनाम् । दिनानि सस गच्छन्ति निजाङ्गुष्टावलेहनैः ।।१२॥ रंगतामपि सप्तैव सतास्थिरपराक्रमैः । स्थिरश्च सप्त सप्त कलासु च गुणेषु च ॥३३॥ कालेन तावता तेषां प्राक्षयौवनसम्पदाम् । सम्यवाहणेऽपि स्याद् योग्यता सप्तभिर्दिनः ॥१४॥ स्त्रीपुंसलक्षणैः पूर्णा विशुद्धेन्द्रियबुद्धयः । कलागुणविदग्धास्ता रमन्ते नीरुजा प्रजाः ॥१५॥ नरा देवकुमाराभा नार्यो देवानोपमाः । वर्णगन्धरसस्पर्शशब्दवेषमनोरमाः॥१६॥ श्रोनं गीतरचे रूप धाोणं सुसौरभे । जिह्वा मुखरसास्वादे सुस्पर्श स्पशेनं तनोः ॥१७॥ भन्योन्यस्य तदाशक्तं दम्पतीनां निरन्तरम् । स्तोकमपि न सन्तृप्तं मनोऽधिष्टितमिन्द्रियम् ॥१८॥ मिथुनानि यथा नृणां रमन्ते प्रेमनिर्भरम् । तथा कल्पद्रुमाहारैस्तिरश्चां तृप्तचेतसाम् ॥६६॥ क्वचिन्सँह क्वचिच्चैर्भ क्वचिदौष्ट्रं च शौकरम् । कचिन् क्रीडन्ति वैयाघ्र मिथुनं मदमन्थरम् ॥१०॥ गवाश्वमहिपादीनों मिथुनानि मिथस्तदा । मायुःप्रमितायूंपि रंरम्यन्ते निजेच्छया ॥१०॥ आमाह नरो नारीमार्य नारी नरं निजम् । भोगभूमिनरस्त्रीणां नाम साधारणं हि तत् ।।१०२|| उत्तमा जातिरेकैव चातुर्वण्यं न पक्रियाः । न स्वस्वामिकृतः पुंसां सम्बन्धो न च लिगिन।।१०३॥ पुशोभित होते थे ॥७॥ माल्याङ्ग जातिके कल्पवृक्ष मालती, मल्लिका आदिके ताजे फूलोंसे गुथी हुई मालाओंको धारण करते हुए सुशोभित हो रहे थे ॥८॥ भूपणाङ्ग जातिके कल्पवृक्ष श्री-पुरुपोंके योग्य हार, कुण्डल, वाजूवन्द तथा मेखला आदि आभूपोंसे व्याप्त हो सुशोभित धे ॥८६॥ और मद्याङ्ग जातिके कल्पवृक्षाके द्वारा स्त्री-पुरुषांके लिए प्रिय तथा उनकी मदशक्तिको उत्पन्न करनेवाले प्रसन्ना आदि नाना प्रकारके मद्य उत्पन्न किये जाते थे ॥१०॥ उस समय यहाँ स्त्री-पुरुपोके युगल दश प्रकारके कल्पवृक्षोंसे उत्पन्न चक्रवर्तीके दशाङ्ग भोगोंसे भी अधिक भोगीका उपभोग करते थे ॥१॥ उस समय गर्भसे उत्पन्न हुए स्त्री-पुरुषों ( युगलियों) के सात दिन तो अपना अंगूठा चूसते-चूसते व्यतीत हो जाते थे, तदनन्तर सात दिन रेंगते हुए, सात दिन लड़खड़ाती हुई गतिसे, सात दिन स्थिर गतिसे, सात दिन कला तथा अनेक गुणोंके अभ्यास. से और सात दिन यौवन रूप सम्पदाके प्राप्त करने में व्यतीत होते थे। उसके बाद सातवें सप्ताह- मैं उन्हें सम्यग्दर्शन ग्रहण करने की योग्यता आती थी ॥६२-६४|| स्त्री-पुरुषाके उत्तमोत्तम लक्षणों- से युक्त, विशुद्ध इन्द्रिय और बुद्धिके धारक, कला और गुणों में चतुर एवं रोगोसे रहित उस समयके लोग आनन्दसे क्रीड़ा करते थे ।।६शा वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श और वेपके द्वारा मनको आनन्दित करनेवाले वहाँ के लोग देवकुमारोंके समाज तथा वहाँकी स्त्रियाँ देवागनाओंके समान जान पड़ती थी १६६|| उस समय स्त्री-पुरुषांके कान परस्परके संगीत शब्दमि, धतु रूपके देखने में, घ्राण सुगन्धिके ग्रहण करनेमें, जिता मुखके रसास्वादमें और स्पर्शन शरीरके उत्तम स्पर्शके ग्रहण करने में निरन्तर आसक्त रहते थे। उनके मन तथा इन्द्रियों रश्चमात्र भी सन्तुष्ट नहीं होती थीं ॥६७-६८। जिस प्रकार मनुष्योंके जोड़े कल्पवृक्ष सम्बन्धो आहारोंसे सन्तुष्ट ही प्रेमपूर्वक कीड़ा करते हैं उसी प्रकार सन्तुष्ट चित्तके धारक तिर्यचोंके जोड़े भी प्रेमपूर्वक क्रीड़ा करते थे | उस समय कहीं सिंहाँके युगल, कहीं हाथियोंके युगल, कहीं ऊँटोंके युगल, कहीं शूकरोंके युगल, और कहीं मदसे धीमी चाल चलनेवाले व्याघोंके युगल क्रीड़ा करते थे ॥१०॥ कहीं मनुष्योंके धरायर आयुको धारण करनेवाले गाय, घोड़े और भसोंके जोड़े अपनी इच्छानुसार अत्यधिक क्रीड़ा करते थे ॥१०१।। वह पुरुष स्त्रीको आर्या और स्त्री पुरुपको आर्य कहती थी। यथार्थमें भोग भूमिज खो-पुरुपोंका यह साधारण नाम है ॥१०२।। उस समय सयकी एक हो उत्तम जाति होती १४. हरिवंशपुराणे मध्यस्था एव सर्वत्र न मित्राणि न शत्रवः । प्रकृत्यापकपायित्वाधान्ति वायुःश्ये दिवम् ॥१०॥ सुखमृत्युः क्षुतेः पुंसो जम्भारम्भेण च स्त्रियाः । जन्मबद्धस्य प्रेमस्य युगलस्य सहैव सः १०५|| भय ज्ञास्वा गणाधीशः श्रेणिकस्य मनोगतम् । भोगभूमिसमुत्पत्तिनिमित्तमभीदिति ॥१०६॥ कर्मभूमिगता मयाः प्रकृत्याल्पकपायिणः । भन ते पात्रदानात् स्यु गभूमिपु मानुपाः ||१०|| सम्यक्त्वज्ञानचारित्रतपःशुद्धिपविग्निताः । मध्यस्थाः शामित्रेषु सन्तो हि पात्रमुत्समम mol मध्यमं तु भवेन्पानं संयतासंयता ननाः । जघन्यमुदितं पायं सम्यग्दृष्टिरसंयतः ॥१०॥ त्रिविधेऽपि बुधः पाने दानं दत्वा यथोचितम् । भोगभूमिसुखं दिग्यं भुड्के भूत्वा तु मानुपः ॥१०॥ मुक्षेत्रे विधिवत्तिप्तं बीजमल्पमपि व्रजेत् । वृद्धिं यथा तथा पाने दानमाहारपूर्वकम् || शालीक्षुक्षेत्रनिनिसं यथा मिष्टं पयो भवेत् । धेनुभिश्च यथा पीतं चारवं प्रतिपद्यते ॥१२॥ तथैवालारसास्वादमनपानौपधादिकम् । पात्रदत्तं परन स्यादमृतास्वादमण्यम् ॥१३॥ निवृत्ताः स्थूलहिंसादेमिध्याग्ज्ञानवृत्तयः । कुपात्रमिति विशेयमपात्रमनिवृत्तयः | कुपानदानतो भूत्वा तियंञ्चो भोगभूमिपु । सम्भुजतेन्तरं दीपं कुमानुपकुलेषु वा ११५॥ असक्षेत्रे यथा वितं बीजमल्पफलं फलेत् । कुपात्रेऽपि तथा दत्तं दानं दात्रे कुभोगभाक् ॥१६॥ ऊपरक्षेत्रनिजिप्तशालिनश्यति मूलतः । यथास्त्र विफलं दानं कुपानपतितं तथा ॥१७॥ है, वहाँ न ब्राह्मणादि चार वर्ण होते हैं व असि, मपी आदि छह कर्म होते हैं, न सेवक और स्वामीका सम्बन्ध होता है और न वेषधारी ही होते हैं ॥१०३॥ वहाँके मनुष्य सब विपयोमें मध्यस्थ रहते हैं, वहाँ न मित्र होते हैं और न शत्रु । एवं स्वभावसे ही अल्पकपायी होनेके कारण आयु समाप्त होनेपर सब नियमसे देव पर्यायको ही प्राप्त होते हैं ॥१०४॥ जन्मसे ही जिसका प्रेमभाव परस्परमे निबद्ध रहता था ऐसे पुरुपकी मृत्यु छींक आनेसे तथा स्त्रीको मृत्यु जिमहाई लेने मात्रसे मुखपूर्वक हो जाती थी ॥१०॥ अथानन्तर गणधर देव श्रेणिकका मनोभिप्राय जानकर भोगभूमिमें उत्पन्न होने के कारण इस प्रकार कहने लगे ॥१०६॥ कर्म भूमिके जो मनुष्य स्वभावसे हो मन्दकपाय होते हैं वे पात्र- दानके प्रभावसे भोगभूमिमें मनुष्य होते हैं ।।१०७|| जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र और सम्यक् तपको शुद्धिसे पवित्र हैं तथा शत्रु और मित्रोपर मध्यस्थ भाव रखते हैं ऐसे साधु उत्तम पात्र कहलाते हैं ॥१०८।। संयमासंयमको धारण करनेवाले श्रावक मध्यम पात्र हैं और अविरत सम्यग्दृष्टि जघन्य पात्र कहे जाते हैं ।।१०६॥ उक्त दोनों प्रकारके पात्रॉम यथायोग्य दान देकर बुद्धिमान् मनुष्य भोगभूमिमें आर्य होकर वहाँका दिव्य सुख भोगता है ॥११०॥ जिस प्रकार उत्तम क्षेत्रमे विधि-पूर्वक बोया हुआ छोटा भी बीज वृद्धिको प्राप्त होता है उसी प्रकार पात्रके लिए दिया हुआ आहार आदि दान भी वृद्धिको प्राप्त होता है ॥१११॥ जिस प्रकार धान और ईखके खेतमे पड़ा हुआ जल मीठा हो जाता है और गायोंके द्वारा पीया हुआ पानी प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार पात्रके लिए दिया हुआ अल्प रसवाला अन्न, पान तथा औष- ध्यादिकका दान परभवमे अविनाशी तथा अमृतके समान स्वादसे युक्त हो जाता है ।।११२-११३।। जो स्थूल हिंसा आदिसे निवृत्त हैं परन्तु मिथ्यादृष्टि, मिथ्याज्ञान और मिथ्या-चारित्रके धारक हैं वे कुपात्र कहलाते हैं और जो स्थूल हिंसा आदिसे भी निवृत्त नहीं हैं उन्हें अपात्र जानना चाहिए ।।११४॥ कुपात्र दानके प्रभावसे मनुष्य, भोगभूमियों में तिर्यन होते हैं अथवा कुमानुप कुलोमें उत्पन्न होकर अन्तर द्वीपोका उपभोग करते हैं ॥११५।। जिस प्रकार खराब खेतमें बोया हुआ बीज अल्प फलवाला होता है उसी प्रकार कुपात्रके लिए दिया हुआ दान भी दाताको कुभोग प्राप्त करानेवाला होता है ॥११६॥ जिस प्रकार ऊपर क्षेत्रमे बोया हुआ धान समूल नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार कुपात्रके लिए दिया हुआ दान भी निष्फल हो जाता है ।।११७॥ दूध पर्यायको सप्तमः सर्गः 'अम्बु निम्बद्रुमे रौद्रं कोद्रवे मदद् यथा । विषं व्यालमुखे शीरमपाने पतितं तथा mil सुपात्रे सुफलं दानं कुपात्रे कुफलं भवेत् । अपाने दुःपदं तस्मान्पानेभ्यः प्रतिपादयेत् ।।१६।। यान्युपाधिवशाद् भेदं निर्मला स्फटिकोपलः । यथा तथा च दानापं प्रतिग्राहकभेदतः ॥१२॥ सम्यग्दृष्टिः पुनः पात्रे स्वपरानुग्रहेच्छया । दानं दया त्रिशुद्धामा स्वर्गमेव गृही प्रजेत् ॥१२॥ अथ कालदयेऽतीते क्रमेण सुखकारणे । पल्याष्टभागशेपे च तृतीये समवस्थिते ।।१२२॥ क्रमेण क्षीयमाणेपु कल्पवृशेषु भूरिपु । तेने कुलकरोत्पत्ति शृणु श्रेणिक ! साम्प्रतम् ॥१२३।। गहासिन्धुमहानद्योमध्ये दक्षिणभारते । चतुर्दश यथोपनाः क्रमेण कुलकारिणः ॥१२॥ प्रतिश्रुतिरभूदायस्तेषां कुलकरप्रभुः । महाप्रभावसम्पन्नः स्वभवस्मरणान्वितः ॥१२५॥ तस्य काले प्रजा दृष्ट्वा पौर्णमास्यां सहैव खे । आकाशगजघण्टाभेलै चन्द्रादित्यमण्डले ।।१२६॥ आकस्मिकभयोद्विग्नाः स्वमहोत्पातशङ्किताः । प्रजाः सम्भूय पारस्तं प्रभु शरणागताः ॥१२७।। नरप्रधान ! कावेतावपूर्वी गगनान्तयोः। दृश्यते मण्डलाकारावकाण्डे नो भयङ्करौ ।।१२।। अहो दुःसहमस्माकमकस्मात् भयमुद्गतम् । कि महाप्रलयः प्राप्तः प्रजानामेव दुस्तरः ॥१२॥ इति पृष्टः प्रभुः प्राह शुचं मुञ्चत हे प्रजाः । न किञ्चिद् भयमस्माकं स्वस्था भवत कथ्यते ।।१३०॥ प्रभामण्डलसंवीतमेतदादित्यमण्डलम् । प्रतीच्यां बीतते भद्रा ! प्राच्या भोश्चन्द्रमण्डलम् ।।१३।। जिस प्रकार नीमके वृक्षमें पड़ा हुआ पानी कडू आ हो जाता है, कोदोंमें दिया हुआ पानी मद- कारक हो जाता है और सर्पके मुखमें पड़ा हुआ दूध विष हो जाता है, उसी प्रकार अपात्रके लिए दिया हुआ दान विपरीत फलको करनेवाला हो जाता है ॥११८|| चूंकि सुपात्रके लिए दिया हुआ दान सुफलको देनेवाला है, कुपात्रके लिए दिया हुआ दान कुफलको देनेवाला है और अपात्र के लिए दिया हुआ दान दुःख देनेवाला है अतः पात्रके लिए ही दान देना चाहिए ॥११॥ जिस प्रकार निर्मल स्फटिकमणि उपाधिके वशसे भेदको प्राप्त होता है उसी प्रकार पात्रके भेद- दानका फल भी भेदको प्राप्त हो जाता है ॥१२०॥ निर्मल अभिप्रायको धारण करनेवाला सम्यग्दृष्टि गृहस्थ यदि पात्रके लिए दान देता है तो यह नियमसे स्वर्ग ही जाता है ।।१२१।। अथानन्तर सुखके कारणभूत जब प्रारम्भके दो काल बीत गये भौर पल्यके आठवें भाग बराबर तीसरा काल वाकी रह गया तथा कल्पवृक्ष जो पहले अधिक मात्रामे थे क्रम-क्रमसे कम होने लगे तब इस क्षेत्रमें कुलकरोंकी उत्पत्ति हुई। हे श्रेणिक ! मैं इस समय उन्हीं कुल- करोंकी उत्पत्ति कहता हूँ तू श्रवण कर ।।१२२-१२३|| गद्गा और सिन्धु महानदियों के बीच दक्षिण भरत क्षेत्रमै क्रमसे चौदह कुलकर उत्पन्न हुए थे ।।१२४।। उन कुलकरोंमें पहला कुलकर प्रतिश्रुति था। वह महा प्रभावसे सम्पन्न था तथा अपने पूर्वभवके स्मरणसे सहित था ॥१२५॥ उसके समय प्रजाके लोग पौर्णमासीके दिन आकाशमं एक साथ, आकाशरूपी हाथीके दो घंटाओके समान भाभावाले चन्द्र और सूर्य-मण्डलको देखकर अपने ऊपर आनेवाले किसी महान उत्पातसे शङ्कित हो आकस्मिक भयसे उद्विग्न हो उठे तथा सत्र एकत्रित हो प्रतिश्रुति कुलकरकी शरणम जाकर उससे पूछने लगे ॥१२६-१२७॥ कि हे नररत्न ! आकाशके दोनों छोरोंपर, मण्डलाकार तथा असमयमें हम लोगोंको भय उत्पन्न करनेवाले ये दो कौन अपूर्व पदार्थ दीख रहे हैं ? ॥१२८॥ अहो! हम लोगोके लिए यह अकस्मात् ही दुःसह भय प्राप्त हुआ है। क्या यह प्रजाके लिए दुस्तर महाप्रलय ही आ पहुँचा है ? ॥१२६॥ इस प्रकार पूछे जानेपर स्वामी प्रतिश्रुतिने कहा कि हे प्रजाजनो ! भय छोड़ो, हमारे लिए कुछ भी भय प्राप्त नहीं हुआ है। लोग स्वस्थ रहिए। ये जो दिसाई दे रहे हैं मैं उनका कथन करता हूँ ॥१३०॥ हे भद्रपुरुपो ! यह पश्चिममें प्रभाके समूहसे व्याप्त सूर्य-मण्डल १. अम्बु निम्बुद्रुमे क०, स० | २. दृश्यते ।

१४२ हरिवंशपुराणे ज्योतिश्चकाधिपावेतो सूर्याचन्द्रमसौ स्थितौ । मेरुप्रदक्षिणौ नित्यं भ्रमन्तौ भ्रमणात्मकौ ॥१३२॥ चतुर्विधेषु देवेषु ज्योतिर्देवकदम्बकम् । खे करोस्यनयोनित्यमनुभ्रमणमीशयोः ॥१३३॥ ज्योतिरङ्गमहाप्रभाच्छादितविग्रहो । प्रागन्यनविदेहेभ्यो न गतौ दृष्टिगोचरम् ॥१३॥ तेजोहीनेऽधुना लोके ज्योतिरङ्गप्रभाक्षये। जिगीपयेव चन्द्राको स्थिती प्रकटविग्रही ।।१३५॥ अहोरात्रादिको भेदो भवत्यकंवशादिह । अधुनेन्दुवशाद् व्यक्तिः पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः ॥१३६॥ शीतदीधितिरस्ताभो धर्मदोधितिना दिवा । न स्पष्टः स्पष्टतामेति ज्योतिश्चक्रसखो निशि ।।१३७।। पूर्वजन्मनि युष्माभिदृष्टपूर्वाविमौ स्फुटम् । विदेहेषु यतस्तस्मान्नाद्य वोऽपूर्वदर्शनो ॥१३॥ दृष्टश्रुतानुभूतस्य वस्तुनः सति दर्शने । माभू दुत्पातशङ्का वो निर्भया भवत प्रजाः ॥१३॥ कालस्वभावभेदेन स्वभावो भिद्यते ततः । द्रव्यक्षेत्रप्रजावृत्तवैपरीत्यं प्रजायते ॥१०॥ अव्यवस्थानिवृत्यर्थमतः परमतः प्रजाः । हा मा धिक्कारतो भूताः तिस्रो चै दण्डनीतयः ॥१४॥ मर्यादोल्लइनेच्छस्य कथञ्चित्कालदोपतः । दोषानुरूपमायोज्याः स्वजनस्य परस्य वा ॥१४२॥ नियन्त्रितो जनः सर्वस्तिमृभिर्दण्डनीतिभिः । दृष्टदोषभयत्रस्तो दोपेभ्यो विनिवर्तते ॥१४३॥ रक्षणार्थमनर्थेभ्यः प्रजानामर्थसिद्धये । प्रमाणमिह कर्त्तव्याः प्रणीता दण्डनीतयः ॥१४॥ प्रासादेषु यथास्थान मिथुमान्यकुतोमयम् । अनुस्मृत्यावतिष्ठन्त्वस्मदीयमनुशासनम् ॥१५॥ "इत्युक्ता प्रतिपद्याऽऽशु वचस्तस्य प्रजापतेः । श्रुत्वा तस्थुर्यथास्थानं प्रजातप्रमदाः प्रजाः ॥१४६।। और यह पूर्व दिशामें चन्द्र-मण्डल दिखाई दे रहा है ॥१३१॥ ये सूर्य और चन्द्रमा समस्त ज्योतिश्चकके स्वामी हैं, भ्रमणशील हैं और निरन्तर मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा देते हुए घूमते रहते हैं ॥१३२।। चार प्रकारके देयोंमे जो ज्योतिपी देवोका समूह है वह आकाशमें निरन्तर अपने इन दोनों स्वामियों के पीछे पीछे भ्रमण करता रहता है ।।१३३।। पहले इनका आकार ज्योतिरङ्ग जातिके महावृक्षोकी प्रभासे आच्छादित था इसलिए ये विदेह क्षेत्रको छोड़ अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं थे ॥१३४।। इस समय लोक, ज्योतिरङ्ग वृक्षांकी प्रभा क्षीण हो जानेसे तेजरहित हो गया है इसलिए उसे जीतनेकी इच्छासे हो मानो चन्द्रमा और सूर्य अपने शरीरको प्रकटकर स्थित हैं ॥१३५।। अब पृथिवीपर सूर्यके भेदसे दिन-रातका भेद होगा और चद्रमाके द्वारा शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष प्रकट होगे ॥१३६॥ दिन समय चन्द्रमा सूर्यके द्वारा अरत जैसा हो जाता है, स्पष्ट नहीं दिखाई देता और रात्रिके समय स्पष्टताको प्राप्त हो जाता है। यह चन्द्रमा समस्त ज्योतिश्चक्रका सखा है ॥१३७॥ तुम लोगोंने पूर्व जन्मके समय विदेह क्षेत्रमै इन्हें अच्छी तरह देखा है इसलिए आज इनका दिखना तुम्हारे लिए अपूर्व नहीं है ॥१३८।। पहले देखी सुनी और अनुभवमे आई वस्तुका दर्शन होनेपर आप लोगोको उत्पातको आशङ्खा नहीं होनी चाहिए। हे प्रजाजनो! तुम सब निर्भय होओ-उत्पातका भय छोड़ी ।।१३।। कालके स्वभावमे भेद होनेसे पदार्थों का स्वभाव भिन्न रूप हो जाती है और उसीसे द्रव्य क्षेत्र तथा प्रजाके व्यवहारमें विपरीतता आ जाती है ।।१४०॥ इसलिए हे प्रजाजनो! अब इसके आगे अव्यवस्था दूर करने के लिए हा, मा और धिक ये तीन दण्डकी धाराएँ स्थापित की जाती हैं ॥१४१।। यदि कोई स्वजन या परजन काल दोपसे मर्यादाके लाँघनेको इच्छा करता है तो उसके साथ दोपोंके अनु- रूप उक्त तीन धाराओंका प्रयोग करना चाहिए ॥१४२॥ तीन धाराओसे नियन्त्रणको प्राप्त हुए समस्त मनुष्य इस भयसे त्रस्त रहते हैं कि हमारा कोई दोष दृष्टिम न आ जाय । और इसी भय- से वे दोषांसे दूर हटते रहते हैं ॥१४३।। अनोंसे बचनेके लिए तथा प्रजाकी भलाई के लिए आप लोगोंको ये निश्चित को हुई दण्डको धाराएँ स्वीकृत करनी चाहिए ॥१४४॥ हमारी आज्ञाका स्मरणकर अब सब युगल निर्भय हो यथास्थान महल में निवास करें ॥१४॥ इस प्रकार कहने- १. स्थितं म ।२ प्रदक्षिणा म० । ३. विद्यते म० । ४. हितसिद्धये । ५. इत्युक्त्वा म ।

सप्तमः सर्गः १४३ प्रतिश्रुतं वचस्तामियंतस्तस्य गुरोर्यथा । प्रथमं प्रथितस्तस्मारस पृथिव्यां प्रतिध्रुतिः ॥१४॥ पल्यस्य दशमं भागं जीविरवाऽसौ प्रतिश्रुतिः । पुत्रं सन्मतिमुत्पाद्य जीवितान्ते दिवं सृतः ॥१४॥ स रतन पितृमयांदा प्रजानां सम्मतो यतः। ततः सन्मतिनामायं कुलकारी कलालयः ।।१४६॥ पल्यस्य शतम भागं स प्रतिजीव्य निजस्थितिम् । पुत्रं क्षेमकरामिख्यमुत्पाद्य त्रिदिवं गतः ॥१५॥ प्रजानां च तदा जाताः सिंहव्याघ्रविभीपिकाः । सोऽपि क्षेमं ततः कृत्वा प्राप्तः क्षेमकरध्रुतिम् ॥५१॥ सहस्रमागमाजीय पल्यस्यासौ प्रजाप्रभुः । पुत्रं क्षेमन्वराभिख्यं जनयित्वा गतो दिवम् ॥१५२॥ क्षेमन्धरः स मत्वार्यस्थिति कुलकरो गुरोः । सहस्रमागमाजीव्य पल्यस्य दशसगुणम् ॥१५३॥ सूनुं सीमधुरं नाम्ना समुत्पाद्य ययौ दिवम् । वृक्षलुब्धप्रजानां च स सीमामकरोत् प्रभुः ॥१५॥ लउभागं स पल्पस्य जीवित्वा स्वर्गगोऽभवत् । सीमन्धरो यथार्याख्यस्तरसुतो दशताडितम् ॥१५॥ तत्पुनो वाहनीकृत्य चिनीड विपुलद्विपान् । यत्तरयातः स भूग्नाऽभूत् नाम्ना विपुलवाहनः ॥५६॥ कोटीमागं स पत्यस्य जीवित्वा स्वर्गमाश्रितः । चक्षुष्मानिति तसूनुरजनिष्ट जनप्रभुः ॥१५॥ पुत्रचक्षुमुखालीकाचक्षुमन्वा भियाऽनया । आयुष्मत् प्रजया गीतश्चक्षुष्मानिरयसौ प्रभुः ॥१५६१ कोरीभार्ग स पत्यस्य दशताडितमीडितः । भुक्ता भोगमुदात्तोऽपि "स्वरितोऽभूस्थितिक्षये ।।१५॥ पर सब लोगोंने प्रतिश्रुति कुलकरके वचन शीघ्र ही स्वीकृत किये और सब बड़ी प्रसन्नतासे यथा- स्थान महलों में रहने लगे ॥१४६|| जिस प्रकार गुरुके वचन स्वीकृत किये जाते हैं उसी प्रकार प्रजाने चूँकि उसके वचन स्वीकृत किये थे इसलिए वह पृथिवीपर सर्वप्रथम प्रति श्रुति इस नाम- से प्रसिद्ध हुआ था ॥१४७॥ यह प्रतिश्रुति कुलकर, पल्यके दशयें भाग तक जीवित रहकर तथा सन्मति नामके पुत्रको उत्पन्नकर आयुके अन्तमें स्वर्ग गया ॥१४८॥ सन्मति कुलकर पिताकी मर्यादाकी रक्षा करता था, प्रजाको अतिशय मान्य था और अनेक कलाओंका घर था इसलिए सन्मति इस नामसे प्रसिद्ध हुआ था |१४६॥ वह सन्मति पल्यके सौवें भाग जीवित रहकर तथा क्षेमकर नामक पुत्रको उत्पन्न कर स्वर्ग गया ॥१५०|| उसके समयमें प्रजाको सिंह तथा व्याघोंसे भय उत्पन्न होने लगा था उससे उनका कल्याण कर वह क्षेमङ्कर इस नामको प्राप्त हुआ था ॥१५१।। यह प्रजाका स्वामी पल्यके हजारवें भाग जीवित रहकर तथा क्षेमन्धर नामक पुत्रको उत्पन्न कर स्वर्ग गया ॥१५२॥ वह क्षेमन्धर पिताकी आर्य मर्यादाकी रक्षा करनेवाला था और पल्यके दश हजारवें भाग जीवित रहकर तथा सीमङ्कर नामक पुत्रको उत्पन्नकर स्वर्ग गया । इसके समयमे कल्पवृक्षोंको संख्या कम हो गई थी इसलिए उनकी लोभी प्रजामें परस्पर कलह होने लगी थी । इसने उनको सीमा निर्धारित को थी इसलिए यह सीमङ्कर इस सार्थक नामको धारण करता था। यह पल्यके लाखवं भाग जीवित रहकर स्वर्गगामी हुआ और इसके सीमन्धर इस सार्थक नामको धारण करनेवाला पुत्र हुआ। वह पल्यके दश लाख भाग जीवित रहकर स्वर्ग गया। इसके विपुलवाहन नामका पुत्र हुआ, यह बड़े-बड़े हाथियोंको वाहन बनाकर उनपर अत्यधिक क्रीड़ा करता था इसलिए विपुलवाहन इस नामका धारी हुआ था ।।१५३-१५६|| वह पल्यके करोड़वें भाग जीवित रहकर स्वर्ग गया और उसके चक्षुप्मान् नामका पुत्र हुआ ॥१५७॥ पहले माता-पिता, पुत्रका मुख तथा चतु देखे बिना ही मर जाते थे पर इसके समय पुत्रका मुख और चक्ष देखकर मरने लगे इससे प्रजाको कुछ भय उत्पन्न हुआ परन्तु इसने उन सबके भयको दूर किया इसलिए कुछ अधिक काल तक जीवित रहनेवाली प्रजाने इसे 'चनुप्मान्' इस नामसे सम्बोधित किया ॥१५८।। स्तुतिको प्राप्त हुआ वह चक्षुष्मान पल्यके दश करोड़वें भाग तक भोग भोगकर आयु समान होनेपर स्वर्ग गया । वह यद्यपि उदात्त उदात्त नामका स्वर था तो भी १ स्मृतः म०। २. व्याघ्रादिभीपकाः म । ३ प्रजा प्रभुः म०। ४. उदाचो महान् अन्यत्र उदातः स्वर उच्यते । ५ स्वर इतः स्वगं गतः, अन्यत्र स्वस्तिस्वर उच्यते शब्दच्छलेन ।

१४४ हरिवंशपुराणे तदपत्यं यशस्वीति स्वकालेऽपत्यमारयया। प्रजयायोजयस्प्रोयो योजितो यशसारुणा ॥१६॥ कोटीभाग स पल्यस्य शतसगुणितं प्रभुः । जीविस्वोत्पाद्य सरपुनमभिचन्द्रं दिवं गतः ॥१६॥ तत्कालेऽपत्यमुत्क्षिप्य प्रजा रमयति स्म यत् । अभिचन्द्रमतः प्रापरसोऽभिचन्द्र इति श्रुतिम् ॥१६२।। कोटीभागं स पल्यस्य सहस्रगुणितं गुणी । सञ्जीव्योपाद्य चन्द्रामं तनयं प्रययौ दिवम् ॥१६॥ कोटीमागं सहस्रं तु तस्यायुर्दशसगुणम् । पल्यस्य मरुदेवं स मासं पुनमलालयत् ॥१६४॥ मरुदेवस्य काले च मातः पितरिति ध्वनिम् । शुश्राव शिशुयुग्मस्य प्रथमं मिथुनं कलम् ।।१६५।। एकमेवारजपुत्र प्रसेनजितमन्न सः । युग्मसृष्टेरिहैवोध्यमितो व्यपनिनीपया ॥१६६॥ प्रसेनजितमायोज्य प्रस्वेदलवभूषितम् । विवाह विधिना वीरः प्रधानकुलकन्पया ।।१६७॥ कोटीभागसहनं स पल्यस्य शतसगुणम् । सञ्जीव्य मरुदेवोऽपि महतां लोकमुद्ययौ ॥१६॥ पूर्वकोटयायुप नाभिं प्रसेनजिदजीजनत् । नाभिच्छेदव्यवस्थायाः कतारं स्वर्गगामिनम् ॥१६॥ दशानां कोटिलक्षाणां पल्यांशानामांशकम् । जीवित्वा कालधर्मेण प्रसेनजिदितो दिवम् ॥१७॥ शतान्यष्टादशोत्सेधो धनूंध्यासन्प्रतिश्रुतेः । त्रयोदश तु पुत्रस्य पौत्रस्याप्टशतान्यतः ॥१७॥ परतः महानिस्तु धनुषां पञ्चविंशतेः । स पञ्चविंशतिः शेषा नाभः पञ्चधनुःशती ॥१७२॥ भाद्यसंस्थानसद्धातगम्भीरोदारमूर्तयः । स्वपूर्वभवविज्ञाना मनवस्ते चतुर्दश ॥१७३॥ स्वरित स्वरित नामका स्वर हुआ था यह विरोध है । परिहार पक्षमें वह उदात्त-महान था और स्वरितः : स्वर, इतः-स्वर्ग गया था ॥१५६॥ चक्षुष्मानका पुत्र यशस्वी हुआ। इसने अपने समयमें प्रजाको पुत्रका नाम रखना सिखाया इसलिए प्रजाने इसे विस्तृत यशसे युक्त किया अर्थात् इसका यशस्वी यह नाम रक्खा ।।१६०॥ वह पल्यके सौ करोड़वें भाग जीवित रहकर तथा अभिचन्द्र नामक उत्तम पुत्रको उत्पन्न कर स्वर्ग गया ॥१६१॥ उसके समयमें प्रजा अपनी सन्तानको ऊपर उठा चन्द्रमाके सामने क्रीड़ा कराती थी इसलिए वह अभिचन्द्र इस नामको प्राप्त हुआ था ।।१६२॥ वह गुणवान् कुलकर पल्यके हलार करोड़वे भाग जीधित रहकर तथा चन्द्राभ नामक पुत्रको उत्पन्न कर स्वर्ग गया ११६३॥ चन्द्राभने पल्यफे दश हजार करोड़वें भाग तक जीवित रहकर मरुदेवको उत्पन्न किया। वह अपने मरुदेव पुत्रको एक मास तक खिलाता रहा अनन्तर स्वर्गको प्राप्त हुआ ॥१६४|| मरुदेवके समय स्त्री-पुरुप अपनी सन्तानके मुखसे 'हे माँ', 'हे पिता' इस प्रकारके मनोहर शब्द सुनने लगे थे ॥१६शा पहले यहाँ युगल सन्तान उत्पन्न होती थी परन्तु इसके आगे युगल सन्तानको उत्पत्तिको दूर करनेकी इच्छासे हो मानो मरुदेवने प्रसेनजित् नामक अकेले पुत्रको उत्पन्न किया था ॥१६६।। इसके पूर्व भोगभूमिज मनुष्योंके शरीरमें पसीना नहीं आता था परन्तु प्रसेनजित्का शरीर जब कभी पसीनाके कणोसे सुशोभित हो उठता था । वीर मरुदेवने अपने पुत्र प्रसेनजित्को विवाह विधिके द्वारा किसी प्रधान कुलकी कन्याके साथ मिलाया था ॥१६७।। अन्तम मरुदेव पल्यके लाख करोड़वें भाग तक जीवित रहकर स्वर्ग गया ॥१६८॥ तदनन्तर प्रसेनजित्ने एक करोड़ पूर्वकी आयुवाले, जन्म कालमै बालकोंकी नाल काटनेकी व्यवस्था करनेवाले थे, तथा स्वर्गगामी नाभिगज पुत्रको उत्पन्न किया ।।१६।। पल्यके दश लाख करोड़ये भाग तक जीवित रहकर आयु समाप्त होनेपर प्रसेनजित् स्वर्ग गया ।।१७०॥ प्रथम कुलकर प्रतिश्रुतिकी ऊँचाई अठारह धनुप थी, इसके पुत्र दूसरे कुलकर सन्मति- की तेरह सौ धनुष थी, प्रतिश्रुतिके पौत्र---तीसरे कुलकर क्षेमङ्करकी आठ सौ धनुप थी और इसके आगे प्रत्येककी पञ्चीस-पच्चीस धनुप कम होती गई है। इस तरह अन्तिम कुलकर नाभि- राजको ऊँचाई पाँच सौ पचीस धनुप थी ॥१७१-१७२॥ ये चौदह कुलकर समचतुरस्र संस्थान १. यरासा उमणा = विशालेन यशसाऽरुणा म० | २. प्रस्वेदमलभूषितम् म ।

सप्तमः सर्गः १४५ चक्षुष्मांश्च यशस्वी च तथैवासौ प्रसेनजित् । श्रयः कुलकरा: प्रोकाः प्रियमुश्यामरोचिषः ॥१७॥ चन्द्राभश्चन्द्रगौराभस्तथैव प्रथितः प्रभुः । कथिता दश शेपास्ने सन्तप्तकनकप्रमाः ।।१७।। मर्यादारखणोपायहामाधिकारनीतयः । प्रजानां जनकाभास्ते प्रमवः प्रतिभाधिकाः ॥१७६।। इत्थं कुलकरोरपत्तिः सकला कथिता नृप । नाभेयस्याधुनोत्पत्ति शृणु पारविनाशिनीम् ।। १७७॥ शिखरिणीवृत्तम् जगपभिव्यैरनुपचरितैव्याप्तमखिलं तदप्यहज्ज्ञानादधिकमभियुक्तरेधिगतम् । यतः कालाद्ययें घनमपि धुनात्यन्घतमसं जिनादियालोकः स्थिरपरिणतः श्रीमदुदयः ॥१७॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती कालकुलकरोत्पत्तिवर्णनो नाम सप्तमः सर्गः। और वज्रवृपभ नाराचसंहननसे युक्त गम्भीर तथा उदार शरीरके धारक थे, इनको अपने पूर्व भवका स्मरण था तथा इनकी मनुसंता थी ।।१७।। इन कुलकरोंमें चक्षुप्मान, यशस्वी और प्रसेनजित् ये तीन कुलकर प्रियङ्गु पुष्पके समान श्याम कान्तिके धारक थे, चन्द्राभ चन्द्रमाके समान गौरवर्ण था, और वाकी दश तपाये हुए स्वर्णके समान प्रभासे युक्त थे ॥१७४-१७५॥ ये चौदहीं राजा मर्यादाकी रक्षाके उपायभूत 'हा', 'मा' और 'धिक्' इन तीन प्रकारको दण्डनीतियों- को अपनाते थे, प्रजाके पिताके तुल्य थे और अत्यधिक प्रतिभाशाली थे ॥१७६॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! इस तरह मैंने समम्त कुलकरोंको उत्पत्ति कही । अब नाभिराजाके पुत्र भगवान आदिकी पापनाशिनी कथा सुन ॥१७७|| यद्यपि यह समस्त संसार छह अकृत्रिम द्रव्योंसे व्याप्त है तो भी उद्यमशील आचार्यों ने उसे अरहन्त भगवानके दिव्य ज्ञान के प्रभावसे जान लिया है सो ठीक ही है क्योंकि नित्य और श्रीसम्पन्न उदयको धारण करनेवाला जिनेन्द्र रूपी सूर्यका प्रकाश, काल आदि द्रव्योंके विषयमें जो गाढ़ अन्धकार है उसे भी क्षणभरमें नष्ट कर देता है ॥१८॥ इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनमेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें कालद्रव्य तथा कुलकरोंकी उत्पत्तिका वर्णन करनेवाला सातवाँ सर्ग समाप्त हुश्रा। १. तदप्यहत्शाना-ख०१२. ऋषीश्वरैः ज्ञातम् । १६ अष्टमः सर्गः श्रीमतामनुरूपं यः परिणाममनुसृतः । मननात् मनुजार्थस्य मनुसंज्ञामनुसृतः ॥१॥ प्रवीणः कल्पवृक्षामा मध्येदक्षिणभारतम् । नाभेरपि स एवाभूत् प्रासादः पृथिवीमयः ॥२॥ शातकुम्भमयस्तम्भो विचित्रमणिभित्तिकः । पुष्पविद्रुममुक्तादिमालामिरुपशोभितः ॥३॥ सर्वतोभद्रसंज्ञोऽसौ प्रासादः सर्वतो मतः । सेकाशीतिपदः शालवाप्युद्यानाधलकृतः ॥४॥ स्वस्थानमेककोऽनल्पकल्पवृक्षवृतः क्षितौ । अध्यतिष्ठदधिष्ठातुः स नाभेरनुभावतः ।।५।। अथ नाभेरभूदेवी' मरुदेवीति वल्लभा । देवी शचीव शक्रस्य शुद्धसन्तानसम्भवा ॥६॥ अम्युनती पदाङ्गुष्टौ प्रोल्लसन्नखमण्डलौ । यस्या रेजतुरुच्यैव ललाटस्य दिदृक्षया ॥७॥ उनताप्रसमस्निग्यतनुताम्रनखांशुभिः । कुहिमे कुरुतां यस्याः क्रमौ कुरवाश्रियम् ॥८॥ श्लिष्टा गुलिदलौ गूढगुल्फो कान्तिजलप्लवम् । समौ कूर्मोन्नती यस्याः पादपद्मौ प्रचक्रतुः ।।६।। यस्याश्च चरणौ चारुमत्स्यशङ्खादिलक्षणी । क्रीडास्वेव प्रियस्पर्शास्वेदसम्बन्धसङ्गिनौ ॥१०॥ भानुपूर्यसुवृत्ते च जो रोमशिरोज्झिते । लावण्यरसवर्णाट्ये शरधी पुष्पधन्वनः ॥१३॥ आनुनी मृदुनी यस्या गूढसन्धानवत्तिनी । ददातुः प्रियगात्राणां मृदुस्पर्शकृतं सुसम् ॥१२॥ भासाराः कदलीस्तम्भा: कर्कशाः करिणा कराः । परिणाहगुणत्वेऽपि यदूर्वोः सदृशा न ते ॥१३॥ अथानन्तर ऊपर जिन नाभिराजका कथन किया गया है वे श्रीमान् पुरुपोंके अनुरूप परिणामको प्राप्त थे तथा समस्त पुस्पार्थीका मनन करनेसे मनु कहलाते थे ॥१॥ उस समय दक्षिण भरत क्षेत्रमें कल्पवृक्षरूप प्रासाद अन्यन्न नष्ट हो गये थे परन्तु राजा नाभिराजका जो कल्पतरूप प्रासाद था वही पृथिवी निर्मित प्रासाद बन गया था ॥२॥ राजा नाभिराजके उस प्रासादका नाम सर्वतोभद्र था, उसके खम्भे स्वर्णमय थे, दीवालें नाना प्रकारको मणियोंसे निर्मित थीं, वह पुसराज, मूंगा तथा मोती आदिकी मालाओंसे मुशोभित था, इक्यासी खण्डसे युक्त था और कोट, वापिका तथा बाग-बगीचोंसे अलंकृत था ॥३-४॥ यह अधिष्ठाता नाभि- राजके प्रभावसे अकेला ही अनेक कल्पवृक्षोंसे आवृत था तथा पृथिवीके मध्य अपने स्थानपर अधिष्ठित था ॥५॥ अथानन्तर राजा नाभिराजको भरदेवी नामको पटरानी थी। यह शुद्ध कुलमें उत्पन्न हुई थी तथा जिस प्रकार इन्द्रको इन्द्राणी प्रिय होती है उसी प्रकार राजा नाभिराजको प्रिय थी ॥६॥ जिन नग्न अत्यन्त धमकदार थे ऐसे उसके उठे हुए दोनों पैरोंके अंगूठे ऐसे जान पड़ते थे मानो ललाटके देसनेकी इच्छासे हो ऊपर की ओर उठ रहे हों ॥७॥ उसके दोनो चरण, उन्नत अप्रभागसे युक्त, सम, स्निग्ध, पतले और लाल-लाल नखाकी किरणोंसे फर्स- पर पुरयकको शोभा उत्पन्न कर रहे थे | जिनकी अगुलियाँ रूपी फलिकाएँ परस्परमें सटो हुई थी, जिनको गाँट छिपी हुई थीं और जो मछुआंके समान उन्नत थे, ऐसे उसके दोनों चरण- फमल कान्तिरूपी जलमें मानो तर ही रहे ये ६सुन्दर मच्छ तथा शन आदिके लक्षणांसे युक्त जिसके घरण, पीड़ाओके समय ही पतिका स्पर्श पाकर पसीनाके सम्बन्धसे युक्त होते थे अन्य ममय नहीं ॥१०॥ अनुकमिस गोलाईमे युक्त, नया गेम एवं नसोंसे रहित उसकी दोनों नहाय मौन्दर्य रममे भरे हुए मानो कामदेयके दो तरफश ही हैं ।।११।। गूद सन्धिसे युक्त जिमफे दोनों कोमल घुटनं पनिके अयययों को कोमल स्पर्श जन्य मुप प्रदान करते थे ॥१२॥ लेके स्तम्भ १.महादेम..२. जमल्यो ।

भष्टमः सर्गः ११७ । अरू सन्धिनितम्वश्च कुकुन्दरमनोहरः । गुरुजघनभारश्च यस्याः सादृश्यमत्यगात् ॥१४॥ प्रदक्षिणकृतावतं गम्भीरं नाभिमण्डलम् । रोमाजिकृतासङ्गं यस्या नाभेरभून्मदे ॥१५॥ अरोमशं कृशं मध्यं यस्यास्त्रिवलिःभगुरम् । बभौ वृत्तसमोत्तुगधनस्तनभरादिव ॥१६॥ कठिनस्तनचक्राभ्यां यस्या मृदुभियोरसा । प्रक्रीडचक्रवाकाम्यां सरितेव विराधितम् ॥१॥ रक्तहस्ततलौ श्रेष्प्रकोष्टमणिबन्धनौ । स्वसौ मृदुभुजौ यस्याः कामपाशी बभूवतुः ॥१८॥ शङ्खावतंसमग्रीवा प्रवालाधरपल्लवा । दन्तमुक्ताफलोद्योता सिन्धोवेलेब या बभौ ॥१३॥ संरक्ततालुजिह्वानमन्तरास्यमराजत । यस्या वाचि प्रवृत्तायां कोकिलस्वननिस्वनम् ॥२०॥ प्रियामुखमिवारमीयं दिक्षोः प्रेयसो मुखम् । सम्मुखौ भवतो यस्याः कपोलावित्र दर्पणौ ॥२१॥ सन्नासिकाऽतिमध्यस्था समा समपुटाभ्यभात् । स्पर्दिन्योवारयन्तीव दृशोरन्योन्यदर्शनम् ।।२२॥ निवर्णाजनिभे यस्या दर्शने दीर्घदर्शने । मन्त्रस्य मन्त्रणायेव कर्णमूलमुपाश्रिते ॥२३॥ तनुरेखभ्रुवौ यस्या न दूरे न च संहते । समारोपितचापाभे शुशुभाते शुभावहे ॥२४॥ न मतस्य न तुगस्य सादृश्यस्य सिसूक्षयों । यस्या ललाटपट्टस्य नार्धन्दोरभवत् स्थितिः ॥२५॥ कुण्डलोज्ज्वलगण्डस्य यरकर्णयुगलस्य तु । नोपमा मांसलस्यासीत् कोमलस्य समस्य तु ॥२६॥ सार रहित हैं और हाथीके शुण्डादण्ड कठोर स्पर्शसे युक्त हैं अतः विस्ताररूपी गुणोंसे युक्त होनेपर भी दोनों मरु देवीको जाँघोंके समान नहीं थे ॥१३|| जिसके कूल्हे, गर्तविशेपसे मनोहर नितम्ब और स्थूल जघन सादृश्यसे परे थे अर्थात् अनुपम थे ॥१४|| जिसकी आवर्त- जलभेवरके समान गोल, गहरी एवं रोमराजिसे युक्त नाभि, राजा नाभिराजके हर्पका कारण थी ॥१५॥ जिसकी रोम रहित, पतली एवं त्रिवलिसे युक्त कमर ऐसी जान पड़ती थी मानो गोल, सम, ऊँचे और स्थूल स्तनोंके भारसे ही झुक रही हो ॥१६॥ जिस प्रकार मन्द भयके साथ क्रीड़ा करते हुए चकवा चकवियोंके युगलसे नदी मुशोभित होती है उसी प्रकार जिसका वक्षःस्थल कठोर स्तनोंके मण्डलसे सुशोभित हो रहा था ॥१७॥ जिनकी हथेलियाँ लाल-लाल थीं, जिनकी कोहनी और कलाई उत्तम थीं और जिनके कन्धे शोभास्पद थे ऐसी नसकी दोनों कोमल भुजाएँ कामपाशके समान जान पड़ती थीं ॥१८]] उसकी प्रोया शतके आवर्तके समान थी, अधर पल्लव मूंगाके समान थे और दॉत मोतियोंके समान प्रकाशमान थे इसलिए वह समुद्रको वेलाके समान सुशोभित हो रही थी ॥१६॥ जिसका तालु और जिहाका भप्रभाग अत्यन्त लाल था ऐसा उसका अन्तर्मुख सुशोभित था और जब उससे शब्द निकलते थे तब वह कोकिलाके शब्दको भी अशब्द कर देता था-फीका बना देता था ॥२०॥ प्रिया मुसके समान जब नाभिराज अपना मुस देसनेकी इच्छा करते थे तब सामने स्थित मरुदेवीके दोनों कपोल दर्पणके समान हो जाते थे ॥२१॥ ठीक वीचमे स्थित सम और समान पुटवाली उसकी नासिका ऐसी जान पड़ती थी मानो स्पर्धा करनेवाले दोनों नेत्रांके पारस्परिक दर्शनको रोक ही रही थी ॥२२॥ सफेद, काले और लाल इन तीन वर्णके कमलोंके समान जिसके बड़े-बड़े नेत्र किसी मन्त्रको सलाह करनेके लिए ही मानो कानोंके समीप तक गये थे ॥२६॥ जिसकी पतली भौहे न दूर थीं और न पास ही थीं। शुभ लक्षणों से युक्त थी तथा पढ़ाये हुए धनुषके समान मुशोभित थीं ॥२४॥ जिसका ललाटपट्ट न अधिफ नोचा था और न अधिक ऊँचा या इसलिए उसका सादृश्य प्राप्त करने के लिए अर्ध-चन्द्रको सामथ्र्य नहीं थी ॥२५॥ जिसके कानोंका युगल अपने कुण्डलोंसे गालोंको उज्वल बना रहा था, स्थूल था, कोमल था और समान था अतः ३ मिमध्यस्था मा। १. 'पकी तु नितम्बस्यो त्यहीने कुकुन्दरे इत्यमरः । २. यस्यो म.। ४ साहश्यसिसमा म 1५ सप्टुनिया मिसदा वा । ६ नार्धेन्दु-म.।

१५० हरिवंशपुराणे इति नक्तदिवं दृष्ट्वा देवताभिरनुष्टितम् । आत्मनः शासनं लोके परेपामतिदुर्लभम् ॥५४॥ निश्चितश्चापि पण्मासान् पतन्या वसुधारया। नाभिना मरुदेव्या च प्राध्यस्तीर्थकरोद्भवः ॥५५|| अथासौ सौग्यताराभिरभितः कृतसेवना । मरुदेवी सुरनीभिश्चन्द्रलेखेव हारिणी ।।५।। शरदभ्रावलीशुने प्रासादेऽगुरुधूपिते । नानोपधानकाधाने शयाना शयने विधौ ॥५॥ निधीनिव निशाशेपे ददर्श शुभसूचकान् । प्रमेण पोडशस्वप्नानिमान दुर्लभदर्शनान् ॥५८।। प्रभूतदानधाराईकरपुष्करधारिणम् । गीयमानं शुचिं भृङ्गदर्दानार्थिभिरिवेश्वरम् ॥५६॥ सुप्रतिध्वनिविक्षिप्तप्रतिपतं शुभोदयम् । शुभं भद्राकृतिं धीरं वृष वृषमिवोन्नतम् ॥६॥ मत्तेभ तमिवान्वेष्टुं मदगन्धेन भूचितम् । सिंह मुत्थितमदासीनखदंष्ट्रासटोत्कटम् ॥६॥ चित्ररत्नघटाटोपघनघोपधनाघन: । श्रियोऽभिपेक्रमम्भोजे नवाम्भोभिरिवावनेः ॥१२॥ नानापुष्पधने दीर्धे श्रीमाले सौरभोरकटे । सम्भूयेव च सर्वर्तुश्रीभिः सेवार्थमुद्धृते ॥३३॥ इस प्रकार लोकर्म जो दूसरोके लिए दुर्लभ थी, ऐसी देवियों द्वारा अपनी आज्ञाकी पूर्ति देखकर तथा लगातार छह माहसे पड़ती हुई रत्नधारासे राजा नाभिराज और मरुदेवीने निश्चय कर लिया कि हमारे यहाँ सबके द्वारा प्रार्थनीय तीर्थङ्करका जन्म होगा ॥५४-५५॥ अथानन्तर मनोहर ताराओंसे सेवित चन्द्रकलाके समान अनेक देवियोंसे सेवित मनो. हराङ्गी मरुदेवी, शरद् ऋतुकी मेघावलीके समान सफेद एवं अगुरु चन्दनसे सुवासित राजभवन- में नाना गद्दा-तकियोंसे युक्त चन्द्र तुल्य शय्यापर शयन कर रही थी कि उसने रानिके पश्चिम भागमें निधियोंके समान शुभ सूचक, इन दुर्लभ सोलह स्वप्नोंको क्रमसे देखा ॥५६-५८।। प्रथम हो उसने सफेद हाथी देखा, ऐसा हाथी कि जो अत्यधिक मदकी धारासे गोली सँड़ और उसके अग्रभागको धारण कर रहा था तथा मदके अर्थी भ्रमर जिसके आस-पास गुजार कर रहे थे । वह हाथी किसी राजाके समान जान पड़ता था क्योकि जिस प्रकार राजाके कर पुष्कर-हस्त कमल अत्यधिक दानके संकल्पके लिए गृहीत जलकी धारासे गीले रहते हैं उसी प्रकार उस हाथी- के कर पुष्कर--सूड़ और उसके नथने अत्यधिक दान-मद जलकी धारासे गीले थे और जिस प्रकार राजाके समीप खड़े दान के अर्थीजन उसकी स्तुति किया करते हैं उसी प्रकार दान-मदके अर्थी भ्रमर उसके समीप गुञ्जार कर रहे थे ॥५६॥ दूसरी बार उसने भद्र आकृतिको धारण करने- वाला एक धीर-वीर बैल देखा। वह बैल ठीक धर्मके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार धर्म अपनी मधुर देशनासे एकान्तवादी प्रतिपक्षियोंको पराजित कर देता है उसी प्रकार वह बैल भी अपनी हुम्याध्वनिसे प्रतिपक्षी भैलोको पराजित कर रहा था, जिस प्रकार धर्म शुभ अभ्युदयः को देता है उसी प्रकार वह बैल भी शुभ अभ्युदयको सूचित करनेवाला था। जिस प्रकार धर्म भद्राकृति-मगलकारी होता है उसी प्रकार वह बैल भी भद्राकृति-उत्तम आकृतिका धारक था, जिस प्रकार धर्म धीर-धी बुद्धि को प्रेरणा करनेवाला है उसी प्रकार यह बैल भी धीर-गम्भीर था और जिस प्रकार धर्म उन्नत-उत्कृष्ट होता है उसी प्रकार यह बैल भी उन्नत-ऊँचा था ॥६०॥ तीसरी बार तीक्ष्ण नस्स, दंष्ट्रा और सटा (गरदनके बालों) से युक्त एक सिंह देखा । वह सिंह ऐसा जान पड़ता था मानो पहले स्वप्नमें दिखे हाथीके मदकी गन्ध पा उसे ढूँढ़ने के लिए ही तैयार खड़ा हो ॥६१॥ चौथी बार उसने नाना रत्नमयी पड़ोंके विशाल शब्दसे युक्त मदोन्मत्त हाथियोंके द्वारा कमलपर घेठी लक्ष्मीका अभिषेक देखा । लक्ष्मीका वह अभिषेक ऐसा जान पड़ता था मानो इन्द्रधनुपसे उपलक्षित एवं घनघोर गर्जना करनेवाले मेघ नूतन जलसे पृथिवीका ही अभिषेक कर रहे हो ॥६२॥ पाँचवीं बार उसने नाना पुप्पोसे व्याप्त तथा अत्यन्त सुगन्धित दो बड़ी-बड़ी मालाएँ देखीं। वे मालाएँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो समस्त ऋतुओकी १ घनाघना मत्तगजा मेघाथ ( इति क० प्रतिटिप्पण्याम् )। - अश्मः सर्गः १५1 अधोमुखमयूखौधदण्डमातपवारणम् । तारामरणयोरिषप्तं श्यामयेवेन्दुमण्डलम् ॥६॥ सभ्यारागारागाय पूर्वाशागनयारणम् । सिन्दूरारुणितं कुम्भ मङ्गलार्थमिवोद्धतम् ॥६५॥ मीनी कृतजलक्रीडी हतारमोदरशोभयोः । नेत्रयोश्चलयोदातुमुपालम्भमिवागती ॥६६॥ हारिणौ वारिणा पूर्णी विशालौ कलशौ घनौ । सौवर्णी स्वोपमो द्रष्टुं स्तनभाराविवोद्ध्ती ॥६७॥ 'सोहण्टपुण्डरीकीचं राजहंसमनोहरम् । रथपादातिनादाय सरः सैन्यमियोर्जितम् ॥६॥ प्रमोनमिथुनोन्मेपमकरायुरुराशिभिः । प्रपूर्णितमिवाकाशं वर्द्धमानं महार्णवम् ॥६६॥ सावभिभुजस्तम्भः प्रौढदृष्टिमिरुन्मुखैः । सिंहैहेमासनं व्यूढं मनुराजैर्जगद् यथा ॥७॥ स्वर्गमौन्दर्यसन्दर्भमिव दर्शयितुं नृणाम् । विमानं कलगोताभिर्देवकन्याभिराहृतम् ॥७॥ लक्ष्मीने मिलकर मरदेवीकी सेवाके लिए उन मालाओंको बनाकर ऊपर उठा रक्खा हो ॥६३।। छठवीं बार उसने चन्द्रमण्डलको देखा। वह चन्द्रमण्डल ऐसा जान पड़ता था मानो तारा रूपी आभूपोंसे युक्त रात्रिरूपी स्त्रीके द्वारा ऊपर उठाया हुआ छत्र ही हो। ऐसा छत्र कि जिसकी नीचेकी ओर आनेवाली किरणांका समूह ही दण्डका काम दे रहा था ॥६४॥ सातवीं बार उसने सन्ध्याकी लालिमा रूपी अद्गरागसे युक्त उदित होता हुआ सूर्य देखा । वह सूर्य ऐसा जान पड़ता था मानो पूर्व दिशारूपी स्त्रीने मगलके लिए सिन्दूरसे रंगा हुआ कलश ही ऊपर उठाया हो ॥६५॥ आठवीं बार उसने जलके भीतर क्रीड़ा करते हुए दो मीन देखे। वे मीन ऐसे जान पड़ते थे मानो अपने उदरकी शोभाको हरनेवाले चम्बल नेत्रोंका उलाहना देने के लिए ही मरुदेवीके पास आये हो ॥६६॥ नौवीं बार उसने जलसे भरे हुए दो स्वर्णमय विशाल कलश देसे । वे कलश ऐसे जान पड़ते थे मानो अपनी उपमा धारण करनेवाले माताके स्तनोंको देखनेके लिए ही ऊपर उठे हो ॥६७॥ दशवीं बार उसने एक ऐसा सरोवर देसा जो किसी बलिष्ट सेनाके समान जान पड़ता था । क्योंकि जिस प्रकार सेना, सोद्दण्डपुण्डरीकीघ-ऊपर उठे दण्डोंसे युक्त छत्रोंके समूहसे सहित होती है उसी प्रकार वह सरोवर भी सोद्दण्डपुण्डरीकोष-ऊँचे ऊँचे डण्ठलोंसे युक्त श्वेत फमलोंके समूहसे सहित था। जिस प्रकार सेना, राजहंस मनोहर--उत्तम राजाओंसे मनोहर होती है उसी प्रकार वह सगेवर भी राजहंस मनोहर-हंस विशेषांसे मुन्दर था। और जिस प्रकार सेना, रथ पादातिनादाढ्य-रथके पहियोंकी विशाल चीत्कारसे युक्त होती है उसी प्रकार वह सरोवर भी रथपादातिनादास्य-चक्रवाक पक्षियोंके अत्यधिक शब्दसे युक्त था ॥६॥ ग्यारहवीं बार उसने बढ़ता हुआ एक ऐसा महासमुद्र देसा जो ठीक आकाशके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार आकाश, मीन, मिथुन, मकर आदि गशियोंसे युक्त होता है- उसी प्रकार महासमुद्र भी उत्तम मीन युगलोंकी उछल-कूद तथा मगर-मच्छ आदिको विशाल राशिसे पूर्ण था॥६६॥ बारहवीं वार उसने एक मुरर्णमय सिंहासन देसा। वह सिंहासन जिस प्रकार सबल भुजाभोके धारक, प्रौढ़ दृष्टिसे युक्त एवं कार्य करनेमें तत्पर कुलकरोंके द्वारा जगत् पारण किया जाता है उसी प्रकार मजबूत भुज स्तम्भोंसे युक्त, प्रौढ दृष्टिसे सहित एवं ऊपरको और मुग्न किये हुए सिंहोंके द्वारा धारण किया गया था ॥७०|| तेरहवीं बार उसने एक विमान देगा जो ऐमा जान पड़ता था मानो मनुष्यों को स्वर्गलोकका सौन्दर्य दिखलानेके लिए सुन्दर १. मयूरोद्यदण्ड म । २ सोद्दण्डपुण्डरीपराज म. 1 ३ रथगदाः नावाकाः तेषामनिनादेन दीर्घशब्देन आदर्य सहितम् । ४. प्राश मीना मत्स्यास्तेषां निथुनानि तेशामुन्मेपः । मकगदीनामुरुगरािध तः, पक्षे गशिविशेषः। रामहमास्तु से च धरणलोहिनः मिना:-जिनकी चौस मोर घरग हाल होने पाकी सफेद होते हैं, ऐसे हम रामहम कहलाते हैं।

हरिवंशपुराणे नागलोकं विजिन्येव नागेन्द्रभवनं श्रिया । नागकन्याभिरुद्भूतं शेपलोकजिगीपया ॥७२॥ अभ्रंलिहं निरभ्रेऽपि विद्युदिन्द्रधनुःश्रियम् । खे सृजन्तं महारत्नराशि प्रांशुभिरंशुभिः ॥७३॥ सुप्रसन्नं भ्रमज्ज्वाल निर्धूमेन्धनपावकम् । प्रचलत्पुष्पिताद 'भ्रकिंशुकोकरविभ्रमम् ॥७॥ खण्डस्वप्नानिमाम् दृष्ट्वा धेऽनन्तरमात्मनि । जिनं सा वृषरूपेण प्रविष्टं मुखवर्मना ॥७५|| मुस्वप्नदर्शनानन्द स्वामिनी यसवं मया । प्रापितेति कृतार्थव काऽपि निद्रासखी निरत् ॥७॥ विबुध्यस्य विबुद्धार्थे विवर्धस्व विवर्धने । विजयस्व जयश्रोशे देवि पूर्णमनोरथे ॥७७॥ इत्यादयो विबोयाय दिक्कुमारीभिरीरिताः । याताः स्वयं विबुद्धायाः केवलं मगलं गिरः ॥७८ दीपाकरः कलक्षेप निःकलगुणाकरम् । दृष्ट्व मुखचन्द्र ते हिया भवति निष्प्रभः ॥७॥ तवैव गृहमुद्योत्य दशनप्रभयाऽधुना । इतीव स्फुरितव्याजात् प्रदीपा: स्वं हसन्त्यमी ॥२०॥ अन्यन्तमुखरागाड्या पणरक्षितविप्रिया । प्रस्खलखलमैत्रीव वन्ध्या सध्या विरज्यते ॥८॥ स्वभावमत्सरारम्भा व्यापिकोदयमेष्यतः । प्रभा रखेरवन्ध्यार्था साधोमनीव वर्द्धते ॥२॥ गीत गानेवाली देवकन्याएं उसे पृथिवीपर ले आई हो ॥७१।। चौदहवीं बार उसने नागेन्द्रका भवन देखा जो ऐसा जान पड़ता था मानो यह अपनी शोभासे नागलोकको तो जीत चुका था अब अन्य लोकोंको जीतनेकी इच्छासे ही नागकन्याएँ उसे पृथिवीपर ऊपर लाई हो ॥७२॥ पन्द्रहवीं बार उसने आकाशमें महारत्नोंकी एक ऐसी राशि देखी जो अपनी उन्नत किरणोके द्वारा मेघ रहित आकाशमे बिजली और इन्द्रधनुपसे शोभित मेघकी रचना कर रही थी ॥७३॥ और सोलहवीं बार उसने अत्यन्त निर्मल एवं घूमती हुई ज्यालाओसे युक्त, निर्धूम अग्नि देखी। वह अग्नि ऐसी जान पड़ती थी मानो चञ्चल फूलोंसे युक्त पलाशके बड़े-बड़े वृक्षोंका समूह हो हो ।।७४।। इस प्रकार पृथक्-पृथक् दिखनेवाले इन सोलह स्वप्नोंको देखकर रानी मरुदेवीने उसके बाद बैलके रूपमे मुख मार्गसे प्रविष्ट हुए जिनेन्द्र भगवान्को भीतर धारण किया 11७५] मैं स्वामिनीको उत्तम स्वप्नोके देखनेका नूतन आनन्द प्राप्त करा चुकी हूँ इसलिए कृतः कृत्य हुईकी तरह रानी मरुदेवीकी निद्रारूपी सखी कहीं भाग निकली ॥७६।। महारानी मरुदेवी स्वप्न-दर्शनके बाद स्वयं जाग गई थीं इसलिए दिक्कुमारियोंके द्वारा उसके जगानेके लिए 'हे पदार्थोको जाननेवाली माता ! जागो, हे वृद्धिरूपिणी माता । वृद्धिको प्राप्त होओ, हे जयलक्ष्मी- की स्वामिनि ! पूर्ण मनोरथोवाली माता ! जयवन्त रहो' इत्यादि कहे गये वचन केवल मगल. रूपताको प्राप्त हुए थे ।।७७-७८।। हे माता ! यह चन्द्रमा दोपाकर- दोपोकी खान (पक्षम निशाकर) और कलको दोपयुक्त ( पक्षमें काले चिह्नसे युक्त) है अतः तुम्हारे निष्कलङ्क और गुणोंकी खान भूत मुखचन्द्रको देखकर लज्जासे ही मानो प्रभा-रहित हो गया है ॥७६। अब तो यह घर तुम्हारे ही दोनोंकी प्रभासे प्रकाशित है- हम लोगोंकी आवश्यकता नहीं, यह विचार फर ही मानो ये दीपक स्फुरणके बहाने अपने आपकी हंसी कर रहे हैं ॥८०॥ हे माता ! यह प्रातः संध्या, दुष्टको चश्चल मित्रताके समान गग-रहित होती जा रही है अर्थात् जिस प्रकार दुष्टको मित्रता प्रारम्भमे रागसे सहित होती है और क्षणभर बाद ही शत्रुओको अनुरञ्जित करने लगती है उसी प्रकार यह प्रातः सन्ध्या पहले तो राग अर्थात् लालिमासे सहित थी और भय क्षणभर बाद लालिमासे रहित हुई जा रही है। जिस प्रकार दुष्टकी मित्रता बन्ध्या-- निष्फल रहती है-मसे किसी कार्यको सिद्धि नहीं होती उसी प्रकार यह प्रातः संध्या भी बन्ध्या है-इसमे किसी कार्यकी सिद्धि दृष्टिगत नहीं हो रही है ॥१॥ और यह उदित होते हुए सूर्य- की प्रभा सजनकी मित्रताके समान उत्तरोत्तर बढ़ती चली जा रही है। क्योंकि जिस प्रकार सजनको मित्रता प्रारम्भमें मत्सर-युक्त होनेके कारण फीकी रहती है और भागे चलकर खूब १ पुष्मितादात् किंशुको म । २ सान्तरान् था । ३. त्वं म. | ४ मेष्यति क० ।

अष्टमः सर्गः भास्वराम्बरभूषा भाति भास्वद्विशेषका । पुरन्ध्रीरिव पूर्वाशा मगलाय तवोद्गता ॥३॥ दीघा नोवा निशामेपा दीर्विकास्विनदर्शने । तुष्टा स्वान् घटयस्येव चक्रवाको कलारवान् ॥६॥ स्वत्पादन्यासलीलायामीवणार्यमिवाकुलम् । त्वामुत्थापयते कूजस्कलहंसकुलं कलम् ॥५॥ घूर्मिता मृदुवानेन एनामिनयमूर्तयः । भवाया दर्शयन्तीव नृत्तारम्मममी दुमाः ॥८६॥ दिदमुपानि प्रसन्नानि चेष्टितानीव तेऽधुना । सुप्रमातमिदं देवि मुञ्च शय्यामनिन्दिवे ॥८॥ इति वन्जिमवन्या सामुञ्चत् शुञ्चिविप्रहा। शय्यां पुष्पतरशाच्या हंसोव सिकताथलीम् ॥८॥ धोतवासं गृहीत्वाऽसौ धौतच्छाया विनिर्गता । शुशुभे शारदामोदात् तन्वीव शशिनः कला ॥८॥ श्रीविद्युदिक्कुमा मिः प्रत्यप्रकृतभूपणा । साऽन्तर्गाऽन्तिकं याता धनश्रीनामिभूभृतः ॥१०॥ भद्रासनस्थितायाऽस्मै क्रमेण स्वासनस्थिता । श्रीरिवावेदयत् स्वप्नान् सत्कराम्भोजकुड़मला HERE स्वप्नायं सोऽवधार्यता जगाद दयिते ध्रुवम् । सक्रान्तोऽद्य त्रिलोकानां नायस्तीर्यकरस्वयि ॥१२॥ न दूराल्पफलप्राप्तावीदर्श स्वप्नदर्शनम् । अतोऽद्यैव प्रतीतो मे भवरयां गर्मसम्भवः ॥१३॥ पामासबसुवृष्टया च देवतापरिचर्यया । सूचिता जिनसम्भूतियाँ साद्य फलिताऽवयोः ॥४॥ फैल जाती है उसी प्रकार सूर्यको प्रभा पहले मन्द होती है और आगे चलकर खूब फैल जाती है-सर्वत्र व्याप्त हो जाती है। जिस प्रकार सन्ननकी मित्रता सार्थक है उसी प्रकार सूर्यको प्रभा सार्थक है ॥२॥ भास्वर-अम्बर-देदीप्यमान आकाश ही जिसका आभूषण है (पक्षम जिसके वन और आभूपण देदीप्यमान हैं तथा भास्वद्विशेषका सूर्य ही जिसका तिलक है (पक्षमें देदीप्यमान तिलकसे युक्त है ) ऐसी यह पूर्व दिशा सौभाग्यवती स्त्रीके समान मानो तुम्हारा मंगल करनेके लिए ही उद्यत हुई है ॥८३॥ वापिकाओंमें लम्बी रात वितानेके बाद भव सूर्यका दर्शन हुआ है. इसलिए यह चकवी प्रसन्न हो अपने मधुर शब्द कर रही है अथवा मधुर शब्द करनेवाले आत्मीय जनोंको इकट्ठा कर रही है ॥८४|| इधर मधुर शब्द करता हुआ यह कलईसीका समूह तुम्हें उठा रहा है जिससे ऐसा जान पड़ता है मानो तुम्हारे पादनिक्षेप- की लीलाको देखनेके लिए अत्यन्त उतावला हो रहा है ॥८॥ जो मन्द-मन्द वायुसे हिल रहे हैं, तथा अभिनयको मुद्राको धारण किये हैं ऐसे ये वृत्त, आपके लिए मानो अपने नृत्यका आरम्म ही दिसला रहे हैं ॥८६॥ हे माता ! इस समय समस्त दिशाएँ तुम्हारी चेष्टाके समान निर्मल हो गई हैं एवं सुन्दर प्रभातकाल हो गया है, इसलिए हे अनिन्दिते देवि ! शय्याको छोड़ी ॥७॥ इस प्रकार बन्दीजनों के द्वारा वन्दनीय, एवं निर्मल शरीरको धारण करनेवाली महारानी मरदेयोने शय्याको उस प्रकार छोड़ा जिस प्रकार कि हंसी नदोके रेतीले तदको छोड़ती है ।।८।। उज्ज्वल कान्तिको धारण करनेवाली मरुदेवी धुले हुए पत्रको प्रदणकर जय शयनागारसे बाहर निकली तव शरद् ऋतुके मेघसे बाहर निकली चन्द्रमाको पतली कलाके समान सुशोभित होने लगी । विद्युत्कुमारी और दिक्कुमारी देवियों ने जिसे नवीन-नवीन आभूपण पदिनाये थे तथा जो अन्तर्गतगर्भा होनेसे गृहीतजला मेघमालाके समान जान पड़ती थी ऐमी मम्देवी नाभि- गजारूपी पर्वतके समीप गई || जो शोमामें लक्ष्मीके समान जान पढ़ती थी ऐसी मठ- देवी वहाँ जाकर अपने भासनपर घेठी और हस्तकमल जोड़, मद्रासनपर बैठे हुए महाराजसे 1 म-पूर्वक स्वप्नों का वर्णन करने लगी ॥३१॥ म्यप्नोंका फल सममकर महाराज नाभिराजने उससे कहा कि हे प्रिये ! निश्चय हो आज तुम्हारे गर्भ में तीन लोक नाथ तीर्थफरने अवतार लिया है ||६२॥ दूरपर्ती तथा अल्प पलकी प्रानिक समय ऐसे स्वप्न नहीं दियते इसलिए मुझे विश्वास है कि आज ही आप गर्भ रहा है ।।६३॥ टगानार छह माससे होनेपाली रत्नोंकी पर्पा और देवत्ताभोंके द्वारा की हुई शUषासे १ सूर्यदर्शने सी। २. धोनेयाम म । २० १५४ हरिवंशपुराणे सर्वथा सर्वकल्याणभाजनारमजजन्मना । प्रिये ! स्वमचिरेणव जगदानन्दयिष्यसि ॥१५॥ इति सुस्वप्नफलं श्रुत्वा सद्यः सम्भूतमात्मनि । मुमुदेऽतितरां देवी दीप्ति कान्ति च विनती ॥१६॥ सृतीयकालशेपेऽसावशीतिश्चनुरुपरा । पूर्वल पाखिवर्षाष्टमासपच्युतास्तदा ॥१७॥ स्वर्गावतरणं जैनमापाढबहुलस्य तु । द्वितीयामुत्तरापाटनपत्र जगतम् ॥१॥ वर्धमाने क्रमाद् गर्भ धधते वपुषो वपुः । तस्यास्त्रियलिशोभाया भागभीरयेव नोदरम MEn गौरवातिशयाधानी दधाना निजगद्गुरुम् । लायवातिशयं देहे दभ्रे विमिदं परम ॥१०॥ सन्तापहेतुरन्तःस्यो मातुर्माभूत सुनिश्चलः । ज्ञानघान् म जिनो भानुयथाऽमु प्रतिमिग्यितः ॥१०॥ ज्ञाननेत्रैः निभिः पश्यन् विश्व मामानसौ सुखम् । नवगर्भगृहेऽतिष्टदिकुमारी विशोधिते ।।१०२॥ पूर्णपु तेषु मासेट निपतमुवृष्टिषु । जिनं सा सुपुवे देवी सोसरापाढसन्निधौ ॥१०॥ प्राच्या इव विशुद्धाया विशुद्धस्फटिकोपमात् । धनोदराद्विनिःकान्तो जिनः सूर्य इवायमौ ॥१०॥ जातकर्मणि कर्तव्ये व्यापता लघुदेवताः । अन्तरङ्गा हि कत्र्तव्ये व्याप्रियन्ते जगत्यरम ॥१०५॥ विजया वैजयन्ती च जयन्ती चापराजिता । नन्दा नन्दोसरा नन्दी नन्दीवद्धन या सह ॥१०॥ भालोलकुण्डलालोकविलसद्गण्डमण्डलाः । एतास्ता दिक्कुमार्योऽष्टौ तस्थु गारपाणयः ॥१०॥ मुस्थिता प्रणिधान्या सुप्रबुद्धा च यशोधरा । लघमीमती तथैवान्या कीर्तिमायुपवर्णिता ॥१०॥ हम दोनोंको जिनेन्द्रदेवके जिस जन्मकी सूचना मिली थी वह भाज सफल हुई ॥६४॥ हे प्रिये ! निश्चय ही समस्त कल्याणोंके पात्र रूप पुत्रको उत्पन्न कर तुम शीघ्र ही संसारको आनन्दित करोगी ॥६५॥ इन उत्तम स्वप्नोंका फल अपने-आपमें शीघ्र ही संघटित हो चुका है, यह सुन दीप्ति और कान्तिको धारण करती हुई मरुदेवी बहुत ही प्रसन्न हुई ॥६६॥ तीसरे कालमें जब चौरासी लाख पूर्व तीन वर्ष साढ़े आठ माह बाकी रहे थे तब आपाढ़ कृष्ण द्वितीयाके दिन उत्तराषाढ़ा नक्षत्रम समस्त जगत्के द्वारा नमस्कृत श्री जिनेन्द्रदेवका स्वर्गावतरण हुआ था ॥६७-६८॥ क्रम-क्रमसे गर्भ में वृद्धि होनेपर माताका शरीर भी बढ़ गया परन्तु त्रिवलिकी शोभा कहीं नष्ट न हो जाय इस भयसे मानो उसके उदर में वृद्धि नहीं हुई ।।६॥ माता मरुदेवी स्वयं अत्यधिक गौरवसे सुशोभित थी और उसपर तीनों जगत्के गुरु-भारी (पक्षमें श्रेष्ठ) जिनेन्द्र देवको धारण कर रही थी, फिर भी वह शरीरमें अत्यधिक लघुताका अनुभव करती थी यह बड़े आश्चर्यकी बात थी ॥१०॥ मैं गर्भमें स्थिर रहकर माताके सन्तापका कारण न बनें यह जानकर ही मानो जिन-बालक गर्भ में अत्यन्त निश्चल रहते थे। माताके गर्भमैं उनका निवास वैसा ही था जैसा कि जलमे प्रतिविम्बित सूर्यका होता है ।।१०१॥ मति, श्रुत और अवधि इन तीन ज्ञानरूपी नेत्रोंके द्वारा जगत्को देखते हुए जिन बालक, दिक्कुमारियोके द्वारा शुद्ध किये हुए गर्भ में नौ माह तक सुखसे स्थित रहे ॥१०२।। तदनन्तर नौ माह पूर्ण होनेपर जब लगातार रत्नोंकी वर्षा हो रही थी तब उत्तरापाढा नक्षत्र के समय माताने जिन-बालकको उत्पन्न किया ॥१०३॥ जिस प्रकार निर्मल पूर्व दिशा में विशुद्ध स्फटिकके तुल्य मेघ मण्डलके मध्यसे निकला हुआ सूर्य सुशोभित होता है उसी प्रकार माता मरुदेवीके स्फटिकके समान स्वच्छ गर्भसे निकले हुए जिन-बालक सुशोभित हो रहे थे ।।१०४।। उस समय वहाँ जो देवियों थीं वे शीघ्र ही करने योग्य जातकर्ममें लग गई सो ठीक ही है क्योंकि जो अन्तरङ्ग व्यक्ति होते हैं वे संसारमे शीघ्र ही अपने करने योग्य काममें लग जाते हैं ॥१०॥ चञ्चल कुण्डलोके प्रकाशसे जिनके कपोल सुशोभित हो रहे थे ऐसी १ विजया, २ वैजयन्ती, ३ जयन्ती, ४ अपराजिता, ५ नन्दा, ६ नन्दोत्तरा, ७ नन्दी और नन्दीवर्धना ये आठ दिक्कु- मारी देवियाँ हाथोंमें झारियाँ लिये हुए खड़ी थीं ॥१०६-१०७॥ नाना प्रकारके आभरणोंसे सुशोभित १ सुस्थिता, २ प्रणिधान्या, ३ सुप्रबुद्धा, ४ यशोधरा, ५ लक्ष्मीमती, ६ कीर्तिमती, अष्टमः सर्गः १ वसुन्धरा तथा चित्रा चित्रामरणमास्वराः । दिक्कुमार्य इमाशाष्टौ तस्थुदंर्पणपाणयः ॥१०९॥ इला मुरा पृथिव्यारया पद्मावत्यपि काञ्चना । सीता नवमिकाऽन्या च दिक्कन्या भद्रकाभिधा ॥१०॥ अष्टौ तुष्टाः प्रकृष्टाङ्गप्रमामासितदिड् मुग्ाः । धवलान्यातपत्राणि धारयन्ति स्म विस्मिता ॥११॥ ही: श्रीः तिः परा सा च वारुणी पुण्डरी किणी । अलम्बुसाम्बुजास्यश्रीमिश्रकेशीति विश्रुताः ॥१२॥ 'कनरकनकदादानि कनस्कनककुण्डलाः । चामराणि गृहीखाष्टौ दिक्कुमायः स्थिता इमाः ॥१३॥ चित्रा कनकचित्रा च सूत्रामगिरिमा बभुः । त्रिशिराश्च कृतोद्योता विद्युत्कन्यास्तडित्यमा ॥११॥ विजया वैजयन्ती च जयन्ती चापराजिता । इमा विद्युत्कुमारीणां चतस्रः प्रमुखाः स्थिताः ॥१५॥ रुचका दिवकुमारीणां प्रधाना हचकोरग्वला । रुचकामाश्चतस्रस्ता रुचप्रमया सह ॥१६॥ जातकर्म जिनस्यैताश्चरष्टौ यथाविधि । जातकर्मणि निष्णाताः सर्वत्र जिनजन्मनि ॥१७॥ भाचेलुश्चलमोलीनां काले तस्मिन् सुरेशिनाम् । त्रैलोक्येऽप्यासनान्याशु जिनोभूतिप्रभावतः ॥११॥ प्रणेमुरहमिन्द्रास्तं प्रयुनावधयो जिनम् । तत्रस्याः सिंहपीटेम्यो गरवा सतपदान्यरम् ॥१६॥ लोके मावनदेवानां शङ्खध्वनिरमूरस्वयम् । व्यन्तराणां रखो भेयां ज्योतिषां सिंहनिस्वनः ॥१२॥ घण्टाररानमहाघोपः कल्पलोकमतीतनत् । किंकर्तव्यत्वसंमुख्यं त्रैलोक्यमभवाषणम् ॥१२॥ आसनस्य प्रकम्पेन दथ्यो विस्मितधीस्तदा । सौधर्मेन्द्रश्चलन्मौलिए॒त्वा मूर्धानमुनतम् ।।१२२॥ भतिवालेन मुग्धेन स्वतन्त्रेगाशुकारिणा । निमयेन विशङ्खन केनेदमप्यनुष्टितम् ॥३२॥ ७ वसुन्धरा और 5 चित्रा ये आठ दिक्कुमारी देवियाँ हाथों में दर्पण लिये हुए सड़ी थी ॥१०६-१०६॥ अपने शरीरकी श्रेष्ठ प्रभासे दिशाओंको सुशोभित करनेवाली १ इला, २ सुरा, ३ पृथिवी, ४ पद्मावती, ५ काश्मना, ६ सीता, ७ नयमिका और ८ भद्रका ये आठ दिक्कुमारी • देवियाँ आश्चर्यचकित हो सफेद छत्र धारण कर रही थीं ॥११०-१११॥ देदीप्ययान स्वर्णके कुण्डलीको धारण करनेवाली १ ही, २ श्री, ३ धृति, ४ वारुणी, ५ पुण्डरीकिणी, ६ अलम्बुसा, ७ अम्बुजास्यश्री और मिश्रकेशी ये भाठ दिक्कुमारी देवियाँ देदीप्यमान सुवर्णमय दण्डॉसे युक्त चामर लेकर खड़ी थीं ।।११२-११३॥ बिजलीके समान प्रभावाली १ चित्रा, २ कनकचित्रा, ३ सूत्रामणि और ४ त्रिशिरा इन चार विद्युत्कुमारी देवियोने सर्वत्र प्रकाश हो प्रकाश कर दिया था ॥११४॥ १ विजया, २ वैजयन्ती, ३ जयन्ती और ४ अपराजिता ये चार देवियों विद्युत्कुमा- रियोंमें प्रमुस थीं ॥११५॥ १ रुचका, २ रुचकोज्ज्वला, ३ रुचकामा और ४ रुचकप्रभा ये चार देवियों दिक्कुमारियों में प्रधान थीं ॥११६॥ इन आठ देवियोंने विधिपूर्वक जिनेन्द्रदेवका जातकर्म किया था। ये देवियाँ जातकर्ममें अत्यन्त निपुण हैं और सब जगह जिनेन्द्र देवका जातकर्म ये ही देवियों करती है ।।११७|| उस समय तीनों लोकोंमें जो इन्द्र थे, जिनेन्द्र जन्मके प्रभावसे उन सबके मुकुट चञ्चल हो गये और सबके आसन कम्पायमान हो उठे ॥११८॥ अवधिज्ञानका प्रयोग करनेवाले अहमिन्द्र अपने-अपने निवासस्थानों में ही स्थिर रहे, मात्र उन्होंने मिहामनोंसे सात डग चलकर जिनेन्द्र भगवान्को शीघ्र ही परीक्ष नमस्कार किया ॥११॥ भवनवासी देवाके लोकमें अपने आप शीका शब्द, व्यन्तरीके लोकमें भेरीका शब्द और ज्योतिषी देवोंके लोकमें सिंहोंके शब्द होने लगे ॥१२०n श्रेष्ठ घण्टाओंके जोरदार शब्दने कल्पवासी देयों के ठोकको व्यात फर लिया। उस समय तीनों लोक 'क्या करना चाहिए' यह विचार करने में तत्पर हो गये ॥१२१॥ उस समय भासनके फायमान होनेसे जिसको युद्धि चकित हो गई थी ऐमा सौधर्मेन्द्र मुकुट हिलाकर तथा ऊँचे मस्तकको फंपार विचार करने लगा कि उत्पन्न यालक, मूर्स, स्वच्छन्द, सहसा कार्य करनेवाले निर्भय एवं शङ्कारहित किस व्यक्तिने यह कार्य किया १. क्वपत् म.। ४ निबनाः म.1 २ स्वगत् म.. ३ अरं शोमं सतरदानि गया। मनपदान्गरम् म ।

हरिवंशपुराणे देवदानवचक्रस्य स्वपराक्रमशालिनः । कथचिरप्रतिफूलस्य यः समर्थः कदर्थने ॥१२॥ इन्द्रः पुरन्दरः शक्रः कथं न गणितोऽधुना । सोऽहं कम्पयताऽनेन सिंहासनमकम्पनम् ॥२५॥ सम्भावयामि नेपप्रभाव भुवनत्रये । प्रभुं तीर्थरादन्यमिति मावा सूतोऽवधिम् ॥१२६॥ भतो विस्फुरितेनायमवधिज्ञानचक्षुपा । तं तीर्थकर मुम्पन्नमाधमैशिष्ट मारते ॥१२७॥ आसनादवतीर्याशु फ्रानवा सप्तपदानि सः । जयतां जिन इत्युक्त्वा प्रणनाम कृताञ्जलिः ॥१२॥ पुनश्चासनमारुह्य समाज्ञापयति स्म सः । ध्यानानन्तरमानन्य स्थित सेनापति पुरः ॥१२॥ भस्यामाद्योऽवसपिण्यां जातस्तीथंकरोऽधुना । गन्तव्यं भारतं देवर्याध्यन्ता ते त्वया स्विति ।।१३०॥ स्वाग्यादेशे कृते तेन चेलुः सौधर्मवासिनः । देवेश्चाच्युतपर्यन्ताः स्वयम्बुद्धाः सुरेश्वराः ॥१३॥ यथास्वस्वं निमित्तेभ्यः प्रतिबुद्धाः प्रहर्पिणः । निश्चेलुनिजलोकेन्यो ज्योतिम्यंन्तरभावनाः ॥१३२|| गजाश्वरथसद्धपदातिवृषभस्तदा । गन्धर्वनर्तकीमिश्रः सप्तानीकैश्चितं नमः ॥१३॥ महिपाद्यैश्च नावाद्यः खङ्गायैगरुदादिभिः । शिविकाश्वोष्ट्रमकरद्विपहंसादिभिस्तथा ॥३॥ दशानामसुरादीनां कुमाराणां यथाक्रमम् । सप्तानीकै भो व्याप्तं बभासे नितरां तदा ॥१३५।। विमानानि समारूढा गोवृषान् गवयान रथान् । भवान् शरभशार्दूलान् मकरान करभान मुराः।।१२६॥ वराहमहिपान् सिंहान् पृपतान् द्वीपिनो द्विपान् । घमरान हरिणांश्चारुरुरून केचिद् गरमतः ॥१७॥ है ? ॥१२२-१२३॥ अपने पराक्रमसे सुशोभित देव-दानवोंका समूह भी यदि कदाचित् प्रतिकूल हो जावे तो उसे भी जो नष्ट करनेमें समर्थ है ऐसा मैं इन्द्र, शक या पुरन्दर हूँ फिर मेरे अकम्पित आसनको कम्पित करनेवाले इस मूर्खने इस समय मुझे कुछ क्यों नहीं समझा ? १२४-१२॥ मैं तीनों लोकोमें तीर्थंकरके सिवाय किसी दूसरे प्रभुको ऐसे प्रभावसे युक्त नहीं समझता हूँ, ऐसा विचारकर उसने अवधिज्ञानका आश्रय लिया ।।१२।। तदनन्तर सौधर्मेन्द्रने प्रकट हुए अवधिज्ञान रूपी नेत्रके द्वारा भरत क्षेत्रमें उत्पन्न हुए प्रथम तीर्थङ्करको देख लिया ॥१२७॥ उसने शीघ्र ही आसनसे उतरकर तथा सात ढग आगे जाकर 'जिनेन्द्र भगवान्की जय हो' यह कहते हुए हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया ॥१२८।। तद नन्तर सिंहासनपर आरूढ़ हो सीधर्मेन्द्रने विचार करते ही नमस्कार कर सामने खड़े हुए सेनापति- को आदेश दिया कि इस समय इस अवसर्पिणीके प्रथम तीर्थकर उत्पन्न हो चुके हैं अतः समस्त देवोंको भरतक्षेत्र चलना है। तुम यह सूचना सबके लिए देओ ॥१२६-१३०॥ सेनापति के द्वारा स्वामीका आदेश सुनाये जाते ही सौधर्म स्वर्ग में रहनेवाले समस्त देव चल पड़े। तथा अच्युत स्वर्ग तकके समस्त इन्द्र स्वयं ही इस समाचारको जान देवों के साथ बाहर निकले ॥१३१।। अपने- अपने स्थानोमे होनेवाले निमित्तोंसे जिन्हें जिनेन्द्र जन्मका समाचार ज्ञात हुआ था, ऐसे हर्पसे भरे हुए ज्योतिषी व्यन्तर और भवनवासी देव अपने अपने स्थानोसे बाहर निकले ॥१३२॥ उस समय १ हाथी,२ घोड़ा, ३ रथ, ४ पैदल सैनिक, ५ बैल, ६ गन्धर्व और नर्तकी इन सात प्रकार की सेनाओसे आकाश व्याप्त हो गया था ।।१३३॥ असुर कुमार आदि दश प्रकारके भवनवासी देवोकी भैंसा, नौका, गेडा, हाथी, गरुड़, पालकी, घोड़ा, ऊँट, मगर, हाथी और हंसको आदि लेकर क्रमसे जो सात प्रकारकी सेनाएँ थीं उन सबसे व्याप्त हुआ आकाश उस समय अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥१३४-१३शा उन देवामे कितने हो देव विमानों में बैठे थे, कितने ही बैलोपर, कितने ही रोझॉपर, कितने ही रथोपर, कितने ही घोड़ोपर, कितने ही अष्टापद और शार्दूलोपर, कितने ही मगरोपर, कितने ही ऊँटॉपर, कितने ही वराह और भैंसोंपर, कितने ही सिंहोपर, कितने हो हरिणापर, कितने ही चीतापर, कितने ही हाथियोंपर, कितने ही सुरागायोंपर, कितने ही सामान्य हरिणापर, कितने ही श्याम हरिणोपर, कितने ही गरुडीपर, कितने ही तोताओं- १. बोध्यतामिति म..

अष्टमः सर्गः 1 शुकान परभृतान् क्रौञ्चान् कुररान् शिखिकुक्कुटान् । परे पारावतान् हंसान् सकारण्डवसारसान् ।।१३।। चक्रवाकरलाकौघान बकादीन् समधिष्टिताः । चतुर्देवनिकायास्ते सह जग्मुरितस्ततः ॥१३॥ श्वेतच्छन्नैयश्चित्रैश्चामरैः फेनपाण्डुरैः । कुर्वाणाः सर्वमाकाश समाकीर्ण निरन्तरम् ॥१४०॥ भेरीदुन्दुभिशङ्खादिरवापूरितविष्टपम् । नृत्यगीतेयुतं रेजे देवागमनमद्भुतम् ॥१४॥ सौधर्मेन्द्रस्तदारूढो गजानीकाधिपं गजम् । ऐरावतं विकुर्वाणमाकाशाकारवद्वपुः ।। १४२॥ प्रोदृष्टान्तरविस्फारिकरास्फारितपुष्करम् । प्रोद्वंशाङ्करमध्योद्यद्मोगीन्द्रमिव भूधरम् ॥१३॥ कर्णचामरशङ्खाङ्क कहानश्यमालिगम् । बलाकाहंसविद्युमिरिव भ्रान्त मरुपयम् ॥१४॥ आरूढवारणेन्द्राणामिन्द्राणां निव हैर्युतः । जन्मक्षेत्रं जिनस्यासौ पविगं प्राप्तवान् सुरैः ॥१४५|| नमसोऽवतरन्तो वै सा सुराऽमुरसन्ततिः । कुबेरकृतमद्रासीत् पुरं स्वर्गमिव तितौ ॥१४॥ वनप्राकारपरिखापरिवेपमनोहरम् । सोद्यानकाननारामसरोवापीविराजितम् ॥१४॥ इन्द्रनीलमहानीलवनवैदूर्यभित्तयः । प्रासादाः पद्मरागादिप्रभाड्या यत्र रेजिरे ॥१४॥ सुराणामसुराणां च तत्पुरश्रीविलौकिनाम् । मनोऽभूह रितोत्कण्ठं स्वर्गपातालजश्रियः ॥१४॥ यतः साकमितं यत्नाक सुरासुरजगत्त्रयम् । पुरं तरकीर्तिमत्तस्मात्साकेतमिति कीर्तितम् ॥१५०॥ पर, कितने ही कोकिलाओंपर, कितने ही क्रौञ्च पक्षियोंपर, कितने ही कुररीपर, कितने ही मयूरों और मुर्गापर, कितने ही कबूतरों, हंसों, कारण्डव और सारसोंको, कितने ही चकवा और पला- काओके समूहपर और कितने ही बगुला आदि जीवापर बैठे थे। इस प्रकार उस समय चारों निकायके देव इधर-उधर जा रहे थे ॥१३६-१३॥ सफेद छत्रों, नाना प्रकारकी ध्वजाओं, और फेनके समान सफेद चमरोंसे समस्त आकाशको व्याप्त करते हुए वे चारों निकायके देव जहाँ- तहाँ चल रहे थे ॥१४०॥ भेरी, दुन्दुभि तथा शख आदिके शब्दोंसे जिसने समस्त लोकको भर दिया था तथा जो नृत्य और गीतसे युक्त था, ऐसा वह देवोंका आश्चर्यकारी आगमन अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥१४॥ उस समय सौधर्मेन्द्र, हाथियोंकी सेनाके अधिपति तथा आकाशके समान अपने शरीरकी विक्रिया करनेवाले ऐरावत हाथोपर आरूढ़ था ॥१४२।। वह ऐरावत, दोनों खीसोके बीच उठी हुई सूड़के अग्रभागको फैलाये हुए था, अतएघ जिसके बाँसोके अंकुशोंके बीच सर्पराज ऊपरकी ओर उठ रहा था, ऐसे पर्वतके समान जान पड़ता था।॥१४३|| यह ऐरावत ठीक आकाशके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार आकाश, बलाका, हंस और बिजलियोंसे युक्त होता है, उसी प्रकार यह हाथी भी कर्ण, चामर, शङ्ख तथा कक्षामें लटकती हुई नक्षत्रमालासे युक्त था ॥१४४॥ भन्य-दूमरे गजराजोपर बैठे हुए इन्द्रोके समूहसे युक्त सौधर्मेन्द्र, समस्त देवोंके साथ-साथ जिनेन्द्र भगवान्के पवित्र जन्मक्षेत्रको प्राप्त हुआ ॥१४५।। आकाशसे उतरती हुई उम सुर और असुरोंकी पक्तिने पृथिवीपर कुबेरके द्वारा निर्मित नगरको ऐसा देसा मानो स्वर्ग ही हो ॥१४॥ वह नगर धूलिके बन्धान, कोट और परिखाके चक्रसे मनोहर था तथा उद्यान, वन, आराम, सरोवर और वापिकाओंसे अलंकृत था ॥१४७॥ इन्द्रनील, महानोल, हीरा और वैडूर्यमणिको दीवालोंसे युक्त तथा पद्मराग श्रादि मणियोंकी प्रभासे परिपूर्ण वहाँके भवन अत्यधिक सुशो- मित हो रहे थे ॥१४॥ उस नगरकी शोभा देखनेवाले सुर और अमुरोंका मन स्वर्ग तथा पाताल सम्बन्धी शोभाके देसनेकी उत्कण्ठा दूर कर चुका था ॥१४॥ क्योंकि सुर, असुर आदि तीनों जगत्के जीव वहाँ पहले एक साथ पहुंचे थे इसलिए वह कीर्तिशाली नगर उस समयसे 'साकेत' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ था ॥१०॥ १. तान्त म. 1 २. महलथम् म । ३ दुरितोत्कण्ठ- म० ।

हरिवंशपुराणे ततः समं पुरं देवरिपरीत्य पुरन्दरः । प्रविश्य जिनमानेतुमादिदेश शची शुचिम् ॥१५॥ लव्यादेशा जमन्याः सा प्रविश्य प्रसत्रालयम् । सुखनिद्रा विधायान्यं शिशुंध सुरमायया ॥५२॥ प्रणम्य जिममादाय चकार करयोहरेः । तद्रूपातिशयं पश्यन् सहलाहो न तृप्तिमैत्' ।।१५३॥ भारोप्य जिनमारमामरावतगजे स्थितः । सोऽस्यमादुदितादिश्यः शिखरारमेव नैपधः ॥१५॥ छत्रच्छायापरच्छन्नं घामरोस्करवी जितम् । जिनं निनाय देवौधैः मुमेरुशिखरं हरिः ॥१५॥ सप्रदक्षिणामागन्य पाण्डकाव्यशिलातले । सिंहासने जिनं शक्रश्चक्रे चक्रेण नाकिनाम् १५६॥ क्षुभिताम्भोधिगम्भीरा भेरीपटहमदलाः । ताडिताः समृद्गाद्याः सुरैः शङ्खाश्च पूरिताः ॥३५७।। जगुः किन्नरगन्याः स्वीमिस्तुम्बुरुनारदाः । सविश्वावसवो विश्वे चित्रं श्रोममनोहरम् ।।१५। ततं च विततं चैव धनं सुपिरमप्यलम् । मनोहारि तदा देवैर्वाग्रते स्म चतुर्विधम् ॥१५६।। हावभावाभिरामं च नृत्यमप्सरसामभूत् । अङ्गहारकृतासङ्ग शृङ्गारादिरसाद्भुतम् ।।१६०॥ इरय सम्र महानन्दे देवसद्धः प्रवर्तिते । पूरित प्रतिशब्दैश्च मन्दरे रुन्दकन्दरे ॥१६॥ ताऽऽकल्पेऽभिपेकार्य सौधर्मेन्द्र ससम्भ्रमे । साटमङ्गलहस्तासु प्रशस्ताभरभीरुषु ॥१६२।। 'सघदेः सुरसातेमहावगेमहाधनैः । सर्वदिक्षु गतेः क्षिप्रं शोभितः क्षीरसागरः ॥१६३।। तदनन्तर देवोंके साथ-साथ उस नगरकी तीन प्रदक्षिणाएँ देकर सौधर्मेन्द्रने भीतर प्रवेश किया और पवित्र जिनेन्द्रको लाने के लिए इन्द्राणीको आज्ञा दी ॥१५१॥ इन्द्रकी आज्ञा पाते ही इन्द्राणीने माताके प्रसूति गृहमें प्रवेश किया और देयकृत मायासे माताको सुखनिद्रामें निमग्न कर उसके पास मायामयी दूसरा वालक लिटा दिया ॥१५२॥ तत्पश्चात् प्रणाम करनेके बाद जिन• यालकको लेकर उसने इन्द्रके हाथों में सौंपा। इन्द्रने हजार नेत्र बनाकर उनका अतिशय सुन्दर रूप देसा फिर भी वह तृप्तिको प्राप्त नहीं हुआ ॥१५३॥ जिन बालकको अपनी गोदमें रखकर ऐरावत हाथीपर बैठा हुआ सौधर्मेन्द्र उस समय ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो सूर्योदयसे सहित निषधाचलका शिखर हो हो ॥१५४॥ जो छनकी छायारूपी वस्त्रसे आच्छादित थे तथा जिनकी दोनों ओर चामरीके समूह ढोले जा रहे थे, ऐसे जिन बालकको सौधर्मेन्द्र देव-समूहके साथ सुमेरुके शिरपरपर ले गया ॥१५५५ इन्द्रने पहले आकर देव समूहके साथ मेरु पर्वतको प्रदक्षिणा दी फिर पापदुक शिलापर स्थित सिंहासनपर जिन-बालकको विराजमान किया ॥१५६।। उस समय देवाने क्षोभको प्राप्त हुए ममुद्रके समान गम्भीर शब्दयाले भेरी, पटह, मर्दल तथा मृद्ग भादि पाजे यजाये और शर के ॥१५॥ किन्नर, गन्धर्व, तुम्बुरु, नारद तथा विश्वावसु जातिके समस्त देव अपनी-अपनी स्त्रियों के साथ कानों एवं हृदयको हरनेवाले भाँति-भौ तिके गान गाने लगे ।।१५॥ उस समय देघ तत, वितत,धन और मुपिर नामके चारों मनोहारी वाजे यज्ञा गहे थे ॥१५। हाव-भायसे सुन्दर, भङ्गाहारोसे युक्त तथा शृङ्गारादि रसांसे आश्चर्य उत्पन्न करने याला अमराओंका नृत्य हो रहा था ॥१६॥इस प्रकार जप वहाँ देव-समूहके द्वारा महान् आनन्द मनाया जा रहा था। लम्बी-चौड़ी गुफाओंसे युक्त मेरु पर्यत उनकी प्रतिध्यनिसे गूंज रहा था, इपसे भग मोधमन्द्र अभिपके लिए योग्य वेष धारण कर रहा था, और उत्तम देवागनाएँ अपने २ रात योगादियं याचे मानद मुरादिकम् । घंगादि मुधिरं वागतालादिकं धनम् ॥ अमरकोपम्य ३ मनोहरदेवन । ४. महरेःमः। मारा वोगा भादियो तर । मम मोहुए प्रवला गृप भारि वितत । माया मम ममीरा मामि मि बामडो धन और शव पोपुरी आदि पर सान।

अष्टमः सर्गः । सारापूर्णाः सुरैः पिता राजताः करतः करम् । सौवर्गाश्च बभुः कुम्भाश्चन्द्रा इव मेहगाः ॥१६॥ कुम्भनिरन्तरारावैबहुदेवसहस्रकैः । पीसम्मोभिजिनेन्द्रस्य चक्रे जन्माभिषेचनम् ॥१६॥ पेन्द्राः कुम्भमहाम्भोदा दुग्धाम्मोऽन्तरवर्षिणः । शिशोर्जिनगिरेरासन्न तदाऽऽयासहेतवः ॥१६॥ जिनोच्यासमुहुः पितक्षीरवारिप्लवेरिताः । प्लवन्ते स्म पुणं देवाः पारौधे मदिकौघवत् ॥१६॥ दृष्टः सुरगणैर्यः प्राग मन्दरो रत्नपिजरः। स एव तीरपूरोघर्धवलीकृतविग्रहः ६८|| तदाऽत्यन्तपरोकोऽपि प्रत्यक्षः वीरवारिधिः । कृतः खेचरसहावैर्जिनजन्मामिपेचने ॥१६॥ स्नानासनमभून्मेरुः स्नानवारिपयोम्बुधेः । स्नानसम्पादका देवाः स्नानमोग जिनस्य तन् ।1000 इन्द्रसामानिकानेकलोकपालादयोऽमराः । क्रमेण चक्रुरम्मोभिरभिषेकं पयोम्बुधः 10m अत्यन्तसुकुमारस्य जिनस्य सुरयोषितः । शच्याद्याः पल्लवस्पर्शसुकुमारकरास्ततः ।।१७२॥ दिव्यामोदसमाकृष्टपट पदोघानुलेपनः । उद्वर्तयन्त्यस्ताः प्रापुः शिशुस्पर्शसुखं नवम् ।।१७३॥ ततो गन्धोदकैः कुम्भैरम्यपिचन् जगत्प्रभुम् । पयोधरमरानमारता वर्षा इव भूभृतम् ॥१७॥ समं च चतुरस्रं च संस्थानं दधतः परम् । सुबज्रपमनाराचसद्धातसुधनात्मनः ॥१७५॥ कर्णावततकायस्य कथञ्चिद् वज्रपाणिना । विद्धौ यत्रधनी तस्य वनसूचीमुसेन तौ ॥१०॥ कृताभ्यां कर्णयोरीशः कुण्डलाभ्यामभाततः । जम्बूद्वीपः सुभानुभ्यां सेवकाम्यामिवान्वितः ॥१७॥ हाथों में अष्ट मङ्गल द्रव्य धारण कर रही थीं, तब महावेगशाली देवोंके समूह घट लेकर विशाल मेघोंके समान समस्त दिशाओंमें फैल गये और उन्होंने क्षीरसागरको क्षोभित कर दिया ॥१६१-१६३।। क्षीरसे भरे चाँदी और सोनेके कलश देवों द्वाग एक हाथसे दूसरे हाथमें दिये जाकर सुमेरु पर्वतपर पहुंच रहे थे और वे चन्द्र तथा सूर्य के समान मुशोभित हो रहे थे ।।१६।। निरन्तर शन्द करनेवाले एवं क्षीर सागरके जलसे भरे हुए कलशोके द्वारा हजारों देवोंने जिनेन्द्र भगवानका अभिषेक किया ॥१६।। उस समय इन्द्रोंके कलशरूपी महामेघ जिनबालक रूपी पर्वतके ऊपर क्षीरोदकको वर्षा कर रहे थे परन्तु वे उन्हें रश्च मात्र भी सेदके कारण नहीं हुए थे॥१६६॥ भगवान्के श्वासोच्छ्राससे बार-बार उछाले हुए क्षीरोदकके प्रवाहसे प्रेरित देव, उस शोरोदकके समूहमें क्षण भर के लिए मक्खियों के समूहके समान तैरने लगते थे ॥१६॥ देवोंके समूहने पहले जिस मेरुको रनोंसे पीला देखा यही उस समय क्षीरोदकके पूरसे सफेद दिसने लगा था ॥१६८|| यद्यपि क्षीरसागर अत्यन्त परोक्ष है तथापि जिनेन्द्र के जन्माभिपेक्के समय देवोंके समूहने उसे प्रत्यक्ष कर दिखाया था ॥१६॥ जिसमें मेरु पर्वत स्नानका आसन था, क्षीर समुदका क्षीर स्नान जल था, और देव स्नान करानेवाले थे ऐसा वह भगवान्का स्नान था ॥१७०।। इन्द्र सामानिक तथा लोकपाल आदि अनेक देवॉन क्षीरसागरके जलसे भगवानका क्रम पूर्वक अभिषेक किया था ॥१७॥ तदनन्तर जिनके हाथ पल्लवोंके समान अत्यन्त सुकुमार थे, ऐसी इन्द्राणी आदि देवियोंने अतिशय सुकुमार जिन-बालकको अपनी दिव्य मुगन्धिसे भ्रमर समूहको आकृष्ट फग्नेयाले अनु- लेपनसे उबटन किया और इस तरह उन्होंने जिन बालकके सर्शसे समुत्पन्न नूनन मुग्य प्राप्त किया ॥१७२-१७३।। तदनन्तर पयोधरभार-मेघोंके भारमे नम्रीभूत वर्षा ऋतु जिस प्रकार पर्वतका अभिषेक करती है उसी प्रकार पयोघरभार--स्तनोंके भारसे नम्रोभून देवियान मुगन्धित जलसे भरे फलशों द्वारा भगवान्का अभिषेक किया ॥१७१|| जो पाम मुन्दर सम. चतुरन संस्थानको धारण कर रहे थे तथा क्यम नाराच संहननसे जिनका शरीर अत्यन्त मुह था, ऐमे अत्तनकाय जिन पालक यमके समान मजबूत कानोंको इन्द्र यममयो सूचीको नौकसे किसी तरह वेध मका था ।।१७५-१७६।। तदनन्तर पानी में पहिनाये हुए दो पुण्हलॉसे भगवान् म तरह मुशोभित हो रहे थे जिस तरह कि सदा मेया करनेवाले दो सूर्यसि जम्बूद्वीप १६० हरिवंशपुराणे चूलायां स्निग्धनीलायां पद्मरागमणिः कृतः । परभागमसौ लेभे हरिनीलमणौ यथा ॥१७।। ललाटपट्टविन्यस्ता सितवन्दनचर्चिका । राजार्द्धन्दुरेखेव सन्ध्यारीताम्रवर्तिनी ।।१७।। सुरश्नहेमकेयूरभूपितौ च भुजौ मृदू । रेजतुः सफणारत्नाविव यालभुजङ्गमौ ॥१०॥ प्रकोष्ठौ ज्येष्टमाणिक्यकटकप्रकटप्रभौ । अभाता रत्नशैलस्य तटाविव सुराश्रितौ ॥१८॥ स्थूलमुक्ताफलेनास्य रेजे हारेण हारिणा । वक्षस्थलं महीध्रस्य निझरेणेव सत्तटम् ॥१२॥ बभौ प्रालम्बसूत्रेण भास्वदत्नमयेन सः । कल्पद्रुम इवाश्लिष्टः कान्तकल्पलतारमना ॥१३॥ विचित्रस्योपरिस्थेन कटिसूत्रेण घाससः । बभौ कटीतटीवाटेरभ्रस्य तदिदचिपा ॥१८॥ चरणौ मणिसङ्कीर्णरणच्चरणभूपणौ । परस्परसमालापं कुर्वाणाविव रेजतुः ॥१५॥ मुद्रिकाभरणेनाभाद् रश्नहेमात्मना गलत् । स्वाङ्गुलीबहुलावण्यरक्षामुद्रीकृतेन वा ॥१६॥ दिग्धश्चन्दनपङ्केन कुङ्कुमस्थासकाचितः। सन्ध्यापीताम्रलेशाक्तस्फटिकाद्विरिवायभौ ॥१७॥ उत्तरीयाम्बरं स्वच्छ हंसमालोज्ज्वलं सृतः । शुशुभेऽमौ शुमाकारः शरदन इवानघः ।।१८।। सन्तानपारिजातादिदेवलोकतरूद्भवैः । जलस्थलोद्भवनानासुरभिप्रसवैः शुभैः ॥१८६|| भदशालवनोद्भूतै रुन्द्र नन्दनसम्भवः । पुष्पैः सौमनसोद्भूतः सपाण्डुकवनोद्भवः ॥१३॥ सुशोभित होता है ॥१७७॥ भगवान्की चिकनी एवं नीली चोटीपर धारण किया पद्मराग मणि, ऐसा वर्णोत्कर्षको प्राप्त हो रहा था मानो इन्द्रनील मणिके ऊपर ही धारण किया गया हो ॥१७२।। भगवान्के ललाट पटपर बनाई हुई सफेद चन्दनकी खौर, संध्याके पोले बादलोके बीच वर्तमान अर्धचन्द्रकी रेखाके समान सुशोभित हो रही थी ॥१७॥ उत्तम रत्नोंसे खचित स्वर्णमय बाजू- बन्दोंसे सुशोभित उनकी दोनो कोमल भुजाएँ फणाके मणियोंसे सहित दो बाल सके समान जान पड़ती थीं ॥१०॥ उत्तम मणिमय कड़ोंसे जिनकी शोभा बढ़ रही थी ऐसी उनकी दोनों कलाइयाँ, देवोसे आश्रित रत्नाचलके दो तटोंके समान सुशोभित हो रही थीं ॥१८१॥ जिसमें बड़े-बड़े मोती लगे हुए थे ऐसे सुन्दर हारसे उनका वक्षःस्थल उस तरह सुशोभित हो रहा था जिस तरह कि झरनेसे किसी पर्वतका उत्तम तट सुशोभित होता है ।।१८२॥ देदीप्यमान रत्नोंसे निर्मित प्रालम्ब सूत्रसे भगवान् उस तरह सुशोभित हो रहे थे जिस तरह कि सुन्दर कल्पलतासे वेष्टित कल्पवृक्ष सुशोभित होता है ॥१८३शारङ्ग-विरङ्गे वनके ऊपर स्थित कटिसूत्रसे भगवानकी कटि ऐसी जान पड़ती थी मानो मेधके ऊपर स्थित बिजलीकी किरणसे शोभित किसी पर्वतकी तटी ही हो ।।१८४|| जिनमे रुनझुन करनेवाले मणिमय आभूपण पहिनाये गये थे, ऐसे उनके दोनो चरण परस्पर वार्तालाप करते हुएके समान जान पड़ते थे ॥१८५|| रत्न-जटित स्वर्णमय मुदरियोंसे वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो अपनो अङ्गुलियोंसे टपकते हुए अत्यधिक सौन्दर्यको रक्षाके निमित्त उनपर मुद्रा (मुहर) ही लगा दी हो ॥१८६॥ पहले तो भगवानपर चन्दनका लेप लगाया और उसके ऊपर केशरके तिलक लगाये गये जिससे वे सध्याकालके पोले पोले मेघखण्डोंसे युक्त स्फटिकके पर्वतके समान सुशोभित होने लगे ॥१८७।। स्वच्छ एवं हंसमालाके समान उज्ज्वल उत्तरीय वस्त्रको धारण किये हुए भगवान् शुभ आकारवाले, शरदऋतुके निर्मल मेधके समान जान पड़ते थे ॥१८८।। उस समय माला बनानेके कौशलमें अत्यन्त निपुण देवांगनाओंके द्वारा सन्तानक, पारिजात, आदि देवलोकके वृक्षोंसे उत्पन्न पुष्पोंसे, जल-स्थल सम्बन्धी नाना प्रकारके शुभ सुगन्धित पुष्पासे तथा भद्रशाल, नन्दन, सौमनस और पाण्डक धनके पुप्पासे गूंथी हुई मुण्डमालाके अप्रभागको अलंकृत करनेवाली मालासे वे सुमेरुके भाभूपण भगवान् १ तनी म २ 'कटिभागादयालम्बि प्रालय सूत्रमुच्यते' ॥ इति क० पुस्तके टिप्पणी । ३. तडिदचिपः म०। ४. गलत् म०, गलन्च तत्स्वानुली यहुलावण्यं च तस्य रक्षार्थ मुद्रीकृनेनेव (क.टि.)। ५ सन्ध्याघ्रदभ्रलेशाक्त ख०, ५०,ग अष्टमः सर्गः प्रन्धितेन मुरस्रोभिर्माल्यकौशलेचुभुभिः । मण्डितो मुण्डमालाग्रमण्डनेनाद्विमण्डनः ॥११॥ भद्रशालो जगत्युच्चैर्जगतामभिनन्दनः । सोऽभारसौमनसोऽखण्डयशसा पाण्डुकः स्वयम् ॥१२॥ विशेषको भुवामोशो विशेषकविभूषितः । विशेषतो बभौ देवविशेषकविभूपितः ॥१३॥ शिशोनिरक्षनस्यास्ये स्वञ्जनाञ्जितलोचने । परं जितार्कचन्द्रामिदीप्तिकान्ती बभूवतुः ॥१६॥ श्रीशचीकात्तिलक्ष्मीमिः स्वहस्तैः कृतमण्डनः । स तथाऽखण्डलादीनां देवानामहरन्मनः ।।१९५।। ततस्तमृप नाम्ना प्रधानपुरुष सुराः । युगाद्यमभिधायेत्थं शक्राद्याः स्तोतुमुद्यताः ॥१६॥ मतिश्रुतावधिश्रेष्ठचक्षुपा वृषभ ! त्वया । जातेन भारते क्षेत्रे घोतितं भुवनत्रयम् ॥१९॥ नृभवाभिमुखेनैव भवताद्भुतकर्मणा । आवर्जितं जगद् येन किं जातस्यैतदद्भुतम् ।।१६।। पादाधास्थापितोत्तुङ्गमान महागुरुः । महागुरुस्त्वमीशानां शैशवेऽप्यशिशुस्थितिः ॥१३॥ अस्पृशन्तो भुवं सां पादाः सुरपर्वताः। पादौ मुकुटकूटोच्चैःशिरोभिस्ते वहन्त्यमी ॥२०॥ मन्त्रशक्तिरियं किन्नु प्रभुशक्तिस्तयाऽथवा | प्रोत्साहशक्तिराहोस्थित् किमप्यन्यन्महाद्भुतम् ॥२०॥ पौरुषाधिकमानीतं त्वया नाथ जगत्त्रयम् । कथमेकपदे विश्वं विधिनेव विधीयताम् ॥२०२॥ अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ॥१८६-१६१॥ वे भगवान् भद्रशाल, नन्दन, सौमनस और पाण्डुक इन चारों वन-स्वरूप सुशोभित थे। भद्रशाल इसलिए थे कि उनकी शाला अर्थात् प्रासाद भद्र अर्थात् उत्तम था। नन्दन इसलिए थे कि जगत्के सब जीवोंको अत्यधिक भानन्दित करने- वाले थे, सौमनस इसलिए थे कि उत्तम हृदयको धारण करनेवाले थे और पाण्डुक इसलिए थे कि वे स्वयं यशसे पाण्डुक-सफेद हो रहे थे ॥१६२॥ जो तीनों लोकोंमें विशेपक अर्थात् तिलक- के समान श्रेष्ठ थे, जो विशेषकों अर्थात् तिलकोंके द्वारा सुशोभित थे और जो देव-विशेषक अर्थात् विशिष्ट देवोंके द्वारा विभूपित किये गये थे ऐसे भगवान् उस समय विशेष रूपसे - शोभायमान हो रहे थे॥१६३।। यद्यपि जिन-बालक स्वयं निरञ्जन-कज्जल (पक्षमें पाप) से रहित थे तो भी उनके मुखपर जो नेत्र थे वे उत्तम अञ्जन-कजलसे अलंकृत थे और सूर्य तथा चन्द्रमाकी दीप्ति एवं कान्तिको जीतनेवाले थे ॥१४॥ श्री, शची, कीर्ति तथा लक्ष्मी नामक देवियोंने अपने हाथोंसे उन्हें उस तरह अलंकृत किया था कि जिससे वे इन्द्रादिक देवोंका मन हरण करने लगे थे ॥१६॥ तदनन्तर युगके आदिमें हुए उन प्रधान पुरुपका ऋषभ नाम रखकर इन्द्र आदि देव उनकी इस प्रकार स्तुति करनेके लिए तत्पर हुए ।।१६६।। हे ऋषभदेव ! मति श्रुत और अवधिज्ञान रूपी श्रेष्ठ नेत्रोंको धारण करनेवाले आप यद्यपि भरतक्षेत्र में उत्पन्न हुए हैं फिर भी आपने तीनों लोकोंको प्रकाशमान कर दिया है ॥१६७।। हे भगवन् ! जब आप मनुष्य-भवमै आनेके लिए सन्मुख ही थे तभी रत्नवृष्टि आदि अद्भुत कार्य दिखाकर आपने जगत्को आधीन कर लिया था फिर अब तो आप मनुष्य-भवमें स्वयं उत्पन्न हुए, अब आश्चर्यकी बात ही क्या है ? ॥१६८॥ हे नाथ ! बहुत बड़े शिखर (पक्षमें मान रूपी शिखर) से युक्त सुमेरु पर्वतको भी आपने अपने पैरके नीचे दबा दिया इसलिए आप समस्त स्वामियोंमें महागुरु अत्यन्त श्रेष्ठ हैं । और बालक अवस्थामें भी बालकों जैसी आपको चेष्टा नहीं है ॥१६॥ जो देव रूपी पर्वत अपने चरणोंके अग्रभागसे कभी समस्त पृथिवीका स्पर्श भी नहीं करते वे ही देवरूपी पर्वत अपने मुकुटरूपी ऊँचे शिखरोंसे आपके दोनों चरणोंको धारण कर रहे हैं। सो यह क्या आपकी मन्त्र शक्ति है ? या प्रभु शक्ति है ? या उत्साह शक्ति है ? अथवा कोई दूसरा हो महान् आश्चर्य है ? भावार्थ-जो देव, देवत्वके अभिमानमें चूर होकर पृथिवीको तुच्छ समझते हैं वे ही आपको अपने शिरपर धारण कर रहे हैं, इससे आपका सर्वोपरि प्रभाव सिद्ध है ॥२००-२०शा हे नाथ ! पौरुषसे वशमें न होनेवाले तीनों जगत्को आपने कैसे विधिके समान १. 'तेन वित्तश्चुञ्चुपचणपौ' इति चुञ्चुप्प्रत्ययः । २१ हरिवंशपुराणे क चेदं सौकुमार्य ते क च काश्यमीदृशम् । नाथान्योन्यविरुद्धार्थसम्भवस्त्वयि दृश्यते ॥२०३॥ अष्टोत्तरसहस्रोच्चैलक्षण व्यञ्जनाञ्चितम् । रूपं तवैतदाभाति भूसुरासुग्दुर्लभम् ॥२०॥ रूपातिशयतो लोके प्रथमश्वरमश्च ते । विधत्ते प्रणतं विश्वं विग्रहो' विग्रहाद् विना ।।२०५।। हिरण्यवृष्टिरिष्टाभू गर्भस्थेऽपि यतस्त्वयि 1 हिरण्यगर्भ इत्युच्चैर्गीर्वाणर्गीयसे ततः ।।२०६॥ सह ज्ञानत्रयेणान तृतीयभवभाविना । स्वयम्भूतो यतोऽतस्त्वं स्वयम्भूरिति भाष्यसे ॥२०७॥ व्यवस्थानां विधाता त्वं भविता विविधा मनाम् । भारते यत्ततोऽन्वर्थ विधातेत्यभिधीयसे ।।२०।। भपूर्वः सर्वतो रक्षां कुर्वन् जातः पतिः प्रभो । प्रजानां त्वं यतस्तस्मात् प्रजापतिरितीर्थसे ॥२०१।। आकन्तीपुरसं प्रीत्या बाहुल्येन त्वयि प्रभो । प्रजाः प्रभो यतस्तस्मादिधाकुरिति कास्यसे ।।२१०॥ पूर्वः सर्वपुराणानां त्वं महामहिमा महान् । इह दीव्यसि यत्तेन पुरुदेव इतीध्यसे ।।२५॥ भरतासनमध्यास्य त्रैलोक्यैश्वयंमर्जयत् । युज्यते ततवात्यल्पमनन्तैश्वर्ययोगिनः ।।२१२॥ रवं विधाता स्वयम्बुद्धस्तपसा दुष्करात्मनाम् । सञ्चैता चेतसामुच्चैयंशसा वाऽतिशायिनाम ॥२१३।। श्रेयसो दानधर्मस्य श्रेयोऽयं प्राणिनां मुनिः । भुवि दर्शयिता वीरः विशुद्धां पात्रता स्वयम् ॥२१॥ स्वमनगभुजङ्गस्य मन्त्रो द्वेषद्विपाकुशः। मोहाघ्रपटलभ्रान्तिभ्रंशहेतुः प्रभञ्जनः ॥२:५।। एक साथ अपने आधीन कर लिया ? भावार्थ-जिस प्रकार विधि-नियति तीनों जगत्को अपने आधीन किये हुए है उसी प्रकार आपने भी तीनों जगत्को अपने आधीन कर लिया है, परन्तु यह कार्य पुरुषार्थ साध्य नहीं है, यह तो केवल आपकी अचिन्त्य आत्मशक्तिका ही प्रभाव है ॥२०२॥ हे नाथ ! कहाँ तो यह सुकुमारता ? और कहाँ ऐसी कठोरता ? हे प्रभो ! विरुद्ध पदार्थोंका संभव आपमें ही दीख पड़ता है ॥२०३॥ मनुष्य, देव और दानवोंके लिए दुर्लभ तथा एक हजार आठ व्यञ्जन और लक्षणों से युक्त आपका यह रूप अतिशय शोभायमान हो रहा है ॥२०४।। हे भगवन् ! आपका शरीर चरम-पर्याय धारण करनेकी अपेक्षा अन्तिम है तथा रूपके अतिशयसे प्रथम है-सर्वश्रेष्ठ है और युद्धके विना ही समस्त विश्वको नम्रीभूत कर रहा है ॥२०॥ हे नाथ ! जब आप गर्भ में स्थित थे तभी सबको इष्ट हिरण्य-सुवर्णकी वृष्टि हुई थी इसलिए देव आपको हिरण्यगर्भ (हिरण्यं गर्भे यस्य सः) कहते हैं ।।२०६॥ हे प्रभो ! इस भवसे पूर्ण तीसरे भवमें जो तीन ज्ञान प्रकट हुए थे उन्हींके साथ आप यहाँ स्वयं उत्पन्न हुए हैं इसलिए आप स्वयम्भू कहे जाते हैं ।।२०७॥ क्योंकि आप भरत क्षेत्र में नाना प्रकारको व्यवस्थाओं के करनेवाले होंगे इसलिए आप विधाता इस सार्थक नामके धारी कहे जाते हैं ॥२०८।। हे प्रभो! आप सब ओरसे प्रजाकी रक्षा करते हुए अपूर्व ही प्रभु हुए हैं इसलिए आप प्रजापति कहलाते हैं ।।२०६॥ हे प्रभो! आपके रहते हुए प्रजा बहुत प्रीतिसे इतुरसका आम्वादन करेगी इसलिए आप इक्ष्वाकु कहे जाते हैं ॥२१०॥ भाप समस्त पुराण पुरुषों में प्रथम हैं, महा महिमाके धारक हैं, स्वयं महान् हैं और यहाँ अतिशय देदीप्यमान हैं इसलिए पुरुदेव कहलाते हैं ॥२११॥ हे भगवन् ! आपने भरतक्षेत्रके आसनपर आरूढ होकर तीन लोकका ऐश्वर्य उपार्जित किया है सो अनन्त ऐश्वर्यको धारण करनेवाले आपके लिए यह अत्यन्त तुच्छ बात है-आश्चर्यकी बात नहीं है ।।२१२॥ हे प्रभो! आप स्वयं बुद्ध होकर अतिशय कठिन तपके करनेवाले हैं तथा उत्तम ज्ञान और बहुत भारी यशके संचेता हैं ।।२१३॥ हे विभो ! पृथिवीपर आप धीर-वीर मुनि बनकर प्राणियोंके लिए कल्याणकारी दान, धर्मको श्रेष्ठता तथा स्वयं निर्दोष पात्रताको दिखलावेगे। भावार्थ-आप मुनि बनकर लोगोमे दान-धर्मको प्रवृत्ति चलायेगे तथा अपनी प्रवृत्तिसे प्रकट करेंगे कि निर्दोप पात्र कैसे होते हैं ? ॥२१४॥ हे भगवन् ! आप कामरूपी भुजङ्गको नष्ट करने के लिए मन्त्र हैं, द्वेप रूपी १ लक्षणं म.! २. चरमस्य म०! ३ शरीरं । ४ युद्धात् । ५ विधिनात्मनाम् म । ६ श्रास्या- दयन्ति।

अष्टमः सर्गः प्रशस्तस्तिमितध्यानसुप्तमीनमहाहदः। 'बन्धानन्तरसन्धानघातीन्धनहुताशनः ॥२६॥ स्नेहानपेक्षकैवल्यप्रदीपोद्योतिताखिलः । देशको मोक्षमार्गस्य निसर्गाद भविता भुवि ॥२१७॥ कालमष्टादशाम्भोधिकोटोकोटीप्रमाणकम् । धर्मनामनि निमूलं नष्टे स्रष्टेह भारते ॥२१॥ स्वर्गापवर्गमार्गस्य मागणे भन्यदेहिनाम् । दिग्मोहान्धधियां धीमान् जातस्त्वमुपदेशकः ॥२१॥ जायन्तेऽभ्युदयश्रीशाश्रयो निःश्रेयसनियः । साम्प्रतं भुवि भव्यौघा नाथ स्वदुपदेशतः ॥२२०॥ प्रमाणनयमार्गाभ्यामविरुद्धेन जन्तवः । त्वदुपज्ञेन मार्गेण प्राप्नुवन्तु पदं प्रियम् ॥२२१॥ प्रणन्तव्यः प्रयत्नेन स्तोतव्यस्त्वं हितार्थिनाम् । स्मर्तव्यः सततं नाथ जगतामुपकारकः ।।२२२॥ प्रणतेस्ते कृती कायो गुणिनी वाग्गुणस्तुतेः । प्रणिनां प्राणिधानेन गुणानां गुणवन्मनः ॥२२३॥ नमस्ते मृत्युमल्लाय नमस्ते भवभेदिने । नमस्ते जरसोऽन्ताय नमस्ते ध्वस्तकर्मणे ॥२२४॥ नमस्तेऽनन्तबोधाय नमस्तेऽनन्तदशिने । नमस्तेऽनन्तवीर्याय नमस्तेऽनन्तशर्मणे ॥२२५॥ नमस्ते लोकनाथाय नमस्ते लोकबन्धवे । नमस्ते लोकवीराय नमस्ते लोकवेधसे ॥२२६॥ हाथीको वश करनेके लिए अंकुश हैं तथा मोहरूपी मेघ-पटलके संचारको नष्ट करनेके लिए प्रचण्ड वायु हैं ॥२१५॥ हे स्वामिन् ! आप प्रशस्त तथा निश्चल ध्यानके द्वारा जिसमें मछलियाँ सो रही हैं ऐसे महा सरोवर के समान हैं, तथा संवरको धारणकर आप घातिया कर्मरूपी ईन्धनको जलाने- के लिए अग्नि स्वरूप हैं ॥२१६।। हे नाथ ! तेलसे निरपेक्ष केवलज्ञानरूपी दीपकके द्वारा जिन्होंने समस्त पदार्थोको प्रकाशित कर दिया है ऐसे मोक्षमार्गके उपदेशक आप पृथिवीपर स्वभावसे ही होंगे ॥२१७॥ हे भगवन् ! इस भारतवर्षमे अठारह कोडाकोड़ी सागर तक धर्मका नाम निर्मूल नष्ट रहा अब आप पुनः उसकी सृष्टि करेंगे। भावार्थ-उत्सर्पिणीके चौथे, पाँचवें, छठवें और अवसर्पिणीके पहले, दूसरे तथा तीसरे कालके अठारह कोड़ाकोड़ो सागर तक यहाँ भोग-भूमिकी प्रवृत्ति रही इसलिए भोगोंकी मुख्यता होनेसे यहाँ चारित्र रूप धर्म नहीं रहा, अव आप पुनः उसकी प्रवृत्ति करेंगे ॥२१॥ हे नाथ ! आप परम बुद्धिमान हो तथा दिशा भ्रान्तिके कारण जिनकी बुद्धि अन्धी हो रही है ऐसे भव्य प्राणियोंके लिए आप स्वर्ग तथा मोक्षका मार्ग बतलाने- के लिए उपदेशक हुए हैं ॥२१॥ हे नाथ ! इस समय आपके उपदेशसे भव्य जीवोंके समूह, संसारमें स्वर्ग लक्ष्मीके स्वामी तथा मोक्षलक्ष्मीके आश्रय होंगे ।।२२०।। हे भगवन् ! आपके द्वारा चलाया हुआ मार्ग प्रमाण और नयमार्गके अविरुद्ध है, उसपर चलकर जगत्के प्राणी अपने प्रिय स्थानको प्राप्त करें ।।२२१॥ हे नाथ ! आप तीनों लोकोंका उपकार करनेवाले हैं इसलिए हितके इच्छुक जीवोके द्वारा प्रयत्नपूर्वक नमस्कार करने योग्य, स्तुति करने योग्य और ध्यान करने योग्य हैं (१२२२॥ हे प्रभो! आपको प्रणाम करनेसे प्राणियोंका काय कृतार्थ हो जाता है, आपके गुणों- की सुति करनेसे उनकी वाणी सार्थक हो जाती है और आपका ध्यान करनेसे उनका मन गुण- सहित हो जाता है ॥२२३॥ हे नाथ ! आप मृत्युको नष्ट करनेके लिए मल्ल हैं अतः आपको नमस्कार हो, आप संसारको नष्ट करनेवाले हैं अतः आपको नमस्कार हो, चाप बुढ़ापेफा अन्त करनेवाले हैं अतः आपको नमस्कार हो, आप कर्माको नष्ट करनेवाले हैं अत: आपको नमस्कार हो ॥२२४|| हे भगवन् ! आप अनन्त ज्ञानके स्वामी हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप अनन्त दर्शनके धारक हैं, इसलिए आपको नमस्कार हो, आप अनन्त-बलसे सहित हैं, इसलिए आपको नमस्कार हो, आप अनन्त सुखसे सम्पन्न हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ॥२२॥ आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप समस्त जीवोंके वन्धु हैं इस- लिए आपको नमस्कार हो, भाप लोकमें अद्वितीय वीर हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप १ बन्धानन्तरा संवरः तस्य सघानं धारणं येन घातीधनस्य हुताशनः । २. भिया क. 1 चारित खलु धम्मो-(कुन्दकुन्द)।

3 हरिवंशपुराणे नमस्ते जिन चन्द्राय नमस्ते जिन भानवे । नमस्ते जिन सार्वाय नमस्ते जिन तायिने ॥२२७॥ इति स्तुतिशतैः स्तुन्वा मत्वा शतमखादयः । भक्तिस्त्वय्यस्तु शस्तेति शतशस्तं ययाचिरे ॥२२॥ ततः सरमसोद्यातसुरसङ्घातसेनया । वृतः शतावरो मेरोरुञ्चचाल जिनान्वितः ॥२२६॥ सुवर्णकर्णिकारोएराशिपिञ्जरविग्रहम् । तमैरावतमारोप्य रौप्यादिमिव जङ्गमम् ॥२३०॥ तामयोध्यां परायोध्यां ध्वजमालाविभूषिताम् । वादिनध्वनिधोरां स्वामध्यास्य ध्वजिनीमिव ॥२३॥ पौलोम्या मातुरसङ्ग स्थापयिरवा जिनं ततः । जनकौ प्रणिपत्याशु कृतनेपथ्यविग्रहः ॥२३२॥ नृत्यरसुराङ्गनोद्भासिमास्वद्भुजवनावृतः । नन ताण्डवारम्भचलविश्वम्भरो हरिः ॥२३३॥ चिरं प्रेक्षकयोरने नटित्वाऽऽनन्दनाटकम् । पित्रोः कृत्वोचितं देवः सहेन्द्रः स्वास्पदं ययौ ॥२३॥ कोट्यस्तिस्रोऽर्द्धकोटी च वसुदृष्टिदिने दिने । मासान् पञ्चदशोत्पत्तेः प्राग जिनस्यापतगृहे ॥२३॥ वसन्ततिलकावृत्तम् प्राप्तोऽभिषेकममरेन्द्रगणगिरीन्द्र प्राप्तःसुतस्त्रिभुवनेश्वर इन्युदारौ। प्राप्तौ महाप्रमदभारयशौ तदानीं नाभिश्च नाभिवनिता च सुखं स्ववेद्यम् ॥२३६॥ लोकके विधाता हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ॥२२६।। हे जिन! आप चन्द्रमा रूप हो इसलिए आपको नमस्कार हो, हे जिन ! आप सूर्य स्वरूप हो इसलिए आपको नमस्कार हो, हे जिन ! आप सबका हित करनेवाले हैं इसलिए आपको नमस्कार हो और हे जिन ! आप सबकी रक्षा करनेवाले हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।२२७|| इस तरह सैकड़ों प्रकारकी स्तुतियोंसे स्तुति कर तथा नमस्कारकर इन्द्र आदि देवोंने उनसे बार-बार यही याचना की कि हे भगवन् ! हमारी उत्तम भक्ति सदा आपमें बनी रहे ॥२२८।। तदनन्तर शीघ्रगामी देवोकी सेनासे घिरा हुआ इन्द्र, जिन-बालकको साथ ले मेरु पर्वतसे चला ॥२२६।। सुवर्ण और कनेरके फूलोंकी राशिके समान पीत शरीरके धारक जिन बालक को चलते-फिरते रजताचलके सदृश ऐरावत हाथीपर सवारकर वह अयोध्याकी ओर चला ॥२३०॥ जो शत्रुओके द्वारा अयोध्या थी, ध्वजाओंकी पंक्तियोसे सुशोभित थी, बाजोंको ध्वनि- से व्याप्त थी तथा अपनी सेनाके समान जान पड़ती थी ऐमी अयोध्याम पहुँचकर उसने जिन- वालको इन्द्राणीके द्वारा माताको गोद में विराजमान कराया। तदनन्तर माता-पिताको नमस्कार. कर शीघ्र ही सुन्दर वेपभूपासे युक्त हो ताण्डव नृत्य करना प्रारम्भ किया। उस समय वह इन्द्र, मृत्य करनेवाली देवाहनाओंसे सुशोभित सुन्दर भुजा रूपी वनसे घिरा हुआ था और ताण्डव मृत्यो प्रारम्भमें ही उसने पृथियीको कम्पायमान कर दिया था ॥२३१-२३३॥ भगवानके माता- पिता इस नृत्यके दर्शक थे। उनके आगे चिर काल तक आनन्द नाटकका अभिनय कर तथा यथा- योग्य उनका सरकारकर इन्द्र देवों के साथ अपने स्थानपर चला गया ॥२३४॥ जिनेन्द्र भगवानके जन्मसे पन्द्रह माह पूर्व प्रतिदिन उनके पिनाके घर साढ़े तीन करोड़ रत्नोंको वर्षा आकाशसे पढ़ती यी ॥२३शा हमारा पुत्र इन्द्रोफे समूह द्वारा सुमेरु पर्वतपर अभिषेकको प्राप्त हुआ है तथा तीनों लोकोंका स्वामी है। यह जानकर उस समय अतिशय उदार राजा नाभिराज और मरुदेवी १ जिनमय म.. २. इन्द्रः। ३. मुरणं च कर्णिकाराशि च तेषामुरुराशिस्तनिअरो विग्रहो यस्याम् ( ८० टि.) । मुरणकर्णिकारोहराशि-मः।

अष्टमः सर्गः
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स्वर्गावतारजननाभिश्वद्विभेद-
कल्याणवर्णनमिदं वृपभेश्वरस्य ।
भक्त्या सदा पठति योऽत्र शृणोति यश्च
कल्याणमेति स जनो जिनभास्करस्य ॥२३७॥
इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती ऋपमनाथजन्माभिपेकवर्णनो
नाम अष्टमः सर्गः॥८॥
महान आनन्दके वशीभूत हो स्वसंवेद्य सुखको प्राप्त हुए ॥२३६॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि भग-
वान वृषभदेवके स्वर्गावतार और अन्माभिषेक इन दो कल्याणकोंके इस वर्णनको जो भक्तिपूर्वक
सदा पढ़ता है, अथवा जो सुनता है वह इस संसारमें जिन-सूर्य के ही समान कल्याणको प्राप्त
होता है ॥२३७॥
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें भगवान्
ऋषभदेयके जन्माभिषेकका वर्णन करनेवाला आठवाँ सर्ग समाप्त हुभा ॥८॥

नवमः सर्गः अथेन्द्रेण कराङ्गुष्ठे निपिक्तममृतं पिबन् । पित्रोनेत्रामृताहारं वितरन् वर्द्धते जिनः ॥१॥ वृद्धः शीतमयूखस्य बालचन्द्रस्य दर्शनात् । प्रत्यहं वर्द्धमानस्य जगन्प्रमदसागरः ॥२॥ बालक्रीडामृतरसः पीयमानोऽप्यनारतम् । सुलभोऽपि विभो भूल्लोकलोचनतृप्तये ॥३॥ कुमारः क्रीडितं चक्रे स शक्राहितैहित । प्रतिविम्वैरिवात्मीयह| देवकुमारकैः ॥४॥ मृदुशय्यासनं वस्त्रं भूपणं चानुलेपनम् । भोजन वाहनं यानं तस्यासीत् देवनिर्मितम् ॥५॥ भक्त्या शक्राज्ञया चाभूदु धनदो धनदोऽर्थतः । वयःकालानुरूपेण वस्तुनाऽनुचरन् जिनम् ॥६॥ सहायैः सहजैः स्वच्छः दिव्यैरिव कलागुणैः । सम्पूर्णो यौवनेनापि जिनश्चन्द्र इवाबभौ ॥७॥ तुझांसी साङ्गदी वृत्तौ सुप्रकोष्टौ महाभुजौ । परिष्वगाय पर्याप्ती प्रैलोक्यविपुलश्रियः ॥८॥ श्रीदासलक्षणेनोरुवक्षःस्थलमभाद् विभोः । गाढोपगूढराज्यश्रीकुचाग्रोत्पीडितेन वा ॥६॥ सुश्लिष्टपदजद्धोद्यगृढजानूरदण्डयोः । वक्षःप्रासादसंस्तम्भस्तम्भयोः श्रीरभूत् परा ॥१०॥ केशकुन्तलभारोऽभान्नीलो हेमाचलस्य सः । छन्नाकारे शिरस्युच्चैरिन्द्रनीलचयो यथा ॥११॥ श्रीलंलाटस्य नासायाः सुकर्णोत्पलनालयोः । सज्यचापभ्रुवोर्वापि वाचागोचरमस्यगात् ॥१२॥ अथानन्तर इन्द्रके द्वारा हाथके अँगूठेमे स्थापित अमृतको पीते तथा माता पिताके नेत्रों के लिए अमृत रूप आहार प्रदान करते हुए भगवान् जिनेन्द्र दिनोदिन बढ़ने लगे ॥१॥ प्रतिदिन बढ़ने वाले जिन-बालकरूपी चन्द्रमाके देखनेसे संसारके समस्त प्राणियोंका आनन्दरूपी सागर वृद्धिको प्राप्त होने लगा ||२|| यद्यपि भगवान्का चालक्रीड़ा रूपी अमृतरस पिया जाता था और सबके लिए निरन्तर सुलभ भी था तो भी वह मनुष्योंके नेत्रोंकी तृप्तिके लिए पर्याप्त नहीं था। भावार्थ-भगवान की बालक्रीड़ा देखकर मनुष्योंके नेत्र संतुष्ट नहीं होते थे ॥३॥ जिन-बालक, इन्द्रके द्वारा भेजे हुए, हितकारी एवं अपने हो प्रतिबिम्बके समान दिखनेवाले देव-बालकोके साथ मनोहर फ्रीड़ा करते थे ॥४॥ भगवान्का कोमल विरतर, कोमल आसन, वस्त्र, आभूपण, अनुलेपन, भोजन, वाहन तथा यान आदि सभी वस्तुएँ देव निर्मित थीं ॥५॥ इन्द्रकी आज्ञानुसार अवस्था तथा ऋतुके अनुकूल वस्तुओंसे भक्तिपूर्वक भगवान्को सेवा करनेवाला धनद-कुवेर वास्तवमें ही धनद-धनको देनेवाला था ॥६॥ अपने सहज मित्रोके समान स्वच्छ एवं दिव्य कलारूप गुणोंसे युक्त तथा यौवनसे परिपूर्ण जिनेन्द्र चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे ॥७॥ ऊँचे कन्धोंसे मुशोभित, बाजूबन्दोसे युक्त गोल तथा उत्तम कलाइयोंसे सहित उनकी दोनों महाभुजाएँ त्रैलोक्य- की लक्ष्मीका आलिङ्गन करनेके लिए पर्याप्त थीं । भगवान्का विशाल वक्षःस्थल श्रीवत्स चिह्न- से ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो अच्छी तरहसे आलिङ्गित गज्यलक्ष्मोके स्तनके अप्रभागसे ही पीड़ित हो ॥६॥ जिनके पैर और संघाएँ अच्छी तरह मिली हुई थीं, जिनके घुटने मांसपेशियों- में भीतर छिपे हुए थे और जो वक्षस्थल रूप महलके आधार भूत स्तम्भोंके समान जान पड़ते थे ऐसे उनके दोनों उगओंकी शोभा बहुत चढ़ी-बढ़ी थी ॥१०॥ भगवान्के छनाकार शिरपर काले घुपराले यालीका समूह ऐमा जान पड़ता था मानो सुमेरुके ऊँचे शिसरपर इन्द्रनील मणियोंका समूह ही रक्या हो ॥११॥ उनके ललाट, नाक, मुन्दर कानोंपर लगे हुए नील कमलोंकी नाल, भोर डोरी पदे घनुपी समानता फरनेवाली भौहोकी शोभा वचन मार्गको उल्लंघन कर चुकी १ वृद्धिंगतः । २ इमारपीडित म० । ३ हिनः म० । ४. कुरेः । ५. धनदायकः । ५. मारोप-म० । ७. सत्र-म.।

नवमः सर्गः चन्द्रश्चन्द्रिकया रात्री दिवा दीपया दिवाकरः । मुदे निभुवने न स्यात् तस्य ताभ्यां तयोमुखम् ॥१३॥ पुण्डरीकस्य पत्रेण नेत्रे श्रोते सूने समे । पिण्डालतकाक्तं वा हस्तगादतलाधरम् ॥3॥ शुद्धमौक्तिकसङ्घातघटितेव धनद्युतिः । कुन्दद्युतिमधाज्जैनी दन्तपतिरदन्तुरा १५॥ सनवन्यजनशते सहाशतलक्षणे । पञ्चचापशतोच्छाये तथा हेमाद्रिसनिमे ॥१६॥ रूपशोभासमस्तेयं जिनस्य गदितुं सह । लेशेनापि न सा शक्या शक्रकोटिशतैरपि ॥१७॥ स जगत्त्रयरूपिण्या नन्दया च सुनन्दया । प्रौढयौवनया प्रौढश्विकीड विधिनोढया ||१En स गौरीश्यामयोमध्ये स्तवकस्तनयोस्तयोः । जगत्कल्पद्रुमोऽमामीलतयोरङ्गलग्नयोः ॥१६॥ नसा कान्तिनं सा दीक्षिन सा सम्पद् न सा कला । अस्यानयोश्च या नाऽभूत् तत्र सौरयं किमुग्यताम् ॥२०॥ भरतानन्दनं नन्दा नन्दनं चक्रवर्तिनम् । भरताख्यं सुनां ब्राह्मीमपि युग्ममसूत सा ॥२१॥ सुनन्दा वाहुबलिनं महाबाहुवलं सुतम् । तथैव सुपुवे लोके मुन्दरामपि सुन्दरीम् ॥२२॥ भष्टानवतिरस्येति नन्दायां सुन्दराः सुताः । जाता वृपभसेनाद्या वेद्याश्वरमविग्रहाः ॥२३॥ अपरालेख्यगन्धर्वगणितादिकलाभवम् । मुमेधान: कुमारीभ्यामवगाहयति स्म सः ॥२४॥ अथान्यदा प्रजाः प्राता नाभेयं नाभिनोदिताः । स्तुतिपूर्व प्रणम्योचुरेकीभूय महातयः॥२५॥ थी॥१२॥ तीनों लोकोंमें चन्द्रमा अपनी चाँदनीसे रात्रि ही आनन्द उत्पन्न करता है और सूर्य अपनी दीप्तिसे दिनमें ही लोगोंको आनन्द पहुँचाता है परन्तु भगवानका मुख दिन रातके भेदके विना निरन्तर सबको आनन्द पहुंचाता था अतः वह न तो चन्द्रमाकी चाँदनीके समान था और न सूर्यकी दीप्तिके ही सदृश था ॥१३॥ उनके कानों तक लम्बे नेत्र कमलपत्रके समान थे और हथेलियाँ पदतल और अधरोष्ठ महावरके रहके समान लाल थे॥१४|| शुद्ध मोतियोंके समूहसे बनी हुईके समान अत्यन्त चमकदार एवं ऊँचे-नीचे विन्याससे रहित उनको दाँतों की पंक्ति कुन्दपुष्पकी शोभा धारण कर रही थी ॥१शा नौ सौ व्यञ्जन, और एक सौ आठ लक्षणोंसे सहित, पाँच सौ धनुप ऊँचे एवं हेमाचल-सुमेरुके समान उनके शरीरको जो शोभा थी उस सबको यदि सैकड़ों करोड़ इन्द्र भी एक साथ कहना चाहें तो भी लेशमात्र नहीं कह सकते ॥१६-१७॥ | जब भगवान् पूर्ण युवा हुए तब तीनों लोकोंकी अद्वितीय सुन्दरी प्रौढ़ योयनवती नन्दा और सुनन्दाके साथ उनका विधिपूर्वक विषाह हुआ और उनके साथ वे क्रीड़ा करने लगे ॥१८॥ गुच्छोंके समान स्तनोको धारण करनेवाली उन गौराही एवं नये योवनवती नन्दा और मुनन्दाके बीचम भगवान ऐसे जान पड़ते थे मानो अगमें लगी हुई दो लताओंके बीच में संसारके कल्प- वृक्ष हो हो ॥१॥ संसारमें न वह कान्ति थी, न दीप्ति थी, न संपत्ति थी, और न वह कला ही थी जो भगवान ऋषभदेव और नन्दा सुनन्दाको प्राप्त नहीं थी फिर उनके मुसका क्या वर्णन किया जाय ? |२०नन्दाने भरतक्षेत्रको आनन्दित करनेवाले भरत नामक चक्रवर्ती पुत्रको और प्रामो नामक पुत्रीको युगल रूपमें उत्पन्न किया ॥२१॥ और मुनन्दा नामक दूसरी रानीने महा बाहुबलमे युक्त याहुबलो नामक पुत्र तथा संसारमे अतिशय रूपवती सुन्दरी नामक पुत्रीको जन्म दिया ॥२२॥ भरत और नामोके सिवार भगवानको मुगन्दा रानीके पृषभसेनको आदि लेकर अंठानवे पुन और हुए | उनके ये सभी पुत्र घरमशरीरी ये ॥२३॥ भगवान्ने अतिशय पुद्धिसे सम्पन्न अपने ममस्त पुत्रोंके साथ-साथ ब्राझी भौर सुन्दरी नामक दोनों पुत्रियों को भी अक्षर, चित्र, सङ्गीत और गणित आदि कलाओंके सागरमे प्रविष्ट कराया था। भावार्थ-अपने समरन पुत्र-पुत्रियोंको उन्होंने विविध कलाओम पारद्गत किया था।।२।। अथानन्नर किमी ममय यहुत मारो व्यथासे युक्त समात प्रजा, राजा नाभिराज से प्रेरित २ रिधिवत्परिणीतया । ३ भरतक्षेनबनानन्दनन् । ४ मुटुमे (!). ५ मुमेधानी म1 मुष्ट बुद्धिमापनः पुत्रः सद (5. टि.)। ६ कुमाराम्याम् म । १ पानेग-म..

हरिवंशपुराणे प्रमो कल्पद्रुमाः प्वं प्रजानां वृत्तिहेतवः । तेषां परिपयेऽभूवन् स्वयंच्युतरसेक्षवः ॥२६॥ दिव्येक्षुरसतृप्तानां रवितानां तवौजसा । प्रजानां नाथ ! दूरेण विस्मृताः फरपपादपाः ॥२७॥ इदानी छिन्नभिग्नाव न परन्तीवो रसम् । यान्ति कालानुभावेन मृदवोऽपि कटोरताम् ॥२८॥ फलभारवशासम्रा दृश्यन्ते नृगजातयः । न विमो वयमेताभिः कथमविधिवेत् ॥२६॥ सुरभीणां घटोनीनां महिषीणां च सन्ततम् । स्तनेभ्यो प्रचरत् भषयमभक्ष्यं वा तदुष्यताम् ॥३०॥ कण्ठाश्लेपोचिताः पूर्व सिंहव्याघ्रकादयः । भस्मानुजयन्तीशे कुपुग्ना इव साम्प्रतम् ॥३॥ भतः क्षुधामहामस्ता जीवनोपायदर्शनात् । स्वामिशनुगृहाणता रक्षणाय भयात् प्रजाः ॥३२॥ ततो वीचय क्षुधासीणा: प्रज्ञाः सर्वाः प्रजापतिः । कृस्वातिहरणं तासां दिव्याहारैः कृपान्वितः ॥३३॥ सर्वानुपदिदेशासी प्रजानां वृत्तिमिद्धये । उपायान् धर्मकामार्थान् साधनान्यपि पार्थिवः ॥३॥ असिर्मपी कृषिविद्या वाणिज्यं शिरूपमित्यपि । पटकम शर्मसिद्धयर्थ सोपायमुपदिष्टवान् ॥३५॥ पशुपाल्यं ततः प्रोक्तं गोमहिप्यादिसङ्ग्रहम् । वर्जनं फरसावानां सिंहारीना यथायथम् ॥३६॥ ततः पुत्रशतेनापि प्रजया च कलागमः । गृहीतः सुगृहीतं च कृतं शिल्पिशतं जनैः ॥३०॥ पुरग्रामनिवेशाश्व ततः शिल्पिजनैः कृताः । सखेटकवंटारयाश्च सर्वत्र भरतरिती ॥३॥ क्षत्रियाः तितस्त्राणात् वैश्या वाणिज्ययोगतः । शूद्राः शिल्पादिमम्बन्धानाता वर्णास्त्रयोऽप्यतः ॥३६॥ हो एक साथ भगवान् वृषभदेवके पास पहुंची और स्तुति पूर्वक प्रणामकर कहने लगी ॥२।। हे प्रभो! पहले, कल्पवृक्ष प्रजाकी आजीविकाके साधन थे, फिर उनके नष्ट होनेपर स्वयं ही जिनसे रस चू रहा था ऐसे इन वृक्ष साधन हुए ॥२६॥ हे प्रजानाथ ! उन दिव्य इक्षु वृक्षोंके रससे प्रजा इतनी सन्तुष्ट हुई और आपके प्रतापने उसकी ऐसी रक्षा की कि उसने कल्पवृक्षोंको दूरसे ही भुला दियो ॥२७॥ परन्तु इस समय वे इक्षुवृत छिन्न-भिन्न होनेपर भी रस नहीं देते हैं सो ठीक ही है क्योकि समयके प्रभावसे कोमल भी कठोरताको प्राप्त हो जाते हैं ।।२८। यद्यपि फलोके भारसे झुके हुए नाना प्रकारके तृण दिखाई देते हैं परन्तु हम लोग नहीं जानते कि इनसे अन्न कैसे प्राप्त किया जाता है ? ॥२६॥ घटके समान स्थूल स्तनोको धारण करनेवाली गायों और भैंसोंके स्तनोंसे भी कुछ झर रहा है सो वह भक्ष्य है या अभक्ष्य यह कहिये ॥३०॥ जो सिंह, व्याघ्र तथा भेड़िया आदि पहले कण्ठालिङ्गन करनेके योग्य थे हे नाथ! अब वे ही इस समय कुपुत्रोके समान हम लोगोंको भयभीत कर रहे हैं ॥३१॥ इसलिए हे स्वामिन् ! सुधाको तीन वाधा- से ग्रस्त इस प्रजाको जीवन निर्वाहके उपाय दिखाकर तथा भयसे उसकी रक्षाकर अनुगृहीत कीजिए ॥३२॥ तदनन्तर दयालु भगवान्ने समस्त प्रजाको भूखसे व्याकुल देख पहले तो दिव्य आहारके द्वारा सबकी पीड़ा दूर की फिर आजीविकाके निर्वाहके लिए सब उपाय तथा धर्म अर्थ और काम रूप साधनोका उपदेश दिया ॥३३-३४॥ उन्होंने सुखकी सिद्धिके लिए अनेक उपायोके साथ असि, मपी, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छह कोका भी उपदेश दिया ।।३५॥ तदनन्तर उन्होंने यह भी बताया कि गाय, भैंस आदि पशुओका संग्रह तथा उनकी रक्षा करनी चाहिए और सिह आदिक दुष्ट जीवोंका परित्याग करना चाहिए ॥३६॥ तदनन्तर भगवान के सौ पुत्रों और प्रजाने कला शाब सीखा, एव लोगोने सैकड़ों शिल्पी बनाकर उन्हें अपनाया ॥३७॥ जिससे शिल्पिजनीने भरतक्षेत्रकी भुमिपर सब जगह गाँव, नगर तथा सेट, कर्वट आदिको रचना की ॥३८॥ उसी समय क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये तीन वर्ग भी उत्पन्न हुए । विनाशसे जोवोंको रक्षा करनेके कारण क्षत्रिय, वाणिज्य-व्यापारके योगसे वैश्य भौर १. क्ण्ठाश्लेषोदिताः म०१२.तीशः म० 1 ३. संग्रहः म । ४. क्षततस्त्राणात् म० ।

नवमः सर्गः पड्भिः कर्मभिरासाद्य सुखितामर्थवत्तया । प्रजाभिस्तत्सुतुष्टाभिः प्रोक्तं कृतयुगं युगम् ॥१०॥ सेन्द्राः सुरास्तदागन्य करवा राज्यामिपेचनम् । नाभेयस्य प्रजानां ते सौस्थिन्यं विदधुः परम् ॥४॥ अयोध्येति विनीतेति विनोतजलसङ्घला । सातेति च विख्याता पुरी रेजे उदाधिकम् ॥३२॥ इक्ष्वाकुक्षत्रियज्येष्ठज्ञातिज्ञा लोकबन्धुना । भूमौ वृपमनाथेन स्थापितास्तेऽन रमणे ॥४३॥ कुरवः कुरुदेशेशी उपास्ते चोप्रशासनाः । न्यायेन पालनाद् भोजाः प्रजानामपरे मताः ॥४४॥ राजानश्च तथैवान्ये जाताः प्रकृतिरञ्जनाः । श्रेयःसोमप्रभायेस्तैः कुरुपुत्रस्तु भूरभात् ॥४५॥ दिव्यान् भोगान् सुरानीतान् भुञानस्य जगद्गुरोः । पूर्वलपाख्यशीतिश्च जग्मुराजन्मनस्ततः ॥१६॥ सोऽय नीलाममां दृष्ट्वा नृत्यन्तीमिन्द्रनर्तकीम् । बोधस्याभिनिबोधस्य निर्विवेदोपयोगतः ॥४०॥ ये रागहेतवो वाया भावाः प्रागमवन् भुवि । ते स्युरन्तनिमित्तस्य शमे प्रशमहेतवः ।।४।। य एव विषया रम्या मतिविभ्रमकारिणः । प्रशमानुगुणे काले त एव स्युः शमावदाः ॥४६॥ स दध्यौ च स्वयं बुद्धौ व्यावृत्तविषयस्पृहः । चिरं भोगसमासस्या लजितात्मारमनारमनः ॥५०॥ भहो परमवैचित्र्यं संसारस्य शरीरिणाम् । यत्र कर्मविधेयानामन्ये यान्ति विधेयंताम् ॥५१॥ सदभावं दर्शयन्तीयमतिनृत्यति नर्तकी । हावभावरसप्राय विचित्राभिनयागिका ॥५२।। तोपिते मयि नृत्येनं शक्रः स्यात् किल तोपितः । ततस्तु सुखितामेपा सम्मोहादतिमन्यते ।।५३॥ शिल्प आदिके सम्बन्धसे शूद्र कहलाये ॥३६॥ उस समय असि, मपी आदि छह कर्मों के द्वारा प्रजाने वास्तविक सुख प्राप्त किया और अत्यन्त सन्तुष्ट होकर उसने उस युगको कृतयुग कहा ॥४॥ उसी समय इन्द्र सहित समस्त देवोने आकर तथा भगवान् वृपमदेवका राज्याभिपेफकर प्रजाको परम सुखी किया ॥४१॥ उस समय विनयी मनुष्योंसे व्याप्त अयोध्या, विनीता और साता 'नामसे प्रसिद्ध, भगवानको जन्मपुरी अधिक सुशोभित हो रही थी ।१४२॥ जो इक्ष्वाकु क्षत्रियोंमे 'वृद्ध तथा जाति व्यवहारके जाननेवाले थे उन्हें लोकबन्धु भगवान वृपभदेवने यहाँ रक्षा कार्य- में नियुक्त किया ॥४३॥ जो कुछ देशके स्वामी थे वे कुरु, जिनका शासन उप-कठोर था वे उस और जो न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करते थे वे भोज कहलाये ॥४४॥ इनके सिवाय प्रज्ञाको हर्पित करनेवाले अनेक राजा और भी बनाये गये। उस समय श्रेयान्स तथा सोमप्रभ आदि कुरुवंशी राजाओसे यह भूमि अत्यधिक सुशोभित हो रही थी ॥४५॥ तदनन्तर देवोपनीत दिव्य भोगों- फो भोगते हुए भगवान्के जन्मसे लेकर तेरासी लाख पूर्व व्यतीत हो गये ॥४६॥ अथानन्तर किसी समय नृत्य करती हुई इन्द्रकी नोलाजसा नामक नर्तकीको देख, मति- ज्ञानका उस ओर उपयोग जानेसे भगवान् ऋषभदेव विरक्त हो गये ।।१७। इस संसारमें जो पदार्थ पहले रागके कारण थे वे ही पदार्थ अब अन्तरग निमित्तके शान्त हो जानेपर शान्ति- कारण हो गये ॥४८॥ जो विषय पहले बुद्धिमें विभ्रम उत्पन्न करनेवाले थे वे हो विषय अय शान्ति के अनुकूल समयके आनेपर शान्तिके उत्पादक हो गये ॥४६॥ जिनको भोगाभिलापा दूर हो चुकी थी, तथा चिरकाल तक भोगीमें आसक्त रहने के कारण जिनकी आत्मा स्वयं अपने आपसे लजिन हो रही थी ऐसे भगवान् वृषभदेव अपने मनमें विचार करने लगे कि अहो! संसारके जीयोंकी पड़ी विचित्रता देखो, इस संसारके जोय स्वयं कर्मों के आधीन है और दूसरे जीय उनकी Vाधीनताको प्रान हो रहे हैं ॥५०-५१॥ अभिनयके विविध अगोंमे युक्त यह नतंकी समीचीन मावको दिसानी हुई हाव-भाव तथा रसपूर्वक इस अभिप्रायसे अधिक नृत्य कर रही है कि मेरे नृत्यसे भगवान् प्रमन्न होंगे, उनके प्रसन्न होनेपर इन्द्र प्रसन्न होगा और इन्द्रकी प्रसन्नतासे में १. ज्येष्ठा शातिरा मा, येातिना फ० । २. कुरदेशेऽसावुमले। ३. रभूत म०।४ नलजमा म.1५ घोषसमि। ६ स्थिीयो म.। ७ नाम।

१७० १ हरिवंशपुराणे घिग जन्तोः परतन्त्रस्य सुवानुभवनस्पृहाम् । पराराधनसनस्य यन्मनः सतताकुलम् ॥५॥ यस्वतन्त्राभिमानस्य सुसं तदपि कि मुखम् । स्वकर्मपरतन्त्रस्य भोगतृष्णाकुलाामनः ॥५५॥ आत्माघीनं यदत्यन्तमात्माधीनस्य यरसुसम् । नेन्द्रियार्थपराधीनं पराधीनस्य कर्मभिः ॥५६॥ नानन्तेनापि कालेन नृसुरासुरभोगकैः । तृहिर्जीवस्य संसारे नद्याधैरिव वारिधेः ॥५॥ महाबलस्य विधेशो ललितास्य नाविनः । वनजङ्घमरेन्द्रस्य तथोत्तरकुरुस्थितेः ॥५॥ श्रीधरस्य सुरेशस्य सुविधेरच्युतस्थितः । वज्रनाभेश्च सर्वार्थसिद्धिदेवस्य पश्यतः ॥५६] न तृप्तिम्तैरभूद भोगदिव्यैश्विरनिषेवितैः । यस्य नस्याद्य किं सा स्यात् सुलभैविपुलैरपि ॥६०।। तस्मात् मांसारिक सौख्यं त्यक्त्वान्ते दुःखदूपितम् । मोहसील्यपरिमाप्य प्रविशामि तपोवनम् ॥६॥ विज्ञानोपचितो राज्ये स्थितोऽहमितरो यथा । कालोपेक्षणमेतद्धि कालो हि दुरतिक्रमः ॥२॥ ज्ञातपूर्वभवे तस्मिन्निति ध्यानपरे जिने । ब्रह्मलोकालया ज्ञात्वा लौकान्तिकमुरास्तदा ॥६३।। कुर्वाणश्चन्द्रसङ्काशाश्चन्द्राकोणमिवाम्बरम् । नत्वा सारस्वतादित्यप्रमुखाः प्रोचुरीश्वरम् ॥६॥ साधु नाथ ! यथाख्यातं स्वपरार्थहितं तथा । क्रियतां वर्तते कालो धर्मतीर्थप्रवर्तने ॥६५॥ चतुर्गतिमहादुर्गे दिग्मूढस्य प्रभो दृढम् । मार्ग दर्शय लोकस्य मोषस्थानप्रवेशकम् ॥६६॥ विच्छिन्नसम्प्रदायस्य मन्त्रस्येव चिरं प्रभो । सिद्धिमार्गस्य विश्वेश ! कुरु द्योतनमुद्यतः ॥६॥ अधिक सुखी हो सकॅगी । परन्तु यह भ्रान्ति वश ऐसा मान रही है ॥५२-५३॥ पराधीन प्राणीको जो सुखोपभोगकी इच्छा है उसे धिक्कार है क्योंकि पराधीन मनुष्यका मन निरन्तर आकुल रहता है ॥५४॥ और अपने आपको स्वतन्त्र माननेवालेका जो सुख है वह भी क्या सुख है ? क्योकि वह भी तो अपने कमों के परतन्त्र है तथा भोगोको तृष्णासे उसको आत्मा व्याकुल रहती है ॥५५॥ आत्माधीन भनुप्यका जो सुख है वह आत्माके ही आधीन होनेसे अन्तातीत है और कर्माधीन मनुष्यका सुस इन्द्रिय-विपयोके आधीन होनेसे अन्तातीत नहीं है ॥५६॥ जिस प्रकार नदियोके पवाहसे समुद्रकी तृप्ति नहीं होती उसी प्रकार इस संसारमें मनुष्य सुर तथा असुरीके मुखासे अनन्तकालमै भी जीवकी तृप्ति नहीं हो सकती ॥५७। मैं पहले विद्याधरोंका राजा महा घल था, फिर ललिताङ्ग देव हुआ, फिर वनजङ्घ राजा हुआ, फिर उत्तरकुरुमे आर्य हुआ, फिर श्रीधर देव हुआ, फिर सुविधि राजा हुआ, फिर अच्युतेन्द्र हुआ, फिर वन्ननाभि हुआ और फिर सर्वार्थसिद्धिका देव हुआ। चिरकाल तक भोगे हुए उन दिव्य भोगोसे जिसे उस समय तृप्ति नहीं हुई उसे आज भले ही जो मुलभ और अधिक हों इन भोगोंसे क्या तृप्ति हो सकती है ? ॥५८-६०॥ इसलिए जो अन्तमे दुःखसे दूपित है ऐसे सांसारिक सुखको छोड़कर मैं मोक्ष-सुसकी प्राप्तिके लिए तपोवनमे प्रवेश करता हूँ॥६१॥ हाय, मैं मति श्रुत और अवधि इन तीन ज्ञानोसे युक्त होकर भी साधारण मनुष्यके समान राज्यमें स्थित रहा; यह मेरी समयकी उपेक्षा ही है अर्थात् मैने व्यर्थ वीतते हुए समयकी ओर दृष्टि नहीं दी। यथार्थमें समयका उल्लंघन करना कठिन है-जिस समय जो जैसा होनेवाला है वैसा ही होता है ॥६२॥ पूर्व भयोको जाननेवाले जिनेन्द्र भगवान् जब इस प्रकारका ध्यान कर रहे थे तब ब्रह्मलोकके वासी सारस्वत, आदित्य आदि लौकान्तिक देव यह ज्ञात कर यहाँ आये। वे चन्द्रमाके समान थे अतः आकाशको चन्द्रमामोसे व्याप्त जैसा करते हुए आये और नमस्कारकर भगवान्से बोले ॥६३-६४॥ हे नाथ ! ठीक है, जिससे स्त्रपर कल्याण हो वही कीजिए | धर्म-तीर्थके प्रवर्तनका यही समय है ॥६५॥ हे प्रभो! यह संसार चतुर्गति रूप महावनमै दिशाभ्रान्त हो रहा है इसे आप मोक्ष-स्थानमें प्रवेश करानेवाला मार्ग दिखलाइए ॥६६॥ हे प्रभो ! हे जगदीश्वर ! मन्त्रकी तरह १ सुरभ्रानुवनस्पृह (१) म०। २ तदिन्द्रियार्थपराधीन •म । ३ विद्यानाम् ईट् विधेट तस्य । ४ विज्ञानोपनिने म० । ५. पारम्पर्येणोपदेशः सम्प्रदायो गुरुत्रम इत्यभिधानात् (क० टि०)।

नवमः सर्गः दुःखवयमहावतें दोपत्रयमहोरगे । भ्रमतां भव भतस्त्वं कगंधारो भवोदधौ ॥६॥ वं संसारमहाचकाद्रमतो वेगशालिनः । उपदेशकरेगाशु विश्वमुत्तारय प्रभो ॥६९॥ विश्वमन्त्वना गवा सन्तस्त्वद्दर्शितावना । वस्तजन्मश्रमा निस्यसौरये त्रैलोक्यमूर्धनि ॥७॥ कान्या लौकान्तिकैर्वाचः स्वयम्बुद्धस्य तस्य ताः । पूजार्थमेव सञाताः पत्युरापो यथा झपाम् ॥७॥ सुत्रामाद्यैश्च सम्प्राप्तेश्चनुर्विधमुरैनतेः । प्रोक्तं लौकान्तिकैः प्राक्तं यत्तदेव मुहुर्मुहुः ॥७२॥ ऋपभोऽमात् स्वयम्बुद्धो बोधितो विबुधैः करैः । भानोः प्रबुद्धपद्मौधो यथा पममहादः ॥७३॥ धीरपुत्रशतस्यासौ प्रविभक्तवसुन्धरः । कृती दशशतस्येव कराणां रविरावभौ ॥७॥ अभिषिक्तस्ततो देवैः पीरावजलैजिनः । दिग्धो गन्धैरवस्त्रभूपामात्यविभूषितः ॥७॥ दत्तास्थानो नृपैदेविनोऽभान्मणिभूषणः । पूर्वापरायतैमेरुयथाऽसौ कुलभूधरैः ॥७६॥ भय वैश्रवणो दिव्यां निममे शिविका नवाम् । नाम्ना सुदर्शनां भूरिशोभयाऽपि सुदर्शनाम् ॥७७॥ ताराभरत्नजातीनां प्रभाभिरतिमास्वरा । मण्डलाकृतिशुभ्राभ्रधवलातपवारणा ॥७॥ चिरकालमे जिसको परम्परा टूट चुकी है ऐसे मोक्षमार्गका आप फिरसे प्रकाश कीजिए ॥६॥ हे स्वामिन् ! जो जन्म, जरा, मरण, इन तीन दुःखरूपो भँवरोंसे युक्त है, तथा गग द्वेप मोह ये तीन दोपरूपी बड़े-बड़े सर्प जिसमें निवास कर रहे हैं ऐसे इस संसाररूपी सागरमें भ्रमण करने- वाले-गोता खानेवाले जीवोंके लिए आप कर्णधार होइए ॥६८|| हे प्रभो ! आप उपदेशरूपी हाथ- के द्वारा इस वेगशाली घूमते हुए संसाररूपी महाचक्रसे सबको उतारो-सबकी रक्षा करो ॥६६॥ इस समय सत्पुरुष आपके द्वारा दिखलाये हुए मार्गसे चलकर तथा जन्म सम्बन्धी थकावटको दूरकर नित्य सुरससे सम्पन्न तीन लोकके शिखरपर विश्राम करें ॥७॥ जिस प्रकार समुद्रके लिए चढ़ाया हुआ जल केवल उसकी पूजाके लिए है उसी प्रकार स्वयं ही प्रतिबोधको प्राप्त हुए • भगवान के लिए लोकान्तिक देवोंके वचन केवल पूजाके ही लिए थे। भावार्थ-लौकान्तिक देवों के उपदेशके पहले ही भगवान् विरक्त हो चुके थे इसलिए उनके वचन केवल नियोग पूतिके लिए ही थे ॥७१॥ उसी समय इन्द्रको आदि लेकर चारों निकायके देव आ पहुंचे। उन्होंने भी नमस्कारकर वही कहा जो कि लौकान्तिक देवाने इनके पूर्व वार-बार कहा था ॥७२॥ देवोंके द्वारा सम्बोधित स्वयं बुद्ध भगवान् ऋपभदेव, उस समय, जिसका कमल-समूह सूर्यको किरणोंसे खिल उठा है उस महासरोवरके समान सुशोभित हो रहे थे ।।७३|| धीर-वीर सौ पुत्रोंके लिए जिन्होंने पृथिवी- का विभाग कर दिया था ऐसे कृतकृत्य भगवान् उस समय, एक हजार किरणोके लिए अपना तेज वितरण करनेवाले सूर्य के समान मुशोभित हो रहे थे ॥७॥ तदनन्तर देयोंने क्षीर समुद्रके जल- से जिनेन्द्र भगवानका अभिषेक किया, उत्तम गन्धसे लेपन किया और उत्तमोत्तम वस्त्र, आभूपण तथा मालाओंमे उन्हें विभुपिन किया ॥५॥ सभामें विगजमान तथा मणिमय आभूपणांसे विभूपित देव और गजाओंसे घिरे हुए भगवान उस समय पूर्व-पश्चिम रम्ये फुलाचलोंसे घिरे हुए मुमेम्के समान मुशोभित हो रहे थे ॥७६॥ अथानन्तर कुवेरने एक नूतन दिव्य पालकी यनायो जो नामको अपेक्षा सुदर्शना थी भोर अत्यधिक शोभासे भी मुदर्शना-सुन्दर थी ||७७॥ यह पालकी आकाश अथवा उत्तम स्त्रीके समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार आकाश (नागमग्लज्ञातीनां प्रभाभिरतिभास्वरा) तारा और श्रेष्ठ नक्षत्रों को प्रभासे अतिशय देदीप्यमान होता है, तथा उत्तम स्त्री नेत्रीको पुतलियों और नक्षत्रोंके समान देदीप्यमान रत्नोंकी प्रभासे उज्वल होती है उसी प्रकार यह पालकी मी वाराओं के समान आभायाले रत्नोंकी प्रभासे अतिशय देदीप्यमान थी। जिस प्रकार आकाश १. मुत्तस्य म० । २. विश्राम- म० 1 ३. नित्य सौरये म०। ४. पूर्वायमेव म.1 ५. मुरेम। ६. रमणि-म।

१७२ हरिवंशपुराणे चलचामरसद्धातहंसमालांशुकोज्ज्वला । आदर्शमण्डलाखण्डदीप्ति दिङ्मुखमण्डला ॥७॥ बुबुदापाण्डुगण्डान्ता मूर्धचन्द्रालिकाकृतिः । सन्ध्याघ्रखण्डसंरक्तविस्फुरद्विद्रुमाधरा ॥ पतन्जललवस्वच्छभुक्तादशनशोभिता । शुभवेत्तुपताकालीलीलाभुजलतोज्ज्वला ॥८॥ दिङ्नागनासिका जङ्घारम्भास्तम्भोरुशोमिनी । चित्रस्तोतारकालोका जगतीजघनस्थला PERH (मण्डलाकृतिशुभ्राभ्र-धवलातपवारणा) मण्डलाकार सफेद मेघोंसे उज्वल तथा सन्तापको दूर करनेवाला होता है और उत्तम स्त्री मण्डलाकार सफेद मेघावलोके समान उज्ज्वल और सन्ताप. को हरनेवाली होती है, उसी प्रकार वह पालकी भी मण्डलाकार सफेद मेघके समान उज्ज्वल छत्रसे युक्त थी ॥७८॥ जिस प्रकार आकाश (चलच्चामरसंघात-हंसमालांशुकोज्ज्वला) चञ्चल चमरोके समूहके समान उड़ती हुई हंसमालासे देदीप्यमान तथा उज्ज्वल होता है, और उत्तम स्त्री पश्चल चमरीके समूह तथा हंसपंक्तिके समान सफेद वस्त्रोसे युक्त होती है, उसी प्रकार वह पालकी भी हंसमालाके समान चञ्चल चमर और वस्त्रोंसे उज्ज्वल थी। जिस प्रकार आकाश (आदर्श- मण्डलाखण्डदीप्तिदिङ्मुखमण्डला) दर्पण तलके समान अखण्ड दीप्तिसे युक्त दिशाओंसे सहित होता है, और उत्तम स्त्रीका मुखमण्डल दर्पण तलकी अखण्ड दीप्तिसे देदीप्यमान दिशाके समान भास्वर होता है उसी प्रकार वह पालकी भी दर्पणोके समूहसे समस्त दिशाओंको अखण्ड प्रति भासित करनेवाली थी ॥६॥ जिस प्रकार आकाश (बुबुदापाण्डुगण्डान्ता) जलके बबूलोके समान सफेद प्रदेशोसे युक्त होता है, और उत्तम स्त्रीके कपोल चन्दनकी विन्दुओंसे सफेद होते हैं उसी प्रकार उस पालकोके छज्जोंका चौगिर्द प्रदेश भी बुद्बुदाकार मणिमय गोलफोसे सफेद था। जिस प्रकार आकाश (मूर्धचन्द्रालिकाकृतिः) ऊपर विद्यमान चन्द्रमासे युक्त होता है और उत्तम स्त्री मस्तक तथा चन्द्राकार ललाटसे युक्त होती है उसी प्रकार यह पालकी भी ऊपर तनी हुई चाँदनीसे सहित थी। जिस प्रकार आकाश ( सन्ध्याघ्रसण्डसंरक्त-विस्फुट्ठिमाधरा) लाल-लाल चमकते हुए मूंगोके समान सन्ध्याके लाल-लाल मेघखण्डीको धारण करता है और उत्तम स्त्रीका अधरोष्ठ सन्ध्याकालीन मेघखण्ड तथा चमकते हुए लाल मूंगेके समान होता है, नसी प्रकार वह पालको भी सन्ध्याकालीन मेघखण्डके समान लाल चमकदार मूंगाको धारण कर रही थी l जिस प्रकार आकाश (पतज्जललवस्यच्छमुक्तादशनशोभिता) स्वच्छ मोतियो तथा दाँतोके समान उज्ज्वल पड़ती हुई जलकी बूंदासे शोभित होता है और उत्तम स्त्री पढ़ते हुए जलकण तथा उज्जल मोतियोंके समान दॉतोंसे सुशोभित होती है उसी प्रकार वह पालको भी पड़ते हुए जलकणोके समान स्वच्छ मोतियोंके जड़ावसे सुशोभित थी। जिस प्रकार भाफाश (शुध्रफेतुपताकालीलीलाभुजलतोयला) सुन्दर भुजलनाओके समान केतुके शुभ विमानपर फहराती हुई पताकाओंको पंक्तिसे सुशोभित होती है और उत्तम स्त्री शुभध्वजदण्डसे युक्त पताकाओको पंक्तिके समान घयल भुजलताओसे उज्ज्वल होती है, उसी प्रकार वह पालकी भी उत्तम ध्वजापताकाओं और मुन्दर भुजाओंकी तुलना करनेवाली लताभोसे सुशोभित थी । जिस प्रकार आकाश (दिग्नागनासिकाजहारम्भास्तम्भोगशालिनी) दिग्गजोंकी सूई और पेलाय स्तम्भोके समान मुशोभित उनकी मोटी-मोटी जहाँसे अत्यधिक शोभित होता है भीर उत्तम स्नी दिग्गजोंकी सूहके ममान जहाओ और वेलाके स्तम्भोके समान सुन्दर ऊरभासे सुशोभित होती है उसी प्रकार यह पालकी भी दिग्गजाकी दो भीर स्त्रियोंकी जहाओंकी समा. नना करनेवाले पेलेके स्तम्भासे अत्यधिक मुशोभित थी। जिस प्रकार आकाश (चित्रात्रीतारका. लोका) चित्रा नसके आलोकसे युफ होता है, और उत्तम स्त्री चित्रा नक्षत्र तथा साराके समान ददायमान होता है उसी प्रकार यह पालकी भी चित्रा नक्षत्र भोर तारा समान प्रकाशसे युक्त १.१२. दामिनाम।

नवमः सर्गः १७३ वारिधारास्फुरद्धाराशुम्भलुम्मपयोधरा । तारापुष्पवती रम्या सुनक्षत्रबृहत्फला ||३|| सुनीलघनकेशाऽसौ कुबेरेण मुदर्शना । धौरिवोचमयोपेव कौशिकार्य प्रदर्शिता ॥ अथ विज्ञापितो नाथः सुरनाथेन हपिणा । आपृच्छय पितृपुत्रादीन् परिवगं च संश्रितम् ॥८५॥ गृहीतचामरच्छत्रैः सेव्यमानः सुरेश्वरैः । स द्वात्रिशदुपदानुव्यां पयामेव प्रचक्रमे ।।८६॥ लोकाञ्जलिपुटालोकशब्दार्शादिवन्दितः । शिविकामासरोहेशः सवितेवोदयश्रियम् ॥७॥ हितेः दितीश्वरोन्तिप्तां समुत्पत्य सुरेश्वरः । सन्नाहिनः समूहुस्तां शिरसाज्ञामिवेशितुः ॥८॥ तत शहाः सभेरीका मुखरीकृतदिङ्मुखाः । दध्वनुवंशीणाश्च पहा बहुनिस्वनाः ॥८॥ नानानीकैः मुरैरूवं चतुरङ्गवलेरधः । राजक्षत्रोप्रभोजायेजमिाप्तमीश्वरैः ॥१०॥ ऊवं नवरसा जाता नृत्यदप्सरसां स्फुटाः । नाभेयन विमुक्तानामधः शोकरसोऽभवत् ॥११॥ थी। जिस प्रकार आकाश (जगतीजघनस्थला) पृथिवीरूपी मध्यम स्थलसे सहित होती है और उत्तम स्त्री पृथिवीके समान स्थूल नितम्ब स्थलसे युक्त होती है, उसी प्रकार वह पालकी भी मध्य- लोकमें विराजमान थी ॥२॥ जिस प्रकार आकाश (वारिधाराम्फुरद्धाराशुम्भत्कुम्भपयोधरा) जलसे भरे एवं पड़ती हुई धारोंसे सुशोभित घड़ों के समान मेघोंसे युक्त होता है और उत्तम स्त्रीके स्तनकलश जलधागके समान शोभायमान हारसे सुशोभित रहते हैं उसी प्रकार वह पालकी भी जलधाराके समान सुशोभित हारों-मणिमालाओंसे अलंकृत घड़ोंमें जलको धारण करनेवाली थी--जलसे भरे घड़ोसे युक्त थी। जिस प्रकार आकाश ( तारापुष्पवती रम्या) फूलोके समान ताराओंसे युक्त एवं मनोहर होता है और उत्तम स्त्री तारोंके समान फूलोंसे युक्त एवं मनोहर रहती है उसी प्रकार वह पालकी भी ताराओंके समान चमकीले फूलोंसे युक्त और मनोहर थी। जिस प्रकार आकाश ( सुनक्षत्रवृहल्फला ) बड़े-बड़े फलोंके समान उत्तम नक्षत्रांसे युक्त होता है और उत्तम खी अच्छे नक्षत्रोंके विशाल परिणामसे सहित होती है उसी प्रकार वह पालकी भी उत्तम नक्षत्रोके समान बड़े-बड़े फलीसे युक्त थी | और जिस प्रकार आकाश (सुनीलघनक्शा) केशोंके समान अत्यन्त नोले मेघोंसे युक्त रहता है और उत्तम स्त्री अत्यन्त काले एवं सघन केशो- से युक्त होती है उसी प्रकार वह पालकी भी सघन केशोंके समान उत्तम नील मणियोंसे खचित थी । ऐसी वह सुदर्शना पालकी कुवेरने इन्द्र के लिए दिखलायी ॥४॥ अथानन्तर हर्षसे भरे हुए इन्द्रने पालकीपर सवार होनेके लिए भगवान से प्रार्थना की। तब भगवान अपने माता-पिता पुत्र तथा आश्रित परिजनों से पूछकर बत्तीस कदम पृथिवीपर पैदल ही चले। उस समय चमर तथा छत्र लेकर इन्द्र उनकी सेवा कर रहे थे ।।५-८६॥ तदनन्तर लोगोंने हाथ जोड़कर जय जयकार करते हुए जिन्हें नमस्कार किया था और माता पिता आदि गुरुजनोंने जिन्हें आशीर्वाद दिया था ऐसे भगवान ऋपभदेव पालकीपर उस तरह आरूढ हुए जिस तरह कि सूर्य उदयकालीन लक्ष्मीपर आरूढ होता है ॥७॥ उस पालकीको पृथिवीसे तो गजाओंने उठाया पर बादमें तैयार सड़े हुए इन्द्रोंने उसे आकाशमैं उछलकर इस प्रकार धारण कर लिया जिस प्रकार कि प्रभुकी आज्ञाको शिरसे धारण करते हैं ॥ तदनन्तर दिशाओंको मुसरित करनेवाले शड्स, भेरी, बाँसुरी, वीणा तथा जोरदार शब्द करनेवाले नगाड़े शब्द करने लगे। उस समय ऊपर आकाश तो देवीको नाना प्रकारकी चतुरङ्ग सेनाआसे व्यात था और नीचे पृथिवी तल साथ-साथ चलनेवाले भनेक राज-क्षत्रियों तथा उप्रवंशी, भोज. वंशी आदि राजाओंसे व्याप्त था mean ऊपर आकाशमे नृत्य करनेवाली अप्सराओंके शृङ्गागदि नौ रस प्रकट हो रहे थे और नीचे पृथिवी तलपर भगवान्के द्वाग छोड़े हुए माता-पिता आदिके १. इन्द्राय । २. समायुः म० १ ३. स्मितानाम् म० 1 - . हरिवंशपुराणे सेव्यमानः सुरैरीशः सिद्धार्थ वनमाप सः । अशोकचम्पकायुग्मच्छदचूतवटैश्चितम् ॥१२॥ अवतीर्णः स सिद्धयर्थी शिविकायाः स्वयं यथा । देवलोकशिरस्थाया दिवः सर्वार्थसिद्धितः ।।१३॥ ततः प्राह प्रजास्त शोकं त्यजत भोः प्रजाः । संयोगो हि वियोगाय स्वदेहरपि देहिनाम् ||६|| राजा वो रक्षणे दसः स्थापितो भरतो मया । स्वधर्मत्तिमिनित्यं सेव्यतां सेन्यता श्रितः ॥१५|| एवमुत्र वा प्रजा यन्त्र प्रजापतिमजयन् । प्रदेशः स 'प्रजागाल्यो यतः पूजार्थयोगतः ॥१६॥ आपृच्छय ज्ञातिवगं च राजकं च नतं विभुः । स्यवाऽन्तदिः सह संयम प्रतिपसवान् ॥१७॥ पञ्चमुष्टिभिरूपातान् विडोजा" मूधंजान् विभोः । प्रतिगृह्य कृतान् मूनि चिक्षेप वीरवारिधी 10 जाते निःक्रमणे जैने कृत्वा पूजा सुरासुराः । यथायथं ययुनरवा चिन्ताकान्ताश्च मानवाः ॥१६॥ राजक्षत्रोग्रभोजायाः स्वामिभक्ता महानृपाः । चतुःसहस्रमष्ट्रस्याना मुख्या नान्यस्थिति श्रिताः ॥१०॥ कायोस्मर्गेण पग्मासान् परोपहमहो जिनः । महातपाश्चतुानी तस्थौ मौनी गिरिस्थिरः ॥१०॥ नृपास्तेऽपि तथा तस्थुः कायोत्सर्गेण निश्चलाः । परमार्थमजानन्तः स्वामिच्छन्दानुवर्तिनः ।।१०२|| भृत्यपुत्रालागि क्षुत्पिपासाकुलारमनाम् । अद्य श्वो नोऽग्नमादाय समेष्यन्तीत्यमी विदुः॥१०३।। शोक-रस प्रक्ट हो रहा था ॥६१॥ अनेक देवासे सेवित भगवान् अशोक, चम्पा, सप्तपर्ण, आम, और बट वृक्षांसे व्याप्त सिद्धार्थ नामक वनमें पहुंचे ॥२॥ सिद्धि अर्थात् मोक्षकी इच्छा करने वाले भगवान् वहाँ पालकोसे उस प्रकार उतरे जिस प्रकार कि पहले स्वर्ग लोकके शिखरपर स्थित सर्वार्थसिद्धि विमानसे उतरे थे ॥३॥ तदनन्तर भगवान्ने प्रजासे कहा कि हे प्रजाजनो! तुम लोग शोक छोड़ो क्योंकि प्राणियोंका अन्य वस्तुओंकी बात जाने दो, अपने शरीरके साथ भी जो संयोग है वह वियोगके ही लिए है। भावार्थ-जब शरीरका भी वियोग हो जाता है तब अन्य वस्तुओंकी तो बात हो क्या है ? ॥६४|| अतिशय चतुर भरतको मैंने आप लोगोंकी रक्षा करने में नियुक्त किया है। आप लोग निरन्तर अपने धर्ममें स्थिर रहते हुए उसकी सेवा करें, वह आपकी सेवाका पात्र है ॥६॥ भगवानके ऐसा कहने के बाद प्रजाने उनकी पूजा की। प्रजाने जिस स्थानपर भगवानकी पूजा को वह स्थान आगे चलकर पूजाके कारण प्रयाग इस नामको प्राप्त हुआ ॥६६॥ प्रभुने कुटुम्बके लोगों तथा नम्रीभूत राजाओसे पूछकर अन्तरङ्ग, बहिरङ्ग दोनों प्रकारके परिप्रहका त्याग कर संयम धारण कर लिया ॥६७॥ इन्द्रने पञ्चमुट्टियों के द्वारा उखाड़े हुए भगवान्के शिरके बालोंको उठाकर पिटारेमे रख लिया और 'इन्हें भगवान्ने शिरपर धारण किया था। यह विचारकर बड़े आदरसे उन्हें क्षीर-समुद्र में क्षेप दिया |इस प्रकार दीक्षाकल्याणक होनेपर समस्त सुर और असुर भगवान्की पूजाकर यथायोग्य अपने-अपने स्थानांपर चले गये। साथ ही चिन्तासे भरे हुए मनुष्य भी नमस्कार कर यथायोग्य अपने अपने स्थानोंपर गये ॥६) उस समय इक्ष्वाकु, कुरु, उप्र तथा भोज आदि वंशोंके चार हजार बड़े-बड़े मुख्य स्वामिभक्त राजाओने भी नग्नदीक्षा धारण की ॥१०॥ परीपहोंको सहनेवाले,महातपस्वी,चार ज्ञानके धारक और पर्वतके समान निश्चल भगवान् छह माहका कायोत्सर्ग लेकर मौनसे विराजमान हुए ॥१०१। साथ ही वे अन्य राजा भी जो परमार्थको नहीं जानते थे मात्र स्वामीकी इच्छानुसार काम करना चाहते थे, निश्चल हो कायो- त्सर्गसे स्थित हो गये ॥१०२॥ जब उनकी आत्मा भूख और प्याससे व्याकुल हो उठी तब ये विचार करने लगे कि हमारे नौकर, पुत्र अथवा स्त्रियाँ हमारे लिए भोजन लेकर आज-कलमें १.सिद्धाथां म01 २ सयोगी म०। ३. सतत श्रियःमः। ४ प्रजागारो म। ६ स्वामिभक्तमहानृपाः म० । ७. नः अस्माकम् ।

नवमः सर्गः । ततः कच्छमहाकच्छमरीच्यप्रेसरास्तके । षड्मासाभ्यन्तरे मग्नाः क्षुधाधुनपरोप हैः ॥१०॥ तेषां शुत्क्षामगात्राणां भ्रमती दृष्टिरस्थिरा । भ्रान्तदृष्टेभविष्यस्याः पूर्वरङ्गमिवाकरोत् ।।१०५॥ दृष्टं तैमिरिक कैश्चिदन्धकारेऽपि तादृशे । स्पर्धयेव हि चन्द्राः शतचन्द्रं नमस्तलम् ॥१०॥ श्रुतं शब्दात्मकं विश्वं भावयद्भिरिवापरैः । स्वशब्दलिङ्गमाकाशमिति वैशेषिकागमम् ॥१०७॥ पतद्भिरपि तत्रान्यैनं मनागपि चेतितम् । भचिस्वभावमात्मानमनुर्तुमिवोद्यतैः ।।१०।। चेतयन्तोऽपि तत्रान्ये स्वैरमासिनुमप्यलम् । निरीहात्मतया जनुः स्वां सासयपुरुपस्थितिम ॥१०॥ केचित् निरन्वयध्वस्तबुद्धयो नैव सस्मरू । पूर्वापरस्थ मूछाताः क्षणभङ्गानुवर्तिनः ॥१०॥ इति ते क्षुत्पिपासाद्यैरतिव्याकुलवुद्धयः । कायो सर्जनमुरसृज्य दुद्रुवुश्च शनैः शनैः ॥११॥ स्वामिनं कौलपुत्रांश्च मर्यादा चानुवर्तते । तावदेव जनो यावद् स्वशरीरस्य निर्वृतिः ।।११२॥ भक्षणं फलमूलादेरपां पानावगाहनम् । कुर्वतां नग्नरूपेण स्वयंग्राहेण भूभृताम् ॥११३॥ भो भो माऽनेन रूपेण स्वयंग्राहविरोधिना । प्रवत्तध्वमिति व्यक्ताः खेऽभवन्मरुतां गिरः॥११॥ ततस्ते पिताखस्ता दिशो वीच्य महीक्षितः । चक्रुर्वेपपरावर्त कुशचीवरवल्कलैः ॥११५॥ आते ही होंगे ।।१०३।। तदनन्तर कच्छ, महाकच्छ और मरीचि जिनमें अग्रेसर थे, ऐसे वे कृत्रिम मुनि छह माहके भीतर ही सुधा आदि कठिन परीपहोंसे भ्रष्ट हो गये ॥१०४|| भूखके कारण जिनके शरीर अत्यन्त कृश हो गये थे ऐसे इन कृत्रिम मुनियोंकी अस्थिर दृष्टि घूमने लगी तथा ऐसी जान पड़ने लगी मानो आगे होनेवाली भ्रान्त दृष्टि (भ्रान्त श्रद्धान )का पूर्वा- भ्यास ही कर रही हो ॥१०॥ कितने ही लोगोने अन्धकारका समूह देखा अर्थात् उनकी आँखों- के सामने अन्धकार ही अन्धकार छा गया, उनके नेत्र क्षुधाके कारण चन्द्रमाके समान पाण्डु- वर्ण हो गये तथा उन्हें उस अन्धकारके बीच आकाशमै एकके बदले सो चन्द्रमा दिखाई देने लगे ॥१०६|| कितने ही लोगोंने समस्त संसारको शब्दमय सुना अर्थात् उनके कानोंके सामने शब्द ही शब्द सुनाई पड़ने लगा जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वे 'शब्द रूप लक्षणसे सहित आकाश हैं। इस वैशेपिक मतके शास्त्रका ही चिन्तन कर रहे थे ॥१८७॥ कितने ही लोग जमीनपर गिरने लगे तथा उन्हें कुछ भी चेत नहीं रहा जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वे आत्माको जड़-स्वभाव करनेके लिए ही उद्यत हुए हो अर्थात् जड़स्वभाव है यह चार्वाकका मत ही प्रचलित करना चाहते हों ॥१०८।। कितने ही लोगोंको चेत (होश) तो था पर वे स्वच्छ- न्दता-पूर्वक रहने के लिए निरीह वृत्तिके कारण अपने आपकी सांख्यमत संमत पुरुप जैसी स्थिति बतलाने लगे ॥१०६॥ जिनकी बुद्धि निरन्वय नष्ट गई थी तथा जो मू से दुःखी हो रहे थे, ऐसे कितने ही लोगोंको आगे-पीछेका कुछ भी स्मरण नहीं रहा, जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वे बौद्धोके क्षणभङ्गवादका ही अनुकरण कर रहे हो ॥११०॥ इस प्रकार भूख-प्यास आदिसे जिनकी बुद्धि अत्यन्त व्याकुल हो गई थी ऐसे वे सब कायोत्सर्ग छोड़कर धीरे-धीरे भागने लगे ॥१११॥ सो ठीक ही है क्योंकि जब तक अपने शरीरकी सन्तोषपूर्ण स्थिति रहती है तभी तक मनुष्य स्वामी, कुल, पुत्र और मर्यादाका अनुसरण करता है ॥१२२।। वे गजा नग्नरूपमें रहकर ही फल-मूल आदिका भक्षण तथा जलका पीना और उसमे प्रवेश करना आदि कार्य स्वेच्छासे करनेके लिए उद्यत हुए तो उसी समय आकाशमें देवोंके यह शब्द प्रकट हुए कि स्वयं ग्राहके विरोधी इस नग्नवेपसे आपलोग ऐसी प्रवृत्ति न करें ॥११३-११४॥ तद. नन्तर देवोके उक्त शब्द सुनकर वे राजा बड़े लजित हुए और भयभीत हो दिशाओंकी ओर देख उन्होने कुशा, चीवर तथा वल्कल आदिसे नग्नवेश बदल लिया अर्थात् कुशा, चीवर एवं १. द्विचन्द्राक्षः म०, ग०, १० । दुधावशाच्चन्द्रवन्नेत्रैः(क० टि.)।२ चेतिकं म० । ३ महतां म० | हरिवंशपुराणे पुनः कृत्वा सुविश्रब्धास्ते दग्धोदरपूरणम् । स्वस्थाः कार्य विचार्योचुः स्वस्थे चित्ते हि बुद्धयः ॥१६॥ कोऽभिप्रायः प्रभोरस्य स्यक्तभोगस्य लक्ष्यताम् । नवैहिकफलायेदं चेष्टितं सुष्टदुष्करम् ।।३१७॥ तथा ह्यनेन भो दृष्टा सम्पदो विपदो यथा । रत्यरत्योर्विघातेन विषयाश्च विपोपमाः ॥११८।। सालङ्कारं परित्यक्तं वसनं व्यसनं यथा । मूलोखाताः स्वहस्तेन मूधंजा वैरिणो यथा ॥११॥ शरीरमपि संन्यस्त संन्यस्ताहारवस्तुना । तदस्याभिमतं फिजिदामुत्रिकफल भवेत् ॥१२०॥ नैष्टिकवतमास्थाय स्वामिन्येवं व्यवस्थिते । किं नः कर्तव्यमित्येकं न विनः साम्प्रतं वयम् ॥१२॥ निष्फ्रान्तानामनेनामा स्वदेशोत् प्रतिनिवर्तनम् । नैव पुष्णाति नश्छायामपायवहुलं च तत् ॥१२२॥ न शक्ताश्चरितुं चयां यदि नाम वयं विभोः । वनवासिस्वप्ताम्येन कि न कुर्मोऽनुवर्तनम् ॥१२३॥ इति निश्चित्य तेऽन्योन्यं पाण्डपत्रफलाशिनः । जटावल्कलिनो जातास्तापसा वनवासिनः ॥२४॥ यो मरीचिकुमारस्तु नप्ता तप्ततनुविभोः । दृष्टवान् जलमावेन तृपामस्मरीचिकाम् ॥१२५॥ जलावगाहनान्यस्य गजस्येव विदाहिनः । मृवश्व मृदश्वः शरीरपरिनिर्वृतिम् ।।१२६॥ यत्तन्मानकपायी स कापायं वेपमाहीत् । एकदण्डी शुचिमुण्डी परिबाड्नतपोपणम् ॥२७॥ नमिश्च विनमिश्चोभो भोगयाचनयातुरौ । तावुद्विग्नो विभोर्लग्नौ पादयोदुःस्थितौ स्थितौ ॥१२॥ वृक्षोकी छाल आदि धारणकर नग्न वेप छोड़ दिया ॥११॥ इसके बाद निश्चिन्ततासे अधम- उदरकी पूर्तिकर जब वे स्वस्थ हुए तब कार्यका विचारकर परस्पर कहने लगे सो ठीक ही है क्योकि चित्तके स्वस्थ होनेपर ही बुद्धि उत्पन्न होती है-विचारशक्ति आती है ।।११६॥ वे कहने लगे कि भगवान्ने समस्त भोगोंको छोड़ दिया है सो इसमें इनका क्या अभि- प्राय है यह ज्ञात किया जाय । ऐहिक फलके लिए तो इनकी यह अतिशय कठिन चेष्टा नहीं हो सकती क्योंकि इन्होने सम्पत्तियोंको विपत्तियोंके समान देखा है, रति और अरतिको नष्ट कर विषयोको विपके सगान समझा है, वस्त्राभूपणको दुःखके समान छोड़ दिया है, शिरके बाली- को शत्रुओकी तरह अपने हाथसे जड़से उखाड़ दिया है और आहार-पानीका परित्याग कर दिया है इसलिए शरीरको भी छोड़ा हुआ समझना चाहिए। इससे जान पड़ता है कि इन्हें कोई पारलौकिक फल ही अभिप्रेत होगा ॥११७-१२०॥ जबकि भगवान नैष्ठिक व्रत लेकर इम प्रकार विराजमान हैं कुछ बोलते चालते नहीं हैं, तब इस स्थितिमें हमें क्या करना चाहिए, इस एक बातको हम लोग इस समय बिलकुल नहीं जानते ॥१२१॥ हमलोग इनके सोथ अपने देशसे निकल आये हैं इसलिए अब लौटकर जाना तो हमारी शोभाको नहीं बढ़ाता। साथ ही लौटकर जाना अनेक बाधाओ-कष्टोसे भरा है ।।१२२।। यदि हम भगवान्की चर्याका आचरण करनेके लिए समर्थ नहीं हैं तो क्या वनवासीपनेकी सदृशतासे हम इनका अनुसरण नहीं कर सकते ? भावार्थ-यदि हमसे इनके समान कुछ तपश्चर्या नहीं बनती है तो इनके समान वनमें तो रह सकते हैं ॥१२३॥ आपसमे ऐसा निश्चयकर वे भ्रष्ट राजा, पके पत्र और फलोंको खाते हुए जटा और वृक्षोकी छाल धारणकर वनवासी तापस बन गये ॥१२४॥ उनमें मरीचि कुमार नामका जो भगवान्का पोता था, प्याससे उसका शरीर संतप्त हो रहा था, उसने भ्रान्तिवश मरुस्थलकी मरीचिकाको ही जल समझ लिया तथा उसमें लोटने लगा सो जिस प्रकार जलमें प्रवेश करना संतप्त हाथोके शरीरको शान्ति पहुंचाता है उसी प्रकार कोमल मिट्टीने उसके शरीरको कुछ शान्ति पहुँचाई ॥१२५-१२६|| मरीचि बड़ा मानकपायो था इसलिए उसने परिवाजोंके जनको पोपण करनेवाला गेरुआ वेप स्वीकार कर लिया। वह एक दण्ड अपने साथ रखता था, स्नादादिसे अपनेको पवित्र मानता था तथा शिर मुड़ाये रखता था ॥१२७॥ इधर जो भोगोंकी याचनासे अतिशय दुःखी थे, भोगोंके अभावके कारण उद्विग्न थे। १. त्यनं । २. स्वदेशान् म । ३. -ऽनुवर्ततं म ।

नवमः सर्गः १७७ - धूनामनोऽवधिज्ञानात् तबुद्ध्वा धरणः फगी । भाजगाम मुनेमक्या मौनं सर्वार्थसाधनम् ॥१२॥ विश्वास्य दिव्यरूपोऽसौ भ्रातरौ श्रोतरी यथा । महाविद्यां ददौ ताम्यां विद्यालाभो गुरोवंशात् ।।१३०॥ योऽगो विद्याधराधारो विजयाद्धं इतारितः । सोऽपि ताभ्यां ततो लब्धः किं न स्याद् गुरुपेवया ॥१३॥ स नमिदक्षिणनेण्यां पञ्चाशनगरेश्वरः । विनमिश्नोत्तरश्रेण्यामभूत् पष्टिपुरेश्वरः ॥१३२॥ अध्यतिष्टनमिः श्रेष्ठं नगर रचनूपुरम् । नमस्तिलकमन्वयं विनमिः सह बान्धवैः ॥१३३॥ विद्याधरजनो धारी प्राप्य तो परमेश्वरी । उपरिस्थितमारमानं भुवनस्याप्यमन्यत ।।१३।। अधाऽसौ प्रतिमास्थोऽपि प्रविश्य भगवान् स्थितः। परीपहाग्निविध्यापिसयानजलधौ स्थिरः ॥१३५॥ मत्वेतरमनुष्याणां भवतां च भविष्यताम् । मोवाय विजिगीपूर्ण मुक्त्यमावेशपतिताम् ।।१३६।। धर्मार्थकाममोक्षेपु धर्मः शान्त्यादिलक्षणः 1 पुरुषार्थः स्थितो मुरयो मोसकामार्थमाधनः ।।१३७॥ प्राणाधिष्टाननिष्ठं शरीरं धर्मसाधनम् । प्रारधिष्टितः प्राणी प्राणाश्चान्नैरधिष्ठिताः ॥१३॥ पारम्पर्येण धर्मस्य ततोऽन्नमपि साधनम् । प्राणिनामसवीर्याणां प्रधानस्थितिकारणम् ।।१३।। अतस्तस्यानवद्यस्य प्रहणे विधिमर्थिनाम् । शासनस्थितयेऽन्नस्य दर्शयामीह भारते ।।१४०॥ इति ध्यावा स्वयंशक्तः स धुधादिविनिम्रह । परायं मतिमायत्त गोचरामपरिग्रहे ॥१४॥ तथा दुःखमय स्थितिमें स्थित थे, ऐसे नमि और विनमि दोनों राजपुत्र भगवान्के चरणों में आ लगे ॥१२८।। उसी समय जिसका आसन कम्पायमान हुआ था ऐसा धरणेन्द्र अवधिज्ञानसे यह समाचार जान जिनेन्द्रकी भक्तिपूर्वक वहाँ आया, सो ठीक ही है क्योंकि मौन सब कार्योको सिद्ध करनेवाला है ॥१२॥ दिव्यरूपको धारण करनेवाले उस धरणेन्द्रने उन दोनों भाइयोंको अपने भाइयों के समान विश्वास दिलाकर महाविद्या प्रदान की सो ठीक ही है क्योंकि विद्याकी प्राप्ति गुरुसे ही होती है ॥१३०॥ और जो विद्याघरोंका निवासभूत विजया नामका पर्वत है वह भी उन दोनोंने धरणेन्द्रसे प्राप्त किया सो ठीक ही है क्योंकि गुरुसेवासे क्या नहीं होता है ? ॥१३१॥ उनमें नमि दक्षिणश्रेणीके पचास नगरोंका स्वामी हुआ और विनमि उत्तर श्रेणीके साठ नगरीका अधिपति हुआ ॥१३२॥ नमि अपने वन्धुजनोंके साथ रथनू पुर नामक श्रेष्ट नगरमें निवास करने लगा और विनमि सार्थक नाम धारण करनेवाले नभस्तिलक नामक नगरमै रहने लगा ।।१३३।। विद्याधर लोग उन घोर-चोर राजाओंको पाकर अपने-आपको संसारमे ऊपर मानने लगे ॥१३४|| अथानन्तर-यद्यपि धीर-वीर भगवान् परीपहरूपी अग्निको वुझानेवाले प्रशस्त ध्यान- रूपी सागर में प्रवेशकर प्रतिमायोगसे विराजमान थे-छह माहसे प्रतिमायोग धारण करनेपर भी आहारके बिना उन्हें कुछ भी आकुलता नहीं थी तो भी 'मोक्ष प्राप्त करने के लिए कर्मरूपी शत्रुओको जीतनेकी इच्छा करनेवाले जो अन्य मनुष्य वर्तमानमें हैं तथा आगे होगे आहारके अभावमे उनकी शक्ति क्षीण हो जायगी' ऐसा मानकर वे विचार करने लगे कि क्षमा आदि लक्षणासे युक्त धर्म-पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुपार्था में मुख्य है, यही मोक्ष, काम और अर्थका साधन है। धर्मका साधन शरीर है और शरीर प्राणोका आधार होनेसे प्राणोंपर निर्भर है। प्राणी प्राणांसे अधिष्ठिन है अर्थात् प्रागोंके द्वारा जीवित है और ' प्राण अन्नसे अधिष्ठित है अर्थात् भन्नसे ही प्राण सुरक्षित रहते हैं। इसलिए परम्परासे अन्न भी धर्मका साधन है। अल्पशक्तिके धारक मनुष्योंकी स्थिति प्रधान पुरुषार्थ-धर्ममें बनी रहे इसमें भन्न भी कारण है। अतः इस भरत क्षेत्रमें शासनकी स्थिरताके लिए मैं आहारके इच्छुक मनुष्योंको निदोंप आहार ग्रहण करनेकी विधि दिसाता हूँ ॥१३५-१४०॥ ऐसा विचारकर, यद्यपि १ चानुगै म० । २. धरणेन्द्रात् । ३ -मत्ययं म०। ४. धीरः म०। ५. स्थिरः म०१६. रियाग। ७. पुरुपार्थस्थितो मोक्षो मुग्यो म०1८. प्राणस्त्वन्नै-म० ६. परार्थमति म० । २३ हरिवंशपुराणे पण्मासानशनस्यान्ते संहृतप्रतिमास्थितिः। प्रतस्थे पदविन्यासः क्षिति पल्लवयमिव ।।१४२॥ आकेवलोदयान्मौनी प्रलम्बितभुजः पथि । सावधानां गति विभ्रमातिद्रुतविलम्बिताम् ।।१४३।। मध्याह्न षु पुरग्रामगृहपतिषु दर्शनम् । प्रशस्तासु प्रजाभ्योऽदाच्चान्द्रीचर्या चरन् तितौ ।।१४॥ भ्राम्यन्त तं तथा नाथ सौम्यविग्रहमुन्मुसाः । पश्यन्न्यो न प्रजास्तृप्ता यथा चन्द्रं नवोदितम् ॥१४५॥ श्वेतभानुरयं किन्नु स्वर्भानुप्रासशकया । भूमिगोचरमायातस्त्यक्ततारार्कगोचरः ।।:४६॥ पूपा किंवा भवेदेप भूभृत्प्रासादभूरुहाम् । छायातमस्तिरस्कर्तुं द्वितीतितिमागतः ।।१४७|| भहो कान्तः परं स्थानमहो दीप्तः परं पदम् । अहो सुशीलशैलोऽय गुणराशिरहो महान् ॥१४॥ सौरूप्यस्य परा कोटिः सौलावण्यस्य भूः पराः। माधुर्यस्य पराऽवस्था धैर्यस्यायं परा स्थितिः ॥१४॥ एतैतेक्षणमाफल्यमन्ते पश्यत पश्यत । जना 'दिग्वसमस्यापि परमा रमणीयताम् ॥१५०॥ इत्यन्योन्यकृनालापा घनसट्टमयाः । जिनं मराश्च नार्यश्च दहशुविस्मयाकुलाः ॥ [पभिः कुलकम्] केचित् वस्त्राणि चित्राणि भूएगान्यपरे परे । दिव्यानि गन्धमाल्यानि प्रकुर्वन्ति पुरः ममोः ॥१५२॥ तुरगतुङ्गमातङ्गरथयानान्यथाऽपरे । सद्यःसनानि तस्याने स्थापयन्ति विमोहिनः ॥१५३॥ अदृष्टश्रुतपूर्वस्वात् तत्प्रयोग्यमजानता । मितादानविधिस्तस्मै न लोकेन विकल्पितः ॥१५॥ भगवान तुधादिके दूर करनेमें स्वयं समर्थ थे तो भी परोपकारके अर्थ उन्होंने गोचर-वृत्तिसे अन्न- ग्रहण करनेकी इच्छा की ।।१४।। तदनन्तर छह महीनेके अनशनवे बाद जिन्होने प्रतिमा योगका संकोच कर लिया था ऐसे भगवान् आदि जिनेन्द्र अपने चरणोके निक्षेपसे पृथिवीको पल्लवित करते हुए आहारके लिए चले ॥१४२॥ केवलज्ञान प्राप्त होने तक उन्होंने मौन व्रत ले रखा था, मार्गमें चलते समय उनको भुजाएँ नीचे की ओर लम्बी थी, वे न अधिक शीघ और न अधिक धीमी चालसे साय- धानी पूर्वक चल रहे थे ॥१४३॥ पृथिवीपर चान्द्री चर्यासे विचरण करते हुए वे मध्याह्नके समय नत्तम नगर तथा ग्रामोंकी गृह-पंक्तियों में प्रजाके लिए दर्शन देते थे ॥१४४॥ जिस प्रकार नूतन उगे हुए चन्द्रमाको देखती हुई प्रजा सन्तुष्ट नहीं होती है उसी प्रकार उस तरह भ्रमण करते हुए सौम्य शरीरके धारक भगवान्को ऊपरकी और मुस उठा-उठाकर देखती हुई प्रजा सन्तुष्ट नहीं होती थी ॥१४५॥ भगवानको देख अनेक लोग ऐसा तर्क करते थे कि क्या यह राहुके द्वारा प्रसे जानेके भयसे नक्षत्र और सूर्य मण्डलको छोड़कर चन्द्रमा ही पृथिवी तलपर आ गया है ? अथवा क्या पहाड़, महल और वृक्षाकी छायारूपी अन्धकारको दूर करने के लिए यह सूर्य ही पृथिवीपर अव- तीण हुआ है ? ॥१४६-१४७॥ अहो ! ये भगवान् कान्तिके परम स्थान हैं, दीप्तिके अद्वितीय धाम है, अहो ! ये उत्तम शीलके मानो पर्वत हैं, अहो ! ये गुणोंके महासागर हैं । ये सुन्दर रूपकी परम मोमा है, वे लावण्यकी उत्कृष्ट भूमि है, माधुर्यको परम अवस्था है और धैर्यको उत्कृष्ट गति हैं।।१४८-१४६॥ अरे भव्यजनो ! आओ, आओ नेत्रोंको सफल करो। देखो, नग्न-दिगम्बर होने- पर भी इनकी केसी परम सुन्दरता है ? ॥१५०॥ इस प्रकार आपसमे वार्तालाप करते तथा बहुत- बहुत यही भीड़ के साथ इकट्ठे हुए नर-नारी आश्चर्यसे व्याकुल हो भगवान के दर्शन कर रहे थे ॥१५१॥ उस समय कोई चित्र-विचित्र वस्त्र, फोई नरह-तरह के आभूषण और कोई उत्तमोत्तम गन्ध तथा मालाएँ भगवानके आगे ममर्पित करते थे ॥१५०|| कितने ही अज्ञानी लोग तत्काल सजाये हुए घोदे, ऊँचे-ऊँचे हाथी, ग्य तथा अन्य वाहन उनके आगे रसते थे ॥१५३॥ लोगाने की फिमीको आहार देते हुए न देसा था और न सुना था और न वे भगवान्के अभिप्रायको ही जानने में मलिए किसीको भाहार देनेका विकल्प नहीं उठा ॥१५४॥ जिस प्रकार लोगोंको जागृत १ भाम्यन्त म.1२ पश्यन्तो क... म । ३. चन्द्र।४ सापल्यं एन म०१५ नग्नण्या। ६ नालापनमाहा म1 जिनम्याभिमार्य क. टि. ८. मिलिना ।

नवमः सर्गः लोकस्य प्रतिबोधायमुदितस्य दिने दिने । जिनास्य न खेदाय जगद्रमगमप्यभूत् ॥१५॥ तया पयागमं नाथः पण्मासानविपग्णधीः । प्रजाभिः पूज्यमानः सन् विजदार महीं प्रमात् ॥१५॥ सम्प्राप्तोऽय सदादानरिभरिभपुरं विभुः । दानप्रवृत्तिरप्रेति सूचभिरिवाचितम् ॥१५॥ तस्मिन् मोमप्रभः श्रेयानपि भूपी सहोदरौ । तस्यामेव विभावयां स्वप्नानेतानपश्यताम् ॥१५॥ चन्द्रमिन्द्रध्वजं मेरं सतडिकलपादपम् । रत्नद्वीपं विमानं च नाभेयं पुरुषोत्तमम् ॥१५॥ प्रभाते नी कुरुष्टावास्थानस्थौ च विस्मिती । चत्राते बुधचक्रेण सुस्वप्नफलमकथाम् ॥१६॥ यन्धुः कौमुदखानामित्र कौमुदमावही । भोवेष्यति यन्धुनः कोऽपि नूनमनूनभाः ॥१६॥ उच्चैर्यशोऽत्र जो लोके सर्वकल्याणपर्वतः । जगरकल्पगुमो विद्युत्वदर्शितविग्रहः ॥१६२॥ धर्मरत्नमहाद्वीपो वैमानिकजगच्युतः । स्वप्नवकिन्नु नाभेयः स्वयमेवाध दृश्यते ॥१६॥ पुरस्म राजगेहस्य लक्ष्मीरचैव लक्ष्यते । भद्रं निवेदयरयाशु क्कुभां च प्रससता॥१६॥ स्वप्नार्थमिति बुद्धा तो नियुज्यान्तवहिनरान् । कथया जिननायस्य शनी यावदवस्थिती १६५॥ तावदामातमायारागुनादः समुच्छ्रितः । यचंयनिक दिष्टया तो जिनागमनिवेदनात् ॥११॥ रचितः परिवर्गेण स्नातयोश्च तयोस्ततः । मुभोजनविधिस्तन दिव्याहारमनोहरः ॥१६॥ करनेके लिए उगे हुए सूर्यका जगत्में भ्रमण करना उसके सेदका कारण नहीं है उसी प्रकार लोगों को प्रतिबुद्ध करनेके लिए तत्पर जिनेन्द्र भगवान्का जगत्में जहाँ-तहाँ भ्रमण करना उनके सेदका कारण नहीं था ॥१५५।। इस प्रकार जिनकी बुद्धिमें गश्चमात्र भी विपाद नहीं था ऐसे भगवान प्रजाके द्वारा पूजित होते हुए लगातार छह माह तक आगमके अनुसार क्रमसे पृथिवीपर विहार करते गये ॥१५६॥ तदनन्तर विहार करते-करते भगवान् हस्तिनागपुर नगर पहुंचे। यह नगर जिनसे मदा दान (मद ) चूना रहता था और जो मानो इस बातकी सूचना ही दे रहे थे कि यहाँ दान (त्याग) को प्रवृत्नि होगा ऐसे हाथियोंसे सहित था ॥१५७।। उस नगरके गजा सोमप्रभ और श्रेयान्स थे। इन दोनों भाइयों ने उसी रातमें चन्द्रमा, इन्द्रकी ध्वजा, मेरु पर्वत, बिजली, कल्पवृत, रत्नद्वीप, विमान और पुरुषोत्तम भगवान् ऋपभदेव ये आठ स्वप्न देगे ॥१५८-१५६।। प्रातःकाल दांनी भाई सभामें धैठे और आरचर्यसे चकित हो विद्वत्समूहके साथ इन्हीं उत्तम स्वप्नोंके फलको चर्चा फरने लगे ॥१६॥ विद्वानोने उक्त स्वप्नों का फल इस प्रकार बताया कि कुमुदवन्धु-चन्द्रमाके ममान पृथिवीपर आनन्दको बहानेवाला तथा उत्कृष्ट कान्तिको धारण करनेवाला इमाग कोई पन्धु आज ही यहाँ आयेगा । वह उत्तम यश रूपी ध्वजाका धारक होगा,संसारमें समस्त ल्याणी. फा पर्यत होगा, जगतके मनोग्याको पूर्ण करने के लिए कल्पवृक्ष रूप होगा, यिजलीके ममान भग-भर ही अपना शरीर दिपलानेवाला होगा, धर्मरूपी ग्लोंका महाद्वीप होगा भीर धैमानिक जगन्-स्वर्ग लोकसे च्युत हुआ होगा। भगवान् ऋषभदेयने जिम प्रकार म्यनमें दर्शन दिया है क्या माज वेपर्य हो दर्शन देंगे-स्वयं यहाँ पधारेंगे। नगर तथा गजभवनको जो शोभा यह आज ही दिखाई दे रही है ऐमी शोभा पहले कभी नहीं दिया। तथा दिशाभाको निर्मलता भी शाम ही कल्याणको सूचना दे रही है ।।१६१-१६४॥ इस प्रकार स्वप्नाका फल जानकर तथा भीतर और याहर अनेक मनुष्यों को नियुनकर जिनेन्द्र भगवानसी पा कर ए दानी समर्थ भाई जय तक पेठे नय नफ मध्याह्न कालो के हुए राष्ट्रका जोरदार शन्दा। यह शंग। शाद ऐमा जान पड़ता था मानो जिनेन्द्र भगवान भागमन होनेवाला है-मगुम ममागारमे इन दोनों को पढ़ा हो रहा हो ॥१६५-१६६॥ मदनन्नर दोनों भाई ग्नानकर मयार हुए भीर परि- १ नागपुग्न २ सिंनिसन म.।। भीगमि. भूमी म । ५. पुरयभनी । मि.।

१८० हरिवंशपुराणे मणिकुहिमभूमौ तावुपविष्टौ भुजि प्रति । सिद्धार्थस्तूर्णमागत्य दिष्टया वर्धयतीत्यसौ ॥१६॥ तितिक्षोः पृथिवीं यस्य मकरालयमेखलाम् । शिविकोद्वाहिनोऽभूवन देवा वज्रधरादयः ।।१६६ ॥ भग्ने कच्छमहाकच्छपूर्वपुगवमण्डले । बिभर्ति दुवहामेको वृपभो यस्तपोधुराम् ॥१७०।। यत्कथामृततृप्तानां गोष्टीपु विदुषां सदा । वर्तते युष्मदादीनां नाहारमहणे मतिः ॥१७॥ प्रापूर्णिकोऽध सोऽस्माकमकस्माक्षगताम्मतिः । शान्तिमैत्रीतपोलचमीसहायः समुपागतः ।।१७२।। दिशा वैश्रवणस्यैव प्रविश्य नगरी विभुः । युगान्तदृष्टिरास्थाय चान्द्री चर्चा यथोचिताम् ॥३७३।। सम्भारयान्वितलोकस्य पादयोरध्यदायिनः । स्तुतिभिर्वन्दनाभिश्च समन्तादुपसेवितः ॥१७॥ धाम धाम निजं धार्म प्रकिरनिव शीतगुः । भस्मदीयतया नाथो निशान्ताजिरमातवान् ॥१५॥ इति सिद्धार्थवागथं ज्ञातोच्छ्रायसमम्भमौ । अभिजग्मतुरीशस्य ललाटे न्यस्तहस्तकौ ॥१७॥ भागच्छ भतरादेशं प्रयच्छेति कृतध्वनी । चन्द्राकाविध शैलेशमनीमं परीयतुः ।। १७७॥ पतित्वा पादयोस्तस्य सुखपृच्छापुरःसरी । 'भागतेमा मिनो हेतुं ध्यायन्तावमतः स्थितौ ॥१७॥ सोमप्रभस्य देवी भिलंचमीमत्यकरोत् प्रिया । शशिरेखेव तारामिगिरीशं तं प्रदक्षिणम् ॥१७॥ स श्रेयानीठमाणस्तं निमेपरहितेक्षणः । रूपमीतमद्राक्ष क्वचित् प्रागित्यधान्मनः ॥१०॥ जनांने उनके लिए दिव्य आहारसे मनोहर उत्तम भोजनकी विधि की-भोजनसे थालियों सजायौं । मणिमय फर्शके ऊपर दोनों भाई भोजनके लिए बैठे हो थे कि उसी समय सिद्धार्थ नामका द्वार- पाल शीव्रतासे आकर इस हर्षवर्धक समाचारसे उन्हें वृद्धिंगत करने लगा ॥१६७-१६८।। कि समुद्रान्न पृथिवीका त्याग करते समय इन्द्रादिक देव जिनकी पालकोके उठानेवाले थे। कच्छ, महाकन्छ आदि पूर्व पुरुषोंके भ्रष्ट हो जानेपर जो अकेले ही तपके दुर्धर भारको धारण कर रहे हैं, सभा-गोष्ठियों में पाप जैसे विद्वान् जिनकी कथा रूपी अमृतसे सन्तुष्ट होकर आहार ग्रहण करनेको इच्छा नहीं रखते और जो क्षमा, मैत्री तथा तप रूपी लक्ष्मीसे सहित हैं, वे त्रिलोकी नाथ भगवान् वृषभदेव आज अकस्मात् हमारे अतिथि बनकर आये हुए हैं ॥१६६-१७२।। वे प्रभु उत्तर दिशासे हो नगरमे प्रवेशकर पधार रहे हैं, यथायोग्य चान्द्रीचर्याका नियम लेकर जूडा प्रमाण दृष्टिसे विहार कर रहे हैं, हड़बड़ाहट से युक्त मनुष्य उनके चरणों में अर्घ दे रहे हैं तथा स्तुति और वन्दना- के द्वारा उनकी सब ओरसे सेवा कर रहे हैं, वे चन्द्रमाके समान प्रत्येक घरमं अपना तेज बिसे- रते हुए अपना समझ अन्तःपुरके ऑगनमें आ पहुँचे हैं ॥१७३-१४५|| इस प्रकार सिद्धार्थके घरोंका तात्पर्य समम हर्पसे भरे हुए दोनों भाई, हाथ जोड़ ललाटपर धारणकर भगवान के सामने गये ॥१७६॥ हे स्वामिन् ! आइए आज्ञा दीजिए, यह कहते पदोनों भाइयोने जिस प्रकार चन्द्रमा और सूर्य सुमेरुकी प्रदक्षिणा देते हैं उसी प्रकार मार्गमें भगवान की प्रदक्षिणा दी ॥१७७।। तदनन्तर धरणाम पड़कर (नमस्कार फर) मुस समाचार पूछते हुए दोनों भाई आगे सड़े हो गये। उस समय वे मीनके घारफ भगवान्के आगमनका कारण विचार रहे थे ॥१८॥ जिस प्रकार चन्द्रमाकी रेया तागओके साथ सुमेरु पर्वतको प्रदक्षिणा देती है, उसी प्रकार राजा मामप्रमकी रानी लक्ष्मीमतीने अन्य अनेक गनियोंके साथ भगयानकी प्रदक्षिणा दी ॥१७॥। उसी समय टिमकार रहित नेयोंसे भगवान्की भार दंसते हुए श्रेयान्सके MAN १ भुन म० । २. पानिन्छौ। ३. यानो भूगन म०। ४. प्रयगरदेव म०।५ गृह गृह प्रति । ६. तेरः । ३. माना | मपनि मागे; म भगवं । आगतो म.। भिम प्रकार पत्रमा पोटे यो गभीर पापा भामा प्राय पलाता है, उसी प्रकार निमम पतिपिपर-पर ममी पापा माता से वादियो ।

नवमः सर्गः दीप्रेणाप्युपशान्तेन स तद्रूपेण बोषितः । 'दशामेशभवान् बुद्धा पादावाश्रित्य मूच्छितः ।।११॥ मूच्छितेनापि तत्पादौ प्रमृज्य मृदुमूर्धजैः । भध्वधमच्छिदा धौती सोष्णानन्दाश्रुधारया ॥१२॥ श्रीमतीवज्रजवाभ्यां दतं दानं पुरा यथा । चारणाम्यां स्वपुत्राभ्यां संस्मृत्य जिनदर्शनात् ||१३|| भगवन् ! तिष्ठ तिष्ठेति चोवरवा नीतो गृहान्तरे । उच्चैः सञ्चासने स्थाप्य धौतत पादपङ्कजः ॥१८॥ 'तच्चरणपूजन कृत्वा प्रणति च निधा तथा । दानधर्मविधैर्बोद्धा विधाता स्वयमेव सः ।।५।। श्रद्धादिगुणसम्पूर्णः पाने सम्पूर्णलक्षणे । दित्सुरिक्षुरसापूर्ण कुम्भमुद्धृत्य सोऽनवीत् ॥१६॥ पोडशोद्गमदोपैश्च पोडशोत्पादनिश्चितैः । दशमिश्वेपणादोपैविशुद्धमपरैस्तथा En धूमाहारप्रमाणारयः संयोजमयुतैः प्रभो । मुक्त दायकदोपैश्च गृहाण प्रासुकं रसम् ॥१८८।। वृत्तवृद्धये विशुद्धामा पाणिपात्रेण पारणम् । समपादस्थितश्चक्रे दर्शयन् क्रियया विधिम् ।। १८९॥ श्रेयसि श्रेयसा पात्रे प्रतिलब्धे जिनेश्वरे । पञ्चाश्चर्यविशुद्धिभ्यः पञ्चाश्चर्याणि जज्ञिरे ॥१०॥ अहो दानमहो दानमहो पात्रमहो क्रमः । साधु साध्विति खे नादः मादुरासी दिवौकसाम् ।।१३।। नेदुरम्बुदनि|पाः सुरदुन्दुभयोऽश्वरे । दानतीर्थकरो पत्ति घोषयन्तो जगत्त्रये ॥१६२॥ श्रेयोदानयशोराशिपूर्णदिग्वनिताननः । प्रोद्गीण इव निःश्वाससुरभिः पवनो धवौ ॥१३॥ पपात मुमनोवृष्टिरमान्तीवाङ्गनिर्गता । श्रेयसः सुमनोवृत्तिरमान्तीव दिवः पुनः ॥१६४॥ मनमें यह विचार आया कि ऐसा रूप तो मैंने पहले कहीं देखा है ॥१८०1। भगवानके देदीप्यमान होनेपर भी उपशान्त रूपसे प्रतियोधको प्राप्त हुआ। श्रेयान्स अपने तथा भगवान के दश पूर्व भवों- को जान गया और उनके चरणोंके समीप आकर मूर्च्छित हो गया ॥१८१॥ मूच्छित होनेपर भी श्रेयान्सने अपने शिरके कोमल-बालोंसे भगवान के चरण पोंछे और मार्गका श्रम दूर करनेके लिए भानन्दजन्य गरम-गरम आँसुओंको धारासे धोये ।।१८।। श्रीमती और वनजंघने पहले चारण ऋद्धिके धारक अपने दो पुत्रोंके लिए जिस यिधिसे दान दिया था वह सब विधि भगवानका दर्शन करते ही श्रेयान्सकी स्मृति में आ गई ॥१८३॥ तदनन्तर दान-धर्मको विधिका ज्ञाता और उसकी स्वयं प्रवृत्ति करानेवाला राजा श्रेयान्स श्रद्धा आदि गुणोंसे युक्त हो हे भगवन् ! तिष्ठ-तिष्ठ-ठहरिए-ठहरिए यह कहकर भगवान्को घर- के भीतर ले गया, वहाँ उच्चासनपर विराजमानकर उसने उनके चरण-कमल धोये, उनके चरणोंकी पूजा करके उन्हें मन, वचन, कायसे नमस्कार किया फिर संपूर्ण लक्षणोसे युक्त पात्रके लिए देने की इच्छासे उसने इतुरससे भरा हुआ कलश उठाकर कहा कि प्रभो! यह इचरस सोलह उद्गम दोप, सोलह उत्पादन दोप, दश एपणा दोष तथा धूम अङ्गार प्रमाण और संयोजना इन चार दाता सम्बन्धी दोषांसे रहित एवं प्रामुक है, इसे ग्रहण कीजिए ॥१८४-१८८|| तदनन्तर जिनकी आत्मा विशुद्ध थी और जो पैरोंको सीधाकर खड़े थे ऐसे भगवान् वृषभदेवने क्रियासे आहारकी विधि दिखाते हुए चारित्रको वृद्धि के लिए पारणा की ॥१८॥ राजा श्रेयान्सने कल्याणकारी श्रीजिनेन्द्र- रूपी पात्र प्राप्त किये इसलिए पाँच प्रकारको आश्चर्यजनक विशुद्धियोसे पञ्चाश्चर्य प्रकट हुए ॥१६०॥ 'अहो दान, अहो दान, अहो पात्र, अहो दान देनेकी पद्धति, धन्य धन्य,' इस प्रकार आकाशमे देवोंके शब्द हुए ॥१६१|| आकाशमं मेघोके समान शन्द करनेवाले देव-दुन्दुभि यजने लगे। वे दुन्दुभि तीनों जगत्म मानो इस नामकी घोषणा ही कर रहे थे कि दानरूपी तीर्थको चलानेवालेकी उत्पत्ति हो चुकी है ॥१२॥ राजा श्रेयान्सके दानसे उत्पन्न यशकी राशिसे पूर्ण दिशारूपी स्त्रियोंके मुखसे प्रकट हुए श्वासोच्छासके समान सुगन्धित वायु वहने लगी ॥१६॥ उस समय आकाशम न समा सकनेके कारण ही मानो सुमन (पुष्पों) की वर्षा होने लगी थी १. आत्मनः ईशस्य च दश भवान् बुद्ध्या । २ अधभ्रम म० । ३ सदासने मः । ४. सर्व पुस्तके चित्यमेव पाठः क्न्यिन पादे नवाक्षरत्वात् छन्दोमनो भाति 'तसादपूजनं कृत्वा' इति पाठः मुष्टु प्रतिभाति । བ་ १९२ । हरिवंशपुराणे श्रेयसा पात्रनिक्षिप्तपुण्ढ़ क्षुरसधारया । स्पर्धयेव सुरैः स्पृष्टा वसुधाराऽपतदिवः ॥११॥ अभ्यचिने तपोवृद्धय धर्मतीर्थकरे गते । दानतीर्थकरं देवाः साभिषेकमपूजयन् ॥११६॥ ध्रुवा देवनिकायेभ्य: सद्दामफलघोषणम् । समेत्य पूजयन्ति स्म श्रेयांसं भरतादयः ॥१७॥ इतिहासमनुस्मृस्य दानधर्मविधि ततः । शुश्रवुः श्रद्धया युक्ताः प्रत्यक्षफलदर्शिनः ॥१९॥ प्रतिग्रहोऽतिधेरुचैःस्थानस्थापनमन्यतः । पादप्रक्षालनं दाया पूजनं प्रणतिस्ततः||११६॥ मनोवचनकायानामेपणायाश्च शुद्धयः । प्रकारा नव विज्ञेया दानपुण्यस्य सङ्ग्रहे ॥२०॥ पुण्यमित्यमुपातं यत् तदभ्युदयलक्षणम् । 'दत्वा दातुः फलं दत्ते प्राग् निश्रेयसलक्षणम् ॥२०१॥ इनिश्रुतयधातत्त्वा श्रेयांसमभिनन्द्य ते । दानधर्मीयतस्वान्ता नृपा याता यथागेतम् ॥२०२॥ सहस्रवर्ष वृषभो चतुनिचतुर्मुखः । चक्रे मोक्षार्थबोधार्थ तपो नानाविध स्वयम् ॥२०३॥ ममलम्रजटाभारश्रामिष्णुर्जिष्णुरायभो । रूढमारोहशाखाम्रो यथान्यग्रोधपादपः ॥२०४॥ अन्यदा बिहरन् प्रातः पूर्वतालपुरं पुरम् । राजा वृषभसेनाख्यो यत्रास्ते भरतानुजः ॥२०५॥ तनोद्यानं महोद्योगः शकटास्यभिधानम् । ध्यानयोगमथासाद्य स न्यग्रोधतरोरधः ॥२०६।। उपविष्टः शिलापट्टे पर्यङ्कासनबन्धनः । वशस्थकरणमामः शुक्लध्यानासिधारया ॥२०॥ आरूढः सपकमिं रणक्षोणी क्षणेन सः। महोत्साहगजारूढी मोहराजमपातयत् ॥२०॥ और वह ऐसी जान पड़ती थी मानो गजा श्रेयान्सकी सुमनोवृत्ति-पवित्र मनका व्यापार ही भीतर न समा सकनेके कारण शरीरसे बाहर निकल रहा हो ॥१६४|| राजा श्रेयान्सने पात्रके लिए जो इतुरसकी धारा दी थी उसके साथ ईर्ष्या होनेके कारण ही मानो आकाशसे देवकृत ग्लोकी धारा नीचे पड़ने लगी ॥१६५।। पूजा होने के बाद जब धर्म तीर्थकर भगवान् ऋषभदेव तपकी वृद्धि के लिए वनको चले गये तय देवाने अभिषेक पूर्वक दान तीर्थकर-राजा श्रेयान्सकी पूजा फी ॥१६६॥ देवांसे समीचीन दान और उसके फलकी घोषणा सुन भरतादि राजाओंने भी आकर राजा श्रेयान्सको पूजा को ॥१६७। इतिहास-पूर्व घटनाका स्मरणकर राजा श्रेयान्सने जो दान- रूपी धर्म की विधि चलाई थी उसे दानका प्रत्यक्ष फल देसनेवाले भरत आदि राजाओने बड़ी श्रद्धाके साथ श्रवण किया ॥१९८॥ राजा श्रेयान्सने बताया कि दान सम्बन्धी पुण्यका संग्रह करने- के लिए १ अतिथिको पड़गाइना, २ उच्च स्थानपर बैठाना, ३ पाद-प्रक्षालन करना, ४ दाता द्वारा अतिथिकी पूजा होना, ५ नमस्कार करना, ६ मनः-शुद्धि, ७ बघन-शुद्धि, ८ काय शुद्धि और ६. आहार-शुद्धि योलना ये नौ प्रकार जाननेके योग्य हैं ॥१६९-२००॥ दानका फल बताते हुए राजा श्रेयान्सने कहा कि इस तरह दान देनेसे जो पुण्य संचित होता है वह दाताके लिए पहले स्वर्गादि रूप फल देकर अन्तम मोक्षरूपी फल देता है ॥२०१॥ हम तरह यथार्थ बातको मुनकर जिनके चित्त दानरूपी धर्मके लिए उद्यत हो रहे थे ऐसे भरत आदि राजा जैसे आये थे घेसे चले गये ॥२०॥ घार ज्ञानरूपी चार मुगीको धारण करनेवाले भगवान वृपभदेवने स्वयं मोक्ष तत्त्व. का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक हजार वर्ष तफ नाना प्रकारका तप किया ।।२०३।। लम्बी- लम्पी जटाओके भारसे सुशोभित आदि जिनेन्द्र उस ममय जिसकी शारयाओसे पाये लटक रहे धे ऐसे घट-तके समान मुशोभित हो रहे थे ॥२०४॥ अधानन्नर फिमी ममय यिहार करते हुए भगवान , पूर्यतालपुर नामक उम नगरमें पहुँचे जहा कि भातका छोटा भाई गजा पृषभमेन रहता था ॥२०॥ यहाँ ये शकटास्य नामक उद्यान में बड़ी सत्तामा माघ ध्यान धारण का पटवृक्षफे नीचे एक शिलापर पर्यवामनमे विराजमान हो गये । उस मगय उन्होंने शुक्ल भ्यानम्पो मलपारको धाग्मे इन्द्रियों के समूहको अपने यश कर लिया था ।।२०६-२०॥ उन्होंने अपफ अगिया रणभूमिमें प्रवेशकर गहीत्साह रूपी हाथी. १ सापाल भुगम.। २. यथाममन म.।

नवमः सर्गः ज्ञानावरणशत्रु च दर्शनावरणद्विपम् । अन्तरायरिपुं चैव जघान युगपत् प्रभुः ॥२०॥ चतुर्घातिक्षयाचास्य केवलज्ञानमुद्दतम् । समस्तद्रव्यायायलोकालोकावलोकनम् ॥२१०॥ चतुर्देवनिकायाश्च पूर्ववत् समुपागताः । सेन्द्राः नेमुर्जिनेन्द्रं तं गायन्तः कर्मणां जयम् ॥२३॥ प्रातिहार्यस्ततोऽष्टाभिजिनेन्द्रस्ताक्षणोद्भवः । स चतुर्विशदिशेपेरशेषः महितो बभौ ।।२१२॥ पुत्रचक्रपमुत्पत्त्या जिनकवलजन्मना । दिष्टयाभिवर्धितो यातो भरतो वन्दितुं विभुम् ॥२३॥ सम्प्राप्तः कुरुभोजायेश्चतुरङ्गबलामृतः । भान्त्यिविभवोपेतमभ्यर्य प्रणनाम तम् ॥२१॥ नृपैपभमेनस्तं बहुभिपभं श्रितः । संयम प्रतिपद्याभूत् गणभृत् प्रथमः प्रभोः ॥२१५॥ लक्ष्मीम यात्मजं राधे जयमायोज्य सानुजम् । प्रवज्यां प्रतिपनी तो श्रेयःमोमप्रभौ नृपो ॥२१६॥ ब्राह्मी च सुन्दरी चोमे कुमायाँ धेयंसहते । प्रनग्य बहुनारीभिरायांगो प्रभुतां गते ॥२१७॥ भाहन्स्येश्वर्यमालोक्य वृपमस्य जिनस्य यत् । सम्यवव्रतसंयुनं यथायोगमभूत्तदा ।।२१।। इन्दनी कनिभान् केशान पमरागमयः कर. । उद्धरन्तः स्वयं रेजुः स्त्रीपुंसोऽरागिणस्ततः ॥२६॥ तदा प्रव्रजतां तेषां नापेक्षाभून्मनस्विनाम् । केशेष्विव शरीरेषु मृदुस्निग्यधनेष्वपि ॥२२०॥ ततश्चतुर्विधे सड़े निकाये च दिवौकसाम् । शरणे समेवाये च जाते द्वादश योजने ॥२२॥ महाप्रभावसम्पन्नास्तत्र शासनदेवताः । नेमुश्चाप्रतिचक्राद्या वृषभं धर्मचक्रिणम् ॥२२२॥ पर सवार हो क्षणभरमें मोहरूपी राजाको नीचे गिरा दिया ॥२०॥ और उसके बाद ही एक साथ जानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन शत्रुओंको भी नष्ट कर दिया ॥२०६।। इस तरह चार घातिया कर्मा के भयसे उन्हें समस्त द्रव्य पर्याय तथा लोक अलोकको दिखानेवाला केवल- ज्ञान प्राप्त हुआ ॥२१०।। पूर्वकी भाँति इन्द्रों सहित चारों निकायोंके देवाने आकर जिनेन्द्र देयको नमस्कार किया। उस समय समस्त देव भगवानने कर्म शत्रुओंपर जो विजय प्राप्त की थी उसका गुणगान कर रहे थे ।।२१।। तदनन्तर तत्क्षणमें उत्पन्न हुए आठ प्रातिहार्यों और चौतीस अतिशयों- से सहित भगवान् अत्यधिक सुशोभित होने लगे ॥२१२।। उसी समय भरतको पुत्रकी उत्पत्ति, चक्ररत्नकी प्राप्ति और भगवानको केवलज्ञानका लाभ ये तीन समाचार एक साथ मिले। इस भाग्यवृद्धिसे प्रसन्न होता हुआ भरत सर्वप्रथम भगवानकी वन्दना करने के लिए चला ॥२१३।। कुरुवंशी तथा भोजवंशी आदि राजाओके साथ चतुरङ्ग सेनासे आवृत भरतने जाकर अरहन्त सम्बन्धी विभूतिसे युक्त भगवान्की पूजाकर उन्हें प्रणाम किया ॥२१४॥ उसी समय अनेक राजाओंके साथ राजा वृपभसेन भगवान्के पास गया और संयम धारणकर उनका प्रथम गणधर हो गया ॥२१५। लक्षमीमतीके पुत्र जयकुमार तथा उसके छोटे भाईको गज्यकार्यमें नियुक्तकर राजा श्रेयान्स और सोमप्रभने भी दीक्षा धारण कर ली ॥२१६॥ धैर्यसे युक्त ब्राह्मी और मुन्दरी नामक दोनों कुमारियों अनेक स्त्रियों के साथ दीक्षा ले आर्यिकाओंकी स्वामिनी बन गई ॥२१७|| वृषभ जिनेन्द्र के अन्त सम्बन्धी वैभवको देखकर अन्य लोग भी उस समय यथायोग्य सम्यग्दर्शन तथा प्रायकोंके व्रतसे युक्त हुए थे ॥२१८॥ उस समय गगरहित स्त्री-पुरुष, पद्मराग मणियांके समान अपने लाल-लाल हाथांसे इन्द्रनील मणिके समान काले-काले केशोंको स्वयं उसाइते हुए अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे ॥२१॥ उस समय दीक्षा लेनेवाले धर्यशाली मनुष्योंका जिम प्रकार कोमल, चिकने और सपन पाली में स्नेह नहीं था उसी प्रकार अपने शगैरीम भी उनका स्नेह नहीं था ।।२२०॥ तदनन्तर यारह योजन विस्तारवाले समवशरणको रचना हुई, उममें चतुर्विधसंघ भीर घार निकायके देव यथास्थान आसीन हुए ॥२२१॥ उस समयसरणमें महाप्रभार सम्पन्न अनिचक्र आदि शासन देवता, धर्मचक्रके घारफ भगवान् वृषभदेयको निरन्तर नमस्कार करते । १. सम्मापुरु म० । २. समाये म।

१८४ हरिवंशपुराणे शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् तस्थुदक्षिणतो जिनस्य मुनयः क्पागनाशायिकाः ज्योतिय॑न्तरभावनामरवधूवर्गाः क्रमेणव हि । भूयोभावनभोमदेव निवहा ज्योतिष्फाल्पाः नृपाः तिपञ्चश्व पृथक् पृथक पृधुनिजस्थाने गणा द्वादश ॥२२३॥ प्रैलोक्ये जिनशामनोरुपदवीशुभ्रूपयावस्थिते सम्पृष्टः प्रथमेन तत्र गणिना विश्वार्थविद्योतनः । भूयोभेदविवृत्तयावरपैरिस्पन्दोमितस्यात्मना मोहधान्तमपाकरोदध जिनो भानुः स्वभाषाश्रिया ॥२२॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती ऋषभनाथकैवल्योत्पत्तिवर्णनो नाम नवमः सर्गः। रहते थे ॥२२२॥ समवसरणमें बारह सभाएँ थीं उनमें भगवान्को दाहिनी ओरसे लेकर १ मुनि, २ कल्पवासिनी देवियों, ३ आर्यिकाएँ, ४ ज्योतिपोदेयोंकी देवियों, ५ व्यन्तर देवोंकी देवियाँ, ६ भवनवासी देवोंकी देवियाँ, ७ भवनवासी देव, व्यन्तर देव, ज्योतिषी देव, १० कल्प- वासी देव, ११ मनुष्य और तिर्यञ्च ये बारह गण पृथक्-पृथक् अपने-अपने विस्तृत स्थान पर बैठे थे ॥२२३।। अथानन्तर जय तीन लोकके जीव भगवान्का दिव्य उपदेश सुननेको इन्छासे शान्तिपूर्वक बैठ गये तब प्रथम गणधरने समस्त पदार्थीके प्रकाशित करनेवाले जिनेन्द्ररूपी सूर्यसे प्रश्न किया और उन्होंने नाना भेदाम परिवर्तित होनेवाली एवं ओठोके परिस्पन्दसे रहित अपनी दिव्य ध्वनिरूपी लक्ष्मीके द्वारा मोहरूपी अन्धकारको नष्ट कर दिया ॥२२४॥ इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराण के संग्रह से सहित जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें श्रीऋपभनाथ भगवानकी केवलज्ञानकी उत्पत्तिका वर्णन करनेवाला नवा पर्व समाप्त हुआ। १. भीम म० । २. पतिस्यन्दोभितः स्यात्मना म., परिष्पन्दोल्झितास्यात्मना क०, ड० दशमः सर्गः धर्म प्रवदता तेन तदा त्रैलोक्यसन्निधौ । एतं वर्षसहस्रान्तं मौनमुद्योदितं दृढम् ॥३॥ संमारतरणं तीर्थ नाथे दर्शयति स्वयम् । ददर्श जगदत्यर्थ गम्भीराथमपि स्फुटम् ॥२॥ वागाधतिशयोद्योवे द्योतयत्यर्थसम्पदम् । जिनेन्द्रद्युमणी को वा मिथ्यान्धतममं मजेत् ॥३॥ जिनेन्द्रोऽय जगौ धर्मः कार्यः सर्वसुखाकरः । प्राणिभिः सर्वयरनेन स्थितः प्राणिदयादिपु ॥४॥ सुखं देवनिकायेषु मानुपेषु च यत्सुखम् । इन्द्रियार्थसमुद्भूतं तत्सर्व धर्मसम्भवम् ॥५॥ कर्मतयसमुद्भूतमपवर्गसुख च यत् । आत्माधीनमनन्तं तद् धर्मादेवोपजायते ॥६॥ दया सत्यमथास्तेयं ब्रह्मचर्यममूच्र्छता । सूचमतो यतिधर्मः स्यास्थूलतो गृहमेधिनाम् ॥७॥ दानपूजातपशील लक्षणश्च चतुर्विधः । त्यागजथैव शारीरो धर्मो गृहनिपेविणाम् ॥ सम्यग्दर्शनमूलोऽयं महर्टिकसुरश्रियम् । ददाति यतिधर्मस्तु पुष्टो मोससुखप्रदः ।। स्वर्गापवर्गमूलस्थ सद्धर्मस्येह लक्षणम् । श्रुतज्ञानाद्विनिश्चयम,ग्दर्शिभिरधिभिः ॥१०॥ द्वादशाङ्ग श्रुतज्ञानं द्रव्यभावभिदां नितम् । भाप्ताभिव्यनियमाप्तश्च निर्दोपावैरणो मतः ॥११॥ उस समय त्रिलोकवर्ती जीवोंके सन्निधानमे धर्मका उपदेश देते हुए भगवान्ने एक हजार वर्प तक दृढ़तापूर्वक धारण किया हुआ मौन खोला ॥१॥ श्री आदि जिनेन्द्र स्वयं ही संसार- सागरमें पार करनेवाला तीर्थ दिखला रहे थे, इसलिए संसारके समस्त जीव अतिशय गूढ़ अर्थ- को भी सरलतासे देख रहे थे। भावार्थ-यद्यपि दिव्यध्वनिमे प्रतिपादित पदार्थ अत्यन्त गम्भीर था फिर भी वक्ताके प्रभावसे लोग उसे सरलतासे समझ रहे थे ॥॥ उस ससय जब कि वचन भादिके अतिशयोंसे प्रकाशमान जिनेन्द्ररूपी सूर्य स्वयं पदार्थोंको प्रकाशित कर रहे थे तय कौन मनुष्य मिथ्यात्वरूपी अन्धकारको प्राप्त हो सकता था ? अर्थात् कोई नहीं ॥३॥ अथानन्तर जिनेन्द्र भगवान्ने कहा कि समस्त प्राणियोंको जीवन्दया आदि कार्यों में स्थित धर्म पूर्ण प्रयत्नसे करना चाहिए क्योंकि धर्म ही समस्त सुखोंकी सान है || चार निकायके देवों और मनुष्योंमें इन्द्रिय विषयजन्य जो मुस दिखाई देता है वह सब धर्मसे ही उत्पन्न हुभा है ॥शा और कर्मा के रूपसे उत्पन्न, स्वाधीन तथा अन्तसे रहित जो मोक्षसम्बन्धी मुस है वह भी धर्मसे हो उत्पन्न होता है ॥६॥ अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह-ये सूक्ष्म रीतिसे धारण किये जाये तो मुनिका धर्म है और स्थूल रीतिसे धारण किये जाये तो गृहस्थका धर्म है ॥७॥ दान, पूजा, तप और शील यह गृहस्थका चार प्रकारका शारीरिफ धर्म है-शरीरसे करने योग्य है। गृहस्थका यह चतुर्विध धर्म-त्यागसे हो स्पन्न होता है | सम्यग्दर्शन जिसकी जद है ऐसा यह गृहस्थका धर्म महर्चिफ देवाकी लक्ष्मी प्रदान फरता है और पूर्णतासे पालन किया हुआ मुनिधर्म मोक्ष मुसको देनेवाला है जो मात्र अर्थाचीन यातको ही देख सकते हैं ऐसे हिताभिलारी मनुष्योंको (छमस्य जीवारो) स्वर्ग और मोरके मूल भून समोचीन धर्मका ललग प्रतज्ञानके द्वारा मानना चाहिए भावार्थ-अल्पज्ञानी मनुष्य द्वादशाग के सहारे ही धर्मका लक्षण समझ सकते हैं, इसलिए यहाँ द्वादशाह का वर्णन करना उचित है ॥१०॥ द्रव्यग्रुत और भायश्रुनके भेदको प्रत हुभा द्वादशाह १ मा म०, १०,१०१२ सत म०।३निपाचरणो मः। .४ १८५ हरिवंशपुराणे ध्रुतं च स्वममासेन पायोऽधरमेव च । पदं चैव हि सातः प्रतिपत्तिरतः परम् ।।१२॥ अनुयोगयुतं द्वारः प्रामृतप्रामृतं ततः । प्राभृतं वस्तु पूर्व च भेदान् विंशतिमाश्रितम् ॥१३॥ श्रुतज्ञानविकल्पः स्यादेवहस्वाधरात्मकः । अनन्तानन्तभेदाणुपुद्गलस्कन्धसञ्चयः ।।४।। अनन्तानन्तभागैस्तु भिद्यमानस्य तस्य च । भागः पर्याय इत्युक्तः श्रुतभेो नल्पशः ॥१५॥ सोऽपि सूक्ष्मनिगोदस्यालअपर्याप्तदेहिनः । सम्भवी सर्वथा तावान् श्रुतावरणवर्जितः ॥१६॥ सर्वस्येच हि जीवस्प तावन्मात्रस्य नातिः । आवृत्ती तु न जीवः स्यादुपयोगवियोगतः ।।१७।। जीवोपयोगशश्न न विनाशः सयुक्तिकः । स्यादेवात्यधरोधेऽपि सूर्याचन्दमसोः प्रमा पर्यायानन्तमागेन पर्यायो युज्यते यदा । स पर्यायसमामः स्यात् श्रुतभेदो हि सातिः ॥१९॥ अनन्तामङ्खयमद्वय यभागवृद्धिधयान्वितः । सङ्घय यासङ्घयकानन्तगुणवृद्धिक्रमेण च ॥२०॥ स्यात्पर्यायसमासोऽमौ यावदरपूर्णता । एकैकाक्षरवृद्धया स्यात् तत्समासः पदावधिः ॥२१॥ पदमपद शेयं प्रमाणपदमित्यपि । मध्यम पदमिन्येवं त्रिविधं तु पदं स्थितम् ॥२२॥ 'एकद्वित्रिचतुःपञ्चपटमप्ताक्षरमर्थवत् । पदमाद्यं द्वितीयं तु पदमारारमकम् ॥२३॥ श्रुतज्ञान आपके द्वारा प्रकट होता है और आत यही माना गया है जो रागादिक दोप तथा ज्ञानावरण और दर्शनावरण इन आवरणोंसे रहित हो ॥११॥ श्रुतज्ञानके १ पर्याय, २ पर्याय- समास, ३ अक्षर, ४ अक्षर-समास, ५पद, ६ पद-समास, ७ संघात, ८ संघात-समास, ६ प्रति- पत्ति, १० प्रतिपत्ति-समास, ११ अनुयोग, १२ अनुयोग-समास, १३ प्राभृत-प्राभृत, १४ प्राभूत- प्राभृत-समास, १५ प्राभृत, १६ प्राभृत-समास, १७ वस्तु, १८ वस्तु-समास, १६ पूर्व और २० पूर्व-समास-ये बीस भेद हैं ॥१२-१३॥ श्रुतज्ञानके अनेक विकल्पों में एक विकल्प एक हरव भक्षर रूप भी है। इस विकल्पमे द्रव्यकी अपेक्षा अनन्तानन्त पुद्गल परमाणुओंसे निष्पन्न स्कन्धका सञ्चय होता है ॥१४॥ इस एक हस्वाक्षररूप विकल्पके अनेक बार अनन्तानन्त भाग किये जाये तो उनमें एक भाग पर्याय नामका श्रुतज्ञान होता है ॥१५॥ यह पर्याय ज्ञान सूदम निगोदिया लब्धपोतक जीवके होता है और श्रुतज्ञानावरणके आवरणसे रहित होता है।॥१६॥ ममी जीवों के नतने ज्ञानके ऊपर कभी आवरण नहीं पड़ता। यदि उसपर भी आवरण पद जाये तो शानोपयोगका सर्वथा अभाव हो जायग और ज्ञानोपयोगका अभाव होनेसे जायका भी अभाय हो जायगा ॥१७॥ यह युक्तिसे सिद्ध है कि जीवको उपयोग शक्तिका कभी विनाश नहीं होना । जिस प्रकार कि मेघका आवरण होनेपर भी सूर्य और चन्द्रमाकी प्रभा पुछ अंशोमं प्रपट रही भाती है उसी प्रकार श्रुतज्ञानफा भावरण होनेपर भी पर्याय नामका पान प्रस्ट हा माना है ॥१८॥ जय यही पर्यायज्ञान पर्याय मानके अनन्त भागके साथ मिल जाता है सय यह पर्याय ममास नामका ध्रुनशान काहलाने लगता है। यह श्रुतज्ञान आव- गणमे मदिन होता है अर्थात् जय तक पर्याय-ममाम नामफ श्रुतज्ञानापरणका पदय रहता है मय तक प्रकट नही दाना नमका प्रयापराम होनेपर दो प्रकट होता है ॥१६॥ यह पर्याय समास- सान भागभागवृद्धि, समश्यमाद्धि, संग्यानभागद्धि तथा अनन्तभागहानि, असंग्यात- भागदानि एवं मन्यानभागदानिमे मदिन है । पर्यायदानके ऊपर संग्यातगुणद्धि, अमायात- गुगल और अनन्नगुगनिफे प्रमसे पृति होते-होते जप तक अासानफी पूर्णता होती है नप महा मान पाय गमागतान पाता है। प्रमफे याद भसगान प्रारम्भ होता है इसके पदान गफ एफ-एफ भारी लिदानी है। इस पृद्धि प्रामाफी भया-समाम शान काम। भागमाम पार पसान होता है ॥२-२१॥ अर्धपद, प्रमागरद और मध्यम पर मेरी परमीन प्रकारका है। इनमें एक, दो, सीन, पार, पान, पद और मान अपर. PIमा,..।

दशमः सर्गः १८७ कोट्यश्चैव धनुस्त्रिंशत् तच्छतान्यपि पोटश । व्यशीतिश्च पुनरीक्षाः शतान्यष्टौ च सप्ततिः ॥२४॥ अष्टाजतिश्च वर्णाः स्युमध्यमे तु पदे स्थिताः । पूर्वाङ्गपदसङ्ख्या स्यान्मध्यमेन पदेन सा ॥२५।। एकैकातरवृद्धद्या तु तत्समासभिदस्ततः । इत्थं पूर्वसमासान्त द्वादशाह श्रुतं स्थितम् ॥२६॥ भष्टादशमहस्राणां पदानां सङ्घयया युतम् । तन्नाचाराङ्गमाचारं साधूनां वर्ण यत्यलम् ॥२७॥ यत्पट प्रिंशत्महौस्तु पदैः सूत्रकृतं युतम् । परस्वसमयार्थानां वर्णकं तद् विशेषतः ।।२।। चरवारिशत्सहस्रश्च द्विसहस्रः पदैर्युतम् । स्थानं स्थानान्तरं जन्तोवक्त्येकादिदशोत्तरम् ॥२६॥ चतुःषष्टिसहस्रयत्पदैश्च पदलक्षया । लवितं समवाया वक्ति द्रव्यादितुल्यताम् ॥३०॥ धर्मावकजीवानां लोकाकाशस्य वा यथा । प्रदेशा व्यतस्तुल्याः समवायेन वर्णिताः ॥३॥ सिद्धिमीमन्तकरियं विमानं नरलोकजम् । प्रमाणं सममिन्युक्तं तत्रैव क्षेत्रतस्तथा ॥३२॥ उत्सपिण्यवसर्पिण्योः कालतः समतोदिता । भावतोऽनन्तयोस्तत्र ज्ञानदर्शनयोरपि ॥३३॥ पदानां तु सहस्राणि यत्राष्टाविंशतिस्तथा । लक्ष्योदयमाख्यात व्यारयाप्रज्ञप्तिमनके ॥३॥ तत्रोत्पथव्युदासेन विनयेन सविस्तरः । प्रश्नव्यारयानभेदानां क्रमः समुपवर्ण्यते ॥३५॥ तकका पद अर्थपद कहलाता है। आठ अक्षररूप प्रमाणपद होता है और मध्यमपदमें सोलह सौ चौंतीस करोड़ तिरासी लाख सात हजार आठ सौ अठासी अक्षर होते हैं, और अङ्ग तथा पूर्वो के पदकी संख्या इसी मध्यम पदसे होती है ॥२३-२।। एक-एक अक्षरकी वृद्धिकर पद- समाससे लेकर पूर्व-समास पर्यन्त समस्त द्वादशाङ्ग श्रुत स्थित है ॥२६॥ उनमें पहला अङ्ग आचाराङ्ग है जो मुनियोंके आचारका अच्छी तरह वर्णन करता है और अठारह हजार पदोंसे सहित है ।।२७॥ दूसरा अड्ग सूत्रकृताङ्ग है जो स्वसमय और परसमयका विशेष रूपसे वर्णन करता है तथा छत्तीस हजार पदोसे सहित है ।।२८॥ तीसरा अङ्ग स्थानाङ्ग है जो जीवके एकसे लेकर देश तक स्थानोंका वर्णन करता है और वयालीस हजार पदोंसे सहित है। भावार्थ-स्थानागमें-जीवके एक केवलज्ञान, एक मोक्ष, एक आकाश, एक धर्म द्रव्य, एक अधर्म द्रव्य आदि। दो दर्शन, दो ज्ञान, दो राग-द्वेप आदि । तीन सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र, रूप रत्नत्रय, माया, मिथ्या, निदान-तीन शल्य, जन्य जरा मरण-तीन दोप आदि । चार गति, चार कपाय, चार अनन्त चतुष्टय आदि । पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच अस्तिकाय, पाँच कपाय आदि । छह द्रव्य, छह लेश्या, छह काय, छह आवश्यक आदि । सात तत्त्व, सात भय, सात व्यसन, सात नरक आदि । आठ कर्म, आठ गुण, आठ ऋद्धियाँ आदि, नौ पदार्थ, नौ नय, नौ शील आदि । तथा दश धर्म, दश परिग्रह, दशदिशा आदि । इस तरह सदृश संख्यावाले पदार्थीका वर्णन है ।।२६॥ चौथा अङ्ग समवायाङ्ग है यह एक लारा चौसठ हजार पदोंसे सहित है तथा द्रव्य आदिको तुल्यताका वर्णन करता है ॥३०॥ जैसे धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, एक जीव द्रव्य और लोकाकाशके प्रदेश एक बराबर हैं-असंख्यात- प्रदेशी है-यह द्रव्यकी अपेक्षा तुल्यता समवाय अङ्ग द्वारा वर्णित है ॥३१॥ सिद्धशिला, प्रथम नरकका मीमन्तक नागका इन्द्रक विल, प्रथम स्वर्गका ऋतु-विमान और अहाई द्वीप ये क्षेत्रसे समान हैं-पैंतालीस लास योजन विस्तारवाले है-यह क्षेत्रकी अपेक्षा समानता उसी समवा- यागमे कही गई है ॥३२॥ कालकी अपेक्षा उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीकी समानता कही गई है अर्थात् दोनों दश-दश कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण हैं और भावकी अपेक्षा केवलज्ञान तथा केवलदर्शनकी तुल्यता बतलाई गई है अर्थात् जिस प्रकार केवलज्ञानके अविभाग प्रनिच्छेद हैं उसी प्रकार केवलदर्शनके भी अनन्त अविभाग प्रतिच्छेद हैं ॥३३।। पाँचवाँ अङ्ग व्याख्या- प्रज्ञप्ति यह है उसमें पदोकी संख्या दो लास अट्ठाईस हजार है। इस अङ्गमें कुमागत्यागी १ माख्यं म.1 १८म । हरिवंशपुराणे पट्पश्चाशत् सहस्राणि पञ्च लक्षाः पदानि तु । ज्ञातृधर्मकथाचष्टे जिनधर्मकथामृतम् ॥३६॥ यत्रैकादशलक्षाश्च सहस्राण्यपि सप्ततिः । पदान्युपासकास्तत्रोपासकाध्ययने सृताः ॥३७॥ प्रयोविंशतिलक्षाश्च सहस्राणि च विंशतिः । भष्टौ चैव सहस्राणि स्युः पदान्यन्तकृदशे ॥३८।। दशोपसर्ग 'जेतारः प्रतितीर्थ दशोदिताः। संसारान्तकृतस्तत्र मुनयो छन्तकृद्दशे ॥३६॥ लसा द्वानवतियंत्र चत्वारिंशत्सहस्रकैः । चत्वारिंशन्सहस्राणि पदान्यभिहितानि तु ॥४०॥ तत्रौपपादिक देशे वर्ण्यन्तेऽनुत्तरारिक । दशोपसर्गजयिनो दशानुत्तरगामिनः ।।४।। स्त्रीपुंनपुंसकैस्तियग्नृसुरैरष्ट ते कृताः । शारीराचेतनत्वाम्यामुपसर्गा दशोदिताः ॥४२॥ भाक्षेपण्यादयो यत्र प्रश्नव्याकरणे कथाः । पालशास्त्रिनवतिः सहस्राण्यत्र पोडश ॥४३॥ श्रङ्गं विपाकसूत्रं यद् विपाकं कर्मणोऽवदत् । कोटी चतुरशीतिश्च पदलक्षा इहोदिताः ॥४॥ शत कोर्टीभिरष्टाभिः सहायाः पष्टिलक्षकाः । पटपञ्चाशत्महस्राणि पदानां पञ्च यत्र हि ॥४५॥ दृष्टिबादप्रमाणं स्यादेतत्तत्र सविस्तरम् । शतानि चीणि वर्ण्यन्ते त्रिपष्टयाधिकदृष्टयः ॥४६॥ क्रियातश्चाक्रियातोऽन्या अज्ञानाद्विनयात्पराः । वदरयो दृष्टयः सिद्धि ताश्चतुर्धा व्यवस्थिताः ॥४७॥ सक्रियाः शतधाऽशीत्या चतस्रोऽशातिरक्रियाः । अज्ञानात्सप्तपष्टिस्ता द्वात्रिंशद्विनयनिताः ॥४८॥ गणधगदि शिष्योके द्वारा विनय-पूर्वक केवलीसे किये गये अनेक प्रश्न तथा उनके उत्तरका विस्तार के साथ वर्णन है ।।३४-३५॥ छठवौँ अङ्ग ज्ञातृकथाङ्ग है यह जिनधर्मकी कथारूप अमृतका व्याख्यान करता है तथा इसमें पाँच लाख छप्पन हजार पद हैं ॥३६॥ सातवाँ अङ्ग उपासकाध्ययनाङ्ग है । श्रावकगण इसी अङ्गके आश्रित हैं अर्थात् श्रावकाचारका वर्णन इमी अङ्ग- मे है, इस अङ्गमें ग्यारह लाख सत्तरह हजार पद हैं ॥३७॥ आठवॉ अङ्ग अन्तकृद् दशाङ्ग है इसमें तेईस लाख अट्ठाईस हजार पद हैं ॥३८॥ इसमें प्रत्येक तीर्थकरके तीर्थमे दश प्रकारके उपसर्गको जीतकर ससारका अन्त करनेवाले दश-दश मुनियोंका वर्णन है ॥३६॥ नौवाँ अङ्ग अनुत्तरोपपादिक दशाङ्ग है इसमे बानवे लाख चवालीस हजार पद कहे गये हैं। इस अङ्गमै प्रत्येक तीर्थकरके तीर्थमे दश प्रकारके उपसर्गजीतकर अनुत्तरादि विमानोंमे उत्पन्न होनेवाले दश दश मुनियोका वर्णन है ॥४०-४१॥ स्त्री, पुरुष और नपुंसकके भेदसे तीन प्रकारके तिर्यश्च, तीन प्रकारके मनुष्य एवं स्त्री और पुरुपके भेदसे दो प्रकारके देव इन आठ चेतनोके द्वारा किये हुए आठ प्रकारके चेतनकृत, एक शारीरिक, कुष्टादिककी वेदनाकृत और एक अचेतनकृत-दीवाल आदिके गिरनेसे उत्पन्न सब मिलाकर दश प्रकारके उपसर्ग कहे गये है।।४२॥ दशवाँ अङ्ग प्रश्नव्याकरणाग हे इसमे *आक्षेपिणी आदि कथाओंका वर्णन है तथा इसमें तिरानवे लाख सोलह हजार पद हैं ॥४॥ ग्यारहवाँ अङ्ग विपाकसूत्राङ्ग है । यह अङ्ग ज्ञानावरणादि आठ कर्मों के विपाक-फलका वर्णन करता है और इसमे एक करोड़ चौरासी लाख पद हैं ॥४४॥ और बारहवाँ अङ्ग दृष्टिप्रवाद अङ्ग है इसमे पदीकी संख्या एक सौ आठ करोड़ अड़सठ लाख छप्पन हजार पाँच है ।।४।। इस अङ्गमे तीन सौ प्रेशठ दृष्टियोका विस्तारके साथ वर्णन किया गया है ॥४६॥ मूलमे १ क्रिया- दृष्टि, २ अक्रियादृष्टि, ३ अज्ञानदृष्टि और विनय दृष्टिके भेदसे दृष्टियाँ चार प्रकारकी हैं। ये दृष्टियाँ कमसे, क्रिया, अक्रिया, अज्ञान और विनयसे सिद्धिकी प्राप्ति होती है, ऐसा निरूपण करतो हैं॥४७॥ इनमे क्रियावादी एक सौ अस्सी, अक्रियावादी चौरासी, अज्ञानवादी अड़सठ और विनय १.के ते दशोपसर्गाः १ निर्यञ्चः स्त्रीपुनपुंसकाः, नरः स्त्रीपुनपुंसकाः, देवाः स्त्रीपुरुषाः इत्य चेतनवृता अष्टौ शारीरिक कुष्टव्याध्यादि, अचेतन मितिपतनादिकम्-सर्वे दशविधा उपसाः । • भाक्षेपिणी, २ विक्षेपिणी, ३ सवेदिनी और ४ निर्वेदिनोके भेइसे कथाएँ चार प्रकारकी हैं। जिसमें स्वमतका स्थापन होता है उसे भाक्षेपिणी, जिसमें पर मतका सण्डन है उसे विक्षेपिणी, जिसमें धर्म फलका वर्णन है उसे सवेदिनी और जिसमें वैराग्यका वर्णन है उसे निवेदिनी कथा कहते है।

दशमः सर्गः नियनिश्च स्वभावश्च कालो देवं च पौरुषम् । पदार्या नव जीवाद्या स्वपरी निस्यतापरी ॥१६॥ पञ्चभिनियतिष्ठश्चतुर्भिः स्वपरादिभिः । एकैकस्यान जीवादेयाँगेऽशास्युत्तरं शतम् ॥५०॥ नियस्याऽस्ति स्वतो जीवः परतो नियतोऽन्यतः । स्वभावाकालती देवात् पौरुषाव तथेतरे ॥५॥ सप्तजीवादितत्वानि स्वतश्च परतोऽपि च । प्रत्येक पौरुपान्तेभ्यो न सन्तति हिमप्ततिः ॥५२॥ नियतेः कालतः स्वन्तनं तानीति चतुर्दश । सप्तरया सासमायोगेशोनिश्चतुरधिष्टिताः ॥५३।। पदार्थाचब को वेत्ति सदायः सप्तमङ्गकैः । इत्याज्ञानिकमदृष्टया निषष्टिरुपचीयते ॥५॥ सनीवभावविको वा को वाऽमजीवभाववित् । सदसनावमावशः कश्चावाप्यजीवविन ।।५।। सदवतव्यजीवतोऽसदवाय विच कः । सदमत्तमवक्तव्यं को धा वेतीति यो जनः ॥५६॥ सद्भावोत्पत्तिविद् वा कोऽमदावोत्पत्तिविश्व कः । उमयोत्पत्तिविकश्वाऽवसाम्योत्पत्तिविय कः ॥५॥ चादी बत्तीस हैं ॥४८॥ नियति, स्वभाव, काल, देव और पौरुप इन पाँचका स्वतः, परतः, नित्य और अनित्य इन चारके साथ गुणा नेपर चीस भेद होते हैं और इन बीस भेदीका जीयादि नी पदार्थों के साथ योग करनेपर क्रियावादियोंके एक सौ भरसी भेद होते हैं। जैसे कोई मानना है कि जीव नियतिसे स्वतः है, कोई मानता है कि परतः है, कोई मानता है कि नित्य है, कोई मानता है कि अनित्य है। कोई मानता है कि जीय स्वभावसे स्वतः है। कोई मानता है कि परता है, कोई मानता है कि नित्य है, कोई मानता है कि अनित्य है। कोई मानता है कि जीय कालसे स्वतः है, कोई मानता है कि परतः है, कोई मानता है कि नित्य है, कोई मानता है कि अनित्य है और कोई मानता है कि जीव देवसे स्वतः है। कोई मानता है कि परतः है। कोई मानता है कि नित्य है और कोई मानता है कि अनित्य है। और कोई मानना है कि जीय पौरूपसे स्वतः है, कोई मानता है कि परतः है। कोई मानता है कि नित्य है और कोई मानता है कि अनित्य है। जिस प्रकार नियति आदिके कारण जीव पदार्थके वीस बीस भङ्ग हैं उसी प्रकार अजीवादि पदार्थो के भी यीस भग हैं। इस तरह क्रियावादियोंके सय मिल मिलाकर एक सी असी भेद होते हैं ॥४९-५१।। जीवादि सान तत्य, नियति, स्वभाव, काल, देव और पौरपकी अपेक्षा न स्वतः है और न परतः हैं। इस तरह जीयादि सान तत्वोंमें नियति आदि पाँचका गुणा करनेपर पैंतीस और पैंतीसमें स्वतः, परतः इन दोका गुणा करनेपर सत्तर भेद हुए। पुनः जीयादि सात तत्त्व नियति और फालकी अपेक्षा नहीं है इसलिए सातमें दोका गुणा करनेपर चौदह भेद हुए। पूर्वोक्त सत्तर भेदोंके साथ इन चौदह भेदोंको मिला देनेपर अक्रियायादियों के चौगमी भेद होते हैं ।।५२-५३|| जीयादि नी पदायाँको ? सन् , २ अमत , ३ नभय, ४ अवतन्य, ५ सद् अवक्तव्य, ६ असत् भवतव्य, और उभय भय कन्य इन नो भगांसे कौन जानना है? इस प्रकार नौ पदामि मात भग्नीफा गुगा करनार भातानिक मिथ्याष्टियों के प्रेशठ भेद होते है ॥४ा जैसे १ कोई कहता है कि जीय मग रूप हे यह कौन जानता है? २ कोई कहता है कि जीय भसद् रूप है यह फोन जानता है ? ३ कोई कहना है कि जीय सन् असत्--उभय रूप है यह कौन जानना है ? ४ कोई पहना है कि जो अयक्तव्य रूप है यह कौन जानना है ? ५ कोई कहता है कि जीप मा भवफव्य रूप है यह फोन जानना है ? ६ कोई पहना है कि जीव अमद् भयाव्य रूप है यह कौन मानना है ? और कोई कहना है कि जीय मन् असन् भयाान्य रूप है यह कौन जानता है? मी प्रकार भजीयादि पदायोंके माय मान-मान भागोंकी योजना करनेर राठभेद होने । इन राठ भेदाम १ जीयको मन् नासिको जाननयारा फोन है? जीया ममम् १.पोनर म., प..२ पगन्दीहि:- सरदरमा।

हरिवंशपुराणे भावमागाभ्युपगमैविकल्पैरेभिराहवैः । विषष्टिः सप्तपष्टिः स्यादाज्ञानिकमतारिमका ।।८।। विनयः खलु कर्तव्यो मनोवाकायदानतः । 'पितृदेवनृपज्ञानियालवृद्धतपस्विषु ।।५।। मनोवाकायदानानां मात्राद्यष्टकयोगतः । द्वानिशरपरिसंख्याता वनयियो हि दृष्टयः ॥१०॥ इत्येवं वदतो दृष्टिं दृष्टिवादस्य पञ्च ते । परिकर्मा यो भेदाश्चूलिकान्ता व्यवस्थिताः ॥६॥ पञ्चप्रज्ञप्तयः प्रोक्ताः परिकर्मणि ताः पुनः । व्याख्याप्रज्ञप्तिपर्यन्ताश्चन्द्रसूर्यादिनामिकाः ।।२।। पत्रिंशत्पदलताभिः सहस्रः पञ्चभिः पदैः । चन्द्रप्राप्तिराचष्टे चन्द्रभोगादिसम्पदाम् ॥६॥ पदानां पञ्चलसाभिः सहस्विमिरेव च । सूर्यप्रज्ञप्तिराख्याति सूर्यस्त्रीविभवोदयम् ॥६॥ सहस्र: पाविशत्या लक्षाभिस्तिसृभिः पदैः। जम्यूद्वीपस्य सर्वस्वं तरप्रज्ञप्तिः प्रभाषते ॥६५॥ पदलशा द्विपञ्चाशत् पट् निशरसहस्रकाः। प्रज्ञप्ती सन्ति यस्यां सा द्वीपसागरयणिनी ॥१६॥ लक्षाश्चतुरशीतियाँ सपत्रिंशत्सहस्रकाः । पदानां प्रवदत्येपा व्याख्याप्रज्ञप्तिरुच्यते ।।६७॥ रूपिद्व्यमरूपं च भव्याभव्यात्मसञ्चयम् । व्यारयाप्रज्ञप्तिरापयाति समस्तं सा सविस्तरम् ॥६॥ पदाष्टाशीति लक्षा हि सूने चादावयन्धकाः । श्रुतिस्मृतिपुराणार्थी द्वितीये सूत्रताः पुनः ॥६६॥ तृतीये नियतिः पक्षश्चतुर्थे समयाः परे । सूत्रिता ह्यधिकारेऽपि नानाभेदव्यवस्थिताः ॥७011 पदैः पशसहस्रेस्तु प्रयुक्त प्रथमे पुनः । अनुयोगे पुरागानिपष्टिरुपवर्ण्यते ।।७।। चतुर्दशविध पूर्व गत श्रुतमुदीर्यते । प्रतिपूर्व च वस्तूनि ज्ञातव्यानि यथाक्रमम् ।।७२।। उत्पत्तिको जाननेवाला कौन है ? ३ जीवकी सत्-असत् उत्पत्तिको जाननेवाला कौन है ? और जीवको अवक्तव्य उत्पत्तिको जाननेवाला कौन है ? केवल भावकी अपेक्षा स्वीकृत इन चार भेदोंके और मिला देनेपर आज्ञानिक मिथ्यादृष्टियोंके सब भेद सड़सठ हो जाते हैं ॥५५-५८।। १ माता, २ पिता, ३ देव, ४ राजा, ५ ज्ञानी, ६ बालक, ७ वृद्ध और ८ तपस्वी इन आठका मन वचन, काय और दानसे विनय करना चाहिए । इसलिए मन, वचन, काय और दान इन चारका माता आदि आठके साथ संयोग करनेपर वैनयिक मिथ्यादृष्टियोंके बत्तीस भेद हो जाते है ॥५६-६०॥ इस प्रकार अनेक मिथ्यादृष्टियोंका कथन करनेवाले दृष्टिवाद अङ्गके १ परिकर्म, २ सूत्र, ३ अनुयोग, ४ पूर्वगत और ५ चूलिका ये पॉच भेद हैं ॥६१॥ परिकर्मम १ चन्द्रप्रज्ञप्ति, २ सूर्यप्रज्ञप्ति, ३ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति, ४ द्वीपसमुद्रप्रज्ञप्ति और व्याख्याप्रज्ञप्ति ये पाँच प्रज्ञ. प्तियों कही गई हैं अर्थात् इन पाँच प्रज्ञप्तियोंकी अपेक्षा परिकर्मके पॉच भेद हैं ॥६२॥ इनमें चन्द्रप्रज्ञप्ति छत्तीस लाख पाँच हजार पदोंके द्वारा चन्द्रमाकी भोग आदि सम्पदाका वर्णन करती है ॥६३।। सूर्यप्रज्ञप्ति पाँच लाख तीन हजार पदोके द्वारा सूर्यके स्त्री आदि विभवका निरूपण करती है ॥६४॥ जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति तीन लाख पच्चीस हजार पदोंके द्वारा जम्बूद्वीपके सर्वस्वका वर्णन करती है ॥६५॥ जिसमे वावन लाख छत्तीस हजार पद है, ऐसी द्वीप और सागरोंका वर्णन करनेवाली चौथी द्वीपसमुद्रप्रज्ञप्ति है ॥६६॥ जो चौरासी लाख छत्तीस हजार पदोसे युक्त है वह पाँचवीं व्याख्याप्रज्ञप्ति कही जाती है ॥६॥ व्याख्याप्रज्ञप्ति, रूपीद्रव्य अरूपीद्रव्य तथा भव्य अभव्य जीवोंके समूह आदि सवका विस्तारके साथ वर्णन करती है ॥६॥ दृष्टि- वादके दूसरे भेद सूत्रमे अठासो लाख पद हैं, इसके अनेक भेदोंमेंसे प्रथम भेदमे अबन्धक- बन्ध न करनेवाले भावोका वर्णन है। दूसरे भेदमे श्रुति, स्मृति और पुराणके अर्थका निरूपण है। तीसरे भेदमे नियति पक्षका कथन है और चौथे भेदमें नाना प्रकारके परसमयों-अन्य दर्शनीका निरूपण है ॥६६-soll दृष्टिवादके तीसरे भेद अनुयोगमे पाँच हजार पद हैं तथा इसके अवान्तर भेद प्रथमानुयोगमें त्रेशठ शलाकापुरुषोके पुराणका वर्णन है ॥७१॥ दृष्टिवादका १. माता च पिता च इति पितरौ एकशेषात् मातृपदस्य लोपः । २. ते म ।

दशमः सर्गः दश चतुर्दशाष्टी पाटादश द्वादश द्वयोः । दशपड्विंशतित्रिंशत्तत्तत्पञ्चदशैव तु ॥७३।। दर्शवोत्तरपूर्वाणां चतुणां वर्णितानि वै । प्रत्येक विंशतिस्तेषां वस्तूनां प्रामृतानि तु ॥७॥ पूर्वमुपादपूरियं पदकोटीप्रमाणकम् । द्रव्यधीध्यध्ययोत्पादनयव्यावर्णनाग्मकम् ।।७५|| लक्षाः पण्णवतियंत्र पदानां तेन दृष्टयः । वय॑न्तेऽप्रायणीयेन स्वमताप्रपदानि तु ॥६॥ भप्रायणीयपूर्वस्य यान्युनानि चतुर्दश । विज्ञातव्यानि वस्तूनि तानीमानि यथाश्रमम् usam पूर्वान्तमपरान्तं च ध्रुवमधुवमेव च । तथाच्यवनलब्धिश्च पञ्चमं वस्तु वर्गितम् ॥3 भध्रुवं सम्प्रणयन्तं कल्पाश्वार्थश्च नामतः । भौमावयाद्यमित्यन्यत् तथा सर्वार्थकल्पकम् ॥७॥ निर्वाणं च तथा जेयाऽतीतानागतकल्रता । सिद्धपारयं चाप्युपाध्याय स्थापितं वस्तु चान्तिमम् ॥८॥ वस्तुनः पचमस्यात्र धनुर्थे मामृते पुनः । कर्मप्रकृतिसंज्ञे तु योगद्वाराण्यमुनि तु ॥ कृतिश्च वेदनास्पर्शः कांग्यं च पुनः परम् । प्रकृतिश्च तथैवान्यद् बन्धनं च निबन्धनम् ॥५२॥ प्रक्रमोपक्रमी प्रोनावुदयो मोर एव च । संझमश्च तथा रेश्या लेश्याकर्म च वर्णितम् ॥३॥ लेश्यायाः परिणामश्च मातासातं तथैव च । दीघंहस्वमपि तथा भवधारणमेव च ॥८॥ पुद्गलामाभिधानं च तसियत्तानिधत्तकम् । सनिकाचितमित्यन्यदनिकाचितसंयुतम् ॥८॥ दमस्थितिकमिन्युक्त पश्चिमं स्कन्ध एव च । ममस्तविषयाधीमा बोध्याल्पयता तथा ॥८६॥ भन्येरामपि पूर्वागां वस्तुपु प्राभूतेषु च । अनुयोगेपु चान्येषु भेदो प्राद्यो ययागमम् ॥८॥ पदानां महनिलंदा यत्र वर्णयति स्फुटम् । तद्वीयानुभवादारय वीर्य वीर्यवतां सताम् ॥८८|| भस्तिनास्तिप्रवादं च यत्पष्टिपदलपकम् । जीवाचस्तित्वनास्तिाव स्वपरादिभिराह तत् ॥८॥ एकोनपदकोटीक यत्तद्वर्णयति श्रुतम् । पूर्व ज्ञानप्रवादाप्य ज्ञान पनविधं गुणः ॥१०॥ चौथा भेद पूर्वगत कहा जाता है उसके उत्पाद आदि चौदह भेद हैं और प्रत्येक भेदमें निम्न कार वस्तुओंकी संख्या जाननी चाहिए ॥७२|| उन भेदाम कमसे दश, चौदह, पाठ, अठारह, बारह, बारह, सोलह, वीस, तीस, पन्द्रह, दश, दश, दश और दश वस्तुएँ हैं तथा प्रत्येक वस्तुके थीम-धीस प्राभूत होते हैं ।।७३-७४ा पहला उत्पादपूर्य है उसमें एक करोड़ पद हैं तथा द्रव्यों के उत्पाद-व्यय और धीश्यका वर्णन है ॥७॥ दूसरा आग्रायणीय पूर्व है उसमें छियानवे लास पद है तथा स्वमत सम्मत सात तत्त्व नव पदार्थ आदिका वर्णन है ।।७६॥ पहले आप्रायणीय पूर्यकी जिन चौदह वस्तुओंका कथन किया गया है उनके नाम यथाक्रमसे इमप्रकार जानना चाहिए। १ पूर्वान्त, २ अपरान्त, ३ ध्रुव, ४ अध्रुव, ५ अच्ययन लब्धि, ६ अध्रुव सम्प्रणधि, ७ फल्प, अयं, भीमावय, १० सर्वार्थकल्पक, ११ निर्वाग, १२ अनीनानागत, १३ सिद्ध और १४ उपाध्याय -आमायणीय पूर्वकी पञ्चम वस्तुकै योम प्राभृत (पाहुई) है। उनमें कर्मप्रकृति नामक चौथे प्राभूतमें निम्नलिखित चौवीस योगद्वार हैं ॥१॥ १ फनि, २ वेदना, ३ स्पर्श, ४ फर्म, ५ प्रकृति, ६ थन्धन, ७ निबन्धन, ८ प्रक्रम, ६ अक्रम, १० उद्य, ११ मोत, १२ संग्रम, १३ लेश्या, १४ लेश्याम, १५ लेयापरिणाम, १६ मातामात, १७ दीर्घसम्ब, १८ भयधारण, १६ पुलारमा, निघता निघतक, २१ सनियाचित, २२ अनिकाचिन, २३ कमयिनि और २१ फन्य । इन योगदागेमें समस्त विपयोंकी होनाधिकता यथायोग्य जाननी चाहिए ॥८२-८॥ अन्य पूर्योको यम्नु, प्राभृत तथा अनुयोग आदिका भेद भागमके अनुमार जानना चाहिए | जिममें मत्तर लार पद है ऐसा तोमग बीयांनुवाद नामा पूर्व अतिशय पगामी मयुगगक पराकमका वर्णन करना है | जिमम माठ लास पदमा नीया अग्नि नाग्नि प्रयाद पूर्व विधनुष्टयको अपेक्षा जायादि द्रव्यों अग्नित्य और पर-चतुष्टयकी अपेक्षा इनर नाग्नित्य का फयन फाता है | एक फम एक करोड़ पदोंमे मदिन जो पापा शानप्रसाद १६२ हरिवंशपुराणे पूर्व सत्यप्रवादाख्यं पदकोटीकपट्पदम् । भाषा द्वादशा प्राह दशा सत्यभाषणम् ॥११॥ हिंसाद्यकर्त: कर्तुळ कर्तव्यमिति भाषणम् । अभ्याश्यानं प्रसिद्धो हि वागादिक्लहः पुनः ॥१२॥ दोषाविकरणं दुष्टैः पश्चात्पैशुन्यभाषणम् । भाषा बद्धप्रलापाण्या चतुर्वर्गविधर्जिता ॥३३॥ रन्यरत्यभिधे वोभे रत्यरत्युपपादिक । भासज्यते यथार्थेषु श्रोता सोपाधिवाक् पुनः ॥६॥ वञ्चनाप्रवणं जीवं कर्ता नि:कृतिवाक्यतः । न नमत्यधिरेवारमा सा चाप्रणतिवागभूत् ॥१५॥ ग प्रवर्तयति स्तैये मोघयाक् सा सीरिता । सम्यग्मागें नियोक्त्री या सम्यग्दर्शनवागसौ ॥६६॥ मिथ्यादर्शनवाक् सा या मिथ्यामार्गोपदेशिनी । वाचो द्वादशभेदाया वक्तारो द्वीन्द्रियादतः ॥२७॥ दशधा सन्यसद्भावे नामसत्यमुदाहृतम् । इन्द्रादिव्यवहारार्थ यत् संज्ञारणं हि तत् ॥८॥ यदर्थासनिधानेऽपि रूपमानेण भाप्यते । तद्रूपसत्यं चित्रादिपुरुपादावचेतने ।।६।। आकारेणाक्षपुस्तादी सता वा यदि वाऽसता । स्थापितं व्यवहाराचं स्थापनासत्यमुच्यते ॥१००॥ प्रतीत्य वर्तते भावान् यदीपशमकादिकान् । प्रतीत्यसत्यमित्युक्तं वचनं तद्ययाऽगमम् ॥१०॥ नामका पूर्व है वह पाँच प्रकारके ज्ञानका वर्णन करता है ॥१०॥ जिसमें छह अधिक एक करोड़ पद हैं ऐसा छठयाँ सत्यप्रवाद नामका पूर्व बारह प्रकारको भाषा तथा दश प्रकार के सत्य वचनका कथन करता है ||६|| बारह प्रकारकी भाषाओके नाम और स्वरूप इस प्रकार हैं- हिंसादि पापोके करनेवाले अथवा नहीं करनेवालेके लिए करना चाहिए। इस प्रकार कहना सो अभ्याख्यान भापा है । कलह कारक वचन बोलना सो कलह भाषा है यह प्रसिद्ध ही है ॥१२॥ दुष्ट मनुष्योंके द्वारा पीठ पीछे दोषोंका प्रकट किया जाना सो पैशुन्य भापा है। जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार वर्गाके वर्णनसे रहित है वह बद्धप्रलाप नामक भाषा है ।।३।। रति अर्थात् राग उत्पन्न करनेवाली भाषाको रति भाषा कहते हैं और अरति अर्थात् द्वेष उत्पन्न करनेवाली भापाको अरति भाषा कहते हैं, जिसके द्वारा श्रोता अर्थार्जन आदि कार्यों में लग जाता है वह उपाधि वाक् भापा है । जो जीवको धोखादेहीमे निपुण करती है वह निकृति भाषा है । जो अपनेसे अधिक गुणवालोको नमस्कार नहीं करती है वह अप्रणति भाषा है ॥६४-६५॥ जो जीवको चोरीमें प्रवृत्त करती है वह मोघ (मोष) भाषा है । जो समीचीन मार्गमें लगाती है वह सम्यग्दर्शन भाषा है और जो मिथ्या मार्गका उपदेश देती है वह मिथ्यादर्शन भाषा है। इन बारह प्रकारको भाषाओंके बोलनेवाले द्वीन्द्रियादिक जीव हैं ॥६६-६७|| सत्य वचन दश प्रकारके हैं उनमे पहला नाम सत्य कहा गया है, व्यवहार चलानेके लिए किसीका इन्द्र आदि नाम रख लेना नामसत्य है ॥८॥ पदार्थके न होनेपर भी रूप-मात्रकी मुख्यतासे जो कथन होता है वह रूपसत्य है जैसे किसी मनुष्यके अचेतन चित्रको उस मनुष्यरूप कहना ॥६॥ पाँसा तथा खिलौना आदिमें आकारकी समानता होने अथवा न होने- पर भी व्यवहारके लिए जो स्थापना की जाती है वह स्थापना सत्य है जैसे सतरंजको गोटोमें वैसा आकार न होनेपर भी बादशाह-वजीर आदिकी स्थापना करना और हाथी, घोड़ा आदिके खिलौनों में उन जैसा आकार होनेपर हाथी, घोड़ा आदिको स्थापना करना ॥१००|| आगमके अनुसार प्रतीतिकर औपशमिकादि भावोका कथन करना प्रतीत्य सत्य है । जैसे मिथ्यादृष्टि गुण- स्थानम आगममे औदयिक भाव बतलाया है । यद्यपि वहाँ ज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम भाव १ अभ्याख्यानकलहपैशुन्यासंबद्धप्रलापरत्यरत्युपधिनिकृत्यप्रणतिमोषसम्यग्दर्शन मिथ्यादर्शनामिका भावा द्वादशधा। राजवार्तिक प्रथमाध्याय सूत्र २० । २ नामरूपस्थापनाप्रतीत्यसंवृतिसयोजनाजनपददेशभावसमयसत्यभेदेन दशविधः सत्यभावः । -राजवार्तिक प्र०अ० मू०२० । ३. जयार्थेषु म०, जयायेंषु स्रोतारो बाधिता पुनः क० १ ४. प्रतीत्या म ।

दशमः सर्गः सामग्रीकृतकायस्य वाचकवैकदेशतः । वचः संवृतिसत्यं स्यात् भैरीशन्दादिकं यया ॥१०२॥ चेतनाचेतनद्व्यसन्निवेशाविभागकृत् । वचः संयोजनासत्यं क्रौञ्चव्यूहादिगोचरम् ॥७०३॥ यदायर्याऽनायनानावनानाजनपदेविह । चनुवंगकरं वाक्यं सत्यं जनपदाधितम् ॥१०॥ यग्रामनगराचारराजधर्मोपदेशकृत् । गणाश्रमपदोनासि देशसयं तु तन्मतम् ॥१०॥ छमस्ये व्ययाथाम्यज्ञानवैकल्यवन्यपि । प्रासुकाप्रासुकरवेऽपि भावमयं वचः स्थितम् ॥१०६॥ द्रव्यपर्यायभेदानां याथालयप्रतिपादकम् । यत्तरममयसत्यं स्यावागमार्थपरं वचः ॥१०॥ कोटयः पड्विशतियंत्र पदानां परिवर्णिताः । भारमप्रवादपूर्वेऽपि भूयोयुक्तिपरिग्रहे ॥१०॥ तत्र कन्धभोक्तृत्वनित्यताऽनित्यतादयः । भात्मधर्मा निरूप्यन्ते तभेदाश्च सयुक्तिकाः ॥१०॥ साशीतिपदलकपदकोटीप्रमाणकम् । पूर्व कर्मप्रवादारय कर्मबन्धस्य वर्णकम् ॥१०॥ लक्षाश्चतुरशीतिस्तु पदानां यत्र वर्णिताः । पूर्व नवममारयातं प्रत्यारयानं तदारयया ॥११॥ प्रमिताप्रमितं तत्र द्रव्यमावसमाश्रयम् । प्रत्यारयानं समारयातं यच्च श्रामण्यवर्धनम् ॥११२॥ कोटी च दशलक्षाश्च यस्पदानां प्रवर्तिता । तद्विद्यानुप्रवादारयं पूर्व दशममत्र च ॥१३॥ लबोऽङ्गुष्ठप्रसेनाद्या विद्याः सप्तशतानि तु । रोहिण्याद्या महाविद्याः प्रोक्ताः पञ्चशतानि च ॥११॥ होनेसे क्षयोपशमिक तथा जीवत्व और भव्यत्व अथवा जीवत्व और अभव्यत्वकी अपेक्षा पारिणामिक भाव भी है परन्तु आगमके कहे अनुसार यहाँ दर्शनमोहकी अपेक्षा औदायिक भाव ही कहना ॥१०१॥ समुदायको एक देशको मुख्यतासे एक रूप कहना संवृति सत्य है, जैसे भेरी, तबला, बाँसुरी, वीणा आदि अनेक बाजोंका शब्द जहाँ एक समूहमैं हो रहा है वहाँ भेरी आदिकी मुख्यतासे भेरी आदिका शब्द कहना ।।१०२॥ जो चेतन-अचेतन द्रव्यों के विभागको करनेवाला न हो उसे संयोजना सत्य कहते हैं। जैसे क्रौञ्चन्यूह आदि । भावार्थ-क्रौञ्चव्यूह, चक्रव्यूह आदि सेनाओंकी रचनाके प्रकार हैं और सेनाएँ चेतन अचेतन पदार्थोके समूहसे वनती हैं पर जहाँ अचेतन पदार्थीको विवता न कर केवल क्रौञ्चाकार रचो हुई सेनाको क्रौश्च. व्यूह और चेतन पदार्थोंकी विवक्षा न कर केवल चक्रके आकार रची हुई सेनाको चक्रव्यूह कह देते हैं वहाँ संयोजनासत्य होता है ॥१०॥ जो वचन आर्य-अनार्य आदि अनेक देशों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका करनेवाला है उसे जनपदसत्य कहते हैं ॥१०४|| जो वचन गाँवकी रीति, नगरकी रीति तथा राजाकी नीतिका उपदेश करनेवाला हो एवं गण और आश्रमां- का उपदेशक हो वह देशसत्य माना गया है ।।१०५॥ यद्यपि छद्मस्थके द्रव्योंके यथार्थ ज्ञानकी विकलता है तथापि केवलीके वचनको प्रमाणता कर वे प्रासुक और अप्रामुक द्रव्यका निर्णय करते हैं यह भावसत्य है ॥१८६|| और जो द्रव्य तथा पर्यायके भेदीको यथार्थताको वतलाने- वाला तथा आगमके अर्थको पोपण करनेवाला वचन है वह समयसत्य है ॥१०७॥ जिसमें छब्बीस करोड़ पद कहे गये हैं ऐसा सातवाँ आत्मप्रवाद नामका पूर्व है। इसमें अनेक युक्तियों- का संग्रह है तथा कर्तृत्व, भोक्तृत्व, नित्यत्व, अनित्यत्व आदि जीवके धर्मों और उनके भेदोंका सयुक्तिक निरूपण है ॥१०-१०६। जिसमें एक करोड़ अस्सी लाख पद हैं ऐसा आठवाँ कर्म- प्रवाद नामका पूर्व है। यह पूर्व ज्ञानावरणादि कर्माके बन्धका निरूपण करनेवाला है ॥११॥ जिसमे चौरासी लाख पद हैं ऐसा नौवाँ प्रत्याख्यान पूर्व कहा गया है ॥१११|| हम पूर्वमें परिमित द्रव्य-प्रत्यास्यान और अपरिमित भाव-प्रत्याख्यानका निरूपण है तथा यह पूर्व मुनिधर्मको बढ़ानेवाला है ॥११२॥ जिसमें एक करोड़ दश लाख पद है ऐसा दुशयाँ विद्यानुवाद नामका पूर्व है ।।११३। इसमें अङ्गुष्ठ प्रसेन आदि सात सौ लघु विद्याएँ और रोहिणी आदि पाँच सौ १ याथात्म्यज्ञानं वैल्य म०।२ प्रारण्य म.1 १९४ - हरिवंशपुराणे कोटयः पड्विशतियस्मिन् पदानां सुप्रतिष्ठिताः । कल्याणनामधेयं तत् पूर्वमन्वर्थनामकम् ॥११५॥ ज्योतिर्गणस्य सञ्चारं त्रिपष्टिपुरुषाश्रितम् । सुरासुरेन्द्रकल्याणं वर्णयत्यतिविस्तरम् ॥११६॥ स्वप्नान्तरिक्षमौभागस्वरव्यञ्जनलक्षणम् । छिन्नमिस्यष्टधाभिन्नं निमित्तं शाकुनं तथा ॥११७॥ यत्त्रयोदशकोटीभिः पदानां समधिष्टितम् । प्राणावायाख्यपूर्व तस्मणीतं द्वादशं परम् ॥११॥ यत्र कायचिकि सादिरायुर्वेदोऽष्टधोदितः । प्राणापानविभागादिभूतकर्मविधिस्तथा ।।११६॥ क्रियाविशालपूर्व तु नवको पदात्मकम् । छन्दःशब्दादिशास्त्राणि तत्र शिल्पकला गुणाः ॥१२०॥ पञ्चाशत्पदलक्षाभिः कोटयो द्वादश यत्र तु । पूर्व चतुर्दशे लोकबिन्दुसारे हि तत्र च ॥१२॥ अङ्कराशिविधिश्चाष्टव्यवहारविधिस्तथा । परिकर्मविधिः प्रोक्तः समस्तश्रुतसम्पदा ॥१२२॥ जलस्थलगताकाशरूपमायागता पुनः । चूलिका पञ्चधान्वर्थसंज्ञा भेदवती स्थिता ॥१२॥ द्विकोटयौ नवलक्षाश्च नवाशीतिसहस्रकैः । द्वे शते पदसङ्खयानां पञ्चानां च पृथक् पृथक् ॥१२॥ चतुर्दशनकारं स्यादगवाह्यं प्रकीर्णकम् । ग्राह्यं प्रमाणमेतस्य प्रमाणपदसङ्ख्यया ॥२५॥ अष्टावक्षरकोटयस्तु लकाष्ट सहस्रकैः । शतं च पञ्चसप्तत्या'तयोऽक्षरसङ्ग्रहम् ॥ १२६।। त्रयोदशसहस्राणि पञ्चशत्येकविंशतिः । कोटी च पदसवय यं वर्णाः सप्तैव वर्णिताः ।।१२७॥ पञ्चविशतिलक्षाश्च त्रयस्त्रिंशत् शतानि च । भीतिः श्लोकसङ्ख्ययं वर्णाः पञ्चदशान च ॥१२८॥ तन्न सामायिकं नाम शत्रुमित्रसुखादिषु । रागद्वेपपरित्यागात्समभावस्य वर्णकम् ॥१२६॥ महाविद्याएँ कही गई हैं ॥११४।। जिसमें छब्बीस करोड़ पद प्रतिष्ठित हैं ऐसा ग्यारहवाँ कल्याण- वाद नामका पूर्व है । यह सार्थक नामधारी है और सूर्य, चन्द्रमा आदि ज्योतिषी देवोंके संचार तथा सुरेन्द्र, असुरेन्द्रकृत नेशठ शलाकापुरुषोके कल्याणका विस्तारके साथ वर्णन करता है। साथ ही इसमे १ स्वप्न, २ अन्तरिक्ष, ३ भौम, ४ अङ्ग, ५ स्वर, ६ व्यञ्जन, ७ लक्षण और ८ छिन्न इन अष्टाङ्ग निमित्तों और अनेक शकुनोका भी वर्णन है ॥११५-११७॥ जो तेरह करोड़ पदोसे सहित है वह प्राणावाय नामका बारहवाँ पूर्व है॥११८॥ इसमें काय-चिकित्सा आदि आठ प्रकारके आयुर्वेदका तथा प्राणापान आदिके विभाग और उनकी पार्थिवी आदि धारणाओंका वर्णन है ।।११६।। तेरहवाँ नौ करोड़ पदोंसे सहित क्रियाविशाल नामका पूर्व है इसमे छन्दः- शाख, व्याकरण-शास्त्र तथा शिल्पकला आदि अनेक गुणोंका वर्णन है ॥१२०॥ और जिसमें बारह करोड़ पचास लाख पद हैं ऐसा चौदहवाँ लोकविन्दुसार नामक पूर्व है। इसमें समस्त श्रुतरूपी सम्पदाके द्वारा अंकराशिकी विधि, आठ प्रकारके व्यवहारकी विधि तथा परिकर्मकी विधि कही गई है ।।१२१-१२२॥ पहले बारहवें दृष्टिवाद अङ्गके पाँच भेदोंमे एक चूलिका नामक भेद बता आये हैं वह जलगता, स्थलगता, आकाशगता, रूपगता और मायागताके भेदसे पॉच प्रकारको है। चूलिकाके ये समस्त भेद सार्थक नामवाले हैं और इनमें प्रत्येकके दो करोड़ नौ लास नवासी हजार दो सौ पाँच पद हैं ।।१२३-१२४॥ इस प्रकार अङ्गप्रविष्ट श्रतज्ञानका वर्णन किया, अब अगवाह्यश्रुतका वर्णन करते हैं- अगवाह्यश्रुत सामायिक आदिके भेदसे चौदह प्रकारका है, यह प्रकीर्णकश्रुत कहलाता है और इसका प्रमाण, प्रमाणपदकी सख्यासे ग्रहण करना चाहिए ॥१२५॥ अगवाह्य श्रुतज्ञान- के समस्त अक्षरोंका संग्रह आठ करोड़ एक लास आठ हजार एक सौ पचहत्तर प्रमाण है ॥१२६।। इसके समस्त पदोका जोड़ एक करोड़ तेरह हजार पाँच सौ इक्कीस पद तथा शेष सात अक्षर प्रमाण है ॥१२७॥ और इसके समस्त श्लोकों की संख्या पच्चीस लाख तीन हजार तीन सौ असी तथा शेष पन्द्रह अक्षर प्रमाण है ॥१२८।। उन चौदह प्रकीर्णकोम पहला सामायिक नामका - १ तौकोऽदर म।

दशमः सर्गः जिनस्तवविधानास्यः स चतुर्विंशतिस्तवः । वर्णको वन्दना वन्द्यवन्दनाविधिवादिनी ॥१३०॥ दव्ये क्षेत्रे च कालादी कृतावधस्य शोधनम् । प्रतिक्रमणमाख्याति प्रतिक्रमणनामकम् ॥१३॥ दर्शनज्ञानचारित्रतपोवार्योपचारिकम् । पञ्चधाः विनयं वक्ति तद् वैनयिकनामकम् ॥१३२॥ चतुःशिरस्त्रिविनतं द्वादशावर्तमेव च । कृतिकारयमाचष्टे कृतिकर्मविधि परम् ।।१३३॥ दशवकालिकं वक्ति गोचरग्रहणादिकम् । उत्तराध्ययनं वीरनिर्वाणगमनं तथा ॥१३४॥ तत्कल्पव्यवहाराख्यं प्राह कल्पं तपस्विनाम् । अकहप्यसेवनायां च प्रायश्चित्तविधि तथा ॥१३५॥ यत्कल्पाफल्पसंझं स्यात् कराकल्पद्वयं पुनः । महाकल्पं पुनद्रव्यक्षेत्रकालोचितं यतेः ।।१३६॥ देवोपपादमाचष्टे पुण्डरीकारयेमप्यतः । देवीनामुपपादं तु पुण्डरीकं महादिकम् ।।१३७।। निषद्यकारयमारयाति प्रायश्चित्तविधि परम् । अङ्गवाह्यश्रुतस्यायं व्यापारः प्रतिपादितः ॥१३८॥ एकमष्टी च चत्वारि चतुः पट् सप्तभिश्चतुः । चतुः शून्यं च सप्तनिसप्तशुन्यं नवापि च ॥१३॥ पज पन्चैकक पट् च तथैकं पञ्चतत्वतः । समस्तश्रुतवर्णानां प्रमाण परिकीर्तितम् ॥१४०॥ लहाशीतिसहस्राणि चतुर्भिश्च चतुःशती । ससपष्टिश्च निर्दिष्टाः कोटीकोटय इमाः स्फुटाः ॥१४१॥ चत्वारिंशचतुलंचास्त्रिसप्ततिशतानि च । सप्ततिश्च तथा ज्ञेया इमाः कोटयः स्फुटीकृताः ॥१४२॥ सपञ्चनवतिलंक्षाः सपञ्चाशत्सहस्रकम् । सहस्रं षट्शती वर्णा वर्णाः पञ्चदशापि ते ॥१४३॥ प्रकीर्णक है। यह प्रकीर्णक, शत्रु, मित्र तथा सुख-दुःख आदिमें राग-द्वेपका परित्याग कर समता. भावका वर्णन करनेवाला है ॥१२६॥ दूसरा जिनस्तव नामका प्रकीर्णक है इसमें चौबीस तीर्थ- करोंका स्तवन किया गया है। तीसरा वन्दना नामका प्रकोणक है इसमें वन्दना करने योग्य पञ्चपरमेष्ठी आदिकी वन्दनाकी विधि वतलाई गई है ॥१३०॥ प्रतिक्रमण नामका चौथा प्रकी- र्णक द्रव्य क्षेत्र काल आदिमें किये गये पापको शुद्ध करनेवाले प्रतिक्रमणका कथन करता है ।।१३१॥ वैनयिक नामका पाँचयाँ प्रकीर्णक दर्शन-विनय, ज्ञान-विनय, चारित्र-विनय, तपोधिनय और उपचार-विनयके भेदसे पाँच प्रकारको विनयका कथन करता है ॥१३२।। कृतिकर्म नामका छठवाँ प्रकीर्णक, सामायिकके समय चार शिरोनति, मन-वचन-कायसे आदि-अन्तमें दो दण्डवत् नमस्कार और बारह आवर्त करना चाहिए। इस प्रकार कृति-कर्मको उत्तम विधिका वर्णन करता है ।।१३३।। दशवैकालिक नामका सातवाँ प्रकीर्णक मुनियोंकी गोचरी आदि वृत्तियोंके ग्रहण करने आदिका वर्णन करता है। आठवाँ उत्तराध्ययन नामका प्रकीर्णक महावीर भगवान्के निर्वाणगमन सम्बन्धी कथन करता है ॥१३४॥ कल्पव्यवहार नामक नौवाँ प्रकीर्णक तपस्वियों के करने योग्य विधिका तथा नहीं करने योग्य कार्योंके हो जानेपर उनको प्रायश्चित्त-विधिका वर्णन करता है ॥१३५॥ कल्पाकल्प नामक दशवाँ प्रकीर्णक करने योग्य तथा न करने योग्य दोनों कार्योका निरूपण करता है। महाकल्प नामका ग्यारहवाँ प्रकीर्णक मुनिके द्रव्य क्षेत्र तथा काल. के योग्य कार्यका उल्लेख करता है. ॥१३६|| पुण्डरीक नामका चारयाँ प्रकीर्णक दोनोंके उपपाद. का वर्णन करता है। महापुण्डरीक नामका तेरहवाँ प्रकीर्णक देवियोके उपपादका निरूपण करता है ॥१३७॥ और निपद्य नामका चौदहवाँ प्रकीर्णक प्रायश्चित्त-विधिका उत्तम वर्णन करता है। इस प्रकार यह अगवाह्य श्रुतज्ञानका विस्तार कहा ॥१३॥ समस्त श्रुतके अक्षरोंका प्रमाण एक, आठ, चार, चार, छह, सात, चार, चार, शून्य, सात, तीन, सात, शून्य, नो, पाँच, पाँच, एक, छह, एक, और पाँच अर्थात् एक लाख चौरासी हजार चार सौ सड़सठ कोडाकोड़ी चवालीस लाख, सात हजार तीन सौ सत्तर करोड़ पंचानवे लाख इक्यावन हजार छह सौ पन्द्रह १ वन्दना द्विविधादिना म. ४. १८४४६७४४०७३७०१५५१६१५ । २ पुण्डरीकाक्ष मः। ३. सप्तति. क. ।

हरिवंशपुराणे सयोपशमभावे च श्रुतावरणकर्मणः । मतिपूर्व परोक्षं स्यादगन्तविषयं श्रुतम् ॥१४॥ इन्द्रियानिन्द्रियोथं स्यान्मतिज्ञानमनेकधा । परोक्षमर्थसान्निध्ये प्रत्यक्ष व्यवहारिकम् ॥१४५|| क्षयोपशमसापेक्षं निजावरणकर्मणः । अयग्रहेहावायारयाधारणातश्चतुर्विधः ॥१४६॥ इन्द्रियानिन्द्रियः पड्भिश्चत्वारोऽवग्रहादयः । भवन्ति गुणिता भेदाश्चतुर्विशतिरेव ते ॥१४॥ शब्दगन्धरमस्पशव्यञ्जनावग्रहयुताः । चाष्टाविंशतिरुक्तास्ते दाग्रिंशन्मूलभगकैः ॥१४॥ बह्वायैः पड्भिरभ्यस्तास्ते प्रयो राशयश्चतुः । चत्वारिंशं शेतं चाष्टापष्टिः द्वानवतं शतम् ॥१४६ अभ्यस्ताः सेतरैस्तैस्तैरष्टाशीतं शतद्वयम् । पट्निशत् त्रिशती च स्यादीस्याऽसौ चतुर्युता ॥१५०॥ मतिज्ञानविकल्पोऽयं तावत्स्वापृतिकर्मणः । योपशमभेदेन भिद्यमानः सुदृष्टिपु ।।१५।। देशप्रत्यक्षमुद्भूतो जीवशुद्धौ निधावधिः । देशः सर्वश्च परमः पुद्गलावधिरिष्यते ॥१५२॥ देशप्रत्यक्षमेव स्यान्मनःपर्यय इस्यपि । विपुलर्जुमतिप्रख्यः सोऽवधेः सूक्ष्मगोचरः ॥१५३॥ सर्वप्रत्यक्षमनत्यं स्यारोवलावरणच्यात् । अक्षयं केवलज्ञानं केवल विश्वगोचरम् ॥१५॥ हे ॥१३६-१४३॥ यह श्रुत ज्ञान, श्रुतज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे होता है, मतिज्ञानपूर्वक होता है, परोक्ष है और अनन्त पदार्थोंको विपय करनेवाला है ॥१४४॥ पाँच इन्द्रियो तथा मनसे जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसे मतिज्ञान कहते हैं। यह मति- ज्ञान अनेक प्रकारका है एवं परोक्ष है। यदि पदार्थों के सान्निध्यमें होता है तो सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष भी कहलाता है ।।१४।। यह मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमकी अपेक्षा रखता है तथा अवग्रह ईहा अवाय और धारणाके भेदसे चार प्रकारका है ॥१४६|| अवग्रह आदि चारों भेद पाँच इन्द्रिय और मन इन छहके द्वारा होते हैं इसलिए चारमें छहका गुणा करनेसे मति- ज्ञानके चौबीस भेद होते हैं ।।१४७॥ इन चौबीस भेदोंमें शब्द, गन्ध, रस और स्पर्शसे होनेवाले व्यञ्जनावग्रहके चार भेद मिलानेसे मतिज्ञानके अट्ठाईस भेद हो जाते हैं और इन भट्ठाईस भेदोमें अवग्रह आदि चार मूलभेद मिला देनेसे बत्तीस भेद हो जाते हैं। इस प्रकार चौवीस, अट्ठाईस और बत्तीस भेद हो जाते हैं। इस प्रकार चौबीस, अट्ठाईस और बत्तीसके भेदमे मति- ज्ञानके भेदोकी प्रारम्भमे तीन राशियाँ होती हैं। उनमें क्रमसे बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनिःसृत, अमुक्त और ध्रुव इन छह पदार्थोंका गुणा करनेपर एक सौ चवालीस, एक सौ अड़सठ तथा एक सौ बानवे भेद होते हैं। यदि बहु आदि छह तथा इनसे विपरीत एक आदि छह इन बारह भेदो- का उक्त तीन गशियो में क्रमसे गुणा किया जाये तो दो सौ अठासी, तीन सौ छत्तीस और तीन- सी चौरासी भेद होते है ॥१४८-१५०॥ मतिज्ञानके ये विकल्प मतिज्ञानाचरणकर्मके क्षयोपशम- में भेद होनेसे प्रष्ट होते हैं तथा सम्यग्दृष्टि जीवीके होते हैं। मिथ्यादृष्टि जीवीका मतिज्ञान कुमतिज्ञान कहलाता है ॥१५१॥ अवधिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे जीवमे शुद्धि होनेपर दशावधि, सर्वावधि और परमावधि यह तीन प्रकारका अवधिज्ञान होता है। यह अवधि- झान देश-प्रत्यक्ष है तथा पुद्गल द्रव्यको विपय करता है ॥१५२।। मनःपर्यय ज्ञान भी देश- प्रत्यक्ष ही है। इसके विपुलमति और ऋजुमतिके भेदसे दो भेद हैं तथा यह अवधिज्ञानकी अपेक्षा सूक्ष्म पदार्थको विषय करता है। अवधिज्ञान परमाणुको जानता है तो यह उसके अनन्त भागतकको जान लेता है ।।१५३॥ अन्तिम ज्ञान केवलज्ञान है यह केवलज्ञानावरणकर्म- के क्षयसे होता है, सर्व प्रत्यक्ष है, अविनाशी है और समस्त पदार्थोको जाननेवाला है ॥१५४|| १ चतुश्चत्वारिंश शत १४४ । २. उभयदीपकमिदम् । ३ शतं चाष्टाषष्टिः १६८ । ४. १९२ । ५ जीवसिद्धौ म०। ६. विधिः म ।

दशमः सर्गः परोक्षस्य प्रमाणस्य हानोपादानीः फलम् । प्रत्यक्षस्य तथोपेदा प्रागमोहः फलद्वयम् ॥१५५|| पारम्पर्येण मोक्षस्य हेतुनिचतुष्टयम् । सानादेव भवन्येकं केवलज्ञानमव्ययम् ॥१५६॥ प्रमाणप्रमितार्थानां श्रद्धानं दर्शनं शुभम् । शुभक्रियासुवृत्तिश्च चारित्रमिति वर्ण्यते ॥१५७॥ सम्यक्त्वज्ञानचारित्रितयं मोक्षसायनम् । श्रद्धय चाप्यनुष्टयं परसम्पदमिच्छता ॥१५॥ इतोऽन्यदुत्तरं नास्ति नासीन्नापि भविष्यति । मुश्यङ्गमित्यवतव्यमिति सारसमुच्चयः ।।१५६।। इत्याद्यस्य जिनेन्द्रस्य प्रपीय वचनौषधम् । मन्देहान्तकनिमुक्ता मुक्तवाभाजगन्त्रयो ।।१६०॥ वंशस्थवृत्तम् गृहीतरत्नत्रयभूपणा पुरा जना बभूवुः स्थिरभावनास्तदा । परे यतिश्रावकधर्मदीक्षिताः कृते युगे युक्तगुणाश्चकासिरे ॥१६॥ युतं च सधेन चतुर्विधेन तं जगद्विहाराभिमुखं जिनेश्वरम् । विशुद्धसम्यक्त्वधियश्चतुर्विधाः प्रणग्य जग्मुर्विवुधा निजास्पदम् ।।१६२॥ गृदाश्रमी श्रावकमुल्यतां श्रितो जिनेश्वर तं भरतेश्वरो नृपः । समय साकेतमितः प्रमोदवानुदारवंशस्थनृपः परिष्कृतः ॥६३॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती प्रथमतीर्थकरधर्मतीर्थप्रवर्तनो नाम दशमः सर्गः ॥१०॥ परोक्ष प्रमाणका फल हेय पदार्थको छोड़ने और उपादेय पदार्थको ग्रहण करनेकी बुद्धि उत्पन्न होना है तथा प्रत्यक्ष प्रमाणका फल उपेक्षा-रागद्वेपका अभाव एवं उसके पूर्व मोहका क्षय होना है ॥१५॥ मतिज्ञानादि वार ज्ञान परम्परासे मोक्षके कारण हैं और एक अविनाशी केवलज्ञान साक्षात् ही मोक्षका कारण है ॥१५६॥ प्रमाणके द्वारा जाने हुए पदार्थीका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है और शुभ क्रियाओम प्रवृत्ति होना सम्यक् चारित्र कहलाता है ॥१५७॥ सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र ये तीनो मोक्षप्राप्तिके उपाय हैं, इसलिए उत्तम सम्पदाकी इच्छा करनेवाले पुरुषको इनका श्रद्धान तथा तदनुरूप आचरण करना चाहिए ॥१५८।। इन तीनोंसे बढ़कर दूसरा मोक्षका कारण न है, न था, और न होगा। यही सबका सार है ॥१५६॥ इस प्रकार भादि जिनेन्द्रके वचनरूपी औपधिका पानकर तीनों जगत् सन्देह रूपी रोग. से छूटकर ऐसे सुशोभित होने लगे मानो मुक्त ही हो गये हों-मोक्षको ही प्राप्त हो गये हो ।।१६०॥ उस कृतयुगमें जिन जीवोंने रत्नत्रयरूप आभूषणोंको पहलेसे ग्रहण कर रक्खा था उस समय भगवान्को दिव्यध्वनि सुननेसे उनकी भावना और भी दृढ़ हो गई तथा कितने ही नवीन लोग मुनिधर्म एवं श्रावक धर्मकी दीक्षा ले सम्यग्दर्शनादि गुणोंसे युक्त हो सुशोभित हुए ।।१६१॥ निर्मल सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानसे युक्त चार प्रकारके देव, चतुर्विध संघसे युक्त तथा जगत्में विहार करनेके लिए उद्यत श्री जिनेन्द्र भगवानको नमस्कार कर अपने-अपने स्थानपर चले गये ॥१६।। गृहस्थाश्रमसे युक्त तथा श्रावकोंमें मुख्यताको प्राप्त राजा भरतेश्वर, जिनेन्द्र भगवान्की पूजाकर उच्चकुलीन राजाओं के साथ हर्पित होता हुआ अयोध्याकी ओर वापिस गया॥२६३।। इस प्रकार परिएनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें प्रथम तीर्थकरके द्वारा धर्मतीर्थकी प्रवृत्ति होनेका वर्णन करनेवाला दशवा सर्ग समाप्त हुना॥ उपेदा पलमाद्यस्य शेषस्यादानहानधीः । पूर्व वाशाननाशो या सर्वस्यास्य खगोवरे ॥१०॥ श्रा० मी. २ प्रागमोहाल दयम् म० । ३ मुष्टिय म. (0)। ४ सतो म०।

एकादशः सर्गः भय कृत्वात्मजोत्पत्ती भरतः सुमहोत्सवम् । कृतचक्रमहोऽयासीत् षट् खण्डविजिगीषया ॥१॥ चतुरङ्गमहासेनो नृपचक्रण सङ्गतः । अप्रप्रस्थितचक्रेण युक्तो दिक्चक्रिणां नृणाम् ॥२॥ गङ्गानुकूलमागत्य गङ्गासागरसङ्गतः । गङ्गाद्वारेऽटमं सद्वागङ्गाद्यत भक्तकम् ॥३॥ द्वारेणोद्घाटितेनासौ प्रविश्याश्वयुगाश्रितम् । अजितञ्जितनामानं रथमारुह्य वेगिनम् ॥४॥ अवगाह्य महाबाहुर्जानुदघ्नं महोदधिम् । वज्रकाण्डधनुःपाणिवैशाखस्थानमास्थितः ॥५॥ सदृष्टिमुष्टिसन्धानविधानेषु विशारदः । स्वनामाङ्कममोघाख्यं मुमोचाशुंगमाशुगम् ॥६॥ शरः पपात वज्राभो गन्वा द्वादशयोजनीम् । प्रासादे मागधस्याशु प्रविशन्मुखरांवरः ॥७॥ हृदयेन सम तस्मिन् प्रामादे चलिते सुरः । सम्भ्रान्तः स तमालोक्य चक्रिनामाङ्कितं शरम ॥८॥ चक्रवर्तिनमुपनं ज्ञात्वा स्वं पुण्यमल्पशः । निन्दित्वा भग्नमानोऽसौ रत्नपाणिरुपागतः ॥३॥ हार स पृथिवीसारं मुकुटं रत्नकुण्डले । उपनीय सुरत्नानि वस्त्रतीर्थोदकानि तु ॥१०॥ शाधि किं करवाणीश देह्यादेशं बुधोऽवदत् । मुक्तस्तेन गतः स्थान निर्ययो भरतोऽप्यतः ॥११॥ भूतव्यन्तरसङ्घातान् दाक्षिणात्यान् महाबलान् । साधयन् सागरद्वारं वैजयन्तमवाप सः ॥१२॥ अथानन्तर समवसरणसे आकर भरतने पुत्र-जन्मका उत्सव किया, चक्ररत्नकी पूजा की और उसके बाद छह खण्डोंको जीवनेको इच्छासे प्रस्थान किया ॥१॥ उस समय चतुरङ्ग सेना उसके साथ थी, वे राजाओं के समूहसे युक्त थे और नाना दिशाओंसे आये हुए अपार जन- समूहके आगे-आगे चलनेवाले चक्ररत्नसे सहित थे ॥२।। वे गद्गा नदीके किनारे-किनारे चलकर गङ्गासागरपर पहुँचे । वहाँ गङ्गाद्वारपर उन्होंने मन, वचन, कायकी क्रियाको प्रशस्त कर तीन दिनका उपवास किया ॥३॥ जिसमें दो घोड़े जुते हुए थे ऐसे वेगशाली रथपर सवार होकर उन्होंने द्वार खोला और समुद्रमें घुटने पर्यन्त प्रवेश किया। उस समय लम्बी भुजाओंके धारक भरत अपने हाथमें वनकाण्ड नामक धनुप लिये हुए थे, तथा वैशाख आसनसे खड़े थे। वे दृष्टिके स्थिर करने, कड़ी मुट्ठी बाँधने और डोरीपर वाण स्थापित करनेमें अत्यन्त निपुण थे। उसी समय उन्होने अपने नामसे चिह्नित अमोघ नामका शीघ्रगामी बाण छोड़ा ॥४-६।। वन के समान चमकता हुआ वाण शीघ्र ही बारह योजन जाकर मागध देवके भवनमें गिरा और उसने भवनमें प्रवेश करते ही समस्त आकाशको शब्दायमान कर दिया ॥७॥ बाणके गिरते ही मागधदेवका भवन और हृदय दोनो ही एक साथ हिल उठे। वह बहुत ही क्षोभको प्राप्त हुआ । परन्तु जब उसने चक्रवर्तीके नामसे चिह्नित बाणको देखा और चक्रवर्ती उत्पन्न हो चुका है यह जाना तब वह अपने पुण्यको अल्प जान अपनी निन्दा करने लगा। तदनन्तर जिसका मान खण्डित हो गया था ऐसा मागधदेव हाथोंमे रत्न लेकर भरतके पास आया ।।८- आकर उस बुद्धिमान् देवने पृथिवीका सारभूत हार, मुकुट, रत्ननिर्मित दो कुण्डल, अच्छे-अच्छे रत्न, वस्त्र तथा तीर्थोदककी मेंट दी और कहा कि हे स्वामिन् ! बताइए मैं क्या करूँ ? मुझे आज्ञा दीजिए। तदनन्तर भरतसे विदा हो वह अपने स्थानपर गया और भरत भी वहाँसे चलकर दक्षिण १ उपवासत्रयम् 'तेला' कृत्वा । २ वाक् च श्रङ्गानि च इति वागङ्गं तदादौ यस्य तत् वागङ्गादि सत् शोमन वागङ्गादि यस्मिन् तत् । ३ कृतवान् । ४ शोघ्रगाभिनम् | ५ वाणम् । ६ कथय। ७ विजयं तमाम।

एकादशः सर्गः १३३ सुरं वरतनुं तत्र यथा मागधमादयन् । चूडामणिममौ दिव्यं अवेयकमुरश्छदम् ॥१३॥ वीराङ्गदे च कटके कटीवतं च सूत्रकम् । उपनीय प्रणम्येशं विमुक्तः किङ्करो ययौ ॥१४॥ पाश्चान्यं साधयन् विश्वं दधद्भूपालमण्डलम् । अनुवेदिकमागच्छत् सिन्धुद्वारं स वन्धुरम् ॥१५॥ प्रभासममरं तत्र गहाद्वार विधानतः । नमयित्वा वशं चक्र चक्रेशः शरविक्रमः ॥१६॥ लेभे सान्तानकं तस्मान्मात्यदामकमुत्तमम् । मुक्काजालं च मौलिं च रत्नचित्रं च हेमकम् ॥१७॥ चक्ररत्नानुमार्ग स विजयाद्धस्य वेदिकाम् । प्राप्तश्चक्रधरो दध्यौ सोपवासो गिरेः मुरम् ॥१८॥ बुद्ध्वा स्वावधिकात्प्राप्तः सोऽमिपिच्य महदिभिः । विजयाईकुमारारयो देवः प्रणतिपूर्वकम् ॥१६॥ भृङ्गारं कुम्भतोयं च सिंहासनमनुत्तमम् । छत्रचामरयुग्मानि दत्वा तेऽहमिति न्यगात् ॥२०॥ तन चक्रमहं कृत्वा स तमिस्रगुहामुग्वम् । प्रापत्तु कृत्तमालस्तं सुरः प्राप ससग्भ्रमः ॥२१॥ तिलकाद्यानि दिव्यानि भूषणानि चतुर्दश । प्रदाय प्रगिपत्यासौ तवाहमिति यातवान् ॥२२॥ सेनापतिरयोध्यश्च राजराजस्य शासनात् । अश्वरत्न शुकच्छायं कुमुदामेलकाभिधम् ॥२३॥ भारुह्य दण्डररमेन प्रचण्डेन पराइमुखः । गुहाद्वारकवाटानि प्रताड्यानुपलायितः ॥२४॥ उद्घाटिते गुहाद्वारे पण्मासैः स निरूप्मणि । सेनयाऽविशदारा गज विजयपर्वतम् ॥२५॥ तत्रोन्मग्मजला नाग्ना सन्निमग्नजलापगा । महान धोस्तयोस्तीरे गुहामध्येऽमुचच्चमूः ॥२६॥ दिशामें रहनेवाले महाबलवान् भूत और व्यन्तर देवोंके समूहको वश करते हुए समुद्रके वैजयन्त- द्वारपर जा पहुँचे ॥१०-१२। वहाँपर उन्होंने मागधदेवके समान उस प्रदेशके स्वामी वरतनु देवको बुलाया और वरतनु देवने आकर चूड़ामणि, सुन्दर कण्ठहार, कवच, वीरोके वाजूवन्द, कड़े और करधनी भेंटकर भरतको प्रणाम किया। तदनन्तर सेवकवृत्तिको स्वीकार करनेवाला वरतनु भरतसे विदा ले अपने स्थानपर चला गया ॥१३-१४॥ बहाँसे चलकर भरत पश्चिम दिशाके समस्त राजाओंको वश करते हुए वेदिकाके किनारे-किनारे चलकर सिन्धु नदोके मनोहर द्वारपर पहुँचे ॥१५|| यहाँ इन्द्र के समान पराक्रमको धारण करनेवाले चक्रवर्ती भरतने गङ्गाद्वारके समान वहाँ के अधिपति प्रभास देवको नम्रीभूत कर अपने वश किया ॥१क्षा तथा उससे सन्तानक वृक्षोंके पुष्पीको उत्तम माला, मोतियोंकी जाली, मुकुट और रत्नोंसे चित्र-विचित्र कटीसूत्र प्राप्त किया ॥१७॥ तदनन्तर भरत, चक्ररत्नके पीछे-पीछे चलकर विजया पर्वतकी वेदिकाके समीप आये। वहाँ उन्होंने उपवास कर पर्वतके अधिष्ठाता (विजयार्ध कुमार ) देवका स्मरण किया ॥१८॥ वह देव अपने अवधिज्ञानसे भरतको वहाँ आया जानकर आया। उसने भरतको प्रणाम कर बड़ी ऋद्धियोंसे उनका अभिषेक किया तथा मारी, कलशजल, उत्तम सिंहासन, छत्र और दो चमर भेंटकर कहा कि मैं आपका हूँ-आपका सेवक हूँ। इस प्रकार निवेदन कर वह घला गया ।।१६-२०॥ राजा भरत वहाँ चक्ररत्नकी पूजाकर तमिन गुहाके द्वारपर आये । वहीं घबड़ाया हुआ कृतमाल नामका देव उनके पास आया ॥२१॥ और तिलक आदि चौदह दिव्य आभूपण देकर तथा प्रणामकर 'मैं आपका हूँ! यह कहता हुआ चला गया ॥२२॥ राजराजेश्वर भरतकी आज्ञासे उनके भयोध्य नामक सेनापतिने सुआके समान कान्तिवाले कुमुदामलक नामक अश्वरत्नपर सवार हो तथा पीछेको भओर अपना मुसकर दण्डरलसे गुहाद्वारके कियाहाँको ताड़ित किया और ताड़ित कर यह एकदम पीछे भाग गया २३-२४॥ बुला हुआ गुहाद्वार जब छह माहमें ऊपमा रहित हो गया तब चक्रवर्तन विजयपर्यत नामक हाथीपर मवार हो सेनाके साथ उसमें प्रवेश किया ॥२५॥ गुहाके यीचमें उन्मग्नाला और निमग्नजला । १ बरतनुन्ना म० । २ चिमुक्न म । ३. कुततीयं च म०1४, अयोधस्य मा।

हरिवंशपुराणे निरयान्धकारमुद्वास्य काणीमणिरोचिषा । स्कन्धावारं स्थितं तत्र नक्तन्दिवमतन्द्रितम् ॥२७॥ कामदृष्टिगृहपती रत्नभद्रमुखो द्रुतम् । स्थपनिश्च स्थिरस्ताभ्यां सड्क्रमः सरितोः कृतः ॥२८॥ उत्तीय समाक्रान्त्या सद्यो नद्योययौ चमूः । द्वारमुत्तरमुद्घाटय प्रागिवोत्तरभारतम् ॥२६॥ म्लेच्छराजसहस्राणि वीक्ष्यापूर्ववरूथिनीम् । क्षुभितान्यभिगम्याशु योधयामासुरश्रमात् ॥३०॥ ततः क्रुद्धो युधि म्लेच्छरयोध्यो दण्डनायकः । युवा निर्धूय तानाशु दधे नामार्धसङ्गतम् ॥३॥ भयाग्लेच्छास्ततो 'याताः शरणं कुलदेवताः । घोरान्मेघमुखानागान् दर्भशय्याधिशायिनः ॥३२॥ ततो मेघमुखा देवा खमापूर्य युधि स्थिताः । युवा जयकुमारस्तैलेंभे मेघस्वराभिधाम् ॥३३॥ पुनर्मघमुखा घोरैधेरापूर्य पुष्करम् । वपुर्मुष्टि मात्राभिर्धाराभिः सैन्यमस्तके ॥३४॥ दृष्टा वृष्टिं ततश्चक्री सतडिद्गणिताशनिम् । चर्मरत्नमवश्वके छत्ररत्नं तथोपरि ॥३५॥ द्विषट्योजन विस्तीर्णा तरन्ती साऽप्मु वाहिनी । भण्डायते स्म सप्ताह कान्दिशीक यमागता ॥३६॥ ततो निधिपतिः क्रुद्धो गणबद्धाभिधानकान् । देवानाज्ञापयत् वैस्तैख़स्ता मेघमुखाः मुराः ॥३७॥ ततो मेघमुखम्लेंच्छाः प्रोक्ताः संहृतवृष्टिमिः । चक्रिणं शरणं जग्मुरादाय वरकन्यकाः ॥३८॥ भीतानामभयं दत्त्वा स तेषां शामनैपिणाम् । आयादायासनिर्मुक्तः सिन्धुनद्यनुवेदिकम् ॥३६॥ सिन्धुदेव्यभिषिच्यैनं सिन्धुङ्कटाप्रवासिनी । ददौ भद्रासने भद्रे पादपीठोपशोभिते ॥४०॥ नामकी दो नदियाँ थीं, उनके तटपर भरतने सेनाओंको छोड़ दिया-उन्हें विश्राम कराया ॥२६॥ उस गुफाम निरन्तर अन्धकार रहता था जिसे भरतने काकणी मणिकी किरणोंसे दूर कर दिया था। भरतकी सेनाने यहाँ आलस्य रहित होकर एक दिन-रात निवास किया ॥२७॥ कामदृष्टि नामक गृहपतिग्न और रत्नभद्रमुख नामक स्थपतिरत्न इन दोनोने उन नदियोंपर मजबूत पुल वनाये ॥२८॥ सेना उन पुलोके द्वारा शीघ्र ही नदियोंको पारकर आगे बढ़ गई और पहलेको तरह उत्तर द्वारको सोलकर उत्तर भारतमें जा पहुँची ॥२६॥ उत्तर भारतके हजारों म्लेच्छ राजा चक्रनको अपूर्व सेनाको देसकर नुभित हो गये और शीघ्र ही सामने श्राकर अनायास युद्ध करने लगे ॥३०॥ तदनन्तर क्रोधसे भरे अयोध्य सेनापतिने युद्ध में म्लेच्छ राजाओंके साथ युद्धकर तथा उन्हें शीघ्र ही खदेड़कर अपना 'अयोध्य' नाम सार्थक किया ॥३१॥ सेनापतिसे भयभीत हुए म्लेच्छ, अपने कुलदेवता, दर्भशय्यापर शयन करनेवाले एवं भयंकर मेघमुस नागकुमारीको शरण गये ॥३२॥ जिससे मेघमुस देव आकाशको व्याप्तकर युद्धके लिए आ डटे परन्तु जयकुमारने उनके साथ युद्धार उन्हें परास्त कर दिया और स्वयं 'मेयस्वर' यह नाम प्रान किया ॥३३॥ कुछ देर बाद मेघमुस देव भयंकर मेघांसे आकाशको व्याप्तकर मुट्ठी बराबर मोटी-मोटी धाराओंसे सेनाके मस्तकपर जल-वर्पा फरने लगे ॥३४॥ तदनन्तर जिसमें बिजलीके साथ यमको भयंकर गर्जना हो रही थी ऐसी जलसृष्टि देसकर चकवीने सेनाके नीचे चर्मरत्न और उपर छत्ररत्न फैला दिया ॥३॥ यारद योजन पर्यन्त फैली एवं जलके भीतर तैरती हुई यह सेना अण्डाके समान जान पड़ती थी। वह सेना सात दिन तक इसी तरह भयभीत रही ॥३६।। तदनन्तर निधियोंके स्वामी चक्रयाने फुपित होकर गणवद्ध देवों को आज्ञा दी और उन्होंने इन मेघमुग्य देयोंको पगान फर सदेड दिया ॥३७॥ तत्पश्चात् जिन्होंने पृष्टिका संकोच कर लिया था ऐमे मेघमुप देयों को प्रेरणा पाकर वे म्लेच्छ राजा उत्तमोत्तम फन्याएँ लेकर पश्यतीकी शरणमें भाये ॥३८॥ कयौन उन भयभीन तथा आमा पान की इच्छा फरनेयाले ग्लेन्छ गजाभीको अभयदान दिया और मो याद श्रममे रहित हो सिन्धु नदीकी वेदिकाके किनारे-किनारे गमन किया ॥३|| यीचमें सिन्धुक्टपर नियाम करनेवाली मिन्धु देवीने १ जागा: म.। २. आकारान् ।३ मेघमात्राभिम.।

एकादशः सर्गः ३०१ चक्रवर्ती धV मूले संस्थाप्य हिमवगिरेः । कृताप्टमोपवायोऽसौ दर्मशय्यामधिष्टितः ॥४॥ कृनतीर्थोदकस्नानः कृतकौतुकमण्डनः । आरूढाश्वरथो धन्वी चक्रायुधपुरःसरः ॥४२॥ क्षुल्लक हिमवाफूटं यत्र सत्र गतः शरी । वैशाखस्थानमास्थाय यमाण रणदक्षिणः ॥१३॥ भो भो नागसुपर्णाद्या: शामनं शृणुताशु मे । देशस्था इत्यतश्चापमाकृष्य शरमाधिपत् ॥४४॥ पपाताशनिनि?पो योजने द्वादशे शरः । हिमवन्कूटवासी त सुरो दृष्ट्वा समागमत् ॥४५॥ दिव्यामोपधिमालां स दिव्यं च हरिचन्दनम् । दत्त्वा सम्पूज्य तं यातः शासनैपी विसर्जितः ॥४६॥ मागीय चक्रवर्ती च ततो वृपभपर्वतम् । तग्रालिखनिजं नाम काकण्या स परिस्फुटम् ॥४०॥ वृपभस्य मुतो भोऽहं चक्री भरत इत्यसौ । प्रवाच्य विजयाचस्य वेदिकामगमत् प्रभुः ॥४८॥ युद्ध्वोपवासिनं तत्र श्रेणिद्वय निवामिनी । नमिश्च विनमिश्चोभी गन्धारायः समागती ॥४॥ स्वीरनं प्रतिगृह्याभ्यां सुभद्राख्यं खगेनंतः । गङ्गानुवेदिकं गवा भक्तमष्टममास्थितः॥५॥ गगादेवी विदित्वा तं गङ्गास्टानिवासिनी । हेमकुम्मसहस्रग कृत्वा तदमिपेचनम् ॥५॥ ररनसिंहासने तस्मै पादपीट्युते ददौ । विजयाईकुमारोऽपि तस्यी चक्रेशशासने ॥५२॥ भष्टादशसहस्राणि म्लेच्छचितिभृतां ततः । वशीकृपयात्तसदनः सण्डकापातमाप सः ॥५३॥ भरतका अभिषेक कर उन्हें पादपीठसे सुशोभित दो उत्तम आसन भेंट किये ॥४॥ चक्रवर्ती सेनाको हिमवान् पर्वतकी तगईमें ठहराकर तथा स्वयं तीन दिनके उपवासका नियम लेकर दर्भशय्यापर आरूढ़ हुए ॥४१।। तदनन्तर जिन्होंने तीर्थजलसे स्नान किया था, उत्तम वेपभूपा धारण की थी, जो घोड़ाके रथपर सवार थे, जिनके आगे-आगे चक्ररत्न चल रहा था और जो रणमें अत्यन्त कुशल थे ऐसे भरत, जहाँ हिमवान् पर्वतका हिमवत् नामक छोटा कूट था वहाँ आये और वाण हाथमे ले तथा वैशास आसनसे सड़े होकर बोले कि 'हे इस देशमें रहनेवाले नागकुमार, सुपर्णकुमार आदि देवो! तुम लोग शीघ्र ही मेरी आज्ञा सुनो।' यह कह उन्होंने धनुप सींचकर बाण छोड़ा ॥४२-४४॥ पत्रके समान शब्द करता हुआ वह बाण यारह योजन दूर जाकर गिरा तथा हिमवत् कूटपर रहनेवाला देव उसे देखकर भरतके पास आया ॥४शा उसने दिव्य ओपधिओंकी माला तथा दिव्य हरिचन्दन देकर भरतकी पूजा की। तदनन्तर आज्ञाफी इच्छा करता हुआ वह भरतसे विदा ले अपने स्थानपर चला गया।॥४॥ चक्रवर्ती वहाँसे चलकर घृषभाचल पर्वतपर आये और वहाँ उन्होंने काफणी रत्नसे साफ-साफ अपना यह नाम लिसा कि 'मैं भगवान कृपभदेवका पुत्र भरत चक्रवर्ती हूँ। नाम लिसकर क्या याचकर वे विजया पर्वतकी वेदिकाके समीप आये ॥४७-४८॥ वहाँ जाकर उन्होंने उपवास धारण किया। दोनों श्रेणियों के निवासी नमि और पिनमिको जय यह ज्ञात हुआ कि भरत यहाँ विद्यमान हैं तब वे गन्धार आदि विद्याधरों के साथ यहाँ आये ॥४६॥ समस्त विद्यापगने उन्हें नमस्कार किया और भरतने नमि, विनमिसे मुभद्रा नामक स्त्रीरत्न ग्रहण किया। तत्पश्चात् वे गद्गा नदीकी वेदिकाके फिनारे-किनारे पलकर गद्गाष्टके समीप आये और तीन दिनके उपवासका नियम लेकर यहाँ ठहर गये। वहाँ गद्दाफूटपर रहनेवाली गंगा देवीने उनके आनेका ममाचार जान र मुवर्णमय एक हजार फलशोंमे उनका अभिषेक किया ॥५०-५१॥ अभिषेकके बाद उसने पादपीठसे युफ दो रवीके मिहामन भेंट किये । यहाँ विजयार्य पर्वतका स्वामी विजयाचं युमाग्देव पनयनाको आना पड़ा रहा ॥५२॥ सदनन्तर यहाँसे पलकर अठारह हजार म्लेन्स गजाभोंको यश फरने भोर इनमें सप्तमी. सम रत्नोंकी भेंट स्वीकार करवे हुए भरत विजयाकी दूमरी गुफा गण्डफामपानके ममीप १ मटर:म.१२ पेशागं स्थान गर, १०,.,म २०२ हरिवंशपुराणे उपोषिताप्टमायास्मै नाटयमालोऽत्र दत्तवान् । नानारूपं स नेपथ्यं विद्युदाभे च कुण्डले ॥५४॥ अयोध्योद्घाटितेनासौ गुहाद्वारेण पूर्ववत् । प्रविश्य निर्गतः सिन्धोरिव गाङ्गेन सेनया ॥५५।। विजित्य भारत वर्ष स पटखण्डमखण्डितम् । पष्टिवर्षसहस्रस्तु विनीतां प्रस्थितः कृती ॥५६॥ चक्रे मुदर्शनेऽयोध्यामविशत्यथ चक्रभृत् । बुद्धिसागरमप्राक्षीत् सन्दिहानः पुरोधसम् ॥५७॥ साधिते भारते वास्ये चक्ररत्नमिदं किमु । दिव्यं विशति नायोध्यां योध्याः सन्ति न के च नः ॥५॥ पुरोधाः सोऽभ्यधागतंभ्रांतरो भवतो नेनु । ये महाबलसम्पसास्ते न शृण्वन्ति शासनम् ॥५६॥ तदाकण्यं वचस्तूणं तेषां प्रेपयति स्म सः । ससामोपप्रदानादिनीतिपूर्व वचोहरान् ॥६०॥ ततस्ते तनिमित्तेन मानिनो लब्धयोधयः । स्वराज्यान्यस्यजस्स्याग मन्यमाना महोत्सवम् ॥६॥ प्रपद्य शरणं सर्वे नाभेयं भवभीरवः । मानशल्यविनिर्मुक्ताः प्रवज्यां मोतियो दधुः ॥१२॥ सुकुमारैः कुमारैस्तैभव्यसि हैः सहैव हि । ज्ञेयानि त्यक्तदेशानां नामानीमानि पण्डितैः ॥१३॥ कुरुजालपञ्चालसूरसेनपटचराः । तुलिङ्ग-काशि-कौशल्य-मद्रकारवृकार्थकाः ॥६॥ सोवावृष्टनिगश्चि कुशाम्रो मत्स्यनामकः । कुणीयान् कोशलो मोको देशास्ते मध्यदेशकाः ॥६५।। बाहीकानेयकाम्बोजा यवनाभीरमदकाः । कायतोयश्च शूरश्च वाटवानश्च कैकयः ॥६६।। गान्धारः सिन्धुसौवीरभारद्वाजदशेरुकाः । प्रास्थालास्तीर्णकर्णाश्च देशा उत्तरतः स्थिताः ॥६७॥ खड्गाहारकपौण्ड्राश्च मल्लप्रवकमस्तकाः । प्राद्योतिपश्च वनश्च मगधो मानवर्तिकः ।।६८।। पहुँचे ॥५३॥ वहाँ वे तीन दिनके उपवासका नियम लेकर ठहर गये । यहाँ नाटयमाल नामक देवने उन्हें नाना प्रकारके आभूषण और बिजलोके समान चमकते हुए दो कुण्डल भेंट किये ॥५४॥ जिस प्रकार पहले अयोध्य सेनापतिने दण्डरत्नके द्वारा सिन्धु नदीकी गुफाका द्वार खोला था उसी प्रकार यहाँ भी उसने दण्डरत्नसे गङ्गानदीको गुफाका द्वार खोला और भरत उस द्वार- से प्रवेशकर सेनासहित बाहर निकल आये ॥५५॥ इस तरह अतिशय कुशल भरतने साठ हजार वमि छह खण्डोंसे युक्त समस्त भरतक्षेत्रको जीतकर अयोध्या नगरीकी ओर प्रस्थान किया ।।५६॥ अथानन्तर-समीप आनेपर जब सुदर्शनचक्रने अयोध्याम प्रवेश नहीं किया तब भरतने सन्देहयुक्त हो बुद्धिसागर पुरोहितसे पूछा कि समस्त भरत क्षेत्रको वश कर लेनेपर भी यह दिव्य चक्ररत्न अयोध्यामें प्रवेश क्यों नहीं कर रहा है ? अब तो हमारे युद्धके योग्य कोई नहीं है? ॥५७-५८॥ पुरोहितने कहा कि आपके जो महायलवान् भाई हैं वे आपकी आज्ञा नहीं सुनते हैं ।।१६। यह सुनकर भरतने शीघ्र ही उनके पास साम, दाम आदि नीतिके साथ दूत भेजे ॥६०॥ तदनन्तर इस निमित्तसे जिन्हें बोधिकी प्राप्ति हुई थी ऐसे भरतके अभिमानी भाइयोंने त्यागको ही महोत्सव मान अपने-अपने राज्य छोड़ दिये ॥६१।। जो संसारसे भयभीत थे, जिनकी मानरूपी शल्य छूट चुकी थी, और जो अन्तरगमें मोक्षकी इच्छा रसते थे ऐसे भरतके समस्त भाइयांने भगवान् वृषभदेयके समीप जाकर दीक्षा धारण कर ली ॥६२।। उन सुकुमार एवं भव्य-शिरोमणि कुमारोने जो देश छोड़े थे विद्वानोको उनके नाम इस प्रकार जानना चाहिए ॥६३|| कुरुजाहल, पश्चाल, सूरसेन, पटवर, तुलिग, काशि, कौशल्य, मद्रकार, वृकार्थक, सोल्ब, आवृष्ट, त्रिगत, कुशाम, मत्स्य, कुगीयान् , कोशल और मोक ये मध्यदेश थे ॥६४-६।। याडीक, आत्रेय, काम्पोज, यवन, आभार, मद्रक, क्वाथतोय, शूर, वाटयान, कैकय, गान्धार, सिन्धु, मायोर, भारद्वाज, दशेरुक, प्रास्थाल और तीर्णकर्ण ये देश उत्तरको ओर स्थित थे ॥६६-६७॥ गन, अंगारक, पोण्ड, मल्ल, प्रवक, मस्तक, प्रायोतिष, यद्ग, मगध, मानयर्तिक, १. न तु म०।२ बचोहगत् म० ।

एकादशः सर्गः २०३ मलदो भार्गवश्वामी प्राच्यां जनपदाः स्थिताः । वाणमुक्तरच वैदर्भाः माणवः सककापिराः ॥६॥ मूलकाश्मक दाण्डीकलिङ्गासिकुन्तलाः । नवराष्ट्रो माहिपकः पुरुषो भोगवर्धनः ॥७॥ दाक्षिणात्या जनपदा निरुच्यन्ते स्वनामभिः । माल्यकल्लीवनोपान्तदुर्गसूरिकवुकाः ॥७॥ काशिनासारिकागाः ससारस्वततापमाः । माहेमो भरुकच्छश्न सुराष्ट्रो नर्मदस्तथा ॥७२।। एते जनपदाः सर्वे प्रतीच्यां नाममिः स्मृताः । दशार्णकेति किंष्कन्धस्त्रिपुरावर्तनश्याः ॥७३॥ नेपालोत्तमवणश्च वैदिशान्तपकौशलाः । पत्तनो विनिहात्रश्च विभ्यापृष्टनिवासिनः1७४।। भद्रवत्सविदेहाश्व कुशमगाश्च सैतवाः । वनखण्डिक इत्येते मध्यदेशाश्रिता मताः ॥७५|| देशानंताननुज्ञातान् गुरुणा भरतानुजाः । दारानिव विधेयांश मुमुचुस्ने मुमुक्षवः ।।७।। भय बाहुबली चके चक्रेशं प्रन्यवस्थितिम् । सन्दधानो मनश्चके चक्रेलातमये यथा ॥७॥ भवतो न भुजिप्योऽहमिति प्रेष्य वचोहरान् । पोदनान्निययो यो मौहिण्या युतो द्रुतम् ॥७॥ चक्रवत्यपि सम्प्राप्तः सैन्यसागररुद्धदिक् । विततापरदिग्मागे चम्बोः स्पर्शस्तयोरभूत् ।।७।। उभये मन्त्रिणो मन्त्रं मन्त्रयित्वाहुरीशयोः । माभूजनपदक्षयो धर्मयुद्धमिहास्त्विति ।।०॥ प्रतिपद्य वचस्तो तत् दृष्टियुद्धं प्रचक्रनुः । चिरं निमेषमुक्ताची दृष्टौ से खेचरामरः ॥८॥ कनिष्टोऽयानयज्येष्ठ पञ्चचापशतोच्छितिम् । ऊर्ध्वदृष्टिमधोदृष्टिस्नदुचैः पञ्चविंशतिः ॥२॥ ततोऽन्योन्यभुजक्षिप्ततरणाघातदुःसहम् । जलयुद्धमभूदु रौद्रं सरस्यत्र जितोऽग्रजः ॥३॥ मलद और भार्गव, ये देश पूर्व दिशामे स्थित थे। वाणमुक्त, वैदर्भ, माणव, सककापिर, मूलक, अश्मक, दाण्डीक, कलिग, आंसिक, कुन्तल, नवराष्ट्र, माहिपक, पुरुप और भोगवर्धन, ये दक्षिण दिशाके देश थे। माल्य, कल्लीवनोपान्त, दुर्ग, सूर्पार, कषुक, काक्षि, नासारिक, अगत, सारस्वत, तापस, महिम, भरुकन्छ, सुराष्ट्र और नर्मद, ये सब देश पश्चिम दिशामें स्थित थे। दशार्णक, किटकन्ध, त्रिपुर, आवर्त, नेपध, नेपाल, उत्तमवर्ण, वैदिश, अन्तप, कौशल, पत्तन और विनि- हात्र, ये देश विन्ध्याचलके ऊपर स्थित थे ॥६-७४|| भद्र, वत्स, विदेह, कुश, भङ्ग, सैनव और वसण्डिक, ये देश मध्यदेशके आश्रित थे ।।७५॥ पिता-भगवान् वृषभदेवके द्वारा दिये हुए इन सब देशोंको मोक्षकी अभिलापा रसनेवाले भरतके छोटे भाइयोंने स्त्रियोंके समान छोड़ दिया माथ ही उन्होंने आज्ञाकारी सेवकोंका भी परित्याग कर दिया ।।६।। अथानन्तर कुमार बाहुबलीने भग्तके प्रति अपनी प्रतिकूलता प्रकट की। उन्होंने उनके मुदर्शनचक्रको अलातचक्रके समान तुच्छ समझा और 'मैं आपके आधीन नहीं है' यह कहकर दूत भेज दिये तथा वे शीघ्र ही अक्षौहिणी सेना साथ ले युद्ध के लिए पोदनपुरसे निकल पड़े।७७- 5 इधर सेनारूपी सागरसे दिशाओंको व्याप्त करते हुए चक्रवर्ती भरत भी आ पहुँचे जिससे वितता नदीके पश्चिम दिग्भागमें दोनों सेनाओंको मुठभेड़ हुई ॥ell तदनन्तर दोनों राजाओं- के मन्त्रियों ने परस्पर सलाह कर कहा कि देशवासियों का क्षय न हो इसलिए दोनों ही राजाओंमें धर्मयुद्ध हो ॥०॥ भग्त और बाहुबलीने मन्त्रियोकी यह बात मानकर सर्वप्रथम दृष्टियुद्ध शुरू किया और आकाशमें बड़े हुए देव और विद्याधरोंने दोनोंको चिरकाल तक टिमकार रहित नेत्रों- से युक्त देसा। अर्थात् दोनों भाई चिरकाल तक टिमकार रहित नेत्रोंसे पड़े रहे और कोई किसीसे हारा नहीं। परन्तु अन्तमें छोटे भाईने बड़े भाईको हरा दिया क्योंकि बड़े भाई पाँच सो घनुप ऊँचे थे इसलिए उनकी दृष्टि ऊपर की ओर थी और छोटे भाई उनसे पीस धनुप ऊँचे थे इसलिए उनकी दृष्टि नीचेकी ओर थी ॥८१-८२|| दृष्टियुद्धके बाद दोनों भाइयोंका १. 'गुरुस्तु गोप्यती श्रेष्ठे गुरौ पितरि दुर्मरे' इति विश्सः म०, २०१२ तथा म्ब०, प० । ३. टामः । ४ विनतार द.1 हरिवंशपुराणे वलितास्फोटिताटोपं नानाकरणकौशलम् । मल्लयुद्धमभूत्पश्चाद् रगभूमौ चिरं तयोः ॥४॥ पानावष्टम्भसम्भिवहृदया युध्यमानयोः । तयोभियेव वरयो ररास चमुधावधूः ||५|| भरतं भुजयन्त्रेण दयावान् भुजविक्रमी । निरद्धयोक्षिप्य सन्तस्थे रत्नशैलमिवामरः ॥८६॥ प्रेषकैः सुरसङ्घातैः खेचरैरपि भूचरैः । अहो वीर्यमहो धैर्य साधु साध्विति वर्णितम् ॥७॥ साधु संसाध्य मुक्तेन भरतेन रुशा ततः । अपमृत्यु स्मृतं चक्रं सहस्रारं स्थितं करे । रचय यक्षसहस्त्रेण सहस्रकिरणप्रभम् । प्रभ्राम्य चक्रमुन्मुक्तं वधार्थ भ्रातुरुन्मुखम् ॥८॥ चरमोत्तमदेहस्य तस्याशक्तं विनाशने । देवताधिष्टितं चक्रं निःपरीत्यागतं पुनः ॥on ज्येष्ठभ्रातरमालोक्य निर्धणं भुजविक्रमी । की पिधाय हस्ताभ्यां निनिन्द श्रियमित्यसो ॥६॥ स्वच्छानामनुकूलानां संहतानां नृचेतसाम् । विपर्यासकरी लघमी धिक् पार्द्धमिवाम्भसाम् ॥१२॥ मधुरस्निग्धशीलानां चिरस्थस्नेहहारिणीम् । चलाचलात्मिकां धिक् धिक् यन्त्रमूर्तिमिव श्रियम् ॥१३॥ सर्वतोऽपि सुदुःप्रेक्ष्यां नरेन्द्राणामपि स्वयम् । दृष्टिं दृष्टिविषस्येव धिक धिक् लक्ष्मी भयावहाम् ॥१४॥ तालाबमें भयंकर जलयुद्ध हुआ। उस समय दोनों ही भाई एक दूसरेपर अपनी भुजाओंसे लहरें उछाल-उछालकर दुःसह आघात कर रहे थे। परन्तु इस युद्ध में भी बड़े भाई भरत हार गये ॥३।। तदनन्तर दोनोंका रङ्गभूमिमें चिरकाल तक मल्लयुद्ध हुआ। उनका वह मल्लयुद्ध तालों- की फटाटोपसे युक्त था तथा नाना प्रकारके पैंतरा बदलनेकी चतुराईसे पूर्ण था ॥८४॥ उस समय युद्ध करते हुए दोनों वरोके पदाघातसे जिसका हृदय फट गया था ऐसी पृथिवीरूपी स्त्री भयसे ही मानो चिल्ला उठी थी ।।५।। अन्तमे दयावान् बाहुबली अपने भुजयन्त्रसे भरतको पकड़कर तथा ऊपरकी ओर उठाकर इस प्रकार खड़े हो गये मानो कोई देव रत्नोंके पर्वतको उठाकर खड़ा हो ॥६॥ देखनेवाले देवोके समूह, विद्याधरों तथा भूमिगोचरी मनुष्योने उसी समय जोरसे यह शब्द किया कि अहो ! वीर्यम्-आश्चर्यकारी शक्ति है, अहो ! धैर्यम्- आश्चर्यकारी धैर्य है, साधु-साधु-ठीक है, ठीक है आदि ||८७॥ तदनन्तर अच्छी तरह जीत- कर जय बाहुबलीने भरतको छोड़ा तब उन्होंने क्रोधके कारण अपमृत्यु करनेयाले सुदर्शनचक्रका स्मरण किया और स्मरण करते ही हजार अरोंको धारण करनेवाला सुदर्शनचक्र उनके हाथमे आकर सड़ा हो गया ॥८॥ एक हजार यक्ष जिसकी रक्षा कर रहे तथा जो सूर्यके समान देदीप्यमान प्रभाका धारक था ऐसे सुदर्शनचक्रको उन्होंने ऊपरकी ओर घुमाकर भाईको मारने- के लिए छोड़ा ।। परन्तु वह देवाधिष्ठित चक्र चरमोत्तम शरीरके धारक बाहुबलीके मारने में असमर्थ रहा इसलिए उनकी तीन प्रदक्षिणाएँ देकर वापिस आ गया || तदनन्तर याहुयली बड़े भाईको निर्दय देख हाथोंसे कान ढककर लक्ष्मीको इस प्रकार निन्दा करने लगे ॥१॥ जिस प्रकार कीचड़ स्वच्छ, अनुकूल, एवं मिले हुए जलको विपरीत- मलिन कर देती है उसी प्रकार यह लक्ष्मी स्वच्छ, अनुकूल और मिले हुए मनुष्यों के चित्तको विपरीत कर देती है अतः इसे धिकार हो ॥६२॥ जिस प्रकार यन्त्र-मूर्ति- ( फोल्हू ) मधुर एवं चिफग स्वभाववाले तिलहनोंके दीर्घकालिक स्नेह-तेलको हर लेता है तथा अत्यन्त अस्थिर होती है उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी मधुर एवं स्नेहपूर्ण स्वमाययाले मनुष्यों के घिर-कालिक स्नेह-प्रियको नष्ट कर देती है एवं अत्यन्त अस्थिर है अतः इसे विकार हो । जिस प्रकार दृष्टिविष सर्पको दृष्टि नरेन्द्र-विपवेद्योके लिए भी सब ओर. में स्वय अत्यन्त दुःपसे देखने के योग्य तथा भय उत्पन्न करनेवाली है उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी नरेन्द्र-राजाभाके लिए भी सय ओरसे अत्यन्त दुःप्रेय-दुःससे देखने योग्य तथा भय उत्पन्न १. यररोम।

एकादशः सर्गः । मूलमध्यान्तदुःस्पशा सर्वदाग्निशिखामिव । भास्वरामपि धिग्लक्ष्मी सर्वमन्तापकारिणीम् ॥१५॥ मर्त्यलोके सुखं तद् यश्चित्तमन्तोषलक्षणम् । सति बन्धुविरोधे हि न सुखं न धनं नृणाम् ॥१६॥ जनयन्ति नृणां भोगाः प्रतिकूलेपु कधुपु । शीतज्वरामिभूतानां शीतस्पर्शा इवासुखम् ॥२७॥ इति सञ्चिन्त्य सन्त्यज्य स राज्य तपसि स्थितः । कैलासे प्रतिमायोगं तस्थौ वर्ष सुनिश्चलः ॥६॥ वल्मीकरन्ध्रनिर्यातः फणिभिर्मणिभूषितः । चरणी रेअतुस्तस्य पुरेव नरपै तैः ॥६॥ वल्लभेव पुरावल्ली मावी कोमलाशिका । निःशेपाहपरिष्वनं चक्रे तस्य मुनेरपि ॥१०॥ लता व्यपनयन्तीभ्यां खेचरीम्यां बभौ मुनिः । श्याममूर्तिः स्थिरो योगी यथा मरकताचलः ॥१०॥ कपायान्तमसो कृवा भरतेन कृतानतिः । केवलज्ञानमुत्पाद्य पारिपद्यः प्रमोरभूत् ॥१०२॥ चतुर्दशमहारत्ननिधिभिनंबमियुतः । निःसपन्नं ततश्चक्री वुभोज वसुधा कृती ॥१०३॥ भदावादशवर्षाणि दानं चासौ यथेप्सितम् । लोकाय कृपया युक्तः परीक्षापरिवर्जितम् ॥१०॥ जिनशालनवा सत्यभक्तिमारवशीकृतः । परीक्ष्य श्रावकान् पश्चाद् यीशहुरादिभिः ॥१०५॥ काकिण्या लक्षणं कृत्वा सुरत्नत्रयसूत्रकम् । सम्पूज्य स ददौ तेभ्यो भक्तिदान कृते युगे ॥१०६॥ करनेवाली है इसलिए इसे धिक्कार हो ॥६॥ जिस प्रकार अग्निकी शिखा सदा मूल, मध्य और अन्तमें दुःखकर स्पर्शसे सहित है तथा देदीप्यमान होकर भी सबको सन्ताप करनेवाली है उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी आदि, मध्य और अन्तमें दुःखकर स्पर्शसे सहित है-सब दशाओम दुःख देनेवाली है तथा देदीप्यमान-तेज तर्राटेसे युक्त होनेपर भी सबको सन्ताप उत्पन्न करने वाली है-आकुलताकी जननी है इसलिए इसे धिक्कार हो ॥६शा मनुष्य लोकमें मुख वही हे जो चित्तको सन्तुष्ट करनेवाला हो परन्तु बन्धुजनों में विरोध होनेपर मनुष्योंको न सुख प्राप्त होता है और न धन ही उनके पास स्थिर रहता है ॥६६जिस प्रकार शीत-ज्वर से आक्रान्त मनुष्यों के लिए शीतल स्पर्श दुःख उत्पन्न करते हैं उसी प्रकार बन्धुजनों के विरुद्ध होनेपर भोग भी मनुष्योंके लिए दुःख उत्पन्न करते हैं ।।६७|| इस प्रकार विचार कर तथा राज्यका परित्याग कर बाहुवली तप करने लगे और कैलास पर्वतपर एक वर्षका प्रतिमा योग लेकर निश्चल खड़े हो गये ।।१८। उनके चरण, यामीके बिलोंसे निकले हुए मणिभूपित साँसे इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जिस प्रकार कि पहले मणिभूपित आश्रित राजाओंसे सुशोभित होते थे IMELI जिस प्रकार पहले कोमलाङ्गी वल्लभा उनके समस्त शरीरका आलिङ्गन करती थी उसी प्रकार कोमलाङ्गी माधवीलता उनके मुनि होनेपर भी उन वाहुबलीके समस्त शरीरका आलिङ्गन कर रही थी।।१०।। दो विद्याधर परियों उनके शरीरपर लिपटी हुई लताको दूर करती रहती थी जिससे श्याममूर्तिके धारक एवं स्थिर सड़े हुए योगिराज बाहुबली मरकतमणिके पर्वतके समान सुशोभित हो रहे थे ॥१०१॥ तदनन्तर भरतने आकर जिन्हें नमस्कार किया था ऐसे बाहुबली मुनिराज कपायोंका अन्तकर तथा केवलज्ञान उत्पन्न कर भगवान् वृषभदेवके सभासद् हो गये-उनके समवसरणमें पहुँच गये ॥१०२॥ तदनन्तर चौदह महारत्नों और नौ निधियोंसे युक्त अतिशय बुद्धिमान् चक्रवर्ती भरन, पृथिवीका निष्कण्टक उपभोग करने लगे ॥१०६।। भरत महाराज दयासे युक्त हो विना रिसी परीक्षाके बारह वर्ष तक लोगोके लिए मनचाहा दान देते रहे ॥१०॥ तदनन्तर जिन-शासन सम्बन्धी वात्सल्य और भक्ति के भारसे वशीभूत होकर उन्होंने जो तथा धान्य आदिफे अदुरीसे श्रावकोंको परीक्षा की, काकिणी रत्नसे निर्मित रत्नत्रयसूत्र-यझोपवीवको उनका चिह्न बनाया १. शीतदाराभिभूतानां ख..

हरिवंशपुराणे ततस्ते ब्राह्मणाः प्रोक्ता प्रतिनो भरतारताः । वर्णप्रयेण पूर्वण जाता वर्णचतुष्टयी १०७॥ चकच्छवासिदण्डास्ते काकिणीमणिचर्मणो । सेनागृहपतीभाश्वाः पुरोधःस्थपतिस्त्रियः ॥१०॥ चतुर्दशमहारत्ननिचयाश्चक्रवर्तिनः । प्रत्येक रक्षिता देवैः सहस्रगगनैर्वभुः ॥१०॥ कालश्चापि महाकालः पाण्डुको माणवस्तथा । नःमः सर्वरनाश्च शङ्खः पद्मश्च पिङ्गलः ॥१०॥ भी पुण्यवतस्तस्य निधयोऽनिधना' नव ! पालिता निधिपालाख्यैः सुरैलोकोपयोगिनः ॥११॥ शकटाकृतयः सर्वे चतुरहाटचत्रकाः । नवयोजनविस्तीर्णा द्वादशायामसम्मिताः ॥११२॥ ते चाप्टयोजनागाधा बहुवचारकुक्षयः । नित्यं यक्षसहस्रेण प्रत्येक रक्षितेक्षिताः ॥१३॥ ज्योतिर्निमित्तशास्त्राणि हेतुवादकलागुणाः । शब्दशास्त्रपुराणायाः सर्वे कालनिधौ मताः ॥११॥ पञ्चलोहादयो लोहा नानाभेदाः प्रवर्तिताः । लब्धवणे विनिर्णया महाकालनिधौ पुनः ॥१५॥ धान्यानां सफला भेदाः शालिवाहियवादयः । कटुतिक्तादिभिव्यः प्रणीताः पाण्डुके निधौ ॥१६॥ कवचैः खेटकैः खड्गः शरैः शक्तिशरासनः । चक्रायैरायुधैर्दिव्यैः पूर्णो माणवको निधिः ॥१७॥ शयनामनवस्तूनां विविधानां महानिधिः । सो गृहोपयोग्यानां भाजनानां च भाजनम् ॥११॥ इन्द्रनीलमहानीलवज्रवद्र्यपूर्वकैः । सर्वरत्न निधिः पूर्णः सुरत्नः सुमहाशिखैः ॥११॥ भेरीशड्डानकैाणाझल्लरीमुरजादिभिः । आतोटुश्चोद्यसम्पूर्णेः पूर्णः शङ्खनिधिर्महान् ॥१२०॥ और आदर-सत्कार कर कृतयुगमें उन्हें भक्तिपूर्वक दान दिया ॥१०५-२०६।। आगे चलकर भरनके द्वारा आदरको प्राप्त हुए वे प्रती ब्राह्मण कहे जाने लगे। इस तरह पहले कहे हुए तीन वों के साथ मिलकर अय ब्राह्मग, क्षत्रिय, वैश्य और शूद ये चार वर्ण हो गये ॥१०७॥ १ चक्र, २ छत्र, ३ सद्ग, ४ दण्ड, ५ काकिणी, ६ मणि, ७ चर्म, ८ सेनापति, गृहपति, १० हस्ती, ११ अश्व, १२ पुरोहित, १३ स्थपति और १४ स्त्री चक्रवर्तीके ये चौदह रत्न थे, इनमें प्रत्येककी एक-एक हजार देव रक्षा करते थे तथा ये अत्यधिक सुशोभित थे ॥१०८-२०६॥ १ काल, २ महाकाल, ३ पाण्डक, ४ माणय, ५ नौसर्प, ६ सर्वग्न, ७ शत, ८ पद्म और पिगल''ये पुण्यशाली चक्रवर्तीकी नौ निधियाँ थीं। ये सभी निधियों अविनाशी थीं, निधिपाल नामक देवों के द्वारा सुरक्षित थीं और निरन्तर लोगोंके उपकारमें आती थीं ॥११०-१११॥ ये गाड़ीके आकारको थीं, चार-चार भोरों और आठ-आठ पहियोंसे सहित थीं। नौ योजन चौड़ी, बारह योजन लम्बी, आठ योजन गहरी और वक्षार गिरिके समान विशाल फुक्षिसे सहित थीं। प्रत्येकको एक-एक हजार यक्ष निरन्तर देस-रेस रसते थे ॥११२-११।। इनमेंसे पहली कालनिधिमै ज्योतिषशास्त्र, निमित्तशास्त्र, न्यायशास्त्र, कलाशास्त्र, व्याकरणशास्र, एवं पुगण आदिका मद्भाव था अर्थात् कालनिधिसे इन सबकी प्राप्ति होती थी॥११४॥ दूसरी महाकाल निधि, विद्वानोंके द्वाग निर्णय करने योग्य पश्चलोह आदि नाना प्रकारफे लोहाका सद्भाय था अर्थात उमसे इन सबकी प्राप्ति होती थी ।।११।। तीसरी पाण्डुक निधिर्म शालि, प्रीहि, जो आदि समस्त प्रकारको धान्य तथा का चिरपरे आदि पदार्थाका मद्भाय था ॥१६॥ चोयो माणवक निधि, कवच, ढाल, सलवार, याग, शक्ति, धनुष तथा घन आदि नाना प्रकारफे दिव्य शस्त्रोंसे परिपूर्ण थी ॥११॥ पायी मर्प-निधि, शय्या, आसन भादि नाना प्रकारको यस्तुओं तथा घरमें उपयोग आनेयाले नाना प्रकारफे भानोंकी पात्र थी ॥११८|| छठयों मबरन निधि इन्द्रनील मणि, महानील मणि, यसमणि भादिषदी-यही शियाके भाग्फ उत्तमोत्तम ग्रामे परिपूर्ण थी ॥११॥ सातवीं शत- निधि, भंग, शंख, नगाई, योगा, मालरी और मृदा आदि भापानसे तथा फॅफकर यजान १ नाराहाः, निधनानिय १.। २. युगमाद्याः म.। ३. भीमनानाम।

एकादशः सर्गः २०७ . पट्टचोणमहानेत्रदुकूलवरकम्बलः । वस्त्रविचित्रवर्णाः पूर्णपद्मनिधिः सदा ॥१२॥ कटकैः कटिसूत्राद्यैः स्त्रीपुंसाभरणैः शुभैः । स पिझलनिधिः पूर्णो मजवाजिविभूषणैः ॥१२२॥ 'कामवृष्टिवशास्तेऽमी नवापि निधयः सदा । निष्पादयन्ति निःशेपं चक्रवत्तिमापितम् ॥१२३॥ शतानि त्रीणि पष्टया तु सूपकाराः परे परे । कल्याणसिस्थमाहारं प्रत्यहं ये वितन्वते ॥१२॥ सहस्रसिक्थः कबलो द्वात्रिंशत् तेऽपि चरिणः । एकश्चासौ सुभद्रायाः एकोऽन्येषां तु तृप्तये ॥१२५|| चित्रकारसहस्राणि नवतिवभिः सह । द्वात्रिंशत् ते सहस्राणि नृपा मुकुटबदकाः ॥१२६॥ देशाश्चापि हि तावन्तो जयन्त्यपि सुरस्त्रियः । भन्तःपुरसहस्राणि तस्य पण्णवतिः प्रभोः ॥१२॥ हलकोटी तथा गावनिकोटयः कामधेनवः । कोटयश्चाष्टादशाश्वानां निश्चेया दातरंहसाम् ॥१२॥ लक्षाश्चतुरशीतिस्तु मदमन्थरगामिनाम् । हस्तिनां सुरथानां च प्रत्येकं चक्रवर्तिनः ॥१२६॥ आदित्ययशसा साद्धं विवद्धनपुरोगमाः । पञ्च पुत्रशतान्यस्य वशाश्चरमदेहकाः ॥१३०॥ भाजनं भोजनं शय्या चमूर्वाहनमासनम् । निधिरत्नपुरं नाट्यं भोगास्तस्य दशालकाः ॥१३॥ स पोडशसहस्रश्च गणवद्धसुरैः सदा । सेवायां सेव्यते दः प्रमादरहितैहितैः ॥१३२॥ विभवेन नरेन्द्रोऽपौ तादृशेन युतोऽपि सन् । शास्त्रार्थक्षुण्णधीश्चक्रे दुर्गतिमहनिग्रहम् ॥१३३॥ स द्वात्रिशरमहस्राणां स्मयबाहुल्यमस्मयः । अपाकरोद्विकीयतान् दोःकृताहितमन्धनः ॥१३॥ "श्रीवृक्षलक्षितोरस्के सचतुःषष्टिलक्षणे । पोडशे मनुराजेऽस्मिन् विटोज: श्रीविडग्विनि ॥१३५॥ स्वायम्भुवे महाभागे भरते भरततितिम् । नास्या शासति खण्डानां निरयासपिडतपौरुपे ॥१३६॥ योग्य नाना प्रकार के वाजोंसे पूर्ण थी ॥१२०।। आठवीं पद्मनिधि पाटाम्बर, चीन, महानेत्र, दुकूल, उत्तम कम्बल तथा नाना प्रकारके रग-विरन यस्रास परिपूर्ण थी १२शा और नौवीं पिगलनिधि कड़े तथा कटिसूत्र आदि स्त्री-पुरुषोके आभूपण और हाथी, घोड़ा आदिके अलङ्कारोंसे परिपूर्ण थी ॥१२२।। ये नौकी नौ निधियाँ कामवृष्टि नामक गृहपतिके आधीन थीं और सदा चक्रवर्तीके समस्त मनोरथोंको पूर्ण करती थीं ।।१२।। चक्रवर्तीके एक-से-एक बढ़कर तीन सौ साठ रसोइया थे जो प्रतिदिन कल्याणकारी सीथोंसे युक्त आहार बनाते थे ॥१२४|| एक हजार चावलोंका एक • कबल होता है ऐसे बत्तीस कबल प्रमाण चक्रवर्तीका आहार था, सुभद्राका माहार एक कवल था और एक कवल अन्य समस्त लोगोंकी तृप्तिके लिए पर्याप्त था ॥१२॥ चक्रवर्ती के निन्यानवे हजार चित्रकार थे, वत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजा थे, उतने ही देश थे और देवाङ्गनाओंको भी जीतनेवाली छियानवे हजार स्त्रियों थीं ॥१२६-१२७|| एक करोड़ हल थे, तीन करोड़ कामधेनु गायें थीं, वायुके समान वेगशाली अठारह करोड़ घोड़े थे, मत्त एवं धीरे-धीरे गमन करनेवाले चौरासी लाख हाथी और उतने ही उत्तम रथ थे ॥१२८-१२६।। अर्ककीर्ति और विवर्धनको आदि लेकर पाँचसौ चरम शरीरी तथा आज्ञाकारी पुत्र थे ॥१३०॥ १ भाजन, २ भोजन, ३ शय्या, ४ सेना, ५ वाहन, ६ आसन, ७ निधि, ८ रन, नगर और १० नाश्य ये दश प्रकारके भोग थे ॥१३१।। सेवामें निपुण, प्रमाद रहित एवं परमहितकारी सोलह हजार गणवद्ध देव सदा उनकी सेवा करते थे ॥१३॥ यद्यपि राजाधिराज चक्रवर्ती इस प्रकारके विभवसे सहिन थे तथापि उनकी बुद्धि शास्त्रोंका अर्थ विचारनेमें निरत रहती थी और वे दुर्गतिरूपी ग्रहका सदा निग्रह करते रहते थे ॥१३३॥ भुजाओंसे शत्रुओंका मथन करने वाले चक्रवर्तीने यद्यपि यत्तीस हजार गजाओंको बिसेर कर उनका अभिमान नष्ट कर दिया था तथापि स्वयं अभिमानसे रहित थे ।।१३४॥ जिनका वक्षस्थल श्रीवृत्तके चिह्नसे सहित था, जो चौंसठ लक्षणोंसे युक्त थे, जो इन्द्रकी लक्ष्मीको तिरस्कृत करनेवाले थे और जो नित्य एवं असण्डित पौरुपको धारण करनेवाले थे ऐसे स्वयंभूपुत्र सोलहवें कुलकरभरत महाराज जब भरत क्षेत्र सम्बन्धी छह सण्डोंकी भूमिका १. कामदृष्टि म० । २. अकीर्तिना। ३.विबर्द्धनकुमारादयः । ४. निविरत्नं पुरं म०।५. श्रीवन-म० ।

२०६
हरिवंशपुराणे
धर्मार्थकाममोक्षेषु यथेष्टमनुरागिणः । जनाः सन्ततमारेमुनिःप्रत्यूहसमाहिताः ॥१३७॥
अवाग्विसर्गमन्येषां पूर्वधर्मफलं प्रभुः । श्रिया स दर्शयन् वेषां नाभूधर्मस्य देशकः ॥१५
शार्दूलविक्रीडितवृत्तम्
धर्मस्याचरितस्य पूर्वजनने मार्गे जिनाना महान्
माहात्म्येन सपौरुषः सुखनिधिोंकैककल्पद्रुमः ।
सम्यग्दर्शनरत्नरक्षितमनोवृत्तिमनश्चक्रभृत्
चक्रे शक्रनिमः श्रियाऽन भरतः शार्दूलविक्रीडितम् ॥१३॥
इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिक्शे जिनसेनाचार्यकृती भरतदिग्विजयवर्शनो
नाम एकादशः सर्गः।
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नीतिपूर्वक शासन करते थे तब धर्म, अर्थ, काम और मोक्षमें यथेष्ट अनुराग रखने वाले लोग
निर्विघ्न रूपसे निरन्तर आनन्दका उपभोग करते थे ॥१३५-१३७॥ जो अपनी लक्ष्मीके द्वारा
विना वचन बोले ही अन्य मनुष्योंके लिए पूर्वजन्ममें किये हुए धर्मका फल दिखला रहे थे ऐसे
भरत महाराज किनके लिए धर्मके उपदेशक नहीं थे। भावार्थ-- उनकी अनुपम विभूतिको
देखकर लोग अपने आप समझ जाते थे कि यह इनके पूर्वकून धर्मका फल है इसलिए सबको
धर्म करना चाहिए ॥१३८॥ इस प्रकार पूर्वजन्ममें आचरण किये हुए धर्मके माहात्म्यसे जो
स्वयं अतिशय महान थे, पौरुपसे युक्त थे, सुखके भाण्डार थे, लोगोके लिए कल्पवृक्ष स्वरूप थे,
सम्यग्दर्शन रूपी रत्नसे रञ्जित मनोवृत्तिसे युक्त थे, और लक्ष्मीसे इन्द्रके समान थे ऐसे चक्रवर्ती
भरत, सिंहकी चेष्टाके समान सुदृढ़ मनको जिनमार्गमें लीन रखने लगे ॥१३॥
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें
भरतकी दिग्विजयका वर्णन करनेवाला ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥११॥

द्वादशः सर्गः चकार वन्दनां गत्वा चक्री भतुरनारतम् । स त्रिषष्टिपुराणानि शुनाव च सविस्तरम् ॥१॥ चतुर्विंशतितीर्थेशवन्दनाय शिसस्पृशम् । अचीकरदसौ वेश्मद्वारे वन्दनमालिकाम् ॥२॥ अदृष्टपूर्वतीर्थशाः प्रविष्टाः समवस्थितिम् । कदाचिच्चक्रिणा सार्द्ध विवर्द्धनपुरोगमाः ॥३॥ क्लिष्टाः स्थावरकार्यवनादिमिथ्यात्वदृष्टयः । दृष्ट्वा भगवतो लक्ष्मी राजपुत्राः सुविस्मिताः ॥४॥ अन्तर्मुहूर्तकालेन प्रतिपयसुसंयमाः । अयोविंशान्यहो चिनं शतानि नवभियंभुः॥५॥ सान् प्रशस्य ततश्चक्री शासनं च जिनेशिनाम् । नरवेशं साधुसङ्घ च विवेश मुदितः पुरीम् ॥६॥ शनैर्याति ततः काले साम्राज्ये लोकपालिनः । चतुर्वाचितज्ञानजलचालितचेतसः ॥७॥ ततः स्वयंवरारम्भे प्राप्ते भूचरखेचरे । वृते मेघेश्वरे धीरे सुसुलोचनया तया ॥८॥ युद्धे वद्धऽर्कात्तौ च मुक्ते च कृतपूजने । भम्पनमुताम" पूजितश्चक्रवर्तिना nen स हास्तिनपुराधीशः प्रासादस्थोऽन्यदा वृतः । वाभिः खे खेचरं यान्तं खेो वीच्य मूञ्छितः ॥१०॥ अथानन्तर चक्रवर्ती भरत समवसरणमें जाकर निरन्तर भगवान् वृपमदेवको नमस्कार करते थे और प्रेशठ शलाकापुरुपोंके पुराण विस्तारके साथ सुनते थे॥१॥ उन्होंने चौबीस तीर्थङ्करों- की वन्दनाके लिए अपने महलोंके द्वारपर शिरका स्पर्श करने वाली वन्दनमालाएँ बँधवाई थीं। भावार्थ-पक्रवर्ती भरतने अपने महलोंके द्वारपर रत्ननिर्मित चौबीस घंटियोंसे सहित ऐसी वन्दन-मालाएँ बघवाई थीं जिनका निकलते समय शिरसे स्पर्श होता था। घंटियोंकी आवाज सुनकर भरतको चौवीस तीर्थकरीका स्मरण हो आता था जिससे वह उन्हें परोक्ष नमस्कार फरता था ना किसी समय चक्रवर्तीके साथ विवद्धन कुमार आदि नौ सौ तेईस राजकुमार भगवानके समवसरणमें प्रविष्ट हुए। उन्होंने पहले कभी तीर्थकरके दर्शन नहीं किये थे। वे अनादि मिथ्याष्टि थे और अनादि कालसे हो स्यावर कार्यों में जन्ममरण कर क्लेशको प्राप्त हुए थे। भगवान्की लक्ष्मी देखकर वे सब परम आश्चर्यको प्राप्त हुए और अन्तर्मुहूर्तमें ही उन्होंने संयम प्राप्त कर लिया ॥३-शा चक्रवर्तीने उन सब कुमारोंको तथा जिनेन्द्रदेवके शासनको प्रशंसा की और अन्तमें वे श्रीजिनेन्द्र भगवान् तथा मुनिसंघको नमस्कार कर प्रसन्न होते हुए अयोध्या नगरी में प्रविष्ट हुए ॥६॥ तदनन्तर धीरे-धीरे समय व्यतीत होनेपर लोगोंकी रक्षा करने वाले एवं चतुर्वर्गके वास्तविक ज्ञानरूपी जलसे प्रक्षालित चित्तके धारक महाराज भरतके साम्राज्यमें सर्व प्रथम स्वयंवर प्रथाका प्रारम्भ हुआ। स्वयंवर मण्डपमें अनेक भूमिगोचरी तथा विद्याधर दकहे हुए । बनारसके राजा अकम्पनकी पुत्री सुलोचनाने हस्तिनापुरके राजा सोमप्रभके पुत्र मेपेश्वर जयकुमारको यग। अर्ककीर्ति और जयकुमारका युद्ध हुआ जिसमें जयकुमारने अर्ककीर्तिको घाँघ लिया । पश्चात् अकम्पनकी प्रेरणासे जयकुमारने अर्ककीर्तिको छोड़ दिया एवं उसफा सत्कार किया और चक्रवर्तीने मुलोचनाके पनि जयकुमारका सत्कार किया sil तदनन्तर किसी समय हस्तिनापुरका राजा जयकुमार स्त्रियोंसे पिरा महलकी इसपर पैठा था कि आकाशमें जाते हुए विद्याधर और विद्याधरीको देखकर अकस्मात् मूञ्छित हो १ तीरां वन्दनाथ म। २. विनकुमारप्रभृतयः ६२१ मरतपुत्राः अनादिमिप्याररपः सदा पूर्व भगवतो वैमा हवा मर्म स्वीन रिति क्यासारः । ३. बदे च कौतों च म० १४. पियाधयां सह ।

हरिवंशपुराणे विह्वलान्तःपुरस्त्रीमिः कृतमूर्छाप्रतिक्रियः । हा प्रभावति ! याताऽसि केरयवादोत्प्रबुद्धवान् ॥११॥ जये जातिस्मरे जाते तस्प्रियाऽपि सुलोचना । प्रासादवलभी क्रोडरपारावतयुगेक्षणात् ॥१२॥ भूरवा जातिस्मरा मूच्छां गत्वा प्राप्य प्रतिक्रियाम् । हिरण्यवर्मणो नाम गृहतीव समुत्थिता ॥१३॥ हिरण्यवर्मपोऽहमित्युवाच जयः प्रियाम् । साऽहं प्रभावतीत्याह प्रहृष्टा तं सुलोचना ॥१४॥ विद्याधरभवं पूर्वमभिज्ञानरुभावपि । परस्परस्य संवाद्यं स्पष्टं विदधतुः प्रियो ।।१५।। ततोऽन्तःपुरलोकस्य कौतुकव्याप्तचेतसः । किमेतदिति जिज्ञासाज्ञापनार्थ जयोक्तया ॥१६॥ सुखदुःखरसोन्मिश्रमवियोगसुखान्वितम् । द्वयोश्चरितमाख्यातं चतुर्भवमयं तया ॥१७|| उहिण्टिकारिसम्बन्धं सुकान्तरतिवेगयोः । दम्पत्योर्दग्धयोस्तेन मरणं करुणावहम् ॥ मार्जारेण सता तेन स्वपारावतजन्मनि । भक्षणे दुःखमरणं स्वं जगाद सुलोचना ॥१६॥ साधुदानानुमोदेन प्रमावस्या प्रभावितः । हिरण्यवर्मणो भोगं महाविद्याधरश्रियः ॥२०॥ स्वपूर्ववैरिणा दाहं तयोः सह तपस्थयोः । आद्यकल्पसमुत्पत्ति संक्लेशपरिणामतः ॥२॥ क्रीडार्थमागतस्यास्य चर्मा देवमिथुनस्य च । वैरिणो नरकोस्थस्य भीमसाधोश्च मर्पणम् ॥२२॥ स्वर्गच्यवनपर्यन्तं दम्पत्योश्चरितं यथा । दृष्टश्रुतानुभूतार्थ सविस्तरमुदीरितम् ॥२३॥ गया ॥१०॥ घबड़ायी हुई अन्तःपुरकी स्त्रियोंने उसको मूर्छाका उपचार किया जिससे सचेत होकर वह कहने लगा कि 'हाय ! प्रभावति ! तू कहाँ गई ? ॥११॥ उधर विद्याधर और विद्या- धरीको देखकर जयकुमारको जातिस्मरण हुआ और इधर महलके छज्जेपर क्रीड़ा करते हुए कबूतर और कबूतरीका युगल देखनेसे सुलोचनाको भी जातिस्मरण हो गया जिससे वह भी मूछित हो गई। पश्चात् मूर्छाका उपचार प्राप्त कर सुलोचना हिरण्यवर्माका नाम लेती हुई उठी ॥१२-१३।। प्रियाके मुखसे हिरण्यवर्माका नाम सुनकर जयकुमारने उससे कहा कि पहले में ही हिरण्यवर्मा था इसके उत्तर में सुलोचनाने भी प्रसन्न होती हुई कहा कि वह प्रभावती मैं ही हूँ ॥१४॥ इस प्रकार पति-पत्नी दोनोंने अनेक चिह्नोंसे हम पहले विद्याधर थे, इसका स्पष्ट निर्णय कर लिया ।।१५॥ तदनन्तर जिसका चित्त कौतुकसे व्याप्त हो रहा था ऐसे अन्तःपुरके समस्त लोगोंकी 'यह क्या है' इस जिज्ञासाको दूर करनेके लिए जयकुमारकी प्रेरणा पाकर सुलोचनाने दोनोंके पिछले चार भवोंसे सम्बन्ध रखनेवाला चरित कहना शुरू किया। उनका वह चरित सुख और दुःख रूपी रससे मिला हुआ था तथा संयोग सम्बन्धी सुखसे सहित था॥१६-१७॥ उसने बताया कि सुकान्त और रतिवेगा नामक दम्पतिके साथ उर्टिटिकारिका क्या सम्बन्ध था तथा किस प्रकार उसने उक्त दोनों दम्पतियोंको जलाकर उनका करुणापूर्ण मरण किया था। उटिटिकारि मरकर बिलाव हुआ और सुकान्त तथा रतिवेगा मरकर कबूतर-कबूतरी हुए तो उटिटिकारिने कबूतर-कबूतरीका भक्षण किया। जिससे उन्हें मरते समय बड़ा दुःख उठाना पड़ा ॥१८-१६॥ मुनिदानकी अनुमोदनासे कबूतरीका जीव प्रभावती नामकी विद्याधरी हुई और कबूतरका जीव हिरण्यवर्मा नामका विद्याधर हुआ तथा दोनो ही विद्याधरोकी लक्ष्मीका उपभोग करते रहे। फदाचित् हिरण्यवर्मा और प्रभावती वनमें तपस्या करते थे उसी समय अपने पूर्व भवके वैरी- मार्जारके जीव (विद्युद्वेग नामक चोर) ने उन्हें अग्निमें जला दिया । संक्लिष्ट परिणामोंके कारण हिरण्यवर्मा और प्रभावती मरकर प्रथम स्वर्गमें देव-देवी हुए और विद्युद्वेग चोरका जीव मरकर नरक गया। किसी समय उक्त देव-देवियोंका युगल कोडाके लिए पृथिवीपर आया था और विद्युद्व गफा जीव नरकसे निकलकर भीम नामका साधु हुआ था । सो कारण पाकर तीनों जीवों- १ कृतम निवारणः । २ प्रतिक्रियः म । ३. दृष्टं श्रुता म० ।

द्वादशः सर्गः निजाज्ञया च कथितं श्रीपालचरितं तथा । सान्तःपुरो जयः श्रुत्वा महान्तं विस्मयं प्रितः ॥२४॥ भवपकसम्बन्धस्नेहसागरवर्तिनोः । स्मरणादेव सम्प्राप्ताः विद्याः प्राग्जन्मजास्तयोः ॥२५॥ ततो विद्याप्रभावेण विद्याधरयुवश्रियो । विजहतुर्जयन्ती तौ लोकं खेचरगोचरम् ॥२६॥ जिनेन्दवन्दनापूर्व निवर्गपरिपोपिणा । मन्दरस्य रतं तेन कन्दरासु समं तया ॥२७॥ क्लशैलनितम्वेषु सुविशालनितम्बया । रेमे किसरगीतेपु रामया सोऽभिरामया ॥२८॥ कर्मभूमिभवेनापि क्रीडितं भोगभूमिपु । कलागुणविदग्धेन मिथुनेन यथेप्सितम् ॥२६॥ शप्रशंसनादेत्य रतिप्रमसुरेण सः। परीक्ष्य स्वस्त्रिया मेरावन्यदा पूजितो जयः ॥३०॥ सर्वामामेव शुद्धीनां शीलशुद्धिः प्रशस्यते । शीलशुद्विविशुद्धानां किङ्करास्त्रिदशा नृणाम् ॥३॥ वर्षाणि बहुपत्नीक सुबहूनि बहुप्रजाः । बुभुजे परमान् भोगान् विजयेन समं जयः ॥३२॥ सुतयाऽकम्पनस्यासावाक्रीड्यादिषु चान्यदा । वन्दनाय जिनेद्रस्य वृपभस्य समागमत् ॥३३॥ प्रस्यासनममुञ्चन्ती प्रोवाच दयितां च सः । प्रिये पश्य जिनार्धाशं प्रैलोक्यपरिचारितम् ॥३४॥ प्रातिहार्ययुतोऽष्टाभिश्चतुस्प्रिंशन्महातैः । अयं भाति विभुर्धाता त्रैलोक्यपरमेश्वरः ॥३५॥ अमी चतुर्विधा देवाः सौधर्मप्रमुखाः प्रिये । देव्योऽमीपामपि मूनां प्रणमन्ति जिनेश्वरम् ॥३६॥ ने परस्पर क्षमा भाव धारण किया । काल पाकर भीम मुनि तो मोक्ष चले गये और देवदम्पती स्वर्गसे च्युत होकर हम दोनों हुए हैं। इस प्रकार स्वर्गसे च्युत होने पर्यन्त देवदम्पतीका चरित जैसा देखा,सुना अथवा अनुभव किया था वैसा सुलोचनाने विस्तारके साथ वर्णन किया ॥२०-२३।। तदनन्तर जयकुमारकी आज्ञा पाकर सुलोचनाने श्रीपाल चक्रवर्तीका भी चरित पहा जिसे अन्तः- पुरके साथ-साथ सुनकर जयकुमार परम आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥२४॥ जो पाँच भयोंके सम्बन्धसे समुत्पन्न स्नेह रूपी सागर में निमग्न थे ऐसे जयकुमार और सुलोचनाको स्मरण मात्रसे ही पूर्व भव सम्बन्धी विद्याएँ प्राप्त हो गई ।।२।। तदनन्तर विद्याके प्रभावसे विद्याधर और विद्याधरियों- की शोभाको जीवते हुए वे दोनों विद्याधरोंके लोक विहार करने लगे ॥२६॥ धर्म, अर्थ और काम इस त्रिवर्गको पुष्ट करनेवाला जयकुमार कभी जिनेन्द्र भगवान्की वन्दना कर सुमेरुपर्वतकी गुफाओंमें सुलोचनाके साथ रमण करता था और कभी जहाँ किन्नर देव गाते थे ऐसे कुलाचलोंके नितम्वोंपर विशाल नितम्बोंसे सुशोभित सुन्दरी सुलोचनाके साथ क्रीड़ा करता था ॥२७-२८।। वह यद्यपि कर्मभूमिमें उत्पन्न हुआ था तथापि कला गुणमें विदग्ध आर्य दम्पतीके समान भोग- भूमियोंमें इच्छानुसार कोड़ा करता था ।।२६॥ किसी समय इन्द्रके द्वारा की हुई प्रशंसासे प्रेरित होकर रतिप्रभ नामक देवने अपनी लोके साथ मुमेरु पर्वतपर जयकुमारके शीलको परीक्षा की और परीक्षा करनेके बाद उसकी पूजा की ॥३०॥ सो ठीक ही है क्योंकि सब प्रकारकी शुद्धियों में शोलशुद्धि ही प्रशंसनीय है। जो मनुष्य शीलकी शुद्धिसे विशुद्ध हैं उनके देव भो किंकर हो जाते हैं ॥३१॥ बहुत पत्नियों और बहुत पुत्रोंसे सुशोभित जयकुमार अपने छोटे भाई विजयके साथ उत्तमोत्तम भोग भोगता रहा ॥३२॥ तदनन्तर किमी दिन वह सुलोचनाके साथ पर्वतोपर फ्रीड़ा कर श्री वृषभ जिनेन्द्रको चन्दनाके लिए समवसरण गया ॥३३|| समवमरणके ममीप पहुँचकर उसने पासमें पड़ी मुन्टो. घनासे कहा कि प्रिये ! तीन लोकके जीवोंसे घिरे हुए जिनेन्द्रदेवको देवो ॥३४|| ये त्रिलोको- नाथ आठ प्रातिहासेि सहित हैं तथा चौतीस अतिशयोंसे मुशोभित हो रहे हैं ॥३५॥ हे प्रिये ! ये सौधर्म आदि पारी निकायके देव और इनकी देवियों मस्तक मुका-मुकाकर जिनेन्द्र देयको १. मोचन्ती म०।२ पिशुशान्तो म०, २०।

२१२ हरिवंशपुराणे नानद्धियतिभियुक्ताः सप्ततिगंणधारिणः । अमी वृपभसेनायाः प्रकाशन्तेऽन्तिकं प्रभोः ॥३७॥ असौ बाहुबली कान्ते ! केवली जटिलो वृतः । स्वभ्रातृमुनिभिर्भाति न्यग्रोध इव पादपैः ॥३८॥ एप सोमप्रभो देवि ! शोभते गुरुरावयोः । श्रेयसा सहितो योगी तप:श्रीपरिवारितः ॥३६॥ भयं पुत्रसहस्रेण तपस्थो जनकस्तव । भकम्पनमहाराजो राजते तपसः श्रिया ॥४०॥ दुर्मर्पणादयस्तैऽमी त्वत्स्वयंवरयोधिनः । उपशान्तधियः कान्ते ! तपस्यन्ति महानृपाः ॥४॥ ब्राह्मीयं सुन्दरीयं च समस्तार्यागणाग्रणीः । कुमारीभ्यां प्रिये ताभ्यां मारभङ्गः स्फुटीकृतः॥४२॥ भरतोऽयं नृपः साईमुपविष्टो जिनान्तिके । अन्तःपुरमिदं तस्य सुभद्रादिकमेकतः ॥४३॥ पश्य पश्य प्रिये चित्रं यदन्योन्यविरोधिनः । तिर्यञ्चोऽमी समासीनाः सममेकत्र मित्रवत् ॥४४॥ दर्शयनिति कान्तायै समवस्थितिमहंतः । सोऽवतीय महन्मार्गात् कृतजैनेन्द्रसंस्तवः ॥४५॥ निविष्टश्चक्रिणः पार्वे विनयी नयविजयः । सुभद्रान्तिकमासाद्य समासीना सुलोचना ॥४६॥ धमं तत्र जयः श्रुत्वा सप्रपञ्चकथामृतम् । बोधिलाभमसौ लेभे मोहनीयतनुस्वतः ।।४७॥ स्नेहपाशं दित्वा प्रयोज्य स सुलोचनाम् । पुत्रायानन्तवीर्याय दत्वा राज्यं निजं कृती ॥४८॥ चक्रिणा रध्यमानोऽपि स स्नेहवशवर्तिना । भवनाज जिनस्थान्ते विजयेन जयः समम् ॥४६॥ शतान्यष्टौ जयेनामा प्रायजन् चितिपास्तदा । कलत्रपुत्रमित्राणि सराज्यान्यवहाय ते ॥५०॥ दुःसंसारस्वभावज्ञा सपस्नीभिः सिताम्बरा । नाहीं च सुन्दरी धित्वा प्रववाज सुलोचना ॥५॥ प्रणाम कर रही हैं ॥३६।। ये भगवान् ऋपभदेवके समीप नाना ऋद्धियोंके धारक मुनियोंसे युक्त वृपभसेन आदि सत्तर गणधर मुशोभित हो रहे हैं ॥३७॥ हे कान्ते ! यहाँ ये केवलज्ञानी जटाधारी बाहुबली भगवान् विराजमान हैं । ये मुनि अवस्थाको प्राप्त हुए अपने भाइयोंसे घिरे हुए हैं और अनेक वृक्षांसे घिरे वटवृक्षके समान सुशोभित हो रहे हैं ॥३८॥ हे देवि ! इधर ये तपरूपी लक्ष्मीसे घिरे हुए हमारे पिता सोमप्रभ मुनिराज, अपने छोटे भाई श्रेयान्सके साथ मुशोभित हो रहे हैं ॥३६॥ इधर ये तुम्हारे पिता अकम्पन महाराज एक हजार पुत्रोके साथ तप- में लीन हैं तथा तपोलक्ष्मोसे अत्यधिक सुशोभित हो रहे हैं ॥४०॥ हे कान्ते ! इधर ये तुम्हारे स्वयंवर, युद्ध करनेवाले दुर्मर्पण आदि बड़े-बड़े राजा शान्त चित्त होकर तपस्या कर रहे हैं ॥४१॥ हे प्रिये ! यह समस्त आर्यिकाओंकी अग्रणी ब्राह्मी है और यह सुन्दरी है इन दोनोंने कुमारी अवस्था में ही कामदेवको पराजित कर दिया है ॥४॥ इधर यह जिनेन्द्र भगवान के समीप अनेक राजाभीके साथ भरत चक्रवर्ती धैठा है और उधर दूसरी ओर उसकी सुभद्रा आदि रानियाँ अवस्थित हैं ॥४३॥ हे प्रिये ! देखो देखो, कैसा आश्चर्य है कि ये परस्पर के विरोधी तिर्यञ्च यहाँ एक साथ मित्रकी तरह बैठे हैं ॥४४॥ इस प्रकार प्राणवल्लभा--सुलोचनाके लिए मरहन्त भगवान्का समवसरण दिसाता हुआ नीतिका वेत्ता कुमार आकाशसे नीचे उतरा और जिनेन्द्र भगवानकी स्तुति करता हुआ विनय-पूर्वक चक्रवर्तीके पास घेठ गया तथा सुलोचना मुभद्राके पास जाकर बैठ गई ॥४५-४६३॥ जयमारका मोह अत्यन्त सूक्ष्म रह गया था इसलिए यहाँ विस्तृत फयारूपी अमृतसे सहित धर्मका उपदेश मुनकर उसने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान भीर सम्यक् पारिनरूपी घोधिका लाभ प्रान किया ॥४७॥ तदनन्तर अतिशय बुद्धिमान् जयकुमारने स्नेहरूपी सुदृढ़ बन्धनको छेदकर मुलोचनाको समझाया, अनन्तवीर्य नामक पुत्र के लिए अपना राज्य दिया और स्नेहके यशवर्ती चक्रवर्तक मना करनेपर भी छोटे भाई विजयके साथ जिनेन्द्र- दय के समीप दीक्षा ले ली ॥४-४॥ उस समय जयकुमारके साथ एक सौ आठ राजाओने सो, पुत्र, मित्र नया राज्यको छोड़कर दीक्षा धारण कर लो १०॥ दुष्ट संसारके स्वभाषको जाननेवाली सुलोचनाने अपनी सपत्नियोंके साथ सफेद पत्र धारण कर लिये भीर प्राझी तथा १. तरमा भिया म..

द्वादशः सर्गः द्वादशाङ्गधरो जातः चित्रं मेघेश्वरो गणी । एकादशाङ्गजाता सायिकाऽपि सुलोचना ॥५२।। भूचरेषु ततोऽन्येषु खेचरेषु च राजसु । निष्क्रान्तेषु श्रियस्त्यरत्वा दोपिीरिव योपितः ॥५३॥ अभूवन् गणिनो भत्तु रशीतिश्चतुरुत्तरा । सहस्राणि गणाश्चामनगतिश्चनुरुत्तरा ॥५॥ आद्यो धूपमसेनोऽन्यः कुम्मो रढरयो गणी । चतुर्थः शगुदमनो देवशर्मा च पञ्चमः ।।५५।। पष्टो गगधरो धीमान् धनदेव इतीरितः । नन्दनः सोमदत्तश्च सुरदत्तस्तथा परः ॥५६॥ वायुशर्मा सुबाहुश्च देवाग्निद्वादशो गणी । अग्निदेवोऽग्निभूतिश्च' चतुर्दश उदारितः ॥५॥ तेजस्वी चाग्निमित्रश्च तथा हलधरः श्रुती 1 महीधरश्च माहेन्द्रो वसुदेवो वसुन्धरः ।।५।। तथैवाचलनामान्यो मेरच जगतीप्यते । भूतिः सर्वसहो यज्ञः सर्वगुप्तस्तथापरः ||५६॥ द्वौ च सर्वप्रियो देवो विजयश्चापि संशया 1 परो विजयगुवश्च मित्रान्तविजयस्ततः ॥६॥ विजयश्रोरिति रयातः परारयोऽप्यपराजितः । वसुमिनोऽपि सेनान्तो वमुसाधुरनादृशः ॥६॥ सत्यदेव इति ज्ञेयः सत्यवेदः पुनर्गणी । सर्वगुप्तरच मित्रश्च सस्यवानिति नामतः ॥१२|| विनीतः संवरश्चोभापिगुप्तर्षिदत्तकौ । यज्ञदेव इति प्रोक्तो यज्ञगुप्तस्तथैव च ॥३॥ यज्ञमित्रो यज्ञदत्तः स्वायम्भुव इति स्तुतः । भागदत्तो भागफल्गुगुंतफल्गुः प्रकीर्तितः ।।६।। तथाऽन्यो गगभृन्नाम्ना मित्रफरगुः प्रजापतिः । ततः सन्ययशा नाम्ना वरुणो धनवाहिकः ॥६५॥ गणी महेन्द्रदत्तश्च तेजोराशिमहारथः । विजयश्रुतिरन्यश्च महाबल इति श्रुतः ॥६६॥ सुविशालश्च वज्रश्च वैरनामा ततोऽपरः । सप्ततिश्चन्द्रचूहोऽन्यस्ततो मेघेश्वरः परः ।।६७॥ कच्चश्चापि महाकच्छा सुकच्छोऽतिवलोऽपि च । भदावलिश्च विख्यातो नमिश्च विनमिस्तथा ॥६॥ गणी भद्रबलो नन्दी तथाऽन्यः समुदीरितः । महानुभावसंज्ञश्च नन्दिमित्रश्च नामतः ॥६॥ तथैव कामदेवश्च चरमोऽनुपमः स्मृतः । वृषभस्य गणिनस्तेऽमी भीतिश्चतुरुत्तराः ॥३०॥ सुन्दरीके पास जाकर दीक्षा ले ली ॥३१॥ मेघेश्वर जयकुमार शीघ्र ही द्वादशाके पाठी होकर भगवान्के गणधर हो गये और आर्यिका सुलोचना भी ग्यारह अगोंकी धारफ हो गई ॥५२॥ तदनन्तर अनेक भूमिगोचरी और विद्याधर राजाओने जब दोपवती स्त्रियोंके समान लक्ष्मीका त्यागकर दीक्षा धारण कर ली तब भगवान्के चौरासी गणधर हो गये और गणोंकी संख्या चौरासी हजार हो गई ।।५३-५४|| उनमें चौरासी गणधरोके नाम ये हैं-१ वृपभसेन, २ कुम्भ, ३ दरथ, ४ शत्रुदमन, ५ देवशर्मा, ६ घनदेव, ७ नन्दन, सोमदत्त, सुरदत्त, १० वायुशर्मा, ११ मुबाहु, १२ देवाग्नि, १३ अग्निदेव, १४ अग्निभूति, १५ तेजस्वी, १६ अग्निमित्र, १७ हलधर, १८ महीधर, १६ माहेन्द्र, २० वसुदेव, २१ वसुन्धर, २२ अचल, २३ मेरु, २४ भूति, २५ सर्वसह, २६ यज्ञ, २७ सर्वगुम, २८ सर्वप्रिय, २६ सर्वदेय, ३० विजय, ३१ विजयगुन, ३२ विजयमित्र, ३३ विजयश्री, ३४ पराख्य, ३५ अपराजित, ३६ वसुमित्र, ३७ वसुसेन, ३८ साधुसेन, ३६ सत्यदेव, ४० सत्यवेद, ४१ सर्वगुण, ४२ मित्र, ४३ सत्यवान , ४४ विनीत, ४५ संवर, ४६ ऋपिगुम, ४७ ऋपिदत्त, ४८ यज्ञदेव, ४६ यज्ञगुम, ५० यतमित्र, ५१ यज्ञदत्त, ५२ स्वायंभुव, ५३ भागदत्त, ५४ भागफल्गु, ५५ गुम, ५६ गुप्त- फल्गु, ५७ मित्रफल्गु, ५८ प्रजापति, ५१ सत्ययश, ६० वम्ग, ६१ धनवाहिक, ६२ महेन्द्रदत्त, ६३ तेजोगशि, ६४ महारय, ६५ विजय-श्रुति, ६६ महायल, ६७ मुविशाल, ६८ यम, ६६ वैर, ७७ चन्द्रचूड, ७१ मेघेश्वर, ७२ कच्छ, ७३ महाफच्च, ७४ मुकच्छ, ७५ अतियन्ट, ७६ भद्रायलि, ७७ नाम, ७८ विनमि, ७६ भद्रयल, नन्दी,८१ महानुभाव, ८२ नन्दिमित्र, ८३ फामदेव और ८४ अनुपम । भगवान् वृपभदेयके ये चौरासी गगधर थे ॥१५-७॥ १. भूनध म .२ पनाम:मा, स्व.।

हरिवंशपुराणे सहः परिपदि श्रीमान् वभौ सक्षविधस्तदा । विचित्रगुणपूर्णानामृषीणां वृषभेशिनः ॥७॥ सहस्राणि च चत्वारि तत्र सतशतानि च । पञ्चाशच महाभागा वभुः 'पूर्वधरास्तदा ॥७२॥ तावस्येव सहखाणि शतं पज्ञाशतायुतम् । श्रुतस्य शिक्षकाः प्रोक्ताः संयताः संयताक्षकाः ॥७३॥ सहस्राणि नवाधीता मुनयोऽवधिलोचनाः । विंशतिस्ते सहस्राणि केवलज्ञानलोचनाः ॥७४।। विंशतिस्ते सहस्राणि पट् शतानि च वैक्रिया: । विक्रियाशक्तियोगेन जयन्तः शक्रमप्यलम् ॥७५।। द्वादशैव सहस्राणि तथा सप्तशतानि च । पञ्चाशच युतास्तत्र मत्या विपुलया वभुः ॥७॥ तावन्त एव संख्याता संख्ययाऽसंख्यसद्गुणाः । जेतारो हेतुवादज्ञा वादिनः प्रतिवादिनाम् ॥७॥ सपळाशरसहस्रास्ता शुद्धज्ञा वभुरार्यिकाः । श्राविकाः पञ्चलक्ष्यस्ताखिला श्रावकाश्च ते ।।७८|| छद्मस्थकालनिर्मुक्तां पूर्वलक्ष जिनेश्वरः । विजहार महीं भव्यान् भवान्धेस्तारयन् बहून् ॥७॥ स्नग्धराच्छन्दः इत्थं कृत्वा समर्थ भवजलधिजलोत्तारणे भावतीर्थ कल्पान्तस्थायि भूयत्रिभुवनहितकृत् क्षेत्रतीर्थ स कत्तुंम् । स्वाभाव्यादातरोह श्रमणगणसुरवातसम्पूज्यपादः कैलासारयं मही, निपधमिव वृपादिस्य इद्धभभाव्यः ८०॥ तस्मिनदी जिनेन्द्रः स्फटिकमणिशिलाजालरम्ये निपण्यो योगानां ससिरोधं सह दशभिरथो योगिनां यः सहस्रः । करवा कृत्वान्तमन्ते चतुरपरमहाकर्मभेदस्य शर्म- स्थानं स्थानं स सैद्धं समगमदमलस्रग्धराभ्यय॑मानः ॥८॥ भगवान् वृषभदेवको सभामें नाना प्रकारके गुणोंसे पूर्ण मुनियों का सात प्रकारका संघ था - ७१।। उनमें चार हजार सात सौ पचास महाभाग तो पूर्वधर थे ॥७२॥ चार हजार सात सौ पचास मुनि श्रुतके शिक्षक थे, ये सब मुनि इन्द्रियोंको वश करनेवाले थे ॥७३|| नौ हजार मुनि अवधिज्ञानी थे, वोस हजार केवलज्ञानी थे, बोस हजार छह सौ विक्रिया ऋद्धिके धारक थे, ये मुनि अपनी विक्रिया शक्तिके योगसे इन्द्रको भी अच्छी तरह जीतनेवाले थे, बोस हजार सात सौ पचास विपुलमति मनःपर्यय ज्ञानके धारक थे, घीस हजार सात सौ पचास ही असं- ख्यात गुणोंके धारक; हेतुवादके ज्ञाता तथा प्रतिवादियोंको जीतनेवाले वादी थे, शुद्ध भात्मतत्वको जाननेवाली पचास हजार आर्यिकाएं थी, पाँच लास प्राधिकार थीं और तीन लास श्रावक थे ॥७४-७८॥ भगवानको कुल आयु चौरासी लाख पूर्व वर्ष की थी उससे इनस्थ कालके तेरासी लास वर्ष पूर्व वर्ष कम कर देनेपर एक लास पूर्व यर्प तक उन्होंने अनेक भव्य जीवोंको संसार-सागरसे पार करते हुए पृथिवीपर विहार किया था ।।७६// इस प्रकार मुनिगग और देवोके समूहसे पूजित चरणोंके धारक श्री वृषभ जिनेन्द्र, संसाररूपी सागरके जलसे पार करने में समर्थ रत्नत्रयहा भाव तीर्थका प्रवर्तन कर कल्पान्त काल तक स्थिर रहनेवाले एवं त्रिभुवन जनहितकारी क्षेत्र तीर्थको प्रवर्तनके लिए स्वभावयश (इच्छाके यिना हो) फैलाम पर्यतपर उम तरह मारूद हो गये जिस तरह कि देदीप्यमान प्रभाका धारक पृषका मूर्य निषधाचलपर भारूद होता है ।।२०॥ स्फटिक मणिको शिलाओंके समूहसे रमणीय स फैटराम पयंतपर आरन होकर भगवान्ने एक हजार गजाओके साथ योग निरोध किया और अन्त में पार भवातिया फर्माका अन्त कर निर्मल मा ओंके धारफ देयोंसे पूजित हो अनन्त १-४३५०।२-४१५.।३-१...1४-२००..1५-२०६.०।६-१२७५० ।

द्वादशः सर्गः उद्घः सोऽस्य 'मौनः स्फुटभुवनगुरोदेवदेवस्य देह देवौघश्चक्रवत्तिप्रमुखनृपगणश्चातिभवत्या समेत्य । गन्धः पुष्पैश्च धूपैः सुरभिभिरमलेरचतेश्व प्रदीपः सम्पूज्यानम्य सम्यग्वृषभजिनगुणश्रीफलं याचते स्म ॥२॥ इत्यरिटनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती वृपभेश्वरपरिनिर्वाणवर्णनो नाम द्वादशः सर्गः ॥१२॥ सुखके स्थानभूत मोक्षस्थानको प्राप्त किया ॥१॥ मोक्षप्राप्तिके अनन्तर मुनियोंका श्रेष्ठ संघ, देवोंका समूह और चक्रवर्ती भादि प्रमुख राजाओंका समूह–इन सबने तीव्र भक्तिवश आकर गन्ध, पुष्प, सुगन्धित धूप, उज्ज्वल अक्षत और देदीप्यमान दीपकके द्वारा निजगद्गुरु देवादि देव वृपभदेवके शरीरकी पूजा कर तथा अच्छी तरह नमस्कार कर यही याचना की कि हम- लोगोंको श्री ऋपभ जिनेन्द्र के गुण लक्ष्मीरूपी फलकी प्राप्ति होवे ।। ८२ ॥ इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें श्रीवृषभदेवकी निर्वाण-प्राप्तिका वर्णन करनेवाला चारहवाँ सर्ग समाप्त हुभा ॥१२॥ १. मुनीनामयं मौनः 'तस्येदम्' इत्या प्रत्ययः ।

त्रयोदशः सर्गः अनुभूय चिरं लक्ष्मी भूपतिर्भरतेश्वरः । आदित्ययशसं पुत्रमभिषिच्य भुवो विभुः ॥३॥ दीक्षां जमाह जैनेन्दीमुग्रामात्मपरिग्रहाम् । दुर्निग्रहेन्द्रियग्राममृगनिग्रहवागुराम् ॥२॥ पञ्चमुष्टिभिरु पाध्य ग्रुटयद्वन्धस्थितिः कचान् । लोचानन्तरमेवापद् राजन् श्रेणिक ! केवलम् ॥३॥ द्वात्रिंश त्रिदशेन्द्रः स कृतकेवलपूजनः । दीपको मोक्षमार्गस्य विजहार चिरं महीम् ॥१॥ पूर्वलक्षाः कुमारखे तस्यागुः सप्तसप्ततिः । साम्राज्ये पट प्रभोरेका श्रामण्ये विश्वदृश्वनः ॥५॥ शैलं अपभसेनाद्यैः कैलासमधिरुह्य सः । शेपकर्मक्षयान्मोक्षमन्ते प्राप्तः सुरैः स्तुतः ॥६॥ भादित्ययशसः पुत्रो जातः स्मितयशःश्रुतिः । श्रियं तस्मै वितीर्यासी तपसा प्राप निवृतिम् ॥७॥ बलस्तस्मादभू पुत्रः सुबलोऽतो महाबलः । ततोऽतिबलनामा च तस्यामृतवलः सुतः ॥८॥ सुभद्रः सागरो भद्रो रवितेजाः शशी ततः । प्रभूततेजास्तेजस्वी तपनोऽन्यः प्रतापवान् ॥६॥ अनिवार्यः सुवीर्योऽतस्तथोदितपराक्रमः । महेन्द्रविक्रमः सूर्य इन्द्रद्युम्नो महेन्द्र जित् ।।३०॥ प्रभुर्विभुरविध्वंसो वीतभीवृषभध्वजः । गरुडाको मृगातारय इत्याद्याः पृथिवीभृतः ॥११॥ आदिरयवशसम्भूताः प्रमेण पृथुकोत्तयः । सुते न्यस्तमराः प्रापुस्तपसा परिनिर्वृतिम् ॥१२॥ अथानन्तर पट्खण्ड पृथिवीके स्वामी महाराज भरतने चिरकाल वक लक्ष्मीका उपभोगकर अर्ककीर्ति नामक पुत्रका अभिषेक किया और स्वयं अतिशय कठिन आत्मरूप परिग्रहसे युक्त, एवं कठिनाईसे निग्रह करने योग्य इन्द्रियरूपी मृग समूहको पकड़नेके लिए जालके समान जिन- दीक्षा धारण कर ली ॥१-२|| गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् श्रेणिक ! महाराज भरतने अपने समस्त केश पञ्चमुट्टियोंसे उखाड़कर फेंक दिये तथा उनके कर्मबन्धनकी स्थिति इतनी जल्दी क्षीण हुई कि उन्होने केशलोचके बाद ही केवलनान प्राप्त कर लिया ॥३॥ तदनन्तर बत्तीसों इन्द्राने आफर जिनके केवलज्ञानकी पूजा की थी और जो मोक्षमार्गको प्रकाशित करनेके लिए दीपकके समान थे ऐसे भगवान् भरतने चिरकाल तक पृथिवीपर विहार किया ॥४॥ सर्व- दर्शी भगवान भरतकी आयु भी चौरासी लाख पूर्वको थी उसमेंसे सतहत्तर लाख पूर्व तो कुमार कालमें बीते, छह लाख पूर्व साम्राज्य पदमें व्यतीत हुए और एक लाख पूर्व उन्होंने मुनि पदमें विहार किया ॥५|| आयुके अन्त समय वे वृपभसेन आदि गगधरोके साथ कैलास पर्वतपर भारूढ़ हो गये और शेप कर्माका क्षयकर वहींसे उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया, देवोंने उनकी स्तुति- बन्दना को ॥६॥ राजा अर्कोर्तिके स्मितयश नामका पुत्र हुआ। अर्ककीर्ति उसे लक्ष्मी दे तपके द्वारा मोक्ष- को प्राप्त हुआ || स्मितयशके बल, पलके सुवल, सुबलके महाबल, महाबलके अतिबल, अति- बलके अमृतबल, अमृतबलके सुभद्र, सुभद्रके सागर, सागरके भद्र, भद्रके रवितेज, रवितेजके शशी, शशीके प्रभूततेज, प्रभूततेजके तेजस्वी, तेजस्वीके तपन, तपनके प्रतापवान् , प्रतापवान्के अतिवीर्य, अतिवीर्यके मुवीर्य, मुवीर्यके उदितपराक्रम, उदितपराक्रमके महेन्द्रविक्रम, महेन्द्र विक्रमके सूर्य, सूर्यके इन्द्रद्युम्न, इन्द्रद्युम्नके महेन्द्रजिन् , महेन्द्रजितके प्रभु, प्रभुके विभु, विभुके अविघंस, अविध्वंसके वीतभी, चीतभीके वृपमध्वज. वृपभध्वजके गरुडाङ्क और गरुडाके मृगाङ्क भादि अनेक राजा फ्रमसे सूर्यवंशमै उत्पन्न हुए। ये सब राजा विशाल यशके धारक थे १. क्रासिनः १२, भरनवासिनः १०, व्यन्तराः ८, स्यांचन्द्रमसौ इति % ३२ ! २ मोक्षम् ।

त्रयोदशः सर्गः २१७ मोचमिच्याकबो जग्मुर्भरताद्या निरन्तराः । ते चतुर्दशलक्षास्तु प्रापकोऽग्रेऽहमिन्द्रताम् ॥१३॥ तथा दशगुणाश्चाष्टौ परिपाट्या नरेश्वराः । मुक्तास्तदन्तरे प्रापदेकैकः सुरनाथताम् ॥१४॥ धीरा राज्यधुरा त्यक्त्वा स्वान्तेऽन्ये तपोधुराम् । स्वर्गमेकेऽपवर्ग तु जग्मुरादित्यवंशजाः ॥१५॥ योऽसौ बाहुबली तस्माज्ञातः सोमयशाः सुतः । सोमवंशस्य कर्तासौ तस्य सूनुर्महाबलः ॥१६॥ ततोऽभूत्सुबलः सुनुरभूदुजबली ततः । एवमाद्याः शिवं प्राप्ताः सोमवंशोद्भवा नृपाः ॥१७॥ पञ्चाशन्कोटिलक्षाश्च सागराणां प्रमाणतः । तीथें वृपमनाथस्य तदा वहति सन्तते ॥८ इक्ष्वाकवो द्विधादित्यसोमवंशोद्भवा नृपाः । उनाद्या कौरवाद्याश्च मोक्षं स्वगं च भेजिरे man नमः खेचरनाथस्य रत्नमाली शरीरजः । रत्नवत्रोऽभवत्तस्मात्ततो रत्नरथस्तथा ॥२०॥ रत्नचिह्नाभिधानोऽस्मात् तस्माञ्चन्द्ररथः सुतः । वनजो बभूवास्माद् वज्रसेनसुतस्ततः ॥२१॥ सजातो वन्नदंष्ट्रोऽस्मादभूद्वध्वजस्ततः । वज्रायुधश्च वनोऽतः सुवज्रो वज्रभृत्पुनः ॥२२॥ वब्राभो वनवाहुश्च वज्राको वनसुन्दरः । वज्रास्यो वज्रपाणिश्च वज्रमानुश्च वज्रवान् ॥२३॥ विद्युन्मुखः सुवक्त्रश्च विद्युइंष्ट्रस्तथैव च । विद्युखान् विद्युदाभश्च विद्युद्वेगश्च वैद्युतः ॥२४॥ इत्याद्याः सुतविन्यस्तविभवाः खेचराधिपाः । आये तीयें तपः कृन्वा स्वर्ग मोसं च भेजिरे ॥२५॥ स्वर्गाप्रादवतीर्याऽथ नातस्तीर्थकरोऽजितः । नाभेयस्येव तस्यापि पञ्चकल्याणवर्णना ॥२६॥ काले तस्याभवञ्चक्री द्वितीयः सगरश्रुतिः । अतीणनिधिरत्नेशः प्रसिद्धो भरतो यथा ॥२७॥ और पुत्रोंके लिए राज्यभार सौंप तपकर मोक्षको प्राप्त हुए ॥८-१२॥ भरतको आदि लेकर चौदह लाख इक्ष्वाकु वंशीय राजा लगातार मोक्ष गये। उसके बाद एक राजा सर्वार्थसिद्धिसे अह- मिन्द्र पदको प्राप्त हुआ, फिर अस्सी राजा मोक्ष गये परन्तु उनके वीचमें एक-एक राजा इन्द्र- पदको प्राप्त होता रहा ॥१३-१४।। सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए कितने ही धीर-वीर राजा अन्तमें राज्य- फा भार छोड़ और तपका भार धारणकर स्वर्ग गये तथा कितने ही मोक्षको प्राप्त हुए ॥१५।। भगवान् ऋपभदेवके जो वाहुबली पुत्र थे उनसे सोमयश नामक पुत्र हुआ। वही सोमयश सोमवंश (चन्द्रवंश) का कर्ता हुआ। सोमयशके महावल, महाबलके सुबल और सुबलके भुजबलो पुत्र हुआ। इन्हें आदि लेकर सोमवंशमें उत्पन्न हुए अनेक राजा मोक्षको प्राप्त हुए ॥१६-१७|| इस प्रकार भगवान् घृपभदेवका तीर्थ पृथिवीपर पचास लाख करोड़ सागर तक अनवरत चलता रहा। इस तीर्थकालमें अपनी दो शाखाओं-सूर्यवंश और चन्द्रवंशम उत्पन्न हुए इक्ष्वाकुवंशीय तथा कुरुवंशीय आदि अनेक राजा स्वर्ग और मोक्षको प्राप्त हुए ।॥१८-२६॥ विद्याधरोंके स्वामी राजा नमिके रलमाली, रत्नमालीके रत्लवन, रत्नवन के रत्नरथ, रत्नरथके रत्नचिह्न, रत्नचिह्नके चन्द्ररथ, चन्द्ररथके वनजल, वनजङ्घके वनसेन, वयसेनके वनदंष्ट्र, वनदंष्ट्रके वन्नध्वज, वनध्वजके वसायुध, वायुधके वन, वनके मुवन, मुवनके वनभृत् , वनभृत्के वनाभ, वनामके वनवाहु, वनवाहुके वाङ्क, वाङ्कके वनमुन्दर, यस. मुन्दरके यत्रास्य, वनारयके वसपाणि, वाणिके वनभानु, वनभानुके वनवान , वसयान्के विद्युन्मुख, विद्युन्मुसके सुवक्त्र, सुवक्त्रके विद्युदंष्ट्र, विद्युदंष्टके विद्युत्वान्, विद्युत्थान के विद्यु. दाभ, विद्युदामके विद्युद्वेग और विद्युद्वेगके वद्युत पुत्र हुआ। इन्हें आदि लेकर जो विद्याधर राजा हुए वे भी भगवान् आदिनाथके तीर्थमे पुत्रोंके लिए राज्य चैभव सीप तपश्चरण कर यथा- योग्य स्वर्ग और मोक्षको प्राप्त हुए ।।२०-२५॥ अथानन्तर सर्वार्थ सिद्धिसे चयकर दूसरे अजितनाथ तीर्थकर हुए। इनके पञ्च कल्याणको- का वर्णन भगवान् ऋषभदेवके समान हो जानना चाहिए ||२६|| इनके फालमें मगर नामका १ एको मुक्तिमन्यः मुरनाथता पुनरेको मुत्तिमन्य इन्द्रत्वमित्यनेन क्रमेण । २. नामेयस्यापि मा।

हरिवंशपुराणे पुत्राः पष्टिसहस्राणि तस्य दुर्ललितकियाः । परस्परमहाप्रीताः प्रत्याख्याताऽगुपूर्वकाः ॥२८॥ कृताष्टापदकैलासा दण्डरनेन ते तितिम् । भिन्दानाः कुपितेनामी नागराजेन भस्मिताः ॥२६॥ संसारस्थितिविञ्चक्री पुत्रशोकमुदस्य सः । दीक्षित्वाजितनाथान्ते मोउमैत् मुक्तयन्धनः ॥३०॥ ततः सम्भवनाथोऽभूत्ततोऽभूदभिनन्दनः । ततः सुमतिनाथश्च ततः पद्मप्रभो जिनः ॥३१॥ सुपावश्च जिनेन्द्रोऽस्मात् ततश्चन्द्रप्रभः प्रभुः । पुष्पदन्तः परस्तस्मादृशमः शीतलस्ततः ॥३२॥ शार्दूलविक्रीडितम् इक्ष्वाकुः प्रथमः प्रधानमुदगादादित्यवंशस्तत- स्तस्मादेव च सोमवंश इति यस्त्वन्ये कुरुपादयः । पश्चाद् श्रीपभादभूदृषिगणः श्रीवंश उच्चस्तरा- मित्थं ते भूपसेचरान्वययुता वंशास्तवोक्ता मया ॥३३॥ शुद्ध श्रेणिक ! शीतलस्य दशमे तीर्थे वहत्युज्वले काले देवलदोपकोज्वलजगद्देवेन्द्रदेवागमे । प्रोतः प्रकटप्रभावमहता वंशो हरीणां यथा वर्ण्यः सोऽपि मया तथा जिनपथे तथ्यो नृपाकर्ण्यताम ॥३४॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतौ इक्ष्वाकुवंशवर्णनो नाम प्रयोदशः सर्गः । दूसरा चक्रवर्ती हुआ यह अक्षीणनिधियों तथा रत्नोंका स्वामी था और भरत चक्रवर्तीके समान प्रसिद्ध था ॥२७। इसके अद्गुको आदि लेकर साठ हजार पुत्र थे। ये सभी पुत्र अद्भुत चेष्टाओं- के धारक थे औरपरस्परमें महाप्रीतिसे युक्त थे ॥२८॥ किसी समय ये समस्त भाई कैलास पर्वतपर गये यहाँ आठ पाद स्थान बनाकर दण्डरत्नसे वहॉकी भूमि खोदने लगे परन्तु इस कियासे कुपित होकर नागराजने सबको भस्म कर दिया ॥२६॥ चक्रवर्ती सगर संसारकी स्थिति- का ज्ञाता था इसलिए पुत्रोंका शोक छोड़ उसने अजितनाथ भगवान्के समीप दीक्षा धारण कर ली और कर्म-अन्धनसे छूटकर मोक्ष प्राप्त किया॥३०॥तदनन्तर अजितनाथके बाद संभवनाथ, उनके बाद अभिनन्दन नाथ, उनके बाद सुमतिनाथ, उनके वाद पद्मप्रभ, उनके बाद मुपाय- नाथ, उनके बाद चन्द्रप्रभ, उनके बाद पुष्पदन्त और उनके बाद शीतलनाथ हुए ॥३१-३२॥ गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! सर्व-प्रथम इक्ष्वाकु वंश उत्पन्न हुआ फिर उसी इक्ष्वाकुवंशसे सूर्यवंश और चन्द्रवंश उत्पन्न हुए। उसी समय कुरुवंश तथा जावंश आदि अन्य अनेक बंश प्रचलित हुए। पहले भोगभूमिमें ऋपि नहीं थे परन्तु आगे चलकर भगवान ऋषभदेवसे दीक्षा लेकर अनेक पि उत्पन्न हुए और उनका उत्कृष्ट श्रीवंश प्रचलित हुआ। इस प्रकार मैंने तेरे लिए अनेक राजाओं और विद्याधरीके वंशोका कथन किया ॥३३॥ भय जिस समय शीतलनाथ भगवानका शुद्ध एवं टवल दसवाँ तीर्थ बीत रहा था तथा केवल- मानरूपी दीपकसे उगवल संसारमें इन्द्र और देवांका आगमन जारी था ऐसे समय महाप्रभाष- के धारक हरियाँका जो वंश प्रकट हुआ था उसका भी वर्णन करता हूँ। हे राजन् ! जिनमार्गमें इसका जो यथार्थ वर्णन है उसे तू प्रयण कर ॥३४॥ इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराण के सपहसे युक जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें इचाकुवंशका वर्णन करनेयाला तेरहवा पर्व समाप्त हुमा ||१३|| । १ अगुःशी ज्येषस्य नाम।

. चतुर्दशः सर्गः अस्ति व-साभिधो देशो देशेविह परेषु यः । सासु वत्साकृति धत्ते गोदोहे दोग्टगोचरे ॥३॥ कालिन्दीस्निग्धनीलाम्बुप्रतिविम्बितसौधता । कौशाम्बी नगरी तस्य गम्भीरा नाभिरत्यभात् ।।२।। वाप्राकारपरिखाभूपणाम्बरधारिणी । नितम्बस्तनभारास्तिम्भितेव वधूरभात् ॥३॥ रत्नचिन्नाम्बरधरा या प्रासादमुखैर्धनान् । वर्षानिशास्विव स्निग्धान् लेढि प्रौढाभिसारिका ॥४॥ दोपाकरकराप्राप्ता रत्नभूपाचिषां चयः । लेभे बहुलदोपासु परभाग सीव या ॥५॥ पुर्याः प्रभुरभूत्तस्याः प्रतापप्रभत्रो नृपः । सवितेव काक्रान्तदिक्चक्रः सुमुखः मुखी ॥६॥ अथानन्तर जम्बूद्वीपमें एक वत्स नामका देश है जो दूसरे देशोंके विद्यमान रहते हुए दोहनकर्ता जब गायको दुहते हैं तब सचमुच ही वत्स-बछड़ेको आकृतिको धारण करता है। भावार्थ-जिस प्रकार वत्स गायके दूध निकालनेमें सहायक है उसी प्रकार यह देश भी गौ- पृथिवीसे धन सम्पत्ति निकालनेमें सहायक था ॥१॥ यमुना नदीके स्निग्ध एवं नीले जलमें जिसके मौंका समूह सदा प्रतिविम्बित रहता था ऐसी कौशाम्बी नगरी उस वत्स देशकी गहरी नाभि- के समान अतिशय सुशोभित थी ॥२॥ वन, प्राकार और परिखा रूपी आभूषण तथा अम्बर- आकाश (पक्षमें वस्त्र ) को धारण करनेवाली वह नगरी नितम्ब और स्तनोंके भारसे पीड़ित होकर खड़ी हुई स्त्रीके समान जान पड़ती थी ॥३॥ वह नगरी प्रौढ़ अभिसारिकाके समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार प्रौढ़ अभिसारिका रत्नचित्राम्बरधरा-रत्नोंसे चित्र-विचित्र यत्रको धारण करती है उसी प्रकार वह नगरी भी रत्न-चित्राम्बरधरा- रत्नोंसे चित्र-विचित्र आकाशको धारण करती थी, और अभिसारिका जिस प्रकार रात्रिके समय अपने स्नेही जनोंका प्रसन्न मुखसे स्पर्श करती है उसी प्रकार वह नगरी भी वर्षा ऋतु रूपी रात्रिके समय स्निग्ध- नूतन जलसे भरे मेघोंका महलरूपी मुखोसे स्पर्श करती थी ॥४॥ अथवा यह स्त्री कृष्ण पक्षको रात्रियोमे पतिव्रता स्त्रीके समान सुशोभित होती थी क्योंकि जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री दोपाकर- करामाता-दोपोंकी खान स्वरूप दुष्ट मनुष्योंके हाथसे अस्पृष्ट रहती है उसी प्रकार वह नगरी भी बहुलदोपासु-कृष्ण पक्षकी रात्रिमें दोपाकरकराप्राप्ता-चन्द्रमाकी किरणोंसे अस्पृष्ट थी और पवित्रता स्त्री जिस प्रकार बहुलदोपासु-अनेक दोपोंसे भरी व्यभिचारिणी त्रियोग रत्नमय आभूषणोकी किरणों के समूहसे उत्कृष्ट शोभाको प्राप्त होती है, उसी प्रकार वह नगरी भी बहुल- दोपासु-कृष्ण पक्षकी रात्रियों में रत्नमय आभूपणोंकी किरणांसे उत्कृष्ट शोमाको प्राप्त थी ॥५॥ उस कौशाम्बी नगरीका स्वामी राजा मुमुस था। वह सुमुस ठीक सूर्य के समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार सूर्य प्रतापप्रभवः-अकृष्ट संतापका कारण है उसी प्रकार यह राजा भी प्रताप- प्रभवः-उत्कृष्ट प्रभावका कारण था। जिस प्रकार सूर्य कराक्रान्तदिक्चक्र:-अपनी किरणों से दिमण्डलको व्याप्त कर लेता है उसी प्रकार वह राजा भी कराक्रान्तदिक्चक:- अपने टेक्ससे १. ७ पुस्तके 'दोग्धगोचरे' इति पाठः केनापि 'दुग्धगोचरे' इति रूपेण शोधितः । २. साधममूहः। ३. मपदेशो नाभिश्च । ४ टोपामरः दोपवान् मनुष्यः तस्य करेण अप्राता पने दोषाकरश्चन्द्रस्तस्य करे: किरणः अमासा ! ५ प्रभूतदोषामु स्त्री पक्षे कृष्णपदनिशामु । ६ गुणोत्कर्षम् । ७ माटस्तापः प्रतापस्तम्य ममयः कारणं पने प्रतारस्य प्रभावस्य प्रभवः कारणं 'म प्रभावः प्रतापश्च यचेजः कोशदण्डजम्' इत्यमरः । ८ कराः किरणाः पक्षे राजमायो पनि । मुष्टु खम् श्राकाशं यस्य स पने मुग्यमस्यारतीति मुम्बी।

२२२ हरिवंशपुराणे इत्थं राजा मधौ मासे जाते जनमनोहरे । बने वनविहाराय मनो मदनविनमम् ॥२७॥ कृतमण्डनमारूढो द्विपेन्द्रं कृतमण्डनः । अखण्डमण्डरेद्धाभच्छत्रछनार्कमण्डलः ॥२८॥ पूर्यमागः पुरो निर्यन् नृपैरोधैरिवोदधिः । राजा राजपथं भेजे चन्दिवृन्दस्तुतोऽन्यदा ।।२।। वसन्तमिव सासरात तं वसन्त हृदि सन्ततम् । दिदृक्षुः क्षुभिता मंच पौरनारीजनाततिः ॥३०॥ वर्धस्व जय नन्देति कृतनादा कृताञ्जलिः । भूपरूपं एपौ सैपा नेत्राझलिभिराकुला ॥३॥ तत्र स्त्रीजनमध्यस्थामेकामत्यन्तहारिणीम् । रति साक्षादिव प्राप्तामद्रासीद् वनितां नृपः ॥३२॥ मुखेन्दो नेत्रयुग्माजे बिम्बोष्टे कम्बुकण्ठके । स्तनचक्र कृशे मध्ये गम्भीरे नाभिमण्डले ॥३३॥ सुघने जघने तस्या नितम्बे सकुकुन्दरे । उरुजानुलसजडापाणिपादे पदे पदे ॥३४॥ लोला निपतितां दृष्टिं मनसाधिष्ठितां मिजाम् । न शशाकोपसंहर्दा मतिरक्तो नरेश्वरः ॥३५।। दध्यौ वधूरिय कम्य रूपपाशैन मे मनः । बढवा मुग्धमृगीनेत्रा समाकर्षति हर्पिणी ॥३६॥ यदीयं नानुभूयेत मया हृदयहारिणी । ततो व्यथं ममैश्वर्य रूपं च नवयौवनम् ॥३७॥ लोकोऽयमेरुती भूयात्सर्वदा दुर्व्यतिक्रमः । अभिलापोऽन्यदारेषु दुःसहोऽयमर्थकतः ॥३८॥ इति ध्यायन्मनश्चक्रे स तस्याहरणे नृपः । अपवादो हि सात रक्तेन न मनोव्यथा ॥३६॥ यशःप्रकाशमानोऽपि लोकज्ञः सोऽ यमुखत । तमः पतनकाले हि प्रभवत्यपि भास्वतः ॥४०॥ । इस प्रकार मनुष्यों के मनको हरण करनेवाले चैत्रमासके आनेपर राजा सुमुखने काम- विलाससे परिपूर्ण अपने मनको वन-विहारके लिए उद्यत किया ॥२७॥ तदनन्तर किसी दिन जिसने नाना प्रकारके आभूपण धारण किये थे, अपने अखण्डमण्डलवाले देदीप्यमान छत्रसे जिसने सूर्यके मण्डलको आच्छादित कर दिया था, जो सजाये हुए हाथीपर आरूढ़ हो नगरसे बाहर निकल रहा था, जिस प्रकार नदियोक्के प्रवाह आकर समुद्र में मिलते हैं उसी प्रकार अनेक राजा आकर जिसके साथ मिल रहे थे तथा बन्दीजनोंके समूह जिसकी स्तुति कर रहे थे ऐसा राजा मुमुस राजमार्गको प्राप्त हुआ ॥२८-२६॥ साक्षात् वसन्तके समान हृदयमें निरन्तर वास करनेवाले राजा सुमुखको देखनेके लिए इच्छुक नगरको स्त्रियाँ शीत्र हो क्षोभको प्राप्त हो गई ॥३०|| 'हे राजन ! वृद्धिको प्राप्त होओ, जयवन्त रहो, और समृद्धिमान् हो' जो इस प्रकार शब्द कर रही थीं, हाथ जोड़े हुई थीं तथा घड़ी आकुलताका अनुभव कर रही थीं, ऐसी नगरकी त्रियोंने नेत्ररूपी अञ्जलियोंके द्वारा राजा मुमुसके सौन्दर्यका पान किया ॥३१॥ राजा मुमुखने उन स्त्रियों के मध्य में स्थित एक अत्यन्त सुन्दर स्त्रीको देखा। वह स्त्री ऐसी जान पड़ती थी मानो साक्षात् पनि ही आ पहुँची हो ॥३२॥ अतिशय रागको प्राप्त हुआ राजा, उसके मुसचन्द्र, नेत्र कमल, विम्बके समान लाल-लाल ओठ, शंखतुल्य कण्ठ, रतनचक्र, पतली कमर, गम्भीर नाभि- मण्डल, मुन्दर जघन, गर्तविशेषसे सुशोभित निनन, जाँपा-घुटनी, पिंडरियों-हाथ एवं पैरोपर पद-पदमे पढ़ती हुई अपनी मनोयुक्त पश्चल दृष्टिको संकुचित करने के लिए समर्थ नहीं हो सका ॥३३-३५॥ वह विचार करने लगा कि यह भोली-भाली हरिणीके समान नेत्रोंवाली हपसे भरी किसकी स्त्री रूपपाशसे मेरे मनको याँधकर सींच रही हे ॥३६॥ यदि में इस हृदयहारिणी नीका उपभोग नहीं करता है तो मेरा यह ऐश्वर्य, रूप एवं नवयौवन व्यर्थ हे ॥३७॥ जिसका सर्वदा उल्लंघन करना कठिन है ऐसा यह लोक तो एक ओर है और जिसका सहन करना अतिशय कठिन है ऐसी परस्त्री विपयफ अभिलाया एक ओर है ॥३८॥ इस प्रकार विचार करते दुए राजा मुमुग्गने उसके हरण करने में मन लगाया सो ठीक ही है क्योंकि रागी मनुष्य अपवाद को सो सह सकता है परन्तु मनकी व्यथाको नहीं सह सकता ||३|| आचार्य कहते हैं कि दंगो राजा मुगुम यशमे प्रकाशमान या तया लोक व्यवहारका जाता था फिर भी अत्यन्त मोहको प्राप्त हो गया सो ठीकही है क्योंकि सूर्यफे पतनका जय समय आता है तप अन्धकारको प्रयलना धनुर्दशः सर्गः २२३ साऽपि दर्शनतस्तस्य रूपिणः शिथिलागिका । शशाक न मनो धत्तु दोलारूदेव कामिनी ॥४॥ 'विचित्ररससंस्पर्शप्रादुर्भावफलोदयम् । मावं च प्रकटीचक्रे सानुलुब्धमनोगतम् ॥४२॥ दूरान्कटानविक्षेपि चक्षुरन्ते निकुञ्चितम् । जहेस्यास्तम्मनो भगि प्रतिचक्षुःप्रदानतः ॥४३॥ अधरस्तननाभ्यन्तःश्रोणीचरणबीक्षणः । परावृत्तेक्षितैश्चके सा तस्य स्मरदीपनम् ॥४॥ प्रियालापेसिभिः स्निग्धैरन्योन्यपरितः कृते । जिह्वा विह्वलयोर्वाचि न लेभेऽवसरं तयोः ।।४।। तावारूदौ च दुर्मोचप्रेमबन्धी मनोरथम् । दुलंमाश्लेषसम्भोगफललाभार्थमर्थिनौ ॥४६॥ रक्तायाश्चित्तमादाय प्रदायास्यै मनोनिजम् । नगर्या निर्ययौ राजा पणबन्धास्कृतीव सः ॥४॥ यमुनोत्तंसमुद्यानं वसन्तस्यावतंसकम् । विवेश जनतानन्दि नरेन्द्रो नन्दनोपमम् ॥८॥ रग्यं नागलताश्लिष्टेः पुष्पितैः फलितद्रुमैः । क्रमुकैालिकेराद्यैदाडिमीकदलीवनैः ॥४६॥ विज़हार वने हो स्त्रीजनैः स निजैर्वृतः । वयस्यैरनुकूलश्च नृपपुत्रः सहारमत् ।।५०॥ काचित्कालकलां तस्य क्रीडतो जनसङ्खला । शन्येव वनमालाऽऽसीद् वनमालावियोगिनः ॥५१॥ वनमालानुरागेण हियमाणोऽविशत्पुरीम् । तितीशः स्थीयते स्वस्थैः परचित्तैः कियच्चिरम् ।।५२॥ हो ही जाती है ॥४०॥ उधर सुन्दर शरीरके धारक राजा सुमुखको देखनेसे उस स्त्रीके भी अङ्ग- अङ्ग ढीले हो गये और यह मूलापर बैठी स्त्रीके समान मनको रोकनेके लिए समर्थ नहीं हो सकी ॥४१॥ उसका मन राजा सुमुखमें अत्यन्त लुभा गया था इसलिए वह नाना प्रकारके रसके स्पर्श और प्रादुर्भाव रूप फलसे सहित भावको प्रकट करने लगी ॥४२॥ जो दूर तक कटाक्ष छोड़ रहा था तथा जिसका अन्तभाग संकोचको प्राप्त था ऐसा उस स्त्रीका नेत्र, बदले में सुमुखकी ओर देखकर उसके चञ्चल मनको हर रहा था ॥४३॥ वह अधर, स्तन, नाभिका मध्यभाग, नितम्ब और चरणोंको दिखानेसे तथा मुड़कर संचारित तिरछी चितवनसे उसके कामको उद्दीपित कर रही थी ॥४४॥ उस समय विह्वलताको प्राप्त हुए दोनोंके स्निग्ध तथा परस्पर मिले हुए नेत्रोंने ही मधुर वार्तालाप कर लिया था इसलिए वेचारी जिह्वाको घोलनेका अवसर ही नहीं मिल सका था ॥४।। जिनका प्रेम बन्धन छूट नहीं सकता था ऐसे दोनों स्त्री-पुरुष, दुर्लभ आलिङ्गन, तथा संभोगरूप फल की प्राप्ति करानेवाले मनोरथपर आरूढ हुए । भावार्थ-आलिङ्गन तथा संभोगकी इच्छा करने लगे ॥४६॥ अतिशय अनुरक्त उस स्त्रीका चित्त लेकर और अपना चित्त उसे देकर राजा सुमुख नगरीसे बाहर निकला। उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो आगामी मिलापके लिए बयाना देकर कृत-कृत्य ही हो गया हो ॥४७॥ नगरीसे निकलकर राजाने यमुनोत्तंस नामक उद्यानमे प्रवेश किया। वह उद्यान, वसन्त ऋतुका आभूपण स्वरूप था, जनताको आनन्दित करनेवाला था और नन्दन वनके समान जान पड़ता था ॥४८॥ वह उद्यान, नागलताओंसे आलिङ्गित फूले-फले मुपारीके वृक्षों और नारियल, अनार तथा केलोंके वनोंसे अतिशय रमणीय था ॥४॥ अपनी स्त्रियोंसे घिरे हुए राजा सुमुसने उस सुन्दर वनमें विहार किया एवं अनुकूल मित्रों और राज-पुत्रोके साथ क्रीड़ा की ॥५०॥ वह वहाँ कुछ काल तक क्रीड़ा करता रहा परन्तु वनमालाके वियोगसे उसे वह मनुष्योंसे व्याप्त वनको पंक्ति शून्य जैसी जान पड़ती थी ॥५१॥ वनमालाके अनुरागसे हरे हुए राजाने लौटकर शीघ्र ही कौशाम्बीपुरी में प्रवेश किया सो ठीक ही है क्योकि जिनका चित्त दूसरेमे लग रहा है वे कितनी देर तक स्वस्थ रह सकते हैं ? ॥५२॥ १ विचित्ररसस्य संस्पर्शप्रादुर्भावौ एव पल तस्योदयो यस्मात् तं, एवंभूत मावम् । ३. हृद्यं क.. २. वनं क.

हरिवंशपुराणे अपृच्छ सुमतिमन्त्री तमुपांशु विशां विभुम् । विएण्णोऽसि किमधेश ! कथ्यता मिति सादरः ॥५३॥ एकच्छत्रमिदं राज्यमनुरक्ताः प्रजाः प्रभो । अनुरागप्रतापाभ्यां निभृता भृत्यभूभृतः ।।५४॥ इष्टार्थस्य प्रदानेन प्रीणितोऽर्थिजनोऽखिलः । वल्लभाः प्रणयोद्रकान्मानिताश्च प्रसादिना ।।५।। धर्मे चार्थे च कामे च प्रार्थितं दुर्लभं न ते । तदित्थं नाथ ! सौस्थित्य' मनो दुःखमितं कुतः ॥५६॥ सविभज्य मनोदुःखं सख्यौ प्राणसमे सुखी । सम्पद्यते जनः सर्व इतीयं जगतः स्थितिः ॥५७॥ तदुस्यता प्रभोऽयेव विदधामि तवेसितम् । सुस्थिते हि प्रभो लोके सुस्थिताः सकलाः प्रजाः ॥५॥ इत्युक्तः सोऽभ्यधात् सद्यो मयाद्योद्यानयातया । दृष्टया परव-वाऽऽशु विद्ययेव वशीकृतः ॥५६॥ ईदृशी क्स्वनेपथ्या प्रायेण भवताऽप्यसौ । लक्षितव निज भावं कथयन्ती स्फुटेशितैः ।।६।। इति श्रुत्वाऽवदन्मन्त्री लहिता लक्षिता विभो । वणिमो वीरकस्यासौ वनमालाभिधा वधूः ॥६॥ नृपोऽवादीत्तया योगो यदि मेऽद्य न जायते । न मन्ये जीवितं स्वस्य तस्याश्च कुटिलभ्रवः ॥६२।। मन्ये दिवसमप्येपा सहते न मया विना । अनयाऽहमपि क्षिप्रं तद्विधरस्व प्रतिक्रियाम् ॥१३॥ दुर्यशः प्राप्यतेऽमुष्मिानर्थोऽमुत्र मूढधीः । तथापि नेक्षते कार्य यथैवानिमिपान्धकः ॥६॥ तत्वया न निवार्योऽहमकार्येऽपि प्रवृत्तीः । पापोपशमनोपायाः सत्येव सति जीविते ॥६५॥ अनुमेने वचो मन्त्री तदन्यायमपि प्रभोः । अत्यभ्यर्णविपत्तीना मन्त्रिणो हि निवर्तकाः ॥६६॥ सुमति नामक मन्त्रीने एकान्तमें आदरपूर्वक राजासे पूछा कि हे स्वामिन ! आज आप विपादयुक्त क्यों हैं ? कृपाकर कहिए ।।५३॥ हे प्रभो! आपका यह एकछत्र राज्य है, प्रजा आपमें अनुरक्त है तथा अन्य राजा 'अनुराग और प्रतापसे वशीभूत हो आपके दास हो रहे हैं ॥५४॥ अभिलषित वस्तुओंको देकर आपने समस्त याचकोंको सन्तुष्ट कर रक्खा है तथा प्रेमको अधिकतासे प्रसन्न होकर आपने समस्त स्त्रियोंको सम्मानित किया है ॥५५॥ धर्म, अर्थ तथा काम-विषयक कोई भी वस्तु आपको दुर्लभ नहीं है, इस प्रकार हे नाथ ! सब प्रकारकी कुशलता होनेपर भी आपका मन दुःखी क्यों हो रहा है ? ॥५६॥ सभी लोग प्राणतुल्य मित्रके लिए मनका दुःस बाँटकर सुखी हो जाते हैं यह जगत् की रीति है ॥५७॥ इसलिए हे प्रभो ! यतलाइए मैं आज ही आपकी अभिलापाको पूर्ण करूँगा क्योंकि स्वामीके सुखी रहनेपर ही समस्त प्रजा सुखी रहती है ।।८।। मन्त्रीके इस प्रकार कहनेपर राजाने शीव्र हो कहा कि आज उद्यानको जाते समय मैंने एक पर-स्त्रीको देखा था उसीने विद्याकी भॉति मुझे शीघ्र ही वश कर लिया है ॥५६॥ वह ऐसी थी, ऐसी उसकी वेप-भूपा थी और अपनी स्पष्ट चेष्टाओंसे अपना अभिप्राय प्रकट कर रही थी प्राय: आपने भी वह देसी होगी ॥६०॥ यह सुनकर मन्त्रीने कहा कि हे स्वामिन् ! देखी है, अवश्य देसी है, वह वीरक वैश्यको वनमाला नामकी स्त्री है ।।६१॥ राजाने कहा कि यदि आज उसके साथ मेरा समागम नहीं होता है तो मैं मानता हूँ कि न मेरा जीवन बचेगा और न उस फुटिल भौहोंवाली वनमालाका ॥६२।। जान पड़ता है.कि वह मेरे बिना एक दिन भी नहीं ठहर सकती और न इसके बिना में भी एक दिन ठहर सकता हूँ इसलिए शीघ्र ही इसका उपाय करो ॥६३॥ यद्यपि इस कार्यसे इस जन्ममे अपयश प्राप्त होता है और परजन्ममे अनर्थको प्राप्ति होती है तथापि जन्मान्धके समान मूर्स मनुष्य कार्यको नहीं देखता ॥६४॥ इसलिए अकार्यमें प्रवृत्त होनेपर भी मैं तुम्हारे द्वारा रोकने योग्य नहीं हूँ । यदि जीवन रहा तो पापको शान्त करने के यहुतसे उपाय हो जायेंगे ||६शा यद्यपि राजाका यह वचन अन्याय रूप था तथा मन्त्रीने उसे , मास्थिन्य म० । २. मया द्योतनया नया मः । ३. हरभूत स्वनेपथ्यं यस्याः सा (२० दि०)। ४ अनिभिषमात्रेणान्धः जायध इत्यर्थः (4० दि०)।

२२५ न चतुर्दशः सर्गः आह चास्यनुकूलस्तमित्यसौ प्रणतः प्रभो । वनमालां सुकण्ठे ते पश्यायेव मया कृताम् ॥६७॥ स्वं मजनविवि सद्यः भुक्ति च मज पूर्ववत् । दिव्यानुलेपनश्लक्षणवत्रताम्बूलमाल्यकम् ।।८।। इति विज्ञापितो नत्वा प्रज्ञानेक्रेग मन्त्रिणा । कतु मैच्छत्तदुद्दिष्टं द्विष्टभुक्तिरपि प्रभुः ॥६६॥ विज्ञाय सुमुखातं कृपयेव विभाकरः । प्रतीचीमगमस्ट्रीघ्रमुपसंहृनदीधितिः ॥७०।। प्रौढऽस्ताभिमुग्वे ध्वस्तप्रतापे मिग्रमण्डले । मोधमोऽन्यमवल्लोको निखिलः स्खलितोद्यमः ॥७१॥ दृष्टिरश्मिभिराकृप्य चम्चाटतो यथा । तदा कथमपि प्रायान् शनैर्भानुरदृश्यताम् ॥७२॥ सध्यारागेण चच्छन्नं भुवनं तदनन्तरम् । वनमालानुरागेश सुमुग्वस्येव भूरिणा ॥७३॥ सट्टोवः पनखण्डानां ततोऽभूरखण्डितौजसाम् । मिग्रोदयोदयाः के वा मित्रापदि विकासिनः ॥४॥ सध्यारागानुसन्धाने ध्वान्तेनापि कृते बभौ । मुक्तरमाम्बरं गूढं जगन्नीलपटेन वा ॥७५॥ लब्बो वर्गविको 'लब्धवगैरपि चणम् । प्रदोषे विषमे काले तिमिरोपप्लुतैस्तदा ॥७६॥ मान लिया सो ठीक ही है क्योंकि मन्त्री अत्यन्त निकटवर्ती आपत्तियों को ही दूर करते हैं ॥६६॥ मन्त्रीने अत्यन्त अनुकूल एवं विनम्र होकर कहा कि हे प्रभो! मैं प्रयत्न करता हूँ आप वनमालाको आज ही अपने कण्ठमे लगी देखिए ॥३७॥ आप पहलेकी भाँति शीघ्र ही स्नान कीजिए, भोजन कीजिए, दिव्य विलेपन, सुकोमल वस्ख, पान तथा माला आदि धारण कीजिए ॥६८।। यद्यपि राजाको वनमालाके बिना भोजन करना इष्ट नहीं था तथापि बुद्धिरूपी नेत्रको धारण करनेवाले मन्त्रीने जब नमस्कार कर प्रार्थना की तब उसने उसके कहे अनुसार सब कार्य करनेकी इच्छा की ॥६६॥ तदनन्तर सुमुखमा अभिप्राय जानकर दयासे ही मानो सूर्य अपनी किरणोंको संकुचित कर पश्चिम दिशाकी ओर चला गया |७०॥ जिस समय अतिशय प्रतापी मित्रमण्डल-सूर्य- मण्डल (मित्रोंका समूह ) प्रताप रहित ही अस्त होने लगा उस समय समस्त उद्यमी मनुष्य भी उद्यमरहिन हो गये । भावार्थ-जिस प्रकार समर्थ मित्रोके समूहको नष्टप्रताप एवं नाशके सन्मुग्न देखकर उसके अनुगामी अन्य लोग पुरुषार्थहीन हो जाते हैं उसी प्रकार प्रतापी सूर्यको भी नष्ट. प्रताप एवं अस्त होनेके सन्मुख देख दूसरे उद्यमी मनुष्य भी उद्यम रहित हो गये-दिनभर काम करनेके बाद संध्याके समय विश्रामके लिए उद्यत हुए ॥७१।। उस समय सूर्य धीरे-धीरे किमी तरह अदृश्यताको प्राप्त हुआ सो ऐसा जान पड़ता था मानो चक्रवाक पक्षियोंने उसे अपनी दृष्टि रूपी रस्सियोंसे सीकर रोक ही रक्या था ॥७२॥ तदनन्तर जिस प्रकार राजा सुमुसका अन्तःकरण वनमालाके अनुरागसे व्याप्त था उसी प्रकार समस्त संमार संध्याकालकी लालीसे व्याम हो गया ॥७३॥ तत्पश्चात् जिनका तेज खण्डिन हो गया था ऐसे कमलीका ममूह भी संकोचको प्राप्त हो गया सो ठीक ही है क्योंकि मित्र (सूर्य पक्षमे मित्र ) के उदयकालमें अभ्युदयको प्राय होनेवाले ऐसे कौन हैं जो मित्रकी विपत्तिके समय विकसित (पक्ष में हर्पित) रह म ? ॥७॥ धीरे-धीरे अन्धकारने भी जब मन्ध्याकालिक लालिमाकी खोज की तय संसार लाल वस्त्रको छोड़कर नील-बरसे आच्छादित हो गया ॥ भावार्थ-संध्याकी लालीको दूर कर उसके स्थानपर अन्धकारने अपना अधिकार जमा लिया जिससे ऐमा जान पड़ता था - मानो संसारने लाल वस्त्र छोड़कर नीला वन ही धारण कर लिया हो ॥७॥ जिस प्रकार प्रदोप- दोपपूर्ण विषम कालमे मोहरूपी अन्धकारसे आच्छादित हुए विद्वान् मनुष्य भी प्रादागादि वर्णोका विवेक नहीं प्राप्त करते हैं-वर्णभेदको भूल जाते हैं उसी प्रकार उस प्रदोप-गत्रिके प्रारम्भ रूप विपम कालम अन्धकारसे उपद्रुत विद्वान मनुष्य भी लाल-पीले आदि वर्गाके भेद- को नहीं प्रात कर सके थे-उस ममय सब पदार्थ एक वर्ण-काले काले ही दिग्याई देते थे ।।६।। १.पिद्रिगति २२६ हरिवंशपुराणे ॥८॥ वेलायां तत्र सम्मन्ध्य मन्त्री दूतीमजीगमत् । आत्रेयीं वनमालायाः समीपं सुमुखाज्ञया ॥७७॥ मानिताऽऽसनदानाद्यः सम्फली वनमालया। साभिनन्ध रहस्येतामुवाचवं विचक्षणा ॥७॥ वनमाले प्रिये वरसे विचित्तेवाद्य लक्ष्यसे । वद वैचिस्यहेतुं मे पत्या किमसि कौपिता ॥७॥ चारको टेकपानीकस्तत्र कि कोपकारणम् । अन्यदन निमित्तं स्यारस्वसंवेद्य निगद्यताम् ॥२०॥ पुनि ! सबरहस्येषु नन्वह तु परीहिता । भवत्या मयि सत्यां वा दुर्लभं किमभीप्सितम् ॥८॥ इत्युका सोगनिश्वासग्लपिताधरपल्लवा । तया प्रार्थितया वार्ता कथमप्यत्वीद् वचः ।।८२॥ रखा मुक्याम्ब न मे काचिद्विश्रम्भस्थानमत्र हि । पटकर्णो भिद्यते मन्त्रो रमणीयः स यत्नतः ।।८३॥ दृष्टो मयाऽद्य सद्रूपः सुमुखः सुमुसो नृपः । रटमा प्रविष्टोऽमा स मनो मे मनोभुवा ॥४॥ दुर्लभेऽप्यमिलापस्य द्वेषिणः सुलमै जने । हृदयस्य खलस्येव वृत्तिरामोपतापिनी ॥५॥ दिग्ध चन्दनपन हृदयं मम शुष्यति । बहिरङ्गो विधिः कुर्यादन्तरङ्गे विधौ तु किम् ॥८६॥ भावस्वमपि न्यस्तमगोपालेऽतिशुष्यति । शीतस्पर्शोऽल्पशोऽयुष्णे किं करोतु निधापित यस्य पल्लवतश्पोऽपि करिश्तो ग्लायतेतराम् । तापकक्शगाग्रस्य मृदुं शीतः करोतु किम् ॥८॥ अगस्पर्शाद्विना तस्य नाहं पश्यामि नितिम् । तरकुरुष्व दयां पते तरसमागममेव मे ॥६॥ उस समय मन्त्रीने सलाह कर राजा सुमुखकी आज्ञासे वनमालाके पास आत्रेयी नामकी दूती भेजी ॥४७॥ वनमालाने आसन आदि देकर उस दूतीका सम्मान किया जिससे वह बहुत प्रसन्न हुई । तदनन्तर उस चतुर दूतीने एकान्तमें वनमालासे इस प्रकार कहा कि प्रिय वेटी वनमाला ! तू आज उदास-सी दिख रही है । उदासीका कारण मुझसे कह, क्या पतिने तुझे नाराज कर दिया है ? ॥७८-७॥ वीरकके तो तू ही एक पत्नी है अत: उसके क्रोधका कारण क्या हो सकता है ? उदासी में फुल दूसरा ही कारण होना चाहिए जो कि तेरे अनुभवमें आ रहा है, उसे बता ॥ बेटी! तूने सब रहस्यों में कई बार मेरी परीक्षा की है, मेरे रहते हुए तुमे कौन-सा इष्ट कार्य दुर्लभ रह सकता है ? ||१|| दूतीके यह कहते ही उसके मुखसे गरम-गरम साँसें निक- लने लगी जिनसे उसका अघरपल्लव मुरझा गया। तदनन्तर दूतीके कई बार प्रार्थना करनेपर उसने बड़े दुःपसे यह वचन कहे कि हे माँ ! तुझे छोड़कर इस विषयमे मेरा कोई भी विश्वास- पात्र नहीं है। चूंकि छह कानाम पहुँचा हुआ मंत्र फूट जाता है-उसका रहस्य खुल जाता है इमलिए मन्त्रको यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए ॥२-८३|| बात यह है कि आज मैंने प्रशस्त रूप एवं मुन्दर मुग्न धारक राजा सुमुसको देखा था और देसते ही कामदेवके साथ यह मेरे मनमें प्रविष्ट हो गया ॥४॥ इस समय मेरे हृदयको प्रवृत्ति दुर्जनकी प्रवृत्तिके समान अपने भापको संताप उत्पन्न कर रही है। क्योंकि जिम प्रकार दुर्जन दुर्लभ वस्तुको अभिलापा फरता है और मुलभ वस्तुसे द्वेप करता है उसी प्रकार मेरा हृदय, जो मेरे लिए सर्वथा दुर्लभ है ऐसे राजा मुमुग्यसरी अभिलाषा कर रहा है और सुलभ बोरकसे द्वेष कर रहा है । मेरा हदय चन्दनके लेपसे रित होनेपर भी सूप रहा है, सो ठीक ही है क्योंकि पा उपचार भन्तन कार्यमें क्या फर साना है ? ॥८६॥ मेरे अन्न और उपाहॉपर रमा हुमा गीला कपड़ा भो मूम जाना है सो टीक ही है क्योंकि अत्यन्त उष्ण पदार्थपर ग्या हुआ थोड़ा-सा शीत. पशं क्या कर सकता है ? II जिस मापसे फर्कश शरीर के लिए बनाया हुमा पल्लयों का विनर भी अत्यन्न मुग्गा जाना है उसके लिए थोड़ा-सा शीत-स्पर्श क्या कर सकता है? ET में उसके शरीर के सरांके पिना शान्ति नहीं देगी इसलिए वे पवित्र ! पया फरी भोर १.ती। २ या + अनां पामेन सगेगा (१.० ८.P.) 11. मुमताप म. 1४. मुदामुपयुधः । ५ नाम 1. मा ७, गुरमी मनःमः।

२२७ चतुर्दशः सर्गः तस्यापि हि मनोवृत्ति प्रतीहि मम दर्शनात् । मदभिप्रायसम्मिश्रा सकिारोपलक्षिताम् ॥१०॥ तदा तप्तौ प्रवीगे ! द्वौ स्वं नौ रहसि योजयेः । सुखेनैव हि कालज्ञे तप्तं तप्तेन योज्यते ॥११॥ निशम्य वनमालायास्तद्वचो भावसूचक्म् । जगाद वचनं दूती तदेति मुदितात्मिका ॥३२॥ वत्से बरसेश्वरेगाहं त्वद्रूपहृतचेतसा । प्रहिताऽस्मि तदेह्याऽऽशु तेन त्वां घटयाम्यहम् ॥१३॥ इति स्वेष्टार्थसंवादे वनमाला स्मरातुरा । दूत्या पत्यो परोक्षे द्रागविशदाजमन्दिरम् ॥४॥ विलोक्य मनसश्चौरी सुमुखः सुमुखी मुदा । एोहोति प्रियालापाञ्चकार सुखिनों सुखी ॥१५॥ हस्ते स्तनानुलुप्तां तां स्वेदिनि स्वेदिना युवा । हस्तेनादाय तन्वङ्गीं शयने स्वे न्यवेशयत् ॥१६॥ प्रौढयौवनयोर्योगमनुकत्तु मिवैतयोः । उदियाय निशानायो प्रसादितनिशामुखः ॥१७॥ शशाकस्य करस्पर्शान्मुमोदाशु कुमुदती । सुमुखस्य करस्पर्शाद् वनमालेव हारिणी ।।८ उक्तप्रत्युकयुक्तार्थान् स्त्रीपुंसगुणसङ्गतान् । प्रेमवन्धप्रवृद्धये तो बहून् भावांस्तु चक्रनुः ॥१६॥ सोऽपि विनम्मदूरास्तनवसङ्गमसाध्यसाम् । तामुन्सङ्गे कृतां गाढमालिलिङ्गागसगताम् ॥१०॥ असन्तोपभुजाश्लेपैविलेपमुषितमैः । चुम्बनैश्चूपणैर्दशैः कण्ठग्रहकचग्रहैः ।।१०१॥ मेरे लिए शीघ्र ही उसका समागम प्राप्त कराओ ॥८६॥ तुम यह विश्वास करो कि मेरे देखनेसे उसकी मनोवृत्ति भी मेरी चाहसे मिश्रित है-उसके मनमें मेरी चाह है क्योंकि उसकी समस्त चेष्टाओंसे यह स्पष्ट प्रतीत होता था ॥६०|| तुम बड़ी चतुर और समयकी गतिको जाननेवाली हो इसलिए हम दोनों संतप्त स्त्री-पुरुपोंको एकान्तमें मिला दो क्योंकि संतप्त वस्तु दूसरी संतप्त वस्तुके साथ सुखसे मिलाई जा सकती है ।।१॥ इस प्रकार वनमालाके अभिप्रायको सूचित करनेवाले उन वचनोंको सुनकर दूती बहुत प्रसन्न हुई और निम्नाङ्कित वचन कहने लगी ॥२॥ उसने कहा कि हे वेटी ! तेरे रूपसे जिसका चित्त हरा गया है ऐसे वत्स देशके स्वामी राजा सुमुखने ही मुझे भेजा है अतः चल मैं शीघ्र ही तुझे उसके साथ मिलाये देती हूँ ॥३॥ इसप्रकार अपने मनोरथके अनुकूल बात होनेपर कामसे पीड़ित वनमाला, पतिकी अनुपस्थितिमें दूतीके साथ शीघ्र ही राजभवन में प्रविष्ट हो गई ॥६४॥ राजा मुमुख, मनको चुरानेवाली सुमुखीको देखकर बहुत सुखी हुआ और हर्पसे 'आइए, आइए' इस प्रकारके प्रिय वचन कहकर उसे सुखी करने लगा ॥६॥ जिसके स्तनोंका स्पर्श किया गया था ऐसी कृशाङ्गी वनमालाको तरुण सुमुखने अपने स्वेद युक्त हाथसे उसका स्वेद युक्त हाथ पकड़कर अपनी शय्यापर बैठा लिया ॥६६|| उसी समय रात्रि रूपी स्त्रीके मुखको प्रसन्न करता हुआ (पक्षमें रात्रिके प्रारम्भको प्रकाशमान करता हुआ) चन्द्रमा उदित हुआ सो ऐसा जान पड़ता था मानो वह प्रौढ यौवनसे युक्त राजा सुमुख और वनमालाके समागमका अनुकरण करनेके लिए ही उदित हुआ था ॥६७॥ जिस प्रकार राजा सुमुखके कर स्पर्श ( हाथके स्पर्श) से सुन्दरी वनमाला प्रसन्न हो रही थी उसी प्रकार चन्द्रमाके करस्पर्श (किरणोके स्पर्श) से कुमुदिनी शीघ्र ही प्रसन्न हो उठी-खिल उठी ॥८॥ राजा सुमुख और वनमालाने उत्तर- प्रत्युत्तरसे सहित तथा स्त्री-पुरुषोके गुणोंसे संगत बहुतसे भाव किये-नाना प्रकारको शृङ्गार चेष्टाएँ की || विश्वासकी अधिकतासे नूतन समागमके समय होनेवाला जिसका भय दूर छूट गया था ऐसी वनमालाको राजा सुमुखने गोदमें उठा लिया और अपने शरीरसे लगाकर उसका गाढ़ आलिङ्गन किया ॥१००॥ तदनन्तर कामसे उत्तप्त दोनों स्त्री-पुरुषांने, वीच-बीच में आलिङ्गन छोड़ देनेसे जिनमें आलिगन जन्य थकावट दूर हो जाती थी ऐसे भुजाओंके गाढ़ १ रतनारटुता ता ग०, ड. । हस्तस्तनानुलुप्तां ता म० । स्वेदिनि हस्ते स्तनयोध अनुलुप्तां कृतस्पर्धा (ख० टि०) । २ मुक्तार्या म० । ३. सुखितश्रमः म ।

२२८ हरिवंशपुराणे नितम्बास्फालनैरङ्गप्रत्यास्पर्शनैमिथः । मिथुनं मन्मथोद्दीप्तं चिक्रोड विविधक्रियम् ।।१०२॥ यथासत्त्वं यथाभावं यथावेदाध्ययमङ्गना । पुंसः मुसाय तस्याऽसौ बभूव सुरतोत्सरे ॥१०३।। श्रमप्रस्चिन्नसर्वाङ्गी कृतसवाहनौ मिथः । नागाविव कृताश्लेपौ शयने शयितायुभौ ।।१०४॥ घंशस्थवृत्तम् प्रकृष्टवै , यहतास्मनोस्तयोः प्रसुप्तयोः प्रेमनिबद्धचिच्योः । प्रवृत्तवृत्तान्तमिव प्रवेदितुं प्रभातसम्भ्यां व्यसृजत्नभाकरः ॥१०५॥ सहेन्दुना बन्धुरयाऽप्रसन्ध्ययो मुरञ्जिता द्यौरभजत्परां द्युतिम् । सुचित्त त्या सुमुसेन सन्मुखी वधूरिवाऽसौ वनमालिका नवा ॥१०६॥ नृप शयान सुमुसं विभाकरः सरोरुहश्रीवनमालया सह । महोदयाद्रिस्थित एव च द्रुतो व्यबोधयश्लोकमिमं यथा जिनः ॥१०७॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतौ सुमुखरनमालावर्णनो नाम चतुर्दशः सर्गः ॥१४॥ आलिङ्गनसे, चुम्बनसे, चूषणसे, दशनसे, कण्ठ ग्रहणसे, केश ग्रहणसे, नितम्बारफाल नसे और अङ्ग-प्रत्यागके स्पर्शसे परस्पर नाना प्रकारकी क्रीड़ा की ॥१०१-१०२॥ वनमालामें जैसा उत्साह था, जैसा भाव था, और जैसा चातुर्य था उन सबके अनुसार वह संभोगोत्सबके समय राजा सुमुखके मुखके लिए हुई थो-उसने अपनी समस्त चेष्टाओंसे राजा सुमुखको सुखी किया था ॥१०॥ तदनन्तर थकावटसे जिनके सर्व शरीरमे पसीना आ गया था और जो परस्पर एक दूसरेका संमर्दन कर रहे थे ऐसे वे दोनों, हस्ती-हस्तिनियों के समान आलिङ्गनकर शय्यापर सो गये ॥१०४॥ तदनन्तर अत्यधिक चातुर्यसे जिनकी आत्मा हरी गई थी, और चित्त प्रेमरूपी बन्धनसे बद्ध थे ऐसे गाढ़ निद्रामे निमग्न सुमुख और वनमालाका क्या हाल है ? यह जानने के लिए ही मानो सूर्यने प्रभात सन्ध्याको भेजा। भावार्थ-आकाशमें प्रातःकालको लालिमा छा गई ॥१०५।। उस समय चन्द्रमाके साथ-साथ सुन्दर प्रभात सन्ध्यासे अनुरञ्जित (रक्तवर्ण की हुई ) द्यावा (आकाशरूपी स्त्री) राजा सुमुख द्वारा उत्तम मनोवृत्तिसे अनुरब्जित (प्रसन्न की हुई ) सुवदना नव-वधू वनमालाके समान सुशोभित हो रही थी ॥१०६। जिस प्रकार जिनेन्द्र भगवान् समवसरणमे सिंहासनारूढ़ हो इस समस्त लोकको प्रबुद्ध करते हैं उसी प्रकार आगत सूर्यने उदयाचलपर स्थित होकर कमलोंके समान सुशोभित वनमालाके साथ सोते हुए राजा सुमुखको प्रबुद्ध किया-जगाया ॥१८७॥ इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराण के सपहसे सहित जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें सुमुख और वनमालाका वर्णन करनेवाला चौदहवा सर्ग समाप्त हुआ। १ सन्ध्या म०।२. सन्धया म०1 पञ्चदशः सर्गः मस्ता तदा। rum द्रुतविलम्बितवृत्तम् अथ विनुद्धसरोजवनस्पृशा मुरमिणा स्पृशता हृतवपुःश्रमकं मिथुनं मिथस्तदरोदुपगृढमतिश्लथम् ॥in मृदुतरनयने शयनस्थले मृदितपुष्पचये शयितीस्थितः । सह बभी प्रियया सुमुसो यया समदहमयुवा सिकतास्थले ॥२॥ विपहते स्म वियोगविष घणं विरहिणोरिव रात्रिषु पक्षियोः । प्रियवधूवरयोवरयोम्तयो हृदयं हृदयगमचेष्टयोः ॥३॥ न विसस ततः स्वपतेह स्वगृह एव सरोष वधू प्रभुः । रहमि दुर्लभमाप्य मनीपितं न हि विमुजति रघरमो जनः ॥४॥ मुमुग्वमुग्यवधूजनमुरयतां ममधिगम्य निजः सुगुग्वगुणः । वरवधूरतिगौरवमाप सा न मुलभं सुमुग्वे किमु मर्तरि ॥५॥ भवततार कदाचिदचिन्तितो निधिरिवोरुतपोनिविरचितः । नृपगृहं दरधर्ममुनिगृहानतिथिरेति हि भूरिशुमोदये ॥६॥ परमदर्शनशुद्धिविशुद्धधारधिम्बोधविबुद्धपदार्थकः । तसुगुप्तिममित्यतिशुद्धनामयचरित्रपरिनितविग्रहः ॥७॥ अथानन्तर खिले हुए कमल पनका स्पर्श करनेवाली सुगन्धित वायुने स्पर्श कर जिमा समस्त श्रम दूर कर दिया था ऐसे उस मिथुनने उम समय परस्सरका आलिङ्गन अत्यन्त ढीला कर दिया || जिसपर तग्गाके समान कोमल मिकुड्ने उठ रही थीं तथा जिसपर फूलोंका समूह मसला गया था ऐसी शय्यापर सोकर उठा मुमुख, प्रिया वनमालाके साथ उस तरह मुशोभित हो रहा था जिस तरह कि बालूके स्थलपर हमीके साथ मदोन्मत्त युया हम मुशी- भित होता है ॥२॥ जिस प्रकार रात्रिके समय बिछुड़नेवाले चकवा-चकवीका हृदय क्षण भरके लिर भी वियोगरूपी विषको सहन नहीं करता है उसी प्रकार मनोहर चेष्टाके धारक उन प्रिय वधूवरका हृदय क्षण भरके लिए भी वियोगरूपो विषको सहन नहीं करना चाहता था ॥३॥ इसलिए गजा मुमुग्रने वधू-वनमालाको उमके पतिके घर नहीं भेजा अपने ही घर रोक लिया सो टोक ही है क्योंकि दुर्लभ वन्नुको पाकर उसका रस प्राप्त करनेवाले उसे छोड़ते नहीं है ॥४॥ मुन्दरी वनमाला, अपने उत्तम गुणांसे गजा मुमुखको ममस्त मुग्य स्त्रियों में मुग्यताको पाकर परम गौरवको प्राप्त हुई थी सो ठीक ही है क्योकि भर्ताक अनुकूल रहनेपर कौन-सी पानु मुटभ नहीं ? ॥शा तदनन्तर किसी समय भचिन्तित निधिक समान ररकृष्ट तपके भाण्डार परधर्म नामके पूज्य मुनि गजा मुमुपके घर आये सो ठीक ही है क्योंकि अत्यधिक पुण्यका उदय होनेपर ही अनिधि घर आने हैं | उन मुनिकी बुद्धि उत्कृष्ट दर्शनविशुद्धिसे विशुद्ध थी, अधिक मानमे ये अनेक पदार्थीको जानते थे, मन गुप्ति और समिनिकी अतिशय शुद्धि रूपी धारिममे उनका शरीर पवित्र था, ये अनशन तथा स्वाध्याय आदि तपकी निर्मल लदमामे युधि थे भार घयल १ माना । २. दयामा मनोसा घेश पोनः । ३ अनुदले ।

हरिवंशपुराणे अनशनाध्ययनादितपःनिया धवलया प्रशमास्तविकारया । जनितगौरवया शुचिभूपितो विपुलनिर्जरया जरया यथा ॥८॥ विजितदोपकपायपरीपहं मुनिगृहीतजितेन्द्रियवृत्तकम् । यतिवृष' सुमुखः स्वगृहागतं तमभिवीक्ष्य नृपः सहसोस्थितः ॥३॥ प्रमदभारवशीकृतमानसस्तमभिगत्य परोक्ष्य वधू युतः । सविनयं प्रतिगृह्य शुचिः शुचिं शुचिनि साधुमधामणिकुटिमे ॥१०॥ प्रियवर्धकरधारितसत्कनस्कनककरिकोजलधारया । व्यपगतासुकया वरभूभृता स्वकरधौतमकारि मुनेः पदम् ॥११॥ सुरभिगन्धशुभाततपुष्पसत्यकरदीपकधूपपुरःसरैः । समभिपूज्य वचस्तनुचेतसा तमभिवन्द्य सुदानमदान्मुदा ॥१२॥ समगुणात्परिणामविशेषतः परभवे सहभोगफलोदयम् । सुमनसा सुमुखो वनमालया सह बबन्ध सुपुण्यमपुण्यभित् ॥१३॥ बहुदिनानशनवतधारणः कृशतनुस्थितये कृतपारणः । विहितदातृसुखोदयकारणः स मुनिरेपटुतत्वविचारणः ॥१४॥ घजति नित्यसुखे सुमुखेशिनः शममनेहसि पुण्यफलाशिनः । परयुव-यपहारदुरीहित प्रतिकृतानुशयस्य हताहितम् ॥१५|| मणिगणच्छविविच्छुरितोदरे सुरभिगर्भगृहे विहितादरे । सह कदाचिदसौ गुणमाल्या दयितया शयितो वनमालया ॥१६॥ अर्थात् सफेद (पक्षमें उज्ज्वल ) समस्त विकारोंसे रहित एवं गौरवको उत्पन्न करनेवाली वृद्धा. वस्थाके समान कर्माकी विपुल निर्जरासे सुशोभित थे ।।७-८॥ जिन्होने दोप कपाय और परिपह-" को जीत लिया था एवं इन्द्रियोंकी वृत्तिको अच्छी तरह रोककर परास्त कर दिया था ऐसे अपने घर आये हुए उत्तम मुनिराजको देखकर राजा मुमुख सहसा उठकर खड़ा हो गया ॥६॥ आनन्दके भारसे जिसका हृदय विवश था ऐसे उज्ज्वल परिणामोंके धारक राजा सुमुखने स्त्रीके साथ आगे जाकर पहले तो उन पवित्र मुनिराजको प्रदक्षिणा दी फिर विनय सहित पड़गाह कर उन्हें रत्नमय पवित्र फर्शपर विराजमान किया ॥१०॥ तदनन्तर प्रिय स्त्रोके द्वारा हाथमे धारण की हुई सुवर्णमय झारीकी प्रासुक जलधारासे राजाने मुनिराजके चरण धोये॥११॥ फिर सुगन्धित चन्दन, शुभ अक्षत, नैवेद्य, दीप, धूप आदि अष्टद्रव्यसे पूजा कर मन, वचन, कायसे उन्हें नम- स्कार किया । तदनन्तर हर्ष-पूर्वक दान दिया॥१२॥ उस समय राजा सुमुख और वनमालाके परि- णाम एक समान थे इसलिए दोनोने ही परभवमे एक साथ भोग-रूपी फलको देनेयाला पापाप- हारी उत्तम पुण्य बन्ध किया ॥१३॥ जिन्होने अनेक दिनका उपवास रूपी व्रत धारण किया था, जो दाताओके लिए सुख प्राप्तिका कारण जुटानेवाले थे और जो तत्त्वके विचार करने में अतिशय निपुण थे ऐसे मुनिराज अपने कृश शरीरको स्थिरताके लिए पारणा कर वनको चले गये ॥१४॥ तदनन्तर जो पुण्यका फल भोग रहा था और परस्त्रीके अपहरणसे उत्पन्न पापके प्रति जो निरन्तर पश्चात्ताप करता रहता था ऐसे राजा सुमुखका काल जब अहितोंको नष्ट कर निरन्तर मुखसे बीत रहा था तब वह किसी समय गुणोकी माला स्वरूप वनमाला नोके साथ सुगन्धित १ यतिश्रेष्ठम् । २. झारी । ३ प्रामुक्या । व्यपगताशुरुया (१)म०। ४. कृततनु-म० । ५. सममनेहसि क०, ख, ग, घ०, म०१६ वरयुनत्य ४०। ७. प्रतिकृतः अनुशयः पश्चात्तापी येन स तस्य ।

पञ्चदशः सर्गः अथ तयोः परिपाकमुपेयुपि प्रगुणमानसयोः प्रगुणायुपि । अधिपपात हि कालनियोगतो 'जलदकालसमागतचजला ॥१७॥ अशनिपातसहोमितजीविती परमदानफलोदयसैविती। सुविजयादगिराविह ताविती विपुलरोचरतां मुखभावितौ ॥१८॥ उभयकोटितटीघटितोदविधवलताधरितेन्दुपयोदधिः । स्फुरितरानतमूर्तिरसौ यतः पितिवधूपृथुहार इवायतः ॥१६॥ वियदतीन्य भुवो दशयोजनों स्वजगतीद्वितयांशयुगेन सः । जगति भोगभुवोऽभिनवा यथा वहति सेचरराजपुरीगिरिः ॥२०॥ 'सुभृतमारतभूरिगिरीशते स्थिरदशोत्तररम्यपुरीशते । उदितपञ्चविशतियोजने वितततद्विगुणे मुग्वयोजने ॥२१॥ पुरमिहोत्तरमस्ति मुखचम तरुवनानुकृनोरुकुरुक्ष्मम् । हरिपुरं विदितं तदभिरयया हरिपुरप्रतिमं यदभिरयया ॥२२॥ अभवदस्य पुरस्य तु गोपिता पवनपूर्वगिरिः खचरः पिता । सुमुखराजचरस्य मृगावती गुणवती जननी हि कलावती ॥२३॥ अमृत चार्थवतीमभिधामयं प्रकटमार्य इतीह सुधामयम् । वचनमार्यजनप्रमदाबह स्मरणमन्यभवप्रमदावहम् ॥२४॥ गर्भगृहमें सोया था। उस गर्भगृहका मध्य भाग मणिसमूहकी कान्तिसे व्याप्त था तथा आदरको प्रदान करनेवाला था॥१५-१६॥ उमी समय जिनके मन एक दूसरेके आधीन थे ऐसे उन दोनोंकी श्रेष्ठ आयु समाप्त होनेको आई इसलिए उनके ऊपर वर्पाकालकी बिजली आ गिरी ॥१७॥ बिजली गिरनेसे जिनके प्राण एक ही साथ छूटे थे, तथा जो उत्तम दानके फलको प्राप्त थे ऐसे दोनों दम्पती सुखसे मरणकर विजयाध पर्वतपर विद्याधर-विद्याधरी हुए ॥१८॥ वह विजया पर्वत, अपनी पूर्व पश्चिम-दोनों कोटियोसे समुद्रका स्पर्श करता है, उसने अपनी सफेदीसे चन्द्रमा और क्षीर समुद्रको जीत लिया है, वह चाँदीके समान देदीप्यमान मूर्तिका धारक है और पृथिवी रूपी स्त्रीके बड़े भारी हारके समान लम्बा है ॥१|| वह विजयाध पर्वत पृथिवीसे दश योजन ऊपर चलकर अपनी दो श्रेणियोके द्वारा विद्याधर राजाओंकी उन नगरियोंको धारण करता है जो संसारमें नूतन भोगभूमियोंके समान जान पड़ती हैं ॥२०॥ यह पर्वत भरत क्षेत्रके समस्त पर्वतोंके स्वामित्वको धारण करता है, इसपर एकसौ दश सुन्दर नगरियाँ स्थित हैं, यह पच्चीस योजन ऊँचा, पचास योजन चौड़ा तथा सुखको उत्पन्न करनेवाला है ॥२१॥ इसी पर्वतकी उत्तर श्रेणीपर एक हरिपुर नामका नगर है जो सब प्रकारके सुस देने में समर्थ है, नाना प्रकार के वृत्तोंके वनसे उत्तरकुरुकी पृथिवीका अनुकरण करता है और शोभामें इन्द्रपुरीके समान जान पड़ता है ॥२२॥ इस नगरका रक्षक पवनगिरि विद्याधर था। वही राजा सुमुसके जीव का पिता था तथा इसकी अनेक कलाओं और गुणोमें निपुण मृगावती नामको स्त्री थी वहीं सुमुसके जीवकी मासा थी ॥२३॥ यहाँ सुमुखका जीव, 'आर्य' इस सार्थक नामको धारण करता था। धीरे-धीरे वह आर्यजनोंको आनन्द उत्पन्न करनेवाले अमृतमय वचन बोलने लगा तथा उसे अपनी पूर्व भयको स्त्रीका स्मरण हो आया ।।२४|| १ क्षणरुचिः सहसा समयोगतः घ०, इ.। २. मुभृता भारतभूरिगिरीणामीराता येन स तस्मिन् । ३ पञ्चाशद्योजन विष्कम्भे । ४ चिनिहिताखिलचाक्षगणश्रमं ख०, ग०, १०, म. अन यः पाठः स्वीकृतस्तस्य है. पुस्तकस्य टिप्पण्या समुल्लेतः कृतः । विनिहिताग्विलवादगणश्रम क। ५. शोमया । ६. रक्षकः। ७ सचराधिपः घ.1 २३२ हरिवंशपुराणे पुरमथोत्तरदिग्जगतीमितं भवति तत्र गिरी विभवामितम् । यदिह मेघपुरं परमं परां वहति सन्मगिसोधपरम्पराम ॥२५॥ अधिवसत्यथ तद्दमनो हरी रिपुमदेभकुलस्य मनोहरी । रतिषु यस्य मनोहरति प्रिया पवनवेगखगस्य रतिप्रिया ॥२६॥ भजनि साथ तयोर्दुहिता सती सहचरी सुमुखस्य हिता सती । विदितपूर्वभवाऽत्र मनोरमा जगति चन्द्रकलेव मनोरमा ॥२७॥ कुलमुवाह विवाहविधोचित शुचि यथैव तथाकृतभावितम् । शिशुसमागममाशु विधिः स्वयं कृतिषु यद् यतते सकलास्वयम् ॥२८॥ मिथुनमर्भकयोः सुखलालितं निजनिषङ्गकृताक्षिनिमीलितम् । स्मितमुख सुमुख वचनाध्वनि स्वजनतोपमपोपयदुद्ध्वनि ॥२॥ स्वजननीस्तनपानकृताशनं निजरुचोपमितार्कहुताशनम् । भजति भोगभुवा शिशुभावनां विजयिनां मिथुन स्म सुभावनाम् ॥३०॥ स्वतनुवृद्धिमतश्च शनैः शनैः सह कलाभिरिदं च दिने दिने । शशिवपुर्यदियाय यथा यथा स्वजनमुज्जलधिश्च तथा तथा ॥३१॥ निखिलखेचरसाधितविद्यया मिथुनमेतदभाद् भवविद्यधा। ललितयोवनभाररुचा तथा जनमनोऽन्यहरद् गुणयातया ॥३२॥ इसी विजया पर्वतकी उत्तर श्रेणी में एक मेघपुर नामका उत्तम नगर है जो अपरिमित वैभवसे युक्त है तथा मणिमयी उत्तम महलोंकी पंक्तिको धारण करता है ।।२शा उस मेघपुर नगरका राजा परनवेग था। पवनवेग शत्रुरूपी मदोन्मत्त हाथियोंको नष्ट करनेके लिए सिंह के समान था । इसकी स्त्री मनोहरी थी। मनोहरी रतिकाल में पतिके मनको हरण करती थी इसलिए - वह पवनवेगको गतिके समान प्यारी थी ॥२६॥ राजा सुमुखको जो वनमाला नामकी हित- कारिणी उत्तम स्त्री थी वह इन्हीं दोनोंके मनोरमा नामकी उत्तम पुत्री हुई। मनोरमा अपने पूर्वभवको जानती थी और संसारमै चन्द्रकलाके समान मनको आनन्दित करती थी ॥२७॥ उन दोनोने जैसी पहले भावना की थी उसीके अनुसार विवाहके योग्य पवित्र कुल प्राप्त किया और पन दोनोका विधाता सदा समस्त कार्यों में स्वयं ऐसा ही प्रयत्न करता था कि जिससे उन दोनो शिशुओंका शीघ्र ही समागम हो जाय ॥२८। उन दोनो बालक-बालिकाओका अपने-अपने पर सुखपूर्वक पालन होता था, वे अपनी हथेलियोंसे कभी अपनी आँस बन्द कर लेते थे, कभी मन्द हास्य करते थे, कभी वचन बोलनेमे तत्पर होते थे, और कभी किलकारियों भरते हुए अपने कुटुम्धीजनोके हर्षको बढ़ाते थे ॥२६|| और अपनी-अपनी कान्तिसे जो सूर्य तथा अग्निकी उपमा धारण कर रहे थे ऐसे उन दोनों बालिका-बालिकाओंका युगल भोगभूमियाँ बालकांकी विजययुक्त उत्तम भावनाको प्राप्त हो रहा था अर्थात वे भोग-भूमियाँ बालकोके समान सुशोभित होरहे थे॥३०॥ चन्द्रमाके समान शरीरको धारण करनेवाला यह युगल प्रतिदिन कलाओके साथ जिस प्रकार धीरे-धीरे शरीरको वृद्धिको प्राप्त होता जाता था उसी प्रकार उनके कुटुम्पीजनोंका आनन्दरूपी मागर भी पृद्धिको प्राम होता जाता था ॥३१॥ संसारको जाननेवाला यह युगल, जिस प्रकार ममस्त विद्याधराफी सिद्ध की हुई विद्याभासे सुशोभित हो रहा था उसी प्रकार अंक गुणांके साथ प्राप्त हुई सुन्दर योवनको शोभामे लोगोफे मनको हरण कर रहा था ॥३२॥ १ मनोग म०१२. वियोनितमारिन म । ३ सजनांदधिः । 'जनमनो मुदितं च तथा तयार ४ गरशेता, यथा । ५ गुणान् याता तशा ।

पञ्चदशः सर्गः २३३ अथ तया स खगेन्द्रयुवाऽन्यदा कमलयेव च खेचरकन्यया। परमभृतिविवाहविधानतः सममयोजि' निजैजनतानतः ॥३३॥ अनुबभूव सुसं चिरमेतया मदनमावविलाससमेतया। सुरतनाटकभूमिविनीतया मदननत्तकसूरिविनीतया ॥३४॥ सुरवधूवरसुन्दरकन्दरे परमवरलमया सह मन्दरे । सुरभिदेवतरूपतचन्दने चिरमरंस्त तया सह नन्दने ॥३५॥ स कुलशैलसर सरितां तया सह तटेषु सरागमतान्तया । रतिमवाप कदाचन कान्तया तरुषु भोगभुवामपि कान्तया ॥३६॥ स्थितिमितं विजयादगिरी पुरे रणितदिग्यवधूपदनूपुरे । भुवि यदन्यसुदुर्लभमर्थितं भजति तत्तदयत्नसमर्पितम् ॥३७॥ भय स वीरक ईश्वरवचितः प्रियतमाविरहानशिवं चितः । कचिदियाय शुचा मृदुपालवे शिशिरतत्पतटेऽस्तविपल्लवे ॥३८॥ न समशीशमदस्य शशी करैः हृदयदाहममा हिमशीकरैः। निशि सदा विहगस्य वियोगिनः ससरसोऽपि यथा भुवि योगिनः ॥३६॥ स विनिगृह्य चिराद्विरहच्या रतिरहस्यगृहाश्रममाश्रमम् । जिननिदेशितमासृतवान् घशी स हि परं शरण शरणार्थिनाम् ॥१०॥ तदनन्तर जनसमूहके द्वारा नमस्कृत उस विद्याधर युवाको, उसके कुटुम्बीजनोंने वैभव पूर्ण विवाहकी विधिसे लक्ष्मीको तुलना करनेवाली विद्याधर-कन्या मनोरमाके साथ युक्त किया ॥३३॥ विवाहके बाद कुमार आर्य, कामजनित हाव-भावोंसे सहित कामदेवरूपी नर्तका. चार्यके द्वारा शिक्षित एवं सुरतरूपी नाटककी रङ्गभूमिमें लाई हुई इस मनोरमाके साथ सुखंका उपभोग करने लगा ॥३४॥ कभी वह देव दम्पतियोंसे सुन्दर कन्दराओंसे युक्त मन्दर गिरिपर इस परम वल्लभाके साथ क्रीड़ा करता था तो कभी सुगन्धित देवदारु और चन्दनके ऊँचे-ऊँचे वृत्तांसे मुशोभित नन्दन वनमें इसके साथ चिरकाल तक क्रीड़ा करता रहता था ॥३५॥ कभी वह कुलाचलोंके पद्म भादि सरवरों और गङ्गा आदि महानदियोंके तटॉपर तथा कभी भोगभूमिके वृत्तोंके नीचे सेदरहित सुन्दरी वल्लभाके साथ राग-सहित रति-क्रीडाको प्राप्त होता था ॥३६॥ इस प्रकार विजया पर्वतपर रहनेवाला वह युगल, दिव्य स्त्रियों के पदनुपुरॉकी मनकारसे युक्त अपने नगरमें उस मुसका उपभोग करता था जो पृथिवीपर दूसरे मनुष्यों के लिए इच्छा करनेपर भी दुर्लभ था और उसे बिना ही प्रयलके प्राप्त था ॥३७॥ अथानन्तर-राजा सुमुसके द्वारा ठगा हुआ वीरक सेठ, प्रियतमा-वनमालाके विरहमें शोकके कारण कहीं भी हृदयको शान्तिको प्राप्त नहीं होता था। यहाँतक कि जिसपर विपत्तिका एक अंश भी नहीं था ऐसे फोमल-पल्लवोंसे रची हुई शीतल शप्यापर भी उसे सुप प्राप्त नहीं होता था ॥३८॥ यह विरह-ज्वाला शान्त करनेके लिए रात्रिके समय म्बुली चाँदनीमें सरोवरफे तटपर जा बैठता था पर वहाँपर भी चन्द्रमा वर्फके कणोंके साथ-साथ अपनी किरणोंसे नसके हृदयकी दाहको शान्त नहीं कर पाता था । वह विरही चक्रवाक पक्षीके समान सदा विरहकी दाहमें मुलसना ही रहता था ॥३६॥ तदनन्तर उस चौरकने चिरफाल याद विरहको व्ययाको १. नृपतिना समयोजि विधानतः १०। २. सरागम् अतान्तया इति च्छेदः। अतान्तया - अधान्तया इति घपुस्तके टिप्पणम् । ३ वठदयत्नसमर्पितम् १०। ५ न्नसिरचितः मा, चितो हृदयस्य शिव मुख न पाय । ५. नियोगिनः म । ६. मुमरसोमि । सरोरमस्तिस्यापि । ७ •माभितवान् म ।

२३४ हरिवंशपुराणे अतिवितप्य तपस्तनुशोपणं विषयलुब्धमनोभवपेपणम् । आगमदेशसुखाम्बुधिपोपणं प्रथमक्पमयामरतोपणम् ॥३॥ सुरवधूनिवहादिपरिग्रहः सकलभूपणभूषितविग्रहः । सुरसुखामृतसागरसङ्गतः सममतिष्टत भावरसं गतः ॥४२॥ दिवि कदाचिदसौ वरकामिन निवदमध्यगतोऽवविगोचरम् । समनयद्वनिता वनमालिका परिचितः प्रणयः खल दुस्यजः ॥४३॥ सुमुखराजकृतं च पराभवं स परिचिन्त्य सुरस्तदनन्तरम् । विपमितोन्मिपितावधिचक्षुषा मिथुनमैरत सेचरयोस्तयोः ॥४४॥ प्रभुतया प्रविधाय पराभवं परभवे हृतवांश्च मम प्रियाम् । इह भवेऽपि तयैव सहेचयते रतिमितः स परां सुमुखः खलः ॥४५॥ कृतवतोऽपकृति विपमा द्विपो द्विगुणिता यदि सान विधीयते । प्रभुतया किमनधिक्या प्रभोः प्रभवतोऽपि निरुद्यमचेतसः॥४॥ इति विचिन्त्य रुपा कलुपीकृतः प्रतिविधानकृती कृतनिश्चयः । भुवमवातरदाशु स वैराखिदिवतो दिवसाधिपभास्वरः ॥१७॥ स खलु खेचरराजसुतं सुरः सुमुखराजचर खचरीसखम् । प्रविलसन्तमवाप यहच्छ्या सुहरिवपंगतं हरिविभ्रमम् ॥४८॥ रोककर रति रूप रहस्यसे युक्त गृहस्थाश्रमको छोड़ दिया और जितेन्द्रिय हो जिनेन्द्र भगवान के द्वारा प्रदर्शित आश्रमकी शरण ली अर्थात् दैगम्बरी दीक्षा धारण कर ली, सो ठीक ही है क्योंकि शरणकी इच्छा करनेवाले मनुष्योंके लिए वह ही सर्वोत्तम शरण है ॥४०॥ दीक्षा लेकर उसने शरीरको सुखा देनेवाला एवं विषयके लोभी कामदेवको पोस देनेवाला कठिन तपे किया जिसके फलस्वरूप यह सुखरूपी सागरको पुष्ट करनेवाले एवं देवोंके संतोपदायक प्रथम स्वर्गको प्राप्त हुआ ॥४१॥ वहाँ देवागनाओके समूहको आदि लेकर अनेक प्रकारका परिग्रह जिसे प्राप्त था, सब प्रकारके आभूषणोसे जिसका शरीर सुशोभित था और जो देवोंके सुखरूपी अमृतके सागरम निमग्न था ऐसा वह देव अनेक भावों और रसोंको प्राप्त होता हुआ वहाँ सुखसे रहने लगा ॥४२॥ कदाचित् वह देव स्वर्गमें उत्तमोत्तम स्त्रियोंके बीच बैठा था कि उसने अचानक ही अपनी पूर्वभवकी स्त्री वनमालाको अवधिज्ञानका विषय बनाया अर्थात् अवधिज्ञानके द्वारा उसका विचार किया सो ठीक ही है क्योंकि परिचित-अनुभूत स्नेह बड़ी कठिनाईसे छूटता है ॥४३॥ विचार करते ही उसे सुमुख राजाके द्वारा किया हुआ पराभव स्मृत हो गया। तदनन्तर एकबार निमीलित कर उसने अवधिज्ञानरूपी नेत्रको पुनः खोला तो विद्याधर और विद्याधरीका वह युगल सामने दिखने लगा ॥४४॥ वह विचार करने लगा कि देखो जिस दुष्ट सुमुखने पूर्वभवमें प्रभुतावश तिरस्कार कर हमारी स्वीका हरण किया था वह इस भवमें भी उसी स्त्रीके साथ परम रतिको प्राप्त हुआ दिखाई दे रहा है ॥४॥ यदि विषम अपकार करनेवाले शत्रुका दूना अपकार नहीं किया तो समर्थ होनेपर भी निरुद्यम चित्तके धारक प्रभुकी निरर्थक प्रभुतासे क्या लाभ है ? ॥४६॥ ऐसा विचारकर क्रोधसे जिसका चित्त कलुपित हो रहा था, तथा बदला लेनेका जिसने दृढ़ निश्चय कर लिया था ऐसा वह सूर्यके समान देदीप्यमान देव पूर्व चैरको बुद्धिमें रख शीघ्र ही स्वर्गसे पृथिवीपर उतरा ॥४७॥ उस समय राजा सुमुखका जीव आर्य नामका विद्याधर, अपनी विद्याधरीके साथ हरिवर्ष क्षेत्रमें इच्छानुसार क्रीड़ा करता हुआ इन्द्रके समान सुशोभित १. चतुपः म० । २. हतवाश्चम०।

पञ्चदशः सर्गः २३५ तदवलोक्य सुरो मिथुनं वरं प्रथमयौवननिर्भर विग्रहम् । अकृत खण्डितविद्यमखण्डया सहजखण्डतया सुरमायया ।।४६॥ परवधूप्रिय वीरकवैरिणं स्मरसि किं सुमुख प्रमुखाधुना । स्वमपि कि सुखले वनमालिके! स्खलितशीलमरे ! परजन्मनि ॥५०॥ अहमसौ तपसा सुरतामितः खचरतां मुनिदानफलाद् युवाम् । अरतिमेव ममारतिदायिनोः तपितविद्यकयोः प्रददामि वाम् ॥५॥ इति निगद्य तदा विबुधः खगौ चकितकम्पितचित्तशरीरको । गरुडवत्परिगृह्य खमुद्ययौ मरतवपंवर प्रति दक्षिणम् ॥५२॥ 'मृतवतामृतदीधितिकातिना रहितयाऽनृपया वरचम्पया। स तमयोजयदत्र महीपति प्रणतराजकमैच्च दिवं सुरः ॥५३॥ त्रिदशखण्डितविद्यकदम्पती पितपक्षशकुन्तवदतमी । वियति पर्यटितुं ग्रुटितेच्छको सह समीयतुरत्र ति चितौ ॥५४॥ नवतिकामुकपूर्वसुलवितस्थितिमतो दशमस्य मुनेरिदम् । समधिकाब्धिशतोन्मितकोटिके वहति तीर्थपथेऽकथि वृत्तकम् ॥५५॥ स बुभुजे भुजदण्डवशीकृतप्रणतपार्थिवमानितशासनः । विषयसोरयमखण्डितरागा सुचिरकालमतृहमतिस्तया ॥५६॥ अथ तयोस्तनयो हरिरित्यभूदरिरिव प्रथितः पृथिवीपतिः । समनुभूय सुतश्रियमूर्जितां स्वचरितोचितलोकमिती च ती ॥५७॥ हो रहा था सो उस देवने उसे प्राप्त किया ॥४८॥ नव यौवनसे जिसका शरीर भरा हुआ था ऐसे उस विद्याधर दम्पतीको देसकर देवने अपनी स्वाभाविक अखण्ड मायासे उसे खण्डितविद्य कर दिया अर्थात् उसकी विद्याएँ हर ली ॥४६॥ और क्रुद्ध होकर उससे कहा कि अरे ! पर-स्त्रीको हरनेवाले प्रमुख सुमुख ! क्या तुझे इस समय अपने वीरक वैरीका म्मरण है और परजन्मसे शीलवतको खण्डित करनेवाली दुष्ट वनमाला ! तुझे भी वीरककी याद है ? ॥५०॥ मैं तपकर देव हुआ हूँ और तुम दोनों मुनिदानके फलसे विद्याधर हुए हो। तुम दोनोंने पूर्वभवमें मुझे दुःख दिया था इसलिए मैं भी तुम्हारी विद्याएँ नष्टकर तुम्हें दुःख देता हूँ ॥५१।। इस प्रकार कह- कर वह देव, जिस प्रकार पक्षियोंको गरुड़ उठा ले जाता है उसी प्रकार आश्चर्यसे चकित चित्त एवं भयसे कम्पित शरीरको धारण करनेवाले दोनों-विद्याधर और विद्याधरीको उठाकर दक्षिण भरत क्षेत्रकी ओर आकाशमे उड़ गया ॥५२॥ उस समय चम्पापुरीका राजा'चन्द्रकीर्ति मर चुका था इसलिए वह राजासे रहित थी। वह देव आर्य विद्याधरको यहाँ ले आया और उसे चम्पापुरीका अनेक राजाओके द्वारा नमस्कृत राजा बनाकर स्वर्ग चला गया ॥५३॥ देव द्वारा जिनकी विद्याएँ खण्डित कर दी गई थीं ऐसे वे दोनों विद्याधर दम्पती, पक्ष कटे पक्षियोके समान आकाशमें चलनेको असमर्थ हो गये इसलिए उसको इच्छा छोड़ पृथिवीमें ही संवोपको प्राप्त हुए ॥५४॥ यह वृत्तान्त नवे धनुप ऊँचे शरीर और एक लाख पूर्वको स्थितिको धारण करने- वाले दशवें शीतलनाथ भगवान्के तीर्थमें हुआ था। उस समय उनका तीर्थ कुछ अधिक सौसागर कम एक करोड़ सागर प्रमाण चल रहा था ॥५|| राजा आयने अपने भुजदण्डसे समस्त राजाओंको वश कर नम्रीभूत एवं आज्ञाकारी बनाया और असण्डित प्रेमवाली मनोरमाके साथ चिरकाल तक विषय मुखका उपभोग किया फिर भी तृम नहीं हुआ ॥५६|| तदनन्तर उन दोनांके हरि नामका पुत्र हुआ जो इन्द्रके समान प्रसिद्ध राजा हुआ । राजा १ निर्जर म० । २. मृतेन चन्द्रकोर्तिना राज्ञा । ३. इन्द्रसहराः ।

हरिवंशपुराणे
हरिश्यं प्रभवः प्रथमोऽभवस्सुयशसो हरिवंशकुलोद्गतेः ।
जगति यस्य सुनामपरिग्रहाचरति भो हरिवंश इति श्रुतिः ॥५॥
अभवदस्य महागिरिराजो हिमगिरिस्तनयः सुनयस्ततः ।
वसुगिरिश्च ततो गिरिरित्यमी निदिवमोचयुजस्तु यथाययम् ॥५६।।
शतमखप्रतिमा शतशस्ततः सितिभृतो हरिवंशविशेषकाः ।
कमताधिकराज्यतपोधुराः शिवपदं ययुरत्र दिवं परे ॥६॥
व्यपगतेषु नृपेषु बहुवतः रितिपतिमंगधाधिपतिः क्रमात् ।
इह बभूव हरिप्रभवान्वये कुशलधामकुशामपुराधिपः ॥६॥
स हि सुमित्र इति श्रुतनामका श्रुतविशेपविभूपितपौरुपः ।
अनुशशास भुवं सह पद्मया नितसुखः प्रियया जिनभक्तया ॥२॥
इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती हरिवंशोत्पत्तिवर्णनो नाम पञ्चदशः सर्गः ।
आर्य और रानी मनोरमाने चिरकाल तक पुत्रकी विशाल लक्ष्मीका अनुभव किया तत्पश्चात दोनों
अपने अपने कर्मों के अनुसार परलोकको प्राप्त हुए ॥५७॥ यही राजा हरि, परम यशस्वी हरिवंश-
की उत्पत्तिका प्रथम कारण था । जगत्में इसीके नामसे हरिवंश इस नामकी प्रसिद्धि हुई ॥५॥
राजा हरिके महागिरि नामका पुत्र हुआ। महागिरिके उत्तम नीतिका पालक हिमगिरि पुत्र हुआ। .
हिमगिरिके वसुगिरि और वसुगिरिके गिरि नामका पुत्र हुआ। ये सभी यथायोग्य स्वर्ग और
मोक्षको प्राप्त हुए ।।५।। तदनन्तर हरिवंशके तिलक स्वरूप इन्द्रके समान सैकड़ों राजा हुए जो
क्रमसे विशाल राज्य और सपका भार धारण कर कुछ तो मोक्ष गये और कुछ स्वर्ग गये ॥३०॥
इस प्रकार क्रमसे बहुतसे राजाओंके होनेपर उसी हरिवंशमें मगध देशका स्वामी राजा सुमित्र
हुआ। वह कुशल-मङ्गलका स्थान तथा कुशाग्रपुर नगरका अधिपति था। उसका पराक्रम शास्त्रों के
विशिष्ट ज्ञानसे विभूषित था। वह अपनी जिनभक्त प्रिया पद्मावतीके साथ सुखका उपभोग
करता हुआ चिरकाल तक पृथिवीका शासन करता रहा ॥६१-६२॥
इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें
हरिवंशकी उत्पत्तिका वर्णन करनेवाला पन्द्रहवाँ सर्ग समाप्त हुभा ॥१५॥

षोडशः सर्गः यसन्ततिलकावृत्तम् श्रीशीतलादिह परेषु जिनेषु पश्चात् तीर्थ प्रवत्यं भरते जगतां हितार्थम् । कालक्रमेण नवसु श्रितवत्सु मोक्षं स्वर्गादिहैप्यति जिनाधिपतौ च विशे ॥१॥ शक्राज्ञया प्रतिदिनं वसुधारयोच्चैरापूरयस्यवनिपस्य गृहं कुरः । पद्मावती मृदुतले शयने शयाना स्वप्नान् ददर्श दश पट् च निशावसाने ॥२॥ नागोषसिंहकमलाकुसुमनगिन्दुवालामत्स्यकलशाब्जसरोप्रबुराशीन् । सिंहासनामरविमानफणीन्दगेहसदनराशिशिखिनो जिनसूरपश्यत् ॥३॥ सोपासिता नवनवस्युपमाव्यतीतदिव्यप्रमावदिगमिख्यकुमारिकाभिः । शय्यातले सकुसुमे शुशुभे विबुद्धा लेखा यथा नमसि तारकिता हिमांशोः ॥४॥ उग्निद्रपद्मनयनाननपाणिपादा सा रागिणी दिनमुखेऽधिपति सुमित्रम् । भद्रासनोदयगतं स्थलपमिनीव पद्मावती समुदियाय सपुण्डरीका ॥५॥ 'चिनाम्बराम्वुरमनाग्रणितातिम मीरसिञ्जितविहगनिनादरम्या। मीनेषणा शिवलिभगतरङ्गिणी सा स्त्रीवाहिनी समगमदु वरवाहिनीशम् ॥६॥ पीनस्तनस्तवकमारनतामयष्टिराताम्रपल्लवकरा मृदुबाहुशाखा । सञ्चारिणी मणिविभूषणमृन्महीशकल्पद्रुमं युवतिकल्पलता ननाम ॥७॥ अथानन्तर श्रीशीतलनाथ भगवान के पश्चात् जब कालक्रमसे नौ तीर्थङ्कर भरत क्षेत्रमै जगत्के जीवोंके हितार्थ धर्म तीर्थकी प्रवृत्ति कर मोक्ष चले गये और बीसवें तीर्थङ्कर स्वर्गसे अव- तार लेनेके सन्मुख हुए तब इन्द्रको आज्ञासे कुवेर प्रतिदिन राजा सुमित्रके घरको रत्नोंको उत्कृष्ट धारासे भरने लगा। कदाचित् कोमल शय्यापर शयन करनेवाली रानी पद्मावतीने रात्रिके अन्तिम समय १ गज, २ वृपभ, ३ सिंह, ४ लक्ष्मी, ५ पुष्पमाला, ६ चन्द्रमा, ७ बालसूर्य, ८ मत्स्य, ६ कलश, १० कमलसरोवर, ११ समुद्र, १२ सिंहासन, १३ देवविमान, १४ नागेन्द्रभवन, १५ रन- राशि और १६ अग्नि ये सोलह स्वप्न देखे ॥१-३॥ उपमा रहित एवं दिव्य प्रभावको धारण करनेवाली निन्यानवे दिक्कुमारी देवियों के द्वारा सेवित जिनमाता पद्मावती जब जागकर फूलों की शय्यापर बैठी तय ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो आकाशमें ताराओंसे घिरी हुई चन्द्रमाको लेखा ही हो ॥४॥ तदनन्तर जिसके नेत्र, मुख, हाथ और पैर फूले हुए कमलके समान थे, जो अनुरागसे युक्त थी, हर्पसे सहित थी और हाथमें सफेद कमल धारण कर रही थी ऐसी रानी पद्मावती प्रातःकालके समय ऊँचे सिंहासनपर विराजमान राजा सुमित्रके पास गई सो ऐसी जान पड़ती थी मानो अनेक कमलोंसे सुशोभित, लालिमा युक्त स्थल-कमलिनी ही उदयाचल- पर स्थित सुमित्र-सूर्यके पास जा रही हो ॥शा जो नाना प्रकारके वनरूपी जलसे युक्त थी, अत्यधिक रुन मुन करनेवाले अतिशय सुन्दर नूपुरोंकी मनकाररूपी पक्षियोंको कल-कल ध्वनि- से मनोहर यी, मछलियोंके समान नेत्रोंसे सहित थी और त्रिवलिरूपी तरहोंसे सुशोभित थी ऐसी वह स्त्रीरूपी नदी राजा सुमित्ररूपी समुद्रके पास गई यह उचित हो था ॥६॥ उस समय १. तीर्थङ्करजननी । २. मुमित्राख्यं नृपं, सूर्य च । ३. चित्राएयम्बराएयेवाम्नु यस्यां सा । ४. उत्तम- सेनाध्यदं पदे उत्तमनदीपतिम् ।

२३८ हरिवंशपुराणे आसीनयाऽऽसमवरे स तया समोपे स्वप्नावलीफलमिलाधिपतिः प्रपृष्टः । तस्य जगौ जिनपतेजगतां यस्य भत्गुरू लघु भवाव इति प्रहृष्टः ॥८॥ स्पृष्टा नृपोत्किरणमालिबचोमयूखैः सा तोपपोपभृशहृष्टतनूरुहाऽभात् । बैणं निकृष्टमपि तीर्थकृतो गुरुत्वात् मावा प्रशस्तमिति विस्तृतपमिनीव ॥६॥ भारात्सहस्रपदपूर्वपदादुदारादारानमत्सुरसहस्रगणोऽवतीर्य । मासानुवास नवगर्भगृहे प्रशुद्ध सार्धाष्टमी गणनान् (?)मुनिसुचतोऽस्याः ॥१०॥ भानीलचूचुकविपाण्डुपयोधरश्रीः सा यज्रसंहतिसगर्भतया स्फुरन्ती । विद्युत्प्रभामागचंहितभा वभासे वर्षाशसमयसमियुता यथा द्यौः ॥११॥ साऽसूत सूतिसमयेन्द्रमहे च माधपक्षेऽसिते जनमनोनयनोत्सवं तम् । द्वादश्य सिततिधौ श्रवणेऽश्रमेण स्त्रोद्यौरवद्यरहिता जिनपूर्णचन्द्रम् ॥१२॥ मणिमय आभूपोंको धारण करनेवाली रानी पद्मावती चलती-फिरती कल्पलताके समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार कल्पलता गुच्छोके भारसे नम्रीभूत होती है उसी प्रकार उसकी अद्यष्टि भी स्थूल स्तनरूपी गुच्छोंसे नम्रीभूत थी, जिस प्रकार कल्पलता लाल-लाल पल्लवोंसे युक्त होती है उसी प्रकार वह भी लाल लाल हथेलियोंसे युक्त थी और जिस प्रकार कल्पलता कोमल शाखाओंसे युक्त होती है उसी प्रकार वह भी कोमल भुजाओसे युक्त थी। इस प्रकार रानी पद्मावतीरूपी कल्पलताने राजा मुमित्ररूपी फल्पवृक्षको नमस्कार किया ॥७॥ पास ही में उत्तम आसनपर बैठी रानी पद्मावतीने जब राजासे स्वप्नावलीका फल पूछा तब उन्होंने हर्पित होते हुए कहा कि हम दोनों शीघ्र ही तीनों जगत्के स्वामी जिनेन्द्र भगवानके माता-पिता होंगे ॥ll इस प्रकार राजारूपी सूर्यको वचनरूपी किरणोंसे स्पर्शको प्राप्त हुई रानी पद्मावतीके शरीरमें हर्षातिरेकसे रोमाञ्च निकल आये और वह फूली हुई कमलिनीके समान सुशोभित होने लगी। वह पहले जिस स्त्रीपर्यायको निकृष्ट समझती थी उसे ही अब तीर्थङ्करको माता होनेके कारण श्रेष्ठ समझने लगी ।।६। जिन्हें हजारों देवोंके समूह दूरसे ही नमस्कार करते थे ऐसे भगवान् मुनिसुव्रतने सहस्रार नामक उत्कृष्ट स्वर्गसे भवतीण होकर माता पद्मावतीके विशुद्ध गर्भ-गृहम नी माह निवास किया ॥१०॥ उस समय माता पद्मावती, वर्षा और शरद् ऋतुके संधिकालसे युक्त आकाशके समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार वर्षा और शरदके संधिकालका आकाश कुछ काले भीर कुछ सफेद पयोधरों-मेघोसे युक्त होता है उसी प्रकार पद्मावती भी नीली चू चुकसे युक्त सफेद पयोधर्ग-स्तनों से युक्त थी। जिस प्रकार वर्मा और शरद्के संधि- काल का आकाश धनसमूह-यमके समूहसे गर्भित होने के कारण देदीप्यमान रहता है उसी प्रकार पद्मावती भी वनपभ संहननके धारक भगवान के गर्भ में स्थित होनेसे देदीप्यमान हो रही थी और जिस प्रकार वर्षा तथा शरद्के सन्धिकालका आकाश विद्युत्प्रभाभरणहितभा-बिजली फी प्रभाको धारण करनेसे कान्तियुक्त होता है उसी प्रकार माता पद्मावती भी विद्युत्मभामरण इंदितमा-बिजली के समान देदीप्यमान आभूपणांसे बढ़ी हुई कान्तिसे युक्त थी ॥११॥ तदनन्तर पाप (पक्ष में क्लंक) से रहित रानी पद्मायती रूप आकाशने प्रसूतिके योग्य समय आनेपर इन्द्रमह मत्सबके दिन माघ कृष्ण द्वादशीको शुभ तिथिमें जय कि श्रवण नक्षत्र धायिना किसी श्रमके, मनुष्यों के मन और नेत्रीको आनन्द देनेवाले जिनेन्द्ररूपी पूर्णचन्द्रको १ मावाणि। २ शीघ्रम् । ३. चनकिरणः । ४. माघांटमीत स. (1) सापारमा क... (1) दिनगरिमयमासान् (क.दि.)।५ मीदिए म ।

पोदशः सर्गः जातेन तेन शुभलक्षणचचिंतेन पद्मावती प्रमुदिता मुनिसुव्रतेन । सा रूढरागशिखिकण्ठरुचा चमासे स्निग्धेन्द्रनीलमणिनाकरभूरिवका ॥१३॥ भाकम्पितासनतिरीटजगत्त्रयेन्द्राः सद्यःप्रयुक्तविशदावधयोऽधिगम्य । चेलुः सुरा जिनसमुद्भवमद्भुतोच्चैघण्टामृगेट पटहशङ्खरवैश्व शेषाः ॥१४॥ गन्धाग्नुवर्षमृदुमारुतपुष्पवृष्टिसम्पूरिताखिलजगद्वलयाः समन्तात् । भागस्य चाशु मुकृतोज्ज्वलभूपवेशः शक्रादयः पुरुकुशाग्रपुरं परीयुः ॥१५॥ नस्वा जिनं जिनगुरू च सुरासुराश्च तनातकर्मणि कृते सुरकन्यकाभिः । ऐरावतं तमधिरोप्य महाविभूरया गरवा परीत्य गिरिराजमधित्यकायाम् ॥१६॥ संस्थाप्य पाण्डकशिलातलमस्तके तं सिंहासने सुपयसोद्धपयःपयोधेः । भूरयाभिषिच्य कृतभूपमभिष्टवस्ने स्तुत्वाऽभिधाय मुनिसुव्रतनामधेयम् ॥१७॥ भानीय नीतिकुशलाः जननीशुभामारोप्य नाटकविधि प्रविधाय देवाः । नत्वा ययुः शतमखप्रमुखा यथास्वमानन्दितत्रिभुवनं सगुरुं जिनं ते ॥१८॥ ज्ञानत्रयं सहजनेत्रमुदारनेत्रो विजिनः सुरकुमारकसेव्यमानः । कालानुरूपकृतसबकुबेरयोगक्षेमो ययावपघनस्य गुणस्य वृद्धिम् ॥१६॥ उत्पन्न किया।१२।। जिस प्रकार इन्द्रनीलमणिसे खानकी भूमि सुशोभित होती है, उसी प्रकार शुभ लक्षणों से युक्त एवं लाली सहित नीलकण्ठ-मयूरको कान्तिको धारण करनेवाले मुनिसुव्रत भगवानसे हर्पित पद्मावती सुशोभित हो रही थी। ॥१३॥ उस समय तीनों जगत्के इन्द्रौके आसन और मुकुट कम्पायमान हो गये थे जिससे तत्काल ही अवधिनानका प्रयोग कर उन्होंने जिनेन्द्र भगवान के जन्मका समाचार जान लिया था और शेप देवोने अत्यन्त आश्चर्य तथा जोरके साथ होनेवाली घंटाध्वनि, सिंहध्वनि, पटहध्वनि और शङ्खध्वनिसे जिनेन्द्र जन्मका निश्चय कर लिया था। इस प्रकार जिनेन्द्र भगवान्का जन्म जानकर समस्त इन्द्र और देव जन्मोत्सवके लिए चले ॥१४॥ सुगन्धित जल, मन्द वायु और पुष्पोंकी वर्षासे जिन्होंने समस्त जगत्को भर दिया था तथा जिन्होंने उत्तमोत्तम देदीप्यमान आभूषणोंसे सुशोभित वेप धारण किया था ऐसे इन्द्र आदि देवांने सब ओरसे शीघ्र आकर विशाल कुशाग्रपुरकी प्रदक्षिणाएँ दी ॥१५॥ तत्पश्चात् समस्त सुर-असुर देवोंने जिनेन्द्र भगवान और उनके माता-पिताको नमस्कार किया, देव-कन्याओं- ने जातकर्म किया और उसके बाद समस्त देव जिनेन्द्र भगवान्को ऐरावत हाथीपर बैठाकर बड़े वैभवके साथ सुमेरु पर्वतपर ले गये। वहाँ प्रथम हो उन्होंने मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणाएँ दी फिर उसके ऊर्ध्यभागपर बनी पाण्डुक शिलाके ऊपर स्थित सिंहासनपर जिनेन्द्र भगवानको विराज- मान किया। वहाँ क्षीर सागरके उत्तम जलसे महाविभूतिके साथ उनका जन्माभिषेक किया, नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे स्तुति की, मुनिसुव्रत नाम रक्खा। तदनन्तर नीति-निपुण देवाने भगवानको ला माताको शुभ गोद में विराजमान कर आनन्द नाटक किया। तत्पश्चात् इन्द्रादि देव, त्रिभुवनको आनन्दित करनेवाले जिनेन्द्र भगवान् और उनके माता-पिताको नमस्कार कर यथायोग्य अपने-अपने स्थानपर चले गये ॥१६-१८।। जो स्वयं विशाल नेत्रोसे युक्त थे, तीन बानरूपी सहज नेत्रीको धारण करनेवाले थे, देवकुमार जिनको निरन्तर सेवा करते थे और समय-समयके अनुरूप कुवेर जिनके योग-क्षेमका ध्यान रखता था-सब सुख सामग्री समर्पित करता था ऐसे भगवान मुनिसुव्रत शरीर और गुणोंकी वृद्धिको प्राप्त होने लगे । भावार्थ-जैसे- १. सा रागरूद -म० । २ मृगे पटह •म० । मातापितरौ। ५. शरीरस्य । ३ गत्वाम्बुवर्षमृदुमाश्तपुष्पवृष्टिं म०। ४. जिन- २४० हरिवंशपुराणे रम्याङ्गनाश्च कुलशैलसमुद्भवास्तमाद्यन्तमध्यसतताभ्युदया युवानम् । लावण्यवाहिनमवाप्य विवाहपूर्व नद्यः समुद्रमिव संवरयाम्बभूवुः ॥२०॥ राज्यस्थितः स हरिवंशमरीचिमाली राजा प्रजाकमलिनीहितलोकपालः । राजाधिराजसुरसेवितपादपमो भेजे चिरं विषयसौख्यमखण्डिताज्ञः ॥२१॥ प्राप्ता कदाचिदय तं शरदम्बुजास्या बन्धूकबन्धुरतयाधरपल्लवश्रीः । काशाच्छचामरकरा विशदाम्बुवस्वा वर्षावधूव्यतिगमे स्ववधूरिवैका ॥२२॥ अन्तर्दधे धवलगोकुलधोपयोपैमेघावली लघुविधूतरवेद धूम्रा। मेघावरोधपरिमुक्तदिशासु सूर्यः पादप्रसारणसुखं श्रिताश्चिरेण ॥२३॥ रोधोनितम्बगलदम्युविचित्रवस्त्राः सावर्तनाभिसुभगाश्चलमीननेवाः । फेनावलीवलयवीचिविलासवाहाः क्रीटासु जहरबलासरितोऽस्य चित्तम् ॥२४॥ अमिभ्रुवश्चटुलनेनशफर्यपाङ्गाः मत्तद्विरेफकलहंसनिनादरम्याः । फुल्लारविन्दमकरन्दरजोऽङ्गरागा रागं रतौ विदधुरस्य वधूसरस्थः ॥२५॥ जैसे उनका शरीर बढ़ता जाता था वैसे-वैसे ही उनके गुण बढ़ते जाते थे ॥१६॥ जिस प्रकार बुलाचलोंसे उत्पन्न, आदि मध्य और अन्तमें समान रूपसे बहनेवाली नदियाँ लवण समुद्रको प्राप्त कर वरती हैं उसी प्रकाररूउत्तम कुलरूपी-पर्वतोंसे उत्पन्न, बालक, युवा और वृद्ध तीनों अवस्थाओंमें निरन्तर अभ्युदयको धारण करनेवाली सुन्दर स्त्रियोंने सौन्दर्यके धारक युवा मुनि- सुव्रतनाथको प्राप्त कर विवाहपूर्वक वरा था ॥२०॥ तदनन्तर जो राज्य-सिंहासनपर आरूढ़ थे, हरिवंशरूपी आकाशके मानो सूर्य थे, प्रजा- रूपी कमलिनीका हित करनेके लिए सूर्यस्वरूप थे, राजा, महाराजा और देव जिनके चरण- कमलोंकी सेवा करते थे तथा जो अखण्ड आज्ञाके धारक थे ऐसे राजा मुनिसुप्रतनाथने चिर- फाल तक विषय-सुखका उपभोग किया ॥२१॥ अथानन्तर किसी समय शरद् ऋतु भाई सो वह ऐसी जान पड़ती थी मानो वर्षारूपी स्रोके चले जानेपर एक दूसरी अपनी ही स्त्री आई हो अर्थात् वह शरदऋतु स्त्रीके समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार स्त्री कमलके समान मुखसे युक्त होती है उसी प्रकार वह शरद् ऋतु भी फमलरूपी मुखमे सहित थी, जिस प्रकार खो लाल-लाल अधरोष्ठसे युक्त होती है उसी प्रकार वह शरदऋतु भी बन्धूकके लाल-लाल फूलरूपी अधरोष्ठसे युक्त थी, जिस प्रकार स्त्री हाथमें चामर लिये रहती है उसी प्रकार वह शरदऋतु भी काशके फलरूपी स्वच्छ पामर हाथमें लिये थी और जिस प्रकार स्त्री उज्ज्वल वस्त्रोंसे युक्त होती है उसी प्रकार वह शरद भी उज्ज्वल मेघरूपी यत्रोंसे युक्त थी ।।२२।। जिसने शीघू हो अपना शब्द वन्द कर दिया था ऐसी धूमिल मेघमाला, सफेद-सफेद गायोंके समूहसे युक्त अहोरोंको घसतोके जोरदार शब्द मुनकर ही मानो अन्तर्हित हो गई थी और मेघोंके आवरणसे रहित दिशाओं में सूर्य चिरकालके बाद पाद-पायों ( पतमें किरणों) के फैलानेका सुख प्राप्त कर सका था ॥२२॥ जिनके तटरूपी नितम्यसे जलरूपी चित्र-विचित्र वन नीचे सिसक गये थे, जो अंधररूपी नाभिसे मुन्दर थी, मीनरूपी पश्चल नेत्रोंसे युक्त थी और फेनावलीरूपी चूड़ियांसे युक्त तरल- रूप पश्चल भुजाओंसे सहित थी ऐसी नदीरूपो त्रियाँ क्रीड़ाओंके समय इनका हृदय हरने लगीnen उर्मियों ही जिनको भी थी, मछलियों ही जिनके पश्चल फटार थे, जो मदोन्मत्त भौंरी भोर कलहंसाके शब्दसे मनोहर थी और फूछे हुए कमलोंका मकरन्द सम्बन्धी पराग ही जिनका अंगराग था ऐसौ सरसीरूपी त्रियाँ मोडाके समय इनके रागको उत्पन्न १.शरदमुनाया म.1 पोडशः सर्गः २४१ नम्रो भृशं फलभरेण सुगन्धिशालिः शालेयजा व विकचोरपलजातिहत्या। सौभाग्यगन्धवशवत्तितयाङ्गमङ्गमासाद्य जिघ्रनुरिचास्यमजनमेवी ॥२६॥ धूलीः कदम्बमदधूलिगताद्गरागाधाराः कदम्बमधुनो विधुराः स्मरन्तः । माद्यद्विपेन्द्रमदगन्धिषु पट पदोघाः सप्तच्छदेषु विततेषु रति वितेनुः ॥२७॥ काले स तत्र मुनिसुव्रतराजहंसः कैलासशैलसहशे स्थितवान् सुसौधे । लीलावधूतरतिविभ्रमराजहंसीः बीटाभयातिरुचिराभरणाः प्रपश्यन् ॥२८॥ पश्यन् दिशः सकलशारदसस्यशोभाः मेघं ददर्श शशिशुभ्रमदभ्रशोभम् । व्योमार्णवारमणतृष्णमिवावतीर्णरावणं भ्रमणविभ्रमवारणेन्द्रम् ॥२६॥ निःशेपनिर्गलितनीरनिजोत्तरीयमाशावधूविपुलपीनपयोधरं सः । प्रोत्तुङ्गपाण्डुपरिणाहिनमम्बरस्य भूपायमाणमवलोक्य तमाप तोपम् ॥३०॥ पश्चारप्रचण्डतरमारुतवेगघातनिर्मूलितावयवमाशु विलीयमानम् । ज्वालोपनीतमिव तं नवनीतपिण्डमालोक्य लोकविभुरिस्थमचिन्तयत्सः ॥३॥ शीर्णः शरजलधरः कथमेप शीघ्रमायुःशरीरवपुषां विशरारुताया। लोकस्य विस्मरणशीलविशीर्णबुद्धराशूपदेशमिव" विश्वगतं वितन्वन् ॥३२॥ कर रही थी ॥२५॥ फलके भारसे अतिशय मुके हुए सुगन्धित धानके पौधे और धानके खेतोंमें उत्पन्न हुई ऊँची उठी विकसित उत्पलोंको श्रेणियाँ-दोनों ही सौभाग्य सम्बन्धी हर्पके वशीभूत हो अंगसे अंग मिलाकर मानो एक दूसरेका मुख ही सूंघ रही थीं ॥२६।। जिनके शरीरपर विकसित कदम्ब-पुष्पोंकी परागका अङ्गराग लगा था तथा जो कदम्ब मधुकी धाराओं २ और धूलिका स्मरण करते हुए दुःखी हो रहे थे ऐसे भ्रमरों के समूह अब कदम्ब-पुष्पोंका अभाव हो जानेसे मदोन्मत्त गजराजके मद जैसी गन्धसे युक्त सप्तपर्ण वृक्षोंके लम्बे-चौड़े वनों में प्रीति करने लगे ॥२७॥ ऐसी शरदऋतुके समय भगवान मुनिसुव्रतरूपो राजहंस-श्रेष्ठ राजा (पक्षमें राजहंस ), लज्जा और भय हो जिनके सुन्दर आभूपण थे तथा जिन्होंने अपनी लीलासे रतिको शोभाको दूर कर दिया था ऐसी राजहंसियों-श्रेष्ठ रानियों (पक्षमें राजहंसिनियों ) को देखते हुए भगवान् मुनिसुव्रतनाथ कैलास पर्वतके समान ऊँचे महलपर विराजमान थे ॥२८॥ शरद्- ऋतुके समस्त धान्योंकी शोभासे युक्त दिशाओंको देखते-देखते उन्होंने एक मेघको देखा। वह मेघ चन्द्रमाके समान सफेद था, अत्यधिक शोभासे युक्त था और आकाशरूपी समुद्र में कोड़ा करनेकी अभिलापासे अवतीर्ण भ्रमणप्रेमी, गजराज ऐरावतके समान जान पड़ता था ॥२EII जिसके ऊपरसे समस्त जलरूपी अपना उत्तरीय वन नीचे खिसक गया था, जो अतिशय ऊँचा, सफेद एवं विस्तारसे युक्त था, आकाशका आभूपण था, और दिशारूपी स्त्रीके अतिशय स्थूल स्तनके समान जान पड़ता था ऐसे उस मेघको देखकर भगवान् आनन्दको प्राप्त हो रहे थे ॥३०॥ कुछ ही समयके पश्चात् अत्यन्त प्रचण्ड वायुके वेगजन्य आघातसे उस मेघके समस्त अवयव नष्ट हो गये और वह ज्यालाओके समीप रसे हुए नवनीतके पिण्डके समान शोधू ही विलीन हो गया, यह देस जगत्के स्वामी भगवान् मुनिसुव्रतनाथ इस प्रकार विचार करने लगे ॥३१॥ अरे ! यह शरदऋतुका मेघ इतनी जल्दी कैसे विलीन हो गया ? जान पड़ता है. मायु, शरीर और वपुको क्षणभंगुरताको भुला देनेवाले मनुष्यको व्यापक उपदेश देनेके लिए ही मानो - १ धूलीक्दम्बमदधूलिगवा सरागा धारा खः । २ वितेने म० । ३. अपयशोमम् । ४.नश्वरनायाः । ५ श्राशु + अदेशनिव । अाशु शीघमित्यर्थः । ३१ २४२ हरिवंशपुराणे अल्पप्रमाणपरमाणुसमूहराशिरासचितः 'स्वपरिणामवशादसारः कालप्रभञ्जनजवावनिपातमात्रादायुर्घनः प्रलयमत्र लघु प्रयाति ॥३३॥ वज्रामसंहननसंहतसन्धियन्धः सत्सग्निवेशनवरम्यशरीरमेघः । मोघीभवस्यसुभृतामसमर्थ एष वायुप्रकोपभरभग्नसमस्तगानः ॥३॥ सौभाग्यरूपनवयौवनभूपणस्य भूलोकचित्तनयनामृतवर्पणस्य । देहाम्बुदस्य दिनकृत्प्रतिघातिनी स्याच्छायावयःपरिणतिद्रुतवात्ययाऽस्य ॥३५॥ शौर्यप्रभावसुवशीकृतसागरान्तभूराजसिहचिररक्षितभूमिभागाः। सौराज्यमोगगिरयोऽपि विशीर्णशृङ्गाश्चूर्णीभवन्ति समयान्तरवज्रधातैः ॥३६॥ नेनं मनश्च भवदन कलनमिष्टं प्राणः समं समसुखामुखमित्रपुत्रम् । व्येतीह पनमिव शुष्कमदृष्टवाताहेवोऽप्युपैति हि भवे प्रियविप्रयोगम् ।।३७॥ पश्यन्नपि क्षणविभङ्गुरमगभाजामहादिकं स्वयममृत्युभयोऽयमही । मोहान्धकारपिहितागमदृष्टिरिष्टं मागं विहाय विपयामिपगतमेति ॥३॥ प्रत्यङ्गमङ्गजमतङ्गजसद्गताङ्गः स्वाहैः स्पृशन् प्रियवधूजनगाप्रयोः । धिक् स्पर्शसौख्यविनिमीलित नेत्रभागो मातगवद् विषमबन्धमियत्ति मयः ॥३॥ आहारमिष्टमिह पट्रसभेइभिन्नमाहारयन् बहुविधं स्पृहयापदृष्टिः । जिह्वावशो दलितशङ्कविलग्नमांसपेशीप्रियश्चपलमीन इवैति बन्धम् ॥४०॥ यह शीघ विलीन हो गया है ।।३२।। अपने-अपने परिणामोंके अनुसार संचित, अल्प प्रमाण परमाणुओंका राशिस्वरूप यह आयुरूप मेघ निःसार है इसी लिए तो मृत्युरूपी प्रचण्ड वायुके, वेगका आघात लगते ही शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ।।३३।। वन रूपी संधियों के बन्धनसे युक्त यह प्राणियोंका उत्तम रचनासे सुशोभित नूतन एव सुन्दर शरीररूपी मेघ, मृत्युरूपी पवनके प्रबल आघातसे क्षत-विक्षत हो असमर्थ होता हुआ विफल हो जाता है ॥३४॥ सौभाग्य, रूप और नवयौवन ही जिसका आभूपण है तथा जो पृथिवीके समस्त मनुष्योके चित्त और नेत्री के लिए अमृतकी वर्षा करता है ऐसे इस शरीररूपी मेघकी छाया, वृद्धावस्थारूपी तीव्र आँधीसे सूर्यको आच्छादित करनेवाली हो जाती है नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है ॥३शा शौर्य और प्रभावके द्वारा सागरान्त पृथिवीको अच्छी तरह वश करनेवाले बड़े-बड़े राजाओं के द्वारा जिनमें भूमि-भागोंकी चिर रक्षा की गई है ऐसे उत्तम राज्यके भोगरूपी पर्वतोंके शिखर भी कालरूपी प्रचण्ड वनके आघातसे चूर-चूर हो जाते हैं ॥३६॥ नेत्र और मनरूप होती हुई नेत्र और मनके समान प्यारी स्त्री तथा प्राणोके समान सुख दुःखके साथी मित्र और पुत्र इस संसारमें अदृष्टरूपी वायुसे प्रेरित हो सूखे पत्तेके समान नष्ट होते रहते हैं। मनुष्यकी तो बात ही क्या है देव भी इस संसारमें प्रियजनों के वियोगको प्राप्त होता है ॥३७॥ अहो ! यह प्राणी, अन्य प्राणियों के शरीर आदिको क्षणभङ्गुर देखता हुआ भी स्वयं मृत्युके भयसे रहित है तथा इसकी शास्त्ररूपी दृष्टि मोहरूपी अन्धकारसे आच्छादित हो गई है इसलिए यह इष्ट मार्गको छोड़कर विषयरूपी आमिषके गर्त में पड़ रहा है ॥३८॥ जिसका प्रत्येक अंग कामरूपी मत्त हाथीसे संगत है ऐसा यह मनुष्य अपने अवयवोंसे प्रिय स्त्रियोंके शरीरका स्पर्श करता हुआ उनके स्पर्शजन्य सुखसे निमोलित नेत्र हो मत्त-मातङ्गके समान विषय बन्धको प्राप्त होता है इसलिए इस स्पर्शजन्य सुखके लिए धिक्कार है ॥३६॥ जिसकी विवेक दृष्टि नष्ट हो गई है ऐसा यह मनुष्य जिह्वा इन्द्रियके वशीभूत हो १. सपरिणाम- म०, क० ख० । २. श्रायुरेव घनः । ३. शीघ्रम् । ४. रन्ध-म० }५ वनरम्य म०, ख०।६ मेधीभर म.1 पोडशः सर्गः .२४३ घ्राणेन्द्रियप्रियसुगन्धिसुगन्धमन्धौ जहावलादिव विलद्धिततृप्तिमार्गः। दुप्पाकमस्तधिषणो विषपुष्पगन्धमाघ्राय शीघ्रमधमेति यथा पडधिः ॥४१॥ चित्तद्वीकरणदचकटाक्षपातसस्मेरवक्त्रवनिताननिविष्टरष्टिः । रूपप्रियोऽपि लभते परितापमुग्रं प्राप्तः पतग इव दीपशिखाप्रपातम् ॥४२॥ स्वेष्टागनामुखरन् पुरमेखलादिनानाविभूपणरवैः प्रियमापणैश्च । सङ्गीतकैश्च मधुरैहतधारधीरः श्रोत्रेन्द्रियमंग इव नियते मनुष्यः ॥४३॥ सक्लिश्यते विषयभोगकलङ्कपके यत्पुलवा ततिरिहाल्पबला निमग्ना । चित्रं न तद् यदतिमजति वज्रकायपुन्नागसन्ततिरितीदमतीव चित्रम् ॥४४॥ यः स्वर्गसौख्यजलधीनतिदीर्घकालं पीत्वाऽपि तृप्तिमगमद् बहुशो न जीवः । सौहित्यमल्पदिवसैः कथमस्य कुर्यात् भूलोकसौख्यलेबलोलतृणोदबिन्दुः ॥४५॥ अमेरिवेन्धनमहानिचयैनं तृप्तिम्भोनिधेरिव सदापि नदीसहस्रः। जीवस्य तृप्तिरिह नास्ति तथानिपेव्यैः सांसारिकरुपचितैरपि कामभोगः ॥४६॥ भोगामिलापविषमाग्निशिखाकलापसंयुद्धये हि विपयेन्धनराशिरुच्चैः । तस्यैव तु प्रशमहेतुरिहैब तस्मात् व्यावृत्तिरिन्द्रियजिति स्थिरवारिधारा ॥४७॥ हित्वा ततो विषयमौरयमसारभूतं शीघ्रं यतेऽहमिह मोक्षपथे सनाथे । स्वार्थ प्रसाध्य परमं प्रथमं परार्थ तीर्थप्रवर्तनमथ प्रथयामि तथ्यम् ॥४८॥ इच्छापूर्वक छह प्रकारके रसोंसे युक्त नाना प्रकारके इष्ट आहारको ग्रहण करता हुआ वंशीके कोटेपर लगे मांसके लोभी मीनके समान बन्धको प्राप्त होता है ॥४०॥ जिस प्रकार निर्बुद्धि भ्रमर (विपपुष्पकी गन्धको सँघकर दुष्पाकसे युक्त मरणको प्राप्त होता है उसी प्रकार जङ्घाबलके कारण हो मानो तृप्तिके मार्गको उल्लंघन करनेवाला यह मनुष्य घ्राणेन्द्रियको अच्छे लगनेवाले सुगन्धित पदार्थोकी सुगन्धको सूंघकर अन्धा होता हुआ दुष्परिणामसे युक्त पाप बन्धको प्राप्त होता है ॥४१॥ जिस प्रकार दीप-शिखापर पड़ा पतंग उग्र संतापको प्राप्त होता है उसी प्रकार रूपका लोभी यह प्राणी, चित्तको द्रवीभूत करनेमें दक्ष कटाक्ष और मन्द-मन्द मुसकुराहटसे युक्त मुससे सुशोभित स्त्रियोंके शरीरपर दृष्टि डालता हुआ भयंकर संतापको प्राप्त होता है ।।४२।। अपनी इष्ट स्त्रियों के शब्दायमान नूपुर तथा मेखला आदि नाना प्रकारके आभूपणोके शब्दों, प्रियभापणी और मधुर संगीतासे जिसको बुद्धि हरी गई है ऐसा यह मनुष्य अधीर होता हुआ श्रोनेन्द्रियके द्वारा मृगके समान मृत्युको प्राप्त होता है ।।४३॥ अल्प शक्तिके धारक क्षुद्र मनुष्योंका समूह विषय भोग जन्य पापरूपी कीचड़में फंसकर जो क्लेश उठाता है यह भाश्चर्य नहीं है किन्तु समय शरीरके धारक श्रेष्ठ मनुष्योंका समुदाय भी जो उस पापपङ्कमें अतिशय निमग्न हो रहा है यह अत्यधिक आश्चर्यकी बात है ॥४४॥ जो जीव अनेकों घार अत्यन्त दीर्घ कालतक स्वर्गके सुसरूपी सागरको पीकर भी तृप्तिको प्राप्त नहीं हुआ उसे भूलोक सम्बन्धी अल्प सुसरूपी तृणको चञ्चल जलबिन्दु कुछ दिनोंम कैसे सन्तुष्ट कर सकती है ? ॥४५|| जिस प्रकार ईन्धनकी बहुत बड़ी राशिसे अग्निको तृप्ति नहीं होती और सदा गिरनेवाली हजारों नदियोंसे समुद्रको सन्तोप नहीं होता उसी प्रकार सेवन किये हुए संसारके संचित काम- 'भोगोंसे जीवको तृप्ति नहीं होती ॥४६॥ निश्चयसे विषयरूपी ईन्धनकी बहुत बड़ी राशि, भोगा- भिलापारूपो विषम अग्निकी ज्वालाऑकी वृद्धिका कारण है और इन्द्रियविजयो मनुष्यको जो उन विपयोंसे व्यावृत्ति है यह स्थिर जलधाराके समान उस विपमाग्निकी शान्तिका कारण है ॥४७॥ इसलिए मैं सारहीन विषयमुसको छोड़कर शीघ्र ही हितरूप मोक्ष-मार्गमें प्रवृत्ति करता १. सन्धो म । २. -मणुलोल-ख० । ३. तयाभिषेक: म ।

२४४ हरिवंशपुराणे इत्थं मतिश्रुतयुतावधिबोधनेने 'जाते स्वयम्भुवि तदा स्वयमेव बुद्धे । आकम्पितासनमभूदमरेन्द्रवृन्दं सर्वार्थसिद्धिसुरपर्यवसानमाशु ॥४६॥ लौकान्तिका ललितकुण्डलहारशोभाः सारस्वतप्रभृतयो निभृताः सितामाः। आगाय मौलिमिलिताञ्जलयः किरन्तः पुष्पाञ्जलीनिति जिनं नुनुवुनमन्तः ॥५०॥ वर्धस्व नन्द जय जीव जिनेन्द्रचन्द्र ! विज्ञानरश्मिहतमोहतमोवितान । निबन्धुबन्धुतम ! भव्यकुमुदतीनां तीर्थस्य विंशतितमस्य हितस्य कर्ता ॥५॥ खं वर्तय त्रिभुवनेश्वर ! धर्मतीर्थ यत्रायमुप्रभवदुःखैशिखिप्रतप्तः । स्नात्वा जनस्त्यजति मोहमलं समस्तमहाय याति च शिवं शिवलोकमग्रयम् ॥५२॥ चारित्रमोहपरमोपशमात्प्रबुद्धं लौकान्तिका इति जिनं प्रतिबोधयन्तः । नान्यजगुञ्जिनियोगनिवेदनेषु युक्ता हि यान्ति न पुनः पुनरुक्तदोपम् ॥५३॥ सौधर्मपूर्वविबुधाश्च चतुर्णिकाया नानाविमाननिवहस्थगितान्तरिक्षाः । सम्प्राप्य नाथमभिपिच्य सुगन्धितोयस्तं भूपितं विदधुरद्भुतभूपणाद्यः ॥५४॥ पुत्रं च सुव्रतमसो मुनिसुव्रतेशः प्राभावतेयमभिराज्यपदेऽभ्यपिञ्चत् । श्वेतातपत्रसितचामरविष्टराणि सोऽलश्चकार हरिवंशनभाशशाकः ॥५५॥ भूपोद्धृता नभसि देवगणरुदूदामारूढवान् सुरुचिरां शिविका विचित्राम् । याती वन विदितकात्तिकशुक्लपक्षे षष्ठोपवासकृदुपाश्रितसप्तमीकः ॥५६॥ हूँ और सबसे पहले अपना उत्कृष्ट प्रयोजन सिद्धकर पश्चात् परहितके लिए यथार्थ तीर्थकी प्रवृत्ति करूँगा ॥४८।। इस प्रकार मति, श्रुत और अवधि ज्ञान रूपी नेत्रोसे युक्त स्वयंभू भगवान जब.. स्वयं प्रतिबुद्ध हो गये तब सर्वार्थसिद्धि तकके समस्त इन्द्रोंके आसन शीघ्र ही कम्पायमान हो गये ॥४६।। उसी समय सुन्दर कुण्डल और हारोंसे सुशोभित, निश्चल मनोवृत्ति और श्वेत दीप्तिके धारक सारस्वत आदि लोकान्तिक देव आ गये और हाथ जोड़ मस्तकसे लगा पुष्पा- जलियाँ बिखेरते हुए नमस्कार कर जिनेन्द्र भगवानकी इस प्रकार स्तुति करने लगे ॥५०॥ हे जिनेन्द्र चन्द्र ! हे सम्यग्ज्ञानरूपी किरणोंसे मोहरूपी अन्धकारके समूहको नष्ट करने वाले ! आप वृद्धिको प्राप्त हों, समृद्धिमान् हो, जयवन्त रहें, चिरकाल तक जीवित रहें, आप बन्ध रहित हैं, भव्य जीवरूपी कुमुदिनियोंके उत्तम बन्धु हैं और हितकारी बीसवें धमतीर्थके प्रवर्तक हैं ॥५१॥ हे त्रिलोकीनाथ ! आप उस धर्मतीर्थकी प्रवृत्ति करें जिसमें संसारके तीव्र दुःख- रूपी अग्निसे संतप्त प्राणी स्नानकर समस्त मोहरूपी मलको छोड़ दें और शीघ्र ही आनन्ददायी उत्तम शिवालयको प्राप्त हो जावें ॥५२॥ भगवान् , चारित्र मोहकर्मके परमोपशम ( उत्कृष्ट क्षयो- पशम ) से स्वयं ही प्रतिबोधको प्राप्त हो गये थे इसलिए उन्हें उक्त प्रकारसे संबोधते हुए लोकान्तिक देवोंने अन्य कुछ नहीं कहा सो ठीक ही है क्योंकि योग्य मनुष्य अपने नियोगकी पूर्ति में कभी पुनरुक्त दोपको प्राप्त नहीं होते ॥५३॥ उसी समय नाना विमानोंके समूहसे आकाश- को आच्छादित करते हुए सौधर्मेन्द्र आदि चारों निकायके देव आ पहुँचे। आकर उन्होंने सुगंधित जलसे भगवान्का अभिषेक किया और आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले उत्तमोत्तम आभूषण आदिसे उन्हें अलंकृत किया ॥१॥ भगवान् मुनिसुमननाथने अपनी प्रभावती स्त्रीके पुत्र सुप्रतका राज्य पदपर अभिषेक किया और हरिवंशरूपी आकाशमें चन्द्रमाके समान सुशोभित सुव्रतने भी सफेद छन, सकेद चामर तथा सिंहासनको अलंकृत किया ।।५।। तदनन्तर पहले जिसे भूमिपर राजाओने उठाया था और उसके बाद जिसे देवलोग आकाशमै उठा ले गये थे ऐसी अतिशय १गने । २.निन्ध-क० । ३.दुःखाग्नि। ४.योग्याः । ५.प्रमावस्याः अपत्य पुमान् प्रामावतेयः तम् ।

पोटशः सर्गः २१५ भूभृत्सहस्रपरिवारभृदेष बभ्रे दीक्षां समसमखिलस्य जगत्त्रयस्थ । तन्मूधज्ञानधिनिधाय निजोत्तमाझे शक्रनकार विधिना सुपयःपयोधौ ॥५॥ कृत्वामराश्च जिननिष्क्रमणं तृतीयकरयाणपूजनममी जगुरीश्वरोऽपि । ज्ञानेश्चनुभिरनुगैश्च सहस्त्रसंरयस्तैः पार्थिवैदिनमणिः किरणैरिवाभात् ॥५८] पष्टोपवासिनि परेयुरिनेऽवतीणे भिसाविधिप्रकटनाय कुशाग्रपुर्याम् । भिक्षां ददौ वृषभदत्त इति प्रसिद्धः सत्पायसं सविधिना मुनिसुव्रताय ॥५६॥ स्वाधीनमप्रतिहतं स्थितिभुक्तियुक्तं सत्याणिपानमधिपेन विधानपूर्वम् । प्रावत्ति वर्तनसुवर्तनसाधुयोग्य तीथे मिजे स्थितिविदा जिनमास्करण ॥६०॥ चित्रं तदा हि परमानपीन्द्रपाणी शुद्धयान्वितेन ददता परिनिष्टशेपम् । शेपैरशेषयतिमिश्च सहस्रसङ्खयोभुज्यमानमपरैश्च ययौ न मिष्टाम् ॥६॥ नेदुस्ततस्त्रिदशदुन्दुभयो निनादाः साधुस्वनः सकलमम्बरमाततान । वायुर्वची सुरभिरद्भुतपुष्पवृष्टिग्निः पपात महती वसुनश्च धारा ॥६२॥ आश्चर्यपञ्चकमिदं चिरमम्बरस्था देवा विकृत्य परमं परदुर्लभ ते । सम्पूज्य दानपतिमर्जितपुण्यपु जग्मुर्जिनोऽपि विहार विहारयोग्यम् ॥१३॥ छमस्थकालमतिवाध समासवर्ष सन्मार्गशीर्षसुतिथि सितपञ्चमी तु । ध्यानाग्निदग्धघनघातिसमित्समृद्धिः कैवल्यलाभविमवेन चकार पूताम् ॥६॥ सुन्दर विचित्र पालकीपर भारूढ़ होकर भगवान् वनमें गये तथा वहाँ कार्तिक शुक्ल सप्तमौके दिन वेलाका नियम लेकर दीक्षा लेने के लिए उद्यत हुए ॥५६॥ उस समय एक हजार राजाओके साथ भगवानने समस्त जगत् त्रयके समक्ष दीक्षा धारण की। उन्होंने अपने शिरके केश उखाड़- कर फेंक दिये और इन्द्रने उन केशोंको पिटारेमें रखकर विधिपूर्वक क्षीरसमुद्र में क्षेप दिया ॥५७|| इस प्रकार देव, भगवानका निष्क्रमणकल्याणक तथा उसकी पूजाकर यथा स्थान चले गये और भगवान भी चार ज्ञानों तथा एक हजार अनुगामी राजाओंसे उस तरह सुशोभित होने लगे जिस तरह कि एक हजार किरणोंसे सूर्य सुशोभित होता है ।।८।। वेलाका उपवास धारण करनेवाले भगवान् जब आगामी दिन, आहारकी विधि प्रकट करने के लिए कुशाग्रपुरीमे अवतीर्ण हुए तब वृषभदत्त नामसे प्रसिद्ध पुरुपने उन्हें विधिपूर्वक खीरका आहार दिया ॥५६॥ उस समय मर्यादाके जाननेवाले भगवान मुनिसुव्रतरूपी सूर्यने अपने तीर्थमें निर्दीप चारित्रके धारक मुनियोंके योग्य आहारको वह विधि प्रवृत्त को जो स्वाधीन थी, वाघासे रहित थी, खड़े होकर जिसमें भोजन करना पड़ता था, जिसमें पाणिपात्रमें भोजन होता था और दानपति जिसमें विधिपूर्वक भोजन प्रदान करता था ॥६०|| आश्चर्यकी वात थी कि उस समय शुद्धिसे सहित वृपभदत्तने मुनिराजके हाथमे जो सीर दी थी उससे वाकी धची खोरको हजारोंकी संख्यामें अन्य मुनियोंने साया तथा घरके अन्य लोगोंने भी वार-बार ग्रहण किया फिर भी वह समाप्तिको प्राप्त नहीं हुई ॥६॥ तदनन्तर विशाल शब्द करते हुए देव दुन्दुभि बजने लगे, धन्य. धन्यके शब्दने समस्त आकाशको व्याप्त कर दिया, सुगन्धित वायु बहने लगी, आश्चर्यकारी फूलांकी वर्षा होने लगी और आकाशसे बड़ी मोटी रत्नोंकी धारा पड़ने लगी ॥६२॥ दूसरोके लिए अतिशय दुर्लभ इस पञ्चाश्चर्यको आकाशमें खड़े देवाने चिरकाल तक किया । तदनन्तर पुण्यराशिका सञ्चय करनेवाले दानपतिको पूजाकर वे देवलोग यथास्थान चले गये और भगवान् भी विहारके योग्य स्थानमें विहार कर गये ॥६३।। तत्पश्चात् तेरह महीनेका छद्मस्थ १. सत्तात्रसं म० १२. शुद्धान्वितेन । ३ -रशेषपतिभिश्च ! ४ समातिम् । ५. त्रयोदशमासात्मकम् । ६. पूतम् म..

हरिवंशपुराणे साक्षाञ्चकार युगपत्सकलं स मेयमेकेन केवलविशुद्धविलोचनेन । नाथस्तदा न हि निरावरणो विवस्वानभ्युद्गतः क्रमसहायपरः प्रकाश्ये ॥६५॥ नेमुः ससप्तपदमेत्य निजासनेभ्यः सर्वेऽहमिन्द्रनिवहाः कृतमौलिहस्ताः । तं प्रापुरम्युदिततोपविशेष चित्ताः शेषा महेन्द्रसुरसन्ततयः समन्तात् ॥६६॥ भवत्याऽर्चयन् त्रिभुवनेश्वरमानवेन्द्रास्तं देवमम्युदितचम्पकचैत्यवृतम् । सत्प्रातिहार्यविभवातिविशेषरूपमाहन्त्यमद्भुतमचि स्यमनन्तमेतम् ॥६७॥ स द्वादशस्वय गणेषु निषण्णवत्सु स द्वादशागमनुयोगपथं जिनेन्द्रः । धर्म विशाखगणिना विनयेन पृष्टः सम्भाप्य तीर्थमवनौ प्रकटं प्रचक्रे ॥६॥ कल्याणपूजनमिनस्य तुरीयमिन्द्राः कृत्वा यथायथमगुः प्रणिपातपूर्वम् । देशान् जिनोऽपि विजहार बहून् बहूनां धर्मामृतं तनुभृतां धनवप्रवर्षन् ॥६॥ अष्टौ च विशतिरिनस्य जिनेन्द्रचर्याः क्रोडीकृताखिलचतुर्दशपूर्वशास्त्राः । त्रिंशत्सहस्रगणना परिषद् यतीनां नानागुणैरजनि सप्तविधः स सहः ॥७॥ स्युस्तत्र पन्चशतपूर्वधरा यतीशा एकादिविंशतिसहस्रभिदाश्च शिक्षाः । भष्टादशैव गदितानि शतानि तेषु प्रत्येकमस्य मुनयोऽवधिकेवलाप्ताः ॥७॥ द्वाविंशतिर्यतिशतानि तु वैक्रियाख्यास्तान्येव पञ्चदश ते विपुलास्तु मन्या । स्युदशैव हि शतानि विवान्तवैराः सदादिनो मुनिपतेः प्रथिताः सभायाम् ॥७२॥ काल बिताकर भगवान्ने ध्यानरूपी अग्निके द्वारा धातिया कर्मरूपी ईन्धनको विपुल राशिको दग्धकर केवलज्ञानकी प्राप्तिसे मगसिर मासको शुक्ल पञ्चमी तिथिको पवित्र किया ॥४॥ अब केवलज्ञानरूपी एक ही विशुद्ध लोचनसे भगवान् समस्त पदार्थीको एक साथ प्रत्यक्ष देखने लगे सो ठीक ही है क्योंकि जब निगवरण सूर्यका उदय होता है तब वह प्रकाशित करने योग्य पदार्थों के विषयमें न तो क्रमकी अपेक्षा करता है और न दूसरेको सहायताकी ही अपेक्षा करता है ।।६।। उस समय समस्त अहमिन्द्रीने अपने-अपने आसनोंसे सात-सात डग आगे चलकर तथा हाथ जोड़ मस्तकसे लगा जिनेन्द्र भगवान्को परोक्ष नमस्कार किया और जिनके चित्तमें विशेष हर्ष प्रकट हो रहा था ऐसे शेष समस्त इन्द्र तथा देव सब ओरसे वहाँ आये ॥६६।। जिनके चम्पक नामक चैत्य वृक्ष प्रकट हुआ था, जो अष्ट प्रातिहार्यरूपी वैभवसे अतिशय सुन्दर थे, और जो आश्चर्यकारी अचिन्त्य एवं अन्तातीत आर्हन्त्य पदको प्राप्त थे ऐसे देवाधिदेव मुनिसुव्रतनाथको, तीनों लोकोके स्वामी यथा राजाओने भक्तिपूर्वक पूजा को ॥६७|| तदनन्तर जब बारह गण बारह सभाओंमें यथास्थान बैठ गये तब विशाख नामक गण- धरने विनयपूर्वक अनुयोग द्वारसे द्वादशाङ्गका स्वरूप पूछा उसके उत्तरमें भगवान्ने धर्मका निरूपणकर पृथिवीपर तीर्थ प्रकट किया ॥६॥ इन्द्रादिदेव भगवान्के चतुर्थ कल्याणककी पूजा कर नमस्कार करते हुए यथास्थान चले गये और भगवान् भी अनेक प्राणियोंके लिए धर्मामृतकी वर्षा करते हुए अनेक देशोमें विहार करने लगे ॥६६॥ भगवान् मुनिसुव्रतनाथके सम्पूर्ण चौदह पूर्वोको जाननेवाले भट्ठाईस गणधर थे, और तीस हजार मुनि थे। भगवान्का यह संघ नाना गुणोसे सात प्रकारका था ॥७॥ उस संघ पाँच सौ मुनिराज पूर्वधारी थे, इकोस हजार शिक्षार्थी ये, अठारह सौ अवधिज्ञानी थे, इतने ही केवलज्ञानी थे, बाईस सी विक्रियाऋद्धिके धारक थे, पन्द्रह सौ विपुलमति मनःपर्यय जानके घारक थे, वैर को दूर करनेवाले बारह सौ प्रसिद्ध वादी थे, पचास हजार आर्यिकाएं थी, एक लास अणुमत गुणप्रत और शिक्षाप्रतीको धारण करनेवाले भावक थे, और सम्यग्दर्शनसे पवित्र हृदयको धारण करनेवाली तीन लाख भाविकाएँ थीं। १-मेक म। .

पोदशः सर्गः
२४०
पञ्चाशदात्मकसहस्रभिदास्तदायर्याः शिवागुणवतधरा गृहिणोऽपि लक्षाः ।
सम्यक्त्वपूतमनसो वनिताखिलवाः सम्योडुमिः परिवृतश्च बभौ जिनेन्दुः ॥७३॥
त्रिंशद्गुणप्रयितवर्षसहस्रजीवी प्राक् पञ्चसप्ततिशताब्दकुमारकालः ।
राज्येऽपि पञ्चदशवर्षसहस्रमोगी सरसंयमेन विजहार स शेषकालम् ॥७॥
भन्ते स सम्मदविधायिवनान्तकान्तं सम्मेदशैलमधिरुह्य निरस्तबन्धः।
बन्धान्तकृन्मुनिसहस्रयुतो जगाम मोई महामुनिपतिर्मुनिसुव्रतेशः ॥७॥
माघत्रयोदशतिथौ सितपचभाजि मासोपसंहृतविहारविसृष्टदेहे ।
स्थित्वाऽपरालसमये वरपुष्ययोगे सिद्धे जिने ननु मह विदधुः सुरेन्द्राः ॥७६॥
पड्वपलक्षपरिमाणमिनस्थ तस्य प्रावर्तत प्रविततं भुवि धर्मतीर्थम् ।
विद्यावबोधबुधितार्थमुनिप्रभावं देवागमाविरतिवर्दित्तलोकहपम् ॥७७॥
विंशस्य तस्य चरितस्य जिनस्य लोके कल्याणपञ्चविभूति विभावयन् यः ।
भक्त्या शृणोति पठति स्मरतीदमस्मिन् मन्यो जनो भजति सिद्धिसुखं स शीघ्रम् ॥७॥
एवं वसन्ततिलकप्रचुरप्रस्नमालामिमां समधिरोप्य विनूतवृत्तः ।
विघ्नान् विध्य विदधातु समाधिबोधी धीरो जिनो जितभवो मुनिसुव्रतो नः ॥७॥
इत्यरिटनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती मुनिसुव्रतनाथपञ्चकल्याणवर्णनो
नाम पोडशः सर्गः।
। इन सभासद रूपी नक्षत्रोंसे घिरे हुए भगवान् रूपी चन्द्रमा अतिशय सुशोभित हो रहे थे ।।७१-
७३॥ भगवानकी पूर्ण आयु तीस हजार वर्षकी थी, उसमे साढ़े सात हजार वर्पका कुमारकाल
था, पन्द्रह हजार वर्ष तक उन्होंने राज्यका भोग किया और शेप साढ़े सात हजार वर्ष तक संयमी
होकर विहार किया ॥७४|| महामुनियों के अधिपति मुनिसुव्रत भगवान् आयुके अन्त समयमें
हर्पको उत्पन्न करनेवाले वन-खण्डोंसे सुशोभित सम्मेदाचलपर आरूढ़ होकर कर्मोके बन्धसे
रहित हुए और बन्धका नाश करनेवाले एक हजार मुनियोंके साथ वहींसे मोक्ष गये ॥७५।। मोक्ष
जानेके एक माह पूर्व भगवान्ने विहार आदि बन्दकर योगनिरोध कर लिया था तथा माघ
शुक्ला त्रयोदशीके दिन अपराह्न कालमें पुष्य नक्षत्रका उत्तम योग रहते हुए पद्मासनसे मोक्ष
प्राप्त किया था । मुक्त होनेपर इन्द्रने निर्वाणकल्याणककी पूजा की थी ॥७६॥ भगवान् मुनिसुव्रत-
नाथका धर्मतीर्थ पृथिवीपर छहलाख वर्ष तक अखण्ड रूपसे चलता रहा। उनके तीर्थमें
विद्याओंका परिज्ञान होनेसे मुनियोंका पूर्ण प्रभाव था,और देवांका निरन्तर आगमन होते रहनेसे
लोगोंका हर्ष बढ़ता रहता था ॥७७|| गौतम स्वामी कहते हैं कि संसारमें जो भव्य प्राणी बीसवें
तीर्थकरके पञ्चकल्याणक विभूतिसे युक्त इस चरितका चिन्तवन करता है, भक्तिसे इसे सुनता
है, पढ़ता है, और इसका स्मरण करता है वह शीघ्र ही मोक्षके सुखको प्राप्त होता है ।१७८॥
जिनसेनाचार्य कहते हैं कि इस तरह वसन्ततिलका छन्दसे निर्मित (पक्षमें वसन्तऋतुके श्रेष्ठ
नाना पुष्पोंसे निर्मित) पुष्पोंको माला समर्पित कर जिनके चरित्रकी स्तुति की गई है वे संसारको
जीतनेवाले धीर-वीर मुनिसुव्रत जिनेन्द्र विघ्नोंको नष्टकर हमारे लिए समाधि (चित्तकी स्थिरता)
और बोधि (रत्नत्रयकी प्राप्ति) करावें ॥७॥
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराण के संग्रहसे युक्त जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराण में मुनिसुव्रतनाथ
मगवान्के पञ्चकल्याणकोंका वर्णन करनेवाला सोलहवा सर्ग समाप्त हुश्रा ॥१६॥

सप्तदशः सर्गः बभूव हरिवंशानां प्रभुवंश्यवसुन्धरः । भरिपड्वर्गजिन्मार्गनिधर्मस्य स मुव्रतः ॥१॥ स दक्षं दसनामानं पुग्नं कृत्वा निजे पदे । दीक्षितः स्वपितुस्तीय माप मोकं तपोबलात् ॥२॥ ऐलेयाख्य मिलायां स दक्षः पुत्रमजीजनत् । मनोहरी च तनयामर्णवोऽपि यथा श्रियम् ॥३॥ ववृधेऽनुकुमारं च कुमारी नेत्रहारिणी । साऽनुचन्द्रं यथा कान्तिः कलागुणविशेषिणी ॥४॥ यौवनेन कृताश्लेपा कृशमध्याऽवभासते । स्तनभारेण गुरुणा जघनेन च भारिणा ॥५॥ स्वाधीने सति रूपाने तस्या धीरमनोभिदि । मनोभवोऽत्यजत्स्वेषु कुसुमास्त्रेषु गौरवम् ॥६॥ तद्रूपास्त्रविमोक्षेण मनोभूरे करोद् भृशम् । दक्षस्यापि मनोभेदमन्येषां नु किमुच्यताम् ॥७॥ कन्यया हृतचित्तश्च ततो दक्षः प्रजापतिः । आहूय च्छद्मना सन पप्रच्छ प्रणताः प्रजाः ॥८॥ पृष्टा वदत यूयं मे सजना जगति स्थितिम् । भविरुद्धं विचार्यह विश्व विदितवृत्तयः ॥६॥ यद्वस्तु भुवनेऽनध्य हस्त्यश्ववनितादिकम् । प्रजानुचितमेतस्य राजा विभुरहो न वा ॥१०॥ केचिदूचुर्जनास्तत्र विचार्य चिरमात्मनि । यत्प्रजानुचितं देव ! तरप्रजापतये हितम् ॥११॥ यथा नदीसहस्राणां सदनानां च सागरः । आकरोऽनघरत्नानां तथैवान्न प्रजापतिः ॥१२॥ अथानन्तर भगवान् मुनिसुव्रतनाथके पुत्र सुव्रत हरिवंशके स्वामी हुए। उन्होंने समस्त पृथिवीको वश कर लिया था, काम क्रोध लोभ मोह मद एवं मात्सर्य इन छह अन्तरङ्ग शत्रुओंको जीत लिया था, तथा वे धर्म अर्थ काम रूप त्रिवर्गके मार्ग प्रवर्तक थे ॥१।। उनके दक्ष नामका अतिशय दक्ष-चतुर पुन था । वे उसे अपने पदपर नियुक्त कर अपने ही पिताके समीप दीक्षित हो गये और तपोबलसे मोक्ष चले गये ॥२॥ राजा दक्षने इला नामक रानीमें ऐलेय नामका पुत्र उत्पन्न किया और उसके बाद जिस प्रकार समुद्रने लक्ष्मीको उत्पन्न किया था उसी प्रकार मनोहरी नामकी पुत्रीको उत्पन्न किया ॥३॥ जिस प्रकार चन्द्रमाके साथ-साथ कलारूपो गुणसे युक्त उसकी कान्ति बढ़ती जाती है उसी प्रकार कुमार ऐलेयके साथ साथ कलारूपी गुणसे युक्त नेत्रोंको हरण करनेवाली कुमारी मनोहरी दिनों-दिन बढ़ने लगी ॥४॥ जब वह यौवनवी हुई तब उसकी कमर पतली हो गई और वह स्थूल स्तनोके भार तथा विस्तृत नितम्ब स्थलसे अतिशय सुशोभित होने लगी ॥॥ धीर-वीर मनुष्यों के मनको भेदन करनेवाले उसके सौन्दर्यरूपी अनके स्वाधीन रहते हुए कामदेवने अपने पुष्पमयी वाणोंका गर्व छोड़ दिया था ।।६। उसके सौन्दर्यरूपी शस्त्रको छोड़कर कामदेवने राजा दक्षके भी मनको भेद दिया फिर अन्य पुरुपोंकी तो बात ही क्या कही जाय ? ॥७॥ तदनन्तर कन्याके द्वारा जिसका चित हरा गया था ऐसे दक्ष प्रजापतिने एक दिन किसी छलसे नम्रीभूत प्रजाको अपने घर बुलाकर उससे पूछा कि हे सज्जनो! आप सब व्यवहारके ज्ञाता हैं । मैं आपलोगोंसे एक बात पूछता हूँ सो आप सब जगत्की स्थितिका पूर्वापरविरोध रहित विचारकर उत्तर दीजिए ॥६-६॥ बात यह है कि यदि हाथी घोड़ा स्त्री आदि कोई वस्तु संसारमें अमूल्य हो और प्रजाके योग्य न हो तो राजा उसका स्वामी हो सकता है या नहीं १ ॥१०॥ प्रजाजनों में कितने ही लोगोंने चिरकालतक आत्मामे विचारकर कहा कि हे देव! जो वस्तु प्रजाके लिए अयोग्य है वह राजाके लिए हितकारी है ॥११॥ जिस प्रकार समुद्र हजारों १. साधोने म०, ग, १०, १० । २. कामः | ३ हृतचित्त स म ।

सप्तदशः सर्गः २४३ तद् यत्तव स्थितं पिसे समस्ते वसुधातले । स्वासरेपु ममु पनं तदनं रियतां करे ॥१३॥ एवं दसः प्रजावास्यमाकण्यं विपरीतधीः । प्रजानुमतिकारित्वं प्रकाश्य विममर्ज ताः ॥१४॥ ततः स दुहिनुस्तस्या स्वयमेवाग्रहीत् करम् । कामप्रहगृहीतस्य का मर्यादा प्रमोऽपि कः ॥१५॥ इला देवी ततो रुटा पत्युः पुत्रमभेदयत् । तावद्भार्यादयो यावन्मर्यादासस्थितः प्रभुः ॥१६॥ इला चैलेयमावृत्त्य महासामन्तसंवृता । प्रस्यवस्थानमकरोदुगदेशमुपाश्रिता ॥१७॥ त्रिविष्टपपुराकारं समिविष्टं पुरं तया। इलायां वर्धमानायामिलावधनसंज्ञया ॥८॥ ऐलेयः स्थापितो राजा रे तत्र प्रजातः । वीर्यधेयनयाधारो हरिवंशविशेषकः ॥१३॥ पार्थिवेन सता तेन तामलिप्तिप्रसिद्धिकाम् । निवेशितं पुरं कान्तमझदेशनिवामिना ॥२०॥ जिगीपता परान् देशान् नर्मदातटमीयुगा । मझा माहिष्मती ख्याता नगरी विनिवेशिता ॥२॥ तत्र स्थितश्चिरं राज्यं करपा प्रणतपार्थिवम् । पुत्रं कुणिमनामानं संस्थाप्य तपसे ययौ ॥२२॥ कुणिमश्च विदर्भपु विजिगीषुद्धिपन्तपः । कुण्टिनारयं पुरं चक्रे वरदायास्तटे वरे ॥२३॥ कुणिमः सणिकं मरवा जीवितं निजवैभवम् । पुलोमारये मुते न्यस्य तपोवनमयात् स्वयम् ॥२४॥ पुलोमपुरमेतेन विनिवेशितमाशिना । श्रियं न्यस्य तपस्यागात् पौलोमचरमारययोः ॥२५॥ नदियों और उत्तम रत्नोंकी खान है उसी प्रकार राजा भी इस लोकमै अनर्घ्य वस्तुओंकी खान है ॥१२।। इसलिए समस्त पृथिवीतल और उत्तमोत्तम खानोंमें उत्पन्न हुआ जो भी रल आपके चित्तम है-जिसे आप प्राप्त करना चाहते हैं उसे हाथमें कीजिए ||१३॥ इस प्रकार विपरीत बुद्धिके धारक राजा दक्षने प्रजाके वचन सुन प्रकट किया कि जैसी आपलोगोंको अनुमति है वैसा ही कार्य करूँगा यह कहकर उसने प्रजाके लोगोको विदा किया ॥१४॥ तदनन्तर उसने पुत्री मनोहरीका कर ग्रहण स्वयं ही कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि कामरूपी पिशाचसे गृहीत मनुष्यको मर्यादा क्या है ? और क्रम क्या है ? भावार्थ-कामी मनुप्य सब मर्यादाओं और क्रमाको छोड़ देता है ॥१५॥ राजा दक्षकी रानी इला देवी, पतिके इस कुकृत्यसे बहुत ही रुष्ट हुई इसलिए उसने पुत्रको पितासे फोड़ लिया-अलग कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि स्त्री आदि तभी तक है जब तक स्वामी मर्यादा रहता है-मर्यादाका पालन करता है ।।१६।। बड़े-बड़े सामन्तोंसे घिरी इला देवी अपने ऐलेय पुत्र को लेकर दुर्गम स्थानमें चली गई और वहीं उसने निवास करनेका निश्चय किया ॥१७॥ उसने स्वर्गपुरीके समान एक नगर बसाया जो बढ़ती हुई पृथिवीपर स्थित होनेके कारण इलावर्धन नामसे प्रसिद्ध था ॥१८॥ ऐलेय- को उसने उसका राजा बनाया सो प्रज्ञासे सहित, वीर्य धैर्य और नीतिका आधार तथा हरिवंश का तिलक स्वरूप राजा ऐलेय वहाँ अत्यधिक सुशोभित होने लगा ॥१६॥ राजा होनेपर अंग देशमें निवास करनेवाले ऐलेयने ताम्रलिप्ति नामसे प्रसिद्ध एक सुन्दर नगर वसाया ॥२०॥ जब ऐलेय नाना देशोंको जीतनेकी इच्छा करता हुआ नर्मदा नदीके तटपर आया तो उसने पृथिवी पर प्रसिद्ध माहिष्मती नामकी नगरी वसाई ॥२१॥ उस नगरीमे रहकर राजा ऐलेयने चिरकाल तक नम्रीभूत राजाओसे युक्त राज्य किया । तदनन्तर वह कुणिम नामक पुत्रके लिए राज्य सौंप- कर तपके लिए चला गया ॥२२॥ विजयके अभिलापी एवं शत्रुओंको संताप देनेवाले कुणिम- ने विदर्भ देशमं वरदा नदीके किनारे कुण्डिन नामका सुन्दर नगर बसाया ॥२३॥ कुछ समय वाद कुणिमको जीवन क्षण-भङ्गुर जान पड़ा इसलिए वह अपना वैभव पुलोम नामक पुत्रके लिए सौंपकर स्वयं तपोवनको चला गया ॥२४॥ राजा पुलोमने भी पुलोमपुर नामका नगर बसाया । १ पतिः । २. -मावृत्ता म०, ख०, ग०, ड० । ३. इलया वर्धमानं यदि-म० । ४. मलितप्रसिद्धकम् घ० | ५ मुलोमाख्ये घ० । ३२ हरिवंशपुराणे जगत्प्रभावसम्भारो तावखण्डितमण्डलौ । सूर्याचन्द्रमसौ नित्यं विजिगीपू प्रजिग्यतुः ।।२६।। ताभ्यामिन्द्रपुर चक्रे रेवायाः सरितस्तटे । जयन्तीवनवास्यौ द्वे चरमेण पुरौ कृते ॥२७॥ सञ्जयश्चरमस्यासीत् तनयो नयवित्तथा । पौलोमस्य महीदत्तस्तपस्थी जनकौ च तौ ॥२८॥ महीदत्तेन नगरं कृतं कल्पपुराख्यया । सोऽरिष्टनेमिमरस्याप्यौ तनयावुदपादयत् ।।२।। मत्स्यो भद्रपुर जित्वा सेनया चतुरङ्गया। तथा हास्तिनपुरं प्रीतस्सोऽध्यतिष्ठत् प्रतापवान् ॥३०॥ तस्य पुत्राः शतं 'जाताः शतमन्युसमाः क्रमात् । अयोधनादयो ज्येष्ठे राज्यं न्यस्य स दीक्षितः ॥३१॥ अयोधनसुतो मूलः शालस्तस्य सुतोऽभवत् । सूर्यस्तस्याभवत् सूनुस्तेन शुभ्रपुरं कृतम् ॥३२॥ तस्यासीत्वमरस्तेन वन्त्राख्यं पुरमाहितम् । देवदत्तस्ततो जातो देवेन्द्रसमविक्रमः ॥३३॥ मिथिलानाथमुत्पाद्य विदेहानामभूद्विभुः । हरिपेणस्ततो जसे नमसनस्तु सत्सुतः ॥३४॥ ततः शङ्ख इति ख्यातस्ततो भद्र इतीरितः । भभिचन्द्रस्ततश्चाभूदभिभूतरिपुधुतिः ॥३५।। विध्यपृष्टेऽभिचन्द्रेण चेदिराष्ट्रमधिष्टितम् । शुक्तिमत्यास्तटेधायि नाम्ना शुक्तिभती पुरी ॥३६॥ उप्रवंशप्रसूनायां वसुमत्यामभूद्वसुः । अभिचन्द्राद् यथामा चन्द्रकान्तमहामणिः ॥३७॥ नाम्ना तीरकदम्बोऽभूत्तन्त्र घेदार्थविदद्विजः । तस्य स्वस्तिमती पत्नी पर्वतस्तनयस्तयोः ॥३८॥ अध्यापिताश्रयस्तेन वसुपर्वतनारदाः । सरहस्यानि शास्त्राणि गुरुणा धिषणावता ॥३६॥ भारण्यकमसौ वेदमरण्येऽध्यापयन् सुतान् । आकर्णयद् गिरं व्योग्नि मुनेराकाशगामिनः ॥४०॥ अन्तमे वह पौलोम और चरम नामक पुत्रोंके लिए राज्यलक्ष्मी सौंपकर तपके लिए चला गया ॥२५।। पौलोभ और चरमका प्रभाव समस्त जगत्में फैल रहा था तथा वे दोनों अखण्डित मण्डल-अखण्ड राष्ट्रके धारक थे इसलिए विजयकी अभिलापा रखते हुए वे दोनों निरन्तर सूर्य और चन्द्रमाको जीतते थे । सूर्य और चन्द्रमाका प्रभाव भी समस्त जगत्में फैला रहता है और वे अखण्ड मण्डल-अखण्ड बिम्बके धारक होते हैं ।।२६॥ उन दोनोंने मिलकर रेवा नदीके, तटपर इन्द्रपुर नामका नगर बसाया और घरमने जयन्ती तथा वनवास्य नामकी दो नगरियाँ घसाई ॥२७॥ पौलोमके महीदत्त और चरमके संजय नामका नीतिवेत्ता पुत्र था । अन्तमें पौलोम और चरम दोनों ही तप करने लगे ॥२८॥ महीदत्तने कल्पपुर नामका नगर बसाया और अरिष्ट- नेमि तथा मत्स्य नामक दो पुत्र उत्पन्न किये ॥२६॥ प्रतापो मत्स्य अपनी चतुरंग सेनासे भद्रपुर और हास्तिनपुरको जीतकर बड़ी प्रसन्नतासे हस्तिनापुरमें रहने लगा ॥३०॥ उसके कम-क्रमसे अयोधनको आदि लेकर इन्द्रके समान पराकमके धारक सौ पुत्र उत्पन्न हुए । अन्तमें वह ज्येष्ठ पुत्रके लिए राज्य सौंपकर दीक्षित हो गया |॥३१॥ राजा अयोधनके मूल, मूलके शाल और शाल के सूर्य नामका पुत्र हुआ । सूर्यने शुभ्रपुर नामका नगर बसाया था ॥३२॥ सूर्यके अमर नामका पुत्र हुआ और उसने वन्न नामका नगर बसाया । अमरके देवेन्द्रके समान पराक्रमी देवदत्त नाम. का पुत्र हुआ ।।३३।। देवदत्त मिथिलानाथके हरिपेण, हरिषेणके नभसेन, नभसेनके शव, शसके भद्र और भद्रके शत्रुओंकी कान्तिको तिरस्कृत करनेवाला अभिचन्द्र नामका पुत्र हुआ ॥३४-३५।। अभिचन्द्रने विन्ध्याचलके ऊपर चेदिराष्ट्रकी स्थापना की तथा शुक्तिमती नदीके किनारे शुक्तिमती नामकी नगरी घसाई ॥३६॥ अभिचन्द्रकी उग्रवंशमें उत्पन्न वसुमती नामकी रानीसे वसु नामका पुत्र हुआ। वह वसु चन्द्रकान्त महामगिक समान आहृदय था ॥३७॥ उसी नगरीमें वेदार्थका वेत्ता एक क्षीरकदम्य नामका ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्रीका नाम स्वस्तिमती था और उन दोनोंके पर्वत नामका पुत्र था ॥३८॥ बुद्धिमान गुरु क्षीरकदम्बने वसु, पर्वत और नारद इन तीन शिष्याको गूढार्थ सहित समस्त शास्त्र पढ़ाये ॥३६॥ एकयार क्षीरफदम्यक वनमें उक्त तीनों पुत्रीको आरण्यफ वेद पढ़ा रहा था कि उसने १ याता: म.।

सप्तदशः सर्गः २५ वेदाध्ययनसक्तानां मध्येऽमीपामधोगतिम् । गन्तारी द्वौ नरौ पापाद् द्वौ पुण्यादूर्वगामिनी ॥४॥ इरयुक्रवा मुनिरन्यस्मै साधवेऽवधिलोचनः । करुणावान् गतः कापि ज्ञातसंसारसंस्थितिः ॥४२॥ श्रुत्वा क्षीरकदम्योऽपि वचनं शङ्किताशयः । विसृज्य सदनं शिष्यानपरासेऽन्यतो गतः ।।४३।। अपश्यन्ती पति शिष्यान् परछ स्वस्तिमयसी । उपाध्यायो गतः पुत्राः ! कुतो तेति शक्षिता ॥४४॥ तेऽयुवग्नहमेमोति वयं तेन विसर्जिताः । भायात्येवानुमागें नो माताभूस्वमुन्मनाः ॥४५॥ इति तेषां वचः श्रुरवा तस्थौ स्वस्तिमती दिवा । रामावपि यदा घाऽसौ गृहं नागतास्तदा ॥४६।। गता सा शोकिनी युवा मत्त राकूतमाकुला । ध्रुवं प्रबजितो विप्र इत्यरोदीविरं निशि ॥४७॥ समन्वेष्टुं प्रभाते तो गतो पर्वतनारदौ । धनान्तेऽपश्यतो भ्रान्ती दिनैः कतिपयैरपि ॥८॥ स निषण्णमधीयानं निन्थं गुरुमसिधौ । पितरं पर्वतो दृष्ट्वा दूराग्निववृतेऽतिः ॥४६॥ मारे गिवेग वृसान्तं तया दुःखितचित्तया । कृत्वा दुःखं विशोकाऽसौ तिष्ठति स्म यथामुखम् ॥५०॥ नारदस्तु विनीतामा गुरोः कृत्वा प्रदक्षिणम् । प्रणम्याणुवती भूस्खा सम्भाप्य गृहमागतः ॥५॥ 'भाश्वास्य शोकसन्तप्ता नवा पर्वतमातरम् । जगाम निजधामासी नारदोऽतिविशारदः ॥५२॥ घसोरपि पिता राज्यं वसी विन्यस्य विस्तृतम् । संसारमुखनिर्विष्णः प्रविवेश तपोवनम् ॥५३।। । आकाशमें किन्हीं चारण ऋद्धिधारी मुनिके निम्नांकित वचन सुने ॥४०॥ वे कह रहे थे कि वेदाध्ययनमें लगे हुए इन चार मनुष्योके वीचमें पापके कारण दो तो अधोगतिको जावेंगे और दो पुण्यके कारण ऊर्ध्वगति प्राप्त करेंगे ॥४१॥ जो अवधिज्ञानरूपी नेत्रके धारक थे, दयालु थे और संसारकी सब स्थिति जानते थे ऐसे वे मुनिराज साथके दूसरे मुनिसे इस प्रकार कहकर फहीं चले गये ॥४२॥ इधर मुनिराजके उक्त वचन सुनकर क्षीरफदम्बकका हृदय शकित हो उठा। जय दिन ढल गया तो उसने शिष्योंको तो घर भेज दिया पर स्वयं अन्यत्र चला गया ॥४३॥ पतिको शिष्यों के साथ न देख स्वस्तिमतिने शङ्कित हो पूछा कि अरे शिष्यो ! उपाध्याय कहाँ गये हैं ? यताओ॥४४॥ शिप्योंने कहा कि उन्होंने हमलोगोंको यह कहकर भेजा था कि मैं अभी भाता हूँ। हे माँ ! चे मार्गमें पीछे आते ही होंगे, व्यग्र न होभो ॥४॥ शिष्योंके उक्त वचन मुन स्वम्तिमती दिन भर तो चुप बैठी रहो परन्तु जब यह रात्रिको भी घर नहीं आया तो उसके शोकको सीमा नहीं रही। यह पतिका अभिप्राय जानती थी इसलिए जान पड़ता है प्राह्मणने दीक्षा ले ली है, यह विचारकर यह चिरकाल तक रोती रहो ॥४६-४७॥ प्रातःकाल होनेपर पर्वत और नारद उसे खोजने के लिए गये । वे कितने ही दिन भटकते रहनेसे थक गये। अन्तमें उन्होंने देखा कि पिता क्षीरफदम्यक बनके अन्त में गुरुके पास निमन्य मुद्रा में बैठकर पढ़ रहे हैं। पिताको इस प्रकार घंठा देसफर पर्वतका धैर्य छूट गया। उसने दूरसे ही लौटफर माताके लिए सय समाचार सुनाया। पर्वतके मुससे पतिकी दीक्षाका समाचार जानकर प्रादाणी स्वस्तिमती बहुत दुसी हुई । पर्वतने भी माताके साथ दुःस मनाया । अन्तमें धीरे-धीरे शोक दूरफर दोनों पहलेके समान मुससे गहने लगे ॥४८-५०॥ पर्यत तो दूरसे चला आया था परन्तु नारद विनयी था इसलिए उसने गुम्के पास जाकर प्रदक्षिणा दी, नमस्कार किया, उनसे यार्तालाप कर अणुव्रत धारण किये और उसके बाद यह घर पापिस आया ॥५१॥ भतिशय निपुण नारदने आफर शोफसे संवत पर्वतको माताको आश्वासन दिया, नमस्कार किया और उसफे. याद भपने घरफी और प्रस्थान किया ॥५२॥ तदनन्तर घमुके पिता राजा अभिचन्द्र भी संसारफे मुखसे उदासीन हो गये इसलिए अपना विस्तृत राज्य यमुके १.धाशास्वम.।

२५२ हरिवंशपुराणे वसुना वासवेनेव नवयौवनवतिना । वनितेव विनीतरवं नीता नीतिविदावनिः ।।५४|| नभःस्फटिकमूर्द्धस्थसिंहासनमधिष्ठितम् । नभस्थमेव भूपास्तं दत्तास्थानममंसत ॥५५।। भूमौ कीर्तिरभूत्तस्य महिम्ना धर्मजन्मना । 'अश्मोपरिचरस्यात्र वसोरन्वर्थतापुपः ॥५६॥ इक्ष्वाकुवंशजा जाया कुरुवंशोद्भवा परा । दशपुत्रास्तयोर्जाताः यसोवंसुसमाः क्रमात् ।।५।। वृहद्वसुरिति ज्ञेयः पूर्वश्चिन्नवसुः परः । वासवश्वार्कनामा च पञ्चमश्च महावसुः ॥१८॥ विश्वावसू रविः सूर्यः सुवसुश्च बृहद्ध्वजः । इत्यमी वसुराजस्य मुताः सुविजिगीषवः ॥५६॥ सुतैर्दशभिरन्योऽन्यनीतिबद्धमनोरथैः । इन्द्रियार्थे रिवोपेतः पार्थिवः सुखमन्वभूत् ।।६०॥ एकदा नारदरछात्रैबहुभिश्छनिभिर्वृतः । गुरुवद्गुरुपुत्रेच्छः पर्वतं द्रष्टुमागतः ।।६१॥ कृतेऽभिवादने तेन कृतप्रत्यभिवादनः । सोऽभिवाद्य गुरोः पत्नी गुरुसङ्कथया स्थितः ॥१२॥ अथ व्याख्यामसौ कुर्वन् वेदार्थस्यापि गर्वितः । पर्वतः सर्वतश्शात्रवृतो नारदसन्निधौ ॥६३।। भजैर्यध्यमित्यन्न वेदवाक्ये विसंशयम् । जशब्दः फिलाम्नातः पश्वर्थस्यामिधायकः ॥६॥ तैरजः खलु यष्टव्यं स्वर्गकामैरिह द्विजः । पदवास्यपुराणार्थपरमार्थविशारदः ॥१५॥ प्रतिबन्धमिहान्धस्य तस्य चक्रे स नारदः । युक्रयागमबलालोकध्वस्ताज्ञानतमस्तरः ।।६।। भट्टपुत्र ! किमित्येवमपव्याख्यामुपाश्रितः । कुतोऽयं सम्प्रदायस्ते सहाध्यायित्नुपागतः ॥६७।। लिए सौंपकर तपोवनको चले गये ॥५३॥ नव यौवनसे मण्डित, नीतिका वेत्ता वसु इन्द्रके समान जान पड़ता था। उसने समस्त पृथिवीको स्त्रीके समान वशीभूत कर लिया था ।।५४|| राजा वसु समामे भाकास्शफटिकके ऊपर स्थित सिंहासनपर बैठता था इसलिए अन्य राजा उसे आकाशमें ही स्थित मानते थे ॥५५॥ राजा वसु सदा आकाशस्फटिक पर चलता था और सदा सत्यका ही पोषण करता था इसलिए पृथिवीपर उसका यही यश फैल रहा था कि यह धर्मकी महिमासे आकाशमें चलता है ॥५६॥ उसकी एक स्त्री इक्ष्वाकुवंशको और दूसरी कुरुवंशकी थी। उन दोनोसे उसके क्रमसे १ वृहद्वसु, २ चित्रवसु, ३ वासव, ४ अर्क, ५ महावसु, ६ विश्वावसु, ७ रवि, ८ सूर्य, सुवसु और १० बृहद्ध्वज ये दश पुत्र हुए। ये सभी पुत्र वसुके ही समान अतिशय विजिगीषु-विजयाभिलापी-पराक्रमी थे ॥५७-५६।। इन्द्रियों के विषयोंके समान परस्परकी प्रीति- से युक्त इन दश पुत्रोंसे सहित राजा वसु अत्यधिक सुखका अनुभव कर रहा था ॥६॥ अथानन्तर एक दिन बहुतसे छत्रधारी शिष्योसे घिरा नारद, गुरुपुत्रको गुरुके समान मानता हुआ पर्वतसे मिलनेके लिए आया ॥६१॥ पर्वतने नारदका अभिवादन किया और नारदने पर्वतका प्रत्याभवादन किया। तदनन्तर गुरुपत्नीको नमस्कारकर नारद गुरुजीकी चर्चा करता करता हुआ बैठ गया ॥६॥ उस समय पर्वत सब ओरसे छात्रोसे घिरा वेद वाक्यकी व्याख्या कर रहा था सो नारदके सन्मुख भी उसी तरह गर्वसे युक्त हो व्याख्या करने लगा ॥६३॥ वह कह रहा था कि 'अजैर्यष्टव्यम' इस वेद वाक्यमें जो अज शब्द आया है वह निःसन्देह पशु अर्थका ही वाचफ माना गया है ॥६४॥ इसलिए पद् वाक्य और पुराणके अर्थके वास्तविक जाननेवाले एवं स्वर्गके इच्छुक जो द्विज हैं उन्हें बकरासे ही यज्ञ करना चाहिए ॥६॥ युक्तिबल और आगम बलरूपी प्रकाशसे जिसका अज्ञानरूपी अन्धकारका पटल नष्ट हो गया था ऐसे नारदने अज्ञानी पर्वतके उक्त अर्थपर आपत्ति की ॥६६॥ नारदने पर्वतको सम्बोधते हुए कहा कि हे गुरुपुत्र ! तुम इस प्रकारको निन्दनीय व्याख्या क्यों कर रहे हो ? हे मेरे सहाध्यायी ! यह १. अस्योपरि -म०। २. रन्वर्धतायुषः म०, फ०। ३. बृहद्ध्वजाः म । ४ युक्तागम- म०1 युक्त्यागमबलाल्लोक-ख० !

सप्तदशः सर्गः २५३ एकोपाध्यायशिष्याणां नित्यमन्यभिचारिणाम् । गुरुशुश्रूपताऽन्यागै सम्प्रदायभिदा कुतः ॥६॥ म स्मरत्याशब्दस्य यथैहार्थो गुरूदितः । निवर्षा ब्रीहयोऽयोजा अजा इति सनातनः ॥६६॥ इत्युक्तोऽपि स दुर्मोचग्राहमहगृहीतधीः । सोऽनादृत्य वचस्तस्य प्रतिज्ञामकरोत्पुनः ॥७०॥ किमान बहुनौक्तेन शृणु नारद ! वस्तुनि । पराजितोऽस्मि यद्यत्र जिह्वाच्छेदं करोग्यहम् ॥७॥ नारदेन ततोऽवाचि किं दुःखाग्निशिखातती । पतग इव दुःपक्षः पर्वत ! पतसि स्वयम् ॥७२॥ पर्वतोऽपि ततोऽवोचद् यात कि बहुजल्पितेः । श्वोऽस्तु नौ वसुराजस्य सभायां जल्पविस्तरः ॥७३॥ नष्टस्त्वं दृष्ट इत्युक्त्वा स्वावासं नारदोऽगमत् । पर्वतोऽपि च तां वातां मातुरातमतिर्जगी ॥७॥ सा निशम्य हतास्मीति वदन्ती सान्तमानसा । निनिन्द नन्दन मिथ्या त्वदुक्तमिति वादिनी ॥७५॥ नारदस्य वचः सत्य परमार्थनिवेदनात् । वचस्तवान्यथा पुत्र ! विपरीतपरिग्रहात् ॥७६॥ समस्तशास्त्रसन्दर्भगर्भनिभेदशुद्धीः । पिता ते पुत्र ! यत्प्राह तदेवारयाति नारदः॥७॥ एवमुक्त्वा निशान्ते सा निशान्तमगमहसोः । भादरेणेषिता तेन पृष्टा चागमकारणम् ॥७॥ निगद्य वसवे सर्व ययाचे गुरुदक्षिणाम् । हस्तन्यासकृतां पूर्व स्मरयित्वा गुरोहे' n७६॥ जानताऽपि त्वया पुन ! तत्त्वाऽतत्त्वमशेषतः । पर्वतस्य वचः स्थाप्यं दूप्यं नारदमापितम् ॥ सन्येन श्रावितेनास्या वचन वसुना ततः। प्रतिपनमतः साऽपि कृतार्थव ययौ गृहम् ॥१ सम्प्रदाय तुम्हें कहाँसे प्राप्त हुआ है ? १६७॥ जो निरन्तर साथ-ही-साथ रहे हैं तथा जिन्होंने कभी गुरुकी शुश्रूपाका त्याग नहीं किया ऐसे एक ही उपाध्यायके शिष्योंमें सम्प्रदाय भेद कैसे हो सकता है ? ॥६८। यहाँ अज शब्दका जैसा अर्थ गुरुजीने वताया था वह क्या तुम्हें स्मरण नहीं है ? गुरुजीने तो कहा था जिसमें अंकुर उत्पन्न होनेकी शक्ति नहीं है ऐसा पुराना धान्य अज कहलाता है यही सनातन अर्थ है ॥६६॥ दुःखसे छूटने योग्य हठ रूपी पिशाचसे जिसकी बुद्धि मस्त थी ऐसे पर्वतने नारदके इस प्रकार कहनेपर भी अपना हठ नहीं छोड़ा प्रत्युत नारदके वचनोंका तिरस्कारकर उसने यह प्रतिज्ञा कर ली कि हे नारद ! अधिक कहनेसे क्या ? यदि इस विषयमें मैं पराजित हो जाऊँ तो अपनी जीभ कटा लें ॥७०-७१॥ पश्चात् नारदने कहा कि हे पर्वत ! खोटा पक्ष लेकर, खोटे पंखोंसे युक्त पीके समान दुःखरूपी अग्निकी ज्यालाआम स्वयं क्यों पड़ रहे हो ? इसके उत्तरमै पर्वतने भी कहा कि जाओ बहुत कहने से क्या ? कल हम दोनों- का राजा यसुकी सभामें शास्त्रार्थ हो जावे ।।७२-७३॥ वितण्डावाद बढ़ते देख नारद यह कहकर अपने घर चला गया कि पर्वत ! मै तुम्हें देखने आया था सो देख लिया, तुम भ्रष्ट हो गये। नारदके चले जानेपर पर्वतने भी दुःखी होकर यह वृत्तान्त अपनी मातासे कहा ॥७४॥ पर्वतकी वात सुनकर उसकी माताका हृदय बहुत दुःखी हुआ। 'दाय मैं मरी' यह कहती हुई उसने पर्वत- को निन्दा की, उसके मुखसे बार-बार यही निकल रहा था कि तेरा कहना मूळ है ॥७॥ हे पुत्र! परमार्थका प्ररूपक होनेसे नारदका कहना सत्य है और विपरीत अर्थका आश्रय लेनेसे तेरा कहना मिथ्या है ॥६॥ समस्त शास्त्रोंके पूर्वापर सन्दर्भके ज्ञानसे जिनकी बुद्धि अत्यन्त निर्मल थी ऐसे तेरे पिताने जो कहा था हे पुत्र ! घही नारद कह रहा है ॥७७॥ इस प्रकार पर्ववसे कहकर वह प्रातःकाल होते ही राजा वसुके घर गई । गजा वमुने उसे बड़े आदरसे देखा और उससे आनेका कारण पूछा ॥७॥ स्वस्तिमतीने घसुके लिए सब वृत्तान्त सुनाकर पहले पढ़ते समय गुरुगृहमें उसके हाथमें धरोहर रूपी रखी हुई गुरुदक्षिणाका स्मरण दिलाते हुए याचना की कि हे पुत्र ! यद्यपि तू सत्र तत्त्व और अतत्वको जानता है तथापि तुमे पर्वतके हो वचनका समर्थन करना चाहिए और नारदके वचनको दूपित ठहराना चाहिए ॥६-८०॥ स्वस्तिमतीने १. शुभूपता त्यागे म. १२. यात: म । ३ सोऽस्तु म०, क, ड० । ४. दुष्ट म 1५ गृहम् ।

२५४ हरिवंशपुराणे भास्थानीसमये तस्थौ दिनादी वमुरासने । तमिन्द्रमिव देवीघा सत्रियौघाः सिपेविरे ॥२॥ प्रविष्टौ च नृपास्थानी विौ पर्वतनारदौ । सर्वशास्त्रविशेषज्ञः प्राश्निकैः परिचारिती ॥३॥ माझगाः सप्रियाः वैश्याः शूद्राः सामिणोऽविशन् । लौकिकाः सहज प्रष्टुमविशेपाहते सभाम् ॥४॥ तस्मामानि' जगुः केचिजनधोत्रमुग्मायलम् । तन प्रोचारणं भृष्टं केचिद् विप्राः प्रचबिरे ॥५॥ यपि प्रणवारम्भघोपभाजोऽपरेऽपटन् । पदमजुपो मन्यानामनन्ति स्म केचन ॥६॥ उदात्तस्यानुदात्तस्य स्वरस्य स्वरितस्य च । हस्वदीर्घप्लुतस्थस्य स्वरूपमुदचीचरन् ॥७॥ द्विजैः मामग्यं जुदमारभ्याध्ययनोधुरैः । यधिरीकृन दिवनिचितं सदसोऽजिरम् ॥८॥ सिंहासनस्थमाशीभिरंवोपरिचरं घम् । पीटमर्दः सहासीनी वित्री नारदपर्वतोमा कृचंपारोहिगम्नय कमण्डलुहरफलाः । मवरकलजटामारास्तस्थुस्तापसपादपाः ॥३०॥ मदः सागरसशोभमेतुयन्धेषु पुचित् । भपक्षपातसम्बन्धतुलादण्देषु केचित् ॥६॥ उरपोरयानवादीभस्वंकुशेषु घ केचित् । निक्षोपलक्रुपेषु केचित्तत्यमार्गणे ॥३२॥ पण्डितेषु यथास्थानं निविष्टेषु यथामनम् । भूपं ज्ञानवयोवृद्धाः केचिदेवं व्यजिज्ञपन् ॥३३॥ राजन् ! पस्तुविवादादिमी नारदपयंती। विद्वांसायागती पाच न्यायमार्गविदस्तव ॥४॥ चूंकि यमुको गुरुदक्षिणाविषयक सत्यका स्मरण कराया था इसलिए उसने उसके वचन स्वीकृत कर लिये और वह भी फनकृत्यके समान निश्चिन्त हो घर वापिस गई ॥१॥ सदनन्सर जय प्रातःकाल के समय सभाका अवसर भाया तय राजा यमु सिंहासनपर आम्द दुभा और जिस प्रकार देवांके समूह इन्द्रकी सेवा करते हैं उसी प्रकार क्षत्रियों के समूह नमकी सेवा करने लगे ॥२॥ उसी समय सर्व शास्त्रों के विशेपक्ष प्रश्नकर्ताओंसे घिरे पर्यत और नारदने राजसभामें प्रवेश किया ॥८३॥ प्राग, सत्रिय, वैश्य, शूद्र और आश्रमवासी भी आये तथा अन्य साधारण मनुष्य भी विशेष आमन्त्रण न होनेपर भी सहज स्वभाववश प्रश्न फरनेके लिए मभामें आ ये || उस समय राजसमामें कितने ही प्रामण मनुष्योंके फानोंको मुख देनेयाले मामवेद गा रहे थे और कितने ही वेदीका स्पष्ट एवं मधुर उच्चारण फर गरे थे | फिनने दी भीकार ध्यनिके माथ यजुर्वेदका पाठ कर रहे थे और कितने ही पद सथा प्रगमे युग. अनेक मन्त्रीको आवृत्ति कर रहे थे ॥८६॥ किसने हो हस्य दीर्घ और प्लुन भेदीको लिये हुए वदास अनुदात्त और स्यरित स्यगरे स्वरूपका उच्चारण कर रहे थे ॥८७।। जो प्रग्वेद मामयेर और यजु दफो प्रारम्भफर जोर-जोरमे पाठ कर रहे थे तथा जिन्होंने दिशाओंके ममूहको यहिंग पर दिया था ऐसे मानगोम मभाषा भोगन गपागप भर गया ||| अन्तर्गत मिदामनगर स्पिन गजायको भाशीयांदकर नारद और पर्यन अपने-अपने महायोंके साथ पथायोग म्यानपर बैठ गये जो टांडीपी अंपुरीसे सहित ये नथा पगण्टरुपी पहे. पई पल धान पर रहे मे पन्फल भीर अदाभीक माग्मे मुक्त भनेक तापसरूपी वृथा यही विमान on मममय जो पनि ममाम यथा ग्यान पैठे थे हम किमने ही समारपी मागम मनोनपर उगेगाने दिल मेमुपन्य ममान धे, विनोद पास नदी गरमा दिप गुटादण्डके ममान थे, जिन दो एमागमे परीपाले यादीमपी हाथियों को परा पनि गोष, ममान भोर किलोदी भेटतात्यकी गा कर लिए मोदी पायागमन गप पितान गयाम्मान पयायोग्य भामांसपेट गये गयीशान भीर {qរឮ पर मेशिन होमोगाने रामा गगुमे इस प्रकार निवेदन किया ॥६१-५३॥ गतमय नार भौर पपंत पिकान किसी यातु विपार दोनंगे भार पाग - सतदशः सर्गः २५५ वैदिकार्यविचारोऽयं वदन्येपामगोचरः। विच्छिन्नसम्प्रदायानामिदानीमिह भूतले ॥१५॥ तदन्न भवतोऽध्यक्षममीपां विदुषां पुरः । लभेता निश्चयादेतौ न्यारयो जयपराजयौ ॥२६॥ न्यायेनावसिते ह्यन वादे वेदानुसारिणाम् । स्यात्प्रवृत्तिरसन्दिग्धा सर्वलोकोपकारिणी ॥१७॥ इयुर्वीन्द्रः स विज्ञप्तः पूर्वपतमदापयत् । पर्वताय सदस्यस्तैः सगर्वः पक्षमग्रहीत् ॥१८॥ अजैर्यज्ञविधिः कार्यः स्वर्गाधिमिरिति श्रुतिः । भजाश्चात्र चनुपादाः प्रणीताः प्राणिनः स्फुटम् ॥२६॥ न केवलमयं वेदे लोकेऽपि पशुवाचकः । आवृद्धादगनाबालाइजशब्दः प्रतीयते ॥१०॥ नरोऽजपोतगन्धोऽयमजायाः तीरमित्यपि । नापनेनुमियं शश्या प्रसिद्धिस्त्रिदशैरपि ॥१०॥ सिद्धशब्दार्थसम्बन्धे नियते तस्य बाधने । व्यवहारविलोपः स्यादन्धकमिदं जगत् ॥१०२॥ भबाधितः पुनाये शादे शब्दः प्रवर्तते । शास्त्रीयो लौकिकश्चात्र व्यवहारः सुगोचरे ॥१०॥ यथाग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम इति श्रुती । भग्निप्रभृतिशब्दानां प्रसिद्धार्थपरिग्रहः ॥१०४॥ तथैवात्राजशब्दस्य पशुरः स्फुटः स्थितः । कुन यागादिशब्दार्थः पशुपातश्च निश्चितः ॥१०५॥ भतोऽनुष्टानमास्थेयमजपोतनिपातनम् । यजैयष्टव्यमित्यन वाक्यनिष्टितसंशयः ॥१०६॥ आशङ्का च न कर्तव्या पशोरिह निपातने । दुःसं स्यादिति मन्त्रेण सुखमृत्योर्न दुःखिता ॥१०७॥ मन्त्राणां घाहने सासाद् दीक्षान्तेऽतिसुखासिका । मणिमन्त्रीपधीनां हि प्रभावोऽचिन्त्यतां गतः ॥१०॥ आये है क्योंकि आप न्याय मार्गके वेत्ता हैं ॥६४|| यह वैदिक अर्थका विचार इस समय पृथिवी- तलपर आपके सिवाय अन्य लोगोंका विपय नहीं है क्योंकि उन सबका सम्प्रदाय छिन्न-भिन्न हो चुका है ॥६५॥ इसलिए आपकी अध्यक्षतामें इन सब विद्वानोंके आगे ये दोनों निश्चय कर न्यायपूर्ण जय और पराजयको प्राप्त करें ॥६६॥ न्याय द्वारा इस वादके समाप्त होनेपर वेदा- नुसारी मनुष्योंकी प्रवृत्ति सन्देह रहित एवं सब लोगोंका उपकार करनेवाली हो जायगी ॥६७|| इस प्रकार वृद्धजनोंके कहने पर राजा वसुने पर्वतके लिए पूर्व पक्ष दिलवाया अर्थात् पूर्वपक्ष रखनेका उसे अवसर दिया और अपने साथी सदस्योंके कारण गर्वसे भरे पर्वतने पूर्व पा ग्रहण किया ॥६॥ पूर्व पक्ष रखते हुए उसने कहा कि 'स्वर्गके इच्छुक मनुष्योंको अजों द्वारा यज्ञकी विधि करना चाहिए' यह एक श्रुति है इसमें जो अज शब्द है उसका अर्थ चार पायों वाले जन्तु विशेष-बकरा है MEET अज शब्द न केवल वेदमें हो पशु वाचक है किन्तु लोकमें भी स्त्रियों और बालकोसे लेकर वृद्धों तक पशु वाचक ही प्रसिद्ध है ।।१००॥ यह मनुष्य अजके चालकके समान गन्ध वाला है, और यह अजा-बकरीका दूध है' इत्यादि स्थलों में अज शब्दकी जिस अर्थमे प्रसिद्धि है वह देवोंके द्वारा भी दूर नहीं की जा सकती ॥१०१॥ सिद्ध शब्द और उसके अर्थका जो सम्बन्ध पहलेसे निश्चित चला आ रहा है यदि उसमें बाधा डाली जावेगी तो व्यवहारका हो लोप हो जावेगा क्योंकि यह जगत् अंध उलूकोसे सहित है-निर्वि- चार मनुष्यांसे भरा हुआ है ।।१०२॥ शब्द योग्य अर्थमें अवांछित रूपसे प्रवृत्त होता है और ऐसा होनेपर ही शास्त्रीय अथवा लौकिक व्यवहार चलता है ।।१०३|| जिस प्रकार 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' स्वर्गका इच्छुक मनुष्य अग्निहोत्र यज्ञ करे,' इस श्रुतिमें अग्नि आदि शब्दोंका प्रसिद्ध ही अर्थ लिया जाता है उसी प्रकार 'अर्यष्टव्यं स्वर्गकामः' स्वर्गके इच्छुक मनुष्योंको अजोंसे होम करना चाहिए इस श्रुतिमें भी अजका पशु अर्थ ही स्पष्ट है और यागादि शब्दोंका अर्थ तो पशुधात निश्चित ही है ॥१०४-१०५॥ इसलिए 'भर्यष्टव्यम्' इत्यादि वाक्यों द्वारा निःसन्देह, जिसमें अजके वालकका घात होता है ऐसा अनुष्ठान करना चाहिए ॥१०॥ यहाँ यह आशङ्का नहीं करनी चाहिए कि घात करते समय पशुको दुःस होता होगा क्योंकि मन्त्र- के प्रभावसे उसकी सुखसे मृत्यु होती है उसे दुःस तो नाम मात्रका भी नहीं होता ।।१०।। दीक्षाके अन्त मन्त्रीका उच्चारण होते ही पशुको सुखमय स्थान साक्षान् दिसाई देने लगता है २५६ हरिवंशपुराणे निपातनं च कस्यात्र यत्रारमा सूक्ष्मतां श्रितः । 'अवध्योऽग्निविषास्त्रायः किं पुनमन्त्रवाहनैः ॥१०॥ सूर्य चक्षुर्दिशं श्रोनं वायु प्राणानसृक्पयः । गमयन्ति वपुः पृथ्वों शमितारोऽस्य याज्ञिकाः ॥११॥ स्वमन्त्रेणेष्टमात्रेण स्वाक गमितः सुखम् । याजकादिवदाकल्पमनल्पं पशुरश्नुते ॥११॥ अभिसन्धिकृतो बन्धः स्वर्गाश्यै सोऽस्य नेत्यपि । न बलाद्याज्यमानस्य शिशोद्धिघृतादिभिः ॥१२॥ स्वपक्षमित्युपन्यस्य विरराम स पर्वतः । नारदस्तमपाक मिस्युवाच विचक्षणः ॥११३॥ शृण्वन्तु मद्वचः सन्तः सावधानधियोऽधुना। पर्वतस्य वचः सर्व शतखण्डं करोम्यहम् ॥१४॥ अजैरित्यादिके वाक्ये यन्मृपा पर्वतोऽब्रवीत् । भजाः पशव इत्येवमस्यैषा स्वमनोपिका ॥१५॥ स्वाभिप्रायवशाद वेदे न शब्दार्थगतियंतः । वेदाध्ययनवसालादुपदेशमुपेक्षते ॥११६॥ गुरुपूर्वक्रमादर्थात् दृश्यः शब्दार्थनिश्चितः । सान्यथा यदि जायेत जायताध्ययनं तथा ॥१७॥ अथाध्ययनमन्य त् स्यादन्यत्स्यादर्थवेदनम् । स्थिते साधारणे न्याये कामचारगतिः कुतः ॥११॥ शब्दस्या स्वतो वेत्ति प्रज्ञासातिशयोऽपि हि । न शब्दमिति शापोऽयं कुतः कस्यात्र दुस्तरः ॥११॥ सो ठीक ही है क्योंकि मणि मन्त्र और ओपपियोंका प्रभाव अचिन्त्य होता है ।।१०८।। जब कि आत्मा अत्यन्त मूक्ष्मताको प्राप्त है तब यहाँ यात किसका होता है ? यह आत्मा तो अग्नि, विष तथा अस्त्र आदिके द्वारा भी घात करने योग्य नहीं है फिर मन्त्र पाठोंके द्वारा तो इसका घात होगा ही किस तरह ? ॥१०॥ याज्ञिक लोग यज्ञमें पशुका घातकर उसके चक्षुको सूर्यके पास, क्षेत्रको दिशाओके पास, प्राणोंको वायुके पास, खूनको जलके पास और शरीरको पृथियोके पास भेज देते हैं। इस तरह याज्ञिक उसे शान्ति पहुँचाते हैं न कि कष्ट । मन्त्र द्वारा होम करने मात्रसे ही पशु सीधा स्वर्ग भेज दिया जाता है और वहाँ यज्ञ करानेवाले आदिके समान वह कल्पकाल तक बहुत भारी सुख भोगता रहता है ॥११०-१११॥ अभिप्राय पूर्वक किया हुआ पुण्य बन्ध ही स्वर्ग प्राप्तिका कारण है और बलपूर्वक होमे गये पशुके वह सम्भव नहीं है इसलिए उसे स्वर्गकी प्राप्ति होना असम्भय है, यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि जिस प्रकार बच्चेको उसको उसकी इच्छाके विरुद्ध जबर्दस्ती दिये हुए घृतादिकसे उसकी वृद्धि देखी जाती उसी प्रकार यज्ञमें जबर्दस्ती होमे जानेवाले पशुके भी स्वर्गको प्राप्ति देखी जाती है ॥११२।। इस प्रकार यह पर्वत अपना पूर्व पक्ष स्थापित कर चुप हो रहा तदनन्तर बुद्धिमान नारद उसका निराकरण करने के लिए इस तरह बोला ।।११३।। उसने कहा कि हे सज्जनो! सावधान होकर मेरे वचन सुनिए मैं अय पर्वतके सब वचनोंके सो टुकड़े करता हूँ ॥११४॥ 'अजैर्यष्टव्यम्' इत्यादि वाक्यमें पर्वतने जो कहा है वह मूठ है। क्योकि अजका अर्थ पशु है यह इसकी स्वयंकी कल्पना है ॥११५॥ वेदमं शब्दार्थको व्यवस्था अपने अभिप्रायसे नहीं होती किन्तु वह वेदाध्ययनके समान आप्तसे उपदेशको अपेक्षा रखती है ॥११६॥ कहने का तात्पर्य यह है कि गुरुओंको पूर्व परम्परासे शब्दोंके अर्थका निश्चय फरना चाहिए । यदि शब्दार्थका निश्चय अन्यथा होता है तो अध्ययन भी अन्यथा हो जायगा ॥११७॥ यदि यह कहा जाय कि अध्ययन दूसरा है और अर्थज्ञान उससे भिन्न हो सकता है तो यह कहना ठीक नहीं क्योंकि उभयत्र न्याय समान होने या एकके विपयम मनमानी कैसे हो सकती है ? भावार्थ-यदि अध्ययन गुरु-परम्पराको अपेक्षा रखता है तो अर्थमान भी गुरु परम्पराको अपेक्षा रक्सेगा यह न्याय सिद्ध यात है ॥११॥ यदि यह कहा जाय कि प्रज्ञाशाली १. नैनं छिन्दन्ति नैन दहति पारकः। न चैनं क्लेदयन्त्यारोन शोषयति मारुतः॥ -भगवद्गीता २. श्यः शन्दाधनिश्चितिः घ०, म०, ४० टएः शन्दार्थ क.। ३ -मन्यः स्यादन्यःमः !

सप्तदशः सर्गः २५७ न चायं सम्प्रदायोऽस्मायेकस्मै गुरुणोदितः । त्रयः शिष्याः वयं योग्या वसुनारदपर्वताः ॥१२०॥ समानश्रुतिकाः शब्दाः सन्ति लोकेऽत्र भूरिशः । गवादयः प्रयोगोऽपि तेषां विषयभेदतः ॥२१॥ पशुरश्मिमृगाक्षाशावनवाजिषु वाग्भुवोः । गोशदव्यक्तयो व्यक्ताः प्रयुज्यन्ते पृथक-पृथक् ॥१२२॥ न हि चित्रगुरित्या रश्मिवस्तुनि शेमुपी । न चोशीतगुरिस्यत्र सास्नादिमति वर्तते ॥१२३॥ रूढ्या क्रियावशाद्वाच्ये वाचां वृत्तिरवस्थिता । तामस्थिरोपदेशास्तु विस्मरन्ति गुरूदितम् ॥२४॥ तदन्न चोदनावाक्ये रूढिशब्दार्थदूरगः । क्रियाशब्दस्य चाम्नातो न जायन्त इति राजाः ॥२५॥ ऐश्वर्य रूढिशब्दस्य विद्वद्भिर्लोकशास्त्रयोः । अजगन्धोऽयमिन्यादौ प्रयोगो न निषिध्यते ॥१२॥ तेन पूर्वोन्नदोषोऽपि नैवास्माकं प्रसज्यते । व्यवहारोपयोगित्वाद् वाचां स्वोचितगोचरे ॥१२७॥ सत्यां क्षित्यादिसामग्यामप्ररोहादिपर्यया । बीहयोऽजाः पदार्थोऽयं वाक्यार्थो यजनं तु तैः ॥१२॥ देवपूजा यजेरथस्तैरजैयंजनं द्विजैः । नैवेद्यादिविधानेन यागः स्वर्गफलप्रदः ॥२६॥ मनुष्य शब्दका अर्थ तो स्वयं जान लेता है पर शब्दको नहीं जान पाता यह दुस्तर शाप यहाँ किसके लिए किससे प्राप्त हुआ था सो वताओ। भावार्थ-यदि बुद्धिमान् मनुष्य अपनी इच्छासे शब्दके अर्थकी कल्पना कर लेता है तो उसे शब्द भी बना लेना चाहिए इसमें द्विविधा की क्या बात है ? ।।११।। गुरुने यह सम्प्रदाय एक पर्वतके लिए ही बनाया हो यह भी सम्भव नहीं है क्योंकि हम वसु, नारद और पर्वत ये तीन योग्य शिष्य थे। भावार्थ-तीन शिष्योमसे एक शिष्यको गुरु दूसरा अर्थ बतलावें और शेपको दूसरा अर्थ यह सम्भव नहीं दिखता ॥१२०॥ लोकमें गोको आदि लेकर ऐसे बहुत शब्द हैं जिनका समान श्रवण होता है-समान उच्चारण - होता है परन्तु विषय भेदसे उनका प्रयोग जुदा-जुदा होता है। जैसे गो शब्द-पशु, किरण, मृग, इन्द्रिय, दिशा, वन, घोड़ा, वचन और पृथिवी अर्थमें प्रसिद्ध है परन्तु सब अर्थो में उसका पृथक्- पृथक् ही प्रयोग होता है । 'चित्रगु इस शब्दमें गोका किरण अर्थ कोई नहीं करता और 'अशी- तगु' इस शब्दमें गो शब्दका अर्थ सारनादिमान् पशु कोई नहीं मानता किन्तु प्रकरणके अनुसार 'चित्रगु' शब्दमें गोका अर्थ गाय और 'अशीतगु' शब्दमै किरण ही माना जाता है ॥१२१-- १२३॥ शब्दोंके अर्थमे जो प्रवृत्ति है वह या तो रूढ़िसे होती है या क्रियाके आधीन होती है परन्तु जिनके हृदयमें गुरुका उपदेश चिरकाल तक स्थिर नहीं रहता वे गुरु-प्रतिपादित अर्थको भूल जाते हैं ।।१२४|| इसलिए 'अजैर्यष्टव्यम्' इस वेद-वाक्यमें अज शब्दका अर्थ रूढ़िगत अर्थसे दूर 'न जायन्ते इति अजाः' (जो उत्पन्न न हो सकें वे अज हैं) इस व्युत्पत्तिसे क्रिया सम्मत 'तीन वर्षका धान्य' लिया गया है ।।१२शा विद्वान् लोग, लोक और शास्त्र दोनों में रूढ़ि शब्दके ऐश्वर्य- को जानते हैं अतः 'अजगन्धोऽयं पुरुषः' इत्यादि स्थलों में अज शब्दका यकराअर्थमें प्रयोग निपिद्ध नहीं है ॥१२६॥ पर्वतने जो पहले यह दोष दिया था कि यदि शब्दोंका स्वभावसिद्ध अर्थ न पिया जायगा तो व्यवहारका ही लोप हो जायगा उसका हमारे ऊपर प्रसङ्ग ही नहीं आता क्योंकि शब्दोका अपने-अपने योग्य स्थलोपर व्यवहारकी सिद्धिके लिए ही उपयोग किया जाता है ॥१२७। इसलिए पृथिवी आदि सामग्रीके रहते हुए भी जिसमें अंकुगदि रूप पर्याय प्रकट न हो सके ऐसा तीन वर्षका पुराना धान अज कहलाता है । यह तो अज शब्दका अर्थ है और । ऐसे धान्यसे यज्ञ करना चाहिए यह 'भर्यष्टव्यम्' इस वाक्यका अर्थ है ॥१२॥ यज घातुका अर्थ देव-पूजा है इसलिए द्विजीको पूर्वोक्त धानसे ही पूजा करनी चाहिए क्योंकि नैवेद्य भादि- १ चिया गावो यस्य स चित्रगुः=चित्रनगंगोयुक्तः। २ अशीना उष्णाः गावः किरमा यस्य सोशीतगुः = सूर्यः । ३ क्रियाशब्दसमाग्नाती म०। ४. यज देवपूजा संगतिकरण-दानेषु । ५ निवेद्यादि- क०, ह.। ३३ ૨૫ हरिवंशपुराणे पटकर्मणां विधातारं पुरागपुरुषं परम् । नातारमिन्द्रमिन्द्रज्यं वेदे गीतं स्वयम्भुवम् ॥३०॥ देशकं मुक्तिमार्गस्य शोपकं भववारिधः । अनन्तज्ञानसौख्यादिमदीशाक्यं महेश्वरम् ॥१३॥ ब्रहाणं विष्णुमीशानं सिद्धं बुद्धमनामयम् । आदित्यवर्ण वृपभं पूजयन्ति हिवैपिणः ॥१३२॥ ततः स्वर्गसुखं पुंसां ततो मोक्षसुखं ध्रुवम् । ततः कीर्तिस्ततः कान्तिस्ततो दीप्तिस्ततो तिः ॥१३३॥ पिप्टेनापि न यष्टव्य पशुत्वेन विकल्पितात् । संकल्पादशुभात्पापं पुण्यं तु शुभतो यतः ॥१३॥ यो नामस्थापनाद्रव्यैर्भावेन च विभेदनात् । चतुर्धा हि पशुः प्रोक्तस्तस्य चिन्त्यं न हिंसनम् ॥१३५॥ मन्त्रतो मृत्योर्न दुःखमिति तन्मृपा । न चेद् दुःखं न मृत्युः स्यात् स्वस्थावस्थस्य पूर्ववत् ॥१३॥ पादनासाधिरोधेन विना चेग्निपतत्पशुः । मन्त्रेण मरणं तथ्यमसम्भाध्यमिदं पुनः ॥१३॥ मुसासिकाऽपि नैकान्तान्मत्त मन्त्रप्रभावतः । दुःखिताप्यारटज्जन्तोहात्तस्य निरीक्ष्यते ॥१३॥ मुमूक्ष्मत्वावध्योऽयमात्मेति यदुर्दारितम् । तन्न स्थूलशरोरस्था स्थूलोऽपि सम्भवेद्यतः ॥१३॥ 'प्रदीपवदयं देही देहाधारवशाद् यतः । सूक्ष्मस्थूलतया याति स्वसंहारविसर्पणम् ॥१०॥ भनीहशस्तु ससारी शरीरानन्तवेदकः । सूक्ष्म एप कथंकारं सुखदुःखमवाप्नुयात् ।।१४।। अतः शरीरयाधायां मन्त्रतन्त्रास्त्रयोगतः । याधनं नियमादस्य देहमात्रस्य देहिनः ॥१२॥ से की हुई पूजा ही स्वर्ग रूप फलको देनेवाली होती है ॥१२६॥ हिताभिलापी मनुष्य जिन्होंने युगके आदिमें असि, मपि, कृषि, सेवा, शिल्प और वाणिज्य इन छह कर्माको प्रवृत्ति चलाई थी जो पुराग पुरुप हैं, उत्कृष्ट हैं, रक्षक हैं, इन्द्र रूप हैं, इन्द्रके द्वारा पूज्य हैं, वेदमे स्वयंभू नामसे प्रसिद्ध हैं, मोक्ष मार्गके उपदेशक हैं, संसार-सागरके शोषक हैं, अनन्त ज्ञान-सुख आदि गुणों से युक्त ईश नामसे प्रसिद्ध हैं, महेश्वर हैं, ब्रह्मा हैं, विष्णु हैं, ईशान हैं, सिद्ध हैं, बुद्ध हैं, अनामय- रोगरहित हैं और सूर्यके समान वर्णवाले हैं ऐसे भगवान् वृषभदेवको ही पूजा करते हैं ॥१३०- १३२॥ उसी पूजासे पुरुपोंको स्वर्ग सुख प्राप्त होता है, उससे मोक्षका अविनाशी सुख मिलत है, उसीसे कीर्ति, उसीसे कान्ति, उसीसे दीप्ति और उसीसे धृतिकी प्राप्ति होती है ॥१३३॥ साक्षात् पशुकी बात तो दूर रही पशुरूपसे कल्पित चूनके पिण्डसे भी पूजा नहीं करनी चाहिए क्योंकि अशुभ संकल्पसे पाप होता है और शुभ संकल्पसे पुण्य होता है ॥१३४।। जो नाम स्थापना, द्रव्य और भाव निक्षेपके भेदसे चार प्रकारका पशु कहा गया है उसकी हिंसाका कभी मनसे भी विचार नहीं करना चाहिए ॥१३५।। यह जो कहा है कि मन्त्र द्वारा होनेवाली मृत्युसे दुःस नहीं होता है वह मिथ्या है क्योंकि यदि दुःख नहीं होता है तो जिस प्रकार पहले स्वस्थ अवस्थामे मृत्यु नहीं हुई थी उसी प्रकार भव भी मृत्यु नहीं होना चाहिए ॥१३६॥ यदि पेर बाँधे गिना और नाक मूंदे विना अपने आप पशु मर जाये तब तो मन्त्रसे मरना सत्य कहा आय परन्तु यह असंभव यात है ॥१३७॥ मन्त्रके प्रभावसे मरनेवाले पशुको मुसासिका प्राप्त होती है यह भी एकान्त नहीं है क्योंकि जो पशु मारा जाता है वह प्रहसे पीड़ितकी सरह जोर- जोरसे घिल्लाता है इसलिए उसका दुःस स्पष्ट दिसाई देता है ।।१३८॥ यह जो कहा है कि आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे अवध्य है-मारनेमें नहीं आता है यह भी ठीक नहीं है क्योंकि जय आत्मा म्यूल शरीर में स्थित होता है तय स्थूल भी तो होता है ।।१३६॥ यह आत्मा शरीररूपी आधारफे अनुमार दोपकफे प्रकाशके समान सूक्ष्म और स्थूलरूप होता हुआ संकोच तथा विस्तार पो प्राप्त होता रहता है ।।१४।। यदि अनन्त शरीरोंका अनुभव करनेवाला संसारी जीव इस प्रकार छोटा-यदा न माना जाये और एकान्तसे सूक्ष्म ही माना जाये तो यह मुय-दुःसको किस ताह प्रान फर सकेगा ? ॥१४१॥ इसलिए यह निर्विवाद सिद्ध है कि जीय शरीर प्रमाण है और १ मरेशान्य म। २ - म०।३ तल्यादमभाय-म। ४. प्रदेशसहाररिमार्गम्या प्रोता. घ.५।

सप्तदशः सर्गः २५६ - नियमाणोऽतिदुःखेन चक्षुरादिभिरिन्द्रियः। वियुज्यते स्वयं तेन कोऽन्यस्तेषां वियोजकः ॥१४३।। 'प्राणिघातकृतः स्वर्गः कुतः स्याद्याजकादयः । याज्यस्य स्वर्गगामित्वे दृष्टान्तत्वं गता यत्तः ।।१४४॥ धम्यमेव हि शर्मास्य कर्म याज्यस्य जायते । नापथ्यं शिशोदत्त मात्राऽपि स्यारसुखाप्तये ॥१४५।। परिपत्प्रापि स्फूजवचोवज्रमुखैरिति । भित्त्वा पर्वतदुःपहं स्थिते नारदनारदे ॥१४६।। साधुकारो मुहुर्दत्तस्तस्मै धर्मपरीक्षकैः । सलौकिकैः शिरकम्पैस्वाङ्गुलिस्फोटनिस्वनैः ।।१४७१ राजोपरिचरः पृष्टस्ततः शिष्टेबहुश्रुतैः । राजन यथाश्रुतं हि त्वं सत्यं गुरुभाषितम् ॥१४॥ मूढसत्यविमढेन वसुना दृढबुद्धिना । स्मरताऽपि गुरोर्वाक्यमिति वाक्यमुदीरितम् ॥१४॥ युक्तियुक्तमुपन्यस्तं नारदेन समाजनाः । पर्वतेन यदन्नोक्तं तदुपाघ्यायमापितम् ॥१५०॥ मन्त्र-तन्त्र तथा अस्त्र आदिसे शरीरका पात होनेपर इसे नियमसे दुःख होता है ॥१४२।। जब यह जीव तीत्र दुःखसे मरने लगता है तब चक्षु आदि इन्द्रियोंसे स्वयं ही वियुक्त हो जाता है इसलिए उनका वियोग करानेवाला और दूसरा कौन है ? । भावार्थ - जब जीव स्वयं ही चतु आदि इन्द्रियोंसे वियुक्त होता है तब यह कहना कि 'याजक लोग उनके चक्षु आदिको सूर्य आदिके पास भेज देते हैं। मिथ्या है ॥१४३॥ प्राणियोंका घात करनेवालेको स्वर्ग कैसे हो सकता है ? जिससे कि याजक आदिको याज्य (पशु आदिके ) स्वर्ग जानेमें दृष्टान्त माना जा सके। भावार्थ-पर्वतने कहा था कि मन्त्र द्वारा होम करते ही पशु स्वर्ग भेज दिया जाता है और वहाँ वह याजकादिके समान कल्प काल तक अत्यधिक सुख भोगता रहता है सो प्राणियोंका घात करनेवाले याजक आदिको स्वर्ग कैसे मिल सकता है ? उन्हें तो इस पापके कारण नरक मिलना चाहिए अतः जब याजक आदि स्वर्ग नहीं जाते तब उन्हें पशुके स्वर्ग जाने दृष्टान्त कैसे बनाया जा सकता है ?॥१४४|| धर्म सहित कार्य ही पशुको सुख प्राप्तिमें सहायक हो सकता है अधर्म सहित कार्य नहीं क्योंकि बच्चे के लिए माताके द्वारा दिया हुआ अपथ्य पदार्थ सुख प्राप्तिका कारण नहीं होता। भावार्थ-पर्वतने कहा था कि जिस प्रकार न चाहने- पर भी बच्चेके लिए घी आदि दिया जाता है तो वह उसकी वृद्धिका कारण होता है, उसी सकार पशुके न चाहनेपर भी उसे यज्ञमै होमा जाता है तो वह उसके लिए स्वर्गप्राप्तिका कारण होता है। पर्वतका यह कहना ठीक नहीं क्योंकि धर्मयुक्त कार्य ही पशुके लिए सुखप्राप्तिमें सहा- यक हो सकता है अधर्मयुक्त नहीं। जिस प्रकार माताके द्वारा दिये हुए घृत, दुग्ध आदि हितकारी पदार्थ ही बच्चे के लिए सुखप्राप्तिमें सहायक होते हैं विपादिक अपथ्य पदार्थ नहीं उसी प्रकार पशुको जबर्दस्ती होम देने मात्रसे उसे स्वर्गको प्राप्ति नहीं हो सकती किन्तु उसके धर्मयुक्त कार्यसे ही हो सकती है ॥१४॥ इस प्रकार सभारूपी वर्षाकालमै अपने तीक्ष्ण वचन रूपी वनके अग्रभागसे पर्वतके मिथ्या पक्षरूपी पर्वत-पहाड़के भदे किनारेको तोड़कर जब नारदरूपी मेघ चुप होरहा तब सभामें चैठे हुए धर्मके परीक्षक लोगोंने एवं साधारण मनुष्योंने शिर हिला-हिलाकर तथा अपनी-अपनी अँगुलियाँ चटकाकर नारदके लिए बार-बार धन्यवाद दिया ॥१४६-१४॥ तदनन्तर अनेक शाखोंके ज्ञाता शिष्टजनोंने अन्तरिक्षचारी राजा चमुसे पूछा कि हे राजन् ! आपने गुरके द्वारा कहा हुआ जो सत्य अर्थ सुना हो वह कहिए ॥१४८॥ यद्यपि राजा वसु दृढ़- बुद्धि था और गुरुके वचनोंका उसे अच्छी तरह स्मरण था तथापि मोह यश सत्यके विपयमें अविवेकी हो यह निम्न प्रकार वचन कहने लगा॥१४॥ कि हे सभाजनो ! यद्यपि नारदने युक्ति- १. प्राणिपातं करोतीति प्राणिरातहत् तस्य । २. धर्ममेव म । ३ शिसप म०।

२६० हरिवंशपुराणे वाइमाण सतो भूमौ निमग्नः स्फदिकासनः । वसुः पपात पाताले पातकात् पतनं ध्रुवम् ॥१५॥ पातालस्थितकायोऽमी सप्तमी पृथ्वौं गतः । नरके नारको जातो महारबनामनि ॥१५२॥ हिंसानन्दशानन्दरौदध्यानाविलो यमुः । जगाम नरकं रोदं रौद्रष्यानं हि दुःपदम् ॥१५३॥ प्रत्यक्ष सर्वलोक्स्य पानाले पतिते वसी । तदाकुलः समुत्तस्थौ हा हा धिम्धिगिति धनिः ॥१५॥ लब्धामत्यफलं सघो मिनिन्दुनृपति जनाः । पर्वनं च निराचः सलीकृश्य सलं पुरात ॥५५॥ ताववादिनमशुदं नारदं जितवादिनम् । कृत्वा मारथारूदं पूजयित्वा जना ययुः ॥१५६॥ पर्वतोऽपि 'खलीकारं प्राप्य देशान् परिभ्रमन् । दुष्टं द्विष्टं निरैपिट महाकालमहामुरम् ॥१५७१ ततस्तस्मै पराभूति पराभूतिजुपे पुरा । निवेद्य तेन मंयुक्तः कृत्वा हिंसागमं कुधीः ।।१५८ लोके प्रसारको भूत्वा हिंसायनं प्रदर्शयन् । भरञ्जयननं मूढं प्रागिहिंसनतस्परम् ॥१५॥ मृत्वा पापोपदेशेन पापशापयशान्मृतः । सेवामिव वमोः कुर्वन् पर्वतो नरकेऽपतत् ॥१६॥ स्थापिता वमुराज्येऽटो ज्येष्छानुप्रमशः प्रमात् । स्वरुपैरेव दिनयुं सूनवोऽपि वसोययुः १६॥ ततो । मृत्युभयात्यस्ता मुवमुः प्रपलायितः । गरवा नागपुरेऽतिष्ठन्मधुरायां वृहत्वज्ञः ।।१६२॥ शार्दूलविक्रीडितम् कष्टं त्यातिमवाप्य सत्यजनितां पापादयोऽगाद्वमुः पापं पर्वतकोऽभिमानवशगस्तस्यैव पश्चाद् ययौ । युक्त कहा है तथापि पर्वतने जो कहा है यह उपाध्यायके द्वारा कहा हुआ कहा है ।।१५०।। इतना कहते हो वसुका स्फटिकमणिमय आसन पृथिवीमें घुस गया और वह पातालमें जा गिरा सो ठीक ही है क्योंकि पापसे पतन होता ही है ॥१५१॥ जिसका शरीर पातालमें स्थित था ऐसा वसु मरकर सातवीं पृथिवी गया और वहाँ महागैरव नामक नरकमे नारकी हुआ ॥१५२।। हिंसानन्द और मृपानन्द रौद्र ध्यानसे कलुपित हो वसु भयंकर नरकमें गया सो ठीक ही है क्योकि रौद्रध्यान दुःसदायक होता ही है ॥१३॥ सत्र लोगोंके समक्ष जब वसु पातालमें चला गया तब सब ओर आकुलतासे भग हा-हा धिक्-धिक शब्द गूंजने लगा ॥१५४॥ जिसे तत्काल ही असत्य बोलनेका फल मिल गया था ऐसे राजा वसुको सब लोगोंने निन्दा की और दुष्ट पर्वत- फा तिरस्कार कर उसे नगरसे बाहर निकाल दिया ||१५५॥ तत्त्ववादी, गम्भीर एवं वादियोंको परास्त करनेवाले नारदको लोगोने ब्रह्म रथपर सवार किया तथा उसका सम्मान कर सब यथा स्थान चले गये ।।१५६॥ इधर तिरस्कार पाकर पर्वत भी अनेक देशामें परिभ्रमण करता रहा अन्तमें उसने द्वेष-पूर्ण दुष्ट महाकाल नामक अमुरको देखा ॥१५७॥ पूर्व भवमें जिसका तिरस्कार हुआ था ऐसे महाकाल असुरके लिए अपने पराभवका समाचार सुनाकर पर्वत उसके साथ मिल गया और दुर्बुद्धिके कारण हिंसापूर्ण शास्त्रको रचनाकर, लोकमें ठगिया बन हिंसापूर्ण यज्ञका प्रदर्शन करता हुआ प्राणिहिंसाम तत्पर मूर्खजनीको प्रसन्न करने लगा ॥१५८-१५६।। अन्त- में पापोपदेशके कारण पापरूपी शापके वशीभूत होनेसे पर्वत मरा और मरकर वसुकी सेवा करने के लिए ही मानो नरक गया ॥१६०।। मन्त्रियोने वसुके आठ पुत्रीको क्रमसे एक दूसरेके बाद उसकी गद्दीपर चैठाया परन्तु वे भी थोड़े ही दिनोंमे मृत्युको प्राप्त हो गये ॥१६१॥ तदनन्तर जो दो पुत्र शेष बचे उनमें मृत्युके भयसे भयभीत हो सुवसु तो भागकर नागपुरमें रहने लगा और वृद्ध्वज मथुराम जा घसा ॥१६२॥ बड़े खेदकी बात है कि एक ओर तो वसु सत्य जनित प्रसिद्धिको पाकर अन्तमें पापके कारण नरक गया और अभिमानके वशीभूत हुआ पर्वत भी उसके पीछे पापपूर्ण नरकको प्राप्त १. खलु म । २. लब्ध्वा म० | ३. तिरस्कार ! ४ महाकाय -म०१५ प्रदर्शयत् म.

सप्तदशः सर्गः
२६१
सम्यग्दृष्टिदिवाकरायपचरं लब्ध्वा सखायं पुनः
चिप्ला पर्वतदुर्मतं कृतितया स्वगं गतो नारदः ॥१६३॥
धर्मः प्राणिदया दयाऽपि सततं हिंसाच्युदासो मनो-
वाक्कायविरतिबंधारप्रणिहितः प्राणात्ययेऽग्यारमनः ।
धत्तेऽसौ बुधमादरेण चरितः स्वर्गापवर्गार्गलां
भित्त्वा मोहमयीं सुखेऽतिविपुले धर्मों जिनव्याहृतः ॥१६॥
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इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतो वसूपाख्याने नारदपर्वतविवादपर्णनो
नाम सप्तदशः सर्गः।
हुआ तथा दूसरी और सम्यग्दृष्टि दिवाकर नामक विद्याधर मित्रको पाकर एवं पर्वतके मिथ्या
मतका खण्डनकर नारद कृत-कृत्य होता हुआ स्वर्ग गया ३१६३॥ जीवापर दया करना धर्म है,
निरन्तर हिंसाका त्याग करना दया है और अपने प्राणजानेपर भी उस ओर लगे हुए मन, वचन,
कायके द्वारा वधसे दूर रहना हिंसा त्याग है। जिनेन्द्र भगवान्ने हिसा त्यागको ही धर्म कहा
है। आदरपूर्वक आचरण किया हुआ यह धर्म, स्वर्ग और मोक्षको मोहरूपी अर्गलाको भेदकर
विद्वजनोंको भतिशय विस्तृत सुखमें पहुंचा देता है ॥१६४||
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराण के संग्रहसे युक्त जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें राजा वसुके
चरितमें नारद और पर्वतके विवादका वर्णन करनेवाला सत्रहवाँ सर्ग समाप्त हुभा ॥१७॥

अष्टादशः सर्गः अथ योऽसौ वसोः सूनुर्मथुरायां वृहद्धजः । सुबाहुरभवत्तस्मात्तनयो विनयोद्यतः ॥१॥ लक्ष्मी स तत्र निक्षिप्य तपोलक्ष्मीमुपाश्रितः । सुबाहुदीर्घबाहौ च वज्रबाही नृपश्च सः ॥२॥ सोऽपि लब्धाभिमानेऽसौ भानी सोऽपि यवौ सुते । सुभानी नयने सोऽपि भीमनामनि स प्रभुः ॥३॥ पवमाद्यास्तथाऽन्येऽपि शतशोऽथ सहस्रशः । मुनिसुव्रतनाथस्य तीर्थेऽतीयुः सितीश्वराः ॥४॥ आयुवर्षसहस्राणि यस्य पञ्चदशाऽगमत् । नमेवहति तस्येह पञ्चलक्षाब्दके पथि ॥५॥ उदियाय यदुस्तन्त्र हरिवंशोदयाचले । यादवप्रभवो व्यापो भूमौ भूपविभाकरः ॥६॥ सुतो नरपतिस्तस्मादुदभूद् भूवधूपतिः । यदुस्तस्मिन् भुवं न्यस्य तपसा त्रिदिवं गतः ॥७॥ शूरश्चापि सुवीरश्च शूरौ वीरौ नरेश्वरौ । स तो नरपती राज्ये स्थापयित्वा तपोऽभजत् ॥८॥ शूरः सुवीरमास्थाप्य मथुरायां स्वयं कृती । स चकार कुशोपु पुरं शौर्य पुरं पुरम् ॥६॥ शूराश्चान्धकवृष्ण्याद्याः शूरादुदभवन् सुताः । वीरा भोजकवृष्ण्याद्याः सुवीरान्मधुरेश्वरात् ॥१०॥ ज्येष्टपुत्रे विनिक्षिप्ततितिभारौ यथायथम् । सिद्धौ शूरसुवारी तो मुप्रतिष्टेन दीक्षितौ ॥११॥ आसीदन्धकवृष्णेश्च सुभद्रा वनितोत्तमा । पुत्रास्तस्या दशोत्पन्नास्त्रिदशामा दिवश्च्युताः ॥१२॥ समुद्र विजयोऽशोभ्यस्तथा स्तिमितसागरः । हिमवान् विजयश्चान्योऽचलो धारणपूरणी ॥१३॥ अथानन्तर-राजा वसुका जो बृहद्ध्वज नामका पुत्र मथुराम रहने लगा था उसके सुबाहु नामका विनयवान पुत्र हुआ। राजा बृहध्वज सुबाहु के लिए राज्यलक्ष्मो सौंप आप तपरूपी लक्ष्मीको प्राप्त हो गया । यथाक्रमसे सुबाहुके दीर्घबाहु, दीर्घवाहुके वजूबाहु, वजूबाहुके लब्धाभि- मान, लब्धाभिमानके भानु, भानुके यवु, यवुके सुभानु और कभानुके भीम पुत्र हुआ। इस प्रकार इन्हें आदि लेकर भगवान् मुनिसुव्रतनाथके तीर्थमैं सैकड़ों हजारों राजा उत्पन्न हुए और सबने अपने-अपने पुत्रोंपर राज्य-भार सौंपकर तप धारण किया ॥१-४॥ भगवान मुनिसुव्रतके चाद नमिनाथ हुए । इनकी आयु पन्द्रह हजार वर्षकी थी तथा इनका वीर्थ पाँच लाख वर्ष तक प्रचलित रहा। इन्हींके तीर्थ में हरिवंशरूपी उदयाचलपर सूर्य के समान यदु नामका राजा हुआ यही यदु राजा, यादवोकी उत्पत्तिका कारण था तथा अपने प्रतापसे समस्त पृथिवीपर फैला हुआ था ॥५-६॥ राजा यदुके नरपति नामका पुत्र हुआ ! उसपर पृथिवीका भार सौंप राजा यदु तप- कर स्वर्ग गया ॥णा राजा नरपतिके शूर और वीर नामक दो पुत्र हुए सो नरपति उन्हें राज्य- सिंहासनपर बैठाकर तप करने लगा ||८॥ अत्यन्त कुशल शूरने छोटे भाई सुवीरको मथुराके राज्यपर अधिष्ठित किया और स्वयं कुशद्य देशग एक शौर्यपुर नामका नगर बसाया ॥६॥ शूरसे अन्धकवृष्णिको आदि लेकर अनेक शूर वीर उत्पन्न हुए, और मथुराके स्वामी सुवीरसे भोजक- वृष्णिको आदि लेकर अनेक वीर पुत्र उत्पन्न हुए ॥१०॥ यथायोग्य अपने-अपने बड़े पुत्रोंपर पृथिवीका भार सौंपकर कृतकृत्यताको प्राप्त हुए शूर और मुवीर दोनों ही सुप्रतिष्ठ मुनिराजके पास दीक्षित हो गये ॥११॥ अन्धकवृष्णिको मुभद्रा नामक उत्तम स्त्री थी उससे उनके दश पुत्र हुए जो देवोंके समान कान्तिवाले थे तथा स्वर्गसे च्युन होकर आये थे ॥१२॥ उनके नाम इस प्रकार थे-१ समुद्रविजय, २ अक्षोभ्य, ३ स्तिमितसागर, ४ हिमवान, ५ विजय, ६ अचल, ७ धारण - १. यदुनाम्निपुत्रे । २ भूपतिभाहारः (4० दि०)। ३. भोजनमवृष्ण्याचाः म ।

अष्टादशः सर्गः २६३ अमिचन्द्र इहाख्यातो वसुदेवश्च ते दश । दशाहीः सुमहाभागाः सर्वेऽप्यन्वर्थनामकाः ॥१४॥ कुन्ती मद्री च कन्ये द्वे मान्ये स्त्रीगुणभूषणे । लक्ष्मीसरस्वतीतुल्ये भगिन्यौ वृष्णिजन्मनाम् ॥१५॥ राज्ञो भोजककृष्णेर्या परनी पद्मावती मुतान् । उग्रपेनमहासेनदेवसेनामसूत सा ॥१६॥ सुवसोस्न्वभवत्सूनुः कुञ्जरावर्तवर्तिनः । बृहद्य इति रयातो मागधेशपुरेऽवसत् ॥१७॥ तस्मादप्यगजो जातस्ततो दृढेरयोगजः । तस्मातरवरो जज्ञे ततो दृढरथस्ततः ॥१८॥ जातः सुखरयस्तस्माद्दीपनः कुलदीपनः । सूनुः सागरसेनोऽस्मान्सुमित्रो वप्रथुस्ततः ॥१६॥ विन्दुसारः सुतस्तस्माहेवगर्भस्तदर्भकः । ततः शतधनुर्वोरो धनुर्धरपुरःसरः ॥२०॥ क्रमात् शतसहस्रेषु व्यतिक्रान्तेषु राजसु । जातो निहतशत्रुः स सुतः शतपतिनृपः ॥२१॥ जातो वृहद्रथो राजा ततो राजगृहाधिपः । तस्य सूनुर्जरासन्धो वशीभूतवसुन्धरः ॥२२॥ स रावणसमो भूत्या निखण्डमरताधिपः । नवमः प्रतिशतॄणां सुरश्रीसदृशौजसाम् ॥२३॥ मध्ये कालिन्दसेनारया महिपी महिपीगुणा । तनयाः सनयास्तस्य ते कालयवनादयः ॥२४॥ अपराजित इत्याद्या भ्रातरश्चक्रा । हरिवंशमहावृत्तशाखायाः फलितारमनः ॥२५॥ एकस्या एकवीरोऽयं धारको धरणीपतिः । वहुविद्याधरेन्द्राणां दक्षिणश्रेण्युपाश्रिताम् ॥२६॥ संहति नृपसिंहोऽसौ शास्ति राजगृहे स्थितः । उत्तरापथभूपालाः दक्षिणापथभूभृतः ॥२७॥ पूर्वापरसमुद्रान्ता मध्यदेशाश्च तदृशाः । भूचरैः खेचरैः सवैः शेखरीकृतशासनः ॥२८॥ ८ पूरण : अभिचन्द्र और १० वसुदेव । ये सभी पुत्र योग्य दशाके धारक, महाभाग्यशाली और सार्थक नामोंसे युक्त थे ॥१३-१४॥ उक्त पुत्रोंके सिवाय कुन्ती और मद्री नामकी दो कन्याएँ भी थी जो अतिशय मान्य थीं, स्त्रियोंके गुणरूपी आभूषणोंसे सहित थीं, लक्ष्मी और सरस्वतीके समान जान पड़ती थीं और समुद्रविजयादि दश भाइयोकी बहिनें थीं ॥१५॥ राजा भोजकवृष्णिको जो पद्मावती नामकी पत्नी थी उसने उग्रसेन, महासेन तथा देवसेन नामक तीन पुत्र उत्पन्न किये थे ॥१६॥ राजा वसुका जो सुवसु नामका पुत्र, कुञ्जरावर्त- पुर (नागपुर) मे रहने लगा था उसके बृहद्रथ नामका पुत्र हुआ और वह मागधेशपुरमें रहने लगा ॥१७॥ वृदयके दृढरथ नामका पुत्र हुआ। दृढरथके नरवर, नरवरके दृढरथ, दृढरथके सुखरथ, सुखरथके कुलको दीप्त करनेवाला दीपन, दीपनके सागरसेन, सागरसेनके सुमित्र, सुमित्र- के व प्रथु, वप्रथुके विन्दुसार, विन्दुसारके देवगर्भ और देवगर्भके शतधनु नामका वीर पुत्र हुआ। यह शतधनु, धनुर्धारियों में सबसे श्रेष्ठ था ॥१८-२०॥ तदनन्तर क्रमसे लाखों राजाओंके व्यतीत हो जानेपर उसी वंशमें निहतशत्रु नामका राजा हुआ। उसके शतपति और शतपतिके बृहद्रथ नामका पुत्र हुआ। यह राजगृह नगरका स्वामी था। वृहद्रथके पृथिवीको वश करनेवाला जरासन्ध नामका पुत्र हुआ ॥२१-२२।। यह विभूतिमें रावणके समान था, तीन खण्ड भरतका स्वामी था और देवोंके समान प्रतापी प्रति नारायणोंमें नौवाँ नारायण था ॥२३॥ अनेक स्त्रियों के वीच उसकी कालिन्दसेना नामकी पट्टरानी थी जो पट्टरानियोके समस्त गुणोंसे सहित थी। राजा जरासन्धके कालयवन आदि अनेक नीतिज्ञ पुत्र थे ॥२४॥ चक्रवर्ती जरासन्धके अपराजित आदि अनेक भाई थे जो हरिवंशरूपी महावृक्षकी शाखापर लगे हुए फलोंके समान जान पड़ते ये ॥२शा राजा जरासन्ध अपनी अद्वितीय माताका अद्वितीय वीर पुत्र था। वह राजसिंह, राजगृह नगरमे स्थिर रहकर ही दक्षिण श्रेणीम रहनेवाले समस्त विद्याधर राजाओंके समूहपर शासन करता था। उत्तरापथ और दक्षिणापथके समस्त राजा, पूर्व पश्चिम समुद्रोके तट नया मध्यके समस्त देश उसके वशमें थे। समस्त भूमिगोचरी और समस्त विद्याधर उसकी आज्ञाको १ दशया अाः योग्याः पूज्याश्च । २ हदरथोप्रजः म० १३. नयेन सहिताः सनयाः । ४.भूभृताम् म०1 हरिवंशपुराणे चक्रवत्तित्रियो भर्ता बिभर्तीन्द्रस्य विभ्रमम् । जानु शौर्यपुरोद्याने गन्धमादननामनि ॥२६॥ रात्री प्रतिमया तस्थौ सुप्रतिष्ठः प्रतिष्ठितः । पूर्ववैराद्यतेस्तस्य चक्रे यतः सुदर्शनः ॥३०॥ अग्निपातं महापातं मेघवृष्टयादिदुःसहम् । उपसर्ग स जित्वाऽऽप केवल धातिघातकृत् ॥३३॥ तद्वन्दनार्थमिन्द्रौघाः सौधर्माद्याश्चतुर्विधैः । देवैः सह समागत्य तेचयित्वा ववन्दिरे ॥३२॥ वृष्णिरण्यागतो भक्या पुनदार बलान्वितः । सम्पूज्यानन्य सौम्यं तं निजभूमावुपाविशतू ॥३३॥ सावधाने स्थिते धर्मदत्तकणे कृताञ्जली । जगजने जगादेयं सुप्रतिष्टमुनीश्वरः ॥३४॥ धर्मास्त्रिवर्गनिप्पत्तिस्त्रिषु लोकेपु भापिता । ततस्तामिच्छता कार्यः सततं धर्मसंग्रहः ॥३५॥ धर्मों धामनि सन्धत्ते शर्माबारे शरीरिणम् । निर्मितो वाड्मनाकायकर्मभिः शुभत्तिभिः ॥३६॥ धर्मो मद्गलमुत्कृष्टमहिमासंयमस्तपः । तस्य लक्षणमुद्दिष्टं सदृष्टिज्ञानलक्षितम् ॥३७॥ धर्मों जगति सर्वेभ्यः पदार्थेभ्य इहोत्तमः । कामधेनुः स धेनूनामप्यनूनसुखाकरः ॥३८॥ धर्म एव परं लोके शरणं शरणार्थिनाम् । मृत्युजन्मजरारोगशोकदुःखातापिनाम् ॥३६॥ विश्वाभ्युदयसौख्यानां मनुजामरवर्तिनाम् । धर्म एव मतो हेतुनिश्रेयससुखस्य च ॥४०॥ नमिना भापितो धर्मः समन्वन्तरवर्तिनाम् । एकविंशेन नाथेन का तीर्थस्य साम्प्रतम् ॥४१॥ पञ्चकल्याणपूजानां स्वर्गावतरणादिषु । भाजनं यो बभूवात्र तेन धर्मोऽयमीरितः ॥४२॥ महावतानि साधूनामहिसा सत्यभाषणम् । अस्तेयं ब्रह्मचर्य च निर्मूछो" चेति पबंधा ॥४३॥ - - शेखरके समान शिरपर धारण करते थे ॥२६-२८|| वह चक्रवर्तकी लक्ष्मीका स्वामी था तथा इन्द्रकी शोभाको धारण करता था । कदाचित् शौर्यपुरके उद्यानमें गन्धमादन नामक पर्वतपर रात्रिके समय सुप्रतिष्ठ नामक मुनिराज प्रतिमा योग लेकर विराजमान थे। पूर्व वैरके कारण सुदर्शन नामक यक्षने उन मुनिराजपर अग्निवा, प्रचण्ड वायु तथा मेघ वृष्टि आदि अनेक कठिन उपसर्ग किये परन्तु उन सबको जीतकर घातिया कमीका क्षय करनेवाले उक्त मुनिराजने केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया ॥२६-३१।। उनको वन्दनाके लिए सौधर्म आदि इन्द्रोंके समूह, चारों निकाय- के देवोंके साथ वहाँ आये और सबने भक्तिपूर्वक पूजाकर केवली भगवान्को नमस्कार किया ॥३२॥ शीर्यपुरका राजा अन्धकवृष्णि भी अपने पुत्रो-त्रियों तथा सेनाओंके साथ आया और भक्तिपूर्वक सुप्रतिष्ठ केवलोकी पूजा-वन्दनाकर अपने स्थानपर बैठ गया ॥३३|| जब जगत्के जीव धर्मोपदेश सुननेके लिए कान देकर तथा हाथ जोड़कर सावधानीके साथ बैठ गये तब मुप्रतिष्ठ मुनिराजने इस प्रकार उपदेश देना प्रारम्भ किया ||३४|| उन्होंने कहा कि तीनों लोकोंम त्रिवर्गकी प्राप्ति धर्मसे ही कही गयी है इसलिए उसकी इच्छा रसनेवाले पुरुषको सदा धर्मका संग्रह करना चाहिए ॥३५॥ शुभ वृत्तिसे युक्त मन, वचन, कायके द्वारा किया हुआ धर्म, प्राणीको मुखके आधारभूत स्थान-स्वर्ग अथवा मोक्षमें पहुंचा देता है ॥३६॥ धर्म उत्कृष्ट मगल स्वरूप है तथा सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानसे सहित अहिंसा, संयम और तप उस धर्मके लक्षण बतलाये गये हैं ।।३०। इस संसारमें धर्म सब पदार्थासे उत्तम है, यह धेनुओंमें कामधेनु है तथा उत्कृष्ट सुखको सान है ॥३८॥ जन्म, जरा, मरण, रोग, शोक भादिसे उत्पन्न दुःसरूपी सूर्यसे संतप्त शरणार्थी जनोके लिए लोकमें धर्म ही उत्तम शरण है ॥३६॥ मनुष्यों और देवोंमे पाये जानेवाले समस्त अभ्युदय सम्बन्धी सुस और मोक्ष सम्बन्धी मुग्पका कारण धर्म हो माना गया है ॥४०॥ जो स्वर्गावतरणादिके समय पश्चकल्याणक पूजाओंके पात्र थे ऐसे इक्कीसवें तीर्थकर भगवान् नमिनाथने इस युगमें अपने समयवर्ती जीवोंके लिए जो धर्म कहा था वह इस प्रकार है ।।४१-४२॥ उन्होंने मुनियों के लिए १ अहिंसा, २ सत्य भाषण, १ घातिना यात फरोतीति घातिघातकृत् । २ पुवटाराग्लान्वितः म । ३. शरीरिणाम भ० । ४.-वर्तिना म० । ५. आरिग्रहः ।

अष्टादशः सर्गः गुप्तिश्च निविधा प्रोक्ता पञ्चधा समितिस्विदम् । सर्वसावद्ययोगस्य प्रत्यारयानं मतं सतः ॥४४॥ पञ्चधाऽणुयनं प्रोक्तं विविधं च गुणवतम् । शिधावतं चतुर्भदं धोऽयं गृहिणां स्मृतः ॥४५॥ हिंसादेर्देशतो मुत्तिरणुव्रतमुदीरितम् । दिग्देशानर्थदण्टेग्यो विरतिश्च गुणव्रतम् ॥४६॥ सामायिकं त्रिसन्ध्यं तु प्रोपधातिधिपूजनम् । आयुरन्ते च सल्लेसः शिवाव्रतमितारितम् ॥४॥ मांसमद्यमधुघूतीरिवृसफलोगमनम् । वेश्यावधूरतिस्याग इत्यादिनियमो मतः ॥४८॥ इदमेवेति तत्वार्थश्रद्धानं ज्ञानदर्शनम् । शाऽऽकाइदाजुगुप्सान्यमतशंसास्तवोगमनम् ||४|| वयोपगृहनं मार्गभ्रंशिनां स्थितियोजनम् । हेतवो दृष्टिसंशुद्ध वारसल्यं च प्रमावना ॥५०॥ साधादम्युदयोपायः पारम्पर्येण मुक्तये । गृहिधर्मोऽन मानस्तु सामान्मोचाय कल्पते ॥५॥ स धर्मो मानुपे देहे प्राप्यने नान्यजन्मनि । मानुषस्तु भवो दुःखाल्लम्यते भवसस्टें॥५२॥ स्थावरग्रसकायेषु चतुर्गतिपु देहिनः । कर्मोदयवशावलेशानश्नन्तः पर्यटन्स्यमी ॥५३॥ पृथिव्योजसा काये मरुतां च वनस्पतेः । स्पर्श केन्द्रियो जीवो दीर्घकाल मरारयते ॥५॥ सन्ति चानन्तभेदास्ते जीवाः कर्मकलहिताः । ये श्रमस्वमनापमाः कुनिगोदनिवासिनः ॥५५॥ कुयोन्यातिलपासु चतुरम्यधिकास्वमी । अनेककुलकोटीपु बभ्रम्यन्ते तनूमृतः ॥५६॥ ३ अचौर्य,४ ब्रह्मचर्य और ५ अपरिग्रह ये पाँच महाप्रत, १ मनोगुप्ति,२ वचनगुप्ति और ३ कायगुप्ति ये तीन गुप्तियों, १ ईर्या, २ भाषा, ३ एपणा, ४ आदान निक्षेपण और ५ प्रतिष्ठापन ये पाँच समि- तियाँ और विद्यमान समस्त सावध योगका त्याग-यह धर्म बतलाया है ॥४३-४४॥ तथा गृहस्थों- के लिए पाँच अणुव्रत, तीन गुणवन और चार शिक्षाबत यह बारह प्रकारका धर्म कहा है ॥४५॥ हिंसादि पापीका एक देश छोड़ना अणुव्रत कहा गया है, दिशा देश और अनर्थदण्डोंसे विरत होने- को गुणव्रत कहते हैं और तीनों संध्याओंमें सामायिक करना, प्रोपधोपवास करना, अतिथिपूजन करना और आयुके अन्तमें सल्लेखना धारण करना इसे शिक्षावत कहते हैं ।।४६-४॥ मद्य-त्याग, मांस-त्याग, मधु-त्याग, द्युत-त्याग, क्षारिफल-त्याग, वेश्या-त्याग तथा भन्यवधू-त्याग आदि नियम कहलाते हैं ॥४॥ तत्व यही है। इस प्रकार ज्ञान और श्रद्धान होना सो सम्यग्ज्ञान आर सम्यग्दर्शन है । शङ्का, आकांक्षा,जुगुप्सा तथा अन्य मतको प्रशंसा और स्तुतिका छोड़ना,उपगृहन, मार्गसे भ्रष्ट होनेवालोंका स्थितीकरण करना, वात्सल्य और प्रभावना ये सब सम्यग्दर्शनको शुद्ध फरनेके हेतु हैं ।।४६-५०|| गृहस्थ धर्म सातान् तो स्वर्गादिक अभ्युदयका कारण है और परम्परा. से मोक्षका कारण है परन्तु मुनि धर्म मोक्षका साक्षात् कारण है ॥५१॥ वह मुनिधर्म मनुष्य शरीरमें ही प्राप्त होता है अन्य जन्ममें नहीं और मनुष्य-जन्म सकटपूर्ण संसारमें बड़े दुःखसे प्राप्त होता है ॥५२॥ ये प्राणी कर्मोदयके वशीभूत हो स्थावर तथा उसकायोंमें अथवा नरकादि चतुर्गतियों में क्लेश भोगते हुए भ्रमण करते रहते हैं ॥५३॥ मात्र स्पर्शन इन्द्रियको धारण करने घाला एन्द्रिय जीव पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पतिके शरीरमें दीर्घकाल तक भ्रमण करता रहा है ॥५४॥ कर्मकलंकसे कलंकित ऐसे अनन्त जीव है जिन्होंने आज तक प्रसपर्याय नहीं प्राप्त की और आगे भी उसी निगोद पर्यायमें निवास करते रहेंगे ॥५५॥ ये प्राणी चौगमी लाय कुयोनियों तथा अनेक फुलकोटियोंमें निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं ॥४६॥ १. मुनेर मौनः मुनिमम्बन्धी। २. अषि भगन्ना जीवा रेटिंग पत्तो तसाए परिणामो। मावश्लंक मुगउरा निगोहराम ए मुंचति गो. नी. ३४ हरिवंशपुराणे 'प्रत्येक सप्तलक्षाः स्युनित्येतरनिगोदयोः । पृथिवीवायुतेजोऽम्भःकार्यध्वपि तथैव ताः ॥५७॥ 'ता वनस्पतिकायेषु दश पट विकलेन्द्रिये । द्विःसप्त नुश्चतस्रस्तास्तिर्यग्नारकनाकिनाम् ॥५८|| द्वाविंशतिपृथिव्यङ्गा लक्षाः सप्ताम्बुवायुजाः । तेजस्कायिकजीवानां निलक्षाः कुलकोटयः ॥५६॥ वनस्पतिजलक्षास्ता अष्टाविंशतिरीरिताः । द्वितीन्द्रियेषु सप्ताष्टौ चतुरिन्द्रियजा नव ॥६०॥ अर्धत्रयोदश प्रोक्ता लक्षा जलचरेष्वपि । पक्षिषु द्वादशैव स्युश्चतुष्पारसु दशानिषु ॥६१॥ नवोर परिसपु मनुजेषु चतुर्दश । नारकामरभेदेपु विंशतिः पञ्च पद युताः ॥६२॥ कोटीकोटी च लक्षाश्च नवतिनवभिः सह । पञ्चाशच्च सहस्राणि कुलकोट्यः समासतः ॥६३॥ द्वाविंशतिसहस्राणि वरसराणि खरक्षितेः । भायुHदुपृथिव्यास्तु द्वादश प्राणधारिणाम ॥६४॥ सहाकायिकजीवानां त्रीणि वायुमयाङ्गिनाम् । अहोरात्रास्त्रयस्तेजोमयानां समये मताः ॥६५॥ दशवर्षसहस्राणि वनस्पतिमयाङ्गिनाम् । द्वादश द्वीन्द्रियाणां च वर्षाण्यायुरुदीरितम् ॥६६॥ दिनान्येकोनपञ्चाशत्त्रीन्द्रियाणां प्रकीर्तितम् । चतुरिन्द्रियजीवानां पण्मासाः परमायुपः ॥६७॥ द्वासप्ततिसहस्राणि वर्षाण्यपि च पक्षिणाम् । द्विचत्वारिशदब्दानां सहस्राण्यहिदेहिनाम् ॥६॥ भय पूर्वाङ्गमानं स्यादुरसा परिसर्पिणाम् । पूर्वकोटी मनुष्याणां मरस्यानां चापि जीवितम् ॥६६॥ वे कुयोनियाँ नित्यनिगोद, इतरनिगोद, पृथिवोकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक और वायु- कायिक जीवामे प्रत्येकी सात-सात लाख होती हैं ॥५७॥ वनस्पतिकायिकोंकी दश लाख, विकलेन्द्रियोको छह लाख, मनुष्योंकी चौदह लाख, तिर्यश्च , नारकी और देवोंकी प्रत्येकको चार चार लाख होती हैं ॥५८॥ पृथिवीकायिक जीवोंकी बाईस लाख, जलकायिक और वायुकायिक- की प्रत्येककी सात-सात लाख, अग्निकायिकको तीन लाख, वनस्पतिकायिककी अट्ठाईस लाख, दो इन्द्रियोंकी सात लाख, तीन इन्द्रियोंकी आठ लाख, चौइन्द्रियोंकी नौ लाख, जलचरौंको साढ़े बारह लाख, पक्षियोको घारह लाख, चौपायोको दश लाख, छातीसे सरकनेवालोंकी नौ लाख, , मनुष्योंकी चौदह लाख, नारकियोंको पच्चीस लाख और देवीकी छब्बीस लाख कुल कोटियाँ हैं। संक्षेपसे ये सब कुल कोटियाँ साढ़े निन्यानबे लाख हैं ॥५६-६३॥ खर पृथिवीकी बाईस हजार वर्ष, कोमल पृथिवीको बारह हजार वर्ष, जलकायिक जीवोंकी सात हजार वर्ष, वायुकायिक जीवोंकी तीन हजार वर्ष, तेजरकायिक जीवोंकी तीन दिन रात, वनस्पतिकायिक जीवोंकी दश हजार वर्ष, दो इन्द्रिय जीवोंको बारह वर्ष, तीन इन्द्रिय जीवोंकी उनचास वर्ष, चार १. शिश्चिदरधादु सत्तय तक दस वियलिंदियेसु छच्चेव । मुर गिरथ तिरिय चउरो चोद्दसमणुए सदसहरमा ।। गो० जी०। २ यावीस सत्ततिरिए य सत्त य कुलकोटि सयसहस्साई । ऐया पुढवि दगागणि वाउपकायाण परिसंखा ।।११३॥ कोहिसयसहस्माइ सत्ता एव य अठ्वीसादं । इंदिय तेइंदिय चरिंदिय हरिदकायाण ||११४॥ अस्तेरम बारस दसयं कुलकोडि सदसहस्साएं। जलचर पक्सि चउप्पय उरपरिसप्पेमु णा होनि ॥११४॥ छापंचाधिय वीसं पारस कुलकोडि सटसहस्साई । मुरणेरहयणराण महामं होति ऐयाणि ॥११॥ एया य कोहिकोदी मत्ताणउदीय सद सहस्साई। परणं कोटि सहस्मा सन्चंगीणं कुलाण य॥११६|| गो० जी०। ३ हिमतविधतयम्नास-मः।

अष्टादशः सर्गः २६७ - 'मौमा मसूरसंस्थाना जीवा भाप्यास्तृगाम्बुवत् । तेजसाः सूचिसंस्थानाः पताझावच्च वायुजाः ॥७०॥ बहुसंस्थानमाजस्नु बनस्पतिभवाङ्गिनः 1 विज्ञेया हुण्डसंस्थाना विकलेन्द्रियनारकाः ॥७॥ पटसंस्थानभृतो मन्यास्तिर्यशः कथितास्तथा । समेन चतुरोग संस्थानेन युनाः सुराः ।।०२॥ "देहः सूक्ष्मनिगोदस्य भागोऽयंस्येय अङ्गुलः । अपर्याप्तस्य जातस्य तृतीयसमयेऽत्पशः ॥७३॥ स एवैकेन्द्रियादीनां देहः स्यादरुपमानतः । पञ्चेन्द्रियावसानानां सूक्ष्मोदारप्रभेदिनाम् ॥७॥ सहस्रयोजनं पनं सगव्यूतं प्रमाणतः । समस्तेकेन्द्रियोकृष्टदेहमानमिदं मतम् ॥७॥ उत्कर्षाद् द्वीन्द्रियेषु स्यात् शङ्को द्वादशयोजनः । प्रीन्द्रियोऽङ्गी निगव्यूतो भ्रमरो योजनाङ्गकः ॥७६॥ सहस्रयोजनो मत्स्यः सपर्याप्तः स्वयम्भुवः । सिस्थप्रमाणकोऽत्यल्सः प्राणी जलचरः स्मृतः ॥७॥ संमुलुनजसत्यानां खजलस्थलचारिणाम् । तिरश्चों तु वितस्तिः स्यादपर्याप्तशरीरिणाम् ॥७॥ अपर्याप्ताः पुनः सत्वा ये जलस्थलगभंजाः । संमूच्छनोयपर्याप्ताः खगा जलचरास्तथा ॥७॥ धनुःपृथक्त्वमुत्कर्थात् खगाश्चापि च गर्मजाः । पर्यावाश्चाप्यपर्याप्ता देहमानं वहन्ति ते ॥८॥ जलगर्भजपर्यासाः स्युः पञ्चशतयोजनाः । त्रिपल्याउनुतिर्यञ्चस्निगव्यूताः प्रमाणतः ॥८॥ इन्द्रिय जीवोंकी छह माह, पक्षियोंकी बहत्तर हजार वर्ष, साँपोंकी ब्यालीस हजार वर्प, छातीसे सरकनेवालोंकी नौ पूर्वाङ्ग,मनुष्यों और मत्स्योंकी एक करोड़ वर्ष पूर्वको उत्कृष्ट आयु है ॥६४-६॥ पृथिवीकायिक जीव मसूरके आकार हैं, जलकायिक तृणके अग्रभागपर रखी वूदके समान हैं, तेजस्कायिक जीव खड़ी सूइयोंके सदृश हैं, वायुकायिक जीव पताकाके समान हैं, वनस्पति- कायिक जीव अनेक आकारके धारक हैं। विकलेन्द्रिय तथा नारकी जीव हुण्डक संस्थानसे युक्त हैं ॥७०-७१॥ मनुष्य और तिर्यश्च छही संस्थानोंके धारक कहे गये हैं और देव केवल समचतुरस्त्र E संस्थानसे युक्त बतलाये गये हैं ॥७२॥ सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवका शरीर अहलके असंख्यातवें भाग है और वह उत्पन्न होनेके तीसरे समयमें जघन्य अवगाहना रूप होता है ॥७३॥ सूक्ष्म और स्थूल भेदोंको धारण करनेवाले एकेन्द्रियसे लेकर पञ्चेन्द्रिय जीवों तकका शरीर यदि छोटेसे छोटा होगा तो अङ्गुलके असंख्यातचें भाग प्रमाण ही होगा इससे छोटा नहीं ॥७४॥ कमल प्रमाणको अपेक्षा एक हजार योजन तथा एक कोश विस्तारवाला है । समस्त एकेन्द्रिय जीवॉम देहका उत्कृष्ट प्रमाण यही माना गया है ॥७५।। दोइन्द्रिय जीवोंमें सबसे बड़ी अवगाहना शतकी है और वह बारह योजन प्रमाण है। तीन इन्द्रियों में सबसे बड़ा कानखजूग है और वह तीन कोश प्रमाण है। चौइन्द्रियों में सबसे बड़ा भ्रमर है और वह एक योजन-चार कोश प्रमाण है तथा पञ्चेन्द्रियों में सबसे बड़ा स्वयंभूरमण समुद्रका राघव मच्छ है और वह एक हजार योजन प्रमाण है । पञ्चेन्द्रियों में सूक्ष्म अवगाहना सिक्थक मच्छकी है।।७६-७७॥सम्मूर्च्छनजन्मसे उत्पन्न अपर्याप्तक जलचर, थलचर और नभचर तिर्यञ्चोंकी जयन्य अवगाहना एक वितस्ति प्रमाण है ॥८॥ गर्भजीमें अपर्याप्तक जलचर, स्थलचर, सम्मूर्छनोंमे पर्याप्तक जलचर, नभश्चर तथा गर्भजोंमें पर्यातक, अपर्याप्तक दोनों प्रकारके नभश्चर, तिर्यच, उत्कृष्ट रूपसे पृथक्त्व घनुप प्रमाण शरीरको अवगाहना धारण करते हैं ॥६-८०॥ गर्भजन्मसे उत्पन्न पर्याप्तक जलचर जीव पाँच - १ १. पृथिवीकायिकाः । २ जलकायिकाः । ३. अग्निकायिकाः । ४. वायुकायिकाः । ममुरंबु बिन्दु सूई कलारधयसण्णिहो हत्रे देहो । पुढवी आदि च उरह तक तस काया अणेयविहा ॥१८॥गो० जी०१ ५ मुहुम णिगोद अपजत्यस्म जादस्स तदिय समयम्हि । अगुल असंखभाग जहएणमुक्कस्मयं मच्छे ॥१४॥ गो० जी० । ६ साहिय सहस्समेक वारं कोसूणमेकमेक्क च । जोयशसहस्म दीहं पम्मे वियले महामन्छे ||१५|| पिति च य पुरण जहणणं श्रृणु धरी कुथुकाणमच्छीमु । सिच्छयमन्छे चिदंगुलसंखे संवगुणिदकमा ६६|| गो० जी० । ७ जलधरा-म०।

हरिवंशपुराणे
पञ्चचापशतोत्सेधा उत्कर्षाचारकाः सुराः । पञ्चविंशतिचापाः स्युरायुस्तेषां पुरा यो २॥
पर्याप्तयः पडाहारशरोरेन्द्रियगोचराः । आनप्राणमनोभाषाभेदैस्ता: परिभाषिताः ॥८३॥
स्पर्शनं रसनं घ्राणं चक्षुः धोय तथैव तत् । इन्द्रियपञ्चकं प्रोक्त स्थावरमसगोचरम् ॥८॥
लब्धिश्चैवोपयोगश्च भावेन्द्रियमिहोदितम् । द्रव्येन्द्रियं तु निवृत्तिः सहोपकरणमंतम् ॥८॥
"स्पर्शनं नैकसंस्थानं रसनं तु क्षुरप्रवत् । घ्राणं धानुकरीत्येवमतिमुक्तकचन्द्रिकाम् ॥८६॥
चक्षुमंसूरमन्वेति श्रोत्रं तु यवनालिकाम् । स्वाकारेणेति संस्थानं तद्रव्येन्द्रियगोचरम् ॥७॥
धनुःशतानि चत्वारि स्पर्शनेन्द्रियगोचरः । एकेन्द्रियस्य चोकृष्टस्ततो यावदसंज्ञिनाम् NEEll
अष्टौ पोडश संख्यातो द्वाविंशद्विगुणान्यपि । चतुःषष्टिःशतं पण्डा घ्राणान्ते द्विरसंशिनः ॥८॥
चतुःपञ्चाशता सार्धमेकासत्रिंशदीयते । शतानि योजनानां तु चक्षुपा चतुरिन्द्रियः ॥१०॥
योजनानां शतान्येकन्यून पष्टिः सहाभिः । असज्ञिचक्षुविपयो योजनं प्रोग्रगोचरः ॥६॥
स्पर्श रसं च गन्धं च नवयोजनमानगम् । संझी यथास्वमादसे शब्दं द्वादशयोजनम् ॥१२॥
सौ योजन विस्तारवाले हैं। जिन मनुष्य और तिर्यञ्चोंकी आयु तीन पल्यकी है उनकी अवगाहना
तीन कोश प्रमाण है ॥१॥ नारकी उत्कृष्टतासे पाँच सौ धनुप ऊँचे हैं, और देव पचीस धनुष
प्रमाण है । इनकी आयु पहलेके समान है ॥२॥
आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्रास, भाषा और मनके भेदसे पर्याप्तियाँ छह कही गई
हैं ॥३॥ स्पर्शन, रसना, घाण, चतु और श्रोत्र ये पाँच इन्द्रियों कही गई हैं। इनमें स्थावर जीवोंके
केवल स्पर्शन इन्द्रिय और त्रसजीवोंके यथाक्रमसे सभी इन्द्रियाँ पाई जाती हैं ।।८४॥ भावेन्द्रिय
और द्रव्येन्द्रियके भेदसे इन्द्रियाँ दो प्रकारकी हैं। इनमें भावेन्द्रियाँ लब्धि और उपयोग रूप हैं
तथा द्रव्येन्द्रियाँ निर्वृति और उपकरण रूप मानी गई हैं ॥५॥ स्पर्शन इन्द्रिय अनेक आकारवाली
है, रसना खुरपोके समान है, घ्राण अतिमुक्तक--तिल पुष्पका अनुकरण करती है, चनु मसूरका'
अनुसरण करती है और कर्ण इन्द्रिय यवको नलीके समान है। इस प्रकार द्रव्येन्द्रियों का आकार
कहा ।।८६-८७॥ एकेन्द्रिय जीवको स्पर्शन इन्द्रियका उत्कृष्ट विषय चार सौ धनुप है । उसके आगे
असैनी पञ्चेन्द्रिय तक दूना-दूना होता जाता है ॥८॥ इस प्रकार द्वीन्द्रियके स्पर्शनका विषय
आठ सौ धनुप, त्रीन्द्रियके सोलह सौ धनुप, चतुरिन्द्रियके बत्तीस सौ धनुप और असैनी पञ्चे-
न्द्रियके चौंसठ सौ धनुष है । रसना इन्द्रियका विपय द्वीन्द्रिय जीवके चौंसठ धनुष,
त्रीन्द्रियके
एक सौ अट्ठाईस धनुप, चतुरिन्द्रियके दो सौ छप्पन धनुप, और असैनी पञ्चेन्द्रियके पाँच सौ
धनुप है। घ्राण इन्द्रियका विषय त्रीन्द्रिय जीवके सौ धनुष, चतुरिन्द्रियके दो सौ धनुष और
असैनी पञ्चेन्द्रियके चार सौ धनुष प्रमाण है | चतुरिन्द्रिय जीव अपनी चतुरिन्द्रियके
द्वारा उनतीस सौ चौवन योजन तक देखता है ॥१०॥ और असैनी पञ्चेन्द्रियके चतुका विषय
उनसठ सौ साठ योजन है। एवं असैनी पञ्चेन्द्रियके श्रोत्रका विपय एक योजन है ॥१॥ सैनी
पञ्चेन्द्रिय जीव नौ योजन दूर स्थित स्पर्श, रस और गन्धको यथायोग्य ग्रहण कर सकता है
१ ययौ म। २. श्राहारसरीरिंद्रियपजत्तीबाणपाणभासमणो। चत्तारि पच छप्पिय एइदिय
वियलसरणीणं ॥११८|| गो० नी० १ ३ लन्भ्युपयोगौ भावेन्द्रियम् त० सू०। ४ निर्वृत्ति म । निवृत्युपकरणे
द्रव्येन्द्रियम् त० सू०।
५. चक्खू सोद घाणं जिन्भायारं मसूर जवणाली।
अतिमुत्तखुरप्पसमं पास तु अणेयस ठाण ||
६. घणुवीसड दसय फदी जोयण छादारल हीणतिसहस्सा।
असहस्स पण विसया दुगुणा असरिणत्ति ॥१६॥

अष्टादशः सर्गः सहस्रः सष्ठमिः सत्रा चरवारिंशत्सहस्रकैः । त्रिषष्टया च द्विशन्या च योजनेश्वभुपेक्षते ॥३३॥ इत्यनेकविकल्पेऽस्मिन् संसारे सारवर्जिते । मोपसाधनतः सारं मानुष्यं दुलमं च तत् ॥१४॥ दुष्कर्मोपशमालवा तन्मानुष्यं कथन । यन्नो मविरक्तेन विधेयो मुक्तये विदा ।।१५|| अयानावसरेऽपृच्छन्नन्दा केवलिनं मवान् । पूर्वानन्यवृष्णिः स्वानिस्युवाच च सर्वविन् ॥१६॥ साकेते रत्नवीयस्य राज्ञो राज्ये जिताहिते । तीर्थे वृषभनायस्य वर्तमाने महोदये ॥१७॥ श्रेष्ठी सुरेन्द्रदत्तोऽमूवात्रिंश कोटिभिर्धनी । तस्य जैनस्य मित्रं च रुद्रदत्तोऽभवद्विजः || तिथिपर्वचनुर्मामी जिनपूजायमस्य सः । दत्त्वार्य द्वादशान्दान्त वणिगयातो वणिज्यया ॥६॥ स धूतवेश्याव्यमनी विनाश्य द्रविणं द्विजः । चौर्यगृहीत मुक्तोऽगादुल्कामुखवनं खलः ॥१०॥ स हि मुष्यन् सह व्याधैलोकं व्याधिनिभो हतः । सेनान्या नेणिकेनागावरक रौरवं ततः ॥१०॥ दैवस्वस्य विनाशेन अस्निगदुदन्वताम् । समं कालं महादुःखं प्राप्योदया॑भ्रमद् भवे ॥१०२॥ पापस्योपशमात् पश्चादुदभूद् गजपुरे पुरे । कापिटलायनाभिरयादनुमत्यामिह द्विजः ॥१०॥ और बारह योजन दूर तकके शब्दको सुन सकता है ||२|| सैनी पञ्चेन्द्रिय जीव अपने चतुके द्वारा सैंतालीस हजार दो सौ त्रेशठ योजनकी दूरीपर स्थित पदार्थको देख सकता है ॥६३।। इस प्रकार यह असार संसार अनेक विकल्पोंसे भरा हुआ है। इसमें मोक्षका साधक होनेसे मनुष्य पर्याय ही सार है परन्तु वह अत्यन्त दुर्लभ है ।।६४|| दुष्कर्मोंका उपशम होनेसे यदि किसी तरह मनुष्य पर्याय प्राप्त हुई है तो बुद्धिमान मनुष्यको संसारसे विरक्त होकर मुक्ति प्राप्तिके लिए प्रयत्न करना चाहिए ॥६॥ अथानन्तर इसी वीचमें केवली भगवान्को नमस्कार कर अन्धकवृष्णिने अपने पूर्वभव छे और सर्वज्ञ सुप्रतिष्ठ केवलो उसके पूर्वभवोंका वर्णन इस प्रकार करने लगे ॥६६॥ जय गवान् वृषभदेवका महाप्रभावशाली तीर्घ चल रहा था तब अयोध्या नगरीमें राजा रत्नवीर्य राज्य करता था। उसके निष्कएटक राज्यमें एक सुरेन्द्रदत्त नामका सेठ रहता था जो यत्तीस रोड़ दोनारीका धनी था, जैनधर्मका परम श्रद्धालु था और रुद्रदत्त ब्राह्मण उसका मित्र था |६७-६८॥ कदाचित् सुरेन्द्रदत्त सेठ, यारह वर्ष तक अष्टमी, चतुर्दशी, आष्टाहिक पर्व तथा चौमासोंमें जिनपूजाके लिए उपयुक्त धन, रुद्रदत्तको देकर व्यापार के लिए बाहर चला गया ||६|| बामण रुद्वद्वत्त वडा दृष्ट था उसने जुआ तथा वेश्या व्यसनमें पड़कर यह धन शीघ्र ही नष्ट कर देया । जय धन नष्ट हो गया तब चोरी करने लगा। चोरीके अपराधमें पकड़ा गया और जब एटा तब उल्कामुख नामक वनमें जाकर रहने लगा | वहाँ वह भीलोंके साथ मिलकर डोगोको लूटने लगा और अपने दुष्कर्म से लोगों के लिए व्याधि स्वरूप हो गया । अन्तमें श्रेणिक नामक सेनापति के हाथसे मरकर रौरव नामक सातवें नरक गया ॥१०॥ देवद्रव्यके हड़पनेसे वह वैतीस सागर तक नरकके भयंकर दुःख भोगकर वहाँसे निकला और संसारमें भ्रमण करता रहा ॥१२॥ कदाचित् पाप कर्मका उपशम होनेसे वह हस्तिनागपुरमें कापिष्ठलायन नामक बाझगको अनुमति नामक खीसे गौतम नामका बाझग-पुत्र हुआ। वह महादरिद्र था, उत्पन्न होते ही उसके माता-पिता मर गये थे क्या भीस माँगता हुआ वह इधर-उधर घूमता-फिरता था। एक घार १ सविस्त यार सौदे तिएदं राव बोयणासि चक्नुस्ल । सत्ताल सहस्सा वेसद तेमटिमदिरेया ॥१६॥ विरिगमय सटि विरहिद लक्वं दसमूल ताडिदे मूलं । परगुणिदे सटिहिदे चम्बुपासन प्रदागं ॥१६॥ गो. नी. 1 २ बरियातो म०।३ देवगम्यस्य ।

२७० हरिवंशपुराणे नि:श्रीगीतमनामाऽयौ कृतमातृपितृतयः । साधु भुनानमद्रासी भिक्षार्थी पर्यटन वटुः ॥१०॥ समुददत्तनामानमनुगम्य तमाश्रमे । जगादामसमं सूर्य कुरुवं मां बुभुक्षितम् ॥१०॥ भव्यसत्त्वमसौ बुवा दीक्षां तस्मै ददौ गुरुः । पापं वर्षसहस्रेण विघ्नकृत् सोऽन्यशीशमत् ॥१०॥ स श्रीगौसमसंज्ञाकः प्राप्तोऽतीगमहानसम् । पदानुसारिणी लन्धि वीजबुद्धिरसर्द्धिमान् ॥१०७॥ भाराध्याराधनां सम्यक मुविशालमगाद् गुरुः । शिघ्यो वर्षसहस्राणि पञ्चाशत् स तपोऽतपत् ॥:08 उदियाय स तव सुविशोले विशालधीः । स्थिति सन्मानयन्मान्यामष्टाविंशतिसागरः ॥१०॥ अहमिन्द्रसुखं भुक्त्वा सोऽवतीर्य ततो नृपः । सञ्जातोऽन्धकदृष्णिस्त्वमहं तु भवतो गुरुः ॥१०॥ अप्रासीत् पूर्वजन्मानि दुःखितः सितिपः पुनः । स्वपुत्राणां दशानां च केवली घ जगाविति ॥११॥ सद्भगिलपुरे राजा नाम्नो मेघरयोऽभवत् । भार्या तस्य सुभद्राख्या तयोहंढरथः सुतः ॥१२॥ इयो राजसमस्तस्य भार्या नन्दयशाः मुते । सुदर्शना सुज्येष्टा धनदत्तस्य सूनवः ॥१३॥ धनश्च जिनदेवौ च पालान्तास्ते नयो मताः । अहंद्दासः प्रसिद्धश्च जिनदासस्तथा परः ॥१४॥ अहंदत्त इति ख्यातो जिनदत्तः परः स्मृतः । प्रियमित्रः प्रीतोऽन्यस्तथा धर्मरुचिध्वनिः ॥१५॥ सुमन्दरगुरोः पावें प्रवबाज नरेश्वरः । धनदत्तोऽपि पुस्तैनवभिः सह दीक्षितः ।।११६॥ सुदर्शनायिकापार्थे सुभद्रा च सुदर्शना । सुँग्येष्ठा च तपो ज्येष्टं सहैव प्रतिपेदिरे ॥११७॥ धनदत्तो गुरुश्चैव वाराणस्यां नृपस्तथा । केवलज्ञानमुपाद्य विहृत्य वसुधा क्रमात् ॥१८॥ उसने समुद्रदत्त नामक मुनिराजको आहार करते देखा। आहारके बाद वह उनके पीछे लग गया तथा आश्रममें पहुंचनेपर उनसे बोला कि मैं भूखा मरता हूँ आप मुझे अपने समान बना लीजिए ॥१०३-१०५।। मुनिराजने उसे भव्य प्राणी जानकर दीक्षा दे दी और उसने भी दीक्षा लेकर एक हजार वर्षको कठिन तपस्यासे विघ्नकारक पापोंका उपशम कर दिया ॥१०६|| तपस्याके प्रभाषसे उक्त गौतम मुनि, बीजबुद्धि तथा रसऋद्धिसे युक्त हो गये और अक्षोणमहानस एवं पदानुसारिणी ऋद्धि भी उन्होने प्राप्त कर ली ॥१०७॥ गुरु समुद्रदत्त मुनि, अच्छी तरह आराध- नाओकी आराधना कर छठवें अवेयकके सुविशाल नामक विमानमे अहमिन्द्र हुए और शिष्य गौतम मुनिने पचास हजार वर्ष तप किया ॥१०॥ अन्तमें विशाल बुद्धिके धारक गौतम मुनि भी अट्ठाईस सागरको सम्भावनीय आयु प्राप्तकर उसी सुविशाल विमानमे उत्पन्न हुए ॥१०॥ अमिन्द्रके सुख भोगनेके बाद वहाँसे चलकर गौतमका जीव तो तू अन्धकवृष्णि हुआ है और तेरा गुरु मुनि समुद्रदत्तका जीव मैं सुप्रतिष्ठ हुआ हूँ ।।११०॥ तदनन्तर दुःखी होते हुए राजा अन्धकवृष्णिने अपने दशों पुत्रोंके पूर्व भव पूछे सो केवली भगवान इस प्रकार कहने लगे ॥१११॥ उन्होंने कहा कि किसी समय सद्भद्रिलपुर नगरमें राजा मेघरथ रहता था, उसकी स्त्रीका नाम सुभद्रा था और उन दोनोके दृढ़रथ नामका पुत्र था ॥११२॥ उसी नगरमै राजाको तुलना करनेवाला धनदत्त नामका सेठ रहता था उसकी स्त्रीका नाम नन्दयशा था । नन्दयशासे उसके सुदर्शना और सुज्येष्ठा नामको दो कन्याएँ तथा धनपाल, जिनपाल, देवपाल, अर्हद्दास, जिनदास, अर्हद्दत्त, जिनदत्त, प्रियमित्र और धर्मरुचि ये नौ पुत्र उत्पन्न हुए ॥११३-११५॥ कदाचित् राजा मेघरथने सुमन्दर गुरुके पास दीक्षा ले ली । यह देख सेठ धनदत्त भी अपने नौ ही पुत्रोंके साथ दोक्षित हो गया ॥११६॥ और सुदर्शना नामक आर्यिकाके पास सुभद्रा सेठानी तथा उसकी सुदर्शना और सुज्येष्ठा नामक दोनों पुत्रियोंने साथ ही-साथ दीक्षा धारण कर ली ॥११७॥ कदाचित् धनदत्त सेठ, सुमन्दर गुरु और मेघरथ १. सुरद्धिमान् म०। २. पष्टनैवेयके विशालनानि विमाने । ३ श्रेष्ठी। ४. सुस्येष्ठा म01 ५. विहता म.।

अष्टादशः सर्गः २७१ । सप्तभिः पञ्चभिः पूज्या वर्षद्वादशभिश्व ते । अन्ते सिद्धशिलारूढाः सिद्धा राजगृहे पुरे ॥११॥ अन्तर्वग्नी प्रसूता सा पूर्वनन्दयशाः सुतम् । धनमित्रं यथा योग्यं सन्न्यज्य तपमि स्थिता ॥२०॥ पुत्रान् पिद्धशिलारूढान् प्रायोपगमनस्थितान् । वन्दित्वा पुत्रमातृत्वमावृणोत् स्नेहमोहिता ॥१२॥ स्नेहगह्वरमोहिन्यौ भगिन्यौ च तदैच्छताम् । सोदरलं भवेऽन्यत्र किं वा स्नेहस्य दुष्करम् ॥१२२॥ माता सुताः समाराध्य देवा भूरवाऽच्युनेऽपिलाः । द्वाविंशतिसमुद्रान्तं कालं भुक्त्वा परं सुखम् ॥१२३॥ अवतीर्य ततो भूमि देवीदुहितृदेहजाः । तवैवं भूप ! चित्रा हि परिणामवशाद् गतिः॥१२॥ बमाण भगवानन्ते वसुदेवभवान्तरम् । प्रणिधानपरोस्वर्णनरदेवसभान्तरे ॥१२५॥ कश्चिद्भवाब्धिदुःखोमिनिमग्नोन्मग्नताकुलः । प्राणी प्राप युगच्छिदं कीलवत् नृभवान्तरम् ॥१२६॥ मागधामिघदेशेऽसौ शालिग्रामेऽप्रजन्मनोः । अभूदुविधेयोस्नोक तोकं नोपनयत् मुप्तम् ॥१२७॥ गर्भस्थेऽपि पिता तस्मिन्नभऽमृत मातृका । दुभंगस्याष्टवर्पस्य निर्भा मातृत्वमा शुचा ॥१२८॥ राजा-तीनो ही मुनि वनारस आये और वहाँ केवलज्ञान उत्पन्नकर पृथिवीपर विहार करने लगे ॥११८।। पूजनीय धनदत्त, सुमन्दर गुरु और मेघरथ मुनि क्रमसे सात वर्ष, पाँच वर्प और बारह वर्ष तक पृथिवीपर विहारकर अन्तमें राजगृह नगरसे सिद्धशिलापर आरूढ़ हुए-मोक्ष पधारे ॥११॥ उस समय सेठ धनदत्तकी स्त्री नन्दयशा गर्भवती थी इसलिए दीक्षा नहीं ले सकी थी परन्तु जब उसके घनमित्र नामका पुत्र हो गया और वह योग्य बन गया वव वह भी उसे छोड़ तप करने लगी ॥१२०।। एक दिन सेठ धनदत्तके पुत्र धनपाल आदि नौके नौ मुनिराज प्रायोपगमन संन्यास लेकर सिद्धशिलापर विराजमान थे। मुनियोंकी माता आर्यिका नन्दयशाने उन्हें देख वन्दना की और नेहसे मोहित हो निदान किया कि मैं अग्रिम भवमें भी इनकी माता च ॥१२१।। मुनियोंकी यहिन सुदर्शना और सुज्येष्ठा नामक आर्यिकाओंने भी स्नेहरूपी गर्तमें मोहित हो निदान किया कि ये अग्रिम भवमे भी हमारे भाई हो । सो ठीक ही है क्योंकि स्नेहके लिए क्या कठिन है ? ॥१२२॥ अन्तम समाधि धारण कर माता पुत्र और पुत्रियाँ-सबके सब अच्युत स्वर्गमें देव हुए । तदनन्तर बाईस सागर तक उत्कृष्ट सुख भोगकर वहाँसे चले और पृथिवीपर आकर हे राजन् ! तुम्हारी स्त्री, पुत्रियाँ तथा पुत्र हुए हैं सो ठीक ही है क्योंकि परिणामों के अनुसार नाना प्रकारकी गति होती ही है । भावार्थ-नन्दयशाका जीव तो तुम्हारी रानी मुभद्रा हुआ है, सुदर्शना और सुज्येष्ठाके जीव क्रमसे कुन्ती और माद्री हुए हैं तथा धनपाल आदिके जीव वसुदेवके सिवाय नो पुत्र हुए हैं ॥१२३-२२४॥ तदनन्तर भगवान् मुप्रतिष्ठ केवली, ध्यानमें तत्पर एवं कान खड़े कर बैठे हुए मनुष्य और देवोंकी उस सभामें वसुदेवके भवान्तर कहने लगे-॥१२शा जिस प्रकार समुद्रकी लहरीमें तैरती हुई कील जुएके छिद्रको बड़ी कठिनाईसे प्राप्त कर सकती है उसी प्रकार संसार सागरको दुःसरूपी लहरीमे डूबता और उबरता हुआ यह प्राणी मनुष्य भवको बड़ी कठिनाईसे प्राप्त कर पाता है ।।१२क्षा इसी पद्धतिसे वसुदेवका जीव मागध देशके शालिग्राम नामक नगरमें रहने- वाले अत्यन्न दरिद्र ब्राह्मग और ब्राह्मणोके यहाँ ऐसा पुत्र हुआ जिसे थोड़ा भी सुख प्राप्त नहीं था ॥१२७॥ जब वह गर्भमै था तब पिता मर गया। और उत्पन्न होते ही माता मर गई इसलिए मौसीने इसका पालन-पोपण किया परन्तु वह लगभग आठ वर्पका ही हो पाया था कि उसकी १ पूजा म०। २ परोत्कर्म म० । ३. दरिद्रयोः । ४ पुनः । तोमः क० । ५ इतः श्रारभ्य १३१ श्लोक्पयन्ताः श्लोकाः 'ख' पुस्तके न सन्ति । 'क' पुस्तकेपि पश्चात् केनापि पाटटिपण्या योजिताः। ६ शोकेन मातृष्वमापि निभाः दीतिरहिता जाता मृतेत्यर्थः ।

२७२ हरिवंशपुराणे पुरे राजगृहे सोऽथ मातुलस्य गृहेऽवसत् । भनु स्वसीय इत्येष पितृष्ववानुपालितः ॥१२॥ मलप्रस्तशरीरोऽसावुमगन्धोऽजपोतवत् । विकोणशीर्णरेशानः कुलः पिलेषणः ॥१३॥ दुहितमातुलस्यासौ घान्छन् दमरकश्रुतेः । ताभिर्जुगुप्मुभिर्नुपी स्वगृहाद्विनिघाटितः ॥१३॥ दुर्भाग्याग्निशिखालीढः स्थाणुरेप'मलीमसः । मर्तमिच्छन् पसगाभो वेभारे साधुभिटतेः ॥३२॥ निन्दिरवामानमाकण्यं धर्माधर्मफलं ततः । मायामोद् गुरुपादान्ते शान्तः संख्याएथयोगिनः ॥१३॥ चचार गुरुपन्देशादाशापाशविनाशनः । तपोऽन्यदुश्चरं चारुचारित्रज्ञानदर्शनः ॥१३॥ मनन्द नन्दिपेणाख्यस्तपसोरपलब्धिभिः । एकादशाभृरमाधुः सोळाशेपपरीपदः ॥३५॥ उपवासविधियों यः शासनेऽन्यातिदुष्करः । तस्य धैर्यवतः साधोः स सर्वः मुकरोऽभवत् ॥१३॥ आचार्यग्लानशैयादिदशभेदमुदीरितम् । चैयारयतपश्चके सविशेषमसापिः ॥१७॥ महालब्धिमतस्तस्य यावृत्योपयोगि यत् । यस्तु सचिन्तितं हस्ते भेषजापाशु जायते ॥ ३८॥ तपो वर्षसहस्राणि यहूनि तपतोऽस्य च । वैयावृश्यं तपः शक्रः शशंस मुरसंसदि ॥१३॥ काले सम्प्रति साधूनां चयापत्यं करोति यः । नन्दिपेणः परो जातो जम्बूद्वीपस्य भारते ॥१४०॥ यन चिन्तितं पथ्यमनुल्लाधसुरष्टिना । तत्तस्य पिप्रमणं स सम्पादयति एमी ॥१४॥ मौसी भी शोकके कारण प्राणरहित हो गई ॥१२८।। अब वह राजगृह नगरमें मामाके घर रहने लगा। वहाँ 'यह हमारे पविका भानजा है' यह सोचकर चुआने उसफा पालन-पोषण किया ॥१२६।। इसका शरीर मलसे ग्रस्त था, शरीरसे छागके बच्चे के समान तीव्र गन्ध आती थी, केश रूसे तथा बिखरे हुए थे, वह मैले-कुचैले वस्त्र पहिने रहता था और उसकी आँखें स्वभावसे ही पीली थीं ॥१३०॥ इतनेपर भी वह अपने मामा दमरककी पुत्रियोके साथ विवाह करना चाहता था । परन्तु विवाह करना तो दूर रहा घृणा करनेवाली उन पुत्रियोंने उसे घरसे निकाल दिया जिससे वह बहुत दुःखी हुआ ॥१३१।। अन्त में वह दुर्भाग्यरूपी अग्निकी शिखाओं से झुलसकर दूँठके समान मलिन हो गया और पतंगकी तरह कूदकर मरनेकी इच्छासे वैभार गिरिपर गया परन्तु मुनियों ने उसे रोक लिया ॥१३२॥ तदनन्तर धर्म-अधर्मका फल सुनकर उसने अपने-आपकी बहुत निन्दा की और शान्त हो संख्य नामक मुनिराजके चरण मूलमें दीक्षा धारण कर ली ॥१३॥ गुरुके सम्यक् उपदेशसे आशारूपी पाशको नष्टकर वह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्रका धारक हो गया और अन्य मनुष्यों के लिए दुश्वर तप तपने लगा ॥१३४॥ उसका नन्दिपेण नाम था, वह सपके प्रभावसे उत्पन्न ऋद्धियोंसे युक्त हो गया, ग्यारह अगका धारी एवं समस्त परोपहीको सहनेवाला उत्तम साधु हो गया ॥१३५॥ शास्त्रोमें जो-जो उपवास दूसरोंके लिए अत्यन्त करिन थे वे सब उस धैर्यशालो, साधुके लिए सरल हो गये ॥१३६॥ आचार्य लाल शैक्ष्य आदिके भेदसे जिसके दश भेद बताये गये हैं उस वैयावृत्य तपको वह विशेष रूपसे करता था ॥१३७॥ वह मुनि बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंसे युक्त था इसलिए वेयावृत्यमे उपयोग आनेवाली जिस औषधि आदिका वह विचार करता था वह शीघ्र ही उसके हाथमे आ जाती थी॥१३८॥ इस प्रकार मुनि नन्दिपेणको तप करते हुए जब कई हजार वर्ष बीत गये तब एक दिन इन्द्रने देवोंकी सभामें उसके वैयावृत्य तपकी प्रशंसा की ॥१३६॥ इस समय जम्बू द्वीपके भरत क्षेत्रमे जो साधुओंकी वैयावृत्य करता है वह नन्दिषेण मुनि सबसे उत्कृष्ट है ॥१४०॥ क्योकि रोगसे पीड़ित मुनि जिस पथ्यको इच्छा करता है उसे क्षमाको धारण करनेवाला नन्दिपेण मुनि शीघ्र ही पूर्ण कर १ मणीमयः म० 1 मलीमयः ग०, ८० । २ वृतः म । ३. अस्मादने 'तपोलब्धिप्रभावेन वैयावृत्यं करोति सः' इति 'ख' पुस्तकेऽधिकः। ४ रोगयुक्तसुदृष्टिना 'उल्लायो निर्गतो गटात्' इति कोषः। न उल्लाघोऽनुल्लाधः स चासौ सुदृष्टिश्च तेन ।

अष्टादशः सर्गः २०३ प्रामुकद्रव्ययोगेन चयाबग्योद्यतस्य हि । संयनस्यापि नो बन्धो निरेव तु जायते ॥१२॥ 'धर्ममाधनमाय हि शरीरमिह देहिनाम् । तस्य धारणमाघेयं ययाशक्ति च शासने ॥१३॥ सम्यादष्टिरशेषोऽपि मन्दालानादिरादरान् । पर्युपासनया निन्यमुपचयः सुदृष्टिना ॥१४४|| प्रतीकारसमर्थोऽपि यन्सुदृष्टिमुपेक्षते । व्याधिक्लिष्टममौ नष्टः सम्यवस्थापबृंहकः ॥१४॥ यन्नोपयुज्यते यस्य धनं वा वपुरेव वा । स्वशामनजने तेन तस्य किंबन्धहेनुना ॥१४॥ तदेव हि धनं तस्य वपुर्वा सर्वया मतम् । यद्यस्य शासनाया ना यथास्वमुपयुज्यते ॥१४॥ शकस्योपेक्षमाणस्य सद्दष्टिननमापदि । का वा कटिनचिचस्य जिनशासनभक्तता ||१४॥ सम्यवशुदिशुद्धे नु जने भनिविलोपने । पुमो मिष्याविनीतस्य का वा दर्शनशुद्धिता ||१een वोधिलामनिमित्ताया दृष्टिशुद्धविवाधने । पुनर्योधिपरिमाठिटुलंमा भवमटे ॥१५०॥ बोधिलामपरिप्राप्तावमन्यां मुनिमाधनम् । कुतो वृत्तममावेऽस्य कुतो मुक्तिस्तदपिनः ॥१५॥ मुत्रयमात्र कुतः सौरयमनन्तमनपायि च । मौरयामावे कुतः स्वास्थ्य स्वास्थ्यामावे कुनः कृती ॥१५२॥ अतः मा मना भाव्यं ययास्वं स्वहिनैपिणा । वैयावृत्योद्यतेनाऽत्र यतिना गृहिणा तथा ॥१५३।। शरीरं दर्शनं ज्ञानं चारित्रं परमं तपः । वैयावृत्यकृना म स्यापितं हि परारमनोः ।।१५४॥ शामनस्थितिविद् विद्वानुपकुर्वन् परं स्वयम् । निरपेचोपकारी वः परान्मलघुमोक्षमाग् ॥१५॥ - देता है ।१४१|| गृहस्थकी तो बात ही क्या प्रामुक द्रव्यके द्वारा वैयावृत्य करनेमें तत्पर रहने वाले मुनिको भी उससे वन्ध नहीं होता किन्तु निर्जरा ही होती है ।।१४।। इस संसारमें शरीर ही प्राणियोंका मबसे पहला धर्मका साधन है इसलिए यथाशक्ति उसकी रक्षा करनी चाहिए। यह आगमका विधान है॥१४॥ मन्द शक्ति अथवा बीमार आदि जितने भी सम्यग्दृष्टि है, मम्यग्दृष्टि मनुष्यको उन सबकी वैयारत्य द्वारा निरन्तर सेवा करनी चाहिए ॥१४॥ जो प्रति. कार करनेमें ममर्थ होकर भी रोगसे दुःखी सम्यग्दृष्टिकी उपेक्षा करता है वह पापी है तथा सम्यग्दर्शनका घात करनेवाला है ॥१४॥ जिमका धन अथवा शरीर सहधर्मी जनोंके उपयोगमें नहीं आता उसका वह धन अथवा शरीर किस कामका ? वह तो केवल कर्मबन्धका ही कारण है ।।१४६॥ जिसका तो घन अथवा जो शरीर सहधर्मी जनोंके उपयोगमें आता है यथार्थमें वही धन अथवा वही शरीर उसका है ।।१४७॥ जो समर्थ होकर भी आपत्तिके समय सम्यग्दृष्टिकी उपेक्षा करता है उम कठोर हृदय वालेके जिनशासनको क्यो भक्ति है ? कुल भी नहीं है ।।१४।। जो सम्यग्दर्शनकी शुद्धतासे शुद्ध सहधर्मीकी भक्ति नहीं करता है वह मूठ-मूठका विनयी बना फिरता है उसके सम्यग्दर्शनको शुद्धि क्या है! ॥१४६॥ यदि योषिकी प्रालिम निमित्त- भून दर्शनविशुद्धि में बाधा पहुँचाई जाती है तो फिर इस संसारके संकटमें पुनः बोधिको प्रानि दुर्लभ ही समझनी चाहिए ॥१५०॥ यदि बोषिकी प्रामि नहीं होती है तो मुक्तिका साधन भुत. चारित्र से हो सकता है ? और जब चारित्र नहीं है तय मुक्तिके अभिलापी मनुष्यको मुक्ति फैसे मिल सकती है ? ॥१५१॥ मुक्तिके अभावमें अनन्त एवं अविनाशी मुग्म कैसे प्राप्त हो सकता है ? मुपके अभाव में स्वास्थ्य कमे मिल सकता है ? और म्वास्थ्यके अभाव में यह जीव कृत्यम्त्य फैसे हो सकता है ? ॥१५॥ इसलिए आत्महित चाहनेवाला पाहे मुनि हो चाहे गृहन्य, उसे मर प्रकारसे अपनी शक्तिक अनुमार यामृत्य करनेमें उद्यत रहना चाहिए ॥१५३॥ जो मनुष्य वैयावृत्य करना है वह अपने तथा दूसरेके शरीर, दर्शन, ज्ञान, चारित्र एवं उत्तम तप आदि समी गुणों को स्थिर करता है ॥१५॥ जिन-शासनको रीतिको जाननेवाला जो विद्वान् परका उपकार १ 'शरीरमाद्यं मनु घमंसाधनम्' कुमारसम्भो। २. शनिशरकः । ३. बन्युरेनुना म०, क.। ४ शासनस्थान म। ५. दर्शनशानं म.।

हरिवंशपुराणे वैयावृत्यप्रवृत्ती या शासनार्थातिमावितः । न स शक्यः सुरै रोर्बु किं पुनः क्षुदजन्तुभिः ॥१५॥ नन्दिपेणमुनिश्चैष तथाविध इति स्तुते । सौधर्मेन्द्रेण देवास्तं प्रशशंसुः प्रणामिनः ॥१५७॥ मुनिधैर्यपरीक्षार्थ तत्रैको विबुधस्तदा । मुनिरूपधरः प्राह नन्दिपेणमिति श्रितः ॥१५॥ बैयावृत्यमहानन्द नन्दिपेग मुने शृणु । व्याधिव्यथितदेहस्य देहि मे किञ्चिदौषधम् ॥५६॥ इत्युक्तस्स तमा हैवमविकल्पानुकम्पया । ददामि यत ते साधो रुचिः कस्मिसिहाशने ॥१६॥ पूर्वदेशजशालीनामोदनः सुरभिः शुभः । पञ्चालदेशमुद्गानां सूपः स्वादुरसान्वितः ॥१६॥ हयगवीनमुत्तममपरान्तभुवां गवाम् । पयः कलिङ्गधेनूनां सुसृष्टं व्यञ्जनान्तरम् ॥१२॥ लभ्येत यदि साधु स्यात् श्रद्धा ह्यन ममाधिका । इत्युक्तश्चानयामीति जगाम श्रद्धयान्वितः ॥१३॥ विरुद्धदेशवस्तूनां प्रार्थनेऽप्यविपण्णधीः । गत्वा गोचरवेलायामानीय सहसा ददौ ॥१६॥ उपभुक्तानपानोऽसौ शरीरान्तमलाविलः । धौतस्तेन स्वहस्ताभ्यां निशि निर्विचिकित्सया ॥१६५॥ अभग्नोत्साहमालोक्य नन्दिपेणमनिन्दितम् । वैयावृत्यकृतं प्रोचे दिव्यरूपधरः सुरः ॥१६॥ यथा देवसभेऽस्तौपीत् भगवन्तं मघवानृपे । यावृत्योद्यतो लोके तथैव भगवान् भवान् ॥१६॥ अहो लब्धिरहो धैर्यमहो निर्विचिकित्सता । अहो शासनवारसल्यमशल्यं तव सन्मुनेः ॥१६॥ अन्येषामपि यद्येषा मनीपा स्यान्मनीषिणाम् । कालत्रये तपस्यत्र तेषां शासनभक्तता ॥१६॥ करता हुआ स्वयं प्रत्युपकारको अपेक्षासे रहित होता है वह शीघ्र ही स्वपर आत्माका मोक्ष प्राप्त करता है ।।१५५॥ जो जिन शासनके अर्थको उत्कट भावना करता हुआ वैयावृत्य करनेमे प्रवृत्त रहता है उसे देव भी रोकनेके लिए समर्थ नहीं हैं फिर शुद्र जीवोंकी तो बात ही क्या है ॥१५६॥ यह नन्दिपेण मुनि ऐसे ही उत्तम मुनि हैं इस प्रकार सौधर्मेन्द्र द्वारा स्तुति किये जानेपर सब देवोंने उनकी प्रशंसा की और परोक्ष नमस्कार किया ॥१५७|| उन्हीं देवों में एक देव, मुनिके धैर्यः की परीक्षाके लिए मुनिका रूप रख नन्दिषेण मुनिराजके पास पहुंचा और इस प्रकार कहनं लगा ॥१५८।। हे वैयावृत्यमे महान् आनन्दवाले नन्दिपेण मुनि ! मेरा शरीर व्याधिसे पीड़ित हो रहा है इसलिए मुझे कुछ ओपधि दीजिए ॥१५६॥ उसके इस प्रकार कहनेपर नन्दिषेण मुनिने अपनी अखण्ड अनुकम्पासे कहा कि हे साधो ! मैं ओपधि देता हूँ परन्तु यह बताओ कि तुम्हारी किस भोजनमें रुचि है ?॥१६०॥ मुनि रूपधारी देवने कहा-पूर्वदेशके धानका शुभ एवं सुगन्धित भात, पंचाल देशको मूंगकी स्वादिष्ट दाल, पश्चिम देशकी गायोंका तपाया हुआ घी, कलिङ्ग देशकी गायोंका मधुर दूध और नानाप्रकारके व्यञ्जन यदि मिल जावे तो अच्छा हो क्योंकि मेरी श्रद्धा इन्हीं चीजोंमें अधिक है । इस प्रकार कहनेपर 'मैं अभी लाता हूँ' यह कहकर नन्दिपेण मुनि वड़ी श्रद्धाके साथ उक्त आहार लेनेके लिए चल दिये ॥१६१-१६३।। विरुद्ध देशकी वस्तुओकी चाह होनेपर भी उनके मनमे कुछ भी खेद उत्पन्न नहीं हुआ और गोचरी वेलामें जाकर तथा उक्त सब आहार लाकर उन्होंने शीघ्र ही उस कृत्रिम मुनिको दे दिया ।।१६४॥ कृत्रिम मुनिने उस आहार पानीको ग्रहण किया परन्तु रात्रिमें शरीरके अन्तर्गत मलसे उसका समस्त शरीर मलिन हो गया और नन्दिपेण मुनिने बिना किसी ग्लानिके उसे अपने हाथोसे धोया ॥१६॥ तदनन्तर जिनका उत्साह भग्न नहीं हुआ था, तथा जो बराबर वैयाकृत्य कर रहे थे ऐसे प्रशंसनीय नन्दिपेण मुनि को देखकर दिव्य रूपको धारण करनेवाले देवने कहा कि हे ऋपे ! देवोंकी सभामें इन्द्रने आपको जिस प्रकार स्तुति की थी मैं देख रहा हूँ कि आप उसी तरह वैयावृत्य करनेमें उद्यत हैं ॥१६६-१६७॥ अहो ! आपकी ऋद्धि, आपका धैर्य, आपको ग्लानि जीतनेकी क्षमता और संशय रहित आपका शासन वात्सल्य सभी आश्चर्यकारी हैं, आप उत्तम मुनिराज हैं ॥१६८॥ यदि तप करते समय १. स्तुतेः म० । २ श्रौतस्तेन म । ३. सन्मने म०।

अष्टादशः सर्गः
२७५
इति स्तुन्वा मुनि नत्वा सम्यक्त्वं प्रतिपद्य सः । स्वर्गी स्वर्गमगान्मार्ग जैनेन्द्रमतिवर्तयन् ॥१७॥
पत्रिंशत्सहस्राणि वांग्यतिगमय्य सः। प्रायोपगमनं भेजे पण्मासावधि धीरधीः ॥१७॥
संन्यस्तवपुराहारः स्वपरास्तप्रतिक्रियः । श्रीसौमाग्यनिदानेन स्वं वन्य सुमोहतः ॥१२॥
मिन्दितं नाकरिष्यनिदानं स मुनिस्तदा । भवभ्यत तदा शक्त्या तीर्थकृशाम तद्भवम् ॥१७३॥
स चाराध्य महाशुक्रे शक्नुल्यस्ततोऽभवत् । तन तस्थौ सुसं कालं साई पोडशसागरम् ॥१७॥
स भुक्तसुरसौरयस्ते ततः प्रच्युत्य पार्थिव । पार्थिवो वसुदेवोऽयं सुभद्रायामभून्सुतः ॥१७॥
इति श्रुत्वा मवान् पूर्वान् वृष्णिभार्यासुताः स्वकान् । धर्मसंवेगसम्पन्नाः सनाता नृमुरास्तथा ॥१७६॥
मुप्रतिष्ठं प्रणम्येयुखिदशा नृपतिः पुनः । समुद्रविजयं राज्ये साभिषेकमतिष्टपन् ॥१७॥
समप्यं वसुदेवं च समुद्र विजयाय सः । सुप्रतिष्ठस्य पादान्ते निपान्तस्तद्वान्तकृत् ॥१७॥
राज्ये मोजमणिश्व मथुरायां निधाय सः । उग्रसेनं समग्रेऽयं निग्रन्यवतमाहीत् ॥१७॥
पृथिवीछन्दः
समुद्र विजयः शिवां विहितपबन्धों प्रियां
वधूनिवहमुख्यतामधिगमय्य राज्यस्थितिम् ।
स्थिरां स परिपालयन् सहजबन्धुभन्याम्बुजः
प्रतापमभिवर्धयन्नुदयनैजिनार्को यथा ॥१०॥
इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती समुद्रविजयराज्यलाभवर्णनो
नामाष्टादशः सर्गः ॥१८॥
अन्य बुद्धिमान् मनुष्योंकी भी इसी प्रकार त्रिकालमे वैयावृत्य करनेकी बुद्धि हो जाये तो उसे
उनको शासन भक्ति समझना चाहिए ।।१६। इस प्रकार वह देव, मुनिराजकी स्तुति कर तथा
सम्यग्दर्शन प्राप्त कर जिन-शासनको प्रभावना करता हुआ स्वर्गको चला गया ।।१७०।। अत्यन्त
धीर बुद्धिको धारण करनेवाले नन्दिपेण मुनिने तपश्चरण द्वारा पैंतीस हजार वर्ष विताकर
। अन्तिम समय छह माहका प्रायोपगमन संन्यास ले लिया ॥१७॥ उन्होंने शरीर और माहारका
त्याग कर दिया वे अपने शरीरकी वैयावृत्ति न स्वयं करते थे न दूसरेसे कराते थे किन्तु इतना
होनेपर भी मोहकी तीव्रतासे उन्होंने 'मैं अग्रिम भवमें लक्ष्मीमान् तथा सौभाग्यवान हो इस
निदानसे अपनी आत्माको बद्ध कर लिया ॥१७२।। यदि वे मुनि उस समय यह निन्दित निदान
'नहीं करते तो अपनी सामर्थ्यसे अवश्य ही तीर्थकर प्रकृतिका बन्ध करते ।।१७३।। तदनन्तर वह
आराधनाओंकी आराधना कर महाशुक्र स्वर्गमें इन्द्र तुल्य देव हुआ और वहाँ साढ़े सोलह सागर
तक सुससे विद्यमान रहा ॥१७४|| हे राजन् ! वही पुत्र देवाके सुख भोगकर अन्तमें वहाँसे
च्युत हो तेरी सुभद्रा रानीसे यह पृथिवीका अधिपति वमुदेव नामका पुत्र हुआ है ॥१७॥ इस
प्रकार अन्धकवृष्णि, उसकी सुभद्रारानी तथा समुद्रविजय आदि पुत्र सुप्रतिष्ट केवलोसे अपने-
अपने पूर्वभव सुनकर धर्म और संवेगको प्राप्त हुए। इनके सिवाय जो यहाँ मनुष्य तथा देव थे वे
भी धर्म और संवेगको प्राप्त हुए ॥१७६।। मुप्रतिष्ठ स्वामीको नमस्कार कर देवलोग अपने-अपने
स्थानपर चले गये। तदनन्तर संसारका अन्त करनेवाले राजा अन्धकवृष्णिने समुद्रविजयका
अभिषेक कर उसे राज्य-सिंहासनपर बैठाया और यमुदेवको समुद्रविजयके लिए सौंपकर मुप्रतिष्ठ
केवलोके पादमूलमें दीक्षा धारण कर ली nes-En उधर भोजपवृष्णिने भी मथुराके समप्र
राज्यपर उग्रसेनको बैठाकर निर्मन्थ प्रत धारण कर लिया-मुनि दीक्षा ले ली ॥१७६॥ राजा समुद्र-
विजयने अपनी प्रियरानी शिवादेवीको पट्ट योधकर समस्त स्त्रियों में मुख्यता प्राप्त करा दी। तदनन्तर
जिस प्रकार निन्द्ररूपी सूर्य, प्रातिहा कप अभ्युदयम प्रभावको यदाते हुए भव्य जोवरूपी
कमलीको प्रसन्न करते हैं. इसी प्रकार राज्य मर्यादाको रक्षा करनेवाले राजा समुद्रविजय मी अपनी
अनुपम विभूतिसे प्रतापको बढ़ाते हुए अपने यन्धुरूपी कमलोंको प्रसन्न करने लगे ॥१८॥
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराएके संग्रहसे युक्त, जिनमेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें ममुहरिजयके
लिए राज्य प्राप्तिका वर्णन करनेवाला भठारहवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥१८॥

एकोनविंशः सर्गः । अथाह गणमाथाद्यः शृणु श्रेणिक वर्ण्यते । चेष्टितं वसुदेवस्य वसुधाविजयाद्भुजम् ॥१॥ समुद्र विजयो भूभृदष्टानां नवयौवने । प्रातणां राजपुत्रीभिः सत्कल्याणमकारयत् ॥२॥ उवाह तिमक्षोभ्यस्ततः स्तिमितसागरः । स्वयप्रभा प्रभाऽनूनां सुनीता हिमवानपि ॥३॥ सिताख्यां विजयः ख्याता प्रियालापां नथाऽचलः । उपयेमे युवा धीरो धारणश्च प्रभावतीम् ॥४॥ कालिङ्गी पूरणश्वामिभिचन्द्रश्च सुप्रभाम् । अष्टौ स्त्रीपु महादेव्यस्वष्टानामपि ताः स्मृताः ॥५॥ कलागुणविदग्धानां तेपामासीत् सयोषिताम् । अन्योन्यप्रेमबद्धानामनन्यसदृशी रतिः ॥६॥ तदा देवकुमाराभो वसुदेवः श्रिया श्रितः । शौर्यपुयां च चिक्रीड कुमारक्रीडया युतः ॥७॥ रूपलावण्यमौभाग्यभाग्यवैदग्ध्यवारिधिः । जहार जनचेतांमि कुमारो मारविभ्रमः ॥८॥ चतुणां लोकपालानां वेपमादाय हारिणम् । इन्द्रादिदिक्षु निःक्षुद्रः क्रमात्पुयाँ विनिर्ययौ ॥६॥ 'निर्याति सूर्यदीप्ता चन्द्रसौम्यमुखाम्बुजे । तत्र शौयपुरे स्वीणां भवत्याकुलता परा ॥३०॥ सहहः पुरनारीणां वसुदेवदिवसया । जायतेऽर्णववेलायां पूर्णचन्द्रोदये यथा ॥११॥ भूमौ रथ्या यथा स्त्रीभिस्यकप्रस्तुतकर्मभिः । प्रासादेषु गवाक्षाश्च सन्छाद्यन्ते दिक्षुभिः ॥१२॥ सौभाग्यहृतचेतस्कं बहिरन्तरितस्ततः । बभूव पुरमुभ्रान्तं वसुदेवकथामयम् ॥१३॥ । अथानन्तर गौतम गणधरने कहा कि हे श्रेणिक ! अब वसुदेवकी पृथिवी तथा विजया सम्बन्धी चेष्टाओं का वर्णन करता हूँ सो सुन ॥१॥ राजा समुद्रविजयने अपने आठ छोटे भाइयों- के नवयौवन आनेपर उनका राजपुत्रियोंके साथ विवाह करा दिया ।।२॥ अक्षोभ्यने धृतिको, स्तिमितसागरने उत्कृष्ट प्रभाको धारण करनेवाली स्वयंप्रभाको, हिमवानने सुनीताको, विजयने सिताको, अचलने पियालापाको, युवा तथा धीर वीर धारणने प्रभावतीको, पूरणने कालिङ्गीको और अमिचन्द्रने सुप्रभाको विवाहा। ये आठों स्त्रियाँ अक्षोभ्य आदि कुमारोंकी आठ महादेवियाँ थी तथा अनेकों स्त्रियों में प्रधान मानो गई थीं ॥३-१॥ जो कला तथा अनेक गुणोंमें चतुर थे, अपनी-अपनी स्त्रियांसे सहित थे और पारस्परिक प्रेमसे आपसमे बंधे हुए थे ऐसे उन सब भाइयों- में परस्पर वेजोड़ प्रेम था ॥६।। उस समय लक्ष्मीसे सेवित वसुदेव, देव कुमारके समान जान पड़ते थे और बालक्रीड़ासे युक्त हो शौर्यपुरी नगरीमै यथेच्छ क्रीड़ा करते थे ॥णा रूप, लावण्य, सौभाग्य, भाग्य और चतुराईसे सागर तथा कामदेवके समान सुन्दर वसुदेव जनताके चित्तको हरण करते थे ॥८॥ अतिशय उदार वसुदेव क्रम-क्रमसे चार लोकपालोंका मनोहर वेप रखकर पूर्व आदि दिशाओमे निकलते थे ॥६॥ जिनका शरीर सूर्य के समान देदीप्यमान था तथा मुख कमल चन्द्रमाके समान सौम्य था ऐसे वसुदेव जय उस शौर्यपुरमें बाहर निकलते थे सब स्त्रियाँम घड़ी आकुलता उत्पन्न हो जाती थी ॥१०॥ जिस प्रकार पूर्णचन्द्रका उदय होनेपर समुद्रकी वेलामें संघट्ट मच जाता है उसी प्रकार वसुदेवको देसनेको इच्छासे नगरकी स्त्रियों में संघट्ट मच जाता था- उनकी बड़ी भोर इकट्ठी हो जाती थी ॥११॥ उनके बाहर निकलते ही देखने के लिए इच्छुक स्त्रियाँ अपने प्रारब्ध कायों को छोड़कर पृथिवीपर तो गलियोंको रोक लेती थीं और ऊपर महलोंके झरोपोंको भान्छादित कर लेनी थीं ॥१२॥ यमुदेवके सौभाग्यसे जिसका चित्त हरा गया था १ गीतमः । २ विगाहम् । ३ निर्गन्छनि मति । ४. सूर्यवत् दीनमन यस्य तस्मिन् । ५. चन्द्रवत् सौम्य मुम्बाम्बुज यस्य तस्मिन् । ६ पूर्णचन्द्रोदय यथा म १७ मारध म०।

२७७ एकोनविंशः सर्गः भन्यदा पुरवृद्धास्ते समुद्रविजयं नृपम् । नत्वा व्यजिज्ञपन्नित्थमुपांशु'पिशुनान्तराः॥१४॥ भभयं नः प्रदाय त्वं शृणु विज्ञापनं विमो। युक्तं वा यदि वाऽयुक्तं बालस्यैव वचः पिता ॥१५॥ नृपस्त्वं रक्षणान्नणां भूपणे रक्षणतो भुवः । त्वमेव जगतो राजा राजन् ! प्रकृतिरञ्जनात् ॥१६॥ त्वयि राजनि राजन्ते जनितप्रमदाः प्रजाः । अक्षुद्रोपद्वाः पूर्व पितरीव तवाधुना ॥१७॥ उर्वरा सर्वसस्यौपः शालिबीह्यादिभिर्वरैः । भवग्रहोज्झितैधत्ते प्रतिवर्षमवध्यताम् ॥१८॥ यथा कृषिस्तथास्यर्थ चणिज्या फलति प्रभो । क्रयविक्रयबाहुल्याद् वणिजा राज्यमूर्जितम् ॥१६॥ घटोन्यो घटपूर हि गोमहिप्युद्घधेनवः । दुहन्ति सततं दुग्धं प्रभूताः सुहितास्नृणैः ॥२०॥ गृहार्थमन्नमत्यल्पं प्रसाधितमयत्नतः । नान्तमेति दिनान्तेऽपि दानधर्मात्मभुक्तिभिः ॥२३॥ स्वस्वभावविभक्तान्यभावपष्टयन्दवस्तुनि । त्वत्प्रभावाचिरस्थैर्यः कालो दुन्दुभिरेव नः ॥२२॥ एव सति सुखे दुःखं स्वल्पं तदपि भूपते । न प्रकाशयितुं शक्यं यथारमोदरपाटनम् ॥२३॥ ऐसा समस्त नगर उस समय भीतर-बाहर उद्भ्रान्त हो गया था तथा जहाँ-तहाँ एक वसुदेवकी ही कथा सुनाई देती थी ॥१३।। तदनन्तर किसी समय जिनके हृदय मात्सर्यसे परिपूर्ण थे ऐसे वृद्धजन राजा समुद्रविजयके पास जाकर तथा नमस्कार कर एकान्तमें इस प्रकार निवेदन करने लगे ॥१४॥ उन्होंने कहा कि हे प्रभो ! जिस प्रकार वालकके वचन चाहे युक्त हो चाहे अयुक्त, उन्हें पिता सुनता ही है उसी प्रकार आप हम लोगोंको अभय देकर हमारे वचन सुनिए । हमारे वे वचन भले ही युक्त हों अथवा अयुक्त हों ।।१५।। हे नाथ ! आप मनुष्योंकी रक्षा करते हैं इसलिए नृप हैं, पृथिवीकी रक्षा करते हैं इसलिए भूप हैं और प्रजाको अनुरब्जित करते हैं इसलिए आप ही राजा है ।।१६।। जिस प्रकार पहले आपके पिताके राज्य-काल में प्रजा सानन्द तथा क्षुद्र उपद्रवोंसे रहित थी उसी प्रकार इस समय आपके राज्य-कालमें भी प्रजा सानन्द तथा क्षुद्र उपद्रवासे रहित है ॥१७॥ यहाँकी उपजाऊ भूमि वर्षाके प्रतिबन्धसे रहित शालि, ब्रीहि आदि सब प्रकारके उत्तमोत्तम धान्यों के समूहसे प्रतिवर्ष सफलताको धारण करती है ॥१८॥ हे प्रभो! जिस प्रकार खेती सफल रहती है उसी प्रकार वाणिज्य भी सफल रहता है। आपका राज्य व्यापारियोंके क्रय-विक्रयकी अधिकतासे अत्यधिक सम्पन्न हो रहा है ।।१६॥ घटके समान बड़े-बड़े स्तनोंको धारण करनेवाली एवं हरे भरे तृणोंसे सन्तुष्ट बहुत-सी गाये, भैंसे और उत्तम जातिकी घेनुऍ निरन्तर घड़े भर- भरकर दूध देती हैं ।।२०।। घरके उपयोगके लिए साधारण रीतिसे तैयार किया हुआ थोड़ा-सा अन्न भी, दानके समय धर्मात्माओंके भोजनमें आनेसे सायंकालतक भी समाप्त नहीं होता ।।२१।। हे नाथ ! साठ संवत्सरी रूप जो वस्तु है उसमे स्वभाववश ही अन्यथा परिणमन होता रहता है परन्तु आपके प्रभावसे हमलोगोंका तो दुन्दुभि नामक काल ही चिरकालसे स्थिर है । भावार्थ-ज्योतिप-शास्त्र के अनुसार साठ संवत्सर होते हैं जो क्रमसे परिवर्तित होते रहते हैं उनमें हानि-लाभ सभी कुछ होते हैं। परन्तु उन संवत्सरोंमे एक दुन्दुभि नामका संवत्सर भी होता है जिसमें प्रजाका समय आनन्दसे बीतता है। प्रजाके लोग राजा समुद्रविजयसे फह रहे हैं कि यद्यपि संवत्सर परिवर्तनशील हैं परन्तु हमारे लिए आपके प्रभावसे दुन्दुभि नामक १. पिहितान्तराःमः। २. विज्ञापना म० । ३. प्रमदाः सपनाः म० । ४ वृष्टिप्रतिवन्धरहितः। ५. मुन्ताः। ६. क्षयकृनास्ति पष्टिसंवत्सरीरूपे काले सत्यपि इति ख० पुस्तकं निहाय सर्वन टिप्पणी । 'सर्वसत्ययुता धात्री पालिता धरणीधरैः । पूर्वदेशविनाशः स्यात्तत्र दुन्दुभिवत्सरे' ।। इति वर्षप्रमोधे । ७.

ते ॥३३॥ हरिवंशपुराणे इत्याकण्यं नृपः प्राह पौरप्राग्रहरानिति । प्रत वीतमया दुःयं यूयं मनं हिता यदि ॥२४॥ आधिव्याधिरिवापोऽपि हृदये कृतसविधिः । मागकारणमप्या प्रतिहन्ति न संशयः ॥२५॥ इन्युनास्तेन ते प्रोचुरिति विनम्भमागताः । दुर्विज्ञप्तिमिमा राजन् नित्यस्व प्रजाहितम् ॥२६॥ वमुदेवकुमारस्य निस्यं निःसरतः पुरात् । रूपदर्शनविम्रान्ता विस्मरन्ति वपुः खियः ॥२७॥ निगमे च प्रवेशे च कुमारस्यान्यानाः । न पश्यन्ति न गण्वन्ति भवन्ति विकलेन्द्रियाः ॥२८॥ तिटन्नु तावदन्यानि स्वानुष्ठेपानि योषिताम् । स्तनन्धयस्तनादानं रागान्धाना मुविस्मृतम् ॥२६॥ अतिरूपतमो धीरः स्वभायम्वरहमानसः । सर्वोपधाविशुद्धारमा कुमारः शीटशेम्बरः ॥३०॥ नृप ! कस्य न विज्ञातस्ममस्ते वसुधातले । तथापि किं वयं धर्मो चित्तोद्मान्तमभूरपुरम् ॥३ यदन युनमाधानुं तत्वमेव निरूपय । 'ययास्वन्तं पुरस्पेश ! कुमारस्य च जायते ॥१२॥ तनिशम्य बचो राजा विचिरय चिरमामनि । तथेति प्रतिपर्वतान् विससर्ज ययुश्च पर्यटय चिरमागग्य प्रणतं भ्रातरं नृपः । भालियाई तमारोप्य स्नेहनाधाय मस्तके ॥३४॥ 'श्रान्तोऽग्यन्तं कुमार! त्वं चिरं भ्रान्वा वनान्तरम् । विवर्ण! क्षुपिपासास ! किमित्येवं चिरायितम् ॥ वातातपपरिग्लानः शिरशेखरनीरुचिः । अगणय्य वपुःखेदं पर्यटस्यटनप्रियः ॥३६॥ दुःस भी है परन्तु जिस प्रकार अपना पेट फाड़कर नहीं दिखाया जा सकता उसी प्रकार वह थोड़ा-सा दुःख भी नहीं प्रकट किया जा सकता ॥२३॥ इस प्रकार सुनकर राजा समुद्रविजयने नगरके वृद्धजनोंसे कहा कि यदि आप लोग हमारा हित चाहते हैं तो निर्भय होकर वह दुःख कहिए ॥२४॥ क्योंकि हृदयमें रहनेवाली छोटी-सी मानसिक व्यथा भी शारीरिक व्यथाके ही समान, प्राण-रक्षाका कारण जो अन्न है उसे भी छुड़ा देती है इसमें संशय नहीं है। भावार्थ-मानसिक पीड़ाके कारण मनुष्य साना-पीना भी छोड़ देता है ।।२५।। इस प्रकार समुद्रविजयके कहनेपर प्रजाके लोग विश्वस्त हो कहने लगे। उन्होंने कहा कि हे राजन् ! हमारी विज्ञप्ति, विज्ञप्ति नहीं किन्तु दुर्विज्ञप्ति है परन्तु प्रजाफे हितके लिए उसे अवश्य सुनिए ॥२६॥ वसुदेवकुमार प्रतिदिन नगरसे बाहर निकलते हैं जिससे नगरकी स्त्रियाँ उनका रूप देखकर पागल-सी हो जाती हैं और अपने शरीरकी सुध-बुध भूल जाती हैं ॥२७॥ कुमारके बाहर निकलने और भीतर प्रवेश करनेके समय स्त्रियाँ इन्द्रियोंसे रहित जैसी हो जाती हैं इसलिए वे न अन्य किसीको देखती हैं और न अन्य कुछ सुनती ही हैं ।।२८।। स्त्रियों के अपने करने योग्य दूसरे काम तो दूर रहें परन्तु रागान्ध होकर वे छोटे-छोटे बच्चों के लिए स्तन देना-दूध पिलाना भी भूल जाती हैं ।।२६।। हे राजन् ! यद्यपि कुमार वसुदेव, अत्यन्त सुन्दर, धोर-वीर, स्वभावसे स्वच्छ हृदयके धारक, सर्वप्रकारसे विशुद्ध आत्मासे युक्त और शीलके शिरो. मणि हैं ॥३०॥ यह समस्त पृथिवीतलपर किसे नहीं विदित है ? फिर भी हम क्या करें? नगर- वासियोका चित्त उद्भ्रान्त हो रहा है ॥३१॥ हे स्वामिन् ! हम लोगोंने अपनी मनोव्यथा कही अब यहाँ जो कुछ करना उचित हो तथा जिससे नगर और कुमार दोनोंका परिणाम अच्छा हो वह आप ही कहिए ॥३२॥ राजा समुद्रविजयने नगरवासियोको बात सुनकर चिरकाल तक अपने-आपमें उसका विचार किया, उसके बाद सबको आश्वासन देकर विदा किया और आश्वासन पाकर नगरवासी यथास्थान चले गये ॥३३॥ उसी समय भाई वसुदेवने चिरकाल तक भ्रमण करनेके बाद आकर राजा समुद्रविजयको प्रणाम किया। समुद्रविजयने उनका आलिङ्गन कर गोद में बैठाया और स्नेह से मस्तक सूंघते हुए कहा कि कुमार! तुम चिरकाल तक वनके मध्यमें भ्रमण करनेसे अत्यन्त थक गये हो । देखो, तुम्हारा वर्ण फीका पड़ गया है और तुम भूख-प्याससे पीड़ित जान पड़ते हो । १. शोभनपरिणामः । २. भ्रान्तोऽत्यन्तं म । ३. परिम्लानशिरःमः। ।

एकोनविंशः सर्गः . स्नानभोजनवेलाया मा कृतास्त्वमतिक्रमम् । अद्य प्रभृति शुद्धान्तवनान्तेष्वारमाधुना ॥३०॥ इति राजाऽनुजं भक्तमनुशिय शिवागृहम् । सप्तकक्षापरिक्षेपि तं गृहीस्वा करेऽविशत् ॥३८॥ स्नावा भुक्त्वा स तेनामा कृतरचाविधिः स्वयम् । तदलपितसंकेतो बभूव नृपतिः सुखी ॥३६॥ कुमारोऽपि शिवादेव्याः स वनोद्यानभूमिपु । क्रीडलाट्यसुगीताद्यविनोदैश्चावसरसदा ॥४०॥ एकदा तु शिवादेव्यै समालम्भनमेकया। कुब्जया नीयमानं तां खलीकृत्य जहार सः ॥४॥ सा जगाद ततो रुष्टा कुमार ! तव चेष्टितैः । ईदशैरेव सम्प्राप्तो बन्धनागारमीदृशम् ॥१२॥ स तां पप्रच्छ शशावान् कुब्जे ! किमिति जल्पितम् । न्यवेदयञ्च सा तस्मै ययावन्नृपमन्त्रणम्॥५३॥ तत्तः स्वं वचन ज्ञावा विमनाः स नृपं प्रति । समनश्छममा दशो निरगानगराततः ४k गावैकानुचरो मन्त्रसाधनव्याजवाग्निशि । श्मशाने चैकदेशस्थं तं कृत्वोत्तरसाधकम् ॥४५॥ किजिदूरे निवेश्यकं मृतकं भूपणैनिजैः । विभूप्य चितिकामध्ये निषिप्य वदति स्म सः ॥४६॥ आर्यस्तातसमो राजा पोराश्च पिशुनाश्विरम् । मुखं जीवन्तु सन्तुष्टाः प्रविष्टोऽहं हुताशनम् ॥४७॥ इत्युक्त्वोच्चैः प्रधाच्यासौ प्रदाग्निप्रवेशनम् । अन्तर्धानं गतो दूरं भुजिष्योऽपि पुरं ततः ॥४८॥ वसुदेवस्य वृत्तान्ते तद्धृत्येन निवेदिते । सपोरान्तःपुरभ्रातृवृष्णिवर्गस्तदा नृपः ॥४६ इतनी देर तुमने किस लिए की ? वायु तथा घामसे तुम मुरझा गये हो, तुम्हारे शिरका सेहरा भी कान्तिहीन हो गया है, तुम घूमनेके ऐसे शौकीन हो कि शरीरके खेदकी परवाह न कर घूमते रहते हो ? अब आजसे स्नान तथा भोजनके समयका उल्लंघन नहीं करना तथा जसे अन्तः- पुरके भीतर जो बगीचा है उसीमें क्रीड़ा करना ॥३४-३७|| इस प्रकार राजा समुद्रविजय भक्तिसे भरे हुए छोटे भाई-समुद्रविजयको समझाकर तथा हाथ पकड़कर सात कक्षाओंसे घिरे हुए । शिवादेवीके महलमें प्रविष्ट हुए ॥३८॥ वहाँ वसुदेवके साथ ही उन्होंने स्नान किया, भोजन किया तथा 'वे वहीं रहे' इस बातकी स्वयं ऐसी व्यवस्था कर दी कि जिसका वसुदेवको कुछ भी संकेत मालूम नहीं हुआ। यह सब कर राजा समुद्रविजय सुखी हुए-निश्चिन्त हो गये ॥३६॥ और कुमार वसुदेव भी शिवादेवीके बगीचोंमें नाट्य संगीत आदि विनोदासे क्रीड़ा करते हुए सदा रहने लगे ॥४॥ अथानन्तर एक दिन अन्तःपुरकी एक कुब्जादासो शिवादेवीके लिए विलेपन लिये जा रही थी सो कुमारने उसे तंगकर छीन लिया। इससे रुष्ट होकर कुब्जाने कहा कि कुमार! ऐसी ही चेष्टाओंसे तुम इस प्रकार बन्धनागारको प्राप्त हो–कैद किये गये हो ॥४१-४२॥ कुब्जाको वात मुनकर शङ्कायुक्त हो वसुदेवने उससे पूछा कि कुब्जे ! तूने यह क्या कहा ?-वेरे कहनेका क्या तात्पर्य है ? तब उसने राजाकी जो सलाह थी वह ज्योंकी-त्यों कुमारको यता दी ॥४३॥ तदनन्तर 'हमारे प्रति धोसा किया गया' यह जानकर कुमार राजासे विमुख हो गये । वे चतुर तो थे हो इसलिए छलपूर्वक घरसे तथा नगरसे बाहर निकल गये ॥४४॥ वे मन्त्रसिद्धिका बहाना बना एक नौकरको साथ लेकर रात्रिके समय श्मशानमें गये। वहाँ नोकरको एक स्थानपर बैठाकर -तथा 'जब मैं पुकारूँ उत्तर देना' ऐसा संकेतकर कुछ दूर अकेले गये। वहाँ एक मुर्दाको अपने आभूषणोंसे अलंकृत कर तथा उसे एक चितापर रसकर उन्होंने कहा कि पिताके समान पूज्य राजा और चुगली करनेवाले नगरवासी सन्तुष्ट होकर चिरकाल तक सुखसे जीवित रहें; में अग्निमें प्रविष्ट हो रहा हूँ। इस प्रकार जोरसे कहकर तथा 'दौड़कर अग्निमें प्रवेश किया है। यह दिसा- कर अन्तहित हो दूर चले गये। इस घटनाके बाद वह नौकर भी नगरमें वापिस आ गया ॥४५-४८॥ नौकर द्वारा वसुदेवका मृत्तान्त कहे जानेपर राजा समुद्रविजय उसी समय नगरवासी, १ माध- म० । २. राकासात् म.१ ३. वचनं म.१४. अनुचरोऽपि ।

२८० हरिवंशपुराणे सम्प्राप्य प्रातराक्रन्दमुखरो वीचय भस्मनि । कुमाराभरणं तत्र दिवा मृत इत्यसौ ॥५०॥ पश्चात्तापहतो दुखी स कृतोचिततक्रियः । निन्दन् मन्दोद्यमः स्वं च वञ्चितोऽहमिति स्थितः ॥५॥ वसुदेवस्तु निःशङ्को गृहीत्वा पश्चिमां दिशम् । द्विजवेपधरो धीरो योजनानि घहन्ययात् ॥५२॥ प्रापद् विजयखेटारयं पुरं खेटपुरोपमम् । क्षत्रियान्वयजेनात्र दृष्टो गन्धर्वसूरिणा ॥५३॥ सुग्रीव इत्यनुग्राही गान्धर्वार्थिजनस्य सः । वोचयेवाकारमेतस्य वशीकृत इवाऽभवत् ॥५४॥ कन्याऽनन्यसमा तस्य सोमा 'सोमसमानना । अन्या विजयसेनाख्या रूपपारमिते शुभे ॥५५॥ गन्धर्वादिकलापार प्राप्तयोः स तयोः पिता । गान्धर्व योऽनयोर्जेठा स भत्तस्यभिमन्यते ॥५६॥ लच्यलक्षणयोगेन यत्र यत्र तयोर्जयः । तत्र तत्र सभामध्ये ते जिगाय म यादवः ॥५॥ सुग्रीवेण सतोपेण कन्ये दत्ते ततः शुभे । परिणीय मुदा रेमे प्रासादवरभूमिषु ॥५८॥ सूनुं विजयसेनायामुपाद्यावरसंज्ञकम् । शौरिः शौर्यसहायोऽयादविज्ञातविनिर्गतः ॥५६॥ गच्छन्मार्गवशात् क्वाऽपि प्रविवेश महाटवीम् । अपश्यच्च सरो रम्यं हंससारसवारिजैः ॥६०॥ नाम्ना तत् स जलावर्तमवगाह्य महासरः । शोतं प्रपाय पानीय सस्नौ तन्न चिरन्तनम् ॥६॥ जल मुरजनि?प समवादयदुनतः । निशम्य रवमुत्तस्थौ तत्र सुप्तो महागजः ॥६२॥ अन्तःपुर, भाई तथा अन्य यदुवंशियोंके साथ श्मशान गये। उस समय सबके मुखसे रोनेकी ध्वनि निकल रही थी। जब प्रातःकाल राखमें कुमारके आभूपण देखे तब 'कुमार निश्चित ही मर गये हैं। यह जानकर सब रोने लगे। राजा समुद्रविजय पश्चात्तापसे पीड़ित हो बहुत दुःखी हुए । उन्होंने मरणोत्तर कालकी सब क्रियाएँ की, अपने-आपकी बहुत निन्दा की और हम भाईसे वञ्चित हुए हैं इस खेदसे उनका उद्यम कुछ मन्द पड़ गया ॥४-५१॥ इधर धीर-वीर वसुदेव निःशङ्क हो पश्चिम दिशाकी ओर चल पड़े और एक ब्राह्मणका वेप रखकर बहुत योजन दूर निकल गये ॥५२॥ चलते-चलते वे देवोंके नगरके समान सुन्दर विजयसेट नामक नगरमें पहुंचे। वहाँ क्षत्रियवंशमे उत्पन्न सुग्रीव नामका एक गन्धर्वाचार्य रहता था । वह गन्धर्वाचार्य संगीत विद्याके इच्छुक मनुष्योका बड़ा उपकारी था तथा वसुदेवका रूप देखकर उनका वशीभूत जैसा हो गया ॥५३-५४॥ उस गन्धर्वाचार्यकी, रूप में अपनी शानी न रखनेवाली चन्द्रमुखी सोमा और विजयसेना नामकी दो उत्तम पुत्रियाँ थीं । ये पुत्रियों सौन्दर्यको परम सीमाको प्राप्त हुई-सी जान पड़ती थीं ॥५५॥ ये कन्याएँ गन्धर्व आदि कलाओंको परम सीमाको प्राप्त थी इसलिए उनके पिता सुप्रीवने अभिमानवश ऐसा विचार कर लिया था कि जो गन्धर्व-विद्यामें इन दोनोंको जीतेगा वही इनका भर्ता होगा ॥५६॥ लक्ष्य लक्षणके योगसे अन्यत्र जिन-जिन विपयोंमें उन दोनों कन्याओंको जीत हुई थी उन्हीं-उन्हीं विषयों में सभाके बीच वसुदेवने उन कन्याओंको पराजित कर दिया ॥५७।। तदनन्दर सुग्रीव ने संतुष्ट होकर अपनी दोनों कन्याएँ वसुदेवके लिए दे दी। वसुदेव उन्हें विवाह कर महलकी उत्तम भूमियों आनन्द पूर्वक क्रीड़ा करने लगे ॥५८|| शूरवीरता हो जिनकी सहायक थी ऐसे वसुदेव, विजयसेना नामक स्त्रीमें अकर नामक पुत्र उत्पन्न कर अज्ञात रूपसे बाहर निकल गये ||५|| मार्गके अनुमार भ्रमण करते हुए उन्होंने एक यहुत बड़ी अटवीमें प्रवेश किया. और वहाँ हंस, सारस क्या कमलांसे सुशोभित एफ मुन्दर सरोवर देसा ॥३०॥ जलावर्त नामके उस महामरोवरमें प्रवेशकर वसुदेवने ठण्डा पानी पिया तथा चिरकाल तक स्नान किया ॥६॥ तदनन्तर अतिशय उन्नत शगैरके धारक यमुद्देवने यहाँ जलको इस तरह यजाया कि जिमसे मृदद्ग के समान शब्द निकलता था। उस शब्दको सुनकर यहां सोया हुआ एक बड़ा हाथी उठकर . । १ चन्द्रनुल्यरदना । २. नाम्नान्तः स.म० ३. पीत्वा । ४. समायदुन्नतः म।

एकोनविंशः सर्गः २८१ भापतन्तं स तं हन्तुं वञ्चयन्नतिदक्षिणः । चिक्रोड दन्तिदन्ताने दोलाप्नवनमाचरन् ॥६३॥ वशीकृय घशी शीतकरशीकरशोभितम् । भारशास्फात्य हस्तेन हस्तिनं निश्चलं स्थितम् ॥६॥ विस्मितः स्वयमेवासौ सशिरसकम्पमुन्करः । अरण्यरुदितं जातमित्यचिन्तयदेककः ॥६५॥ अभविष्यदिभक्रीडा यदि शौर्यपुरे त्रियम् । अभविष्यत्ततो लोको मुखरः साधुकारतः ॥६॥ इति ध्यायन्तमेवैनं जहतुगंजमस्तकात् । सौम्यरूपधरी धीरौ विद्याधरकुमारको ॥६७॥ नीत्वा तं कुभरावत नगरं विजयाजम् । चक्रतुर्वहिरुद्याने सर्वकामिकनामनि ॥६॥ भशोकानोकहस्याधः शोकरलेशविवर्जितम् । वसुदेवं सुखासानं नत्वा ताविदमूचतुः ॥६॥ स्वामिनशनिवेगस्य विद्याधरमहेशिनः । शासनात्त्वमिहानीतो जानीहि श्वशुरः स ते ॥७॥ भचिौली कुमारोऽहं वायुवेगोऽयमिरयमुम् । निवेद्य पुरमेकोऽगादस्थादेकोऽत्र पालकः ॥७॥ दिष्टया स्वं वर्द्धसे स्वामिग्मानीतो द्विपमर्दनः । धीरः शूरोऽभिरूपश्च विनीतो नवयौवनः ॥७२॥ नवेति ज्ञापितस्तेन स प्रमोदवशो नृपः । अङ्गस्पृष्टं ददजातः 'परिधानावशेषकः ॥७३॥ ततः समगलं तेन नगरं स प्रवेशिता । भलकृतवपुः पौरनरनारीभिरीक्षितः ॥७॥ प्रशस्ततिथिनक्षत्रमुहृत्तकरणोदये । कन्यामशनिवेगस्य श्यामां श्यामामुवाह सः ॥७॥ रेमे काम स कामिन्या कलागुणविदग्धया । तया तदा तदुप्रस्बिट मुम्बपङ्कजपट्पदः ॥६॥ खड़ा हो गया ।।६२॥ मारनेके लिए आनेवाले उस हाथीको छलकर अतिशय चतुर वसुदेव उसके दाँतोके अग्रभागपर मूला-सा मूलते हुए क्रीड़ा करने लगे ॥६॥ तदनन्तर जो चन्द्रमाके समान जलके कणोंसे सुशोभित था, ऐसे निश्चल खड़े हुए उस हाथीको वशकर जितेन्द्रिय वसुदेव हाथ: से उसका आस्फालन करते हुए उसपर सवार हो गये ॥६४|| उस समय एकाकी वसुदेव स्वयं आश्चर्यसे चकित हो तथा हाथ ऊपरको उठा शिर हिलाते हुए मनमें इस प्रकार विचार करने लगे कि मेरा यह कार्य अरण्यरोदन जैसा हुआ ॥६५॥ यदि यह हरितक्रीड़ा शौर्यपुरमें हुई होती तो लोग धन्यवादसे मुखर हो जाते अथवा यह संसार धन्यवादको ध्वनिसे गूंज उठता ॥६६॥ वसुदेव इस प्रकार विचार कर रहे थे कि उसी समय सौम्यरूपके धारक दो धीर-वीर विद्याधर- कुमार हाथी के मस्तकसे उन्हें हर ले गये ।।६७॥ और विजयार्घ पर्वतके कुञ्जरावर्त नगरमें ले जाकर उसके सर्वकामिक नामक बाह्य उपवनमें छोड़ दिया ।।६८॥ वहाँ जब वसुदेव अशोक वृक्ष- के नीचे शोक और क्लेशसे रहित सुखसे धैठ गये तब उन दोनों विद्याधर कुमारोंने नमस्कार कर कहा ॥६६॥ कि हे स्वामिन ! तुम अशनिवेग नामक विद्याधर राजाकी आज्ञासे यहाँ लाये गये हो । उसे तुम अपना श्वसुर समझो ।।७०॥ मैं अर्चिमाली नामका कुमार हूँ और यह दूसरा वायुवेग है। इस तरह वसुदेवसे कहकर उनमें से एक तो नगरकी ओर चला गया और एक रक्षा करता हुआ वहीं खड़ा रहा ॥७२॥ हे स्वामिन् ! आप भाग्यसे बढ़ रहे हैं। हाथीको मर्दन करने- वाला, धीर-वीर, शूरवीर, सुन्दर, विनीत और नवयौवनसे सुशोभित वह कुमार यहाँ लाया जा चुका है। इस प्रकार नमस्कार कर जब उसने राजासे कहा तो राजा आनन्दसे विभोर हो गया। उसने मात्र वस्त्र शेष रसकर शरीरपरके सब आभूषण उसे पुरस्कारमें दे दिये ।।७२-७३।। तद्- नन्तर जिसका शरीर अलंकृत था और नगरके नर-नारी जिसे बड़ी उत्सुकतासे देख रहे थे ऐसे यमुदेवको राजाने मगलाचार पूर्वक नगर में प्रविष्ट कराया ॥४॥ वहाँ उत्तम तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त और करणका उदय होनेपर वसुदेवने राजा अशनिवेगको यौवनवती श्यामा नामक कन्या- को विवाहा ॥७॥ जो कलाओं और गुणोंमें अत्यन्त चतुर थी ऐसी उस कन्याके साथ वसुदेव इच्छानुसार क्रीड़ा करने लगे। अधिक क्या कहें उस समय वसुदेव उसके अतिशय देदीप्यमान १. परिधानं वयित्वा सर्व ददौ । २. यौवनवती ।

२८२ हरिवंशपुराणे सा सप्तदशतन्त्रीका पादयन्ती प्रियाऽमुना । विपश्ची तोपिणाऽवाचि वृणोव वरमियरम् ॥७॥ सा प्रणम्य वरं प्रवे'निशायां यदि वा दिया । मया विनेश ! न स्थेयं स प्रसादवरोऽस्तु मे ॥७॥ शृणु कारणमेतस्य वरस्य वरणे प्रिय । रिपुरङ्गारको रन्ध्र वां हरेदिति मे भयम् ॥७॥ भरतीह किसरोद्गीतं किन्नरोद्गीतसद्गुणम् । वैताध्यदक्षिणश्रेण्या नगरं नगशेखरम ८०n भचिमाली प्रभुस्तन सेवरातिशासनः । प्रिया प्रभावती पुत्रौ गान्तो ज्वलनाशनी ॥८॥ राज्यं प्रज्ञप्तिविद्या च दरवासौ ज्येष्टसूनवे । युवराज्यं कनिष्टाय दीरितोऽरिन्दमान्तिके ॥२॥ तनयोहारको राज्ञो"विमलायामभूसत्तः। अहं विशनिवेगस्य सुप्रभायां प्रभोऽभवम् ॥३॥ राजा राज्यं च मपिने प्राप्ति च स्वसूनवे । दावा जग्राह नैनेन्द्रीं दीक्षा कल्याणदायिनीम् ।। नाग्ना धागारको दुष्टो युवराजोऽतिगर्वितः । निर्घात्याशु नृपं देशारपाप्मा राज्यं जहार सः ॥५॥ तिष्त्यत्र पिता भटः कुभरावत्तपत्तने । नरकुझर ! चिन्तात्तः पारस्थशकुन्तवत् ॥८६॥ भन्यदायापद यातो दृष्ट्वा गिरिसमागतम् । चारणभ्रमणं मत्वा ज्ञास्या लोक्यदर्शिनम् ॥ मुग्गरूपी फमलके भ्रमर हो गये ॥७६॥ एक दिन उसने सत्रह तारयाली वीणा बजाई जिससे यमुदेष यहुत ही प्रसन्न हुए। और प्रसन्न होकर बोले कि प्रिये ! तुम शीघ्र ही वर माँगो ||७७|| इसके उत्तरमें उसने नमस्कारकर वसुदेवसे यह उत्तम वर माँगा कि हे स्वामिन् ! चाहे दिन हो चाहे रात्रि, आप मेरे विना अकेले न रहें यही उत्तम वर मुझे दीजिए ॥८॥ हे प्रिय ! मेरे इस वरदानके माँगनेका कारण भी सुनिए ? वह कारण यही है कि मेरा शत्रु अंगारक अवसर पाकर तुम्हें हर ले जा सकता है यह भय मुझे लगा हुआ है | इसका स्पष्ट विवरण इस प्रकार है- विजया पर्वतको इस दक्षिण श्रेणीपर, किन्नर देव जिसके सद्गुणों की प्रशंसा करते हैं तथा जो यिजया पर्वतके मुकुटके समान जान पड़ता है ऐसा किन्नरोद्गीत नामका नगर है॥८॥ उम नगरमें विद्याधरोंपर पूर्ण शासन चलानेवाला भर्चिमाली नामका राजा था उसकी प्रमायती स्त्री है और उसके ज्वलनवेग तथा अशनिवेग नामके दो पुत्र हैं ॥१॥ गजा भर्चिमाली, यो पुरके लिए राज्य तथा प्राप्ति विद्या और छोटे पुत्रके लिए युवराज पद देकर अरिदम गुरके पास दीक्षित हो गया ॥२२॥ हे नाथ ! आगे चलकर गजा ज्वलनगको विमला रानीके भझारक नामफा पुत्र हुआ और युवराज अशनिवेगकी सुप्रमा सीमे में श्यामा नामको पुत्री हुई ॥३|| तत्परपान् राजा ज्वलनवेगने भी मेरे पिता अशनिवेगके लिए राज्य और अपने पुत्र के लिए प्रशान्ति मिसा देकर फल्याणदायिनी जिनदीमा प्रहण कर ली || युवराज भनारफ प्रकृतिका यदा दुष्ट सथा गर्योला है. मलिए उस पापीने हमारे पिताको शीव ही देश निकालकर, राज्य दीन लिया है ॥४॥ नागर! भय मेरे पिता राज्यमे भ्रष्ट हो इसो फुजरायत नगरमें रहते है और पिजहेंगे स्थित पतीफे समान निरन्तर चिन्तासे दुस्पी रहते हैं ॥८६॥ किसी एक १ दियायाम. । २ नगररोवरम् म.। ३ लनोगः अग्रनिगध। ४. ती म.। ५.णियोग.। ६.पानी रथं पाट:- सोन्यायनिगार मति गमभूमि । प्रामिपुरमा सामाग्पाप मुगुनी ।। मार मेन्ट्री दी करिनाशिनी । माग्ना गातारको दो युगान्या मम ।। निदेयामा बारमा । • पुगके एक पाट गप गटनगोने वा गाउनमार गः | मारपोरगा चमूना मुभिः || भE HT: FAfter | निसन मे : गोभ गाय ग्राम महारा॥ ७ ....| एकोनविशः सर्गः पिता मे पृथ्वानेवं भगवन् ! दिव्यचक्षुषा । राज्यं पश्यसि मेऽवश्यं स्थाने नाथ ! पुनर्न वा El कथितं मुनिना दिव्यचक्षुरुन्माल्य निर्मलम् । श्यामायास्तव कन्यायाः पत्या राज्यपुनर्भवः ॥८॥ पुनः पृष्टे कथं नाय ! ज्ञायत इति म स्फुटम् । तेनोक्तं यो जलावतें मदेममदमदंगः ॥१०॥ भविता तव कायायाः श्यामायाः पतिरिस्यलम् । तदादेशात्सरस्यां च द्वौ द्वौ तन नभश्वरी । पित्रा निन्यं नियुक्ती मे तव स्थानगवेषणे ॥११॥ लब्धस्त्वमचिरेणैव मन्मनोरथसारथिः । जायते जानुचिताय ! न हि मिथ्या मुनर्वचः ॥१२॥ अङ्गारकेण वृत्तान्तो निश्चितः स्यात्स हि द्विपन् । धूमायमानमूर्तिनों धूमकेतुरिवोत्थितः ॥१३॥ अविद्याकुशलं स्वाऽसौ महाविद्यावलोद्धतः । विद्यावत्या मया मुक्तं कदाचिरस हरेदरिः ॥१४॥ श्यामाया वचनं श्रुत्वा कोऽत्र दोपस्तथाऽमिवति । स्मेरः स्मेरमुखी गाढं प्रियामुपजुगृह सः ॥१५॥ सविशेपमसौ तत्र विद्याधरजगदतम् । हृद्यं गान्धर्वविज्ञानं शिशिक्षे इतमत्सरः ॥१६॥ नि-प्रमादतया याति तयोः काले कदाचन । चिराय मुस्तफ्रीडाखिलयोनिशि सुधयोः ॥१७॥ सगरयाङ्गारका स्वैरं विश्लिष्याश्लेषबन्धनम् । श्यामायाः शयनात् जहे गरुडो नृपोरगम् ॥६॥ दिन मेरे पिता कैलास पर्वतपर गये थे वहाँ पर्वतपर आये हुए एक चारण ऋद्धिधारी मुनिराजके दर्शनकर पिताने उन्हें नमस्कार किया। तदनन्तर मुनिराजको त्रैलोक्यदर्शी जानकर पिताने पूछा कि हे भगवन् ! आप तो अवधिज्ञानरूपी नेत्रसे मेरे राज्यको अवश्य ही देख रहे हैं। हे नाथ ! कृपाकर कहिए मुझे पुनः राज्य प्राप्त होगा या नहीं ?॥८७-८८| इसके उत्तरमें मुनिराजने अतिशय निर्मल अवधिज्ञानरूपी दिव्य नेत्रको खोलकर कहा कि जो तुम्हारी श्यामा नामकी कन्या है उसके पतिके द्वारा तुम्हें पुनः राज्यको प्राप्ति होगी ॥ पिताने इसके उत्तरमै पुनः पूछा कि हे नाथ ! श्यामा कन्याका पति कौन होगा ? यह स्पष्ट किस तरह जाना जावेगा ? तब मुनिराजने कहा कि जलावर्त नामक सरोवरमें जो मदोन्मत्त हाथीके मदका मर्दन करेगा वही तुम्हारी श्यामा कन्याका पनि होगा यही उसकी पर्याप्त पहिचान है। मुनिराजफे आदेशसे उसी समयसे पिताने जलावर्त नामक सरोवरपर आपकी स्थितिका अन्वेषण करने के लिए दो विद्याधर नियुक्त कर दिये ।।६०-६१|| और उसके फलस्वरूप शीव ही आपकी प्राप्ति हो गई है। हे नाथ ! आप मेरे मनरूपी रथके सारथि हैं-उसे आगे बढ़ानेवाले हैं । यथार्थमें मुनिराजके वचन कभी मिथ्या नहीं होते ॥३२॥ अद्गारकको इस वृत्तान्तका निश्चित ही पता चल गया होगा क्योंकि यह हम- लोगोंसे सदा द्वेप रखता है और हमलोगोंको नष्ट करनेके लिए सदा धूमिल अग्निके समान उद्यत रहला है ॥३॥ वह महाविद्याके बलसे उद्धत है और आप विद्यामें कुशल नहीं हैं। यद्यपि मैं विद्यासे युक्त होनेके कारण आपकी रक्षा करनेमें समर्थ हूँ तो भी यदि कदाचित् आप मेरे बिना रहेंगे तो वह आपको हर ले जा सकता है। हे नाथ ! इसी भयके कारण मैंने आपसे वर मांगा है कि आप चाहे दिन हो चाहे रात, कभी मेरे विना न रहें ॥६४|| श्यामाके उक्त वचन सुनकर वसुदेवने कहा कि ऐसा ही हो इसमें क्या दोप है। यह कहकर मन्द-मन्द हँसते हुए वसुदेवने मुसकराती हुई प्रियाका गाढ़ आलिङ्गन किया II वहाँ रहकर वसुदेवने ईर्ष्या रहित हो विद्या. घर लोक सम्बन्धी सुन्दर गन्धर्व विद्याको विशेषताके साथ सीखा ॥६६॥ तदनन्तर उन दोनोंका समय सदा सावधानीके साथ बीत रहा था। एक दिन रात्रिके समय चिरकाल तक संभोग झोडासे खिन्न होकर दोनों सोये हुए थे ॥६७|| कि अङ्गारकने स्व- च्छन्दतासे आकर उनके आलिङ्गन सम्बन्धी घन्धनको अलग कर दिया और जिस प्रकार गरुड़ साँपको ले उड़ता है उसी प्रकार वह श्यामाकी शय्यासे राजा वसुदेवको ले उड़ा ॥८॥ ! १ वर्तनः म.१२ तवास्थाता म.३ इवार्थे वा प्रयोगः।

२६४ हरिवंशपुराणे - स्वं बुवा ह्रियमाणं खे खेचरं स निरीक्षितम् । कस्त्वं हरसि मां पाप मुच्च मुञ्चेति भाषणः ॥६६॥ बुद्धाप्यड्भारकं शत्रु श्यामया कथिताकृतिम् । नावधीद् बद्धमुष्टिः खादधःपतनशया ॥१०॥ तावच्च सहसा बुद्ध्वा खड्गखेटकहस्तया । वेगिन्या प्राoया रुदः शौरिबध्वा स शुरया ॥१०॥ तिष्ठ तिष्ठ दुराचार चौरखेचर निघृण । हरसि प्राणनाथं मे जीवन्त्यां मयि भोः कथम् ॥१०२॥ राज्यस्थोऽपि न सन्तुष्टः सदाऽस्मदु:खचिन्तक । चिरेणाद्य मया दृष्टः क प्रयासि मृतोऽधुना ॥१०॥ इति व्याहृत्य रुवाऽने खग मुद्गीर्य तां स्थिताम् । बभाण 'रिपुरात्मानं रक्षन् राक्षसरूतवाक् ॥१०॥ श्यामिके स्त्रीवधो लोके गहितोऽपसराधमे । स्वसाऽपि मे कथं हस्तो हन्तुमुद्यच्छतु त्वकाम् ॥१०५॥ का स्त्री का वा स्वसा भ्राता को वै कार्याभिलापिणः (वैरिणो मनु हन्तारो हन्तव्या नाय दुर्यशः ।।१०६॥ सिंही व्याघ्री च किं पुंसां मारयन्ती म मार्यते । वृथा न्यायविचारोऽयं जहि यद्यस्ति पौरुषम् ॥१०७॥ विद्याशाखाबलेनोत्यां रुद्धमागां जघान सः । खड्गधाराशिलाघातः श्यामामझारकोत्करः ॥१०॥ "प्रतिघातमनेकाऽभूत्खड्गखेटकसकटा । खड्गस्यूतस्फुलिङ्गागमङ्गारकमयाकरोत् ॥१०॥ मायायुद्धमिदं दृष्ट्वा तयोः स हृदये रिपुम् । दृढमुष्टिप्रहारेण प्राणसन्देहमावहत्॥११०॥ द्वारा बताये । अपने आपको हरा हुआ जानकर वसुदेवने आकाशमें उस विद्याधरसे कहा कि अरे पापी ! तू कौन मुझे हरे लिये जा रहा है छोड़-छोड़ ||६|| यद्यपि वसुदेवने उसे जान लिया था कि यह श्यामा के हुए आकारको धारण करनेवाला शत्रु अङ्गारक है फिर भी आकाशसे नीचे गिरने की आशंकासे उन्होंने उसे मुढ़ियोंकी मारसे मारा नहीं ॥१००। इतनेमे ही सहसा जागकर तथा तलवार और ढाल हाथमें ले वोराङ्गना श्यामाने बड़े वेगसे जाकर उसे रोका ॥२०१॥ श्यामाने ललकारते हुए कहा कि ठहर, ठहर, अरे दुराचारी, निर्दय ! चोर विद्याधर ! तू मेरे जीवित रहते हुए मेरे प्राणनाथको कैसे हर सकता है ? ॥१०२।। तू राज्यपर बैठकर भी संतुष्ट नहीं हुआ सदा हमारे दुःखका ध्यान रखता है ! तू आज मुझे चिरकाल बाद दिखा है, कहाँ जाता है ? तु अभी मारा जाता है ॥१०३॥ यह कहकर श्यामाने उसका मार्ग रोक लिया और तलवार उभारकर वह उसके आगे खड़ी हो गई। तदनन्तर राक्षसके समान रुक्ष वचनोंका प्रयोग करनेवाला शत्रु अपनी रक्षा करता हुआ श्यामासे बोला ॥१०४॥ अरी नीच श्यामा ! संसार में स्त्रीका मारना निन्दित समझा जाता है इसलिए तू सामनेसे हट जा । तू मेरी बहिन भी है अतः तुझे मारनेके लिए मेरा हाथ कैसे उठे?॥१०।। अथवा कार्यके इच्छुक मनुष्योंके लिए क्या स्त्री ? क्या वहिन ? क्या भाई ? उन्हें तो जो वैरी अपना घात करे उसका अवश्य ही घात करना चाहिए इसमें कुछ भी अपयश नहीं है ॥१०६॥ क्या पुरुषांको मारनेवाली सिंही और व्याघ्री नहीं मारी जाती ? इसलिए न्यायका विचार करना व्यर्थ है । यदि तुझमें पौरुप है तो मार ।।१०७|| तदनन्तर जिसने विद्यारूपो शाखाके बलसे उठकर अङ्गारकका मार्ग रोग रक्खा था ऐसी श्यामाको अङ्गारोके समूहके समान उग्र अङ्गारक, तलवारको धार और पत्थरीकी चोटसे मारने लगा ||१०॥ प्रत्येक चोटके समय तलवार और ढालकी करारी टक्कर होती थी। कुछ समय बाद श्यामाने तलवारसे निकले हुए तिलगोंके द्वारा अद्गारकके शरीरको आच्छादित कर दिया ॥१०॥ श्यामा और अद्गारकके इस माया युद्धको देखकर कुमार वसुदेवने भी शत्रुके हृदय- पर अपनी मुट्ठियाँसे इतना बढ़ प्रहार किया कि उसे प्राणोंका सन्देह उत्पन्न कर दिया ॥११॥ १. दुःवचिन्तक म०१ २ रिपुमात्मान म० । ३ मुद्यत्कृतिविकाम म०1४. अंगारक्स्य उत् उर्ध्वः करो हस्तः अंगारकोकरा अन्यर अगारक्समूहः ५. घात घात प्रति, प्रविधातम् । अन्योऽन्यप्रतिघात सेटफसकटः म ।

२५ एकोनविंशः सर्गः - मुक्तश्च दुःसिना खिन्नः स खे श्यामानियुक्तया । स्वपुरं नीयमानोऽसौ तया खाद्ध्वनिरुदतः ॥११॥ 'खेटेऽम्यवान लाभोऽस्ति भविष्यो मुञ्च साम्प्रतम् । मुञ्चितो यादवेन्द्रोऽसौ तया श्यामलछायया ॥१२॥ 'समप्यं तं स्वविद्याया जगाम स्वगृहं प्रति । विद्यया पर्णलध्वायं गां शनैः पर्णवल्लघुः ॥१३॥ बाह्योधानेऽध चम्पायाः पतितोऽम्बुजसङ्गमे । सरस्यम्बुरुहच्छन्ने तदुत्तीर्य तीमितः ॥१४॥ मानस्तम्भादिसलक्ष्यं वासुपूज्यजिनालयम् । परीत्य तत्र वन्दिस्वा दीपिकोज्ज्वलितेऽवसत् ॥११५।। देवार्चनार्थमायात प्रत्यूपे द्विजमन्त्र सः । अपृच्छद्विषयः कोऽयं पुरीयं चेनि सोऽवदत् ॥१६॥ अङ्गो जनपदश्चम्पापुरी त्रिभुवनश्रुता । किं न वेरिस किमाकाशात्पतितस्त्वं महामते ॥१३७॥ सत्यमेतद् द्विज ! ज्ञातं किमु ज्योतिषविद् भवान् । भस्ति संवादि ते ज्ञानं नान्यथा जिनशासनम् ॥ हृतो यचकुमारीभ्यां रूपलोभानभस्तलात् । च्युतश्च पतितो भूमावन्योन्यकलहे तयोः ॥१६॥ इत्युत्तरमसौ दत्त्वा विप्रवेषधरोऽभवत् । पुरी विशन् विशालाको गन्धर्वनगरी निभाम् ॥१२०॥ लोकं वीक्ष्य तु तत्राऽसौ वीणाहस्तमितोऽमुतः । अप्रापीद्विप्रमेकं हि बम्भ्रमीतीति कि जनः ॥१२॥ सोऽब्रवीचारुदत्ताख्यः कुबेरविभवः प्रभुः । पुर्यामिभ्यपतिस्तस्य तनया रूपगर्विता ॥१२२॥ नाम्ना गन्धर्वसेनेति गान्धर्वपथपण्डिता । गान्ध योऽन्न में जेता स भरेत्यवतिष्ठते ॥१२॥ तदर्थमत्र लोकोऽयं मिलितो लोभनोदितः । वीणावादन विज्ञानो नानादेशसमागतः ॥१२॥ अन्तमै दुःखी होकर अङ्गारकने कुमारको छोड़ दिया। नीचे गिरनेके भयसे कुमार कुछ खिन्न हुए परन्तु श्यामाके द्वारा नियुक्त श्यामलछाया नामकी दासी उन्हें वीचमें ही सँभालकर अपने नगर ले जाने लगी । उस समय यह आकाशवाणी हुई कि कुमारको इसी ग्राममें लाभ होनेवाला है इसलिए इस समय यहीं छोड़ दो। आकाशवाणी के अनुसार श्यामलछाया कुमारको अपनी पर्णलघ्वी नामक विद्याके लिए सौंपकर अपने घर चली गई और कुमार उस पर्णलध्वी विद्याके द्वारा पत्तके समान लघु शरीर होकर धीरे-धीरे पृथिवीकी ओर आये ॥१११-११३।। तदनन्तर कुमार वसुदेव, चम्पानगरीके बाह्योद्यानमे कमलोंसे ढंका हुआ जो कमल सरोवर था उसमें गिरे । तालाबसे निकलकर वे तटपर आये ॥११४॥ सरोवरके तटपर मानस्तम्भ आदिसे युक्त श्रीवासुपूज्य भगवान्का मन्दिर था। वसुदेवने पास जाकर प्रदक्षिणा दी, वन्दना की और उसके बाद दीपिकाओंके प्रकाशसे प्रकाशित उसी मन्दिरमें वह बस गये ॥११५।। प्रातःकाल भगवान्की पूजाके लिए एक ब्राह्मण आया तो वसुदेवने उससे पूछा कि यह कौन देश है ? तथा कौन नगरी है ? इसके उत्तर में ब्राह्मणने कहा कि यह अङ्गदेश है और यह तीन लोकमें प्रसिद्ध चम्पा नगरी है। इसे क्या तुम नहीं जानते ? अरे महाविद्वन् ! क्या तुम यहाँ आकाशसे पड़े हो ?॥११६-११७॥ इसके उत्तरमे वसुदेवने कहा कि हे ब्राह्मण! आपने बिलकुल ठीक जाना। क्या आप ज्योतिष जानते हैं ? आपका ज्ञान संवादी-- यथार्थज्ञान है । अहा ! जिन-शासन अन्यथा नहीं हो सकता ॥११॥ रूपके लोभसे दो यक्ष कुमारियाँ मुझे हरकर ले गई थीं; उनका आपसमें झगड़ा होने लगा और मैं छूटकर आकाशसे पृथिवीपर गिरा हूँ ॥११॥ यह उत्तर देकर विशाल नेत्रोंके धारक वसुदेवने ब्राह्मणका वेप रख गन्धर्वनगरीके समान उस चम्पापुरीमें प्रवेश किया ||१२०॥ वहाँ उन्होंने जहाँ-तहाँ वीणा हाथमें लिये मनुष्यों को देखकर एक ब्राह्मणसे पूछा कि ये लोग इधर-उधर क्यों घूम रहे हैं ? ॥१२१॥ ब्राह्मणने कहा कि इस नगरी में कुवेरके समान वैभव वाला एक चारुदत्त नामका सेठ रहता है उसकी गन्धर्वसेना नामको पुत्री है। वह पुत्री सौन्दर्यके गर्वसे युक्त है, गन्धर्व शास्त्र- में अत्यन्त निपुण है तथा उसने यह नियम किया है कि जो मुझे गन्धर्वशास्त्र-संगीतशास्त्रमें जीतेगा वही मेरा पति होगा ॥१२२-१२३॥ लोभसे प्रेरित, वीणा बजानेमें निपुण, तथा नाना- १ खेटस्यैवात्र म० । २. समर्पितः म०, ग०, ड०।

२६६ हरिवंशपुराणे रूपलावण्यसौभाग्यसागरप्लवकारिणी । 'हारिणी हरिणीनेत्रा कन्या व्यामोहयजगत् ॥१२५॥ कन्यार्थी च यशोऽयों च वीणाविधिविशारदः । ब्राह्मणः सत्रियो वैश्यो जयार्थी हि अनः स्थितः ॥२६॥ मास मासे समाजश्व भवस्यन्न कलाविदाम् । सदा जयपतामाया ही कन्या सरस्वती ।।१२७॥ समाजः समतीतश्च शस्तनेऽहनि साम्प्रतम् । गुणनैकमनम्कानां पुनर्मासेन जायते ॥१२॥ उपाध्यायः प्रसिद्धोऽत्र किनामा साम्प्रतं पुरि । वदेति तेन पृष्टश्व जगी मुग्रीव इन्यसो ॥२६॥ ऊचे गवेति सुग्रीवमभिवाद्य गृहीव सः । गौतमो गोत्रतस्तेऽहं कत्तु मिस्छामि शिष्यताम् ॥३०॥ भभिरूपोऽतिमुग्धोऽयमिति मत्वा दयावता । प्रतिपग्नश्च तत्रास्थाद्वीणया हासयन् जनम् ॥१३॥ सम्प्राप्ते दिवसे तस्मिन् समाजोऽभूत्स पूर्ववत् । वसुदेवोऽपि संविश्य पश्यति स्म महाजनम् ॥१३२॥ सा चुक्षोभ सभा लोकांद्यश्रवणवेदिभिः । कौतूहलिभिरन्यैश्च महाकोलाहलाकुलैः ।।१३३॥ ततः कन्या सभामध्यमविशद्विशदप्रभा । स्वलंकृता दिवो मध्यं प्रावृपीव शतदा ॥१३॥ वीणावाद्यविदग्धेषु जितेषु बहुषु क्रमात् । गन्धर्वसेनया यद्वग्मूर्तगान्धर्वविद्यया ॥१३५॥ वमुदेवः समासीनस्ततः सोऽपि वरासने । समानीताः समानीत वीणा स समदूपयत् ।।१३६॥ सुधोपाख्यां ततो वीणा दत्तां गन्धर्वसेनया । सुसप्तदशाहन्त्रीको सन्ताज्य मुदितोऽवदत् ॥१३७॥ साध्वी साची सुवीणेयं प्रवीणे ! दोपवर्जिता । वद गान्धर्वसेने ! ते गेयवस्तु मनीषितम् ।।१३८॥ देशोंसे आये हुए ये लोग उसी कन्याके लिए यहाँ इकट्ठे मिले हैं ॥१२४॥ रूप लावण्य औ सौभाग्यके सागरमें तैरनेवाली इस मृगनेत्री मनोहर कन्याने समस्त संसारको व्यामोहित क रक्खा है ।।१२।। यहाँ जो भी ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य रहता है वह कन्याका अर्थी, यशक अर्थी, वीणा बजानेमें निपुण और विजयका अभिलापो है ॥१२६॥ यहाँ एक-एक महीने में कला जानकार मनुष्योंकी सभा जुड़ती है जिससे सदा जयपताकाको हरनेवाली यही कन्यारूपी सर स्वती रहती है-सदा इसीकी जीत होती है ॥१२७॥ पिछले दिन ही यहाँ गुणी मनुष्योंकी सभ जुड़ी थी अब एक माह बाद फिरसे होगी ॥१२८॥ यह सुन वसुदेवने उस ब्राह्मणसे पूछा इस नगरीमें संगीतका प्रसिद्ध विद्वान् कौन है ? यह कहो ? इसके उत्तरमे ब्राह्मणने कहा कि इस समय सुग्रीव सगीतका सबसे अधिक प्रसिद्ध विद्वान है ॥१२६॥ तदनन्तर वसुदेव घरके लोगोंकी तरह सुप्रै पास चले गये और उसे नमस्कार कर बोले कि मैं गौतम गोत्री हूँ तथा आपकी शिष्यता करना चाहता हूँ ।।१३०॥ यह परम सुन्दः तथा भोला-भाला है यह मानकर सुग्रीवने यापूर्वक उन्हें स्वीकार कर लिया-अपना शिष्ट बना लिया। और वे अपनी उलटी-सीधी वीणासे सबको हँसाते हुए वहाँ रहने लगे ।।१३१। दिन आनेपर पहलेकी भॉति फिरसे विद्वानोको सभा हुई; वसुदेव भी उस सभामे प्रविष्ट होक विशाल जन-समूहको देखने लगे ॥१३२॥ वह सभा बाजा सुननेको कलासे युक्त सथा बहुत भारं कोलाहल करनेवाले अन्य कौतूहली मनुष्योसे क्षोभको प्राप्त हो रही थी ।।१३३।। तदनन्तर जिस प्रकार वर्षाऋतुमें बिजली आकाशके मध्यमें प्रवेश करती है उसी प्रकार निर्मल कान्तिकी धारव एवं उत्तमोत्तम आभूषणांसे अलंकृत कन्याने सभाके मध्यमे प्रवेश किया ॥१३४॥ मूर्तिमती गन्ध विद्याके समान कन्या गन्धर्वसेनाके द्वारा जब क्रम-क्रमसे वीणा बजानेमें निपुण बहुतसे विद्वान जीत लिये गये तव वसुदेव भी उत्तम आसनपर आसीन हुए। उस समय वसुदेवको अनेय वीणाएँ दी गई पर उन सबको दोपयुक्त बता दिया ॥१३५-१३६॥ अन्तम गन्धर्वसेनाने अपनी मुघोपा नामकी सत्तरह तारोंवाली वीणा उन्हें दो। उसे बजाकर वे प्रसन्न होते हुए बोले कि यह १. हरिणो म० । २ व्यमोहयजगत् म०। ३. हासयज्जनम् म० । ४. विद्युत् । ५ समानीता समानीता वीणा: म। वि एकोनविंशः सर्गः २८७ १२ ॥५०॥ मृदूपीणयाम्येपामादेशस्थानमग्रतः। विदुषां दीयतां मेऽद्य गेयवस्तुनि पण्डिते १३९॥ साह विष्णुकुमारस्य बलिबन्धनकारिणः । त्रिविक्रमकृतौ गीतं हाहातुम्बुरुनारदः ॥१०॥ यत्तदद्य त्वया वस्तु पाद्यतां वाद्यविद् यदि । पुराणप्रतिबद्धं हि गेयवस्तु प्रशस्यते ॥१४॥ ततं चाप्यवनद्धं च घनं सुपिरमिन्यपि । यथास्वं लक्षणयुक्तमातोयं स्याच्चतुर्विधम् ॥१४२॥ ततं तन्त्रीगत तेपामवनद्धं हि पौष्करम् । धनं तालस्ततो वंशस्तथैव सुपिरारयया ॥१४३॥ प्राणिप्रीतिकरं प्रायः श्रवणेन्द्रियतर्पणात् । गान्धर्नदेहसम्बद्धं ततं गान्धर्वमीरितम् ॥१४॥ वीणा वंशश्च गानं च तस्य योनिरितीरितम् । गान्धर्व विविध चैतरस्वरतालपदे गतम् ॥११५॥ वैशाश्वापि च शारीरा द्विविधास्तु स्वराः स्मृताः । विधानं लक्षणं चापि तेपामिति निरूपितम् ॥१४६॥ अति श्रुति]वृत्तिस्वरग्रामवर्णालङ्कारमूछनाः । धानुसाधारणाद्याचे दारवीणास्वराः स्मृताः ॥१४७॥ जातिवर्णस्वरग्रामस्थानसौधारण[माधारण] क्रियाः । सालझारविधिश्वायं शारीरस्वरगोचरः ॥१४॥ भति जाति तद्धितवृत्तानि सन्धिस्वरविभक्तयः । नामारयातोपसर्गाद्या वर्गाद्यास्ते पदे विधिः ।।१४६॥ "भावापश्चापि नि:क्रीमो विक्षेपश्च प्रवेशनम् । शम्यातीलं "परावतः सन्निपातः" सबस्तुका वीणा बहुत अच्छी है, बहुत अच्छी है, हे चतुरे ! यह वीणा निर्दोप है । हे गन्धर्वसेने! कह तुमे कौन-सी गेय वस्तु पसन्द है ? तू गेय वस्तुओंमें पण्डित है अतः मुझे आदेश दे मै इन विद्वानोंके आगे कोमल-कान्त वीणा बजाता हूँ ।।१३७-१३६। इसके उत्तरमें गन्धर्वसेनाने कहा कि वलिको बाँधनेवाले विष्णुकुमार मुनिने जब अपनी तीन डगोंका तव्य दिखाया था तब हाहा, तुम्बुरु तथा नारदने जो गेय वस्तु गाई थी यदि आप वाद्य विद्याके जानकार हैं तो वही वस्तु भाज बजाइए क्योंकि पुराणसे सम्बन्ध रखनेवाली गेय वस्तु ही प्रशंसनीय होती है ॥१४०-१४१॥ गन्धर्वसेनाका आदेश पाकर वसुदेव संगीत विद्या का निम्नप्रकार वर्णन करने लगे- १ तत, २ अवनद्ध, ३ घन और ४ सुपिरके भेदसे बाजे चार प्रकारके हैं। ये सभी बाजे यथायोग्य अपने अपने लक्षणोंसे युक्त हैं ।।१४२॥ जो तारसे बजते हैं ऐसे वीणा आदि तत कहलाते हैं। जो चमड़ेसे मढ़े जाते हैं ऐसे मृदङ्ग आदि अवनद्ध कहलाते हैं। काँसेके मॉम, मजीरा आदि धन कहलाते हैं और बाँसुरी आदिको सुपिर कहते हैं ॥१४३।। इनमें तत नामका वादिन कर्ण इन्द्रियको तृप्त करनेवाला होनेसे प्रायः प्राणियोंके लिए अधिक प्रीति उपजानेवाला है सथा गन्धर्व शरीरके साथ सम्बद्ध होनेसे गान्धर्व नामसे प्रसिद्ध है ॥१४४|| गान्धर्वकी उत्पत्तिमें योगा, वंश और गान ये तीन कारण हैं तथा स्वरगत, तालगत और पदगतके भेदसे वह तीन प्रकारका माना गया है ॥१४शा वेण और शारीरके भेदसे स्वर दो प्रकारके माने गये हैं और उनके भेद तथा लक्षण इस प्रकार कहे गये हैं ॥१४६॥ श्रुति, वृत्ति, स्वर, ग्राम, वर्ण, भलंकार, मूर्च्छना, धातु और साधारण आदि वेण स्वर माने गये हैं और जाति, वर्ण, स्वर, ग्राम, स्थान, साधारण किया और अलंकार विधि ये शारीर स्वरके भेद कहे गये हैं ॥१४७-१४८॥ जाति, वद्धित, छन्द, सन्धि, स्वर, विभक्ति, सुबन्त, तिइन्त, उपसर्ग तथा वर्ण आदि पदगत गान्धर्वको विधि है और आपाप, निष्काम, विक्षेप, प्रवेशन, शम्याताल, परावर्त, सन्निपात, सवस्तुक १.तत चैावनदं च धनं मुघिरमेव च । चतुर्विधन्तु विशेयमातोद्यं लदग्णान्वितम् ॥१॥ ततं तन्नोगत शेयमरनसन्तु पौत्तरम् । पनं तालस्तु विशेयः मुपिरो वंश उच्यते ॥२॥ नाट्य शास्त्र अध्याय २८ २ उपाध' ख० पुग्नके । ३ सौधम्पनियाः ख०, म० सौगरण- क० ४. श्रावायचारि म०, घ०। ५. वालपदेशः आपापः । ६.तालनिष्कासनं कमः। ७ निर्यक्चालनं विक्षेपः। ८ पुनस्लर प्रवेशः प्रवेशनम् । ६ उमयोस्तालयोः सहशी शन्दवृतिः शभ्यातालम् । १०. वामहरलेन देदिगतानालाटन परावतः । ११. सनि- पातः शन्दसाभ्यन् । १२. सवस्तुकः सनयुषः । । 7 .

२८८ हरिवंशपुराणे मन्त्राविदार्यगलया[मात्राविडायोगलया]गतिप्रकरणं यतिः । गीतीच मार्गावयवाः पादभागाः सपाणयः ॥१५॥ द्वाविंशतिप्रमाणोऽयं विधिस्तालगतस्तदा । गन्धसंग्रहस्तन प्रयुक्तस्तेन विस्तरः ॥१५२॥ पड्जश्चाप्यपभश्चैव गान्धारो मध्यमोऽपि च । पञ्चमो धैवतश्च स्यानिपादः सहमः स्वरः ॥१५३॥ वादी चापि च संवादी तो विवाद्यनुवादिनौ । प्रयुक्ता वसुदेवेन चत्वारोऽमी यथाक्रमम् ॥१५४॥ संवादो मध्यमग्रामे पञ्चमस्यर्पभस्य च । पड्जमामे च पड्जस्य संवादः पञ्चमस्य च ॥१५॥ पड्जश्चतुःश्रुतिश्च स्याहपभनिश्रुतिस्तथा । गान्धारो द्विश्रुतिश्चैव मध्यमश्च चतुःश्रुतिः ॥१५६॥ चतुर्भिः पञ्चमश्चैव द्विश्रुतिधैवतस्तथा । त्रिश्रुतिश्च निपादोऽपि पड्जमामे स्वरास्त्वमी ॥१५॥ चतुःश्रुतिश्च विज्ञेयो मध्यमे मध्यमाश्रयः । द्विश्रुतिश्चैव गान्धार अपभस्त्रिश्रुतिः स्मृतः ॥१८॥ पड्जश्चतुःश्रुतिश्चैव निषादो द्विश्रुतिस्तया । धैवतस्विश्रुति यः पञ्चमनिश्रुतिस्तथा ॥१५॥ द्वाविंशतिस्त्विमा वेद्याः श्रुतयोऽत्र निदर्शनात् । द्वैग्रामिक्यस्तथैव स्युर्मूर्च्छनास्तु चतुर्दश ।।१६०॥ भादावुत्तरमन्द्रा स्याद् रजनी चोत्तरायता । चतुर्थी शुद्धपड्जा तु पञ्चमी मरसरीकृता ॥१६॥ - में मात्रा, अविदार्य, भङ्ग, लय, गति, प्रकरण, यति, दो प्रकारको गीति, मार्ग, अवयव, पादभाग और सपाणि । ये तालगत गान्धर्वके बाईस प्रकार हैं। इस प्रकार गान्धर्व ( तत) वाद्यका जितना विस्तार है. वसुदेवने उस सबका प्रयोग किया अर्थात् तदनुसार वीणा बजाई ॥१४६-१५२॥ दूसरी तरहसे स्वर १ पड्ज, २ ऋषभ, ३ गान्धार, ४ मध्यम, ५ पश्चम, ६ धैवत और ७ निपादके भेदसे सात प्रकारके हैं। इन स्वरोंके प्रयोग करनेके वादी', संवादी, विवादी और अनुवादी ये चार प्रकार हैं सो वसुदेवने इन चारों प्रकारोंका यथाक्रमसे प्रयोग किया ॥१५३-१५४॥ मध्यम ग्राममें पश्चम और ऋषभ स्वरका तथा पड्ज ग्राममें षड्ज तथा पञ्चम स्वरका संवाद होता है ।।१५५।। पड्ज ग्रामके पड़ज स्वरमें चार, ऋपभमें तीन, गान्धारमे दो, मध्यममें चार, पञ्चम- चार, धैवतमे दो और निपादमें तीन श्रुतियाँ होती हैं ।।१५६-१५७॥ मध्यम ग्रामके मध्यम स्वरमें चार, गान्धारमें दो, ऋपभमे तीन, पड्जमें चार, निपादमें दो, धैवतमें तीन और पञ्चमर्म तीन प्रतियों होती हैं ॥१५८-१५६॥ इस प्रकार पड्ज और मध्यम-दोनों प्रामोंमें प्रत्येककी बाईस-बाईस श्रुतियाँ होती हैं एवं उक्त दोनों ग्रामीको मिलकर चौदह मूर्च्छनाएँ कही गई हैं।।१६०।। इनमें पहली उत्तरभद्रा, दूसरो रजनी, तीसरी उत्तरायता, चौथो शुद्धपड्जा, पाँचवीं मत्सरीकृता, १ खड्गश्चापि म० । २. आवापस्त्वथ निष्कामो विक्षेपश्च प्रवेशकः । शम्यातालः सन्निपातः परिवर्तः सवस्तुकः ॥१५॥ मात्राविदार्यशैलया यतिः प्रकरणं तया । गीतयोऽवयवा मार्गा पादभागाः सपाणयः। इत्येकं- विंशको शेयो विधिस्तालगतो बुधैः ॥१६॥ नाट्यशास्त्र अध्याय २८ । ३. षड्जश्च 'ऋषभश्चैर गान्धारो मध्यमस्तथा । पञ्चमो धैवतश्चैव निपादः सप्त च स्वराः ॥१६॥ चतुर्विधत्वमेतेषा विज्ञेयं श्रुतियोगतः। वादी चैवाथ सवादी अनुवादी विवाद्यपि ॥२०॥ ४. 'रागोत्पादनशक्तेर्वदनं तद्योगतो वादी' । वादी राजा स्वरस्तस्य संवादी स्यादमात्यवत् । शत्रुर्विवादो तस्य स्यादनुवादी तु भृत्यवत् ॥ ५ श्रुतयोऽष्टौ द्वादश वा भवन्ति मध्ये ययोः स्वरयोः। सवादिनौ तु कथितौ परस्पर निषादगान्धारौ ( । सगीतदर्पणे १-६-६६ ॥) ६ ग्रामः स्वराणा समूहः स्यान्मूचनादेः समाश्रयः । तौ द्वौ धरातले तन स्यात् षड्जग्राम आदिमः॥ द्वितीयो मध्यमग्रामः (संगीतमहोदधौ १-७-५) ७. पड्जश्चतुश्रुतिज्ञेय ऋषभस्त्रिश्रुतिः स्मृतः। द्विश्रुतिश्चापि गान्धारो मध्यम चतुःश्रुतिः ॥२३॥ चतुःश्रुतिः पञ्चमः स्यात् निश्रुतिधैवतस्तथा । द्विश्रुतिस्तु निषादः स्यात् षड्नमामे स्वरान्तरे ॥२४॥ ना शा २८। ८. चतुःश्रुतिस्तु विशेयो मध्यमः पञ्चमः पुनः । त्रिश्रुतिर्धवतस्तु स्याच्चतुःश्रुतिक एव च ॥२५॥ निषादषड्जी विशेयो द्विचतुःश्रुतिसम्भवौ । ऋषभन्निश्रुतिश्च स्यात् गान्धारो द्विश्रुतिस्तथा ॥२६।। ना शा अ २८॥

२८ एकोनविंशः सर्गः भश्वक्रान्ता तथा पठी सप्तमी चाभिदता । पड्जनामाश्रिता श्रेता विज्ञेयाः सप्त मूर्च्छनाः ॥१२॥ सौवीरी हरिणाश्वा च स्यात्कलोयवना कलोपनता] तथा । शुद्धमध्यमसंज्ञा च मार्गवी पौरवी तथा १६३॥ रियका हृष्यका] सप्तमी चेति मूछनाः सप्त वर्णिताः। मध्यमग्रामसम्भूता बोद्धव्या वुधसत्तमैः ॥१६॥ पड्जेनोत्तरमन्दा स्यात्पभेनाभिरुद्गता । अश्वक्रान्ता तु गान्धारे मध्यमे मरसरीकृता ॥१६५॥ पञ्चमे शुद्धषड्जा स्यावते चोत्तरायता । निपादे रजनी ज्ञेया हत्येताः सप्त मूछनाः ॥१६६॥ मध्यमग्रामजाश्चापि मध्यमे गन्धरर्पभैः । पड्जेन च निपादेन धैवतेन च मूर्छनाः ॥१६७॥ पञ्चमेन च विज्ञेया सौवीर्याचा यथाक्रमम्।रिष्यकान्ता हृष्यकान्ता]इतीमाश्च ताश्चतुर्दश मूर्च्छना॥१६॥ पट्पञ्चैकस्वरास्तानाः[पट्पञ्चकस्वरास्तासां]पाडवौडवसंश्रयाः । साधारणकृताश्चैव काकलीसमलड्कृताः ॥१६॥ आन्तरस्वरसंयुक्ता मूर्च्छना ग्रामयोद्धयोः । द्विधेकमुर्छनासिद्धियथायोगमुदाहृता ॥१७॥ तानाश्चतुरशीतिः स्युः पञ्चपद स्वरसम्भवाः । ते पञ्चत्रिंशदेकानपञ्चाशच्च यथाक्रमम् ॥१७॥ छठवीं अश्वकान्ता और सातवीं आमिरुद्गता ये सात पड्ज नामकी मूर्च्छनाएँ हैं ॥१६१-१६२॥ और पहली सौबीरी, दूसरी हरिणाश्वा, तीसरी कलोपनता, चौथी शुद्धमध्यमा, पाँचवीं मार्गवी, छठवीं पौरवी और सातवीं रिष्यका (हृष्यका) ये सात मूर्च्छनाएँ मध्यम पाममें विद्वज्जनोके द्वारा जानने योग्य हैं ॥१६३-१६४॥ पड्ज स्वरमें उत्तरमन्द्रा, ऋपभमें आमिरुद्गता, गान्धारमें अश्वकान्ता, मध्यममै मत्सरीकृता, पञ्चममें शुद्ध पड्जा, धैवतमें उत्तरायता और निपादमें रजनी मूर्च्छना होती है। ये मूर्च्छनाएँ षड्जग्राम सम्बन्धिनी हैं ॥१६५-१६६|| अब मध्यम ग्राम सम्ब- धिनी मूर्च्छनाएँ कहते हैं। मध्यम ग्रामके मध्यम, गान्धार, ऋषभ, पड्ज, निपाद, धैवत और पश्चम स्वरमे क्रमसे सौवीरीको भादि लेकर हृष्यका तक सात मूर्च्छनाएँ होती हैं अर्थात् मध्यम- में सौवीरी, गान्धारमें हरिणाश्वा, ऋपभमे कलोपनता, पड्जमैं शुद्धमध्यमा, निपादमे मार्गवी, धैवतमें पोरवी और पञ्चममें हुप्यका मूर्च्छना होती है । इस प्रकार दोनों प्रामीको ये चौदह मूर्छ- नाएँ हैं ॥१६७-१६८॥ इन चौदह मूर्च्छनाओके पाडव, औडय, साधारण-कृत और काकलीके भेद- से चार-चार स्वर होते हैं । इस तरह इनके छप्पन स्वर हो जाते हैं । जिसकी उत्पत्ति छह स्वरोंसे होती है उसे पाडव और जिसकी पाँच स्वरोंसे उत्पत्ति होती है उसे भीडव कहते हैं ॥१६६।। पड्ज मध्यम इन दोनों ग्रामोंकी मूर्च्छनाएँ अनन्तर स्वरसे भी संयुक्त होती हैं तथा इनका यथा- योग्य मेल होनेपर एक मूर्च्छना दो रूप हो जाती है इसकी सिद्धि भी बताई गई है ॥१७०॥ तान चौरासी प्रकारको हैं इनमें पाँच स्वरोसे उत्पन्न होनेवाली पैंतीस और छह स्वरोंसे उत्पन्न १. श्राचा युत्तरमन्द्रा स्याद् रजनी चोत्तरायता ( चतुर्थी शुद्धपइजा तु पञ्चमी मत्सरीकृता । २७॥ अश्व- शान्ता तु षष्ठी स्यात् सप्तमी चाभिरुद्गता। पड्जनामाश्रिता एता विज्ञेयाः सप्तमूर्चनाः ॥२८॥ नाट्य शास्त्र श्रध्याय २८ । २ सौवीरी हरिणाश्वा च स्यात् कलोपनता तथा ! चतुर्थी शुद्धमध्या तु मार्गवी पौरवी तया ॥२६॥ हृष्यका चैव विज्ञेया सप्तमी द्विजसत्तमाः । मध्यमग्रामजा ह्येता विशेयाः सत मूर्च्छनाः ॥ ३० ॥ ना. शा० अ० २८१३ तत्र पड्जग्रामे-पड्जेनोत्तरमन्द्रा, निषादेन रजनी, धैवतेनोत्तरायता, पश्चमेन शुद्धषड्जा, मध्यमेन मत्सरीकृता, गान्धारेणश्वनान्ता, ऋषमेणाभिन्द्गता इति । ना० शा० पृ० ३२० । ४ अय मध्यम- मामे-मध्यमेन सौवीरी, गान्धारेण हरिणाश्वमान्ता, ऋषभेण क्लोपनता, षड्जेन शुद्धमध्यमा, निपादेन मार्गी, धैवतेन पौरयो, पञ्चमेन हृष्यका इति ना० शा० पृ० ३२० १५, एवमेताः मयुताः षट्पञ्चाशत् स्वराः स्मृताः । पाडवोडवितमंज्ञिताः पूर्णाः साधारणकृताश्चेति चतुर्विधाश्चतुर्दशमूर्छनाः । ना० शा० पृ. ३२० । ६. पट्पञ्चकस्वरास्तासा पाडवोडवितस्मृताः । साधारणकृताश्चेति काक्ली संमल कृताः ॥ ७, अन्तरस्वर• संयुक्ता मूछंना ग्रामयोर्द्वयोः ॥३२॥ द्विविधैकमूछनासिद्धिः इत्यादि व्याख्यानेन नाट्यशास्त्रस्य ३२० पृष्ठे स्पष्टीकृतम् ।

हरिवंशपुराणे भन्तरस्वरसंयोगो नित्यमारोहिसंश्रयः । कार्योऽवल्पविशेषेण नावरोही कदाचन ॥१७॥ क्रियमाणोऽवरोही स्यादरपो वा यदि वा बहु । याति रागं श्रुतिश्चैव नयते स्वं ततः स्वरः जातिरागं श्रुतिञ्चैव नयते स्वन्तरस्वरः] ॥१७३॥ पाड्जी स्यादार्पभी चैव धैवत्यथ निपादजा । सुपड्जा दिव्य[सुषड्जोदीच्य]वा चैव तया वै पड्जकैशिकी ॥१७॥ पड्जमध्या तथा चैव पड्जग्रामसमाश्रया । जातयोऽष्टोदशोद्दिष्टा मध्यमग्रामजाश्रिताः ॥१५॥ गान्धारी मध्यमा चैव गान्धारी दिव्यवा[गान्धारोदीच्यवा] तथा। पञ्चमी रक्तगान्धारी तथाऽन्या रक्तपञ्चमी ॥१७॥ मध्यमोदिव्यवा[मध्यमोदीच्यवाjचैव मन्दयन्ती तथैव च । कारवी च विज्ञेया तथान्ध्री कैशिकी तथा ॥१७७॥ स्वरसाधारणगतास्तिस्रो ज्ञेयास्तु जातयः । मध्यमा पड्जमध्या च पञ्चमी चेति सूरिभिः ॥१८॥ ताश्चापि द्विविधाः शुद्धा विकृताश्च प्रकीर्तिताः । अपरस्परनिष्पमा ज्ञेयाश्चैव तु जातयः ।।१७६॥ भपृथग्लक्षणयुक्ता ग्रामिक्यः स्वरप्लुताः । चतस्रो जातयो नित्यं ज्ञेयाः सप्तस्वरा घुधैः ॥१०॥ चतस्रः पदस्वराश्चान्या दश पञ्चस्वराः स्मृताः । मध्यमोदीच्यचा चैव तथा वै पड्जकैशिकी ॥१८॥ होनेवाली उनचास है ॥१७१।। भन्तर स्वरका संयोग सदा आरोहो अवस्थामें ही करना चाहिए अवरोही अवस्थामें थोड़ा या बहुत किसी भी रूपमें कभी भी नहीं करना चाहिए ॥१७२॥ क्योंकि यदि अवरोही अवस्थामें थोड़ा या बहुत अन्तर स्वरका संयोग किया जाता है तो उस समय अन्तर स्वर जातिके राग और श्रुति दोनोंको समाप्त कर देता है ।१७३।। अब दोनों ग्रामों को जातियोंका वर्णन करते हैं, उनमें पड्ज प्रामसे सम्बन्ध रखनेवाली १ पाड्जी, २ आपभी, ३ धैवती, ४ निषादजा, ५ सुपड्जा, ६ उदीच्यवा, ७ पड्जकैशिकी और ८ पडूजमध्या ये आठ जातियाँ हैं एवं नीचे लिखी दश जातियाँ मध्यमग्रामके आश्रित हैं -१ गान्धारी, २ मध्यमा ३ गान्धारोदीच्यवा, ४ पञ्चमी, ५ रक्तगान्धारी, ६ रक्तपञ्चमी, ७ मध्यमोदीच्यवा, नन्दयन्ती, ६ कारवी, १० आन्ध्री, ११ कैशिकी। दोनों प्रामोंकी मिलाकर अठारह जातियाँ होती हैं ॥१७४-१७७॥ इन जातियोंमें मध्यमा, पडुजमध्या और पञ्चमी ये तीन जातियाँ साधारण स्वरगत हैं ॥१८॥ ये जातियाँ शुद्ध और विकृतके भेदसे दो प्रकारको कही गई हैं। जो परस्पर में मिलकर उत्पन्न नहीं हुई हैं तथा पृथक्-पृथक् लक्षणोसे युक्त हैं वे शुद्ध कहलाती हैं और जो समान लक्षणोसे युक्त हैं वे विकृत कहलाती हैं। विकृत्त जातियों दोनों ग्रामोंकी जातियोंसे मिलकर बनती हैं तथा दोनोके स्वरोंसे आप्लुत रहती हैं। इन जातियोमें चार जातियाँ सात स्वरवाली, चार जातियों छह स्वरवाली और शेप दश जातियाँ पाँच स्वरवाली कही गई हैं । मध्यमो- दीच्यवा, षड्जकैशिकी, कर्मारवी और गान्धारपश्चमी ये चार जातियाँ सात स्वरवाली हैं । १ तर मूर्च्छनातानाश्चतुरशीतिः । तत्रैकोनपश्चाशत् पट्स्वराः, पञ्चत्रिंशत् पञ्चस्वराः । नाट्यशास्त्र पृ० ३२० 'मूछना एव तानाः स्युः शुद्धा आरोहणाश्च ताः' । ( नारदपुराणे). विस्तार्यन्ते प्रयोगाय मूछनाः शेषसंश्रयाः। तानास्तेपूनपञ्चाशत् सप्तस्वरसमुद्भवाः' ॥ ( संगीतदामोदरे १-३५) २. अन्तरस्वरसयोगो नित्यमारोदिसंश्रयः । कार्यस्त्वल्पो विशेषेण नावरोही कदाचन ॥ क्रियमाणोऽवरोही स्यादल्पो या यदि वा बहु । जातिराग श्रुतिश्चैव नयन्ते त्वन्तरे स्वयः ॥३५॥ नाट्यशास्त्र अध्याय २८ । ३ नाट्यशास्त्रे तु षड्जग्रामाश्रिताः सप्त, मध्यमग्रामाश्रितास्त्वेकादश जातयो निर्दिष्टाः । (श्लोका अष्टाविशाध्याये ३६-४२) । ४.स्वरसाधारणगतास्तिस्रो शेयास्तु जातयः । मध्यमा पञ्चमी चैव षड्जमध्या तथैव च ॥३६॥ ना. शा० अ०२८।

एकोनविंशः सर्गः कारवी च सम्पूर्णा तथा गान्धारपञ्चमी । पड़जान्ध्री नन्दयन्ती च गान्धारोदीच्यवा तथा ॥१२॥ चतस्रः षट्स्वरा होताः शेषाः पवस्वरा दश । नेपादी वार्षमी चैव धैवती पढ्जमध्यमा १८३॥ पड्जौदीरयवती चैव पञ्च पड़जाश्रया स्मृताः । गान्धारी रक्तगान्धारी मध्यमा पञ्चमी तथा ॥१८॥ कैशिकी चेति विज्ञया पञ्चैता मध्यमाश्रयाः । यास्ताः पञ्चस्वरा ज्ञेया याश्चैताः पट्स्वराः स्मृताः ।। कदाचित् पाडवीभूताः कदाचिच्चौडवीकृताः । पड्जप्रामेऽपि सम्पूर्ण विज्ञेया बहु[पड्ज] कैशिको 1 पटूस्वराश्चैव विज्ञ या पड्जे ता गानयोगतः। सम्पूर्णा मध्यमग्रामे ज्ञेया कारवी तथा ॥१८॥ गान्धारपञ्चमी चैत्र मध्यमोदीच्यवा तथा । पुनश्च पट्स्वरोपेता गान्धारोदीच्यवा तया ॥१८॥ आन्ध्री च नन्दयन्ती च मध्यमप्रामसंश्रयाः । एवमेता बुधया ग्रामिक्यो हि जातयः ॥१८॥ षट्स्वरे सहमस्त्वंशो नेप्यते षड्जमध्यमः । संवादिलोपाद् गान्धारस्तत्रैव न विशिष्यते ॥११०॥ गान्धारी रक्तगान्धारी कैशिकीनां च पञ्चमः । पढ्जायाश्चैव गान्धारी मानसं विद्धि पाढवम् ॥30 पाडवे धैवतो नास्ति पड्जोदीच्या वियोगतः । संवादिलोपारसप्तैताः षट्स्वरेण विवर्जिताः ॥१२॥ भासां तु रवगान्धाः पढ्जमध्यमपक्षमाः । सप्तमश्चैव विशेयो येषु नौदवितं भवेत् ॥१६३॥ दो पड्जमध्यमावंशौ गान्धारोऽध निषादवान् । अपभश्चैव पञ्चम्याः कैशिक्याश्चैव धैवतः ॥१६॥ पहजा, आन्ध्री, नन्दयन्ती और गान्धारोदीच्यवा ये चार जातियों छह स्वरयाली हैं और शेष दश जातियाँ पाँच स्वरवाली हैं । नेपादो, आपभी, धैवती, पड्जमध्यमा और पड्जोदीच्यवती ये पाँच जातियों पड्जप्रामके आश्रित हैं और गान्धारी, रक्तगान्धारी, मध्यमा, पञ्चमी तथा फैशिकी ये पाँच मध्यमप्रामके आश्रित हैं। इन जातियों में जो पाँच स्वरवाली (ओडय) और छह स्वरवाली (पाडव) जातियों कही गई हैं वे कदाचित् क्रमसे पाडव (छह स्वरवाली) और ओडव (पाँच स्वरवाली ) हो जाती हैं। पड्जप्राममें सात स्वरवाली पड्जकैशिको जाति होती है और गानके योगसे छह स्वरवाली भी होती है। मध्यमग्राममें सात स्वरवाली कारवी, गान्धारपञ्चमी और मध्यमोदीच्यवा होती है और छह स्वरवाली गान्धारोदीच्यवा, आन्ध्री एवं नन्दयन्ती जातियाँ होती हैं । इस तरह विद्वानोंके द्वारा ये दोनों प्रामोंकी जातियाँ जानने योग्य हैं ॥१७६-१८।। जहाँ छह स्वर होते हैं वहाँ पड्जमध्यम स्वर उसका सतांश नहीं होता और संवादिका लोप हो जानेसे वहाँ गान्धारस्वर विशेषताको प्राप्त नहीं होता ॥१६०॥ गान्धारी, रक्तगान्धारी, कैशिकी और पाजामें पश्च स्वर नहीं होता तथा पाडवको गान्धारीका हृदय जानना चाहिए ॥१६॥ पाडवमें धैवत स्वर नहीं रहता क्योंकि वहाँ पड्ञोदीच्यवा जातिका वियोग हो जाता है । एवं ये सात जातियों संवादीका ममाव होनेसे छह स्वरोंसे वर्जित रहती हैं ॥१२॥ इनमेंसे रकगान्धारी जातिम पड्ज मध्यम और पञ्चमरवर सममस्वर रूप हो जाते हैं तथा इनमें मोडवित नहीं रहता ॥१६॥ पड्ज, मध्यम, गान्धार, निपाद और ऋपभ ये पाँच अंश पञ्चमी जातिम रहते हैं और कैशिकीमें धैववके साथ छह रहते हैं। ये बारही जातियों पञ्चस्वरमें सदा वर्जनीय मानी गई है। किन्तु इनमें जो भोडवितसे रहित हैं उनका स्वरके आश्रय निरन्तर प्रयोग १ निपावृषभी म.। २ पोडशीभूता कदाचित् पडवीकृताः म । 'कदाचिन् पाहवीभूता कदा. अ०२८। ४. मानेच म०। ५. पड्जमामे तु रिया पाइज्येका पट्स्वपश्या ||५|| ना शा०अ० २८ । ६. समूगां मध्यममाने हेपा कारयो तया ॥६॥ मम्पमोदीयवा चैव तपा गान्धारपञ्चमी । ना० शा. २०२८1७. एषमेता बुधैया देग्रामिपम मातयः ।।६२॥ ना. शा. म० २८ । ८. पट्य सप्तमाया व नेप्प३ पट्नमप्पमा । रार दिलोग गान्धारस्तव न भविष्यति ॥६५॥ ना• • म. २८ ।

1 हरिवंशपुराणे एवं सु द्वादशेवेह धाः पञ्च स्वरे सदा । यास्तु नौटविता नित्यं कर्तव्या हि स्वराश्रयाः ॥१५॥ सर्वस्वराणां नाशस्तु विहितस्स्वध जातिपु । न मध्यमस्य नाशस्तु कर्तव्यो हि कदाचन ॥१६॥ सर्वस्वराणां प्रबरो ह्यनाशान्मध्यमः स्मृतः । गान्धर्वकल्पे विहिते समस्तेष्वपि मध्यमः ॥१७॥ जातीनां लक्षणं तारो मन्द्रो न्यासादिरेव च । अल्पावं च यहुत्वं च पावोडविते तथा ॥११॥ एवमेता बुधैया जातयो दशलक्षणाः । यथा यस्मिन् रसे यावदिति तन्प्रतिपाद्यते ॥१६॥ यस्मिन् भवति रागश्च यस्माच्चैव प्रवर्तते । मन्द्रश्च तारमन्द्रश्च योज्यर्थमुपलभ्यते ॥२०॥ ग्रहोपन्यासविन्याससंन्यासन्यासगोचरः । अनुवृत्तिश्च या चेह सोऽशः स्याद्दशलक्षणः ॥२०॥ 'संसारोरसाचलस्थानमल्पत्वं दुर्बलामु च । द्विविधोत्तरमार्गस्तु जातीनां व्यक्तिकारकः ॥२०२॥(१) मन्द्रास्वं पसरो नास्ति न्यासौ तु द्वादयस्थिती । गान्धारो न्यासलिङ्गन टमापंभमेव च ॥२०॥(1) ग्रहस्तु सर्वजातीनामंशवत् परिकीर्तितः । यत्प्रवृत्ते भवेदंशः सोऽशो प्रहविकल्पितः ॥२०४॥ "मामिकीनां जातीनां सर्वासां चैव निरयशः । अंशास्त्रिपष्टिविज्ञेयास्तासां वे पट्सु संग्रहः ॥२०५१ "मध्यमोदीच्यवायास्तु नन्दयन्त्यास्तथैव च । ततो गान्धारपञ्चग्यां पञ्चमोऽशो ग्रहस्तथा ॥२०६॥ धेवरयाश्च तथा दशौ विज्ञयो धैवतर्पभौ । पञ्चम्याश्च तथा ज्ञेयौ ग्रहांशी पद्धमर्पभो ॥२०॥ गान्धारोदीच्यवायाश्च ग्रहांशी पड्जमध्यमौ । भाभ्यास्तु तथा चैव विज्ञेया धैवतभी ॥२०॥ करना चाहिए ।।१६४-१६५॥ जातियों में समस्त स्वरीका नाश किया जा सकता है परन्तु मध्यम- स्वरका नाश कभी नहीं करना चाहिए ॥१६॥ क्योंकि मध्यम स्वरका कभी नाश नहीं होता इसलिए वह समस्त स्वरोंम प्रधान स्वर माना गया है। साथ ही यह मध्यमस्वर गान्धर्व कल्पके समस्त भेदोमे भी स्वीकृत किया गया है ॥१९७|| १ तार, २ मन्द्र, ३ न्यास आदि (४ उपन्यास, ५ ग्रह, ६ अंश) ७ अल्पत्व, ८ बहुत्व, ६ पाडव और १० औडवित ये जातियों के नाम है ॥१८॥ इस प्रकार विद्वानों द्वारा ये दश जातियों जानने योग्य हैं। उन जातियोंका जिस रसमें जितना प्रयोग होता है उसका कथन किया जाता है ।।१६६॥ राग जिसमें रहता है, राग, जिससे प्रवृत्त होता है, जो मन्द्र अथवा तारमन्द्र रूपसे अधिक उपलब्ध होता है, जो ग्रह उपन्यास, विन्यास, संन्यास और न्यासरूपसे अधिक उपलब्ध होता है, तथा जो अनवृत्ति पाई जाती है वह दश प्रकारका अंश कहलाता है ॥२००-२०१।। सञ्चार, अंश, बलस्थान, दुर्बल स्वरों- की अल्पता और नाना प्रकारका अन्तर मार्ग ये जातियोंको प्रकट करनेवाले हैं ॥२०॥ मन्द्रमें अंश नहीं होता परन्तु न्यासमें दो अंश होते हैं। गान्धार ग्रह तथा न्यासमें आर्षभ अंश देखा जाता है ॥२०३॥ समस्त जातियों में जिस प्रकार अंश स्वीकार किया गया है उसी प्रकार ग्रह भी माना गया है । जिस प्रहके प्रवृत्त होनेपर जो अंश होता है वह अंश उसी ग्रहसे विकल्पित माना जाता है ॥२०४॥ समस्त ग्रामिकी जातियोंके सदा वेशठ अंश जानना चाहिए और जातियोंका संग्रह छह स्वरोंमे माना गया है ॥२०५॥ मध्यमोदीच्यवा, नन्दयन्ती और गान्धार पञ्चमीमें पञ्चम अंश तथा पश्चम ही ग्रह रहता है ॥२०६।। धैवतीमें धैवत और ऋषभ ये दो अंश तथा दो प्रह और पञ्चमीमै पञ्चम नथा ऋषभ दो अंश और दो प्रह जानना चाहिए ॥२०७॥ गान्धारो- । १ सञ्चार्गेऽशबलस्थानमल्पत्वं दुर्थलेषु च । विविधोऽन्तरमार्गस्तु जातीना व्यक्तिकारकः ।।१।। अ० २८ नाट्यशास्त्र एवं पाटः । २. मन्द्रो ह्यशपरो नास्ति न्यासे तु द्वौ व्यवस्थितौ । गान्धारे च ग्रहे न्यासे दृष्ट- मार्षभदैवतम् ॥९४॥ नाट्य अ० २८ । ३ ग्रहस्तु सर्वजातीनामंश एव हि कीर्तितः । यत्प्रवृत्त भवेद्गानं सोऽशो ग्रहविकल्पितः ॥७१] ना० शा० अ० २८॥ ४ द्वैग्रामिकीना जातीना सर्वासामपि नित्यशः। अंशास्त्रि- पष्टिविशेयास्तासा चैव तथा प्रहः ।।७५|| ना० शा० अ० २८। ५. नाट्यशास्त्रस्य अष्टाविशतितमाध्यायस्थ ७६-८७ श्लोकाः द्रष्टव्याः।

- एकोनविंशः सर्गः निषादः पाडवश्चैव गान्धारोऽधमत्तथा। तथैव पढ्जकशिश्याः पढ्जगान्धारमध्यमाः ॥२०॥ तिसूणामपि जातीनां ग्रहा न्यासाश्च कीर्तिताः । गान्धार पमरचप निषादः पञ्चमस्तथा ॥२१॥ ग्रहायशाश्च चत्वारस्तथैवान्त्याः प्रकीर्तिताः । पद्जश्चाप्यपमरचैव मध्यमः पञ्चमस्तथा ॥२॥ मध्यमायां ग्रहांशी तु गान्धारो धैवतस्तथा । निपादपदजगान्धारा मध्यमाः पञ्चमस्तथा ॥२२॥ गान्धारो रक्तगान्धार्या गृहांशाः परिकीर्तिताः । भन्चितर्षभयोगास्तु केशिकांशा ग्रहास्तथा ॥२३॥ स्वराः सर्वे च विज्ञेयाः प्रहांशी पद्जमध्यमौ । एवं त्रिषष्टिविज्ञेया ग्रहाश्चांशाः स्वजातिषु ॥२१॥ अंशवच्च ग्रहा ज्ञेयाः सर्वास्वपि हि जातिपु । सर्वासामेव जातीनां त्रिजात्यास्तु गुणाः स्मृताः ॥२५॥ पगुणास्तेषु विज्ञेया बद्धमानाः स्वरास्तथा । एकस्वरो द्विस्वरश्च निस्वरोऽथ चतुःस्वरः ॥२१॥ पास्वरस्तथा चैव पट्स्वरः सप्तकस्तथा । पूर्वमुक्तमिदं त्वासा ग्रहांशपरिकल्पनम् ॥२७॥ पञ्चैव सु भवेत् पड्जे निपादपमहीनतः । उपन्यासा भवन्त्यन्त्र गान्धारः पञ्चमस्तथा ॥२१८॥ न्यासश्चात्र भवेत् पष्टो लोपो वै सप्तमपभो । गान्धारस्य तु बाहुल्यं तन कार्य प्रयोक्तृभिः ॥२१॥ पन्यास्तु तथा त्वंशौ निषादो धैवतस्तथा । एतावन्तो झुपन्यासा न्यासश्चाप्यापभस्तथा ॥२२०॥ धैवस्या धैवतश्चैव न्यासश्चैवापंमः स्मृतः । उपन्यासा भवन्त्यम धैवतमपञ्चमाः ॥२२॥ पद्जपचमहीनं च पञ्चस्वयं विधीयते । पञ्चमं च विना चैव पाहवः परिकीर्तितः ॥२२२॥ आरोहणीयौ ती कायौ लड्धनीयौ तथैव च । निषादश्चर्पमश्चैव गान्धारो बलवस्तिथा ॥२२३॥ दीच्यवामें पड्ज और मध्यम ये दो अंश तथा ग्रह हैं। आपभीमें धैवत, ऋषभ और निपाद ये तीन अंश और ग्रह हैं । नेपादिनी पाडव, गान्धार और ऋषभ ये तीन अंश और ग्रह हैं । इसी प्रकार पड्ज कैशिकीमें पड्ज, गान्धार और मध्यम ये दोन अंश तथा ग्रह हैं ।।२०८-२०६।। तीनों जातियों के प्रह और न्यास कहे जा चुके हैं। गान्धार, ऋषभ, निपाद और पश्चम ये चार प्रहके यादि अंश हैं तथा पड़ज, ऋषभ, मध्यम और पञ्चम ये अन्त्य अंश कहे गये हैं ॥२१०-२११।। मध्यमा जातिमें गान्धार और धैवत ये दो मह एवं अंश हैं । निपाद, पड़ज, गान्धार, मध्यम और पश्चम ये रक्तगान्धारीके प्रह और अंश हैं। कैशिकीमें ऋपम योगके साथ समस्त ग्रहोंसे युक्त समस्त स्वर हैं। इसमें पड्ज और मध्यम ये दो मह और अंश हैं । इस प्रकार अपनी-अपनी जातियों- में प्रेसठ ग्रह तथा इतने ही अंश जानना चाहिए ।।२१२-२१४|| समस्त जातियोंमें अंशोंके ही समान मह जानना चाहिए । समस्त जातियोंके गुण विजातीय होते हैं ॥२१इनमें एकसे लेकर बढ़ते- यदते छहगुने स्वर हो जाते हैं और वे एक स्वर, दो स्वर, तीन स्वर, पार स्वर, पाँच स्वर, छह स्वर और सात स्वर-इस क्रमसे होते हैं। इन जातियों में ग्रह भीर अंश कल्पना पहले कही जा चुकी है ॥२१६-२१७|| पड्जमें निपाद और ऋपभको छोड़कर शेष पाँच स्वर होते हैं और यहाँ गान्धार तथा पञ्चम अपन्यास होते हैं। पष्ठ स्वर न्यास होता है एवं ऋषभ क्या सप्तम स्वरका लोप होता है। इसमें प्रयोक्ताओंको गान्धारको बहुलता करनी चाहिए ॥२१८-२१६॥ आपभीमें निपाद और धैवत ये दो अंश तथा ये ही दो उपन्यास होते हैं और भार्पभ न्याम होता है ॥२२०॥ धैवतीम धैवत और आर्पभन्यास तथा धैवत, ऋषभ और पद्धम ये उपन्यास होते हैं ।।२२। इसमें पड़ा और पञ्चमको छोड़कर पाँच स्वरोका प्रयोग किया जाता है व्या पश्चमको छोड़कर शेष पाडव कहा जाता है ।।२२२॥ पूर्वोक्त पश्चरवर्य और पाडव आरोहणीय और लड्यनीय दोनों प्रकार के हैं। इसी प्रकार निषाद, शुपम और यलयान् १. फेशिकीसमहालथा ख०। २ नाटिन्या निपादस्तु गान्धारमार्पभस्तथा । अंशाच पद न शिस्याः पर अगामारपन्चमाः ||६|| ना.ग.०२८।

हरिवंशपुराणे निपादश्च 'निषादांशो गान्धारश्चर्पभस्तथा । एवमेते ग्रुपन्यासा न्यासश्चैव तु सप्तमः ॥२२४॥ धेवग्या अपि कर्तव्यो पावौदविती तथा । तद्वच लघनीयौ तु बलवन्तौ तथैव च ॥२२५॥ अंशास्तु पद्नकै शिक्या ज्ञेयो गान्धारपसमौ । उपन्यासाश्च विज्ञेयाः पड्जपञ्चममध्यमाः ॥२२६॥ गान्धारश्च भवेन्न्यासो होनस्वयं नवात्र तु । दौर्बल्यं धान कर्तव्यं धैवतस्यपभस्य च ॥२२॥ पजश्व मध्यमश्चैव निपादो धैवतस्तथा । पड्जगोदीच्यवांशास्तु न्यासश्चैवान मध्यमः ॥२२॥ उपन्यासस्तथा चैव धैवतः षड्ज एव तु । परस्परांशातिगमश्छन्दतश्च विधीयते ॥२२॥ पञ्चमपंभानं तु पञ्चस्वयं तु तत्र वै । पजश्चाप्यर्पमश्चैव गान्धारश्च पली भवेत् ॥२३०॥ पढ्जमध्यास्तु सर्वेषामुपन्यासास्तथैव च । पढ्जश्व सप्तमश्चैव न्यासौ कार्यों प्रयोक्तृभिः ॥२३॥ गान्धारसप्तमोपेतं पयस्वयं च सद् भवेत् । पाटवः सप्तमोपेतः कार्यश्चैवात्र योगतः ॥२३२॥ सर्वस्वराणां सञ्चार इष्टवस्तु विधीयते । पड्जनामाश्रया घेताः विज्ञेयाः सप्त जातयः ।।२३३॥ गान्धार्याः पञ्चधैवांशा धैवतर्षभवर्जिताः । पञश्च पञ्चमश्चैव ापन्यासाः प्रकीर्तिताः ॥२३४॥ गान्धारोऽत्र भवेन्न्यासो पाध्यमसम्भवः । धैवतपमहीनं च तथा चौवितं भवेत् ॥२३५॥ लखनीयौ च ती नित्यमाघमाद्धयतं प्रजेत् । इति गान्धारविहितः स्वरन्यासांशसमरः ॥२३॥ लक्षणं रक्तगान्धायाँ एवं सरसमा गतम् । पलवाश्चैव तन्त्र स्याद्वैवतः पञ्चमस्तथा ॥२३७॥ गान्धारपद्जयोश्चाऽत्र समारो गुभयं विना । उपन्यास समध्यस्तु मध्यमस्तु विधीयते ॥२५॥ गान्धारोदायवायास्तु विशेयो पहलमध्यमौ । सप्तमश्च ततोऽन्यत्र पट्स्वयंमृपमं विना ॥२३॥ गान्धार भो भारोहणीय तथा लघनीय दोनों प्रकारके हैं ॥२२३|| निपाद, निपादका अंश, गान्धार और ऋषभ इस प्रकार ये उपन्यास हैं परन्तु सप्तम स्वर न्यास ही होता है ।।२२।। धैवती जातिमें भी पाडव और भीडवितका प्रयोग करना चाहिए। ये दोनों ही पूर्व- की भाँति लनीय तथा भारोहणीय होते हैं ॥२२॥ पड्ज़ कैशिकीके गान्धार और पञ्चम ये प्रहांश हैं तथा षड्ज, पञ्चम और मध्यम ये उपन्यास है ।।२२६॥ यहाँपर गान्धार चाहे होन स्वरवाला हो चाहे अधिक स्वरवाला हो न्यास होता है साथ ही इसके यहाँ धैवत तथा ऋपम स्वर में दुर्यलताका प्रयोग करना चाहिए ।।२२७॥ पड्ज, मध्यम, निपाद और धैवत"ये पड्जो. दीच्ययाके अंश है, मध्यम न्यास है और धैयत तथा पहज उपन्यास है। यहाँ छन्दके अनुसार परस्परके अंशों में व्यतिक्रम भी हो जाता है ।।२२८-२२६।। जहाँ पध्वम और ऋपमको पोदकर शेप पाप स्यर होते हैं यहाँ पहज, ऋषभ और गान्धार पलवान होते है ॥२३०॥ पड्ज और मध्यम सयके उपन्यास है तथा पहज और सप्तम सयके न्यास है ॥२३१|| पवारपर्य गान्धार भोर सप्तम स्यरसे युक्त होता है तथा पाहयको सप्तम स्वरसे युक्त अवश्य करना चाहिए ॥२३२।। इन समस्त स्वरांका मंचार इन्छानुमार किया जाता है । ये सात जातियों पहज प्रामफे भाप्रय रहती है।।२३गान्धारी जानिमें धैयत और ऋषभको छोड़कर शेष पाच ही अंश रहते हैं। पहज और पद्राम प्रपन्यास होते है ।।२३। इसमें पाहय भोर अपमसे उत्पन गान्धार न्यास होता है तथा पवन और शपभसे दिन भीडयित होता है।।२३।। यहाँ शपभ और धैयत नियमसे लापनीय माने गये हैं और जप सरपन दोसा है तो शपमसे घयतकी भोर ही दोसा है। इस प्रकार गान्धारी जामिक स्यर न्यास और अंशीफे संपारफा वर्णन किया ।।२३६॥ रफगान्धारीका लग मी-पापा के ममान दावा है। विशेषता यह है कि इसमें घयत और पाम स्वर पलपान होते ॥२३॥ यह प्रयास भीर पप्रमफे पिना गापार भोर पाका संपार दोसा, सपा मध्य मदिन मध्यम पायाम होता है ॥२३८॥ गापागदीज्यया परज, मध्यम भोर साम १. मामी म.। २५ पगुम.। मभार राममात म. ५. माग-1 मंसपल पीयो" नापसाचे! उपपगी ममम.1 एकोनविंशः सर्गः कार्यः स्वन्तरमार्गश्च न्यासोपन्यास एव च । गान्धारोदाग्यवायास्तु तत्र सर्वो विधिः स्मृतः ॥२०॥ मायमायाः भवेदंशी विना गान्धारसप्तमौ । एक एव यपन्यामो न्यासश्चैव तु मध्यमः ॥२४॥ गान्धारसप्तमापेतं पञ्चस्वयं विधीयते । पट्स्वरं चाप्यगान्धारं कर्तव्यं तु प्रयोगतः ॥२४२॥ पढ्जमध्यमयोश्चाऽत्र कार्य बाहुल्यमेव हि । गान्धारलहनं चात्र नित्यं कार्य प्रयोक्तृभिः ॥२४॥ मध्यमोदीष्यवायाः स्यादेको ग्रंशस्तु मध्यमः। शेषो विधिश्च कर्तव्यो मध्यमायास्तु यो भवेत् ॥२४॥ द्वावंशावय पञ्चम्यामृषभः पञ्चमस्तथा। भपन्यासो भवेदेको न्यासश्चैव तु पञ्चमः ॥२४५॥ मध्यमाया विधिर्योऽत्र पायोडविते तया । दौवश्यं चात्र कर्तव्यं पड़जगान्धारपञ्चमः ॥२६॥ कुर्यादा सजारं पक्षमस्य पंभस्य च । पान्धारगमनं चैव कुर्यादपि च पञ्चमः ॥२७॥ भय गान्धारपम्या पक्षमोऽशः प्रकीर्तितः । पञ्चमश्चमश्चैव अपन्यासः प्रकीर्तितः ॥२४॥ 'न्यासश्चैवाय गान्धारः स प पूर्वस्वरो भवेत् । पञ्चम्यास्वय गान्धार्याः सवरः संविधीयते ॥२४॥ ऋपमः पञ्चमश्चैव गान्धारोऽथ निषादवान् । चस्वारोऽशास्तया घान्ध्रया अपन्यासास्त एव च ॥२५॥ गान्धारश्च तथा न्यासः पद्जापेतश्च पाटवः। गान्धारपंभयोवापि सशरस्तु परस्परम् ॥२५॥ सप्तमस्य पठस्य न्यासगत्यनुपूर्वशः । पद्जस्य रहनं चात्र नास्ति चौरवितं तथा ॥२५२॥ अंश जानना चाहिए। इसमें पमके बिना छह स्वर होते हैं ।।२३। इसमें अन्तरमार्ग, न्यास और अपन्यास करना चाहिए तथा उनमें गान्धागेदीच्यवाकी सब विधि स्मरणमें रसना चाहिए ॥२४०।। मध्यमा गान्धार और सप्तमको छोड़कर पहज, ऋषभ, मध्यम, पचम और घेवन ये पाँच अंश होते हैं। इसमें एक मध्यम हो अपन्यास तथा न्यास रहता है ॥२४१॥ यहाँ गान्धार और सप्तमसे रहित पञ्चरवर्य किया जाता है और कभी प्रयोगवश गान्धारको छोड़कर । पट्रवर्य भी किया जाता है ॥२४२।। इसमें प्रयोक्ताओंको पड ज और मध्यम म्वरकी बहुलता करनी चाहिए तथा गान्धार स्वरका लयन निरन्तर करना चाहिए-उसे छोड़ते रहना पाहिए ।।२५३।। मध्यमोदीच्यवामें एक ही मध्यम अंश होता है और शेप विधि जो मध्यमामें होती है, वही इसमें फरनी चाहिए ॥२५४॥ पञ्चमी जातिम पम और पञ्चम ये दो अंश होते है तथा ये हो दो अपन्यास होते हैं परन्तु न्यास एक पञ्चम ही होता है ||२४५ मध्यमाकी जो विधि यता आये है वह तथा पाडव और मोडवित इसमें भी जानना चाहिए तथा इसमें पड़ ज गान्धार और पश्चम स्वरको दुर्वल करना चाहिए ॥२४६। यहाँ पनम और पभ स्वरका संचार फरना चाहिए क्या पक्षम स्वरके साथ गान्धार स्वरका भी संचार किया जा सकता है ॥२४॥ गान्धार पधमीका एक पश्चम अंश ही कहा गया है तथा पञ्चम भऔर शुपम ये दो उसके अप. न्यास कहे गये हैं ॥२४॥ इसमें गान्धार न्यास होता है और वह अपने पूर्व स्वरको लिये होता है। परमी भोर गान्धारी जातिका परस्पर संचार मा किया जाता है ॥२४॥ आन्धी जानिक रुपम, पद्यम, गान्धार और निषाद ये पार अंश तथा ये हो पार अपन्यास हैं ॥२५॥ गान्धार न्यास है, तया पह जसे रहित पाडव-पद स्वयं है। यहाँ गान्धार भोर ऋपम स्वरका परसर संचार होता है ॥२५॥ कभी-कभी न्यासको गति के अनुमार पाठ भीर सतम भादसावप मा दायायप पञ्चम्या मतः पञ्चमपभो। अग्न्यामो निशप पनामा मंतः॥१२॥ सामः पन्चम एप रसात् मापनमरीनता । साधार बरसा पाटगाधारमपमाः||१२४॥ मुपचाप सन्चार मपमस्मरप च । गापारगमनं पर मतमान सम्मान देत् ॥१२॥-ना. पापार ८ । शिरमानु भन्नाः स परंपरा । ल व मालमा सामो साधारयनमी नितादेव ममःमरप्पने। -...। २. far म., म .. मसरनुम: R•, ग.। ४. पोपुयामा ० पैर सपा म.।

हरिवंशपुराणे नन्दयरया भपि न्यासा अंशाश्वापि तथैव च । गान्धारो मध्यमश्चैव पञ्चमश्चैव नित्यशः ॥२५३॥ न पड्जो लडुनीयोऽशो न चान्धीसञ्चरः स्मृतः । लहन झर्षभस्यान तच्च मन्द्रगतं स्मृतम् ॥२५४॥ तारे चापि ग्रहे कार्यस्तथा न्यासश्च नित्यशः । कमारण्यास्तथा यश ऋषभः पञ्चमस्तथा ॥२५५॥ धैवतश्च निपादोऽपि झपन्यासः प्रकीर्तितः । पञ्चमश्च भवेन्न्यासो हीनस्वयंस्तथैव च ॥२५॥ गान्धारस्य विशेषेण सर्वतो गमनं भवेत् । कैशियास्तु सपद्जायाः सर्वे चैवाभं विना ॥३५७॥ एत एव घपन्यासा गान्धारा ससमो भवेत् । धेवते सनिपादे च न्यासः पञ्चम एव च ॥२५॥ अपन्यासः कदाचित् स ऋषभोऽभिविधीयते । व्यापमं पावं चान धैवतश्चपमं विना ॥२५॥ तथा नौडवितं कुर्याद्वलिनश्चान्त्यपञ्चमाः । दौर्बल्यमृपभस्यात्र लद्धनं च विशेषतः ॥२६०॥ सपड्जो मध्यमश्वाघ्र सञ्चारस्तु विधीयते । यधारसं बुधैर्योज्या जातयः स्वरसचराः ॥२६॥ इत्यादि स यथायोग्य तथा गन्धर्वविस्तरे । सुगीते वसुदेवेन श्रोतारो विस्मयं ययुः ॥२६२॥ तुम्बुरुनारदः किंवा गन्धर्वः किसरो ह्ययम् । वीणावादनमीर कुतोऽन्यस्येति वेदनम् ॥२६३॥ विष्णुगीतक्रमोद्देश स्थानं गीतं सुवीणया । श्रुत्वा गन्धर्वसेनाऽभूद् विस्मिता च निरुत्तरा ॥२६४॥ तथा जयपताकायां वसुदेवेन संसदि । गृहीतायां समुत्तस्यौ गम्भीरः साधुनिस्वनः ॥२६५॥ अनुरागवती वने वसुदेवं स्वभावतः । कण्ठे कण्ठगुणं कन्या कुर्वती तस्य संसदि ॥२६६।। स्वरका भी संचार होता है। इसमें पड ज स्वरका लधन और औडवित नहीं होता ॥२५२॥ जो न्यास, अंश तथा अपन्यास आन्ध्री जातिके हैं वे ही नन्दयन्तीके भी हैं। इसमें गान्धार, मध्यम और पश्चम स्वर नित्य रहते हैं ॥२५३॥ इसमें पडज स्वर लड्पनीय नहीं हैं और न आन्ध्रीके समान इसमें संचार ही होता है । इसमें ऋषभ स्वरका लङ्घन होता है और वह मन्द्रः गतिके समय होता है ।।२५४॥ सार ग्रहमें भी निरन्तर उसीके अनुरूप न्यास करना चाहिए। कर्मारवी जातिमें ऋषभ, पञ्चम, धैवत और निषाद ये चार अंश कहे गये हैं तथा ये ही चार! अपन्यास बतलाये गये हैं। इसमें पञ्चम न्यास होता है और वह होनस्वर्य होता है ।।२५५- २५६॥ यहाँ गान्धार स्वरका विशेष रूपसे सर्वत्र गमन होता है । षड्जा सहित कैशिकीमें ऋपभ- को छोड़कर शेप सभी अंश और अपन्यास माने गये हैं। गान्धार और सप्तममें दो न्यास है परन्तु धैवत और निपाद अंशमैं एक पश्चम हो न्यास होता है ॥२५७-२५८॥ कभी-कभी इसमें ऋपभ भी न्यास हो जाता है। इसमें पाडव ऋषभसे रहित होता है तथा धैवत ऋषभके बिना प्रयुक्त होता है। यहाँ औडवित नहीं करना चाहिए, अन्तिम और पञ्चम स्वरको बलवान् करना चाहिए तथा ऋपभको दुर्बल करना चाहिए और उसीका विशेष रूपसे लड़न करना चाहिए ।।२५६-२६०। इसमें पड़ ज और मध्यमका संचार किया जाता है। इस प्रकार स्वरों में संचार करनेवाली जातियाँ कहीं। विद्वान् इनका रसके अनुसार प्रयोग करें ॥२६१।। इस प्रकार गन्धर्व शास्त्र विस्तारके साथ जब वसुदेवने यथायोग्य उत्तम गाना गाया तब सभी श्रोता आश्चर्यको प्राप्त हो गये ।।२६२।। लोग कहने लगे कि यह क्या तुम्बुरु है ? या नारद है ? या गन्धर्य है ? अथवा किन्नर है क्योंकि ऐसी वीणा बजाना किसी दूसरेको कहाँ भा सकती है ? ॥२६३|| बलिको बाँधते समय नारद आदिने विष्णुकुमार मुनिका जिस रूपसे स्तवन किया था वसुदेवने वीणा बजाकर वही गाया जिसे सुनकर गन्धर्वसेना आश्चर्य से चकित एवं निरुत्तर हो गई ।।२६४॥ इस प्रकार जब सभामै विजयपताका उमदेवने प्रहण की तब चारों ओरसे 'साधु-साधु' 'ठीक-ठीक'का जो शब्द गूंज उठा ॥२६॥ 'विक अनुरागसे भरी 1 १. मन्दयन्त्या म.1 २.धै चौडवितं युर्यादलिनधात्र पन्चमः lr.c minimilanmaritrITTER.. पाRIMARISTO MEIRTE Hrn शिरगी HEY Emerk rautetrolkami Hit पnिfrmHIRAgriinमाEिERINE FREEmt... प्राण PATRIKARAN in Timi TRAपापा । FREEMENT ENT भारतिमा Nirm.... rfreविनाvi विधा rinा पीर माना ERT Rates गमय पामा नागेन पपने TET करा AMERITERActure meri me Putive Internantart. HThere minimurti Sairat are furrani॥ ॥ infrint Rati Tur Fairneaantigrrihittal TETraum witlantine virgirint विंशतितमः सर्गः भथापच्छत्पृथुश्रीकः श्रेणिकोऽन गणेश्वरम् । कथं विष्णुकुमारेण विभो बलिरबध्यत ॥१॥ अभणीद्गणमुल्यश्च शृणु श्रेणिक ! वैष्णवीम् । दृष्टिशुद्धिकरीं श्रव्यां सरकथां कथयामि ते ॥२॥ वजयिन्यामभूद्राजा श्रीधर्मा नाम विश्रुतः । श्रीमती श्रीमती तस्य महादेवी महागुणा ॥३॥ चत्वारो मन्त्रिणश्चास्य मन्त्रमार्गविदो बलिः । बृहस्पतिश्च नमुचिः प्रहाद इति चाचितः ॥४॥ अन्यदा श्रुतपारस्थः सससशतसंयतः । भागन्याकम्पनरतस्थौ बाह्योद्याने महामुनिः ॥५॥ वन्दनाथं नृपो लोकं निर्यान्तमिव सागरम् । प्रासादस्थस्तदालोक्य मन्त्रिगोश्टच्छदित्यसौ ॥६॥ अकालयावया लोकः क यातीति ततो बलिः । राजन्नज्ञानिनो द्रष्टुं श्रमणानित्यवेदयत् ॥७॥ ततो जिगमिपू राजा निपिद्धोऽपि बलाद् ययौ । मन्त्रिणोऽपि सहागत्य दृष्ट्वा किञ्चिदवीवदन ॥८॥ गुर्वादेशाच सोऽपि स्थितो मौनमुपाश्रितः । यान्तः प्रतिनिवृत्यामी संमुखं वीक्ष्य योगिनम् ॥६॥ भनूनुदन्नृपाध्यक्ष मिथ्यामार्गविमोहिताः । प्रमाणमार्गतस्तान् स जिगाय श्रुतसागरः ॥१०॥ स्थितं प्रतिमया रात्रौ जिघांसूस्ताश्च तहिवा । देवतास्तम्भितान् दृष्ट्वा राजा देशादपाकरोत् ॥११॥ तदा नागपुरे चक्री महापन इतीरितः । भष्टौ च कन्यकास्तस्य ताश्च विद्याधरैहताः ॥१२॥ अथानन्तर विशाल लक्ष्मीके धारक राजा श्रेणिकने गौतम गणधरसे पूछा कि हे विभो ! विष्णु कुमार मुनिने बलिको क्यों बाँधा था ? ॥१॥ इसके उत्तर में गौतम गणपतिने कहा कि हे श्रेणिक ! तू सम्यग्दर्शनको शुद्ध करनेवाली विष्णुकुमार मुनिकी मनोहारिणी कथा सुन, मैं तेरे लिए कहता हूँ ॥२॥ किसी समय उज्जयिनी नगरीमें श्रीधर्मा नामका प्रसिद्ध राजा रहता था। उसकी श्रीमती नामको पटरानी थी। वह श्रीमती वास्तव में श्रीमती-उत्तम शोभासे सम्पन्न और महा गुणवती थी ॥३॥ राजा श्रीधर्माके वलि, बृहस्पति, नमुचि और प्रह्लाद ये चार मन्त्री थे । ये सभी मन्त्री मन्त्र मार्गके जानकार थे ॥४॥ किसी समय श्रुतके पारगामी तथा सात सौ मुनियोंसे सहित महा- मुनि अकम्पन आकर उज्जयिनीके बाह्य उपवनमें विराजमान हुए ॥५॥ उन महामुनिकी वन्दनाके लिए नगरवासी लोग सागरको तरह उमड़ पड़े । महलपर खड़े हुए राजाने नगरवासियोंको देख मन्त्रियोंसे पूछा कि ये लोग असमयकी यात्रा द्वारा कहाँ जा रहे हैं ? सब वलिने उत्तर दिया कि हे राजन् ! ये लोग अज्ञानी दिगम्बर मुनियोंकी बन्दनाके लिए जा रहे हैं ॥६-७|| तदनन्तर राजा श्रीधर्माने भी वहाँ जानेको इच्छा प्रकट की। यद्यपि मन्त्रियोंने उसे बहुत रोका तथापि वह जमर्दस्ती चल ही पड़ा । अन्तमें विवश हो मन्त्री भी राजाके साथ गये और मुनियोंके दर्शनकर कुध विवाद करने लगे ॥५-६॥ उस समय गुरुको भाज्ञासे सब मुनि सङ्घ मौन लेकर बैठा था इसलिए ये चारी मन्त्री विवश होकर लौट आये। लोटकर माते समय उन्होंने सामने एक मुनिको देखफर राजाके समक्ष छेड़ा। सब मन्त्री मिथ्यामार्गमें मोहित तो थे हो इसलिए श्रुतसागर नामक उक्त मुनिराजने उन्हें जीत लिया ॥ १३॥ उसी दिन रात्रिके समय उक्त मुनिराज प्रतिमा योगसे विराजमान थे कि सय मन्त्री उन्हें माग्नेके लिए गये परन्तु देवने उन्हें कोलित कर दिया। यह देस राजाने उन्हें अपने देशसे निकाल दिया ॥११॥ उस समय हस्तिनापुरमें महापन नामक पक्रया रहता था। उसको भाठ कन्याएँ थीं १. उन्नपिन्या भोज ..|२. भीधर्मों म.1 म.|४. अन्नु म.

विशतितमः सर्गः भानीता रादशीलास्ता: संगिन्यः प्रवरानुः । तेऽपि संगिनोऽधौ च मेचराः सपमि धिता: na धवर्ती च तदेतोः प सदमीमती तम् । ज्येष्ठं राज्ये निधायान्यदेहोऽदीपिष्ट विष्णुना agen तपो विष्णुकुमारोऽमी रस्नयधरस्तपन् । निधिर्वभूव सन्धीनां नदीनां या नदीपतिः ॥१५॥ नवरायस्थमागाय पन बलिपुरोगमाः । मन्त्रिशोऽशिधियन् देशकालावस्थाविदम्तथा ॥१६॥ रियत सिंहयलं दुर्गे प यल्युपदेशतः । गृहीवाऽह गृहाणेष्टं वरीत्वति पलिं सदा aron सं प्रणम्य विदग्धोऽमो हस्तन्यासं न्यधाद् वरम् । ततः सन्तोपियां पां काले याति कदाचन nen भागन्याकम्पनाधार्यस्तदा नागपुरं शनैः । मुनीनाममहाद् योग चातुर्मास्यावधि यहिः ॥२॥ सतस्ने मन्त्रिणो माता शशविपमुपागताः । तदपाकरणोपायं चिन्तयन्ति स्म सम्मयाः ॥२०॥ भयवाद् वलिराधिरय पमं राजन् ! पररवया । दत्तः स दीयतां मेऽद्य राज्यं मप्तदिनाधि ॥२॥ दसं गृहाण ते राज्यमिन्युश्वारयवस्थितः । राज्यस्थोऽपि वलिम्तेपामुपद्यमकारयन् ॥२२॥ यतीनम्पन्तरीकृष्य परितोऽहनिशं कृतम् । पग्रमादिकोन्दिष्टयरायग्मिर्जनादिकम् ॥२३॥ उपसर्गमहास्नेऽपि कायोग्माण योगिनः । तस्थुः मारम्बमादाय प्रत्यारयानं समूरयः ॥२४॥ सम्मिन् काले गुरविष्णोमिथिलायामवस्थितः । दिग्यशानी जगी ध्यावास संयुनोऽनुकम्पया ॥२५॥ और आठ विद्याधर उन्हें इरकर ले गये थे। शुद्ध शीलको धारण करनेवाली वे कन्याएँ जब पापिस लाई गई तो उन्होंने संसारसे विरक्त हो दीक्षा धारण कर ली । उधर संसारसे विरक हो वे आठ विद्याधर भी तप करने लगे ॥१२-१३।। इस घटनासे परमशरीरी महापद्म चक्रवर्ती भी संसारसे विरक्त हो गया जिससे उसने लक्ष्मीमती रानीसे उत्पन्न पद्म नामक बड़े पुत्रको गग्य देकर छोटे पुत्र विष्णु कुमारके साथ दीक्षा धारण कर ली ॥१४॥ जिस प्रकार सागर नदियों- भाण्डार होता है उसी प्रकार रत्नत्रयके धारी एवं तप तपने पाले विष्णुकुमार मुनि अनेक शुद्धियोंके भाण्डार हो गये ॥१५॥ देशकालको अवस्थाको जाननेवाले वलि आदि मन्त्री नये गज्य. पर भारुद गज्ञा पाकी सेवा करने लगे ॥२६॥ उम समय राजा पद, यलि मन्त्रीके उपदेशसे रिटमें स्थित सिंहयल राजाको पकड़ने में सफल हो गया इमलिए उमने यलिसे कहा कि घर माँग- फर इष्ट यम्नुको महण फरो॥१७॥ वलि बड़ा चतुर था इसलिए उसने प्रणामकर उक्त घरको राजा पलके हाथमें धरोहर य दिया अर्थात् 'अभी आवश्यकता नहीं है जय आवश्यकता होगी तय मागलंग।' यह कहकर अपना घर घरोहर नरम दिया। तदनन्तर वलि आदि पारी मन्त्रियों- का सन्तोप पूर्यफ समय व्यतीत होने लगा ॥१८॥ भयानन्तर किसी ममय धीरे-धीरे विदार करते हुए अपनाचार्य, अनेक मुनियों के साथ हस्तिनापुर आये भीर पार माहफे लिए पर्यायोग धारण कर नगरके यादर विगतमान दो गये ॥१६॥ नदनन्नर शासपी यिपको प्राप्त हुए बलि आदि मन्त्री भयभीत हो गये और अहंकार के. माथ उन्हें दूर करनेका उपाय सोचने लगे ॥२०॥ यटिने गजा परके पास भाकर कहा कि राजन! आपने मुझे जो घर दिया था नमफे पलम्वरूप सात दिनसागम्य मुझे दिया जाय ॥२१॥ 'ममाट, तेरे लिए सात दिनका गव्य दिया' यह पदकर गजा पन भरपके समान दिने रगा। भोर परिने गार सिंहामनर आर होकर इन अफापनागार्य आदि मुनियोंपर उदय कर पाया मने पागंभोगसे मुनियों को परफर मनके ममाप पका धुभा कराया गया जूटन दर भादि शिवाय ॥३॥ अमनापायं मदिम मप मुनि 'यदि सामगदूर होगा को भारथितार करेंगे भन्यथा नही' इस प्रकार सायधिक मंन्याम पाप कर मनमर्ग मदमे हुए सामगंमे गई गये । मम ममप विनामार मुनि भवधिमानी गुर मिधिटा नगर्ग थे। ये धिमानमें .

! ! हरिवंशपुराणे भाचार्याकम्पनादीनां ससप्तशतयोगिनाम् । वर्ततेऽवृत्तपूर्वोऽयमुपसोऽद्य दारुणः ॥२६॥ क्षुल्लकः पुष्पदन्तस्तं क नात्यतिसम्भ्रमः । अप्रासीदित्यथ प्राह स हास्तिनपुरे स्फुटम् ॥२७॥ कुतोऽपवर्तते नाथ स इत्युक्ते जगौ गुरुः । प्राप्तवैक्रियसामाद्विष्णोजिष्णोवियतः ॥२८॥ तस्मै स क्षुल्लको गत्वा तमुदन्तं न्यवेदयत् । विक्रियालब्धिसद्भावपरीक्षामकरोन्मुनिः ॥२६॥ बाहुः प्रसारितस्तेन गिरिभित्तौ विभिद्यताम् । 'अरुद्धप्रसरो दूरं सहसासु यया तथा ॥३०॥ ज्ञातलब्धिपरिप्राप्तिजिनशासनवत्सलः । गत्वा पनं मुनिः प्राह प्रणतं प्रणतप्रियः॥३॥ पद्मराज ! किमारब्धं भवता राज्यवर्तिनः । न वृत्तं कौरवेष्वत्र कदाचिदपि यद्भुवि ॥३२॥ अनार्यजनसंवृत्तमुपसर्ग तपस्विनाम् । निवर्तयेन्नृपस्तस्य प्रवृत्तिस्तु कुतस्ततः ॥३३॥ निर्वाप्यते ज्वलसाग्निजलेन सुमहानपि । उत्तिष्ठेद् यद्यसौ तस्मात्तस्य शान्तिः कुतोऽन्यतः ॥३४॥ नेम्वाऽऽज्ञाफलमैश्वयंमाज्ञादुवृत्तशासनम् । ईश्वरः स्थाणुरप्युक्तः क्रियाशून्यो यदीश्वरः ॥३५॥ तसिवतंय दुवृत्ताद्वलिमाशु पशुपमम् । प्रद्वेषः कोऽस्य मित्रारिसमभावेषु साधुपु ॥३६॥ साधोः शीतलशीलस्य तापनं न हि शान्तये । गाढतप्तो दहत्येव तोयामा विकृति गतः ॥३७॥ विचार कर तथा दयासे युक्त हो कहने लगे कि हा ! आज अकम्पनाचार्य आदि सात सौ मुनियों पर अभूतपूर्व दारुण उपसर्ग हो रहा है ॥२५-२६। उस समय उनके पास पुष्पदन्त नामका तुल्लक बैठा था। गुरुके मुखसे उक्त दयाई वचन सुन उसने बड़े संभ्रमके साथ पूछा कि हे नाथ! वह उपसर्ग कहाँ हो रहा है ? इसके उत्तरमें गुरुने स्पष्ट कहा कि हस्तिनापुरमें ॥२७॥ तुल्लकने पुनः कहा कि हे नाथ ! यह उपसर्ग किससे दूर हो सकता है ? इसके उत्तरमें गुरुने कहा कि जिसे विक्रिया ऋद्धिकी सामर्थ्य प्राप्त है तथा जो इन्द्रको भी धौंस दिखाने में समर्थ है ऐसे विष्णुकुमार मुनिसे यह उपसर्ग दूर हो सकता है ॥२८॥ तुल्लक पुष्पदन्तने उसी समय जाकर विष्णुकुमार मुनिसे यह समाचार कहा और उन्होंने 'विक्रिया ऋद्धि प्राप्त हुई है या नहीं ?' इसकी परीत को ॥२६। उन्होंने परीक्षाके लिए सामने खड़ी पर्वतकी दीवालके आगे अपनी भुजा फैलाई सो यह भुजा, पर्वतको उस दीवालको भेदनकर विना किसी रुकावटके दूरतक इस तरह आगे बढ़ती गई जिस तरह मानो पानी में हो यदी जा रही हो ॥३०॥ तदनन्तर जिन्हें ऋद्धिको प्राप्तिका निश्चय हो गया था, जो जिनशासनके स्नेही थे और नम्र मनुष्योंके लिए अत्यन्त प्रिय थे ऐसे विष्णुकुमार मुनि उसी समय विनयावनत राजा पद्मके पास जाकर उससे बोले कि हे पद्मराज ! राज्य पाते हो तुमने यह क्या कार्य प्रारम्भ कर रक्खा ! ऐमा कार्य तो पुरुवंशियोंम पृथिवीपर कभी हुआ ही नहीं ।।३१-३२॥ यदि कोई दुष्टजन तपरवी- जनोंपर उपसर्ग करता है तो राजाको उसे दूर करना चाहिए । फिर राजासे हो इस उपसर्गको प्रवृत्ति क्यों हो रही है ? ॥३३॥ हे राजन् ! जलती हुई अग्नि फितनी ही महान क्यों न हो अन्त- में जलके द्वारा शान्त कर दी जाती है फिर यदि जलसे ही अग्नि सठने लगे तो अन्य किस पदार्थसे उसकी शान्ति हो सकती है ? ॥३४॥ निश्चयसे ऐश्वर्य, आशारूप 'फलसे सहित है अर्थात् पश्चर्यका फल आशा है और आज्ञा दुरापारियोंका दमन फरना है, यदि ईश्वरराजा इस क्रियामे शून्य है-दुष्टीका दमन करनेमें समर्थ नहीं है तो फिर ऐसे ईश्यको स्थाणु-] भी कहा है अर्थात यह नाममात्रका ईश्वर है ॥३शा इमलिए पशुतुल्य यलिको इस दुष्कार्यसे शीन ही दूर करो। मित्र और शयु पर समान भाव रापनेवाले मुनियोंपर इसका यह देप क्या है ? ॥३६॥ शीसल स्वमायके धारक साधुफो सन्ताप पहुँचाना शान्तिके लिए नहीं है फ्याँकि जिस प्रकार अधिक तपाया हुमा पानी विश्व छोफर जला ही देता है उसी प्रकार अधिक गरिजारात्यो म. 1४. शीरथ म.।

विंशतितमः सर्गः धीराः प्रश्नमामध्यां 'गावावष्टब्धमूर्तयः । साधवोऽपि कदाचित स्युदहिका ननु चाग्निवत् ॥३॥ तेन ते यावदायाति नापायो वत्युपेषणम् । नृप ! तावनिवर्तस्व मोपेवस्त्र स्वतोऽन्यतः ॥३६॥ पमस्ततो नतः माद नाय ! राज्यं मया बलेः । सप्ताहावधि दत्तं नाधिकारोऽधुनाऽत्र मे ॥४॥ रखमेव भगवन् ! गन्वा शाधि ते कुरुते वचः । वलिदाक्षिण्यतोऽसूणादित्युने वलिमाप सः ॥४॥ भाइ चैनमयो साधो ! किं दिनानिमित्तकम् । संवर्द्धनमधर्मस्य कुरुपे कर्म गहितम् ॥४२॥ तपाकमैकनिष्टस्तैः किमनिष्टमनुष्टितम् । वरिष्टेन त्वया येषु कनिष्टेनेव याकृतम् ॥४३॥ स्वकर्मबन्धीत्वामान्यानिष्टं कदाचन । तपस्विनो विचेष्टन्ते मनोवाक्कायकर्मभिः ॥४४॥ तादित्यमुपशान्तेषु न ते युनं दुरीहितम् । उपसंहर शान्त्यर्थमुपसगं प्रमादजम् ॥१५॥ ततो वलिहवाचामी यान्ति मे यदि राज्यतः । तदा निरुपसर्गः स्यादन्यथा तदवस्थितिः ॥४६॥ विष्णुरूचे स्वयोगस्था न यान्ति पदमप्यतः । कुर्वन्त्यमी तनुस्यागं न व्यवस्थितिलद्धनम् ॥४७ अनुमन्यस्व में भूमि स्थातुं तेषां पदप्रयम् । मातिकशमामानं कुश्यावयाचितः ॥१८॥ अनुमन्यायीदित्यं तद्वहिः पदमप्यमी । यद्यतीयुस्ततो दण्ड्या न मे दोपोऽग्न विद्यते ॥४६॥ तदा हि पुरुषो लोके प्रत्यवायेन युज्यते । यदा प्रध्यवते वास्यात् न तु वाक्यस्य पालकः ॥५०॥ दुःसी किया हुआ साधु विकृत होकर जला ही देता है-शाप आदिसे नष्ट ही कर देता है ॥३५|| जो धीर-वीर हैं, जिनकी सामर्थ्य छिपी हुई है और जिन्होंने अपने शरीरको अच्छी तरह वश कर लिया है ऐसे साधु भो कदाचित् अग्निके समान दाहक हो जाते हैं ॥३८॥ इसलिए हे गजन् ! जब तक तुम्हारे उपर कोई बड़ा अनिष्ट नहीं आता है तब तक तुम वलिके इस कुकृत्यके प्रति की जानेवाली अपनी उपेक्षाका दूर करो। स्वयं अपने तथा आश्रित रहनेवाले अन्य जनोंके प्रति उपेक्षा न करो ॥३६॥ तदनन्तर राजा पद्मने नम्रीभूत होकर कहा कि हे नाथ ! मैने वलिके लिए सात दिनका राज्य दे रक्सा है इसलिए इस विषयमें मेरा अधिकार नहीं है ॥४०॥ हे भगवन् ! भाप स्वयं ही जाकर उसपर शासन करें आपके असण्ड चातुर्यसे वलि अवश्य ही आपकी बात स्वीकृत करेगा। राजा पद्मके ऐसा कहनेपर विष्णुकुमार मुनि पलिके पास गये ॥४१॥ और बोले कि हे भले भादो ! आधे दिनके लिए अधर्मको बढ़ानेवाला यह निन्दित कार्य क्यों कर रहा है ? ॥४२॥ भरे ! एक सपरूप कार्यमें हो लीन रहनेवाले उन मुनियोंने तेरा क्या अनिष्ट कर दिया जिससे भूने उच्च होकर भी नीचको तरह उनपर यह कुकृत्य किया ॥४३॥ अपने कर्मबन्धसे भीर होने के कारण तपस्वी मन, वचन, कायसे कभी दूसरेका भनिष्ट नहीं करते ।।४। इसलिए इस नरह शान्त मुनियों के विपयमैं तुम्हारी यह दुरचेष्टा उचित नहीं है। यदि शान्ति चाहते हो तो शीन ही इस प्रमादजन्य उपसर्गका संकोच करो ॥४५॥ तदनन्तर बलिने कहा कि यदि ये मेरे राज्यसे चले लाते हैं तो उपसर्ग दूर हो सकता है अन्यथा उपसर्ग व्योंका-त्यों बना रहेगा ।।४।। इसके उत्तर में विष्णुमार मुनिने कहा कि ये सय आत्मध्यानमें लीन हैं इसलिए यहाँमे एक ग भी नहीं जा सकते। ये अपने शरीरका त्याग भले ही कर देंगे पर व्यवस्थाका उल्लंघन नहीं फर सस्ते ॥४॥ वन मुनियों के ठहरनेके लिए मुझे तीन डग भूमि देना स्वीकृत फगे। अपने आपको अत्यन्त कठोर मत करो। मैन कमी किसीसे यापना नही को फिर भी इन मुनियों के ठहरनेके निमित्त तुमसे सीन ढग भूमिकी याचना करता हूँ अतः मेरी यान स्यांकन फगे nean विष्णुकुमार मुनिको यात स्वीकृत करते हुए पलिने कहा कि यदि ये टस सीमा याहर एक गया मी मन्टंधन काँगे तो दण्डनीय होंगे इसमें मेरा अपराध नहीं है क्योंकि टोको मनुष्य १ मुगादा पद्ध-म.1 ३०२ हरिवंशपुराणे तं छलव्यवहारस्थाविनेयमनार्जवम् । दुष्टाहिमिव दुःशीलं वशीकत्तु प्रचकमे ॥५१॥ मिनौमि पाप ! पश्य त्वं पदत्रयमितीरयन् । व्यजृभत महाकायो ज्योतिःपटलमास्टशन् ॥५२॥ मेरावककमो न्यस्तो द्वितीयो मानुपोत्तरे । अलाभादवकाशस्य तृतीयोऽभ्रमदम्बरे ॥५३॥ तदा विष्णोः प्रभावेण क्षुभिते भुवननये । कि किमेतदितिध्वाना जाताः किंपुरुपादयः ॥५४॥ अनुकर्ण मुनेस्तस्य वीणावंशादिधादिनः । मृदुगीताः सनारीकाः जगुर्गन्धर्वपूर्वकाः ॥५५॥ तस्य रक्ततलः पादो भ्रमन् स्वैरं नमस्यभात् । सङ्गीतकिक्षरादिस्त्रीमुखाब्जनम्बदर्पणः ॥५६॥ संक्षोभं मनसो विष्णो प्रभो संहर संहर । तपःप्रभावतस्तेऽद्य चलितं भुवनत्रयम् ॥५॥ देवविद्याधरैर्वीरः श्रव्यगान्धर्ववीणिभिः । सिद्धान्तगीतिकागानेरुचराकाशचारणः ॥५॥ इति प्रसाद्यमानोऽसौ शनैः संहृत्य विक्रियाम् । स्वभावस्थोऽभवद्भानुर्यथोत्पातशमेस्थितः ॥५६॥ उपसगं विनाश्याशु बलि बद्ध्वा सुरास्तदा । विनिगृह्य दुरात्मानं देशाद् दूरं निराकिरन् ॥६०॥ वीणाघोषोत्तरश्रेणी खगानां किन्नरैः कृता । सिद्धटे महाघोषा सुघोषा दक्षिणे तटे ॥११॥ कृत्वा शासनयात्सल्यमुपसर्गविनाशनात् । विष्णुः स्वगुरुपादान्ते विक्रियाशल्यमुजही ॥६२॥ तभी आपत्तिसे युक्त होता है जब वह अपने वचनसे च्युत हो जाता है। अपने बचनका पालन करनेवाला मनुष्य लोकमें कभी आपत्तियुक्त नहीं होता ॥५०।। तदनन्तर जो कपट-व्यवहार करनेमें तत्पर था, शिक्षाके अयोग्य था, कुटिल था और दुष्ट सॉपके समान दुष्ट स्वभावका धारक था ऐसे उस वलिको वश करने के लिए विष्णुकुमार मुनि उद्यत हुए ॥५१॥ 'अरे पापी ! देख, मैं तीन डग भूमिको नापता हूँ' यह कहते हुए उन्होंने अपने शरीरको इतना बड़ा बना लिया कि वह ज्योतिष्पटलको छूने लगा ॥५२।। उन्होने एक डग मेरुपर रक्खी दूसरी मानुपोत्तरपर और तीसरी अवकाश न मिलनेसे आकाशमें ही घूमती रही ।।३।। उस समय विष्णुके प्रभावसे तीनों लोकोंमें क्षोभ मच गया। किम्पुरुप आदि देव क्या है ? क्या है ?' यह शब्द करने लगे ॥५४॥ वीणा-बाँसुरी आदि बजानेवाले कोमल गीतोंके गायक गन्धर्वदेव अपनी-अपनी स्त्रियों के साथ उन मुनिराजके समीप मनोहर गीत गाने लगे ॥५५॥ लाल-लाल तलुएसे सहित एवं आकाशमें स्वच्छन्दतासे घूमता हुआ उनका पैर अत्यधिक सुशो भित हो रहा था और उसके नख संगीतके लिए इकट्ठी हुई किन्नरादि देवोंकी नियोको अपना अपना मुख-कमल देखनेके लिए दर्पणके समान जान पड़ते थे ॥५६॥ हे विष्णो! हे प्रभो ! मनके क्षोभको दूर करो, दूर करो, आपके तपके प्रभावसे आज तीनों लोक चल-विचल हो उठे हैं। इस प्रकार मधुर गीतोंके साथ वीणा वजानेवाले, देवों, धीर-वीर विद्याधरौं तथा सिद्धान्त शास्त्रको गाथाओंको गानेवाले एवं बहुत ऊँचे आकाशमें विचरण करनेवाले चारण ऋद्धिधारी मुनियोने जब उन्हें शान्त किया तब वे धीरे-धीरे अपनी विक्रियाको संकोच कर उस तरह स्वभावस्थ हो गये-जिस तरह कि उत्पातके शान्त होनेपर सूर्य स्वभावस्थ हो जाता है अपने मूल रूपमें आ जाता है ॥५७-५६॥ उस समय देवीने शीघ्र ही मुनियों- का उपसर्ग दूर कर दुष्ट वलिको बाँध लिया और उसे दण्डित कर देशसे दूर कर दिया ॥६०॥ उस समय किन्नरदेव तीन वीणाएँ लाये थे उनमे घोपा नामकी वीणा तो उत्तरश्रेणिमे रहनेवाले विद्याधरीको दो। महाघोपा सिद्धकूटवासियोंको और सुघोपा दक्षिणतरवासी विद्याधरीको दी ॥६१॥ इस प्रकार उपसर्ग दूर करनेसे जिनशासनके प्रति वत्सलता प्रकट करते हुए विष्णुकुमार मुनिने सीधे गुरुके पास जाकर प्रायश्चित्त द्वारा विक्रियाको शल्य छोड़ी ॥२॥ १. यथोत्यात समोस्थितः म०।

विंशतितमः सर्गः सपणे धोरमसौ कृत्वा कृावान्तं घातिकर्मणाम् । विहन्य केवली विष्णुर्मासमन्ते ययौ विमुः ॥६॥ इदं विष्णुकुमारस्य चरितं दुरिताशनम् । यः शृणोति जनो भक्या रटिशुदि श्रयेत मः ॥६॥ शार्दूलविक्रीडितम् स्वस्थानाचलयेदलं गुरुतरान् कामन्दरान्मन्दरां. श्चन्द्राकानपि पातये करयलच्यापारत: पारतः । तोयेशान् विकिरदुपप्लवयुतानिमुक्तये मुक्तये साधुः स्यात् किमु दुष्करं जिनतपाधीयोगिनां योगिनाम् ॥६५॥ इति अरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती विष्णुकुमारमाहात्म्यवर्णनी नाम विशः सर्गः ॥२०॥ (वामी विष्णुकुमार, घोर तपश्चरण कर तथा घातिया कोका भयकर केवली हुए और विहार कर अन्तमें मोलको प्राप्त हुए ।।६३।। गौतम स्वामी कहते हैं कि जो मनुष्य विष्णुकुमार मुनिके इस पापापहारी परितको भक्तिपूर्वक सुनता है वह सम्यग्दर्शनकी शुद्धिको प्राप्त होता है ॥४|| साधु चाहे तो अतिशय विशाल मन्दराचलोंको भी स्वेच्छानुसार भयसे अपने स्थानसे विचलित कर सकता है, हथेलियोंके व्यापारसे सूर्य और चन्द्रमाको भी आकाशसे नीचे गिरा सकता है, भद्रयोंसे युक्त लहराते हुए समुद्रांको भी बिसेर सकता है और जो मुक्तिका पात्र नहीं है उसे भी मुक्ति प्राप्त करा सकता है, सो ठीक ही है क्योंकि जिनशासन प्रणीन तपोलक्ष्मीके धारक योगियों के लिए क्या कठिन है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ।।६।। इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्यविरचित हरिवंशपुराणमें विष्णुकुमारका वर्णन करनेवाला वीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥२०॥ १ दुनिनारनन् म.।२ पात:म्बानरम. 1३. मायग्नोगग्दः १.।

एकविंशतितमः सर्गः अथ गान्धर्वसेना तां कथञ्चिखेवरान्वयाम् । भतिराजविभूति च चारुदत्तं निरूप्य सः॥१॥ चारुगोष्टीसुखास्वादश्चारुदत्तं यदूत्तमः । उदारचरितोऽपृच्छदुदारचरितप्रियः ॥२॥ 'प्रतीच्य कथमीदृश्यः सादृश्यपरिवर्जिताः । देवपौरपसूचिन्यः सम्पदो भवतार्जिताः ॥३॥ वद विद्याधरी चेयं कुतः स्तुन्या तवास्पदे । म्यवसद् वसुभिः पूर्ण वर्पकर्णामृतं मम ॥४॥ इति पृष्टोऽवदासोऽस्मै प्रहृष्टमतिरादरात् । साधु पृष्टमिदं धीर ! वच्मि ते शृणु वृत्तकम् ॥५॥ आसीदव वैश्येशश्चापायां सुमहाधनः । भानुदत्त इति ख्यातः सुभद्रा तस्य भामिनी ॥६॥ सम्यग्दर्शनसशुद्धिनानाणुव्रतधारिणोः । काले याति सुखाम्भोधिमग्नयोर्योवनस्थयोः ॥७॥ चिरायति तयोश्चित्तमयनामृतवपिणि । साहाद्गृहिफले श्रीमदपत्यमुखपजे ॥ अहंदायतने पूजां कुर्वागावन्यदा च तौ । चारणश्रमणं दृष्ट्वा पुत्रोत्पत्तिमपृच्छताम् ॥९॥ अचिरेणेव तेनापि यतिना कृपया तयोः । प्रधानसुतसम्भूतिरादिष्टा पृष्टमानतः ॥१०॥ उत्पन्नश्वाचिरेणाहं तयोः प्रीतिकरः सुतः । चारदत्ताभिधानश्च कृतः कृतमहोत्सवः ॥११॥ कृताणुव्रतदीक्षश्च माहितः सकलाः कलाः । वालचन्द्रः परां वृदि बान्धवाम्भोनिधेरधात् ॥१२॥ अथानन्तर जिन्हें उत्तमोत्तम गोष्ठियोंके सुखका स्वाद था, जो स्वयं उदार चरितके धारक थे और उदारचरितके धारक मनुष्यों के लिए अत्यन्त प्रिय थे ऐसे यदुवंशशिरोमणि वसुदेव किसी तरह विद्याधरोके कुलमें उत्पन्न गान्धर्वसेनाको एवं राजाओंको विभूतिको तिरस्कृत करने वाले चारुदत्तको देखकर उनसे पूछने लगे कि हे पूज्य ! जो अपनी तुलना नहीं रखती तथा जं आपके भाग्य और पुरुषार्थ दोनोको सूचित करनेवाली हैं ऐसी ये सम्पदाएँ आपने किस तरह प्राप्त की ? कहिए कि यह प्रशंसनीय विद्याधरी, धन-धान्यसे पूरिपूर्ण आपके भवनमें निवास करत हुई मेरे कानोंमें अमृतकी वर्षा क्यों कर रही है ?॥१-४॥ वसुदेवके द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर चारुदत्त बहुत ही प्रसन्न हुआ और आदरके साथ कहने लगा कि हे धीर ! तुमने यह ठीक पूछा है । अच्छा, ध्यानसे सुनो मैं तुम्हारे लिए अपना वृत्तान्त कहता हूँ ॥५॥ इसी चम्पापुरीमें अतिशय धनाढ्य भानुदत्त नामका वैश्यशिरोमणि रहता था। उसकी स्त्रोका नाम सुभद्रा था ॥६॥ सम्यग्दर्शनको विशुद्धताके साथ नाना अणुव्रतोको धारण करनेवाले सुखरूपी सागरम निमग्न एवं पूर्ण यौवनसे सुशोभित उन दोनोंका समय सुखपूर्वक बीत रहा था ॥७॥ तदनन्तर किसी समय जब कि उन दोनोंके चित्त और नेत्रोंके लिए अमृत बरसाने वाला एवं गृहस्थीका साक्षात् फलस्वरूप, भाग्यशाली पुत्रका मुख कमल विलम्ब कर रहा था अर्थात उन दोनोंके जब पुत्र उत्पन्न होनेमे विलम्ब दीखा तब वे दोनों मन्दिरमें पूजा कर रहे थे उसी समय चारणऋद्धिधारी मुनिके दर्शन कर उन्होंने उनसे पुत्रोत्पत्तिकी बात पूछी ॥८-६॥ पूछते ही उन मुनिराजने दोनों दम्पतियोंपर दया कर कहा कि तुम्हारे शीघ्र ही उत्तम पुत्रकी उत्पत्ति होगी ॥१०॥ और कुछ ही समय बाद उन दोनों दम्पतियोंके आनन्दको बढ़ानेवाला मैं पुत्र हुआ। मेरा चारुदत्त नाम रक्खा गया तथा मेरे जन्मका बड़ा उत्सव मनाया गया ॥११॥ अणुवतीकी दीक्षाके साथ-साथ जिसे समस्त कलाएँ ग्रहण कराई गई थीं ऐसा वह बालकरूपी चन्द्रमा परिवार रूपी समुद्रकी वृद्धि करने लगा । भावार्थ-वह बालक ज्यों-ज्यों कलाओको ग्रहण करता जाता १ पूज्य!

एकविंशतितमः सर्गः - वराहगोमुवाभिएपहरिसिंहनमोऽन्तकाः । मरभूतिरिति प्रीता वयस्या मेऽमवस्तदा ॥१३॥ तैः सह क्रीच्या यातो निग्नगां रत्नमालिनीम् । 'भपादोपहतं पश्यन दम्पत्योः पुलिने पदम् ॥१४॥ जातविद्याधराशाः प्रगयाऽनुपदं च तम् । रतशय्यामपश्याम श्यामले कदलीगृहे ॥१५॥ रतिव्यतिकरग्लानपुष्पपल्लवतल्पतः ! भएपमन्तरमन्विष्य सुमहागहनं वनम् ॥१६॥ दृष्टो विद्याधरी वृक्षे कोलितो लोहकालकैः । पावरोटकखड्गामध्यप्ररननिरीक्षणः ॥१७॥ तिस्रः सेटकमंगुढा गृहीस्वापधिवत्तिकाः । चालनोस्कीलनोन्मूलव्रणरोहाः कृता मया ॥१८॥ निःकीलो निर्वगवासी गृहोरवा सड्गखेटको । निरुत्तरः पमुपत्य दधावोत्तरया दिशा ॥१६॥ प्रलापानुपदं गरवा हियमाणां द्विपा मियाम् । विमोच्यादाय तामेय मामयोचन्महादरः ॥२०॥ भद्र ! दत्ता यथा प्रागा नियमाणाय मे स्वया । तथैव दीयतामाशा पद किं विदधामि ते ॥२॥ वैनाड्येऽस्ति नृपः श्रेण्या दक्षिणस्यां हि दक्षिणः । महेन्द्रविक्रमो नाम्ना नगरे शिवमन्दिरे ॥२२॥ तस्यामितगतिनाम्ना तनयोऽहमतिप्रियः । मित्रं मे धूमसिंहश्च गौर मुण्डश्च सेयरः ॥२३॥ हीमन्तं पर्वत ताम्यामागतेन मयाऽन्यदा । योवनश्रियमारूढा हा तापसकन्यका ॥२४॥ हिरण्यरोमतनया शिरीपमुकुमारिका । जहार हृदयं हया नाम्ना मे सुकुमारिका ॥२५॥ था त्या-त्यों वन्धुजनोंका हर्परूपी सागर वृद्धिंगत होता जाता था ॥१२|| उस समय वराह, गोमुख, हरिसिंह, तमोऽन्तक और मरुभूति ये पाँच मेरे मित्र थे जो मुझे अतिशय प्रिय थे ॥१३॥ एक- धार उन मित्रोंके साथ क्रीड़ा करता हुआ मैं रत्नमालिनी नदी गया । वहाँ मैंने किनारेपर किसी दम्पतीका एक ऐमा स्थान देसा जिसपर पहुँचनेके लिए पैरोंके चिह्न नहीं उदले थे॥१४॥ हम लोगोंको विद्याधर दम्पतीको आशङ्का हुई इसलिए कुछ और आगे गये वहाँ जाकर हमलोगोंने रे-भरे कदली गृहम उस विद्याधर दम्पतीको रनि-शय्या देखो ॥१५॥ रति सम्बन्धी कार्यसे जिसके फूल भौर पल्लव मुरझा रहे थे ऐसी उस रतिशय्यासे कुछ दूर आगे चलनेपर एक बड़ा सचन यन दिसा ॥१६॥ यहाँ एक पृक्षपर लोहको कोलोंसे कीलित एक विद्याधर दिसाई दिया । उस विद्याधरके लाल-लाल नेत्र समीपमें पड़ी हुई ढाल और तलवारके अप्रभागमें व्यग्र थे अर्थात् यह पार-बार उन्हींकी और देख रहा था ॥१७॥ उसके इम संकेतसे मैंने ढालके नीचे छिपी हुई पालन, उत्कीलन और उन्मूलनणगेह नामक तीन दिव्य औषधियाँ पठा लीं। भोर पालन नामक भोपधिसे मैंने उस विद्याधरको चलाया, उत्कीलन नामक भोपधिसे उसे फील रहित किया तथा उन्मूलनप्रणरोह नामक ओपधिसे कील निकालनेका घाव भर दिया ॥१८॥ ज्योंही यह विद्याधर फील रहित एवं घाव रहित हुआ त्यों ही ढाल और तलवार लेकर चुपचाप आकाशमें सहा और उत्तर दिशाको ओर दौड़ा ॥१॥ जिस ओरसे रोनेका शब्द आ रहा था यह उसी ओर दौड़ना गया और शयुके द्वारा हरी हुई अपनी प्रियाको छुड़ा लाया। प्रियाको लाकर यह यही आया और बड़े आदग्के साथ मुझसे बोला कि हे भद्र ! जिसप्रकार आम मुम मग्ते एएके लिए आपने प्राग दिये हैं उसी प्रकार आज्ञा दीजिए । फहिए. मैं आपका क्या प्रत्युपकार फलं? ॥२०-२शा विजया पर्वतकी दक्षिण अंगी एक शियमन्दिर नामका नगर है। उममें महेन्द्रविक्रम नामका माल गजा है । उमा महेन्द्रायक्रम गजाका में अतिशय प्याग अमिनगति नामका पुत्र । धूमसिंह भीर गोग्गुण्ड नामके दो विद्याधर मेरे मित्र है ॥२२-२३॥ किमी समय उन दोनों मिनाक माय में द्वमन्त नामक पर्यनपर भाया । यही एक हिरण्यगेम नामफा तापम रहता था अमी पूर्ण योयनयती एयं शिरीष पूरके समान मुषुमार मुरुमारिका नामकी मुन्दर पन्या थी। १ प्रारदोगल म.प.१२. पार मेट-२०1३. मा. ३६ हरिवंशपुराणे गाढाकल्पकशल्याय पित्रा मे याचिता घसा। संवृत्तश्चोभयोराशु विवाहः परमोत्सवः ॥२६॥ धूमसिहोऽपि चामुष्यां पाभिलायोऽमिलक्षितः । अप्रमततया चाहं विरामि तया सदा ॥२७॥ रममाणोऽद्य तेनाऽहं की लितो मोचितस्त्वया । हृताऽसो मोचिता शत्रोमयेयं सुकुमारिका ॥२८॥ तदेप योज्यतामद्य जनः कर्मणि वान्छिते । वयोज्येष्ठोऽपि तं कुर्वे प्राणदस्यानुवर्तनम् ॥२६॥ भवतोद्धतशल्यं मां जीवन्तमिह जन्मनि । कृतमत्युपकारं ते प्रतोयुद्धतशल्यकम् ॥३०॥ इति प्रियंवदोश्वादि स्त्रीसखः खेवरो मया। कृतं कृतं हि मे सर्व स्वया सद्भावदर्शिना ॥३॥ शुद्धं दर्शयता भावं वद किं न कृतं स्त्रया । तदेवोपकृतं पुंसां यत् सद्भावदर्शनम् ॥३२॥ पुण्यवान् ननु पूज्योऽहं तत्तवानघदर्शनम् । जातं मे सुलभं लोके सामान्यनरदुर्लभम् ॥३३॥ सर्वसाधारणं नृणामवस्थान्तरवर्तनम् । स्वं विषण्णमना मा भूः कीलितोऽस्मीति वैरिणा ॥३॥ उपकारमतिस्तात ! यदि मां प्रति ते ततः । मय्यपस्यमतिः कार्या रवया नित्यमितोरिते ॥३५॥ वाढमित्यभिधायासी नाम गोनं च मे ततः । पृष्ट्वाभिधाय मापृच्छय स्त्रीसखः स खमुद्ययौ ॥३६॥ प्रविष्टाश्च वयं चम्पा विद्याधरकथारताः । इष्टश्रुतानुभूतं हि नवं तिकरं नृणाम् ॥३७॥ ऊदा च यौवनस्थेन नाग्ना मित्रवती मया । सर्वार्थस्य सुमिनाया मातुलस्य तनूभवा ॥३८॥ शास्त्रव्यसनिनो मेऽभूमात्मस्त्रीविषयेऽपि धीः । शास्त्रव्यसनमन्येषां व्यसनानां हि बाधकम् ॥३॥ वह मेरे देखने में आई और देखते ही साथ उसने मेरा मन हर लिया ॥२४-२५॥ मैं वहाँसे चला तो आया परन्तु उसकी प्राप्तिकी उत्कण्ठारूप शल्य मेरे मनमें बहुत गहरी लग गई। अन्तमें पिताने मेरे लिए उस कन्याकी याचना की और शीघ्र ही दोनोंका बड़े उत्सवके साथ विवाह हो गया ॥२६॥ चूंकि मुझे दिखा कि मेरा भित्र धूमसिंह भी इस सुकुमारिकाको पानेकी अभिलाषा रखता है इसलिए मैं सदा प्रमादरहित होकर इसके साथ विहार करता हूँ ॥२७॥ परन्तु आज मैं इसके साथ रमण कर रहा था कि वह धूमसिह मुझे कीलित कर इस सुकुमारिकाको हर ले गया।" आपने मुझे छुड़ाया और मै इसे शत्रुसे छुड़ा लाया हूँ ॥२८॥ इसलिए आज इस जनको ( मुझे) इच्छित कार्यमै लगाइए । क्योंकि आप मेरे प्राणदाता हैं इसलिए अवस्थामै ज्येष्ठ होनेपर भी मैं आपकी सेवा करूँगा ॥२६॥ यद्यपि आपने मेरो शल्य निकालकर मुझे जीवित किया है तथापि यथार्थमे मेरी शल्य तभी निकलेगी जब मैं आपका प्रत्युपकार कर लेगा ॥३०॥ इस प्रकार स्त्री सहित मधुर वचन बोलनेवाले उस विद्याधरसे मैंने कहा कि जब आप मेरे प्रति इस तरह शुभ भाव दिखला रहे हैं तब मेरा सब काम हो चुका । कहिए शुद्ध अभि- प्रायको दिखाते हुए आपने मेरा क्या नहीं किया है ? मनुष्योंको जो शुभ भावको दिखाना है वही तो उनका उपकार है ।।३१-३२॥ हे निष्पाप ! निश्चयसे मैं आज पुण्यवान् और पूज्य हुआ हूँ क्योकि संसारमे अन्य सामान्य मनुष्योंके लिए दुर्लभ आपका दर्शन मुझे सुलभ हुआ है ॥३३॥ मनुष्योंकी अवस्थाओका पलटना सर्वसाधारण बात है इसलिए मैं शत्रुके द्वारा कोलित हुआ । यह सोचकर आप खिन्नचित्त न हों ॥३४॥ हे तात ! यदि आपकी मेरे प्रति उपकार करनेकी भावना ही है तो आप मुझे सदा अपना पुत्र समझिए । इस प्रकार मेरे कहने पर उसने कहा कि बहुत ठीक है । तदनन्तर वह मेरा नाम और गोत्र पूछकर स्त्री सहित आकाशमे उड़ गया ॥३५-३६।। और हम लोग उसी विद्याधरको कथा करते हुए चम्पा नगरीम प्रविष्ट हुए मो ठीक ही है क्योकि . देखी-सुनी और अनुभवमे आई नूतन वस्तु ही मनुष्योको सुखदायक होती है ॥३७॥ तरुण होनेपर मैंने अपने मामा सर्वार्थकी सुमित्रा स्त्रीसे उत्पन्न मित्रवती नामक कन्याके साथ विवाह किया ॥३८॥ क्योकि मुझे शास्त्रका व्यसन अधिक था इसलिए अपनी स्त्रोके विषयमें १. वर्धनं म । २. मा पृच्छय के०, ख०, ग०, प० । मा= माम् + श्रापृच्छय, इतिच्छेदः । । ३ रुदा म०1 - एकविंशतितमः सर्गः रुद्रदत्तः पितृभ्यो मे बहुव्यसनसक्तधीः । सन्मान्य योजितो मात्रा कामुकव्यवहारवित् ॥४०॥ आसीन्कलिङ्गसेनाऽन गणिका गणनायिका । सुता वसन्तसेनाऽस्या वसन्तश्रीरिक श्रिया ॥४॥ कन्याऽमौ नृत्यगीतादिकलाकौशलशालिनी । सौरूप्यस्य परा कोटियविनस्य नवोन्नतिः ॥४२॥ नृत्यारम्भेऽन्यदा तस्या रप्रदत्तन सङ्गवः । ससाहित्यजनाकोणें स्थितोऽहं नृत्यमण्डपे ॥४३॥ सूचिनाटकसूच्यग्रे सा जातिमुकुलाञ्जलिम् । व्यकिरत् प्रविकामं च प्राप्तेषु मुकुलेषु च ॥४४॥ मुटुकारे प्रयुक्तस्याः कैश्चित्साहित्यवर्तिमिः । मया विकासकालज्ञमालाकारस्य योजिते ॥४५॥ तम्या दत्ते बुधैस्तस्मिन्नगुष्टेऽभिनये कृते । नापितस्य मया दो नखमण्डलशोधिनः ॥४६॥ कुक्षौमविकायाश्च व्यु दासाभिनये कृते । पूर्ववत् तैः कृने प्राप्तगोपालस्य मया पुनः ॥४७॥ रसभावविवेकस्य व्यक्षिका सा च सम्प्रति । सुष्टुकारमदानीता स्वागुलिस्फोटकारिणी ॥८॥ ततः सर्वस्य लोकस्य पश्यतो मम सम्मुखम् । ननाट नाटकं हारि साऽनुरागवशा च सा ॥४॥ उपसंहृतनृत्या च निजप्रासाइवत्तिनी । स्वमात्रेययद्भावमिति सापकातुरा ॥५०॥ इह जन्मनि मे मातश्चारुदत्तात्परस्य न । सङ्कलसस्तेन तेनारं मां योनयितुमर्हसि ॥५१॥ माता ज्ञात्वा सुताचित्तं चारुदत्तस्य योजने । दानमानादिनाम्यय॑ रुद्रदत्तमयोजयत् ॥५२॥ तेन चाहमुपायेन पृष्ठनश्वामतः पथि । गजी प्रयोज्य तद्वेश्यावश्म जातु प्रवेशितः ॥५३॥ मेरी कुछ भी रुचि नहीं थी सो ठीक ही है क्योंकि शास्त्रका व्यसन अन्य व्यसनोंका बाधक है ॥३६॥ मेरा एक रुद्रदत्त नामका काका था जो अनेक व्यसनोम आसक्त था तथा कामीजनों के समरन व्यवहारको जाननेवाला थामेरी मावाने उसे मेरे साथ लगा दिया ॥४०॥ इसी चम्पा नगरीमें एक कलिगसेना नामकी वेश्या थी जो समस्त वेश्याओंकी शिरोमणि थी और उसकी वसन्तसेना नामकी पुत्री थी जो शोभा वसन्तकी लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी ॥४१॥ वह वसन्तसेना नत्य-गीत आदि कलाओं सम्बन्धी कौशलसे सुशोभित थी, सौन्दर्यको परम सीमा थी और यौवनको नूतन उन्नति थी ॥४२|| किसी एक दिन वसन्तसेनाका नृत्य प्रारम्भ होनेवाला था। उसके लिए मैं भी रुद्रदत्त के साथ साहित्यिक जनोंसे भरे हुए नृत्य-मण्डपमें बैठा था॥४३॥ यह सूचीनृत्य करना चाहती थी। उसके लिए उसने सुइयोके अप्रभागपर अञ्जलि भरकर जाति पुप्पीकी चोड़ियां बिखेर दी और गायनके प्रभावसे जब सब बाड़ियाँ खिल गई तो सभामें बैठे हुए कितने ही लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। मैं जानता था कि पुष्पोंके खिलनेसे कौन-सा राग होता है, इसलिए मैंने उसे मालाकार रागका संकेत कर दिया। सूची-नृत्यके बाद उसने अङ्गुष्ट नृत्य किया तो सभाके विद्वान उसकी प्रशंसा करने लगे। परन्तु मैंने नखमण्डलको शुद्ध करने- वाले नापित रागका संकेत कर दिया। तदनन्तर उसने गौ और मक्षिकाको कुक्षिका अभिनय किया तो अन्य लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। परन्तु मैंने गोपाल रागका संकेत कर दिया । इस प्रकार रस और भावके विवेकको प्रकट करनेवाली उस वसन्तसेनाने प्रसन्न हो अपनी अगु- लियाँ चटकाती हुई मेरी बहुत प्रशंसा की। तदनन्तर अनुरागसे भरी हुई उक्त वेश्याने सब लोगोंके देखते-देखते मेरे सामने सुन्दर नृत्य किया ॥४४-४६॥ नृत्य समाप्त कर वह अपने घर गई और तीव्र उत्कण्ठासे आतुर हो अपनी मातासे कहने लगी कि हे माता ! इस जन्ममें मेरा चारुदत्तके सिवाय किसी दूसरेके साथ समागमका संकल्प नहीं है इसलिए मुझे शीघ्र ही चार- दत्त के साथ मिलानेके योग्य हो ।।५०-५१॥ माताने पुत्रीका अभिप्राय जानकर चारुदत्त के साथ मिलाने के लिए दान सम्मान आदिसे सन्तुष्ट कर रुद्रदत्तको नियुक्त किया अर्थात् इस कार्यका मार उसने रुद्रदत्त के लिए सौंप दिया ॥५२॥ किसी दिन मैं रुद्रदत्तके साथ मागमें जा रहा था कि १ प्रविकासात्प्राक् ग..

। हरिवंशपुराणे कृतसङ्केतया पूर्व कृतः कालिगसेनया । स्वागतासनदानाद्येस्पचारोऽन चावयोः ॥५४॥ धूते तनोत्तरीयं च 'रोददत्तं जितं तया । ततोऽहमुद्यतो रस्तुमपसार्य तमेतया ॥५५॥ वसन्तसेनया धूतादपसार्य स्वमातरम् । कृता दुरोदरक्रीडा मया सह विदग्धया ॥५६॥ आसक्तश्च चिरंतन पायितोऽतिपिपासितः । मतिमोहनयोगेन वासितं शिशिरोदकम् ॥५॥ अतिविसम्मतस्तस्यामनुरागे ममोद्गते । करग्रहणमेतस्या जनन्या कारितोऽस्म्यहम् ॥५॥ वसता तत्र वर्षाणि मया द्वादश विस्मृतौ । पितरौ मित्रवत्यामा कार्येवन्येषु का कथा ॥५६॥ वृद्धसेवाविवृद्धा मे गुणास्तरुणिसेवया । दोपहपचितैश्छन्नाः सन्जना इव दुर्जनः ॥६०॥ स्वर्णपोडशकोटीपु प्रविष्टासु निजं गृहम् । दृष्ट्वा कालिङ्गसेनान्ते मित्रवत्या विभूपणम् ॥६॥ जगो वसन्तसेना तामेकान्ते मन्त्रकोविदा । दुहितहितमाभापे कणे मद्वचनं कुरु ॥६२॥ गुरवाक्यामृतं मन्त्र सदाभ्यस्यति यो जनः। तमनर्थग्रहा दूराद् ढौकन्ते न कदाचन ॥६३॥ जानास्येव जघन्यां नो वृत्ति यद्वित्तवान् प्रियः । हेयः पीलितसारः स्यादिच्चलककवनरः ॥६॥ तनुलग्नमलङ्कारं चारुदत्तस्य भार्यया । प्रेपितं प्रेक्ष्यकारुण्याद् व्यसर्जयमहं पुनः ॥६५॥ तदस्य पीतसारस्य कुरु तावद्विमोक्षणम् । सारवन्त नरं स्वन्यं नवेचमिव भक्षय ॥६६॥ उसने उपाय कर मेरे आगे और पीछे दो-दो हाथियोंको लड़ा दिया और सुरक्षा पानेके लिए मुझे उस वेश्याके घर प्रविष्ट कर दिया ।।५३।। कलिङ्गसेना वेश्याको इस बातका पहलेसे ही सकेत कर दिया गया । इसलिए उसने स्वागत तथा आसन आदिके द्वारा हम दोनोंका सत्कार किया ॥५४॥ तदनन्तर कलिङ्गसेना और रुद्रदत्तका जुआ प्रारम्भ हुआ।सो कलिङ्गसेनाने जुआमें मद्रदत्तका दुपट्टा तक जीत लिया। तब मैं रुद्रदत्तको हटाकर कलिङ्गसेनाके साथ जुआ खेलनेके लिए उद्यत हुआ ॥५५॥ मुझे उद्यत देख वसन्तसेनासे भी नहीं रहा गया। इसलिए वह चतुरा अपनी माताको अलग कर मेरे साथ जुआ सेलने लगी ॥५६॥ मैं जुआ खेलनेमे चिरकालतक आसक्त रहा। इसीके बीच मुझे जोरकी प्यास लगी तो उसने बुद्धिको मोहित करनेवाले योगसे सुवासित ठण्डा पानी मुझे पिलाया ॥५७|| अतिशय विश्वासके कारण जब उसपर मेरा अनुराग बढ़ गया तब उसकी माताने मुझे उसका हाथ पकड़ा दिया ॥५८॥ मैं उसमे इतना आसक्त हुआ कि उसके घर बारह वर्पतक रहा । इस बीचमे मैने अपने माता-पिता तथा प्रिय स्त्री मित्रवतीको भी भुला दिया। फिर अन्य कार्योको तो कया ही क्या थी ?॥ वृद्धजनोंकी सेवासे पहले जो मेरे गुण-वृद्धिको प्राप्त हुए थे वे तरूणीकी से यासे उत्पन्न हुए दोपोंसे उस तरह आच्छादित हो गये जिस तरह कि दुर्जनौसे मजन आच्छादित हो जाते हैं ॥६०॥ हमारे पिता सोलह करोड़ दोनारके धनी थे । सो जब सब धन क्रम-क्रमसे फलिङ्गसेनाके घर आ गया और अन्तमें मित्रवतीके आभूषण भी आने लगे तब यह देख मन्त्र करनेमे निपुण कलिङ्गसेना एक दिन एकान्तमे वसन्तसेनासे योली कि वेटी ! मैं हितको वात कहती हूँ सो मेरे वचन कानमै घर ॥६१-६२॥ जो मनुष्य गुरु- जनोके यचनामृन रूप मन्त्रका सदा अभ्यास करता है अनर्थ रूपी ग्रह सदा उससे दूर रहते हैं, कभी उसके पास नहीं आते ॥६३।। तू हम लोगोंकी इस जघन्य वृत्तिको जानती ही है कि धन- घान् मनुष्य ही हमारा प्रिय है । जिसका धन सींच लिया है ऐमा मनुष्य ईखके छिलकेके समान छोड़ने योग्य होता है ॥३४॥ आज चारुदत्तकी भार्याने अपने शरीरका आभूपण उतार कर भेजा था सो उसे दे मैंने दयावश वापिस कर दिया है ॥६॥ इसलिए अब साग्रहीन (निर्धन) चारुदत्तका साथ छोड़ और नई ईसके ममान किसी दूसरे सारवान् (सधन) मनुष्यका उपभोग फर ॥६६॥ १ रुद्रदत्तस्येद रौद्रदत्तं, उत्तरीय वस्त्रम् । २. जयन्यातो वृत्तिद्वितन् मियः म० । ३. मेध्य म० ।

एकविंशतितमः सर्गः शकुनेव ततः कणे ताडिता साऽतिपीडिता । जगाद मातरं मातः किमिदं गदितं स्वया ॥६॥ कौमारं पतिमुग्मित्वा चारुदणं चिरोपितम् । कुबेरेगापि मे कार्य नेश्वरेण परेण किम् ॥६॥ प्राणरपि हि मे 'नार्थश्चारुदत्तवियोजकः । मैव वोचः पुनर्मातयदि मे जीवितं प्रियम् ॥६६॥ परितं कोटिशो द्युम्नैगृहं ते तद्गृहागतः । तथापि तजिहासाऽभूदकृतज्ञा हि योपितः ।।७०॥ कलापारमितस्याम्ब रूपातिशययोगिनः । सदमंदशिनो मेऽस्य स्यात्यागस्त्यागिनः कुत्तः ॥७॥ अरयासक्तामिति ज्ञात्वा कृत्वा तदनुवर्तनम् । चिन्तयन्ती स्थितोपायमावयोः सा वियोजने ॥७२॥ आसने शयने स्नाने भोजने चापि युक्तयोः । योगेनायुज्य नौ निद्रामहं रात्रौ बहिः कृतः ॥७३॥ निद्रापाये गृहं गत्वा भर्तृनिःक्रान्तिदुःखिनीम् । अपश्यं मातरं दुःखी भायां च कृतरोदनाम् ॥७॥ ततः कृततदाश्वासः प्रियालङ्कारहस्तकः । उशीरावर्गमायातो मातुलेन वणिज्यया ॥७॥ क्रीत्वा तत्र च काप्पाम ताम्रलिप्त प्रगच्छतः । देवकालनियोगेन सोऽयदाहि दवाग्मिना ॥७॥ मुक्त्वा मातुलमश्वेन पूर्वाशां गच्छतो मृतः । सोऽपि पद्भ्यां ततो यातः प्रियहुँ नगरं श्रमी ॥७॥ सुरेन्द्रदत्तनाम्नाऽहं पितृमित्रेण वीक्षितः । विश्रान्तः कतिचित्तन दिनानि सुखसद्गतः ॥७॥ कलिङ्गसेनाकी बात सुनकर वसन्तसेनाको इतना तीन दुःख हुआ मानो उसके कानमें कीला ही ठोक दिया हो। उसने मातासे कहा कि हे मातः ! तूने यह क्या कहा ? ॥६५॥ कुमार फालसे जिसे स्वीकार किया तथा चिरकाल तक जिसके साथ वास किया उस चारुदत्तको छोड़- कर मुझे कुवेरसे भी क्या प्रयोजन है ? फिर दूसरे धनाढ्य मनुप्यकी तो बात ही क्या है ? ॥६८॥ अधिक क्या कहूँ चारुदत्त के साथ वियोग करानेवाले इन प्राणोंसे भी मुझे प्रयोजन नहीं है । हे मातः ! यदि मेरा जीवन प्रिय है तो अब पुनः ऐसे वचन नहीं कह ।।६।। अरे ! उसके घरसे आये हुए करोड़ो दीनारोंसे तेरा घर भर गया फिर भी तुझे उसके छोड़नेको इच्छा हुई सो ठीक ही है क्योंकि खियाँ अकृतज्ञ होती हैं ॥७०॥ हे मातः ! जो कलाओंका पारगामी है, अत्यन्त रूपवान् है, समीचीन धर्मको जाननेवाला है एवं अतिशय त्यागी-उदार है, उस चारुदत्तका त्याग मैं कैसे कर सकती हूँ ? 11७१|| इस प्रकार वसन्तसेनाको मुझमें अत्यन्त आसक्त जान कलिगसेना उस समय तो कुछ नहीं कह सकी, उसीकी हॉमें-हाँ मिलाती रहीं परन्तु मनमें हम दोनोंको वियुक्त करनका उपाय सोचती रही ||७२।। हम दोनों आसनपर बैठते समय, शय्यापर सोते समय, स्नान करते समय और भोजन करते समय साथ-साथ रहते थे इसलिए उसे वियुक्त करनेका अवसर नहीं मिलता था। एक दिन उसने किसी योग ( तन्त्र) द्वारा हम दोनोको निद्रामें निमग्न कर रात्रि के समय मुझे घरसे बाहर कर दिया ॥७३॥ निद्रा दूर होनेपर मैं घर गया । मेरे पिता मुनिदीक्षा ले चुके थे इसलिए मेरी माता और स्त्री बहुत दुःखी थीं। वे विलख-विलखकर रोने लगी उन्हें देख मैं भी बहुत दुःखी हुआ ॥७४|| तदनन्तर माता और स्त्रोको धैर्य बधाकर तथा स्त्रीके आभूषण हाथमें ले व्यापारके निमित्त मैं अपने मामाके साथ उशीरावर्त देश आया ||७५। वहाँ कपास खगेदकर बेचने के लिए मैं ताम्र- लिप्त नगरकी भोर जा रहा था कि भाग्य और समयको प्रतिकूलताके कारण यह कपास दावा- नळसे बीचमें ही जल गया ॥७६|| मैंने मामाको वहीं छोड़ा और घोड़ापर सवार हो मैं पूर्व दिशाको ओर चला परन्तु घोडा बीच में ही मर गया इसलिए पैदल चलकर थका-मांदा प्रियहु- नगर पहुँचा !!७७|| उस समय प्रियङ्गु नगरमें मेरे पिताका मित्र सुरेन्द्रदत्त नामका सेठ रहता था उसने मुझे देखकर बड़े सुखसे रक्खा और कुछ दिनतक मैंने वहाँ विश्राम किया IIEI १ नायथावदत्तो रियोजकैः म०१२ अन्यासका-म.1३ निमान्त म०1४. कृतरोदनीम् म । ५. प्रियाया अलंकारा हस्ते यस्यासी ।

हरिवंशपुराणे समुद्रयात्रया यातः पट्कृत्वो भिन्ननौस्थितिः । अष्टकोटीश्वरश्चाहमभवं भिन्नपात्रकः ॥७॥ भासाद्य फलकं कृच्छादुत्तीर्य मकरालयम् । प्राप्तो राजपुरं तत्र परिव्राजकमैचिपि ॥५०॥ तेनाहं शान्तवेषेण श्रान्तो विश्रान्तिमाहितः । रसलोभेन च विश्वास्य कान्तारं च प्रवेशितः ॥८॥ मुग्धः सदुग्धिको रज्ज्वा परिवाजावतारित । प्रविष्टोऽहं बिलं भीमं प्रेरितो रसतृष्णया ॥२॥ रसाया मूलमासाद्य रजवारूढो ढासनः । भाददानो रसं पुंसा निपिद्धस्तत्र केनचित् ॥३॥ मा स्त्रातीस्त्वं रसं भद्र ! रौद्रं यदि जिजीविपुः । स्पृश्येत चेन्न जीवन्तं मुञ्चति क्षयरोगवत् ।।८।। ततश्चकितचित्तोऽहमवोचं तमिति दुतम । स्वं भोः कः केन वा क्षिप्त इहेत्युक्तो जगाद सः ॥८५॥ उज्जयिन्या वणिग्भिन्नपात्रोऽपात्रेण लिङ्गिना । रसमादाय नितिप्तो रसराक्षसवक्षसि ॥८६॥ रखगस्थिशेषभूतोऽहं रसभुक्तो व्यवस्थितः । ममातो निर्गमो भद्र ! मृतस्यैव न जीवतः ॥७॥ संपृष्टस्तेन भोः कस्त्वमित्यवोचमहं पुनः । चारुदत्तो वणिक क्षिप्तः परिवाजा तवारिणा ॥८॥ पियवादीति विश्वस्य वकवृत्तेदुरात्मनः । अधोऽधोऽनुचरो मुग्धः पततीति किमद्भुतम् ॥६॥ पूरयित्वा रसं तेन रजुमारोप्य चालितम् । एकामाकृष्य "कृत्वकां कृतार्थः स खलो गतः ॥१०॥ पतितस्य तटे तेन पुंसा निर्गमनाय मे । उपायः साधुनाऽवाचि ततश्चेति कृपावता ॥६॥ यहाँसे मैं समुद्रयात्राके लिए गया सो छह बार मेरा जहाज फट गया। अन्तमें जिस किसी तरह मैं आठ करोडका स्वामी होकर लौट रहा था कि फिर भी जहाज फट गया और सारा धन समुद्रमे डूब गया ||७Ell भाग्यवश एक तख्ता पाकर बड़े कष्टसे मैंने समुद्रको पार किया । समुद्र पारकर मैं राजपुर नगर आया और वहाँ एक संन्यासीको मैंने देखा ||२०|| मैं थका हुआ था इसलिए शान्तवेपको धारण करनेवाले उस संन्यासीने मुझे विश्राम कराया। तदनन्तर रसका लोभ देकर एवं विश्वास दिलाफर वह मुझे एक सघन अटवीमें ले गया ॥१॥ मैं भोला-भाला था इसलिए उस संन्यासीने एक तूमड़ी देकर मुझे रस्सीके सहारे नीचे उतारा जिससे मैं रसको तृष्णा से एक भयंकर कुऍमें जा घुसा ।।८२॥ पृथिवीके तलमें पहुँचकर रस्सीपर अपना दृढ़ आसन जमाये हुए जब मै रस भरने लगा तब वहाँ स्थित किसी पुरुपने मुझे रोका ॥५३॥ उसने कहा कि हे भद्र ! यदि तू जीवित रहना चाहता है तो इस भयंकर रसका स्पर्श मत कर | यदि किसी तरह इसका स्पर्श हो जाता है तो क्षयरोगकी तरह यह जीवित नहीं छोड़ता ॥४॥ तदनन्तर आश्चर्यचकित हो मैंने उससे शीघ्र ही इस प्रकार पूछा कि महाशय! तुम कौन हो ? और किसने तुम्हें यहाँ डाल दिया है ? मेरे यह कहनेपर वह बोला कि मैं उज्जयिनीका एक वणिक हूँ । मेरा जहाज फट गया था इसलिए एक अपात्र साधुने रस लेकर मुझे रसरूपी राक्षसके वक्षःस्थलपर गिरा दिया है ।।८५-८६॥ रसके उपभोगसे मेरी चमड़ी तथा हट्टी ही शेष रह गई है। हे भद्र! मेरा तो यहाँसे निकलना तभी होगा जब मैं मर जाऊँगा जीवित रहते मेरा निकलना नहीं हो सकता ॥२७॥ उस मनुप्यने मुझसे भी पूछा कि तुम कौन हो ? तब मैंने कहा कि मैं चारुदत्त नामका वणि हूँ और जो तुम्हारा शत्रु था उसी संन्यासीने मुझे यहाँ गिराया है ।।८८। 'यह प्रियवादी है। इसलिए बगलेके समान मायाचारी दुष्ट मनुष्यका विश्वास कर उसके पीछे-पीछे चलनेवाला मूढ़ मनुष्य यदि नीचे-नीचे गिरता है तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ? || अन्तमें मैने तूमहीम रस भरकर तथा रस्सीमें पाँधकर उसे चलाया। जिस रस्सीमें रसकी तूमड़ी बधी थी उस रस्सीको तो उस संन्यासीने खींच लिया और जिसके सहारे मुझे ऊपर चढ़ना था उसे काट दिया। इस प्रकार अपने मनोरथको सिद्ध कर वह दुष्ट वहाँ से चला गया ॥६०॥ जय में किनारेपर जा पड़ा तय उस सजन पुरुपने दयायुक्त हो मेरे लिए निकलनेका मार्ग यतलाया ॥११॥ १ -माहतः म । २ पम् ग. दि. ! ३. मूलमाशाया म.! ४. सुशेत म । स्पृशत ग०। ५ दिया ।

एकविंशतितमः सर्गः गोधैका रसपानाय साधोऽत्रावतरिष्यति । मृत्वा शीघ्रं हि तत्पुच्छं घरवा निगच्छ निश्चयम् ॥१२॥ तदेत्युक्तवते धर्म तस्मै सम्यक्त्वपूर्वकम् । समपञ्चमुवाचाहं सहपञ्चनमस्कृतिम् ॥१३॥ परेधुश्च रसं पीत्वा गच्छन्त्याः पुच्छमाश्वहम् । गोधाया एतवान् दोामाकृष्यश्च बहिस्तया ॥६॥ वटीपाटितगात्रोऽहं बहिर्मुक्तोऽतिमूच्छितः। विबुद्धश्च पुनर्जन्म जातमिति व्यचिन्तयम् ॥१५॥ शनैरुत्थाय गच्छन्तमन्वधावद् यमोपमः । महिषो वनमध्ये मां प्रविष्टोऽहं गुहां ततः ॥६६॥ प्रसुप्तोऽजगरस्तत्र मयाक्रान्तः समुस्थितः । अभिधावन्तमस्युग्रं सोऽगृहोन्महिपं मुखे ॥१०॥ यावच्चोद्धतयोयुद्धं वर्तते विषमं तयोः । तावत् तरपृष्ठमाक्रम्य निर्गतोऽहमतिद्रुतम् ॥६॥ विनिःसृस्य महारण्याद् प्रत्यन्तनाममाप्नुयाम् । काकतालीयतस्तत्र रुद्रदत्तं ददर्श तम् ॥१६॥ क्षुत्पिपासातिहरणं कृत्वाऽसौ मे ततोऽयवीत् । चारुदत्त ! विपादं मा कास्त्वं शृणु मे वचः ॥१०॥ सुवर्णद्वीपमाविश्य समुपायं धनं महत् । प्रत्येप्यावः पुनर्यन रच्यते कुलसन्ततिः ॥१०॥ एकवाक्यतया तेन यातौ चैरावती नदीम् । उत्तीय गिरिकूटं च गिरि वेत्रवनं वनम् ॥१०॥ टकणं देशमासाद्य क्रीत्वाऽजो गतिदक्षिणौ । गतौ वामपथैनातिविपमेण शनैः शनैः ॥१०३॥ भतिलङ्घय समां प्राह रुद्रदत्तोऽन्वितादरः । चारुदत्त ! पशून हत्वा कृत्वा भस्वाप्रवेशनम् ॥१०॥ आस्वहे तब नौ द्वीपे भारुण्डावण्डतुण्डकाः । गृहीत्वाऽमिपलोभेन पक्षिणः मक्षिपन्ति हि ॥१०५॥ उसने कहा कि हे सत्पुरुष ! रस पोनेके लिए यहाँ एक गोह आवेगी सो तुम सरककर यदि शीघ्र ही उसकी पूंछ पकड़ लोगे तो निश्चय ही बाहर निकल जाओगे ॥२॥ वह उस पुरुपका अन्तिम समय था इसलिए इस प्रकार निकलनेका मार्ग बतलानेवाले उस पुरुषके लिए मैंने सम्यग्दर्शन- पूर्वक विस्तारके साथ धर्मका उपदेश दिया और पञ्च नमस्कार मन्त्र भी सुनाया ॥६३।। दूसरे दिन रस पीकर जब गोह जाने लगी तब मैंने दोनों हाथोंसे शीघ्र ही उसकी पूंछ पकड़ ली और वह मुझे बाहर खींच लाई ॥४॥ किनारोंकी रगड़से मेरा शरीर छिन्न-भिन्न हो गया था इस- लिए उस गोहने जब मुझे बाहर छोड़ा तब मैं अत्यन्त मूच्छित हो गया। सचेत होनेपर मैंने विचार किया कि मेरा पुनर्जन्म ही हुआ है ॥६५॥ धीरे-धीरे उठकर मैं आगे चला तो वनके वीचमें यमराजके समान भयंकर भैंसाने मेरा पीछा किया । अवसर देख मैं एक गुहा में घुस गया ॥६६॥ उस गुफामें एक अजगर सो रहा था मेरा पैर पड़नेपर वह जाग उठा और सामने दौड़ते हुए उस भयंकर भैंसेको उसने अपने मुखसे पकड़ लिया ॥६॥ भैंसा और अजगर दोनों ही अत्यन्त उद्धत थे इसलिए जबतक उन दोनोमें युद्ध हुआ तबतक मैं उसकी पीठपर चढ़कर बड़ी शीव्रतासे बाहर निकल आया || उस महायनसे निकलकर मैं समीपवर्ती एक गाँव में पहुंचा तो काकतालीयन्यायसे (अचानक ) मैंने वहाँ अपने काका रुद्रदत्तको देखा IIEEL मैं कई दिन. का भूखा-प्यासा था इसलिए रुद्रदत्तने मेरो भूख-प्यासको बाधा दूरकर मुझसे कहा कि चारुदत्त ! सेद मत करो मेरे वचन सुनो ॥१०॥ हम दोनों सुवर्णद्वीप चलकर तथा बहुत भारी धन कमा कर चम्पापुरी वापिस आयेंगे जिससे अपने कुलको रक्षा होगो ॥१०१॥ तदनन्तर रुद्रदत्तके साथ एक सलाह हो जानेपर दोनों वहाँसे चले और ऐरावती नदीको उतरकर तथा गिरिकूट नामक पर्वत और वेत्रवनको उल्लंघकर टंकण देशमे जा पहुंचे। वहाँ 'मार्ग अत्यन्त विषम था इसलिए चलनेमें चतुर दो बकरा खरीदकर तथा उनपर सवार हो धीरे- धीरे आगे गये ।।१०२-१०३।। तदनन्तर समभूमिको उल्लंघकर रुद्रदत्तने बड़े आदरके साथ मुझसे कहा कि चारुदत्त ! अब आगे मार्ग नहीं है इसलिए इन बकरोंको मारकर तथा इनकी भस्त्रा (भाथड़ी) बनाकर उनमें हम दोनों बैठ जावें । तीक्ष्ण चोंचोंवाले भारुण्ड पक्षी मांसके लोभसे इम ? १ आशु+ अहम् । २. वनवध्ये म०।

हरिवंशपुराणे निपिद्धोऽपि बधाद्रौद्रो रुद्रदत्तोऽधीग्निजम् । भज मदीयमध्यन्तं निनाय विनयप्युतः ॥१०॥ यावन मार्यते तावापूर्वमेव प्रतीकृतः । मार्यमाणाय चादायि तस्मै पसनमस्कृतिः ॥१०॥ भनां कृत्वा सशस्त्र मामन्तस्तस्य निधाय सः । प्रविश्य स्वयमन्यस्यां शत्रहम्तो व्यवस्थितः ॥१०॥ भारण्डधातुण्डायो भनीत विहायमा । भत्रा काणेन मेऽन्यत्र नीरवा शिक्षा पितो ततः ॥१०॥ वेगाद्विपाद्य तां भरा निर्गतः स्वर्गसशिभम् । रनरश्मिभिरुदीप्तमपश्यं द्वीपमायतम् ॥१०॥ पश्यता च दिशो रम्या पर्वताने शिनालयः 1 प्रेषितो महदुतपताकाभिरिवानटन् ॥११॥ तपातापनयोगस्थश्चारणः श्रमणोऽन्तिक । वीसितो वीक्ष्य यं प्राप प्रागमातं परं मुम्बम् ॥१२॥ ततः पर्व समारहा विपरीस्य जिनालयम् । वन्दिता जिनचन्द्रागा कृमिमा प्रतिमा मया ॥३॥ योगस्थो योगभवरयाऽसौ वन्दितश्च मुनिर्मया । समाप्तनियमश्चाह दवाऽसीनस्तदाशिषम् ॥11॥ कुशली चारुदत्ताऽत्र कुतः स्वप्न हवागमः । प्राकृतस्य यथा पुंसः सहायरहितस्य ते ॥14॥ कुशलं नाथ ! युप्मा प्रसादादिति वादिना । नवा विस्मितचित्तेन मयारच यत सन्मुनिः ॥१६॥ प्रत्यभिज्ञा कुतो नाय तव मद्विपया च ते । अपूर्वदर्शनं मन्ये मान्यमान्यस्य पावनम् ॥१७॥ इति पृन तेनोक्त चम्पायां यस्तदा द्विपा । सेवरोऽमितगत्यात्यः कीलितो मोचितस्वया ॥१८॥ दोनोंको उठाकर सुवर्णद्वीपमें डाल देंगे ॥१०४-१०५॥ रुद्रदत्त बड़ी दुष्ट प्रकृतिका था इसलिए मेरे रोकनेपर भी उसने अपना बकरा मार डाला और विनयसे च्युत हो मेरे याराका भी अन्त कर दिया ॥१०६॥ मेरा बकरा जबतक मारा नहीं गया तबतक मैंने पहले उसके मारनेका पूर्ण प्रतिकार किया-रुद्रदत्तको मारनेसे रोका परन्तु जब मारा ही जाने लगा तब मैंने उसे पञ्च नमस्कार मन्त्र ग्रहण करा दिया ॥१०७॥ रुद्रदत्तने मृत बकरोंको भाड़ियों बनाई और एकके भीतर छुरी देकर मुझे बैठा दिया तथा दूसरीमें वह स्वयं हाथमें छुरी लेकर बैठ गया ॥१०॥ तदनन्तर भारुण्ड पक्षी पैनी चोंचोंसे दवाकर दोनों भस्त्राओंको आकाशमे ले गये। मेरी मायके एक काना भारुण्ड पक्षी ले गया था इसलिए उसने दूसरी जगह ले जाकर पृथिवीपर गिरा दी ।१०।। मैं वेगसे उस भाथड़ीको चीरकर जब बाहर निकला तो मैंने रत्नोंकी किरणों से देदीप्य- मान स्वर्गके समान एक विस्तृत द्वीप देखा ॥११०॥ उस द्वीपको सुन्दर दिशाओंको देखते हुए मैंने पर्वतके अग्रभागपर एक जिनमन्दिर देखा जो हवासे उड़ती हुई पताकाओंसे ऐसा जान पड़ता था मानो नृत्य ही कर रहा हो ॥१११|| उसी जिनमन्दिरके समीप मैंने आतापन योगसे स्थित एक चारण ऋद्धिधारी मुनिराजको देखा। उन मुनिगजको देखकर मुझे ऐसा उत्तम सुख प्राप्त हुआ जैसा कि पहले कभी प्राप्त नहीं हुआ था ॥११२॥ तदनन्तर पर्वतपर चढ़कर मैंने जिनमन्दिरको तीन प्रदक्षिणाएँ दी और श्री जिनेन्द्र भग वानकी कृत्रिम प्रतिमाओंको वन्दना की ॥११३॥ प्रतिमाओंकी वन्दनाके बाद मैंने ध्यानम लोन मुनिराजको भी मुनिभक्ति के कारण वन्दना की। जब मुनिराजका नियम समाप्त हुआ तब वे मेरे लिए आशीर्वाद देकर वहीं बैठ गये और मुझसे कहने लगे कि चारुदत्त ! कुशल तो हो ? यहाँ स्वप्नकी तरह तुम्हाराआगमन कैसे हुआ ? तुम एक साधारण पुरुपकी तरह हो तथा कोई तुम्हारा सहायक भी नहीं दिखाई देता ।।११४-११५॥ 'हे नाथ ! आपके प्रसादसे कुशल है। यह कहकर मैंने उन्हें नमस्कार किया। तदनन्तर आश्चर्यसे चकित होते हुए मैंने उन उत्तम मुनिराजसे पूछा कि हे नाथ ! आपको मेरी पहिचान कैसे हुई ? हे माननीयोके माननीय ! में तो आपके इस पवित्र दर्शनको अपूर्व ही मानता हूँ ॥११६-११७॥ इस प्रकार पूछनेपर मुनिराजने कहा कि मैं वही अमितगति नामका विद्याधर हूँ जिसे चम्पापुरी में उस समय शत्रुने कोल दिया था और तुमने १. सशस्त्रा-म०, ग० । २. दुद्भूत म० । ३. तत्र तापन-म० । ४. पुसां ग० ।

एकविंशतितमः सर्गः राज्ये संस्थाप्य मां प्राप्ये सम्यग्दर्शनमावितम् । गुगेरियकुम्मन्य समारे प्रारजन् पिता BIREE माया विजयसेना में नानाभ्यापीमनोरमा । स्यावा गान्धवमेनास्या प्रथमायाम मुना १२०० इतरस्यामम् पुनो ज्येष्टो मिइयरा युतिः । वाराहीवनानाम्यो दिनयादिगुमाकर 25 राज्य ती पौगाये च स्यारपिचा पयाम गुरोरेव गुरोरन्न प्रत्रयां प्रितवानहन् १९२२० कुम्भकएकनामापं द्वीपः सागरवेष्टितः । गिरिः काटकमदात्र मापदचागतः क्यम् ॥१२३५ इल्युफे पनिनायन्तां मुखदुःसविमिश्रिताम् । व्यंश्यमई तरने कयामध्ययनिवान 12 सदा विद्याधरो हौ तं मुनि पुत्री नमस्तलान् । अवतीय दवन्दाने वन्दनीप्रमनिन्दिनी ॥३५॥ कुमारी ! चारुदत्तोऽयं माता यो वा मोदितः । इयु मां परिपाय रियतास्वा बहुप्रियम् ॥१२॥ वास हौ विमानाप्राइवताय मुरी पुग। मां मन्य मुनि पवायचासोनी ममात Poll भरमस्य तदा हेतु संत्ररी पछुताम् । देवावृषिमविन्य प्राग्नठी पावकं कुतः 150 विदाडूमनु जिनमोरदेशकः । चारदो गुममाडादायपोरिति युज्यताम् ॥३२॥ तक्यं यमि युन् ागर्व: मुरोधमोद । यूपता मे च्या वावन् वपत मेंदरी ! म्फुटम् ॥१०॥ वारागरयों पुरागावेदव्यासनावित् । प्रायः मममममायोमिटातम्य मानी ॥३॥ तयोर्मुहितरी महा मुलमा च मुपोवने । वेदव्यानरमादीनां माया पारगे पर 11 जिसे छुड़ाया था ॥११८इस घटनाने मेरे हृदय मन्यन्दर्शनका भाव भर दिया था। कुछ समय बाद हमारे पिताने विशाल रामपर मुझे बेटाकर हिरण्यकृन्म नामक गुरुक पाम दीदारे ली ॥११॥ मेरी विजयसेना और मनोरमा नामकी दी नियों थी उनमें पहली विजयमेनाके गान्पर्वमेना नामकी पुत्री हुई और दूसरी मनोरमा सिंहयश नामका बड़ा और बागहीन नामका यौटा इस प्रकार दो पुत्र हुए। ये दोनों ही पुत्र विनय बादि गुणोंकी बान ये ॥१२०-१२। एक दिन भने शमसे पड़े पुत्रको राज्यपर और छोटे पुत्रको दुबराज पदपर आरुढ़कर भग्न पिठा रूप गुपके समीप ही दीक्षा धारण कर टीना चाम्हन! यह समुद्रमे मिश्राम इंटक नामका द्वीप है और यह कोटक नामका पर्वत है यहाँ नुन पे आये ? ॥१३॥ मुनि- राजके ऐसा कहनपर मन आदि टेकर यन्त दक मुन्दुम मिरी हो यानी ममम कथा जिमादिमी तरह उनके रिए कह मनाई ॥१२॥ मी ममय मुनिगरके दोनों उनम विद्याधर पुनि मारासे नीचे उतरकर उन वन्दनीय मुनिराजको बन्दना को उन्हें नमकार किया 11201 मुनिगइन दोनों पुत्रौंको संबोधते हुए कहा कि दे ! दिनकर पाटन न vिes यह वही तुम्हारा माई पादत्त है। मुनिगई ऐमा कनर दोनों विद्यायर मेंग थाटनकर रिय दपन कहीं हुए समीर ही दे ग ११॥ मी ममय दो देव विमान अप्रमागमे प्रा. करपट मुभ और धाद, मुनिगको नमनाकर मेरे याने ट ग 1 विद्यापनि प्रण समय म भकमा कारण पूछा कि देवा ! तुम दोनोंने मुनिगहरी छोडर मायकको पहले नमसार क्यों रिया ? देवानमा कात्र शाहिम भारदमन हम पानी की दिन पारदरा दिया है इसरि यमाग माहान गुरु या मागे? म HER नेपर जो पहले पाराव या वह देव बोरा कि विद्यारी! मुनियम यानी या पहनाई ११३॥ किसी समनारस पुगोमय, बैंद नया सारयो रहस्यको बाननेवासा दर समराम AIRTAIगता दो दमको नाम मामासान दोनों मना भोर मुटमा नाम दीपोरनपती पुत्रियाँ थी। जी हा याचा या ग्रामसमपा.

३१४ हरिवंशपुराणे कुमावेव वैराग्यात् परिव्राजकतां श्रिते । सुप्रसिद्धि गते भूमौ जिरवा वादेषु वादिनः ॥१३॥ याज्ञवल्क्य इति ख्यातः परिबाटपर्यटन् धराम् । वाराणसी तदायासीत्तजिगीषामनीपया ॥१३॥ सुलसा जल्पकालेऽस्य सावलेपा सभान्तरे । स्यां शुश्रूपाकरी जेतुरिति सगरमाहीत् ॥१३५॥ पूर्वपक्षमुपन्यस्तं तया न्यायविदा पुरः। संदूष्य याज्ञवल्क्यस्तं स स्वपक्षमतिष्पत् ॥ १३६॥ याज्ञवल्क्यो वृतो वादे सुपराजितया तया । विषयामिपलुब्धस्तां सस्मरां समरीरमत् ॥१३७॥ सुलसायाज्ञवल्क्यौ तौ जनयिस्वा शुभं शिशुम् । अश्वत्थतरुमूलस्थं कृत्वा यातौ कृपाच्युतौ ॥१३८॥ तनोत्तानशयं भद्रा दृष्ट्वाश्वत्थफलादिनम् । पिप्पलादाभिधानेन व्याहूयनमवीवृधत् ॥१३॥ पारगः सर्वशास्त्राणामेकदाऽपृच्छदित्यसौ। मातः ! किमभिधानो मे पिता जीवति वा न वा ॥१०॥ तयोक्तं ते पिता पुत्र ! याज्ञवल्क्यः कनीयसी । मम तेन जिता वादे सुलसा जननी तव ॥१४॥ जातमात्रमपत्राणं त्वां तौ पुत्र ! तयोरधः । मुक्त्वा मुक्तकृपौ पापौ यातावद्यापि जीवतः ॥१२॥ स्तनरन्यस्त्रिया: क्लेशान्मया समभिवद्धितः । कर्म पूर्व कृतं पुत्र ! पितरौ तु स्मरातुरी ॥१३॥ इत्याकर्ण्य तदा तस्याः 'कर्णदाहकरं वचः। तद्वार्ताकर्णनोत्कों लब्धवर्णो रुपा स्थितः ॥१४॥ लब्श्रवातों रुपा गरवा स जित्वा जनकं ततः । शुश्रूषां च तयोश्चके मिथ्याविनयपूर्वकम् ॥१५॥ स मातृपितृसेवास्यं पिप्पलादः स्वयं कृतम् । ऋतु प्रवत्यं तौ निन्ये समन्युप्रेन्युगोचरम् ॥१४६॥ गामिनी थी १३२॥ उन दोनों पुत्रियोंने कुमारी अवस्थामें ही वैराग्यवश परिव्राजकको दीक्षा ले ली और दोनों ही शास्त्रार्थ में अनेक वादियोंको जीतकर पृथिवीमें परम प्रसिद्धिको प्राप्त हुई ॥१३३।। किसी समय पृथिवीपर घूमता हुआ याज्ञवल्क्य नामका परिव्राजक उन्हें जीतनेको इच्छासे बनारस आया ॥१३४॥ शास्त्रार्थ के समय अहंकारसे भरी सुलसाने सभाके बीच यह प्रतिज्ञा की कि जो मुझे शास्त्रार्थमे जोतेगा मैं उसीको सेविका (स्त्री) घन जाऊँगी ।।१३५।। शास्त्रार्थ शुरू होनेपर सुलसाने न्याय विद्याके जानकार विद्वानोके आगे पूर्व पक्ष रक्खा परन्तु याज्ञवल्क्यने उसे दूपित कर अपना पक्ष स्थापित कर दिया ॥१३६॥ सुलसा शास्त्रार्थमें हार गई इसलिए उसने याज्ञवल्क्यको घर लिया-अपना पति बना लिया। याज्ञवल्क्य विपयरूपी मांसका बड़ा लोभी था तथा सुलसाको भी कामेच्छा जागृत हो उठी इसलिए दोनों मनमानी क्रीड़ा करने लगे ॥१३७।। सुलसा और याज्ञवल्क्यने एक उत्तम पुत्रको जन्म दिया परन्तु वे इतने निर्दयी निकले कि उस सद्योजात पुत्रको पीपल के वृक्षके नीचे रखकर कहीं चले गये ॥१३॥ वह पुत्र पीपलके नीचे चित्त पड़ा था तथा मुखमें पड़े हुए पीपलके फलको खा रहा था । सुलसाकी बड़ी बहिन भद्रा उसे इस दशामे देख उठा लाई और उसका पिप्पलाद नाम रखकर उसका पोपण करने लगी ॥१३॥ समय पाकर पिप्पलाद समस्त शास्त्रोंका पारगामी हो गया । एक दिन उसने भद्रासे पूछा कि मातः ! मेरे पिताका क्या नाम है ? वे जीवित हैं या नहीं ? ॥१४०॥ भद्राने कहा कि बेटा! याज्ञवल्क्य तेरा पिता है । उसने मेरी छोटी बहिन सुलसाको शास्त्रार्थमें जीत लिया था वही तेरी माता है ।।१४१॥ हे वेटा ! जब तू पैदा ही हुआ था तथा कोई तेरा रक्षक नहीं था तब तुझे एक वृक्षके नीचे छोड़कर वे दोनों दयाहीन पापी चले गये थे और आजतक जीवित हैं ॥१४२॥ मैंने दूसरी स्त्रीके स्तन पिला-पिलाकर तुझे बड़े क्लेशसे बड़ा किया है । हे पुत्र ! तूने पहले ऐसा ही कर्म किया होगा यह ठीक है परन्तु कहना पड़ेगा कि तेरे माता-पिता बड़े कामी निकले ॥१४३॥ उस समय कानाम दाह उत्पन्न करनेवाले भद्राके पूर्वोक्त वचन सुनकर विद्वान् पिप्पलादको बड़ा क्रोध आया और उसकी बात सुनकर उसके कान खड़े हो गये ।।१४४|| पता चलाकर वह अपने पिता याज्ञवल्क्य के पास गया और रोप पूर्वक उसे शास्त्रार्थमें जीतकर मूठ-मूठको विनय दिखाता हुआ माता-पिताको सेवा करने लगा ॥१४५पिप्पलाद माता-पिताके प्रति क्रोधसे भरा था इस. १ फर्णशूलकर ग. ।२ क म ।

एकविंशतितमः सर्गः ३१५ पिप्पलादस्य शिष्योऽहं जडो अन्येन वावलिः । तद्दर्शनं समागाबरकं घोरवेदनम् ॥१४॥ ततो निर्गत्य जातोऽस्मि पड्वारानजपोतकः । हुतश्च यज्ञविद्या यज्ञे पर्वतदर्शिते ।।१४८॥ सप्तमेऽपि च वारेऽहं देशे टकमकेऽभवत् । मज एव निजैः पापैः प्रेरितः प्राणिघातजैः ॥१४॥ चारुदत्तेन मे जैनो धर्मोऽदशि निरञ्जनः। दत्तः पञ्चनमस्कारो मरणे करुणावता ॥१५०॥ जातोऽहं जिनधर्मेण सौधर्म विवुधोत्तमः । चारुदत्तो गुरुस्तेन प्रथमो नमितो मया ॥५॥ इत्युचा विरते तस्मिनितरोऽपि सुरोऽब्रवीत् । श्रूयतां चारुदत्तो मे यथाऽभूद्धर्मदेशकः ॥५२॥ रसपे परिवाजा पातितः पतिताय मे । सद्धर्म वगिजेऽवोचचारुदत्तः कृपापरः ॥१५॥ मृतो गृहीतधर्मोऽहं सौधर्मेऽभवमुत्तमः । सुरस्तेन गुरुः पूर्व चारुदत्तो नतो मया ॥१५॥ पापकूप निमग्नेभ्यो धर्महस्तावलम्बनम् । ददता कः समो लोके संसारोत्तारिणा नृगाम् ॥१५५।। अक्षरस्यापि चैकस्य पदाधस्य पदस्य वा । दातारं विस्मरन् पापी किं पुनधर्मदेशिनम् ।।१५।। पूर्व कृतोपकारस्य पुंसः प्रत्युपकारतः । कृतित्वमुपकार्यस्य नान्यथेति विदो विदुः ॥१५॥ तस्कृतौ शक्तिवैकल्ये कुलीनः स कथं न यः । सद्भावं दर्शयेत्तस्मै स्वाधीनं विगतस्मयः ॥१५॥ लिए उसने मातृ-पितृ सेवा नामका एक यज्ञ स्वयं चलाया और उसे कराकर दोनोंको मृत्युके अधीन कर दिया ॥१४६॥ मैं उसी पिप्पलादका वाग्वलि नामका शिष्य था । उससे शास्त्र पढ़कर मैं जड़-विवेकहीन हो गया था और उसीके मतका समर्थन कर घोर वेदनाओंसे भरे नरकमें उत्पन्न हुआ ॥१४७॥ नरकसे निकलकर मैं छह बार वकराका वच्चा हुआ और छहों वार यज्ञ विद्याके जानने वाले लोगोने मुझे पर्वत द्वारा दिखाये हुए यज्ञमें होम दिया ॥१४८॥ सातवीं वार भी मैं प्राणिघातसे उत्पन्न हुए अपने पापोंसे प्रेरित हो टंकणक देशमे बकरा ही हुआ ॥१४६॥ उस समय दयालु चारुदत्तने मुझे पापरहित जैनधर्म दिखलाया तथा मरणकालमें पञ्च नमस्कार मन्त्र दिया ॥१५०॥ जिनधर्मके प्रभावसे.मैं सौधर्म स्वर्गमे उत्तम देव हुआ हूँ । इस प्रकार चारुदत्त मेरा साक्षात् गुरु है और इसीलिए मैंने उसे पहले नमस्कार किया है ॥१५१॥ यह कहकर जब वह देव चुप हो गया तब दूसरा देव घोला कि सुनिए चारुदत्त जिस तरह मेरा धर्मोपदेशक है वह मैं कहता हूँ ॥१५२॥ मैं पहले वणिक् था। एक परिव्राजकने मुझे रसकूपमें गिरा दिया। पीछे चलकर उसी परि- प्राजकने चारुदत्तको भी उसी रसकूपमें गिरा दिया। मेरी दशा मरणासन्न थी इसलिए चारुदत्तने वहाँ दयायुक्त होकर मुझे समीचीन धर्मका उपदेश दिया ॥१५३॥ चारुदत्तके द्वारा बताये हुए उस समीचीन धर्मको ग्रहण कर मैं मरा और मरकर सौधर्म स्वर्गमें उत्तम देव हुआ। इसतरह पारुदत्त मेरा साक्षात् गुरु है और इसीलिए मैंने उसे पहले नमस्कार किया है ॥१५४|| जो पाप- रूपी कुएँमें डूबे हुए मनुष्यों के लिए धर्मरूपी हाथका सहारा देता है तथा संसार-सागरसे पार करनेवाला है उस मनुष्यके समान संसारमें मनुष्यों के बीच दूसरा कौन है ? ॥१५॥ एक अक्षर, आधे पद अथवा एक पदको भी देनेवाले गुरुको जो भूल जाता है वह भी जब पापी है तब धर्मोपदेशके दाताको भूल जानेवाले मनुष्यका तो कहना हो क्या है ? ॥१५६॥ जिसका पहले उप. कार किया गया है ऐसे उपकार्य मनुष्यको कृतकृत्यता प्रत्युपकारसे ही होती है अन्य प्रकारसे नहीं, ऐसा विद्वान लोग जानते हैं ॥१५७॥ प्रत्युपकारकी शक्तिका अभाव होनेपर जो अहंकार 7 रहित होता हुआ अपने सपकारीके प्रति अपना शुभ अभिप्राय नहीं दिखलाता है यह कुलीन कैसे हो सकता है ? भावार्थ-प्रथम पक्ष तो यही है कि अपना उपकार करनेवाले मनुष्यका भवसर आनेपर प्रत्युपकार किया जाये । यदि कदाचित् प्रत्युपकार करनेको सामर्थ्य न हो तो १. निरते मः । २. तारणं म । ३. पदार्यस्य म ।

हरिवंशपुराणे इयुवा महत्तीमृद्धि मुनिसेचरतसिधौ । सम्प्रदश्य तदा देवी देवदेवीविमानकैः ॥१५॥ वरग्निविशोध्या भूगामाल्पविलेपनैः । भूपयित्वा ससाकारममापेतां सुभूपणैः ॥१६॥ भादेशो दीयतां स्वामिन् कर्तव्ये समुपस्थिते । चम्पा किं प्राप्यसेऽव सयो भूयसङ्गतः ॥१६॥ इत्युक्तेन मया प्रोक्तं पतं निजमास्पदम् । स्मरणानन्तरं देवी पुनरागम्यतामिति ॥१६२॥ यथादेशमिति प्रोग्य प्राञ्जलि प्रणिपत्य तौ । मुनि मां च समापुग्छय प्रयाती निदिवं निजम् ॥१६॥ अहं च मुनिमानम्य विमानेन विहायसा । खेघराम्यां सहायातः प्राविशं शिवमन्दिरम् ॥१६॥ तत्र स्वर्ग इवातिष्ठन् सुसेन सचरार्चितः । जन्मान्यदिव च प्राप्तः शृण्वन् निजयशो जनात् ॥१६५।। अन्यदा मातृपुत्रास्ते मयाऽमा सम्मधारणम् । चक्रुर्गान्धर्वसेनाण्यां कुमारी सम्प्रदश्य मे ॥१६॥ चारुदत्त ! शृणु श्रीमानेकदावधिचक्षुपम् । राजेति पृथ्वान् भता को में दुहितुरीच्यते ।।१६७॥ सोऽवोचचारुदत्तस्य गृहे गान्धर्वपण्डितः । जेताऽस्या भविता तेऽसौ कन्याया यादवः पतिः ॥१६॥ इत्याकपर्य तदा तेन राज्ञा प्रबजताऽपि च । स्थिरीकृतमिदं कार्य प्रमाणं वं ततोऽसि नः ॥१६॥ दिष्टयाभ्युपगतं तत्तु बन्धुकार्य मया ततः । धायादिपरिवाराव्या कन्येयं मे समर्पिता ॥१७॥ कन्याया भ्रातरी नानारत्नस्वर्णादिसम्पदाम् । वृती खेचरवाहिन्या सज्जो चम्पागम प्रति ॥१७॥ उपकर्ताके प्रति नम्रताका भाव अवश्य ही दिखलाना उचित है ॥१५८।। इस प्रकार कहकर उन दोनों देयोने उस समय मुनिराज तथा विद्याधरोंके समीप देव-देवियों तथा विमान आदिके द्वारा अपनी बड़ी भारी ऋद्धि दिखलाकर अग्निमें शुद्ध किये हुए वस्त्र, आभूषण, माला, विलेपन आदि से मेरा बहुत सत्कार किया तथा उत्तमोत्तम आभूषणोंसे विभूपित कर मुझसे कहा कि हे स्वामिन् ! जो भी कार्य करने योग्य हो उसके लिए आप आज्ञा दीजिए । क्या आज शीघ्र ही आपको बहुत भारी धन सम्पदाके साथ चम्पापुरी भेज दिया जाय ? ॥१५६-१६१॥ इसके उत्तरमें मैंने कहा कि इस समय आप अपने-अपने स्थानपर जाइए । जब में आपका स्मरण करूँ तब पुनः आइए ।।१६२०० देवाने 'जो आज्ञा' यह कहकर मुझे तथा मुनिराजको हाथ जोड़कर नमस्कार किया एवं मुझसे तथा मुनिराजसे पूछकर वे अपने स्वर्ग चले गये ॥१६३॥ देवोके चले जानेपर मैंने भी मुनिराज- को नमस्कार किया और विद्याधरीके साथ विमानपर बैठकर उनके शिवमन्दिर नगरमें प्रवेश किया ॥१६४॥ शिवमन्दिर नगर स्वर्गके समान जान पड़ता था मैं उसमें सुखसे रहने लगा। अनेक विद्याधर मेरी सेवा करते थे। वहाँ रहते हुए मुझे ऐसा जान पड़ता था मानो दूसरे ही जन्मको प्राप्त हुआ हूँ। वहाँ प्रत्येक मनुष्यसे मेरा यश सुनाई पड़ता था ॥१६॥ एक दिन वे दोनो कुमार अपनी माताके साथ मेरे पास आये तथा मेरे लिए कुमारी गान्धर्वसेनाको दिखाकर मेरे साथ इस प्रकार सलाह करने लगे ॥१६६॥ उन्होंने कहा कि हे चारुदत्त ! सुनो, एक समय लक्ष्मीसे सुशोभित राजा अमितगतिने भवधिज्ञानी मुनिराजसे पूछा था कि आपके दिव्यज्ञानम हमारी पुत्री गान्धर्वसेनाका स्वामी कोन दिखाई देता है ? ।।१६७।। मुनिराजने कहा था कि चारुदत्तके घर गान्धर्व विद्याका पण्डित यदुवंशी राजा आवेगा वही इस कन्याको गन्धर्वविद्यामें जीतेगा तथा वही इसका पति होगा ।।१६८।। मुनिराजके वचन सुनकर राजाने उस समय इस कार्यका निश्चय कर लिया था। यद्यपि राजा अमितगति इस समय दीक्षा लेकर मुनि हो गये हैं तथापि उस समय उन्होंने इसका पूर्ण भार आपके हो ऊपर रखनेका निश्चय किया था इसलिए हम लोगोंको आप ही प्रमाणभूत हैं ॥१६६।। इसके उत्तरमे भाग्यवश प्राप्त हुए इस भाईके कार्यको मैंने स्वीकृत कर लिया । सदरन्तर धाय आदि परिवारके साथ यह कन्या मेरे लिए सौंप दी गई ॥१७०॥ नाना रत्न तथा सुवर्णादि सम्पदासे युक्त कन्याके दोनों भाई विद्या- १ प्रजतो म० । २. के मे म० । ३. परिवाराद्या मः।

एकविंशतितमः सर्गः मित्रकार्यसमुयुक्ती मित्रदेवी मया स्मृती । स्मरणादेव सम्प्राप्ती निविहस्तौ ममान्तिकम् ॥१७॥ चारसविमानेन साकं गान्धर्वसेनया । भानीय मित्रदेवी मां भूस्या विस्मयनीयया ॥१७॥ मुव्यवस्थाप्य चम्पायामपनिधिभिः सह । नरवा देवी गती स्वर्ग खेचरी च निजास्पदम् ॥१७॥ मातुलं मातरं पत्नी यन्धुवर्ग घ सादरम् । दृष्ट्वा तुष्टमति प्राप्तं प्राप्तोऽहं मुसितां पराम् ॥१५॥ तां शुश्रूपाकरीं श्वश्रू मदणुवतसङ्गताम् । श्रुत्वा वसन्तसेनां व प्रीतः स्वीकृतवानहम् ॥१७॥ द किमिच्छकं दानं दीनानाथानितर्पणम् । विश्वस्मै यन्धुलोकाय दीयते स्म यथेप्सितम् ||१७७॥ एप यादव ! सम्बन्धः कथितस्ते मयाग्विलः । खेवरेन्द्रकुमार्या मे विभवस्य च सम्भवः ॥१७॥ यदयं रविता कन्या सवं प्राप्तोऽसि धन्यया । कृतकृत्यः कृतश्चाहं भवता यदुनन्दन ! ॥१७॥ प्रत्यासनापवर्गस्य मम स्वर्गस्तपस्विभिः । तपःस्थस्योदितश्चेतो यतिष्ये च तपस्यहम् ॥१०॥ इति गान्धर्वसेनायाः श्रुत्वा सम्बन्धमादितः । चारुदत्तस्य चोरसाई सुष्टस्तुष्टाव यादवः ॥1510 भहो चेष्टितमायस्य महोदायसमन्वितम् । अहो पुण्ययलं गण्यमनन्यपुरुषोचितम् ॥१२॥ न हि पौरुपमीर विना देवयलं तथा । ईसान् विभवान् शक्रयाः प्राप्तु समुरखेचराः ।।१३।। शुरवेति चारुदत्तीयमामीयं च विचेष्टितम् । तस्मै गान्धर्वसेनादिपर्यन्तं यादवोऽवदत् ॥१८॥ धरोंकी सेना साथ लेकर चम्पानगरीके प्रति मानेके लिए तैयार हो गये ॥१७१।। उसी समय मित्र- फा कार्य करने के लिए उद्यत दोनों मित्र देवोंका मैने स्मरण किया और मरणके बाद ही वे दोनों देव निधियाँ हाथमें लिये हुए मेरे पास आ पहुंचे ॥१७२।। वे देव, गान्धर्वसेनाके साथ मुझे सुन्दर हंस विमानमें बैठाकर आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली सम्पदा सहित चम्पानगरी ले आये। यहाँ भाकर अक्षय निधियोंके द्वारा उन्होंने मेरी सब व्यवस्था की। तदनन्तर नमस्कार कर देय स्वर्ग चले गये और दोनों विद्याधर अपने स्थानपर गये ॥१७३-१७४|| में मामा, माता, पत्नी तथा अन्य पन्धुवर्गसे बड़े आदरसे मिला, सबको बड़ा सन्तोप हुआ और मैं भी बहुत सुखी हुआ॥१७५।। 'वसन्तसेना वेश्या, अपनी मौके परसे आकर सासकी सेवा करती रही है तथा अणुप्रतासे विभूषित हो गई है' यह सुनकर मैंने वही प्रसन्नतासे उमे स्वीकृत कर लिया-अपना यना लिया ॥१७६॥ मैंने दोन तथा अनाथ मनुष्योंको सन्तुष्ट करनेवाला किमिच्छक दान दिया और समस्त फुटुम्बी जनों के लिए भी उनकी इच्छानुसार यस्तुएँ दी ॥१७७॥ इस प्रकार हे यादव ! विद्याधर पुमारीका मेरे साथ जो सम्बन्ध है तथा इस विभवको जो मुझे प्राप्ति हुई है यह सय हे यदुनन्दन ! जिनके लिए यह कन्या रखी गई थी इस भाग्यशालिनी कन्याने उन्दी तुमको नाम किया है इसलिए कहना पड़ता है कि आपने मुझे फतकृत्य किया है ॥१७॥ तपस्वियोंने बताया है कि मेरा मोक्ष निकट है और तप धारण करनेसे इस भवके बाद तुझे स्वर्ग प्राप्त होगा इसलिए अब में निश्चिन्त होकर तपके लिए ही यरन फर्कंगा ॥१८०|| इस प्रकार यमुदेष, गान्धर्यमेनाका आदिसे लेकर अन्ततक सम्बन्ध तथा पारदत्तका उत्साह मुनकर पलुन सन्तुष्ट हुए और पारदत्ती इस तरह स्तुनि करने लगे कि अहो ! आपकी चेष्टा अत्यधिक उदा. खासे सहित है, अहो ! आपका असाधारण पुण्य पल भी प्रशंसनीय है। बिना भाग्यलक ऐसा पौरप होना कठिन है और बिना भाग्ययलये साधारण मनुष्योंकी को मात ही क्या है देय मया विद्याधर भी ऐसे विभयको प्राप्त नहीं हो सकते ।।१८१-१८शा इस प्रकार पामदत्तका पृत्तान्त मुनकर पमुदेयने उसके लिए गान्धर्वसेना आदिकी प्राप्ति पर्यन्त अपना भी समरत वृत्तान्त पद मुनाया ॥१च्या मैंने आपसे कहा है ॥१७॥ 7 १. परंम..

हरिवंशपुराणे
इश्यन्योन्यस्वरूपज्ञा रूपविज्ञानसागराः । त्रिवर्गानुभवप्रीताश्चारुदत्तादयः स्थिताः ।।१८५।।
शार्दूलविक्रीडितम्
तीणार्थोऽपि पयोधिमप्यधिगतः कूपावती!ऽप्यतो
दुर्लध्येऽपि च सञ्चरन् गिरितटे द्वीपान्तरे चा पुमान् ।
लक्ष्मी धर्मसखः प्रयाति निखिला पापव्यपायाद्यत-
स्तद्धर्म जिनबोधितं बुधजनाश्चिन्वन्तु चिन्तामणिम् ॥१६॥
इति अरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती चारुदत्त चरित्रवर्णनो नाम
एकविशतितमः सर्गः ॥२१॥
इस प्रकार आपसमें एक दूसरेके स्वरूपको जाननेवाले रूप तथा विज्ञानके सागर और
त्रिवर्गके अनुभवसे प्रसन्न चारुदत्त आदि सुखसे रहने लगे ॥१८॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि
हे राजन् ! धर्मात्मा मनुष्य भले ही अत्यन्त निर्धन हो गया हो, समुद्र में भी गिर गया हो, कुएँमे
भी उतर गया हो, पर्वतके अलंध्य तटपर भी विचरण करने लगा हो और दूसरे द्वीपमें भी जा
पहुँचा हो तो भी पाप नष्ट हो जानेसे सम्पूर्ण लक्ष्मीको प्राप्त होता है इसलिए हे विद्वज्जनो!
जिनेन्द्रदेवके द्वारा प्रतिपादित धर्मरूपी चिन्तामणि रत्नका संचय करो ॥१६॥
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें चारुदत्तके
चरित्रका वर्णन करनेवाला इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥२१॥

हाविंशतितमः सर्गः चम्पायर्या रममाणस्य सह गान्धवसेनया । वसुदेवस्य सम्प्रातः फाल्गुनाष्टदिनोग्सवः ॥१॥ देवा नन्दीश्वरं द्वीपं खेचरा मन्दरादिकम् । यान्ति वन्दारवः स्थानमानन्दं दधतस्तदा ॥२॥ जन्मनिष्क्रमणज्ञाननिर्वाणप्राप्हितोऽहतः । वासुपूज्यस्य पूज्यां तो चम्पां प्रापुः स्फुरद्गृहाम् ॥३॥ भागच्छन्ति तदा कर्तुं जिनेन्द्रमहिमोत्सवम् । सर्वतः पुत्रदाराच चराश्च नमश्चराः ॥४॥ चम्पावामी जनः सर्वो निश्चक्राम सराजकः । प्रतिमा वासुपूज्यस्य पूज्यां पूजयितुं बहिः ॥५॥ रथैः केचिद्गनैः केचित् वाजियुग्यादिभिः परे । निर्यान्ति योजनाः पुर्या यानायां चिनभूपणा ॥६॥ शौरिरश्वरयारूढः सा गान्धर्वसेनया। जिनं पूजयितु पुर्या निर्यातोऽमी सपर्यया ॥७॥ भटमण्डलमध्यस्थो गम्छन् जिनगृहातः । मातङ्गकन्यकावेषां नृत्यत्कन्यां निरतत HEL भोलोम्पलदलश्यामा वृत्तोत्तुलपयोधराम् । भूपाविद्युल्लताश्लिष्टां योषां वा प्रावृपः श्रियम् ॥६॥ मुबन्धकाधरायां मुपद्मपदपाणिकाम् । पुण्डरीकाशं श्यां मूतामिव शरट्रियम् ।।१०।। प्रियं हियं धृति बुद्धिं लक्ष्मी चापि सरस्वतीम् । स्वयं जिनेन्द्रभवत्येव नृत्यन्तीमतिरूपिणीम् ॥1॥ स्थितो रमविभागेऽन गायकः सपरिग्रहः । दही पणवी चैव ददुरी कंसवादकः ॥१२॥ अथानन्तर फुमार वसुदेव चम्मापुरीमें गान्धर्वसेनाके साथ क्रीड़ा करते हुए रहते थे कि मी समय फाल्गुन मासकी अष्टाहिकाओंका महोत्सव आ पहुँचा ॥१॥ वन्दनाके प्रेमी एवं हृदय- में आनन्दको धारण करनेवाले देव नन्दीश्वर द्वीपको तथा विद्याधर मुमेरु पर्वत आदि स्थानोपर जाने लगे ॥२॥ भगवान् वासुपूज्यके गर्भ, जन्म, दीक्षा, ज्ञान और निर्वाग इन पाँच कल्याणकोंके होने से पूज्य एवं देदीप्यमान गृहसे मुशोभित धम्पापुरीमें भी देव और विद्याधर आये ॥३॥ उस समय श्री जिनेन्द्र भगवान्की पूजाका उत्सव करने के लिए भूमिगोचरी और विद्याधर राजा अपनी स्त्री तथा पुत्र आदिके साथ सर्व भोरसे वहाँ आये थे॥४॥ चम्पापुरीके रहनेवाले सबलोग भी राना को साथ ले श्री वासुपूज्य स्वामीको प्रतिमाको पूजनेके लिए नगरसे बाहर गये उस समय नाना प्रकार के भाभूपोंको धारण करनेवाली स्त्रियाँ नगरसे याहर जा रही थीं। उनमें कितनी ही हाधीपर बैठकर तथा कितनी ही घोड़े एवं बैल आदिपर बैठकर जा रही थीं ॥६॥ कुमार यमुदेय- भी गान्धर्वसेनाके साथ घोड़ाके रथपर आरूढ हो श्री जिनेन्द्र देवकी पूजा करनेफे लिए मामग्री साथ लेकर नगरीसे याहर निकले १७॥ अनेक योद्धाओंके मध्यमें जाते हुए कुमार वमुद्देयने वहाँ जिनमन्दिर के आगे मातहकन्या वेपम नृत्य करती हुई एक कन्याको देगा ॥1 पर फच्या नील कमल दल के समान श्याम थी, गोल एवं उठे हुए स्तनोंसे युक्त थी तथा बिजलीके समान हुए भाभूपगोंसे सहिन थी इसलिए हरी-भरी, ऊंचे मेघोंसे युक्त एयं घमकती दुई बिजली- युक्त वषां ऋनुकी लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी ll अथया उसके भोट पन्थको पुष्पके समान लाट ये, उसके हाथ-पैर उत्तम फमलके समान थे और नेत्र सफेद कमलके ममान थे, इसलिए यह साक्षात् मूर्निमवी शरद् ऋतुको लक्ष्मीके समान दिमाई देती यो ११०॥ भयया यह यत्री कन्या जिनेन्द्र भगवानको भक्तिम स्ययं नृत्य करती हुई भी, ही, धृति, बुद्धि, सदमी एवं सरातो देयों के समान जान पड़ती थी ॥११॥ नृत्यको रमभूमिमें गाने वाले, अपने परिफरफ साथ रियन में । मृदंग, पगय, दर, मॉम, विपत्री भोर योगा यजानेवाले पादक तथा नुत्तम चमकते मे 7 १ बिहामाः म.।२ मिनेन्द्रमनेयम ३२० हरिवंशपुराणे वैपञ्ची वैणिकश्शेष कुनुपः परिभाषितः । उसमाधममध्याभिः स्थितः प्रकृतिभियुतः ॥३॥ कुतुपेषु यथास्थानं सुप्रयुक्तं प्रयोक्तृभिः । भलातचक्रप्रतिमं गानं वाद्यं घ नाटकम् ॥१४॥ रसाभिनयभावानामभिव्यक्ति सुनत्तकी । सा कुर्वाणा रथस्थेन शौरिणैक्षि सजानिना ||१५|| रूपविज्ञानपाशेन तं बबन्धाशु सा सं ताम् । बन्धव्यबन्धकावं तावन्योन्यस्य तदापतुः ॥१६॥ ततो गान्धर्वसेनाऽभूदीाकुञ्चितलोचना । विपक्षस्य हि सानिध्यमक्षिसङ्कोचकारणम् ॥१७॥ सापायमन विनासकोपायं च चिरस्थितम् । मन्वाना सारथिं साह धन्विनो रथिनः प्रिया ||१८|| क्षिप्रमस्मात्प्रदेशात्त्वं रथं प्रेरय सारथे । शकरायलमास्वादानाददाति रसान्तरम् ॥१६॥ इत्युक्तो नोदयद्वेगात्सारथी रथमाप सः । जिनवेश्म तमास्थाप्य तो प्रविष्टौ प्रदक्षिणम् ॥२०॥ सोरेक्षुरसधारौघघृतदघ्युदकादिभिः । अभिपिच्य जिनेन्द्रार्चितां नृसुरासुरैः ॥२१॥ हरिचन्दनगन्धाढ्यैर्गन्धशाल्यसताततैः । पुष्पैर्नानाविधैरुदै पैः कालागुरूद्भवैः ॥२२॥ दीपोप्रशिखाजालेन वेद्यनिरवद्यकैः । तावानचतुरचा तामचनाविधिकोविदौ ॥२३॥ समपादौ पुरः स्थित्वा जिनार्चनकृताञ्जली । उच्चार्योपांशुपाठेन प्रागीर्यापथदण्डकम् ॥२४॥ नृत्य करने वाले कुतुप उत्तम मध्यम और जघन्य प्रकृतिके साथ युक्त थे। इनमें जो अच्छेसे-अच्छे प्रयोग दिखानेवाले थे वे यथास्थान अलातचक्रके समान-व्यवधान रहित गायन-वादन और नर्तनके प्रयोग दिखला रहे थे ॥१२-१४। इस प्रकार रस, अभिनय और भावोंको प्रकट करने वाली उस नर्तकीको प्रिया गान्धर्वसेनाके साथ रथपर बैठे हुए कुमार वसुदेवने देख। ।।१५॥ देखते ही उस नर्तकीने कुमारको और कुमारने उस नर्तकीको अपने अपने रूप तथा विज्ञानरूपी पाशसे शीघ्र ही बॉध लिया । उस समय ये दोनों ही आपसमै बन्धव्य और बन्धक दशाको प्राप्त हुए थे अर्थात् एक दूसरेको अनुराग रूपी पाशमें बाँध रहे थे ॥१६॥ यह देख गान्धर्वसेनाने अपने नेत्र ईर्ष्यासे संकुचित कर लिये सो ठीक ही है क्योंकि विरोधीका सन्निधान नेत्र संकोचका कारण होता ही है ।।१७।। 'यहाँ अधिक ठहरना हानिकर एवं भयको उत्पन्न करनेवाला है। ऐसा मानती हुई गान्धर्वसेनाने सारथिसे कहा कि हे सारथे ! तुम इस स्थानसे शीघ्र ही रथ ले चलो क्योंकि शक्कर भी अधिक सानेसे दूसरा रस नहीं देती॥१८-१६॥ गान्धर्वसेनाके ऐसा कहनेपर सारथिने स्थको वेगसे पढ़ाया और सब जिन मन्दिर जा पहुंचे। वहाँ रथको खड़ा कर वसुदेव और गान्धर्वसेनाने मन्दिर में प्रवेश किया, तीन प्रदक्षिणाएँ दी और दूध, इतुरसकी धारा, घी, दही तथा जल आदिके द्वारा मनुष्य सुर एवं असुरोंके द्वारा पूजित जिनेन्द्र देवको प्रतिमाका अभिषेक किया ॥२०-२१॥ दोनों ही पूजाको विधि अत्यन्त निपुण थे इसलिए उन्होंने हरिचन्दनकी एल्ध, धान के मुगन्धित एवं भरगण्ड चावल, नाना प्रकार के उनमोलम पुष्प, फालागुरु, चन्दनसे निर्मित उत्तम धूप, देदीप्यमान शिसाओंसे युक्त दीपक और निर्याप नैवेद्यसे जिन-प्रतिमाकी पूजा की ॥२२-२३।। पूजाके याद वे सामायिकके लिए उद्यत हुए सो प्रथम ही दोनों पैर परायर कर जिन प्रतिमाके आगे हाथ जोड़कर सड़े हो गये। तदनन्तर र्यापथ दण्डकका मन्द स्वरसे मारण कर कायोत्सर्ग करने लगे। कायोत्सर्गके द्वारा उन्होंने ईर्यापथ शुद्धि की। तत्पश्चात् - - १ नटपेटकः (ग. टि.)।२ नटपेटकेतु (ग. दि.)। ३.-मास्वाध नाददति म०। ४. उपाश हल्कायोचारणाहरण्ययोः । ५. प्रयोगविविधो हो रिशेयो नाटकामयः । ततं चैपावन च तय नारयान सः ॥२॥ तते युनापिन्यासो गायनः सपरिग्रहः । वैक्षिशे वैगिस्थ वंशयादक एव च ॥४॥ मालिश: पारिम्नया दारिको मुः । अनारियविधायेर कुनाः समुद्राहनः ॥५॥ उसमाधममध्यामिस्तय माभि:। पुनगे नाट्ययोगेन नानादेशसमाश्रयः । एवं गानं च नाट्यं च यायं न विविधाभयम् अगायनसीम पराम्प नाटपपोस्मृभिः ॥-नात्यान अध्याय २८ ।

द्वाविंशतितमः सर्गः कायोत्सर्गविधानेन शोधितर्यापथौ पथि । जैनेऽतिनिपुणौ क्षोण्यां निषण्णौ पुनरुस्थिती ॥२५॥ पुण्यपञ्चनमस्कारपदपाठपवित्रितौ। चतुरुत्तममांगल्यशरणप्रतिपादिनी ॥२६॥ द्वीपेवर्धनृतीयेपु ससप्ततिशतात्मके । धर्मक्षेत्रे त्रिकालेभ्यो जिनादिभ्यो नमोऽस्त्विति ॥२७॥ सामायिक करोमीति सर्व सावद्ययोगकम् । सम्प्रस्यास्यामि कार्य च तावदित्युज्झिताङ्गको ॥२८॥ शत्री मिन्ने सुखे दुःखे जीविते मरणेऽपि वा। समताऽलाभलाभे मे तावदिस्यन्तराशयौ ॥२६॥ सप्तप्राणप्रमाणं तु स्थित्वा कृत्वा शिरोमलिम् । इत्युदाहरतां श्रव्यं तौ चतुर्विशतिस्तवम् ॥३०॥ ऋषमाय नमस्तुभ्यमजिताय नमो नमः । शम्भवाय नमः शश्वदभिनन्दन ! ते नमः ॥३१॥ नमः सुमतिनाथाय नमः पद्मप्रभाय ते । नमः सुपाय विश्वेशे नमश्चन्द्रप्रमाहते ॥३२॥ नमस्ते पुष्पदन्ताय नमः शीतलतायिने । नमोऽस्तु श्रेयसे श्रीशे श्रेयसे शितदेहिनाम् ॥३३॥ नमोऽस्तु वासुपूज्याय सुपूज्याय जगत्त्रये । वर्तते यस्य चम्पायां नि:कम्पोऽयं महामहः ॥३४॥ विमलाय नमो नित्यमनन्ताय नमो नमः । नमो धर्मजिनेन्द्राय शान्तये शान्तये नमः ॥३५॥ नमस्ते कुन्थुनाथाय तथाऽराय नमस्त्रिया ! मल्लये शल्यमल्लाय मुनिसुनत ! वे नमः ॥३६॥ जिनेन्द्र प्रदर्शित मार्गमें भतिशय निपुणता रखनेवाले दोनों, नमस्कार करनेके लिए जमीनपर पड़ गये, फिर उठकर खड़े हुए। पञ्च नमस्कार मन्त्रके पाठसे अपने आपको उन्होंने पवित्र किया, अरहन्त, सिद्ध, साधु और केवलिप्रजप्त धर्म ये चार ही संसारमें उत्तम पदार्थ हैं, चार ही मंगल हैं और इन चारोंको शरणमें हम जाते हैं इस प्रकार उच्चारण किया । 'अढाई द्वीपके एक सौ सत्तर धर्मक्षेत्रोंमे जो तीर्थकर आदि पहले थे, वर्तमानमें हैं और आगे होंगे उन सबके लिए हमारा नमस्कार हो, यह कहकर उन्होंने निम्नांकित नियम ग्रहण किया कि हम जब तक सामायिक करते हैं नवतकके लिए समस्त सावध योग और शरीरका त्याग करते हैं-यह नियम लेकर उन्होंने शरीरसे ममत्व छोड़ दिया और शत्र-मित्र, सुख-दुःख, जीवन-मरण तथा लाभ-अलाभमें मेरे समता भाव हो ऐसा मनमें विचार किया। तदनन्तर सात श्वासोच्छास प्रमाण खड़े रहकर उन्होंने शिरोनति की और उसके बाद चौबीस तीर्थङ्करोंके सुन्दर स्तोत्रका उच्चारण किया ॥२५-३०॥ चौबीस तीर्थङ्करोंका स्तोत्र इस प्रकार था- हे ऋषभदेव ! तुम्हें नमस्कार हो, हे अजितनाथ ! तुम्हें नमस्कार हो, हे शम्भवनाथ ! तुम्हें निरन्तर नमस्कार हो, हे अभिनन्दन नाथ ! तुम्हें नमस्कार हो ॥३१॥ हे सुमतिनाथ ! तुम्हें नमस्कार दो, हे पद्मप्रभ ! तुम्हें नमस्कार हो, हे जगत्के स्वामी सुपार्श्वनाथ ! तुम्हें नमस्कार हो, हे चन्द्रप्रभ जिनेन्द्र ! तुम्हें नमस्कार हो ॥३२॥ हे पुप्पदन्त ! तुम्हें नमस्कार हो, हे शीतलनाथ ! भाप रक्षा करनेवाले हैं अतः आपको नमस्कार हो, हे श्रेयांसनाथ ! आप अनन्त चतुष्टय रूप लक्ष्मीके स्वामी है तथा आश्रित प्राणियोंका कल्याण करनेवाले हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ॥३३॥ जिनका चम्पापुरीमें यह अचल महोत्सव मनाया जा रहा है तथा जो तीनों जगत्में पूज्य हैं ऐसे वासुपूज्य भगवान के लिए नमस्कार हो ॥३४ा हे विमलनाथ ! आपको नमस्कार हो, हे अनन्तनाथ ! आपको नमस्कार हो, हे धर्मजिनेन्द्र ! आपको नमस्कार हो, हे शान्तिके करने वाले शान्तिनाथ ! आपको नमस्कार हो ॥३५॥ हे कुन्थुनाथ ! आपको नमस्कार हो, हे अरनाथ ! , आपको नमस्कार हो, हे मल्लिनाथ ! आप शल्योंको नष्ट करनेके लिए मल्लके समान हैं अतः १. निष्पन्नी म०, ग । २ 'चत्वारि मंगल-अरदन्ता मंगलं सिद्धा मंगलं साहू मंगलं केवलि- परणतो धम्मो मंगल । चत्तारि लोगुतमा-अरहन्ता लोगुत्तमा, सिदा लोगुत्तमा, साह लोगुचमा, फेवरिपएणतो घम्मो लोगुत्तमा । चत्तारि सरणं पपजामि अरहन्ते सरणं पवनामि, मिद्धे सरणं पन्जामि, साहू सरण पाग्जामि, केवलिपण्ण धम्म मरणं पान्जामि । ३ विश्वस्य ईट पिसेट तस्मै । ४. प्रिया इंट धीट् तस्मै ।

३२२ हरिवंशपुराणे नमोऽस्तु नमिनायाय नतत्रिभुवनेशिने । यस्येदं वर्तते तीर्थ साम्प्रतं भरतावनी ॥३७॥ भरिष्टनेमिनाथाय भविष्यतीर्थकारिणे । हरिवंशमहाकाशशशाङ्काय नमो नमः ॥३॥ नमः पाश्वजिनेन्द्राय श्रीवीराय नमोऽस्तु ते । सर्वतीर्थराणां च गणेन्देन्यो नमः सदा ॥३६॥ कृत्रिमाकृत्रिमेभ्यश्च सदनेभ्योऽहंतां नमः । भुवनग्रयवर्तिम्यः प्रतिबिम्बेग्य एव च ॥१०॥ इत्थं कृत्वा स्तवं भवाया तो प्रहृष्टतनूरुहो । प्रणेमतुः शिरोजानुकरस्पृष्टधरातली ॥४॥ पूर्ववरपुनरुत्थाय कायोत्सर्जनयोगतः । पुण्यं पञ्चगुरुस्तोत्रमुदचीचरतामिति ॥४२॥ महन्द्रयः सर्वदा सर्वसिद्धेभ्यः सर्वभूमिपु । आचार्यम्य उपाध्यायसाधुभ्यश्च नमो नमः ॥४३॥ परीस्य जिष्णुधिष्ण्यं तो रथमारुह्य हारिणौ । प्रविष्टौ दम्पती चम्पा सम्पदा परया ततः ॥४४॥ नर्तकीप्रेक्षणचिप्तचक्षुरिशितलषितः । स तां प्रणाममात्रेण मानिनीमनयदशम् ॥४५॥ विपक्षप्रेक्षणासक्तिसापराधेऽपि मतरि । स्त्रीणां प्रणयकोपस्य प्रणामो हि निवर्तकः ॥१६॥ अथ विद्याधरी वृद्धा वृद्धा विद्येव रूपिणी । तरकन्ययान्यदोरसृष्टा ग्रिपुण्ड्रकृतमण्डना ॥४७॥ एकान्ते सुस्थित हाये कथञ्चिञ्चित्तहारिणी । दत्ताशीः शौरिमा हेवमासीमा सन्मुखासने ॥४॥ पुराणवस्तुनो वीर ! विस्तरस्तव चेतसि । शुद्धादर्शतले यद्वद् यद्यपि प्रतिभासते ॥४॥ आपको नमस्कार हो, हे मुनिसुव्रतनाथ ! आपको नमस्कार हो ॥३६॥ जिन्हें तीन लोकके स्वार्म सदा नमस्कार करते हैं और इस समय भरत क्षेत्रमें जिनका तीर्थ चल रहा है उन नमिनाथ भगवान के लिए नमस्कार हो ॥३७॥ जो आगे तीर्थङ्कर होनेवाले हैं तथा जो हरिवंशरूपी महान आकाशमै चन्द्रमाके समान सुशोभित होगे उन अरिष्टिनेमिको नमस्कार हो॥३८॥श्रीपार्श्वजिनेन्द्र के लिए नमस्कार हो, श्रीवर्धमान स्वामीको नमस्कार हो, समस्त तीर्थङ्करोंके गणधरोंको नमस्कार हो, श्रीभरहन्त भगवान्के त्रिलोकवर्ती कृत्रिम अकृत्रिम मन्दिरों तथा प्रतिबिम्बोंके लिए नमस्कार हो ॥३६-४०॥ इस प्रकार स्तवनकर भक्तिके कारण जिनके शरीरमें रोमाश्च उठ रहे थे ऐसे कुमार वसुदेव तथा गान्धर्वसेनाने मस्तक, घुटने तथा हाथोंसे पृथिवीतल्का स्पर्श करते हुए प्रणाम किया ॥४१॥ तदनन्तर पहलेके समान खड़े होकर कायोत्सर्ग किया और पुण्यवर्धक पञ्च नमस्कार मन्त्रका उच्चारण किया ॥४२॥ पञ्च नमस्कार मन्त्र पढ़ते हुए उन्होंने कहा कि अरहन्तों को सदा नमस्कार हो, समस्त सिद्धोंको नमस्कार हो, और समस्त पृथिवीमें जो आचार्य, उपा. ध्याय तथा साधु हैं उन सबके लिए नमस्कार हो ॥४३॥ अन्तमे जिन-मन्दिरकी प्रदक्षिणा देकर सुन्दर शरीरके धारक दोनों दम्पति रथपर सवार हो बड़े वैभवके साथ चम्पापुरी में प्रविष्ट हुए ॥४४॥ नृत्यकारिणीको देखते समय कुमार वसुदेवके नेत्रों में जो विकार हुआ था वह गान्धर्व सेनाको टिम आ गया था इसलिए वह उनसे मान करने लगी थी परन्तु कुमारने प्रणामकर उसे वश कर लिया ॥४५।। सो ठीक ही है क्योंकि सपत्नीके देखनेमें आसक्ति होनेसे पतिके सापराध होनेपर भी हाथ जोड़कर किया हुआ नमस्कार स्त्रियोके मानको दूर कर देता है ॥४६॥ अथानन्तर किसी समय कुमार वसुदेव महलके एकान्त स्थानमें अच्छी तरह बैठे थे कि उस नृत्य करनेवाली कन्याके द्वारा भेजी हुई एक वृद्ध विद्याधरी उनके पास आई। वह वृद्धा त्रिपुण्डाकार तिलकसे सुशोभित थी, कुमार वसुदेवके चित्तको हरनेवाली थी, और मूर्तिमती वार्धक्य विद्याके समान जान पड़ती थी । उसने आते ही कुमारको आशीर्वाद दिया और सामने के आसनपर बैठकर कुमारसे इस प्रकार कहना शुरू किया ॥४७-४८॥ हे वीर! यद्यपि भापके हृदयमें शुद्ध दर्पगतलके समान पुराणोका विस्तार प्रतिभासित हो रहा है तथापि में विद्याधरोंसे १. नमस्त्रिभुवने सदा ख०, ग, घ, ड० । नमितस्त्रिभुवने सदा म०१२. -मुंदरीरचतामिति म०। ३. जिनग्रहम् । ४. वमुदेवम् ।

द्वाविंशतितमः सर्गः तथाप्यनूद्यने वस्तु मया विद्याधरश्रितम् । 'रोचिपौषधिनाथस्य स्पृष्टं किं नौषधिः स्पृशेत् ॥५०॥ प्रदर्शितजगजीव्यो युगाद्यो वृषभेश्वरः । भरतेश्वरविन्यस्तराज्योऽसौ प्रावजद् यदा ॥५॥ राजत्रोमभोजाद्यास्तदा तत्तपसि स्थिताः । चतुःसहस्रसढया ये प्राग्भग्नाश्च परोपहैः ॥५२॥ तेषां मध्ये तु यौ भग्नौ नमिर्विनमिरित्युभौ । भ्रातरौ पादयोलग्नौ भतुस्तस्थतुरर्थिनौ ॥५३॥ धरणेन शरण्येन निर्गत्य धरणः सह । दित्यदित्यभिधानाभ्यां देवीभ्यामागतेन तौ ॥५४॥ आश्वास्य जिनभक्तेन विद्याकोशो जिनान्तिके । ताम्यां प्रदापितस्तेन स्वदेवीभ्यां महात्मना ॥५५॥ विद्यानामदितिस्त्वष्टौ निकायान् प्रददौ तदा । गान्धर्वसेनकश्चासौ विद्याकोशः प्रकाशितः ॥५६॥ मनुश्च मानवस्तत्र निकायः कौशिकस्तदा । गौरिकश्चैव गान्धारो भूमितुण्डश्न खण्डितः ॥५७॥ निकायौ चापरौ स्यातौ मूलवीर्यकशङ्कुकौ । ते चार्यादिस्यगन्धर्वास्तथा व्योमचराः स्मृता ॥५॥ दित्या चाष्टौ निकायास्ते वितीर्णाः पन्नगाभिधाः । मातगः पाण्डकः कालः स्वपाकः पर्वतोऽपि च ॥५६॥ वंशालयः पांशुमूलो वृतमूलस्तथाष्टमः । दैत्यपन्नगमातङ्गनामतः परिभाषिताः ॥६॥ पोदशानां निकायानामिमा विद्याः प्रकीर्तिताः । सर्वविद्याप्रधानत्वं याः प्रप व्यवस्थिताः॥६॥ प्रज्ञसी रोहिणी विद्या विद्या चाङ्गारिणीरिता । महागौरी च गौरी च सर्वविद्याप्रकर्षिणी ॥२॥ महाश्वेताऽपि मायूरी हारी निर्वज्ञशाड्वला ! सा तिरस्करिणी विद्या छायासक्रामिणी परा ॥६३॥ कूष्माण्डगणमाता च सर्वविद्याविराजिता ! आर्यकूष्माण्डदेवी च देवदेवी नमस्कृता ॥६॥ सम्बन्ध रखनेवाली एक यात आपसे कहती हूँ और यह उचित भी है क्योंकि ओपधियोंका नाथ-चन्द्रमा अपनी किरणोंसे जिसका स्पर्श कर चुकता है क्या सामान्य ओपधि उसका स्पर्श नहीं कर सकती ? अर्थात् अवश्य कर सकती है ? भावार्थ बड़े पुरुष जिस वस्तुको जानते हैं - उसे छोटे पुरुष भी जान सकते हैं ॥४-५०॥ जिस समय जगत्को आजीविकाका उपाय बतलाने वाले, युगके आदिपुरुप भगवान् घृपभदेव भरतेश्वरके लिए राज्य देकर दीक्षित हुए थे उस समय उनके साथ उपवंशीय, भोजवंशीय आदि चार हजार क्षत्रिय राजा भो तपमें स्थित हुए थे परन्तु पीछे चलकर वे परीपहांसे भ्रष्ट हो गये। उन भ्रष्ट राजाओंमें नमि और विनमि ये दो भाई भी थे । ये दोनो राज्यको इच्छा रखते थे इसलिए भगवान्के चरणाम लगकर वहीं बैठ गये ॥५१-५३।। उसी समय रक्षा करने में निपुण जिन-भक्त धरणेन्द्रने अनेक धरणों-देवविशेषों और दिति तथा अदिति नामक अपनी देवियोंके साथ आकर नमि, विनमिको आश्वासन दिया और अपनी देवियोंसे उस महात्माने वहीं जिनेन्द्र भगवान्के समीप उन दोनोके लिए विद्याकोश-विद्याका भाण्डार दिलाया ॥५४-५५॥ अदिति देवीने उन्हें विद्याओंके आठ निकाय दिये तथा गान्धर्व सेनक नामका विद्याकोश बतलाया ॥५६ विद्याओंके आठ निकाय इस प्रकार थे-१ मनु, २ मानव, ३ कौशिक, ४ गौरिक, ५ गान्धार, ६ भूमितुण्ड, ७ मूलवीर्यक और ८ शङ्कुक । ये निकाय आर्य, आदित्य, गन्धर्व तथा व्योमचर भी कहलाते हैं ।।५७-५८॥ धरणेन्द्रकी दूसरी देवी दितिने भी उन्हें ? मातङ्ग, २ पाण्डुक, ३ काल, ४ स्वपाक, ५ पर्वत, ६ वंशालय, ७ पांशुमूल और च वृक्षमूल ये आठ निकाय दिये। ये निकाय दैत्य, पन्नग और मातङ्ग नामसे कहे जात हैं ।।५६-६०॥ इन सोलह निकायोंको नीचे लिखो विद्याएँ कही गई हैं जो समस्त विद्यानाम प्रधानताको प्राप्त कर स्थित हैं ॥६१॥ प्राप्ति, रोहिणी, अङ्गारिणी, महागौरी, गौरी, सर्वविद्या- प्रकर्पिणी, महाश्वेता, मायूरी, हारी, निवज्ञशाइवला, तिरस्करिणी, छायासंकामिणी, कूप्माण्ड गण- माना, सर्वविद्याविराजिता, आर्य कूष्माण्डदेवी, अच्युता, आर्यवती, गान्धारी, निर्वृति, दण्डाध्यक्ष- १. ओपधिनायस्य चन्द्रस्य रोचिषा कान्मा स्पृष्टमिति सम्बन्धः। शोचिषौषधिनायस्य स०, ग०, १०, १० १२. जीवो ग०, ड०१३ सर्वविद्यापकर्पियो म । ४ तिरस्कारिणी म ।

हरिवंशपुराणे नमोऽस्तु नमिनाथाय नतत्रिभुवनेशिने । यस्येदं वर्तते तीर्थ साम्प्रतं भरतावनी ॥३॥ भरिष्टनेमिनायाय भविष्यतीर्थकारिणे । हरिवंशमहाकाशशशाक्षाय नमो नमः ॥३८ नमः पाच जिनेन्द्राय श्रीधीराय नमोऽस्तु ते । सर्वतीर्थराणां च गणेन्द्रेभ्यो नमः सदा ॥३३॥ कृत्रिमाकृनिमेभ्यश्च सदनेभ्योऽहतां नमः । भुवनप्रयवर्तिभ्यः प्रतिबिम्बेश्य एव च ॥४०॥ इस्यं कृत्वा स्तवं भक्त्या तौ प्रहृष्टतनूरुहो । प्रणेमतुः शिरोजानुकरस्पृष्टधरातली ॥४sti पूर्ववत्पुनरूयाय कायोत्सर्जनयोगतः । पुण्यं पञ्चगुरुस्तोत्रमुदचीचरतामिति ॥४२॥ भहयः सर्वदा सर्वसिद्धेभ्यः सर्वभूमिपु । भाचार्यम्य उपाध्यायसाधुभ्यश्च नमो नमः ॥४३॥ परीत्य जिष्णुधिष्ण्यं तो रथमारुह्य हारिणौ । प्रविष्टौ दम्पती चम्पां सम्पदा परया ततः ॥४॥ नतंकीप्रेक्षणचितचक्षुरिहितलपितः । स तां प्रणाममात्रेण मानिनीमनयदशम् ॥४५ विपक्षप्रेक्षणासक्तिसापराधेऽपि भत्तरि । स्त्रीणां प्रणयकोपस्य प्रणामो हि निवर्तकः ॥४६॥ अथ विद्याधरी वृद्धा वृद्धा विद्येव रूपिणी । तत्कन्ययान्यदोरसृष्टा त्रिपुण्ड्रकृतमण्डना ॥४७॥ एकान्ते सुस्थितं हाये कथञ्चिञ्चित्तहारिणी । दत्ताशीः शौरिमाहेवमासीना सन्मुखासने ॥४॥ पुराणवस्तुनो वीर ! विस्तरस्तव चेतसि । शुद्धादर्शतले यद् यद्यपि प्रतिभासते ॥४॥ आपको नमस्कार हो, हे मुनिसुव्रतनाथ ! आपको नमस्कार हो ॥३६॥ जिन्हें तीन लोकके स्वाम सदा नमस्कार करते हैं और इस समय भरत क्षेत्रमें जिनका तीर्थ चल रहा है उन नमिनार भगवान के लिए नमस्कार हो ॥३७॥ जो आगे तीर्थकर होनेवाले हैं तथा जो हरिवंशरूपी महार आकाशमे चन्द्रमाके समान सुशोभित होगे उन अरिष्टिनेमिको नमस्कार हो।।३८॥श्रीपार्श्वजिनेन्द्र के लिए नमस्कार हो, श्रीवर्धमान स्वामीको नमस्कार हो, समस्त तीर्थङ्करीके गणधरोंको नमस्का हो, श्रीअरहन्त भगवान के त्रिलोकवर्ती कृत्रिम अकृत्रिम मन्दिरों तथा प्रतिबिम्बोंके लिए नमस्का हो ॥३६-४०॥ इस प्रकार स्तवनकर भक्तिके कारण जिनके शरीरमें रोमाञ्च उठ रहे थे ऐसे कुमार वसुदेव तथा गान्धर्वसेनाने मस्तक, घुटने तथा हाथोंसे पृथिवीतर का स्पर्श करते हुए प्रणाम किया ॥४१॥ तदनन्तर पहलेके समान खड़े होकर कायोत्सर्ग किया और पुण्यवर्धक पञ्च नमस्कार मन्त्रका उच्चारण किया ॥४२॥ पञ्च नमस्कार मन्त्र पढ़ते हुए उन्होंने कहा कि अरहन्ती को सदा नमस्कार हो, समस्त सिद्धोको नमस्कार हो, और समस्त पृथिवीमें जो आचार्य, उपा- ध्याय तथा साधु हैं उन सबके लिए नमस्कार हो ॥४३॥ अन्तमे जिन-मन्दिरको प्रदक्षिणा देकर सुन्दर शरीरके धारक दोनों दम्पति रथपर सवार हो बड़े वैभवके साथ चम्पापुरीमें प्रविष्ट हुए ॥४४॥ नृत्यकारिणीको देखते समय कुमार वसुदेवके नेत्रों में जो विकार हुआ था वह गान्धर्व- सेनाकी दृष्टि में आ गया था इसलिए वह उनसे मान करने लगी थी परन्तु कुमारने प्रणामकर उसे वश कर लिया ॥४५॥ सो ठीक हो है क्योंकि सपत्नीके देखनेमें आसक्ति होनेसे पतिके सापराध होनेपर भी हाथ जोड़कर किया हुआ नमस्कार स्त्रियोंके मानको दूर कर देता है ॥४६॥ अथानन्तर किसी समय कुमार वसुदेव महलके एकान्त स्थानमें अच्छी तरह बैठे थे कि उस नृत्य करनेवाली कन्याके द्वारा भेजी हुई एक वृद्ध विद्याधरी उनके पास आई। वह वृद्धा त्रिपुण्डाकार तिलकसे सुशोभित थी, कुमार वसुदेव के चित्तको हरनेवाली थी, और मूर्तिमती वार्धक्य विद्याके समान जान पड़ती थी। उसने आते ही कुमारको आशीर्वाद दिया और सामने के आसनपर बैठकर कुमारसे इस प्रकार कहना शुरू किया ॥४७-४८|| हे वीर ! यद्यपि आपके हृदयमें शुद्ध दर्पणतलके समान पुराणोका विस्तार प्रतिभासित हो रहा है तथापि मैं विद्याधरोंसे । १ नमस्त्रिभुवने सदा ख०, ग०, ३०, ३. नमितस्त्रिभुवने सदा म० १२. -सुदरीरचतामिति म० । ३. जिनगृहम् । ४. वमुदेवम् ।

हाविंशतितमः सर्गः
३२५
आदित्यनगरं रम्यं पुरं गगनवल्लभम् । पुरी चमरचम्पा च पुरं गगनमण्डलम् ॥५॥
विजयं वैजयन्तं च शत्रुञ्जयमरिक्षयम् । पद्मालं केतुमालं च रुद्राश्वं च धनञ्जयम् ॥८६॥
वस्वीकं मारनिवहं जयन्तमपराजितम् । वराहं हस्तिनं सिंह सोकरं हस्तिनायकम् ॥८॥
पाण्डुकं कौशिकं वारं गौरिकं मानव मनुः । चम्पा काचनमैशानं मणिवत्रं जयावहम् ॥८॥
नैमिषं हास्तिविनयं खण्डिका मणिकाञ्चनम् । अशोकं वेणुमानन्दं नन्दन श्रीनिकेतनम् ॥६
अग्निवाल महाज्वालं माश्यं तत्पुरनन्दिनी । विद्युत्प्रभ महेन्द्रं च विमलं गन्धमादनम् ॥१०॥
महापुरं पुष्पमालं मेघमालं शशिप्रभम् । चूडामगि पुष्पचूदं हंसगर्भ वलाहकम् ॥६॥
वंशालयं सौमनसं तथैव परिकीर्तितम् । विजयार्घोत्तरश्रेण्यां पटिरिष्टा इमाः पुरः ॥१२॥
रयनूपुरमानन्दं चक्रयालमरिक्षयम् । मण्डितं बहुकेत्वात्यं नगरं शकटामुखम् ॥१३॥
पुरं गन्धसमृद्धं च नगरं शिवमन्दिरम् । वैजयन्त रयपुरं श्रीपुरं रनसजयम् ॥६॥
भागढं मानवं सूर्य स्वर्णनाभं शतहदम् । अहावत जलावतं तयावतं वृहद्गृहम् ॥१५॥
राहवनं च नामान्तं मेघाट मणिप्रभम् । कुभरावर्तनगरं तथैवासितपर्वतम् ॥६६॥
सिन्धुकर महाक मुकक्षं चन्द्रपर्वतम् । श्रीमूटं गीरिकूटं च लचमोफूट धरावरम् ॥२७॥
कालकेशपुरं रम्यं पार्वतेयं हिमायम् । किनरोद्गीतनगरं नमस्तिलकनामकम् MEER
मगधामार नलका पांशुमूल पर तथा । दिप्योरयं चाकमूलं तथैवोदयपर्वतम् ॥u
विख्यातामृनधारं च मातङ्गपुरमेव च । भूमिकुण्डलफूटं च जम्यूशष्टुपुरं परम् ॥१०॥
श्रेण्यां तु दक्षिणस्यां हि पुराण्येतानि पर्वते । शोभया स्वर्गदत्यानि पचाराचैव संप्यया ॥१०॥
पुरेपु तेषु च स्तम्भारतविकायारययाऽहिताः । ऋषमाधीश नागेशदित्यदिग्यचंयाविनाः ॥१०२॥
-इत्तर भागमें साठ हैं और दक्षिण भागमें पचास हैं ॥४॥ १ आदित्यनगर, २ गगनवल्लभ,
२ चमचम्पा, ४ गगनमण्डल, ५ विजय, ६ वैजयन्त, ७ शत्रुजय, ८ अरिचय, ६ पद्माल,
१० केतुमाल, ११ रद्राश्य, १२ धनजय, १३ वस्वीक, १४ सारनियह, १५ जयन्त, १६ अप-
राजित, १७ वराह, २८ हास्तिन, १६ सिंह, २० सोकर, २१ हस्तिनायक, २२ पाण्डुक, २३ कौशिक,
२४ वीर, २५ गौरिक, २६ मानव, २७ मनु, २८ चम्पा, २६ काश्चन, ३० ऐशान, ३१ मणिबज,
३२ जयावह, ३३ नैमिप, ३४ हास्तिविजय, ३५ सण्डिका, ३६ मणिकाञ्चन, ३७ अशोक, ३८ वेशु,
२९ भानन्द, ४० नन्दन, ४१ श्रीनिकेतन, ४२ अग्निञ्चाल, ४३ महावाल, ४४ माल्य, ४५ पुरु,
४६, नन्दिनी, ४७ विद्युत्नभ, ४८ महेन्द्र, ४६ विमल, ५० गन्धमादन, ५१ महापुर, ५२ पुष्पमाल,
१३ मेघमाल, ५४ शशिप्रभ, ५५ चूडामणि, ५६ पुष्पचूद, ५७ हंसगर्भ,५८ वलाइफ, ५६ वंशालय,
और ६० सौमनस-ये मानगरियाँ विजयाको उत्तर श्रेणी में है ॥८५-६२॥ और १ रथनूपुर,
२ आनन्द, ३ पक्रवाल, ४ अरिचय, ५ मण्डित, ६ बहुकेतु, ७ शकटामुग्य, गन्धसमृद्ध,
शिवमन्दिर, १० वैजयन्त, ११ रथपुर, १२ श्रीपुर, १३ रत्नसंचय, १४ थापाद, १५ मानस,
१६ मूर्यपुर, १७ स्वर्णनाभ, १८ शहद, १६ अगावत, २० जलावर्त, २१ भायर्तपुर, २२ वृहद्गृह,
२३ रामवन, २४ नामान्त, २५ मेघफूट, २६ मणिप्रभ, २७ कुञ्जयत, असितपर्यन, सिन्धु.
कन, ३० महामन, ३१ मुकश, ३२ घन्द्रपर्वत,३३ श्रीस्ट, २४ गौरिफूट,३५ लदमीफूट, ३६ धरा.
र, ३७ फाटशपुर, ३ रम्यपुर, ३६ दिमपुर, ४० किन्नरोद्गीतनगर, ४१ नमस्तिलक,
स्टमातंगपुर, १६ भूमिकुण्डल तथा ४० जम्यूशंकुपुर ये पचास नगरिया विजयाधको दक्षिण
भेजीमें हैं। ये सभी नगरियाँ शोभा व तुल्य जान पड़ती है ।।६३-२०१॥ न नगरिया
विद्यापर निकायों के नामसे युक्त तथा भगवान् पृषभदेव, धरणेन्द्र भौर एमकी दिवि-अधिनि
देवियांची प्रतिमाओंसे सहित अनेक स्तम्भ सदे किये गये हैं ॥१२॥

३२४ हरिवंशपुराणे 'भच्युतार्यवती चाऽपि गान्धारी नितिः परा । दण्डायक्षगणश्चापि दग्दभूतसहस्रकम् ॥६५॥ भद्रकाली महाकाली काली कालमुसी तथा । एवमाद्याः समाग्याता विद्या विद्याधरेशिनाम् ॥१॥ एकपर्वा द्विपळ घनिपर्वा दशपर्यिका । शतपर्वा सहसारया लक्षपर्वाधलक्षिता ॥६॥ उत्पातिन्यश्च ताः सर्वानिपातिन्यस्तथापि च । धारिण्यन्तविधारिण्यो जलाग्निगतिदपिणा ॥६॥ निःशेषेषु निकायेपु नानाशक्तिसमन्विताः । नानानगनिवासिन्यो नानीपधिविदस्तथा ॥६६॥ सर्वार्थसिद्धा सिद्धार्या जयन्ती मनाला जया । सङ्ग्रामिण्यः प्रहाराणामशय्याराधनी तथा us on विशत्यकारिणी चैव प्रगसंरोहिणी तथा । सवर्णकारिणी चैव मृतसञ्जीवनी परा ॥1॥ सर्वाः परमकल्याण्यः सर्वा मन्त्रपरिष्कृताः । सर्वविद्यायलयुक्ताः सर्वरोकहितावहाः ॥७२॥ सवाः पठितविद्यास्ता विद्या दिव्योपधिस्नया । धरणो नमये तम्मै ददी विनमयेऽप्यसौ ॥७३॥ धरणेन्द्रवितीणे च विजयाधे धराधरे । नमिदक्षिणभागेऽस्यायुत्तरे विनमिस्तथा ॥७॥ नानाजनपदोपेतो मित्रवान्धवसंस्तुनो । मुग्न तस्थतुरीि सी घेण्योरुभयोरुमौ ॥७५।। भोपाश्चापि विद्याश्च सर्वेभ्यो ददतुश्च तो । विद्यानिकायसंज्ञाभिः स्याताः विद्याधराश्च ते ७६॥ गौरीणां गौरिका वेद्या मनूना मनुनामकाः । गान्धारीणां च गान्धारा मानवीनां च मानवाः १७७॥ कौशिकीनां च विद्यानां वेद्याः कौशिकनामकाः । भूमितुण्डकविद्यायां भूमिनुण्डाः प्रभाषिताः ॥७॥ तथैव मूलवीर्यास्तु मूलवीर्यकखेचराः । राङ्गुकानां च विद्यानां शाकाः रोचराः स्मृताः ॥७९॥ विद्यानां पाण्डुकीनां च पाण्डुकेयाः प्रमापिताः । कालाः कालकविद्यानां स्वपाकानां स्वपाकजाः ॥३०॥ मातीनां च विद्यानां मातना नामतो मताः । पर्वतानां च विधान पार्वतेयाः स्वचारिणः ॥८॥ वंशालयानो विद्यानां वंशालयगणः स्मृतः । पांशुमूलकविद्यानां विज्ञेयाः पांशुमूलिकाः ॥२॥ विद्यानां वृषमूलानां खेचरा वामूलिकाः । एवं ते क्रमशः प्रोक्ता निकायानां खचारिणः ॥३॥ दशोत्तरशतं तेषां नगराणि खगामिनाम् । पष्टिरुत्तरभागे स्युः पञ्चाशहतिणे पुनः ॥१४॥ गण, दण्डभूतसहस्रक, भद्रकाली, महाकाली, काली और कालमुखी-इन्हें आदि लेकर विद्याधर राजाओंकी अनेक विद्याएँ कही गई हैं ।।६२-६६॥ इनके सिवाय एकपर्वा, द्विपळ, विपर्वा, दश- पर्वा, शतपर्या, सहस्रपा, लक्षपर्वा, उत्पातिनी, त्रिपातिनी, धारिणी, अन्तर्विचारिणी, जलगति और अग्निगति ये विद्याएँ समस्त निकायोंमें नाना प्रकारकी शक्तियोसे सहित हैं, नाना पर्वतोपर निवास करनेवाली हैं एवं नाना ओषधियोंकी जानकार हैं ॥६७-६६॥ सर्वार्थसिद्धा, सिद्धार्था, जयन्ती, मङ्गला, जया, प्रहारसंक्रामिणो, अशय्याराधिनी, विशल्याकारिणी, व्रणरोहिणी, सवर्ण- कारिणी और मृतसंजीवनी-ये सभी विद्याएँ परम कल्याण रूप हैं, सभी मन्त्रोंसे परिष्कृत हैं, सभी विद्यायलसे युक्त हैं, सभी लोगों का हित करनेवाली हैं। ये पर कही हुई समस्त विद्याएँ तथा दिव्य ओपधियाँ धरणेन्द्र ने नमि और विनमिको दी ॥७०-७३॥ धरणेन्द्रके द्वारा दिये हुए विजया पर्वतको दक्षिण श्रेगिमे नमि रहता था और उत्तर श्रेणिमें विनमि निवास करता था ॥४॥ नाना देशवासियोसे सहित एवं मित्र तथा बन्धुजनोंसे परिचित दोनो वीर विजया की दोनों श्रेणियोंमे सुखसे निवास करने लगे ।।७। इन दोनोने सब लोगोंको अनेक ओपधियाँ तथा विद्याएँ दी थी इसलिए वे विद्याधर उन्हीं विद्या निकायोंके नामसे प्रसिद्ध हो गये ।।७६॥ जैसे गौरी विद्यासे गौरिक, मनुसे मनु, गान्धारीसे मान्धार, मानव से मानव, कौशिकीसे कौशिक, भूमितुण्डकसे भूमितुण्ड, मूलवीर्यसे मूलवीयक, शङ्खकसे शङ्खक, पाण्डुकीसे पाण्डुकेय, कालकसे काल, श्वपाकसे श्वपाकज, मातङ्गीसे मातङ्ग,पर्वतसे पार्वतेय, वंशालयसे वंशालय गण, पांशुमूलसे पांशुमूलिक और वृक्षमूलसे वार्शमूल-इस प्रकार विद्यानिकायोसे सिद्ध होनेवाले विद्याधरीका क्रमसे उल्लेख किया ॥७७-८३॥ विद्याधरीकी कुल नगरियाँ एक सौ दश हैं उनमें १. अच्युतार्जवती ग० । २. अशब्दाराधिनी ख० ।

द्वाविंशतितमः सर्गः ३२५ भादिस्यनगरं रम्यं पुरं गगनवल्लभम् । पुरी चमरचम्पा च पुरं गगनमण्डलम् ॥५॥ विजयं वैजयन्तं च शत्रुञ्जयमरिक्षयम् । पद्मालं केतुमालं च रुद्राश्वं च धनञ्जयम् ॥२६॥ धस्वीकं सारनिवहं जयन्तमपराजितम् । वराह हस्तिनं सिंह सोकर हस्तिनायकम् ॥८७॥ पाण्डुक कौशिकं वारं गौरिक मानवं मनुः । चम्पा काञ्चनमैशानं मणिवत्रं जयावहम् ॥८॥ नैमिषं हास्तिविनयं खण्डिका मणिकाञ्चनम् । अशोकं वेणुमानन्दं नन्दनं श्रीनिकेतनम् Han अग्निज्वालं महाज्वालं माल्यं तत्पुरनन्दिनी । विद्युत्प्रभ महेन्द्रं च विमलं गन्धमादनम् ॥१०॥ महापुरं पुष्पमाल मेघमालं शशिप्रभम् । चूडामगि पुष्पचूढं हमगर्भ वलाहरुम् ॥६॥ वंशालयं सौमनसं तथैव परिकीर्तितम् । विजयात्तिरश्रेण्यां पष्टिरिष्टा इमाः पुरः ॥१२॥ रथनूपुरमानन्दं चक्रयालमरिक्षयम् । मण्डितं बहुवेवास्यं नगरं शकटामुखम् ॥३३॥ पुरं गन्धसमृद्धं च नगरं शिवमन्दिरम् । वैजयन्त रथपुरं श्रीपुरं रस्मसक्यम् ॥६॥ भाषाढं मानवं सूर्य स्वर्णनाभं शतहदम् । अङ्गावत जलावतं तथावत्तं वृहद्गृहम् ॥१५॥ राक्षवत्रं च नाभान्तं मेधकूट मणिप्रभम् । कुनरावर्त्तनगरं तवैवासितपर्वतम् ॥६६॥ सिन्धुकर महाका मुकक्ष चन्द्रपर्वतम् । श्रीफूटं गौरिकूटं च लपीयूटं धराधरम् ॥१७॥ कालकेशपुरं रम्यं पार्वतेयं हिमायम् । किन्नरोद्गीतनगरं नभस्तिलकनामकम् ॥ मगधासार नलको पांशुमूल पर तथा । दिव्योपयं चामूलं तथैवोदयपर्वतम् ॥१६॥ विख्यातामृतधारं च मातङ्गापुरमेव च । भूमिकुण्डलफूटं च जम्बूशदुपुरं परम् ॥१०॥ श्रेण्या त दक्षिणस्यां हि पुराण्येतानि पर्वते । शोभया स्पर्गतुल्यानि पहाराच्चैत्र संरयया ॥१०॥ पुरेपु तेषु च स्तम्भास्तनिकायाख्ययाऽऽहिताः । ऋपमावीश नागेशदिस्यदित्यचंयाहिताः ॥१०॥ । उत्तर भागमें साठ हैं और दक्षिण भागमें पचास हैं ॥४॥ १ आदित्यनगर, २ गगनवल्लभ, ३ चमरचम्पा, ४ गगनमण्डल, ५ विजय, ६ वैजयन्त, ७ शत्रुजय, ८ अरिञ्जय, . पद्माल, १० केतुमाल, ११ रुद्राश्व, १२ धनञ्जय, १३ यस्वीक, १४ सारनिवह, १५ जयन्स, १६ अप- राजित, १७ वराह, १८ हास्तिन, १६ सिंह, सीकर, २१ हस्तिनायक, २२ पाण्डुक, २३ कौशिक, २४ चौर, २५ गौरिक, २६ मानव, २७ मनु, २८ चम्पा, २६ काश्चन, ३० ऐशान, ३१ मणिप्रज, ३२ जयावह, ३३ नेमिप, ३४ हास्तिविजय, ३५ सण्डिका, ३६ मणिकाचन, ३७ अशोक, ३८ वेणु, ३६ मानन्द, ४० नन्दन, ४१ श्रीनिकेतन, ४२ अग्निज्वाल, ४३ महाज्वाल, ४४ माल्य, ४५ पुरु, ४६, नन्दिनी, ४७ विद्युत्लभ, ४८ महेन्द्र, ४६ विमल, ५० गन्धमादन, ५१ महापुर, ५२ पुष्पमाल, ५३ मेपमाल, ५४ शशिप्रभ, ५५ चूडामणि, ५६ पुष्पचूद, ५७ इंसगर्भ, ५८ पलाहक, ५६ वंशालय, भौर ६ सौमनस-ये साठ नगरिया विजयाको उत्तर श्रेणी में हैं ॥८५-६२॥ और १ रथनूपुर, २ आनन्द, ३ पक्रयाल, ४ अरिचय, ५ मण्डित, ६ पहुकेतु, ७ शकटामुम्ब, ८ गन्धसमृद्ध, १.शिवमन्दिर, १० जयन्त, ११ रथपुर, १२ श्रीपुर, १३ ग्लसंघय, १४ थापाद, १५ मानम, १६ सूर्यपुर, १७ वर्णनाभ, १८ शहद, १६ अगायत, २० जलायर्न, २१ भायर्तपुर, २२ वृहद्गृह, २३ शदवस, २५ नामान्त, २५ मेयकूट, २६ मणिप्रभ, २७ फुजरायत, २८ असिनपर्यत, सिन्धु. फत्त, ३० महाकन, ३१ मुकक्ष, ३२ चन्द्रपर्वत,३३ श्रीक्ट, ३४ गौरिफ्ट,३५ टरमीकूट, ३६ घरा पर, ३७ फारवेशपुर, ३८ रम्यपुर, ३ दिमपुर, ४० फिन्नरोद्गीतनगर, ४१ नमनिलया, 7 ४२ मगधसारनलक, ४३ पांगुमूल, दिव्यौपध, १५ अमूल, ४६ उदयपर्यन, अगृतधार, १८ फूटमातंगपुर, ४ भूमिकुण्टल तथा ५० जम्यूशंकुपुर ये पचाम नगरियो विजयाको दक्षिण- भगी है। ये सभी नगरियाँ शोभाम स्वरे तुल्य जान पड़ती है ॥६३-२०१॥ धन नगरिया विद्यापर निकायों के नामसे युक्त या भगवान् पृषभदेय, धरणेन्द्र और एमको दिवि-अपिनि पियांची प्रतिमासे माहत भनेक स्तम्भ सड़े किये गये हैं।

हरिवंशपुराणे सूनवो विनमयुक्ता विनयेन नयेन च । नानाविद्याकृनोद्योता जाताः सुवहुशस्ततः ॥१०३॥ सञ्जयोऽरिजयो नाम्ना शत्रुञ्जयधनञ्जयो । मणिचूलो हरिश्मश्रुमेधानीकः प्रभञ्जनः ॥१०॥ चूडामणिः शतानीकः सहस्रानीकसंज्ञकः । सर्वन्जयो वज्रबाहुमहाबाहुररिन्दमः ॥१०॥ इत्यादयस्तु ते स्तु-या उत्तरश्रेणिभूपणाः । भद्रा कन्या सुभद्रान्या स्त्रीरत्नं भरतस्य सा ॥१०॥ नमेस्तु तनया जाता बहुशो 'बहुशोचिपः । रविस्तनयसोमश्च पुरुहूतोऽशुमान हरिः ॥१०॥ जयः पुलस्त्यो विजयो मातङ्गो वासवादयः । कन्या कनकपुनश्रीः कन्या कनकमञ्जरी ॥१०॥ नमिश्च विनमिः पश्चाद्विपश्चिरपुत्रमण्डले । न्यस्तविद्याधरैश्वयों निवृत्तौ जिनदीषितौ ॥१०॥ मातगो विनमेः सूनुः सूनवस्तस्य भूरिशः । तरपुत्रपौत्रसन्तानो जातः स्वोसाधनः ॥१०॥ जिनस्य ोकविशस्य तीर्थे मातङ्गवंशजः । राजा प्रहसितो जातः पुरे ह्यसितपर्वते ॥११॥ श्रीमातङ्गान्वयव्योमपतङ्गस्य प्रतापिनः । अहं हिरण्यवस्याख्या विद्यावृद्धास्य भामिनी ॥१२॥ पुनो मे सिंहदंष्ट्राख्यस्तस्य नीलाञ्जना प्रिया । नीलनीरजनीलामा कन्या नीलयशास्तयोः ॥१३॥ भनीलयशसस्तस्याः कुलशीलकलागुणः । कृतोद्यम मया घशो वर्णितो लब्धवर्णया ॥११॥ हरिवंशनभश्चन्द्र ! चन्द्रमुख्याऽवलोकितः । नृत्यन्त्या त्वं तये हैरय वासुपूज्यमहाहवे ॥११५॥ तव दर्शनमेतस्याः सुखहेतुरभूद् यथा । दुःखहेतुस्तथैवाद्य वर्तते विरहे स्मृतम् ॥१६॥ न सा स्नाति न सा भुड्के न सा वक्ति न चेष्टते । साऽनङ्गशरशल्या च जीवतीति महाद्भुतम् ॥१७॥ तदनन्तर राजा विनमिके संजय, अरिंजय, शत्रुञ्जय, धनञ्जय, मणिचूल, हरिश्मा, मेघानीक, प्रभजन, चूडामणि, शतानीक, सहस्रानीक, सर्वजय, वयाहु, महाबाहु और अरिंदम आदि अनेक पुत्र हुए। ये सभी पुत्र विनय एवं नीतिज्ञानसे सहित थे, नाना विद्याभोसे प्रकाशमान थे और उत्तरश्रेणिके उत्तम आभूषण स्वरूप थे। पुत्रोंके सिवाय भद्रा और सुभद्रा नामकी दो कन्याएँ भी हुई। इनमें सुभद्रा भरत चक्रवर्तीके चौदह रत्नोमें एक स्त्रीरत्व' थी ।।१०३-२०६॥ इस प्रकार नमिके भी रवि, सोम, पुरुहूत, अंशुमान, हरि, जय, पुलस्त्य, विजय, मातङ्ग तथा वासव आदि अत्यधिक कान्तिके धारक अनेक पुत्र हुए और कनकपुञ्जश्री तथा कनकमञ्जरी नामको दो कन्याएँ हुई ॥१०७-१०८॥ आगे चलकर परम विवेकी नमि और विनमि, पुत्रोके ऊपर विद्याधरोंका ऐश्वर्य रखकर संसारसे विरक्त हो गये और दोनोंने जिन-दीक्षा धारण कर ली ।।१०।। राजा विनमिके पुत्रों में जो मातङ्ग नामका पुत्र था उसके बहुतसे पुत्र-पौत्र तथा प्रपौत्र आदि हुए और वे अपनी-अपनी साधनाके अनुसार स्वर्ग तथा मोक्ष गये ॥११०|| इस तरह बहुत दिन के बाद इकोसवें तीर्थकरके तीर्थ में असितपर्वत नामक नगरमे मातङ्ग चशमे एक प्रहसित नामका राजा हुआ। वह बड़ा प्रतापी था और मातङ्ग वंशरूपी आकाशका मानो सूर्य था। उसीकी मैं हिरण्यवती नामकी स्त्री हूँ और विद्यासे मैंने वृद्धस्त्रीका रूप धारण किया है ।।१११-११२।। सिंहदंष्ट्र नामका मेरा पुत्र है और नीलांजना उसकी स्त्री है । उन दोनोंकी नील कमलके समान नीली आभासे युक्त नोलयशा नामकी एक पुत्री है । मुझे बोलनेका अभ्यास है इसलिए मैने उद्यमकर कुल, शील, कला तथा अनेक गुणोके द्वारा उज्ज्वल यशको धारण करने वाली उस कन्याके बंशका वर्णन किया है ॥११३-११४॥ हे हरिवंशरूपी आकाशके चन्द्र ! वह चन्द्रमुखी कन्या आष्टाह्निक पर्वके समय श्रीवासुपूज्य भगवानके पूजा-महोत्सव में इस चम्पापुरी में आई थी और मन्दिरके आगे जब नृत्य कर रही थी तब उसने आपको देखा था॥११५।। हे कुमार ! इस कन्याके लिए उस समय आपका दर्शन जैसा सुखका कारण हुआ था वैसा ही आज विरहकालमै दुःखका कारण हो रहा है ।।११६॥ न वह स्नान करती है, न खाती है, न बोलती १. बहुरोचिपः म० । २. तनयः सोमध ग० । ३. विद्यावृद्धस्य म०। ४, अनीलममलिन यशो ! यस्यास्तस्याः।

द्वाविंशतितमः सर्गः तस्यामेतदवस्थायां कुलमस्माकमाकुलम् । न वेत्ति किं करोमीति पितृमातृपुरोगमम् ॥१८॥ कन्याया मानसं प्रश्ने घोतितं कुलविद्यया । पद्मिन्येवान्यथाभूत्या युवमातङ्गदूपितम् ततो विनिश्चितास्माभिर्यादवस्य तवेप्सया । मत्तमातङ्गगामिन्याः कन्याया हृदयव्यथा ॥१२०॥ आगताऽस्मि ततो नेतुं भवन्तं तत्र यादव । सा तवैव विदोद्दिष्टा तदेहि परिणीयताम् ॥१२॥ स श्रुत्वा तदवस्थां तां चेतश्चोरणकारिणीम् । सोत्कण्ठितोऽपि तत्काले नैच्छच्चम्पाविनिर्गमम् ॥२२॥ आगमिष्याम्यहं तावत्वं तां तावत्तनूदरीम् । अम्ब ! बिम्बाधरां गत्वा ममोदन्तेन सान्वय ॥१२॥ सेत्युक्त्यानुज्ञया मुक्ता दत्ताशीरेवमस्स्विति । मनोरथरथारूडा गत्वा कन्यामसान्धयत् ॥१२४॥ स्नात्वा पयोधरोन्मुक्तवसुदेवो नवोदकैः । कृत्वा पयोधराश्लेपं कान्तया शयितोऽन्यदा ॥२५॥ भीमदर्शनयाऽऽकृष्टकरो वेतालकन्यया । विबुद्धोऽताढयन्मुग्धो भुजेन दृढमुष्टिना ॥२६॥ नीतश्च निशि निस्त्रिंशनराकारभृता तया । रथ्यामागंण दुहं महापितृवनं यदुः ॥१२७॥ मातगीमिभृशं भृङ्गीसङ्गताङ्गप्रमात्मभिः । सङ्गतामिशितज्ञोऽन्न मातङ्गी शौरिरैतत ॥१२॥ एहि स्वागतमित्याह साहसन्ती तमेतया। सिक्तो वेताल विद्यामिहंसन्त्यन्तरधीयत ॥१२॥ है और न कुछ चेष्टा ही करती है। कामके वाणरूपी शल्योंसे छिदो हुई वह कन्या जीवित है यही बड़े आश्चर्यकी बात है ॥११७॥ उसकी इस दशामें माता-पिताको लेकर हमारा समस्त कुल व्याकुल हो रहा है तथा वह यह भी नहीं जानता है कि मैं क्या कर रहा हूँ ? ॥११८॥ जब मैंने उसके हृदयका हाल जाननेके लिए कुल-विद्यासे पूछा तो उसने यह प्रकट किया कि हाथी के द्वारा नष्ट की हुई कमलिनीके समान इसका हृदय किसी युवा पुरुपके द्वारा दूषित किया गया है ॥११॥ तदनन्तर मैंने निश्चय कर लिया कि मत्त-मतङ्गजके समान चलनेवाली कन्याके हृदय- की पीड़ा आपकी ही इच्छासे है । भावार्थ-उसके हृदयकी पीड़ा आपके हो कारण है ॥१२०॥ यादव ! मैं आपको वहाँ ले जानेके लिए आई हूँ, निमित्तज्ञानीने भी यह आपकी ही बतलाई है अतः आप चलें और उसे स्वीकार करें ॥१२१॥ कुमार वसुदेव अपने चित्तको थुरानेवाली नीलंयशाको वह अवस्था सुन जानेके लिए यद्यपि उत्कण्ठित हो गये तथापि उस समय उन्होंने चम्पापुरीसे बाहर जाना ठीक नहीं समझा ॥१२२॥ और यही उत्तर दिया कि हे अम्ब ! मैं आऊँगा तुम तबतक जाकर उस कृशोदरी बिम्बोष्ठीको मेरा समाचार सुनाकर सान्त्वना देओ ॥१२३॥ कुमारने इस प्रकारको आज्ञा देकर जिसे छोड़ा था ऐसी वृद्धा स्त्रीने 'तथास्तु' कहकर उन्हें आशीर्वाद दिया और मनोरथ रूपी रथपर आरूढ़ हो जाकर कन्याको सान्त्वना दी ।।१२४|| तदनन्तर किसी समय वसुदेव, मेघों द्वारा छोड़े हुए नूतन जलसे स्नान कर कान्ता गान्धर्व- सेनाके साथ उसके स्तनाका गाढ़ालिङ्गन करते हुए शयन कर रहे थे ॥१२५ कि एक भयंकर आकारवाली वेताल-कन्याने आकर उनका हाथ खींचा। वे जाग तो गये पर यह नहीं समझ सके कि इस समय क्या करना चाहिए फिर भी दृढ़ मुट्ठियांवाली भुजासे उन्होंने उसे खूब पीटा ॥१२॥ इतना होनेपर भी दुष्ट मनुष्यकी आकृतिको धारण करनेवाली वह कन्या उन्हें मजबूत पकड़कर रात्रिके समय गलोक मार्गसे श्मशान ले गई ॥१२७॥ हृदयको चेष्टाओंको जाननेवाले कुमारने वहाँ भ्रमरीके समान काली काली मातलियों से युक्त एक मातङ्गीको देखा। उस मासगीने हँसकर कुमार- कहा कि आइए आपके लिए स्वागत है । यह कहकर वेताल विद्याओं से उसने इनका अभिषेक कराया और उसके बाद वह हँसती हुई अन्तहित हो गई ॥१२८-१२६॥ तदनन्तर उसने असली रूपमें प्रकट होकर कहा कि कुमार, मुझे मातङ्गो मत समझो, मैं हिरण्यवती हूँ। मैंने कार्य सिद्ध से 7 १ यादवश्व म० १ २. सगोताङ्ग-म० 1 ३ वसुदेवः । ४. हसन्तीतिमेनया ग० । ५. सिक्का म०,स। ६.अन्तर्हिता बभूव ।

३२८ हरिवंशपुरागे माता इति मा संस्था एवं हिरण्यवतीयहम् । यो मातङ्गविद्यायाः शौरऽयं कार्यसाधनः ॥२०॥ सेयं वा नासितो म्लाना याला चेतोमलिग्लुचम् । याला यष्टि रदं नेतुं पाहुपाशेन बन्धनम् ॥३॥ तमित्युवस्वान्तिकं प्राप्त सा नीलयशसं जगी। वलमा एश सोऽयं ते करेण करपल्लवम् ॥३२॥ साऽनुज्ञाता करेणास्य प्रस्विन्नावयवा करम् । प्रसारितागुलिं याला स्वेदिनस्ताहशाऽमहोत् ॥३३॥ तयोः प्रेमतरुः सिक्तस्तनुस्पर्शमुसाभिसा । रोमामध्यपदेशेन व्यमुञ्चत् 'कांशाकुरान् ॥१३४॥ पाणिग्रहणमाद्यं हि तदेवासीत्तदा तयोः । भावाद कृतयोः पवादाविता व्यावहारिकम् ॥१३५॥ सद्यो विद्याधरीवृन्दं खमुस्पस्य ततोऽखिलम् । शौरिणा सह संहृष्टमुत्तर दिशमुग्यो।१३६॥ भूपौषधिप्रभापिण्डखण्डितध्वान्तसन्ततिः । रेजे से खेघरस्त्रीणां संहतिस्तढितां यथा ॥१३॥ तदा शौरिरिवार्कोऽपि करसम्पर्कमाग्रतः । प्राग्नीलाशाववनमकरोत् प्रभयोज्ज्वलम् ॥१३॥ भोंदितो यमी भानुः पाटलः प्राग्वधूमुखे । दिवसस्य स्फुरद्वादमचंदष्ट इवाधरः ॥२६॥ मोदितमभात्प्राग्या मुखमण्डलमण्डगम् । मार्तण्डमण्डलं यदरसौवर्ण कर्णकुण्डलम् ॥१४॥ रविगा शौरिणेवाशु भुवनद्योतकारिणी । चावापृथिव्यो विस्पटे द्राप्टिमसरे कृते ॥१४॥ शौरि हिरण्यवरयाह महारण्यनगावृतम् । अधः पश्यसि यं भूमौ कुमार ! गिरिगुप्ततम् ॥१४२॥ श्रीमन्तं प्रवदन्तीम हीमन्तं नामतो गिरिम् । तप:श्रीमन्तमाधत्ते लोकं हीमन्तमप्ययम् ॥१३॥ करने के लिए मातङ्ग विद्याके प्रभावसे यह वेप रक्खा था ॥१३०॥ यह कहकर उसने पासमें बैठी नीलंयशाफी ओर संकेत कर कहा कि देखो यह वही बाला नीलंयशा है जो हृदयको चुरानेवाले आपको न पाकर मुरझा गई है। यह बाला आपको अपने बाहुपाशसे वोधना चाहती है- आपका आलिङ्गन करना चाहती है ॥१३१|| कुमारसे इतना कहकर हिरण्यवतीने पासमें बैठी हुई नीलंयशासे भी कहा कि यही तेरा वह स्वामी है अपने हाथ से इसके हस्त पल्लवका स्पर्श कर ॥१३२।। इस प्रकार हिरण्यवतीकी आज्ञा पाकर कुमारी नीलंयशाने कुमार वसुदेवके फैलाये हुए हाथको अपने हाथसे पकड़ लिया। उस समय एक दूसरेके स्पर्शसे दोनों के शरीरसे पसीना छूट रहा था ।।१३३।। उन दोनों का प्रेमरूपी वृक्ष शरीरके स्पर्शजन्य सुम्वरूपी जलसे सींचा गया था इसलिए वह गेमाञ्चके बहाने कठोर अङ्कुगेको प्रकट कर रहा था ॥१३४॥ वे दोनों ही स्नेहसे आर्द्रचित्त थे इसलिए उनका प्रथम पाणिग्रहण उसी समय हो गया था और व्यावहारिक पाणि- ग्रहण पीछे होगा ॥१३५॥ तदनन्तर हर्पसे भरा विद्याधरियोंका समस्त समूह शीघ्र ही कुमार वसुदेवके साथ आकाशमें उड़कर उत्तर दिशाको ओर चल दिया ॥१३६॥ आभूपण तथा औषधियोंकी प्रभासे अन्धकारको सन्ततिको नष्ट करता हुआ वह विद्याधरियोंका समूह आकाश- मे विलियोंके समूहके समान सुशोभित हो रहा था ॥१३७॥ उस समय जिस प्रकार कुमार वसु देवने हाथके स्पर्शमात्रसे नीलंयशाके मुखको प्रभासे उज्ज्वल कर दिया था उसी प्रकार सूर्यने भी अपनी किरणोके स्पर्श मात्रसे पूर्व दिशारूपी स्त्रीके मुखको प्रभासे उज्ज्वल कर दिया था ॥१३॥ उस समय पूर्व दिशाके अग्रभागमें आधा सदित हुआ लाल-लाल सूर्य ऐसा जान पड़ता था मानो दिवसरूपी युवाके द्वारा आधा डसा हुआ पूर्व दिशारूपी स्त्रीका लाल अधर ही हो ॥१३॥ थोड़ी देर बाद जब सूर्यमण्डल पूर्ण उदित हो गया तब ऐसा जान पड़ने लगा मानो पूर्व दिशारूपी स्त्री- के मुखमण्डलको अलंकृत करनेवाला सुवर्णमय कानोंका कुण्डल ही हो ॥१४०॥ कुमार वसुदेव- के समान संसारको प्रकाशित करनेवाले सूर्यने जब शीघ्र ही आकाश और पृथिवीको स्पष्ट कर दिया तथा उनकी ओर शीघ्र ही दृष्टिका प्रसार होने लगा ॥१४१॥ तब हिरण्यवतीने वसुदेवसे कहा कि हे कुमार ! नीचे पृथिवीपर महावनके वृक्षोसे घिरे हुए जिस उन्नत पर्वतको देख रहे हो उस शोभासम्पन्न पर्वतको लोग हीमन्त गिरि कहते हैं। यह पर्वत लज्जासे युक्त मनुष्यको भी १. कर्कराकुरान् म । २ समूहः । ३ समूहः ।

द्वाविंशतितमः सर्गः श्यामयाऽशनिवेगस्य दुहिनाङ्गारकः खगः । युद्धे खण्डितविद्योऽत्र विद्यासिद्धि प्रतिस्थितः ॥१४४॥ दर्शनेन तवास्याशु किल विद्या प्रसिद्धयति । तदाऽस्यानुनहेच्छा चेद्देहि देहि स्वदर्शनम् ॥१५॥ इत्युक्तो विदितश्यामाक्षेमवातः स तोषवान् । जगाद किमनिष्टेन रष्टेनाकारण मे ॥४६॥ कालातिपातिभिर्व्यः क्रीहितैरिह किं कृतैः । प्रयामो वयमारस्व स्वं पश्यामः श्वासुरं पुरम् ॥१४॥ एवमस्विति नीस्वाऽसौ स्थापितोऽसितपर्वते । कृतविद्याधरीरक्षो बायोचाने मनोहरे man प्रविष्टा तचित्ता च निजं नोलयशाः पुरम् । शौरिसध्यया तस्थौ तरसमागमकाया ॥१४॥ सुस्नातोऽलङ्कृतो भूया महरया स रथस्थितः । प्रवेशितः पुरं वीरः खेचरैः स्वर्गसनिभम् ॥१५॥ रएः सप्रश्रयं श्रीमानवितृप्तविलोचनैः । जनः ससिंहदंष्ट्रः स सुष्टान्तःपुरपूर्वकैः ॥१५॥ ततः पुण्यदिने पुण्यपूर्णयोः पूर्णरूपयोः । विधिपूर्व तयोवृत्तं पाणिग्रहणमालम् ॥१५२॥ स नीलयशसा शौरिनंगरेऽसितपर्वते । रत्येव सहितः कामः कामभोगानसेवत ॥५३॥ शार्दूलविक्रीडितम् नीलं नीलयशोयशो न जनित स्त्रीभियंसः स्वैगुणः शौरेः शौर्यशरीरिणो हि न यशः कृष्णीकृतं खेघरैः। सपरूपी लक्ष्मीसे युक्त कर देता है ॥१४२-१४३॥ यहाँ अशनिवेगकी पुत्री श्यामाने युद्ध में जिसकी विद्या सण्डित कर दी थी ऐसा अङ्गारक नामका विद्याधर विद्या सिद्ध करने के लिए स्थित है। भापके दर्शनसे इसे शीघ्र विद्या सिद्ध हो जावेगी इसलिए यदि इसका उपकार करनेको मापको (च्छा है तो इसे अपना दर्शन दें ॥१४४-१४५॥ हिरण्यवतीके इस प्रकार पहनेपर प्रियतमा श्यामाके कुशल समाचार जानकर कुमार बहुत सन्तुष्ट हुए और कहने लगे कि अङ्गारक तो हमारा शव है इसको देखनेसे क्या लाभ है ? ॥१४६॥ इस पर्वतपर की हुई समयको बितानेवाली व्यर्थको फोड़ाओंसे मुझे क्या प्रयोजन है ? यदि तुम्हें रहना इष्ट है तो रहो में नो जाता हूँ और श्वसुरफे नगरको देखता हूँ॥१४७॥ कुमारके ऐसा कहनेपर हिरण्यवतीने 'एवमस्तु' कहा अर्थात् जैसा आप चाहते हैं वैसा ही करती हूँ। यह कह उसने भसितपर्वत नगर ले जाकर उन्हें नगरके याहर एक सुन्दर उद्यानमें ठहरा दिया तथा रक्षाके लिए विद्यापरियोंको नियुक्त कर दिया ॥१४॥ कुमारी नीलंयशा प्रसन्नचित्त हो अपने नगरमें प्रविष्ट हुई और कुमार समागमको आकांक्षा तथा उन्हींकी कथा करती हुई रहने लगी ॥१४॥ तदनन्तर बड़े वैभयके साथ जिन्हें स्नान पराया गया था तथा उत्तमोत्तम आभूपण पहिनाये गये थे ऐसे वीर कुमार वसुदेवको रथ. पर पैठाकर विद्याधरीने स्वर्ग तुल्य नगरमें प्रविष्ट कराया ॥१५०॥ यहाँ कुमारका मनोहर रूप देख-देखकर जिसके नेत्र तृप्त नहीं हो रहे थे ऐसे नीलंयशाके पिता सिंहदंष्ट्रा तथा सन्तोपसे युक्त अन्तःपुरको आदि लेकर समस्त लोगोंने पढ़े विभयके साथ श्रीमान् वसुदेवको देखा ।।१५।। तदनन्तर जो पुण्यसे परिपूर्ण थे और जिनका रूप परम सीमाको प्राप्त था ऐमे कुमार यसुदेव और नीलंयशाका पाणिमहण मगल किसी पवित्र दिन विधिपूर्वक सम्पन्न हुभा ॥१५२॥ तत्पश्चात् जिस प्रकार कामदेव अपनी नी रतिके साथ इच्छानुसार भौगोंका सेवन करता है उसी प्रकार यमुदेय असितपर्वत नगरमें नौलंयशाफे साथ इच्छानुसार भोगीफा सेवन फरने लगे॥१५३॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि चूंकि यहाँको स्त्रियाँ अपने गुगोंसे नीलंयशाके यशफो मलिन नहीं कर सकी थी और न विद्याधर ही पराक्रमी यसुदेवके यराको कलंकित कर सके पे १. तपास्या-म०।२ श्वमुरम् मामुरम् । ३. स्प: रिपतः म.| ४. नियम

हरिवंशपुराणे,
तत्तत्र स्थितयोस्तयोः सुखरसं प्रेमप्रसक्तात्मनोः
साकल्येन जनो जिनप्रवचनज्ञो हि प्रवक्तुं हमः ॥१५॥
इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती नीलयशोलाभवर्णनो नाम
द्वाविंशः सर्गः ॥२२॥
इसलिए यहाँ प्रेमपूर्वक रहनेवाले वसुदेव और नोलयशाको जो सुख उपलब्ध था उसका सम्पूर्ण
रूपसे वर्णन करनेके लिए जिन प्रवचनका ज्ञाता श्रुतकेवली ही समर्थ हो सकता है ॥१५४॥
इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणसंग्रहसे युक्त जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें नीलयशाके
लाभका वर्णन करनेवाला वाईसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥२२॥

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३३२ हरिवंशपुराणे प्राप्तः शरस्तुतः शरपुडकरस्ततः । गुभभृङ्गज्यया सजः प्राज्यवाणासनश्रिया ॥१॥ काले विद्याधरास्तत्र स्वविद्यौषधिसिद्धये । निगृहीतमनोवेगा मनोवेगा विनिर्ययुः ॥१४॥ तदा तौ दम्पती शलं हीमन्तं कामवपिणौ । प्रयातौ विद्ययाश्लिष्टौ धनं विद्युघनौ यथा ॥१५|| भसपत्नसपत्नीकतापसस्त्रीधरोरसम् । असिधारावतं तीनं घरन्तमिव सन्ततम् ॥१६॥ मधुपानमदोन्मत्तपतत्रिमधुपारवः । विध्यतो मदनस्येव स शरग्यारवर्युतः॥१७॥ अवतीणों तमुद्गन्धिसप्तपर्णावतंसकम् । हारिणं वर्णयन्तौ तौ मरुधूर्णितभूरहम् ।।१८।। परिभ्रम्य चिरं शोभा पश्यन्ती तृशिवर्जितौ । गिरेः सानुषु रम्येषु रंरम्यते स्म सस्मरौ ॥१६ तयोः सम्भोगसम्भारः पुष्पपल्लवकल्पिते । तल्पेऽनल्पोऽपि खेदाय समजायत नो तदा ॥२०॥ चिरेण रतिसम्भोगसम्भूतस्वेदभूपितौ । निष्क्रान्ती कदलीगेहात् तौ रक्तान्तविलोचनौ ॥२१॥ मुक्तककारवं तत्र चित्रगात्रमपश्यताम् । कलापिनमकस्मात्ती मयूरं मत्तलोचनम् ।।२२।। शोभया हृतचित्तं तमुरकादिस्सुः सकौतुका । स्कन्धमारोप्य तेनाऽसौ नीता नीलयशा नभः ।।२३।। नीचेन नीलकण्ठेन नीलकण्ठवपुभृता । हृतायां विह्वलो बच्चा वसुदेवोऽभ्रमद्वने ॥२४॥ पागस्वने या-सफेद-सफेद कटाक्षों और मधुर वाणीसे मनोहर होती है उसी प्रकार वर्षा ऋतु भी शुक्लापागस्वनैहृद्या-मयूरौंको वाणीसे मनोहर थी ॥१२॥ वर्षाके बाद, जो बाणोंकी मूठको हाथमें धारण कर रहा था तथा गुंजार करते हुए भ्रमररूपी डोरीसे युक्त उत्तम वाणासन जातिके वृक्षरूपी बाणासन-धनुपकी शोभासे युक्त था ऐसे अहंकारी सुभटके समान शरद् ऋतु आई ॥१३॥ उस समय मनके समान तीव्र वेगको धारण करनेवाले विद्याधर अपनी-अपनी विद्याओं और ओपधियोंकी सिद्धिके लिए मनके वेगको नियन्त्रित कर बाहर निकले ॥१४॥ उस समय इच्छानुसार कामभोग करनेवाले एवं विद्याके द्वारा अत्यन्त आलिङ्गित दोनों दम्पती-- कुमार वसुदेव और नीलयशा भी होमन्त पर्वतको ओर गये। उस समय वे ऐसे जान पड़ते थे' मानो परस्परमें गाढ़ आलिङ्गनको प्राप्त एवं इच्छानुसार वर्षा करते हुए बिजली और मेघ ही पर्वतकी ओर जा रहे हो ॥१शा उस पर्वतका मध्य भाग वैरिरहित सपत्नीक तपस्वियोंकी स्त्रियों- को धारण करता था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो निरन्तर अतिशय कठिन असिधारा प्रतका हो भाचरण कर रहा हो ॥१६॥ वह पर्वत जगह-जगह मधुपानके मदसे उन्मत्त पक्षियों और भ्रमरोंके शब्दसे युक्त था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो कामीजनोंफो वेधनेवाले कामदेवफे याण और प्रत्यञ्चाके शब्दोंसे ही युक्त हो ॥१७॥ उत्कट समन्धिसे युक्त सप्तपर्णचन जिसकी शोभा बढ़ा रहा था, जो स्वयं सुन्दर था तथा वायुसेनिसके वृक्ष हिल रहे थे ऐसे होमन्त पर्वतपर उतरकर वे दोनों उसको प्रशंसा करने लगे। चिरकाल तक इधर-उधर भ्रमण कर शोभाको देखते हुए वे तृप्त हो नहीं होते थे अत: कामाकुलित होकर दोनोंने पर्वतको सुन्दर शिसरोंपर यार-बार रमण किया था ॥१८-१६॥ उन्होंने पुष्प और पत्तोंसे निर्मित शय्यापर अत्यधिक सम्भोग किया था फिर भी वह उस समय उनके सेदके लिए नहीं हुआ था ॥२॥ जो रतिफोदासे उत्पन्न पसीनासे सुशोभित थे तथा जिनके नेत्रोंके कोण लाल-लाल हो रहे थे ऐसे वे दोनों चिरफाल याद कदली गृहसे बाहर निकले ॥२१॥ बाहर निकलते ही उन्होंने एक ऐसा मयूर देसा जो केका वाणी छोड़ रहा था, चित्र विचित्र शरीरसे युक्त था, शिसण्दीसे सहित. था और जिसके नेत्र अत्यन्त मत्त थे ।।२२॥ शोभासे चित्तको हरण करनेवाले उस मयूरको देख- फर जो अत्यन्त उत्कण्ठित थी तथा कौतुफवश जो उसे पकड़ लेना चाहती थी ऐसी नीलयशा को कन्धेपर येठाफर यह मयूर आकाराम ले गया ।।२३॥ यथार्थमें वह मयूर नहीं था किन्तु मयूर १ अमरना ये सपत्नीकनारमास्लेषां त्रिय इति असरलसपत्नीकतापसनियतासा धरमुरो यो यम्य परंतरप स सन् । २ मनोरम् । ३ हतचिचो तो म. 1४. मयूराकारमारिया।

प्रयोविंशः सर्गः गोष्टे गोपवधूतक्षुत्पिपासापरिश्रमः । उपित्वा प्रात्तरस्थाय स प्रायाइक्षिण दिशम् ॥२५॥ पुरं गिरितट सत्र याप्राकारवेष्टिनम् । दृष्ट्वा हयः प्रविष्टोऽसौ विशिष्टजनतावृतम् ॥२६॥ घेदाध्ययननिर्घोषमुखरीकृतदिग्मुसे । समान्छारं कशिदिति शौरिः सकौतुकः ॥२७॥ कि केनान महादान माइनेभ्यः प्रवर्तितम् । येनामी मिलिता विश्वे मेदिन्या घेदघेदिनः ॥२८॥ सोऽवोचरसुदेवोऽत्र भोजकोऽस्यास्ति कन्यका । सोमनीरिय सोमनीः कलावेद विशारदा ॥२६॥ जेता घेदविचारेऽस्याः यः स मा भविष्यति । इति देवज्ञवाश्येन संहता पैदिको प्रजा ॥३०॥ अघनस्तनभाराता तनुमध्यातिरूपिणी । भरक्षमस्य नो विशः कस्योपरि पसिष्यति ॥३॥ श्रुस्वयं शब्दमानण सा कन्या श्रोनहारिणी । सीव राजहंसस्य चक्र सोरकण्ठितं मनः ॥३२॥ प्रझदसमुपाध्यायं सोऽभ्युपेश्य निवेद्य च । गोनसशारणं घेदानहोऽध्यापय मामिति ॥३३॥ आपारस्वमिह कि येदान् धर्मानविजिगांससे । मनापानथया येदानित्यवादीदसौ गुरुः ॥३॥ कथं वैविध्यमेतेपामिति पृष्टोऽयवरपुनः । प्रहरादयोऽस्य यथार्थवचनो द्विजः ॥३५॥ पट्कर्मसु मजाः प्राप्ताः कल्पवृक्षपरिपये । यः शशास पुरा वेदेखिभियंगरियाश्रिताः ॥३६॥ हिमविन्ध्यरतनाभोग"रौप्यपहारिणीम् । वाधिकालीगुणां राजा योऽन्यभूसुधायधूम् ॥३॥ का शरीर धारण करनेवाला नीच नीलकण्ठ था। उसके द्वारा स्त्रीके हरे जानेपर वसुदेव विहल होकर बनमें घूमते रहे ॥२४॥ वह भूसे थे इसलिए गोपोंको एक बस्तीमें गये वहाँ गोपीको स्त्रियों- ने उनकी भूख-प्यासको बाधा तथा परिश्रमको दूर किया। उस यस्तीमें रातभर रहकर वे प्रातः- काल दक्षिण दिशाको ओर चल दिये ॥२५॥ वहाँ धूलिफुट्टिम तथा प्राकारसे वेष्टित गिरितट नामक नगरको देखकर वसुदेवने हर्पित हो उसमे प्रवेश किया। उस समय यह नगर विशिष्ट जनममूहसे व्याप्त था तथा वेद-पाठफी ध्वनिसे उसकी समस्त दिशाएँ शब्दायमान हो रही थी। यहाँ कौतुकसे भरे घसुदेवने किसी मनुष्यसे इस प्रकार पूछा ॥२६-२७॥ क्या यहाँ प्रादाणों के लिए फिसीने महादान किया है ? जिससे वेदोंको नाननेयाले पृथियोफे समस्त प्राह्मण यहाँ आकर इकटे हुए हैं ॥२८॥ उस मनुष्यने कहा कि यह एक वसुदेव नामका प्राण रहता है। उसके एक सोमश्री नामकी कन्या है जो चन्द्रमाके समान सुन्दर और अनेक फला तथा वेद-शास्त्रम निपुण है २६ज्योतिपीने कहा है कि जो इसे वेदोंके विधारमें नीत-लेगा वही इसका पति होगा इसीलिए यह वेदोंको जाननेवाली प्रजा इफटी हुई है ॥३०॥ स्थूल नितम्य और स्तनोके भारसे पीड़ित, कमरको पतली यह अतिशय सुन्दरी कन्या, भार धारण करनेमें समर्थ किस भाग्यशाली के ऊपर गिरती है यह हम नहीं जानते ॥३१॥ यह सुनकर जिस प्रकार शब्दमासे पानीको हरनेवाली हँसी राजहंसके मनको उत्कण्ठित कर देती है उस प्रकार चर्चामाप्रसे फानोको हरने- वाली उस फन्याने वसुदेवके मनको उत्कण्ठित फर दिया ॥३२॥ तदनन्तर कुमाग्ने प्रादत्त नामक उपाध्यायके पास जाकर तथा उसे अपना गोत्र बताकर प्रार्थना की कि आप हमें वेद पढ़ा दीजिए ॥३३॥ इसके उत्तरम प्रादप्सने कहा कि यहाँ तुम धर्मको प्रकट करनेवाले भाप वेदीको पढ़ना चाहते हो या अनापं घेदीको ?॥३४॥ यह सुन फुमार- ने फिर पूछा कि दो वेद फैसे ? कुमारके इस तरह पूछनेपर अत्यन्त प्रसन्न चित्त एवं यथार्थवादी उपाध्याय पुनः इस प्रकार कहने लगा कि युगके आदिमें कल्पवृक्षोंके नष्ट होनेपर जिन्होंने शरणा- गत प्रजाको असि मपि आदि छह कार्याका उपदेश दिया था तथा अपने पूर्व ज्ञानके भाधारपर उनमें क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन तीन वर्णीका विभाग किया था ||३५-३६॥ जिन्होंने राजा १ भादाणेभ्यः १० । माइयेभ्यः म० । २. सोमस्येव पन्द्रस्येर भीर्यस्याः या । ३ दिवशमा ग ४ नाहराध्यापय मामिति क.५ रोप्यात एव हारो यस्याः सा गाम् ।

१ हरिवंशपुराणे राज्ये पुत्रशतं प्राज्ये संस्थाप्य भरतादिकम् । यो मुमुक्षुर्विनिःकान्तः सचतुर्नुसहनकः ॥३८॥ यश्चचार चतुर्वेदस्तपो दुश्चरमात्मभूः । धारो वर्षसहवं वै पराजितपरीपहः ॥३६॥ समुत्पादितकैवल्यवेदनेत्रेदिताखिलः । धर्मतीर्थेन यत्रके धर्मक्षेत्रंखलोमितम् ॥४०॥ यो द्वौ धर्माधमौ धन्यौ गृहिश्रमणसंध्यौ । स्वर्गापवर्गसौत्यस्य सिद्धयेऽदर्शयन्मुनिः ॥४॥ द्वादशाङ्गविकल्पेषु वेदेषु यतिवृत्तिषु । अन्तर्गता गृहस्थानां यथोक्ताचारदर्शिता ॥४२॥ गुणशिधावतस्थानामनेनियमश्रिताम् । तेन ये दर्शिता वेदा ऋपभप्रभुणार्षकाः ॥४३॥ तानीय तदुनेन विधिना भरतार्चितः । धर्मयज्ञानयोद्ययुगे विप्रगणोऽग्विलः ॥४४॥ अनापागां तु वेदानामुत्पत्तिरभिधीयते । ऐदंयुगीनविभागां तात्पर्य यत्र वर्तते ॥४५॥ भूपो धारणयुग्मेऽभूरपुरे यो रणभूमिषु । अयोधनतया योधैरयोधन इतारितः ।।४।। भूपितादित्यवंशस्य सोमवंशतनद्भवा । दितिस्तस्य महादेवी नृणविन्दोः कनीयसी ।।४७॥ सा योषिद्गुणमञ्जूपामसूत मुलसां सुताम् । यौवने च पिता तस्याः स्वयंवरमचीकरत् ॥१८॥ भागताच समाहूताः पृथिव्यां पृथुकीर्तयः । स्वयंवरार्थिनो भूपाः सादरीः सगरादयः ॥४॥ सगरस्य प्रतीहारी नाग्ना मन्दोदरी दितेः। गृहं गताऽन्यदाऽनौपीदेकान्ते वचनं दितः ॥५०॥ घनकर हिमाचल और विन्ध्याचल रूप स्तनोंसे युक्त, विजया रूपी हारसे सुशोभित और सागर रूपी मेखलासे अलंकृत पृथिवी रूपी स्रीका उपभोग किया था ॥३७॥ जिन्होंने अन्तमें विरक्त हो श्रेष्ठ राज्यपर भरतादिक सौ पुत्रोंको आसीन कर चार हजार राजाओके साथ दीक्षा धारण की थी ॥३८॥ जो स्वयं प्रतियुद्ध थे, धीर-वीर थे, परीपहोके जेता थे और जिन्होंने चार ज्ञानके धारक होकर एक हजार वर्पतक कठिन तप किया था ॥३६॥ जिन्होंने उत्पन्न हुए केवलज्ञान रूपी नेत्रके द्वारा समस्त पदार्थोको जान लिया था तथा धर्म रूप तीर्थके द्वारा जिन्होंने धर्मक्षेत्र को दुष्टोंसे रहित कर दिया था ॥४०॥ जिन्होंने स्वर्ग और मोक्ष सुखको प्राप्ति के लिए गृहस्थ और मुनियों से सम्बन्ध रसनेवाले दो धर्माश्रम दिसलाये थे ॥४१॥ जिन्होंने मुनिधर्मका वर्णन करनेके लिए द्वादशाङ्ग रूप वेदोंका निर्माण किया था तथा उन्हीं वेदोंके अन्तर्गत (उपासका- ध्ययनाङ्ग) गुणव्रत और शिक्षाप्रतीके धारक एवं अनेक नियमोंका पालन करनेवाले गृहस्थोंके भी आचारका वर्णन किया था। उन्हीं भगवान् वृषभदेवके द्वारा उस समय जो वेद दिसाये गये थे वे आर्ष वेद कहलाते हैं ।।४२-४३n युगके आदिमें भरत चक्रवर्तीने जिसका सम्मान किया था ऐसा समस्त ब्राह्मणांका समूह नन्हीं आप वेदोंका अध्ययन कर इन्हीं में बतायी हुई विधिसे धर्म-यज्ञ करता था ॥४४॥ अव जिनमें इस युगके ब्राह्मणोंका तात्पर्य है उन अनापं वेदों- की उत्पत्ति कही जाती है ॥४॥ धारण-युग्म नगरमै एक राजा रहता था जिसे युद्ध-भूमिमें अयोध्य होनेके कारण योधा लोग अयोधन कहते थे ॥४६॥ सूर्यवंशको अलंकृत करनेवाले राजा अयोधनको महारानीका नाम दिति था। यह दिति चन्द्रवंशकी लड़की थी तथा चन्द्रवंशी राजा तृणविन्दुकी छोटी बहिन थो॥४७॥ महारानी दितिने कदाचित् स्त्रियोंके गुणोंको पिटारो स्वरूप मुलसा नामको कन्याको जन्म दिया जय वह-योधनवती हुई तब पिताने उसका स्वयंवर करवाया 11 और पृथिवी- के यशस्वी राजाओंको युलवाया जिससे विशाल यशके धारक, स्वयंवरके भभिलापी एवं आदरसे युक्त सगर आदि राजा वहाँ आ पहुँचे ॥४६|| एक दिन राजा सगरको मन्दोदरी नामको प्रतीहारी रानी दितिके घर गई थी, वहाँ उसने एकान्तमें दितिके यह वचन सुने कि बेटी मुलसा ! तू मुझसे बहुत स्नेह करती है क्योंकि पुत्रीका १. यधयारधनुद- म० । २. धर्म ती म । ३. पार्षभाः म०1४. -नयन्दाद्य -म ।

प्रयोविंशः सर्गः मुलेसे ! शणु घरसे मे वचस्व मातृवरसले । स्तन्यानुमारिणी स्नेहव्यक्तिमातरि यन्मता ॥५॥ जातः सर्वयशोदेम्यां तृणविन्दोममाग्रजात् । स्थितः सत्रमधिक्षिप्य भिया नु मधुपिहलः ॥५२॥ पूर्वमेव मया तस्मै मनसा स्वं निरूपिता । मन्मनोरयमेवातः पय व स्वयंवरे ।।५।। इयुश्रवा सुलसा साश्रु मातरं माह सा वरा । मारोदोर्मातरिष्टं ते कुर्वे राजन्यसंनिधौ ॥५४॥ इत्युक्तमखिलं श्रुरवा गरवा मन्दोदरी रहः । कन्यारवीकारचित्ताय सगराय न्यवेदयत् ॥५५॥ ततः पुरोहितेनाशु सगरो विश्वभूतिना । नरलक्षणविज्ञापि रहः शास्त्रमकारयत् ॥५६॥ स्वयंवरधरोस्खातलोहमपिकोद्धतम् । भदर्शयपुरो राज्ञां पुस्तकं धूमधूसरम ॥५॥ स्वयंवरार्थिनां तेषां पुरः पुस्तकमुच्चकैः । भवाचयपुरोधाच लक्षणप्रवणाधिनाम् ॥५॥ मस्यशङ्खाशायी पद्मगर्भनिभोदरौ। सुपाणिभागशोभायौ मुश्लिष्टाङ्गलिपर्वको ॥५॥ स्निग्धताम्रनखौ पादौ गूढगल्फौ सिरोझितौ । सोष्णौ कूर्मोसतो स्वेदमुक्तौ स्तां पृथिवीपतेः ॥६॥ सूर्पाकारी सिरानी यौ रूक्षनखौ स्मृतौ । पादौ पापवतः पुंसः संशुष्को विरलाइगुली ॥६॥ सच्चिद्रौ सकपायी च वंशच्छेदकरौ तु तौ। हिस्रस्य दग्धमृरछायो पीती गम्येत रोपिणः ॥१२॥ अल्पातितनुरोमानुवृत्तजका सुजानवः । वृत्तोरवः शुभा निन्याः शुष्कजहोरुजानवः ॥१३॥ माताके ऊपर जो स्नेह होता है वह दूधके अनुसार प्रकट होता है, इसलिए तू मेरो पात मुन ॥५०-५१॥ मेरे बड़े भाई राजा तृणविन्दुको सर्वयशा देवीसे उत्पन्न हुमा मधुपिङ्गल नाम- का पुत्र है जो अपनी शोभासे समस्त राजाओका तिरस्कार कर स्थित है-सबसे अधिक सुन्दर एवं प्रतापी है ॥५२।। मैंने पहले ही उसके लिए तेरे देनेका मनमें संकल्प कर लिया था। इसलिए तू स्वयंवरमै मेरा ही मनोरथ पूर्ण कर ॥५३॥ इस प्रकार कहकर माता दिति आँसू छोड़ने लगी। माताको रोती देख कन्या मुलसाने कहा कि हे माता ! तू रो मत ! मैं राजाओंके सामने जो तुझे 'इष्ट है वही करूंगी-तेरे कहे अनुसार मधुपिङ्गलको ही बरूँगी ॥५४॥ मन्दोदरीने यह सब मुना भोर जाकर कन्याको प्राप्तिके लिए उत्कण्ठित राजा सगरके लिए एकान्तम कह सुनाया ॥५५॥ तदनन्तर राजा सगरने शीघ्र ही अपने विश्वभूति नामक पुगेहितसे एकान्तमें मनुष्योंके लतणीको पतानेवाला एक शास्त्र धनवाया ॥५६॥ और उसे धूमसे धूसरित कर तथा लोहेको सन्दूक में भरवा कर स्वयंवरको भूमिमें गढ़वा दिया । जय स्वयंवरका दिन आया तब सगरने स्वयंवरको भूमिको मुद्दया फर लोहेका वह सन्दूक निकलवाया और उससे उक्त शास्त्र निकालकर राजाभोंक आगे दिखाया ॥७॥ स्वयंवरमें जो राजा आये थे, वे मनुष्योंके लक्षण मुनना चाहते थे । इस- लिए उन सबके आगे पुरोहितने जोर-जोरसे उस शास्त्रको याचना शुरू किया ॥५८) उसमें लिसा या कि राजाके पैर मछली, शंस तथा अंकुश आदिके चिहांसे युक्त होते हैं, फमलके भीतरी भागके समान उनका मध्य भाग होता है, एड़ियांको उत्तम शोभासे वे सहित होते हैं, उनको अंगुलियोंके पोरा एक दूसरेसे सटे रहते हैं, उनके नएस चिकने एवं लाल होते हैं, उनको गोह लिपी रहती है, पे नसीसे रहित होती है, प-युध उष्ण होते हैं, फाएके समान उठे होते हैं और पसीनासे युक्त रहते हैं ।।५१-६ापापी मनुष्य पर सूपाके भाकार, फैले हुए, नसीसे व्यान, देदे, रूप ना. मे युक्त, मूर्य एवं विल भंगुलियोंवाले होते हैं ॥६१जो पैर छिद्र सहित एवं फले रंग होने हैं यंशका नाश करनेवाले माने गये हैं। हिंसक मनुष्यके पैर जली हुई मिट्टी के समान भोर मोधी मनुष्य के पैर पीले रंग जानना चाहिए ॥२॥ जिनकी पिण्डलियो थोड़े एवं अत्यन्त मुदम रोमोसे युक्त और ऊपर-ऊपर गोल होती जाती हैं, जिनके घुटने अन्य और जागो १ मुरमे ! रार मे परमे २ माात्मने मा। २ गुगनुमागियो म.11 उन्मा क. प., ...हि पमपिपिप्प मः।५ यासा: सीकसारे चिरा पर म सम्मे 7 - - हरिवंशपुरागे एकैकं कूपके रोम राज्ञां द्वे द्वे सुमेधसाम् । ध्यादीनि जनिस्वानां केशाश्चैवंफलाः स्मृताः ॥६॥ भल्पं दक्षिणतो वक्र स्थूलमन्धि शुभं शिशोः । शिश्न तद्विपरीतं तु विपरीतफलं मतम् ॥६५॥ नियन्ते स्वल्पवृषणा विषमैः खीवलाश्च तैः । समै पाश्चिरायुष्काः प्रलम्यपणा नराः ॥६६॥ सशब्दमूत्राः सुखिनो विपरीतास्तु दुःखिनः । द्वयादिप्रदक्षिणावसंधारा: श्रीशास्तु नेतरे ॥६॥ स्थूलस्फिकच पुमानिःस्वो मांसलस्फिक् सुखी भवेत् । माण्डूकस्फिक् नरो व्याघ्रादुद्धप्तरिफरमृति मजेत राजा सिहकटिः प्रोक्तो वानरौष्ट्रकटिधनी । समोदरः सुखी दुःखो घटोरुपिठरोदरा ॥६॥ सम्पूर्णेनिनः पार निम्नवकरभोगिनः । कुरिभिश्च तथा निम्नै गिनः समकुवयः ॥७॥ उन्नतैः कुक्षिभिर्भूपाः कुधना विषमैश्च तैः । सर्पोदरा दरिद्रास्तु भवन्ति बहुभोजनाः ॥७॥ विस्तीर्णोलतगम्भीरवृत्तनाभिः सुखी नरः । निम्नाल्पाश्यनाभिस्तु कथितः क्रेशभाजनः ॥७२॥ शूलवाधाश्च दारिद्रय विषमा पलिमध्यमाः। सा वामदक्षिणावर्ता 'साध्या मेधां करोति च ॥७३॥ कुरुते भूपति नाभिः पनकर्णिकया समा | भायतोपर्यधःपाश्वा वित्तगोमस्चिरायुपः ॥७॥ शुभ हैं-अच्छे पुरुष हैं और जिनको पिण्डलियाँ, घुटने तथा जाँचें सूखी हैं वे निन्दनीय हैं ।।६३॥ राजाओंके एक रोम-कूपमें एक रोम होता है, विद्वानोके एक रोम-कूपमें दो रोम होते हैं और मूर्ख तथा निर्धन मनुष्योंके एक रोम-कूपमें तीनको आदि लेकर अनेक रोम होते हैं। रोमांक समान ही केशोंका भी फल समझना चाहिए ॥६॥ बच्चेका लिंग यदि छोटा दाहिनी ओर कुछ टेढ़ा और मोटी गाँठसे युक्त है तो शुभ है और इससे विपरीत अशुभ है ॥६५॥ जिन मनुष्यों के वृषण (अण्डकोप) अत्यन्त छोटे होते हैं वे शीघ्र मर जाते हैं, जिनके विषम-एक छोटे एक बड़े होते हैं वे स्त्रियोंपर अपना पल रखते हैं-त्रियोंको वश करनेवाले होते हैं, जिनके एक बराबर होते हैं वे राजा होते हैं और जिनके नीचेकी ओर लटकते रहते हैं वे दीर्घजीवी होते हैं ॥६६॥ पेशाब करते समय जिनका मूत्र शब्द सहित निकलता है वे सुखी होते हैं और जिनका मूत्र शब्दरहित निकलता है वे दुखी होते हैं। पेशाब करते समय जिनके मूत्रको पहली और दूसरी धारा दाहिनी ओर पड़ती है वे लक्ष्मीके स्वामी होते हैं और जिनकी धारा इसके विपरीत पड़ती है वे निर्धन होते है ॥६७। जिस पुरुषका नितम्ब स्थूल होता है वह दरिद्र होता है, जिसका पुष्ट होता है वह सुखी होता है और जिसका मण्डूकके समान ऊँचा उठा होता है वह व्याघ्रसे मृत्यु- को प्राप्त होता है ॥६॥ जिसकी कमर सिंहको कमरके समान पतली होती है वह राजा होता है और जिसकी कमर वानर अथवा ऊँटको कमरके समान होती है वह धनी होता है । जिसका पेट न छोटा न बड़ा किन्तु समान होता है वह सुखी होता है और जिसका पेट घड़ा अथवा मटकाके समान हो वह दुखी होता है ॥६॥ जिनकी पसलियाँ भरी हुई हों वे मुखी होते हैं और जिनकी पसलियों नीची तथा टेढ़ी हों वे भोगरहित होते हैं। जिनकी कूख नीची हो वे भोग रहित होते हैं, जिनकी ।ख सम हों वे भोगी होते हैं, जिनको पूँख उठी हुई हों वे राजा होते हैं और जिनकी कँख विषम हों वे निर्धन होते हैं। जिनका उदर सर्पके समान लम्बा हो वे दरिद्र तथा बहुत भोजन करनेवाले होते हैं ।।७०-७१। जिसकी नाभि चौड़ी, ऊँची, गहरी और गोल होती है वह सुखी होता है और जिसको नाभि छोटी तथा कुछ कुछ दीखनेवाली होती है वह क्लेशका पात्र होता है ||७२।। यदि मध्य भागको रेखाएँ विषम हैं, तो वे शूलको बाधा तथा दरिद्रताको उत्पन्न करती हैं और वही रेखा यदि बायीं और दाहिनी ओर आवर्ती-भैवरोंसे युक्त हैं तो उत्तम बुद्धिको करती हैं ॥७३॥ कमलको कर्णिकाके समान नाभि मनुष्यको राजा बना देती है और जिसका ऊपर, नीचे तथा आजू-बाजूका भाग विस्तृत हो ऐसी नाभि मनुष्यको धनवान् १. साव्य म० । २. पार्श्व म।

प्रयोविंशः सर्गः . शाम्बा नीप्रिया नियमाचार्या यहपश्यकः । एकद्विनिचतुर्मिः स्यादलिभिः नितिपोऽयति ॥७५॥ ज्ञेयाः रववारमन्तुष्टा ऋजुभिवलिभिनंराः। भगायगामिनः पापा विषमलिभिः पुनः ॥७॥ मामलेदभिः पादक्षिणायतरोमभिः । भूपास्सद्विपरीतैस्तु परमेष्यकरा नराः ॥७॥ मुमगाः स्युरनुधूनैश्चुकैः पीवरेनराः । दीर्घश्च विषमैमस्या जायन्ते धनयजिताः ॥७॥ मामलं हदयं राजा पृथ्शनमयेपनम् । विपरीतमपुण्यानां पररोममिराचिराम् ॥७॥ पक्षीमिश्च समैराळ्याः पीनः शरास्वकिशनाः । सनुभिर्विपमैनिनिःस्यास्तथा शवासीविरा:" icon पीनेन जानुना गाया भोगवानुननेन । निस्यो निम्नास्थिनन्छेन यिषमो विपमेण मा0 नित्यमस्येदनाः कसाः पीनोन्नतमुगन्धयः । निश्चेतम्या धनेशानां सला. समरोमभिः ॥१२॥ निःस्वस्य चिपिटा ग्रीवा संशुष्का च सिराचिसा । कम्युग्रीयो नृपः शूरो महिपीयमानयः ।।२।। भरोमशममानं च पृष्टं शुमकरं मतम् । रोमशं घातिमुग्नं च न शुभावहामिप्यते ॥८॥ भदपायमांमली भुंग्नी रोमशावधनस्य तु । मुश्लियो मांसलायंसी शीय वित्तयता नृणाम् ||५|| पीनो समी प्रणम्यौ च करी करिकरोपमी । नृपाणामधनानां तु नृणां हम्पी व रोमशी ॥८॥ दीपा दीर्घायुषां पुंसां करशाप्पाः मुकोमलाः । मुमगामामयलिसाः सूचमा मेवामिना पुनः ||६ गोमान और दीर्घजीवी करती है ॥४॥ जिसके एक वलि होती है पर शास्त्रार्थी होता है, जिसके दो यलि होती है यह निरन्तर स्त्रीका प्रेमी होता है, जिसके तीन वलि होनी हैं यह माचार्य होता है और जिसके चार वलि होती हैं यह यहुत सन्तानयाला होता है और जिसके एक भी पलि नहीं होनी यह राजा होता है ||७|| जिन मनुष्योंकी पलि मीधी होती है वे स्यदार- सन्नीपी होते हैं और जिनकी यलि विषम होती है वे अगम्यगामी एवं पापी होते हैं ।।६।। जिन गाने -~ 1. अथवा विषम होते है ये निधन होते है || राजाओंका हृदय पुष्ट, चौड़ा, ऊँचा और फम्पनमे रहित होना है तथा पुण्यहीन मनुष्योंका हृदय इससे विपरीत तीक्ष्ण गेगास व्याप्त होता है | जिनके यक्षस्थल सम हो वे सम्पत्तिशाली होते हैं, जिनके स्थूल हो ये शूर-बीर किन्तु निर्धन होते हैं और जिनके कृश तथा यिम व निधन एवं शम्से मरनेवाले होते हैं ॥८०॥ जो मनुष्य स्थूल घुटनेसे सहित होता है यह धनाड्य होता है, जिसका घुटना ऊँया नठा होता है यह भोगी होता है, जिनका गहरा तथा हदियोंसे यद्ध रहता है यह निर्धन होता है और जिमका विषम होना है यह विषम हो रहना है || धनाढ्य मनुष्यांकी यगले निरन्तर पसीनासे रहित, पुष्ट, ऊँची, सुगन्धित और समान रोमांसे व्याप्त रहती है ॥२॥ निर्धन मनुष्यको गरदन घपटी सूची एवं नसीसे व्याप्त रहनी है। इसके विपरीत शतके समान गरदनवाला मनुष्य राजा होता है और भैसेके समान गरदनयाला मनुष्य शूर-धीर होता है ||३|| जो पीठ रोगरहित एवं सीधी हो यह शुभ मानी गई है तथा जो रोमांसे व्याप्त और अत्यन्त मुकी हुई हो यह अच्छी नहीं मानी गई है।शानिर्धन मनुष्य कन्धे छोट, अपुष्ट, नाचेकी और मुके हुए और गेमाने व्याप्त होते हैं नया पराक्रमी और धनवान् मनुष्यों के पन्धे सटे हुए एवं पुष्ट होते हैं ॥५|| राजाओं के हाथ स्यूल, मम, ठम्ये और हायाको हक समान होते हैं परन्तु निर्धन मनुष्योंकि हाथ छोट और रोमांस युक्त रहते हैं ॥८६॥ दीर्घायु मनुष्योंकी आलियाँ लम्मी तथा अत्यन्त कोमल होती है, भाग्यशाली १. शालार्थ नीप्रियो मः। २ वलिरहितः। ३. अन्यदाररता नोया या निराः । ४. अस्य श्लोकस्य स्थाने 'व' पुग्न इत्यं पाठः 'स्थ्लेच मृदुभिः पाश्र्य दक्षिणायगरोममिः । राजा भवति मोइसापन्यया किं भवेत् ॥ ७ ॥५. जीविनः म० १६. पातिभग्नं म०। ७ भग्नी मः।

हरिवंशपुराणे स्थूला धन विमुक्तानां चिपिटाः प्रेष्यकारिणाम् । आठ्याः कपिकरा माः क्रूरा व्याघ्रकराः स्मृताः ॥८८] निगृढगूढसुश्लिष्टसन्धिसन्मणिबन्धनैः । भूपा दारिद्रययुक्तास्तैः सशब्दैश्च श्लथैस्तथा ॥८॥ निम्नैः करतलैः क्लीयाः पितृवित्तविजिताः । धनिनः 'संभृतैनिम्नैः प्रोत्तानस्तु प्रदायकाः ॥१०॥ लासाभरीश्वरा निस्स्वा विपमैविपमाश्च तैः । अगम्यगामिनः पीतैरू रूपविवर्जिताः ॥६॥ तुपच्छविनखैः क्लीवाः स्फुटितैर्वित्तवर्जिताः । आताम्रश्च चमूनाथा कुनखैः परितर्किणः ॥१२॥ अङ्गुष्ठजैर्य वैराध्याः पुत्रिणोऽङ्गुष्टमूलजैः । निम्नातिस्निग्धरेखाभिर्धनिनो व्यत्ययेऽन्यथा ॥१३॥ सुघनाइगुलयोऽर्थाढ्या विरलागुलयोऽन्यथा । तिसः करमिता रेखा नृपतेर्मणिबन्धनात् ॥६॥ प्रदेशिनी सृता रेखा लक्षणं परमायुपः । छिन्नाभिस्ताभिरूनाभिरायुरूनं निरूपितम् ॥१५॥ भसिशक्तिगदाकुन्तचक्रतोमरपूर्विकाः । कथयन्ति चमूनाथं कररेखाः परिस्फुटम् ॥१६॥ कृशैस्तु चिबुकैदीधै निस्स्वा धन्यास्तु मांसलैः । भोष्टरस्फुटितावर्भूपा विग्बफलोपमैः ।।१७।। तीचगदंष्टाः समाः स्निग्धा विशदा दशना घनाः । जिह्वा रक्ताच दीर्घा च श्लपणाभोगवतां नृणाम् ॥८॥ आननं सम्भृतं सौम्यं समं राज्ञामवक्रकम् । दुर्भगानां वृहद्वक्त्रं शठानां परिमण्डलम् ॥२६॥ मनुष्योंकी बलिरहित और बुद्धिमान् मनुष्योंको छोटी-छोटी होती हैं ॥७॥ निर्धन मनुष्यों के हाथ स्थूल रहते हैं, सेवकोंके हाथ चिपटे होते हैं, वानरोंके समान हाथवाले मनुष्य धनाढ्य होते हैं और व्याघ्रके समान हाथवाले मनुष्य शूर-वीर होते हैं ॥८॥ जिनकी कलाइयाँ अत्यन्त गूढ एवं सुश्लिष्ट सन्धियोंसे युक्त होती हैं वे राजा होते हैं और जिनकी कलाइयाँ ढोली तथा शब्दोंसे सहित हैं वे दरिद्रतासे युक्त होते हैं | जिनकी हथेलियाँ गहरी-भीतरको दबी हुई हों वे नपुंसक तथा पिताके धनसे रहित होते हैं, जिनकी हथेलियाँ भरी हुई तथा गहरी हो वे धनाढ्य होते हैं और जिनकी हथेलियाँ ऊपरको उठी हुई हों वे दानी होते हैं ॥६०॥ जिनकी हथेलियाँ लाखके समान लाल हो वे धनाढ्य होते हैं, जिनकी विषम होती हैं वे दरिद्र तथा विपम होते हैं, जिनकी पोलो हों वे अगम्यगामी होते हैं और जिनकी रूक्ष होती हैं वे सौन्दर्यसे रहित कुरूप होते हैं ॥६१॥ जिनके नख तुपके समान हों वे नपुंसक, जिनके फटे हों वे निर्धन, जिनके कुछ-कुछ लाल हों वे सेनापति और जिनके भद्दे हो वे तर्क-वितर्क करनेवाले होते हैं ॥२॥ जिनके अंगूठेपर यवका चिह्न हो वे धनाड्य होते हैं, जिनके अंगूठेके मूलमें यवका चिह्न हो वे अधिक पुत्रवाले होते हैं, जिनके अँगूठे में गहरी तथा चिकनी रेखाएँ होती हैं वे धनाढ्य होते हैं और जिनके इससे विपरीत रेसाएँ हैं वे निर्धन होते हैं ॥३॥ जिनको अँगुलियाँ अत्यन्त सघन होती हैं वे धन-सम्पन्न होते हैं और जिनको अँगुलियाँ विषम होती हैं ये निर्धन होते हैं। जिनकी कलाईसे लेकर हाथ तक तीन रेखाएँ होती हैं ये राजा होने हैं ||४|| प्रदेशिनी अंगुली तक लम्बी रेखा दीर्घायुका चिह्न है अर्थात् जिसकी रेसा फनिष्ठासे लेकर प्रदेशिनी तक लम्बो चली जाती है वह दीर्घायु होता है और जिमकी रेखाएँ कटी तथा छोटी होती है वह अल्प आयुफा धारक होता है ॥६५तलवार, शक्ति, गदा, भाला, चक्र और तोमर आदिको रेसाएँ हाथमें हों तो वे स्पष्ट कहती हैं कि यह व्यक्ति सेनापति होगा ।।६६॥ जिनकी दादी पतली और लम्बी होती है ये दरिद्र होते हैं तथा जिनको पुष्ट होती है ये धनी होते हैं। जिनके ओंठ मिना फटे, सांधे और बिम्धीफलके समान लाल होते हैं वे राजा होते हैं ॥१७n जिनकी डादें तीक्ष्ण, सम और ग्निग्ध होती है, दाँत सफेद और सपन रहते हैं एवं जीभ लाल, लम्बी भीर कोमल होती है वे भोगी होते हैं NEFII जिनका मुग्म भरा हुआ, सौम्य मम भौर पुटिटना रहित होता है ये राजा होते हैं। जिनका गुग्प यहुन बड़ा होता है वे भमागे • मो-म०, ग० । २. प्रदेशिनी स्मना म. । ३. उष्टेरएटिना योभूषा म० ।

प्रयोविशः सर्गः रस्त्रीवस्त्रमनपत्यानां निग्नं वन्नं च निश्चितम् । हरवं कृपणमानां दीर्घमदव्यभागिनाम् ॥१०॥ शहुवर्णाः महीपालाः रोमकर्णाश्चिरायुपः । ऋग्वी समपुटा नासा स्वरसच्छिद्रा च भोगिनाम् ॥१०॥ सुक्षुतं धनेशानां द्विस्तिः शाखवतां विदुः । संहतं च प्रमुक्तं च विदितं चिरजीविनाम् ।।१०।। रक्तान्तैः पद्मपत्राभः श्रीधनमागिनः । गजेन्द्रवृपनेवास्तु भवन्ति वसुधाधिपाः ॥१०॥ भमङ्गलदशः पापाः पिगलामहासशिनः । असम्भाथ्याः सदा घुमामहश्याश्च विशेषतः ।।१०।। मानसर्वाचिकः कार्यः पापैः सम्वचिंताः सदा । दुर्जना दुर्भगाः फराः पापा मारिलोचनाः १०५॥ लक्षणानां समस्तानां गुणदोपविचिन्तने ! चक्षुर्लक्षणमेवान पर्याप्त फलमाधने ।।१०६॥ मानोन्मानस्वरं देहं गतिसंहतिमन्दयम् । सार वणं बुधो दृष्ट्वा प्रकृति च वदेत्फलम् ॥१०॥ इनि प्रवाच्यमानेऽसौ पुस्तके मधुपिगलः । नेत्रदोपकृताशको निर्गत्य सदसोऽगमत् ॥१०८।। सुलसां च परित्यज्य मनग्य नवयौवनः । मुनिचर्याधितो देशान् पर्यटन्मधुपिङ्गलः ॥१०६ ।। इतः सुलसदम्भोजलोचना सुलसा स्वयम् । प्राप्तः स्वयंवरे दक्षः सगरः सुखमन्यभूत् ॥१०॥ तदावेऽभ्येति शब्दश्चेद् वैदग्भ्यमभिकथ्यते । नातिगृढतया जन्तुरायस्यां तु दुरन्तताम् ॥१४॥ सामुद्रिकोऽन्यदाऽद्राधीनिःसङ्गमधुपिगलम् । मध्याह्रो पुरि स्याचित्पारणार्थमुपागतम् ॥१२॥ होते हैं और जिनका मुख गोलाकार होता है वे मूर्स होते हैं ।।६६॥ सन्तान-रहित मनुष्योंका मुख स्त्रीके समान तथा नीचा होता है । कंजूस मनुष्योंका मुख छोटा और निर्धन मनुष्योंका मुल लम्बा होता है ॥१०॥ जिनके कान कीलाके समान हों वे राजा होते हैं, जिनके कानोंपर रोम होते हैं वे दीर्घायु होते हैं, जिनकी नाक सीधी समान पुटवाली एवं छोटे छिद्रोंसे युक्त होती है वे भोगी होते हैं ॥१०॥ जिनको एक छींक आवे वे धनाढ्य, जिनको दो-तीन छींके एक असाथ आवें वे विद्वान् तथा जिनको लगातार अनेक खुली छींके आवें वे दीर्घायु होते हैं ॥१०२।। जिनके नेत्र अन्तमें लाल और कमल पत्रके समान हो वे लक्ष्मीमान और जिनके गजेन्द्र एवं वैल- के समान हो वे राजा होते हैं ॥१०३॥ जो मनुष्य पिगलवर्णके नेत्रोसे युक्त हैं वे अमाङ्गलिक और पापो हैं उनके साथ न कभी बात करना चाहिए और न उनकी ओर सासकर देखना चाहिए ।।१०४॥ जिनके नेत्र मार्जार के नेत्रों के समान रहते हैं वे सदा मानसिक, पापनिक और कायिक पापोसे युक्त होते हैं तथा दुर्जन, अभागे, क्रूर और पापी माने गये हैं ॥१०॥ समरत लक्षणोंके गुण और दोपका विचार करते समय चतुके लक्षणका पूर्ण विचार करना चाहिए क्योंकि फलकी सिद्धि के लिए यही पर्याप्त कारण है ॥१६॥ विद्वानको चाहिए कि वह मनुष्य के मान, उन्मान, स्वर, देह, चाल-ढाल, वंश, उत्तमवर्ण और प्रकृतिको देखकर फलका प्रतिपादन फरे ॥१७॥ इस प्रकार पुस्तक बाँचे जानपर मधुपिगलको यह आशङ्का हो गयी कि हमारे नेत्र में दोप है इसीलिए वह सभासे निकलकर चला गया ॥१८यद्यपि मधुपिङ्गल नवयौवनसे युक्त था चयापि मुलसाको छोड़फर दीक्षित हो गया और मुनिष को धारणकर अनेक देशामें विहार करने लगा ॥१६॥ इधर राजा सगर बड़ा चतुर था इसलिए वह कमटके समान मुन्दर नेत्रोंवाली मुलसाको स्वयंवर में स्वयं प्राप्तकर मुखका उपभोग करने लगा ॥११॥ आचार्य कहते हैं कि ऐसी त्ति तत्काल तो चतुराई कही जाती है परन्तु यह सदा छिपी नहीं रहती इमलिए इसका करने- घाला प्राणी आगामो कालमें अवश्य ही दुष्परिणामको प्रार होता है -उसका सोटा फल भोगवा 7 है॥११॥ सदनन्तर एक दिन मध्यादफे समय पारणाके लिए फिसी नगरमं भाये हुए दिगम्बर मुद्रा १. पवं म.। २. मुनमती मुगीभमाने अम्मालोचने पर मा सान।

३४० हरिवंशपुराणे पादमस्तकपर्यन्तानिरूप्यावयवान्यनेः । सशिरसकम्पमाहासी महाविस्मयसत्तः ॥१३॥ तिलमानोऽपि देहस्य नेप्यतेऽवयवो मुनेः । सामुद्या सुदृष्टया यः शुद्धया परिदृप्यते ॥११॥ तिष्ठवन्यदिहामुष्य सल्लक्षणकदम्बकम् । राज्यं सौभाग्यमध्याह मधुपिङ्गलनेग्रता ॥१५॥ ईदग्लक्षणयुक्तोऽपि यदयं नवयौवने । परिभ्रमति भिक्षार्थी तखिक सामुद्रशासकम् ॥११६॥ यद्यप दग्धदेवेन कदायितुमर्थितः। तस्किमर्थमनिन्धेन लक्षणोधेन चर्चितः ॥१७॥ अथवा दुःखभीरुत्वान्न स्टशन्ति सुसैपिणः । फलितामपि दुप्पाका विषवल्लीमिव श्रियम् ॥११॥ शुभलक्षणपूर्णस्य पुनः शुद्धान्वयस्य हि । युज्यते' पतोऽमुप्य मुमुखोपया तिः ॥१६॥ सामुद्रिकवचः श्रुत्वा नरः कश्चिदुवाच तम् । कि सामुद्रिकवार्ताऽस्य न श्रुता विश्रुतावनी ॥१२०५ मिलितैः खलभूपालः सुलसायाः स्वयंवरे । चक्षुलंपणहीनोऽयमिनि संसदि दूषितः ॥१२॥ यथैव सूचकः पुंसां पृष्ठमांसस्य खोदकः । निन्दितः स्वप्रशंसी च तथैव किल पिलः ॥२२॥ परप्रमाणको सुग्धो मत्वात्मानमलक्षणम् । मधुपिट्नः शुभाशोऽयं विलक्षस्तपसि स्थितः ॥१२३॥ प्रमादालस्यदभ्यो ये स्वतो नागमेक्षिणः । ते शठविप्रलभ्यन्ते यादृष्टार्थगोचरे ॥१२॥ स्वयंवरे नरश्रेष्ठः कन्यया सगरो वृतः । वृतः पत्रसमूहेन भोगासक्तोऽवतिष्ठते ॥१२५॥ धारी मधुपिगलको एक सामुद्रिकशास्त्रीने देखा ॥११२॥ वह पैरसे लेकर मरतक तक मुनिराजके समस्त अवयवोंको देखकर बहुत भारी आश्चर्यमें पड़ गया और शिर हिलाता हुआ कहने लगा कि इन मुनिके शरीर में तिल बराबर भी ऐसा अवयय नहीं दिखाई देता जो सामुद्रिक शास्त्रकी शुद्ध दृष्टिसे दूपित किया जा सके अर्थात् जिसमें सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार दोप यताया जा सके ॥११३-२१४॥ इनके शरीरमें जो उत्तमोत्तम अन्य लक्षणों का समूह है वह तो एक ओर रहे एक नेत्रोंकी पीलाई ही इनके राज्य तथा सौभाग्यको सूचित कर रही है ॥११५॥ क्योंकि ऐसे लक्षणों से युक्त होनेपर भी जब यह नई जवानीमें भिक्षा के लिए इधर-उधर भ्रमण कर रहा है तब ऐसे सामुद्रिक शास्त्रको धिकार हो ॥११६॥ यदि दुर्दैव इसे पीड़ित ही करना चाहता है तो फिर निर्दोष लक्षणोके समूहसे इसे युक्त क्यों किया १ ॥११७॥ अथवा यह भी हो सकता है कि जो मनुष्य सुखको इच्छा रखते हैं वे दुःखसे भयभीत होनेके कारण फलोंसे लदी किन्तु खोटा फल देनेवाली विष लताके समान प्राप्त हुई लक्ष्मीको छूते भी नहीं हैं ।।११। यथार्थमें यह मुनि शुभ लक्षणोंसे पूर्ण और शुद्ध कुलका है तथा मोक्षकी इच्छासे तप कर रहा है इसलिए इसका दीक्षा द्वारा सन्तोष धारण करना युक्त हो है ॥११॥ सामुद्रिकके उक्त वचन सुनकर किसी मनुष्यने उससे कहा कि क्या आपने इसके सामुद्रिक शास्त्रको पात सुनी नहीं ? वह तो समस्त पृथिवीं में प्रसिद्ध है ॥१२०|| सुलसाके स्वयंवरमें इकट्ठे हुए दुष्ट राजाओंने 'यह नेत्रके लक्षणोंसे होन है' यह कहकर इसे सभामे दूपित ठहराया था ॥१२१।। उस समय कहा गया था कि जिस प्रकार पीठ पीछे दूसरेको चुराई करनेवाला चुगल और अपनी प्रशंसा स्वयं करनेवाला मनुष्य निन्दित है उसी प्रकार यह पिङ्गल भी निन्दित है. दोपयुक्त है ।।१२२॥ यह मधुपिङ्गल भोला-भाला था तथा दूसरों को प्रमाण मानता था इसलिए शुभ नेत्रोंका धारक होनेपर भी अपने आपको अशुभ लक्षणयाला मान बैठा और लजित हो तप करने लगा ॥१२३।। ठीक ही है जो मनुष्य प्रमाद, आलस्य और अहंकारके कारण स्वयं शास्त्रोंक नहीं देखते हैं वे देखे-अनदेखे पदार्थोक विषयमें धूतों के द्वारा ठगे जाते हैं ॥१२४|| मधुपिङ्गलके चले जानेपर फन्याने स्वयंवरमें राजा सगरको वर लिया जिससे वह क्षत्रियोंके समूहसे घिरा भोगामें आसक्त है ॥१२५॥ १ क्षपितेऽग । क्षिपितेऽ-ड । उन्नयतो ख. १ २. वृतदत्र •म | प्रयोविंशः सर्गः इति श्रुत्वा महाक्रोधः स मृत्वा मधुपिङ्गलः । जातो वननिकायेषु' महाकालोऽधमामरः ॥ १२६॥ बहो कपायपामस्य वैषम्यं यद्विरोधिनः । सम्यवस्वीपधिपानस्य जातमत्यन्तदूषणम् ॥१२७ ॥ सुलसापहति व्यारवा सोपायां सगरेण सः। क्रोधाग्निना महाकालो जम्वाल हृदये भृशम् ॥१२॥ नीवर विपदग्धस्य हृदयस्य विदाहिनः । स दाहोपशमं करत न शशाक शमाम्बुना ॥१२॥ अचिन्तयदसी येन शनोदुःसपरम्परा । जायवे दीर्घसंसारे तमुपायं करोग्यहम् ।।१३०॥ प्राणी प्रत्यपकाराय चेष्टते छपकारिणः । तैरुपाययंकैयोति मूढधीः स्वयमप्यधः ॥१३॥ भागतश्च महाकालः सोधेन दीपितः । नारदेन नितं जल्पे पश्यति स्म स पर्वतम् ॥१३२॥ शाण्डिल्याकृतिरूपोऽध तस्य विश्वासमाह सः । मागाः पर्वत ! निवेदं जरूपेऽहं जित इग्यलम् ॥१३॥ धीच्यनाम्नो पुरोः शिष्यः शाण्डिल्योऽहं पिता च ते । वन्यश्चापि तथोदशः प्रावृतश्चैव पञ्चमः ॥१३॥ सूनोः चीरकदम्बस्य भवतो यः पराभवः । स ममैव ततोऽस्याहं मानाय समुद्यतः ॥१३५॥ सहायं मां परिप्राप्य कुछ क्षेत्रमकण्टकम् । मख्ससस्य रौदस्य शिखिनः किमु दुष्करम् ॥३॥ इति पर्वतमाभाष्य पुरस्कृत्य स दुष्टधीः । सक्ष भरतक्षेयं चक्रे व्याधिशताकुलम् ॥१३॥ धके व्याधिविनासाय शान्तिकम च पर्वतः। विश्वासन ततो लोकः शरणं प्रतिपद्यते ॥१३८।। सगरः क्षत्रलोकेन सहोपेग्य तमादरात् । होममन्यविधानश्च यभूव विगतग्नरः ।।१३।। यह सुनकर मधुपिङ्गलको बहुत भारी क्रोध उत्पन्न हुआ और उसी समय मरकर यह व्यन्तर देवोंमें महाकाल नामका नीच देव हुआ ॥१२६॥ आचार्य कहते हैं कि अहो कपाय रूपी कपले शरयतकी यही विषमता है क्योंकि वह सम्यग्दर्शन रूपी ओषधिके शरवतको अत्यन्त पित कर देता है। भावार्थ-जिस प्रकार फपैला रस पीनेसे उसके पूर्व पिया हुआ मीठा रस दूषित हो जाता है उसी प्रकार क्रोधादि कपायोंकी तीव्रतासे सम्यग्दर्शन रूप ओषधिका रस दूपित हो जाता है-सम्यग्दर्शन नष्ट हो जाता है, यह बड़े आश्चर्यको घात है ॥१२७। राजा सगरने उपाय भिडाफर मुलसाका अपहरण किया था इसका ध्यान आते ही महाकाल, हृदयमें शोध रूपी अग्निसे अत्यन्त जलने लगा | उसका हृदय नीके पैर रूपी विपसे जलफर वीन दाइ उत्पन्न कर रहा था इसलिए यह शान्ति रूपी जलसे उसकी दाहको शान्त करने के लिए समर्थ नहीं हो सका ॥१२॥ वह विचार करने लगा कि जिससे शत्रुको दीर्घ संसारमें दुःोंकी परम्परा प्राप्त होती रहे मैं उसी उपायको करता हूँ ॥१३०॥ आचार्य कहते हैं कि यह प्राणी अपने अपकारी मनुष्यका उन उपायोंसे अपकार करनेको बदला लेने की चेष्टा करता है कि जिनसे वह मूर्ग स्वयं नीचेकी ओर जाता है-अधोगतिको प्राप्त होता है ॥१३१॥ इस प्रकार गना मगरके ऊपर कोषसे देदीप्यमान होता हुआ महाकाल पृथिवीपर भाया और भाते हो तुमने सानार्थमें नारदके द्वारा जाते हुए पर्वतको देखा ॥३२॥ महाकालने शाण्डिल्यका रूप धारण कर पर्वतको विश्वास दिलाते हुए उससे कहा कि हे पर्वत ! तुम इस यातका ग्वेद मन फगे कि में शास्त्रार्थमें हार गया हूँ ॥१३३।। प्रौव्य नामक गुरुके में शाण्डिन्य, तुम्हारे पिता शीरफदायक, पैन्य, उदम्प और प्राप्त ये पाँच शिष्य थे ॥१३॥ तुम साम्यफ पुत्र हो इसलिए जो तुम्हारा पराभव है यह मेरा ही पराभव है और इसीलिए मैं उसे दूर करनेके लिए मान ६ ॥१३॥ तुम मेरी सहायता पाकर अपने क्षेत्रको निष्कण्टक करो, क्योंकि यायुसे प्रज्याटिन 7 भयंकर अग्निको क्या कार्य कठिन है ? भर्यान् युछ भी नहीं ॥१३६॥ डम प्रकार दुर्युद्धिके धारफ महाकालने पर्वतसे कहकर तथा उसे आगे फर गजाओं सहित समस्त भरत क्षेत्री सेरों भीमारियोंमे व्याकुल कर दया ॥१३७ उन बीमारियोंको नष्ट करने के लिए पर्यन शान्तिकम करना था जिससे लोग विश्वास कर उसको शरणमें आने लगे ॥१३८|| गजा मगर मी भनेक १. पन्तदे।। प्रानिकायम 1२. महायो म । ३ पराम.४, पाई।

- ३४२ हरिवंशपुराणे हिसानोदनयाऽनापान क्रूरान् क्रूरः स्वयंकृतान् । वेदानध्यापयन् विप्रान् क्षिप्रं देवोऽनयदशम् ।।१४०॥ अश्वमेधोऽजगोमेधो यागो यागफलैषिणाम् । दर्शितः सनियादीनां साक्षात्प्रत्ययकारिणाम ॥१४॥ सूयन्ते यत्र राजानः शतशोऽपि सहस्रशः । राजसूयक्रतुस्तेन दर्शितो राजवैरिणा ॥१४२।। प्राग्दिवाकरदेवाख्यः खेचरो नारदाम्वितः । पापविघ्नकरस्तेन विधिनतः सुरमायया ॥१३॥ अणिमादिगुणोत्कृष्ट विकुर्वाणे सुराधमे । विद्याबलसमृद्धोऽपि मानुपः किं करिष्यति ॥१४॥ घातयित्वा बहून् जीवान् माहाणादिभिरुद्यतः । यष्टेऽयष्ट स दुष्टस्तान् स्वपरानिष्टकृत्सुरः ॥१४५॥ इवा च सगरं यागे सुलसां च कृपोज्झितः । हिसानन्दं परिप्राप्तः प्रयातश्च मिजं पदम् ॥१४॥ प्रवर्तिताश्च ते वेदा महाकालेन कोपिना । विस्तारितास्तु सर्वस्यामवनौ पर्वतादिभिः ॥१७॥ नारदस्य सुतायाऽसौ खेचरोऽपि सुदृष्टये । सुतां परमकल्याणी ददौ विद्यासमन्विताम् ॥१४॥ अन्वये तनुजातेयं क्षत्रियायां सुकन्यका । सोमश्रीरिति विरयाता वसुदेवद्विजन्मनः ॥१४॥ करालब्रह्मदत्तेन मुनिना दिव्यचक्षुपा । वेदे जेतुः समादिष्टा महतः सहचारिणी ॥५०॥ इति श्रुत्वा तदाधीत्य सर्वान् वेदान् यदूत्तमः । जि-वा सोमश्रियं श्रीमानुपयेमे विधानतः ॥१५॥ परे प्रेम वर जातं नववधा यथा दृढम् । वरस्यापि तथा तस्यां तन का सुसवर्णना ॥१५२॥ राजाओके साथ आदरपूर्वक उसके पास आया और बताये हुए होम तथा मन्त्र-विधानसे नीरोग हो गया ।।१३।। दुष्ट महाकाल देव हिंसाकी प्रेरणा देने के लिए स्वयं बनाये हुए अनार्य वेद ब्राह्मणोको पढ़ाता था और उन्हें शीघ्र अपने वश कर लेना था ॥१४०॥ उसने यज्ञके फलको इच्छा रखनेवाले एवं साक्षात् विश्वास करनेवाले क्षत्रिय आदि जनोको अश्वमेध, अजमेध तथा गोमेध यज्ञ बतलाये ॥१४॥ जिसमें सैकड़ों हजारों राजा होमे जाते थे ऐसा राजसूय यज्ञ भी उस राजाओंके वैरी महाकालने दिखलाया था ॥१४२॥ यद्यपि प्रादिवाकर देव नामका विद्याधर नारदके साथ आकर महाकाल के इस पाप कार्य विध्न करने के लिए उद्यत था तथापि देवकी मायाने उसके इस कार्यमे विघ्न डाल दिया ॥१४३॥ सो ठीक ही है क्योंकि अणिमादि गुणोंसे उत्कृष्ट नीच देव जब अपनी विकिया दिखानेमे तत्पर है तब मनुष्य विद्यायलसे समृद्ध होनेपर भी क्या कर सकता है ? ॥१४४॥ इस प्रकार निज और परका अहित करनेवाले उस दुष्ट देवने आज्ञापालन करनेमे उद्यत ब्राह्मण आदिके द्वारा बहुत जीवोंका घात कराकर उन्हें यज्ञमें होम दिया। यही नहीं उस निर्दयने राजा सगर और सुलसाको भी यज्ञमें होम दिया और इस प्रकार हिंसानन्द नामक रोद्र ध्यानको प्राप्त होता हुआ अपने स्थानपर चला गया ।।१४५-१४६।। क्रोधसे युक्त महाकाल देवने उन अनार्ष वेदों को चलाया और पर्वत आदिने समस्त पृथिवीपर उनका विस्तार किया ॥१४॥ नारदका एक सम्यग्दृष्टि पुत्र था। उसे प्रादिवाकर देव नामक विद्याधरने विद्याओसे सहित अपनी परम कल्याणी पुत्री प्रदान की थी ॥१४॥ उसी वंशमें वसुदेव ब्राह्मण- की क्षत्रिया वीसे यह सोमश्री नामकी उत्तम कन्या उत्पन्न हुई है ॥१४६॥ करालब्रह्मदत्त नामक अवधिज्ञानी मुनिराजने कहा था कि जो इसे वेदोमें जीतेगा उसो महापुरुपकी यह स्त्री होगी ॥१५॥ यह सुनकर श्रीमान कुमार वसुदेवने उस समय समस्त वेदीका अध्ययन किया और सोमश्रीको जीतकर विधिपूर्वक उसके साथ विवाह किया ॥१५१॥ जिस प्रकार नववधूका कुमार वसुदेवमें हद प्रेम था उसी प्रकार कुमार वसुदेवका भी नववधूम दृढ़ प्रेम था। इसलिए उनके १. मुरोलष्टे म० | २ यष्टे यथा स दुष्टस्ता म. | ३. यमुदेवः । ४. परिणीतवान् ।

प्रयोविंशः सर्गः
पृथ्वोच्छन्दः
रहस्यकृत वक्षसा धनपयोधरोस्पीडनं
चुचुम्ब सकचग्रहं जघनमाजधानाधरम् ।
ददंश नृवरो वरः सनसपातमस्या वधू-
विवेद मदनातुरा न च तथाविधं याधनम् ॥१५॥
पचार पचरीसम्यः ग्वचरलोक्लोकाधिक
रवरूपगुणसम्पदारतिपु दक्षिणो यो
स्थतन्त्रजिनभन्न्याश्रमदतीव सोमश्रिया
पुरे गिरितराभिधे मुमतिचारुयोनिमः ॥१५॥
युवा।
इति अरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनमेनाचार्यकृती सौमश्रीलागवर्णनों
नाम प्रयोविंशः सर्गः ॥२३॥
मुगका फ्या वर्णन किया जाय ? ॥१५२॥ कुमार यसुदेवने एकान्त स्थानमें अपने यशस्थलसे
नमके स्थूल स्तनोंका पीडन किया, केश खींचते हुए चुम्यन किया, नवक्षन करते हुए नितम्यका
भारफालन किया और अधरको डसा परन्तु कामातुर सोमश्रीने उम प्रकारको बाधाको कुछ भी
नहीं जाना ॥१५३।। जो अपने सौन्दर्य तथा गुण रूणे सम्पदाके द्वारा विद्याधरोंसे भी श्रेष्ठ थे, जो
विद्यापरियों के साथ भ्रमण करते थे, जो रतिक्रिया अत्यन्त कुशल एवं युवा थे और जो मुबुद्धि
स्पो सुन्दर स्त्रीके सपा थे, ऐसे कुमार वसुदेवने गिरितट नामक नगरमे स्वतन्त्र एवं जिनभक्त
रमणी मोमीके साथ अत्यधिक क्रीडा की ॥१५४॥
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराण के संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरियंशपुराणमें सोमश्री
लाभका वर्णन करनेवाला तेईसयों सर्ग समाप्त हुआ ॥२२॥

चतुर्विंशः सर्गः ४ अधासावेकदा शौरिरिन्द्रशर्मोपदेशतः । उद्याने साधयन् विद्यां निशि धूर्तनिरीक्षितः ॥१॥ आरोप्य शिविका कापि दूरं नीतो दिवानने' । अपसृत्य ततो यातो नगरं तिलवस्तुकम् ॥२॥ बाह्यचैत्यगृहोद्याने रानी सुप्तः प्रबोधितः । केनचिद्राक्षसेनेव पुंसा मानुपमक्षिणा ॥३॥ भो ! भो ! बुध्यस्व बुध्यस्व कस्त्वं स्वपिपि मानुष । व्याघ्रस्येव क्षुधातस्य ममास्ये पतितः स्वयम् ॥४॥ विनिद्रो रौद्रनादेन शौरिः शूरतरोऽमुना । जिघांसन्तं भुजेनारिमाजघान भुजेन सः ॥५॥ दृढमुष्टियनाघातघोर निर्धोपभीषणम् । भूतं भूतलसंशोभं युद्धमुद्धतयोस्तयोः ॥६॥ चिरेण दानवाकारो यादवेन बलीयसा । निहत्य मल्लयुद्धऽसौ मोचितः प्रियजीवितम् ॥७॥ प्रभाते पौरलोकस्तं नराशिनरनाशनम् । रथेन पुरमावेश्य सत्यौरुपमपूजयत् ॥८॥ कन्याः पञ्चशतान्यत्र रूपलावण्यवाहिनीः । कुलशीलवतीलब्ध्वा तत्र तावदतिष्ठपत् ॥६॥ कुसस्त्योऽयं नृमांसादः पुरुषः परुषाशयः । इति तेन तदा पृष्टद्धरिति निवेदितम् ॥१०॥ आसीनृपः कलिङ्गेषु पुरे काञ्चननामनि । जितशत्रुगणः ख्यातो जितशत्रुरभिख्यया ॥१॥ भासीदयममोघाज्ञः स्वदेशे देशपालकः । जीवधातनिवृत्तेच्छः सर्वनाभयघोषणः ॥१२॥ अथानन्तर एक समय कुमार वसुदेव, इन्द्रशर्मा ब्राह्मणके उपदेशसे गिरितट नगरके उद्यान मै रानको विद्या सिद्ध कर रहे थे कि कुछ धूताने उन्हें देख लिया ॥१॥ वे उन्हें पिछली रात्रिमें पालकीपर बैठाकर कहीं दूर ले गये। वसुदेव वहाँ से चलकर तिलवस्तु नामक नगर पहुँचे ।।२।। और वहाँ नगरके बाहर जो चैत्यालय था उसके उद्यानमें रात्रिके समय सो गये, वहाँ राक्षसके समान एक मनुष्यभक्षी पुरुपने आकर उन्हें जगाया ॥३॥ वह कहने लगा कि अरे मनुष्य ! जाग-जाग, तू यहाँ कौन सो रहा है ? भूखसे पीड़ित बाघके समान मेरे मुखमें तू स्वयं आकर पड़ा है ॥४॥ शूर-वीर वसुदेव उस भयंकर शब्दसे जाग उठे । जब मनुष्यभक्षी पुरुप अपनी भुमासे वसुदेवको मारनेके लिए उद्यत हुआ तब उन्होंने भी अपनी भुजाभोंसे उसे कसकर पिटाई लगाई ॥५॥ तदनन्तर प्रबल शक्तिको धारण करनेवाले उन दोनोंके बीच पृथिवीको कपा देनेवाला युद्ध हुआ। उनका वह युद्ध मुट्ठियोके प्रबल प्रहारसे उत्पन्न घोर शब्दसे भयंकर था ॥६॥ वसुदेव बहुत बलवान् थे इसलिए उन्होंने बहुत देर तक युद्ध करनेके बाद उस दानवाकार मनुष्यको मल्लयुद्धमे मारकर प्राण-रहित कर दिया १७ जब प्रातःकाल हुआ तब नगरवासी लोग, उत्तम पौरुपके धारी एवं नरभोजी मनुष्यको नष्ट करनेवाले वसुदेवको रथपर बैठाकर नगरमें ले गये और उन्होंने वहाँ उनका बहुत सन्मान किया ॥८॥ कुमार वसुदेव उस नगरमें रूप और सौन्दर्यको धारण करनेवाली फुल और शीलसे सुशोभित पाँच सौ फन्याएँ प्राप्त कर यहीं रहने लगे ॥६॥ मनुष्योके मांसको सानेवाला यह दुष्ट मनुष्य यहाँ कहाँ से भाया था? इस प्रकार वमुदेयके पूछनेपर यहो के वृद्धजनोंने इस प्रकार कहा ॥१०॥ कलिङ्ग देशके काञ्चनपुर नामक नगरमें शत्रुओंके समूहको जीतनेवाला एक जितशयु नामका राजा था ॥१२॥ अपने देश में उस राजाको आज्ञाका कोई भी उल्लवन नहीं करता था। यह नीति पूर्वक देशका पालन करता था, उसकी इच्छा जीव हिंसासे दूर रहती थी तथा समस्त १ पभिमरात्री। २ बातम् । ३ मनुष्यमतिमनुष्यनाशक-यमुदेवम् । ४. स्थितगन् । ५. जितः रागणी येन सः।

चतुर्विशः सर्गः ३४५ - तनयस्तस्य सौदासः स मांसरसलालसः । मायूरमांसमानायाः पितुराज्ञामदापयत् ॥१३॥ प्रत्यहं शिखिनां मांसं सूपकारेण संस्कृतम् । भक्षयत्यप्रकाशं तत् प्रासादान्तरवस्थितः ॥१४॥ कदाचित्तु हृते मांसे मार्जारेण पुरो बहिः । सूपकारो गतोऽपश्यन्मृतं शिशुमुपांशु च ॥१५॥ भानीयादामुसंस्कृस्य सौदासोऽप्यघसन्मुदा । भपृच्छच्च स तं मांसं कायेदमिति सादरः ॥१६॥ अशितानि पुरा भद्र ! पिशितानि बहूनि भोः । न शतांशेन तान्यस्य स्पृशन्ति स्म रसान्तरम् ॥१७॥ सत्यं हि हितं सायो ! सत्यमस्मस ते भयम् । इत्युक्तः सोऽवदरसवं नीत्या युक्तः स्वचेष्टितम् 1950 सौदामोऽपि च तत् श्रुत्वा सूपकारं शशास सः । तुष्टोऽस्मि मर्त्यमांस मे नित्यमानीयतामिति ॥१॥ पितर्युपरते तावत्सौदासेऽपि पदस्थिते । सोपायं सूपकारोऽभूदन्वहं शिशुमारकः ॥२०॥ प्रत्येकं प्रत्यहं हानिमपरयानामवेक्ष्य वै । परीचय भएको लोकैराशु देशादपाकृतः ॥२१॥ रन्ध्र व्याघवदापत्य निशि नीरवा नु मानुपान् । दिवाऽरण्ये चरः कुर्याद् व्यसनोपहतो न किम् ॥२२॥ भसाभ्यो लोकविनासी स एप भवताऽधुना । प्रापितः साधुना मृत्युमसाधारणशक्तिना ॥२३॥ इत्यावेद्य वयोवृद्धाः सौदासस्य कुचेष्टितम् । वस्त्रमाल्यविभूपाद्यः पूजयन्ति स्म यादवम् ॥२४॥ लेभे च सोऽचलमामे सार्थवाहस्य देहजाम् । घेदसामपुरं घामा प्रयातो वनमालया ॥२५॥ राज्यमें उसने अभयकी घोषणा करा रक्खी थी ॥१२॥ उसका एक सौदास नामका पुत्र था। वह मांस खानेका वड़ा लम्पट था इसलिए उसने पितासे मयूरका मांस खानेकी आज्ञा प्राप्त कर ली थी॥१३॥ प्रतिदिन रसोइया उसे मयूरका मांस तैयार कर देता था और वह उसे महलके भीतर छिपकर खाया करता था ॥१४॥ किसी एक दिन तैयार मोसको दिल्ली उठा ले गई जिससे मांसकी तलाशमें रसोइया नगरके बाहर गया वहाँ उसने एक मरा हुआ यालक देखा जिसे वह दिपाकर ले आया और अच्छी तरह तैयार कर उसे सौदासके लिए दे दिया। सौदासने उस मांसको बड़ी प्रसन्नतासे खाया और आदरपूर्वक उस रसोइयासे पूछा कि यह मांस किसका है ? ॥१५-१६॥ वह फहने लगा कि हे भद्र ! मैंने पहले बहुतसे मांस खाये हैं पर ये इस मांसके रसके सौयें भागका भी स्पर्श नहीं करते ॥१७॥ हे भले भादमी ! जो बात सत्य और हितकारी हो वह कहो। यह सच है कि तुम्हें मुझसे कुछ भी भय नहीं है। इस प्रकार कहनेपर नीतिसे युक्त रसोइयाने अपनी सय चेष्टा सौदासके लिए बतला दी ॥१८॥ रसोइयाको यात सुनकर सौदासने उसको बहुत प्रशंसा की और कहा कि मैं तुम्हारे ऊपर बहुत सन्तुष्ट हूँ तुम प्रतिदिन मेरे लिए मनुष्यका हो मांस लाया करो ॥१६॥ तदनन्तर पिताके मरनेपर सौदास राज्य-सिंहासनपर आरुद्ध हुआ और उसका रसोइया किसी उपायसे प्रतिदिन बच्चोंको मारने लगा ॥२०॥ 'प्रतिदिन एक-एक बच्चेकी हानि होती जा रही है। यह देस नगरवासी लोगोंमें खलबली मच गई। उन्होंने परीक्षा कर सौदासको शिशु-भक्षक पाया। और उसे शीघ्र ही देशसे याहर सदेड़ दिया ॥२१॥ अम यह भवसर देस व्याघको तरह रात्रिमें झपाटा मारकर मनुष्यों को ले जाता है और दिनभर जगलमें रहता है सो लोक ही है क्योंकि व्यसनमें पढ़ा मनुष्य क्या नहीं करता है ? ॥२२॥ हे कुमार! लोगोंको भय. भौत करनेवाला यह वही सौदास था। यह हमलोगों के लिए असाध्य था परन्तु असाधारण राक्तिको धारण करनेवाले आपने उसे आज यमलोक पहुँचा दिया ॥२३॥ इस प्रकार नगरके षयो. पृद्ध लोगोने सौदासकी कुचेष्टाओंका वर्णन फर वन, माला तथा आभूषण भादिसे वमुदेवका सूप सत्कार किया ॥२४॥ तदनन्तर,यहाँसे चलकर कुमार वसुदेवने अपल मके सेठको पनमाला नामक पुत्रीको प्राप्त किया-उसके साथ विवाह किया और यहाँसे वनमाला के साथ पलकर वे पेदसामपुर 7 हरिवंगारागे तपुराधिपनि युद्ध, स जिग्वा कग्लिश्रुतिम् । टवाह विधिना धारस्तम्फया कपिलामियाम् ॥२६॥ तस्यामजनय पुत्र प्रसिद्ध कपिलाग्यया । प्रोनि रवमुरपुग प्राप्तवांशुमता पराम ॥२॥ धारियन्यन्यदा गन्धगजेन' हियमाणः । तमुष्टिबंधानमं नीलः शुचामवत् ॥२८॥ पतितश्च शनैः शौरिनडागाभम्पनाकृतः । अग्यान दिनिकाय गतः शारगुहां पुरीम् ॥२३॥ तत्र पद्मावती लेभे धनुर्वेदोपदेशतः । जिवा जयपुरेशं च तमुतामपि लभवान् ॥३०॥ साकर्ममता यातो भदिलाग्यपुरं परम् । पौरन नृपतिस्तन दुहिता धारहापिनी ॥३॥ दिग्योपधिप्रमावेन सा युर्ववेषधारिंगी । तेन विज्ञानवृत्तान्ता परिणीतानिहारिंगी ॥३२॥ पुयं पात्रं श्रियां तस्यां स पौण्ड्रमुपादयत् । निशि हंसपदेशेन इतत्रागारकारिणा ॥३३॥ विसृष्टवापि गद्गायां पपात वियतः शनैः । अपरयापुरं प्रातरिलावधनसंज्ञकम् ॥३॥ तत्रापणे निविष्टोऽसौ वगिदत्तबरासने । भाषणः गमाग पूर्यते स्म घनश्च सः॥३५॥ ताप्रभावमप्ती बुचा वणिग्नीत्वा स्वमन्दिरम् । ददौ रनवती यूने कन्यां धन्याय सम्पदा ॥३॥ भुझानः स तया दिव्यान् भोगानन्तरवनितान् । यातः शक्रमहं दष्टुमैकदा तु महापुरम् ॥३७॥ पुरो पहिरसौ दृष्ट्वा प्रासादान् विपुलान् बहून् । पृष्टयानिति केनामी किमयं वा निर्देशिताः ॥३८॥ पहुँचे ।।२५॥ वीर वसुदेवने वेदसामपुरके राजा कपिलमुनिको युद्धमें जीतकर उसकी कपिला नामक पुत्रौके साथ विधि-पूर्वक विवाह किया ॥२६॥ वहाँ कपिलाके भाई अंशुमान नामक साले. के साथ वसुदेव परम प्रीतिको प्राप्त हुए जिससे वहाँ रहकर उन्होंने कपिलाके कपिल नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥२७॥ एक दिन जिस नीलकण्ठने पहले नीलयशाका अपहरण किया था वह गन्ध हस्तीका रूप धरकर वेदसामपुरमें आया। उसे बन्धनमें डालनेके लिए जब वसुदेव उसपर आरूढ हुए तो उन्हें वह हरकर आकाशमे ले गया । यह देस वसुदेवने उसे मुट्ठियोंके दृढ प्रहारसे ' खूब पीटा जिससे शोकवश वह गन्धहस्तीका रूप छोड़कर नीलकण्ठ हो गया ॥२८॥ वसुदेव । धीरे-धीरे तालाबके जलमें गिरे और बिना किसी आकुलताके अटवीसे निकलकर शालगुहा नामक नगरीमें पहुंच गये ॥२६॥ वहाँ धनुर्वेदके उपदेशसे उन्होंने पद्मावती नामकी कन्या प्राप्त को । वहाँसे चलकर जयपुर गये और वहाँ के राजाको जीतकर उसकी कन्या भी प्राप्त की ॥३०॥ वहाँसे चलकर वे अपने साले अंशुमानके साथ भद्रिलपुर नामक श्रेष्ठ नगर गये । वहाँ उस समय पौण्डू नामका राजा राज्य करता था। उसकी चारहासिनी नामको एक कन्या थी, वह कन्या दिव्य ओषधिके प्रभावसे सदा युवाका वेप धारण करती थी । वसुदेवको इसका पता लग गया इसलिए उन्होंने उस अतिशय सुन्दरी कन्याके साथ विवाह कर लिया ॥३१-३२॥ तथा कुछ समय बाद उस कन्याम उन्होंने लक्ष्मीका पात्र एक पौण्ड्र नामका पुत्र उत्पन्न किया। एक दिन वसुदेव रात्रिके समय शयन कर रहे थे कि उनका वैरी अंगारक उन्हें हंसका रूप धरकर हर ले गया ॥३३॥ जब उससे छूटे तो धीरे धीरे आकाशसे गङ्गा नदीमें गिरे। उसे पारकर जब किनारे- पर आये तो सवेरा होते ही उन्होंने इलावर्धन नामका नगर देसा ॥३४॥ वहाँ वे एक दुकान सेठके द्वारा दिये हुए उत्तम आसनपर बैठ गये। उनके बैठते ही क्षणमात्रमे वह दुकान धनसे भर गई ॥३५इसको सेठ, वसुदेवका ही प्रभाव जानकर उन्हें अपने घर ले गया तथा वहाँ ले जाकर उसने भाग्यशाली तरुण वसुदेवके लिए अपनी रत्नवती कन्या प्रदान की ॥३६|| वसुदेव रत्नवती के साथ निरन्तराय दिव्य भोगोंको भोगते हुए वहीं रहने लगे। तदनन्तर वे एक समय इन्द्रध्वज विधान देखने के लिए महापुर नगर गये ॥३७॥ वहाँ उन्होंने नगरके बाहर बहुतसे बड़े- बड़े महल देखकर किसी मनुष्यसे पूछा कि ये महल किसने किसलिए बनवाये हैं ? ॥३८॥ १ गन्धगजेन्द्रहियमाणक: घ०१२. स चाभवत् म० । ३ तरैता- म०। ४. युपन्वेष- म०, क०, ग०,०,०।- चतुर्विशः सर्गः ३४० तेनोक्तं सोमदतेन राज्ञा कन्यास्वयंवरे । कारिता बहुशश्चिन्नाः प्रासादाः पृथिवीभृताम् ॥३३॥ स्वयंवर विधेः कन्या कुत्तश्चिदपि हेतुतः । विरक्ताऽभूदतः सर्वे राजानश्च विसर्जिताः ॥४०॥ इत्याकार्य स तस्याश्च चिन्तयन्मनसो गतिम् । पश्यग्निन्द्रमहं तन शौरियावदवस्थितः ॥४१॥ तावच्च एहसा प्राप्ताः सरचा नृपतिस्त्रियः । इन्द्रध्वजं च वन्दित्वा प्रस्थिताः स्वगृहं पुनः ॥४२॥ भालानस्तम्भमामस्य तदा स समदद्विपः 1 मारयन्सहसागच्छन्मयान्मृत्युरिव स्वयम् ॥४३॥ लोक्स्य मार्यमाणस्य महाकलकलध्वनिः । दिशो दश तदा व्याप रसतः पश्यतः पथि ॥४१॥ प्रासश्च मत्तमातङ्गो वेगी प्रवहणान्यसौ । कन्या प्रवहणाच्चैका पपात सभया क्षितौ ॥४५॥ करिणं निर्मदीकृत्य ता र भयाकुलाम् । पश्यतः सर्वलोकस्य कृतक्रीहः स यादवः ॥४६॥ परित्यज्य गजे श्रान्त कन्या भयविमूछिताम् । समाश्वासयदुत्थाय सा तमैक्षिष्ट रूपिणम् ॥४७॥ दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य वाप्पाकुलविलोचना। नपानता करं तस्य जग्राह स्पर्शसौख्यदम ॥४८॥ गते शौरौ यथास्थानं धात्री वृद्धा महत्तराः । प्रगृह्य कन्यकां तां च ययुरन्तःपुरालयम् ॥४६॥ ततः कुबेरदत्तस्य भवने कृतभूपणम् । शौरिमेत्य प्रतीहारी राजादेशात्ततोऽवदत् ॥५०॥ ज्ञातमेव हि ते नूनं वृत्तं देव ! यथा नृपः । सोमदत्तः प्रिया चास्य पूर्णचन्द्रेति कीर्तिता ॥५१॥ नाग्ना भूरिश्रवाः पुत्रः सोमश्रीस्तनयाऽनयोः । अस्याः स्वयंवरार्थ च समाहूता नरेश्वराः ॥५२॥ सोमश्रीनिशि हम्यस्था देवागमनदर्शनात् । जातिस्मरणसंयुक्ता मुमूर्छ प्रेमवाहिनी ॥५३॥ मनुष्यने कहा कि राजा सोमदत्तने अपनी कन्या के स्वयंवर में आनेवाले राजाओंके ठहरनेके लिए ये नाना प्रकार के महल बनवाये थे ॥३॥ परन्तु कन्या, किसी कारण स्वयंवरकी विधिसे विरक्त हो गई इसलिए स्वयंवर नहीं हो पाया और सब लोग विदा कर दिये गये ॥४०॥ यह सुनकर कुमार वसुदेव, उस कन्याके भनकी गतिका विचार करते हुए इन्द्रध्वज विधान देखनेके लिए ज्योंही बैठे त्याही रक्षकोंके साथ राजाको स्त्रियों सहसा वहाँ आ पहुँची। कुछ समय बाद वे स्त्रियाँ इन्द्रध्वज विधानको नमस्कार कर अपने घरकी ओर चलीं ॥४१-४२।। उसी समय बन्धनका खम्भा तोड़कर एक मदोन्मत्त हाथी साक्षात् मृत्यु ( यम ) की तरह मनुष्योंको मारता हुआ वहाँ आ पहुँचा ॥४३|| उस समय जो लोग मारे जा रहे थे तथा जो मार्गमें यह सब देखते हुए चिल्ला रहे थे उनका बहुत भारी कलकल शब्द दशो दिशाम व्याप्त हो गया ४४|| वह मदोन्मत्त हाथी बड़े वेगसे उन स्त्रियों के वाहनोके समीप आया जिससे भयभीत हो एक कन्या चाहनसे नीचे पृथिवीपर गिर पड़ी ॥४५॥ यह देख कुमार वसुदेवने उस हाथीको मदरहित कर भयसे घबड़ाई हुई उस कन्याको रक्षा की और सब लोगोंके देखते-देखते वे उस हाथीके साथ क्रीड़ा करने लगे ॥४॥ तदनन्तर जब हाथी थक गया तो उसे छोड़ उन्होंने भयसे मूच्छित कन्याको सान्त्वना दी। कन्याने उठकर सुन्दर रूपके धारक वसुदेवको देखा । देखते ही वह गरम और लम्बी साँस भरने लगी, उसके नेत्र आसुओं से व्याप्त हो गये तथा लज्जासे नम्रीभूत होकर उसने स्पर्शजन्य सुखको देनेवाला कुमारका हाथ पकड़ लिया ॥४७-४८॥ तेदनन्तर वसुदेव यथास्थान चले गये और वृद्धा धाय, तथा कुल की बड़ी बूढ़ी खियाँ उस कन्याको लेकर अन्तःपुर चली गयीं ॥en तत्पश्चात् एक दिन कुमार वसुदेव कुवरदत्त सेठके पर आभूषण आदि धारणकर बैठे थे कि इतनेमे राजाकी आज्ञासे उनकी द्वारपालिनी आकर कहने गी कि हे देव ! यह समाचार आपको अच्छी तरह विदित ही है कि यहाँका राजा सोमदत्त है और उसको रानी पूर्णचन्द्र नामसे प्रसिद्ध है ।।५०-५१॥ इन दोनों के भूरिश्रवा नामका पुत्र और सोमश्री नामकी कन्या है। कन्या सोमश्री के स्वयंवरके लिए राजाने अनेक राजाओंको बुलाया था ॥५२॥ परन्तु सोमनी रात्रिके समय महलके ऊपर बैठी थी वहाँ देवोंका आगमन देश यह १ विमोचना म०१२ भुवने मः।

हरिवंशपुराणे
लब्धसंज्ञा समुत्थाय ध्यायन्ती स्वर्गिणं पतिम् । स्नानाशननिवृत्तेच्छा मौनयतमशिश्रियत् ॥५४॥
एकान्ते पृष्टया कृच्छ्रात् कथितं च ममानया। पूर्वजन्मनि देवेन सह मीडितमारमनः ॥५५॥
पूर्वप्रच्युनदेवस्य हरिवंशे समुद्भवः । विज्ञातश्चानया देव्या सत्यात् केवलिभापितात् ॥५६॥
समागमश्च विज्ञातः परया हस्तिभयच्छिदा। संवादे चाधुना जाते सा ते वाञ्छति सङ्गमम् ॥५॥
राज्ञा मदचनाज्ज्ञारवा प्रेषिताहं तवान्तिकम् । सौम्य ! सोमश्रिया साकं भज वीवाहमङ्गलम् ॥५॥
इत्यावेदितसम्बन्धः स तुष्टोऽन्धकवृष्टिजः । सोमश्रियमुवाहेष्टां सोमदत्ततनुद्भवाम् ॥५६॥
स्वास्यारविन्दसौगन्ध्यमकरन्दोपयोगिनोः । काले याति सुखे तावत् सोमश्रीवसुदेवयोः ॥६०॥
भय कोऽप्येकदा भत्तं भुजपक्षरशायिनीम् । सोमश्रियं श्रियं वाऽरिरहरनिशि खेचरः ॥६॥
विबुद्धस्तु पतिः पत्नीपमश्यन् परमाकुलः । सोमधीः क्व गताऽसि रवमेोहीति जुहाव ताम् ॥६२॥
वचोऽनन्तरमेपाऽहमिति दत्वा वचः श्रिताम् । खेटस्वसारमदाशीसोमश्रीरूपवत्तिनीम् ॥६६॥
निष्क्रान्तासि बहिः कान्ते किमर्थमिति नोदिता । धर्मशान्त्यर्थमित्याह सोमश्रीरिव सा स्वयम् ॥६॥
कृतरूपपरावतिः शौरिरूपवशीकृता। कन्याभावमुदस्यैनमरीरमदरिस्वता ॥६५॥
नित्यशो भुक्तभोगा च सुते पत्यो स्वपित्यसौ । प्राक् प्रबुद्धा करोत्यूरूपादसंवाहनादिकम् ॥६६॥
जाति स्मरणसे युक्त हो गई और अपने पूर्व पतिके प्रेमको प्रकट करती हुई मूञ्छित हो गई ॥५३॥
जब वह सचेत हुई तो उठकर अपने देव पतिका ध्यान करने लगी और स्नान, भोजन आदिकी
इच्छा छोड़ मौन लेकर बैठ गई ॥५४|| एकान्तम मैंने उससे पूछा तो उसने बड़ी कठिनाईसे मुझे
बताया कि पूर्वजन्ममे मैंने देवके साथ क्रीड़ा की थी उसने यह भी बताया कि जब मैं देवी थी
और वह देव मुझसे पहले ही वहाँसे च्युत हो गया तब केवली भगवान्के सत्य कथनसे मुझे
मालूम हुआ था कि वह देव हरिवंशमें उत्पन्न हुआ है तथा हाथीके भयको नष्ट करनेवाले उस
पतिके साथ मेरा पुनः समागम होगा। इस समय केवली भगवान्का कथन ज्योंका-त्यों मिल
गया है अर्थात् जैसा उन्होंने बताया था वैसा ही हुआ है इसलिए वह आपके समागमको
इच्छा करती है ।।५५-५७॥ मेरे कथनसे सव समाचार जानकर राजाने मुझे भापके पास
भेजा है इसलिए हे सौम्य ! मेरी यही प्रार्थना है कि आप सोमश्रीके साथ विवाह मङ्गलको
प्राप्त हो ॥५८॥
इस प्रकार पूर्व भवका सम्बन्ध बतलानेपर वसुदेव बहुत ही संतुष्ट हुए और उन्होंने राजा
सोमदत्तकी पुत्री सोमनीके साथ जो कि उनकी पूर्वभवकी प्रिय स्त्री थी विवाह कर लिया ॥५॥
तदनन्तर जब अपने मुख कमलकी सुगन्धि और मकरन्दका उपयोग करनेवाले सोमनी और
यसुदेवका काल मुससे व्यतीत हो रहा था तब एक दिन रात्रिके समय पतिके भुजपञ्जरमै शयन
करनेवाली लक्ष्मीके समान सुन्दर सोमश्रीको कोई विद्याधर वैरी हर ले गया ॥६०-६१॥ जय
यसुदेव जागे तत्र पत्नीको न देख पहुत व्याकुल हुए और 'हे सोमनी! तू कहाँ गई ? जल्दी
भाओ, आगो' इस प्रकार उसे पुकारने लगे ॥६२॥ जिस विद्याधरने सोमश्रीका हरण किया
था उसकी पहिनने यमुदेवके पास आकर सोमश्रीका रूप धारण कर लिया और उनके पुकारते ही
फहा कि 'मैं यह तो हूँ इस प्रकार उत्तर देकर पासमें सड़ी हुई तथा सोमश्रीका रूप धारण करने
पाली विद्याधरको पहिनयो यमुदेवने देखा ।।६३॥ पसे देखकर कुमारने पूछा कि हे प्रिये ! याहर
किसलिए गई थी? इसके उत्तर में उसने स्वयं सोमश्रीफे समान कहा कि गरमी शान्त फरनेके
लिए गई थी ||| इस प्रकार पमुदेयके रूपसे वशीभूत हुई शत्रुको यहिन रूप पदलकर तथा
अपना कन्यामाप छोड़कर उनके साथ कीड़ा फरने लगी ॥६५॥ यह प्रतिदिन भोग भोगनेके याद
पति जय सो जाते थे सय सोती थी और उनके पहले ही जागकर जंपा तथा पैर आदिका गर्दन
करने लगी थी॥६॥

चतुर्विश सर्गः अन्यदा तु विबुद्धोऽसौ प्रथमं कथमप्यथ । सोमश्रीरूपमुक्तां तां ददर्श शयितां निशि ॥६॥ धारो विस्मययुक्तस्ता सहसा स्वयमुस्थिताम् । अप्रासद् ह्यहो का वं सीमश्रीरिव वतसे ॥६॥ सा प्रणम्यामणीरसौम्य ! दक्षिणश्रेण्यवस्थितम् । स्वर्णाभं पुरमस्येशश्चित्तवेगो नभश्चरः ॥६६॥ परम्यगारवती तस्य प्रत्यङ्ग सङ्गतप्रभा । सूनुमानसवेगोऽस्याः सुता वेगवती स्वहम् ॥७॥ राज्यं मानसवेगे च पिता न्यस्य तपस्यया। पापस्योपशमं कत्तुं तपोवनमुपाविशत् ॥७॥ नीता मानसवेगेन सोमश्रीः स्वपुरं परम् । आर्य ! तिष्ठति समासौ शीलवेलावलम्बिनी ॥७२॥ तस्याः प्रसादने तेन प्रयुक्ताऽहमशक्तितः । स्वस्प्रियायाः ससी जाता सत्वशीलवशीकृता ॥७३॥ वातानिवेदनायाहं प्रेपिताशु तया तदा । स्वस्कलवन्वमायाता विचित्राश्चित्तवृत्तयः ॥७॥ इत्यावेद्य तदादेशाद्वेगवत्या निवेदितम् । सक्रमं पितृबन्धुभ्यः सोमश्रीहरणादिकम् ॥७५॥ श्रुरवा च तत्तथा तेऽपि विषण्णमतयः स्थिताः । वेगवस्यपि पत्यामा प्रकृया चिरमारमत् ॥७६॥ तथा सह सुखं तस्य रममाणस्य भोगिनः । सम्प्राप्तो माधवो मासो मधुमत्तमधुव्रतः ॥७७॥ कदाचित्सह सुप्तोऽसौ तया सुरतखिन्नया । हतो मानसवेगेन खेचरेण निशि द्रुतम् ॥७॥ तादितश्च विउद्धेन खेचरो दृढमुटिना । तेन गङ्गाजले तं च मुमोच भयविह्वलः ॥७॥ विद्या साधयतस्तत्र स्कन्धे विद्याधरस्य सः । पपात नभसस्तस्य विद्यासिद्धिस्तथोदिता ॥०॥ सिद्धविद्यः प्रणम्यासी प्रयातो यदुनन्दनम् । कन्या विद्याधरी चैनं निनाय खचराचलम् HERm अथानन्तर किसी दिन वसुदेव उससे पहले जाग गये और रात्रिके समय सोमश्रीका रूप छोड़कर सोती हुई उस वीको उन्होंने असली रूप में देख लिया ॥६७। यह देख धीर-चार वसुदेव आश्चर्यमें पड़ गये । उसी समय वह स्त्री भी सहसा जाग उठी। वसुदेवने उससे पूछा कि - अहो ! तू सोमश्रीके समान कौन है ? ॥६॥ इसके उत्तरमें उसने प्रणाम कर कहा कि हे सौम्य ! दक्षिण श्रेणी में एक स्वर्णाभ नामका नगर है। इसका स्वामी मनोवेग नामका विद्याधर है ॥६६॥ मनोवेगको अङ्गारवती नामको अत्यन्त सुन्दर पत्नी है। उसके मानसग नामका पुत्र और वेग- यती नामकी में पुत्री हूँ ॥७०ा हमारे पिता मानसवेगको राज्य देकर तपस्यासे पापका उपशम करने के लिए तपोवनमें चले गये ॥७१॥ हे आर्य ! हमारा भाई मानसवेग, सोमश्रीको हरकर अपने श्रेष्ठ नगरको ले गया जहाँ यह शीलको मर्यादाका अवलम्बन लेकर विद्यमान है ||७२।। मानसवेगने उसे प्रसन्न करने के लिए मुझे नियुक्त किया था पर मैं इस कार्यमे समर्थ नहीं हो सकी अवः आपकी प्रियाके सत्त्व और शील गुणसे वशीभूत हो उसकी सखी बन गई ।।७३।। उस समय शीघ्रनासे अपना समाचार देने के लिए उसने मुझे आपके पास भेजा था पर मैं आपकी स्त्री बन गई सो ठीक हो है क्योंकि चित्तवृत्तियाँ नाना प्रकारकी होती हैं ।।७४॥ इम प्रकार वेगवतीने कुमारको सय समाचार बताकर उनको आज्ञानुसार सोमश्रीके पिता तथा भाई आदिको भी हरण आदिके सब समाचार क्रमसे सुनाये ||७५॥ जिन्हें सुनकर वे सब सेदसिन्न हुए। इधर वेगवती भी अपने असली रूप में रहकर चिरकाल तक पति के साथ क्रीड़ा करती उसके रही ॥७६॥ अथानन्तर जय भोगी वसुदेव वेगवतीके साथ मुससे क्रीड़ा करते हुए समय व्यतीत कर रहे थे तय वसन्तका महीना आ पहुंचा और भ्रमर मधु पी-पी कर उन्मत्त होने लगे | कदाचित् वसुदेव संभोगसे खिन्न हुई वेगवदोके साथ सो रहे थे कि रात्रिके समय मानमवेग विद्याधर उन्हें शीघ्र ही हर ले गया। जागनेपर उन्होंने मुट्टियोंके दृढ़ प्रहारसे उसे इतना पीटा कि उसने भयसे विह्वल हो उन्हें गद्गाके जलमे छोड़ दिया Iss-उस समय गगा जलम बैठकर एक विद्याधर विद्या सिद्ध कर रहा था सो वसुदेव आकाशसे उसके कन्धेपर गिरे और उनके गिरते ही उस विद्याधरको विद्या सिद्ध हो गई ॥०विद्या सिद्ध होनेपर यह विद्याधर वो हरिवंशपुराणे तदनन्तरमाकीर्ण खेचरैनभसस्तलम् । पुष्पाणि पञ्चवर्णानि मुञ्चदिः प्रणतः पुरः ॥२॥ प्रवेशितः पुरं सोऽथ रथेन रविरोचिषा । तूर्यशङ्खनिनादेन पूरिताखिलदिङ्मुखम् ॥३॥ कन्यां मदनवेगां च मदनोपमविभ्रमः ! उपयेमे मुदा दत्ता खगैर्दधिमुखादिभिः ॥८॥ विभ्राणो वसुदेवोऽत्र भावं मदनवेगजम् । चिक्रोड निविडस्तन्या चिरं मदनवेगया ॥५॥ द्रुतविलम्बितवृत्तम् अनुभवन्तममु जिनधर्मजं शमनुपङ्गजमहगोचरम् । रतिषु लब्धवरा वरमगना जनकबन्धविमोक्षमयाचत ॥८६॥ इति अरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतौ मदनवेगालाभवर्णनो नाम चतुर्विशतितमः सर्गः ॥२४॥ वसुदेवको प्रणाम कर चला गया और एक विद्याधर कन्या उन्हें विजयाध पर्वतपर ले गई ॥१॥ उनके वहाँ पहुंचते ही आकाश विद्याधरोसे व्याप्त हो गया। वे विद्याधर उस समय पाँच रङ्गके फूलोंकी वर्षा कर रहे थे तथा सामने आ-आकर प्रणाम करते थे।।२॥ तदनन्तर उन विद्याधरोंने सूर्यके समान देदीप्यमान रथपर बैठाकर वसुदेवका नगरमें प्रवेश कराया। उस समय तुरही और शटोंके शब्दसे दशों दिशाएँ भर गई थीं ॥३॥ वहाँ कामदेवके समान सुन्दर शरीरके धारक वसुदेवने, दधिमुख आदि विद्याधरोंके द्वारा प्रदत्त मदनवेगा नामक कन्याके साथ हर्पपूर्वक विवाह किया ॥८४॥ और वहीं रहकर कामके वेगसे उत्पन्न भावको धारण करते हुए वसुदेवने पीनस्तनी मदनवेगाके साथ चिरकाल तक क्रीड़ा की ॥५॥ कदाचित् कुमार वसुदेव, जिनधर्मके प्रसादसे मदनवेगाके साथ कामजनित सुखका उप- भोग कर रहे थे कि रतिकालमें मदनवेगाने उन्हें अत्यन्त आनन्द दिया इसलिए प्रसन्न होकर उन्होंने मदनवेगासे कहा कि 'प्रिये ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ जो वर माँगना हो मांगो।' इस प्रकार वह वर पाकर मदनवेगाने उनसे यही वर मॉगा कि हमारे पिता बन्धनमें पड़े हैं सो उन्हें छुड़ा दीजिए ॥८६॥ इस प्रकार अरिएनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणामें मदनवेगाके लाभका वर्णन करनेवाला चौबीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥२४॥ १. कामगोत्सन्न ! २ सममु गज म.।

पञ्चविंशः सर्गः भ्राता मदनवेगायाः श्रिवा दधिमुखोऽन्यदा। पितृबन्धविमोक्षार्थी सम्बन्धं शौरयेऽत्रदत् ॥१॥ शणु देव ! नमेवंशे संख्यातीतेपु राजसु । अरिक्षयपुराधीशो मेघनादोऽभवन्नृपः॥२॥ पद्मश्रीस्तस्य कन्याऽभूत् सा च नैमित्तिकैः पुरा । स्त्रीरत्नं भवितेत्येवमादिष्टा चक्रवर्तिनः ॥३॥ नभस्तिलकनाथश्च प्रियपूर्वमनेकशः ! वज्रपाणिरिति रयातस्तामयाचत रूपिणीम् ॥४॥ अलाभे च ततस्तस्या स रुष्टो दुटखेचरः । युद्धे जेतुमशक्तोऽगादकृनार्थो निजं पुरम् ॥५॥ मेघनादोऽपि तत्काले जातकेवललोचनम् । मुनिमभ्ययं पप्रच्छ मृसुरासुरसंसदि ॥६॥ प्रभो ! मे दुहितुर्भत भविता भरतेऽत्र कः । इति पृष्टोऽत्रदत्सोऽपि वरमन्वयपूर्वकम् ॥७॥ कौरवान्वयसम्भूतो भूतो गजपुरे नृपः । कार्तवीर्य इति स्याति विभ्रद्वीर्यसमुद्धतः ॥८॥ मोऽवधीत् कामधेन्वर्थ जमदग्नि तपस्विनम् । क्रोधात्परशुरामस्तं जघान पितृघातिनम् ॥१॥ क्षत्रियेषु तथाऽन्येषु सकलवेषु शत्रुणा । क्रुद्धेन दत्तयुद्धेषु मार्यमाणेषु भूरिषु ॥१०॥ अन्नदन्नी तदा पत्नी कार्तवीर्यस्य कातरा । तारा रहसि निःमय प्राविशत्कौशिकाश्रमम् ॥११॥ वमन्ती तत्र सा भीरः प्रसूता तनयं शुभम् । सत्रियग्रासनिभेदमष्टमं चक्रवर्तिनम् ॥१२॥ अथानन्तर किसी दिन मदनरेगाका भाई दधिमुख अपने पिताको बन्धनसे छुड़ानेकी इच्छा करता हुमा कुमार वसुदेव के पास आकर निम्नाङ्कित सन्दर्भ कहने लगा ॥१॥ उसने कहा कि हे देव ! सुनिए, नमिके वंशमें असंख्यात राजाओंके हो जानेसे अरिजयपुरका स्वामी राजा मेघनाद हुआ ॥२॥ उसके एक पद्मश्री नामको कन्या थी। उस कन्या विषयमै निमित्तानियोंने बताया था कि यह चक्रवर्तीकी स्त्री-रत्न होगी ॥३॥ उसीके समयमें नभस्तिलक नगरका राजा वत्रपाणि भी हुआ । उसने रूपवती पद्मश्री कन्याकी पहिले अनेक बार याचना की परन्तु जब वह उसे नहीं प्राप्त कर सका तो उस दुष्ट विद्याधरने रुष्ट होकर युद्ध ठान दिया। मेघनाद प्रबळ शक्तिका धारक था इसलिए वनपाणि उसे युद्ध में जीत नहीं सका फलस्वरूप वह कार्यमें असफल हो अपने नगरको वापिस लौट गया ॥४-शा उसी समय किन्हीं मुनिराजको केवलज्ञानरूपी लोचनको प्राप्ति हुई सो उनकी पूजाके अर्थ अनेक मनुष्य, देव और धरणेन्द्रोंको सभा जुदी । उस सभामें केवली भगवान की पूजा कर मेघनादने उनसे पूछा कि हे प्रभो ! इस भरत क्षेत्रमें मेरी पुत्रीका भर्ता कौन होगा ? इस प्रकार पूछनेपर केवलज्ञानी मुनिराजने उसके योग्य वर और उमके कुलका निरूपण किया ॥६-७] उन्होंने कहा कि हस्तिनापुर नगरमें कौरववंशमें उत्पन्न हुआ कार्तवीर्य नामका एक राजा था जो पराक्रमसे बहुत ही उद्दण्ड था | उसने कामधेनुके लोभसे जमदग्नि नामक तपस्वीको मार डाला था। जमदग्निका लड़का परशुराम था वह भी बड़ा बलवान् था अतः उसने क्रोध- वश पिताका घात करनेवाले कार्तवीर्यको मार डाला nell इतनेसे ही उसका क्रोध शान्त नहीं 16 अतः उसने क्रुद्ध होकर युद्धमें स्रो-पुत्रों सहित और भी अनेक क्षत्रियोंको मार डाला। इस वरह जब वह अनेक क्षत्रियोंको मार रहा था तब राजा कार्तवीर्यको गर्भवती तारा नामकी पनी भयभीत हो गुप्त रूपसे निकलकर कौशिक ऋपिके आश्रममें जा पहुँची ॥१०-११॥ यहाँ भय सहित निवास करती हुई तारा रानीने एक पुत्र उत्पन्न किया जो क्षत्रियों के प्रासको नष्ट करने- १. पितृसन्धु म । २. यमग्नि क०, ख०, गः ।

हरिवंशपुराणे यस्माद्भूमिगृहे जातः सुभौमस्तेन भापितः । कौशिकस्याश्रमे रम्ये अच्छलो वर्धतेऽधुना ॥१३॥ स हन्ता जामदग्न्यस्य पखण्डपतिरूजितः । दुहितुर्भविता भत्ता भवतोऽत्पदिनरिह ॥१४॥ सहकृत्वः कृतान्तामः स कृत्वा क्षत्रमारणम् । रामोऽपि निभृतं चेतो धत्ते द्विहितेऽधुना ॥१५॥ एवमेकातपत्रायां पृथिव्यां जमदग्निः । प्रतापाग्निपरीताशः पूरिताशो विजम्भते ॥१६॥ सुभौमे वर्धमाने तु तापसाश्रमवासिनि । उस्पाताः शतशो जाता जामदग्नपगृहेऽधुना ॥१७॥ आशङ्कितः स नैमित्तं पृच्छति स्म सविस्मयः । उत्पाताः कथयन्तीमे किमनिटमिति श्रुतम् ॥१८॥ म आह वर्धते वैरी भवतोऽन्तहिंतः क्वचित् । विज्ञेयः कथमित्युक्ते प्राह नैमित्तिकस्ततः ।। इतक्षत्रियमवाना दंष्ट्रा यस्य जिघासतः । पायसत्वेन पत्तन्ते स एवारिस्तवोद्धतः ॥२०॥ इति श्रुत्वा स जिज्ञासुः शयु पत्रियपुङ्गवम् । विशाला सनशाला तामाश्वेव समचीकरत् ॥२१॥ सनमध्ये व्यवस्थाप्य दंष्ट्रामरितभाजनम् । निरूपिततदायक्षो यानवानवतिष्टने ॥२२॥ भाकर्ण्य मेघनादस्तं कृत्वा केवलिवन्दनाम् । गया गजपुरं शीघ्रं पश्यति स्म कुमारकम् ॥२३॥ शस्त्रशास्त्रार्णवस्यान्ते वर्तमानमधिश्रियम् । बलस्प्रतापमभितो भानुमन्तमिवोदितम् ॥२४॥ शनैः स प्रेरितस्तेन वृत्तान्तविनिवेदिना । भहितेन्धनदाहाय यायुनेव तनूनपात् ॥२५॥ भाजगाम च सेनैव सह शत्रुगृहं गृहात् । वुभुक्षुरुपविष्टश्च दर्भासनपरिग्रहः ॥२६॥ वाला आठवाँ चक्रवर्ती होगा ॥१२।। क्योंकि वह पुत्र भूमिगृह-तलघरमें उत्पन्न हुआथा इसलिए 'मुभीम' इस नामसे पुकारा जाने लगा। इस समय वह बालक कौशिक ऋपिके रमणीय आश्रम- में गुमरूपसे बढ़ रहा है ॥१३॥ वही कुछ ही दिनों में परशुरामको मारनेवाला बलशाली चक्रवर्ती होगा और वही तुम्हागे कन्याका पति होगा ॥१४॥ परशुराम यमराजके समान क्रूर है वह सात बार क्षत्रियोंका अन्त कर इस समय ब्राह्मणों के हितमें अपना मन लगा रहा है ।।१शा इस तरह जिसने प्रतापरूपी अग्निसे समस्त दिशाओंको व्याप्त कर दिया है तथा मनोवाञ्छित दान देकर जिसने याचकोकी आशाएँ पूर्ण कर दी हैं ऐसा परशुराम इस समय एकछत्र पृथिवीपर निरन्तर वृद्धिको प्राप्त हो रहा है ॥१६॥ इधर तपस्वीके आश्रममें निवास करनेवाला सुभौम जैसे-जैसे बढ़ने लगा उधर परशुराम के घर वैसे-वैसे ही सैकड़ों उत्पात होने लगे ।।१७।। उत्पातीसे आशङ्कित एवं आश्चर्य चकित हो उसने निमित्तज्ञानीसे पूछा कि ये उत्पात मेरे किस भनिष्टको कह रहे हैं ? ॥१८॥ निमित्तज्ञानीने कहा कि आपका शत्रु कहीं छिपकर वृद्धिको प्राप्त हो रहा है। वह कैसे जाना जा सकता है ? इस प्रकार परशुरामके पूछनेपर निमित्तज्ञानीने पुन: कहा कि ॥१६॥ तुम्हारे द्वारा मारे हुए क्षत्रियोंकी डाढ़ें जिसके भोजन करते समय खीर रूपमें परिणत हो जायें वही तुम्हारा उद्दण्ड शत्रु है ।॥२०॥ यह सुनकर क्षत्रियों में श्रेष्ठ शत्रुको जाननेकी इच्छा करते हुए परशुरामने शीघ्र ही एक विशाल दानशाला बनवाई ॥२१॥ और दानशालाके मध्यमें डाढ़ासे भरा बर्तन रखकर उसके अध्यक्षको सब वृत्तान्त समझा दिया जिससे वह यत्नपूर्वक वहाँ सदा अवस्थित रहता है ॥२२॥ यह सत्र समाचार सुन राजा मेघनाद केवलीको वन्दना कर शीघ्र ही हस्तिनापुर गया और वहाँ उसने कुमार सुभौमको देखा ॥२३॥ उस समय सुभौम कुमार शस्त्र और शास्त्र रूपी सागरके अन्तिम तटपर विद्यमान था,अधिक शोभासे युक्त था, सब ओर उसका देदीप्यमान रहा था, और वह उदित होते हुए सूर्यके समान जान पड़ता था ॥२४॥ जिस प्रकार इन्धनको नष्ट करनेके लिए वायु अग्निको प्रेरित कर देती है उसी प्रकार पूर्ववृत्तान्त सुनानेवाले राजा मेघनादने उसे शत्रुरूपी इन्धनको जलानेके लिए धोरेसे प्रेरित कर दिया ।।२शा वह उसी प्रताप १. जिघामुः म० 1 २. भोजनशालाम् । ३. शत्रुमध्ये २० १४. निरूपितं तदध्यचे क० ।५. अग्निः ।

३५३ पाविंशः सर्गः 'दंष्ट्रामाजनमऽस्य द्विजाग्राममवर्तिनः । विन्यस्तं तरप्रमावेण दंष्ट्राः पायसतां ययुः ॥२७॥ ततोऽध्ययनरैराशु रामाय विनिवेदितम् । स जिवांसुस्तमागच्छापरशुध्यप्रपाणिकः ॥२८॥ मुशानः पायम पायां सुभौमो हन्यमानकः । जथानारि तयैवान चश्वपरिवृत्तया ॥२॥ तं चतुर्दशररनानि निधयो नव भेजिरे । द्वात्रिंशच सहस्राणि नृपाश्चक्रिणमष्टमम् ॥३०॥ स्त्रीरत्नलामतुष्टेन मेघनादोऽपि चक्रिणा । नीती विद्याधरेशिस्वमवधीद्वज्रपाणिकम् ॥३॥ एकविंशतिवारांश्च चक्रवायपि रोषणः । चक्रेगामाह्मणां सोणी शठं प्रतिशठस्तत: ॥३२॥ पष्टिवर्पसहस्राणि जीविग्वा तृप्तिवर्जितः । मुभीमः सावमीमोऽन्ते सप्तमी पृथिवीं गतः ॥३३॥ 'सन्ताने मेघनादस्य विद्यावलममुदतः । प्रतिशत्रुरभूपटस्निपण्डाधिपविलिः ॥१४॥ नन्दश्च पुण्डरीका हलचक्रधरी ततः । भभूतां निहतस्ताम्यां वलिम्या यलिराइवे ॥३५।। थलेशे समुपसः सहस्रप्रावपेचरः । परः पञ्चशतप्रीवो द्विशतग्रीव इत्यतः ॥३६॥ एवमादिप्वतीलेषु खेचरेषु यहुप्वभून् । विद्युद्वगः पिताऽस्माकं श्वमुरस्तव यादव ॥३०॥ सोन्यदा मुनिममातीदयधिज्ञानचक्षुपम् । पतिमंदनवेगायाः कोऽस्वस्या भगवमिति ॥३८॥ मुनिराह भवासूनोवियां साधयतो निशि । पण्डवेगस्य यः स्कन्धे गास्थस्य पतिप्यति ।।३।। तं निश्चिग्य पिता पुत्रं चण्टवा न्ययोजयत् । गन्नायां पण्डवेगायां विचाराधनकमणि ॥४०॥ समय घरसे निकल गजा मेघनादके साथ शत्रुके घर जा पहुँचा भी भूखा धन दुर्भका आसन ले परशुरामको दानशालामें भोजनार्थ जा बैठा ॥२६॥ ब्राह्मणके अग्रासनपर बैठे हुए कुमार मुभीमके आगे डाँदीका पात्र रक्खा गया और उसके प्रभावसे समस्त डाढ़ें सीर रूपमें परिणत हो गई ॥२७॥ तदनन्तर अध्यक्षके आदमियोंने शीघ्र ही जाकर परशुराम के लिए इसकी सूचना दी और परशुराम उसे मारनेकी इच्छासे फरसा हाथमें लिये शीघ्र ही वहाँ मा पहुँचा ॥२८ जिस समय मुभीम थालीमें आनन्दसे खीरका भोजन कर रहा था उसी समय परशुरामने नसे मारना चाहा। परन्तु सुमोमके पुण्य प्रभावसे वह थाली चक्र रूपमें परिवर्तित हो गई और उसीसे तुमने शीघ्र ही परशुरामको मार डाला |REII मुभौम अष्टम चक्रवर्तीके रूपमें प्रकट हुआ। चौद्द ग्ल, नौ निधियों और मुकुट यद्ध वत्तीम हजार राजा उसकी सेवा करने लगे ॥३०॥ स्त्री रसके लाभसे सन्तुष्ट हुए पक्रयता सुमोमने मेघनादको विद्याधरीका राजा बना दिया जिससे राति सम्पन्न हो उमने यसपाणिको मार डाला ||३१|| तदनन्तर शठके प्रति शठता दिसानेवाले मुभीम पकवतीने भी क्रोधयुक्त हो चक्ररत्नसे इक्कीस यार पृथिवीको प्राण-रहित किया ॥३२॥ घवनी मुभोग साठ हजार वर्ष तक जीवित रहा परन्तु मृतिको प्राप्त नहीं हुआ इसलिए आयुके अन्तमें मरकर सात नरक गया ॥३३॥ राजा मेघनादको सन्ततिमें आगे चलकर छठयाँ राजा यलि हुआ। पलि विद्यायलसे भएण्ड या, और तीन गण्डका स्वामी प्रतिनारायण था ॥३४|| उसी समय नन्द और पुण्डरीक नामक यभद्र तथा नारायण विद्यमान थे और अतिशय यलके पारफ इन्हीं दोनों के द्वारा युद्ध में पटि माग गया शालिक वंशम सहनीय, पशतप्रीय और द्विशतप्रीयको आदि लेकर जा पहनसे विद्याधर राजा हो चुके तय है यादय ! विद्यद्वेग नामका राजा उत्पन्न हुआ । यह विद्युग हमारा पिता है तथा आपका यमुर है ॥३६-३७॥ एक दिन राजा विद्यद्वेगने अपधि- मानी मुनिराजमे पूछा कि है भगवन् ! हमारी इस मदनवेगा पुत्राका पान कोन होगा mel कि रात्रिके ममय गद्गामें स्थित होकर विद्या सिद्ध करनेवाले तुम्हारे पण्डवेग नामक पुयके कन्धेपर जो गिरेगा मसीको यह स्त्री होगी ॥३६॥ यह निधय फरक पितान अपने १. दयाभोजन म.। १. वाशु म.। ४ तथा म• । ५. गम्मा पिता भाभीमा परी । ६. मन्दानोम. 1७. रायरी म.. मुनिराजने २ पाग।

३५४ हरिवंशपुराणे नभस्निलकनाथश्च खेटनिशिसरः खलः । यामिना स्वपुत्राय सूर्यकाय न लब्धवान् ॥४॥ युद्धे रन्ध्रमसौ लब्ध्वा मध्वाऽस्मजनकं व्यधात् । वैरानुयन्धविस्तं बन्धनागारयत्तिनम् ॥४२॥ सम्प्राप्तश्च स्वमस्माभिः साम्प्रतं पुरुविनमः । श्वशुरस्यारिषद्धस्य कुरु बन्धविमोक्षणम् ॥३॥ पूर्वजानां च दत्तानि सुभौमेन प्रसादिना । विद्यावाणि गृहाणेश! शानवस्य जिघांसया ॥४४॥ भूत्वा दधिमुखस्योक्तं वसुदेवः प्रतापवान् । श्वशुरस्य विमोपाय मतिमामनि पादधे ॥४५॥ घण्डवेगस्ततस्तस्मै विद्याखाणि यहून्यसौ । विधिपूर्व ददौ यूने सेवितानि सुरैः सदा ।।४६॥ भवं ब्रह्मशिरो नाम्ना लोकोत्सादनमप्यतः । आग्नेयं वारणं चास्त्र माहेन्द्र वैष्णवं तथा ॥४॥ यमदण्डमधेशानं स्तम्भनं मोहनं तथा । वायव्यं जम्भणं चापि बन्धनं मोषण ततः ॥१८॥ विशल्यकरणं चास्त्र व्रणरोहणं तथा । सर्वानछादनं चैव छेदन हरणं परम् ॥४॥ एवमाद्यानि चान्यानि सरहस्यानि यादयः । चण्डवेगवितीर्णानि अप्राहावाणि सादरः ॥५०॥ स्वयमेव 'यलो कात् रखिशिखरो यलैः । युयुत्सुरागमस्तिनं चण्डवेगपुरान्तिकम् ॥५॥ गत्वा बध्यः स्वयं प्राप्तः समीपमिति तोपवान् । शौरिः श्वशुरपुत्रादिवलेमामा विनिययौ ॥५२॥ खेचराणां निकायस्य मध्ये स यदुनन्दनः । करप्यवासिनिकायस्य पुरन्दर इवावभौ ॥५३॥ खे मातगनिकायस्य मध्ये निशिखरो बभौ । रौद्रासुरनिकायस्य यथैव चमरासुरः ॥५४॥ विमानश्च महामानगंजैश्व मदमस्सरः । तुरयायुवेगैश्च घलयोः स्थगितं नमः ।।५५।। चण्डवेग नामक पुनको तेज वेगसे युक्त गङ्गा नदीमें विद्या सिद्ध करनेके कार्य में नियुक्त किया ॥४०॥ नभस्तिलक नगरका राजा त्रिशिखर नामका दुष्ट विद्याधर, अपने सूर्यक नामक पुत्रके लिए इस कन्याकी कई बार याचना कर चुका था पर इसे प्राप्त नहीं कर सका ॥४१॥ इसलिए सदा पैर रखता था । एक दिन युद्ध में अवसर पाकर उसने हमारे पिताको बाँधकर कारागृह डाल दिया ॥४२॥ इस समय प्रबल पराक्रमको धारण करनेवाले आप हम सबको प्राप्त हुए है इसलिए शत्रुके द्वारा अपने श्वसुरको शोघ्र ही बन्धनसे मुक्त करो ॥४३॥ सुभौम चक्रवर्तीने प्रसन्न होकर हमारे पूर्वजोके लिए जो विद्यान दिये थे हे स्वामिन् ! शत्रुका घात करनेकी इच्छा से उन्हें ग्रहण कीजिए ॥४४॥ इस प्रकार दधिमुखके कहे वचन सुनकर प्रतापी वसुदेवने श्वसुरको छुड़ानेके लिए मनमें विचार किया ॥४५॥ तदनन्तर चण्डवेगने युवा वसुदेवके लिए देव जिनकी सदा सेवा करते थे ऐसे बहुतसे विद्यास्त्र विधिपूर्वक प्रदान किये ॥४६।। उनमें से कुछ विद्यास्त्रोंके नाम ये हैं- शिर, लोकोत्सादन, आग्नेय, वारुण, माहेन्द्र, वैष्णव, यमदण्ड, ऐशान, स्तम्भन, मोहन, वायव्य जुम्मण, बन्धन, मोक्षण, विशल्यकरण, व्रणसंरोहण, सस्त्रिच्छादन, छेदन और हरण ।।४७-४६|| इस प्रकार इन्हें आदि लेकर चलाने और संकोचनेको विधि सहित अन्य अनेक विद्यास्त्र पण्डवेग ने कुमार वसुदेवके लिए दिये और उन्होंने आदरके साथ उन्हें ग्रहण किया ॥५०॥ उस समय बलकी अधिकतासे युद्धकी इच्छा रखता हुआ दुष्ट त्रिशिखर, स्वयं ही सेनाओके साथ शीघ्र चण्ड वेगके नगरके समीप आ पहुंचा ॥५१॥ 'जिसे जाकर बाँधना था वह स्वयं ही पास आ गया' यह विचारकर संतुष्ट होते हुए वसुदेव, अपने सालों आदिको सेनाके साथ बाहर निकले ॥५२।। विद्याधरोंके अण्डके बीच वह वसुदेव कल्पवासी देवोके समूहके बीच इन्द्रके समान सुशोभिर हो रहे थे ॥५३॥ और आकाशम खड़े मातङ्ग जातिके विद्याधरोके बीच त्रिशिखर क्रूर असुरों के बीचमे स्थित चमरेन्द्र के समान सुशोभित हो रहा था ॥५४॥ दोनो ही सेनाओं के बड़े-बड़े विमानों मदोन्मत्त हाथियों और वायुके समान वेगशाली घोड़ोसे आकाश आच्छादित हो गया ॥५५।। १ शक्त्यतिरेकात् । २ सह । ३ श्राच्छन्नम् ।

पविशः सर्गः शस्त्रजालकर नवांशुकरयोरभूत् । तूर्यादिश्वतोपिण्योः सहातो च्योरिन सेनयोः ॥५६॥ आकांकृष्टकोदण्डमण्डलोन्मुक्तसायकः । भभिद्यत नृणां याह्या नान्तःस्था हृदयस्थली ॥५॥ भछिद्यन्त शिरांस्युप्रचक्रधाराभिराहवे । शशिशवविशुद्धानि न यशांसि मनस्विनाम् ।।५८॥ पपात सुभटः खड्गधारापातेन मूछितः । अनेकरणनिव्यूढप्रतापस्तु न संयुगे ॥५६॥ घोरमुद्गरघातेन चक्षुर्वनाम मानिनः । विपक्षस्य जयोग्रासघस्मरं तु न मानसम् ॥६॥ गजाश्वरथपादातं यथास्वं सुमनोरयम् । युयुधे युधि धैर्येण शौर्येण च विशेषितम् ॥६॥ शस्त्रायः प्राकृतर्योधाः कृतयुद्धमहोसवाः। 'युद्धभ्रमविनिमुक्ताश्चिरं युयुधिरेऽधिकम् ॥६२।। मोपकारवैगारिनीलकण्ठपुरोगमाः । पुरस्कृष्य जिताश्चण्डारचण्डवेगेन वेगिना ॥६॥ जवनाश्वरथारूदं नानाशनाभीपणम् । अप्रेदधिमुसं शौरि प्राप्तस्तिशिखरोऽभितः ॥६॥ प्राकृतावस्तयोरासीप्रथम प्रधनं महत् । परस्परशरासारव्याप्ताशान्तान्तरिक्षयोः ॥६५॥ क्षिप्रं चिक्षेप चाग्नेयमस्त्रं शौरिधनुर्धरः । रौद्रग्वालाकुलेनाशु सेनादाहि रिपोर्बलम् ॥६६॥ भनेग वारणेनारिविष्याप्याग्नेयमाहवे । मोहनेन महावेग शारिसन्यं व्यमोहयत् ॥६७॥ चित्तप्रसादनेनाशु मोहनाबमपास्य सः । शौरिय॑नाशयद् व्योग्नि वायव्येन च वारुणम् ॥६॥ पिनं क्षिप्रं निरस्यासावसमस्त्रेण वैरिणः । माहेन्दारेण विच्छेद शिरस्तस्य यदूत्तमः ॥६६॥ तस्मिन्नस्तमिते दीप्ते विमं शेषा नभश्चराः । नेशुराशाः परित्यज्य रवाविव करोरकराः ॥७॥ रान-समूहको किरणोंसे जिन्होंने सूर्यको किरणोंको आच्छादित कर दिया था तथा जो तुरही भादि वादिनोंके शब्दसे अपना संतोप प्रकट कर रही थी ऐसी दोनों सेनाओंकी आकाशमे मुठ- भेड़ हुई ॥५६॥ कानी तक खींचे हुए धनुप-मण्डलोंसे छूटे बाणांसे मनुष्यों के बाह्य हृदय तो मण्डित हुए थे परन्तु अन्तर्मन हृदय नहीं ॥५७॥ युद्धमें चक्रोंको तीदश धाराओंसे तेजस्वी अनुष्योंके शिर तो कटे थे परन्तु चन्द्रमा और शङ्ख समान उज्ज्वल यश नहीं ॥५॥ युद्धमें वलवारको घारके पढ़नेसे मूञ्छित हुआ योद्धा तो गिरा था, परन्तु अनेक युद्धोंमें वृद्धिको प्राप्त हुआ प्रताप नहीं ॥५६।। मुद्गरको भयंकर चोटसे अभिमानीका नेत्र तो घूमने लगा था परन्तु शाकी विजय रूपी उत्कट प्रासको सानेवाला मन नहीं ॥६०॥ युद्धस्थलमें धीरता और शूरतासे विशेषता- को प्राप्त हुई हाथी, घोड़ा, रथ और पयादोंको-चतुरङ्गिणी सेना, अपनी-अपनी इच्छानुसार यथायोग्य रीतिसे युद्ध कर रही थी ॥६१|| जो योद्धा पहले साधारण शस्त्रोंसे युद्धका महोत्सव मनाया करते थे घे भो उस समय युद्धजन्य परिश्रमसे रहित हो चिरफाल तफ अधिक युद्ध करते रहे । ॥३२॥ सौपक, अनार, गारि तथा नीलकण्ठ आदि शत्रुपक्षके जो प्रमुख शूरवीर थे वेग- शाली पण्डवेगने सामनार सयको जीत लिया ॥६॥ तदनन्तर जो वेगशाली घोड़ाके रथ. पर आरूद थे, नाना शस्त्र और अस्त्रोंसे भयंकर थे, तथा जिनके आगे रथ होकने के लिए दधि- मुप विद्यमान या ऐसे वसुदेवके सामने मिशिखर आया ॥६४॥ परपरको याण वर्षासे जिन्होंने दिशाओंके अन्त तथा आकाशको व्या कर रक्सा या ऐसे उन दोनोंका पहले तो साधारण रात्रोंसे महायुद्ध हुआ किन्तु पीछे धनुर्धारी यमुदेवने शीघ्र ही आग्नेय अस छोड़ा जिसको भयं- र बालाओंसे शाकी सेना तत्काल जलने लगी ॥६५-६६n घर शाने घारगानके द्वारा युझाकर मोहन नामफ महा अम्रसे यमुदेवको मेनाको विमोहित कर दिया ॥६॥ 7पर यमुदेवने पित्तप्रसादन नामक अनसे मोहनाखको दूर हटा दिया और आकाश पायव्य भाष पलाकर यारुगास्त्रको नष्ट कर दिया। इस प्रकार अपने प्रतिद्वन्द्वी सरग्रसे शनके शस्त्र- को शोमानिशीघ्र नष्ट कर यमुदेवने माहेन्द्रायके द्वारा शयुको काट डाला ॥६॥ जिस प्रकार मूर्यके अस्त होनेपर किरणों के समूह दिशाएँ धोरकर नष्ट हो जाते हैं उसी प्रकार देदीयमान १ पुस्चम म.२.सोपंगारिम। भाग्नेयास्त्रको

३५६
हरिवंशपुराणे
ततः शौरिः समस्तैस्वैरारमीयः खेचरैवृत्तः । श्वसुरं बन्धनागाराद्विमोन्य स्वपुरं ययौ ॥७॥
दोधकवृत्तम्
बहूनाम् ॥७२॥
दुर्जयमप्यरिलोकमनेकः शोयंसखो निखिलं खचरोधैः ।
भाशु विजिरय जनो जिनधर्मादाश्रयतामिह याति
इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती मदनवेगालाभत्रिशिखरवधवर्णनो
नाम पञ्चविशः सर्गः ॥२५॥
-
त्रिशिखरके अस्तमित होते ही शेष विद्याधर दिशाएँ (अथवा अभिलापाएँ) छोड़कर नष्ट हो गये-
भाग गये ॥७०॥ तदनन्तर अपने पक्षके समस्त विद्याधरोंसे घिरे हुए वसुदेव, कारागृहसे श्वसुर-
को छुड़ाकर अपने नगर वापिस गये ॥७१॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि जिनधर्मके प्रसादसे एक
प्रतापी मनुष्य, अनेक विद्याधरोंके समूहसे दुर्जेय समस्त शत्रुओंको शीघ्र ही जीतकर बहुतसे
मनुष्योंकी आश्रयताको प्राप्त हो जाता है-उनके द्वारा सेवनीय हो जाता है अतः सदा जिन-
धर्मकी उपासना करनी चाहिए ॥७२।।
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें मदनवेगा-
के लाभ और त्रिशिखरके वधका वर्णन करनेवाला पञ्चीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥२५॥

षड्विंशः सर्गः । 'शौरमंदनवेगायां मदनप्रतिमोऽभवत् । भनावृष्टिरिति स्यातस्तनयो नयविबली ॥१॥ सखीकाः खेचरा याताः सिद्धकूटजिनालयम् । एकदा वन्दितु सोऽपि शौरिः मदनवेगया ॥२॥ कृत्वा जिनमहं खेटा: प्रवन्ध प्रतिमागृहम् । तस्थुः स्तम्भानुपाधिस्य पहुवेपा यथायथम् ॥३॥ विधुद्वेगोऽपि गौरीणां विद्यानां स्तम्भमाश्रितः । कृतजास्थितिः श्रीमान् स्वनिकायपरिष्कृतः ॥४॥ पृष्टया वसुदेवेन ततो मदनवेगया। विद्याधरनिकायास्ते यथास्वमिति कीर्तिताः ॥५॥ भरमदीयं विभो स्तम्भ ये प्रिता: पद्मपाणयः । पद्ममालाघरास्तेऽमी गौरिकास्या नभश्वराः ॥६॥ रतमालाधराश्चैते रक्तकम्बलयाससः । गान्धारस्तम्भमानिरय गान्धाराः खेचराः स्थिताः ॥७॥ नानावर्णमयस्वर्णपातकौशेयवाससः । मानवस्तम्भमेत्यामी स्थिता मानवपुत्रकाः ॥८॥ किशिदारक्तवस्खा ये लसन्मणिविभूषणाः । मानस्तम्भमिता येते खेचरा मनुपुत्रकाः ॥३॥ विचित्रौषधिहस्तास्तु विचित्राभरणलजः । भोपधिरतम्भमायाता मूलवीर्या नभश्चराः ॥१०॥ सवंत कुसुमामोदकाशनाभरणलजः । भन्तभूमिचरा होते ये स्तम्भे भूमिमण्डके ॥११॥ विचित्रकुण्डलाटोपा ये नागादभूषणाः । शकुस्तम्भाश्रितास्तेऽमी शडकाः खचराः प्रभो ॥१२॥ भावद्ध मुकुटापोडविलसन्मणिकुण्डलाः । ये तेऽमी कौशिकाः खेटा कोशिस्तम्भमाश्रिताः ॥१३॥ अथानन्तर कुमार वसुदेवसे मदनवेगामें कामदेवके समान सुन्दर अनावृष्टि नामका नीतिज्ञ 1 और बलवान पुत्र उत्पन्न हुआ॥१॥ एक दिन अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ विद्याधर सिद्धकूट जिनालयको वन्दना करनेके लिए गये सो कुमार वसुदेव भी मदनवेगाके साथ वहाँ पहुँचे ॥२॥ नाना प्रकार के वेपोंको धारण करनेवाले विद्याधर जिनेन्द्र भगवानको पूजा कर तथा प्रतिमा-गृहों- को वन्दना कर यथायोग्य स्तम्भोंका आश्रय ले बैठ गये ॥३॥ शोभासम्पन्न विद्युद्वेग भी भग- वानकी पूजा कर अपने निकायके लोगों के साथ गौरी विद्याभोंके स्तम्भका सहारा ले बैठ गया ॥ तदनन्तर वसुदेवने मदनवेगासे विद्याधर निकायोंका परिचय पूछा सो वह यथायोग्य इस प्रकार उनका वर्णन करने लगी ॥२॥ उसने कहा कि हे नाथ ! जो ये हायमें कमल लिये तथा कमलोंकी माला धारण किये हमारे सम्भाके पाश्रय बैठे हैं वे गौरिक नामके विद्याधर हैं ॥६॥ ये लाल मालाएँ धारण किये तथा लाल कम्बलके वनोंको पहिने हुए गान्धार खम्भाका भाश्रय ले गान्धार जातिके विद्याधर बैठे हैं ॥७॥ ये जो नाना घोंसे युक एवं सुवर्णके समान पीले वनोंको धारण कर मानव स्तम्भके सहारे पेठे हैं चे मानव पुत्रक विद्याधर है ॥॥ जो कुछ-कुछ लाल पत्रोंमे युक्त एवं मणियोंके देदीप्यमान आभूषणोंसे सुसन्नित हो मानस्तम्भके सहारे बैठे हैं पे मनुपुत्रक विद्या घर है ॥ नाना प्रकारको भोपधियों जिनके हाथमें हैं तथा जो नाना प्रकार के माभूपण और मालाएं पहिनकर ओषधि स्तम्भके सहारे बैठे हैं ये मूलवीर्य विद्याधर हैं ॥१०॥ सय ऋतुओंफे पुगेको मुगन्धिसे युक्त स्वर्णमय आभरण और मालाओंको धारण कर जो भूमिमण्डक स्तम्भ के समीप बैठे हैं वे अन्तभूमिपर विद्याधर हैं ॥११॥ हे प्रभो ! जो चित्र-विचित्र पुण्डल पदिने या साकार पाजू-बन्दोंसे मुशोभित हो शकु स्तम्भके समीप पेठे हैं ये शटुक नामक विद्याधर हैं ॥१२॥ जिनके मुष्टॉपर सेहरा यँधा हुआ है तथा जिनके मणिमय पुण्डल देदीप्यमान 7 १. चौरिमंदन म । २. विद्यापराः।

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पदिशः सर्गः तस्यैव साऽभवत्पनी निःसपानं यथा तथा । भवश्यम्भाविनी पत्नी तवाहमिति बुध्यताम् ॥५३॥ त्वं गृहाण विभो विद्यां विद्याधरसुदुर्लभाम् । इत्युक्तः सोऽवदद्देया वेगवत्यै ममेच्छया ॥५४॥ लन्धादेशा तथेत्युक्त्वा ततो वेगवतीमसौ । खमुक्षिप्य ययौ कन्या पुरं गगनवल्लभम् ॥५५|| शालिनीच्छन्दः विद्यादानं बालचन्द्राभिधाना विद्या दत्त्वा कन्यका वेगवत्यै । सद्यो जाता मुक्तशल्या च जेन्यो विद्याधर्यः साधयन्त्यभ्युपेतम् ॥५६॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती बालचन्द्रादर्शनवर्णनो नाम पड्विंशः सर्गः ॥२६॥ नामकी कन्या हो गई है। उसे मेरे ही समान पुण्डरीक नामक अर्धचक्रीने अचानक आकर वन्धनसे मुक्त किया था और वह जिस प्रकार उसी अर्धचक्रोको निर्विरोध पत्नी हो गई थी उसी प्रकार में भी आपकी पत्नी अवश्य होनेवाली हूँ | यह आप निश्चित समझ लीजिए ।।५२-५३॥ हे नाथ ! आप विद्याधरोंके लिए अतिशय दुर्लभ इस विद्याको ग्रहग कीजिए | कन्याके इस प्रकार कहनेपर कुमार वसुदेवने कहा कि वह विद्या मेरो इच्छासे वेगवतोके लिए देने योग्य • है ॥५४॥ कुमारको आज्ञा पाकर उसने 'तथास्तु' कह वेगवतीके लिए वह विद्या दे दी और तद- नन्तर आकाशमें उड़कर वह गगनवल्लभ नगरको चली गई ॥५५॥ कुमारी बालचन्द्रा, वेगवती- के लिए विद्या रूपी विद्या दान देकर शीव्र ही निःशल्य हो गई सो ठीक ही है क्योंकि जिन धर्म- की उपासना करनेवाली विद्याधरियाँ अपने मनोरथको शीघ्र ही सिद्ध कर लेनी हैं ॥५६॥ इस प्रकार अरिएनेमिपुराणके संपहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें बालचन्द्राके दर्शनका वर्णन करनेवाला छन्चीसवाँ सर्ग समाप्त हुना ॥२६॥ 7 7 १. निःसानी म० । २. इत्युक्तोऽसौ यदद्देया म०, क०, ५० । ३. नगरवल्लभम् म. 1 ४. पिया क.स.।

१५८ हरिवंशपुराणे अमी विद्याधरा शायर्याः समासेन समोरिताः । मातङ्गानामपि स्वामिन् निकायान् शृणु वस्मि ते ॥१४॥ नीलाम्बुदचयश्यामा नीलाम्बरवरलजः । अमी मातङ्गनामानो मातङ्गस्तम्मसङ्गताः ॥१५॥ श्मशानास्थिकृतोत्तंसा भस्मरेणुविधूसराः । श्मशाननिलयास्त्वेते श्मशानस्तम्भसंश्रिता. ॥१६॥ नोलवैडूर्यवर्णानि धारयन्त्यम्बराणि ये ! पाण्डरस्तम्भमेश्यामी स्थिताः पाण्डकखेचराः ॥१७॥ कृष्णाजिनधरास्वेते कृष्णचर्माम्वरजः । कालस्तम्भ समभ्येत्य स्थिताः कालश्वपाकिनः ॥१८॥ पिगलमूर्धयुक्तास्तप्तकाशनभूषणाः । श्वपाकीनां च विद्यानां श्रिताः स्तम्भं श्वपाकिनः ॥१६॥ पत्रिपांशुकच्छन्नविचित्रमुकुटलजः । पार्वतेया इति ख्याताः पार्वतं स्तम्भमाश्रिताः ॥२०॥ वंशीपत्रकृतोत्तमाः सर्वत्तु कुसुमस्रजः । वंशस्तम्माश्रिताश्चैते खेटा वंशालया मता ॥२॥ महाभुजगशोभासंदष्टवरभूषणाः । वृक्षमूलमहास्तम्भमाश्रिता वाईमूलिकाः ॥२२॥ स्ववेषकृतसञ्चाराः स्वचिकृतभूषणाः । समासेन समाख्याता निकायाः खचरोद्गताः ॥२३॥ इति भार्योपदेशेन ज्ञातविद्याधरान्तरः । शौरिातो निजं स्थानं खेचराश्च यथायथम् ॥२४॥ शौरिनंदनवेगां तामेकदा तु कुतश्चन । एहि वेगवतीरयाह साऽपि रुष्टाऽविशद्गृहम् ॥२५॥ प्रज्वाल्यात्रान्तरे गेहान शौरि त्रिशिखराङ्गना । नित्वा मदनवेगामा सूर्पणख्याहरच्छलात् ॥२६॥ हो रहे हैं ऐसे ये कौशिक स्तम्भके आश्रय कौशिक जातिके विद्याधर बैठे हैं ॥१३।। हे स्वामिन् ! अभी मैंने संक्षेपसे आर्य विद्याधरों का वर्णन किया है अब आपके लिए मातङ्ग विद्याधरों के भी निकाय कहती हूँ सो सुनिए ॥१४॥ जो नील मेघोंके समूहके समान श्याम वर्ण हैं तथा नीले वस्त्र और नीली मालाएँ पहिने हैं वे मातङ्ग स्तम्भके समीप बैठे मातङ्ग नामके विद्याधर हैं ॥१५॥ जो श्मशानकी हड्डियांसे निर्मित भआभूषणोंको धारणकर भस्मसे धूलि-धूसर हैं वे श्मशान स्तम्भके आश्रय बैठे हुए श्मशान निलय नामक विद्याधर हैं ॥१६॥ जो ये नीलमणि एवं वैडूर्यमणिके समान वस्रांको धारण किये हुए हैं तथा पाण्डुर स्तम्भके समीप आकर बैठे हैं वे पाण्डक नामक विद्याधर हैं ॥१७॥ जो ये काली मृग-चर्मको धारण किये तथा काले चमड़ेसे निर्मित वन और मालाओंको पहिने हुए काल: स्तम्भके पास आकर बैठे हैं वे कालवपाको विद्याधर हैं ॥१८जो पीले-पीले केशांसे युक्त हैं, तपाये हुए स्वर्णके आभूपण पहिने हैं और श्वपाकी विद्याओं के स्तम्भके सहारे बैठे हैं वे श्वपाको विद्याधर हैं ॥१६॥ जो वृक्षोके पत्तोंके समान हरे रशके वनोंसे आच्छादित हैं तथा नाना प्रकारके मुकुट और मालाओको धारण कर पार्वत स्तम्भके सहारे बैठे है वे पार्वतेय नामसे प्रसिद्ध है ॥२०॥ जिनके आभूषण बाँसके पत्तों के बने हुए हैं तथा जो सब ऋतुओंके फूलोंकी मालाओंसे युक्त हो वंशस्तम्भके आश्रय बैठे हैं वे वंशालय विद्याधर माने गये हैं ।।२१।। जिनके उत्तमोत्तम आभूपण महासपीके शोभायमान चिह्नोंसे युक्त हैं तथा जो वृतमूल नामक महा- स्तम्भोंके आश्रय बैठे हैं वे वार्तमूलिक नामक विद्याधर हैं ॥२२॥जो अपने-अपने निश्चित वेपमें ही भ्रमण करते हैं तथा जो आभूपणों को अपने-अपने चिह्नोसे अंकित रखते हैं ऐसे इन विद्याधरों- के निकायोंका संक्षेपसे वर्णन किया ॥२३॥ इस प्रकार आर्या मदनवेगाके कथनसे विद्याधरोफा अन्तर जानकर यमुदेव अपने स्थानपर चले गये तथा अन्य विद्याधर भी यथायोग्य अपने-अपने स्थानीकी ओर रवाना हुए ॥२४॥ भधानन्तर एक दिन कुमार वसुदेवने किसी कारणवश मदनवेगासे 'आओ वेगपति !' यह कह दिया जिससे नष्ट होकर वह घरके भीतर चली गई ॥२शा उसी समय त्रिशियर विद्या घरकी विधवा पत्नी शूर्पणखी, मदनवेगाका रूप धरकर तथा अपनी प्रभासे महलोको एकदम १. पर्णपत्राशुक्-म०, पत्रपणांशुक ग. 1 २. गताः म० १ ३. गेहात् म । ४. मूर्य नख्य-म०, स० । - पड्विंशः सर्गः अन्तरिक्ष मुमुक्षुस्तमद्रासीद् दागधोऽन्तरे । रिपुं मानसवेगास्यमकस्मात्समुपस्थितम् ॥२७॥ विमुच्य 'वियतः शौरिमारणे विनियुज्य तम् । यथेष्टं सा गता सोऽपि पपात तृणकूट के ॥२८॥ गीयमानं नरैः श्रुत्वा जरासन्धयशः सितम् । ज्ञात्वा राजगृहं तुष्टः प्रविष्टः पुरमुत्तमम् ॥२६॥ द्यूते जित्वा हिरण्यस्य कोटिमत्र जनाय सः । स्यागशीलो ददौ सर्वा सर्वस्मै तामितस्ततः ॥३०॥ जरासन्धस्य हन्तारमीना जनयिष्यति । इति नैमित्तिकादेशादीगन्विष्यते तदा ॥३१॥ दृष्ट्वा च तं तदाध्यक्ष नारुद्धतनुश्च सः । नीत्वा मुक्तो गिरेरणान् प्रियतामिति तरक्षणे ॥३२॥ ततः पतन्नसौ वेगाद्वेगवाया तो बलाद् । नीयमानस्तया क्वापि चिन्तामेतामुपागतः ॥३३॥ भारुण्डेरण्डः पूर्व चारुदत्तो यथाऽऽहृतः । तथाऽहमपि नूनं तैर्दुरन्तं किं नु मे भवेत् ॥३४॥ दुरन्ना बन्धुसम्बन्धा दुरन्ता मोगसम्पदः । दुरन्ताः कान्तिकायाश्च तथापि स्वन्तधीजनः ॥३५॥ पुण्यपापकृदेकोऽयं भोक्ता च सुखदुःखयोः । जायते नियते चारमा तथापि स्वजनोन्मुखः ॥३६॥ त एव सुखिनो धीरास्त एव स्वहिते स्थिताः । विहाय भोगसम्बन्धान ये स्थिता मोचवरमनि ॥३७॥ भोगतृष्णोमिनिमग्ना वयं तु गुरुकर्मकाः । संसारसुखदुःखातो मुहुः कुर्मी विवर्तनम् ॥३८॥ इत्यादि चिन्तयन् वीरो वेगवत्या गिरेस्तटे । अवतायष भस्रायाः समाकृष्य बहिः कृतः ॥३६॥ प्रज्वलितकर छलसे वसुदेवको हर ले गई ॥२६॥ वह उन्हें आकाशमें ले जाकर छोड़ना ही चाहती थी कि उसे नीचे आकाशमें अकस्मात् आता हुआ कुमारका बैरी मानसवेग विद्याधर दिग्वा । आकाशसे छोड़कर कुमारको मार दिया जाय इस कार्यमें मानसवेगको नियुक्तकर सूर्पणखी यथेष्ट स्थानपर चली गई और कुमार घासकी गंजीपर नीचे गिर गये ॥२७-२८॥ वहाँ मनुष्यों के द्वारा गाये हुए जरासंधके उज्ज्वल यशको सुनकर कुमारने जान लिया कि यह राजगृह नगर है अतः उन्होंने सन्तुष्ट होकर उस उत्तम नगरमें प्रवेश किया ॥२६॥ राजगृह नगरमें कुमारने जुएमे एक करोड़ स्वर्णकी मुद्राएँ जीती और दानशील बनकर सबकी सब यहाँ- वहाँ समस्त लोगोंको बाँट दी ॥३०॥ निमित्तज्ञानियों ने जरासंघको वतलाया था कि जो जुएमें एक करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ जीतकर बाँट देगा वह तुम्हें मारनेवाले पुत्रको उत्पन्न करेगा। निमित्त- ज्ञानियों के आदेशानुसार वहाँ उस समय ऐसे व्यक्तिको खोज हो रही थी ॥३१॥ जरासंधके अधिकारियोंने वसुदेवको देखकर पकड़ लिया और 'तत्काल मर जाय' इस भावनासे उन्हें एक चमड़ेको भाथड़ीमें बन्दकर पहाड़की चोटोसे नीचे छोड़ दिया ॥३२॥ वसुदेव नीचे गिर हो रहे थे कि अकरमात् वेगवतीने वेगसे आकर जोरसे उन्हें पकड़ लिया। जब वेगवती उन्हें पकड़कर कहीं ले जाने लगी तब वे मनमें ऐसा विचार करने लगे कि देखो ! जिस प्रकार पहले भारुण्ड पक्षी चारुदत्तको हर ले गये थे उसी प्रकार जान पड़ता है मुझे भी भारुण्डपक्षी हरकर लिये जा रहे हैं, न जानें अब क्या दुःख होता है ? ॥३३-३४॥ ये बन्धुजनोंके सम्बन्ध दुरन्त-दुःखदायक हैं, भोग सम्पदाएँ दुरन्त हैं, और कान्तिपूर्ण शरीर भी दुरन्त हैं फिर भी मूर्ख प्राणी इन्हें ग्वन्त- सुखदायक समझता है ॥३५॥ यह जीव अकेला ही पुण्य और पाप करता है, अकेला ही सुख और दुःस भोगता है, और अकेला ही पैदा होता तथा मरता है फिर भी आत्मीयजनों के संग्रह करनेमे तत्पर रहना है ॥३६॥ वे ही धीर, वीर मनुष्य सुखी हैं और वे ही आत्महितमें लगे हुए हैं जो भोगोंसे सम्बन्ध छोड़कर मोक्षमार्गमें स्थित हैं ॥३७॥ हमारे कर्म बड़े वजनदार हैं इस- | लिए हम भोग तृष्णारूपी तरङ्गोंमें डूब रहे हैं तथा सुस-दुखकी प्राप्तिमें ही वार-बार परिभ्रमण - करते-फिरते हैं ॥३८॥ तदनन्तर इस प्रकार चिन्तन करते हुए वीर वसुदेवको वेगवतीने पर्वतके तटपर उतारा १ वियनि म०।२ ईदृशो नरः । ३. पतदसौ म । ४ यथाहतः ।

हरिवंशपुराणे पति वेगवती रट्वा रुरोद विरहाकुला । परिष्वज्य स तां मेने स्वपरागसुखासिकाम् ॥४॥ ततस्तेन प्रिया पृष्टा सस्मै सवं न्यवेदयत् । हृते भर्तरि यवृत्तं सुखदुःखं निजास्पदे ॥४॥ द्वयोरन्वेपितः श्रेण्योर्यधारण्यपुरादिषु । पर्यटन्त्या चिरं क्षेत्र भारतास्यमशेषतः ॥४२॥ पावें मदनवेगायाः परयुदर्शनमेतया 1 वियोगमपि कांशत्या स्वस्याः स्थानमलक्षितम् ।।४३॥ श्रिरवा मदनवेगाया रूपं विशिखमार्यया ! सूर्पणख्या हृति घाख्यस्खमुरिक्षप्य जिघांसया ॥४४॥ अमुनोऽधिस्यकातस्त्वमापत्य विश्तो मया । तीर्थ पशनदं चाद्रि हीमन्तमधितिष्ठसि ॥१५॥ इत्यावेदितवृत्तान्तः स तया चन्द्रवक्त्रया । रेमे तत्र धुनीधीरधानहारिपु सानुषु ॥४६॥ सोष्टन् यहच्छयाऽद्राचीसागपाशवशां ठम् । धन्यां कन्यां यथा वन्या नागपाशवशां वशाम् ॥४७॥ तदादहृदये नद्धांतामुद्यन्मुखकान्तिकाम् । व्यपाशयदसौ पाशारपापपाशाद् यथा यतिः ॥४८॥ मुक्तयन्धा च मरवा सा तमचिन्तितवान्धवम् । प्रसादात्तव मे नाथ ! सिद्धा विद्यत्यभाषत ॥४॥ शृणु स्वं दक्षिणश्रेण्यां पुरे गगनवल्लभे । विद्युहूंष्ट्रान्वयोत्याहं बालचन्द्रा नृपारमजा ॥५०॥ साधयन्ती महाविद्या नद्या विद्याभृतारिणा । नागगरीरहं यहा मोचिता भवता विभो ॥५१॥ अन्ववायेऽस्मदीयेऽन्या कन्या केतुमतीत्यभूत् । मोचिताहमिवाकाण्डे पुण्डरीका,चक्रिणा ॥५२॥ और भाथहीसे खींचकर बाहर निकाला ॥३६॥ पतिको देख वेगवती विरहसे आकुल हो रोने लगी और वसुदेवने भी उसका आलिङ्गन कर उसे स्वपरके शरीरके लिए सुख देनेपाली माना ॥४०॥ तदनन्तर वसुदेवके द्वारा पूछी प्रिया वेगवतीने पति के हरे जानेपर अपने घर जो सुख-दुख उठाया था वह सब उनके लिए कह सुनाया ॥४१॥ उसने कहा कि मैंने आपको विज- याकी दोनों श्रेणियों में सोजा, अनेक वन और नगरों में देखा तथा समस्त भरत क्षेत्रमें चिरकाल तक भ्रमण किया परन्तु आपको प्राप्त न कर सकी ॥४२|| बहुत घूमने-फिरनेके बाद मैंने मदन वेगाके पास आपको देखा । सो देखकर यह विचार किया कि यहाँ रहते हुए भले ही आपके साथ वियोग रहे पर आपके दर्शन तो पाती रहूंगी। इसी विचारसे मैंने वहाँ अलक्षित रूपसे रहने की इच्छा की परन्तु विशिखरको भार्या शूर्पणखी मदनवेगाका रूप धरकर आपके पास आई और मारनेकी इच्छासे हरकर आपको आकाशमें ले गई ।।४३-४४॥ नधर उस पर्वतकी घोटीसे आप नीचे गिराये जा रहे थे कि मैंने योचमें हो लपककर आपको पकड़ लिया। इस समय आप पश्चनद तीर्थ और होमन्त नामक पर्वतपर विराजमान है॥४॥ इस प्रकार चन्द्रमुग्गी वेगयतीसे सय समाचार जानकर यसुदेव, नदियोंके गम्भीर शब्दमे सुन्दर हीमन्त पर्वतको अधित्यकामापर फोड़ा करने लगे ॥४६॥ पा दिन कुमार चमुच अपनी इच्छानुसार वहाँ घूम रहे थे कि उन्होंने नागपाशसे धी हुई यमको इम्तिनीफे समान, नागपाशसे मजयूत पॅपी हुई एक भाग्यशालिनी सुन्दर कन्याको देवा ॥४७॥ उसे देखते ही कुमारका हृदय दयासे आई हो गया इसलिए उन्होंने जिस प्रकार मुनि मंसारफे प्राणियोंको पाप रूपी पाशसे मुक्त कर देते हैं उसी प्रकार मुसकी फैलती हुई कान्ति मे युक्त प्रप्त पन्धनपद कन्याको यन्धनसे मुक्त कर दिया ॥४॥ पन्धनसे छूटते ही उस कन्याने भतर्किन पापु-यमुदयको नमस्कार किया और कहा कि हे नाथ! भापके प्रसादसे मेरो विद्या मिड हो गई है REn सुनिए, मैं दक्षिण श्रेणीपर स्थित गगनपल्लभ नगरकी रहनेवाली राज कन्या है, मेग नाम पाठपन्द्रा है और मैं विघदशके पंशमें सत्पन्न हुई हूँ ॥all में नदी पेठकर महायिणा मिद कर रही थी कि पा शत्रु विद्याधरने मुझे नागपाशम याच दिया और प्रमी! भाग्ने मुझे उस पन्धनसे मुक्त किया है ॥४१॥ हमारे घरामें पहले भी एक केतुमनी १.परिणीम् । २. नपाम् म... मतिम.1 पदिशः मर्गः तस्यैव माऽभवत्पनी निःसपने यथा तथा ! अवश्यम्माविनी पानी तबाहमिनि युध्यनाम ॥५३॥ त्वं गृहाग विभी विद्या विद्याधरसुदुर्लभाम् । इन्युनतः मोऽवदद्देया घेगवण्यै ममेच्छया ॥५॥ लन्धादेशा तथेग्युक्त्वा ततो घेगवतीममौ । पमुस्लिप्य ययौ कन्या पुरं गगनवल्लभम् ॥५५॥ शालिनीच्छन्दः विद्यादान यालचन्द्राभिधाना विधा दावा कन्यका वेगवाये । सद्यो जाता मुकशल्या च जेन्यो विद्यायः साययन्त्यम्युपेतम् ॥५६॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनमेनाचार्यकृती बालचन्द्रादर्शनवर्णनो नाम पविशः सर्गः ॥२६॥ नामकी कन्या हो गई है। उसे मेरे हो समान पुण्डरीक नामक अर्धचक्रोने अचानक आकर बन्धनसे मुक्त किया था और वह जिस प्रकार उमी अर्धचक्रोफी निर्विरोध पत्नी हो गई थी उसी प्रकार में भी आपकी पत्नी अवश्य होनेवाली हूँ। यह आप निश्चित समझ लीजिए ।।५२-५३॥ हे नाथ ! आप विद्याधरीके लिए अतिशय दुर्लम इस विद्याको ग्रहण कीजिए । कन्याके इस प्रकार कहनेपर कुमार वसुदेवने कहा कि यह विद्या मेरी इच्छासे वेगवना के लिए देने योग्य है ॥५४॥ कुमारको आना पाकर उपने 'तथास्तु' कह वेगवतीके लिए वह विद्या दे दी और तद्- नन्तर भाकाशमैं उड़कर वह गगनवल्लभ नगरको चली गई ॥५५॥ कुमारी बालचन्द्रा, वेगवनी. के लिए विद्या रूपी विद्या दान देकर शीघ्र ही निःशल्य हो गई सी ठोक ही है क्योंकि जिन धर्म- को उपामना करनेवाली विद्याधग्यिाँ अपने मनोरथ को शीघ्र ही सिद्ध कर लेनी है ।।५।। . इस प्रकार अरिएनेमिपुराण के संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें याल चन्द्रा के दर्शनका वर्णन करनेवाला छन्बीसवाँ सर्ग समाप्त हुश्रा ॥२६॥ १. निमारनी म० । २. इत्युनो मी वदना म, क०, प० । ३. नगायतमम् म०1४. पिया फ.व.1 सप्तविंशः सर्गः गोतमोऽग्रान्तरे पृष्टः स्वस्थैन मगधैशिना । विद्युदंष्ट्रो मुने ! कोऽसौ कोरगाधरणोऽपि वा ॥३॥ इयुक्तो सोऽवदद्वंशे नमेगंगनयन्लभे । विद्युदंष्टोऽभवद् भत्ता श्रेण्योरद्भुतविक्रमः ॥२॥ अपरेग्यो विदेहेभ्यः सोऽन्यदानीय योगिनम् । सनयन्तमिहोदारमुपसर्गमकार यत् ॥३॥ हेतुना केन नाधेति प्रश्नितः कौतुकाद् गणी । पुराणं सजायन्तस्य जगी पापविनाशनम् ॥४॥ इहापरविदेहेऽस्ति विषयो गन्धमालिनी । पीतशोका पुरीहाय वैजयन्तोऽभवन्नृपः ॥५॥ सर्वोरिति मायर्यास्य स्वयं श्रीरिव रूपिणी । सायन्तजयन्तारयो तस्याश्च तनयो शुभो ॥६॥ विहरमन्यदा यातः स्वयम्भूस्तीथंकृत्ततः । धर्म शुन्या पिता पुत्रो से प्रयोऽपि प्रवमनुः ॥७॥ तेषां विहरता साध पिहितासवरिणा ! सनातं जयन्तस्य देवलं धातिधातिनः ॥८ चतुर्णिकायदेवेपु वन्दमानेपु तं मुनिम् । जयन्तो वीचय धरणं निदानी' धरणोऽभवत् ॥६॥ स्वपुर्याश्च मनोहयोः श्मशाने भीमदर्शने । सप्ताहप्रतिमा योगी सनयन्तोऽन्यदा स्थितः ॥१०॥ भद्रशाले बने नीभिविद्युइंष्ट्रोऽन्यदा चिरम् । रत्वाऽऽगच्छरपुरं रष्ट्वा सञ्जयन्तं याच्या ॥१॥ पूर्ववरवशाखस्तमानीयान भारते । वैताट्यदक्षिणोपान्ते गिरी वरणनामनि ॥१२॥ अथानन्तर इसी घीचमें निश्चिन्ततासे बैठे हुए राजा श्रेणिकने गौतम स्वामोसे पूछा कि हे मुनिनाथ ! विद्युदंष्ट्र कौन था ? और उसका आचरण कैसा था? ॥१॥ इस प्रकार पूछनेपर गौतम स्वामी कहने लगे कि नमिके वंशमै गगनयल्लभ नामक नगर में एक विद्युदंष्ट्र नामका विद्याधर हो गया है जो दोनों श्रेणियोंका स्वामी था तथा अद्भुत पराक्रमसे युक्त था ।।२॥ एक समय वह पश्चिम विदेह क्षेत्रसे संजयन्त नामक मुनिराजको अपने यहाँ उठा लाया और उनपर उसने घोर उपसर्ग कराया ॥३॥ यह सुन राजा श्रेणिकने कौतुक वश फिर पूछा कि हे नाथ ! विद्युदंष्ट्रने संजयन्त मुनिराजपर किस कारण उपसर्ग कराया था ? इसके उत्तरमै गणधर भगवान् संजयन्त मुनिका पापनाशक पुराण इस प्रकार कहने लगे ॥४॥ हे राजन् ! इसी जम्बू द्वीपके पश्चिम विदेह क्षेत्रमें एक गन्धमालिनी नामका देश है । उसमें चीतशोका नामकी नगरी है। उस नगरीमें किसी समय वैजयन्त नामका राजा राज्य करता था ॥५उसकी सर्वश्री नामकी रानी थी जो ऐसी जान पड़ती थी मानो शरीरको धारण करनेवाली साक्षात् लक्ष्मी हो । इन दोनोंके संजयन्त और जयन्त नामके दो उत्तम पुत्र थे ॥६॥ किसी एक समय विहार करते हुए स्वयंभू तीर्थकर वहाँ आये। उनसे धर्म श्रवण कर पिता और दोनों पुत्र-तीनोंने दीक्षा धारण कर लो ||७॥ अपने पिहितात्रय नामक आचार्यके साथ ये तीनों मुनि विहार करते थे। कदाचित् घातिया कर्माको नष्ट करनेवाले वैजयन्त मुनिको केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ।।८॥ केवलज्ञानके उत्सव में जब चारों निकायके देव मुनिराज वैजयन्तकी वन्दना कर रहे थे तय धरणेन्द्रको देख जयन्त मुनिने धरणेन्द्र होने का निदान किया और उसके फलस्वरूप वे मरकर धरणेन्द्र हो भी गये ॥६॥ किसी समय जयन्तके बड़े भाई संजयन्त मुनिराज अपनी वीतशोका नामक सुन्दर नगरीके भीमदर्शन-भयंकर श्मशानमे सात दिनका प्रतिमा योग लेकर विराजमान थे ॥१॥ उसो समय विद्युदंष्ट्र, भद्रशाल वनमे अपनी स्त्रियों के साथ चिरकालतक कोड़ा कर अपने नगरकी ओर लौट रहा था कि अचानक उसकी दृष्टि संजयन्त मुनिराजपर पड़ी ॥११॥ पूर्व वैरके कारण कुपित हो वह उन्हें उठा लाया और भरत क्षेत्र सम्बन्धी विजया १.निदानधरणो र.।

सप्तविंशः सर्गः हरिद्वती सरिचण्डवेगा गजवतीति च । तथा कुसुमवत्यन्या या मुवर्णवती च सा ॥१३॥ पश्चानां सहमे तासां प्रदोपसमये स तम् । स्थापयित्वा समं गरवा प्रत्यूपेऽसोमयरखगान् ॥१४॥ राक्षसोऽद्य महाकायः स्वप्नेदशि मया निशि । यकृत्स किलास्माकं निहन्मस्तं खगा लघु॥१५॥ इति प्रणोद्य नैः साकमुद्यतैषिविधायुधैः । सोऽवर्धानिववी तीर्थे शीतले शीतलस्य सः ॥१६॥ तच्छरीरस्य पूजार्य धरणेन्द्रः समागतः । रुष्टो हृत्वाऽखिला विद्यास्तं हन्तुं स समुद्यतः ॥१७॥ भादिश्याभस्तमागत्य लान्तवेन्द्रो न्ययारयत् । मा मा प्राणिवधं कार्धिरणेन्द्र ! फणीन्द्र ! भोः ॥१८॥ स्वमहं च खगेन्द्रोऽयं सञ्जयन्तश्च संसृतौ । बद्धवैरा वयं सर्वे यथा भ्रान्तास्तथा शृणु ॥१॥ भनाऽस्ति भरतक्षेत्रे विषयः शकटश्रुतिः । पुरं सिंहपुरं तन सिंहसेनो नृपोऽभवत् ॥२०॥ रामदत्ता प्रिया तस्य कलागुणविभूपणा । धानी निपुणमत्याएया निपुणा निपुणेष्वपि ॥२१॥ सत्यवादी नरेन्द्रस्य श्रीभूत्याख्यः पुरोहितः । अलुब्ध इति स स्यातः श्रीदत्ता तस्य माहनी ॥२२॥ भाण्डशालाः समस्तासु दिशासु नगरस्य सः । कारयित्वा वणिग्वर्गविश्वासं कुरुतेतराम ॥२३॥ यणिक सुमित्रदत्तोऽस्ति पमखण्डे पुरोधसि । रत्नानि पञ्च विन्यस्य यातः पोतेन तृष्णया ॥२४॥ भिग्नपायः स चागस्य याचित्वा तान्यलब्धवान् । पुरोहितप्रमाणश्च रागलोकनिराकृतः ॥२५॥ पर्वतके दक्षिण भागके समीप वरुण नामक पर्वतपर उन्हें ले गया ॥१२॥ हरिद्वती, चण्डवेगा, गजवती, कुमुमवती और सुवर्णवती इन पाँच नदियोंका जहाँ समागम हुआ है यहाँ सायंकालके समय उन्हें रखकर चला गया और प्रातःकाल उसने विद्याधरीको यह कहकर क्षुभित कर दिया कि आज रात्रिको मैंने स्वप्न में एक महाकाय राक्षस देखा है। वह राक्षस हम लोगोंका क्षय करनेवाला होगा। इसलिए हे विद्याधरो! चलो उसे शीघ्र ही मार डालें ॥१३-१५। इस प्रकार विद्याधरीको प्रेरित कर उसने नाना प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले विद्याधरोंके साथ उन्हें मार 'डाला। मुनिराज संजयन्त भी अन्तिम समय केवलज्ञान प्राप्त कर श्री शीतलनाथ भगवान्के शान्तिदायक तीर्थ में निर्वाणको प्राप्त हुए ॥१६॥ तदनन्तर उनके शरीरकी पूजाके लिए जयन्तका जीव-धरणेन्द्र आया सो विद्युदंष्ट्रको इस करतूतसे यह बहुत ही रुष्ट हुआ। वह विद्युदंष्ट्रको समरत विद्याओंको हरकर उसे मारने के लिए उद्यत हुआ ही था कि उसी समय आदित्याभ दिवाकर देव नामफ लान्तवेन्द्रने वहाँ आकर हे धरणेन्द्र ! हे फणीन्द्र ! व्यर्थ हो जीव हिंसा न करो' इन शमा द्वारा उसे हिंसासे रोक दिया ॥१७-१८॥ तुम, में, यह विद्याधरीका राजा विद्युदंष्ट्र और संजयन्न इस प्रकार हम सब वैर याँधकर संसारमं जिस तरह भटकते रहे हैं वह मैं कहता हूँ सो मुनो ॥१॥ मी भरत क्षेत्रमें एक शकट नामका देश है। उसके सिंहपुर नगर में किसी समय सिंहसेन नामका राजा राज्य करता था ॥२०॥ सिंहसेनकी कला और गुण रूपी आभूपगाँसे मुशोभित रामदत्ता नामकी दी थी तथा निपुणमति नामकी एफ धाय धी जो निपुण मनुष्यों में भी भति- राय निपुण थी ॥२१॥ राजाका एक श्रोभूति नामका पुरोहित या जो मपर्नेका सत्ययादी प्रफट करता था तथा लोकमें अम्य-निर्लोम है इस तरह प्रसिद्ध था। उसकी प्रामगीका नाम श्रीदत्ता पारा यह श्रीभूति नगरको समस्न दिशामि भाण्डशालाएँ-गेहर रखने के स्थान यनया र व्यापारी वर्गका यहुन विश्यामपात्र बन गया था ॥२३॥ उसी समय पद्ममण्ड नामक नगर- नामक यणिफ रहता था। यह किसी समय अपने पाच ग्ल श्रीभूति पुरोदिन के पाम पर कृष्णा यश जहाज द्वारा कही गया था neen भाम्ययश उसका पहात फट गया। में एक सुमित्रदत्त १ सपनांगा । २. 'लगु विनर टुम्' इतमः | ३. नियां कामपा | ४. म., ग...., मम।५ मारिनी मोबासनी।

हरिवंशपुराणे प्रत्याशादग्धचित्तश्च नृपागारसमीपगम् । उच्चस्तरं समारुह्य पूकरोतीति नित्यशः ॥२६॥ सिंहसेनो महाराजो रामदत्ता कृपावती । साधुलोकस्तथाऽन्योऽपि शृणोतु कृपया युनः ॥२७॥ मासे पक्षेऽति चामुग्मिन् श्रीभूतेः सम्यतो मया। पचैवंविधरनानि हस्ते न्यस्तानि तान्यसौ ॥२८॥ प्रदातुं नेच्छतीदानीमतिलुन्धमतिर्मम । इति प्रत्यूपवेलायां नित्यं पूत्कृत्य यात्यसौ ॥२६॥ बहुस्वेवमतीतेषु मासेषु नृपमेकदा । रात्री प्रियाऽवदद्राजन्नन्यायोऽयमहो महान् ॥३०॥ यलिमी दुवैलाश्चापि लोके सन्ति तदन किम् । यलिनो दुबला हस्तै भन्ते नैव जावितुम् ॥३॥ दुबरस्य वराकस्य हनान्यस्य बलीयसा । रत्नानि तानि दाप्यन्तां यदि तेऽस्ति कृपा प्रभो ॥३२॥ राजा प्राह प्रिये ! वाधी भिलपात्रोऽयमत्रपः । भर्थनाशे ग्रही जातः प्रलपत्यतिदुःखितः ॥३३॥ इस्युक्ता सा जगी राजनेयोऽर्थप्रहदूपितः । यतो नियमितालापस्तत्वतस्तस्परीक्ष्यताम् ॥३४॥ इन्याकण्यं नृपोऽहत्तमुपांशु दिनानने । अपह ते स्म स द्रोही कुतो लुब्धस्य सन्यता ॥३५॥ ततो द्यूतन्दलेनैव स परीचितुमुद्यतः । राज्ञी तं तु पुराप्राशीत राम्रो भुक्तमलक्षिता ॥३६॥ गरवा निपुणमरया च राजपरन्या निदेशतः । याचिता नो ददौ तानि साभिज्ञानमपि प्रिया ॥३७॥ पने मितिमादाय ब्रह्मस्य ययाच सा । धात्री तथापि नो लेभे परयादेशो हि तादृशः ॥३८॥ लौटकर उसने पुरोहितसे अपने रन माँगे परन्तु प्राप्त नहीं कर सका। राजद्वारमें उसने प्रार्थना की परन्तु पुरोहितको प्रमाण माननेवाले राज-कर्मचारियों ने उसे तिरस्कृत कर भगा दिया ।।२५।। भन्नमें बदलेको आशासे जिसका चित्त जल रहा था ऐसा सुमित्रदत्त वणिक राज महलके समीप एक ऊँचे वृक्षपर चढ़कर प्रतिदिन यह कहता हुआ रोने लगा कि महाराज मिहसेन, दयावती रानी रामदत्ता तथा अन्य सज्जन पुरुष दयायुक्त हो मेरी प्रार्थना सुनें । मैंने अमुक मास और पक्षके अमुक दिन श्रीभूति पुगेहिती सत्यवादितासे प्रभावित होकर उसके हाथमें इस-इस प्रकार के पाँच रत्न रक्स थे परन्तु इस समय यह अत्यन्त लुब्ध होकर मेरे यह रत्न देना नहीं चाहता है । इस प्रकार प्रतिदिन प्रातःकालके समय रोकर वह यथास्थान चला जाता था॥२६-२६॥ इस प्रकार उसे रोते-रोते जब यहुत महीने बीत गये तब एक दिन प्रिया रामदत्ता ने रात्रिके समय राजासे कहा कि हे राजन् ! यह बड़ा अन्याय है । लोकमें पलवान् और दुर्घन सभी होते हैं तो क्या यलवानोंके हायसे दुर्वल मनुष्य जीवित नहीं रह सकते १ ॥३०-३१।। इस धारे दुर्यलके रत्न अतिशय यलयान पुगेहितने हड़प लिये हैं। इसलिए हे प्रभो! यदि इसर आपको दया आती है तो इसके रत्न दिलाये जावें ॥३२॥ राजाने कहा कि हे प्रिये ! समुद्रमें इसका जहाज फट गया था, इमलिए यह निलंब धन नष्ट हो जाने के कारण अतिशय दुःखी हो पिशायमे आरान्त हो गया है और उसी दशामें कुछ वकता रहता है ॥३३॥ इस प्रकार राजाका उत्तर पाफर गमदत्ताने कहा कि हे गजन् ! यह धन रूपी पिशापसे आक्रान्त नहीं है क्योंकि यह प्रतिदिन एक हो यान कहता है अतः इमको परीक्षा की जाय ॥३४॥ यह मुनकर राजाने प्रातःकाल एकाममें पुगेदिनमे पूछा परन्तु यह द्रोही मर्यथा मेंट गया सो ठीक ही है क्योंकि लोभी मनुष्य के मत्यना कैसे हो मसी है ? ॥३५॥ तदनन्तर गना जुआके छलमे हो पुरोहितको परीक्षा करने के लिए बात हुभा । गनी गमत्ताने जुआ मेलमेफे पूर्व दो किसी बहाने पुरोहितमे रिया था कि आज भाग्ने गनिमें क्या मोजन किया था? nा रानी रामदत्ताको भामा पाकर निगमनि घायने झाका पुदिनको नाम रत्न माग और पहिचान के लिए गत्रिक भीगनको यात बनाई पग्नु पुगेनिकी नौने ग्य नहीं दिये ॥३७॥ भएको पार जुमाम जीता भाजन से मार नियुगमनिन पुगेदिनी नामे रत्न मांगे परन्तु फिर भी यह र प्रान , .

सप्तविंशः सर्गः ३६५ पतिनामादितां वा मुद्रिका तायदात् प्रिया । वचनादामदत्ताया चूतं चाप्युपसंहृतम् ॥३॥ ग्यामिश्राण्यपि सदानः परकीयैरसो घणिम् । स्वररनान्येवमादाय राजप्जामवाप्तवान् ॥४०॥ परस्वहरणप्रीतः सर्वस्वहरण द्विजः । गोमयादनमायाप्य मलमुष्टिहतो मृतः ॥४॥ अर्थ यानाविलवासी सोन्धननामकः । भाण्डागारान्तरे जई राज्ञो द्रोही हताशकः ॥४२॥ स्थापितोऽन्यः पदे तस्य द्विजो धम्मिलसज्ञकः । मिथ्यादृष्टिरदियार्थ प्रति प्रायः किलोद्यतः ॥४३॥ पद्मखण्डपुरं गत्वा जैनोभूनोऽप्यसौ वणिक् । दानो चासीलिदानी च दत्तापुत्र धवान्छया ॥४॥ मुमिप्रदत्तिका तस्य भार्या मृत्वा विरोधिनी । व्याघ्रीभूता चखादादौ तं साधोनंतये गतम् ॥४५॥ सोऽभवदामदत्तायाः पुनः सस्नेहबन्धनः । सिंहचन्द्र इतीन्द्ररवमगणय्य निदानतः ॥४६॥ पूर्णचन्द्र इतीन्द्रामः कनीयान् तस्य जातवान् । जातौ च ती पितौ ख्याती सूर्याचन्दमसो यथा ॥४॥ भाण्डागारप्रविष्टं च सिंहसेनमगन्धनः । दष्टवान् दुष्टसर्पोऽसावेकदा वैरभावतः ॥४८॥ मन्यगरुडदण्डेन महागाडिकेन तु । अगन्धनादयः सस्तिवाहूय प्रणोदिताः ॥४॥ निष्टग्वेकोऽपराधी हि शेषा यान्तु यथागतम् । इत्युक्तोऽगन्धनोऽनिष्टद् यातायन्ये दाकवः ॥५०॥ नहीं कर सकी सो ठीक हो है क्योंकि उसके लिए पतिकी आज्ञा ही वैसी ही थी ॥३८॥ तीसरी यार पतिके नामसे चिह्नित अँगूठी देखकर पुरोहितको स्त्रीने वे रत्न दे दिये। उसी समय गनी रामदत्ताकी आज्ञानुसार जुआ बन्द कर दिया गया ॥३६॥ यद्यपि राजाने पणिक्के उन ग्लॉको दूसरेके रत्नों के साथ मिलाकर दिया था तथापि वणिक्ने अपने ही रत्न पहिचान कर उठा लिये और इस सचाईके कारण राजासे सम्मानको भी प्राप्त किया ॥४०॥ दूसरेका धन हरण करनेमें भौतिका अनुभव करनेयाले पुरोहितका सब धन छीन लिया गया, उसे गोवर खिलाया गया और मल्लों के मुकांसे पिटवाया गया जिससे वह मर गया ॥४॥ चूंकि वह धनके आर्तध्यानसे फ्लु- यित चित्त होकर मग था इसलिए राजाके भाण्डार गृहमें आन्धन नामका सॉप हुआ और अपनी दुष्टताके कारण राजासे सदा द्रोह रसने लगा ॥४२॥ श्रीभूति पुरोहितके स्थानपर धम्मिल्ल नामक दूसरा मामण रक्खा गया परन्तु वह भी मिथ्यादृष्टि था और प्रायः नहीं कहे हुए कार्यको करने के मुमित्रदत्त वणिक रत्न लेकर अपने पद्मसण्डपुर नगरको चला गया। यद्यपि वह जैन था- जैन धर्मके स्वरूपको समझता था तथापि 'मैं रानी रामदत्ताका पुत्र होॐ ऐसा उसने निदान याँध लिया और इसी इच्छासे वह सूर दान करने लगा ॥४४॥ वणिकफी म्रो सुमित्र- दत्तिका जो सदा उससे विरोध रसती थी मरकर एक पर्वतपर व्याघ्री हुई। एक दिन मुमिनदत्त किन्हीं मुनिराजको बन्दना लिए उसी पर्यतपर गया था सो उस व्याघीन उसे सा लिया ॥४५॥ मरकर यह रामदत्ताका पुत्र हुआ। यद्यपि यह अपने पुण्य पलसे इन्द्र हो सकता था तथापि निदानके द्वारा इन्द्रत्यकी उपेक्षा कर राजपुत्र हो हुआ। उसका सिंहचन्द्र नाम रपया गया तथा यह गमहत्ताके स्नेह-मनये युक्त था उसे अतिशय प्यारा था ॥४३॥ सिंहपन्द्रफे, इन्द्र समान आभायाला पूर्णचन्द्र नामका एक छोटा भाई भी हुभा। ये दोनों भाई पृथियोपर सूर्य- पन्द्रमाके समान प्रसिद्ध थे ॥४॥ एक समय राजा सिंहमन फार्ययश भाण्डागारमें प्रविष्ट हुए गो यहाँ पूर्व प्रेरके कारण पुरोहितके जीव अगन्धन नामक दुष्ट सौपने उन्हें फाट गया | उसी 7 नगरमें एक गाव (म उत्तानेको विद्या) का अन्दा जानकार गाडदण्ड रहता था। पुमने मन्त्री दाग भगन्धनको आदि लेकर समान माँको बुलाकर मनमे पहा बिनम लोगों जो एक अपराधी मर्प हे यही यहा ठहरे, याको सय यथास्यान घले जायें। गरदड ऐमा १. म० 1 २.मदसापाः पुत्र रमोपनियादा निदानपुरोगिन धन: लिए उद्यत रहता था ॥४॥ म.1४. सर्गः।

हरिवंशपुराणे उपसंहर हे दुष्ट ! स्वविसृष्टं विपं लघु । नोपसंहर्तुमिच्छा चेत्प्रविशाशु हुताशनम् ॥५॥ इत्युनो नोपसंहृत्य विषं विषधरो रुपा । वलत्कृशानुमाविश्य मृत्वाऽभूञ्चमरी मृगी ॥५२॥ सिहसेनो मृतो जातः स हस्ती सल्लझीवने । शाखामृगस्तु धम्मिलः का वा मिथ्यादृशां गतिः ॥५३॥ रामदत्तासुतौ राजयुवराज्ञी नयान्वितौ । शशासतुरिलां वेलावलयावधिको विभू ॥५४॥ पोदने पूर्णचन्द्रो यो या हिरण्यवती च तौ'। पितरौ रामदत्ताया जिनशासनभावितौ ॥५५॥ राहुभद्रमुनेः पावें प्रव्रज्यावधिमैपिता । दत्तवस्यायिकापावें माताऽधत्तायिकावतम् ॥५६।। पूर्णचन्द्रमुनेः श्रुत्वा रामदत्ताम्बिकाऽयिका । प्रवृत्ति रामदत्ताया गत्वा बोधयतिस्म ताम् ॥५॥ प्रावजद्रामदत्ता सा संसारभयवेदिनी । राहुभद्रगुरोरन्ते सिंहचन्द्रोऽपि बोधितः ।।५।। पूर्णचन्द्रस्तु राज्यस्थः प्रतापप्रणताहितः । भोगासक्तो बभूवासौ सम्यक्त्वव्रतवर्जितः ॥५६॥ एकदा रामदत्ताऽयो सिंहचन्द्र तावधिम् । पप्रच्छ चारणं नत्वा स्वमातृसुतजन्म सा ॥६॥ स माह भरतेऽत्रैव विषये कोसलाभिधे । बभूव व किग्रामे विप्रो नाम्ना मृगायणः ॥६॥ ब्राह्मणस्य स्वभावेन मधुरा मधुराभिधा । सुता च वारुणी यूनां वारुणीव मदावहा ॥६२।। कहनेपर राजाको काटनेवाला अगन्धन सर्प रह गया बाकी सब चले गये ॥४६-५०॥ गरुडदण्डने उसे ललकारते हुए कहा कि अरे दुष्ट ! अपने द्वारा छोड़े हुए विपको शीघ्र ही खींच और यदि खींचनेको इच्छा नहीं है तो शीघ्र ही अग्निमें प्रवेश कर ॥५॥ गरुडदण्डके इस प्रकार कहनेपर उस अगन्धन सर्पने क्रोधके कारण विप तो नहीं खींचा पर जलती हुई भग्निमें प्रवेश कर मरण स्वीकार कर लिया और मरकर वह चमरी मृग हुआ ॥५२॥ विपके वेगसे मरकर राजा सल्लकी वनमें हाथी हुआ और जिसे श्रीभूतिके स्थानपर रखा गया था वह धम्मिल्ल मरकर उसी धनमे वानर हुआ सो ठीक ही है क्योंकि मिथ्यादृष्टि जीवोंकी और गति हो ही क्या सकती है ?५३॥ रामदत्ताके सिंहचन्द्र और पूर्णचन्द्र नामक दोनों नीतिज्ञ एवं सामर्थ्यवान पुत्र क्रमसे राजा और युवराज बनकर समुद्रान्त पृथिवीका पालन करने लगे ॥५४॥० पोदनपुर नगरमें जो राजा पूर्णचन्द्र और रानी हिरण्यवती थी वे रानी रामदत्ताके माता- पिता थे और वे दोनों ही जिनशासनको भावनासे युक्त थे ॥५शा एक बार रामदत्ताके पिता पूर्णचन्द्रने राहुभद्र मुनिके समीप दीक्षा ले अवधिज्ञान प्राप्त किया और माता हिरण्यवतीने दत्तयती आर्यिकाके समीप दीक्षा ले आर्यिकाके व्रत धारण कर लिये ॥५६॥ कदाचित् रामदत्ताको माता हिरण्यवती आर्यिकाने अवधिज्ञानी पूर्णचन्द्र मुनिसे रामदत्ताका सय समाचार सुना और जाकर उसे सम्बोधित किया--समझाया ॥५७॥ माताके मुखसे उपदेश श्रवण कर रामदत्ता संसारसे भयभीत हो उठी जिससे उसने उसी समय दीक्षा ले ली। हिरण्यवतीने रामदत्ताके पुत्र सिंहचन्द्रको भी समझाया जिससे उसने भी गहुभद्र गुरुके समीप दीक्षा ले ली ||५८॥ सिंहचन्द्र के वाद प्रतापके द्वारा शत्रुओंको नम्रीभून करनेवाला युवराज पूर्णचन्द्र राज्य-सिंहासनपर आरूढ़ हुआ परन्तु वह सम्यग्दर्शन और व्रतसे रहित होनेके कारण भोगोंमें आसक्त हो गया ॥५॥ एक घार आर्यिका रामदत्ताने अवधिज्ञानी एवं चारण ऋद्धिके धारक सिंहचन्द्र मुनिको नमस्कार फर उनसे अपना, अपनी माताका तथा अपने पुत्रों का पूर्यभव पूछा ॥६०|| इसके उत्तर में मुनिगज कहने लगे कि इसी भरतक्षेत्रके कोसल देशमें एक वर्धकि नामका ग्राम था और उसमे मृगायण नाम का एक ब्राह्मण रहता था ॥६१|| ब्राह्मणकी ब्राह्मणीका नाम मधुरा था जो न केवल नामसे ही मधुग थी किन्तु स्वभावसे भी मधुरा थी। उन दोनों एक यारुणी नामकी पुत्री थी जो तरुण मनुष्यों के लिए वारुणी-मदिराके समान मद उत्पन्न करनेवाली १.बतीत्यमी म.। २. प्रतापेन प्रगताः अहिताः शत्रयों येन सः। ३ मदिरेव ।

सप्तविंशः सर्गः मृत्वा मृगायणो रामः साकेतेऽतियलस्य सः ! हिता हिरण्यवस्येपा श्रीमायाच मुताऽभवत् ॥१३॥ मधुरा वं रामदत्ताऽभूः पूर्णचन्द्रस्तु वारुणी । वणिकमियदत्तोऽहं सिंहचन्द्रस्तवात्मजः ।।६॥ 'दयः श्रीभूतिपूर्वेण भुजगेन पिता गजा । सलातो ग्राहितो धर्म मया स मदवारणः ।।६।। दुर्भुजङ्गचरी मृत्वा धमरी घमरातुरा । रोदः कुक्कुटसर्पोऽभूद् रुपापरिग्रहः ॥६६॥ मोपवासमतान्तः स विश्रान्तमदः करी । प्रस्तः कुश्कुटसण सहनारमगारमुधीः ॥६॥ विमाने श्रीप्रमे तन श्रीधरः श्रीधरोऽमरः । अप्सरोमिरमा भोगी धर्मेण रमत्तेऽधुना ॥६॥ ग्रोधाद् धमिक्लपूर्वग मकंटेन इतस्तदा । पापः कुक्कुटसोजगारपिव: यालुकाप्रभाम् ॥६॥ ग्लेरछः शृगालदनस्तदन्तिदन्तास्थिमौक्तिकम् । दत्तवान् धनमिग्राय पूर्णचन्द्राय वाणिजः ॥७०॥ दन्तास्थिभिरयं तुष्टः कारयित्वा नृपासनम् । हारमारं तु मुक्ताभिरथास्ते तदयिमत्ति सम् 11 अहो संसारवंचियं देहिनामिह मोहिनाम् । पितुरङ्गानि जायन्ते भोगागानि परागवत् ॥७२॥ निशम्य शमिनो वाक्यं रामदत्ता प्रमादिनम् । तदशेपमुदाहृत्य पूर्णचन्द्रमयोधयत् ॥७३॥ दानपूजातपाशीलसम्यकावमनुपास्य सः । कल्पे तस्मिन् विमानेऽभूदद्वयंप्रमनामनि ॥७॥ रामदत्ताऽपि सम्यक्त्वाम्णमुस्मृज्य तन तु । प्रमरविमानेऽभूवः सूर्यप्रमाभिधः ॥७५॥ सिंहचन्द्रमुनिः सम्यगाराधितचतुष्टयः । येयकेऽहमिन्द्रोऽभूरस प्रीतिकरसंशके ॥७॥ थी ।।६२।। मृगायण मरकर साकेत नगरमें राजा अतिबल और उसकी रानी श्रीमतीके तुम्हारी माँ हिरण्ययसी हुआ है।।६३॥ उसकी मधुरा ब्राह्मणी तू रामदत्ता हुई है,वारुणीका जीव तेरा छोटा पुत्र पूर्णचन्द्र हुआ है, और वणिक् सुमित्रदत्तका जीव मैं तेरा सिंहचन्द्र नामका पुत्र हुआ हूँ ॥६४|| पिता सिंहसेनको श्रीभूतिके जीव अगन्धन सर्पने डस लिया था इसलिए मरकर वे हाथी हुए थे मैंने उन्हें हाथीकी पर्यायमै श्रायकका धर्म धारण कराया था ॥६५।। श्रीभूति पुगेहितका जीय साँप हुआ था फिर चमरी मृग हुआ। तदनन्तर घमरमृगके लिए आतुर होता हुआ मरकर रूपे पडाको धारण करनेवाला दुष्ट कुक्कुट सर्प हुआ ॥६६॥ पिताका जीव जो हाथी हुभा था वह उपवासका मत लेकर शिथिल पड़ा हुआ था और उसका सय मद सूस गया था उसी दशामें पुरोहित के जीय कुक्कुट सर्पने उसे डस लिया जिससे वह अच्छे परिणामांसे मरकर सहस्रार स्वर्ग गया ॥६७॥ वह वहाँ श्रीप्रभ नामक विमानमें लक्ष्मीको धारण करनेवाला श्रीधर नामका देव हुआ है और इस समय धर्मके प्रभावसे भोगोंसे युक्त हो अप्सराओके साथ रमण कर रहा है ॥६॥ धम्मिल्ल- का जीव जो मर्कट हुआ था उसने हाथीका घात करनेवाले कुक्कुट सर्पको क्रोधवश मार डाला जिससे वह मरकर यालुकाप्रभा नामक तीसरे नरकमें गया ||६धा किसी शृगालदत्त नामक भीलने उस हाथ के दाँत, हट्टी और मोती इकटे कर धनमित्र सेठके लिए दिये और धनमित्रने राजा पूर्णचन्द्र के लिए समर्पित किये ७०॥ राजा पूर्णचन्द्र उन्हें पाकर बहुत सन्तुष्ट हुआ। उसने दोनोंकी हटियोंसे सिंहासन यनवाया है और मोतियोंसे बड़ा हार तैयार करवाया है। इस समय यह उसी मिहामनपर बैठता है और उसी हारको धारण करता है ॥७२|| अहो ! मोही प्राणियों- संमारकी विचित्रता तो देखो कि जहाँ अन्य प्राणियोंके अद्ग के समान पिताके अद्ग भी भोगके साधन हो जाते हैं ॥७२॥ मुनिराज सिंहचन्द्र के वचन सुनकर भार्यिका गमदत्ताने जाकर प्रमादमें झे पूर्णचन्द्रको यह स यताकर अच्छी तरह समझाया ॥७३॥ जिससे वह दान, पूजा, तप, शॉल और सम्यक्त्वका भन्छी तरह पालन कर सो सहनार स्वर्गके बर्यप्रभ नामक विमान देय हुआ रामदत्ता भी सम्यादर्शन के प्रभावसे नी पर्यायको छोड़ कर इसी महनार स्वर्गक प्रभंकर नामफ विमानमें सूर्यप्रभ नामका देव हुई॥४॥और सिंहचन्द्र मुनि भी अच्छी तरह पार १. ६ः म.1 २. लक्ष्मोधरः । ३ एलनामधेयः । ४ याच्यं म ।

- हरिवंशपुराणे सूर्यप्रभसुरश्च्युन्या जम्बूद्वीपस्य भारते । ताड्यदक्षिणश्रेण्यां धरणीतिलके पुरे ॥७॥ भूभृतोऽतिबलस्याभूत्सम्यक्त्वच्युतिदोपतः । सुलक्षणमहादेव्यां श्रीधराया शरीरजा ॥८॥ मलकापतये दत्ता सा सुदर्शनभूभुजे । स वैडूर्यविमानेशस्तस्यां जाता यशोधरा ॥७॥ दत्तायामुत्तरश्रेण्या प्रभाकरपुरेशिने । सूर्यावर्ताय जातोऽस्यां सुतोऽसौ श्रीधरोऽमरः ॥१०॥ तस्मै तु रश्मिवेगाय राज्यं दत्वा पिता सता । मुनिचन्द्रसमीपेऽमौ मोक्षार्थी तपसि स्थितः ॥८॥ गुणवस्यार्यिकापावें श्रीधरा सयशोधरा । सम्यग्दर्शनसंशुद्धा प्रवज्या प्रत्यपधत ॥२॥ रश्मिवेगोऽन्यदा यातः सिद्धक्टं ववन्दिपुः । हरिचन्द्रमुनेस्तत्र धर्म श्रुत्वाऽभवद्यतिः ॥३॥ काशनाख्यगुहायो तं स्वाध्यायध्वनिपावनम् । आर्य ते वन्दितुं याते रश्मिवेगं महामुनिम् ॥४॥ बालुकाप्रभभूमेयों निर्यातो नारकश्विरम् । स संसृत्य गुहायां हि जातः सोऽजगरोऽन तु ॥५॥ कायोत्सर्गस्थितं माधुमुपसर्गनिरीक्षणात् । आयें च ते समर्यादे सोऽगिलद्विपुलोदरः ॥८॥ रश्मिवेगो मृतः कल्पे कापिटे श्रेष्ठधीरभूत् । अप्रभस्तथाऽत्राणे विमाने रुचके सुरौ ॥१७॥ महाशनुरखौ मृत्वा रौद्रध्यानदुराशयः । पङ्कप्रभा भुवं प्राप्तः पापपकलङ्कितः ॥८॥ प्रीतितरविमानेशः सिंहचन्द्रचरश्च्युतः । अपराजितसुन्दर्योः पुत्रश्चक्रपुरेऽजनि ॥६॥ चायुधाभिधानस्य चित्रमालाऽस्य भामिनी । तस्यामप्रभश्च्युरला जातो वनायुधः सुतः ॥१०॥ आराधनाओंकी आराधना कर प्रीतिङ्कर नामक अवेयकमें अहमिन्द्र हुए ॥७६॥ रामदत्ताका जीव जो सूर्यप्रभ देव हुआ था वहाँ उसका सम्यग्दर्शन छूट गया था इसलिए आयु पूर्ण होनेपर वहाँसे च्युत हो वह विजया पर्वतकी दक्षिणश्रेणीपर जो धरणीतिलक नामका नगर है उसके राजा अतिथलकी सुलक्षणा नामक महादेवीके श्रीधरा नामको पुत्रो हुआ ॥७७-७८श्रीधरा, भलका नगरीके स्वामी गजा सुदर्शनको दी गई और उसके पूर्णचन्द्रका जीव जो वैडूर्यप्रभ विमानका स्वामी था वहाँसे चयकर यशोधरा नामकी पुत्री हुआ ॥६॥ यशोधरा, उत्तरश्रेणीपर स्थिर प्रभाकरपुरके स्वामी राजा सूर्यावर्त के लिए दी गई और उसके राजा सिंहसेनका जीव जो श्रीधर देव हुआ था वह वहाँसे चयकर रश्मियेग नामका पुत्र हुआ|heen तदनन्तर अब गजा सूर्यावर्त मोक्षकी अभिलापासे उस रश्मिवेग पुत्र के लिए राज्य देकर मुनिचन्द्र गुरुके समीप तप करने लगा तब श्रीधग और यशोधराने भी सम्यग्दर्शनसे शुद्ध हो गुणवतो आर्यिकाके पास दीक्षा ले ली ॥८१-८२॥ एक समय रश्मिवेग वन्दना करनेकी इच्छासे सिद्धकूट गया था कि वहाँ हरिचन्द्र मुनिसे धर्म श्रवण कर मुनि हो गया ।।८३एक दिन महामुनि रश्मिवेग, काश्चन नामक गुहा में स्वाध्याय करते हुए विराजमान थे कि श्रीधरा और यशोधरा नामको आर्यिकाएँ उनकी वन्दनाके लिए यहाँ गई ॥८|| श्रीभूति पुरोहितका जीव जो पालुकाप्रभा पृथिवीम नारकी हुआ था वह चिरकाल के बाद वहाँ से निकलकर तथा संसारमे परिभ्रमण कर उसी गुहा में अजगर हुआ था। उपसर्ग आया देख मुनि रश्मिवेग कायोत्सर्गमें स्थित हो गये और दोनों आर्यिकाओने भी साथ- धिक संन्यास ले लिया। विशाल उदरका धारक वह अजगर उन तीनोंको निगल गया ।।६।। रश्मिवेग मरकर कापिष्ठ स्वर्गमें उत्तम बुद्धिके धारक अर्कप्रम देव हुए और दोनों आर्यि- फाएँ भी उसी स्वर्गके रुथक विमानमें देव हुई ||८७॥ जिसका हृदय रौद्र ध्यानसे दूपित था ऐसा महाशत्र अजगर पापरूपों पङ्कसे कलङ्कित हो मरकर पङ्कप्रभा नामक चौथी पृथियों में उत्पन्न हुआ heen सिंहचन्द्रका जीप जो प्रीतितर विमानका स्वामी था वह वहाँ से च्युत हो चापुर नामक नगरके राजा अपराजित और गनी सुन्दरीके चक्रायुघ नामका पुत्र हुआ। चक्रायुधको चित्रमाला थी और उसके मुनि रश्मियेगका जीव ( रानी रामदत्ताका पति गजा सिंहसेनका १. प्रातः म. 1 २. वन्दिमिन्युः।

सप्तविंशः सर्गः श्रीधरापूर्वको देवः पृथिवीतिलके पुरे। प्रियरातिगाम्यां रत्नमालाऽम'मुता ॥११॥ वायुयाय मा दत्ता तस्यां रस्नायुधः सुनः । जानो यशोवरापूः सुरः पूर्यमुकर्मणः ॥१२॥ चक्रायुधः श्रियं न्यस्य मुने यत्रायुधे सपः 1 पिहितानवपादान्ने कृवान्ते निति श्रितः ॥१३॥ पन्नायुधोऽपि विन्यस्य राज्यं रस्नायुधे तपः । दधे राज्यमदोन्मतः स च मिथ्यामागसः ॥३॥ जलागाहनायास्य रामहस्यन्यदा गतः । मुनिदर्शननः स्मृत्वा जाति नापः पियायनी ॥५॥ सस्य मेघनिनादस्य राजा कृत्यमज्ञानता । वनदत्तमुनिः पृष्टः कारणं प्रत्यमापस ||३|| चित्रकारपुरेऽत्राभूप्रीतिभद्रो नरेश्वरः । दयिता मुन्दरी तम्य पुत्रः प्रीतिरस्तयोः ॥७॥ चिनबुद्धिस्तथा मन्त्री कमला तस्य कामिनी । विचिन्नमसिरियामोत्तनयः सनयोऽनयोः । अमान्यराजपुत्री ती श्रुग्धा तु तपमः फलम् । श्रुतमागरपादान्त युवानी सपयि स्थिती तीच निर्वागधामानि पश्यन्ती कान्तदर्शनी । माकेसमन्यदा यासी नानायियतपोधनी ।।१००॥ गणिकां युद्धिसेनाम्यां तन रष्ट्याऽतिरूपिणीम् । भग्नः कर्मवशामान्यानमन्त्रिपुत्रस्यपः ||१०|| रानः स गन्धमिग्रस्य नूपकारपद स्थितः । मांसपाकविशेषको लेभे मां गणिको सतः १०२॥ म मुक्याऽमाऽनया कामं मर्वतोऽविरसात्मकः । मांसाशनमियो मृष्या सप्तमों पृथियी मिसः ।।१०३|| जीय) अकंप्रम देव कापिष्ठ म्वर्गसे च्युत हो वसायुध नामका पुत्र हुमा |E-01| श्रीधरा आर्यिकाका जीव जो कापिष्ठ स्वर्गमें देव हुआ था, वहाँसे च्युत हो पृथियोतिलक नगरमें राजा प्रियंकर और अतिवेगा रानीके रत्नमाला नामकी पुत्री हुआ ॥१॥ ग्लमाला पयायुधके लिए दी गई और उसके आर्यिका यशोधराका जीव जो फापिष्ठ स्वर्गमें देय हुआ था वहाँसे च्युन हो पूर्व पुण्यके उदयसे ग्लायुध नामका पुत्र हुआ ||२|| चक्रायुध, यायुध पुत्र के लिए राज्यलक्ष्मी सौंपकर पिहिताम्रय मुनिके पादमूलमें तप करने लगा और अन्नमें निर्वाणको प्राप्त हुआ n६३|| राजा यमायुधने भी राज्यका भार ग्नायुध पुत्र के लिए सौंपकर तप धारण कर लिया। परन्तु रत्नायुध राज्यके मदसे मन्मत्त हो मिथ्यादष्टि हो गया ॥६४|| राजा रत्नायुधका एक मेघनिनाद नामका मुख्य इम्ती था । एक समय यह जलावगाइनके लिए गया था परन्तु योचमें मुनिराजका दर्शन होनेसे से जाति स्मरण हो गया जिससे उमने पानी नहीं पिया II राजा रत्नायुध मेवनिनादके इस कार्यको नहीं समझ सका इसलिए उसने यमदत्त नामक मुनिराजसे इसका कारण पूछा। उत्तरमें मुनिराज कहने लगे ॥६॥ इसी भरत क्षेत्रके चित्रकारपुरमें एक प्रीतिभद्र नामका राजा रहता था। उमकी सुन्दरी नामको की थी और दोनों के प्रीतिकर नामका पुत्र था ॥१७॥ राजा प्रीतिभद्रका एक पिप्रवृद्धि नामका मन्त्री था। मन्त्रीकी स्त्रीका नाम कमला था और दोनों के विचित्रमति नामका नीतिवेत्ता पुय था | राजपुत्र प्रीनिंकर और मन्त्रिपुत्र विचित्रमति दोनों ने एक बार श्रुतसागर मुनिसे तुपका फल मुना और दोनों ही युयायस्थामें उनके घरणोंके समीप रहकर सप करने लगे ||६|| जो देखने में बहुत मुन्दर थे और नाना प्रकारका तपश्चरण हो जिनका धन या ऐसे ये दोनों मुनि एक समय मि - Tum Tam.npramrit nो. नामकी पेश्य भ्रष्ट हो गया 79 (गना गयमि ममस्त पापोंमे अविरत थी-जिसे किमी भी पापके करने में मंकोप नहीं था तथा जो मांम गानेका प्रेमी हो चुका था ऐमा यिचित्रमति बम येश्याफे साथ इन्धानुमार भोग भोगकर मग १. यगोधरापूर्व म. । २. मृत्यान्ते म. ग. 1 ३. अरगा प्रग लग्ना यम्य मः। फलाम राना हरिवंशपुराणे उदयोऽपि ततो भ्रान्वा संसारं सारवर्जितम् । जातः पापविशेषेण मारणो मत्तवारणः॥१०॥ साधुदर्शनयोगेन जातिस्मृतिमुपागतः । निन्दन् मन्दरुचिः कर्म गजोऽयमुपशान्तवान् ॥30410 तदाकण्यं करीन्द्रोऽसौ नरेन्द्रश्च यतेर्वचः । मिथ्याकलङ्कमुत्सृज्य जातौ श्रावकतायुजौ ॥१०॥ पप्रभाविनिर्यातो नारकोऽप्यभवत्पुनः । मदीदारुणयोाधो नामकर्मातिदारणः ॥१०॥ वने प्रियमुखण्डेऽसौ वज्रायुधमहामुनिम् । व्याधो विव्याध योगस्थं सोऽपि सर्वार्थसिद्धिमत् ॥१०॥ महातमम्प्रभा प्राप्तो मृत्वा व्यायोऽतिदारुणः । दुःखमन्वभवरसोऽस्यां घोरं मुनिवघोद्भवम् ॥१०६]] मृत्वा श्रावकधर्मेण रत्नमालाऽच्युतेऽमरः । जातो रस्नायुधश्चापि तत्रैव सुरसत्तमः ॥१०॥ द्वीपे च धातकीखण्डे पूर्वमेरोश्च पश्चिमे । विदेहे गन्धिलादेशे राज्ञोऽयोध्यापतेः सुतौ ॥११॥ अहंद्दासस्य तौ देवौ सुव्रताजिनदत्तयोः । जाती वीतभयः सीरी चक्री चात्र विभीषणः ॥१२॥ पृथ्वी रनप्रभा यातो जोदितान्ते विभीषणः । अनिवृत्तिमुनेस्रवन्ते कृत्वा वीतभयस्तपः ॥१३॥ जातः स लान्तवेन्द्रोऽहमादित्याभो मयाप्यसौ । नारको बोधितो गरवा विभीषणचरस्नतः ॥१४॥ जम्बूद्वीपविदेहे यो विषयो गन्धमालिनी । तन्त्र रौप्यगिरौ चारौ'चारुखेचरगोचरें ॥१५॥ प्राणी श्रीधर्मणः पूर्वः श्रीदत्तायामजायत । श्रीदामनामधेयोऽसौ मया मेरौ प्रबोधितः ॥१६॥ और मरकर सातवें नरक गया ॥१०३।। वहॉसे निकलकर इस असार संसार में भटकता रहा। अब किसी पाप विशेषके कारण आपका हिंसाशील मदोन्मत्त हाथी हुआ है ॥१०४॥ मुनिराजके दर्शनका योग पाकर यह जाति-स्मरणको प्राप्त हुआ है और इसीलिए संसारसे मन्दरुचि हो अपने कार्यको निन्दा करता हुआ शान्त हो गया है ।।१०५॥ वदत्त मुनिराजके उक्त वचन सुनकर वह मेघनिनाद हाथी और राजा रत्नायुध दोनों ही मिथ्यात्व रूपी कलंकको छोड़ श्रावक- के व्रतसे युक्त हो गये ।।१०।। श्रीभूति पुरोहितका जीव, जो अजगर पर्यायसे पङ्कप्रभा पृथिवीम गया था वह वहाँसे निकलकर मंगी और दारुण नामक भील भीलनीके नाम और कार्य दोनोंसे ही अतिदारुण पुत्र हुआ। भावार्थ-उस पुत्रका नाम अतिदारुण था और उसका काम भी अति दारुण-अत्यन्त कठोर था ॥१०७|| एक दिन राजा सिंहसेनके जीव वायुध महामुनि प्रियङ्गखण्ड नामक वनमें ध्यानारूद थे कि उस अतिदारुण भीलने उन्हें मार डाला । महामुनि मरकर सर्वार्थसिद्धि गये और वह अतिदारुण भील मरकर महातमःप्रभा नामक सातवीं पृथिवीमें गया जहाँ मुनिवधसे उत्पन्न घोर दुःख उसे भोगना पड़ा ॥१०८-१०६॥ रत्नमाला, मर कर श्रावक धर्मके प्रभावसे अच्युत स्वर्गमें देव हुई तथा रत्नायुध भी उसी स्वर्ग में उत्तम देव हुआ ॥११०॥ घातकीखण्ड द्वीपमें पूर्व मेम्के पश्चिम विदेहमें एक गन्धिला नामका देश है। उसको अयोध्या नगरीमे राजा अहहास राज्य करते थे। उनको सुत्रता और जिनदत्ता नामको दो रानियाँ थीं। रत्नमाला और रत्नायुधके जीव जो अच्युत स्वर्ग में देव हुए थे वहाँसे च्युत हो उन्हीं दोनों रानियोके क्रमसे वीतभय नामक वलभद्र और विभीषण नामक नारायण हुए ॥१११-११२॥ इनमें विभीषण तो आयुका अन्त होनेपर रत्नप्रभा नामक पहली पृथिवीमें उत्पन्न हुआ और वीवभय अनिवृत्ति मुनिके समीप तप कर आदित्याम नामका लान्तवेन्द्र हुआ। वह लान्तवेन्द्र मैं ही हूँ। मैंने रत्नप्रभा पृथिवीमें जाकर विभीपणके जीव नारकोको अच्छी तरह समझाया ॥११३-२१४॥ तदनन्तर इसी जम्बू द्वीपके विदेह क्षेत्रमें जो गन्धमालिनी नामका देश है उसमें विद्याधरोंके मनोहर-मनोहर निवासोंसे युक्त एक अतिशय सुन्दर विजयाध पर्वत है। उसी विजयाधपर श्रीधर्म राजा और श्रीदत्ता नामकी रानी रहती थी। विभीपणका जीव नारकी, नरकसे निकलकर इन्हीं दोनोंके श्रीदाम नामका पुत्र हुआ। यह श्रीदाम मुझे एक घार सुमेरु १ अगन्धत् । २ विनयाधपते । ३. सुन्दरे । ४ गोचरः म०, ग० ।

सप्तविशः सर्गः - अनन्तमतिसंज्ञस्य गुरोः कृत्वातिशिप्यताम् । स चन्द्रामविमानेन्द्रो ब्रह्मलोकेऽभवासुरः ॥११॥ व्याधपूर्वोऽपि सप्तम्या निःमृत्य भुजगोऽभवत् । रानप्रभां प्रविश्यत्य प्रान्स्वा तिर्यक्षु दुःखमा ||१८|| स भूतरमगाटव्यामरावस्यास्तटेऽभवत् । तोकं कनकवेश्यां तु तापसस्य बमालिनः ॥११॥ स पञ्चाग्नितपः कुर्वन् मृगशो मृगोपमः । चन्द्राभं खेचरं दृष्ट्वा से चरन्तं यच्छया 11१२०॥ निदानी वनदंष्ट्रस्य विद्युदंष्टोऽयमारमजः । जातो विद्युप्रमागर्ने विद्याविद्योतितोचमः ॥१२॥ वत्रायुधचरश्च्युत्दा जातः सर्वार्थसिद्धितः । संजयन्तः फणीन्द्रस्त्वं जयन्तो ब्रह्मलोकतः ॥२२॥ एकजन्मापकारेग बहुजन्मसु वैरधीः । अवधीत् सिंहमेनं तं श्रीभूतिचरजीवकः ।।१२३॥ नतोऽस्य घनवरेण कोपनिम्नस्य को गुणः । जातः प्रत्युत जातोऽयं सौख्यविनदारमनः ।।१२४॥ उपलश्य मतं जैनं गजो जन्मनि पञ्चमे । निरो निवृतोऽहिस्व संसरत्येष वैरभाक् ।।१२५।। बैरवन्धमिति ज्ञावा घोरससारवर्धनम् । धरणेन्द्र ! विमुश स्वं तथा मिय्यावमप्यरम् ।।१२६॥ इत्यादिश्यामदेवेन धरणेन्द्रः प्रयोधितः । मुक्तवरः स सम्यक्त्वं जग्राह भवतारणम् ॥२७॥ वतः खण्डितविद्यास्ते छिनपक्षाः खगा यथा । ग्विन्नोद्यमास्तदेत्युना धरणेन मेचराः ॥१२॥ प्रतिमा ब्योमगाः सर्वे सजयन्तस्य पावनीम् । शेले स्थापयतानाशु पञ्चचापरातोच्छ्याम् ॥१२॥ पर्वतपर मिला तो वहाँ भी मैंने उसे समझाया ॥११५-११६। जिससे अनन्तमति गुरुका शिष्य बनकर वह ब्रह्मलोक स्वर्गमें चन्द्राम विमानका स्वामी देव हुआ है ।।११७॥ श्रीभूतिका जीव जो पहले भील था सातवीं पृथिवीसे निकलकर सर्प हुआ। फिर रत्नप्रभा नामक पहिली पृथिवीमें गया, वहाँ से निकल कर तिर्यश्चीमें भ्रमण कर दुःख भोगता रहा ।।११।।" तदनन्तर भूतरमण नामक अटवीमें ऐरावती नदी के किनारे खमाली नामक तापसकी कनककेशी खीसे पुत्र उत्पन्न हुआ ॥११॥ वह मृगके समान था तथा मृगङ्ग उसका नाम था । एक बार यह पश्चाग्नि तप तप रहा था कि उसकी दृष्टि स्वेच्छासे आकाशमै विचरण करते हुए चन्दाम नामक विद्याधरपर पड़ी। विद्याधरको देखकर उमने विद्यावर होनेका निदान किया और उसके फलस्वरूप यह राजा वनदंष्ट्रकी विद्युत्प्रभा रानीके गर्भसे, जिसका उद्यम विद्याओंसे प्रकाशमान है ऐसा यह विद्युदंष्ट्र नामका पुत्र हुआ है ॥१२०-१२१।। पत्रायुधका जीव सर्वार्थ- सिद्धिमे च्युत होकर संजयन्त हुआ है और ब्रह्मलोकसे चलकर जयन्तका जीव तू धरणेन्द्र हुआ है ।।१२।। देखो वैरकी महिमा, राजा सिंहसेनने श्रीभूति पुरोहितका एक जन्ममें अपकार किया था पर उसी अपकारसे वैर याँधकर श्रीभूतिके जीवने अनेक जन्मोंमें सिंहसेनका वध किया ॥१२३॥ तीव्र वैरसे क्रोधके वशीभूत हो श्रीभूतिके जीवने सिंहसेनका अनेक बार बात किया अवश्य पर उससे उसे क्या लाभ हुआ ? प्रत्युत इसका यह कार्य अपने ही मुसको नष्ट करनेवाला हुआ ॥१२|| सिंहसेनका जीव तो जब हाथी था तभी जैनधर्म प्राप्तकर वैर रहित हो गया था और उसके फलस्वरूप पाँचवें भवमें संजयन्त पर्यायसे मोक्ष चला गया है पर तू नागेन्द्र होकर भी बैरको धारणकर संसारमें परिभ्रमण कर रहा है ॥१२॥ हे धरणेन्द्र ! इस प्रकार वैर भावको घोर संसारका वर्धक जानकर तू छोड़ दे और सबका मूल जो मिथ्यादर्शन है उसका भी शीघ्र त्याग कर दे ॥१२६|| इस प्रकार आदित्याभ देवके द्वारा प्रबोधको प्राप्त हुए धरणेन्द्रने सब वैर-भाव 7 छोड़कर संसारसागरसे पार करनेवाला सम्यग्दर्शन धारण कर लिया ॥१२७॥ तदनन्तर विद्याओके खण्डित हो जानेसे जो पच कटे पक्षियोंके समान वेद विन्न हो रहे थे ऐसे उन विद्याधरोंसे घरणेन्द्र ने कहा कि हे समस्त विद्याधरो ! तुम सब शीघ्र ही इस पर्वतपर १ पुनः। 'पुनः मुनूरपत्यं च तुक्तोक चात्मजः प्रजा' इत्यमरः । २. भूतपूर्वो पत्रायुध इनि वज्रायुवचरः।

३७२ - हरिवंशपुराणे तस्याश्चरणमूले वः पुरश्चरणकारिणाम् । कालेन महता क्लेशाद्विधाः सिद्धयन्तु नान्यथा ॥३०॥ इतः प्रभृति च स्त्रीणां विद्युदंष्ट्रस्य सन्तती 1 प्रज्ञप्तिरोहिणीगौर्यः सिभ्यन्तु न नृणां तु ताः ॥१३॥ इयुक्तमनुमन्यते खगाः प्रणतिपूर्वकम् । विद्याः स्वा लेमिरे भूयो यथास्वं च ययुः सुराः ।।१३२॥ खेचराः स्थापयास्तां यतेः प्रतियातनाम् । नानोपकरणां तत्र हेमररनमयों गिरी ॥१३॥ हृतविद्या यतस्तन होमन्तस्तस्थुरानताः । विद्याधरास्ततः शैलं हीमन्तं तं जना जगु १३४॥ भूभृतो रत्नवीयस्य मथुरायां पृथुश्रियः । स मेरुमघमालायां लान्तवेन्द्रोऽभवन्मुतः ॥१३॥ श्रमितप्रभया तस्य प्रिययाऽलाभि भूपतेः। धरणेन्द्रचरः पुत्रो मन्दरश्चन्द्रसुन्दरः ॥३६॥ युवानौ तौ ततो भुक्रवा कामभोगान् यथेप्सितान् । श्रेयसो जिनचन्द्रस्य शिष्यतामुपजग्मतुः ॥१३॥ स मेरुमरुनिष्कम्पः प्राप्य केवलसम्पदम् । निर्वधी तु गणेन्द्रवं मन्दरो मन्दरोपमः ।।१३८॥ रथोद्धतावृत्तम् सञ्जयन्तचरितं जगत्त्रये सुप्रसिद्धमतिभक्तिभावतः । सम्भवन्तु भुवि भव्यजन्तवः संस्मरन्तु जिनता यियासवः ॥१३॥ इत्यरिष्टनेमिपुराण संपहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतो सजयन्तपुराणवर्णनो नाम सप्तविंशः सर्गः ॥२७॥ संजयन्त स्वामीकी पाँच सौ धनुप ऊँची पवित्र प्रतिमा स्थापित करो। उसी प्रतिमाके पादमूलमें उनको सेवा करते हुए तुम लोगोंको बहुत समय बाद बड़े कप्टसे विद्याएँ सिद्ध होंगी अन्य प्रकार से नहीं ॥१२८-१३०॥ आजसे विद्युदंष्ट्रके वंशमें केवल स्त्रियोंको ही प्राप्ति, रोहिणी और गोरी नामको विद्याएँ सिद्ध हो सकेंगी पुरुपोंको नहीं ॥१३१॥ इस प्रकार धरणेन्द्रकी आज्ञाको विद्याधरोंने नमस्कार पूर्वक स्वीकार किया तथा यथायोग्य विधिसे अपनी विद्याएँ पुनः प्राप्त की । यह सब होनेके बाद देव यथास्थान चले गये ॥१३२॥ विद्याधरीने धरणेन्द्रकी आज्ञानुसार उस पर्वतपर नाना उपकरणों से युक्त एवं सुवर्ण और रत्नोंसे निर्मित संजयन्त स्वामीकी प्रतिमा स्थापित कराई ॥१३३॥ विद्याओं के हरे जानेसे लज्जित हो नीचा मस्तक किये हुए विद्याधर चूंकि यस पर्वतपर बैठे थे इस लोग उस पर्वतको हीमन्त कहने लगे ॥१३४॥ मथुरामें विशाल लक्ष्मीका धारक रत्नवीर्य नामका राजा रहता था । उसको मेघमाला नामको स्त्री थी, आदित्याभ नामका लान्तवेन्द्र उन्हीं दोनोंके मेक नामका पुत्र हुआ ॥१३॥ उसी राजा रत्नवीर्यकी दूसरी श्री अमितप्रभा थी, उसके धरणेन्द्रका जीव चन्द्रमाके समान सुन्दर मन्दर नामका पुत्र हुआ ॥१३६।। तदनन्तर युवा होनेपर दोनोने इच्छानुसार कामभोगोका उपभोग किया और उसके बाद दोनों ही, श्री श्रेयांसनाथ जिनेन्द्र के शिष्य हो गये-दीक्षा लेकर मुनि हो गये ॥१३७। उनमें मेरु पर्वतके समान निष्कम्प मेरु मुनिराज केवलज्ञानरूपी सम्पत्तिको प्राप्त कर मोक्ष चले गये और मन्दरगिरिको उपमाको धारण करनेवाले मन्दर मुनिराज श्रेयान्सनाथ भगवान्के गणधर हो गये ॥१३८॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि इस पृथिवीपर जो भव्य जीव तीर्थंकर पद प्राप्त करना चाहते हैं वे तीनों लोकोंम अतिशय प्रसिद्ध संजयन्त स्वामीके इस चरितका उत्कट भक्ति भावसे आदर करें तथा उसीका अच्छी तरह स्मरण करे ॥१३॥ इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराण के संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराण में सजयन्त पुराणका वर्णन करनेवाला सत्ताईसवा सर्ग समाप्त हुआ ॥२७॥ १. यातुमिच्छवः ।

अष्टाविंशः सर्गः अतः परं परं शौरः शृणु श्रेणिक ! चेष्टितम् । वेगवस्या वियुक्तस्य पुण्यपौरपयोगिनः॥१॥ पर्यटनटवीं वीरस्तापसाश्रममधमः । प्रविष्टोऽपश्यदाविष्टविकथान् तत्र तापसान् ।।२।। राजयुद्धकथामकाः यूयं किमिति तापसाः । तापसास्तपसायुक्तास्तपो वाक्संयमादिकम् ॥३॥ इति पृष्टा जगुस्ते तं विशिष्टजनवरसलाः । नवप्रव्रजिता वृत्ति मौनी विद्मो वयं न भोः ॥l श्रावस्त्यामस्ति विस्तीर्णयशस्तीमहार्णवः । एणीपुत्र इति चोणीप तिरछीणपौरुषः ॥५॥ प्रियमुसुन्दरी तस्य दुहिता लोकसुन्दरी । तस्याः स्वयंवराथं तु तेनाहूता वयं नृपाः ॥६॥ केनापि हेतुना कोऽपि न वृतो वृतया श्रिया । कम्यया वन्यहस्तिन्या वन्येतरगनो यया ॥७॥ भूपाः मम्भूय भूयांसो विलक्षा लोमलपिताः । कन्यापित्रा ततः सत्रा मद्यो यो समुद्यताः ॥८॥ वेन भोः क्षुमितान्याशु सहस्राणि महीभुजाम् । सोचितानि समामे नेत्राणि रविणा यथा ॥ तामिमानिमः केचिद् मनाङ्गी करणाक्षमाः । रणागणगता भृपाः प्राणान् सद्यो हि तत्यजुः ॥१०॥ विश्वेऽप्यश्वरवात्तस्मात्सहस्रकरतो वयम् । चान्तीघा इव भीता भोः प्रविष्टा गहरं धनम् ।।११।। कुर धर्मोपदेश भो धर्मतत्त्वमजानताम् । वं वचोभिरलं मृष्टेष्टतत्त्वोऽमिलक्ष्यमे ॥१२॥ अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! अब तुम वेगवतीसे रहित तथा पुण्य और पुरुषार्थके समागमको प्राप्त वसुदेवका आगेका चरित सुनो ||१|| एक दिन बिना किसी । थकावटके अटवीमें भ्रमण करते हुए वीर वसुदेवने तपस्वियोंके आश्रममें प्रवेश किया और वहाँ विकथा करते हुए तापसीको देखा ॥२॥ कुमारने उनसे कहा-अये तापसो! आप लोग इस तरह राज-कथा और युद्ध-कथामें आसक्त क्या है ? क्योंकि तापस वे कहलाते हैं जो तपसे युक्त हो और तप यह कहलाता है जिसमें वचन संयम आदिका पालन किया जाय अर्थात् वचनाको पशमें किया जाय ॥३॥ इस प्रकार कहनेपर विशिष्ट आगन्तुकसे स्नेह रखनेवाले उन तपस्वियोंने कहा कि हम लोग अभी नवीन ही दीक्षित हुए हैं। इसलिए मुनियोंकी वृत्तिको जानते नहीं हैं ॥४॥ इसी श्रावस्ती नगगेमें विस्तृत यशसे समुद्रको पार करनेवाला एवं असण्ड पौरुपका धारक एक एणीपुत्र नामका गजा है ।शा उसकी लोकमै अद्वितीय सुन्दरी प्रियहुसुन्दरी नामकी कन्या है। उसके स्वयंवर के लिए एणोपुत्रने हम सब राजाओंको बुलाया था ॥l परन्तु किसी कारणवश; जिस प्रकार यनकी हस्तिनी वनके मिवाय किसी दूसरे इस्तीको नहीं बरती है उसी प्रकार उस शोमासम्पन्न कन्याने किसीको नहीं यग ॥ तदनन्तर जो कन्याके लोभसे युक्त थे, परन्तु उसके प्राप्त न होनेमे मन-ही-मन लन्नित हो रहे थे, ऐसे बहुतमे राजा मिलकर कन्याके पिताके साथ शीघ्र ही युद्ध करनेको तैयार हो गये ८॥ परन्तु जिस प्रकार एक ही सूर्य हजारों नेत्रोंको अकेला ही संकोचित कर देता है उमी प्रकार उस अकेले एणीपुत्रने हजारों राजाओंको शीघ्र ही सुमित कर मंकोचित कर दिया | उत्कट अभिमानमे भरे कितने हो रामानि जो पराजय को स्वीकृत करनेमें समर्थ नहीं थे, युद्ध के मैदान में जाकर शीघ्र ही प्राण त्याग दिये ॥१०॥ जिस 7 प्रशार सूर्यसे डरकर अन्धकारके समूह सघन वनमें जा घुसते हैं उसी प्रकार हम मय भी घोड़ों की हिनहिनाटसे युक्त युद्धसे डग्फर इस मघन वनमें आ घुसे हैं ॥११॥ भो महाशय ! हम लोग धर्मका कुछ भी तत्व नहीं जानते । इसलिए आप हम लोगोंको धर्मका उपदेश दीजिए। १ श्रेष्ठन् । • सारिदिग्यासाला क., ग०, घ०, ८०1 ३. रणाग्नीकरणवमा: का, मलामी करणदमाः म.

हरिवंशपुराणे पृष्टस्तथा तथा शौरिस्तेषां धर्म द्विधाऽभ्यधात् । यतिश्रावकभेदज्ञाः श्रामण्यं ते यथा ययुः ॥१३॥ प्रियङ्गसुन्दरीलाभलोभेन यदुनन्दनः । श्रावस्ती वस्तुविस्तारविश्रुतां तामशिश्रियत् ॥१॥ वाद्योद्याने च तपासौ कामदेवगृहेऽप्रतः । त्रिपादं कृत्रिमं हैमं महामहिपमैवत ||१५|| पप्रच्छ विप्रमेकं भो किमेप महिपत्रिपाद् । निर्मितो रत्ननिर्माणो भाग्यमा हि हेतुना ॥१६॥ स प्राईवमि हैवाभूरपुर्या भूपतिरार्यकः । इक्ष्वाकुर्जितशत्रुस्तरपुत्रश्चापि मृगध्वजः ॥१७॥ श्रेष्टी तु कामदत्तोऽन गोष्ठं द्रष्टुं गतोऽन्यदा । पपात पादयोस्तस्य कृपणो महिपोऽल्पकः ॥१८॥ ततश्चाश्चर्यकृत् कार्य यथास्वं स्वामिनाऽमुना ।'पिण्डारो दण्टकस्तय पृष्टः कारणमग्रवीत् ।।१६।। उत्पन्नदिन एवास्योपरि करुणा मेऽभवत् । वने दृष्ट्वा मुनि नरवा पृष्टवान् तमहं पुनः ॥२०॥ अस्योपरि किमर्थ मे करणा महती मुने । स वभाग मुनिानी शृणु गोपाल ! निश्चितम् ॥२॥ एकस्यामेव चामुष्यां महिप्यामेप जातवान् । पञ्चकृरवो वराकस्तु जातो जातो हतस्त्वया ॥२२॥ घारे पष्टे तु तनिष्टकनिष्ठस्य तवैपकः । सहसोत्याय सन्त्रस्तः पादयोः पतितः शिशुः ।।२।। कृपया समयाऽग्रायं पुत्रवत्परिपालितः । जीवितार्थी तवेदानी पतितः पादयोरिह ।।२।। ध्रुस्यैवं कृपया तेन समानीतः पुरीमसौ । अभयं राजलोकेभ्यो लब्ध्वाऽवर्दिष्ट भद्रकः ॥२५।। आपके मधुर वचनोंसे पता चलता है कि आपने धर्मका तत्त्व अच्छी तरह देखा है ॥१२॥ इस प्रकार उन सबके पूछनेपर वसुदेवने उन्हें श्रावक और मुनिके भेदसे दोनों प्रकारका धर्म बतलाया जिससे वे मुनि और श्रावकके भेदको अच्छी तरह जानकर यथार्थ साधु अवस्थाको प्रात हुए ॥१३॥ तदनन्तर प्रियंगुसुन्दरीके लाभके लोभसे प्रेरित हो कुमार वसुदेवने, वस्तुओंके विस्तारसे प्रसिद्ध नस श्रावस्ती नगरीमें प्रवेश किया ॥१४॥ वहाँ उन्होंने वाह्य उद्यानमै कामदेवके मन्दिरफे आगे निर्मित तीन पाँयका एक पड़ा भारी सुवर्णमय भसा देसा ॥१५॥ उसे देसफर उन्होंने एक प्रादाणसे पूछा कि हे महानुभाव ! यहाँ यह रत्नमयी तीन पाँवाका भैसा किसलिए बनाया गया है ? इसका कुछ कारण अवश्य होना चाहिए ॥१६॥ ब्राह्मणने कहा कि इस नगरमें पहले शत्रुओं को जीतनेवाला एक इदयाकुवंशीय जितशत्रु नामका उत्तम गजा था और उसका मृगध्धन नामक पुन था ॥१७॥ इसी नगरमै एक कामदत्त नामका सेठ रहता था। यह एक समय गोशाला देसनेके लिए गया तो यहाँ एक दीन-हीन छोटा-सा भैंसा उसके घरणोंपर आ गिरा॥१८॥ उसका यह आश्चर्यजनक कार्य दस सेठने गोशालाके अधिकारी पिण्डार नामक गोपालसे इसका कारण पूछा ॥१६|| गोपाल ने कहा कि जिस दिन यह उत्पन्न हुआ था उसी दिनसे इसपर मुझे यहुन दया उत्पन्न हुई थी इसलिए मैंने यनमें विराजमान मुनिराज के दर्शन फा नमस्कार पूर्वक उनसे इसके विषयमें पूछा था ॥२०॥ कि हे मुनिनाथ ! इसके ऊपर मेरे हृदयमें यद्भुत भारी दया क्यों उत्पन्न हुई है ? इसके उत्तग्में शानी मुनिराजने कहा था हे गोपाल ! मुन, मैं इसका कारण पहना हूँ॥२१॥ यह पारा इमी एक भमके पौष पार उत्पा हुआ भीर सत्पन्न होते ही नू ने इसे मार डाला ॥२२॥ अप घठयों या भी उसी भैसके भत्ता हुमा है, अपी पार इमे जानिम्मरण हुभा है इसलिए भयभीत हो ससा उठकर तेरे पैरापर भागिराया। छोटे पन्गांका मरण भी तो तेरे दो आधीन था ॥२२॥ मुनिगज वा. यपन सुनकर मैंने यहाँ पुग्यम इसका पालन किया है। भय जीवित रहनेको सामे या या आपके परणाम भी गिरा ॥२४॥ गोपारके यमन गुनार यह सेठ दयापूर्वक म भगः पगेको भपने माय नगर ले गया भोर गज-कर्मचारियोंसे मुगे अभय म.। २. पनं म.11 ममेयरमा।

भष्टाविंशः सर्गः भन्यदायभवोपात्तवैरवन्धानुबन्यतः । पाई चकत्तं चक्रेण महिपत्य मृगध्वजः ॥२६॥ राज्ञा विधाय'चाज्ञप्ते मृगध्वजवधे रुपा । छाना मन्त्रिणा नीवारण्ये श्रामण्यमापितः ॥२७॥ भद्रके मदभावेन मृते घाटादशेऽहनि । द्वाविंश वेचली जातः शुद्धध्यानान्मृगध्वनः ॥२८॥ चतुर्णिकायदेवः म मायश्च कृतजनः । संपृष्टो वैरसम्बन्धः पिना नु जितशग्रुणा ॥२६॥ मृगध्वजमुनिः प्राह देवदानवमानवैः । कथाकर्णनसन्तुष्टचित्तकणंपुरतः ॥३०॥ प्रतिशत्रुखिपिष्टस्य द्रोह्यभूदलकापुरे । भश्वनीव इति स्यानो विद्याधरमहेश्वरः ॥३॥ सचिवस्तस्य निस्तीर्णतकमार्गमहार्णवः । हरिश्मध्रुवदस्पृश्यो,हरिश्मश्रु इति श्रुतः ॥३२॥ नास्तिकैकान्तवादी प्रत्यकप्रमाणकः । प्रत्यक्षानुपलभ्यं यत्तशास्तीत्यम्युपेतवान् ।।३३।। चतुर्भूतसमूहेऽस्मिन् किण्वादी मदशक्तिवत् । चैतन्यशक्तिरस्यन्तमसम्येव भवस्यमौ ॥३४॥ भात्मेति व्यवहारोऽध लोकस्य न विरुध्यते । न भूतप्यतिरिक्तोऽस्ति संसायंनुपलब्धितः ॥३५॥ पुण्यापुण्यविधाता यो भोक्ता च सुखदुःखयोः । इष्टो स्निस्य वा रटेरभावात् पारलौकिकः ॥३६॥ नारकस्वर्गतियंकरवविकल्पोऽज्ञविकल्पितः । भोगाधिष्टाधिष्टान: परलोको न विद्यते ॥३७॥ - दिलाकर उसका भद्रक नाम रख दिया। भद्रक दिन-प्रति-दिन बड़ा होने लगा ॥२५|| किसी समय राजपुत्र मृगध्वजने अन्यभव सम्बन्धी वैरके संस्कारसे चक्र द्वारा उस भैंसेका एक पाँव काट डाला ॥२६॥ राजाको जब इस बातका पता चला तो उसने क्रोधमें आकर मृगध्वजको मारनेका आदेश दे दिया । मन्त्री बुद्धिमान् था इसलिए उसने मृगध्वजको मारा तो नहीं किन्तु किसी छलसे वनमें ले जाकर उसे मुनि दीक्षा दिला दी ॥२७॥ भद्रक शुभ परिणामोंसे अठारहवें दिन मर गया और वाईसवें दिन निर्मल ध्यानके प्रभावसे मृगध्वज मुनि केवलज्ञानी हो गये ॥२८॥ चारों निकायके देव तथा मनुष्याने आकर मृगध्वज केवलीकी पूजा की। तदनन्तर 'पिता जितरात्रुने मृगध्वज केवलीसे मृगध्वज तथा भैसेके बैरका सम्बन्ध पूछा ॥२६॥ तदनन्तर कथाके मुननसे जिनके चित्त तथा हृदय प्रसन्न हो रहे थे ऐसे देव, दानव और मानवाँसे घिरे भृगध्वज मुनि इस प्रकार कहने लगे ॥३०॥ किसी समय अलका नगरीमें प्रथम नारायण त्रिपिष्टका प्रतिशत्रु-प्रतिनारायण, अश्यपीय नाममे प्रसिद्ध विद्याधरीका राजा रहता था ||३१|| उसका हरिश्मश्रु नामका एक मन्त्री था जिसने तर्कशास्त्र रूपी महासागरको पार कर लिया था और सिंहकी मूंछके समान जिसका पर्श करना कठिन था ॥३०॥ हरिश्मश्रु एकान्तवादी नास्तिक तया सिर्फ प्रत्यक्षको प्रमाण मानने बाला था इसलिए जो वातु प्रत्यक्ष नहीं दिसती थी उसे वह 'है ही नहीं' ऐसा मानता था ॥३३॥ उसका कहना था कि जिस प्रकार आटा आदिमें मद शक्ति पहले नहीं थी किन्तु विभिन्न वस्तुओं- फा संयोग होनेपर नवीन ही उत्पन्न हो जाती है इसी प्रकार पृथिवी आदि चार भूतकि समूह स्वरूप इस शरीरमं जो पहले बिलकुल ही नहीं थी ऐसी नवीन ही चैतन्य शक्ति उत्पन्न हो जाती है ॥३४॥ इसी चैतन्य शक्तिमें यह आत्मा है ऐसा लोगोंका व्यवहार विरुद्ध नहीं होता अर्थात् इस पैनन्य शक्तिको लोग आत्मा कहते रहे इसमें कोई विरोधकी बात नहीं है। यथार्थमें पृथिव्यादि भूतोंसे अतिरिक्त कोई संसार्ग आत्मा नहीं है क्योंकि इसको उपलब्धि नहीं होती ॥३५॥ पुण्य-पापका कर्ता, मुस-दुःसका मोक्ता और परलोकमें जानेवाला जो अज्ञानी बनाने मान किया है यह नहीं है क्योंकि वह दिखाई नहीं पड़ता ॥३६॥ भोगीके अधिष्ठाता- आत्माके रहने का भाधार, तथा नरक देव और विर्ययोंके भेदसे युक जिस परलोकको कल्पना १. चारलग-म० 1 २ वर्णन म.। ३ मिश्मिभूत् । ४ दृष्टा: म ।

हरिवंशपुराणे ज्ञानवृत्तिविशेषस्य शक्यो यश्च विनिश्चितः । मोको मोस्तुरमावास न युक्तो निःप्रमाणकः ॥३८॥ भूतसंश्लेपजातस्य भूतविश्लेपनाशिनः । सुखिनश्चिद्विशेषस्य संयमो भोगनाशनः ॥३॥ इत्येकान्तकुतर्केण रक्षितः सचित्रः स च । प्रागमानुमितिज्ञेय जीवाद्यर्थात् परोमनः ।।१०।। परलोककथापोटदुःकथामूढमानसः । कामभोगेकनिष्टोऽभूत्कनिष्ठो धर्मदूपकः ॥४॥ नास्तिकस्य तथा तस्य प्रेत्यभावापलापिनः । तीर्थकृचत्रवादिमहापुरुषदूपिणः ॥४२॥ हरिश्मश्रोरीहस्य हरिकण्ठोऽपि नास्तिकः । धर्मकुण्ठोऽपि भावेन नित्याविष्टोऽवतिष्टने ॥४॥ अश्वग्रीको हतो युद्धे त्रिपिप्टेन तमस्तमः । विजयेन हरिश्मश्रुः प्राविशनरकं ततः ॥४४}} चिरं संसृत्य जातोऽहं हयग्रीवो मृगध्वजः । हरिश्मश्रुः पुना राजन् भद्को महिषोऽधुना ॥४५॥ पूर्वकोपानुबन्धेन मयैव महिषो हत्तः । अकामनिर्जरातोऽभूलोहितात्यो महासुरः ॥४६॥ भागतो वन्दनाभल्या देवभूस्याऽधुना युतः । भारतेऽयमत्र जातेन मिनभावेन भावितः ||१७|| क्रोधानुबन्धमित्येकं सत्वान्धीकरणक्षमम् । विनियम्य महाराज ! शाम्यन्तु शिवकाक्षिण: ॥४॥ राजाद्याः प्रावजन् श्रुत्वा प्रशान्तो महिषासुरः । निःशल्यो लौल्यमुग्मिरवा रराज ससमाजनः ॥४॥ ६गता केवलिनं नत्वा ससुरासुरमानवाः । यथास्वं स्थानमन्ये च सिद्धस्थानं मृगचजः ॥५०॥ अज्ञानी जनोने कर रखी है वह नहीं है ॥३७॥ विशिष्ट ज्ञानवान मनुष्योंको हो जिसकी प्राप्ति शक्य एवं सुनिश्चित की गई है ऐसा मोक्ष मानना भी निष्प्रमाण है क्योंकि जब मुक्त होनेवाला आत्मा ही नहीं है तब मोक्षका मानना उचित कैसे हो सकता है ? ॥३८॥ जो भूतोंके संयोगसे उत्पन्न होता है और भूतोंके वियोगसे नष्ट हो जाता है ऐसे सुखके उपभोक्ता चेतनके लिए संयम धारण करना भोगोंको नष्ट करना है ॥३६॥ इस प्रकार जो एकान्त मत रूपी कुतर्कोसे रँगा हुआ था, भागम तथा अनुमान प्रमाणके द्वारा ज्ञेय जीवादि पदार्थोंसे सदा पराड्मुख रहता था, पर लोक सम्बन्धी कथाओंसे रहित दुष्ट कथाओमे हो जिसका मन मूढ रहता था और जो धर्मको निन्दा करता रहता था ऐसा वह क्षुद्र मन्त्री निरन्तर काम भोगों में ही आसक्त रहता था॥४०-४१॥ नास्तिक, परलोकके अपलापी, तीर्थंकर तथा चक्रवर्ती आदि महापुरुषों को दोष लगानेवाले और खोटी चेष्टासे युक्त हरिश्मश्रु मन्त्रीके संसर्गसे अश्वग्रीव भी नास्तिक बन गया जिससे वह भी धर्मसे विमुख एवं भवों द्वारा पिशाचादिसे निरन्तर आक्रान्त हुएके समानरहने लगा ॥४२-४३।। तदनन्तर किसी समय युद्ध में अश्वग्रीवको त्रिपिष्ट नारायणने और हरिश्मश्रुको विजय बलभद्रने मार गिराया जिससे वे दोनों ही मरकर तमस्तमः नामक सातवें नरक गये ॥४४॥ हे राजन् ! चिर काल तक अनेक योनियोमे भ्रमण कर अश्वग्रीवका जीव तो मैं मृगध्वज हुआ हूँ और हरिश्मश्रुका जीव इस समय भद्रक नामका भैंसा हुआ है ।।४।। पूर्व क्रोधके संस्कारसे मैंने ही उस भैसेको मारा था और अकाम निर्जराके प्रभावसे वह लोहित नामका असुर हुआ है ॥४६॥ वह लोहितासुर इस समय चन्दनाकी भक्तिसे यहाँ आया है और देवोंको विभूतिसे युक्त हो मित्र भावसे यहीं बैठा है ॥४॥ हे महाराज! यह क्रोधका संस्कार प्राणीको अन्धा बना देने में समर्थ है इसलिए जो मोक्षको इच्छा रखते हैं वे इसे रोककर शान्त हो ॥४॥ मृगध्वज केवलीके मुखसे यह वृत्तान्त सुन जितशत्रुको आदि लेकर कितने ही राजाओंने दीक्षा ले ली। महिषासुर शान्त हो गया और सभाके लोग लोलुपता छोड़, शल्य रहित हो सुशोभित होने लगे ॥४६॥ तदनन्तर देव-दानव और केवलीको नमस्कार कर यथायोग्य अपने-अपने स्थानपर चले गये और केवली मृगध्वज सिद्ध स्थानपर जा १ शेयो जीवाद्यर्थात् म०। २ कामभोगैः कनिष्ठोऽभूत् म०1 ३. प्रेत्याभावाप -म० । ४. अश्व प्रीवोऽपि । ५ लोहितादो क०।६, गत्वा म अष्टाविंशः सर्गः आर्यागोतिच्छन्दः महिपमृगध्वजवृत्तं यः सततं शुद्धवृत्तमनसि धत्ते । स भजति दृष्टिविशुद्धिं जिनदृष्टपदार्थगोचरां भव्यजनः॥५१॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतौ मृगध्वजमहिषोपाख्यानवर्णनो नाम अष्टाविंशः सर्गः ॥२८॥ विराजे ॥५०॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि जो भव्य जीव इस महिषासुर और मृगध्वजके वृत्तान्त- को सदा अपने शुद्ध हृदयमें धारण करता है वह जिनेन्द्र भगवानके द्वारा इष्ट पदार्थोंको विषय करनेवाली दर्शनविशुद्धि-सम्यग्दर्शनको निर्मलताको प्राप्त होता है ॥५१॥ इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें मृगध्वज और महिपके चरितका वर्णन करनेवाला अहाईसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥२८॥ १ महिपध्वज म.।

एकोनत्रिंशः सर्गः कामदत्तो जिनागारपुरो लोकप्रवेशने । मृगध्वजस्य प्रतिमा स न्यधान्महिपस्य च ॥१॥ अव कामदेवस्य रतेश्च प्रतिमा व्यधात् । जिनागारे समस्तायाः प्रजायाः कौतुकाय सः ॥२॥ कामदेवरतिप्रेक्षाकौतुकेन जगजनाः । जिनायतनमागत्य प्रेक्ष्य तत्प्रतिमाद्वयम् ॥३॥ संविधानकमाकर्ण्य तद् भाद्रकमृगध्वजम् । बहवः प्रतिपद्यन्ते जिनधर्ममहर्दिवम् ॥४॥ प्रसिद्धं च गृहं जैनं कामदेवगृहाख्यया । कौतुकागतलोकस्य जातं जिनमताप्तये ॥५॥ व्यतिक्रान्तेषु बहुपु सातपुरुषेविह । कामदेवाभिधः श्रेष्ठी कामदत्तान्वयेऽधुना ।।६।। रूपयौवनसम्पूर्णा पूर्णचन्द्रसमानना । कन्या बन्धुमती तस्य बन्धुलोकातिनन्दिनी ॥७॥ भादिष्टः पितृपृष्टेन दैवज्ञेने नरो वरः । तस्याः स्मरगृहद्वारमुद्धाट्य स्मरपूजनः ॥८॥ एवंविधवचः श्रुत्वा तद्गृहद्वारमेस्य सः । द्वानिशदर्गलादुर्गमुद्घाट्य सहसाऽविशत् ।।६।। ततोऽभ्यर्य जिनेन्द्रार्चाः सोऽर्चयत् सरतिस्मरम् । चैत्याचनार्थमेतेन कामदेवेन वीक्षितः ॥१०॥ तेन नैमित्तिकादेशसंवादमुदितात्मना । दत्ता बन्धुमती तस्मै बन्धुराधरबन्धुरा ॥११॥ कामदः कामदेवेन कामदेवस्य कामिनः । जामाता कामदेवाभः कोऽपि दत्त इतीहशी ॥१२॥ वार्ता प्रादुरभूरपुर्यामतस्तस्यामितोऽमुतः । राज्ञान्तःपुरपोरैश्च यः स्वैरमसौ ततः ।।१३।। अथानन्तर सेठ कामदत्तने, जहाँ लोगोंका आना जाना अधिक था ऐसे स्थानपर नगरमे जिनमन्दिरके आगे मृगध्वज केवलीकी प्रतिमा और महिपकी मूर्ति स्थापित की ॥१॥ सेठने इसी मन्दिरमें समस्त प्रजाके कौतुक के लिए कामदेव और रतिको भी मूर्ति बनवाई ॥२॥ कामदेव और रतिको देखनेके कोतूहलसे जगत्के लोग जिन-मन्दिरमें आते हैं और वहाँ स्थापित दोनो प्रतिमाओंको देखकर मृगध्वज केवली और महिपका वृत्तान्त सुनते हैं जिससे अनेकों पुरुप प्रति दिन जिनधर्मको प्राप्त होते हैं ॥३-४॥ यह जिनमन्दिर कामदेव मन्दिरके नामसे प्रसिद्ध और कौतुकवश आये हुए लोगोंको जिनधर्मको प्राप्तिका कारण है ॥५॥ उसी कामदत्त सेठके वंशमें अनेक लोगोंके उत्पन्न हो चुकनेके बाद इस समय एक कामदेव नामका सेठ उत्पन्न हुआ है ॥६॥ "उसकी रूप और यौवनसे पूर्ण, पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखयाली तथा बन्धुजनोंको आनन्दित करनेवाली बन्धुमती नामकी एक कन्या है ॥७॥ पिताके पूछनेपर निमित्तज्ञानीने बताया था कि जो मनुष्य कामदेवके मन्दिरका दरवाजा खोलकर कामदेवको पूजा करेगा वहीं इसक पति होगा ॥८॥ ब्राह्मणके इस प्रकारके वचन सुन यमुदेव कामदेवके मन्दिर के द्वारपर पहुंचे और बत्तीस अर्गलाओंसे दुर्गम उस द्वारको खोलकर शीघ्र ही भीतर जा पहुँचे ॥६॥ भीतर जाकर वसुदेवने प्रथम तो जिनेन्द्र भगवानकी प्रतिमाओंकी पूजा को और उसके बाद रति सहित कामदेवकी पूजा की। उसी समय कामदेव सेठ प्रतिमाओंकी पूजाके लिए मन्दिरमें आया थ सो उसने वसुदेवको दसा ॥१०॥ तदनन्तर निमित्तज्ञानीके आदेशकी सचाईसे जिसकी आत्म प्रसन्न हो रही थी ऐसे कामदेव सेठने सुन्दर भौठोसे सुशोभित अपनी वन्धुमती कन्या वसुदेव लिए प्रदान कर दी ॥११॥ उसी समय नगरीम चारों ओर यह समाचार फैल गया कि वरके अभिलाषी सेठ फामदेवके लिए कामदेवने, मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला एवं कामदेव के समान १. निमित्तशेन, ज्योतिर्विदा।

एकोनग्रिंशः सर्गः प्रिय गुमुन्दरी तं च कश्चिदवलोक्य सा । अनुरक्ता तथा जाता विरक्ताऽभूद् यथाऽभिमि ॥१४॥ रहस्याबाह्य चामुच्चय तो स्वा बन्धुमती सखीम् । पत्युलमिकाऽसि स्वं वैदग्ध्यं चाऽस्य कीरशम् ॥१५॥ साऽस्य मुग्याऽवदत्तस्य विदग्यस्य विचेष्टितम् । तथा यथा गता मोई स्वसंवेद्यसुयामिकम् ॥१६॥ माभिमानमुदस्यान्तं तस्य द्वास्थमजीगमन् । तरसमागममिच्छाशु स्वावधं वेत्यनुत्तरम् ॥१७॥ अन्याय्यमुभयं चैतदिति सञ्चिन्य यादवः । व्याजेन केनचिद्दतः कालक्षेपमयोजयत् ॥१८॥ सब्यप्रत्यागया कन्या शौरिविन्यस्तधीरमौ । शयने निशि सम्पूर्ण मन्यमाना मनोरथम् ॥१६॥ यन्धुमत्युपगूढा मुप्तमन्धकवृष्णिजम् । ज्वलनप्रमनागस्त्री रात्रौ दिव्या व्यबोधयत् ॥२०॥ विबुद्धो देहभूषामाभामिताखिलदिङ्मुखाम् । तां दृष्ट्वा नागचिहां स्त्रों केयमत्रेत्यचिन्तयत् ॥२॥ आहूतश्च तया धीरः प्रियालापविदग्धया । अशोकवनिका नीरवा नीश्याऽभापि विनीतया ॥२२॥ . शृणु एवं धीर ! विश्रब्धो ममागमनकारणम् । तप्यते श्रवणे येन तवामृतरसेन वा ॥२३॥ आसीदमीवविक्रान्तिः समाक्रान्तारिमण्डलः । भमोघदर्शनो नाम्ना नरेन्द्रश्चन्दने वने ॥२४॥ कान्ता चारुमतिश्चारुश्वारचन्दोऽस्य देवजः । नीतिपीरुपसम्पनो नवयौवनभूषितः ॥२५॥ रगसेना व गणिका कलागुणगणान्विता । मुता कामपताकाऽस्याः कामस्येव पताकिका ॥२६॥ आभावाला कोई अद्भुत जामाता दिया है । इस समाचारसे प्रेरित होकर राजाने, उसके अन्तः- पुरकी स्त्रियोंने, तथा नगरवासी लोगोंने इच्छानुसार वसुदेवको देवा ॥१२-१३॥ गजपुत्री प्रियङ्ग- सुन्दरीने भो नन्हें किसी तरह देख लिया और देखकर वह उनपर इतनी अनुरक्त हो गई कि पानीसे विरक्त हो गई अर्थात भोजन पानीसे भी उसे अरुचि हो गई ॥१४॥ प्रियङसुन्दरीने अपनी सखी बन्धुमतीको एकान्तम बुलाकर उससे पूछा कि हे सखी ! तुम पतिको बहुत प्यारी ५ हो, कहो इनकी चतुराई कैसी है ? ॥१५॥ भोलीभाली बन्धुमतीने चतुर यमुदेवकी चेष्टाओंका 'प्रियहसुन्दरीके लिए इस ढगसे वर्णन किया कि वह एकदम म्वसंवेद्य सुससे युक्त मोहको प्राप्त हो गई ॥१६॥ निदान प्रियङ्गसुन्दरीने अभिमान छोड़कर द्वारपालको यह संदेश देकर वसुदेवके पास भेजा कि या तो हमारे साथ समागम करो या शीघ्र ही हत्या स्वीकृत करी ॥१७॥ 'यह दोनों ही काम अनुचित है। यह विचारकर वसुदेव चिन्तामे पड़ गये । अन्तमें वे चतुर तो थे ही इसलिए किसी बहाने उन्होंने कुछ समय तक ठहरनेका समाचार कहला भेजा ॥१८वसुदेवमें जिसकी बुद्धि लग रही थी ऐसी प्रियङ्गसुन्दरीको उनकी प्राप्तिको आशा हो गई और इसी आशा- से वह रात्रिके समय शय्यापर अपने मनोरथको पूर्ण हुआ ही मानने लगी ॥१६॥ एक दिन रात्रिके समय कुमार यमुदेव बन्धुमतीका गाद आलिङ्गन कर सो रहे थे कि एक ज्वलनप्रभा नामकी दिव्य नागकन्याने आकर उन्हें जगा दिया ॥२०॥ कुमार जाग गये और शरीर तथा आभूषणोंकी कान्तिसे जिसने समस्त दिशाओंको प्रकाशित कर दिया था तथा जिसके शिरपर नागका चिह था ऐसी उस स्त्रीको देखकर वे विचार करने लगे कि यह कौन स्त्री यहाँ आई है ? ॥२|| सी समय प्रिय वार्तालाप करनेमें निपुण नागकन्याने धीर, वीर कुमारको बुलाया भोर यड़ी विनयके साथ नीतिपूर्वफ अशोकवाटिकामें ले जाकर कहा कि हे पीर ! निश्चिन्त होकर मेरे आनेका कारण मुनिए। वह कारण कि जिससे तुम्हारे कान अमृत रसके तृम हो जायेंगे ॥२२-२३॥ हे घोर वीर कुमार ! चन्दनवन नामक नगरमें, अमोघ शक्तिका धारक एवं शत्रुमण्डलको श करनेवाला अमोघदर्शन नामका गजा था ॥२४॥ उसमें चारमति नामकी ती थी और निॉक नीति तथा पुम्पार्थ से युक्त नवयौवनमे मुशोभित चारचन्द्र नामका पुत्र था ॥२शा उसी गरमै फला और गुगोंके समूहसे सहित एक पद्मना नामफी-वेश्या थी और उसकी काम- १ तम्या म. । २ नागी म.1३. वनिता म० हरिवंशपुराणे । प्राविपद् यागदीचार्य शितिपो धर्ममोहितः । तापसाः कौशिक्राचाश्च तहायाता जटाधराः ॥२७॥ नृत्यन्त्या च नृपादेशात् तथा कामपताकया । व्यक्त कामपताकार हरन्त्या हृदयं नृणाम् ॥२८॥ शास्त्रकौशलतायुक्तो मूलपत्रफलाशनः । कौशिकः क्षुभितो यन्न तवान्यस्य तु का कथा ॥२६॥ यागकर्मणि निवृत्त सा कन्या राजसूनुना । स्वीकृता तापसा भूपं भक्तं कन्यामागताः ॥३०॥ कौशिकायात्र तेस्तस्यां याचितायां नृपोऽवदत् । कन्या सोढा' कुमारेण यातेयुक्तास्तु ते ययुः ॥३॥ सभूयापि हन्तव्यो मया स्वमपि भूपते । माक्रुश्य कौशिको यातः क्लिशितेनान्तरात्मना ॥३२॥ अभिपिच्य नृपस्वस्तो धरित्रीधरणे सुतम् । अव्यक्तगर्भया देव्या सहाभूतापसस्तया ॥३३॥ तापस्यपि सुता लेभे तापसाश्रमभूपिणीम् । ऋषिदत्ताख्यया ख्यातां भूपितामप्यभिण्यया ॥३४॥ अणुवतानि मा लेभे चारणश्रमणान्तिके । यौवनं च नवं यूनां मनोनयनबन्धनम् ॥३५॥ शान्तायुधसुतः श्रीमान् श्रावस्तीपतिरेकदा । शीलायुध इति ख्यातस्तं यातस्तापसाश्रमम् ॥३६॥ एकयैव कृतातिथ्यस्तया तापसकन्यया । रुस्याहारमनोहारिसवल्कलकुचश्रिया ॥३७॥ अतिविश्रामतः प्रेम तयोरप्रतिरूपयोः । विभेद निजमर्यादा चिर समनुपालिताम् ॥३८॥ गतो रहसि निःशश निःशङ्कस्तामसी युवा । भरीरमद् यथाकाम कामपाशवशो वशाम् ॥३६॥ पताका नामकी पुत्री थी जो सचमुच ही कामकी पताकाके समान जान पड़ती थी ॥२६॥ एक चार धर्म-अधर्मके विवेकसे रहित राजा अमोघदर्शनने यज्ञदीक्षाके लिए प्रवेश किया । उसी समय जटाओको धारण करनेवाले कौशिक आदि ऋपि भी आये ॥२७॥ उस यज्ञोत्सबमे राजाकी आज्ञासे कामपताकाने नृत्य किया। ऐसा नृत्य, कि मनुष्यों के हृदयको हरण करती हुई उसने स्पष्ट कर दिया कि मैं यथार्थमें कामकी पताका ही हूँ ॥२८॥ उस नृत्यको देखकर शास्त्रोंकी निपुणतासे युक्त तथा वृक्षोके मूल पत्र और सलीको खानेवाला कौशिक ऋषि भी क्षोभको प्राप्त हो, गया तब अन्यकी तो कथा हो क्या थी र यज्ञ कार्य समाप्त होनेपर राजपुत्र चारुचन्द्रने उस कन्या-कामपताकाको स्वीकृत कर लिया। उसी समय कौशिक ऋपिके शिष्य कुछ तापस राजाको भक्त जान कन्याकी याचना करनेके लिए यहाँ आये ॥३०॥ जब उन्होंने कौशिक ऋषिके लिए कामपताकाकी याचना को तय राजाने कहा कि वह कन्या तो राजकुमारने विवाह ली है आपलोग जाये। राजाके इस प्रकार कहनेपर वे तापस चले गये ||३१|| कन्याके न मिलनेसे कौशिकी भात्माम बड़ा संक्लेश उत्पन्न हुआ। वह राजाके पास गया और 'हे राजन् ! तूने मुझे फन्या नहीं दी है इसलिए मैं सर्प बनकर भी तुझे मारूँगा' इस प्रकार आक्रोशपूर्ण वचन कहकर चला आया ॥३॥ राजा, कौशिकके आक्रोशपूर्ण वचन सुनकर डर गया इसलिए पुत्रका राज्या: भिषेककर अव्यक्त गर्भवाली रानी चारुमतिके साथ तापस हो गया ॥३३॥ कुछ समय बाद तापसी पारुमतिने तपस्वियोके आश्रमको सुशोभित करनेवाली, एवं अनुपम शोभासे सुशोभित ऋषिदत्ता नामकी कन्याको जन्म दिया ॥३४॥ कन्या ऋपिदत्ताने एक यार चारण ऋद्धिधारी मुनिराजफे समीप अणुन धारण किये। धीरे-धीरे उस कन्याने तरुण पुरुषोंके मन और नेत्रीको योजनेयाला नवयौवन प्राप्त किया ॥३५॥ फा गजा तपस्थियोंके उस आश्रम पहुँचा ॥३६॥ उसे देख अकेली ऋषिदत्ता कन्याने रुधियर्थ एक समय शान्नायुधका पुत्र, लक्ष्मीसे मुशोभित एवं शीलायुध नामसे प्रसिद्ध श्रावस्ती- उत्तम आहार देकर उमका अतिथि सत्कार किया। कन्या ऋपिदत्ता सुन्दरी तो थी ही उसपर यल्कलीफे कारण उसके स्तनोको शोभा और भी अधिक मनोहारिणी हो गई थी ॥३७॥ फल यह हमा है कि अनुपम रूपको धारण करनेवाले उन दोनोंके प्रेमने विश्यासको अधिक्तामें घिरका से पाली अपनी-अपनी मर्यादा तोड़ दी ॥३८॥ कामपाशसे घंधा युवा शीलायुध निश १ गा+ऊदा इनिन्छ। २. श्रीयिधमतः म ।

एकोनविंशः मनः प्यभिपन समान मा साध्या माध्यापारिमा । मुमन्यायपुयाहं यदि म्यां गर्भधारिणी ॥४०॥ सदा या विधयं में किमिक्षाकृतगया । पृष्टम्नया य नामाह माइकृष्णा भूनिये ! शणु ॥४॥ इजो रामा श्रावस्यामानशात्रयः । शोलायुवम्ययाऽवयं द्रष्ट्या मप्रया ॥५२॥ याधाम्प रहम्येनामाशिष्य विदामः । मावनिमय प्राई गापमाश्रमगोशम् ॥१३॥ दृष्टा मुष्टेन गेनामा प्रविष्टी नगरीममौ । यासे नृपे नया पित्राविनिगृा गमनाम् ॥१४॥ मिदिनमिदं वृत्त लोकवृत्तयिदम्यया | सामयानी रहापानी निम्रपम्प नृपश्य पा ॥४५॥ माम मुममुगीमिय पित्रानुसारिणम् । प्रमूमिको रामा माग प्रमूमियमनम्मरम् ॥४॥ না পুনাখা স্বপন্নয়না। নষ্ট নাম্বার মাংশাসনিঃ ৪০ हाम्नहबशाप्रामा पिसाबमपत्रिनम् । भावाम्य शोकासम्मप्ती पितरी धुर्क नकम् ॥४॥ তুগাষধিগা যথাসমাঈলঃ। বিবাহিঙ্গা প্রমান বিদ্যা ৪৫ दष्टी मोघमप्रेग जीविन प्रापिमा मया । धर्मोपदेशानेम दुवित्रीयदृषितः ॥५०॥ मयामी प्रादितो धर्ममयामी गगिर्मिमाम् । गमा: पुत्रमादाय मापीयेरवारिणी ॥५१॥ गोपचार भूपं या समयीच मयाम्यिनम् । मनपातय राजेन्द्र ! राजक्षणरानिमः ॥५२॥ होकर एकान्तमें प्रषिदत्ताफे पाम चला गया और शवारहिम एयं यशोगा प्रापिदलाफ माथ हमने इच्छानुमार फ्रीड़ा को ||३|| नदनन्ना भयमे युक्त हो नापी पिदनान गजामे कहा कि हे आयंपुन ! म पानुमती है यदि गर्भयती हो गई तो मुझे क्या करना होगा मा बनाओ। इस प्रकार घ्यायल पित्तम युक्त ऋपिदत्ता पूछनेर शीलायुधने कहा कि है प्रिये ! व्याकुल्ल मन होती। मुनी, में शत्रुओंको नष्ट करनेयाला, इक्ष्याक कुलम उत्पन्न हुआ श्रायम्मीका गजा - शीलायुध है । पुनके माथ-साथ तुम मुझ अवश्य ही दर्शन देना अर्थात पुत्र प्रमयके बाद श्रायनी या जाना 120-४२॥ मप्रकार आश्यामन देकर तथा एकान्त में मालिशनकर, यिरहगे पन्फण्ठिन होना हुआ यह जाने के लिए पान ही था कि इनमें ममकी मेना नपम्पियोंके आश्रममें आ पहुँच ॥४३॥ मेनाको दंग्य गजा ग्रहम मन्तुष्ट हुआ और यमके माथ नगरीको लौट आया। सदनन्ना गजाफे पले जानेपर लोकव्यवहारको जाननेयाली प्रापिदत्ताने लता छोड़कर माना- पिना के लिए यह वृत्तान्न सुना दिया और कह दिया कि मैं निलंटा राजा शालायुधकी एकानमें परनी बन चुकी हूँ और गर्भयनी हो गई हूँ ॥१४-१५।। तदनन्मा नब माम व्यमीम होनेपर ऋषिदमान सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया जो बिलकुल पिनाफे अनुरूप था और ऐमा जान पदगा था माना पिनाक द्वारा ही प्रकट किया गया हो। प्रतिफ मगय ऋपिदनाकी यलेश अधिक हुआ था इसलिए यह प्रमूनिके बाद ही मर गई और मम्यादर्शन प्रमायमे उयलनप्रभयालमा नामको नागहमागे कान हुई। यही में है, गुम देय पर्यायफे कारण भयप्रत्यय अधिशान भी प्रकट हुआ है ।।१६-१७॥ इमलिए उमसे पूर्यमयी मय यान जानकर दया भार नाहक यशी- भून ही में पिता और पुत्रके तपायनमें गई । यहाँ नोकमन्ना माना-पिणाको श्राश्यामन देकर मने अपने म पुको मृगीका प प दूध पिठा-पिलाकर यदा किया। मदनगर कौशिक पिका जीय निदानके कारण म हुआ था मी एमने पूर्व येथे कारण हमारे पिमाका रम लिया परन्तु मैन अमोपमन्त्रमे पन्हें जीयन प्राप्त कर दिया-अन्या कर दिया। मेरे पिता यापि जो छूट न मके से क्रोधमे दृपिन थे तथापि धर्मापदेश देकर मन कहें, धर्म प्रहण कग दिया जिममे ये गाकर उनम गतिको प्राप्त हुए । मपचा नापमीका ये धारणका और दम पुन- को लेकर मैं गला गोलायुधके पाम गई 12८-५१|| गना शीटायुध पड़ी विभूमिगे युग मथा १. भयपग्लिा । २ घामःम, ग..मगाम, ग.८ पुष !: पाको शिम: १ः शाययः शिशुः' इत्यमरः । ५ पाचप्रत्ययः ।

हरिवंशपुराणे गृहाण गृहिणीयतमेणीपुत्रास्यमेतकम् । इत्युक्तेन तु तेनोक्तमपुनस्य कुतः सुतः ॥५३॥ कथं वा तारसि ! प्राप्तो दारकोऽयं खया वद । वृत्तं मया समस्तं तरसाभिज्ञानं ततोऽकथि ॥५४॥ देवीरवं च निजं येन स राजात्मजमग्रहीत् । वर्धमानस्य तस्याहं पुनस्नेहेन मोहिना ॥५५॥ जातानुपालिनी नित्यं राज्ञश्चेप्सितदायिनी । एणीपुत्रमसौ राजा स्वराज्ये न्यस्य पण्डितः ॥५६॥ प्रनग्य मुनिमार्गस्थः स्वर्गलोकमवाप्तवान् । जाता च तनया पश्चादेणीपुत्रस्य रूपिणी ॥५७॥ प्रियमुसुन्दरीनाम्ना प्रियङ्गुश्यामवर्तिनी । स्वयंवर विधौ धीरा प्रत्याख्यातवती च सा ॥५॥ भूमौ राजसुतान् कामसौख्यभोगविरागिणी । अदासी बन्धुमस्यामा त्वां मा राजगृहे यदा ॥५॥ ततः परमधत्तागमनङ्गशरशरियतम् । तद् विधरस्व तथा वीर ! वचनान्मम सङ्गमम् ॥६०॥ अदति न घाशंश्यं तुभ्यं दत्ता मया हि सा । भस्य राजकुलस्याहं प्रमाणं कार्यवस्तुनि ॥६॥ अतो मया वितीर्णेयं वितीर्णा पितृवान्धवः। समागमस्तु वामस्तु देवतागृहे ततः ॥६२।। श्वस्तन्यां कृतसङ्केतो रनन्यां सुविनिश्चितः । भमोघदर्शनं देव ! देवतानामतो भवान् ॥१३॥ वरित्या वरमादत्स्व यन् किञ्चिदिह वान्छितम् । इत्युक्तेनैव साऽवाचि वाचा विनयपूर्वया ॥६॥ कृतस्मरणया देवि ! स्मर्तव्योऽमोघसस्मिते । एवमुक्ता च तेनासावेवमस्विति देवता ॥६५॥ परम नीतिज्ञ था उसे देखकर मैंने कहा कि हे राजेन्द्र ! यह राजाओंके लक्षणों से युक्त भापका पुत्र है ॥५२।। यह आपकी मृत स्त्री द्वारा छोड़ा गया है और एणीपुत्र इसका नाम है । इसे आप ग्रहण कीजिए। मेरे इस प्रकार कहनेपर राजा शीलायुधने कहा कि मैं तो पुत्रहीन हूँ। मेरे पुत्र कहाँसे आया ? ॥५३॥ हे तापसि ! ठीक-ठीक बता यह पुत्र तुझे कैसे प्राप्त हुआ है ? गजाके इस प्रकार पूछनेपर मैंने अभिज्ञान-परिचायक घटनाओके साथ-साथ वह सब वृत्तान्त कह दिया ॥५४॥ और यह भी कह दिया कि मैं मर कर देवी हुई हूँ। मेरे इस कथनपर विश्वासकर राजा शोलायुधने वह पुत्र ले लिया । पुत्र धीरे-धीरे बढ़ने लगा और मै मोहयुक्त पुत्रस्नेहके कारण उसको निरन्तर रक्षा करने लगी। राजा शोलायुधको जो इच्छा होती थी उसकी मैं तत्काल पूर्ति कर देती थी। कदाचित् परम विवेको राजा शीलायुध, उस एणीपुत्रको अपने राज्यपर पदारूढ कर दीक्षा ले मुनि हो गया और मरकर स्वर्गलोकको प्राप्त हुआ । पश्चात् राजा एणीपुत्रके प्रियङ्कः पुष्पके समान श्यामवर्ण, अतिशय रूपवती, प्रियजुसुन्दरी नामको पुत्री हुई। राजा एणीपुत्रने उसका स्वयंवर किया परन्तु कामभागसे विरक्त उस धैर्यशालिनीने प्रथिवीत्तलके समस्त राज कुमारोंका निराकरण कर दिया अर्थात् किसीके साथ विवाह करना स्वीकृत नहीं किया । तदनन्तर जिस दिनसे उसने राजमहलमें बन्धुमतोके साथ आपको देखा है उसी दिनसे वह कामके वागा- से अत्यन्त सशल्य शरीरको धारण कर रही है इसलिए हे वीर ! मेरे कहनेसे तू उसके साथ समागम कर ॥५५-६०॥ वह कन्या अदत्ता है किसीके द्वारा दी नहीं गई है-ऐसी आशंका नहीं करना चाहिए क्योंकि मैंने तेरे लिए वह कन्या दी है। इस राजकुलके करने योग्य कार्योम मैं प्रमाणभूत हूँ अर्थात् समस्त कार्य मेरो ही सम्मतिसे होते हैं ॥६॥ इसलिए मैने तुझे यह कन्या दी मानो इसके पिता और भाइयोने ही दी है। अतः कामदेवके मन्दिरमे तुम दोनोंका समागम हो और इसके लिए कलकी रातका संकेत निश्चित किया गया है । हे देव ! देवताओंका दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता इसलिए आप मुझसे वर माँगकर इस संसारमे जो कुछ भी आपको इट हो वह प्राप्त करो। नागकुमारीके इस प्रकार कहने पर वसुदेवने विनयपूर्ण वचनो द्वारा उससे कहा कि हे अमोघ मुस्कानको धारण करनेवाली देवि ! मैं यही वर चाहता हूँ कि जब मैं आपका स्मरण फरूँ तब आप मेरा ध्यान रक्से । वसुदेवके इस प्रकार कहने पर उसने 'एवमस्नु' कहा ॥६२-६५।। १ मोहिनी म० । २. युपयोः । ३ श्रागामिन्याम् । ४ समिते म०।

एकोनप्रिंशः सर्गः ३८५ भन्तर्धानमिता सोऽपि निजवासमुपागमत् । देवतोक्तविधानेन देवताया गृहे ततः ॥६६॥ प्रिपद्मुन्दरी शौरी रहसि प्रत्यपयत । सा गन्धर्व विवाहाप्ता'विहसन्मुपपना ॥६॥ रमिता यदुमूर्येण पमिनीय तदा यभो । प्रियगुसुन्दरीसद्मन्यहान्यस्य यहन्यगुः ॥१८॥ भन्योन्यप्रेमयदस्य मिथुनस्य रहस्यतः । कृतं देवतया योग राशा ज्ञात्वाऽनुरूपयोः ॥६६॥ तोपोलोकप्रकाशार्थ सद्विवाहमकारयत् । ततः सर्वस्य लोकस्य विरिती यदुनन्दनः ॥७॥ रेमे प्रियासुन्दा सुन्दर्या सह सुन्दरः । रूपयौवनहारिण्या शरयेव कौशिको यथा ॥७॥ पृथियोच्छन्दः स राजमुतया तया प्रथमयन्धुमस्यापि च मतीतगुणसम्पदा गुणम्लाकलापश्रिया। फ्रमेण रतिगोधरे रहसि संग्यमानः पुरी- मिमा जिनगृहाधिता सुचिरम युवासाचितः ।।७२।। इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतो वन्धुमतीप्रियङ्ग,सुन्दरीलामवर्णनो नाम एकोनत्रिशः सर्गः ॥२६॥ दयान फराया है- एक यग्दान देकर देयी अन्तर्हित हो गई और वसुदेव अपने निवास स्थानपर भा गये । तदनन्तर दयामे कहे अनुसार युमार यसुदेव एकान्त पाकर कामदेवके मन्दिर में प्रियगुसुन्दरीके पास गये। हमारको दाग प्रियगुसुन्दरीका मुग्य-कमल सिर ठ। और गन्धर्ष वियाहस उन्होंने उसे स्वीकृत -पिया ४६६-६७। उस समय यसुदेवरूपी सूर्यके द्वारा रमणको प्राप्त हुई प्रिय हुसुन्दरी कमलिनीके समान मुशोभित हो रही थी। इस प्रकार प्रियासुन्दरीके परमें घसुदेयके बहुत दिन निकल गये ॥६॥ तदनन्तर परसरफे प्रेमसे बंधे हुए इस दम्पतिका यह समागम रहस्यपूर्ण रीतिसे -यह जानकर राजा बहुत सन्तुष्ट हुआ और उसने लोकमें प्रकट करने के लिए अम अनुरूप दम्पतीका वियाह करा दिया। विवाह के पश्चात् मुन्दर पसुदेय सयलोगों की जानकारी- में रूप और योपनके द्वारा मनको हरण करनेवाली मुन्दरी प्रियंगुमुन्दरीफे साथ, इन्द्राणीके साथ द्रके ममान रगश फाने लगे ॥६-१॥ इस प्रकार जिनको गुणरूपी सम्पदाएं प्रमिद्ध थीं तथा जो गुण और फलाओंके समूहसे लक्ष्मीफे समान जान पड़ती थी ऐमी पधुमती तथा राज- पुरो प्रियंगुमुन्दगै एकान्त पूर्ण रतिगृहमें क्रमसे जिनकी सेया करती थीं तथा जो नगरवासियों के द्वारा अत्यन्त सम्मानको प्रान ये ऐमें कुमार पमुदेयने जिन-मन्दिगंसे मुशोभित इम भापरती नगरी चिरकाल तक नियास फिया ॥७२॥ गार भरिएननि पुराए के मंग्रहसे युक्त जिनमेनाचार्यरचित हरिपशपुराणमें पामती सौर प्रियगुमुन्दरी लागका पएन फग्नाला उनतीसपा सर्ग समामा ॥२६॥ Prifगामन्. । २.ल: मद्रणमामि | त्रिंशः सर्गः भय कार्तिकराकायां चिरक्रीडातिखेदकः । मियगुसुन्दरोगाढभुजबन्धवशः प्रियः ॥१॥ सुखनिद्राप्रसुप्तोऽमी विबुद्धश्च कुतश्चन ! भद्रासी रूपिणीमेकां कन्यामन्यामिव श्रियम् ।।२।। भप्रासीत् पुण्डरीकाति ! का स्वमत्रे यसौ हि सा । ज्ञास्यसे हि कुमारेति तमाहूय विनियंयौ ।।३।। व्यपनीय प्रियाश्लेपमेपोऽनुपदवीमयात् । रम्यहम्यंतलासीना हेतु साह निजागमे ॥४॥ भार्यपुत्र ! शृणु श्रीमन् समाधाय निजं मनः । वचो मदीयममाप्यवस्तुप्रापणकारणम् ॥५॥ इहास्ति दक्षिणघेण्यां देशे गान्धारनामनि । पुरं गन्धसमृद्वात्यं गन्धारात्यस्तु तत्पतिः ॥६।। पृथिवीति महादेवी पृथिवीवास्य वल्लभा । मुता प्रभावतो तस्य श्रीरिवाहं प्रभावती ॥७॥ गता मानसवेगस्य स्वर्णनाभपुरं परम् । ज्ञावागारवती वार्ता दुहितुः पृष्टवत्यहम् ।। प्रवृत्तिवेगव-यास्तु तरसी भिममोदिता । सङ्गमो यदुचन्द्रेण चित्राया इव च स्वया ॥६॥ तत्रैव नगरे या सा शुद्धीलविभूपणा । स्वन्नामग्रहणाहारा सामश्रीरवतिष्टते ॥१०॥ स्वद्वियोगमहादुःखपाण्डुगण्डालकान्तया । कान्तया प्रहिता तेऽहं सन्देशप्रापिपी तया ॥11॥ शीलप्राकाररक्षाऽहमलवयानुनयररेः । भार्यपुत्रावतिष्ठेयं शत्रुस्थाने कियञ्चिरम् ॥१२॥ अथानन्तर कार्तिककी पूर्णिमाके दिन चिरकाल तक क्रीड़ा करनेसे अतिशय खिन्न कुमार वसुदेव प्रियंगु सुन्दरोसे प्रगाढ़ भुजबन्धनसे बँधे सुखको नोंद सो रहे थे कि किसी कारण जाग पड़े । जागते ही उन्होंने सामने खड़ी द्वितीय लक्ष्मीके समान अतिशय रूपवती एक कन्या देखी ॥१-२॥ कुमारने उससे पूछा कि हे कमललोचने ! यहाँ तुम कौन हो ? उत्तरमे कन्याने. कहा कि हे कुमार ! थोड़ी देर बाद मेरा सब वृत्तान्त जान लोगे। अभी मेरे साथ आइए-इस प्रकार कुमारको चुलाकर वह कन्या बाहर चली गई ॥शा कुमार भी प्रियाका आलिङ्गन दूरकर उसके पीछे-पीछे चल दिये। बाहर जाकर वह सुन्दर महलके फर्सपर बैठ गई और अपने आनेका कारण इस प्रकार कहने लगी ॥४॥ हे भार्यपुत्र ! हे श्रीमन् ! अपना मन स्थिरकर अप्राप्य वस्तुको प्राप्तिमें कारणभूत मेरे वचन सुनिए ॥शा इस विजयाध पर्वतको दक्षिण श्रेणीके गान्धार देशमें एक गन्धसमृद्ध नामका नगर है उसका स्वामी राजा गन्धार है ॥६॥ उसकी पृथिवी नामको स्त्री है जो उसे पृथिवीके हो समान प्यारी है । मैं उन दोनोको साक्षात् लक्ष्मीके समान कान्तिमती प्रभावती नामकी पुत्री हूँ I मैं एक दिन मानसवेगके स्वर्णनाभ नामक उत्तम नगरको गई थी। वहाँ मैंने मानस- वेगकी माता अङ्गारवतीको जानकर उससे उसकी पुत्री वेगवतीका वृत्तान्त पूछा ॥८॥ वेगवतीको सखियांने मुझे उसका समाचार बताया और साथ ही यह भी बताया कि जिस प्रकार चन्द्रमाके साथ चित्रा नक्षत्रका संगम होता है उसी तरह आपके साथ उसका संगम हुमा है ॥६॥ उसी नगरमे शुद्ध शील ही जिसका आभूषण है तथा आपका नाम ग्रहण करना ही जिसका आहार है ऐसी सोमश्री भी रहती है ॥१०॥ जिसकी अलकावलीके छोर आपके लियोगजन्य महा दुःखसे. सफेद-सफेद दिखनेवाले गालोपर लटक रहे हैं ऐसी आपकी उस सोमश्री प्रियाने मुझे सन्देश लेकर आपके पास भेजा है ॥११।। उसने कहलाया है कि हे आर्यपुत्र ! यद्यपि मैं शत्रुकी अनुः नय-विनयके द्वारा अलंघनीय शीलरूपी प्राकारके अन्दर सुरक्षित हूँ तथापि इस तरह मुझे यहाँ १ कार्तिकपूर्णिमायाम् ! २ श्रीमान् म । ३ ज्ञात्वासारवती म० | प्रिंशः सर्गः ३८५ रक्षिता शत्रुमायाहं पुत्रतर्जनशीलया। प्राणिनी 'माणमायाऽनो मोचनीया लघु स्वया ॥३॥ अविरामवियोगाया मा कदाचिदिहैव मे । स्याद्विपत्तिरतो वीर ! मोपेक्षिष्टाः कठोरधीः ॥१४॥ साधुलोचनयाऽजस्रमिति सन्दिष्टमिष्टया । निवेधाऽमीकृतार्याऽहं कृत्यं पन्यो स्वयि स्थितम् ॥१५॥ न चागम्यमगस्थानमिति चिनयं स्वया यतः। नेष्ये निमेषमात्रेण तत्र स्वाहं यथेप्सितम् ॥१६॥ साभिज्ञानमभिज्ञोऽसौ तं निशम्य निशाग्य ताम् । प्राह प्रापय सौग्यास्ये सोमधीधाम मां द्रुतम् ॥१७॥ सा मातानुमतिः प्रोता समुत्क्षिप्य प्रभावती । विद्याप्रमावसम्पन्ना ययौ विद्युदिवोदिता ।। भन्योन्यासमासङ्गात् साताहरुही च तौ । खमुल्लध्य लघु प्राप्तौ स्वर्णनाभपुरं वरम् ॥१६॥ प्रवेशितस्तया अस्तरसनांमुकया गृहम् । अप्रकाशमसौ देवः सोमश्रियमवैषत ॥२०॥ लम्बालककाम्लानकपोलवदनश्रियम् । स्वान्तभ्रान्तालिसग्लानिर्मपनामिव पमिनीम् ।।२।। देवदर्शनपर्यन्तवेणीवन्धेन सङ्गताम् । तनुना सेनुबन्धेन धुनीमिव तदन्तिकम् ॥२२॥ ताम्बूलरागनिमुक्तकिञ्चिधुसरिताधराम् । म्लानामपिपरिग्लानपतवामिव घालरीम् ॥२३॥ अम्युस्थितां विभुं वीक्ष्य पीनपाण्दुपयोधराम् । तुष्टः सोमश्रियं दृष्ट्वा शारदीमिव स श्रियम् ॥२४॥ भालिलिङ्गतुरन्योऽन्य गाढं रोमाञ्चकर्कशौ । पुनविरहमीरस्वादेकतामिव तो गती ॥२५|| किननी देर तक रहना होगा ? ॥१२॥ पुत्रको डॉटनेवाली शत्रुकी माता ही मेरी रक्षा कर रही है इसीलिए अबतक जीवित हूँ। हे प्राणनाथ ! इस शत्रुसे आप मुझे शीघ्र छुड़ाइये ॥१३॥ निरन्तर वियोग सहते-सहते कदाचित् मेरो यहीपर मृत्यु न हो जाये इसलिए हे वीर ! कठोर बुद्धि होकर मेरी उपेक्षा न कीजिए ॥१४॥ इस तरह जिसके नेत्र सदा आँसुओंसे युक्त रहते हैं ऐसी सोमनी द्वारा भेजा हुआ सन्देश सुनाकर मैं कृत-कृत्य हुई हूँ। अब जो कुछ करना हो वह मआरपर निर्भर है आप उसके पति हैं ॥१शा आप यह नहीं सोचिए कि यह पर्यनका स्थान मेरे लिए भगम्य है क्योंकि आपकी इच्छा होते ही मैं निमेप मात्रमें आपको वहाँ ले चलँगी ॥१६॥ बुद्धिमान् वसुदेवने भनेक परिचायक चिह्नोंके साथ श्रवण करने योग्य यातको मुनकर उससे कहा कि हे सौम्यवदने ! तुम मुझे शीघ्र ही सोमनीके घर पहुँचा दो ॥१७॥ कुमारकी अनुमति पाते ही विद्या के प्रभावसे सम्पन्न प्रभावतो उन्हें लेकर आकाशमें उस तरह जानड़ी जिस तरह मानो बिजली ही कौंध उठी हो ॥१८॥ परस्परके अगस्पर्शसे जिन्हें रोमाञ्च निकल आये थे ऐसे वे दोनों, आकाशको उल्लंघकर शीघ्र ही स्वर्णनाभपुर नामक उत्तम नगर में जा पहुँचे ॥१६॥ तदनन्तर जिसका फटीसूत्र और वस्र कुछ-कुछ नोचेकी ओर खिसक गया था ऐसी प्रमावतीने गुम रीतिसे वसुदेवको सोमश्रीके घर जा उतारा। यहाँ पहुँचते ही कुमारने सोमनीको देसा ॥२०॥ उस समय विरहके कारण सोमश्रीको युरी हालत थी। चारों ओर लटकते हुए घालोंसे उसके विरहपाण्ड मुखको शोभा मलिन हो गई थी इसलिए समोपमें भ्रमण करते हुए भौरांसे मलिन- कमलसे युक्त कमलिनीके समान जान पड़ती थी ॥२१॥ वह पतिका दर्शन होने की अवधि तक पौधे हुए वैगी बन्धनसे युक्त थी इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो पतले पुरसे युक्त नदी ही हो । उसका भघरोध ताम्यूलफी लालिमासे रहित होने के कारण कुछ-कुछ मटमैला हो गया था इसलिए वह कुछ पुम्हलाये हुए पल्लवको धारण करनेवाली म्लान लगाके समान जान पड़ती थी ।।२२-२३॥ पतिको आया देस जो उठकर सड़ी हो गई थी तथा जो स्यूल एवं पाण्डवर्ण । पयोधरी-स्नोको धारण करने के कारण त्यूल धवल पयोधरी-मेघोंको धारण करनेयाली शग्द ऋतुको शोमाके समान जान पड़ती थी ऐसी सोमग्रीको देखकर कुमार यमुदेय यहुत ही सन्तुष्ट दुए ॥२४॥ जिनके शरीर रोमानोंसे फर्फरा हो रहे थे ऐसे दोनोने परसार गाद आलिङ्गन किया, १. प्रायनामोजोमः । २. नेप्पन म., ग.। . निशा म. 1४ भारतीय म.। मल. बालनामान म..सालान् ।

manaam हरिवंशपुराणे साधुमाधितकायां सा तामाश्लिष्य प्रभावतीम् । सखी माणसमा अध्ययनरम्यनन्दयत् ॥२६॥ रूपं नाम च तस्यासी निजं कृत्वा प्रभावती । भाग्छप दम्पती मुक्त्वा पयावारमीयमास्पदम् ॥२७॥ धाग्नि माक्सवेगस्य परावर्तितरूपभृत् । सोमश्रिया सहाहानि व्यवसाकतिविद् यदुः ॥२८ एकदा माग विबुद्धाऽसौ प्रकृतिस्थाकृति पतिम् । दृष्ट्वारुदिपीत्या प्रमादपरिशशिनी ॥२५॥ भपृच्छच विबुद्धोऽसौ किमर्थ रोदिपि प्रिये । भाह रूपपरावृत्तिमपश्यन्ती तयेत्यसो ॥३०॥ मा भपोरेप विद्यानां स्वभावः स्वपतां वपुः । भपसरयाऽवतिष्ठन्ते संध्यन्ते मुमाग्रताम् ॥३॥ इत्युक्त्वा सुपरावृत्यरूपं पूर्ववदेव सः । वसुदेवोऽवसतन यथेष्ट प्रियया युतः ॥३२॥ ततो मानसवेगेन कश्चिदुपलपितः । वैजयन्तीपति परन्या पलसिंहमसी भिसः ॥२६ तस्य न्यायपरस्याने व्यवहारे पराजितः । मायी मानसवेगोऽसौ विलको योद्धमुस्थितः ॥३४॥ शौरिपपतया केचित् खघराः समवस्थिताः । सतोऽभूदुप्रसंग्रामः शौरिमानसवेगयोः ।।३।। वेगाद् वेगवतीमात्रा जामाने धनुरक्तिम् । दिव्यं विग्यशरापूर्ण शरधिद्वयसंयुतम् ॥३६॥ प्रज्ञप्तिश्च प्रभावश्या विज्ञाय लघु योजिता । तरप्रमावादसौ संख्ये ययन्ध रिपुखेघरम् ॥३७॥ तन्माया याचितः शौरिः पुत्रभिक्षा दयापरः । सोमधीदर्शन नीया मुमोच खचराधिपम् ॥३८॥ उस समय मालिङ्गनको प्राप्त हुए दोनों ऐसे जान पड़ते थे मानो पुनः विरह न हो जाय इस भयसे एकरूपताको ही प्राप्त हो गये थे ॥२५॥ अच्छी तरह कार्य सिद्ध करनेवाली प्राणतुल्य प्रभावती सखोका आलिङ्गन कर सोमनीने मनोहर वचनों द्वारा ससका अभिनन्दन किया- मीठे-मीठे वचन कहकर उसे प्रसन्न किया ॥२६॥ वसुदेवके आनेका रहस्य प्रकट न हो जाय इस विचारसे प्रभावती वसुदेवको अपना रूप तथा अपना नाम देकर दोनों दम्पतीसे पूछकर एवं उनसे विदा लेकर अपने स्थानपर चली गई। भावार्थ-प्रभावतीने अपनी विद्या प्रभावसे वसुदेवको प्रभावती बना दिया ॥२७॥ इस प्रकार परिवर्तित रूपको धारण करनेवाले कुमार वसुदेवने मानसवेगके घर सोमश्रीके साथ कितने ही दिन निवास किया ! एक दिन सोमश्री पहले जाग गई और पति-वसुदेवको अपने स्वाभाविक वेपमें देख शत्रुके भयसे किसी विपत्तिकी आशङ्का करती हुई रोने लगी ॥२॥ इतने में कुमार भी जाग गये और उसे रोती देख पूछने लगे कि हे प्रिये ! किसलिए रोती हो ? सोमनीने उत्तर दिया कि भापका रूप परिवर्तित नहीं देख रही हूँ यही मेरे रोनेका कारण है ॥३०॥ कुमारने कहा कि डरो मत विद्याओंका यह स्वभाव है कि वे सोते हुए मनुष्यों के शरीरको छोड़कर पृथक हो जाती हैं और जागनेपर पुनः आ जाती है ॥३१॥ इस प्रकार कहकर तथा पहले के ही समान रूप बदलकर कुमार वसुदेव प्रिया सोमश्रीके साथ वहाँ रहने लगे ॥३२॥ तदनन्तर एक दिन मानसवेगने किसी तरह कुमार वसुदेवको देख लिया जिससे 'कुमार वसुदेव हमारी स्त्री सोमश्रीके साथ रूप बदलकर रहता है। यह शिकायत लेकर वह पत्नीके साथ वैजयन्ती नगरीके राजा बलसिंहके पास गया ॥३३॥ राजा बलसिह न्यायपरायण पुरुप था इसलिए जब उसने इस शिकायतकी छानबीन की तो मानसवेग हार गया। हार जानेसे मानसवेग बहुत ही लजित हुआ और वसुदेवके साथ युद्ध करने के लिए उठ खड़ा हुआ ॥३४॥ यह देख कितने ही विद्याधर वसुदेवका पक्ष लेकर खड़े हो गये । तदनन्तर वसुदेव और मानसवेगका युद्ध हुआ ॥३५॥ वेगवतीकी माताने जमाई वसुदेवके लिए एक दिव्य धनुष तथा दिव्य बाणोंसे भरे हुए दो तरकस दे दिये और प्रभावतीने युद्धका समाचार जानकर शीघ्र ही प्राप्ति नामको विद्या दे दी। उसके प्रभावसे कुमारने मानसवेगको युद्धमे शीघ्र बाँध लिया ॥३६-३७॥ तदनन्तर मानसवेगकी माताने कुमारसे पुत्र भिक्षा माँगी जिससे दयायुक्त हो कुमारने उसे सोमश्रीके पास १. मुपरावृत्ति रूप म०, ग० । २. दुपलदितम् ग० । ३ पत्या ग०। ४ वेदात् म० । ५. युद्ध।

त्रिंशः सर्गः ३८० तेन मानसवेगेन बन्धुमावमुपेयुपा । सपत्नीको विमानेन प्रापितः स महापुरम् ।।३।। सोमश्रीवन्धुभिस्तन जाते तस्य समागमे । गतो मानसवेगोऽपि स्वस्थानं तद्वचःस्थितः ॥४०॥ श्रुतानुभूतवादिप्रश्नप्रकथनारमनोः । याति कामरसमितचेतसोः समयस्तयोः ॥४॥ अश्वरूपधरेणासावेकदा सूर्पकारिणा । हरता नभमः पितो गङ्गायामतपद् यदुः ॥४२॥ स तामुत्तीयं सम्प्रावस्तापसाश्रममन च । निरीक्ष्योन्मादिनी नारी नरास्थिमयशेखराम ॥१३॥ पप्रच्छ तापसं कश्चित् कस्येयं युवतिरी । परिभ्रमति विनान्ता महोन्मादशा वसा ।।४।। तस्मै सोऽकथयद् राज्ञो जरासन्यस्य देहना । नाम्ना केनुमतीयं च जितशत्रुनृपप्रिया ॥४५|| मन्त्रवादिपरिवाना वराकी स्वीकृता । हतस्यास्यास्थिमालां च मालीकृयानि क्षितिम् ॥४६।। इत्याकर्ण्य कृषायुको महामन्यप्रभावतः । भावेशपूर्वकं तस्याः स चक्रे ग्रहनिग्रहम् ॥४॥ गौरिस्तदा नियुक्तस्तु जरासन्धस्य मानवैः । पुरं राजगृहं नीतः परिवार्योपकार्यपि ॥४८॥ तानवोचदसौ राज्ञः कोऽपराधो मया कृतः । ग्रूत मे येन नोयेऽई ताजपुरुषाः रुपा ||४|| इयुका इस्यवोचस्ते यो राजदुहितुर्ग्रहम् । व्युदस्यति भवेरसोऽय राजारिजनकः किल ॥५०॥ इन्यावेद्य वधस्थानं नीतो नीचरैवृतः । खमुन्धिप्यापनीतः प्राक केनचिवचरेण सः ॥५१॥ उत्तरच वीर ! विद्धि वं प्रभावत्याः पितामहम् । मां भगीरथनामानं स्व-मनोरथपूरकम् ।।५२॥ ले जाकर छोड़ दिया ॥३८|| इस घटनासे मानसवेग कुमारका गहरा वन्धु हो गया और विमान द्वारा सोमश्री सहित वसुदेवको उनके अभीष्ट स्थान महापुर नगरतक पहुँचाने गया ॥३६॥ वहाँ पहुँचनेपर वसुदेवका सोमश्रीके बन्धुओंके साथ समागम हो गया और मानसग भी उनका माज्ञाकारी हो अपने स्थानपर वापिस चला गया ॥४०॥ तदनन्तर सुनी एवं अनुभवी बातोंके -प्रश्नोत्तर करना ही जिनका काम शेप था और जिनके चित्त कामरसके आधीन थे ऐसे उन दोनों दम्पतियोंका समय सुखसे व्यतीत होने लगा ॥४१॥ अथानन्तर एक समय कुमारका शत्रु राजा त्रिशिखरका पुत्र सूर्पक भश्वका रूप रखकर कुमारको हर ले गया और आकाशसे उसने नीचे गिरा दिया जिससे वे गद्गा नदीमें जा गिरे ॥४२॥ गङ्गा नदीको पारकर कुमार वमुदेव तापसीके एक आश्रममें पहुँचे। वहाँ उन्होंने मनुष्योंकी हडियाका सेहरा धारण करनेवाली एक पागल स्त्रीको देखकर किसी तापमसे पूछा कि यह सुन्दरी युवती किसकी स्त्री है जो मदोन्मादके चश हो पागल हस्तिनीके ममान इधर- उघर घूम रही है ॥४३-४४|| तापसने कहा कि यह राजा जरासन्धकी पुत्री केतुमती है और राजा जितशत्रुको विवाही गई है ||१५|| इस वेचारीको एक मन्त्रवादी परिवाजकने अपने यश कर लिया था वह मर गया इसलिए उसकी हड़ियों के समूहकी माला बनाकर यह पृथिवीपर घूमती रहती है ॥४६॥ यह सुनकर वसुदेवकी दया उमड़ पड़ी और उन्होंने महामन्त्रों के प्रभावसे शीघ्र हो केतुमतीके पिशाचका निप्रद कर दिया ॥४७॥ यहाँ वमुदेवकी सोजमें जरासन्धके आदमी पहलेसे ही नियुक्त थे इसलिए यद्यपि कुमार उपकारी थे तथापि ये उन्हें घेरकर गलगृह नगर ले गये ॥४८॥ उनको ले जानेवाले लोगोंसे वसुदेवने पूछा कि हे राजपुरुषो ! यताओ तो सही मैंने गजाका कौन-सा अपराध किया है जिससे मैं इस तरह क्रोधपूर्वक ले जाया जा रहा हूँ ॥४॥ इस प्रकार कहनेपर राजपुरुष बोले कि जो राजपुत्रीके पिशाचको दूर करेगा यह गनाको पात कानेवाले शत्रुका पिता होगा ॥५०॥ इस प्रकार कहकर नीच मनुष्यों में घिरे यमुदेय बघ स्यान- पर ले जाये गये परन्तु यध होने के पहले हो कोई विद्याधर इन्हें मारटकर आकारामें ले गया ॥५।। उस विद्याधरने कुमारको मम्योधते हुए कहा कि हे घोर ! तुम मुझे प्रमायतीका १. कामग्मानितचेतसोम. 1 २. विनोम। ३ नीयेयं म.।

हरिवंशपुराणे प्रभावतीसमोपं त्वं मया नीतिज्ञ! नीयसे । इति प्रियवचोवाची निनाय सचराचलम् ॥३॥ प्राप्य गन्धसमृद्धं च नगरं नगमूर्धनि । प्रवेशितो महाभूत्या विद्याधरजनर्वृतः ॥५४॥ प्रशस्ततिथिनषप्रयोगे 'योगे कृते ततः । पितृबन्धुजनः शौरिप्रभावश्योः प्रहृष्टयोः ॥५५॥ प्रागेव मदनावेशपरस्परवशात्मको । वधूवरी वरी वृत्ती भोगसागरवर्तिनी ॥५॥ रथोद्धतावृत्तम् सम्प्रयुक्तमपि वल्लभैः सदा विप्रयोजयति पापकृत्परम् । पूर्वतोऽपि शतशोऽतिवल्लभयुज्यते तु जिनधर्मरपुरा ॥५॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती प्रभावतीलाभवनो नाम त्रिशः सर्गः ॥३०॥ पितामह जानो, भगीरथ मेरा नाम है और तुम्हारे मनोरथको पूर्ण करनेवाला हूँ ॥५२॥ हे नीतिज्ञ ! मैं तुम्हें प्रभावतीके पास लिये जाता हूँ-इस प्रकार मधुर वचन कहता हुआ वह विद्याधर उन्हें विजया पर्वतपर ले गया ॥५३॥ वहाँ पर्वतके मस्तकपर एक गन्धसमृद्ध नामक नगर था। उसमे अनेक विद्याधरों से घिरे हुए वसुदेवका उसने बड़े वैभवके साथ प्रवेश कराया ॥५४॥ तदनन्तर प्रशस्त तिथि और नक्षत्रके योगमें प्रभावतीके पिता तथा बन्धुजनोंने हर्पसे युक्त वसुदेव और प्रभावतीका विवाहोत्सव किया ॥५५॥ वसुदेव और प्रभावतीके हृदय कामके आवेशसे पहले ही एक दूसरेके वशीभूत थे। अतः अब वर-वधू बनकर दोनों भोग रूप सागरमें निमग्न हो गये ॥५६॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि यद्यपि पापी मनुष्य प्रियजनोके साथ संयोगसे प्राप्त हुए अन्य मनुष्यको सदा प्रियजनोसे वियुक्त करता है तथापि पूर्वभवमें जिनधर्म- को धारण करनेवाला मनुष्य पूर्वको अपेक्षा सैकड़ों बार अतिशय प्रियजनोके साथ संयोगको प्राप्त होता है ।।५७॥ इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें प्रनापतीके लाभका वर्णन करनेवाला तीसवाँ सर्ग समाप्त हुभा ॥३०॥ १. योग म०, सम्बन्धे कृते सतीत्यर्थः।

एकत्रिंशत्तमः सर्गः अथ हयतले सुधः प्रभावया सहान्यदा । सूर्पकेण हृतः शौरिबुबुधे स चिरेण से ॥१॥ जधान मुष्टिघातेन विद्विपं चामुचत् स सात् । गोदावर्याः पपातायं हृदे देहसुग्गावहे ॥२॥ तत्र कुण्डपुरे लेभे कन्यां पद्मरथस्य सः । मात्यकौशलयोगेन कलाकौशलशालिनीम् ॥३॥ ततोऽपि नीलकण्ठेन नारवा मुन्नोऽपतद् यदुः । चम्पासरसि सम्प्राप्ठस्तस्यां सोऽमात्यदेहजाम् ॥४॥ जलकीहारतस्तन स हृतः मूर्पकारिणा । विमुनश्च पपातासौ भागीरथ्यां मनोरथी ॥५॥ पर्यटनटवीं तत्र म्लेच्छराजेन वीक्षितः । परिणीय सुतां तस्य जराल्यां तत्र चावसत् ॥६॥ जरकुमारमुपाद्य तस्यामुग्नतविक्रमः । अवन्तिमुन्दरी प्राप शूरसेनां च शंसिताम् ॥७॥ पुरषान्वेषिणीमन्यां कन्यां जीवद्यशःश्रुतिम् । उपयम्यापरावासावरिष्टपुरमाययौ ॥८॥ राजा तन तदा धीरो रुधिरो युधि रोधनः । तस्य मित्रा महादेवी देवीव द्युतिसम्पदा ॥६॥ ज्येष्टी हिरण्यनामाख्यस्तनयो नयवित्तयोः । रणशौण्डो महासत्वः शस्त्रशास्ने कृतग्रहः ॥१०॥ कलापारमिता रूपयौवनोदयधारिणी । तनया रोहिणीनाम्ना रोहिणीव यशस्विनी ॥११॥ अथानन्तर-किसी समय कुमार वसुदेव प्रभावतोके साथ महलमें सो रहे थे कि उसी समय उनका वेरी शूर्पक उन्हें हरकर आकाशमें ले गया ॥ कुछ देर बाद जब उनकी नींद खुली वो मुधों के प्रहारसे उन्होंने शत्रुको पीटना शुरू किया। मुक्कोंको मारसे घबड़ाकर शूर्पकने उन्हें आकाशसे छोड़ दिया जिससे वे शरीरको मुख पहुँचानेवाले गोदावरीके कुण्डमें गिरे ॥१-२॥ यहाँसे निकलकर ये कुण्डपुर ग्राममें पहुंचे। यहाँका राजा पद्मरय था उसकी कला कौशलसे मुशोभित एक सुन्दरी कन्या थी। उस कन्याकी प्रतिज्ञा थी कि जो मुझे माला गूंथने में पराजित फरेगा उसीके साथ में विवाह करूंगी। कुमार वसुदेवने उसे माला गूंथनेका कौशल दिसाफर मान किया-उसके साथ विवाह किया ॥शा एक दिन कुमारका शत्रु नीलकण्ठ वहाँसे भी उन्हें हरकर ले गया तथा आकाशमें ले जाकर उसने छोड़ दिया। भाग्यवश कुमार चम्पानगरीके तालायमें गिरे। यहाँसे निकलकर उन्होंने चम्पापुरीमें प्रवेश किया तथा वहाँके मन्त्रीकी पुत्रीके साथ विवाह किया ॥४॥ एक दिन कुमार चम्पानगरीमें जलक्रीड़ा कर रहे थे कि वैरी शर्पक फिर हर ले गया। अबकी बार उससे छूटकर अनेक मनोरथोंको धारण करनेवाले कुमार भागीरथी नदी में गिरे ॥शा यहाँसे निकलकर वे अटवीमें घूमने लगे । यहाँ म्लेच्छोंके राजाने उन्हें देवा जिसमे ये म्लेच्छगजको जरा नामक कन्याको विवाहकर वहीं रहने लगे ।।६।। उन्नत पराक्रम- को धारण करनेवाले यमुदेवने उस कन्याम जरबमार नामका पुत्र उत्पन्न किया। उसी समय कुमाग्ने अवन्तिसुन्दरी और शूरसेना नामकी उत्तम कन्याको भी प्राप्त किया ॥5॥ तदनन्तर पुरुषको योजनेवाली जीवद्यशा नामकी कन्याको एवं अनेक कन्याओंको विवाह कर कुमार नामक नगर आये || उस समय वहाँ युद्धर्म शत्रुओंको रोकनेवाला धीर वीर गधिर नामका राजा था। उसकी मित्रा नामको महारानी थी जो कान्ति रूपी सम्पदासे देवाके समान जान पड़ती थी l उन दोनोंके नीतिका वेत्ता, रण निपुण महा पराक्रमी एवं शन और शास्त्रका अभ्याम करनेवाला हिरण्यलाभका ज्येष्ठ पुत्र या 1?] और कलाकार गामिनी, रूप तथा यौवनके अभ्युदयको धारण करनेवाली, रोहिणी नामको पुी थी। यह वसुदेव अरिष्टपुर १. अश्या अन्याः कन्या विह्य अमी अरिष्टपुरम् प्राय । २. नौतियः ।

हरिवंशपुराणे स्वयंवरविधौ तस्या समताः सकलाः नृपाः । जरासन्धं पुरोधाय समुदविजयादयः ॥१२॥ तत्र चित्रमणिस्तम्भधारितेषु यथाक्रमम् । ते मञ्चेषु समासीना मृपा भूपितविग्रहाः ॥१३॥ वसुदेवोऽपि तत्रैव 'भ्रात्रलक्षितवेषभृत् । तस्थौ पाणविकान्त स्थो गृहीतपणवोऽप्रणीः ॥१४॥ ततः स्वयंवरान्तभूभागं सौभाग्यभूमिका । प्रविष्टा रोहिणी कन्या रोहिणीवातिरूपिणी ॥१५॥ तदा च सर्वभूपाललितैरलमाकुलः । साऽलोकि युगपन्नेरचयद्भिरिवाम्बुजैः ॥१६॥ तद्रूपश्रवणाद् येषां परा प्रीतिरभूत्पुरा । सा रूपदर्शनात्तेषां महत्त्वमगमस्परम् ॥१७॥ श्रुतितूलततो वृद्धो योऽनुरागतनूनपात् । दर्शनेन्धनदीप्तस्य तस्य वृद्धिः किमुच्यताम् ॥१८॥ शहतूर्यरवस्यान्ते ततो धात्री पवित्रवाक् । धृतप्रसाधनां कन्यां मान्यामाहाभितो नृपान् |13|| भातपत्रमिदं यस्य चन्द्रमण्डलपाण्डुरम् । निखण्टजयतो लब्धं यशः स्वमिव शोभते ॥२०॥ यस्य चाज्ञाकराः सर्वे भूचरास्तु नभश्चराः । सुन्धरेश्वरः सोऽयं जरासन्धोऽवतियते ॥२१॥ वृणीष्व रोहिणीशं तं नृपं स्वल्लाभलोमतः । रोहिणीसद्गमुनिझत्वा शितिं चन्द्रमिधागतम् ॥२२॥ तस्मिन्नरागिणी बुवा रोहिणी साह सारिवका । जरासन्धसुतास्वेते वृणीष्वपु हदि स्थितम् ॥२३॥ धात्री चेतोविदूचे तां मधुरानाथमप्रतः । उग्रसेननृपं पश्य रोचते यदि ते मुते ॥२४॥ पुत्री सचमुच ही रोहिणी ताराके समान कीर्तिमती थी॥११॥रोहिणीके स्वयंवरमें जरासंधको भागे कर समुद्रविजय आदि समस्त राजा आये ॥१२॥ शोभित शरीरको धारण करनेवाले राजा लोग स्वयंवर मण्डपमें नाना प्रकारके मणिमयी खम्भोंसे सुशोभित मञ्चोंपर यथाक्रमसे बैठ गये ॥१३॥ भाइयोको पहचानमें न आ सके ऐसे वेषको धारण करनेवाले कुमार वसुदेव भी स्वयंवर में गये और पण नामक बाजा बजानेवालोंके पास जाकर बैठ गये। उस समय कुमार अपने हाथमे पणव नामक बाजा लिये हुए थे और उसके बजानेवालोंमे सबसे अग्रणी जान पड़ते थे ॥१४॥ तदनन्तर सौभाग्यकी भूमि और रोहिणी-ताराके समान अतिशय रूपवती रोहिणी कन्या ने स्वयंवरके भीतर प्रवेश किया ॥१५॥ उस समय समस्त राजाओंने मुड़-मुड़कर, आकुलवासे युक्त नेत्रों द्वारा एक साथ उसका अवलोकन किया। उस समय उसकी ओर देखनेवाले राजा ऐसे जान पड़ते थे मानो नेत्ररूपी कमलोसे उसको पूजा ही कर रहे हो ॥१६॥ जिन राजाओं को पहले उसका रूप सुनकर परम प्रीति उत्पन्न हुई थी अब उसका रूप देखकर उन राजाभी की वह परम प्रीति और भी अधिक महत्त्वको प्राप्त हो गई | सो ठीक ही है क्योंकि जो अनुरागरूपो अग्नि श्रवण रूपी रूईकी सन्ततिमें लगकर धीरे-धीरे सुलग रही थी वह यदि दर्शन- रूपी ईधनको पाकर एक दम प्रज्वलित हो उठे तो उसकी वृद्धिका क्या कहना है ? ॥१८|| तद नन्तर जय शड्स और तुम्ही आदि वादिनीका शब्द शान्त हुआ तय पवित्र वचन घोलनेवाली धाय, अलंकारीको धारण करनेवाली माननीय कन्याको राजाओंके सम्मुख ले जाकर कहने लगी ॥१६॥ कि हे पुनि ! जिसका यह चन्द्र-मण्डलके समान सफेद छत्र, तीनखण्डीकी विजयसे प्राप्त यशरूपी धनके समान सुशोभित हो रहा है और समस्त भूमिगोचरी तथा विद्याधर राजा जिसके आज्ञाकारी हैं ऐसा यह वसुधाका स्यामो राजा जरासंध बैठा है।।२०-२शा हे रोहिणो ! तुझे पाने लोभसे रोहिणीका समागम छोड़कर पृथिवीपर आये हुए चन्द्रमाके समान जान पड़ता है ऐसे इस राजा जगसंधको तू स्वीकृत कर॥२२॥ सत्यगुणको धारण करनेवाली धायने जब देखा कि इसका अनुराग जरासंध नहीं है तब उसने आगे बढ़कर कहा कि ये जरासन्धके पुत्र हैं इनमें से जो तुझे पसन्द हो उसे घर ॥२३॥ उनमें भी जय अनुराग नहीं देसावर चित्तको जाननेवाली घायने आगे पदकर कहा कि हे घंटी! यह आगे मथुराके स्वामी राजा उग्रसेन यठे हैं यदि तेरी रुचि हो १ भ्रातृभिग्लक्षिां ये विभीति भ्राप्रलदितोपभृत् । २. तनी म० । श्रुतिकुलतनौ ग० । ३ रोहिणी शन्तिम् म ।

एकत्रिशत्तमः सर्गः लमधीः साह शौर्यादीन् पश्य सौर्यपुराधिपान् । मालामारोपयामाषामेकस्य रुचितस्य ते ॥२५॥ इत्युक्त तेषु चेतोऽस्या वभार गुरुगौरवम् । ततोऽदर्शयदेपास्यै पाण्डं विदुरमप्यतः ॥२६॥ दमघोपं यशोधोपं दत्तवानं सुविक्रमम् । शल्यं शल्यमिवारीणां तथ्यं शत्रुञ्जय नृपम् ॥२७॥ चन्द्राभं चन्द्रवरकान्तं मुख्यं कालमुखं ततः । पौण्डूच पुण्डरीकाक्षं मस्स्यं मात्सर्यवर्जितम् ॥२८॥ सायं च जये सक्तं सोमदत्तं नृपोत्तमम् । तत्पुत्रं मातृभियुक्त भूरिधवसमाभवम् ॥२६॥ सूनुनांशुमताऽत्यन्तं कपिलं विपुलेक्षणम् । तथा पद्मरथं भूपं सोमकं सोमसौम्यकम् ॥३०॥ देवकं देवनायाभं श्रीदेवं श्रीवधूश्रितम् । प्रदर्श्य तान् नृपानित्यं वंशस्थानादिशंसिनी ॥३॥ अन्यानपि च कन्यायै धात्री सा न्यायविनगौ । एतावन्तो नृपा वाले मुख्याः किमिदमास्यते ॥३२॥ कुरु कन्ये गुणं कण्ठे चित्तस्थस्येह कस्यचित् । वत्सौभाग्यगुणाकृष्टराजमस्यास्य ससिधौ ॥३३॥ 'वं प्रकाशय सौभाग्य कस्यचिचित्तहारिणः । योग्यभत्तृ परिप्राप्तिचित्तचिन्तास्तनियोः ॥ वृतयोग्यवरा पित्रोमुग्धे कुरु सुखासिकाम् ॥३४॥ एवमुक्ताऽवदरकन्या साधु मातरुदीरितम् । किन्तु वहशितेवेषु न मनो रज्यते क्वचित् ॥३५॥ दर्शनानन्तरं या स्नेहोऽभिव्यज्यते हृदि । पौनरुक्त्यं भवेद्वाच्यं तत्राप्यन्नाप्यतर्षता ॥३६॥ तो इसकी ओर देख ॥२४॥ सदनन्तर विवेकवती धायने आगे बढ़कर कहा कि सौर्यपुरके स्वामी समुद्रविजय आदिको देख, यदि तेरी रुचि हो तो इनमेंसे किसी एकके गलेमें माला डाल ॥२५॥ धायके इस प्रकार कहनेपर कन्या चित्तने उन सबके ऊपर गुरुके समान गौरव धारण किया अर्थान् उन्हें गुरु समझकर प्रणाम किया। तदनन्तर धायने कन्याके लिए राजा पाण्डुको दिखाया और उसके बाद विदुरको भी दिखलाया ॥२६॥ जब उसे इनमेंसे किसोपर भी कन्याका अनुराग नहीं दिखा तब उसने यशको घोषणा करनेवाले दमघोष, अतिशय पराक्रमी दत्तवक्त्र, शत्रुओंके लिए शल्यके समान दुःस देनेवाले शल्य, सार्थक नामको धारण करनेवाले शत्रुञ्जय, चन्द्रमाके समान सुन्दर चन्द्राम, अतिशय मुख्य कालमुख, कमलके समान नेत्रोंको धारण करनेवाले पौण्ड, मात्सर्यसे रहित मत्स्य, विजय प्राप्त करनेमें लीन संजय, राजाओंमें उत्तम सोमदत्त, भाइयोंसे सहित सोमदत्तका आज्ञाकारी पुत्र भूरिश्रवा, अंशुमान् नामक पुत्रसे सहित तथा अतिशय विशाल नेत्रोंको धारण करनेवाला राजा फपिल, राजा पद्मरय, सोम-चन्द्रमाके सौम्य राजा सोमक, इन्द्र के समान आभाको धारण करनेवाला देवक और लक्ष्मीरूपी वधूसे सेवित श्रीदेव राजाको दिखाया तथा इन सब राजाओंको दिखाकर उनके वंश और स्थान आदि- का भी वर्णन किया ॥२७-३१॥ तदनन्तर न्यायको जाननेवाली धायने कन्याके लिए और भी अनेक राजाओंका परिचय देते हुए कहा कि हे याले ! मुख्य इतने ही हैं। इस तरह चुपचाप क्या सही है ? इनमें से जो भी तेरे हृदयमें स्थित हो-जिसे तू चाहती हो उसके कण्ठम माला डाल दे। ये सभी राजा तेरे सौभाग्यरूपी गुणसे आकर्षित होकर इधर सेरे समीप स्थित हैं इनमें जो तुम्हारे चित्तको हरण करनेवाला हो उसके सौभाग्यको प्रकाशित कर । हे मुग्धे ! तेरे लिए योग्य भर्ताको प्राप्तिको चिन्तासे तेरे माता-पिताको निद्रा नष्ट हो गई है सो योग्य वरको स्वीकार कर उन्हें सुखी बना ॥३२-३४॥ पायके इस प्रकार कहनेपर कन्याने उत्तर दिया कि हे मातः ! आपने ठीक कहा है किन्तु भआपके द्वारा दिखाये हुए इन राजाओंमसे किसीपर मेरा मन अनुरक्त नहीं हो रहा है ॥३शा देयनेके बाद ही जिसके ऊपर हृदयमें स्नेह प्रकट हो जाता है उसे वरनेके लिए वचन कहना पुनरुक्त होता है तथा आन्तरिक स्नेहके प्रकट होनेपर हो खो-पुरुष दोनोंम सन्तोषका अनुभव १ शल्यं म० १ २. -माभयं म।३ पट्पाटोऽयं श्लो: । ४. कन्यां म. 1५. प्यनर्थना मा 1 3 हरिवंशपुराणे न रागो न च विद्वेषो न मोहो न च शून्यता । मुनेरिच ममामीपु जातोपेक्षा कुतोऽप्यहो ॥३७॥ यद्यमीभ्यः परः कोऽपि विधिना मे विधिसितः । वरस्तं दर्शयत्वद्य विधिरेव जगद्गुरुः ॥३॥ तद्वचोऽनन्तरं कन्या शुश्राव पणवध्वनिम् । श्रव्यं श्रवणमार्गेण गत्वा चेतोऽतिकर्पिणम् ॥३६॥ इतः पश्य वरारोहे ! स्वन्मनोहरणक्षमम् । राजहंसमिति स्पष्टं बमाण पणवः स हि ॥१०॥ परावृत्य ततः कन्या पश्यन्ती सा व्यलोकत । राजलक्षणसंयुक्तं वसुदेवं वसूपमम् ॥४१॥ अन्योन्यदृष्टिसम्पातनिशातशरसम्पदा । मनो मनसिनश्चक्रे ततो जर्जरितं तयोः ॥४२॥ आसाद्य सा ततस्तस्य भूषणस्वनहारिणी । कण्ठे कण्ठगुणं चक्रे स्तनचकेण सन्नता ॥४३॥ मञ्चस्थस्योपकण्ठेऽस्य समाप्तीना व्यराजत । रोहिणी हारिणी तारा रोहिणीव कलाक्तः ॥४॥ नवसङ्गमसजातसाध्वसेन सकम्पना । कन्या सा स्वाङ्गसङ्कन तम्याङ्गमुखमाहरत् ॥४५।। त स्वयवरमालोक्य केचिदूचुरिदं नृपाः । जातोऽनुरूपयोर्योगी रत्नकाचनयोरिव ॥४६॥ अहो नैपुण्यमेतस्याः कन्याया यदयं नृपः । कोऽपि गृढकुलः श्रीमान् प्रधानपुरुषो वृतः ॥४७॥ मात्सर्योपहतास्त्वन्ये जगुः पाणविकं वरम् । कुर्वन्त्या पश्यतात्यन्तमन्यायः कन्यया कृतः ॥४८॥ पराभूतिमिमां राज्ञां नव युक्तमुपेक्षितुम् । सर्वदातिप्रमशः स्यादेवं सति महीतले ॥४६॥ कुलीमानां समाजेऽस्मिन् परस्यावसरोऽस्य कः । वक्तु वा वस्तुकामश्चेत्कुलीनः कुलमान्मनः ॥५०॥ न चेदेवं करोत्येप कोऽपि नीचान्वयोद्भवः । कुट्यतां राजपुत्रस्य कन्याप्यस्स्विहं कस्यचित् ॥५॥ होता है ॥३६॥ इन राजाओंपर मुझे न राग है, न उप है, न मोह है और न शून्यता है । अहो! मुनिके समान मेरी इन सबपर किसी कारणसे उपेक्षा हो गई है ॥३७॥ यदि विधाताने इन सबसे बढ़कर कोई दूसरा वर मेरे लिए बनाना चाहा है तो जगत्का गुरु विधाता ही आज उस घरको दिखलावे ॥३८॥ इतना कहने के बाद ही कन्याने, कर्ण मार्गसे भीतर जाकर चित्तको खींचनेवाली पणवकी मधुर ध्वनि सुनी ॥३६॥ वह ध्वनि मानो स्पष्ट रूपसे यही कह रही थी कि हे सुन्दरि ! तुम्हारे मनको हरण करनेवाला राजहंस इधर बैठा है, अतः इस ओर देखो ॥४॥ तदनन्तर ज्याही कन्याने मुड़कर उस ओर देखा, त्योंही उसे राजलक्षणों से युक्त कुवेरके समान वसुदेव दिखे ॥४१॥ उसी क्षण कामदेवने परस्पर टि सम्मिश्रण रूप तीक्ष्ण वाणों की सम्पदासे दोनोंका मन जर्जरित कर दिया ॥४२॥ तदनन्तर जो आभूपोंके शब्दसे अतिशय मनोहर जान पड़ती थी और स्तनचकके भारसे नीचेकी ओर झुक रही थी। ऐसी रोहिणीने पास जाकर यमुदेवके गलेमे माला डाल दी ।।४३॥ मञ्चपर आसीन वसुदेवके समीप बैठी हुई रोहिणी चन्द्रमाके समीप स्थित रोहिणी ताराके समान मनाहा जान पड़नी met नवीन समागममे उत्पन्न भयके कारण जिसका शरीर कुछ-कुछ काँप रहा था ऐसी रोहिणीने अपने शरीरके स्पर्शसे यमुदेवके शरीरको सुग्न उत्पन्न कराया |शा उस स्वयंवरको देखकर किनने ही राजा यह कहने लगे कि अहो ! जिस प्रकार रत्न और सुवर्णका संयोग होता है उसी प्रकार यह दोनों योग्य घर वधूका संयोग हुआ है ॥४६॥ अहो ! इस कन्याकी चतुराई देखो कि जिसने छिपे फुलसे युक्त लक्ष्मी सम्पन्न एवं प्रधान पुरुप रूप इस किसी अनिवर्चनीय राजाको परा है |GN मात्सर्यसे पीड़ित अन्य राजा लोग यह कह रहे थे कि देसो पणवयादकको वर यनाती हुई कन्याने यह बड़ा अन्याय किया है ॥४॥ गजाओंको इस पगमयकी उपेक्षा करना उचित नहीं है क्योंकि ऐसा. होनेसे तो पृथियो तलपर सदा अतिप्रसन्न होने लगेगा--कुल मर्यादाकी सब व्यवस्था ही मन हो जायगी nHell कुलीन मनुष्योंकी इस सभा इस अकुलीन मनुष्यका असर ही क्या था ? अथवा यह पुलीन है और अपना फुल यताना चाहता है तो पताचे ॥५|| यदि यह ऐमा नहीं करता १ यमरणाग्निनाशिनु' इति जयन्ती 1 २. तोदश । ३. चन्द्रस्य । ४ रिम म.।

एकत्रिंशत्तमः सर्गः - वमुदेवस्ततो धीरः प्रोवाच क्षुभितान् नृपान् । श्रूयतां क्षत्रियः साधुभिश्च वचो मम ॥५२॥ स्वयंवरगता कन्या वृणोते रुचिरं वरम् । कुलीनमकुलीन वा न क्रमोऽस्ति स्वयंवरे ॥५३॥ अक्षान्तिस्तत्र नो युक्ता पितुर्कातुनिजस्य वा । स्वयंवरगतिज्ञस्य परस्येह च कस्यचित् ॥५॥ कश्चिन्महाकुलोनोऽपि दुर्भगः सुभगोऽपरः । कुलसौभाग्ययोर्नेह प्रतिबन्धोऽस्ति कश्चन ॥५५॥ तत्र यदि सौभाग्यमविज्ञातस्य मेऽनया। अभिव्यक्तं न वक्तव्यं भवद्भिरिह किचन ॥५६॥ अथ पौरादर्पण कश्चिदन्न न शाम्यति । शमयामि तमाकर्णकृष्टमुक्तैः शिलीमुखैः ॥५७॥ तच्छुत्वाऽऽशु जरासन्धः क्रुद्धः प्राह नृपान् नृपाः । गृह्यतामयमुवृत्तो रुधिरश्च सपुत्रकः ॥५॥ क्षुभिताः पूर्वमेवाऽऽसन् द्विगुणं चक्रिवाक्यतः । खलप्रकृतयो भूपाः सनद्धाः यो मुद्यताः ॥५६॥ साधुप्रकृतयः केचित्तत्र क्षत्रियपुगवाः । तस्थुः पापनिवृत्तेच्छाः पृथक् स्वबलसङ्गताः ॥१०॥ पक्षास्तु रुधिरस्यैके प्रतिपक्षविभित्सया । सन्ना सहसा प्राप्ताः रुधिरारुणबीक्षणाः ॥६१॥ रथं हिरण्यनाभः स्व तस्थावारोप्य रोहिणीम् । समस्तबलसंयुक्तो रुधिरोऽपि वरं वरम् ॥६२॥ रुधिरो मधुरैक्यैिर्निजयोधानबोधयत् । यूयं महारथा युद्ध कुरुष्वं युक्तमात्मनः ॥६३॥ वरेण श्वशुरोऽत्राचि पूज्य ! मे स्यन्दनं द्रुतम् । समर्पय महानेकशस्त्रास्त्रपरिपूरितम् ॥६॥ है-अपना कुल नहीं बतलाता है तो यह कोई नीच कुल में उत्पन्न हुआ है अतः इसे यहाँसे हटा दिया जाय और यह कन्या किसी राजपुत्रको दे दी जाय ॥५१।। तदनन्तर धोर-योर वसुदेवने क्षोभको प्राप्त हुए राजाओं से कहा कि अहंकारसे भरे क्षत्रिय तथा सज्जन पुरुष हमारे वचन सुनें ॥५२॥ स्वयंवरमें आई हुई कन्या अपनी इच्छाके अनुरूप कुलीन अथवा अकुलीन वरको वरती है । स्वयंवरमें कुलीन अथवा अकुलीनका कोई क्रम नहीं है ॥५३॥ इसलिए कन्याके पिता, भाई अथवा स्वयंवरकी विधिको जाननेवाले किसी अन्य महाशयको इस विषयमें अशान्ति करना योग्य नहीं है ॥५४॥ कोई महाकुलमें उत्पन्न होकर भी दुर्भग-बीके लिए अप्रिय होता है और कोई नोच कुलमें उत्पन्न होकर भी सुभग-स्त्रीके लिए प्रिय होता है। यही कारण है कि इस विषयमें कुल और सौभाग्यका कोई प्रतिबन्ध नहीं है ॥५५॥ इसलिए यदि इस कन्याने मुझ अपरिचितका सौभाग्य प्रकट किया है तो इस विषयमें आप लोगोंको कुछ नहीं कहना चाहिए ॥५६॥ इतनेपर भी यदि कोई पराक्रमके गर्यसे यहाँ शान्त नहीं होता है तो मैं कानतक खींचकर छोड़े हुए बाणोंसे उसे शान्त कर दूंगा ॥५६॥ वसुदेवके उक्त वचन सुनकर राजा जरासन्ध शीघू हो कुपित हो उठा। उसने राजाओंसे कहा कि इस उद्दण्डको तथा पुत्र सहित राजा रुधिरको पकड़ लो ।।५७] दुष्ट स्वभावके राजा पहले होसे कुपित थे फिर चक्रवर्तीका आदेश पाकर तो दूने कुपित हो गये। तदनन्तर वे दुष्ट राजा तैयार होकर युद्धके लिए उद्यत हो गये ॥५८-५६|| वहाँ जो सज्जन प्रकृतिके राजा थे ये पापसे निस्पृह हो अपनी-अपनी सेना लेकर अलग पड़े हो गये ।।६०॥ जो क्षत्रिय रुधिरके पक्ष के थे वे क्रोधसे रक्तके समान लाल लाल नेत्र करते हुए, शत्रुको घायल करनेको इच्छासे शीघ्र ही तैयार होकर वहाँ आ पहुँचे ॥३१॥ राजा रुधिरका पुत्र स्वर्णनाभ रोहिणीको अपने रथपर चढ़ाकर सड़ा हो गया और समस्त सेनासे युक्त राजा रुधिर उत्कृष्ट वर-वसुदेवको अपने रथपर सवार कर सड़ा हो गया ॥६२॥ रुधिरने मोठे-मीठे शब्दों द्वारा अपने योधाओंको सम्बोधते हुए कहा कि हे महारथियो ! तुम लोग युद्ध में अपने अनुरूप ही कार्य करो-जैसा तुम लोगोंका नाम है येसा हो कार्य फरो ॥३२॥ वसुदेवने अपने श्वर-राजा मधिरसे कहा कि हे पूज्य ! आप मुझे अनेक १. मुवृत्ता म० | २. मुपुत्रकः म । ३ महारथो म । ४. युरेः कुरुप युदमात्मनः ग।

1 ॥ हरिवंशपुराणे 'कान्दिशीकान् करोग्यद्य यद्भुतं क्षत्रियानमून् । संख्येऽप्ररयातवंशस्य सहन्ता मे शरानी ॥६५।। इयुक्ने रुधिरोऽतोपि पुरुषान्तरवाषणात् । अढोकयंदाखादयं जैवनाश्वमहारथम् ॥६६।। सेटो दधिमुग्वः शौरि शुरो रथवरस्थितः । मनोरय इव प्राप्तस्तदा दिव्यास्त्रभासुरः ॥६॥ प्रगतश्च म तं प्राह रथमारोह मे द्रुतम् । सारथिस्तव युद्धेऽहं जहि शत्रुकदम्बकम् ॥६॥ भारलोह र शारिस्तस्य तुष्टः परिष्कृतः । चापी च कवची चित्रशरसंघातसंकुलम् ॥६॥ द्विसहसरथं सैन्यं पट्सहस्रमदद्विपम् । चतुर्दशसहस्राव लक्षारमपदातिकम् १७०॥ "रोधिर युधि सान्निध्यं शौरेराशु तदानितम् । शत्रुमैन्यविनाशाय कृतनिश्चयमावमौ ॥७॥ चतुरङ्गण तेनाशु बलेन बलशालिना । भरटपारमभ्याञ्च शौरिः शत्रुबलोदधिम् ॥७२॥ सम्पातश्च तयोर्मातः सेनयोश्चतुरङ्गयोः । समुद्रघोषयोः शहतूर्यादिश्वरौद्योः ॥७३॥ हस्त्यश्वस्थपादातमौचित्येन यथायथम् । हत्यश्वरथपादातमभ्येत्यायुभ्यदाहवे ॥७४॥ नारन्ध्रशरनालेन नभोरन्ध्रपिधायिना । न सहस्रकरोऽदशि रणेऽन्यत्र कथैव का ॥७५॥ भसिचन पदाघातरक्तधारान्धकारिते । निरुद्धः पादसञ्चारो रणे तेजोनिधेरपि ॥७६॥ पतमित्तमातह: पर्वतेरिव सवंतः । नरैरश्वै रोपः शीयमाणैर्महानभूत् ॥७७॥ अन-शस्त्रोंसे भग हुआ रथ शीघ्र ही दीजिए ॥६४॥ जिससे मैं इन क्षत्रियोंको शीघ्र ही पलायमान कर दूं । ये लोग युद्धमें जिसके फुलका पता नहीं ऐसे मेरे बाणोंको सहन करें।।६।। वसुदेवके इस प्रकार कहनेपर राजा मधिर बहुत सन्तुष्ट हुआ। वह पुरुषों के अन्तरको समझनेवाला जो था । तदनन्तर उसने मजबूत अस्त्र-शस्त्रांसे युक्त एवं वेगशाली घोड़ोंसे जुता हुआ महारय बुलाया ॥६६।। उसी समय शूर, वीर, उत्तम रथपर स्थित तथा दिव्य अस्त्रोंसे देदीप्यमान दधि. मुस नामका विद्याधर मनोग्यके समान कुमार यसुदेयके पास आ पहुँचा ॥६॥ और नम्र होकर योला कि आप शीघ्र ही मेरे स्थपर चढ़ जाइए । युद्धमें मैं आपका सारथी रहूँगा। भाप इच्छा मुमार शत्रुभों के समूहको नष्ट कीजिए ।६८॥ उसके वचन सुनकर वसुदेव बहुत सन्तुष्ट हुए और धनुप हाथ में ले तथा कयच धारण कर नाना प्रकारके वाणोके समूहसे भरे हुए उसके स्थपर चढ़ गये ॥६॥ जिसमें दो हजार रथ थे, छह हजार मदोन्मत्त हाथी थे; चौदह हजार घोड़े थे और एक लास पैदल सैनिक थे । ऐसी राजा मधिरकी विशाल सेना, शत्रु सेनाफे नाशका दृढ़ निश्शन फर शीघ्र ही कुमार यमुदेयके समीप आ गई ॥७०-७१|| उस यलशाली चतुगल सेना के साथ यमुदेय शीघ्र ही, जिसका अन्त नहीं दिखाई देता था ऐसे शत्रुफी सेना रूपी समुद्रके सम्मुख गये ॥७॥ मदनन्तर समुद्र के समान शब्द करनेयाली एवं शद्ध तुम्ही भादिफे शब्दोंमे भयंकर दोनों घनुगद्ग मेनाभीमें गुठभेड़ शुरू हुई ॥७३॥ हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल सैनिक यथायोग्य गतिसे हाथी, पोहा, ग्य भौर पैदल सैनिकांके मामने जाकर रणक्षेत्रमें युद्ध करने लगे us!! भासरा-बियरको आम्दादित करनेयाले मधन पागों के समूहमे उस समय युद्ध में सूर्य भी दिया न देता या फिर अन्य पदार्थो की सो यात ही क्या थी ? |लयार, चक्र और गदा प्रदारगे निकलती गनकी पागभांसे जदा भन्धकार फैल रहा था ऐम पम रणक्षेत्रम सूर्यका भी पाश्मंगार-फिरों का संचार एक गया था। परमे अतिशय से जम्मी मनुष्यका पैदल भाना जाना गा गया था !! यही मप भोर पर्यताकि मगान पर पड़े हाथों गिर रहे थे तथा मनुष्य गाह भी मान-गण होकर पराशायी हो रहे थे। इन सबसे पक्ष बहुत भारी शम्मीद १ मान । २ भए म । परनारा- Y Antart. nिt गया. म. मुन जाम11 +भपुपा + प्रा.म.t एकग्रिंशत्तमः सर्गः भय मेनामुर्य विनं घिरं कृतरणं निजम् । शोरिहिरण्यनामा साधारयितुमुवती ॥७॥ सौ टिमुष्टिमन्धानप्रयोगानभिल्लविती । शपयादयितुं सानो परयोवानिनस्तमः ॥७॥ न नागो न रथो नाश्वो न नरो या महाहये । यो न जरिरास्ताम्यां मुखमा निशितान शरान 1८०॥ द्विदप्रयुन शरासारं पायव्याण सोऽविरत् । शौरिमहिन्द्रयाणेन निघक धन्यपि 10 एलागि शशिशुमाणि शग्रूणां म यशपि च । मुगान्मृधंजान्मान्यान् गरपानरपानयम् ॥२॥ युध्यमाने तथा तम्मिन् वीरे धारभयानके । हिरण्यनामधीरेण रणे पोपट पुरस्कृतः ॥३॥ कुमारयोस्तयोस्तन मुमहारथार्सिनोः । गरयुद्धमभूद्रौद्रं यथा सिंदकिशोरयोः ॥८॥ भपासपद् ध्वज छ रोधिरिः माथि रिपोः । स्थस्य मुरगान् धेगादध्यांश्च गरेः शिनः ॥१५॥ सनशाणा पौण्डी पन्नदण्डनिभः शरी। मृतानुरूपमस्यारेः म चकार नदेव हि ॥८६॥ मी हिरण्यमामाऽपि विभेद क्यचं विपः । कंगु नं च धागाध रथमारविवाजिनः ॥८॥ विरीकृष्य पौडोऽपि समाशु शितसायकैः । सघः प्राणहर नस्य संधत्ते याप्रदाशुगम् 1500 घमुदेवो चन्द्रेण तावच्छिावाऽस्य तदनुः । चक्रे हिरण्यनाभं च यस्यास्य रथ स्थिर ॥३॥ छाधमाने सथा पोग शारिणा शरयपिंगा । वपुः शरसवासानेकीभूय अद्विपः ॥१०॥ श शरान् नियाऽयी निभेद निशितैः शरैः । शय शघिसीस्चिः साधुकारः पदे पदे ॥११॥ था मा तदनन्नर चिरफाल तक युद्ध करनेके बाद जो ग्वेद सिन्न हो गया था ऐनी अपनी सेनाके अप्रभागको सहारा देने के लिए वमुदय और स्वर्णनाभ दोनों ही उद्यत हुए ॥८॥ दृष्टिको अपहरण करनेवाले प्रयोगमे जिन्हें कोई देख नहीं पाता था ऐमे ये दोनों ही जहाँ-तहाँ यागांके द्वारा शत्रु-पक्षके योद्धामाफी आच्छादित फरने लगे ||७en इस महायुद्धमें न ऐमा हाथी था,न रथ था, न घोड़ा था और न मनुष्य ही था जो तीक्ष्ण याणीको छोड़नेवाले उन दोनों के द्वाग जर्जरित न किया गया हो|कुमार यमुदेव,शत्रुफे द्वारा चलाये हुए यागांकी वर्षाको ती यायत्र्य अनमे नितर-बितर कर देते थे और अपने माहेन्द्र बाणसे शत्रुभकेि धनुष तकको ताद देते थे।।८।। उन्होंने यागों के प्रहारमे शत्रुओंके चन्द्रमाके समान मफेद छत्र, राज्यल यश तथा अतिशय-उन्नत माननीय शिरफे यालीको नीचे गिग दिया ||| इधर योगको भय उत्पन्न करनेवाले शूरवीर यमुदय इस प्रकारका भयंकर युद्ध कर रहे थे और रघर योर स्वर्णनाभने युद्धक्षेत्रगे पोण्ड गजा- को अपने मामने किया शाजिम प्रकार सिंहके दो बच्चोंका भयंकर युद्ध होता है टमी प्रकार अनिशय महान ग्थपर बैठे हुए उन दोनों कुमागम भी वाणों द्वारा भयंकर युद्ध होने लगा ||2|| वर्णनामने देखते-देयने तीक्ष्ण पाणीसे शत्रुको ध्यजा, छत्र, सारथि और ग्थके घोड़ोंको शीघ्र ही नीचे गिरा दिया । तदनन्ता गजा पौण्डने मी अत्यन्त कुपित हो यमदण्टके ममान तीदग पागोसे शत्रुको नकल करते हुए उमको धजा, छत्र, सारथि और घोदीको धराशायी कर दिया ।।६तत्पश्चात् स्वर्णनामने भी यागांके समूहमे शत्रुके कयच, पताका, छुन, रथ, माथि, और घोडॉकी काट डाला ISI यह देव पौण्डने भी तोदा पाणी द्वारा स्वर्णनामको शीघ्र ही रथ गहिन कर तत्काल हो उसके प्रागीको हरण करनेयाला याण ज्यांही धनुषपर पढ़ाया त्याही यमुस्यने अर्धचन्द्राकार घागसे उसफे धनुपको काट टाला भी शीघ्रता माथ ग्यनामको अपने स्थिर ग्धपर चढ़ा लिया ॥८- तदनन्तर लगातार याण वर्षा फग्नेयाले यमुदयने 7 जय पौडको आपछादिन कर लिया मय यहुनगे शत्रु एक होका-मिलका यमुदेवपर पानी समूहको यो फरने लग ॥१०॥ परन्तु फिर भी यमुदय अपने यागामे शत्रुके यागांका निवारण १ राम । २t योनिITT: R. | ३. मियाम् गुमान गरिः। ४, गिनिगम 4.14 याम.।

- हरिवंशपुराणे अथ साधुनृपैस्तत्र न्यायविद्भिरितीरितम् । न दृष्टव्यमिदं युद्धमेकस्य बहुभिः सह ॥१२॥ ततो जगौ जरासन्धो धर्मयुद्धदिक्षया । अनेन सह कन्यार्थमेकैको युध्यतामिति ॥१३॥ ततः शत्रुञ्जयो लग्नः शौरिणा यो मुद्यतः । शेपास्तु प्रेक्षका जाता क्षत्रियाः तमसरा॥६॥ शरान् शत्रुन्जयोरिक्षप्तान् शौरिः प्रक्षिप्य दूरतः । तं ध्वस्तरथसन्नाहं विह्वलीकृत्य मुक्तवान् ॥१५॥ दत्तवक्त्रस्ततो दत्तचिरयुद्धो मदोद्वतः । विरथीकृय निर्मुको निःसारीकृतपौरुषः ॥६६॥ रिपुं कालमुखं प्राप्तं रणे कालमिवोद्धतम् । प्राणशेषमसौ कृत्वा विससर्जोर्जितो यदुः ॥१७॥ शल्यं रथेन सम्प्राप्तं तीचसायकमोचकम् । जुम्भणास्त्रेण रौद्रेण बबन्धान्धकवृष्णिजः ॥१८॥ समुद्रविजय प्राह जरासन्धस्ततो द्रुतम् । त्वं हरास्य रणे दपं पार्थिवास्तविशारदः ॥६६॥ अपि न्यायविदुत्तस्थौ स राजा राजशासनात् । युद्धे प्रायोऽनुवर्तन्ते प्रभुं न्यायविदोऽपि हि ॥१०॥ समुदविजयादेशात्पुनः सारथिना रथः । दधावोच्चैर्वजच्छत्री वासुदेवरथं प्रति १०१॥ हवा उपेटरथं दूरात् कनीयान् सारथिं जगी । ज्यायांसं मम जानीहि समुद्रविजयं स्विमम् ॥१०२॥ मन्दमत्र गुरौ वाह्यो रथो दधिमुख ! त्वया । सापेकं हि मया योध्यमनेन गुरुणा रणे ॥१०३ यथोद्दिष्टं ततस्तेन रथः सारथिना रणे । नोदितोऽपि ययी मन्दः स्यन्दनं गुर्वधिष्ठितम् ॥१०॥ कर तीक्ष्ण बाणोसे शत्रुपर प्रहार करते रहे। उस समय कुमारकी कुशलतासे प्रसन्न होकर शत्रु भी उन्हें पद-पदपर साधु-साधु-बहुत अच्छा बहुत अच्छा कहकर धन्यवाद दे रहे थे ॥१॥ अथानन्तर जो वहाँ न्याय-नीतिके जाननेवाले सज्जन राजा थे उन्होने कहा कि हम लोगोंको यह युद्ध नहीं देखना चाहिए क्योंकि यह एकका अनेकके साथ हो रहा है--एकके कार अनेक व्यक्ति प्रहार कर रहे हैं इसलिए यह अन्यायपूर्ण युद्ध है ।२।। तदनन्तर धर्म-युद्ध देखने को इच्छासे जरासंधने कहा कि अच्छा, कन्याके लिए इसके साथ एक-एक राजा युद्ध करे ॥३॥ तत्पश्चात् जरासंधका आदेश पाकर राजा शत्रुञ्जय कुमार वसुदेवके साथ युद्ध करनेके लिए उठा और शेष राजा मत्सर रहित हो युद्ध देखने लगे ॥४॥ कुमारने शत्रुञ्जयके द्वारा चलाये हुए घाणोंको दूर फेंककर उसके रथ और कवचको तोड़ डाला तथा उसे मूच्छित कर छोड़ दिया ne तदनन्तर मदसे उद्धत राजा दत्तवस्त्र युद्ध करने लगा परन्तु कुमारने उसका भी रथ तोड़ डाला और उसके पौरुषको निःसार कर उसे भगा दिया ॥६६॥ तदनन्तर जो यमराजके समान उद्धत था ऐसा कालमुख युद्ध के लिए सामने आया सो अतिशय बलवान वसुदेवने उसे भी प्राण शेषकर छोड़ दिया | अब रथपर सवार हो तोष्ण वाणोंको छोड़ता हुआ शल्य सामने आया सो वसुदेवने उसे भी अतिशय भयंकर जृम्भण नामक अरसे बाँध लिया ||८|| तदनन्तर जगसंघने समुद्रविजयसे कहा कि हे राजन् ! तुम अस्त्र-विद्या अत्यन्त निपुण हो इसलिए शीघ्र ही युद्धमे इसका गर्व हरण करो II यद्यपि समुद्रविजय न्याय-नीतिके वेता थे-युद्ध नहीं करना चाहते थे तथापि राजा जरासंघको आज्ञासे उठे सो ठीक ही है क्योंकि युद्ध के थिपयमे न्यायके वेत्ता मनुष्य भी प्रायः अपने स्वामीका ही अनुसरण करते हैं ॥१०॥ तत्पश्चात् समुद्रयिजयकी आज्ञा पाकर सारथिके द्वारा चलाया हुआ रथ, ऐसा रथ कि जिसर बहुत ऊँचो ध्वजा और छन लगा हुआ था, वसुदेवके रथको और दौड़ा ॥२०॥ वसुदेवने दूरसे हो पड़े भाईके रथयो देखकर अपने सारथिसे कहा कि इन्हें तुम मेरे बड़े भाई समुद्रविजय जाने ॥१०॥ हे दधिमुग्य! ये हमारे पितातुल्य हैं अतः तुम्हें इनके आगे रथ धीरे-धीरे ले जान चाहिए । मुझे रणभूमिमें इनके साथ इनको रक्षाका ध्यान रखते हुए ही युद्ध करना चाहिए ॥१०॥ माथि-दधिमुखने, यमुदेवकी भाज्ञानुमार हो रथ चलाया जिससे वह प्रेरित होनेपर भी १. दरममगः म । २. यमुदेवं रथं मः।

एकत्रिंशत्तमः सर्गः . निजसारथिमाजिस्थः समुद्रविजयो जगौ । भद्र ! योधमिमं दृष्ट्वा सस्नेहं मे मनः कुत्तः ।।१०५॥ दक्षिणाविमुजास्पन्दो बन्धुमम्बन्धगन्धनः । युधि वध्यस्य सान्निध्ये बद सम्बध्यते कथम् ॥१०॥ मुनिमित्तविसंवादो नानुभूतश्च जासुचित् । विरुद्धदेशकालत्वारसंवादोऽपि न युज्यते ॥१०॥ इायुक्त सोऽवदत् स्वामिनभ्यमिग्रमितस्य ते । अवश्यं यन्धुसम्बन्धी जितजेयस्य जायते ॥१०८।। पर राजन जय्यस्य राजलोकस्य सन्निधौ । परस्य विजये पूजां राजराजादवाप्स्यसि ॥१६॥ मोऽभिनन्दितत्तद्वाच्या कामुकी तं सकामुकम् । शरधेः शामुष्टस्य जगादोशनसायकम् ॥११०॥ भो धीर ! ते यथादृष्टं मृधे धनुषि कौशलम् । तथा निर्वहणं तस्य स्वं कुरुष्व ममाग्रतः ॥19॥ शौर्यशैल ! तवोत्तुगमानशृद्मनावृतम् । भावृणोमि शरैमधेः समुद्रविजयस्वहम् ।।११२॥ कुमारः स्वरभेदेन जगी कि नो यहूदितः । भावयोरिह राजेन्द्र ! रणे व्यक्तिर्भविष्यति ॥११३।। समुद्रविजयस्वं चरसंग्रामविजयस्वहम् । न चेन्प्रत्येपि तरिक्ष सिप संधाय सायकम् ॥११॥ इयुक्त मुनामाध्यस्थ्यो वैशाखस्थानमा स्थितः । संधाय शरमाय विव्याध क्रोधतो नृपः ॥११५|| प्रनिक्षिप्तेन स क्षिप्रमाशुगेन तमाशुगम । दूरादेव च विच्छेद धैशाखस्थानमण्डितः ॥१६॥ मुकान्मुनान्नपेगासाविपूनिघुमिराहवे । प्रत्युन्मुनेरतिविमं दूरादेव निराकरोत् mom वायव्यवारुगास्नी दिव्यास्प्रेरखकोविदी । युयुधाते नृदेवानां साधुकारः स्तुती चिरम् ||१८|| समुद्रविजयसे अधिष्ठित ग्थकी ओर धीरे-धीरे ही चला ॥१०४॥ युद्ध के मैदानमें आनेपर राजा समुद्रनिजयने अपने सारथिसे कहा कि हे भद्र ! इस योद्धाको देखकर मेरा मन स्नेहयुक्त क्यों हो रहा है ? ।।१०५॥ दाहिनी आँख तथा भुजा भी फड़क रही है जो बन्धुके समागमको मूचित करनेवाली है परन्तु युद्धके मैदान में जब कि शत्रु सामने खड़ा है इस शकुनकी संगति 5 कैसे बैठ सकती है तुम्हीं कहो ॥१०६॥ उत्तम शकुनाम विसंवाद-विरोधका कभी अनुभव नहीं किया और देश तथा कालके विरुद्ध होनेसे निमित्तीका संवाद भी संगत नहीं जान पड़ता ॥१०॥ ममुद्रविजयके इस प्रकार कहनेपर सारथिने कहा कि हे स्वामिन् ! अभी आप शत्रुके सामने पड़े हैं जब इसे आप जीत लेंगे तब अवश्य हो यन्धु समागम होगा ।।१०८।। हे राजन् ! यह शत्रु दूसरों के द्वारा अजेय है अतः इसके जीत लेनेपर आप राजाओंके समक्ष राजाधिराज जरासंघसे अवश्य ही विशिष्ट सम्मानको प्राप्त करेंगे ॥१०॥ ममुद्रविजयने मारथिके वचनोंकी प्रशंसाकर धनुष उठाया और तरकशेसे वाण निकाल. कर धनुप हायमें ले बाग निकालकर खड़े हुए कुमार वसुदेवमे कहा कि हे धीर ! युद्ध में तुम्हारे धनुषका जैसा कौशल देखा है अब मेरे आगे येसा हो उसका समारोप फगे-उसी प्रकारको कुशलता दिमाते रहो तो जानें ।।११०-१११।। हे शूरवीरताके पर्यत ! तुम्हारा अतिशय उन्नत यह मानरूपी शिसर अभी तक अनाच्छादित है सो में बागरूपी मेघोंसे अभी आच्छादित करता हूँ में समुद्रविजय हूँ ॥११॥ कुमारने आवाज बदलकर कहा कि हे राजेन्द्र ! हम लोगों को यहन कहनेसे क्या लाभ है ? युद्ध ही हम दोनाको प्रकटता हो जायगी-जो जैमा होगा वह वैमा सामने आ जायेगा ॥११३।। यदि आप समुद्रविजय हैं नो में संग्रामविजय हैं। यदि आपको भवानि न हो नी शीघ्र ही धनुपपर याग गयकर छोड़िए ॥११४॥ वसुदेयके इस प्रकार कहनेपर जिनकी मध्यस्थता एट गई थी तथा जो यशाम्य आमनमे सड़े थे ऐसे गजा ममुद्रविजयने टोरी. पर बाग रयकर तथा सींचकर ग्रोधयश जोरसे मारा ॥११।। घर पैशाम्य आसनमे मुशोभित यमुदेवने शीघ्र ही यदलेमें चलाये हुए भागमे ममुद्रविजयके उम यागको दूग्मे ही फाट टाला ॥११६॥ म प्रकार राजा ममुद्रविजयने युद्ध में जितने भाग दोहे इन सयको यदल छाई हुए पागोके द्वारा यमुटेयने यहुन शीघ्र दूग्मे ही निगमन फर दिया ॥११७॥ नदनन्तर जी अन्न १ युदयः हरिवंशपुराणे अथ साधुनृपस्तत्र न्यायविद्धिरितीरितम् । न द्रष्टव्यमिदं युद्धमेकस्य बहुभिः सह ॥१२॥ ततो जगौ जरासन्धो धर्मयुद्धदिदृक्षया । अनेन सह कन्यार्थमेकैको युध्यतामिति ॥१३॥ ततः शत्रुभयो लग्नः शौरिणा योद्धुमुद्यतः । शेषास्तु प्रेक्षका जाता क्षत्रियाः तमासराः ॥१४॥ शरान शत्रुब्जयोरिक्षप्तान् शौरिः प्रक्षिप्य दूरतः । तं ध्वस्तरथसन्नाहं विह्वलीकृत्य मुक्तवान् ॥१५॥ दत्तवक्त्रस्ततो दत्तचिरयुद्धो मदोद्धतः । विरथीकृत्य निर्मुक्तो निःसारीकृतपौरुषः ॥२६॥ रिपुं कालमुखं प्राप्तं रणे कालमिवोद्धतम् । प्राणशेषमसौ कृत्वा विससर्जोर्जितो यदुः ॥६॥ शल्यं रथेन सरप्रासं तीचगसायकमोचकम् । जुम्भणास्त्रेण रौदेण वयन्धान्धकवृष्णिजः ॥२८॥ समुद्रविजयं प्राह जरासन्धस्ततो द्रुतम् । एवं हास्य रणे दपं पार्थिवास्त्रविशारदः ॥६॥ अपि न्यायविदुत्तस्थौ स राजा राजशासनात् । युद्धे प्रायोऽनुवर्तन्ते प्रभुं न्यायविदोऽपि हि ॥१००॥ समुद्रविजयादेशात्पुनः सारथिना रथः । दधावोच्चैर्वजच्छन्नो वासुदेवरथं प्रति ॥१०॥ दृष्ट्वा ज्येष्ठरथं दूरात् कनीयान् सारथिं जगौ । ज्यायांसं मम जानीहि समुद्रविजयं विमम् ॥१०२॥ मन्दमत्र गुरौ वाह्यो रथो दविमुख ! त्वया । सापेतं हि मया योध्यमनेन गुरुणा रणे ॥१०३ यथोद्दिष्टं ततस्तेन रथः सारथिना रणे । मोदितोऽपि ययौ मन्दः स्यन्दनं गुधिष्टितम् ।।१०।। कर तीक्ष्ण बाणोंसे शत्रुपर प्रहार करते रहे। उस समय कुमारकी कुशलतासे प्रसन्न होकर शत्रु भी उन्हें पद-पदपर साधु-साधु-बहुत अच्छा बहुत अच्छा कहकर धन्यवाद दे रहे थे ॥१॥ अथानन्तर जो वहाँ न्याय-नीतिके जाननेवाले सज्जन राजा थे उन्होंने कहा कि हम लोगोंको यह युद्ध नहीं देखना चाहिए क्योंकि यह एकका अनेकके साथ हो रहा है-एकके ऊपर अनेक व्यक्ति प्रहार कर रहे हैं इसलिए यह अन्यायपूर्ण युद्ध है । तदनन्तर धर्म-युद्ध देखने को इच्छासे जरासंधने कहा कि अच्छा, कन्याके लिए इसके साथ एक-एक राजा युद्ध करे ॥६॥ तत्पश्चात् जगसंधका आदेश पाकर राजा शत्रुञ्जय कुमार वसुदेवके साथ युद्ध करनेके लिए उठा और शेप राजा मत्सर रहित हो युद्ध देखने लगे ॥६४॥ कुमारने शत्रुञ्जयके द्वारा चलाये हुए बागोंको दूर फेंककर उसके रथ और कवचको तोड़ डाला तथा उसे मूछित कर छोड़ दिया ॥६५॥ तदनन्तर मदसे उद्धत राजा दत्तयत्र युद्ध करने लगा परन्तु कुमारने उसका भी रथ तोड़ डाला और उसके पीरुपको निःसार कर उसे भगा दिया ॥६॥ तदनन्तर जो यमराजके समान उद्धत था ऐसा कालमुख युद्धके लिए सामने आया सो अतिशय बलवान् वसुदेवने उसे भी प्रार शेषकर छोड़ दिया अब स्थपर सवार होताण वाणीको छोड़ता हुआ शल्य सामने आया सो वसुदेवने उसे भी अतिशय भयंकर जृम्भण नामक अनसे बाँध लिया ॥६॥ तदनन्तर जरासंघने समुद्रविजयसे कहा कि हे राजन् ! तुम अन्न-विद्या, अत्यन्त निपुण हो इसलिए शीघ्र ही युद्ध में इसका गर्व हरण करो ॥ यद्यपि समुद्रविजय न्याय-नीतिके वेत्ता थे-युद्ध नहीं करना चाहते थे तथापि राजा जरासंधकी आज्ञासे उठे सो ठीक ही है क्योंकि युद्ध के विषयमें न्यायके वेत्ता मनुष्य भी प्रायः अपने स्वामी का ही अनुसरण करते हैं ॥१०॥ तत्पश्चात् समुद्रविजयकी आज्ञा पाकर सारथिके द्वारा चलाया हुआ रथ, ऐसा रथ कि जिसपर यहुत ऊँचा ध्वजा और छा लगा हुआ था, मुदेवकै रथको और दौड़ा ||१०१॥ यमुदेयने दूरसे हो यो भाईके रथको देखकर अपने सारथिसे कहा कि इन्हें तुम मेरे बड़े भाई समुद्रविजय मानो ॥१२॥ है दधिमुप ! ये हमारे पितातुल्य हैं अतः तुम्हें इनके आगे रथ धीरे-धीरे ले जाना चाहिए। मुझे रणभूमिमें इनके साथ इनको रक्षाका ध्यान रखते हुए ही युद्ध करना चाहिए ॥१०३१ मारधि-दधिमुसने, वमुदेवकी आज्ञानुमार हो रथ चलाया जिससे वह प्रेरित होनेपर भी १. धमरमरा: म.१२. यमुदेवं रथं म.1 एकनिशत्तमः सर्गः श्वसुरास्तस्य यावन्तः सपुत्रास्तन्न सङ्गताः । बान्धवाश्चापरे लग्ना ररुदू रणरङ्गगाः ॥१३॥ जरासन्धादयस्तु दृष्ट्वा भ्रातृसमागमम् । शशसू रोहिणी कन्यां तद्भातृपितृवान्धवाः ।।१३२।। यथास्त्र शिविरस्थानं दिनान्ते ते ययुपाः । वसुदेवकथासक्ता निशा निन्युदिनान्यपि ॥१३३॥ ततस्तिथौ प्रशस्तायां रोहिणीचन्द्रसङ्गमे । रोहिणीमुपयेमेऽसौ समुद्रविजयानुजः ॥१३॥ दृष्ट्वा विवाहमु:शास्तुष्टिपुष्टिसमन्विताः । वर्ष तस्थुजरासन्धसमुद्रविजयादयः ।।१३५॥ कृतसाहाय्यक संख्ये वसुदेवः सुपूजितः । आपृच्छय प्रययौ प्रीतो निजं दविमुखः परम् ।। १३६॥ परो नववधूहारिच क्वाम्भोजमधुवतः । सस्मार स्मरासक्तः पूर्वभुक्तवधूलताः ।।१३।। शार्दूलविक्रीडितम् प्रादुर्भूतसमस्तभूतलमहाभूपाललोकैः सम सम्भूयाद्भुतविक्रमैकशरणप्राणे रणप्राङ्गणे । प्रारब्धोऽप्यतिलुब्धबुद्धिभिरभूज्जय्यो न यद्दोःसखः शौरिः शौर्यगिरिजिनोक्ततपसस्तप्तस्य तस्माभवम् ।।१३८।। इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती रोहिणीस्वयंवर- भ्रातृसमागमवर्णनो नाम एकत्रिशः सर्गः ॥३१।। आदि शेष भाई भी आ गये और सब गले लगकर रोने लगे ॥१३०।। उस समय युद्धभूमिमें । वसुदेवके जितने श्वसुर, साले तथा अन्य बन्धुजन थे वे सब उनसे लिपटकर रोने लगे ॥१३१॥ जरासन्ध आदि राजा, भाइयों के इस समागमको देखकर बहुत ही सन्तुष्ट हुए। रोहिणीके भाई, पिता तथा अन्य सम्बन्धी जन उसकी बहुत प्रशंसा करने लगे ।।१३२॥ तदनन्तर सायंकाल के समय सब राजा लोग अपने-अपने शिविरों में गये और वसुदेवकी ही कथा आसक्त हो दिन तथा रात्रियाँ व्यतीत करने लगे ॥१३३॥ तत्पश्चात् शुभ तिथिमें जय कि चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्रपर था वसुदेवने रोहिणीको विधिपूर्वक विवाहा ॥१३४॥ जरासन्ध तथा समुद्रविजय आदि राजा उस विवाहोत्सवको देसकर बहुत ही प्रसन्न हुए और एक वर्ष तक वहीं गजा मधिरके यहाँ रहे आये ॥१३५।। युद्ध में जिसने सहायता की थी तथा वसुदेवने जिसका अच्छा सम्मान किया था ऐसा दधिमुस वसुदेवसे आज्ञा लेकर प्रसन्न होता हुआ अपने स्थानपर चला गया ॥१३६॥ कामासक्त वसुदेव नवीन स्त्रीके सुन्दर मुस फमलके भी रे यन गये थे इस- लिए उन्होंने पहले भोगी हुई स्त्रीरूपी लताओंका स्मरण भी नहीं किया ॥१३७॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि देयो शूरवीरताके पर्वत वसुदेव यद्यपि रणांगगमें भले ही थे केवल भुजाएँ हो उनकी सहायक थीं और अद्भुत पराक्रमके घारफ, अतिशय लोभी पृथिवीतलके ममस्त गजाओं- ने एक साथ मिलकर उन्हें पराजित करना चाहा था तथापि चे उन्हें पराजित नहीं कर सके सी यह अच्छी तरह तपे हुए जिनेन्द्र कथित तपका ही प्रभाव सममना चाहिए ॥१३८॥ इस प्रकार परिष्टनेमि पुराण के संग्रहमे युक्त, जिनमेनाचार्य रचित हरिपंश पुराण में रोहिणीस सयंरर और भाइयों के समागमका वर्णन करनेाला इस्तीसौं सर्ग समाल हुआ ॥३१॥ १ रानी म. । २ यमुदेवः म पूजितः । म यमुदेयेन मुपूधिमः शिवाचारीकत बलधः ।

३६८ हरिवंशपुराणे ज्येष्ठो मुमोच यान् वाणान् योद्धसारथिवाजिनाम् । तान् कनिष्टोऽच्छिनबाणैनतेय इवीरगान् ॥११॥ एकैकं स विधा छित्त्वा क्षुरप्रं भ्रातृयोजितम् । युवा विव्याध तस्यास्त्र रथसारथिवाजिनः ॥२०॥ दृष्ट्वाम्नकौशलं तस्य शशंसुरवनीश्वराः। शिरकम्पाङ्गुलिस्फोटसाधुवादविधायिनः ॥१२॥ ज्यायानज्ञातसम्बन्धः पुनः सन्धाय सायकम् । दिव्यमस्वसहस्राणां सहस्रममुचद् रुषा १२२॥ अस्त्रं ब्रह्मशिरः शीघ्रमनच्छाइनमप्यसौ । युवा क्षिप्त्वाऽछिनद्रौद्रं ज्यायसा लिप्तसायकम् ॥२३॥ पर कौशलमनेषु वसुदेवस्य यद्गणे । चिच्छेदास्त्राणि चित्राणि ररक्ष च निजाग्रजम् ॥१२॥ इत्थं कृतरणकांडः कनीयान् ज्यायसे ततः । प्रजिघाय धनस्नेहः स्वनामाई शनैः शरम् ॥२५॥ अनुकूलमिपु राजा तमादायेत्यवाचयत् । अज्ञातो निर्गतो योऽसौ महाराज ! तवानुजः ।।१२।। सोऽयं वर्षशतेऽतीते सम्प्राप्तः स्वजनान्तिकम् । पादप्रणाममद्यार्य वसुदेवः करोति ते ।।१२७॥ भ्रातृस्नेहसमुदेकात्समुद्रविजयस्ततः । शिप्तचापो रथात्तर्णमुत्तीयांप निजानुजम् ॥१२॥ उत्तीर्णः स्यन्दनादाशु वसुदेवोऽपि दूरतः । प्रगतः पादयोस्तेन दोर्यामालिन्य चौद्धतः ।।१२।। आश्लिष्य रुदतो त्रोः साधुलोचनयोस्तयोः । प्राप्यातुभ्यादयः सर्वे कण्ठलग्नास्ततोऽनन् ।।१३०।। विद्यामे निपुण थे और राजा लोग 'साधु-साधु' शब्द कहकर जिनकी स्तुति कर रहे थे ऐसे उन दोनोंने वायव्य तथा वारुण आदि भनोसे चिरकाल तक युद्ध किया ॥११॥ योद्धा, सारथि और घोड़ोको लक्ष्यकर बड़े भाई जिन वाणोको छोड़ते थे छोटे भाई उन्हें अपने बाणोंसे उस तरह छेद डालते थे जिस तरह कि गरुड़ सोको छेद डालता है ॥२१॥ तदनन्तर युवा वसुदेवने भाईके द्वारा चलाये हुए एक-एक बाणके तीन-तीन टुकड़े कर अपने अनोसे उनके रथ, सारथि और घोड़ोंको छेद डाला ||१२०॥ वसुदेवके अन-कौशलको देखकर राजा लोग उनकी बड़ी प्रशंसा कर रहे थे। उस समय कितने ही राजा अपना शिर हिला रहे थे, कोई अंगुलियाँ चटका रहे थे और कोई मुखसे साधु-साधु शब्दका उच्चारण कर रहे थे ।।१२१।। बड़े भाईको इस बात का पता नहीं था कि इसके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है इसलिए उन्होंने क्रोधमै आकर वसुदेव पर हजारों अत्रोंसे युक्त दिव्य रौद्रास छोड़ा परन्तु कुमार वसुदेवने भी शीघ्र ही अस्राको आच्छादित करनेवाला ब्रह्मशिर नामक अन छोड़कर बड़े भाईके द्वारा छोड़े हुए उस रौद्रास्त्रको बीचमे ही काट डाला ॥१२२-१२३॥ वसुदेवका संग्राममें शस्त्र चलानेका कौशल परम प्रशंसनीय था क्योंकि उन्होनें नाना प्रकारके शस्त्रोको तो काट दिया था परन्तु अपने बड़े भाईको सुरक्षित रक्सा था ।।१२४॥ इस प्रकार रणक्रीड़ा करते-करते जिनका हृदय स्नेहसे भर गया था ऐसे वसुदेवने घड़े भाईके पास अपने नामसे चिह्नित बाण भेजा। उनका वह बाण मन्दगतिसे गमन करता हुआ बड़े भाई के पास पहुंचा ॥१२५राजा समुद्रविजयने उस अनुकूल बाणको लेकर उसमें लिया हुआ यह समाचार पढ़ा कि 'हे महाराज ! जो अज्ञात रूपसे निकल गया था वही मैं आपका छोटा भाई घसुदेव हूँ। सौ वर्ष बीत जाने के बाद वह आज आत्मीय जनों के समीप आया है। हे आर्य ! वह आपके चरणाम प्रणाम करता है ॥१६-१२॥ तदनन्तर भ्राट स्नेहकी प्रबलतासे समुद्रविजयने अपने हाथका धनुप दूर फेंक दिया और वे शोधू हो रथसे उतरकर छोटे भाई के पास जा पहुंचे ॥१२८|| इधर वसुदेव भी शीघ्र ही रथसे उतरकर दूरसे हो उनके चरणों में गिर गये। समुद्रविजयने दोनों भुजाओंसे उठाकर उनका आलिङ्गन किया ॥१२६॥ दोनों भाई एक दूसरेका आलिङ्गन कर रोने लगे और उनके नेत्रोंसे आँसू टप-टप गिरने लगे। उसी समय अनुभ्य १ निजं म.1 द्वात्रिशः सर्गः ४०१ " देव ! वेगवती पत्नी बालचन्द्रा च मे सुता । पादयोस्तव सम्पत्य वाञ्छति प्रियदर्शनम् ॥१३॥ कुमारी स्वद्गतप्राणा बालचन्द्रावतिष्टते । गन्वा तां त्वं विवाह्याऽऽशु कुरु तच्चिसनितिम् ॥१४॥ तदाकण्यं वचस्तेन दृष्टिज्येष्टे समर्पिता । अभिप्रायविदा तेन लम्वेहीति विसर्जितः ॥१५॥ तमादाय गता साऽपि पुरं गगनवल्लभम् । समुद्रविजयाद्याश्च ययुः शौर्यपुरं नृपाः ॥१६॥ भायां वेगवती दृष्ट्वा शौरिगंगनबल्लभे । बालचन्द्रामुवाहाऽत्र पूर्णचन्द्रसमाननाम् ॥१७॥ नववध्वा तया साधं वेगवत्या च हृद्यया । रममाणोऽवसत्ता दिनानि कतिचिरसुखी ॥१॥ ताभ्यां जिगमिपोस्तस्य शीघ्रं शौर्यपुरं पुरम् । चक्रे वनवती देवी विमानं रानभास्वरम् ॥१६॥ पिता काशनदंष्ट्रोऽय परिवारं ददौ परम् । समस्तं बालचन्द्राया वेगवस्याश सोऽग्रजः ॥२०॥ कामगेन विमानेन सोऽनेन वनितासखः । अरिजयपुरं गत्वा विद्युद्वेगं निरक्षत ॥२॥ प्रियां मदनवेगां तामनावृष्णि च देहजम् । आदायाऽऽशु विमानेन तेनैव वियदुद्ययौ ॥२२॥ पुरं गन्धसमृद्ध द्राक् श्रीसमृद्धमवाप्य सः । सुतां गान्धारराजस्य पश्यति स्म प्रभावतीम् ॥२३॥ ममारोप्य विमाने तो परिवारसमन्विताम् । प्राप्तः प्राप्तमहाहपः सहसाऽसितपर्वतम् ॥२४॥ सिंहदंष्ट्रान्मजां दृष्ट्वा स नीलयशसं प्रियाम् । तयारमत्तया चित्रं प्रवियुक्तसमेतया ॥२५॥ तामप्यादाय सम्प्राप्तः किन्नरोद्गीतमत्र च । नीलोत्पलदलश्यामां कामं श्यामाममानयत् ॥२६॥ सबको अभिनन्दनकर सुखदायक आसनपर बैठ गई। कुछ समय बाद उसने वसुदेवको लक्ष्यकर कहा कि हे देव ! आपकी पत्नी वेगवती तथा हमारी पुत्री बालचन्द्रा आपके चरणों में गिरकर आपका प्रिय दर्शन करना चाहती हैं ॥११-१३॥ कुमारी यालचन्द्राके प्राण एक आपमें ही अटक रहे हैं इसलिए शीव जाकर उसे विवाहो और उसका चित्त सन्तुष्ट करो॥१४॥ विद्याधरीके वचन सुनकर कुमार वसुदेवने अपनी दृष्टि बड़े भाई समुद्रविजयपर डाली और अभिप्रायको जानने- वाले घड़े भाईने भी जल्दी जाओ' यह कहकर उन्हें छोड़ दिया-विद्याधरीके साथ जानेको अनुमति दे दी ॥१५॥ तदनन्तर विद्याधरी वसुदेवको लेकर गगनवल्लभपुर गई और समुद्रविजय आदि राजा शौर्यपुर चले गये ॥१६॥ वसुदेवने गगनवल्लभ नगरमें अपनी प्रिया वेगवतीसे मिल- फर पूर्णचन्द्रके समान मुग्ववाली बालचन्द्राको विवाहा ॥१७|| और विवाहके बाद वे नयी वधू घालचन्द्रा तथा हृदयको अत्यन्त प्रिय लगनेवाली वेगवतीके साथ क्रीड़ा करते हुए कुछ दिन तक वहीं मुग्यसे रहे आये ॥१८॥ कुछ दिन बाद कुमार वमुद्देवने उन दोनों स्त्रियोंके साथ शीघ्र ही शौर्यपुर लौटने की इच्छा प्रकट की जिससे एणीपुत्रकी पूर्व भवकी माँ वनवतो देवीने रत्नोंसे देदीप्यमान एक विमान रचकर उन्हें दे दिया ||१६|| यह देय बालचन्द्राके पिता काश्चनदंष्ट्र तथा वेगवतोके बड़े भाई मानसवेगने समस्त परिवारके साथ यालचन्द्रा और वेगवतीको कुमारके लिए सौंप दिया ॥२०॥ घुमार, दोनों स्त्रियोंको साथ ले इच्छानुसार घलनेवाले विमानके द्वारा भरिचयपुर नगर गये और यहाँ जाकर विशुद्वेगसे मिले ॥२१॥ यहाँसे प्रिया मदनवेगा और अनावृष्णि नामक उसके पुत्रको लेकर वे शीघ्र ही सी विमानसे आकाशमें उड़ गये ॥२२॥ तदनन्तर शीघ्र ही लक्ष्मीसे समृद्ध गन्धसमृद्ध नामक नगरमें जाकर वे गान्धार राजाकी पुत्री प्रभावतीसे मिले ।।२३॥ तत्पश्चात् परियार सहित उसे विमानमे बैठाकर महान् हर्पको प्राप्त होते हुए वे असितपर्वत नामक नगरमें 'रई ॥२४॥ यहाँ गजा सिंहदंष्ट्रकी पुत्री प्रिया नीलंयशासे मिले और वियोगफे बाद मिली 'हुई इस नीलंयशाके साथ नाना प्रकारकी नाड़ा करने लगे।रशा तत्पश्चात् उसे साथ ले किन्नरो. इगीन नामक नगर पहुंचे और वहाँ नील कमटकी फलिकाओं के समान श्यामवर्ण श्यामा नामक १ शोममागन्द्रत्युत्ता मिशिः। २ सा- म. । ३. या नागदेवता पूजा र यनयनत्य- पानामा । ४. निरोसा म०,१०५. चित परियुन ममेराम।

उसने गम्भीर गजन करता हुआ चन्द्रमाके समान सफेद विशाल हाथी देखा। दूसरे स्वप्न में द्वात्रिंशः सर्गः भध सा रोहिणी भा विचित्रे शयनेऽन्यदा । प्रमुप्ता चतुरः स्वप्नान् ददर्श शुभसूचिनः ॥१॥ रुन्द्र चन्द्रसमरछायं गजेन्दं मन्दगर्जितम् । समुद्रं सान्दनिषि महीनोचैमहोमिकम् ॥२॥ चन्द्रं चन्द्रमुखी पूर्ण दृष्ट्वा पूर्णमनोरथा । कुन्दशुभ्रं मृगेन्द्र सा ददर्शास्यप्रवेशिनम् ॥३॥ विबुद्धा च प्रभाते तान विबुद्धाम्बुजलोचनों । परये न्यवेदयरसोऽस्या इति स्वप्नफलं जगौ ॥४॥ उत्परस्यते सुतः सिप्रं धौरीलङ्ध्यः शशिप्रमः । एकवीरो भुवो भत्ता प्रिये ! ते जनताप्रियः ॥५॥ इति पत्या समादिष्टं ध्रुस्वा स्वप्नफलं शुभम् । हारिणी रोहिणी हटा शिश्रिये श्रियमैन्दवीम् ॥६॥ एयुवा कल्पान्महाशुक्रान्महासामानिकः सुरः । गर्भेऽभूदिह रोहिण्या धरण्या इव सन्मणिः ॥७॥ ततः पूर्णेषु मासेपु सुखं सम्पूर्णदोहला । साऽभूत सुतम्रक्षेपु शुभेषु शशिसन्निभम् ॥८॥ सस्य जन्मोसवं दृष्ट्वा जरासन्धपुरस्मराः । यथास्थानं ययुः प्रीताः पार्थिवाः कृतपूजनाः ॥६॥ अभिरामः स रामाख्या प्रख्याप्य पृथिवीतले । वर्द्धते वर्द्धयन् प्रीति विनोबन्धुजनस्य च ॥३०॥ श्रीमण्डपस्थितान् सर्वानेकदा रोधिरास्पदे । समुदविजयाघांस्तान् धसुदेवहितोद्यतान् ॥१३॥ खावतीर्णाभिनन्द्यैका दिव्या विद्याधरी श्रिता । वसुदेवमितः प्राह सुखासनकृतासना ॥३२॥ अथानन्तर किसी समय वह रोहिणी अपने भर्ता-वमुदेवके साथ विचित्र शय्यापर शयन कर रही थी कि उसने शुभको सूचित करनेवाले चार स्वप्न देखे ॥१॥ पहले स्वप्नमें पर्वतके समान ऊँची एवं बड़ी-बड़ी लहरासे युक्त अत्यधिक शब्द करनेवाला समुद्र देखा। तीसरे स्वप्नमे पूर्ण चन्द्रमाको देखकर चन्द्रमुखी रोहिणीका मनोरथ पूर्ण हो गया और चौथे स्वप्न में उसने मुखमें प्रवेश करता हुआ कुन्दके समान सफेद सिंह देखा ॥२-३॥ प्रातःकालके समय जागनेपर जिसके नेत्र खिले हुए कमलके समान मुशोभित थे ऐसी रोहिणीने वे स्वप्न पतिके लिए बतलाये और पतिने उनका यह फल बताया कि हे प्रिये ! तुम्हारे शीघ्र ही ऐसा पुत्र होगा, जो धीर, वीर, अलङ्घय, चन्द्रमाके समान कान्तिवाला, अद्वितीय वीर, पृथिवीका स्वामी और जनता फा प्यारा होगा ॥४-१॥ इस प्रकार पतिके द्वारा बताये हुए स्वप्नोंका शुभ फल सुनकर सुन्दरी रोहिणी हर्पित हो उठी तथा चन्द्रमाकी शोभा धारण करने लगी। उसी समय महासामानिक देव महाशुक्र स्वर्गसे च्युत होकर रोहिणीके गर्भमैं उस तरह स्थित हो गया जिस तरह कि पृथिवी- के गर्भ में उत्तम मणि स्थित होता है ॥७॥ तदनन्तर जिसके समस्त दोहला पूर्ण किये गये थे ऐसी रोहिणीने सुखसे नौ माह पूर्ण होनेपर शुभ नक्षत्रों में चन्द्रमाके समान सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया । जो जरासन्ध आदि राजा एक वर्षसे राजा मधिरके यहाँ रह रहे थे वे उस पुत्रका जन्मोत्सव देखकर प्रसन्न होते हुए अपने अपने स्थानपर गये। जाते समय राजा रुधिरने उन सबका खूब सत्कार किया ॥६॥ यह बालक अत्यन्त सुन्दर था इसलिए पृथिवी तलपर अपना 'राम' नाम प्रसिद्ध कर माता-पिता और बन्धुः जनोंकी प्रीतिको बढ़ाता हुआ दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा ॥१०॥ तदनन्तर एक समय कुमार वसुदेवके हितमे उद्यत समुद्रविजय आदि सभी भाई राजा रुधिरके घर श्रीमण्डपमें बैठे थे कि एक दिव्य विद्याधरी आकाशसे उतरकर वहाँ आई और १. रुद्र ग०, म० । २. चन्द्रं म०१ ३. महीन्द्रोच्चै -1४. विकसितकमलनयना ।

বাঃ মঃ ममुद्रविजयं दृष्ट्या समुदेवं च देवता । ययों वनवनांगीना नि ध्यान दिनोचना ४३ शार्दूलविक्रीडिनवृत्तम् लोक गायपुरोद्भवो नहा गायोडिनं निर्जिन- मामृचकमुदारवारचरितं विद्याधरांबलभम् । देवामं वमुदेवमातविमरवानितुष्टोगदान धर्मम्येय निनादितस्य मदिमा पूर्वावितस्यन्यया ॥४४॥ इत्यारिष्टनेनिपुरागतंयहे हरिवंशे जिनमेनाचार्यहना मकनाथ- समागमारांनी नाम हानिशः सर्गः ॥३२॥ समाप्तं च विद्याधरकाण्टम् नदनन्तर जिनका उदय, पन्धम्पी सागरके रिए हितकार्ग था ऐसे गहिणीश-युमार वमुद्देव (पनमें चन्द्रमा) शॉर्यपुग्में रहते हुए क्रीड़ा करने लगे ॥ मदा दिन करने में जान रहनेवाली बनवती देवी ममुद्रविजय और वमुदेवको देखकर बहुत प्रसन्न हुई और अन्त में उनसे पूछकर भरने म्यानको घटो गयी ।।१३।। जो शर वोरनामे बलिष्ट थे, जिन्होंने राजाओं के समूहको जान दिया था, जो उदार एवं मुन्दा चरित्रमे युक्त ये, विद्यापरियों के स्वामी थे, देवतुल्य थे, और महान् येमवको पार ये ऐसे यमुदेवको देखकर उस समय शौर्य पुरके टोग अत्यन्न मन्तुष्ट ही यही कहते थे कि यह पूापार्जिन जैनधर्मको ही महिमा है | म अरिष्टनेमि पुगाके संग्रहमे युक्त, जिनमनाचार्य नित हरिश पुग में मनम्न मादयों को ग्रियों के ममागम यन करनेवाला पदोमवा मग मनाममा विद्यावर काट ममान १०२ हरिवंशपुराणे श्यामामादाय सम्प्राप्तः श्रावस्तीमनयत्ततः । प्रियङ्गसुन्दरी शौरिस्तां च बन्धुमती प्रियाम् ॥२७॥ महापुरान्समादाय सोमश्रियमसौ प्रियाम् । इलावर्धनतो निन्ये मान्यां रनावतीं च ताम् ।।२।। नगरे भदिलाभिरये गृहीत्वा चारहासिनीम् । पौण्ड्रे संस्थाप्य तत्रैव गत्वा जयपुरं ततः ॥२६॥ अश्वसेनामुपादाय गत्वा शालगुहं पुरम् । पद्मावती समादाय वेदसामपुरं ययी ॥३०॥ कपिलं तत्र पुत्रं स्वमभिपिच्य ततोऽपि च । गृहीत्वा कपिलां प्रापदचलग्राममन च ॥३॥ मित्रश्रियं प्रगृह्यागानगरं तिलवस्तुकम् । कन्यापञ्चशतं ग्राही पुरं गिरितटं गतः ॥३२॥ ततः सोमश्रिया युक्तश्चम्पां प्राप महापुरीम् । अतोऽमान्यसुतां निन्ये सह गन्धर्वसेनया ॥३३॥ पुरे विजयग्वेटे च सुनुमकूरदृष्टिकम् । दृष्ट्वा विजयसेनां स निन्ये कुलपुरं ततः ॥३४॥ पद्मश्रियमुपादाय तथैवावन्तिसुन्दरीम् । सूरसेनां सपुत्रां च जरा जीवद्यशोऽन्विताम् ॥३५॥ गृहीत्वाऽन्याः स्वभार्याः स वसुदेवः ससम्मदः । माययौ प्रमदं प्राप्तो विमानेनाशुगामिना ॥३६॥ आससाद विमानं तच्चारुपङ्गीतसङ्गतम् । आशु शौर्यपुरं सूर्यविमानमिव भास्वरम् ॥३७॥ ततो 'बनवती देवी समुद्रविजयं स्वयम् । प्राग् दृष्टयाऽवर्षयत्तुष्टया वसुदेवागमाप्तया ॥३८॥ कारयिम्वा ततः पारः पुरशोभा नृपो मुदा । नियंयौ बन्धुभिः सार्धं तस्यामिमुखमादृतैः ॥३३॥ सोऽवतीय विमानामाइग्रजान् गुरुबान्धवान् । प्रणनाम प्रियायुक्तः प्रणतः प्रणयान् परैः ॥४०॥ देव्यः शिवादयो नम्र सयोपं साधुलोचनाः । तमाश्लिष्याशियो भूयः खेऽविश्लेषफला ददुः ॥३१॥ सम्मानितयथायोगजनताजनितादरः । स रेमे रोहिणीशोऽस्मिन् बन्धुसिन्धुहितोदयः ॥४२॥ स्त्रीको उन्होंने अच्छी तरह मनाया-प्रसन्न किया।२६ सदनन्तर श्यामाको लेकर श्रावस्ती पहुँचे। यहाँसे प्रियमुसुन्दरी और वन्धुमतीको साथ ले महापुर गये। महापुरसे प्रिया सोमश्रीको लेकर इलावर्धनपुर पहुंचे । वहाँसे माननीय रत्नावतीको लेकर भद्रिलपुर गये । वहाँसे चाम्हासिनीके साथ लेकर तथा उसके पुत्र पौण्डूको वहीं बसाकर जयपुर गये। वहाँसे अश्यसेनाको साथ के शालगुह नगर पहुंचे। वहाँ से पद्मावतीको लेकर वेदसामपुर गये ॥२७-३०॥ वहाँ अपने कपिल नामक पुत्रका राज्याभिषेक कर कपिलाको साथ ले अचलग्राम आये ॥३१॥ वहाँसे मित्रतीक लेकर तिलयम्नु नगर गये यहाँ पाँच सौ कन्याओंको ग्रहणकर गिरितट नगर पहुँचे ॥३२॥ वहाँस सोमश्रीको साथ ले चम्पापुरी पहुँचे। वहाँसे मन्त्रीको पुत्री और गन्धर्यसेनाको साथ ले विजयः ग्वेट नगर गये। यहाँ अफरदृष्टि नामक पुनसे मिलकर तथा विजयसेनाको साथ लेकर कुलपुर पहुँचे ॥३३-३४॥ यहाँसे पद्मश्री, अयन्तिसुन्दरी, पुत्र सहित सूरसेना, जग, जीवद्यशा तथा अपनी अन्य स्त्रियोंको साथ ले हर्षित होते हुए शीघ्रगामी विमानसे वापिस आये ।।३५-३६१ जो सुन्दर संगीतसे युक्त, तथा सूर्यके विमानके समान देदीप्यमान था ऐसा उनका वह विमान शीन ही शोर्यपुर आ पहुँचा ।।३७॥ तदनन्तर नियती देवीने स्वयं ही पहलेसे आकर यमुद्देयके आगमनसे उत्पन्न हर्षसे रान समुद्रविजयको वृद्धिंगत किया-यमुद्देयके आगमनका समाचार मुनाकर प्रसन्न किया ॥३८ तत्पश्चात् राजा समुद्रविजय, प्रजाजनासे नगरकी शोभा कराकर बड़े हर्षसे आदरसे युक्त या जनाके साथ कुमार यमुदेवको लेने के लिए उनके सम्मुस गये ॥३॥ यमुदेवने अपनी समस्त त्रियों सहित विमानम उतरकर पड़े भाइयों तथा अन्य गुरुजनाको प्रणाम किया तथा अन्य लोगों ने प्रेमपूर्वक यमुदेयको प्रणाम किया जिनके नाम हपके अव भर रहे थे ऐसी। शिया आदि महारानियोने ग्रियों सहित नमस्कार करते हुए यमुदयको आलिगन कर आकारा जनाको यथायोग्य मन्मान किया और जनता भी उनके प्रति आदरका भाव प्रकट किया। और मुंद कर यार-बार यही आशीर्वाद दिया कि अय पुनः वियोग न हो ॥४१॥ कुमाग्ने भाग १. धनी म.

प्रयस्त्रिंशः सर्गः वरं वृणीच तेनोक्तं तिष्ठाचार्य तवौकसि । दर्शितो वसुदेवेन जरासन्धाय सोऽप्यरिः ॥११॥ दृष्ट्वा च तेन तुष्टेन मुतोपनयनं प्रति । वसुदेवः समादिष्टः कंसेनारग्रह जगौ ॥१२॥ पृष्टः कमो नृपेणाख्यत् स्वजातिमिति भूपते । मम मनोदरी माता कौशाम्न्यां सीधुकारिणी ॥१३॥ कंसवाक्यमिति श्रुत्वा ततो राजेत्यचिन्तयत् । आकृतिः कथयस्यस्य नायं सीधुकरीमुतः ॥१४॥ भानीनयन्नृपं मंच कौशाम्यास्तां निजैस्ततः । प्राप्ता मोदरी स्वात्तमंजूपानाममुद्रिका ॥१५॥ पृष्टा पूर्वापरं राज्ञा व्यजिज्ञपदिति प्रभो। यमुनायाः प्रवाहेऽयं लब्धी मंजूपया सह ॥१६॥ संवद्धितः शिशू राजन् मया कारुण्ययुक्तया । उपालम्भसहस्राणां भूयो भाजनभूतया ॥१७॥ स्वभावाच्चण्डतुण्डोऽयम कान् दुभंगोऽभकः । रम यन्न शिरस्तादाविना क्रीडति पुण्यवान् ॥ १En गृहं सीधुगृहीत्यर्थ वेश्यानां बालिकाः श्रिनाः । पाणिनाऽऽकृप्य वेणीस्ताः सुखलीकृत्य मुञ्चति ॥१६॥ लोकोपालम्भतो भीत्या मयकाध्य निराकृतः । कृतवान् शस्त्रशिक्षार्थी शिष्यतां किल कस्यचित् ॥२०॥ कंसमंपिका ोपा माता तिष्ठति नाहकम् । तद्गुणैरस्य दोपर्वा न स्पृश्ये स्पृश्यतामियम् ॥२१॥ इ.युक्त दर्शितायां च तया तस्यां व्यलोकन । तन्नाममुद्रिको राजा ततो वाचयति स्म सः ॥२२॥ गर्भस्थोऽपि सुतोऽत्युनः पद्मावत्युग्रसेनयोः । जीवताद्वरमात्मीयः कर्मभिः कृतरक्षणः ॥२३॥ वाचयिन्वेति विज्ञाय राज्ञा स्वसीयमा मनः । हृष्टः कन्यां ददौ तस्मै सम्पन्न गुणसम्पदाम् ॥२४॥ कि वर माँग । कंसने उत्तर दिया कि हे आर्य ! अभी वर आपके हो घर रहने दीजिए। वसुदेव- ने शत्रुको ले जाकर जरासंधको दिखा दिया ॥१०-११॥ शत्रुको सामने देख जरासंध संतुष्ट हुआ और वसुदेवसे बोला कि तुम पुत्री जीवद्यशाके साथ विवाह करो। इसके उत्तर में वसुदेवने कह दिया कि शत्रुको कंसने पकड़ा है मैंने नहीं ॥१२॥ राजा जरासंधने जब कंससे उसकी जाति पूछी सय उसने कहा कि हे राजन् ! मेरी माता मञ्जोदरी कौशाम्बीमे रहती है और मदिरा बनानेका काम करती है ॥१३॥ तदनन्तर कंसके वचन सुनकर राजा इस प्रकार विचार करने लगा कि इसकी आकृति कहती है कि यह मदिरा बनानेवालीका पुत्र नहीं है ॥१४॥ तत्पश्चात् राजा जरासंधने अपने आदमी भेजकर शीघ्र ही कौशाम्बीसे मञ्जोदरीको बुलाया और मञ्जोदरी मंजूपा तथा नामकी मुद्रिका लेकर वहाँ आ पहुंची ॥१५॥ राजाने उससे पूर्वापर कारण पूछा तो वह कहने लगी कि हे प्रभो ! मैंने यमुनाके प्रवाहमे इसे इस मञ्जपाके साथ पाया था ॥१६॥ हे राजन् , इस शिशु- को देखकर मुझे दया आ गई अतः पीछे चलकर हजारों उपालम्भीका पात्र बनकर भी मैंने इसका पालन-पोपण किया ॥१७॥ यह पालक स्वभावसे ही उपमुस है-कठोर शब्द वकनेवाला है । यद्यपि यह पुण्यवान है तो भी अभागा जान पड़ता है। यह वञ्चोके साथ खेलता था तो उनके शिरमै थप्पड़ लगाये बिना नहीं खेलता था। मदिरा सरीदनेके लिए घरपर वेश्याभाको. लड़कियों आती थीं तो हाथ से उनकी चोटियाँ खींचकर तथा रम्ह तंग करके ही छोड़ता था 1॥१८-१६। इसकी इस दुष्प्रवृत्तिसे मेरे पास लोगोंके उलाहने आने लगे जिनसे डरकर मैन इस निकाल दिया। यह शस्त्र विद्या सीखना चाहता था इसलिए किसीका शिष्य बन गया ||२०|| यह कामकी मञ्जूपा ही इसकी माता है में नहीं हूँ अतः इसके गुण अथवा दोपांसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है । लीजिए यह मञ्जूषा है-यह कहकर उसने साथ लाई हुई मञ्जूपा राजाको दिसा दी। जब मंजूषा सोली गई तो उसमें उसके नामकी मुद्रिका दिसी । राजा जरासंघ उसे रेकर बाँचने लगा ॥२१-२२॥ उसमें लिसा था कि यह राजा मसेन और रानी पद्मावतीका पुत्र है । जब यह गर्भमें स्थित था तभीसे अत्यन्त उप था। इसकी उग्रनासे भयभीत होकर हो इसे छोड़ा गया है, यह जीवित रहे तथा इसके अपने कर्म ही इसकी रक्षा करें ॥-मुद्रिकाको याँचकर राजा जरासंघ समझ गया कि यह हमारा मानना है अतः उसने हर्पित होकर उसे १ तान्ति म०, ख.। २-३. रजोदरीमः । ४. भानया म०। ५. मोनो मद्यस्य रहीनिन्तदर्थन् ।

त्रयस्त्रिंशः सर्गः
अथ स प्रार्थितः प्राज्यैः पार्थिवः पार्थिवारमः । शस्त्रोपदेशमातन्वन्नास्ते सूर्यपुरे यदुः ॥१॥
*जातु कंसादिभिः शिप्यधनुर्वेदविचक्षणः । गतो राजगृहं शौरिजरासन्धदिडक्षया ॥२॥
अधोपीद् घोषणां राज्ञः पुरे राजकराजिते । सावधानस्य लोकस्य समाकर्णयतस्तदा ॥३॥
यः सिंहरथमुवृत्तं तं सिंहपुरवासिनम् । सत्यसिंहरथारूढमारूढपुरुपौरपम् ॥४॥
जीवनाहं गृहीत्वाऽसौ दर्शयिष्यति मेऽप्रतः । स एव पुरुपो लोके शूरः शूरतरोऽपि च .५||
तस्य मानधनस्यान्ते पीतशत्रुयशोऽम्बुधैः । भानुपङ्गिकमप्येतत्फलमन्यसुदुर्लभम् ॥६॥
जीवद्यशसमाशान्तविभ्रान्तयशसं गुणः । सुतामीप्सितदेशेन सह दास्यामि सुन्दरीम् ॥७॥
श्रुत्वा ता घोषणां श्रव्यां वीरकरसभावितः । कंसेनाग्राहयद्धीरः पताका यदुनन्दनः ॥८॥
गत्वाऽसौ स समारय विद्यासिंहमयं रथम् । सिहशृङ्खलमच्छरसीत् शरैस्ते हरयोऽप्यगुः ॥६॥
शत्रुमुत्प्लुत्य कसस्तं वबन्ध गुरुशासनात् । दृष्ट्वा कंसस्य कौशल्यं वसुदेवो जगी तकम् ॥३०॥
अथानन्तर राजा वसुदेव, श्रेष्ठ राजपुत्रों द्वारा प्रार्थित होनेपर उन्हें शस्त्र विद्याका उपदेश
देते हुए सूर्यपुर में रहने लगे ॥१॥ किसी दिन कुमार वसुदेव, धनुर्विद्या प्रवीण अपने कंस आदि
शियोंके साथ, राजा जरासंघको देखनेकी इच्छासे राजगृह नगर गये ॥२॥ उस समय वह
गजगृह नगर बाहरसे आये हुए अनेक राजाओंके समूहसे शोभित था। उसी समय यहाँ साव
धान होकर श्रवण करनेवाले लोगोंके लिए राजा जरासंधकी ओरसे निम्नाङ्कित घोपणा दी गई
थी जिसे वसुदेवने भी सुना ॥३|| घोपणामें कहा गया था कि "सिंहपुरका स्वामी राजा सिंह:
रथ बड़ा उद्दण्ड है, वह वास्तविक सिंहोंके रथपर सवारी करता है और उत्कट पराक्रमका
धारक है । जो मनुष्य उसे जीवित पकड़कर हमारे सामने दिखावेगा वही पुरुष संसारमै शूर
और अतिशय शूरवीर समझा जावेगा ।।४-शा शत्रुके यशरूपी सागरको पीनेवाले उस पुरुषको
सन्मानरूपी धन तो समर्पित किया ही जावेगा उसके बाद यह अन्य जन दुर्लभ आनुपनिक
फल भी प्राप्त होगा ॥६॥ गुणोके कारण जिसका यश दिशाओंके अन्तमें विश्राम कर रहा है
तथा जो अद्वितीय सुन्दरी है ऐसी अपनी जीवद्यशा नामकी पुत्री भी मैं उसे इच्छित देशके साथ
दूंगा" ॥७॥
उस हृदयहारी घोषणाको सुनकर वीररसमें पगे हुए धीर-बीर वसुदेवने कंससे पताका प्रहण
करवाई। भावार्थ-वसुदेवने प्रेरित कर कंससे, सिंहरथको पकड़नेकी प्रतिज्ञा स्वरूप पताका
उठवाई । तदनन्तर वसुदेव, कंसको साथ ले विद्यानिर्मित सिंहोके रथपर सवार हो सिंह
पुर गये। जब सिंहरथ, सिंहोंके रथपर बैठकर युद्धके लिए वसुदेवके सामने आया तब उन्होंने
बाणोके द्वारा उसके सिंहोंकी रास काट डाली जिससे उसके सिंह भाग गये ॥६॥ उसी समय
कंसने गुरुको आज्ञासे उछलकर शत्रुको बाँध लिया। कंसकी चतुराई देख वसुदेवने उससे कहा
१. पार्थिवैः म० । २. शास्त्रोपदेश-म० । ३ राजन राजसमूहेन गजिते-शोभिते। ४. समावण्यं -
यतस्तदा म०। ५. -माकान्त-म।
* म पुस्तके प्रथमश्लोकादनन्तरं निम्नाद्वितः श्लोको दृश्यते--
दृष्ट्वा क्सस्य कौशल्यं वसुदेवो जगी तम् ।
वरं वृणीष्व तेनोक्त तिष्ठत्वार्य तपान्तिकम् ॥२॥

प्रनिशः सर्गः ४०० श्रवा कंसोऽपि शंकावानाशु गन्या पदानतः । वसुदेवं वरं बचे तीयधीः सत्यवाग्नतम् ॥३८॥ स्वामिन् ! वरप्रसादो मे दातव्यो भवता ध्रुवम् । प्रसूतिसमये वासो देवक्या मदगृहेऽस्विति ॥३६॥ मोऽप्यविज्ञातवृत्तान्तो दत्तवान् वरमस्तधीः । नापायः शङ्कयने कश्चिन्सोदरस्य गृहे स्वसुः ॥४०॥ पश्चाद्विदितवृत्तान्तः पश्चात्तापहत्तान्तरः । सहकारवनान्तस्थमतिमुनकमाप्तवान् ॥४१॥ देवक्या सह वन्दिरवा चारगश्रमण स तम् । दत्ताशिषमुपामस्य पारछ मनसि स्थितम् ॥४२॥ भगवन्नन कंसोऽयं कृतेनान्यत्र जन्मनि । पितुरेव रिपुर्जातः कर्मणा केन दुर्मतिः ॥४३॥ कथं वा मम पुरोऽस्य कंसस्य भविता विभो । हिंसकः पापचित्तस्य वद वाञ्छामि वेदितुम् ॥४४॥ इति पृष्टो मुनिः प्राह स दीप्तावधिलोचनः । संशयग्लेदिनी यस्मारप्रवृत्तिदिव्यचक्षुपः ॥१५॥ आवर्णयस्व देवामाप्रिय ! सर्वजनप्रियः। कयपामि यथाप्रश्नं वस्तु जिज्ञामितं मृप ॥४६॥ मधुरायामि हैवामीदुनग्येने तु राजनि । प्राक् पञ्चाग्नितपोनिष्टो वशिष्टो नाम तापसः ॥४॥ एकपादस्थितश्वासावर्धवाहुहजट । यमुनायास्तटे सोऽज्ञः तपस्तपति तापसः ॥४॥ जमाकर उसने सब समाचार कह सुनाया ॥३७॥ स्त्रीके मुखसे यह समाचार सुनकर फंसको भी शङ्का हो गई । वह तीक्ष्ण बुद्धिका धारक तो था ही इसलिए शीघ्र हो उपाय सोचकर सत्यवादी यसुदेवके पास गया और चरणोंमे नम्रीभूत होकर वर माँगने लगा ॥३८|| उसने कहा कि हे स्वामिन् ! मेरा जो वर आपके पास धरोहर है उसे दे दीजिए और वह वर यही चाहता हूँ कि 'प्रसूतिके समय देवकीका निवास मेरे ही घरमें रहा करे' ॥३६॥ वसुदेवको इस वृत्तान्तका कुछ भी ज्ञान नहीं था इसलिए उन्होंने निवुद्धि होकर कंसके लिए वह वर दे दिया। भाईके घर यहिनको कोई आपत्ति आ सकती है यह शङ्का भी तो नहीं की जा सकती ? ॥४॥ पीछे जय उन्हें इस वृत्तान्तका पता चला तो उनका हृदय पश्चात्तापसे बहुत दुःखी हुआ। वे उसी समय आम्रवनके मध्य में स्थित चारण ऋद्धिधारी अतिमुक्तक मुनिराजके पास गये और देवकीके साथ प्रणाम कर समीपमें बैठ गये । मुनिराजने दोनोंको आशीर्वाद दिया। तदनन्तर वसुदेवने उनसे अपने हृदय में स्थित निम्नाङ्कित प्रश्न पूछा ।।४१-४२।। हे भगवन ! कंसने अन्य जन्ममें ऐसा कौन-सा कर्म किया कि जिससे यह दुर्बुद्धि अपने पिताका ही शत्रु हुआ। इसी प्रकार हे नाथ! मेरा पुत्र इस पापी कंसका विघात करनेवाला फैसे होगा ?-यह मैं जानना चाहता हूँ सो कृपाकर कहिए ॥४३॥ अतिमुक्तक मुनिराज देदीप्यमान अवधिज्ञानरूपी नेत्रके धारक थे और अवधिज्ञानरूपी दिव्य नेत्रके धारक पुरुषोंकी वागी चूंकि संशयको नष्ट करनेवाली होती है इसलिए कुमार वसुदेवके पूछनेपर मुनिराज कहने लगे ॥१४॥ हे देवोके प्रिय ! राजन् ! सुन, तेरा प्रश्न सब लोगोके लिए प्रिय है इसलिए मैं तेरे प्रश्नके अनुमार तेरी जिज्ञासित वस्नुको कहता हूँ ॥४॥ इसी मधुरा नगरी में जब राजा प्रसेन राज्य करता था तब पहले पञ्चाग्नि तप तपनेवाला एक वशिष्ठ नामक तापम रहता था ॥४६॥ यह अनानी यमुना नदी किनारे तप तपना या, एक पोबसे पढ़ा रहता था, ऊपर की ओर भुजा उठाये रहता था और बड़ी-बड़ी जटाओंको धारण करता था ॥४॥ यहाँपर लोगोंको पनिहारिन पानी के लिए माती थी। एक दिन जिनदास सेठको प्रियदनिका नामको पनिहारिन भी यहाँ आई। हिनको बुद्धि स्पनेवाली अन्य पनिहारिनाने प्रियहुलतिकामे कहा कि हे प्रियहुन्लनिक ! १ पत्रक. ग... पुनर एसरिधः पाठः-'रधादिवाचान्नः पयानारदानमः। देयको रसमानामा निधनाय जगाट सा netu प्रावो नन्दनाग्ने:स्मिन् किं करिष्याम्पर पुनः। तर त्याम पनाम्पमानिनुनकमाप्तयन् ॥१२॥'

हरिवंशपुराणे सद्योजातं पिता नद्यां मुक्तवानिति स क्रुधा । वरीत्वा मथुरा लब्ध्वा सर्वसाधनसङ्गतः ।।२५।। कंसः कालिन्दसेनाया सुतया सह निघृणः । गत्वा युद्धे विनिर्जिन्य बबन्ध पितरं दुतम् ॥२६॥ महोम्रो भग्नसब्चारमुग्रसेनं निगृह्य सः । अतिष्ठिपत् कनिष्टाशः स्वपुरद्वारगोचरे ॥२७॥ वमुदेवोपकारेण हृतः प्रत्युपकारधीः । न वेत्ति कि करोमीति किड़करत्वमुपागतः ॥२८॥ अभ्यर्थ्य गुरुमानीय मथुरां गृथुमक्तितः । स्वसारं प्रददौ तस्मै देवकी गुरुदक्षिणाम् ॥२६॥ आस्ते कंसोपरोधेन मथुरायां ततो यदुः । प्रदीव्य दिव्यदीप्याऽसौ देवक्या हारिवामिया ॥३०॥ सूरसेनमहाराष्ट्र राजधानी द्विषन्तपः । शशास मथुरा कंसो जरासन्धातिवल्लभः ॥३॥ जातुचिन्मुनिवेलायामतिमुक्तकमागतम् । कंपज्येष्ठ मुनि नत्वा पुरः स्थित्वा सविभ्रमम् ॥३२॥ हसन्ती नर्मभावेन जगौ जीवद्यशा इति । भानन्दवस्वमेतत्ते देवक्याः स्वसुरीक्ष्यताम् ॥३३॥ तस्या निर्बन्धचित्ताया प्रमत्ताया निवृत्तये । वचोगुप्तिमसौ भित्वा संसारस्थितिविनगौ ॥३४॥ अहो क्रीडनशीलायास्तवेयमतिमूढता । शोकस्थाने प्रपन्नासि यदानन्दमनन्दिनि ॥३५॥ भविला यो हि देवक्या गर्भेऽवश्यमसौ शिशुः । पत्युः पितुश्च ते मृत्युरितीयं भवितव्यता ॥३६॥ ततो भीतमतिर्मुक्त्वा मुनि साश्रुनिरीक्षणा । गत्वा न्यवेदयत्पत्ये सत्यं हि यतिभाषितम् ॥३॥ गुणरूपी सम्पदासे सम्पन्न अपनी जीवाशा पुत्री दे दी ॥२४॥ पिताने मुझे उत्पन्न होते ही नदीमे छोड़ दिया था। यह जानकर कसको बड़ा क्रोध आया इसलिए उसने जरासंधसे मथुराका राज्य मांगा और जरासंधने दे भी दिया। उसे पाकर सब प्रकारको सेनासे युक्त कंस जीवद्यशा- के साथ मथुरा गया | वह निर्दय तो था ही इसलिए वहाँ जाकर उसने पिता उग्रसेनके साथ युद्ध ठान दिया तथा युद्धमे उन्हें जोतकर शीघ्र ही बाँध लिया ॥२५-२६॥ तत्पश्चात् जो प्रकृतिका अत्यन्त उग्र था और जिसको आशाएँ अत्यन्त शुद्र थीं ऐसे उस कंसने अपने पिता राजा, उग्रसेनका इधर-उधर जाना बन्द कर उन्हें नगरके मुख्य द्वारके ऊपर कैद कर दिया ॥२७॥ वसुदेवके उपकारका आभारी होनेसे कंस उनका प्रत्युपकार तो करना चाहता था पर यह नहीं निर्णय कर पाता था कि मै इनका क्या प्रत्युपकार करूं। वह सदा अपने-आपको वसुदेवका किङ्कर समझता था ॥२८॥ एक दिन वह प्रार्थनापूर्वक बड़ी भक्तिसे गुरु वसुदेयको मथुरा ले आया और वहाँ लाकर उसने उन्हें गुरु दक्षिणा स्वरूप अपनी देवकी नामक बहिन प्रदान कर दी ॥२६॥ तदनन्तर वसुदेव, कंसके आग्रहसे, सुन्दर कान्तिको धारक एवं मधुर वचन बोलनेवाली देवकीके साथ क्रीड़ा करते हुए मथुरामें ही रहने लगे॥३०॥ शत्रुओंको सन्तान करनेवाला एवं जरासंधको अनिशय प्रिय कंस, शूरसेन नामक विशाल देशको राजधानी मथुराका शासन करने लगा ॥३१॥ एक दिन कंसके बड़े भाई अतिमुक्तक मुनि आहारके समय राजमन्दिर आये सो कंसको स्त्री जीवद्यशा नमस्कार कर विभ्रम दिखाता हुई उनके सामने खड़ी हो गई और हँसती हुई कीड़ा भावसे कहने लगी कि यह आपकी बहिन देवकीका आनन्द वस्त्र है इसे देखिए ।।३२-३३॥ संसारकी स्थितिको जाननेवाले मुनिराज, उस निर्मर्याद चित्तकी धारक एवं राज्य धैभवसे मत्त जीवद्यशाको रोकने के लिए अपनी वचनगुप्ति तोड़कर बोले कि अहो ! तू हसी कर कर रही है परन्तु यह तेरो यही मूर्खता है तु दुःखदायक शोकके स्थानमे भी आनन्द प्राप्त कर रही है ॥३५-३शा तू वह निश्चित समझ, कि इस देवकी गर्भसे जो पुत्र होगा वह तेरे पति और पिताको मारनेवाला होगा । यह ऐसी ही होनहार है-इसे कोई टाल नहीं सकता ।।३६॥ यह सुनते ही जीवद्यशा भयभीत समय मुनिराजको छोड़ पतिके पास गई और मुनिक वचन सत्य हो निकलते हैं। यह विश्वास उठी, उसके नेत्रोसे आँसू निकलने लगे। वह उसी १ रीताम् कर, ग प्रयस्त्रिंशः सर्गः ४०8 पृथिव्यपने जसा वायोः प्राणिनां च वनस्पतेः । प्रघाते ज्ञानहीनस्थ कुतः स्यान् प्राणिमंयमः ॥६|| विरागस्यापि मिथ्याहगज्ञानचारित्रमानिनः । संज्ञानपूर्वको जन्तोः कुनश्चेन्द्रियसंयमः ॥६॥ केवलं कायसन्तापं मनमानस्य मानिनः । सम्यक्संयमहीनस्य तापस्यं मुक्तये कुतः ॥६५॥ जैन एव हि मन्मार्गे संयमस्तप एव च । दर्शनं चापि चारित्रं ज्ञानं चाशेषमासनम् ॥६६॥ अवेहि तारसा मीयं पितरं व्यालतां गतम् । बालाघूमावलीच्या दह्य मानमिहेन्धने ॥६७॥ इत्युक्ते तापमः काष्टं कुठारेण विपाट्य सः । ददर्श दंदशकं तं दद्यमानं तदाकुलम् ॥६॥ कृततापमधर्मस्य ब्रह्मारयस्वपितुर्गतिम् । कुरिसतामवगम्यासावज्ञत्वं चापि चात्मनः ॥६॥ ज्ञात्वा च जैनधर्मस्य ज्ञानपूर्वकता तथा । वीरभद्गुरोरन्ते वशिष्टोऽधिष्ठितस्तपः ॥४०॥ एको लामान्तरायस्य कर्मणः परिपाकतः । तपस्यतामभूत् साधुः स मितालब्धिवर्जितः ॥७॥ स पर्युपासनातोरागमागमनाय च । शिवगुप्तयतेयरनात् गुरुणापि समर्पितः ।।७२॥ सन्तप्तं च स पण्मासान् वीरदत्ते न्ययोजयत् । तथा सोऽपि सुमत्यारये पण्मासान् सोऽप्यपालयत् ।।७३।। यतिधर्मविधानज्ञः परीपहसहस्ततः । बभूवैकविहारी स वशिष्टो विदितः तितौ ॥७॥ मधुरायामय सम्प्राप्तो विहरन् स महातपाः । पूज्यते च प्रजापालप्रजाभिगुरुवत्तया ॥७५॥ न्द्रिय जीव अवश्य जलते हैं ॥६२॥ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति इन पाँच स्थावरी तथा अन्य प्रस प्राणियोंका विधात होनेसे अज्ञानी जीवके प्राणिसंयम कैसे हो सकता है ॥६३॥ इसी प्रकार जो विरक्त होकर भी मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्रको माननेवाला है उसके सम्यग्नान पूर्वक होनेवाला इन्द्रिय संयम भी कैसे हो सकता है ?॥६४॥ जो केवल काय- क्लेश तपको प्राप्त है, मानसे भरा हुआ है और समीचीन संयमसे रहित है उसकी तपस्या मुक्तिके लिए कैसे हो सकती है ?||६|| एक जैन मार्ग ही सन्मार्ग है, उसीम संयम, तप, दर्शन, चारित्र और समस्त पदार्थीको प्रकाशित करनेवाला ज्ञान प्राप्त हो सकता है ॥६६॥ हे तापस ! तुम जानते हो तुम्हारा पिता मरकर साँप हुआ है और ज्वालाओं तथा धूमकी पंक्तिसे व्याप्त इसी इंधनम जल रहा है ॥६७।। आचार्यके इस प्रकार कहनेपर तापसने कुल्हाड़ासे रस काप्टको चीरकर देखा तो उसके अन्दर साँप जलता हुआ छटपटा रहा था ॥६८।। तदनन्तर आचार्यने फिर कहा कि तेरे पिताका नाम ब्रह्मा था और वह तेरे ही समान तापसके धर्मका पालन करता था। उसीसे उसकी यह कुगति हुई है । आचार्यके मुखसे यह सब जानकर वशिष्ठ तापसको जान पड़ा कि मैं अज्ञानी हूँ और जैनधर्म सम्यग्ज्ञानसे परिपूर्ण है । अतः उसने उन्हीं वीरभद्र गुरुके पास जैन दीक्षा धारण कर ली ॥६९-७०॥ उनके साथ अनेक मुनि तपस्या करते थे परन्तु लाभान्तराय कर्मके उदयसे उन सबमें एक वशिष्ठ मुनि ही भिक्षाके लाभसे वर्जित रह जाते थे अर्थात् उन्हें भिक्षाकी प्राप्ति बहुत कम होती थी १७१॥ तदनन्तर वीरभद्र गुरुने सेवाके निमित्त और आगमका विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करने के लिए वशिष्ठ मुनिको यत्नपूर्वक शिवगुप्रयतिको सौंप दिया ||७२|| छह महीने तक तप करनेके बाद शिवगुन यनिने वशिष्ठ मुनिको बीरदत्त नामक मुनिराजके लिए सौंप दिया। वीरदत्त मुनिने भी छह माह अपने पास रखकर उन्हें सुमति नामक मुनिके लिए सौंप दिया और सुमति मुनिने भी छह माहतक उनका अच्छी तरह पालन किया ॥७३॥ तदनन्तर अनेक गुरुओंके पास रहने से जो मुनि-धर्मकी विधिको अच्छी तरह जानने लगे थे और परिपह सहन करनेका जिन्हें अच्छा अभ्यास हो गया था ऐसे वशिष्ठ मुनि पृथिवीपर प्रसिद्ध एकबिहारी हो गये-अकेले ही विचरण करने लगे ॥४॥ अथानन्तर महातपस्वी वशिष्ठ मुनि कदाचित् विहार करते हुए मथुरा आये सो राजा १. पशिष्ठः तपोऽधिष्ठितवान् इत्यर्थः । २. तपः कुतामन्येया मध्ये । तपस्यन्समभूत् माधुः कः ।

१०६ हरिवंशपुराणे जलार्थ तत्र लोकानां घटदासीभिः सा तथा । भणिता जिनदासस्य चेटिकाहितबुद्धिभिः ॥४६॥ प्रियद्गुलतिके स्वस्य प्रणाम कुरु सत्वरम् । सा चावादीन मे भक्तिरस्योपरि करोमि किम् ॥५०॥ ततो हठानामिताभिः सा जगौ धीवरस्य है । पातिताहं पदद्वन्द्वे श्रवणादुष्टः स भूदधीः ।।५।। गतो राजसमीपेऽसौ जगावाक्रोशितोऽप्यहम् । श्रेष्टिना जिनदत्तेन भो प्रभो कारणं विना ॥५२॥ राज्ञा यानार्य पृष्टोऽसौ जिनदत्तो बमाण तम् । अस्य मे दर्शनं नास्ति कि शाप्यमप्रवीन्मुनिः ॥५३॥ शापितशास्य दाम्याऽहं पृष्टा चानाय्य तेन सा । कथं न नमसे पापे मुनि निन्दयसि धा ॥५४॥ तयोनं न मुनिस् वेष धीवरोऽस्ति प्रभो कुधीः । जटाभारस्य नो अस्य शुद्धिः कुत्रापि दृश्यते ॥५५॥ शोधिते यहवो मस्याः सूचमास्तेभ्यश्च निर्गताः । लज्जितो हसितो लोकेशवादी स्वसौ मुनिः ॥५६॥ यदा स परीक्षितो राज्ञा तदा कोपं विधाय सः । प्रकाशितमिजाज्ञानो मथुराया विनिर्गतः ॥५॥ वाराणसी समासाद्य समासादितनिधयः । गवा बाह्यच गङ्गायाः सङ्गमे कुरुते तपः ॥५ वीरभद्रगुरुश्चागात् सपनशतशिष्यकः । तद्देश तत्र चैन नवप्रवृजितेन सः ।।५।। प्रशंसितो वशिष्टोऽयमहो घोरता इति । वारित स तपः कीदृगज्ञानस्येति सूरिणा ॥६०॥ वशिष्टेन किमज्ञोऽहमिन्युक्तो गुरुरववीत् । स्वं पड्जीवनिकायानां पीटनादज्ञ इन्यसो ॥६॥ पजाग्नितपमि प्रायो नियोगो दहनस्य हि । दह्यन्ते तेन चावश्यं पकविक्लेन्द्रियाः ॥६२।। तू शीघ्र ही इस साधुको नमस्कार कर । उत्तर में प्रियङ्गुलतिकाने कहा कि इसके ऊपर मेरी भक्ति बिलकुल नहीं है। मैं क्या करूँ ? ॥४-४६|| तदनन्तर अन्य पनिहारिनाने प्रियॉलतिकारी जबर्दम्ती उम साधुके चरणों में नमा दिया । प्रियङ्गुलतिकाने रुष्ट होकर कहा कि अहो ! तुम लोगों ने मुझे धीवरके चरणों में गिरा दिया। प्रियङ्गुलतिकाके उक्त वचन सुनते ही मूर्ख साधु पुषित हो उठा ॥५०-५१।। वह सौधा राजा उग्रसेनके पास गया और कहने लगा कि हे प्रभो! जिनदत्त सेठने मुझे बिना कारण ही गाली दी है ॥५२॥ राजाने जिनदत्त सेठको बुलाकर पूछा तो उसने कहा कि नाथ ! मैंने तो इसे देखा भी नहीं है फिर गाली तो दूर रही है। इसके उत्तरमें साधुने कहा कि हमको दासीने गाली दी है । राजाने दासीको बुलाकर क्रोध दिखाते हुए पूछा कि अगे पापिन ! तू इस साधुको नमस्कार क्यों नहीं करती ? उल्टी निन्दा करती है ?||५३-५४॥ दासीने कहा कि प्रभो ! यह साधु नहीं है यह तो मूर्य धीवर है। इसकी जटामि कही भी शुद्धता नहीं दियाई देती ॥५५।। साधुकी जटाएँ शोधी गई तो उनसे बहुत-सी छोटी-छोटी मछलियाँ निकल पड़ी । इससे साधु बहुत लजित हुआ और यह 'असत्यवादी है। यह कहकर लोगोने उमको यहुत हँसी उड़ाई ॥५६॥ जय गजाने उसकी परीक्षा ली तो वह क्रोधकर अपना अमान प्रकट करता हुआ मधुगसे बाहर चला गया ॥५७|| और बनारस जाफर यहाँ रहनेका उसने नित्राय फर लिया। भय यह बनारसके बाहर जाकर गङ्गाके किनारे तप करने लगा ।।५।। फिमी एक दिन यहाँ अपने पाँच सौ शिप्योके साथ वीरभद्र मुनिराज आये। उनके संघके एक नवदीक्षिन मुनिने यशिष्ठकी तपस्या देस, 'महा! यह घोर तपस्वी वशिष्ठ है। इस प्रकार समकी प्रशंमा की। 'अरे भगानीका तप फैसा ?' यह कहते हुए भाचार्यने उस नवदीक्षित मुनिको प्रशंमा फरनेमे गेका ॥६-६॥ यशिष्ठने पूछा कि 'मैं अज्ञानी से हू ?' इसके उत्तर में आचार्य- ने कहा कि तुम यह फायके जीयोंको पीड़ा पहुँचाने हो इमलिए शानी हो ॥६शा पनाग्नि नप. में अग्निका ममग अवश्य रहता है और उम अग्नि द्वारा चन्द्रिय, बिलेन्द्रिय या एक- , नामि मामिः । २. भागातुष्टी ५०,०।३. प्रमोद पारणादिना म । ४. गानाध्यम ५ मा पुगो एनिग्यारानमात् पपवारानमयन्ताः श्लोराः न माता का निमा पाnिami-भगिनी निमार भाषणगान इलामो । लोः गोप्यधिविमः पिलानिया ॥ उसी गनमा गा saffa!' . माघ म. ग.।

प्रयस्त्रिंशः सर्गः ४११ साऽस्य निवन्धतो वाचा दुःखगद्गदयाऽगदीत् । विपाट्य जठरं पानु रुधिरं तव मे स्पृहा ॥७॥ सचिवोपायतस्तस्या दोहदे विहिते ततः । असून तनयं देवी भकुटीकुटिलाननम् ॥८॥ गर्भप्रभृतिरौद्रं तं कसमञ्जूपिकाकृतम् । देव्यमोचयदेकान्ते प्रवाहे यामुने भयात् ॥८६॥ अवीवृधदसौ लब्ध्वा कौशाम्ब्यां सीधुकारिणी । कृतकंसाभिधं शेषं तवापि विदितं नृप 10t निदानदोपदुष्टोऽयं कृतवान् पितृनिग्रहम् । उग्रसेननृपं चापि मोचयिष्यति ते सुतः ॥१॥ नृपोक्तः कंससम्बन्धः पितृबन्धनिबन्धनः । वस्मि ते पुनसम्वन्धं शृणु सन्धाय मानसम् ॥१२॥ देवस्याः सप्तमः सूनुः शङ्खचक्रगदासिभृत् । निहत्य कंसपूर्वारीन् निःशेषां भोयति तितिम् ॥१३॥ चरमोत्तमदेहास्तु शेषाः पदपि सूनवः । न तेपामपमृत्युः स्यादाधिव्याधिमतस्त्यज || रामभद्समेताना तेषां जन्मान्तराणि ते । भणामि शृणु सस्त्रीकश्चित्तप्रीतिकराण्यहम् ॥१५।। शूरसेननृपे पाति मथुरां भानुरित्यभूत् । इभ्यो द्वादशकोटीशो यमुना तस्य भामिनी ।।६।। सुभानुर्भानुकोतिश्च भानुपेणस्तथा परः । शूरश्च सूरदेवश्च शूरदत्तस्तथैव च ॥१७॥ शूरसेनश्च सप्तैते यमुनामानुसूनवः । अभिरामाः स्वभावेन तेऽन्योऽन्यानुगतास्तदा ॥६॥ कालिन्दी तिलका कान्ता श्रीकान्ता सुन्दरी द्युतिः । चन्द्रकान्ता च तत्कान्ता क्रमेण कुलवालिकाः ।। भानुः प्रानजदन्नेऽसौ गुरोरभयनन्दिनः । तथा यमुनदत्तापि जिनदत्तार्यिकान्तिके ॥१०॥ जो दोहला हुआ है वह न तो कहने योग्य है और न विचार करने योग्य है । रानीके इस प्रकार कहनेपर राजाने कहा कि वह दोहला तुम्हें अवश्य कहना चाहिए ॥८६॥ राजाका हठ देख उसने दुःखसे गद्गद वाणी द्वारा कहा कि हे नाथ ! मेरी इच्छा है कि मैं आपका पेट फाड़कर आपका रुधिर पीऊँ ॥८॥ तदनन्तर मन्त्रियोके उपायसे उसका दोहला पूर्ण किया गया। नौ माह बाद रानी पद्मावतीने ऐसा पुत्र उत्पन्न किया जिसका मुख भौंहोंसे अत्यन्त कुटिल था ।।८। चूंकि वह बालक गर्भसे ही अत्यन्त रौद्र था इसलिए रानी पद्मावतीने भयसे उसे काँसकी मञ्जूपामें बन्द कर एकान्तमें यमुनाके प्रवाहमे छुड्या दिया ||८॥ वह मञ्जूपा बहती-बहती कौशाम्बी नगरी पहुंची। वहाँ एक कलारिनने उसे पाकर पुत्रका कंस नाम रक्खा तथा उसका पालन-पोपण किया। हे राजन् ! इसके आगेका सब समाचार तुम्हें विदित ही है ॥६०॥ निदानके दोपसे दूषित होकर इसने पिताका निग्रह किया है। आगे चलकर तुम्हारा पुत्र उसे मारेगा और उसके पिता राजा उग्रसेनको भी बन्धनसे छुड़ावेगा ॥१॥ हे राजन् ! कसने अपने पिताको बन्धनमें क्यों डाला इसका कारण बतलानेवाला कंसका वृत्तान्त कहा । अब तेरे पुत्रोंका वृत्तान्त कहता हूँ सो मनको स्थिर कर सुन ॥२॥ देवकीका सातवाँ पुत्र शङ्ख, चक्र, गदा तथा खड्गको धारण करनेवाला होगा और वह कंस आदि शत्रुओंको मारकर समस्त पृथिवीका पालन करेगा ।।६३॥ शेष छहों पुत्र चरम- शरीरी होंगे। उनकी अपमृत्यु नहीं हो सकेगी, अतः चिन्ता रूपी व्याधिका त्याग करो ॥४॥ मैं रामभद्र (बलदेव) सहित उन सबके पूर्वभव तुम्हें कहता हूँ सो अपनी स्त्रीके साथ श्रवण करो। अवश्य ही उन सबके पूर्वभव तेरे चित्तको प्रीति करनेवाले होंगे ॥६॥ जब राजा सूरसेन मथुरापुरीकी रक्षा करते थे तब यहाँ बारह करोड़ मुद्राओंका अधिपति भानु नामका सेठ रहता था। उसकी स्त्रीका नाम यमुना था ॥६६॥ उन दोनोंके सुभानु, भानुकीर्ति, भानुषेण, शूर, सूरदेव, शूरदत्त और शूरसेन ये सात पुत्र उत्पन्न हुए। ये सातों भाई अत्यन्त सुन्दर तथा स्वभावसे ही एक दूसरेके अनुगामी थे 1६७-६८|| उन सातों पुत्रोंको क्रमसे कालिन्दी, तिलका, कान्ता, श्रीकान्ता, सुन्दरी, द्युति और चन्द्रकान्ता ये सात बियाँ थीं जो उच्च फुलोंकी कन्याएँ थीं ॥६६ कदाचित् भानु सेठने अभयनन्दी गुरुके समीप और उसकी १. यमुनाया इदमिति यामुनं तस्मिन् यामुने । २. तेषामपि म । ।

४१२ हरिवंशपुराणे धूतवेश्यामसङ्गेन विनाश्य द्रविणं पितुः । चौर्यार्थ भ्रातरः सर्वे गतास्तूज्जयिनी पुरीम् ॥१०॥ कीयांसं महाकाले सन्तत्यर्थ निधाय ते । प्राविशन् निशि निःशङ्काः पुरी पढपि चेतरे ॥१०२।। कमलायास्तदा भर्ता राजाऽत्र वृषभध्वजः । वप्रश्रीवल्लभस्तस्य 'दृढमुष्टिभटोत्तमः ॥१०॥ स वद्रमुष्टये मङ्गों स्वागजाया जातये । राज्ञा विमलचन्द्रेण विमलाजामदापयत् ॥१०॥ सातिवलभिका तरय बल्लकीवाङ्गवर्तिनी । श्वशुश्रूपया मनी सद्गता नानुवर्तते ।। १०५।। अन्तःकलुपिणी साऽस्याः सततापायचिन्तनी । उपायं चिन्तयन्त्यास्ते उद्मना तद्वियोजने ॥१०॥ सा वसन्तोत्सवे रन्तुं वनं प्रमदपूर्वकम् । दाइ मामन्वहि महीति राज्ञामा प्रागतेऽङ्गजे ॥१०॥ माल्यदानापदेशन तामादिष्टां वधू कुधीः । संदष्टां दंदकेन धूपिनेन घटोदरे ।।१०८ मूछिता विपवेगेन श्वधूभृत्यरजीहरत् । श्मशानं तन्महाकालं कालस्यापि भयङ्करम् ॥१०॥ स रात्रौ गृहमागत्य ज्ञात्वा वृत्तान्तमाविशत् । महाकालं महास्नेहाइन्वेष्टुं स्वप्रियां प्रियः ॥१०॥ खगादीमकरः सोऽयं तच्छ मशानमशङ्कितः । रात्री प्रतिमयाऽपश्यद् वरधर्ममुनि स्थितम् ॥११॥ स्त्री यमुनाने जिनदत्ता आर्यिकाके समीप दीक्षा ले ली ॥१००।। मानों भाइयोंने जुआ और वेश्या व्यसनमे फंसकर पिताका सब धन नष्ट कर दिया । जब उनके पास कुछ भी नहीं रहा तब सब भाई चोरी करनेके लिए उज्जयिनी नगरी गये ॥१०१॥ उज्जयिनीके बाहर एक महाकाल नामका वन है। वहाँ सन्ततिकी रक्षाके लिए छोटे भाईको रखकर शेष छहों भाई निःशङ्क हो रात्रिके समय नगरीमे प्रविष्ट हुए ॥१०२।। उस समय उन्नयिनीका राजा वृषभध्वजका था। उसको स्त्रीका नाम कमला था। राजा वृषभध्वजका दृदमुष्टि नामका एक उत्तम योद्धा था। उसकी स्त्रीका नाम वप्रश्नी था। उन दोनों- को वनमुष्टि नामका पुत्र था । युवा होनेपर जब यह कामसे पीड़ित हुआ तब उसने राजा विमलचन्द्रसे उनकी विमला रानीसे उत्पन्न मङ्गी नामक पुत्री उसके लिए दिलवा दी ।।१०३-१०४॥, मगी वज्रमुष्टिके लिए बहुत प्यारी थी। वह वीणाकी तरह सदा उसीके साथ रहती थी और शुश्रूपा-सेवासे युक्त हो सासके अनुकूल आचरण नहीं करती थी अर्थात् सासको कभी सेवा नहीं करती थी। इसलिए उसकी सास मन-ही-मन बहुत कलुपित रहती थी और निरन्तर उसके नाश- का उपाय सोचती रहती थी। एक दिन वह छलसे उसके मारनेका उपाय सोचती हुई बैठी थी कि इतनेमे वसन्तोत्सवका समय आ गया और उसका पुत्र वज्रमुष्टि प्रमदवनमें कोड़ा करनेके लिए राजाके साथ पहले चला गया तथा मंगीसे कह गया कि हे मंगि! तू शीघ्र ही मेरे पीछे आ जाना ॥१०५-१०७। इधर सासने मंगीको वसन्तोत्सवमें नहीं जाने दिया। उस दुर्बुद्धिने एक घड़ेम धूपिन जातिका जहरीला सॉप पहलेसे बुला रक्खा था। अवसर देख उसने मंगीसे कहा कि तू वसन्तोत्सवमे नहीं जा सकी है इसलिए दुःखी न हो । मैंने तेरे लिए पहलेसे ही सुन्दर माला बुला रसी है । जा उस घड़ेमेसे निकालकर पहिन ले। भोली भाली मंगीने मालाके लोभ- से घड़ेमे ज्याही हाथ डाला त्योंही उस धूपिन सर्पने उसे डस लिया ॥१०८॥ मंगी विपके वेगसे तुरन्त ही मूर्च्छित हो गई और सासने उसे अपने भृत्यो द्वारा उस महाकाल नामक श्मशानमें जो समराजके लिए भी भय उत्पन्न करनेवाला था छुड़वा दिया ॥१०॥V यन्त्रमुष्टि जब रात्रिको घर आया और सब वृत्तान्त उसे मालूम हुआ तो वह बड़े स्नेहसे अपनी प्रिया मंगीको हृढ़ने के लिए महाकाल श्मशानमें जा घुसा ॥११०॥ उस समय उसके हाथमें एक चमकती हुई तलवार थी । उसीके बलपर वह निःशङ्कहोकर श्मशानमे घुसा जा रहा था। आगे चलकर उसने उस श्मशानमे रात्रिभरके लिए प्रतिमा योग लेकर विराजमान वर धर्म १ दृष्टमुष्टि -म० १२ वीणे । ३. श्वश्रूशुश्रृपया म०,ग० १४ सकृतापाय -ग० । ५. राज्ञा अमा - सहेत्यर्थः। ६. रात्रिप्रतिमा-म०, ख०, ग.!

प्रयस्त्रिंशः सर्गः त्रिः परीश्य स तं नन्वा जगी ते पाइपूजनम् । कुवं पद्मसहस्रेण मुने ! महीं लभे यदि ॥११२॥ उक्थेति प्रगतो लब्ध्वा स तामानीय मानिनाम् । महामुनिपदस्पर्शान्निविषां विदधे वधूम् ॥ १३॥ मुनिपादोपकण्ठेऽसौ तावत्तिष्टेयुदीर्य ताम् । सुदर्शन सरो यानः पमानामानिनीपया ॥११॥ शूरसेनस्तमादश्य महास्नेह मियां प्रति । स जिज्ञासुमनस्तस्या रूपी रूपमदर्शयत् ॥१५॥ गूढाः कृतसल्लापस्तया सकृतमन्त्रणः । तस्य दर्शनमात्रेण जाताऽसौ कामविह्वला ॥११॥ तमागन्यावाद देव ! मामिच्छ कृपयान्वितः । स वमाण करोभ्येवं कथं मतरि जीवति ।।११७॥ विभेम्यतः प्रियेऽवश्यं वीर्यान्वितभटादहम् । वं मा कुभियं नाथ ! सा तं प्राह सुरक्तीः ।।११८॥ असिना घातयाम्येनं तेनाभ्युपगतं तया' । तत्र गूढतनुस्तस्थौ तस्कृत तद्वितया ॥१६॥ भागत्याभ्यय साध्वंही नमतोऽस्य शिरस्पतिः । मुक्तस्तया निरुद्धो दाक शूरसेनेन तेन सः ॥१२०॥ अन्तहितवपुर्यातः सूरसेनो विरक्तधीः । ततोऽनु मायया मङ्गी तस्य स्पर्शण शहिता ॥१२॥ स्वदोपरछादनायासौ पपात धरणीतले । भर्ना पृष्टा प्रिये किं नु केनचिद् भीपिताऽत्र हि ॥१२२॥ न किश्चिदपि चास्स्यत्र तां प्रबोध्य भयातुराम् । पत्रमुष्टिमुनि नत्वा सकान्तः स्वगृहं गतः ॥१२३॥ नामक मुनिराजको देखा ॥१११॥ उसने तीन प्रदक्षिणाएँ देकर मुनिराजको नमस्कार किया और कहा कि हे मुनिराज ! यदि मैं मंगीको प्राप्त कर सका तो एक हजार कमलोंसे आपके चरणोंको पूजा करूँगा ॥११२॥ इस प्रकार कहकर वह ज्याही आगे बढ़ा त्योंहो उसे उसकी स्त्री मंगी मिल गई । वह उसे मुनिराजके पास ले आया और उनके चरणोके स्पर्शसे उसने उसे विप रहित कर । लिया ॥११३॥ तदनन्तर 'जबतक मैं न आ जाऊँ तबतक तुम मुनिराजके चरणोंके समीप बैठना' इस प्रकार मंगीसे कहकर वनमुष्टि कमल लानेकी इच्छासे सुदर्शन नामक सरोवरकी भोर चला गया ११ पास ही छिपा हुआ शूरसेन मंगोके प्रति वनमुष्टिका महान् स्नेह देख चुका था इसलिए उसने उसके मनका भाव जाननेकी इच्छासे उसे अपना रूप दिखाया। वह सुन्दर तो था ही ।।११।। वह अपने अभिप्रायको छिपाकर उसके साथ मीठी-मीठी बातचीत और गुप्त सलाह करने लगा। मंगी उसे देखते ही कामसे विह्वल हो गई ॥११६|| उसी विह्वल दशामें उसने शूरसेनके पास जाकर कहा कि हे देव ! आप कृपाकर मुझे स्वीकृत कीजिए। मंगीको प्रार्थना सुनकर शूरसेनने कहा कि जबतक तुम्हारा पति जीवित है तबतक मै ऐसा कैसे कर सकता हूँ ? हे प्रिये ! मैं इस शक्तिशाली सुभटमै अवश्य ही डरता है। इसके उत्तरमें अनुरागसे भरी मंगाने कहा कि हे नाथ ! आप इसका भय नहीं कीजिए। मैं इसे तो तलवारसे अभी मार डालती हूँ। शूरसेनने उत्तर दिया कि यदि ऐसा है तो मुझे स्वीकार है। इस प्रकार कहकर वह उसका वह कार्य देसनेको इच्छासे वहीं छिपकर सड़ा हो गया ॥११७-२१६|| तदनन्तर वनमुष्टिने आकर मुनिराजके चरणोंकी पूजा की और पूजा करने के बाद ज्याही वह नमस्कार करने लगा त्याही मंगाने उसके शिरपर तलवार छोड़ना चाही, परन्तु शूरसेनने शीघ्र हो आकर तलवार छीन ली ॥१२॥ शूरसेनको यह दृश्य देसकर संसारसे वैराग्य हो भाया, इसलिए वह अपने-आपको प्रकट किये बिना ही यहाँ से चला गया। मंगी उसके सर्शसे शक्ति हो गई, इसलिए अपना दोष छिपाने के लिए वह माया यताती हुई पृथिवो तलपर गिर पड़ी। - पनमुष्टिको मंगीके इम दुप्फत्यका पता नहीं चल पाया । इसलिए वह उससे पूछता है कि प्रिये ! क्या यहाँ तुम्हें किसीने टरा दिया है ? यहाँ भयका तो कुछ भी कारण दिखाई नहीं देता। इस प्रकार भयसे पीड़ित मंगीको सचेत कर वनमुष्टिने मुनिराजको नमस्कार किया और तदुपरान्त यह स्त्रीको साथ ले घर चला गया ॥१२१-५२३।। १. यदा R• ! २ तत्वृत्वं म । ३ मुनिचरपी।

४१४ हरिवंशपुराणे - चौरास्ततः समागत्य चौर्याल्लब्धधनं तदा । विभज्य समभागेन स्वं गृहाणेति तं जगुः ॥२४॥ अनिच्छन् शूरसेनोऽपि जगी दारार्थमर्थिनः । घटन्तेऽनर्थकार्य ते वज्रमुष्टिस्त्रियः समाः ||१२५॥ दृष्ट्वा ध्रुत्वा च वृत्तान्तं पट् कनिष्ठाः विरागिणः । प्रायजन् वरश्रान्ते 'ज्येप्टेम्योऽप्यनयद् धनम् ॥१२६॥ सप्तसु श्रुतवार्ता निष्क्रान्तास्वथ तास्वपि । तस्यैव स गुरोरन्ते सुभानुः प्रानजसुधीः ॥१२॥ मुनीन् कालान्तरेगामूनागतान् वीच्य सूरिणा । दीक्षाहेनुमसौ पृष्ट्वा वज्रमुष्टिरदीपत ॥२८॥ भार्यिकास्तास्तथा पृष्ट्वा जिनदत्तापुरसराः । मङ्गी संस्मृतवृत्तान्ता प्रवनाज दमता ॥१२॥ भृतघोरतपोभाराः सर्वेऽप्याराध्य तेऽभवन् । सौधर्मे चाणवायुष्कास्त्रायशिरसुरोत्तमाः ॥३०॥ पूर्वस्मिन् धातकीखण्डे भारते रौप्यपर्वते । युत्वा दक्षिणश्रेण्यां च नित्यालोकपुरोत्तमे ॥१३॥ चित्रचूलमनोहर्योज्येष्ठश्चित्राङ्गदोऽङ्गजः । जज्ञे विद्वन्दगर्भास्तु क्रमेणेव तथोत्तरे ॥३२॥ कान्तौ गरुइसेनी द्वौ गरुडध्वजवाहनी । चूलौ मणिहिमादी च व्योमानन्दचरी घरौ ॥१३॥ अभिरूपतमाः सर्वे भूरिविद्योद्यताः स्थिताः । चिनचूलसुता मूनि ते चूलामगयो नृणाम् ॥१३॥ राजा मेघपुरे चैव सर्वधीशो धनञ्जयः । धनश्रीरिति विख्याता तस्य कन्यातिरूपिणी ॥१३५॥ तदनन्तर शूरसेनके जो छह भाई चोरी करनेके लिए गये थे उन्होंने चोरीसे प्राप्त हुए धनके बराबर हिस्से कर शूरसेनसे कहा कि अपना हिस्सा उठा लो ॥१२४|| शूरसेनने हिस्सा लेने के प्रति अनिच्छा प्रकट करते हुए कहा कि लोग स्त्रियोके पीछे ही नाना प्रकारके अनर्थ करते हैं और स्त्रियाँ धनमुष्टिकी लीके समान होती हैं ।।१२।। इस वृत्तान्तको देख-सुनकर छह छोटे भाइयोने विरक्त होकर उसी समय वरधर्मगुरुके समीप दीक्षा ले ली और बड़ा भाई स्त्रियोके पास धन ले गया ॥१२६|| जब उन भाइयोंकी सातों स्त्रियोने यह वृत्तान्त सुना तो उन्होंने भी विरक्त हो दीक्षा ले लो। अन्तमें बड़े भाई सुभानुको धुद्धि भी ठिकाने आ गई इसलिए उसने भी उन्हीं वरदत्त गुरुके पास दीक्षा ले ली ॥१२६-१२७॥ अथानन्तर किसी समय अपने गुरुके साथ विहार करते हुए वे साती मुनि उज्जयिनी आये । उनके दर्शन कर वनमुगिने उनसे दीक्षा लेनेका कारण पूछा। उत्तर में उन्होंने वनमुष्टि और मंगीका सब वृत्तान्त कह सुनाया जिसे सुन वज्रमुष्टिको बहुत खेद हुआ तथा उसी समय उसने दीक्षा ले ली ॥१२८। उसी समय आर्यिका जिनदत्ताके साथ विहार करती हुई पूर्वोत्त सात आर्यिकाएँ भी उज्जयिनी आई । मंगीने उनसे दीक्षाका कारण पूछा । उन्होंने जो उत्तर दिया उसे सुनकर मंगीको अपना पिछला सय वृत्तान्त स्मृत हो गया इसलिए उसने भी दृढ़ व्रत धारण कर दीक्षा ले ली ॥१२६॥ तदनन्तर घोर तपके भारको धारण करनेवाले सातों मुनिराज आयुके अन्तम समाधिमरण कर सौधर्म स्वर्गमे एक सागरकी आयुवाले त्रायस्त्रिंश जातिके उत्तम देव हुए ॥१३०॥ धातकीखण्डद्वीपके पूर्व भरतक्षेत्रमं जो विजया, पर्वत है उसकी दक्षिण श्रेणीमे एक नित्यालोक नामका नगर है ॥१३१॥ उसमे किसी समय राजा चित्रचूल राज्य करता था उसकी स्त्रीका नाम मनोहरी था। बड़े भाई सुभानुका जीव उन्हीं दोनोके चित्राङ्गद नामका पुत्र हुआ और शेप छह भाइयोंके जीव भी उन्हीं के क्रम-क्रमसे तीन युगलोंके रूपमे गरुडकान्त, सेनकान्त, गरुडध्वज गरुडवाहन, मणिचूल और हिमचूल नामके छह पुत्र हुए। ये सभी आकाशमें आनन्दसे विचरण करते थे तथा अत्यन्त उत्कृष्ट थे ॥१३२-१३३॥ चित्रचूलके ये सभी पुत्र अत्यन्त सुन्दर थे, अनेक विद्याओके प्राप्त करनेमे उद्यत थे और मनुष्योके मस्तकपर चूडामणिके समान स्थित थे ॥१३४॥ उसी समय मेघपुर नगरमे सर्वश्री नामका स्त्रीका स्वामी धनञ्जय नामका राजा राज्य करता था। राजा धनञ्जय और रानी सर्वश्रीके एक धनश्री नामकी अत्यन्त रूपवती १. ज्येष्ठश्चासौ इभ्यश्चेति ज्येष्ठेभ्यः । २ यज्ञे म ।

व्रत्रिशः सर्गः स्वयंवरमगुस्तस्या विश्व विद्याधरामज्ञाः । तन्त्रात्ममेथुनं वने कन्यासी हरिवाहनम् ॥१३६॥ वयं स्वयंवरच्यानात् स्वविधाहाय मायया । समाहृता इति क्रुदास्तत्पित्रे गगनायनाः ॥१३७।। परस्परवधं चक्रुरते तत्कन्यार्थिनस्ततः । चित्रचूरसुता निन्। दृष्ट्वा चत्रवधं तकम् ॥१३८।। पापहेतुं विनिन्द्या विषयान् विषमानी । भूतानन्दजिनस्यान्ते प्रव्रज्यां ते प्रपेदिरे ।।१३६॥ सप्ताप्याराध्य माहेन्द्रे सप्ताम्ध्युपमजीविताः । मामानिकसुरा भून्वा सुखं बुभुजिरे चिरम् ॥१४॥ ततश्च्युन्वाऽप्रमोऽत्रैव भारते हस्तिनाहये । नगरे श्रेष्ठिनः शङ्खो बन्धुमस्यामभूरसुतः ॥१४॥ इतरे गङ्गदेवस्य तत्पुरेशस्य भूपतेः । नन्दना नन्दयशसो द्वन्द्वभूतास्तु जज्ञिरे ॥१४२॥ गगनश्च गगदत्तश्च गगरचितकस्तथा । नन्दश्चापि सुनन्दश्च नन्दिपेणश्व सुन्दरः ॥१४३॥ सप्तमस्त सुतो देव्या गर्भे दौर्भाग्यदग्यया । त्यक्तः संवर्धितश्चासौ धान्या रेवतिकाख्यया ॥१४॥ शङ्खो यातोऽन्यदाऽाय तं नि मकनामकम् । हृद्यं मनोहरोद्यानं पौरलोकसमाकुरम् ॥१५॥ भुञानानाह राजन्यस्तित्र राजमुवैः सह । भोक्तुं नाहूयते कस्मादयं निर्नामकोऽनुजः ।।१४।। भाहूतस्वैरसौ भोक्तुमासीनः सादरैः सह । राश्या चागतया मात्रा कोपात्पादेन ताहितः ॥१४॥ धिग मद्धेनोरयं दुःखं निर्नामा प्राप्तवानिति । दुःखी शसस्तमादाय गन्वा राजादिभिर्वने ।।१४।। कन्या थी ।।१३५॥ धनश्रीका किसी समय स्वयंवर किया गया, स्वयंवरमें समस्त विद्याधरोंके पुत्र गये परन्तु कन्याने उनमें अपने पिताके भानजे हरिवाहनको वरा ॥१३६।। 'जब इमे अपने सम्बन्धीके साथ ही विवाह करना था तो स्वयंवरके बहाने छलपूर्वक हम लोगोंको क्यों बुलाया यह कहते हुए अन्य विद्याधर कन्या के पितापर क्रुद्ध हो गये ।।१३७।। तदनन्तर उस कन्याकी इच्छा रखते हुए वे विद्याधर परस्पर एक-दूसरेका वध करने लगे। राजा चिनचूलके पुत्र भी स्वयंवरमें गये थे इस निन्दनीय क्षत्रिय-वधको देखकर वे विचार करने लगे कि अहो ! ये इन्द्रियोंके विपम विपय ही पापके कारण हैं । इस प्रकार इन्द्रियोंके विषयोंकी निन्दा कर भूतानन्द जिनराजके समीप दीक्षित हो गये ॥१३८-१३६॥ सातों मुनिराज अन्तमें समाधि धारण कर माहेन्द्र स्वर्गमे सात सागरको आयुके धारक सामानिक जातिके देव हुए और वहाँको विभूतिसे चिरकाल तक सुख भोगते रहे ॥१४०॥ तदनन्तर वहाँसे च्युत होकर बड़े भाईकाजीव इसी भरतक्षेत्रके हस्तिनापुर नगरमें किसी सेठको वन्धुमती स्त्रीसे शङ्ख नामका पुत्र हुआ ॥१४॥ शेष छह भाइयोंके जीव इसी नगरके राजा गङ्ग देवकी नन्दयशा रानीसे तीन युगलके रूपमें गङ्ग, गद्गदत्त, गहरक्षित, नन्द, मुनन्द और नन्दिपेण नामके छह मुन्दर पुत्र हुए ॥१४२-१४३॥ रानी नन्दयशाके गर्भ में जब सातवाँ पुत्र. आया तब उसके अत्यन्त दुर्भाग्यका उदय आ गया उससे दुग्नी होकर उससे उत्पन्न होनेपर उस पुत्रको छोड़ दिया, निदान, रेवती नामक धायने पालन पोषग कर उसे बड़ा किया ॥१४|| रानी नन्दयशाके इस त्याज्य पुत्रका नाम निर्नामक था। यह निर्नामक, श्रेष्ठिपुत्र शद्को बड़ा प्रिय था। एक दिन शश, निर्नामरको साथ लेकर नागरिक मनुष्योंसे भरे हुए मनोहर उद्यानमें गया ॥१४॥। वहाँ राजा गङ्गदेवके छहों पुत्र एक माथ भोजन कर रहे ये नन्हें देख शदने कहा कि यह निर्नामक भी तो तुम्हारा छोटा भाई है इसे भोजन करने के लिए क्यों नहीं बुलाते ? ।।१४६|| शद की यात सुन राजपुत्राने निर्नामकको बुटा लिया और वह भाइयों के साथ भोजन करने के लिए बैठ गया। उसी समय उसकी माता रानी नन्दयशा कहींसे आ गई और उसने फोघसे आगबबूला हो उसे लात मार दी ॥१४॥ इस घटनामे शद्धको बड़ा दुःप हुआ। वह कहने लगा कि मेरे निमित्तसे ही निर्नामकको यह दुःय उठाना पड़ा है १. रितुभंगिनीपुरम् इति ग पुम्न के टिपणी। २. जातो म०। ३. गगामागतया म० ।

हरिवंशपुराणे दुमपेणपिमेकान्ते दृष्ट्वा नत्वा स पृष्टवान् । निर्नामकस्य जन्मानि सावधिः सोऽभ्यधान्मुनिः ॥१६॥ भासीञ्चित्ररथो राजा नगरे गिरिपूर्वके । कामिनी गुगिनी यस्य कान्ता कनकमालिनी ॥१५॥ मांसप्रियस्य तस्यासीरसूदोऽमृतरसायनः । राज्ञा च मांसपाक्ज्ञो दशग्रामेश्वरः कृतः ॥१५॥ मांसदोषं नृपः श्रुत्वा सुधर्मास्त्रिशतै पैः । विश्वा मेघरथे लघमीमदीशिष्ट मुमुक्षया ॥१५२।। नवराजेम सूदोऽपि श्रावकेन सता ततः । निर्मदीकृत्य मास्पाको नाममात्रपतिः कृतः ॥१५३।। सूदेन कुपितेनासौ मुनिमांसनिषेधनः । कट्वालाम्बुविपाहारं दत्वा प्राणेवियोजितः ।।१५।। उर्जयन्तगिरी मृत्वा स्वयोगार्जितादभूत् । द्वात्रिशदब्धित्तुल्यायुः सोऽहमिन्द्रोऽपराजिते ।।१५५|| सूपकारो मृतः प्राप पृथिवी वालुकाप्रभाम् । ग्रिसमुद्रोपमं कालं नारकं दुःखमन्वभूत् ।। १५६॥ ततश्वोद्वरयं पर्यटय तिर्यग्गतिमहाटवीम् । सोनी मलयराष्ट्रान्तःपलाशग्रामवर्तिनोः ।।१५७।। कुटुम्बिनोजडप्रायोयक्षिलायक्षदत्तयोः । यवस्वावरजो नाम्ना सूनुर्यक्षलिकोऽभवत् ।।१५।। स भ्रात्रा वार्यमाणोऽपि पर्यटन् शकटं शठः । उपरिष्टात्तदान्धाहेरवाहयदनिष्टकृन् ॥१५॥ भग्नभोगा भुजङ्गी तु नियमाणातिदुःखतः । भकामनिर्जरायोगात् मानुष्यगतिमार्जयत् ॥१६०॥ मृत्वा श्वेताम्बिकापुयां वासवस्य महीपतेः । जाता वसुन्धरागर्भ देवी नन्दयशा स्वियम् ॥१६१॥ अतः मुझे धिक्कार है । अन्तमें वह दुखी होता हुआ निर्नामकको लेकर राजा आदिके साथ वन- में गया ॥१४८॥ वहाँ एकान्तमे द्रुमपेण नामक मुनिराजको देखकर शङ्खने उनसे निर्नामकके पूर्व भव पूछे । मुनिराज अवधिज्ञानी थे अतः उसके भवान्तर इस प्रकार कहने लगे ।।१४६।। गिरिनगर नामक नगरमें राजा चित्ररथ रहता था, उसको कनकमालिनी नामकी गुणवती एवं सुन्दरी स्त्री थी ॥१५०॥ राजा चित्ररथ मांस खानेका बड़ा प्रेमी था, उसका एक अमृत. रसायन नामका रसोइया था जो मांस पकाना बहुत अच्छा जानता था। उसको कलासे प्रसन्न होकर गजाने उसे दश ग्रामोंका स्वामी बना दिया था ॥१५१।। एक दिन राजाने सुवर्म नामक मुनिराजसे मांस खानेके दोष सुने जिससे प्रभावित होकर उसने राज्य-लक्ष्मीको मेवरथ नामक पुत्रके लिए सौंप दी और स्वयं मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छासे तीन सौ राजाओके साथ दीक्षा धारण कर ली ॥१५२॥ नवीन राजा मेघरथ श्रावक बन गया इसलिए उसने मांस पकानेवाले रसोइयाको अपमानित कर केवल एक ग्रामका स्वामी कर दिया ॥१५३॥ इस घटनासे रसोइया बड़ा कुपित हुआ। उसने सोचा कि मेरे अपमानके कारण मांसका निषेध करनेवाले ये मुनि ही हैं इसलिए उसने कडुवी तूमड़ीका विषमय आहार देकर मुनिको प्राण रहित कर दिया ॥१५४॥ मुनिराजका समाधिमरण ऊर्जयन्तगिरिपर हुआ था। प्रबल आत्मध्यानके प्रभावसे वे मरकर अपराजित नामक अनुत्तर विमानमे बत्तीस सागरकी आयुके धारक अहमिन्द्र हुए ॥१५॥ रसोइया मरकर तीसरी बालुकाप्रभा पृथिवीमे गया और वहाँ तीन सागर तक नरक तोत्र दुःख भोगता रहा ॥१५६॥ वहाँसे निकलकर तिर्यञ्च गति रूपी महा अटवीमे भ्रमण करता रहा। एक बार वह मलय देशके अन्तर्गत पलाश नामक प्राममे रहनेवाले यतदत्त और यक्षिला नामक दम्पतीके यक्षलिक नामका पुत्र हुआ। यह यक्षलिक स्वभावसे ही मूर्ख था । और यक्षस्व नामक बड़े भाईसे छोटा था ॥१५७-१५८।। एक वार दुष्ट यक्षलिक गाड़ीपर बैठा कहीं जा रहा था। सामने मार्गमें एक अन्धी सर्पिणी पड़ी थी । बड़े भाईके रोकनेपर अनिष्टकारी यक्षलिकने उसपर गाड़ी चला दी जिससे उसका फण कट गया। तीत्र दुःखसे वह मरणोन्मुख हो गई उसी समय अकामनिर्जराके कारण उसने मनुष्यगतिका बन्ध कर लिया ।।१५६-१६०॥ तदनन्तर सापिणी मरकर श्वेनाम्बिका पुरीम वहाँके राजा वासवको स्त्री वसुन्धराके गर्भम यह नन्दयशा । १ उपरिष्टात्ततो ग्राहे म०, ख०, ग० । २. वमुन्धरी गर्भ-म ।

ग्रयस्त्रिंशः सर्गः ४१७ सोऽयं यतलिको नाम्ना निर्नामा मुनिमारणात् । निर्दयत्वाञ्च पूर्वन माना विद्वेषतां गतः ॥१६२॥ श्रुत्वा तद्विशतसौ राजा संसारभीरधीः । देवनन्दे श्रियं न्यस्य तस्यान्ते दीतितो मुनेः ॥१६३॥ राजपुत्राश्च ते सर्वे श्रेष्ठी शङ्खच दीक्षितः । सुनिमल तपश्चर्भवचक्रनिवृत्तये ॥१६॥ राज्ञी चापि सधात्रीका बन्धुमत्या सहाश्रिता । प्रवज्यां सुबतार्यान्ते सुक्तमातभूपिताम् ।।१६५|| कुर्वनि मस्तीचं सिंहनिःक्रीडितं तपः । निदानमकरोदन्यजनने जनकान्तताम् ॥१६॥ धात्री मानुष्य प्राप्ता पुरे भद्रिलसाहये । सुदृष्टिश्रेटिनो भार्या वर्तते हलकाभिधा ॥१६॥ गङ्गाद्या देवकीगर्भ पडपि द्वन्द्वभाविनः । उत्पत्स्यन्ते क्रमणैव विक्रमैकमहार्णवाः ।।१६८।। हारिगा स्वर्गिणा धात्री सुत्रामादेशकारिणा प्राप्स्यन्ते जातिमात्रेण तत्राप्स्यन्ति च यौवनम् ॥१६॥ नृपदत्तोऽग्रजस्नेश देवपालस्तथाऽपरः । तृतीयोऽनीकदत्तस्तु तुरीयोऽ कपालकः ॥१७॥ शञ्नो जितशत्रुस्ताविति नामभिरीरिताः । रूपेण सदृशाः सर्वे भविष्यन्ति तवारमजाः ॥१७॥ हरिवशशशाकस्य जिनस्य त्रिजगद्गुरोः । शिप्यतां ते करिष्यन्ति गमिप्यन्ति च निवृतिम् ॥१७२॥ आगत्य देवकीगर्भ निर्नामा सप्तमः सुतः । उत्पद्यं भविता वीरो वासुदेवोऽग्न भारते ।।१७।। शार्दूलविक्रीडितम् श्रुरवा कंमभवान्तरं तदुदयं सञ्चिन्त्य पुण्योदयात् सोपेक्षान्तर मिग्रतामुपगतोऽयमाभवत्कालवित् । नामकी पुत्री हुई ॥१६॥ और यक्षलिक निर्नामक हुआ, इस यक्षलिकने रसोइयाकी पर्यायमें मुनिराजको मारा था तथा सर्पिणीके साथ अत्यन्त निर्दयताका व्यवहार किया था इसलिए माता नन्दयशाके साथ विद्वेपको प्राप्त हुआ है ॥१६२।। यह सुनकर राजा गङ्गदेव संसारसे भयभीत हो गया और अपने देवनन्द नामक पुत्रको राज्यलक्ष्मी सौंपकर दो सौ राजाओंके साथ उन्हीं मुनिके समीप उसने दीक्षा धारण कर लो।।१६।। समस्त राजपुत्रों और श्रेष्ठिपुत्र शखने भी दीक्षा ले ली तथा सय, संसार चक्रसे निवृत्त होने के लिए निर्मल तप करने लगे ।।१६४॥--गनी- नन्दयशाने रेयती धाय और बन्धुमती सेठानीके साथ सुबता नामक आर्यिकाके समीप उत्तम यता समूहसे सुशोभित दीक्षा धारण कर ली ॥१६५|| निर्नामकने मुनि होकर सिंहनिप्की- डित नामक कठिन तप किया था और यह निदान याँध लिया कि मैं जन्मान्तरमें नारायण होऊँ ॥१६६॥ रेवती धाय मनुष्य पर्याय प्राप्त कर भदिलसा नगरमें सुदृष्टि नामक सेठको अलका नामकी स्त्री हुई है ॥१६७॥ गङ्ग भादि छह पुत्रों के जीव युगलिया रूपसे देवकीके गर्भ में क्रम-क्रमसे उत्पन्न होंगे और वे पराक्रमके महासागर-अत्यन्त पराक्रमी होंगे ॥१६८।। इन्द्र- का आज्ञाकारी हारी नामका देव उन पुत्रोंको उत्पन्न होते ही धायके जीव भलकाके पास पहुँचा देगा वहीं वे यौवनको प्राप्त करेंगे ॥१६॥ उन पुत्रोंमें बड़ा पुत्र नृपदत्त, दूसरा देयपाल, तीसरा अनीकदत्त, चीथा अनीकपालक, पाँचौँ शत्रुघ्न और छठयाँ जितशत्रु नामसे प्रसिद्ध होगा। तुम्हारे ये सभी पुत्र रूपसे अत्यन्त सदृश होंगे अर्थात् समान रूपके धारक होंगे ॥१७०-१७१ ये सभी कुमार हरिवंशके चन्द्रमा, तीन जगत्के गुरु श्री नेमिनाथ भगवान्को शिप्यताको प्राप्त कर मोक्ष जायेंगे ॥१७२॥ निर्नामकका जीव देवकीके गर्भ में आकर सावाँ पुत्र होगा। वह अत्यन्त वीर होगा तथा इस भरत क्षेत्रमें नौवाँ नारायण होगा ।।२७३|| जिनमतको लक्ष्मीको प्रशंसा करनेवाले कालम वसुदेव, मुनिराजके मुम्बसे कंसके भवान्तर तया पुण्यके उदयसे प्राप्त हुए उसके अधुदयको मुनकर उसके साथ उपेक्षा पूर्ण मित्रताको प्राप्त हुए अर्थात् उन्होंने मित्रता १ जनानां मध्ये कान्तवा मनोजताम् (फ० टि०) जनकान्तिकम् म०, ग०, १०, १० । २ ममेगैर-म। ३. यातमाग म०, क. | ४. शउन्न-म०। ५.देवकीमुनः म.।

हरिवंशपुराणे
आकण्याष्टसुतप्रियामुचरितं चामुय चेहान च
प्राप्तः सम्ममुग्नतं जिनमतधीशंसनो यादवः ॥१७॥
इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती कमोपाख्यानबलदेववासुदेव-
देवकीतनयागारचरितवर्णनो नाम प्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥३॥
तो पूर्ववत् बनाये रक्खी परन्तु नसमें उपेक्षाका भाव आ गया। वे अपने आठों पुत्र तथा
प्रिया देवकोके पूर्वभय एवं वर्तमान भव सम्बन्धी परितको सुनकर अत्यधिक हर्पको प्राप्त
हुए ॥१७४||
इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें कंसका
उपारस्यान तथा बलदेव, वासुदेव और देवकीके अन्य पुत्रोंके गृह चरितका वर्णन
करनेवाला तैतीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥३३॥

चतुस्त्रिंशः सर्गः स्ववंशभाविनं श्रुत्वा जिनेन्द्र देवकीप्रियः । हृष्टः श्रेणिक ! नत्वेति पृष्टवानतिमुक्तकम् ।।३।। कथं नाथ ! जिनो भावी हरिवंशविशेषकः । चरितं श्रोतुमिच्छामि तस्येत्युक्तेऽवद मुनिः ॥२॥ द्वीपेऽनैव सुपद्मायां शीतोदायास्वपाक्तटे । भभूत् सिंहपुरे भूभृदहद्दासो महाहितः ॥३॥ जायाऽस्य जिनदत्ताऽमी कृतोरुजिन पुजना । लेभे श्रीममृगेन्द्राचन्द्रसुस्वप्नदृक् सुतम् ॥४॥ अपराजित इत्यास्यां स परैरपराजितः । पितृभ्यां लम्भितो द्यावापृथिव्योः प्रथितस्ततः ।।५।। पुत्री चाभ्नस्तत्र पवित्रगुणमालिनीम् । कन्यां प्रीतिमती मान्यामुपयेमे स यौवने ।।६।। तमन्योऽन्यातिशायिन्यो मानिन्यो गुणमण्डनाः । कन्याश्वारीरमन् धन्याः सहस्रगणनाः पतिम् ॥७॥ राजा मनोहरोद्याने वन्धं देवैर्विवन्दिषुः । अन्येद्युः ससुतो यातो जिनं विमलवाहनम् III प्रवनाज नृपोऽस्यान्ते पञ्चराजशतान्वितः । बभ्रेपराजितो राज्यं सम्यक्त्वं चैव निर्मलम् || जिनेन्द्रपितॄनिर्वाणं गन्धमादनपर्वते । श्रुत्वा कृत्वाऽष्टमं भक्तं कृतनिर्वाणभक्तिकः ॥१०॥ जिनाचा चैत्यगेहाचा समयं धनदारिताम् । आसीनो जातु जाया यो धर्म मप्रोपोऽवदत् ॥११॥ अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! 'तीर्थकर भगवान अपने वंशमें उत्पन्न होने वाले हैं। यह सुनकर कुमार वसुदेव बहुत ही हर्पित हुए और उन्होंने उसी समय अतिमुक्तक मुनिराज को नमस्कार कर इस प्रकार पूछा कि 'हे नाथ । हरिवंश के तिलक स्वरूप जिनेन्द्र भगवान् किस प्रकार हांगे ? मैं उनका चरित सुनना चाहता हूँ ।' कुमार वसुदेवके इस प्रकार कहने पर अतिमुक्तक मुनिराज कहने लगे ॥१-२॥ इसी जम्बूद्वीपके विदेह क्षेत्रमें शीतोदा नदीके दक्षिण तटपर सुपद्मा नामका देश है। उसमें सिंहपुर नामका नगर है। और उसमें किसी समय राजा अहहास रहता था जो अत्यन्न योग्य था ॥३|| जिनेन्द्र भगवान् की महा पूजा करने वाली जिनदत्ता उसको स्त्री थी। एक बार उसने लक्ष्मी, हाथी, सिंह, सूर्य और चन्द्रमा ये पाँच शुभ स्वप्न देखने के वाद उत्तम पुत्र प्राप्त किया ॥४॥ चूँकि वह पुत्र दूसरोंके द्वारा कभी पराजिन नहीं होता था इसलिए माता-पिताने उसका 'अपराजित' नाम रक्सा | अपराजित आकाश और पृथिवी दोनोंमें ही अत्यन्त प्रसिद्ध था ॥शा यौवन-काल-आनेपर अपराजितने चक्रवर्ती को पवित्र गुणों की मालासे सहित, प्रीतिमती नामकी माननीय कन्याके साथ विवाह किया ॥६॥ इसके सिवाय जी परस्पर एक दूसरे को शोमाका चल्लङ्घन कर रही थीं, माननीय थी एवं गुण रूपी आभूपोंसे सुशोभित थी ऐसी सौभाग्यशालिनी एक हजार कन्याएँ उसे और भी क्रीडा कराती थीं ॥ ७ ॥ किसी एक दिन राजा अहंद्दास, मनोहर नामक वनमें देवोंके द्वारा वन्दनीय विमलवाहन भगवान की वन्दना करने के लिए अपने पुत्र सहित गया ॥ ८ ॥ उपदेशसे प्रभावित होकर राजा अहंद्दासने पाँच सौ राजाओं के साथ उन्हीं भगवान्के समीप दीक्षा ली। पिताके दीक्षा लेनेके बाद युवराज अपराजितने गज्य एवं निर्मल सम्यग्दर्शन धारण किया | एक दिन अपराजितने मुना कि गन्धमादन पर्वतपर जिनेन्द्र विमलवाहन और पिता अहहासको मोक्ष प्राप्त हो गया है। यह सुनकर उसने तीन दिनका उपयासकर निर्वाण भक्ति की ॥१०॥ एक थार राज अपराजित, कुवेरके द्वारा समर्पित जिनन्यतिमा एव चैत्यालय में विराजमान अहत्प्रतिमा को पूजाकर उपवासका नियम ले मन्दिरमें बैठा हुआ अपनी वियों के लिए १. दक्षिणतटे । २ गरिनो क०, स०, म.। ३. चारीरमन्याम । ४. योग्योऽध्रुघत् म । प्रोपोग्रुवन् स०, ग०, ५०, १० ४२० हरिवंशपुराणे काले तत्र मुनी व्योम्नश्शारणाववतेरतुः । नरवा सितौ सुम्बासीनी पप्रच्दति कृताञ्जलिः ॥१२॥ तोपः साधुपु मे नायौ ! जैनस्याकृतिमो युगाम् । भपूर्वो वाच्य किं ज्ञातः सहजस्नेहवर्मनः ॥१३॥ भस्ति तत्पूर्वसम्बन्धः स्नेहाधिक्यप्रयोधनः । राजसिरयाह तप्रायः सबमिव गिरामतम् ॥१४॥ पाश्चात्यपुष्कराद्धस्य विदेहस्यापरस्य हि । रोप्यादेहत्तरश्रेण्यामस्ति गण्यपुरं पुरम् ॥१५॥ 'सूर्याभो विभुरस्यासामारसूर्याभ इति भूपतिः । धारिणी धारिणीवार्या गृहिणी तस्य हारिणी ॥१६॥ पुत्रास्त्रयस्तयोश्चिन्तामनश्चपलपूर्वकाः । गरयन्ता वेगवन्तस्ते स्नेहवन्तः मुपारुपाः ॥१७॥ तत्रैवारिञ्जयो राजा पुरेऽरिअयसंज्ञके । कन्याऽस्याजितसेनाया जाता नीतिमती घरा ॥८॥ सिद्धविद्या प्रसिद्धाऽसौ घणगहणकारिणी 1 गुरू प्राह वरं देहि पितरेकमभीप्सितम् ।। कन्याकूतविदूचे स वृणीष्व वरमीप्सितम् । तपसोऽन्यमितीदं च ध्रुवाऽह प्रीतिमत्यपि ॥२०॥ तपो वरप्रसादो मे पितयदि न दीयते । गतियुद्धे विजेत्रेऽहं देयेत्येप बरोऽस्तु मे ॥२५॥ तथाऽस्वित्यभिधायासावाजुहाव नभश्चरान् । स्वयंवरे स्वकन्याया गतियुद्धजिगीपया ॥२२॥ विश्वान् विद्याधरान् प्रासान् प्राह कन्यापिता ततः । गतियुद्धं समोऽस्या ददातु दुहितुर्मम ॥२३॥ मेरुं प्रदक्षिणीकृत्य कृत्वा जिनवराचनम् । प्राप्तस्येह द्वयोः पूर्वमेकस्य विजयो मतः ।।२४।। धर्मोपदेश कर रहा था ॥११॥ कि उसी समय दो चारणऋद्विधारी मुनिराज आकाशसे नीचे उतरे। जब दोनों मुनिराज पृथ्वीतलपर सुखसे विराजमान हो गये तय राजा अपराजितने हाथ जोड़ नमस्कार कर उनसे इस प्रकार पूछा-॥१२॥ हे नाथ ! वैसे तो जैनधर्मके साधुओंको देखकर मुझे अकृत्रिम स्वाभाविक आनन्द होता ही है परन्तु आप दोनोंके दर्शन कर आज अपूर्व ही आनन्द हो रहा है तथा मेरा स्वाभाविक स्नेह उमड़ पड़ा है सो इसका कारण क्या है ? ॥१३॥ उन मुनियों में जो बड़े मुनि थे वे अपनी वाणीसे अमृत झराते हुए के समान योले कि हे राजन् ! पूर्वभवका सम्बन्ध हो स्नेहकी अधि- कताको प्रकट करनेवाला है । मैं पूर्वभवका सम्बन्ध कहता हूँ सो सुनो-॥१४॥ पश्चिम पुष्करराधके पश्चिम विदेह क्षेत्रमें जो रूप्याचल है उसकी उत्तर श्रेणीमें एक गण्यपुर नामका नगर है ॥१५॥ उस नगरका स्वामी सूर्याभ था जो सचमुच ही सूर्याभ-सूर्यके समान आभा वाला था और धारिणी उसको स्त्री थी जो दूसरी धारिणी-पृथिवीके समान जान पड़ती थी और आर्य तथा अत्यन्त सुन्दरी थो ॥१६॥ उन दोनोंके चिन्तागति, मनोगति और चपलगति नामके तीन पुत्र थे । जो अतिशय वेगशाली, स्नेहवान और उत्तम पराकमसे मुक्त थे ॥१७॥ उसी समय अरिञ्जयपुरमें राजा अरिञ्जय रहता था उसकी अजितसेना नामकी स्त्री थी और उससे उसके प्रीतिमती नामको उत्तम कन्या उत्पन्न हुई थी ॥१८॥ प्रीतिमतीको अनेक विद्याएँ सिद्ध थीं, वह अत्यन्त प्रसिद्ध थी और स्त्री पर्यायकी सदा निन्दा करती रहती थी । एक दिन उसने अपने पितासे कहा कि हे पिताजी ! मुझे एक इच्छित वर दीजिए ॥१६॥ पिता कन्याके भावको जानता था इसलिए उसने कहा कि तपके सिवाय और जो कुछ वर तुझे इष्ट हो सो माँग ले । पिताका उत्तर सुनकर प्रीतिमतीने कहा कि हे पिताजी ! यदि तप करनेका वर आप नहीं देते हैं तो यह वर मुझे अवश्य दीजिये कि गति युद्ध में जीतने वालेके लिए ही मैं दो जाऊँ ॥२०-२१॥ 'तथास्तु' कहकर पिताने कन्याका वर स्वीकृत कर लिया और गतियुद्धगे जीतनेकी इच्छामे अपनो कन्याका स्वयंवर रचकर उसमें विद्याधरोंको आमन्त्रित किया ॥ २२ ।। तदनन्तर जब सब विद्याधर आगये तब कन्याके पिताने सबको लक्ष्य बनाते हुए कहा कि आप लोगोंमे जो भी समर्थ हो वह मेरी पुत्री के लिए गतियुद्धका अवसर देवे ।। २३ ॥ गतियुद्धका रूप यह है कि वर और कन्या जो भी, मेरु पर्वतको १. मूर्याभ चतु-म० (१)। २. मनोहारिणी। ३ नभश्वरं म०। ४. गतियुद्धे म० ।

चतुरिंशः सर्गः ४२१ जीयेत येन कन्येयं गतियुद्धेऽतिवेगिना । परिणेया तेन वीरेण मन्मनोरथरिणा ॥२५॥ श्रुत्वेति खेचरास्तस्थुवा विद्याधिकाममूम् । विद्यावेगोयता वो मुत्तस्थुर्धारिगीसुताः ॥२६॥ ततः परिकर बवा चेतसा च समं तदा । करमारफाल्य लोकेन मुक्ता माध्यस्थ्यमीयुग ॥२७॥ अहंयवो दधावुस्ते सार्द्धमद्धपथं पथा। 'मरुतां मेरुमुद्दिश्य हरन्तो मरुतां रयम् ॥२८॥ अतिक्रम्य तथा कन्या परीस्य सुरपर्वतम् । भदशालवनेऽभ्यर्य जिनार्चाः प्राङ्न्यवर्तत ॥२९॥ वेगनमागतस्वेदलवमुक्ताफलार्चिता । प्राप्य नावा ददौ पित्रे सिद्धशेषां प्रमोदिने ॥३०॥ ततो लब्धजया पित्रा मुक्ता मुक्कैहिकस्पृहा । 'निर्वृत्त्यन्ते प्रवधाज व्रतवातविभूपिता ॥३॥ गतियुद्धे जितास्तेऽपि चिन्तागत्यादयस्तया। दीक्षा दमवरस्थान्ते त्रयोऽपि भ्रातरो दधुः ॥३२॥ भन्ते माहेन्द्रकल्पान्ते प्राप्तसताब्धिीविनः । सामानिकास्त्रयोऽप्यत्र दिव्यं बुभुजिरे सुखम् ॥३३॥ प्रच्युन्य पुष्कलावरयामुदश्रेण्यां ततो नृप । मध्यमावरजौ जातौ पुरे गगनवल्लभे ॥३॥ सुतौ गगनसुन्दा गगनेन्दोः क्रमेण तौ । प्रथमोऽमितवेगाण्योऽमिततेजास्ततोऽनुजः ॥३५॥ दीपित्वा पुण्डरीकियां स्वयम्प्रभजिनान्तिके । श्रुत्वा पूर्वभवांस्तस्मात्तावावामिह पार्थिव ॥३६॥ प्रदक्षिणा देकर तथा श्री जिनेन्द्र देव की पूजाकर सबसे पहले वापिस आ जावेगा उसी एकको जीत समझी जावेगी ॥ २४॥ इस प्रकार अत्यन्त वेगसे गमन करनेवाले जिस वीरके द्वारा गतियुद्धमें यह कन्या जीती जावेगी मेरे मनोरथको पूर्ण करनेवाले उसी वीरके द्वारा यह कन्या विवाहने योग्य है ॥ २५ ॥ यह सुनकर अन्य विद्याधर उसे अधिक विद्यावतो जान चुप-चाप बैठे रहे परन्तु विद्याके वेगसे उद्यत धारिणीके पुत्र चिन्तागति, मनोमति और चपलगति गतियुद्ध करने के लिए उठकर खड़े हो गये ॥ २६ ॥ तदनन्तर मनके साथ-साथ परिकर बाँधकर जब सब तैयार हो गये तब मध्यस्थता को प्राप्त हुए लोगोंने हाथ हिलाकर उन्हें छोड़ा ॥ २७ ॥ अहंकारसे वे चारों व्यक्ति अपने वेगसे वायुके वेग को रोकते हुए, मेरुको लक्ष्यकर आकाशमें दौड़े और आधे मार्गतक तो साथ-साथ दौड़ते रहे परन्तु उसके बाद कन्याने उन्हें पीछे छोड़ दिया और वह मेरु पर्वत को प्रदक्षिणा देकर तथा भद्रशालवनमें विद्यमान जिन-प्रतिमाओंकी पूजाकर पहले वापिस लौट आई ।। २८-२६ ॥ वेगके श्रमसे उत्पन्न पसीनाके कोंसे जो मोतियोंके समान सुशोभित होरही थी ऐसी कन्याने आकर पिताके लिए नमस्कार किया एवं पूजाके शेषानत भेंट किये । पुत्रीको विजयसे पिता को अधिक हर्ष हुआ ॥३०॥ तदनन्तर गतियुद्ध में जिसे विजय प्राप्त हुई थी और इस लोक सम्बन्धी भोगोंकी इच्छा जिसको छूट चुकी थी ऐसी कन्या प्रीतिमती के लिए पिताते तप धारण करनेकी अनुमति दे दी जिससे उसने प्रतोंके समूहसे सुशोभित हो निवृत्ति नामक आर्यिकाके समाप दक्षिा धारण कर ली ॥३१॥ गतियुद्ध में प्रीतिमतीके द्वारा पराजित चिन्तागति आदि तीनों भाइयोने भी दमयर मुनिराजके समीप दीक्षा धारण कर लो ॥३२॥ आयुके भन्तमें तीनों भाई महेन्द्र स्वर्गके अन्तिम पटलमें सात सागरकी आयु प्राप्त कर सामानिक जातिके देव हुए और यहाँफे दिव्य सुसका उपभोग करने लगे ॥३३॥ तदनन्तर हे राजन् ! पुष्कलावती देशके विजया की उत्तर श्रेणीमें जो गगनवल्लभ नामका नगर है उसमें राजा गगनचन्द्र रहते हैं और उनकी खोका नाम गगनसुन्दरी है । मध्यम तथा छोटे भाईके जीय माहेन्द्र स्वर्गसे च्युत होकर उनके कमसे हम अमितवेग और अमिततेज नामक पुत्र हुए हैं ॥३४-३५॥ पुण्डरीकिणी नगरी में स्वयं- प्रभ जिनेन्द्र के ममोप दीक्षा लेकर उनसे हमने अपने पूर्व भव सुने । हे राजन् ! हमें स्वयंप्रभ जिनेन्द्रने बताया कि तुम्हारे बड़े भाई चिन्तागतिका जीय माहेन्द्र स्वर्गमे पूर्ण हो च्युत हो कर १. मस्ती पथा = आकाशेन । २ निवृत्तिनामिकापिकासमीपे । ३. नृपः म०.ग० ।

हरिवंशपुराणे पूर्व प्रच्युत्य माहेन्दारप्रजातमपराजितम् । ज्यायांसं द्रष्टुमायाती स्वा चिन्तागतिपूर्वकम् ॥३७॥ अरिष्टनेमिनामाहंन् भविता भरतावनौ । हरिवंशमहावंशे स्वमितः पञ्चमे भवे ॥३८॥ भायुमासावशेपं ते साम्प्रतं पध्यमात्मनः । क्रियतामिति तावुक्रवा तमाच्छय गती यती ॥३६॥ श्रवणीयं वचः श्रुत्वा चारणश्रमणस्य सः । प्रहृष्टोऽपि चिरं दध्यो तपाकालव्यतिक्रमम् ॥३०॥ भष्टाहं प्रविधायापी जिनेन्द्रमहमन्ततः । प्रीतिवरे श्रियं न्यस्य शरीरादिपु निस्पृहः ॥४॥ स द्वात्रिंशत्यहोरात्रो प्रायोपगमनाञ्चिती । श्राराध्यापाच्युतेन्द्ररव द्वाविंशत्यधिजीवितः ॥४२॥ ध्युन्या गजपुरे जसे जिनेन्द्र मतभावितः । श्रीचन्द्रश्रीमतीसूनुः सुप्रतिष्ठः प्रतिष्टितः ॥४३॥ सुप्रतिष्ठं प्रतिष्ठाय राज्ये श्रीचन्द्रचन्द्रमाः । सुमन्दिरगुरोरन्ते दीपिरवा मोशमाप्तवान् ॥४४॥ श्रीचन्द्रामजराजोऽसौ दानं मासोपवासिने । यशोधराय दयाऽऽप वसुधारादिपक्षम् ॥४५॥ कार्तिभ्यामन्यदा रात्रावष्टस्त्रीशतवेष्टितः । तिष्ठन्पतनमुल्काया दृष्ट्वा लक्ष्मी सुरष्टये ॥४६॥ सुनन्दासूनचे दत्वा सुमन्दिरमहागुरोः । सुप्रतिष्ठोऽप्यदीशिष्ट दृष्ट्वोरकासरशी श्रियम् ॥४७॥ चतुःसहस्रसंख्याताः सहस्रकिरणौजसः । प्रातिष्टन्त तपस्युग्रे सुप्रतिष्ठेन पार्थिवाः ॥४८॥ ज्ञानदर्शनचारित्रतपोवीर्यविद्धिमान् । अध्यष्ट सोझपूर्वाणि सरहस्यान्यतन्द्रितः ॥४॥ तपाविधिविशेषः स सर्वतोमदपूर्वकैः । वपुर्विभूपयांचफ्रे सिंहनिक्रीडितोत्तरैः ॥५०॥ श्रवणादपि पापघ्नानुपवासमहाविधीन् । शृणु यादव ! ते बच्मि समाधाय मनः पणम् ॥५॥ यहाँ अपराजित राजा हुआ है सो उसे देखनेके लिए हम दोनों आये हैं ॥३६-३७॥ हे अपराजित ! तुम इससे पाँचवें भवमें भरतक्षेत्रके हरिवंश नामक महावंशमें अरिष्टनेमि नामक तीर्थकर होओगे ॥३८॥ इस समय तुम्हारी आयु एक माहकी शेष रह गई है इसलिए आत्महित करो। यह कह कर तथा राजा अपराजितसे पूछकर दोनों मुनिराज विहार कर गये ।। ३६ ॥ चारण ऋद्धि धारी मुनिराजके श्रवण करने योग्य वचन सुन कर राजा अपराजित हर्पित होता हुआ भी चिर कालतक इस बातकी चिन्ता करता रहा कि अहो ! मेरा तप करनेका समय व्यर्थ ही निकल गया ॥४०॥ वह आठ दिन तक जिनेन्द्र भगवानको पूजा करता रहा और अन्तमे प्रीतिकर नामक पुत्रके लिए राज्यलक्ष्मी सौंपकर शरीरादिसे निःस्पृह हो गया ॥४१॥ तत्पश्चात् प्रायोपगमन संन्याससे सुशोभित बाईस दिन राततक चारो आराधनाओं को आराधना कर वह अच्युत स्वर्गमें बाईस सागरकी आयुका धारक इन्द्र पदको प्राप्त हुआ ॥४२॥ वहाँसे चयकर नागपुरमै श्रीचन्द्र और श्रीमतीके सुप्रतिष्ठ नामका पुत्र हुआ। वह सुप्रतिष्ठ जिनेन्द्रमत की भावनासे युक्त था ।। ४३ ॥ राजा श्रीचन्द्ररूपी चन्द्रमा, सुप्रतिष्ठ पुत्र को राज्य सिंहासनपर प्रतिष्ठित कर सुमन्दिर नामक गुरुके पास दीक्षा ले मोक्ष चले गये ॥४४॥ एक दिन राजा सुप्रतिष्ठने मासोपवासी यशोधर मुनिराजके लिए दान देकर रत्नदृष्टि आदि पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ॥४शी कदाचित् राजा सुप्रतिष्ठ कार्तिककी पूर्णिमाकी रात्रिम अपनी आठ सौ खियोंसे वेष्टित्त हो महलकी छतपर बैठा था। उसी समय आकाशसे उल्कापात हुआ उसे देख वह राज्य लक्ष्मीको उल्काके समान ही क्षणभंगुर समझने लगा। इसलिए अपनी सुनन्दा रानीके पुत्र मुद्रष्टिके लिए राज्यलक्ष्मी देकर उसने सुमन्दिर नामक महागुरुके समीप दीक्षा ले ली ॥४६-४७॥ राजा सुप्रतिष्ठके साथ, सूर्यके समान तेजस्वी चार हजार राजाओंने भी उग्र तप धारण किया था ॥४८मुनिराज सुप्रतिष्ठने ज्ञान दर्शन चारित्र तप और वीर्यको वृद्धिसे युक्त हो आलस्य छोड़ गूढार्थसहित ग्यारह अंग और चौदह पूर्वोका अध्ययन किया तथा सर्वतोभद्रको आदि लेकर सिंहनिष्कोडितपर्यन्त के विशिष्ट तपासे अपने शरीरको विभूपित किया ॥४६-५०॥ हे यादव ! श्रवण मात्रसे भी पापोंको नष्ट करनेवालो, उन उपवासोंकी महाविधि, मैं तेरे लिए कहता हूँ सो तू क्षणभरके लिए मन स्थिरकर सुन ॥५१॥ १ हितम् । २. महिमा ततः म०। ३ आराध्य आप अच्युतेन्द्रलम् इति पदच्छेदः ।

चतुस्रिशः सर्गः एकादिपूपवायेषु पशान्तेषु यथाक्रमम् । भन्तयोः कृतयोरादी शेषमान्नसमुद्रये ॥५२॥ फविपतचतुरस्रोऽयं प्रस्तारः पञ्चमः । सर्वनोऽप्युवामान गण्याः परशान हि ॥५३॥ पञ्चमिगुणितास्ते स्युः संन्यथा पञ्चमप्ततिः । ताहिताः पञ्चभिः पञ्च पारणाः पञ्चविंशतिः ॥५५॥ सर्वतोमदनामायमुपत्रामविधिः कृतः । विधत्ते सर्वतोभद्रं निर्वाणाभ्युदयोदयम् ॥५५|| पश्चादिपु नवान्तेपु भद्रीत्तरवसन्तकः । विधिस्तनोपयासाम्नु पञ्चनिशरसमं परम् ॥५६॥ मसान्तवेकपूर्वेषु प्रस्तारे सप्तमरके । भाययोः कृतयोरन्ते सर्वमशवनुक्रमम् ॥५७॥ अष्टाविंशतिरिष्टाम्ने सर्वतः सप्तपारणा: 1 म महामवतोमदः मयंतोमदमाधनः ॥५॥ पक्षाचा या रूपान्ता पाधास्ते चतुरन्तकाः । याद्या रूपान्तकाः म त्रिलोकमारः स्मृतो विधिः ॥५॥ सर्वतोभद्र-पाँच भङ्गका एक चौकोर प्रस्तार बनाये और एकसे लेकर पाँच तफके अद उसमें इम तरह भरे कि सब ओरसे गिननेपर पन्द्रह-पन्द्रह उपवासाकी संख्या निकल आये। इन पन्द्रह उपवासोंमें पाँच भंगीका गुणा करनेसे उपवासोंकी संख्या पचहत्तर और पाँच पारणामि पाँच भंगांका गुणा फरनेसे पारणाओंकी संख्या पच्चीस निकलती है। यह सर्वतो. भद्र नामका उपवास है तथा इसकी विधि यह है कि एक उपवास, एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा, चार उपवास एक पारणा और पाँच उपवास एक पारणा । इमी प्रकार आगे के भगीमें भी समझना चाहिए। यह सर्वतोभद्र प्रत सो दिनमें होता है और निर्वाण तथा म्वर्गादिककी प्राप्तिरूप समस्त कल्याणोंको प्रदान करता है ॥५२-५५॥ यसन्तम-एक सीधी रेसामें पाँचसे लेकर नी तक अङ्क, लिग्वे | उन सबका जोड़ पैतीस होता है । इस प्रकार बसन्तभद्र व्रतमें ३५ उपयास होते हैं । उनका क्रम यह है कि पाँच उपवास एक पारणा, यह उपवास एक पारणा, सात टपयास एक पारणा, आठ उपवास एक पारणा और नी उपवास एक पारणा । इस प्रतमें उपवासाँके ३५ भीर पागणाओंके ५ इस तरह चालीस दिन लगते हैं ॥५६॥ सर्वतोमद्रयंत्रम् यमन्तगयंत्रम् २ ३ उपवास ५ ६ ५ १ ८ १ १ १ पारमा १ १ १ १ ५ १ ३ १ उपवाम पारगा उपवाम ४ पार उपनाम २ पारणा उपवास ५ पारणा उपनाम ३ पारणा १ ४ १ २ १ ५ १ 국 १ १ १ १ २ ४ १ २ १ ५ १ १ १ महासर्वतोमद-मात भंगांयाला एक चौकोर प्रस्तार यनाये। उममें एकमे लेकर सान तकके अङ्क इस गैनिमे लिये कि सब ओरसे संग्याफा जोड़ अहाईस अहाईम माये। एक-एक भगमें अट्टाहम-भहाईम अयास और सात-सान पारणाएँ होती है। सासों भद्गों को मिलाकर एफ मो छयानवे उपयाम और उनचास पारणाएँ होती है। इसके उपवास और पारणाओंकी विधि पहले के समान जानना चाहिए। यह महामयंतीमद्र नामका मन कहलाता है नया सय प्रकार के फन्यागोंका करनेवाला है। इममें दो सौ पैंतालीस दिन लगते हैं ।।५७-५८11 पिलोकसाविधि-जिममें नीचेसे पाँचसे लेकर एक तक, फिर दोमे लेकर घार तक और उमफे घाद तीनसे लेकर एक तक बिन्दु ग्ययी जायें यह निलोकमार विधि है। इसका ४२४ • हरिवंशपुराणे प्रस्तारश्चास्य विन्यस्यखिलोकाकृतिस्त्र तु । धारणाः पारणाश्चापि त्रिशदेकादशक्रमात् ॥६॥ फलमस्य विधेः श्रेष्ठं कोष्टबोजादिशुद्धयः । निलोकसारभूतं च निलोकशिखरे सुखम् ॥६१॥ क्रमेणाधन्तमध्येषु यः पन्चकोपवासकः । वज्रमध्यो विधिः स स्याद् गण्याः पारणधारणाः ॥६२॥ शकचकिगणेशवं समनापर्ययोऽवधिः । प्रज्ञाश्रमणतो मोनो वज्रम यविधेः फलम् ॥६३॥ याद्यास्ते यन्न पञ्चान्ता द्वयन्ताश्च चनुरादयः । विधिमंदामध्योऽयं मृदङ्गाकृतिरिष्यते ॥६॥ प्रस्तार तीन लोकके आकार बनाना चाहिए। इसमें तीस धारणाएँ अर्थात् तीस उपवास और ग्यारह पारणाएँ होती हैं। उनका क्रम यह है पाँच उपवास एक पारणा, चार उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा, एक उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा, चार उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा और एक उपवास एक पारणा । इस विधिमें इकतालीस दिन लगते हैं। इस विधिका फल कोष्ठबीज आदि ऋद्धियाँ तथा तीन लोकके शिखरपर तीन लोकका सारभूत मोक्ष सुखका प्राप्त होना है ॥५६-६१॥ महासर्वतोभद्रयन्त्रम् त्रिलोकसारविधियन्नम् १ २ ६ ७ १ १ १ . o ३ १ ५ १ १ २ ४ ७ १ ३ १ ५ १ १ १ १ ६ १ १ १ ३ ७ ६ १ १ २ १ ३ १ or १ १ २ . उपवास पारणा उपवास पारणा उपवास पारणा उपवास पारणा उपवास पारणा उपवास पारणा उपवास पारणा १ १ ० ० ३ ७ १ ६ १ or .. ૨ १ ४ ० ५ १ १ ०० १ ५ ४ १ ६ १ २ १ ३ १ . . १ १ १ ३ ६ ७ १ २ १ १ १ १ १ १ १ १ वज्रमध्यविधि-जिसमें आदि और अन्तमें पाँच-पाँच तथा बीचमें घटते-घटते एक बिन्दु रह जाय वह वनमध्यविधि है । इसमें जितनी बिन्दुएँ हैं उतने उपवास और जितने स्थान हैं उतनी पारणाएँ जानना चाहिए । इनका क्रम इस प्रकार है-पाँच उपवास एक पारणा, चार उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा, एक उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा, तीन उपचास एक पारणा, चार उपवास एक पारणा और पॉच उपवास एक पारणा । इस व्रतमें उनतीस उपवास और नौ पारणाएँ होती है तथा अड़तीस दिनमें समाप्त होता है । इन्द्र, चक्रवर्ती और गणधरका पद, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान, प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि और मोक्षका प्राप्त होना इस वनमध्यविधि व्रतका फल है ॥६२-६३॥ मृदङ्गमध्यविधि-जिसमें दोसे लेकर पाँच तक और चारसे लेकर दो तक बिन्दुएँ रक्खों जावें वह मृदगाकार प्रस्तारसे युक्त मुदगमध्यविधि है। इसमें जितनी बिन्दुएँ हैं उतने उपवास और जितने स्थान हैं उतनी पारणाएँ जानना चाहिए। इनका क्रम यह है-दो उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा, चार उपवास एक पारणा, पाँच उपवास एक पारणा, चार उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा और दो उपवास एक पारणा | इस प्रकार इस ४२५ चतुस्विशः सर्गः चरित्राविरवमीणमहानसगुणादिकाः । लब्धयोऽवधिरन्ते च फल निर्वागमस्य च ॥६॥ पञ्चादयो द्विपर्यन्ताः पञ्चान्ता द्वयादयः परे । विधिमुरजमध्योऽस्य फलं चानन्तरं श्रुतम् ॥६६॥ चतुर्यकानि यत्र स्पुश्चतुर्विशतिरेव सा । एकावली फलं तस्याः सुखमेकावलीस्थितम् ॥६॥ प्रतमें तेईस उपवास और सात पारणाएँ होती है तथा तीस दिन में समाप्त होता है । क्षीरसावित्व, अक्षीणमहानस आदि ऋद्धियाँ, भवधिज्ञान और अन्तमें मोक्ष प्राप्त होना इस व्रतका फल है॥६४-६॥ वज्रमध्यविधियन्त्रम्- मृदङ्गमध्यविधियन्त्रम्- . ० . ० ० ० . . . ० . . ० .. . . .. ० . . मुरजमध्यविधि-जिसमें पाँचसे लेकर दो तक, दोसे लेकर पाँचतक बिन्दुएँ हों वह मुरजमध्यविधि कहलाती है । इसमें जितनी बिन्दुएं हो उतने उपवास और जितने स्थान हो उतनी पारणाएँ समझनी चाहिए । इनका क्रम यह है कि पाँच उपवास एक पारणा, चार उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा, तीन उप- वास एक पारणा, चार उपचास एक पारणा और पाँच उपवास एक पारणा है। इस प्रकार इसमें अट्ठाईस उपवास और आठ पारणाएँ हैं तथा छत्तीस दिनमें समाप्त होता है। इमफा फल मृदङ्गमध्यविधिके समान है ॥६६॥ पकायलीविधि-जिसमें चौबीस उपवास और चौवीस पारणा हों वह एकावलीविधि है। इसमें एक उपवास तथा एक पारणाके क्रमसे चौपीस उपवास और चौबीस पारणाएँ होती हैं। यह व्रत अड़तालीस दिनमें समाप्त होता है तथा अखण्ड सुसकी प्राप्ति होना इसका फल है ॥६॥ मुरजमध्यविधियन्त्रम्- o ० . . ० ०. .. . ० ० . एकावलीयन्त्रम्- १. १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १.१.१ १ १ १ १ १ १ ११ १ १ १. रिधिरन्ते मा। २. उश्यामाः।

हरिवंशपुराणे या पटोपपासाः स्युरचत्वारिंशसभाट च । विकावलीयमुद्गीता लोकटिकमुखावली ॥६॥ एकाचा यत्र पक्षान्ता एकान्ताश्चतुरादिकाः । मुक्तावलीगमात्याता स्याता मुनावली यथा ॥६६ नान्तरीयकमेतस्या लोकालहरणं फलम् । मुमालयपरिमाप्तिरन्ते धारयन्तिकं फलम् ॥७॥ पशान्ता यन्त्र कायाः पञ्चायेकान्तिका पुनः । रस्नावलीयमस्याश्च फलं सनावलीगुणाः ॥ 'द्विकावलीविधि-जिसमें भड़तालीस वेला और अड़तालीस पारणाएँ ही वह द्विका- वलीविधि कही गई है। यह दोनों लोकोंमें सुखको देनेवाली है। इसमें एक वेलाके बाद एक पारणा होता है । यह प्रत छयानवे दिनमें पूर्ण होता है ।।६८|| ३ द्विकावलोयन्त्रम्- १ मुक्तावली विधि-जिसमें एकसे लेकर पाँचतक और चारसे लेकर एकतक बिन्दुएँ हों वह मुक्तावली विधि है। यह मोतियों को मालाके समान प्रसिद्ध है। इसमें जितनी बिन्दुएँ है उतने उपवास और जितने स्थान हैं उतनी पारणाएँ होती हैं। इस प्रकार इस व्रतमें पच्चीस उपवास और नौ पारणाएँ होती हैं । उनका क्रम यह है-एक उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा,चार उपवास एक पारणा, पाँच उपवास एक पारणा, चार उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा, और एक उपवास एक पारणा । यह व्रत चौतीस दिनमें पूर्ण होता है। इसका साक्षात् फल यह है कि इस प्रतको, करते हो मनुष्य समस्त लोगोंका अलंकार स्वरूप श्रेष्ठ हो जाता है और अन्तम सिद्धालयको प्राप्तिस्वरूप आत्यन्तिक फलको प्राप्ति होती है ।।६९-७०॥ रत्नावली विधि-जिसमें एकसे लेकर पाँचतक और पाँचसे लेकर एकतक विन्दुएँ हों वह रत्नावली विधि है। इसका फल ग्नावलीके समान भनेक गुणोंकी प्राप्ति होना है। इसमें जितनी बिन्दुऍ हो उतने उपवास और जितने स्थान हो उतनी पारणाएँ जानना चाहिए । उनका क्रम यह है-एक उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा, चार उपवास एक पारणा, पाँच उपवास एक पारणा, पाँच उपवास एक पारणा, चार उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा और एक उपवास एक पारणा । इस प्रकार इसमे तीस उपवास और दस पारणाएँ होती हैं। यह व्रत चालीस दिनमें पूर्ण होता है ।।७१॥ मुक्तावलीविधियन्त्रम्- रत्नावलीविधियन्त्रम्- 0 . . ० ० . . ० . ० . . ० . . . . . . ० ० . १दिनद्वयोपासाः।

चतुमिशः सर्गः ४२० इन्द्रवज्रावृत्तम् 'रूपान्तराः पञ्चदशावसाना रूपान्तराः पोटश यत्र धाने। रूपोनकाः स्तरपरमन्तरूपाः मुक्तावलीयं खलु रत्नपूर्वा | उपजातिवृत्तम् द्विशत्यत्तिश्चनुरुत्तराः स्युरोपवासाः परिगण्यमानाः। एकोनपष्टिश्च हि भुक्तिकालाः फलं तु रत्नत्रयसारलब्धिः ॥७३॥ शार्दूलविक्रीडितम् एको द्वौ च नव निकायपि ततश्चैकादिभिः षोडश प्रास्ते गणिताश्चतुस्लिफ्युतं त्रिंशस्निकाण्येव तु । रत्नमुक्तावलीविधिएक ऐसा प्रस्तार बनाया जावे जिसमें रूप अर्थात् एक-एकका अन्तर देते हुए एकसे लेकर पन्द्रह तकके अङ्क लिसे जावें । उसके आगे एक-एकका अन्तर देकर सोलह लिखे जावें और उसके आगे एक-एकका अन्तर देते हुए एक-एक कमकर अन्तमें एक आ जावे वहाँ तक लिखे। इसमें प्रारम्भमें प्रथम अङ्कसे दूसरा भङ्क लिखते समय बीचमें और अन्तमें दोसे प्रथम अङ्क लिखते समय बीचमें पुनरुक्त होनेके कारण एकका अन्तर नहीं देवे । इस व्रतमें सब अङ्कीका जोड़ करनेपर दो सौ चौरासी उपवास और उनसठ पारणाएँ होती हैं। उस उपवासमें तीन सौ तैतालीस दिन लगते हैं । इसका फल रत्नत्रयको प्राप्ति है। इसको विधि यह है कि एक उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा, एक उपवास एक पारणा आदि ७२-७३॥ कनकावलीविधि-जिसमें एकका अङ्क दो का अङ्क, नौ बार तीनका अङ्क, फिर एकसे लेकर सोलह नकके अङ्क, फिर चौंतीस बार तीनके अङ्क, सोलहसे लेकर एक तकके अङ्क, नौ बार तीनके अङ्क तथा दो और एकका अञ्जलिखा जावे अर्थात् इस क्रमसे चार सौ चौंतीस उपवास और अठासी पारणाएँ को जावें वह कनकावली व्रत है। लौकान्तिक देव पदकी प्राप्ति होना अथवा संसारका अन्तकर मोक्ष प्राप्त करना इस बतका फल है। इसका क्रम यह है कि एक उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा आदि। इस व्रतके रलमुक्तावलीयन्त्रम्-- १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १६११०१११११२११३११४११५११६ ११५११४११३ ११२१११११०१६ १८१७१६१५१४१३१२१ कनकापलीयन्त्रम्- १२३३३३ ३ ३.३.३.३ १२३४५६७८६१०१११२१३१४१५१६३ ३ ३ ३ ३१६१५१४ १३ १२१११०६८७६५४३२१३३३३३३३३३२१ १. रूपान्तराज्य च दशा स.1 २.-स्तद्गएिता म।

४२५ हरिवंशपुराणे रूपान्तोन्यपि पोडशप्रभृतयो रन्ध्र 'त्रिक द्वय केक यत्रैया कनकावली प्रकुरते लौकान्तिक्रवं फलम् ।।७४।। द्विप्ने संकलिते हि पोडशगते त्रिनारमकोच्चैश्चतुः- पञ्चाशत् त्रिकयोग्ययोजितचतुःशत्याश्चतुचिशता। द्विग्नकादश षोडशान्वितचतुनिशदिनैः साशन- वर्ष द्वादशवासरैरभिहिताः पञ्चह मासा विधौ ॥७५॥ एकद्वित्रिचतुर्द्विकानि सहितैस्ते पोडशैकादिभि- विज्ञेयानि सितं चतुर्विकयुतं प्रिंशद्विकान्यादरात् । एकान्ता खलु पोडशादय इह ह्यष्टौ द्विकान्येव तु त्रिदय कोऽपि च यत्र ते प्रकथिता रनावलीयं परा ॥७६।। स्रग्धरावृत्तम् षट्पञ्चाशद्विकोत्थे द्विकपरिगुणिते मिश्रिते पोडशोत्थ- द्वासप्तत्या द्विशत्याशनिरसनगणो गण्यते मिश्रितेऽस्मिन् । और मिला दें। ऐसा करनेसे चार सौ चौंतीस उपवास निकल आते हैं और अठासी स्थान होनेसे अठासी पारणाएँ होती हैं। इस कनकावली विधिमे एक वर्ष पाँच मास और बारह दिन लगते हैं। दूसरे प्रकारको रत्नाधलीविधि-जिसमें रत्नोंके हारके समान एक प्रस्तार बनाकर बाँई । ओर पहले बेलाका सूचक दो बिन्दुओका एक द्विक लिखे, फिर दो बेलाओंके सूचक दो द्विक लिखे, फिर तीन बेलाओंके सूचक तीन द्विक लिखे, फिर चार बेलाओंके सूचक चार द्विक लिखे । इसके आगे एक उपवासको सूचक एक बिन्दु लिखे, उसके बाद दो उपवासौंको सूचक दो बिन्दुएँ बराबरीपर लिखे । तदनन्तर इसके आगे इसी प्रकार तीन आदि उपवासोंको सूचक सोलह तक बिन्दुएँ रक्खे। फिर वे बोई ओरसे दाहिनी ओर गोलाकार बढ़ते हुए बत्तीस बेलाओंके बत्तीस द्विक लिखे और उनके नीचे चार बेलाओंके सूचक चार द्विक लिखे। तीस द्विकके ऊपर सोलह आदि उपवासोंके सूचक सोलहसे लेकर एक तक बराबरीपर सोलह पन्द्रह आदि बिन्दुऍ रक्खे । और उसके आगे आठ बेलाओके सूचक आठ द्विक, तीन बेलाओंके सूचक तीन द्विक, दो बेलाओके सूचक दो द्विक तथा एक बेलाका सूचक एक द्विक लिखे। इस प्रतमें छप्पन द्विकके द्विगुणित एक सौ बारह तथा दोनो ओरको पोडशियोंके दो सौ बहत्तर इस प्रकार सब मिलाकर तीन सौ चौरासी उपवास और अठासी स्थानोंके अठासी भुक्तिकाल होते हैं । यह व्रत एक वर्ष तीन माह और बाईस दिनमै पूरा होता है तथा रत्नत्रयरूपी तेजको बढ़ानेवाला है अर्थात् इस व्रतके फल स्वरूप रत्नत्रयमें निर्मलता आती है। इसकी विधि इस प्रकार है--एक बेला एक पारणा, एक वेला एक पारणा, इस क्रमसे दश बेला दश पारणा, फिर एक उपवास एक पारणा, दो उपवास एक पारणा, तीन उपवास एक पारणा, चार उपवास एक पारणा इस क्रमसे सोलह उपवास तक बढ़ाना चाहिए । फिर एक बेला एक पारणा इस क्रमसे तीस वेला तीस पारणा, फिर पोडशीके सोलह उपवास एक पारणा, पन्द्रह उपवास एक पारणा, इस क्रमसे एक उपवास एक १. द्विक त्र्येकक म०। २. एकः द्वौ, नवसारं त्रयः, एकः द्वौ त्रयः इत्यादि पोडशपर्यन्ताः, ततः चतुस्त्रिंशद्वार उग्यासत्रिक ( तेला) ततः पोडरा पञ्चदश इत्याचे कार्यन्ताः, ततः नवारं उपवासत्रिक ततो दावेकश्च इति कनकावली। ३. पारणादिवसः। ४. कनकावलौसमयः एको वर्षः पञ्चमासाः दादादिनानि । ५ गिरि फ०, म०।६ अन्त ।

चतुस्त्रिंशः सर्गः अष्टाशीत्या समाहैरिह भवति विधाकालसंरयाप्यहोमि- द्वाविंशत्या त्रिरत्नद्युतिकृतिसुकृते वर्षमेकं निमास्या ॥७॥ पारणा तक आना चाहिए । फिर एक वेला एक उपवासके क्रमसे बारह वेला और बारह पारणाएँ तत्पश्चात् नीचेके चार वेला और चार पारणाएँ करना चाहिए ॥७६-७७|| द्वितीयरत्नावलीयन्त्रम्-- ० 0 . . ०० . ०० .० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० ०० o . 6 ० ०० ०० ०० ०-00 १ चिनी गमः । २. रत्नावली समय एको वर्षयो मासा द्वाविशतिदिनानि ।

४३० हरिवंशपुराणे १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ ३ अनुष्टुप् द्रौ द्वौ चैकादया शस्ताः पञ्चपर्यवसानका । होने मुभयतः पष्टि.सिंहनिकोटित विधौ ॥७॥ त एव चाप्टपर्यन्ता नवं च शिखराः पुनः । मध्यमेऽप्युपवासाः स्युनि पशाशं शतं स्फुटम् ॥७९॥ सिंहनिष्क्रीडित विधि-सिंहनिष्कोडित व्रत जघन्य मध्यम और उत्कृष्टके भेदसे तीन प्रकारका है उनमें हीन अर्थात् जघन्य सिंहनिष्कोडित व्रतका क्रम इस प्रकार है । एक ऐसा प्रस्तार बनावे जिसमें एकसे लेकर पॉप तकके अङ्क दो दीवार आ जायें तथा वे पहलेके अंकोंमें दो-दो अङ्कोंको सहायतासे एक-एक बढ़ता और घटता जाय इस रोतिसे लिखे जावें । पुनः पाँचसे लेकर एक तकके अङ्क भी दो-दो बार पूर्वोक्त क्रमसे लिखे जायें। समस्त अटोंका जोड़ करनेपर जितनी संख्या हो उतने उपवास और जितने स्थान हो उतनी पारणाएँ जानना चाहिए। इस व्रतके प्रस्तारका आकार यह है-- १ १ १ ५ ४ २ ३ १ इसमें पहले एक उपवास एक पारणा और दो उपवास एक पारणा करना चाहिए। फिर दोमे से एक उपवासका अङ्कघट जानेसे एक उपवास एक पारणा, दोमें एक उपवासका अङ्क बढ़ जानेसे तीन उपवास एक पारणा, तीनमें एक उपवासका अङ्क घट जानेसे दो उपवास एक पारणा, तीनमें एक उपवासका अङ्क बढ़ जानेसे चार उपवास एक पारणा, घारमें से एक उप- वासका अङ्क घट जानेसे तीन उपवास एक पारणा, चारमें एक उपवासका अङ्क बढ़ जानेसे पाँच उपवास एक पारणा, पाँच में से एक उपवासका अंक कमा देनेपर चार उपवास एक पारणा, चारमें एक उपवासका अङ्क बढ़ा देनेपपाँच उपवास एक पारणा होती है। यहॉपर अन्तमें पाँचका अङ्क भा जानेसे पूर्वार्ध समाप्त हो जाता है। आगे उल्टी संख्यासे पहले पाँच उपवास एक पारणा करना चाहिए। पश्चात् पाँच में से एक उपवासका अंक कमा देनेपर चार उपवास एक पारणा, चारमें एक उपवासका अङ्क बढ़ा देनेपर पाँच उपवास एक पारणा, चारमे से एक उपवासका अङ्क घटा देनेपर तीन उपवास एक पारणा, तीनमें एक उपवासका अङ्क बढ़ा देनेपर चार उपवास एक पारणा, तीनमें से एक उपवासका अङ्क घटा देनेपर दो उपवास एक पारणा, दोमें एक उपवासका अङ्क बढ़ा देनेसे तीन उपवास एक पारणा, दोमें से एक उपवासका अङ्क घटा देनेपर एक उपवास एक पारणा, फिर दो उपवास एक पारणा और एक उपवास एक पारणा करना चाहिए। इस जघन्य सिंहनिष्क्रीडित व्रतमें समस्त अङ्कीका जोड़ साठ होता है इसलिए साठ उपवास होते हैं और स्थान बोस है इसलिए पारणाएँ बीस होती हैं। यह व्रत अस्सी दिनमें पूर्ण होता है ।। मध्यम सिंहनिष्कोडित विधि-मध्यम सिंहनिष्क्रीडित व्रतमे एकसे लेकर आठ अङ्क तकका प्रस्तार बनाना चाहिए और उसके शिखरपर नौ अङ्क लिखना चाहिए। उसके बाद उल्टे क्रमसे एक तकके अङ्क लिखना चाहिए । यहाँ भी जघन्य निष्कोडितके समान दो दो अङ्कोकी अपेक्षा एक एक उपवासका अङ्क घटाना बढ़ाना चाहिए। इस रीतिसे लिखे हुए समस्त अङ्कोका जितना जोड़ हो उतने उपवास और जितने स्थान हो उतनी पारणाएँ समझनी चाहिए | इस तरह इस व्रतमे एक सौ पन उपवास और तेतीस पारणाएँ होती हैं। यह व्रत एक सौ छयासी दिनमे पूर्ण होता है । इसका प्रस्तार इस प्रकार है-||७६।। १ १ १ १ १ १ १ १ ४ १ १ २ १ ७ ७ १ १ ६ १ १ १ ४ १ ५ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ २ १ १ ५ १.वेकादयः मा।

चतुस्त्रिंशः सर्गः ४३१ पूर्वे पश्चरशान्तास्तु शिखरे पोदशाधिकाः । उत्कृष्ट तत्र ते वेद्याः पण्णवत्या चतुःशती १८०॥ उत्कृष्ट सिंहनिष्क्रीडित विधि-उत्कृष्ट सिंहनिष्क्रीडित व्रतमें एकसे लेकर पन्द्रह तकके अङ्कीका प्रस्तार बनाना चाहिए और उसके शिखरमें सोलहका अङ्क लिखना चाहिए। उसके बाद उल्टे क्रमसे एक तकके अङ्क लिखना चाहिए । यहाँपर भी जघन्य और मध्यम सिंह- निष्क्रीडितके समान दो-दो अङ्कोंको अपेक्षा एक-एक उपवासका अङ्क घटाना-बढ़ाना चाहिए । इस रीतिसे लिखे हुए समस्त अङ्कीका जितना जोड़ हो उतने उपवास और जितने स्थान हों उतनी पारणाएँ जाननी चाहिए । इस तरह इस व्रतमें चार सौ छियानचे उपवास और इकसठ पारणाएँ होती हैं। यह व्रत पाँच सौ सत्तावन दिन में पूर्ण होता है। इसका प्रस्तार इस प्रकार -11८०॥ १ १ १ १२१३ २४३५४ ६ ५ ७६८ ७ ६ ८१० ६ १११० १२ १२ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १३ १२ १४ १३ १५ १४ १५ १६ १५ १४ १५ १३ १४ १२ १३ १ १ १ १ ११ १२ १० ११ १ १० ८६७८६७५६ विशेष--७८, ७६, ८० वें श्लोकोंका एक सीधा-साधा अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है विद्वज्जन इसपर विचार करें--- जघन्य सिंहनिष्क्रीडित विधिमें एकसे लेकर पाँच तकके अङ्क दो-दो की संख्यामें लिखें और उसके बाद उलटे क्रमसे पाँचसे एक तकके अंक दो-दोकी संख्यामें लिखें। दोनों ओरके सब अंकोंका जोड़ कर देनेपर साठ उपवास और वीस पारणाएँ होती है ॥७॥ मध्यम सिंहनिष्क्रीडितमें एकसे लेकर आठ तफके अंक दो-दोकी संख्यामें लिखें और उनके ऊपर शिखरस्थानपर नौका अंक लिखे फिर उल्टे क्रमसे एक तकके अंक दो दोकी संख्यामें लिग्वे । सब अंकोंका जोड़ करनेपर एकसौ त्रेपन उपवास और तेतीस पारणाएँ आती हैं ||vell उत्कृष्ट सिंहनिष्क्रीडितमें कसे लेकर पन्द्रह तकके अंक दो-दोकी संख्यामें लिखे और उसके ऊपर शिखर स्थानपर सोलहका अंक लिसे फिर उल्टे क्रमसे एक तकके अंक दो-दोकी संख्यामें लिखे सब अंकोंका जोड़ करनेपर चारसी छियानवे उपवास और इकसठ पारणाएँ होती हैं। इनके प्रातार इस नमसे जानना चाहिए- जघन्य सिंहनिष्क्रीडित- ३ हरिवंशपुराणे १ मध्यम सिंहनिफीडित- ६ M० .m0 ११११११११११११११११ . ८० ku0 kura 00 १ उत्कृष्टसिंहनिष्फीडित- - 4-0 १५१५१४ १४१३१३१२१२१११११०१०६८८७७ . wr m M 9 ore M m K ~30 70 MY W 10 ~~ 0 Who सिहनिष्क्रीडित व्रतमें कल्पना यह है कि जिस प्रकार सिंह किसी पर्वतपर क्रम क्रमसे चढ़ता हुआ उसके शिखपर पहुंचता है और बादमें क्रम-क्रमसे नीचे उतरता है उसीप्रकार मुनिराज क्रम-क्रमसे उपवास करते हुए तपरूपी पर्वतके शिखरपर चढ़ते हैं और उसके बाद क्रम-क्रमसे नीचे उतरते हैं।

चतुरिंशः सर्गः आर्या पञ्चानां संकलिते चतुर्गुणो पष्टिरेवमष्टानाम् । नवनिर्मिधितमध्यः पञ्चदशानां च पोडशभिः ॥1॥ अनुष्टुप् विंशतिश्च त्रयस्त्रिंशदेकषष्टिश्च पारणाः । जघन्यमध्यमोत्कृष्सिंहनिप्पीडितं क्रमान् ॥२॥ वनसंहननोऽनन्तवीयसिंह इवामयः । अणिमादिगुणः सिद्धधरफलेनास्य नरोऽचिरात् ॥३॥ हरिणीच्छन्दः प्रतिदधिमुखं चस्वारस्ते निरस्तमनोमला प्रतिरतिकरं चाष्टौ यत्र युपोषितवामराः । प्रतिदिशमयो पष्ट कार्य तथालनकान्प्रति व्रतविधिरयं श्रेष्टो नन्दीश्वरो जिनचक्रिकृत् ॥८॥ प्रन्थ कर्ताने तीनों प्रकारके सिंहनिष्क्रीडित व्रतोंकी संख्या और पारणा गिननेकी एक सरल रीति यह भी बतलाई है कि जघन्यसिंहनिष्क्रीडित व्रतमें एकसे लेकर पाँचतकके अंक लिखकर सबको जोड़ ले फिर उसमें चारका गुणा कर दे। जैसे एकसे लेकर पाँच तकके अंकोंका जोड़ पन्द्रह होता है उसमें चारका गुणा करनेपर उपवासोंकी संख्या साठ आती है। मध्यमसिंहनिष्क्रीडित व्रतमें एकसे लेकर आठतकके अंक लिखकर सबको जोड़ दे फिर उसमें चारका गुणा कर दे और शिखर के नौ अलगसे जोड़ दे। जैसे--एकसे लेकर आठ तकके अंकोंका जोड़ छत्तीस होता है उसमें चारका गुणा करनेपर एकसौ चवालीस आते हैं उसमें शिखरके नौ जोड़ देनेपर उपवासोंकी संख्या एक सौ बेपन होती है। उत्कृष्ट सिंहनिष्क्रीडितमें एकसे लेकर पन्द्रहतऋके अंक लिखकर उनका जो जोड़ हो उसमें चारका गुणा करे फिर शिरसग्के सोलह अलग से जोड़ दे । जैसे एक से पन्द्रह तक के अंक का जोड़ एक सौ बीस होता है। उसमें चार का गुणा करनेपर चार सौ अस्सी होते हैं । नसमें शिखरके सोलह जोड़ देनेपर उपयासीकी संख्या चार सौ छथानवे होती है ॥८१|| जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट सिंहनिष्क्रीडित व्रतोंकी पारणाएँ क्रमसे वीस, तेंतीस और इकसठ होती हैं ।।२|| इस व्रतके फलस्वरूप मनुष्य वनपभनाराच संहननका धारक, अनन्तवीर्यसे सम्पन्न, सिंहके समान निर्भय और अणिमा आदि गुणांसे युक्त होता हुआ शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है ॥३॥ नन्दीश्वर व्रतविधि-नन्दीश्वर द्वीपको एक एक दिशाम चार-चार दधिमुख हैं इसलिए प्रत्येक दधिमुखको लक्ष्यकर मनकी मलिनताको दूर करते हुए चार उपवास करना चाहिए। नन्दीश्वर व्रतविधि यंत्रम्- । ນ १ २) १ १ [१ ५३४ हरिवंशपुराणे रथोद्धता मेरुपु प्रतिषनं तु षष्ठतः प्रत्यगारमुदिता चतुर्थकान् । मेहातिविधिरेषु मेरुपु प्रापयिष्यति महाभिषेचनम् ॥८५11 एक एक दिशाम आठ-आठ रतिकर हैं इसलिए प्रत्येक रतिकरको लक्ष्यकर आठ उपवास करना चाहिए। एक एक दिशामें एक-एक अंजनगिरि है इसलिए उसे लक्ष्यकर एक वेला करना चाहिए । इस प्रकार एक दिशाके घारह उपवास एक वेला और तेरह पारणाएँ होती हैं। यह व्रत पूर्व दिशासे प्रारम्भ कर दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाके क्रमसे चारों दिशाओं में करना चाहिए। इसमें अड़तालीस उपवास, चार वेला और बावन पारणार हैं। इस तरह यह व्रत एक-सौ आठ दिन में पूर्ण होता है। यह नन्दीश्वर व्रत अत्यन्त श्रेष्ठ है और जिनेन्द्र तथा चक्रवर्तीके पदको प्राप्त कराने वाला है ॥४॥ मेरुपंक्तिवत विधि-जम्बूद्वीपका एक, धातकीखण्ड पूर्वदिशाका एक, धातकीखण्ड पश्चिम दिशाका एक, पुष्कराध पूर्व दिशाका एक और पुष्कराध पश्चिम दिशाका एक इस प्रकार कुल पाँच मेरु पर्वत हैं। प्रत्येक मेरु पर्वतपर भद्रशाल, नन्दन, सौमनस और पाण्डुक ये वन हैं और एक-एक वनमें चार-चार चैत्यालय हैं। मेरुपंक्तिप्रतमें वनीको लक्ष्य कर घेला और मेरुपंक्तियतयन्त्रम्- AAAAA - अथवा--- १ पा. १११११ पा. पा. ०० ०० ००० ० ० 0 ०० . ० . . १ मो. सौ. ०० 0 . ०० ० . ० सौ. ०००० . . सौ. ००००० . . . न. . ० . . ० ०० 0 न. ००० न. ००००० . . . . ० १ भ. भ. १११११ भ. . . . o o भ. 0 . 0 0 0 ० . . . 0 . . . . ० ० . . . ० 0 0 . १.८० उपवासाः २० पष्ठानि ।

चतुनिशः सर्गः उपजातिः धनुश्चतुर्यान्वितषष्ठकेन विपष्ठिनावेष्टनभागपष्टे । विमानपक्तित्रिं घिरस्य कर्ता विमानपंक्तीश्वरमावकर्ता ॥८६॥ चैत्यालयोंको लक्ष्यकर उपवास करने पड़ते हैं। इस प्रकार इस व्रतमें पाँचों मेरु सम्बन्धी अस्सी चैत्यालयोंके अस्सी उपवास और बीस वन सम्बन्धी बीत चेला करने पड़ते हैं तथा सौ स्थानोंकी सौ पारणाएँ होती हैं। इसमें दो सौ बीस दिन लगते हैं । व्रत, जम्बूद्वीपके मेरुसे शुरू होता है। इसमें प्रथम हो भद्रशाल वनके चार चैत्यालयोंके चार उपवास चार पारणाएँ और वनसम्बन्धी एक चेला, एक पारणा होती है। फिर नन्दन वनके चार चैत्यालयोंके चार उपवास, चार परणाएँ और वन सम्बन्धी एक वेला एक पारणा होती है। फिर सौमनस वनके चार चैत्यालयों के चार उपवास चार पारणाएँ और वन सम्बन्धी एक बेला एक पारणा होती है। तदनन्तर पाण्डुक वनके चार चैत्यालयोंके चार उपवास चार पारणाएँ और वन सम्बन्धी एक वेला एक पारणा होती है। इसी क्रमसे धातकीखण्ड द्वीपके पूर्व और पश्चिममेरु तथा पुष्कराध द्वीपके पूर्व और पश्चिम मेरु सम्बन्धी उपवासवेला और पारणाएँ जानना चाहिए । यह मेरुपंक्तिवत, मेरु पर्वतपर महाभिषेकको प्राप्त कराता है अर्थात् इस व्रतका पालन करने वाला पुरुप तीर्थकर होता है ॥२५॥ विमानपक्ति विधि-इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णकके भेदसे विमान तीन प्रकारके हैं। इन्द्रक विमान योचमें है और श्रेणीबद्ध विमान चारों दिशाओं में श्रेणी रूपसे स्थित हैं । तु विमानको आदि लेकर इन्द्रक विमानोंकी संख्या नेसठ है । विमानपंक्तिवतमें इन्द्र ककी चारों दिशाओं में श्रेणीबद्ध विमानोंकी अपेक्षा चार उपवास, चार पारणाएँ और इन्द्रककी अपेक्षा एक अवेला एक पारणा होती है। इस तरह सठ इन्द्रक विमानोंकी चार-चार श्रेणियोंको अपेक्षा चार-चार उपवास होनेसे ये दो सौ यावन उपवास तथा वेसठ इन्द्रक सम्बन्धी प्रेसठ वेला होते हैं । वेसठ बेलाके बाद एक तेला होता है इस प्रकार उपवास २५२ बेला ६३ और तेला ? सय मिलाकर तीन सौ सोलह स्थान होते है अतः इतनी ही पारणाएँ होती हैं। यह व्रत पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाके क्रमसे होता है। चारों दिशाओंके चार उपवासके याद बेला होता है । इसमें कुल छह सौ सत्तान दिन लगते हैं। यह व्रत विमानोंकी ईश्वरता प्राप्त कराने. वाला है अर्थात् इस प्रतका करनेवाला मनुष्य विमानांका स्वामी होता है ॥६॥ विमानपंक्तियन्त्रम्- श्रेणी १ १ २ . T ६३.४.२५२ उपवास ६३... ५३ वेला तेला ta ३१६ पारणा १६० दिने समाप्यते घर ११६ स्थानानि ।

हरिवंशपुराणे १ १ १ १ १ or १ १ ३ १ २ १ १ १ १ २ ५ ४ 20 ४ १ ४ ३ रथोद्धता रूपमादिरधि यग्न पञ्च ते त्रिस्ततो भवति रूपमप्यतः । शातकुम्भविधिरेप सम्भवे शातकुम्भमुखंदस्तृतीयके ॥६॥ शातकुम्भ विधि-शातकुम्भ विधि जघन्य, मध्यम और उत्कृष्टके भेदसे तीन प्रकारकी है उनमे जघन्य शातकुम्भ विधि इस प्रकार है। एक ऐसा प्रस्तार बनावे जिसमे एकसे लेकर पाँच तकके अक्षर पाँच, चार, तीन, दो, एकके क्रमसे लिखे । तदनन्तर प्रथम अंक अर्थात पॉच को छोड़कर अवशिष्ट अंकोको चार, तीन, दो, एकके क्रमसे तीन बार लिखे । सब अकोका जितना जोड़ हो उतने उपवास और जितने स्थान हो उतनी पारणाएँ जान । इस विधिमे पैंतालीस उपवाम और सत्तर पारणाएँ हैं, यह बासठ दिनमें पूर्ण होता है । प्रस्तारका आकार इस प्रकार है- १ २ मध्यमशातकुम्भ विधि-एक ऐसा प्रस्तार बनावे जिसमें एकसे लेकर नौ पर्यन्त तक अंक नौ, आठ, सात, छह, पॉच, चार, तीन, दो, एकके क्रमसे लिखे । तदनन्तर प्रथम अंक अर्थात् नोको छोड़कर आठ-सात भादिके क्रमसे अवशिष्ट अंकोंको तीन बार लिसे। सब अंकोंका जितना जोड़ हो उतने उपवास और जितने स्थान हो उतनो पारणाएँ जाने । इस व्रतमे एक सौ पन उपवास और तैंतीस पारणाएँ हैं। यह व्रत एकसौ छयासी दिनमे पूर्ण होता है । इसका प्रस्तार इस प्रकार है- १ ३ १ ३ ३ उत्कृष्ट शातकुम्भ विधि -एक ऐसा प्रस्तार बनाये जिसमें एकसे लेकर सोलह तकके अंक सोलह पन्द्रह चौदह आदिके क्रमसे एक तक लिखे फिर प्रथम अंकको छोड़ कर अवशिष्ट अंकोका जितना जोड़ हो उतने उपवास और जितने स्थान हो उतनी पारणाएं जाने। इस ध्रनमे चार सौ छयानवे उपवास और इकसठ पारणाएँ हैं । यह विधि पाँच सौ सन्तावन दिनमें पूर्ण होनी है। इसका प्रस्तार इस प्रकार है- १ or १ १ १ or १ १ ६ १ १ १ ८ १ ६ १ ७ १ ४ ७ २ १ . ur ३ ५ १ १ २ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ ८ १ ५ १ ४ २ १ १ २ ur १ . १ १ १ १ १ १ १ १० १ १ ७ १ है १ ५ १ ४ ८ १ १ १ १ १ २ १ १ ६ १ ८ १ . है १ १५ १ ३ १ १ १ ५. १ ६ ४ १ १३ १ १ १ ३ १ १ १५ १ २ १ ६ २ १ ४ १ ११ १० १ १४ १३ १ १ १ १५ १ ३ २ १ १२ १ १ १ १ १ १ ६ १ १ १ or १ ४ ७ ६ यह विधि मुवर्णमय फलशांसे अभिषेक सम्यन्धी मुसको देनेवाली है । यह इन १४५ उपासा: १७ पारगा:।

चतुखिशः सर्गः भार्या एकादयः प्रीता विधयोऽमी शातकुम्भपयंत्ताः । पञ्चनपोडशान्ता भवन्त्यपि प्रथममध्यमोटाः || उपजातिवृत्तम् यथोक्तमेषां हि तपोविधीनां विधेरशक्तरुपवाससंख्या। ययात्मशक्ति स्वहितप्रवृत्तश्चतुर्थपष्टाष्टमतोऽपि पूर्या 1581 स्नग्धरा योऽमावस्थोपवासी प्रतिपदि कवलाहारमात्रः पुरस्ता- त्तवृद्धया पौर्णमास्यामुपवसनयुतोद्धासयन प्रासमने। सामावस्योपवासः स भजति तपसश्चन्द्रगरयानुपूर्या चार्या चान्द्रायगस्य प्रविततयशसः कणः कर्तृभावम् ॥६५॥ तपोंकी विधि कही है परन्तु जो मनुष्य इनके करने में असमर्थ हैं वे अपनी शक्तिके अनुसार आत्महितमें प्रवृत्त होते हुए उपवास, बेला तथा तेलाके द्वारा भी उपवासोंकी निश्चित संख्या पूरी कर सकते हैं ॥८७-८॥ चान्द्रायणविधि-चान्द्रायण व्रत चन्द्रमाको सुन्दर गतिके अनुसार होता है । इस व्रतका करनेवाला अमावास्याके दिन उपवास करता है फिर प्रतिपदाको एक डकवल-एक ग्रास मात्र आहार लेना है । तदनन्तर द्वितीयादि तिथियों में एक-एक ग्रास बढ़ाता हुआ चतुर्दशीको चौदह कवलका आहार करता है । पूर्णिमाके दिन उपवास करता है फिर चन्द्रमाकी कलाओंके अनुसार एक एक कवल घटाता हुआ चौदह, तेरह, बारह आदि कवलोंका आहार लेता है और अन्तमें कवलचान्द्रायणविधियन्त्रम्- उपास केवन १४ १४ कटन 116दव कवल १२ १३ऊठल कवल 1 "कवल कवल १० १० कैवल कवन९ कवल केवल कवल ७वल कदल ५ कपल ४कंच कम्त ३- मदर्य काल उपवास- ३.--उपटान १ १५३ उपवासाः ३३ पारणाः ।२ ४६६ उपवासाः ६१ पारगाः। ३. अमावस्यायामुपवास: प्रतिदि एकक्वलाहारः एच क्रमेण चतुर्दश्या चतुर्दशकपलाहारः तम उपामः कृष्णपतिपदि चतुर्दशकवलाहारः एवमूनामेण पुनरमावस्यायामुपयासः । * एक हजार चावलोका एक क्वल होता है। अतः एक हजार चाक्लोका जिवना परिमाण हो उतना करल बनाना चाहिए।

४३८ हरिवंशपुराणे रथोद्धता प्रागुपोष्य कवलस्य भोजनं सलमान्तमपि सैकवृद्धिकम् । सप्तकृत्व इति यत्र तु क्रिया सप्तसप्तमतपोविधिस्वसौ ॥६॥ श्रार्या अशष्टमनवनवमौ दशदशमैकादशो विधयः । द्वात्रिशद्वात्रिशद्विध्यन्ता एवमात्मका बोध्याः ॥२॥ अनुष्टुप एकद्वित्रिचतुःपञ्चषट्सप्ता भुक्तिपिण्डकाः । प्रत्येक सप्तमान्ताः स्युः सप्तसप्तमकेऽथवा ॥१३॥ अष्टान्तादिषु विज्ञेयः शेषेध्वपि विधिस्त्वयम् । क्रमेणैकोपवासादिकवलक्रमसंज्ञकः ॥६॥ श्रार्या भाचाम्लवर्धमाने भवन्ति सौवीरभुक्तयस्त्वेकाद्याः । सोपोपिता दशान्ता दशादयश्चापि रूपान्ताः ॥१५॥ निर्विकृति पूर्वाधः सैकस्थानस्तु पश्चिमाधश्च । आचारलवर्धमाना क्रमेण विधयो विधेयास्ते ॥१६॥ अमावास्याको पुनः उपवास करता है। यह व्रत इकतीस दिनमें पूर्ण होता है और यशको विस्तृत करनेवाला है अतः इस व्रतको करनेवाला यशको प्राप्त होता है ।।६०|| सप्तसप्तमतपोविधि-जिसमें पहले दिन उपवास और उसके बाद एक-एक ग्रास बढ़ाते हुए आठवें दिन सात ग्रासका आहार लिया जाय फिर एक एक ग्रास घटाते हुए अन्तिम दिन उपवास किया जाय । इसी प्रकारकी क्रिया सात बार की जाय । यह सप्तसप्तमविधि है ॥१॥ अष्टअष्टम, नवनवमादिविधि-सप्तसप्तमविधिके अनुसार अष्टअष्टम, नवनयम, दश- दशम, एकादशएकादश और द्वादशद्वादशको आदि लेकर द्वात्रिंशद्वात्रिशद् तककी विधि भी इसी प्रकार जानना चाहिए। जितनेवीं विधि प्रारम्भ की जावे उसमें प्रथम दिन उपवास रखार एक-एक ग्रास बढ़ाते हुए उतने प्रास तक आहार लेना चाहिए । फिर एक-एक ग्रास घटाते हुए एक ग्रास तक आवे और अन्तिम दिनका उपवास रखना चाहिए । मनुप्यका स्वाभाविक भोजन बत्तीस ग्रास बतलाया है, अतः यह व्रत भी बत्तीस पास तक ही सीमित रक्खा गया है ॥६॥ अथवा सप्तसप्तमविधिका एक दूसरा क्रम यह भी बतलाया गया है कि पहले दिन उपवास न कर क्रमसे एक, दो, तीन. चार, पाँच, छह और सात कवलका आहार ले जब एक दौर पूर्ण हो जाये तो यही क्रम फिर करे । इस तरह सात बार इस क्रमके कर चुकने- पर यह व्रत पूर्ण होता है ||६३॥ अष्टअष्टम आदि विधियोमे भो यही क्रम जानना चाहिए । इनमे क्रमसे एक उपवाससे प्रारम्भ कर एक-एक प्रास बढ़ाते जाना चाहिए ॥४॥ आचालवर्धमानविधि-आचाम्लवर्धमान विधिमे पहले दिन उपवास करना चाहिए दूसरे दिन एक धेर बराबर भोजन करना चाहिए, तीसरे दिन दो वेर बराघर, चौथे दिन तीन बेर वराधर इस तरह एक-एक बेर बराबर बढ़ाते हुए ग्यारहवें दिन दस वेर बराबर भोजन करना चाहिए फिर दशको आदि लेकर एक-एक बेर बराबर घटाते हुए दशवें दिन एक बेर बराबर भोजन करना चाहिए और अन्तमे एक उपचास करना चाहिए । इस व्रतके पूर्वार्धके दश दिनोंमे निर्विकृति-नीरस भोजन लेना चाहिए और उत्तराद्ध के दश दिनोंमें इक्कट्ठाणाके साथ अर्थात भोजन के लिए बैठनेपर पहली बार जो भोजन परोसा जाय उसे ग्रहण करना चाहिए। दोनों ही अाम भोजनका परिमाण ऊपर लिसे अनुसार ही समझना चाहिए। ये आचाम्ल वर्धमान तपकी विधियाँ कमसे करनी चाहिए ॥६५-६६॥ १. प्रथमदिने उपवासः पुनरेकैकहिम्मेण अष्टमदिवसे सप्तक्वलाहारः पुनहानिन मेणापयासः एवं सप्तगर पर्तव्यम् ।

४३६ चतुखिशः सर्गः शार्दूलविक्रीडितम् भष्टाविशतिरिष्टसाधनमती चैकादशानेषु ते द्वाविष्टौ परिकर्मणोऽष्टसहिताशीतिस्तु सूत्रस्य हि । एको चाद्यनुयोगकेवलकृतौ द्विःसप्तपूर्वेष्वमी पट्पञ्चावधिचूलिके श्रुतविधौ द्वौ तौ मनापर्यये ।।१७॥ उपजातिः प्रत्येकमावुपवासभेदा निश्शंकिताद्यष्टगुणव्यपेक्षाः। निदर्शनानामपि ते विधेयास्तपोविधौ दर्शनशुद्धिसंज्ञे ॥८॥ शार्दूलविक्रीडितम् द्वावेकः पुनरेक एव हि परे पक एकः क्रमात् पोदा बाद्यतपस्यमी प्रमगताः पुण्योपवासाः पृथक् । अन्तःस्थे दश साधिकाच नवमिस्त्रिंशद्दश व्याहृताः पञ्च द्वौ पुनरेक एव च तपःशुद्धी विधेया विधौ १६॥ अनुष्टुप चतुर्दशस्वहिसायं जीवस्थानेषु भाविताः । त्रियोगनवकोटिना ते पड्विशं शतं स्फुटम् ॥१००॥ श्रुतविधि-श्रुतविधि उपवासमें मतिज्ञानके अट्ठाईस, ग्यारह भङ्गोंके ग्यारह, परि- कर्मके दो, सूत्रके अठासी, प्रथमानुयोग और केवलज्ञानके एक एक, चौदह पूर्वोके चौदह, अवधिज्ञानके छह, चूलिकाके पाँच और मनःपर्यय ज्ञानके दो इस प्रकार एक सौ अट्ठावन उप- वास करने पड़ते हैं। एक एक उपवासके बाद एक एक पारणा होती है इसलिए यह व्रत तीन - सौ सोलह दिनों में पूर्ण होता है ।। दर्शनशुद्धि विधि-दर्शनविशुद्धि नामक तपकी विधिमें औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक इन तीन सम्यग्दर्शनोंके निःशङ्कित आदि आठ-आठ अगोंकी अपेक्षा चौवीस उप- वास होते हैं । एक एक उपवासके बाद एक-एक पारणा होती है । इस तरह यह व्रत अड़तालीस दिनमें समाप्त होता है ।६८॥ तपःशुद्धि विधि-बाह्य और आभ्यन्तरके भेदसे तपके दो भेद हैं। उनमें बाह्य तपके अनशन, ऊनोदर, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश ये छह भेद हैं और आभ्यन्तर तपके प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और कायोत्सर्ग ये छह भेद हैं। इनमें अनशनादि बाह्य तपोंके क्रमसे दो, एक, एक, पाँच, एक और एक इस प्रकार ग्यारह पवित्र उपवास होते हैं और प्रायश्चित्त आदि छह अन्तरङ्ग तपोंके क्रमसे उन्नीस, तीस, दश, पाँच, दो और एक इस प्रकार सड़सठ उपवास होते हैं। दोनों भेदोंके मिलाकर अठहत्तर उपवास होते हैं। ये सब उपवास पृथक् पृथक्क होते हैं अर्थात् एक उपवासके बाद एक पारणा होती है IHEELI चारित्रशुद्धि विधि–पाँच महायत, तीन गुप्ति पाँच समितिके भेदसे चारित्रके तेरह भेद हैं । चारित्रशुद्धि विधिमें इन सबको शुद्धिके लिए पृथक्-पृथक् उपवास करनेकी प्रेरणा दी गई है । प्रथम ही अहिंसा महावत है सो १ धादर एकेन्द्रियपर्याप्तक, २ बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्रक, ३ सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्यातक, ४ सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्तक, ५ द्वीन्द्रिय पर्याप्तक, ६ द्वीन्द्रिय अप- १. १५८ उपवासस्थानानि । २ २४ उपासस्थानानि । ३ अहिसाव्रतोपवासाः १४xt= १२६ । * कुछ लोग अठहत्तर उपवासोके बारह स्थान मानते हैं अर्थात् पारणाएँ केवल बारह ही होती हैं ऐसा अर्थ करते हैं परन्तु इस अर्थ में पृथक् शन्द निरर्थक जाता है और आम्यन्तर तोंमें उन्नीसके बाद एक पारणा तथा उसके बाद तोस उपचास लगातार करना अत्यन्त क्यसाध्य है। T ४४० हरिवंशपुराणे 'भीर्यास्वपक्षपैशुन्यक्रोधलोभारमशंसनैः । द्वासप्ततिनवघ्नस्ते परनिन्दान्वितैरिति ॥१०॥ मामारण्यखलैकान्तैरन्यग्रोपध्यमुक्तकः । सपुष्टग्रहणः प्राग्ववासप्ततिरमी मताः ॥१०२॥ नेदेवाचित्ततियक्तीरूपैः पञ्चेन्द्रियाहतैः । नवघ्नः ब्रह्मचयः स्युः शतं तेऽशीतिमिश्रितम् ।।१०३॥ उपजातिः चतुष्कपाया नव नोकपाया मिथ्यात्वमेते द्विचतुःपदे च । क्षेनं च धान्यं च हि कुप्यभाण्डे धनं च यानं शयनासनं च ॥१०॥ अन्तर्बहिर्भेदपरिग्रहास्ते रन्धश्चतुर्विशतिराहतास्तु । ते द्वशते पोडशसयुते स्युर्महावते स्यादुपवासभेदाः ॥१०५॥ अनुष्टुप् पठे दशोपवासाः स्युरनिच्छा नव कोटिमिः । प्रत्येकं नव विज्ञेया त्रिगुप्तिसमितिनिके ॥१०६॥ र्याप्तक, ७ श्रीन्द्रिय पर्याप्तक, ८ त्रीन्द्रिय अपर्याप्तक, ६ चतुरिन्द्रिय पर्यातक, १० चतुरिन्द्रिय अपर्याप्तक, ११ संज्ञी पन्चेन्द्रिय पर्याप्तक, १२ संज्ञी पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्तक, १३ असंझी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्तक और १४ असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्तक । इन चौदह प्रकारके जीवस्थानोंकी हिंसाका त्याग मन वचन काययोग तथा कृत कारित अनुमोदना इन नौ कोटियोसे करना चाहिए । इस अभिप्राय को लेकर प्रथम अहिंसा व्रतके एक सौ छब्बीस उपवास होते हैं और एक-एक उपवासके बाद एक- एक पारणा होनेसे एक सौ छब्बीस ही पारणाएँ होती हैं ॥१०॥ दूसरा सत्य महाप्रत है सो १ भय, २ ईर्ष्या, ३ स्वपक्ष पुष्टि, ४ पैशुन्य, ५ क्रोध, ६ लोभ, ७ आत्मप्रशंसा और ८ परनिन्दा-इन आठ निमित्तांसे बोले जानेवाले असत्यका पूर्वोक्त नो कोटियोंसे त्याग करना चाहिए। इस अभिप्रायको लेकर द्वितीय सत्य महाव्रतके बहत्तर उपवास होते हैं तथा उपवासके बाद एक-एक पारणा होनेसे बहत्तर ही पारणाएँ होती, हैं ॥१०॥ तीसरा अचीर्य महावत है सो १ प्राम, २ भरण्य, ३ खलिहान, ४ एकान्त, ५ अन्यत्र, ६ उपधि, ७ अभुक्तक और ८ पृष्ठ प्रहण-इन आठ भेदोंसे होनेवाली चौरीका पूर्वोक्त नी कोटियोंसे त्याग करना चाहिए । इस अभिप्रायको लेकर हतोय अचार्य महाप्रतमें घहत्तर उपयास होते हैं तथा प्रत्येक उपवासको एक-एक पारणा होनेसे बहत्तर ही पारणाएँ होती हैं ॥१०॥ चौथा ब्रह्मचर्य महाप्रत है सो मनुष्य, देव, अचित्त और तिर्यञ्च इन चार प्रकारको स्त्रियों का प्रथम ही सर्शनादि पाँच इन्द्रियों और तदनन्तर पूर्वोक्त नौ कोटियोंसे त्याग करना चाहिए। इस अभिप्रायको लेकर ५४४ =२०४६-१८० एक सौ अस्सी उपवास होते हैं और इतनी ही पारणाएं होती हैं ॥१०॥ पाँचया परिसह त्याग महामत है। सो पार कपाय, नी नोकपाय और एक मिथ्यात्य इन चौदह प्रकारके अन्तरग और दोपाये, (दासी-दाम आदि) चौपाये, (हाथी घोड़ा भादि) गन, अनाज, परम, यर्तन, सुवर्णादिधन, यान (सवारी), शयन भीर आसन-इन दस प्रकारके या दोनों मिलाकर पीयोस प्रकारफे परिप्रहका नौ कोटियोंसे त्याग करना चाहिए । इस अभि- प्रायको लेको परिप्रयाग महायतमें दो सौ सोलह पयास होते हैं और उननी ही पारणाएँ होती हैं ॥१०४-२०॥ पठया गरिमोशन त्याग महामन यद्यपि तेरह प्रकार के पारियों में परिगणित नहीं है तथापि गृहगः सम्यन्धमे मुनियोंपर भी असर आ सकता है अर्थात् गृश्य द्वारा गनिमें बनाई बनुको मुनि जान-यूगकर ग्रहण करे मो उन्हें गत्रिभोजनका दोगमकता है।

चतुत्रिंशः सर्गः श्रार्या भावोपमाध्यवहारप्रतीत्यसम्भावनासुभाषाबाम् । जनपदसंवृतिनामस्थापनारूपा दश नवानाः०७॥ अनुष्टुप फट्चत्वारिंशतोपानपणासमिती मतान् । नवप्नान् विनितुं कार्यास्तावन्त उपवासका: १०८ त्रयोदशविधस्यैव चारित्रस्य विशुद्धये । विधौ चारित्रशुद्धौ स्युरुपवासाः प्रकीर्तिताः ॥१०॥ श्रार्या निर्विकृतिपश्चिमाविकस्थान तथोपवासश्च । भाचाम्ल-भुक्तमेकं तपोविधिस्त्वेकल्याणः ॥११०॥ अनुष्टुप् पकृत्वः कृतावश्यः पञ्चकल्याण उच्यते । चतुर्विशतिसंख्यान् स् कार्यस्तीर्थकरान प्रति 10 तुर्यग्रतोपत्रासैस्तु शीलकल्याणको विधिः । पञ्चविंशतिसंख्येस्तैर्भावनाविधिरिप्यते ॥११२॥ इस प्रकारके रात्रिभोजनका नौ कोरियोंसे त्याग करना चाहिए तथा अनिच्छा-दूसरेकी जबर्दस्तीसे भी रात्रिमें भोजन नहीं करना चाहिए। इस भावनाको लेकर रात्रिभोजन त्याग प्रतमें दश उपवास होते हैं और दश ही पारणाएँ होती हैं । मनोगुप्ति, बचनगुप्ति और कायगुप्ति, इन तीन गुप्तियों तथा ईर्या, आदान, निक्षेपण और प्रतिष्ठापन समिति इन तीन समितियों में प्रत्येकके नौ कोटियोंको अपेक्षा नौ-नौ रपवास होते हैं अर्थात् तीन गुप्तियोंके सत्ताईस उपवास और सत्ताईस पारणाएँ हैं तथा उपरिकथित तीन समितियोंके भी सत्ताईस उपवास और सत्ताईस पारणाएँ जानना चाहिए ॥१०६।। भाषा समितिमें १ भाव सत्य, २ रुपमा सत्य, ३ व्यवहार सत्य, ४ प्रतीत सत्य, ५ सम्भावना सत्य, ६ जनपद सत्य, ७ संवृत्ति सत्य, नाम सत्य, ६ स्थापना सत्य और १० रूप सत्य इन दश 'प्रकार सत्य वचनोंका नौ कोटियोंसे पालन करना पड़ता है। इस अभिप्रायको लेकर भाषा- समितिमें नये उपवास होते हैं तथा इतनी ही पारणाएँ होती हैं ॥१०॥ और एपणा समितिमें नौ कोटियाँसे लगनेवाले छियालिस दोपौंको नष्ट करने के लिए चार सौ चौदह उपवास होते हैं तथा उतनी ही पारणाएँ होती हैं ॥१०॥ इस प्रकार तेरह प्रकार के पारित्रको शुद्ध रसनेके लिए चारित्र शुद्धि व्रतमें सत्र मिलाकर एक हजार दो सौ चौंतीस उपवास कहे हैं तथा इतनी ही पारणाएँ कही गई है। इस प्रतमें छह वर्प दश माह आठ दिन लगते हैं ॥१०॥ एककल्याण विधि-पहले दिन नीरस आहार लेना; दूसरे दिन, दिनके पिछले भागमें अर्ध भाहार लेना, तीसरे दिन एकरयान-इक्काट्ठाना करना अर्थात् भोजनके लिए बैठनेपर एक पार जो भोजन सामने आवे तसे ही महण करना, चौथे दिन उपवास करना और पाँच दिन भाचाम्ल-इमलीके साथ केवल भात ग्रहण करना, यह एक फल्याणककी विधि है ।।११०॥ पन्चकल्याण विधि-जो विधि एककल्याण प्रतमें कही गई है उसे समता, यन्दना आदि आवश्यक कार्य करते हुए पाँच पार करना पञ्चकल्याणक विधि है। यह पञ्च फ्ल्याण विधि चौबीस तीर्थकराको लक्ष्य करके करना चाहिए ॥११॥ शोल करयाणक गिधि-चतुर्थ प्रनचर्य महाप्रतमें जो एफसी अस्सी उपचास, यतलाये ' उनमें उपयाम फर लेनेपर शोउ कल्याणक विधि-वन पूर्ण होता है। एक उपवास एक पारणा, दूसग उपयास दूसरी पारणा, इस क्रमसे करनेपर इस प्रत ३६० दिन लगते हैं। मायनायिधि-हिमादि महाप्रतों में प्रत्येक प्रतकी पाच पाच भावनाएं हैं। एकत्रित फरनेपर पांच प्रतोंको परचीस मायनाएं होती है। उन्हें लरय कर पच्चीस उपवास करना १. पश्निमा सम्मान म.1 पश्चिमाहसियान १० | २ र म., ग. ।

४४२ 4 हरिवंशपुराणे पञ्चविंशतिकल्याणभावनाविधिरत्रतः । तावद्भिरेव योद्धव्यो विद्वद्भिरूपवर्णितः ॥११३॥ सम्यक्त्वविनयज्ञानशीलसत्वश्रुतश्रुताः । समित्येकान्तगुप्तीनां भावना धर्म्यशुक्गाः ॥१४॥ संक्रशेच्छानिरोधस्य संवरस्य च भावनाः । प्रशस्तयोग संवेगकरुणोहगभावनाः ॥११५।। भोगसंसारनिवेदभक्तिवैराग्यमोक्षजः । मैञ्युपेशा प्रमोदान्ताः ख्याताः कल्याणभावनाः ॥११६॥ प्रतीत्य सप्तभूमीनां जघन्यपरमायुषाम् । चतुर्दशोपवासास्तु विधेया विधिवबुधैः ॥११७॥ तिग्गतावपर्याप्तपर्याप्तानां नृणां गतौ । प्रत्येकमपि चस्वार ऐशानान्ते प्रबुद्धयः ॥११८॥ द्वाविंशतिरतस्नूवमच्युतान्तेष्वमी ततः । अवेयकेषु कर्तव्या अष्टादश नवस्वपि ॥११॥ द्वी नवानुदिशेष्वेतौ द्वौ वानुत्तरपञ्चके । भाष्टिरमी सर्व स्युर्मुःखहरणे विधौ ॥१२०॥ नामत्रिणवतित्वादोरुत्तरप्रकृतीः प्रति । ते चरवारिंशदष्टाभिः कर्मक्षयविधौ स तम् ।।१२।। तथा एक-एक उपवासके बाद एक-एक पारणा करना, यह भावना विधि नामका व्रत है । य पचास दिनमें पूर्ण होता है ॥११२॥ पञ्चविंशति कल्याण भावना विधि-पच्चीस कल्याण भावनाएं हैं, उन्हें लक्ष्य क पच्चीस उपवास करना तथा उपवासके बाद पारणा करना यह पञ्चविशति कल्याण भावन व्रत विद्वानोंके द्वारा कहा गया है ॥११३।। १. सम्यक्त्व भावना, २.विनय भावना, ३. ज्ञान भावन ४. शील भावना, ५. सत्य भावना, ६. श्रुत भावना, ७. समिति भावना, ६ एकान्त भावना ६. गुप्तिभावना, १०. ध्यानभावना, ११. शुक्ल ध्यान भावना, १२. संक्लेश निरोध भावना १३ इञ्छा निरोध भावना, १४ संवर भावना, १५. प्रशस्तयोग, १६. संवेग भावना, २७ करुण भावना, १८. उद्वेग भावना, १६ भोगनिर्वेद भावना, २०. संसारनिर्वेद भावना, २१. भुक्ति वैराग्य भावना, २२ मोक्षभावना, २३. मैत्री भावना, २४. उपेक्षा भावना और २५. प्रमोद भावना, ये पच्चीस कल्याण भावनाएँ हैं ॥११४-११६ ॥ दुख हरण विधि-दुःखहरण विधिमें सर्वप्रथम विद्वानोंको सात भूमियोंको जघन्य औः उत्कृष्ट आयुकी अपेक्षा चौदह उपवास करना चाहिए ॥११०॥ तदनन्तर तिर्यश्चगतिक पर्याप्त और अपर्याप्तक जीवोंकी विविध आयुकी अपेक्षा चार उपवास करना चाहिए। उसके बाद मनुष्यगतिके पर्याप्तक और अपर्याप्तक जीवोंको द्विविध भायुकी अपेक्षा चार उपवास करन चाहिए। फिर देवगतिमें ऐशान स्वर्ग तकके दो, उसके आगे अच्युत स्वर्ग तकके वाईस, फिर नौ मवेयकोंके अठारह, नी अनुदिशोंके दो और पश्चानुत्तर विमानोंके दो इस प्रकार सब मिलाकर महसठ उपवास करना चाहिए। इस प्रतमें दो उपवासके बाद एक पारणा होती है। इस तरह असठ उपवास और पानीस पारणा दोनोंको मिलकर यह विधि एफ सौ दो दिनमें पूर्ण होती है। इस विधिके करनेसे सब दुःस दूर हो जाते हैं ।।११८-१२०॥ कर्मक्षय विधि-कर्मक्षय विधिमें नाम फर्मको तेरान प्रकृतियोंको आदि लेकर समस्त फीको जो एक सौ अड़तालीस सत्ता प्रकृतियाँ है उन्हें लक्ष्य फर एक सौ अड़तालीस उपवास फरना चाहिए । इसमें एक उपवासके यार एक पारणा होती है। इस प्रकार उपवास और पारणा दोनोंको मिलाकर दो मी छियानये दिनमें यह प्रत पूर्ण होता है । इस प्रतके प्रभावसे कर्माका क्षय होता है ॥१२॥ १. प्रमुमयो मधेगमा प्ररालप्रयोगमवेग ग०।२ कारणांग गमक०।३.प्रमादान्ता ग. १.४ रामान्ने म । ५. प्रबुस्मन् १ म. प्रबुदयः ग.१६. परमपंग। ७ नामतभिनयादी-म । .

चतुस्त्रिंशः सर्गः ४४३ आर्या कल्याणातिविशेषः प्रतिकार्य: प्रातिहार्यकारणगः । जिनगुणसम्पत्तिस्वैः पञ्चचतुर्विंशदष्टपोटशमिः ॥२२॥ अनुष्ट द्वात्रिंशता चतुःषष्टया अष्टोत्तरशतेन तैः । दिव्यलक्षणपंक्तिः स्यादिव्यातिमहतः परा ॥२३॥ स्या परस्परकल्याणा चतुर्विशतिवारत:। भादौ पष्टोपवासः स्यात्समाप्तावष्टमस्तथा ॥१२॥ जिनेन्द्रगुणसंपत्ति विधि-जिसमें पाँच कल्याणकोंके पाँच, चौंतीस अतिशयोंके चौवीस, आठ प्रातिहायोंके आठ और सोलह कारण भावनाओं के सोलह इस प्रकार नेशठ उपवास किये जावे तथा एक-एक उपवासके बाद एक-एक पारणा की जावे उसे जिनेन्द्र गुण सम्पत्ति व्रत कहते हैं । यह व्रत एक सौ छब्बीस दिनमें पूर्ण होता है । इस व्रतके प्रभावसे जिनेन्द्र भगवान्के गुणांकी प्राप्ति होती है अर्थात् इसका आचरण करनेवाला तीर्थकर होता है ।।१२।। दिव्यलक्षण पंक्ति विधि-बत्तीस व्यञ्जन, चौंसठ कला और एक सौ आठ लक्षण इस प्रकार दो सौ चार लक्षणोंकी अपेक्षा जिसमें दो सौ चार उपवास किये जावे उसे दिव्यलक्षण विधि कहते हैं। इसमें एक उपवासके बाद एक पारणा होती है अतः दोनोंके मिलाकर चार सौ आठ दिनमें यह व्रत पूर्ण होता है। इस व्रतके प्रभावसे यह जीव अत्यन्त महान होता है तथा उसके अत्यन्त श्रेष्ठ दिव्य लक्षणों की पंक्ति प्रकट होती है ।।१२३॥ 'धर्मचक्र विधि-धर्मचक्रमें हजार अराएँ होती हैं। उनमें प्रत्येक अरा की अपेक्षा एक एक उपवास लिया गया है, इसलिए इस प्रतम हजार उपवास हैं तथा स्थान भी हजार है. इसलिए पारणा भी हजार समझनी चाहिए। इस तरह उपवास और पारणा इसमें कुल दो हजार हैं। एक उपवास एक पारणा, पुनः एक उपवास एक पारणा इसी क्रमसे इस व्रतका आचरण करना चाहिए । इस व्रतके आदि और अन्तमें एक एक बेला करना आवश्यक है। यह व्रत दो हजार चार दिनमें समाप्त होता है और इससे धर्म चक्रकी प्राप्ति होती है । परस्पर कल्याण विधि-पाँच कल्याणकोंके पाँच उपवास, आठ प्रातिहायों के आठ और चौंतीस अतिशयों के चौतीस इस प्रकार ये सैंतालीस उपवास हैं। इन सैंतालीसको चौबीस वार गिननेपर जितनी संख्या सिद्ध हो उतने तो इस विधिमें उपवास समझना चाहिए और जितने स्थान हो उतनी पारणा जाननी चाहिए। सैंतालीसको चौबीस वार गिननेसे ग्यारह सौ अहाईस होते हैं, इसलिए इतने तो उपवास समझना चाहिए और स्थान भी ग्यारह सी अट्ठाईस हैं इसलिए इतनी ही पारणा जाननी चाहिए। इस प्रकार इस व्रतमें कुल उपवास और पारणा दो हजार दो सौ छप्पन हैं। इसके आचरण करनेकी विधि एक उपवास एक पारणा पुनः एक उपवास एक पारणा इस प्रकार है। यह प्रत दो हजार दो सौ छप्पन दिनमें समाप्त होता है । इसके प्रारम्भमें एक बेला और अन्तमें एक तेला करना पड़ता है। यह प्रत आचरण करने वालेका कल्याण करने वाला है ॥१२४|| १. धर्मचर विविका वर्णन करनेवाला श्लोक हमारे द्वारा उपलब्ध प्रतियों में नहीं है परन्तु श्रीमान् स गजाधरलालजीने अपने अनुवाटम उसका वर्णन किया है तथा श्लोकका नम्बर भी दिया है अतः उनके द्वारा उपलब्ध प्रतियोम वह श्लोक होगा। इसी भावनासे हमने अनुवादमें उक्त पण्डितजीके अनुवाट. से उक्त व्रतकी विधि अङ्कित की है। २ इस व्रतकी विधि भी पण्डित गजाधरलालजीके अनुवाद के आधारपर ही लिम्बी है। उनके अनुवादमे 'प्रादौ पप्टोपवासः स्यात्समाप्तावष्टमस्तथा' इस पट्टिकका अनुवाद इस प्रतकी आगे बढ़ गया है उसे इसमें शामिल किया गया है। स्व०प० 1 हरिवंशपुराणे विधीनामिह सर्वेषामेषा हि च प्रदर्शना । एकश्चतुर्थकाभिल्यो द्वौ पष्टं तु नयोऽटमः । दशमाद्यास्तथा वेद्याः पण्मास्यन्तोपवासकाः ।।१२५।। श्रार्या पञ्चदशीपर्यन्ता उपवासाः प्रतिपदादितिथिपु कार्याः । बहुभेदा विज्ञया जिनमार्गे सर्वसौख्यसम्पमाः ॥२६॥ भाद्रपदशुक्लपक्षे सप्तम्यामायनन्तफलसुखफलदः । परिनिर्वागारयविधि प्रतिवर्षमुपोपणीयस्तु ॥१२७॥ शालिनी एकादश्यां प्रातिहार्यप्रसिद्धः तुल्यां पल्यैः शं फलत्यस्य चैव । एकादश्यां कृष्णजायामीतिः षट् पूर्वाशं संविधत्ते धनन्तम् ॥१२॥ अनुष्टुप् शुद्धस्थ मार्गशीपस्य तृतीयस्यामनन्तकृत् । विमानपंक्तिवैराज्यः चतुभ्यां पष्ठतो विधिः ॥१२॥ एतेषु विधयः कार्या यथाशक्ति शरीरिभिः । स्वर्गापवर्गसौख्यस्य पारम्पर्येण हेतवः ॥१३०॥ इस प्रकरणमें ऊपर जितनी विधियोंका वर्णन किया गया है उन सबमें सामान्य रूपसे यह दिखा देना आवश्यक है कि जहाँ उपवासके लिए चतुर्थक शब्द आया है वहाँ एक उपवास, जहाँ पष्ठ शब्द आया है वहाँ दो उपवास और जहाँ अष्टम शब्द आया है वहाँ तीन उपवास समझना चाहिए। इसी प्रकार दशमको आदि लेकर छह मासपर्यन्त- के उपवासींकी संज्ञा जाननी चाहिए ।।१२५॥ प्रतिपदासे लेकर पञ्चदशी तककी तिथियों में उपवास करना चाहिए। ये उपवास अनेक भेदोंको लिये हुए हैं और जैन मार्गमें इन्हें सब, प्रकारके सुखोंसे सम्पन्न करनेवाला कहा है ॥१२६॥ प्रतिवर्ष भादों मुदी सप्तमोके दिन उपवास करना चाहिए। यह परिनिर्वाण नामक विधि है तथा अनन्त सुखरूपी फलको देनेवाली है।१२७।। भादों सुदी एकादशीके दिन उपवास करनेसे प्रातिहार्य प्रसिद्धि नामको विधि होती है तथा यह पल्या प्रमाणकाल तक मुखरूपी फलको फलती है। हरएक मासको कृष्ण पक्षकी एकादशियोंके दिन किये हुए छियासी उपवास अनन्त सुखको उत्पन्न करते हैं ॥१२८|| मार्गशीर्ष मुदी तृतीयाके दिन उपवास करना अनन्त मोक्ष फलको देनेवाला है तथा इसी मासकी चतुर्थी के दिन बेला करनेसे विमान पक्ति वैराज्य नामको विधि होती है और उसके फलस्वरूप विमानोंको पंक्तिका राज्य प्राप्त होता है ||१२६|| इन ऊपर कही हुई विधियोम मनुष्योंको यथाशक्ति विधियाँ करनी चाहिए क्योंकि वे साक्षात् और परम्परासे स्वर्ग और मोक्ष सम्बन्धी मुखके कारण १ प्रतिपदादिषु च कार्या-क० । २. पलमुखदः म०1 ३. विंशनि सप्ताधिकाश्चाष्टौ क०, १० • अस्मिन् प्रकरणे क० १० ग० पुस्तकेयु पार्श्वभागे निम्नाङ्किताः श्लोकाः समावद्धाः सन्ति परन्तु रचनाशैथिल्याने प्रत्यागभूताः सन्तोति न प्रनिमान्ति । पश्चात् केनचित् योजिता इति प्रमीयते 140 गजा- घरलालेन तु स्वकृतानुसादे प्रवेगितास्ते-- भाद्रपदकृष्णपक्षे पठया मूर्यप्रभस्त्रयोदश्याम् । चन्द्रप्रमनामा च ज्योतिमाला च पल्यं तु ॥ ततः कृपावादश्या नन्दीश्वर इत्युदीरितानन्तानः। कार्तिकशुद्धतृतीयामधिष्ठिनश्वारि विविधसगरिधिः । भी पगबाधाला न भायेऽपि दियाः श्लोश अनूदिताः येषु कुमारमंभर मुमारविष्यापल्लेखः T: किनुपरमम्त ते का नारलोरिताः, मुम्बईस्य सरस्वतीभपनपुस्त-पि एते लोकान सन्ति ।

चतुस्त्रिशः सर्गः इत्युक्तविधिकर्तासो सुप्रतिष्ठो यतिस्तदा । बबन्ध तीर्थकृन्नाम शुद्धः षोडशकारणैः ॥१३॥ आर्या निशवायष्टगुणा जिनकथिते मोपसत्पथे श्रद्धा । दर्शनविशुद्धिरावस्तीथंकरप्रकृतिकृद्धेतुः ॥१३२॥ ज्ञानादिपु तद्वत्सु च महादरो यः कपायविनिवृपया। तीर्थकरनामहेतुः स विनयसम्पन्नताभिख्यः ।।१३३॥ शीलवतरक्षायां कायमनोवचनवृत्तिरनवद्या । वेद्यो मार्गोयुक्तः स शुद्धः शीलवतेप्वनतिधारः ॥१३॥ भज्ञाननिवृत्तिफले प्रत्यक्षपरोक्षलक्षणज्ञाने । निरयमभियुक्ततोक्तस्तज्ज्ञानोपयोगस्तु ॥१३॥ जन्मजरामरणामयमानसशारीरदुःखसम्भारात् । संसारागीरत्वं संवेगो विषयतृट्छेदी ॥१३॥ आहारामयदानं तदिनभवदुःखमुद्यथायोगम् । संसारदुःखहरणं ज्ञानमहादानमिप्यते त्यागः ॥१३॥ भनिगृहितवीर्यस्य हि विशराह शरीरमशुचि मृतकाभम् । संयोजयतः कार्ये तपोऽपि मार्गानुगावेशः ॥३८॥ भाण्डागारहुताशोपशमनवजातविघ्नमनुपद्य । सन्धारणं हि तपसः साधूनां स्यात्समाधिरिह ।।१३६॥ गुणवरसाधुजनानां क्षुधानृपाव्याधिजनितदुःखस्य । व्यपहरणे व्यापारो वय्यावृत्यं व्यसुद्रव्यः ।।१४०॥ हैं ।।१३०॥ इस प्रकार कही हुई विधियोंके कर्ता सुप्रतिष्ठ मुनिराजने उस समय निर्मल सोलह कारण भावनाओं के द्वारा तीर्थकर नामकर्मका वध किया ॥१३१॥ जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कथित समीचीन मोक्षमार्गमें निःशंकता आदि आठ गुणांसे सहित जो श्रद्धा है उसे दर्शनविशुद्धि कहते हैं । यह तीर्थकर प्रकृतिके बन्धका प्रथम कारण है ॥१३२॥ ज्ञानादि गुणों और उनके धारकोंमें कपायको दूर कर जो महान् आदर करना है वह तीर्थकर प्रकृतिके बन्धमें कारणभूत विनयसम्पन्नता नामकी दूसरी भावना है ॥१३३॥ शीलतोंकी रक्षा मन, वचन और कायकी जो निर्दोष प्रवृत्ति है उसे मार्गमें उद्युक्त पुरुषोंको शुद्ध शोलनतेवनतीचार नामकी भावना जाननी चाहिए ॥१३४।। अज्ञानको निवृत्ति रूप फलसे युक्त तथा प्रत्यक्ष और परोक्ष भेदोंसे सहित मानमें निरन्तर उपयोग रसना सा अभीक्ष्णज्ञानो. पयोग भावना है ॥१३॥ जन्म, जरा, मरण तथा रोग आदि शारीरिक और मानसिक दुःखों के भारसे युक्त संसारसे भयभीत होना सो विषयरूपी सृपाको छेदनेवाली संवेगभावना है ॥१३६।। जिस दिन आहार ग्रहण किया जाता है उस दिन एवं पर्याय सम्बन्धी दुःसको दूर करनेवाला आहारदान, अभयदान और संसारफे दुःसको हरनेवाला ज्ञान महादान शक्तिके अनुसार देना सो त्याग नामकी भावना है ।।१३७|| शक्तिको नहीं छिपानेवाले एवं विनाशीक, अपवित्र और मृतकके समान शरीरफो कार्यमें लगानेवाले पुरुपका मोक्षमार्गके अनुरूप जो उद्यम है यह तप नामकी भावना है ॥१३८॥ भण्डारमें लगी हुई अग्निको उपशान्त फरनेके समान आगत विघ्नोंको नष्टकर साधुजनांके तपरी रक्षा करना सो साधुसमाधि नामकी भावना है ।१३।। गुणवान साधुजनांके सुधा, नृपा, व्याधि आदिसे उत्पन्न दुःसको प्रासुक द्रव्यों के द्वारा दूर करनेका १. शुभरानिमने-म., स. 1 २ मामुक द्रव्यैः (क. ड. टि.) वमुद्रव्यःमः।

४४६ हरिवंशपुराणे अहस्सु योऽनुरागो यश्चाचायें बहुश्रुते यच्च । प्रवचनविनयश्चासौ चातुर्विध्यं भजति भक्तेः ॥१४॥ आवश्यकक्रियाणां पण्णां काले प्रवर्तन नियते । तासां साऽपरिहाणिज्ञेया सामायिकादीनाम् ॥१४२॥ साद्ययोगविरह सामायिकमेकभावगं चित्तम् । गुणकीर्तिस्तीर्थकृतां चतुरादेशितः स्तवकः ॥१४३॥ द्वयासना यासु शुद्धा द्वादशवर्ताः प्रवृत्तिषु प्राज्ञः । सशिरश्चतुरानतिकाः प्रकीर्तिता वन्दना वन्द्याः ||४|| द्रव्ये क्षेत्रे काले भावे च कृतप्रमादनिहरणम् । बाकायमनःशुद्धया प्रणीयते तु प्रतिक्रमणम् ॥१५५॥ भागन्तुकदोपाणां प्रत्याख्यानं तु वर्ण्यतेऽपोहः । कायोत्सर्गः काये मितकाल निर्ममरवं तु ॥१४६।। परमतभेदसमर्थज्ञानतपोजिनमहामहैजंगति । मार्गप्रभावना स्याप्रकाशनं मोसमागस्य ॥१४॥ धेनोरिव निजवत्से सौत्सुक्यधियः सधर्मणि स्नेहः । प्रवचनवन्सलता स्यात्सस्नेहः प्रवचने यस्मात् ||१८|| तीर्थकरनामकर्मणि पोडश तत्कारणान्यमून्यनिशम् | ध्यस्तानि समस्तानि च भवन्ति सभाध्यमानानि ||३|| प्रत्यक्ष करना सो वैयावृत्य भावना है ॥१४०॥ अर्हन्तमें जो अनुराग है, आचार्य में जो अनुराग , है, बहुश्रुत-अनेक शास्त्रों के ज्ञाता उपाध्याय परमेष्ठीमें जो अनुराग है और प्रवचनमे जो विनय है वह क्रमसे अर्हद् भक्ति, आचार्य भक्ति, बहुश्रुत भक्ति और प्रवचन भक्ति नामक चार भावनाएँ हैं ॥१४१॥ सामायिक आदि छह आवश्यक क्रियाओंकी नियत समयमें प्रवृत्ति करना सो आवश्यकापरिहाणि नामक भावना है॥१४२॥ समस्त सावध योगोंका त्यागकर चित्तको एक पदार्थमे स्थिर करना सो सामायिक है। चौबीस तीर्थंकरोंके गुणों का कथन करना सी स्तुति है ॥१४३।। जिन प्रवृत्तियोंमें दो आसन, निर्दोप यारह आवर्त और चार शिरोमतियों की जाती हैं उन्हें विद्वज्जन बन्दनीय वन्दना कहते हैं ॥१४४॥ द्रव्य क्षेत्र काल और भावके विषयम किये हुए प्रमादका मन वचन कायको शुद्धिसे निराकरण करना सो प्रतिक्रमण है ॥१४॥ आगन्तुक- आगामी दोषोंका निराकरण करना प्रत्याख्यान कहलाता है। और निश्चित समय तक शरीरम ममताका त्याग करना कायोत्सर्ग है ॥१४६॥ अन्य मतोंके खण्डन करनेमें समर्थ ज्ञान, तपश्चरण एवं जिनेन्द्र भगवानकी महामह-पूजाओंसे संसारमै मोक्षमार्गका प्रकाश करना मार्ग प्रभावना है ॥१४७|| जिस प्रकार गायका अपने वनडेमे स्नेह होता है उसी प्रकार उत्सुकतासे युक्त घुद्धि- वाले मनुष्यका सहधर्मी भाईम जो रह है उसे प्रवचनवात्सल्य कहते हैं क्योंकि सहधर्मासे जो स्नेह है यह प्रवचनसे हो स्नेह है ॥१४॥ सत्पुरुषोके द्वारा निरन्तर चिन्तन की हुई उक्त मोलह भावनाएँ, पृथक् पृथक् भया समुदाय रूपसे तीर्थकर नामकर्मके यन्धकी कारण हैं ॥१४॥ १ भक्तिम | २ नियने म० । ३. चतुराशितितमः म०, ०, १० | ४ वर्यते यो श म । ५. शालीम०१६. मितायं म०। ७. दि. मध्यमानानि सद्भारमानानि (क.टि.)।

चनुखिशः सर्गः ४४७ शार्दूलविक्रीडितम् प्रैलोक्यासनकापशक्तसुबृहत्पुण्यप्रकृयारमका प्रस्यारयाय स सुप्रतिष्टसुमुनिर्भक्तं ततो मासिकम् । आराध्याथ चतुर्विधां बुधनुतामाराधनां शुद्धी- द्वात्रिंशउजलधिस्थितिः पुरुसुखं स्वर्ग जयन्तं श्रितः ॥१५॥ भुक्वा संसतिसारसौख्यमतुलं तम्राहमिन्द्रोचित सज्ज्ञानत्रयरष्टनेत्रसकलेलोक्यतत्वस्थितिः । ध्युखातो मविता समुद्रविजयाद्देध्यां शिवायां शिवो नेमोशो हरिवंशलतिलको द्वाविंशसंश्यो जिनः ॥१५॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनमेनाचार्यकृती महोपवासविधिवर्णनो नाम चतुर्विंशः सर्गः । इस प्रकार तीनों लोकोंके आसनोंको कम्पित करनेमें समर्थ तीर्थकर प्रकृतिनामक महापुण्य प्रकृतिके बन्ध करनेवाले सुप्रतिष्ठ मुनिराजने, एक मासके आहारका त्याग कर दिया तथा विशुद्ध - युद्धिके धारक हो विद्वज्जनों के द्वारा स्तुत चार प्रकारकी आराधनाओंकी अच्छी तरह भाराधना की जिससे वाईस सागरकी स्थितिके धारक हो विशाल सुखसे युक्त जयन्त स्वर्ग (जयन्त नामक अनुत्तर विमान) में उत्पन्न हुए ॥१५॥ अब जिन्होंने तीन सम्यग् ज्ञान रूपी नेत्रोंसे तीन लोकके पदार्थों की स्थितिको देख लिया है ऐसे सुप्रतिष्ठ मुनिराज, जयन्त विमानमें अहमिन्द्रोंके योग्य, संसारके सारभूत अनुपम सुखका उपभोगकर वहाँ से च्युत होंगे और राजा समुद्रविजयकी शिवा देवीसे हरिवंशरूपी पर्वतके तिलक म्वरूप नेमीश्वर नामके कल्याणकारी बाईसवें तीर्थकर होंगे ॥१५॥ इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें महोपवास विधिका वर्णन करनेवाला चौतीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥३४॥ १. नत-म., प०।२ स्थितः म । ३. मुस्त्या म। ४. टोक्यनेन ।

पञ्चत्रिंशः सर्गः उपेन्द्रवज्रा भरिनेमेश्चरितं निशम्य यदुः परं श्रेगिक संप्रहृष्टः । प्रणम्य भावादतिमुनकवि जगाम कान्तामहितो निशान्ते ॥१॥ यधापुरा तो मधुरामुपुयां यथेष्टमाक्रीडनयातिसक्ती । सुदम्पती तस्थतुरिष्टभोगौ सशङ्ककसेन समयमानौ ॥२॥ यभार गर्भ युगलात्मक सासुदेवकी कसभयस्य हेतुम् । सहायभावो हि विपरयोगान्महाभयस्योपनिपातहेतुः ॥३॥ अथ प्रसूती सुतयुग्ममस्याः सुरेण संकामितमिन्द्रवाश्यात् । सुनेगमेतिश्रुतिना सुभद्रं सुमदिलोद्भूतपुरोक्तधान्याः ॥४॥ प्रजातमात्रं खलु दैवयोगात् सुदृष्टिजायाच्यसुपुप्रयुग्म । स देवकीसूतिगृहे निधाय जगाम देवो निजदेवलोकम् ॥५॥ प्रविश्य कंसः स्वसूसूतिगेहं निरीक्ष्य निर्जीवितजीवयुग्म् । प्रगृय पादेषु निराद सैद्रः शिलातले ताडितवान् सशकः ॥६॥ क्रमेण स द्वन्द्वयुगं प्रयातं निनाय देवोऽप्यलको सुकामाम् । पुनश्च कंसोऽप्यसुविप्रयुक्तमतात्यापूर्ववदेव पापी ॥७॥ पडप्यविघ्ना वसुदेवपुन्नाः स्वपुण्यरक्ष्यास्रवलकातिहयाः पुरोकसंज्ञाः सुखलालितास्ते शनैरवर्धन्त ततोऽतिरूपाः॥८॥ अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इस प्रकार अतिमुक्तक मुनिराजसे भगवान् अरिष्टनेमिका चरित सुनकर वसुदेव बहुत प्रसन्न हुए और भावपूर्वक मुनिराजको नमस्कारकर बी सहित अपने घर चले गये ।। १ ।। जिन्हें भोग अत्यन्त इप्ट थे ऐसे दोनों दम्पति इच्छानुसार क्रीड़ामे आसक्त होते हुए मथुरापुरीमें पहलेके समान रहने लगे और मृत्युकी शङ्कासे शङ्कित कंस इनकी निरन्तर सेवा-शुश्रूषा करने लगा ॥२॥ तदनन्तर देवकीने फैसके भयका कारण युग सन्तान रूप गर्भ धारण किया सो ठोक ही है क्योंकि शत्रुओंमें परस्परके मिल जानेसे जो सहाय भाव उत्पन्न होता है, वह शत्रुके लिए महाभयकी प्राप्तिका कारण हो जाता है ॥३॥ तत्पश्चात् प्रसूति कालके आनेपर जब देवकोके युगल पुत्र उत्पन्न हुए तब इन्द्रको आज्ञासे सुनैगम नामका देव उन उत्तम युगल पुत्रोंको उठाकर सुभदिल नगरके सेठ सुप्टिको स्त्री अलका (पूर्वभवकी रेवती धायका जीव) के यहाँ पहुँचा आया। उसी समय अलकाके भी युलिया पुत्र हुए थे परन्तु भाग्यवश बे उत्पन्न होते हो मर गये थे । नैगम देव उन दोनों मृत पुत्रोंको उठाकर देवकीके प्रसूति गृहमें रख आया और उसके बाद अपने स्वर्ग लोक को चला गया ।। ४-५॥ शङ्कासे युक्त कंसने बहिनके प्रसूतिका गृहमें प्रवेश कर उन दोनो मृतकपुत्रोंको देखा और भीलके समान रौद्रपरिणामी हो पैर पकड़ कर उन्हें शिलातलपर पछाड़ दिया ।।६।। तदनन्तर देवकीने कम क्रमसे दो युगल और उत्पन्न किये सो देवने उन्हें भी पुत्रीकी इच्छा रखने वाली अलका सेठानीके पास भेज दिया। इधर पापी कंसने भी उन निष्प्राण पुत्रोको पहले के समान ही शिलापर पछाड़ दिया ॥७॥ तदनन्तर अपना पुण्य ही जिनकी रक्षा कर रहा था, जो अलका सेठानीके लिए अत्यन्त प्रिय थे, जिनके नृपदत्त, देवपाल १ - दतिमुकिमि० १२ -तिशती ग०, ५०, ड० । ३. मृत ।

पञ्चग्रिंशः सर्गः प्रवर्धमानेवध तत्र तेषु सुदृष्टिसुश्रावकभूतिवृद्धिः । अपूर्वनानाविधवस्तुलाभस्तदात्यशेतापरभूपंभूती ॥९॥ इतोऽपि देवक्यपि मतवाक्यादपाकृनापत्यवियोगदुःखा । शनैः प्रपेदे प्रतिपकलेव दिनोत्तरः पूर्ववदेव कान्तिम् ॥ १०॥ अर्थकदा चन्द्रसिते निशान्ते निशान्तकान्ते शयने शयना । ददर्श सप्तोदयशसिनः सा पदार्थकान् स्वप्न इमान्निशान्ते ॥१॥ प्रदीप्तमुद्यन्तमिनं तमोऽन्तं समञ्चकान्तं शशिनं प्रपूर्णम् । प्रियं सदिग्नागमहाभिषेकां विमानमाकाशतलासमच ॥१२॥ ज्वलबृहज्ज्वालहुताशमुच्चः मुरध्वज रत्नमरीचिचक्रम् । मृगाधिपं चाननमाविशन्तं निशाम्य सौम्या बुबुधे सकरपा ॥१३॥ अपूर्वसुस्वप्नविलोकनारसा सविस्मया हृपतनूरहा तान् । जगी प्रभाते कृतमगलाना समेत्य पस्येऽभिदधे स विद्वान् ॥१४॥ प्रतापविश्वस्तरिपुः सुतस्ते प्रियोऽतिसौभाग्ययुतोऽभिपेकी । दियोऽवतीयांतिरुचिः स्थिरोऽभीभविष्यति विप्रमिनो जगन्याः ॥१५॥ अनीकदत्त, अनीकपाल, शत्रुघ्न और जितशत्रु ये नाम पहले कहे जा चुके थे, जिनका सुस पूर्वक लालन पालन हो रहा था, तथा जो अत्यन्त रूपवान् थे ऐसे वसुदेवके छहों पुत्र धीरे-धीरे वृद्धिको प्राप्त होने लगे ॥८॥ तदनन्तर उन पुत्रोके वृद्धिंगत होनेपर मुदृष्टि सेठको नाना प्रकारकी अपूर्व अपूर्व वस्तुओंका लाभ होने लगा और उसके वैभवकी वृद्धिने उस समय अन्य राजाओके वैभवको भी अतिक्रान्त कर दिया ॥ ६ ॥ इधर पतिके कहनेसे जिसने संतान वियोग जन्य दुःसको दूर कर दिया था ऐसी देवकी भी धीरे धीरे प्रतिपद्की चन्द्रकलाके समान दिनों दिन पहलेकी ही कान्तिको प्राप्त हो गई ।। १०॥ तदनन्तर एक दिन देवको, चन्द्रमाके समान सफेद भवनमें प्रातःकालके समान सुन्दर शय्यापर शयन कर रही थी कि उसने रात्रिके अन्तिम प्रहरमै अभ्युदयको सूचित करनेवाले निम्नलिखित सात पदार्थ स्वप्नमें देखे ॥११॥ पहले स्वप्नमें उसने अन्धकारको नष्ट करनेवाला उगता हुआ सूर्य देखा । दूसरे स्वप्नमें उसीके साथ अत्यन्त सुन्दर पूर्ण चन्द्रमा देखा। तीसरे स्वप्नमें दिग्गज जिसका अभिषेक कर रहे थे ऐसी लक्ष्मी देखी। चौथे स्वप्न में आकाश नलसे नीचे उतरना हुआ विमान देखा। पाँचचे स्वप्नमें बड़ी-बड़ी ज्यालाओंसे युक्त अग्नि देसी । छठवें स्वप्न में ऊंचे आकाशमें रत्नोंकी किरणोंसे युक्त देवों की ध्वजा देसी और सातवें स्वप्नमें अपने मुसमे प्रवेश करता हुआ एक सिंह देखा। इन स्वप्नोंको देखकर सौम्यवदना देवको भयसे काँपती हुई जाग उठी ॥१२-१३॥ अपूर्व एवं उत्तम स्वप्न देसनेसे जिसे विस्मय उत्पन्न हो रहा था, जिसके शरीरमे गेमाच्च निकल आये थे, और जिसने प्रातःकालके समय शगैरपर मङ्गलमय अलंकार धारण कर रकने थे ऐसी देवकीने जाकर पतिसे सब स्वप्न कहे और विद्वान् पति-राजा यमुदेवने इस प्रकार उनका फल कहा ॥१४॥ "हे प्रिये ! तुम्हारे शीघ्र ही एक ऐसा पुत्र होगा जो समस्त पृथिवीका स्वामी होगा। तुमने पहले स्वप्नमे सूर्यको देखा है इससे सूचित्त होता है कि वह अपने प्रतापसे शत्रुओंको नष्ट करने- वाला होगा। दूसरे स्वप्न पूर्ण चन्द्रमा देखा है उसके फलस्वरूप वह सबको प्रिय होगा। तीसरे १. भूपभूमिः म० । २ सूर्यम् । ३ ममन्नकान्त म०1४.इनः सामो । 'समाधिः पतिः स्वामी मतेन्द्र इन ईशिता' इति धनञ्जयः।

१५० हरिवंशपुराणे निशम्य सा स्वप्नफलं स्वभत्स्तथास्त्विति 'प्रीतिमतिप्रपद्य । ध्यवस्थिता गर्भमयत्त चाशु जगद्धित्तं धौरिव तापशान्तये ॥१६॥ यथा यथासौ परिवर्धतेऽस्याः प्रवर्धमानाङ्गमनासुखायाः । तथा तथावर्धत भूतधाभ्यां जनस्य सर्वस्य च सौमनस्यम् ॥१७॥ ररक्ष गर्भ प्रसवव्यपेक्षः स्वसुः स संक्षोभगतस्तु कंसः । दिनानि मासानसमासामा गुणानपेक्ष्यो गणयनलच्यः ॥१८॥ अयोदपादि श्रवणे तु पो ह्यधोक्षजो भाद्रपदस्य शुक्के। पवित्रयन् द्वादशिकां तिथि तामलक्षितः सप्तम एव मासे ॥१६॥ सशङ्खचक्रादिसुलक्षिताङ्गः स्फुरन्महानीलमणिप्रकाशः । स देवकीसूतिगृहं स्वदीप्त्या प्रदीप्तिमान् द्योतयति स्म कृष्णः ॥२०॥ स्त्रपक्षगेहेषु तदाऽऽविरासन् स्वतो निमित्तानि शुभावहानि । विपतगेहेषु भयावहानि प्रभावतस्तस्य नरोत्तमस्य ॥२१॥ तदा च सप्ताहमहातिवर्ष प्रवर्तमाने मिशि जातमानम् । हलो स्वपित्रा विवृतातपत्रं हरिं गृहीत्वा गृहतो निरैद् द्राक् ॥२२॥ स्वप्नमें दिग्गजों द्वार। लक्ष्मीका महाभिपेक देखा है इससे जान पड़ता है कि वह अत्यन्त सौभाग्यशाली एवं राज्याभिषेकसे युक्त होगा। चौथे स्वप्नमें आकाशसे नीचे आता हुआ विमान देखा है उससे प्रकट होता है कि वह स्वर्गसे अवतीर्ण होगा। पाँचवें स्वप्न में देदीप्यमान अग्नि देखी है इसके फल स्वरूप वह अत्यन्त कान्तिसे युक्त होगा। छठवें स्वप्नमें रत्नोंकी किरणों से युक्त देवोंको ध्वजा देखी है इसके फलस्वरूप वह स्थिर प्रकृतिका होगा और सातवें स्वप्नमें मुखमें प्रवेश करता हुआ सिंह देखा है इससे जान पड़ता है कि वह निर्भय होगा ॥१५॥ इस प्रकार पतिके मुखसे स्वप्नीका फल सुनकर 'तथास्तु'-ऐसा हो होगा-कहती हुई वह अत्यधिक प्रीतिको प्राप्त हुई । तदनन्तर जिस प्रकार आकाश, संतापकी शान्तिके लिए जगत् हितकारी मेघको धारण करता है उसी प्रकार उसने शीघ्र ही जगत्का हित करनेवाला गर्भ धारण किया ॥१६॥ जिसके शारीरिक और मानसिक सुसकी वृद्धि हो रही थी ऐसी देवकीका वह गर्भ ज्योज्यों बढ़ता जाता था त्यों-त्यों पृथिवीपर समस्त मनुष्योंका सीमनस्य बढ़ता जाता था ॥१७॥ परन्तु कंसका सोभ उत्तरोत्तर बढ़ता जाता था। फलस्वरूप जिसकी आत्मा अत्यन्त नीच थी, जो गर्भस्य पालकके गुणोकी अपेक्षा नहीं रसता था और जो अलक्ष्यरूपसे गर्भके महीनों तथा दिनीकी गिनती लगाना रहता था ऐसा कंस, प्रसवकी प्रतीक्षा करता हुआ बहिन के गर्भकी रक्षा कर रहा था अर्थात् उसपर पूर्ण देप-रेस रसता था ॥१८॥ सय बालक नी मासमें ही उत्पन्न होते हैं परन्तु कृष्ण प्रवण नक्षत्रमें भाद्रमासके शुक्लपक्षको द्वादशी तिथिको पवित्र करते हुए सातयें ही मासमें अलक्षित रूपसे उत्पन्न हो गये ॥१६॥ जिनका शरीर शङ्क चक्र आदि उत्तमोत्तम लक्षणों से युक्त था, जिनके शरीर से देदीप्यमान महानीलमणिके समान प्रकाश प्रकट हो रहा था और जो प्रष्ट कान्तिसे माहित ये ऐसे कृष्णने अपनी कान्तिसे देवीके प्रसूतिका गृहको प्रकाश मान कर दिया था |२०|| उस समय उम पुरुषोत्तम प्रभाषसे स्नेही मन्धुजनाफे घरोंमें अपने आप अन्ये अच्छे निमित्त प्रकट हुए और शाओंफे घमि भय उत्पन्न करनेवाले निमित्त प्रकट हुए ॥२१॥ पन दिनी सात दिनसे परायर घनघोर या हो रही थी फिर भी उत्पन्न होते हो बालक कृष्णको पलंदयो १ठा लिया और पिता यमुदेवने धनपर छत्ता तान दिया एवं रात्रिके समय १ श्रीम: प्रा.। २. अपत्यादिभमगेम। ३ प्रदोषान् म. प्रिटीपमान ग०।

पञ्चत्रिंशः सर्गः अलशितः कसभः प्रसुप्तः प्रसुप्तपौरे समये पुरस्य स गोपुरद्वारकपाटमन्धि विपाट्य विष्णुक्रमयुग्मसात् ॥२३॥ पयाकणे घ्राणपुटं प्रविष्टे शिशोस्तडिद्वातगभीरनादे । क्षुते चिरञ्जीव जयस्त्रविधनस्त्वमित्यनुश्रुत्य तदोपरिष्टात् ॥२४॥ प्रियोग्रसेनेन नृपेण दत्तां प्रियाशिपं तोषयुतोऽगदीत्तम् । रहस्यरक्षा क्रियतां प्रतीक्ष्य विमुक्तिरस्मात्तव देवकेयात् ॥२५॥ प्रवर्धतां भ्रातृशरीरजायाः सुतोऽयमज्ञातमरेरितीष्टम् । तदौग्रसेनीमभिवन्द्य वाचममू विनिजग्मतुराशु पुर्याः ॥२६।। ज्वलद्विपाणो वृपभः पुरस्ता प्रदीपयन्मार्गमगास तूर्णम् । महानुभावाद्यमुना हरेक बभूव विच्छिन्नमहाप्रवाहा ॥२७॥ धुनी समुत्तीय ततोऽभिगम्य वनं च वृन्दावनमन गोप्टे । सुनन्दगोपं सयशोदमाप्तं क्रमागतं तो निशि रचन्तौ ॥२८॥ समय॑ ताभ्यामहरस्यभेद प्रवर्द्धनीयं निजपुत्रबुद्धया । शिशुं विशालेक्षणमीक्षणानां महामृतं कान्तिमयं सवन्तम् ॥२६॥ ततश्च तरकालभवां यशोदाशरीरजां विश्वसनाय शन्नोः । अरं समादाय समेत्य देव्यै प्रदाय तो तस्थतुरप्रलक्ष्यौ ॥३०॥ ही दोनों शीघ्र ही घरसे बाहर निकल पड़े ॥२२॥ उस समय समस्त नगरवासी सो रहे थे तथा कंसके सुभट भी गहरी नीदमें निमग्न थे इसलिए कोई भी उन्हें देख नहीं सका। गोपुर द्वारपर आये तो किवाड़ बन्द थे परन्तु श्रीकृष्णके चरणयुगलका स्पर्श होते ही उनमें निकलने योग्य सन्धि हो गई जिससे सब बाहर निकल आये ॥२३॥ उस समय पानीकी एक बूंद घालकको नाकमें घुस गई जिससे उसे छींक आ गई । उस छींकका शब्द बिजली और वायुके शब्दके समान अत्यन्त गम्भीर था। उसी समय ऊपरसे भावाज आई कि 'तू निर्विघ्न रूपसे चिरकाल तक जीवित रह ।। गोपुर द्वारके ऊपर कंसके पिता राजा उग्रसेन रहते थे। उक्त भाशीर्वाद उन्होंने दिया था। उनके इस प्रिय आशीर्वादको सुनकर बलदेव तथा वसुदेव बहुत प्रसन्न हुए और उग्रसेनसे कहने लगे कि हे पूज्य ! रहस्यकी रक्षा की जाय । इस देवकीके पुत्रसे तुम्हारा छुटकारा होगा ॥२४-२५॥ इसके उत्तर में उग्रसेनने स्वीकृत किया कि 'यह हमारे भाईको पुत्रीका पुत्र शत्रुसे अज्ञात रहकर वृद्धिको प्राप्त हो ।' उस समय उग्रसेनके उक्त वचनको प्रशंसा कर दोनों शीघ्र ही नगरीसे बाहर निकल गये ॥२६॥ उस समय, जिसके सींग देदीप्यमान थे ऐसा एक बैल आगे-आगे मार्ग दिखाता हुआ बड़े वेगसे जा रहा था। यमुनाका अखण्ड प्रवाह बह रहा था परन्तु श्रीकृष्णके प्रभावसे उसका महाप्रवाह शीघ्र ही सण्डित हो गया ॥२७॥ तदनन्तर नदीको पार कर वे वृन्दावनको ओर गये। वहाँ गाँव के बाहर सिरका अपनी यशोदा स्त्रीके साथ सुनन्द नामका गोप रहता था। वह वंश परम्परासे चला आया इनका बड़ा विश्वासपात्र व्यक्ति था। घलदेव भोर वसुदेवने रात्रिमें ही उसे देखा और दोनोंको पुत्र सौंपकर कहा कि देखो भाई ! यह पुत्र विशाल -नेत्रीका धारक है तथा नेत्रोके लिए कान्ति रूपी महाअमृतको वर्षानेवाला है। इसे अपना पुत्र समझकर पढ़ाओ और यह रहस्य किसीको प्रक्ट न हो सके इस बात का ध्यान रक्सो ॥२८-२६॥ सदनन्तर उसी समय उत्पन्न हुई यशोदाको पुत्रीको लेकर दोनों शीन ही वापिस आ गये और शत्रुको विश्वास दिलानेके लिए उसे रानी देवकीके लिए देकर गुप्त रूपसे स्थित हो गये ॥३०॥ १ पूज्य ! प्रतीद म।

४५० हरिवंशपुराणे निशम्य सा स्वप्नफलं स्वमतुस्तथास्विति प्रीतिमतिप्रपद्य । व्यवस्थिता गर्भमधत्त चाशु जगद्धितं चौरिव तापशान्त्यै ॥१६॥ यथा यथासौ परिवर्धतेऽस्याः प्रवर्धमानागमनःसुखायाः । तथा तथावर्धत भूतधाग्यां जनस्य सर्वस्य च सौमनस्यम् ॥१७॥ ररक्ष गर्भ प्रसवव्यपेक्षः स्त्रसुः स संक्षोभगतस्तु कंसः । दिनानि मासानसमञ्जसारमा गुणानपेक्ष्यो गणयनलक्ष्यः ॥१६॥ अथोदपादि श्रवणे तु पक्षे ह्यधोक्षजो भाद्रपदस्य शुक्के। पवित्रयन् द्वादशिकां तिथिं तामलतितः सप्तम एव मासे ॥१६॥ सशङ्खचक्रादिसुलक्षिताः स्फुरन्महानीलमणिप्रकाशः । स देवकीसूतिगृहं स्वदीप्त्या प्रदीप्तिमान् घोत यति स्म कृष्णः ॥२०॥ स्वपसगेहेषु तदाऽऽविरासन् स्वतो निमित्तानि शुभावहानि । विपचगेहपु भयावहानि प्रभावतस्तस्य नरोत्तमस्य ॥२१॥ तदा च सप्ताहमहातिवर्ष प्रवर्तमाने निशि जातमात्रम् । हली स्वपिना विस्तातपत्रं हरिं गृहीत्वा गृहतो निरेद् द्राक् ॥२२॥ स्वप्नमें दिग्गजों द्वारा लक्ष्मीका महाभिषेक देखा है इससे जान पड़ता है कि वह अत्यन्त सौभाग्यशाली एवं राज्याभिषेकसे युक्त होगा। चौथे स्वप्नमें आकाशसे नीचे आता हुआ विमान देखा है उससे प्रकट होता है कि वह स्वर्गसे अवतीर्ण होगा। पाँचवें स्वप्नमें देदीप्यमान अग्नि देखी है इसके फल स्वरूप वह अत्यन्त कान्तिसे युक्त होगा। छठवें स्वप्न में रत्नोंकी किरणों से युक्त देयोंकी ध्वजा देसी है इसके फलस्वरूप वह स्थिर प्रकृतिका होगा और सात स्वप्नमें मुसमें प्रवेश करता हुआ सिंह देखा है इससे जान पड़ता है कि वह निर्भय होगा ॥१५॥ इस प्रकार पतिके मुससे स्वप्नीका फल सुनकर 'तथास्तु'--ऐसा ही होगा-कहती हुई वह अत्यधिक प्रीतिको प्राप्त हुई । तदनन्तर जिस प्रकार आफाश, संतापकी शान्तिके लिए जगत् हितकारी मेघको धारण करता है उसी प्रकार उसने शीघ्र ही जगत्का हित करनेवाला गर्भ धारण किया ॥१६॥ जिसके शारीरिक और मानसिक मुखकी वृद्धि हो रही थी ऐसी देवकीका वह गर्भ ज्यों-ज्यों यदता जाता था त्यों-त्यों पृथिवीपर समरत मनुष्योंका सीमनस्य चढ़ता जाता था ॥१७॥ परन्तु कमका क्षोभ उत्तरोत्तर बढ़ता जाना था। फलस्वरूप जिसकी आत्मा अत्यन्त नीच थी, जो गर्भस्य पालयके गुणोंकी अपेक्षा नहीं रसता था और जो भलक्ष्यरूपसे गर्भके महीनों तथा दिनोंकी गिनती लगाता रहता था ऐसा पंस, प्रमयको प्रतीक्षा करता हुआ यहिन के गर्भको रक्षा कर रहा था अर्थात एसपर पूर्ण देश-रेय ग्यता या ॥१॥ सब वालक नौ मासमें दो उत्पन्न होते हैं परन्तु कृष्ण प्रवण नक्षत्रमें भाद्रमासके शुक्लपक्षको द्वादशी तिथिको पवित्र करते हुए मानये ही माममै अलक्षित रूपमे उत्पन्न हो गये ||१|| जिनका शरीर शपक आदि उत्तमोत्तम माम युक्न था, जिनके शगग्गे देदीप्यमान महानीलमणिके समान प्रकाश प्रकट हो रहा था भोर जो प्रष्ट कान्तिसे महिन थे ऐसे फटने अपनी कान्तिम देवफीफे प्रसूतिफा गृहको प्रकाश- मान कर दिया था nran इस समय उम पुरोत्तम प्रमापसे स्नेही बन्धुजनाफे धर्म अपने भार अन् अन्ये निमित्त प्रकट हुए और शत्रुओंके घर्गम भय उत्पन्न करनेवाले निमित्त प्रकट एप II गहिनी मान दिनमे घराया पापार वर्षा हो रही थी फिर भी उत्पन्न होते ही पालक हमको पलको उठा लिया और पिना यमुदयो मनपर पता तान दिया एवं गनिके समय १ मी): एम.। २. अमीरपादिभमा मागन् म. । प्रसीमान् ग. ।

पन्चत्रिशः सर्गः ४५३ १ जगावसौ कोऽपि ममास्ति वैरी प्रवर्धमानः कचिदप्यलक्ष्यः । तमाशु यूयं परिमृग्य मृत्योर्मुखे कुरुध्वं करुणानपेक्षाः ॥४०॥ इतीरितं ताः प्रतिपद्य याताः प्रदृश्य चैकोप्रशकुन्तरूपा । प्रनुद्य हन्त्री हरिणात्ततुण्डा प्रचण्हनादा प्रणनाश भीता ॥४॥ कुपूतना पूतनभूतमूर्तिः प्रपाययन्ती सविपस्तनौ तम् । स देवताधिष्टिननिष्ठुरास्यो व्यरीरटरचूचुकचूषणेन ॥४२॥ स्वपनिषीदन्नुरसा प्रसर्पन पदं ददन्नस्खलितं प्रधावन् । कलाभिलापो नवनीतमद्यनजीगमजिष्णुरहदिनानि ॥१३॥ अनःशरीरामपरा पिशाची स चापतन्तीं घनपादघाती । विभोर्बभनाअनशैलशोभी पृथूदयस्तां पृथुकोऽपि कोऽपि ॥४४॥ यशोदया दामगुणेन जातु यदृच्छयोदूखलबद्धपादः । निपीडयन्तौ रिपुदेवतागौ न्यपातयत्तौ जमलार्जुनौ सः ॥४५|| सुनन्दगोपेन यशोदया च सुदृष्टशक्तिः शुभशैशवादौ । सविस्मिताभ्यामभिनन्धमानो वालः स दृश्यो वृधे वनान्ते ॥४॥ स गोपति दृप्तमशेषघोपमितस्ततो दृष्टमुदअधोषम् । महार्णवं वा प्रतिपूर्णयन्तं जघान कण्ठो द्वलनात्सुकण्ठः ॥४७॥ कंससे कहने लगी कि ये हम सब तुम्हारे पूर्व भवके तपसे सिद्ध हुई देवियाँ हैं । आपका जो कार्य हो वह कहिए, वलभद्र और नारायणको छोड़कर कंसका कौन-सा शत्रु क्षणभरमै नष्ट करने योग्य है सो वताओ ॥३८-३॥ कंसने कहा कि हमारा कोई वैरी कहीं गुप्त रूपसे बढ़ रहा है सो तुमलोग दयासे निरपेक्ष हो शीघ्र ही पता लगाकर उसे मृत्युके मुखमें करो-उसे मार डालो ॥४०॥ इस प्रकार कसके द्वारा कथित बातको स्वीकृत कर वे देवियाँ चली गई। उनमेसे एक देवी शीघ्र ही उग्र-भयंकर पक्षीका रूप दिखाकर आई और चोंच द्वारा प्रहार कर बालक कृष्णको मारनेका प्रयत्न करने लगी परन्तु कृष्णने उसकी चोंच पकड़कर इतनी जोरसे दबाई कि वह भयभीत हो प्रचण्ड शब्द करती हुई भाग गई ॥४१॥ दूसरी देवी प्रपूतन भूतका रूप रखकर कुपूतना बन गई और अपने विप सहित स्तन उन्हें पिलाने लगी। परन्तु देवताओंसे अधिष्ठित होनेके कारण श्रीकृष्णका मुख अत्यन्त कठोर हो गया था इसलिए उन्होंने स्तनका अप्रभाग इतने जोरसे चूसा कि वह बेचारी चिल्लाने लगी ॥४२॥ बालक कृष्ण कभी तो सोता था, कभी बैठता था, कभी छातीके वल सरकता था, कभी लड़सड़ाते पैर उठाता हुआ चलता था, कभी दौड़ा-दौड़ा फिरता था, कभी मधुर आलाप करता था और कभी मक्खन खाता हुआ दिन-रात व्यतीत करता था ॥४३॥ तीसरी पिशाची शकट का रूप रखकर उनके सामने आई परन्तु कृष्ण बालक होने पर भी अत्यन्त निर्भय थे, अजनगिरिके समान शोभायमान थे और अत्यधिक अभ्युदयको धारण करनेवाले कोई अनिर्वचनीय पुरुष थे इसलिए उन्होंने जोरको लात मारकर ही उसे नष्ट कर दिया ॥४४॥ किसी दिन उपद्रयकी अधिकताके कारण यशोदाने कृष्णका पैर रस्सीसे कसकर उखलीमें बाँध दिया था उसी दिन शत्रुको दो देवियाँ जमल और अर्जुन वृक्षका रूप रसकर, उन्हें पीड़ा पहुंचाने लगी परन्तु कृष्णने उस दशाम भी “दोनों देवियोंको गिरा दिया-मोर भगाया ॥४५॥ शुभ बाल्यकालके प्रारम्भमें ही सुनन्दगोप और यशोदनि जिसकी अद्भुत शक्ति देखी थी तथा आश्चर्यसे चकित हो जिसकी प्रशंसा की थो ऐसा वह दर्शनीय-मनोहर वालक वनके मध्यमें बढ़ने लगा ॥४६॥ एक दिन छठवीं देवी १. भूपणेन म०। २. ददन्म स्खनितं क.. ३. अतः सरोरा म.। शकटरूपामित्यर्थः । ४. कोशी ग०। ५ मुद्दष्टिशक्तिः ग०। ६. वनान्तरे ग० ।

. हरिवंशपुराणे स्वमुः प्रसूति प्रतिविध कंमः प्रसूत्यगार विणः प्रविश्य । विलोक्य वालाममलाममुष्याः पतिः कदाचित्प्रभवेदरिम ॥३१॥ विचिन्त्य शशाकुलितस्तदेति निरस्तकोपोऽपि स दीर्घदर्शी । स्वयं समादाय करेण तस्याः प्रणुध नासा 'चिपिटींचकार ।।३२।। R देवकीमानसतापकारी सुतान्तदर्शी क्लि निवृतारमा । भतिष्ठदन्ततिरोदभावः सुखेन तावरकतिचिद्दिनानि ॥३३॥ ततो धजस्थः कृतजातकर्मा स्तनंधयोऽसौ कृतकृष्णनामा । प्रवर्धते नन्दयशोदयोस्तु प्रवर्धयन् प्रीतिमभूतपूर्वाम् ॥३॥ गदासिचक्राशशङ्खपद्मप्रशस्तरेसारुणपाणिपादः । स गोपगोपीजनमानसानि सकाममुत्तानशयो जहार ॥३५।। सुरूपमिन्दीवरवर्णशोभं स्तनप्रदानव्यपदेशगोप्यः । भहंयवा पूर्णपयोधरास्तमतृप्तनेत्राः पपुरेकतानम् ॥३६॥ इतः कदाचिद्वरुणेन कंसो निमित्तविझन हितैषिणोकः । नृपंधते ते रिपुरत्र कश्चित्पुरे वने वा परिमृग्यतां सः ॥३७॥ ततोऽएमास्थानशनं तपोऽसौ चकार कंसो रिपुनाशत्रुधा। पुराभ्युपेतार्थसमर्थनाय सुदेवताः मोचुरुपे य तास्तम् ॥३८॥ पुरातपासाधितदेवतास्ता इमा वयं ते वद वस्तु कृत्यम् । बिहाय शीरायुधचक्रपाणी क्षणेन कः कसरिपुर्निरस्यः ॥३६॥ तदनन्तर बहिनको प्रसूतिका समाचार पाकर निर्दय कंस प्रसूतिका गृहर्म घुस गया । वहाँ निर्दोष कन्याको देखकर यद्यपि इसका क्रोध दूर हो गया था तथापि दीर्घदर्शी होनेके कारण उसने विचार किया कि कदाचित् इसका पति मेरा शत्रु हो सकता है। इस शङ्कासे आकुलित होकर उसने उस कन्याको स्वयं उठा लिया और हाथसे मसलकर उसकी नाक चपटी कर दी ॥३१-३२।। इस प्रकार देवकीके मनको संताप करनेवाले कंसने जब देखा कि अब इसके पुत्र होना बन्द हो गया है तन यह संतुष्ट हो हृदयकी क्रूरताको छिपाता हुआ कुछ दिनों तक सुखसे निवास करता रहा ॥३३।। तदनन्तर जिसका जातसंस्कार कर कृष्ण नाम रक्खा गया था ऐसा ब्रजवासी बालक नन्द और यशोदाको अभूतपूर्व प्रीतिको बढ़ाता हुआ सुखसे बढ़ने लगा ॥३४॥ जब वह बालक चित्त पड़ा हुआ गदा, खड्ग, चक्र, अङ्कुश, शङ्ख तथा पद्म आदि चिह्नोंकी प्रशस्त रेखाओंसे चिह्नित लाल-लाल हाथ पैर चलाता श तर गोप और गोपियोंके मनको बरबस खींच लेता था ॥३५॥ नील कमल जैसी सुन्दर शोभाको धारण करनेवाले उस मनोहर बालकको, पूर्ण स्तनोको धारण करनेवाली गोपिकाएँ स्तन देनेके बहाने अतृप्त नेत्रोसे टकटकी लगाकर देखती रहती थीं ॥३६॥ इधर किसी दिन कंसके हितैषी वरुण नामक निमित्तज्ञानीने उससे कहा कि राजन ! यहाँ कहीं नगर अथवा धनमें तुम्हारा शत्रु बढ़ रहा है उसकी खोज करनी चाहिए ॥३७॥ तद- नन्तर शत्रुके नाशकी भावनासे कंसने तीन दिनका उपवास किया सो पूर्व भवमें इसने जिन- देवियोंको यह कहकर वापिस कर दिया था कि अभी कुछ काम नहीं है अगले भवमें आवश्यकता पड़े तो सहायता करना। वे देवियों पूर्व स्वीकृत कार्यको सिद्ध करनेके लिए आकर २ विगता धृणा दया यस्य सः वेशृणः म०, ग०। ३. चिपिटींचकार म । ४. बलभद्रनारायणी मुक्त्वा । १ विज्ञ म.

पम्चतिशः सर्गः जगावसौ कोऽपि ममास्ति वरी प्रवर्धमानः क्वचिदप्यलच्या। तमाशु यूयं परिमृग्य मृत्योर्मुखे कुरुध्वं करुणानपेक्षाः ॥४०॥ इतीरितं ताः प्रतिपद्य याताः प्रदश्य चैकोप्रशकुन्तरूपा । अनुय हन्त्री हरिणात्ततुण्डा प्रचण्डनादा प्रणनाश भीता ॥४॥ कुपूतना पूतनभूतमूर्तिः प्रपाययन्ती सविपस्तनौ तम् । स देवताधिष्टितनिष्ठुरास्यो व्यरीस्टच्चूचुकचूषणेन ॥४२॥ स्वपग्निपीदन्नुरसा प्रमपन पदं ददन्नस्खलितं प्रधावन् । कलाभिलापो नवनीतमद्यन्नीगमजिष्णुरहदिनानि ।।३।। अनःशरीरामपर पिशाची स चापतन्ती धनपादघाती । विभीर्यभनाञ्जनशैलशोभी पृथूदयस्ता पृथुकोऽपि कोऽपि ।।४४|| यशोदया दामगुणेन जातु यहच्छयोदूखलबद्धपादः । निपीडयन्ती रिपुदेवतागौ न्यपातयत्तौ जमलार्जुनौ सः ॥४५|| सुनन्दगोपेन यशोदया च सुदृष्टशक्तिः शुभशैशवादी। सविस्मिताभ्यामभिनन्द्यमानो बालः स दृश्यो ववृधे वनान्ते ॥४६॥ स गोपति समशेपघोपमितस्ततो दृष्टमुदप्रधोपम् । महार्णवं वा प्रतिपूर्णयन्तं जघान कण्ठोद्वलनात्सुकण्ठः ॥४७॥ कंससे कहने लगी कि ये हम सब तुम्हारे पूर्व भवके तपसे सिद्ध हुई देवियाँ हैं । आपका जो कार्य हो वह कहिए, बलभद्र और नारायणको छोड़कर कंसका कौन-सा शत्रु क्षणभर में नष्ट करने योग्य है सो बताओ ।।३८-३।। कंसने कहा कि हमारा कोई वैरी कहीं गुप्त रूपसे बढ़ रहा है सो तुमलोग दयासे निरपेक्ष ही शीघ्र ही पता लगाकर उसे मृत्युके मुखमें करो-उसे मार डालो ।।४।। इस प्रकार कंसके द्वारा कथित यातको स्वीकृत कर वे देवियाँ चली गई। उनमें से एक देवी शीव हो उग्र-भयंकर पक्षीका रूप दिखाकर आई और चौच द्वारा प्रहार कर बालक कृष्णको मारनेका प्रयत्न करने लगी परन्तु कृष्णने उसको चोंच पकड़कर इतनी जोरसे दवाई कि वह भयभीत हो प्रचण्ड शब्द करती हुई भाग गई ॥४१॥ दूसरी देवी प्रपूतन भूतका रूप रखकर कुपूतना वन गई और अपने विप सहित स्तन उन्हें पिलाने लगी। परन्तु देवताओंसे अधिष्ठित होने के कारण श्रीकृष्णका मुख अत्यन्त कठोर हो गया था इसलिए उन्होंने स्तनस अप्रभाग इतने जोरसे चूसा कि वह वेचारी चिल्लाने लगी ॥४२॥ बालक कृष्ण कभी तो सोता था, कभी बैठता था, कभी छातीके वल सरकता था, कभी लड़खड़ाते पैर उठाता हुआ चलता था, कभी दौड़ा-दौड़ा फिरता था, कभी मधुर आलाप करता था और कभी मक्खन खाता हुआ दिन-रात व्यतीत करता था ॥४३॥ तीसरी पिशाची शकटका रूप रसकर उनके सामने आई परन्तु कृष्ण बालक होने पर भी अत्यन्त निर्भय थे, अजनगिरिक समान शोभायमान थे और अत्यधिक अभ्युदयको धारण करनेवाले कोई अनिर्वचनीय पुरुप थे इसलिए उन्होंने जोरको लात मारकर ही उसे नष्ट कर दिया ॥४४॥ किसी दिन उपद्रवकी अधिकताके कारण यशोदाने कृष्णका पेर बस्सीसे कसकर उसलीमें बाँध दिया था उसी दिन शत्रुकी दो देवियाँ जमल और अर्जुन वृक्षका रूप रसकर उन्हें पीड़ा पहुँचाने लगीं परन्तु कृष्णने उस दशामें भी "दोनो देवियों को गिरा दिया-मार भगाया॥४५|| शुभ बाल्यकाल के प्रारम्भमें ही मुनन्दगोप और यशोनि जिसकी अद्भुत शक्ति देसी थी तथा आश्चर्यसे चकित हो जिसकी प्रशंसा की थी ऐसा वह दर्शनीय-मनोहर बालक वनके मध्य में बढ़ने लगा ॥४६॥ एक दिन छठयी देवी १. भूषणेन म.. २. ददन्मस्वरितं क.। ३ अतः शरीरां म । शक्टरूपामित्यर्थः । ४. कोपी ग०। ५ मुदृष्टिशक्तिः ग०। ६. वनान्तरे ग० ।

हरिवंशपुराणे स्वसुः प्रमूर्ति प्रतिविध कंसः प्रसूत्यगार विणः प्रविश्य । विलोभ्य बालाममलाममुख्याः पतिः कदाचित्प्रभवेदरिमें ॥३॥ विचिन्त्य शङ्काकुलितस्तदेति निरस्तकोपोऽपि स दीर्घदी। स्वयं समादाय करेण तस्याः प्रणुद्य नासां चिपिटरीचकार ॥३२॥ स देवकीमानसतापकारी सुतान्तदर्शी किल नितारमा । भतिष्ठदन्तहितरौदभावः सुखेन तावस्कतिचिहिनानि ॥३३॥ ततो ब्रजस्थः कृतजातकर्मा स्तनधयोऽसौ कृतकृष्णनामा । प्रवर्धते नन्दयशोदयोस्तु प्रवर्धयन् प्रीतिमभूतपूर्वाम् ॥३४॥ गदासिचक्राशशद्धपद्मप्रशस्तरेखारुणपाणिपादः । स गोपगोपीजनमानसानि सकाममुतानशयो जहार ॥३५।। सुरूपमिन्दीवरवर्णशोभं स्तनप्रदानव्यपदेशगोप्यः । अहंयवः पूर्णपयोधरास्तमतृप्तनेत्राः पपुरेकतानम् ॥३६॥ इतः कदाचिद्वरुणेन कसो निमित्तविज्ञेन हितैपिणोक्तः । नृपंधने ते रिपुरन कश्चिापुरे वने वा परिमृग्यतां सः ॥३७॥ ततोऽष्टमाख्यानशनं तपोऽसौ चकार कंसो रिपुनाशबुद्धधा। पुराभ्युपेतार्थसमर्थनाय सुदेवताः प्रोनुरुपेत्य तारतम् ॥३८॥ पुरातपःसाधितदेवतास्ता इमा वयं ते वद वस्तु कृयम् । विहाय शीरायुधचक्रपाणी क्षणेन का कंपरिपुर्निरस्यः ॥३६।। तदनन्तर बहिनको प्रसूतिका समाचार पाकर निर्दय कंस प्रसूतिका गृहमे घुस गया। यहाँ निर्दोष कन्याको देखकर यद्यपि इसका क्रोध दूर हो गया था तथापि दीर्घदर्शी होनेके कारण उसने विचार किया कि कदाचित् इसका पति मेरा शत्रु हो सकता है । इस शङ्कासे आकुलित होकर उसने उस कन्याको स्वयं उठा लिया और हाथसे मसलकर उसकी नाक चपटी कर दी ॥३१-३।। इस प्रकार देवकीके मनको संताप करनेवाले कंसने जब देखा कि अब इसके पुत्र होना बन्द हो गया है तब वह संतुष्ट हो हृदयकी क्रूरताको छिपाता हुआ कुछ दिनों तक मुखसे निवास करता रहा ॥३३॥ तदनन्तर जिसका जातसंस्कार कर कृष्ण नाम रक्पा गया था ऐसा ब्रजवासी बालक नन्द और यशोदाको अभूतपूर्व प्रीतिको बढ़ाता हुआ सुखसे बढ़ने लगा ॥३४॥ जब वह बालक चित्त पड़ा हुआ गदा, खड्ग, चक्र, अङ्कुश, शत तथा पद्म आदि चिह्रींकी प्रशस्त रेखाओंसे चिह्नित लाल लाल हाथ पैर चलाता था तय गोप और गोपियोके मनको बरबस खींच लेता या ॥३५।। नील कमल जैसी सुन्दर शोभाको धारण करनेवाले उस मनोहर चालकको, पूर्ण स्तनांको धारण करनेवाली गोपिकाएँ स्तन देनेके बहाने अतृप्त नेत्रोंसे टकटकी लगाकर देखती रहती थीं ॥३६॥ इधर किसी दिन सके हितैपी वरुण नामक निमित्तज्ञानीने उससे कहा कि राजन् ! यहाँ यहीं नगर अथवा वनमें तुम्हारा शत्रु बढ़ रहा है उसको सोज करनी चाहिए ॥३७॥ तद. नन्तर शत्रुके नाशकी भावनासे कंसने तीन दिनका उपवास किया सो पूर्व भवमें इसने जिन देवियाको यह कहकर वापिस कर दिया था कि अभी कुछ काम नहीं है अगले भवमें आवश्यकता पड़े तो सहायता करना। वे देवियों पूर्व स्वीकृत कार्यको सिद्ध करने के लिए आकर १ शिम २ विगता घृणा दया यस्य सः णिः म०, ग.। ३. विपियोचमार म. ! ४. यसमदनारायणी मुस्त्या ।

पम्चनिशः सर्गः ४५३ जगावसौ कोऽपि ममास्ति वैरी प्रवर्धमानः कचिदप्यलक्ष्यः । तमाशु यूयं परिमृग्य मृत्योर्मुखे कुरुध्वं करुणानपेक्षाः ॥४०॥ इतीरितं ताः प्रतिपद्य याताः प्रदृश्य चैकोग्रशकुन्तरूपा । अनुद्य हन्त्री हरिणात्तगुण्डा प्रचण्डनादा प्रणनाश भीता ॥४॥ कुपूतना पूतनभूतमूर्तिः प्रपाययन्ती सविपस्तनौ तम् । स देवताधिष्टितनिष्ठुरास्यो व्यरीस्टच्चूचुकचूपणेन ॥४२॥ स्वपन्निपीदन्नुरसा प्रसपन पदं ददन्नस्खलितं प्रधावन् । कलाभिलापो नवनीतमद्यन्नजीगमज्जिष्णुरहदिनानि ।।४३॥ भैनःशरीरामपरा पिशाची स चापतन्ती घनपाघाती । विभिनाक्षनशैलशोभी पृथूदयस्तां पृथुकोऽपि कोऽपि ॥४४॥ यशोदया दामगुणेन जातु यहच्योदूखलबद्धपादः । निपीडयन्तौ रिपुदेवतागौ न्यपातयत्ती जमलार्जुनौ सः ॥४५॥ सुनन्दगोपेन यशोदया च सुदृष्टशक्तिः शुभशैशवादी। सविस्मिताभ्यामभिनन्द्यमानो बालः स दृश्यो ववृधे वनान्ते ॥४६॥ स गोपति समशेपघोपमितस्ततो दृष्टमुदग्रघोषम् । महार्णवं वा प्रतिपूर्णयन्तं जघान कण्ठो द्वलनात्सुकण्ठः ॥४७।। कंससे कहने लगी कि ये हम सब तुम्हारे पूर्व भवके तपसे सिद्ध हुई देवियाँ हैं । आपका जो कार्य हो वह कहिए, वलभद्र और नारायणको छोड़कर कंसका कौन-सा शत्रु क्षणभरमें नष्ट करने योग्य है सो बताओ ।।३८-३६।। कंसने कहा कि हमारा कोई वैरी कहीं गुप्त रूपसे बढ़ रहा (है सो तुमलोग दयासे निरपेक्ष हो शीघ्र ही पता लगाकर उसे मृत्युके मुखमें करो-उसे मार डालो ॥४०॥ इस प्रकार कंसके द्वारा कथित यातको स्वीकृत कर वे देवियाँ चली गई। उनमसे एक देवी शीय ही उग्र-भयंकर पक्षीका रूप दिखाकर आई और चोच द्वारा प्रहार कर चालक कृष्णको मारनेका प्रयत्न करने लगी परन्तु कृष्णने उसकी चोंच पकड़कर इतनी जोरसे दवाई कि वह भयभीत हो प्रचण्ड शब्द करती हुई भाग गई ॥४१॥ दूसरी देवी प्रपूतन भूतका रूप रखकर कुपूतना वन गई और अपने विप सहित स्तन उन्हें पिलाने लगी। परन्तु देवताभीसे अधिष्ठित होने के कारण श्रीकृष्णका मुख अत्यन्त कठोर हो गया था इसलिए उन्होंने स्तनमा अग्रभाग इतने जोरसे चूसा कि वह वेचारी चिल्लाने लगी ॥४२॥ वालक कृष्ण कभी तो सोता था, कभी धैठता था, कभी छातीके बल सरकता था, कभी लड़खड़ाते पैर उठाता हुआ चलता था, कभी दौड़ा-दौड़ा फिरता था, कभी मधुर आलाप करता था और कभी मक्खन खाता हुआ दिन-रात व्यतीत करता था ॥४३॥ तीसरी पिशाची शकट का रूप रखकर उनके सामने आई परन्तु कृष्ण बालक होने पर भी अत्यन्त निर्भय थे, अजनगिरिके समान शोभायमान थे और अत्यधिक अभ्युदयको धारण करनेवाले कोई अनिर्वचनीय पुरुष थे इसलिए उन्होंने जोरको लात मारकर ही उसे नष्ट कर दिया ॥४४॥ किसी दिन उपद्रयको अधिकताके कारण यशोदाने कृष्णका पैर रस्सीसे कसकर उसलीमें बाँध दिया था उसी दिन शत्रुकी दो देवियाँ मिल और अर्जुन वृक्षका रूप रसकर उन्हें पीड़ा पहुंचाने लगी परन्तु कृष्णने उस दशामें भी नों देवियों को गिरा दिया मार भगाया ॥४५॥ शुभ बाल्यकालके प्रारम्भमें ही सुनन्दगीप और यशोदान जिसकी अद्भुत शक्ति देसी थी तथा भाश्चर्यसे चकित हो जिसकी प्रशंसा की की ऐसा वह दर्शनीय-मनोहर बालक वनके मध्यमें बढ़ने लगा ॥४६॥ एक दिन छठवीं देवी १. भूषणेन म.. २. ददनसंस्वस्तिं क.। ३ अनः शरीरां म०। शक्टरूपमित्यर्थः । ४. कोगी ग०। ५ मुद्दष्टिशक्तिः ग०। ६. वनान्तरे ग.!

४५४ हरिवंशपुराणे कुदेवपाषाणमयातिवरनाकुली व्याकुलगोकुलाय । दधार गोवर्धनमूर्ध्वमुच्चः स भूवरं भूधरणोदोाम् ॥४॥ अमानुपं कृष्णविचेष्टित तत्सकर्णमाकण्यं बलेने वय॑म् । कृतोपवासव्यपदे रातोऽगायनं सविनी मुतदर्शनाय ॥४६॥ सुकण्टगोपालकैलोपगीतं मुतारघण्टाध्वनिगोधनाध्यम् । महीध्रपादे वनरन्ध्रमागापुरध्रिरध्यास्य परां धृति सा ॥५०॥ कचिचितं स्निग्धमुकृष्णवर्णैः कचिच्च सोद्यदलमहशुभैः। गवां गणेचिय वनं जहां भवन्यपत्यप्रतिम हि हृष्टये ॥५॥ तृणाम्बुतृप्ताः स्तनलमबस्साः प्रदुझमानाश्च परा घटीनी । ददर्श गा गोष्टगतास्तदेपा प्रवृत्तरोमाञ्चमुखाभिरामा ०५२।। सबसधेनुध्वनयोऽतिधीरा रवाश्च गोपीदधिमन्यनोत्याः । मनोऽमिज हरिमातुरञ्चगंभीरनादा न हरन्ति किं वा ॥५३॥ ततोऽमिनन्दी हृदि नन्दगोपो यशोदयोपेत्य यशोविशुद्धाम् । स देवकी स्वामिनिका निकायमनस्विनी भक्तियुतो ननाम ॥५४॥ येलका रूप बनाकर आई। वह बैल बड़ा अहंकारी था, गोपालीको समस्त बस्तीमें जहाँ-तहाँ दिखाई देता था, जोरदार शब्द करता था और सबको डुबोते हुए महासागरके समान जान पड़ता था परन्तु सुन्दर कण्ठके धारक कृण्णने उसकी गरदन मोड़कर उसे नष्ट कर दिया--दूर भगा दिया ॥४७॥ सातवी देवीने पापाणमयी तीन वर्षासे कृष्णको मारना चाहा परन्तु वे उस वर्षासे रश्चमात्र भी व्याकुल नहीं हुए प्रत्युत उन्होंने घबड़ाये हुए गोलकी रक्षा करनेके लिए पृथिवीका भार धारण करनेसे विशाल अपनी दोनों भुजाभोंसे गोवर्धन पर्वतको बहुत ऊँचा, उठा लिया और उसके नीचे सबकी रक्षा की ॥४८|| जब कृष्णकी इस लोकोत्तर चेष्टाका पता काना-कान बलदेवको चला तब उन्होंने माता देवकीके सामने इसका वर्णन किया । उसे सुन वह किये हुए उपयासके बहाने पुत्रको देखने के लिए ब्रज-गोकुलकी और गई ॥४६ वहाँ पर्वतकी शासापर स्थित, सुन्दर कण्ठके धारक गोपालकोंके मुख गीतसे मंकृत एवं घंटाओंके जोरदार शब्दोंसे सहित गोधनसे युक्त धनखण्डमें बैठकर यह परम संतोपको प्राप्त हुई ॥५०॥ कहीं तो वह वन, कृष्णके रद्ग के समान स्निग्ध एवं उत्तम कृष्ण वर्ण वाली गायोंके समूहसे व्याप्त था और कहीं वलभद्रके समान सफेद वर्ण वाली गायोंके समूहसे युक्त था। उसे देस माता देवको बहुत ही प्रसन्न हुई सो टीक ही है क्योंकि पुत्रकी समानता प्राप्त करनेवाली वस्तु भी हर्षके लिए होती है ॥५१॥ जो घास और पानीसे संतुष्ट थी, जिनके थनांसे बचदे लगे हुए थे, गोपाल लोग जिन्हें दुह रहे थे तथा घडाँके समान जिनके यड़े-बड़े नन थे ऐसी गोशालामि सड़ी एक-से बढ़कर एक मुन्दर गायोंको देखकर माता देवीके रोमांच निकल आये और वह मुग्यसे सुशोभित होने लगी ॥५२॥ उस समय वहाँ बछड़ों के साथ गायोंकि रमानेको ध्वनि फैल रही थी तथा गोपियों द्वारा दही मथे जानेका जोरदार शब्द प्रसरित हो रहा था। उन मयसे देयकी का मन अत्यधिक हरा गया सो ठीक ही है. क्योंकि गम्भीर शब्द क्या नहीं हरते है ? ॥३॥ तदनन्तर जो मन ही मन अत्यधिक हर्पित हो रहा था, ऐमे नन्द गोपने यशोदाके साथ भाफर, यशमे यिशुद्ध, अनेक लोगोंके समूहसे सहित, गौरयशालिनी स्वामिनी देयकीको भक्ति- १. यज्ञरामंग। २ माता देशकी। ३. कोलग प०। ४. मागा म। ६ र म.। ७ रामाः म.। . ५ रध्याम म..

पञ्चत्रिंशः सर्गः ४५५ सुपीतवासोयुगलं वसानं वनेवतंसीकृतवहिवहम् । अखण्डनीलोत्पलमुण्डमालं सुकण्ठिकाभूपितकम्बुकण्ठम् ॥५५॥ सुवर्णकांमरणोज्ज्वलाभं सुबन्धुजीवालिकमुच्चमौलिम् । हिरण्यरोचिवलयप्रकोष्ट सुपादगोपालकसानुवंशम् ॥५६॥ यशोदयानीय यशोदयाय प्रणामितं पुत्रमसौ सवित्री । सुगोपवेषं निकटे निषण्णं परामृशन्ती चिरमालुलोके ॥५॥ जगी च देवी विपिनेऽपि वासस्तवेदशापत्यशो यशोदे। यशस्विनि श्लाध्यतमो जगत्यां न राज्यलामोऽमिमतोऽनपत्यः ॥५॥ जगाद गोपी भवती यथाह तथैव मे स्वामिनि सत्यमेतत् । तर्थव सन्तोपविशेषपोपी प्रियाशिपा जीवतु नित्यमृत्यः ॥५६॥ इहान्तरे सा सुतदर्शनेन सुनिर्भरप्रस्नुतसुस्तनौ तौ । शशाक नो संवरितुं परन्तौ न संवृतिः स्यात्सति चित्तभेदे ॥६॥ रिपोर्भयापुत्र वियोजितोऽसि न दुष्टबुद्धयति विशुद्धिमन्तः । स्तनपररक्षीरनिभेन राज्ञी प्रदर्शयन्ती। तदा रराज ॥६॥ प्रकाशभीरः सहसा ततोऽसौ हलायुधः क्षीरघटेन दक्षः। तदाम्यपिस्वस्त्रयमजितास्था न मुद्दति प्राप्तकृतौ कृती हि ॥२॥ पूर्वक नमस्कार किया ॥५४॥ तत्पश्चात् जो पीले रगके दो वस्त्र पहिने हुए था, वनके मध्यमें मयूर-पिच्छकी क्लँगी लगाये हुए था, अखण्ड नील कमलको माला जिसके शिरपर पड़ी हुई थी, जिसका शतके समान सुन्दर कण्ठ उत्तम कण्ठीसे विभूपित था, सुवर्णके कर्णाभरणोंसे जिसकी आभा अत्यन्त उज्ज्वल हो रही थी, जिसके ललाटपर दुपहरियाके फूल लटक रहे थे, जिसके शिरपर ऊँचा मुकुट बँधा हुआ था, जिसकी कलाइयोंमें सुवर्णके देदीप्यमान कड़े सुशोभित थे, जिसके साथ अनेक सुन्दर गोपाल यालक थे एवं जो यश और दयासे सहित था ऐसे पुत्रको लाकर यशोदाने देवकीके चरणों में प्रणाम कराया। उत्तम गोपके वेपको धारण करनेवाला वह पुत्र प्रणामकर पासमें ही बैठ गया। माता देवकी उसका स्पर्श करती हुई चिरकाल तक उसे देखती रही ॥५५-५७॥ देवकीने यशोदासे कहा कि हे यशस्विनि यशोदे ! तू ऐसे पुत्रका निरन्तर दर्शन करती है अतः तेरा वनमे भी रहना प्रशंसनीय है। यदि पृथिवीका राज्य भी मिल जाय पर मंतान न हो तो वह गज्य अच्छा नहीं लगता ॥५८|| इसके उत्तरमें गोपी यशोदाने कहा कि हे स्वामिनि ! आपने जैसा कहा है यह वैसा ही सत्य है। मेरे मनके संतापको अत्यधिक रूपसे पुष्ट करनेवाला यह सदाका दास आपके प्रिय आशीर्वादसे चिरंजीय रहे यही प्रार्थना है ॥५॥ इसी बीच पुत्रको देसनेसे देयको रानीके दोनों स्तन अत्यधिक दूधसे परिपूर्ण हो गये। वह उन करते हुए स्वनीको रोकनमें समर्थ नहीं हो सकी सो ठीक ही है क्योंकि चित्तमें भेद पर जाने पर किमी यातका छिपाना नहीं हो सकता ॥६०॥ उस समय स्तनांसे मरते हुए दूध के यहाने रानी, 'हे पुत्र ! शाके भयसे मैने तुझे वियुक्त किया है दुष्ट युद्धिमे नही' अपने अन्नग्गको दम विशुद्धिको दिसाती दुई के समान मुशोभित हो रही थी ॥६१|| 'कही रहस्य न खुल जाय इममे भयभीत हो बुद्धिमान यलदेयने नमी समय स्वयं ही दूध के पहेमे प्रेमपूर्ण माताका अभिषेक कर दिया--उसके ऊपर दूधमे भग घड़ा उड़ेल दिया सी ठीक ही है क्योंकि १ यलय प्रकोटमा १२. मानुवरी म०1३. पराम च्या चेरि पोटये ताम्याम् आदर्ष लिम् । ४ टीम.। ५ प्रदाम। मभिताम्मा ग..

हरिवंशपुराणे ततो हरिप्रेक्षणलधसौग्यो हलो समानीय समातकार्याम् । प्रवेश्य साधी मधुरो पुनरत न्यवेदयवृत्तमपि स्वपित्रे ॥६॥ कलागुणान् प्रत्यहमेश्य दक्षमशिच्याशवमाशु शौरी । स्थिरोपदेशे प्रणते न शिष्ये गुरूपदेशाः उपयन्ति कालम् ॥६॥ स यालभावारसुकुमारभावस्तवमुदिसधा कुमारः। सुयोवनोन्मादभराः 'मुरासैररीरमा लिपु गोपकन्याः ॥१५॥ करागुलिस्पर्शसुख स रासेपनीमनगोपवमनस्य । मुनिविकारोऽपि महानुभावो सुमुदिकानदमणिययायः ॥६॥ यथा हरी भूरिजनानुरागो जगाम दिदि दिमूची । तपास्य सेने विरहानुरागो विहारकाले विरहातुरस्य ॥६॥ द्विपं समन्वेष्टुमितः प्रविष्टः स शङ्कया सरिपुः कदाचित् । मजं निजैरामजदयुतोऽस्मापुरोऽभ्युपायाहमितो जमन्या ॥६॥ स ताटवी स्पष्टपत्ताहासां कुरापसी रूक्षनिरीक्षणारयाम् । अधोरजो वीच्य विद्धकायों शरीरयष्टयो विकृतो जघान ॥६॥ कुशल मनुष्य अवसरके अनुसार कार्य करनेमें कभी नहीं चूमते ॥६२॥ तदनन्तर कृष्णके देखनेसे जिसे सुख प्राप्त हुआ था और जिसके दुग्धाभिषेकका कार्य समाप्त हो चुका था ऐमी साध्वी माता देवकोको लाकर बलदेवने मथुरापुरी में प्रविष्ट कराया और इसके बाद उन्होंने यह समाचार अपने पिता यसुदेवके लिए भी सुनाया n६३|| कृष्ण अत्यन्त चतुर थे अतः बलदेवने प्रतिदिन जा-जाकर उन्हें शीघ्र ही कलाओं और गुणांकी शिक्षा दी थी सो ठीक ही है क्योंकि स्थिर रूपसे उपदेश ग्रहण करनेवाले विनयी शिष्यके मिलने पर गुरुओके उपदेश व्यर्थ ही समय नहीं नष्ट करते अर्थात् शीघ्र ही उसे निपुण बना देते हैं ॥६४॥ कुमारके समान अत्यन्त निर्विकार अथवा अत्यन्त कोमल हृदयको धारण करनेवाले यह कुमार कृष्ण, क्रीड़ाओके समय अतिशय यौवनके सन्मादसे भरी एवं प्रस्फुटित स्तनोंवाली गोपकन्याओंको उत्तम रास द्वारा क्रीड़ा कराते थे ॥६॥ चे रासक्रीड़ाओंके समय गोपालाओके लिए अपने हाथको अङ्गुलियोंके स्पर्शसे होनेवाला सुख उत्पन्न कराते थे परन्तु स्वयं अत्यन्त निर्विकार रहते थे। जिस प्रकार उत्तम अंगूठीमे जड़ा हुआ श्रेष्ठ मणि स्त्रीके हाथकी अंगुलिका स्पर्श करता हुआ भो निर्विकार रहता है उसी प्रकार महानुभाव कृष्ण भी गोप- बालाओंकी हस्तांगुलिका स्पर्श करते हुए भी निर्विकार रहते थे ॥६६॥ क्रीड़ाके समय कुमार कृष्णसे मिलने पर वृद्धिको सूचित करनेवाला मनुष्योंका अत्यधिक अनुराग जिस प्रकार हृदयमे वृद्धिको प्राप्त होता था उसी प्रकार उनके विरहकालमै विरहसे पीड़ित मनुष्योंका विरहानुराग भी वृद्धिको प्राप्त होता थो। भावार्थ-खेलके समय कृष्णको पाकर जिस प्रकार लोगोंको प्रसन्नता होती थी उसी प्रकार उनके अभावमे लोगोको विरह जन्य संताप भी होता था ॥६॥ कृष्णकी लोकोत्तर चेष्टाएँ सुन एक दिन कंसको इनके प्रति सदेह हो गया और वह वैरी जान इन्हें खोजने के लिए गोकुल आया । कृष्ण अपने सखाओंके साथ उसके समीप आ रहे थे--- परन्तु माताने कोई उपाय रच उन्हें आत्मीय जनोंके द्वारा नगरके बाहर ब्रजको भेज दिया ॥६॥ अजमें एक ताडवी नामकी पिशाची आई जो जोर-जोरसे अट्टहास कर रही थी, जिसके नेत्र और मुस दोनों ही अत्यन्त रूक्ष थे, जिसका शरीर अत्यन्त बढ़ा हुआ था और जिसकी शरीरयष्टि १ सौख्या म० | २. मुराशे-म० । सुन्दररामकोडाभिः । ३. जनन्याःमः । ४. नाटवीं म ।

पच प्रशः सर्गः ४५७ सुशालमलीखण्डसुमण्डपस्य 'सुदुर्भास्तम्भतति परेपाम् । तमुरिक्षपन्तं वदयं विदिरवा न्यवर्तयत्सा जननी विशङ्का ७०॥ निवृत्त्य कंसः पुरि घोषणां स्वैरघोपय देवविदुक्तकारी । गवेपणार्थ द्विपतो निजस्य स पापशापाभिमुखः मुखार्थी ॥७॥ भुजगशय्यामिह मिहवाहं शरासनं चाप्यजितं जयान्तम् । सपाञ्चजन्याजमथारहेद्यः करोत्यधिज्यं परिपरयच्च ॥७२॥ ददाति तस्मै पुरुषोत्तमाय पराजिताशेपपराक्रमाय । अलम्यलाभं समभीष्टमिष्टः प्रहृष्टकंसः पुरुपान्तरज्ञः ॥७३॥ इति प्रवृत्तिश्रवणात्प्रवृत्तास्ततस्तदारोहणपूर्विकासु । क्रियामु निस्तनितवृत्तयश्च महीरितो जग्मुरतो विलसाः ॥७॥ अधानपदानुरुपेन्द्रमर्थी सहोदरोऽमी खलु कंसवध्वाः । नदीयसामर्थ्यमुदीच्य जानु प्रजाततोयो मथुरापुरौं ताम् ॥७५॥ महाहिशय्यामिह सन्जितां तां विलोक्य चन्द्रव्यपदेशपृष्टाम् । समारहीपणभोगिमोगा स्वभावशय्यामित्र शौरिराशु ॥७॥ अत्यन्त विकृत थी कृष्णने उसे देखते ही मार भगाया ॥६६॥ ब्रजमें एक शाल्मली वृक्षकी लकड़ीका मण्डप तैयार हो रहा था वहाँ उसके ऐसे बड़े-बड़े खम्भोंका समूह पड़ा था जिसे दूमरे लोग उठा नहीं सकते थे परन्तु कृष्णने उन्हें अकेले ही उठा कर ऊपर चढ़ा दिया। यह जान माताने निःशङ्क हो उन्हें व्रजसे वापिस लौटा लिया ||७०॥ दुष्ट एवं सुखार्थी कंसको जय कृष्ण गोकुलम नहीं मिले तब वह मथुरा लौट आया। उसी समय उसके यहाँ सिंहवाहिनी नाग- शय्या, अजितंजय नामका धनुप और पाश्चजन्य नामका शङ्ख ये तीन अद्भुत पदार्थ प्रकट हुए । कंमके ज्योतिषीने बताया कि 'जो कोई नागशय्यापर चढ़कर धनुपपर ढोरी चढ़ा दे और पांचजन्य शंसको फूंक दे वही तुम्हारा शत्रु है', अतः ज्योतिपीके कहे अनुसार कार्य फरनेवाले कंमने अपने शत्रुकी तलाश करने के लिए आत्मीय जनोंके द्वारा नगरमें यह घोषणा करा दी कि 'जो कोई यहाँ आकर सिंहवाहिनी नागशय्यापर चढ़ेगा, अजितंजय धनुपको डोरीमे सहिन फरेगा और पाश्चजन्य शंसको मुससे पूर्ण करेगा-फूकेगा यह पुरुषों में उत्तम तथा सयके पराक्रमको पराजिन करनेवाला समझा जावेगा । पुम्योंके अन्तरको जाननेवाला कंम उसपर बहुत प्रसन्न होगा, अपने आपको उसका मित्र मममेगा तथा उसके लिए भलभ्य दष्ट वस्नु दंगा' ॥७१-७३॥ फंमकी यह घोषणा सुन अनेक राजा मथुरा आये और नागराव्यापर चढ़नं मादिकी क्रियाभागे प्रवृत्ति करने लगे परन्तु सय भयभीत हो लज्जित होते हुए चले गये 10 एक दिन फमकी भी जीवधशाका भाई भानु, किमी कार्यवश गोल गया। वहाँ पृष्यका अद्भुत पराधम दंग यह बहुत प्रसन्न हुआ और उन्हें अपने माय मथुगपुरी ले आया 11 यहाँ, जिसके समापका प्रदेश अत्यन्त मुमनित था, जिसका पृष्ठ भाग चन्द्रमाके समान 7 उजाल था जिमरे पर भयंकर सके फगा लहलहा रहे थे ऐसी महानाग शय्यार कृष्ण १. मभंगलम्भननिः म०। २ पुरपोरगा म.! ३. देवपिन-म । ४. मिहार म । ५ मशनम:म. । ६ निशिनर:ग.। ७. सीनान म.। चेन्द्रमपम पृश्या म. (!) । चंदर पसरा ग(!)।

हरिवंशपुराणे ततो हरिप्रेक्षणलब्धसौरगो हलो समानीय समातकार्याम् । प्रवेश्य साध्वी मथुरा पुनस्तं न्यवेदयवृत्तमपि स्वपित्रे ॥६३॥ कलागुणान् प्रत्यहमेत्य दक्षमशिक्षयकेशवमाशु शीरी । स्थिरोपदेशे प्रणते न शिध्ये गुरूपदेशाः उपयन्ति कालम् ॥६॥ स बालभावात्सुकुमारभावस्तथैवमुद्धिनकुचाः कुमारः । भुयौवनोन्मादभराः सुरासैररीरमरकेलिपु गोपकन्याः ॥६५॥ कराङ्गुलिस्पर्शसुस स रासेवजीजनद्रगोपवधूजनस्य । सुनिर्विकारोऽपि महानुभावो सुमुद्रिकानदमणियथायः ॥६६॥ यथा हरी भूरिजनानुरागो जगाम वृद्धि हृदि वृद्धिसूची। तथास्य तेने विरहानुरागो विहारकाले विरहातुरस्य ॥६७॥ द्विपं तमन्वेष्टुमितः प्रविष्टः स शङ्कया कंसरिपुः कदाचित् । प्रज निजैराबजदच्युतोऽस्मात्पुरोभ्युपायाद्गमितो जनन्या ॥६॥ स ताडवी स्पष्टकृताहासो कुराक्षसी रूक्षनिरीक्षणास्याम् । अधोक्षजो वीच्य विवृद्धकायां शरीरयष्टयां विकृतां जघान ॥६६॥ कुशल मनुष्य अवसरके अनुसार कार्य करनेमें कभी नहीं चूकते ॥२॥ तदनन्तर कृष्णके देखनेसे जिसे सुख प्राप्त हुआ था और जिसके दुग्धाभिषेकका कार्य समाप्त हो चुका था ऐसो साध्वी माता देवकीको लाकर बलदेवने मथुरापुरीमें प्रविष्ट कराया और इसके बाद उन्होंने यह समाचार अपने पिता वसुदेवके लिए भी सुनाया ॥६३|| कृष्ण अत्यन्त चतुर थे अतः बलदेवने प्रतिदिन जा-जाकर उन्हें शीघ्र ही कलाओं और गुणोकी शिक्षा दी थी सो ठीक ही है क्योकि स्थिर रूपसे उपदेश ग्रहण करनेवाले विनयी शिष्यके मिलने पर गुरुओके उपदेश व्यर्थ ही समय नहीं नष्ट करते अर्थात् शीघ्र ही उसे निपुण बना देते हैं ॥६४|| कुमारके समान अत्यन्त निर्विकार अथवा अत्यन्त कोमल हृदयको धारण करनेवाले वह कुमार कृष्ण, क्रीड़ाओके समय अतिशय यौवनके उन्मादसे भरी एवं प्रस्फुटित स्तनोवाली गोपकन्याओंको उत्तम रासौ द्वारा क्रीड़ा कराते थे ॥६५॥ वे रासक्रीड़ाओंके समय गोपबालाओं के लिए अपने हाथको अङ्गुलियोंके स्पर्शसे होनेवाला सुस उत्पन्न कराते थे परन्तु स्वयं अत्यन्त निर्विकार रहते थे। जिस प्रकार उत्तम अंगूठीमें जड़ा हुआ श्रेष्ठ मणि स्त्रीके हाथकी अंगुलिका स्पर्श करता हुआ भी निर्विकार रहता है उसी प्रकार महानुभाव कृष्ण भी गोप- बालाओंकी हरतांगुलिका स्पर्श करते हुए भी निर्विकार रहते थे ॥६६॥ क्रीड़ाके समय कुमार कृष्णसे मिलने पर वृद्धिको सूचित करनेवाला मनुष्योंका अत्यधिक अनुराग जिस प्रकार हृदयमे वृद्धिको प्राप्त होता था उसी प्रकार उनके विरहकालमें विरहसे पीड़ित मनुष्योंका विरहानुराग भी वृद्धिको प्राप्त होता थो । भावार्थ-रोलके समय कृष्णको पाकर जिस प्रकार लोगोंको प्रसन्नता होती थी उसो प्रकार उनके अभावमै लोगीको विरह जन्य संताप भी होता था ॥६७॥ कृष्णको लोकोत्तर चेष्टाएँ सुन एक दिन कंसको इनके प्रति सदेह हो गया और वह वैरी जान इन्हें सीजने के लिए गोकुल आया । कृष्ण अपने सखाओंके साथ उसके समीप आ रहे थे- परन्तु माताने कोई उपाय रच उन्हें आत्मीय जनोंके द्वारा नगरके बाहर ब्रजको भेज दिया ॥६॥ अजमें एक ताइवी नामकी पिशाची आई जो जोर-जोरसे अट्टहास कर रही थी, जिसके नेत्र और मुष दोनों ही अत्यन्त रूक्ष थे, जिसका शरीर अत्यन्त बढ़ा हुआ था और जिसकी शरीरयष्टि १ मोख्या म० | २. मुगरी-म । मुन्दरराममोडाभिः । ३. जनन्याः म०। ४. नाटवीं म ।

पत्रिंशः सर्गः मालिनोच्छन्दः अथ विरुवदलिज्यारूढवाणासनायां कलरवकलहंसीशङ्खशय्याश्रितायाम् । रिपुशिखिमदपक्षक्षोदपक्षोदयायां शरदि हरिनवश्रीलोलयाध्यासितायाम् ॥१॥ घननिवविधातायौरमाचन्द्रहासा विघटितधनपङ्का मेदिनी काशहापा। कतिपयदिनभाविधीढकंमाभिघातप्रकटितहरिहासाकारविद्योततीव ( वद् द्योतने मा) ॥२॥ विपुलपुलिनफेनव्याजतः स्वच्छनद्यः सहजजलसरस्थः पुण्डरीकापदेशात् । सितकुमुमनिभेन स्वर्वनान्तैश्च शैला हरियश इव शुभं द्राग्दधाना विरेजुः ॥३॥ फलकुचगुरुभाराकान्तिराकान्तसस्यप्रचुररुचिरकासत् कक्षुकोद्भासमाना। प्रमदवशविकासिन्युवरा सर्वतोऽभादमिनवहरिकण्टाश्लेषणोत्कण्ठितेव ॥४॥ प्रसवभरविभूतिव्यग्रताव्यप्रगर्भग्रहणसमयहृष्यद्गोवृपोद्घोषधोपाः । शरदि हृदयतोपं पोयन्तिस्म विष्णोः प्रसभमिह रिपूणां पेपणं घोपयन्तः ॥५॥ विदितहरिसमीहश्चापि कंसस्तदानीं पुनरपि तदपायोपीयोर्गापवर्गम् । कमलहरणहेतोद्गमम्यगीजां हृदमपि विर्षमाहि प्राहिणो द्यामुनं सः ॥६॥ अथानन्तर गूंजते हुए भ्रमररूपी प्रत्यञ्चासे युक्त बाणासन जातिके वृतरूपी धनुपसे सुशोभित, कबूतर रूपी शङ्ख और कलहंस रूपी शय्यासे सहित तथा शत्रुरूपी मयूरोके मद और पट्टीको नष्ट करनेवाली शरद् ऋतु आई सो ऐसो जान पड़ती थी मानो कृष्णकी नवीन लक्ष्मीको लीलासे ही सहित हो । भावार्थ-जिस प्रकार कृष्णने उज्ज्वल नागशय्यापर भारूढ हो शङ्क बजाया था और धनुप धारण किया था उसी प्रकार वह शरद् ऋतु भी कलहंस रूपी नाग- शय्यापर आरूढ़ हो कबूतर रूपी शङ्कको बजा रही थी तथा वाणासन वृक्षरूपी धनुषको धारण कर रही थी ॥१॥ उस समय आकाशमें मेघोंका समूह नष्ट हो गया था तथा चन्द्रमाका प्रकाश फैलने लगा था इसलिए यह अत्यधिक सुशोभित हो रहा था। इसी प्रकार पृथियोकी विपुल कीचड़ नष्ट हो गई थी तथा उसपर काशके फूल फूल उठे थे इसलिए वह ऐसी जान पड़ती थी मानो कुछ दिन बाद जो अतिशय बलवान् कंसका घात होनेवाला है उससे प्रकट होनेवाले कृष्णके अट्टहासको ही पहलेसे धारण करने लगी हो ॥२।। उस समय स्वच्छ नदियों में विशाल पुलिनोंकी टक्करसे फेन निकल रहा था, स्वाभाविक जलसे भरे सरोवरों में सफेद-सफेद कमल फूल रहे थे और पर्यवोंके अपने वनों में सफेद-सफेद फूल खिल उठे थे उनसे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो उन सबके बहाने श्रीकृष्णके शुक्ल यशको ही शीघ्र धारण कर रहे हों ॥३॥ फलरूपी स्तनों के भारी भारसे आक्रान्त, सर्वत्र व्याप्त धानकी सातिशय कान्तिरूपी चोलोसे सुशोभित और हीतिरेकसे सय ओर विकसित-नये-नये अंकुरोंको धारण करनेवाली उपजाऊ भूमिरूपी रमणी उस समय नये राजा श्रीकृष्णके कण्ठालिङ्गनके लिए उत्सुकके समान जान पड़ती थी 18|| उस शरद् ऋतुमें सन्ततिके भार रूप विभूतिसे प्राप्त होनेवाली व्यप्रतासे व्यग्र एवं गर्भधारणके योग्य समय पाकर हर्पित होनेवाली गायों और चैलोंके जोरदार शब्द श्रीकृष्णके हृदय सम्बन्धी संतोषको मानो इसलिए हो यरयस पुष्ट कर रहे थे कि वे उनके शत्रुओके नष्ट होने की घोषणा कर रहे थे । यद्यपि कंस, श्रीकृष्णको चेष्टाको जान चुका था तथापि उनके नष्ट करने के उपायों में बुद्धि लगानेवाले उस दुष्टने फिर भी उस समय कमल लाने के लिए समस्त गोपोंके समूहको यमुनाके १ मामा ग०, ५०, १० । २. वेन म । ३. शोममान | ४. तप-म०।५ तदायेगारपी-म० । ६. मत्यङ्ग-म०। ७. विषमा अक्ष्यो यस्मिन् । प्रेषयामास । ६. यमुनाया इदं यामुनम् ।

४५८
हरिवंशपुराणे
धनुस्ततोऽधिज्यमसौ व्यधत्त भुजङ्गमोदीर्णविकीर्णधूमम् ।
अपूरयच्छसमखेदमाशाः प्रपूरयन्तं निखिला निनादैः ।।७७॥
जनस्तदालोक्य तदातिलोकं तदीयमाहारम्यमुदीयमानम् ।
अघोषय क्षुब्धसमुदघोषो महानहो कोऽप्ययमित्यशेपः ॥७॥
कुकंसशङ्का वहतानजेन निजेन नौस्या प्रहितो हरिस्तु ।
महानुकूलो व्रजमारमानैः सहायजत्तीवगुणानुरागः ॥७॥
शालिनीच्छन्दः
गर्भाधानात्पूर्वमा प्रसूतेराबद्धान्तवैरभावोऽपि शत्रुः ।
मत्तः कुर्याकि ह्युदात्तस्य पुंसो जनाद्धर्मात् पूर्वजन्मप्रयातात् ॥२०॥
इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवशे जिनसेनाचार्यस्य कृती कृष्णबालीडावर्शनो
नाम पञ्चत्रिशः सर्गः ॥३५॥
स्वाभायिक शय्याके समान शीघ्र चढ़ गये १७६॥ तदनन्तर उन्होंने साँपोंके द्वारा उगले हुए
धूमको बिखेरनेवाले धनुषको प्रत्यञ्चासे युक्त किया और शब्दोंसे समस्त दिशाओंको भरनेवाले
शहको खेद रहित-अनायास ही पूर्ण कर दिया ॥७७. उस समय कृष्णके प्रकट होते हुए लोकोत्तर
माहात्म्यको देखकर समस्त लोगोने घोषणा की कि अहो क्षभित समुद्र के समान शब्द करनेवाला
यह कोई महान् पुरुष है ॥७॥ कृष्णका यह पराक्रम देख बड़े भाई बलदेवको दुष्ट कंससे
आशङ्का हो गई इसलिए उन्होंने महान् आज्ञाकारी कृष्णको, साथ-साथ जानेवाले गुणोके तीव्र
अनुरागी आत्मीय जनोंके साथ व्रजको भेजा। भावार्थ-बलदेवने कंससे शङ्कित हो कृष्णको
अकेला नहीं जाने दिया किन्तु 'यह बहुत गुणी है, इसलिए सब लोग इसे भेजने जाओ' यह
कहकर अपने पक्षके बहुतसे लोगोंको उनके साथ कर दिया ||६|| गौतम स्वामी कहते हैं कि जो
पूर्व जन्ममें प्राप्त हुए जैन धर्मसे उत्कृष्टताको प्राप्त हुआ है उस मनुष्यका मदोन्मत्त शत्रु क्या कर
सकता है ? भले ही वह गर्भाधानसे पूर्व और जन्मके पहले हो. इद्रयमें वैरभाव, बाँधकर.
बैठा हो ॥८॥
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें
कृष्ण की बालक्रीडाओंका वर्णन करनेवाला पैंतीसवाँ पर्व पूर्ण हुआ ॥३५॥

पत्रिंशः सर्गः चिरवियुतकनीयोदर्शनव्याजतस्तान् पृथुतरमथुरा तामागतान यादवेन्द्रान् । अभिमुखमपशङ्कोऽवेस्य कंसः सशको निभृतकृतनतिः प्रावेशयरसानुजान् सः ॥१४॥ पुरु पुरगृहशोभादर्शनात्तृप्नेब्रास्लेदधिपतिनियुक्तावासकास्ते यथेष्टम् । प्रतिदिनमुपसेव्या दानमानप्रणामः प्रणयमिव वहन्तस्तस्थुरन्तर्विदाही ॥१५॥ हलभूदवरतार्थो मल्लयुद्धाभिलापं वृप धवलविशेषोऽयन्तविज्ञो विधित्सुः । अतिनिपुणमतिस्तां सन्निधौ तस्य धीरो वदति लघु यशोदा स्नानमाकल्पयेति ॥१६॥ चिरयसि किमिति त्वं विस्मृतात्मीयदेहे न सकृदसकृदुत्ता न स्वभावं जहासि । न हि शुचिशुभशुक्त्युत्पादितोडारमुक्तामणिरतिभृतवेला चापलं स्वं जहाति ॥१७॥ इति सह चिरवासेऽप्युक्तपूर्वा न जातु ह्यतिचकितमया सा साश्रुनेत्रा निरुक्तिः । दुततरमुपकल्प्य स्नानमनप्रसिद्धय प्रकृतमकृत यनं स्नातुमेतौ नदी तौ ॥६॥ अवदिति अलस्तं कृष्णमेकान्तवर्ती किमिति मुखमिदं ते दीर्घनिश्वाससानम् । हिमहतरुचिपळच्छायमच्छायमद्य प्रथयति पृथुमन्तस्तापमाचक्ष्व हेनुम् ॥१६॥ भूपित करते और अकस्मात् आगमनसे दुष्ट कंसके अहंकारपूर्ण हृदयको विदीर्ण करते हुए शीघ्र ही मथुराकी ओर चल पड़े ॥१३॥ यदुवंशी राजाओंको विशाल मथुरा नगरीकी ओर आया देख यद्यपि कंस शङ्कासे युक्त हो गया था तथापि जब उसे यह बताया गया कि ये चिरकालसे वियुक्त छोटे भाई-वसुदेवको देसनेके लिए आये हैं तब उसने निःशङ्क हो सामने जाकर उनका स्वागत किया, उन्हें अच्छी तरह नमस्कार किया और छोटे भाइयोंसे सहित उन समस्त भाइयोंका नगरमें प्रवेश कराया ॥१४॥ विशाल मथुरा नगरीके घरोंकी शोभा देखनेसे जिनके नेत्र सन्तुष्ट हो गये थे तथा निगरीके अधिपति-कंसने जिन्हें उत्तमोत्तम भवन प्रदान किये थे, ऐसे वे सब यदुवंशी राजा मथुरा नगरीमे रहने लगे । कंस दान, मान तथा नमस्कार के द्वारा प्रतिदिन उनकी सेवा करता था । यद्यपि वे बाह्यमें ऐसी चेष्टा दिखाते थे जैसे प्रेम ही धारण कर रहे हो तथापि अन्तरङ्गमें अत्यधिक दाह रखते थे ।।१५।। तदनन्तर जिन्होंने समस्त कार्यका अच्छी तरह निश्चय कर लिया था, जिनके अवयव वृपभके समान सफेद थे, जो अत्यन्त विज्ञ थे, जिनको बुद्धि अत्यन्त निपुण थी और जो कृष्णके हृदयमें युद्धकी अभिलापा उत्पन्न करना चाहते थे ऐसे धीर वीर बलभद्रने गोकुल जाकर कृष्णके सामने ही यशोदासे कहा कि जल्दी स्नान कर ॥१६॥ क्यों इस तरह देर कर रही है, तू अपने शरीरकी सम्भालमें हो भूली हुई है, एक बार नहीं अनेक बार कहा फिर भी अपनी आदत नहीं छोड़ती। ठीक ही है उज्ज्वल एवं शुभ शुक्तियोके द्वारा उत्तम मुत्तामणियोंको उत्पन्न करनेवाली समुद्रकी वेला अपनी चञ्चलता नहीं छोड़ती है। चिरकाल तक साथ-साथ रहनेपर भी बलभद्रने यशोदासे ऐसे कटुक वचन पहले कभी नहीं कहे थे इसलिए वह बहुत ही चक्रित तथा भयभीत हो गई। यद्यपि उसने कहा कुछ नहीं फिर भी उसके नेत्रोंसे ऑसू निकल आये । वह चुपचाप शीघ्र ही स्नान कर भोजन बनाने के लिए प्रकृत-भयसरानुकूल यत्न करने लगी। इधर कृष्ण और बलभद्र-दोनों स्नान करनेके लिए नदी चले गये ॥१७-१८॥ एकान्तम पहुँचनेपर बलभद्रने कृष्णसे कहा कि आज तुम्हारा यह मुस सम्बी-लम्बी साँसों तथा अश्रुभोसे युक्त क्यों है ? तुपारसे कुम्हलाये हुए कमलके समान कान्तिसे रहित १. तदधिपतिना क्सेन नियुक्ताःप्रदचा यावासा येभ्यस्ले । २ हृदये मात्सपिताः १३. हलधृदयनार्थी म., ख० । ४. वृपल यधविशेषोदन्तविशो मा, ख० ।

हरिवंशपुराणे निजभुजबलशाली हेल्यैवावगाह हदमपि कुपितोरधं कालियाहि महोत्रम् । फणमणिकिरणाघोद्गीणवद्विस्फुलिङ्गन्यतिकरमतिकृष्णं मधु कृष्णो ममदं ॥७॥ तरहविटपामय्यप्रगोपप्रणादस्फुटहलधरधीरध्वानसंहृष्टदेहः । भुजनिहतभुजङ्गः संसमुच्छित्य पद्यानुपतटमटतिस्म दाक् मरुत्वानिवासौ ॥८ प्रविलसदतिभास्वपीतवासा घलेन प्रमदभरवशेन प्रौलसम्मेचवेन । सरभसमुपगूढचोद्धृतोऽभालुजाभ्यामसितसितशिलाणेव सोऽन्दः सविद्युत् ॥६॥ निहितकमलमारान् गोपकैरमतोरिः परगुणमसहिष्णुः सोरणमुस्य वा । समभणदिति शी नन्दगोपाएमजा सरभसमिह गोपा मल्लयुद्धाय सन्तु ॥१०॥ इति विहितमहाज्ञो मल्लयुद्धाय मल्लानतिकठिनकनिएज्येष्टमध्यप्ररूढान् । दुततरमुपकण्ठे स्वस्य चक्रे स चक्रकचनिशितचित्ता तुकामस्तदानीम् ॥११॥ चरितमिदमकालक्षेपि विज्ञाय शत्रो स्थिरमतिवसुदेवश्वाप्यनावृष्टियुक्तः । ज्ञपयितुमपि सर्व ज्येष्ठवर्ग स वार्तामगमयदिह शीघ्नं सन्निधानाय तस्य ॥१२॥ विदितरिपुविचेष्टास्ते नव ज्येष्ठमुख्या रथनुरगपदातिप्रोन्मदेभैः स्वसैन्यः । सरभसमभिजग्मुर्भूतलं भूपयन्तः शठहृदयमकस्मारसस्मयं दारयन्तः ॥१३॥ उस ह्रदके सन्मुख भेजा जो प्राणियोंके लिए अत्यन्त दुर्गम था और जहाँ विपम सॉप लहलहाते रहते थे ॥६॥ अपनी भुजाओके बल से सुशोभित कृष्ण अनायास ही उस हदमें घुस गये और जो कुपित होकर सामने आया था, महाभयङ्कर था, फणपर स्थित मणियोंकी किरणोके समूहसे जो भग्निके तिलगोंकी शोभा प्रकट कर रहा था तथा अत्यन्त काला था ऐसे कालिय नामक नागका उन्होंने शीघ्र ही मर्दन कर डाला ॥७॥ किनारेके वृक्षको शाखाओपर चढ़े घबड़ाये हुए गोपोंकी जय जयकार तथा बलभद्र के गम्भीर शब्दसे जिनका समस्त शरीर रोमाञ्चित एवं हर्पित हो रहा था तथा भुजाओसे जिन्होंने कालिय भुजङ्गको नष्ट किया था ऐसे श्रीकृष्ण कमल तोड़कर वायुके समान शोघ हो तटके समीप आ गये ॥८॥ देदीप्यमान पीताम्बरसे सुशोभित श्रीकृष्ण ज्याही हदसे बाहर निकले त्योही आनन्दके समूहसे विवश, नीलाम्बरसे सुशोभित बलभद्रने दोनो भुजाओंसे उनका गाढालिङ्गन किया। उस समय नीलाम्बरधारी गौरवर्ण बलभद्रसे आलिगिन पीताम्बरधारी श्याम सलोने कृष्ण, ऐसे जान पड़ते थे जैसे बिजली सहित श्याम मेघ, काली और सफेद शिलाओके अग्रभागसे आलिङ्गित हो रहा हो ॥६॥ दूसरोंके गुणों को सहन नहीं करनेवाला वैरी कंस, गोपालोके द्वारा सामने रसे हुए कमलोके समूहको देखकर गरम-गरम उच्छास भरने लगा | तदनन्तर उसने शीघ्र ही यह आज्ञा दी । नन्द गोपके पुत्रको आदि लेकर समस्त गोप यहाँ मल्लयुद्धके लिए अविलम्ब तैयार हो जाये ॥१०॥ इस प्रकार मल्लयुद्धके लिए कड़ी आज्ञा देकर चक्र और करोतके समान तीक्ष्ण चित्तका धारक कंस मल्लयुद्धके लिए इच्छुक हो शीघ्र ही अत्यन्त बलवान छोटे-बड़े और मध्यम श्रेणीके मल्लोंको उसी समय बुलाकर अपने पास रख लिया ॥११॥ स्थिर बुद्धिके धारक वसुदेवने, अपने अनावृष्टि पुत्रके साथ सलाहकर शत्रुको इस चेष्टाको तत्काल समझ लिया और अपने समस्त बड़े भाइयोको बतलाने तथा उन्हें शीघ्र ही मथुरामें उपस्थित होनेके लिए सबर भेज दी ॥१२॥ जिन्होने शत्रुको चेटाको जान लिया था ऐसे वसुदेवके नौ ही बड़े भाई, रथ, घोड़े, पदाति और मदोन्मत्त हाथियोंसे युक्त अपनी सेनाओके द्वारा पृथिवीतलको १ शीघ्रम् म । २. भेदः म० । ३ वायुरिव (ग० टि.)।

पत्रिंशः सर्गः ४६१ चिरवियुतकनीयोदर्शनव्याजतस्तान् पृथुतरमथुरा तामागतान् यादवेन्द्रान् । अभिमुम्बमपशङ्कोऽवैत्य कंसः सशको निभृतकृतनतिः प्रावेशयत्सानुजान् सः ॥१४॥ पुरु पुरगृहशोभादर्शनात्तृप्तनेवास्तदधिपतिनियुक्तावासकास्ते यथेष्टम् । प्रतिदिनमुपसेव्या दानमानप्रणामः प्रणयमिव वहन्तस्तस्थुरन्तर्विदाहः ॥१५॥ हलवकृतार्थो मल्लयुद्धाभिलाषं वृष धवलविशेपोश्यन्तविज्ञो विधित्सुः। भतिनिपुणमतिस्तां सन्निधौ तस्य धीरो वदति लघु यशोदा स्नानमाकल्पयेति ॥१६॥ चिरयसि किमिति त्वं विस्मृतात्मीयदेहे न सकृदसकृदुत्ता न स्वभावं जहासि । न हि शुचिशुभशुक्न्युत्पादितोदारमुक्तामणिरतिभृतवेला चापलं स्वं जहाति ॥१७॥ इति सह चिरवासेऽप्युक्तपूर्वा न जातु ह्यतिचकितभया सा साश्रुनेत्रा निरुक्तिः । द्रुततरमुपकल्प्य स्नानमन्नप्रसिद्धय प्रकृतमकृन यत्नं स्नानुमती नदी तौ ॥१८॥ भवददिति बलस्तं कृष्णमेकान्तवर्ती किमिति मुखमिदं ते दीर्घनिश्वाससास्त्रम् । हिमहतमचिपळच्छायमच्छायमद्य प्रथयति पृथुमन्तस्तापमाचक्ष्व हेतुम् ॥१६॥ भूपित करते और अफरमात् आगमनसे दुष्ट कंसके अहंकारपूर्ण हृदयको शीघ्र ही मथुराको ओर चल पड़े ॥१३|| - यदुवंशी राजाओंको विशाल मथुरा नगरीकी ओर आया देख यद्या हो गया था तथापि जब उसे यह बताया गया कि ये चिरकालसे वियुक्त छोटे देसनेके लिए आये हैं तब उसने निःशङ्क हो सामने जाकर उनका स्वागत तरह नमस्कार किया और छोटे भाइयोंसे सहित उन समस्त भाइयोंकार ॥१४॥ विशाल मथुरा नगरीके घरोंकी शोभा देखनेसे जिनके नेत्र नगरीके अधिपति-कंसने जिन्हें उत्तमोत्तम भवन प्रदान किये थे, ऐ .. मथुग नगरी में रहने लगे। कंस दान, मान तथा नमस्कारके द्वारा था। यद्यपि वे बाह्य में ऐसी चेष्टा दिखाते थे जैसे प्रेम ही धारण कर अत्यधिक दाह रसते थे ॥१५॥ तदनन्तर जिन्होंने समस्त कार्यका अच्छी तरह नि बृपभके समान सफेद थे, जो अत्यन्त विज्ञ थे, जिनकी बुद्धि हृदयमें युद्धकी अभिलापा उत्पन्न करना चाहते थे ऐसे घोर दं सामने ही यशोदासे कहा कि जल्दी स्नान कर ॥१६॥ क्य शरीरको सम्भालमै हो भूली हुई है, एक धार नहीं व नहीं छोड़ती। ठीक ही है उज्ज्वल एवं शुभ शुटिया करनेवाली समुद्रकी वेला अपनी चञ्चलता नहीं छोड़नाई : भी बलभद्रने यशोदासे ऐसे कटुक वचन पहले कमी तथा भयभीत हो गई। यद्यपि उसने कहा कुछ नहीं वह चुपचाप शीघ्र ही स्नान कर भोजन बनाने- इधर कृष्ण और बलभद्र-दोनों स्नान करने के निर: एकान्तम पहुँचने पर बलभद्रने कृपा साँसों तथा भश्रुओंसे युक्त क्यों है ? तुम १. तदधिपतिना क्सेन नियुताः पादर म०, स० । ४. वृषलयरिशेपोदन्तविही माह हरिवंशपुराणे प्रणयसहितमित्थं प्रनितः प्राह कृष्णः प्रहसितमुखपनं पंद्रमालोक्य वाक्यम् । शृणु वचनमिहार्य स्वं मदीयं प्रसिद्ध स्फुटवदनविकाराल्लक्षितं चित्तदुःखम् ॥२०॥ श्रुतगुरुरसि विद्वान् वेरिस लोकानुवृत्ति स्वमुपदिशसि मार्ग चार्य वयं पुरस्य । तदिह भण सुपूज्या युज्यते मे यशोदामतिपरुपयचोभिस्ते तिरस्कर्तुमद्य ॥२१॥ इति सुविहितमन्यु गङ्गदे गदन्तं हृषिततनुरुहोऽसौ गाढमाश्लिष्य दोभ्याम् । अवददविरलाश्रुपातसंसूचितान्तःकरणविशदवृत्तिः सर्ववृत्तान्तमस्मै ॥२२॥ मुनिवचनमवन्ध्यं तजरासन्धजायाः पटुमदवशवृत्तेहँ तुतो वृत्तमादौ । निधनमपि च पण्णां देवकोगर्भजानां तुमितहृदयकंसापादितं कोपहेतुम् ॥२३॥ प्रसवसमयतोऽग्गिोकुले लीनवृत्ति रिपुविहितमनेकापायमप्यत्र बाल्यात् । प्रभृति सकलमने मल्लसंग्राममुग्रं विरचितमवधार्य द्विवधेऽवत्त चित्तम् ॥२४॥ हरिरिति हरिवशं रौहिणेयादशेष पितृजनगुरुबन्धुं भ्रातृवर्ग विदित्वा । प्रेमदमुरुमुवाह श्रीमुखाम्भोजलक्ष्मी हरिरिव गुरुभूभृद्भरिरक्षासनाथः ॥२५।। हितसहजतयोस्थस्नेहसंपृक्तभावी सुसरिति यमुनायां तो महामीमलीली । जलविहरणदसौ स्नानमासेव्यसेव्यौ निजसदनमगातामन्वितौ गोपवर्गः ॥२६॥ तुम्हारा यह मुस किसी भारी मानसिक सन्तापको प्रकट कर रहा है सो उसका कारण कहो ॥१६|| इस प्रकार प्रेमसहित पूछे हुए कृष्णने, प्रसन्न मुख कमलसे युक्त बलभद्रकी ओर देखकर यह वचन कहे कि हे आर्य ! मेरे वचन सुनिए । मेरे मुखपर प्रकट हुए विकारसे मेरा मानसिक दुःख प्रकट हो रहा है, यह ठीक है। आप शास्त्र ज्ञानसे श्रेष्ठ विद्वान हैं, लोककी रीतिको जानते हैं और हे पूज्य ! आप नगरवासी लोगोंको श्रेष्ठ मार्गका उपदेश देते हैं फिर यह तो बताइए कि आज आपको हमारी पूज्य माता यशोदाका अत्यन्त कठोर वचनोंसे तिरस्कार करना क्या उचित था ? ||२०|| इस प्रकारके वचनी द्वारा शोक प्रकट करते हुए कृष्णका बलभद्रने दोनों भुजाओसे गाढ़ आलिङ्गन कर लिया। हर्पसे उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया। तदनन्तर अविरल अश्रुधारासे हृदयको स्वच्छ वृत्तिको सूचित करते हुए उन्होंने कृष्णके लिए सब वृत्तान्त कह सुनाया ॥२१॥ उन्होंने सबसे पहले तीव्र अहङ्कारको वशीभूत जरासंधकी पुत्री कंसको स्त्री जीवद्यशाके लिए अतिमुक्तक मुनिने जो अवन्ध्य-सत्य वचन फहे थे वे सुनाये। तदनन्तर तुमितहृदय कसने देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुए छह पुत्रोंको अपनी जानमें मार डाला यह क्रोधवर्धक ममाचार सुनाया । फिर, तुम प्रसवके समयसे पहले ही उत्पन्न हुए थे और उत्पन्न होते ही तुम्हें हम गोलमे छिपाकर यशोदाके यहाँ रख गये थे यह कहा। तदनन्तर चाल्य. फालसे हो लेकर शत्रुने माग्नेके जो नाना साधन जुटाये उनका निरूपण किया । अन्तम यह बताया कि इस समय कम भयंकर मल्लयुद्धका निश्चय कर तुम्हारे मारनेमे चित्त लगा रहा है ॥२२-२४॥ इस प्रकार ध्याही कृष्णनं यड़े भाई बलभद्रसे समस्त हरिवंश, पिता, गुरु, बन्धु, तथा भाइयों का हाल जाना त्योही वे आनन्दसे अत्यधिक मुम्ब कमलको शोभाको धारण करने लगे-पांतिरेकसे उनके मुय-फमलकी लक्ष्मी सिल उठी। और चे बड़े भाई रूपी पर्वतसे प्रान अत्यधिक रक्षासे युक्त हो सिंहके समान सुशोभित होने लगे ॥२५॥ तदनन्ता जन्मजात हितबुद्धिसे उत्पन्न स्नेहसे जिनके अन्तःकरण परस्पर मिल रहे थे, जो महामन्योकी लीला धारण कर रहे थे एवं जलक्रीडामें जो अत्यन्त चतुर थे ऐसे दोनों भाइयोंने यमुना नदीमे स्नान किया। तत्पश्चात् गोप समूहसे सेयनीय दोनों भाई दन्ही १ बम् । २ मि मामित्वः । ३. बलात् । ४ प्रमदपुर-म०11. सदारिरिय म ।

पत्रिंशः सर्गः ४६३ शुभपरिमलसद्यस्ताप हैयङ्गवी स्फुटसुरससुसूपव्यञ्जनक्षीरदध्ना। विरचितमणिभूमौ हेमपान्यां सहेतौ मृदुविशासुसिक्यं शालिमनं हि मुक्या ॥२७॥ मुमृदुसुरभिगन्ध्युद्वतितास्यस्वपाणी स्वकर किसलयौ तौ दिग्धदिव्यानुलिप्ती। [ स्वकर किसलयात्तोदिग्धदिव्यानुलेपो] "दलितहरितपूगैलादिताम्बूलरागप्रविततमुम्बरागाद्धासमानाधरोष्ठी ॥२८॥ विविधकरणदछौ मल्लविद्यानवद्यौ कृनचलनमुवेपो नीलपीताम्बराम्याम् । बृहदुरसि विधायोदारसिन्दूरधुलोरभिनववनमालामालतीमुण्डमालौ ॥२६॥ स्थिरमनसि विधाय ध्वमनं कंसशनोश्चल चरणनिघातर्धारिणीं क्षोभयन्ती। 'सममरमतिघोरैमल्ल्वेषैः सवर्गः पुरमभि मथुरां तो चलनुर्गापवर्गः ॥३०॥ अभिपतदुरगेन्द्रं रामभं दरसन्तं पथि हि पुरनिवेशे विघ्नयन्तं बृहध्वम् । वितवदनरन्धं चापतन्तं दुरन्तं कुतुरगमवधीतं केशवः केशिनं सः ॥३१॥ नगरमभिविशन्ती द्वारिती वारणेन्द्रावविरतमदलेखामण्डितापाण्डगण्डौ । युगपदरिनियोगादापतन्ती विदित्वा तुतुपतुरिव दृष्ट्वा युद्धरगादिमल्ली ॥३२॥ गोपोंके साथ-साथ अपने घर आ गये ।।२६।। घरपर दोनों साथ-साथ मणिजटित भूमिमें गये और वहाँ उन्होंने साथ-ही-साथ, जिसके सीथ अत्यन्त कोमल और उज्ज्वल थे ऐसा शालिधानका भात, शुभ सुगन्धित एवं तत्काल तपाये हुए घी से स्वादिष्ट दाल, शाक, दूध और दहीके साथ जीमा । जीमने के बाद अत्यन्त कोमल और सुगन्धित चन्दनादि द्रव्योके चूर्णसे फुल्ला किया, हाथों में उन्हींका उद्वर्तन किया, अपने कर-किसलयमें लेकर गाढ़ा गाढ़ा सुन्दर लेप 'गाया, कटी हुई हगे सुपारी तथा इलायची आदिसे युक्त पान खाया। पानकी लालीसे उनके मुखकी स्वाभाविक लाली और भी अधिक बढ़ गई जिससे उनके अधर तथा ओठ अत्यन्त सुन्दर दिखने लगे ॥२७-२८॥ सदनन्तर जो नाना आसनोंके लगानेमें चतुर थे, मल्लविद्याके निर्दोप ज्ञाता थे, नीलाम्बर और पीताम्बर धारण कर जिन्होंने चलनेके योग्य सुन्दर वेप धारण किया था, लम्बे-चौड़े वक्षस्थलपर उत्तम सिन्दूरको रज लगा कर जिन्होंने नूतन वनमाला और मालतीका सेहरा धारण किया था, और जो अपने दृढ़ मनमें वैरी कसके माग्नेका निश्चय कर चञ्चल चरणोंके आघातसे पृथिवीको कम्पित कर रहे थे ऐसे दोनों भाई, अतिशय भयानक मल्लोंके वेपसे युक्त एवं अपने-अपने वर्गके लोगांसे सहित गोपीके साथ शीघ्र ही मथुराकी ओर चले ।।१-३०॥ मार्गमें कंसके भक्त एक असुग्ने नागका रूप बनाया, दूसरेने कटु शब्द करनेवाले गधाका और तीसरेने दुष्ट घोड़ेका रूप बनाया तथा नगर प्रवेशमें विघ्न डालते हुए सबके-सब मुँह फाड़ कर सामने आये परन्तु कृष्णने उन सबको मार भगाया ॥३१॥ नगरमें प्रवेश करते हुए दोनों भाई जय द्वारपर पहुँचे तो शत्रु की आज्ञासे उनपर एक-माथ चम्पक और पादाभर नामक दो हाथी हूल दिये गये । नन हाथियोंके भूरे रङ्गके गण्डस्थल, निरन्तर मरती हुई मदको रेसाओंसे सुशोभित थे। नन हाथियोंको सामने आते जान कर दोनों भाई ऐसे संतुष्ट हुए जैसे युद्धको रङ्गभूमिमें भागत प्रथम मल्लीको देस कर १. हेपनीनं म०।२ टप्नः म । ३. भुवम् ग०। ४.२८-२९ श्लोक्योः म्याने म पुसी एवं पार:-मुममुगमिगत्युदर्तनोनितास्यस्वकरविमलकी ती मल्लविद्यानपयो। मनचलननुरेपी मील. पीताम्बराम्या यहदुरमि विधायौदार सिन्दूरघूजीः ॥ अभिनवनमालामालनीमुण्डमाली प्रददिननुविनोदाम- मानाधगेटी। ५. परिव ३० । ६. ममम् अपम् इतिन्दः । ३. वारिती म०।

हरिवंशपुराणे सललितमभितस्धी चम्पक शौरपाणिः फणिरिपुरपि नागं तन पादामराम्यम् । अभवदभिनयं तद्विस्मयापादि पुंसां नरवरकरिमल्लद्वन्द्वयोद्वन्द्वयुद्धम् ॥३३॥ दृढपदहतिगाढाक्रान्ति चोत्पाटगन्ती कुटिस्तिकारद्वान् दन्तिदन्तानभाताम् । पृथुभुजयलीलोत्पाट्यमानाप्रबन्धनितिभृदुरगवेष्टप्रौढवंशाहुरान् वा ॥३४॥ अदयमथसमूलोन्मूलितोल्लामिताभस्वरदनपरिघातेर निघतघोषः । विरसविरटितेभी तो निहाय प्रविष्टौ पुरमुरुरववेलाच्येहिताम्फोटगोपः (१) ॥३०॥ कमलकिसलयोद्यत्तोरणद्वारशोभा नृपजनपदशुम्भश्चश्वालालयालिम् । भुजशिखरनिधृष्टज्येष्टमलासटौ विशदमविशता तो तां महारङ्गभूमिम् ॥३६॥ स्वचरणभुजदण्डाकुचिताकारशोभान्यभिनयादष्टिक्षेपरग्याणि रेजुः । चलितचलनवस्त्रप्रान्तकान्तानि रस हरिहलधरहलावहिंगतास्फोटितानि ॥३७॥ रिपुरयमिह कंसोऽयं जरासन्धलोकः मलिलधिविजयाचारते दशामी सपुत्राः । सहलिसहरिचकालोकिनो लागलीत्थं प्रतिपुरुषमशेष संज्ञयादर्शयत्तान् ॥३॥ ही संतुष्ट हो रहे हों ।।३२।। उनमेंसे बलभद्र तो बड़ी सुन्दरताके साथ धम्पक हाथीके सामने अड़ गये और कृष्ण पादाभर हाथीके सामने जा डटे। तदनन्तर नर मल्ल और हस्तिमल्ली की जोड़ियामें ऐसा मल्लयुद्ध हुआ जो देखनेवाले मनुष्यों के लिए बिलकुल नया तथा आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला था ॥३३॥ यद्यपि हाथियोंने अपने दाँत टेड़ी डोसे छिपा रक्से थे तथापि उन दोनोंने उन्हें पैगंके मजबूत प्रहार और बहुत भारी चपेटसे उखाड़ लिया था। उस समय वे हाथियोंके दाँत ऐसे जान पड़ते थे मानो अत्यधिक बाहुबलकी लीलासे जिसका अग्रभाग उखाड़ा जा रहा था ऐसे किसी पर्वतके साँपोंसे घिरे हुए बड़े बाँसोके अंकुरोका समूह ही हो ॥३४॥ सदनन्तर निर्दयतापूर्वक जड़से उखाड़े हुए अपने सुशोभित दाँतोके परिघातसे जो भयंकर वनपातके समान जोरदार-विरस शब्द कर रहे थे ऐसे उन दोनों हाथियों को मारकर दोनो भाई नगरमे प्रविष्ट हुए । उस समय वह मथुरा नगर जोरसे जय-जयकार करनेवाले गोपोंसे व्याप्त होने के कारण बहुत बड़ा जान पड़ता था (?) ॥३५॥ तदनन्तर कमलकी कलिकाओसे जिसके तोरण द्वारकी शोभा बढ़ रही थी एवं जिसके भीतर घेरकर बैठे हुए राजाओ तथा नगरवासियोंसे सुशोभित, कुश्ती के लिए गोलाकार स्थान बनाये गये थे ऐसी बहुत बड़ी रङ्गभूमिमे दोनों भाई, अपने कन्धोसे बड़े-बड़े मल्लोंके उन्नत कन्याको 'चषका देते हुए, हर्ष पूर्वक प्रविष्ट हुए ॥३६॥ उस समय रङ्गभूमिमें अपले चरणों और भुजदण्डोके संकोच तथा विस्तारसे जिनकी शोभा बढ़ रही थी, जो अभिनयके अनुरूप दृष्टिके दृढ़ निक्षेपसे अत्यन्त रमणीय थीं एवं हिलते हुए चञ्चल वस्त्रोके छोरसे जो सुन्दर थीं ऐसी कृष्ण और बलभद्रकी क्रीड़ा पूर्वक उछलना तथा ताल ठोकना आदि चेष्टाएँ अधिक सुशोभित हो रही थीं ॥३७॥ रङ्गभूमिमें पहुँचते हो बलभद्रने 'यह यहाँ शत्रु कंस बैठा है, ये जरासंध के आदमी हैं और ये अपने अपने पुत्री सहित समुद्रविजय आदि दशो भाई विराजमान हैं। इस प्रकार इशारेसे कृष्णको समस्त मनुष्योंका परिचय करा दिया। वे समस्त लोग भी उसी गोलकी ओर देख रहे थे जो बलभद्र तथा कृष्णसे सहित था ॥३८॥ १ कृष्णः । २. कररुद्धादन्ति म० । कररुद्धौ दन्तिदन्तावमाताम् क० । ३. पाट्यमानारवाधे का, ग०, इ०, म०। ४. चेष्ट-म० । ५. ल्लासिताम-ख०, ग०, १०, १० । ६. निर्याषघोपैः-मः । ७. समुद्र- विजयादयः म०।- सहलसग्विनालोकिनो म।

पत्रिंशः सर्गः १६५ ४ बहुजनपदराजप्राज्यलोकावलोके क्षुभितसकलमल्लास्फोटवल्गामिरामे । क्रमसहितमिहान्ये तावदादेशमाजो वनमहिपविहप्ता मल्लयुद्ध प्रचक्रुः ॥३६॥ अथ गिरिगुरुभित्तिव्यूहवसोविभागस्फुटबढभुजयन्त्रोपीलितोदृप्तमल्लम् । हरिममि सलकंसोध्युक्त चाणूरमलं विपमितविपदृष्ट्या पृष्टतो मुष्टिकं च ॥४०॥ खरनखरकठोरी मुष्टिबन्धौ विधाय प्रकटितपैटुसिंहाकारसंस्थानभेदी। स्थिरचरणनिवेशौ शौरिचाणूर मल्लावनिभृतमभिलग्नौ मुष्टिसंघयुद्धे ॥४॥ कुलिशकठिनमुहिं मुष्टिकं पृष्तस्तं समपतिनुसकामं राममल्लः सलीलम् । अलमलमिह तावत्तिष्ठ तिष्ठेति साशी:शिरसि करतलेनामम्य चक्रे गतासुम् ॥४२॥ हरिरपि हरिशक्तिः शक्तचाणूरक तं द्विगुगितमुरसि स्ले हारिहुङ्कारगर्भः । व्यतनुत भुजयन्याक्रान्तनीरन्ध्रनिर्यदहलरुधिरधारोवारमुद्गीर्णजीवम् ॥४३॥ दशशतहरिहस्तिप्रोदली साधिभावितिहठहतमल्लो वीच्य तो शीरिकृष्णो । प्रचलितवति कसे शातनिझिंशहस्ते व्यञ्चलदखिलरङ्गाग्भोधिरुत्तुङ्गनादः ॥४४॥ अभिपतदरिहस्ताखड्गमाक्षिप्य केशेष्वतिहढमतिगृह्माहत्य भूमौ सरोषम् । विहितपरुपपादाकर्षणस्तं शिलायां तदुचितमिति मावास्फाल्य हत्वा जहास ॥३५॥ अथानन्तर जहाँ अनेक नगरवासी और राजा आदि श्रेष्ठ पुरुष देखनेके लिए एकत्रित थे तथा क्षोभको प्राप्त हुए समस्त मल्लोंकी उछल-कूद एवं तालके शब्दोंसे जो अत्यधिक मनोहर जान पड़ता था ऐसे अखाड़ेमें बारी-बारीसे कसकी आज्ञा पाकर अन्य अनेक मल्ल जंगली भैंसाओके समान अहंकारी हो मल्ल युद्ध करने लगे ॥३६॥ जब साधारण मल्लीका युद्ध हो चुका जय दुष्ट कंसने कृष्णसे लड़नेके लिए उस चाणूर मल्लको आज्ञा दी जो पर्वतकी विशाल दीवालके समान विस्तृत वक्षःस्थलसे युक्त था और जिसने अपने मजबूत भुजयन्त्रसे बड़े-बड़े अहंकारी मल्लीको पेल डाला था। यही नहीं, पीछेसे मुष्टिक मल्लको भी उसने उनपर रूर पड़नेके लिए अपनी विपम-विपमयी दृष्टिसे इशारा कर दिया ॥४०॥ तदनन्तर समर्थ सिंहके समान आकार और खड़े होनेकी मुद्रा विशेषको प्रकट करनेवाले कृष्ण और चाणूर मल्ल, स्थिर चरण रख एवं तीक्ष्ण नखोंसे कठोर मुट्ठियाँ घाँधकर अविराम रूपसे मुष्टि-युद्धमै जुट गये-परस्पर मुक्केयाजी करने लगे ॥४१॥ घनके समान कठोर मुट्टिका धारक मुष्टिक मल्ल पीछसे मुट्टिका प्रहार करना ही चाहता था कि इतनेमें बलभद्र मल्लने शीघ्रतासे 'वस-बस ! ठहर ठहर ! यह कहते हुए चबड़े और शिरमें जोरसे मुक्का लगाकर उसे प्राणरहित कर दिया ॥४२॥ इधर सिंहके समान शक्तिके धारक एवं मनोहर हुंकारसे युक्त श्रीकृष्णने भी चाणूर मल्लको जो उनसे शरीरमे दूना था अपने वक्षःस्थलसे लगाकर भुजयन्त्रके द्वारा स्तने जोरसे दवाया कि उससे अत्यधिक मधिरकी धारा बहने लगी और वह निष्प्राण हो गया ॥४३|| कृष्ण और बलभद्र में एक हजार सिंह और हाथियों का चल था। इस प्रकार असाइमें जव उन्होंने हठ पूर्वक कंसके दोनों प्रधान मल्लोको मार डाला तो उन्हें देस, कंस हाथमें पैनी तलवार लेकर उनको ओर चला। उसके चलते ही समरत असाढेका जनसमूह समुद्र की नाई जोरदार शब्द फरला हुआ उठ सड़ा हुआ ॥४४॥ कृष्णने सामने आते हुए शयुके हायसे तलवार छीन ली और मजबूतीसे उसके बाल पकड़ उसे क्रोधवश पृथिवीपर पटक दिया। तदनन्तर उसके कठोर पैरोंको सींचकर 'उसके योग्य यही दण्ड है।' यह विचार से पत्यरपर पछाड़कर मार डाला । कंसको मारकर कृष्ण हमने लगे ॥१५॥ १. पीलित इतमल्लं क.. पीडितो दृष्टमल्लं म०, ख० । २. अयुवायोजितमान, युक्तचापूर-म० । ३. पद म । ४. मृतम् । ५ हरेः सिहस्येव शरिर्यस्य सः१६. शाल म । ७. कोगेषु म । - हरिवंगपुरागे क्षुभितमभिपतन्तं कंससैन्यं च रामः कुटिलमृकुटिमधस्तम्ममुपा व्य कोपात् । कुलिशसदशधावैः सर्वतो गवदत्तरकृत कृतविरावं कान्दिशी क्षणेन ॥४॥ यदुपु विषमष्टिवेककालं बलः स्वैश्वलित जलधिनादेशरियतेपद्धतेषु । क्षुभितमपि समस्तं कंपकायें नियुक्त ग्यनशदवशमत्तं तजरासन्धमैन्यम् ॥७॥ रथमय चतुरेश्वं तावनावृष्टियुक्ती सपदि सममिभदौ महनेपथ्ययुक्तौ । सदनमगमतां तरपैतृकं यादेवीलधिविजययैः पूर्णमुवभृिदीशैः ॥४॥ अमयुतमवनस्या पूजयिस्वा दशाहप्रमृतिगुरुजनान् तो सप्र दत्ताशिपी तैः। चिरविरहजमन्तस्तापमस्तं स्वयोगप्रथमसलिलधारासाती निन्यस्तम् ॥४३॥ वसुनिमवमुदेवो देवकी चामजस्य प्रशमितरिपुर वश्य विश्रन्धमास्यम् । सुखमनुलमगातामेकनासा घ कन्या भुवि मुतमहनानां संप्रयोगः सुखाय ॥५०॥ गतनिगलकलङ्कः कंसराताविमुचिरविरहकशानं राज्यलक्ष्मीकलमम् । यदुनिबहनियोगादुप्रसेनस्तदानीममजत मथुरायां कंसमाथिप्रदत्तम् ॥५१॥ स्वजननिजबधूनां क्रन्दनायः सभावे श्रितवति रघु कंसेऽप्यसंस्कारमन्यम् । यदुपु कुपितचित्ता प्राप जीवघशाच स्वकपितरुपकण्ठे बाप्पसंरुद्धकण्ठा ॥५२॥ फंसको सेना तुभित हो सामने आई तो उसे देख रामकी भौहें कुटिल हो गई। उन्होंने उसी समय क्रोधवश मञ्चका एक खम्भा उसाड़ लिया और गर्वसे सब ओर दिये हुए उसके पतुल्य कठोर आघातांसे चिल्लाती हुई उस सेनाको क्षणभरमै खदेड़ दिया ॥४६॥ कंसके कार्यमें नियुक्त जरासंघको स्वच्छन्द एवं मदोन्मच सेना यद्यपि जुभित हुई थी तथापि ज्योंही विपम दृष्टिके धारक शक्तिशाली यादव लोग चञ्चल समुद्रके समान शब्द करनेवाली अपनी- अपनी सेनाओके साथ एक ही समय उठ खड़े हुए त्योंही वह समस्त सेना नष्ट-भ्रष्ट । हो गई ॥४॥ तदनन्तर मल्लके वेपसे युक्त दोनों भाई अनावृष्टि के साथ-साथ, चार घोड़ोंसे वाहित रथपर सवार हो अपने पिताके घर गये। पिताका वह घर समुद्रविजय आदि राजाओं तथा अन्य अनेक यदुवंशियोंके समूहसे भरा हुआ था ॥४८॥ वहाँ जाकर दोनों भाइयोंने क्रमसे समुद्रविजय आदि गुरुजनोंको नमस्कार कर उनकी पूजा की तथा गुरुजनोंने उन्हें आशीर्वाद दिया। इस प्रकार अपने संयोग रूप प्रथम जलको धारासे युक्त दोनों भाइयोने चिर कालके विरहसे उत्पन्न सबके मानसिक संतापको अस्त कर दिया ॥४८॥ कुबेरकी उपमा धारण करनेवाले वसुदेव और देवकी, शत्रु रूपी अग्निको शान्त करनेवाले पुत्र के मुखको निःशङ्क रूपसे देस कर अनुपम सुखको प्राप्त हुए। इसी प्रकार कंसने जिसकी नाक चिपटी कर दी थी उस कन्याने भी भाईका मुख देख अनुपम सुखका अनुभव किया सो ठीक ही है क्योंकि संसारमें पुत्र-पुत्रियोंका समागम सुसके लिए होता ही है ॥५०॥ जिनकी वेड़ियोंका कलंक नष्ट हो गया था और जो कंसकी शङ्कासे विमुक्त हो चुके थे ऐसे राजा उग्रसेन उस समय यादवोंकी आज्ञासे कृष्णके द्वारा प्रदत्त, चिरकालीन विरहसे दुबली-पतली राज्यलक्ष्मी रूपी स्त्रीका मथुरामे पुनः उपभोग करने लगे ॥ भावार्थ-कुष्णने राजा उग्रसेनकी बेड़ी काट कर उन्हें पुनः मधुगका राजा बना दिया और वे चिरकालके विरहसे कृश राज्यलक्ष्मीका पुनः सेवन करने लगे ॥५१॥ उघर फुटुम्बी जन तथा अपनी स्त्रियोंके रुदन आदिसे सहित कंस जय अन्तिम शारीरिक संस्कारको प्राप्त हो चुका तथा यादवोंके ऊपर जिसका चित्त अत्यन्त १. मञ्चस्तम्भनुत्पाद्य म० । २. चतुरस्रम् म० । ३. यादवाट्य क० । ४. सयोग म०। ५. 'वसु. मयूखाग्निधनाधिपेषु' इति कोशः । ६. चित्ताः म० । ७. प्राप्य म० । ८. जीवद्यशायाः म ।

पत्रिंशः सर्गः ४६७ भय गगनसमुद्र मोदरङ्गतर स्वरितगतिरनूनामुदहन्मीनलीलाम् । खवरनृपतिदूतोऽलोकि लोकः समस्तैः स्फुरितमणिविभूषो माथुरैरुन्मुसाजैः ॥५३॥ तनुविशददुकूलरचन्दनार्दीकृताङ्गः स्फुट इव कलहंसो मानसस्नानसेवी । सुरसरितमिवाप्ठो माधुरी सोऽय रध्यां दिशि दिशि एतशोमा सरदाजहंसः ॥५४॥ परिषदमय दसद्वारपालप्रवेशो यदुभिरवहितारमा भूषितां सम्प्रविश्य । कृतविनतिनिपण्णो विष्णुमूचेऽरिजिष्णुं प्रभुभवसरवेदी यादवानां समपम् ॥५५॥ शृणुत विनुत राजा राजतागौ सुकेनु मिविन मिकुलश्नोवैजयन्तीसुकेतुः । अधिवसति रथं यो नूपुरं चक्रवाल पुरमिह नयदको दक्षिणश्रेण्यधिष्टम् ॥५६॥ जलजरायनचापरवा परीक्ष्यामुनाहं तव निकटमिहाशु प्रेषित. प्रेमपूर्वम् । भन घरदतस्त्वं सत्यमामावरत्वं पचरभुवनभूत्यै सर्वकल्यागमूलम् ॥५॥ सकलयदुमनोज्ञ दूतवाक्यं निशम्य प्रतिवचनमुपेन्द्रोऽदादिति प्रीतचित्तः । 'खगधनपतिसृष्टा रत्नशैले मयि द्राकू निपततु वसुधारा सत्यमामाभिधाना ॥५॥ कुपित हो रहा था एवं आँसुओंसे जिसका गला रुधा हुआ था ऐसी जीवद्यशा अपने पिता जरासंघके पास पहुँची ॥५२॥ अथानन्तर किसी समय ऊपरकी ओर मुख कमल किये हुए मथुरानिवासी समस्त लोगोंने शाकाशमें विद्याधरोंके राजा सुकेतुका दूत देखा। वह दूत हर्पसे लहराते हुए आकाश रूपी समुद्र में बड़े वेगसे आ रहा था, मच्छकी उत्कट लीलाको धारण कर रहा था, और देदीप्य- मान मणियोंके भाभूपोंसे युक्त था ।।५३|| उसका शरीर चन्दनसे आर्द्र था तथा यह महीन और श्वेत वस्त्र पहिने था इसलिए मानसरोवरमें स्नान करनेवाले हंसके समान जान पड़ता था। वह शीघ्र ही प्रत्येक दिशाओं में विचरण करनेवाले श्रेष्ठ राजाओं (पक्षमें राजहंस पक्षियों ) से गद्गा नदीके समान सुशोभित मथुरानगरीकी गलीमें आया ५४॥ तदनन्तर द्वारपालने जिसे प्रवेश दिया था ऐसा वह दूत, यादवोंसे मुशोभित सभामें सावधानीसे प्रविष्ट हो नमस्कार कर बैठ गया। फिर कुछ देर बाद अवसरको जाननेवाले उस दूतने यादवोंके समक्ष, शत्रुओंको जीतनेवाले कृगसे निम्नावित वचन कहे ॥५।। उसने कहा कि हे राजाओंके द्वारा स्तुन ! आप मेरी प्रार्थना मुनिए-विजया पर्वतके ऊपर एक सुकेनु नामका राजा है जो नमि और विनमिकी फुल लक्ष्मीको मानो विजय-पताका है, नीतिमें अत्यन्तम चतुर है और दक्षिण श्रेणिमें स्थित रथनपुरचक्रवाल नामक नगरमें रहता है ।।।६। राक्ष फूछना, नागशय्या पर पढ़ना और घनुप पढ़ाना इन लक्षणोंसे आपको परीक्षा कर उसने शीघ्र ही प्रेमपूर्वक मुझे यहाँ भापके पास भेजा है तथा फहलाया है कि यद्यपि आप उत्तमोत्तम यस्तुओंको प्रदान करनेवाले लोगोंसे घिरे रहते हैं तथापि मेरी एक तुच्छ प्रार्थना है यह यह कि आप मेरी पुर्वा सत्यभामाको स्वीकृत करलें । आपका यह कार्य विद्याधर लोकके वैभवको पढ़ाने पाला पयं समस्न फल्याणीका मूल होगा ॥५७] समस्त यादयों के लिए मचिकर दूतके वचन मुन कर प्रसन्नचित्त कृगने यह उत्तर दिया कि विद्याघरोंके राजा सुरेनु रूपी फुरके द्वारा रपी सत्यभामा नामक रत्नोंको पारा मुम रलापलपर शीघ्र ही पड़े। भावार्य-मुझे मत्य- भामाका यर दोना स्वीकृत है भयषा दुध पुस्तकों में धनपतिके स्थानपर नगपति पाठ है इसटिए इस श्लोकका यह भयं भी होता है कि विद्याधर रूपी विजया पर्यत तारा रपी सत्यभामा रूपी जलमी पारा मुम रत्नापलपर शीघ्र ही पदे ॥५८] १. समनगरनिया म.।

हरिवंशपुराणे क्षुभितमभिपतन्तं कंसलैन्यं च रामः कुटिलभृकुटिमयस्तम्भमुस्पान्य कोपात् । कुलिशसशधातः सर्वतो गर्वद संरकृत कृतविरावं कान्दिशोक क्षणेन ॥४॥ यदुपु विषमदृष्टिप्वेक्कालं यलो स्वैश्चलितजलधिनादेशस्थितेपद्धतेषु । क्षुभितमपि समस्तं कसज्ञायें नियुक्तं व्यनशदवशमन्तं तरासन्धसैन्यम् ॥७॥ रथमथ चतुरेश्वं तावनावृष्टियुक्तौ सपदि समभिरुढी मल्लनेपथ्ययुक्तौ । सदनमगमता तत्पैतृकं यादवोधजलधिविजयपूर्वः पूर्णमुर्वीभूदोशः ॥४॥ क्रमयुतमवनरया पूजयित्वा दशाहप्रभूतिगुरुजनान् ती तन दत्ताशिपी वैः । चिरविरहजमन्तस्तापमस्तं स्वयोगप्रथमसलिलधारासद्गती निन्यतुस्तम् ॥४॥ वसुनिभवसुदेवो देवकी चामजस्य प्रशमितरिपुवीक्ष्य विश्रब्धमास्यम् । सुखमतुलमगातामेकनासा च कन्या भुवि सुतसहजानां संप्रयोगः मुसाय ॥५०॥ गतनिगलक्लङ्कः कंसशक्षाविमुक्तश्चिरविरहकृशाझं राज्यलक्ष्मीकलनम् । अदुनिवनियोगादुमसेनस्तदानीमभजत मधुरायां समाधिप्रदत्तम् ॥५१॥ स्वजननिजवधूनां क्रन्दनायः सभावे श्रितवति रघु कंसेऽस्यसंस्कारमन्यम् । यदुषु कुपितचित्ती प्राप जीवद्यशार्च स्वकपितुरुपकपठे वापसंरुद्धकण्ठा ॥५२॥ कंसकी सेना सुभित हो सामने आई तो उसे देख रामकी भौहें कुटिल हो गई। उन्होंने उसी समय क्रोधवश मञ्चका एक खम्भा उखाड़ लिया और गर्वसे सब ओर दिये हुए उसके वनतुल्य कठोर आघातीसे चिल्लाती हुई उस सेनाको क्षणभरमें खदेड़ दिया ॥४६॥ कंसके कार्यमें नियुक्त जरासंधको स्वच्छन्द एवं मदोन्मत्त सेना यद्यपि जुभित हुई थी तथापि ज्योंही विपम दृष्टिके धारक शक्तिशाली यादव लोग चश्चल समुद्रके समान शब्द करनेवाली अपनी- अपनी सेनाओंके साथ एक ही समय उठ खड़े हुए त्योंही वह समस्त सेना नष्ट-भ्रष्ट हो गई ॥४॥ तदनन्तर मल्लके वेपसे युक्त दोनों भाई अनावृष्टिके साथ-साथ, चार घोड़ोंसे वाहित रथपर सवार हो अपने पिताके घर गये। पिताका वह घर समुद्रविजय आदि राजाओं तथा अन्य अनेक यदुवंशियोंके समूहसे भरा हुआ था ॥४८॥ वहाँ जाकर दोनों भाइयोंने क्रमसे समुद्रविजय आदि गुरुजनोंको नमस्कार कर उनकी पूजा की तथा गुरुजनोंने उन्हें आशीर्वाद दिया। इस प्रकार अपने संयोग रूप प्रथम जलको धारासे युक्त दोनों भाइयोने चिर कालके विरहसे उत्पन्न सबके मानसिक संतापको अस्त कर दिया ॥४॥ कुबेरकी उपमा धारण करनेवाले वसुदेव और देवकी, शत्रु रूपी अग्निको शान्त करनेवाले पुत्रके मुखको निःशङ्क रूपसे देख कर अनुपम सुखको प्राप्त हुए । इसी प्रकार कंसने जिसकी नाक चिपटी कर दी थी उस कन्याने भी भाईका मुख देख अनुपम सुखका अनुभव फिया सो ठीक ही है क्योंकि संसारमे पुत्र-पुत्रियोंका समागम सुखके लिए होता ही है ॥५०॥ जिनकी वेड़ियोंका कलंक नष्ट हो गया था और जो कंसको शङ्कासे विमुक्त हो चुके थे ऐसे राजा उग्रसेन उस समय यादवींकी आज्ञासे कृष्णके द्वारा प्रदत्त, चिरकालीन विरहसे दुबली-पतली राज्यलक्ष्मी रूपी स्त्रीका मथुरामें पुनः उपभोग करने लगे ॥ भावार्थ--कुष्णने राजा उग्रसेनकी बेड़ी काट कर उन्हें पुनः मथुगका राजा बना दिया और वे चिरकालके विरहसे कृश राज्यलक्ष्मीका पुनः सेवन करने लगे ॥५१॥ उधर कुटुम्बी जन तथा अपनी स्त्रियोंके रुदन आदिसे सहित कंस जब अन्तिम शारीरिक संस्कारको प्राप्त हो चुका तथा यादवोंके ऊपर जिसका चित्त अत्यन्त १. मञ्चस्तम्भमुत्पाद्य म० | २. चतुरस्रम् म । ३. यादवाट्य क०। ४. सयोग म०। ५. 'चमु- मयूखाग्निधनाधिपेषु' इति कोशः । ६. चित्ताः म० । ७. प्राप्य म०। ८, जीवद्यशायाः म ।

पत्रिंशः सर्गः स्वयि सकलधरित्रों शासति ध्वस्तनाया कथमहमुपयाता तात वैधव्यदुःखम् । इदमपि सलु सोढं वैरनिर्यातनाथ मदमुदितयदूनां रक्तपक शिरोभिः ॥६६॥ दुहितुरिति विलापप्रायमाकण्यं वाक्यं नरपतिरुदवोचन्मुञ्च वालेऽतिशोकम् । जगति हि भवितव्यं भाविनो देवयोगादगणितपरवीयं देवमत्र प्रधानम् ॥६॥ पशुरपि निरपायं निगमोपायमार्ग विमृशति वधशङ्कः क्षेत्रमादौ विविक्षुः । स्फुटमिदमपि वृत्तं विस्मृतं मर्नु कामैस्तव पतिमतिमत्तर्यादवारयभिः ॥१८॥ तव पदशरणा स्तेऽकण्टका यद्यपि स्युः सहबलकुलशाखास्ते तथाप्याशु वरसे । श्रुतिपयमति वृताः सन्ति मस्क्रोधवर्षवदहनशिखामिभस्मिता ध्वस्तसंज्ञाः ॥६६॥ प्रियवचनपयोमिदहजाक्रोधवहिपततिमुपशमय्य क्षुब्धकोपानलः सः । यवननिधनकालं कालकल्पं तनूनं यदुजनिधनहेतोरादिदेशाशु राजा ॥७॥ चलजलधिसमानेनाभ्यमित्रं बलेन द्विपचतुरतुरहस्यन्दनायेन गत्वा । स लघु दश च सप्तायुप्रयुद्धानि युवा यदुमिरतुलमालावर्तशैले ननाश ॥७॥ पुनरपि जितजेयं भ्रातरं मागधो दागजितमपरपूर्व प्राहिणोप्रागनुल्यम् । प्रलयशिविशिसालीघरमरः स स्वयोगात्स्वबलपवननुनो द्विट्जगद्मासलोलः ॥७२॥ जिस प्रकार वेला समुद्रको जुभित कर देती है उसी प्रकार उसने राजा जरासंधको सुभित कर दिया ॥६५॥ वह कह रही थी कि हे तात ! जब आप समस्त पृथिवीका शासन कर रहे हैं तब मैं पनिरहिन हो वैधव्यके दुःखको कैसे प्राप्त हो गई ? हे पिताजी ! अब तक मैंने जो यह वैधव्यका दुःख सहा है यह गर्वसे फुले यादवोंके रक्त रूप पङ्कसे युक्त शिरोंसे बैरका बदला । चुकाने के लिए ही सहा है ॥६६॥ इस प्रकार प्रायः विलापसे युक्त पुत्रीके वचन सुनकर राजा जरासंधने कहा कि बेटी ! अत्यधिक शोक छोड़। इस संसारमै जो होता है वह होनहार देवके योगसे ही होता है। दूसरोंकी शक्तिका तिरस्कार करनेवाला देव हो इस संसारमें प्रधान है ॥६॥ येतमें घुसनेका इच्छुक पशु भी वधको शंका कर सबसे पहले निकलने के लिए निरुपद्रव मागेका विचार कर लेता है परन्तु तेरे पतिको मारते हुए इन अत्यन्त मत्त यादवोंने इस स्पष्ट यातको भी भुला दिया इससे सिद्ध है कि ये मरना चाहते हैं ॥६८॥ हे वत्से ! ये भले हो अब तक तेरे चरणोंकी शरण प्राप्त कर निष्कण्टक रहे हों और भले ही ये बल तथा कुलको शासाओंसे युक्त हो परन्तु यह निश्चित है कि ये शीघ्र ही मेरे क्रोधसे घरसनेवाली दावा- नसको ज्यालाओंसे भस्म होने वाले हैं, इनका नाम भी नष्ट हो जाने वाला है और ये श्रवण मार्गको अतिक्रान्त फर चुके हैं- -अब इनका नाम भी नहीं सुनाई देगा ॥६॥ इस प्रकार प्रिय वचन रूपी जलके द्वारा पुत्रीको ग्रोधाग्निके समूहको शान्त कर शोभको प्राप्त हुए फोधानलसे युक्त राजा जरासंधने यादवोंको मारनेके लिए यमराजके तुल्य अपने काल. ययन नामक पुत्रको शीघ्र ही मादेश दिया ॥७॥ कालयवन, चञ्चल समुद्रके समान दिसनयाली हाथी पोड़ा और रय आदिसे युक्त सेनाके साथ शीघ्र ही शगुके सम्मुस चला और यादयोंके साथ सग्रह यार भयङ्कर युद्ध कर अतुल मालाय नामक पर्वत पर नष्ट हो गया-मर गया ॥७॥ तदनन्तर राजा जरासंघने शीघ्र ही अपने भाई अपराजित को भेजा जो कि शाओंको जीतने याला या, प्रागोंके तुल्य था, अपने संयोगसे प्रलय फाटकी अग्निको शिसाओंके समूहको नष्ट करने याला था, अपनी सेना रूपी प्रवल पवनसे प्रेरित था, और शत्रु रूपी जगन्के प्रसनेके १. गरमाया फररका म०,०, ग०, २.1 २. मतिमनाः ६०, स०,०, ८०, म । ३. न मोध-. । ४. म्युमपुमानि म । ५. दिगमास-ग।

४६६ हरिवंशपुराणे प्रतिविहितसुपूज खेचरेन्द्रस्य दूतः प्रमुदितमतिरित्या स्वास्पदं स्वामिनेऽसी । घरगुणनुतिपूर्व सर्वकार्यस्य सिद्धि सममणदिति तोपो तोपिणे सप्रियाय ॥५६॥ भुवि हरिबलदेवौ भ्रातरौ भ्राजमानी प्रतिहतपरतेजोरूपकान्ती विदिखा। निजवचनहरास्याखेचरेन्द्रः सुकेतुः खचरप-रतिमालश्चागती कन्यकाम्याम् ॥६०॥ रतिमिव रतिमालो रूपतो रेवती स्वां दुहितरमतिकान्तां देहजो ज्यायसेदात् । अतिमुदितसुकेतुः सत्यभामा प्रभायाः स्वयमुपपदवत्या गर्भां देशवाय ॥६॥ कुचकलशकलंबोदारभारातिखिन्नाः शिथिलवसनकाञ्चीकेशपाशोत्तरीयाः । गन्तुरिह विवाहे नूपुरारावरम्याः शितिचरखचराणां योपितः शोषिवेषाः ॥३२॥ प्रथमनववधूको नीलपीताम्बरौ तौ विविधमणिविभूपाज्योतिरुद्भासिताडौ । यदुनृपतिपरीतौ वीक्ष्य पुत्रावतोपीद्यदुयुवतिसमग्रा रोहिणी देवकी च ॥१३॥ प्रथममदनरङ्गे शाणि: सत्यभामा हृदयमहरदिष्टा रेवती शीरपाणेः । गुणितगुणकलानां सुप्रयोग स्तयोस्तावुचितकरणकाले न स्खलन्ति प्रगल्भाः ॥६॥ अथ सकलुपभावा सा जरासन्धराज जलनिधिमिव चेला व्याकुला क्षोभयन्ती । अतिविततत मालोचीलकेशाप्यरोदीघदुकुलकृतदोष कंसयोपिद्वदन्ती ॥६५॥ तदनन्तर कृष्णकी ओरसे जिसका सत्कार किया गया था और जिसकी बुद्धि अत्यन्त प्रसन्न थी ऐसा राजा सुकेतुका वह दूत अपने स्थानपर चला गया। वहाँ जा कर उसने पहले कृष्णके उत्तम गुणोकी स्तुति की उसके पश्चात् संतुष्ट हो कर, वल्लभाके साथ बैठे हुए संतोषी राजा सुकेतुके लिए सर्व कार्यके सिद्ध होनेकी सूचना दी ॥५६॥ 'पृथिवीपर श्री कृष्ण और बलदेव दोनों भाई अत्यन्त देदीप्यमान हैं तथा शत्रुओंके तेज, रूप और कान्तिको खण्डित करनेवाले हैं। इस प्रकार अपने दूत के मुखसे जान कर विद्याधरोंका राजा मुकेतु और उसका भाई रतिमाल अपनी-अपनी कन्याओंके साथ मथुरा आ पहुंचे ॥६०|| रतिमालको कन्याका नाम रेवती था और यह रूपमे साक्षात् रतिके समान जान पड़ती थी। रतिमालने अपनी वह सुन्दर कन्या बड़े भाई बलभद्रके लिए दी और अत्यन्त प्रसन्न सुकेतुने स्वयंप्रभा रानीके गर्भसे उत्पन्न अपनी सत्यभामा नामक पुत्री कृष्णके लिए दो ॥६१॥ इस विवाह-मङ्गलके अवसर पर जो स्तन रूपी कलश और नितम्बोके बहुत भारी भारसे खिन्न थीं, जिनके वस्त्र, मेखला, केश- पाश और उत्तरीय वस्त्र शिथिल हो रहे थे, जो नूपुरोंकी भनकारसे मनोहर जान पड़ती थी और उज्ज्वल वेपको धारण करनेवाली थीं ऐसी भूमिगोचरी एवं विद्याधरीकी स्त्रियोंने नृत्य किया था ॥६२|| जो पहली पहली नई वधुओंसे सहित थे, नील और पीत वनके धारक थे, नाना प्रकारके मणिमय आभूपोंकी कान्तिसे जिनके शरीर देदीप्यमान हो रहे थे तथा जो चारों ओर बैठे हुए यदुवंशी राजाओसे घिरे हुए थे ऐसे अपने पुत्रोंको देख कर यादवोंकी स्त्रियोंसे युक्त रोहिणी तथा देवकी अत्यधिक संतुष्ट हो रही थीं ॥६३॥ प्रथम समागममें ही सत्यभामाने कृष्णके तथा अतिशय प्रिय रेवतीने बलभद्रके हृदयको हर लिया था। इसी प्रकार कृष्ण तथा बलभद्रने भी अभ्यस्त गुग और कलाओंके उत्तमोत्तम प्रयोगोसे उन दोनोंका हृदय हर लिया था सो ठोक ही है क्योंकि चतुर मनुष्य उचित कार्यके करने के समय कभी नहीं चूकते हैं ॥१४॥ तदनन्तर जिसका हृदय अत्यन्त कलुपित था, ली अत्यधिक व्याकुल थी और जिसके रामाल पुष्पके समान काले काले केश विखरे हुए थे ऐसी कंसको स्त्री जीवद्यशा, राजा जरा. सन्धके पास जाकर यदुवंशियों के द्वारा किये हुए दोष का बखान करती हुई रोने लगी तथा १. तेषा म०। २. तोपणे म., ग। ३. हरबलदेवौ म. ४. नितम् । ५. सुप्रयोगो तयो-म०।६.तमालानील-म० । .

पत्रिंशः सर्गः स्वयि सकलधरित्री शासति स्वस्तनाथा कथमहमुपयाता तात वैधव्यदुःखम् । इदमपि खलु सोढं चैरनिर्यातनाथ मदमुदितयदूना रक्तपः शिरोभिः ॥६६॥ दुहितरिति विलापप्रायमाकण्यं वाश्यं नरपतिरुदवीचन्मुन्च बालेऽतिशोकम् । जगनि हि भवितव्यं भाविनो देवयोगादगणितपरवायं देवमत्र प्रधानम् ॥६७॥ पशुरपि निरपायं निगमोपायमार्ग विमृशति वधशः क्षेत्रमादौ विविशुः । स्फुटमिदमपि वृत्तं विस्मृतं मतुकामस्तव पतिमतिमत्तांदवारयभिः ॥८॥ तव पदशरणा स्वेऽकण्टका यद्यपि स्युः सहबलकुलशास्त्रास्ते तथाप्याशु वसे । श्रुतिपयमति वृत्ताः सन्ति मनोधवपंवदहनशिस्वामिभस्मिताध्वस्तसंज्ञाः ॥६६॥ प्रियवचनपयोमिदैहजाक्रोधवह्निपततिमुपशमय्य क्षुब्धकोपानलः सः । यवननिधनकालं कालकरुपं तन्जं यदुजनिधनहेतोरादिदेशाशु राजा ॥७०॥ चलजलधिसमानेनाभ्यमित्रं वलेन द्विपचतुरतुरङ्गस्यन्दनाघेन गन्त्रा। स लघु दश च सप्ताप्युप्रयुद्धानि युवा यदुभिरतुलमालावतीले ननाश ॥७॥ पुनरपि जितजेय भ्रातरं मागधो दागजितमपरपूर्व प्राहिणोत्प्राणनुल्यम् । प्रलयशिखिशिखालीघरमरः स स्वयोगास्वबलपवननुनौ द्विट्जगद्ग्रासलोलः ॥७२॥ जिस प्रकार वेला समुद्रको भित कर देती है उसी प्रकार उसने राजा जरासंधको शुभित कर दिया ॥६५॥ यह कह रही थी कि हे तात ! जब आप समस्त पृथिवीका शासन कर रहे हैं तब मैं पनिरहित हो वैधव्यके दुःखको कैसे प्राप्त हो गई ? हे पिताजी ! अब तक मैंने जो यह वैधन्यका दुःख सहा है वह गर्वसे फुले यादवोंके रक्त रूप पङ्कसे युक्त शिरोंसे रैका बदला चुकाने के लिए ही सहा है ।।६६।। इस प्रकार प्रायः विलापसे युक्त पुत्रीके वचन सुनकर राजा जरासंधने कहा कि बेटी ! अत्यधिक शोक छोड़। इस संसारमें जो होता है यह होनहार देवके योगसे ही होता है। दूसरोंकी शक्तिका तिरस्कार करनेवाला देव हो इस संसार में प्रधान है ॥६॥ खेतमें घुसनेका इच्छुक पशु भी वधको शंका कर सबसे पहले निकलने के लिए निरुपद्रच मागका विचार कर लेता है परन्तु तेरे पतिको मारते हुए इन अत्यन्त मत्त यादवोंने इस स्पष्ट बातको भी भुला दिया इससे सिद्ध है कि ये मरना चाहते हैं ॥६॥ हे वत्से ! ये भले ही अब तक तेरे चरणोंकी शरण प्राप्त कर निष्कण्टक रहे हों और भले ही ये पल तथा कुलको शाखाओंसे युक्त हो परन्तु यह निश्चित है कि ये शीघ्र ही मेरे क्रोधसे घरसनेवाली दावा- नलकी ज्यालाओंसे भस्म होने वाले हैं, इनका नाम भी नष्ट हो जाने वाला है और ये श्रवण मार्गको अतिक्रान्त कर चुके है अब इनका नाम भी नहीं सुनाई देगा ।।६।। इस प्रकार प्रिय वचन रूपी जलके द्वारा पुत्रीको क्रोधाग्निके समूहको शान्त कर, नोभको प्राप्त हुए क्रोधानलसे युक्त राजा जरासंघने यादवोंको मारने के लिए यमराजके तुल्य अपने काल- यवन नामक पुत्रको शीघ्र ही आदेश दिया ॥७०1। कालयवन, चञ्चल समुद्रके समान दिखनेवाली हाथी घोड़ा और रथ आदिसे युक्त सेनाके साथ शीव ही शत्रुके सम्मुस चला और यादवोंके साथ सत्रह बार भयङ्कर युद्ध कर अतुल मालावत नामक पर्वत पर नष्ट हो गया-मर गया ।।७१॥ वदनन्तर राजा जरासंधने शीघ्र ही अपने भाई अपराजित को भेजा जो कि शत्रुओंको जीतने वाला था, प्राणों के तुल्य था, अपने संयोगसे प्रलय कालकी अग्निको शियाओं के समूहको नष्ट फरने वाला था, अपनो सेना रूपी प्रबल पवनसे प्रेरित था, और शत्रु रूपी जगन्के प्रसनेके १. शरणाशा एटका म०, १०, ग०, इ.। २. मतिमताः का, ख०, ग०, ३०, 10 1३. न मोध-4 | ४. व्युमयुद्धानि म । ५. दिगजपास-पा० ।

४७० हरिवंशपुराणे तुमुलरणशतानि वीणि स प्रोणितास्वैयंदुभिररिषु चत्वारिंशतं पट् ध युद्ध वा । श्रमनुदमिव वोरो वीरशरयां यशस्वी हरिशरमुखपीतमाणसारोऽभ्यशेत ॥७३॥ प्रमदमथ वहन्तः सन्ततं संवसन्तो हरिपुरि मथुरायां माथुरैः पौरलोके । हरिहलधरवीरावार्यवीर्यावलेपप्रतिहतरिपुशङ्काः शौरयो रेमिरेऽमो ॥७॥ शमयति रिपुलोकोदारदाबावलेपं जनयति जनयन्धुबन्धुलोकप्रहपम् । जिनमतधनचर्यावारिधाराततिभूवलयफलसमृद्धिः श्रीयशोमालिनीयम् ॥७५॥ इत्यरिटनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतौ कंसापराजितवधवर्णनो नाम पट्त्रिंशः सर्गः । लिए सतृष्ण था ॥७२॥ वीर अपराजितने संतुष्ट होकर शत्रुओके बीच यादवोंके साथ तीन सौ छयालिस वार युद्ध किया परन्तु अन्तमें यह श्रीकृष्णके बाणोंके अग्रभागसे निष्प्राण हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। पृथिवी पर पड़ा यशस्वी अपराजित ऐसा जान पड़ता था मानो थकावटको दूर फरनेवाली वीरशय्या पर ही शयन कर रहा हो ॥७३॥ अथानन्तर जो निरन्तर हर्पको धारण कर रहे थे, कृष्णपुरी मथुराम निवास करते थे और वोर कृष्ण तथा बलभद्रके अवार्य वीर्यके गर्यसे जिनकी शत्रुकी शंका नष्ट हो गई थी ऐसे यादव लोग मथुरावासी नागरिक जनोंके साथ कौड़ा करने लगे।७४ा गौतम स्वामी कहते हैं कि जो समस्त जीवोंके लिए बन्धुके समान है, पृथिवी मण्डल के फलों को समृद्धिको बढ़ाने वाली है तथा लक्ष्मी और यशकी मालासे सहित है ऐसी यह जिनेन्द्र मतरूपी मेषके जलकी धारा शत्रुसमूह रूपी प्रचण्ड दायानलके गर्वको शान्त फरती है और बन्धुजनोंके प्रकृष्ट बहुत भारी हर्पको उत्पन्न करती है ।।७।। इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें कंस और अपराजितके वधका वर्णन करनेवाला छत्तीसवाँ सर्ग पूर्ण हुआ ॥३०॥ १, मनियारोमा। २. परादेनोग, गंयन्तो म.क.। शं यान्तो ग । ३.हरिरिपु म., परिपुर..

सप्तत्रिंशः सर्गः वंशस्थवृत्तम् अयान यवृत्तमतीव पावनं पुरैव तु श्रेणिक लोकहर्पणम् । दशाहमुख्यस्य 'सुसौर्यवासिनः शृणु प्रवच्येऽवहितस्तदद्भुतम् ॥ १ ॥ जिनस्य नेमेनिदिवावतारतः पुरैव पण्मासपुरस्सरा सुरैः । प्रवर्तिता तज्जमनावधिगृहे हिरण्यवृष्टिः पुरुहूतशासनात् ॥ २ ॥ तया पतन्त्या वसुधारयार्धमात्रिकोटिसंरयापरिमाणया जगत् । प्रतपितं प्रत्यहमथि सर्वतः क पात्रभेदोऽस्ति धनप्रवर्षिणाम् ॥ ३ ॥ दिशा मुखेम्यः समितास्तदाश्रिता दिश कुमार्यः परिचर्यया शिवाम् । दिशां च चक्रस्य जयं जगस्नये दिशन्त्यपत्येन जिनेन जिष्णुना ॥ ४ ॥ समेत्य पत्यातिशयप्रदर्शनादतीव संहृष्टा शिवान्यदा। ददर्श सासुप्तमिमान निशान्तरे प्रशंसितान् स्वप्नवरान् हि पोडश ॥ ५ ॥ समन्ततोऽश्रान्तमदाम्बुनिरः प्रतिध्वनिव्याप्तदिगिन्द्रपो द्विपः । तया समालासितभृगमतिरलोकि कैलास इवाचलाचलः ॥ ६ ॥ सुङ्गमुत्तुगककुरखनरखुरं प्रलम्बसारनायतवालधीक्षणम् । सितं घनादेकितधारमम्बिकामहोदमचिप्रियमैदत सणम् ॥ ७ ॥ अथानन्तर-गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! दशाहमि मुख्य सौर्यपुर निवासी राजा समुद्रविजयके यहाँ भगवान्के गर्भ में आनेके पहलेसे ही जो लोकको हर्पित करनेवाला परम पवित्र आश्चर्य हुआ था उसे में कहता हूँ सो सावधान होकर सुनो ॥१॥ भगवान् नेमि जिनेन्द्र के स्वर्गावतारसे छह माह पहलेसे लेकर जन्म पर्यन्त-पन्द्रह मास तक इन्द्रकी आज्ञासे राजा समुद्रविजयके घर देवोंने धनकी वर्षा जारी रक्खी ।।२।। वह धनकी धारा प्रतिदिन, तीन चार साढ़े तीन करोड़की संख्याका परिमाण लिये हुए पढ़ती थी और उसने सब ओर याचक जगत्को संतुष्ट कर दिया था सो ठीक ही है क्यों कि धनको वर्षा करनेवालीको पात्र भेद कहाँ होता है ? ॥३॥ स समय पूर्वादि दिशाओंके अप्रभागसे आई हुई दिक्कुमारी देवियाँ परिचर्या द्वारा माता शिवादेवीको सेवा कर रही थी और उससे यह सूचित कर रही थीं कि जो विजयी जिन वालक माताके गर्भमैं आनेवाला है उसने तीनों जगतमें समस्त दिशाओंके समूहको जीत लिया है ॥४॥ पतिके साथ मिलकर नाना प्रकारके अतिशय देखनेसे जिसकी बुद्धि अत्यन्त हर्पित हो रही थी ऐसी शिवादेवीने एक दिन रात्रिमें सोते समय नीचे लिखे सोलह उत्तम स्वप्न देसे ।। पहले स्वप्न में उसने इन्द्रका वह ऐरावत हाथी देखा जिसके सब ओरसे निरन्तर लगातार मदरूपी जलके निमर कर रहे थे, जिसने अपनी ध्वनिसे दिशाओंको व्याप्त फर रक्सा था, जिसपर तमालके समान काले काले भ्रमर मङ्कार कर रहे थे और जो फैलास पर्वतके समान स्थिर था ॥६॥ दूसरे स्वप्नमें अम्बिकाका वह महापम देसा जिसके सुन्दर सींग थे जिसकी दोकांल ऊँची उठ रही थी, जिसके बुर पृथिवीकोसोद रहे थे, जिसकी सास्ना-गलकम्बल अत्यन्त लम्बी थी, किसको पूंछे और आँखें अत्यन्त दीर्घ थीं, जो रगमें सफेद था, मेघकी गर्जनाके समय १. मुशौर्यवासिनः प० । २. मुप्तं यथा स्यात्तथा । पूतनमान्-१० । स्वप्न इमान् म । ३. अचलाचलः इति, अचलाचलः स्थिर इत्यर्थः। चलाचलः ख०, चलाऽमल. ३० वाचलोऽचलः ग ।

हरिवंशपुराणे थिलयितचमाभृतमप्रशैलग मृगालेखाकुरदंष्ट्रमायतम् । दिगन्तविधान्तनिनादमाविशत्शरस्पयोदाममिमारिमैवत ॥८॥ महेभकुम्भामचामिभः शुभैः कृताभिपेका कुटगन्धवारिमिः । करनिताम्भोजपुटो ददर्श सा विकासिपद्मासनयतिनी श्रियम् ॥ ४॥ सजी प्रलम्बे विमलाग्यरे वरे रजोहणीभून पाघिमण्डले । भुजे निजे वा कुसुमातिकोमले सजागरेवावहिता म्यलोक्त ॥१०॥ निरस्य नै निशिवेस्पागो रेस्तमोजालमलं निशाकरम् । निरभिंते व्योग्नि प्रपश्यति स्म सा स्थिराहहासं रजनीयर स्त्रियाः ॥७॥ दिनं दिनं हरयमुसं दिवाकर सुसायसिन्दूरपरागपिक्षरम् । पुरन्दराशासुपुरन्ध्रिनन्दनं चिरं एतं टिमुसं ददर्श सा ॥१२॥ तहिचला सरसीयराननाविलोलसल्लोचनयुग्ममायतम् । परस्परस्नेहभर तयारमद् व्यलोकि सन्मस्ययुगं विमरसरम् ॥१३॥ सुमौरभाम्भोभरकुम्मयुग्मक मुखाहिताम्भोरहमम्मुजेक्षणा । सुशातकुम्भारमकमभ्यलोकत स्वभावसूचकुचकुम्मसन्निभम् ॥१४॥ शुभाम्बुपूर्ण जलपुष्पराजितं सुराजहंसादिविहासातम् । महासरोऽदशि ततो मनोहरं मनो निजं वा शुचि निर्मलं तया ॥१५॥ गम्भीर शब्द कर रहा था तथा नेत्रोंके लिए अत्यन्त प्रिय थाना तीसरे स्वप्न में एक ऐसा सिंह देखा जो पर्वतीको लाँघनेवाला था, पर्वतके अप्रभागपर स्थित था, चन्द्रमाकी कला अथवा अंकुशके समान दाँदीको धारण करनेवाला था, शरीरका अत्यन्त लम्बा था, जिसका शब्द दिशाओंके अन्तमे विश्राम कर रहा था और जो शरद् ऋतुके घुमड़ते हुए मेधके समान सफेद था ॥८॥ चौथे स्वप्न में वह लक्ष्मी देखी जो किसी बड़े हाथी गण्ड स्थलाके समान स्थूल स्तनोसे युक्त थी, शुभ हाथी घड़ोमे रखे हुए सुगन्धित जलसे जिसका अभिषेक कर रहे थे, जो अपने हाथमे कमल लिये हुए थी और खिले हुए कमलोंके आसनपर बैठी थी ॥६॥ पाँचवें स्वप्न में जागती हुईके समान सावधान शिवादेवीने निर्मल आकाशमे लटकती हुई दो ऐसो उत्तम मालाएँ देखीं जिन्होंने अपनी परागसे भ्रमरोंके समूहको लाल लाल कर दिया था और जो अपनी भुजाओंके समान फूलोंसे भी कहीं अधिक सुकोमल थीं (पक्षमे फलोंके द्वारा अत्यन्त कोमल थीं) ॥१०॥ छठवें स्वप्नमें उसने निरभ्र आकाशके बीच ऐसा चन्द्रमा देखा जो अपनी तीक्ष्ण किरणों (पक्षमे हाथो) से रात्रिके सघन अन्धकारके समूहको नष्टकर उदित हुआ था और रात्रिरूपी स्त्रीके स्थिर अट्टहासके समान जान पड़ता था ॥१शा सातवें स्वप्नमें ऐसा सूर्य देखा जिसका मुख सम्पूर्ण दिन दर्शनीय था, जो संध्याको लालीरूपी सिन्दूरकी परागसे पिञ्जर वर्ण था, पूर्व दिशारूपी स्त्रीके पुत्र के समान जान पड़ता था और नेत्रोंके लिए चिरकाल तक सुख उत्पन्न करनेवाला था ॥१२॥ आठवें स्वप्नमे उसने मत्स्योंका वह युगल देखा जो बिजलोके समान चञ्चल शरीरका धारक था, सरसी रूपी उत्तम स्त्रोके चञ्चल एवं समीचीन नेत्रोंके युगलके समान जान पड़ता था, लम्बा था, पारस्परिक स्नेहसे भरा हुआ था, क्रीड़ा कर रहा था और ईर्ष्यासे रहित था ।।१३।। नौवे स्वप्नमें कमललोचना शिवादेवीने अत्यन्त सुगन्धित जलसे भरे हुए दो ऐसे फलश देखे जिनके मुख- पर कमल रखे हुए थे, जो उत्तम स्वर्णसे निर्मित थे और स्वभावसे उठते हुए कुचकलसके समान जान पड़ते थे ॥१४॥ तदनन्तर दशवें स्वप्नमे उसने एक ऐसा बड़ा सरोवर देखा जो शुभ जलसे भरा हुआ था, कमलासे सुशोभित था, राजहंस आदि उत्तम पक्षियोंसे युक्त था, मनको हरण करनेवाला था और अपने मनके समान पवित्र एवं निर्मल था ॥१५॥ १.विलम्बित-म० । २ करोद्धताम्भोजपुरा ख० । ३. सुमाध्य-म० । ४. मुखावहिताम्भोरुह-म० ।

सप्रिंशः सर्गः प्रर्णितोत्तुङ्गतरङ्गभङ्गुरं प्रवालमुक्तामणिपुष्पशोभितम् । महार्णवं फेनिलमुद्धतं श्रमद्विभीषणग्राहगृहं निरैक्षत ॥१६॥ नखानदंष्ट्राइष्टिमासुरज्वलत्सदारोपमृगेन्द्रधारितम् । मणिप्रभारक्षितदिग्वधूमुखं ददर्श सिंहासनमासनं श्रियः ॥१७॥ विचित्रमक्ति ध्वजकोटिसञ्जलं सुवैजयन्तीभुजमालयानटत् । प्रलम्बमुक्तामणिमालिकोज्ज्वलं विमानमालोकि तया नभस्तले ॥१८॥ 'फगामणिद्योतविभिन्नभूतमःफणीन्द्रकन्याकलगीतसंकुलम् । घलन्मणि प्रैक्षि भुवः समुद्गत फणीन्द्रभास्वदवनं महत्तया ||१६॥ सपनरागोज्ज्वलवज्रपूर्वकं प्रकृष्टमाणिक्यमहाशिखाकुलम् । व्यलोकतेन्द्रायुधरुद्धदिङ्मुसं सुरत्नराशि गगनस्पृशं शिवा ॥२०॥ शिखाकरालं शिखिनं मुखं दिशां प्रकाशयन्तं शुचिशोचिपा निशि । ददर्श सन्दर्शितसौग्यविग्रहं सविग्रहा श्रीरिव तोषपोपिणी ॥२॥ अनन्तरं स्वप्नगणस्य कम्पयन् सुरासनान्याविशदम्बिकाननम् । सितेभरूपो भगवान् दिवश्च्युतः प्रकाशयन् कार्तिकशुक्लपछिकाम् ॥२२॥ ग्यारहवे स्वप्नमे एक ऐसा महासागर देखा जो उठती हुई ऊँची-ऊँची लहरोंसे भङ्गुर था, मूंगा, मोती, मणि और पुप्पोंसे सुशोभित था, फेनसे युक्त था, उद्धत था, तथा घूमते हुए भयंकर मगरमच्छोका घर था ॥ १६॥ बारहवें स्वप्नमें लक्ष्मीका आसनभूत एक ऐसा सिंहासन देखा जिसे नखोंके अग्रभाग एवं डाँदांसे मजबूत, दृष्टि से देदीप्यमान और चमकती हुई सदाओंसे युक्त सिंह धारण किये हुए थे तथा मणियोंकी कान्तिसे जिसने दिशा रूप स्त्रियोंके मुखको रक्त वर्ण कर दिया था ॥ १७ ॥ तेरहवें स्वप्नमें (उसने आकाशतलमें ऐसा विमान देखा जो नाना प्रकारके बेल-बूटोंसे युक्त था, ध्वजाओंके अग्रभागसे चंचल था, उत्तम पताका रूपी भुजाभोंकी मालासे जो नृत्य करता हुआ-सा जान पड़ता था, और जो लटकती हुई मोतियों और मणियोंकी मालाभासे उज्ज्वल था॥ १८ ॥ चौदहवें स्वप्नमें उसने नागेन्द्रका एक ऐसा विशाल देदीप्यमान भवन देखा जो फणाओंपर स्थित मणियों के प्रकाशसे पृथिवीके अन्धकारको नष्ट करनेवाली नागकन्याओंके मधुर संगीतसे व्याप्त था, देदीप्यमान मणियोसे जगमगा रहा था और पृथिवीसे ऊपर प्रकट हुआ था ।। १६ ।। पन्द्रहवें स्वप्नमें शिवा देवीने उत्तम रत्नोंको एक ऐसी राशि देखो जो पद्मरागमणि तथा चमकते हुए हीरॉके सहित था, उत्तमोत्तम मणियोंकी बड़ी-बड़ी शिखाओंसे व्याप्त थी, इन्द्रधनुपसे दिशाओंके अप्रभागको रोकने वाली थी, तथा आकाशका स्पर्श कर रही थी ॥२०॥ और शरीरधारिणी लक्ष्मीके समान संतोषको पुष्ट करने वाली शिवा देवीने सोलहवें स्वप्नमें ऐसी अग्नि देसी जो शिसाओंसे भयंकर थी, रात्रिके समय अपनी उज्वल किरणोंसे दिशाओंके अप्रभाग को प्रकाशित कर रही थी तथा अपना सौम्य रूप दिसला रही थी ॥२१ । इस प्रकार स्वप्न दर्शन के बाद कार्तिक शुक्ला पष्टीके दिन देवोंके आसनोंको कम्पित करते हुए भगवान्ने स्वर्गसे च्युत हो सफेद हाथीका रूप धर कर माताके मुखमें प्रवेश किया। 7भावार्थ-आनुपूर्वी नामफर्मके उदयसे भगवानके आत्म-प्रदेशीका आकार तो पूर्व शरीरके समान ही रहता है। यहाँ जो 'सफेद हाथीका रूप धर कर' कहा गया है उसका तापर्य यह है कि माताने सोलह स्वप्न देखने के बाद देसा था कि एक सफेद हाथी आकाशसे १. हिज-(1) म. १२. गामणीनां द्योतेन विभिन्न भूतमो यामिः तथाभूता याः पपीन्द्र कन्यास्तासां फ्ले मधुर यद् गीत तेन संकुलम् । ३. शुमा म । ४. शुचिरोचिषां म । ६० ४७२ हरिवंशपुराणे बिलयितपमाभृतमनशैला मगाइलेखाशदष्ट्रमायतम् । दिगन्तविधान्तनिनादमाविशत्शरस्पयोदामभिमारिमैरत ॥ ८ ॥ महेमकुम्भामकुचामिभः शुभैः कृताभिषेका कुटगन्धवारिभिः । केरश्रिताम्भोजपुरो ददर्श मा विकासिपमासनयतिनी श्रियम् ॥ १ ॥ सजी प्रलम्ये विमलाम्बरे वरे रजोहणीभूतपद घिमण्डले । भुजे निजे वा कुसुमातिकोमले सजागरेवावदिता घ्यलोक्त ॥१०॥ निरस्य नै निशितैरुपाग कौस्तमौजालमलं निशाकरम् । निरभिंते व्योग्नि प्रपश्यति स्म सा स्थिराहदासं रजनीवधियाः ॥११॥ दिन दिनं दृश्यमुखं दिवाकर सुसायसिन्दपरागपिञ्जरम् । पुरन्दराशामुपुरन्ध्रिनन्दनं चिरंत रहिसुसं ददर्श सा ॥१२॥ तदिश्चलानं सरसीवराहनाविलीलमल्लोचनयुग्ममायतम् । परस्परस्नेहभरं तयारमद् व्यलोफि सन्मत्स्ययुगं विमस्मरम् ॥१३॥ सुसौरभाम्भोभरकमयुग्मक मुसाहिताम्भोरुहमम्मुजेक्षणा। सुशातकुम्भारमकमम्यलोकत स्वभावमूयाकुचकुम्भसन्निभम् ॥१४॥ शुभाम्वपूर्ण जलपुष्पराजित मुराजहंसादिविहासङ्गतम् । महासरोऽदशि ततो मनोहरं मनो निज वा शुचि निर्मलं तया ॥१५॥ गम्भीर शब्द कर रहा था तथा नेत्रों के लिए अत्यन्त प्रिय था। तीसरे स्वप्नमें एक ऐसा सिंह देखा जो पर्वतोंको लाँघनेवाला था, पर्वतके अग्रभागपर स्थित था, चन्द्रमाकी कला अथवा अंकुशके समान दाँढोंको धारण करनेवाला था, शरीरका अत्यन्त लम्या था, जिसका शब्द दिशाओंके अन्तमे विश्राम कर रहा था और जो शरद् ऋतुके घुमड़ते हुए मेधके समान सफेद था |८|| चौथे स्वप्नमें वह लक्ष्मी देखी जो किसी बड़े हाथोके गण्ड स्थलोके समान स्थूल स्तनोसे. युक्त थी, शुभ हाथी घडॉमें रखे हुए सुगन्धित जलसे जिसका अभिषेक कर रहे थे, जो अपने हाथमै कमल लिये हुए थी और खिले हुए कमलोंके आसनपर बैठी थी 11 पाँचचे स्वप्नमें जागती हुईके समान सावधान शिवादेवीने निर्मल भाकाशमे लटकती हुई दो ऐसी उत्तम मालाएँ देखी जिन्होंने अपनी परागसे भ्रमरों के समूहको लाल लाल कर दिया था और जो अपनी भुजाओके समान फूलोसे भी कहीं अधिक सुकोमल थीं (पक्षमें फूलोंके द्वारा अत्यन्त कोमल थीं) ॥१०॥ छठवे स्वप्नमें उसने निरभ्र आकाशके बीच ऐसा चन्द्रमा देखा जो अपनी तीक्ष्ण किरणों (पक्ष हाथों) से रात्रिके सघन अन्धकारके समूहको नष्टकर उदित हुआ था और रात्रिरूपी स्त्रीके स्थिर अट्टहासके समान जान पड़ता था ॥१शा सातवें स्वप्न में ऐसा सूर्य देखा जिसका मुख सम्पूर्ण दिन दर्शनीय था, जो संध्याकी लालीरूपी सिन्दूरकी परागसे पिञ्जर वर्ण था, पूर्व दिशारूपी स्त्रीके पुत्र के समान जान पड़ता था और नेत्रोंके लिए चिरकाल तक सुख उत्पन्न करनेवाला था ॥१२॥ आठय स्वप्नमें उसने मत्स्योंका वह युगल देखा जो बिजलीके समान चञ्चल शरीरका धारक था, मरसी रूपी उत्तम स्त्रोके चश्चल एवं समीचीन नेत्रोंके युगलके समान जान पड़ता था, लम्बा था. पारस्परिक स्नेहसे भरा हुआ था, क्रीड़ा कर रहा था और ईर्ष्यासे रहित था॥१॥ नौवें स्वप्नमें कमललोचना शिवादेवीने अत्यन्त सुगन्धित जलसे भरे हुए दो ऐसे कलश देखे जिनके मुख- पर कमल रसे हुए थे, जो उत्तम स्वर्णसे निर्मित थे और स्वभावसे उठते हुए कुचकलसके समान जान पड़ते थे ॥१४॥ तदनन्तर दशवें स्वप्नमें उसने एक ऐसा बड़ा सरोवर देखा जो शुभ जलसे भरा हुआ था, कमलोंसे सुशोभित था, राजहंस आदि उत्तम पतियोंसे युक्त था, मनको हरण करनेवाला था और अपने मनके समान पवित्र एवं निर्मल था ॥१५॥ १.विलम्बित-म० । २. करोद्धृताम्भोजपुटां ख० । ३. सुमाध्य-म० । ४. मुखावहिताम्भोरुह-म० ।

सप्तविशः सर्गः ४७५ यदेति लधारभिपेकिगी ततः प्रसूतमात्रस्य गिरोन्द्रमस्तके । सुरासुरेन्द्रर्दयितेऽभिषिच्यते गिरिस्थिरः चोरसमुद्रवारिभिः ॥३०॥ स्रजोः सुगन्धाय तयोः प्रदर्शनाऽजगत्त्रयच्यापियशाः सुगन्धिमा । निरन्तरं लोकमलोकमप्यमावनन्तहरज्ञानशा तनिध्यति ॥३१॥ स चन्द्रसंदर्शनतः सुदर्शने 'महादयाचन्द्रिकया सुदर्शनः । जिनेन्द्रचन्द्रो जगतां तमोऽन्तकृन्निरन्तरालादकरो भविष्यति ॥३२॥ समस्ततेजस्विजनस्य भूयसा निजेन तेजांसि विजित्य तेजसा । जगन्ति तेजोनिधिरकंदर्शनाकरिष्यति ध्वस्ततमांसि ते सुतः ॥३३॥ सुरां कृतकोडझपदयेक्षणादवाप्य सौख्यं विपयोपभोगजम् । अनन्तमन्ते सुखमाप्स्यति ध्रुवं शिवालयेऽसौ शिवदेवि ! नन्दनः ॥३४॥ सुपूर्णकुम्भवयदर्शनात्ततो गृहं प्रपूर्ण निधिमिभविष्यति । जगन्मुदापूर्णमनोरथस्य हि प्रभावतस्तस्य शरीरजस्य ते ॥३५॥ विचित्रपुष्पाम्बुजखण्डदर्शनादशेषसल्लक्षणलक्षितः सुतः । विदाहितृष्णातृपितान्वितृष्णारिहैव निर्वाणमयान् करिष्यति ॥३६॥ महासमुद्रस्य महामृतात्मनः समुदगम्भीरमतिविलोकनात् । "श्रुताम्बुधि नीतिमहासरिद्धितं स पाययिष्यत्युपदेशकृज्जनान् ॥३७॥ सुररनसिंहासनदर्शनेन स स्फुरन्मणिद्योतितिरीटपाणिभिः । परीतमारोक्ष्यति देवदानवः पराध्यसिंहासनमूर्ध्वशासनः ॥३८॥ कठिन तपश्चरण करेगा ॥२९॥ हे वल्लभे ! जो तूने अभिपेकसे युक्त लक्ष्मी देखी है उसका फल यह है कि उत्पन्न होते ही तेरे पुत्रका सुरेन्द्र और असुरेन्द्र सुमेरु पर्वतके मस्तकपर क्षीरसागरके जलसे अभिषेक करेंगे और वह पर्वतके समान स्थिर होगा ॥३०॥ सुगन्धित मालाओंके देखनेसे यह सूचित होता है कि यह पुत्र तीनों जगत्में व्याप्त यशसे सहित होगा, उत्तम सुगन्धिको प्राप्त होगा और अपने अनन्त नान तथा अनन्त दर्शन रूपी दृष्टिके द्वारा समस्त लोक और अलोकको भी व्याप्त करेगा॥३१॥हे सुन्दरि!चन्द्रमाके देखनेसे यह जिनेन्द्र चन्द्र, अत्यधिक दया रूपी चन्द्रिकासे सुन्दर होगा, जगत्के अज्ञान रूपी अन्धकारको नष्ट करनेवाला होगा और समस्त जगत्के निरन्तर आह्वादको करने वाला होगा ॥ ३२॥ सूर्यके देखनेसे तेरा वह पुत्र तेजका भाण्डार होगा, और अपने बहुत भारी तेजके द्वारा समस्त तेजस्वी जनोंके तेजको जीतकर तीनों लोकोंको अन्धकारसे रहित करेगा ।। ३३ ।। हे शिव देवि ! सुखसे क्रीडा करती हुई मछलियोंका युगल देखनेसे यह सूचित होता है कि तुम्हारा पुत्र विषयोंके उपभोगसे उत्पन्न सुखको पाकर अन्तमें मोक्षके अनन्त मुखको अवश्य ही प्राप्त होगा ।। ३४ ॥ सुवर्ण कलशांका युगल देखनेसे यह सिद्ध होता है कि तुम्हारा पुत्र हर्ष पूर्वक जगत्के मनोरथोंको पूर्ण करने वाला होगा और उसके प्रभावसे यह घर निधियोंसे परिपूर्ण हो जायगा ।। ३५ ॥ नाना प्रकारके पुष्पोंसे युक्त कमल सरोवरके देखनेसे तुम्हारा वह पुत्र समस्त उत्तम लक्षणों से युक्त होगा, तृष्णा रहित बुद्धिका धारक होगा और अत्यधिक दाह उत्पन्न करने वाली तृष्णारूपी प्याससे पीड़ित मनुष्योंको इसी संसारमें संतोपसे युक्त-सुपी करेगा ।। ३६ ।। अमृतमय महासागरके देसनेसे यह सूचित होता है कि तुम्हारा पुत्र समुद्र के समान गम्भीर बुद्धिका घारफ होगा, तथा उपदेश देकर जगनके जीवोंको कीर्तिरूपी महा नदियोंसे परिपूर्ण प्रवज्ञान रूपी सागरफा पान करायेगा । ३७ ॥ उत्तम रत्नांसे जटित सिंहासन देपनसे यह प्रकट होता है कि तुम्हारे पुत्रकी आज्ञा सर्वोपरि होगी और यह देदीप्यमान मणियोंसे जगमगाते १ महोदयाचन्द्रिफया म। महोदयचन्द्रिक्या ग० ॥२. पिपयोपयोगजं म०1३. श्रुताम्बुधिर्नीतिम।

४४४ हरिवंशपुराणे जय-जयकार और पुनः पुनर्जागरणेन सान्तराननन्तरायानिति तान् विलोक्य सा । विनिद्नेन्ना जयगीतमलेरनालसा तल्पतलं ततोऽयजत् ॥२३॥ प्रभातकाले कृतमगलागिका कुतूहलादेश्य पति प्रणामिनी । क्रमेण तान् स्वप्नवरान्यवेदयत् प्रसन्नर्धारित्यगदीस तत्फलम् ॥२५॥ प्रिये यदुत्पत्तिमिय पदत्यहदिनं पतन्ती वसुवृष्टिरभुता। सुदिक्कुमार्यों भवतीमुपासते यदर्थमास्थात्वयि सोऽद्य तीर्थकृत् ॥२५॥ किमन्न ते स्वप्नफलं निगद्यते वरोरु यत्तीर्थकरप्रसूरसि । प्रपरस्यते सोऽपि महान् महीयसा जगत्प्रये यत्तदवेहि कष्यते ॥२६॥ भनेकपोऽनेकपलोकनादलं विलम्बितानेकपविधेमो गतः । जगत्प्रये ते तनयस्तनूदरि प्रकाममेकाधिपतित्वमेष्यति ॥२७॥ भलंकरिष्यत्यकलङ्कधीः कुलं जगत्प्रयं धान जगद्गुरगुणः । गवां कुलं धा वृषभो वृपेक्षणापेक्षणः स्कन्धतिः सुतस्तव ॥२८॥ महाबलेपानखिलाननेकपान् करिष्यते सिंहवदुरिमतोन्मदान् । अनन्तवीर्यः स हि सिंहदर्शनात् म हैकधीरोऽन्ततपोवनेश्वरः ॥२६॥ उतर कर हमारे मुखमे प्रविष्ट हुआ है ॥२२॥ इस प्रकार बार-बार जागनेसे जिनमें अन्तर पड़ रहा था ऐसे पूर्वोक्त निरन्तराय-निर्विघ्न सोलह स्वप्नोंको देख कर मङ्गलमय संगीतसे माता शिवा देवीके नेत्र निद्रारहित हो गये तथा आलस्यरहित होकर उसने शय्पा छोड़ दी ।। २३ ।। प्रातःकाल होनेपर जिसने शरीरपर मङ्गलमय अलंकार धारण किये थे ऐसी शिवा देवीने कुतूहल वश पतिके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया तथा रात्रिमे' देखे हुए सब स्वप्न क्रम-क्रमसे सुना दिये। तदनन्तर प्रसन्न बुद्धिके धारक राजा समुद्र विजयने उन स्वप्नोंका इस प्रकार फल कहा-॥ २४ ॥ हे प्रिये ! यह प्रतिदिन पड़ने वाली आश्चर्यकारिणी धनकी दृष्टि जिसकी उत्पत्ति कह रही है, तथा दिक्कुमारी देवियाँ जिसके लिए आपकी सेवा करती हैं वह तीर्थंकर आज तुम्हारे गर्भमे आकर विराजमान हुआ है ॥ २५ ।। हे सुन्दर जाँघोंवाली प्रिये ! यहाँ तेरे स्वप्नोंका फल क्या कहा जाय १ क्योंकि तू तीर्थकरकी माता है । तेरे तीर्थकर पुत्र उत्पन्न होगा। यद्यपि स्वप्नोंका इतना ही फल पर्याप्त है तथापि वह तीनों लोकोंका परम गुरु जिस फलको प्राप्त होगा वह कहा जाता है सो समझ ॥ २६ ॥ हे कृशोदरि ! तूने स्वप्नमें अनेकप- हाथी देखा है उसका फल यह है कि तेरा पुत्र अनेकप-अनेक जीवोंकी रक्षा करने वाला होगा। अपनी चालसे हाथोकी चालको विडम्बित करनेवाला होगा और तीनों जगत्में इच्छाके अनुरूप एक आधिपत्यको प्राप्त होगा ।। २७ ॥ हे प्रिये ! बैल देखनेसे तेरा पुत्र निर्मल बुद्धिका धारक, तथा जगत्का गुरु होगा और जिस प्रकार बैल गायोंके कुलको अलंकृत करता है उसी प्रकार यह गुणांसे अपने कुल तथा तीनों जगत्को अलंकृत करेगा। वह बैलके समान उज्ज्वल नेत्र तथा उन्नत कन्धाको धारण करनेवाला होगा ॥२८॥ सिह देखनेसे वह अनन्त वीर्यका धारक होगा और जिस प्रकार सिंह मदोन्मत्त हाथियोंको मदरहित कर देता है। उसी प्रकार वह अत्यधिक गर्वको धारण करनेवाले समस्त पुरुषोंको गर्वरहित कर देगा। वह महान् , अद्वितीय धीर, चोर और अन्तमें तपोवनका स्वामी होगा अर्थात् दीक्षा लेकर १. स हि म० । २. अनेकान् पाति रक्षतीति अनेकपः । ३. हस्तिदर्शनात् । ४. विलम्बितोऽनुकृतः अनेक्पस्य हस्तिनो विभ्रमो येन सः । ५. धीरोग्रतपोवनेश्वरः कः ।

सप्तनिशः सर्गः ४७५ यदेवि लक्ष्मीरभिपेकिणी ततः प्रसूतमात्रस्य गिरोन्द्रमस्तके । सुरासुरेन्द्रदयितेऽभिषिच्यते गिरिस्थिरः सोरसमुद्वारिभिः ॥३०॥ स्रजोः सुगन्धाय तयोः प्रदर्शनारजगत्त्रयव्यापियशाः सुगन्धिभाक् । निरन्तरं लोकमलोकमप्यमावनन्तहरज्ञानदृशा तनिष्यति ॥३१॥ स चन्द्रसंदर्शनतः सुदर्शने 'महादयाचन्द्रिकया सुदर्शनः । जिनेन्द्रचन्द्रो जगतां तमोऽन्तकृग्निरन्तराहादकरो भविष्यति ॥३२॥ समस्ततेजस्विजनस्य भूयसा निजेन तेजांसि विजिस्य तेजसा । जगन्ति तेजोनिधिरकंदर्शनाकरिष्यति ध्वस्ततमामि ते सुतः ॥३३॥ सुसं कृतक्रीडमपद्धयेक्षणादवाप्य सौख्यं विपयोपैमोगजम् । अनन्तमन्ते सुखमाप्स्यति ध्रुवं शिवालयेऽसौ शिवदेवि ! नन्दनः ॥३४॥ मुपूर्णकुम्भद्यदर्शनात्ततो गृहं प्रपूर्ण निधिभिभविष्यति । जगन्मुदापूर्णमनोरथस्य हि प्रभावतस्तस्य शरीरजस्य ते ॥३५॥ विचित्रपुष्पाम्बुजखण्डदर्शनादशेषसल्लक्षणलक्षितः सुतः । विदाहितृष्णातृषितान्वितृष्णधोरिहव निर्वाणमयान् करिष्यति ॥३६॥ महासमुद्रस्य महामृतात्मनः समुन्द्रगम्भीरमतिर्विलोकनान् । श्रुताम्बुधि नीतिमहासरिद्वितं स पाययिष्यत्युपदेशकृजनान् ॥३७॥ सुरत्नसिंहासनदर्शनेन स स्फुरन्मणिद्योतितिरीटपाणिभिः । पीतमारोक्ष्यति देवदानवैः परायसिंहासनमूध्वंशासनः ॥२८॥ कठिन तपश्चरण करेगा ॥२६॥ हे वल्लभे ! जो तूने अभिपेकसे युक्त लक्ष्मी देसी है उसका फल यह है कि उत्पन्न होते ही तेरे पुत्रका सुरेन्द्र और असुरेन्द्र सुमेरु पर्वतके मस्तकपर क्षीरसागरके जलसे अभिषेक करेंगे और वह पर्वतके समान स्थिर होगा ॥३०॥ मुगन्धित मालाओंके देखनेसे यह सूचित होता है कि वह पुत्र तीनों जगत्में व्याप्त यशसे सहित होगा, उत्तम सुगन्धिको प्राप्त होगा और अपने अनन्त ज्ञान तथा अनन्त दर्शन रूपी दृष्टिके द्वारा समस्त लोक और अलोकको भी व्याप्त करेगा॥३शाहे सुन्दरि! चन्द्रमाके देखनेसे वह जिनेन्द्र चन्द्र, अत्यधिक दया रूपी चन्द्रिकासे सुन्दर होगा, जगत्के अज्ञान रूपी अन्धकारको नष्ट करनेवाला होगा और समस्त जगत्के निरन्तर आह्वादको करने वाला होगा ॥ ३२ ॥ सूर्यके देखनेसे तेरा वह पुत्र तेजका भाण्डार होगा, और अपने बहुत भारी तेजके द्वारा समस्त तेजस्वी जनोके तेजको जीतकर तीनों लोकोंको अन्धकारसे रहित करेगा ॥ ३३ ॥ हे शिव देवि ! सुससे क्रीड़ा करती हुई मछलियोंका युगल देसनेसे यह सूचित होता है कि तुम्हारा पुत्र विपयोंके उपभोगसे उत्पन्न सुखको पाकर अन्वमें मोक्षके अनन्त सुसको अवश्य ही प्राप्त होगा ॥ ३४ ॥ सुवर्ण कलशांका युगल देखनेसे यह सिद्ध होता है कि तुम्हारा पुत्र हर्ष पूर्वक जगत्के मनोरथाको पूर्ण करने वाला होगा और उसके प्रभावसे यह घर निधियों से परिपूर्ण हो जायगा ।। ३५ ।। नाना प्रकारके पुप्पोसे युक्त कमल सरोवरके देसनेसे तुम्हारा वह पुत्र समस्त उत्तम लक्षणों से युक्त होगा, तृष्णा रहित बुद्धिका धारक होगा और अत्यधिक दाह उत्पन्न करने घाली तृष्णारूपी प्याससे पीड़ित मनुष्योंको इसी संसारमें संतोपसे युक्त-मुसी करेगा ॥३६ ।। अमृतमय महासागरके देसनेसे यह सूचित होता है कि तुम्हारा पुत्र समुद्रके समान गम्भीर बुद्धिका धारक होगा, तथा उपदेश देकर जगनके जीवोंको कीर्तिरूपी महा नदियोसे परिपूर्ण श्रवज्ञान रूपी सागरका पान करायेगा ॥ ३७ ॥ उत्तम रत्नीसे जटित सिंहासन देसनेसे यह प्रकट होता है कि तुम्हारे पुत्रकी आज्ञा सर्वोपरि होगी और वह देदीप्यमान मणियोंसे जगमगाते १ महोदयाचन्द्रिकया मः। महोदयचन्द्रिक्या ग.१२. पियोपयोगचं म०। ३. भुताम्बुधिनानिमः।

हरिवंशपुराणे विमाननाथामरनाथकोटिभिः प्रजिताधिः सुविमानदर्शनात् । *विमानसाधिः महतो महोदयो विमानमुख्यादवतीर्णवानिह ॥३॥ भवेत्तु भेत्ता भवपारस्य स फणीन्द्रनियंद्भवनावलोकनात् । सुतोऽन्वितश्चापि मतिश्रुतावधिप्रधाननेत्रग्रितयेन जायते ॥४०॥ बहुप्रकारस्फुरदंशरञ्जितं धुरत्नराशिप्रविलोकनासुतम् । प्रतीहि नानागुणरत्नराशिना श्रयिष्यमाणं शरणाधिताश्रयम् ॥४॥ शिखावलीलीढनभस्तलोज्ज्वलत्प्रदक्षिणावर्त विधूमवहितः । निरीक्षिताद्ध्यानमहाहुताशनः स कर्मक् सकलं प्रधक्ष्यति ॥४२॥ किरीटसत्कुण्डलपूर्वभूपणाः प्रभावतस्तस्य मदीयशासनम् । अलंकरिष्यस्यनुकूलसेवकाः सुरेश्वराः प्राकृतपार्थिवा इव ॥४३॥ लयारमधम्मिल्ललसग्निजनजः समेखलानूपुरमशिञ्जिताः । प्रसाधनादावनुभावतोऽस्य ते सुरेन्द्रसुन्दर्य उपासनोचता ॥४४॥ जनिष्यमाणेन जिनेन्द्रभानुना प्रतीहि तेनान पवित्रकर्मणा। स्ववंशमात्मानमिमं च मां जगत्पविनितं भूपितमुद्धतं तथा ॥४५॥ मुकुटॉपर हाथ लगाये हुए देव-दानवोसे घिरे उत्तम सिंहासनपर आरूढ़ होगा ।। ३८ ॥ उत्तम विमानके देखनेसे यह सूचित होता है कि विमानोंके स्वामी इन्द्रीको पङ्क्तियोंसें उसके चरण पूजित होंगे, वह मानसिक व्यथासे रहित होगा, महान अभ्युदयका धारक होगा और बहुत बड़े मुख्य विमानसे वह यहाँ अवतार लेगा ॥ ३६॥ नागेन्द्र के निकलते हुए भवनको देखनेसे यह प्रकट होता है कि तुम्हारा वह पुत्र संसार रूपी पिंजड़ेको भेदनेवाला होगा और मति श्रुत तथा अवधिज्ञान रूपी तीन प्रमुख नेत्रोंसे युक्त होगा ॥४०॥ आकाशमें रत्नोंको राशि देखनेसे तुम यह विश्वास करो कि तुम्हारा पुत्र बहुत प्रकारकी देदीप्यमान किरणों से अनुरंजित होगा, नाना प्रकारके गुण रूपी रत्नोंकी राशि उसका आश्रय लेगी और वह शरणागत जीवोंको आश्रय देने वाला होगा ॥ ४१ ॥ और ज्यालाओंके समूहसे व्याप्त आकाशमैं देदीप्यमान तथा दक्षिणावर्त से युक्त निर्धूम अग्निके देखनेसे यह सिद्ध होता है कि तुम्हारा पुत्र ध्यानरूपी महा प्रचण्ड अग्निको प्रकट कर समस्त कमौके वनको जलावेगा॥४२॥ हे प्रिये ! उस पुत्रके प्रभावसे मुकुट तथा उत्तम कुण्डल आदि आभूपणों से सुशोभित इन्द्र साधारण राजाओं के समान अनुकूल सेवक होकर मेरी आज्ञाको अलंकृत करेंगे ॥ ४३ ॥ अपनी चोटो गुंथी हुई जिनकी निजकी मालाएँ ढीली हो रही हैं तथा जो मेसला और नूपुरोंकी मनोहर मंकारसे युक्त हैं ऐसी इन्द्रको इन्द्राणियों इसके प्रभावसे सजावट आदिके कार्यमे तेरी सेवा करने के लिए सदा उद्यत रहेंगी ॥४४॥ हे प्रिये ! यहाँ पविन फर्म करनेवाला जो जिनेन्द्र रूपी सूर्य उत्पन्न होने पाला है उससे तुम अपने वंशको, अपने आपको इस मुमको तथा समस्त जगत्को पयित्रित भूपित एवं संसार-सागरसे पद्धत सममो ॥ ४५ ॥ १.विमाननाघोऽमरनाय-मः । २. विगतो मानमाधिः मानसी व्यथा यस्य सः । ३. एकोनचरा- रिरामः श्लोकः 'ग' पुस्तके एवं पटित:-पिमानस दर्शनको नुना नतो विमाननाथा मरनायकोटिमिः । मामिला हमहतो मादयो विमानमायादयतीगंयानि ॥३६॥ ४ मुस्त म० ।

सप्तत्रिंशः सर्गः १७७ निशम्य सा स्वप्नफलं पतीरितं प्रतुष्टचित्ता सुतमवर्तिनम् । विचिन्त्य चक्रे जिनपूजनादिकाः क्रिया प्रशस्ता जनतामनोहरा ॥४६॥ "जिनोद्भवे स्वप्नफलानुकीर्तनं पवित्रसुस्तोत्रमिदं दिने दिने । प्रभातसन्ध्यासमये पठन जनः स्मरंश्च शृण्वन् श्रयते जिनश्रियम् ॥४७॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृतौ स्वप्नफलकथनो नाम सप्तनिशः सर्गः । इस प्रकार पतिके द्वारा कहे हुए स्वप्न के फलको सुनकर रानी शिवा देवीका चित्त बहुत ही संतुष्ट हुआ। और पूर्वोक्त गुण विशिष्ट पुत्र मेरी गोदमें आ ही गया है, ऐसा विचार कर वह समस्त जन समूहके मनको हरने वाली जिनपूजा आदि उत्तम क्रियाएँ करने लगीं ॥ ४६॥ गौतम स्वामी कहते हैं, कि जो मनुष्य, जिनेन्द्र भगवानके जन्मसे संबद्ध स्वप्नोंके फलका वर्णन करने वाले इस स्तोत्रका प्रतिदिन प्रातः संध्याके समय पाठ करता है, स्मरण करता है, अथवा श्रवण करता है वह जिनेन्द्र भगवान्की लक्ष्मीको प्राप्त होता है ।। ४७ ।। इस प्रकार अरिएनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें स्वप्नों के फलका वर्णन करने वाला सैंतीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ।। ३७ ॥ १ जिनोद्भवस्वप्नफ्लानुकीर्तनं कः ।

हरिवंशपुराणे अनुत्तरमुखोग्यलः शिवपदोसमानस्तदा नवानुदिशसवनुनयविमानकीवकः । सुक्लपवपुरन्तराधरनगरकटीजइकत्रिलोकपुरुषोऽचलरकटिकरी नटिस्वा स्फुटम् ॥३॥ अभूभवनवासिनां जगति ताररावस्वनो राट परहः पटुमैटिति मौमलोकेऽसिले । रवेजगति सिंहनाद उरुघोषानदरमुभरपभवने जिनप्रभववैभवाद स्वयम् ॥१॥ जगत्रितयवासिनश्चलितमौलिसिहासनास्ततोऽसुरसुराधिपाः प्रणिहितावधिस्वेक्षणाः । प्रबुध्य जिनजन्म जातपुरुसम्मदाः सम्पदा प्रचेलुरिह भारत प्रति चतुर्णिकायामरैः॥५॥ विशुद्धतमदृष्टयो मुकुटकोटिसहित-स्फुरस्क्टकररनरश्मिखचिताबिलाशामुखाः । प्रणेमुरहमिन्द्रदेवनिवहास्तु तत्र स्थिताः पदान्यभिसमेत्य सप्त हरिविष्टम्यो जिनम् ॥१६॥ मितेरसुरनागविद्युदनलानिलद्वीपसरसुपर्णसुमहोदधिस्तनितदिक्कुमाराभिधाः । समुद्ययुरितस्ततो भवनवासिनो मास्वरास्तदा विदधतो दिशो दश दशप्रकारामराः ॥७॥ सुकिम्पुरुषकिन्नरामरमहोरगा राक्षसाः पिशाचसुरभूरिभूतवरयक्षगन्धर्वकाः । मनोहरणदक्षगीतबहुनृपयुक्ताहनाः समोयुरिह मध्यलोकरतयोऽष्टधा प्यन्तराः ॥१८॥ गणश्च शुचिशोचिषां प्रयितपमधाग्योतिषां ग्रहशशिभास्करप्रतततारकाल्यापुपाम् । बभौ युगपदापतन्निजविमानके योऽधिकं विधानुमिव चोचतो जगदिहापरं ज्योतिपाम् ॥११॥ मानो हर्पके वशीभूत हो नृत्य ही कर रही हो ॥१२॥ जो अनुत्तर विमानरूपी मुखसे उज्ज्वल था, मोक्षरूपी मस्तकसे सहित था, नौ अनुदिश रूपी ठोड़ोसे युक्त था, नी अवेयकरूपी ग्रीवाको धारण करनेवाला था, स्वर्गरूपी शरीरसे सहित था, तथा मध्यम लोकरूपी कमर और अधोलोक- रूपी जंघाओसे युक्त था ऐसा तीन लोकरूपी पुरुप उस समय चञ्चल हो उठा था सो ऐसा जान पड़ता था मानो कमरपर हाथ रखकर नृत्य ही कर रहा हो ॥१३।। उस समय जिनेन्द्र भगवान्के जन्मके प्रभावसे भवनवासी देवोंके लोकमें अपने आप शहोंका जोरदार शब्द होने लगा ! समस्त व्यन्तर देवोंके लोकमें शीघ्र हो जोरदार पदह शब्द होने लगे। सूर्यलोकमें सिंहनाद होने लगा और कल्पवासी देवोके भवनों में विशाल शब्द करनेवाले घण्दा बज ठे ॥१४॥ तदनन्तर जिनके मुकुट और सिंहासन कम्पायमान हो रहे थे, जिन्होंने अपने अवधिज्ञान रूपो नेत्रको प्रयुक्त किया था, और उसके द्वारा जिनेन्द्र भगवान्के जन्मको जानकर जिन्हें अत्यधिक हर्ष उत्पन्न हुआ था ऐसे तीनों लोकों में रहने वाले सुरेन्द्र तथा असुरेन्द्र चतुर्णिकायके देवोंको साथ ले बड़ी विभूतिसे भरत क्षेत्रकी ओर चल पड़े ॥१५॥ हाथ जोड़कर मस्तकसे लगाते समय मुकुटोंके अप्रभागसे टकराये हुए फटकोके रत्नोंकी किरणोसे जिन्होने समस्त दिशाओके अग्रभाग व्याप्त कर दिये थे ऐसे अत्यन्त शुद्ध सम्यग्दर्शनके धारक अमिन्द्र देव, यद्यपि अपने अपने ही निवास स्थानों में स्थित रहे थे तथापि उन्होंने सिहासनोंसे सात कदम सामने आकर जिनेन्द्र भगवानको नमस्कार किया था ।।१६।। असुरकुमार, नागकुमार, विद्युत्कुमार, अग्निकुमार, वायुकुमार, द्वोपकुमार, महोदधिकुमार, स्तनितकुमार और उदधिकुमार ये दश प्रकारके भवनवासी देव, दशौं दिशाओंको देदीप्यमान करते हुए जहाँ तहाँ पृथिवीसे ऊपर आने लगे॥१७॥ जिनकी स्त्रियाँ मनको हरण करने में दक्ष, गीत तथा नाना प्रकारके नृत्योसे युक्त थीं, ऐसे किंपुरुप, किन्नर,महोरग, राक्षस, पिशाच, भूत, यक्ष और गन्धर्व ये मध्यमलोकमे विशिष्ट प्रतिके रखने वाले आठ प्रकारके व्यन्तर देव चारों ओरसे आने लगे ॥१८॥ उज्ज्वल किरणोंसे युक्त प्रह, नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य और तारा नामको धारण करनेवाले पांच प्रकारके प्रसिद्ध ज्योतिपो देवाका समूह एक साथ अपने-अपने विमानासे यहां भाता हुआ ऐसा सुशोभित होने लगा मानो वह पृथिवी पर एक दूसरा ही ज्योतिपलोक बनानेके लिए उद्यत हुआ हो ११६॥ १. चतुनिकायामराः क० । २. शुचिरोचिषां म० ।

भत्रिंशः सर्गः ४८१ यथास्त्रमपि सप्तभिः प्रयमकल्पनायादयोऽप्यनीकनिववृता युगपदच्युतेन्द्रोत्तराः । प्रतिस्वमपि सप्तभिः सकलकल्पजैः षोडश प्रमोदवशवर्तिनः सममिजग्मुरिन्द्राः सुरैः ॥२०॥ भनेकमुखेदत्तसकमलखण्डपन्नावलीसुरूपमुरसुन्दरीललितनाटकोझासिनम् । हिमादिमिव जङ्गमं निजवधूभिरैरावतं करोन्द्रमधिरूढवानभिरराज सौधर्मपः ॥२३॥ भनीकमय यौवन रचितसप्तकशान्तरं गृहीतवलयाकृतिप्रकृतिपौरुपाधिष्ठितम् । परीत्य कुलिशायुघं कुलिशपूर्वशस्त्राटवीनिरुद्धगगनान्तरं भृशमशोभत त्रैदशम् ॥२२॥ जवेन लघु लयदुतसमीरणं हेपितप्रयोजितवियोजितत्रिभुवनान्तरालं तथा । वृहद हिरवतंत प्रविततं हयानीकमप्यरं गगनधारिधेरधितरहरङ्गायितम् ॥२३॥ मुमुग्धमुखकोशकैनयनपुण्डरीकैनिजैललत्ककुदवालधिश्रुतिसुगाप्रसास्नापुटः । सुवर्णखुरशृङ्गकैः प्रतिवृपं वृपानीकमप्युवाह परितः स्थितं विपुलकान्तिमिन्दुप्रभाम् ॥२४॥ विभिन्नमपि सप्तधा स्वयमभेद्यमप्यदिभिनंभोवलयसागरे त्रिदशयानपानायितम् । प्रभाविजितविस्फुरद विरथं रथानीकमप्यभादतिमनोहरं वलयवस्परिक्षेपकम् ॥२५॥ विकोणघनशीकरः करिगिरूवलीलाकरैः प्रवृत्तगुरुगर्जितैर्गुरुतरैरिवाम्भोधरः । महामरुदधिष्ठितैः सुघठितं गज्ञानीकमप्यनेकरचनान्तरं व्यतनुत श्रियं प्रावृपः ॥२६॥ स्वरैरपि च सप्तभिर्मधुरमूर्छनाकोमलैः सवीणवरवंशतालरवमिश्रितैराश्रितैः । प्रपूर्णभुवनोदरं बहरतोऽप्यनीकं बभौ युक्त्यमरवन्धुरं धृतिकरं तु गन्धर्वजम् ॥२७॥ जो यथायोग्य अपनी अपनी सात प्रकारको सेनाओंके सहित थे, ऐसे प्रथम स्वर्गसे लेकर सोलहवें स्वर्गतकके सोलह इन्द्र, आनन्दके वशीभूत हो समस्त स्वर्गाके देवोंके साथ यहाँ आ पहुँचे ॥२०॥ सौधर्मेन्द्र अपनी स्त्रियों के साथ उस ऐरावत नामक गजराजपर बैठा हुआ सुशोभित हो रहा था, जो चलते-फिरते हिमालयके समान जान पड़ता तथा अनेक मुखोंके भीतर दाँतोपर विद्यमान कमल समूहको फलिकाओंपर नृत्य करती हुई देवाङ्गनाओंके सुन्दर नृत्यसे सुशोभित था।॥२१॥ इन्द्रको चारों भोरसे घेरे हुए देवोंकी वह सेना सुशोभित हो रही थी जिसने सात कक्षाओंका विभाग किया था, जो गोल आकारके सहित थी, स्वाभाविक पुरुपार्थसे युक्त थी, तथा वन आदि शस्त्रोंके वनसे जिसने आकाशके अन्तरालको रोक रसा था ।। २२ ॥ तदनन्तर घोड़ोंकी बहुत बड़ी विराट सेना थी जो अपने वेगसे शीघ्रगामी वायुको शीघ्र ही जीत रही थी। जो अपनी हिनहिनाहटसे तीन लोकके अन्तरालको संयुक्त तथा वियुक्त कर रही थी, और आकाशरूपी समुद्रको उठती हुई तरङ्गोके समूहके समान जान पड़ती थी ॥२३॥ तदनन्तर बैलोंको वह सेना चारों ओर खड़ी थी जो कि सुन्दर मुख, सुन्दर अण्डकोश, नयन कमल, मनोहर फांदील, पूँछ, शब्द, सुन्दर शरीर, सास्ना, सुवर्ण मय खुर और सींगोंसे युक्त थी तथा अत्यधिक कान्तिसे युक्त चन्द्रमाको प्रभाको धारण कर रही थी ॥ २४ ॥ तदनन्तर रथोंकी वह सेना भी सुशोभित हो रही थी जो स्वयं सात प्रकारसे विभिन्न होनेपर भी पर्वतोंसे अभेद्य थी, आकाश रूपी सागरमें जो देवोके यानपात्रके समान जान पड़ती थी, प्रभासे जिसने सूर्य के देदीप्यमान रथको जीत लिया था, जो अत्यन्त मनोहर थी और जिसका घेरा वलयके समान सुशोभित था ॥२५॥ तत्पश्चात् जो चारों ओर जलके छींटोंकी वर्षा कर रहे थे, जिनके शुण्डादण्ड ऊपरकी ओर उठे हुए थे, जो बहुत भारी गर्जना कर रहे थे, जो आकारमें बहुत भारी थे, एवं जो बड़े-बड़े 'देवोंसे अधिष्ठित थे, ऐसे मेघोंकी समानता धारण करने वाले हाधियोंसे रचित, अनेक प्रकारकी रचनाओंसे युक्त हाथियोंकी सेना भी वर्षा ऋतुकी शोभा विस्तृत कर रही थी ॥२६॥ हाथियोंकी १. दन्तस्कमलमा, दन्तदन्तसर कमल ग०।२. योघज म स०देवजं घ०।३. प्रघोषित ग०। ४ कौशिनयन म० । कौरानयन ग० । ५. पौग० । ६. अपूर्णमुवनोपरम् म० । ६१ हरिवंशपुराणे भनुपरमुखोगालः शिवायोसमास्तमा नयानुदिशमनुनपयिमानकप्रीयकः । मुरवपुरन्तरराधरपकटीजकपिलोकगोश्चर करिफरो मटिया स्फुटम् ॥१३॥ अभूभवनवासिनो जगति सारशस्यनो राट परहः पटुरिति मौमलोकेऽविले । खेजगति सिंहनाद उपोषघण्टानामुक्तसमवने मिनप्रभवमा स्वयम् ॥१४॥ जगत्रितयवासिनश्चलितमोलिसिंहासनास्ततोगुरमुराधिपाः प्रणिहिसावधिस्वतमाः । प्रयुष्य जिनजन्म जातपुरुमम्मदा सम्पदा प्रघेलरिह भारतं प्रति पनिकोयामरः ॥५॥ विशुद्धतमस्टयो मुकुटकोटिस हिस-स्फुरफटकररनररिमसचितानिलाशामुग्याः । प्रणेमुरहमिन्द्रदेवनियहास्तु सप्र स्थिताः पदान्यमिसमेरम सप्त हरिविधरेग्यो जिनम् ॥१॥ सितेरसुरनागविघुदनलानिलद्वीपसमुपर्णमुमहोदधिस्तनितदिषमाराभिवाः । समुघयुरिनस्ततो भवनवामिनो मास्वस्तिदा निधनो दिशो दश दशप्रकारामराः II सुकिम्पुरपकिनारामरमहोरगा रापसाः पिशाचमुरभूरिभूतवरयाचगन्धर्यकाः । मनोहरणदक्षगीतयहुनुपयुकानाः समीयुरिह मध्यलोकरतयोऽधा प्यन्तरा: En गगश्च शुचिशोचिषां प्रयितपश्चधाग्योति ग्रहशशिमारकरप्रतततारकाएपापुपाम् । वमी युगपदापतशिजविमानकेन्योऽधिकं विधानुमिय चोयतो जगदिहापरं ज्योतिषाम् ॥3॥ मानो हपके वशीभूत हो नृत्य ही कर रही हो ॥१२॥ जो अनुत्तर विमानरूपी मुरासे उज्ज्वल था, मोक्षरूपी मस्तकसे सहित था, नौ अनुदिश रूपी ठोड़ीसे युक्त था, नौ मवेयकरूपी प्रीवाको धारण करनेवाला था, स्वर्गरूपी शरीरसे सहिन था, तथा मध्यम लोकरूपो कमर और अधोलोक- रूपी जंघाओंसे युक्त था ऐसा तीन लोकरूपी पुरुष उस समय पश्चल हो उठा था सो ऐसा जान पड़ता था मानो कमरपर हाथ रखकर नृत्य ही कर रहा हो ॥१३॥ उस समय जिनेन्द्र भगवानके जन्मके प्रभावसे भवनवासी देवोंके लोकमें अपने आप शद्रोंका जोरदार शब्द होने लगा । समरत व्यन्तर देवोंके लोकमैं शीघ्र हो जोरदार पटह शब्द होने लगे। सूर्यलोकमै सिंहनाद होने लगा और कल्पवासी देवोंके भवनों में विशाल शब्द करनेवाले घण्टा बज घटे ॥१४॥ तदनन्तर जिनके मुकुट और सिंहासन कम्पायमान हो रहे थे, जिन्होंने अपने अवधिज्ञान रूपी नेत्रको प्रयुक्त किया था, और उसके द्वारा जिनेन्द्र भगवानके जन्मको जानकर जिन्हें अत्यधिक हर्प उत्पन्न हुआ था ऐसे तीनों लोकोंमें रहने वाले सुरेन्द्र तथा असुरेन्द्र चतुर्णिकायके देवोंको साथ ले बड़ी विभूतिसे भरत क्षेत्रकी ओर चल पड़े ॥१५॥ हाथ जोड़कर मस्तकसे लगाते समय मुकुटोके अग्रभागसे टकराये हुए कटकोके रत्नोंको किरणोंसे जिन्होंने समस्त दिशाओके अग्रभाग व्याप्त कर दिये थे ऐसे अत्यन्त शुद्ध सम्यग्दर्शनके धारक अहमिन्द्र देव, यद्यपि अपने अपने ही निवास स्थानों में स्थित रहे थे तथापि उन्होंने सिंहासनोंसे सात कदम सामने आकर जिनेन्द्र भगवानको नमस्कार किया था।।१६।। असुरकुमार, नागकुमार, विद्युत्कुमार, अग्निकुमार, वायुकुमार, द्वीपकुमार, महोदधिकुमार, स्तनितकुमार और उदधिकुमार थे दश प्रकारके भवनवासी देव, दशो दिशाओंको देदीप्यमान करते हुए जहाँ तहाँ पृथिवीसे ऊपर आने लगे ॥१७॥ जिनकी स्त्रियाँ मनको हरण करनेमें दक्ष, गीत तथा नाना प्रकारके नृत्योंसे युक्त थीं, ऐसे किंपुरुष, किन्नर,महोरग, राक्षस, पिशाच, भूत, यक्ष और गन्धर्च ये भध्यमलोक विशिष्ट प्रीतिक रखने वाले आठ प्रकारके व्यन्तर देव चारों भोरसे आने लगे॥१८॥ उज्ज्वल किरणोंसे युक्त ग्रह, नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य और तारा नामको धारण करनेवाले पांच प्रकारके प्रसिद्ध ज्योतिषी देवोंका समूह एक साथ अपने-अपने विमानों से यहां आता हुआ ऐसा सुशोभित होने लगा मानो वह पृथिवी पर एक दूसरा ही ज्योतिषलोक बनाने के लिए उद्यत हुआ हो ॥१६॥ १. चतुर्निवायामराः क० । २.शुचिरोचिषा म० ।

अधिशः सर्गः ४०३ श्रिया च धृतिराशया च वरवारणी पुण्डरी किणी स्फुरदलग्युसा व सह मिश्ररेशी हिया। सचामरकरा इमा बभुरुदारफेनावलीतरजकुलसकुला इव कुलापगाः सङ्गताः ॥३५॥ कनस्कनकचित्रया सहितया पुनश्चित्रया ग्रिलोकसुरविश्रुतत्रिशिरसा च सूश्रामणिः । कुमार्य इव विद्युतो विलसितैर्जिनस्यान्तिके तमोनुद इवाबभुर्जलधरस्य विद्युम्लताः ॥३६॥ सहैव रुचकप्रभा रुचकया तदाद्याभया परा च रुचकोवला सकलविद्युदप्रेसराः । दिशां च विजयादयो युवतयश्चतस्रो वरा जिनस्य विदधुः परं सविधि जातकर्मश्रिताः ॥३७॥ चतुर्विधसुरासुरा लधु समेरय तावत्परं कुबेरननिताद्भुतप्रथमशोभमुच्चैर्ध्वजम् । परीत्य जिनभत्ति तस्त्रिदशनाथलोकश्रियं विजेतुमिव चोचतं ददृशुराहताः सेन्द्रकाः ॥३८॥ प्रविश्य नगरं ततः शतमखः स्वयं सरसखः शिवास्पदसमीपगः स्थितिविदादिदेशाहताम् । राची शुचिमचापला समुपनेतुर्माशं शिशु प्रसूतिगृहमाविशन्मिति तदा बभौ सादरा ॥३६॥ विकृय सुरमायया शिशुमिहापरं निद्रया प्रयोज्य जिनमातरं प्रणतिपूर्वकं यत्नतः । प्रगृय मृदुपाणिना शिशुमदादसी स्वामिने प्रणम्य शिरसा ददावमरराट् कराभ्यां जिनम् ॥४०॥ 'जितेन्द्रमुखचन्दकं विजितपुण्डरीकेक्षणं विशेषविजितासितोपलवनश्रियं तं धिया। निरीक्ष्य जितपनपाणिचरणं सहस्रषणः सहस्रगणनेवगैरपि ययौ न तृप्ति तदा ॥१॥ श्री, धृति, आशा, वारुणी, पुण्डरीकिणी, अलम्वुसा, मिश्रकेशी और ही आदि देवियों हाथोंपर चामर लिये खड़ी थी तथा अत्यधिक फेनावली और तरङ्गोंसे युक्त आई हुई कुलनदियों- गगा आदि नदियों के समान सुशोभित हो रही थीं ।। ३५ ॥ देदीप्यमान कनकचित्रा, चित्रा, तीन लोकके देवीमें प्रसिद्ध त्रिशिरा और सूत्रामणि, ये विद्युत्कुमारी देवियों उस समय जिनेन्द्र भगवानके समीप अपनी चेष्टाओंसे ऐसी सुशोभित हो रहीं थीं मानो मेघके समीप अन्धकारको नष्ट करने वाली बिजली रूपी लताएँ हो हो ॥३६॥ उस समय समस्त विद्युत्कुमारियों में प्रधान रुचकप्रभा, रुचका, रुचकामा और रुचकोज्ज्वला तथा दिक्कुमारियों में प्रधान विजय आदि चार देवियाँ विधिपूर्वक भगवान्का जातकर्म कर रही थीं ॥३७॥ भगवानके जन्मोत्सवके पूर्व ही कुवेरने सूर्यपुरकी अद्भुत शोभा बना रखी थी। उसके महलोपर यड़ी ऊँची-ऊँची धजाएँ फहरा रही थीं तथा वह इन्द्रलोककी शोभाको जीतनेके लिए उद्यत सरीखा जान पड़ता था। अपने अपने इन्द्रों सहित चारों निकायोंके सुर और भमुर आदरके साथ शीघ्र ही आकर जिनेन्द्र भगवान की भक्तिसे उस नगरकी तीन प्रदक्षिणाएँ दे उसकी शोमा देसने लगे ॥ ३८॥ तदनन्तर सज्जनांका ससा और मर्यादाको जाननेवाला इन्द्र नगर में प्रवेश कर शियादेवीके महलके समीप सड़ा हो गया और वहीसे उसने भादरसे युक्त, पवित्र एवं चञ्चलतासे रहित इन्द्राणीको जात पालकके लानेका आदेश दिया । पतिकी आज्ञानुसार इन्द्राणीने प्रसूतिका-गृहमें प्रवेश किया । उस समय आदरसे भरी इन्द्राणी अत्यधिक मुशोभित हो रही थी ॥ ३६॥ वहाँ उसने यत्नपूर्वक जिन-माताको प्रगाम कर मायामयी निद्रामें मुला दिया तथा देव-मायासे एक दूसरा याटक बनाकर उनके समीप लिटा दिया। तदनन्तर इन्द्राणोने कोमल हाथोंसे जिन-यालकको उठा कर अपने स्वामी इन्द्रके लिए दे दिया और देयोंके राजा इन्द्रने शिरसे जिन-यालकको प्रणाम कर दोनों हाथों से उन्हें ले लिया ॥४॥ जिन्होंने अपने मुस रूपी चन्द्रमाके द्वारा चन्द्रमाको जीत लिया था, नेवासे पुण्डरीक-मफेद फमलफो जीत लिया था, शरीरको कान्तिसे नील कमलोंके यनकी शोभाको प्रमुस रूपसे पराजित कर दिया था और अपने हाथों तथा परोसे फमलीको पराभूत कर दिया था ऐसे जिनेन्द्र याटफको उस समय इन्द्र एक हजार नेत्रोंसे भी दंग कर सृप्तिको प्राप्त १. स्थितिविद् + आदिदेश + मारताम् । २. जिनेन्द्रमन-म, ग० । ३. मिना-1 r ४८२ हरिवंशपुराणे समस्तरसपुष्टिकं वलयहारिंगात्रोत्करमैनाकुसुममम्जरीरमरभूरुहामाहरत् । प्रनृत्यदुरुनतंकीमयमीकमप्यम्बरे नितम्यभरमन्थर निचितमाविरासीत्तथा ॥२८॥ सहस्रगुणितोदिता चतुरशीतिरेषु स्फुटं प्रमाणमपि सप्तसु प्रथमसप्तकत्तास्वतः । परं द्विगुणमेतदेव सकलेघु कक्षान्तरेऽधनीकवलयेष्वियं क्रमभिदासमाः स्थितिः ॥२६॥ . यथायधमनीकिनः सकलनाकलोकाधिपा जिनेन्द्रजननाभिषेकारणाय यावद्वियत् । वितत्य पुरमानजन्ति मुदितास्तु तावहिर्शा कुमार्य उपकुर्वते निखिलजातकर्माहताः ॥३०॥ तथाहि विजया स्मृता जगति वैजयन्ती परा परोक्तिरपराजिता प्रवदिता जयन्ती बेरा। तथैव सह नन्दया भवति चापरानन्दया सनन्यभिधवर्धना हृदयनन्दिनन्दोत्तरा ॥३॥ कुचानिव निजानिमा विगलदगशृङ्गारसद्सेन भरितान् भृशं विपुलतुङ्गमदारकान् । समूहुरभिरामकानमलहारभारोवला ज्वलन्मणिविभूषणश्रवणकुण्डलोद्भासिताः ॥३२॥ तथैव सयशोधरा प्रथितसुप्रबुद्धामरी सुझीर्तिरपि सुस्थिता प्रणिधिरन लचमीमती। विचित्रगुणचित्रया सह वसुन्धरा चाप्यमू गृहीतमणिदर्पणा दिश इवेन्दुमत्यो बभुः ॥३३॥ इला नवमिकासुरासहितपीतपद्मावती तथैव पृथिवी परप्रवरकाजना घन्द्रिका । प्रभास्फुटिततारकाभरणभूपिता भास्वराः सचन्द्ररजनी निभा धृतसितातपत्रावभुः ॥३॥ सेनाके बाद गन्धवोंकी वह सेना सुशोभित हो रही थी जिसने मधुर मूर्छनासे कोमल वीणा. उत्कृष्ट वाँसुरी और तालके शब्दसे मिश्रित साती प्रकारके आश्रित स्वरोंसे जगत्के मध्यभागको पूर्ण कर दिया था, जो देव-देवाङ्गनाओंसे सुशोभित थी एवं सबको आनन्द उत्पन्न करने वाली थी ॥२७ ।। गन्धवोंकी सेनाके बाद उत्कृष्ट नृत्य करनेवाली नर्तकियोंकी यह सेना भी आकाशमें प्रकट हुई थी जो कि नितम्बोंके भारसे मन्द-मन्द चल रही थी, समस्त रसीको पुष्ट करनेवाली थी और वलयोंसे सुशोभित अपने शरीरोंसे देव रूपी वृक्षोंके मन रूपी पुष्प- मञ्जरीको ग्रहण कर रही थी ॥२॥ प्रत्येक सेनामें सात-सात कक्षाएँ थीं। उनमें से प्रथम कक्षामें चौरासी हजार घोड़े, बैल आदि थे फिर दूसरी तीसरी आदि कक्षाओं में क्रमसे दूने-दूने होते गये थे |॥२६॥ अपनी-अपनी सेनाओंसे युक्त समस्त इन्द्र, भगवानका जन्माभिषेक करनेके लिए आकाशमै व्याप्त हो जब-तक सूर्यपुर आते हैं तब तक प्रसन्नतासे युक्त एवं आदरसे भरी दिक्कुमारी देवियाँ भगवान्का समस्त जातकर्म करने लगीं ॥३०॥ देवियोमें निर्मल हारोके धारण करनेसे सुशोभित एवं चमकते हुए मणियोंके आभूपण और कानोंके कुण्डलासे विभूपित-जगत्-प्रसिद्ध विजया, वैजयन्ती, अपराजिता, जयन्ती, नन्दा, आनन्दा, नन्दिवर्धना, और हृदयको आनन्दित करनेवाली नन्दोत्तरा नामकी देवियाँ अपने स्तनोंके समान स्थूल, तथा अङ्गसे विगलित होते हुए शृङ्गार रसके समान निर्मल जलसे भरी हुई बड़ी ऊँची झारियाँ लिये हुए थीं ॥३१-३२॥ यशोधरा, सुप्रसिद्धा, सुकीर्ति, सुस्थिता, प्रणिधि, लक्ष्मीमती, विचित्र गुणोंसे युक्त चित्रा और वसुन्धरा ये देवियों मणिमय दर्पण लेकर खड़ी थी और चन्द्रमासे युक्त दिशाओके समान सुशोभित हो रही थीं ॥ ३३ ॥ इला, नवमिका, सुरा, पीता, पद्मावती, पृथ्वी, प्रवरकाञ्चना और चन्द्रिका नामकी देवियों, प्रभासे देदीप्यमान ताराओके समान भाभूपणांसे मुशोभित तथा देदीप्यमान थीं। ये देवियाँ भगवान्को मातापर सफेद छत्र लगाये हुए थीं और चन्द्रमाके सहित रात्रियों के समान जान पड़ती थीं ॥ ३४॥ १ बलमहारि-म० 1 २. प्रनृत्यपुरुनर्तकी म० । ३. मप्यम्बर-म०१ ४. करुणाय म० । ५. परा म०। ६ पोटपमारती मः।

भष्टत्रिशः सर्गः १८५ बहुत्रिदशपतिभिः प्रमदपूरिताभिनभः स्फुरन्मणिगणोज्ज्वलकलशपाणिभिः सर्वतः । सुमेरुगिरिपञ्चमानिधिमध्यमध्यासित राज बहुरज्जुभिस्तदिव नीयमानं तदा ॥४६॥ गृहाण कलशं लघु सिप नयाशु सन्धारय प्रभुं च मम सन्मुखं खमिति कर्णरम्यारवैः । कराकरमितस्ततः मुरगणस्य कुम्भावली प्रिया श्रयति पाण्डुकं वनमिवोरहंसाबली ॥५०॥ सुवर्णमणिरत्नरौप्यमयकुम्भकाल्यो बभुः प्रवेगमरुतां वशा रविशशाङ्कमाला यथा । सुपरपुटदीप्तिभिः खचितदिङ्मुखाः खे स्योत्पतद्गरुडहंसपट्क्तय इव यथानेकशः ॥५१॥ शताध्वरभुजोतेर्जलधरैरिवोद्गर्जिवैः सहस्रगणनघटेः शुचिपयोभिरावर्जितः । जिनोऽभिपर्वमाप्नुवन् धवलमदिराज व्यधाद्दधाति धवलात्मतामधवलो हि शुद्धाश्रयात् ॥५२॥ सतोपमपरेऽपि ते निखिलकल्पनाथादयो यथेष्टमभिपेचनं विदधुरम्बुभिर्निर्मलैः । जिनस्य जिनशासनाधिगमशस्तरागोदयाः प्रकाशिततनूरुहास्तनुतरामजन्माब्धयः ॥५३॥ ततः सुरपतिस्त्रियो जिनमुपेत्य शच्यादयः सुगन्धितनुपूर्वकैदुकराः समुद्वर्तनम् । प्रचक्रुरभिपेचनं शुभपयोभिरुचर्घटः पयोधरभरैनिजैरिव समं समावर्जितः ॥५४॥ थी तव अनेक शरीरोंको धारण करनेवाले इन्द्रने देवोंके साथ भक्ति पूर्वक, देवाके द्वारा लाये हुए, मणिमय और सुवर्णमय कुम्भोंसे च्युत, अत्यन्त सुगन्धित क्षीरसागरके शुभ जलसे जिनेन्द्र भगवानका स्वयं महाभिषेक करना शुरू किया ॥४५-४८॥ उस समय सुमेरु पर्वत और क्षीरसागरके मध्य आकाशमें, हर्पसे भरी एवं देदीप्यमान मणियोंके समूहसे उज्ज्वल कलश हाथमें लिये देवोंकी पंक्तियों सब ओर खड़ी थीं उनसे उस समय वह आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो बहुत-सी रस्सियोंसे बाँधकर कहीं ले जाया जा रहा हो ॥४|| उस समय वहाँ 'कलश लो, जल्दी दो, और तुम भगवान्को शीघ्र ही मेरे सम्मुख धारण करो' इस प्रकार कान के लिए प्रिय शब्द हो रहे थे। तथा यह कलशोंकी पंक्ति देव-समूहके एक हाथ से दूसरे हाथमें जाती हुई शोभा पूर्वक पाण्डुक वनमें ऐसी प्रवेश कर रही थी मानो बड़े-बड़े हंसोंकी पंक्ति ही प्रवेश कर रही हो ॥५०॥ आकाशमें वेगशाली देवोंके वशीभूत (हाथोंमें स्थित ) सुवर्ण, मणि, रत्न और चाँदीसे निर्मित कलशांको पंक्तियाँ आकाशमैं ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो सुन्दर पद्धोंकी कान्तिसे दिशाओंको व्याप्त करती हुई वेगसे उड़नेवाले गरुड़ और हंसोंकी अनेक पंक्तियाँ ही हो ॥५१॥ इन्द्रकी भुजाओंके द्वारा उठाये हुए, मेघोंके समान गर्जना करनेवाले एवं सबल जलसे भरे हुए हजार कलशोंसे अभिषेकको प्राप्त होनेवाले भगवानने मेरुपर्वतको सफेद कर दिया सो ठीक हो है क्योंकि शुद्ध पदार्थके भाश्रयसे अशुद्ध भी शुद्धताको प्राप्त हो जाता है। भावार्थ-भगवान्के अभिषेक जलसे मेरु पर्वत सफेद-सफेद दिसने लगा ॥२॥ जिनशासनकी प्राप्तिसे जिनके प्रशस्त रागका उदय हो रहा था, जिनके शरीरमें रोमाञ्च प्रकट हुए थे और जिनका संसार रूपी सागर अत्यन्त अल्प रह गया था ऐसे अन्य समस्त स्त्रोंके इन्द्रोने भी बड़े सन्तोपके साथ इच्छानुसार निर्मल जलसे जिनेन्द्र भगवान्का अभिषेक किया था ।।३।। तदनन्तर कोमल हाथोंको धारण करनेवाली शची आदि इन्द्रागियोंने आकर सुगन्धित द्रव्योंसे भगवान्को उद्वर्तन 1-उबटन किया और अपने ही स्तनोंके समान सुशोभित एक साथ उठाये हुए, १ तदयनीयमानं म० १२ सुवर्णमयरूपकान्तिमय-म० १३ प्रगमरता म०१ ४.. मानयादरल- म०। ५. समलदेवेन्द्रादयः । ६. जन्माधयः म० ।

85 हरिवंशपुराणे विधाय स सुरद्विपस्फटिकभूभृतो मस्तके जिनेन्द्रशिशुमिन्द्रनीलमणितुझचूडामणिम् । चचाल चलचामरातपनिवारणोच्चैरुधिश्चलोमिंकुलसकुलो जलनिधिर्यथा फेनिलः ॥४२॥ सुरेभवदनिके दशगुणे द्वयोश्चाष्ट ते रदाः प्रतिरदं सर: सरसि पद्मिनी तत्र च । भवन्ति मुखसंत्यया सहितपनपत्राण्यपि प्रशस्तरसभाविता प्रतिदलं नटत्यासराः ॥४३॥ तथाविधविभूतिभिः समुपगम्य मेरुं सुराः परीत्य पृथु पाण्डकाख्यवनखण्डमभ्येस्य ते । जिनेन्द्रमतिरुन्द्रपाण्डकशिलातले कोमले सुपञ्चशतकामुंकोच्चहरिविष्टरेऽतिष्टपन ॥४४॥ ततश्च एतपूजनोपकरणेषु देवाङ्ग नागणेषु परितः स्थितेष्वभिनवोरमवानन्दिषु । नटरसु कुनपोत्कटप्रकटनाटकेषु स्फुरप्रकृष्टरसभावहावलयरक्षितस्वर्गिः ॥ ४५ ॥ स्टापटहरातशब्दहरिनादभेरीरवैगिरीन्द्रसुवृहद्गुहाप्रतिनिनादसंवर्धितः । दिगन्तरविसर्दिभिर्जिनगुणैरिव प्रस्फुटरशेषभुवनीदरे श्रुतिसुखाव हैः परिते ॥४६॥ नभस्तलमितस्ततः स्थगयति स्फुरत्सौरभे विचित्रपटवासधूपपटले मुपुष्पोत्करे । सुगन्धयति बन्धुरे परमगन्धहृद्ये दिशा मुखानि मुखपाण्डुकप्रभवमातरिश्वन्यलम् ॥४७॥ गृहीतबहुविमहः सुरपरिग्रहो वासवः समारमत भक्तितो जिनमहाभिपेकं स्वयम् । विधातममराहतैस्तु मणिहेमकुम्भच्युतः पयोमयपयोनिधेः शुभपयोभिरुद्गन्धिभिः ॥४॥ [चतुर्मिः कसलापकम् ] नहीं हुआ उसकी देखनेको उत्कण्ठा ज्यों-की-त्यों बनी रही ॥४१॥ वह इन्द्र जिनके मस्तकपर इन्द्रनील मणिका ऊँचा चूड़ामणि सुशोभित हो रहा था, ऐसे जिन बालफको ऐरावत हाथी रूपी स्फटिकमय पर्वतके मस्तकपर विराजमान कर चला । उस समय वह इन्द्र चञ्चल चामर और छत्रीसे अतिशय शोभायमान था और उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो चन्चल सरगोंके समूहसे युक्त फेनसे भरा समुद्र ही चला जा रहा हो ॥४२॥ ऐरावत हाथी के चत्तीस मुख थे, प्रत्येक मुख में आठ-आठ दाँत थे, प्रत्येक दाँतपर एक-एक सरोवर था, प्रत्येक सरोवरमें एक-एक कमलिनी थी, एक-एक कमलिनी में बत्तीस यत्तीस पत्र थे और एक-एक पत्रपर उत्तम रससे भरी हुई एक एक अप्सरा नृत्य कर रही थी ॥४३॥ उस प्रकार की लोकोत्तर विभूतिके के साथ देव लोग मेरु पर्वतके समीप पहुंचे तथा उसकी परिक्रमा देकर पाण्डुक नामक विशाल वन सण्डम प्रविष्ट हुए । यहाँ उन्होंने विशाल पाण्डुशिलाके ऊपर जो पाँच सौ धनुष ऊँया सिंहासन है उसपर जिन-बालकको विराजमान किया ॥४४॥ तदनन्तर पूजाके उपकरणोंको धारण करनेवाले एवं नवीन उत्सबसे आनन्दित देवाण- नाओंके ममूह जय चारों ओर सड़े थे, स्पष्ट तथा श्रेष्ठ रस, भाष, हाव और लयसे देवोंको मनुरजित करनेवाले श्रेष्ठ नृत्यकारों के समूह जय नृत्य कर रहे थे, सुमेरु पर्वतको मुविशाल गुफाओंसे गूंजनेवाली प्रतिध्वनिसे वृद्धिद्गत, दिशाओंके अन्तरालमें फैलनेवाले, जिनेन्द्र भगवान के गुणोंके समान अत्यन्त प्रकट, एवं कानोंको मुख देनेवाले बजते हुए नगाड़ों और शहीके शब्द तथा सिंहनाद भोर भेरियोंकी ध्वनियोंसे जब संसारका मध्यभाग परिपूर्ण हो रहा था, होती हुई सुगन्धिसे युक्त, नाना प्रकारके पटवास, धूपोंके समूह और उत्तमोत्तम पुष्पोंके समूह अन घर घर आकाशतलको व्याप्त कर रहे थे, भोर मुसरूपी पाण्डुक यनसे उत्पन्न उत्कृष्ट गन्यसे हदयको प्रिय छगनेवाली मुन्दर वायु जब दिशाओंके मुसको अत्यन्त मुगन्धित कर रही १. नामयिक., स०, ग. 1२. भारिता म., ग. 1. नदन्त्यसम०,ग. [४. मतिर म.। . नारायः (ग.20)। प्रकट एकोनचत्वारिंशः सर्गः 'सकलश्रुतमरयवधिप्रविकासिविशुद्धविलासनिनिद्र विशिष्ट- विलोचनदृष्टिविरष्टसमस्तचराचरतत्वजगस्त्रितय । त्रितयारमकदर्शनवोधचरित्रविनिमलररनविराजितपूर्व- भवोग्रतपोयुतपोदशकारणसंचिततीर्थकरप्रकृने ॥१॥ प्रकृतेः स्थितितोऽनुमवारच विशिष्टतराद्भुनपुण्यमहोदय. मारुनवेगविचालितंदेवनिकायकुलाचलसेवितपादयुग। युगमुण्य मुखाम्बुजदर्शननृष्टिविवर्जितमध्यमधुवतधार. तरस्तवनध्वनिहितदुन्दुभिनादनिवेदित्तशुदयशः ॥२॥ यरामा धवलीकृतजन्मपविनित वर्ष महाहरिवंश- महोदयशैलशिखामणिवालदिवाकरदीप्तिजिताकवपुः । पपुपाधिककान्तिभृताजितपूर्णशशाङ्क, विभो ! हरिनीलमणि. घुतिमण्डलमण्डितदिमुखमण्डल नेमिजिनेन्द्र ! नमो भवते ॥३॥ भवतेह मुवां नितये भवता गुरुणा परमेश्वर विश्वजनीन महेन्दुधिया प्रतिपादितमप्रतिमप्रतिमारहितम् । हितमुनिपथं प्रथितं विधिवत् प्रतिपय विधाय तपो विविध विधिना प्रविधूय कुकर्ममलं सकलं भुवि भव्यजनः प्रशतः ॥४॥ इन्द्र, नेमिजिनेन्द्रकी इस प्रकार स्तुति करने लगा-हे प्रभो! आपने समस्त श्रुतज्ञान मविज्ञान और भवधिज्ञानसे विकसित, शुद्ध चेष्टाओंके धारक, जागरूक एवं विशिष्ट पदार्थीको दिखलानेवाली दृष्टिके द्वारा समस्त चराचर पदार्यासे युक्त तीनों जगत्को अच्छी तरह देस लिया है। आपने सम्यग्दर्शन, सम्यग्तान और सम्यक् चारित्रके भेदसे विविधताको प्राप्त निर्मल रलोंसे मुशोमित पूर्वभव सम्बन्धी उप्र तपसे युक्त सोलह कारण भावनाओं के द्वारा तीर्थकर नामक पुण्य प्रकृतिका संचय किया है। ॥१॥ उसी तीर्थकर प्रकृतिकी स्थिति तया अनुभागवन्धके फारण अत्यन्त विशिष्ट एवं अद्भुत पुण्यके महोदय रूपी वायुके वेगसे आपने देव समूह रूपी कुलाचलोंको विचलित किया है। उन्होंने आपके चरण युगलको सेवा की है। थाप युगमें मुख्य है नया मापके मुख कमलके देखने सम्बन्धी तृप्तिसे रहित भव्यजीव रूपी भ्रमरों के अत्यधिक स्तवनाको धनिसे वृद्विगत दुन्दुभियोंके शब्दसे आपका शुद्ध यश प्रकट हो रहा है ॥२॥ हे नाय ! आपने यशसे शुम्लीकृत जन्मसे समस्त भारतवर्षको पवित्र किया है । अत्यन्त श्रेष्ठ हरिवंश रूप विशाल उदायचलके शिखामणि स्वरूप पालदिनकर जैसी कान्तिसे आपने सूर्यके शरीरको जीत लिया है। हे विभो ! आपने अधिक कान्तिको धारण करनेवाले शरीरके द्वारा पूर्णचन्द्रको जीत टिया है एवं इन्द्रनील मणि जैसी कान्तिके समूहसे आपने समस्त दिशाओंके मुग्य मण्डलको मुशोभित कर दिया है इसटिए. हे नेमि जिनेन्द्र ! आपको नमस्कार हो ॥३॥ परमेश्वर ! ६ विश्वजनीन ! हे अप्रतिम हे अनुपम ! आप तीनों लोकोंके गुर है, एवं उत्कट बुद्धिके धारक हैं । यहाँ उत्पन्न होते ही मापने अनुपम, प्रसिद्ध एवं मोहका जो हितकारी मार्ग पतलाया है उसे स्वीकारफर तथा नाना प्रकारका तपकर मत्र्यजीव विधिपूर्वक समस्त पाप १ पोपनिर्मित पश्चिन् छन्दो विशेषः (1) ! २. बोगनाम्नः रिपत्रनुमागोयान्च (ग. दि.)। ३. पिचापि म ।

४५६ हरिवंशपुराणे दुकूलमणिभूषणनगनुलेपनोझासितं प्रयोज्य शुभपर्वतं विभुमरिष्टनेम्याख्यया । भुरासुरगणास्ततः स्तुतिमिरित्यमिन्द्रादयः परोस्य परितुष्टुबुजिनमि सुपृथ्वीश्रियाम् ॥५५॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती जन्माभिपेकवर्णनो नामाष्टमिशः सर्गः ॥३८॥ GO शुभ जलसे परिपूर्ण कलशोंके द्वारा उनका अभिषेक किया ॥५४॥ तदनन्तर इन्द्र आदि समस्त मुर और असुरों के समूहने उत्तम वस्त्र, मणिमय आभूपण, माला तथा विलेपनसे सुशोभित, कल्याणके पर्वत, एवं अतिशय विशाल लक्ष्मीके स्वामी श्री जिनेन्द्र देवका अरिष्टनेमि नाम रखकर उनकी प्रदक्षिणा दी और उसके बाद नाना प्रकारकी स्तुतियोंसे उनका स्तवन किया ॥५५॥ इस प्रकार अरिएनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें भगवान्के जन्माभिपेकका वर्णन करनेवाला अडतीसयाँ पर्व समाप्त हुआ ॥३८॥ , १ जिनमिति म। २. प्रियम् म०, ग०।

- एकोनचत्वारिंशः सर्गः 'सकलभ्रुतमरयवधिप्रविकासिविशुद्धविलासनिनिद्र विशिष्ट- विलोचनदृष्टिविष्टसमस्तचराचरतरवजगस्त्रितय । त्रितयारमकदर्शनबोधचरित्रविनिर्मलरानविराजितपूर्व- भवोग्रतपोयुतोदशकारणसंचिततीर्थकरप्रकृते ॥१॥ प्रकृतेः स्थितितोऽनुभवाच्च विशिष्टतराद्भुतपुण्यमहोदय मारुतवेगविचालितंदेवनिकायकुलाचलसेवितपादयुग । युगमुख्य मुखाम्बुजदर्शनधिविवर्जितमध्यमधुप्रतधीर- तरस्तवनध्वनिवृहितदुन्दुभिनादनिवेदितशुद्धयशः ॥२॥ यशसा धवलीकृतजन्मपविनितभारतवर्ष महाहरिवंश- महोदयशैलशिसामणिवालदिवाकरदीप्तिजिवावपुः । वपुपाधिककान्तिभृताजितपूर्णशशाय, विभो ! हरिनीलमणि- धुतिमण्डलमण्डितदिङ्मुखमण्डल नेमिजिनेन्द्र ! नमो भवते ॥३॥ भवतेह भुवां प्रितये भवता गुरुणा परमेश्वर विश्वजनीन महेच्छधिया प्रतिपादितमप्रतिमप्रतिमारहितम् । हितमुक्तिपयं प्रथितं विधिवत् प्रतिपद्य विधाय तपो विविधं विधिना प्रविधूय कुकर्ममलं सकलं भुवि भव्यजनः प्रणतः ॥४॥ इन्द्र, नेमिजिनेन्द्रकी इस प्रकार स्तुति करने लगा हे प्रभो! आपने समस्त श्रुतज्ञान मविज्ञान और अवधिज्ञानसे विकसित, शुद्ध चेष्टाओंके धारक, जागरूक एवं विशिष्ट पदार्थीको दिखलानेवाली दृष्टिके द्वारा समस्त चराचर पदार्थोसे युक्त तीनों जगत्को अच्छी तरह देख लिया है। आपने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्रके भेदसे त्रिविधताको प्राप्त निर्मल रलोंसे सुशोभित पूर्वभव सम्बन्धी उग्र तपसे युक्त सोलह कारण भावनाओं के द्वारा तीर्थकर नामक पुण्य प्रकृतिका संचय किया है । ॥१॥ उसी तीर्थकर प्रकृतिकी स्थिति तया अनुभागवन्धके कारण अत्यन्त विशिष्ट एवं अद्भुत पुण्यके महोदय रूपी वायुके वेगसे आपने देव समूह रूपी कुलाचलोंको विचलित किया है। उन्होंने भापके चरण युगलकी सेवा की है। आप युगमें मुख्य है तथा आपके मुख कमलके देसने सम्बन्धी तृप्तिसे रहित भव्यजीव रूपी भ्रमरोंके अत्यधिक स्तवनोंको ध्वनिसे घृद्धिगत दुन्दुभियोके शब्दसे आपका शुद्ध यश प्रकट हो रहा है ॥२॥ हे नाथ ! आपने यशसे शुक्लोफत जन्मसे समस्त भारतवर्षको पवित्र किया है । अत्यन्त श्रेष्ठ हरिवंश रूप विशाल उदायचलके शिखामणि स्वरूप बालदिनकर जैसी कान्तिसे आपने सूर्यके शरीरको जीत लिया है। हे विमो! आपने अधिक कान्तिको घारण करनेवाले शरीरके द्वारा पूर्णचन्द्रको जीत लिया है एवं इन्द्रनील मणि जैसी कान्तिके समूहसे आपने समस्त दिशाओं के मुम्ब मण्डलको सुशोभित कर दिया है इसलिए हे नेमि जिनेन्द्र ! आपको नमस्कार हो ॥३॥ हे परमेश्वर ! हे विश्वजनीन ! हे अप्रतिम हे अनुपम ! आप तीनों लोकोंके गुरु हैं, एवं उत्कट बुद्धिके धारक हैं। यहाँ उत्पन्न होते हो मापने अनुपम, प्रसिद्ध एवं मोक्षका जो हितकारी मार्ग यतलाया है उसे स्वीकारकर तथा नाना प्रकारका तपकर भव्यजीव विधिपूर्वक समस्त पाप १ बोटक्दयनिर्मित पश्चित् छन्दो-विशेषः (1)। २. तीर्थकरनाम्नः स्थितेरनुभागोदयान्च (ग. दि०)। ३. विधायि म ।

४८८ हरिवंशपुराणे प्रणतप्रिय ! संप्रति जन्मजरामरणामयभीममहाभवदुःख- समुद्रसपारमतीत्य समेष्यति मोक्षमशेषजगरिछखरम् । शिखरामसमग्रगुणाश्रयसिद्धमहापरमेष्टिमहोपचय प्रवदन्ति च यं मुनयः परमं पदमेकमिहाक्षरमात्महितम् ॥५॥ महितं महतां महदारमगतं सतप्तोदयमन्तविवर्जितमूर्जित- सत्त्वसुखं प्रतिलभ्यमलभ्यमभव्यजनैः खलु यन्त्र सुखम् । सुखमन्त्र यदीश्वरविश्वनगत्प्रभुताप्रतिबद्धमपि त्रिद- शेन्द्र नरेन्द्रपुरस्सरदेवमनुष्य विशेपमहाभ्युदयप्रभवम् ॥६॥ प्रभवप्रलयस्थितिधर्मपदार्थनिरूपणनैपुणशासन शासन तावकशासनसेवनयेव भविष्यति नान्यमताभयतः । प्रयतामिति निश्चयमेत्य भवन्ति भवत्यविभूतिमतिवणाः सतत तनुभृन्निवहा भुवि येऽन त एव जिनेन्द्र कृतित्वमिताः ॥७॥ प्रियसर्वहितार्थवचोविभवं विभवं सुरभीकृतदिग्विवरं वरसंहतिसंस्थितिरूपयुतं युतसर्वसुलक्षणपतिरुचिम् । रुचिमत्पयसा समदेहरसं रसभावविदं मलमुक्ततर्नु तनुजस्विविहीनमनन्ततया ततया संहितं भुवि वीर्यतया ॥८॥ तोटकवृत्तम् यतयात्मधियाँ जितमारम व भुवमव्यतरां सुखसत्यभृताम् । भृतविश्व ! भवन्तमनन्तगुणं गुणकाशितया वयमीश नता: En कर्मरूपी मलको विधिपूर्वक नष्टकर पृथिवीमें वन्दनीय होगे ॥४॥ हे प्रणतप्रिय ! हे भक्त वत्सल ! अब आप जन्म जरा मरण रूपी रोगोंसे भयंकर संसार रूपी महादुःखके अपार सागर- को पारकर मोक्षस्वरूप, समस्त लोककी उस शिखरको प्राप्त होंगे जहाँपर उत्कृष्ट सीमाको प्राप्त समस्त गुणांके आधारभूत सिद्ध भगवान रूप महा परमेष्ठी विराजमान रहते हैं और जिसे मुनिगण उत्कृष्ट, अद्वितीय, अविनाशी एवं आत्म-हितकारी पद कहते हैं ॥५॥ जहाँका उत्तम, महान, आत्मगत, निरन्तर उदयमै रहनेवाला, अन्तरहित और अनन्त बलसम्पन्न सुस महापुरुपोंको ही प्राप्त हो सकता है अभव्य जीवोंको नहीं। हे स्वामिन् ! आप उत्पाद व्यय और ध्रौव्य स्वभाववाले पदार्थों के निरूपण करनेमें निपुण शासनका उपदेश करनेवाले हैं। इस संसार में समस्त जगत्की प्रभुतासे मंबद्ध एवं इन्द्र नरेन्द्र आदि देव और मनुष्यों के विशेष महान् अभ्युदयोंका कारण भूत जो सुख है यह भी आपके शासनको सेवासे ही प्राप्त होगा। अन्य मतोके आश्रयसे नहीं। इसलिए सब आपका ही आश्रय लेवे इस प्रकार आपके विषयमें निश्चय-दृढ़ श्रद्धाको प्राप्तकर जो प्राणी इस पृथिवीमें निर्मन्थ बुद्धिके धारण करनेमे प्रवीण होते हैं-निर्मन्य मुद्रा धारण करते हैं हे जिनेन्द्र ! वे हो प्राणी इस संसारमै कृतकृत्यताको प्राप्त होते हैं ॥६-७॥ हे भगवन ! भाप प्रिय एवं सर्वहितकारी वचनाके वैभवसे सहित हैं, संसारका अन्त करने वाले हैं, आपने दिशाओके अन्तरालको सुगन्धित कर दिया है, आप उत्कृष्ट संहनन, उत्कृष्ट संस्थान और उत्कृष्ट रूपसे युक्त हैं, आप समरत लक्षणोंसे मुशोभित हैं, आपके शरीरका रस-रुधिर दूधके समान है, आप रस और भावको जाननेवाले है, आपका शरीर मलसे रहित है, पसीनासे रहित है, आप पृथिवीमें व्याप्त अनन्त बलसे सहित हैं, ||| अपने संयम रूप आत्म बुद्धिसे कामदेवको जीत लिया है। आप सुग्र रूपी १ प्रणनिप्रिय म० । २. प्रविटन्ति म । ३. प्रतिबुद्धमार म०। ४. स्यभिभूति म । ५. नति ग० । ६. महितम् ग०। ७ जिनयात्ममुगम । ८ कामदेवम् (ग. दि.)। ९. मुन्नसस्यभूतम् ।

एकोनचत्वारिंशः सर्गः ४८९ दोधकवृत्तम् योजनभूरिसहस्रनमोगं भोगकरवमिवाचलनाथम् । नाय ! परं स्नपनासनमिद्धमिद्धमतिः कुख्ने क उदारः ॥ १०॥ इंदृशमीश विभुत्वममानं मानधनामरमानवमान्यम् । मान्यतमोऽन्यतमो भुवि ना को नामवोपि जिनैति यथा स्वम् ॥११॥ शैशव एव जनातिगसत्वः सत्त्वहितो भुवनत्रयनूतः । नुतनमक्तिमरण नतानां तानवमानमसौरयकर स्वम् ॥१२॥ कामकरीन्द्रमृगेन्द्र नमस्ते क्रोधमहाहिविराज नमस्ते । मानमहीधरवज्र नमस्ते लोभमहावनदाव नमस्ते ॥१३॥ ईश्वरताधरधीर नमस्ते विष्णुतया युत देव नमस्ते । अहंदचिन्त्यपदेश नमस्ते ब्रह्मपदप्रतिवन्ध नमस्ते ॥१४॥ सत्यवचोनिरहः सुरसंघा इत्यमिनुत्य जिनं प्रणिपत्य । तारकमुप्रभवाद्वरमेकं याचिनवन्त इन घरबोधिम् ॥१५|| सस्यसे परिपूर्ण एवं अत्यन्त रक्षणीय भूमिकी रक्षा करनेवाले हैं । हे सबके रक्षक भगवन् ! इस तरह आप अनन्त गुणोंके धारक हैं । हे नाथ ! आपके गुणोंकी अभिलापासे हम आपके प्रति नम्रीभूत हैं आपको नमस्कार करते हैं ॥९॥ हे नाथ ! यह अनेकों हजार योजन ऊँचा पर्वतोंका राजा सुमेरु पर्वत भी मानो आपके योगका साधन हो गया। सो आपके सिवाय प्रचण्ड बुद्धिको धारण करनेवाला ऐसा, कोन महापुरुप है जो इसे श्रेष्ठ तथा देदीप्यमान स्नानपीठ बना सकनेको समर्थ है ।।१०) हे ईश ! यह आपका ऐश्वर्य अपरिमित है, मान- रूपी धनके धारक बड़े-बड़े देव तथा मनुष्यांके द्वारा माननीय है । हे जिनेन्द्र ! इस संसारमै स्वर्गमें उत्पन्न होनेवाला भी एसा कोन दूसरा माननीय पुरुप है जो आपके समान ऐश्वर्यको प्राप्त कर सके ॥११॥ हे भगवन् ! थाल्यकालमें भी आप लोकोत्तर पराक्रमके धारक हैं, प्राणियोंके हितकारक हैं, तीनों लोकोंके द्वारा स्तुत हैं तथा आप नूतन भक्तिके भारसे नम्रीभूत मनुष्योंके लिए शारीरिक और मानसिक सुखकै फरनेवाले हैं ॥१२॥ हे प्रभो ! आप कामरूपी गजराजको नष्ट करनेके लिए सिंहके समान हैं इसलिए आपको नमस्कार हो। आप क्रोधरूपी महानागको वश करनेके लिए पक्षिराज-गरुडके समान हैं इसलिए आपको नमस्कार हो। आप मानरूपी पर्वतको चकनाचूर करनेके लिए वनके समान हैं अतः आपको नमस्कार हो और आप लोमरूपी महावनको भस्म करनेके लिए दावानलके समान हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ॥१३।। आप ईश्वरताके धारण करने में धीर-चीर है अतः आपको नमस्कार हो। हे देव ! आप विष्णुतासे युक्त हैं अतः आपको नमस्कार हो। आप अर्हन्त रूप अचिन्त्य पदके स्वामी हैं अतः आपको नमस्कार हो और आप ब्रह्म पदको प्रान करनेवाले हैं अतः आपको नमस्कार हो || इस प्रकार मत्य वचनोंके समूहसे देवोंने भगवानकी स्तुति कर उन्हें प्रणाम किया तथा भयंकर संमारसे पार फरनेवाले भगवानसे उन्होंने यही एक वर माँगा कि हे भगवन् ! हम लोगेको उत्तम योधिको प्राप्ति हो ॥१२॥ १. मा पुरुषः मट. निनामधेय इत्ययं. 1 २ नारभुवोऽपि ग• 1 ३. मानर म०। ४. शारीरिष. मानसिकमौर विधायरः । ५. द्रोपमहानागगा। ६. ब्रह्मपपरतिबन्ध म., ग.।

हरिवंशपुराणे वृत्तानुगन्धिगद्यम् अथ मयिनमहामृताम्भोधिसंशुद्धपीयूषपिण्डातिपानातिदोपाञ्चिराज्जीयमाणेष्विवोद्रीयमाणेषु तत्खण्ड- रयण्डेपु, शङ्खेषु खे खेदमुक्तः सुरैस्तोषपोषादनीषन्मनीपैभृशं पूर्यमाणेषु तद्यथा वाद्यमानोरुगम्भीरभेरीमृदङ्गा. नकादिप्रभूताततातोद्यशब्देषु संवृत्तजैनेन्द्रजन्मामिपेकोत्सवोद्घोषणायेव निश्शेषलोकान्तदिक्चक्रवालान्तरा- क्रान्तिमभ्युस्थितेषु प्रनृत्यरसु विद्याधरवातदेवाङ्गनातुगसंगीतनादाभिरामातिशृङ्गारहास्यागुतोद्यदसोदारवागह- सत्त्वस्फुटाहार्यहार्यात्मदिव्याभिनेयप्रवृत्ताप्सरोवृन्दबन्धेषु, सौधर्मकल्पाधिपः संभ्रमाद्विधमत्राजमानोद्यदैरावत- स्कन्धमारोप्य संवृत्यधीरं जिनेन्द्र सितच्छत्रशोमं चलञ्चामरालीमिरावोग्यमानं प्रगीताप्सरोलोकसंगीय. मानातिशुद्धात्मकीर्ति चचालाचलेन्द्रादेनीकैरशेपैरशेष नमोमागमापूर्य शौर्यशैलरलं यादवेन्द्रर्मगेन्दैरिवाध्या- सितं प्रथितविबुधनिकायैः पथि प्रस्थितैः सप्रमोदैः प्रगामप्रणुतिप्रगीतिप्रयोगप्रवृत्तर्यथायोगममिनन्द्यमानो महानन्दमापादयन् पादपद्मोपसेवासनाथस्य नाथस्त्रिलोकामराधीशलोकस्य लोकातिधतिप्रवृत्तं परम्पार- मैश्वर्यमत्यद्भुतं संदधानः, वानन्दनो, नन्द वर्धस्व जीवेति चेत्यादि पुण्याभिधानस्तदा स्तूयमानः फुलादिप्रसूतिप्रभूताच्छतोयापगावीचिसन्तानसंसर्गशीतात्मना मोगभूभूरहाणां विचित्रप्रसूनप्रवानप्रसङ्गेन अथानन्तर खेद-रहित एवं विशाल बुद्धिके धारक देव संतोपकी अधिकतासे आकाशमें जिन शहोंको अधिक मात्रामें फेंक रहे थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो अमृतके महासागरके मथनेसे जो अत्यन्त शुद्ध अमृतका पिण्ड निकला था उसे अधिक मात्रामें पी जानेके दोपसे देव लोग चिरकाल तक पचा नहीं सके इसलिए उन्होंने उगल दिया हो उसी पीयूप-पिण्डके टुकड़े हो । शड्ढोंके शब्दोंके साथ-साथ बजाये जानेवाले अत्यधिक गम्भीर ध्वनिसे युक्त भेरी, मृद्ग तथा पटह आदिको एवं अधिक मात्रासे बजनेवाली बॉसुरी और वीणाके शब्द, 'श्री जिनेन्द्र भगवानके जन्माभिषेकका उत्सव हो चुका है। इसकी घोषणा करने के लिए ही मानो जव समस्त लोकके अन्त तक एवं समस्त दिशाओंके अन्तरालमें व्याप्त होनेके लिए उठ रहे थे । और जब विद्याधरों के समूह एवं देवागनाओंके उन्नत संगीतमय शब्दोंसे सुन्दर श्रेष्ठ शृङ्गार, हास्य और अद्भुत रससे परिपूर्ण वाचिक, आङ्गिक, सात्त्विक और आहार्य इन चार प्रकारके अपने सुन्दर दिव्य अभिनेयोंके प्रकट करने में प्रवृत्त अप्सराओंके समूह सुन्दर नृत्य कर रहे थे। तव सौधर्म स्वर्गका इन्द्र, संभ्रम पूर्वक विभ्रमासे शोभायमान उठते हुए ऐरावत हाथीके कन्धेपर धोर-वीर जिनेन्द्रको विराजमानकर सुमेरु पर्वतसे उस शौर्यपुरको ओर चला जो शूरवीरताके पर्वत एवं सिंहोंके समान बलवान् यादववंशी राजाओंसे अधि- प्टित था। उस समय जिनेन्द्र भगवान के ऊपर सफेद छत्र सुशोभित हो रहा था, चनाल चमरोंको पंक्तियाँ उनपर ढोरी जा रही थी, और प्रकृष्ट गोतोंसे युक्त अप्सराओंके समूह उनको अत्यन्त विशुद्ध कीर्ति गा रहे थे। सौधर्मेन्द्रने उस समय समस्त आकाशको सब प्रकारको सेनाओंसे पूर्ण कर रखा था। मार्गमें चलते हुए, हर्पसे परिपूर्ण, प्रणाम, स्तुति तथा संगीतके प्रयोगमे लीन प्रसिद्ध देवों के समूह भगवानका यथायोग्य अभिनन्दन कर रहे थे। त्रिलोक सम्बन्धी इन्द्रोंका समूह भगवानके चरणकमलोंको सेवामें तत्पर था और भगवान् उसे महान् आनन्द प्राप्त करा रहे थे। इस प्रकार जो लोकोत्तर एवं अत्यन्त आश्चर्य- फारी परम ऐश्वर्यको धारण कर रहे थे, शिवादेयोके पुत्र थे, 'समृद्धिको प्राप्त होओ' 'बढ़ते रहो 'जीवित रहो' इत्यादि पुण्य शब्दोंसे उस समय जिनकी स्तुति हो रही थी, कुलाचलोस उत्पन्न अत्यधिक स्वच्छ जलसे युक्त महानदियोंकी तरंगोंके संमर्गसे शीतल, भोगभूमि सम्बन्धी पल्पवृक्षोंके रंग-बिरंगे पुष्प-समूहके संयोगसे आश्चर्यकारी मुगन्धिको धारण करने. १. पापालोतराकान्ति . 1 २. दारान म०1३. -ने-म.। ४. -मापूर्वशैले-म० ।

४९९ एकोनचत्वारिंशः सर्गः सौगन्थ्यमत्यद्भुतं विनता सम्भ्रमेणातिदूराच वेदापनोदार्थमभ्युत्थितेनेव मित्रेण गात्रानुकूलेन मन्दानिलेन प्रभुस्तीर्थकृत्कोमलाङ्गः समालिहग्यमानो मनोहारिवाल्यानुरूपाम्बरोदासिभूषाविशेपोदमाल्योज्ज्वलो बालकल्पद्रमोहामशोमानिशायी घनश्याममूर्तिः सितोद्गन्धिसञ्चन्दनेनोपदिग्धः स्फुरत्सान्द्रचन्द्रातपादिलष्ट- रुन्देन्द्रनीलाद्विलक्ष्मीधरो देवसेनावृतः शीघ्रमुल्लङ्घ्य काष्टामुदीचीमधिष्ठानमात्मीयमुच्चचंजवातवादितधोर- ध्वनिच्याप्तदिक्चकवालाम्बरं दिव्यगन्धाम्बुवर्षामिपितापनपुष्पवर्षापरुद्रोररथ्यापथं श्रीनिधानं विधानेन माङ्गल्यसंसङ्गिना चारसौयं पुरं प्रापदेश्वर्यमाश्चर्यभूतं भुवि प्राकटं विश्वलोकस्य कुवंग्नसो नेमिनाथः । जिनशिशुमशिशुश्रियं शौरिसौर्यग्रजाशंमदम्मोजिनीवालभास्वन्तमुत्तुगमानराजोत्तमानस्थमादाय तं मातुरन्सनमानीय शक्रः स्वयंविक्रियाशनियुक्तः सहस्रं भुजां मासुरांसस्थलश्रीपुषां स प्रकृन्य प्रमार्यो- रसौन्दर्यसन्दर्भगमिरस्त्रीसहस्राणि चित्रं प्रनृत्यन्ति विभ्रद्भुजेष्वग्रतो यादवानां मुदा पश्यतां विश्वकाश्यप्य. धीशस्वलामादपि प्राज्यलाम हृदि ध्यायतां स्फारिताशं क्षणारब्धसत्ताण्डवाखण्डशोभाप्रयोगान्वितं वाय जानिप्रतानप्रदाभिनेयं सक्षोमलीलं सदिक्चक्रभेदं सभूमिप्रपात महानन्दसन्नाटक राज्यदक्षी मनाट स्फुटीभूतनानारपोदारमावं ततोऽहंद्गुरुं देवराजः प्रणम्य प्रपूज्यान्यमत्यरनयरलभ्यर्विभूपादिमिभूष- वाले तथा सेद दूर करनेके लिए संभ्रमपूर्वक बहुत दूरसे सम्मुख आये हुए मित्रके समान, शरीरके अनुकूल मन्द-मन्द समीरसे जिनका आलिङ्गन हो रहा था, जो प्रमु थे, तीर्थकर थे, कोमल शरीरके धारक थे, जो मनको हरण करनेवाले तथा वाल्य अवस्थाके अनुरूप वस्त्रोंसे मुशोभित विशिष्ट आभूपणोंसे युक्त थे, देदीप्यमान मालाओंसे उज्ज्वल थे, बाल कल्पवृक्षकी उत्कट शोभाको तिरस्कृत करनेवाले थे, मेघके समान इयाममूर्तिके धारक थे, सफेद एवं उत्कृष्ट गन्धसे युक्त उत्तम चन्दनसे लिप्त थे और इसके कारण जो उदित होती हुई सघन चाँदनीसे आलिगित प्रगाढ इन्द्रनीलमणिके पर्वतकी शोभाको धारण कर रहे थे, और देवोंकी सेनासे आवृत थे ऐसे नेमिजिनेन्द्र शीन ही उत्तर दिशाको उल्लङ्क कर अपने उस सौर्यपुर नगरमे जा पहुंचे जहाँको दिशाओंका अन्तराल और आकाश ऊँची-ऊँची ध्वजाओंके समूह तथा वादिनोंकी गंभीर ध्वनिसे व्याप्त था, जहाँ के बड़े-बड़े मार्ग, दिव्य और सुगन्धित जलको सृष्टिसे सींचे जाकर फूलोंकी पड़ती हुई वसे रुके हुए थे, जो लक्ष्मीका भण्डार था तथा मङ्गलाचारमय विधि-विधानसे मुन्दर था, उस समय भगवान नेमिनाथ पृथिवीपर समस्त लोगोंको आश्चर्यमें डालनेवाले आश्चर्यको प्रकट कर रहे थे। चालक होनेपर भी जिनकी शोभा वालकों जैसी नहीं थी अर्थात् जो प्रकृतिसे वयस्क के ममान सुन्दर थे। जो कृष्ण तथा सौर्यपुरको प्रनारूपी शोभायमान कमलिनीको विकसित करने के लिए बालसूर्य थे और जो अतिशय ऊँचै ऐरावत-गजराजके मस्तकपर विराजमान थे ऐसे जिन-बालकको लेकर इन्द्रने उन्हें माताकी गोदमें दिया। तदनन्तर विक्रिया शक्तिसे युक्त इन्द्रने स्वयं देदीप्यमान कन्धोंकी शोभाको पुष्ट करनेवाली हजार भुजाएँ बनाकर उन्हें फैलाया तथा उनपर अत्यधिक सौन्दर्यसे युक्त नानाप्रकारका नृत्य फरनेवाली हजारों देवियोंको धारण किया। तत्पश्चात् इस टीलाको जव सामने बैठे हुए यादव लोग बड़े हर्षसे देख रहे थे तथा अपने हृदयमें जब इसे समस्त पृथ्वोंके स्वामित्वके लाभसे भी अधिक समझ रहे थे तब राज्यमें दक्ष इन्द्रने महानन्द नामका यह उत्तम नाटक किया जिमने सथके नेत्रों को विस्तृत कर दिया था, अर्थात् जिसे सर टकटकी लगाकर देय रहे थे। उत्सवपूर्वक प्रारम्भ किये हुए उत्तम ताण्डव नृत्यशी असण्ड शोभा प्रयोगसे सहित १. मात्सरसायों म०। २. पापनाविमतातहताभिने म०, बाघमातिप्रमानुप्रासाभिनयं ग.। ३. प्रपात म.।

४९२ हरिवंशपुराणे यित्वा जिनस्यामृताहारसुचकरामुष्टके दक्षिणे न्यस्य रक्षानिमित्तं वयस्यान् कुमारान् सुराणां मुरेन्द्रः कुमारस्य सम्यग्निरूप्याप्रमत्तं कुबेरं वयोभेदकाल योगं विमोः क्षेमयोग्यं विधेयं समस्तं स्वयेति स्थिरं भापयित्वा समापृच्छ्य जैनौ गुरू तावनुज्ञां ततः प्राप्यसंप्राप्सलामः कृतार्य निजं मन्यमानो यथायातमन्यैरशेपैः सुरेन्द्रश्चतु ददेवानुगर्यातवान् सिद्धयाग्रस्ततो दिक्कुमार्योऽपि संवृत्तकार्याः समासाद्य तामार्यपुत्री सपुत्री शियां संप्रणग्य प्रहृष्टाः प्रजग्मुनिजस्थानदेशान् दिशस्ता दश द्योतयन्त्यः शरीर- प्रमामिर्जगन्नेमिचन्दोऽपि शुभ्रगुणग्रामसान्द्रांशुजालैः समासादयन् बालमावेऽप्ययाललियो लालितो यन्धुवर्गामरवर्द्धमानो रराज श्रिया । स्तवनमिदमरिष्टनेमीश्वरस्येष्टमन्माभिषेकामिसम्बन्धमाकान्तलोकत्रयातिप्रमावस्य पापापनोदस्य पुण्यैकमार्गस्य संसारसारस्य मोक्षोपकण्ठस्य मध्यप्रजानां प्रमोदस्य कर्नुः प्रमादत्य हतुधर्मस्यो. पनेतुर्मुदा धूयमाणस्य स्मर्यमाणस्य च संकीय॑मानस्य संकीर्तनं पथ्यमानं समाकण्यमानं सदा था, नानाप्रकारके वादिनोंकी जातियोंके समूहसे जिसमें अभिनेय अंश वृद्धिको प्राप्त हो रहे थे, जो भौहोंके क्षोभकी लीलासे सहित था, दिड्मण्डलके भेदसे सहित था, पृथ्वीके प्रपातसे सहित था, और नाना रसोंके कारण जिसमें उदार-भाव प्रकट हो रहा था। तदनन्तर इन्द्रने भगवान्के माता-पिताको प्रणाम किया, उनकी पूजा की, अन्य मनुष्यों के लिए दुष्प्राप्य अमूल्य आभूपण आदिसे उन्हें विभूपित किया, रक्षाके निमित्त जिनेन्द्र के दाहिने हाथके अंगूठे में अमृतमय मुख्य आहार विक्षिप्त किया। क्रीडाके लिए. भगवानकी समान अवस्थाको धारण करनेवाले देवकुमारोंको उनके पास नियुक्त किया, कुवेरको यह आज्ञा दी कि तुम भगवानको अवस्था, काल और ऋतुके अनुकूल उनके कल्याणके योग्य समस्त व्यवस्था करना। इस प्रकार इन्द्र यह आज्ञा देकर भगवानके माता-पितासे पूछकर तथा उनकी आज्ञा प्राप्तकर अपने आपको कृतकृत्य मानता हुआ चार निकायके देवोंसे अनुगत समस्त इन्द्रोंके साथ जैसा आया था वैसा चला गया। इन्द्रकी यात्रा सफल हुई। तदनन्तर अपना-अपना कार्य पूराकर दिक्कुमारी देवियोंने आर्यपुत्री, जिनवालक सहित माता-शियादेवीके पास आकर उन्हें प्रणाम किया और उसके बाद वे प्रकृष्ट हर्पसे युक्त अपने शरीरकी प्रभाओंसे दशों दिशाओंको देदीप्यमान करती हुई अपने-अपने स्थानोंपर चली गई। इधर गुण-समूहरूपी किरणोंके समूहसे समस्त जगत्को आनन्दित करनेवाले, बालक होनेपर भी वृद्धों जैसी क्रियासे युक्त, बन्धुवर्ग तथा देवोंके द्वारा लालित नेमिजिनेन्द्ररूपी चन्द्रमा दिन-प्रतिदिन बढते हुए लक्ष्मीसे सुशोभित होने लगे । गौतम स्वामी कहते हैं कि यह स्तवन उन नेमिजिनेन्द्रक जन्माभिषेकसे सम्बन्ध रखनेवाला है जिनके सातिशय प्रभावने तीनों लोकोंको व्याप्त कर रसा है, जो पापको दूर करनेवाले हैं, एक पुण्यका ही मार्ग बतानेवाले हैं, संसारमें सारभूत हैं, मोक्षके निकट' हैं, भव्य-जीवोंको हर्ष उत्पन्न करनेवाले हैं, प्रमादको हरनेवाले हैं, धर्मका उपहार देनेवाले हैं, सब लोग बड़े हर्षसे जिनका नाम श्रवण करते हैं, जिनका स्मरण करते हैं और जिनका अच्छी तरह कीर्तन करते हैं । पढा गया, सुना गया और सदा चिन्तवन किया गया यह स्तोत्र इस लोकमें साक्षात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूपी सम्पत्तिको करता है, मानसिक और शारीरिक सुख-प्रदान करता है, शान्ति करता है, पुष्टि करता है, तुष्टि और १. मुख्य म० । २ त्रियोल्लालितो ग.1 एकोनचत्वारिंशः सर्गः ४९३ चिरयमानं सम्यक्रवज्ञानचारित्ररत्नत्रयस्यामिसंपत्करं चत्तशारीरसौख्यप्रदं शान्तिकं पौष्टिक तुष्टिसंपत्तिसंपादि सामादिहामुत्र चानेककल्याणसंप्राप्तिहेतोः प्रपुण्यात्र वस्य स्वयं कारणं वारणं सर्वपापास्त्रवाणां सहस्रस्य विध्वंसकरणं दारुणस्यापि पूर्वत्र सर्वत्र चानेहसि स्नेहमोहादिमावेन संचित- स्यैनसः । स्तोत्रमुख्य जिनेन्द्र विधेयादिदं भक्तिमारं परम् । इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती जन्माभिषेके इन्द्रस्तुतिवर्णनो नाम एकोनचत्वारिंशः सर्गः ॥३॥ सम्पत्तिको सम्पन्न करता है तथा परलोकमें अनेक कल्याणोंकी प्रापिमें कारणभूत उत्कृष्ट पुण्यास्रवका स्वयं कारण है, समस्त पाप कर्मोके हजारों प्रकारके आस्रवोंका निवारण करता है और पूर्वभवमें सर्वदा स्नेह तथा मोह आदि भावोंसे सश्चित भयंकरसे-भयंकर पापोंका नाश करता है । यह मुख्य स्तोत्र, जिनेन्द्र भगवानमें सातिशय भक्ति उत्पन्न करे। इस प्रकार परिएनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचर्य रचित हरिवंश पुराणमें जन्माभिषेक के समय इन्द्र द्वारा कृत स्तुतिका वर्णन करनेवाला उनतालीमयाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥३॥ १. म.। २. स्नेहमीदिमायेन म । ..बिनेन्द्रमा चत्वारिंशः सर्गः भय श्रुत्वा जरासन्धो भ्रानुर्वधमसी मृधे'। शोकसिन्धी निमग्नोऽरिक्रोधपोतेन धारितः ॥१॥ समस्तयदुनाशाय समस्तनयपौरुषः । सेोऽभ्यमित्रममार्गन्तुं मित्रवर्गमजिज्ञपत् ॥२॥ प्रमोस्तव्य समादेशासानादेशाधिपा नृपाः । चतुरङ्गबलोत्तुङ्गाः श्रिताः स्वामिहितैपिणः ॥३॥ दत्तप्रयाणमेनं स्वनन्तसैन्यान्धिवर्त्तिनम् । विविदुयंदुशार्दूलाश्चतुराश्चारचक्षुषः ॥४॥ ततः श्रुतवयोवृद्धा वृष्णिमोजकुलोत्तमाः । कर्तुमारेभिरे मन्त्रमिति तत्वनिरूपिणः ॥५॥ बिसण्डासण्डिताज्ञोऽन्यः प्रचण्डचण्डशासनः । चासगगदादण्डररनाद्यनबलोद्धतः ॥६॥ कृतज्ञः कृतदीपेषु प्रणतेषु कृतक्षमः । अस्मारनपकारः प्रागुपकारकतत्परः ॥७॥ जामातृभ्रातृधातोत्थप रामवरजोमलम् । प्रमाष्टुं कोपवानस्मान्मागधोऽभ्येत्य विभ्यतः ॥८॥ देवपारपसामध्यमस्मदीयमतिस्मयः । प्रकरीभूतमप्येप पश्यन्नपि न पश्यति ॥९॥ कृष्णस्य पुण्यसामयं पौरपं च वलस्य च । बाल्यादारभ्य निःशेपमिदं परमपैमवम् ॥१०॥ नेमितीर्थकरस्यापि देवेन्द्रासनकम्पिनः । प्रभुत्वं च स्फुटीभूतं बालस्यापि जगत्त्रये ॥११॥ अथानन्तर-युद्ध में भाईका वध सुनकर शोकरूपी सागरमें डूबता हुआ जरासंध, शत्रुओंपर उत्पन्न हुए क्रोधरूपी जहाजके द्वारा बचाया गया था। भावार्थ-भाई अपरा. जितके मरनेसे जरासन्धको जो दुःख हुआ था उससे वह अवश्य ही मर जाता परन्तु शत्रुओंसे बदला लेनेके क्रोधने उसकी रक्षा कर दी ॥१॥ समस्त नय और पराक्रममें निपुण जरासंधने समस्त यादवोंका नाश करनेके लिए मनमें पक्का विचार कर लिया और निर्भीक, हो शत्रुके सन्मुस जाने के लिए मित्रोंके समूहको आज्ञा दे दी ।।२।। स्वामीकी आज्ञा पाकर उसके हितको इच्छा करनेयाले नाना देशोंके राजा अपनी-अपनी चतुरङ्ग सेनाओंसे युक्त हो आ पहुँचे ।।३।। इधर अनन्त सेनारूपी सागरके मध्य में वर्तमान जरासन्धने जव यादवोंको ओर प्रयाण किया तब गुप्तचररूपी नेत्रोंको धारण करनेवाले चतुर यादवोंने शीघ्र ही उसका पता चला लिया ॥2॥ तदनन्तर जो शास्त्र और अवस्था में वृद्ध थे तथा पदार्थका यथार्थ स्वरूप निरूपण करनेवाले थे ऐसे वृष्णियश एवं भोजवंश प्रधान पुरुष इस प्रकार मन्त्र करनेके लिए तत्पर हुए।।५।। वे कहने लगे कि तीन खण्डोंमें इसकी आज्ञा अन्य पुरुषोंके द्वारा कभी सण्डित नहीं हुई। यह अत्यन्त उप्र है, इसका शासन भी अत्यन्त उग्र है, चक्र, खड्ग, गदा तथा दण्डरन आदि अनोंके बलसे यह उद्धत है, किये हुए उपकारको माननेवाला है, जो मनुष्य अपराध- फर नम्रीभूत हो जाते हैं उनपर यह अमा कर देता है, हम लोगोंका इसने पहले कभी अपकार नहीं किया, उपकार करनेमें हो निरन्तर तत्पर रहा है किन्तु अब माता और भाईके यधसे उत्पन्न पराभवरूपी रजके मलको दूर करनेके लिए क्रोध युक्त हुआ है और भयभीत होते हुए हम लोगोय. मम्मुख आ रहा है ॥६-८|| यह इतना अहंकारी है कि हम लोगोंकी देव और पुरपार्थ मम्बन्धी मामर्थ्यको जो कि अत्यन्त प्रकट है देखता हुआ भी नहीं देख रहा है ।।२।। कृष्णके पुण्यका मामय और बलरामका पाय-यह मय परम वैभव पालक अवस्था ही से प्रकट हो रहा है। इन्द्रोंके आसनको कम्पित कर देनेवाले नेमिनाथ तीर्थकर यद्यपि इस समय पालक हैं तथापि उनका प्रमुन्य तीनों जगन्में प्रपद हो चुका है। यह यह भी नहीं सोच रहा १. रो। २ भन्मापनाकारेणु प्रागुणकारतत्परः (म. टि.)1 ३. पूर्ण हत्यार (म ..)। ।

घावारिंशः सर्गः ४९५ यस्थानुपालनन्यमाः सममा लोकपालिनः । तत्तीयं कृन्कुले को वा मानुषोऽपकरिष्यति ॥१२॥ करेण कः स्पृशेदज्ञः कृशानुमकृशापिम् । तीर्थद्वलकृष्णान् वा कोऽभ्यति विजिगीषया ॥१३॥ प्रनिराग्रुरयं राजा जरासन्धोऽस्य हिंसकौ । ध्रुवमत्र समुद्भुती रामनारायणाविमौ ॥१४॥ तदन यावदापत्य सपक्षः कृष्णपावकं । प्रतिशत्रुपतङ्गोऽयं मस्मीमवति न स्वयम् ।। १५॥ तावदाशु वयं शूरंशोरिमस्मद्वनां परम् । विगृयासनयोगन योजयामो जयोन्मुसम् ॥१६॥ स्वीकृत्य वारणीमाशां कानिचिदिवसानि । विगृह्मासनमेवं हि कार्यमिदिरमंशया ॥१७॥ आमीनानेवमप्यस्मानभ्येति यदि मागधः । रणातिथ्यं प्रकृत्येनं प्रेषयामो रणप्रियम् ॥१८॥ इति संमभ्य ते मन्त्रं प्रकाश्य कटके स्वके । आनन्दिनीनिनादेन प्रयाणकमजिज्ञपन् ॥१९॥ भेर्यास्तस्या रवं श्रुत्वा चतुरगवलं ततः । यदुमोजकुलश्माभृत्प्रधानमचलबलम् ॥२०॥ माधुर्यः शौर्यपूर्यश्च वीर्यपूर्यः प्रजास्तदा । समं स्वाम्यनुरागेण स्वयमेव प्रतस्थिर ॥२१॥ प्रजाः प्रकृतिमिः सर्वाश्चानुवर्णाः सधार्मिकाः । प्रस्थान मेनिरे स्थानादुद्यानकोडया समम् ॥२२॥ अष्टादशनि संरयाताः कुलकोट्यः प्रमाणतः । अप्रमाणधनाकीर्णा निर्यान्ति स्म यदुप्रियाः ॥२३॥ प्रशस्त तिथिनक्षत्रयोगगरादिलब्धयः । सुलब्धमुकुला भूपा जग्मुरल्पैः प्रयाणकैः ॥२४॥ देशानुछय निःोपान् प्रतीची प्रति गच्छताम् । वभूय विपुलस्तेषामुपान्ते विन्ध्यपर्वतः ॥२५॥ गजकाननरम्यस्य सिंहशार्दूलशालिनः । शृङ्गालीदाम्बरस्यास्य श्रीजंहार मनो नृणाम् ॥२६॥ है कि जिम तीर्थकरका पालन करने के लिए समस्त लोकपाल व्यन रहते हैं, उस तीर्थकरके फुलका कौन मनुष्य अपकार कर सकेगा ? ऐमा कौन अज्ञानी है जो बड़ी-बड़ी ज्वालाओंको धारण करनेवाली अग्निका हाथसे स्पर्श करेगा और ऐसा कौन बलवान है जो जीतनेकी एन्छासे तीर्थकर, वलभद्र और कृष्णका सामना करेगा ? ॥१०-१३।। यह राजा जरामन्ध निनारायण है और इसके मारनेवाले ये बलभद्र तथा नारायण यहॉ निश्चित ही उत्पन्न हो थुके हैं ।।१४।। इसलिए जबतक यह प्रतिनारायण रूपी पतंग, अपने पक्षों (महायकों, परमें हो) के साथ आकर कृष्णरूपी अग्निमें स्वयं भस्म नहीं हो जाता है तबतक हम लोग शीघ्र से विप्रहके बाद अन्यत्र आसन ग्रहण कर शूर-धीर कृष्णको विजयके सम्मुख करें। इस समय हम लोगोंको पश्चिम दिशामा आश्रयकर कुछ दिनों तक चुप बैठ रहना उचित है क्योंकि ऐमा करनेसे कार्यकी सिद्धि निःसन्देह होगी ॥१५-१७। हम लोग इस तरह शान्तिसे चुप रहेंगे फिर भी यदि जरासन्ध हमारा मामना करेगा तो हम लोग युद्ध-द्वारा सत्कार कर उमे यमराजके पाम भेज देंगे ॥१८॥ इस प्रकार परस्पर सलाहकर उन्होंने वह मन्त्रणा अपने फ्टको प्रकट को और भेरीफे शब्दसे नगरमें प्रस्थान करनेकी आज्ञा दे दी ॥१९॥ भेरीका शब्द सुनकर यादव और भोजवंशी राजाओंकी चतुरग सेना चल पड़ी वा मधुग, शौर्यपुर और वीर्यपुरको प्रजाने स्वामी के अनुरागसे माथ ही प्रस्थान कर दिया ।।२।। धर्मात्माजनासे युन ग्रामग, क्षत्रिय, वैश्य आदि चारों वर्णको प्रज्ञाने राजा, मन्त्री आदि प्रकृतिके माथ होने पाले उम प्रस्थानको ऐमा माना जैसे अपने स्थानसे वनक्रीडारे लिए ही जा रहे हैं। उम ममय अपरिमिन धनसे युक्त अठारह करोड़ यादव शौर्य पुरसे बाहर निकले थे। उत्तम तिथि, नक्षत्र, योग और वार आदिको प्रान हुए वे उच्चकुलीन राजा, छोटे-छोटे पड़ाया-दाग. गमन फरते तदनन्तर अनेक देशांका उल्लंघन कर जय ये पत्रिम दिशामी ओर गमन कर रहे थे तो विशाल विम्याचल पर्यत उनके ममीपम्य हुआ अर्थान् प्रमशः गमन करते हुए ये विन्ध्याचलके मीर जा पहुँचे।ा जोहाधियोंकि यनोंमे मुन्दरथा, १ पाहने मामा। २. मुदेव । ३.रवः विकी यार त यमनिरपं.। ४. मेरीराम्देन । .. 'साम्पम मुस्तापरामगंवानि च । महानि मातपः पोयना लोधी' TRI चत्वारिंशः सर्गः अथ ध्रुरवा जरासन्धो भ्रानुर्वधमसौ मधे'। शोकसिन्धौ निमग्नोऽरिमोधपोतेन धारितः ॥१॥ ममलयदुनाशाय समस्तनयपौरुषः । सोऽभ्यमित्रमभीगन्तुं मिग्रवर्गमजिज्ञपत् ॥२॥ प्रमोस्तस्य समादेशासानादेशाधिपा नृपाः । चतुरगबलोत्तुङ्गाः श्रिताः स्वामिहितैषिणः ॥३॥ दत्तयाणमेनं स्वतन्तसैन्याधिवर्तिनम् । विविदुयंदुशार्दूलाचतुराश्चारचक्षुपः ॥४॥ ततः श्रुतवयोवृद्धा वृष्णिमोजलोत्तमाः । कत्तुंमारेभिरे मन्त्रमिति तत्वनिरूपिणः ॥५॥ विपण्डायण्डिताज्ञोऽन्यः प्रचण्डचण्डशामनः । चक्रसङ्गगदादण्डरत्नाद्यनबलोद्धतः ॥६॥ कृतज्ञः कृतदोपेषु प्रणतेषु कृतक्षमः । अस्मास्वनपकारः प्रागुपकारकतत्परः ॥७॥ जामातृभानुघानोत्थररामवरजोमलम् । प्रमाष्टुं कोपवानस्मान्मागधोऽभ्येत्य विभ्यतः ॥८॥ देवपारपमामध्यमस्मदीयमतिस्मयः । प्रस्टीभूतमप्येष पश्यन्नपि न पश्यति ॥९॥ कृष्णय पुण्यसामयं पौरपं च बलस्य च । बाल्यादारभ्य निःशेषमिदं परमवमवम् ॥१०॥ नेमिनीयंकरस्यापि देवेन्द्रासनकम्पिनः । प्रभुत्वं च स्फुटीभूतं बालस्यापि जगप्रये ॥११॥ अथानन्तर-युद्धमें भाईका वध सुनकर शोकरूपी सागरमें डूबता हुआ जरासंध, शत्रुओंपर उत्पन्न हुए क्रोधरूपी जहाजके द्वारा बचाया गया था। भावार्थ-भाई अपरा- जितके मरनेमे जरामन्धको जो दुःस हुआ था उससे यह अवश्य ही मर जाता परन्तु शत्रुओंसे बदला लेनेके गोधने उसको रक्षा कर दी ॥१॥ समस्त नय और पराक्रममें निपुण जरासंधने समस्त यादवोंका नाश करनेके लिए मनमें पफा विचार कर लिया और निर्भीक, हो शत्रु मन्मुख जानेके लिए मित्रोंके समूहको आज्ञा दे दी ॥२॥ स्वामीकी आज्ञा पाकर उमफे हितको इच्छा करनेवाले नाना देशोंके राजा अपनी-अपनी चतुरङ्ग सेनाओंसे युक्त हो आ पहुँचे ।।३।। इधर अनन्त सेनारूपी सागरके मध्यमें वर्तमान जरासन्धने जय यादवोंको ओर प्रयाण किया तय गुमचरम्पो नेत्रोंको धारण करनेवाले चतुर यादयोंने शीघ्र ही उसका पता चला लिया ।।। तदनन्तर जो शास्त्र और अवस्थामें युद्ध थे तथा पदार्थका यथार्थ स्वरूप निरुपण करनेवाले थे ऐसे वृष्णिवंश एवं भोजवाफे प्रधान पुरुष इस प्रकार मन्त्र फरने लिा. सत्पर हुए ये पहने लगे कि तीन खण्डोंमें इसको आशा अन्य पुरुषों द्वारा कभी सण्डित नहीं हुई। यह अत्यन्त उप्र है, इमफा शामन भी अत्यन्त उप्र है, चम, गला, गदा तथा दण्डाक आदि अनोंय. यलसे यह उदन है, किये हुम उपकारको माननयाला है, जो मनुष्य अपराध. पर नधोभून हो जाते हैं उनपर यह अमा कर देता है, हम लोगोंफा इमने पहले कभी अपकार नही रिया, उसकार करने में ही निरन्तर नसर रहा है रिन्नु अब माता और भाई पधसे उपम पराभपापी ग्जफे मलको दूर करने के लिए मोघ युक्त हुआ है और भयभीत होते हुए हम लोगोग गरगुम आ गहा ॥६-८1। यह इतना अहंकारी किहम लोगोंकी देय और पुरा गम्पन्धी मामध्यको जो फि अत्यन्त प्रपट दम्ना दुआ भी नदी देर रहार! कृष्णो पुग्या गामय और पनगमका पौरा -पद गय पाम येभय पालक अयम्यादीसे प्रपद गहाप. मामन पापित पर देनयाले नेमिनाथ सायंकर यापितम समय पामारि राप्रय गानों जगन्मं प्राटदो भुकाई। पद यद भी नहीं मोग रहा १. wiTRAILE (Aft.). पूर्णतया (..)

चत्वारिंशः सर्गः ४९७ यादवाः कौरवा मोजाः प्रजाः प्रकृतिमिः सह । अनुलग्नजरासन्धाः प्रलीना हुतभुग्मुखे ॥४०॥ अहं तु दुःखसम्मारनिलयीकृतविग्रहा। सग्रहे वियोगार्ता प्राणिमि प्राणवल्लमा ॥४॥ श्रुन्चेति जरतीवाक्यं जरासन्धोऽतिविस्मितः । श्रयान्धकवृष्णीनामन्वयान्तममन्यत ॥४२॥ दाग नित्य निजं स्थानं सोऽध्यास्य सह बान्धवैः । विपन्नेभ्यो जलं दत्वा कृतकृत्य इव स्थितः ॥१३॥ यदयोऽपि ययुः स्वेच्छमुपकण्ठमुदन्वतः । एलाबनलतासगसद्गन्धानिलबीजितम् ॥४४॥ अपराणवमासृत्य दूरदेशनिदेशनाः । यथास्वं ते नृपास्तस्थुः प्रजाः प्रकृतयस्तथा ॥४५॥ शार्दूलविक्रीडितम् पाणिमाहितयानुमार्गमघृणो लग्नाऽतिर्निवन्धतः सन्धावन् परनाशमाशु कुपितः कत्तुं च मर्नु स्वयम् ज्वालादपथो न्यवर्तत रिपुर्यदन्यसर्व क्रिया- स्तजनाः कथयन्ति तावदनयोः पुण्योदयः श्रूयताम् ॥४६॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनेसनाचार्यकृतो हरिवंशयादवप्रस्थानवर्णनो नाम चत्वारिंशः सर्गः॥४०॥ ॥३९॥ जिनके पीछे जरासन्ध लगा हुआ था ऐसे यदुवंशी, कुरुवंशी तथा भोजवंशी राजाओंकी प्रजा अपने मन्त्री आदिके साथ अग्निके मुख में प्रविष्ट हो चुकी है ॥४॥ परन्तु मुझ अभागिनीको अपने प्राण प्यारे रहे इसलिए मेरा शरीर दुःखके भारका स्थान हो रहा है तथा उन सबके वियोगसे दुःखी हो मैं पिशाचसे प्रस्तकी तरह साँसें भर रही हूँ- जी रही हूँ॥४१॥ वृद्धाके इस प्रकार वचन सुनकर जरासन्ध यहुत विस्मित हुआ और उसके वचनोंका विश्वासकर अन्धकवृष्णियोंके वंशका नाश मानने लगा ॥४२।। वह उसी समय अपने स्थान- पर वापिस लौट आया और वहाँ रहकर मृतक जनोंके लिए बन्धुजनोंके साथ जलाञ्जलि देकर कृतकृत्यकी तरह निश्चिन्ततासे रहने लगा ।।४३।। उधर यादव लोग भी अपनी इच्छा- नुसार इलायचीके वनकी लताओंके समागमसे मुगन्धित वायुके द्वारा वोजित समुद्र के तटपर जा पहुँचे ।।४४॥ इस प्रकार पश्चिम समुद्रके पास आकर दूर देशमें ठहरे हुए वे सब राजा, प्रजा तथा मन्त्री आदि लोग यथायोग्य स्थानोंमें स्थित हो गये ॥४५॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि देखो, अत्यन्त निर्दय और कुपित जरासन्ध अत्यधिक हठसे मार्ग में यादयोंके पीछे लगा और शत्रुका नाश करने तथा स्वयं मरनेके लिए शीघ्र दौड़ा परन्तु ज्वालाओंसे मार्ग रुक जानेके कारण चूंकि लौट आया इसलिए समस्त उत्तम क्रियाओंको करनेवाले जिनेन्द्र भक्त जन कहते हैं कि वह उन दोनोंका पुण्योदय ही श्रवण करने योग्य था । भावार्थ-अपने-अपने पुण्योदयसे ही दोनोंकी रक्षा हुई थी ॥४६॥ इस प्रकार अरिएनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें हरिवंश और यादवोंके प्रस्थानका वर्णन करनेवाला चालीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ||४|| १. क्रियस्त-०।

४९६ । हरिवंशपुराणे अनुवर्म जरासन्धं समायातं निशम्य ते । प्रत्यक्षन्त महोरसाहा यदधोऽपि युयुत्सवः ॥२७॥ अल्पमन्तरमालोक्य देवताः सेनयोस्तयोः। मरताईनिवासिन्यः कालदेवनियोगतः ॥२८॥ विकृत्य दिव्यसामर्थ्यादन्तरे चितिकाश्च ताः । अग्निज्वालापरीतांस्तान् दर्शयाचतिरेऽरये ॥२९॥ चतुरङ्गबलं तच दह्यमानमितस्ततः । पश्यति स्म जरासन्धो ज्वालालीलोदविग्रहम् ॥३०॥ ज्वालाद्धपथस्तन विनान्तनिजसाधनः । अपृच्छददतीमेको स्थविरीभूय देवताम् ॥३१॥ दह्यते विपुलः कस्य स्कन्धावारोऽयमाकुलः । किमर्थ रोदिपि त्वं च वद वृद्ध! यथास्थितम् ॥३२॥ इति पृष्टा समाचष्टे तस्मायलाविलेक्षणा । शोकं निगृह्य कृच्छ्रेण रुढे कण्ठेऽपि मन्युना ॥३३॥ वदामि शृणु तेजस्विन् ! यथादृष्टं यतो जनः । निवेद्य महते दुःखान्महतोऽपि विमुच्यते ॥३४॥ अस्ति राजगृहे राजा जरासन्ध इति श्रुतिः । सत्यसन्धः स यः शास्ति सागरान्तां वसुन्धराम् ॥३५॥ पाडवार्चिइछलेनास्य नूनमम्बुनिधावपि । प्रज्वलन्ति द्विपां शान्त्यै प्रतापदहनार्चिपः ॥३६॥ आरमापराधबाहुल्यात्सशल्यहृदयास्ततः । यादवाः क्वापि सन्त्रस्ताः प्रयान्तः प्रियजीविताः ॥३७॥ ते काश्यप्यामपश्यन्तः सन्तः सशरणं कचित् । प्रविश्य दहनं याताः शरणं मरणं परम् ॥३८॥ कुलक्रमागता तेपा भुजिष्या भूभुजामहम् । स्वामिदुम॒तिदुःखार्ता रोदिमि प्रियजीविता ॥३९॥ सिंह और व्याघ्रोंसे मुशोभित था, और अपनी चोटियोंसे आकाशका चुम्बन कर रहा था ऐसे उस विन्ध्याचलकी शोभाने मनुष्योंका मन हर लिया ।।२६॥ 'मार्गमें पोछे-पीछे जरासन्ध आ रहा हैयह सुनकर अत्यधिक उत्साहसे भरे हुए यादव लोग भी युद्धको इच्छा करते हुए उसकी प्रतीक्षा करने लगे ॥२७॥ उन दोनोंकी सेनाओंमें थोड़ा अन्तर देखकर समय और भाग्यके नियोगसे अर्धभरत क्षेत्रमें निवास करनेवाली देवियोंने अपने दिव्य सामर्थ्यसे विक्रिया कर बहुत-सी चिताएँ रच दी और शत्रुके लिए यह दिखा दिया कि यादव लोग। अग्निकी ज्वालाओंसे व्याप्त हैं ॥२८-२९॥ जरासन्धने, ज्वालाओंके समूहसे जिसका शरीर। व्याप्त था ऐसी जलती हुई चतुरङ्ग सेनाको जहॉ-तहाँ देखा ॥३०॥ ज्वालाओंसे जब जरासन्धका मार्ग रुक गया तब उसने अपनी सेना वहीं ठहरा दी और बुढियाका रूप धरकर रोती हुई एक देवीसे पूछा कि 'हे वृद्धे ! यह किसका विशाल कटक व्याकुल हो जल रहा है ? और तू यहाँ क्यों रो रही है. ? सब ठोक-ठीक कह'। उस समय वृद्धाके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त थे तथा उसका कण्ठ यद्यपि शोकसे रुंधा हुआ था तथापि जरासन्धके इस प्रकार पूछनेपर बड़ी कठिनाईसे शोकको रोककर वह कहने लगी ॥३१-३३॥ हे प्रतापी राजन् ! मैंने जो कुछ देखा है वह कहती हूं क्योंकि यह एक साधारण बात है कि जो मनुष्य महापुरुपके लिए अपना दुःख निवेदन करता है वह बड़े-से-बड़े दुःखसे विमुक्त हो जाता है-छूट जाता है ॥३४॥ राजगृह नगरमें जरासन्ध नामका एक वह सत्यप्रतिज्ञ राजा है जो समुद्रान्त पृथिवीका शासन करता है ॥३५।। जान पड़ता है कि उसको प्रतापरूपी अग्निकी ज्वालाएँ शत्रुओंको शान्त करनेके लिए बड़वानलके छलसे समुद्र में भी देदीप्यमान रहती हैं ॥३६।। अपने अपराधोंको बहुलतासे यादव लोग जरासन्धकी ओरसे सदा सशल्यहृदय रहते थे इसलिए उससे भयभीत हो प्राण बचानेके लिए कहीं भाग निकले। परन्तु समस्त पृथिवीमें जब उन्होंने कहीं किसीको शरण देनेवाला नहीं देखा तब वे अग्निमें प्रवेश कर मरणको ही उत्तम शरणमें जा पहुँचे अर्थात् अग्निमें जलकर निःशल्य हो गये ॥३७-३८।। मैं उन राजाओंकी वंशपरम्परासे चली आई दासी हूँ। मुझे अपना जीवन प्रिय था इसलिए मैं उनके साथ नहीं जल सकी परन्तु अपने स्वामीके कुमरणके दुःखसे दुःखी होकर रो रही हूँ १. परीतास्तान म०। २. चक्रिरे रये म.

एकचत्वारिंशः सर्गः ४९९ आत्मान्तःस्थापितानन्तजीवरक्षाढव्रतम् । अलहितपदं सर्वादिमिविजिगीषुमिः ॥८॥ निरस्यन्नमनन्तानुबन्धितापमुपाश्रिताम् । मुखेन स्पर्शनेनापि स्वावगाहेन किं पुनः ॥९॥ निशम्यार्णवमुद्गीण मिव शास्त्रार्णवं जिनैः । पिप्रिये राजकं राजदाकीर्णकुसुमाञ्जलिः ॥१०॥ नेमिनाथागमोद्भुतसम्मदेनेव भूरिणा । नृत्यन्निवोमिंदो दिवमौ शसस्वनोद्धरः ॥११॥ प्रवालमौक्तिकरध्य स्वतरङ्गकरः किरन् । स्वागतं ब्याजहारेव हरये मुसरोम्बुधिः ॥१२॥ युगप्रधानमम्भोधिर्वलं वीक्ष्य झपेक्षणः । अम्मास्थलैः समुद्यनिरभ्युत्तिष्ठन्निवावमा ॥१३॥ समुद्रविजयाक्षोभ्यमोजादिविषयां मुदम् । आविष्कुर्वनिवामास्वां समुद्रः फेनमण्डलः ॥१४॥ सामान्यको दृष्टिसे अनादि है उसी प्रकार वह समुद्र भी अनादिक-असदृश जलसे युक्त है। जिस प्रकार जिनेन्द्र-निरूपित शास्ररूपी सागर विशालता और निर्दोषताके संयोगसे आकाशको लक्ष्मीको स्वीकृत करता है-आकाशके समान जान पड़ता है उसी प्रकार वह समुद्र भी अपने विस्तार और स्वच्छताके कारण आकाशको लक्ष्मीको स्वीकृत कर रहा था। जिस प्रकार जिनेन्द्र-निरूपित शास्त्ररूपी सागर अपने भीतर अनन्त जीवोंकी रक्षा रूप दृढ व्रतको धारण करता है अर्थात् अनन्त जीवोंकी रक्षा रूप सुदृढ़ व्रतको धारण करनेका उपदेश देता है उसी प्रकार वह समुद्र भी अपने भीतर रहनेवाले अनन्त जीवोंकी रक्षा रूप दृढ व्रतको धारण करता था-अपने भीतर रहनेवाले अनन्त जीवोंकी रक्षा करता था। जिस प्रकार जिनेन्द्र-निरूपित शास्त्ररूपी सागर, विजयकी इच्छा रखनेवाले समस्त वादियों के द्वारा अलद्वित पद है अर्थात् समस्त बादी उससे एक पदका भी खण्डन नहीं कर कते हैं उसी प्रकार यह समुद्र भी वक-झक करनेवाले समस्त विजयाभिलापी लोगोंके रा अलचित पद था अर्थात् उसके एक स्थानका भी कोई उल्लङ्घन नहीं कर सकता था। जिस प्रकार जिनेन्द्रनिरूपित शास्त्ररूपी सागर अपने मुख अथवा स्पर्शसे ही शरणागत मनुष्योंके अनन्तानुबन्धी सम्बन्धी संतापको दूर करता है फिर अपने अवगाहन, मनन, चिन्तन आदिके द्वारा तो कहना ही क्या है ? उसी प्रकार यह समुद्र भी अपने अग्रभाग अथवा स्पर्शसे ही समीपमें आये हुए मनुष्योंके अगणित एवं सन्ततिवद्ध संतापको दूर करता था फिर अपने अवगाहनकी तो बात ही क्या थी ? इस प्रकार जिनेन्द्र भगवानके द्वारा निरूपित शाग्न-रूपी सागरके समान उस समुद्रको देसकर यह राजाओंका समूह अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उस समय वह समुद्र बिखरी हुई पुष्पाञ्जलियोंसे सुशोभित हो रहा था, तरङ्गोंसे लहरा रहा था और शहोंके शब्दसे व्याप्त था। इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो भगवान् नेमिनाथके आगमनसे उत्पन्न अत्यधिक हर्पसे ही उसने पुष्पाञ्जलियाँ विसेरी हों, तरङ्गरूपी भुजाओंको ऊपर उठाकर वह नृत्य कर रहा हो और शवध्वनिके यहाने हपध्वनि कर रहा हो ।।५-११॥ धह अपने तरङ्गरूपी हायोंके द्वारा मूगा और मोतियोंका अर्घ्य विसेर रहा था तथा गर्जना से मुग्घर होनेके कारण मानो कृष्णके लिए स्वागत शब्दका उगारण ही कर रहा हो ॥१२॥ उम समुद्र में मछलियाँ उछल रही थी उससे ऐसा जान पड़ता था मानो वह मछलियाँ रूपी नेत्रोंसे युगके प्रधान श्री बलदेवको देसकर उछलते हुए जलसे उठकर उनका सत्कार हो कर रहा हो ॥१३॥ समुद्रमें जो फेनोंके समूह उठ रहे थे उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो समुद्र हर्षको ही प्रकट कर रहा हो ॥१४॥ १. -मराभितम् म. 8 नदिने आदि सदसो पस्य तत् अनादि, तपाभूत कं जलं यस्मिन् सः अनादिनः सम् ।

एकचत्वारिंशः सर्गः दिक्षया ततो याताः क्षत्रियाः क्षुब्धतीयधेः । ते दशाहमहामोजविष्णुनेमीश्वरादयः ॥१॥ ततः शौकरिणं मत्तमिव दिधरिणं मुहुः । अपस्फुरणलीलेपदुन्मीलननिमीलनम् ॥२॥ महरसस्पर्द्धयेवोर्ध्वमृमिदोमण्डलेश्चलः । आस्फालयितुमाकाशमाशानुगत मूर्जितम् ॥३॥ घूर्णमानमुदी!प्रमकरमाहविग्रहम् । मकराकरमैक्षन्त मकरीकरिणीवृतम् ॥४॥ अलब्धपारमुयुक्तरप्यनुत्पबुद्धिमिः । अतिगम्मीरतायोगादलहितनिजस्थितिम् ॥५॥ तुझमातरमोबदनपूर्णमहासम् । पुराणमार्गसंपातनदीमुखमनोहरम् ॥६॥ अनाममहारलमुक्ताकरमनादिकम् । पुल्यस्वच्छतासगादगीकृतनमाश्रियम् ॥७॥ तदनन्तर समुद्रविजय आदि दशाई, महाभोज, वृष्णि, कृष्ण तथा नेमिजिनेन्द्र आदि क्षत्रिय ठहराते हुए समुद्रको देखनेकी इच्छासे उसके समीप गये ॥ १॥ उस समय उस समुद्र में जहाँ-तहाँ जलके छींटे बिखर रहे थे। उनसे ऐसा जान पड़ता था भानो मदोन्मत्त दिग्गज ही हो और मछलियोंके बार-बार उछलने तथा नीचे आनेकी लीलासे ऐसा जान पड़ता था मानो नेत्रोंको कुछ-कुछ खोल रहा हो और बन्द कर रहा हो ॥२॥ वह समुद्र ऊँची उठती हुई अपनो चञ्चल तरङ्ग-रूपी भुजाओंके समूहसे ऐसा जान पड़ता था मानो विशाल आकाशसे ईर्ष्याकर समस्त दिशाओंसे युक्त आकाशका आस्फालन करनेके लिए ही उद्यत हुआ हो ॥३॥ जो लहरोंसे चारों ओर घूम रहा था, जिसके भीतर घड़े-बड़े भयंकर मगरमच्छ उछल-कूद कर रहे थे, एवं जो भकरी-रूपी हस्तिनियोंसे घिरा हुआ था ऐसे समुद्रको उन सक्ने देखा । उस समय वह समुद्र, जिनेन्द्र भगवानके द्वारा निरूपित शास्त्र रूपी सागरके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार धुद्धि- होन मनुष्य उद्योग करनेपर भी जिनेन्द्र-निरूपित शास्त्ररूपी सागरका पार प्राप्त नहीं कर पाते हैं उसी प्रकार बुद्धिहीन (नौकानिर्माण आदिको बुद्धिसे रहित) मनुष्य उद्यम करने पर भी उस समुद्र का पार नहीं प्राप्त कर पा रहे थे। जिस प्रकार जिनेन्द्र-निरूपित्त शास्त्र रूपी सागरको अपनी स्थिति, अत्यन्त गम्भीरताके योगसे अलवित है अर्थात् उसका कोई उल्लङ्गन नहीं कर सकता है, उसी प्रकार उस समुद्रकी अपनी स्थिति भी अत्यधिक गम्भीरता-गहराईके योगसे अलवित थी अर्थात् उसे लाँधकर कोई नहीं जा सकता था। जिस प्रकार जिनेन्द्र-निरूपित शास्त्ररूपी सागर, उत्कृष्ट भङ्गरूपी तरङ्गोंसे युक्त अङ्ग- द्वादशागरूपी महाजलसे युक्त है उसी प्रकार यह समुद्र भी ज्यारभाटा, तरङ्ग तथा फेन आदि उठते हुए. अहोंसे पूर्ण महाजलसे युक्त था। जिस प्रकार जिनेन्द्र निरूपित शाम्ररूपी सागर पुराणों में निरूपित नाना मार्गों के समूहरूषो नदियोंके अमभागसे मनोहर है उसी प्रकार यह समुद्र भी पुराण जीर्ण-शीर्ण मार्गको यहाकर लानेवाले नदियोंये, अप्रभागसे मनोहर था अर्थान् उसमें अनेक नदियाँ आकर मिल रही थी। जिम प्रकार जिनेन्द्र निरूपित शास्त्ररूपी सागर सर्वश्रेष्ठ आत्मद्रव्य, सम्यग्दर्शन, सम्यग्शान और मम्यकचारित्र रूपी महारत्न तथा मुक्त जीव रूपी मुक्ताफलोंका आकर- मान है उमो प्रकार यह ममुद्र भी अमूल्य-श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त बड़े-बड़े रत्न तथा मुशाफलोंका आकरयान था। जिस प्रकार जिनेन्द्र-निरूपित शास्त्ररूपी सागर अन ३- अर्य १ पम्कि.। २ माराम!

एकचत्वारिंशः सर्गः ४९९ आत्मान्तःस्थापितानन्तजीवरक्षादृढव्रतम् । अलहितपदं सर्वादिमिविजिगीषुमिः ॥८॥ निरस्यन्तमनन्तानुवन्धितापमुपाश्रिताम् । मुखेन स्पर्शनेनापि स्वावगाहेन किं पुनः ॥९॥ निशम्यार्णवमुद्गीर्णमिव शास्त्रार्णवं जिनैः । पिप्रिये राजकं राजदाकीर्णकुसुमाञ्जलिः ॥१०॥ नेमिनाथागमोभूनसम्मदेने भूरिणा । नृत्यन्निवोमिदोद्धिर्वमौ शङ्खस्वनोद्धरः ॥११॥ प्रवालमौक्तिकरय स्वतरङ्गकरः किरन् । स्वागतं व्याजहारेव हरये मुखरोम्बुधिः ॥१२॥ युगप्रधानमम्माधिलं वीक्ष्य झपेक्षणः । अम्मास्थलैः समुदिरभ्युत्तिष्टन्निवाबमा ॥१३॥ समुद्रविजयाक्षोभ्यभोजादिविपयां मुदम् । आविष्कुर्वग्निवामारस्वां समुद्रः फेनमण्डलः ॥१४॥ सामान्यको दृष्टि से अनादि है उसी प्रकार वह समुद्र भी अनादिक-असदृश जलसे युक्त है। जिस प्रकार जिनेन्द्र-निरूपित शास्त्ररूपी सागर विशालता और निर्दोषताके संयोगसे आकाशकी लक्ष्मीको स्वीकृत करता है--आकाशके समान जान पड़ता है उसी प्रकार वह समुद्र भी अपने विस्तार और स्वच्छताके कारण आकाशकी लक्ष्मीको स्वीकृत कर रहा था। जिस प्रकार जिनेन्द्र-निरूपित शास्त्ररूपी सागर अपने भीतर अनन्त जीवोंकी रक्षा रूप दृढ व्रतको धारण करता है अर्थात् अनन्त जीवोंकी रक्षा रूप सुदृढ़ व्रतको धारण करनेका उपदेश देता है उसी प्रकार वह समुद्र भी अपने भीतर रहनेवाले अनन्त जीवोंकी रक्षा रूप दृढ प्रतको धारण करता था अपने भीतर रहनेवाले अनन्त जीवोंकी रक्षा करता था। जिस प्रकार जिनेन्द्र-निरूपित शाम्ररूपी सागर, विजयकी इच्छा रखनेवाले समस्त वादियोंके द्वारा अलवित पद है अर्थात् समस्त वादी उससे एक पदका भी खण्डन नहीं कर मकते हैं उसी प्रकार वह समुद्र भी यक-झक करनेवाले समस्त विजयाभिलापी लोगोंके द्वारा अलवित पद था अर्थात् उसके एक स्थानका भी कोई उल्लङ्घन नहीं कर सकता था। जस प्रकार जिनेन्द्रनिरूपित शानरूपी सागर अपने मुख अथवा स्पर्शसे हो दारणागत मनुष्योंक अनन्तानुवन्धी सम्बन्धी संतापको दूर करता है फिर अपने अवगाहन, मनन, चिन्तन आदिके द्वारा तो कहना ही क्या है ? उसी प्रकार वह समुद्र भी अपने अग्रभाग अथया स्पर्शसे ही समीपमें आये हुए मनुष्योंके अगणित एवं सन्ततिवद्ध संतापको दूर करता था फिर अपने अवगाहनकी तो बात ही क्या थी ? इस प्रकार जिनेन्द्र भगवानके द्वारा निरूपित शास्त्र-रूपी सागरके समान उस समुद्रको देखकर वह राजाओंका समूह अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उस समय यह समुद्र विसरी हुई पुष्पाञ्जलियोंसे सुशोभित हो रहा था, तरगोंसे लहरा रहा था और राहोंके शब्दसे व्याप्त था। इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो भगवान नेमिनाथके आगमनसे उत्पन्न अत्यधिक हर्पसे ही उसने पुष्पाञ्जलियाँ विखेरी हो, तरङ्गरूपी भुजाओंको ऊपर उठाकर वह नृत्य कर रहा और शसध्यनिके बहाने हर्षध्वनि कर रहा हो ।।५-१३॥ यह अपने तरङ्गरूपी हायोंके द्वारा मूगा और मोतियोंका अर्घ्य बिसेर रहा था तथा गर्जना से मुखर होने के कारण मानो कृष्णके लिए स्वागत शब्दका उभारण हो कर रहा हो ॥१॥ उम समुद्र में मछलियाँ उछल रही थीं उससे ऐसा जान पड़ता था मानो वह मछलियाँ रूपी नेत्रोंसे युगके प्रधान श्री वलदेवको देखकर उछलते हुए जलसे उठकर उनका सत्कार हो कर रहा हो ।।१३।। समुद्र में जो फेनोंके ममूह उठ रहे थे उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो समुद्र- विजय, अक्षोभ्य तथा भोजक वृष्णि आदि राजाओंको देख उनके निमित्तसे होनेवाले अपने हर्पको ही प्रकट कर रहा हो ||१४|| १. -मुभिवन् म. नविले आदिः सदयो यस्य तत् अनादि, तपाभूत के अतं पम्मिन् सः अनादिरः तम् ।

हरिवंशपुराणे ततस्तिथी प्रशस्तायां कृतमङ्गलसन्निधिः । कृष्णा स्थानेप्सया चक्रे सबलोऽष्टममक्तकम् ॥१५॥ दर्भशय्याश्रिते तस्मिन् कृतपञ्चगुरुस्तवे । नियमस्थितया धोरे समुद्रस्य तटे स्थिते ॥१६॥ गोतमाख्यः सुरो वादि सीधमेन्द्रनिदेशतः । न्यवर्तयदरं शक्तः कृतकालान्तरस्थितिम् ॥१७॥ वासुदेवस्य पुण्येन भक्त्या तीर्थकरस्य च । सद्यो द्वारवती चक्रे कुबेरः परमां पुरीम् ॥१८॥ नगरी द्वादशायामा नवयोजनविस्तृतिः । वनप्राकारवलया समुद्रपरिखावृता ॥१९॥ रत्नकाञ्चननिर्माणः प्रासादेवहुभूमिकैः । रुन्धाना गगनं रेजे साऽलकव दिवश्च्युता ॥२०॥ वापोपुष्करिणीदोघदीधिकासरसीहदः । पद्मोपलादिसम्छरक्षया स्वादुवारिभिः ॥२१॥ मास्वकल्पलतारूडकल्पवृक्षोपशोमितैः । नागवल्लीलवङ्गादिपूगादीनां च सदनैः ॥२२॥ प्रासादाः सङ्गतास्तस्यां हेमप्राकारगोपुराः । सर्वत्र सुखदा रेजविचित्रमणिकुहिमाः ॥२३॥ रख्यामिरमिरा मान्तःप्रपामिश्च सदादिमिः । राज्ञां सर्वप्रजानां च वासयोग्या व्यराजत ॥२४॥ सर्वरत्नमयैस्तुहैर्जिनेन्द्रमवनैरसौ। प्राकारतोरणोपेते रेजे सोपवनैः पुरी ॥२५॥ आग्नेयादिपु मध्येऽस्या दिक्षु प्रासादपक्रयः । समुद्र विजयादीनां दशानां क्रमतो यभुः ॥२६॥ तन्मध्ये सर्वतोमदः कल्पवृक्षलताकृतः । प्रासादः केशवस्यामात्तदाष्टादशभूमिकः ॥२७॥ अन्तःपुरसुतादीनां योग्या: प्रासादमालिकाः । शौरिसौधमुपाश्रित्य परितोऽतिबमासिरे ॥२८॥ तदनन्तर किसी प्रशस्त तिथिमें मङ्गलाचारको विधिको जाननेवाले कृष्णने अपने धड़ भाई बलदेयके साथ स्थान प्राप्त करनेकी अभिलाषासे अष्टमभक्त अर्थात् तीन दिनका उपचास किया ॥१५।। तत्पश्चात् पश्चपरमेष्टियोंका स्तवन करनेवाले धीर-वीर कृष्ण, जय समुद्रके नटपर नियमोंमें स्थित होनेके कारण डाभको शय्यापर उपस्थित थे तब सौधर्मेन्द्रकी आज्ञासे गोतम नामक शक्तिशाली देवने आकर समुद्रको शीघ्र ही दूर हटा दिया। यह समुद्र वहाँ कालान्तरमें आकर स्थित हो गया था ॥१६-१७। तदनन्तर श्रीकृष्णके पुण्य और श्री नेमिनाथ तीथकरकी सातिशय भक्तिसे कुबेरने वहाँ शीघ्र ही द्वारिका नामकी उत्तम पुरीकी रचना कर दी ॥१८॥ वह नगरी चारह योजन लम्बी, नौ योजन चौड़ी, वनमय कोटके घेरासे युक्त तथा समुद्ररूपी परिखासे घिरी हुई थी ॥१९॥ रन और स्वर्णसे निर्मित अनेक सण्डोंके बड़े-बड़े महलोंसे आकाशको रोकती हुई वह द्वारिकापुरी आकाशसे च्युत अलकापुरीके समान मुशोभित हो रही थी।॥२०॥ कमल तथा नीलोत्पलों आदिसे आच्छादित, स्वादिष्ट जल से युक्त वापी, पुष्करिणी, बड़ी-बड़ी यापिकाएँ, सरोपर और हृदोंसे युक्त थी ॥२१॥ देदीप्यः मान कल्पलताओंमे आलिह्नित कल्पवृक्षों के समान सुशोभित पान-लॉग तथा मुपारी आदिके उत्तमोत्तम वनोंमे सहित थी॥२२॥ वहाँ सुवर्णमय प्राकार और गोपुरीसे युक्त बड़े-बड़े महल विद्यमान थे तथा मभी स्थानोंपर सुस देने वाले रग-बिरङ्गे मणिमय फर्स शोभायमान थे ३। जिनके बीच-बीचमें प्याऊ तथा सदावर्त आदिका प्रवन्ध था ऐसी लम्बी-चौड़ी भड़कॉमे यह नगरी बहुन सुन्दर जान पड़ती थी तथा वह राजाओं और समस्त प्रजाके नियामा योग्य मुशोभित थी ।२ मय प्रकारक रजांसे निर्मित प्राकार और तोरणांसे युक्त एवं याग-बगीचोंमे मदिन ऊँचे-ऊँचे जिनमन्दिरोंसे यह नगरी अत्यधिक मुशोभित हो रही थोराइम नगरीके यीचों-याच आग्नेय आदि दिशाओम समुद्रविजय आदि दशों भाइयोंकि फ्रममे महल मुशोभित हो रहे थे ।।२६।। उन सय मद्दलॉक याचमें कल्पवृक्ष और सनामे आएन, अठाग पण्डोंमे युग श्री कृष्णका मर्यतोभद्र नामका महल मुशोभित हो रहा था IPा अन्तःपुर तथा पुत्र आदिके योग्य मइटीको पंजियाँ श्रीकृष्ण भयनया १. भिगमामिः..

एकचत्वारिंशः सर्गः ५०१ स्वान्तःपुरगृहालीमिः प्रासादः परिवारितः । शुशुभे वलदेवस्य वाप्युद्यानादिभूषितः ॥२९॥ तप्रासादपुर:शक्रममामण्डपसनिमः । श्रीसमामण्डपोऽमासीन्मार्तण्डकरखण्डनः ॥३०॥ उग्रसेनादिभूपानां योग्या भवनकोटयः। 'साष्टकक्षान्तरास्तत्र सर्वपामपि रेजिरे ॥३१॥ अशक्यवर्णनां दिव्यां बहुद्वारवती पुरीम् । निर्माय वासुदेवाय राजराजो न्यवेदयत् ॥३२॥ किरीटं वरहारं च कौस्तुभं पीतवाससी । भूपानक्षत्रमालादि वस्तु लोके सुदुर्लभम् ॥३३॥ गदां कुमुदनी शक्ति सङ्गं नन्दकमंज्ञकम् । शाङ्ग धनुश्च तूणीरयुग्मं वज्रमयान् शरान् ॥३४॥ सर्वायुधयुतं दिव्यं रथं सगरध्वजम् । चामराणि मितच्छत्रं हरये धनदो ददौ ॥३५॥ मेचकं वस्त्रयुगलं मालां च मुकुटं गदाम् । लागलं मुसलं चापं सशरं शरधिद्वयम् ॥३६॥ रयं दिव्यास्त्रमंपूर्णमुच्चैस्तालध्वजोर्जितम् । कुबेरः कामपालाय ददौ उन्नादिमिः सह ॥३७॥ ब्रानरोऽपि दशाहस्तेि वस्त्रामरणपूर्वकः । सम्प्राप्तपूजनास्तेन मोजाद्याश्च नृपाः कृताः ॥३८॥ तीर्थकृपुनरन्यूनर्वयोयोग्यैः मुवस्तुमिः । प्रायः पूजनमेवासौ किं तत्र बहुवर्णनः ॥३९॥ प्रविशन्तु पुरी सर्वे भवन्त इति रैपतिः । तानुक्त्वा पूर्णभद्रं च सन्दिश्यान्तर्हितः क्षणान् ॥१०॥ ततो यादवसङ्घास्तावमिपिच्याम्बुधेस्तटे । जयशब्देन संधुष्य हृष्टा हलगदाधरी ॥४१॥ विविशुद्वारिका भूत्या चतुरङ्गावलान्विताः । सप्रजाः कृतपुण्यास्ते प्राप्तां दिवमिव स्वयम् ॥४२॥ पूर्णभद्रोपदिष्टेषु मद्रेपु भवनेप्वमी। "यथायथं सुसं तस्थुः प्रज्ञाश्च निजसंस्थया ॥३॥ आश्रय कर चारों ओर सुशोभित हो रही थीं ।।२८।। अन्तःपुरके घरोंकी पंक्तियोंसे घिरा एवं वापिका तथा बगीचा आदिसे विभूपित बलदेवका भवन सुशोभित हो रहा था ॥२९॥ यलदेव के महलके आगे एक सभामण्डप मुशोभित था जो इन्द्र के सभामण्डपके समान था और अपनों दीप्तिसे सूर्यको किरणोंका सण्डन करनेवाला था ॥३०॥ उस नगरीमें उग्रसेन आदि सभी राजाओंके योग्य महलोंकी पंक्तियाँ मुशोभित थीं जो आठ-आठ सण्डकी थीं ॥३१॥ जिसका वर्णन करना शक्य नहीं था तथा जो अनेक द्वारांसे युक्त थी ऐसी सुन्दर नगरीकी रचना कर कुबेरने श्रीकृष्णसे निवेदन किया अर्थात् नगरी रची जानेको सूचना श्रीकृष्णको दी॥३२॥ उमी समय कुबेरने श्रीकृष्णके लिए मुकुट, उत्तम हार, कौस्तुभमणि, दो पीत-वस्त्र, लोकमे अत्यन्त दुर्लभ नक्षत्रमाला आदि आभूपण, कुमुदनी नामकी गदा, शक्ति, नन्दक नाम का सङ्ग, माङ्ग नामका धनुप, दो तरका, वञमय वाण, सब प्रकारके शस्त्रांसे युक्त एवं गरुड की ध्वजासे युक्त दिव्य रथ, चमर और श्वेत छत्र प्रदान किये ।।३३-३५।। साथ ही बलदेयके लिए दो नील-वस्त्र, माला, मुकुट, गदा, हल, मुमल, धनुप-याणोंसे युक्त दो तरका, दिव्य अस्त्रांमे परिपूर्ण एवं तालको ऊँची ध्यजासे सबल रथ और छत्र आदि दिये ॥३६-३७॥ समुद्र- विजय आदि दसों भाई तथा भोज आदि राजाओंका भी कुवेरने यस्त्र, आभरण आदिके द्वारा सून सत्कार किया ॥३८|| श्री नेमिनाथ तीर्थकर अपनी अवस्थाके योग्य उत्तमोत्तम धम्नुओंके द्वारा पूजाको प्राप्त हुए ही थे । इम विषयका अधिक वर्णन करनेसे क्या प्रयोजन है ? ॥३९|| 'आप सब लोग नगरी में प्रवेश करें' इस प्रकार सवसे कहकर और पूर्णमद्र नामक यसको संदेश देकर कुवेर क्षणभरमें अन्तर्हित हो गया ॥४०॥ तदनन्तर यादवोंके संपने समुद्रके तटपर श्रीकृष्ण और बलदेवका अभिषेक कर हपिन हो उनकी जयजयकार घोषित की ॥४१॥ तत्पश्चान् जिन्होंने पुण्यका संचय किया था ऐमे श्रीकृष्ण आदिने चतुरङ्ग सेना और समस्त प्रजाके साथ, प्राप्त हुए स्वर्गके समान उम द्वारिकापुरी में बड़े पैमवमे प्रवेश किया ॥४॥ पूर्णभद्र यनके द्वारा यतलाये हुए मद्गलमय भवनों में प्रजाके सब लोग अपने परिवारकै साथ यथायोग्य मुग्यमे ठहर गये ।।१३।। १. अष्टमगाः (ग.टि.)।२. पुरेरः।३ बलमद्राय । ४. पुरेः । ५. यथा स्वेन्टम , , .

५०० हरिवंशपुराणे । ततस्तिथौ प्रशस्तायां कृतमङ्गलसन्निधिः । कृष्णः स्थानेप्सया चक्रे सवलोऽष्टममक्ताम् ॥१५॥ दर्भशय्याश्रिते तस्मिन् कृतपञ्चगुरुस्तवे । नियमस्थितया धीरे समुद्रस्य तटे स्थिते ॥१६॥ गोतमाख्यः मुरी वादि सौधर्मेन्द्रनिदेशतः । न्यवर्तयदरं शक्तः कृतकालान्तरस्थितिम् ॥१७॥ वासुदेवस्य पुण्येन मक्त्या तीर्थकरस्य च । सद्यो द्वारवती चक्र कुबेरः परमां पुरीम् ॥१८॥ नगरी द्वादशायामा नवयोजनविस्तृतिः । वज्रप्राकारवलया समुद्रपरिखावृता ॥३९॥ रत्नकाञ्चननिर्माणः प्रासादैर्बहुभूमिकैः । रुन्धाना गगनं रेजे साऽलकेव दिवश्च्युता ॥२०॥ वापीपुष्करिणीदीर्घदीधिकासरसीहदैः । पद्मोत्पलादिसञ्चौरक्षया स्वादुवारिभिः ॥२१॥ मास्वस्कल्पलतारूदकल्पवृक्षोपशोमितेः । नागवलोलवङ्गादिपूगादीनां च सदनैः ॥२२॥ प्रामादाः सङ्गतास्नस्यां हेमप्राकारगोपुराः । सर्वत्र सुखदा रेजुर्विचित्रमणिकुटिमाः ॥२३॥ रथ्यामिरमिरी मान्तःप्रपामिश्च सदादिमिः । राज्ञां सर्वप्रजानां च वासयोग्या व्यराजत ॥२४॥ सर्वरत्नमयैस्तुहैर्जिनेन्द्रभवनैरसौ । प्राकारतोरणोपेतै रेजे सोपवनैः पुरी ॥२५॥ आग्नेयादिपु मध्येऽत्या दिक्षु प्रासादपतयः । समुद्र विजयादीनां दशानां क्रमतो यभुः ॥२६॥ तन्मध्ये सर्वतोभद्रः कल्पवृक्षलतावृतः । प्रासादः केशवस्यामात्तदाष्टादशभूमिकः ॥२७॥ अन्तःपुरसुतादीनां योग्याः प्रासादमालिकाः । शौरिसौधमुपाश्रित्य परितोऽतिबमासिरे ॥२८॥ तदनन्तर किसी प्रशस्त तिथिमें मङ्गलाचारको विधिको जाननेवाले कृष्णने अपने घड़े भाई बलदेवके साथ स्थान प्राप्त करनेकी अभिलापासे अष्टमभक्त अर्थात् तीन दिनका उपवास किया ॥१५।। तत्पश्चात् पञ्चपरमेष्ठियोंका स्तवन करनेवाले धीर-वीर कृष्ण, जब समुद्रके तट पर नियमों में स्थित होनेके कारण डाभको शय्यापर उपस्थित थे तब सौधर्मेन्द्रकी आक्षासे गोतम नामक शक्तिशाली देवने आकर समुद्रको शीघ्र ही दूर हटा दिया । यह समुद्र वहाँ कालान्तरमें आकर स्थित हो गया था ॥१६-१७॥ तदनन्तर श्रीकृष्णके पुण्य और श्री नेमिनाथ तीथकरकी सातिशय भक्तिसे कुबेरने वहाँ शीघ्र ही द्वारिका नामको उत्तम पुरीकी रचना कर दी ॥१८॥ यह नगरी बारह योजन लम्बी, नो योजन चौड़ी, वनमय कोटके घेरासे युक्त तथा समुद्ररूपी परिखासे घिरी हुई थी ॥१९॥ रत्न और स्वर्णसे निर्मित अनेक खण्डोंके बड़े-बड़े महलोंसे आकाशको रोकती हुई वह द्वारिकापुरी आकाशसे च्युत अलकापुरीके समान मुशोभित हो रही थी ।।२०|| कमल तथा नीलोत्पलों आदिसे आच्छादित, स्वादिष्ट जल से युक्त वापी, पुष्करिणी, बड़ी-बड़ी बापिकाएँ, सरोवर और हदोंसे युक्त थी ।।२१।। देदीय भान कल्पलताओंसे आलिङ्गित कल्पवृक्षोंके समान सुशोभित पान-लौग तथा सुपारी आदिके उत्तमोत्तम बनाते सहित थोबारशा वहाँ सुवर्णमय प्राकार और गोपुरोंसे युक्त बड़े-बड़े महल विद्यमान थे तथा सभी स्थानोंपर मुख देने वाले रङ्ग-बिरङ्गे मणिमय फर्स शोभायमान थे ॥२३॥ जिनके बीच-बीचमें प्याऊ तथा सदावर्त आदिका प्रबन्ध था ऐसी लम्बी-चौड़ी भड़कोंसे यह नगरी बहुत सुन्दर जान पड़ती थी तथा वह राजाओं और समस्त प्रजारे निवामके योग्य सुशोभित थी ॥२४॥ सब प्रकारके रनोंसे निर्मित प्रकार और तोरणोंसे युक्त एवं बाग-बगीचोंसे सहित ऊँचे-ऊँचे जिनमन्दिरोंसे वह नगरी अत्यधिक मुशोभित हो रही थी ।२५।। इस नगरीके बीचों-बीच आग्नेय आदि दिशाओं में समुद्रविजय आदि दशों भाइयोंके कमसे महल मुशोभित हो रहे थे ॥२६|| उन सब महलोंके बीचमें कल्पवृक्ष और लताओंमे आयन, अठारह सण्डोंसे युक्त श्री कृष्णका सर्वतोभद्र नामका महल सुशोभित हो रहा था ।२७|| अन्तःपुर तथा पुत्र आदिके योग्य महलोंको पंक्तियाँ श्रीकृष्णके भवनका १. मभिरामाभिः क.।

एकधावारिंशः सर्गः शालिनीच्छन्दः निर्वाण प्ण वैलिभद्रश्चन्द्रालोकप्राकटः सद्गुणाधैः । "स्पृष्टात्यर्थ हटलोकोमिरामाद्वैलेवाग्धेरिका द्वारकान्ता ॥५॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती दारवतीनिवेशवर्णनो नाम एकचत्वारिंशः सर्गः ॥४१॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि जो नेमिजिनेन्द्र, भोजक वृष्णि, कृष्ण और बलभद्र के उत्तम गुणोंके समूहरूपी प्रकट चाँदनीसे स्पृष्ट थी, जिसमें हर्पसे भरे लोग तरङ्गोंके समान उछल रहे थे तथा जो द्वारोंसे सुन्दर थी ऐसी द्वारिकापुरी समुद्रकी वेलाके समान अत्यधिक सुशोभित हो रही थी ।। ५७ ॥ इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेमाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें द्वारिका- पुरीका वर्णन करनेवाला इकतालीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ।। ४१ ।। १. नेमिजिनसम्बन्धिमिः। २. वृष्णीनामिमे वाणांस्तैः। १. विष्णोरिमे वैष्णवास्तः श्रीकृष्णा- सम्बन्धिः। ४. बलभद्रस्येमे बालमद्रास्तै । ५. स्पष्टात्ययं म. ६. द्वारः कान्ता मनोहरा ।

हरिवंशपुराणे माथुराः सौर्यजा' वीर्यपुरपौराः पुरा यया । यास्वं कृतसंकेतसंनिवेशा ययुतिम् ॥३॥ पुर्यामर्धचतुर्थानि दिनानि धनदाया। यक्षा बयपुरक्षीणधनधान्यादि धामसु ॥१५॥ तन्न स्थितस्य कृष्णस्य प्रतापेन वशीकृताः । अपरान्तिकभूपालाः शासनं प्रतिपेदिरे ॥४६॥ बहुराजसहस्राणां तनयाः स सहस्रशः । परिणीय ततो रेमे यथेष्टं द्वारिकापतिः ॥४७॥ तत्र नेमिकुमारोऽपि कुमार इव चन्द्रमाः। संवर्धते स्म निःशेषक्लानिलयविग्रहः ॥१८॥ दशाहवदनाम्मोजविकासकरणोदयः। पालमानुर्यमासेऽसौ ज्योति—रातमस्तरः ॥४९॥ रामदामोदरानन्दं प्रत्यहं प्रतिवर्धयन् । चकार क्रीडितं याल्ये पारनेग्रमनोहरम् ॥५०॥ समस्तयदुपत्नीनां करात्करमितस्ततः । अलंकुर्वग्नरूपी स ययौ यौवनोदयम् ॥५१॥ प्रव्यक्तलक्षणे तन यूनि श्यामाम्बुजेक्षणे । विधान्तदृष्टिमन्यत्र नेतुं शेकुर्न योपितः ॥५२॥ जिनरूपशरो दूराजगतो हृदयस्थलीम् । विभेद न पुनर्जनों पररूपशरायतिः ॥५३॥ नोपमा जिनरूपस्य नोपमेयं क्षिती यतः । उपमानोपमेयार्थ सिद्यते स्म हरिस्ततः ॥५४॥ स्वान्तरङ्गजनैतुि क्रियमाणामु केलिपु । स्वविवाहकथास्वीशः स्मेरास्यो लजते स्वयम् ॥५५॥ बोधनमाम्बुनिधूतमोहनीयकलङ्कजम् । न तस्य भूतिधूलीभिधूसरीकृतमान्तरम् ॥५६॥ मथुरा, सूर्यपुर और वीर्यपुरके निवासी लोग अपने-अपने मोहल्लोंके पूर्व जैसे ही नाम रस कर यथा योग्य संतोपको प्राप्त हुए ॥४४|| कुवेरकी आज्ञासे यक्षोंने इस नगरीके समस्त भवनों में साढ़े तीन दिन तक अट धन-धान्यादिकी वर्षा की थी ॥४५॥ जव श्रीकृष्ण यहाँ रहने लगे तब उनके प्रतापसे वशीभूत हो पश्चिमके राजा उनकी आज्ञा मानने लगे ॥४६॥ तदनन्तर द्वारिकापुरीके स्वामी श्रीकृष्ण अनेक राजाओंकी हजारों कन्याओं के साथ विवाह कर यहाँ इच्छानुसार क्रीड़ा करने लगे ॥४७॥ जिनका शरीर समस्त कलाओंका स्थान था ऐसे नेमिकुमार भी वहाँ वालचन्द्रमाके समान दिनों-दिन वढने लगे ॥४८॥ जिनका उदय यादवोंके मुख-कमलको विकसित करने वाला था, एवं जिन्होंने अपनी ज्योतिसे अन्धकारके समूहको नष्ट कर दिया ऐसे नेमिकुमार रूपी बालसूर्य अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ॥४२॥ प्रतिदिन बलभद्र और श्रीकृष्णके आनन्द को बढाते हुए नेमिकुमार बाल्य अवस्थामें नगर निवासी लोगोंके नेत्र और मनको हरण करनेवाली क्रीड़ा करते थे।५०|| अतिशय रूपके धारक भगवान् नेमिनाथ जहाँ-तहाँ समस्त यादयोंकी स्त्रियों के एक हाथसे दूसरे हाथको सुशोभित करते हुए यौवन अवस्थाको प्राप्त हुए ॥५१|| जिनके शरीर में अनेक शुभ लक्षण प्रकट थे, तथा जिनके नेत्र नील कमलके समान थे ऐसे युवा नेमिकुमारपर लगी दृष्टिको स्त्रियाँ दूसरी जगह ले जानेमें समर्थ न हो सकी |२२|| भगवान्के रूपरूपी वाणने दूरसे ही जगत्के जीवोंकी हृदयस्थलीको भेद दिया था परन्तु उनको हृदयस्थलीको दूसरोंका रूपरूपी वाणोंका समूह नही भेद सका था । भावार्थ- यौवन प्रकट होनेपर भी भगवानके हृदयमे कामको बाधा उत्पन्न नहीं हुई थी ॥५३॥ चूंकि पृथिवीतलपर भगवान के रूपकी न उपमा थी और न उपमेय ही था इसलिए भगवानके रूपके विपयमें उपमान और उपमेयके लिए इन्द्रको खेदखिन्न होना पड़ा ॥५४॥ क्रीड़ाओंके समय अपने कुटुम्बी जनोंके द्वारा अपने विवाहकी चर्चा की जानेपर नेििजनेन्द्र मन्द-मन्द मुसकराते हुए स्वयं लजित हो उठते थे ||१५|| तीन ज्ञान रूपी जलके द्वारा जिसके भीतरका मोहरूपी कलङ्क धुल गया था ऐमा भगवानका अन्तःकरण वैभवरूपी धूलिसे धूसर नहीं हुआ 11५६॥ १. सौरजा म०, ग० । २. वोरपुर म०, ग० । ३. पूर्वपूर्वस्वनाम्ना (ग० दि०)।

द्वाचवारिंशः सर्गः प्रस्तावेऽत्र गणिज्येष्ठं श्रेणिकोऽपृच्छदित्यसौ । क एष नारदो नाथ ! कुतो वाऽस्य समुद्भवः ॥१२॥ गण्युवाच वचो गण्यः शृणु श्रेणिक मण्यते । उत्पत्तिरन्त्यदेहस्य' नारदस्य स्थितिस्तथा ॥१३॥ आसीत्सार्यपुरस्यान्ते दक्षिणे तापमाश्रमः । वसन्ति तापसान्तस्मिन् फलमूलादिवृत्तयः ॥१४॥ सुमिनस्तापसस्तन म सोमयशसि स्त्रियाम् । उन्छत्तिः राशिच्छायं पुत्रमेकमजीजनत् ॥१५॥ तमुत्तानशयं यावत्तौ संस्थाय तरोध । उन्मृत्यर्थमायाती नगरं क्षुपिपासिनी ॥१६॥ संक्रोढमानमेकान्ते तावत्तं जृम्मकामराः । दृष्ट्वा पूर्वमवस्नेहानीत्वा वैताध्यपर्वतम् ॥१७॥ मणिकाञ्चनसंज्ञायां गुहायां तत्र तं शिशुम् । कल्पवृक्षसमुद्भूतैर्दिव्याहाररवर्द्धयन् ॥१८॥ स्वेष्टाय तेऽटवर्षाय सरहस्यं जिनागमम् । देवास्तस्मै ददुस्तुष्टा विद्यां चाकाशगामिनीम् ॥१९॥ नारदो बहुविद्योऽसी नानाशास्त्रविशारदः । संयमासंयमं लेभे सायुः माधुनिषेवया ॥२०॥ कन्दर्पग्य विजेतापि कन्दपंनिमविनमः । सन्दर्पप्रियो हासलीलोऽभूलोमवर्जितः ॥२१॥ अन्त्यदेहः प्रकृन्यैव नि.कपायोऽप्यमी क्षितौ । रणप्रेक्षाप्रियः प्रायो जातो जल्लोकमारकरः ॥२२॥ जिनजन्मामिपेकादिमहातिशयदर्शने । कुतूहलितया लोकं परिभ्रमनि विभ्रमी ॥२३॥ पूर्व-पश्चिम विदेह क्षेत्रमें उत्पन्न तीर्थङ्करोंकी कथा रूप अमृतसे तथा मेरु पर्वतकी वन्दनाके समाचारोंसे उन सबके मनको सन्तुष्ट किया ॥११॥ इसी अवसरमें राजा श्रेणिकने गौतम गणधरसे पूछा कि हे नाथ ! यह नारद कौन है ? और इसकी उत्पत्ति किससे हुई है ? इसके उत्तर में पूज्य गणधर देव कहने लगे कि हे श्रेणिक ! चरमशरीरी नारदकी उत्पत्ति तथा स्थिति कहता हूँ सो श्रवण कर ॥१२-१३।। सीर्यपुरके पास दक्षिण दिशामें एक तापसोंका आश्रम था उसमें फल-मूल आदिका भोजन करनेवाले अनेक तापस रहते थे ।। १४ । वहाँ उच्छ वृत्तिसे आजीविका करनेवाले एक सुमित्र नामक तापसने अपनी सोमयशा नामक स्त्रीमें चन्द्रमाके समान कान्तिवाला एक पुत्र उत्पन्न किया ॥१५॥ भूख और प्याससे पीडित मुमित्र और सोम- यशा, दोनों दम्पती चित्त सोनेवाले उस बच्चेको एक वृक्षके नीचे रखकर उन्छ मृत्तिके लिए जब तक नगरमें आये तब तक एकान्तमें क्रीड़ा करते हुए उस वालकको देखकर जृम्भक नामक देव पूर्वभवके स्नेहसे उठाकर वैताध्यपर्वतपर ले गये। वहाँ उन्होंने में उस बालकको रखकर कल्प वृक्षोंसे उत्पन्न दिव्य आहारसे उसका पालन-पोपण किया ॥१६-२८|| वह बालक देवोंको बहुत ही इष्ट था इसलिए जब वह आठ वर्षका हुआ तब उन्होंने सन्तुष्ट होकर उसे रहस्यसहिन जिनागम और आकारागामिनी विद्या प्रदान की ॥१९॥ वही नारदके नामसे प्रसिद्ध हुआ। नारद अनेक विद्याओंका शाता तथा नाना शास्त्रोंमें निपुण था। वह साधुके वेपमें रहता था तथा साधुआंकी सेवासे उसने संयमासंयम-देशवत प्राप्त किया था। वह कामको जीतनेवाला होकर भी कामके समान विभ्रमको धारण करता था, कामी मनुष्योंको प्रिय था, हास्य रूप स्वभावसे युक्त था, लोमसे रहित था, चरमशरीरी था, यद्यपि स्वभावसे हो निष्कपाय था तथापि पृथ्वीमें युद्ध देखना उसे बहुत प्रिय था, अधिकतर वह अधिक बोलनेवालोंमें शिरोमणि था, और जिनेन्द्र भगवान्के जन्माभिषेक आदि महान् अतिशयोंके देखनेका कुतूहली होनेमे -विभ्रमपूर्वक लोकमें परिभ्रमण करता रहता था॥२०-२३ ।। १. चरमशरीरस्य (ग० टि०,म. टिक)। नारदस्य चरमशरीरत्वमाग्नायविरुद्धमति अत. 'अन्त्यदेहस्य' स्थाने 'प्रत्यदेहस्य' इति पाठो योजनीयः । न विद्यते देहो यस्य सोऽदेहः कामः, तमतिप्रान्त इत्यदेहस्तस्य, कामवाधारहितस्येति तदर्थः। एवं २२ तमे श्लोकेऽपि अन्त्यदेहः' इत्यत्य स्थाने 'अत्यदेहः इति पाठो योजनीयः (५० ला०)। २ कन्दर्पण सह वर्तन्ते इति सकन्दपस्तेिषां प्रिय (ग० दि०)। ३. वाचालभानुः (ग. टि.)। ६४ मणिकाञ्चन नामक द्वाचत्वारिंशः सर्गः अथ सभ्यसमाकीर्णामन्यदा यादवीं समाम् । आजगाम नभोगामी नारदो नमसो मुनिः ॥३॥ आपिशगजटामारश्मश्रुचः शशिधुतिः । विद्युबलयविद्योतिशारदाम्बुधरोपमः ।।२।। विचित्रवर्णविस्तीर्णयोगपट्टविभूषितः । परिवेषवतो विनदीपधीशस्य विभ्रमम् ॥३॥ 'चलदुकूलकौपीनपरिधानपरिच्युतः । दिवोऽनुग्रहबुद्धव जगतः कल्पपादपः ॥४॥ देहस्थितेन शुद्धेन त्रिगुणेनोज्ज्वलीकृतः । यज्ञोपवीतसूत्रेण स रत्नत्रितयेन वा ॥५॥ अमाधारणरूपेण गौरवाधानहेतुना । नैष्ठिकब्रह्मचर्येण पाण्डित्येनेव मण्डितः ॥६॥ शुद्धप्रकृतिरत्यन्तमरिषड्वर्गवर्जितः । राज्योदय इवोदारो राजलोकस्य पूजितः ॥७॥ द्वारिकाविमवालोकस्वशिर.कम्पविग्रहम् । तेऽवतीणं तमालोक्य सहसोत्थाय पार्थिवाः ॥८॥ नमस्यासनदानादि सोपचारेण सक्रमम् । पूजयन्ति स्म सन्मानमात्रेण परितोषिणम् ॥९॥ जिनकृष्णबलालोकममाषणसुखामृतम् । पीत्वाप्यतृप्तनेत्रस्तमध्यतिष्ठन्समार्णवम् ॥१०॥ पूर्वापरविदेहानां जिनेन्द्राणां कथामृतैः । समेरुवन्दनीदन्तैमनोऽमीपामतर्पयत् ॥११॥ अथानन्तर किसी समय आकाशमें गमन करनेवाले नारद मुनि आकाशसे उतर कर सभासदोंसे भरी हुई यादवोंकी सभामें आये | उन नारदजीकी जटाएँ दाढ़ी और मूंछ कुछ-कुछ पीले रङ्गको थीं तथा वे स्वयं चन्द्रमाके समान शुक्ल कान्तिके धारक थे इसलिए विजलियोके समूहसे सुशोभित शरद् ऋतुके मेघके समान जान पड़ते थे ॥२॥ वे रङ्ग-विरङ्गे एक विस्तृत योगपट्टसे विभूषित थे इसलिए परिवेष (मण्डल) से युक्त चन्द्रमाको.. शोभा धारण कर रहे थे ।।३।। उनका कौपीन और चहर हवासे मन्द-मन्द हिल रहा था इसलिए वे उनसे ऐसे जान पड़ते थे मानो जगत्का उपकार करनेकी इच्छासे आकाशते कल्प वृक्ष ही नीचे आ गिरा हो ॥४॥ वे अपने शरीरपर स्थित तीन लरके उस शुद्ध यज्ञो- पवीत सूत्रसे अत्यन्त उज्ज्वल थे जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीन गुणोंके समान जान पड़ता था ॥५॥ वे जिस प्रकार असाधारण पाण्डित्यसे सुशोभित धे उसी प्रकार गौरवकी उत्पत्तिके असाधारण कारण रूप नैष्ठिक ब्रह्मचर्यसे सुशोभित थे ॥३॥ वे राजाओंके उत्कृष्ट राज्योदयके समान समस्त राजाओंके पूजनीय थे क्योंकि जिस प्रकार राज्योदय शुद्धप्रकृति अर्थात् भ्रष्टाचार-रहित मन्त्री आदि प्रकृतिसे सहित होता है उसी प्रकार नारद भी शुद्धप्रकृति अर्थात् निर्दोष स्वभावके धारक थे और राज्योदय जिस प्रकार शत्रुओंके पड्वर्गसे रहित होता है उसी प्रकार नारद भी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य इन छह अन्तरङ्ग शत्रुओंसे रहित थे ॥१॥ द्वारिकाका वैभव देख, आश्चर्यसे जिनका शिर तथा शरीर कंपित हो रहा था ऐसे नारदजीको आकाशसे नीचे उतरते देख सब राजा लोग सहसा उठ कर खड़े हो गये । सम्मान मात्रसे संतुष्ट हो जाने वाले नारदजीको सबने नमस्कार तथा आसन-दान आदि उपचारोंसे क्रमपूर्वक सम्मान किया ॥२॥ श्रीनेमि जिनेन्द्र, कृष्ण नारायण और बलभद्र के दर्शन तथा संभापणसे उत्पन्न मुखरूपी अमृतका पान करके भी जिनके नेत्र तृप्त नहीं हुए थे ऐसे नारद मुनि सभा रूप मागरके मध्यमें अधिष्ठित हुए--विराजमान हुए ॥ ९-१० । तत्पश्चात् नारदने १. चलदुकूलकोपीनपरिधानपरिच्युत. ग०, घ०, ४०, म० । २. पार्थिव म०।

द्वाचवारिंशः सर्गः प्रस्तावेऽत्र गणिज्येष्ठं श्रेणिकोऽपृच्छदित्यसो । क एष नारदो नाथ ! कुतो वाऽस्य समुद्भवः ॥१२॥ गण्युवाच वचो गण्यः शृणु श्रेणिक मण्यते । उत्पत्तिरन्त्यदेहस्य नारदम्य स्थितिस्तथा ॥१३॥ आसीत्सौर्य पुरस्यान्ते दक्षिणे तापमाश्रमः । वसन्ति तापमास्तस्मिन् फलमूलादिवृत्तयः ॥१४॥ मुमिनस्तापसस्तत्र स सोमयशमि स्त्रियाम् । उत्तिः शशिच्यायं पुत्रमेकमजीजनत् ॥१५॥ तमुत्तानशयं यावत्ती संस्थाय तरोरघ । उन्छवृत्त्यर्थमायाती नगरं क्षुत्पिपासिती ॥१६॥ संकीढमानमकान्ते तावत्तं जम्मकामराः । दृष्ट्वा पूर्वमवस्नेहानीत्वा चैनाड्यावतम् ॥१७॥ मणिकाञ्चनसंज्ञायां गुहायां वत्र तं शिशुम् । कलपक्षसमुद्भूतैर्दिव्याहारैरवर्दयन् ॥१८॥ स्वेष्टाय तेऽष्टवय सरहस्यं जिनागमम् । देवास्तस्मै ददुस्तुष्टा विद्यां चाकाशगामिनीम् ॥१९॥ नारदो बहुविद्योऽसौ नानागास्त्रविशारदः । संयमासंयम लेभे सायुः माधुनिपेवया ॥२०॥ कन्दर्पग्य विजेतापि कन्दर्पनिमविभ्रमः । समन्दर्पप्रियो हासलीलोऽभूलोमवर्तितः ॥२॥ अन्त्यदेहः प्रकृयव नि.कपायोऽन्यसौ क्षिती । रणप्रेक्षाप्रियः प्रायो जातो जल्पाकमास्करः ॥२२॥ जिनजन्माभिषेकादिमहातिशयदर्शने । कुतूहलितया लोकं परिभ्रमति विभ्रमी ॥२३॥ पूर्व-पश्चिम विदेह क्षेत्रमें उत्पन्न तीर्थङ्करोंकी कथा रूप अमृतसे तथा मेरु पर्वतकी वन्दनाके समाचारोंसे उन सबके मनको सन्तुष्ट किया ||११|| इसी अवसरमें राजा श्रेणिकने गौतम गगधरसे पूछा कि हे नाथ ! यह नारद कौन है ? और इसकी उत्पत्ति किससे हुई है ? इसके उत्तरमें पूज्य गणधर देव कहने लगे कि हे श्रेणिक ! चरमशरीरी नारदको उत्पत्ति तथा स्थिति कहता हूँ सो श्रवण कर ११२-१३।। सौर्यपुरके पास दक्षिण दिशामें एक तापसोंका आश्रम था उसमें फल-मूल आदिका भोजन करनेवाले अनेक तापस रहते थे ।। १४ ॥ यहाँ उञ्छ वृत्तिसे आजीविका करनेवाले एक सुमित्र नामक तापसने अपनी सोमयशा नामक स्त्रीमें चन्द्रमाके समान कान्तिवाला एक पुत्र उत्पन्न किया ।।१५।। भूख और प्याससे पीडिन मुमित्र और सोम- यशा, दोनों दम्पती चित्त सोनेवाले उस बच्चेको एक वृक्षके नीचे रखकर उञ्छ वृत्तिके लिए जब तक नगरमें आये तय तक एकान्तमें क्रीड़ा करते हुए उस बालकको देखकर जृम्भक नामक देव पूर्वभयके स्नेहसे उठाकर वैताड्यपर्वतपर ले गये। वहाँ उन्होंने मणिकान्चन नामक गुहामें उस बालकको रखकर कल्प वृक्षोंसे उत्पन्न दिव्य आहारो उसका पालन-पोपण किया ॥१६-१८॥ वह यालक देवोंको बहुत ही इष्ट था इसलि जब वह आठ वर्षका हुआ सय उन्होंने सन्तुष्ट होकर उसे रहस्यसहिन जिनागम औ आकाशगामिनी विद्या प्रदान की ॥१९॥ वही नारदके नामसे प्रसिद्ध हुआ। नारद अने. विद्याओंका माता तमालाला झानों में निपुण धा। द्रह साधुके वेपमें रहता था इस साधुआंकी सेवासे उसने संयमासंयम-देशवत प्राप्त किया था। वह कामको जीतनेवाल होकर भी कामके समान विभ्रमको धारण करता था, कामी मनुष्योंको प्रिय था, हास्य रूप स्वभावसे युक था, लोमसे रहित था, चरमशरीरी था, यद्यपि स्वभावसे ही निष्काय थ तथापि पृथ्वी में युद्ध देखना उसे बहुत प्रिय था,अधिकतर यह अधिक बालनेवालोंमें शिरोमणि धा, और जिनेन्द्र भगवान्के जन्माभिषेक आदि महान् अतिशयोंके देखनेका कुतूहली होने विभ्रमपूर्वक लोकमें परिभ्रमण करता रहता था । २०-२३ ॥ १. चरमरारीरस्य (ग.टि.,म.टि.)। नारदस्य चरमरारीरस्वमाम्नायविरुदमस्ति यत. 'अन्यस्य' स्थाने 'सत्यदेहस्य' इति पाठो योजनीयः । न विद्यते देश यस्य सोऽदेहः कामः, तमविकान्त इत्यदेहस्तस्य, कामवाधारहितस्येति तदपः। एवं २२ तमे श्लोरेडरि अन्त्यदेशः इत्यस्य स्थाने 'अत्यदेति पाठी योजनीयः (५० ला०)। २. कन्दर्पण सह वर्तन्ते इति सकन्दपस्तेिषा मिय. (ग. टि.)। ३. पारासमानुः (ग• सि.)।

हरिवंशपुराणे स एष नारदो राजन् परिपृच्छय यदूत्तमान् । केशवान्तःपुरं द्रष्टुं प्रविष्टोऽन्तःपुरालयम् ॥२४॥ तय विष्णोर्महादेवी प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम् । धनप्रसाधनां साध्वी करस्थे मणिदर्पणे ॥२५॥ प्रेक्षमाणां निजं रूपं सस्यमामा विदूरतः । अदाक्षीनारदः साक्षाद् दृष्टेरतिमिव स्थिताम् ॥२६॥ स्वरूपालोकनाक्षिप्तचेतसा सत्यया यतिः । न दृष्टः सहसा रुष्टो निर्जगाम ततो द्रुतम् ॥२७॥ दध्याविति स लोकेऽस्मिन् सविद्याधरभूचराः । मामुत्थाय नमस्यन्ति राज्ञामन्तापुरस्त्रियः ॥२८॥ सत्यमामा स्वियं रूपमदगर्वितमानसा । धिग मां नालोकतेऽस्मापि भ्रष्टा विद्याधरात्मजा ॥२९॥ तदस्या रूपसौभाग्यगर्वपर्वतचूरणम् । प्रतिपक्षवधूवज्रसंपातेन' करोम्यहम् ॥३०॥ रूपसौभाग्यतो अन्यां सत्यमामातिशातिनीम् । हरिलघु लभेत् कन्यां बहुरता वसुन्धरा ॥३३॥ ततः पश्यामि भामाया निश्वासश्याममाननम् । कुतोऽनर्थविमोक्षः स्यात् कुपिते मयि नारदे ॥३२॥ इति ध्यायन् खमुत्पत्य कुण्द्धिनाख्यमयात्पुरम् । यत्र मीमो नृपस्तिष्टत्यरिभीष्मो महान्वयः ॥३३॥ रुक्मीति तनयस्तस्य नयपौरुपपोषणः । रुक्मिणी च शुमा कन्या कलागुणविशारदा ॥३४॥ तां ददर्श च शुद्धान्ते शुद्धान्तःकरणः श्रिताम् । पितृस्वस्रानुरागिण्या सन्ध्ययेवोदयश्रियम् ॥३५॥ सौलक्षण्यं च सौरूप्यं सौभाग्यं निजगद्गतम् । गृहीत्वेव हरे पुण्यैः परमैस्तां विनिर्मिताम् ॥३६॥ पागिपादमुखाम्मोजजद्दोरुजघनश्रिया । रोमराजिभुजानामिकुचोदरतनुत्विषा ॥३७॥ हे राजन् ! यह वही नारद, यादवोंसे पूछकर श्रीकृष्णका अन्तःपुर देखनेके लिए अन्तःपुरके महलमें प्रविष्ट हुआ ॥२४॥ उस समय कृष्णको महादेवी सत्यभामा, जो उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी, आभूषणादि धारणकर हाथमें स्थित मणिमय दर्पणमे अपना रूप देख रही थी। नारदने उस साध्वीको दूरसे ही देखा। वह उनकी दृष्टिके सामने साक्षात् रतिके समान जान पड़ती थी। अपना रूप देखने में जिसका चित्त उलझा हुआ था ऐसी सत्यभामा नारदको न देख सकी इसलिए वह सहसा रुष्ट हो वहाँसे शीघ्र । ही पाहर निकल आये ॥२५-२७॥ बाहर आकर वह विचार करने लगे कि इस संसारमे समस्त विद्याधर और भूमिगोचरी राजा तथा उनके अन्तःपुरोंकी स्त्रियाँ उठकर मुझे नमस्कार करती हैं परन्तु यह विद्याधरकी लड़की सत्यभामा इतनी ढीठ है कि इसने सौन्दर्यके मदसे गर्वितचित्त हो मेरी ओर देखा भी नहीं अतः इसे धिक्कार है ॥२८-२९॥ अब मैं सपत्नी रूपी वअपातके द्वारा इसके सौन्दर्य, सौभाग्य और गर्वरूपी पर्वतको अभी हाल चूर-चूर करता हूँ ॥३०॥ रूप और सौभाग्यमें सत्यभामाको अतिक्रान्त करने वाली अन्य कन्याको श्री कृष्ण शीघ्र ही प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि यह पृथ्वी अनेक रत्नोंसे युक्त है। सपत्नीके आनेपर मैं सत्यभामाके मुखको श्वासोच्छ्वाससे मलिन देवूगा। मुझ नारदके कुपित होनेपर इसका अनर्थसे छुटकारा कैसे हो सकता है ? ॥ ३१-३२ । इस प्रकार विचार करते हुए नारद आकाशमें उड़कर उस कुण्डिनपुरमें जा पहुंचे, जहाँ शत्रुओंके लिए भयंकर महाकुलीन राजा भीष्म रहते थे ॥ ३३ ॥ उनके नीति और पौरुषको पुष्ट करनेवाला रुक्मी नामका पुत्र था तथा कला और गुणोंमें निपुण रुक्मिणी नामको एक शुभ कन्या थी ।। ३४ ॥ निर्मल अन्तःकरणके धारक नारदने, राजा भीष्मके अन्तःपुरमें, अनुराग-प्रेमको धारण करनेवाली फुआसे युक्त उस रुक्मिणी नामक कन्याको देखा जो अनुराग-लालिमाको धारण करनेवाली सन्ध्यासे युक्त सूर्यको उदयकालीन लक्ष्मीके समान- जान पड़ती थी ॥ ३५ ॥ यह कन्या ऐसी जान पड़ती थी मानो तीनों जगत्के उत्तम लमण, उत्तम रुप और उत्तम भाग्यको लेकर नारायण-कृष्णके उत्कृष्ट पुण्यके द्वारा ही रची गयी हो ॥ ३६॥ यह कन्या अपने हाथ, पैर, मुख्य, कमल, जवा और स्थूल नितम्बकी शोभासे, १. सन्तापेन मा, ग.। .

द्वाचत्वारिंशः सर्गः धूर्णाक्षिशिरःकण्ठयाणाधरपुटामया' । अमिभूयोपमाः सर्वाः स्थितां जगति तां पराम् ॥३८॥ दृष्ट्वाऽमो विस्मितो दध्या दृष्टानकाहनोत्तमः । अहो रूपस्य पर्यन्त कन्येयं वर्तते भुवि ॥३९॥ संयोज्य हरिणा कन्यामनन्यसीमिमाम् । मनज्मि सत्यमामाया रूपसौमाग्यदुर्मदम् ॥४०॥ इति ध्यायन्तमायातं नारदं वीक्ष्य रुक्मिणी । अभ्युत्तस्थौ रणभूषा स्वभावविनकभूः ॥४॥ साञ्जलिः प्रणनामासौ प्रत्युपेत्य तमादरात् । द्वारिकापतिपत्याप्त्या सोऽभ्यनन्दयदानताम् ॥४२॥ प्रनितेन तया तेन द्वारावत्या विकीर्तने । कृतेऽनुरागिणी कृष्णे रक्मिणी नितरामभूत् ॥३३॥ कृष्णं भीष्मसुताचित्तमित्ती नारदचित्रकृत् । वर्णस्पवयोविदं विलिख्य बहिरथयो ॥४४॥ विलिरय परके स्पष्ट रक्मिण्या रूपमद्रुतम् ।, हरयेऽदर्शयद्गत्वा चित्तसंमोहकारणम् ॥४५॥ दृष्ट्वा चित्रगता कन्या श्यामां सीलक्षणा जिताम् । पप्रच्छ हरिरित्येवं द्विगुणादरसंगतः ॥४६॥ कस्ययं भगवन् ! कन्या विचित्रा पट्टके त्वया। दुष्करं मानुषी क्षिप्वा विचित्रासुरकन्यका ॥४७॥ इति पृष्टोऽवदस्मोऽस्मै यथावृत्तमवञ्चकः । ध्रुन्वा सौरिरपि प्राप्त चिन्तां कन्याकरग्रहे ॥४८॥ काले पितृवमा तस्मिन्नेकान्त हितकाम्यया । रुक्मिणीमित्यमाषिष्ट सर्ववृत्तान्तवेदिनी ॥४९॥ अाकर्णय वची याले कदाचिदनिमुक्तकः । दिव्यचक्षुरिहायातस्त्वां दृष्ट्वाऽवदादित्यसौ ॥५०॥ रोमराजि, भुजा, नाभि, स्तन, उदर तथा शरीरकी कान्तिसे, भौंह, कान, नेत्र, शिर, कण्ठ, नाक और अधरोष्ठकी आभासे संसारकी समस्त उपमाओंको अभिभूत-तिरस्कृत कर उत्कृष्ट- रूपसे स्थित थी॥ ३७-३८ ।। अनेक उत्तमोत्तम स्त्रियोंको देखनेवाले नारद उस कन्याको देखकर आश्चर्यमें पड़ गये तथा इस प्रकार विचार करने लगे कि 'अहो! यह कन्या तो पृथिवीपर रूपकी चरम सीमामें विद्यमान है- सबसे अधिक रूपवती है ।। ३९ ॥ जो अपनी सानी नहीं रखती ऐसी इस कन्याको कृष्णके साथ मिलाकर मैं सत्यभामाके रूप तथा सौभाग्य- सम्बन्धी दुष्ट अहङ्कारको अभी हाल खण्डित किये देता हूँ ॥ ४० ॥ इस प्रकार विचार करते हुए नारदको आये देख, शब्दायमान भूपणोंसे युक्त तथा स्वाभाविक विनयकी भूमि रुक्मिणी उठकर खड़ी हो गयी ।। ४१ ।। उसने हाथ जोड़कर बड़े आदरसे सम्मुख जाकर नारदको प्रणाम किया तथा नारदने भी 'द्वारिकाके स्वामी तुम्हारे पति हो' इम आशीर्वादसे उस नम्रीभूत कन्याको प्रसन्न किया ॥ ४२ ॥ उसके पूछनेपर जय नारदने द्वारिकाका वर्णन किया तव वह कृष्णमें अत्यन्त अनुरक्त हो गयी ॥ ४३ ॥ अन्तम नारदरूपी चित्रकार, रुक्मिणीके हृदयकी दोबालपर वर्ण रूप तथा अवस्थासे युक्त कृष्णका चित्र खींचकर बाहर चले गये।॥४४॥ बाहर आकर नारदने मक्मिणीका आश्चर्यकारी रूप सष्टरूपसे चित्रपर लिखा और चित्तमें विभ्रम उत्पन्न करनेवाला यह रूप उन्होंने जाकर श्रीकृष्णके लिए दिखाया ।। ४५ ॥ नवयौवनयती तथा नियोंके लमणांसे युक्त उस चित्रगत कन्याको देखकर कृष्णने दुगुने आदरसे युक्त हो नारदसे इस प्रकार पूछा कि हे भगवन् ! यह किसकी विचित्र कन्या आपने चित्रपटपर अङ्कित की है ? यह तो मानुपीका तिरस्कार करनेवाली कोई विचित्र देव- कन्या जान पड़ती है ॥ ४६-४७ ॥ कृष्णके इस प्रकार पूछनेपर छल-रहित नारदने सब ममाचार ज्योंका-त्यों सुना दिया तथा उमे मुनकर कृष्ण उसके साथ विवाह करनेकी चिन्ता फरने लगे ॥४८॥ उधर मय समाचारको जाननेवाली फुआने हितकी इच्छासे एकान्तमें ले जाकर योग्य समयमें मक्मिसि इस प्रकार कहा कि हे वाले! तू मेर वचन मुन। किसी समय अवधि- ज्ञानके धारक अतिमुक्तक मुनि यहाँ आये थे। उन्होंने तुझे देखकर कहा था कि 'यह कन्या १. पुटोमया म०। २ द्वारिकापतिरेव पतिस्तस्याप्तिः प्रातिस्तया । ३. विना म.1 हरिवंशपुराणे स एष नारदो राजन् परिपृच्छय यदूतमान् । केशवान्तःपुरं द्रष्टुं प्रविष्टोऽन्तःपुरालयम् ॥२४॥ तब विष्णोर्महादेवी मागेभ्योऽपि गरीयसीम् । एतप्रसाधनां साध्वी करस्ये मणिदर्पणे ॥२५॥ प्रेक्षमाणां निजं रूपं सत्यभामा विदूरतः । अदाक्षीनारदः साक्षाद् दृष्टेरतिमिव स्थिताम् ॥२६॥ स्वरूपालोकनाक्षिसचेतसा सत्यया यतिः । न दृष्टः सहसा रुष्टो निजंगाम ततो द्रुतम् ॥२७॥ दध्याविति स लोकेऽस्मिन् सविद्याधरभूचराः । मामुत्थाय नमस्यन्ति राज्ञामन्तःपुरस्त्रियः ॥२८॥ सन्यमामा रिचयं रूपमदगर्वितमानसा । धिग मां नालोकतेऽस्मापि ष्टा विद्याधरात्मजा ॥२९॥ तदस्या रूपसौमाग्यगर्वपर्वतचूरणम् । प्रतिपक्षवधूवज्रसंपातेनं करोग्यहम् ॥३०॥ रूपसौभाग्यतो सन्यां सरयमामातिशातिनीम् । हरिलघु लभेत् कन्यां बहुरता बसुन्धरा ॥३॥ ततः पश्यामि मामाया निश्वासश्याममाननम् । कुतोऽनर्थविमोक्षः स्यात् कुपिते मयि नारदे ॥३२॥ इति ध्यायन समुत्पत्य कुण्डिनाल्यमयात्पुरम् । यत्र भीष्मो नृपस्तिष्टन्यरिभीष्मो महान्वयः ॥३३॥ रस्मीति तनयस्तस्य नयपरिपपोषणः । रुक्मिणी च शुमा कन्या कलागुणविशारदा ॥३॥ तां ददर्श च शुद्धान्त शुद्धान्तःकरणः श्रिताम् । पितृस्वखानुरागिण्या सन्ध्ययेवोदयश्रियम् ॥३५॥ सोलक्षण्यं च सारूप्यं सौमाग्यं निजगद्गतम् । गृहीत्वेव हरे पुण्यैः परमैस्तां विनिर्मिताम् ॥३६॥ पाणिपादमुखाम्मोजनहोरुजघननिया । रोमराजिभुजानामिकुचोदरतनुविषा ॥३७॥ हे राजन् ! यह वही नारद, यादवोंसे पूछकर श्रीकृष्णका अन्तःपुर देखनेके लिए अन्तःपुरके महलमें प्रविष्ट हुआ उस समय कृष्णको महादेवी सत्यभामा, जो उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी, आभूषणादि धारणकर हाथमें स्थित मणिमय दर्पण अपना रूप देख रही थी। नारदने उस साध्वीको दूरसे ही देखा। वह उनकी दृष्टिके सामने साक्षात् रतिके समान जान पड़ती थी। अपना रूप देखने में जिसका चित्त उलझा । हुआ था ऐमी सत्यभामा नारदको न देख सकी इसलिए यह सहसा रुष्ट हो वहाँसे शीघ्र हो पाहर निकल आये ।।२५-२७ा बाहर आकर यह विचार करने लगे कि इस संसारमें समस्त विद्याधर और भूमिगोचरी राजा तथा उनके अन्तःपुरोंको स्त्रिया उठकर मुझे नमस्कार करती है, परन्तु यह विद्याधरकी लड़की सत्यभामा इतनी ढीठ है कि इसने मौन्दर्यके मदसे गर्वितचित्त हो मेरी ओर देखा भी नहीं अतः इसे धिक्कार है ॥२८-२९॥ अप में सपत्नी रूपी वनपातके द्वारा इसके सौन्दर्य, सौभाग्य और गर्यरूपी पर्वतको अभी हाल चूर-चूर करता हूँ ॥३०॥ रूप और सौभाग्यमें सत्यभामाको अतिक्रान्त करने पाली अन्य फैन्याफो श्री कृष्ण शीघ्र ही प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि यह पृथ्वी अनेक रत्नोंसे युक्त है। मपत्नीके आनेपर मैं सत्यभामाके मुखको क्यामोन्याससे मलिन देग्यूँगा। मुझ नारदके युपिन होनेपर इसका अनर्थसे छुटकारा कैसे हो सकता है ? ॥३१-३२।। इस भफार विचार करते हुए नारद आकाशमें उड़कर उस कुण्डिनपुरमें जा पहुँचे, जहाँ साधुओंके लिए भयंकर महाफुलीन राजा भीष्म रहते थे ॥ ३३ ॥ उन नीति और पौरपको पुष्ट फरनेपाला कमी नामका पुत्र था तया कला और गुणोंमें निपुण सक्मिणी नामको पक गुभ पन्या यो ।। ३४ ॥ निर्मल अन्तःकरण धारक नारदने, गजा भीमफे अन्तःपुरमें, अनुराग-प्रेमको धारण करनेयाली फुआसे युक्त उम मक्मिणी नामक कन्याको देखा जो अनुगग-लालिमाको धारण करनेयाली मनायासे युक्त सूर्यको उदयकालीन लामीफे ममान- जान पाती थी॥३५॥ पा पन्या मी जान पहनी थी मानोसानों जगाये राम लक्षण, म रूप और उत्तम भाग्यफो टेकर नारायण-मन लाट पुण्यफे द्वारा ही रची गई दो॥३६॥ पर कन्या अपने दाप, पैर, मुम्प, फमल, जाा और पूल निमाएकी शोभागे, 1. मन.. ।

। द्वाचस्वारिंशः सर्गः धूर्णाक्षिशिरःकण्ट्याणाधरपुटामयो । अभिभूयोपमाः सर्वाः स्थितां जगति तां पराम् ॥३८॥ दृष्ट्वाऽसी विस्मिनी दभ्यो दृष्टानेकाहनोत्तमः । ग्रहो रूपस्य पर्यन्ते कन्येयं वर्तते भुवि ॥३९॥ संयोज्य हरिणा कन्यामनन्यसदशीमिमाम् । मनज्मि सत्यमामाया रूपसौभाग्यदुर्मदम् ॥४०॥ इति ध्यायन्तमायातं नारदं वीक्ष्य रुक्मिणी । अभ्युत्तस्थौ रणद्भूषा स्वभावविनयकभूः ॥४॥ साञ्जलिः प्रणनामामो प्रत्युपेन्य तमादरात् । द्वारिकापतिपत्याप्त्या सोऽभ्यनन्दयदानताम् ॥४२॥ प्रभितेन तया तेन द्वारावत्या विकीर्तने । कृतेऽनुरागिणी कृष्णे रक्मिणी नितरामभूत् ॥४३६ कृष्णं भीष्मसुताचित्तमित्ती नारदचित्रकृत् । वर्णरूपवयोविदं विलिख्य बहिरथयो n४४॥ विलिप्य पदके स्पष्टं रुक्मिण्या रूपमद्भुतम् । हरयेऽदर्शयद्गत्वा चित्तसंमोहकारणम् ॥४५॥ दृष्या चित्रगनां कन्यां श्यामा सीलक्षणाचिताम् । पप्रच्छ हरिरित्यवं द्विगुणादरसंगतः ॥४६॥ कस्ययं भगवन् ! कन्या विचित्रा पट्टकं त्वया । दुष्करं मानुषी क्षिप्वा विचित्रासुरकन्यका ॥४७॥ इति पृष्टोऽवदत्मोऽस्मै यथावृत्तमवञ्चकः । श्रुग्वा सौरिरपि प्राप्त चिन्ता कन्याकरग्रहे ॥४८॥ काले पितृष्वमा तस्मिन्नेकान्ते हितकाम्यया । रुक्मिणीमिरयभाषिष्ट सर्ववृत्तान्तवेदिनी ॥४९॥ श्राकर्णय वचो बाले कदाचिदनिमुक्तकः । दिग्यचक्षुरिहायातस्त्वां दृष्ट्वाऽवदादित्यसो ॥५०॥ रोमराजि, भुजा, नाभि, स्तन, उदर तथा शरीरकी कान्तिसे, भौंह, कान, नेत्र, शिर, कण्ठ, नाक और अधरोष्ठको आभासे संसारको समस्त उपमाओंको अभिभूत-तिरस्कृत कर उत्कृष्टं- रूपसे स्थित थी॥ ३७-३८ ॥ अनेक उत्तमोत्तम नियोंको देखनेवाले नारद उस कन्याको देखकर आश्चर्यमें पड़ गये तथा इस प्रकार विचार करने लगे कि 'अहो! यह कन्या तो पृथिवीपर रूपकी चरम सीमामें विद्यमान है-सबसे अधिक रूपवती है ।। ३९ ।। जो अपनी सानी नहीं रखती ऐसी इस कन्याको कृष्णके साथ मिलाकर मैं सत्यभामाके रूप तथा सौभाग्य- सम्बन्धी दुष्ट अहवारको अभी हाल खण्डित किये देता हूँ' ॥ ४ ॥ इस प्रकार विचार करते हुए नारदको आये देख, शब्दायमान भूपोंसे युक्त तथा स्वाभाविक विनयकी भूमि रुक्मिणी उठकर खड़ी हो गयी ।। ४१ ॥ उसने हाथ जोड़कर बड़े आदरसे सम्मुख जाकर नारदको प्रणाम किया तथा नारदने भी 'द्वारिकाके स्वामी तुम्हारे पनि हो' इस आशीर्वादसे उस नम्रीभूत कन्याको प्रसन्न किया ।। ४२ ।। उसके पूछनेपर जब नारदने द्वारिकाका वर्णन किया तब यह कृष्णमें अत्यन्त अनुरक्त हो गयी ।। ४३ ।। अन्तमें नारदरूपी चित्रकार, रुक्मिणीके हृदयकी दीवालपर वर्ण रूप तथा अवस्थासे युक्त कृष्णका चित्र खीचकर बाहर चले गये ॥४४॥ वाहर आकर नारदने मक्मिणीका आश्चर्यकारी रूप स्पष्टरूपसे चित्रपर लिखा और चित्तमें विभ्रम उत्पन्न करनेवाला वह रूप उन्होंने-जाकर श्रीकृष्णके लिए दिखाया ।। ४५ ॥ नपयोयनवती तथा त्रियोंके लमणांसे युक्त उस चित्रगत कन्याको देखकर कृष्णने दुगुने आदरसे युक्त हो नारदसे इस प्रकार पूछा कि हे भगवन् ! यह किसकी विचित्र कन्या आपने चित्रपटपर अङ्कित की है ? यह तो मानुपीका तिरस्कार करनेवाली कोई विचित्र देव- कन्या जान पड़ती है ।। ४६-४७॥ कृष्णके इस प्रकार पूछनेपर छल-रहित नारदने सय समाचार ज्योंका-त्यों मुना दिया तथा उसे सुनकर कृष्ण उसके साथ विवाह करनेकी चिन्ता फरने लगे॥४८॥ उधर मय समाचारको जाननेवालो फुआने हितको इच्छासे एकान्तमें ले जाकर योग्य ममयमें सक्मिणस इस प्रकार कहा कि हे बाले! तू मेर वचन मुन | किसी समय अवधि- ज्ञानके धारक अतिमुक्तक मुनि यहाँ आये थे। उन्होंने तुझे देखकर कहा था कि 'यह कन्या १. पुरामया म.। २ द्वारिकारतिरेव पतिस्तस्याप्तिः प्रातिम्वया । ३. विनाम।

हरिवंशपुराणे स्त्रीलक्षणवत्ती लक्ष्मीरिव वक्षःस्थलाश्रिता । बालेयं वासुदेवस्य मविष्यति भविष्यतः ॥५१॥ पोडशानां सहस्राणां विष्णोः स्त्रीगुणसंयुजाम् । अन्तरन्तःपुरस्त्रीणां प्रभुत्वमियमेष्यति ॥५२॥ इत्यादिश्य तदा यातः सिद्धादेशो महामुनिः । कथा चान्तहिता विष्णोः कियन्तंचिदनेहसम् ॥५३॥ पुनर्जन्मस्थेवेयं नारदेन कथा कृता । यदि सत्यमिदं सर्व सत्यं वेधि मुनेर्वधः ॥५४॥ त्वं पुनः शिशुपालाय वाले ! बान्धवतो युजे । सुप्रभुत्वभृता भ्राग्रा रुक्मिणा' किल दीयसै ॥५५॥ विवाहसमयस्तेऽपि प्रत्यासन्नस्तु वर्तते । अद्य श्वो वा त्वदर्थं च शिशुपाल: किलष्यति ॥५६॥ विदर्भपतिपुत्री तसिशभ्य वचनं जगौ । कथमस्य मुनेर्वाक्यमन्यया भवति क्षिती ॥५७॥ सन्मदीयममिप्रायं कथञ्चिदपि सत्वरम् । द्वारिकापतये यसात् प्रापयेति स मप्रियः ॥५॥ -इति श्रुत्वा मनो ज्ञात्या क्न्यकायाः पितृश्वसा । विससर्ज रहस्येनं लेखमाप्तेन सत्वरम् ॥५९॥ त्वसामग्रहणाहारप्रीणितप्राणधारिणी । हरे ! कांक्षति ते रक्ता रुक्मिणी हरणं त्वया ॥६०॥ शुक्लाष्टम्यां हि माघस्य यदि माधव ! रुक्मिणीम् । त्वमस्य हरसि क्षिप्रं तवेयमविसंशयम् ॥६॥ अन्यथा नु वितीर्णायाश्चैधाय गुरबान्धवैः । त्वदलाभे भवेदस्याः शरणं मरणं हरे ! ॥६२॥ नागवल्यपदेशेन बाझोद्यानस्थिनामिमाम् । तदवश्यं त्वमागत्य स्वीकुरुष्व कृपापरः ॥३३॥ लेखामिति तत्त्वार्थमधिगम्य स माधवः । सावधानमनास्तस्थौ रुक्मिणीहरणं प्रति ॥६॥ त्रियों के उत्तम लक्षणोंसे युक्त है अतः लक्ष्मीके समान होनहार नारायण श्रीकृष्णके वक्षः- स्थलका आलिङ्गन-माप्त करेगी। कृष्णके अन्तःपुरमें खियाके योग्य गुणांसे युक्त सोलह हजार रांनियाँ होंगी उन सबमें यह प्रभुत्वको प्राप्त होगी-उन सबमें प्रधान बनेगी।' इस प्रकार कहकर अमोघवादी मुनिराज उस समय चले गये और कुछ समय तक कृष्णकी चर्चा अन्तर्हित रही आयी । परन्तु आज नारदने पुनर्जन्मको कथाके समान यह कथा पुनः उठायी है। यदि यह सब सत्य है तो मैं समझती हूँ कि मुनिराजके उक्त वचन सत्य ही निकलेंगे। परन्तु हे बाले ! विचारणीय बात यह है कि तेरा भाई रुक्मी जो अत्यधिक प्रभावको धारण करनेवाला है वह तुझे बन्धुपनेको धारण करनेवाले शिशुपालके लिए दे रहा है। तेरे विवाहका समय भी निकट है और आज-कलमें तेरे लिए शिशुपाल यहाँ आने- घाला है ।। ४९-५६॥ फुआके ऐसे वचन सुन रुक्मिणीने कहा कि मुनिराजके वचन पृथिवीपर अन्यथा कैसे हो सकते हैं ॥ ५७ ।। इसलिए आप मेरे अभिप्रायको किसी तरह शीघ्र ही प्रयत्न कर द्वारिकापतिके पास भेज दीजिए। वही मेरे पति होंगे ।। ५८ ॥ कन्याके यह वचन सुनकर तथा उसका अभिप्राय जानकर फुआने शीघ्र ही एक विश्वासपात्र आदमीके द्वारा गुप्त रूपसे यह लेख श्रीकृष्णके पास भेज दिया ।। ५९ ॥ लेखमें लिखा था कि हे कृष्ण ! रुक्मिणी आपमें अनुरक्त है तथा आपके नामग्रहणरूपी आहारसे सन्तुष्ट हो प्राण धारण कर रही है। यह आपके द्वारा अपना हरण चाहती है। हे माधव ! यदि माघ शुक्ला अष्टमीके दिन आप आकर शीघ्र ही रुक्मिणीका हरण कर ले जाते हैं तो निःसन्देह यह आपकी होगी । अन्यथा पिता और बान्धवजनोंके द्वारा यह शिशुपालके लिए दे दी जायेगी और उस दशामें आपकी प्राप्ति न होनेसे मरना ही इमे शरण रह जायेगा अर्थात् यह आत्म-घातकर मर जायेगी। यह नागदेवको पूजाके बहाने आपको नगरके वाह्य उद्यानमें स्थित मिलेगी सो आप दयालु हो अवश्य ही आकर इसे स्वीकृत करें। ६०-६३ ।। इस प्रकार लेखके यथार्थ भायको शातकर कृष्ण, कस्मिणीका हरण करनेके लिए मावधानचित्त हो गये ।। ६४॥ १. रूपिमपी म.१२. दीयते मः।

५०९ द्वाचत्वारिंशः सर्गः कन्यादानकृतारम्मविदर्भश्वरवाश्यतः । चेदीनामीश्वरः प्राप्तो वैदर्मपुरमादरात् ॥६५॥ वलेन महता तस्य चतुरङ्गेण रागिणा। मण्डिताशान्तरं जातं कुण्डिनं नगरं तदा ॥६६|| इतवावसरशेन नारदेन रहस्यरम् । चोदितो हरिरप्यातो गुदवृत्तः सहाप्रजः ॥६७॥ दत्तनागवलिः कन्या पुरोपवनवत्तिनी । पितृवसादिमियुक्ता माधवेन निरीक्षिता ॥६॥ श्रुतीन्धनसमृद्धोऽनुरागबन्धहुताशनः । अतिवृद्धिं तदा प्राप्तस्तयो दर्शनवायुना ॥६९॥ कृतोचितकथस्तत्र रुक्मिणीमाह माधवः । त्वदर्थमागतं मदे ! विद्धि मां हृदयस्थितम् ॥७॥ सत्यं यदि मयि प्रेम त्वया वद्धमनुत्तरम् । तदेहि रथमारोह मन्मनोरथपूरणि ॥१॥ पितृष्वस्त्राऽपि साऽवाचि योऽतिमुक्तकभाषितः । स एव तव कल्याणि घर पुण्यरिहाहृतः ॥७२॥ यत्रापि पिनरी मद्रे ! दातारी दुहितुर्मती । तत्राऽपि विधिपूर्वी ती ततो ज्येष्टो विधिर्गुरुः ॥७३॥ सानुरका अपायुक्तां श्रीमत्यास्तनयां ततः । रथमारोपयोामुरिक्षप्यामीलितक्षणः ॥७॥ निर्वाहकस्तयोरासीत्तदान्योन्यसुखावहः । सर्वाङ्गीणस्तनुस्पर्शः प्रथमो मन्मथायोः ॥७॥ मुगन्धिमुग्पनिश्वासस्तयोरन्योन्ययोगतः । वास्यवासकमावस्थो वशीकरणतामगात् ॥७६॥ विमुखीकृतचयेन सम्मुखीकृतविष्णुना । विधिनैकेन रक्मिण्यास्तस्कल्याणमनुष्टितम् ॥७॥ इधर कन्यादानकी तैयारी करनेवाले विदर्भश्वर -राजा भीष्मके कहे अनुसार शिशुपाल आदरके साथ कुण्डिनपुर जा पहुंचा ।। ६५ ॥ उस समय उसकी रागसे युक्त बहुत भारी चतुरङ्गिणी सेनासे कुण्डिनपुरके दिदिगन्त सुशोभित हो उठे ।। ६६ ।। इधर अय- सरको जाननेवाले नारदने शीघ्र ही आकर एकान्तमें कृष्णको प्रेरित किया सो वे भी बड़े भाई बलदेवके साथ गुप्त रूपसे कुण्डिनपुर आ पहुँचे ।। ६७ ॥ रुक्मिणी नागदेवकी पूजाकर फुआ आदिके माथ नगरके वाह्य उद्यानमें पहलेसे ही खड़ी थी सो कृष्णने उसे अच्छी तरह देखा ।। ६८ ॥ उन दोनोंको जो अनुरागरूपी अग्नि एक दूसरेके श्रवणमात्र इंधनसे युक्त थी वह उस समय एक दूसरेको देखने रूप वायुसे अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त हो गयो ।। ६९ ॥ कृष्णने यथायोग्य चर्चा करनेके बाद यहाँ रुक्मिणीसे कहा कि 'हे भद्रे! मैं तुम्हारे लिए ही आया हूँ और जो तुम्हारे हृदयमें स्थित है वही मैं हूँ ।। ७० ।। यदि सचमुच ही तूने मुझमें अपना अनुपम प्रेम लगा रखा है तो हे मेरे मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली प्रिये ! आओ रथपर सवार होओ' ॥ ७१ ।। फुआने भी रुक्मिणीसे कहा कि हे कल्याणि ! अतिमुक्तक मुनिने जो तुम्हारा पति कहा था वही यह तुम्हारे पुण्यके द्वारा खींचकर यहाँ लाया गया है । ७२ ।। हे भद्रे ! जहाँ माता-पिता पुत्रीके देनेवाले माने गये हैं वहाँ वे कोके अनुसार ही देनेवाले माने गये हैं इसलिए मबसे बड़ा गुरु कर्म ही है ।। ७३ ।। तदनन्तर जिनके नेत्र कुछ-कुछ निमीलित हो रहे थे ऐसे श्रीकृष्णने अनुराग और लज्जासे युक्त रक्मिणीको अपनी दोनों मुजाओंसे उठाकर रथपर बैठा दिया ।। ७४ ॥ कामको व्यथासे पीडित उन दोनोंका जो सर्व-प्रथम सर्वागीण शरीरका स्पर्श हुआ था यह उन दोनोंक लिए परस्पर मुसका देनेवाला हुआ था ।। ७५ ॥ उन दोनोंके मुससे जो मुगन्धित श्वास निकल रहा था यह परस्पर मिलकर एक दूसरेको मुगन्धित कर रहा था तथा एक दूमरेको वश में करनेके लिए वशीकरणमन्त्रपनेको प्राप्त हो रहा था॥७६ ।। मक्मिणीका वह कल्याण, शिशुपालको विमुख और कृष्णको सम्मुख करनेवाले एक विधि-पुगत कर्मके द्वारा ही किया गया था। भावार्थ-रुक्मिणीका जो कृष्णके साथ संयोग हुआ था उसमें उसका पूर्वकन कर्म ही प्रयल कारण था क्योंकि उसने पूर्वनिश्चित योजनाफे माथ १ शिशुपाल:। २. शोभित दगन्तरालम् । ३. कृष्णरुरिमण्योः। ४. पल्याणवरः म । ५. तनया म०। ६.सीदन्योन्य म० । ।

५०८ -- हरिवंशपुराणे स्त्रीलक्षणवती लक्ष्मीरिव वक्षःस्थलाश्रिता। बालेयं वासुदेवस्य मविष्यति भविष्यतः ॥५१॥ पोशानां सहस्राणां विष्णोः स्त्रीगुणसंयुजाम् । अन्तरन्तःपुरस्त्रीणां प्रभुत्वमियमेष्यति ॥५२॥ इत्यादिश्य तदा यातः सिद्धादेशो महामुनिः । कथा चान्तहिता विष्णोः कियन्तंचिदनेहसम् ॥५३॥ पुनर्जन्मकथेवेयं नारदेन कथा कृता । यदि सरयमिदं सर्व सत्यं वेनि मुनेर्वचः ॥५५॥ त्वं पुनः शिशुपालाय याले ! यान्धवसा युजे । सुप्रभुत्वभृता भ्रामा रुक्मिणां किल दीयसे ॥५५॥ विवाहसमयस्तेऽपि प्रत्यासनस्तु वर्तते । अद्य श्वो वा त्वदर्थ च शिशुपालः किलष्यति ॥५६॥ विदर्मपतिपुत्री तनिशम्य वचनं जगा । कथमस्य मुनेक्यिमन्यया भवति क्षितौ ॥५७॥ तन्मदीयमभिप्रायं कथञ्चिदपि सरचरम् । द्वारिकापतये यत्नात् प्रापयेति स मप्रियः ॥५६॥ इति श्रुत्वा मनो ज्ञान्वा कन्यकायाः पितृश्वसा । विससर्ज रहस्येनं लेखमाप्तेन सस्वरम् ॥५९॥ (वभामग्रहणाहारप्रीणितप्राणधारिणी । हरे ! कांशति ते रक्ता रुक्मिणी हरणं त्वया ॥६॥ शुक्लाष्टम्यां हि माघस्य यदि माधय ! रुक्मिणीम् । त्वमेश्य हरमि क्षिप्रं तवेयमविसंशयम् ॥६॥ अन्यथा तु वितीर्णायाश्चैद्याय गुरबान्धवैः । स्वदलाभे भवेदस्याः शरणं मरणं हरे ! ॥६२॥ नागवल्यपदेशेन याह्योद्यानस्थिनामिमाम् । तदवश्यं त्वमागत्य स्वीकुरव कृपापरः ॥१३॥ लेखार्थ मिति तत्त्वामधिगम्य स माधवः । मावभानमनास्तस्थौ रुक्मिणीहरणं प्रति ॥६॥ खियोंके उत्तम लक्षणोंसे युक्त है अतः लक्ष्मीके समान होनहार नारायण श्रीकृष्णके वक्षः- स्थलका आलिङ्गन-प्राप्त करेगी कृष्णके अन्तःपुरम स्त्रियोंके योग्य गुणांसे युक्त सोलह हजार रानियाँ होगी उन सबमें यह प्रभुत्वको प्राप्त होगी-उन सबमें प्रधान बनेगो।' इस प्रकार कहकर अमोघवादी मुनिराज उस समय चले गये और कुछ समय तक कृष्णकी चर्चा अन्तर्हित रही आयी। परन्तु आज नारदने पुनर्जन्मकी कथाके समान यह कथा पुनः उठायी है। यदि यह सब सत्य है तो मैं समझती हूँ कि मुनिराजके उक्त वचन सत्य ही निकलेंगे। परन्तु हे बाले ! विचारणीय यात यह है कि तेरा भाई रुक्मी जो अत्यधिक प्रभावको धारण करनेवाला है वह तुझे बन्धुपनेको धारण करनेवाले शिशुपालके लिए दे रहा है। तेरे विवाहका ममय भी निकट है और आज-कलमें तेरे लिए शिशुपाल यहाँ आने- वाला है।॥ ४९-५६ ।। फुआके ऐसे वचन सुन रुक्मिणीने कहा कि मुनिराजफे वचन पृथिवीपर अन्यथा कैसे हो सकते हैं ॥५७ । इसलिए आप मेरे अभिप्रायको किमी तरह शीघ्र ही प्रयत्न कर द्वारिकापतिके पास भेज दीजिए । वही मेरे पति होंगे ॥ ५८ ॥ कन्याके यह वचन सुनकर तथा उमका अभिप्राय जानकर फुआने शीघ्र ही एक विश्वासपात्र आदमीके द्वारा गुम रूपसे यह लेर श्रीकृष्णके पास भेज दिया ॥ ५९॥ लेखमें लिखा था कि हे कृष्ण! रुक्मिणी आपमें अनुरक्त है तथा आपके नामग्रहणरूपी आहारसे सन्तुष्ट हो प्राण धारण कर रही है। यह आपके द्वारा अपना हरण चाहती है। हे माधव ! यदि माघ शुक्ला अष्टमीके दिन आप आकर शीघ्र ही रुक्मिणीका हरण कर ले जाते हैं तो निःसन्देह यह आपकी होगी । अन्यथा पिता और यान्धवजनोंके द्वारा यह शिशुपालके लिए दे दी जायेगी और उस दशामें आपको प्राप्ति न होनसे मरना ही इसे शरण रह जायेगा अर्थात् यह आत्म-घातकर मर जायेगी। यह नागदेयकी पूजा, यहाने आपको नगरके याह्य उद्यानमें स्थित मिलेगी मो आप दयालु दो अवश्य ही आकर इसे वीरत करें ॥ ६०-६३ ।। इस प्रकार लेखके यथार्थ मायको शातकर पृष्ण, गरिमणीका हरण करने के लिए मावधानचित्त हो गये ।। ६४ ॥ १. स्मिती म.। २.दीयतेम।

५११ दाचत्वारिंशः सर्गः एवमस्त्विति सन्यस्ता सान्त्वयित्वां प्रियां हरिः । न्यवर्तयद्रयं वेगादभ्यमित्रं हली तथा ॥११॥ रष्टयोः शरजालेन द्विष्टसैन्यं ततोऽनयोः । लिष्टं ननाग विधस्तक्लिष्टदर्पमभिद्रुतम् ॥१२॥ हरिणेव रणे रौदे हरिणा दमघोषजः । हलिना मोघमजो राजा मीमाकारः पुरस्कृतः ॥१३॥ द्वन्द्वयुद्धे शिरस्तुङ्गं शिशुपालस्य पातितम् । विष्णुना यशसा साकं मायकेन विदूरतः ॥१४॥ हली जर्जरितं कृत्वा रथेन सह रुक्मिणम् । प्राणशेषमपाकृत्य कृती कृष्णयुतो ययौ ॥१५॥ रक्मिणी परिणीयासौ गिरौ रैवतके हरिः । विभूत्या परया तुष्टः सबन्धुरविशत् पुरीम् ॥१६॥ स्वं विवेश गृहं शोरी रेवतीदर्शनोन्सुकः । शाहपाणिरपि प्रीतो मववध्वा युतो निजम् ॥९७॥ पृथिवीच्छन्दः अनेकरयचक्रचूणि विजिगीषुतेजोहरं निरीक्ष्य शिशुपालघाति चरितं हरेराहवे । वपुः स्वमुपसंहरन् करसहस्रतीक्ष्णोऽप्यरं गतोऽस्तगिरिगह्वरं ग्रहणशङ्कयेवांशुमान् ॥९॥ अनेन घनरागिणा समनुवर्तिता रागिणी महोदयनिषेविणाप्यनुरतेन पूर्व तु या। तयाऽस्तमितसम्पदं तमनुवृत्तया सन्ध्यया कुसुम्मकुसुमामया तदनुरक्तता दर्शिता १९९॥ हे नाथ ! आपके द्वारा युद्ध में मेरा भाई यत्नपूर्वक रक्षणीय है अर्थात् उसकी आप अवश्य रक्षा कीजिए ॥२०॥ ऐसा ही होगा' इस प्रकार भयभीत प्रियाको सान्त्वना देकर श्रीकृष्ण तथा बलभद्रने बड़े वेगसे शत्रुकी ओर अपने रथ घुमा दिये ।।९।। तदनन्तर रोपसे भरे हुए इन दोनोंके वाणोंके समूहसे मुठभेड़को प्राप्त हुई शत्रुकी सेना चारों ओर भागकर नष्ट हो गयो तथा उसका सब अहंकार नष्ट-भ्रष्ट हो गया ।।९।। भयंकर युद्धमें सिंहके समान शूर-वीर कृष्णने शिशुपालको और वलदेवने भयंकर आकारको धारण करनेवाले भीष्मपुत्र राजा रुक्मीको सामने किया ॥९३॥ द्वन्द्व-युद्ध में श्रीकृष्णने अपने बाणके द्वारा यशके साथ-साथ शिशुपालका ऊँचा मस्तक दूर जा गिराया ।।९४॥ और बलदेवने रथके साथ-साथ रुक्मीको इतना जर्जर किया कि उसके प्राण ही शेष रह गये। तदनन्तर कुशल बलदेव कृष्णके साथ वहा से चल दिये ।।१५।। रैवतक (गिरनार ) पर्वतपर श्रीकृष्णने विधि-पूर्वक रुक्मिणीके साथ विवाह किया और उसके पश्चात् उत्कृष्ट विभूतिसे सन्तुष्ट हो भाई-बलदेवके साथ द्वारिकापुरीमें प्रवेश किया ॥१६॥ रेवतीके देखनेके लिए उत्सुक बलदेवने अपने महलमें प्रवेश किया और प्रीतिसे युक्त कृष्णने भी नववधूके साथ अपने महल में प्रवेश किया ॥१७॥ तदनन्तर सूर्य अस्त होनेके सम्मुख हुआ सो ऐमा जान पड़ता था मानो युद्धमें अनेक रथोंके चक्रको चूर्ण करनेवाला, विजिगोपु राजाओंके तेजको हरनेवाला एवं शिशुपालका घात करनेवाला कृष्णका चरित देखकर वह अपने आपके पकड़े जानेको आशङ्कासे भयभीत हो गया था इसीलिए तो हजार किरणोंसे तीक्ष्ण होनेपर भी यह अपने शरीरको संकुचितकर अस्ताचलकी गुफामें चला गया था ।।१८।। प्रातःकालके समय राग (प्रेम-पक्षमें ललाई) से युक्त जिस सन्ध्याको सूर्यने महान् उदय ( उदय-पक्षमें वैभव ) के धारक होनेपर भी तीन राग (प्रेम-पक्षमें ललाई) से युक्त हो अपने बदलेके प्रेमसे अच्छी तरह अनुवर्तित किया था अर्थात् सन्ध्याको रागयुक्त देख अपने आपको भी रागयुक्त किया था उस सन्ध्याने अब मायंकालके ममय कुसुम्भके फूलके समान लाल वर्ण हो फिरणरूप सम्पत्तिके नष्ट हो जानेपर भी सूर्य के प्रति अपनी अनुरक्तता दिखलायी थी । भावार्थ-'सूर्यने महान अभ्युदयसे - १. शान्तयित्वा म० । २. दस्य मित्रं म.। ३. सिंहेनेव । ४. कृष्णेन । ५ शिशुपाल । ६.इन्द. युक्ते म.1 • घात-म., ग.।

हरिवंशपुराणे
भक्मिणः शिशुपालस्य मीन्मस्य च हरिस्ततः । रुक्मिणीहरणोदन्तं दत्त्वा रथमचोदयत् १७८॥
पाञ्चजन्यमनो दध्मौ मुखरीकृतदिग्मुखम् । सुघोषं तु बलः शङ्ख चुक्षोमारिबलं ततः ॥७९॥
रक्मी विदितवृत्तान्तः शिशुपालश्च सत्त्वरी। धीरौ धीरौ परिप्राप्ती रथिनौ रथिनी प्रति ॥४०॥
रथैः पटिसहस्रेस्तैः करिणामयुतेन च । त्रिमिः शतसहस्रश्च वाजिनां वायुरहसाम् ॥४१॥
असिचक्रधनु-पाणिबहुलक्षपदातिभिः । ग्रसमानौ दिशो शेषा निकटत्वमुपागतौ ॥४२॥
अर्धासनसुसासीनां सान्त्वयन मीप्मजां हरिः । ग्रामाकरमरःसिन्धदर्शयन् प्रययों शनैः ॥८३॥
अथ रौद्रं वलं प्राप्तमन्वीक्ष्य हरिणेक्षणा । रुक्मिण्युवाच मरिमपायपरिशक्किनी ॥४४॥
प्राता में कुपितः प्रातः सम्प्रत्येष' महारथः । शिशुपालश्च तन्नाथन मन्ये स्वन्तमात्मनः ॥८५॥
युवयोः पृथुसेनाभ्यामाभ्यां जाते महारणे । विजयं प्रति संशीतिरहो मे मन्दभाग्यता ॥८६॥
चुवाणामिति तां शाहीं मा भैपीमुदुमानसे । बहुत्वेन किमन्येषां मयि सत्त्ववति स्थिते ॥८७॥
इत्युक्त्याऽसौ क्षुरप्रेण क्षिप्रमप्राकृताम्रवित् । अयत्नेनैव चिच्छेद तालवृक्षं पुरःस्थितम् ॥४८॥
अगुलीयकनदं च वज्र सञ्चूर्ण्य पाणिना । तस्याः सन्देहमामूलं चिच्छेद यदुनन्दनः ॥८९॥
ततः सा प्राञ्जलिः प्राह प्रियसामर्थ्यवेदिनी । नाथ ! यत्नेन में भ्राता रक्षणीयस्त्वयाहवे ॥१०॥
आये हुए शिशुपालको विमुख कर दिया था और अनायास आये हुए श्रीकृष्णको सम्मुख
कर दिया था। ७७॥
तदनन्तर श्रीकृष्णने रुक्मिणीके भाई रुक्मी, शिशुपाल और भीष्मको रुक्मिणीके
हरणका समाचार देकर अपना रथ आगे बढ़ा दिया ।। ७८ ॥ उसी समय श्रीकृष्णने दिशा-
ओंको मुखरित करनेवाला अपना पाश्चजन्य और बलदेवने अपना मुघोष नामका शङ्ख फूका
जिससे शत्रुकी सेना क्षोभयुक्त हो गयी ॥ ७९ ॥ समाचार मिलते ही रक्मी और शिशुपाल
दोनों धीर-वीर, बड़ी शीघ्रतासे रथोंपर सवार हो, धीर-वीर एवं रथोंपर सवार होकर जाने ।
वाले कृष्ण और बलदेवका सामना करनेके लिए पहुँचे ।।८०॥ साठ हजारं रथों, दश हजार
हाथियों, वायुके समान वेगशाली तीन लाख घोड़ों और खड्ग, चक्र, धनुष, हाथमें लिये
कई लाख पैदल सिपाहियों के द्वारा शेष दिशाओंको ग्रस्त करते हुए वे दोनों वीर निकटताको
प्राम हुए ॥८१-८२।। इधर अर्धासनपर धैठी रुक्मिणीको सान्त्वना देते एवं ग्राम, खाने,
सरोवर तथा नदियोंको दिखाते हुए श्रीकृष्ण धीरे-धीरे जा रहे थे ।।८।।
तदनन्तर भयंकर सेनाको आयो देख मृगनयनी रुक्मिणी अनिष्टकी आशङ्का करती हुई
स्वामीसे बोली कि 'हे नाथ ! क्रोधसे युक्त यह मेरा भाई महारथी रुक्मी और शिशुपाल अभी
हाल आ रहा है इमलिए मैं अपना भला नहीं ममझती ।।८४-८५।। विशाल सेनासे युक्त इन
दोनोंके साथ एकाकी आप दोनोंका महायुद्ध होनेपर विजयमै सन्देह है। अहो ! मैं बड़ी मन्द
भाग्यवती हुँ' ॥८६-८७।। इस प्रकार कहती हुई रक्मिणीसे श्रीकृष्णने कहा कि 'हे कोमल
हृदये ! भयभीत न हो, मुम पराक्रमीके रहते हुए दूसरोंकी संरया यहुन होनेपर भी क्या हो
मकता है ?' इस प्रकार कहकर अमाधारण अम्रके जाननेवाले श्रीकृष्णने अपने वाणसे
मामने पड़े हुए ताल-भको अनायास ही काट डाला ।।८।। और अंगूठीमें जड़े हुए हीराको
हायसे चूर्णकर उमफे मन्देहको जड़-मूलमे नष्ट कर दिया ।।८।।
तदनन्तर इन कार्योसे पतिकी शक्तिको जाननेवाली रुक्मिणीने हाथ जोड़कर कहा कि
१. सम्प्रत्येव म । २ समाय १० । ३. सप्ताशीतितमान् श्लोकादो घ०, ग०, ८०, म. पुस्तके
निम्नाहिती श्लोकी भघिरालम्यते।
तपोस्त मुनिरादेशः सरसतानाजून् पुमान् ! यश्चिनत्येवाणेन स हरिनान्यथा शुभे ॥१॥
तानः शारिणा भुत्ला प्रपाकम्य तस्पिरम् । स चिच्छेद दुरप्रेणाप्य तालमण्डलीम् ॥२॥

- द्वाचत्वारिंशः सर्ग: एवमस्त्विति सन्त्रस्तां सान्त्वयित्वो प्रियां हरिः । न्यवर्त्तयथं वेगादभ्यमित्रं हली तथा ॥११॥ रष्टयोः शरजालेन द्विष्टमैन्यं ततोऽनयोः । श्लिष्टं ननाश विध्वस्तक्लिष्टदर्पममिद्रुतम् ॥१२॥ हरिणेव रणे रौद्रे हरिणा दमघोषजः । हलिना मीमजो राजा मोमाकारः पुरस्कृतः ॥९॥ द्वन्द्वयुई शिरस्तुझं शिशुपालस्य पातितम् । विष्णुना यशसा सार्क मायकेन विदूरतः ॥९॥ हली जर्नरितं कृत्वा रथेन सह रुक्मिणम् । प्राणशेषमपाकृत्य कृती कृष्णयुतो ययौ ॥१५॥ रक्मिणी परिणीयासौ गिरौ रैवतके हरिः। विभूत्या परया तुष्टः सबन्धुरविशत् पुरीम् ॥१६॥ स्वं विवेश गृहं शोरी रेवतीदर्शनोत्सुकः । शाङ्गपागिरपि प्रीतो मववध्वा युतो निजम् ॥९॥ पृथिवीच्छन्दः अनेकरथचक्रचूर्णि विजिगीपुतेजोहरं निरीक्ष्य शिशुपालघाति चरितं हरेराहवे । वपुः स्वमुपसंहरन् करसहनतीक्ष्णोऽप्यरं गतोऽस्तगिरिगह्वरं ग्रहणशकयेवांशुमान् ॥१८॥ अनेन घनरागिणा समनुवत्तिता रागिणी महोदयनिषेविणाप्यनुरतेन पूर्व तु या। तयाऽस्तमितसम्पदं तमनुवृत्तया सन्ध्यया कुसुम्मकुसुमामया तदनुरक्तता दर्शिता ॥१९॥ हे नाथ! आपके द्वारा युद्ध में मेरा भाई यत्नपूर्वक रक्षणीय है अर्थात् उसकी आप अवश्य रक्षा कीजिए ॥१०॥ ऐसा ही होगा' इस प्रकार भयभीत प्रियाको सान्त्वना देकर श्रीकृष्ण तथा बलभद्रने बड़े वेगसे शत्रुकी ओर अपने रथ घुमा दिये ।।९।। तदनन्तर रोपसे भरे हुए इन दोनोंके वाणोंके समूहसे मुठभेड़को प्राप्त हुई शत्रुकी सेना चारों ओर भागकर नष्ट हो गयो तथा उसका सब अहंकार नष्ट-भ्रष्ट हो गया ॥९२।। भयंकर युद्धमें सिंहके समान शूर-वीर कृष्णने शिशुपालको और बलदेवने भयंकर आकारको धारण करनेवाले भीष्मपुत्र राजा रुक्मीको सामने किया ॥९३।। द्वन्द्व-युद्ध में श्रीकृष्णने अपने बाणके द्वारा यशके साथ-साथ शिशुपालका ऊँचा मस्तक दूर जा गिराया ॥९॥ और बलदेवने रथके साथ-साथ रुक्मीको इतना जर्जर किया कि उसके प्राण ही शेष रह गये। तदनन्तर कुशल बलदेव कृष्णके साथ वहा से चल दिये ।।१५।। रैवतक (गिरनार) पर्वतपर श्रीकृष्णने विधि-पूर्वक रुक्मिणीके साथ विवाह किया और उसके पश्चात् उत्कृष्ट विभूतिसे सन्तुष्ट हो भाई-बलदेयके साथ द्वारिकापुरीमें प्रवेश किया ।।१६।। रेवतीके देखने के लिए उत्सुक वलदेवने अपने महल में प्रवेश किया और प्रीतिसे युक्त कृष्णने भी नववधूके साथ अपने महल में प्रवेश किया ॥९७।। तदनन्तर सूर्य अस्त होनेके सम्मुख हुआ सो ऐसा जान पड़ता था मानो युद्ध में अनेक रोंके चक्रको चूर्ण करनेवाला, विजिगोषु राजाओंके तेजको हरनेवाला एवं शिशुपालका घात करनेवाला कृष्णका चरित देसकर वह अपने आपके पकड़े जानेको आशङ्कासे भयभीत हो गया था इसीलिए तो हजार किरणोंसे तीक्ष्ण होनेपर भी यह अपने शरीरको मंकुचितकर अस्ताचलकी गुफामें चला गया था ॥९८॥ प्रातःकालके समय राग (प्रेम-पक्षमें ललाई) मे युक्त जिस सन्ध्याको सूर्यने महान् उदय ( उदय-पक्षमें वैभव ) के धारक होनेपर भी तीन राग (प्रेम-पक्षमे ललाई) से युक्त हो अपने बदले प्रेमसे अच्छी तरह अनुवर्तित किया था अर्थान् सन्ध्याको रागयुक्त देख अपने आपको भी रागयुक्त किया था उस सन्ध्याने अब मायंकाल के समय कुमुम्भके फूलके समान लाल वर्ण हो किरणरूप मम्पत्तिके नष्ट हो जानेपर भी सूर्यके प्रति अपनी अनुरक्तता दिखलायी थी । भावार्थ-'सूर्यने महान अभ्युदयसे 1 . १. शान्तयित्वा म० । २. दस्य मित्रं म.। ३. सिंहेनेव । ४. कृपेन । ५. शिशुपाल. 1 ६. इन्द्र युस्ते म01 • पात-म, ग.।

हरिवंशपुराणे" ततोऽजनमहारजोमलिनमूर्त्तिमिमोहनैः प्रमअनवशैरिव प्रतिमयायहरूद्वनैः । तमःपटलपातकैरभिपतहिरव्युन्मुखैः सलैरिव निरन्तरजगदमिश्नं च द्तम् ॥१०॥ किरनमृतदीधितिबहुलमन्धकार करः तृपेव जनलोचनैः सपदि पीयमानस्नतः । जगन्मदनदीपनस्तपनजातसन्तापनुत् सुखाय सुखिनामपि प्रकटमुनगामोदयम् ॥११॥ विकासमगमद् विधोः कुमुदिनी करामर्शनालगत्यखिलजन्तुभिः सह निजप्रियाप्रोपितः । तदा न खलु पमिनी विरहदीप्तचक्राइरहो येप्रमदहेतवोऽपि सुसयन्ति नो दुःखितान् ॥१०२॥ प्रदोषसमये ततो मुपितमानिनीमानके प्रवृत्तयति दम्पतिप्रमदमम्पदापादने । मुधाधवलचन्द्रिकाधवलितेपु हम्य ते मनोज्ञवनितायसास्तु परिरमिरे यादवाः ॥१०॥ मुरारिरपि रक्मिणीतनुलताद्विरेफस्तदा चिरं रमितया तयाऽरमन रम्यमूर्तिनिशि । अशेत शयनस्थले मृदुनि गूढगूढानना घनस्तनभुजानन स्पर्शलब्धनिद्रासुखः ॥१०॥ ततः प्रमितयामिनीनिखिलयामभेदा मदप्रसुप्तयदुकामिनीजनमियेव नीचोच्चकैः । क्रमेण पटुपक्षपातसुमगाश्चुकूजुः कलं क्षपाक्षयनिवेदिनो विविधचूडकाः कुक्कुटाः ॥१०५॥ तया प्रथमबुद्धया प्रथमसन्ध्ययेवोपमि प्रशस्तकरपद्मया विहितदेहसंवाहनः । विबुध्य हरिराश्रितां श्रियमिव न्यलोकिष्ट तां रनिन्यतिकरस्फुरत्परिमलां हिया समताम् ॥१०६॥ युक्त होनेपर भी मेरे प्रति राग धारण किया था इसलिए इस विपत्तिके समय मुझे भी इसके प्रति राग धारण करना चाहिए' यह विचारकर ही मानो सन्ध्याने सूर्यास्तके समय लालिमा धारण कर ली ॥१९॥ तदनन्तर अञ्जनकी महारजके समान काले, मोह उत्पन्न करनेवाले, प्रचण्ड पवनके समान भयंकर, उद्धत, सब ओर फैलनेवाले, उन्मुख एवं अन्तर-रहित अन्ध- कारके समूहरूपी पापोंसे जगत् शीघ्र ही ऐसा आच्छादित हो गया मानो दुर्जनोंसे ही व्याप्त हुआ हो ।।१०।। तत्पश्चात् जो अपनी किरणोंसे गाढ़ अन्धकारको दूर हटा रहा था, मनुष्योंके नेत्र तपासे पीड़ित होकर हो मानो जिसका शीघ्र पान कर रहे थे, जो जगत्के जीवोंको कामकी उत्तेजना करनेवाला था और जो सूर्यसे उत्पन्न हुए सन्तापको नष्ट कर रहा था ऐसा चन्द्रमा सुखी मनुष्योंके सुखको और भी अधिक बढानेके लिए उदयको प्राप्त हुआ ।।१०१।। उस समय जगत्में समस्त जीवोंके साथ-साथ, चन्द्रमाकी किरणों के स्पर्शसे कुमिदिनी विकासको प्राप्त हुई और अपनी प्रियासे वियुक्त विरहसे देदीप्यमान चक्रयाकोंके साथ-साथ कमलिनी विकासको प्राप्त नहीं हुई सो ठीक ही है क्योंकि दुःखी मनुष्योंको हर्षके कारण सुख नहीं पहुंचा सकते ॥१०२॥ तदनन्तर मानवती त्रियोंके मानको हरनेवाले एवं दम्पतियोंको हर्प रूपो सम्पत्तिके प्राप्त करानेवाले प्रदोष कालके प्रवृत्त होनेपर वे यादव अपनी सुन्दर स्त्रियोंके साथ चूनाफे समान उज्ज्वल चॉदनीसे शुभ्र महलों में क्रीड़ा करने लगे ॥१०शा जो प्रक्मिणीके शरीररूपी लतापर'भ्रमरफे समान जान पड़ते थे ऐसे सुन्दर शरीरके धारक कण भी लात्रिके समय चिरकाल तक रमण की हुई रुक्मिणीके साथ क्रीड़ा करते रहे और कीड़ाके अनन्तर कोमल शय्यापर उसके गाढ़ आलिङ्गित स्थूल स्तन, भुर्जा और मुखके स्पर्शसे निद्रा सुखको प्राप्त कर सो रहे ।।१०४॥ तदनन्तर रात्रिके समस्त भेदोंको जाननेवाले, उत्तम पलोंकी फड़- फड़ाहटसे सुन्दर, रात्रिके अन्तकी सूचना देनेवाले और नाना प्रकारको कलंगियोंसे युक्त मुर्गे पहले नीची और बादमें ऊँची ध्वनिसे सुन्दर बांग देने लगे सो उससे ऐसा जान पड़ता था मानो 'मदमें सोई हुई यदु स्त्रियाँ जाग न जाँय' इस भयसे ही वे एक साथ न चिल्लाकर क्रम- क्रमसे चिल्लाते थे॥१०५प्रातकालमें प्रातः सन्ध्याके समान-क्मिणी पहले जाग गयी और अपने उत्तम करकमलोंसे कृष्णका शरीर दबाने लगी। उसके कोमल हाथोंका स्पर्श पा श्रीकृष्ण १ सखा सुमुखिनामनि म०, ग०, प० । २. जघनस्तन ग. 1 ३. अत्र छन्दोमनः ।

द्वाचत्वारिंशः सर्गः प्रभातपटहस्फुटध्वननशमंगीतकमधोषधनगर्जिताम्बुधिनिनादिनी द्वारिका । गृहं गृहमितोऽमुतो बुधितराजलोकामवद् यथायथमनुष्टिनस्वकनियोगमर्वप्रजा ॥१०॥ परघटितमप्यतो विघटयन पदार्थ अटिन्युपेत्य 'घटयन्पटुर्विघटितं समर्थक्रियः । परं भुवनचक्षुरूज्ज्वलमनिमभ्युद्ययौ यथा जिनवचःपयो विधिरिवाऽय वा मानुमान् ॥१०॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती रुक्मिणीहरणवर्णनो नाम द्वाचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४२ ॥ भी जाग गये और जागकर उन्होंने रतिक्रीड़ाके कारण जिसके शरीरसे सुगन्धि निकल रही थी तथा जो लज्ञासे नम्रीभूत थी ऐसी रुक्मिणीको पासमें बैठी लक्ष्मीके समान देखा ॥१०६।। उस समय द्वारिकापुरी प्रातःकालके नगाड़ोंके जोरदार शब्दों, हों, मधुर संगीतों और मेघोंकी उत्कट गर्जनाके समान समुद्रको गम्भीर गर्जनाके शब्दोंसे गूंज उठी। इधर-उधर घर-घर राजा और प्रजाके लोग जाग उठे तथा यथायोग्य अपने-अपने कार्यो में सव प्रजा लग गयो॥ १०७ ।। तदनन्तर जो शीघ्र ही आकर दूसरोंके द्वारा संयोजित पदार्थको यहाँ से दूर हटा रहा था, तथा दूसरोंके द्वारा वियोजित पदार्थको मिला रहा था, अत्यन्त चतुर था, समर्थ था, जगत्का उज्ज्वल एवं जागृत रहनेवाला उत्कृष्ट नेत्र था, जो जिनेन्द्र भगवान्के वचनमार्गके समान था अथवा विधाताके समान था ऐसा सूर्य उदयको प्राप्त हुआ। भावार्थ-रात्रिके समय चन्द्रमा, प्रह, नक्षत्र आदि कान्तिमान पदार्थ अपने साथ अन्धकारको भी थोड़ा-बहुत स्थान दे देते हैं पर सूर्य आते ही साथ उस अन्ध- कारको पृथिवीतलसे दूर हटा देता है। इसी प्रकार रात्रिके समय पकया-चकवी परस्पर वियुक्त हो जाते हैं परन्तु सूर्य उदय होते ही उन्हें मिला देता है ॥१०८] इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त जिनसेनाचार्यरचित हरिवंशपुराणमें रुक्मिणी-हरणका वर्णन करनेवाला न्यालीसौं सर्ग समाप्त हुमा ॥ ४२ ॥ १. प्रतित्य दुर्विघटितं म, ख., १०, . !

. त्रिचत्वारिंशः सर्गः मन्यमामागृहाभ्यर्णमाकाणं व्यसम्पदा । धिष्ण्यं विष्णुदी दिव्यं रक्मिण्य परिवाररत् ॥१॥ महत्तरप्रतीहारीभृत्यादिपरिवारिता'। यानाश्वरथयुग्याटि पाया गारपिताऽनुषत् ॥२॥ ज्ञाला मामा हरीष्टां तां भामा भामातिशायिनामामा सेप्योऽपि हरि धीरा रह: प्रीडास्परीरमन् ॥३॥ एकदा भुयनाम्बूलं निष्प्यूतं मामजन्मना । मौकान्तन मंगोप्य मत्यभामागृहं गतः ॥४॥ स्वमावमुससौगन्ध्यबभ्रान्तालिमण्डलम् । शहरसत्यभामा तद् भ्रान्या मद्गन्धयम्बिनि ॥५॥ वर्णगन्धाद रमापिप्य समालमत चादरान् । हमिना हरिचन्द्रेण सा चुत्रोश तमीप्यया ॥६॥ सौभाग्यातिशयं सत्या सपन्या हरिचेष्टितः । विदित्वा रूपलावण्यं इष्टुमभ्युन्मुकाऽमनन ॥७॥ अदच पति नाथ ! रक्मिणों मम दर्शय । श्रोत्रयोरिव संहष्टिं नेत्रयोरपि में कुर ॥८॥ प्रतिपद्य स नवाक्यमन्तगुंदो विनिर्गतः । मणिराप्यास्तटे कान्ता संस्थाप्य पुनरागतः ॥९॥ पानमामि तामाटो विशोद्यानमिति प्रियाम् । सम्मेप्यानुगतस्तस्यो गुल्मसंगृहविग्रहः ॥१०॥ नारच मणिवाप्यन्तै मणिभूषणधारिणीम् । पाटाग्रेण स्थितां चूतलतामालाव्य पाणिना ॥३॥ प्रोल्लसन्स्थूलधम्मिलां वामहस्तेन विभ्रतीम् । स्तनमारनतामवंफलन्यस्तायतक्षणाम् ॥१२॥ श्रीकृष्णने सत्यभामाके महलके पास, नाना प्रकारको सम्पदाओंसे व्याप्त एवं योग्य परिजनोंसे सहित एक सुन्दर महल रुक्मिणीके लिए दिया। उसे महत्तरिका, द्वारपालिनी तथा सेवक आदि परिजनोंसे युक्त किया। नाना प्रकार के वाहन घोड़े, रथ, बैल आदि दिये तथा पट्टरानी पदसे उमका गौरव बढाया जिससे वह बहुत ही सन्तुष्ट हुई ।।२॥ इधर सत्यः भामाको जब पता चला कि श्रीकृष्ण ममस्त स्त्रियोंको अतिक्रान्त करनेवाली एक बी लाये हैं और वह उन्हें अत्यधिक प्रिय है तब यह ईर्ष्यासे सहित होनेपर भी बड़ी धीरतासे उन्हें नाना प्रकारकी क्रीड़ाओंमें रमण कराने लगी ।।३।। एक दिन कृष्ण रुक्मिणीके द्वारा उगले हुए मुखके पानको वरके छोर में छिपाकर सत्य भामाके घर गये वह पान स्वभावसे ही सुगन्धित था और उसपर रुक्मिणोके मुखकी सुगन्धिने चार चाँद लगा दिये थे इसलिए उसपर भ्रमरोंका ममूह आ बैठा था। 'यह कोई मुगन्धित पदार्थ है' इस भ्रान्तिसे मत्यभामाने उसे ले लिया और उत्तम वर्ण तथा गन्धसे युक्त उस पानके उगालको अन्छी तरह पीमकर अपने शरीरपर लगा लिया। यह देख श्रीकृष्णने उनकी खूब हॅमी उड़ायी जिससे वह ईर्ष्यावश उनके प्रति आगबबूला हो गयी ॥४-६।। कृष्णकी चेष्टाओंसे सौतके सौभाग्यका अतिशय जानकर सत्यभामा उमका रूप- लावण्य देखने के लिए उत्सुक हो गयी || और एक दिन पतिसे बोली कि 'हे नाथ ! मुझे मस्मिणी दिपलाइए, कानोंकी तरह मेरे नेत्रोंको भी हर्ष 'उपजाइए' ||८|| सत्यभामाकी बात स्वीकृतकर वे हृदयमें कुछ रहस्य छुपाये हुए गये और मणिमय वापिकाके तटपर रुक्मिणी को सड़ाकर पुनः सत्यभामाके पास आ गये ||२|| तदनन्तर 'तुम उद्यानमें प्रवेश करो, मैं तुम्हारी प्रष्ट रुक्मिणीको अभी लाता हूँ' यह कहकर उन्होने सत्यभामाको तो आगे भेज दिया और आप स्वयं पीछेसे जाकर किमी झाड़ीके ओटमे शरीर छिपाकर खड़े हो गये ॥१०॥ मणिमय आभूपणोंको धारण करनेवाली रुक्मिणी मणिमय वापिकाके समीप एक हाथसे आम्रको लता पकड़कर पोंके बल सड़ी थी। उस समय वह अपनो अतिशय सुशोभित बड़ी १ परिचारवत् प० । २. परिवारताः म । ३ सत्यभामा । ४. पक्मिण्या । ५ सा-शुकान्त्येन म० ।

त्रिचत्वारिंशः सर्ग: निरूप्य रक्मिणी सत्या देवतामिव रूपिणीम् । देवतेयमिति ध्यात्वा विकीर्य कुसुमाञ्जलिम् ॥१३॥ निपन्य पादयोस्नग्याः स्वयामाग्यमयाचन । विपक्षस्य तु दार्माग्यमीयांशल्यफलहिता ॥१४॥ अन्तरेऽत्र हरिः सन्यां हारिस्मितमुग्योऽवदन् । अपूर्व दर्शनं स्वखोरहा वृत्तं नयान्वितम् ॥१५॥ ध्रुवा तत्सत्यभामांचे ज्ञाततत्था रवान्विता । किं भवानदिच्छे नौ दर्शनं किं तवेनि तम् ॥१६॥ कृतकृष्णरचा मामा रुक्मिणी विनयात्ततः । ननाम कुलजातानां विनयः महजो मतः ॥१७॥ विहृत्य चिरमुद्यानं लतामण्डपमण्डितम् । ताभ्यामधोक्षजो यातो निवृत्तो भवनं निजम् ॥१८॥ ताभ्यामरुदिनौपम्यमनपु दिनप्पनः । तस्य यान्सु मुखाम्भोधिपतिनः गायगालिनः ॥१९॥ दुर्योधनोऽन्यदा दृतं हरयं प्रियपूर्वकम् । प्रजिघाय वनस्नेहः म हास्तिनपुराधिपः ॥२०॥ यः प्रागु-पम्यते यग्या रक्मिणीमन्यमामयोः । सूनुरूपस्यमानायाः म घरी दुहितुर्मम ॥२१॥ इति दूनवः शु-या प्रीतः सम्पूल्य तं हरिः । विससर्ज म पन्येऽनः कार्यमिदि न्यवेदयन् ॥२२॥ नां वार्तामुपलभ्याऽमा मामा मीप्मान्मजान्तिकम् । ग्यमान्निजदृतीस्ताः पादयोः प्रणता जगुः ॥२३॥ स्वामिनि ! स्वामिनी नस्वामिनि वक्ति वची वरम् । अवर्तममिव श्लाघ्यं कुरु णे मनस्विनी ॥२४॥ आवयो. प्रथमं यम्याम्तनयोऽन भविष्यति । मुतां दुर्योधनम्यासी माविनी परिणेप्यनि ॥२५॥ मोटी चोटी बायें हाथसे पकड़े थी। स्तनोंक भारसे यह नीचेको झुक रही थी तथा ऊपर लगे हुए फलपर उसके बड़े-बड़े नेत्र लग रहे थे। देवीके ममान सुन्दर म्पको धारण करनेवाली मक्मिणीको देखकर मत्यभामाने समझा कि 'यह देवी है। इसलिए उसने उमके मामने फूलों की अञ्जलि विखर कर नथा उमके चरणों में गिरकर अपने सौभाग्य और मीनके दीर्भाग्यको याचना की बह ईर्ष्या रूपी शल्यसे कलकिन जो थी ।।११.१४|| इमी ममय मन्द-मन्द मुमकाते • हुए श्रीकृष्णने आकर मत्यभामासे कहा कि अहा! दो बहिनोंका यह नीतियुक्त अपूर्व मिलन हो लिया ? ॥१५|| श्रीकृष्णक वचन मुन मत्यभामा सय रहस्य जान गयी और कुपित हो बोली कि अरे! क्या आप हैं ? हम दोनोंका इच्छानुम्प दर्शन हो इसमें आपको क्या मतलब ?।।१६।। तदनन्तर कृष्णके बचन स्वीकारकर मक्मिणीने मत्यभामाको विनयपूर्वक नमस्कार किया मो ठीक ही है क्योंकि उन कुलमें उत्पन्न हुए मनुप्योंके विनय स्वभावसे ही होता है ॥१०॥ श्रीकृष्ण लगामण्टपांसे मुशोभित उद्यानमें उन दोनों रानियोंके साथ चिरकाल तक क्रीड़ा कर अपने महल में लौट गये ।।१८।। तदनन्तर मुसमागरम निमग्न एवं पराक्रमस मुशोभित कृष्णक अनेक दिन उन दोनों रानियोंके माथ जब एक दिनके ममान व्यतीत हो रहे थे नव एक दिन अत्यधिक ग्नेह से युक्त हस्तिनापुरके गजा दुर्योधनने दम प्रिय समाचारके माथ कृष्णके पास अपना दूत भेजा कि 'आपकी क्मिणी और मत्यभामा गनियांमसे जिसके पहले पुत्र उत्पन्न होगा यह यदि मेरे पुत्री उत्पन्न हुई तो उसका पति होगा' ॥१०.२०॥ दूत के उक्त वचन सुनकर श्रीकृष्ण वहन प्रसन्न हुए और उन्होंने दूतका मम्मान कर उसे विदा किया। इतने भी अपने स्वामीके लिए कार्य मिद्ध होनेका ममाचार कह मुनाया ।।२२।। यह समाचार मुनकर मत्यभामाने मक्मिणी पाम अपनी दूनियाँ भेती और वे रक्मिणांके चरणों में नम्रीभूत हो कहने लगी कि हे म्यामिनि ! हम लोगोंकी म्यामिनी-सत्य- भामा आपसे कुछ उत्तम वचन कह रही हैं मो हे मानवनि ! आभग्णकी तरह उम प्रांमनीय वचनको आप कानमे धारण करें--प्रवण करें। यह वचन यह है कि हम दोनोमस जिम पहले पुत्र होगा यह दुर्योधनकी होनहार पुत्रीको वियाहंगा यह निश्चित हो चुका है। उन १. -टिस्य म०।२ तवरित ग.। ३.कृष्णवनी भामा म०, ग.। .. भीमवाति म ।

त्रिचत्वारिंशः सर्गः सन्यभामागृहाभ्यर्णमाकोणं व्यसम्पदा । धिष्ण्यं विष्णुदेदी दिव्यं रश्मिण्य परिवारवत् ॥१॥ महत्तरप्रतीहारीभृत्यादिपरिवारिता'। यानाश्वरथयुग्यादि पन्या गौरविनाऽनुषत् ॥२॥ ज्ञाचा मामा हरीष्टां तां मामा मामातिशायिनीम्।मा सेाऽपि हरि धीरा रहः क्रीडा स्वरीरमन् ॥३॥ एकदा मुसनामूलं निष्ठयूनं मोमजन्मना । मोऽशुकान्तन मंगोप्य सत्यभामागृहं गतः ॥४॥ स्वमायमुसमौगन्ध्यबभ्रान्तालिमण्डलम् | अहरल्पत्यभामा नद्भ्रान्त्या सद्गन्धरस्त्विति ॥५॥ वर्णगन्धाढ यमापित्य समालमत चादरात् । हमिता हरिचन्द्रेण सा चुक्रोश तमीर्यया ॥६॥ मौमाग्यानिमयं सत्या सपन्या हरिचेष्टितैः । विदित्वा रूपलावण्यं द्रष्टुमभ्युत्सुफाऽमवन ॥७॥ श्रयदश्च पनि नाथ ! रक्मिणी मम दर्शय । श्रोत्रयोरिव संहृष्टि नेत्रगोरपि में कुरु ॥८॥ प्रतिपद्य स तद्वाक्यमन्तऍटो यिनिर्गतः । मणियाप्यास्तटे कान्ता संस्थाप्य पुनरागतः ॥९॥ ग्रानयामि तवामीष्टां विशोद्यानमिति प्रियाम् । सम्प्रेष्यानुगतस्तस्था गुल्ममंगृहविग्रहः ॥१०॥ नारय मणियाप्यन्त मणिभुषणधारिणीम् । पाढाग्रेण स्थितां चूतलतामालम्ब्य पाणिना ॥११॥ प्रोलपतम्थूलधम्मिल्ला वामहस्तेन त्रिभ्रतीम् । स्तनमारतनामूलफलन्यस्तायतेक्षणाम् ॥१२॥ श्रीकृष्णने सत्यभामाके महलके पास, नाना प्रकारको मम्पदाओंसे व्याप्त एवं योग्य परिजनोंसे सहित एक सुन्दर महल रुक्मिणीके लिए दिया ॥१॥ उसे महत्तरिका, द्वारपालिनी तथा सेवक आदि परिजनोंसे युक्त किया। नाना प्रकारके वाहन घोड़े, रथ, वैल आदि दिये तथा पट्टरानी पदसे उसका गौरव बढाया जिससे वह बहुत ही सन्तुष्ट हुई ।।२।। इधर मत्य- भामाको जब पता चला कि श्रीकृष्ण समग्न स्त्रियोंको अतिक्रान्त करनेवाली एक स्त्री लाये हैं और वह उन्हे अत्यधिक प्रिय है तब वह ईर्ष्यासे सहित होनेपर भी बड़ी धीरतासे उन्हें नाना प्रकारकी क्रीड़ाओमे रमण कराने लगी ||३|| एक दिन कृष्ण रक्मिणीके द्वारा उगले हुए मुखके पानको वरके छोरमे छिपाकर सत्य- भामाके घर गये वह पान म्वभावसे ही सुगन्धित था और उसपर रुक्मिणोके मुखको सुगन्धिने चार चॉट लगा दिये थे इसलिए उसपर भ्रमरोंका समूह आ बैठा था। 'यह कोई मुगन्धित पदार्थ हैं। इस भ्रान्तिसे मत्यभामाने उसे ले लिया और उत्तम वर्ण तथा गन्धमे युक्त उस पानकै उगालको अन्छी तरह पीसकर अपने शरीरपर लगा लिया। यह देख श्रीकृष्णने उसको स्वय हँसी उड़ायी जिससे वह ईर्ष्यावश उनके प्रति आगबबूला हो गयी॥४-६।। कृष्णाकी चेष्टाओंमे सौतके मौभाग्यका अतिशय जानकर सत्यभामा उसका रूप. लावण्य देखनेके लिए उत्सुक हो गयी 19ी' और एक दिन पतिसे बोलो कि 'हे नाथ मुझे क्मिणी दिसलाइए, कानोंकी तरह मेरे नेत्रोंको भी हर्प उपजाइए' || सत्यभामाकी चात म्वीकृतकर | हृदयमे कुछ रहस्य छुपाये हुए गये और मणिमय वापिकाके तटपर रक्मिणी को सड़ाकर पुनः सत्यभामाके पास आ गये ॥९तदनन्तर 'तुम उद्यानमे प्रवेश करो, मैं तुम्हारी इष्ट रुक्मिणीको अभी लाता हूँ' यह कहकर उन्होंने सत्यभामाको तो आगे भेज दिया और आप स्वयं पीछेसे जाकर किसी झाड़ीके ओटमे शरीर छिपाकर सड़े हो गये ॥१०॥ मणिमय आभूषणोंको धारण करनेवाली रुक्मिणी मणिमय वापिकाके समीप एक हाथसे आम्रको लना पकड़कर पोंके बल सड़ी थी। उस समय वह अपनी अतिशय सुशोभित बड़ी १ परिचारयत् प० । २. परिवारताः म०।३ सत्यभामा ! ४. क्मिण्या । ५. सोशुकान्त्येन म ।

निचत्वारिंशः सर्गः . २ तस्यामेव च वेळायां बलवान् नमसा नजन् । धूमकंतुर्विमानस्थो धूमकंतुरिवासुरः ॥३९॥ स्तम्भितेन विमानेन कयचिदपि विस्मितः । अयोऽवलोरमानोऽमा विमङ्गज्ञानलोचनः ॥४०॥ रक्मिण्याः सुतमालोक्य रोपाऽरणनिरीक्षणः । दर्शनेन्धनसंदीपूर्वबैरविभावसुः ॥४१॥ महारक्षाधिकारस्य परिवारजनस्य सः । रक्मिण्याच महानिद्रां निपात्यापत्यपातकः ॥४२॥ Lशिशुमुद्धृत्य बाहुभ्यां महीधमिव गौरवात् । नमः ममुग्यो नीलो'नीलवुदिर्महामुरः ॥४३॥ हस्ताभ्यां किमु मृदनामि पूर्ववैरिणमेनकम् । रगेभ्यो नवनिर्मिनं वे वलिं विकिरामि किम् ॥४४॥ नऋचम्महारौद्रे मारप्राहसंकुले । पातयामि समुद्रे किं क्षुद्रं में द्रोहिणं रिपुम् ॥४५॥ अथवा मांसपिण्डेन मारितनामुनाऽत्र किम् । 'त्यनचापतरक्षस्तु स्वयमेव मरिष्यति ॥१६॥ इति संचिन्त्य पुण्येन शिशोरव महासुरः । पश्यग्नवततारानो विदूरखदिराटवीम् ॥४७॥ अधस्तक्षशिलायास्तं निधापामकमाशु सः । धूमकनुरियारश्यो धूमकनुरभूत्ततः ॥४८n तदनन्तरमवाऽत्र मेघकूटपुराधिपः । कालसंवर इत्याख्यः साद कनकमालया ॥४९॥ प्राप्तो मोमविहारण विमानेन वियचरः। शिशोस्तस्य प्रभावेण खण्डिताऽस्य गतिस्तदा ॥५०॥ किमेतदिस्यसा ध्यारवा परं विस्मयमागतः । अवतीयं शिलां पृथ्वीमुच्छ्वसन्ती न्यलोकत ॥५॥ समुक्षिप्य शिला स्वैरमपमार्य स रटवान् । अक्षतागमनकाममर्मकं कनकपमम् ॥५२॥ मत्यभामाके सेवकजनोंने उनकी स्तुति कर उन्हें मत्यभामाके पुत्रोत्पत्तिका समाचार सुनाया जिससे सन्तुष्ट होकर कृष्णने उन्हें भी पुरस्कारमें धन दिया ॥३८|| उमी समय अग्निके ममान देदीप्यमान धूमकेतु नामका एक महायलवान असुर विमानमें बैठकर आकाशमार्गसे जाता हुआ रुक्मिणीके महलपर आया ॥ ३९ ॥ आतेके ही साथ उसका विमान रुक गया जिससे कुछ आश्चर्यमें पड़कर यह नीचेको ओर देखने लगा। वह विभद्गायधिन्नानरूपी नेत्रको धारण करनेवाला था ही इसलिए उसके द्वारा रुक्मिणी पुत्रको देख क्रोधसे उसके नेत्र लाल हो गये और दर्शनरूपी ईन्धनसे उसकी पूर्व वैररूपी अग्नि भड़क उठी। उस पापीने आते ही कड़ी रक्षामें नियुक्त पहरेदारोंको, परिवार के लोगोंको तथा खयं रुक्मिणोको महानिद्रामे निमन कर पुत्रको उठा लिया और वजनमे पर्वतके ममान भारी उम पुत्रको दोनों भुजाओंसे लेकर वह मलिनबुद्धि एवं श्यामगद्गका धारक महा अमुर आकाशमें रह गया ॥ ४०-४३ ।। आकागमें ले जाकर वह विचार करने लगा कि इम पूर्व भवफे पैरीको क्या मैं हाथोंसे ममल डालूं ? या भोंसे चीरकर आकाशमें पक्षियोंके लिए इमी यलि विश्वर दूं? अथवा मुझसे द्रोह करनेयाले इमं क्षुद्र शत्रुको नाकाके ममूहसे महाभयंकर एवं मगरों और प्राहोंके ममूहसे भरे हुए ममुद्र में गिरा ? अथवा यह ममिका पिण्ड तो है ही। इमफे मारनेसे क्या लाभ है ? यह रनकोंमे रहित ऐमा ही छोड़ दिया जायेगा तो अपने-आप मर जायगा ॥४2-४६ ॥ पालक पुण्यसे इस प्रकार विचार फरता यह महामुर जा रहा था कि दुरसे यदिर अटयीको देख वह नीचे उनरा ॥४७॥ और. यहाँ ननशिलाफ नीचे उम यालकको रखकर यह धूमकेनु नाममा अमुर, धूमकेतु ताराके ममान शीघ्र ही अदृश्य हो गया ॥१८॥ नदनन्तर उमी ममय मेपरट नगरका राजा कालमंयर, अपनी फनफमाला गनीय माय पृथियार समम्न म्यलॉपर विहार फरना हुआ विमानद्वारा आरमा-मार्गमे यहाँ आया मो पालम्फे प्रभावसे उमकी गनि ग्फ गयी ॥४-५० ।। 'यह क्या इस प्रकार विचारकर फालमयर परम आभयो प्रान हुआ। नीचे उतरकर उसने हिलनी हुँ पर यड़ी मोटी शिला देग॥५१॥ बन्छामे मिला इटार जय उमने देखा तो उसके नीचे अमन मार्गर, १ मनिनारयः। २ पशिम ! .सनमारम.! ४. विशलान् ।

। हरिवंशपुराणे तत्रापत्यविहीनाया विलूनालकपल्लरीम् । स्नास्यतस्तामधः कृत्वा पादयोस्तु वधूवरौ ॥२६॥ प्रशस्मं च यशस्यं च यद्योमागिनि मागिनि । यदि ते रोचते कार्यमिदमायेऽनुमन्याम् ॥२७॥ कर्णामृतमिवाकण्यं तबिवृत्य जगावसी । तथाऽस्विति ततो गत्वा ताः स्वामिन्यै न्यवेदयन् ॥२८॥ रुक्मिणी तु शिसस्नासा शयिता शयने निशि । स्वप्ने हंसविमानेन विजहार किलाम्बरे ॥२९॥ विजुदा च समाचल्यो पत्ये स्वप्नमसो जगौ । सुपुत्रस्ते वियचारी भविताऽन महानिति ॥३०॥ वचः पत्युरसौ श्रुत्वा विकासमगमद् वधः । तेजसांऽशुमतः श्लिष्टा पग्रिनीव दिनानने ॥३१॥ श्रवतीर्याऽच्युतेन्द्रस्तु रुक्मिणीगर्ममाश्रितः । पूरयन् परमानन्दमुपेन्द्रस्य जनस्य च ॥३२॥ तत्काले सत्यमामाऽपि शिरःस्नातवती सती । अधत्त स्वश्च्युतं गमें सुतं सुस्वप्नपूर्वकम् ॥३३॥ वर्धमानौ च तो गर्मी वर्धमानयशोलतो । वर्द्धमानां मुदं मात्रोः पितुश्चाकुरुतां पराम् ॥३४॥ पूर्णप्रसवमासेऽन्न प्रसूता रुक्मिणी सुतम् । नरलक्षणसम्पूर्ण सत्याऽपि युगपग्निशि ॥३५॥ प्रहिताच हितास्ताभ्यां युगपग्निशि वर्द्धकाः । शिरोऽन्ते सत्यया विष्णोः पादान्ते तस्थुरन्यया ॥३६॥ प्रबुधश्च हरिर्दिष्टय रुक्मिणीपुत्रजन्मना । मानन्दितो ददौ तेभ्यः स्वागस्पृष्टं विभूषणम् ॥३७॥ परावृत्य पुनः पश्यन् सत्यमामाजनैः स्तुतः । पुत्रोत्पत्या ददौ तुष्टस्तेभ्योऽप्यर्थ जनार्दनः ॥३८॥ विवाहके समय जिसके पुत्र न होगा उसकी कटी हुई केश-लताको पैरोंके नीचे रखकर वधू और वर स्नान करेंगे'। यह कार्य बहुत ही प्रशस्त नथा यशको यढानेवाला है इसलिए हे यशस्विनि ! हे भाग्यशालिनि !हे आयें! यदि आपको रुचता है-अच्छा लगता है तो स्वीकृति दीजिए ।।२३-२७।। कानोंके लिए अमृतके समान आनन्द देनेवाले उस वचनको सुनकर रुक्मिणीने सन्तुष्ट हो 'तथास्तु' कह दिया और दूतियोंने जाकर अपनी स्वामिनी-सत्यभामा के लिए यह समाचार कह सुनाया ॥२८॥ तदनन्तर चतुर्थ स्नानके बाद रुक्मिणी जब रानिमें शय्यापर सोई तब उसने स्वप्नमें हंसविमानके द्वारा आकाशमें विहार किया ॥२९॥ जागनेपर उसने वह स्वप्न पतिदेव श्रीकृष्णके लिए कहा और उसके उत्तरमें उन्होंने कहा कि तुम्हारे आकाशमें विहार करनेवाला कोई महान् पुत्र होगा ॥३०॥ पतिके वचन सुनकर रुक्मिणी, प्रातःकालके समय सूर्यको किरणोंसे संसर्गको प्राप्त हुई कमलिनीके समान विकासको प्राप्त हुई ॥३१॥ तदनन्तर श्रीकृष्ण तथा अन्य समस्त जनोंके परम आनन्दको बढ़ाता हुआ अच्युतेन्द्र, स्वर्गसे अवतार ले रुक्मिणीके गर्भमें आया ॥३२॥ उसी समय सत्यभामाने भी शिरसे स्नानकर उत्तम स्वमपूर्वक स्वर्गसे च्युत हुए पुत्रको गर्भ धारण किया ।।३३।। जिनकी यशरूपी लता बढ़ रही थी ऐसे बढ़ते हुए दोनों गर्भाने अपनी-अपनी माताओं और पिताके परम आनन्दको वृद्धिगत किया ॥ ३४॥ प्रसवका महीना पूर्ण होनेपर रुक्मिणीने उत्तम मनुष्यके लक्षणोंसे युक्त पुत्र उत्पन्न किया और उसीके साथ- माथ सत्यभामाने भी रात्रिमें उत्तम पुत्रको जन्म दिया ||३५।। दोनों ही रानियोंने हितके इन्छुक एवं शुभ समाचार देनेवाले पुरुष रात्रिके ही समय एक साथ श्रीकृष्णके पास भेजे। उस समय श्रीकृष्ण शयन कर रहे थे इसलिए सत्यभामाके द्वारा भेजे सेयक उनके सिरके पास और रुक्मिणीके द्वारा भेजे सेयक उनके चरणोंके समीप खड़े हो गये ॥३६॥ जय श्रीकृष्ण जगे तो पहले उनकी दृष्टि परणोंके पास सड़े सेवकोंपर पड़ी। उन्होंने भाग्य-वृद्धिके लिए पहले गक्मिणीफे पुत्र-जन्मका समाचार सुनाया जिससे प्रसन्न होकर फष्मने उन्हें अपने शरीरपर स्थित आभूषण पुरस्कारमें दिये ॥३७॥ तदनन्तर जय कृष्णने मुड़कर दूमरी ओर देसा तो १. स्नास्येने म., स., पारयेते ग०, २०, ५०१२. न्यवेदयत् म० । ३. हरिराय म ।

७१९ - त्रिचत्वारिंशः सर्गः ततो विदिनवृनान्तो घामुदेवः सवान्धरः । संप्राप्य महमा तत्र कलत्रः 'मुक्लनिमिः ॥६६॥ आरन्दनस्वनप्राप्तसंक्रन्दनपुर मरः । निनिन्द भुनवीय स्वं प्रमादं च मनन्दकः ॥१७॥ अवञ्च वचो दक्षी देवपारपयोः परम् । देशमन परं लोक धिक् पारपममरणम् ॥६॥ अन्यथा कथमुन्यातपड्गधारावमापिनः । वियत बामुदयम्य ममापि ननयः परः ॥६९॥ इन्यादि बहुबाही म सक्मिणीमाह मा प्रियं । गाकिनी भूरिहान्यथं धीरे ! धारय धीरताम् ॥७॥ नाल्पः कल्पच्युनः पुत्री जातस्तव ममापि यः। भवितव्यमिहनेन भुवने मोगमागिना ।।७१॥ गवेपयामि नलोकं तं लोकनयनोमवम् । मूक्ष्मदृष्टिरिबोहिम्यं प्रतिपचन्दमम्बरं ॥७२॥ मान्ययित्वाध्रुसंधौनकपोलयुगला प्रियाम् । माधोऽन्वेपणे मूनोम्पायपरमोऽभवत् ॥७३॥ काले नत्र हरिं प्राप्तो नारदोऽनारतोद्यमः । श्रुनवात्तंश्च शोफैन क्षणं निश्चलतां गतः ॥७॥ श्राननानि यदना म पश्यनि म्म मविस्मयः । प्लान्तानि हिमदग्धानि पद्मानीव समन्ततः ॥७॥ ततो निरस्तमन्युश्च प्रत्युवाच जनार्दनम् । वीर ! भोकलि मुन्च मुतवार्तामहं लभे ॥७६॥ योऽनिमुनक न्यासीटय धितानवान् मुनिः । म कंवलमयं नेत्रं लब्ध्या निर्याणमाश्रितः ॥७॥ योऽपि नमिकुमारोऽत्र जानत्रयरिलोचनः । जानन्नपि न म ब्रूयान्न विद्या कंन हेतुना ॥१८॥ अनः पूर्वविदहंपु गन्या सीमन्धरं जिनम् । संपृच्छय पुत्रयात्तां ने प्रापयामीति नारदः ॥७९॥ दत्तोत्तरी विनिगन्य रक्मिणीमवनं गतः । शोकपालग्रनिग्धं दृष्ट्वा नन्मुग्नपङ्कजम् ॥४०॥ तदनन्तर मव वृत्तान्त जानकर भाई-बान्धवों एवं अन्य सुन्दर स्त्रियांफै माथ कृष्ण भी यहाँ ग्रीन आ पहुँचे । गेनेका शब्द मुनकर बलदेव भी आ गये। अपने नन्दक नामक ग्गनको हाथमें लिए श्रीकृष्ण अपने भुजाओंके पराक्रम तथा अपने प्रमादको निन्दा करने लगे ।। ६६-६७ ।। वचन बोलनेमें अतिशय चतुर श्रीकृष्ण कहने लगे कि 'देव और पुम्पार्थमें देव ही परम वलवान है। समाग्में दम अकारण पुरुषार्थको धिक्कार है ॥ ६८ ।। अन्यथा उभारी हुई तलबारको धागसे मुशोभित मुझ वासुदेवका भी पुत्र दूसरोंके द्वारा किस प्रकार ।। ६ ।। इत्यादि बद्दन बोलनेवाले श्रीकृष्णने रुक्मिणीसे कहा कि 'हे प्रिये ! दम विषयमें अधिक शोकयुक्त न होओ। हे धीरे! धीरता धारण करो ॥ ७० ॥ जो पुत्र म्बर्गसे न्युन हो तुम्हारे और हमारे उत्पन्न हुआ है यह माधारण पुत्र नहीं है। उसे दम मंमारमें अवश्य ही भोगांका भोगनेवाला होना चाहिए 107 ।। टमलिए जिम प्रकार सूक्ष्म दृष्टि मनुष्य आकागमे सूक्ष्म विम्वको धारण करनेवाले प्रतिपदाकै चन्द्रमाको गोजते हैं उसी प्रकार मैं लोगोंक नेत्रोंको आनन्द देनेवाले तेरे पुत्रको लोकमें मर्यत्र सोजता है ।। ७ ।। इस प्रकार ऑमुआंसे जिमके दोनों कपोल धुल रहे थे ऐमी प्रिया रुक्मिणीको मान्न कर श्रीकृष्ण पुत्रके स्त्रोतनेमें उपाय करने लगे ॥ ७३ ॥ उमी ममय निरन्तर उद्यम करनेवाले नारद ऋपि यहाँ श्रीकृष्णक पाम आये और मय ममाचार सुनकर शोकसे अणभरके लिए निश्चलनाको प्राप्त हो गये ।। ७४ ।। उन्होंने मव ओर तुपारसे जले कमलाके ममान मुग्हाये हए यादवोंके मुग्य बड़े आर्यके माथ टेग्वे ।। ७५॥ नदनन्तर शोक दृग्कर नारदने कृष्णाने कहा कि 'हे वीर ! गोफ छोड़ो, मैं पुत्रका ममाचार लाना हूँ ।। ७ ।। यहाँ जो अवधिनानो 'अतिमुक्तक मुनिगज ये वे नो केवलज्ञानम्पी नेत्रको प्राम कर मोझ जा चुके हैं । और जो नीन नानक धाक नेमिकुमार हैं वे जानते हुए भी नहीं कहेंगे। किम कारणमे नहीं कहेंगे ? यह हम नहीं जानते। इसलिए मैं पूर्वविदह क्षेत्रमें जाकर तथा मीमन्धर भगवानसे पृछार पुत्रका गब ममाचार तेर लिए प्राम कगऊँगा' || श्रीकृष्णका उना पा नारद यहॉसे निकल सक्मिणीके भवन पहुँचे और यहाँ शोक १ मुनितम्ययुन रित्यर्थः । मकरविमि म०, गः । २ नन्दकनामनगसहितः । ३. तो म०। हरा जाता ग ।

५१८ हरिवंशपुराणे गृहीया करणोपेतः प्रियायै दानुमुद्यतः । तनयस्तेऽनप याया गृहागेति प्रियंवदः ॥५३॥ प्रमार्य करयुग्मं सा पुन. संकोच्य कोपिदा । अनिच्छन्तीय संतस्ये खेचरी दीर्घदर्शिनी ॥५॥ प्रिय ! किमिदमिन्युक्तमा जगी तब सूनवः । महाभिजनसम्पन्नाः सन्ति पञ्चशतानि ते ॥५५॥ तैरनातकुलं दृप्तस्ताड्यमानं शिरस्यमुम् । न शक्नोमि तदा द्रष्टुं तन्मे वरमपुत्रता ॥५६॥ इन्युक्ने मान्धयित्या तां गृहीत्वा कर्णपत्रकम् । युवराजोऽयमित्युक्त्वा पहमस्य ववन्ध सः ॥१७॥ तना जग्राह तुष्टा सा तनयं नयशालिनी । सपुत्री तो प्रविष्टौ च मे कूटपुरं परम् ॥५८॥ गृढगर्मा महादेवी प्रसूता तनयं शुभम् । इनि वातां पुरे कृत्वा कोविदः कालसवरः ॥५॥ नृत्यद्विद्याधरीवृन्द मिनन्मिजीरवन्धुरम् । तस्य पुण्यनिधानस्य जन्मोत्सवमझारयत् ॥६०॥ प्रकृष्टद्युम्नधामध्वान् प्रद्युम्न इति संजिनः । कुमारी पद्धते नत्र कुमारशतसेपितः ॥६॥ इनश्च रक्मिणी सूनुं विबुदा नेक्षते यदा । वृद्धधात्रोमिरित्युशै. सह द्रष्टु ततस्तदा ॥६२।। विललाप च हा पुत्र ! हृतः केनाऽपि वैरिणा । विधिना निधिमादश्य ने मंऽपहृतं कथम् ॥६३॥ चियोजिता मया नूनमपन्यन भान्तरं । काचन स्त्री न हीदृशं भवेन्फलमहेतुकम् ॥६॥ विलापमिति कुर्वन्त्यां रश्मिण्या करणावहम् । रोदनधनिरत्तस्थौ परिवारण्य मामलः ॥६५॥ कामदेवके ममान आभावाला एवं सुवर्ण के समान कान्तिमान वह बालक देखा ॥ ५२ ।। दयासे युक्त हो कालसंवरने उस बालकको उठा लिया और 'तुम्हारे पुत्र नहीं है इसलिए यह तुम्हारा पुत्र हुआ, लो' इस प्रकार मधुर शब्द कहकर अपनी प्रियाको देने के लिए उद्यन हुआ।। ५३ ॥ पहले तो विद्याधरी कनकमालाने दोनों हाथ पमार दिये पर पीछे चतुर एवं दूर तक देखनेवाली उस विद्याधरीने अपने हाथ संकोच लिये और इस प्रकार खड़ी हो गयी मानो पुत्रको चाहती ही न हो ॥ ५४॥ 'प्रिये ! यह क्या है ?" इस प्रकार पतिके कहनेपर उमने कहा कि आपके उच्च कुलमें उत्पन्न हुए पॉच मी पुत्र हैं। ५५ ।। सो जब वे इस अज्ञात कुलयाले पुत्रको अहंकारमे उन्मत्त हो शिरमे थप्पड़ मारेगे तब मैं वह दृश्य देखने को समर्थ न दो मफेंगी इसलिए मेरा निपूती रहना ही अच्छा है ।। ५६ ।। गीके इस प्रकार कहनेपर कालसंवरने उसे मान्त्वना दी और कानका मुवर्ण- पर ले 'यह युवराज है' एमा कर कर उसे पट्ट बाँध दिया ॥ ५७ ।। तदनन्तर नीति-निपुण कनकमालाने सन्तुष्ट होकर वह पुत्र ले लिया। और पुत्रसहित दोनों मेघफूट नामक श्रेष्ठ नगरमें प्रविष्ट हुए ॥ ५८ ॥ अतिशय निपुण राजा कालमंवरने नगरमें यह घोषणा कराकर कि 'गूढ गर्भको धारण करनेवाली महादेवी कनकमालाने आज शुभ पुत्र को जन्म दिया है' पुग्यके भण्डारम्वरुप उम पुत्रका जन्मोत्मय कराया। जन्मोत्सवमे विद्याधरियोंके समूह नृत्य कर रहे थे और उनके नूपुरोंकी ग्नझुन न्यारी ही शोभा प्रकट कर रही थी ।।९९-६०|| म्वर्णके ममान श्रेष्ठ कान्तिका धारक होनेसे उसका प्रयाम्न नाम ग्गा गया। यहाँ मैकड़ों विद्याधर-कुमागेंक द्वारा मवित होता हुआ यह प्रद्युम्न कुमार दिना-दिन बढने लगा।। ६१ ॥ in rem चागत ई तो उसने पुनको नहीं देगा। तदनन्तर व प्रयत्न मफल नहीं हुआ तब वह जोर- जोर तुझ कान हर ले गया है। विधानाने मेरे ननको निधि विरार यां छीन लाअवश्य ही मन दमर उन्मम किमी स्त्रीको पुत्रम नियुग रिया होगा नहीं ना कारण के बिना यह एमा फल कैसे प्रान हाता? ॥२-१४॥ गरिमीक दम प्रकार करण विलाप करनेपर परियाग्फ लोग भी रान लग और इस तरह रोनेका एक जाग्दारद उट पहा हुआ।। ६२ ।। १ सान्नाय सम० १२. पुरम् म०।३ मिन् म०, ग.।

त्रिचत्वारिंशः सर्गः ५१९ 1 ततो विदितवृत्तान्तो वासुदेवः सवान्धवः । मंप्राप्य महसा तत्र कलत्रैः 'मुकलत्रिभिः ॥६६॥ आक्रन्दनस्वनप्राप्तसंक्रन्दनपुरःसरः । निनिन्द भुजवीर्य स्वं प्रमाई च सनन्दकः ॥६७॥ अवश्य बचो दक्षी देवपारपयोः परम् । देवमेव परं लोके धिक् पारुपमशरणम् ॥६८॥ अन्यथा कथमुखातपड्गधारावमामिनः । हियत वासुदेवन्य ममापि तनयः परः ॥६९॥ इन्यादि बहुवादी स रक्मिणीमाह मा प्रिये ! शोकिनी भूरिहात्यर्थ धीरे ! धारय धीरताम् ॥७०।। नाल्पः कल्पच्युनः पुत्रो जातस्तव ममापि यः। भवितव्यमिहनेन भुवन मोगमागिना ॥७ गवेषयामि तल्लो तं लोकनयनोल्पवम् । मूक्ष्मदृष्टिरिबोहिम्यं प्रनिपञ्चन्दमम्बरे ॥७२॥ मान्त्वयित्वाश्रुसंधौतपोलयुगलां प्रियाम् । माधोऽन्वेषणे सूनोसायपरमोऽमरत ॥७३॥ काले तत्र हरि प्राप्ती नारतोऽनारतोद्यमः । श्रुतवार्तश्च शोन क्षणं निश्चलतां गतः ॥७४॥ अाननानि यदनां स पश्यति स्म सविस्मयः । क्लान्तानि हिमदग्धानि पद्मानीव समन्ततः ॥७॥ नतो निरस्तमन्युश्च प्रत्युवाच जनार्दनम् । वीर ! शोककलिं मुन्च सुतवार्तामहं लभे ॥७६॥ योऽतिमुक्तक इत्यासीदयधिज्ञानवान् मुनिः । कंवलमयं ने लम्ध्वा निर्वाणमाश्रितः ॥७॥ योऽपि नेमिकुमारोऽत्र ज्ञानत्रयरिलोचनः । जानन्नपि न स ब्रूयान्न विद्मो केन हेतुना ॥७॥ ग्रतः पूघिदहेपु गत्या सीमन्धरं जिनम् । संपृच्छय पुत्रयातां ते प्रापयामीति नारदः ॥७९॥ दत्तोत्तरी चिनिगन्य रक्मिणीभवनं गतः । शोकपालेयनिर्दग्धं दृष्ट्वा नन्मुसपङ्कजम् १८०॥ तदनन्तर मव वृत्तान्त ज्ञानकर भाई-बान्धवों एवं अन्य सुन्दर स्त्रियोंके साथ कृष्ण भी वहाँ शीघ्र आ पहुँचे । रोनेका अन सुनकर बलदेव भी आ गये। अपने नन्दक नामक सङ्गको हाथमे लिये श्रीकृष्ण अपने भुजाओंके पराक्रम तथा अपने प्रमादकी निन्द्रा करने लगे ।। ६६-६७ ॥ बचन बोलने में अतिशय चतुर श्रीकृष्ण कहने लगे कि 'देय और पुम्पार्थ में व ही परम पलवान है । संसारमें इम अकारण पुरुषार्थको धिक्कार है ॥ ६८ ॥ अन्यथा उभारी हुई तलवारकी धारासे मुशोभित मुझ वासुदेवका भी पुत्र दूसरों के द्वारा किस प्रकार हग जाता । ।। ६९. ।। इत्यादि बहुत योलनेवाले श्रीकृष्णने रुक्मिणीसे कहा कि 'हे प्रिये ! इस विपयमे अधिक शोकयुक्त न होओ। हे धीरे ! धीरता धारण करो ॥ ७० ॥ जो पुत्र म्वर्गसे च्युत हो तुम्हारे और हमारे उत्पन्न हुआ है वह साधारण पुत्र नहीं है। उसे इम मंमारमें अवश्य ही भोगोंका भोगनेवाला होना चाहिए ।। ७१ ।। दमलिए जिस प्रकार सूक्ष्म दृष्टि मनुष्य आकाशमे सूक्ष्म विम्यको धारण करनेवाले प्रनिपटाके चन्द्रमाको खोजते हैं उसी प्रकार मैं लोगोंके नेत्रीको आनन्द देनेवाले तेरे पुत्रको लोकमें मर्वत्र खोजता हूँ ।। ७ ।। इस प्रकार ऑमुआंसे जिसके दोनों कपोल धुल रहे थे ऐसी प्रिया रुक्मिणीको शान्त कर श्रीकृष्ण पुत्रके सोजनेमें उपाय करने लगे ।। ७३ ।। उसी समय निरन्तर उद्यम करनेवाले नारद ऋपि यहाँ श्रीकृष्ण के पाम आये और सब ममाचार मुनकर शोकसे क्षणभरकै लिए निश्चलताको प्राप्त हो गये ॥ ७५ ।। उन्होंने मव ओर तुपारसे जले कमलाके ममान मुरझाये हुए यादवोंके मुप बड़े आश्चर्यके माध देखे ।। ७ ।। तदनन्तर झोक दृग्कर नारदने कृष्णने कहा कि 'हे वीर ! शोक छोड़ो, मैं पुत्रका ममाचार लाता है ।। ७६ । यहाँ जो अवधिन्नानी अतिमुक्तक मुनिगज थे वे तो केवलज्ञानरूपी नेत्रको प्राप्त कर मोम जा चुके हैं 100 और जो तीन ज्ञानके धारक नेमिकुमार हैं ये जानते हुए भी नहीं कहेंगे। किम कारणमे नहीं कहेंगे? यह हम नहीं जानते। इसलिए मैं पूर्व विदेह क्षेत्रमे जाकर तथा मीमन्धर भगवानसे पूछकर पुत्रका मब ममाचार तेरे लिए प्राप्त कराऊँगा' || ४-७९ ॥ श्रीकृष्णका उत्तर पा नारद वहॉसे निकल मक्मिणीके भयन पहुँचे और वहाँ मोक १ मुनितम्रयुक्त ग्त्यिर्थः । मुकलबिभि म०, ग०। २ नन्दकनामवद्दगमहिनः । ३. तो म० ।

५२० हरिवंशपुराणे शोकवानपि चित्तेन बहिधैर्यमुपाश्रितः । अभ्युत्थायाचिंतस्तस्या न्यषीदनिकटासने ॥८॥ सा तं पितृसमं दृष्ट्वा रुरो दोन्मुक्तकण्ठकम् । सजनोपनिधौ शोकः पुराणोऽपि नवायते ॥८२॥ तस्याः शोकसमुद्रं म प्रक्षिपनिव दक्षिणः । पालादयन्मनोऽवादीदिति नारदमन्मुनिः ॥८॥ त्यज रक्मिणि ! शोकं त्वं कचिजीवति ते 'सुतः । कथञ्चिदपि नीतोऽपि केनचित्पूर्वरिणा ॥४॥ दीर्घजीवितसद्भावं ननु तस्य महात्मनः । निवेदयति सम्भूतिर्वासुदेवात् त्वयि ध्रुवम् ॥४५॥ संयोगाश्च वियोगाश्च प्राणिनां प्राण वत्सले । वत्से भवन्ति संसारे सुखदुःखविधायिनः ॥८६॥ 'तत्र कर्मवशज्ञानां ज्ञानोन्मीलितधीदृशाम् । प्रभवन्ति न ते वत्से यदूनामिव शत्रवः ॥८॥ जिनशासनतत्वज्ञा संसृतिस्थितिवेदिनी । मा भूः शोकवशा वातां त्वत्सुतस्य लभे लघु ॥८॥ इति तां नारदस्तन्वीमनुशिष्य वचोऽमृतैः । प्रयातो वियदुत्पत्य सीमन्धरजिनान्तिकम् ॥८९॥ 'विषये पुष्कलाबत्यां नृसुरासुरसेवितम् । नगर्या पुण्डरीकिण्यामहन्तं स तमैक्षत ॥९०॥ कृताञ्जलिपुटस्तोत्रपवित्रीकृतवाग्मुखः । प्रणम्य जिनमासीनः स नरेन्द्रसमान्तरे ॥९॥ तत्र पमरथश्चक्री,पन्चचापशतोच्छितिः । दशचापोच्छृतिं पश्यनारदं नरशंसितम् ॥१२॥ कौतुकास्करपद्माभ्यामास्थायापृच्छदीश्वरम् । माकृतिरयं नाथ ! कोटः किममिधानकः ।।१३।। ततः प्राह जिनस्तत्त्वं जम्बू द्वीपस्य मारते । भारदो वासुदेवस्य नवमस्य हितोद्यतः ॥९॥ रूपी तुपारसे जले हुए रुक्मिणीके मुख-कमलको देख स्वयं हृदयसे शोक करने लगे परन्तु बाह्यमें धैर्यको धारण किये रहे । रुक्मिणीने उठकर उनका सत्कार किया। अनन्तर वे उसीके निकट आसनपर बैठ गये ।। ८०-८१ ॥ रुक्मिणी पिताके तुल्य नारदको देखकर गला फाड़- फाड़कर रोने लगी सो ठीक ही है क्योंकि सजनोंके समीप पुराना शोक भी नवीनके समान हो जाता है ।। ८२ ॥ अत्यन्त चतुर नारदमुनि, उसके शोक-सागरको हलका करनेके लिए ही मानो मनको आनन्दित करते हुए इस प्रकार वचन बोले ।। ८३ ।। हे रुक्मिणि ! तू शोक छोड़, तेरा पुत्र कहीं जीवित है भले ही उसे पूर्वभवका कोई पैरो किसी तरह हरकर ले गया है। श्रीकृष्णसे तुझमें जो उसको उत्पत्ति हुई है यहीं उस महात्मा के दीर्घायुष्यको सूचित कर रही है ॥ ८४-८५ ॥ हे प्रिय पुत्री! तू जानती है कि इस संसारमें प्राणियोंको सुख-दुःख उत्पन्न करनेवाले संयोग और वियोग होते ही रहते हैं ॥ ८६ ॥ परन्तु जो काँकी अधीनताको जाननेवाले हैं एवं ज्ञानके द्वारा उन्मीलित बुद्धि- रूपी नेत्रोंको धारण करनेवाले हैं ऐसे यादवोंके ऊपर वे संयोग और वियोग शत्रुओंके समान अपना प्रभाव नहीं जमा मकते हैं ।। ८७तू तो जिन-शासनके तत्वको जाननेवाली एवं संसारकी स्थितिको जानकार है अतः शोकके वशीभूत मत हो। मैं शीघ्र ही तेरे पुत्रका समाचार लाता हूँ ॥ ८८ ॥ इस प्रकार वचनरूपी अमृतसे उस कृशाहीको समझाकर नारदमुनि आकाशमें उड़ सीमन्धर भगवान के समीप जा पहुँचे ।। ८९ ॥ वहाँ पुष्कलावती देशको पुण्डरीकिणी नगरीमें मनुष्य सुर और असुरोंसे सेवित सीमन्धर जिनेन्द्रके उन्होंने दर्शन किये ॥९० ॥ हाथ जोड़ मुखसे पवित्र स्तोनका उच्चारण कर उन्होंने जिनेन्द्र भगवान्- फो नमस्कार किया और उसके बाद वे राजाओंकी सभामें जा बैठे ॥९१॥ वहाँ उम ममय पाँच-मो धनुपको ऊँचाईवाला पद्मरथ चक्रवर्ती बैठा था। दश धनुप ॐ नर-प्रशमित नारदको देखते ही उमने उन्हें कौतुकवश अपने हस्न-कमलोंसे उठाकर भगवानमे पूछा कि नाथ ! यह मनुप्यके आकारका कीड़ा कौन-माहै ? और इसका क्या नाम ? ||९२-१३ ।। तदनन्तर मीमन्धर भगवानने मय रहस्य कहा। उन्होंने यताया कि यह जम्बूद्वीपक भरत क्षेत्रके नौवें नारायणके हितमें उात रहनेवाला नारद है ॥२४॥ १. गुतं म.। २.विर म.।

विचवारिंशः सर्गः ५२. - किमर्थमागनी मतरिहायमिति छन । मूलतः कथितं मयं चक्रिणे धर्मचत्रिणा १९५॥ प्रद्युम्न इति नाम्नाऽमी पितृभ्यां याश्यतं पुनः । संप्राप्त पाठशे वर्षे प्राप्तपशिलामकः ॥९॥ म प्रज्ञप्तिमहाविद्याप्रयोनितपराक्रमः । देवानामपि मापामजय्योऽत्र भविष्यति ॥९७॥ कीर चरितं तम्य हना वा कन हनुना । इनि पृष्टी जिनोऽमाणीनम्मै नारदमनिधौ ॥१८॥ इह मारतवर्षेऽभूद्विषय मगधामिधे । गालिग्रामऽप्रजन्मामी सोमदेव इति ध्रुनः ॥९९॥ अमिला ब्राह्मणी तम्य स्वाहवाः मुखापहा । अग्निभूतिरभूत्तम्या वायुभूनिश्च नन्दनः ॥१०॥ बभूवनुरिमा भूमा वेदवेदार्थकोविटी । छादितान्यद्विनच्छायो यथा शुक्रवृहसती ।।१०।। वेदार्थभावनाजातजानिबादानिगवितो । वाचाटी चाटुभि. पिनोलोलिता भोगनपरी ।।१०२॥ द्विरष्टवर्षमु मापु स्वर्गबुद्धिं प्रकृत्य तौ । जातायन्यन्नविद्विष्टा परलोककथा प्रति ॥१०॥ अन्यदाऽऽगन्य मधेन महता नन्दिवद्धनः । तत्राद्याने गुम्म्नम्यौ थुनमागरपारगः ॥१०॥ नद्वन्दनार्यमद्वन्द्वं चानुवयंमहाजनम् । निगच्छन्नं ममालोक्य कारणं तावच्छनाम् ॥१०॥ निवेदितं तनम्ताभ्यां हिजनकन साधुना । महच्छमणमयम्य वन्दनाथमिति स्फुटम् ॥१०॥ अम्मत्परः परः कोऽपि वन्दनीयोऽस्ति भूनले । पश्यामस्तम्य माहात्म्यमिति नौ मानिनी गती ॥१॥ यह मुन चक्रवर्तीने फिर पूछा कि हे स्वामिन् ' यह यहाँ किमलिए आया है ? इमफे उत्तग्मे धर्मचक्र प्रवर्तक मीमन्धर भगवानने चक्रवर्तक लिए प्रारम्भसे लेकर मव ममाचार कहा। साथ ही यह भी कहा कि उम बालकका प्रयम्न नाम है। वह मोलहवाँ वर्ष आनेपर मोलह लाभोंको प्राप्तकर अपने माता-पिताके माथ पुनः मिलेगा। प्रगति नामक महाविद्यासे जिमका पराक्रम चमक उठेगा गमा यह प्रद्युम्न इम पृथिवीपर ममस्न देवोंके लिए भी अजय्य हो जायेगा ।९५-९७॥ चक्रवर्तनि फिर पूछा-'प्रभो ! प्रद्युम्नका चरित कैमा है ? और वह किम कारणले हरा गया " दमके उत्तर मीमन्धर जिनेन्द्रने चक्रवर्ती के लिए नाग्दक मनिथानमें प्रद्युम्नका निम्न प्रकार चरित कहा ।। ९८।। भग्नक्षेत्र मम्बन्धी मगध देशके शालिग्राम नामक गाँव में मोमदेव नामका एक प्रामण रहना था ।। १५ ।। अनिकी म्याहाक ममान उमकी अग्निला नामफी ब्राह्मणी थी जो उसे बहुत ही मुम्ब देनेवाली थी। उम ब्राह्मणीमे मोमामाके अग्निभूनि और वायुभूति नामक दो पुत्र हुप ।। १० ।। ये दोनों ही पुत्र. पृथिवीपर वेद तथा वेढार्थम अत्यन्त निपुण हो गये। इन्होंने अपने प्रभावमे अन्य ग्राह्मणोंको प्रभाको आन्तादिन कर दिया नया मुक और वृहम्पनिक ममान देदीप्यमान होने लगे || 10१॥ वेदार्थकी भायनामे उत्पन्न जानियादमे गर्थिन, यक- पाम फग्नेवाले, माता-पिनाय प्रिय यचनांम पल-पुमे ये दोनों पुत्र भोग-यामनामें तत्पर हो गये। जब वे मोलह वर्ष हा नो स्त्रियोंको ही म्बर्ग ममझने लगे और पग्लोकको कथामे अत्यन्त द्वप करने लगे। 10-१.३॥ नदनन्तर किमी ममय श्रुतम्प मागग्यं पाग्गामा नन्द्रियर्थन नामके गुर विशाल मंघर्फ माथ आकर शालिग्राम बाहर उपयनमें ठहर गये ॥2॥चागें वर्णक महाजन आकुलनारहिन हो उनकी वन्दना लिए जा रहे थे मो उन्हें देय दोनों प्राधग पुराने मका फारण पूछा।। १५ ।। तदनन्तर एक मग्लम्यभाया प्राममने उन्हें मष्ट यनाया कि मुनियोंका एक बड़ा मह आया है। उमा यदना लिा हम लोग जागर ॥३०प्राभगका उत्तर मुन दोनों पुत्र विशाग्ने लगे कि पृथियांतलपर हम लोगांम यदकर दमग बन्दनाय हो चनो हम भी उमा माहाम्य देय हम प्रकार विचारकर मानमे भर दोनों पुत्र १ पछी म.। 2. मागमम् इति मुटु नाति ।

५२२ २ हरिवंशपुराणे प्रासावपश्यतां विप्राववधिज्ञानचक्षुपम् । जनसागरमध्यस्थं साध्विन्द्रं धर्मवादिनम् ॥१०॥ महिषाभ्यामिव क्षामो माभूदाभ्यामिहाधुना । सद्धर्मश्रवणस्येति शुश्रूपुहितबुद्धिना ॥१०९॥ माधुनाऽवधिनत्रेण दूराल्मात्यकिना तकौ । इत आगम्यतां विप्रावित्याहृतो पुरःस्थिती ॥११०॥ ततो लोफस्तको दृष्ट्वा मौवष्टम्मौ यतेः पुरः । आपुपूर पयःपूरैः प्रावृषीव महानदः ॥१११॥ अनः प्राह यतिः प्राप्तो कुनः पण्डितमानिनौ । माहतुस्तौ न कि ज्ञाती शालिग्रामादिहागती ॥११२॥ मात्यकिः प्राह सत्यं मोः शालिग्रामादुपागतौ । किन्त्वनाद्यन्तसंसार संसरन्तो कुतो गतः ॥११३॥ अन्यस्यापि च दुर्बोधर्मतदिन्युदिते यनिः । नैवमिन्यगदीद् विप्रौ ! श्रूयतां कथयाम्यहम् ॥११॥ ग्रामस्यास्यैव सीमान्ते शृगालौ कर्मनिर्मिती । युवां परस्परप्रीती जाती जन्मन्यनन्तरे ॥११५॥ शासीत्प्रवरको नाम्ना ग्रामऽत्रैव कृपीबलः । विप्रः प्रकृप्य स क्षेत्रं महावर्षानिलादितः ॥१६॥ मुक्त्वोपकरणं क्षेत्रे वटवृक्षतलेऽखिलम् । फम्पमानशरीरोऽगात् क्षुद्रोगानिवशीकृतः ॥११७॥ 'सप्ताहोरात्रवण प्राणिसंहारकारिणा । आोपकरणं ताभ्यां तिर्यग्भ्यां मक्षितं क्षुधा ॥११॥ जातोदरमहाशूली प्रसह्यामह्यवेदनाम् । अामनिर्जरायोगादर्जितेनोर्जिनायुषा ॥११९॥ उपवनकी ओर चले ।। १०७ ।। उस समय अवधिज्ञानरूपी नेत्रके धारक, साधुशिरोमणि नन्दिवर्धनगुरु, समुद्रके समान अपार जन-समूहके मध्यमें स्थित हो धर्मका उपदेश दे रहे थे। जब दोनों ब्राह्मण उनके पास पहुंचे तब भैसाआके समान इन दोनोंसे इस समय यहाँ समीचीन धर्मके श्रवणमें बाधा न आवे' इस प्रकार श्रोताओंका हित चाहनेवाले अयधिज्ञानी सात्यकि मुनिने उन दोनों ब्राह्मणोंको दूरसे देख 'हे ब्राह्मणो । यहाँ आइए' इस तरह बुला लिया और आकर वे उनके सामने बैठ गये ॥ १०८-११० ।। तदनन्तर उन अहंकारी ब्राह्मणों- को मात्यकि मुनिराजके सामने बैठा देख, लोगोंने आ-आकर उनके सामनेकी भूमिको उस प्रकार भर दिया जिस प्रकार कि वर्षाऋतुमै महानद जलके प्रवाहसे भर देता है। भावार्थ-) कौतुकसे प्रेरित हो लोक मुनिराजके पास आ गये ॥ १११ ।। तदनन्तर मुनिराजने कहा कि हे विद्वानो | आप लोग कहाँ से आये है ? इसके उत्तरमें ब्राह्मणोंने कहा कि क्या आप नहीं जानते इसी शालिग्रामसे आये हैं ॥ ११२ ।। सात्यकि मुनि- राजने कहा कि हॉ यह तो सत्य है कि आप शालिग्रामसे आये है परन्तु यह तो घताइए कि इस अनादि-अनन्त संसारमें भ्रमण करते हुए आप किस गतिसे आये हैं ? ॥ ११३॥ ब्राह्मणों- ने कहा कि यह बात तो हम लोग ही क्या दूसरेके लिए भी दुर्जेय है अर्थात् इसे कोई नहीं जान सकता । तब मुनिराजने कहा कि हे ब्राह्मणो ! सुनो यह बात नहीं है कि कोई नहीं जान मकता, मुनिए, मैं कहता हूँ ॥ ११४ ॥ तुम दोनों भाई इस जन्मसे पूर्व जन्ममें इसी शालिग्रामको सीमाके निकट अपने कर्मसे दो शृगाल थे और दोनों हो परस्परकी प्रीतिसे युक्त थे ॥ ११५ ।। इमी प्राममे एक प्रवरक नामका ब्राह्मण किसान रहता था। एक दिन वह खेतको जोतकर निश्चिन्त हुआ ही था कि बड़े जोरमे वर्षा होने लगी तथा सोत्र ऑधी आ गयी। उनसे यह बहुत पीड़ित हुआ, उमका शरीर कॉपने लगा और भूख-रूपी गेगने भी उसको खूब सताया जिससे यह मन पाम ही वटवृक्षके नीचे अपना चमड़ेका उपकरण छोड़कर घर चला गया ॥ ११६-१७ । प्राणियोंका मंहार फग्नेवाली यह वर्पा लगातार मात दिन-गन तक होती रही । इम बीच में दोनों शृगाल भूगसे अत्यन्त व्याकुल हो उठे और उन्होंने उम किमानका यह भीगा हुआ उपकरण या लिया ॥ ११८ ॥ कुछ ममय बाद पेट में बहुत भारी शूलकी वेदना उठनेमे उन दोनों शृगालोको अमह्य वेदना महन करनी पड़ी। अकामनिर्जग योगसे मगरी १ । २. प्राययुश्चम..

त्रिचत्वारिंशः मर्गः - कालं कृत्वा युवां जानी जातिगौरवगवितो । अग्निभूनिर्मरद्भुतिः मोमदेवस्य देहजो ॥१२०॥ पापपाकेन दौर्गत्यं सौगन्यं पुण्यपातः । जीवानां ज्ञायते तत्र जानिगःण कि वृथा ॥१२॥ प्राप्तः पामरको दृष्ट्वा क्राष्टारौ नष्टजीविती । ही कृत्वा कृती गहे तिष्टनोऽद्यापि तद्दनी ॥१२२॥ सोऽपि मृत्वा मुतस्यैव सुतो भूत्वातिमानवान् । जातिस्मरः स्मरच्छायो मृषा मूक इव स्थितः ॥२३॥ म एप बन्धुमध्यस्थी मामतीव विलोकने । इन्युक्त्वाऽऽहूय नं मृकं सात्यकिः सम्यवाग जगौ ॥१२॥ सवं पामरको विप्रः प्राप्तस्तोकस्य तोकताम् । शोकं च मूकमानं च मुञ्च मुञ्च बचोऽमृतम् ॥१२५॥ जायतेऽत्र नटस्यव संसार स्वामिभृत्ययोः । पितृपुत्ररुयोर्मातृमार्ययोश्च विपर्ययः ॥१२६॥ घटीयन्त्रघटीनाले जटिले कुटिले मवे । उत्तराधर्यमायान्ति जन्तवः मततभ्रमाः ॥१२७॥ इति विज्ञाय निस्मारं घारं संसारसागरम् । कुरु पुत्र ! दयामुलं व्रताग्यं मारपग्रहम् ॥१२॥ इति साक्षात्कृते तेन प्रत्यय यतिना द्विजः । पपात पादयोस्तन्य प्रदक्षिणपुरस्परम् ॥१२॥ धानन्दात्रपरीनाक्षः पुनरुत्थाय विस्मयी । जगाद गद्गदालापः कृताञ्जलिपुटालिकः ॥१३०॥ अहो सर्वज्ञकल्पस्वं वस्तुनस्तत्वमीश्वरः । अस्थः पश्यमि स्पष्टं जगत्रितयगोचरम् ॥१३॥ उन्मीलितं मनोनेत्रमज्ञानपटलाविलम् । यया नाथ ! ममहाद्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ॥१३२॥ उन्हें प्रशस्त आयुका वन्ध हो गया और उसके फलस्वरूप मरकर वे सोमदेव ब्राह्मणके जातिके गर्वसे गर्वित अग्निभूति और वायुभूति नामके तुम दोनों पुत्र हुए ।। ११९-१२० ॥ पापके उदयसे प्राणियोंको दुर्गनि मिलती है और पुण्यके उदयसे सुगति प्राप्त होती है इसलिए जानिका गर्व करना वृधा है ।। १२१ । वर्षा वन्द होनेपर जव किसान खेनपर पहुंचा तो वहाँ मरे हुए दोनों शृगालोंको देखकर उठा लाया और उनकी मग बनवाकर कृत-कृत्य हो गया। वे माकें उसके घरमें आज भी रसी हैं ।। १२२ ॥ तीत्र मानसे युक्त प्रवरक भी ममय पाकर मर गया और अपने पुत्रके ही पुन हुआ। वह कामदेयके समान कान्तिका धारक है नथा जानि म्मरण होनेसे झूठ-मूठ हो गूंगाके ममान रहना है ॥ १२३ ॥ देसो, वह अपने बन्धुजनोंके बीच में बैठा मेरी ओर टकटकी लगाकर देख रहा है। इतना कहकर सत्यवादी मात्यकि मुनिराजने उस गूगेको अपने पास बुलाकर कहा कि तु वही ब्राह्मण किसान अपने पुत्रका पुत्र हुआ है। अब तू यांक और गूंगेपनको छोड़ तथा यचनरूपी अमृतको प्रफटकर- स्पष्ट बात चीत कर अपने वन्धुजनोंको हर्पित कर ।। १२४-१२५ ॥ इस संमारमें नटके समान म्वामी और सेवक, पिता और पुत्र, माता तथा वीमें विपरीनता देसी जानी है अर्थात् स्वामी सेवक हो जाता है, सेवक स्वामी हो जाता है, पिना पुत्र हो जाता है, पुत्र पिता हो जाता है, और माता स्त्री हो जाती है, स्त्री माता हो जाती है ।। १२६ ।। यह संमार रेहट में लगी घटियांके जालके ममान जटिल तथा कुटिल है । इममे निरन्तर भ्रमण करनेवाले जन्तु ऊँच-नीच अवस्थाको प्राप्त होते ही हैं ।। १२७ ।। इमलिए हे पुत्र! मंमाररूपी मागरको निःमार एवं भयंकर जानकर दयामूलक बनका मारपूर्ण मंग्रह कर ।। १२८ ।। टम प्रकार मुनिराजने जब उसके गुगेपनका कारण प्रत्यक्ष दिगमा ढिया नव वह नोन प्रदक्षिणा देकर उनके चरणों में गिर पड़ा ॥१२९॥ उमक नेत्र आनन्दके ऑमुआंसे व्याप्न हो गरे। यह बड़े आश्चर्यके साथ खड़ा हो हाथ जोड़ मम्नकमे लगा गद्गद वाणांसे कहने लगा ॥३०॥ 'भगवन ! आप मर्यशक ममान हैं, ईश्वर हैं, यहाँ बैठे-बंटे ही तीनों लोक मम्बन्धी यस्तु के यथार्थ म्यरूपको स्पष्ट जानते हैं ।।१३। हे नाथ! मेरा मनरूपी नेत्र अज्ञानपी पटलमें मलिन हो रहा था मो आज आपने उमे ज्ञानरूपी अन्जनरी मलाईमे गोल दिया १ पुषम्प । २. पुत्रतान् । ३ अप्रेत्य म., ग.१ ४. दृष्टं म ।

५२४ । हरिवंशपुराणे अनादौ भवकान्तारे महामोहान्धकारिते । भ्रमतो मे मुने ! जातो बन्धुस्स्त्रं मार्गदर्शनः ॥३३॥ प्रसीद भगवन् ! दीक्षा देहि दैगम्वरीमिति । प्रसाद्य गुरमामाद्य जग्राहानुमतां सताम् ॥ १३४॥ चरितं तस्य विप्रस्य श्रुत्वा दृष्ट्वा च तादृशम् । श्रामण्यं केचिदापनाः कचित् श्रावकना पराम् ॥१३५॥ तावग्निवायुभूनी तु विलक्षी लोकगर्हितौ । स्वनिकतं पुनर्याता पितृभ्यामपि निन्दिता ॥१३६॥ कायोत्सर्गस्थितं रात्री मुनिर्मकान्तवत्तिनम् । जिघांम खड्गहस्ती तो यक्षेण स्तम्भितो स्थितौ ॥१३७॥ प्रमाते च जनो दृष्ट्वा तौ यतेः पार्श्वयोः स्थितौ । निनिन्द निन्दिताचारी तातो पातकाविति ॥१३८॥ तावचिन्तयतां साधोः प्रभावोऽयमही महान । भावामयन्ननो यन स्तम्मिती स्तम्मतां गतौ ॥१३९॥ कछिन यदि मोक्षः स्याटस्माकं कृच्छ्तोऽमुतः । जिनधर्म प्रपत्स्यामा दृष्टमामध्यमित्यपि ॥१०॥ सायत्तव्यसनं श्रुत्वा पितरौ शीप्रमागतौ । पादलग्नौ मुनि तं ती प्रसादयितुमुद्यतौ ।।१४१॥ करुणावानसौ योगी योग संहृन्य सुस्थितः । क्षेत्रपालकृतं ज्ञात्वा तमाह विनयस्थितम् ॥१४२॥ क्षम्यतां यक्ष ! दोपोऽयमनयोरनयोद्भवः । कर्मप्रेरितयोः प्रायः कुरु कारुण्यमहिनो. ॥१४३॥ - इत्यामाद्य मुनेराज्ञां राज्ञामिव नियोगतः । यथाऽऽशापयमीत्युक्त्वा विसमज स तौ तदा ॥१४॥ है ॥१३२।। महामोहरूपी अन्धकारसे व्यात इम अनादि समार-अटवीमें भ्रमण करते हुए मुझे आपने सच्चा मार्ग दिखलाया है. इसलिए हे मुनिराज! आप ही मेरे बन्धु है ।।१३।। हे भगवन ! प्रसन्न होइए और मुझे दैगम्बरी दीक्षा दीजिए।' इस प्रकार गुरुको प्रसन्न कर तथा उनके निकट आ उस गूंगे ब्राह्मणने सत्पुरुषों के लिए इष्ट दैगम्बरी दीक्षा धारण कर ली ११३४। उस ब्राह्मणका प्रोक्त चरित सुनकर तथा देखकर कितने ही लोग मुनिपदको प्राप्त हो गये और कितने ही श्रावक अवस्थाको प्राप्त हुए ॥१३५।। अग्निभूति और वायुभूति अपने पूर्वभव सुन बड़े लज्जित हुए। लोगोंने भी उन्हें बुरा कहा इसलिए वे चुप-चाप अपने घर चले गये। वहाँ माता-पिताने भी उनकी निन्दा की ॥१३६॥ रात्रिके समय सात्यकि मुनिराज कहीं एकान्तमे कायोत्सर्ग मुद्रासे स्थित थे सो उन्हे अग्निभूति और वायुभूति तलवार हाथमे ले मारना ही चाहते थे कि यक्षने उन्हें कील दिया जिससे वे तलवार उभारे हुए ज्योंके त्यों खड़े रह गये ।।१३७॥ प्रातःकाल होनेपर लोगांने मुनिराजके पास खड़े हुए उन दोनोंको देखा और 'ये वही निन्दित कार्यके करनेवाले पापी ब्राह्मण हैं। इस प्रकार कहकर उनकी निन्दा की ।।१३८।। अग्निभूति, वायुभूति सोचने लगे कि देखो, मुनिराजका यह कितना भारी प्रभाव है कि जिनके द्वारा अनायास ही कोले जाकर हम दोनों खम्भे-जैसी दशाको प्राप्त हुए हैं ॥१३९।। उन्होंने मनमे यह भी संकल्प किया कि यदि किसी तरह इस कष्टसे हम लोगोंका छुटकारा होता है तो हम अवश्य ही जिनधर्म धारण करेंगे क्योंकि उसकी सामर्थ्य हम इस तरह प्रत्यक्ष देख चुके हैं ।।१४।। उसी समय उनका कष्ट सुन उनके माता-पिता शीघ्र दौड़े आये और मुनिराजके चरणोंमे गिरकर उन्हें प्रसन्न करनेका उद्यम करने लगे ॥१४॥ करुणाके धारक मुनिराज अपना योग समाप्त कर सब विराजमान हुए तब उन्होंने यह सब क्षेत्रपालक द्वारा किया जान विनयपूर्वक बैठे क्षेत्रपालसे कहा कि-'यक्ष ! यह इनका अनीतिसं उत्पन्न दोष क्षमा कर दिया जाय । कर्मसे प्रेरित इन दोनों प्राणियोंपर दया करो ॥१४०-१४३।। इस प्रकार राजाओंकी आज्ञाके समान मुनिराजकी आजा प्राप्तकर 'जैमी आपकी आजा हो' यह कह क्षेत्रपालने दोनोंको छोड़ दिया ।।१४४॥ १. प्रासाद्य म०, ग० । २ यतिनी म०, ग.। ३ जियासी म०, ग०।

निचत्वारिंशः मगः ५२५ मुनिमामाय तो धर्म श्रुत्वा द्विविधम यतः । अणुव्रतानि मंगृह्य श्रावकत्वमुपागती ॥१४५॥ अनुपाल्य चिरं धर्म सम्यग्दर्शनमाविती । कालेन कालधर्मण जाती मौधर्मवामिनी ॥१४॥ अश्रद्धाय मतं जनं पितरी तु मृतो तयोः । जाती कुयोनिपान्या तौ यतो मिध्यात्वमाहिती ॥१७॥ देवी देवसुर भुक्वा च्युम्बाऽयोध्यानिवासिनः । जाती समुद्रदत्तस्य धारिण्यां श्रेष्टिनः सुतौ ॥१४८॥ पूर्णमद स्रायोज्य ष्ठा मणिभद्रोऽनुजोऽभवत् । अविराधितसम्यक्त्वा ती च शासनवत्सली ॥१४९॥ गुरोर्महेन्द्रमनाच धर्म श्रुत्वा पिताऽनयोः । तापुरेश्वरराजश्च मन्याश्चान्ये प्रवत्र जुः ॥१५॥ अन्यदा मुनिपूजार्थ रथेन प्रस्थिनी पुरः । चाण्डालं सारमेयी च ती दृष्ट्वा स्नहमागती ॥१५॥ चन्दिया सद्गुरुं भन्या पृच्छतःम्म सविस्मयो । शुनीचाण्डालयोः स्नेहः स्वामिना किमभूदिति॥१५२॥ गुरुराहावधिज्ञानज्ञातलोकत्रयस्थितिः । विप्रजन्मनि यो ती या पितरी ताविमा यतः ।।१५३॥ निशम्यमि गुरुं नत्वा गत्वा नो धर्ममुचनुः । भवान्तरकथा कयामायमुपशान्ता ततस्तकौ ॥१५४॥ निर्वेदी दीनतां त्यक्त्वा त्याबाहारं चतुविधम् । मासेन श्वपचो मृत्वा भून्या नन्दीश्वरोऽमरः ॥१५॥ मारमयों पुरऽय राजपुत्रिवमागताम् । प्रबोधयदमावत्य स्वयंवरगतां सतीम् ॥१५६॥ तदनन्तर मुनिराजके समीप आकर अग्निभूति, वायुभूतिने मुनि और श्रायकके भेदसे दो प्रकारका धर्मश्रवण किया और अणुव्रत धारण कर श्रावक पद प्राप्त किया ।।१४५।। सम्यग्दर्शनकी भावनासे युक्त दोनों ब्राह्मणपुत्र चिरकाल तक धर्मका पालन कर मृत्युको प्राप्त हो मोधर्म स्वर्गमे देव हुए ॥१४६।। उनके माता-पिताको जैनधर्मको श्रद्धा नहीं हुई इसलिए वे मिथ्यात्यसे मोहित हो मरकर कुगतिके पथिक हुए ॥१४७।। अग्निभूति, वायुभूतिके जीव जो मोधर्म म्बर्गम देव हुए थे, स्वर्गक मुग्य भोग, वहाँसे व्युन हुए और अयोध्या नगरीमे रहनेवाले समुद्रदत्त सेठकी धारिणी नामक स्त्रीसे पुत्र उत्पन्न हुए ॥१४८।। उनमें बड़े पुत्रका नाम पूर्णभद्र और छोटे पुत्र का नाम मणिभद्र था। दम पर्यायमे भी दोनोंने मम्यक्त्वको विराधना नहीं की थी तथा दोनों ही जिन-शामनसे स्नेह रसनेयाले थे ।।१४९।। तदनन्तर काल पाकर इन दोनोंके पिना, अयोध्याके राजा तथा अन्य भव्य जीवान महेन्द्रसेन गुम्से धर्म श्रवण कर जिन-दीक्षा धारण कर ली ।।१५० किमी ममय पूर्णभद्र और मणिभद्र, रथपर मवार हो मुनिपूजाके लिए नगरसे जा रहे थे मो थीचमे एक चाण्डाल तथा कुत्तीको देखकर स्नेहको प्राप्त हो गये ||१५मुनिराज पाम जाकर दोनोंने भक्तिपूर्वक उन्हे नमस्कार किया। तदनन्तर आश्चर्यसे युक्त हो उन्होंने पूछा कि है बामिन् ! कुत्ती और चाण्डालके ऊपर हम दोनोंको स्नेह किम कारण उत्पन्न हुआ ? ॥१५॥ अयधिज्ञानके द्वारा नीनों लोकांफी स्थितिको जाननयाले मुनिगजने कहा कि वादग- जन्मम तुम्हार जो माता-पिता ये वे ही ये कुनी और चाण्डाल हुए हैं मो पर्यभव कारण इनपर तुम्हाग म्नेह हुआई ॥ १५३ ।। इम प्रकार मुनकर तथा मुनिगजको नममारकर दोनों भाई कुत्ती और चाण्डालर पाम पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने उन दोनोंको धर्मका उपदेश दिया तथा पूर्वभवको कथा मुनायो जिममे ये दोनों ही गान्त हो गये ।।१५।। पाण्डालने मंमारमे विग्न हो दीनना छोड़ चारों प्रकार आहारया त्याग कर दिया और एक माहरा मंन्याम ले माफर नन्दीभ्यर द्वीपमें देय हुआ।। १९५५ ।। गुनी मी नगग्में गजाकी पुत्री हुई। इधर गजपुत्रीका म्ययंवर हो रहा था। जिम ममय या म्ययंवरमें ग्धिन यी उमी ममय पूर्वोक्न नन्दीयर देयन आरुर उमे मम्बोधा ।। १५६ ।। जिसमें १ पाओम., ग.. - ५२४ हरिवंगपुराणे अनादौ मवकान्तारं महामोहान्धरित । भ्रमतो में मुने ! जाती बन्धुस्त्वं मार्गदर्शनः ॥१३॥ प्रमीद भगवन् ! दीक्षां देहि दैगम्वरीमिति । प्रसाद गुस्मामाघ जग्राहानुमतां सताम् ॥१३॥ चरितं तस्य विमस्य श्रुत्वा दृष्ट्वा च तादृशम् । श्रामण्यं केचिदापनाः केचित् श्रावकता पराम् ॥१५॥ ताबग्निवायुभूती नु विलक्षी लोकहिती । स्वनितं पुनयांना पितृभ्यामपि निन्दितां ॥१३६॥ कार्यान्सर्गस्थितं रात्रौ मुनिमकान्तरत्तिनम् । जिघांमू सद्गहम्ना ना यक्षेण स्तम्भिनी स्थिना ॥१३॥ प्रमाते च जनो दृष्ट्वा तो यतः पार्श्वयोः स्थिता । निनिन्द निन्दिताचा तातो पानकाविति ॥ १३८॥ तावचिन्तयतां माधाः प्रभावोऽयमही महान् । ग्रावामयलतो यन स्तम्मिती स्तम्भतां गती ॥ १३९॥ कथञ्चिद् यदि मोक्षः म्यादस्माकं कृच्छ्नोऽमुतः । जिनधर्म प्रपरस्यामो दृएमामयमियपि ॥१४॥ तावत्तद्व्यमनं श्रुन्या पिनरी शीघ्रमागतां । पादलगा मुनि त ती प्रमादयितुमुद्यनी ॥१४॥ करुणाबानसौ योगी योग संहृन्य सुस्थितः । क्षेत्रपाल कृतं मावा तमाह विनयस्थितम् ॥१४२॥ क्षम्यतां यक्ष ! दापोऽयमनयोरनयोद्भवः । कर्मप्रेरितयोः प्रायः कुरु कारण्यमगिनीः ॥१४३॥ : हत्यामाध मुनेराजा राजामिव नियोगतः । यथाऽऽडापयसीत्युक्त्या विसमज स तदा ॥१४४॥ - है ॥१३२।। महामोहरूपी अन्धकारसे व्याप्त इस अनादि संसार-अटवीमें भ्रमण करते हुए मुझे आपने सच्चा मार्ग दिखलाया है इमलिए हे मुनिराज ! आप ही मेरे बन्धु हैं ।।१३३।। हे भगवन् । प्रसन्न होडए और मुझे दैगम्बरी दीमा दीजिए।' इस प्रकार गुरुको प्रसन्न कर तथा उनके निकट आ उम गूंगे ब्राह्मणने मत्पुरुपोंके लिए इष्ट दैगम्बरी दीक्षा धारण कर ली ॥१३४।। उस ब्राह्मणका पूर्वोक्त चरित सुनकर तथा देखकर कितने ही लोग मुनिपदको प्राम हो गये और कितने ही श्रावक अवस्थाको प्राप्त हुए ।।१३५।। अग्निभूति और वायुभूति अपने पूर्वभव भुन बड़े लज्जित हुए। लोगोंने भी उन्हें बुरा कहा इसलिए वे चुप-चाप अपने घर चले गये। बहाँ माता-पिताने भी उनकी निन्दा की ॥१३६।। रात्रिक समय मात्यकि मुनिराज कहीं एकान्तमें कायोत्सर्ग मुद्रासे स्थित थे सो उन्हे अग्निभूति और वायुभूति तलवार हाथमे ले मारना ही चाहते थे कि यक्षने उन्हें कील दिया जिससे वे तलवार उभारे हुए ज्योंके-त्यों खड़े रह गये ॥१३७॥ प्रातःकाल होनेपर लोगाने मुनिराजके पास खड़े हुए उन दोनोंको देखा और 'ये वही निन्दित कार्यके करनेवाले पापी ब्राह्मण है' इस प्रकार कहकर उनको निन्दा की ॥१३८॥ अग्निभूति, वायुभूति सोचने लगे कि देखो, मुनिराजका यह कितना भारी प्रभाव है कि जिनके द्वारा अनायास ही कीले जाकर हम दोनो खम्भ-जैमी दयाको प्राप्त हुए है ॥१३९।। उन्होंने मनमे यह भी संकल्प किया कि यदि किमी तरह इस कष्टसे हम लोगांका छुटकारा होता है तो हम अवश्य ही जिनधर्म धारण करेंगे क्योंकि उसकी सामर्थ्य हम इस तरह प्रत्यक्ष देख चुके हैं ।।१४।। उसी समय उनका क्ट सुन उनके माता-पिता शीघ्र दौड़े आये और मुनिराजके चरणोमे गिरकर उन्हें प्रसन्न करनेका उद्यम करने लगे ॥१४१।। करुणाके धारक मुनिराज अपना योग समाप्त कर जब विराजमान हुए तब उन्होंने यह मब क्षेत्रपालके द्वारा किया जान विनयपूर्वक बैठे क्षेत्रपालसे कहा कि 'यक्ष ! यह इनका अनातिसे उत्पन्न दोप क्षमा कर दिया जाय । कर्मसे प्रेरित इन दोनों प्राणियोंपर दया करो' ।।१४२-१४३।। इस प्रकार राजाआकी आज्ञाके समान - मुनिराजको आज्ञा प्राप्तकर 'जैसी आपकी आजा हो' यह कह क्षेत्रपालने दोनोंको छोड़ दिया ।।१४४॥ १. प्रासाद्य म०, ग० । २. यत्तिनी म०, गः। ३. जिघास मा, ग.।

विचमारिंशः सर्ग. चन्द्राभायंगसंजालविकासस्य मुगन्धिताम् । कुमुद्राकरराजस्य पङ्कगन्धो न बाधनं ॥१६९।। इति मंचित्य रागान्धः म तस्या हरणे मनः। न्यधत्त मधुम्बाशो मतिमानपि मान्यपि ॥१७॥ नता भीमरमुवृत्तं बगीकृत्य कृती मधुः । अयोध्यापुरमागत्य चन्द्रामाहतमानमः ॥११॥ मान्तःपुरान् स्वमामन्तान् स्थपुरं म्पुरम्थिनान् । मत्वरं सत्त्वसम्पन्नः ममाहूय यथायथम् ॥१७२।। मर्गन संपूज्य मंपूज्य विचित्राम्वरभूषणः । विमम निजावामान् प्रमादाह्रादिनाननान ॥१७॥ अतिसंमान्य मम्री तथा वटपुरेश्वरम् । अजीगमदनिनीनं प्रोनिपूर्व निजाम्पदम् ॥१४॥ चन्द्रामायास्नु यद् योग्यमद्याप्यामरणं परम् । न मजमिनि नाल्मा तेन रुधा निजीकृना ॥१७॥ प्रभुन्चमविलम्रीणां महादेवीपदेन सः । दत्वा कामान् यथारामं न्ययन नया मधुः ॥१७६॥ नस्याः कौमारमत्ता न वियोगानलीपितः । उन्मत्तता परां प्राप्तः पर्यटन् क्षिनिमाकुलः ॥१७॥ “चन्द्राभालापवात्तिः पुररथ्यामु पयंटन् । धूमरो वीक्षितो जानु प्रामादस्थितया तया ॥१७८॥ जानकारण्ययामाथि मधुराजस्ततोऽनया । नाथ ! पूर्वपतिं पश्य भ्रमन्तं मे प्रलापिनम् ॥१७९॥ तम्मिलवसर चाईम्तैः कश्चित्पारदारिकः । गृहीच्या दर्शिनम्नस्मै नृपाय न्यायवेदिने ॥१०॥ किमही देवदण्डोऽभ्य तेनीनं सोऽपराधान् । अन्यन्तपापभागेप तस्मादम्य विधीयते ॥१८॥ चन्द्रिका मंगसे विकमित कुमुदवनकी मुगन्धिको कीचड़की दुर्गन्ध नष्ट नहीं कर मकनी उसी प्रकार चन्द्रामा मंगसे प्रफुल्लिन मेरी कीर्तिको अपवादरूपी कीचड़की दुर्गन्ध नष्ट नहीं कर मकेगी ।।१६।। गजा मधु यद्यपि बहुन बुद्धिमान और अभिमानी था तथापि रागसे अन्धा होने के कारण उसने उक्त विचारकर चन्द्राभाके हरण करने में अपना मन लगाया-उमके हग्नेका मनमें पक्का निश्चय कर लिया ॥१७॥ तदनन्तर उन्हल गजा भीमकको वाकर कृतकृत्य होता हुआ गजा मधु अयोध्या नगरीमें वापिस आ गया। यहाँ चूंकि चन्द्राभाके द्वाग उमका मन हग गया था इमलिए 'उमने बड़े उत्माहस युक्त हो अपने ममस्त मामन्तोंको अपनी-अपनी स्त्रियों के माथ शीघ्र ही अपने नगरमें बुलाया और यथायोग्य नाना प्रकारके वस्त्राभूपणोंसे मबका मत्कारकर उन्हें अपने-अपने घर विदा कर दिया । म्यामीके द्वारा यह मत्कार प्रामकर मयके मुग्य प्रमन्नतामे विकमित हो रहे थे। वटपुरका गला योग्मेन भी अपनी स्त्री चन्द्राभा माथ यहाँ आया था मो गजा मधुने उमका बहन भारी मत्कार कर उसे यह कहकर अपने घरके लिए विटा कर दिया कि चन्द्राभाके योग्य आभूपण अभी तक तैयार नहीं हो सके हैं टमलिए तैयार होनेपर भेज देंगे। भोला-भाला वीरसेन चला गया और चन्द्राभाको रोककर राजा मधुने अपनी स्त्री बना ली। महादेवीका पद देकर उमने चन्द्राभाको ममम्न स्त्रियांका प्रभुन्य प्रदान दिया। इस प्रकार यह उम माथ मनचाहे भोग भोगने लगा ।।१७१-१७३।। इधर चन्द्राभाका पहलेका पति उमको विग्हरूपी अग्निसे प्रदीम हो अत्यधिक उन्मननारो प्राप्त हो पृथि पर बढ़ी व्यग्रनामे इधर-उधर घूमने लगा ।।१७७। एक दिन यह 'चन्द्रामा चन्द्रामा' इस प्रकार आलापको वानामे दुग्गी हुआ धूलि-धूमग्नि हो नगरको गलियोंमें घूम रहा था कि महलपर गड़ी चन्द्राभाने उमे देख लिया ।। १७८ ॥ देयते ही पं. माय उन दयमे दया उमड़ आयी। उसने पाम ही बैठे गजा मधुमे कहा कि हे नाथ ! ग्यो या भेग पूर्व पनि फैमा प्रलाप करना हुआ घूम रहा है ।।१७।। उमी अयमरपर कुछ ब्रा फर्मचाग्यिाने पाम्बामयन यग्नेयाने पिमा पुरुषको पकड़कर न्यायर बना गजा मधुके लिए निम्माया और कहा कि हदय ! इमर लिए यौन-मा दण्ट योग्य ' गजा मधुने उनर दिया कि यह अपगधी अत्यन्न पापी इमलिए मर्ग काय. १पनाएर म., म.। २.रिनिम.!

५२६ हरिवंशपुराणे ज्ञातसंसारनिःसारा सम्यक्त्वपरिभाविता । सितैकवसना कन्या प्रावजन्नवयौवना ॥१५॥ अनुष्ठाय चिरं श्रेष्टं श्रावकवतमुत्तमम् । संलिख्य भ्रातरौ जातो सौधर्म सुरसत्तमौ ॥१५॥ च्युत्या पुनरयोध्यायां हमनामस्य भूपतेः । धरावत्या सुतौ भूतो मधुकैटमनामको ॥१५९॥ अमिपिच्य मधु राज्य यौवराज्य च कैटमम् । हेमनाभो महामागो व्रतं जैनेन्द्रमग्रहीत् ॥१६॥ मधुकैटमवीरौ तावकारी धरातले । भूतावद्भुततेजस्को सूर्याचन्द्रमसाविध ॥१६॥ अक्षुण्णः क्षुद्रमामन्तैरन्धकार इचतयोः । गिरिदुर्गमुपाश्रित्य भीमकः प्रत्यवस्थितः ॥१६२॥ तहीकरणाथ नौ चेलतुर्मधुकैटमी ! प्राप्तौ वटपुरं यत्र वीरसेनोऽयविष्ठते ॥१६३॥ अभ्युद्गतेन तेनासौ प्रीतेन मधुरादरात् । सान्तःपुरण वीरेण स्वामिभवस्यानिमानितः ॥१६४॥ चन्द्रामा चन्द्रिकवाऽस्य मानिनी रूपमानिनी । अहरन्मधुराजस्य मनी मधुरभापिणी ॥१६५॥ शस्त्रशासकठोराऽपि चन्द्रामादर्शनान्मधीः । आईभावमगाद् बुद्धिश्चन्द्रकान्तशिला यथा ॥१६६॥ राज्यं यदनया युक्त रूपसौमाग्ययुक्तया । सुसाय तदहं मन्ये वियुक्तं तु विपोपमम् ॥१६७।। चन्द्रामयोपगृढस्य महोदयमहीभृतः । सम्पूर्णस्यय चन्द्रस्य कलङ्कोऽयतिशोमते ॥१६॥ संसारको असार जान सम्यक्त्वकी भावनासे युक्त उस नवयौवनवती राजपुत्रीने एक सफेद साड़ीका परिग्रह रख आर्यिकाकी दीक्षा ली ॥१५७।। पूर्णभद्र और मणिभद्र नामक दोनों भाई चिरकाल. तक श्रावकके उत्तम एवं श्रेष्ठ व्रतका पालन कर अन्तमे सल्लेखना-द्वारा सौधर्म स्वर्गमे उत्तम देव हुए ॥१५८।। पश्चात् स्वर्गसे च्युत होकर अयोध्या नगरोके राजा हेमनाभी धरावती रानीमें मधु और कैटभ नामक पुत्र हुए ॥१५९॥ तदनन्तर किसी दिन राज्यगद्दीपर मधुका और युवराजपदपर, कैटभका अभिषेक कर महानुभाव राजा हेमनाभने जिनदीमा धारण कर ली ॥१६०॥)- मधु और कैटभ पृथिवीतलपर अद्वितीय वीर हुए। वे दोनों सूर्य और चन्द्रमाके समान अद्भुत तेज धारक थे ॥१६॥ तदनन्तर जो क्षुद्र सामन्तोंक द्वारा वशमें नहीं किया जा सका था ऐसा अन्धकारके समान भयंकर भीमक नामका एक राजा पहाड़ी दुर्गका आश्रय पा मधु और कैटभके विरुद्ध खड़ा हुआ सो उसे वश करनेके लिए दोनों भाई चले। चलते-चलते वे उस घटपुर नगरमे पहुँचे जहाँ वीरसेन राजा रहता था ॥१६२-१६३॥ प्रसन्नतासे युक्त राजा वीरसेनने सम्मुस आकर बड़े आदरसे मधुकी अगवानी की और स्वामि-भक्तिसे प्रेरित हो अपने अन्त:- पुरके माथ उमका खूब सम्मान किया॥१६४।। राजा वीरसेनकी एक चन्द्राभा नामकी स्त्री थी जो चन्द्रिकाके समान सुन्दर और मानवती थी। मधुर-मधुर भापण करनेवाली उस चन्द्राभाने राजा मधुका मन हर लिया ।।१६५|| जिस प्रकार अत्यन्त कठोर चन्द्रकान्तमणि- की शिला, चन्द्रमाको देखनेसे, आईभावको प्राप्त हो जाती है उसी प्रकार शस्त्र और शास्त्रोके अभ्याससे अत्यन्त कठोर होनेपर भी मधु राजाकी बुद्धि चन्द्राभाको देखने से आईभावको प्राम हो गयी ।।१६।। वह विचार करने लगा कि जो राज्य, रूप और मौभाग्यसे युक्त इस चन्दाभागे महिन है उसे ही मैं मुग्यका कारण मानना हूँ और इमसे रहित राज्यको विपके ममान समझता हूँ ॥१६॥ जिम प्रकार पूर्ण चन्द्रमाका कलङ्क भी मुशोभित होता है उसी. प्रकार चन्द्राभाके द्वारा आलिङ्गित मुद्रा गजाधिराजका कलङ्क, भी शोभा देगा । भावार्थ- परम्नांश मम्पको यद्यपि मेग अपवाद होगा-मै फली कहलाऊंगा नधापि चन्द्रमा कलक ममान मंग यह कला शोभाका ही कारण होगा ॥ १६८ ।। जिस प्रकार १ गल्लेपना कृता । २. अतुद्र म०, ग ।

विचवारिंशः मगः मुवास्तु मनोहस्ती नपामयरणक्षिती । पापसेनां निगृहानि माध्वाधारणनोदिनः ॥१९६॥ शब्दरूपरसस्पर्शगन्धयस्यामिलापिणः । हृषीकमृगयूथम्य मनोमारनहारिणः ॥१९७॥ निरध्य प्रमभं धयं दृढवागुरया चितम् । चिरमंचितपापस्य करोमि तपमा क्षयम् ॥१९॥ इत्यामाप्य मनोवेगं निगृह्य विदधे मधुः । धियं वधिपयोधानां तापस्य तापशान्तयं ॥१९॥ आगन्य च तदाऽयोध्यां नाना विमलवाहनः । मुनिमुनिसहमेण महसाम्रवनेऽप्रमत् ॥२०॥ मयुः सर्कटमः श्रुत्वा नमयात्मवधूजनः । प्रपूज्य विधिना धर्म शुभ्राय च विशेषतः ॥२०१॥ भोगसंमारशारीरपुरवराग्यमंगनः । प्रयवान मह प्रात्रा अनियवहुमिमंधुः ॥२०२।। विशुद्धान्वयमम्भूनाः शतशोऽथ सहनमः । प्रावजन् व्रतशीलायाश्चन्द्रामाद्या नृपस्त्रियः ॥२०॥ माधवोऽपि निजं राज्यं ररक्ष कुलवर्धनः । वर्धमानः शरीरण पारंषण जयन च ॥२०॥ चातुम्ती नपा धोरं राजाना मधुकैटमी । वनगुप्तिममिन्यायो निग्रंन्यो ग्रन्थवर्जिनी ॥२०५॥ एक एव तयोरामीढङ्गोपाङ्गपरिग्रहः । न बायाभ्यन्तरामंगादगोपाङ्गपरिग्रहः ॥२०६॥ पधाष्टमादिपण्मामपर्यन्तोपोपिनाथषी । निःशेपैरागमातस्तो चक्रनुः कर्मनिराम् ॥२०७॥ उत्तुङ्गगिरिशृङ्गेषु तयोरातापनस्थयोः । स्वेदस्य विन्दवः पेनुविलीनस्यैव कर्मणः ॥२०॥ वर्षामु जीवरक्षार्थ वृक्षमूलस्थयोर्वपुः । युधीव 'शरधारामिन भिन्नं पृतिकण्टकम् ॥२०९॥ इमके विपरीत अच्छी तरह वशमें किया हुआ मनरूपी हाथी, माधुरूपी महावनके द्वारा प्रेरित हो तपम्पी रणभूमिमे पापरूपी सेनाको अच्छी तरह रोक लेता है ॥१९६।। शब्द, रूप, रम, पर्श और गन्धरूपी धान्यकी अभिलापा रखनेवाले एयं मनरूपी वायुमे प्रेरित हो चौकड़ी भरनेवाले इम इन्द्रियरूपी मृगोंके झुण्डके मंचित धैर्यको ध्यानरूपी मजबूत जालसे जबरदस्ती रोककर मैं तपके द्वारा चिरसंचित पापका अभी हाल भय करता हूँ ।।१०७-१९.८।। इस प्रकार कहकर तथा मनके बेगको रोककर राजा मधुने ज्ञानम्पी जलसे धुली हुई अपनी बुद्धिको मंतापको शान्ति के लिए तपश्चरणमें लगाया ॥१९९|| उमी ममय विमलवाहन नामक मुनिराज एक हजार मुनियों के माथ अयोध्या नगरी- में आकर उमके महम्राम्रवनमे ठहर गये ॥२००|| मुनियोंके आगमनका ममाचार सुन गजा मधु, अपने छोटे भाई कैटभ और स्त्रीजनांके माथ उनके दर्शन करनेके लिए गया। विधिपूर्वक उनकी पूजा कर उसने विशेष रूपसे धर्मश्रवण किया ।।२०।। तथा भोग, मंमार, शारीरिक मुख एवं नगर आदिसे विग्न हो उमने भाई केटम तथा अन्य अनेक क्षत्रियों के माथ जिन-दीक्षा ले ली ॥२०॥ विशुद्ध कुलमें उत्पन्न तथा व्रत और शीलसे युक्त चन्द्रामा आदि मैकड़ों हजारों गनियाँ भी दीक्षित हो गयीं-आर्यिका यन गयीं ॥२०३॥ गजा मधुके बाद उसका पुत्र कुलवर्धन, जो अर्गर, पुस्पार्थ तथा विजयमे निरन्तर बढ रहा था अपने फुलकी रक्षा करने लगा ॥२०४|| गजा मधु और कैटभ घोर तप करने लगे। वे वन गुमि और ममिनिसे युक्त थे नथा परिप्रहमे रहिन निर्गन्ध-मुनिराज थे ॥२०५॥ उम ममय उन दोनोंके एक अनोपान ही परिग्रह था अथवा याद्य और आभ्यन्तर आमनिका अभाव होनेमे अगोपाग भी परिग्रह नहीं था ॥२६॥ ये दोनों मुनि घेला तेलाको आदि लेकर छह-छह माहक उपवाम करते थे और आगममें प्रतिपादिन ममम्न आचरणोंसे कोफी निर्जग करते थे ।।२०। जब कभी के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ोंकी चोटियांपर आनापन योग लेकर विराजमान होते थे नय उनके दार्गरसे पानाकी बूंदे टपरने लगती थीं और "मी जान पड़नी थीं मानो कर्म ही गल-गल कर नीचे गिर रहे हो ॥२८॥ वर्षाऋतुम जीवांकी रक्षाके लिए वे बिहार बन्द कर पृलोके , जलधागमिः पदे वाणधागभिः । २. धैर्य क्यनयुनम् ।

५२८ हरिवंशपुराणे हस्तपादशिरच्छे देहदण्डं भयास्पदम् । देव्या चोतं तदा देव ! अयं दोषो न कि तब ॥१८२॥ 'तद्वचमा स म्लानी हि हिमानीहतपद्मवत् । चिन्तयेदनया तध्यं ममोनं हितमिच्छया ॥१८३॥ परस्त्रीहरणं मत्यं दुर्गतेदुःखकारणम् । जान्या विरागिणं कान्तमूचे मापि विरागिणी ॥१८॥ कि मोगरीदृशैः कृत्यं परस्त्रीविषयः प्रमो। किपाकपदृशैः स्वामिन् ! दुःपदैः प्रीणकैरपि ॥१४५॥ मोगास्ते स्वपरयायें नोपनापस्य हेतवः । सम्मताः साधुलोकस्य नेतर विषयामकाः ॥ १८६॥ इति प्रबोध्यमानोऽयं मधुश्चन्द्रामया शनैः। मुमोच सुदृढीभूनं मोहकादम्बरीमदम् ॥१८७॥ जगाद च स तां देवी प्रसन्नमतिरादरात् । साधु ! माधु ! वया माधि ! प्रतिपादितमन्त्र में ।। १८८॥ न युनमीदृशं कर्म पुंसामाचरितु मताम् । परपीडांकरं वाढं परनेह च पापकृत् ॥१८९॥ मादृक्षोऽपि यदीदक्षं कर्म लोकविगहितम् । करोति तत्र किं वाच्यमव्युत्पमः पृथग्जनः ॥१९०॥ स्त्रकलत्रेऽपि यत्राऽयं रागोऽन्यर्थ निषेवितः । कर्मवन्धस्य हेतुः स्यात् कि पुनः परयोषिति ॥१९॥ ज्ञानाशनिरूद्वोऽपि मनोमत्तमहाद्विपः । उत्पथेन नयत्युनः किमत्र कुरुते बुधः ॥१९२।। निरद्वय निशितैर्दण्डैरनकुशमनोगजम् । प्रवर्त्तयन्ति ये मागें केचिदेवात्र ते भटाः ॥१९३॥ दण्डैमनोगजी मत्तो रतिवामितया हृतः । यावन्न युज्यते तावत् कुतस्तस्य मदक्षतिः ॥१९४।। प्रयग्नेन मनोहस्ती यावन्नात्र वशीकृतः । तावदारोहकस्यापि मयायैव न शान्तये ॥१९५॥ पॉय तथा शिर काटकर इसे भयंकर शारीरिक दण्ड दिया जाये। देवी चन्द्राभाने उसी ममय कहा कि हे देव ! क्या यह अपराध आपने नहीं किया है ? आपने भी तो परस्त्री- हरणका अपराध किया है ।।१८०-२८२॥ चन्द्राभाके उक्त वचन सुनते ही राजा मधु तुपारसे पीड़ित कमलके ममान म्लान हो गया-उसके मुखकी कान्ति नष्ट हो गयी। वह विचार करने लगा कि मेरा हित चाहनेवाली इस चन्द्राभाने यह सत्य ही कहा है ।।१८।। सचमुच ही परस्त्रीहरण दुर्गतिके दुःखका कारण है। पतिको विरागी देख चन्द्राभाने भी विरक्त हो, कहा कि हे प्रभो! इन परस्त्रीविषयक भोगोंसे क्या प्रयोजन है ? हे नाथ ! ये भोग यद्यपि वर्तमानमें सुख पहुंचानेवाले हैं तथापि परिपाक कालमें किंपाक फलके ममान दुःखदायी हैं। मजन पुरुपोंको वे ही भोग इष्ट होते हैं जो निज और परके सन्तापके कारण नहीं हैं । अन्य विषय रूप भोगोंको सत्पुरप भोग नहीं मानते ।।१८४-२८६।। चन्द्राभाके द्वारा इस प्रकार समझाये जानेपर राजा मधुने धीरे-धीरे मोहरूपी मदिराके सुदृढ़ मदको छोड़ दिया ।।१८७। और बड़ी प्रसन्नतासे आदरपूर्वक उससे कहा कि ठीक, ठीक, हे मावि ! तुमने बहुत अच्छी बात कही ॥१८८।। यथार्थ में सत्पुरुपोंको ऐमा काम करना उचित नहीं जो परलोक तथा इस लोकमे दूमरोंको पीड़ा करनेवाला तथा पापको बढानेवाला हो ॥१८९|| जब मेरे जैसा प्रबुद्ध व्यक्ति भी ऐसा लोक-निन्द्य कार्य करता है तब अविवेकी माधारण मनुष्यकी तो यात ही क्या है ? ॥१९०।। जहाँ अपनी स्त्रीके विपयमें भी सेवन किया हुआ यह अत्यधिक गग कर्मबन्धका कारण है यहाँ परस्त्रीविषयक रागकी तो कथा ही क्या है ? ॥१९११। यह मनरूपी मदोन्मत्त महा हाथी ज्ञानरूपी अंकुलासे गेके जानेपर भी इम जीवको कुमार्गमें ले जाता है। यहाँ विद्वान क्या करे ? ॥१९॥ जो इम अनंयुश मनरूपी गजको तोष्ण दण्टोंमे रोककर सुमार्गमें ले जाते हैं ऐसे शूरवीर पुरुष मंमाग्में विलि ही हैं ॥१९३॥ रतिरूपी हस्तिनीक द्वागहरा हुआ यह मनरूपी मत्त हाथी जवनक इन्द्रिय-विजयम्पी दण्डांसे युक्त नहीं किया जाता है तबतक इमके मदका नाश+ फैसे हो सकता है ? ॥१०॥ यह मनरूपी हाथी जवनक प्रयत्नपूर्वक वामें नहीं किया गया है नयतक यह पदनेवालेके लिए भयका ही कारण रहता है, शान्तिका नहीं ॥१९५।। १. तदनमामन्यभो हिदेमन्ने पप्रवन्नृप. ग । मादिति: म. ग.।

त्रिचत्वारिंशः सर्गः मुवास्तु मनोहस्ती नपामयरणक्षितो । पापमेनां निगृह्णाति माम्बाधारणनोदितः ॥१९॥ शब्दस्परमस्पर्शगन्धमस्यामिलापिणः । हृषीकमृगयूथम्य मनोमारनहारिणः ॥ १९७॥ निरध्य प्रममं धयं दृढवागुरया चितम् । चिम्मचिनपापम्य करामि तपमा क्षयम् ॥१९॥ इन्यामाप्य मनोवेगं निगृह्य विदधे मधुः । धियं वोधपयांधानां तापस्य तापशान्तयं ॥१९९॥ आगन्य च तदाऽयोध्यां नाम्ना विमलबाहनः । मुनिमुनिमहयेण महमानवनेऽवमत् ॥२०॥ मधुः मकैटमः श्रुत्वा तमयान्सरयूजनः । प्रपूज्य रिधिना धर्म शुभार च विशेषतः ॥२०॥ भोगमंमारशारीरपुरवैराग्यमंगनः । प्रववान मह भ्रात्रा क्षत्रियवहुभिर्मधुः ॥२०२॥ विशुद्धान्वयसम्भूनाः शतशोऽथ महनगः। प्रायजन् व्रतशीलायाश्चन्द्रामाद्या नृपस्त्रियः ॥२०॥ माधवोऽपि निज राज्यं ररक्ष कुलवर्धनः । वर्धमानः शरीरेण पारपेण जयेन च ॥२०॥ चक्रतुम्ना तपी घोरं राजानी मधुकंटमौ । व्रनगुप्तिममिन्याच्या निर्ग्रन्यो ग्रन्यवर्जिनी ॥२०५॥ एक एव तयोरासीढङ्गोपाङ्गपरिग्रहः । न वाह्याभ्यन्तरामंगाढङ्गोपाङ्गपरिग्रहः ॥२०६॥ पष्टारमादिपण्मामपर्यन्तोपापिनाषी । निःशेषरागमोनस्ती चक्रतुः कर्मनिराम् ॥२०॥ उत्तुगगिरिशृङ्गेपु तयोरानापनस्थयोः । स्वेदस्य विन्दवः पनुविलीनस्यव कर्मणः ॥२०॥ वर्षामु जीवरक्षायं वृक्षमूलस्थयोरपुः । युधीव 'शरधारामिन मिजं निकण्टकम् ॥२०९।। इसके विपरीत अन्छी तरह वशमें किया हुआ मनरूपी हाथी, माधुरूपी महावनके द्वारा प्रेरिन हो तपरूपी रणभूमिमे पापम्पी सेनाको अन्छी तरह रोक लेना है ।।१९६॥ शब्द, रूप, रम, स्पर्श और गन्धरूपी धान्यकी अभिलापा रखनेवाले एवं मनरूपी बायुमे प्रेरित हो चौकड़ी भरनेवाले इम इन्द्रियरूपी मृगोंके झुण्डके मंचित धैर्यको ध्यानम्पी मजबूत जालसे जबरदस्ती रोककर मैं तपके द्वारा चिरमंचित पापका अभी हाल क्षय करता हूँ ।।१०७-१०.८।। इस प्रकार कहकर तथा मनके बेगको रोककर राजा मधुने ज्ञानम्पी जलसे धुली हुई अपनी बुद्धिको मंतापकी शान्ति के लिए तपश्चरणमें लगाया ॥१९९।। उमी ममय विमलयाहन नामक मुनिराज एक हजार मुनियोंके माथ अयोध्या नगरी- में आकर उमर महसाम्रवनमे ठहर गये २००|| मुनियोंके आगमनका ममाचार सुन गजा मधु, अपने छोटे भाई कैटभ और स्त्रीजनांक माथ उनके दर्शन करनेके लिए गया। विधिपूर्वक उनकी पूजा कर उमने विशेष रूपसे धर्मश्रयण किया ॥२०॥ नथा भोग, मंमार, शारीरिक मुम्ब एवं नगर आदिसे विरन हो उमने भाई कैटभ तथा अन्य अनेक भत्रियोंक माथ जिन-दीक्षा ले ली ।।२८॥ विशुद्ध कुलमें उत्पन्न तथा व्रत और शीलमे युक्त चन्द्राभा आदि मैण्ड़ों हजागें गनियाँ भी दीक्षित हो गयीं-आर्यिका बन गयीं ।।२०३॥ गजा मधुके बाद उसका पुत्र कुलवर्धन, जो शरीर, पुरुषार्थ नथा विजयमे निरन्तर यह रहा था अपने कुलकी रक्षा करने लगा | गता मधु और कैटभ घोर नप करने लगे। वे व्रत गुनि और ममिनिसे युग थे नथा परिणामे रहिन निर्गन्ध-मुनिगत थे ॥१५॥ उम ममय उन दोनों एक अनोपान ही परिणा था अधया वाघ और आभ्यन्तर आमनिका अभार होनेमे अनोपराह्न भी परिणा नहीं था ॥६॥ ये दोनों मुनि पला तेलाको आदि लेकर छह-छह माहो. उपयाम करते थे र आगममे प्रनिपादित ममन्न आग्णांमे कोरी निर्जग करते थे। जब कभी ये ऊँचे-ऊँचे पाहाहांग चोटियांपर आनापन योग लेकर विगतमान होते ये नय टनर मार्गरमे पर्माना यूंदै टपरने लगती थी और गमी जान पड़नी थीं मानो कर्म ही गल-गल कर नारे गिर Errer वर्णनुमें जीवोंकी मारे लिए ये विहार यन्न कर लाय. , भागनिः परेवाभाभिः । २.रयनयुगन् ।

हरिवंशपुराणे यामिनीपु मनापिन्या हेमनीपु हिमानिलाः । सहिर प्रतिमास्थाम्या देहरछायाम्जिनीप्नुपः ॥१०॥ धनुनेक्षाभिस्टामिर्धमंचारिग्रादिमिः । धातुः मेयर धोरी परोपहजयेन च ॥२३॥ स्वाध्यायध्यानयोगस्था बैन्यायापक्रियोपता । रसत्रयविशुद्धया सीटी इष्टान्तां गती ॥२२॥ बहुवर्षसहयाणि संचितोरतपोधनां । मधुकैटमयोगीमा शल्यदोपविवर्जिती ॥२१३॥ भन्दे सम्मंदमारय प्रायोपगमनेन ती । भामक्षपणयोगन समाराध्यौनिवारकी ॥२१॥ धारणाच्युतकच्ये तापिन्दसामानिश प्रभू । देवीदेवमहसाणां 'जाती प्रत्येकमीश्वरी ॥२१५॥ द्वाविंशतिपयोराशिममाणपरमायुपा । बुभुजाते मुग्मं सम्यक मम्यग्दर्शनमाविता ॥२१६॥ अवतीयं मधु तो रक्मिणीभिभूमणिः । कृष्णस्य भारत पुत्रों नाना प्रयुग्न इग्यमी ॥२१॥ कैटमोऽपि दिवश्प्युपाभ्रातास्यय भविष्यति । जाग्ययस्यां महादेग्यां शम्यः कृष्गनिमयुनिः ॥२१॥ जन्मान्तरमहाप्रीत्या परस्परहितोपती । धारी धरमदही ती शम्वप्रधुम्नमुन्दरी ॥२९॥ कान्ताविरहमन्तापादातध्यानपरायणः । भान्या संसारकान्तारं चिरं परपुरप्रमुः ॥२२०॥ मनुष्यभावमापनः म भूरवाजानतापमः । धूमनुरियोडीप्तो धूमानुरभूरमुः ॥२२॥ नीचे विराजमान रहते थे। उस समय धैर्यरूपी कवचको धारण करनेवाला उनका शरीर युद्धमें धाणोंकी पडितके समान जलकी धाराओंसे सण्डित नहीं होता था। भावार्थ वर्षा योगके समय वे वृक्षोंके नीचे बैठते थे और जलकी अविरल धाराओंको बड़े धैर्यके माथ महन करते थे ॥२८९॥ हेमन्त ऋतुकी रात्रियों में वे प्रतिमा योगसे विराजमान रहकर शरीर- की कान्तिरूपी कमलिनीको जलानेयाली तुपार वायुको बड़ी शान्तिसे सहन करते थे ॥२१॥ वे दोनों धीर, वीर, मुनिराज, उत्तम अनुप्रेक्षाओं, दशधों, चारित्रको शुद्धियों और परीपत् जयके द्वाग संवर करते थे ॥२११। वे स्वाध्याय, ध्यान तथा योगमें स्थित रहते थे, वैयावृत्त्यो, करनेमें उद्यत रहते थे और रत्नत्रयी विशुद्धताके द्वारा दृष्टान्तपनेको प्राप्त देखे गये थे ॥२१२।। इस प्रकार अनेक हजार वर्ष तक जिन्होंने तपरूपी विशाल धनका संचय किया था और जो शल्यरूपी दोपसे सदा दूर रहते थे ऐसे मधु और कैटभ मुनिराज अन्तमें सम्मेदाचलपर आरूढ़ हुए और वहाँ एक महीनेका प्रायोपगमनसंन्यास लेकर उन्होंने समाधिपूर्वक शरीरका त्याग किया ॥२१३-२१४|| शरीर त्यागकर वे आरण और अच्युत स्वर्ग में हजारों देव-देवियों के स्वामी इन्द्र और सामानिक देव हुए ।।२१५॥ वहाँ बाईस सागर प्रमाण उत्कृष्ट आयुको धारण करनेवाले वे दोनों सम्यग्दृष्टि देव स्वर्गके उत्तम सुखका उपभोग करने लगे ।।२१६।। उनमें जो मधुका जीव था वह स्वर्गसे न्युत हो भरत क्षेत्र में कृष्ण नारायणको रुक्मिणी रानीके उदररूपी भूमिका मणि वन प्रद्युम्न नामका पुत्र हुआ।॥२१७।। और जो कैटभका जीव था वह भी स्वर्गसे च्युत हो कृष्णकी जाम्बवती पट्टरानीमें कृष्णके समान कान्तिको धारण करनेवाला प्रद्युम्नका शम्ब नामका छोटा भाई होगा ।।२१८॥ प्रद्युम्न और शम्ब दोनों ही भाई अत्यन्त धीर वीर चरमशरीरी एवं सुन्दर थे और दूसरे जन्मसम्बन्धी महाप्रीति के कारण परस्पर एक दूसरेके हित करने में उद्यत रहते थे।।१९।। पटपुरका स्वामी राजा वीरमेन चन्द्राभाके विरहजन्य सन्तापसे आर्तध्यानमे तत्पर रहता हुआ चिर काल तक संसार रूपी अटवीमें भ्रमण करता रहा ।।२२०।। अन्तमें - मनुष्य पर्यायको प्राप्तकर वह अज्ञानी तापस हुआ और आयुके अन्तमें मरकर धूमकेतु- अग्निके समान प्रचण्ड धूमकेतु नामका देव हुआ ||२२|| ज्यों ही उसे पूर्वजन्मसम्बन्धी १ याती मः। , ५३१ विचवारितः मग. प्रास्त्रीवैरानुबन्धेन स प्रबोधमुपेयुपा । शिशुं व्ययोजयन्मात्रा धिग्वैरं पापवर्धनम् ।।२२२॥ प्रद्युम्नी रमितोऽपायास्वपुण्यः पूर्वसंचितः । पुण्यानामर मामय्यंमपायपरिरक्षणे ॥२२॥ मीमन्धरजिनेन्द्रेण तदानीमिति माषितम् । श्रुग पभरथवक्री प्रणनाम प्रमोदयान् ॥२२४॥ नारदोऽपि जिनं नया प्रमोइन वशीकृतः । समुन्पग्य मल्माण मेघ ममायया ॥२२५॥ कालमयरमानन्ध पुत्रलाभारसवेन मः । देवों कनक्रमालां च स्नुररा पुत्ररतीं मुहुः ॥२२६८ रक्मिण्यास्तनुजं दृष्ट्वा कुमारशवसेवितम् । गूदवृत्तप्रमोदन रोमाजममजपरम् ॥२२७॥ प्रणामनाचिंतस्तेषां दत्त्वाशिपमतिदुनम् । वियदुन्पत्य संप्राप्तो द्वारिकां नारदो मुनिः ॥२२८॥ यथागतं यथादृष्टं यथाध्रुवमशेषतः । स प्रद्युम्नकयां कृत्वा यादवेभ्यो मुदं ददौ ॥२२९॥ देवी च रक्मिणी दृष्ट्वा विकामिमुग्वपङ्कजः । मीमन्धरजिनेन्द्रोक्त प्रतिपाद्य पुनजंगी ॥२३०॥ दृष्टी रस्मिणि ते पुत्रो मया फ्रीडन् कुमारकः । पचरंशगृह देवकुमार इन स्परान् ॥२३॥ लब्धपोशालामाऽयं कृतमज्ञप्तिसंग्रहः । अमोघं पोडशे वर्षे ममप्यनि मुनस्तव ॥२३२॥ 'मस्यागमनवेलायामुद्याने नव रुक्मिणि । शिवी जिप्यतेऽन्युचरकाले प्रियसूचनः ॥२३३॥ शुष्का नद्गनवैलायामुद्यानर्माणयापिका । सुनागमनवेलायां पूर्यते साम्बुजाम्बुना ॥२३४॥ भव शोकापनादाय शोकापनुदसूचकः । अशोकः पादपोऽकाले मुञ्चन्यकुरपहयान् ।।२३ ॥ घरका स्मरण आया त्यों ही उमने बालक प्रद्युम्नको मातासे वियुक्त कर दिया मो आचार्य कहते हैं कि पापको बढ़ानेवाले इस वैर-भावको धिक्कार है ।२२|| अपने पूर्व-संचित पुण्यने प्रद्युम्नकी मृत्युसे रक्षा का सो ठीक ही है, क्योंकि अपायसे रक्षा करने में पुण्यकी ही मामर्थ्य कारण है ।।२२३|| इस प्रकार उस ममय मीमन्धर जिनेन्द्रके द्वारा प्रतिपादित प्रद्युम्नका चरित श्रवण कर चक्रवर्ती राजा पद्मरथने बड़ी प्रसन्नतासे जिनेन्द्र भगवानको प्रणाम किया ।।२२४॥ इधर आनन्दके, वशीभूत हुए नारद, सीमन्धर जिनेन्द्र को नमस्कार कर आकाश- मार्गमें जा उड़े और मेघफूट नामक पर्वतपर आ पहुँचे ।।२५।। यहाँ पुत्रलाभके उत्मयसे नारदने कालमंयर राजाका अभिनन्दन किया नया पुत्रपती कनकमाला नामकी देवीकी म्नुनि को २२६|| सैकड़ों कुमार जिमकी सेवा कर रहे थे ऐसे मक्मिणी-पुत्रको देख नारदको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे प्रसन्नता वेगको मनमे छिपाये हुए परम रोमाञ्चंको प्राप्त हुए १२मा कालमंत्रर आदिने नमस्कार कर नारदका मम्मान किया। तदनन्तर आशीर्वाद देकर वे बहुत ही शान आकाश में उड़कर द्वारिका आ पहुँचे IR२८|| यहाँ आकर जिस प्रकार गये, जिस प्रकार देगा और जिम प्रकार मुना वह मय प्रकट कर नारदन प्रद्युम्नको कथा कर यादयोंक दिए हर्ष प्रदान किया ।R|| नदनन्तर जिनका मुग्पकमल ग्विल रहा था ऐस नारदने गक्मिणी रानीको देसकर उसे मीमन्धर जिनेन्द्र के द्वारा कहा सब ममाचार फड मुनाया ॥२३|| अन्तमें उन्होंने कहा कि मम्मिणि! मैन विद्याधरोंक राजा फाल. मंयक पर फीडा करता हुआ नुम्हाग पुत्र देखा है। यह देययुमारके समान अत्यन्न पयान है ।।२३। सोलह लामाको प्रामकर तथा प्रामिविपाका मंप्रदकर तुम्हारा यह पुत्र मोलहवें वर्ष में अवश्य ही आवेगा ।२३२॥ है गरिमणि ! अब उमफे आनेका समय होगा तय तेरे उद्यानमें अममयमें ही मिय ममायारको सूचित करनेयाला मयूर अत्यन्त उच्च स्वरमे शब्द फरने लगेगा ॥२३३) तेरे उमानम जो मणिमयी यापिका मम्मी पड़ी है यह उमपं. आगमनके ममय कमलांमे मुशामिन उलमे भर जायेगी दशा तुम्हारा शोक दूर करनेके लिए, शोक दूर होने का मुचना देने- .मुदागमन ब..!

हरिवंशपुराणे यामिनीपु मनीपिभ्यां हैमनीपु हिमानिलाः । महिर प्रतिमास्थाभ्यां देहरछायाम्जिनीप्लुपः ।।२१०॥ अनुप्रेक्षामिद्धामिर्धमंचारित्रशुद्धिमिः । चक्रतुः संघरं धौरी परीपहजयेन च ॥२१॥ स्वाध्यायध्यानयोगस्था पैरयावृत्यप्रियोपती । समययिशुद्धया तो स्टा स्टान्तनां गनी ॥२२॥ बहुवर्षसहमाणि पंचितोरनपोधनी । मधुकैटमयोगशी सल्यदोपविवर्जिती ॥२१३॥ अन्ते सम्मेदमारा प्रायोपगमनेन तौ । मामक्षपणयोगेन समाराध्योजिाताहका ॥२१॥ भारणाच्युतकल्पे ताविन्द्रसामानिकी प्रभू । देवीदेवसहस्राणां 'जाती प्रयकमीश्वरी ॥२१५॥ द्वाविंशतिपयोराशिप्रमाणपरमायुपा । भुजात सुखं सम्यक् सम्यग्दर्शनमाविती ॥२६॥ अवीर्य मधुर्जातो रक्मिणीकुक्षि भूमणिः । कृष्णस्य मारते पुनो नामा प्रद्युम्न हत्यमा ॥२१७॥ कैटमोऽपि दिवश्व्युत्या धातास्यैव भविष्यनि । जाम्बवरयां महादेग्यो शम्या कृष्गनिमयुतिः ॥२१॥ जन्मान्तरमहाप्रीत्या परस्परहितोद्यता । धीरो चरमदेही तो शम्वप्रद्युम्नसुन्दरी ॥२१९॥ कान्ताविरहसन्तापादातध्यानपरायणः । भान्या संसारकान्तारं चिरं वटपुरप्रभुः ॥२२०॥ मनुप्यमावमापसः स भूरवाज्ञानतापमः । धूमकनुरिवोडीप्तो धूमरेनुरभूरसुरः ॥२२१॥ नीचे विराजमान रहते थे। उस समय धैर्यरूपी कवचको धारण करनेवाला उनका शरीर युद्ध में वाणोंकी पडिक्तके समान जलकी धाराओंसे खण्डित नहीं होता था। भावार्थ-वर्पा योगके समय वे वृक्षों के नीचे बैठते थे और जलको अविरल धाराओंको बड़े धेयके साथ सहन करते थे ॥२०९॥ हेमन्त ऋतुकी रात्रियों में वे प्रतिमा योगसे विराजमान रहकर शरीर- की कान्तिरूपी कमलिनीको जलानेवाली तुपार वायुको धड़ी शान्तिसे सहन करते थे ।।२१०।। वे दोनों धीर, वीर, मुनिराज, उत्तम अनुप्रेक्षाओं, दशधों, चारित्रको शुद्धियों और परीपह जयके द्वारा संवर करते थे ॥२१शा वे स्वाध्याय, ध्यान तथा योगमें स्थित रहते थे, वैयावृत्त्य करनेमें उद्यत रहते थे और रत्नत्रयको विशुद्धताके द्वारा दृष्टान्तपनको प्राप देखे गये थे ॥२१२।। इस प्रकार अनेक हजार वर्ष तक जिन्होंने तपरूपी विशाल धनका संचय किया था और जो शल्यरूपी दोपसे सदा दूर रहते थे ऐसे मधु और कैटभ मुनिराज अन्तमें सम्मेदाचलपर आरूढ हुए और वहाँ एक महीनेका प्रायोपगमनसंन्यास लेकर उन्होंने समाधिपूर्वक शरीरका त्याग किया ।।२१३-२१४ा शरीर त्यागकर वे आरण और अच्युत स्वर्ग में हजारों देव देवियोंके स्वामी इन्द्र और सामानिक देव हुए ।।२१५।। वहाँ बाईस सागर प्रमाण उत्कृष्ट आयुको धारण करनेवाले वे दोनों सम्यग्दृष्टि देव स्वर्गके उत्तम सुखका उपभोग करने लगे ॥२१६।। उनमे जो मधुका जीव था वह स्वर्गसे च्युत हो भरत क्षेत्र में कृष्ण नारायणकी मक्मिणी रानीक उढररूपी भूमिका मणि वन प्रद्युम्न नामका पुत्र हुआ ।।२.१७।। और जो कैदभका जीव था वह भी स्वर्गसे न्युत हो कृष्णकी जाम्बवती पट्टरानीमें कृष्णके समान कान्तिको धारण करनेवाला प्रद्युम्नका शम्ब नामका छोटा भाई होगा ॥२१८॥ प्रद्युम्न और शम्ब दोनो ही भाई अत्यन्त धीर वीर चरमशरीरी एवं सुन्दर थे और दूसरे जन्मसम्बन्धी महाप्रीतिके कारण परस्पर एक दूसरेके हित करनेमें उद्यत रहते थे।।२१९|| वटपुरका स्वामी राजा वीरसेन चन्द्रामाके विरहजन्य सन्तापसे आर्तध्यानमे तत्पर रहता हुआ चिर काल तक संसार रूपी अटवीमें भ्रमण करता रहा ।।२२०॥ अन्तमें मनुष्य पर्यायको प्राप्तकर यह अज्ञानी तापस हुआ और आयुके अन्त में मरकर धूमकेतु-- अग्निके समान प्रचण्ड धूमकेतु नामका देव हुआ ॥२२१|| ज्यों ही उसे पूर्वजन्मसम्बन्धी १ याती म०।

चतुश्चत्वारिंशः सर्गः मामायास्तनुजः श्रीमान् भानुभामण्डलद्युतिः । मानुर्नाम्ना महिनासो ववृधे बालभानुचत् ॥३॥ मानुना वर्धमानेन मानुमानुनिमाजमा । सूनुना सत्यमामाया मानशैलः प्रबंधित. ॥२॥ अन्यदा नारदोऽवादि कृष्णेन भगवन् ! कुतः । अागतोऽस्यधुनऽऽत्यं ते कथयत्यधिक मुदम् ॥३॥ सोऽवोचटक्षिणश्रेण्यामस्ति जम्मपुर खगः । जाम्बवः शिवचन्द्राऽस्य चन्द्राम्या वल्लमा तयोः ॥४॥ विश्वक्कृतयशाः पुत्री विश्वक्मेन इतिश्रुतिः । कन्या जाम्बवती नाम्ना श्रीरिव स्वयमागता ॥५॥ जालवीमवतीणां तु मीभिः स्नातुमुद्यताम् । चन्द्रलेखामियोटारां कान्तताराभिरामृताम् ॥६॥ गङ्गाद्वारगतामङ्गतुङ्गच्छन्नपयोधराम् । हर वीर पराशक्यां जाम्बा स्येव वाहिनीम् ॥७॥ इति नारदवाक्येन सस्नेहेन हरिस्तदा । प्रोडीपितः समुत्तस्थौ घृतेनेच हुताशनः ॥८॥ अनावृष्टिवलोपतस्तं प्रदेशमितोऽचिरात् । प्रारब्धमजनक्रीडामपश्यत्कन्यका हरिः ॥९॥ सहसा कन्ययादर्शि हरिरिन्दीवरद्युतिः । ततोऽगजेन तो विद्धा शरः पञ्चभिरेकदा ॥१०॥ दोामालिङ्ग य तां गादः सुसामीलितलोचनाम् । श्रामीलितेक्षणी जहे हेपितश्रीरतिहियम् ॥११॥ रानी सत्यभामाका जो पुत्र था वह श्रीमान् तथा सूर्य के प्रभामण्डलके समान देदीप्य- मान था इसलिए उसका भानु नाम रखा गया। वह भानु प्रातःकालके सूर्यके समान अपनी महिमासे बढ़ने लगा ।।११। सूर्यको किरणोंके समान तेजका धारक भानु ज्यों-ज्यों बढ़ता जाता था त्यों-त्यों सत्यभामाका मान रूपी पर्वत वढता जाता था ॥२॥ तदनन्नर किसी समय नारद कृष्णको सभामें आये तो कृष्णने उनसे पूछा-भगवन् ! इस समय कहाँ से आ रहे हैं ? आपका मुख किसी बड़े भारी हर्पको प्रकट कर रहा है ।।३।। नारदने कहा-विजया पर्वतकी दक्षिणश्रेणीमें एक जम्बूपुर नामका नगर है। उसमें जाम्बव नामका विद्याधर रहता है, उसकी शिवचन्द्रा नामकी चन्द्रमुखी भार्या है । उन दोनों मब ओर यशको फैलानेवाला विश्वक्सेन नामका पुत्र तथा जाम्बवती नामकी कन्या है। जाम्बवती क्या है मानो स्वयं आयी हुई लक्ष्मी ही है ॥४-५|| वह इस समय सखियोंके माथ स्नान करनेके लिए गङ्गा नदीमे उतरी है और मुन्दर ताराओंसे घिरी चन्द्रमाकी कलाके समान उत्तम जान पड़ती है। वह गङ्गाके द्वार में स्थित है तथा ऊंचे उठे वस्त्राच्छादिन स्तनोंसे युक्त है। वह जाम्यय नाम पर्वतसे निकली नदीके समान है एवं दूसरेके लिए प्राप्त करना अशक्य है अथवा अपने पिता जाम्बरकी सेनाके समान दूसरे के लिए वश करना अशक्य है ।।६-७॥ इस प्रकार स्नेहसे युक्त नारदके इन वचनोंसे श्रीकृष्ण उम समय उग प्रकार उत्तेजित हो उठे जिस प्रकार कि धीसे अग्नि उत्तेजित हो उठती है ।।८।। वे अनावृष्टि और उसकी सेनाको साथ ले शीघ्र ही उम स्थानकी ओर चल पड़े। वहाँ जाकर उन्होंने स्नान-कौड़ाको प्रारम्भ करनेवाली जाम्बवतीको देखा ।।२।। उसी समय सहसा नील कमल के समान कान्तिके धारक श्रीकृष्णपर कन्या जाम्बवतीको दृष्टि भी जा पड़ी। तदनन्तर कामदेवने एक ही साथ अपने पॉचो बाणोंसे दोनोंको वेध दिया ॥१०॥ अवमर देस श्रीकृष्णने श्री, रति और हीदेवीको 7 लजित करनेवाली जाम्बवतीका दोनों भुजाओंसे गाढ आलिङ्गन किया। तदनन्तर जिनके नेन कुछ-कुछ निमोलित हो रहे थे ऐसे श्रीकृष्ण, म्पर्शजन्य मुखसे निर्मालिन नेत्रोंवाली १ सूर्यकिरातुल्यतेजसा । २. गङ्गादारवती स०। ३. तुङ्गवृत्तपयोधरां म०। ४. जाम्वो नाम पर्वतः तस्य वाहिनी नदी तामिव । अथवा अनावृष्टि और चल देवको साथ ले।

। हरिवंशपुराणे म्कोभूय स्थिताम्नारवायाप्रयदरता । प्रग्यामनं पुनमूंग मृकमारं रिमुवति ॥२३६॥ मुगागमनवेलनेनिमिााक्ष्यतो स्फुटं. 1 समन्धरिमौर्यास्यं मान्यथामंम्न मानिता ॥२३७॥ भारण्यं नारदीयं तम्मिणी वचनं हितम् । श्रद्धाय प्रणतायाचदिनि मा प्रस्नुतस्तनी ॥२३॥ बाभुयमिदं मा वाग्मल्योचतनमा । कृतं घयाय में सो भगान्परदुष्करम् ॥२३९॥ पुत्रशोकाग्निदग्धाहं निरालम्या स्वया मुन । दया माधारिता धीर ! नाथ ! हस्तारलग्यनम् ॥२४॥ मान. मामन्धान मननेह यद्यया । तत्तवास्ति ममारश्य जीवनयाः पुनदर्शनम् ॥२४॥ जीगमि जिनगायन कटिनीभूतमानमा । प्रजम्यमधुना म्वग्छं पुनदर्शनमस्तु ते ॥२४२॥ गप्रगाममिनि प्रोमो दत्ताशीनारदी यया । मुनशोका हररियां पूरयन्तीर मा धिना ॥२४॥ द्रुतविलम्बितवृत्तम् 'मनुजदंगनरामरमयं विशुधन व शिवाभ्युदयावहम् । मदनसम्पपुराचरितं जनवरतु मनिमना जिनशासने ॥२४॥ प्रत्यरिष्टनेमिपुराणसंमहे हरियरो जिनेसनाचार्यस्तो शम्बप्रद्युम्नवर्णनो नाम निचत्वारिंशः सर्गः ॥१३॥ वाला अशोक वृक्ष अममयमें ही अकुर और पल्लयोंको धारण करने लगेगा ।।२३५।। तर यहाँ जो गंगे है, वे नभी तक गूंगे रहेंगे जब तक कि प्रदाम्न दूर है। उसके निकट आते हो वे गूंगापन छोड़ देयेगे ॥२३६॥ न प्रकट हुग लक्षणांमे नू पुत्रक आगमनका समय जान लेना । मीमधर भगयान. यचनको अन्यथा मन मान ।।३।। हम प्रकार नारदर्ग. हिनका वचन मुन रस्मिोक म्ननांसे दूध शरने लगा। यह असायंक प्रणाम पर इस प्रकार करने लगी कि भगवन ! वान्मन्य प्रस्ट करने में जिना निन महा उगन गहना है में आपने आज यह मेग उत्तम ययुजनोंकामा फार रिया है जो दुमगा लिग मर्यथा दुष्कर ॥३८-२३०॥ हे मुने ! हे धोर! हे नाथ! में पुमा मोगाग्निमें निराधार जल नहीं थी मो आपने या महाग दे गा पा लिया EVAR गीगार भगयानने जो यहा या धैमा हो और गुर यिन्याम गया। fr में जीने गत अयश्य ही पुरका दर्शन होगा | मैं अपना दय गटोपर जिनेन्द्र भगवान पां. अनुमार जायित गंगी। अय आप न्यानुसार जाए और मुझे आरा in भी मानम पानमा ध्यान मियाम प्रकार नारद निवदना vান পৃ গান বিআ স না মাখা সা ন ন। নননি। रोड भाप करनी पुरंगी भागि गने गगी २४॥ हम मगम पूमार प्रान और सपा पर्षभयांग पग्नि निमा गया। जिसमें उगा मनुगणे देव. माग. मनुषसे देश, यो मनुष्य. पुनः मनुष्यगे दंप भी गये HTTAfrग पनाग 1 m गा भी पाया गया। दोनों भान भारपांग र निगम भाग पान भजन:ग पनि. Turmr mai-मानगंग पाग Iml marririri बननापाxिitr राम्म FIR मेगमगंगमा हुन ।

चतुश्चत्वारिंशः सर्गः भामायास्तनुजः श्रीमान् भानुमामण्डलद्युतिः । भानुर्नाम्ना महिनामा वधे बालमानुषत् ॥१॥ भानुना वर्धमानेन'मानुभानुनिमाजमा । सूनुना सत्यमामाया मानदौलः प्रवर्धित ॥२॥ अन्यदा नारदोऽवादि कृष्णेन मगवन् ! कुतः । वागतोऽग्यधुनऽऽम्यं ते कथयत्यधिक मुदम् ॥३॥ मोऽवोचदक्षिणघेण्यामस्ति जम्बूपुरे वगः ! जाम्बवः शिवचन्द्राऽस्य चन्द्रास्या बल्लमा तयोः ॥४॥ विश्वस्कृतयशाः पुत्री विश्वक्सेन इतिश्रुतिः । कन्या जाम्बवती नान्ना श्रीरिव स्वयमागता ॥५॥ जाह्नवीमवतीणां तु मामिः नातुमुद्यताम् । चन्द्रलेखामियोदारां कान्ततारामिराताम् ॥६॥ गाद्वारगतामहतुगच्छमपयोधराम् । हर वीर पराशक्यां जाम्बर स्यैव वाहिनीम् ॥७॥ इति नारदवाक्येन मस्नेहन हरिस्तदा । प्रोद्दीपितः समुत्तस्थौ धृते व हुताशनः ॥८॥ अनावृष्टिवलोपेतस्तं प्रदेशमिताऽचिरान् । प्रारब्धमजनक्रीडामपश्यत्कन्यका हरिः ॥९॥ सहसा कन्ययादर्शि हरिरिन्दीवरद्युतिः । ततोऽङ्गजेन तो विद्धा शरः पञ्चभिरेकदा ॥१०॥ दोामालिङ्ग य तां गाः मुसामीलितलोचनाम् । श्रामीलितेक्षणी जहे हेपितधीरतिहियम् ॥११॥ रानी सत्यभामाका जो पुत्र था वह श्रीमान तथा सूर्यके प्रभामण्डलके समान देदीप्य- मान था इसलिए उसका भानु नाम रखा गया। यह भानु प्रातःकालके सूर्यके समान अपनी महिमासे बढ़ने लगा ॥१॥ सूर्यको किरणोंके समान तेजका धारक भानु ज्यों-ज्यों बढता जाता था त्यों-त्यों सत्यभामाका मान रूपी पर्वत बढ़ता जाता था ।।२।। तदनन्नर किसी समय नारद कृष्णको सभामें आये तो कृष्णने उनसे पूछा-भगवन् ! म समय कहाँ से आ रहे हैं ? आपका मुख किमी बड़े भारी हर्षको प्रकट कर रहा है ॥३॥ नारटने कहा-विजया पर्वतकी दक्षिणश्रेणीमें एक जम्बूपुर नामका नगर है। उनमें जाम्बव नामका विद्याधर रहता है, उसकी शिवचन्द्रा नामकी चन्द्रमुखी भाया है । उन दोनोंके सब ओर यशको फैलानेवाला विश्वक्सेन नामका पुत्र तथा जाम्बवती नामकी कन्या है। जाम्बवती क्या है मानो स्वयं आयी हुई लक्ष्मी ही है ॥४-५।। बह इस समय मखियाके माथ स्नान करने के लिए गगा नदीमें उतरी है और मुन्दर ताराओंसे घिरी चन्द्रमाको कलाके समान उत्तम जान पड़ती है। यह गङ्गाके द्वारमें स्थित है तथा ऊंचे उठे वस्त्राच्छादित स्तनोंसे युक्त है। वह जाम्बव नाम पर्वतसे निकली नदीके समान है एवं दूसरेके लिए प्राप्त करना अशक्य है अथवा अपने पिता जाम्बवकी सेनाकै समान दूसरेक लिए वश करना अशक्य है ॥६-ना इस प्रकार स्नेहसे युक्त नारदके इन बचनांसे श्रीकृष्ण उस समय उम प्रकार उत्तेजित हो उठे जिस प्रकार कि घाँसे अग्नि उत्तेजित हो उठती है ।।८।। वे अनावृष्टि और उमकी सेनाको साथ ले शीघ्र ही उम स्थानकी ओर चल पड़े। यहाँ जाकर उन्होंने स्नान-क्रोडाको प्रारम्भ करनेवाली जाम्बवतीको देखा ।।२।। उसी समय सहसा नील कमल के समान कान्तिक धारक श्रीकृष्णपर कन्या जाम्बवतीको दृष्टि भी जा पड़ी। तदनन्तर कामदेवने एक ही माथ अपने पॉची वाणोंसे दोनोंको वेध दिया ॥२०॥ अमर देख श्रीकृष्णने श्री, रति औरहीदेवीको लजित करनेवाली जाम्बवतीका दोनों भुजाओंसे गाढ आलिङ्गन किया। तदनन्तर जिनके नेत्र कुछ-कुछ निमोलिन हो रहे थे ऐसे श्रीकृष्ण, स्पर्शजन्य मुससे निमीलिन नेत्रोंवाली १ सूर्यकिरणतुल्यतेजसा । २. गङ्गाद्वारवती प० । ३. तुङ्गवृत्तपयोधरा म । ४. जाम्मो नाम पर्वतः तस्य वाहिनी नदी तामिव । अथवा अनावृधि और बलदेवको साथ ले।

५३४ हरिवंशपुराणे सखीनाममवत्तुङ्गस्तत्र चानन्दनस्वनः । समीपशिविरव्यापी कन्याहरणकारण. ॥१२॥ श्रुत्वा कन्यापिता क्रुद्धः खगोद्यतफरः सगेट । समुत्पत्य लघु प्राप्तः कनरपेटकहस्तक ॥१३॥ अनावृष्टिस्ततस्तस्य खेटको खड्गपाणिकम् । रणानिध्यं स ख कृत्वा वबन्ध सचराधिपम् ॥१४॥ धामीय नीतिविद्वारो विष्णवं तमदर्शयत् । सूनु जामातरि न्यस्य स यया तपसे धनम् ॥१५॥ जाम्बवत्या विवाहन परमानन्दमाश्रितः । विश्वक्सेनयुतो विष्णुरिकामगमनिजाम् ॥१६॥ प्रासादस्योपकण्ठे च रक्मिण्या मुदितात्मनः । प्रासादं प्रददौ दिव्यं जाम्बवत्यै जनादन. ॥१७॥ सम्मान्य भ्रातरं तस्या विसृज्य निजमास्पदम् । अरीरमदिमां मांगी भोग नलदुर्लभै. ॥१८॥ परस्परगृहाजनगन्यागमनपर्धिता । रुक्मिणीजाम्बवत्याः प्राग्जाता प्रीतिरखण्डिता ॥१९॥ श्लक्ष्णधीः श्क्ष्णरोमाख्यो राजाभूमिहलेश्वरः । नदशीकृतय शौरिर्जातु दूतमजीगमत् ॥२०॥ गत्वागत्याशु दूनस्तं प्रतिकूलमवेदयन् । लक्ष्मणां लक्षणोपेतां तकन्यां चापि शानिणः ॥२१॥ सत्वरं स ततो गत्या हलिना मह सम्मदी । समुद्रं स्नानुमायातामद्राक्षीदायतक्षणाम् ॥२२॥ दमसेनं महावीयं हत्वा सेनापति युधि । हत्वा चेतः स्वरूपेण रूपिणीमहरपुनः ॥२३॥ उपयस्य समानीय लक्ष्मणां लक्ष्मणप्रभुः । जाम्बवत्या गृहाभ्यर्णगृहे रमयति स्म ताम् ॥२४॥ उस कन्याको हर लाये ।।११।। उसी समय वहाँ कन्या हरणके कारण उसको सखियोंका जोरदार रोनेका शब्द हुआ जो समीपवर्ती शिविर में फैल गया ।।१२।। उस शब्दको सुन, क्रोधसे भरा कन्याका पिता विद्याधरांका राजा जाम्बव, हाथमें तलवार और देदीप्यमान ढाल ले आकाश-मार्गसे चलकर शीघ्र ही वहाँ आ पहुंचा ।।१३।। उसे आया देख आकाश- गामी अनावृष्टिने आकाशमें कुछ देर तक तो उसका युद्धके द्वारा अतिथि सत्कार किया। तदनन्तर हाथमें तलवारको धारण करनेवाले उस विद्याधर राजा जाम्बवको उसने बाँध लिया ॥१४॥ नीतिके ज्ञाता वीर अनावृष्टिने उसे लाकर श्रीकृष्णको दिखाया। इस घटनासे राजा जाम्बवको वैराग्य उत्पन्न हो गया जिससे वह अपने पुत्र विश्वक्सेनको श्रीकृष्णके अधीन कर तपके लिए वनको चला गया ॥१५ जाम्बवतीके विवाहसे परम आनन्दको प्राप्त हुए श्रीकृष्ण विश्वक्सेनको साथ ले अपनी द्वारिका नगरीको चले गये ।।१६।। जाम्ब- वतीक आगमनमे रुक्मिणोको भी हर्ष हुआ, इसलिए श्रीकृष्णने रुक्मिणीके महलके ममीप ही जाम्बवतीके लिए सुन्दर महल दिया ।।१७। जाम्बवतीके भाई विश्वक्सेनका सम्मान कर उसे अपने स्थानपर विदा किया और पृथियोनल में दुर्लभ भोगोंसे जाम्बवतीके साथ मोड़ा करने लगे ।।१८।। मक्मिणी और जाम्बवत्तीमें जो प्रोति प्रथम उत्पन्न हुई थी वह परम्पर एक-दूसरेके महल में आने-जानेसे बढ़ती गयी तथा अखण्ड रूपमें परिणत हो गयी ॥१९॥ उसी समय मिहलद्वीपमे सूक्ष्मबुद्धिका धारक इलगरोम नामका राजा रहता था । उसे वश करने के लिए किमी समय कृष्णने अपना दून भेजा ।।२०। दूतने वहाँ जाकर और शीघ्र ही वापिस आकर श्रीकृष्णको उसके प्रतिकूल होनेको खबर दी और माथ ही यह भी खबर दी कि उसके उत्तम लक्षणोसे युक्त एक लक्ष्मणा नामकी कन्या है ॥२१॥ तदनन्तर हर्पसे युक्त श्रीकृष्ण बलदेवके साथ शीघ्र ही वहाँ गये । यहाँ जाकर उन्होंने स्नान करनेके लिए समुद्रम आयी हुई दीर्घलोचना लक्ष्मणाको देखा ॥२२॥ तदनन्तर अपने रूपसे- उसके चित्तको हरकर और महाशक्तिशाली द्रुमसेन नामक सेनापतिको युद्धमे मारकर श्रीकृष्ण उम रूपवती लक्ष्मणाको हर लाये ।।२३।। द्वारिकामे लाकर उसके साथ विधिपूर्वक विवाह किया और जाम्बवतीमहलके ममीप उसे महल रमण करने लगे।२४ालक्ष्मणा- १ समुत्स्त्य म ! २ मुम्पेण य० । ३. स रमतिरम क०, स०, ग.!

चतुश्चन्वारिंशः सर्गः तस्या भ्राता महासेनः ममागन्य नतो हरिम् । संमान्य मानिना मुक्तः सिंहलद्वीपमभ्यगात॥२५॥ राष्ट्रवर्धन इत्यासीन्सुराष्ट्राधिपतिर्नृपः । अनाम्खुरी पुरी चास्य विनया वनितोत्तमा ॥२६॥ तस्यां नमुचिनान्नाभूत्तनयो नयविक्रमी । तनया च सुमीमारया सुमीमा वसुधा यथा ॥२७॥ युवराजः स नमुचिः क्षिनिविश्रुतपौरपः । राज्ञोऽवमन्यते मान्यानमिमानमहागिरिः ॥२८॥ नमुचिश्च सुमीमा च समुद्रं स्नानुमागनौ । हितेन हरयं तेन नारदन निवेदितौ ॥२९॥ प्रभामतीर्थतीरस्थमैन्यं तं मीरिणा हरिः । गन्ना निहत्य हुन्वा तां कन्यां द्वारवनीमगात् ॥३०॥ लक्ष्मणामवनाभ्यणं मौवणं भुवनोत्तमम् । दत्वा माधं यथारंस्त मीमन्निन्या सुमीमया ॥३१॥ राष्ट्ररर्धनराजोऽपि सुताय सुपरिच्छदम् । प्रजिघाय रथमादिप्रामृतं प्रभवे तथा ॥३२॥ मिन्धुदशाधिपो मेररिश्वाकुकुलवर्धनः । पुरे वीतमये चामीचन्द्रवन्यस्य भामिनी ॥३३॥ गौरी नामाभयत्सम्यां गौरी वर्णेन कन्यका । गौरीव रूपिणी विद्या गौरीनिरहितेव सा ॥३४॥ दूतप्रेषणपूर्व म मेरः प्रेषयति स्म ताम् । नैमित्तिकवचास्मर्ता हरयं हरिणेक्षणाम् ॥३५॥ परिणीय हरिगौरी मनोहरणकारिणीम् । मुमीमापदनाभ्यणं प्रादायामादमुच्चकैः ॥३६॥ अरिष्टपुरनाथस्य सीरिणो मातुलस्य तु । राजो हिरण्यनामस्य श्रीकान्तायां मुयोविति ॥३७॥ का भाई महासेन कृष्णके पाम आकर नन्नीभूत हुआ और मानो कृष्णके द्वारा सम्मान-पूर्वक विदा पाकर अपने मिहलद्वीपको चला गया ।।२५।। उसी समय मुराष्ट्र देशमें एक राष्ट्रपर्धन नामका राजा था। अजाखुरी उमकी नगरी थी और विनया नामकी रानी थी जो समस्त स्त्रियों में उत्तम थी ॥२॥ विनया नामक रानीसे उसके नमुचि नामका पुत्र हुआ था जो नीति और पराक्रमका भण्डार था। दमी प्रकार एक मुमीमा नामकी पुत्री थी जो कि उत्तम सीमासे युक्त पृथिवीक समान जान पड़नी यी ॥२७॥ युवराज नमुचिका पराक्रम ममस्न पृथिवीमें प्रमिद्ध, था। वह अभिमानका मानो वड़ा ऊँचा पर्वत था और माननीय राजाओंका निरन्तर तिरस्कार करता रहता था । एक दिन युवराज नमुचि और उमकी बहिन मुसीमा दोनों ही स्नान करनेके लिए समुद्रनटपर आये । इधर हितकारी नारदने श्रीकृष्णके लिए उन दोनोंकी खबर दी ।।२९।। श्रीकृष्ण सवर पाते ही वलदेवके माथ वहाँ गये और प्रभास नीर्थके तीरपर जिमकी सेना ठहरी हुई थी ऐसे उम नमुचिको मारकर तथा कन्या मुमीमाको हरकर द्वारिका आ गये ॥३०यहाँ लक्ष्मणाके भवनके ममीप मुवर्णमय उत्तम महल देकर उसके साथ इन्छानुसार फ्रीड़ा करने लगे ॥३॥ तदनन्तर सुमीमाके पिना राजा गष्टवर्धनने भी पुत्रीके लिए उत्तमो.. त्तम वस्त्राभूपण और प्राकृष्णक लिए रय, हाथी आदिकी भेंट भेजी ॥३॥ उमी ममय मिन्धुदेशके वीतमय नामक नगग्में इन्वाकु वंशको बढानेवाला मेर नाममा राजा रहना था, उमकी चन्द्रवती नामकी भार्या थी ॥३३॥ उससे उमके एक गौरी नामकी कन्या उत्पन्न हुई थी जो गौरवर्णकी थी, रूपवती गौरी विद्याके ममान थी अथवा ईनियोंसे रहित श्रृथियोंके ममान जान पड़ती थी ॥३४|| निमिनमानीने यताया था कि यह नीचे नागयण धीरणको म्बी होगी, इसलिए उसके वचनोंका म्मरण गनेवाले गजा मेमने पहले नो श्रीकृष्णक पाम दूत भेजा और उसके बाद मृगलोचना गौरीको भेजा ॥३५।। । श्रीकृष्णने मनोहरनेवाली गौरीको विवाहकर उसके लिए मुमीमाके भवन ममीप ऊँचा महल प्रदान क्यिा ॥३॥ मी ममय बलदेव. मामा गना हिरण्यनाम अरिष्ट्रपुर नगग्में गग्य करते , यथा निरहिता गौरिव पृथिवी । ३. दरिदगा म.! ४. मनोहरबमारियोमः। - हरिवंशपुराणे पद्मावती समुत्पन्नां कन्यां पद्मामिव स्वयम् । स्वयंघरगतां श्रुत्वा संप्राप्तौ रामकेशवौ ॥३८॥ सगौरवमिमा दृष्टावनावृष्टिपुरस्मरौ । ग्रीन्या हिरण्यनाभेन स्वजनस्नेहवर्धनौ ॥३९॥ पित्रा हिरण्यनामस्य सत्रा प्रावजदग्रतः । पुरैव रेवतो नाम्ना महिम्ना यो घनश्रितः ॥३०॥ चतस्त्रस्तरमुताः कन्या रेवती बन्धुमत्यपि । सीता राजीवनेत्रा च ता दत्ताः मारिणे पुरा ॥४॥ म्वयंवर प्रवृत्तेऽय हृत्वा पद्मावती हठात् । रणशौण्डान्ममर्दाशु शारिराहवदक्षिणः ॥४२॥ परिणीय समायों तो भ्रातरौ भ्रातृभिर्युतौ । द्वारिकामरमायातावरंमाता सुरोपमौ ॥१३॥ गौरीगृहसमीपे च पद्मावत्यै गृहं हरिः । प्रदाय प्रमदोपेतः प्रसादपरमाऽमवत् ॥४४॥ नगयां पुष्कलावन्यां गान्धारविषयेऽमवत् । भूभृदिन्द्रगिरिस्तस्य मेस्मत्यभिधा प्रिया ॥४५॥ सुतो हिमगिरिस्तस्यां जातो हिमगिरिस्थिरः। गान्धारी दुहिता चावी गन्धर्वादिकलाधिका ॥४६॥ भ्राना हयपुरीन्द्राय सुमुखाय ततो हरिः । दीयमानां विदित्वना 'नारदादरमागतात् ॥४७॥ गल्या हिमगिरि हरवा प्रतिकूलं रणाजिरे । तां हृत्वानीय सौम्यास्यामुपयम्य ससंमदः ॥४८॥ पद्मावल्या गृहोपान्त गान्धार्य भवनं वरम् । वितीयं धैर्यसंपन्नामेनां मोगैरमानयत् ॥४९॥ महादेवीमिरिष्टामिरष्टामिरवरोधने । प्रमाधितामिराशामिरिव तामिरपासितः ॥५०॥ विन्दन् भोगफलं भूरि गोविन्दः पुण्यवृक्षजम् । संददलनतानन्दं ननन्द पुरुपौरपः ॥५१॥ उनकी श्रीकान्ता नामकी उत्तम स्त्री थी। उससे उनके पद्मावती नामकी कन्या उत्पन्न हुई थी जो साक्षात् लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी। 'उसका स्वयंवर हो रहा है' यह मुनकर अनावृष्टिके साथ-साथ बलदेव और कृष्ण भी वहाँ गये ।।३७-३८॥ आत्मीयजनोंके माथ म्नेह वढानेवाले इन दोनोंको राजा हिरण्यनाभने बड़े गौरव और प्रेम के साथ देखा ॥३९॥ हिरण्यनाभका बड़ा भाई रेवत जो पिताके साथ पहले ही दीक्षित हो वनमें रहने लगा था उसकी चार कन्या' १ रेवती, २ बन्धुमती, ३ सीता और ४ राजीवनेत्रा बलदेवके लिए पहले ही दी जा चुकीं ॥४०-४१|| जब पद्मावतीका स्वयंचर होने लगा तब युद्धनिपुण श्रीकृष्ण, उसे हठपूर्वक हर ले आये और रणमें जिन्होंने शूरवीरता दिखायी उन्हें शीघ्र ही नष्ट कर डाला ॥४२।। तदनन्तर विवाह कर अपनी-अपनी स्त्रियोंको साथ लिये दोनों भाई, भाइयोंके साथ शीघ्र ही द्वारिका आये और देवोंके समान क्रीड़ा करने लगे ।।४३॥ हर्पित श्रीकृष्ण गौरीके महलके समीप पद्मावतीके लिए महल देकर बहुत प्रसन्न हुए ॥४४॥ उमी ममय गान्धार देशको पुष्कलायती नगरीमें एक इन्द्रगिरि नामका राजा रहता था। उसकी मेरमती नामकी स्त्री थी। उमसे उसके हिमगिरिक समान स्थिर हिमगिरि नामका पुत्र था और गान्धारी नामको सुन्दरी पुत्री थी जो गन्धर्व आदि कलाओं में अत्यन्त निपुण थों ॥४५-४६।। शीघ्रतासे आये हुए नारदसे श्रीकृष्णको जब यह विदित हुआ कि गान्धारीका भाई उसे हयपुरी गजा मुमुखको दे रहा है तब वे शीघ्र ही जाकर रणागणमें प्रतिकूल हिमगिरिको मारकर गान्धारीको हर लाये एवं उम मौम्यमुखीके माथ विवाह फर बहुत हर्षित हुए ॥४७-४८।। उन्होंने पद्मावती महलके ममपि गान्धारी के लिए उत्तम महल दिया और उम धैर्यशालिनीको उत्तम भोगांसे मम्मानित किया । इस प्रकार जो नसीहत आठ दिशाओं ममान उन आठ इष्ट पट्टगनियोंमे अन्नःपुरमें मदा सेयित रहते थे, जो पुण्यम्पा पृषी उत्पन्न भौगम्पा विशाल फल का उपभोग करते थे, जन-ममूहको आनन्द प्रदान करते थ, एयं प्रयल पराग्रमक धारक ये गये श्रीकृष्ण ममृद्धिको प्रान हुए ।।५-५गौनमयामी ..मर भम् । २ नारदात् + गम् + प्रागतात् ।

धनुश्वग्वारिंशः मर्गः द्रुतविलम्बितम् कृतरणं परिभूये पुर.स्सिनं रिपुगणं तृगवरक्षणमात्राः । यरमधूवररवमयत्रनः प्रयति मध्यजनो जिनधर्मकृत् ॥१२॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती जाम्बवत्यादिमहादेवीलाभवानी नाम चतुश्चत्वारिंशः सर्गः॥शा कहते हैं कि जिनधर्मको धारण करनेवाला भव्य जीव युद्ध में मामने सड़े शत्रुओंके समूहको भणमात्रमें तृणके ममान पराजित कर अनायाम ही उत्तमोनम स्त्रीम्पी ग्नोंको प्राप्त कर लेता है ॥५२॥ इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराण के संग्रहमे युक, जिनमेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें जाम्बवती श्रादि महादेवियों के लाममा वर्णन करनेवाला चवालीसया सर्ग समाप्त हुभा ॥१४॥ १ विनय माग..

हरिवंशपुराणे पद्मावती समुत्पन्नों कन्या पक्षामिव स्वयम् । स्वयंवरगनां श्रुन्या संप्राप्ती रामकंशया ॥३०॥ मगौरवमिमा दृष्टावनावृष्टिपुरस्सरी । प्रीत्या हिरण्यनामेन स्वजनस्नेहवर्धनी ॥३९॥ पित्रा हिरण्यनामस्य सत्रा प्रावजदग्रजः । पुरव रेवती नाम्ना महिम्ना यो वनश्रितः ॥३०॥ चतस्तन्मुताः कन्या रंवती वन्धुमन्यपि । मीता राजीवनेत्रा च ता दत्ताः मारिणे पुरा ॥४१॥ म्वयंवर प्रवृत्तेऽत्र हत्वा पद्मावती हठात् । रणशाण्डान्ममर्दाशु शारिराहवदक्षिणः ॥४२॥ परिणीय समायौँ तो भ्रातरौ भ्रातृमियुती । द्वारिकामरमायानावरंमातां सुरोपमा ॥४३॥ गौरीगृहसमीप च पद्मावन्य गृहं हरिः । प्रदाय प्रमटोपेतः प्रमादपरमोऽभवत् ॥४४॥ नगयां पुष्कलावत्यां गान्धारविषयेऽभवत् । भूभृदिन्द्रगिरिस्तस्य मेरमन्यमिधा प्रिया ॥४॥ मुनो हिमगिरिस्तस्यां जातो हिमगिरिस्थिरः । गान्धारी दुहिता चायी गन्धर्वादिकलाधिका ॥४६॥ भ्रामा हयपुरीन्द्राय मुमुखाय ततो हरिः । दीयमानां विदित्वनां नारदादरमागतात् ॥४७॥ गरा हिमगिरि हत्या प्रतिकृलं रणाजिरे । तां हृन्मानीय सौम्यास्थामुपयम्य मर्ममद. ॥४८॥ पद्मावत्या गृहोपान्त गान्धार्य मयनं वरम् । वितीर्य धैर्य संपनामनां मोगरमानयत् ॥४९॥ महादवामिरिष्यामिरटामिरवरोधने । प्रमाधितामिराशामिरिव तामिरपासितः ॥५०॥ विन्दन् भोगफल भूरि गोविन्दः पुण्यवृक्षजम् । मंददलनतानन्दं नमन्द पुरपौरपः ॥५१॥ उनकी श्रीकान्ता नामकी उत्तम स्त्री थी। उससे उनके पद्मावती नामकी कन्या उत्पन्न हुई थी जो मामान लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी। 'उसका स्वयंवर हो रहा है' यह सुनकर अनावृष्टिके माथ-साथ वलदेव और कृष्ण भी वहाँ गये ॥३७-३८॥ आत्मीयजनांके माथ म्नेह बढ़ानेवाले इन दोनोंको गज्ञा हिरण्यनाभने बड़े गौग्य और प्रेमके माथ देखा ॥३९।। हिरण्यनाभका बड़ा भाई रेवत जो पिताके माथ पहले ही दीक्षित हो अनमें रहने लगा था उमकी चार कन्याएँ १ रेवती, २ वन्धुमतो, ३ मीता और ४ राजीवनेत्रा बलदेवके लिए पहले हो दी जा चुकीं ।।४०-४१|| जब पद्मावतीका स्वयंवर होने लगा तब युद्ध निपुण श्रीकृष्ण, उसे हटपूर्वक हर ले आये और रणमें जिन्होंने शूरवीरता दिखायी उन्हें शीघ्र ही नष्ट कर डाला । तदनन्तर विवाह कर अपनी-अपनी स्त्रियोंको माथ लिये दोनों भाई, भाइयोंके माथ मीन ही द्वारिका आये और देवोंके ममान क्रीड़ा करने लगे ॥४३॥ हर्पित श्रीकृष्ण गौरीके महल के समीप पद्मावती के लिए महल देकर यहुत प्रसन्न हुप ॥४४|| उमी ममय गान्धार देशको पुष्कलावती नगरी में एक इन्द्रगिरि नामका राजा रहना था। उसकी मेग्मती नामकी स्त्री थी। उससे उसके हिमगिरिके ममान स्थिर हिमगिरि नामका पुत्र था और गान्धारी नामकी सुन्दरी पुत्री थी जो गन्धर्व आदि कलाओं में अत्यन्त निपुण थी (४५-४६।। शीघ्रतासे आये हुए नारदसे श्रीगको जब यह विदित हुआ कि गान्धार्गका भाई उमे हयपुगेके गजा मुमुग्यको दे रहा है तब वे शीन ही जाफर रणागणमें प्रतिकूल हिमगिरिको मारकर गान्धारीको हर लाये एवं उम मोम्यमुपीके माथ विवाह कर बहुत हर्षित दुग ।।४४-४८॥ उन्होंने पद्मायनीक महलो मी गान्धा के लिए उत्तम महल दिया और उम धैर्यशालिनीको उनम भोगोंगे मम्मानिन किया ।।गा इस प्रकार जो मति आठ दिशापि ममान उन आठ इष्ट पट्टगनियाँम अन्नापुरमें मदा सेधित रहते थे, जो पुण्यपी पृशमें उत्पन्न भौगरपापिमाल फलका सभागे करते थे, जन-समूहको आनन्द प्रदान करते थे, ज्यं प्रयल पराक्रमो धारक थे मे श्रीकृष्ण ममृद्धिको प्राम हुग ।।५०-५मा गीतमम्यामी भासीनम् । २ नारदात् + गम् +शागतात् ।

पञ्चचयारिंशः सर्गः ततः सनत्कुमारोऽभूच्चनुर्थश्चक्रवर्तिनाम् । रूपाशसमाकृष्टमुरबोधितदीक्षितः ॥१६॥ मुकुमारः सुतस्तस्य तम्माद्वरकुमारकः । विश्वो वैश्वानरश्चाभूद्विश्ववतुहध्वजः ॥१७॥ विश्वसेनस्ततो जातो यस्यरा प्राणवलमा । तन्सुनः पञ्जमश्चक्री शान्तिः पोडशतीर्थकृत् ॥१८॥ नारायणी नरहरिः प्रशान्नि: शान्तिवर्धनः । शान्तिचन्द्रः शशाकाङ्कः कुख्य कुरवंशनाः ॥१९॥ एवमायेष्वतीनेषु मूर्योऽभूधम्य मामिनी । श्रीमती तीर्थकृन्कुन्थुस्तयोश्चक्रधरोऽपि सः ॥२०॥ अनिकान्तेषु भूपंपु ननोऽपि यहुपु क्रमात् । राजा मुदर्शनी जातो यम्य मित्रा प्रियागना ॥२१॥ तयारर इनि प्यानः सप्तमश्चक्रवनिनाम् । कृती तीर्थकराणान्य यतोऽष्टादशसंश्यकः ॥२२॥ ततः मुचारचाच चाररूपोऽथ वीर्यवान् । चारपद्धस्तथान्यषु समीनेषु राजसु ॥२३॥ पद्ममालः मुमीमश्च जातः पमरथी नृपः । ततश्चक्री महापो विष्णुपनो तु तन्मुती ॥२४॥ मुपाः पद्मदेवश्च कुलकीर्तिस्ततः परः । कीर्तिः मुकौतिकीती तो वमुर्कात्तिश्च वीर्यवान् ॥२५॥ यासुकिमिराभिरयों वसुः सुवसुरेव च । पुरुवंशश्रियो नाथः श्रीवसुश्च वसुन्धरः ॥२६॥ जजे वमुरथस्तस्मादिन्द्रवीर्यश्च वीर्यवान् । चित्रो विचित्रो वीर्योऽथ विचित्रोऽपि महाबलः ॥२७॥ तनो विचित्रवीर्योऽभूत्तनश्चित्ररथो नृपः । महारयो तरयो वृपानन्तो वृषध्वजः ॥२०॥ श्रीवनी व्रतधर्मा च धृतो धारण एव च । महासरः प्रतिसरः शरः पारशरी नृपः ॥२९॥ शरद्वीपश्च राजाऽमी द्वीपी द्वीपायनो नृपः । मुशान्तिः शान्तिमद्रश्च शान्तिपेणश्च भूपतिः ॥३०॥ भत्ता योजनगन्याया राजपुष्यास्तु शन्ननुः । तनयः शन्ननीभूभृद्धनन्याम इति स्मृतिः ॥३१॥ एनधर्मा ततस्तस्य तनयोऽपि धृतोदयः । पृतनंजा तयना धूनमानी नी नृपः ॥३२॥ ततोऽपि टनराजोऽभूत्तस्य निसः प्रियागनाः । अम्बिाऽम्बालिकाऽम्यारया वेद्यामिजासंमवाः ॥३३॥ एतराष्ट्रच पाण्दुश्च विदुरध विदां वरः । यथाक्रमममी तामां तिमृणां तनयानयः ॥३४॥ जयराज हुए ।।१४-१५।। इनके पश्चात् उमी चंगम चतुर्थ चक्रवर्ती मनत्कुमार हुए जो रूप- पाशमे खिंचकर आये हुए देवोंके द्वारा सम्बोधित हो दीक्षित हो गये थे ।।१६।। मनकुमारके मुकुमार नामका पुत्र हुआ। उसके याद वरकुमार, विश्व, वैश्वानर, विश्वकेतु और वृहयज नामक राजा हुए। तदनन्तर विश्वसेन राजा हुए जिनकी स्त्रीका नाम ऐग था। इन्हीके पश्चम चक्रयी और सोलहवें तीर्थकर शान्तिनाथ हुए ।।१७-१८।। इनके पश्चात् नारायण, नरहरि, प्रशान्नि, शान्तिवर्धन, शान्तिचन्द्र, शशाङ्का और कुरु गजा हुए ।।१९।। इत्यादि राजाओंके व्यतीत होनेपर इमी वंशमे सूर्य नामक राजा हुए जिनकी स्त्रीका नाम श्रीमती था। उन दोनोंक भगवान कुन्धुनाथ उत्पन्न हुए जो नीर्थकर भी थे और चक्रवर्ती भी थे ।।२०।। नदनन्नर क्रम-क्रमसे बहुन गजाआक व्यनीन हो जानेपर सुदर्शन नामक राजा हुए जिनकी स्त्रीका नाम मित्रा था। इन्हों दोनोंक ममम चक्रवर्ती और अठारह नीध- फर अरनाथ हुए ॥२१-गा उनकै याद मुचार, चार, चाररूप और चारपद्म गजा हुए। तदनन्तर अन्य गजाओंके हो चुकनपर इमी यंगमें पदामाल, मुभीम और पद्मरथ राजा हुए। उनके याद महापद्म चयी हुए। उनक विष्णु और पद्म नामक दो पुत्र हुए।।२३-२४|| नदनन्तर मुपद्म, पद्मदेव, कुलकीर्ति, फौनि, मुशीनिं, कौनि, यमुकौनि, यामुकि, बामय, यमु, मुबसु. श्रीयमु, यमुन्धर, यमुरथ, इन्दयौर्य, चित्र, विचित्र, वीर्य, विचित्र, विचित्रवीर्य, चिनग्ध, महाग्य, धृतरथ, पानन्त, पृपध्वन, श्रीनन, प्रतधर्मा, घृत, धाग्ण, महामर, प्रनिमर, गर, पारशर, नारद्वीप, द्वीप, दीपायन, मुशान्ति, सान्निभद्र, शान्तिपेग, योजनगन्धा गजपुरी भनां गन्ननु और शन्तनु गजा धृतव्याम पुत्र हुए ।५-३|| नदनन्तर धृतधर्मा, धृनोदय. धृततेज, धृतया, धृतमान और धृन हुए। धृनक नगन नामक पुत्र हुआ। उनकी अम्बिका, अम्बालिका और अम्या नामकी नीन स्त्रियाँ थीं जो उच्चकुलम उत्पन्न हुई थी ॥३०-३२॥ उनमें अम्यिकामे धृनगष्ट, अम्बालिगामे पाहु और अग्नामे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः । अथ प्राप्ता महासधास्तदा द्वारपती पुरीम् । मागिनया दशार्हाणां प्रमिद्धाः पञ्च पाण्डवाः ॥१॥ युधिष्टिरोऽर्जुनो ज्यष्टी भीमसेनो महावलः । नकुलः सहदेवश्च परत पाण्डुनन्दनाः ॥२॥ 'मागधोऽत्रान्तरेऽप्राक्षीत्याअलिगणनायकम् । अन्वये मगरन् ! कस्य पाण्दुः पाण्डवनन्दनाः ॥३॥ गण्याह कुरराजानामन्यवाये महोदये । शान्तिकुन्धरनामानी यत्र तीर्थकरावयः ॥४॥ आदित्तः कुरवंश्यानो चतुरंगोपसेविनाम् । कतिचिन्मागधाख्यामि शृणु नामानि भूभृताम् ॥५॥ कुरजाङ्गलदेशस्य कुरुभूमिसमस्य हि । अभूतां भूपणे भूपी यो हास्तिनपुरे परं ॥६॥ श्रेयान् सोमप्रभश्चेति कुरवंशविशेषको । नायसमकाली ती दानधर्मस्य नायकौ ॥७॥ तत्र सोमप्रमस्याभूत्कुमारी जयनायकः । मधस्वरस्म एवात्र मरतेन कृताभिधः ॥८॥ तस्माकुररभूत्तस्मात्कुरचन्द्रस्नु नन्दनः । ततः शुमकरो राजा जातो प्रतिक्रस्ततः ॥९॥ राज्ञां कोटिपु कालेन समतीतासु भूरिपु । जिनान्तरेषु चानकमागरोपमोटिपु ॥१०॥ तिदेवो एतिकरी गङ्गदेवादयस्तथा । एतिमिप्रतिः मसुव्रतवातमन्दराः ॥११॥ श्रीचन्द्रसुप्रनिद्याद्या व्यतीताः शनशो नृपाः । तपनो तेन्द्रश्च पृतवीर्यः प्रतिष्ठितः ॥१२॥ इत्यादिपु व्यतीने तिरष्टि निद्युतिः । तिप्रीतिकराद्याश्च व्यतीताः पुरुवंशजाः ॥१३॥ ततो भ्रमरधोपाख्यो हरिधोपी हरिध्वजः । मूर्यघोषः सुनेजाश्च पृथुश्च पृथिवीपतिः ॥१४॥ इभवाहननामाद्याः समतीतास्ततो नृपाः । विजयाख्यो महाराजो जयराजस्ततोऽभवत् ॥१५॥ अथानन्तर किसी दिन यादयोंके भानेज महापराक्रमी, राजा पाण्डुये पुत्र युधिष्ठिर, अर्जुन, महा बलवान् भीमसेन, नकुल और सहदेव ये पाँचों पाण्डव द्वारिकापुरी आये ॥१-२॥ इसी बीच में राजा श्रेणिकने हाथ जोड़कर गौतमगणधरसे पूछा कि हे भगवन् ! पाण्डु और पाण्डव किसके वंशमें उत्पन्न हुए हैं ? ||३|| गौतमस्वामीने कहा कि पाण्डु और पाण्डय कुरुवंशमें हुए है जिसमें कि शान्ति, कुन्थु और अर ये तीन तीर्थकर हुए हैं ॥४॥ हे मगधेश्वर अब में प्रारम्भसे लेकर चतुर्वर्गकी सेवा करनेवाले कुरुवंशी राजाओंके कुछ नाम कहता हूँ सुनो ॥५॥ शोभामे देयकुर-उत्तरकुरुकी तुलना करनेवाले कुरुजाइल देशके हस्तिनापुर नगरमे जो आभूपणास्वरूप श्रेयान और मोमप्रभ नामके दो राजा हुए थे वे कुरुवंशके तिलक थे, भगवान् वृषभदेव के समकालीन थे और दानतीर्थके नायक थे ॥६-७। उनमें सोमप्रमके जय. कुमार नामका पुत्र हुआ । यह जयकुमार ही आगे चलकर भरत चक्रवर्ती के द्वारा 'मेघस्वर' इस नामसे सम्बोधिन किया गया | जयकुमारसे कुरु पुत्र हुआ। कुरुके कुरुचन्द्र, कुरुचन्द्र के शुभंकर और शुभंकरके धृतिकर पुत्र हुआ ॥९॥ तदनन्तर कालक्रमसे अनेक करोड़ राजा और अनेक मागर प्रमाण तीर्थकरोंका अन्तराल काल व्यतीत हो जानेपर धृतिदेव, धृतिकर, गगदेव, धृति मित्र, धृतिक्षेम, सुत्रत, जात, मन्दर, श्रीचन्द्र और सुप्रतिष्ट आदि सैकड़ो राजा हुए। तदनन्तर धृतपद्म, घृतेन्द्र, धृतवीर्य, प्रनिष्टिन आदि राजाओंके हो चुकनेपर धृतिदृष्टि, धृतिद्युति, धृतिकर, प्रीतिकर आदि हुए ।।१०-१३॥ तत्पश्चात् भ्रमरपोप, हरियोप, हरिध्वज, सूर्यघोप, सुतेजम्, पृथु और इभवाहन आदि राजा हुए। तदनन्तर विजय, महाराज और १ श्रेणिकः । २. जननायकः म01 २. विक्षेत्र म० ।

पचयारिंशः सर्गः ५३९ ततः सनत्कुमारोऽभूचनुर्थश्चक्रवर्तिनाम् । रूपराशसमाकृष्टमुरबाधितदीक्षितः ॥१६॥ मुकुमारः मुतस्तस्य तस्माद्वरकुमारकः । विश्वो वैश्वानरचाभूद्विश्वकंतुहयजः ॥१७॥ विश्वमेनस्ततो जानो यस्यरा प्राणवलमा । तासुतः पञ्चमश्चक्री शान्तिः पीडशतीर्थकृत् ॥१८॥ नारायणी नरहरिः प्रशान्तिः शान्तिवर्धनः । शान्तिचन्द्रः शशाङ्काङ्कः कुरुथ कुरुवंशजाः ॥१९॥ एवमायेवतीनेषु सूर्याऽभूयस्य मामिनी । श्रीमती तीर्थकृकुन्थुस्तयोश्चक्रधरोऽपि सः ॥२०॥ अनिकान्तेषु भूपु नतोऽपि बहुषु क्रमात् । राजा मुदर्शनो जाती यम्य मिया प्रियागना ॥२१॥ तयोरर इनि ख्यातः मप्तमश्चक्ररनिनाम् । कृती तीर्थकराणान्च यतोऽष्टादशसंख्यकः ॥२२॥ ततः मुचारुवाल्व चाररूपोऽय धीर्यवान् । चारपमस्तथान्येषु यमनीतेषु राजसु ॥२३॥ पद्ममालः मुमौमश्च जातः पमरथी नृपः । ततश्चक्री महापमो विष्णुपनो तु तत्मुती ॥२४॥ मुपदाः पद्मदेवश्च कुलकीर्तिस्ततः परः । कीर्तिः मुकौतिकीनी ता यमुर्कात्तिश्च वीर्यवान् ॥२५॥ यामुकिमियामिरयो घसुः मुवसुरेव च । पुरवंशश्रियो नाथः श्रीवसुश्च वसुन्धरः ॥२६॥ जज्ञे वसुरथस्तस्मादिन्द्रवीर्यश्च वीर्यवान् । चित्रो विचित्रो वीर्योऽथ विचित्रोऽपि महाबलः ॥२७॥ सनो विचित्रवीर्योऽभूत्तनश्चित्ररथो नृपः । महारथी वृतरथो वृपानन्तो वृषधजः ॥२८॥ श्रीनी प्रतधर्मा च तो धारण एव च । महासरः प्रतिसरः शरस पारशरी नृपः ॥२९॥ शरद्वीपश्च राजाऽमी द्वीपो द्वीपायनो नृपः । मुशान्तिः शान्तिभद्रश्च शान्तिपेणश्च भूपतिः ॥३०॥ मत्त योजनगन्धाया राजपुत्र्यास्तु शन्तनुः । तनयः शन्ननोभूभृद्धतव्यास इति स्मृतिः ॥३१॥ एनधर्मा ततस्तस्य तनयोऽपि धुनोदयः । तनेजा नयशा एनमानी एनी नृपः ॥३२॥ पसोऽपि धनराजोऽभूत्तस्य तिस्रः प्रियागनाः । अम्बिकाऽम्बालिराऽम्यारया वेद्याभिजासंभवाः ॥३३॥ एतराष्ट्रच पाण्डुश्च विदुरश्च विदां वरः । यथाक्रमममी तामां तिमृणां तनयायः ॥३४॥ जयराज हुए ॥१४-१५॥ इनके पश्चात् उसी वंश चतुर्थ चक्रयनी मनत्कुमार हुए जो रुप- पाशसे सिंचकर आये हुए देवों के द्वारा सम्बोधित हो दीभिन हो गये थे ।।१६।। मनकुमारके सुरुमार नामका पुत्र हुआ। उसके बाद घरकुमार, विश्व, पैश्वानर, विश्वकेतु और गृहध्वज नामक राजा हुए। तदनन्तर विश्वसेन राजा हुए जिनकी स्त्रीका नाम ऐग था । इन्हीके पश्चम चक्रयता और मोलहवें तीर्थकर शान्तिनाथ हुए ॥१७-१८।। इनके पश्चात् नारायण, नरहरि, प्रशान्ति, शान्तिवर्धन, मान्तिचन्द्र, शशाहाङ्क और कुरु गजा हा ।।१९।। इत्यादि राजाऑफ व्यतीन होनेपर इमी यंशम मूर्य नामक राजा हुए जिनकी स्त्रीका नाम श्रीमती था। उन दोनों भगवान कुन्थुनाथ उत्पन्न हुए. जो तीर्थकर भी थे और चक्रवर्ती भी थे ।।२०) नदनन्नर क्रम-क्रममे बहुन राजाओंके व्यतीत हो जानेपर सुदर्शन नामक राजा हुए जिनको त्रीका नाम मित्रा था । इन्हीं दोनों मप्तम चक्रायनों और अठारहवें नीर्थ- फर अग्नाथ हुए ॥२१-२२॥ उनके बाद मुचार, चार, चाररूप और चारपद्म गजा हुए। तदनन्तर अन्य गजाओंके हो चुकनेपर इमी वंशम पद्ममाल, मुभीम और पद्मरथ गजा हुए। उनके याः महापद्म चक्रवर्ती हुए। उनके विष्णु और पद्म नामक दो पुत्र हुए ॥२३-२४ा नदनन्तर मुपद्म, पद्मदेव, फुलकीनि, फीनिं, मुफोनि, कीनि, यमुकौनि, यामुकि, वागव, यमु, मुबसु. श्रीवमु, यमुन्धर, यमुरथ, इन्द्रवीर्य, चित्र, विचित्र, पाय, विचित्र, विचित्रवीर्य, चित्रग्य, महाग्थ, धृतरथ, पानन्त, पृपघात, श्रीरत, बनधर्मा, धृन, धारण, महामर, प्रनिमर, शर, पारार, पारद्वीप, दीप, दीपायन, मुमान्ति, शान्निभद्र, शान्निपंग, योजनगन्या गजपुरी भनो गन्ननु और शन्तनुम् गजा धृतव्याम पुत्र हुए।५-३।। तदनन्तर धृनधा, धृनोदय, धृनतेज, धृतयश, धृनमान और धृन हुए। धृनयः धृनगज नामक पुत्र हुआ। इमसी अम्यिका, अम्बालिका और अम्या नामकी नीन स्त्रियाँ थी जो उन्यालम उपम 3-2उनमें अम्बिसारी धृतराष्ट्र, अग्यालिकामे पातु और अग्नामे ५४० हस्विंशपुराणे भोप्मोऽपि शन्तनौरव सन्ताने रुक्मणः पिता । यस्य गङ्गामिधा माता राजपुत्री पवित्रधीः ॥३५॥ धृतराष्ट्रस्य तनया दुर्योधनपुरस्सराः । नयपरिषसम्पयाः परस्परहिते रताः ॥३६॥ पाण्डोः कुन्त्यां समुत्पन्नः कर्णः कन्याममङ्गतः । युधिष्ठिरोऽर्जुनो मीम अदायामभवंस्त्रयः ॥३७॥ नकुलः महदेवश्च कुलस्य तिलको मुतौ । मद्यामद्रिस्थिरौ जाती पञ्च ते पाण्डुनन्दनाः ॥३८॥ पाण्डौ स्वर्ग गते देण्या मद्रयां च जिनधर्मत. । पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च राज्येऽभूवन्धिरोधिनः ॥३९॥ विभज्य कौरवं राज्यं भुजतां सममागतः । पञ्चानामकतस्तेपामितरेषां तथैकतः ॥४०॥ भीष्मश्च विदुरी द्रोणो मध्यस्थाः शकुनिः पुनः । मन्त्री दुर्योधनस्येष्टाः शशरोमादयस्तथा ॥४१॥ अजय सह कर्णेन वयं दुर्योधनस्य तु । जरासन्धेन नैभृत्य' निभृतस्यागपत्तराम् ॥१२॥ भार्गवाचार्य द्रोणो धनुर्वेदविशारदः । कौन्तेयधाराष्ट्राणां चके मध्यस्थमावतः ॥४३॥ मार्गवाचार्यबंशोऽपि शृणु श्रेणिक वर्ण्यते । द्रोणाचार्यस्य विख्याता शिष्याचार्य परम्परा ॥४४॥ आत्रेयः प्रथमस्तत्र तच्छिप्यः कौथुमिः सुतः । तस्याभूदमरावतः सितस्तस्यापि नन्दनः ॥४५॥ वामदेवः सुतस्तस्य तस्यापि च कपिष्टलः । जगत्स्थामा सरयरस्तस्य शिष्यः भारासन. ॥४६॥ तस्मादावण इत्यासीत्तस्त्र विद्रावणः मुतः । विद्रावणमुतो दोणः सर्वभार्गवन्दितः ॥४७॥ अश्विभ्यामभवत्तस्मादश्वत्थामा धनुर्धरः । रणे यस्य प्रतिस्पर्धी पार्थ एव धनुर्धरः ॥४८॥ ज्ञानिश्रेष्ठ विदुर ये तीन पुत्र हुए ॥३४॥ भीष्म भी शन्तनुके ही वंशमें उत्पन्न हुए थे । धृतराज के भाई रुक्मण उनके पिता थे और पवित्र बुद्धिको धारण करनेवाली राजपुत्री गगा उनकी माता थी ॥३५॥ राजा धृतराष्ट्रके दुर्योधन आदि सौ पुत्र थे जो नय-पौरुपसे युक्त तथा परस्पर एक दूसरेके हित करनेमें तत्पर थे ॥३६॥ राजा पाण्डुकी स्त्रीका नाम कुन्ती था, जिस समय राजा पाण्डुने गन्धर्व विवाह कर कुन्तीसे कन्या अवस्थामें संभोग किया था उस समय कर्ण उत्पन्न हुए थे और विवाह करनेके बाद युधिष्ठिर, अर्जुन और भीम ये तीन पुत्र हुए ॥३७॥ इन्हीं पाण्डुको माद्री नामकी दूसरी स्त्री थी उससे नकुल और सहदेव ये दो पुत्र उत्पन्न हुए। ये दोनों ही पुत्र कुलके तिलकस्वरूप थे और पर्वतके समान स्थिर थे । युधिष्ठिरको आदि लेकर तीन तथा नकुल और सहदेव ये पॉच पाण्डव कहलाते थे ॥३८॥ जब राजा पाण्डु और रानी मद्री जिन-धर्मके प्रसादसे स्वर्गवासी हो गये तब पाण्डव और दुर्योधनादि धार्तराष्ट्र राज्य विपयको लेकर एक दूसरेके विरोधी हो गये ॥३९॥ जब इनका विरोध बढने लगा तब भीष्म, विदुर, द्रोण, मन्त्री शकुनि तथा दुर्योधनके मित्र शशरोम आदिने मध्यस्थ वनकर कौरवोंके राज्यके बराबर दो भाग कर दिये। एक भाग युधिष्ठिर आदि पाँच पाण्डवोंको मिला और दूमरा भाग दुर्योधन आदि मौ कौरवोको प्राप्त हुआ ॥४०-४१।। इधर दुर्योधनकी कर्णके साथ उत्तम मित्रता हो गयी और जरासंधके साथ स्थिर बैठकें होने लगी ॥४२॥ द्रोणाचार्य धनुर्विद्याम अत्यन्त निपुण थे और वे मध्यस्थ-भावसे पाण्डवों तथा कौरवोंके लिए भार्गवाचार्यका काम करते थे अर्थात् दोनोंको ममान रूपसे धनुर्विद्याका उपदेश देते थे ॥४३।। गौतमस्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! द्रोणाचार्यकी शिष्य और आचार्योकी परम्परा तो प्रसिद्ध है अतः उसे छोड़ भार्गवाचार्यकी वंशपरम्पराका वर्णन करता है उसे सुन ॥४॥ भार्गवका प्रथम शिष्य आत्रेय था, उसका शिष्य कोथुमि पुत्र था, कोथुमिका अमरावर्त, अमरावर्तका मित, सितका वामदेव, वामदेवका कपिटल, कपिष्टलका जगस्थामा, जगत्स्थामाका मरवर, मरचरका शरामन, शरासनका रावण, रायणका विद्रावण और विद्रावणका पुत्र द्रोणाचार्य था जो ममस्त भार्गव वंशियोंक द्वारा पन्दित्त था-मब लोग उसे नमस्कार करते थे ॥४५-४॥ द्रोणाचार्यकी अश्विनी नामक त्रासे १ नत्यं गः । २ वारिद्वनि. म०1३ पपिष्टकः म ।

पञ्चचग्वारिंशः सर्गः ५४१ पार्थप्रतापविज्ञानमात्पर्योपहता अथ। दुर्योधनादयः कर्नु सन्धिदूषणमुद्यताः ॥४९॥ पञ्च कौरवराज्योधर्मस्तः शतमकतः । भुञ्जन्ति फिमितोऽन्यत्स्यादन्याय्यमित्ति ते जगु. ॥२०॥ समुद्रा इव चचारस्नतः परुषवायुभिः । अपि प्रसनगम्भीराः क्षुमिताः पाण्डुनन्दनाः ॥२१॥ छादयामि द्विपच्छेलं शरधारामिरुच्छ्रितम् । इन्युन्थितोऽर्जुनोऽम्मोदः शमितोऽग्रजमायुना ॥५२॥ दृष्ट ग दहामि दायादशतमित्युदिनं ध्रुवन् । मन्रोणाशीशमज्ज्यायान् स्फुरदीमभुजङ्गमम् ॥५३॥ अहितापकुलान्ताय नकुलोऽपि कृताधमः । ज्येष्टेन सनयं दो भुजपचरयन्त्रितः ॥५॥ मस्मयामि लघु द्वेपिवनपण्डमिति ज्वलन् । अशामि ज्यष्टमधेन सहदेवदवानलः ॥५५॥ वसता शान्तचित्तानां दिनैः कतिपयैरपि । प्रसुप्तानां गृहं तपां दीपितं धृतराष्ट्रजः ॥५६॥ विबुध्य सहसा मात्रा सत्रा ते पचपाण्डवा. । मुरड्या विनिःसृत्य गताः छाप्यपारयः ॥५७॥ ततोऽपरागो लोकस्य जानो दुर्योधनं प्रति । छ वा पापानुरागाध्ये नापरागः सती मवेत् ॥५॥ अश्वत्थामा नामक पुत्र हुआ था। यह अश्वत्थामा बड़ा धनुर्धारी थी और युद्ध में एक अर्जुन ही उसका प्रतिस्पर्धा था-अर्जुन ही उसकी बराबरी कर सकता था अन्य नहीं ।।४।। तदनन्तर अर्जुनके प्रताप और विज्ञानसे ईर्ष्या रखनेयाले दुर्योधन आदि कौरव सन्धिमें दोप लगानेके लिए उद्यत हो गये अर्थात् अर्जुनके लोकोत्तर प्रताप और अनुपम सूझ-यूझसे ईर्ष्या कर कौरव लोग राज्यके विपयमें पहले जो सन्धि हो चुकी थी उममें दोप लगाने लगे ॥४९।। वे कहने लगे कि कौरवोंके आधे राज्यको एक ओर तो सिर्फ पाँच पाण्डव भोगते हैं और एक ओर आये राज्यको हम सौ भाई भोगते हैं-इससे घटकर अन्याय- पूर्ण कार्य और क्या होगा ? ॥५०॥ दुर्योधनादिकका यह विचार पाण्डयोंने भी मुना। पाण्डवोंमें युधिष्ठिर शान्तिप्रिय व्यक्ति थे अतः उन्होंने इस ओर कुछ ध्यान नहीं दिया परन्तु शेप चार पाण्डव प्रमन्न तथा गम्भीर होनेपर भी उम तरह क्षोभको प्राप्त हो गये जिस तरह कि प्रचण्ड वायुसे चारों दिशाओंके चार समुद्र क्षोभको प्राप्त हो जाते हैं ।।५।। अर्जुनरूपी मेघ यह कहता हुआ उठकर खड़ा हो गया कि मैं उठते हुए इम शत्रुरूपी पर्वतको वाणरूपी जलकी धारासे अभी हाल आच्छादित किये देना हूँ परन्तु युधिष्टिररूपी वायुने उसे शान्त कर दिया ॥५२॥ भीमरूपी भुजङ्ग यह कहकर उठ खड़ा हुआ कि मैं मी-के-मो हिम्सेदारोंको अपनी दृष्टिसे अभी भस्म किये देता हूँ परन्तु बड़े भाई युधिष्टिरने उमे मन्त्रके द्वारा शान्त कर दिया ॥५३॥ नकुल भी, नकुल (नेवला) के समान शत्रुपी मौके सन्ताप- दायी कुलका अन्त करने के लिए उद्यम करने लगा परन्तु अग्रज-युधिष्ठिरने उसे अपने भुजरूपी पिंजरेमे कैद कर गेफ रखा १५४॥ और सहदेवरूपी दावानल यह कहता हुआ देदीप्यमान होने लगा कि मैं शत्रुम्पी वनसण्डको अभी हाल भस्म किये देता है परन्तु बड़े भाई- युधिष्ठिररूपो मेघने उसे शान्त कर दिया ।।५५|| तदनन्तर मय पाण्डव शान्त चित्त होकर रहने लगे। कुछ दिनों बाद जब वे गहरी नीदमें मो रहे थे तव कौरवोंने उनके घरमें आग लगवा दी ।।१६।। महमा उनकी नीद मुल गयी और पॉचोंके पॉच पाण्डव माताको साध ले मुरगसे निकलकर निर्भय हो कहीं चले गये ।।५७॥ इम घटनामे जननाका दुर्योधनके प्रति विद्वेष उमड़ पड़ा मो ठीक ही है क्योंकि पापमें अनुराग रसनेवाले फिम पुरुषपर मजनोंको विद्वेष नहीं होना ? अर्थान् मीपर होता १. रामायं म०, ग० । २ अहिताना रागामाकृष्ट कुलमपकुलं तम्यान्नस्लम्मै, पवे नापेनोपलदिन बुलं तारकुल अहीना सर्राणा यत् ताराल तस्यान्तम्तस्मै । ३. माल पारडयः पदे नाला जन्नुपिशेषः । ४.मान्त कृत.।

५४० हस्विंशपुरागे मीमोऽपि शन्तनौरव सन्तान रमणः पिना । यस्य गहामिधा माता राजपुत्री पवित्रधीः ॥३५॥ धनराष्ट्रस्य सनया दुर्योधनपुरस्मराः । नयपरिपसम्पमाः परस्परहिते रताः ॥३६॥ पाण्डोः कुन्यां समुत्पनः कर्णः कन्याप्रमगतः । युधिष्टिरोऽर्जुनो मीम उडायामभवंस्त्रयः ॥३॥ नकुलः सहदेवश्च कुलस्य तिलको सुती । मद्यामद्रिस्थिरी जाती पञ्च ते पाण्डुनन्दनाः ॥३८॥ पाण्डी स्वर्ग गते देव्यां मद्रयां च जिनधर्मतः । पाण्डवा धार्तराष्ट्राच राज्येऽभूवन्विरोधिनः ॥३९॥ विभज्य कौरवं राज्यं भुजतां सममागतः । पञ्चानामकतस्तपामितरपा तथकतः ॥४०॥ मोमध पिदुरो द्रोणो मध्यस्याः शकुनिः पुनः । मन्त्री दुर्योधनस्येष्टाः शरीमादयस्तथा ॥४॥ अजय मह वर्णन वयं दुर्योधनस्य नु । जरासन्धेन नभृत्य' निभृतस्यामरत्तराम् ॥४२॥ मागंगाचार्य द्रोणो धनुर्वेदविशारदः। कौन्तेयधार्तराष्ट्राणां चक्रे मध्यस्थमावतः ॥४३॥ मार्गवाचायंशोऽपि णु श्रेणिक वर्ण्यने । द्रोणाचार्यस्य विरयाता शिष्याचार्य परम्परा ॥४॥ आत्रेयः प्रथमस्तम नच्छिप्यः काथुमिः सुतः । तस्याभूदमरावतः पितस्तस्यापि नन्दनः ॥४५॥ वामदेवः मुतस्तस्य तस्यापि च कपिटलः । जगरस्थामा सरपरस्तस्य शिष्यः शरामनः ॥४६॥ तस्मादारण इत्यासीत्तस्त्र विद्रापणः मुनः । विदारणमुनो द्रोणः सर्वभागययन्दितः ॥५॥ अश्विन्याममवत्तम्मादश्वरयामा धनुर्धरः। रणे यस्य प्रतिस्पर्धा पार्थ एव धनुर्धरः ॥४८॥ ज्ञानिश्रेष्ठ विदुर ये तीन पुत्र हुए ॥३४॥ भीष्म भी शन्तनुके ही वंशमें उत्पन्न हुए थे। धृतराज के भाई रमण उनके पिता थे और पवित्र बुद्धिको धारण करनेवाली गजपुत्री गडा उनकी माता थी ॥३५।। गजा धृतराष्ट्र के दुर्योधन आदि मौ पुत्र थे जो नय-पौरपसे युक्त तथा परस्पर एक दूमरके हित करनेमें नत्पर थे ॥३६) राजा पाण्डुकी स्त्रीका नाम कुन्ती था, जिम ममय राजा पाण्डुने गन्धर्य विवाह कर पुन्नीसे कन्या अवस्थामें मंभोग किया था उम समय कर्ण उत्पन्न हुए थे और विवाह करनेके याद युधिष्ठिर, अर्जुन आर भीम ये तीन पुत्र हुए ॥३०॥ इन्ही पाण्डुको माद्री नामको दुमरी स्त्री थी उमसे नकुल और महदेय ये दो पुत्र उत्पन्न हुए। ये दोनों ही पुत्र कुलके तिलकस्यरूप थे और पर्वतके ममान स्थिर थे । युधिष्टिरको आदि लेकर तीन तथा नकुल और महदेव ये पाँच पाण्डय कहलाते थे ।।३८॥ जय गड़ा पाद और रानी मही जिन-धर्मफे प्रमादसे स्वर्गवासी हो गये तय पाण्डव और दुर्योधनादि धानगष्ट्र राज्य विषयको लेकर एक दुमरक विराधी हा गय ॥३॥ जब इनका विरोध बाने लगा नय भीष्म, विदुर, द्रोण, मन्त्री शकुनि तथा दुर्योधन मित्र शशरोम आदिने मध्याय यनकर कांग्याँक सम्यक अगर दो भाग फर दिये। एक भाग युधिष्ठिर आदि पाँच पाण्डयों को मिला और दूमग भाग दुर्योधन आदि मौ कौरवोंको प्राप्त हुआ ॥४०-४१|| इधर दुर्योधनको कर्णक माय उत्तम मित्रना हो गया और जरामंधफे माथ स्थिर पैटर होने लगी है। दोनापारी धनुविधाम अन्यन्न निपुण ये और मध्यम्य-मायरी पाया गया पोग्योप लिए भायाचार्यका काम करते थे अयान दोनों की मगान मे धनुपियामा सांग देने में ॥१३॥ गीनमम्यामी पाहते कि गिर ! होगाचार्यको शिल और आग परम्पग नो प्रमिद । अतः उसे छोर भार्गमापाकी यशपरम्परा पान करता हूँ ग गुन सा भागंपरा प्रथम शिष्य आग्रेय था, उसका शिष्य पामि पुत्र भा, पीमिया अमंगनं, भगगनका मिन, मिनका यागदेय, यामदेवरा पपिटल, परिणामामा, जगम्यागारा मग्यर, गग्यम्मा गगन, गगनका गपन, गापामा पिमान और शिया पुरोगामार्ग था जो समान भागय पक्षियों का पति- मनमगार पर-सा दोगासाकी गिनी नाम ! it.R. Rasi.1 पञ्चचत्वारिंशः सर्गः उदाररूपलावण्या दुकूलपटमाटिका । जटिला वटशाखेव स्निग्धच्छाया व्यराजत ॥७३॥ आफर्णायतनेत्राभ्यां स्वधरण मुखेन्दुना । जघनस्तनमारेण मनी हरनि तापसी ॥४॥ पूज्या तापसलोकस्य मकलस्य तपोवनम् । अकरोत्पावनं तन्वी चन्द्रलेखेव निर्मला ॥७॥ कौन्तेयानां कृतातिथ्या तापमोचिनवृत्तिमिः । जहार हारिवाक्यासौ क्षुत्पिपासापथश्रमम् ॥७६॥ कुन्ती पप्रच्छ तां प्रीत्या वाले ! कमलकोमले । नवे वयसि वैराग्यं कुतो जातमतिव्रते ॥७॥ इति सानुनयं प्रष्टा राजपुत्री जगी गिरा। मनो मधुरया तेषां हरन्ती हरिणेक्षणा ॥७८॥ माधु पृष्टं स्वया पूज्यं ! श्रूयतामत्र कारणम् । सननो हि मनोदुःखं निवेदितमुंदस्यनि ॥७९॥ कारवाय पुरवाह कौन्तेयायामजाय हि । स्वभावोदारचेष्टाय गुरभिर्विनिवेदिता ॥८॥ समातृभ्रानुकस्यास्य मदपुण्यप्रमावतः । श्रुता वार्ता जनेभ्यो या न स्मर्तुमपि शक्यते ॥१॥ दाहदुःखमृतं कान्तं युक्तं तेनैव वर्मना । अनुमतुं तु तापस्ये शक्तिहीनतया स्थिता ॥१२॥ निशम्यति वचः सौम्या सा जगा भाविनी स्नुषाम् । कृतं भद्रं त्वया मद्रे कुर्वन्या प्राणरक्षणम् ॥८३॥ अन्यथा चिन्नयत्येष मित्रे मित्रजनो जने । अन्यथा विधिरप्यस्मादयत दीर्घदर्शिता ॥८४॥ कल्याणहनवः प्राणाः कल्याणि! मम वाक्यतः । तपस्यन्न्यापि धार्यन्तां जीवन्ती मद्रमाप्यसि ॥८५॥ अतिशय रूप और लावण्यकी धारक थी, मुन्दर स्वच्छ साड़ीसे सुशोभित थी, शिरपर जटाएँ रखाचे हुई थी और स्निग्ध कान्तिसे सहित थी इसलिए पायोंको धारण करनेवाली स्निग्ध छायासे सहित वटवृक्षकी शाखाके समान सुशोभित हो रही थी १७३।। यह तापसी कानों तक लम्बे नेत्र, मुन्दर ओंठ, मुखरूपी चन्द्रमा एवं नितम्ब और स्तनोंके भारसे सबका मन हरती थी।७४।। वह समस्त तापसोंके द्वारा पूज्य थी, चन्द्रमाकी कलाके समान कृया तथा निर्मल - थी और अपने आवाससे उस तपोवनको पवित्र करती थी १७॥ मधुर वचन बोलनेवाली उस तापमीने तापसोंके योग्य वृत्तिसे पाण्डवोंका अतिथि सत्कार किया तथा उनकी भूख- प्यास और मार्गकी थकावटको दूर किया ।।६।। एक दिन कुन्तीने बड़े प्रेमसे उससे पूछा कि हे कमलके समान कोमलागी बेटी! तुझे नयो अवस्था में ही वैराग्य किस कारणसे हो गया है जिससे तूने यह कठिन व्रत धारण कर रखा है ? 1991| इस प्रकार स्नेहके साथ पूछी जानेपर मृगनेत्री राजपुत्री मनोहर वाणीसे उनका मन हरती हुई बोली कि हे पूज्ये ! आपने ठीक पूछा है, मेरे वैराग्यका कारण सुनिए क्योंकि मजन पुम्प बताये हुए मनके दुःखको दूर कर देते हैं ।।७३-७२।। मेरे गुरुजनोंने मुझे स्वभावसे उत्तम चेष्टाके धारक पाण्डयोंके बड़े भाई युधिष्ठिरके लिए पहले ही दे रगा था। परन्तु मेरे पापके प्रभावसे माता और भाइयोंके माथ उनके विपयका जो समाचार लोगोंमे सुना है उमका स्मरण भी नहीं किया जा सकता 110 'मेरा पति दाहके दुःखसे मरा है इमलिए मुझे भी उसी मार्गसे मरना युक्त था परन्तु में दाक्तिहीन होने के कारण उस मार्गसे मर नहीं सकी इमलिए तपस्या करने लगी है.' ॥८॥ नापीके वचन मुन उसे होनहार पुत्रवधू जान मौम्य म्वभावकी धारक कुन्नीने कहा कि हे भरे ! तूने बहुत उत्तम किया जो प्राणोंकी रक्षा को ।। ८३॥ मित्रजन, मित्रजन विषयमें कुछ अन्य विचार करते हैं और भाग्य उमसे विपरीत कुछ अन्य ही कार्य कर 7 देता है इसलिए दीर्घदर्शिनाको आकांक्षा की जाती है |शा हे कल्याणि ! प्राण कल्याणक कारण हैं इमलिए मेरे कहनसे तू तपस्या करती हुई भी इन्हें अवश्य धारण कर । यदि १ मुष्टु अधरः सघरः तेन । २. जातमिनिमते म०।३ रोक्गेति । ४. चिन्तयत्येया म०, ५०, म., १५.-टर्यते म०, ५०, ग०,।

५४२ हरिवंशपुराणे प्रलीनानेय तान्मन्या पाण्डवान् गोत्रनास्ततः । निवृत्ता इव ते तस्थुः कनकालोचितक्रियाः ॥५९॥ नदी गगां समुत्तीर्य कौन्तयास्तु महाधियः । कृतवेषपरावर्तास्त पूर्या दिशमाश्रिताः ॥६॥ कुन्तीगतियशेनेने गच्छन्तः सुखमिच्छया । कौशिकाख्यां पुरी प्राप्ता वर्णो यत्र नरेश्वरः ॥६॥ तस्य प्रभावती मार्या सुता कुसुमकोमला । जनानुरागतस्तांस्तान' श्रुम्बा दृष्टवती तदा ॥६२॥ युधिष्ठिरकुमारन्दुदर्शनेन मुदर्शना । कन्याकुमुदनी धन्या विकासमगमत्परम् ॥६३॥ अचिन्त यदसौ तस्य माविनी प्रियभामिनी । इह जन्मनि में भूयादयमेव परो वरः ॥६॥ ज्ञात्वाभिप्रायमस्याः म संजातप्रेमबन्धनः । आशाबन्धं प्रदश्यांगायज्ञयय करग्रह ॥६५॥ प्रतीक्षमाणया तस्य तया भूयः समागमम् । नीयते स्म विनोदैः स्वैः काल, कन्याजमोचितैः ॥६६॥ ततस्ने ललिताकाराः स्वमावेन सहोदरा । द्विजवेपभृता जग्मुर्जनचित्तापहारिणः ॥६७॥ श्रासनं शयनं तेषां भोजनं च मनोहरम् । मुखेनैव सुपुण्यानामचिन्तितमभूत्तदा ॥६॥ पुनस्तापसपेण प्राप्ताः श्लेष्मान्तक वनम् । ते तापसाश्रमे रम्य विशश्रमुरिहाचिंताः ॥६९॥ रेशस्य विन्ध्यसेनस्य देहना । बसन्तसुन्दरीनाम्ना नर्मदाजाऽस्ति तन च ॥७॥ युधिष्ठिराय सा दत्ता पुरैब गुरुभिर्वरा । दग्धार्तामुपश्रुत्य निन्दितस्वपुराकृता ॥७॥ जन्मान्तरंऽपि काइझन्ती तस्य कान्तस्य दर्शनम् । तपश्चरिनुमारब्धा तन सा तापमाश्रमे ।।७२।। है ॥५८।। तदनन्तर कुटुम्बके लोगोंने समझा कि पाण्डव तो इसी आगमें भस्म हो चुके हैं इसलिए वे मरणोत्तरकाल होनेवाली क्रियाओंको कर निश्चिन्त-जैसे होकर रहने लगे।५९।। इधर महाबुद्धिमान पाण्डव गङ्गा नदीको पार कर तथा वैप बदलकर पूर्व दिशाको ओर गये ।।६०॥ माता कुन्ती धीरे-धीरे चल पाती थी इसलिए वे उसकी चालके अनुसार इच्छापूर्वक सुखसे धीरे-धीरे चलते हुए उस कौशिक नामकी नगरोमें पहुंचे जहाँ वर्ण नामका राजा रहता था ।।६।। राजा वर्णकी स्त्रीका नाम प्रभावती था और उससे उनके कुसुमकोमला नामकी पुत्री उत्पन्न हुई थी। पाण्डवोंपर लोगोंका अधिक अनुराग था इसलिए कुसुमकोमलाने भी उनका नाम मुना तथा उन्हें देखा ॥६२॥ वह भाग्यशालिनी सुन्दर कन्या रूपी कुमुदिनी, युधिष्ठिररूपी चन्द्रमाको देखनेसे परम विकासको प्राप्त हो गयो ॥६॥ जो युधिष्टिरकी प्रिय स्त्री होनेवाली थी ऐसी कन्या कुसुमकोमला उन्हे देख मनमें विचार करने लगी कि इस जन्म मेरे यही उत्तम पति हो ॥६४॥ कन्याके अभिप्रायको जानकर युधिष्टिरके भी प्रेमरूपी यन्धन समुत्पन्न हो गया और वे उसे इशारेसे विवाहको आशा दिखा आगे चले गये ।।६५।। कुमुमकोमला, उनके पुनः समागमकी प्रतीक्षा करती हुई कन्याजनोके योग्य विनोटोंसे समय बिताने लगी ॥६६॥ तदनन्तर जो स्वभावसे हो सुन्दर आकारके धारक थे ऐसे वे पॉचो भाई ब्राह्मणका वेष रस, मनुष्योंके चित्तको हरते हुए आगे चले ॥६॥ वे सब महापुण्यशाली जीव थे इसलिए उस अज्ञातवासके समय भी उन्हे मनोहर आसन, शयन और भोजन सुसपूर्वक अचिन्तित रूपसे प्राप्त होते रहते थे ॥६८|| तत्पश्चात् वे तापसके वेपमें श्लेष्मान्तक नामक वनमे पहुँचे यहाँ तापमाके सुन्दर तपोवनमे उन्होंने विश्राम किया और तापसाने उनका अन्छा सत्कार किया ।। ६९ ।। उस आश्रममें वसुन्धरपुरके राजा बिन्ध्यसेनकी वसन्तमुन्दरी नामकी पुत्री, जो कि नर्मदा नामक स्त्रीसे उत्पन्न हुई थी रहती थी ।।७। यह कन्या गुरुजनाने युधिष्ठिरके लिए पहले ही दे रखी थी परन्तु जब उनके जल जानेका समाचार सुना तब यह अपने पूर्वकृत कर्मको निन्दा करती हुई इस इन्छासे कि 'उन प्राणनाथका दर्शन इम जन्ममें न हो मका तो जन्मान्तरमें हो', तपस्वियोंके उस आश्रममें तप करने लगी थी ।।७१-७२।। यह १ •मासताः म० । २. तास्तान म० । ३. नर्मदायाश्च तत्र च क० । नर्मदायास्ति-०, ५०, ड ।

पञ्चचत्वारिंशः सर्गः उदाररूपलावण्या दुकृलपटमाटिका । जटिला वटगाव स्निग्धच्छाया न्यराजन ।।७।। आकर्णायतनवान्यां स्वधरंण मुग्वेन्दुना । जवनस्तनमारण मनो हरनि नापसी ॥७४॥ पृज्या तापमलोकस्य सक्लम्य तपोवनम् । अकरोपावनं नन्त्री चन्द्रलेखेव निर्मला ।।७५|| कम्तियानां कृनानिय्या तापमोचिनवृत्तिमिः । जहार हारिवाक्यामी क्षुत्पिपामाग्यश्रमम् ॥७॥ कुन्नी पप्रच्छ तां प्रीन्या वाले ! कमलकोमले । नवे वयपि वैराग्यं कुतो जानमनिव्रते ॥७॥ इनि सानुनयं प्रष्टा राजपुत्री जगी गिरा । मनो मधुरया तेषां हरन्नी हरिणक्षणा ॥८॥ माउ पृष्टं त्वया पूज्ये ! धूयनामन कारणम् । मजनो हि मनोदुःखं निवेदितमुदम्यति ॥ १९॥ कारवाय पुरनाहं कौन्तेयायोग्रजाय हि । म्यमादोदारचष्टाय गुरामिविनिवेदिता ॥८॥ समातृभ्रातृरम्यास्य मदपुण्यप्रभावतः । श्रुता वार्ता जनम्यो या न स्मनुमपि शक्यते ॥८॥ दाहृदुःश्वमृनं कान्तं युक्तं तेनैव बर्मना । अनुमतुं नु नापस्ये शनिहीनतया स्थिता ॥१२॥ निदाम्यति बचः सौम्या मा जगी भाविनी स्नुपाम् । कृतं मई वया मद्रे कुर्वन्न्या प्राणरक्षणम् ॥४३॥ अन्यथा चिन्नयन्यप मित्रे मित्रजनो जने । अन्यथा निधिरप्यस्मादय्यत दीधंदर्शिता ॥४॥ क्ल्याणहंनवः प्राणाः कल्याणि! मम वाक्यतः । तपम्यन्यापि धार्यन्ता जीवन्नी ममापयामि ॥८५॥ अनिदाय रूप और लावण्यकी धारक थी, मुन्दर म्वच्छ साड़ीसे मुगोभिन थी, शिरपर जटाएँ रग्बाये हुई थी और स्निग्ध कान्तिसे सहित थी इसलिए पायोंको धारण करनेवाली स्निग्ध छायाले सहित वटवृनकी शाखाके समान सुशोभित हो रही थी || यह तापमी कानों तक लम्बे नेत्र, सुन्दर ओंठ, मुखरूपी चन्द्रमा एवं नितम्ब और स्तनोंक भारसे सबका मन हरती थो ।।७।। यह ममम्न तापसके द्वारा पूज्य थी, चन्द्रमाको कलाके ममान कृटा तथा निर्मल थी और अपने आवामसे उस तपोवनको पवित्र करती थी ||७|| मधुर वचन बोलनेवाली उम तापमीने तापमोंके योग्य वृत्तिसे पाण्डवोंका अतिथि-सत्कार किया तथा उनकी भूग- प्यास और मार्गकी थकावटको दूर किया !|६|| एक दिन कुन्तीने बड़े प्रेमसे उमसे पूछा कि हे कमलके समान कोमलागी बेटी ! तुझे नयी अवस्था में ही पैराग्य किम कारणसे हो गया है जिससे तूने यह कठिन व्रत धारण कर रखा है ? ॥७॥ इस प्रकार स्नेहके माथ पूछी जानेपर मृगनेत्री गजपुत्री मनोहर वाणीसे उनका मन हरती हुई बोली कि हे पूज्ये ! आपने ठीक पूछा है, मेरे बैराग्यका कारण मुनिए क्योंकि मजन पुम्प बनाये हुए मनके दुःखको दूर कर देते हैं ।।७३-७२।। मेरे गुरुजनांने मुझे स्वभावसे उत्तम चेष्टाके धारक पाण्डवोंके बड़े भाई युधिष्टिरके लिए पहले ही दे रखा था। परन्तु मेरे पापक प्रभावसे माता और भाइयोंके माथ उनके विपयका जो समाचार लोगोंसे मुना ई उमका स्मरण भी नहीं किया जा मकता 11८1 मग पनि दाहके दुःश्यसे मरा है इमलिए मुझे भी उमी मार्गसे मरना युक्त था परन्तु मैं शक्तिहीन होने के कारण उम मार्गसे मर नहीं मको इमलिए तपस्या करने लगी है ॥८॥ तापीके वचन मुन उसे होनहार पुत्रवधू जान मौम्य स्वभावकी धारफ कुन्नीने कद्दा कि हे भद्रे ! नूने बहुन उत्तम किया जो प्राणोंकी रक्षा की ।। ८३ ।। मित्रजन, मित्रजनके विषयमे कुछ अन्य विचार करते हैं और भाग्य उममे विपर्गन कुछ अन्य ही कार्य कर देता है इमलिए दीर्घदमिनाको आकांक्षा की जाती है ।1८४हे कल्याणि ! प्राण कल्याणक हैं इसलिए मेरे कहनेसे तू तपस्या करती हुई भी इन्हें अवश्य धारण कर । यदि कारण १ मुष्ट अधरः स्वघरः तेन । २. नातमितिव्रते म.। : दूरीकरोति । ४. चिन्तयत्येवा म०, १ । ५. -टयते म०, २०, ग०, । घ.

५४४ हरिवंशपुराणे तदेवान्यवदपाण्डोः प्रथमस्तनयो यतः । धर्म चास्थयातमणुशीलगुणवतैः ॥८६॥ परस्परं समालाप मनः प्रीतिकरऽनयोः । वनमाने तदा कन्या मनमामन्यतेति सा ॥८॥ राजलक्षणयुक्तः म किं स्यादप युधिष्टिरः । ममातृकोऽनुशास्तीह मामतीर कृपान्वितः ॥१८॥ मथा मम पुण्यन गण्यन नपमापि च । मन्यमन्धः मियो जीच्यादना हतिरिहोगमी ॥८९॥ यियामवस्तु युनानां पुनदर्शनमस्थिति । मम्मानिताः प्रियालापैत्युरस्याच साशया ॥२०॥ ममुद्रविजयः श्रुत्वा ससस्वसीयमारणम् । मारणाय कुरूणां म प्राप्तः कुपितमानमः ॥११॥ जरासन्धस्तनः प्राप्य स्वयमेव महादरः । यदूना कारवाणां च सन्धिमापाय यातगन् ॥१२॥ इतोऽपि नापमाकारं स्यनवेनि द्विजवेपिणः । प्रयान्नो भ्रातरः कुल्या प्रापुरीहापुरं परम् ॥१३॥ भीमसेनी महामीमं भृगामं भृगराक्षमम् । मनुनाशनमुद्वाम्य तवाम ग्राममनिनाम् ।।९४॥ चीनमीभ्यः प्रजाम्यस्तै प्राप्तपूजाः समातृकाः । ब्रजन्तः स्वेच्छया प्रापुस्त्रिशृङ्गाख्यं महापुरम् ॥१५॥ प्रचण्डवाहनस्तत्र प्रचण्डचण्डकर्मणाम् । आसीनृपनिरस्यष्टा वनिता विमलप्रमा ॥१६॥ रूपातिशयसम्पूर्णाः पूर्णचन्द्रममाननाः । करापारमिताः सस्तियोदुहितरी दश ॥९॥ जीवित रहेगी तो कल्याणको अवश्य प्राप्त करेगी ।।८५।। पाण्डुके प्रथम पुत्र-युधिष्ठिरने भी माता कुन्तीके हो वचनोंका अनुवाद किया-वहीं वात कही और अणुत्रत, शीलवत तथा गुणवतोंसे युक्त धर्मका उपदेश दिया ।।८६। उस समय युधिष्ठिर तथा कन्याका, मनमें प्रीति उत्पन्न करनेवाला जो परस्पर वार्तालाप हुआ था उससे कन्याने मनमें यह समझा अर्थात् यह शङ्का उसके मनमें उत्पन्न हुई कि क्या यह राजाओंके लक्षणोंसे युक्त वही युधिष्ठिर हैं जो दयासे युक्त हो माताके साथ यहाँ मुझे अत्यधिक उपदेश दे रहे हैं ? मेरे पुण्य अथवा गणनीय आदरणीय तपसे ही यहाँ प्रकट हुए हैं। ये दृढप्रतिज्ञ और उद्यमी प्रिय, कुमार । यहाँ बिना किसी आपातके चिर काल तक जीवित रहे ।।८७-८९।। युधिष्ठिर आदि पाण्डव जब वहाँसे जाने लगे तब उस कन्याने 'आप शिष्ट जनोंका फिरसे दर्शन प्राम हो' यह कह मधुर वार्तालापसे उनका सम्मान किया। वे चले गये और कन्या युधिष्ठिरकी प्रापिकी आशासे उसी तपोवनमें रहने लगी ।।९०। इधर जब राजा ममुद्र विजयने सुना कि दुर्योधनने हमारी बहिन तथा भानजीको महलमें जला कर मार डाला है. तब वे कुपित हो कौरवोंको मारनेके लिए आये ॥९॥ तदनन्तर महान् आदरसे युक्त जरासन्धने स्वयं आकर यादवों और कौरवोंके बीच सन्धि करा दी । सन्धि कराकर जरासन्ध अपनी राजधानीको चला गया।।९।। इधर पाण्डव तापसोंका वेष छोड़ सामान्य ब्राह्मणके वेपमें विचरण करने लगे और माता कुन्तीके माथ चलते-चलते सव ईहापुर नामक उत्तम नगरमें पहुँचे ।।१३।। यहाँ एक भ्रमरके समान काला भृङ्गरानस नामका महाभयंकर नरभोजी राक्षस मनुष्योंको दुःखी कर रहा था सो भीमसेनने उसे नष्ट कर वहॉके निवासियोंका भय दूर किया ।।९।। जिनका भय नष्ट हो गया था ऐसे प्रजाके लोगोंने मातासहित पाण्डवोंका खूब मत्कार किया। तदनन्तर इच्छानुसार चलते हुए वे त्रिशृङ्ग नामक महानगरमें पहुँचे ।।१५।। वहाँ क्रूरकर्मा मनुष्यों के लिए तीन दण्ड देनेवाला प्रचण्डवाहन नामका राजा था। उसकी विमलप्रभा नामकी प्रिय स्त्री थी ।।९ना उन दोनोंके दश पुत्रियाँ थीं जो सबकी.सन रूपके अतिशयसे युक्त, पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाली और कलाओमें पारङ्गत थीं सं९७|| उनके नाम थे- १. दन्याहति म० । २. सम्मानिता म० । ३. ६१-९२ तमौ श्लोको क-पुस्तके केनापि रेखां दत्वा- न्यक्ती । ४. वर + श्रास । तत्र-नगरे, अङ्गिना त्रासम् , आस-क्षिप्तवान् । ५ प्राप्तपूजा म01 पाचवारिंशः सर्गः ५४५ । प्राधा गुगरमा तासु सुप्रमा होधियो रनिः । पना चन्दीपरा विश्वा चर्या चाशोक्या सह ॥१८॥ युधिष्टिराय ताः सर्वाः पूर्वमेव निवेदिताः । लभ्वा तस्यान्यथा वार्तामणुमनधराः स्थिताः ॥१९॥ इभ्योऽपि प्रियमित्राख्यस्तत्र पुर्या सपर्यया । अन्ववर्तत कौन्तेयान् पुरपान्तरविद्धनी ॥१०॥ मोमिनी भामिनी तस्य कन्या नयनसुन्दरी । सौन्दर्येण सरूपेण नयनानन्ददायिनी ॥१०॥ युधिष्टिराय वीराय प्रागेव प्रतिपादिता । राजपुन्यो यथा पूर्वास्तथा सा तद्गता स्थिता ॥१०२॥ राजा समार्य इभ्यश्च महापुरपवेदिनी । कुन्तीपुत्राय ताः कन्या ज्यायसे दातुमिच्छतः ॥३०३॥ तास्तु निश्चिन्तचित्तत्वादन्यलोकगनोऽपि हि । स एष पतिरस्माकमिति नेच्छन्ति तं द्विजम् ॥१०॥ ततोऽपि नगराधाता नगराजस्थिरात्मकाः । प्राप्ताश्वम्पापुरी तेऽमी कणों यत्र महानृपः ॥१०५॥ तत्र भीमो महानागं पुरमध्य मदोत्कटम् । प्रक्रीय निर्मदीचक्रे कर्णसंक्षोमकृन्कृती ॥१०॥ तनोऽपि वैदिशं याता पुरं सुरपुरोपमम् । राजा वृपध्वजो यत्र युवराजो दृढायुधः ॥१०॥ दिशावली प्रिया राज्ञो दिशानन्दा तु नन्दना । दिशासु विदिताकारा दिशामिव विशुद्धना ॥१०॥ मीमो राजगृहे राज्ञा गम्मीरस्वरदर्शनः । अदृश्यतदशा कान्तो मिक्षार्थी किल रूपवान् ॥१०९।। १ गुणप्रभा, २ सुप्रभा, ३ ह्री, ४ श्री, ५ रति, ६ पद्मा, ७ इन्दीवरा, ८ विश्वा, ९ आचर्या और १० अशोका। इनमें गुणप्रभा ज्येष्ठ थी ॥२८॥ ये सभी कन्याएँ पहले युधिष्ठिरके लिए प्रदान की गयी थीं परन्तु बादमें उनका अन्यथा समाचार प्राप्त कर वे अणुव्रतोंको धारण करनेवाली प्राविकाएँ बन गयी थीं ||१९|| उसी त्रिशृङ्गपुरमें एक प्रियमित्र नामका सेठ रहता था जो बहुत भारी धनी तथा पुरुपोंके अन्तरको समझनेवाला था। पाण्डवोंको विशिष्ट पुरुष समझ उसने उनका बहुत सत्कार किया ।।१०।। उसको सोमिनी नामको स्त्री यी और उससे उसके स्वरूप तथा सौन्दर्यसे नेत्रोंको आनन्द देनेवाली नयनसुन्दरी नामकी कन्या हुई थी ।।१०१॥ यह कन्या वीर युधिष्ठिरके लिए पहले ही दे दी गयी थी इसलिए वह भी पूर्वोक्त राजपुत्रियोंके समान अणुव्रत धारण कर रहती थी ॥१०२।। राजा प्रचण्डवाहन और अपनी स्त्रीसहित सैठ प्रिय मित्र, माझगर्वपधारी पाण्डवोंको महापुरुप समझते थे इसलिए ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिरके लिए वे सब कन्याएँ देना चाहते थे ॥१०३।। परन्तु कन्याओंने अपने मनमे यह दृढ निश्चय कर लिया था कि 'युधिष्ठिर भले हो परलोक चले गये हों पर इस भवमें वे ही मेरे पति हैं अन्य नहीं।' इस निश्चयसे उन्होंने ब्राह्मणवेपधारी युधिष्ठिरको अन्य पुरुप समझ स्वीकृत नहीं किया ।।१०।। नदनन्तर सुमेरके ममान स्थिरचित्तके धारक वे मब पाण्डव उस नगरसे भी चल दिये और चलते-चलते उस चम्पापुरीमे पहुँचे जहाँ महाराजा कर्ण राज्य करते ये ।।१०५।। वहाँ एक मदोन्मत्त बड़ा हाथी नगरमें उपद्रव मचा रहा था सो कुदाल भीमने क्रीड़ा कर उसे मदरहित कर दिया। भीमको यह योरना देस कर्णको क्षोभ उत्पन्न हुआ ।।१०।। वहाँ से चलकर वे इन्द्रपुरके ममान मुन्दर वैदिशपुर पहुंचे। उम ममय यहाँका राजा यूपध्वज था और युवराज दृढायुध था ॥१८॥ गजा वृपध्वजको रानीका नाम दिशावली था और उसके दिशानन्दा नामकी पुत्री थी। दिशाओंकी विमुद्धताके ममान दिशानन्दाको मुन्दरता ममस्त दिशाओम प्रमिद्ध धादा एक दिन गम्भार र और गम्भीर - दृष्टिरो धारण करनेवाले, नेत्रप्रिय म्पवान भीम भिमाकी अभिलापामे राजमहलमें गये । १श्विाचायां म.। २. युधिष्ठिरसर । ३ कोन्नया म०। ४. स्थिताः म । ५ निश्चित म । ६. नगगन र मुमेररिख घिर आग देशाते। .. प्रमोडन् कः | ८. पर्ण-म । १. जाताः १०, ग.,.,म.। १०.त्यान्ना म.। ६०.

हरिवंशपुराणे ज्ञात्वा महानरं तं च कन्यामादाय तां नृपः । सान्तःपुरः पुरः स्थित्वा जगाद मधुरं वचः ॥१०॥ तवानुरूपकन्येयं दीयते प्रतिपद्यताम् । भिक्षा प्रमारय श्रीमन् पाणि पाणिग्रहं प्रति ॥११॥ अपूर्वयमही मिक्षा नेदृशी प्रनि साम्प्रतम् । स्थानल्यमिति सम्माप्य गन्दा तेभ्यो न्यवेदयत् ॥११२॥ साधं मासमिह स्थित्वा पुरै जग्मुरमी ततः । तरीन्य(?)नर्मदां नर्मप्रवणां विन्ध्यमाविशन ॥११३॥ सन्ध्याकारऽन्तरद्वीपे सन्ध्याकारे पुरे नृपः । हिडम्ववंशसंभूतः सिंहघोपीऽवतिष्ठते ॥११॥ देवी सुदर्शना तस्य मुता हृदयसुन्दरी । मघवेगः त्रिकूटेन्द्रो याचित्वा तां न लब्धपान् ।।११५॥ यो हनिष्यति तं विन्ध्ये गहाविद्याप्रसाधकम् । मर्ता हृदयसुन्दर्या इति नैमित्तिकागमः ॥११६॥ द्रुमकोटरमध्यान्य साधयन्तं खगं गदाम् । तयैव गदया सागं भीमोऽ पीपतदेकदा ॥११७॥ ततो हृदयसुन्दर्या भीमसेनस्य मंगमः । हैडिम्बेन च सम्वन्धः संबभूव महोत्सवः ॥११॥ विहृत्य विविधान् देशान् दाक्षिणान्यान् महोदयाः। ते हास्तिनपुरं गन्तुं प्रवृत्ताः पाण्डुनन्दनाः ॥१९॥ प्राप्ता मार्गवशाद्विश्वे माकन्दी नगरी दिवः । प्रतिच्छन्दस्थिति "दिव्यान् दधाना देवविनमान् ॥१२०॥ द्रपदोऽस्यास्तदा भूपस्तस्य भोगपती प्रिया । इष्टद्युम्नादयः पुत्राः प्रत्येकं दृष्टशक्तयः ॥१२॥ वहाँ राजा वृपध्वजने उन्हें देखा ॥१०॥ देखते ही उसने समझ लिया कि यह कोई महा- पुरुष है इसलिए वह कन्या दिशानन्दाको लेकर अपने अन्तःपुरके साथ भीमके आगे खड़ा हो गया और इस प्रकारके मधुर वचन कहने लगा ।।११०।। 'हे श्रीमन् ! यह कन्या ही आपके लिए अनुरूप भिक्षा है पसारिए ।।११।। भीमने कहा कि 'अह स्वीकृत करनेके लिए मैं स्वतन्त्र ( आकर युधिष्ठिर आदिके लिए यह समाचार सुनाया ॥११२।। तदनन्तर ये सब इस नगरमें डेढ मास तक रहे। उसके बाद क्रीड़ाओंके प्रदान करनेमें निपुण नर्मदा नदीको पार कर विन्ध्याचलमें प्रविष्ट हुए ॥११३॥ विन्ध्याचलके बीच सन्ध्याके आकारका एक अन्तरद्वीप था उसके सन्ध्याकार नामक नगरमें हिडम्बवंशमें उत्पन्न राजा सिंहघोप रहता था ।।११४॥ उसकी सुदर्शना नामकी स्त्री थी और उससे हृदयसुन्दरी नामकी पुत्री उत्पन्न हुई थी। त्रिकूटाचलका स्वामी मेघवेग उस हृदयसुन्दरीको चाहता था और उसके निमित्त उसने राजा सिंहघोपसे याचना भी को थी परन्तु वह उसे प्राप्त नहीं कर सका ।।११५।। हृदयसुन्दरीके विपयमे निमित्त. ज्ञानियोंने यह कहा था कि 'विन्ध्याचलपर गढाविद्याको सिद्ध करनेवाले विद्याधरको जो मारेगा वही हृदयसुन्दरीका पति होगा' ॥११६॥ भीमने विन्ध्याचलपर जाकर देखा कि एक विद्याधर वृक्षको कोटरमे बैठकर गदाको सिद्ध कर रहा है। देखते ही भीमने वह गदा हाथमे ले ली और उसीके प्रहारसे उस वृक्षको एक साथ गिरा दिया ॥११॥ तदनन्तर भीम- का हृदयसुन्दरीके साथ समागम हुआ। हिडिम्यवंशी राजा सिंहघोपके साथ पाण्डवोंका यह सम्बन्ध महान हर्पका कारण हुआ ॥११८॥ तदनन्तर महान अभ्युदयको धारण करनेवाले पाण्डव दक्षिणके नाना देशों में बिहार कर हस्तिनापुर जानेके लिए उद्यत हुए ||११|| मार्गके वश चलते-चलते वे सव, स्वर्गके प्रतिबिम्बको धारण करनेवाली माकन्दी नगरी पहुंचे। उस ममय सुन्दर शरीरसे मुशोभित पाण्डव देवोंके विभ्रमको धारण कर रहे थे-देवों के समान जान पड़ते थे ॥१२०। यहाँका गजा द्रुपद था, उसकी स्त्रीका नाम भोगवती था और उन दोनोंक धृष्टद्युम्न आदि अनेक १ भिक्षा १०, २०, ग०, ५०।२ श्रीमान् म., भीमन् स०, प० । ३. इतिष्यति म.। ४ सावं ५ पातयामाम। ६. सोन भीमोऽापरयपटा म०। ७. दिव्या मः। ८. देवविभ्रमाः म. रिम्पो माना देयपिनमा १०। - पञ्चचत्वारिंशः सर्ग: ५४७ रूपलावण्यसौमाग्यकलालंकृतविग्रहा। द्रौपदी तनया तस्य द्रुपदस्योपमोज्झिता ॥१२२॥ तस्याः कृते कृताः सर्वे 'मनोजेन नृपात्मजाः । सग्रहा इव याचन्ते नानोपायनपाणयः ॥१२३॥ दाक्षिण्यमङ्गमीतेन द्रुपदन ततो नृपाः । विश्वे चन्द्रर्वधार्थमाहूताः कन्यकार्थिनः ॥१२४॥ दोपदीग्रहवश्यानां काश्यप्यामिह भूभृताम् । कर्णदुर्योधनादीनां माकन्यां निवहोऽभवत् ॥१२५॥ सुरेन्द्रवर्धनः खन्द्रः समुतावरमागंणः । धनुर्गाण्डीयमादशादिव्यं तत्र तदाऽकरोत् ।।१२६॥ चण्डगाण्डीवकोदण्डमण्डलीकरणक्षमः । राधावेधसमर्थो यो द्रौपद्याः स भवपतिः ॥१२७॥ इतीमा घोषणा श्रुत्वा द्रोणकर्णादयो नृपाः । ममेश्य मण्डलीभूय कोदण्डममितः स्थिताः ॥१२८॥ देवताधिष्ठिनायास्तैश्चापयष्टेः प्रदर्शनम् । ग्रासीमन्या इवाशक्यं स्पर्शनाकर्षणे कुतः ॥१२९॥ माग्निा सामिना पश्चादर्जुनन मैदर्जुना । दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा तदाकृष्टा स मतीव वशं स्थिता ।।१३०॥ आरोप्याकृष्य पार्थेन धनुश्यस्फिालिताक्षिमिः । श्रान्तं वधिरिनं कर्ण : कर्णादीनां पटुध्वनौ ॥१३१॥ वितर्कः काशं दृष्ट्वा तं तेषामित्यभूदयम् । सहजः सहजश्वयों मृत्योपन्नः किमर्जुनः ॥१३२॥ धचिनः स्थानमन्यस्य सामान्यस्य दृशं कुतः । अहो रटिरही मुष्टिरहो मौटवमित्यपि ॥१३३॥ पुत्र थे जो एकसे-एक बढ़कर बलवान थे ॥१२१॥ राजा द्रुपदको एक द्रौपदी नामको पुत्री भी थी जिसका शरीर रूप लावण्य मौभाग्य तथा अनेक कलाओंसे अलंकृत था एवं जो अपने सौन्दर्यके विपयमें सानी नहीं रखती थी ॥१२२।। कामदेवने मब राजपुत्रोंको उसके लिए पागल-सा बना दिया था इसलिए वे नाना प्रकारके उपहार हाथमें ले उसकी याचना करते थे ॥१२३।। तदनन्तर 'किस-किससे बुराई की जाये' यह विचार दाक्षिण्य-भगसे भयभीत राजा द्रुपदने कन्याकी इच्छा रखनेवाले सब राजकुमारोंको चन्द्रक यन्त्रका वेध करनेके लिए आमन्त्रित किया ॥१२५|| इस पृथिवीपर द्रौपदीरूपी ग्रहके वशीभूत हुए कर्ण, दुर्योधन आदि जितने राजा थे उन सबका झुण्ड माकन्दी नगरीमें इकट्ठा हो गया ॥१२५।। उसी समय मरेन्द्रवर्धन नामका एक विद्याधर राजा अपनी पुत्रीक योग्य वर खोजनेके लिए यहाँ आया और उसने राजा द्रुपदकी आज्ञासे गाण्डीव नामक धनुषको बरकी परीक्षाका साधन निश्चित किया ॥१२६ उम समय यह घोषणा की गयी कि 'जो अत्यन्त भयङ्कर गाण्डीव धनुपको गोल करने एवं राधावेध (चन्द्रकवेध ) में समर्थ होगा वही द्रौपदीका पति होगा' ५१२७। इस घोषणाको सुनकर वहाँ जो द्रोण तथा कर्ण आदि राजा आये थे वे सब गोलाकार हो धनुपके चारों ओर खड़े हो गये ।।१२८।। परन्तु सती स्त्रीके समान देवांसे अधिष्ठित उस धनुप-यष्टिका देखना भी उनके लिए अशक्य था फिर छूना और खींचना तो दृर रहा ॥१२९|| तदनन्तर जब सब परास्त हो गये तब द्रौपदोके होनहार पनि एवं मटा सरल प्रकृतिको धारण करनेराले अर्जुनने उस धनुप-यष्टिको देखकर तथा छूकर ऐमा खोचा कि यह मती स्त्रीक ममान इनके वशीभून हो गयी ।।१३। जब अर्जुनने खींचकर उसपर डोरी चढायी और उममा आस्फालन किया तो उसके प्रचण्ड शब्दमें कर्ण आदि राजाओं नेत्र फिर गये तथा कान बहरे हो गये ।।१३|| तीक्ष्ण आकृतिके धारक पार्थको देसकर कर्ण आदिक मनमें यह तर्क उ पन्न हुआ कि क्या स्वाभाविक ऐश्वर्यको धारण करनेवाला अर्जुन अपने भाइयोंके साथ मरकर यहाँ पुनः उत्पन्न हुआ है ? ॥१३॥ अर्जुनके सिवाय अन्य मामान्य धनुर्धारीका ऐसा सड़ा होना कहाँ मम्भव अहा दमकी दृष्टि, इमकी मुट्ठी और इमकी चतुराई- २. मनोवैगन पात्मजाः म०, क० । २. पृथिव्याम् 'कोणीज्या काश्यपी दिति' इति धनञ्जयः। ३. सदा सर्वदा ऋजुना सरलेन । ४. क्षिति म० (१)।

५४८ हरिवंशपुराणे भ्रमञ्चक्रसमारूढी वाणं संघस्य दक्षिणः । लक्ष्यं चन्द्रकवेधाख्यं विव्याध' नृपसमिधा ॥१३॥ द्रौपदी च द्रुतं मालां कन्धरैऽभ्येत्य बन्धुरै । अकरोस्करपद्माभ्यामर्जुनस्य घरेच्छया ॥१३५॥ विप्रकीर्णा तदा माला सहसा सहवर्तिनाम् । पञ्चानामपि गानेषु चपलेन नभस्वता ॥१३६॥ ततश्चपललोकस्य तत्वमूढम्य करणचिन् । वाचो पिचेरुरियुञ्चताः पञ्यानयस्यपि ॥१३७॥ मद्गन्धस्य सुवृक्षस्य तुङ्गम्य फलितस्य सा । पुपितेव लतामासौदर्जुनस्याङ्गमाश्रिता ॥१३॥ ततः कुन्त्याः समीपं सा भीरमीरबन्धना । अप्रतः पश्यतां रानां नीतानीतिविदां विदा ॥१३९॥ ते नृपाः केचिदनुयाता युयुत्सवः । निषिद्धा अपि यत्नेन द्रुपदेन नयैषिणा ॥१४०॥ अर्जुनेन च भीमेन सृष्टद्युम्नेन च त्रिभिः । धन्विमिट्टरतो रुद्वा नामितः पदमप्यदुः ।।१४१1। पृष्टद्युम्नरथस्थेन स्वनामात्र. किरीटिना । द्रोणस्याङ्के शरः क्षिप्तः सर्वसंबन्धवाचकः ॥१४२॥ द्रोणाश्वत्थामवीराभ्यां भीमेण विदुरेण च । वाचितः सर्वसम्बन्धः प्रमदं प्रददौ परम् ॥१४३॥ द्रुपदस्य सगोत्रस्य द्रोणादीनां च सौख्यतः । शङ्खयादिवनिर्घोपा जाताः पाण्डवसंगमे ।।१४४।। जातबान्धवसंबन्धे परमानन्ददायिनि । संवृत्या नन्दिताः पञ्च तेऽमी दुर्योधनादिमिः ॥१५॥ द्रौपदी दीपिकवासी स्नेहसंभारपूरिता । पाणिग्रहणयोगेन दिदीपेऽर्जुनधारिता ॥१४६॥ सन्ना । सभी आश्चर्यकारी हैं ॥१३३।। उधर राजा लोग ऐसा विचार कर रहे थे इधर अत्यन्त चतुर अर्जुन डोरीपर बाण रख झटसे चलते हुए चक्रपर चढ गया और राजाओंके देखते-देखते उसने शीघ्र ही चन्द्रकवेध नामका लक्ष्य वेध दिया ॥१३४।। उसी समय द्रौपदीने शीघ्र ही आकर वरकी इच्छासे अर्जुनको झुकी हुई सुन्दर प्रीवामें अपने दोनों कर-कमलोंसे माला डाल दी ॥१३५।। उस समय जोरदार वायु चल रही थी इसलिए वह माला टूटकर साथ खड़े हुए पॉचों पाण्डवोंके शरीरपर जा पड़ी ॥१३६।। इसलिए विवेकहीन किसी चपल मनुप्यने जोर-जोरसे यह वचन कहना शुरू कर दिया कि इसने पाँच कुमारोंको वरा है ॥१३७॥ जिस प्रकार किसी सुगन्धित, ऊँचे एवं फलोंसे युक्त वृक्षपर लिपटी फूली लता सुशोभित होती है उसी प्रकार अर्जुनके समीप खड़ी द्रौपदी सुशोभित हो रही थी ॥१३८।। तदनन्तर कुशल अर्जुन नूपुरोंके निश्चल बन्धनसे युक्त उस द्रौपदीको अनीतिज्ञ राजाओंके आगेसे उनके देखते-देखते माता कुन्तोके पास ले चला ॥१३९|| युद्ध करनेके लिए उत्सुक राजाओंको यद्यपि नोनिचतुर राजा द्रुपदने रोका था नथापि कितने ही राजा जबर्दस्ती अर्जुनके पीछे लग गये ।।१४०॥ परन्तु अर्जुन, भीम और धृष्टद्युम्न इन तीनों धनुर्धारियोंने उन्हें दूरसे ही रोक दिया। ऐमा रोका किन आगे न पीछे कहीं एक डग भी रखने के लिए समर्थ नहीं हो सके ।।१४१॥ तदनन्तर धृष्टद्युम्नके रथपर आरूढ अर्जुनने अपने नामसे चिह्नित एवं समस्त मम्बन्धोंको सूचित करनेवाला बाण द्रोणाचार्यकी गोदमें फेका ॥१४२॥ द्रोण, अश्वत्थामा, भीष्म और विदुरने जब उस समस्त सम्बन्धीको सूचित करनेवाले बाणको बाँचा तो उसने सवको परम हर्ष प्रदान किया ॥१४३।। पाण्डवांका समागम होनेपर राजा द्रुपद, कुटुम्बी जन, तथा द्रोणाचार्य आदिको जो महान् मुख उत्पन्न हुआ था। उससे शख और वाजोंके शब्द होने लगे ॥१४४|| परम आनन्दको देनेवाले भाइयोंके इस समागमपर दुर्योधन आदिने भी ऊपरी स्नेह दिखाया और पाँचो पाण्डवोंका अभिनन्दन किया ॥१४५।। जिस प्रकार स्नेह- तेलके समूहसे भारी दीपिका किसीके पाणिग्रहण-हाथमें धारण करनेसे अत्यधिक देदीप्यमान होने लगती है उसी प्रकार स्नेह-प्रेमके भारसे भरी द्रौपदी, पाणिग्रहण-विवाहके योगसे १. शिव्याध म.. २. याचोदितो म०, ५०। ३ धीरगा जीवन्धना म०। ४. प्रपदौ म । ५ सौख्यता म० । सौख्यतः घ०, स० । ६ निघांषानाताः म पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ५४९ विवाहमङ्गलं दृष्ट्वा द्रौपद्यर्जुनयोपाः। 'प्रयाताः पाण्डवैर्युक्तः स्थानं दुर्योधनोऽप्यगात् ॥३४७॥ अर्धराज्यविभागेन ते हास्तिनपुरे पुनः । तस्थुर्दुर्योधनाद्याश्च पाण्डवाश्च यथायथम् ॥१८॥ आनाय्यानाय्यवृत्तोऽसौ ज्येष्टं कन्याः पुरातनीः। विवाह मुसिताश्चके भीमसनो निजीचिताः ॥१४९।। स्नुपाबुद्धिरभूत्तस्यां ज्येष्ठयोरर्जुनस्त्रियाम् । द्रौपयां यमलसापि मातरीवानुवर्तनम् ।।१५०।। तस्याः श्वसुरवृद्धिस्तु पाण्डाविव तयोरभूत् । अर्जुनप्रेममरद्धमौचिन्यं देवरद्वये ॥१५१॥ अत्यन्तशुद्धवृत्तेपुयेऽभ्याख्यानपरायणाः । तेषां तत्प्रभवं पापं को निवारयितुं क्षमः ॥१५२॥ मद्भूतस्यापि दोषस्य परकीयस्य भाषणम् । पापहेतुरमोघः स्यादसद्भूतस्य किं पुनः ॥१५॥ प्राकृतानामपि प्रीन्या समानधनता भने । न स्त्रीषु त्रिषु लोकेषु प्रसिद्धानां किमुच्यते ।।१५४|| महापुरषकोटीस्थकूटदोपविभाषिणाम् । असतां कथमायाति न जिह्वा शतखण्डताम् ।।१५५।। वक्ता श्रोता च पापस्य यमात्र फलमश्नुते । नदमोघममुत्रास्य वृद्धयर्थमिति बुद्धयताम् ।।१५६॥ वक्तुः श्रीतुश्च सद्बुद्ध्या यथा पुण्यमयी श्रुतिः ! श्रेयस विपरीताय तथा पापमयी श्रुतिः ॥१५७॥ अर्जुनके द्वारा धारण की हुई अत्यधिक देदीप्यमान होने लगी ।।१४६।। राजा लोग द्रौपदी और अर्जुनका विवाह-मङ्गल देखकर अपने-अपने स्थानपर चले गये और दुर्योधन भी पाण्डवोंको साथ ले हस्तिनापुर पहुँच गया ॥१४७|| दुर्योधनादि सौ भाई और पाण्डव आधे- आधे राज्यका विभाग कर पुनः पूर्वकी भॉति रहने लगे ॥१४८|| उज्ज्वल चारित्रके धारक युधिष्ठिर तथा भीमसेनने पहले अज्ञातवासके समय अपने-अपने योग्य जिन कन्याओंको स्वीकृत करनेका आश्वासन दिया था उन्हें बुलाकर तथा उनके साथ विवाह कर उन्हें मुखी किया ।।१४९।। द्रौपदी अर्जुनकी स्त्री थी उसमें युधिष्ठिर और भीमकी बहू-जैमी बुद्धि थी और सहदेव तथा नकुल उसे माताके समान मानते थे ॥१५०॥ द्रौपदीको भी पाण्डुके समान युधिष्ठिर और भीममें श्वसुर बुद्धि थी और सहदेव तथा नकुल इन दोनों देवरों में अर्जुनके प्रेमके अनुरूप उचित बुद्धि थी ॥१५१॥ गौतमस्वामी कहते हैं कि जो अत्यन्त शुद्ध आचारके धारक मनुष्योंकी भी निन्दा करनेमें तत्पर रहते हैं उनके उस निन्दासे उत्पन्न हुए पापका निवारण करनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥१५२॥ दूसरेके विद्यमान दोपका कथन करना भी पापका कारण है फिर अविद्यमान दोपके कथन करनेकी तो बात ही क्या है ? यह तो ऐसे पापका कारणं होता है जिसका फल कभी व्यर्थ नहीं जाता-अवश्य ही भोगना पड़ता है ॥१५३॥ साधारणसे-साधारण मनुष्योंमें प्रीतिके कारण यदि ममान- धनता होती हैं तो धनके विपयमें ही होती है स्त्रियोंमें नहीं होती। फिर जो तीनों लोकोंमे प्रसिद्ध हैं उनकी तो बात ही क्या है ? ॥१५४|| महापुरपांकी कोटिम स्थित पाण्डयोंके मिथ्या दोष कथन करनेवाले दुष्टोंकी जिह्वाके सौ सण्ड क्यों नहीं हो जाते ? ॥१५५।। पापका यक्ता और श्रोता जो इम लोकमें उसका फल नहीं प्राप्त कर पाता है यह मानो परलोकमें वृद्धि के लिए ही सुरक्षित रहता है ऐसा समझना चाहिए। भावार्थ-जिस पापका फल वक्ता और श्रोताको इम जन्ममें नहीं मिल पाता है उसका फल परभवमें अवश्य मिलता है और व्याजके माथ मिलता है ॥१५६।। सद्बुद्धिमे पुण्यरूप कथाओंका मुनना वक्ता और श्रोताके लिए जिस प्रकार कल्याणका कारण माना गया है उसी प्रकार पाप रूप कथाओंका मुनना उनके लिए अकल्याणका कारण माना गया है ।।१५७। इमलिएअसत्य - १. पायाता. पाण्डवयुना म०, प० । २. सहदेवनकुलयो म| ३ योऽभ्याम्यान-म० । ४. स्त्रीचरित्रलोक म०, प० ।

५५० हरिवंशपुराणे द्रुतविलम्बितवृत्तम् स्यजत वाचमसस्यमलोद्धतां मजत 'सत्यवचौनिरवद्यताम् । 'निजयशोविशदां सगुणोद्यतां विजयिनी विह विश्वविदोदिताम् ।।१५८|| सुभृतमाचरणं शरणं भवेदसुभृतां विपदीह पराभवे । सुचरितस्य फलं मयपौरुषं परिभवत्यहितस्य हि तां रुषम् ॥१५९॥ शिखिशिखावलिधर्मघनागमः परनिराकरणकजिनागमः । विविधलामनिधिधियतां जनैत्रतविधिः श्रुतवर्तिकृताअनैः ॥१६॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती कुरुवंशोत्पत्तिपाण्डवधार्तराष्ट्राणां च पार्थद्रौपदीलामवर्णनो नाम पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥४५॥ रूप दोपस उद्धन वाणीको छोड़ो, और सत्य वचनसे उत्पन्न उस निर्मलताका सेवन करो जो अपने यशसे विशद है, गुणी मनुष्यों के प्राप्त करनेमें उद्यत है । इस लोकमें विजय प्राप्त कराने वाली है और मर्वज्ञदेवके द्वारा निरूपित है ॥१५८। इस संसारमें विपत्ति और पराभयके ममय अच्छी नरहसे आचरिन अपना आचरण ही प्राणियों के लिए शरण है क्योंकि मदाचारका फल जो नीति और पौरुप है वह शत्रुके उस रोपको परिभूत कर देता है-दूर कर देता है ॥१५९॥ जो अनिकी शिखावलीसे वर्धमान धर्मरूपी प्रीष्म कालको नष्ट करने के लिए वर्षा ऋतुके समान है, दूसरोंका निराकरण करनेके लिए एक जिनागम है, और नाना प्रकारके लाभोंका भण्डार है, ऐसा व्रतविधान, श्रुतरूपी अञ्जनको शलाकाका प्रयोग करनेवाले मनुष्यों के द्वारा अवश्य ही धारण करने योग्य है ॥१६०॥ इस प्रकार परिष्टनेमि पुराणके संग्रह से युक्त, जिनमेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें कुरुवंशकी उत्पत्ति, पायडर और धार्तराष्ट्रोंके समागम तथा अर्जुनको द्रौपदीके लाभका वर्णन करनेयाला पंतालीसवाँ सगं समाप्त हुआ ॥५॥ १. मत्वरनग निरयणा गा । २. निमगोविरादारागुणोवता म० 1 निजययो विशद न गुणोदता १.।। गया जिपिनी लि लिपि ताम् पी पाट: + पुस्तरिणत गंगन मोरे विपदा प्राना, साम् याचं, रिपिनी रित्य मानीप । ४. पगभये ग... | ५. मनिष भूमि. Filmfarmया मनन य इनिक प्रति टिनी।

षट्चत्वारिंशः सर्गः अथ मानितयन्धूनां पाण्डवानां गजाह्वये । नगरे नगधीराणां काले गच्छति भोगिनाम् ॥१॥ प्रत्यहं परया भूत्या वर्धमानानमूनमी । पञ्चापि शतमालोक्य पूर्ववचलिताः स्थितेः ॥२॥ तं शकुन्युपदेशेन मधो धूते विजित्य सः । पञ्चज्यष्टं शतज्येष्टः मानुजं सानुजोऽगदीत् ॥३॥ . गन्तब्यं यत्र ते नाम श्रूयते न युधिष्ठिर । स्थानन्यं मत्यसधेन त्वया प्रच्छन्नवर्तिना ॥४॥ इत्युक्त प्रतिपद्यासौ शमितभ्रातृमण्डलः । निरेत्परिच्छदं त्यक्त्वा द्वादशान्दतावधिः ॥५॥ "अनुयातार्जुन प्रेरणा प्रमदेन च पूरिता । द्रौपदीन्दुमिव ज्योत्स्ना कृतकृष्णनिस्थितिः (?)॥६॥ ततस्ते धैर्यसम्पन्नाः सुवीर्या नरकुजराः । क्रमेण सहिताः प्राप्ता रम्यां कालानलाटवीम् ॥७॥ प्रकीर्णकासुरीसूनुः सुनारस्तन खेचरः । असुरोहीतनगरादागत्य रमते तदा ॥८॥ कान्तया कुसुमावल्या रममाणं बनान्तरे । किरातवेषिणं कान्तं युक्तं शावरविद्यया ॥९॥ किरातवेषभू-परन्या सह क्रीडन् यदृच्छया । ददर्श खेचरं चापी चापिनं स धनञ्जयः ॥१०॥ अस्माच्च तयो ते दर्शने सहमानयोः । बभूव विषमं युद्धं दिव्ये पुच्छन्नदिमुखम् ॥११॥ भुजयुद्धे ततो लग्ने भुजेन दृढमुष्टिना । जघानोरसि तं पार्थः खचरं बलिनं बली ॥१२॥ अथानन्तर वन्धुओंका सम्मान करनेवाले पर्वतोंके समान धीर-वीर पाण्डयोंका भोग भोगते हुए हस्तिनापुरमें सुखसे समय व्यतीत होने लगा ॥१॥ पाँचों पाण्डव उत्कृष्ट विभूतिसे प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त हो रहे थे, उन्हें देख सौ कौरव पहलेके समान पुनः मर्यादासे विचलित हो गये ।।२।। एक बार शकुनिके उपदेशसे दुर्योधनने युधिष्ठिरको शीघ्र ही जुआमें जीत लिया। जीत लेनेपर अपने छोटे भाइयोंके माथ मिलकर दुर्योधनने भीमसेन आदि छोटे भाइयोंसे युक्त युधिष्ठिरसे कहा कि हे युधिष्ठिर! चूंकि तुम सत्यवादी हो-तुम्हारे द्वारा की हुई प्रतिज्ञा कभी मिथ्या नहीं होती इसलिए तुम्हें अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार यहाँसे चला जाना चाहिए और छिपकर वहाँ रहना चाहिए जहॉ से तुम्हारा नाम भी मुनायो न दे सके ॥३-४॥ दुर्योधनके इस कथनको सुनकर यद्यपि भीमसेन आदि भाइयोंको क्षोभ उत्पन्न हुआ तथापि युधिष्ठिर उन्हें शान्त कर बारह वर्षकी लम्बी अवधिके लिए सब राज्य-पाट छोड़ हस्तिनापुरसे बाहर निकल गये ||५|| जिस प्रकार चॉदनी चन्द्रमाके पीछे-पीछे चलती है उमी प्रकार प्रेम और हर्पसे भरी द्रोपदी अर्जुन के पीछे-पीछे चलने लगी ॥६॥ तदनन्तर धैर्यसे सम्पन्न, उत्तम शक्तिसे मुशोभित एवं एक-दूसरेके हित करने में तत्पर वे सब श्रेष्ठ पुरुष क्रम-क्रमसे कालाजला नामक अटवीमें पहुँचे ॥७॥ उस समय वहाँ प्रकीर्ण- कासुरीका पुत्र सुतार नामका विद्याधर असुरोद्गीत नामक नगरसे आकर क्रीड़ा कर रहा था |८|| वह शावरी विद्यासे युक्त था अतः किरातका मुन्दर वेप रख अपनी कुमुमावली नामक स्त्रीके साथ क्रीड़ा कर रहा था ॥९|| उसकी स्त्री भी किरातका वेप रखे थी और दोनों इच्छानुसार साथ-साथ कोड़ा कर रहे थे। धनुर्धारी अर्जुनने धनुर्धारी उस विद्याधरको देसा ॥१०॥ उन दोनोंने ज्योंही अकस्मात् पदमरेको देखा त्योंही उनमें भयङ्कर युद्ध होने लगा। ऐसा युद्ध कि जिममें दिशाएँ दिव्य वाणोंसे आच्छादित हो गयीं ॥११॥ तदनन्तर उन दोनोंमे या युद्ध होनेपर बलवान् अर्जुनने दृढ मुट्ठी याँधकर उस बलवान विद्याधरको छातीपर २. कोरवा । ३. युधिष्ठिरं । ४ दुर्योधन । ५. वैरिणाम.. पापामो म.. अनुजाता-म., घ.। १ परमा म.।

हरिवंशपुराणे पतिमिक्षा ययाचेऽसावर्जुनं कुसुमावली । मुक्तः स तं प्रणम्यागाद्रौप्यादक्षिणां क्षित्तिम् ॥१३॥ गता क्रमेण ते धीराः पुरं मंघदलाभिधम् । सिंहो नरेश्वरी यत्र कान्ता कनकमेखला ॥१॥ तनया कनकायां तयोरत्यन्तमुन्दरी । मधेभ्यो लकयोश्वारुलक्ष्मीः कान्ता शरीरजा ॥१५॥ ते चादेशवशात्कन्ये भीमो मीमांसवेषभृत् । मिक्षार्थमागतो लेभे पुण्यस्य किमु दुप्फरम् ॥१६॥ विश्नम्य तत्र ते सौम्या दिनानि कतिचिन्सुखम् । याताः प्रमण पुग्नागा' विषयं कौशलाभिधम् ॥१७॥ स्थिन्वा तत्रापि सौरयेन मासान् कतिपयानपि । प्राप्ता रामगिरि प्राग यो रामलक्ष्मणसेवितः ॥१८॥ चैत्यालया जिनेन्द्राणां यत्र चन्द्रार्कमासुराः । कारिता रामदेवेन संभान्ति शतशो गिरौ ॥१९॥ नानादेशगतैमव्यवन्द्यन्ते या दिने दिने । वन्दितास्ना जिनेन्द्राणां प्रतिमाः पाण्डुनन्दनैः ॥२०॥ चित्रं चिक्रीड तत्रादौ द्रौपद्या महितोऽर्जुनः । लतागृहेषु रम्येषु सीतयेव रघूत्तमः ॥२१॥ अविज्ञातसुसच्छेदा स्वेच्छया विहृतिं श्रिताः । निन्युरेकादशाब्दानि धन्यास्ते मान्यचेष्टिताः ॥२२॥ श्रतः परं पुनः प्राप्ता विराटपुटभेदनम् । विराटो यत्र राजासी मार्या यस्य सुदर्शना ॥२३॥ अध्यकाः पाण्डवास्तत्र द्रौपदी च विचक्षणा । विराटनगरे तस्थुविराटस्यातिपूनिताः ॥२४॥ यथायथं विनोदेन तन संवसनां सताम् । 'प्रयाति सुखिना काले प्रमादरहितान्मनाम् ॥२५॥ भुजासे मजबूत प्रहार किया। जिससे घबड़ाकर विद्याधरकी स्त्री कुसुमावली अर्जुनसे पतिकी भिक्षा मॉगने लगी। फलस्वरूप अर्जुनने उसे छोड़ दिया और वह उन्हें प्रणाम कर विजया पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें चला गया ।।१२-१३।। तदनन्तर वे धोर-वीर क्रम-क्रमसे मेघदल नामक उस नगरमें पहुंचे जहॉ सिंह नामका राजा राज्य करता था। राजा सिंहकी स्त्रीका नाम कनकमेखला था और उन दोनोंके कनकावर्ता नामकी अत्यन्त सुन्दरी कन्या थी। उसी नगरीमें मेघ नामक सेठ और अलका नामक सेठानीके चामलक्ष्मी नामकी एक सुन्दर कन्या और थी ॥१४-१५।। निमित्तज्ञानीके आदेशानुसार भिन्नाके लिए गये हुए भयङ्कर कन्धोंको धारण करनेवाले भीमसेनने उन दोनों कन्याओंको प्राप्त किया सो ठीक हो है क्योंकि पुण्यके लिए क्या कार्य कठिन है ? ।।१६।। सौम्य प्रकृतिके धारक उन श्रेष्ठ पुरुषोंने कुछ दिन तक वहाँ विश्राम किया। तदनन्तर क्रम कमसे चलकर वे कौशल नामक देशमें पहुँचे ।।१७। वहाँ भी कुछ महीने तक सुखसे ठहरकर वे उस रामगिरि पर्वतपर पहुंचे जो कि पहले राम और लक्ष्मणके द्वारा सेवित हुआ था ।।१८।। नथा जिस पर्वतपर रामचन्द्रजीके द्वारा बनवाये हुए चन्द्रमा और सूर्यके समान देदीप्यमान, सेफड़ों जिन-मन्दिर मुशोभित हो रहे थे ।।१९।। नाना देशोंसे आये हुए भव्य जीय प्रतिदिन जिन-प्रतिमाओंकी बन्दना करते थे, पाण्डवोंने भी उन प्रतिमाओंकी बड़ी भक्तिये वन्दना की ॥२०॥ जिस प्रकार मीताके साथ रामचन्द्रजीने कोड़ा की थी उसी प्रकार उम पर्वतके सुन्दर-सुन्दर लतागृहोंमें अर्जुन द्रौपदीके साथ नाना प्रकारको क्रीड़ा करता था ॥२१॥ जिन्होंने कभी सुगर विच्छेदका अनुभव नहीं किया था, जो स्वेच्छासे जहाँजहाँ विहार करते थे और मान्य चेष्टाओंके धारक ये ऐसे उन भाग्यशाली पाण्डवोंने उम पर्वतपर ग्यारह वर्ष व्यतीत कर दिये || तदनन्तर यहाँसे चलकर वे उम विराटनगरमें पहुंचे जहाँ विराट नामका राजा रहता था। गजा विरादकी ग्रीका नाम मुदर्शना था ।।३|| पाण्डव और अत्यन्त कुशल द्रौपदी- मय अपने-आपको छिपार गजा विगटसे सम्मानित हो विराटनगरमें रहने लगे रक्षा गप्रसार विनोदपूर्वक यहाँ गहते हुए प्रमादरहिन पाण्डवांका मुग्पसे ममय पीतने लगा HTRI| अब इनमें मम्यन्य सम्पनेयाली दुमरी घटना लिपी जानी है- १. गपप्रानको ग, प.,.1२ पुष्पाः। ममानि म०1४. गन्धनि मति ।

पट्चत्वारिंशः सर्गः चूलिका नगरी राजा चूलिकस्तस्य कामिनी 1 विक्रचा विकचाम्जास्या शतपुत्रपविनिता ॥२६॥ कीचकः प्रथमस्तेषां प्रथमश्चण्डकर्मणाम् । रूपयौवनविज्ञानशार्यद्रव्यमदाविलः ॥२७॥ विराटनगरं जातु स्वसारं स सुदर्शनाम् । श्रागतो द्रष्टुमत्रतां दृष्टवान् द्रौपदी सतीम् ॥२८॥ गन्धयुक्तिविशेषेण सुगन्धीकृतदिङ्मुखाम् । रूपलावण्यसौभाग्यगुणरितविग्रहाम् ॥२९॥ तस्यां दर्शनमात्रेण मानिनोऽपि मनोगतम् । दैन्यमन्यत्र यातस्य तस्य तन्मयतां गतम् ॥३०॥ अनेकोपाययोगैस्तामुपलोमयतामुना । स्वतोऽपि परतोऽप्यस्या नालामि हृदये स्थितिः ॥३१॥ प्रत्याख्यातस्य पृष्टस्य तृणीभूतस्य तस्य सा । निर्वन्धं भीमसेनाय शैलन्ध्री तं न्यवेदयत् ॥३२॥ ततः कुपितचित्तोऽसौ शैलन्धीवेपमृद्वली । प्रदोषे कृतसङ्केतर्मकान्ते मदनानुरम् ॥३३॥ वारीबन्धमिवायातं स्पर्शान्, गन्धवारणम् । कण्ठे जग्राह वाहुभ्यां स्पर्शामीलितलोचनाम् ॥३॥ भूमौ निपात्य पादाभ्यामुरस्याक्रम्य कामिनम् । पिपंप मुष्टिनिघांतर्निर्घावरिव भूधरम् ॥३५॥ तथा तस्य तदा श्रद्धां प्रपूर्य परयोषिति । अमुचद् ब्रज पापेति दयमानो महामनाः ॥३६॥ महावैराग्यसम्पन्नस्ततो विपयहेतुकम् । प्रावजत्कीचकः श्रिवा मुनीन्द्रं रतिवर्धनम् ॥३७॥ इसी पृथिवीतलपर एक चूलिका नामकी नगरी थी। उसके राजाका नाम चूलिक था। राजा चूलिककी, विकसित कमलके समान मुखवाली एवं सौ पुत्रोंसे पवित्र विकचा नामको स्त्री थी ।।२६|| विकचाके सौ पुत्रोंमें सबसे बड़े पुत्रका नाम कीचक था। यह कीचक क्रूरकर्मा मनुष्योंमें अग्रणी था तथा रूप, यौवन, विज्ञान, शूर-धीरता और धनके मदसे मलिन था ॥२७॥ एक बार वह कीचक, अपनी बहिन सुदर्शनाको देखनेके लिए विराटनगर आया। वहाँ उसने द्रोपदीको देखा ॥२८॥ उस समय द्रौपदी किसी विशिष्ट सुगन्धित पदार्थके मंयोगसे समस्त दिशाओंको सुगन्धित कर रही थी एवं रूप, लायण्य, सौभाग्य आदि गुणोंसे उसका शरीर परिपूर्ण था ।।२९॥ यद्यपि कीचक मानी था तथापि उसका मन देखते से द्रौपदीके विषयमें दीनताको प्राप्त हो गया। वह वहाँसे अन्यत्र जाता था तब भी उसका मन द्रोपदी के साथ तन्मयताको ही प्राप्त रहता था ॥३०॥ कीचकने अनेक उपायोंसे द्रौपदी को स्वयं लुभाया तथा दूसरोंके द्वारा भी उसे प्रलोभन दिखलाये पर यह उसके हृदयमें स्थिति को प्राप्त न कर सका।।३शा द्रौपदी उसे तृणके समान तुच्छ समझती थी और उसे मना भी कर चुकी थी पर वह अपनी धृष्टता नहीं छोड़ता था अतः विवश हो शैलन्ध्री (सैरन्ध्री ) का वेप धारण करनेवाली द्रौपदीने एक दिन उसको इस दुईठकी शिकायत भीमसेनसे कर दी ॥३२॥ फिर क्या था, भीमसेनका हृदय क्रोधसे उबल उठा। उन्होंने कामातुर कीचकको द्रौपदीके द्वारा सायंकाल के समय एकान्त स्थानमें मिलनेका संकेत करा दिया और आप स्वयं झालन्धी (द्रोपदी) का वेप रख उस स्थानपर पहुँच गये। आप अत्यन्त बलवान तो थे ही ॥३३॥ जिस प्रकार हस्तिनीके स्पर्शसे अन्धा मदोन्मत्त हाथी वन्धनके स्थानमें स्वयं आ जाता है उसी प्रकार मदनातुर कीचक उस संकेत-स्थानमें स्वयं आ गया। तदनन्तर स्पर्शजन्य आनन्दके अतिरेकसे जिसके नेत्र निमीलित हो रहे थे ऐसे उस कीचकके कण्ठको द्रौपदीका वेप धारण करनेवाले भीमसेनने अपनी दोनों भुजाओंसे आलिङ्गित किया और पृथिवीपर पटक कर उसकी छातीपर दोनों पैरोंसे चढ गये। जिस प्रकार वज्राघातसे किसी पर्वतको चूर-चूर किया जाता है उसी प्रकार मजबूत मुक्कोंके प्रहारसे उसे चूर-चूर कर दिया। इस प्रकार उसको परस्त्रीविषयक आकांमाको पूर्ण कर महामना भीमसेनने दयायुक्त हो 'अरे पापी जा' यह कह उसे छोड़ दिया ॥३४-३६।। तदनन्तर विपयोंका प्रत्यक्ष फल देख कीचकको उनसे अत्यन्त वैराग्य उत्पन्न हो गया १. विशानं शौर्य म०। २. द्रौपदीमयताम् ।

५५४ हरिवंशपुराणे अनुप्रेक्षामिरात्मानं भावयन् भावशुद्धितः । रत्नत्रयमसौ शुद्धं श्रुतवान् कर्तुमुद्यतः ॥३८॥ कीचकं शतसंख्यास्ते भ्रातरो भ्रान्तचेतसः । अदृष्ट्वा कुपिता 'दुष्टाश्चितकाग्निमचिन्वत ॥३९॥ तत्र चिंक्षिप्सवः पापाः शैलन्ध्री बलशालिनः । क्षिप्तास्ते तन मीमैन भस्मसादावमागताः ॥४०॥ एकनवाह्वयं नीतास्ते भीमेन मदोद्धताः । वहयोऽपि हि हिंस्यन्ते सिंहेनैकेन दन्तिनः ॥४१॥ अयासौ कीचकः साधुरेकान्तोद्यानमध्यगः । पर्यङ्कासनयोगस्थो यक्षेणैक्षि कदाचन ॥४२॥ तस्य चित्तपरीक्षार्थ द्रौपदीवेपमाश्रितः । निशीथेऽदर्शयद्रुपमात्मनो मदनालसम् ॥४३॥ साधुना घधिरेणेव रम्यालापश्रुतौ स्थितम् । रूपं दृष्टिविलासाढ्यामन्धेनेव मनोहरम् ॥४॥ गुप्तेन्द्रियकलापस्य मनःशुद्धिमुपेयुषः । साधोस्तस्य समुत्पन्नमवधिज्ञानलोचनम् ॥४५॥ उपसंहृतयोगं तं प्रणम्यासौ सुरस्ततः । मुनिमक्षमयनाथ क्षमस्वेति पुनः पुनः ॥४६॥ पुनः प्रणम्य पप्रच्छ द्रौपदीमोहकारणम् । कारणेन विना न स्यात्तादृग्मोहसमुद्भवः ॥४७॥ कतिचित्पूर्वजन्मानि द्रौपद्याः स्वस्य चेत्यसौ । कीचकाल्योऽवदद्योगी यक्षाय प्रणतारमने ॥४८॥ तरङ्गिणीसरित्तीरे वेगवत्याश्च संगमे । म्लेच्छोऽहममबद्रौदः क्षुद्रः क्षुद्रासुमद्रिपुः ॥४९॥ जिससे उसने रतिवर्धन नामक मुनिराजके पास जाकर दीक्षा धारण कर ली ॥३७।। कीचक मुनि अनुप्रेक्षाओंके द्वारा आत्माकी भावना करते-आत्माका स्वरूप विचारते, शास्त्रोंका स्वाध्याय करते और भाव-शुद्धिके द्वारा रत्नत्रयको शुद्ध करनेके लिए उद्यम करने लगे ॥३८॥ कीचकके सौ भाइयोंने जब कीचकको नहीं देखा तो वे बहुत ही घबड़ाये । उन्होंने जहाँ-तहाँ उसकी खोज की पर कहीं नहीं दिखा। उसी समय उन्हें एक जलती हुई चिताकी अग्नि दिखी। किसीने बता दिया कि वह कोचककी ही चिता है, यह सुन वे सब भाई बहुत हो कुपित हुए । वे सोचने लगे कि कीचककी यह दशा इस शैलन्ध्रीने ही की है इसलिए वे कुपित होकर उसे (शैलन्धीका वेप धारण करनेवाले भीमको) उसी चितामें डालनेकी इच्छा करने लगे। परन्तु भीमसेनने उनकी बलवत्ता ठिकाने लगा दी और एक-एक कर सबको जलती हुई चितामें डाल दिया जिससे सब जलकर राख हो गये ॥३९-४०॥ देखो, एक ही भीमसेनने मदसे उद्धत हुए अनेक पुरुषोंको नामावशिष्ट कर दिया-मरणको प्राप्त करा दिया सो ठीक ही है क्योंकि एक सिंह अनेकों हाथियोंको नष्ट कर देता है ॥४१॥ अथानन्तर किसी दिन कीचक मुनि एकान्त उपवनके मध्यमें विराजमान थे। वे उस समय पद्मासनसे योगारूढ हो निश्चल बैठे थे कि एक यक्षने उन्हें देखा ॥४२॥ उनके चित्तकी परीक्षा करनेके लिए वह यक्ष आधी रात के समय द्रौपदीका रूप रख उनके पास पहुंचा और कामसे अलसाया हुआ अपना रूप उन्हें दिखाने लगा ॥४३॥ परन्तु मुनिराज कोचक, उसके सुन्दर आलापके सुननेमें यहिरे-जैसे हो गये और दृष्टिके विलाससे युक्त उसका मनोहर रूप देखने के लिए अन्धेके समान हो गये ।।४४।। जिन्होंने अपनी इन्द्रियोंके समूहकी अच्छी तरह रक्षा की थी तथा जो मनको शुद्धिको प्राप्त हो रहे थे ऐसे उन कोचक मुनिराजको उसी समय अवधिज्ञान उत्पन्न हो गया ॥४५॥ तदनन्तर ध्यान समाप्त होनेपर यक्षने उन्हे प्रणाम किया और 'हे नाथ ! क्षमा कीजिए' इस प्रकार वार-बार कहकर उनसे क्षमा मांगी ॥४६॥ तत्पश्चात् यक्षने पुनः नमस्कार कर उनसे द्रौपदी के प्रति मोह उत्पन्न होनेका कारण पूछा क्योंकि बिना कारणके उस प्रकारके मोहकी उत्पत्ति नही हो सकती ।। ४७ ॥ उत्तरस्वरूप मुनिराज कीचक,- नम्रीभूत यक्षके लिए अपने तथा द्रौपदीके कुछ पूर्वभव इस प्रकार कहने लगे ॥४॥ एक ममय में, तरङ्गिणी नामक नदीके तटपर जहाँ वेगवती नामक नदीका संगम २ विक्षिप्सव मन ३. नामावशेष मरणमित्यर्थ (ग० टि.)। ४. विलामाभ्या-मः। १. दृष्टा म०, घा।

५५५ पट्चत्वारिंशः सर्गः साधुदर्शनतः शान्तः प्रापमर्यमनुष्यताम् । धनदेवः पिता चात्र माता में सुकुमारिका ॥५०॥ कुमारदेवसंज्ञोऽहं मात्रा च मम सुनतः । मारितः साधुराहारं दत्वा विपविमिश्रितम् ॥५१॥ प्रविश्य नरकं पापा दुःखं साधुवधोद्भवम् । अनुभूय पुनस्तियन्मारकवरतिस्म सा ॥५२॥ अवतोऽहमपि भ्रान्त्या संसार तीव्रवेदनम् । मातरिश्वतया वृत्ती(१) नुन्नोंहोमातरिश्वमिः ॥५३॥ सितेन तापसेनान्ते जनितो मधुमंज्ञकः । तापस्यां मृगशिपयां प्रवृद्धस्तापमाश्रम ॥५४॥ मुनेविनयदत्तस्य दानमाहात्म्यदर्शनात् । प्रवज्य स्वर्गमारा जातोऽहं कीचकरच्युतः ॥५५॥ चिरं पर्यट्य संसार सुदुःख सुकुमारिका । मानुषी दुर्मगीभूता भूनाभूतासुरवावहा ॥५६॥ सा चानुमतिका नाम्ना सनिदानतपोयुता । जातेयं द्रौपदी तन मोहोऽस्या में महानभूत् ॥५७।। यसन्ततिलकावृत्तम् माता स्वसा च तनुजा प्रियकामिनीत्वं मातृस्वसृन्वदुहितृत्वमुपैति पत्नी । संसारचक्रपरिवर्तिनि जीवलोके ही संकरव्यतिकरी नियती मवेताम् ।।५८॥ वैचिन्यमेतदवगम्य भवस्य मच्या वैराग्यमेत्य सुखतो महतोऽप्यमुष्य । संसारकारणनिवृत्तधियः सुवृत्ता मोक्षार्थमेव महता तपसा यतन्ताम् ॥५९॥ इत्यादि तस्य वचनं मुनिकीचकस्य श्रुत्वा सुरः सुरवधूमिरमा तदानीम् । सम्यक्त्वरतवरभूषणभूषितात्मा नत्वा गुरुं प्रतियुतोऽन्तरधानान्ते ॥६॥ होता था, क्षुद्र मनुष्योंका पैरी क्षुद्र नामका म्लेच्छ था, उस समय मेरे परिणाम अत्यन्त रौद्र रूप थे ॥४९॥ एक वार अचानक ही मुनिराजके दर्शन कर मैं अत्यन्त शान्त हो गया और वैश्य कुलमें मनुष्य पर्यायको प्राप्त हुआ। इस समय मेरे पिता धनदेव और माता मुकुमारिका थी तथा मेरा निजका नाम कुमारदेव था। एक बार मेरी माताने विप मिला आहार देकर एक सुबत नामक मुनिको मार डाला ।।५०-५१|| उसके फल-स्वरूप वह पापिनी नरक पहुँची और वहाँ मुनिके घातसे उत्पन्न दुःख भोगकर तिर्यञ्च तथा नरकगतिके दुःख भोगती रही॥५२॥ मैं भी संयमसे रहित था इसलिए तीव्र वेदनावाले संसारमें भटक कर पापरूपी पचनसे प्रेरित हुआ अपनी माताके जीवके कुत्ता हुआ। तदनन्तर तापसोंके किसी तपोवनमें सित नामक तापसके द्वारा मृगशृङ्गिणी नामक तापसीके मधु नामका पुत्र हुआ तथा तापसांके आश्रममें ही मैं वृद्धिको प्राप्त हुआ ।।५३-५४|| एक दिन किसी श्रावकने विनयदत्त नामक मुनिराजको आहार दान दिया। उसका माहात्म्य देख मैंने दीक्षा ले ली और उसके फलस्वरूप स्वर्गारोहण कर वहाँसे च्युन होता हुआ कीचक हुआ ॥५५॥ माता सुकुमारिका चिरकाल तक भ्रमण कर संसारमें तीव्र दुःख भोगती रही। अन्तमें वह दौर्भाग्यसे युक्त दुःखोंको भोगनेवाली मानुपी हुई ॥५६॥ अनुमतिका उसका नाम था। अन्तमें वह निदान सहित तपसे युक्त हो द्रौपदी हुई है। इसी कारण इसमें मुझे मोह उत्पन्न हो गया था ।।१७।। देसो, माता वहिन हो जाती पुत्री प्रिय स्त्री हो जाती है, और स्त्री, माता, वहिन तथा पुत्रीपनेको प्राप्त हो जाती है । आश्चर्यकी बात है कि संसार रूपी चक्रके साथ घूमनेवाले जीवोंमें संकर और व्यतिकर नियम से होते रहते हैं ।।५८॥ इसलिए हे भव्यजनो! संसारकी इस विचित्रताको अच्छी तरह समझ कर वैपयिक मुखसे भले ही यह कितना ही महान् क्यों न हो विरक्त होओऔर संसार के कारणोंसे विरक्त हो सदाचारके धारी वन विशाल तपसे मोक्षके लिए ही यत्न करो ।।५९।। इस प्रकार कीचक मुनिके वचन सुन उस यक्षने अपनी देवियों के साथ-साथ अपनी आत्माको उस समय सम्यग्दर्शन रूपी उत्कृष्ट रत्नोंके आभूपणोंसे आभूपित किया । तदनन्तर १. वैश्यकुलम् 'अरव्या ऊरुजा अर्या वैश्या भूमिस्पृशो विशः' इत्यभिधानात् । 'अयं स्वामिवैश्ययो' इति पाणिनिस्त्रम् । -मार्यमनुष्यताम् म०, क०,१०, ग०, ५०। २. पापपवन. । ३. भूतामाता मुखावहा प०। r । हरिवंशपुरागे 1. विद्याकरिवरं प्राप कपित्थवनदेवतः । यल्मी क्षुरिकां चापि कर मुद्रिकादिकम् ॥३७॥ शरायपर्वते लेभे कटिसूत्रमुरश्छदम् । कामः कटककेयूरकण्टिकामरणं गुमम् ॥३८॥ शूरामुरतः शड्यं दिव्यं प्राप शरासनम् । हारं सुरेन्द्रजालं च मनोवेगाद्विकीलितात् ॥३९॥ मनोवेगरिपोलेंभे वसन्तराचरात्ततः । कन्यां नरेन्द्रजालं च तयोः सख्यस्य कारकः ॥४०॥ चापं च कौमुमं प्रापदर्जुनो भवनाधिपात् । उन्मादमोहसंतापमदशोककरान् शरान् ॥४॥ अन्यां नागगुहां यातचन्दनागुरमालिकाः । पाप्पं छत्र च शयनं लेभे तय तु पार्थिवान् ।।१२।। स दुर्जययने लेभे जयन्तगिरिवर्तिनी । खेटवायुसरस्वत्यो रनि कामः शरीरजाम् ॥४३॥ पोडशेयपि चैतेषु लामस्थानेषु मन्मथम् । लब्धानेकमहालामं दृष्ट्वा विस्मितमानसाः ॥४४॥ ज्ञारवा पुण्यस्य माहाम्यं कुमाराः संवरादयः । शश्रिया मदनेनामा निजं नगरमाययुः ॥४५ लब्धं दिव्यं रथं शुभ्रवृपैयूंहमधिष्टिनः । चापो पञ्चशरी छत्री ध्वजी दिव्यविभूषणी ॥४६॥ मनो हरनरस्त्रीणां मदनो मदनेपुमिः । मेघफूट प्रविष्टोऽसौ कुमारशतवेदितः ॥४७॥ सप्रणामस्ततो दृष्ट्वा प्रद्युम्नः कृष्णसंवरम् । धिष्ण्यं कनकमालायाः प्रस्थितः स रथे स्थितः ॥४८॥ तथा च स्थितनेपथ्यं नेत्रपथ्यं न दूरतः । दृष्ट्वा कनकमाला तं मावं कमपि संश्रिता ॥४९॥ रथादुत्तीर्य विनतं शंमित्वाघ्राय मस्तक । आसयित्वान्तिक तं सास्पर्शयन्मृदुपाणिना ॥५०॥ अमृतमयी माला लेकर लौटा ॥३६॥ कपित्थ नामक वनमें गया तो यहाँके निवासी दे विद्यामय हाथी ले आया। वल्मीक वनमें प्रवेश कर वहाँके निवासी देवसे भुरी, कवच । मुद्रिका आदि ले आया ॥३७॥ शराव नामक पर्वतमें वहाँ के निवासी देवसे कटिसूत्र, कर कड़ा, बाजूबन्द और कण्ठाभरण आदि प्राप्त किये ॥ ३८॥ शूकर नामक वनमें शूकरदे शङ्ख और सुन्दर धनुप प्राप्त किया तथा वहींपर कीले हुए मनोवेग नामक विद्याधरसे हार इन्द्रजाल प्राप्त किया ।। ३९ ॥ मनोवेगंका वैरी वसन्त विद्याधर था, कुमारने उन दोन मित्रता करा दी इसलिए उससे एक कन्या तथा नरेन्द्रजाल प्राप्त किया ॥४०॥ आगे चल एक भवनमें प्रवेश कर उसके अधिपति देवसे पुष्पमय धनुप और उन्माद, मोह, सन्ताप, तथा शोक उत्पन्न करनेवाले बाण प्राप्त किये ॥४१॥ तदनन्तर एक दूसरी नागगुहामें गया वहाँ के स्वामी देवसे चन्दन तथा अगुरुकी मालाएँ, फूलोंका छत्र और फूलोंको शय्या प्राप्त ॥ ४२ ॥ तदनन्तर जयन्तगिरिपर वर्तमान दुर्जय नामक वनमें गया और वहाँ से विद्या वायु तथा उसकी सरस्वती नामक स्त्रीसे उत्पन्न रति नामक पुत्री लेकर लौटा ॥ ४३ ।। प्रकार इन सोलहों लाभके स्थानोंमें जिसे अनेक महा लाभोंको प्राप्ति हुई थी ऐसे प्रद्युम्न कुर को देखकर संवर आदि कुमारोंके चित्त आश्चर्यसे चकित हो गये। तदनन्तर पुण्यका माहार समझ शान्ति धारण कर वे प्रद्युम्नके साथ अपने नगर वापिस आ गये ॥ ४४-४५ ॥ जो प्र हुए सफेद बैलोंसे जुते दिव्य रथपर आरूढ था, धनुष, पॉच वाण, छन्न, ध्वजा और दि आभूषणोंसे आभूषित था तथा कामके वाणोसे पुरुप और स्त्रियोंके मनको हर रहा था प्रद्यन्नने सैकड़ों कुमारोंसे परिवृत हो मेघकूट नामक नगरमें प्रवेश किया ।। ४६-४७ ।। पहुँचते ही उसने नमस्कार कर कालसंवरके दर्शन किये और उसके बाद उसी भाँ रथपर बैठा हुआ कनकमालाके घरकी ओर प्रस्थान किया । ४८ ॥ उस प्रकारको वेपभूप युक्त तथा नेत्रोंके लिए आनन्ददायी प्रद्युम्नको समीप आया देख कनकमाला किसी दूसरे भावको प्राप्त हो गयी ॥४९॥ रथसे नीचे उतरकर नम्रीभूत हुए प्रद्युम्नको कनकमाल बहुत प्रशंसा की, उसका मस्तक सूंघा, उसे पासमें बैठाया और कोमल हाथसे उसका स् १. संशित्वा म., ग० । २. सह ।

सप्तचत्वारिंशः सर्गः गाढमोहोदयात्तस्यास्ततः परवशात्मनः । कर्षन्तो हृदयक्षोणों प्रत्ता दुमनोरथाः ॥५॥ साराम या लभेत शयने सकृत् । कामिनी भुवने सैका शेपास्वाकृतिमात्रकम् ॥५२॥ रूपलावण्यसामाग्यवैदग्ध्यं गुणगोचरम् । कामाश्लेषस्य सौलम्य दोलभ्य स्यात्तुगं तु मे ॥५३॥ इनिप्रवृत्तसंकल्पामसंमाविततन्मनाः । तां प्रणम्य स लब्धाशीः प्रद्युम्नः गृहं गतः ॥५४॥ इनिमयलदुःखेयं रोचरी निविलाः क्रियाः । विसस्मार स्मराक्षेपमुसलाम मनोरथा ॥५५॥ अवस्थामपरेशुस्तां प्रधुम्नो द्रष्टुमागतः । अद्राक्षीद्विसिनोपत्रपर्यस्तननुमाकुलाम् ॥५६॥ पृथ्चति स्म मतां कामः शरीरास्वास्थ्यकारणम् । इनितराङ्गिक साऽपि चाचिक्यश्च व्ययोधयत्॥५७॥ परीत्यं ततो ज्ञावा निन्दित्वा कर्मचेष्टिनम् । स मानपत्यसंयन्धप्रत्यायनपरोऽभवत् ॥५४॥ मापि तस्मै यथावृत्तमादिमध्यावसानतः । अटवीलाममंद्धिविद्यालामानवेदयत् ॥५९॥ समयन्धं ततः शुन्या संदिग्धाधमतिर्गतः 1 दृष्ट्वा मागरचन्द्राख्यं मुनिं चैन्यगृहे मुद्दा ॥६॥ मस्या दृष्ट्वा ततो ज्ञात्या सर्वान् पूर्वमयाग्निजान् । तथा कनकमालायाश्चन्द्रामायाः पुरा भवे ॥६॥ सम्यग्दर्शनसंशुद्धो ज्ञातप्रशहिलामकः । गत्वा शीलधनोऽप्राक्षीन्मदनो मदनानुराम् ॥६२ ।। किया।॥५०॥ तदनन्तर मोहका तीन उदय होनेसे उसकी आत्मा विवश हो गयी और हृदयरूपी भूमिको खोदते हुए अनेक खोटे विचार उसके मनमें उठने लगे ॥५१॥ वह विचारने लगी कि जो त्री शय्यापर अपने अंगोंसे इसके अंगोंके स्पर्शको एक बार भी प्राप्त कर लेती है संसारमें बद्दी एक स्त्री हे अन्य स्त्रियाँ तो स्त्रीको आकृतिमात्र हैं ॥५२॥ यदि मुझे प्रद्युम्नका आलिङ्गन प्राप्त होता है तो मेरा रूप, लायण्य, सौभाग्य तथा चातुर्य सफल है और दुर्लभ रहता है तो यह सब मेरे लिए तृणके समान तुच्छ है ।। ५३ ।। जिसके मनमें कनकमालाके ऐसे विचारोंको कल्पना भी नहीं थी ऐसा प्रद्युम्न, पूर्वोक्त संकल्प-विकल्प करनेवाली कनकमालाको प्रणाम कर तथा आशीर्वाद प्राप्त कर अपने घर चला गया ॥५४॥ उधर प्रदाम्नके आलिङ्गनजन्य मुखको प्राप्त करनेकी जिसकी लालमा लग रही थी ऐसी विद्याधरी फनफमाला प्रअल दुःससे दुःसो हो सब काम-काज भूल गयी ।। ५५॥ दूसरे दिन उमफे अस्वस्थ होनेका ममाचार पा प्रद्युम्न उसे देखने गया तो क्या देखता है कि फनफमाला कमलिनीके पत्तोंको शय्यापर पड़ी हुई बहुत व्याकुल हो रही है ।१६।। प्रद्यम्नने 'उमसे शरीरको अस्वस्थताका कारण पूछा तो उसने शरीर और वचनसम्बन्धी चेष्टाओंसे अपना अभिप्राय प्रपट किया॥५७। तदनन्तर इम विपरीत यातको जानकर और फर्मको पेष्टाओंकी निन्दा फर प्रद्युम्न उसे माता और पुत्रका सम्बन्ध पतलानेमें नत्पर हुआ ॥५८।। इसके उत्तरी फनामालाने भी उसे आदि, मध्य और अन्त तक जमा वृत्तान्त हुआ था यह मय पनलाते हुए कहा कि तू मुझे अटवीमें किस प्रकार मिला, किम प्रकार तेरा लालन-पालन दुआ और फिम प्रकार मुझे विद्याओंका लाभ हुआ १९९|| फनफमालामे अपना मम्यन्ध मुन मगुग्नरे मनमें मंशय उत्पन्न हुआ जिमसे यह स्पष्ट पूछने लिए जिन-मन्दिर में विद्यमान मागरगन्द्र मुनिराज पाम गया और हर्षपूर्वक उन्हें नमस्कार पर उमने उनसे अपने मय पूर्वमय पूछे। पूर्यभव शान फर उसे यह भी मालूम हो गया कि यह फनरमाला पूर्वभय में पन्द्रामा थी।६०-६१|| शुद मम्यग्दर्शनके धारक प्रद्युम्नको मुनिराजमे यह भी विदिन हुआ फिगु पनामालामे प्रामि विधाकालाभ होनेवाला । नदननर नीलमपी धनरो पारण फरनेराले गुम्नने जाकर फाममे पीडित पनरुमालागे प्रतमि विद्या विषयमें पूछा ।।। १ प्रदुम्नास्मिनार । २. साम मनोरपाम। ४.मम.. ५ मानादरम् ! ..-गदि म.,.,., किन ग..

५५८ हरिवंशपुराणे बतगुप्तिसमित्यक्षकषायजयसंयमाः। यत्र मार्ग स्थितास्तत्र सिद्ध्यन्ति त्यादृशोऽचिरात् ॥११॥ इति मार्गस्तुतिं कृत्वा तं च स्तुत्वा कृतानतिः । द्वारिका ज्ञातिमितिः संविवेश सहानुजैः ॥१२॥ उत्सवः परमो जातः स्वसस्वस्त्रीयसंगमे । समुद्रविजयादीनां दशानां चिरदर्शिनाम् ॥१३॥ नेमीशहरिरामादिदशासुतसुन्दराः । अन्तःपुराणि सर्वाणि प्रजाच तुतुपुस्तदा ॥१४॥ यथाक्रममशेषाणां दर्शने दर्शनोत्सवे । जाते परस्परं तेषां स्वजनानां सुसावहे ॥१५॥ यदुपाण्डववर्गी तो मेनाते मिलितौ मुदा । अपकारमपि त्यक्त्या सूपकारं परेः कृतम् ॥१६॥ ततः प्रासादवयेपु पञ्च पञ्चसु विष्णुना । निरूपितेपु ते तस्थुः सर्वमोगप्रदायिषु ॥१७॥ ज्येष्ठो लक्ष्मीमती लेभे भीमः शेषवतीं ततः । सुभद्रामर्जुनः कन्यां कनिष्टौ विजयां रतिम् ॥१४॥ दशाहतनयास्तास्ते परिणीय यथाक्रमम् । रेमिरेऽभूमिरिष्टामिः पाण्डवास्त्रिदशोपमाः ॥१९॥ कथेयं कुरुवीरस्य कथिता ते ममासतः । प्रद्युम्नस्याधुना वच्मि शृणु श्रेणिक चेष्टितम् ॥२०॥ विजयागिरी रम्ये प्रद्युम्नोऽसौ कलागुणैः । विधुवबन्धुमुदाधि सहावधंत वर्धयन् ॥२१॥ विद्याधरोचिता विद्या स विद्याधरपुत्रकः । वियद्यानादिका बाल्ये जग्राहाशु महोद्यमः ॥२२॥ बाल्यादारभ्य लावण्यरूपसौभाग्यपौरुपैः । सोऽरिमित्रनरस्त्रीणामस्त्रीभूतैर्मनोऽहरत् ॥२३॥ यौवनं स परिप्राप्तः प्राप्तसर्वास्त्रकौशलः । हृदयेषु युवा यूनां प्रहरनपि वल्लभः ॥२४॥ एवं व्रत, गुप्ति, समिति तथा इन्द्रिय और कपायको जीतनेवाले संयमका निरूपण किया गया है उस मार्गमे स्थित हो आप-जैसे महानुभाव शीघ्र ही सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हो जाते हैं ॥१०-११।। इस प्रकार जिनेन्द्रोक्त मार्ग तथा महामुनि विदुरकी स्तुति कर युधिष्ठिर द्वारिका पहुँचे । यादवोंको पाण्डवोंके आगमनका जब पता चला तो उन्होंने इनका बड़ा स्वागत किया और छोटे भाइयोंके साथ युधिष्ठिरने द्वारिकामें प्रवेश किया ॥१२॥ समुद्रविजय आदि दशों भाइयोंने बहिन तथा अपने भानजोंको बहुत समयके बाद देखा था इसलिए इन सबके समा- गमसे उन्हें परम हर्प हुआ ॥ १३ ॥ भगवान् नेमिनाथ, कृष्ण, वलदेव आदि समस्त यादव कुमार, समस्त अन्तःपुर और प्रजाके सब लोग उस समय बहुत ही सन्तुष्ट हुए ॥१४॥ नेत्रीको आनन्द देनेवाला पाण्डवों तथा समस्त स्वजनोंका वह दर्शन-परस्परका मिलना सबके लिए सुखदायी हुआ ॥ १५ ॥ यादव और पाण्डव परस्पर मिलकर हर्पसे ऐसा मानने लगे कि शत्रुओंने हमारा अपकार नहीं उपकार ही किया है। भावार्थ-यदि दुर्योधनादिक अपकार न करते तो हम लोग इस तरह परस्पर मिलकर आनन्दका अनुभव नही कर सकते थे, अतः उनका किया अपकार अपकार नहीं प्रत्युत उपकार है ऐसा सव लोग मानने लगे ॥१६॥ तदनन्तर श्रीकृष्णके द्वारा दिखलाये हुए भोगोपभोगकी सब सामग्रीसे युक्त पॉच उत्तमोत्तम महलोंमें पॉचों पाण्डव पृथक्-पृथक् रहने लगे ॥१७॥ युधिष्ठिरने लक्ष्मीमनी, भीमने शेपवती, अर्जुनने सुभद्रा, सहदेवने विजया और नकुलने रति नामक कन्याको प्राप्त किया।।१८।। यथा-क्रमसे पूर्वोक्त यादव-कन्याओको विवाह कर दवांका उपमाको धारण करनेवाले पाण्डव उन इष्ट स्त्रियांक साथ कोड़ा करने लगे।॥१९॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक! इस प्रकार मैंने तेरे लिए संक्षेपसे कुरुयोरकी कथा कही । अब मैं प्रद्युम्नकी चेष्टाएँ कहता हूँ सो सुन ।।२०।। अत्यन्त रमणीय विजयाध पर्वतपर कन्या रूपी गुणोंके द्वारा बन्धु-जनोंके हर्परूपी सागरको बढ़ाता हुआ प्रद्युम्न चन्द्रमाके समान बढ़ने लगा ॥२१॥ विद्याधरपुत्र प्रद्युम्नने बड़े उद्यमके साथ वाल्यकालमें ही आकाशगामिनी आदि विद्याधरोंके योग्य विद्याओंको शीघ्र ही मीस लिया था ।।२२।। वह वाल्य अवस्थासे हो लेकर अस्त्रके समान अपने लावण्य रूप, सौभाग्य और पौरुपके द्वारा शत्रु-मित्र पुरुष तथा स्त्रियोंके मनको हरण करता था ।। २३ ।। यौवनको प्राप्त होते ही प्रद्युम्न ममस्त अस्त्र-शस्त्रोंमे कुशल हो गया। अपने सौन्दर्यके कारण सप्तचत्वारिंशः सर्गः ५५९ मन्मयो मदनः कामः कामदेवो मनोमयः । इत्यन्वामिधानः स नानगोऽनद्गनामकः ॥२५॥ युद्ध सिंहरथं जिण्या जितपञ्चशतान्मनम् । कालसंवरभूपाय सकामोऽदर्शयत्कृती ॥२६॥ तादृशं तनयं दृष्ट्वा संतुष्टः कालमंवरः । मने श्रेणीद्वयं तं वशीकृतमिनामनाम् ॥२७॥ महाराज्यपदादारफलपुष्पं नृपोऽस्य सः। योगराजमहापर्ट यवन्ध च विधानतः ॥२८॥ शतानि तनयाः पत्र कालसंवरभूभृतः । चिन्तयन्ति ततोऽपायं मदनस्य समन्ततः ॥२९॥ आपने शयने बस्ने ताम्बूलेशनपानकं । नालं लयितुं ते तं छलान्वेपणतस्पराः ॥३०॥ अन्यदा नु यिनीनोऽयी नीतो नीत्यानुकूलकैः । कुमारस्तः कुमारायः मिदायतनगोपुरम् ॥३॥ नोदितस्तैः समारूढो गोपुरानं सवेगयान् । विद्यारी तिरीटं च लेभे तहासिनोऽमरान् ॥३२॥ प्रविष्टश्च पुनवेगान्महाकालगुहामसी । सद्गं सखेटकं हे छत्रचामरमंयुतम् ॥३३॥ लेभे नागगुहायां च पादपीठं सुराद्वरम् । नागशय्यामनं वीणां विद्या प्रासादकारिणीम् ॥३॥ मकरध्वजमुत्तुझं याप्यां युद्ध जितासुरान् । अपिण्डऽनिमंशोध्यं यत्रयुग्ममवाप्य सः ॥३५॥ मंपाकृतिगिरी लेभे कर्णकुण्डलयोदयम् । मालिं चामृतमालां च पाण्डक मर्कटामरान् ॥३६॥ तरुण प्रद्युम्न यद्यपि अन्य युवाओंके हृदयपर प्रहार करता था उनमें मात्सर्य उत्पन्न करता था नथापि यह सबको प्रिय था ।२४ मन्मथ, मदन, काम, कामदेय और मनोभव इत्यादि मार्थक नामोंमे यह युक्त था। यद्यपि वह अनङ्ग-शरीरसे रहित नहीं था तथापि लोग उसे अनग कहते थे। भावार्थ-प्रद्युम्न कामदेव पदका धारक था। साहित्यमें कामका एक नाम अनङ्ग है इमलिए प्रद्युम्न भी अनङ्ग कहलाता था ॥ २५ ॥ अतिशय कुशाल प्रद्युम्नने, पॉच-मी पुत्रोंको जीननेवाले सिंहरथको युद्ध में जीतकर कालसंवरको दिसा दिया। भावार्थ उस ममय एक सिंहरथ नामका विद्याधर कालसंवरके विरुद्ध था उसे जीनने के लिए उसने अपने पाँच-सी पुत्र भेजे थे परन्तु मिहरथने उन सयको पराजित कर दिया था। प्रद्युम्न ऐमा युाल भरपोर या कि उमने उसे युद्धमें जीतकर कालमंवरके आगे डाल दिया ॥२६॥ ऐसे धीर पुनको देखकर कालमयर बड़ा सन्तुष्ट हुआ और विजयार्धकी दोनों श्रेणियोंको अपने यशीभूत मानने लगा रखाइमासे प्रभावित हो राजाने प्रद्युम्न के लिए विधि-विधान पूर्वक युवराज पद- फा यह महापट्ट बाँध दिया जो महाराग्य पद रूपी उत्कृष्ट फलके लिए पुष्पके ममान था RI. इम पटनासे राजा कालसंवरके जो पाँच-मी पुत्र थे ये मय ओरसे प्रद्युम्नये नाराका उपाय मोरने लगे ॥२९॥ वे निरन्तर छलके योजनेमें नत्पर रहने लगे। परन्तु पैठने, मोने, यन्त्र, पान नया भोजन, पानी आदिके समय ये उसे छलनेके लिए समर्थ नहीं हो मफे ॥३०॥ किमी एक ममय नीनिके अनुरुल आचरण फग्नेयाले पुमागे ममूह, विनीन प्रद्युम्न- सुमागको मिदायतनफे गोपुरये ममीप ले गये और इस प्रकारको प्रेरणा फग्ने लगे कि जो इस गोपुर. अमभागपर पड़ेगा यह इमपर रहनेवाले देयमे विद्याओंका मजाना नया मुकुट मान फरंगा'। माधियोंगे इस प्रकार प्रेरित हो युमार वेगमे गोपुरफ अप्रभागपर पद गया और यहाँ के निवामी दयसे विद्याओंपा पजाना नया मुकुट ले आया ।। ३१-३२ ॥ गदनन्तर भाइयोंमे प्रेरित होगमे महाफाल नामक गुदाम गुम गया और यहाँ मे नलयार, दाल, सत्र नया पमर से आया ।। ३३ ।। यहाँ मे निकलकर नागगुदामें गया और पदों के नियामी दयमे राम पादरीट. नागाणा, आमन, योगा नया भयन पना देनेपाली विधा में आया ॥३॥ पदोंमे आकर रिमायापिरामे गला और युद्ध में जाते हुए दंपरी मफरफ गिद्गे पिहिन ऊँची पजामान पर निकला। गहनन्नर अप्रिटमें प्रविष्ट भा मा यहाँ में अनिमे मुद किये दो पर आया||५|| मरमान मेगानि पर्यन में प्रसपा पानोर दो गुट में भाग। इस पार पाहु नामर पन पर फर पदपि. नियामी मपंट नाम देय नट और - ५६० हरिवंशपुरागे । । विद्याकरिवरं प्राप कपित्थवनदेवतः । वल्मीके क्षुरिकां चापि करचं मुद्रिकादिकम् ॥३७॥ शरावपर्वते लेभे कटिसूत्रमुरश्छदम् । कामः कटककेयूरकण्टिकामरणं शुभम् ॥३८॥ शूकरासुरतः शड्स दिव्यं प्राप शरासनम् । हारं मुरंन्दजालं च मनोवेगाद्विकीलितान् ॥३९॥ मनोवेगरिपोलेंभे वसन्तसचरात्ततः । क्न्यां नरेन्द्रजालं च तयोः सत्यस्य कारकः ॥४०॥ चापं च कौसुमं प्रापदर्जुनो मयनाधिपात् । उन्मादमोहसंतापमदशोककरान् शरान् ॥४१॥ अन्यां नागगुहां यातचन्दनागुरमालिकाः । पाप्पं छत्रं च शयन लेभे तन तु पार्थिवात् ॥४२॥ स दुर्जयवने लेभे जयन्तगिरिवर्तिनी । खेटवायुसरस्वत्यो रति कामः शरीरजाम् ॥४३॥ पोडशेष्वपि चैतपु लामस्थानेषु मन्मथम् । लब्धानेकमहालामं दृष्ट्वा विस्मितमानमाः ॥४॥ ज्ञात्वा पुण्यस्य माहात्म्यं कुमाराः संवरादयः । 'शंधिया मदनेनामा निजं नगरमाययुः ॥४५॥ लब्धं दिव्यं रथं शुभैपैयूंढमधिष्टितः । चापी पञ्चशरी छत्री ध्वजी दिव्यविभूपणी ॥४६॥ मनो हरतरस्त्रीणां मदनी मदनपुमिः । मेघाटं प्रविष्टोऽसौ कुमारशतवेष्टितः ॥१७॥ सप्रणामस्नतो दृष्ट्वा प्रद्युम्नः कृष्णसंवरम् । धिष्ण्यं कनकमालायाः प्रस्थितः स रथे स्थितः ॥८॥ तथा च स्थितनेपथ्यं नेत्रपथ्यं न दूरतः । दृष्ट्वा कनकमाला तं मावं कमपि संश्रिता ॥४९॥ रथादुत्तीर्य विनतं शंसित्वाघ्राय मस्तके । आमयित्वान्तिके तं सास्पर्शयन्मृदुपाणिना ॥५०॥ अमृतमयी माला लेकर लौटा ।। ३६ । कपित्थ नामक वनमें गया तो वहाँके निवासी देवसे विद्यामय हाथी ले आया। वल्मीक यनमें प्रवेश कर वहाँके निवासी देवसे क्षुरी, कवच तथा मुद्रिका आदि ले आया ॥३७॥ शराव नामक पर्वतमें वहाँ के निवासी देवसे कटिसूत्र, कवच, कड़ा, वाजूवन्द और कण्ठाभरण आदि प्राप्त किये ।। ३८ ॥ शूकर नामक वनमें शूकरदेवसे शङ्ख और सुन्दर धनुप प्राप्त किया तथा यहींपर कीले हुए मनोवेग नामक विद्याधरसे हार और इन्द्रजाल प्राप्त किया ॥ ३९ ॥ मनोवेगंका वैरी वसन्त विद्याधर था, कुमारने उन दोनोंकी मित्रता करा दी इसलिए उससे एक कन्या तथा नरेन्द्रजाल प्राप्त किया ॥४०॥ आगे चलकर एक भवनमें प्रवेश कर उसके अधिपति देवसे पुष्पमय धनुष और उन्माद, मोह, सन्ताप, तथा शोक उत्पन्न करनेवाले बाण प्राप्त किये ॥४१॥ तदनन्तर एक दूसरी नागगुहामें गया तो वहाँ के स्वामी देवसे चन्दन तथा अगुरुकी मालाएँ, फूलोंका छत्र और फूलोंको शय्या प्राप्त को ॥ ४२ ॥ तदनन्तर जयन्तगिरिपर वर्तमान दुर्जय नामक वनमें गया और वहाँ से विद्याधर वायु तथा उसकी सरस्वती नामक स्त्रीसे उत्पन्न रति नामक पुत्री लेकर लोटा ॥४३ ॥ इस प्रकार इन सोलहों लाभके स्थानांमे जिसे अनेक महा लाभोंकी प्राप्ति हुई थी ऐसे प्रद्युम्न कुमार को देखकर संवर आदि कुमारोंके चित्त आश्चर्यसे चकित हो गये । तदनन्तर पुण्यका माहात्म्य समझ शान्ति धारण कर वे प्रद्युम्नके साथ अपने नगर वापिस आ गये ॥ ४४-४५ ॥ जो प्राप्त हुए सफेद बैलोंसे जुते दिव्य रथपर आरूढ था, धनुप, पॉच वाण, छत्र, ध्वजा और दिव्य आभूषणोंसे आभूपित था तथा कामके वाणोंसे पुरुप और स्त्रियों के मनको हर रहा था ऐसे प्रद्यम्नने सैकड़ों कुमारोंसे परिवृत हो मेघकूट नामक नगरमें प्रवेश किया ।। ४६-४७ ॥ पहुँचते ही उसने नमस्कार कर कालसंवरके दर्शन किये और उसके बाद उसी भाँति रथपर बैठा हुआ कनकमालाके घरकी ओर प्रस्थान किया ।। ४८ ॥ उस प्रकारको वेषभूपासे युक्त तथा नेत्रोंके लिए आनन्ददायी प्रद्युम्नको समीप आया देख कनकमाला किसी दूसरे ही भावको प्राप्त हो गयी ।। ४९ ॥ रथसे नीचे उतरकर नम्रीभूत हुए प्रद्युम्नकी कनकमालाने बहुत प्रशंसा की, उसका मस्तक सूंघा, उसे पास में बैठाया कोमल हाथसे उसका पर्श १. संशित्वा म., ग०।२ सह ।

सप्तचत्वारिंशः सर्गः नत्वा पृष्ट्वा गाढमोहोदयात्तस्यास्ततः परवशात्मनः । कर्पन्तो हृदयक्षोणी प्रवृत्ता दुर्मनोरथाः ॥५॥ स्वारस्पाङ्गमग या लभेत शयने सकृत् । कामिनी भुवने सैका शेपास्त्वाकृतिमात्रकम् ॥५२॥ रूपलावण्यसौमाग्यवैदग्ध्यं गुणगोचरम् । कामाश्लेषस्य सौलभ्ये दौलभ्य स्यात्तृगं तु मे ॥५३॥ इतिप्रवृत्तसंकल्पामसंभाविततन्मनाः । तां प्रणम्य स लब्धाशीः प्रद्युम्नः स्वगृहं गतः ॥५४॥ इतिप्रबलदुःखेयं खेचरी निखिलाः क्रियाः । विसस्मार स्मराश्लेषसुखलाम मनोरथा ॥५५॥ अस्वस्थामपरेास्तां प्रद्युम्नो दष्टुमागतः । अद्राक्षीद्विसिनोपत्रपर्यस्ततनुमाकुलाम् ॥५६॥ पृच्छति स्म सतां कामः शरीरास्वास्थ्यकारणम् । इशितैराशिकः साऽपि वाचिक्यश्च व्यवोधयत्॥५७॥ बैपरीत्यं ततो ज्ञात्वा निन्दित्वा कर्मचेष्टितम् । स मानपत्यसंवन्धप्रत्यायनपरोऽभवत् ॥५॥ सापि तस्मै यथावृत्तमादिमध्यावसानतः । अटवीलामसंवृद्धिविद्यालामानवेदयत् ॥५९॥ स्वसंवन्धं ततः श्रुत्वा संदिग्धार्थमतिर्गतः । दृष्ट्वा सागरचन्द्राख्यं मुनि चैत्यगृहे मुदा ॥६०॥ ततो । ज्ञावा सर्वान् पूर्वमवान्निजान् । तथा कनकमालायाश्चन्द्रामायाः पुरा भवे ॥६॥ सम्यग्दर्शनसंशुद्धो ज्ञातप्रज्ञप्तिलामकः । गत्वा शीलधनोऽप्राक्षीन्मदनो मदनातुराम् ॥६२ ।। किया॥५०॥ तदनन्तर मोहका तीव्र उदय होनेसे उसकी आत्मा विवश हो गयी और हृदयरूपी भूमिको खोदते हुए अनेक खोटे विचार उसके मन में उठने लगे ॥५१॥ वह विचारने लगी कि जो स्त्री शय्यापर अपने अंगोंसे इसके अंगोंके स्पर्शको एक बार भी प्राप्त कर लेती है संसारमें वही एक स्त्री है अन्य स्त्रियाँ तो स्त्रीकी आकृतिमात्र हैं ॥ ५२ ।। यदि मुझे प्रद्युम्नका आलिङ्गन प्राप्त होता है तो मेरा रूप, लावण्य, सौभाग्य तथा चातुर्य सफल है और दुर्लभ रहता है तो यह सब मेरे लिए तृणके समान तुच्छ है ।। ५३ ।। जिसके मनमें कनकमालाके ऐसे विचारोंकी । कल्पना भी नहीं थी ऐसा प्रद्युम्न, पूर्वोक्त संकल्प-विकल्प करनेवाली कनकमालाको प्रणाम कर तथा आशीर्वाद प्राप्त कर अपने घर चला गया ।। ५४ ॥ उधर प्रद्युम्नके आलिङ्गनजन्य सुखको प्राप्त करनेकी जिसकी लालसा लग रही थी ऐसी विद्याधरी कनकमाला प्रवल दुःखसे दुःखी हो सब काम-काज भूल गयी ॥५५॥ दूसरे दिन उसके अस्वस्थ होनेका समाचार पा प्रद्युम्न उसे देखने गया तो क्या देखता है कि कनकमाला कमलिनीके पत्तोंको शय्यापर पड़ी हुई बहुत व्याकुल हो रही है ।।१६।। प्रद्यम्नने उससे शरीरकी अस्वस्थताका कारण पूछा तो उसने शरीर और वचनसम्बन्धी चेष्टाओंसे अपना अभिप्राय प्रकट किया ॥५७॥ तदनन्तर इस विपरीत पातको जानकर और कर्मकी चेष्टाओंकी निन्दा कर प्रद्युम्न उसे माता और पुत्रका सम्बन्ध बतलानेमें तत्पर हुआ ॥५८|| इसके उत्तर में कनफमालाने भी उसे आदि, मध्य और अन्त तक जैसा वृत्तान्त हुआ था वह सब बतलाते हुए कहा कि तू मुझे अटवीमें किस प्रकार मिला, किस प्रकार तेरा लालन-पालन हुआ और किस प्रकार मुझे विद्याओंका लाभ हुआ १५९|| कनकमालासे अपना सम्बन्ध मुन प्रद्युम्नके मनमें संशय उत्पन्न हुआ जिससे यह स्पष्ट पूछने के लिए जिन-मन्दिर में विद्यमान सागरचन्द्र मुनिराजके पास गया और हर्पपूर्वक उन्हें नमस्कार कर उसने उनसे अपने मय पूर्वभव पूछे। पूर्वभय ज्ञात कर उसे यह भी मालूम हो गया कि यह कनकमाला पूर्वभयमें चन्द्राभा थी ।।६०-६१॥ शुद्ध सम्यग्दर्शनके धारक प्रद्युम्नको मुनिराजसे यह भी विदित हुआ कि तुझे कनकमालासे प्रज्ञप्ति विद्याकालाभ होनेवाला है । तदनन्तर शीलरूपी धनको धारण करनेवाले प्रद्युम्नने जाकर कामसे पीडित कनकमालासे प्रज्ञप्ति विद्याके विषयमें पूछा ॥३॥ १ प्रद्युम्नालिजनस्य । २. लाभ मनोरथा म० । ४. सोषिम। ५ मदनातुरम् म० । ३.-राङ्गिदै म०, ५०, १०, मिते ग० ।

. हरिवंशपुराणे दृष्ट्वा हृष्टा जगौ तं सा शृणु काम मणामि ते । गौरी प्रज्ञप्तिविद्यां च त्वं गृहाण यदीच्छसि ॥३॥ ततः प्रसाद इच्छामि दीयतामितिवादिने । ददी विधियुते विद्ये विद्याधरदुरासदे ॥६॥ प्रमारितकरो विद्ये गृहीत्वा प्रमदी स ताम् । माणविद्याप्रदानान्मे गुरुस्त्वमिनि सद्वचाः ॥६५॥ निःपरीत्य प्रणम्याग्रे स्थितः सुकरशेखरः । अपत्योचितमादेशं याचित्वा स्वोचितं ययौ ॥६६॥ छमिताहमिति ज्ञात्वा साविकोपवंशात्ततः । कक्षवक्षः कुचोद्देशान् नखक्षतभृतोऽकरोत् ॥७॥ साऽदर्शयञ्च पत्येऽङ्गं नाथ प्रद्युम्नचेष्टितम् । पश्येत्यपन्यसंमारं प्रत्येतिस्म स चापि तत् ॥६८॥ शाहूय रहसि क्रुद्धः पुत्रपञ्चशतानि सः । आदिदेशान्यदुर्बोध प्रद्युम्नो मार्यतामिति ॥६९॥ लब्धादेशास्ततस्तुष्टास्ते तमादाय सादराः । अन्येचुरगमन्पापा यापी कालाम्बुनामिकाम् ॥७॥ निपत्य युगपत्मवें तस्योपरि जिघांसवः । प्राथचुदन जलक्रीडां वाप्यां कुर्म इति द्विषः ॥७॥ कणे कथितमतस्य ततः प्रज्ञप्तिविद्यया । यथातथ्यमिति क्रोधादन्तर्हिततनुः क्षणात् ॥७२॥ पपात मायया याप्यां निर्घाता इव निघृणाः । तेऽपि सर्वे समं पेतुरस्योपरि जिघांसवः ॥७३॥ अर्ध्वपादानधोवस्त्रानेक्शेषानमूनसौ । स्तम्भयित्यानुजं कृत्वा पञ्चचूडमजीगमत् ॥७॥ प्रद्युम्नको आया देख कनकमालाने उससे कहा कि हे काम ! मैं एक बात कहती हूँ मुन, यदि तू मुझे चाहता है तो मै तुझे गौरी और प्रज्ञप्ति नामक विद्याएँ कहती हूँ-बतलाती हूँ-तू ग्रहण कर ॥ ६३ ।। तदनन्तर 'यह आपको प्रसन्नता है, मैं आपको चाहता हूँ, विद्याएँ मुझे दीजिए' इस प्रकार कहनेवाले प्रद्युम्न के लिए कनकमालाने विद्याधरोंको दुष्प्राप्य दोनों विद्याएँ विधिपूर्वक दे दी ॥ ६४ ॥ हाथ फैलाकर दोनों विद्याओंको ग्रहण करता हुआ प्रद्युम्न बड़ा प्रसन्न हुआ। जब वह विद्याएँ ले चुका तय इस प्रकारके उत्तम वचन बोला कि पहले अटवीसे लाकर आपने मेरी रक्षा को अतः प्राणदान दिया और अभी विद्यादान दिया--इस तरह प्राणदान और विद्यादान देनेसे आप मेरी गुरु है' । इस प्रकारके उत्तम वचन कह तीन प्रदक्षिणा दे वह हाथ जोड़ शिरसे लगा कर सामने खड़ा हो गया और पुत्रके उचित जो भी आज्ञा मेरे योग्य हो सो दीजिए, इस प्रकार याचना करने लगा। कनकमाला चुप रह गयी और प्रद्युम्न थोड़ी देर वहाँ रुक कर चला गया ॥६५-६६।। दस तरह इसके द्वारा छली गयी हूँ यह जान कनकमालाने तीन क्रोधवश अपने कान, वक्षःस्थल तथा स्तनोंको स्वयं ही नखोंके आधातसे युक्त कर लिया ॥६षा और पति- के लिए अपना शरीर दिखाते हुए कहा कि हे नाथ ! अपत्यजनोंके योग्य ( ?) यह प्रद्युम्नकी करतूत देसो। पतिने भी स्त्रोके इस प्रपश्चपर विश्वास कर लिया॥ ६८ ॥ राजा कालसंवर इस घटनासे बहुत ही क्रुद्ध हुआ। उसने एकान्तमें बुलाकर अपने पाँच सौ पुत्रोंसे कहा कि 'जिम तरह किमी अन्यको पता न चल सके उस तरह इस प्रद्युम्नको मार डाला जाये ॥९॥ तदनन्तर पिताकी आता पाहसे फूले हुए ये पापी कुमार बड़े आदरसे दूसरे दिन प्रद्युम्नको साथ लेकर कालाम्यु नामक वापिका पर गये ।।७०॥ और एक साथ सब प्रद्युम्नपर फूद कर उसके पातकी इच्छा रखते हुए उसे बार-बार प्रेरित करने लगे कि चलो वापीमें जलमीड़ा करें ।। ७१ ।। उसी समय प्रज्ञप्ति विद्याने प्रद्युम्नके कानमें सब बात ज्योंकी-त्यों कह दी। सुन कर प्रद्युम्नको बहुन फ्रोध आया और यह उमी क्षण मायासे अपना मूल शरीर यही छिपा कृत्रिम शरीरमे वापिकामें कूद पड़ा । उसके फूदते ही पत्रके समान निर्दय एवं मारने 2. पाक सय कुमार एक माथ उसके ऊपर फूद पड़े ॥७२-७३ ॥ प्रद्युम्नने एकको शेप पचा सभी धुमागंको उपर पैर और नीचे गुप फर फील दिया और एक भाईको पाँच चोटियोंका १ पोद्देशान् म । २. जिपिन्सर म.पणी म०।

सप्तचत्वारिंशः सर्गः पुत्रोदन्तं ततः ध्रुन्चा द्विगुणक्रोधदीपितः । समय सर्वसैन्येन संप्राप्तः कालसंवरः ॥७॥ विद्याविकृतसैन्येन प्रद्युम्नेन ततश्विरम् । युद्ध्वामानोऽति मग्नेच्छः स गत्वा कृष्णसंवरः ॥७६॥ ऊचे कनकमालां तां देहि प्रज्ञप्तिमित्यरम् । स्तन्येन सह वाल्येऽस्मै मया दत्तेनि साऽवदत् ॥७॥ ज्ञातमायादुरीहोऽसौ पुनरागत्य मानवान् । युध्यमानोऽमुना यद्धो निहितो हि शिलातले ॥७८॥ तदानीमेव संप्राप्ती नारदोऽतिविशारदः । प्रद्युम्नेन कृताभ्यर्चः संवन्धमखिलं जगौ ॥७९॥ कालसंवरमुन्मुच्य क्षमयित्वा ततोऽवदत् । पूर्वकर्मवशेच्छाया मातुमें क्षम्यतामिति ॥८॥ 'निरुपायानुपायज्ञो मुक्त्वा पञ्चशतान्यपि । भातृस्नेहपरः कामः क्षमयित्वा पुनः पुनः ॥४१॥ आपृष्टेन स तुटेन कालसंवरभूभृता । विसृष्टो रक्मिणीकृष्णदर्शनोत्सुकमानसः ॥८२॥ प्रणम्य पितरं स्नेहानारदेन सहाम्बरम् । अथारूदो विमानेन द्वारिकागमन प्रति ॥८३॥ संक्यामिविचिनामिनमत्यागच्छतोस्तयोः। अतिक्रान्तमपुरयोः सैन्यं दृष्टिपयेऽभवत् ॥४४॥ कस्येदमटवीमध्ये पूज्य सैन्यमघो महत् । पश्चिमाशामुखं याति क किमर्थमतिद्रुतम् ॥८५॥ संपृष्टः कामदेवेन नारदोऽप्यगदीदिति । शृणु काम कथालेशं कथयामि तयाधुना ॥८६॥ अस्ति दुर्योधनो राजा कुरवंशविभूषणः । दुर्योधनो द्विषां युद्धे स हास्तिनपुरे वरे ॥४७॥ धारक वना खवर देनेके लिए कालसंवरके पास भेज दिया ।।७४॥ तदनन्तर पुत्रोंका समाचार सुन द्विगुणित क्रोधसे देदीप्यमान होता हुआ कालसंघर युद्धकी तैयारी कर सब सेनाके साथ वहाँ पहुँचा ।।७।। उधर प्रद्युम्नने भी विद्याके प्रभावसे एक सेना वना ली सो उसके साथ चिर काल तक युद्ध कर कालसंबर हार गया और जीवन की आशा छोड़ जाकर कनकमालासे बोला कि 'तू मुझे शीघ्र ही प्रज्ञप्तिनामक विद्या दे।' कनकमालाने कहा कि 'मैं तो वाल्य अवस्था में दूधके साथ वह विद्या प्रद्युम्न के लिए दे चुकी हूँ' ।। ७६-७७ ॥ तदनन्तर स्त्रीको मायापूर्ण दुश्चेष्टाको जान कर मानी कालसंवर पुनः युद्धके मैदानमें आकर युद्ध करने लगा और प्रद्युम्नने उसे वॉध कर एक शिलातलपर रस दिया 11७८उसी समय अत्यन्त निपुण नारदजी वहाँ आ पहुँचे । प्रद्युम्नने उनका सन्मान किया। तदनन्तर नारदने सव सम्बन्ध कहा ।।७२।। तदनन्तर राजा कालसंवरका बन्धनसे मुक्त कर प्रद्युम्नने क्षमा मांगते हुए उनसे कहा कि माता कनकमालाने जो भी किया है वह पूर्व कर्मके वशीभूत होकर ही किया है अतः उसे क्षमा कीजिए ।।८।। उपायके ज्ञाता प्रद्युम्नने जिनका कुछ भी उपाय नहीं चल रहा था ऐसे पॉच सी कुमारोंको भी छोड़ दिया और भ्रातृस्नेहके प्रकट करनेमें तत्पर हो उनसे बार-बार क्षमा माँगी ।।८।। तदनन्तर रुक्मिणी और कृष्णके दर्शनके लिए जिसका मन अत्यन्त उत्सुक हो रहा था ऐसे प्रद्युम्नने जानेके लिए राजा कालसंवरसे आज्ञा मॉगी और उसने भी सन्तुष्ट होकर उसे विदा कर दिया ॥८२॥ तत्पश्चात् स्नेहपूर्वक पिताको प्रणाम कर प्रद्युम्न, द्वारिका जाने- के लिए नारदके साथ-साथ विमानद्वारा आकाशमें आरुद्ध हुआ ।।८।। नाना प्रकारकी कथा- ओंके द्वारा आकाशमें आते हुए दोनों जय हस्तिनापुरको पार कर कुछ आगे निकल आये तव एक सेना उनके दृष्टिपथमें आयी-एक सेना उन्हें दिखायी दी ।।८४|| सेनाको देख प्रद्युम्न ने नारदसे पूछा कि 'हे पूज्य ! यह अटवीके वीच नीचे किसकी बड़ी भारी सेना विद्यमान है ? इम सेनाका मुख पश्चिम दिशाकी ओर है। यह बड़ी तेजीसे कहाँ और किसलिए जा रही है । इस प्रकार प्रद्युम्नके पूछने पर नारदने कहा कि हे प्रद्युम्न ! सुनो, मैं इस समय तुझसे एक कथाका कुछ अंश कहता हूँ |८५-८६।। कुरुवंशका अलंकारभूत एक दुर्योधन नामका राजा है जो युद्ध में शत्रुओंके लिए सचमुच १ निरपायानु म०,ध.1 ५६४ हरिवंशपुराणे अग्रजाय मया देया रुक्मिणीसत्यमामयोः । दुहितैति प्रतिज्ञातं पूर्व प्रीतेन तेन च ॥८॥ अग्रजस्त्वं ततो जातो विष्णवे विनिवेदितः । मानुश्च सत्यमामायास्तदनन्तरमान्तरः ॥८९॥ अकस्माद्गच्छता क्वापि 'हृतस्त्वं धूमकेतुना । विषण्णा रुक्मिणी जाता सत्यभामा तु तोपिणी ॥९॥ अविज्ञातमवद्वाों दुर्योधनयशोधनः । कन्यकामुदधिं नान्ना भानवे प्राहिणोदसौ ॥९॥ भाविनीन ततः सेयं महासाधनरक्षिता । द्वारिका प्रस्थिता कन्या भानवे किल भाविनी ॥१२॥ श्रुत्या नारदमाकाशे स्थापयित्वा क्षणं ततः । सोऽवतीर्य पुरस्तस्थौ शाबरं वेषमाश्रितः ॥१३॥ केशवेन बितीण में शुल्कं दत्वा तु गम्यताम् । इत्युक्त कैश्चिदित्युक्तं प्रार्थ्यतां प्रार्थितं तय ॥१४॥ यदन निखिले सैन्ये सारभूतमितीरिते । ईरितं सारभूतात्र कन्यकेति समन्युमिः ॥१५॥ यद्येवं दीयतां मह्यं सैवेत्युक्ते जगुः परे । विष्णुना जनितो न त्वं स प्राह जनितस्विति ॥९६॥ श्रसंघद्धप्रलापस्य धृष्टतां पश्यतेति ते । धनुःकोटिमिरुत्सार्य प्रवृत्ता गन्तुमुद्यताः ॥९॥ ततः सावरसेनामिविद्यया विकृतात्मभिः । दुर्योधनयलं जित्वा कन्यामादाय खं श्रितः ॥९॥ दिव्यरूपं तमालोक्य कन्या त्यक्तमया ततः । हृष्टा नारदवाक्येन बुद्धतत्वा समाश्वसीत् ॥१९॥ ही दुर्योधन है (जिसके साथ युद्ध करना कठिन है ) और वह हस्तिनापुर नामके उत्तम नगर में रहता है ।।८७|| एक बार पहले प्रसन्न होकर उसने कृष्णसे प्रतिज्ञा की थी कि यदि मेरे कन्या हुई और आपकी रुक्मिणी तथा सत्यभामा रानियोंके पुत्र हुए तो जो पुत्र पहले होगा उसके लिए मैं अपनी कन्या दूंगा ।।८।। तदनन्तर रुक्मिणीके तुम और सत्यभामाके भानु साथ ही साथ उत्पन्न हुए परन्तु रुक्मिणीके सेवकोंने कृष्ण महाराज के लिए पहले तुम्हारी खबर दी इस- लिए तुम 'अग्रज' घोपित किये गये और सत्यभामाके स्वजनोंने पीछे खबर दी इसलिए उसका पुत्र भानु 'अनुज' घोपित किया गया ।।८।। तदनन्तर अकस्मात् कहीं जाता हुआ धूमकेतु नामका असुर तुम्हें हर गया इसलिए तुम्हारी माता रुक्मिणी बहुत दुखी हुई और सत्य- भामा संतुष्ट हुई ॥१०॥ जय आपका कुछ समाचार नहीं मिला तव यशरूपी धनको धारण करनेवाले दुर्योधनने अपनी उदधिकुमारी नामकी कन्या सत्यभामाके पुत्र भानुके लिए भेज दी।।९।। हे स्वामिन् ! नाना भावोंको धारण करनेवाली यह यही कन्या बड़ी-भारी सेनासे मुरक्षित हो द्वारिकाको जा रही है तथा सत्यभामाके पुत्र भानुको स्त्री होनेवाली है ।।९२॥ यह मुन प्रद्युम्नने नारदको तो वहीं आकाशमें खड़ा रखा और आप उसी क्षण नीचे उतर कर भीलका वप रस सेनाके सामने खड़ा हो गया ।।१३॥ यह कहने लगा कि 'कृष्ण महाराजने मेरे लिए जो शुल्क देना निश्चित किया है यह देकर जाइए' । भोलके इस प्रकार कहने पर कुछ लोगोंने कहा कि 'मॉग क्या चाहता है। १९४|| भीलने उत्तर दिया कि 'इम ममम्त गेनामें जो यस्तु सारभूत हो वही चाहता हूँ। उसके इस प्रकार कहने पर लोगोंने शोध दिखाते हुए कहा कि 'सेनामें सारभूत तो कन्या है' । भीलने फिर कहा कि 'यदि ऐमा है तो यही यन्या मुझे दी जाये । यह सुन लोगोंने कहा कि 'तू विष्णु-कृष्णसे उत्पन्न नहीं हुआ है-पन्या उमे दी जायगी जो विष्णुसे उत्पन्न होगा। भीलने जोर देकर कहा कि 'मैं विष्णु- से उत्पन्न हुआ है'। 'दम अमम्बद्ध पकनेवालेको धृष्टता तो देखो' यह कह उसे धनुपनी फोटोमे अलग हटाकर लोग ज्याही आगे जानेके लिए उद्यत हुए त्यांही यह विद्या द्वारा निर्मिन भीलांकी मेनामे दुर्योधनकी सेनाको जीत कर तथा कन्या लेकर आकाशमें जा पहुँचा IN५-२.८ विमानम पहुँचफर प्राम्नने अपना असली रूप रप लिया अतः मुन्दर रूपो धारण फर नेयाले उमफो देय फर पन्या निर्भय हो गयी और नारदके कहनेसे यथार्थ यालको जान एपित हो गुम्बकी सामने लगी | १. सम्स्य म• । २. भाविनीय म., स. भाविनी+रन हविच्छेदः । ।

सप्तचत्वारिंशः सर्गः विमानं 'कामगं कामः समारुह्य समं तया । नारदेन च संप्राप्तो द्वारिका द्वारहारिणीम् ॥१०॥ अपश्यत्स विदूरण सागरण गरीयसा । प्राकारेण च तां गुप्तां गोपुराट्टालसंकुलाम् ॥१०॥ वाहबाह्यारिकां मानुरश्वव्यायामहेतुना । निर्गतोऽदर्शि कामेन गगनस्थविमानिना ॥१०२॥ तुरगस्त्वरया 'दिव्यः स्थविराकारधारिणा । नीतो मानुकुमारार्थमारूढस्तं स हारिणम् ॥१०३॥ वाझमानेन तेनासी कुमारः कामरूपिणा । खलीकृत्य चिरं नीतः स्थविरान्तं निजेच्छया ॥१०४॥ अवतीर्णस्ततो भानुरहो कौशलमित्यलम् । हसितः साट्टहासेन करास्फालनकारिणा ॥१०५॥ जरनारोप्यमाणस्तु मानुलोकेन तं चिरम् । खलीकृत्य व्यलोकन व्यालाश्वस्थः स्वयं ययौ ॥१०६॥ मायामटमायाश्वैर्मामोपवनमङ्गकृत् । अशोपयन्महावापी मायया मदनस्तदा ॥१०७॥ मक्षिकादंशमशकः सकरस्पन्दनं नृपम् । निवर्त्य द्वारि चिक्रोड खरमैपरथी चिरम् ।।१०८॥ व्यामोह्य पौरलोकं च विविधकोडया चिरम् । वसुदेवेन संक्रोट्य मैपयुद्धेन संमदी ॥१०९॥ मोजनेऽप्रासने विप्रः सत्यायाः सोऽग्रजन्मनः । खलीकृन्यासनलंग्नैइछर्दिकाहारकोऽगमन् ॥११०॥ अथानन्तर कन्या उदधिकुमारी और नारद मुनिके साथ, इच्छानुकूल गमन करनेवाले विमानपर आरूढ़ होकर प्रद्युम्न, द्वारोंसे सुन्दर द्वारिका नगरी जा पहुंचा ॥१००। दूरसे ही उसने विशाल सागर और कोटसे सुरक्षित एवं गोपुर और अट्टालिकाओंसे व्याप्त द्वारिकाको देखा ।।१०१।। उसी समय सत्यभामाका पुत्र भानुकुमार, घोड़ेको व्यायाम करानेके लिए नगरी के याह्य मैदानमें आया था उसे प्रद्युम्न ने देखा। देखते ही वह विमानको आकाशमें खड़ा रस पृथिवीपर आया और वृद्धका रूप रख सुन्दर घोड़ा लेकर भानुकुमारके पास पहुंचा। योला कि मैं यह घोड़ा भानुकुमारके लिए लाया हूँ। देखते ही भानुकुमार उम सुन्दर घोड़ा पर सवार हो गया ।।१०२-२०३।। इच्छानुकूल रूपको धारण करनेवाले उस घोड़ेने भानुकुमार को बहुत देर तक तंग किया और बाद में वह भानुकुमारको साथ ले अपनी इच्छानुसार उस वृद्धके पास ले आया। भानुकुमार घोड़ासे नीचे उतर आया और वृद्धने अट्टहास कर तथा हाथसे घोड़ाका आरफालन कर व्यद्गथपूर्ण भाषामें हँसी उड़ाते हुए भानुकुमारसे कहा कि अहो ! घोड़ाके चलानेमें आपको बड़ी चतुराई है ? ॥१०४-२०५।। साथ ही वृद्धने यह भी कहा कि मैं बहुत यूढा हो गया हूँ स्वयं मुझसे घोड़ापर बैठते नहीं बनता। यदि कोई मुझे बैठा दे तो मैं अपना कौशल दिखाऊँ। साथ ही भानुकुमारके लोग उसे घोड़ापर चढ़ानेके लिए उद्यम करने लगे परन्तु प्रद्युम्नने अपना शरीर इतना भारी कर लिया कि उन अनेक लोगोंको उसका, 'उठाना दुर्भर हो गया । इस प्रकार अपनी मायासे उन मव लोगोंको तंग कर वह वृद्ध रूपधारी प्रद्युम्न उस घोड़ेपर स्वयं चढ़ गया और अपना कौशल दिखाता हुआ चला गया ॥२०६।। तदनन्तर उमने मायामयी वानरों और मायामयो घोड़ोंसे सत्यभामाका उपवन उजाड़ डाला तथा मायासे उमको पड़ी भारी वापिका मुसा दी।। १०७ ॥ नगरके द्वारपर राजा श्रीकृष्ण आ रहे थे उन्हें देस उमने मायामयी मक्सियों और डांस-मच्छरोंको इतनी अधिक सरल्यामं छोड़ा कि उनका आगे बढ़ना कठिन हो गया और हाथ हिलाते हुए उनसे लौटते ही वना। तदनन्तर यह गधे और मेढ़ेके रथपर सवार हो नगरमें चिरकाल तक क्रीडा करता रहा ।।१०।। इस प्रकार नाना तरहकी क्रीड़ाओंसे नगरवामियोंको मोहित कर उसने यही प्रसन्नतासे अपने चाया यमुदेवके माथ मेपयुद्धमे क्रीड़ा की ।।१०९।। तदनन्तर मत्यभामाके महल में पहुंचा । यहाँ ब्राह्मणांका भोज होनेवाला था सो प्रद्युम्न एक प्रामणका रूप रस सबसे आगे आसन पर जा बैठा। एक अपरिचित ब्राह्मणको आगे बैठा देप सब प्राह्मण कुपित हो गये तब लगे हुए आमनोंसे उसने उन माझगोंको सूब तंग १ यपेन्दगामि । २. प्रद्युम्न. । ३. दिगम्यनिराकार-म०, ग० ।

हरिवंशपुराणे विकृत्य क्षोल्लकं वेपं मातृमोदकमक्षिणा। भामादेशकरस्तेन नापितश्च तिरस्कृतः ॥११॥ संकर्षणस्य हत्त्वेच्छां पादाकर्षणकारिणः । थारराम चिरं स्वेच्छं लोकविस्मयकृत्कृती ॥११२॥ प्रद्युम्नागमचिहानि पूर्वोक्तानि तदा परम् । प्रस्तुतस्तनकुम्माया मातुरध्यक्षतां ययुः ।।११३॥ साऽतोऽचिन्तयदत्यन्तविस्मिता मे सुतो न्वयम् । कृतरूपपरावृत्तिरागतः पोडशाब्दके ॥११॥ तां प्रद्युम्नकुमारोऽपि तरक्षणं प्रकृतिस्थितः । सुतस्नेहमितीरित्वा मातरं प्रणनाम सः ॥१५॥ सानन्दा साकुलाक्षी तं रुक्मिणी तनयं नतम् । परिष्वज्य जहौ दुःसमश्रुभिः सहसा चितम् ॥११॥ दर्शनामृतसिताया पुलकव्यपदेशतः । प्रत्यारोमकूपेभ्यः सुतस्नेह इवोद्ययौ ॥११७॥1 तयोः कुशलसंप्रइने संवृत्ते मातृपुत्रयोः। माता पुत्रमवोचत्तं चित्तनिवृत्तिदायिनम् ॥११८॥ धन्या कनकमालासौ पुत्र ! पुत्रफलं यया । बालक्रीडावलोकाख्यमनुभूतं शिशोस्तव ॥११९॥ इत्युक्त प्रणिपत्यासौ जगाद नयनोत्सवः । वालमावमहं मातदर्शयामीह दृश्यताम् ॥१२०॥ ततः स तत्क्षणं जातस्तदहातदारकः । आस्वादितकरामुष्टः प्रोत्फुलनयनोत्पल. ॥१२१॥ किया। तत्पश्चात् उस विप्रभोजमें जितना भोजन बना था वह सव प्रद्युम्नने खा लिया। जब कुछ भी न बचा तो सत्यभामाको कृपण बता खाये हुए भोजनको वमन-द्वारा वहीं उगल वह वहाँ से बाहर चला गया ।।११०॥ अब वह क्षुल्लकका वेष रख माता रुक्मिणीके महलमें गया वहाँ उसने माता रुक्मिणीके द्वारा दिये हुए लड्डू खाये। उसी समय सत्यभामाका आज्ञाकारी नाई रुक्मिणीके शिरके बाल लेने के लिए उसके घर आया सो प्रद्युम्नने सब समा चार जान उसका खूब तिरस्कार किया ॥११॥ सत्यभामाकी शिकायत सुन बलदेव रुक्मिणी के महलपर आनेको उद्यत हुए तो प्रद्युम्न एक ब्राह्मणका रूप रख द्वारपर पैर फैलाकर पड़ रहा। वलदेवने उसे दूर हटने के लिए कहा पर वह टससे मस नहीं हुआ और कहने लगा कि आज सत्यभामा घर बहुत भोजन कर आया हूँ हमसे उठते नहीं बनता। कुपित हो बलदेवने उसकी टॉग पकड़कर खींचना चाहा पर उसने विद्यावलसे टॉगको इतना मजबूत कर लिया कि वे खींचते-खीचते तंग आ गये । इस प्रकार नाना विद्याओं में कुशल प्रद्युम्न अपनी इच्छानुसार लोगोंको आश्चर्य उत्पन्न करता हुआ चिर काल तक क्रीड़ा करता रहा ।।११२।। उसी समय, प्रद्युम्नके आनेके जो चिह्न पहले नारदने कहे थे वे माता रुक्मिणीको प्रत्यक्ष दिखने लगे और उसके स्तनरूपी कलशोंसे अत्यधिक दूध झरने लगा ।।११।। अत्यन्त आश्चर्यमें पड़कर वह विचार करने लगी कि कहीं सोलह वर्प व्यतीत होनेके बाद यह मेरा पुत्र ही तो रूप बदल कर नहीं आ गया है ? ॥११४॥ उसी क्षण प्रद्युम्नने भी अपने असली रूपमें प्रकट हो पुत्रका स्नेह प्रकट कर माताको प्रणाम किया ।।११५।। पुत्रको देखते ही रुक्मिणी आनन्दसे भर गयी, उसके नेत्र हर्षके आंसुओंसे व्याप्त हो गये और यह नम्रीभूत पुत्रका आलिशन कर चिरसंचिन दुःयको ऑमुक द्वारा तत्काल छोड़ने लगी ॥१९७। पुत्रके दर्शन रूपी अमनये मींची हुई रक्मिणांक शरीर में प्रत्येक रोमकूपस रोमाञ्च निकल आये थे उनसे. ऐमा जान पड़ता था मानो पुत्रका स्नेह की फूट-फूट कर प्रकट हो रहा होणारा तदनन्तर जय माना और पुत्र परस्पर कुदाल समाचार पूछ चुक तब माताने चित्तरे लिए अत्यधिक संतोष प्रदान करनेवाले पुत्रसे कहा कि हे पुत्र ! यह कनकमाला धन्य है जिसने तेरी घाल्य अवस्थाको पाल-क्रीड़ाओके देसने रूप पुत्र जन्मफे पलका उपभोग किया ।।२१८-११९ ॥ माताफे इनना यहते ही नेत्रोंको आनन्द पन परतेपाले प्रद्युम्नने नमस्कार कर कहा कि हे मानः! मैं यहाँ अपनी पाल चेष्टा दिग्गलाता है, देम्प, ॥२०॥ तदनन्नर पद उमी क्षण एक दिनका चालक बन गया और नेत्र रूपी नील कमलको १ नामादेश-० १२.परेम,ग. ३. मुतो नु+ भयम् इतिवेदः । ४. सानन्दसायलाची म० ।

सप्तचरवारिंशः सर्गः तत: स्तनन्धयो जानो गृहीतस्तनचूचुः । तथोत्तानशयो मानुः करपलवसौरयदः ॥१२२।। मंसपंग्मुरमा जातस्तथोत्तिष्टम्पनन्पुनः । मातुः कराद्गुलौ हप्नो मणिकुटिमसर्पणः ॥२३॥ पांशुमीडां विधायाम्याकण्ठलनो व्यधारमुखम् । कलालापस्मिताहादिवदनो पदनेक्षणः॥१२॥ मनोहरसिशुक्रीडापूरिसाम्यामनोरथः । स्वभावस्थितदेहस्थो नत्वा विज्ञाप्य तां सुतः ॥१२५।। क्षिप्रमुग्क्षिप्य याहुम्यां पियति प्रकटस्थितः । जगाद श्रूयतां सर्वरिह यादवपार्थिवे. ॥१२६।। युष्माकं पश्यतामय लक्ष्मीरिय हरेः प्रिया । हियते रक्मिणी देवी यादवाः परिरक्ष्यताम् ॥१२॥ इत्युक्ग्या शङ्खमापूर्य नारदोदधिकन्ययोः । रिमाने स्थापयित्वा तां युद्धार्थ वियति स्थितः ।।१२८॥ विनियंयुस्नतः पुर्या योद्धं सराय यादवाः । चतुरङ्गयलोपताः पचायुधविचक्षणाः ॥१२९॥ विद्यायलेन निशेष कामी यादवसाधनम् । मोहयिरयाम्वरस्थेन युयुधे हरिणा चिरम् ।।१३०॥ अनकौशलवैफल्ये कृते कृष्णस्य सूनुना । पौष्टी महादोभ्यां योद्धं पीरो समुच्छिनी ।।१३१॥ निमुननारदनोमी वियरयागरय वेगिना । वारितो तो पिनापुप्रसंयन्धविनिवेदिना ।।१३२॥ नतः प्रणनमाश्लिष्य प्रधुम्नं'प्रमदी हरिः । प्रानन्दायुपरीताशः समयोजयदाशिपा ।।१३३॥ मायया शायिनं सन्यं समुत्थाप्य सविद्यया । तुष्टो यान्धरलोकन मदनः प्राविसापुरीम् ॥१३॥ रश्मिीजास्पररया ते जातपुरसमागमे । सदाचीकरतातोपादुग्सवं वरमवरमले ।।१३५॥ फुला-फुलाकर हाथका अंगूठा चूसने लगा ॥ १२१ ।। कुछ देर बाद वह माताके स्तनका चूचक मुंहमें दायकर दूध पीने लगा तथा चित्त लेटकर माताके कर पल्लवोंको मुस उपजाने लगा ॥ १२२ ॥ फिर छातीके वल मरफने लगा। पुनः उठनेका प्रयत्न करता परन्तु फिर नीचे गिर पड़ता । तदनन्तर माताको हाथको अँगुली पकड़ मणिमय फापर चलने लगा ॥१२३।। तदन- न्तर धूलिमें सेलता-रोलता आकर माताके कण्ठसे लिपटकर उसे मुख उपजाने लगा और 7 फभी माताफे मुग्यकी ओर नेत्र लगा मुमकराता हुआ तोतली योली बोलने लगा ।। १२४ । इस प्रकार मनोहर याल-क्रीड़ाओंसे माताका मनोरथ पूर्ण कर यह अपने अमली रूपमें आ गया और नमस्कार कर बोला कि मैं तुझे आकाशमें लिये चलना हूँ ।। १२५ ।। तदनन्तर यह दोनों भुजाओंमे शीघ्र ही मस्मिणीको ऊपर उठा आकाममें सड़ा हो फदने लगा कि 'ममम्न यादव राजा मुनें। मैं तुम लोगोंके देखते-देखते लक्ष्मीकी भाँति सुन्दर श्री कृष्णा प्रिया रुक्मिणीको हर फर ले जा रहा हूँ। हे यादवो! शक्ति हो तो उसकी रक्षा फरों' ।। १२६-१२७ ।। इस प्रकार कहकर तथा शन फॅककर उमने क्मिणीको तो विमानमें नारद और उदधिमारी के पास बैठा दिया और म्ययं युद्धके लिए आकाशमें आ पड़ा हुआ ॥१२८॥ नदनन्नर चतुरन मेनाओंसे मदित और पाँचों प्रकारके शस्त्र चलानेमें निपुण यादय राजा, युद्धके लिए तैयार हो नगरोगे बाहर निकले ।। १२९ ।। प्रधुम्न विद्यावलसे यादवोंको सय सेनाको मोहित फर. आकाशमें स्थित कृष्णक माय चिरफाल नफ युद्ध करता रहा ।। १३०॥ अन्त में प्रद्युम्नन जय फुल्लर अरवकोशलको निप्पल कर दिया तय प्रौद दृष्टि धारण करने- पाले दोनों योर अग्नी यड़ी-बड़ी मुजाओंमे युद्ध करने के लिए उद्यत हुए ।। १३१ ॥ टमी ममय गरिमगार वागपिन नागदने आमाश शीघ्र ही आरुर पिता-पुत्रका मम्यन्य यवला दोनों पौरांको युद्ध करनेमे गेका ।। १३२॥ नदनन्नर नीभून पुरमा आनिगन फर पीछग परम पंफो प्रान हुए और इपफे ऑनुभओमे नयांग ज्यान करते हुए उसे आशाद देने टगे ॥१३॥ ननस्चात् मायागे मुलायी दुई मेगा पियामे उठाएर प्रपनने मन्तुष्ट हो यन्युजनों माय-गाय नगरी में प्रा किया ॥ १४॥ जिन्हें पुपरी मानि टु पो ऐना पुत्रयन्मला गनी रश्मिनी और जाम्यपनीने दम १मम.1 ५६८ हरिवंशपुराणे मान्यो मान्यामिरन्यस्त्रीहोकरीमिरसौ ततः । मनोभूर्वरकन्यामिः कल्याणममजत्परम् ॥१३६॥ पृथिवोच्छन्दः कनस्कनकमालया कनकमालया सेशया विवाहसमयाप्तया सममिदृष्टकल्याणकः । विवाह्य विधिना वधूरुदधिपूर्विका मन्मयो जिनेन्द्रवरशासनोजितसुसोदयः सोऽन्वभूत् ।।१३७।। इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनेसनाचार्यकृती कुरुवंशप्रद्युम्नमातृपितृसमागमवर्णनो नाम सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥४७॥ समय हर्पसे बहुत उत्सव कराया ॥ १३५ ।। तदनन्तर मान्य प्रद्युम्नकुमार अन्य स्त्रियोंको लज्जा उत्पन्न करनेवाली उत्तमोत्तम मान्य कन्याओंके साथ उत्तम विवाह-मङ्गलको प्राप्त हुआ। ॥ १३६ ॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि स्वर्णको देदीप्यमान मालासे युक्त रानी कनकमालाने अपने पति कालसंवर विद्याधरके साथ विवाहके समय आकर जिसके विवाह रूप कल्याण- को देखा था एवं जिनेन्द्र भगवानके उत्कृष्ट शासनके प्रभावसे जिसे बहुत भारी मुखकी प्राप्ति हुई थी ऐसा प्रद्युम्नकुमार उद्धिकुमारी आदि कन्याओंको विधिपूर्वक विवाह कर उनका उपभोग करने लगा ।। १३७ ।। इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें कुरुवंश तथा प्रधुग्नका माता-पिताके साथ समागमका वर्णन करनेवाला सैतालीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥४॥ १. भीकरीमि-4. ग. । २. ईग्रेन परया सह वर्तमाना सेना तया । सेयया मः।

अष्टचत्वारिंशः सर्गः अथ सम्बस्य संभूति सुमानोश्च यथाक्रमम् । कथयामि यथावृत्तं शृणु श्रेणिक हारिणीम् ॥१॥ देवः कैटभपूर्वोऽपी पूर्वमुक्तोऽच्युनोदयः । हरये हारिणं हारं ददौ मामामुतार्थिने ॥२॥ प्रदीपसमये हारं तं प्रद्युम्नप्रयोगतः । सन्यारूपधरा भुक्रवा लेभे जाम्बवनी हरेः ॥३॥ कटमश्च तदा च्युन्या पुण्यादप्रच्युतोदयः । श्रितो जाम्बरतीगर्भ सागता च निजं गृहम् ॥४॥ हरि सत्यापि संप्राप्ता संप्राप्तमदनोदया। रमिता च दधे गमें सा स्वरांच्युतमर्मकम् ॥५॥ वर्धते स्म ततो हर्क गर्मयोधमानयोः । पितृमातृमवन्धूनां सिन्धूनामिव चन्द्रयोः ॥६॥ पूर्णपु नवमासपु शम् जाम्बवती सुतम् । सुपुवे मत्यमामापि सुमार्नु भानुमास्रम् ॥७॥ हृष्टा प्रद्युम्नशम्याभ्यां रक्मिणी जाम्यवत्यपि । मामा मानुसुभानुभ्यां श्रिताम्यामुदयश्रियम् ॥८॥ हरेरन्यास्वपि स्त्रीपु जाताः पुत्रा यथायथम् । यदूनां हृदयानन्दाः सत्यमरचयशोऽधिकाः ॥९॥ शम्बः क्रीडासु सर्वासु कुमारशतसेवितः । जिन्या सुभानुमाक्रम्य विक्रमी रमतेतराम् ॥१०॥ रक्मिणी राक्मिणेयाय वैदर्भी रक्मिणः सुताम् । यया न ददा कन्यां सोऽपि पूर्वविरोधनः ॥११॥ गत्वा मातङ्गवेषेण शम्वप्रद्युम्नसंवरी । बलादाहरतां कन्यां रुक्मिणं परिभूय ती ॥१२॥ अथानन्तर गौतम गणधरने कहा कि हे श्रेणिक ! अव मैं आगमानुसार क्रमसे शम्ब तथा सुभानु कुमारकी मनोहर उत्पत्तिका वर्णन करता हूँ तुम मुनो ॥१|| राजा मधुका भाई कैटभ जिसका पहले वर्णन आ चुका है, अच्युत स्वर्गमें देव हुआ था। जब उसकी वहॉकी आयु समाप्त होनेको आयो तब यह सत्यभामाके लिए पुत्रकी इच्छा • रखनेवाले श्रीकृष्णके लिए एक सुन्दर हार दे गया ॥२॥ सायंकाल के समय प्रद्युम्नके प्रयोगसे सत्यभामाका रूप धारण कर रानी जाम्बवतीने कृष्णके साथ उपभोग कर वह हार प्राप्त कर लिया ॥३॥ पुण्यके उदयसे उसी समय अखण्ड अभ्युदयको धारण करनेवाला कैटभका जीव स्वर्गसे च्युत हो जाम्बवतीके गर्भ में आ गया । गर्भ धारण कर रानी जाम्बवती अपने घर आ गयी ॥४॥ तदनन्तर मत्यभामा भी श्रीकृष्णके पास पहुंची और कामके उदयको प्राप्त हो श्रीकृष्णके माथ रमण कर उसने भी स्वर्गसे च्युत किसी शिशुको गर्भ धारण किया ।।५।। तदनन्तर दोनों रानियोंका गर्भ बढ़ने लगा और जिस प्रकार चन्द्रमाओंके बढनेपर समुद्रोंका हर्ष बढने लगता है उसी प्रकार उन दोनों रानियोंके गर्भके बढ़नेपर माता-पिता तथा कुटुम्बी जनोंका हर्प बढने लगा ॥६॥ तदनन्तर नौ माह पूर्ण होनेपर रानी जाम्बवतीने शम्य नामक पुत्रको और रानी सत्यभामाने सूर्य के समान देदीप्यमान सुभानु नामक पुत्रको उत्पन्न किया ॥७इधर अभ्युदय को प्राप्त प्रद्युम्न और शम्बसे रुक्मिणी तथा जाम्बवती हर्पको प्राप्त हुई उधर भानु और सुभानुसे सत्यभामा भी अत्यधिक हर्पित हुई |८| कृष्णकी अन्य स्त्रियों में भी यथायोग्य अनेक पुत्र उत्पन्न हुए जो यादवोंके हृदयको आनन्द देनेवाले तथा मत्य, पराक्रम और यशसे अत्यधिक सुशोभित थे ॥५॥ सैकड़ों कुमारोंसे सेवित पराक्रमी शम्ब, समस्त क्रीड़ाओं में मुभानु कुमारको दवा देता था और उसे जीतकर सातिशय क्रीड़ा करता-था ॥१०॥ रुक्मिणीके भाई रुक्मीकी एक वैदर्भी नामकी कन्या थी । रुक्मिणीने उसे प्रद्युम्नके लिए मॉगा परन्तु रुक्मीने पूर्व विरोधके कारण उसके लिए यह कन्या न दी ||२१|| यह सुन शम्य और प्रद्युम्न दोनों भीलके वेपमें गये और रुक्मीको पराजित कर बलपूर्वक उम कन्याको हर १ स्वगन्धूना म०।

हरिवंशपुराणे परिणीय ततः कामः कन्यामन्यामिव श्रियम् । अरीरमदरं मोगरिकार्यो मनोरमैः ॥३॥ दक्षो जित्वा सुमार्नु तं धूत प्रेक्षणक्षणे । शम्बो ददानि सर्वस्य लोकस्य सकलं धनम् ॥१५॥ क्रीडया स पुनर्जिग्ये पक्षिणोबहुजल्पिनोः । गन्धयुक्तिप्रयोगेण पुनः सदसि शाङ्गिण. ॥१५॥ अग्निशोध्येन दिव्येन सवस्मयुगलेन तम् । दिव्यालङ्कारयोगन जिगाय सदसि प्रमोः ॥१६॥ बलदर्शनतो जिरवा तमसौ हृष्टविष्णुतः । मासं लब्ध्वा पुना राज्यं चक्रे दुर्ललिताः क्रियाः ॥१७॥ ताहितः पुनरुद्वृत्तः पिया प्रणयकोपिना । 'युग्येन कन्यकारूपः मस्योत्सङ्गमतोऽविशत् ।। १८॥ सरया सुतार्थमानीता विवाघ वरकन्यकाम् । प्राविश्वकार रूप स्वं शम्बो लोकस्य पश्यतः ॥१९॥ एकस्यामंव रात्री तु कन्यकानां शतेन सः । कल्याणस्नानक सात्वा मातृसौख्यकरोऽभवत् ॥२०॥ सत्यमामादिदेवीना कुमाराः शतशस्तदा । विवाह्य बहुशः कन्याश्चिक्रीदुः शक्रकीर्तयः ॥२१॥ क्रीडापूवं गतो गेहमन्यदा मान्यमाग्मनः । पितामहमिति प्राह शम्बः प्रणतिपूर्वकम् ॥२२॥ युष्माभिः सर्वकालेन क्लेशेन खचराङ्गनाः । पर्यटदिः क्षिती लब्धाः पूज्य पूज्या मनोरमाः ॥२३॥ अक्लेशेनैकराण मया तु गृहवर्तिना । परिणीताः शतं कन्याः पश्यतान्तरमावसोः ॥२४॥ वसुदेवस्ततः प्राह वत्स स्वमिपुवरपुनः । "क्षिप्तोऽपि गृहमध्येऽपि दूरमन्वरमावयोः ॥२५॥ लाये ॥१२॥ तदनन्तर दूसरी लक्ष्मीके समान सुन्दर उस कन्याको विवाह कर प्रद्युम्न द्वारिका नगरीमें उसे मनोहर भोगोंसे शीघ्र हो क्रीड़ा कराने लगा ॥१३॥ शम्ब जुआ खेलनेमें बहुत चतुर था । एक दिन उसने सबके देखते-देखते जुआमें सुभानुका सब धन जीत लिया और सब लोगोंको बॉट दिया ॥१४॥ नाना प्रकारकी बोली बोलनेवाले पक्षियोंकी क्रीड़ासे शम्बने सुभानु कुमारको जीत लिया। एक बार श्रीकृष्णकी सभामें दोनों कुमारोंके बीच सुर्गान्धकी परखमे शास्त्रार्थ हो पड़ा जिसमें शम्बने सुभानुको पुनः हरा दिया ॥१५॥ एक बार उसने अग्नि में शुद्ध किये हुए दो दिव्य वस्त्रों तथा दिव्य अलंकारोंको प्राप्तकर राजा कृष्णकी सभा सुभानुको जीत लिया ॥१६॥ एक बार अपना बल दिखाकर उसने सुभानु कुमारको ऐसा जीता कि कृष्ण महाराज उसपर एकदम प्रसन्न हो गये । कृष्णने उससे वर माँगनेका आग्रह किया जिससे एक माहका राज्य प्राप्तकर उसने बहुत विपरीत क्रियाएँ की ॥१७॥ प्रणय कोप को धारण करनेवाले कृष्णने उस दुराचारी शम्वको बहुत ताड़ना दी। एक दिन शम्बकुमार कन्याका रूप धारण कर रथमें सवार हो सत्यभामाकी गोदमें जा प्रविष्ट हुआ ॥१८|| सत्य- भामाने समझा कि यह कन्या मेरे पुत्र सुभानुके लिए ही लायी गयी है इसलिए उसने सुभानु के साथ विवाह करा दिया परन्तु विवाह के बाद ही शम्बकुमारने लोगोंके देखते-देखते अपना असली रूप प्रकट कर दिया ।।१९। उसने एक ही रात्रिमें सौ कन्याओंके साथ विवाह सम्बन्धी माङ्गलिक स्नान कर अपनी माता जाम्बवतीको बहुत सुखी किया ॥२०॥ इन्द्रके समान कीर्तिको धारण करनेवाले सत्यभामा आदि रानियोंके सैकड़ों कुमार भी उस समय अनेक कन्याओंको विवाह कर इच्छानुसार क्रीड़ा करने लगे।।२।। एक दिन शम्ब अपने मान्य पितामह वसुदेवके घर गया और प्रणाम कर क्रीडापूर्वक इस प्रकार कहने लगा हे पूज्य आपने पृथिवीपर बहुत समय तक क्लेश उठाते हुए भ्रमण किया तब कहीं आप विद्याधरोंको पूज्य एवं मनोहर कन्याएँ प्राप्त कर सके परन्तु मैंने घर बैठे बिना किमी क्लेशके एक ही रात्रि मै सौ कन्याओंके साथ विवाह कर लिया। आप हम दोनोके अन्तरको देखिए ।।२२-२४॥ - यह सुन वसुदेवने कहा कि पत्म! तू याणके समान दूसरेसे (प्रद्युम्नसे) प्रेरित हो चलता है और फिर तेरी चाल भी कहाँ है ? सिर्फ घरमें ही। इसलिए हम दोनोंमें बहुत अन्तर १. रथेन (ग. टि०)। २. वरकन्यकाः म। ३. कल्याणस्नातकं म.. ४. वाणवपरप्रेरितः प्रद्युम्नप्रेरितश्चलसि (ग. टि.)।

भष्टचत्वारिंशः सर्गः ५७१ मया खंटपुराम्भोधिमकरण समं निजम् । द्वारिकापमण्डूकः पण्डितम्मन्य मन्यसे ॥२६॥ अनुभूतं श्रुतं दृष्टं यन्मयातिमनोहरम् । विद्याधरपुरेप्वेतदन्येपामतिदुर्लमम् ॥२७॥ इत्युने प्रणतनोतः शम्बनानकदुन्दुमिः । शुश्रूषाम्यार्य वृत्तं ते मण्यतामिति सादरम् ॥२८॥ स प्राहानन्दर्भय वं वत्स बोधय यादवान् । कथयामि समस्तानां सहैव चरितं निजम् ॥२९॥ तथा कृते समस्तेभ्यो यादवेभ्यः सविस्तरम् । क्लादिसमतभ्यो वृत्तं तेनाकथि स्वकम् ॥३०॥ लोकालोकविमागोनि हरिवंशानुकीर्तनम् । स्वक्रीड़ा सौर्यलोकोक्तिनिर्गमं च ततो निजम् ॥३१॥ इत्यादि घरिनं दिव्यं दिव्यमानुषसंभवम् । प्रद्युम्नशम्बसंभूतिभूतिपर्यवसानकम् ॥३२॥ वमुदवस्य सर्वोऽपि सर्व विद्याधरीमयः । अन्तःपुरजनो हृष्टः श्रुतस्मरणमंगतः ॥३३॥ श्रुत्वा समाजनाश्चापि वृद्धम्बीयुवबालकाः। यदवोऽन्तःपुराण्येषां कुरवो द्वारिकाजनाः ॥३४॥ विस्मयं परमं प्राप्ताः शशंसुः संशयोज्झिताः । वमुदेवं शिवाद्याश्च देव्यः पीतकथारमाः ॥३५॥ यथायथं नृपा जग्मुरावासान्वामिताम्बराः । अन्त.पुराणि सर्वेषां रक्षितानि सुरक्षकैः ॥३६॥ कथा पुनर्नवीभूना प्रतिवेश्म दिने दिने । जाता जनस्य साश्चर्या वसुदेवमयी कथा ॥३७॥ नरवा पृष्टवते भूयः श्रेणिकाय गणी जगौ । कुमारान् कतिचित्पुर्यामिति वीरवचाक्रमात् ॥३८॥ है ॥२५॥ मैं विद्याधरोंके नगररूपी समुद्रांका मगर हूँ और तू द्वारिकारूपी कपका मेढक है फिर भी हे पण्डितंमन्य ! तू अपने आपको मेरे समान मानता है ।।२६॥ मैंने विद्याधरोंके नगरोंमे जो कुछ अनुभव किया, देखा तथा सुना है वह अत्यन्त मनोहारी है और दूसरोंके लिए अतिशय दुर्लभ है ।।२७। यसुदेवके इस प्रकार कहनेपर शम्बने नमस्कार कर आदरपूर्वक उनसे कहा कि हे आर्य ! मैं आपका वृत्तान्त मुनना चाहता हूँ कृपा कर कहिए ।।२८।। इसके उत्तरमें वसुदेवने कहा कि हे वत्स ! तू आनन्दभेरी बजवाकर समस्त यादवोंको इसकी सूचना दे। सबके लिए मैं साथ ही अपना चरित्र कहूंगा ।।२९।। तदनन्तर आनन्दभेरीके यजवानेपर जब स्त्री-पुत्रादि सहित समस्त यादव एकत्रित हो गये सब वसुदेवने उनके लिए विस्तारपूर्वक अपना सब वृत्तान्त कहा ॥३०॥ उन्होंने लोकालोकके विभागका वर्णन किया, हरिवंशकी परम्पराका निरूपण किया, अपनी क्रीड़ाओंका कथन किया, सीर्यपुरके लोगोंने राजा समुद्रविजयसे मेरी क्रीड़ाओंसे होनेवाली लोगोंकी विपरीत चेष्टाएँ कही, तदनन्तर में छलसे मौर्य पुरसे निकलकर बाहर चला गया यह निरूपण किया। इस प्रकार प्रद्युम्न और शम्बकी उत्पत्ति तथा उनकी विभूतिपर्यन्त अपना मनुष्य तथा विद्याधरोंसे सम्बन्ध रसने वाला दिव्य चरित कह सुनाया।॥३१-३२।। यमुदेवके अन्तःपुरमें जो विद्याधर त्रियाँ थीं वे सब उनका यह चरित मुन पूर्व वृत्तान्तको स्मरण करती हुई अत्यन्त हर्पित हुई ॥३३॥ मभासद लोग, वृद्ध पुरुष, स्री, युवा, बालक, ममस्त यदुवंशी, इनके अन्तःपुर, पाण्डव तथा द्वारिकाकै अन्य लोग, वमुदेयके उक्त चरितको मुनकर परम आश्चर्यको प्राम हुए और शिवा आदि देवियाँ वसुदेवके इस क्याम्पी रसका पान कर मंगयरहित हो उनकी प्रशंमा करने लगीं ॥३४-३५।। मुगन्धित वस्रांको धारण करनेवाले मय राजा यथायोग्य अपने-अपने स्थानोंपर चले गये और सबके अन्तःपुर भी पहरेदारोंसे मुरभित हो अपने-अपने स्थानापर पहुँच गये ।।३६॥ अनेक आश्चर्योसे युक्त यमुदेवकी कथा फिरसे ताजी हो गयी और पुनः प्रतिदिन घर-घर होने लगी ॥३॥ तदनन्तर नमस्कार कर पूछनेयाले राजा अणिकके लिए गौतम गणधर, भगवान महावीर म्यामीको दिव्यध्वनिकै अनुमार कुछ युमारोंका इस प्रकार वर्णन करने लगे ।।३।। १. ममाचानां म । २. यादवोत्त:-म.३ भूर: म. 1 ५७२ हरिवंशपुराणे उग्रसेनस्य तनया धरो गुणधरोऽपि च । युक्तिको दुर्धरश्चापि सागरश्चन्द्रसंशकः ॥३९॥ उग्रसेनपितृभ्यस्य शान्तनस्य सुतास्त्वमी । महासेनशिविस्वस्थविपदानन्तमित्रकाः ॥४०॥ महासेनस्य तनयः सुषेण इति नामतः । हदिको विषमिग्रस्य शिवः सत्यक इत्यसौ ॥४१॥ हृदिकास्कृतिधर्मासौ इवधर्मा च देहजः । सत्यकाद्वधर्मोऽभूदसंगस्तु तदङ्गजः ॥४२॥ समुद्र विजयोग ता महासन्यदृढाधिकाः । नेमयोऽरिष्टनेमीशः सुनेमिर्जयसेनकः ॥४३॥ महीजय. सुफल्गुश्च तेजःसेनो मयस्तथा । मेघाख्यः शिवनन्दश्च चित्रको गीतमादयः ॥४४॥ भक्षोभ्यस्योद्धयः सुनर्वचाक्षुमितवारिधिः । अम्भोधिजलधी चान्या वामदेवदृढव्रतौ ॥४५॥ तनयाः पञ्च विख्याता जाताः स्तिमितसागरात् । ऊर्मिमान् वमुमान्वीरः पातालस्थिर इत्यमी ॥४६॥ विद्युन्प्रमो नरपतिर्माल्यवान् गन्धमादनः । इत्यमी सत्यसत्त्वान्याययो हिमवतः सुताः ॥७॥ विजयस्यापि षट् पुत्रा निष्कम्पोऽकम्पनी बलिः । युगन्तः केशरी धीमानलम्बुप इति श्रुताः ॥४८॥ महेन्द्रो मलयः सह्यो गिरिः शैलो नगोऽचलः । इत्येतेऽन्वर्थनामानः सप्ताचलशरीरजाः ॥४९॥ धरणस्यान्मजाः पञ्च वासुकिः स धनञ्जयः । कर्कोटकः शतमुखो विश्वरूपश्च नामतः ॥५०॥ दुप्पूरो दुर्मुखाभिख्यो दुर्दों दुर्धरोऽपि च । सूनवः पूरणस्यामी चत्वारश्चतुरक्रियाः ॥५१॥ पुत्राः षडभिचन्द्रस्य चन्द्रनिर्मलकीर्तयः । चन्द्रः शशाङ्कचन्द्रामौ शशी सोमोऽमृतप्रमः ॥५२॥ ननया वसुदेवस्य बहुसंख्या महाबलाः । नामतः कतिचिवच्मि श्रणु श्रेणिक तानहम् ॥५३॥ पुत्री विजयसेनाया अक्रूरकरनामको । ज्वलनानिलवेगास्यो श्यामारयायाः शरीरजौ ॥५४॥ पुत्राः गन्धर्वसेनायास्त्रयो लोका इव त्रयः । वायुवेगोऽमितगतिर्महेन्द्रगिरिरित्यसौ ॥५५॥ धर, गुणधर, युक्तिक, दुर्धर, सागर और चन्द्र ये राजा उग्रसेनके पुत्र थे ॥३९॥ महासेन, शिवि, स्वस्थ, विपद और अनन्तमित्र ये उग्रसेनके चाचा राजा शान्तनके पुत्र थे ॥ ४० ॥ इनमें महासेनके सुपेण, विपमित्रके हृदिक, शिविके सत्यक, हृदिकके' कृतिधर्मा और दृढधर्मा,सत्यकके वज्रधर्मा और वञधर्माके असंग नामका पुत्र हुआ ॥४१-४२।। राजा समुद्रविजयके महानेमि, सत्यनेमि, दृढनेमि, भगवान् अरिष्टनेमि, मुनेमि, जयसेन, महीजय, मुफल्गु, तेजःसेन, मय, मेघ, शिवनन्द, चित्रक और गोतम आदि अनेक पुत्र हुए ।।४३-४४॥ अक्षोभ्यके, अपने वचनोंसे समुद्रको भुभित करनेवाला उद्धव, अम्भोधि, जलधि, वामदेव और दृढव्रत ये पॉच पुत्र प्रसिद्ध थे। स्तिमितसागरसे ऊर्मिमान् , वमुमान वीर और पातालस्थिर ये चार पुत्र उत्पन्न हुए थे ॥४५-४६।। राजा विगुत्प्रभ, माल्यवान् । और गन्धमादन ये तीन हिमवत्के पुत्र थे तथा ये तीनों ही सत्यव्रत और पराक्रमसे युक्त ॥ निष्कम्प, अकम्पन, बलि, युगन्त, केशरिन और बुद्धिमान् अलम्बुप ये छह पुन विजय के प्रसिद्ध थे ॥४८॥ महेन्द्र, मलय, सह्य, गिरि, शैल, नग और अचल, सार्थक नामोंको धारण करनेवाले ये सात पुत्र अचलके थे ॥४९॥ वासुकि, धनञ्जय, कर्कोटक, शतमुस और विश्वरूप ये पॉच पुत्र धरणके थे ॥५०॥ दुष्पूर, दुर्मुख, दुर्दर्श और दुर्धर, चतुर क्रियाओंको धारण करनेवाले ये चार पुत्र पूरणके थे ॥५१॥ चन्द्र, शशाङ्क, चन्द्राभ, शशिन , सोम और अमृतप्रभ चन्द्रमाके समान निर्मल कीतिको धारण करनेवाले ये छह पुत्र अभिचन्द्र के थे ॥५२॥ और वसुदेवके महायलयान अनेक पुत्र थे। हे श्रेणिक ! मैं यहाँ उनमें से कुछ के नाम कहता हूँ सो मुन ॥५॥ वमुदेवकी विजयसेना रानीसे अफर और फर नामक दो पुत्र हुए थे। श्यामा नामक रानीसे जलन और अग्निवेग ये दो पुत्र उत्पन्न हुए थे ॥५४॥ गन्धर्वसेनासे वायुवेग, अमित- गति और महेनगिरि ये तीन पुत्र हुए थे। ये तीनों पुत्र ऐमे जान पड़ते थे मानो तीनों लोक १. रिपादानन्त-म० । २. म म०1३. युगान्तःमः। थे अष्टचत्वारिंशः सर्गः ५७३ अमात्यदुहितुर्जाताः पद्मावस्याः सुतास्त्रयः । दाबूंदार्थनामा च दारक इत्युदीरिताः ॥५६॥ द्वौ नोलयशमः पुत्रा धारी सिंहमतङ्गनी । नारदो मरुदेवोऽपि सोमश्रीतनयाँ वरौ ॥५७॥ 'मित्रश्रियः सुमित्राख्यः कपिलः कपिलात्मजः । पद्मश्च पनकास्यश्च पद्मावत्याः शरीरजी ॥५४॥ अश्वसेनोऽश्वसेनाया पौण्ड्रया पाण्ट एव तु । रतगर्भः सुगर्मश्च रनवत्याः सुती मता ॥५९॥ सोमदत्तसुतायास्तु चन्द्रकान्तशशिप्रभा । वेगवान्वायुवेगश्च वेगवस्यास्तनमवौ ॥६०॥ दृष्टिमुष्टिरनावृष्टिहिममुष्टिश्च ते अयः । पुत्रा मदनवेगाया मदनप्रतिमागताः ॥६॥ चन्धुणस्तथा सिंहसेनो बन्धुमतीमुतौ । प्रियमुसुन्दरीसूनुः शीलायुध इति श्रुतिः ॥६२॥ हो सुतौ तु प्रमावत्या गन्धारः पिङ्गलस्तथा । जरत्कुमारवाहीको जरायास्तनया स्मृती ॥६३॥ अवन्त्याः सुमुपश्चैव दुर्मुखश्च महारथः । रोहिण्या बलदेवश्च सारणश्च विदूरथः ॥६॥ तनुजौ वालचन्द्राया वज्रदंष्ट्रामितप्रमौ । देवकीतनुजो विष्णुरितीम यसुदेवजाः ॥६५॥ उन्मुण्डो निषधश्चासौ प्रकृतिद्युतिरप्यतः । चारदत्तो ध्रुवः पीठः स शमन्दमनोऽपि च ॥६६॥ श्रीधजी नन्दनचैव धीमान् दशरथस्तथा । देवनन्दश्च विख्यातो विद्रुमः शन्तनुः परः ॥६७॥ पृथुः शतधनुश्चैव नरदेवा महाधनुः । रोमशैत्यादयः पुत्रा बहवो वलिनस्तथा ॥६॥ भानुः सुभानुभीमौ च महामानुसुमानुका । वृहद्यश्चाग्निशिखो विष्णुसञ्जय एव च ॥६९॥ अकम्पनो महासेनो धारी गम्भीरनामकः । उदधिगीतमश्चापि वसुधर्मा प्रसेनजित् ॥७॥ सूर्यश्च चन्द्रवर्मा च चारकृष्ण विश्रुतः । मुचारदेवदत्तश्च मरतः शंखमंज्ञकः ॥७१॥ प्रद्युम्नशम्बनामाद्याः केशवस्य शरीरजाः । शस्त्रास्त्रशास्त्रनिष्णाताः सर्वे युद्धविशारदाः ॥७२॥ तपा पुत्राश्च पात्राश्च यादवानां यशस्विनाम् । पैतृस्वतीयाः स्वस्रीयाः कुमारास्ते सहस्रशः ॥७३॥ हो हो ॥५५॥ मन्त्रीको पुत्री पद्मावतीसे दारु, वृद्धार्थ और दारक ये तीन पुत्र हुए थे ।।६।। नीलयशाके सिंह और मतंगज ये दो धीर-चोर पुत्र थे। सोमश्रीके नारद और मरुदेव ये दो पुत्र थे ।।५७।। मित्रश्रीसे सुमित्र, कपिलासे कपिल और पद्मावतीसे पद्म तथा पद्मक ये दो पुत्र हुए थे ।।५८।। अश्वसेनासे अश्यसेन, पौण्ड्रासे पौण्ड्र और रनयतीसे रत्नगर्भ तथा सुगर्भ ये दो पुत्र हुए थे ।।१९।। सोमदत्तकी पुत्रीसे चन्द्रकान्त और शशिप्रभ तथा वेगवतीसे वेगवान् और वायुवेग ये दो पुत्र हुए थे ॥६०दृढमुष्टि, अनावृष्टि और हिममुष्टि ये तीन पुत्र मदन- वेगासे उत्पन्न हुए थे। ये तीनों ही पुत्र कामदेयकी उपमाको प्राप्त थे ॥६१|| धन्धुपेण और सिंहसेन ये बन्धुमतीफे पुत्र थे तथा शीलायुध प्रियङ्गमुन्दरीका पुत्र था ॥६॥ रानी प्रभावती से गन्धार और पिद्गल ये दो तथा रानी जरासे जरत्कुमार और वाहीक ये दो पुत्र हुए थे ॥६३॥ अयन्तीसे सुमुख, दुर्मुख और महारथ, रोहिणीसे बलदेव, सारण तथा विदूरथ, वालचन्द्रासे घनदंष्ट्र और अमितप्रभ और देवकीसे कृष्ण पुत्र हुए थे। इस प्रकार घमुदेवक पुत्रोंका वर्णन किया ॥६४-६५।। उन्मुण्ड, निपध, प्रकृतिद्युति, चारुदत्त, ध्रुव, पीठ, शमन्दमन, श्रीध्वज, नन्दन, धीमान, दशरथ, देवनन्द, विद्रुम, शन्तन, पृथु, शतधनु, नरदेव, महाधनु और रोमहत्यको आदि लेकर बलदेव अनेक पुत्र थे ॥६६-६८।। भानु, मुभानु, भीम, महाभानु, मुभानुक, वृदय, अमिशिस, विष्णुमाय, अकम्पन, महासेन, धार, गम्भीर, उदधि, गौतम, वमुधर्मा, प्रसन- " जिन. सूर्य, चन्द्रवमा, चारकृष्ण, मुचार, देवदत्त, भरत, शल, प्रद्युम्न तथा शम्य आदि फागके पुत्र थे। ये मभी पुत्र शत्र, अम्म तथा शाम्रम निपुण और युद्ध में पुशल थे ।।६०-७२) उन यशवी यादवॉक पुत्र और पौत्र, बुआ लड़क तथा भानजे भी हजारोंकी मंग्या में . १. मित्राभयम।

हरिवंशपुराणे
निसः कोट्योऽधकोटी च कुमाराणां महौजसाम् । मनोमवस्वरूपाणां रमन्ते रमणप्रियाः ॥७॥
शार्दूलविक्रीडितम्
नित्यं द्वारवती पुरी परिगता वारः कुमारैरिमै
निर्गच्छद्भिरितस्ततो रथगजारूदेशिनिस्तथा ।
नानावेषधर प्रचण्डचरितैः पौरप्रजाहादिभि-
बनाजे भवनामररिव पुरी पाताललोकस्थिता ॥७॥
स्रग्धराच्छन्दः
माय. स्वर्गच्युतानां जिनपथचरितोदारपुण्योदयानां
कीर्त्यानां कोय॑मानं चरितमिदमिह श्रीकुमारोत्तमानाम् ।
संशृण्यन्त्येकमत्या मतिविभवयुताः श्रदधाना जना ये
कामारं यौवनं च व्यपगमितरजस्ते वयो निर्विशन्ति ॥७६॥
इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृतौ यदुकुलकुमारोदेशवर्णनो नाम
अटचत्वारिंशः सर्गः॥४८॥
थे ॥७३।। इस प्रकार मथ मिलाकर महाप्रतापी तथा कामदेवके समान सुन्दर रूपको धारण
करनेवाले माढ़े तीन करोड़ कुमार, क्रीड़ाके प्रमी हो निरन्तर क्रीडा करते रहते थे ।।४।।
निरन्तर रथ तथा हाथियांपर सवार हो बाहर निकलते तथा भीतर प्रवेश करते हुए
नाना वेपोंके धारक, प्रबल पराक्रमी और नगरवासी प्रजाको आनन्द उत्पन्न करनेवाले
घोर कुमारोंसे युक्त द्वारावती नगरी उस समय भवनवासी देवोंसे युक्त पातालपुरीके समा
मुशोभित हो रही थी |७|| गौतम स्वामी कहते हैं कि प्रायः स्वर्गसे च्युत होकर आये हु
तथा जिनेन्द्र प्रणीत मार्गका अनुसरण करनेसे सातिशय पुण्यका संचय करनेवाले इन प्रशंस
नीय उत्तम यदुकुमारोंके इम कहे जानेवाले चरितको जो बुद्धिमान् मनुष्य एकाधिः
होकर सुनते हैं तथा श्रद्धान करते हैं वे ममस्त रोगोंको दूर कर फौमार और यौवन अवस्था
उपभोग करते हैं. उनकी वृद्धावस्था छूट जाती है ||७६।।
इस प्रकार अरिष्टनमिपुराणके संमहसे युक्त जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें यदुपेशके
कुमारोंका नामोल्लेस करनेवाला अड़तालीसयाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥४८॥

एकोनपश्चाशः सर्गः अथ मधुसूदनावरजया वरया जगतामवितथकन्यया शशिविशुद्धयशोधरया । प्रथितसुदुमरप्रथमयौवनभूरिभरः प्रकटममारि हारिगुणभूपणभूषितया ॥१॥ नखमणिमण्डलेन्दुललितागुलिपलचयोरकृत करताहसितमास्वदलक्तक्योः । मृदुपदपद्मयोः प्रपदमागसमोन्नतयोगति यदीययोरपमयापगतं पया ॥२॥ रदगुणगृढगुल्फनिजजानुमनोहरयोः प्रतिपदमानुपूर्व्यपरिवृत्तविलोमशयोः । निरुपमजइयोजधनभूरिमरक्षमयोः मविरसमलयोनं हि यदीयकयोरपमा ॥३॥ भूदुपरिवृत्तपाण्डुरगुणं "विगलदहलस्थिरवरकान्तिदीप्तिरमपूरितमृरयुगम् । करिकरयष्टिकृत्तकदलीमृदिमानमतिप्रथितमतीन्य सत्यगुणवारि यदीयममात् ॥४॥ बहुरमपूर्णवर्णकुलशैलमवनमदाप्रमदविधायिपुण्यसरिनः कलहंसगतेः । गुरुजघनस्थलीपुलिनभूमिरभूमिरमा कुसुमरथस्य शुम्मितनितम्बतटा वियभी ॥५॥ तनुमृदुरोमराजिलतयानिविनीलरुचा जननयनाभिरामनिजनामिगभीरतया । तनुमध्यवन्धनवलित्रयविचित्रतया ललितबधूजनेष्वतिविराजितमननया ॥६॥ अथानन्तर कृष्णकी छोटी बहिन जगत्में उत्तम, चन्द्रमाके समान निर्मल यशको धारण फरनेवाली एवं मनोहर गुणरूपी आभूषणोंसे भूपित यशोदाकी पुत्री (जो कृष्णके बदले में आयी थी )ने अतिशय प्रसिद्ध प्रथम यौवनके बहुत भारी भारको धारण किया ||१|| जिनके अगुलिरूपी पल्लय श्रेष्ठ नखरूपी चन्द्रमण्डलसे सुशोभित थे, जिन्होंने अपनी स्वाभाविक ललाईसे देदीप्यमान महायरकी हँसी की थी, तथा जो अग्रभागमें समान रूपसे ऊँचे उठे हुए थे ऐसे उसके कोमल चरण कमलाकी उपमा उस समय लजासे ही मानो संसारमें कहीं चली गयी थी। उसके कोमल चरण-कमल अनुपम थे ।।२।। जो अत्यन्त मजबूत एवं गूढ गॉठों और घुटनोंसे मनोहर थी, उत्तरोत्तर बढती हुई गोलाईसे सुशोभित एवं रोमरहित थी, नितम्बोंका वहुत भारी भार धारण करनेमें समर्थ थी, और जो परस्परके प्रतिस्पर्धी मल्लक समान जान पड़ती थी ऐसी उसकी अनुपम जवाओंकी उस समय कहीं उपमा नहीं रही ॥३॥ जो कोमल गोल और शुभ्र थे, जिनसे अत्यधिक स्थायी एवं श्रेष्ट कान्ति च रही थी, जो दोनि रूपी रससे परिपूर्ण थे, हाथीकी सूई और गोल कदलोको मुकुमारताको उल्लंघन कर विद्यमान थे, अतिशय प्रसिद्ध थे और यथार्थ गुणोंसे युक्त थे, ऐसे उसके दोनों ऊस उम ममय अत्यधिक मुशोभित होने लगे ॥शा फलहंसके समान सुन्दर चालसे मुशोभिन उस कन्याकी स्थूल जपनस्थली, अनेक रमॉसे परिपूर्ण वर्णवाले कुलाचलोंसे उत्पन्न स्त्रियोंके लिए हर्प उत्पन्न करनेवाले पुण्यरूपी, नदीकी उस पुलिन भूमि-तट भूमिके ममान मुशोभित होने लगी जो कामको अभूमि-अगोचर तथा नितम्वरूपी मुन्दर तटोंसे युक्त थी ।। ५॥ वह पन्या, सूक्ष्म, कोमल और अत्यन्त काली रोमरालिसे, मनुष्योंके नेत्रोंको आनन्द देनेवाली अपनी - नाभिकी गहराईमे और शरीर मध्यमे स्थित त्रियलियों-तीन रेसाओंकी विचित्रतासे १. "स्पायभिनयी अमजला गुरु नवुटकम्" इति सक्षणात् ( वृचरत्नाकरस्य)। २. पशोदाया मत्या (7. टि.)। ३. परनिर्मलपल्लरयोः ६०, अतिनिर्मश:०, रतिनिमल-मः । ४. अतरवा दसित (1)म०१५ प्रमाभागममन्वितयो म.पादस्याने प्रश्न.१६ सरिरममत्ययो क०, मरिरममलपो: म.। ७. स्थिरपर-१०,००,०1८ निवामटेय कभी म.६ रिनीताचा म.१०.-माया मा।

हरिवंशपुराणे उरमि नितान्तनीलनिजचूचुकयोरसको कठिनसुवृत्तपीवरपयोधरयोर्भरतः । अमृनरपक्षयक्षरणमीहरिनीलमणिस्थिरतरमुद्रिकोकनककुम्मवहेव वभौ ॥७॥ भुजलतयोः शिरीषमृद्रुपीनवरांसकयोः वरकमलप्रमापठलपाटलपलवयोः । कुरुपकताम्रकम्रनखपुष्पकयोर्वपुपस्वनुकृतमुद्दकोशकरशाखकयोर्विबभौ ॥८॥ अपठिनकम्बुकण्ठचिबुकापरबिम्बफलाह मितपाण्डुगण्डकुटिलभ्रललाटतटी- द्विगुणितकोमलोत्पलसुनालसुवर्णभृता चिरमनयात्यमासि धवलासितदीर्घदृशा ॥९॥ प्रमितशिरस्यतिभ्रमरकान्तिकनत्कुटिलप्रकटकटीतटीपतितकेशकलापममौ । शशिवदना प्रकाशमवह द्विहमदशना प्रशिथिलकामपाशमिन लोकवशीकरणम् ॥१०॥ करपदमुद्रिकाकटकनू पुरपूर्वक्पत्प्रथितचतुर्दशाभरणभूपणभूतननुः । प्रविलमदनरागमृदुवस्त्रमहालगियं स्थगयति कन्यकोचितसुखा वपुपा युवतीः ॥११॥ पितृसुतपूर्वकस्य यदुसर्वकुलस्य जनरूचितसपर्यया विहितगौरवभूमिरमौ । सकलकलाकलगुणकलापमहावसतिः सफलसरस्वती स्वयमिव स्वजनोपविधी ॥१२॥ इति समये प्रयाति नु कदाचिदमा प्रणतरपहसिता प्रयाभिरवशाबलराजसुतैः । विचिपिटनासिकं रहसि दर्पणक स्वमुसं स्फुटमवलोक्य तद्भवविरागमगात्रपिता ॥१३॥ संसारकी समस्त सुन्दर स्त्रियोंके वीच अत्यधिक सुशोभित होने लगी ॥ ६ ॥ वक्षस्थलपर अत्यन्त नील चूचुकसे युक्त कठोर गोल और स्थूल स्तनोंका भार धारण करनेसे वह कन्या ऐमी सुशोभित होने लगी मानो 'अमृत रसका घर खिरकर कहीं नष्ट न हो जाये' इस भयसे इन्द्रनील मणिको मजबूत मुहरसे युक्त देदीप्यमान सुवर्णके दो कलश ही धारण कर रही हो॥७॥ गिरीपके फूलके समान कोमल मोटी और उत्तम कन्धोंसे युक्त, उत्तम कमलकी कान्ति के समूहके समान लाल-लाल हथेली रूप पल्लवोंसे सहित, कुरुबकके फूलके समान लाल एवं मुन्दर नखरूपी पुप्पोंसे सुशोभित तथा मूंगकी कोशोंका अनुकरण करनेवाली अङ्गुलियोंसे युक्त भुजारूपी लताओंसे यह अत्यधिक सुशोभित होने लगी। कोमल शटके समान कण्ठ, छुट्टी, अधरोष्ठ रूपी विम्योफल, प्रकृष्ट हास्यसे युक्त श्वेत कपोल कुटिल भौहे, ललाट तट एवं द्विगुणित कोमल नील कमलको उत्तम डण्ठलके समान कानोंको धारण करने वाली और सफेद काले तथा विशाल नेत्रोंसे सहित वह कन्या चिरकाल तक अत्यधिक मुशोभित होने लगी ।। ९ ।। हास्ययुक्त दॉतोंसे सहित वह चन्द्रमुखी कन्या, सुन्दर शिरपर भ्रमरोंको कान्तिको तिरस्कृत करनेवाले देदीप्यमान घुघराले एवं विस्तृत कटी-तटपर पड़े प्रकाशमान उम केशममूहको धारण कर रही थी, जो लटकते हुए काम पाशके समान लोगोको घश करनेवाला था ॥ १० ॥ हाथ और पैरोंमें स्थित अँगूठी, कड़े तथा नूपुर आदि समीचीन एवं प्रमिद्ध चौदह आभरणोंसे जिसका शरीर आभूपण स्वरूप हो रहा था, जो शोभायमान अद्गगग, कोमल वस्त्र और महामालाओंको धारण कर रही थी तथा जिसे कन्याओंके उचित ममम्त मुग्न उपलब्ध ये ऐमी वद, कन्या अपने शरीरके द्वारा संसारको अन्य आच्छादित कर रही थी-तिरस्कृत कर रही थी ।।११।। वह पिता, पुत्र आदि ममस्त यदुवंशः फे मनुष्यों के द्वारा योग्य सत्कारके द्वारा किये हुए गौरवको भूमि धी, समन्त कलाओं और मनोहर गुणों ममूहकी महायसनिफा थी और कुटुम्बी जनाफे ममीप स्वयं शरीरधारिणः । मरम्पीके ममान जान पड़ती थी ॥ १२॥ इम प्रकार ममय व्यतीत होनेपर कटाचिन् यलदेवके पुत्रोंने आकर उसे नमस्कार १. यो नियाम (६. 2.)। २. वपुपालनात-म०, यापासनान। ३. प्रसहित म। ४. पुरतो म। युवतियोंको एकोनपञ्चाशः सर्गः पुरि विटनार्जिकागणमहत्तरिकापदया व्रतधरपादमूलमितया मह सुग्रतया । 'सुगुररपृच्छयत प्रणतया निजपूर्वकृतं स्फुरदवधीक्षणः क्षणमसाविति वा न्यगदीत् ॥१४॥ तब दुहितः सुराष्ट्रविषये विषयन्द्रियजविगतमचे सुखैरतिविठितमुधिया । परपतयामिरूपपदमुद्वहनागभृता नभृतमनङ्कुशं निभृतमात्ममनोनयनम् ॥१५॥ अतिविषमं तपो घटयतो मृतशाकिया शफ्टमृपेरपर्युपरि हितं तदा त्वकया । विमृदितनासिकापुटतटस्य मुनेः स्वलनं मनसि न जातमीपदपि धीरतया हतया ॥१६॥ अजनितजीवधातगुणतो नरकं पतनं तव हि मनाग्न जातमृपिगारधादिह तु । श्रजनि विनासिकस्य वदनस्य महाविकृतिः फलति फलं स्वकर्मजगतां हि यथाविहितम् ॥१७॥ मकृदपि जीवघातकृदघादसकृत्परतः परवशघातदुःसममियास्यति जन्तुरिह । श्रवयवधातकृत् मकृदपि स्वकृतैरसकृदवयवधातर्मप्यति सदेति जिनस्य वचः ॥१८॥ घचनमनस्तनुभिरमियः परपाः पुरपाः पुरषवधादिपु प्रभुतया प्रयतन्त इह । दुरितमहाप्रभुः परमवेषु जनेषु पुनः प्रभवति दुःसदानचतुरश्चतुरंप्वपि हि ॥१९॥ अत इह जन्तुमिः परवधादिनिवृत्तिपरः स्वपरहितैः सदापि भवितव्यमपि प्रभुमिः । किया और जाते समय अपने अल्हड़ स्वभावसे उसे 'चिपटी नाकवाली' कह कर चिढा दिया। उसने एकान्तमें दर्पणमें प्रतिविम्बित चिपटी नाकसे युक्त अपना मुख देखा जिससे वह लज्जित होती हुई उस पर्यायसे विरक्त हो गयी ॥ १३ ॥ उसने नगरमें विद्यमान आर्यिकाओं के समृहकी प्रधान सुव्रता नामक गणिनीके चरणोंकी शरण प्राप्त की और उन्हें साथ लेकर वह व्रतधर नामक मुनिराजके चरणमूलमें गयी। उन्हें नमस्कार कर उसने उक्त मुनिराजसे पूछा कि 'हे भगवन् ! मैंने पूर्वभवमें क्या पाप किया था जिससे मुझे यह कुरूप प्राप्त हुआ है।' इसके उत्तरमें अवधिज्ञानरूपी नेत्रको विकसित करनेवाले मुनिराज उससे इस प्रकार कहने लगे-॥ १४ ॥ हे पुत्री ! पूर्वभवमें तेरा जीय सुराष्ट्र देशमें उत्तम रूपको धारण करनेवाला पुरुष था। यहाँ विपय और इन्द्रियजन्य सुखोंसे अत्यन्त मूढ बुद्धि. होनेके कारण वह क्रूरतावश विपयोंमें स्वच्छन्द हुए अपने मन और नेत्रोंको स्वाधीन नहीं रख सका ।। १५ ।। एक बार एक मुनि मृतशय्यासे अत्यन्त विषम तप तप रहे थे । तूने उनपर अपनी गाड़ी चला दी जिससे उनकी नाक पिचक गयी। मुनिराजने अपने मनमें बहुत भारी धीरता धारण कर रखी थी इसलिए इस घटनासे उनके मनमें कुछ भी क्षोभ उत्पन्न नहीं हुआ ।।१६।। मुनिराजके जीयका घात नहीं हुआ था इसलिए तेरा नरक वास नहीं हुआ। किन्तु उनके शरीरका कुछ घात हुआ था इसलिए इस जन्ममें तेरा मुख नासिकासे रहित हो महाविकृत हुआ है। ठीक ही है संसारमें जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है ॥१७॥ जिनेन्द्र भगवान्का यह कहना है कि जो प्राणी इस संसार में एक बार भी किसी जीवका घात करता है यह उसके पापसे पर-भवमें दूसरोंके द्वारा घात होनेके दुःखको प्राप्त होगा और जो किसीके अवयवका एक बार भी घात करता है वह अपने किये पापके अनुसार अनेक वार अवयवके घातको प्राप्त होगा ।। १८ ॥ जो क्रूर मनुष्य, प्रभुताके कारण निर्भय हो मन, वचन, कायसे मनुष्य आदि प्राणियोंके वधमें प्रयत्न करते हैं परभवों में वे कितने ही चतुर क्यों न हों दुःख देनेमें चतुर पापरूपी महाप्रभु उनपर बार-बार अपना प्रभाव जमाता है. उन्हें बार-बार दुःख देता है ॥ १९ ॥ इसलिए स्वपर हितको चाहनेवाले प्राणियोंको भले ही वे राजा क्यों न १ सुरगुरु म०।२ विगतमये म०, १० । ३. कठोरतया (क.टि.)। पुरुषतया म०, ख०, १० । ४ निवभृत म०, ड० | ५. रभि य पुरुषाः एषा म० । ६. दुःखदानचरश्चतुरेष्वपि हिम० ।

हरिवंशपुराणे न हि भयपद्धती मवभृतामिह संसरता'स्वकृतभुजा सनां प्रतिभवति सदा प्रभुता ॥२०॥ इति वचनं गुरोरमिनिशम्य कृतावनतिः प्रगतवती तया सह महत्तरिकार्यिकया। प्रतमदधाद्विमोच्य हि सकाखिलवन्धुजनं सितवसनायतस्तनमरोतकालकचा ॥२१॥ ध्यपहृतभूपणस्रगियमात्मकरागुलिमिनिकचितकेशमारनिसिलोरखननं तु सदा । प्रविदधती वमौ कुमुमकोमलबाहुलता स्फुटमिव धीकुटीकुटिलशल्यकुलांचरणम् ॥२२॥ जघनमुरः कुचायुदरमाचरणं च यपुः सुमृदुदुकूलकैकवसनेन कृतावरणम् । 'सुविदधती सती चिरमराजत सा च तदा वृतसिकतास्थलाच्छपयसा शारदीय नदी ॥२३॥ स्वजनकृतामिनिष्कमणपूजनिकां जनिकां पुरतपसां निशाम्य नवसंयनिका हितकाम् । अजानि महाजनस्य सक्लस्य तदेतिमतिः सतिः सरस्वती किमु तपस्यति किं नु रतिः ॥२४॥ मतगुणसंयमोपवसनादितपोमिरसौ प्रतिदिनभावनाभिरपि मावितमावयुता। वसति तपस्यया वसतिरागमगीतगिरा पुरगुणमंयुता गणनिवासगता सततम् ॥२५॥ यहुपु तु वर्षवासरगणेषु गतेषु ततो जिनजननामिनिष्क्रमणनिर्वृतिभूमिपु सा। कृतविहतिः कदाचन गता पृथुसार्थवशामिजसहधर्मिणीमिररविन्ध्यमहागहनम् ॥२६॥ हो सदा परहिंसा आदि पापोंसे दूर रहना चाहिए | क्योंकि संसारमें भ्रमण करनेवाले प्राणी अपने द्वारा किये हुए कर्माका फल भोगते हैं उनको प्रभुता-राज्य अवस्था सदा स्थित नहीं रहती ।।२०।। इस प्रकार गुरुके वचन मुन यह, सुव्रत गणिनीके साथ चली आयी और समस्त बन्धु जनोंका त्यागकर उसने सफेद साड़ीसे स्तनोंको ढक तथा काले केशोंको उखाड़कर आर्यिका का प्रन धारण कर लिया ।।२१।। जिसने आभूपण और मालाएँ उतारकर फेंक दी थीं तथा जिसकी वाहुरूपी लताएँ फूलोंके समान कोमल थीं ऐसी वह कन्या उस समय अपने हाथको कोमल अंगुलियोंमे अपने बँधे हुए समस्त वालोंको उखाड़ती हुई ऐसी जान पड़ती थी मानो धुद्धिरूपी फुटीफे भीतर विद्यमान शल्योंके समूहको ही उखाड़ रही हो ॥२२॥ जपन, वक्षस्थल, स्तन, उदर और चरणोंपर्यन्त समस्त शरीरको एक अत्यन्त फोमल वस्त्रसे आच्छादित करती हुई यह सती उस समय चिरफाल तक शरद् ऋतुको उस नदीके समान सुशोभित हो रही थी जिसने स्वच्छ जलमे अपने वालुमय स्थलको ढक रखा था ।।२शा फुटुम्बी-जनोंने जिसकी दीक्षा-कालीन पूजा की थी और जो बड़े-बड़े तपोंको जन्म देनेवाली थी ऐमी उस नव-दीक्षिता आयिकाको देखकर उम ममय ममस्त महाजनोंके हृदय में यही बुद्धि उत्पन्न होती थी कि क्या यह धैर्यमहित सरस्यत्ती ६ अधया रनि तपम्पा कर रही है ।।२४ा प्रत, गुण, संयम तथा उपयाम आदि तपों एवं प्रतिदिन भायो जानेयाली अनित्य आदि भावनाओंसे जो विशुद्ध भायोंफो प्राप्त हुई थी, जो आगमोग अनेक पाठोंकी यसतिफा थी, उत्तमोत्तम गुणोंसे सदित थी, और मदा आर्यिकाऑफ महके साथ निपाम करती थी ऐसी यह आयिका, तपस्या परती गहनी थी ll तदनन्तर पहन यी और दिनफि समूह व्यतीत हो जानेपर यह जिनेन्द्र भगवान जन्म, टीना और नियांगल्यागरूको भूमियोंम विहार फर किमी समय यत पदे माको प्रेरणा मे भानो महर्मिगियाँफे माय यिन्यापली पिशाल घनमें जा निकली है और रात्रिक १.-......। २. उमा म । ३ पीरप रीता पुलियनपोरन पुन चीन की TRATHI-मोवाईम., पोरन.1 विपती म ... पुरजर्म .,..,म.मा म.,..।

एकोनपञ्चाशः मगः निशि निशितामिनिमलनिशातमनास्स्वसको प्रतिपथमास्थिता प्रतिमया प्रतिमाप्रतिमा । धरशवरसेनया स्फुटमदशि निशानिमया बहुधनसार्थपातविधये द्रुतमागतया ॥२७॥ इह वनदेवता स्थिनवीयमिति प्रणतः शवरशतैरितिस्ववरदानमयाच्यत सा। मगवति यः प्रसादनिरपद्रविणो द्रविणं यदमिलभेमहि प्रथमकिकरका बयकम् ॥२८॥ इति तु वनेवरः कृतमनोरथकैः पृथुकैः प्रबलतया सुसार्यममितः पुनरापतितः । यिनिहतसार्थसार्थकरायान्तमितैः प्रतिमास्थितियुतसंयतास्थितिमुवीदमदर्शि तु तैः ॥२९॥ प्रशमसमाधिमागनमानस्थितिमामरणादुपगतपुण्डरीका रुपहचण्डत्तया । स्वयमुपपद्य सा दिवमगाप्रतिमाप्तमृतिमधुमयनस्त्रसा सवलति न स्थितितः मुजनः ॥३०॥ नसमुखदंष्टिकाविकटकोटिविपाटिनया यदपि कलेवरखण्डमुपार्जितधर्मतया । मृतिमितया विमुनमविमुक्तममाधितया सदपि करागुलिनिस्शेषमशेपमभूत् ॥३॥ रधिरविलिप्तगुप्तपपभूतलमाकुलिताः सकलमितस्ततस्तदभिधीक्ष्य तदा शवराः । निरिह वध्यते वरददेवतया रघिर इति विनिधाय देवतमदस्निकराजु लिमिः ॥३२॥ वनमहिषं निपास्य विपमं विपमाः परितः परपकिरातका रघिरमांसवलिमकरम् । *विचकररन्मनमशकमक्षिकमक्षिविष प्रविततविखगन्धदुरमीकृतदिग्वलयम् ॥३३॥ समय, तीक्ष्ण तलवारके समान निर्मल एवं निर्विकल्प चित्तको धारण करनेवाली यह प्रतिमा तुल्य आर्यिका किसी मार्ग के सम्मुख प्रतिमायोगसे विराजमान हो गयी। उसी समय किसी बहुत धनी सहपर आक्रमण करनेके लिए रात्रिके समान काली भीलोंकी एक बड़ी सेना शीनतासे यहाँ आयो और उसने प्रतिमायोगसे विराजमान उस आर्यिकाको देखा जा 'यह यहाँ वनदेवी विराजमान है' यह समझकर सैकड़ा भीलांने नमस्कार कर उमसे अपने लिए यह वरदान माँगा कि 'हे भगवनि ! यदि आपके प्रसादसे निम्पद्रव रहकर हम लोग धन प्राप्त फर भकेंगे तो हम आपके पहले दास होंगे' ||२८|| इस प्रकारका मनोरथ कर भीलोंका यह विशाल समूह बड़ी मजवूनीसे चारों ओरसे यात्रियोंके उस सङ्कपर टूट पड़ा और उसे मार- कर तथा लूटकर कृतकृत्य होता हुआ जब यह वापिस समीपमें आया तो उसने प्रतिमायोगसे स्थित आर्यिकाके सड़े होनेके स्थानपर यह देखा ॥२९॥ जब भील लोग आर्यिकाके दर्शनकर आगे बढ़ गये तब वहाँ एक मिहने आकर उनपर घोर उपसर्ग शुरू कर दिया। उपसर्ग देख उन्होंने यही शान्तिसे समाधि धारण की और मरण पर्यन्तके लिए अनशनपूर्वक रहनेका नियम ले लिया। तदनन्तर प्रतिमायोगमें ही मरणकर. वे स्वर्ग गयी मोठीक ही है, क्योंकि मजन पुगप अपनी मर्यादासे कभी विच लिन नहीं होते ॥३०॥ निग्न्तर धर्मका पार्जन करने- याली एवं गृहीत समाधिको न छोड़नेवाली उम आर्यिकाका शरीर मिहके नस, मुख और डादों के अप्रभागसे विदोर्ण होनेके कारण यद्यपि छूट गया या नथापि उसके हाथकी तीन अंगुलियाँ यहाँ शेष यच रही थी यही नीन अंगुलियाँ उन भीलोंको दिसायी दी ॥३१) ग्वूनसे पिलिप होने के कारण जिमका मार्ग अन्तर्हित हो गया था ऐमी यहॉकी ममस्त भूमि उन भीलोंने उम ममय यही आकुलनासे यहाँ यहाँ देखा पर कहीं उन्हें यह आर्यिका नहीं दिसी । अन्तमें उन्होंने निश्चय किया कि परदान देनेवाली यह देवी इम मधिरमें ही मन्तोष धारण करती है इमलिए हाथी उन तीन अंगुलियांको यही देवता रूपसे विराजमान फर दिया और बड़े-बड़े जंगली भैमाओंको मारकर उन विपम एवं कर मीलोने मय और मून एवं मामकी बलि १. प्रतिरयया स्थिता प्रक्रिया प्रतिमा । २. रात्रिनमातुल्या-गया। ३. यिनिति-म., क. ...1४ उगतसिंहात् । ५. द्रतालवचराहतया म.। ६ रिनुम-म.। ७.रिनारदमानराक- मदिक मा-विरराष्ट्रमदाएसमदिक गा।

५८० हरिवंशपुराणे सुगतगताम{ परमकारुणिकां तपसा जगति जनस्ततः प्रभृति निरागसमन जइः । वनचरदर्शितेन नु पथा नरकाभिमुखः पिशितवशो निहन्ति हि पान् महिषप्रभृतीन् ॥३४॥ न हि महिपासंपानविधिका न हि झूलकरा न हि सुरदुर्गतावपि परस्परपातकता । रचयति मित्तिमात्रमुपलभ्य कविः कवितां सदसती यथा च लिसति स्फुटचित्रकरः ॥३५॥ सदपि दुरीहितं रहसिजं हि परस्य परः सदसि निगद्यमानमघमावहतीति सताम् । मतमिदमस्य तु प्रकटनं जगतामसतो न नरकपातहेतुरिति कस्य सतो वचनम् ॥३६॥ अवितथामिन्यमी वितथमेव शटा कवयः स्वपरमहारयो विदधते विकथाकथनम् । परवधकापथेषु भुवि तेषु तथेनि जनः सुर-रव-मृढधीः पतति गडरिकामटवत् ॥३७॥ क परदयापरः परमधर्मपथों भुवने विधिवदनुष्टितस्तनुभृतां सुखदः प्रकटः । क च परघाती नरकहेतुरधर्मकलिः कुरुविविकल्पितः सलकली खलु धर्मतया ॥३८॥ प्रकटिनलोकपालचरिताः खललोकमयात्तनुभृदनुग्रहं विदधतः परिरक्षणतः । समहिपषघातमधिदेवतमन नृपाः विदधति यत्र तत्र कुजनेषु तु कैव कथा ॥३९॥ कथमपि कार्यसिद्धिमुपलभ्य हि दैववशात्प्रतिनिधिदेवताकृतमिति प्रतिपद्य मरः । निजवपुरायुधैः सुविनिकृत्य दधिरं परतनुकतने भवति वा स कथं सघृणः ॥४०॥ चढाना शुरू कर दी। इस बलिदानसे वहाँ मक्खियों और मन्छर उतराने लगे, वह स्थान ऑखोंके लिए विपके समान दिखायी पड़ने लगा। तथा फैली हुई सड़ी याससे वहॉकी दिशाएँ दुर्गन्धित हो गयी ।। ३२-३३ ।। यद्यपि यह आर्यिका परम दयालु थी, निष्पाप थी और तपके प्रभावसे उत्तम गतिको प्राप्त हुई थी तथापि इस संसार में मांसकै लोभी नरकगामी मूर्ख जन भीलोंके द्वारा दिखलाये हुए मार्गसे चलकर उसी समयसे भैंसा आदि पशुओंको मारने लगे ॥३४॥ उत्तम देवगतिकी बात छोड़िए निकृष्ट देवगतिमें भी कोई देव भैंसाओंका रधिर पान करनेवाले एवं हाथों में त्रिशूल धारण करनेवाले नहीं हैं और न उनमें परस्पर एक दूसरे का माग्ना ही है फिर भी कवि स्फुट चित्रकारके समान जरा-सी भित्तिका आधार पा सत्पुरुपोंको भी दूपण लगानेवाली कविता लिख डालते हैं ॥३५|| दूमरंकी एकान्तमें होनेवाली सत्य कुचेष्टाका भी मभामें दूमरोंके द्वारा कहा जाना पाप बन्धका कारण है-यह सत्पुरूपोंका मत है। फिर किसीके अविद्यमान दोपको मंमारके सामने प्रकट करना नरफगतिका कारण नहीं है यह किम मत्पुरुपका वचन है ? अर्थात् किमीका नहीं॥३६॥स्व-परके महावैरोये धूर्त कवि असत्यको मत्य है ऐमा यताकर विकथाओं का कथन करते हैं और 'ये देवनाओंके वचन हैं' ऐसा. समझ मूर्व प्राणी पृथिवीपर, परका वध करना आदि कुमार्गीमें भेड़िया-धमानकै समान गिरते चले जाते हैं ॥३७॥ विधि- पूर्वक आराधना करनेपर प्राणियोंको मुख देनेवाला, परजीवोंकी दयामे तत्पर संसारमे प्रस्ट हुआ परम धर्मका मार्ग कहाँ ? और दुष्ट कलिकालमें कुरुयियोंके द्वारा धर्मरूपसे कल्पित, परपातसे उत्पन्न, नरकका कारण अधर्मकी कलह कहाँ ? भावार्थ-धर्म और अधर्मम महान अन्तर है ॥३८॥ जिन्होंने लोकपालका चरित प्रकट किया है और जो दुष्टजनोंके भयसे रक्षा फर जीयापर मदा अनुप्रद करते हैं ऐसे राजा भी जहाँ इस संमारमें देयताओंको लक्ष्य कर भंमा नया मेप आदि जन्तुओंका धान करते हैं यहाँ अन्य क्षुद्र मनुष्योंकी तो कथा ही क्या है ? ॥३॥ भाग्ययश किमी तरह कार्यको मिद्धिको पाकर यह प्रतिनिधिभून देवताके द्वारा ही कार्य मिद्ध हुआ है' मा मान जो मनुष्य शास्त्रोंमे अपने ही शरीरको चार सूनकी यलि देने लगना है यह दूम के शारीरक छेदन में दयामहित कम हो मकना है ? मायाथ-मनुष्य १.निवागन् । २. महिपाखानधिका म३. मायलासिम 1 ४. खतु मोकभयातनु-म ।

५८१ एकोनपञ्चाशः सर्गः विपुलमपर्यया प्रणनलोकमुतोषिनया विगतविपर्ययत्वगुणया जगतीष्टवरः । यदि हि वितीयंते वरदया वरदवतया न भवनि कथिइप्यमिमतेन जनी विकलः ॥४१॥ प्रतिनिधिराश्रयश्च सधनस्य परस्य कृतिः प्रतिदिनीपतलवलिपुष्पविधिः परनः । श्रय च वरं परस्य नियतं प्रददानि वृतं जडजनदेवता जगनि हास्यमिदं परमम् ॥३२॥ प्रतिकृतिरचिंता भुवि कृताजिनाधिपतेरधिगनमनिमिदं विणमावविधानयो । फलानि फलं परत्र परिणामविदोपवशादभिमनकल्पवृक्षसनिय जनाभिमतम् ॥४३॥ अपयनिपानपातनघनानुमतेरशुभंनिमिर मानवी मपनि दुर्गनिहंतुरलम् । पथि यतिमापित स्वकृतकारकतानुमनैमंत्रति शुमारवः मुगनिहनुपीह शुभैः ।.४४५ मनमि शुभ निज घचमि वा वपुषि प्रगुणे रिमिनि न पुण्यमेव जगदगतं कुम्ने । घटयनि पापमंत्र विगुणस्तु कृतः करणेगुस्तरमत्र कारणमहा गुरुकर्मकृतम् ॥४५॥ मिमिरभरं त्रिमुदिमयमय इदं जगतः स्थगपदलं पवित्रनेत्रमनापधकम् । तदिह जनी दिक्षुरपि नाचमतवमपि प्रतिपदमाकुलः किमु निरूपयितुं क्षमने ॥६६॥ की कार्यमिद्धि तो अपने पूर्वकन कर्मके अनुसार होती है परन्तु देवताको प्रतिनिधि रूप मूर्तिकी उपासना करनेवाला मनुष्य उस मिद्धिको उस मूर्तिके द्वारा किया हुआ मानता है इसलिए प्रसन्न होकर शस्त्रोंसे ही अगोंको छेदकर खूनकी बलि देने लगता है। जो अपने ही अगोको छेद डालना है उसे दूमरके अङ्ग छेदने में दया कहॉ हो मकनी है ? ॥४०॥ नम्रीभूत मनुष्याने बहुत बड़ी पूजासे जिसे अच्छी तरह मन्तुष्ट कर लिया है और जिसका विद्वेपम्प विपरीत गुण दूर हो गया है ऐमी वर देनेवाली उत्कृष्ट देवी द्वारा यदि संसार में इष्ट वर दिया जाता है तो किसी भी मनुष्यको इष्ट मामग्रीसे रहित नहीं होना चाहिए। भावार्थ- जय मभी लोग पूजाके द्वारा देयताको सन्तुष्ट कर उपसे इष्ट वरदान प्रान कर मकते हैं तब मभीको इष्ट वस्तुओंमे भरपूर होना चाहिए ॥४१जिसकी मूर्ति और मन्दिरका निर्माण अन्य धनवान, मनुष्यका कार्य है, तथा जिसको प्रतिदिन काम आनेवाली दीप, तेल, बलि, पुष्प आदिकी विधि सदा दूसरोंसे पूर्ण होती है वह मूर्खजनाकी देवता दूमरोंके लिए माँगा हुआ यरदान निश्चित रूपस देनी है यह मंसारमें बड़ी हमीकी बात है । भावार्थ-जो अपनी मूर्ति और मन्दिर म्ययं नहीं बना मकनी तथा प्रतिदिन उपयोगमें आनेवाले दीपक, तेल, नैवेद्य और फूल आदिके लिए जिसे दूमरीका मुंह देखना पड़ता है यह दूमरोंके लिए क्या वरदान देगी ? ॥४॥ धियर्यापर भक्तानों द्वारा उन्य, भाय, पूजामे पूजी हुई कृतकृत्य जिनेन्द्र भग- यानकी प्रतिमा, अपने-अपने विशिष्ट परिणामांकः अनुमार पग्भवमें इष्ट कल्पवृक्षरी लनाय ममान मनुष्यों नष्ट मनोग्याप फलको फलती है ।।१३।। कुमागमें स्वयं प्रवृत्त होना, दुमरको प्रयन कराना और प्रवृत्त होते हुए को अनुमति देना इन तीन अशुभ प्रवृत्तियोंमे अशुभ कर्माका आयय होता है जो कि दुर्गतिका मुग्य कारण है और मुनिराज द्वारा बताये हुए मार्गमें म्ययं प्रवृत्त होना, दूमरको प्रयत्न कराना और प्रवृत्त होते हुए को अनुमति देना इन तीन शुभ प्रनियोंमे शुभ काँका आम्रय होता है जो कि मुगनिका मुग्न्य कारण है या इस प्रकार जय अपने ही शुभ मन, शुभ बचन और गुम कायमे पुग्ययन्य होता है और ये शुभ मन आदि अपने अधीन है नय ममारके ममम्न प्राणी एक पुण्य कर्मको ही क्यों नहीं करते ? किन्तु उसके विपरोन किये हुए निरर्थक कार्योम पाप ही क्यों करते हैं । अही जान पहनाई किममें पूर्यपद्ध यहुन भार्ग कोंक द्वारा किया हुआ यहुन यहा मारणा है 11 अहो! विधानयाग । २. प्रायनिपाल नियतन-म०,ग. । ३. प्रगुशी म. ४ शिगुभे मुाने म.। १ शिायाम हरिवंशपुराणे अतिनिचितामिवायुजलभूमिलतातरमिः क्षितिरपचेतनैश्च गृहकल्पितदेवतकैः । रविविधुतारकाग्रहगणैर्जननेग्रपथगंगनमतोऽस्तु मूढिरिह कस्य जनस्य न वा ॥४॥ सदसदने कमेकमय नित्यमनित्यमपि स्वकपररूपभेदमपि शेषमशेषपरम् । गुणगुणिकार्यकारणमिदाद्यसिलात्मतया जगदिदमित्यमी नियमिनो दृढमूदतया ॥४८॥ यदि च परस्परब्युदसनन्यसनाः स्युमपा स्फुटमितरतरक्षणतया नमृपा हि तथा । निगमनसंग्रहन्यवहृतिप्रमुखाश्च नयाः सकलनयप्रमाणपरिनिश्चितवस्तुनि याः ॥४९॥ 'पुरुषपुरस्सरेऽमिरुचिरन्यनिवृत्तिरुचेमुनिपति शासनामिनिरतस्य जनस्य हि सा। सुगतिमयसतो विशति सिद्धिमुखान्वयिनी शुभमसिलार्थगोचरमुदारचरित्रमपि ॥५०॥ पतगुणशीलराशिरतिघोरतपी विविधं विमलमिदं यतो भवति दर्शनशुद्धियुतम् । 'जननजरामृतिक्षयकरौं सुखदा भुवि तां भजतु जनस्ततो जिनगुणग्रहणामिरतः ॥५१॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृतौ दुगोत्पत्तिवर्णनो नामकोनपञ्चाशः सर्गः ॥१६॥ देवमूढ़ता और गुरुमूढ़ता इन तीन मूढ़ताओंरूप अन्धकारका समूह बहुत प्रबल है, वह जगन्के जीयोंके पवित्र नेत्रको अच्छी तरह आच्छादित कर रहा है और इसकी कोई ओषधि भी नहीं है इसी अन्धकारके कारण देखनेका इच्छुक मनुष्य भी पद-पदपर आकुल होता हुआ तत्त्व और अतत्त्वको देखनेमें क्या समर्थ हो पाता है ? अर्थात् नहीं हो पाता ।।४६।। यह पृथिवी अग्नि, वायु, जल, भूमि, लता और वृक्षोसे तथा मन्दिरोंमें कल्पित अचेतन देवोंसे व्यात है और आकाश मनुष्योंके नेत्रगोचर सूर्य, चन्द्र, तारा तथा ग्रहोंके समूहसे व्याप्त है इमलिए इनके विपयमें किसे मूढता नहीं होगी ? भावार्थ-पृथिवी और आकाश कल्पित देवताओंसे भरे हुए हैं इसलिए विवेकसे विचारकर यथार्थ देवका निर्णय करना चाहिए ॥४७॥ यह मंसार कथञ्चित् सत् है, कथञ्चित् असत् है, कथञ्चित् एक है, कथञ्चित् अनेक है, फयश्चित् नित्य है, कथञ्चित् अनित्य है, कथञ्चित् स्वरूप है, कश्चिन् पररूप है, कश्चित् सान्त है, कथञ्चित् अनन्त है, और गुण-गुणी तथा कार्य-कारणके भेदसे अनेक रूप है फिर भी ये संमारके प्राणी गाद मूदताके कारण एकान्तवादमें निमग्न हैं ॥४८॥ समस्त नयों और प्रमाणोंके द्वारा निश्चिन वस्तुके विषयमें जो नेगम, संग्रह तथा व्यवहार आदि प्रमुख नय माने गये हैं वे यदि परस्परमें एक दूसरका निषेध करते हैं तो मिथ्या है और परस्पर एक दुसरंपर दृष्टि रसते हैं तो ममीचीन हैं ॥४९॥ अन्य देवताओंकी मचिसे रहित एवं जिनेन्द्र भगवानके मामनमें निरन मनुष्यको जो जीव आदि तत्त्वांमें प्रगाढ श्रद्धा है उसकी यही श्रद्धा यिना किमी प्रयत्न के मोम-मुखसे सम्बन्ध जोड़नेवाली मुगति अथया सम्यग्ज्ञानको और शुभ एवं ममस्त पदार्थोको विपय करनेयाले उत्कृष्ट चारित्रको भी प्राप्त होनी है। भायार्य-मनुष्य को श्रद्धारूप परिणनि ही मम्यग्ज्ञान नथा मम्यचारित्रकी प्राप्तिका कारण है।॥५०॥ यह प्रत गुण और शोलको राशि नथा नना प्रकारका अत्यन्त घोर तप कि दर्शनको शुद्धिसे युद होनेपर ही निर्मल होता है इसलिए जिनेन्द्र भगवान गुण-महण करने में तत्पर मनुष्यको पाहिए कि पह जन्म, बुदापा और मृत्युका भय फरनेवाली एवं मुरादायी दर्शनको मुद्रिका आराधन कर अपने मम्यग्दर्शनको निर्मल यनाये ॥५॥ इस प्रकार परिष्टनेमि पुराण के संग्रहमे युक्त, जिनसेनाचार्य रपित हरियश पुराणमें गांकी उत्पति वर्णन करनेशला उनचासवाँ सर्ग समाप्त हुभा ॥ell १. गुलामभि म१२. मुनिपनियागनासामनाभिरतम्य म० । ३. मिदिममान्यपिन म..। 1. भात पिकामु र चामनः म., :.1 मस्मिन् पार्ट एलोभन मनात यकी।

पञ्चाशत्तमः सर्गः इत: 'केनापि यणिना धनध्यमगिराशिमिः । जरासन्धो भूपो दृष्टः स्वक्रयाणकहेतुना ॥१॥ राष्ट्रा कस्मात्समानीताः प्रोवाय मगधेश्वरः । द्वारवरयाः प्रभो एते यत्र राजाऽच्युतो बली ॥२॥ यादवेन्द्रशिवाय्योनें मिस्लीर्थकरोऽभवत् । मामान् पचदा तन रखवृष्टिः कृता सुरः ॥३॥ यादवानां च माहाण्यं ध्रुरवा राजगृहाधिपः । वणिजः तार्किकभ्यश्च जातः कोपारणेक्षणः ॥४॥ यवृद्धि मिति श्रुत्वा श्रुतवृद्धिविलोचनम् । प्रणम्य गणिनं भूपः अंणिकोऽपच्छदिग्यसौ ॥५॥ मणिराशिविवाम्मोधा महागुणमरीचिषु । प्रख्यातेप्वखिले लोक यादवेत्रतिभूरिषु ॥६॥ भनेकाहपनियूंददायें हरी श्रुते । किमचेष्टत राजासी मगवन्मगधाधिपः ॥७॥ ततो गणभृदाचण्यावनयानरमुग्ययोः । वृत्तं श्रेणिकभूपाय गुध्यावहितात्मने 168 बुद्धवार्ती जरासन्धः सन्धि प्रनि पराङ्मुखः । प्रमुफ्यमन्त्रिभिः सत्रा मन्त्रमारमते स्म मः ॥९॥ उपेक्षिताः कुतो हेतो मन्त्रिणो मणतारयः । वार्थी प्रवृद्धसन्तानास्तरङ्गा इच मगुराः ॥१०॥ मन्त्रिणी हि प्रमोश्चक्षुर्निमंलं चारचक्षुषः । ते कथं स्वामिनं स्वं च वयन्ति पुरः स्थिताः ॥१३॥ यदि नाम मह धर्यप्रमत्तेन मया द्विपः । नालक्ष्यन्त प्रतन्याना युप्मामिस्तु कथं तु ते ॥१२॥ नोच्छिोरन्महोद्योगर्जातमात्रा यदि द्विपः । दुःसयन्ति दुरन्तास्ते ब्याधयः कुपिता इव ॥१३॥ इधर कोई एक वणिक अपना खरीदा हुआ माल वेचनेके लिए बहुत-से अमूल्य मणि लेकर राजा जरासन्धसे मिला ॥१॥ उन मणियोंको देखकर राजा जरासन्धने उससे पूछा कि ये मणि तुम कहाँ से लाये हो ? इसके उत्तरमें वणिक्ने कहा कि हे स्वामिन् ! ये मणि इस द्वारिकापुरीसे आये हैं जहाँ अत्यन्त पराक्रमी राजा कृष्ण रहते हैं ।।२।। यादवोंके स्वामी कृष्ण समुद्रविजय और उनकी रानी शिया देवीके जय नेमिनाथ तीर्थकर उत्पन्न हुए थे तय पन्द्रह मास तफ देयोंने रन-वृष्टि की थी ।३।। उन्हीं रनों से ये रख लाया हूँ। वणिक तथा मन्त्रियोंसे इस प्रकार यादवोंका माहात्म्य सुनकर जरासन्ध क्रोधसे लाल-लाल नेत्रोंका धारक हो गया है। इस प्रकार यादवोंकी वृद्धि सुनकर राजा श्रेणिकने श्रुतज्ञान रूपी नेत्रके धारक गौतम गणधरको नमस्कार कर पूछा कि है मगपन ! महागुण रूपी किरणांसे मुशोभिन, ममुद्र में मणियोंकी राशिके समान ममस्त लोकमें प्रख्यात अत्यधिक यादवों में जब जरामन्धने अनेक युद्धोंमें जिनका दृढ़ पराक्रम परिपूर्णताको प्राम हो चुका था ऐसे कृष्णका नाम सुना लप उमकी क्या चेष्टा हुई ? सो कृपा कर कहिए ।।५-७॥ सुदनन्तर गोलम गणएर, श्रवण करने के लिए उसुरू राजा श्रेणियले लिए दोनों नर- श्रेष्ठ -जरामन्य और कृष्णका चरित इस प्रकार कहने लगे--11८ यादयाँका ममाचार जानकर जगसन्ध मन्धिसे विमुख हो गया और मुग्य मन्त्रियों फसाय मन्त्र करने लगा। उमने पूछा कि हे मन्त्रियो ! यताओ तो मही ममुद्र में बदनी हुई तरहॉफे ममान मंगुर शत्रु आजतक उपेक्षित फैसे रहे आये ? -१०॥ गुमचर रूपी नेत्रोंसे युक्त राजाफे मन्त्री ही निर्मल चक्षु है फिर वे मामने पड़े रहकर म्यामीको तथा अपने-आपको क्यों योग्या देते हैं। यदि महान ऐश्वर्यमें मत्त रहनेवाले मने उन शत्रुओं को नहीं देगा तो आप लोगोंसे अट कैसे रह गये ? आप लोगोंने उन्हें क्यों नहीं देखा ? ना यदि शत्रु उत्पन्न होते हो महान प्रयत्नपूर्वक नष्ट नहीं किये जाते हैं नो ये फोपको प्राम १. पेनचिदगिग अन०, म., १०, ५०। २ सकियाएक-~म.। ३. 'मारापर. पना सारित दापया प्रभा वल्ली' म.न.पारमा यो..। ५. मगगन्मापारियः। ६. मारमी ममः म ...भरसारण म.। महारिपामा।

५८४ हरिवंशपुराणे कंग जामातरं हत्या भानरं चापराजितम् । प्रविष्टाः शरणं दुष्टा यादवा यादमापतिम् ॥१४॥ यद्यप्यनवगाह्याब्धिगम्मीरोदरमाश्रिताः । उपायानायनिकृष्टा वध्यास्ते मे झपा यथा ॥१५॥ द्वारिकामधितिष्टन्तः संतिष्ठन्ते कुतोऽमयाः । तावदेव हि ते यावन मे कोपानली ज्वलेत् ॥१६॥ इयन्तं कालमज्ञाता जातिभिः सह मुस्थिताः । ज्ञातानामधुना तेषां सुस्थितिमद्विषां कुतः ॥१७॥ साम्नश्वोपप्रदानग्य न ते स्थानं कृतागसः । ततो युप्मामिरेकान्तात्स्थाप्यतां भेददण्डयोः ॥१८॥ दण्डोपायप्रधानं तं स्वामिनं मन्त्रिणस्तत. । प्रशाम्य प्रणताः प्रोचुः प्रसादपदवीस्थिताः ॥१९॥ आकर्यतां यथा नाथ विदन्तोऽपि वयं द्विषाम् । द्वारिकायां महावृद्धि कालयापनया स्थिताः ॥२०॥ यादवान्वयसंभूताः स्वर्भुवामपि दुर्जयाः । श्रीनेमिर्वासुदेवश्च वलदेवश्च ते त्रयः ॥२१॥ स्वर्गावतारकाले यः पूजितो वमुवृष्टिमिः । सुरेन्द्ररमिषिक्तश्च जिनो जन्मनि मन्दरे ॥२२॥ स कथं युधि जीयत भवतामररक्षितः । युक्तेनापि समस्तेन राजकन भुवस्तले ॥२३॥ बलकेशवयोश्चापि सामर्थ्य मवता न किम् । तच्छ्रुतं बहुयुद्धेषु शिशुपालवधादिपु ॥२४॥ यस्पक्षाः पाण्डवाश्चण्डाः प्रतापार्जितकीर्तयः । विद्याधराश्च बहवो वैवाहिकपथस्थिताः ॥२५॥ कोट्यो यन्न कुमाराणां प्रसिद्धा रणशालिनाम् । स्वामिनर्धचतुर्थास्ते जीयन्ते यादवाः कथम् ॥२६॥ अन्तस्थानप्यपां पन्युस्तान कदाचिदपेक्षया । मद्रीता इति मामस्था नयमार्गविदो यदून् ॥२७॥ हुई बीमारियोंके समान दुःख देते हैं और उनका अन्त अच्छा नहीं होता ॥१३॥ ये दुष्ट यादव मेरे जमाई कंस और भाई अपराजितको मारकर समुद्रकी शरणमें प्रविष्ट हुए हैं ।।१४॥ यद्यपि वे प्रवेश करने के अयोग्य समुद्रके मध्यभागमें स्थित हैं तथापि उपाय रूपी जलसे खीचार मछलियोंके समान मेरे वध्य हैं ।।१५।। द्वारिकामे रहते हुए वे निर्भय क्यों हैं ? अथवा वे तभीतक निर्भय रह सकते हैं जबतक कि मेरी क्रोधाग्नि प्रज्वलित नहीं हुई है ।।१६।। इतने । ममयतक मुझे उनका पता नहीं था इसलिए अपने कुटुम्बीजनोंके साथ वे सुखसे रहे आये पर अब मुझे पता चल गया है इसलिए उनका सुख-पूर्वक रहना कैसे हो सकता है ? ॥१॥ तीन अपराध करनेवाले वे साम और दानके स्थान नहीं हैं इसलिए आपलोग एकान्तरूपसे उन्हें भेद और दण्डके ही पक्षमें रखिए ॥१८॥ तदनन्तर प्रधान रूपसे दण्डको ही उपाय समझनेवाले स्वामी जरासन्धको शान्त कर प्रमादके मार्गमें स्थित मन्त्रियोंने नम्नीभूत हो कहा कि हे नाथ ! हमलोग शत्रुओंकी द्वारिका में होनेवाली महा वृद्धिको जानते हुए भी समय व्यतीत करते रहे इसका कारण सुनिए ।।१९- २०}यादवोंके थंझमें उत्पन्न हुए श्री नेमिनाथ तीर्थकर श्री कृष्ण और बलदेव ये तीन महानु भाव इतने बलवान हैं कि मनुष्योंकी तो बात ही क्या देवांके लिए भी उनका जीतना कठिन है ॥२१॥ स्वर्गायतारक ममय जो रत्नोंकी वृष्टिसे पूजित हुआ था, जन्म के समय इन्द्रोंने मुमेरु पर्वतपर जिमका अभिषेक किया था और देव जिसकी सदा रक्षा करते हैं यह नेमि जिनेन्द्र युद्ध में आपके द्वारा कैसे जीता जा मकता है अथवा पृथिवी तलके समस्त राजा भी एकटे होकर उसे कैसे जीन मकते हैं ? ॥२२-२३।। शिशुपालके यधको आदि लेकर जो अनेक युद्ध हुए उनमे क्या आपने बलदेव और कृष्णकी उम लोकोत्तर मामर्थ्यको नहीं सुना ? ॥२१ प्रतापसे कोनिको उपार्जित करनेयाले महातेजस्वी पाण्डय तथा वियाह सम्बन्धसे अनुकूलता दिपलानेवाले अनेक विद्याधर इस समय जिनके पश्नमें ॥२५|| और जिनके साढ़े तीन फरोड़ युमार रणयियाम कुमल हैं वे यादव फैसे जीते जा मरते हैं ? २६ नय मार्गके जानकार १. प्रति म । २. दारिकायधि नियन्त. म., ग•| १ मन्त्रिणम्नया म.। ५. मालि: म. 1 ..यो म. । .. मन्दिरे म० । मन्दो-मेरो।

पञ्चाशत्तमः सर्गः देवकालबलोपेना देवताकृतरक्षणाः । सुप्तन्यानोपमा देव ! तावत्तिष्ठन्तु यादवाः ॥२८॥ श्रास्महे वयमप्यत्र कालयापनया प्रभो!। स्वाज्ञ स्वपर कालानां याप्यावस्था हि शस्यते ॥२९॥ अनयावस्थयाऽऽमीने यि तेषां प्रकोपिनाम् । द्विषां प्रनिविधानाय प्रतिपद्यस्व पौरुषम् ॥३०॥ इत्यादि मन्त्रिमिः पथ्यं नथ्यं विज्ञापितं प्रभुः । नाग्रहीक्षयकाले हि ग्राही ग्राहं न मुञ्चति ॥३१॥ सचिवानपकाशु प्रमोपाय नृपो द्विपाम् । दूतं सोऽजिनसेनास्यं प्राहिणोद्वारिका पुरीम् ॥३२॥ म प्राच्यानां प्रतीच्यानामपाच्यानां च भूभृताम् । उदीच्यानामगस्थानां मध्यदेशाधिनासिनाम् ॥३३॥ चतुरङ्गवलेशानां शासनानतिलविनाम् । दूतानजीगमक्षिप्रमायान्विनि पराक्रमी ॥३॥ दूतदर्शनमात्रेण कर्णदुर्योधनादयः । ते संप्राप्ता जरासन्धं सत्यसन्धाहितैषिणः ॥३५॥ नृपैस्तैरनुयातोऽमो तनयायेमहाबलः । निमित्तार्यमाणोऽपि प्रतस्येऽरिजिगीपया ॥३६॥ म दूतोऽजितमेनोऽपि स्वामिकार्यहितः पुरीम् । सुद्वारा द्वारिकां प्राप सुकृतीय दिवं कृती ॥३७॥ भविश्य नगरी रम्यामनेकाद्भुतसगुलाम् । दृश्यमानो जनैः पौरंगसमाद नृपालयम् ॥३८॥ अशेषयादवाकीणां मोजपाण्डवसंयुताम् । समां स प्राविशविष्णोः प्रतीहारनिवेदितः ॥३९॥ कृनप्रणतिरध्यास्य दापितासनमग्रतः । वक्तुं प्रारमत स्वामिबललामावलेपत्तः ॥४०॥ आयंतां समाधाय मनः सफलयादवैः । यथा शारित महाराजो मागधः परमेश्वरः ॥४१॥ यदु किसी समय किसी अपेक्षा समुद्रके मध्य जाकर रहे थे। वे हमसे भयभीत हैं। ऐसा मत समझिए ।।२७। इसलिए हे देव ! जा देव और कालके बलसे महित हैं, देव जिनकी रक्षा करते हैं और जो सोते हुए सिंहके समान हैं ऐसे यादय उधर द्वारिकामें सुखसे रहें और इधर हम लोग भी समय व्यतीत करते हुए सुखसे रहें क्योंकि हे उत्तम आज्ञाके धारक ! प्रभो ! जिसमें • अपना और परका समय सुखसे व्यतीत हो वही अवस्था प्रशंसनीय कही जाती है ।।२८-२९।। आपके इस अयस्थासे रहनेपर भी यदि वे क्रोध करते हैं तो उनका प्रतिकार करनेके लिए पुरु- पार्थको स्वीकृत करो ॥३०|| इसे आदि लेकर मन्त्रियोंने यद्यपि हितकारी एवं सत्य निवेदन किया तथापि जरासन्धने उसे कुछ भी ग्रहण नहीं किया सो ठीक ही है क्योंकि विनाशके समय हठी मनुष्य अपना हठ नहीं छोड़ता ।।३१।। राजा जरासन्धने मन्त्रियोंको अनमुना कर शत्रुओंको शीघ्र ही कुपित करनेके लिए अजितसेन नामक दूनको द्वारिकापुरी भेजा ॥३२॥ पराक्रमी राजा जरासन्धने चतुरङ्ग सेनाओंके स्वामी, एवं आज्ञाका उल्लङ्घन न करनेवाले पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर दिशाओं, पर्वतों एवं मध्यदेशके निवासी राजाओंको 'आप लोग जल्दी आइए' यह कहकर दूत भेजे ।।३३-३४॥ दूतको देखते ही सत्यप्रतिज्ञ एवं हितको चाहनेवाले कर्ण, दुर्योधन आदि राजा, जरामन्धके पास आ पहुँचे ॥३५।। उक्त राजा तथा महाबलवान पुत्र आदि कुटुम्वीजन जिसके पीछे-पीछे चल रहे थे ऐमा जरासन्ध, खोटे निमित्तोंसे रोके जानेपर भी शत्रुओंको जीननेकी इन्टासे चल पड़ा ।।३६|| उधर जिस प्रकार पुण्य कार्य करनेवाला कुशल मनुष्य स्वर्ग जा पहुंचता है, उमी प्रकार स्वामीके कार्यमें लगा हुआ अजितसेन दूत भी उत्तमोत्तम द्वारोंसे युक्त द्वारिका नगरीमें जा पहुँचा ॥३७॥ अनेक आश्चर्यकारी रचनाओंसे व्याम सुन्दर द्वारिकापुरीमें प्रवेशकर नगर- यासी-जनोंके द्वारा देखा गया वह दूत क्रम-क्रमसे राजमहल में पहुँचा ।।३८॥ द्वारपालके द्वारा सूचना देनेपर उमने समस्त यादवोंसे व्यात एवं भोज और पाण्डयोंसे युक्त श्री कृष्णकी सभा में प्रवेश किया ॥३॥॥ प्रणाम करने के बाद आगे दिलाये हुए आमनपर बैठकर उमने स्वामी के बलकी प्राप्तिसे उत्पन्न घमण्डसे इस प्रकार योलना शुरू किया ।।४।। यह बोला कि गजाधिराज महाराज जगमन्ध जो आज्ञा देते है उमे समम्न यादय ५८६ . हरिवंशपुराणे यूयमेव स्फुटं घूत किमनिष्टं कृतं मया । युप्माकं येन साशङ्काः प्रविष्टाः मागरोदरम् ॥५२॥ सापराधतया यूयं यययुद्भूतमीतयः । दुर्ग श्रितास्तथाप्यस्मन्नमयं नमतैत्य माम् ॥४३॥ अथ दुर्गबलाय्यं तिष्टतानतिवर्जिताः । एपोऽहं सागरं पीरवा यलैः कुवें क्दर्थनाम् ॥४४॥ अज्ञातायस्थितीनां च कालदेशवलं बलम् । अधुना ज्ञातवार्तानां कालदेशयलं कुतः ॥४५॥ वचोहरवचः श्रुत्वा कुपिता निसिला नृपाः । कृष्णादयो जगुस्तन भृकुटीकुटिलाननाः ॥४६॥ आयात्यासनकालोऽसौ समस्नबलसंयुतः । रणानिध्यं ददामोऽस्मै समामोत्कण्ठिता धयम् ॥४०॥ इत्युक्त्वा स विसृष्टस्तै रुक्षवाग्यज्रताडितः । गत्वा स्वस्यामिने पूर्व निवेद्य कृतितां गतः ॥४८॥ विमलामलशार्दूलाः समुद्रविजयं ततः । मन्त्रिणो मन्ननिपुणाः संमभ्येति व्यजिज्ञपन् ॥४९॥ शान्तये साम लोकस्य स्यारस्वपक्षविपक्षयोः । मागधेन समं साम तस्माद्राजन् प्रयुज्महे ॥५०॥ शातिवर्गः समस्तोऽयं कुमारनिकरादिक. । अपायवहुले युद्ध संशयः कुशलं प्रति ॥५१॥ सन्ति योधा यथाऽस्माकममोघशरवपिणः। साधनो मागधस्यापि तथैव मुनि विश्रुतः ॥५२॥ तदेवस्थापि हि शानेरपायो रणमूर्धनि । यथा शोस्तथास्माकगतिदु.सकरी मवेत् ॥१३॥ थतो विश्वजनीनाथं साम तावत्प्रशस्यते । तदधं प्रेप्यतां दूतो मागधान्तिकमस्मयात् ॥५४॥ मन स्थिर कर सुनें ॥४१॥। उनका कहना है कि आप ही लोग स्पष्ट बताओ कि मैंने आपका क्या अनिष्ट किया है ? जिससे कि भयभीत हो आप लोग समुद्रके मध्यमें जा बसे हो ॥४॥ यद्यपि अपराधी होने के कारण भयभीत हो तुम लोगोंने दुर्गका आश्रय लिया है तथापि मुझसे तुम्हें भय नहीं है तुम लोग आकर मुझे नमस्कार करो ॥ ४३ ॥ यदि दुर्गका बल पा तुम लोग बिना नमस्कार किये यहाँ रहोगे तो यह मै समुद्रको पीकर सेनाओंके द्वारा तुम्हारी अभी हाल दुर्दशा कर दूंगा ॥४४॥ जबतक तुम्हारे यहाँ रहनेका पता नहीं था तभी तक तुम्हें काल और देशका वल, वल था पर आज पता चल जानेपर काल और देशका बल कैसे रह सकता है १ ॥४५॥ दूतके उक्त वचन सुनकर कृष्ण आदि समस्त राजा कुपित हो उठे और भौहोंसे मुखको कुटिल करते हुए कहने लगे कि जिसकी मृत्यु निकट आ पहुँची है ऐसा तुम्हारा राजा समस्त सेनाओं के साथ आ रहा है सो युद्धके द्वारा हम उसका सत्कार करेंगे। हम लोग संग्रामके लिए उत्कण्ठित है ॥४६-४७॥ इस प्रकार कहकर यादवोंने दूतको विदा किया। वह उनके रूक्ष वचनरूपी वसे ताडित होता हुआ द्वारिकासे चलकर अपने स्वामीके पास गया और सब समाचार कहकर कृतकृत्यताको प्राप्त हुआ ॥४८॥ तदनन्तर दूतके चले जानेपर मन्त्र करनेमें निपुण विमल, अमल और शार्दूल नामक मन्त्रियोंने सलाहकर राजा समुद्रविजयसे इस प्रकार निवेदन किया ॥४९।। हे राजन् ! क्योंकि साम, स्वपक्ष और परपक्षके लोगोंको शान्तिका कारण होगा इस- लिए हम लोग जरासन्धके साथ सामका ही प्रयोग करें। यह जो कुमारोंका समूह आदि है वह सब स्वजनोंका समूह है । अपायबहुल युद्ध में इन सबकी कुशलताके प्रति सन्देह है ।।५०-५१।। जिस प्रकार हमारी सेनामें अमोघ बाणोंकी वर्षा करनेवाले योद्धा हैं उसी प्रकार जरासन्धको सेना भी पृथिवीमें प्रसिद्ध है ।। ५२ ॥ युद्धके अग्रभागमें यदि एक भी स्वजन की मृत्यु हो जायेगी तो वह जिस प्रकार शत्रुके लिए दुःखका कारण होगी उसी प्रकार हमारे लिए भी दुःखका कारण हो सकती है ।। ५३ ।। इसलिए सबकी भलाईके लिए साम ही प्रशंस- नीय उपाय है । अतः अहङ्कारको छोड़कर साम-शान्तिके लिए जरासन्धके पास दूत भेजा - १. पूर्वी म०। २. दएइस्य म० । ३. माधवान्तिक म ।

पञ्चाशत्तमः सर्गः । - मागधः शाम्यमानोऽपि साना यदि न शाम्यति । तदा तदुचितं कुर्मःको दोषः सामयोजने ॥५५॥ इति मन्त्रिमिरामन्य राजा विज्ञापितस्तदा । को दोप इति संमन्व्य लोहजतमजीगमत् ॥५६॥ स दक्षः शौर्यसंपन्नः कुमारो नीतिलोचनः । जगाम निजसैन्येन जरासन्धेन सन्धये ॥५७॥ पूर्वमालवमासाद्य कृतसैन्यनिवेशनः । प्राप्ती कान्तारमिक्षार्थ कान्तारे सार्थयोगिनी ॥५४॥ मासोपवासिनौ दृष्ट्वा तिलकानन्दनन्दको । प्रतिगृह्यानपानायैः पञ्चाश्चर्याणि लब्धयान् ॥५९॥ तीर्थ देवावतारात्यं ततः प्रभृति भूतले । भूतं भूतसहसाणां पापोपशमकारणम् ॥६०॥ दूतो गत्वा जरासन्धं सन्धान प्रत्यसम्मुसम् । प्रत्यबोधयदेकान्ते प्रतिबोधनपण्डितः ॥६१॥ लोहजरवचोऽन्यन्तप्रसन्नः प्रतिपन्नवान् । स सन्धानं जरासन्धः पण्मासावधिकं ततः ॥६२॥ दूतः पूजां नृपान्प्राप्य स प्राप्य द्वारिका ततः । समुद्र विजयाद्ययं निवेद्य स्थितधान् कृती ॥६३॥ साम्येनैव ततो वर्ष सामग्रोप्रत्यपेक्षया । पूर्णे पूर्णमहासन्धो महामामन्तसन्ततिः ॥६४॥ जरासन्धोऽन मंप्राप्तः सैन्यसागरद्धदिक । कुरुक्षेत्रं महाक्षत्रप्रधानप्रधनोचितम् ॥६५॥ पूर्वमभ्येस्य तत्रैव केशवोऽपरसागरः । तस्थावापूर्यमाणः सन् वाहिनीनिवहै निजैः ॥६६॥ तत्रापाच्या नृपाः केचिदुदीच्याश्चापरान्तिकाः । संबन्धिनः सृता विष्णुं सकलैः स्वबलयुनाः ॥६७॥ जाये ।। ५४ ॥ हॉ, सामके द्वारा शान्त करनेपर भी यदि जरासन्ध शान्त नहीं होता है तो हम लोग फिर उसके अनुरूप कार्य करेंगे। इस प्रकार साम उपायके अवलम्बन करनेमें क्या दोप है ॥५५॥ इस प्रकार मन्त्रकर मन्त्रियोंने जब राजा समुद्रविजयसे कहा तो उन्होंने उत्तर दिया कि 'क्या दोप है ?' दूत भेजा जाये। इस प्रकार सलाह कर उन्होंने लोहजन कुमारको भिजवा दिया ॥५६॥ कुमार लोहजङ्घ बहुत ही चतुर, शूर-वीर और नीतिरूपी नेत्रका धारक था। वह अपनी सेना ले जरासन्धके साथ सन्धि करनेके लिए चला ।।५७|| पूर्वमालय देशमें पहुँचकर उसने यहाँ के वनमें अपनी सेनाका पड़ाव डाला, वहाँ साथ-साथ विचरनेवाले तिल- कानन्द और नन्दन नामक दो मुनिराज आये। वे दोनों मुनि मासोपयासी थे और 'वनमें आहार मिलेगा तो लेंगे अन्यथा नहीं' यह नियम ले वनमें विहार कर रहे थे। उन्हें देख कुमार लोहजरने उन्हें पडगाह कर आहार दिया और उसके फलस्वरूप पश्चाश्चर्य प्राप्त किये ॥५८-५९।। उनी समयसे वह स्थान पृथिवीतलपर 'देवावतार' नामक तीर्थ बन गया और हजारों प्राणियोंके पाप शान्त होनेका कारण हो गया ॥६०॥ जरासन्ध यद्यपि सन्धि करनेके पक्षमें नहीं था तथापि समझानेमे चतुर दूत लोहजङ्घ ने जाकर उसे एकान्तमें समझाया ॥६१|| लोहजसके वचनोंसे जरासन्ध बहुत प्रसन्न हुआ और उमने छह माह तकके लिए सन्धि स्वीकृत कर ली ॥३२॥ तदनन्तर राजा जरासन्धसे सम्मान प्राप्तकर लोहजच द्वारिका थापस लौट आया और समुद्रविजय आदिके लिए मुय समाचार मुनाकर कृतकृत्य हो सुखसे रहने लगा ॥६३|| तदनन्तर युद्धकी तैयारीका ध्यान रख यादवोंने एक वर्ष शान्तिसे व्यतीत किया। इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण हो जानेपर महा- प्रतिक्षाको पूर्ण करनेवाला जरासन्ध बड़े-बड़े सामन्तोंके समूहसे युक्त तथा सेनारूपी सागरसे दिशाओंको व्याप्त करता हुआ बड़े-बड़े राजाओंके युद्धके योग्य कुरुक्षेत्रके मैदानमें आ पहुंचा ॥६४-६५।। अपनी सेनारूपी नदियोंके समूहसे भरे हुए कृष्णरूपी दूसरे सागर भी पहले ही आकर यहाँ आ जमे थे ॥३६] उस समय कृष्णके सम्बन्धी कितने ही दक्षिण-उत्तर और पश्चिमके राजा अपनी-अपनी समस्त सेनाओंके साथ आकर कृष्णसे आ मिले।। ६७ ।। १ पूर्णमहासन्धी म०। २ महासामन्तसन्नतिः म० ।

५८८ १ हरिवंशपुराणे दशाः सान्त्वना भोजाः पाण्डवाश्चापि यान्धवाः । अन्ये च नृपशार्दूलाः प्रमिता हरये हिताः॥६॥ अक्षौहिणीपतिस्तत्र समुद्रविजयो नृपः । उग्रसेनोऽप्रणीः पुंसां तथैवाक्षाहिणीप्रभुः ॥६९॥ मेरुरक्षौहिणीस्वामी श्रीमानिक्ष्वाकुवंशजः । अक्षौहिण्यर्धनाथस्तु राष्ट्रवर्धनभूपतिः ॥७॥ तथार्धाक्षौहिणीनाथः सिहलानामधीश्वरः । राजा पारयश्चापि तत्समानवलो यली ॥७॥ दायादः शकुनवारश्चारुदत्तः पराक्रमी । अक्षौहिणीचनुांगपतिः कृष्णहितरितः ॥७२॥ वर्वरा यमनामीराः काम्बोजा इविडा नृपाः । श्रन्ये च बहवः शूराः शारिपक्षमुपाश्रिताः ॥७३॥ अक्षौहिण्या बहुगुणा जरासन्धमुपागताः । चक्ररत्नप्रभावेण वशीमावितमारतम् ॥७॥ अक्षौहिणीप्रमाणं तु सप्रमाणमुदीरितम् । वाजिवारणपतीनां स्थानां गणनायुतम् ॥७५॥ नवहस्तिसहस्राणि नवलक्षा रथा मताः । नय कोव्यस्तुरङ्गास्तु शतकोट्यो नरा नव ॥७६॥ यदुष्वतिरथो मेमिस्तथैव बलकेशवा । अतिक्रम्य स्थितान् सर्वान् भारतेऽतिरथांस्तु ते ॥७७॥ समुद्रविजयो राजा वसुदेवो युधिष्ठिरः । भीमकर्णार्जुना रुक्मी रोक्मणेयश्च सत्यकः ।।७८॥ सृष्टद्युम्नोऽप्यनारष्टिः शल्यो भूरिश्रवा नृपः । राजा हिरण्यनामश्च सहदेवश्च सारणः ॥७९॥ शस्त्रशास्त्रार्थनिपुणाः पराइमुखदयापराः । महावीर्या महाधैर्या राजानोऽमो महारथा. ॥८०॥ दशाह, सान्त्वना देनेवाले भोज और पाण्डव आदि बन्धुजन तथा अन्य अनेक उत्तमोत्तम प्रसिद्ध राजा श्री कृष्णके हितकी इच्छा करते हुए आ मिले ॥६८॥ वहाँ राजा समुद्रविजय एक अक्षौहिणोके स्वामी थे, पुरुपोमें अग्रेसर राजा उग्रसेन भी एक अक्षौहिणीका स्वामी था और इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न राजा मेरु भी एक अक्षौहिणीका अधिपति था। राष्ट्रवर्धन देशका राजा आधी अक्षौहिणीका स्वामी था ॥६९-७०।। सिंहल देशका राजा आधी अक्षौहिणीका प्रभु था और बलवान राजा पद्मरथ भी उसीके समान-अर्ध अक्षौहिणी प्रमाण सेनासे युक्त था।।७१॥ शकुनिका भाई वीर पराक्रमी चारुदत्त जो कि कृष्णके हितमें सदा तत्पर रहता था एक चौथाई अक्षौहिणीका स्वामी था ।।७२।। वर्वर, यमन, आभीर, काम्बोज और द्रविड़ आदिके अन्य शूर-वीर राजा कृष्णके पक्षमें आ मिले ॥७३॥ उस ओर चकरनके प्रभावसे भरतक्षेत्रको वश करनेवाले राजा जरासन्धको भी अनेक अक्षौहिणी सेनाएँ प्राप्त थीं ॥७४|| घोड़े, हाथी, पैदल सैनिक तथा रथोंकी गणनासे युक्त अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण इस प्रकार कहा गया है ।।७५। जिसमें नौ हजार हाथी, नौ लाख रथ, नौ करोड़ घोड़े और नौ-सौ करोड़ पैदल सैनिक हो उसे एक अक्षौहिणी कहते हैं॥७॥ यादवों में कुमार नेमि, बलदेव और कृष्ण ये तीनों अतिरथ थे। ये तीनो भारतवर्ष में जितने अतिरथ थे उन सबको अतिक्रान्त कर उन सबमें श्रेष्ठ थे ॥७|| राजा समुद्रविजय, वसुदेव, युधिष्ठिर, भीम, कर्ण, अर्जुन, रुक्मी, प्रद्युम्न, सत्यक, धृष्टद्युम्न, अनावृष्टि, शल्य, भूरि- श्रवस् , राजा हिरण्यनाभ, सहदेव और सारण, ये सब राजा महारथ थे। ये सभी शस्त्र और शास्त्रार्थमे निपुण, पराङ्मुस जीवोपर दया करनेमें तत्पर, महाशक्तिमान और महाधैर्यशाली १ वरगुणा म० । २ अक्षौहिण्यामित्यधिक सप्तत्या ह्यष्टभिः शतैः। रायुक्तानि सहस्राणि गजाना. मेरविशतिः । एवमेव रयाना तु संख्यानं कोर्तित बुधैं । पञ्चषष्टिसहस्राणि षट्शतानि दशैव तु । सस्यातास्तु. रगारतज्ज्ञविना रयतुरङ्गमै ॥ नृणा शतसहस्राणि सहस्राणि तथा नव । शतानि त्रीणि चान्यानि पञ्चाशच्च पटातय ॥ इत्यमरकोशीकायाम् । भारते अक्षौहिणीप्रमाणम्-अक्षौहिण्याः प्रमाणं तु खाशाष्टकदिकैगजे। रथरेते ये स्त्रिप्न, पञ्चप्नध पदातिमि ॥ गजा २१८७०, रथा २१८७०, अश्वा. ६५६१०, नराः १०९३५० इति ।

पञ्चाशत्तमः सर्गः ५८९ मनोभ्यपूर्वकाश्चाष्टौ शम्बो भोजो विदूरथः । द्रुपदः सिंहराजोऽपि शल्यो वज्रः सुयोधनः ॥८॥ पौण्डूः पद्मरयश्चापि कपिलो भगदत्तकः । क्षेमधून इमे सर्वे समाः समरथा रणे ॥८२॥ महानेमिधरावरनिषधोल्मुकदुर्मुसाः । 'कृतवर्मा वराटारयश्चारकृष्णश्च यादवाः ॥४३॥ शकुनिर्ययनो भानुदुशासनशिवण्डिनी । वाह्रीकमोमदत्तश्च देवशर्मा वकस्तथा ॥८॥ वेणुदारी च विक्रान्नो राजानोऽर्धरया इमे । विचित्रयोधिनो धीराः संग्रामप्यपराङ्मुसाः ॥८५।। श्रतः परं नृपाः सर्वे कुलमानयशोधनाः । रथिनः प्रथिताश्वामी यथायोग्यं बलद्वयं ॥१६॥ श्रणवोपमयोस्तत्र तदाभ्यर्णनिवेशयोः । सेनयोस्तूर्णमागन्य वर्णस्याभ्यर्णमाकुला ॥७॥ कुन्ती निष्णातसम्बन्धतनयानुमता मता । कानीनस्नेहसम्मारपरायत्तशरीरिका ॥८॥ कण्ठलना रुदन्ती तं प्रतिबोधयति स्म सा । मानापुत्रस्यसम्बन्धमादिमध्यावसानतः ॥४९॥ ततः कम्बलवृत्तान्तकुरुवंशावतारचित् । कुन्तीपाण्डुसुतत्वं तु निश्चिकायान्मनस्तदा ॥१०॥ सान्त.पुरण कर्णेन निर्णीतनिजवन्धुना । पूजिताग्रात्मजं कुन्ती जगाद जनितादरा ॥९१।। उत्तिष्ट पुत्र गच्छामो यत्र ते भ्रातरोऽखिलाः । तिष्ठन्त्युत्कण्ठिनाश्चान्य वैकुण्ठप्रमुखा निजाः ॥१२॥ कुरूणामीश्वरः पुत्र त्वमेव भुवि साम्प्रतम् । कृष्णस्य राममद्रस्य सम्प्रति प्राणवत् प्रियः ।।९३॥ त्वं राजावरजाग्रस्त छनधारी युधिष्ठिरः । भीमश्चामरधारी नु मन्त्रिमुग्यो धनञ्जयः ॥९॥ नकुलः महदेवेन प्रतीहारः सहस्फुटम् । अहं तु जननी नीत्या नित्यं तव हितोद्यता ॥१५॥ थे १७८-८०।। समुद्रविजयसे छोटे और वसुदेवसे बड़े अक्षोभ्य आदि आठ भाई, गम्ब, भोज, विदूरथ, द्रुपद, सिंहराज, शल्य, वन, सुयोधन, पौण्डू , पद्मरथ, कपिल, भगदत्त और क्षेम- धूर्त ये सब समरथ थे तथा युद्ध में समान शक्तिके धारक थे ।।८१-८२।। महानेमि, धर, अकर, निषध, उल्मुक, दुर्मुख, कृतवर्मा, वराट, चारुकृष्ण, शकुनि, यवन, भानु, दुश्शासन, शिखण्डी, 'बाहीक, सोमदत्त, देवशर्मा, वक, वेणुदारी और विक्रान्त ये राजा अर्धरथ थे। ये सभी राजा आश्चर्यकारक युद्ध करनेवाले एवं धीर-वीर थे तथा युद्धसे कभी पराङ्मुख नहीं होते थे 11८३-८५।। इनके सिवाय कुल, मान और यहारूपी धनको धारण करनेवाले समस्त राजा रथी नामसे प्रसिद्ध थे। ये राजा यथायोग्य दोनों ही सेनाओंमें थे ।।८।। समुद्रोंके समान दोनों पक्षी सेनाएँ जब पास-पास आ गयीं तय कुन्ती बहुत घबड़ायी। वह शीघ्र ही कर्णके पास गयी। यहाँ जानेमें उसे युधिष्ठिर आदि पुत्रोंने अनुमति दे दी थी। उस समय कन्या अवस्थाफे पुत्र कर्णके ऊपर जो उसका अपार स्नेह था उससे उसका शरीर विवश हो रहा था। उमने कर्णके कण्ठसे लगकर रोते-रोते आदि, मध्य और अन्तमें जैसा कुछ हुआ वह सब अपना माता और पुत्रका सम्बन्ध बतलाया। उसने यह भी बतलाया कि मैंने तुझे उत्पन्न होते ही लोकलाज भयसे कम्बलमें लपेटकर छोड़ दिया था। कर्ण कम्बल फे वृत्तान्नको जानता था और यह भी जानता था कि कुरुवंशमें मेरा जन्म हुआ है। अब कुन्ती कहनेसे उसने निश्चय कर लिया कि मैं कुन्ती और पाण्डुका पुत्र हूँ ॥८७-९०॥ अपने पन्धुजनोंका निर्णय कर कर्णने अपनी ममस्त रियोंके साथ कुन्तीकी पूजा की। तदनन्तर आदर दिसाती हुई कुन्तीने अपने प्रथम पुत्र कर्णसे कहा कि हे पुत्र! उठ, यहाँ चलें जहाँ तेरे सय भाई तथा श्रीकृष्ण आदि अपने अन्य आत्मीय जन तेरे लिए. उत्कण्ठिन हो रहे हैं ।।९१-२२॥ हे पुत्र ! इस समय पृथिवीपर कुमका स्वामी तू ही है और कृष्ण तथा बलदेव लिए प्राणोंक समान प्रिय है ॥ ९३ ॥ तू गजा है तेरा छोटा भाई युधिष्टिर तेरे ऊपर छत्र लगावेगा, भीम चॅवर टोरंगा, धनंजय मन्त्री होगा, महदेव और नकुल तेरे द्वारपाल होंगे और नौनि पूर्वक निरन्तर हित करनेमें उद्यन मैं तेरी माना हूँ ।।९४-९५।। १. तायां म..

हरिवंशपुरागे इति मातृश्चः श्रुग्या भ्रातृस्नेहवशोऽपि सः । जरामन्धोपकारस्तः स्वामिकार्यधरोऽप्रदत् ॥१६॥ ग्निरी प्रातरी लोके वान्धवान मुदुलंमाः । यद्यस्त्येवं तथाप्यत्र प्रस्तावे समुपस्थिते ॥९॥ मामिकाय परिन्यज्य बन्धुमार्यममांप्रतम् । मास्यं च हास्यं च मंमुख सांप्रतं रगे ॥९८॥ एताग्दा कार्य नु युद्धे मातृवशारने । योद्धग्यमन्ययोधर्हि स्वामिकार्यकृता मया ॥१९॥ निवृत्ते युधि जीवामो यदि दैववशाद्वयम् । मविता निश्चितोऽस्माकमम्य भ्रातृसमागमः ॥१०॥ प्रयाहि भ्रातृबन्धूनामनदेव निवेद्यताम् । इन्युक्त्वा पूजिता गया कुन्ती मर्व तयारीत् ॥१०॥ जरासन्धयले तत्र समभूभागवर्तिनी । चक्रव्यूहो द्विषां जिन्य रचित. कुगानुपः ॥१०२॥ चक्रस्यारमहसे हि राजसः ममास्थितः । तस्य राजमहयस्य परिणां तु शतं शतम् ॥१३॥ एककम्य नरेन्द्रस्य द्विमहमरया. स्थिताः । वाविपसहमाणि मदानां तानि पोडश ॥१०॥ निधनुर्धमागेन संयुना. सपदि स्थिताः । नरंन्दाः पट सहयाणि निविष्टास्तत्र नेमिषु ॥१०५॥ मभ्यार घ ममामाघ मुस्थिनो मागधः स्वयम् । राजपमहसः स श्रीमान् कर्णपुरस्परे ॥३०॥ तस्यैव मध्यमागे तु मन्यं गान्धारमैन्धवम् । दुर्योधनममतं तु घात राष्ट्रगढ़ स्थितम् ॥१०॥ मध्ये ध मायदेशाम्नु स्थितास्नय नरेश्वराः । पूर्वमागे स्पितालस्य शेषा नृपगणास्तमा १०॥ कुलमानधरा धीरा नरंगा वनमालिनः । पचासमक्लम्यूहा 'नमिसन्धिम्यवस्थिताः ॥१०॥ मन्तरान्तरसम्याम्नु गुस्मगुल्मनरोत्तमः । म्यूहस्य वामतमापि नानाम्यूनंग. स्थिताः ॥१०॥ इस प्रकार मानारे वचन सुनकर यद्यपि कर्ण भाइयोंके स्नेहसे विवश हो गया परन्तु जरामन्धने उमफे प्रनि जो उपकार किये थे उनसे स्वामी कार्यका विचार करता हुआ योला कि लोकमें माता-पिता, और भाई-यान्धव अत्यन्त दुर्लभ हैं यह यान यापि ऐमी ही है.परन्तु इस अपमरके उपस्थित होनेपर स्वामीका कार्य छोड़ भाइयोंका कार्य करना अनुचित , अनारन है और इम ममय जय कि युद्ध मामने है हास्यका कारण भी है ।।२६-२८। इस ममय तो म्यामीका कार्य करता हुआ मैं इतना ही कर सकता हूँ कि युद्ध में भाइयोंको छोड़कर अन्य योद्धाओंके माथ युद्ध कर २९॥ युद्ध समान होनेपर यदि भाग्ययझा हम लोग जीयित गहेंगे तो है माँ ! हमारा भाइयोके माय ममागम अवश्य ही होगा। नू जा और भाई- यात्ययारोननी सबर दे दें। इस प्रकार कहकर फर्णने माना पुन्तीकी पूजा पो और युन्नी ने जार उमरे र अनुमार मय कार्य किया ॥१०-१०|| घर ममान भूभागमें धर्तमान राजा जरामन्धकी सेनामें बाल गजाओंने शत्रुओंको जीतने लिए पानको रगना की ॥१०॥ उम चक्रव्यूहमें जो चकारगर रचना की गयी थी उमर पाहतार आरे थे, एक-एक आरंभ परयक राजा स्थित था, एक राजा मो-मोही. दो-दो बार ग्य थे, पाचगाँच हजार घोई ये और मोल-गोलह हजार पैन मंनिक १०३.२०१॥ परी भाग पाम घर हजार गजा स्थित थे और उन गामी घोड़ा आदिका परिमाग पूर्योक परिमागमे पीथाई भाग प्रमान या॥१०॥ आपापसार गजाभांगे मुमोमिन गजा जगमन्ध म्ययं मचक्र मध्यभागमें पारर भितmil गाया और मित्र देनाकी मेना, दुर्योधनमे महिन मौ पौग्य, और माता भी मी परी मन्समागमें स्थित थे l पुली मान धारण पानार. पोर. पगरमी पपाम गा मानी भरनी गंगार माय गपागकी मन्धियों पार | आगर पंप चीपो म्यान अपनी-अपनी पिशिष्ट मेनामि यु १२।२ Avir-...| Yat be...! HINgram: मनो। Emire, riमाद पनगर।

पञ्चाशत्तमः सर्गः ५९१ चक्रव्यूहस्तदा दक्ष रचितोऽसौ ग्यराजत । स्वसाधनमनस्तोपी परसाधनीतिकृत् ॥१११॥ चक्रव्यूह विदित्वा तं वसुदेवो विनिर्मितम् । चकार गरुडव्यूहं तद्भेदाय विशारदः ॥११२॥ अर्धकोटीकुमाराणां मुखे नस्य महात्मनाम् । स्थापिता रणशूराणां नानाशस्त्रास्त्रधारिणाम् ॥११३॥ वली हलधरस्तत्र शाईपाणिश्च मूर्धनि । स्थितावतिस्थौ वीरौ स्थैर्यानिर्जितभूधरी ॥१७॥ अङ्करः कुमुदो वीरः सारणो विजयो जयः। पभो जरत्कुमारोऽपि सुमुखोऽपि च दुर्मुखः ॥१५॥ सूनुर्मदनवेगाया दृढमुष्टिमहारथः । विदूरथोऽप्यनावृष्टिवसुदेवस्य येऽङ्गजाः ॥११६॥ रथरक्षान्विती रामकृष्णयोः पृष्टरक्षिणः । रथकोट्या समतस्तु पृप्टेमोजः प्रतिष्टितः ॥११७॥ पृष्टरक्षानृपास्तस्य मोजस्य नृपतेस्ततः । धारणः सागरश्चान्ये रणशीण्डा व्यवस्थिताः ॥११८॥ दक्षिणं पक्षमाश्चित्य सुतैः साऊं महारथैः । समुद्रविजयोऽतिष्टद्वलेन महता वृतः ॥११९॥ तम्पक्षरक्षणे दक्षाः कुमारा रिपुमारणाः । सत्यनेमिर्महानेमिदृढनेमिः सुनेमिना ॥१२०॥ नमिर्महारथश्चापि जयसेनमहीजयो । तेजःसेनो जयः सेनो नयो मेघो महाद्युतिः ॥१२१॥ दशाहश्चिापि विख्याताः शतशोऽन्ये च भूभृतः । रथकोटीचतुर्मागसहिताःसमवस्थिताः ॥१२२॥ वामपक्षमुपाश्रित्य रामस्य तनयाः स्थिताः । पाण्डवाश्च महात्मानः पण्डिता युद्धकर्मणि ॥१२३॥ उल्मको निषधश्चापि प्रकृतिद्युतिरप्यनः । सत्यकः शत्रुदमनः श्रीध्वनो ध्रुव इत्यपि ॥१२॥ राजा दशरथश्चापि देवानन्दोऽय शन्तनुः । अानन्दश्च महानन्दश्चन्द्रानन्दो महाबलः ॥१२५॥ पृथुः शतधनुश्चापि विपृथुश्च यशोधनः । दृढवन्धोऽनुवीर्यश्च सर्वशस्त्रभृतांवरः ।।१२६॥ राजाओंसे सहित थे। इनके सिवाय व्यूहके बाहर भी अनेक राजा नाना प्रकारके व्यूह बनाकर स्थित थे ।। ११० ।। इस प्रकार चतुर राजाओंके द्वारा रचित, अपनी सेनाके मनको सन्तुष्ट करनेवाला और शत्रुको सेनाके मनमें भय उत्पन्न करनेवाला वह चक्रव्यूह उस समय अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥११॥ इधर रचना करनेमें निपुण वमुदेवको जव पता चला कि जरासन्धकी सेनामें चक्र- व्यूहकी रचना की गयी है तब उसने भी चक्रब्यूहको भेदनेके लिए गरुड़ व्यूहकी रचना कर डाली ॥११२।। उदात्तचित्त, रणमें शूर-वीर तथा नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको धारण करने पाले पचास लाख यादव कुमार उस गरुड़के मुखपर खड़े किये गये ॥११३॥ धीर-बीर एवं स्थिरतासे पर्वतको जीतनेवाले अतिरथ, पराक्रमी वलदेव और श्रीकृष्ण उसके मस्तकपर स्थित हुए ।।११४|| अक्रूर, कुमुद, वीर, सारण, विजय, जय, पद्म, जरत्कुमार, सुमुख, दुर्मुख, मदनवेगाका पुत्र महारथ दृढमुष्टि, विदूरथ और अनावृष्टि ये जो वसुदेवके पुत्र थे वे बलदेव और कृष्णके रथको रक्षा करने के लिए उनके प्ठरक्षक बनाये गये । एक करोड़ रथोंसे सहित भोज, गरुड़के पृष्ठ भागपर स्थित हुआ ॥११५-११७॥ राजा भोजको पृष्ठ-रक्षा के लिए धारण तथा सागर आदि अन्य अनेक रणवीर राजा नियुक्त हुए ।।१२८।। अपने महारथी पुत्रों तथा बहुत बड़ी सेनासे युक्त राजा समुद्रविजय उस गम्ड़के दाहिने पंखपर स्थित हुए ॥११९।। और उनकी आजू-बाजूकी रक्षा करने के लिए चतुर, शत्रुओंको मारनेवाले सत्यनेमि, महानेमि, हढनेमि, सुनेमि, महारथी नमि, जयसेन, महीजय, तेजसेन, जय, सेन, नय, मेघ, महाद्युति, आदि दशाई (यादव ) तथा सैकड़ों अन्य प्रसिद्ध राजा पञ्चीस लाख रथोंके साथ स्थित हुए ।। १२०-१२२ ।। वलदेवके पुत्र और युद्ध कार्यमें निपुण महामना पाण्डव गरुड़के यॉये पक्षका आश्रय ले खड़े हुए ॥ १२३ ।। इन्हींके समीप उल्मुक, निपध, प्रकृतिद्युति, सत्यक, सत्रुदमन, श्रीध्यज, ध्रुव, राजा दशरथ, देवानन्द, शन्ननु, आनन्द, महानन्द, चन्द्रानन्द, महाबल, पृथु , शतधनु, विपृथु, यशोधन, दृढवन्ध और सब प्रकारके शस्त्रोंसे आकाशको भर १. मुख्ये म० । २. तेऽङ्गजाः म०1३. पृष्ठभोन म०1४ जयसेनो । ५ शतधनश्चापि म ।

५९४ हरिवंशपुराणे अन्योन्याह्वानपूर्व ते योद्धु लग्ना यथायथम् । 'राजानः क्रोधसम्मारभूमहविषमाननाः ॥१५॥ गजा गजैः समं लमास्तुरङ्गास्तुरंगः सह । रथा रथः संमं योद्धु पत्तयः पत्तिमिः सह ॥१६॥ ज्यारवै रथनि?पैगंजानां गर्जितेन च । मटानां सिंहनादैश्च दलन्तीव दिशो दश ॥१७॥ तत. परबलं दृष्ट्वा प्रवलं स्ववलाशनम् । नेमिपार्थबलाधीशा घृपहस्तिकपिध्वजाः ॥१८॥ ताक्ष्यकेतुमनोमिक्षाः स्त्रयं यो समुद्यताः । ऊरीकृत्य सुसाहाश्चक्रव्यूहरूष भेदनम् ॥१९॥ दध्मौ नेमीश्वरः शङ्ख शाकं शत्रुमयावहम् । देवदत्तं पृथापुत्रः सेनानीश्च बलाहक्म् ॥२०॥ राजानां निनदं श्रुत्या ततो व्याप्तदिगन्तरम् । स्वसैन्येऽभून्महोत्साहः परसैन्ये महाभयम् ॥२१॥ मध्य बिभेद सेनानीनमिदंक्षिणतः क्षणात् । अपरोत्तरदिग्मागं चक्रव्यूहस्य पाण्डवः ॥२२॥ सेनानीः परसेनान्या नेमिनाथोऽपि रक्मिणा । पार्थो दुर्योधनेनासौ सधैर्यण पुरस्कृतः ॥२३॥ महायुद्धमभूत्तस्य ततस्तेषां यथायथम् । सगन्धवलयुनानां पञ्चायुधविवर्षिणाम् ॥२४॥ नारदोऽप्सरसा संघदूरेण नमसि स्थितः । मुञ्चन् पुष्पाणि तुष्टान्मा ननर्त कलहप्रियः ॥२५॥ निपात्य शरवर्षेण रुक्मिणं चिरयोधनम् । रिपुराजसहस्राणि नेमिश्विक्षेप संयुगे ॥२६॥ समुद्रविजयाद्याश्च प्रातरस्तरसुतास्तथा । यथायथं रणे प्राप्ता निन्युमृत्युमुखं रिपून् ॥२७॥ रामकृष्णसुतैः "संख्य निःसंख्यशरवपिभिः । यथेष्टं क्रीडितं मेघः पर्वतष्विव वैरिषु ॥२८॥ पाण्डवानां सपुत्राणां इतराष्ट्रसुतैः सह । कदनं यद् बभूवात्र तत्क. कथयितुं क्षमः ।।२६॥ परस्पर एक-दूसरेके सामने आ गयीं ॥१४॥ क्रोधको अधिकतासे भौंह टेढी हो जानेकै कारण जिनके मुख चिपम हो रहे थे ऐसे दोनों पक्षके राजा परस्पर एक-दूसरेको ललकार कर यथायोग्य युद्ध करने लगे ॥१५॥ हाथी हाथियोंके साथ, घोड़े घोड़ों के साथ, रथ रथोंके साथ और पैदल पैदलोंके साथ युद्ध करने लगे॥१६।। उस समय प्रत्यञ्चाओंके शब्द, रथोंको चीत्कार, हाथियोंकी गर्जना और योद्धाओंके सिंहनादसे दशों दिशाएँ फटो-सी जा रही थीं ॥१७॥ तदनन्तर शत्रुसेनाको प्रबल और अपनी सेनाको नष्ट करती देख, वैल, हाथी और वानरकी ध्वजा धारण करनेवाले नेमिनाथ, अर्जुन और अनावृष्टि, कृष्णका अभिप्राय जान स्वयं युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए और चक्रव्यूहके भेदन करनेका निश्चय कर पूर्ण तैयारीके साथ आगे बढ़े ॥१८-१९।। भगवान नेमिनाथने शत्रुओंको भय उत्पन्न करनेवाला अपना शाक (इन्द्रप्रदत्त) नामक शङ्ख फूंका, अर्जुनने देवदत्त और सेनापति अनावृष्टिने बलाहक नामका शङ्ख बजाया ।।२०।। तदनन्तर इन शवोंके दिगन्तव्यापी शब्द सुनकर अपनी सेनामे महान् उत्साह उत्पन्न हुआ और शत्रुकी सेनामे महाभय छा गया ॥२१॥ सेनापति अनावृष्टिने चक्रव्यूहका मध्य भाग, भगवान नेमिनाथने दक्षिण भाग और अर्जुनने पश्चिमोत्तर भाग क्षण-भरमें भेद डाला ॥२२।। सेनापति अनावृष्टिका जरासन्धके सेनापति हिरण्यनाभने, भगवान् नेमिनाथका रुक्मीने और धैर्यशाली दुर्योधनने अर्जुनका सामना किया ॥२३।। तत्पश्चात् अहंकारपूर्ण सेनासे युक्त एवं पाँचो प्रकारके शस्त्र बरसानेवाले उन वीरोंका यथायोग्य महायुद्ध हुआ ॥२४|| असराओंके समूह के साथ आकाशमे दूर खड़ा कलहप्रिय नारद पुष्प- वर्षा करता हुआ हर्पसे नाच रहा था ।।२५।। भगवान् नेमिनाथने चिरकाल तक युद्ध करने थाले रुक्मीको वाण-वासे नीचे गिराकर हजारों शत्रुराजाओंको युद्धमै तितर-बितर कर दिया ||२६॥ इसी प्रकार समुद्रविजय आदि भाइयों तथा उनके पुत्रोने युद्धमे पहुँच कर शत्रुओंको मृत्युकै मुखमें पहुँचाया ॥२७ा युद्ध में असंख्यात वाणोंकी वर्षा करनेवाले बलदेव और कृष्णके पुत्रोंने, पर्वतोपर बहुत भारी जलवा करनेवाले मेघोके समान शत्रुओंके बीच इच्छानुसार क्रीड़ा की ।।२८ पुत्रीसहित पाण्डवोंका धृतराष्ट्रके पुत्रोके साथ जो युद्ध १. राजान म.1२ समालग्ना म.। ३ बलाहक. । ४ सबन्ध म०,०, ग। ५ युद्धे ।

एकोपञ्चाशत्तमः सर्गः युधिष्टिरोऽन शल्यन भीमो दुश्शासनेन तु । महदेवः शकुनिना झुलूको नमुलेन हि ॥३०॥ दुर्योधनार्जुनी या लग्ना युद्धं ततस्तयोः । बभूव भूतवित्रासी शरसन्धानदक्षयोः ॥३१॥ 'निहताः पाण्डवैः केचिद् धृतराष्ट्रशरीरजाः । रणे दुर्योधनाद्यास्तु केचिनीषन्मृताः कृताः ॥३२॥ श्रावणांकृष्टचापाघः कर्णोऽमिमुसमागतान् । योधान् विभेद संग्राम कृष्णपक्षाननेक्शः ॥३३॥ द्वन्द्वयुद्धे तदा जाते बहुभूतभयावहे । सेनापन्योरभूद्रौद्र कदनं विविधायुधः ॥३॥ हिरण्यनामवीरेण स सप्तमिः शरैः शतः । नवत्या सप्तविंशत्याविद्धोऽनाटिराहवे ॥३५॥ प्रजघान शतेनामी सहस्रेण च पत्रिणाम् । अनावृष्टिहिरण्यामं कुशलः प्रतिकर्मणि ॥३६॥ यादवस्य ध्वज तुझं चिच्छेद रधिरास्मनः । मोऽपि चास्य विभेदाशु चापं छत्रं च सारथिम् ॥३७॥ धनुरन्यदुपादाय शरवर्ष ववर्ष स. । परिघं तु यदुः क्षिप्चा रथं शत्रोरपातयत् ॥३०॥ सगखेटकहस्तं तं प्रापतन्तमरियंदुः । सगखेटरहस्तोऽगाद्रथादुत्तीर्य सम्मुखः ॥३९॥ प्रहारवञ्चनादानलाघवातिशयात्मनोः । अमियुद्धमभूद्घोरं सेनापत्योस्ततस्तयो. ॥४०॥ वाष्र्णेयसहगवातेन प्रदत्तेन भुजे रिपुः । छिन्नवाहुद्वयोरस्कः पपात वसुधातले ॥४॥ हते सेनापती तत्र चतुरङ्गबलं द्रुतम् । विद्रुतं दारणं प्राप्तं जरासन्धं महारणे ॥४२॥ तुष्टोऽनावृष्टिरप्याशु रथमारय सनिकैः । स्तूयमानो गतोऽभ्याश रामकंशवयोस्ततः ॥४३॥ वलशिवीराभ्यां वृपहस्तिकपिध्वजाः । चक्रव्यूहस्य भेत्तारः परिष्वक्ता महाजमः ॥१४॥ हुआ था उसे कहने के लिए कौन समर्थ है ? ॥२९॥ युधिष्ठिर शल्यके साथ, भीम दुःशासनके साथ, सहदेव शकुनिके साथ और उलूक नकुलके साथ युद्ध कर रहे थे ॥३०॥ तदनन्तर दुर्योधन और अर्जुन युद्ध करने के लिए तत्पर हुए सो बाणोंके चढानेमें चतुर उन दोनोंका भूतोंको भयभीत करनेवाला भयंकर युद्ध हुआ॥३१॥ पाण्डवोंने युद्ध में धृतराष्ट्र के कितने ही पुत्रोंको मार डाला और दुर्योधन आदि कितने ही पुत्रोंको जीवित रहते हुए भी मृतकके समान कर दिया ॥३२॥ कर्णने, युद्ध में आये हुए कृष्णक पक्षके अनेक योद्धाओंको कान तक खींचे हुए बाणोंके समूहसे नष्ट कर डाला ॥३३॥ उस समय जब दोनों ओरसे अनेक प्राणियों का क्षय करनेवाला द्वन्द्व युद्ध हो रहा था तव दोनों पक्षके सेनापतियोंका नाना प्रकारके शत्रोंसे भयंकर युद्ध हुआ ॥३४॥ वीर हिरण्यनाभने युद्ध में यादव सेनापनि अनावृष्टिको सात-सी नब्बे वाणी-द्वारा मत्ताईस वार घायल किया ॥३५॥ और बदला लेने में कुशाल हिरण्यनाभने भी एक हजार वाणां-द्वारा उसे सौ वार घायल किया ॥३६॥ रुधिरके पुत्र हिरण्यनाभने अनावृष्टिकी ऊँचो ध्वजा छेद डाली और अनावृष्टिने शीघ्र ही उसके धनुष, छत्र और मारथिको भेद डाला ॥३७॥ हिरण्यनाभने दूसरा धनुप लेकर वाणोंकी वर्षा शुरू की और अनावृष्टिंने परिघ फेंककर शत्रुका रथ गिरा दिया ॥३८॥ अव हिरण्यनाभ तलवार और ढाल हाथमें ले सामने आया तो अनावृष्टि भी तलवार और ढाल हाथमें ले रथसे उतर कर उसके मामने गया ॥३९॥ तदनन्तर प्रहारके बचाने और प्रहारके देनेकी बहुत भारी कुशलतासे युक्त दोनों सेनापतियोंमे भयङ्कर खड्गयुद्ध होता रहा ।। अन्तमें अनावृष्टिने हिरण्यनामकी भुजाओंपर तलवारका घातक प्रहार किया जिमसे उमकी दोनों भुजाएँ कद गयीं, छाती फट गयी और वह प्राणरहित हो पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥४१॥ सेनापतिके • मरनेपर उसकी चतुरङ्ग सेना शीघ्र हो भागकर महायुद्ध में जरासन्धकी शरण में पहुंची ॥४ा तदनन्तर मैनिक लोग जिसकी स्तुति कर रहे थे ऐमा अनावृष्टि, सन्तुष्ट हो शीघ्र ही रथपर बैठकर बलदेय और कृष्ण के समीप गया ||१३|| बलदेव और श्रीकृष्णने चक्रव्यूहको १ निहिता: म०। २. भयावह । ३. जगमंधमहाररो म.। ४ समीर म०।

५९२ हरिवंशपुराणे अनेकरथलक्षास्ते शस्त्रास्त्रेषु कृतश्रमाः । धार्तराष्ट्रवधं युद्धे समाधाय व्यवस्थिताः ॥१२७॥ पृष्टे चन्द्रयशा भूपः सिंहलो वर्वरोऽपि च । कम्बोजाः केरलाथापि कुशला मिलास्तथा ॥२८॥ रथषष्टिसहसैस्तु शान्तनः समवस्थितः । पक्षिणो रक्षिणो देते स्थिता विक्रमशालिनः ।।१२९॥ अशितश्चापि मानुश्च तोमरः समरप्रियः । सञ्जयोऽकल्पितश्चापि मानुर्विष्णुहद्ध्वजः ॥१३०॥ शत्रुञ्जयो महासेनो गम्मीरो गौतमोऽपि च । वसुधर्मादयश्चापि कृतवर्मा प्रसेनजित् ॥१३१॥ दृढवर्मा च विक्रान्तश्चन्द्रवर्मा च पार्थिवः । एते गणमहायास्तु कुलं रक्षन्ति शार्षिणः ॥१३२॥ एषोऽसौ गरुडन्यूहो वसुदेवेन निर्मितः । महारथकृतोत्साहश्चक्रव्यूह विमिन्सति ॥१३३॥ शालिनीच्छन्दः चक्रव्यूह दुर्विगाहे कृतेऽपि न्यूहे न्यूहे पक्षिराजेऽपि दक्षः। युद्ध जेना नायक कश्चिदेको धर्मात्मायादर्जिताज्जैनमार्गे ॥१३४॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती चक्रगरुडव्यूहवर्णनो नाम पञ्चाशत्तमः सर्गः ॥५०॥ देनेवाले अनुवीर्य स्थित थे। ये सभी कुमार अनेक लाख रथोंसे युक्त थे, शस्त्र और अस्त्रों में परिश्रम करनेवाले थे, तथा युद्धमे कौरवोंके वधका निश्चय किये हुए थे ॥ १२४-१२७ ॥ इनके पीछे राजा चन्द्रयश, सिंहल, वर्वर, कम्बोज, केरल, कुशल (कोसल) और द्रमिल देशोंके राजा तथा शान्तन साठ-साठ हजार रथ लेकर स्थित थे। इस प्रकार ये वलशाली राजा उस गरुड़की रक्षा करते हुए स्थित थे ॥ १२८-१२९ ।। इनके सिवाय अशित, भानु , युद्धका प्रेमी तोमर, सञ्जय, अकल्पित, भानु, विष्णु, बृहद्ध्वज, शत्रुक्षय, महासेन, गम्भीर, गौतम, वसुधर्मादि, कृतवर्मा, प्रसेनजित्, दृढवर्मा, विक्रान्त और चन्द्रवर्मा आदि राजा अपनी-अपनी सेनाओंसे युक्त हो श्रीकृष्णके कुलकी रक्षा करते थे॥१३०-१३२॥ जिसके भीतर स्थित महारथी राजा उत्साह प्रकट कर रहे थे, ऐसा यह वसुदेयके द्वारा निर्मित गरुड़- ज्यूह, जरासन्धक चक्रव्यूहको भेदने की इच्छा कर रहा था ॥१३३॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि दोनों पक्षके चतुर मनुष्योंने उस ओर यद्यपि दुःखसे प्रवेश करनेके योग्य चक्रव्यूह और इधर गरुड़-च्यूहकी रचना की थी तथापि जिनेन्द्र प्रदर्शित मार्ग में चलकर सश्चित किये हुए धर्मके प्रभाव से युद्धमे कोई एक नायक ही विजयी होगा ऐसा मै समझता हूँ ॥१३४॥ इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराण में चक्रव्यूह और गरुडव्यूहका वर्णन करनेवाला पचासवाँ सर्ग समाप्त हुभा ॥५०॥ १. धार्तराष्ट्रा वधं म०, ग० । २. दवर्या म०। ३. हृदसहायस्तु म०। ४ तर्कयामि ।

- एकपञ्चाशत्तमः सर्गः अत्रान्तरे सह प्राप्ताः समुद्रविजयं नृपाः । विद्याधरसमस्तास्त दमुदेवहितपिणः ॥१॥ श्वसुरोऽशनिवेगोऽमी हरिग्रीयो वराहकः । सिंहदंष्ट्रः सगेन्द्रश्च विद्युद्वगो महाधमः ॥२॥ तथा मानसवेगश्च विद्युदंष्टः खगाधिपः । राजा पिङ्गलगान्धारो नारसिंहो नरेश्वरः ॥३॥ 'इन्याद्या धार्यमातला वासुदेवार्थमिदये । वसुदेवं पुरस्कृत्य समुद्रविजयं श्रिताः ॥४॥ तान् सम्मान्य यथायोग्यं समुद्रविजयादयः । सिद्धार्थी वयमद्येनि प्रहृष्टमनसो जगुः ॥५॥ वसुदेवरिपूणां ते खगानां क्षोममूचिरे । जरासन्धार्थसिद्धयर्थ तेषामागमनं तथा ॥६॥ तच्छ त्वा यादवाः सर्वे सम्मन्न्यानकदुन्दुमिम् । प्रद्युम्नशम्बसंयुक्तं सपुत्रं तरमामुचन् ॥ ७॥ जिनकेशवरामादीन् परिप्वन्य स वेगवान् । पुत्रनप्लसर्गः साकं सचराचलमाययौ ॥८॥ मिहविद्यारथं दिव्यं दिव्यास्त्रपरिपूरितम् । धनदेवममानीतमारुरोह हलायुधः ॥९॥ गारुडं रथमारूदस्तथा गरुडकतनः । नानाप्रहरणैदिव्यः परिपूर्ण जयावहम् ॥१०॥ मातल्यधिष्टिनं सास्त्रं सुत्रामप्रहितं रथम् । नेमीश्वरः समारूढो यदूनामर्थसिद्धये ॥११॥ मैनानां नायकं शूरमनावृष्टिं कपिध्वजम् । अभ्यपिञ्चन्नृपाः सर्वे समुद्रविजयादयः ॥१२॥ राजा हिरण्यनामस्तु मागधेन महाबलः । सेनापतिपदे शीघ्रमभिषिक्तस्तदा मुद्रा ॥१३॥ युद्धे भेर्यस्तथा शङ्खा नदुर्धारं वलद्वये । 'चतुरंगं वलं यो मामसाद परस्परम् ॥१४॥ अथानन्तर इसी वीचमें वसुदेवका हित चाहनेयाले नीचे लिखे समस्त विद्याधर एक साथ मिलकर ममुद्र विजयके पास आ पहुंचे ॥१|| वसुदेवका श्वसुर अशनिवेग, हरिग्रीय, वराहक, सिंहदष्ट, महापुरुषार्थी विद्युद्वेग, मानसवेग, विद्यद्दष्ट्र, पिगलगान्धार और नार- सिंह इन्हें आदि लेकर आर्य और मातङ्गजातिके अनेक विद्याधर राजा श्रीकृष्णको भलाईके लिए आ पहुंचे और वसुदेयको आगे कर राजा समुद्रविजयसे जा मिले ॥२-४॥ समुद्रविजय आदि उनका यथायोग्य सम्मान कर हर्पितचित्त होते हुए कहने लगे कि अब हम लोग कृतार्थ हो गये | उन आगत विद्याधरोंने कहा कि इस युद्धसे वसुदेवके विरोधी विद्याधरों में बड़ा झोभ हो रहा है और वे जरासन्धकी कार्यसिद्धिके लिए आनेवाले हैं ॥६॥ यह सुनकर मव यादवोंने परस्पर मलाह की और विद्याधरोंको शान्त करने के लिए उन्होंने उन्हीं विद्या- धरोंके साथ प्रद्युम्न, शम्ब एवं अनेक पुत्रों-सहित यमुदेवको विजयार्धके लिए छोड़ा ।। वसुदेव भी भगवान् नेमिनाथ, कृष्ण, बलदेव आदिका आलिङ्गन कर कुछ पुत्रों, पोतों और विद्याधरोंके साथ शीघ्र ही विजयार्धकी ओर चल पड़े ।।८। उसी समय कुवेरफे द्वारा समर्पित, दिव्य अलोंसे परिपूर्ण सिंहविद्याके दिव्य रथपर बलदेव आरूढ हुए।।२।। गम्डाङ्कित पताकासे सुशोभित कृष्ण, नाना प्रकारके दिव्य अस्त्र-शम्रोंसे पूर्ण विजय प्राप्त करानेवाले गम्ड विद्याके रथपर सवार हुए ॥१०॥ और भगवान नेमिनाथ, इन्द्र के द्वारा प्रेपित, मातलि नामक सारथिसे युक्त, तथा अन्न-शम्प्रसे पूर्ण रथपर यादवोंकी कार्यसिद्धिके लिए आरूढ हुए ॥२१॥ समुद्रविजय आदि समस्त राजाओंने वानरकी ध्वजासे युक्त, वसुदेयके शूरवीर पुत्र अनावृष्टिको सेनापति बनाकर उसका अभिषेक किया ॥१२॥ उधर राजा जरामन्धने भी हर्पपूर्वक महायलवान राजा हिरण्यनाभको शीघ्र ही सेनापनिके पदपर अभिषिक्त किया ॥१३॥ दोनों ओरकी सेनाओंमें युद्ध के ममय बजनेवाली भेरियाँ और शहद गम्भीर शब्द करने लगे तथा दोनों ओरकी चतुरङ्ग सेना युद्ध करनेके लिए १ श्वार्य म०, ५० । २ यमुदेव 'यमुदेवोऽस्य जनक स एवानक्दुन्दुभि' इत्यमर 1३. जयावदः म । ४. चतुरङ्गनल म०।

। हरिवंशपुराणे अन्योन्याह्वानपूर्व ते योद्धु लग्ना यथायथम् । 'राजानः क्रोधसम्भारभ्रूमङ्गविषमाननाः ॥१५॥ गजा गजैः सम लमास्तुरङ्गास्तुरंगः सह । रथा रथैः संमं योद्धु पत्तयः पत्तिमिः सह ॥१६॥ ज्यारवे रथनिर्धापैगंजानां गर्जितन च । भटानां मिहनार्दश्च दलन्तीव दिशो दश ॥१७॥ तत परवलं दृष्ट्वा प्रबलं स्ववलाशनम् । नेमिपार्थवलाधीशा पहस्तिकपिध्वजाः ॥१८॥ ताश्यकतुमनोभिज्ञाः स्वयं योद्धु समुद्यताः । ऊरीकृत्य सुसमाहाश्चक्रव्यूहस्य भेदनम् ॥१९॥ दध्मौ नमीश्वरः शङ्ख शाकं शत्रुभयावहम् । देवदत्तं पृथापुत्रः सेनानीश्च वलाहकम् ॥२०॥ थानां निनदं श्रुत्वा ततो व्याप्तदिगन्तरम् । स्वसैन्येऽभून्महोत्साहः परसैन्ये महामयम् ॥२१॥ मध्यं विभेद सेनानीनेमिदक्षिणतः क्षणात् । अपरोत्तरदिग्मागं चक्रव्यूहस्य पाण्डवः ॥२२॥ सेनानीः परसेनान्या नेमिनाथोऽपि रक्मिणा । पार्थो दुर्योधनेनासौ सधैर्येण पुरस्कृतः ॥२३॥ महायुद्धमभूत्तस्य ततस्तेषां यथायथम् । सगन्धबलयुक्तानां पञ्चायुधविवर्षिणाम् ॥२४॥ नारदोऽप्सरमा संधरेण नमसि स्थितः । मुञ्चन् पुष्पाणि तुष्टात्मा ननर्त क्लहप्रियः ॥२५॥ निपात्य शरवर्पण रक्मिणं चिरसोधनम् । रिपुराजसहस्राणि नेमिश्चिक्षेप संयुगे ॥२६॥ समुद्रविजयाद्याश्च भ्रातरस्तरमुतास्तथा । यथायथं रणे प्राप्ता निन्युर्मृत्युमुखं रिपून् ॥२७॥ रामकृष्णमुतैः संख्ये निःसंरयशरवपिमिः । यथेष्ट क्रीडितं मेधः पर्वतष्विव रिपु ॥२८॥ पाण्डवानां मपुत्राणां धृतराष्ट्रसुतैः सह । क्दनं यद् वभूमात्र तत्कः कथयितुं क्षमः ॥२२॥ परस्पर एक-दूमरेके सामने आ गयीं ॥१४॥ क्रोधको अधिकतासे भौह टेढ़ी हो जानेके कारण जिनके मुख विपम हो रहे थे ऐसे दोनों पक्षके राजा परस्पर एक-दूसरेको ललकार कर यथायोग्य युद्ध करने लगे ॥१५|| हाथी हाथियों के साथ, घोड़े घोड़ोंके साथ, रथ रथोंके साथ और पैदल पेदलोंके साथ युद्ध करने लगे॥१६॥ उस समय प्रत्यश्चाओंके शब्द, रथोंको चीत्कार, हाथियोंकी गर्जना और योद्धाओंके सिंहनादसे दशा दिशाएँ फटी-सी जा रही थीं ॥१७॥ तदनन्तर शत्रुसेनाको प्रवल और अपनी सेनाको नष्ट करती देख, बैल, हाथी और वानरकी ध्वजा धारण करनेवाले नेमिनाथ, अर्जुन और अनावृष्टि, कृष्णका अभिप्राय जान स्वयं युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए और चक्रव्यूहके भेदन करनेका निश्चय कर पूर्ण तयारीके साथ आगे बढ़े ॥१८-१९।। भगवान नेमिनाथने शत्रुओंको भय उत्पन्न शाक्र (इन्द्रप्रदत्त) नामक शह फूंका, अर्जुनने देवदत्त और सेनापति अनावृष्टिने वलाहक नामका शद्ध बजाया ॥२०॥ तदनन्तर इन शवोंके दिगन्तव्यापी शब्द सुनकर अपनी सेनामें महान् उत्साह उत्पन्न हुआ और शत्रुकी सेनामे महाभय छा गया ॥२१॥ सेनापति अनावृष्टिने चक्रव्यूहका मध्य भाग, भगवान नेमिनाथने दक्षिण भाग और अर्जुनने पश्चिमोत्तर भार क्षणभरमै भेद डाला ।।२२।। सेनापति अनावृष्टिका जरासन्धके सेनापति हिरण्यनाभने, भगवान नामिनाथका कमीने और धैर्यशाली दुर्योधनने अर्जुनका मामना किया ॥२३॥ तत्पश्चात् अहंकारपूर्ण सेनामे युक्त एवं पॉचों प्रकारके शर वरमानेवाले उन वीरोंका यथायोग्य महायुद्ध हुआ ||२५|| अप्सराओक समूहके माथ आकाशमे दूर सड़ा कलहप्रिय नारद पुष्प- वर्षा करता हुआ हर्षसे नाच रहा था ।।५।। भगवान् नेमिनाथने चिरकाल तक युद्ध करने वाले ग्रामीको याण वर्षामे नीचे गिगार हजारों शत्रुगजाओंको युद्ध मे तितर-बितर कर दिया | इमी प्रकार समुद्रविजय आदि भाइयों नथा उनके पुत्रांने युद्ध में पहुँच कर. शत्रुओरो मृत्युगे मुम्बमें पहुँचाया IPा युद्ध में असंन्यात बाणोंकी वर्षा करनेवालं बलदेव और कृष्ण के पुराने, पर्यनोंपर पहत भार्ग उलवर्षा करनेवाले मेघोंकि ममान शत्रुओंके योन इन्छानुमार प्राडा पी I-II पुत्रोंमहिन पाण्डयांका धृनगष्ट्रय पुत्रां माथ जो युद्ध १. गमान म.1२ समालग्ना मः। ३. पाहा । ४ मन्ध म., ग.१ ५. युद्ध। वाला अपना एकोपञ्चाशत्तमः सर्गः - युधिष्ठिरोऽत्र शल्यन मीमा दुश्शासनन नु । महदेवः शकुनिना झुलू नकुलेन हि ॥३०॥ दुर्योधनार्जुनी योधु लग्नौ युद्धं ततस्तयोः । बभूव भूतवित्रासो सरपन्धानदक्षयोः ॥३१॥ 'निहताः पाण्डवैः कंचिद् पृतराष्ट्रशरीरजाः । रणे दुर्योधनाद्यास्तु केचिन्नीवन्मृताः कृताः ॥३२॥ प्रार्णाकृष्टचापौधः कर्णोऽभिमुसमागतान् । योधान् बिभेद संग्राम कृष्णपक्षाननेकशः ॥३३॥ द्वन्द्वयुद्धे तदा जाते बहुभूतभयावहे । सेनापन्योरभुद्रौद्र कदनं विविधायुधः ॥३४॥ हिरण्यनाभवारण स सप्तभिः शरैः शतः । नत्रस्या सप्तविंशत्याविद्धोऽनावृष्टिराहवे ॥३५॥ प्रजघान शतेनामा सहस्रेण च पत्रिणाम् । अनावृष्टिहिरण्यामं कुशलः प्रतिकर्मणि ॥३६॥ यादवस्य ध्वज तुझं चिच्छेद रधिरात्मजः । सोऽपि चास्य विभेदाशु चापं छत्रं च मारथिम् ॥३७॥ धनुरन्यदुपादाय शरय ववर्ष मः। परिघं नु यदुः क्षिप्त्वा रथं शवोरपातयत् ॥३८॥ खड़गखेटकहस्नं तं श्रापतन्नमरियंदुः । सङ्गखेटकहस्तोऽगाथादुत्तीर्य सम्मुखः ॥३९॥ प्रहारवञ्चनादानलाघवातिशयात्मनोः । असियुद्धमभूद्घोरं सेनापत्योस्ततस्तयो. ॥४०॥ वाष्र्णेयसड्गपातेन प्रदत्तेन भुजे रिपुः । छिन्नवाहुयोरस्कः पपात वसुधातले ॥४१॥ हते सेनापती तत्र चतुरगवलं द्रुतम् । विद्वतं शरणं प्राप्तं जरासन्धं महारणे ॥४२॥ नुष्योऽनावृष्टिरप्याशु रथमारा सैनिकः । स्तूयमानो गतोऽभ्या रामकेशवयोस्ततः ॥४३॥ वलकेशवीराभ्यां वृपहस्तिकपिघजाः । चक्रव्यूहस्य भेत्तारः परिवक्ता महौजसः ॥४४॥ हुआ था उसे कहने के लिए कौन समर्थ है ? ॥२९॥ युधिष्ठिर शल्यके साथ, भीम दुःशासनके साथ, सहदेव शकुनिके साथ और उलूक नकुलके साथ युद्ध कर रहे थे ॥३०॥ तदनन्तर दुर्योधन और अर्जुन युद्ध करनेके लिए तत्पर हुए सो बाणों के चढ़ानेमें चतुर उन दोनोंका भूतोंको भयभीत करनेवाला भयंकर युद्ध हुआ ॥३१॥ पाण्डयोंने युद्ध धृतराष्ट्र के कितने ही पुत्रोंको मार डाला और दुर्योधन आदि कितने ही पुत्रोंको जीवित रहते हुए भी मृतकके समान कर दिया ॥३२॥ कर्णने, युद्ध में आये हुए कृष्णके पक्षके अनेक योद्धाओंको कान तक खींचे हुए थाणोंके समूहसे नष्ट कर डाला ॥३३॥ उस समय जब दोनों ओरसे अनेक प्राणियों का क्षय करनेवाला द्वन्द्व युद्ध हो रहा था तब दोनों पक्षके सेनापतियोंका नाना प्रकारक शत्रोंसे भयंकर युद्ध हुआ ॥३४॥ वीर हिरण्यनाभने युद्ध में यादव सेनापनि अनावृष्टिको मान-सी नव्ये वाणीद्वारा मत्ताईस पार घायल किया ॥३५॥ और बदला लेनेमें कुशल हिरण्यनाभने भी एक हजार वाणों द्वारा उसे सौ बार घायल किया ॥३६॥ रुधिरके पुत्र हिरण्यनाभने अनावृष्टिकी ऊँची ध्वजा छेद डाली और अनावृष्टिने शीघ्र ही उसके धनुप, छत्र और मारथिको भेद डाला ||३७॥ हिग्ण्यनाभने दुमरा धनुप लेकर बाणोंकी वर्षा शुरू की और अनावृष्टिने परिघ फेंककर शत्रुका रथ गिरा दिया ॥३८॥ अव हिरण्यनाभ तलवार और ढाल हाथमें ले सामने आया तो अनावृष्टि भी तलवार और ढाल हाथमें ले रथसे उतर कर उसके मामने गया ॥३९॥ तदनन्तर प्रहारके बचाने और प्रहारके देनेकी बहुन भारी कुदालतासे युक्त दोनों सेनापनियों में भयङ्कर खड्गयुद्ध होता रहा ।।2।। अन्तमें अनावृष्टिने हिरण्यनाभको भुजाओंपर तलवारका चातक प्रहार किया जिमसे उमकी दोनों भुजाएँ कट गयीं, छातो फट गयी और वह प्राणरहित हो पृथ्वीपर गिर पड़ा ।।११। सेनापतिक मरनेपर उसकी चतुरङ्ग सेना शीघ्र ही भागकर महायुद्ध में जरामन्धको शरणमें पहुँची ॥४२॥ तदनन्तर सैनिक लोग जिसकी स्तुति कर रहे थे ऐमा अनावृष्टि, मन्तुष्ट हो शीघ्र ही रथपर बैठकर बलदेव और कृगके मर्माए गया ||१३|| बलदेव और श्रीकृष्णने चक्रव्यूहको १ निहिताः म०।२. भयावह । ३. जगमंघमहाररोम। ४ समीर म०।

हरिवंशपुराणे पृथ्वीच्छन्दः विपादवियदृषितं मगयराजमन्यं ततो निदेशमगमनि लघु दिवाकरऽस्तगते । नितान्तपृथुहर्पपूर्णमतिपूर्णमानार्णव-प्रमाणमरिभङ्गतो यदुवलं जिनश्रीयुतम् ॥४५॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृतौ हिरण्यनाभवधवर्णनो नामैकपञ्चाशत्तमः सर्गः ॥५१॥ भेदनेवाले महापराक्रमी नेमिनाथ अर्जुन और अनावृष्टिका आलिङ्गन किया ॥४४॥ तदनन्तर उधर सूर्यास्त होनेपर विपाट रूपी विपसे दूपित जरासन्धकी सेना शीघ्र ही अपने निवास स्थानपर चली गयी और इधर जिनराज श्री नेमिनाथ भगवानकी लक्ष्मीसे युक्त यादवोंकी सेना, शत्रुके नाशसे अत्यधिक हर्पित एवं लहराते हुए समुद्रके समान झूमती हुई अपने नियामस्थानपर आ गयी ॥४५॥ 1 इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरियशपुराणमें हिरण्यनामके यधका वर्णन करनेवाला इक्यावनयाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥५१॥ १ मगनिम..

द्वापञ्चाशः सर्गः - अन्येद्युडुमणिद्योतद्योतितं भवनोदरे । सन्नद्धौ निर्गती योद्धु बलागधमाधवा ॥१॥ विधाय पूर्वपद व्यूही बलद्वयमधिष्टिनम् । नानाराजन्यविन्यासमन्योन्यं हन्तुमुद्यतम् ॥२॥ रथस्थो मागधो युद्धे हंसक निजमन्त्रिणम् ! अन्तिकस्थमिति प्राह यादवानमिवीक्ष्य सः ॥३॥ प्रत्येक नामचिह्नाद्यैर्यदूनां चश्न हंसक । किमन्यरत्र निहतैरित्युक्ते संजगाचिति ॥४॥ फैनपुञ्जप्रतीकाशैहयः काञ्चनदाममिः । रथोऽरथवदृश्यः कृष्णस्य गरुडध्वजः ॥५lt शुकवर्णसमैरश्चैयुनोऽयं स्वर्णशृखलैः । अरिष्टनेमिवीरस्य वृपकेतुमहारथः ॥६॥ कृष्णदक्षिणपार्श्वेत्वरिष्टवणेस्तुरङ्गमः । रथस्तालध्वजो राजन् बलदेवस्य राजते ॥७॥ कृष्णवण हर्ययुक्तो भाजतेऽयं महारथः । अनीकाधिपतेरत्र कपिकेतूपलक्षिसः ॥८॥ नीलकेसरवालाहयहमपरिष्कृतैः । रथो युधिष्टिरस्यायं पाण्डवस्य विराजते ॥९॥ शशाङ्कविशदेरश्वैमातरिश्वजवैर्वृतः । गजनजयुतो माति सव्यसाचिरथो महान् ॥१०॥ नीलोत्पलनिभैरैप युनो ययुमिरीक्ष्यते । रथो वृकोदरस्यापि मणिकाञ्चनभूषणः ॥११॥ शोणवर्णहंयाति समुद्र विजयस्य हि । मध्ये यादवसैन्यानां महासिंहध्वजो रथः ॥१२॥ अनरस्य कुमारस्य रथोऽसौ कदलीध्वजः । सयलर्वाजिमिर्माति रुक्मविद्रुममास्वरः ॥१३॥ दूसरे दिन जव संसारका मध्य भाग सूर्यके प्रकाशसे प्रकाशित हो गया तव जरा- सन्ध और कृष्ण युद्ध करनेके लिए तैयार हो अपनी-अपनी सेनाओंके साथ बाहर निकले ॥१॥ तदनन्तर जो पहलेके समान व्यूहोंकी रचना कर स्थित थीं और जिनमें अनेक राजा लोग यथास्थान स्थित थे ऐसी दोनों सेनाएँ परस्पर एक दूसरेका घात करनेके लिए उद्यत हुई ।।२।। युद्धके मैदानमें आकर रथपर बैठा जरासन्ध, यादवोंको देखकर अपने समीपवर्ती हमक मन्त्रीसे बोला कि हे हंसक ! यादवोंमें प्रत्येकके नाम चिह्न आदि तो यता और जिससे उन्हींको देव अन्य लोगोंके मारनेसे क्या लाभ है ? इस प्रकार कहनेपर हंसक वोला-३-४।। हे स्वामिन् ! जिसमें सुवर्णमयी साकलोंसे युक्त फेनके समान सफेद घोड़े जुते हुए हैं और जिसपर गड़की ध्वजा फहरा रही है ऐसा यह सूर्यके रथके समान देदीप्यमान कृष्णका रथ दिखायी दे रहा है ।।५।। जो सुवर्णमयी सांकलोंसे युक्त तोतेके समान हरे रंगके घोड़ों- से युक्त है तथा जिसपर बैलकी पताका फहरा रही है. ऐसा यह शूर-चोर अरिष्टनेमिका रथ है ॥६॥ हे राजन् ! जो कृष्णको दाहिनी ओर रीठाके समान वर्णवाले घोड़ोंसे जुता हुआ है तथा जिसपर तालकी ध्वजा फहरा रही है ऐसा यह बलदेवका ग्थ सुशोभित हो रहा है । इधर यह कृष्णवर्णके घोड़ोंसे युक्त एवं वानरकी ध्वजासे सहित जो बड़ा भारी रथ दिसायी दे रहा है वह सेनापतिका रथ है ।।८। उधर सुवर्णमयी सांकलोंसे युक्त, गरदनके नीले-नीले वालोंवाले घोड़ोंसे जुता हुआ यह पाण्डु राजाके पुत्र युधिष्ठिरका रथ मुशोभित हो रहा है ।।९।। जो चन्द्रमाके समान मफेद एवं वायुके समान वेगशाली घोड़ोंसे जुना हुआ है तथा जिसपर हाथीको ध्वजा फहरा रही है ऐसा यह बड़ा भारी अर्जुनका रथ है ।।वा जो नील कमलके समान नीले-नीले घोड़ोंसे युक्त है नथा जिसपर मणिमय और सुवर्णमय आभूपण मुगोभित हैं ऐसा यह भीमसेनका रथ है ।।१२।। यह यादयोंको सेनाफे बीच में लाल रंगके घोड़ोंसे जुना हुआ तथा बड़े-बड़े सिंहोंकी ध्वजासे युक्त समुद्रविजयका रथ ॥१॥ वह कुमार अकरका रथ मुशोभित है जो कदलीफी ध्वजासे महिन है, बलबान घोड़ोंसे युक्त है तथा सुवर्ण और मूंगाओंसे देदीप्यमान हो रहा है ॥१३॥ १. -मुधती म० । २. अश्वै । मुमोभित हो रहा , ५९८ हरिवंशपुराणे 3 हयस्तित्तिरकल्मापैः सत्यकस्य महारथः । महानेमिकुमारस्य कामुदाजिमी रथः ॥१४॥ चामीकरवृहद्दण्डपताकाध्वजभूपितः । 'शुकतुण्डनिभैरवैर्मोजस्यैप महारथः ॥१५॥ अश्वैः कनकपृष्ठ्यों युक्तर्माति महारथः । असौ जरत्कुमारस्य मृगकेतोविराजते ॥१६॥ शुक्लः सोमसुतस्यैय सिंहलस्य विराजते । काम्बोजेर्वाजिमियुक्तो रथोऽश्वरथमास्वरः ॥१७॥ अश्वेशरक्कमवलमरुराजस्य राजते । रथः काञ्चनचित्राः शंशुमाराकृतिध्वजः ॥१८॥ रथः पद्मरथस्यैप पद्माभैस्तुस्गयुतः । शोमते रणशूरस्य बलानामग्रतः स्थितः ॥१९॥ पारावतनिभैः पत्रैः सारणस्य निहायनैः । तपनीयच्छदांति रथोऽसौ पुष्करध्वजः ॥२०॥ शशलोहितसंकाशैर्वाजिभिः पञ्चहायनैः । रथो नग्नजितः सूनोमरदत्तस्य काशते ॥२१॥ पाजिमिः पञ्चवर्णेर्यो रथी भाति रविप्रमः । विदूरथकुमारस्य जवनः कलशध्वजः ॥२२॥ सर्ववर्णनिभैरवैर्यादवानों तरस्विनाम् । न शक्यन्ते रथाः प्रोक्तुं शतशोऽथ सहस्रशः ॥२३॥ अस्माकं नृपवीराणां रथान् वेसि यथायथम् । कुमाराणां च सर्वेषां नानाचिहान्महारथान् ॥२४॥ क्षत्रियबहुभिर्युक्तो नानादेशसमागतः । शोमते मवतो न्यूहो रिपुसेनामयङ्करः ॥२५॥ तदारर्ण्य निजं प्राह सारथि मगधेश्वरः । यादवान् प्रति शीघ्र स्वं रथं नोदय मारथे ! ॥२६॥ नोदितऽथ रथे तेन रग्नश्छादयितुं नृपेट् । यादवानमितः सर्वान् शरासारनिरन्तरः ॥२७॥ तीतरके समान मटमैले घोड़ोंसे युक्त रथ सत्यकका है और कुमुदके समान मफेद घोड़ासे जुता रथ महानेमिकुमारका है ॥१४॥ जो सुवर्णमय विशाल दण्डकी पताकासे शोभित है. तथा तोतेकी चोंचके समान लाल-लाल घोड़ोंसे युक्त है ऐसा यह भोजका महारथ है ।।१५।। जो सुवर्णमय पलानसे युक्त जुते हुए घोड़ोंसे सुशोभित है ऐसा वह हरिणकी ध्वजाके धारक जरत्कुमारका रथ सुशोभित हो रहा है ॥१६॥ वह जो काम्बोजके घोड़ोंसे युक्त, सूर्यके रथके समान देदीप्यमान सफेद रंगका रथ सुशोभित हो रहा है यह राजा सोमके पुत्र सिंहलका रथ है ॥१७|| जो सुवर्णमय आभूपणोंसे चित्र-विचित्र शरीरके धारक कुछ-कुछ लाल रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ है तथा जिसपर मत्स्यकी ध्वजा फहरा रही है ऐसा यह मराजका रथ मुशोभित हो रहा है ॥१८॥ यह जो कमलके समान आभावाले घोड़ोंसे जुता, सेनाओंके आगे स्थित है वह रणवीर राजा पद्मरथका रथ सुशोभित है ॥१९॥ वह जो सुवर्णमयी झूलोंसे युक्त कबूतरके समान रंगवाले तीन वर्पके घोड़ोंसे जुता, एवं कमलको ध्वजासे सहित ग्थ मुशोभित हो रहा है वह सारणका है ॥२०॥ जो सफेद और लाल रंगके पाँच वर्षके घोड़ोंसे जुना है ऐमा वह नग्नजित्के पुत्र मेरुदत्तका रथ प्रकाशमान है ।।२१॥ जो पाँच वर्णके घोड़ोंसे जुना है, सूर्यक समान देदीप्यमान है और जिमपर कलशकी ध्वजा फहरा रही है ऐसा यह युमार विदूरथका वेगशाली रथ सुशोभित है ।।२२।। इस प्रकार बलवान् यादवोंके रथ मय रंग घोड़ोंसे सहित हैं तथा वे सैकड़ों या हजागंको संख्यामें हैं, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता ।।२३।। अपने पनके शूर-चोर राजाओं नथा समस्त राजकुमारोंके नाना चिोंये युक्त रथोंको आप यथायोग्य जानते ही हैं ||२४|| नाना देशांसे आये हुए अनेक अप्रियांसे युक्त आपका यह व्यूह अत्यन्त शोभित हो रहा है तथा शत्रु सेनाकै लिग भय उत्पन्न फर रहा है।॥२५॥ यह सुनकर जरामन्धने अपने मारथिसे कहा कि हे सारथि ! तू मेरा रथ शीघ्र ही. यादयोंकी और ले चल ॥२६॥ तदनन्नर मारथिने रथ आगे बढ़ाया और जरासन्ध लगातार १. गुरुदए- म० । २. मनुराजस्य क०, मेरुराजन्य म० । ३ पारायती म०1४. यह ज. म., स०। ५. स्थान् म.1 द्वापञ्चाशः सर्गः ५९९ । जरासन्धमुतास्तत्र यादवैः सह कोपिनः । यथायथं रथादिस्था रणक्रीडां प्रचक्रिरे ॥२८॥ म कालयवनः काल इव स्वयमुपागतः । गजं मलयनामानमारूढी युयुधेऽधिकम् ॥२९॥ सहदेव इति ख्यातो मसैनो द्रमस्तथा । जलचित्रादिको कंतू धनुर्धरमहीजयाँ ॥३०॥ म भानुः काञ्चनरथो दुर्धरो गन्धमादनः । सिंहाइश्चित्रमाली च महीपालवृहद्ध्वजा ॥३१॥ सुधीरादित्यनागारयो सत्यमत्वसुदर्शनौ । धनपालशतानीको महाशुक्रमहावसू ॥३२॥ वीराख्यो गङ्गदत्तश्च प्रवरः पार्थिवामिधः । चित्राङ्गदो वसुगिरिः श्रीमान् सिंहकटिः स्फुटः ॥३३॥ मेघनादमहानादौ सिंहनादवमुध्वजौ । वज्रनाममहावाहू जितशत्रुपुरन्दरौ ॥३४॥ अजिताजितशत्रू च देवानन्दशतद्रुतौ । मन्दरो हिमवानाम्ना तो विद्युत् केतुमालिनी ॥३५॥ कोटकहीशी देवदत्तधनायो । सगरस्वर्णवाहू च मद्यवानच्युतोऽपि च ॥३६॥ दुर्जयो दुर्मुखश्चापि तथा वामुकिकम्बली । त्रिशिरा धारणाभिख्यो माल्यवान् सम्भवामिधः ॥३७॥ महापद्मो महानागो महासेनो महाजय. । वासवो वरणामिरयः शतानीकोऽपि भास्करः ॥३८॥ गरमान् वेणुदारी च वासुवेगशशिप्रमौ । वरणादित्यधर्माणी विष्णुस्थामी सहस्रदिक् ॥३९॥ कनुमाली महामाली चन्द्रदेवो वृहद्वलिः । सहस्ररश्मिरर्चिष्मान् जघ्नुर्मागधसूनवः ॥४०॥ पतन् मनुजमातङ्गतुरङ्गरथसङ्कटे । स कालयवनो युद्धे निरुतो वसुदेवजः ॥४१॥ तेषां तस्य च सग्रामो यश.संग्रहकारिणाम् । अन्योन्याक्षेपिवाक्यानां प्रवृत्तो वार्तसंकथम् ॥४२॥ छळा तन कुमाराणां शिरोमी रधिरारणः । चक्रनाराचनिर्मिन्नैः पङ्कजरिव भूरमात् ॥४३॥ मारणेन कुमारण स कालयवनो रपा । नीतः खड्गमहारेण कालस्य सदनं चिरात् ॥४४॥ वाणोंकी वर्षासे समस्त यादवोंको आच्छादित करने लगा ||२७|| रथ आदि वाहनोंपर स्थित क्रोधसे भरे जरासन्धके पुत्र भी यादवोंके साथ यथायोग्य रणक्रीड़ा करने लगे ।।२८|| राजा जरासन्धका सबसे बड़ा पुत्र कालयवन जो आये हुए साक्षात् यमराजके समान जान पड़ता था, मलय नामक हाथीपर सवार हो अधिक युद्ध करने लगा ॥२९॥ इसके सिवाय सहदेव, द्रुमसेन, द्रम, जलकेतु, चित्रकेतु, धनुर्धर, महीजय, भानु, काश्चनरथ,दुर्धर, गन्धमादन, सिंहाङ्क, चित्रमाली, महीपाल, बृहद्ध्वज, सुवीर, आदित्यनाग, सल्यसत्य, सुदर्शन, धन- पाल, शतानीक, महाशुक्र, महावमु, वीराख्य, गद्गदत्त, प्रवर, पार्थिव, चित्राङ्गद, वमुगिरि, श्रीमान्, सिंहकटि, स्फुट, मेघनाद, महानाद, सिंहनाद, यमुध्वज, वननाभ, महाबाहु, जितशत्रु, पुरन्दर, अजित, अजितशत्रु, देवानन्द, शतद्रुत, मन्दर, हिमवान् , विद्युत्केतु, माली, कोदक, हपोकेश, देवदत्त, धनंजय, सगर, स्वर्णबाहुँ, मद्यवान , अच्युन, दुर्जय, दुर्मुख, वामुकि, कम्बल, त्रिशिरस् , धारण, माल्यवान् , सम्भव, महापद्म, महानाग, महासेन, महाजय, वासय, वरुण, शतानीक, भास्कर, गमत्मान् , वेणुदारी, वायुवेग, शशिप्रभ, वरण, आदित्य- धर्मा, विष्णुस्वामी, सहस्रदिक , केतुमाली, महामाली, चन्द्रदेव, बृहद्वलि, सह रश्मि और अर्चिप्मान आदि जरासन्धके पुत्र प्रहार करने लगे ॥३०-४०।। गिरते हुए मनुष्य, हाथी, घोड़े और रथोंस व्याप्त युद्धमें कालयवनको यमुदेयके पुत्रोंने घेर लिया ॥४१॥ तदनन्तर याका संग्रह करनेवाले एवं एक-दूसरेके प्रति निन्दात्मक वाक्योंका प्रयोग करनेवाले उन कुमारों और कालयवनका भयंकर संग्राम हुआ। संग्रामके समय वे अहङ्कारवश व्यर्थको टीगे भी हॉक रहे थे ।।दा कालयवनने चक्र, नाराच आदि शस्त्रोंसे कितने ही कुमारोंके शिर छेद डाले जेमसे ग्वूनसे लथ-पथ उन कटे हुए गिरोसे पृथ्वो ऐसी सुशोभित होने लगी मानो कमलोंसे हो मुझोभित हो रही हो ॥४३।। यह देस कुमार मारणने क्रोधमें आरर एक ही तलवारके . १ महीघरी म० । २ विष्णु-मः । ३ जप्नो म०। ४ वरन् ।

- हरिवंशपुराणे कृष्णेनाभिमुसीभूता मागधस्य सुताः परे । शूरा मृत्युमुसं नीतास्तेऽर्धचन्द्रः शिरश्छिदा ॥४५॥ ततः स्वयं जरासन्धः कृष्णस्याभिमुखं रुषा । दधाव धनुरास्फाल्य रथस्थो रथवर्तिनः ॥४६॥ अन्योन्याक्षेपिणोयुद्धं तयोरद्धतवीर्ययोः । अस्त्रैः स्वामाविकैदिव्यरभूदत्यन्तमीपणम् ॥४७॥ अस्त्रं नागसहस्राणां सृष्टप्रज्वलनप्रभम् । माधवस्य वधायासौ क्षिप्रं चिक्षेप मागधः ॥१८॥ अमूढमानसः शौरिनागनाशाय गारडम् । अस्त्रं चिक्षेप तेनाशु ग्रस्तं मागास्त्रमग्रतः ॥४९॥ अम्बं संवर्नकं रौद्रं निमसर्ज स मागधः । तन्महाश्वसनास्त्रेण माधवोऽपि निराकरोत् ॥५०॥ वायव्यं व्यमुचच्छस्नमस्त्रविन्मगधेश्वरः । अन्तरिक्षण वास्त्रेण व्याक्षिपत्तदधोक्षजः ॥५१॥ अग्निसाकरणे सक्तमस्त्रमाग्नेयमुज्ज्वलम् । मागधक्षिप्तमाक्षिप्तं वारणास्त्रेण शौरिणा ॥५२॥ अखं वैरोचनं मुळे मागधेन्द्रेण रोपिणा । उपेन्द्रेणापि तदुरान्माहेन्द्रास्त्रेण दारितम् ॥५३॥ राक्षसास्त्रं रिपुक्षिप्तं क्षिप्रं नारायणो रणे । क्षिप्न्वा नारायणास्त्रेण सोऽरीणां तिमाहरत् ॥५४॥ नामसास्त्रं परिक्षिप्तं मास्करास्त्रेण सोऽभिनत् । अश्वग्रीवास्त्रमत्युग्रं द्राग्यह्मशिरसारणत् ॥५५॥ दिव्यान्यन्यानि चास्त्राणि क्षिप्तानि प्रतिशत्रुणा । प्रतिक्षिप्य निरायामो वासुदेवोऽवविष्टने ॥५६॥ तथा व्यर्थप्रयासोऽसौ क्षितिक्षिप्तशरासनः । रक्ष्य यक्षसहस्रेण चक्ररत्नमचिन्तयत् ॥५॥ प्रहारसे कालयवनको चिरकालके लिए यमराजके घर भेज दिया ||४४॥ जरासन्धके शेप शूर-वीर पुत्र युद्धके लिए सामने आये तो अर्धचन्द्र वाणोंके द्वारा शिर काटनेवाले कृष्णने उन्हें मृत्युके मुखमें पहुंचा दिया ॥४५॥ तदनन्तर स्वयं जरासन्ध, क्रोधवश धनुप तान कर रथपर सवार हो, रथपर बैठे कृष्णके सामने दौड़ा ॥४६॥ दोनों ही एक-दूसरेके प्रति तिरस्कारके शब्द कह रहे थे तथा दोनों ही उत्कट वीर्यके धारक थे इसलिए दोनों में स्वाभाविक एवं दिव्य अत्र-शस्त्रोंसे भयंकर युद्ध होने लगा ।।४७। उधर जरासन्धने श्रीकृष्णको मारनेके लिए शीघ्र ही अग्निके समान देदीप्यमान प्रभाका धारक नागास्त्र छोड़ा ॥४८॥ इधर सावधान चित्तके धारक कृष्णने नागास्त्रको नष्ट करनेके लिए गामड़ अब छोड़ा और उमने शीघ्र ही आगे बढकर उस नागास्त्रको ग्रस लिया ॥४९।। जरासन्धने प्रलयकालके मेघके समान भयंकर वर्षा करनेवाला संवर्तक अत्र छोड़ा तो श्रीकृष्णने भी महाश्यसन नामक अस्त्रके द्वारा तीव्र ऑधी चलाकर उसे दूर कर दिया ।। अत्रोंके प्रयोगको जाननेवाले जरासन्धने वायव्य अस्त्र छोड़ा तो श्रीकृष्णने अन्तरीक्ष अनके द्वारा उसका तत्काल निराकरण कर दिया ॥५१।। जरासन्धने जलाने में समर्थ देदीप्यमान आग्नेय वाण छोड़ा तो कृष्णने वारणास्त्रके द्वारा उसे दूर कर दिया ॥५२॥ क्रोधमें आकर जरासन्धने वैरोचन शस्त्र छोड़ा तो श्रीकृष्णने माहेन्द्र अरसे उसे दूरसे ही नष्ट कर दिया ॥५३॥ शत्रुने युद्ध में राक्षसबाण छोड़ा तो कृष्णने शीघ्र ही नारायण अस्त्र चलाकर शत्रुओंके छक्के छुड़ा दिये ॥५४॥ जरासन्धने तामसास्त्र चलाया तो कृष्णने भास्कर असके द्वारा उसे नष्ट कर दिया। और जरासन्धने अश्वग्रीव नामक अत्यन्त तीक्ष्ण शस्त्र चलाया तो कृष्णने ब्रह्मशिरस नामक शस्त्रसे उसे तत्काल रोक दिया ।।५५। इनके सिवाय शत्रुने और भी दिव्य अस्त्र चलाये परन्तु कृष्ण उन सबका निराकरण कर ज्योंके-त्यों स्थिर खड़े रहे-- भी वॉका नहीं हुआ ||६|| इस प्रकार जब जरासन्धका समस्त प्रयास व्यर्थ हो गया तब उसने धनुप पृश्वीपर फेंक दिया और हजार यक्षोंके द्वारा रक्षित चक्ररत्नका चिन्तवन किया ॥१७॥ चिन्तवन १. भीषण. म० । २ व्यामिप्यत्तदधोदजः क० । ३. उपेन्द्रेण च दारितं ख०। ४ शौरिणा म० । ५ चिक्षेपारुगदारुण म. 1 ६. ऽधितिष्ठते मः। --उनका बाल द्वापञ्चाशत्तमः सर्गः ६०१ चिन्तानन्तरमेवान सहस्रकिरणप्रभम् । चक्रं दिक्चविद्योनि मागधस्य करे स्थितम् ॥५८॥ नानास्त्रव्यर्थताक्रुश्चक्रं 'प्रभ्रश्य मागधः । माधवं प्रतिचिक्षेप क्षिप्रं भ्रूभगमोपणः ॥५९॥ नमस्यागच्छत्तस्तस्य विच्छायीकृतभास्वतः । यथास्वं चिक्षिपुः मवें चक्राण्यन्येऽपि भूमृतः ॥६॥ शाङ्गी शक्तिगदाद्यानि हलं समुपलं हली । गदां वृकोदरः पार्थो नानास्त्राण्यस्वपार्थिवः ॥६१॥ सेनानीः परिघं शनि युधिष्टिरनृपस्तथा । तस्य तु प्रतिघातार्थमुद्गीर्णाशीयमं ययौ ॥६२॥ ममुद्रविजयाक्षोभ्यप्रभृतिभ्रातरो भृशम् । अप्रमत्ता महास्त्राणि प्रतिचक्र प्रचिक्षिपुः ॥६३॥ नमीगस्त्वयधिज्ञातमाविकार्यगतिस्थितिः । चक्रस्यामिमुखश्चक्रे विष्णुनैव मह स्थितिम् ॥६॥ वार्यमाणं तु तञ्चकमनचक्रेण भूभृताम् । विस्फुरद्विस्फुलिङ्गीधं शनैरागत्य मित्रवत् ॥६५॥ मह प्रदक्षिणीकृत्य भगवन्नेमिना हरिम् । तर दक्षिणे तस्थौ शङ्खचक्रामुशातिते ॥६६॥ व्यौग्नि दुन्दुभयो नेदुरपतन्पुष्पवृष्टयः । नवमी वासुदेवोऽयमिति देवा जगुस्तदा ॥६७॥ सुगन्धिवायुमिः सार्धमनुकूलरलं तदा । हृदयर्यदुवीराणां समुच्चमितमायुधम् ॥६॥ चक्रहस्तं हरिं दृष्ट्वा संयुगे मगधाधिपः । दध्यो चक्रपरावृत्तिरन्यथेयमभूदिति ॥६९॥ चक्रविक्रमगंमारसमानान्तदिगन्तरः । त्रिखण्डाधिपतिश्चण्डो जातः खण्डितपौरुषः ॥७॥ चतुरङ्गवलं कालः पुत्रा मित्राणि पौरुषम् । कार्यकृत्तावदेवाय यावद्देववलं परम् ॥७॥ देवे तु विकले कालपारुषादिनिरर्थकः । इति यत्कयते विदिस्तत्तध्यमिति नान्यथा ॥७२॥ करते ही सूर्यके समान देदीप्यमान तथा दिशाओंके समूहको प्रकाशित करनेवाला चक्ररत्न जरासन्धके हाथमें आकर स्थित हो गया ॥५८॥ नाना शस्त्रोंके व्यर्थ हो जानेसे जिसका क्रोध वढ रहा था तथा जो भ्रकुटिके भङ्गसे अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था, ऐसे जरासन्धने घुमा- कर शीघ्र हो वह चक्ररत्न कृष्णकी ओर फेंका ।। ५९ ॥ जिसने अपनी कान्तिसे सूर्यको फीका कर दिया था ऐसे आकाशमें आते हुए उस चक्ररत्नको नष्ट करनेके लिए कृष्णपक्षक अन्य समस्त राजाओंने भी यथायोग्य चक्र छोड़े ॥६०|| श्रीकृष्ण शक्ति तथा गदा आदि लेकर, बलदेव हुल और मूसल लेकर, भीमसेन गदा लेकर, अस्त्रविद्याके राजा अर्जुन नाना अस्त्र लेकर, मेनापति-अनावृष्टि परिघ लेकर और युधिष्ठिर प्रकट हुए साँपके समान शक्तिको लेकर आगे आये ।।६१-६गा समुद्र विजय तथा अक्षोभ्य आदि भाई अत्यन्त मावधान होकर उस चक्ररत्न की ओर महा अत्र छोड़ने लगे॥६३|| किन्तु भगवान नेमिनाथ, अवधि-जानके द्वारा आगामी कार्यकी गतिविधिको अन्छी तरह जानते थे इसलिए वे कृष्णके साथ ही चक्ररबके सामने खड़े रहे ॥६४|| राजाओं के अनसमूह जिसे रोक रहे थे तथा जिमसे देदीप्यमान तिलगोंके समूह निकल रहे थे ऐमा वह चक्ररत्न मित्रके समान धीरे-धीरे पास आया और भगवान् नेमिनाथ के साथ-साथ कृष्णको प्रदक्षिणा देकर शङ्ख, चक्र और अंकुझसे चिह्नित कृष्णके दाहिने हाथमें स्थित हो गया ॥६५-६६३। उसी समय आकाशमें दुन्दुभि बजने लगे, पुष्पवृष्टि होने लगी, और 'यह नौवॉ नारायण प्रकट हुआ है। इस प्रकार देव कहने लगे ॥६७। अनुकूल एवं सुगन्धित वायु बहने लगी तथा वीर यादवोंके अत्र उनके हृदयोंके साथ-साथ उच्छ्यमित हो उठे ॥६॥ संग्राममे कृष्णको चक्र हाथमें लिये देख, जरासन्ध इस प्रकार विचार करने लगा कि हाय यह चक्र चलाना भी व्यर्थ हो गया ॥६॥ चक्ररत्न और पराक्रमके ममूहमे जिसने ममस्त दिशाओं को व्याप्त कर रखा था तथा जो तीन खण्डका शक्तिशाली अधिपति था ऐमा में आज पोप होन हो गया--मेरा पुरुषार्थ खण्डित हो गया ।10। 'जवतक देवका बल प्रबल है तभीतक चतुरङ्ग सेना, काल, पुत्र, मित्र एवं पुरुषार्थ कार्यकारी होते हैं ।।७१।। और देवके निर्बल होनेपर काल नथा पुरुषार्थ आदि निरर्थक हो जाते हैं. यह जो विद्वानों द्वारा कहा जाता प्रणम्य म०। २ मागधं म । ३. नहातहरि म०। १ ६०२ हरिवंशपुराणे गमेश्वरोऽहमन्येषामलइयो महतामपि । प्रारब्धो जेनुमल्पन गर्मादिक्लशिना कथम् ॥७३॥ मतापि यदीक्षी दृष्टोऽत्र विधिना ततः । किमर्थ क्लशितो बाल्य गोकुले धिग्विधीहितम् ॥७४॥ लोकान्धीकरणे दक्षां धीरधैयविलोपिनीम् । कमिव धिलक्ष्मी परमंक्रमकाइक्षिणीम् ॥७५॥ ध्यायतित्यादि निश्चिन्य मृत्युकालमुपस्थितम् । प्रकृत्यत्र जरासन्धः कृष्गमिरयाह निर्मयः ॥७६॥ क्षिप चक्रं किमर्थ त्वं गोप ! कालमुपेक्षसे । कालस्योरक्षेपको मुग्ध ! दीर्घसूत्री विनश्यति ।।७७॥ दृश्युनस्तं प्रति प्राह प्रवृत्या प्रश्रयो हरिः । चक्राय॑हमुद्भूतः शासने मम तिष्ट मोः ॥७॥ अपसारे प्रवृत्तस्त्वमस्माकं यद्यपि स्फुटम् । तथापि मृप्यतेऽस्माभिनंतिमात्रप्रमादिमिः ॥७९॥ तथोहितः सनं प्राह प्रसभं गर्वनिमरः । चक्र नालातचक्र में किमनेन स्मयं गतः ॥८॥ अथवादृष्टकल्याणः स्वल्पेनाल्पः म्मयोमवेत् । न महान् दृष्टक्ल्याण. मस्मयो महनापि हि ॥१॥ सह दशाईचक्रेण चक्रेणानेन च स्वकम् । नृपचक्रेण त्वामाशु समुद्रे प्रतिपामि मोः ॥८॥ इन्युने कुपितश्चक्री चक्रं प्रभाम्य मोऽमुचत् । भूभृतस्तेन गवारं यक्षोमित्तिरभिद्यन ॥४३॥ आगतं च पुनः पाणि चक्रपाणे: क्षणेन तत् । प्रयुक्तस्य कृतार्थस्य कालक्षेपो हि निष्फलः ।।८४॥ पाञ्चजन्यं हरिः शचं दध्मी यदुमनोहरम् । नेमिपावलानण्यो गण्या दध्मुनिजाम्बुजम् ।।१५।। है वह सत्य ही कहा जाता है रंचमान भी अन्यथा नहीं है ।।७२॥ मैं गर्भसे ही ईश्वर था और वड़ेसे-बड़े लोगोंके लिए अलंघनीय था फिर भी गर्भके प्रारम्भसे ही क्लेश उठानेवाले एक छोटेसे व्यक्ति द्वारा क्यों जीता जा रहा हूँ ? ॥७३॥ यदि ऐसा साधारण व्यक्ति भी, विधाता के द्वारा मेरा जीतनेवाला देखा गया था तो फिर इसे वाल्य अवस्थामें गोकुलमें नाना क्लेश क्यों उठाने पड़े ? इसलिए विधिकी इस चेष्टाको धिक्कार है ॥७॥ जो लोगोंको अन्धा बनानेमें दक्ष है, धीर-वीर मनुष्योंके भी धैर्यको नष्ट करनेवाली है तथा जो वेश्याके समान अन्य पुरुपके पास जानेकी इच्छा रखती है ऐसी इस लक्ष्मीको धिक्कार है ||७इत्यादि विचार करते-करते जरासन्धको यद्यपि यह निश्चय हो चुका था कि हमारा मरणकाल आ चुका है तथापि वह प्रकृतिसे निर्भय होनेके कारण कृष्णसे इस प्रकार बोला ॥७३॥। अरे गोप! तू चक्र चला, व्यर्थ ही समयकी उपेक्षा क्यों कर रहा है ? अरे मूर्ख ! समयको उपेक्षा करनेवाला दीर्घसूत्री मनुष्य अवश्य ही नष्ट होता है ॥७॥ जरासन्धके इस प्रकार कहनेपर म्यभावसे विनयी कृष्णने उससे कहा कि मैं चक्रवर्ती उत्पन्न हो चुका हूँ इसलिए आजसे मेरे शासनमे रहिए १७८॥ यद्यपि यह स्पष्ट है कि तुम हमारा अपकार करने में प्रवृत्त हो तथापि हम नमस्कार मात्रसे प्रसन्न हो तुम्हारे अपकारको क्षमा किये देते हैं ॥७९॥ श्रीकृष्णके इस प्रकार कहनेपर अहंकारसे भरे हुए जरासन्धने जोर देकर कहा-अरे यह चक्र तो मेरे लिए अलात चक्रके समान है तू इमसे अहंकारको क्यों प्राप्त हो गया है ? |८०|| अथवा जिमने कभी कल्याण देखा ही नहीं ऐसा क्षुद्र मनुष्य थोड़ा- सा वैभव पाकर ही अहंकार करने लगता है और जिमने कल्याण देखा है ऐसा महान पुरुप यहुन भारी वैभय पाकर भी अहंकार नहीं करता ।।८१॥ मै तुझे यादवोंके साथ, इस चक्रके साथ तथा तेरी सहायता करनेवाले अन्य राजाओंके साथ शीघ्र ही समुद्रमें फेंकता हूँ ।।२।। जरासन्धके इस प्रकार कहनेपर चक्रवर्ती कृष्णने कुपित हो घुमाकर चक्ररत्न छोड़ा और उसने शीघ्र ही जाकर जरासन्धकी वक्षःस्थलरूपी भित्तिको भेट दिया ।।३।। यह चक्ररत्न जरासन्ध को मारकर क्षण-भरमें पुनः कृष्णके हाथमे आ गया सो ठोक ही है क्योंकि भेजे हुए व्यक्तिके कृतकार्य हो चुकनेपर कालक्षेप करना निष्फल है ।।८४॥ कृष्णने यादवोंके मनको हरण करने- १. क्लेटिना म० । २. वेश्यामिव । ३ गर्भनिर्भरः म० । ४. महतामपि म०,६०,ख० । ५. क्त्रेण इ। ६.प्रभृत्य ड। ७. प्रभृत म०।

द्वापञ्चाशत्तमः सर्गः वादिध्वनयी धीरा क्षुभिताधिस्वनोपमाः। प्रभूनाः प्रादुरभवंस्तथैवामयघोषणाः ॥८६॥ स्वमन्यं परमन्यं च संन्यस्तस्वमयं ततः । अनुनमप्यभूदत्य वासुदेवस्य शासने ॥८॥ नृपो दुर्योधनो द्रोणस्तथा दुरशासनादयः । निर्विण्णा विदुरस्यान्त जनी दीक्षा प्रपंदिरे ॥४८॥ कर्णः सुदर्शनाद्याने दीक्षा दमवरान्तिक । जग्राह रणदीक्षान्त निर्माणफलदायिनीम् ॥८९॥ तत्सुवर्णाक्षरं यत्र कर्णकुण्डलमत्यजत् । कर्णः कर्णसुवर्णात्यं स्थानं तत्कातितं जनैः ॥१०॥ गतो मातलिरापृच्च्य सेवेयं स्वामिनोऽन्तिकम् । यादवाः शिविरस्थानं निजं जग्मुः सपार्थिवाः ॥११॥ पृथ्वीच्छन्दः निरीक्ष्य मधुमुदनेन युधि मारते मागधं हनं दिनकृदम्युधावकृत मजनं सजनः । शुचा प्रकटरोदनादिव दधन्मुखं दिग्मुखैजपाकुसुमपाटलं विव जलाअलेर्दित्सया ॥१२॥ ब्रजन्ति खलु जन्तवः कृतशुमोदय संपदा प्रचण्डपुरपान्तराक्रमणकारिणी तत्क्षये । मद्विपदमप्यतो जिनमते जना निर्मलं कुरुवमपुनर्मवनमवहेतुभूतं तपः ॥९३॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती जरासन्धबधवर्णनो नाम द्वापञ्चाशत्तमः सर्गः ॥५२॥ वाला अपना पाञ्चजन्य शह का और भगवान् नेमिनाथ, अर्जुन तथा सेनापति अनावृष्टिने भी अपने-अपने शव के ।।८५।। क्षोभको प्राप्त समुद्रके शब्दके समान बाजोंके गम्भीर शब्द - होने लगे और चारों ओर अभय घोपणाएँ प्रकट की गयी ॥८६॥ जिससे स्वसेना और परसेना अपना-अपना भय छोड़ बिना कुछ कहे ही-चुपचाप आकर श्रीकृष्णकी आज्ञाकारिणी हो गयों १८७।। राजा दुर्योधन, द्रोण तथा दुशासन आदिने संसारसे विरक्त हो मुनिराज विदुरके समीप जिनदीक्षा धारण कर ली ॥८८|| राजा कर्णने भी रणदीशाके याद सुदर्शन नामक उद्यानमे दमवर मुनिराजके समीप मोक्षफलको देनेवाली दीक्षा ग्रहण कर लो ।।८९॥ राजा कर्णने जिस स्थानपर सुवर्णके अक्षरोंसे भूपित कर्णकुण्डल छोड़े थे उस स्थानको लोग कर्ण- मुवर्ण कहने लगे ॥९॥ क्या मैं अपने स्वामीको सेवा करूँ ?' यह पूछ कर मातलि अपने स्वामी इन्द्र के पास चला गया और यादव भी अन्य अनेक राजाओंक साथ अपने-अपने शिविरमें चले गये ॥११॥ उस समय सूर्य अस्त हो गया और सन्ध्याकी लालिमा दशो दिशाओं में फैल गयी, उमसे ऐसा जान पड़ने लगा मानो संग्राममें श्रीकृष्ण-द्वारा मारे गये जरासन्धको देखकर सहृदय सूर्य पहले तो शोकके कारण खूब रोया इसलिए उसका मुस जपाकुसुमके समान लाल हो गया और पहचान जलाञ्जलि देनेको इन्छासे उसने समुद्रमें मजन किया है ॥९२॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि ये संसारके प्राणी, शुभ कर्मका उदय होनेपर बड़ेसे-बड़े पुरुषापर आक्रमण करनेवाली सम्पदाको प्राप्त होते हैं और शुभ कर्मका उदय नष्ट होनेपर विपत्तियॉ भी भोगते हैं इसलिए हे भक्तजनो ! जिनमनमें स्थिर हो मोक्ष-प्राप्रिय कारणभूत निर्मल तप करो॥२३॥ इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें जरासन्धके वधका वर्णन करनेवाला बावनवा सर्ग समाप्त हुआ ॥५२॥ - त्रिपञ्चाशत्तमः सर्गः अथाभ्युदयमभ्यते हरिदश्वे हराविव । परालयमहातेजः प्रसाधितहरिन्मुखे ॥१॥ कृतेषु ग्रणमङ्गेषु प्रवीराणामितोऽमुतः । संस्कारपु तथान्त्येषु जरासन्धादिभूभृताम् ॥२॥ थास्थाने ते यथास्थानं समुद्रविजयादयः । राजानी हरिणासाना वसुदैवागमोन्मुगाः ॥३॥ किमर्थ श्रेमवार्ता ना नाद्याप्यानकदुन्दुभंः । सपुगनप्वृकस्याद्रि गतस्यति हि खेचरम् ॥४॥ इत्यन्योन्याश्रिनालापास्त नृपा यावदासत । धेनुवत्मसमस्वान्ता बालवृद्धपुर सराः ॥५॥ तावदुद्योनिताशाम्ता विद्याधयः पविद्युतः । वेगवत्या सहागत्य नागवघ्या कृनाशिपः ॥६॥ 'जगुरद्य कृतार्था वो गुरुदत्ताशिपोऽसिला. । मुर्तन मागधी ध्वस्तो यय पिया नमश्चराः ॥७॥ सपुत्रनप्लकः क्षेमी क्षेमिणां प्रणयी स यः । यथाज्येष्ठ ममत्यधीन मुतानाश्लेपयत्यपि ॥८॥ इनि धन्या प्रमादेन ते प्रकृष्टतनरहाः । पप्रच्छुः खेचरास्तेन विजिताः कथमित्यमूः ॥९॥ ऊंच वनवनी देवी वसुदेवहितीयता । श्रूयतां वसुदेवस्य रणे सामर्थ्यमित्यसौ ॥१०॥ गया म विजयार्धादि श्वसुरस्यालपूर्वकैः । एकीभूय वगः बंटानरणदणदक्षिणः ॥११॥ समग्रवलयुमास्त समस्तेन पुरस्कृताः । रणे मागधसाहाय्यं विरहय्य युधि स्थिताः ॥१२॥ अथानन्तर दूमरे दिन, शत्रुओं के द्वारा अलाय महातेजफे द्वारा दिशाओंके मुसको अलंन करनेयाल कृष्णके समान जब सूर्य उदयको प्राप्त हुआ तब इधर यादवोंकी सेनामें मुभटॉक घाव अन्छे किये गये और उधर जरासन्ध आदि राजाओंके अन्तिम संस्कार सम्पन्न किये गये ।। १-२।। एक दिन समुद्रविजय आदि राजा, सभामण्डपमें कृष्णके साथ यथास्थान बैठे हुए वमुदेवके आगमनकी प्रतीक्षा कर रहे थे ।। ३ ।। वे परम्परमें चर्चा कर रहे थे कि पुत्र और नातियांके माथ विजयार्ध पर्वतपर गये हुए वमुदेवको यहुन समय हो गया पर आज तक उनकी कुशलताका समाचार क्यों नहीं आया ? ॥४॥इम प्रकार जो परम्पर वार्तालाप कर रहे थे, जिनके हृदय गाय और बछड़के ममान स्नेहसे सराबोर थे एवं जो बालक और वृद्धजनोंसे युक्त थे ऐसे सब राजा यथास्थान धैठे ही थे कि उसी ममय आकाश में चमकती हुई बिजलीक ममान, अपने उद्योतसे दिशाओंको प्रकाशित करनेवाली अनेक विद्याधरियाँ वेगयती नागयुमार्गके माथ यहाँ आ पहुंची और आशीर्वाद देनी हुई कहने लगी कि आप लोगोंको गुरजनांने जो आशीर्वाद दिये थे ये आज सव सफल हो गये । इधर पुग्ने जगमन्धको नष्ट किया है तो उधर पिताने विद्याधरीको नष्ट कर दिया है. ॥५-७॥ पुत्र और नातियांस महित तथा आप लोगों के नहमे युक्त वसुदेव अच्छी तरह हैं और अपनेसे ज्येष्ठ जनों चरणाम प्रणाम और पुत्रकि प्रति आलिङ्गनका सन्देश कह रहे हैं ।।८।। विद्यारियांक मुग्गी यह ममाचार मुनगर पंकी अधिस्नासे जिनक रोमाञ्च निरल आये थे ऐसे मय राजाओने उनसे पूछा कि यमुदेयने विद्याधगंको किस प्रकार जीता ॥ ९॥ यह मुन घसुदेव हित करनेम उद्यत रहनेवाली नागकुमारी देवीने कहा कि यमुदयन रणम जो मामय दिपाया उमे ध्यानमे मुनिए ॥१०॥ युद्ध में निपुग यमुदेवने विज- या पर्वतपर जाकर अपने ग्यमुर और माले आदि विद्याधगंसे मिलकर यहाँ आनेवाले यिधाधगंको गेका ॥११॥ नदनन्तर ममप्र मैनामे युग उन विद्याधरोंका जय यमुदयने रणमें मामना फिया नी ये जगमन्धी महायना छोड़कर म्पयं युद्ध में मंलग्न हो गये ॥ १२ ॥ 1. मरनेटमा १२ मामा, न.1. नथान्ये म., .1. नग्मु. म. 1५. धनवनी t.in म. पुनाने म.

त्रिपञ्चाशत्तमः सर्गः . वलयस्य संपाते जाते तत्र ततोऽन्वभूत् । प्रजानां प्रलयाशङ्का भयव्याकुलचेतमाम् ॥१३॥ द्वन्द्वयुद्धे प्रवृत्तेऽतो नुवाजिस्थहस्तिनाम् । अन्योन्यं न्यायतोऽन्योन्यमवधीसन्ययोदयम् ॥१४॥ आनकेन सपुत्रेण प्रद्युम्नेनामिमानिना । तथा शम्बेन पक्षेण ग्वेचराणां जनेन च ।।१५।। हैतिज्वालावहरेमिः शत्रुभूभृत्कदम्बकम् । मस्मीकुर्वनिरुद्भुतैलिदीवानलायितम् ॥१६॥ अत्रान्तरे मुंरस्तुष्टैस्तस्मिन्बु ष्टमम्बर । नवमी वासुदेवोऽभूद्वसुदेवस्य नन्दनः ॥१७॥ निहतश्च जरासन्यस्तचक्रेणैव संयुगे। प्रतिशत्रुर्गुणहेपी वासुदेवेन चक्रिणा ॥१८॥ इत्युक्त्या वसुदेवस्य स्थम्योपरि पातिता । नानारत्नमयी वृष्टिः कौमुदीव दिवः मुरः ।।१९।। गिरस्ता मरतां श्रुत्या ततस्ते रिपुखेचरा. । वस्ताः शरणमायाता वमुदेवमितोऽमुतः ॥२०॥ वसुदेवस्य पुत्राणां शम्बप्रद्युम्नयारयोः । वसुदेवमुपाश्रित्य कन्या विद्याधरा ददुः ॥२१॥ वयं तु वसुदेवोक्ता युप्मदन्तिकमागताः । मोदन्तं तथैवान्य निवेदयितुमागताः ॥२२॥ नानाविद्याधराधीशा नानाप्राभृतपाणयः । आनकन सहायान्ति ते नारायणभक्तिमः ॥२३॥ यावद्वनवत्ती तपामितीष्टं कथयत्यमौ । तावद्विमानसद्धातैः खटानामावृतं नमः ॥२४॥ श्रवतीय विमानेभ्यो वसुदेवानुयायिनः । वासुदेवं वलोपेतं प्रणेमुः भाभृतान्त्रिताः ।।२५।। अभ्युत्थाय ततो मतो पितरं रामकेशवा । प्रणेमतुरनेनापि तावालिस्यामिनन्दिती ॥२६॥ ज्येष्टानपूजयत्सर्वान्प्रणम्यानकदुन्दुभिः । प्रद्युम्नाद्या यथायोग्यं प्रणेमुर्गुस्वान्धवान् ।।२७॥ यथाक्रमं नमीयाना केशवेन बलेन च । प्रतिसम्मानिताः सर्वे सफलं जन्म मंनिर ॥२८॥ तत्पश्चात् वहाँ जब दोनों सेनाओंमें घोर युद्ध होने लगा तब लोगोंको प्रलयकी आशङ्का होने लगी और उनके चित्त भयसे व्याकुल हो उठे ।।१३।। हाथी, घोड़े, रथ और प्यादोंका द्वन्द्व युद्ध होनेपर दोनों सेनाएँ परस्पर न्यायपूर्वक एक-दूसरेका वध करने लगी ॥ १४ ॥ वसुदेव, उनके पुत्र, अभिमानी प्रद्युम्न, शम्ब तथा पक्षके अनेक विद्याधर ये सव शस्त्ररूपी ज्यालाओंको धारण कर शत्रुरूपी राजाओंके समूहको भस्म कर रहे थे एवं बड़ी चपलताके साथ मामने आये थे इसलिए दावानलके समान जान पड़ते थे ।। १५-१६ ।। इसी अवमरपर सन्तुष्ट हुए देवाने आकाशमें यह घोषणा की कि वसुदेयका पुत्र कृष्ण नौवॉ नारायण हुआ है और उसने चक्रधारी होकर अपने गुणोंमें द्वेप रखनेवाले प्रतिशत्रु जरासन्धको उसीके चक्रसे युद्ध में मार डाला है। यह कहकर देवोंने आकाशसे चाँदनीक समान नानारत्नमयी घृष्टि वसुदेयके रथपर करनी प्रारम्भ कर दी ।।१७-१९ ॥ तदनन्तर शत्रु विद्याधर देवोंकी उक्त वाणी सुनकर भयभीत हो गये और जहॉ-नहाँसे एकत्रित हो वसुदेवको शरणमें आने लगे ।।२०।। उन्होंने वमुदेवके पास आकर उनके पुत्रोंको एवं प्रद्युम्न कुमार और मम्ब कुमारको अपनी अनेक कन्याएँ प्रदान की ॥२१॥ हम लोग पसदेवकी प्रेरणा पाकर यह कुदाल समाचार सुनानेके लिए आपके पास आयी हैं ||२२|| नारायणकी भक्तिसे प्रेरित हुए अनेक विद्याधर राजा, नाना प्रकार उपहार हाथमें लिये वसुदेवके साथ आ रहे है ।।२३।। इस प्रकार वनवती (नागकुमारी ) देवी जय- तक उन्हें यह इष्ट समाचार सुनाती है नक्तक विद्याधरोंके विमानोके समूहमे आकाश व्यात हो गया ॥ २४ ॥ वसुदेवके अनुयायी विद्याधरोंने विमानांसे उतर कर वलदेव और कृष्णको नमस्कार किया तथा नाना प्रकारके उपहार समर्पित किये ॥ २५ ।। तदनन्तर भक्तिसे भरे चलदेव और नारायणने पिताको नमस्कार किया और पिताने भी दोनोंका आलिङ्गन कर उनको बहुत प्रशंसा की।॥ २६॥ वसुदेवने ममुद्रविजय आदि ममस्त गुम्जनाको प्रणाम किया एवं प्रद्युम्न आदिने भी गुरुजनों एवं भाई-बान्धयोंको यथायोग्य नमस्कार किया ।। २७ ।। नारायण अर वलभद्रने यथायोग्य जिनका मकार किया था ऐसे समस्त विद्याधरांने अपना- १. चेतमा म० । २ न्नुत्कृष्टमगरे म० । ३. प्रभृतपाणय म०। ४ यावद्धनयती म० ।

हरिवंशपुराणे समस्तबलसंयुत्तो प्रतीची बलकेशयो । प्रयाती प्रमदापूणो पूर्णसर्वमनोरथौ ॥२९॥ आनन्दं ननूनुर्यत्र यादवा मागधे हते । अानन्दपुरमित्यासीत्तत्र जैनालयाकुलम् ॥३०॥ ततश्चक्रमहं कृत्वा सर्गरत्नान्वितो हरिः । दक्षिणं मारतं जिग्ये सदेवासुरमानुपम् ॥३१॥ वर्षेरष्टाभिरिष्टायमें व्यमानोऽनुवासरम् । जितजेयो ययौ कृष्णः स कोटिकशिलां प्रति ॥३२॥ यतस्तत्यामुदारायामनका ऋषिकोटयः । सिद्धास्ततः प्रसिद्धान को कोटिकशिला शिला ॥३३॥ शिलायां तत्र कृन्वादौ पवित्रायां यलिक्रियाम् । दोामुक्षिपतिस्मासौ तां विष्णुश्चतुरगुलम् ।।३४।' सा शिला योजनोच्छाय समायोजनविस्तृता । अर्धमारतवर्षस्थदेवतापरिरक्षिता ॥३५।। तद्वाहुनो मुक्षिप्ता त्रिपृष्टेन शिला पुरा । मूर्द्धदनं हिपृष्टेन कण्ठदघ्नं स्वयम्भुवा ॥३६॥ वक्षोद्वयमुरिक्षता च पुरषोत्तमचक्रिणा । क्षिप्ता पुरुषसिंहन हृदयावधि हारिणी ॥३७।। पुण्डरीकः कीमानमुरदनं हि दत्तकः । जानुमात्रं च सौमित्रिः कृष्णोऽधाच्चतुरगुलम् ॥३८॥ प्रधानपुरषादीनां सर्वेषां हि युगे युगे। मिद्यते कालभेदेन शक्तिः शक्तिमतामपि ॥३९।। शिलावलेन विज्ञातो महाकायबलो बलैः । सोऽनुयातो ययौ चक्री द्वारिका प्रतिबान्धवैः ॥४०॥ प्रविष्टश्च विशिष्टानामाशीमिरमिनन्दितः । द्वारिका द्वारकान्तां स कृतशोमा दिवं यथा ॥४१॥ अपना जन्म सफल माना ॥२८॥ तदनन्तर जिनके सर्व मनोरथ पूर्ण हो गये थे तथा जो हर्पसे परिपूर्ण थे ऐसे बलदेव और नारायणने समस्त सेनाको साथ ले पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थान किया ॥ २९ ।। जरासन्धके मारे जानेपर यादवोंने जिस स्थानपर आनन्द-नृत्य किया था वह स्थान आन- न्दपुरके नामसे प्रसिद्ध और जैन-मन्दिरोंसे व्याप्त हो गया ।। ३० ।। तदनन्तर मब रत्नोंसे सहित नारायणने, चक्ररत्नकी पूजा कर देव, असुर और मनुष्योसे सहित दक्षिण भरत- क्षेत्र को जीता ।।३१।। लगातार आठ वर्षों तक प्रतिदिन मनोवाञ्छित पदार्थोंने जिनकी सेवा की थी और जीतने योग्य समस्त राजाओंको जिन्होंने जीत लिया था ऐसे श्री कृष्ण अब कोटिक शिलाकी ओर गये ।। ३२ ।। चूंकि उस उत्कृष्ट शिलापर अनेक करोड़ मुनिराज मिद्ध अवस्थाको प्राम हुए हैं इसलिए वह पृथ्वीमें कोटिक शिलाके नामसे प्रसिद्ध है ।।३३।। श्रीकृष्णने सर्व प्रथम उस पवित्र शिलापर पूजा की और उसके बाद अपनो दोनों भुजाओस उसे चार अंगुल ऊपर उठाया ।। ३४॥ वह शिला एक योजन ऊँची, एक योजन लम्बी और एक योजन चौड़ी है तथा अर्थ भरतक्षेत्रमे स्थित समस्त देवोफे द्वारा सुरक्षित है ॥ ३५ ॥ पहले त्रिपृष्ट नागयणने इस शिलाको जहॉतक भुजाएँ ऊपर पहुँचती हैं यहॉतक उठाया था। दूसरे द्विष्टने मस्तक तक, तीमरे स्वयंभूने कण्ठ तक, चौथे पुरषोत्तमने वक्षस्थल तक, पॉचो नृसिंहने हृदय तक, छठवें पुण्डर्गकने कमर तक, मातचे दत्तकने जॉघों तक, आठवें लमणने घुटनों तक, और नयें कृष्ण नागयणने उसे चार अगुल तक ऊपर उठाया था ।। ३६-३८ । क्योकि युग-युगमे कालभेद होनेसे प्रधान पुरुपको आदि लेकर सभी शक्ति शाली गनुष्योंकी शक्ति भिन्न-भिन्न रूप हाती आयी है ।। ३९ । शिला उठाने बलसे समस्त सेनाने जान लिया कि, श्रीकृष्ण महान शारीरिक बलमे सहित हैं। तदनन्तर चकरनको धारण करनेवाले श्रीकृष्ण यान्धवजनोंके माथ द्वारिकाकी ओर यापम आये ॥४०॥ वहाँ पृद्धजनोंने नाना प्रकारके आशीर्वादासे जिनका अभिनन्दन किया था ऐसे श्रीकृष्ण नारायणने. मनोहर गोपुगेमे मुन्दर एवं स्वर्गये ममान मजी हुई द्वारिकापुरीमें प्रवेश किया ॥ ११ ॥ १ आनन्द नना-म० । २ मेग्मानी नु यामरम् म०, ३. लोरे काटिशिला सिला म.. योनीमाया ममा. म.। ५. मानुपानी म.।

विपञ्चाशत्तमः सर्गः यथायोग्यं समोग्यास्ते भूनमोयानभूभृतः । प्रामादेषु स्थिताः सुस्था द्वारिकायां यथाविधि ॥४२॥ अमिपितो ततः सर्वे पै चरखेचरः । भरतार्धविभुत्वे तो प्रसिद्धी रामकेशवौ ॥४३॥ संस्थाप्य सहदेवं स चक्री राजगृहे नृपम् । मागधानां चतुर्मागं ददौ तस्मै गतस्मयः ।।१४।। उग्रसेनमुनायादाद्वाराय' मथुरा पुरीम् । स महानेमय शौर्यनगरं प्रददौ नृपः ॥४५॥ श्रीहास्तिनपुरं प्रीत्या पाण्डवेभ्यः प्रियं हरिः । कोसलं रुक्मनाभाय रधिरात्मजसूनवे ॥४६॥ भूचरान् खेचरान्भूपानाचिन्यन समागतान् । स्थानेषु स्थापनां चक्रे चक्रपाणियथायथम् ॥४७॥ विसृष्टाश्च यथास्थानं यातास्ते पाण्डवादयः । आरेमुारिकायां तु यादवास्निदशा यथा ॥४८॥ वसन्ततिलका चक्रं सुदर्शनमदृष्टमुख' रिपूणां शाई धनुर्ध्वननभूनविपक्षपक्षम् । सौनन्दकोऽपि च गदापि च कौमुदी सा मोघेतरा रिपुपु शक्तिरमोघमूला ॥४९॥ शङ्खश्च शङ्खलचितस्य स पाञ्चजन्यः श्रीकौस्तुमो मणिरमावनणुप्रतापः । रत्नानि सप्त महितानि हरहित्तानि व्याभान्ति दिव्यमयमृतियुतानि तानि ॥५०॥ दिव्यायुधं हलममादपराजिताख्यं दिव्या गदामुमलशक्त्यवतंसमालाः। रत्नानि पञ्च महिनानि हलायुधस्य हेलाविधूतरिषुमण्डलविभ्रमस्य ॥५१॥ राज्ञां स पोडशसहस्रगुणैर्गुणगण्यगुणी प्रणतमूर्धमिरर्धचको । जो भूमिगोचरी और विद्याधर राजा उनके साथ लौटकर आये थे उन्हें यथायोग्य भोग्य सामग्री दी गयी और वे द्वारिकपुरोके महलोंमें विधिपूर्वक निश्चिन्ततासे ठहराये गये थे ।।४२।। तदनन्तर ममस्त भूमिगोचरी और विद्याधर राजाओं ने अतिशय प्रसिद्ध बलदेव और श्रीकृष्णको अर्ध भरतक्षेत्रके स्वामित्वपर अभिषिक्त किया अर्थात् राज्याभिषेक कर उन्हें अर्थ भरतक्षेत्रका स्वामी घोपित किया ॥ ४३ ।। तत्पश्चात् चक्ररत्नके धारक श्रीकृष्णने जरा- सन्धके द्वितीय पुत्र सहदेवको राजगृहका राजा बनाया और उसे निरहङ्कार होकर मगध देशका एक चौथाई भाग प्रदान किया ॥४४॥ उग्रसेनके पुत्र द्वारके लिए मथुरापुरी दी, महा- नेमिके लिए शौर्यपुर दिया ॥४५॥ पाण्डवोंके लिए प्रीतिपूर्वक उनका प्रिय हस्तिनापुर दिया और राजा रुधिरके नाती रुक्मनाभके लिए कोशल देश दिया ॥४६॥ इस प्रकार चक्रपाणि- श्रीकृष्णने आये हुए समस्त भूमिगोचरी और विद्याधर राजाओंकी यथायोग्य स्थानोंपर स्थापना की-यथायोग्य स्थानोंका उन्हें राजा बनाया ॥ १७ ॥ तदनन्तर श्रीकृष्णसे विदा लेकर पाण्डय आदि यथास्थान चले गये और यादव देवोंके समान द्वारिकामें क्रीड़ा करने शत्रुओंका मुख नहीं देखनेवाला मुदर्शन चक्र, अपने शब्दसे शत्रुपक्षको कम्पित करनेवाला शाह धनुप, मोनन्दक खड्ग, कौमुदी गठा, शत्रुओंपर कभी व्यर्थ नहीं जानेवाली अमोघमूला शक्ति, पाञ्चजन्य शङ्ख और विशाल प्रतापको प्रकट करनेवाला कौस्तुभ मणि; शङ्कके चिह्नसे चिह्नित श्रीकृष्णके ये सात रब थे। ये सातों रत्न देवोंके द्वारा पूजित, अतिशय हितकारी और दिव्य आकारसे युक्त होते हुए अत्यन्त सुशोभित थे ।।४९-५०।। शत्रु- समूहके विभ्रमको अनायाम ही नष्ट करनेवाले बलदेवके, अपराजित नामक दिव्य दिव्य गदा, दिव्य मुमल, दिव्य शक्ति और दिव्य माला ये पॉच रत्न थे। बलभद्र के भी ये पाँचों रन देवांके द्वारा प्रजित थे ॥५१॥ गुणोंको जाननेवाले, गणनीय एवं नतमम्नक मोलह- लगे॥१८॥ १ सुनायाद्वीराय १०, मुतायादादराय म । २. कोशला म० । ३. मुसंम०1४. शवास्येन लक्षणेन स्वचितस्य (२० टे.)

हरिवंशपुराणे भस्तदधंगणनगणवदेवराजाकरः मुखमसेरत सेग्यमानः ॥५२॥ शाही स पोडशमहन्यवरागनानां देगगनाललितविभ्रमहारिणीनाम् । मद्धेः क्रमेण रनिपूपनिषेपितागो रेमे नदधंगणनस्तु हली मुदारः ॥५३॥ मालिनीच्छन्दः हिमशिशिरवमन्तप्राप्मवर्षाशसु प्रिययुयनिसहाया यादवा द्वारिकायाम् । जिनमतकृतधर्मा योग्यदेशेषु मोगरपिरनरनिरागा रेमिरे मामामाः ॥५४॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनमेनाचार्यस्य कृती कृष्णविजयवर्णनो नाम निपञ्चाशत्तमः सर्गः ॥५३॥ । हजार प्रमुख राजा और आठ हजार आज्ञाकारी, भक्त, गणबद्ध देव जिनकी निरन्तर सेवा करते थे ऐसे श्रीकृष्ण सुखका उपभोग करते थे ।। ५२ ॥ रनिकालमें देयागनाओंके समान मुन्दर हाव-भावोंसे मनको हरनेवाली सोलह हजार स्त्रियाँ श्रीकृष्णके शरीरकी सेवा करती थी और उनसे आधी अर्थात् आठ हजार उत्तम त्रियाँ बलदेयके शरीरकी सेवा करती थीं। श्रीकृष्ण और बलदेव अपनी-अपनी स्त्रियोके साथ यथेच्छ क्रीड़ा करते थे ॥५३॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि जो जिन-धर्मको धारण करनेवाले थे, जिनके रति और रागमें कभी व्यवधान नहीं पड़ता था, प्रिय युवतियाँ ही जिनकी सहायक थीं और जो समस्त भूमि के अधिपति थे ऐसे यादय लोग, द्वारिकापुरीमे हेमन्त, शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा और शरद् ऋतुके योग्य स्थानों में मनचाहे भोग भोगते हुए क्रीड़ा करते थे ।।५४|| इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें कृष्णविजयका वर्णन करनेवाला तिरेपनयाँ सर्ग समाप्त हुआ ।। ५३ ॥ १ गुणनैः क, ख, ग, घ० । २. योगे. म० ।

चतुःपञ्चाशः सर्गः - श्रेणिकन पुनःपृष्टश्चेष्टितं पाण्डवोद्भवम् । सन्देहध्वान्तघातार्को गौतमः स जगी गणी ॥१॥ स्थितेषु हास्तिनपुरे पाण्डवेषु यथाक्रमम् । निजस्वामिपरिप्राप्त्या तुतुपुः कुरवोऽधिकम् ॥२॥ सौराज्य पाण्डुपुत्राणां वर्तमान सुखायहं । सर्वे वर्णाश्रमा राष्ट्र धार्तराष्ट्रान् विसस्मरः ॥३॥ अखण्डितगतिः प्राप्तः कदाचित्पाण्डवास्पदम् । नारदश्चण्डचित्तोऽसौ प्रकृत्या कलहप्रियः ॥४॥ भादरेण स तैदृष्टः प्रविशन्निस्सरपि । व्यग्रयालकृतौ तन्व्या द्रौपद्या तु न लक्षितः ॥५॥ ततो जग्वाल कोपेन तैलासङ्गादिवानलः । सजनावमरज्ञो न प्राणी सम्मानदुःखितः ॥६॥ स तदुःसविधानाय कृतेच्छः कृतनिश्चयः । धातकोखण्डपूर्वार्धमारतं प्रति खे ययौ ॥७॥ अङ्गप्वमरकङ्कायां पुरि शङ्काविवर्जितः । खोलोलं पद्मनामात्यं 'सामिख्यं दृष्टवान्नुपम् ॥४॥ तनान्तःपुरमात्मीयमात्मीयस्यास्य दर्शितम् । पृष्टश्च दृष्टमीक्षं स्त्रीरूपं क्वचिदित्यसौ ॥९॥ पर्यस्तं मन्यमानोऽयं पायसेमिमतं घृतम् । द्रौपदीरूपलावण्यं लोकातीतमवर्णयत् ॥१०॥ तं द्रौपदीमयं 'ग्राहं ग्राहयित्वा स नारदः । द्वीपक्षेत्रपुरावासकथनः कापि यातवान् ॥११॥ आराधयदसौ तोबतपसा द्रौपदीप्सया। सुरं संगमकामिल्यं पातालान्तर्वासिनम् ॥१२॥ आराधितेन देवेन पद्मनाभपुरी निशि । सा सुप्तव समानीता पार्थस्य पनिता प्रिया ॥१३॥ 7 सद्गसे अग्निके समान, अथानन्तर राजा श्रेणिकने पुनः पाण्डवोंकी चेष्टा पूछी सो सन्देहरूपी अन्धकारको नष्ट करनेके लिए सूर्यके समान गौतम गणधर इस प्रकार कहने लगे ॥११॥ जय पाण्डव हस्तिनापुरमें यथायोग्य रीतिसे रहने लगे तब कुरु देशको प्रजा अपने पूर्वस्वामियोंको प्राप्तकर अत्यधिक सन्तुष्ट हुई ।।२।। पाण्डवोंके सुखदायक सुराज्यके चालू होनेपर देशके सभी पूर्ण और सभी आश्रम धृतराष्ट्रके पुत्र दुर्योधन आदिको सर्वथा भूल गये ॥३॥ एक दिन सर्वत्र वे-रोक-टोक गमन करनेवाले, क्रुद्ध हृदय और स्वभावसे कलहप्रेमी नारद, पाण्डवोंके घर आये |४|| पाण्डयोंने नारदको बहुत आदरसे देखा परन्तु जब वे द्रौपदीके घर गये तब वह आभूषण धारण करनेमें व्यग्र थी इसलिए कय नारदने प्रवेश किया और कब निकल गये यह वह नहीं जान सको ॥५॥ नारदजी, द्रौपदीके इस व्यवहारसे तेल के क्रोधसे जलने लगे सो ठीक ही है क्योंकि जो प्राणी सम्मानसे दुखी होता है वह सज्जनोंके भी अवसरको नहीं जानता। उन्होंने द्रौपदीको दुःख देनेका दृढ़ निश्चय कर लिया और उसी निश्चयके अनुसार वे पूर्वधातकीखण्डके भरत क्षेत्रकी ओर आकाशमें चल पड़े ॥७॥ निशङ्क होकर अङ्ग देशकी अमरकापुरीमें पहुँचे और वहाँ उन्होंने स्त्रीलम्पद, पद्मनाभ नामक शोभासम्पन्न राजाको देखा ।।८। राजा पद्मनाभने नारदको आत्मीय जान, अपना अन्तःपुर दिखाया और पूछा कि ऐसा स्त्रियोंका रूप आपने कहीं अन्यत्र भी देखा है ? ॥९॥ राजा पद्मनाभके प्रश्नको खीरमें पड़े धोके समान अनुकूल मानते हुए नारदने द्रौपदी के लोकोत्तर सौन्दर्यका वर्णन इस रीतिसे किया कि उसने उसे द्रौपदी रूपी पिशाचके वशी- ,.भूत कर दिया अर्थान् उसके हृदयमें द्रौपदीके प्रति अत्यन्त उत्कण्ठा उत्पन्न कर दी। तदनन्तर द्रोपदीके द्वीपक्षेत्र, नगर तथा भवनका पता बताकर वे कहीं चले गये ॥१०-११॥ पद्मनाभने द्रौपदीके प्राप्त करनेकी इच्छासे तीव्र तपके द्वारा पाताललोकमें निवास करनेवाले संगमक नामक देवकी आराधना की ॥१२॥ तदनन्तर आराधना किया हुआ वह देव रात्रिके समय १. सशोभम् 'अभिल्या नामशोमयोः' इत्यमरः । २. प्राचं म ।

हरिवंशपुराणे निवेदिता सुरेणासौ मवनोद्यानवर्तिनी । अद्राक्षोद् द्रौपदों गत्वा साक्षादिव सुराङ्गनाम् ॥१४॥ प्रबुद्धा सर्वतोमदे शयने सा पुनः पुनः । स्वपित्य॑व विनिद्राऽपि स्वप्नोऽयमिति शदिनी ॥१५॥ विनिमीलितनेत्राया ज्ञात्वाकूनमसौ नृपः । शनैः समीपमाश्रित्य वदति स्म प्रियंवदः ॥१६॥ श्रायताक्षि निरीक्षस्व नैप स्वप्नो घटस्तनि । द्वीपोऽयं भातकीखण्डः पद्मनामस्त्वहं नृपः ॥१७॥ नारदेन समाख्यातं तव रूपं मनोहरम् । मयाराधितदेवेन त्वं मदर्थमिहाहृता ॥१८॥ श्रुत्वा चक्तिचित्ता सा किमेतदिति वादिनी । अचिन्तयदहो दुःखं दुरन्तं मे समागतम् ॥१९॥ पार्थदर्शनपर्यन्तमाहारत्यागमात्मनि । कृत्वा पार्थविमोच्यं च वेणीवन्धं दधार सा ॥२०॥ द्रौपदीशीलनिमेंदवज्रप्राकारमध्यगा। पद्मनाभमुवाचेत्थं वाध्यमानं मनोभुवा ॥२१॥ भ्रातरौ रामकृष्णो मे भर्ता पार्थो धनुर्धरः । मज्येष्टी महावीरावनुजौ च यमोपमौ ॥२२॥ जलस्थलपथैस्तेषामनिवारितगोचराः। विचरन्ति भुवं सवां मनोरथरया रथाः ॥२३॥ क्षेमं यदि नृपैतेभ्यो वान्छसि त्वं सबान्धवः । तद्विसर्जय मां शीघ्रमाशीविपवधूपमाम् ॥२४॥ इन्युक्तोन्यनिवृत्तेच्छः स्वग्राहं नैप मुञ्चति । यदा तदा दृढा प्राह प्रत्युत्पन्नमतिः सती ॥२५॥ मासस्याभ्यन्तरे भूप यदीह स्वजना मम । नागच्छन्ति तदा त्वं में कुरव यदमीप्सितम् ॥२६॥ तथाऽस्त्विति निगद्यैतां पद्मनाभोऽनुवर्तयन् । सान्तःपुरः प्रियशतैर्विलोभनपरः स्थितः ॥२७॥ सोती हुई द्रौपदीको पद्मनाभकी नगरीमें उठा लाया ॥१३॥ देवने लाकर उसे भवनके उद्यानमें छोड़ दिया और इसकी सूचना राजा पद्मनाभको कर दी। राजा पद्मनाभने जाकर साक्षात् देवाङ्गनाके समान द्रौपदीको देखा ॥१४॥ यद्यपि द्रौपदी अपनी सर्वतोभद्र शय्यापर जाग उठी थी और निद्रारहित हो गयी थी तथापि 'यह स्वप्न है' इस प्रकार शङ्का करनी हुई बार- बार सो रही थी ॥१५॥ नेत्रीको बन्द करनेवाली द्रौपदीका अभिप्राय जानकर राजा पद्मनाभ धीरेसे उसके पास गया और प्रिय वचन बोलता हुआ इस प्रकार कहने लगा ॥१६।। उसने कहा कि हे विशाललोचने ! देखो, यह स्वप्न नहीं है। हे घटस्तनि ! यह धातकीखण्ड द्वीप है और मैं राजा पद्मनाभ हूँ ॥१७॥ नारदने मुझे तुम्हारा मनोहर रूप बतलाया था और मेरे द्वारा आराधित देव मेरे लिए तुम्हें यहाँ हर कर लाया है ॥१८।। यह सुनकर उसका हृदय चकित हो गया तथा यह क्या है' इस प्रकार कहती हुई वह विचार करने लगी कि अहो ! यह मुझे दुरन्त दुःख आ पड़ा है ॥१९॥ 'जबतक अर्जुनका दर्शन नहीं होता तवतकके लिए मेरे आहारका त्याग है' ऐसा नियम लेकर उसने अर्जुनके द्वारा छोड़ने योग्य वेणी बाँध ली ॥२०॥ तदनन्तर शीलरूपी वनमय कोटके भीतर स्थिन द्रौपदी कामके द्वारा पीड़ित होनेवाले राजा पद्मनाभसे इस प्रकार बोली ।।२१॥ कि बलदेव और कृष्णनारायण मेरे भाई हैं, धनुर्धारी अर्जुन मेरा पति है, पतिके बड़े भाई महावीर भीम और अर्जुन अतिशय वीर हैं और पतिके छोटे भाई महदेव और नकुल यमराजके समान हैं ।।२२।। जल और स्थलके मार्गौसे जिन्हें कोई कहीं रोक नहीं सका ऐसे मनोरथके समान शीघ्रगामी उनके रथ समान पृथिवीमें विचरण करते हैं ।।२३।। इसलिए हे राजन् ! यदि तू भाई-बान्धवों-सहित, इनसे अपना भला चाहता है तो सर्पिणीके समान मुझे शीघ्र ही वापिस भेज दे ॥२४|| जिसकी अन्य सय इच्छाएँ दूर हो चुकी थीं ऐसे पद्मनाभने द्रौपदीके इस तरह कहनेपर भी जब अपना हठ नहीं छोड़ा तव परिस्थितिके अनुसार तत्काल विचार करनेवाली द्रौपदीने दृढ़ताके साथ उत्तम दिया ॥२५॥ कि हे राजन् ! यदि मेरे आत्मीयजन एक मासके भीतर यहाँ नहीं आते हैं तो तुम्हारी जो इच्छा हो वह मेरा करना ।।२६।। 'तथास्तु'-पसा हो' इस प्रकार कहकर पद्मनाभ अपनी स्त्रियोंके माथ उसे अनुकूल करता और मैकड़ों प्रिय पदार्थोसे लुभाता हुआ रहने लगा १. वाग्यमानं म । २. नृपस्नेभ्यो म.। - चतुःपञ्चाशः सर्गः विसम्धा भयमुझिारया स्थिग्वा साश्रुविलोचना । 'विविहारा निराहारा पत्युः पन्थानमीक्षते ॥२८॥ अश्यायामकस्मात्तु तस्यां पाण्डवपञ्चकम् । किंकर्तव्यतया मूढमभूदरयन्तमाकुलम् ॥२९॥ निरपायास्ततो गत्या चक्रिणे ते न्यवेदयन् । दुःखी सयादवः सोऽत्र क्षेओवधावयत्तदा ॥३०॥ भग्रान्तरहृतां मत्वा केनचिक्षुद्रवृत्तिना । तप्प्रवृत्तिपरिघाप्ता यादवास्ते सतत्पराः ॥३१॥ आस्थानस्थितमागस्य कदाचिनारदो हरिम् । पूजितो यदुलोकस्य जगादेति प्रियोदितः ॥३२॥ इंहिता धातकीसण्डे कृष्णा कृष्णकृशानिका । पुर्याममरकाया पद्मनामरा समनि ॥३३॥ अनारतगलद्वाप्पधाराविलापिलोचना । सा तस्यान्तःपुरस्त्रीमिः सादरामिरपास्यते ॥३४॥ शीलमानमहावासा दीघनिश्वासमोचिनी । सरमु यन्धुपु युप्मामु कथमास्ते रिपोगृह ॥३०॥ लाध्वेति द्रौपदीवाता हरिप्रभृतयस्तदा । शशंभुनारदं हटाः सापकारोपकारिणम् ॥३६॥ दोपदीहरणं कृत्वा के प्रयाति म दुष्टधीः । प्रेपयामि दुराचार मृत्यवे मृत्युकाइक्षिणम् ॥३७॥ इति द्विष्टो द्विपे कृष्णः कृष्णामानेतुमुघमी । दक्षिणो दक्षिणाम्मोधेस्तटं सशकटो गतः ॥३८॥ लवणाधिपति देयं मुस्थितं नियमस्थितम् । पाराध्य पाण्डवैः साधं धातकीखपदमीप्सया ॥३९॥ देवेन नीयमानः सन् स्यैः पहिभः सपाण्डवः । द्रागुलस्याधिमापसदातकीरखपडमारतम् ॥१०॥ I॥२७द्रौपदी भय छोड़कर विश्वस्त हो गयी और निरन्तर अश्रु छोड़ती तथा आहार-विहार यन्द कर पतिका मार्ग देसने लगी ।।२८॥ इधर जब द्रौपदी अकरमान् अदृश्य हो गयी तब पाँचों पाण्डव किंकर्तव्यविमूह हो अत्यन्त व्याकुल हो गये ॥२९॥ तदनन्तर जब वे निरुपाय हो गये तब उन्होंने श्रीकृष्णके पास जाकर मय ममाचार कहा। उसे सुनकर यादवों-सहित श्रीकृष्ण बहुत दुःसो हुए और उसी समय उन्होंने समस्त भरत क्षेत्रमें यह समाचार श्रयण कराया ॥३॥ जय भरत क्षेत्रमें फही पता नहीं चला तब उन्होंने समझ लिया कि कोई क्षुद्र वृत्तिवाला मनुष्य इसे हरकर दूसरे क्षेत्र में ले गया है । इस तरह समस्त यादव उसका समाचार प्राप्त करनेमें तत्पर हो गये ।।३।। किसी दिन श्रीकृष्ण सभामण्डपमें बैठे हुए थे कि उमी समय नारदजी यहाँ आ पहुँचे। समस्त यादयोंने उनका सम्मान किया। तदनन्तर प्रिय ममाचार मुनाते हुए उन्होंने पहा कि मैने द्रौपदीको धातकीराण्ड द्वीपको अमरपट्वापुरीमें गजा पद्मनाभके घर देगा है। उमफा शरीर अत्यन्त फाला तथा दुर्वल हो गया है, उसके नेत्र निरन्तर पड़नी हुई अध्रुधारासे व्यार रहते हैं और राजा पद्मनाभके अन्तःपुरको त्रियाँ पई आदर माय इमको सेवा फरती रहती है ॥३२-३४॥ उसे इस समय अपने शीलपनका ही मयगे यहा भरोमाई तया या लम्या-लम्बी श्याम छोड़ती रहती है। आप-जमे भाइयोंफ रहते हुए या शत्रुफै घरमें क्यों गह नहीं है ? ॥३५ ।। इस प्रकार द्रौपदीका ममाचार पाकर उम ममय रण आदि यान हपिन हुए और अपकारफे माथ-साथ अकार करनयाले नारदकी प्रांमा फरने लगे ।। ३६ ॥ यह दुष्ट द्रौपदीका हरणकर कहाँ जायेगा ? मृत्युफ इन्दुः उम दुगनागको अभी पमराजफे पर भेजता हूँ' ।। ३७ ॥ इस प्रकार शक प्रनि देष प्रकट करते हुए धीरज दोपदी को लाने लिए आन हुए और रथपर पैठार दक्षिण समुद्र तटपर जा पहुंचे ।। ३८॥ यहाँ जाकर उन्होंने धानोरण्डीपको प्राप्त करनेको न्याय पाहयोग्र मा नियम पित मयमममुफे अधिष्ठाता देयको अच्छी नरह आराधना की ।।३९॥ तदनन्तर लपगाटमा अधिष्ठाता देय पाँच पायो गहिन को छह श्याम गया और इस नर शोपदी १.नाराम.। २ दीदी।। मारिदाम् R.1 ... दिनार र उप. सरासपास.. ६.सा..

६१२ हरिवंशपुराणे पुर्यास्तेऽमरकङ्काया बहिस्यानवर्तिनः । कृष्णाद्याः पद्मनामाय तनियुक्तनिवेदिताः ॥४॥ चतुरङ्गबलं तस्य पुर्या निर्यातमुद्धतम् । भ्रातृमिः पञ्चभियुद्धे मग्नं नगरमाविशत् ॥४२॥ नृपः स नगरद्वारं पिधाय सनयः स्थितः । अलध्ये पाण्डुपुत्राणां ततश्चक्री स्वयं रुषा ॥४३॥ विभेद पादनिर्धातनिर्यातरिव 'नागरीम् । वहिरन्तभुवं विश्वां भ्रश्यत्प्राकारगोपुराम् ॥४४॥ पतव्यासादशालौघम्यिन्मत्तेभवाजिनि । विप्रलापमहारावे पुरे जाते जनाकुले ॥४५॥ सपोरान्तःपुरो राजा निरुपायो भयाकुलः । प्रविष्टः शरणं द्रोही द्रौपदी द्रुतमानतः ॥४६॥ क्षम्यतां क्षम्यता सौम्ये ! देवि ! देवतया समे । दाप्यताममयं मेऽद्य सवाच्यस्य पतियते ! ॥४७॥ तं सा कृपावती प्राह द्रौपदी शरणागतम् । गच्छ भ्रुकुंसवेषण शरणं चक्रवर्तिनः ॥४८॥ कृतदोषेष्वपि प्रायः प्रणतेषु नरोत्तमाः । सकृपाः स्युर्विशेषेण भीरुवेपेषु मोरपु ॥४९॥ सस्त्रीकः स्त्रीकृताकारः श्रुत्वा पार्थागनाग्रणीः । प्रविष्टः शरणं गत्वा विष्टरभवसं नृपः ॥५०॥ दत्वाऽसावमयं तस्य शरणागतमीहरः । विमसर्ज निजं स्थानं स्थाननामादिभेदिनम् ॥५१॥ कृष्णा कृष्णपदं नत्वा क्षेमदानपुरस्सरम् । प्रायुक्त विनयं योग्यं पञ्चस्वपि यथाक्रमम् ॥५२॥ आश्लिष्य दयितां पार्थो विरहव्यथितां ततः । स्वयं प्रस्वेदिहस्ताभ्यां तद्वेणीमुदमोचयत् ॥५३॥ समुद्रका उल्लङ्घन कर धातकीखण्ड द्वीपके भरत क्षेत्रमें जा पहुँचे ।। ४० ।। वहाँ जाकर ये अमर- कङ्कापुरीके वाह्य उद्यानमें ठहर गये और राजा पद्मनाभके द्वारा नियुक्त पुरुषोंने उसे खबर दी कि कृष्ण आदि आ पहुँचे हैं ।।४१|| खबर पाते ही उसकी उद्धत चतुरङ्ग सेना नगरीसे बाहर निकली परन्तु पाँचों पाण्डवोंने युद्धमें उसे इतना मारा कि वह भागकर नगर में जा घुसी ॥ ४२ ॥ राजा पद्मनाभ बड़ा नीतिज्ञ था इसलिए वह नगरका द्वार बन्दकर भीतर रह गया। नगरका द्वार लॉघना जव पाण्डवोंके वशकी बात नही रही तव श्रीकृष्णने स्वयं पैरके आघा- तोंसे द्वारको तोड़ना शुरू किया । उनके पेरके आघात क्या थे मानो वनके प्रहार थे। उन्होंने नगरकी समस्त बाह्य तथा आभ्यन्तर भूमिको तहस-नहस कर डाला। प्राकार और गोपुर टूटकर गिर गये। बड़े-बड़े महल और शालाओंके समूह गिरने लगे जिससे मदोन्मत्त हाथी और घोड़े इधर-उधर दौड़ने लगे, नगरमें सर्वत्र हाहाकारका महान् शब्द गूंजने लगा और मनुष्य घबड़ाकर बाहर निकल आये ॥ ४३-४५ ।। जब द्रोही राजा पद्मनाभ निरुपाय हो गया तब वह भयसे व्याकुल हो नगरवासियों और अन्तःपुरकी स्त्रियोंको साथ ले शीघ्र ही द्रौपदीको शरणमें पहुंचा और नम्रीभूत होकर कहने लगा कि हे देवि ! तू देवताके समान है, सौम्य है, पतिव्रता है, मुझ पापीको क्षमा करो, क्षमा करो और अभय दान दिलाओ ॥ ४६-४७ ।। द्रौपदी परम दयालु थी इसलिए उसने शरणमें आये हुए पद्मनाभसे कहा कि तू स्त्रीका वेष धारण कर चक्रवर्ती कृष्णकी शरणमे जा। क्योंकि उत्तम मनुष्य नमस्कार करनेवाले अपराधी जनोंपर भी प्राय: दया-सहित होते हैं, फिर जो भीर है अथवा भीरुजनोंका वेप धारण करते हैं उनपर तो वे और भी अधिक दया करते हैं ।। ४८-४९॥ यह सुनकर राजा पद्मनाभने खोका वेष धारण कर लिया और त्रियों को साथ ले तथा द्रौपदीको आगे कर यह श्रीकृष्णको शरणमें जा पहुंचा ।। ५ ।। श्रीकृष्ण शरणागतोंका भय हरनेवाले थे इसलिए उन्होंने उसे अभय दान देकर अपने स्थानपर वापिस कर दिया केवल उसके स्थान तथा नाम आदिमें परिवर्तन कर दिया ।। ५१॥ द्रोपदी ने कुशाल प्रश्नपूर्वक श्री कृष्णके चरणों में नमस्कार किया और पॉचों पाण्डवोंके साथ यथायोग्य विनयका व्यवहार किया ॥५२॥ तदनन्तर अर्जुनने विरहसे पीडित वल्लभा का आलिङ्गन कर पसीनासे भीगे हुए दोनों हाथोंसे स्वयं उसकी वेणी सोलो॥५३ ।। १ नागरम् म० । २. -बेदिनम् क०।३. द्रौपदी।

चतुःपञ्चाशः सर्गः नावा भुक्त्वा कृतातिथ्या मनसा पाण्डवैः सह। निवेद्य निजदुःखं सा मुमोचास्त्रैः समं ततः ॥५४॥ स्थमारोप्य तो वा दध्मौ शव निजं हरिः । श्रापुपूरे दिशां चक्रं चक्रिरावस्य निस्वनः ॥५५॥ कपिलो वासुदेवोऽपि तदा चम्पावहिःस्थितम् । जिनं नन्तुं गतोऽपृच्छत् श्रुत्वा तं कम्पितक्षितिम् ॥५६॥ केनायं पूरितः शङ्खो नाथ ! मत्समशक्तिर्ना नि चाय मादृशोऽस्तोह भारत मदधिष्ठिते ॥५॥ जिनेन कथिते तत्त्वे प्रनितोत्तरवादिना । दिक्षुस्तं पियासुः स मापितो धर्मचक्रिणा ॥५८॥ मान्योन्यदर्शनं जातु चक्रिणां धर्मचक्रिणाम् । हलिनां वासुदेवानां त्रैलोक्ये प्रतिचक्रिणाम् ॥५९॥ गतस्य चिह्नमात्रेण तव तस्य च दर्शनम् । शवास्फोटनिनादैश्च रथवजनिरीक्षणः ॥१०॥ प्रायातस्य ततस्तस्य कपिलस्यानुयादवम् । साफल्यममवदूराजिनोक्तिविधिनाम्बुधी ॥६॥ भागस्य कपिलश्चम्पामसाम्प्रतविधायिनम् । कोपादमरकद्वेशं कंशयः सोऽत्यतर्जयत् ॥१२॥ पूर्वेणैव क्रमेणामी लघूत्तीर्णा महार्णवम् । वेलातटे विशश्राम केशवः पाण्डवा गताः ।।६३॥ नौमिर्गगां समुत्तीर्य तस्थुस्ते दक्षिणे तदे । ध्यपनीता च मीमेन क्रीडाशीलेन नास्तटी ॥६॥ भागतोऽनुपदं विष्णुः कृष्णया सहितस्तदा । अप्राक्षोत्कथमुत्तीर्णा गगां यूयमितीमिकाम् ॥६५॥ वृकोदरोऽवददोमिरिति जिज्ञासुरीहितम् । स सत्यमिति मत्या तदुत्तरोतुमिति त्वरी ॥६६॥ द्रोपदीने पाण्डवोंके साथ स्नान किया, भोजन किया, हृदयसे सबका अतिथि सत्कार किया, उनके सामने अपना दुःख निवेदन किया और अश्रुधाराफे साथ-साथ सब दुःख छोड़ दिया। भावार्थ-पाण्डवोंके सामने सब दुःख प्रकट कर वह सब दुःख भूल गयी ।। ५४ ।। तदनन्तर कृष्णने द्रौपदीको रथमें बैठाकर समुद्र के किनारे आ इस रीतिसे अपना रास बजाया कि उसका शब्द समस्त दिशाओंमें व्याप्त हो गया ।। ५५ ।। उस समय यहाँ चम्पा नगरीके वाहर स्थित जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार करनेके लिए धातकीखण्डका नारायण कपिल आया था उसने पृथिवीको कम्पित करनेवाला शद्धका उक्त शब्द सुनकर जिनेन्द्र भगवानसे पूछा कि हे नाथ ! मेरे समान शक्तिको धारण करनेवाले किस मनुष्यने यह शख पजाया है। इस समय मेरे द्वारा शासित इस भरतक्षेप्रमें मेरे समान दूमरा मनुष्य नहीं है ।। ५६-५७ ।। प्रश्नका उत्तर देनेवाले जिनेन्द्र भगवान्ने जच यथार्थ घात कही तय कृष्णको देखनेको इच्छा करता हुआ वह यहाँसे जाने लगा। यह देख जिनेन्द्र भगवानने कहा कि हे राजन् ! तीन लोकमें कभी चक्रवर्ती-चक्रवर्तियोंका, तोर्थङ्कर-तीथङ्करोंका, वलभद्र-बलभद्रोंका, नारायण-नारायणोंका और प्रतिनारायण-प्रतिनारायणोंका परस्पर मिलाप नहीं होता। तुम जाओगे तो चिह्न मात्रसे ही उसका और तुम्हारा मिलाप हो सकेगा। एक दुमरेके शद्धका शब्द सुनना तथा रथोंकी ध्वजाओंका देखना इन्हीं चिह्नोंसे तुम्हारा और उसका माक्षात्कार होगा १५८-६०।। तदनन्तर कपिल नारायण, श्रीकृष्णको लक्ष्य कर आया और जिनेन्द्र भगवान के कहे अनुसार उसका दूरसे ही समुद्रमें कृष्णके साथ साभात्कार हुआ।। ६१ ॥ कपिल नारायणने चम्पा नगरीमें वापस आकर अनुचित कार्य करनेवाले अमरकट्वापुरीके स्वामी राजा पद्मनाभको क्रोधमें आकर बहुत डाँटा ।। ६२ ।। कृष्ण तथा पाण्डव पहलेको हो भाँति महासागरको शीघ्र ही पार कर इस तटपर आ गये। यहाँ कृष्ण तो विश्राम करने लगे परन्तु पाण्डव चले आये ॥ ६३ ॥ पाण्डव नौकाये द्वारा गद्गाको पार कर दक्षिण तटपर आ ठहरे। भीमका स्वभाव क्रीडा करनेका था इमलिए उमने इस पार आनेके बाद नौका नटपर छिपा दी ।। ६४ ॥ पोर्छ जय द्रौपदी माध कृष्ण आये और उन्होंने पूछा कि आप लोग इम गद्गाको किस तरह पार हुए हैं ? नो कम्पकी चेष्टाको जाननेके इच्छुक भीमने कहा कि हम लोग मुजाओंसे तैरकर आये हैं। श्रीकृष्ण भीम १. मुमोचास म । २. दम्यो म०।३.लोक्य-म०। ४. बीटायलेन म०, 5.1 पञ्चपञ्चाशः सर्गः द्रुतविलम्वितवृत्तम् अथ म नेमिकुमारयुवान्यदा धनदसंभृतवस्त्रविभूषणः । खगनुलेपनरनिराजितो नृपमुतैः प्रथितः परिवारितः ॥१॥ समविशत्ममदेमगतिर्नुपरमिगतः प्रणतश्चलितामनैः । कुसुमचित्रममा बलकेशवप्रभृतियादवकोटिमिराचिताम् ॥२॥ हरिकृनाभिगतिहरिविष्टरं स तदलहवरते हरिणा मह । श्रियमुवाह परां तदलं तदा एनहरिद्वयहारि यथासमम् ॥३॥ सदसि सम्यकथामृतपायिमिः प्रकटशौर्यशरीरविभूतिमिः । सह हरिवः समुपासितः क्षणमरंस्त रुचा स्थगितासिलः ॥१॥ वलबतां गणनास्वथ कंचन प्रतिशशंसुरतीव किरीटिनम् । युधि युधिष्टिरमुग्रवृकोदरं युगलमुद्धतमप्यपरे परान् ॥५॥ हलधरं वलवन्तमलं तथा हरिमयोद्धतदुर्धरभूधरम् । स्वबलदर्शनतत्परराजकं चलयितुं स्वपदात्तु ससायिकम् ॥६॥ हरिसमागतराजकमारतीरिति निशम्य सलीलशा हली। जिनमुदीक्ष्य जगी जिननेमिना मावता न समोऽस्ति जगत्प्रये ॥७॥ अथानन्तर एक दिन कुवेरके द्वारा भेजे हुए वस्त्रं, आभूषण, माला और विलेपनसे मुशोभित, प्रसिद्ध-प्रसिद्ध राजाओंसे घिरे एवं मदोन्मत्त हाथीके समान सुन्दर गतिसे युक्त युवा नेमिकुमार, बलदेव तथा नारायण आदि कोटि-कोटि यादवोंसे भरी हुई कुमुमचित्रा नामक सभामें गये। राजाओंने अपने-अपने आसन छोड़ सम्मुख जाकर उन्हें नमस्कार किया। श्रीकृष्णने भी आगे आकर उनको अगवानी की। तदनन्तर श्रीकृष्णके साथ वे उनके आसनको अलंकृत करने लगे। श्रीकृष्ण और नेमिकुमारसे अधिष्ठित हुआ वह सिंहासन, दो इन्द्रों अथवा दो सिंहासे अधिष्ठितके समान अत्यधिक शोभाको धारण करने लगा ॥१-३॥ सभाके बीच, सभ्यजनोंकी कथारूप अमृतका पान करनेवाले एवं अत्यधिक शूर-वीरता और शारीरिक विभूतिमे युक्त अनेक राजा जिनकी उपासना कर रहे थे और अपनी कान्तिसे जिन्होंने सबको आच्छादित कर दिया था ऐसे नेमिकुमार श्रीकृष्णके साथ क्षण-भर क्रीड़ा करते रहे || तदनन्तर बलवानोंको गणना छिड़नेपर कोई अर्जुनको, कोई युद्ध में स्थिर रहनेवाले युधिष्ठिरकी, कोई पराक्रमी भीमकी, कोई उद्धत सहदेव और नकुलकी एवं कोई अन्य लोगों की, अत्यन्त प्रशंसा करने लगे ।।५।। किसीने कहा कि वलदेव सबसे अधिक बलवान हैं तो किसीने दुर्धर गोवर्धन पर्वतको उठानेवाले एवं अपना वल देखने में तत्पर राजाओंके समूहको अपने स्थानसे विचलित करने के लिए वाण धारण करनेवाले श्रीकृष्णको सबसे अधिक बल- वान् कहा ।।५-६॥ इस प्रकार कृष्णको सभामे आगत राजाओंकी तरह-तरहको वाणी सुनकर लीलापूर्ण दृष्टिसे भगवान् नेमिनाथको ओर देखकर कहा कि तीनों जगनमें इनके समान १. प्रणते क०, ख० । २. कुमुमचित्रानाम्नी समाम् । ३. स्वपटं तु सशामकं कः ।

पञ्चपञ्चाशः सर्गः करतलेन महीतलमुद्धरेजलनिधीनपि दिक्षु लघु क्षिपेत् । प्रचलयेद् गिरिराजमवज्ञया ननु जिनः कनमः परमोऽमुतः ॥८॥ इति निशम्य वचोऽथ निशाम्य तं स्मितमुखो हरिरीशमुवाच सः । किमिति युष्मदुदारवपुर्बलं भुजरणे मगरन् न परीक्ष्यते ॥९॥ सह ममामिनयोर्ध्वमुखो जिनः किमिहमलयुधेति तमब्रवीत् । भुजबलं भवतोऽग्रज बुध्यते चलय मे चरणं सहसासनात् ॥१०॥ परिकर परिवध्य तदोत्थितो भुजबलेन जिनस्य जिगीषया। चलयितुं न शशाक पदाङ्गुलिप्रमुखमस्य नखेन्दुधर हरिः ॥११॥ श्रमजवारिलवाञ्चितविग्रहः प्रबलनिश्वसितोच्छ्वसिताननः । बलमहो तब देव जनातिगं स्फुटमिति स्मयमुक्तमुवाच सः ॥१२॥ चलरिपुश्च तदा चलितासनः स्वयमुपेत्य सुरः सहसा सह । कृतजिनाचनकः कृतसंस्तवः कृतनतिः प्रययौ पदमात्मनः ॥१३॥ निजमगारमगाजिनचन्द्रमाः परिवृतः क्षितिपैः क्षपितस्मयः । हरिरपि स्फुटमात्मनि शङ्कितः क्लिशितधीहिं जिनेष्वपि शकते ॥१४॥ दूसरा बलवान् नहीं है ।।७॥ ये अपनी हथेलीसे पृथिवीतलको उठा सकते हैं, समुद्रोंको शीघ्र ही दिशाओं में फेंक सकते हैं और गिरिराजको अनायास ही कम्पायमान कर सकते हैं । यथार्थ- में ये जिनेन्द्र हैं, इनसे उत्कृष्ट दूसरा कौन हो सकता है ? ||८|| इस प्रकार बलदेवके वचन सुन कृष्णने पहले तो भगवान्की और देखा और तदनन्तर मुसकराते हुए कहा कि हे भगवन् ! यदि आपके शरीरका ऐसा उत्कृष्ट बल है तो बाहु-युद्ध में उसकी परीक्षा क्यों न कर ली जाये ? ||९|| भगवान्ने कुछ खास ढंगसे मुख ऊपर उठाते हुए कृष्णसे कहा कि मुझे इस विषयमें मल्ल युद्ध की क्या आवश्यकता है ? हे अग्रज ! यदि आपको मेरी भुजाओंका वल जानना ही है तो सहसा इस आसनसे मेरे इस पैरको विचलित कर दीजिए ॥१०॥ श्रीकृष्ण उसी समय कमर कसकर भुजबलसे जिनेन्द्र भगवान्को जीतनेकी इच्छासे उठ खड़े हुए परन्तु पैरका चलाना तो दूर रहा नखरूपी चन्द्रमाको धारण करनेवाली पैरकी एक अद्भुलिको भी चलाने में समर्थ नहीं हो सके ॥११॥ उनका समस्त शरीर पसीनाके कणोंसे व्याप्त हो गया और मुखसे लम्बी लम्बी सॉसें निकलने लगी । अन्तमें उन्होंने अहंकार छोड़कर स्पष्ट शब्दोंमें यह कहा कि हे देव ! आपका बल लोकोत्तर एवं आश्चर्यकारी है ।।१२।। उसी समय इन्द्रका आसन कम्पा- यमान हो गया और वह तत्काल ही देवोंके साथ आकर भगवान्की पूजा-स्तुति तथा नम- स्कारकर अपने स्थानपर चला गया ||१३|| उधर कृष्णके अहङ्कारको नष्ट करनेवाले जिनेन्द्र- रूपी चन्द्रमा अनेक राजाओंसे परिवृत हो अपने महल में चले गये और इधर कृष्ण भी अपने आपके विषयमें शहित होते हुए अपने महल में गये सो ठीक ही है क्योंकि संक्लिष्ट बुद्धिक धारक पुरुप जिनेन्द्र भगवान के विषयमें भी शङ्का करते हैं। भावार्थ-कृष्णके मनमें यह शङ्का घर कर गयी कि भगवान् नेमिनाथके घलका कोई पार नहीं है अतः इनके रहते हुए हमारा राज्य-शासन स्थिर रहेगा या नहीं ? ॥ १४ ॥ उस समयसे श्रीकृष्ण, उत्तम-अमूल्य १. शीघ्रम् । २. समाभिनयो-म० । ३ तटोक्तितो म०। ४. नखेन्दुरि म० 1 ५. -मुन्युसितासनः म.,क०। ६.इन्द्रः। ७. शपितस्मयःमः। ७८ ६१४ हरिवंशपुराणे रथमुन्य हस्तेन साश्वसारथिमच्युतः । जानुदानमिवोत्तोर्णस्तां जहाभ्यां भुनेन च ॥६॥ ततो विस्मिततुष्टास्त स्वरयाम्पत्य ससताः। शक्रयमिज्ञाः स्तुनिन्यप्राः समाश्लिष्य नधोक्षजम् ॥६॥ वंशस्थवृत्तम् स्वयं कृतं नर्म ततो वृकोदरः स्वयं च विश्वश्रुतया जगाद सः। तदप कृष्णोऽतिविरक्ततामगाददेशकालं न हि नर्म शोमतं ॥६९॥ अमानुषं कर्म जगन्यनेकशः कृतं मया दृष्टवतामपि स्वयम् । मदीयसामर्थपरीक्षणक्षमं किमत्र गलोचरणे कुपाण्डवाः ॥७॥ निगद्य तानवमसी जनार्दनः सहव तैरत्य तु हास्तिनं पुरम् । सुभद्रया लब्धसुतार्यसूनवे वितीय राज्यं विससर्ज तान्धा ॥७॥ समस्तसामन्तकृतानुयानकः कृतामियानो यदुमिः कृतार्यकः । प्रविश्य कृष्णो नगरी गरीयसी निजां निजस्रीनिवहानमानयत् ॥७२॥ सुतास्तु पापडोहरिचन्द्रशासनादकाण्ड एवाशनिपातनिष्ठुराद । प्रगत्य दाक्षिण्यभृता सुदक्षिणां जनेन का मधुरा न्यवेशयन् ॥७३॥ समुद्रवेलासु मनोहरासु ते लवकृष्णागुरगन्धवायुपु । मुचन्दनामोदितदिक्षु दक्षिणा विजहरुधर्मलयादिसानुषु ॥७॥ के कथनको सत्य मान गङ्गाको पार करनेकी शीघ्रता करने लगे ।।६५-६६|| श्रीकृष्णने घोड़ों और सारथीसे सहित रथको एक हाथपर उठा लिया और एक हाथ तथा दो जवाओंसे गङ्गाको इस तरह पार कर लिया जिस तरह मानो वह घोंद वरावर ही हो ॥६७।। तदनन्तर आश्चर्यसे चकित और आनन्दसे विभोर पाण्डवोंने शीघ्र ही सामने जाकर नम्रीभूत हो श्रीकृष्णका आलिङ्गन किया और उनकी अपूर्व शक्तिसे परिचित हो वे उनकी स्तुति करने लगे ।। ६८ ॥ तत्पश्चात् भीमने सबको मुनाते हुए स्वयं कहा कि यह तो मैंने हॅसी की थी। यह सुन, श्रीकृष्ण उसी समय पाण्डवोंसे विरक्तताको प्राप्त हो गये सो ठीक हो है क्योंकि बिना देश- कालकी हँसी शोभा नहीं देती ।। ६९ ॥ कृष्णने पाण्डवोंको फटकारते हुए कहा कि अरे निन्द्य पाण्डवो ! मैंने संसारमें स्वयं तुम लोगोंके देखते-देखते अनेकों बार अमानुपिक कार्य किये हैं फिर इस गङ्गाके पार करनेमें कौन-सी बात मेरी शक्तिकी परीक्षा करनेमें समर्थ थी ? ॥ ७० ॥ इस प्रकार पाण्डयोंसे कहकर वे उन्हींके साथ हस्तिनापुर गये और यहाँ सुभद्राके पुत्र आर्य- सूनुके लिए राज्य देकर उन्होंने पाण्डवोंको क्रोधवश वहाँसे विदा कर लिया ॥ ७१॥ तदनन्तर समस्त सामन्त जिनके पीछे-पीछे चल रहे थे और यादवोंने सम्मुख आकर जिनका अभिनन्दन किया था ऐसे कृतकार्य श्रीकृष्णने विशाल द्वारिका नगरी में प्रवेश कर अपनी स्त्रियोंके समूहको प्रसन्न किया ।।७२|| असमयमें वपातके समान कठोर कृष्णचन्द्रकी अपने अनुकूल जनोंके साथ दक्षिण दिशाकी ओर गये और वहाँ उन्होंने मधुरा नगरी वसायी ॥७३॥ वहाँ वे दक्षिण दिशा में लोग और कृष्णागुरुको सुगन्धित वायुसे व्याप्त समुद्रके मनोहर तटोंपर तथा उत्तम चन्दनसे दिशाओंको सुगन्धित करनेवाली मलय- गिरिकी ऊँची-ऊँची चोटियोंपर विहार करने लगे ||७४|| आज्ञासे पाण्डव, १. शक्तिभिदया म०। २ निवहाद्यमानयत् म।

चतुःपशाशः सर्गः
क वार्धिजम्बू द्रुममण्डिता क्षितिः क धातकोसण्डधरा दुरासदा ।
गतागतादर्थगतिस्तथापि तु प्रसिद्धयति प्राक्तनजैनधर्मतः ॥७५॥
इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती द्रौपदीहरणाहरणदक्षिणमथुरानिवेश-
वर्णनो नाम चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥५४॥
गौतम स्वामी कहते हैं कि देखो, कहाँ तो लवणसमुद्र और जम्बू वृक्षसे सुशोभित
जम्बूद्वीपकी भूमि और कहाँ अत्यन्त दुर्गम धातकीखण्डकी भूमि ? फिर भी पूर्वकृत जैनधर्म
के प्रभावसे वहाँ यातायात के द्वारा कार्यको सिद्धि हो जाती है |
इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें द्रोपदीका
हरण, पुन. उसका ले आना तथा दक्षिण मथुराके बसाये जानेका वर्णन
करनेवाला चौवनवाँ सर्ग समाप्त हुभा ॥ ५४ ॥

पञ्चपञ्चाशः सर्गः द्रुतविलम्बितवृत्तम् अथ स नेमिकुमारयुवान्यदा धनदसंभृतवस्त्रविभूपणः । खगनुलेपनकैरतिराजितो नृपसुतैः प्रथितैः, परिवारितः ॥७॥ समविशत्समदभगतिर्नुपरमिगतः 'प्रणतश्चलितासनैः । कुसुमचिनसमा बलकेशवप्रभृतियादवकोटिमिराचिताम् ॥२॥ हरिकृनामिगति हरिविष्टरं म तदलकुरुते हरिणा सह । श्रियमुवाह परां तदलं तदा तहरिद्वयहारि यथासमम् ॥३॥ सदसि सभ्यकथामृतपायिमिः प्रकटशौर्यशरीरविभूतिमिः । सह हरिनुवरैः समुपासितः क्षणमरस्त रुचा स्थगिताखिलः ॥४॥ बलवतां गणनास्वथ केचन प्रतिशशंसुरतीव किरीटिनम् । युधि युधिष्ठिरमुग्रवृकोदरं युगलमुद्धतमप्यपरे परान् ॥५॥ हलधरं बलवन्तमलं तथा हरिमथोद्धतदुर्धरभूधरम् । स्वबलदर्शनतत्परराजकं चलयितुं स्वपदात्तु सशायिकम् ॥६॥ हरिसभागतराजकमारतीरिति निशम्य सलीलदृशा हली। जिनमुदीक्ष्य जगी जिननेमिना मगवता न समोऽस्ति जगत्त्रये ॥७॥ अथानन्तर एक दिन कुवेरके द्वारा भेजे हुए वस्त्रं, आभूपण, माला और विलेपनसे सुशोभित, प्रसिद्ध-प्रसिद्ध राजाओंसे घिरे एवं मदोन्मत्त हाथीके समान सुन्दर गतिसे युक्त युवा नेमिकुमार, बलदेव तथा नारायण आदि कोटि-कोटि यादवोंसे भरी हुई कुसुमचित्रा नामक सभामें गये । राजाओंने अपने-अपने आसन छोड़ सम्मुख जाकर उन्हें नमस्कार किया। श्रीकृष्णने भी आगे आकर उनकी अगवानी की । तदनन्तर श्रीकृष्णके साथ वे उनके आसनको अलंकन करने लगे। श्रीकृष्ण और नेमिकुमारसे अधिष्ठित हुआ वह सिंहासन, दो इन्द्रों अथवा दो सिंहोंसे अधिष्टितके समान अत्यधिक शोभाको धारण करने लगा ॥१-३॥ सभाके बीच, सभ्यजनोंकी कथारूप अमृतका पान करनेवाले एवं अत्यधिक शूर-चोरता और शारीरिक विभूतिसे युक्त अनेक राजा जिनकी उपासना कर रहे थे और अपनी कान्तिसे जिन्होंने सबको आच्छादित कर दिया था ऐसे नेमिकुमार श्रीकृष्णके साथ क्षण-भर क्रीड़ा करते रहे ॥४॥ तदनन्तर बलवानोंको गणना छिड़नेपर कोई अर्जुनकी, कोई युद्ध में स्थिर रहनेवाले युधिष्ठिरकी, कोई पराक्रमी भीमकी, कोई उद्धत सहदेव और नकुलकी एवं कोई अन्य लोगों को, अत्यन्त प्रशंसा करने लगे ।।५।। किसीने कहा कि बलदेव सबसे अधिक बलवान् हैं तो किसीने दुर्धर गोवर्धन पर्वतको उठानेवाले एवं अपना यल देखने में तत्पर राजाओंके समूहको अपने स्थानसे विचलित करनेके लिए वाण धारण करनेवाले श्रीकृष्णको सबसे अधिक बल. यान् पहा ॥५-६।। इस प्रकार कृष्णको मभाम आगत राजाओंकी तरह-तरहको वाणी सुनकर लीलापूर्ण दृष्टिसे भगवान् नेमिनाथको ओर देखकर कहा कि तीनों जगन्में इनके समान १.प्रग क., म. | २. दुमुमचित्रानाम्नी सभाम् । ३. स्वपदं तु सशाम क.।

पपञ्चाशः सर्गः करतलेन महीतलमुद्धरेजलनिधीनपि दिक्षु लघु क्षिपेत् । प्रचलयेद् गिरिराजमवज्ञया ननु जिनः कनमः परमोऽमुतः ॥८॥ इति निशम्य वचोऽथ निशाम्य तं स्मितमुखो हरिरीशमुवाच सः । किमिति युष्मदुदारवपुर्वलं भुजरणे भगवन् न परीक्ष्यते ॥९॥ सह ममामिनयोद्ध्वंमुखो जिनः किमिहमल्लयुधेति तमब्रवीत् । भुजवलं भवतोऽग्रज बुध्यते चलय मे चरणं सहमासनात् ॥१०॥ परिकर परिबध्य तदोस्थितो भुजवलेन जिनस्य जिगीषया । चलयितुं न शशाक पदाङ्गुलिप्रमुसमस्य नखेन्दुधर हरिः ॥११॥ श्रमजवारिलवाभितविग्रहः प्रबलनिश्वसितोच्छ्वसिताननः । वलमहो तब देव जनातिगं स्फुटमिति स्मयमुक्तमुवाच सः ॥१२॥ विलरिपुश्च तदा चलितासनः स्वयमुपेत्य सुरः सहसा सह । कृतजिनाचनकः कृतसंस्तवः कृतनतिः प्रययौ पदमात्मनः ॥१३॥ निजमगारमगाजिनचन्द्रमाः परिवृतः क्षितिपैः क्षपितस्मयः । हरिरपि स्फुटमात्मनि शङ्कितः क्लिशितधीहिं जिनेष्वपि शकते ॥११॥ दूसरा वलयान नहीं है । ये अपनी हथेलीसे पृथिवीतलको उठा सकते हैं, समुद्रोंको शीघ्र ही दिशाओं में फेंक सकते हैं और गिरिराजको अनायास ही कम्पायमान कर सकते हैं । यथार्थ- में ये जिनेन्द्र हैं, इनसे उत्कृष्ट दूसरा कौन हो सकता है ? ||८|| इस प्रकार बलदेवके वचन मुन कृष्णने पहले तो भगवानकी ओर देखा और तदनन्तर मुसकराते हुए कहा कि हे भगवन् ! यदि आपके शरीरका ऐसा उत्कृष्ट बल है तो बाहु-युद्धमें उसको परीक्षा क्यों न कर ली जाये ? ॥९॥ भगवान्ने कुछ खास ढंगसे मुख ऊपर उठाते हुए कृष्णसे कहा कि मुझे इस विषयमें मल्ल युद्ध की क्या आवश्यकता है ? हे अग्रज ! यदि आपको मेरी भुजाओंका यल जानना ही है तो सहसा इस आसनसे मेरे इस पैरको विचलित कर दीजिए ॥१०॥ श्रीकृष्ण उसी समय कमर कसकर भुजवलसे जिनेन्द्र भगवान्को जीतनेकी इच्छासे उठ खड़े हुए परन्तु पेरका चलाना तो दूर रहा नखरूपो चन्द्रमाको धारण करनेवाली पैरकी एक अङ्गुलिको भी चलानेमें समर्थ नहीं हो सके ।।११।। उनका समस्त शरीर पसीनाके कणोंसे व्याप्त हो गया और मुखसे लम्बी लम्बी साँसे निकलने लगीं । अन्तमें उन्होंने अहंकार छोड़कर स्पष्ट शब्दोंमें यह कहा कि हे देव ! आपका बल लोकोत्तर एवं आश्चर्यकारी है ।।१२।। उसी समय इन्द्रका आसन कम्पा- यमान हो गया और यह तत्काल ही देयोंके साथ आकर भगवान्की पूजा-स्तुति तथा नम- स्कारकर अपने स्थानपर चला गया ।।१३। उधर कृष्णके अहङ्कारको नष्ट करनेवाले जिनेन्द्र- रूपो चन्द्रमा अनेक राजाओंसे परिवृत हो अपने महल में चले गये और इधर कृष्ण भी अपने आपके विषयमें शहित होते हुए अपने महल में गये सो ठीक ही है क्योंकि संक्लिष्ट धुद्धिक धारक पुरुष जिनेन्द्र भगवान्के विपयमें भी शङ्का करते हैं। भावार्थ-कृष्णके मन में यह शङ्का घर कर गयी कि भगवान् नेमिनाथके वलका कोई पार नहीं है अतः इनके रहते हुए हमारा राज्य-शासन स्थिर रहेगा या नहीं ? ॥ १४ ॥ उस समयसे श्रीकृष्ण, उत्तम-अमूल्य १. शीघ्रम् । २. समाभिनयो-म० । ३. तदोस्तितो म०। ४. नखेन्दुरिं म० 1 ५. -मुन्युसितासनः म., ०। ६.इन्द्रः। ७. शपितस्मयः म ।

हरिवंशपुराणे उपचितो जनतामिरसौ गिरिः श्रियमुवाह सहोपवनैस्ततः । सुरगिरेः सुरसङ्गवधूजनैरपचितस्य चितस्य वनान्तरः ॥३३॥ 'समपनीतयथोचितवाहना वनविहारमतो जनताखिला। सपदि कर्तुमसावुपचक्रमे गिरिनितम्बवनेषु यथायथम् ॥३४॥ सुरमिपुष्परजासुरमौ श्रमध्यपगमव्यसने श्वसने दिशः। वहति शीतलदक्षिणमारुते स्मररतिश्रम एवं नृणामभूत् ॥३५॥ 'रसितचूतलतारसकोकिलाः कलरवाः कलकण्ठतया गिरौ । जनमनांस्यपहर्तुमतिक्षमाः परिचुकूरिह स्मरदीपिताः ॥३६॥ मधुलिहां मधुपानजुषां कुलैः कुरवका वकुला. मुमगाः कृताः। द्विपदषट्पदभेदवतां रवैः श्रयति वाश्रय प्राश्नयिणो गुणान् ॥३७॥ करिकटेप्वयुगच्छदगन्धिषु स्थितिमपास्य मदभ्रमराः श्रिताः । ससहकारसुरदुममञ्जरीरमिनवासु रतिर्महती भवेत् ॥३८॥ कुसुममारभृतः प्रणता भृशं प्रणयमगभियेव मता दमाः। युवतिहस्तधुना: कुसुमोच्चयेऽतनुसुखं तरुणा इव भेजिरे ॥३९॥ अनतिनम्रतया निजशाखया कथमपि प्रमदाकरलब्धया। तरगणः कुसुममहणेऽभजद्दढकचग्रहसौख्यमिव प्रभुः ॥४०॥ सवार होकर चल रहे थे और इनके बाद कृष्ण आदि राजाओंकी स्त्रियाँ पालकी आ। सवार हो मार्ग में प्रयाण कर रही थीं ।। ३२ ॥ उस समय जन-समूहसे व्याप्त और उपव मुशोभित गिरनार पर्वत, देव-देवियोंसे व्याप्त एवं नाना पनोंसे युक्त सुमेरु पर्वतको शोर धारण कर रहा था ।। ३३ ।। समीप पहुंचनेपर सब लोग यथायोग्य अपने-अपने वाहन । पर्वतके नितम्यपर स्थित वनों में शीघ्र ही इच्छानुसार विहार करने लगे ।। ३४ ।। उस र वासन्ती फूलोंकी परागसे सुगन्धित, श्रमको दूर करनेवाली, ठण्डी दक्षिणकी वायु दिशाओंमें वह रही थी इसलिए मनुष्योंके कामभोग-सम्बन्धी श्रम ही शेप रह गया था सब श्रम दूर हो गया था ॥ ३५ ॥ आम्लताओंके रसका आस्वादन करनेवाली, मुन्दर : से मनुष्योंका मन हरण करनेमें अत्यन्त दक्ष और कामको उत्तेजित करनेमें निपुण म भाषी कोकिलाएँ उम समय पर्वतपर चारों ओर कुहू कुहू कर रहीं थीं ।। ३६ ।। मधुपान कर लीन भ्रमरोंके समूहसे कुरयक और मौलिश्रीके वृक्ष तथा द्विपद् अर्थात् स्त्री-पुरुप अ कोकिल आदि पक्षी और पट्पद् अर्थात् भ्रमरोंके शब्दसे धनके प्रदेश, अत्यन्त मनोहन गये थे सो ठीक ही है क्योंकि आश्रय, आश्रयी-अपने ऊपर स्थित पदार्थके गुण ग्रहण क ही है ॥ ३७ ।। मदपायो भ्रमर, सप्तपर्ण पुष्पके समान गन्धघाले हाथियोंके गण्डस्थलं स्थितिको छोड़कर आम्र और देवदारकी मारियोंपर जा बैठी सो ठीक ही है क्योंकि नर चन्तुओंमें अल्पाधिक प्रीति होती ही है ।। ३८ ॥ फूलोंके भारको धारण करनेवाले वृक्ष अत्र ननीभूत हो रहे थे और उससे ऐसे जान पड़ते थे मानो स्नेह भगके भयसे ही नम्रीभूत रहे थे। वे ही वृक्ष पुष्पावचयन के समय जब युवतियोंके हाथोंसे फम्पित होते थे तब त पुरुषाफे ममान अतनु-यहुत भारी अथया काममम्यन्धी मुसको प्राप्त होते थे ॥ ३६॥ धुनते समय पृनाको ऊँची शारयाओंको त्रियाँ किमी तरह अपने हाथसे पकड़कर नीरे और सोच रही थी उससे ये नायफके समान बी-दाग पेश सोचनेके मुसका अनुभव 1. समय म । २ रमित स्पादित चूतनतारसो येरले, ते च ते बोस्लिाम इति । ३. -माधान 1.1.मद भ्रमगभिता: म.। ५ मुरतिरनता मा ६.भानुमु महामुकाममुख या।

पञ्चपञ्चाशः सर्गः 'वनपरिश्रमसाख्यमितस्ततः समनुभूय चिरं वनिताससः । युवजनः कुमुमोत्करकल्पितेऽभजत तल्पतले मुरतामृतम् ॥४॥ प्रतिवनं प्रतिगुल्मलतागृहं प्रतितरु प्रनिवापि विहारतः । विषयसौख्यमसेवत मौल्यवानखिलयादवपरिजनो मधौ ॥४२॥ द्विगुणिताष्टसहस्रवधूगणेवंहुगुणीकृतमोगनभोगतः । मुमधुमाधवमासममानयत् मुमगताधरमाधवचन्द्रमाः ॥४३॥ पतिनिदेशपो हरियोपितो मुपितमानवमानसघृत्तयः । सह विजहुरधीश्वरनेमिना तरलतारमणीयवनपु ताः ॥४४॥ 'वनलताकुसुमस्तवकोश्चर्य मधुमदालसमानसलोचना । मुसमुगन्धितया मुसरालिमिवलयिताऽश्त काचन देवरम् ॥४५॥ उरसि चुम्वति तं कटिनस्तनी स्पृशति काचन जिप्रति तं परा । मृदुकरण कर परिगृह्य तं शशिमुखं कुस्नेऽमिमुसं परा ॥४६॥ विटपकैरपि सालतमालजयंजनकरिव काश्विदवीजयन् । विदधुरम्य परास्त्ववतंसकश्रियमशोफतरोनवपलचः ॥४७॥ विरचितां कुसुमविविधः स निजपरिप्वजनस्पृहया परा । शिरसि मालयति स्म गले परा कुरवकान्यपरा शिरसेऽविरत् ॥४८॥ इति वसन्तमनन्तमसौ युवा हरिवधूभिरमा प्रतिमान यन् । स नुना तदनन्तरमाविना विमुरसेव्यत सेवरवृत्तिना ॥४९॥ रहे थे ।। ४० ॥ तरुण पुरुप, स्त्रियोंके साथ चिरकाल तक जहाँ-तहाँ वन-भ्रमणके मुखका उप- भोग कर फूलोंके समूहसे निर्मित शय्याओंपर सम्भोगरूपी अमृतका सेवन करने लगे।। ४१ ।। उस वसन्त ऋतुमें सुखसे युक्त समस्त यादय, प्रत्येक बन, प्रत्येक झाड़ी, प्रत्येक लतागृह, प्रत्येक वृक्ष और प्रत्येक वापीमें विहार करते हुए विपय-मुखका सेवन कर रहे थे ॥ ४२ ॥ सोलह हजार त्रियोंके द्वारा अनेकरूपताको प्राप्त भोगरूपी आकाशमें विद्यमान एवं सौन्दर्यको धारण करनेवाले श्रीकृष्णरूपी चन्द्रमाने भी वसन्तऋतुके उस चैत्र-वैशारर मासको यहत अच्छा माना था ॥ ४३ ।। मनुप्यकी मनोवृत्तिको हरण करनेवाली श्रीकृष्णको स्रियाँ, पतिकी आज्ञा पाकर वृक्षों और लताओंसे रमणीय वनांमें भगवान नेमिनाथके साथ क्रीडा करने लगीं ॥४४॥ मधुके मदसे जिसका हृदय और नेत्र अलसा रहे थे ऐमी किसी म्रीको वन- लताओंके फूलोंके गुच्छे तोड़ते समय मुखकी मुगन्धि-से प्रेरित गुनगुनाते हुए भ्रमरोंने घेर लिया इमलिए उसने भयभीत हो देवर-नेमिनाथको पकड़ लिया ॥४५॥ कोई कठिनस्तनी वक्षःस्थलपर उनका चुम्बन करने लगी, कोई उनका स्पर्श करने लगी, कोई उन्हें सूचने लगी, कोई अपने कोमल हाथसे उनका हाथ पकड़ चन्द्रमाके ममान मुखक धारक भगवान् नेमि- नाथको अपने मम्मुख करने लगी ॥४६॥ कितनी ही स्त्रियाँ साल और तमाल वृक्षकी छोटी- छोटी टहनियोंसे पहोंके ममान उन्हें हवा करने लगीं। कितनी ही अशोक वृक्ष के नये नये पल्लयोंसे कर्णाभरण अथवा मेहरा बनाकर उन्हें पहिनाने लगीं ॥४७॥ कोई अपने आलिङ्गन- की इच्छासे नाना प्रकारके फूलोंमे निर्मित माला उनके शिरपर पहनाने लगी, कोई गलेमें डालने लगी और कोई उनके गिरको लक्ष्यकर कुरवकके पुष्प फेकने लगी ।। ४८॥ प्रकार युवा नेमिनाथ कृष्णकी मियोंके साथ क्रीड़ा करते हुए उम वमन्नको ऐमा ममझ रहे थे जमे उमका की अन्त ही आनेवाला न हो। नदनन्तर वमन्तके वाट आनेवाली ग्रीष्म ऋतु १. नवसरिभ्रम-म। २ वनलता म.] ३. लोचना. म ।

६१८ हरिवंशपुराणे उपचरन्न नुवासरमादरात् प्रियसतैर्जिनचन्द्रमसं हरिः। प्रणयदर्शनपूर्वकमच्ययन् स्वयमनघंगुणं जिनमुन्नतम् ॥१५॥ अथ पुनर्विजयानगोत्तरे पुरवरेऽभिधया श्रुतशोणिते । जगति बाण इति प्रथितः खगः स खलु तिष्टति गर्वितमानसः ॥१६॥ स्वयमुषा दुहितास्य खगेशिनो गुणकलामरणाविदितावनी । मदनसूनुमुदारगुणः श्रुतं तमनिरुद्धमधत्त चिरं हृदि ॥१७॥ मुमृदुनापि तदा मृदुनि स्वयं विनिहितेन कृतं तनुतापनम् । मनसि संवसता कुटिलध्रुवः कुटिलवृत्तिरनेन निजीकृता ॥१८॥ अनुदितेन परस्य महाधिना कृशतरां परिपृच्छय हि तां हिताम् । निशि निनाय सखी खचरीवरं खचरलोकमनङ्गशरीरजम् ॥१९॥ प्रतिविबुध्य युवा सहसा झपामुषसि रस्नमयूखचिते गृहे । मृदुतले शयने शयितः स्वयं स रालु पश्यति तब तु कन्यकाम् ॥२०॥ गुरनितम्बधनस्तनमारिणों सुतनुमध्यबलित्रयहारिणीम् । सुपरिदृश्य सता सुविहारिणी चिरमचिन्तयदगजधारिणीम् ॥२॥ हरति केयमिह प्रवरा मनो हरिवधूरुत नागवधूरियम् । न हि मनुष्यवधूमहमीदशी धचिदपीह कदाचन दृष्टवान् ॥२२॥ पदमपीदमपूर्वमिवेक्ष्यते नयनहारिसुरेन्द्र पदोपमम् । किमिह सत्यमसत्यमिदं तु किं भ्रमति हि स्वपतां भुवनं मनः ॥२३॥ गुणोंसे युक्त जिनेन्द्ररूपी उन्नत चन्द्रमाकी बड़े आदरसे प्रतिदिन सेवा-शुश्रूषा करते हुए प्रेम-प्रदर्शनपूर्वक उनकी पूजा करने लगे ॥१५॥ अथानन्तर विजया पर्वतको उत्तर श्रेणीमें श्रुतशोणित नामका एक नगर है, उस समय उसमें वाण नामका एक महा अहंकारी विद्याधर रहता था ॥ १६ ॥ राजा बाणके गुण और कला रूपी आभूपणोंसे युक्त तथा पृथिवीमें सर्वत्र प्रसिद्ध उपा नामकी एक पुत्री थी जो अपने उदार गुणोंसे विख्यात प्रद्युम्नके पुत्र अनिरुद्धको चिरकालसे अपने हृदयमें धारण कर रही थी ।। १७ ।। यद्यपि कुमार अनिरुद्ध अत्यन्त कोमल शरीरका धारक था तथापि कुटिल भौहों याली उपाके हृदयमें वास करते हुए उसने कुटिरवृत्ति अङ्गीकृत की थी इसीलिए तो उसके शरीरमें उसने भारी सन्ताप उत्पन्न किया था।॥१८॥ यद्यपि कुमारी उपा अपने मनको महाव्यथा दूसरेसे कहती नहीं थी तथापि भीतर ही भीतर वह अत्यन्त दुर्बल हो गयी थी। एक दिन उसकी सखीने अपना हित करनेवाली उस उपासे पूछकर सय कारण जान लिया और यह रात्रिके समय अनिरुद्धको विद्याधरियोंसे श्रेष्ठ विद्याधरलोकमें ले गयी।॥ १९ ॥ प्रातःकालके समय जब सहसा युवा अनिरुद्धकी नींद खुली तब उसने अपने आपको रत्नोंकी किरणोंसे व्याप्त महलमें कोमल शय्यापर सोता हुआ पाया। जागते ही उसने एक कन्याको देखा ॥२०॥ वह कन्या स्थूल नितम्य और निविड़ स्तनोंके भारसे युक्त थी, पतली कमर और त्रिवलिसे सुशोभित थी, सत्पुरुपोंके मनको हरण करने वाली थी और काम अथवा रोमाञ्चों फो धारण करनेवाली थी। उसे देस अनिरुद्ध विचार करने लगा कि यह यहाँ कौन उत्तम स्त्री. मेरा मन हरण कर रही है ? क्या यह इन्द्राणी है ? अथवा नाग-वधू है ? क्योंकि ऐसी मनुष्य को नो नो मैंने कभी भी कहीं भी नहीं देरी है ।। २१-२२ ।। इन्द्र स्थानके समान नेत्रोंको हरण करनेयाला यह स्थान भी तो अपूर्व ही दिसायी देता है। यहाँ दिसायी देनेवाला यह १. मयन् म । २. वरणादि म० 1 ३. तमनुस् म | ४. प्रद्युम्नपुत्रम् । ५. इन्द्रागी।

पञ्चपञ्चाशः सर्गः इति वितकंमतकि तदर्शनं सुपरिबोध्य तया तमयोजयत् । रहसि कन्यकया कृतकङ्कणं विदितचित्रपदादिकलेखिको ॥२४॥ अविरहं मुरतामृतपायिनोरमनपायिवधूवरयोरिव । वरवधूवरयोः समयं तयोग्रजति वृत्तमिदं विदितं हरः ॥२५॥ हरिरतो वलशम्बमनोमवप्रभृतिमियंदुभिः सह सङ्गतः । मदनजानयनं प्रति यातवान् रागपवाणपुरं स विहायसा ॥२६॥ नरतुरह रथद्विपसङ्कुले युधि विजित्य स तत्र खगाधिपम् । तमनिरुदमुपासहितं हितं निजनिवासपुरं हरिरानयत् ॥२७॥ विरहदुःसमपोह्य ततोऽसिलः शमनिस्तुसमागमसम्मवम् । अनुदिनं स्वजनो जनतासखः सुखमरंस्त समस्तसुखाश्रयः ॥२८॥ निजवधूजनलालितनेमिना हरिरमा नृपपौरपयोधिना । कुसुमितोपवनं स मघौ ययौ विदितरवतकं रमणेच्छया ॥२९॥ पृथुमिरवरथै ययुरीश्वरा रचिरभूषणनेमियलाच्युताः । ध्वसितातपवारणहारिणो वृपमतालवृहद्गरडध्वजाः ॥३०॥ दशदशाहकुमारगणावृतः करिनुरास्थैर्मदयन जनम् । कुमुमवाणधनुर्मकरध्वजैः पथि रयेन यया मकरध्वजः ॥३१॥ पुरजनोऽथ यथार्हमुवाहनविविधवस्त्रविभूषणभूपिनः । हरिपुरस्सरराजवधूजनः पथि जगाम तथा शिविकादिमि. ॥३२॥ सब सत्य है ? या असत्य है ? यथार्थमें सोनेवालोंका मन संसारमें भ्रमण करता रहता है - ॥२३॥ अतकित वस्तुओंको देखकर कुमार इस प्रकार विचार कर ही रहा था कि इतने में चित्रलेखा सखी आयी और सब समाचार वता एकान्तमें कंकण यन्धन कराकर उस कन्याके साथ मिला गयी।।२४ तदनन्तर देव-देवागनाओंके समान निरन्तर मुरत रूपी अमृतका पान करनेवाले उन दोनों स्त्री-पुरुषोंका समय सुखसे व्यतीत होने लगा। इधर श्रीकृष्णको जव अनिरुद्धके हरे जानेका वृत्तान्त विदित हुआ तब वे वलदेव, शम्ब और प्रद्युम्न आदि यादवों- के साथ मिलकर अनिरुद्धको लानेके लिए आकारामार्गसे विद्याधरोंके राजा वाणकी नगरी पहुँचे ।। २५-२६ ।। और मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथियोंसे व्याप्त युद्ध में विद्याधरोंके अधिपति चाणको जीतकर उपासहित अनिरुद्धको अपने नगर वापिस ले आये ॥ २७ ॥ तदनन्तर अनिरुद्ध के समागमसे समुत्पन्न मुखको पाकर सब लोगोंका विरहजन्य दुःख दूर हो गया और समस्त सुखोंके आधारभूत स्वजन और पुरजन मुखसे क्रीड़ा करने लगे ॥२८॥ अथानन्तर एक समय वसन्त ऋतु के आनेपर श्रीकृष्ण, अपनी स्त्रियोंसे लालित भगवान् नेमिनाथ, राजा महाराजा और नगरवासी रूपी मागरके साथ, जहाँ उपयन फूल रहे थे ऐसे गिरनार पर्वतपर फोड़ा करने की इच्छासे गये ।। २९ ।। जो धारण किये हुए सफेद छत्रोंसे मुझोभित थे, तथा वैल, ताल और गरुड़की ध्वजाओंसे युक्त थे ऐसे सुन्दर भूपणोंसे विभूपित भगवान नेमिनाथ, बलदेव और श्रीकृष्ण पृथक्-पृथक् बड़े-बड़े घोड़ोंके रथोपर सवार हो एकके बाद एक जा रहे थे ॥३०॥ उनके पीछे समुद्रविजय आदि दश यादवोंके कुमारोंसे परिवृत प्रद्युम्न, मार्गमें फूलोंके थाण, धनुप तथा मकर चिह्नाङ्कित ध्वजासे मनुष्यों को आनन्दित करता हुआ हाथी और घोड़ोंके रथोंपर सवार हो जा रहा था ।। ३१ ।। उसके पीछे नाना प्रकारके पन्नाभूपोंसे विभूपित नगरवासी ठोग यथायोग्य उत्तमोत्तम वाहनोंपर १. चित्रलेखा नाम सखी । २.-विदित-मः । ३. संगतःमः । ४. खगक म० । ५. रश्वयुन-म०।

६२० 3 हरिवंशपुराणे। उपचितो जनतामिरसा गिरिः श्रियमुवाह सहोपवनैस्ततः । सुरगिरेः सुरसङ्गवधूजनैरुपचितस्य चितस्य वनान्तरैः ॥३३॥ 'समपनीतयथोचितवाहना वनविहारमतो जनताखिला । सपदि कर्तुमसावुपचक्रमे गिरिनितम्बवनेषु यथायथम् ॥३॥ मुरमिपुप्परजःसुरमा श्रमव्यपगमव्यसने श्वसने दिशः। वहति शीतलदक्षिणमास्ते स्मररतिश्रम एव नृणामभूत् ॥३५॥ रसितचूतलतारसकोकिलाः कलरवाः कलकण्ठतया गिरौ । जनमनांस्यपहर्तुमतिक्षमाः परिचुकूजुरिह स्मरदीपिताः ॥३६॥ मधुलिहां मधुपानजुषां कुलैः कुरपका वकुला. सुमगाः कृताः। द्विपदपट्पदभेदवतां रवैः श्रयति वाश्रय यायिणो गुणान् ॥३७॥ करिकटेप्वयुगच्छद्गन्धिषु स्थितिमपास्य मदभ्रमराः श्रिताः । ससहकारसुरद्रुममञ्जरीरमिनवासु रतिमहती भवेत् ॥३०॥ कुसुममारभृतः प्रणता भृशं प्रणयमङ्गभियेव नता द्रुमाः। युवतिहस्तधुताः कुसुमोच्चयेऽतनुसुखं तरुणा इव भेजिरे ॥३९॥ अनतिनम्रतया निजशाखया कथमपि प्रमदाकरलब्धया। तरुगणः कुसुमग्रहणेऽमजदृढकचग्रहसौख्यमिव प्रभुः ॥४०॥ सवार होकर चल रहे थे और इनके वाद कृष्ण आदि राजाओंको त्रियाँ पालकी आदिपर सवार हो मार्गमें प्रयाण कर रही थीं ॥ ३२ ॥ उस समय जन-समूह से व्याप्त और उपवनोंसे मुशोभित गिरनार पर्वत, देव-देवियोंसे व्याप्त एवं नाना यनोंसे युक्त सुमेरु पर्वतको शोभाको धारण कर रहा था । ३३ ।। समीप पहुंचनेपर सब लोग यथायोग्य अपने-अपने वाहन छोड़, पर्वतके नितम्बपर स्थित वनोंमें शीघ्र ही इच्छानुसार विहार करने लगे ॥ ३४ ॥ उस समय वासन्ती फूलोंकी परागसे मुगन्धित, श्रमको दूर करनेवाली, ठण्डी दक्षिणकी वायु सब दिशाओं में वह रही थी इसलिए मनुष्योंके कामभोग-सम्बन्धी श्रम ही शेप रह गया था शेष सब श्रम दूर हो गया था ।। ३५ ॥ आम्रलताओंके रसका आस्वादन करनेवाली, सुन्दर कण्ठ- से मनुष्योंका मन हरण करनेमें अत्यन्त दक्ष और कामको उत्तेजित करनेमें निपुण मधुर- भापी कोकिलाएँ उस समय पर्वतपर चारों ओर कुहू कुहू कर रही थीं ॥३६ ।। मधुपान करने में लीन भ्रमरोंके समूहसे कुरवक और मोलिश्रीके वृक्ष तथा द्विपद अर्थात् स्त्री-पुरुप अथवा कोकिल आदि पक्षी और षट्पद अर्थात् भ्रमरोंके शब्दसे उनके प्रदेश, अत्यन्त मनोहर हो गये थे सो ठीक ही है क्योंकि आश्रय, आश्रयी-अपने ऊपर स्थित पदार्थफे गुण ग्रहण करता ही है ।। ३७ ।। मदपायो भ्रमर, सप्तपर्ण पुष्पके समान गन्धगले हाथियोंके गण्डस्थलोपर स्थितिको छोड़कर आम्र और देवदारकी मञ्जरियांपर जा बैठी सो ठीक ही है क्योंकि नवीन वस्तुओं में अल्पाधिक प्रीति होती ही है ॥३८॥ फूलोंके भारको धारण करनेवाले वृक्ष अत्यन्त नम्रीभूत हो रहे थे और उमसे ऐसे जान पड़ते थे मानो स्नेह-भद्गके भयसे ही नम्रीभूत हो रहे थे। वे ही वृक्ष पुष्पावचयन के समय जय युवतियोंके हाथोंसे कम्पित होते थे तय तरुण पुरपाके ममान अतनु यहुन भारी अथवा कामसम्बन्धी मुसको प्राप्त होते थे ॥३६ ।। फूल चुनते समय पृश्नोंकी ऊँची शासाओंको म्रियाँ किसी तरह अपने हाथसे पकड़कर नीचेको और सोच रही थीं उमसे वे नायफके ममान म्री द्वारा पेश सोचनेके मुसका अनुभव कर १. समय म । २. रसिन. स्वादित. चूतरतारसो येस्ते, ते च ते कोक्लिाथ इति-~1३, माधयिणों म। ४. मदं भ्रमराभिताः R.1५ युथतिहस्तपता म० । ६. अनुमुपं महामु काममुर्ग या।

पञ्चपञ्चाशः सर्गः ६२१ 'वनपरिभ्रमसौख्यमितस्ततः समनुभूय चिरं वनितासखः । युवजनः कुसुमोत्करकल्पितेऽभजत तल्पतले सुरतामृतम् ॥४१॥ प्रतिवनं प्रतिगुल्मलतागृहं प्रतितरु प्रतिवापि विहारतः । विषयसौख्यमसेवत सौल्यवानखिलयादयपौरजनो मधौ ॥४२॥ द्विगुणिताप्टसहस्रवधूगणेवहुगुणीकृतभोगनोगतः । सुमधुमाधवमासममानयत् सुभगताघरमाधवचन्द्रमाः॥४३॥ पतिनिदेशजुपो हरियोपितो मुषितमानवमानसवृत्तयः । सह विजहुरधीश्वरनेमिना तरुलतारमणीयवनेषु ताः ॥४४॥ चनलताकुसुमस्तबकोच्चयं मधुमदालसमानसलोचना । मुखसुगन्धितया मुखरालिमिलयिताऽधृत काचन देवरम् ॥४५॥ उरसि चुम्बति तं कठिनस्तनी स्पृशति काचन जिघ्रति तं परा । मृदुकरण करे परिगृह्य तं शशिमुखं कुरतेऽभिमुसं परा ॥४६॥ विटपकैरपि सालतमालजैर्यजनकरिव काश्चिदवीजयन् । विदधुरस्य परास्त्ववतंसकश्रियमशोकतरोनवपल्लवैः ॥४७॥ विरचितां कुसुमैर्विविधैः नजं निजपरिप्वजनस्पृहया परा । शिरसि मालयति स्म गले परा कुरवकान्यपरा शिरसेऽकिरत् ॥४८॥ इति वसन्तमनन्तमसौ युवा हरिवधूभिरमा प्रतिमानयन् । स ऋतुना तदनन्तरभाविना विभुरसेव्यत सेवकवृत्तिना ॥४९॥ रहे थे।॥४०॥ तरुण पुरुप, स्त्रियोंके साथ चिरकाल तक जहाँ-तहाँ यन-भ्रमणके सुखका उप- भोग कर फूलोंके समूहसे निर्मित शय्याओंपर सम्भोगरूपी अमृतका सेवन करने लगे ।। ४ ।। उस वसन्त ऋतुमें मुखसे युक्तसमस्त यादव, प्रत्येक वन, प्रत्येक झाड़ी, प्रत्येक लतागृह, प्रत्येक वृक्ष और प्रत्येक वापीमें विहार करते हुए विपय-सुसका सेवन कर रहे थे।। ४२ ।। सोलह हजार स्त्रियोंके द्वारा अनेकरूपताको प्राप्त भोगरूपी आकाशमें विद्यमान एवं सौन्दर्यको धारण करनेवाले श्रीकृष्णरूपी चन्द्रमाने भी वसन्तऋतुके उस चैत्र-वैशाख मासको बहुत अच्छा माना था ।। ४३ ॥ मनुष्यको मनोवृत्तिको हरण करनेवाली श्रीकृष्णको स्त्रियाँ, पतिकी आज्ञा पाकर वृक्षों और लताओंसे रमणीय वनोंमें भगवान् नेमिनाथके साथ क्रीड़ा करने लगीं ॥४४॥ मधुके मदसे जिसका हृदय और नेत्र अलसा रहे थे एसी किसी स्रीको वन- लताओंके फूलोके गुच्छे तोड़ते समय मुखकी सुगन्धि-से प्रेरित गुनगुनाते हुए भ्रमरोंने घेर लिया इसलिए उसने भयभीत हो देवर-नेमिनाथको पकड़ लिया ।। ४५ ॥ कोई कठिनस्तनी वक्षःस्थलपर उनका चुम्बन करने लगी, कोई उनका स्पर्श करने लगी, कोई उन्हें सूचने लगी, कोई अपने कोमल हाथसे उनका हाथ पकड़ चन्द्रमाके समान मुखके धारक भगवान् नेमि- नाथको अपने सम्मुख करने लगी।। ४६॥ कितनी ही स्त्रियाँ साल और तमाल वृक्षकी छोटी- छोटी टहनियोंसे पहोंके समान उन्हें हेवा करने लगीं। कितनी ही अशोक वृनके नये नये पल्लवोंसे कर्णाभरण अधया सेहरा बनाकर उन्हें पहिनाने लगी ॥४७॥ कोई अपने आलिङ्गन- की इच्छासे नाना प्रकारके फूलोंसे निर्मित माला उनके शिरपर पहनाने लगी, कोई गलेमें डालने लगी और कोई उनके शिरको लक्ष्यकर कुरवकके पुष्प फेंकने लगो।। ४८॥ इस प्रकार युवा नेमिनाथ कृष्णकी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा करते हुए उम वमन्तको ऐमा ममझ रहे थे जैसे उसका कभी अन्त ही आनेवाला न हो। तदनन्तर वसन्तके बाद आनेवाली ग्रीष्म ऋतु १. नवपरिभ्रम-म । २. वनलता.म। ३. लोचनाः मः।

६२२ हरिवंशपुराणे प्रतिदिनं वसति स्म हरिस्तदा सरनिदायतुं प्रतिमानयन् । स्वरतिकारिणि स्वत गिरी शिशिरशीकरनिझरहारिणि ॥५०॥ हरिवधूनिवहरूपरोधतः प्रकृतिरागपरागपराइमुसः । शिशिरवारिणि तत्र जलास्पद जलविहारमसेवत तीर्थकृत् ॥५॥ तरणदूरनिमजनकक्रियाः सलिलयन्याराश्च परस्परम् । यडुनृपस्य मुदा वरयोपितः प्रतिविचिक्षिपुरम्बुमुसाम्बुजे ॥५२॥ विभुमपि प्रति ता व्यकिरनपः करतलाझलिमिजंलयन्त्रकैः । प्रलघु तेन तु ता फिरतापगाः जलधिनेय मुहुर्विमुसीकृताः ॥५३॥ अजनि भजन जनरञ्जनं न सलु केवलमेचमनीदृशम् । अपि तु चित्रसमालमनभ्रंमत्परिमलैरपि तजलरञ्जनम् ॥५४॥ उदतरत् प्रभुणा तरणीघटा गतनिदाघजघमंघनश्नमा। मृदितपुष्करिणी करिणी चिरादिव महाकरिणा करिणीघटा ॥५५॥ च्युतवतंसविशेपकमाकुलं तरलदृष्टि विषमरिताघरम् । शिथिलमैसलमिष्टकचाहं रत इवाप पुरन्धिकुल श्रियम् ॥५६॥ परिजनाहतवसविभूषणैस्तदनुभूपिततोषितयोषितः । विभुवपुर्वसनैः सममार्जयन् सुपरिधाय परं परिधानकम् ।।५।। मेवककी 'तरह भगवानकी सेवा करने लगी ॥ ४६।। उस समय तीक्ष्ण गरमीसे युक्त ग्रीष्म ऋतुको अच्छा मानते हुए श्रीकृष्ण उसी गिरनार पर्वतपर प्रतिदिन निवास करने लगे क्योंकि वह उन्हें बहुत ही आनन्दका कारण था और ठण्डे-ठण्डे जलकणोंसे युक्त निर्झरोंसे मनोहर था ॥५०॥ यद्यपि भगवान नेमिनाथ स्वभावसे ही रागरूपी परागसे पराङ्मुख थे तथापि श्रीकृष्णकी स्त्रियोंके उपरोधसे वे शीतल जलसे भरे हुए जलाशयमें जलक्रीड़ा करने लगे ॥५१॥ यदु नरेन्द्रकी उत्तम स्त्रियाँ कभी तैरने लगती थी, कभी लम्बी-लम्बी डुबकियाँ लगाती थीं, कभी हाथमें पिचकारियाँ ले हर्षपूर्वक परस्पर एक-दूसरे मुखकमलपर पानी उछालती थी ॥५२॥ वे अपनी हथेलीकी अञ्जलियों और पिचकारियोसे जब भगवानके ऊपर जल उछालने लगी तो उन्होंने भी जल्दी-जल्दी पानी उछालकर उन सवको उस तरह विमुस कर दिया जिस तरह कि समुद्र अपने जलकी तीव्र ठेलसे जव कभी नदियोंको विमुख कर देता है--उल्टा लौटा देता है ।। ५३ ।। उनका वह ऐसा अनुपम स्नान न केवल जनरञ्जन-मनुष्योंको राग-प्रीति उत्पन्न करनेवाला हुआ था किन्तु फैलती हुई सुगन्धिसे युक्त नाना प्रकारके विलेपनोंसे जल रञ्जन-जलको रॅगने घाला भी हुआ था ॥५४॥ जिस प्रकार कमलोंके समूहको मर्दन करनेवाली एक चञ्चल सूंडमे युक्त हस्तिनियोंका समूह जलागयमें किसी महाहम्तीके साथ चिरकालतक तैरता रहता है उसी प्रकार वह तरुण स्त्रियोंका समूह अपने हाथ चलाता और कमलोके समूहको मर्दित करता हुआ चिर कालतक तैरता रहा। इस जल-क्रीडास उनका ग्रीष्मकालीन घामसे उत्पन्न समस्त भय दूर हो गया था ।। ५५ ॥ उस समय स्त्रियोंके कर्णाभरण गिर गये थे, तिलक मिट गये थे, आकुलता बढ़ गयी थी, दृष्टि चञ्चल हो गयी थी, ओंठ धूसरित हो गये थे, मेखला ढीली हो गयी थी और केश खुल गये थे इसलिए वे सम्भोगकाल जैसी शोभाको प्राप्त हो रही थी ॥५६ ।। तदनन्तर परिजनोंके द्वारा लाये हुए वस्त्राभूपणोंसे विभूषित स्त्रियोंने, सन्तुष्ट होकर वस्त्रोंसे भगवानका शरीर पोंछा और उन्हें दूसरे वस्त्र पहिनाये । १.परोधितः म०, ड। २ स्वमुखवारिमुसेकवधूजना म०,३० । ३ सता म०। ४ गतिनिदाघजम।

पञ्चपञ्चाशः सर्गः ६२३ सपदिमुक्तजलाम्बरपीलने स्फुटकटाक्षगुणेन विलासिना। मधुरिपुस्थिरगौरवभूमिकामनुलजाम्बवती समनोदयत् ॥५८|| कृतककोपविकारकटाक्षिणी सललितभ्रु विलोक्य तु चक्षुषा । विभुमुवाच वचः पथपण्डिता त्वरितजाम्बवती स्फुटिताधरा ।।५९॥ भुजगकोटिमणिद्युतिमण्डलद्विगुणितागतिरीटमणिप्रमः । समधिरा स कौस्तुममासुरः स्वहरिवाहमहाशयनं हरिः ॥६॥ घननिनादतताम्बरमम्बुज' जगति पूरयते निजमम्बुमाः । कटिनशाङ्गधनुः सगुणं करोत्यखिलभूपविभुः सुमगाङ्कनः ॥६॥ पतिरमौ मम सोऽपि कदाचन प्रति न शास्ति हि वेशशासनम् । तदिह कश्चिदयं किल शास्ति मामपि मवान् सजलाम्बरपीलने ॥२॥ इति निशम्य नु काश्चन तद्वचः प्रतिजगुर्जगतीपतियोपितः । किमिति नाथमधिक्षिपमि त्रिभूप्रभुमनन्तगुणं विगतत्रपे ॥६३।। कियदिद जगतीपतिपौरुषं जगति दुष्करमित्यभिधाय सः । सरमसं पुरमेत्य नृपालयं द्रुतगतिः प्रविवेश हसन्मुखः ॥६॥ चलभुजङ्गममोगविभूपणं तदधिस्य महाशयनं हरेः । तदकरोद्विगुणं सगुणं धनुस्तमपि शङ्खमपूरयदीश्वरः ॥६५॥ भगवानने जो तत्काल गीला वस्त्र छोड़ा था उसे निचोड़नेके लिए उन्होंने कुछ विलासपूर्ण मुद्रामें कटाक्ष चलाते हुए कृष्णकी प्रेमपात्र एवं अनुपम सुन्दरी जाम्बवतीको प्रेरित किया ॥५८ ॥ भगवानका अभिप्राय समझ शीघ्रतासे युक्त तथा नाना प्रकारके वचन वनानेमें पण्डित जाम्बवती बनावटी क्रोधसे विकारयुक्त कटाक्ष चलाने लगी, उसका ओष्ठ कम्पित होने लगा एवं हाव-भावपूर्वक भौहें चलाकर नेत्रसे भगवानकी ओर देखकर कहने लगी कि ।। ५९। जिनके शरीर और मुकुटके मणियोंकी प्रभा करोड़ों सोके मणियोंके कान्तिमण्डलसे दूनी हो जाती है, जो कौस्तुभ मणिसे देदीप्यमान हैं, जो महानागशय्यापर आरूढ हो जगत्में प्रचण्ड आवाजसे आकाशको व्याप्त करनेवाला अपना शङ्ख बजाते हैं, जो जलके समान नीली आभाको धारण करनेवाले हैं, जो अत्यन्त कठिन शाहनामक धनुप- को प्रत्यञ्चासे युक्त करते हैं, जो समस्त राजाओंके स्वामी हैं और जिनकी अनेक शुभ- सुन्दर स्त्रियाँ हैं वे मेरे स्वामी हैं किन्तु वे भी कभी मुझे ऐसी आना नहीं देते फिर आप कोई विचित्र ही पुरुष जान पड़ते हैं जो मेरे लिए भी गीला वस्त्र निचोड़नेका आदेश दे रहे हैं ।। ६०-६२ ।। जाम्बवतीके उक्त शब्द सुनकर कृष्णकी कितनी ही स्त्रियोंने उसे उत्तर दिया कि अरी निर्लज ! इस तरह तीन लोकके स्वामी और अनन्तगुणोंके धारक भगवान् जिनेन्द्र- की तू क्यों निन्दा कर रही है ? ।। ६३ ।। जाम्यवतीके वचन मुन भगवान् नेमिनाथने हॅसते हुए कहा कि तूने राजा कृष्णके जिस पौरुपका वर्णन किया है संसारमें वह कितना कठिन है ? इस प्रकार कह कर वे वेगसे नगरको ओर गये और शोग्रतासे राजमहलमें घुस गये i६४॥ वे लहलहाते मोकी फगाओंसे सुशोभित श्रीकृष्णकी विशाल नागशय्यापर चढ़ गये। उन्होंने उनके शाह धनुपको दूना कर प्रत्यञ्चासे युक्त कर दिया और उनके पाञ्चल १. शॉ । २. पूरयते च निजाम्बुमाः म०, पूरयते च जिनाधिपः ५०, पूरयने निजमाम्बुजाः ग०, पूरयते निजमाम्बुभाः ३०, ख० । ३. कोऽपि म । ४. -दीश्वरम् मः। .

हरिवंशपुराणे
मुखरशङ्खरवण दिशा मुखान्यसिलमम्वरमम्बुनिधिश्च भूः।
निखिलमतदतीव विपूरितस्फुटदिवस्फुटमाविरभूत्तदा ॥६६॥
पटुमदा. करिण. क्षुमिता निजानमिवमम्जुरितस्तत श्राश्रयान् ।
त्रुटितबन्धतुरङ्गगमकोटयः पुरि सहेपितकास्त्वरितोऽभ्रमन् ॥६॥
मवनकूटतटान्यपतन् हरिः स्वकमकर्पदसिं क्षुभिता समा।
पुरजनः प्रलयागमशङ्कया भयमगात् परमाकुलितस्तदा ॥६॥
हरिरवेत्य निजाम्बुजनिस्वनं त्वरितमैत्य कुमारमयज्ञया ।
स्फुरदहीशमहाशयने स्थितं परिनिरीक्ष्य नृपः सुविसिस्मिये ॥६९।।
परुषजाम्बवतीवचसो रुपा स्फुटमवेत्य कुमारकृतं हरिः।
परितुतोप सबन्धुरधीशितुर्विकृतिरप्यतितीपकरी तदा ॥७॥
कृतपरिष्वजनः स्वजनै, स तं समभिपूज्य युवानमगाद्गृहम् ।
स्वयुवति प्रति दीपितमन्मथं समवबुध्य हरिर्मुमुदेऽधिकम् ।।७१॥
सविधियाचितमोजसुताकरग्रहणहेतुविबोधितवान्धवः ।
नरपतीन् सकलान् सकलत्रकानकृत सग्निहितान् कृतगौरवः ॥७२॥
विहिततरसमयोचितमजनौ परमरूपधरौ एतमण्डनौ ।
पुरि यथास्वमगारमधिष्ठितौ जनमनोऽहरतां सुवधूधरौ ॥७३॥
जन्य शङ्कको जोरसे फूक दिया ॥ ६५ ॥ शसके उस भयंकर शब्दमे दिशाओंके मुख, समस्त
आकाश, समुद्र, पृथिवी आदि सभी चीजें व्याप्त हो गयी और उससे ऐसी जान पड़ने लगी
मानो शङ्खके शब्दसे व्याप्त होनेके कारण फट हो गयी हो ॥६६ ।। अत्यधिक मदको धारण
करनेवाले हाथियोंने क्षुभित होकर जहाँ-तहाँ अपने अन्धनके खम्भे तोड़ दिये । घोड़े भी
बन्धन तुड़ाकर हिनहिनाते हुए नगरमें इधर-उधर दौड़ने लगे॥६७ ।। महलोंके शिखर और
किनारे टूट-टूट कर गिरने लगे। श्री कृष्णने अपनी तलवार खींच ली। समस्त सभा क्षुभित
हो उठी, और नगरवासी जन प्रलयकालके आनेकी शङ्कासे अत्यन्त आकुलित होते हुए भयको.
प्राप्त हो गये ॥ ६८ ॥ जब कृष्णको विदित हुआ कि यह तो हमारे ही शसका शब्द है तब वे
शीघ्र ही आयुधशालामें गये और नेमिकुमारको देदीप्यमान नागशय्यापर अनादरपूर्वक
खड़ा देख अन्य राजाओके साथ आश्चर्य करने लगे ॥ ६९ ॥ ज्यों ही कृष्णको यह स्पष्ट
मालूम हुआ कि कुमारने यह कार्य जाम्बवतीके कठोर वचनोंसे कुपित होकर किया है त्यों ही
बन्धुजनोंके साथ उन्होंने अत्यधिक सन्तोपका अनुभव किया। उस समय कुमारकी बह क्रोध-
रूप विकृति भी कृष्णके लिए अत्यन्त सन्तोषका कारण हुई थी ॥७०|| अपने स्वजनोंके साथ
कृष्णने युवा नेमिकुमारका आलिङ्गन कर उनका अत्यधिक सत्कार किया और उसके बाद
अपने घर गये। घर जानेपर जब उन्हें विदित हुआ कि अपनी वीके निमित्तसे उन्हें
कामोद्दीपन हुआ है तब वे अधिक हर्पित हुए ॥ ७१॥ श्रीकृष्णने नेमिनाथके लिए विधिपूर्वक
भोजवंशियोंकी कुमारी राजीमतीकी याचना की, उसके पाणिग्रहण संस्कारके लिए बन्धुजनोंक
पास खबर भेजी और प्रियोसहित समस्त राजाओंको बड़े सम्मानके साथ बुलाकर
अपने निकट किया ॥ ७२ ॥ उस समयके योग्य जिनका स्नपन किया गया था, जो परम
रूपको धारण कर रहे थे, जिन्होंने उत्तमोत्तम आभूपण धारण किये थे और जो अपने-
अपने नगरमे अपने-अपने धर स्थित थे ऐसे उत्तम वधू और घर मनुष्योंका मन हरण कर
रहे थे॥७३॥

पचपचाशः सर्गः १२५ ऋतुरियाय स धर्ममयस्ततो भुवि धनागमकालमयादिव । नमसि दीनमदर्शि धनावली मरुपये पायिकैस्तृषितैरपि ७४|| प्रथमगर्जितशीतपयःकणा जलमुचा 'शिखिचातकसौख्यदाः । भुवि बभूवुरशेषवियोगिनां द्विगुणतापजुषामविदुःसहाः ॥७५|| दवदिवाकरदग्धवनावलीप्रथमनिर्गतवाप्पसुसौरभ । अमवतामिव सौहृददर्शने नमसि वर्षति मेधकदम्बके ॥७॥ चलतडित्सवलाकवलाहके सुरपचापधरे भरवर्षिणी । क्षितिरमात्सुरगोपशतैश्विता पतितपान्यमनोमिरिवाभितः ॥७॥ कुटजनीपकदम्बकदम्बकः कुसुमितेः ककुमैः ककुमोऽखिलाः । नवशिलीनदलैश्च मनोहराः सवनरन्ध्रगिरिक्षितयो वभुः ॥७॥ धनधनाघनगर्जिततर्जिता मुखरयाहुलतावलयारः। युवतयः प्रियकण्ठप्रहैर्विदधुरुममयप्रहनिप्रहम् ।।७।। गिरिशिलातपयोगविमोचितास्त्रिविषयोगधरा मुनयो वने। शिशिरमारतवर्षसहक्षमास्तरलतामिमुखास्त्ववतस्थिरे ॥८॥ पृथुरथं चतुरश्वयुतं तदा ध्वजपताकिनमकरथमम् । समधिरा सनेमियुवान्वितो नृपसुवैश्चलितो वनभूमिकाम् ॥८॥ तदनन्तर अब पृथिवीपर वर्षाकाल आनेवाला है इस भयसे ही मानो ग्रीष्म ऋतु कहीं चली गयो । आकाशमें मेघमाला छा गयी और उसे मरुस्थलके पथिक प्यासे होनेपर भी बड़ी दीनतासे देखने लगे ।।७४ । मेघोंकी प्रथम गर्जनाके जो शब्द और शीतल जलके छोटे क्रमसे मयूरों तथा चातकोंको सुखदायी थे वे ही पृथिवीपर दूने संतापको प्राप्त समस्त विरही मनुष्योंके लिए अत्यन्त दुःसह हो रहे थे ।। ७५ ।। सावनके महीने में जब मेघोंके समूह बरसने लगे तब दावानल और सूर्यके कारण दग्ध वनपंक्तिसे जो सर्व प्रथम वाप्प (भाप) और सोंदी-सोंदी सुगन्धि निकली वह ऐसी जान पड़ने लगी मानो मेघरूपी मित्रके दिखनेसे हो वनावलोके वाष्प-हर्पाश्रु और सुखोच्छ्वासकी सुगन्धि निकलने लगी हो ।। ७६ ॥ चञ्चल विजली और बलाकाओंसे सहित, मेघ जव इन्द्रधनुपरूपी धनुपको धारण कर शर अर्थात वाण (पक्षमें जल ) को वर्षा करने लगे तब सैकड़ों इन्द्रगोपोंसे व्याप्त पृथिवी ऐसी जान पड़ने लगी मानो जहाँ-तहाँ पथिक जनोंके गिरे हुए अनुरागी हृदयाँसे ही व्याप्त हो रही हो।। ७७) समस्त दिशाएँ फूले हुए कुञ्ज, कदम्ब और कोहाके वृक्षोंसे मनोहर दिखने लगी तथा वन, गर्त और पर्वतोंसे सहित समस्त भूमि शिलीन्ध्रके नये नये दलोंसे सुशोभित हो उठी।। ७८ ॥ मेघोंकी घनघोर गर्जनासे डरी हुई युवतियाँ, मुजाओंकी खनकती हुई चूड़ियोंके शब्दसे युक्त पतियोंके कण्ठके दृढालिंगनसे अपने तीन भयरूपी पिशाचका निग्रह करने लगी। मावार्थ-मेघगर्जनासे भयभीत स्त्रियाँ पतियोंके कण्ठका दृढालिङ्गन करने लगी ।।७।। आतापन, वर्षा और शिशिरके भेदसे तीन प्रकारके योगको धारण करनेवाले मुनियोंका उम समय पर्वत की शिलाओंपर होनेवाला आतापन योग छूट गया था इसलिए वे वनमें शीत, वायु और वर्षाको पाधा सहन करते हुए वृक्ष और लताओंके नीचे स्थित हो गये। भावार्थ-मुनिगण वृक्षोंके नीचे बैठकर वर्षायोग धारण करने लगे।।८० ॥ ऐसी ही वर्षाऋतुमें एक दिन युवा नेमिकुमार, ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित सूर्यके रथके समान देदीप्यमान एवं चार घोड़ोंसे १. दिवि चातक क०, मुवि चातक ० । २. कर्तृपदम् । ३. भावणमासे । ४. मुरचापवरे फ०, ४०, म०१५ इन्द्र कुभोऽर्जुन इत्यमरः। 'कोहा' इति हिन्दी। ७० ६२६ हरिवंशपुराणे मुदितमोजसुतानगराङ्गनातृषितनेत्रनिपीतवपुर्जतः । विपुलराजपथेन स तैरगान् सकृपयेव मनोहरदर्शनः ।।२।। जलनिधिमुखरः स्वतरङ्गकैललितनतनदोमिरिवाकुलैः। अतितरां विवमौ विभुसग्निधौ विश्तननिर्तकंवत्तदा ॥८॥ उपवनं समुपेत्य वनश्रियं सपदि यूनि विलोकयतीश्वरे । विततशाखवनगुमजातयो विचकर कुसुमाअलिमानताः ॥४॥ स खलु पश्यति तय तदा वने विविधजातिभृतस्तृणमक्षिणः । मयविकम्पितमानसगायकान् पुरुषल्बमृगानतिविदलान् ॥८५|| लघु निरुभ्य रथं स हि सारथि निजनिनादजिताम्बुदनिस्वनः । अपि विदन्नवदन्मृगजातयः किमिह रोधमिमाः प्रतिलम्भिताः ॥८६॥ अकथयत् प्रणतः स कृताञ्जलिः क्षितिभुजामिह मांसमुजां विमो। तव विवाहविधी मृगरोधनं विविधांसनिमित्तमनुष्ठितम् ।।८७॥ इति निशम्य निशाग्य मृगयजान् प्रकृतिभूतदयास्थितमानसः । नृपसुतानमिवीक्ष्य विभुर्जगावमिनिबोधविजृम्भणसावधिः ॥८॥ गृहमरण्यमरण्यतृणोदकान्यशनपानमतीय निरागसः। मृगकुलस्य तथापि वधो नृभिर्जगति पश्यत निघृणतां नृणाम् ।।८।। जुते रथपर सवार हो अनेक राजकुमारोंके साथ वनभूमिकी ओर चल दिये ॥८॥ प्रसन्नतासे युक्त राजीमती तथा नगरकी स्त्रियोंने अपने प्यासे नेत्रोंसे जिनके शरीर रूपी जल- का पान किया था एवं जिसका दर्शन मनको हरण कर रहा था ऐसे नेमिनाथ भगवान् , उन राजकुमारोंके साथ विशाल राज-मार्गसे दर्शकोंपर दया करते हुएके समान धीरे-धीरे गमन कर रहे थे ॥८२ ॥ उस समय समुद्र, सुन्दर नृत्यमें व्यस्त भुजाओंके समान अपनी चञ्चल तरनोंसे शब्दा यमान हो रहा था और भगवान के समीप आनेपर नाना प्रकारके नृत्योंको धारण करनेवाले नर्तकके समान अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥३॥ उपवनमें पहुंचकर युवा नेभि कुमारशीघ्र ही वन की लक्ष्मीको देखने लगे और वनके नाना वृक्षोंकी पंक्तियाँ अपनी शाखारूप भुजाएँ फैलाकर नम्रीभूत हो उनपर फूलोंकी अब्जलियॉ विखेरने लगीं ॥८४ ।। उसी समय उन्होंने वनमें एक जगह, भयसे जिनके मन और शरीर काँप रहे थे, जो अत्यन्त विह्वल थे, पुरुप जिन्हें रोके हुए थे और जो नाना जातियोंसे युक्त थे ऐसे तृणभक्षी पशुओंको देखा ।।५।। यद्यपि भगवान् , अवधिज्ञानसे उन पशुओंको एकत्रित करनेका कारण जानते थे तथापि उन्होंने शीघ्र ही रथ रोककर अपने शब्दसे मेघध्वनिको जीतते हुए, सारथिसे पूछा कि ये नाना जातिके पशु यहाँ किस लिए रोके गये हैं ? ॥ ८६ ।। सारथिने नम्रीभूत हो हाथ जोड़- कर कहा कि हे विभो ! आपके विवाहोत्सवमें जो मांसभोजी राजा आये हैं उनके लिए नाना प्रकारका मांस तैयार करनेके लिए यहाँ पशुओंका निरोध किया गया है । ८७ ॥ इस प्रकार सारथिके बचन सुनकर ज्यों ही भगवान्ने मृगोंके समूहकी ओर देखा त्यों ही उनका हृदय प्राणिदयासे सराबोर हो गया। वे अवधिज्ञानी तो थे ही इसलिए राजकुमारोंकी ओर देखकर इस प्रकार कहने लगे कि बन हो जिनका घर है, वनके तृण और पानी ही जिनका भोजन-पान है और जो अत्यन्त निरपराध है ऐसे दीन मृगोंका संसारमें फिर भी मनुष्य १. विधृतनतकनर्तन म०,०।२. महसारथि म ।

६२७ पञ्चपञ्चाशः सर्गः रणमुखेषु रणार्जितकीतयः करितुरङ्गरथेष्वपि निर्मयान् । अमिमुखान मिहन्तुमधिष्ठितानमिमुखाः प्रहरन्ति न होतरान् ॥९॥ शरमसिंहवनद्विपयूथपान प्रकुपितान् परिहत्य विदूरतः । मृगशशान् पृथुकान् प्रहरत्यमून कथमिवान पुमान विलजते ॥११॥, चरणकण्टकवेधमयादा विदधते परिधानमुपानहाम् । मृदुमृगान् मृगयासु पुनः स्वयं निशितशमशतैः प्रहरन्ति हि ॥१२॥ विषयसौख्यफलप्रसवोदयः प्रथम एष मृगौयवधोऽधमः । अनुमचे पुनरस्य रसप्रदे पडसुकायनिपीडनमध्यधि ॥१३॥ विपुलराज्यपदस्थितिमिच्छता सकलसत्ववधोऽभिमुखीकृतः । दुरितबन्धफलस्तु वधो ध्रुवं कटुफला स्थितिरस्य परी' यतः ॥९en प्रकृतिदेशरसानुभवस्थिति प्रचितबन्धचतुष्कवशीकृतः । मजति दुर्गतिषु क्रमतो भ्रमन् विविधदुःसमयं भवभृद्गणः ॥१५॥ प्रतिमवं मयदुःखखनीयुतैर्विषयः कुसुरतिभावितः । नरमवेऽप्यसुमानतिमोहितो न यतते मवदुःखनिवृत्तये ॥१६॥ मनसुखानि यहि विषयोदवान्यतिमहान्त्यपि सन्ततिमन्त्यपि । भवभूतो न भवन्ति हि तुष्टये जलनिधेरिव सिन्धुशतान्यपि ॥९॥ वध करते हैं । अहो! मनुष्योंकी निर्दयता तो देखो ।। 2 ॥रणके अग्रभागमें जिन्होंने कीर्तिका संचय किया है ऐसे शूरवीर मनुष्य हाथी, घोड़े और रथ आदिपर सवार हो निर्भयताके साथ मारनेके लिए सामने खड़े हुए लोगों पर ही उनके सामने जाकर प्रहार करते हैं अन्य लोगोंपर नहीं ॥६० ॥ जो पुरुष अत्यधिक क्रोधसे युक्त शरभ, सिंह तथा जंगली हाथियों आदिको तो दूरसे छोड़ देते हैं और मृग तथा खरगोश आदि क्षुद्र प्राणियों- पर प्रहार करते हैं उन्हें लजा क्यों नहीं आती ? ॥११॥ अहा ! जो शूरवीर पेरमें कॉटा न चुभ जाये इस भयसे स्वयं तो जूता पहिनते हैं और शिकारके समय कोमल मृगोंको सैकड़ों प्रकारके तीक्ष्ण शस्त्रोंसे मारते हैं यह घड़े आश्चर्यको बात है ॥९२ ॥ यह निन्द्य मृग-समूहका वध प्रथम तो विषयसुखरूपी फलको देता है परन्तु जब इसका अनुभाग अपना रस देने लगता है तब उत्तरोत्तर छह कायका विघात सहन करना पड़ता है । भावार्थ-हिंसक प्राणी छहकायके जीवोंमें उत्पन्न होता है और वहाँ नाना जीवोंके द्वारा मारा जाता है ।। ९३ ।। यह मनुष्य चाहता वो यह है कि मुझे विशाल राज्यकी प्राप्ति हो पर करता है समस्त प्राणियोंका वध सो यह विरुद्ध वात है क्योंकि प्राणिवधका फल तो निश्चित ही पापयन्ध है और उसके फलस्वरूप कटुक फलकी ही प्राप्ति होती है राज्यादिक मधुर फलको नहीं ॥९४|| प्रकृति, प्रदेश, स्थिति और अनुभाग रूप चार प्रकारके धन्धके वशीभूत हुआ यह प्राणियोंका समूह कम-क्रमसे दुर्गतियोंमें परिभ्रमण करता हुआ नाना प्रकारकै दुःख भोगता रहता है ।।९५५॥ यह प्राणी प्रत्येक भवमें भय और दुःखको खान से युक्त विषय-सम्बन्धी खोटे सुखोंसे प्रभावित रहा है और आज मनुष्यभयमें भी इतना अधिक मोहित हो रहा है कि संसार-सम्बन्धी दुःखको दूर करने के लिए यत्न ही नहीं करता ॥९६ ॥ जिस प्रकार सैकड़ों नदियाँ समुद्रके सन्तोपके लिए नहीं हैं उसी प्रकार वाह्य विपयों- से उत्पन्न, सन्ततिबद्ध, बहुत भारी संसारमुस भी प्राणीके सन्तोषके लिए नहीं हैं ॥९७ ।। १. वएम० । २. स्थिति प्रचित म०1३. विषमःम।४, सन्ततितान्यरिम २४ हरिवंशपुराणे खचरदेवनृपामरजन्मनं नृपजयन्तविमानभवोद्भवम् । न हि सुख' बहु सागरजीविनः समनुभूतमभून्मम तृप्तये ॥१८॥ कतिपयाहमवं वत किं पुनः मुलममप्यतिमानुषमप्यलम् । भवति तृप्तिकरं मम साम्प्रतं सुखमसारमसारतयायुषः ॥१९॥ अत इदं क्षयि तापकर सुखं विषय प्रविहाय महोघमः। क्षयविमुक्तमतापजमारमज शिषसुखं महता तपसाये ...|| इनि तदा मनसा वचसा समं सुपरिचिन्तयति ध्रुवमीश्वरे । शशिनिमाः खलु पञ्चमकस्यजास्तुपितवह्नयरुणार्कपुरस्सराः॥१०१|| लघु समेत्य नता नतमभोलयः कृतकराालयसिदशा जगुः। समय एप विमो मरतेऽधुना स्वमिह पर्तय तीर्थमिति प्रभुम् ॥१०२॥ प्रतिविबुदपयः स्वयमेव स प्रतिविबोधकदेवगिरोऽस्य ताः । अनुवदन्यपि ताः पुनरुततां फलति चावसरे पुनरुक्तता ॥१०॥ लघु विमुच्य मृगान् मृगबान्धवो नृपसुतैः प्रविवेश पुरं प्रभुः । सपदि तत्र नृपासनभूषणं नुनुवुरेश्य पुरेव मुरेश्वराः ॥१०॥ तमुपवेश्य तत: स्नपनासने समुपनीतपयःपयसा सुरः। सममिपिय्य विभूप्य सुरोचितस्रगनुलेपनवस्त्रविभूषणः ॥१०॥ सुहरि विष्टरवर्तितमीश्वरं हरिबलान्वितभूपसुरासुराः । पभुरतीव तदा परितः स्थिताः प्रथममेरुमियोरुकुलायलाः ॥१०६६ औरकी यात जाने दो मैंने स्वयं सागरों पर्यन्त विद्याधरेन्द्र, देवेन्द्र और नरेन्द्रके जन्ममें राजाओं तथा जयन्त विमानमें समुत्पन्न सुखका उपभोग किया है पर यह मेरी तृप्तिके लिए नहीं हुआ।। ९८ ॥ यद्यपि मुझे लोकोतर सुख सुलभ है तथापि वह कुछ ही दिन ठहरनेवाला है, निःसार है और मेरी आयु भी असार है अतः वह मेरे लिए तृप्ति करनेवाला कैसे हो सकता है ? ॥ ९९ ॥ इस लिए मैं इस विनाशीक एवं सन्तापकारी विषयजन्यसुखको छोड़कर महान उद्यम फरता हुआ अत्यधिक तपसे अविनाशी, असन्तापसे उत्पन्न आत्मोत्थ मोक्ष मुसका उपार्जन करता हूँ ॥१०० ॥ भगवान उस समय मन-वचनसे इस प्रकारका विचार कर ही रहे थे कि उसी समय पञ्चम स्वर्ग में उत्पन्न, चन्द्रमाके समान श्वेतवर्ण तुपित, वह्नि, अरण, आदित्य आदि लौकान्तिक देव शीघ्र ही आ पहुँचे और मस्तक झुकाकर तथा हाथ जोड़ कर निवेदन करने लगे कि हे प्रभो! इस समय भरतक्षेत्रमें तीर्थ प्रवर्तानका समय है इसलिए तीर्थप्रवृत्ति कीजिए । १०१-१०२ ।। भगवान् स्वयं ही मार्गको जानते थे इसलिए लौका- न्तिक देवोंफे उक्त वचन यद्यपि पुनरुक्त थातफा ही फयन करते थे तथापि अवसरपर पुनरु- कला भी फलीभूत होती है ।। १०३॥ मृगोंके हितपो भगवान ने शीघ्र ही मृगोंको छोड़ दिया और राजकुमारों के साथ स्वयं नगरीमें प्रवेश किया। नगरीमें जाकर वे राग्यसिंहासनको अलंकृत करने लगे और इन्होंने पहले के समान आफर उनकी स्तुति की ॥ १०४ ॥ तदनन्तर इन्द्रोंने उन्हें स्नानपीठपर विराजमान कर देयोंके द्वारा लाये हुए धीरोदकसे उनका अभिः पेश किया और देयोंके योग्य माला, विलेपन, पत्र एवं आभूपणोंसे पिभूपित किया ॥१५॥ उत्तम सिंहासनफे ऊपर विराजमान भगवानको घेरकर सड़े हुए कृष्ण, पलभद्र आदि अनेक राजा और मुर-अमुर ऐमे जान पड़ते थे जैसे प्रथम मुमेरको घेरफर म्यिन युलापल हो १. मुमम्भपसागरबीवियः म.। २.पञ्चमस्यौहरमा होमान्टिकदेया. । पापुरेप..।४.रिगा-म ..। , ३. ननवरेत्य म., पज्ञपचाशः सर्गः जिगमिषु तपसे जिनमारता हरिपुरःसरमोजवदूत्तमाः । अनुनयनं निरोद्धमलं तदा प्रपलसिंहमिवोद्धतपारम् ॥१७॥ पितृपुरस्सरबन्धुजनं जिनः सुपरिवोध्य जगरिधतिकोविदः । धनदशिलिकृतां शिविका पदैरगमदुत्तरकुर्वमिधानिकाम् ॥१००n ध्वसितातपवारणमण्डितां सुमणिमित्तिमुपाहितमतिकाम् । विविधरूपधरामधिरूढवान् विधुरिवोदयभूधरमित्तिकाम् ॥१०९॥ क्षितिभृतः क्षितितः शिविका शिवामुदहरन् प्रथमाः प्रथमं ततः । सुरपये सुरनाथपुरोगमाः सुरवराः सुखमू हुर५ मुदा ॥१०॥ अमवदूर्द वमुदारमुदा रवः सुरगणैर्विहितों 'विहितोऽश्रियाम् । श्रुतिमधोमुखरो मुखरोदितो व्यथितमोजगतो 'जगतोऽरणन् ॥19॥ नन्तुरप्सरसः "सहसा रसैः "सशिसि साप्सरसः "सह सारसैः । यममिसाम रसंघनताङ्गतं तमिव शान्तरसं घनतां गतम् ॥११२॥ ७ हों।। १०६ । जिस प्रकर पिञ्जरेको तोड़कर निकलनेवाले बलवान सिंहको कोई अनुनय- विनयके द्वारा रोकनेमें समर्थ नहीं होता है उसी प्रकार तपके लिए जानेके इच्छुक भगवान्को श्रीकृष्ण भोजवंशी तथा यदुवंशी आदि कोई भी रोकनेमें समर्थ नहीं हो सके ।। १०७ ।। तदनन्तर संसारको स्थितिके जानकार जिनेन्द्र भगवान पिता आदि परिवारके लोगों को अच्छी तरह समझाकर कुवेररूप शिल्पीके द्वारा निर्मित उत्तरकुरु नामकी पालकीकी ओर पैदल ही चल पड़े॥१०८॥ वह पालकी ध्वजाओं और सफेद छत्रसे मण्डित थी, उत्तम मणि- मय दीवालोंसे युक्त थी । उत्तमोत्तम वेल-यूटोंसे सहित थी, और विविधरूपको धारण कर रही थी। जिस प्रकार उदयाचलकी मित्तिपर चन्द्रमा आरूढ़ होता है उसी प्रकार भगवान भी उस पालकीपर आरूढ़ हो गये ।।१०९।। तदनन्तर सबसे पहले कुछ दूर तक पृथिवीपर तो श्रेष्ठ राजा लोगोंने उस कल्याणकारिणी पालकीको उठाया और उसके बाद इन्द्र आदि उत्तमोत्तम देव उसे यड़े हर्पसे आकाशमें ले गये ।। ११० ॥ उस समय आकाशमें तो अत्यधिक आनन्दसे देवोंके द्वारा किया हुआ वह शब्द व्याप्त हो रहा था जो श्रीहीन मनुष्योंके लिए हितकारी नहीं था और नीचे पृथिवीपर दुःखसे पीडित भोजवंशके लोगोंका जोरदार करुणक्रन्दन मुखसे सदन करने वाले जगत्के जीयोंके कर्ण-वियरफो व्याप्त कर रहा था ॥११॥ जिनके शरीरको देवोंका समूह नमस्कार कर रहा था तथा जो निविडताको प्राप्त हुए शान्त रसके समान जान पड़ते थे ऐसे उन भगवान नेमिनायके सम्मुख, जिस प्रकार जलके सरोवरके निकट मयूर और सारस नृत्य करते हैं उसी प्रकार अप्सराओंका समूह नाना रसोंफो प्रकट करता हुआ पड़ी शीमतासे नृत्य कर रहा था ॥ ११२ । इस प्रकार जो पापोंकी सेनाको जीत रहे थे वे जिनेन्द्र भगवान् कमलके समान कान्तिकी धारक हितकारी देधसेनाके साथ मुमेर पर्वतके १. पुवंभिधात म.। २. उत्तयण । ३. सन्दः । ४. कृतः । ५.विगतं तिं परमात् स. । १. भभियो भोहिताना माग्यहीनानामित्यपः । ७. मधिमुयो म., स.,ग,पाधिस्यो क०, म्पधिमुयो बगो म.1८. बगतः म । ६. मुराशनाः । १.. मारिति । ११. सरिसमाप्सरस: म.,शिखिभिः सायं पया साचया सरािति मयूरसाराम् । १२. अनिरसदित सर: साप्सरः तस्य । १३. साधम् । १४. सारसे: महादिभिः । १५. यममि यत्समुन्यम् । १६. अमरसन नठं मा पस्य तस्य मारः अमरसहनांगता, तपा मदिवः । १७. एनतो निविटा गतं प्राप्त ग्रान्टरसनिय ।

हरिवंशपुराणे 'गिरिमितः सहितामरसेनया जिनवरः स हि तामरसेन या। समरुचिगिरिराइवमूर्जयन्त इति योऽस्ति हि पापचमूर्जयन् ॥११३॥ रविनिशाकरयोरुमयान्तयोविंचरतोस्तिमिरोरुमयान्तयोः । दिवि न यत्र महारभनिदर्शन किमिह तुगतयास्य निदर्शनम् ॥११॥ मुखरनि भरपातपतस्विमिमुखरसप्रदचूतलताफलः । कुसुमनिर्भरपादपजातिभिः कुसुमनोरहितोऽतिविराजते ॥११५॥ "मणिसुवर्णसुवर्णधराधरे विविधधातुरसौषधराधरे । शिखररक्षितकिन्नरदेवकं वनभुवा हृतधीनरदेवके ॥१६॥ उपवने वृजिने शिविकामतः सुमतमाप्य जिनेशिविकामतः । वति यदहितो हरिणा हरिः स निदधे सहितो हरिणा हरिः" ॥११॥ समान क्रान्तिवाले गिरनार पर्वतपर पहुँचे ॥११३॥ जिस पर्वतपर रानि और दिनके अन्तमें अर्थात् प्रातःकाल और सायंकालके समय आकाशमें विचरनेवाले एवं अन्धकारसे होने वाले विशाल भयका अन्त करनेवाले सूर्य और चन्द्रमाके महान स्वरूपका दर्शन नहीं हो पाता उस गिरनार पर्वतका यहाँ ऊँचाईमें उदाहरण ही क्या हो सकता है ? अर्थात् कुछ भी नही। भावार्थ -यह पर्वत इतना ऊँचा है कि उसपर प्रातःकाल और सायंकालके समय सूर्य और चन्द्रमाका दर्शन ही नहीं हो पाता । वह गिरनार पर्यंत कुत्सित फूलोंसे रहित था, और शब्दायमान किरणोंके गिरनेके स्थानमें उड़नेवाले पक्षियों, मुखमें मधुर रसको देनेवाले आम्रलताके फलों एवं फूलोंसे लदे नाना प्रकारके वृक्षोंसे अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥ ११५ ।। तदनन्तर जो मणियों और सुवर्णके कारण सुमेरु गिरिके समान जान पड़ता था, जो नाना प्रकारकी धातुओंके रङ्ग के समूहसे उपलक्षित भूमिको धारण कर रहा था, अपनी शिखरोंसे किन्नर देवोंको अनुरक्त कर रहा था, और जो वनको वसुधासे मनुष्य तथा देवोंकी बुद्धिको हरण कर रहा था ऐसे गिरनार पर्वतके उस निष्कलङ्क उपवनमें जिसमें कि वानरसे रहित एकाकी सिंह विचरण करता था विष्णु-कृष्णसहित इन्द्रने वीतराग जिनेन्द्रकी १. हि यः पापचमू: पापसेना. जयन् स हि जिनवर, या तामरसेन कमलेन समरुचि. सहशकान्तिः तया, सहितामरसेनया हितेन सहिता सहिता सा चासो अमरसेना च तया साध गिरिराचं गिरिराङ् मेकस्तस्य रुगिव मगयस्य तं, ऊर्जयन्त इति प्रसिद्धगिरिम् इतः प्राप्तः । २. उभयान्तयोः-उभयोनिशादिष- सयोरन्तयोः । दिवि विचरतोः, तिमिरात् अन्धकारात् यउरु विपुलं भयं तस्य अन्तो विनाशो याभ्या तयो. रविनिशाकरयोः यत्र गिरौ महात्मदर्शनं न विद्यते अस्य गिरेः तुङ्गतमा किं निदर्शनं किमुदाहरणम् । ३. निझर-म०। ४. कुत्सितपुष्परहितो यो गिरिः मुखरेषु निर्भरपातेषु विद्यमाना पतत्त्रिणः तैः मुखे प्रारम्भ रसप्रदानि यानि चूतलताफलानि तः, कुसुमानि च, निझगश्च, पादपजातयश्च तैः, अतिविराजते नितरा शोमते । ५ मणिभि सुवर्णेच सुवर्णधराघर: य सुमेरुपर्वतस्तस्मिन् , विविधधातुरसौधन नानाधातुरससमूहेनो- पलक्षिता या घरा तस्या धरः तस्मिन् , शिखरैः रजिता. किन्नरदेवा यस्मिन् तस्मिन् , वनभुवा, कान्तारभूम्या हतधिया दशीभूता नरदेवा यस्मिन् तस्मिन् । ६. निष्पापे । ७. जिनेशी चासौ विकामश्च तस्मात् । ८. मर्कटेन रहित । ९. सिहः । १०. विष्णुना । १२. इन्द्रः ।

पञ्चपञ्चाशः सर्गः इह जही 'वसुधाशिविकासनं पुरुतपोऽधि सुधाशिविकासनम् । नमिसमः स 'शिलातलमाययावपगमामिलातलमायया ॥१८॥ नजमिनोऽथ सवनमलाकृतीरपगमय्य सबस्त्रमलङ्कृती। प्रविलमत्कमलामनधारतः प्रियवधूकमलामनधीरतः ॥१९॥ 'मृदुकरागुलिमीर चिरामितान् घनकचानतिमोरुचिरासिवान् । व्युदहरदृढपञ्चपरिग्रहः स रहितः मकृपं च परिप्रहः ॥१२०॥ 'नृपमहस्रममा नमिना तपः श्रितमिवैनममानमिनातपः । तपति नातपवारणवारितः अपनदातपवारणवारितः ॥१२॥ निकचितां कचसम्पदमारमना प्रकुटिलांगतकोपदमात्मना । ध्यपनयमिव शल्यपरम्परां नृपगणः श्रियमैन् स्वपरम्पराम् ॥१२२॥ सम्मति पाकर वह पालकी रख दी ॥११६-११७। उस उपवनमें पहुँचकर भगवान्ने विशाल तप धारण करनेके उद्देश्यसे देवोंको हर्पित करनेवाले पृथ्वीपर विद्यमान पालकी रूपी आसनको छोड़ दिया और स्वयं पृथ्वीतलकी मायाका परित्याग करनेके लिए नमिनाथ भगवान्के समान शिलातलपर जा पहुँचे ।।११८॥ तदनन्तर जो अतिशय बुद्धिमान थे, जिनकी पद्मासन और धीरता अत्यन्त शोभायमान थी तथा जो प्रियसी, एवं राज्यलक्ष्मीके त्यागको बुद्धिमें रत-लीन थे ऐसे भगवान् नेमिनाथने परदाके अन्दर माला, पख और सब अलंकार उतारकर परिप्रहसे रहित तथा दयासे युक्त होकर कोमल अगलियोंसे युक्त सुदृढ़ पञ्चमुट्ठियोंसे उन सघन केशोंको तत्काल उखाड़कर फेंक दिया जो अत्यन्त सुन्दर और काले थे एवं अतिशय भीक मनुष्य ही अपने शरीरमें जिनका चिरकाल तक स्थान बनाये रखते हैं ।।११९-२२०।। भगवान नेमिनाथने जिस तपको धारण किया था उमी तपको एक हजार राजाओंने भी भगवान् नमिनाथके साथ धारण किया था उस समय मानरहित भगवानको सूर्यका आताप मन्तप्त नहीं कर सका था क्योंकि इन्द्रके द्वारा लगाये हुए छत्रसे यह रुक गया था अथवा छत्ररूपी जल यहाँ पड़ रहा था उसके प्रभावसे सूर्यजन्य आताप उन्हें दुस्खी करने में समर्थ नहीं हो सका था ।।१२१।। उस समय क्रोधरहित इन्द्रिय-दमनसे युक्त अपने आपके द्वारा शिरपर बद्ध कुटिल केशोंको उखाड़ता हुआ राजाओंका ममूह ऐसा मुशोभित हो रहा था मानो चिरकालसे साथ लगी हुई कुटिल शल्योंकी परम्पराको ही उखाड़कर फेंक १. यमुधाया विद्यमानं यन् शिविकारून श्रासनं तत् । २. विशालतरःसग्मुखम् । ३. देवहर्षकम् । ४.शिलातलम् अाययौ इति पदच्छेदः । ५. लातले या माया तया सह । ६. समितीय म०1७. अप अनम् प्रत्यय कती पण्डित सहन. स्वामी, सरस्त्रं यथा स्याचथा यस्त्रस्य नेपथ्यमध्ये इत्यर्थः । मज यस् अलंकृतो. असागंध अपगमय त्यस्त्या कथंमतः इनः । कमलामनं च धीरता च इति कमजामनधोरठे प्रपिलमन्त्यो कमगमनधारते यस्य स , प्रिपाधूध कण्ला च सदमीभ तयो , असनस्य त्यागस्य धिया रत. तर. 1 ८. मृदय पराहत्या पे ते , दसञ्चारिप्रो हपञ्चमुष्टिमि । ६. चिरा मनोहणः असिता कृष्णारच ये तान् । १०. अनि मोतु दिरं आमिर्म स्थान देणे तान् , पनरचान् सान्द्रकेशान्। ११. नमिनापेन व अनेन नेमिनायेन भमा मा मृण्महम तरः भितम् । अमानं मानरहित एनम् विनम् इनातरः मूसंयम. न तरति स्म । आनए. वारऐन छोए यारिन मन् । १२. भावर-यारणं च तद् यारि च इत्लानरवारपयारि प्रतच्च तत् प्रातर. पारपगारि र सम्मान। १३. गत कोसो पम्मिन् एवंभूनी यो दमः इन्द्रियवीधरः स आत्मा स्वम् यस्य तेन, एयभूतेन भात्मना रातारमरामिव, निपचिता निसा कुटिलां यर्ग कचममद पपनयन् दूरीन् , नृरगण: सराप भियं पेट पारन् । 4 हरिवंशपुराणे मणिगणांशुलसत्पटलीकृतान् 'जिनकचाकुलिशी पटलीकृतान् । भकृत दुग्धमये स महोदधौ वपुरलं समये समहो दधौ ॥१३॥ "समवतारमिनोझिकृपावनं स्वकृत बसमयस्य सुपादनम् । सपदि यत्र तदन यथाश्रुतं जगति तीर्थमभूश्च यथाश्रुतम् ॥२४॥ यतिषु 'वोधचतुष्कविराजितस्निदशकोटिमहाकविराजितः । विधुरिवोपगतग्रहतारकः प्रभुरमादपरिग्रहतारकः ॥२५॥ नमसि शुक्लतुरीयतया तियो क्रमभृतीशिनि षष्ठतयातियो । विहितनिष्क्रमणे नृसुराऽमुराः सुविदधर्महमेषु सुरासुराः ॥१२६॥ मदनमकृतप्रमवे मवे भवभृतां शरणाय हितहिते। हतरुपे वितृषे मुनये नये स्थितवते नम इत्यसुराः सुराः ॥१२७॥ स्तवनपूर्वममी च समन्ततः प्रणतिमेत्य नृपात्र समं ततः । "स्वहृदयस्थतपःस्थितनेमयः स्वपदमीयुररिस्थितनेमयः ॥२८॥ रहा हो ॥१२२॥ इन्द्रने भगवान्के केशोंको इकट्ठाकर मणिसमूहको किरणोंसे सुशोभित पिटारेमें रखकर उन्हें क्षीरसागरमें क्षेप दिया। उस समय भगवान् अतिशय तेजसे युक्त शरीर धारण कर रहे थे ।।१२३।। भगवान् नेमिनाथने जिस स्थानपर जीवदयाकी रक्षा करने- वाला, एवं अत्यन्त पवित्र, वस्त्ररूप परिग्रहका त्याग किया था वह शीघ्र हो संसारमें शास्त्र- सम्मत प्रसिद्ध तीर्थस्थान बन गया ॥१२४|| उस समय चार ज्ञानसे सुशोभित, करोड़ों देव- रूपी महाकवियोंसे विभूपित और परिमहरहित मनुष्योंको संसारसे तारनेवाले भगवान् अनेक मुनियोंके बीच, प्रहों और ताराओंके मध्यमें स्थित चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे ।।१२५।। अतिथि भगवान्ने सावन सुदी चौथके दिन घेलाका नियम लेकर दीक्षा धारण की थी इसलिए उसदिन अनेक उत्तम वस्तुओंका त्याग करनेवाला मनुष्य देव तथा असुरोंने दीक्षा कल्याणकका उत्सव किया था ॥१२६।। तदनन्तर सुर और असुर भगवानकी इस प्रकार स्तुति करने लगे-हे भगवन् ! आप फामदेवका पराजय करने में समर्थ हैं, हितकारी चेष्टाओंसे युक्त संसारी प्राणियोंके शरणभूत हैं-रक्षक हैं, कोषसे रहित हैं, तृष्णासे रहित हैं, उत्तम नयमें स्थित हैं-नयका पालन करनेवाले हैं और मुनि हैं मनन-शील हैं अतः आपको नमस्कार हो। इस प्रकार साथ-साथ स्तुतिकर तथा सब ओरसे नमस्कारफर अपने हदयोंमें तपस्वी नेमिनाथ भगवानको धारण करनेवाले एवं चक्र में स्थित नेमि-चक्रधाराके समान प्रवर्तक राजा तथा सुर-असुर अपने-अपने स्थानपर घले गये ।।१२७-१२८॥ १. जिनकचा म.। २. इन्द्रः। ३. पुजीततान् । ४. इन्द्रः । ५. दुग्धमये महोदधौ वीरसागरे । ६. तस्मिन् समये मिना, मन्मत्यन्तं समाः तेजोयुनं वपुः दधौ। ७. स इनः भगवान् अङ्गिकपायनं अनि पापा तस्या अरनं रक्षक मुपावनं अतिशयपाविश्यकारणम् , यस्त्रमयस्य यस्त्रादिपरिपस्य, समवतार त्या सपदि, पत्र सात मुष्ठ अकृत कृतवान् , पाभूत शास्त्रानुसारं वीर्षमभूत्। ८. मविपु म । ६.अपरि. प्रहाणा तारमः भपरिप्रातारकः । १.. भाषणे मासे प्रतिपदादिक्रमपशुस्लपदस्य चतुर्या विथो, भतियो निनि नेमिनाये पठनया दिनायोरपासेन, विदितनिदीपमये तदाप्रपये सति सुरागुराः महम् उत्सर्व मुविधु, मुगम योभनद्रम्पेतु, : रान्तीति सः दातारः । ११. सहदपस्थः पस्थितो नेमिः नेमिनिनेन्द्रः पाते। १२. भरि चक्रं तस्मिन् विषये रिपतनेमय स्थितप्रधागः इस्पतः एवंभूनाः गृपाः स्वपदम् ईयु.।

पचपचाशः सर्गः ११ पुरि वितीयं नु तय जिनाय ताः सुपरमाग्नमयावृजिनाय ताः । प्रवरदत्त इतो महिमा हिताः सुरगणेः सुमहामहिमाहिताः ॥१२९॥ पथि तपस्यति तय कृते हित नृपसुता मनसि अपितेहिते। न्यभूत तापमपारवियोगिनी कुमुदिनीव दिवारवियोगिनो ॥१३०॥ प्रबलशोकवशा प्रविलापिनी शिथिलमूपणशकलापिनी। परिजनेन वृता प्ररदोद सा करणशब्दतता व्युरुरोदमा ॥१३॥ विधिमुपालमते परहारिणं वरवधूवरमप्यति हारिणम् । जघनपीनपयोधरहारिणी नयनवारिकणाविलहारिणी ॥१३२॥ शमितशोकमरा वचनहितगुरुजनस्य तपोवचनहि त । मतिमधत्त तपस्यनपायिनि प्रशमसौख्यतपस्यनपायिनि ॥१३॥ शालिनी-छन्दः 'राजीमस्याश्चारुराजीवलक्ष्मी-राजीमत्याः पाणिपादस्य कास्या । तापस्यान्तं ज्ञातयोऽवस्य वृत्तं तापस्यान्तं मानसस्यापुरन्ते ॥१३४॥ स्त्रीणामाचं पारतव्यं "विदुःखं दौलभ्येऽभूमंत्री विदुः खम् ॥ तदनन्तर जब पापरहित भगवान् आहार लेनेके लिए द्वारिकापुरीमें आये तब उत्तम तेजके धारक प्रवरदत्तने उन्हें उत्तम खीरका आहार देकर देवसमूहके द्वारा महिमासे युक्त, हितकारी अद्भुत महिमा-प्रतिष्ठा प्राप्त की ।।१२९।। जब भगवान् नेमिनाथ किये हुए उस हितकारी मार्ग में तपस्या करने लगे तय अपार वियोगसे युक्त राजपुत्री राजीमती अपने लग्जापूर्ण चेष्टासे युक्त मनमें दिनके समय सूर्यके संयोगसे सहित कुमुदिनीके समान सन्तापको धारण करने लगो।।१३०॥ राजीमती, प्रबल शोकके वशीभूत थी, निरन्तर विलाप करती रहती थी, उसके आभूपण और केशोंका समूह शिथिल हो गया था तथा यह करण शब्दोंसे आकाश और पृथ्वाक विशाल अन्तरालको व्याप्त करनेवाले परिजनोंसे घिरकर अत्यधिक रोती रहती थी ।।१३१|| नितम्ब और स्थूल स्तनांसे मुन्दर तथा अश्रुकणांसे व्याप्त हारको धारण करनेवाली यह राजीमती कभी तो घरको हरनेवाले अपने दुर्दैवको उलाहना देती थी और कमी अत्यन्त मनोहर वरको दोप देती थी॥१३२।। तदनन्तर तप धारण करनेकी प्रेरणा देनेवाले गुरुजनोंके उन हितकारी वचनोंसे जब उसके झोकका भार शान्त हो गया तब उसने अपाय-बाधास रहित, शान्तिरूप सुखके दायक, एवं दुर्भाग्यको दूर करनेवाले तपमें बुद्धि लगायो-तप धारण करनेका विचार किया ॥१३३॥ हाथों और पॉयोंकी कान्तिसे मुन्दर कमल सम्बन्धी शोभा समूहको धारण करनेवाली राजीमतीने जो वृत्त-चारित्र धारण किया है यह दसके नाप-दुःखको अन्त करनेवाला हे ऐमा जानकर अन्तमें उसके कुटुम्बीजन मान- सिक सन्नापके अन्तको प्राप्त हुए ॥१३४|| गौतम स्वामी कहते हैं कि ये स्त्रियाँ नाना दु:म्य १.आजिनाय पापरहिताय ता इति मदिमाशब्दस्य विशेषणम् अत्र आकारान्तमहिमाशन्दः प्रयुक्तः । २. करणयन्देन तने प्रनिरायेन म्याने अतीर उरू रोदसी दाबाममी येन स तेन, परिजनेन । ३. घर परतीति पाहारी विधिम् इत्यस्य विशेषणम् । ४. अतिमनोहरम् । ५. नितम्बरप्लकुचमनोहरा । ६. नयनवारिक). मारिनो मलिनी दागे विद्यते यस्या सा। ७. तपसि विषये पचनं मएनं देशोते, तर प्रेरणादायिभिः 15R निश्चयेन ते. प्रमि... स्थायिनि । १०. भटः अयो मायं परायः, न पियायो पस्मिन् वस्मिन् । ११. पाररानीरस मुन्दरसोरहस्य समोपनीयोमारइतिः पिते पस्या. तस्याः । १२. सारया । १३.विविध दुर्मसिसम् । १४. मनुरटेक., मन थियः मनुः दौलम्ये सति मन स्वकीयं शरीर शन्य म्पमिति पारन वितुः बानन्ति । .

हरिवंशपुराणे सापल्यं वा पुष्पवत्वं च धान्ध्यं वैधव्ये वा सूतिरोगेऽपि वान्भ्यम् ॥१३५|| दौर्भाग्ये वा माग्यहीने स्वनाथे स्त्रीगर्भवे मत्रपत्ये "स्वनाथे । गर्मचावे गर्ममारे वियोगे जीवगा मर्मरोगामियोगे ॥१३६॥ स्यान्मिथ्यात्वं स्त्रीत्वहेतुः स्वतन्त्र वस्त्रस्येवातानतिर्यक् स्वतन्त्रम् । स्त्रोदुःखानामन्तकृगव्यसत्यैजैनी दृष्टि सेव्यता सेव्यसवैः ॥ १३७॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती भगवनिष्क्रमणकल्याण- वर्णनो नाम पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥५५॥ उठाती हैं। सबसे पहिले तो इन्हें परतन्त्रताका विशिष्ट दुःख है, फिर पतिके दुर्लभ होनेपर शरीरको शून्य-व्यर्थ समझती हैं। फिर सपत्नोके होनेका ऋतुमती होनेका, बन्ध्या होनेका विधवा होनेका, प्रसूतिकालमें रोग हो जानेका, अन्धा होनेका, दर्भािग्य होनेका, भाग्यहीन पतिके मिलनेका, लड़की-लड़की ही, गर्भ में आनेका बार-बार मृत सन्तानके होनेका, बिलकुल अनाथ हो जानेका, गर्भ गिर जानेका, गर्भका भार धारण करनेका, पतिके जीवित रहते हुए भी उसके साथ वियोग होनेका, अथवा किसी मर्मान्तक रोगके हो जानेका दुःख सहन करती है ॥१३५-१३६।। जिस प्रकार आतान वितानभूत तन्तु वस्त्रके स्वतन्त्र कारण हैं, उसी प्रकार मिथ्यादर्शन खीपर्यायका स्वतन्त्र कारण है, इसलिए सेवनीय शक्तिके धारक भव्य जीयोंको स्त्री-सम्बन्धी दुःखोंका अन्त करनेवाले सम्यग्दर्शनकी सेवा करनी चाहिए ॥१३७।। . इस प्रकार परिएनेमिपुराएके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्यरचित हरिवंशपुराण में भगवान के दीक्षा-कल्याणका वर्णन करनेवाला पचपनयाँ सर्ग समाप्त हुभा ॥५५॥ । यध्यायाः भावो पापम् । २ वा अथवा अन्याया माव अाध्यम् । ३. सभरि । ४. म मर• पणीजम् भात्यं तस्मिन् । ५. मुठ मनाय. तस्मिन् सनाये सति । ६. भीरमासौ भतां च भोग्नता तेन । पप यया आतानभूताः नियंग्भूताभ ये टन्तरः ते स्वतन्त्र पारणं भान्ति तथा मिप्यावं स्त्रीत्वस्य स्वतन्य चरणमम्नीत्यर्थः।

षट्पञ्चाशः सर्गः । अथ नेमिमुनीन्द्रोऽपि रत्नत्रयतपःश्रिया । व्रतगुप्तिसमित्युच्चै रेजे सोढपरीपहः ॥३॥ अप्रशस्तमपोह्यासावतं रौद्रं च शुक्लधीः । ध्यानं धम्यं च शुक्लं च प्रशस्तं ध्यानुमुधतः ॥२॥ ध्यानमेकाग्रचिन्ताया घनसंहननस्य हि । निरोधोऽन्तर्मुहूतं स्याचिन्ता स्यादस्थिरं मनः ॥३॥ तत्रातिरदन वाधा ह्यात तत्रभवं पुनः । मुकृष्णनीलकापोतलेश्यावलसमुद्भवम् ॥४॥ लक्षणं द्विविधं तस्य वाह्यमाक्रन्दनादिकम् । परनोविस्मयप्रापं विषयासंजनादिकम् ॥५॥ तदात्मनः स्यं वेद्यं परेपामानुमानिकम् । अभ्यन्तरं चतुर्मेदं स्वलक्षणसमन्वितम् ॥६॥ विपयस्यामनोज्ञस्य यदनुत्पत्तिचिन्तनम् । उत्पन्नस्य वियोगाय संकल्पाध्यवसायकम् ॥७॥ मनोशविप्रयोगस्य यच्चानुन्पत्तिचिन्तनम् । उत्पमस्यान्तचिन्ता च चानुर्विध्यमितीरितम् ॥८॥ तनामनोज्ञदुःसस्य साधनं चेतनादिकम् । मर्यादि विषशस्त्रादि बाह्यमेतदुदीरितम् ॥९॥ आध्यात्मिकं तु चातादिप्रकोपजमनेकधा । कुझ्याक्षिदन्तशूलादिशारीरमतिदुस्महम् ॥१०॥ शोकारतिमयोद्वेगविपादविपदूपितम् । जुगुप्सादौमनस्यादि मानसं दुःखमाधनम् ॥११॥ सर्वस्यास्यामनोज्ञस्य माभूदुत्पत्तिरित्यलम् । चिन्ताप्रबन्ध आचं स्यादातध्यान मलाविलम् ॥१२॥ अथानन्तर-बत गुप्ति और समितियोंसे उत्कृष्टताको प्राप्त एवं परीपहोंको सहन करने- वाले मुनिराज नेमिनाथ रत्नत्रय और तपरूपो लक्ष्मोसे सुशोभिन होने लगे ॥१॥ उज्ज्वल बुद्धिके धारक भगवान, आर्त और रौद्र नामक अप्रशस्त ध्यानको छोड़कर धर्म्यध्यान और शुक्लध्यान नामक प्रशस्त ध्यानोंका ध्यान करनेके लिए उद्यत हुए ॥२॥ उत्तमसंहननके धारक पुरुपको चिन्ताका किसी एक पदार्थमें अन्तर्मुहूर्त के लिए रुक जाना सो ध्यान है और चिन्ताका अर्थ चम्चल मन है ॥३॥ पीडाको आर्ति कहते हैं । आर्तिके समय जो ध्यान होता है उसे आतध्यान कहते हैं। यह आर्तध्यान अत्यन्त कृष्ण, नील और कापोत लेश्याके बलसे उत्पन्न होता है ।। ४॥ वाह्य और आभ्यन्तरके भेदसे आर्तध्यान दो प्रकार- का है। उनमें रोना आदि तथा दूसरेकी लक्ष्मी देख कर आश्चर्य करना और विषयोंमें आसक्त होना आदि बाह्य आर्तध्यान है ॥५॥ अपने-आपका आनध्यान स्वसंवेदनसे जाना जाता है और दूसरोंका अनुमानसे | आभ्यन्तर आतध्यानके चार भेद हैं जो नीचे लिसे अनुसार अपने-अपने लमणोंसे सहित हैं ॥६॥ अभीष्ट यस्तुको उत्पत्ति न हो ऐसा चिन्तयन करना सो पहला आर्तध्यान है । यदि अनिष्ट वस्तु उत्पन्न हो चुकी है तो उसके वियोगका यार-बार चिन्तयन करना दूसरा आर्तध्यान है । इष्ट विषयका कभी वियोग न हो ऐसा चिन्तवन करना सो नीमरा आर्तध्यान है और इष्ट विपयका यदि वियोग हो गया है तो उसके अन्तका विचार करना यह चौथा आर्तध्यान है ।।७-८॥ अमनोज्ञ दुःसके पास साधन चेतन और अचेतनके भेदसे दो प्रकारके हैं। उनमें मनुप्य आदि तो चेतन साधन है और विपशास्त्र आदि अचनन साधन हैं ॥९॥ अन्तरङ्ग माधन भी शारीरिक और मानसिफके भेदसे दो प्रकारका है। यात आदिके प्रकोपसे उत्पन्न उदरशूल, नेत्र-मूल, दन्त- शूल आदि नाना प्रकारको दुःसह बीमारियाँ शारीरिक माधन है ॥ १० ॥ और शोक, अरनि, भय, उग, विपाद आदि विपसे दूपित जो जुगुप्मा तथा दीर्मनस्य-बेचैनी आदि विकार + हैं ये मानसिक दुःखके साधन हैं ॥ ११ ।। 'सभी प्रकारके अमनोश- अनिष्ट विपयोंकी उत्पत्ति नहीं हो इस प्रकार बार-बार चिन्ता करना सो पहला मलिन आर्तध्यान है ॥१२॥ १. रोद्रपम० । २. 'उत्तम हननस्पैदाग्रनिन्दानिरोप प्यानमान्तमहतांत्' -त.सु... विस्म प्राच म. मियाय ६० 1 ४. स्वानुत्तचि म• । ५. तधामनोकस्य दुसरय म ।

हरिवंशपुराणे उत्पमस्यास्य धामावः कथं में स्यादितीदृशम् । संकल्पाध्यवसानं तु द्वितीयं तत्प्रकीर्तितम् ॥१३॥ पशुपुत्रकलत्रादि मनोज्ञ सुखसाधनम् । यासं स्याद्धनधान्यादि सधेतनमवेतनम् ॥१४॥ आध्यात्मिकं च पित्तादि साम्यादारोग्यमाझिकम् । मानसं सौमनस्यादि रत्यशोकामयादिकम् ॥१५॥ विप्रयोगश्च मे माभूहिकामुत्रकस्य तु । मनोज्ञस्यति संकल्पस्तृतीयं चामुग्यते ॥१६॥ मनोज्ञविप्रयोगस्य पूर्वोत्पमस्य यत्पुनः । अमावेऽज्यवसानं तु नुमा मनोज्ञजम् ॥१७॥ अधिष्टानं प्रमादोऽस्य तिर्यगतिफलस्य हि । परोक्षं मिश्रको मायः पद्गुणस्थानभूमिकम् ॥१८॥ रुद्रः रामयः प्राणी रौद्रं तत्रभवं ततः । हिंसासंरक्षणस्तेयमृपानन्दैश्चतुर्विधम् ॥१९॥ थानन्दोऽमिरुचियप हिंसादिषु यथायथम् । हिंसानन्दादयस्तेऽनो निरुच्यन्ते समासतः ॥२०॥ लक्षणं द्विविधं तत्र पारुप्याक्रोशनादिकम् । स्वसंवेद्यं परमेयं वासमाध्यात्मिकं पुनः ॥२१॥ स्यारसंरम्मसमारम्भारम्मलक्षणमात्मना । हिंसायो रजनं तोयं हिंसानन्दं तु नन्दितम् ॥२२॥ श्रद्धेयं परलोकस्य स्वविकल्पितयुक्तिमिः । विप्रलम्मनसङ्कल्पो मृषानन्दं सुनन्दितम् ॥२३॥ प्रतीक्षया प्रमादस्य परस्वहरणं प्रति । प्रसह्य हरणं ध्यानं स्तेयानन्दमुदीरितम् ॥२४॥ स्वपरिग्रह दे तु चेतनाचेतनात्मनि । संरक्षणाभिधानं तु स्वस्वामित्वामिचिन्तनम् ॥१५॥ यदि किसी प्रकारके अमनोज्ञ-अनिष्ट विषयको उत्पत्ति हो गयी है तो उसका अभाव किस प्रकार होगा ? इसी बातका निरन्तर संकल्प करना दूसरा आर्तध्यान कहा गया है ॥ १३ ॥ मनोज्ञ सुखके वाह्य साधन चेतन-अचेतनके भेदसे दो प्रकारके हैं। उनमें पशु, खी, पुत्र आदि सचेतन साधन हैं और धन-धान्यादि अचेतन साधन हैं ॥ १४॥ आभ्यन्तर साधन भी शारीरिक और मानसिकके भेदसे दो प्रकारके हैं। इनमें पित्त आदिको समतासे जो आरोग्य अवस्था है वह शारीरिक साधन है और रति, अशोक, अभय आदिसे उत्पन्न जो सौमनस्य आदि है वह मानसिक साधन है ।। १५॥ मुझे इस लोक-सम्बन्धो और परलोक- सम्बन्धी इष्ट विषयका वियोग न हो ऐसा संकल्प करना तीसरा आर्तध्यान कहलाता है ।।१६।। और पहले उत्पन्न इष्ट विषयके वियोगके अभावका संकल्प करना बार-बार चिन्तवन करना चौथा आर्तध्यान है ।। १७ । इस आर्तध्यानका आधार, प्रमाद है, फल तिर्यब्च गति है। यह परोक्ष क्षायोपरामिक भाव है और पहलेसे लेकर छठवें गुणस्थान तक पाया जाता है ॥१८॥ क्रूर अभिप्रायवाले जीवको रुद्र कहते है। उसके जो ध्यान होता है यह रौद्रध्यान कहलाता है । यह हिंसानन्द, चौर्यानन्द, मृषानन्द और परिग्रहानन्दके भेदसे चार प्रकारका है ॥ १९ ॥ जिनको हिंसा आदिमें आनन्द अर्थात् अभिरुचि होती है वे संक्षेपसे हिंसा- नन्द आदि कहे जाते हैं ।।२०॥ वाह्य और आभ्यन्तरके भेदसे रौद्रध्यानके दो भेद हैं। उनमें क्रूर व्यवहार करना तथा गाली आदि अशिष्ट वचन बकना, बाह्य रौद्रध्यान है। अपने आपमें पाया जानेवाला रौद्रध्यान स्वसंवेदनसे जाना जाता है- स्वयं ही अनुभवमें आ जाता है और दूसरेमें पाया जानेवाला रौद्रध्यान अनुमानसे जाना जाता है । हिंसा आदि कार्यों में जो संरम्भ, समारम्भ और आरम्भ रूपी प्रवृत्ति है यह आभ्यन्तर आतध्यान है। इसके हिंसानन्द आदि चार भेद हैं जिनके लक्षण इस प्रकार हैं। हिंसामें तोत्र आनन्द मानना सो हिंसानन्द नामक पहला रौद्रध्यान है ॥२१-२२ ॥ श्रद्धान करने योग्य पदार्थों के विषय में अपनी कल्पितरमा गोको गनेका मंगला काना मानन्द नामका दूसरा रौद्र आर्त्त- ध्यान है ।। २३ अभिप्राय रखना सो स्तेया- नन्द नामका तिन, अचेतन दोनों प्रकारके परिप्रहकी रक्षाका निरन्तर अभिप्राय रखना तथा मैं इसका स्वामी हूँ और यह मेरा स्व है इस १. परोमिश्रको भाव. क० । २. सविकल्पित मः।

पट्पञ्चाशः सर्गः सुकृष्णनीलकापोतबलाधानं प्रमादगम् । अधःपञ्चगुणस्थानं रौद्रध्यानचतुष्टयम् ॥२६॥ अन्तमुहूर्तकालं तु दुर्धरत्वादतः परम् । क्षयोपशमभावस्तु परोक्षज्ञानमावत: ॥२७॥ मावलेश्याकपायस्वातन्त्र्यादौदयिकोऽपि वा । उत्तरं फलमैतस्य नारको गतिरुच्यते ॥२८॥ परिहत्यार्तौदे दे पापध्याने मुमुक्षवः । धय॑शुक्लधियः सन्तु शुद्धमिक्षादिमिक्षवः ॥२९॥ एकान्तं प्रासुकं क्षेत्रं क्षुद्रोपद्रववर्जितम् । दिन्यं संहननं द्रव्यं कालोऽत्युष्णादिवर्जितः ॥३०॥ मावशुद्धिरपि श्रेष्ठा यदा भवति योगिनः । आरभेत तदा ध्यानं सर्वद्वन्दसहः स हि ॥३१॥ गम्भीरः स्तम्भमूर्तिः सन् पर्यशासनवन्धनः । नात्युन्मीलनिमीलश्च दत्तदन्तापदन्तकः ॥३२॥ निवृत्तकरणप्रामन्यापारः श्रुतपारगः । मन्दं मन्दं प्रवृत्तान्तः प्राणापानादिसञ्चरः ॥३३॥ नाभेरुद्ध्वं मनोवृत्ति मूर्ति वा हृदि वालिके । मुमुक्षुः प्रणिधायाक्षं ध्यायेद्ध्यानद्वयं हितम् ॥३४॥ बाह्यात्मिकमावानां याथारम्य धर्म उच्यते । तद्धर्मादनपेतं यद्धम्यं तद्ध्यानमुच्यते ॥३५॥ लक्षणं द्विविधं तस्य बाह्याध्यास्मिनभेदतः । सूत्रार्थमार्गणं शीलं गुणमालानुरागिता ॥३६॥ 'जम्माजम्माक्षुतोद्गारप्राणापानादिमन्दता । निभृताङ्गमतात्मत्वं तत्र बाह्यं प्रकीर्तितम् ॥३७॥ दशधाऽऽध्यात्मिकं धय॑मपायविचयादिकम् । अपायो रहो विचयो मीमांसास्तीति तत्तथा ॥३०॥ प्रकार बार-बार चिन्तवन करना सो परिग्रह संरक्षणानन्द नामका चौथा रौद्रमें चारों प्रकार- का ध्यान है ।। २५ ।। यह रौद्रध्यान तोत्र कृष्ण, गोल तथा कापोत लेश्याके वलसे होता है, प्रमादसे सम्बन्ध रखता है और नोचेके पॉच गुण स्थानोंमें होता है ॥ २६ ॥ इसका काल अन्तर्मुहूर्त है क्योंकि इससे अधिक एक पदार्थमें उपयोगका स्थिर होना दुर्धर है। यह परोक्ष ज्ञानसे होता है अतः श्योपशमभाव रूप है ॥ २७ ॥ भाषलेश्या और कपायके आधीन होता है इसलिए औदार्यकभाव रूप भी है। इस ध्यानका उत्तर फल नरकगति है ॥२८॥ जो पुरुष मोक्षाभिलाषी हैं वे आतरौद्र नामक दोनों अशुभ ध्यानोंको छोड़ शुद्ध भिक्षाको ग्रहण करनेवाले भिक्षु-मुनि होकर धर्मध्यान और शुक्लध्यानमें अपनी बुद्धि लगावें ॥ २२ ॥ जिस समय एकान्त, प्रासुक तथा क्षुद्र जीवोंके उपद्रवसे रहित क्षेत्र, दिव्य संहनन-आदिके तीन संहनन रूप द्रव्य, उष्णता आदिकी बाधासे रहित काल और निर्मल अभिप्राय रूप श्रेष्ठभाव, इस प्रकार क्षेत्रादि चतुष्टय रूप सामग्री मुनिको उपलब्ध होती है तब समस्त बाधाओंको सहन करनेवाला मुनि प्रशस्त ध्यानका आरम्भ करता है ॥३०-३१॥ ध्यान करनेवाला पुरुष, गम्भीर, निश्चल शरीर और सुखद पर्यङ्कासनसे युक्त होता है । उसके नेत्र न तो अत्यन्त सुले होते हैं और न वन्द हो रहते हैं ॥ ३२ ।। नीचेके दाँतोंके अग्रभागपर उसके ऊपरके दॉत स्थित वह इन्द्रियोंके समस्त व्यापारसे निवृत्त हो चुकता है, श्रुतका पारगामी होता है, धीरे-धीरे श्वासोच्छ्यासका सञ्चार करता है ॥३३॥ मोक्षका अभिलापी मनुष्य अपनी मनोवृत्तिको नाभिके ऊपर मस्तकपर, हृदयमें अथवा ललाटमें स्थिरकर आत्माको एकाप करता हुआ धर्म्यध्यान और शुक्लध्यान इन दो हितकारी ध्यानोंका चिन्तयन करता है ॥३४॥ वाह्य और आध्यात्मिक भावोंका जो यथार्थभाव है यह धर्म कहलाता है, उस धर्मसे जो सहित है उसे धर्म्यध्यान कहते हैं ॥३५॥ बाह्य और आभ्यन्तरके भेदसे धर्म्यध्यानका लक्षण दो प्रकार- फा है । शास्त्रके अर्थकी खोज करना, शीलवतका पालन करना, गुणोंके समूहमें अनुराग रखना, अंगड़ाई, जमुहाई, छींक, डकार और श्वासोच्छ्वासमें मन्दता होना, शरीरको निश्चल रखना तथा आत्माको व्रतोंसे युक्त करना, यह धर्म्यध्यानका बाह्य लक्षण हैं। और आभ्यन्तर लक्षण अपाय विचय आदिके भेदसे दस प्रकारका है। इनमें अपायका अर्थ त्याग है और १. ललाटे वा । वालके म०, प० । २. भंजाजम्मा म०, दिवोद्गार म०, खः । * १. अपाय विचय २. उपाय विचय, ३. जीव विचय ४. अजीव विचय ५. विपाक विचय ६. वैराग्य विचय ७ भव विचय ८. संस्थान विचय ९. आता विचय और १० हेतु विचय" हरिवंशपुराणे संसारहेतवः प्रायस्त्रियोगानां प्रवृत्तयः । अपायो वर्जन तासां स में स्यात्कयमित्यलम् ॥३९॥ चिन्ताप्रबन्धसम्बन्धः शुमलेश्यानुरञ्जितः । अपायविचयाख्यं तत्प्रथमं धर्नामीप्सितम् ॥४०॥ उपायविचयं तासां पुण्यानामारमसाक्रिया । उपायः स कथं में स्यादिति सङ्कल्पसन्ततिः ॥४१॥ अनादिनिधना जीवा द्रव्यार्थादन्यथान्यथा । असंख्येयप्रदेशास्ते स्वोपयोगत्वलक्षणाः ॥१२॥ अचेतनोपकरणाः स्वमनोचितभोगिनः । इत्यादिचेतनाध्यानं यजीवविचयं हि तत् ॥४३॥ दन्याणामध्यजीवानां धर्माधर्मादिसंझिनाम् । स्वमावचिन्तनं धर्नामजीवविचयं मतम् ॥४४॥ यञ्चतुधिबन्धस्य कर्मणोऽरविधस्य तु । विपाकचिन्तनं धम्यं विपाकत्रिचयं विदुः ॥४५॥ दारीरमशुचिर्मोगा किंपाकफलपाकिनः । विरागबुद्धिरित्यादि विरागविचयं स्मृतम् ॥४६॥ प्रेत्यमाधो भवोऽमीयां चतुर्गतिपु देहिनाम् । दुःखात्मेत्यादिचिन्ता तु मदादिविचयं पुनः ॥४७॥ सुप्रतिष्टितमाफाशमाकाशे वलयत्रयम् । संस्थानध्यानमित्यादि संस्थानविचयं स्थितम् ॥४८॥ अतीन्द्रियपु भावेषु बन्धमोक्षादिपु स्फुटम् । जिनाज्ञानिश्चयध्यानमाज्ञाविचयमीरितम् ॥१९॥ तर्कानुसारिणः पुंसः स्याद्वादप्रक्रियाश्रयात् । सन्मार्गाश्रयणध्यानं यद्धतविचयं तु तत् ॥५०॥ अप्रमत्तगुणस्थानभूमिकं ह्यप्रमादजम् । पीतपद्मल सल्लेश्यावलाधानमिहाखिलम् ॥५१॥ मीमांसाका अर्थ विचार है ॥ ३६-३८ ॥ मन, वचन और काय इन तीन योगोंकी प्रवृत्ति ही प्रायः संसारका कारण है सो इन प्रवृत्तियोंका मेरे अपाय-त्याग किस प्रकार हो सकता है ? इस प्रकार शुभ लेश्यासे अनुरञ्जित जो चिन्ताका प्रवन्ध है वह अपाय विचय नामका प्रथम धर्म्यध्यान माना गया है ।।३९-४॥ पुण्यरूप योग प्रवृत्तियोंको अपने आधीन करना उपाय कहलाता है । यह उपाय मेरे किस प्रकार हो सकता है इस प्रकारके संकल्पांकी जो सन्तति है वह उपाय विचय नामका दूसरा धर्म्यध्यान है ॥४१॥ द्रव्यार्थिक नयसे जीव अनादि निधन हैं-आदि अन्तसे रहित हैं और पर्यायार्थिक नयसे सादि सनिधन हैं। असंख्यान प्रदेशी हैं, अपने उपयोगरूप लक्षणसे सहित हैं, शरीररूप अचेतन उपकरणसे युक्त हैं और अपने द्वारा किये हुए कर्मके फलको भोगते हैं। इत्यादि रूपसे जीवका जो ध्यान करना है यह जीव विचय नामका तीसरा धर्म्यध्यान है ॥४२-४३॥ धर्म-अधर्म आदि अजीव द्रव्योंके स्वभावका चिन्तन करना यह अजीय विचय नामका चौथा धर्माध्यान है ॥४४॥ ज्ञानावरणादि आठ कर्मकि प्रकृति प्रदेश स्थिति और अनुभाग रूप चार प्रकारके बन्धोंके विपाक-फलका विचार करना सो विपाक विचय नामका पाँचवाँ धर्म्यध्यान है ॥४५॥ शरीर अपवित्र है और भोग किंपाक फल के समान तदात्व मनोहर हैं इसलिए इनसे विरक्त बुद्धिका होना ही श्रेयस्कर है."इत्यादि चिन्तन करना सो विराग विचय नामका छठयाँ धर्म्यध्यान है ॥४६।। चारों गतियों में भ्रमण करनेवाले इन जीवोंको मरनेके बाद जो पर्याय होती है उसे भय कहते हैं। यह भव दुःस रूप है । इस प्रकार चिन्तयन करना सो भव विचय नाममा सातवाँ धर्म्य- ध्यान है ॥४७॥ यह लोकाकाश अलोकाकाशमें स्थित है तथा चारों ओरसे तीन पातवलयांसे वेष्टित है इत्यादि लोक संस्थान-आकारका विचार करना सो मन्थान विचय नामका आठवॉ धर्म्यध्यान है॥४८|| जो इन्द्रियोंसे दिखायी नहीं देते ऐसे बन्ध मोक्ष आदि पदार्थोमें जिनेन्द्र भगवान की आज्ञाकै अनुमार निश्चयका ध्यान करना सो आज्ञा विचय नामका नौयाँ धर्म्यध्यान है और नर्कका अनुसरण करनेयाले पुरुप स्याद्वादको प्रक्रियाका आश्रय लेते हुए ममीचीन मार्गका आश्रय करते हैं उसे प्रहण करते हैं, इस प्रकार चिन्तयन करना मोहंतु विचय नामका दमयाँ धर्म्यध्यान है ॥१०॥ यह दस प्रकारका धय॑ध्यान अप्रमत्त गुणम्यानमें होता है, प्रमादफे अभायसे उत्पन्न होता है, पीन और पानायक शुभ लेश्याओंफे १. मरिधीगना मा। २. भाषारिविश्य म) ३. स्वनिठिन •०1४.रितरप्रस्य सस्लेश्या क.।

पटपञ्चाशः सर्गः ६३९ कालमावविकल्पस्थं धबध्यानं दशान्तरम् । स्वर्गापवर्गफलदं ध्यातव्यं ध्यानतत्परः ॥५२॥ शुक्लं शुचिवसम्बन्धाच्छौचं दोपाझपोढता । शुक्लं परमशुक्लं च प्रन्यकं ते द्विधा मतं ॥५३॥ सीचारविर्वाचारपृथक्त्वैश्यवितकंके । सूक्ष्मोच्छिन्नक्रियापूर्वप्रतिपानिनिवर्तकं ॥५४॥ लक्षणं द्विविधं वाह्य जम्माजम्माद्यपोहनम् । प्राणापानप्रचारस्या व्यक्त्युच्छिन्नाप्रवृप्यतः ॥५५॥ परपामनुमेयं स्यास्वसंवेद्यं यदात्मनः । आध्यात्मिकं तयोरेव लक्षणं प्रतिपाद्यते ॥५६॥ पृथग्मावः पृथक्त्वं हि नानास्वमभिधीयते । वितकों द्वादशानं तु श्रुतज्ञानमनाविलम् ॥५७॥ अर्थव्यञ्जनयोगानां वीचारः संक्रमः क्रमात् । ध्येयोऽर्थो व्यञ्जनं शब्दो योगो वागादिलक्षणः ॥१८॥ पृथक्त्वेन वितर्कस्य विचारोऽर्थादिषु क्रमात् । यस्मिन्नास्ति तथोक्तं तत्पथमं शुक्लमिप्यते ॥५९॥ तद्यथा पूर्वविद्ध्यायनविक्षिप्तमना मुनिः । व्याणुं चापि मागाणुमेकमालम्व्य संवृतः ॥६॥ अतीक्ष्णेनापि शस्त्रेण शनश्छिन्दन्निव दुमम् । मोहस्योपशमं कुर्वन् क्षयं वा बहुनिर्जरः ॥६१॥ वलसे होता है, काल और भावके विकल्पमें स्थित है तथा स्वर्ग और मोक्ष रूप फलको देने- वाला है । ध्यानमें तत्पर मनुष्योंको यह ध्यान अवश्य ही करना चाहिए। भावार्थ-यहाँ उत्कृष्टताकी अपेक्षा धर्म्यध्यानको सातवें अप्रमत्त-गुणस्थानमें बताया है परन्तु सामान्य रूपसे यह चतुर्थ गुणस्थानसे लेकर सातवें गुणस्थान तक होता है और स्वर्गका साक्षात् तथा मोक्षका परम्परासे कारण है ।। ५१-५२ ।। जो शुचित्व अर्थात् शौचके सम्बन्धसे होता है वह शुक्लध्यान कहलाता है। दोप आदिकका अभाव हो जाना शौच है। यह शुक्ल और परम शुक्लके भेदसे दो प्रकार है तथा शुक्ल और परम शुक्ल दोनोंके दो-दो भेद माने गये हैं ॥५३|| पृथक्त्व वितर्क वीचार और एकत्व वितर्क ये दो भेद शुक्लध्यानके हैं और सूक्ष्मक्रिया प्रतिपाति तथा व्युपरत क्रिया निवर्ति ये दो परम शुक्लध्यानके भेद हैं ॥५४॥ वाह्य और आध्यात्मिकके भेदसे शुक्लध्यानका लक्षण दो प्रकारका कहा गया है। इनमें श्वासोच्छ्यासके प्रचारकी अव्यक्त अथवा उच्छिन्नदशासे युक्त मनुष्यके जो अंगड़ाई और जमुहाई आदिका छूट जाना है वह बाह्य लक्षण है एवं अपने-आपको जिसका स्वसंवेदन होता है तथा दूसरेको जिसका अनुमान होता है वह आध्यात्मिक लक्षण है। आगे उन शुक्ल और परम शुक्ल ध्यानाका आध्यात्मिक लक्षण कहा जाता है ।।५५-५६॥ पृथग्भाव अथवा नानात्यको पृथक्य कहते हैं। निर्दोष द्वादशान-श्रुतज्ञान वितर्क कहलाता है। अर्थ, व्यञ्जन (शब्द) और योगोंका जो क्रमसे संक्रमण होता है उसे धीचार कहते हैं। जिस पदार्थका ध्यान किया जाता है वह अर्थ कहलाता है, उसके प्रतिपादक शब्दको व्यञ्जन कहते हैं और वचन आदि योग है ॥५७-५८। जिसमें वितर्क (द्वादशाह) के अर्थादिमें क्रमसे नानारूप परिवर्तन हो वह पृथक्त्व वितर्क धीचार नामका पहला शुक्लध्यान माना जाता है ॥५२॥ इसका स्पष्टीकरण यह है कि निश्चल चित्रका धारक कोई पूर्वविद् मुनि द्रव्याणु अथवा भावाणुका अवलम्बन कर ध्यान कर रहा है सो जिस प्रकार कोई अतीक्ष्ण-मोथले शस्त्रसे किसी वृक्षको धीरे- धीरे काटता है उसी प्रकार यह विशुद्धताका वेग कम होनेसे मोहनीय कर्मके उपशम अथवा । , . १. जाभारतम्मा-मः। २. स्या व्युत्पन्नाप्रहष्यतः म०। ३. प्रतिपद्यते म०।४ स्तिक भ्रनम्' त. सू० अ०६५ ५. 'वीचारोऽयम्यअनयोगमशान्ति' त० सू० अ०६। ६. तर द्रव्यं परमाणु वा घ्यापन्ना- हितवितर्वसामयादर्थव्यञ्जने कायाचसी च पृथक्त्वेन रानामता मनसापांमयालोत्माहयाव्यरस्थिनेनापि शस्त्रेय चिरात छिन्दनिय मोहमतीपशमयन् दायश्च पृथक्त्ववितकंचीचारध्यानमाग मयति ।-स. सि.प्र.६।

हरिवंशपुराणे द्रव्याद्रव्यान्तरं याति पर्यायं चान्यपर्ययात् । व्यञ्जनाद् व्यञ्जनं योगायोगान्तरमुपैति यत् ॥६२॥ शुक्लं तत्प्रथमं शुक्लतरलेश्याबलाश्रयम् । श्रेणीद्वयगुणस्थानं क्षयोपशमभावकम् ॥६३॥ सर्वपूर्वधरस्येदमन्तौतिकस्थिति । श्रेणीद्वयवशाद्वयं स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ॥६॥ एकत्वेन वितर्कोऽस्ति यस्मिन्बीचारवर्जिते । तदेकत्ववितर्कावीचारं शुक्लं तदुत्तरम् ॥६५।। एकमेवाणुपर्याय 'विषयीकृत्य वर्तते । मोहादियातिघातीदं पूर्विणः स कृती ततः ॥६६॥ ज्ञानदर्शनसम्यक्त्ववीर्यचारित्रपूर्वकैः । भासते क्षायिकमविस्तीर्थकृतान्यकेवली ॥१७॥ सोऽर्चनीयोऽभिगम्यश्च त्रिभुवां परमेश्वरः । देशोनां विरहत्येकां पूर्वकोटी प्रकर्पतः ॥६८॥ अन्तर्मुहूर्तशेषायुः स यदा मवतीश्वरः । तत्तुल्यस्थितिवेद्यादित्रितयश्च तदा पुनः ॥६९॥ समस्तं वाइमनोयोगं काययोगं च वादरम् । प्रहाप्यालम्ब्य सूक्ष्मं तु काययोगं स्वभावतः ॥७॥ तृतीयं शुक्लसामान्यात्प्रथमं तु विशेषतः । सूक्ष्मक्रियाप्रतीपाति ध्यानमास्कन्तुमर्हति ॥७॥ सोऽन्तर्मुहूर्तशेषायुरधिकान्यत्रिकस्थितिः । यदा भवति योगीशस्तदा स्वामान्यतः स्वयम् ॥७२॥ स्वोपयोगविशेषस्य विशिष्टकरणस्य हि । सामायिकसहायस्य महासंवरसङ्गतेः ॥७३॥ - शमको धीरे-धीरे करता है। कर्मोको अत्यधिक निर्जराको करता हुआ वह मुनि द्रव्यसे द्रव्यान्तरको, पर्यायसे पर्यायान्तरको, व्यञ्जनसे व्यञ्जनान्तरको और योगसे योगान्तरको प्राप्त होता है ।।६०-६२।। वह प्रथम शुक्लव्यान शुक्लतर लेश्याके बलसे होता है। उपशम. श्रेणी और क्षपकश्रेणी-दोनोंके गुणस्थानोंमें होता है । क्षायोपशमिक भावसे सहित है । समस्तु पूर्वोके ज्ञाता मुनिके यह ध्यान अन्तर्मुहूर्त तक रहता है तथा दोनों श्रेणियोंके वशसे यह स्वर्ग और मोक्ष रूप फलको देनेवाला है । भावार्थ-उपशम श्रेणीमें होनेवाला शुक्लध्यान स्वर्गका कारण है और क्षपकश्रेणी में होनेवाला मोक्षका कारण है ।।६३-६४॥ जिसमें वीचार--अर्थादिके संक्रमणसे रहित होनेके कारण एक रूपमें ही वितर्कका उपयोग होता है अर्थात् बितर्कके अर्थ एवं व्यब्जन आदिपर अन्तर्मुहूत तक चित्तकी गति स्थिर रहती है वह एकत्व वितर्क वीचार नामका दूसरा शुक्लध्यान है ॥६५।। यह ध्यान एक ही अणु अथवा पर्यायको विपय कर प्रवृत्त होता है । मोह आदि घातिया कोका घात करनेवाला है, पूर्व धारीके होता है. और इस ध्यानके प्रभावसे ध्यान करनेवाला कुशल मुनि ज्ञान, दर्शन, सम्यक्त्व, वीर्य और चारित्र आदि क्षायिक भावोंसे सुशोभित होने लगता है । अब वह तीर्थकर अथवा सामान्य केवली हो जाता है । वह सबके द्वारा पूज्य एवं सेवनीय हो जाता है और तीन लोकॉका परमेश्वर हो उत्कृष्ट रूपसे देशोन कोटिवर्प पूर्व तक बिहार करता रहता है ।।६६-६८।। जव उन केवली भगवान्की आयु अन्तर्मुहूर्तको शेष रह जाती है तथा आयुके बरा- वर ही वेदनीय आदि तीन अघातिया कर्माको स्थिति अवशिष्ट रहती है तब वे समस्त बचन योग, मनोयोग और स्थूल काय योगको छोड़कर स्वभावसे ही सामान्य शुक्लकी अपेक्षा तीसरे और विशेष-परमशुल्लकी अपेक्षा प्रथम सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति नामक ध्यानको प्राप्त करनेके योग्य होते हैं ।।६९-७१।। जब उन केवली भगवानकी स्थिति अन्तर्मुहूर्तकी हो और शेप तीन अघातिया कर्माकी स्थिति अधिक हो तब वे स्वभाववश अपने-आप चार- ममयों-द्वारा आत्म प्रदेशोंको फैलाकर दण्ड, कपाट, प्रतर और लोक पूरण कर तथा उतने ही समयों में उन्हें संकुचित कर सब कर्मोको स्थिति एक वरावर कर लेते हैं। इस क्रियाफे १. विषमीकृत्य म । २. पातपातीदं म० । ३. स्थितः म०।४, महासंवरसंगते म० ।

षट्पञ्चाशः सर्गः २४ शतस्य शातने शेषकर्मणां परिपाचने । दण्डं चापि कपाटं च प्रतरं लोकपूरणम् ॥७॥ चतुर्मिः समयैः कृत्वा स्वप्रदेशविसर्पणात् । तावद्भिरेव संहृत्य कृत कर्मसमस्थितिः ॥७५॥ पूर्वकायममाणः सन् भूत्वा निष्ठापयन्निदम् । प्रथमं शुक्लमध्यास्ते द्वितीयं परमं पुनः १७६॥ स्वप्रदेशपरिस्पन्दयोगमाणादिकर्मणाम् । समुच्छिन्नतयोक्तं तत्समुच्छिन्नक्रियास्यया ॥७॥ सर्वबन्धासवाणां हि निरोधस्तत्र यत्रतः । अयोगस्य यथान्यातचारित्रं मोक्षसाधनम् ॥७॥ अयोगकेवली हारमा प्रध्वस्ताखिलकमकः । जात्यहमवदुद्भूतचेतनाशक्तिमास्वरः ॥७९॥ सिद्धयनिहैव संसिद्धस्वोर्ध्वव्रज्यास्त्रमावतः । पूर्वप्रयोगासंगत्ववन्धच्छेदस्वहेतुतः ॥८॥ अग्नेः शिखावदाविदचक्रालाग्दुवदुत्पतन् । एरण्डवीजवञ्चोव लोकं समयतो व्रजेत् ॥८॥ धर्मास्तिकायामावान लोकान्तमतिगच्छति । धान्नि संतिष्टतेऽतोऽग्रे सोऽनन्तसुखसन्ततिः ।।८२॥ चतुर्वर्ग हि देहिभ्यो मोक्षोऽतिशयतो हितः । स चौतादेव सद्ध्यानात्स्वकर्मक्षयलक्षणः ॥४३॥ कर्मप्रकृत्यमावो हि मोक्षोऽनन्तसुखावहः । स यतायनसाध्यत्वाद्विधा मवति देहिनः ।।८४॥ चरमोत्तमदेहस्य प्रागसत्वादयत्रतः । गत्यन्तरायुपामेषाममावो मवतीतरः ॥८५॥ उच्यते तु गुणस्थानात्सम्यग्दृष्टेरमेयतात् । समारभ्याप्रमत्तान्ते क्वचिदेवात्र मानुपः ॥८६॥ समय उनका उपयोग विशेप अपने-आपमें होता है, वे विशिष्ट करण अर्थात् भावका अव- लम्बन करते हैं, सामायिक भावसे युक्त होते हैं, महासंवरसे सहित होते हैं-नवीन कोंका आस्रव प्रायः बन्द कर देते हैं और सत्तामें स्थित कर्मोके नष्ट करने तथा उदयावलोमें लाने में समर्थ रहते हैं। यह सब करनेके बाद जब वे पुनः पूर्व शरीर प्रमाण हो जाते हैं तव प्रथम परम शुक्लव्यानको पूर्ण कर द्वितीय परमशुक्लध्यानको प्राप्त होते हैं ।।७२-७६।। आत्मप्रदेशोंके परिस्पन्द रूप योग तथा कायवल आदि प्राणोंके समुच्छिन्न-नष्ट हो जानेसे यह ध्यान समुच्छिन्नक्रिय नामसे कहा गया है ॥७७॥ इस ध्यानके समय यत्नपूर्वक समस्त कर्मोके वन्ध और आस्रवोंका निरोध हो चुकता है। ध्याता अयोग-योगरहित हो जाता है, और उसके मोक्षका साक्षात् कारण परम यथाख्यातचारित्र प्रकट हो जाता है ।।७।। वह अयोगकेवली आत्मा, समस्त कोको नष्ट कर सोलहवानीके स्वर्णके समान प्रकट हुई चेतनाशक्तिसे देदीप्यमान हो उठता है ॥७९|| इसी समय वह सिद्ध होता हुआ अनादि सिद्ध ऊर्चगमन स्वभाव, पूर्व प्रयोग, असङ्गत्व और बन्धच्छेद रूप हेतुओंसे अग्निशिखा, आविद्धकुलालचक्र, व्यपगतलेपालावु और एरण्डवीजके समान ऊपरको जाता हुआ एक समय मात्रमें ऊर्ध्वलोकके अन्तमें पहुंच जाता है ।।८०-८१॥ धर्मास्तिकायका अभाव होनेसे सिद्धारमा लोकान्तको उल्लङ्घन कर आगे नहीं जाता। वह उसी स्थानपर अनन्त मुखका उपभोग करता हुआ विराजमान हो जाता है ।।८।। चारों वर्गोंमें प्राणियोंके लिए मोक्ष ही अतिशय हितकारी है, अपने समस्त कर्मोका क्षय हो जाना मोशका लक्षण है और ऐसा मोक्ष ऊपर कहे हुए समोचीन ध्यानसे ही प्राप्त होता है ॥८३|| कर्मप्रकृतियोंका अभाव हो जाना ही अनन्त सुखका देनेवाला मोम है। वह कर्म प्रकृतियोंका अभाव यत्नसाध्य तथा अयलसाध्यकी अपेक्षा दो प्रकारका है। चरमशरोरी जीवके मुग्यमान आयुको छोड़- कर अन्य आयुओंका जो अभाव है वह अयत्नसाध्य अभाव है क्योंकि इनकी सत्ता पहलेसे आती नहीं है और चरमशरीरीके नवीन वन्ध होता नहीं है। अब यत्नसाध्य प्रकृतियोंका अभाव किस तरह होता है यह कहते हैं ।।८४-८५|| असंयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे लेकर १. सोऽयोग म० । २. गतिम्रम. म. । ३. 'पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वाद्बन्धच्छेदातथागतिपरिणामान्च' । त० सू० । 'थापिकुलालचक्राव्यपगतलेगलाबुवदेरडवीजवदग्निशिखावच' ॥ त० स० । ४. सद्ध्यातात् म०। ५. -रसंयतान् म । ६ समारभ्य प्रवर्तन्ते फ०। ७. स्वचिदेकत्र म । , ६४२ हरिवंशपुराणे मोहस्य प्रकृतीः सप्तक्षपयिस्वा विशुद्धधीः । सम्यग्दर्शनमर्कामं क्षायिक प्रतिपद्यते ॥८॥ शारोढा क्षपश्रेणीमप्रमत्तः प्रकृत्य सः । भाप्रवृत्तकरणमपूर्वकरण वकृत् ॥८॥ अपूर्वकरणो भूत्वा स पापप्रकृतिस्थितिम् । तनूकृपयानुमागं चानिवृत्तिकरणासितः ॥८९॥ अनिवृत्तिगुणस्थाने क्षपकव्यपदेशमाक । शुक्लध्यानानलाकान्तकर्मप्रकृतिकक्षकः ॥१०॥ सनिद्रानिद्राप्रचला-प्रचनात्यानगृद्धिभिः । दुर्गती सानुपूकि पूर्वा जातिचतुष्टयीम् ॥९॥ सस्थायरातपोद्योतसूक्ष्मसाधारणामिधाः । सहैव क्षपयस्येताः पोडश प्रकृतीः कृती ॥१२॥ 'अत्रैवातः परं स्थानं कपायाष्टकमस्यति । ततो नपुंसकं घेदं स्त्रीवेदं च ततः परम् ॥१३॥ पुंवेदे नोकपायाणां पटकं प्रक्षिप्य वै सह । निरस्याक्षिप्य पुंवेदं क्रोधसंज्यलनानने ॥१४॥ मानसंज्यलने तं च मायासंग्वलने स्वमुम् । लोममंगलने त्वेनं निक्षिप्य दहति फ्रमात् ॥१५॥ लोमसंचलनं सूक्ष्मं कृत्वा सूक्ष्मकपायगः । लोभसंज्वलनस्यान्तमन्ते कृत्वा विमोहकम् ॥१६॥ भूत्वा क्षीणकपायस्योपान्तिम समयेऽस्यति । निद्रां च प्रचलामन्स्ये ज्ञानात्यन्त राययोः ॥२७॥ प्रत्येकं प्रकृतीः पन्ज चतस्रो दर्शनावृतेः । द वैकश्वविताग्नेः सयोगः केवली मवेत् ॥१८॥ सद्वेद्यं चाप्यसद्वेद्यं नामदेवगतिश्रुतिः । औदारिकशरीरादिनाना पवनयं तथा ॥९९॥ सद्धातपञ्चकं चापि पुनर्वन्धकपञ्चकम् । वैक्रियौदारिकाहारकायाङ्गोपाङ्गकत्रिकम् ॥१०॥ संस्थाननामपटकं च पटसंहनननाम च । वर्णपञ्चकनामापि रसपञ्चकनाम च ॥१०॥ अप्रमत्त संयत नामक सातवें गुणस्थान तक किसी गुणस्थानमें कर्मभूमिका मनुष्य मोहनीय कर्मकी सात प्रकृतियोंका क्षय कर विशुद्ध घुद्धिका धारक होता हुआ सूर्यके समान क्षायिक सम्यग्दर्शनको प्राप्त होता है ॥८६-८७॥ तदनन्तर सातिशय अप्रमत्तगुणस्थानवर्ती मनुष्य क्षपक श्रेणीमें चढकर अथाप्रवृत्तकरण (अधःप्रवृत्तकरण ) को करके उसके बाद अपूर्व करणको करता है ।।८८ फिर अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती होकर पापप्रकृतियोंकी स्थिति तथा अनुभागको क्षीण करता हुआ अनिवृत्तिकरणको प्राप्त होता है ॥८९|| तदनन्तर अनिवृत्तिकरण नामक नवम गुणस्थानमें क्षपक संज्ञाको प्राप्त होता हुआ कर्मप्रकृतिरूप धनको शुक्लध्यानरूपी अग्निसे आक्रान्त करता है ।।१०। फिर सत्तामें स्थित निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यञ्चगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रियादि चार जातियॉ, स्थावर, आतप, उद्योत, सूक्ष्म और साधारण इन सोलह प्रकृतियोंका एक साथ क्षय करता है ॥९१-२२।। इसो गुणस्थानमें सोलह प्रकृतियोंके क्षयके बाद अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण नामक आठ कषायोंको नष्ट करता है। फिर नपुंसकवेद और स्त्रीवेदको नष्ट कर हास्यादि छह नोकपायोंको पुंवेदमें डालकर एक साथ नष्ट करता है। फिर वेदको संज्वलन कोधरूपी अग्निमें, संज्वलन क्रोधको संज्वलन मानमें संचलन मानको संज्वलन मायामें और संज्वलन मायाको संज्वलन लोभमें डालकर क्रमसे दग्ध करता है ।।९३-६५। फिर संज्वलन लोभको और भी सूक्ष्म कर सूक्ष्मसाम्पराय नामक दशम गुणस्थानमें पहुंचता है। इसके अन्तमें संज्वलन लोभका अन्त कर मोहकर्मका बिलकुल अभाव कर चुकता है ।। ९६ ।। फिर क्षीणकषायगुणस्थानवर्ती होकर एकत्ववितर्क नामक शुक्लध्यानरूपी अग्निसे इसके उपान्त्य समयमें निद्रा और प्रचलाको तथा अन्त समयमें ज्ञानावरण और अन्तरायको पॉच-पॉच और दर्शनावरणकी चार प्रकृतियोंको जलाकर सयोग- केवली होता है ।।९७-९८॥ तदनन्तर सयोगकेवली गुणस्थानको उल्लङ्घकर जव आगामी गुण- स्थानको प्राप्त होता है तब अयोगकेवली होकर अर्हन्त अवस्थाके उपान्त्य समयमें साता वेदनीय और असाता वेदनीयमें से कोई एक, देवगति, औदारिक शरीरको आदि लेकर पॉच शरीर, १ अत्रैवान्त. परं म०। २ पुंवेद क० । ३. वितर्काग्नि म। - पट्पञ्चाशः सर्गः ६४३ १ अष्टधा स्पर्शनामापि गन्धनाम पुनर्द्विधा । तयायोग्यानुपूर्वी च नामदेवगतेः पुनः ॥१०२॥ नामागुरुलघुच्छ्वासपरघातोपघातकम् । प्रशस्ताशस्तभेदस्यं विहायोगति नाम च ॥१०३॥ प्रत्येककायापर्याप्तस्थिरास्थिरशुभाशुभम् । तथा दुर्मगनामापि पुनः सुस्वरदुस्वरम् ॥१०४॥ अनादेयायशःकीर्तिनाम निर्माणनाम च । प्रकृतीसप्ततिं नीचाँग्रेण सुपिण्डिताः ॥१०५॥ सयोगकेवलिस्थानमतीत्य पदमास्थितः । अयोगफेवलो हन्ति स्वोपान्त्यसमयेऽर्हतः ॥१०६॥ वेद्यमेकं मनुष्यायुर्मनुष्यगतिरेव च । तत्प्रायोग्यानुपूर्वी च जातिः पञ्चेद्रियाभिधा ॥१०॥ असवादरपर्याप्तमुमगादेयसंज्ञिका । उच्चत्रिं यश कीर्तिस्तत्तीर्थकरनाम च ॥१०॥ एतास्त्रयोदश रयाताः प्रकृतीः प्रकृतिस्थिरः । अयोगवली हन्ति चरम समये ततः ॥१०९॥ सहस्वोच्चारणावृत्तीः पञ्च स्थिरवा स्वकालतः। सिद्धिः सादिरनन्ता स्यादनन्तगुणसन्निधिः ॥११०॥ धय॑ध्यानप्रकारं स ध्यायनेमियथोचितम् । पटपञ्चाशदहोरात्रकालं मुतपसानयत् ॥११॥ पॉच संघात, पाँच बन्धन, औदारिक, बैंक्रियिक और आहारक ये तीन अङ्गोपाङ्ग, छह संस्थान, छह संहनन, पाँच वर्ण, पाँच रस, आठ स्पर्श, दो गन्ध, देवगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उच्छ्वास, परघात, उपधात, प्रशस्त और अप्रशस्तके भेदसे दो प्रकारको विहायोगति, प्रत्येक शरीर, अपर्याप्त, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, सुस्वर, दुःस्वर, अनादेय, अयशःकीर्ति, निर्माण और नीच गोत्र इन यहत्तर प्रकृतियोंको नष्ट करता है ।।९९-१०६॥ फिर अन्त समयमें साता- वेदनीय असातावेदनीयमें से एक, मनुष्य आयु, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, पञ्चेन्द्रिय जाति, उस, यादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, उच्चगोत्र, यशस्कीर्ति और तीर्थङ्कर इन तेरह प्रकृतियों- को नष्ट करता है। अयोगकेवली गुणस्थानमें यह जीव प्रदेशपरिस्पन्दका अभाव हो जानेके कारण स्वभावसे स्थिर रहता है ।।१०७-१०९|| अ इ उ ऋ ल इन पॉच लघु अक्षरोंके उच्चारणमें जितना काल लगता है उतने काल तक चौदहवें गुणस्थानमें रहकर यह जीय सिद्ध हो जाता है । जीवकी यह सिद्धि सादि तथा अनन्त है और अनन्त गुणोंके सन्निधानसे युक्त है ॥११॥ भगवान् नेमिनाथने धर्म्यध्यानके पूर्वोक्त दस भेदोंका यथायोग्य ध्यान करते हुए, १. कर्माभावो द्विविध –यत्नमाध्योऽयत्नसाध्यश्चेति । तत्र चरमदेहस्य नारकतिर्यग्देवायुपामभावो न यत्नसाध्य. असत्वात् । यत्नसाध्य इत ऊर्ध्वमुच्यते-असंयतसम्यग्दृष्टयादिषु चतुर्पु गुणस्थानेधु करिमश्चित्सप्त- प्रतिप्रक्षय क्रियते । निद्रानिद्रामचलाप्रचलात्यानगृद्धिनरकगतितिर्यग्गत्येकद्वित्रिचतुरिन्द्रियजाविनरकगतितिर्य- ग्गतिप्रायोग्यानुपूर्व्यातपोद्योतस्थावरसूक्ष्मसाधारणसंशिकाना पोडशाना कर्मप्रकृतीनामनिवृत्तिनादरसाम्परायस्थाने युगपरदय क्रियते । नपुंसकवेद स्त्रीवेदश्च तत्रैव दयमुपयाति । नोकपायषट्कं च सहैवेनैव प्रहारेण विनि. पातयति । तर पु वेदसज्वजनकोषमानमायाः क्रमेण तत्रैवात्यन्तिकं घंसमास्कन्दन्ति । लोभमंचलनः मूक्ष्मसाम्प. रायान्ते यात्यन्तम् । निद्राप्रचले क्षीणक्पायवीतरागच्छदस्यस्योपान्त्यसमये प्रलयमुपव्रजतः । पञ्चाना शाना- वरणाना चतुर्णा दर्शनावरणानां पञ्चानामन्तरायाणा च तस्यैवान्त्यसमये प्रहयो भवति । अन्यतरवेदनीयदेव- गत्यौदारिकवैक्रियिकाहारकतैजसकामणरारीरसंस्थानपटकोदारिकवैक्रियिकाहारकशरीरातोपानपटसंहननपञ्चप्रश - तपर्णपञ्चाप्रशस्तपर्णगन्धद्वयाञ्चपरास्तरसन्चाप्रशस्तरसस्पर्शाष्टकदेवगतिप्रायोग्यानुपू गुम्लरघातपरयातो- वासभरास्ताप्रशस्तविहायोगत्यपर्याप्त प्रत्येकशरीरस्थिरास्थिरशुभाशुभदुभंगमुस्वरदु स्वरानादेयायग्रकीतिनिर्मा- पनाम नीचैर्गोत्राख्या दासप्ततिप्रकृतयोऽयोगवेवलिनमुशन्त्यसमये विनाशमुपयान्ति । अन्यतरपेदनीयमनुप्या- युर्मनुष्यगतिश्चेन्द्रिय मातिमनुष्पगतिमायोग्यानुसूर्यप्रसपादरपोतकमुमगादेयय यकीर्तितीर्थकरनामोच्चै नसशि- कानां त्रयोदशानां प्रकृतीनामयोग वशिनश्चरमसमये विच्छेदो भवति । --सर्वार्थसिद्धि अ. १० सूत्र. २ हरिवंशपुराणे पूर्वाहेऽश्वयुजस्यातः शुरूप्रतिपदि प्रभुः। शुक्लध्यानामिना दग्या चतुर्घातिमहावनम् ॥११२॥ नमन्तकवलज्ञानदर्शनादिचतुष्टयम् । प्रैलोक्येन्द्रासनाकम्पि सम्प्रापरपरदुर्लभम् ॥११३॥ स्रग्धरावृत्तम् घण्टारावीरसिंहस्फुटपटहरचोदारशद्धस्वनस्तां जैनी कैवल्यवन्धि सकलसुरगणा द्राग्विदित्वा यथास्वम् । इन्द्राः सिहासनोच कुटविचलनः स्वान् प्रयुज्यावधीन् स्वैः प्राप्तानीकैः सहायुः क्षुमितसलिलधिवात विद्धिस्त्रिलोक्याः ॥११॥ आपूर्यावार्यवेगैर्गननजलनिधि वाहनानां समूहः ससानीकैरनेकैनिदशपतिगणस्तं परीस्य प्रपेदे । प्रोच्चविलेप गिरिपतिमधिपस्नानकल्याणमात्र भूयः क्ल्याणकण्ठे गुणमरणगुणादूर्जयन्तं जयन्तम् ॥१५॥ मन्दारादिद्रमाणां सुरमितककुमा पुष्पवृष्टया सुराणां दिव्यस्त्रीगीतमूर्छन्मुखरितभुवनैर्दुन्दुमीनां निनादः। भेया लोकस्य शोकं फलकुसुमभृताशोकशाखाभृता च श्वेतच्छनत्रयेण त्रिभुवनविभुताचिह्नभूतोरुभूना ॥११६॥ हंसालीपातलीलधवलितखचलेश्चामराणां सहस्रः मामिओमण्डलेन प्रतिहतविकसद्भानुमामण्डलेन । छमस्थ अवस्थाके छप्पन दिन समीचीन तपश्चरणके द्वारा व्यतीत किये ॥१११।। तदनन्तर आश्विन शुक्ल प्रतिपदाके दिन प्रात:कालके समय भगवानने शुक्लध्यानरूपी अग्निके द्वारा चार घातियारूपी महावनको जलाकर तीन लोकके इन्द्रोंके आसन कॅपा देनेवाले एवं अन्य जनदुर्लभ, केवलज्ञान, केवलदर्शन आदि अनन्तचतुष्टय प्राप्त किये ।।११२-११३।। घण्टाओंके शब्द, विशाल सिंहनाद, दुन्दुभियोंके स्पष्ट शब्द और शंखोंकी भारी आवाजसे समस्त देवोंने शीघ्र ही निश्चय कर लिया कि जिनेन्द्र भगवान्को केवलज्ञान प्राप्त हो गया है तथा इन्द्रोंने भी सिंहासन और उन्नत मुकुटोंके कम्पित होनेसे अपने-अपने अवधिज्ञानका प्रयोग कर उक्त यातका ज्ञान कर लिया। तदनन्तर तीनों लोकोके इन्द्र, समुद्रोंके समूहको भुभित करनेवाली अपनी-अपनी सेनाओंके साथ गिरनार पर्वतकी ओर चल पड़े ।।११४।। उस समय इन्द्रोंने अवार्य वेगसे युक्त वाहनोके समूह और सात प्रकारकी अनेक सेनाओंसे आकाशरूपी समुद्रको व्याप्त कर दिया और आकर गिरनार पर्वतकी तीन प्रद- क्षिणाएँ दी । उस समय वह पर्वत, ऊँचे शिखरका अभिमान धारण करनेवाले गिरिराज- सुमेरु पर्वतको भी जीत रहा था क्योंकि सुमेरु पर्वत पर तो भगवान्का मात्र जन्मकल्याणक सम्बन्धी अभिषेक हुआ था और गिरनार पर्वतपर दीक्षाकल्याणकके बाद पुनः ज्ञान- कल्याणक होनेसे अनेक गुण प्रकट हुए थे ॥११५।। देवलोग, दिशाओंको सुगन्धित करनेवाले मन्दार आदि वृक्षोंके फूलोंकी वर्षा करने लगे। देवागनाओंके सुन्दर संगीतसे मिश्रित दुन्दुभियोंके शब्द संमारको मुखरित करने लगे। लोगोंके शोकको नष्ट करनेवाला फल और फूलोंसे युक्त अशोक वृक्ष प्रकट हो गया। तीन लोकको विभुताके चिह्रस्वरूप श्वेत छत्रत्रय सिरपर फिरने लगे। हंसावलीके पातके समान सुशोभित एवं पर्वतकी भूमिको सफेद करने- वाले हजारों चमर दुलने लगे। अपनी कान्तिसे देदीप्यमान सूर्यको प्रभाके समूहको पराजित करनेवाला भामण्डल प्रकट हो गया। नाना रत्नसमूहकी किरणोंसे इन्द्रधनुषको १. वद्भि म । २.नीकै मा।

पट्पञ्चाशः सर्गः नानारत्नौघरोचिजनितसुरधनुहमसिंहासनेन मापाभेदस्फुरत्या स्फुरणविरहितस्वाधरोदापया च ॥१७॥ भष्टाभिः प्रातिहायरतिशमितपः स्वैविशेपेरशेपैः कर्मागायस्वमावत्रिदिवपतिमवैस्तैश्चतुस्त्रिंशता छ । त्रैलोक्योदारणाय प्रकृतिश्ततिमिनायो जगत्यां द्वाविंशो हारिवंशो गुणगणदिनकृत्तीयकृयाहरासीत् ॥१८॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती भगवन्नेमिनाथ- केवलज्ञानवर्णनो नाम षट्पञ्चाशः सर्गः ॥५६॥ उत्पन्न करनेवाला स्वर्ण-सिंहासन आविर्भूत हो गया और नाना भाषाओंके भेदसे युक्त एवं ओठोंके स्फुरणसे रहित दिव्यध्यनि खिरने लगी। इस प्रकार पूर्वोक्त आठ प्रानिहायों, दूसरोंको अत्यन्त शान्त करनेवाली अपनी समस्त विशेषताओं और केवलज्ञान-सम्बन्धी, जन्म-सम्बन्धी तथा देवकृत चौतीस अतिशयोंसे विभूपित, तीन लोकके उद्धारके लिए स्वाभा- यिक धैर्यके धारक और अनेक गुणोंके समूहको प्रकट करनेके लिए सूर्यके समान, हरिवंशके शिरोमणि वाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ भगवान् पृथिवीपर प्रकट हुए ॥११६-११८।। , इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें भगवान् नेमिनाथके केवलज्ञानकी उत्पत्तिका वर्णन करनेवाला छप्पनयाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥५६|| १. प्रकृत-मः । २. हरिवंशे मयो हारिवशः। ३. गुणगुणहवात् म०,१०। जिनगुणगुणभृत्त -क।

सप्तपञ्चाशः सर्गः समवादि समापादि शरणं शरणं क्षणात् । त्रिजगत्प्राणिनां देवैः पाकशासनशासनात् ॥१॥ सर्वो द्वारवतीलोको यदुमोजकुलाम्बुधिः । आरुरोह गिरि भूत्या रामकेशवपूर्वकः ॥२॥ अवलोक्य जिनेन्द्रस्य शरणं समवादिकम् । यहिरन्तःपरं प्रापद्विस्मयं जनसागरः ॥३॥ यादृशी समवस्थानभूमिस्तीर्थकृतामिह । तादृशी श्रोतृलोकस्य समासेन निगद्यते ॥४॥ भूमेः स्वभावभूताया दिव्यारलिप्रमोच्छृितिः । भूमिस्तावत्समुच्छाया कल्पभूमिरुपय॑तः ॥५॥ स्वर्गश्रियं श्रिया जेत्री चतुरखा सुसप्रदा । सैकान्तद्वादशाद्यात्मयोजना कालदेशतः ॥६॥ उच्चैर्गन्धकुटी देशकर्णिका पद्ममूनिवत् । माति भूमिरसौ बाह्य भूश्रीपत्रपरम्परा ॥७॥ इन्द्रनीलमयो भूमिळह्यादर्शतलोपमा । भूयसामपि भूयस्त्वं विशतां विदधाति या ॥८॥ दूरादिन्दादयो यस्यां मानयन्ति नमस्यया । मानास्त्रिजगन्नाथं साभूर्मानाङ्गणामिधा ॥९॥ महादिक्षु चतस्रोऽस्या गन्यूतिद्वयविस्तृताः । वीव्यस्तन्मध्यगानीयुर्मानपीटान्पुरः प्रभान् ॥१०॥ स्वोत्सेधत्रिगुणात्मीयविस्तराण्युक्तिविस्तरैः । सौवर्णरत्नमूर्तीनि मान्यन्ते नृसुरासुरैः ॥१५॥ नृसुरामानवस्तम्भानास्थायार्चन्ति यत्र भूः । सा त्वास्थानाङ्गणामिख्या ज्वललोहितररनमा ॥१२॥ मध्ये वीथि चतस्रोऽत्र निमगा हैमपीठिकाः । मान्त्युरोद्वयसोच्छायाः वृत्ताः कोशाधविस्तृताः ॥१३॥ अथानन्तर देवोंने इन्द्रकी आज्ञासे क्षण भरमें तीन जगत्के जीवों के लिए शरणभूत समयशरणकी रचना कर दी ॥१॥ बलदेव और कृष्णको आदि ले यादव और भोजवंशके सागर स्वरूप समस्त द्वारिका निवासी बड़े वैभवके साथ गिरिनार पर्वत पर चढ़े और भीतर बाहर जिनेन्द्र भगवानका समवशरण देखकर वह जनताका अपार सागर परम आश्चर्यको प्राप्त हुआ।।२-३॥ तीर्थकरीको समयसरण भूमि जैसी होती है उसका यहाँ संक्षेपसे श्रोता. ओंके लिए वर्णन किया जाता है ॥४॥ समवसरणंकी दिव्य भूमि स्वाभाविक भूमिसे एक हाथ ऊँची रहती है और उससे एक हाथ ऊपर कल्पभूमि होती है ।।५।। यह भूमि अपनी शोभासे स्वर्गलक्ष्मीको जीतने- वाली, चौकोर, सुखदायी और देशकालके अनुसार धारह योजनसे लेकर एक योजन तक विस्तारवाली होती है। भावार्थ-समवसरण भूमिका उत्कृष्ट विस्तार वारह योजन और कमसे-कम विस्तार एक योजन प्रमाण होता है ॥६॥ यह भूमि कमलके आकार होती है इसमें गन्धकुटी तो कर्णिकाफे समान ऊँची उठी होती है और बाह्य भूमि कमलदलके समान विस्तृत होनी है ॥१॥ यह इन्द्रनीलमणिसे निर्मित होती है, इसका वाह्य भाग दर्पणतलके समान निर्मल होता है और प्रवेश करनेवाले बहुतसे जीवोंको एक साथ स्थान देनेवाली रहती है ।।८। जिसमे मानके योग्य इन्द्र आदि देव त्रिलोकीनाथ-भगवानकी पूरसे ही पूजा करते हैं यह मानागण नामकी भूमि है ॥२॥ इस भूमिकी चारों महादिशाओंमें दो-दो कोश पिम्नन चार महावीथियाँ हैं। ये वीथियाँ अपने मध्यमें स्थित चार मानस्तम्भोंके पीठ धारण करती है ॥२०॥! ये पीठ अपनी ऊँचाईसे तिगुने चौड़े एवं सुवर्ण और रत्नमयी मूर्तियोंके धारक होते हैं तथा मनुप्य, सुर, अमुर सभी आफर इन्हें नमस्कार करते है| जहाँ स्थिन होकर मनुष्य और देव, मानस्तम्भोंको पूजा करते हैं यह आस्था नागाणा नामकी भूमि है । यह भूमि देदीप्यमान लाल मणियोंकी कान्निको धारण करती ला पोधियों मध्यमें तीन पटनीदार पार मुवर्णमयी पीठिकाएँ हैं जो छाती घरायर १. परमार क.। २ यायभू म. पासाभक०।३. पुरः प्रमाः १० म०, ग०,म.। ४. मध्ये याशिम.।

सप्तपञ्चाशः सर्गः ६४० चापोनपीटिकाव्यासा योजनाभ्यधिकोच्छ्याः । (मिठा मानवस्तंमाश्च वारः पीटिकास्वधि ॥१४॥ द्विपध्योजनदृश्यास्ते पालिकास्याम्बुजस्थिताः । वज्रस्फटिकवैडूर्यमूलमध्यानविग्रहाः ॥१५॥ द्विसहस्राश्रयो नानारलरश्मिविमिश्रिताः । चतुर्दिसूचंसिद्धार्चाः रनभूनोरपालिकाः ॥१६॥ पालिकामुसपद्मस्थतपनीयस्फुरद्घटाः। घटास्यावद्धफलकाः श्रीमामामिपवश्रियः ॥१७॥ श्रीचूलारत्नमाचक्रमास्यविंशतियोजनाः । सामिमानमनौदेवमानवस्त्रमना वभुः॥१८॥ तत. सरांमि चत्वारि शुम्मदम्मोजमांज्यलम् । हंससारसचक्रातारावरम्यक्कुपवलम् ॥१९॥ अनो वनमयो वनो वशोदनो घनद्युतिः। द्विगुणीभूतविस्तारः परीयाय समन्ततः ॥२०॥ परीत्य परिवातोऽस्थाजलप्रममणिक्षितः 1 जानुदानाम्बुगम्मीरा कृष्णमाटीय भूस्त्रियाः ॥२१॥ हेमाम्भोजरजापुञ्जपिञ्चरी माविताम्मसि । स्वच्छायां दिमुसान्यस्यां सादरागाणि चान्यमान् ॥२२॥ चल्लीवनमतोऽप्यन्तः परीत्य स्थितमित्यमात् । कुसुमामोदिता शान्तं शकुन्तालिकुलाकुलम् ॥२३॥ प्राकारोऽन्तः परीयाय कनकनक्रमास्वरः । विजयादिवृहद्रौप्यचतुर्गापुरमण्डितः ॥२॥ तत्र दीवारिका भौमाः कटकादिविभूषणाः । प्रमावोत्सारितायोग्या मुद्गरोद्धतपाणयः ॥२५॥ ऊँची है गोल हैं और आधा कोदा चौड़ी है ।।१३।। उन पीठिकाओं पर चार मानस्तम्म मुशो- मित हैं जो पीठिकाओंकी चौड़ाईसे एक धनुप कम चौड़े हैं और एक योजनसे कुछ अधिक- ऊँचे हैं ॥१४॥ वे मानस्तम्भ बारह योजनकी दूरीसे दिखायी देते हैं। पालिकाके अग्रभागपर जो कमल हैं उन्हीं पर स्थित हैं, उनका मूलमाग हीराका, मध्यभाग स्फटिकका और अप्र- माग वैडूर्यमणिका बना हुआ है ॥१५॥ हर एक मानस्तम्भ दो-दो हजार कोणोंसे सहित हैं-दो-दो हजार पहलके हैं, नाना रत्नोंको किरणोंसे मिले हुए हैं, उनकी चारों दिशाओं में ऊपर सिद्धोंकी प्रतिमाएँ विराजमान हैं तथा उनकी रत्नमयी बड़ी-बड़ी पालिकाएँ हैं ।।१६।। पालिकाओंके अग्रभाग पर जो कमल हैं उन पर मुवर्णके देदीप्यमान घट हैं, उन घटोंके अग्रभागसे लगी हुई सीढ़ियाँ हैं, तथा उन सीढियों पर लक्ष्मीदेवीके अभिषेककी शोभा दिखलायी गयी है ।।१७। वे मानस्तम्म लक्ष्मीदेवीके चुहारत्नके समान अपनी कान्तिके समूहसे वीस योजन तकका क्षेत्र प्रकाशमान करते रहते हैं तथा जिनका मन अहंकारसे युक्त है ऐसे देव और मनुष्योंको वहीं रोक देनेवाले हैं ॥१८|| उन मानस्तम्भोंकी चारों दिशाएँ हंम, सारस और चकबोंके शब्दोंसे अत्यन्त सुन्दर हैं तथा उनमें खिले हुए कमलोंसे युक्त चार सरोवर हैं ॥१९॥ सरोवरोंके आगे एक यनमय कोट है जो छाती वरावर ऊँचा है, अत्यन्त कान्तिसे युक्त है, ऊँचाईसे दूना चौड़ा है और चारों ओरसे घेरे हुए है ।।२०।। इस कोटको चारों ओरसे घेरकर एक परिग्या स्थित है जिसकी भूमि जलके समान कान्तिवाले मणियांसे निर्मित है, उसमें घुटनों प्रमाण गहरा पानी मरा है तथा यह पृथिवीरूपी स्त्रीको नीली साड़ीके समान जान पड़ती है ।।२१। यह परिसा अत्यन्त स्वच्छ है तथा उसका जल स्वर्णमय कमलोंकी परागके समूहसे पीला-पीला हो रहा है अतएव इसमें प्रतिविम्बित दिशारूप त्रियोंके मुख अद्गरागसे सहितके ममान जान पड़ते हैं |२२|| उसके आगे चारों ओरसे घेरकर स्थित लताओंका यन मुमोमित है जो फूलोंके द्वारा दिशाओंके अन्त मागको मुगन्धित कर रहा है तथा पनियों और भ्रमरोंके समूहसे व्याप्त है ॥२३॥ इसके आगे देदीप्यमान मुवर्णके समान चमकीला, एवं विजय आदि चाँदीके बड़े-बड़े चार गोपुरोंसे मुगोभित कोट, चारों ओरसे घेरे हुए है | उन गोपुरोंपर व्यन्तर जातिके देव द्वारपाल हैं जो कटक आदि १. योजनान्यधिको-म० । २. रत्नभूचोटपालिका...। रत्नभूतोनुपालिका १० । ३. चत्वारः म० । ४. उपनि । ५. क्कुरचल क०, २० । ६. मुस्खायां क० । मुम्बयां घ... कुमुमामादिता सान्तं म।

६१८ हरिवंशपुराणे मणितोरणपाश्चेषु गोपुराणां स्फुरत्रिपाम् । छत्रचामरभृङ्गारपूर्वाष्टशतकान्यमान् ॥२६॥ तद्गोपुरपुरो भान्ति प्रेक्षाशालास्निभूमिकाः । द्विद्विवींध्यंतयोनृत्यद्वात्रिंशत्सुरकन्यकाः ॥२७॥ मात्यशोकवनं प्राच्या सप्तपर्णवनं स्वपाक् । प्रतीच्यां चम्पकवनमुदीच्यामांम्रसद्वनम् ॥२८॥ ससिद्धप्रतिमोऽशोकः सप्तपर्णश्च चम्पकम् । तथैवाम्रतरुस्तेषां बनानामधिपाः क्रमात् ॥२९॥ त्रिकोणाः मण्डलाकाराश्चतुरस्राश्च वापिका. । वनेषु रत्नतट्यन्ताऽशुद्धस्फटिकभूमयः ॥३०॥ विश्वा. सतोरणाः लक्ष्यास्तीर्थ्यास्तूच्चैत्ररोण्डकः । मण्डितागाहमानेपगाधा द्विक्रोशविस्तृता. ॥३१॥ नन्दा नन्दोत्तरानन्दानन्दवत्यमिनन्दिनी ! नन्दघोपेत्यमूर्वाप्यः पडशोकवनस्थिताः ॥३२॥ विजयामिजया जैत्री वैजयन्त्यपराजिताः । जयोत्तरेति पड्वाप्यः सप्तपर्णवनाश्रिताः ॥३३॥ कुमुदा नलिनी पद्मा पुष्करा विकचोत्पला । कमलेत्यपि पड्वाप्यश्चम्पकाख्यवने मताः ॥३४॥ प्रभासा मास्वती भासा सुप्रमा भानुमालिनी । स्वयम्प्रभेति पड्वाप्यः सहकारवनोदिताः ॥३५॥ उदयो विजयः प्रीतिः स्यातिश्चेति क्रमोदितैः । फलैः पूर्वादयो वायः पूज्यन्ते तत्फलार्थिमिः ॥३६॥ तद्वापीपुष्पसन्दोहं यथोक्न प्राप्य माक्तिकाः । आस्तूपं क्रमशोभ्ययं विशन्ति क्रमकोविदाः ॥३७॥ अन्तरेणोदयं प्रीति चामितस्त्रिभुवोऽध्वसु । मान्ति नाटकशालास्ता हाटकोमलमूर्तयः ॥३८॥ अध्यर्धक्रोशविस्तारा द्वात्रिशज्योतिषां स्त्रियः। तद्भुवो रत्ननिर्माणाः स्वच्छस्फटिकमित्तयः ॥३९॥ आभूषणोंसे सुशोभित है, अपने प्रभावसे अयोग्य व्यक्तियोंको दूर हटाते रहते हैं तथा जिनके हाथ मुद्गरोंसे उद्धत होते हैं ॥२५।। देदीप्यमान कान्तिसे युक्त उन गोपुरोंके मणिमय तोर- णोंकी दोनों ओर छत्र चमर तथा भंगार आदि अष्टमङ्गल द्रव्य एक-सी आठ एक सौ आठ संख्यामें सदा सुशोभित रहते है ।।२६। उन गोपुरोंके आगे वीथियोंको दोनों ओर तीन-तीन खण्डकी दो-दो नाट्यशालाएँ हैं जिनमें बत्तीस-बत्तीस देव-कन्याएँ नृत्य करती हैं ।।२०।। तदनन्तर पूर्वदिशामें अशोक वन, दक्षिणमें सप्तपर्ण वन, पश्चिममें चम्पक यन और उत्तरमें आम्रवन सुशोभित है ।।२८॥ इन चारों यनों में अशोक वनका अशोक वृक्ष, सप्तपर्ण वनका सप्तपर्ण वृक्ष, चम्पक वनका चम्पक वृक्ष और आम्रवनका आम्रवृक्ष स्वामी है। ये स्वामी वृक्ष सिद्धकी प्रतिमाओंसे सहित हैं अर्थात् इनके नीचे सिद्धांकी प्रतिमाएं विराजमान रहती हैं ।।२९।। उन वनों में तिकोनी, चौकोनी और गोलाकार अनेक वापिकाएँ हैं । उन यापिकाओंके नट रत्ननिर्मित हैं तथा उनकी भूमि शुद्ध स्फटिकसे निर्मित है। ये सभी वापिकाएँ तोरणोंसे युक्त हैं, दर्शनीय हैं, सीढ़ियों से युक्त हैं, ऊँचे-ऊँचे वरण्डोंसे सुशोभित हैं, प्रवेश करनेमें गहरी है और दो कोश चौड़ी हैं ॥३०-३१।। नन्दा, नन्दोत्तरा, आनन्दा, नन्दवती, अभिनन्दिनी, और नन्दघोपा ये छह वापिकाएँ अशोक वनमें स्थित हैं ॥३२॥ विजया, अभिजया, जैत्री, वैजयन्ती, अपराजिता और जयोत्तरा ये छह वापिकाएँ सप्तपर्ण वनमें स्थित हैं ॥३३।। कुमुदा, नलिनी, पद्मा, पुष्करा, विश्वोत्पला और कमला ये छह वापियाँ चम्पक वनमें मानी गयो हैं ॥३४॥ और प्रभामा, भास्वती, भासा, मुप्रभा,भानुमालिनी और स्वयंप्रभा ये छह वापियाँ आम्रवनमें कही गयी हैं ॥३५।। पूर्व आदि दिशाओंकी वापिकाएँ क्रमसे उदय, विजय, प्रीति और ग्यानि नामक फल देती हैं तथा इन फलोंके इच्छुक मनुष्य इन बापिकाओंको पूजा फरते हैं, ॥३६॥ क्रमके जाननेयाले भक्तजन उन यापिकाओंसे यथोक्त फूलोंका समूह प्राप्त कर म्नुपतिक क्रम-क्रमसे जिनेन्द्र प्रतिमाओंकी पूजा करते हुए आगे प्रवेश करते हैं ॥३७॥ उदय और प्रीनिम्प फलको देनेवाली यापिकाओंफ वीचके मार्गके दोनों ओर तीन सण्डकी: मुपर्णमय देदीप्यमान यतीम नाट्यशालाएँ हैं ॥३॥ ये नाट्यशालाएँ डेंद कोश चौड़ी हैं, १. मनियमिायोक म.। २ रनतयोना म ... यागयटकः। अगर सादिपविभि 7.टि.।

सप्तपञ्चाशः सर्गः ६४९ सामु भक्त्या प्रनृत्यन्ति द्वात्रिंशज्योतिषां मियः । हावभावविलासाच्या रसपुष्टिसपुष्टयः ॥३०॥ सचतुर्गोपुरातोऽपि पति वनवैदिको । दिग्या वज्रमयी वोथीपार्श्वयोर्वजपतयः ॥४॥ निदण्डविस्तृताश्चित्राः पीठिकाः प्रतिमलिगाः। योजना|च्छ्तिास्तासु वंशा रत्नात्मपूर्वकाः ॥४२॥ तदग्रपालिकानदफलकाधिष्ठिता ध्वजाः । महान्तो दश चिन्नाः सत्किरिणीचित्रपट्टकाः ॥४३॥ शिखिहंसगरुमरस्वमिहेभमकराम्बुजैः । वृषरूपेण चक्रेण समधिष्ठिनमूर्तयः ॥४४॥ तेपामष्टशतं जातित्रिंशञ्च चतुःशती। चजसंख्या मवेदेषां सामान्येन समासतः ॥४५॥ सद्वात्रिंशत्सहस्राः स्युर्लक्षाः पञ्चाशदष्ट च । साधिका ध्वजसंख्येयं सैकदिका द्विसंगुणा ॥४६॥ पट्पञ्चाशत्सहस्राणि लक्षा पट्पष्टिरष्टसु । ध्वजकोट्यश्चतस्रः स्युश्चतुर्दिक्ष्वपि साधिकाः ॥४७॥ प्रोतिकल्याणमध्ये स्युरमित पञ्चभूमिकाः । मृत्तशालाः प्रमृत्यन्ति यत्र भावनयोषितः ॥४८॥ प्राकारोऽन्तः परीयाय द्वितीयो हेमनिर्मितः । पञ्चभूमिकरनीचतुर्गोपुरभूपितः ॥४९॥ हटद्धाटकपीठस्था. कम्बुकण्ठगुणोज्ज्वलाः । शातकुम्ममयाः कुम्माः साम्भोजास्याः सहाम्मसः ॥५०॥ शोमन्ते तद्विपार्श्वेषु द्वौ द्वौ मङ्गलदर्शनाः। वेत्रदण्डधरा द्वास्थास्तवाःसु भवनाधिपाः ॥५१॥ पुरस्तादोपुराणां च द्वे द्वे नाटकवेश्मनी । पुरस्तात्तु ततो हैमी द्वौ द्वौ धूपघटौ स्फुटौ ॥५२॥ चतुर्दिसिद्धरूपाढ्यं द्वितिः सिद्धार्थपादपम् । कल्पवृक्षवनं तत्र वींच्यन्तेषु यथायथम् ॥५३॥ नाना प्रकारके वेलबूटोंसे सुशोभित हैं और उनकी भूमियाँ रत्नोंको वनी हैं तथा उनकी दीवालें स्वच्छ स्फटिकसे निर्मित हैं ॥३९॥ उनमें ज्योतिषी देवोंकी बत्तीस-बत्तीस देवागनाएँ नृत्य करती हैं जो हाव, भाव और विलाससे युक्त तथा शृङ्गार आदि रसोंको पुष्टिसे सुपुष्ट होती हैं ।।४०।। उसके आगे चार गोपुरोंसे युक्त अत्यन्त सुन्दर वत्रमयी वनवेदी है जो पूर्वोक्त वनोंको चारों ओरसे घेरे हुए है। चार गोपुरोंके आगे चार वीथियाँ हैं और उनके दोनों पसवाड़ोंमें ध्वजाओंकी पंक्तियाँ फहराती रहती हैं ॥४१॥ प्रत्येक विभागमें उन ध्वजा- ओंको पृथक्-पृथक् पीठिकाएँ हैं जो तीन धनुष चौड़ी हैं, चित्र-विचित्र हैं तथा उनपर आधा योजन ऊँचे रत्नमयी बॉस लगे हुए हैं ॥४२।। उन बॉसोंके अग्रभागपर जो पटिया लगे हैं उनमें दश प्रकारकी रग-बिरगी, छोटी-छोटो घण्टियों और चित्रपट्टकोंसे युक्त बड़ी ध्वजाएँ फहराती रहती हैं ।।४।। वे दस प्रकारको ध्वजाएँ क्रमसे मयूर, हंस, गरुड, माला, सिंह, हाथी, मकर, कमल, वैल और चक्रके चिह्नसे चिह्नित होती हैं ॥४४॥ एक दिशा में एक जातिको ध्वजाएँ एक-सौ आठ होती हैं और चारों दिशाओंको मिलकर एक जातिकी चार-सो बत्तीस होती हैं। यह इनकी सामान्य रूपसे संक्षेपमें संख्या बतलायी है ॥४५॥ विशेष रीतिसे एक दिशामें एक करोड़ सोलह लाख चौंसठ हजार हैं और चारों दिशाओंमें चार करोड़ अड़सठ लाख छत्तीस हजार कुछ अधिक हैं ॥४६-४७॥ प्रीति और कल्याणरूप फल देनेवाली वापिकाओंके वीचके मार्गमें दोनों ओर पाँच खण्डकी नृत्यशालाएँ हैं जिनमें भवनवासी देवोंकी देवागनाएँ नृत्य करती हैं ॥४८॥ नृत्य- शालाओंके आगे पाँच-पाँच खण्डके रत्नमयी चार गोपुरोंसे विभूपित स्वर्णनिर्मित दूसरा कोट है ॥४९॥ गोपुरोंके दोनों पसवाड़ोंमें देदीप्यमान सुवर्णके पीठोंपर स्थित, शसके समान मुन्दर कण्ठोंमें पड़ी मालाओंसे सुशोभित मुखोंपर कमल धारण करनेवाले एवं जलसे भरे स्वर्ण- निर्मित मगलकलश दो-दोकी संख्यामें सुशोभित हैं। इस दूसरे कोटके द्वारोंपर भवन वासी देवोंके इन्द्र द्वारपाल हैं जो वेतको छड़ी धारण किये हुए पहरा देते हैं ॥ ५०-५१ ।। गोपुरोंके आगे दो-दो नाट्यशालाएँ हैं और उनके आगे स्वर्णनिर्मित दो-दो धूपघट रखे हुए हैं ।। ५२ ।। उससे आगे चारों दिशाओं में सिद्धोंकी प्रतिमाओंसे युक्त, दो दो सिद्धार्थ १. विलासाद्या म०। २. वनदेविका मः। ३. वृत्तशालाः म.।

। हरिवंशपुराणे सचतुर्गापुरातोऽन्तवेदिका वनपातत'। तोरणान्तरिताः सार्वाः स्तूपा नत्र नवाध्वसु ॥५४॥ पनरागमहास्तूपपर्यन्तेषु सभागृहाः । हेमरत्नमयाश्चि ना मुनिदेवगणोचिताः ॥५५॥ नभःस्फटिकनिर्माणस्ततः सालस्तृतीयकः । चनुचित्रमहारत्नसप्तभूमिकगोपुरः ॥५६॥ विजयो विश्रुतं कीर्तिविमलोदयविश्वधु । वासवीयं वरं चेति पूर्वास्या ख्यापिताष्टधा ॥५७॥ वैजयन्तं शिवं ज्येष्टं वरिष्टानघधारणम् । याम्यमप्रतिघं चेति दक्षिणाख्याष्टधा मताः ।। १८॥ जयन्तामितसारं च सुधामाक्षोभ्यसुप्रमम् । वरणं वरदं चेति पश्चिमाख्याष्टधा स्मृताः ॥५९॥ अपराजितमारयमतुलार्थममोधकम् । उदयं चाक्षयं चोदकावेरं पूर्णकामकम् ॥६०॥ सुररनासनमध्यस्था द्रष्टणां मवदर्शिनः । तद्द्वारोमयपार्थेषु मान्ति मङ्गलदर्पणाः ॥६॥ यैः प्रध्वस्तमहाध्वान्तप्रमावलयभास्वरैः । मास्वतो माममुद्दय भासन्ते गोपुराण्यलम् ॥६२॥ विजयादिपुरद्वा मु द्वा.स्थास्तिष्टन्ति कल्पनाः । यथायथं ज्वलद्भूषा जयकल्याणकारिणः ॥६३॥ शालास्त्रयोऽप्यमी त्देकद्वित्रिकोशोच्छ्यान्मिताः । मूलमध्योपरिव्या मैस्तदर्धार्धसुसम्मिताः ॥६॥ स्वरन्नित्रयहीनोक्तप्रमाणजगतीतलाः । हस्तोद्विद्धाक्ष विस्तीर्णध्यामार्धकपिशीर्षकाः ॥६५॥ ततोऽप्यन्तर्वणं नानातरुवल्लीगृहाकुलम् । मद्यप्रेवागिरिप्रेक्षागृहकोटिविराजितम् ॥६६॥ वेदिकायद्धवीथीषु कल्याणादिजयाजिरम् । कदल्यः कदलीकरूपाः प्रकाशन्तेऽन्तरस्थिताः ॥६७॥ वृक्षोंसे सहित कल्पवृक्षोंका वन वीथियोंके अन्तमें यथारीति स्थित है ।। ५३ ।। तदनन्तर चार गोपुरोंसे सहित, वनकी रक्षा करनेवाली अन्तर्वेदिका है और मार्गोमें तोरणोंसे युक्त, सबका भला करनेवाले नौ-नौ स्तूप हैं ॥ ५४॥ वे स्तूप पद्मराग मणियोंसे निर्मित होते हैं तथा उनके समीप स्वर्ण और रनोंके वने, मुनियों और देवोंके योग्य नाना प्रकारके सभागृह रहते हैं ।। ५५ ॥ सभागृहोंके आगे आकाशस्फटिक मणिसे बना, नाना प्रकारके महारत्नोंसे निर्मित सात खण्डवाले चार गोपुरोंसे सुशोभित तीसरा कोट है ।। ५६ । इस कोटके पूर्व द्वारके विजय, विश्रुत, कीर्ति विमल, उदय, विश्वधुक, वासवीर्य और वर ये आठ नाम प्रसिद्ध हैं ॥ ५७ ॥ दक्षिण द्वारके वैजयन्त, शिव, ज्येष्ठ, वरिष्ठ, अनघ, धारण, याम्य और अप्रतिघ ये आठ नाम कहे गये हैं ॥५८ ।। पश्चिम द्वारके जयन्त, अमितसार, सुधाम, अक्षोभ्य, सुप्रभ, वरुण और वरद ये आठ नाम स्मरण किये गये है।। ५९ ।। और उत्तर द्वारके अपराजित, अर्थ, अतुलार्थ, उदक, अमोघक, उदय, अक्षय और पूर्णकामक ये आठ नाम हैं ॥६० ।। उन द्वारोंके दोनों पसवाड़ोंमें उत्तम ग्नमय आसनोंके मध्यमें स्थित मंगल- रूप दर्पण सुशोभित हैं जो देसनेवालोंके पूर्व भव दिसलाते हैं। ६१ ।। ये दर्पण गाढ़ अन्धकारको नष्ट करने वाले कान्तिके समूहसे सदा देदीप्यमान रहते हैं और उनसे गोपुर सूर्यको प्रभाको तिरस्कृन कर अतिशय शोभायमान होते हैं ।। ६२ । विजयादिक गोपुरीमें यथायोग्य 'जय हो' 'कल्याण हो' इन शब्दोंका उशारण करनेवाले एवं देदीप्यमान आभू. पणोंसे युक्त कल्पवासी देव द्वारपाल रहते हैं । ६३ ।। ये तीनों कोट एक कोश, दो कोश और तीन कोश ऊँचे होते हैं तथा मूल मध्य और ऊपरी भागमें इनकी चौड़ाई ऊँचाईसे आधी होती है । ६४ ॥ इन फोटोंके जगतीतलोंका प्रमाण अपनी ऊँचाईसे तीन हाय कम पहा गया है और उनके ऊपर बने हुए यन्दरके शिरके आकारके कंगूरे एक हाथ तथा एक वितस्ति चौड़े और आधा चेमा ऊँचे कहे गये हैं। ६५ ।। उसके आगे नाना पक्षों और लता- गृहोंसे व्यान, मन, प्रेमागिरि और प्रेक्षागृहोंसे मुशोभित अन्तर्वण हे ॥६६॥ वेदिकाओंसे पद्र पोधियोकि यीचमें कल्याणजय नामका आँगन है और उसमें शाल्मली पृनके समान १. पनराटत म. (?)। २. चित्रमुनि-मः । ३. चनुधिया म०1४, वैजयन्त्यम् । ५ परिन्या- म.,.,... रस्तोनिद्वार म1७.रिलीवान्तमः मा, स०। ८. मामा मः।

सप्तपञ्चाशः सर्गः ६५१ अन्तर्नाटकशाला स्यात्ततः कल्याणसप्रमाः । लोकपालविलासिन्यो यत्र नृत्यन्ति सन्ततम् ॥६॥ तदन्तर भवत्यन्यत्पीठं पीठगुणास्पदम् । प्रोदंशुरनजालास्ततिमिरावलिमण्डलम् ॥६९|| सिद्धार्थपादपाः सन्ति सिद्ध रूपविराजितः । विटपैयाप्य दिक्प्रान्तमिच्छयव स्थितास्ततः ॥७॥ रतूपा द्वादशभूभूषा भूषयन्त्यथ मन्दिरम् । हिरण्मया महामेरुं चत्वारो मेरवो यथा ॥७॥ चतुर्दिग्गोपुरद्वारवेदिकालकृताः शुमाः । चतस्रो विश्वय ज्ञेयाश्चतसूक्ष्वपि वापिकाः ॥७२॥ नन्दाभद्राजयापूणेत्यभिस्याभिः क्रमोदिताः । यजलाभ्युक्षिता. पूर्वा जाति जानन्ति जन्तवः ॥७३॥ ताः पवित्रजलापूर्णसर्वपापरुजाहराः । परापरमवाः सप्त दृश्यन्ते यामु पश्यताम् ॥७॥ श्रथ गम्यूतमुद्विद्धं योजनाधिकविस्तृतम् । कटीमावरण्डस्थकदलीध्वजसकुलम् ।।७५॥ निरन्तरविशनिर्यज्जनद्वारोच्चतोरणम् । त्रिलोकविजयाधानमहो माति जयाजिरम् ॥७६॥ मुक्तावालुकविस्तीर्णप्रवालसिकतान्तरम् । सुरत्नकुसुमैचित्रं हेमाम्भोजैस्तदर्चितैः ।।७।। तपनीयरसालिप्तैस्तपनरिव भूगतैः । तत्र तत्र ययादेश्यं मण्ड्यन्ते पृथुमण्डलैः ॥७॥ प्रासादैमण्डपैश्चान्यैः सुखाबासः सुशोभते । देवासुरनरापूर्णैस्तत्र तत्र विचित्रितम् ॥७९॥ कचिदालेरय हृद्यानि वेश्मानि क्वचिदन्तरे । पुराणाद्भुतभूतीनि चिनारयानान्वितानि च ।।८।। छचित्पुण्यफलप्राप्त्या पापपान च क्वचित् । धर्माधर्मगति साक्षादर्शयन्तीव पश्यतः ॥८॥ ऊँचे एवं अन्तरसे स्थित केलाके वृक्ष प्रकाशमान हो रहे हैं ॥ ६७ ॥ तदनन्तर उन्हीके भीतर नाटकशाला है जिसमें सुवर्णके समान कान्तिको धारक लोकपाल देवोंकी देवाना निरन्तर नृत्य करती रहती हैं ।। ६८ ॥ उनके मध्यमें श्रेष्ठ गुणोंका स्थान तथा ऊँची उठने- वाली किरणोंसे सुशोभित रत्नावलीसे अन्धकारके समूहको नष्ट करनेवाला दूसरा पीठ है ।। ६९ ॥ उसके आगे सिद्धार्थवृक्ष हैं जो सिद्धोंकी प्रतिमाओंसे सुशोभित शासाओंसे इच्छा. । पूर्वक ही मानो दिशाओंको व्याप्त कर स्थित हैं ॥ ७० ॥ उसके आगे एक मन्दिर है जिसे पृथ्वीके आभरण स्वरूप बारह स्तूप उस तरह सुशोभित करते रहते हैं जिस तरह कि मुवर्ण मय चार मेरु पर्वत जन्यूद्वीपके महामेरुको सुशोभित करते रहते है ।। ७१ ॥ इनके आगे चारों दिशाओमें शुभ यापिकाएँ हैं जो चारों दिशाओं में बने हुए गोपुर-द्वारों और वेदिकासे अलंकृत हैं ।। ७२ ॥ नन्दा, भद्रा, जया और पूर्णा ये चार उनके नाम हैं। उन बापिकाओंके जलमें स्नान करनेवाले जीव अपना पूर्व-भव जान जाते हैं ।। ७३ ॥ वे चापिकाएँ पवित्र जलसे भरी एवं समस्त पापरूपी रोगोंको हरनेवाली हैं। इनमे देखनेवाले जीयोंको अपने आगे-पीछेके सात भय दिसने लगते हैं ।। ७४ ॥ यापिकाओके आगे एक जयाङ्गण सुशोभित है जो एक कोश ऊँचा है, एक योजनसे कुछ अधिक चौड़ा है, कटि घरावर ऊँचे वरण्डोंपर स्थित कदली-ध्वजाआंसे व्याप्त है, जिनमें मनुष्य निरन्तर प्रवेश करते और निकलते रहते हैं ऐसे द्वारों और उच्च तोरणांसे युक्त है, तीन लोकको विजयका आधार है, उममें यीच- पीचर्म मूंगाओंकी लाल-लाल वालूका अन्तर देकर मोतियोंको मफेद चालू विछी हुई है, उत्तम रत्नमय पुप्पों और रसे हुए मुवर्ण-कमलोंसे चित्र-विचित्र है। उस जयागगके भूभाग, जहाँ-तहाँ मुवर्ण रससे लिप्त अतएव पृथिर्वापर आये हुए सूर्योके समान दिसनेवाले विशाल वर्तुलाफार मण्डलांसे मुशोभित हैं । जहाँ तहाँ नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित वह जयाद्गण, देव, असुर और मनुष्योंसे परिपूर्ण भवनों,मण्डपो तथा अन्य मुसकर निघामस्थानोंमे मुशो- भित है ।। ७५-७९ ॥ कहीं चित्रोंसे मुन्दर और कहीं पुराणों में प्रतिपादित आश्चर्यकारी विभूनिसे युक्न तथा नाना प्रकार के कथानकांसे सहित भवन यने हैं ।। ८०॥ वे भवन यहीं पुण्यके फलकी प्राप्तिसे देखनेवाले लोगोंको धर्मका साक्षान् फल दिसलाते हैं तो कहीं पापका १.मभागाक.1 - ६५२ हरिवंशपुराणे दानशीलतप.पूजापारम्मास्तत्फलानि च । तद्वियोगविपत्तीश्च तानि श्रद्धापयनयमून् ।।८।। स्फुरत्पुलकसंसक्तमुक्कादामोन्मिपन्मणिः। पताका घण्टिकारीवरमणीयानिलेरितो ।।३।। उदंशुरनमालेन स्फुरन्सी वीचिरणवे । वीक्ष्यते ग्योमनीन्द्रायः पौतुकायेन चामित. ॥८॥ राजतीन्द्रध्वजः मोऽयं तन्मध्ये हेमपोटिकाम् । अलङ्कुर्वन् यथामूनों देहो देवजयश्रियः १८५|| ततः स्तम्भसहस्रस्थो मण्डपोऽस्ति महोदयः । नाम्ना मूर्तिमती यत्र यती श्रुतदेवता ॥८६॥ तां करवा दक्षिणे भाग पोरबहुश्रुततः । श्रुतं न्याकुरते यत्र प्रायसं श्रुतकरली ॥४७॥ तदर्धमानाश्वत्वारस्तत्परीवारमण्डपाः । प्राक्षेपण्यादयो येषु कथ्यन्ते कथकैः कथाः 11८८|| तत्कीर्णकवासेपु चित्रे वाचक्षते स्फुटम् । पयः स्वेष्टमर्थिभ्यः केवलादिमहर्दयः ॥८९|| तपनीयमयं पीठं ततश्चित्रलताचितम् । यत्तद्वल्युपहारेण ययाकालं समच्यते ॥९०।। "पीठाह श्रीपदद्वारं सरत्नकुसुमोकरम् । मण्डलैः पूर्यते मध्ये मागं चन्द्रासप्रमः ।।९।। अभितः स्वाख्यया द्वौ तं मण्डपो स्तः प्रमासकी । अभ्यध्वं राजतो यत्र निधीशी कामदायिन९२।। प्रेक्षाशाले विशाले स्तः प्रमदाख्ये तत्तोऽन्तरें । यन्त्र कल्पनिवासिन्यो नृत्यन्त्यप्सरसः सदा ।।९३॥ विजयाजिरकोणेषु विलसत्तुमालिनः । चत्वारो योजनोद्विदा लोकस्तूपा भरन्त्यमी ५९.४॥ परिपाक दिखाकर अधर्मका साक्षात् फल दिखलाते हैं ।। ८१॥ भवन, उन दर्शकजनोंको दान, शील, तप और पूजाके प्रारम्भ तथा उनके फलोंकी एवं उनके अभावमें होनेवाली विप- त्तियोंकी श्रद्धा कराते हैं ।। ८२ ॥ उस जयाङ्गगके मध्य में मुवर्णमय पीठको अलंकृत करता हुआ इन्द्रध्वज सुशोभित होता है जो ऐसा जान पड़ता है मानो भगवानको विजयलक्ष्मीका मूर्तिधारी शरीर ही हो। उस इन्द्रध्वजमें देदीप्यमान गोले, लटकती हुई मोतियांकी माला और जगमगाते हुए मणियोंसे युक्त एक पताका लगी रहती है । वह पताका वायुसे कम्पित होने के कारण घंटियोंके शब्दसे अत्यन्त रमणीय जान पड़ती है। ऊपर उठती हुई किरणोंसे युक्त रत्नोंकी मालासे सुशोभित वह पताका जब आकाशमें फहराती है तब ऐसी जान पड़ती है मानो समुद्र में लहर ही उठ रही हो । इन्द्रादिक देव उसे बड़े कौतुकसे देखते हैं ।। ८३-८५ ।। उसके आगे एक हजार खम्भोंपर खड़ा हुआ महोदय नामका मण्डप है जिसमें मूर्ति- मती श्रुतदेवता विद्यमान रहती है ।। ८६ ॥ उस श्रुतदेवताको दाहिने भागमें करके, बहुश्रुतके धारक अनेक धोर-वीर मुनियोंसे घिरे श्रुतफेवली कल्याणकारी श्रुतका व्याख्यान करते हैं ।।। महोदय मण्डपसे आधे विस्तारवाले चार परिवार भण्डप और हैं जिनमें कथा कहनेवाले पुरुष आक्षेपिणी आदि कथाएँ कहते रहते हैं ॥ ८८ ॥ इन मण्डपोंके समीपमें नाना प्रकारके फुटकर स्थान भी बने रहते हैं जिनमें बैठकर केवलज्ञान आदि महाऋद्धियोंके धारक ऋपि इच्छुकजनोंके लिए उनकी इष्ट वस्तुओं का निरूपण करते हैं ।। ८९ ॥ उसके आगे नाना प्रकारको लताओंसे व्याप्त एक सुवर्णमय पीठ रहता है जिसको भव्य- जीव नाना प्रकारकी सामग्रीसे समयानुसार पूजा करते हैं ॥९० ॥ उस पीठका श्रीपद नामका द्वार है जो रत्नों और फूलोके समूहसे युक्त है तथा जो मार्गके बीचमे बने हुए सूर्य और चन्द्रमाके समान देदीप्यमान मण्डलोंसे परिपूर्ण है ॥९१॥ उस द्वारके दोनों ओर प्रभासक नामक दो मण्डप है जिनमें मार्गके सम्मुख, इच्छानुसार फल देनेवाले निधियों के स्वामी दो देव सुशोभित रहते हैं ।। ९२ ।। उनके आगे प्रमदा नामको दो विशाल नाट्यशालाएँ हैं जिनमे कल्पवासिनी अप्सराएँ सदा नृत्य करती रहती हैं ।।९३ ॥ विजयाङ्गणके कोनों में चार लोक- स्तूप होते हैं जिनपर पताकाओंकी पंक्तियाँ फहराती रहती हैं, तथा जो एक योजन ऊँचे १.-रावो म०,०,ड०। २ -लेरिता म०,०,ड० । ३. वीभिता ख०,वीक्षिता म०। ४. हेमपी का म० । ५ पीठादी म०,डा० । ६ मध्ये मार्गश्चन्द्रार्क-म०,०,३० । ७. अत्यध्वं म० । ८. तमोऽम्बरे म० ।

सप्तपञ्चाशः सर्गः अधोवेनासनाकारा मल्लरीसममध्यगाः। अर्व मृद संस्थाना. स्वान्ततालामनालिकाः ॥१५॥ स्वच्छस्फटिकरूपास्ते सुम्यक्तान्तनिवेशकाः । श्यते लोकविन्यासो यत्रादर्शतले यया ॥१६॥ मध्यलोकस्वरूपान्तयननिर्माणमूर्तयः । मध्यलोका इति ख्याताः सन्ति स्तूपास्ततः परं ॥९७॥ मन्दरस्तूपनामानो मन्दराकारमास्वराः । चतुःकाण्डचनुर्दिधु चैन्या भान्ति ततोऽपरे ॥९॥ ततोऽन्तःकल्पवासाख्याः कल्पवासिनिवेशिनः। स्तूपास्ते कल्पवासदि साक्षारकुर्वन्ति पश्यताम् ॥१९॥ प्रेवेयकपरास्तेऽन्ये नाम्ना स्तुपास्तथाविधाः । ततो प्रेदेयकाभिरयां दर्शयन्तीव मानवान् ॥१०॥ नवानुदिशनामानस्ततः स्तुपा विराजते । नवानुदिशम'ध्यक्षं पश्यन्ते यत्र प्राणिनः ॥१०॥ विजयादिचतुर्दिक्का विमानोदासिनस्ततः । सर्वार्थदायिनः सन्ति स्तूपाः सर्वार्थसिद्धयः ॥१०२॥ सिदस्तूपाः प्रकाशन्ते ततोऽन्ये स्फटिकामलाः । यत्रैव दर्पणच्छाया दृश्यते सिद्धरूपमार ॥१०३॥ मन्यकूटास्यया स्तूपा मास्वत्कूटास्ततोऽपरे । यानमन्या न पश्यन्ति प्रभावान्धीकृतेक्षणाः ॥१०॥ प्रमोहा नाम सन्त्यन्ये स्तूपा यत्र प्रमोहिताः। विस्मरन्ति यथाप्राह चिराभ्यस्तं च देहिनः ॥१०॥ प्रवोधाख्या मवन्त्यन्ये स्तूपा यत्र प्रबोधिताः । तत्त्वमामाय संसारान्मुच्यन्ते साधबो ध्रुवम् ॥१०॥ एवमन्योऽन्यसंसक्वेदिकातोरणोगबलाः। दश स्तूपाः समुत्तुहाः राजत्योपरिधे. क्रमान् ॥१०॥ ततोऽस्ति कोशविस्तार परिधिर्धनुरुच्छितिः । यत्र मण्डलभूवार्य परियन्ति नरामराः ॥१०॥ रहते हैं ॥९४ ।। ये लोकस्तूप, नीचे वेत्रासनके समान, मध्यमें झालरके समान, ऊपर मृदङ्गके समान और अन्त में तालवृक्षके समान लम्बीनालिकासे सहित हैं ।।९५॥ इनका स्वच्छ स्फटिक- के समान रूप होता है, अतः इनके भीतरकी रचना अत्यन्त स्पष्ट रहती है। इन स्तूपोंमें लोककी रचना दर्पणतलके समान स्पष्ट दिखायी देती है ।।९६ ।। दन स्तूपोंके आगे मध्यलोक नामसे प्रसिद्ध स्तूप हैं जिनके भीतर मध्यलोककी रचना स्पष्ट दिखती है ।। ९७ ॥ आगे मन्दराचलके समान देदीप्यमान मन्दर नामके स्तूप हैं जिनपर चारों दिशाओंमें भगवानको प्रतिमाएँ मुशोभित हैं ।। ९८ ॥ उनके आगे कल्पवासियोंकी रचनासे युक्त कल्प- वास नामक स्तूप हैं। जो देखनेवालोंको कल्पवासी देयोंकी विभूति साक्षात् दिखाते हैं ॥ ९९ ।। उनके आगे वेयकोंके समान आकारवाले अवेयक स्तूप हैं जो मनुष्योंको मानो अवेयकोंकी शोभा ही दिसाते रहते हैं ।।१००|| उनके आगे अनुदिश नामके नौ स्तूप मुशोभित हैं जिनमें प्राणो नौ अनुदिशोंको प्रत्यक्ष देखते हैं ॥१०१॥ आगे चलकर जो चारों दिशाओं में विजय आदि विमानोंसे सुझोभित हैं ऐसे समस्त प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाले मर्वार्थमिद्रि नामके स्तूप हैं ।।१०२॥ उनके आगे स्फटिकके समान निर्मल सिद्धम्तूप प्रकाशमान हैं जिनमें मिद्धोंके स्वरूपको प्रकट करनेवाली दर्पणोंकी छाया दिसायी देती है ॥ १०३ ।। उनके आगे देदीप्यमान शियरोंसे युक्त भव्यकूट नामके स्तूप रहते हैं जिन्हें अमन्य जीव नहीं देख पाते क्योंकि उनके प्रभावसे उनके नेत्र अन्धे हो जाते हैं । १०४ । उनके आगे प्रमोह नामके स्तृप हैं जिन्हें देखकर लोग अत्यधिक विभ्रममें पड़ जाते हैं और चिरकालसे अभ्यस्त गृहीत यन्नुको भी भूल जाते हैं ॥ १०५॥ आगे चलकर प्रबोध नामके अन्य स्तुप हैं जिन्हें देखकर लोग प्रयोधको प्रान हो जाते हैं और तत्त्वको प्राप्तकर साधु हो निश्चित ही संमारमे छूट जाते है ॥ १०६॥ इस प्रकार जिनको वेडिकाएँ एक दुमरेमे सटी हुई है तथा जो नोरणास समुद्रा- मित हैं ऐसे अन्यन्त ऊँचे दास्तूप क्रम-क्रमसे परिधि तक मुशोभित हैं ।। १० । इमके आगे १. नानुदिश अध्पदं घ०, म । नानुदिशनामानि । नरानामनुदिशानां ममाहारो नानुदिरा ग। २. या पश्यन्ति प्रागिन इति पाठःमुष्ट प्रतिमानि । ३. चर्दितु ग., स.1४. सिदिताःमः। ५ पपामास । ६. मुख्यते म.1७. गजन्या. परिधः म.1८.विस्तारं म.1 ६५४ । हरिवंशपुराणे वायाः सप्तदश न्यस्ता गन्यूतैर्वृतमेकतः । कणिकाय तदन्तस्था ज्ञेया सानियोजना ॥१०९॥ परिवेष इवाकं यः परिधिः परिवेष्टते । चित्ररत्नमयोऽन्तस्थं मामुरं परिमण्डलम् ॥११०॥ निर्मित्सानन्तरं मनुव्रजस्योत्पद्यते पुरम् । दिव्यं तत्र प्रभावो हि मनसा ज्ञायिनां महान् ॥११॥ त्रिलोकसारं श्रीकान्तं श्रीप्रभ शिवमन्दिरम् । त्रिलोकीलोककान्तिश्री श्रीपुरं त्रिदशप्रियम् ॥११२|| लोकालोकप्रकाशा द्यौरुदयोऽभ्युदयावहम् । क्षेमं शेमपुरं पुण्यं पुण्याहं पुष्पकास्पदम् ।।११३।। भुवः स्वर्भूस्तपः सत्यं लोकालोकोत्तमं रुचिः । रुचावहमुदारधि दानधर्मपुरं परम् ।।११|| श्रेयः श्रेयस्करस्तीय तीर्थावहमुदग्रहम् । विशालचित्रकूटं धीश्रीधरं च त्रिविष्टपम् ।।११५it मङ्गलोसमकल्याणशरणादिपुराणि पूः । जयापराजितादित्यजयन्त्यचलसंपुरम् ॥१६॥ विजयं तं जयन्तामं विमलं विमलप्रमम् । कामभूर्गगनाभोगं कल्याणं कलिनाशनम् ॥११७॥ पवित्रं पन्चकल्याणं पद्मावतः प्रभोदयः । परायमण्डिता वासी महेन्द्र महिमालयम् ॥११८॥ स्वायम्भुवं सुधाधानी शुद्धावासः सुखावती। विरजा वीतशोकार्थविमला विनयावनिः ॥११९॥ भूतधात्री पुराकल्पः पुराणं पुण्यसंचयः । 'ऋषीवती यमवती रम्नवत्याजरामरा ॥१२०॥ प्रनिष्टा ब्रह्मनिष्टोवीं केनुमालिन्यरिन्दमम् । मनोरमं तमापारमरस्नीरत्नसञ्चयम् ॥१२॥ अयोध्यामृनधानीति समं ब्रह्मपुराख्यया । जातायमुदात्तार्य तत्कल्पजैरुदीयते ॥१२२॥ अथ त्रैलोक्यसारक्सन्दोहमयमद्भुतम् । माति मर्तृप्नभावोत्थं तत्पदं बहु विस्मयम् ॥१२३॥ कृनावधानस्तन्सिद्धि भूयः स्रष्टापि चिन्तयन् । ध्रुवं मोमुद्यतेऽन्यस्य तथा चेत्तत्र का कथा ॥३२॥ एक कोट रहता है जो एक कोश चौड़ा तथा एक धनुप ऊँचा होता है और उसके मण्डलको भूमिको बचाकर मनुष्य तथा देव प्रदक्षिणा देते रहते हैं ॥१०८॥ इस परिधिमें वाहरकी ओर सत्रह कर्णिकाएँ हैं जो एक-एक कोश विस्तृत हैं और भीतरकी ओर एक कर्णिका है जो साढ़े तीन योजन विस्तार वाली है ( ? ) ॥१०९|| जिस प्रकार परिवेप सूर्यको घेरता है उसी प्रकार चित्र-विचित्र रत्नोंसे निर्मित यह परिधि भीतरके देदीप्यमान मण्डलको घेरे रहती है ।।११०।। वहाँ गणधर देवको इच्छा करते ही एक दिव्य पुर बन जाता है सो ठीक ही है क्योंकि मनःपर्यय ज्ञानके धारक जीयोंका प्रभाव महान् होता है ।। १११ ॥ वह पुर कल्पके ज्ञाता मनुष्यके द्वारा त्रिलोकसार, श्रीकान्त, श्रीप्रभु, शिवमन्दिर, त्रिलोकीश्री, लोककान्तिश्री, श्रीपुर, त्रिदशप्रिय, लोकालोकप्रकाशायी, उदय, अभ्युदयावह, क्षेम, क्षेमपुर, पुण्य, पुण्याह, पुष्पकारपट, भुवःस्वर्भूः, तपःसत्य, लोकालोकोत्तम, रुचि, रुचायह, उदारद्धि, दानधर्मपुर, श्रेय, श्रेयस्कर, तीर्थ, तीर्थावह, उदग्रह, विशाल, चित्रकूट, धीश्रीधर, त्रिविष्टप, मगलपुर, उत्तमपुर, कल्याणपुर, शरणपुर, जयपुरी, अपराजितापुरी, आदित्यपुरी, जयन्तीपुरी, अचल- संपुर, विजयान, जयनाम, विमल, विमलभ, कामभू, गगनाभोग, कल्याण, कलिनाशन, पयित्र, पञ्चकल्याण, पद्मावत, प्रभोदय, परार्घ्य, मण्डितायास, महेन्द्र, महिमालय, स्वाय- म्भुष, मुधाधात्री, शुद्धायाम, मुम्बायती, विरजा, बीनशोका, अर्थविमला, विनयावनि, भूत- धामी, पुराकल्प, पुगण, पुण्यमश्चय, पीयतो, यमयती, रत्नयती, अजरामरा, प्रतिष्ठा, ब्रह्मनिष्ठोयी, तुमालिनी, अरिन्दम, मनोरम, तमःमार, अरनी, रलसञ्चय, अयोध्या, अमृत- धानी, प्रह्मपुर, जातामय और उदात्तार्थ नामसे पहा जाता है ॥ ११२-१२२ ।। भगवान्फे प्रभावगे उतान्न यह नगर, तीन लोकके ममम्न श्रेष्ठ पदार्थो ममूहसे युक्त, आधर्यस्वरूप एवं यहुन भाग आधर्य उत्पन्न करता हुआ मुशोभित होता है ।। १२३ ।। उसका बनानेवाला कुयर भी यदि एकाग्रचित्त हो उमफे यनानेका पुनः विचार करे तो यह भी नियमसे भूल फर १ परिध: म., :.। २. परिपेठयते म०, परिभते । ३. मात् म.। ४.रिणीतो क., १.५नुमारियनिन्दित म.1.रामपणा ....| सप्तपञ्चाशः सर्गः ६५५ दशपोडशमिस्तस्य मुरगंमणि तातिभिः । यथास्थानं स्वयं चित्रं निर्माणममिराजते ॥१२५॥ तलं तिस्रो जगत्यश्च तत्र क्रोशाधविस्तृताः । उपर्युपरि तत्र स्यात्परिहाणिव तावती ॥१२६॥ तासां वन्नमयो मिद्धिश्चित्रात्नोज्ज्वला भुवाम् । यत्प्रमा शवापानि तनोति परितः परा ॥२७॥ उरोदना वरण्डास्ते भूषयन्ति ज्वलत्यमाः । जगनीयंत्र राजन्ते कदल्यो धनुरन्तराः ॥१२८॥ त्रिंशदक्षमित': कूटैडिंगुणायतकोष्टकैः । द्विगुणैभूयते तासु दशदण्डान्तरास्थितैः ॥१२९॥ द्वौ द्वौ दौवारिकावासावमितः स्तस्तदन्तिकै । यत्र वैश्रवणस्याः प्रतिद्वारं प्रकाशते ॥१३०॥ कूटानां सप्तशन्यासु द्वासप्तत्यधिका क्रमात् । चत्वारिंशदष्टयुक्ता कोष्ठकानां च सा गणिः ॥१३१॥ द्वाविंशतिशनान्याहुर्विशानि जगनोत्रये । कूटसंख्या समासेन कोष्टकानां च तावती ।।१३२॥ एकाष्टलोकमीमङ्गा नवैकद्विचनुर्मियः। षडस्तिखैकमगाः स्युर्जगतीकेतवः क्रमान् ।।१३३।। विय योनिभीमङ्गश्रेण यः पूर्वकूटगाः । भूपण्मण्डगलव्योमखोकमा मध्यकूटगाः ॥१३॥ खाष्ट टचतुरस्त्यक्षीण्यन्तकूटगता ध्वजाः । कोष्ठगास्तत्र तत्रामो माव्यन्ते ते द्विमंगुणाः ॥१३५।। लक्षा पड्विंशतिजेयाः सहस्राणां च विंशतिः । पट्पञ्चाशद्विश याा तत्सर्वकदलीगणः ॥१३६॥ तत्र सस्त्रेददेशेषु मण्डपा रत्नमण्डिताः । द्वय कान्यूतविस्तारसमुत्सेधाश्चकासति ।।१३७॥ तदर्धव्यासनिर्माणशिखरान्तरवासिनः । सन्ति सन्मङ्गलोद्भासि भूर्तयोर्चा जिनेश्वरा. ॥१३॥ जायेगा फिर अन्य मनुष्यकी तो बात ही क्या है ? ॥ १२४ ॥ उस नगरका निर्माण यथास्थान छब्बीस प्रकारके सुवर्ण और मणियोंसे चित्र-विचित्र है अतः अत्यधिक सुशोभित होता है ॥ १२५ ।। उसके तल भागमें तीन जगती रहती हैं जो आधा-आधा कोश चौड़ी होती हैं और ऊपर-ऊपर उन जगतियोंमें उतनी ही हानि होती जाती है ॥ १२६ ॥ उन जगतियोंकी रचना वनमयी एवं चित्र-विचित्र रत्नोंसे उज्ज्वल है और उनकी श्रेष्ठ कान्ति चारों ओर इन्द्रधनुपोंको विस्तृत करती रहती है ॥ १२७॥ छाती प्रमाण ऊँचे तथा देदीप्यमान प्रभाके धारक वरण्डे उन जगतियोंको सुशोभित करते रहते हैं तथा उनपर एक धनुपके अन्तरसे स्थित सुशोभित पताकाएं हैं ।। १२८ ।। उन जगतियोंमें तीस-तीस वितस्तियोंके कूट और उनसे द्विगुण आयामवाले दश-दश धनुपोंके अन्तरसे स्थित कोष्ठक रहते हैं ।। १२९ ।। उन जगतियोंके समीप दोनों ओर द्वारपालोंके दो-दो आवासस्थान हैं जिनमें प्रत्येक द्वारपर कुवेरकी अपूर्व धनराशि प्रकाशमान है ॥ १३० । प्रत्येक जगतीके कूटोंकी संख्या सात-सी बहत्तर है तथा कोष्ठकोंकी संख्या अड़तालीस है ।। १३१ ।। संक्षेपसे तीनों जगतियोंकी कूटसंख्या वाईस-सी वीस है और कोष्ठोंकी संख्या उसी प्रमाणसे है ।। १३२ ।। प्रथम जगतीमें बत्तीस हजार तीन सौ इक्यासी, दूसरीमें चौबीस हजार दो सौ उन्नीस और तीसरीमें इकतीस हजार छप्पन ध्वजाएं रहती हैं ।। १३३।। पूर्व कूदों में दो लाख यत्तीस हजार चार सौ सत्तर, मध्यम कूटोंमें सान लाख इकसठ हजार एक सी, और अन्तिम कूटोंमें दो लाख चौवन हजार आठ सौ अस्सी और कोप्टकोंमें दूनी दूनी हैं ।। १३४-१३५ ।। इस प्रकार समस्त ध्वजाओंकी संख्या छन्बीस लाख बीस हजार दो सौ छप्पन है ॥ १३६ ।। वहाँ सस्वेद प्रदेशों (?) में रत्नोंसे मण्डित अनेक मण्डप हैं जो दो कोस चौड़े और एक कोस ऊँचे हैं ।। १३७ ।। जिनकी रचना मण्डपोंसे आधी चौड़ी है, ऐसे शिखरोंके मध्य भागमें विराजमान जिनेन्द्र भगवानको प्रति- १. वितस्ति (ङ० टि०)। २. ३२३८१ । ३. २४२१६ । ४. ३१०५६ । ५. २३२४७० । ६.७६११०० । ७. २५४८८० । पदेन सत, षट्पदेन पद, मण्डः पिच्छवाची तेन एकः, गल. कण्ठयाची वेन पकः, व्योमन्व पदाम्या शन्यद्वयम् , यानि सर्वत्र अनानां वामतो गतिरिति नियम. तयारि अत्र उत्तमशन्देन उपरि उल्लेख: तेन पूर्वोक्ता संख्या नि सरति । ८. श्रमा-सह । ९. मवेददेशेषु म ।

६५६ रिवंशपुराणे तत्रस्था अपि तहेशाद्विनिकम्य नमस्यमी । यथोपदिष्टा दृश्यन्ते सन्मुखीभूय पश्यताम् ॥१३९॥ पीठानि त्रीणि भास्वन्ति चतुर्दिक्षु भवन्ति तु । चत्वारि च सहस्राणि धर्मचक्राणि पूर्वके ॥१४०॥ द्वितीये तु महापीठे शिखिहंसध्वजेतरे । अष्टौ तिष्ठन्ति दिग्मागान्भासयन्तो महायजाः ॥११॥ अग्रे श्रीमण्डपोदासी प्रासादो बहुमङ्गलः । गन्धकुव्यमिधानः स्यात्तत्र सिंहासनं विमो ॥१४॥ तत्रासीनं जिनाधीशं नृसुरासुरकोटयः । तुष्टुवुस्तुष्टचिशास्ता मकुटन्यस्तपाणयः ॥१३॥ विजयस्व महादेव ! विजयस्व महेश्वर । विजयस्व महाबाहो! विजयस्व महेक्षण ॥१४॥ इत्यादि स्तुतिकोटीनामन्ते प्रव्रज्य तरक्षणात् । गणिनामप्रणी॥तो घरदत्तो गणाधिपः ।।१४५।। पट्सहस्रनृपस्त्रीमि सह राजीमती तदा। प्रवग्याप्रेसरी जाता सार्यिकाणां गणस्य तु ॥१४६।। यतिवर्गादयः सर्वे गणा द्वादश ते ततः । प्रणिपत्य यथास्थानं तं प्रभुं समुपासते ।।१४७॥ परिपर्यध्वनस्तस्मिन्पदेषु द्वादशस्वमी । पूर्वदक्षिणमागादिष्वासतेऽनप्रदक्षिणम् ॥१४॥ तत्र प्रत्यक्षधर्माणो धर्मशांशा इवामलाः । मासन्ते वरदस्याने वरदत्तादियोगिनः ॥१४९।। भर्नु भूतयो वाह्यास्तदन्तर्भूतितः प्रति । रामन्ते कल्पवासिन्यो युक्ता नन्मूर्त यो यथा ॥१५०।। हीदयामान्तिशान्त्यादिगुणालंकृतसम्पदः । समेत्योपविशनत्यार्या सद्धर्मतनया यथा ॥१५॥ माएँ हैं जो उत्तम मंगल द्रव्योंसे सुशोभित हैं ।।१३८।। यद्यपि ये प्रतिमाएं अपने-अपने स्थान- पर स्थित हैं तथापि सामने खड़े होकर देखनेवालोंको ऐसी दिखायी देती हैं मानो उन स्थानोंसे निकलकर आकाशमें ही विद्यमान हों ॥ १३९ ॥ वहाँ चारों दिशाओं में देदीप्यमान तीन पीठ होते हैं उनमें पहले पीठपर चार हजार धर्मचक्र सुशोभित हैं ॥१४०॥ दूसरी महापीठपर मयूर और हंसोंकी ध्वजाओंसे भिन्न आठ प्रकारकी महाध्वजाएँ दिशाओंको सुशोभित करती हुई विद्यमान हैं ॥१४॥ तीसरी पीठपर श्रीमण्डपको सुशोभित करनेवाला अनेक मङ्गलद्रव्योंसे सहित गन्धकुटी नामका प्रासाद है उसमें भगवानका सिंहासन रहता है ॥१४२॥ उस सिंहासनपर विराजमान जिनेन्द्रदेवको सन्तुष्ट चित्तके धारक मनुष्य सुर और असुरोंके झुण्डके झुण्ड मुकुटोंपर हाथ लगाकर स्तुति करते थे ।।१४३।। वे कह रहे थे कि हे महादेव ! आपकी जय हो। हे महेश्वर ! आप जयवन्त हो, हे महाबाहो ! आप विजयी हों, हे विशालनेत्र ! जयवन्त हों ॥१४४|| इत्यादि करोड़ों स्तवनोंके वाद वरदत्तने तत्काल दीक्षा ले ली और गणोंके स्वामी प्रथम गणधर हो गये ॥१४५।। उसी समय छह हजार रानियोंके साथ दीक्षा लेकर राजीमती आर्यिकाओंके समूह- की प्रधान बन गयी ४१४६६१ मुनिसमूहको आदि लेकर बारह गण भगवान् नेमिनाथफो प्रणाम कर यथास्थान उनकी उपासना करते थे ।।१४०॥ मार्ग के चारों ओर घेरकर बारह सभाएँ उनकी पूर्व दक्षिण आदि दिशाओं में मुनिसमूहको आदि लेकर बारह गण विराजमान थे ।।१४८॥ वहाँ उत्कृष्ट वरको प्रदान करनेवाले भगवान् नेमिनाथके आगे वरदत्तको आदि लेकर अनेक मुनि सुशोभित थे जो धर्मके स्वरूपको प्रत्यक्ष करनेवाले एवं अत्यन्त निर्मल धर्मेश्वरके अंशके समान जान पड़ते थे ॥१४९|| उनके आगे कल्पवासिनी देवियाँ सुशोभित थीं जो ऐसी जान पड़ती थीं मानो भगवान्की वाह्याभ्यन्तर विभूतियाँ ही उनका रूप रख फर स्थिन हो ॥१५०।। उनके बाद तीसरी समा लज्जा, दया, क्षमा, शान्ति आदि गुणरूपी सम्पत्तिसे सुशोभित आर्यिकाएँ विराजमान थों जो समोचीन धर्मको पुत्रियोंके समान १. तत्रस्यापि । २. दिग्भागा म. 1 ३. मएडोदासी म०, ३० । ४. श्रुति म० । ५. भासते म० । ६. व्यतं तन्मूर्तयो यथा म०, ३० । तदर्भ ख०।

सप्तपश्चाशः सर्गः ઉપ૦ घोतिर्मण्डलवासिन्या मनुंज्योतिष्टमप्रमाः । अभिनन्धतदुमतविमामासश्वकासति ।।१५२॥ वनधियो यथा मूर्ता वानव्यन्तरयोपितः । वन्यपुष्पलतानम्रा नमन्ति वरदक्रमम् ॥१५॥ मवनालयवासिन्यो भगवत्यतिमात्रयः । स्वभूर्भुवो यथा लक्ष्यः समया तं समामते ॥१५४॥ भावनाः पापबन्धस्य छेत्तारं निकया सते । विभ्यतः स्वमवादासरफवारनविमारणाः ॥१५५॥ न्यन्तराः सुन्दराकारा मन्दरस्येवं कल्पकाः । भवन्ति मर्तुराकल्पाः सुमनोमालमारिणः ॥१५६|| परमेश्वरमामास्वप्रमा मास्करादयः । ज्योतिर्गणाः प्रमादि प्रार्थयन्ते तमानताः ।।५।। सौन्दयेंगाः मुसामानो भागा मतुंरिवोद्यताः । 'स्वर्भुवः प्रविमासन्ते महनाभपुरस्सराः ॥१५॥ दानपूजादिधमाशा देहवन्तो यथामलाः । वरदं वरिवस्यन्ति नृपाश्चक्रधरादयः ।।१५९।। अविद्यारिमायादिदोषापायाप्ततद्गुणाः । हरीमाद्या विमान्स्यन्ये तिर्यवस्तादृशो यया ॥१६॥ एवं द्वादशवायदिशागगुणोपमैः । परीस्योतक्रमादीशो गणैरेमिरपासितः ॥१६॥ पारमेष्टयमनन्यस्थं स्यापयशासनधिया। चामरैरमरोतः क्रमस्यैः सुमहेशिताम् १६२।। जान पड़ती थीं ११५११ चौथी सभामें प्रशंसनीय एवं अपने-आपसे निकलनेवाली प्रभासे सुशोभित ज्योतिपी देयोंकी स्त्रियाँ बैठी थीं जो भगवान्की कान्तिके समान जान पड़ती थीं ॥१५२।। पाँचवीं सभामें मूर्तिधारिणी वनकी लक्ष्मीके समान सुन्दर बनवामी व्यन्तर देवों की स्त्रियाँ स्थित थीं तथा वे वनकी पुष्पलताओंके समान नम्रीभूत हो भगवान्के चरणोंको नमस्कार कर रही थीं ॥१५३।। छठी सभामें भगवानको अत्यधिक भक्तिसे युक्त भवनवासी देवोंकी अगनाएँ स्थित थी जो ऐसी जान पड़ती थीं मानो स्वर्ग, भूमि और अधोलोककी लक्ष्मियाँ ही भगवान्के समीप आकर बैठी हैं ।। १५४ ।। सातवीं सभामें फणाके देदीप्यमान रनोंको कान्तिसे लाल-लाल दिखनेवाले भवनवासी देव, अपने संसारसे भयभीत होते हुए, पापबन्धका छेदन करनेवाले भगवान के समीप विद्यमान थे ।।१५५।। आठवीं सभामें मुन्दर आकारके धारक व्यन्तर देव बैठे थे। वे भगवान्के आभूपण स्वरूप थे, तथा फूलोंकी मालाओं- को धारण करनेवाले मन्दरगिरिके समान जान पड़ते थे ॥१५६।। नवमी समामें, जिनकी अपनी प्रभा भगवान्की प्रभाग निमम हो गयी थी ऐसे सूर्य आदि ज्योतिषी देवोंके समूह नम्रीभूत हो भगवान्से अपनी प्रभावृद्धिकी प्रार्थना कर रहे थे ॥१५७॥ दसवीं सभामें सौन्दर्य- के स्वामी, सुखी एवं ऊपर उठे हुए भगवानके अंशोंके समान इन्द्र आदि कल्पवासी देव मुशोभित हो रहे थे ।।१५८।। ग्यारहवीं सभामें चक्रवर्ती आदि राजा भगवान्को उपासना करते थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो शरीरधारी दान-पूजा आदि धर्मकि निर्मल अंश हो हो ॥१५९।। तथा बारहवीं सभामें, जिन्हें अविद्या, वैर, माया आदि दोषोंके नष्ट हो जाने- से विद्या, क्षमा आदि तत्तद्गुण प्राप्त हुए थे ऐसे सिंह, हाथी आदि तिर्यन्त्र विद्यमान थे और वे ऐसे जान पढ़ते थे मानो उन्हींके समान दूसरे तिर्यच हों। भावार्थ-तिर्यञ्च अपनी स्वाभाविक कुटिलताको छोड़कर तदाकार होनेपर भी ऐसे लगते थे जैसे ये वे न हों दूमरे ही हो ॥१६०। इस प्रकार द्वादशागके गुणोंके समान बारह सभाओं-सम्बन्धी बारह गण, प्रदक्षिणा म्पसे भगवान्की उपासना करते थे ।।१६१।। भगवान नेमिनाथ, अपने सिंहासनको शोभासे दूसरोंमें न पाये जानेवाले परमेष्ठीपना- १. ज्योतिर्मण्डल-क०। २. भगवत्पतिभक्तयः म०, भचयः .. ३. समयान्नं मा, सं भगवत समया समीपे 'अभितःपरित.समयानिकपाडाप्रतियोगे:पि' इति द्वितीया । ४. मन्दरेस्येय म.। ५. सौन्दर्येण म०। ६. पोत्पन्नाः फल्यासिदेवाः ।

हरिवंशपुराणे त्रिलोकाधीशितां छत्रत्रयेणेन्दुप्रयस्विषा । मामण्डलेन माधिक्यं मवान्तरतमश्छिदा ।।१६३|| सर्वतुंकुमुमेनान्यसर्वशोकापहारिताम् । अशोकनामिपूज्यत्वं सुमनोवृष्टिपूजया ॥१६॥ सार्वत्वममयाधानघोषणेन जयश्रियाम् । नन्दिमागलघोपेण साधुचित्तामिनन्दिनम् ॥१५॥ आरमाधोनाः प्रतीहाराः प्रातिहार्यगुणोद्भवैः । भूषितोऽष्टमहोदप्रप्रातिहार्यमहेश्वरः ॥१६६॥ लोकानां भूतये भूतिमारमीयां सकलां दधत् । सर्वलोकातिवर्तिन्या मासास्थानमधिष्ठितः ॥१६॥ भयमास्ते समग्रारमा स्वार्थकामाः समभ्रमाः । एतैत नमतेशानमित्याह्वान सघोषणम् ॥१६॥ वर्तयन्ति सुरास्तस्मिन्मण्डले तदनु दतम् । समन्तात्तत्समायान्ति भूतिमिन्सुरासुराः ॥१६९॥ तद्दष्टिगोचरे महक्षु पाहनेभ्योऽवतीर्यते । मानाङ्गणमथास्थाय पूर्व साञ्जलिमौलिमिः ।।१७०॥ तत्र बाह्ये परित्यज्य वाहनादिपरिच्छदम् । विशिष्ट कुदैर्युक्ता मानपीठ परीत्य ते ॥१७॥ प्रादक्षिण्येन वन्दिस्वा मानस्तम्मनमादितः । उत्तमाः प्रविशस्यन्तरुसमाहितमक्तयः॥ १७२।। पापशीला विकर्माणा. शूद्राः पाखण्डपण्डकाः । विकलाङ्गेन्द्रियोद्धान्ताः परियन्ति बहिस्ततः ॥१०॥ छत्रचामरभृङ्गारायवहाय जयाजिरे । प्राप्तरनुगताः कृत्वा विशन्त्यञ्जलिमीश्वराः ॥१७॥ को ख्यापित कर रहे थे। क्रमपूर्वक ढोरे जानेपर देवोपनीत चमरोंसे महेशिताको, तीन चन्द्रमाके समान कान्तिको धारण करनेवाले छत्रत्रयसे तीन लोकके स्वामित्वको, संसारके आन्तरिक अन्धकारको नष्ट करनेवाले भामण्डलसे कान्तिको अधिकताको, सब ऋतुओंके फूलोसे युक्त अशोक वृक्षके द्वारा अन्य समस्त जीवोंके शोक दूर करनेकी सामर्थ्यको, पुष्पवृष्टि रूप पूजाके द्वारा पूज्यताको, अभयोत्पत्तिको घोषणा करनेवाली दिव्यध्वनिसे जयलक्ष्मीको सर्वहितकारिताको और आनन्ददायी मङ्गलमय वादिनोंके नादसे साधुजनोंके चित्तको आनन्दित करनेकी सामर्थ्यको प्रकट कर रहे थे ॥१६२-२६५॥ जो आत्माके आधीन हो उन्हें प्रतीहार कहते हैं। इस प्रकार आत्माधीन गुणोंसे उत्पन्न अष्ट महाप्रातिहार्योंसे भगवान् नेमिनाथ सुशोभित हो रहे थे॥१६६।। आत्मोत्य समस्त विभूतिको धारण करनेवाले भगवान् सर्वलोकातिवर्ती दीप्तिसे लोगोंका कल्याण करनेके लिए समवसरणमें विराजमान हुए ॥१६॥ उस समय देव लोग घोषणाके साथ यह कहकर जीवोंका आह्वान कर रहे थे कि हे आत्म- हिनके इच्छुक भव्यजनो! सम्पूर्ण विकसित आत्माको धारण करनेवाले केवली भगवान् यह विराजमान हैं, शीघ्रतासे यहाँ आओ-आओ और इन्हें नमस्कार करो॥१६८।। इस प्रकार जब देवोंने आह्वान किया तब शीघ्र ही मनुष्य, देव और असुर वैभवके साथ सब ओरसे समव- सरणमें आने लगे ॥१६९।। समवसरणके दृष्टिगोचर होते ही वे मानाङ्गणमें खड़े हो सबसे पहले हाथ जोड़ मस्तक- से लगाकर वाहनोंसे नीचे उतरते हैं ॥१७॥ तदनन्तर वाहन आदि परिप्रहको बाहर छोड़ कर विशिष्ट राज्यचिह्नोंसे युक्त हो मानपीठकी प्रदक्षिणा देते हैं ॥१७१|| प्रदक्षिणाके बाद सबमे पहले मानस्तम्भको नमस्कार करते हैं तदनन्तर हृदयमें उत्तम भक्तिको धारण करते हुए उत्तम पुरुप भीतर प्रवेश करते हैं ॥१७२।। और पापी, विरुद्ध कार्य करनेवाले, शूद्र, पासण्डी, नपुंसक, विकलाग, विकलेन्द्रिय तथा भ्रान्त चित्तके धारक मनुष्य बाहर ही प्रदक्षिणा देते रहते हैं ॥१७३। मुरेन्द्र, असुरेन्द्र तथा नरेन्द्र आदि उत्तम पुरुष छत्र, १. पूज्यन्ते म.। २ अधिष्ठितं म०। ३. सार्थकामा. म०। ४. विशिष्ट काकुदै-म० 'स्त्री कबुत ककुदो प्यत्री ने राज्यलक्ष्मणि' इति विश्वलोचनः । ५. मानातम्ममनादित. म०। ६. नपुंसकाः (२. दि०) पाण्डवाः म., ग०। ७. मिन्छाइहि अमम्बा तेमुमसण्णी ण होति आइ । तह य भणी माया मंदिसा पिपिपिपरी ॥ ३२ ॥ त्रैलोक्यमगतो चतुर्थ उधिकारः। मिथ्यादृष्टिरमभ्योऽसंशी बीयोऽत्र विधते नै । यभानप्परसायो य सन्दिग्धो विपर्यस्तः !! ५८॥-समवसरणस्तोत्रे । चमर सप्तपञ्चाशः सर्गः ६५९ प्रविश्य विधिवद्भक्त्या प्रणम्य मणिमौलयः । चक्रपीठं समारा परियन्ति निरीश्वरम् ॥१७५॥ पूजयन्तो यथाकामं स्वशक्निविभवार्चनैः । सुरासुरनरेन्द्राधाः नामादेशं नमन्ति च ॥१७६॥ ततोऽवतीर्य सोपानः स्वैः स्वैः स्वालिमालयः । रोमाञ्चव्यक्तहस्तं यथास्थानं समासते ॥१७७॥ अभ्यक विकसदाति कमलाकरमण्डलम् । यया तथा जिनाम्यक 'तद्गणाम्बुजमण्डलम् ॥१७॥ सा सेना सर्वतः सर्वा प्रविशन्ती तदास्पदम् । नालं पूरयितुं पूर्णा नदीव वरुणास्पदम् ॥१७९॥ नियंदायद्विारपश्यरपरीयत्प्रीणदानमत् । स्तुवदीशं सतां न्दं सततं सत्र वर्तते ॥१८॥ न मोहो न भयद्वेपो नोरकण्ठारतिमत्सराः । अस्यां भद्रप्रमावेण जम्माजृम्मा न संसदि ॥१८॥ निद्रावन्द्रापरिक्लेशक्षुत्पिपासाऽसुखानि न । 'नास्त्यन्यच्चाशिवं सर्वमहरेव च सर्वदा ॥१८२॥ मालिनीछन्दः समवसरणभूमी वाह्यभूत्येकभूमी स्थितवति मुनिनायेऽत्रान्तरजागिपूतों। पिवति तृषितनेत्रीदशानां गणानां समितिरमृतरूपं जैनरूपाम्बुराशिम् ॥१८३॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य फूतो समवसरणवर्णनो नाम सप्तपञ्चाशः सर्गः॥ ५७॥ और श्रृंगार आदिको जयाङ्गणमें छोड़कर आप्तजनोंके साथ हाथ जोड़कर भीतर प्रवेश करते हैं ।।१७४॥ मणिमय मुकुटोंको धारण करनेवाले वे सब, भीतर प्रवेश कर विधिपूर्वक प्रणाम करते हैं और चक्रपीठपर आरूढ होकर भगवान् जिनेन्द्रकी तीन चार प्रदक्षिणा देते हैं ।।१७।। इच्छानुसार अपनी शक्ति और विभवके अनुकूल सामग्रीसे पूजा करते हुए अपने नामका उल्लेख कर नमस्कार करते हैं ।।१७६॥ तदनन्तर जिन्होंने अपनी अञ्जलियाँ मस्तकसें लगा रखी हैं और रोमाञ्चोंसे जिनका हर्ष प्रकट हो रहा है. ऐसे वे मव अपनी-अपनी सीढ़ियोंसे नीचे उतर कर सभाओंमें यथास्थान बैठते हैं ।।१७७। जिस प्रकार सूर्यके सम्मुख खिला हुआ कमलोंका समूह सुशोभित होता है उसी प्रकार जिनेन्द्र भगवानरूपी सूर्यके सम्मुख वह गण- रूपी-द्वादश सभारूपी कमलोंका समूह मुशोभित हो रहा था ।।१७८। जिस प्रकार नदी समुद्र- को मरनेमें समर्थ नहीं है उसी प्रकार सब ओरसे समवसरणमें प्रवेश करती हुई वह सेना उसे भरने में समर्थ नहीं थी ।।१७९|| वहाँ बाहर निकलता, आता, प्रवेश करता, दर्शन करता, प्रदक्षिणा देता, सन्तुष्ट होता, भगवानको प्रणाम करता और उनकी स्तुति करता हुआ सज्जनों- का समूह सदा विद्यमान रहता है ।।१८०॥ समवसरणके भीतर भगवान के प्रभावसे न मोह रहता है, न राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं, न उत्कण्ठा, रति एवं मात्सर्यभाव रहते हैं, न अंगड़ाई और जमुहाई आती है, न नोंद आती है, न तन्द्रा सताती है, न क्लेश होता है, न भूख लगती है, न प्यासका दुःख होता है और न सदा समस्त दिन कभी अन्य समस्त प्रकारका अमङ्गल ही होता है ।।१८२-१८२।। वाह्य विभूतिके अद्वितीय स्थान समयमरण भूमिमें जय अन्तरङ्ग आत्माको पवित्रतासे युक्त भगवान् विराजमान होते हैं तब बारह समाओंका समूह अपने तृपित नेत्रोंसे उनके अमृतरूप सौन्दर्य सागरका पान करता है ।।१८।। इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें समवसरणका वर्णन करनेवाला सत्तावनवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५॥ १. तद्गुणाम्बुज-म० । २. नात्यभ्याशियं म०, नास्त्यन्यथा क० । ३. अातंकरोगमरण पुचीभी येरकामबाधाओ। तहानुहपीडामो नियमाप्पेण ण हवंति ॥३३॥० प्र० । ४. गादिपूती म. 1 । अष्टपञ्चाशः सर्गः एवं नित्योत्सवानन्तकल्याणकास्पदे पदे। लोके धर्म प्रशुश्रूषों कृताञ्जलिपुटे स्थिते ॥१॥ वदतां वरमानम्य पादत्तो गणाग्रणोः । हितं पप्रच्छ मन्यानां समस्तानां जिनेश्वरम् ॥२॥ तव्यभानन्तरं भातुश्रतुर्मुखविनिर्गता । चतुर्मुखफला सार्या चतुर्वर्णाश्रमाश्रया ॥३॥ चतुरस्रानुयोगानां चतुर्णामेकमातृका । चतुर्विधकथावृत्तिश्चतुर्गतिनिवारिणी ॥४॥ एकद्वित्रिचतु परषट्सप्ताष्टनवास्पदा । अपर्यायापि सत्तेवानन्तपर्यायभाविनी ॥५॥ अहित शातयन्ती सा रोचयन्ती हितं सदा । स्थापयन्ती च तत्पात्रे धारयन्ती यधायथम् ॥६॥ वारयन्स्यशुमादाशु पूरयन्ती शुभं परम् । श्लथयन्त्यर्जित कर्म ग्लपयन्ती प्रभावतः ॥७॥ समन्ततः शिवस्थानाघोजनाधिकमण्डले । अत्रैवात्रैव वृत्तेति तत्र तत्रास्ति ताशी' neu इस प्रकार नित्य उत्सव और अनन्त कल्याणोंके एक स्थानस्वरूप समवसरणमें जब धर्म मुननेके इच्छुक जोय हाथ जोड़कर बैठ गये तब वरदत्त गणधरने वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्री नेमि जिनेन्द्रको नमस्कार कर समस्त भव्यजीवोंका हित पूछा। भावार्थ-हे भगवन् ! समस्त जीवोंके लिए हित रूप क्या है, ऐसा प्रश्न किया ॥ १-२॥ गणधरके उक्त प्रश्नके अनन्तर भगवानकी दिव्यध्वनि खिरने लगी। भगवानकी वह दिव्यध्वनि चारों दिशाओंमें दिखनेवाले चार मुखोंसे निकलती थी; चार पुरुषार्थरूप चार फलको देनेवाली थी, सार्थक थी, चार वर्ण और चार आश्रमोंको आश्रय देनेवाली थी, चारों ओर सुनायी पड़ती थी, चार अनुयोगोंकी एक माता थी, आक्षेपिणी, विक्षेपिणी, संवेजिनी और निर्वेदिनी इन चार कथाओंका वर्णन करनेवाली थी, चार गतियोंका निवारण करनेवाली थी। एक, दो, तीन, चार, पॉच, छह, सात, आठ और नौका स्थान थी, अर्थात् सामान्य रूपसे एक जीवका वर्णन करनेवाली होनेसे एकका स्थान थी, श्रावक और मुनिके भेदसे दो प्रकारके धर्मका अथवा चेनम-अचेतन और मूर्तिक अमूर्तिकके भेदसे दो द्रव्योंका निरूपक होनेसे दोका स्थान थी, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्ररूपी रत्नत्रय अथवा चेतन, अचेतन और चेतना- चेतन द्रव्योंका वर्णन करनेवाली होनेसे तीनका स्थान थी, चार गति, चार कपाय अथवा मिथ्यात्वादि चार प्रत्ययोंका निरूपण करनेवाली होनेसे चारका स्थान थी, पाँच अस्तिकाय अथवा प्रमाद-सहित मिथ्यात्वादि पाँच प्रत्ययोंका वर्णन करनेवाली होनेसे पाँचका स्थान थी, छह द्रव्योंका वर्णन करनेवाली होनेसे छहका स्थान थी, सात तत्त्वोंको निरूपक होनेसे सातका स्थान थी, आठ कर्मोका निरूपण करनेवाली होनेसे आठका स्थान थी और सात तत्व तथा पुण्य-पाप इन नौ पदार्थोका वर्णन करनेवाली होनेसे नौका स्थान थी। पर्याय-रहित होनेपर भी सत्ताके समान अनन्त पर्यायोंको उत्पन्न करनेवाली थी, अहितको नष्ट करनेवाली थी, सदा हितको रुचि उत्पन्न करानेवाली थी, हितका स्थापन करनेवाली थो, पात्रमें यथायोग्य हितको अपने प्रभावसे धारण करने वाली थी, अशुभसे शीघ्र हटानेवाली थी, उत्कृष्ट शुभको पूर्ण करने, वाली थी, अजित फर्मको शिथिल करनेवाली अथवा बिलकुल ही नष्ट करनेवाली थी । जहाँ भगवान् विराजमान थे वहाँसे चारों ओर एक योजनके घेरामें इतनी स्पष्ट सुनायी पड़ती थी जैसे यहीं उत्पन्न हो रही हो। वह दिव्य ध्वनि जैमी उत्पत्तिस्थानमें सुनायी पड़ती थी वैसी ही एक योजनफे घेरामें सर्वत्र मुनायी पड़ती थी-उसमें होनाधिकता नहीं मालूम होती थी, मधुर १. प्रकग भोमिन्छौ । २. -मानत्यम.क., ग.। ३. विनिगते म०। ४. संमारः संसारफारण- मरितम् (..टि.)। ५ मोदी मोदकारण रितम् नः । ६ तारा क, ग., म.।

अष्टपञ्चाशः सर्गः मधुरस्निग्धगम्भीरदिन्योदात्तस्फुटाक्षरम् । वर्ततेऽनन्यवृत्तका तत्र साध्वी सरस्वती ॥९॥ भावामावद्वयाद्वैतभाववदा जगत्स्थितिः । अहेतुर्दश्यते तस्यामनाद्या पारिणमिकी ॥१०॥ अस्त्यात्मा परलोकोऽस्ति धर्माधर्मोस्त एव च । तयोः कर्तास्ति मोक्तास्ति चास्ति नास्तीति यत्पदम्॥११॥ स्वयं कर्म करोत्यामा स्वयं तत्फलमश्नुते । स्वयं भ्राम्यति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते ॥१२॥ अविद्यारागसंक्लिप्टो वम्भ्रमीति भवार्णवे । विद्यारैराग्यशुद्धः सन् सिदयत्यविकलस्थितिः ॥१३॥ इत्याध्यात्मविशेषस्य दीपिका दीपिकैव सा । रूपादेः शमयस्याशु तमित्रं तत्र सन्ततम् ॥१४॥ अनानारमापि तवृत्तं नाना पात्रगुणाश्रयम् । सभायां दृश्यते नाना दिव्यमम्बु यथावनौ ॥१५॥ सावधानसमान्तस्थं ध्वान्तं सावरणं ध्वनिः । जैनोत्यकर्कोभिनदिन्यो विश्वात्मत्यादिमासन. ॥१६॥ भवपद्धतिपान्थस्य मन्यताशुद्धियोगिनः । देहिनः पुरषार्थोऽय प्रेक्षितो मोक्षलक्षणः ॥१७॥ उपायस्तस्य मोक्षस्य ध्यानाध्यानकहेतुतः । प्राक्सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रितयात्मकः ॥१८॥ सम्यग्दर्शनमत्रैष्टं तत्त्वश्रद्धानमुज्ज्वलम् । न्यपोढसंशयाद्यन्तनिशेषमलसकरम् ॥१९॥ तच दर्शनमोहान्धक्षयोपशममिथ्रजम् । क्षायिकाद्यं त्रिधा द्वधा निसर्गाधिगमस्वतः ॥२०॥ स्निग्ध, गम्भीर, दिव्य, उदात्त और स्पष्ट अक्षरोंसे युक्त थी, अनन्यरूप थी, एक थी और साध्वी-अतिशय निर्मल थी॥३-९।। भगवानकी उस दिव्यध्वनिमें जगत्को वह स्थिति दिख रही थी जो भाव और अभाव- के अद्वैत-भावसे बँधी हुई है अर्थात् द्रव्यार्थिक नयसे भाव रूप और पर्यायार्थिक नयसे अभाव रूप है, अहेतुक है-किसी कारणसे उत्पन्न नहीं है, अनादि है और पारिणामिकी है- स्वतः सिद्ध है ।।१०।। आत्मा है, परलोक है, धर्म और अधर्म हैं, यह जीव उनका कर्ता है, भोक्ता है तथा संसारके सब पदार्थ अस्ति रूप और नास्ति रूप हैं, यह कथन भी उसी दिव्य- ध्वनिमें दिखायी देता था ॥११॥ यह जीव स्वयं कर्म करता है, स्वयं उसका फल भोगता है, स्वयं संसारमें घूमता है और स्वयं उससे मुक्त होता है ।।१२।। अविद्या तथा रागसे संक्लिष्ट होता हुआ संसार-सागरमें वार-बार भ्रमण करता है और विद्या तथा वैराग्यसे शुद्ध होता हुआ पूर्णस्वभावमें स्थित हो सिद्ध हो जाता है ॥ १३॥ इस अध्यात्म-विशेषको प्रकट करनेके लिए वह दीपिकाके समान थी तथा रूप आदि गुणोंके विषयमें जो अज्ञानान्धकार विस्तृत था उसे शीघ्र ही दूर कर रही थी ।।१४। जिस प्रकार आकाशसे बरसा पानी एकरूप होता है परन्तु पृथिवीपर पड़ते ही वह नानारूप दिखायी देने लगता है, उसी प्रकार भगवानकी वह वाणी यद्यपि एकरूप थी तथापि सभामें पात्रके गुणोंके अनुसार वह नानारूप दिखायी दे रही थी ॥१५॥ संसारके जीवादि समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाली भगवान्की वह दिव्यध्वनि सूर्यको पराजित करनेवाली थी तथा सावधान होकर बैठी हुई सभाके अन्तः- करणमे स्थित आवरण-सहित अज्ञानान्धकारको खण्ड-खण्ड कर रही थी ॥१६॥ भगवान् कह रहे थे कि संसारके मार्गका जो पथिक भव्यतारूपी शुद्धिसे युक्त होता है उसीके मोक्ष पुरुषार्थ देखा गया है । भावार्थ-मोनकी प्राप्ति भव्य जीवको ही होती है ।।१७।। उम मोक्षका उपाय ध्यान और अध्ययन रूप एक हेतुसे प्राप्त होता है तथा सबसे पूर्व वह, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र इन तीनके समुदायरूप है ॥१८॥ उनमें जीवादि सात तत्त्वांका, निर्मल तथा शंका आदि समस्त अन्तरंग मलोंके सम्बन्धसे रहित श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन माना गया है ।। १९॥ यह सम्यग्दर्शन, दर्शनमोहरूपी अन्धकारके क्षय, उपशम तथा क्षयोपशमसे उत्पन्न होता है, क्षायिक आदिके भेदसे तीन प्रकारका है और १. दैते भाववज्ञा म०। २. अतिशयेन भूयो भूयो वा भ्रमतीति (क० टि.)। ३. मास्वनःमः। ४. हेतुन म०। ५. सशयान्तिनि शेप-म०। ६. दायिकत्वं मः। - ६६४ हरिवंशपुराणे त्रयो द्रव्यार्थिकस्याथा भेदाः सामान्यगोचराः । स्युः पर्यायार्थिकस्यान्ये विशेषविषया नयाः ॥४२॥ अर्थसङ्कल्पमात्रस्य ग्राहको नैगमो नयः । उदाहरणमस्येष्टं प्रस्थौदनपुरस्सरम् ॥४३॥ 'आक्रान्तभेदपर्यायमेकम्यमुपनीय यत् । समस्तग्रहणं तत्स्यात्सद्व्यमिति संग्रहः ॥४॥ संग्रहाक्षिप्तपत्तादेरवहारो विशेषतः । न्यवहारो यतः मत्तां नयत्यन्तविशेषताम् ॥१५॥ "वक्रं भूतं भविष्यन्तं त्यक्रवर्जुसूत्रपातवत् । वर्तमानार्थपर्यायं सूत्रयन्नृजुसूत्रकः ॥४६॥ लिगमाधनसंख्यानकालोपग्रहसकरम् । यथार्थशब्दनाच्छन्दो न वष्टि ध्वनितन्त्रकः ॥४७॥ शब्द, समभिरूढ और एवंभूत ये सात नय हैं ॥४शा इनमें प्रारम्भके तीन नय द्रव्यार्थिक नय- के भेद हैं और वे सामान्यको विषय करते हैं तथा अवशिष्ट चार नय पर्यायार्थिक नयके भेद हैं और वे विशेषको विषय करते हैं ॥ ४२ ॥ पदार्थके संकल्पमात्रको ग्रहण करनेवाला नय नैगम नय कहलाता है। प्रस्थ तथा ओदन आदि इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। भावार्थ-जो नय अनिष्पन्न पदार्थके संकल्पमात्रको विषय करता है वह नैगम नय कहलाता है, जैसे कोई प्रस्थ- की लकड़ी लेनेके लिए जा रहा है उससे कोई पूछता है कि कहाँ जा रहे हो, तो वह उत्तर देता है कि प्रस्थ लेनेके लिए जा रहा हूँ। यद्यपि जंगलमें प्रस्थ नहीं मिलता है वहाँ से लकड़ी लाकर प्रस्थ बनाया जाता है तथापि नैगम नय संकल्प मात्रका ग्राहक होनेसे ऐसा कह देता है कि प्रस्थ लेनेके लिए जा रहा हूँ। इसी प्रकार कोई ओदन-भात बनाने के लिए लकड़ी, पानी आदि सामग्री इकट्ठी कर रहा है उस समय कोई पूछता है कि क्या कर रहे हो ? तो वह उत्तर देता है कि ओदन बना रहा हूँ। यद्यपि उस समय वह ओदन नहीं बना रहा है तथापि उसका संकल्प है इसलिए नैगम नय ऐसा कह देता है कि ओदन बना रहा हूँ ॥४३॥ अनेक भेद और पर्यायोंसे युक्त पदार्थको एकरूपता प्राप्त कराकर समस्त पदार्थका ग्रहण करना संग्रह नय है; जैसे सत् अथवा द्रव्य । भावार्थ-संसारके पदार्थ अनेक रूप हैं। उन्हें एकरूपता प्राप्त कराकर सत् शब्दसे कहना। इसी प्रकार जीव, अजीव आदि अनेक भेदोंसे युक्त पदार्थोंको 'द्रव्य' इस सामान्य शब्दसे कहना यह संग्रह नय है ।। ४४ ॥ संग्रह नयके विषयभूत सत्ता आदि पदार्थोंके विशेष रूपसे भेद करना व्यवहार नय है, क्योंकि व्यवहार नय सत्ताके भेद करता-करता उसे अन्तिम भेद तक ले जाता है । भावार्थ-जैसे संग्रह नयने जिस सत्को ग्रहण किया था व्यवहार नय कहता है कि वह सत्, द्रव्य और गुणके भेदसे दो प्रकारका है। अथवा संग्रह नयने जिस द्रव्यको विषय किया था व्यवहार नय कहता है कि उस द्रव्यके जीव और अजीवके भेदसे दो भेद हैं। इस प्रकार यह नय पदार्थमें वहाँतक भेद करता जाता है जहाँतक भेद करना संभव है ॥४५॥ पदार्थको भूत-भविष्यत् पर्यायको वक्र और वर्तमान पर्यायको ऋजु कहते हैं । जो नय पदार्थको भूत-भविष्यतरूप वक्र पर्यायको छोड़कर सरल सूत्रपातके समान मात्र वर्तमान पर्यायको प्रहण फरता है यह जुसूत्र नय कहलाता है । भावार्थ-इसके सूक्ष्म और स्थूलके भेदमे दो भेद हैं। जीवकी समय-समयमें होनेवाली पर्यायको ग्रहण करना सूक्ष्म ऋजुसूत्र नयका विपय है और देव मनुष्य आदि बहुममय-व्यापो पर्यायको ग्रहण करना स्थूल प्रजु सूत्र नयका विषय है ॥४६॥ योगिक अर्थका धारफ होनेसे शब्द नय, लिङ्ग, साधनकारक, १. पदमतया दम्पत्थी पप्रपगादी य इयरजे मणिया । ते चा अत्यपधाणा सद्दपधाणा हु तिग्णियरा । न० २.१ २. अनभिनिाचार्यमालामात्रप्राही नैगमः! ३. खजात्यविरोधेनकध्यमुचनीय पर्यायानाशन्त- भेदानवियरेण समनपरगांपा । ४. संप्रानपावितानामर्याना विधिपूर्वकमवहरणं व्यासारः । ५. प्रगुणे एपपति तन्त्रयते इति अन । ६. निममस्या सापनादि-पभिचारनिवृत्ति परः शन्दकम् । ५. प्राविति दे मागुरिरस्तोरमाप्योपसर्गपो' प्रयोग: । पृष्टि-५०, १०, ग• । ८. सन्दशास्वाधीनः ।

भष्टपञ्चाशः सर्गः 4 भी व्यक्तपर्यायशब्दकः । नयः समभिरूद्वोऽर्थी नानासममिरोहणात् ॥४८॥ पग्रहपदके व्यभिचारको नहीं चाहता अर्थान् लिङ्ग संख्या आदि- मदा दूर करता है। यह व्याकरणशास्त्र के आधीन रहता 'पुप्यस्तारका नक्षत्रम्' यहाँ पुंलिङ्ग पुष्यका स्त्री- ग नक्षत्र के साथ सम्बन्ध हो जाता है, लिङ्गभेद होनेपर भर नहीं आता। साधनव्यभिचार-साधन कारकको ना पर्वतमधिवसति' है। यहाँ पर्वत शब्द अधिकरणकारक है के अनुसार सप्तमी विभक्ति आना चाहिए तथापि अधि उपमर्ग- गि होनेसे कर्मकारकमें आनेवाली द्वितीया विभक्ति हो गयी फिर भी के अनुसार हो-सेना पर्वतपर रहती है' होता है। संख्याव्यभि- नको कहते हैं, इसके उदाहरण हैं 'जलमापो, वर्पाः ऋतुः, आम्राः वनम् , यहॉपर 'जलम्' एकवचन है फिर भी उसका पर्याय 'आपः' यह नित्य वहु- ६ दिया जा सकता है। 'वर्षाः' बहुवचन है और 'ऋनुः एकवचन है फिर भी घ्य-विशेषण भाव हो सकता है । इसी प्रकार शेप उदाहरण भी समझ लेना चाहिए। भिचार-भूत, भविष्यत् और वर्तमानके भेदसे कालके तीन भेद हैं इनमें परस्पर कालोंका भी प्रयोग होता है, जैसे 'विश्वदृश्वास्य पुत्रो जनिता' यह उदाहरण है। यहाँ श्वदृश्वाका अर्थ होता है. 'विश्वं दृष्टवान्' इति विश्वदृश्वा-जिसने विश्वको देख लिया। परन्तु यहॉपर विश्वाश्व इम भूनकालिक कर्मका जनिता इस भविष्यकालिक क्रियाके साथ सम्बन्ध जोड़ा गया है। उपग्रहव्यभिचार-आत्मनेपद, परस्मैपद आदि पदोंको उपग्रह कहते हैं । शब्दनय परस्मैपदफे स्थानपर आत्मनेपद और आत्मनेपदके स्थानपर परस्मैपदके प्रयोगको जो कि व्याकरणके अनुसार होता है स्वीकृत कर लेता है। जैसे तिष्ठति, संतिष्ठते, प्रतिष्ठते, रमते, विरमति, उपरमति आदि। यहाँ 'तिष्ठति में परस्मैपदका प्रयोग होता है परन्तु सम् और प्र उपसर्ग लग जानेसे संतिष्ठते तथा प्रतिष्ठतेमें आत्मनेपद हो गया। रमते' यह आत्मनेपदका प्रयोग है परन्तु 'विरमति में वि उपसर्ग और 'उपरमति में उप उपसर्ग लग जानेसे परस्मैपद प्रयोग हो जाता है । लिङ्गादिके व्यभिचारके समान शब्दनय पुरुप व्यभि- पारको भी नहीं मानता जैसे 'एहि मन्ये रथेन यास्यति, नहि यास्यति, यातस्ते पिता'-यहाँ पर 'मन्यसे' इम मध्यमपुरुपके बदले हास्यमें 'मन्ये' इम उत्तमपुरुषका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य यह है कि शब्दनय व्याकरण के नियमोंके आधीन है, अतः वह सामान्य नियमों- फे विरुद्ध प्रयोग होनेसे आनेवाले दोषको स्वीकृत नहीं करेगा ॥४७॥ जो शब्दभेद होनेपर अर्थभेद म्बीहत करता है अर्थान् एक पदार्थके लिए अनेक पर्यायात्मक शब्द प्रयुक्त होनेपर उनके पृथक्-पृथक् अर्थको स्वीकृत करता है वह समभिरूद- नय है, जैसे लोसमें देवेन्द्र के लिए इन्द्र, राम और पुरन्दर शब्दका प्रयोग आता है परन्तु ममभि- रुदनय इन मयके पृथक्-यूथर अर्थको प्रहण करना है। वह कहता है कि जो परम ऐश्वर्य- फा अनुभव करता है यह इन्द्र है, जो शक्तिमम्पन्न है यह शक है और जो पुरोका विभाग करनेवाला है। यह पुरन्दर है, इसलिए इन भिन्न-भिन्न पर्याय शब्दोंसे सामान्य देवेन्द्रका प्रहण न कर टमरी भिन्न-भिन्न विशेषताओंका ग्रहण करना है। अथवा जो नाना अोंका १. 'नानार्थममभिरोषणा गमभिदः अथरा 'प्रगत शन्दप्रयोग' अथवा 'यो यनाभिन्दः स तत्र समेत मिनाहान् सममित' ।

हरिवंशपुराणे जीवाजीवालवा बन्धसंवरी निर्जरा तथा । मोक्षश्च सप्त तत्वानि श्रद्धेयानि स्वलक्षणेः ॥२१॥ जीवस्य लक्षणं लक्ष्यमुपयोगोऽष्टधा स च । मतिश्रुतावधिज्ञानतद्विपर्ययपूर्वकः ॥२२॥ इच्छा द्वेषः प्रयवश्व सुखं दुःखं चिदात्मकम् । आत्मनो लिङ्गमेतेन लिगयते चेतनो यतः ॥२३॥ न पृथिव्यादिभूतानां जीवः संस्थानमात्रकः । तदवस्थास्य कायस्य चैतन्यव्यभिचारिणः ॥२४॥ पिष्टकिण्वोदकायेषु मद्यानेषु पृथग्मवेत् । शक्तः लेशो मदं कर्ता कायाङ्गेषु तु नास्ति सः ॥२५॥ चैतन्योत्पत्यमिन्यक्ती चतुर्भूतेभ्य इच्छताम् । तैलस्य सिकतादिभ्यो व्यक्त्युत्पत्ती न कि मते ॥२६॥ अनादिनिधनो जन्तुरेति गत्यन्तरादिह । याति गत्यन्तरं चोतो निजफर्मवशो मवे ॥२७॥ एतावानेव पुरुषो यावान्प्रत्यक्षगोचरः । इत्यादिरपसंवादः स्वपराहितवादिनाम् ॥२८॥ न संविद्यानमारमा स्यारसवित्तौ क्षणिकात्मनि । अनुसन्धानधोलोपे व्यवहारविलोपतः ॥२९॥ द्रव्यभूनः स्वयं जीवो ज्ञाता द्रष्टास्ति कारक । भोक्ता भोक्ता व्ययोत्पादधौन्यवान् गुणवान् सदा॥३०॥ असंख्यातप्रदेगात्मा ससंहारविसर्पणः । स्वशरीरप्रमाणस्तु मुक्तवर्णादिविंशतिः ॥३१॥ निसर्गज तथा अधिगमजके भेदसे दो प्रकारका है ॥२०॥ जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात तत्त्व हैं; इनका अपने-अपने लक्षणों से श्रद्धान करना चाहिए ॥ २१ ॥ जीवका लक्षण उपयोग है और वह उपयोग आठ प्रकारका है । उपयोगके आठ भेदों- में मति, श्रुत और अवधि ये तीन, सम्यग्ज्ञान तथा मिथ्याज्ञान-दोनों रूप होते हैं ।। २२ ।। इच्छा, द्वेप, प्रयत्न, सुख और दुःख ये सब चिदात्मक हैं ये ही जीवके लक्षण हैं; क्योंकि इनसे हो चैतन्यरूप जीवकी पहिचान होती है ।।२३।। पृथिवी आदि भूतोंकी आकृति मात्रको जीव नही कहते; क्योंकि वह तो इसके शरीरकी अवस्था है । शरीरको चैतन्यके साथ अनेकान्त है अर्थात शरीर यहीं रहा आता है और चैतन्य दूर हो जाता है ।।२४।। आटा, किण्य (मदि- राका बीज ) तथा पानी आदि मदिराके अंगोंमें मद उत्पन्न करनेवाली शक्तिका अंश पृथक् होता है, परन्तु शरीरके अवयवों में चैतन्य शक्ति पृथक् नहीं होती। भावार्थ-आटा आदि मदिराके कारणोंको पृथक्-पृथक् कर देनेपर भी उनमें जिस प्रकार मादक शक्तिका कुछ अंश चना रहता है उस प्रकार शरीरके अंगोंको पृथक्-पृथक करनेपर उनमें चैतन्य शक्तिका कुछ अंश नहीं रहता इससे सिद्ध होता है कि चैतन्य शरीरके अंगोंका धर्म नहीं है, किन्तु उनसे पृथक द्रव्य है ॥ २५ ॥ जो पृथिवी आदि चार भूतोंसे चैतन्यकी उत्पत्ति अथवा अभिव्यक्ति मानते हैं उनके मतमें बालू आदिसे तैलकी उत्पत्ति अथवा अभिव्यक्ति क्यों नहीं मान ली जाती है ? भावार्थ-जिस प्रकार बालू आदिसे तेलकी उत्पत्ति और अभिव्यक्ति नहीं हो सकती उसी प्रकार पृथिची आदि चार भूतोंसे चैतन्यको उत्पत्ति और अभिव्यक्ति नहीं हो सकती ।।२६।। यह जीव इस संसार में अनादि निधन है, निजकर्मसे परवश हुआ यह यहाँ दूसरी गतिसे आता है, और कर्मके परवश हुआ दूसरी गतिको जाता है ।। २७ ।। जितना यह प्रत्यक्ष गोचर दिसायी देता है इतना ही जीव है-अतीत अनागत कालमें इसकी संतति नहीं चलती इत्यादि कथन निज-परका अहित करनेवाले जीवोंका ही विरुद्ध कथन है ॥ २८ ॥ क्षण-क्षणमें जो संविद् (ज्ञान) उत्पन्न होता है उतना ही आत्मा है ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि संवित्तिको क्षणिक मान लेनेपर आगे-पीछेको कड़ी जोड़नेवाली बुद्धिका लोप हो जायेगा और उसके लोप होनेपर देने-लेने तथा कर्ता-कर्म आदि व्यवहारका ही लोप हो जायेगा ॥ २९ ॥ इससे सिद्ध होता है कि यह जीय स्वयं द्रव्यरूप है, ज्ञाता है, द्रष्टा है, कर्ता है, भोक्ता है, कर्माका नाश करनेवाला है, उत्पाद-व्ययरूप है, सदा गुणोंसे सहित है, असंख्यात प्रदेशी है, संकोच विस्तार १. भ्रान्तो म०।२ भवेत् इ०, म । ३. सत्यभूत म।

अष्टपञ्चाशः सर्गः श्यामाककणमात्रो न न चाकाशामुमात्रकः । नाङ्गुष्ठपर्वमानो वा न पञ्चशतंयोजनः ॥३२॥ देहे देहे 'सवृत्तिवे प्रदेशः सकल सह । न स्वार्थ प्रतिपद्येत स्पर्शनं चक्षुरादिवत् ॥३३॥ परिमाणमहत्त्वेऽपि योजनेषु बहुप्वपि । सर्शनं न समन्तः स्थाचक्षुपैवार्थदर्शनम् ॥३४॥ तथा सति विरोधः स्याद्दष्टेष्टाभ्यां पुमानयम् । देहमानोऽधिगन्तव्यः सर्वस्यानुभवात्तथा ॥३५॥ स गतीन्द्रियपटकाययोगवेदकपायतः । ज्ञानमयमसम्यक्रवलेश्यादर्शनसंझिमिः ॥३६॥ भव्यत्वाहारपर्यन्तमार्गणामि. स मृग्यते । चतुर्दशमिराख्यातो गुणस्थानैश्च चेतनः ॥३७॥ प्रमाणनयनिक्षेपसरसंख्यादिकिमादिमिः । संसारी प्रतिपत्तव्यो मुक्तोऽपि निजसद्गुणैः ॥३८॥ नयोऽनेकारमनि द्रव्ये नियतकात्मसंग्रहः । द्रव्याथिको यथार्थोऽन्यः पर्यायार्थिक एव च ॥३९॥ 'शेयो मूलनयावेतावन्योन्यापेक्षिणा मती ! सम्यग्दृष्टास्तयोर्मेदाः सङ्कता नैगमादयः ॥४०॥ "नेगमः संग्रहश्चात्र व्यवहारजुसूत्रको । शब्दः सममिरूदाट्य एवंभूतश्च ते नयाः ॥४१॥ रूप है, अपने शरीर प्रमाण है और वर्णादि वीस गुणोंसे रहित है ॥ ३०-३१ । न यह आत्मा सावाँ के कणके बराबर है, न आकाशके बराबर है, न परमाणुके बराबर है, न अंगूठाके पोराके वरावर है और न पॉच-सी योजन प्रमाण है ॥३२॥ यदि आत्माको सावाँके कण, अंगुष्ठ- पर्य अथवा परमाणुके समान छोटा माना जायेगा तो आत्मा प्रत्येक शरीरमें उसके खण्ड- खण्ड रूप प्रदेशोंके साथ ही रह सकेगा, समस्त प्रदेशोंके साथ नहीं और इस दशामें जहाँ आत्मा न रहेगा यहाँको स्पर्शन इन्द्रिय अपना कार्य नहीं कर सकेगी। जिस प्रकार चक्षुरादि इन्द्रियाँ शरीरके किसी निश्चित स्थानमें ही कार्य कर सकती हैं उसी प्रकार स्पर्शन इन्द्रिय भी जहाँ आत्मा होगा वहीं कार्य कर सकेगी सर्वत्र नहीं। इसी प्रकार आत्माका परिमाण यदि शरीरसे अधिक माना जायेगा तो अनेकों योजनों तक जहॉ कि शरीर नहीं है. मात्र आत्माके प्रदेश हैं, वहाँ सब ओर क्या पदार्थका स्पर्श न होने लगेगा ? और इस दशामें जिस प्रकार चक्षुके द्वारा योजनोंकी दूरी तक पदार्थका अवलोकन होता है उसी प्रकार योजनोंकी दूरी तक पदार्थका स्पर्शन भी होने लगेगा और ऐसा माननेपर प्रत्यक्ष तथा अनुमान दोनोंसे विरोध आता है, इसलिए शरीरके प्रमाण ही आत्माको मानना चाहिए। सवका अनुभव भी इसी प्रकारका है ।। ३३-३५ ।। यह जीव गति, इन्द्रिय, छह काय, योग, वेद, कपाय, ज्ञान, संयम, सम्यक्त्य, लेश्या, दर्शन,संज्ञित्व, भव्यत्व और आहार इन चौदह मार्गणाओंसे खोजा जाता है तथा मिथ्यादृष्टि आदि चौदह गुणस्थानोंसे उसका कथन किया गया है ।। २६-३७ ।। प्रमाण, नय, निक्षेप, सत्, संख्या और निर्देश आदिसे संसारी जीवका तथा अनन्त ज्ञान आदि आत्मगुणोंसे मुक्त जीयका निश्चय करना चाहिए ।। ३८ ॥ वस्तुके अनेक स्वरूप हैं उनमें से किसी एक निश्चित स्वरूपको प्रहण करनेवाला ज्ञान नय कहलाता है। इसके द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिकके भेदसे दो भेद हैं। इनमें व्यार्थिक नय यथार्थ है और पर्यायाथिक नय अयथार्थ है ॥३९॥ द्रव्याथिक और पर्यायार्थिक ये ही दो मूल नय हैं तथा दोनों ही परस्पर सापेक्ष माने गये हैं। अच्छी तरह देखे गये नैगम, संग्रह आदि नय इन्हीं दोनों नयोंके भेद हैं।।४०॥ नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, . १. देहे देहसवृत्तिवे कः । २. शस्लैः १०, ख० । ३. स्परांनं न तस्य स्यान्चनु १०, सम तस्य पहुपेवार्थ-ख०, ग. । ४ गरण्यातगुण-म०,०, ग०। ५. सामान्यलक्षणं तावदस्तुन्यनैकान्तात्मन्यपिरोपन हेत्वपणात साध्यविशेषरस यापारम्यप्रापण-प्रवण-प्रयोगो नमः । स ट्रेघा द्रव्यार्षिक: पर्यायाधिश्चेति (स. स.)। ६. दो घेव मूलिमणया भणिया दव्यत्यपग्जयस्थगया । अएवं अमंस्खसखा ते तन्मेया मणेयच्या ।।११।। -जघुनपचकसम । ७, नैगमसंग्रहव्यवहा स्त्रशन्दसममिस्टेवंभृतां नया:-त० स०।

. हरिवंशपुराणे प्रयो द्रव्याधिकस्याधा भेदाः सामान्यगोचराः । स्युः पर्यायाधिकस्यान्ये विशेषविषया नयाः ॥४२॥ 'अर्थसङ्कल्पमात्रस्य ग्राहको नगमो नयः । उदाहरणमस्पष्टं प्रस्थादनपुरस्मरम् ॥४३॥ 'आक्रान्तभेदपर्यायमकध्यमुपनीय यत् । समस्तग्रहणं तरस्यासहव्यमिति मंग्रहः ॥४॥ *संग्रहाक्षिप्तमत्तादेरवहारो विशेषतः । व्यवहारो यतः सत्तां न पश्यन्तविशेषताम् ॥४५॥ वकं भूतं भविष्यन्तं स्यक्रवर्जुस्यपातयत् । वर्तमानार्थपर्यायं मूग्रयन्नृजमूग्रकः ॥४६॥ "लिगमाधनसण्यानकालोपग्रहसरम् । यथाशब्दनाउदो नवष्टि घनितन्नका ॥४॥ शब्द, समभिरूढ और एवंभूत ये सात नय है ॥४।। इनमें प्रारम्भके तीन नय द्रव्यार्थिक नय- के भेद हैं और वे सामान्यको विषय करते हैं तथा अवशिष्ट चार नय पर्यायाधिक नयके भेद हैं और वे विशेषको विषय करते हैं ।। ४२ ।। पदार्थके संकल्पमात्रको ग्रहण करनेवाला नय नैगम नय कहलाता है। प्रस्थ तथा ओदन आदि इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। भावार्थ-जो नय अनिष्पन्न पदार्थके संकल्पमात्रको विपय करता है वह नैगम नय कहलाता है, जैसे कोई प्रस्थ- की लकड़ी लेनेके लिए जा रहा है उससे कोई पूछता है कि कहाँ जा रहे हो, तो यह उत्तर देता है कि प्रस्थ लेनेके लिए जा रहा हूँ। यद्यपि जंगलमें प्रस्थ नहीं मिलता है वहॉसे लकड़ी लाकर प्रस्थ बनाया जाता है तथापि नेगम नय संकल्प मात्रका ग्राहक होनेसे ऐसा कह देता है कि प्रस्थ लेनेके लिए जा रहा हूँ। इसी प्रकार कोई ओदन-भात वनानेके लिए लकड़ी, पानी आदि सामग्री इकट्ठी कर रहा है, उस समय कोई पूछता है कि क्या कर रहे हो ? तो वह उत्तर देता है कि ओदन बना रहा हूँ। यद्यपि उस समय वह ओदन नहीं बना रहा है तथापि उसका संकल्प है इसलिए नैगम नय ऐसा कह देता है कि ओदन बना रहा हूँ ॥४३॥ अनेक भेद और पर्यायोंसे युक्त पदार्थको एकरूपता प्राप्त कराकर समस्त पदार्थका ग्रहण करना संग्रह नय है; जैसे सन् अथवा द्रव्य । भावार्थ-संसारके पदार्थ अनेक रूप हैं उन्हें एकरूपता प्राप्त कराकर सत् शब्दसे कह्ना । इसी प्रकार जीव, अजीव आदि अनेक भेदोंसे युक्त पदार्थोंको 'द्रव्य' इस सामान्य शब्दसे कहना यह संग्रह नय है ॥ ४४ ।। संग्रह नयके विपयभूत सत्ता आदि पदार्थोंके विशेप रूपसे भेद करना व्यवहार नय है, क्योंकि व्यवहार नय सत्ताके भेद करता-करता उसे अन्तिम भेद तक ले जाता है। भावार्थ-जैसे संग्रह नयने जिस सत्को ग्रहण किया था व्यवहार नय कहता है कि वह सत्, द्रव्य और गुणके भेदसे दो प्रकारका है। अथवा संग्रह नयने जिस द्रव्यको विषय किया था व्यवहार नय कहता है कि उस द्रव्यके जीव और अजीवके भेदसे दो भेद हैं। इस प्रकार यह नय पदार्थ में वहाँतक भेद करता जाता है जहाँतक भेद करना संभव है ॥४॥ पदार्थको भूत-भविष्यत् पर्यायको बक्र और वर्तमान पर्यायको ऋजु कहते हैं । जो नय पदार्थकी भूत-भविष्यत्रूप वक्र पर्यायको छोड़कर सरल सूत्रपातके समान मात्र वर्तमान पर्यायको ग्रहण करता है वह ऋजुसूत्र नय कहलाता है । भावार्थ-इसके सूक्ष्म और स्थूलके भेदसे दो भेद हैं। जीवकी समय-समयमें होनेवाली पर्यायको ग्रहण करना सूक्ष्म ऋजुसूत्र नयका विषय है और देव मनुष्य आदि बहुसमय-व्यापी पर्यायको ग्रहण करना स्थूल ऋजु- सूत्र नयका विषय है ॥४६॥ यौगिक अर्थका धारक होनेसे शब्द नय, लिङ्ग, साधन-कारक, १. पदमतया दव्वत्यो पजयगाही य इयरजे मणिया । ते चदु अत्यपधाणा सद्दपधाणा हु तिण्णियरा ।। न च । २. अनभिनिवृत्वार्थसंकल्पमात्रग्राही नैगमः। ३. स्वजात्यविरोधेनकध्यमुपनीय पर्यायानाक्रान्त- भेदानविशेषेण समस्तप्रशासंग्रहः । ४. संग्रहनयादिप्तानामाना विधिपूर्वकमवहरण व्यवहारः । ५. ऋजु प्रगुणं सूतयति तन्त्रयते इति ऋजु । ६. लिङ्गसंख्या साधनादि-व्यभिचारनिवृत्ति परः शब्दकम् । ७. याकांक्षति 'वष्टि मागुरिल्लोपमवाप्योरपसर्गयो' प्रयोगः । वृष्टि-क०, ड, ग०। . शन्दशास्त्राधीनः ।

अष्टपञ्चाशः सर्गः ६६५ शब्दभेदेऽर्थमंदार्थी व्यकपर्यायशब्दकः । नयः मममिरुतोऽयों नानासममिरोहणान् ॥४८॥ संख्या-वचन, काल और उपग्रहपदके व्यभिचारको नहीं चाहता अर्थान् लिङ्ग संख्या आदि- के भेदसे होनेवाले दोपको वह सदा दूर करता है। वह व्याकरणशास्त्र के आधीन रहता है। भावार्थ-जैसे लिङ्गव्यभिचार- 'पुप्यस्तारका नक्षत्रम्' यहाँ पुंलिङ्ग पुष्यका स्त्री- लिङ्ग तारका अथवा नपुंसक लिङ्ग नक्षत्र के साथ मम्बन्ध हो जाता है, लिङ्गभेद होनेपर भी विशेषग-विशेयभाव में अगर नहीं आता माधनव्यभिचार--साधन कारकको कहते हैं, इसका उदाहरण 'सेना पर्वतमधिवसनि' है। यहाँ पर्वत शब्द अधिकरणकारक है अतः उसमें सामान्य नियमके अनुसार सप्तमी विभक्ति आना चाहिए तथापि अधि उपमर्ग- पूर्वक वस् धातुका प्रयोग होनेसे कर्मकारकमें आनेवाली द्वितीया विभक्ति हो गयी फिर भी अर्थ अधिकरणकारकके अनुमार हो-सेना पर्वतपर रहती है होता है। संख्याव्यभि- चार-संख्या वचनको कहते हैं, इसके उदाहरण हैं 'जलमापो, चर्पाः ऋतुः, आम्राः वनम् , वरणाः नगरम्' यहॉपर 'जलम' एकवचन है फिर भी उसका पर्याय 'आप' यह नित्य बहु- वचनान्त शब्द दिया जा सकता है। 'वर्षाः बहुवचन है और 'ऋतुः एकवचन है, फिर भी इनका विशेष्य-विशेपण भाव हो सकता है । इसी प्रकार शेप उदाहरण भी समझ लेना चाहिए । कालव्यभिचार-भूत, भविष्यत् और वर्तमानके भेदसे कालके तीन भेद हैं इनमें परम्पर विरुद्ध कालोंका भी प्रयोग होता है, जैसे 'विश्वश्वास्य पुत्रो जनिता' यह उदाहरण है। यहाँ विश्वदृश्वाका अर्थ होता है. 'विश्वं दृष्टवान्' इति विश्वदृश्वा-जिसने विश्वको देग्य लिया । परन्तु यहॉपर विश्वादश्व इम भूनकालिक कर्मका जनिता इस भविष्यकालिक क्रियाके साथ सम्बन्ध जोड़ा गया है । उपमहव्यभिचार-आत्मनेपद, परम्मैपद आदि पदोंको उपग्रह कहते हैं । शब्दनय परस्मैपदके स्थानपर आत्मनेपद और आत्मनेपदके स्थानपर परस्मैपदके प्रयोगको जो कि व्याकरणके अनुसार होता है स्वीकृत कर लेता है। जैसे तिष्टनि, संतिष्ठते, प्रतिष्ठते, रमते, विरमनि, अरमति आदि। यहॉ तिष्ठनि' में परम्मैपदका प्रयोग होता है परन्तु सम् और प्र उपमर्ग लग जानेसे मंतिष्ठते तथा प्रतिष्टतेमें आत्मनेपद हो गया। रमते' यह आत्मनेपदका प्रयोग है परन्तु 'विरमति'में वि उपसर्ग और 'उपरमति में उप उपसर्ग लग जानेसे परस्मैपद प्रयोग हो जाता है। लिगादिके व्यभिचारफे ममान शब्दनय पुरुप व्यभि- चारको भी नहीं मानता जैसे 'एहि मन्ये रथेन यास्यति, नहि यास्यति, यातस्ते पिता'-यहाँ पर 'मन्यसे' इम मध्यमपुरुपके बदले हास्यमें 'मन्ये' इम उत्तमपुरुपका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य यह है कि शब्दनय व्याकरणके नियमांक आधीन है, अतः यह मामान्य नियमों- के विरुद्ध प्रयोग होनेसे आनेवाले दोपको स्वीकन नहीं करेगा॥४७॥ जो शब्दभेद होनेपर अर्थभेद स्वीकृत करता है अर्थान् एक पदार्थ के लिए अनेक पर्यायात्मक शब्द प्रयुक्त होनेपर उनके पृथक्-पृथक् अर्थको म्वीकृत करता है वह ममभिरुद- नय है, जैसे लोक देवेन्द्र के लिए इन्द्र, शक्र और पुरन्दर शब्दका प्रयोग आता है परन्तु ममभि- रूदनय इन मवके पृथक्-गृथर अर्थको प्रहण करना है। वह कहता है कि जो परम पश्चर्य- का अनुभव करता है वह इन्द्र है, जो शक्तिमम्पन्न है वह शक है और जो पुगेका विभाग • करनेवाला है। यह पुरन्दर है, इसलिए इन भिन्न-भिन्न पर्याय शब्दांमे मामान्य देवेन्द्रका प्रहण न फर टमकी भिन्न-भिन्न विशेषनाओंका ग्रहण करना है। अथवा जो नाना अधोंका , १. 'नानार्थममनिरीक्षणात् सममिन्दः' अथवा 'अर्थगस्य राम्दप्रयोग.' अथवा 'यो यत्राभिम्दः स तप समेत्याभिमुभ्येनारोहणात् मममिन्द'।

हरिवंशपुराणे 'यदेन्दति तदेवेन्द्रो नान्यदेति क्रियाक्षणे । वाच मन्यते स्वयम्भूतो यधावा ॥१९॥ दन्यस्यानन्तशक्तिरवारप्रतिशक्तिमिदो श्रिताः । उत्तरोत्तरसूक्ष्मागोचराः सप्त समयाः ॥५०॥ अर्थशब्दप्रधानत्वाच्छन्दान्ताः पञ्चधा नयाः । संग्रहादिनया: पोढा प्रत्येक स्युः शतानि ते ॥५१॥ यावन्तोऽपि वचोमार्गास्तावन्तो यन्नयास्ततः । इयन्त इति संख्यानं नयानां नास्ति तावतः ॥५२॥ धर्माधर्मी तयाकाशं पुद्गलः काल एव च । पञ्चाप्यजीवतत्वानि सम्यग्दर्शनगोचराः ॥५३॥ गतिस्थित्योर्निमित्तं तो धर्माधर्मों यथाक्रमम् । नमोऽवगाहहेतुस्तु जीवाजीवद्वयोस्सदा ॥५४॥ पूरणं गलनं कुर्वन् पुद्गलोऽनेकधर्मकः । मोऽणुमंघानतः स्कन्धः स्कन्धभेदादणुः पुनः ॥५५॥ वर्तनालक्षणो लक्ष्यः समयादिरनेकधा । कालः कलनधर्मेण सपररवापरत्वकः ॥५६॥ उल्लंघन कर एक अर्थको मुख्यतासे ग्रहण करता है यह समभिरूदनय है, जैसे गो शब्द कोशमें वचन आदि अनेक अर्थोमें प्रसिद्ध है किन्तु लोकमें यह अधिकतासे पशु अर्थमें ही प्रयुक्त होता है । अथवा जो शब्दके निरुक्त-प्रकृति-प्रत्ययके संयोगसे सिद्ध होनेवाले अर्थको न मानकर उसके चालू वाच्यार्थको ही माना है वह समभिरूढनय है, जैसे गो शब्दका निरुक्त अर्थ गच्छतीति गौः जो चले वह है, परन्तु लोकमें इस अर्थको उपेक्षा कर पशु विशेषको गी कहते हैं, वह चलती हो तव भी गौ है और वैठी या खड़ी हो तव भी गो है ॥४८॥ जो पदार्थ जिस क्षणमें जैसी क्रिया करता है उसी क्षणमें उसको उस रूप कहना अन्य क्षणमें नहीं, यह एवंभूतनय है। यह नय पदार्थके यथार्थ स्वरूपको कहता है जैसे 'इन्दतीति इन्द्रः' जिस समय इन्द्र ऐश्वर्यका अनुभव करता है उसी समय इन्द्र कहलाता है. अन्य समयमें नहीं ॥४९॥ द्रव्यको अनन्त शक्तियाँ हैं । ये सातों नय प्रत्येक शक्तिके भेदोंको स्वीकृत करते हुए उत्तरोत्तर सूक्ष्म पदार्थको ग्रहण करते हैं ।।५०॥ इन नियोंमें कितने ही नय अर्थप्रधान हैं और कितने ही शब्दप्रधान हैं, इसलिए प्रारम्भसे लेकर शब्दनय तक पॉच प्रकारके नय और संग्रह- को आदि लेकर अन्त तक छह प्रकारके नय अर्थात् नैगमादि सातो नयोंमें प्रत्येक सैकड़ों प्रकारके हैं ।। ५१॥ क्योंकि जितने वचनके मार्ग-भेद हैं उतने नय है इसलिए नय इतने हैं। इस प्रकार यथार्थमें नयोंकी संख्या निश्चित नहीं है ॥ ५२ ।। धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल और काल ये पॉचो अजीव तत्त्व हैं तथा सम्यग्दर्शनके विषयभूत हैं ।। ५३ ।। इनमें से धर्म और अधर्म द्रव्य कमसे गति और स्थितिके निमित्त हैं अर्थात् धर्म द्रव्य जीव और पुद्गलके गमनमें निमित्त है तथा अधर्म द्रव्य उन्हीकी स्थितिमें निमित्त है। आकाश, जीव और अजीव दोनो द्रव्योंके अवगाहमे निमित्त है ॥ ५४ ।। पुद्गल द्रव्य पूरण गलन क्रिया करता हुआ वर्णादि अनेक गुणोंसे युक्त है । उसके दो भेद है, स्कन्ध और परमाणु । बहुतसे परमाणुओके संयोगसे स्कन्ध बनता है और स्कन्धमें भेद होते- होते परमाणुकी उत्पत्ति होती है ॥ ५५ ॥ जो वर्तना लक्षणसे सहित है वह काल द्रव्य है । इसके समय आदि अनेक भेद है । परिवर्तनरूप धर्मसे सहित होनेके कारण काल द्रव्य परत्व और अपरत्व व्यवहारसे युक्त है ।। ५६ ।। । । १. येनात्मना भूतस्तेनैवात्मनाध्यवसाययतीति एवंभूत, -स. सि. । २. भिदा म०। ३. संग्रहादितया - म.30 क०। ४. बावदिया ययनविदा तावदिया चेव होति णयादा । ५. परत्वापरत्वे क्षेत्रकृते कालकृते चत । ते अत्र कालोपकरणाकालकृते गृह्यते। एते ते वर्तनादय. उपकाराः कालत्यास्तित्वं गमयन्ति । ननु वर्तनामदणमेवास्तु तद्भेदाः परिणामादयः-(क.टि.) निगम, संग्रह, व्यवरार और ऋजु ये चार अर्थनय हैं तथा शेष तीन शब्दनय हैं।

अष्टपञ्चाशः सर्गः ५ 'कायवाड्मनसा कर्मयोगः स पुनरात्रवः । शुभः पुण्यस्य गण्यस्य पापस्याशुभलक्षणः ॥५७॥ सापायाकपायौ द्वौ स्वामिनावासवस्य सः । मिथ्यादृष्ट्यादिकाद्यस्य साम्परायिककर्मणः ॥१८॥ उपशान्तकपायादेरकपायस्य योगिनः । आस्रवः स्वामिनोऽन्त्यस्य स्यादीर्यापथकर्मणः ॥५९॥ इन्द्रियाणि कपायाश्च हिंसादीन्यनतान्यपि । साम्परायिककर्मद्वाः स्याक्रियापञ्चविंशतिः ॥६॥ चैत्यप्रवचनाहत्सद्गुरुपूजादिलक्षणा । सा सम्यक्त्व क्रिया ख्याता सम्यक्त्वपरिवर्धिनी ॥६॥ प्रवृत्तिरकृतादम्यदेवतास्तवनादिका । सा मिथ्यात्वक्रिया ज्ञेया मिथ्यात्वपरिवर्धिनी ॥६२॥ कायानादिसरन्येषां गमनादिप्रवर्तनम् । मा प्रयोगक्रिया वेद्या प्रायोऽसंयमवर्धिनी ॥३॥ आभिमुश्यं प्रति प्रायः संयतस्याप्यसंयमे । समादानक्रिया प्रोक्ता प्रमादपरिवर्धिनी ॥६॥ ईर्यापयनिमित्ता या सा प्रोक्तर्यापथक्रिया । एताः पञ्चक्रिया हेतुरात्रवे साम्परायिक ॥६५॥ क्रोधावेशवशात्प्रादुर्भूता प्रादोपिकी क्रिया । योऽभ्युद्यमः प्रदुष्टस्य सतस्सा कायिकी क्रिया ॥६६॥ क्रियाधिकारिणीन्युक्ता हिंसोपकरणग्रहात् । दुःग्वोत्पत्तिः स्वतन्त्रस्वास्क्रियान्या पारितापिको ॥६॥ इन्द्रियायुर्वलप्राणवियोगकरणाक्रिया । प्राणातिपातिकी नाम्ना पञ्चैवाध्यात्मिकाः क्रियाः ॥६८॥ रागाद्रीकृतचित्तत्वात्प्रशस्तस्य प्रमादिनः । रम्यरूपावलोकान्याभिप्रायो दर्शनक्रिया ॥६९॥ काय, वचन और मनकी क्रियाको योग कहते हैं। वह योग ही आस्रव कहलाता है। उसके शुभ और अशुभके भेदसे दो भेद हैं । उनमें शुभयोग शुभास्रयका और अशुभयोग अशु- भास्रवका कारण है ।। ५७॥ आस्रवके स्वामी दो हैं-सकपाय ( कपायसहित) और अकपाय (कपायरहित )। इसी प्रकार आस्रवके दो भेद है-साम्परायिक आस्रव और ईर्यापथ आस्रव । मिथ्यादृष्टिको आदि लेकर सूक्ष्मकपाय गुणस्थान तकके जीवसकपाय हैं और वे प्रथम साम्परायिक आस्रवके स्वामी हैं तथा उपशान्तकपायको आदि लेकर सयोगकेवली तकके जीव अकपाय हैं और ये अन्तिम ईर्यापथ आस्रवके स्वामी हैं। [चौदहवें गुणस्थानवर्ती अयोगकेवली भी अकपाय हैं परन्तु उनके योगका अभाव हो जानेसे आस्रव नहीं होता] ॥५८-५९ ॥ पॉच इन्द्रियों, चार कपाय, हिंसा आदि पॉच अव्रत और पच्चीस क्रियाएँ ये साम्परायिक आस्रवके द्वार हैं ।। ६० ।। इनमें पॉच इन्द्रियाँ, चार कपाय और पॉच अव्रत प्रसिद्ध हैं, अतः इन्हें छोड़कर पच्चीस क्रियाओंका स्वरूप कहते हैं । प्रतिमा, शास्त्र, अर्हन्त देव तथा सच्चे गुरु आदिकी पूजा, भक्ति आदि करना सम्यक्त्वको बढ़ानेवाली सम्यक्त्यक्रिया है ॥६१ ।। पापके उदयसे अन्य देवताओंकी स्तुति आदिमें प्रवृत्ति करना मिथ्यात्वको बढाने- वाली मिथ्यात्व क्रिया है । ६२ ।। गमनागमनादिमें प्रवृत्ति करना सो प्रायः असंयमको बढानेवाली प्रयोग क्रिया है ।। ६३ ।। संयमी पुरुपका प्रायः असंयमकी ओर सम्मुख होना प्रमादको बढानेवाली समादान क्रिया है ।। ६४ ॥ जो क्रिया ईर्यापथमें निमित्त है वह ईर्यापथ क्रिया है । ये पॉच क्रियाएँ साम्परायिक आस्रवको हेतु हैं ।। ६५ । क्रोधके आवेशसे जो क्रिया होती है वह प्रादोपिकी क्रिया है। दोपसे भरा मनुष्य जो उद्यम करता है वह कायिकी क्रिया है ॥ ६६ ।। हिंसाके उपकरण-शस्त्र आदिके ग्रहणसे जो क्रिया होती है वह क्रियाधिकरिणी क्रिया है । स्व-परको दुःख उत्पन्न करनेवाली पारितापिकी क्रिया है । ६७ ॥ इन्द्रिय, आयु और बल प्राणका वियोग करनेवाली क्रिया प्राणातिपातिकी है। ये पॉच आध्यात्मिक क्रियाएँ हैं ।।६।। चित्तके रागसे आई हो जानेके कारण जब उत्तम पुरुष प्रमादी बन, किसी सुन्दर रूपके १. 'कायराइमन.कर्म योग.' ॥१॥ २. 'स पासव' ॥२॥ ३. 'शुमः पुण्यस्याशुमः पापस्य' ।।३।। ४. 'सकपायाकपाययो सामरायिकांपथयो' ॥४॥ त. सू० ० ६ ५ इन्द्रियकपायात्रतरियाः पञ्चचतु पञ्चाञ्चविंशतिसंख्या. पूर्वस्य भेदा ||त० स० अ०६ । ६. प्रशवतस्य म०, ६० ।

हरिवंशपुराणे सचेतनानुबन्धो यः प्रष्टव्येऽतिप्रमादिन. । सा स्पर्शनक्रिया या कर्मापादानकारणम् ॥७॥ उत्पादनादपूर्वस्य पापाधिकरणस्य तु । पापाखरकरी प्राय. प्रोक्ता प्रत्यायिकी क्रिया ॥१॥ स्त्रीपुंसपशुसम्पातिदेशेऽन्तर्मलमोक्षणम् । क्रिया साधुजनायोग्या सा समन्नानुपातिनी ।।७२॥ अप्रमृष्टाप्रदृष्टायां निक्षेपोऽङ्गादिनः क्षितौ । अनाभोगक्रिया सा तु पञ्चैता अपि दुष्क्रियाः ॥७३।। परेणैव व तु निर्वा या स्त्रय क्रियते क्रिया । सा स्वहस्तन्हिया वोध्या पूर्वोक्तास्रववर्धिनी ॥७॥ पापादानादिवृत्तीनामभ्यनुज्ञानमात्मना । सा निसर्गक्रिया नाना निसर्गेणास्रवावहा ।।५।। पराचरितसावयक्रियादेस्तु प्रकाशनम् । विदारणक्रिया सान्यधीविदारणकारिणी ॥७॥ यथोक्ताजानमतस्य कर्तुमावश्यकादिषु । प्ररूपणान्यथा मोहादाज्ञाव्यापादिकी क्रिया १७७।। शाठ्यालस्याद्धि शास्त्रोक्नविधिकर्तव्यतां प्रति । अनादरस्त्यनाकाङ्क्षा-क्रिया पञ्चक्रिया इमाः ॥७॥ आरम्भ क्रियमाणेऽन्यः स्वयं हर्षः प्रमादिनः । सा प्रारम्भक्रियात्यन्तं तात्पर्य वा छिदादिपु ॥७९॥ सा पारिवाहिको ज्ञेया परिग्रहपरा क्रिया। मायाक्रियापि च ज्ञानदर्शनादिषु वञ्चना ॥४०॥ या मिथ्यादर्शनारम्भदृढीकरणतत्परा । प्रोत्साहनादिनान्यस्य सा मिथ्यादर्शनक्रिया ॥८॥ कर्मोदयवशात्पापादनित्तिरपि क्रिया । अप्रत्याख्यानसंज्ञा सा पञ्चामृरास्रव क्रियाः ॥८२॥ देखनेकी अभिलापा करता है तब उसके दर्शन क्रिया होती है । ६९ ।। यही मनुष्य जब अत्य- धिक प्रमादी बन स्पर्श करने योग्य पदार्थका बार-बार चिन्तन करता है तब कर्मबन्धमें कारणभूत स्पर्शन क्रिया होती है ।। ७० ॥ पापके नये-नये कारण उत्पन्न करनेसे पापका आस्रय करनेवाली जो क्रिया होती है वह प्रत्यायिकी क्रिया कही गयी है ।। ७१ ॥ स्त्री-पुरुप और पशुओं के मिलने-जुलने आदिके योग्य स्थानपर शरीर-सम्बन्धी मल-मूत्रादिको छोड़ना सम- न्तानुपातिनी क्रिया है। यह क्रिया साधुजनोंके अयोग्य है ।। ७२ ।। बिना शोधी, बिना देखी भूमिपर शरीरादिका रसना अनाभोगक्रिया है। ये पाँचों ही क्रियाएँ दुक्रियाएँ कहलाती हैं ।। ७३ ॥ दूसरेके द्वारा करने योग्य क्रियाको स्वयं अपने हाथ से करना यह पूर्वोक्त आस्रव- को बढानेवालो स्वहस्तक्रिया है ॥७४॥ पापोत्पादक वृत्तियोंको स्वयं अच्छा समझना निसर्गक्रिया है, यह स्वभावसे ही आस्रवको बढ़ानेवाली है ।। ७५ ॥ दूसरेके द्वारा आच- रित पापपूर्ण क्रियाओंका प्रकट करना यह दूसरेकी बुद्धिको विदारण करनेवाली विदारण- क्रिया है ।। ७६ ॥ आगमकी आज्ञाके अनुसार आवश्यक आदि क्रियाओंके करने में असमर्थ मनुष्यका मोहके उदयसे उनका अन्यथा निरूपण करना आज्ञाव्यापादिको क्रिया है ।। ७७॥ अज्ञान अथवा आलस्यके सहित होनेके कारण शास्त्रोक्त विधियोंके करनेमें अनादर करना अनाकक्रिया है, इस प्रकार ये पॉच क्रियाएँ हैं ।। ७८ ॥ दूसरों के द्वारा किये जानेवाले आरम्भमें प्रमाढी होकर स्वयं हर्प मानना अथवा छेदन-भेदन आदि क्रियाओं में अत्यधिक तत्पर रहना प्रारम्भ क्रिया है ॥७९॥ परिग्रहमे तत्पर जो क्रिया है वह पारिग्राहिको किया है। मान दर्शन आदिके विषयमें जो छलपूर्ण प्रवृत्ति है वह मायाक्रिया है ।। ८० ॥ प्रोत्साहन आदिके द्वारा दूमरेको मिथ्यादर्शनके प्रारम्भ करने तथा उसके दृढ़ करनेमें तत्पर जो किया है वह मिथ्यादर्शन क्रिया है ।। ८१ ॥ कर्मोदयके वशीभूत होनेसे पापसे निवृत्ति नहीं होना अप्रत्याख्यान किया है। इस प्रकार आप्रयको बढानेवाली ये पॉच क्रियाएँ है। इस प्रकार पाँच-पाँचके पञ्चकसे पशीम क्रियाओंका वर्णन किया ।। २।। १. सध्योऽनिप्रमादिन म०। २. दर्शनरिया म०। ३ वरेणैव म०। ४. सान्या धीपिदारण- ६. मा बालस्यादि म०, साद्यालस्याधिक०, ४०। ७. हर्षप्रमा- दिन । ८. याम्छिादिषु म०, २, ८०, स. । ९. पारिग्राहिणी म०, १०, इ.। म०,०। ५. यथोस्तानमः।

अष्टपञ्चाशः सर्गः मन्दमध्यातितीव्रत्यापरिणामस्य देहिनाम् । मन्दी मध्योऽतितीवः स्यादास्रबो हेतुर्भदवः ॥८॥ जीमाधिकरणश्चाप्यजीवाधिकरतोऽपि सः । श्रास्रवो मिद्यते द्वेधा जीवाधिकरणास्रवाः ॥४॥ तैः संरम्भसमारम्भैः सारम्भस्विकृतादिमिः । त्रियोगश्च कपायैश्च पत्रिंशत्पृथगात्रमाः ॥८॥ *निर्तना च निक्षपोऽजीवाधिकरणास्रवाः । संयोगश्च निसर्गश्च द्विचतुर्दिनिभेदिनः ॥८६॥ निर्वर्तनाधिकरणं मूलोत्तरगुणा द्विधा । शरीरवाट्मन.प्राणापानादीनां च तो गुणौ ॥८॥ सहसादु.प्रमृष्टानाभोगसाप्रत्यवेक्षितैः । भेदैश्चतुर्विधस्तनिपाधिकरणं पुनः ॥६॥ जीवोंके परिणाम मन्द, मध्यम और तीत्र होते हैं इसलिए हेतुमें भेद होनेसे आस्रव भी मन्द, मध्यम और तीव्र होता है । ८३ ॥ जीयाधिकरण और अजीवाधिकरणके भेदसे आस्रवके दो भेद है। जोवाधिकरण आस्रवके मूलमें तीन भेद हैं-१ संरम्भ २ समारम्भ और ३ आरम्भ । इनमें से प्रत्येकके कृत, कारित, अनुमोदना-तीन, मनोयोग, वचनयोग, काययोग तीन और क्रोध, मान, माया, लोभ रूप कपाय-चार इनसे परस्पर गुणित होनेपर छत्तीस-छत्तीस भेद होते हैं। तीनोंके मिलाकर एक-सौ आठ भेद हो जाते हैं ।। भावार्थ-- किसी कार्यके करनेका मनमें विचार करना संरम्भ है। उसके साधन जुटाना समारम्भ है और कार्य रूपमें परिणत करना आरम्भ है । स्वयं कार्य करना कृत है, दूसरेसे कराना कारित है और कोई कर उसमें हर्ष मानना अनुमति है। मनसे किसी कार्यका विचार करना मनो- योग है, वचनसे प्रकट करना वचनयोग है और कायसे कार्य करना काययोग है। क्रोध कपायसे प्रेरित हो किसी कार्यको करना क्रोध कपाय है, मानसे प्रेरित हो करना मान कपाय है, मायासे प्रेरित हो करना माया कपाय है और लोभसे प्रेरित होकर करना लोभ कपाय है। मूलमें संरम्भ आदिके भेदसे आस्रव तीन प्रकारका होता है, इनमें से प्रत्येक भेद कृत, कारित अनुमोदनाको अपेक्षा तीन प्रकारका होता है, फिर यही तीन भेद तीन योगके निमित्तसे होते हैं, इसलिए तीनका तीनमें गुणा करनेपर नी भेद होते हैं । तदनन्तर यही नी भेद क्रोधादि कपाय- को अपेक्षा चार-चार प्रकारके होते हैं इसलिए नोमें चारका गुणा करनेपर छत्तीम भेद होते हैं । छत्तीस भेद संरम्भके, छत्तीस समारम्भके और छत्तीस आरम्भके, तीनोंको मिलाकर एक सौ आठ भेद होते हैं। अथवा दूमरी तरहसे संरम्भादि तीनमें कृत कारितादिका गुणा करने पर नौ भेद हुए, उनमें तीन योगका गुणा करनेपर सत्ताईस हुए और उसमे क्रोधादि चार कपायका गुणा करनेपर एक-सौ आठ भेद होते हैं । ये सब परिणाम जीवकृत हैं अतः इन्हें जीयाधिकरण आस्रव कहते हैं ।।८४-८५।। दो प्रकारको निर्वर्तना, चार प्रकारका निक्षेप, दो प्रकारका संयोग और नीन प्रकारका निसर्ग ये अजीयाधिकरण आम्रवके भेद हैं ॥६॥ मूलगुण निर्वर्तना और उत्तरगुण निर्वर्तनाके भेदसे निर्वर्तनाके दो भेद हैं । शरीर, वचन, मन तथा स्वासोच्छ्वास आदिको रचना होना मूलगुण निर्वर्तना है और काष्ठ, पापाण, मिट्टी आदिसे चित्राम आदिका बनाना उत्तरगुण निर्वर्तना है ।।८सहमा निक्षेपाधिकरण, दुष्प- मृष्ट निक्षेपाधिकरण, अनाभोग निक्षेपाधिकरण और अप्रत्यवेक्षित निक्षेपाधिकरण इन चार भेदोंसे निक्षेपाधिकरण चार प्रकारका होता है। शीघ्रतासे किसी वस्तुको रस देना सहमा निक्षेप है। दुष्टतापूर्वक माफ की हुई भूमिमें किसी वस्तुको रखना दुष्प्रमृष्ट निक्षेप है । अव्य- वस्थाके साथ चाहे जहाँ किसी वस्तुको रख देना अनाभोग निक्षेप है और बिना देखी- २. तीजमन्दशाताशातभाविकरणीयविशेषेभ्यस्तदिशेष ॥६॥ त. मू० अ०६। २. अधिकरण जीवाजीग ॥ ७ ॥ त० स्० अ०६। ३. आद्य रारम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतस्पायविशेषति- स्विस्त्रिश्चतुश्चकश ॥ ८॥त. सू० ० ६ । ४ निर्तनानिरांयोगनिसगां विचह्निनिमेटा त मू० अ०६ १५. परम् साम्प्रत्यवेदिती म ।

६६८ 3 हरिवंशपुराणे सचेतनानुबन्धो यः स्प्रष्टव्येऽतिप्रमादिन. । सा स्पर्शनक्रिया शेया कर्मापादानकारणम् ॥७॥ उत्पादनादपूर्वस्य पापाधिकरणस्य तु । पापावकरी प्राय. प्रोक्ता प्रस्यायिकी क्रिया ॥७॥ स्त्रीपुंसपशुसम्पातिदेशेऽन्तर्मलमोक्षणम् । क्रिया साधुजनायोग्या सा समन्तानुपानिनी ॥७२॥ अप्रमृष्टाप्रदृष्टायां निक्षेपोऽङ्गादिनः क्षिनौ । अनामोगक्रिया सा तु पञ्चैता अपि दुकियाः ॥७३॥ परेणैव तु निवर्त्या या स्वयं क्रियते क्रिया । सा स्वहस्तन्हिया वोध्या पूर्वोक्तास्रवर्धिनी ॥७॥ पापादानादिवृत्तीनामभ्यनुज्ञानमात्मना । सा निसर्गक्रिया नाम्ना निसर्गेणास्रवावहा ।।५।। पराचरितसावयक्रियादेस्तु प्रकाशनम् । विदारणक्रिया मान्यधीविदारणकारिणी ॥७॥ यथोक्ताजानसक्तस्य कर्तुमावश्यकादिपु । प्ररूपणान्यथा मोहादाज्ञाव्यापादिको क्रिया ।।७७।। शाठ्यालस्यादि शास्त्रोक्तविधिकर्तव्यता प्रति । अनादरस्त्वनाकाक्षा-क्रिया पञ्चक्रिया हमाः ॥७॥ आरम्भे क्रियमागेऽन्यः स्वयं हपः प्रमादिनः । सा प्रारम्मक्रियात्यन्तं तात्पर्य वा छिदादिषु ॥७९॥ सा पारिग्राहिको' या परिग्रहपरा क्रिया। मायाक्रियानि च ज्ञानदर्शनादिपु वञ्चना ॥१०॥ या मिथ्यादर्शनारम्भदृढीकरणतत्परा । प्रोत्साहनादिनान्यस्य सा मिध्यादर्शनक्रिया ॥८॥ कर्मोदयवशात्पापादनिवृत्तिरपि क्रिया । अग्रस्याख्यानसंज्ञा सा पञ्चामूरात्रत्रक्रियाः ॥२॥ ६ देखनेकी अभिलाषा करता है तब उसके दर्शन क्रिया होती है ॥ ६९ ॥ वही मनुष्य जब अत्य- धिक प्रमादी बन स्पर्श करने योग्य पदार्थका बार-बार चिन्तन करना है तब कर्मबन्धमें कारणभूत स्पर्शन क्रिया होती है ।। ७०॥ पापके नये-नये कारण उत्पन्न करनेसे पापका आस्रव करनेवाली जो क्रिया होती है वह प्रत्यायिकी क्रिया कही गयी है ।। ७१ ॥ स्त्री-पुरुष और पशुओं के मिलने-जुलने आदिके योग्य स्थानपर शरीर-सम्बन्धी मल-मूत्रादिको छोड़ना सम- न्तानुपातिनी क्रिया है। यह क्रिया साधुजनोंके अयोग्य है ॥७२॥ विना शोधी, बिना देखी भूमिपर शरीरादिका रखना अनाभोगक्रिया है। ये पाँचों ही क्रियाएँ दुक्रियाएँ कहलाती हैं ।। ७३ ॥ दूसरेके द्वारा करने योग्य क्रियाको स्वयं अपने हाथ से करना यह पूर्वोक्त आस्रय- को बढानेवाली स्वहस्तक्रिया है ॥ ७४॥ पापोत्पादक वृत्तियोंको स्वयं अच्छा समझना निसर्गक्रिया है, यह स्वभावसे ही आस्रवको बढानेवाली है ।।७५ ।। दूसरेके द्वारा आच- रित पापपूर्ण क्रियाओंका प्रकट करना यह दूसरेकी बुद्धिको विदारण करनेवाली विदारण- क्रिया है ।। ७६ ।। आगमकी आज्ञाके अनुसार आवश्यक आदि क्रियाओके करनेमें असमर्थ मनुष्यका मोहके उदयसे उनका अन्यथा निरूपण करना आज्ञाव्यापादिको क्रिया है ।।७७॥ अज्ञान अथवा आलस्यके सहित होनेके कारण शास्त्रोक्त विधियोंके करनेमें अनादर करना अनाकांक्षाक्रिया है, इस प्रकार ये पॉच क्रियाएँ हैं ।। ७८ ॥ दूसरोंके द्वारा किये जानेवाले आरम्भमें प्रमादी होकर स्वयं हर्ष मानना अथवा छेदन-भेदन आदि क्रियाओं में अत्यधिक तत्पर रहना प्रारम्भ क्रिया है ॥७९॥ परिग्रहमें तत्पर जो क्रिया है वह पारिग्राहिकी क्रिया है। ज्ञान दर्शन आदिके विषयमे जो छलपूर्ण प्रवृत्ति है वह मायाक्रिया है ।। ८० ॥ प्रोत्साहन आदिके द्वारा दूसरको मिथ्यादर्शनके प्रारम्भ करने तथा उसके हद करनेमें तत्पर जो क्रिया है वह मिथ्यादर्शन क्रिया है ।। ८१ ॥ कर्मोदयके वशीभूत होनेसे पापसे निवृत्ति नहीं होना अप्रत्याख्यान क्रिया है । इस प्रकार आस्रवको बढानेवाली ये पॉच क्रियाएँ हैं । इस प्रकार पाँच-पाँचके पञ्चकसे पञ्चीस क्रियाओंका वर्णन किया॥ ८२ ।। १. प्रष्टव्योऽतिप्रमादिन म०। २. दर्शनक्रिया म०। ३. वरेणैव म०। ४. सान्या धोविदारण. म०,०। ५. ययोक्तादान म । ६. मा व्यालस्याद्धि म०, साद्यालस्याद्धि० क०, इ. । दिन । ८. वाञ्छितादिषु म०, क, ड०, स०। ९. पारिवाहिणी म०, क०, इ. । ७. हर्षप्रमा- अष्टपञ्चागः सर्गः मन्दमध्यातितीवत्वात्परिणामस्य देहिनाम् । मन्दो मध्योऽतितीवः स्यादास्रवो हेतुभेदतः ॥८३॥ जीवाधिकरणश्चाप्यजीवाधिकरणोऽपि सः । श्राववो मिद्यते द्वेधा जोवाधिकरणास्रवाः ॥८॥ ते. संरम्भसमारम्भः सारम्भैविकृतादिमिः । त्रियोगश्च कार्यश्च पत्रिंशत्पृथगात्रयाः ॥४५॥ "निर्वर्तना च निक्षपोऽजीवाधिकरणास्रवाः । संयोगश्च निसर्गश्च द्विचतुद्धिविभेदिनः ॥८६॥ निवर्तनाधिकरणं मलोत्तरगुणा द्विधा । शरीरवाइमन.प्राणापानादीनां च ती गुणौ ॥८७॥ सहसादु.प्रमृष्टानामोगसाप्रत्यवेक्षितैः । भेदेश्चतुर्विधैस्तनिक्षेपाधिकरणं पुनः ॥८॥ जीवोंके परिणाम मन्द, मध्यम और तीन होते हैं इसलिए हेतुमें भेद होनेसे आस्रव भी मन्द, मध्यम और तीन होता है । ८३ ॥ जीवाधिकरण और अजीवाधिकरणके भेदसे आम्रवके दो भेद हैं। जीवाधिकरण आम्रवके मूलमें तीन भेद हैं-१ संरम्भ २ समारम्भ और ३ आरम्भ । इनमें से प्रत्येकके कृत, कारित, अनुमोदना-तीन, मनोयोग, वचनयोग, काययोग तीन और प्रोध, मान, माया, लोभ रूप कपाय-चार इनसे परस्पर गुणित होनेपर छत्तीस-छत्तीस भेद होते हैं। तीनोंके मिलाकर एक-सी आठ भेद हो जाते हैं। भावार्थ-- किसी कार्यके करनेका मनमें विचार करना संरम्भ है। उसके साधन जुटाना समारम्भ है और कार्य रूपमें परिणत करना आरम्भ है । स्वयं कार्य करना कृत है, दूसरेसे कराना कारित है और कोई करे उसमें हर्प मानना अनुमति है। मनसे किसी कार्यका विचार करना मनो- योग है, वचनमें प्रकट करना पचनयोग है और कायसे कार्य करना काययोग है। क्रोध कपायसे प्रेरित हो किसी कार्यको करना क्रोध कपाय है, मानसे प्रेरित हो करना मान कपाय है, मायासे प्रेरित हो करना माया कपाय है और लोभसे प्रेरित होकर करना लोभ कपाय है। मूलमं संरम्भ आदिके भेदसे आस्रव नोन प्रकारका होता है, इनमें से प्रत्येक भेद कृत, कारित अनुमोदनाको अपेक्षा तीन प्रकारका होता है, फिर यही तीन भेद तीन योगके निमित्तसे होते हैं, इसलिए तीनका तीनमें गुणा करनेपर नी भेद होते हैं । तदनन्तर यही नी भेद क्रोधादि कपाय- की अपेक्षा चार-चार प्रकार के होते हैं इसलिए नीमें चारका गुणा करनेपर छत्तीस भेद होते हैं। छत्तीस भेद मरम्भके, छत्तीम समारम्भके और छत्तीस आरम्भके, तीनोंको मिलाकर एक सौ आठ भेद होते हैं। अथवा दूसरी तरहसे संरम्भादि तीनमें कृत कारितादिका गुणा करने पर नी भेद हुए, उनमें तीन योगका गुणा करनेपर सत्ताईस हुए और उसमें क्रोधादि चार कपायका गुणा करनेपर एक-सी आठ भेद होते हैं। ये सब परिणाम जीवकृत हैं अतः इन्हें जीवाधिकरण आस्रव कहते हैं ।।८४-८५।। दो प्रकारको निर्वर्तना, चार प्रकारका निक्षेप, दो प्रकारका संयोग और तीन प्रकारका निसर्ग ये अजीवाधिकरण आम्रवके भेद है ।।६।। मूलगुण निर्वर्तना और उत्तरगुण निर्वर्तनाफे भेदसे निर्वर्तनाके दो भेद हैं। शरीर, वचन, मन तथा श्वासोच्छ्वास आदिकी रचना होना मूलगुण निर्वर्तना है और काप्ट, पाषाण, मिट्टी आदिसे चित्राम आदिका बनाना उत्तरगुण निर्वर्तना है |८७॥ सहसा निक्षेपाधिकरण, दुष्प्र- मृष्ट निक्षेपाधिकरण, अनाभोग निक्षेपाधिकरण और अप्रत्यवेक्षित निक्षेपाधिकरण इन चार भेदोंसे निक्षेपाधिकरण चार प्रकारका होता है । शीघ्रतासे किसी वस्तुको रख देना सहमा निक्षेप है। दुष्टतापूर्वक साफ की हुई भूमिमें किसी वस्तुको रखना दुप्पमृष्ट निक्षेप है । अन्य- वस्थाके साथ चाहे जहाँ किसी वस्तुको रख देना अनाभोग निक्षेप है और बिना देखी- १. तीवमन्दशाताजातभायाधिकरणवीर्यविशेपेभ्यस्तद्विशेष ॥६॥ तक मू० अ०६ । २. अधिकरण जीवाजीवा ॥ ७ ॥ ३० सू० अ०६ । ३. आद्य संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतकपायविशेषति स्विस्त्रिश्चनुश्चैक्श ॥ ८॥ त० सू० अ० ६ । ४ निर्वर्तनानिहासंयोगनिसर्गा द्विचतुर्वित्रिमेदा. IITE सू० १०६ । ५. परम् साम्प्रत्यवेदिती म०।

६७० हरिवंशपुराणे भन्नपानोपकरणसंयोगद्वितयारमना । तदैविध्यं हि संयोगकारणस्य घ कीर्तितम् ॥८९॥ यनिसर्गाधिकरणं तस्पैविध्यं प्रपद्यते । वाइमनःकायपूर्वस्तु निसर्गस्तरप्रवर्तनः ॥२०॥ कर्माप्रयाणां भेदोऽयं सामान्येन निरूपितः । भेदः कर्मविशेषाणामासस्य विशिष्यते ॥११॥ प्रदोषनिह्नवादोन वितासादनदूषणाः । ज्ञानस्य दर्शनज्ञानावृत्योरात्रवहंतुनः ॥१२॥ दुःखशोकवधाक्रन्दनापाः सपरिदेवना. । असद्वेद्यास्रवद्वाराः स्वपरोमयवर्तिनः ॥१३॥ *दया सकलभूतेषु प्रतिघरयनुरागता। सरागपंयमो दानं क्षान्तिः शांचं यथोदितम् ॥९॥ अर्हत्पूजादितात्पर्य वालवृद्धनपस्थिषु । वैय्यात्यादयो वेद्या. सद्वेवासयतयः ॥१५॥ शोधी भूमिमें किसी वस्तुको रख देना अप्रत्यवेक्षित निक्षेप है ।।८। भक्तपान संयोग और उपकरण संयोगके भेदसे संयोगाधिकरण आस्रव दो प्रकारका कहा गया है। भोजन और पानको अन्य भोजन तथा पानमें मिलाना भक्तपान संयोग है तथा बिना विवेकके उपकरणोंका परस्पर मिलाना उपकरण संयोग है जैसे शीतस्पर्श युक्त पीछीसे घाममें संतप्त कमण्डलुका सहसा पोंछना आदि ।।९।। पाइनिसर्ग, मनोनिसर्ग और कायनिसर्गके भेदसे निसर्गाधिकरण आस्रव तीन रूपताको प्राप्त होता है। वचनको स्वच्छन्द प्रवृत्तिको वाइनिसर्ग कहते हैं, मनकी स्वच्छन्द प्रवृत्तिको मनोनिसर्ग कहते हैं और कायकी स्वच्छन्द प्रवृत्तिको काय निसर्ग कहते हैं ॥२०॥ इस प्रकार यह सामान्य रूपसे कर्मास्रवोंका भेद कहा । अव ज्ञानावरणादिके भेदसे युक्त विशिष्ट कर्मकि आम्रयका भेद कहा जाता है ।।९१॥ ज्ञानके विषयमें किये हुए प्रदोप, निव, अदान, विघ्न, आसादन और दूपण ज्ञानायरणके आस्रव हैं और दर्शनके विषयमे किये हुए प्रदोप आदि दर्शनावरणके आम्रव हैं। मोक्षके साधनभूत तत्त्वज्ञानका निरूपण होनेपर कोई मनुष्य चुपचाप बैठा है परन्तु भीतर-ही-भीतर उसका परिणाम कलुपित हो रहा है इसे प्रदोप कहते है। किसी कारण- से 'मेरे पास नहीं है' अथवा 'मैं नहीं जानता हूँ' इत्यादि रूपसे ज्ञानको छिपाना निह्रय है। मात्सर्यके कारण देने योग्य ज्ञान भी दूसरेको नहीं देना सो अदान है। ज्ञानमे अन्तराय डाल देना सो विघ्न है । दूसरेके द्वारा प्रकाशमें आने योग्य ज्ञानको काय और वचनसे रोक देना आसादन है और प्रशस्त ज्ञानमें दोप लगाना दूपण है ॥९२।। वेदनीय कर्मके दो भेद हैं-१असातावेदनीय और २ सातावेदनीय । इनमें से निज, पर और दोनोंके विषयमे होनेवाले दुःग्व, शोक, वध, आक्रन्दन, ताप और परिदेवन ये असाता. घेदनीयके आस्रव हैं। पीड़ारूप परिणामको दुख कहते हैं। अपने उपकारक पदार्थीका संवन्ध नष्ट हो जानेपर परिणामोंमें विकलता उत्पन्न होना शोक है। आयु, इन्द्रिय तथा वल आदि प्राणोंका वियोग करना वध है । संताप आदिके कारण अश्रुपात करते हुए रोना आक्र- न्दन है । लोकमे अपनी निन्दा आदिके फैल जानेसे हृदयमें सीत्र पश्चात्ताप होना ताप है । और उपकारीका वियोग होनेपर उसके गुणोंका स्मरण तथा कीर्तन करते हुए इस तरह विलाप करना जिससे सुननेवाले दयाई हो जायें उसे परिदेवन कहते हैं ॥१३॥ समस्त प्राणियोंपर दया करना, व्रती जनोंपर अनुराग रखना, सरागसंयम, दान, क्षमा, शौच, अर्हन्त भगवानकी पूजामें तत्पर रहना और वालक तथा वृद्ध तपस्वियोंकी वैयावृत्ति आदि करना सातावेदनीय- । १. तत्प्रदोपनिहव-गमर्यान्तरायासादनोग्याता ज्ञानदर्शनापरणयोः ॥ १०॥ त० सू० अ० ६ । २ निहवादाने म०, ड० । ३. दु खशोकतापाक्रन्दनरसारिदेवनान्यात्मपरोभयस्थान्यसद्यस्य ॥११॥ त० सू० श्र० ६।४ भूतनत्यनुकम्पादानसरागरायमादियोग दान्ति. शौचमिति सद्वेद्यस्य ॥१२॥ त० सू० अ०६!

अष्टपश्चाशः सर्गः केवलिश्रुतसंघेषु धर्मदेवेष्ववर्णवाक् । हेतुदर्शनमोहस्याप्यास्रवस्य निरूपितः ॥९६॥ उदयात्तु कषायाणां परिणामोऽपि तीवकः । हेतुश्चारित्रमोहस्य नानाभेदास्रवस्य तु ॥९॥ तत्र स्वान्यकपायाणामुपादेन समुद्धता । कपायवेदनीयस्य हेतुः सद्वृत्तदूषणम् ॥१८॥ प्रहामशीलतादिः स्याद्धोपहसनादिमिः । सहास्यवेदनीयस्य महाखबनिबन्धनम् ।।९९॥ विचित्रक्रीडनासनितशीलाधरोचनम् । रत्याग्न्यवेदनीयस्य हेतुः स्यादाखवो महान् ॥१०॥ परारतिविधानं च रतेरपि विनाशनम् । भरतेवेंदनीयस्य हेतुर्दुश्शीलसेवनम् ॥१०१॥ स्वशोकोत्पादनं चान्यशोकवृद्धयमिनन्दनम् । कुशोकवेदनीयस्य नित्यमाञवकारणम् ॥१२॥ मयोत्पादनमन्येषां स्वमयस्य च मावनम् । भयाख्यवेदनीयस्य सन्ततो हेतुरानवे ॥१०३॥ कुशलाचरणाचारजुगुप्मापरिवादिता । जुगुप्मावेदनीयस्य हेतुरात्रवगोवरः ॥१०॥ अतिसंधानपरता परस्यालीकवादिता । प्रवृद्धरागतादि स्त्रीवेदनीयस्य कारणम् ॥१०५॥ सानुरसेकतनुक्रोधस्वदारपरितोषिताः । हेतु पुंवेदनीयस्य कर्मणः संस्तो मतः ॥१०६॥ प्राचुयं च कषायाणां गुह्यातव्यपरोणम् । परस्त्रीसक्तिरन्त्यस्य वेदनीयस्य हेतवः ।।१०७॥ के आस्रव हैं ।।९४-९५॥ केवली, श्रुत, संघ, धर्म तथा देवका अवर्णवाद करना-झूठे दोप लगाना दर्शन मोहनीय कर्म के आस्रवके हेतु कहे गये हैं । केवली कवलाहारसे जीवित रहते हैं इत्यादि असद्भूत दोपोंका निरूपण करना केवलीका अवर्णवाद है। शास्त्रमें मांस भक्षण आदि निषिद्ध कार्योंका उल्लेख है इत्यादि कहना श्रुतका अवर्णवाद है। ऋपि, मुनि, यति और अनगार इन चार प्रकार के मुनियों का समूह संघ कहलाना है-इनके दोष कहना अर्थात् ये शरीरसे अपवित्र हैं, शूद्र-तुल्य हैं, नास्तिक हैं आदि कहना संघका अवर्गवाद है। जिनेन्द्र भगवानके द्वारा कहा हुआ धर्म निर्गुण है और उसके पालन करनेवाले अमुर होते हैं इत्यादि कहना धर्मका अवर्णवाद है और देव मांस-मदिराका सेवन करते हैं, इत्यादि कहना देवका अवर्णयाद है ॥२६॥ कपायके उदयसे जो तीत्र परिणाम होता है वह चारित्र मोहके नाना- प्रकारके आस्रवोंका कारण है ।।२९७१ चारित्र मोहनीयके कपायवेदनीय और अकपायवेदनीय- की अपेक्षा दो भेद हैं। इनमें से निज तथा पर को कपाय उत्पन्न कर उद्धत वृत्तिका धारण करना तथा तपस्विजनोंके सम्यक् चारित्रमें दूपण लगाना कपायवेदनीयके आम्रव हैं । धर्मका उपहास आदि करनेसे हास्यरूप स्वभावका होना अर्थात् धर्मको हँसी उड़ाकर प्रसन्नताका अनुभव करना हास्य अकपायवेदनीयका आस्रव है ।।९८-१००।। दूसरोंको अरति उत्पन्न करना, रतिको नष्ट करना और दुष्ट स्वभावके धारक जनोंकी सेवा करना रति नामक अकपायवेदनीयके आम्रव हैं ।।१०१॥ अपने-आपको शोक उत्पन्न करना तथा दूसरोंके शोककी वृद्धि देस प्रसन्नता- का अनुभव करना शोक अकपायवेदनीयके आस्रव है ।।१०२॥ दूसरोंको भय उत्पन्न करना तथा अपने भयको चिन्ता करना भय अकपायवेदनीयके आम्रव हैं ।।२०३।। उत्तम आचरण करनेवाले मनुप्योंके आचारमें ग्लानि करना तथा उनको निन्दा करना जुगुप्सा अपाय- वेदनीयका आस्रव है ।।१०४।। दूसरेको धोखा देने में अत्यधिक तत्पर रहना, अमत्य बोलना तथा रागकी अधिकता होना स्त्री अकपायवेदनीयके आस्रव हैं ॥१०॥ नम्रतासे सहिन होना, क्रोधकी न्यूनता होना और अपनी स्त्रीमें मंतोष रखना ये संसारमें पुवेद अपायवेदनीयके आस्रव माने गये हैं ॥१०६ा कपायोंकी प्रचुरता होना, गुह्य अगोंका छेदन करना तथा परस्त्री- में आसक्ति रसना ये नपुंसक अकपायवेदनीयके आम्रव हैं ॥१०॥ १. केवलि तशरधर्मदेवावणंवादो दर्शनमोहस्य ।।१३॥ त० ० ० ६ । २. करायोदयात्तीररिणा- ममारित्रमारस्य ||१४|| त० ०अ०६ । ३. सद्वृत्तभूपगम् म०1४ निन्दनम् म. !

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हरिवंशपुराणे
'नारकस्यायुषो योगो वारम्भपरिग्रहः । तैयंग्योनस्य माया तु हेतुराबवणस्य सः ॥१०॥
मानुपस्यायुपी हेतुरल्पारम्मपरिग्रहः । सन्तुष्टत्वावतत्वादि मार्दवं च स्वभावतः ॥१०९।।
सम्यक्त्वं च प्रतित्वं च बालतापस्ययोगिता । नामनिर्जरा चास्य देवस्थानबहतवः ॥११०॥
'स्वयोगपकना चान्यरिसंवादनयोगिता । हेतु ग्नोऽशुमस्यैव शुमस्यातिमुयोगता ॥११॥
तथा नामविशेषस्य तीर्थकृत्वस्य हेतव । सदर्शनविशुद्याद्याः पोडशातिविनिर्मला ॥११२॥
'सद्गुणाच्छादनं निन्दा परेषां स्वस्य शंसनम् । असद्गुगसमाख्यानं नीचैर्गानालगावहाः ॥११३
"सनीत्त्यनुरसेको हेतुरुक्तविपर्ययः । उच्चैाँग्रेऽन्तरायस्थ दानविघ्नादिकर्तृता ॥११॥
शुमः पुण्यस्य सामान्यादाखव. प्रतिपादितः । तद्विशेषप्रतीत्यर्थमिदं तु प्रतिपद्यते ॥११५॥
"हिंसानृतवचश्वौर्याब्रह्मचर्यपरिग्रहात् । विरतिशतोऽणु स्यात्सर्वतस्तु महद्वतम् ॥११६॥
"महाणुव्रतयुक्तानां स्थिरीकरणहेतवः । व्रतानामिह पञ्चानां प्रत्येकं पञ्च भावनाः ॥११७॥
वहुत आरम्भ और बहुत परिग्रह रखना नरकायुका आस्रव है। मायाचार निर्यञ्च
आयुका आस्रव है ॥१०८॥ थोड़ा आरम्भ और थोड़ा परिग्रह रखनेसे मनुष्य आयुका आम्रव
होता है। संतोप धारण करते हुए अव्रत अवस्था होना तथा स्वभावसे कोमल परिणामी होना
भी मनुष्यायुके आस्रव हैं ॥१०९॥ सम्यग्दर्शन, व्रतीपना, बालतप तथा अकामनिर्जरा ये
देयायुके आस्रव है ॥११०।। अपने योगोंको कुटिलता और दूसरोंके साथ विसंवाद ये अशुभ
नामकर्मके आस्रव हैं और अपने योगोंकी सरलता तथा विसंवादका अभाव होना शुभ
नामका आस्रव है ।।१११।। नामकर्मका विशेष भेद जो तीर्थकर प्रकृति है उसके आसव,
अत्यन्त निर्मलताको प्राप्त दर्शनविशुद्धि आदि सोलह भावनाएँ हैं ।।११२॥ दूसरोंके विद्यमान
गुणोंको छिपाना, अपनी प्रशंसा करना तथा अपने अविद्यमान गुणोंका कथन करना ये नीच-
गोत्रकर्मके आस्रव हैं ।।११३|| विनयपूर्ण प्रवृत्ति करना तथा अहंकार नहीं करना उच्चगोत्रके
आस्रय हैं और दान आदिमें विघ्न करना अन्तरायकर्मके आस्रव हैं ॥११४||
पुण्यकर्मका जो शुभास्रव होता है उसका सामान्यरूपसे वर्णन ऊपर किया जा चुका
है । अब उसकी विशेष प्रतीति के लिए यह प्रतिपादन किया जा रहा है ॥११५।। हिंसा, झूठ,
चोरी, कुशील और अपरिग्रह इन पाँच पापोंसे विरक्त होना सो व्रत है । वह व्रत अणुव्रत और
महानतके भेदसे दो प्रकारका है। उक्त पापोंसे एकदेश विरत होना अणुव्रत है और सर्वदेश
चिरत होना महावत है ।।११६।। महावत और अणुव्रतसे युक्त मनुष्योंको अपने व्रतमें स्थिर
रखने के लिए उक्त पाँचों ब्रतोंमें प्रत्येकको पाँच-पाँच भावनाएँ कही जाती हैं ॥११७|| सम्यक्
१. बहारम्भारिग्रहत्व नारक्स्यायुष ॥१५॥ २. माया तैयग्योनस्य ॥१६॥ ३. अल्पारम्भपरिग्रहत्व
मानुपस्य ॥१॥ ४ निश्शीलप्रतिख च सर्वेषाम् ॥१९॥ ५ स्वभावमार्दवं च ॥१८|| ६ सम्यक्त्व च॥२१॥
७. सरागसंयममयमासयमामनियालतासि देवस्य ॥२०॥ ८. योगवाता विसवादनं चाशुभस्य नाम्न
॥२२॥ ६ तद्विपरीतं शुभस्य ॥२३॥ १० दर्शनविशुद्धिविनयसम्पन्नता शोलतेष्यनतीचारोभादणशानोर.
योगवेगी शक्ततम्यागतासो साधुममाधिर्वयावृत्य करणमईदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरारस्यकापरिहानिर्मार्ग-
प्रभारना प्राचनवत्मलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥२४॥ त० सू० म० ६ | ११. परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणो.
च्छादनोद्धापने च नीचैर्गानस्य ॥२५॥ १२. तद्विपर्ययो नीचैवृत्यनुत्सेको चोत्तरस्य ||२६|| १३. विघ्नकर ए-
मन्तरायस्य ॥२७॥ त० पू० म०६ । १४. हिंसानुनस्तेयात्रापरिप्रदेभ्यो विरतिव्रतम् ॥१॥ देशसतो गु.
महती ॥२॥ तसू० अ०७॥ १५. तरधैयर्याय भावना पच पच ॥३॥

अष्टपञ्चाशः सर्गः
1
११
'सुवाग्गुप्तिमनोगुती सकाले वीक्ष्य मोजनम् । द्वे घेर्यादाननिनेपसमिती प्राग्वतस्य ताः ॥१८॥
स्वोधलोममारत्वहास्यहानोदमाषणाः । द्वितीयस्य प्रतस्यता मापिताः पञ्च मावनाः ॥११९॥
"शून्यान्यमोचितागारवामान्यानुपरोधिताः । भक्ष्यशुद्धविगंवादी तृनीयस्य प्रतस्य ताः ॥१२०॥
"स्त्रीरागकथाश्रुत्या रम्याट्रेक्षागसंस्कृतः । रसपूर्वरनस्मृत्योरन्यागस्तुयंवनस्य ताः ॥१२॥
इष्टानिष्टेन्द्रियायें तापविमुक्तयः । यथास्त्र पज विज्ञेयाः पदमग्रतमावनाः ॥१२२॥
"हिमादिग्विद चामुष्मिनपापादद्यदर्शनम् । व्रतस्थयार्थमवाय भावनीय मनीषिभिः ॥२३॥
'दुवमवेनि चाभदादमद्वद्यादिहेतवः । नित्यं हिंसादयो दोपा मावनीयाः मनी पमिः ॥१२४॥
मंत्रीप्रमोदकारण्यमाध्यस्थ्यं च यथाक्रमम् । सत्वे गुणाधिक क्लिष्टे याविनेये च माप्यते ॥१२५॥
"स्वमवेगविरागाय नित्यं संसारमारमिः । जगरकायस्वभावी च मावनीयो मनस्विमिः ॥१२६॥
'इन्द्रियाद्या दश प्राणाः प्राणिभ्योऽत्र प्रमादिना । यथासंभवमेषां हि हिंसा तु व्यपरोपणम् ॥१२७॥
वचनगुप्ति, सम्यग्मनोगुप्ति, भोजनके समय देखकर भोजन करना ( आलोकितपान भोजन )
ईयांसमिनि और आदाननिक्षेपण समिति ये पाँच अहिंसा प्रतकी भावनाएँ हैं ॥११८।।
अपने क्रोध,लोभ,भय और हास्यका त्याग करना तथा प्रशस्त वचन बोलना (अनुवोचिभापण)
ये पाँच सत्यवनको भावनाएँ हैं ॥११९।। शून्यागारावास, विमोचितावाम, परोपरोधाकरण,
भेक्ष्यशुद्धि और सधर्माविसंवाद ये पॉच अचौर्य बनकी भावनाएँ हैं ॥१२०॥ स्त्री-रागकथा
श्रवण त्याग, अर्थान् नियों में राग बढानेवाली कथाओंके मुननेका त्याग करना, उनके मनोहर
अगोंके देग्रनेका त्याग करना, शरीरकी सजावटका त्याग करना, गरिष्ठ रमका त्याग करना
एवं पूर्व कालमें भोगे हुए रतिके स्मरणका त्याग करना ये पॉच ब्रह्मचर्य व्रतको भावनाएं हैं।
॥१२॥ पञ्च इन्द्रियांक इष्ट-अनिष्ट विपयोंमें यथायोग्य राग-द्वेपका त्याग करना ये पॉच
अपरिग्रह व्रतकी भावनाएँ हैं ।।१२२।। बुद्धिमान मनुष्योंको बनोंको स्थिरताके लिए यह चिन्त-
पन भी करना चाहिए कि हिमादि पाप करनेसे इस लोक तथा परलोकमें नाना प्रकार के कष्ट और
पापबन्ध होता है ॥ १२३ ।। अथवा नीतिके जानकार पुरुषांको निरन्तर एमी भावना करनी
चाहिए कि ये हिंसा आदि दोष दुःस रूप ही हैं । यद्यपि ये दुःखके कारण हैं, दुःम्ब रूप नहीं
परन्तु कारण और कार्यमें अभेद विवक्षासे ऐसा चिन्तयन करना चाहिए ॥१२॥ मत्रो, प्रमोद,
कारण्य और माध्यस्थ्य ये चार भावनाएँ क्रमसे प्राणी-मात्र, गुणाधिक, दुःखी और अविनय
जीयोंमें करना चाहिए। भावार्थ-किमी जीयको दुःय न हो ऐमा विचार करना मैत्री
भावना है। अपनेसे अधिक गुणी मनुष्यों को देखकर हर्प प्रकट करना प्रमोद भावना है।
दुःखी मनुष्योंको देखकर हृदयमें दयाभाव उत्पन्न होना करुणा भावना है और अविनेय.
मिध्यादष्टि जीयों में मध्यस्थ भाव रखना माध्यस्थ्य भावना है ।। १२५ ॥ अपनी आत्मामें
संवेग और वैराग्य उत्पन्न करने के लिए संमारसे भयभीत रहनेवाले विचारक मनुष्योंको मदा
मंमार और शरीरके स्वभावका चिन्तयन करना चाहिए ॥१२६।।
इम संमाग्में प्राणियोंके लिए यथासंभव इन्द्रियादि दश प्राण प्राप्त है । प्रमादी यनकर
१ वाग म०। २ वाट्मनोगुनीयांदाननिक्षेपणममित्याक्तिपानमोजनानि पञ्च ॥४॥
३ मोघलोभभीरत्तदास्यत्रत्वाच्या नान्यनुपीचीभाषणं च पान ॥५॥ ४. शुन्यागारिमावितासागरोया.
करणम वशुद्धिमधमाविबाटा पञ्च ॥ ६॥ ५. स्त्रीरागथायणतन्मनोहगडनिरीक्षणारंगतानुम्मर-
पवयेटरमवशरीरसंस्थत्यागा. पञ्च ॥ ७ ॥ ६. मनोसामनोन्द्रियनिग्यगगदेषवर्धनानि पन्न ।
७.रिमाटिविहामुत्राशयावयदर्शनम् ॥ ६ ॥ ८.दुमय वा ॥ १० ॥ ६. मैत्रीप्रमोदकामाघरमानि
च गावगुणाधिक्लिश्यमानापिनेतु ॥११॥ १० सागादिरागाय मा, जगत्लायवभावो या गंवेगवेग-
ग्याथम् ॥ १२ ॥ ११. प्रमनयोगात् प्रामारोपण हिमा ॥ १३ ॥

६७४ ११ हरिवंशपुराणे प्राणिनो दुःसहेतुम्बादधर्माय वियोजनम् । प्राणानां तु प्रमत्तस्य समितस्य न बन्धकृत् ॥१२८॥ स्वयमेवात्मनात्मानं हिनस्यात्मा प्रमादवान् । पूर्व प्राण्यन्तराणां नु पश्चात्स्याद्वा न वा वधः ॥२९॥ सदर्थमसदर्थ च प्राणिपीडाकरं वचः । असत्यमनृतं प्रोक्तमृतं प्राणिहितं वचः ॥१३०॥ अदत्तस्य स्वयं ग्राहो वस्तुनश्चौर्यमीर्यते । संक्लेशपरिणामन प्रवृत्तिर्यत्र तत्र तत् ।।१३१।। अहिसादिगुणा यस्मिन् वृहन्ति ब्रह्मतत्त्वतः । ब्रह्मान्यत्तु रत्यर्थ स्त्रं पुसमिथुनेहितम् ।।१३।। गवाश्वमणिमुक्तादौ चेतनाचेतने धने । बाह्येऽबाहो च रागादी हेयो मूर्छा परिग्रहः ॥१३३॥ तेभ्यो विरतिरूपाण्यहिसादीनि ब्रतानि हि । महत्वाणुत्वयुक्तानि यस्य सन्ति व्रती तु सः ॥१३॥ सत्यपि व्रतसंबन्धे निश्शल्यस्नु व्रती मतः" । मायानिदानमिध्यात्वं शल्यं शल्यमिव विधा ।।।३५।। "सागारश्चानगारश्च द्वाविह व्रतिनी मती । सागारोऽणुव्रतोऽन स्यादनगारो महाव्रतः ।।१३६॥ सागारो रागमावस्थो वनस्थोऽपि क्यञ्चन । निवृत्तरागमावो यः सोऽनगारो गृहोपितः ।।१३७।। त्रसस्थावरकायेषु सकायाऽपरोपणात् । विरतिः प्रथमं प्रोक्तमहिंसाख्यमणुव्रतम् ।।१३।। उनका विच्छेद करना सो हिंसा पाप है ।।१२७॥ प्राणियोंके दुःखका कारण होनेसे प्रमादी मनुष्य जो क्सिीके प्राणोंका वियोग करता है वह अधर्मका कारण है-पापबन्धका निमित्त है परन्तु समितिपूर्वक प्रवृत्ति करनेवाले प्रमादरहित जीवके कदाचित् यदि किसी जीवके प्राणोंका वियोग हो जाता है तो वह उसके लिए बन्धका कारण नहीं होता है ।।१२८॥ प्रमादी आत्मा अपनी आन्माका अपने-आपके द्वारा पहले घात कर लेता है पीछे दूसरे प्राणियोंका वध होता भी है और नहीं भी होता है ।।१२९॥ विद्यमान अथवा अविद्यमान वस्तुको निरूपण करनेवाला प्राणि-पीडाकारक वचन असत्य अथवा अनृत वचन कहलाता है। इसके विपरीत जो वचन प्राणियोंका हित करनेवाला है वह ऋत अथवा सत्यवचन कहलाता है ।।१३०।। विना दी हुई वस्तुका स्वयं ले लेना चोरी कही जाती है । परन्तु जहाँ संक्लेश परिणामपूर्वक प्रवृत्ति होती है वहीं चोरी होती है ॥१३१।। जिसमें अहिंसादि गुणोंकी वृद्धि हो वह वास्तविक ब्रह्मचर्य है । इससे विपरीत संभोगके लिए स्त्री-पुरुषोंकी जो चेष्टा है वह अब्रह्म है ।।१३२।। गाय, घोड़ा, मणि, मुक्ता आदि चेतन, अचेननरूप बाह्य. धनमें तथा रागादिरूप अन्तरङ्ग विकारमें ममताभाव रखना परिग्रह है । यह परिग्रह छोड़ने योग्य है ।।१३३॥ इन हिंसादि पाँच पापोंसे विरत होना सो अहिंसा आदि पाँच व्रत हैं। ये व्रत महाव्रत और अणुव्रतके भेदसे दो प्रकारके हैं तथा जिसके ये होते हैं वह व्रती कहलाता है ॥१३४॥ व्रतका संबन्ध रहनेपर भी जो निःशल्य होता है वही व्रती मानागया है। माया, निदान और मिथ्यात्वके भेदसे शल्य तीन प्रकारको है । यह शल्य, शल्य अर्थात् कॉटोंके समान दुःस देनेवाली है ॥१३॥ सागार और अनगारके भेदसे व्रती दो प्रकारके माने गये हैं। इनमें अणुव्रतों धारी सागार कहलाते हैं और महाव्रतोंके धारक महाव्रती कहे जाते हैं ॥१३६।। जो मनुष्य राग- भाव में स्थित है यह किसी तरह वनमें रहनेपरभी सागार-गृहस्थ है और जिमका रागभाव दूर हो गया है वह घर में रहनेपर भी अनगार है ॥१३७॥ बस और स्थावरके भेदसे जीव दो प्रकारके हैं । इनमें-मे त्रसकायिक जीयोंके विपातसे विरत होना पहला अहिंसाणुव्रत कहा १. उद्यालिदम्हि पादे इरियासमिदास णिग्गमणाणे। आवादे[2]जलिंगों मरेनोतजोगमासेज ॥ १।। एहि तम्म तरिमित्तो धो मुह मोरि देमिदो समए । मुन्छापरिग्गहो ति य अमापजाणो भगिदो ॥२॥ सपिसिसी उद्धृतम् । २ प्राण्यावरणात् म० । ३ यस्मात्सपाय सन् इन्त्यात्मा प्रथममारम• नात्मानम् । पश्चाउमायेत न या हिंसा प्राण्यन्तगणां तु । पुरुषार्थसिद्प्युपाय । ४. अदत्तादान स्नेयम् । ५. मैथुन- मत्रहा । ६ अनदाएपे तु क०, अनान्यस्तु म०, ३० । ७ हेये म०, ७० । ८. मन्छो परिप्रद । ९. निःशल्यो वती। १० या म० । ११ अगायनगारश्च । १२ अणुबतोडगारी । । - अष्टपञ्चाशः सर्गः ६७५ यद्रागद्वेपमोहादेः परपीडाकरादिह । अनृताद्विरतिर्यत्र तद्वितीयमणुचतम् ।।१३९।। परदन्यस्य नष्टादेमंहतोऽल्पस्य चापि यत् । अदत्तन्वेऽस्य नादाने तत्तृतीयमणुव्रतम् ॥१४०॥ दारेषु परकीयेषु परित्यारतिस्तु यः । स्वदारवेत्र सन्तोषस्तचतुर्थमणुव्रतम् ।।१४।। स्वर्णदासगृहक्षेत्रप्रभृतेः परिमाणतः । 'बुद्धयेच्छापरिमाणारयं पञ्चमं तदणुव्रतम् ।।१४२॥ गुणवतान्यपि त्रीणि पचाणुव्रतधारिणः । शिष्या (क्षा) व्रतानि चत्वारि मवन्ति गृहियः सतः ॥१४३।। यः प्रसिद्धरमिजानैः कृतावध्यनतिक्रमः । दिग्विदिक्षु गुगेप्याद्य वेयं दिग्विरतितम् ।।१४४।। ग्रामादीनां प्रदेशस्य (परिमाणकृतावधि । यहिगतिनिवृत्तिर्या तद्देशविरतिव्रतम् ॥१४५।। पापोपदेशोऽपध्यानं प्रमादाचरितं तथा । हिंसाप्रदानमशुमश्रुतिश्चापीति पञ्चधा ।।१४६।। पापोपदेशहेनुर्योऽनर्थदण्डोऽपकारकः । अनर्थदण्डविरतिव्रतं तद्विरनिः स्मृतम् ।।१४७।। पापोपदेश आदिष्टो वचनं पापसंयुतम् । यद्वणिग्वधकारम्मपूर्व सावध कर्मसु ॥१८॥ अपध्यानं जयः स्वस्य यः परस्य पराजयः । वधवधार्थहरण कथं स्यादिति चिन्तनम् ॥१४९।। वृक्षादिच्छेदनं भूमिकुट्टनं जलसेचनम् । इत्यायनर्थकं कर्म प्रमादाचरितं तथा ॥१५॥ विपकण्टरशस्वामिरज्जुदण्डक्शादिनः । दानं हिंसाम दानं हि हिंसोपहरणस्य वै ॥१५॥ हिमारागादिसंवधिंदु.कथाश्रुतिशिक्षयोः । पापबन्धनिबन्धो यः स स्थापापाशुमश्रुतिः ।।१५२।। माध्यस्थ्यकन्यगमनं देवतास्मरणस्थिते. । सुखदुःसारिमित्रादौ वाध्यं सामायिक प्रतम् ।।१५३।। गया है ।।१३८।। जिसमें राग, द्वेष मोहसे प्रेरित हो पर-पीडाकारक असत्य वचनसे विरति होती है वह दूसरा सत्याणुव्रत है ॥१३९॥ दुसरेका गिरा पड़ा या भूला हुआ द्रव्य चाहे अधिक हो चाहे थोड़ा, विना दी हुई दशामें उसको नहीं लेना तीसरा अचौर्याणुव्रत है ॥१४०।। परस्त्रियोंमें राग छोड़कर अपनी स्त्रियों में ही जो संतोप होता है वह चौथा ब्रह्मचर्याणुव्रत है ॥१४१|| सुवर्ण, दास, गृह तथा खेत आदि पदार्थोंका बुद्धिपूर्वक परिमाण कर लेना इच्छा- परिमाण नामका पाँचवॉ अणुव्रत है ।।१४।। पॉच अणुव्रतोंके धारक सद्गृहस्थके तीन गुणव्रत और चार शिक्षावत भी होते हैं ॥१४३।। दिशाओं और विदिशाओंमें प्रसिद्ध चिह्नों-द्वारा की हुई अवधिका उल्लङ्घन नहीं करना सो दिग्वन नामका पहला गुणत्रत है ।।१४४।। दिनतके भीतर यावजीवनके लिए किये हुए वृहत परिमाणके अन्तर्गत कुछ समयके लिए जो ग्राम-नगर आदिकी अवधि की जाती है उमसे बाहर नहीं जाना सो देशवत नामका दूसरा गुणत्रत है ।।१४५|| पापोपदेश, अपध्यान, प्रमादाचरित, हिंसादान और दुःश्रुति ये पॉच प्रकारके अनर्थदण्ड हैं। जो पापके उपदेशका कारण है वह अपकार करनेवाला अनर्थदण्ड है उससे विरत होना मो अनर्थदण्ड-त्याग नामका तीसरा गुणन्नत है ।।१४६-१४७|| वणिक् तथा वधक आदिके सापद्य कार्योंमें आरम्भ करानेवाले जो पापपूर्ण वचन हैं वह पापोपदेश अनर्थ दण्ड है ॥१४८।। अपनी जय, दूसरेकी पराजय तथा यध, यन्धन एवं धनका हरण आदि किस प्रकार हो ऐमा चिन्तन करना सो अपध्यान है ।।१४९।। वृनादिकका छेदना, पृथियोका कूटना, पानीका सींचना आदि अनर्थक कार्य करना प्रमादाचरित नामका अनर्थदण्ड है ।।१५।। विप, कण्टक, शस्त्र, अग्नि, रस्सी, दण्ड तथा कोड़ा आदि हिंसाके उपकरणोंका देना सो हिंसादान नामका अनर्थदण्ड है ।।१५।। हिंसा तथा रागादिको वढानेवाली दुष्ट कथाओंके मुनने तथा दूमरोंको शिक्षा देनेमें जो पाप- वन्धके कारण एकत्रित होते हैं यह पापसे युक्त दुःश्रुति नामका अनर्थदण्ड है ॥१५२।। देवताके स्मरणमें स्थित पुरुषके मुख-दुःख तथा शत्रु-मित्र आदिमें जो माध्यस्थ्य . १ बुद्धेच्छा म०, फ०, १० १२ पापोरदेशो हेतुयों इ० । ३ रिक्षया म. १४ स्थिति म०। .

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हरिवंदापुराणे
चतुराहारहान यन्निरारम्भस्य परंम् । स प्रोषधोपयामोऽक्षाण्युपंन्यास्मिन्यमन्ति यत् ॥१५॥
गन्धमाल्यानपानादिरपमोग उपत्य यः । मोगोऽन्यः परिभोगो यः परित्यज्यामनादिकः ।।१५५।।
परिमाणं तयोर्यत्र यथाशनि यथायथम् । उपभोगपरीमोगपरिमाणवतं हि सत् ।।१५६।।
मांममद्यमधुधनवेश्यावीनतमुक्तितः । विरतिनियमो शेयोऽनन्तकायादिवर्जनम् ॥१५॥
स मंयमस्य वृत्यर्थमततीरयतिथिः स्मृतः । प्रदानं संविभागोऽस्मै यथाशुद्धियथोदिनम् ॥१५८॥
मिक्षोपयोपकरणप्रतिश्रयविभेदतः । संविभागोऽतिथिभ्यस्तु चनुर्विध उदाहृतः ॥१५९॥
सम्यकायकपायाणां वहिरन्तहि लेखना । सलेखनापि कतंच्या कारगे मारणान्तिकी ॥१६॥
रागादीनामनुत्पत्तावागमोदितवर्मना । अशक्यपरिहार हि सान्त सलेसना मता ॥१६॥
अष्टौ निशकतादीनामष्टानां प्रतियोगिनः । सम्यग्दृष्टेरतोचारास्स्यायाः शङ्कादयः मताम् ॥१६॥
पञ्च पञ्च स्वतीचारा व्रतशीलेषु मापिताः । यथाक्रमममी वेद्याः परिहार्याच तातैः ॥१६३।।
गतिरोधकरो बन्धो बधो दण्डातिताइना । कर्णार्यवयवच्छेदोऽ'यतिमारातिरोपणम् ॥१६॥
भावकी प्राप्ति है उसे सामायिक नामका पहला शिक्षाबत जानना चाहिए ॥१५३।। दो अष्टमी
और दो चतुर्दशी इन चार पर्वके दिनों में निरारम्भ रहकर चार प्रकारके आहारका त्याग
करना सो प्रोपधोपवास नामका दूसरा शिक्षाव्रत है। जिसमें इन्द्रियाँ वाहा-संसारसे हटकर
आत्माके समीप वास करनी हैं वह उपवास कहलाता है ॥१५४|| गन्ध, माला, अन्न. पान
आदि उपभोग हैं और आसा आदिक परिभोग हैं। पास जाकर जो भोगा जाता है वह
उपभोग कहलाता है और जो एक बार भोगकर छोड़ दिया जाता है तथा पुनः भोगने में आता
है वह परिभोग कहलाता है । जिसमें उपभोग तथा परिभोगका यथाशक्ति परिमाण किया
जाता है वह उपभोग-परिभोग-परिमाणवत है ।।१५५-१५६।। मांस, मदिरा, मधु, जुआ, वेश्या,
तथा रात्रिभोजनसे विरत होना एवं काम आदि जीवोंको त्याग करना सो-नियम कह-
लाता है रि५वा जो संयमकी वृद्धि के लिए निरन्तर भ्रमण करता रहता है यह अतिथि कहलाता
है उसे शुद्धिपूर्वक आगमोक्त विधिसे आहार आदि देना अतिथिसंविभाग व्रत है ॥१५८।।
भिक्षा, औषध, उपकरण और आवासके भेदसे अतिथि संविभाग चार प्रकारका कहा गया
है ॥१५९।। मृत्युके कारण उपस्थित होनेपर पहिरनमें शरीर और अन्तरङ्गमें कपायोंका अच्छी
तरह कुश करनी सल्लेखना कहलाती है। व्रती मनुष्यको मरणान्तकालमें यह सल्लेग्यना
अवश्य ही करनी चाहिए ॥१६०।। जब अन्त अर्थात् मरणका किसी तरह परिहार न किया
जा सके तब रागादिकी अनुत्पत्तिके लिए आगमोक्त मार्गसे सल्लेखना करना उचित माना
गया है ॥१६॥
निःशङ्कित आदि आठ अङ्गोंके विरोधी शङ्का, कांक्षा आदि आठ दोप सम्यग्दर्शनके
अतिचार हैं। सत्पुरुपाको इनका त्याग अवश्य ही करना चाहिए ।।१६२॥ पाँच अणुव्रत तथा
सात शील व्रतों में प्रत्येक के पॉच पॉच अतिचार होते हैं । यहाँ यथाक्रमसे उनका वर्णन किया
जाता है । तद्नद् व्रतोंके धारक मनुष्योंको उन अतिचारोंका अवश्य ही परिहार करना
चाहिए ।।१६३|| जीवोंकी गतिमे रुकावट डालनेवाला बन्ध, दण्ड आदिसे अत्यधिक पीटना-
१. इन्द्रियाणि । २. अलपलबहुविधातान्मूलाकनवनीतकादीनि सन्धानकादीन, बहुजन्तुयोनि-
स्थानानि, अतोऽन्यदनिष्टानिवर्तनम् (क० टि०)। ३. मारणान्तिको सल्लेसना जोषिता-त० सू० ।
४. रागादीना समुत्पत्ता म० । ५ तत्त्वार्थसूत्रे तु पञ्चैव अतिचारा प्रतिपादिताः । तथादि-शका-काक्षा-
विचिकित्सान्यदृष्टिप्रशंसामस्रवाः सम्यग्दृष्टेरतिचाग.'-त० सू० । ६. कर्णाद्यपनयच्छेदो । ७. वधबन्धच्छेदिता-
भारारोपणानपाननिरोधाः ॥२५॥

अष्टपञ्चाशः सर्गः
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अन्नपाननिरोधस्तु क्षुद्वाधादिकरोगिनाम् । अहिंसाणुव्रतस्योक्ता अतिचारास्तु पञ्च ते ॥१६५।।
अतिसन्धापन मिय्योपदेश इह चान्यथा । यदम्युदयमोक्षार्थक्रियास्वन्यप्रवर्तनम् ॥१६६॥
रहोस्याप्यानमकान्तवीपुंसेहायकाशनम् । कूटलेखक्रियान्यन स्वनुक्तस्य स्वलेखनम् ॥१६॥
विस्मृतन्यस्तसंन्यस्य स्वल्पं स्वं संप्रगृहतः । न्यासापहार पुतावदित्यनुज्ञापकं वचः ॥१६॥
साकारमन्त्रभेदोऽसी भूविक्षेपादिकङ्गितः । पराकूतस्य बुझाविर्भावनं यदसूयया ।।१६९।।
यरमल्याणुवनम्यामी पञ्जातीचारकाश्विरम् । परिहार्याः समदिचिायांचर्यवेदिमिः ॥१०॥
धस्तनप्रयोगस्तैराहृतादानमारमनः । अन्यो विन्दराज्यातिक्रमवाफमक्क्रये ॥११॥
हीनन दानमन्यामधिनान्मनो ग्रहः । प्रस्यादिमानभेदेन तुलाद्युन्मानवस्नुनः ॥१७२॥
रूपक कृत्रिमः स्वर्णेचनः प्रतिरूपकः । व्यवहारस्वतीचारास्तृतीयाणुव्रतस्य ते ॥१७३॥
'परविवाहकरणमनगक्रीडया गती । गृहोतागृहीतत्वोः कामतीवामिवेशनम् ॥१७॥
एते स्वदारसन्तापवतस्याणुवतात्मनः । प्रतीचाराः स्मृताः पञ्च परिहार्याः प्रयततः ॥१७॥
वध, कान आदि अवयवोंका छेदना,अधिक भार लादना और भूख आदिकी बाधा करनेवाला
अन्नपानका निरोध ये पॉच अहिंसाणु व्रतके अतिचार कहे गये हैं ॥१६४-१६५।। मिथ्योपदेश,
रहोभ्याख्यान, कूटलेखक्रिया, न्यासापहार और साकारमन्त्रभेद ये पॉच सत्याणुव्रतके
अतिचार हैं। किसीको धोखा देना तथा स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त करानेवाली क्रियाओंमें
दूसरोंकी अन्यथा प्रवृत्ति कराना मिथ्योपदेश है । स्त्री-पुरुपोंकी एकान्त चेप्टाको प्रकट करना
रहोभ्याख्यान है । जो बात दूसरेने नहीं कही है उसे उसके नामपर स्वयं लिख देना कूटलेख-
क्रिया है । कोई मनुष्य धरोहरमें रखे हुए धनकी संख्या भूलकर उससे स्वल्प ही धनका ग्रहण
करता है तो उस समय ऐसे बचन बोलना कि 'हॉ इतना ही था ले जाओ' यह न्यामापहार है।
भौहका चलना आदि चेष्टाओंसे दूसरे रहस्यको जानकर ईर्ष्यावश उसे प्रकट कर देना साकार
मन्त्रभेद है। मर्यादाके पालक तथा आचार शास्त्रके ज्ञाता मनुष्योंको विचार कर इन अति-
चारोंका अवश्य ही परिहार करना चाहिए ।।१६६-१७०॥ स्तेनप्रयोग, तदाहतादान, विरुद्ध
राज्यातिक्रम, हीनाधिकमानोन्मान और प्रतिरूपकन्यवहार ये पॉच अचीर्याणुव्रतके अति-
चार हैं । कृन कारित अनुमोदनासे चोरको चारी में प्रेरित करना स्तेन प्रयोग है। चोरोंके
द्वाराचुराकर लायी हुई वस्तुका स्वयं खरीदना तदाहनादान है। आक्रमणकर्नाकी खरीद होने-
पर स्वकीय गज्यकी आज्ञाका उल्लंघन कर विरुद्ध राज्यमें आना-जाना, अपने देशकी वस्तुएँ
वहाँ लेजाकर बेचना विरुद्ध-राज्यातिक्रम नामका अतिचार है। प्रस्थ आदि मानमें भेद
और तुला आदि उन्मानमें भेद रखकर हीन मानोन्मानसे दूमरोंको देना और अधिक
मानोन्मानसे स्वयं लेनाहीनाधिक मानोन्मान नामका अतिचार है । कृत्रिम-मिलावटदार सोना,
चॉदी आदिके द्वारा दूमरॉको ठगना प्रतिरूपक व्यवहार नामका अनिचार है ।।१७१-१७३।।
परविवाहकरण, अनङ्गक्रीड़ा, गृहीतत्वरिकागमन, अगृहीतेत्वरिकागमन और काम-
तीनाभिनिवेश ये पॉच स्वदार संतोपत्रतके अतिचार हैं। प्रयत्नपूर्वक इनका परिहार
करना चाहिए। अपनी या अपने संरक्षणमें रहनेवाली संतानके मियाय दूसरेको संतानका
विवाह कराना परविचाहकरण है। काम-सेवनके लिए निश्चित अंगोंके अतिरिक्त अंगांक
१ रिचायांचायरेदिभिः म.। २. मियोपदेशरहोम्पाख्यानकूटलेखनियान्यामापधारसाचारमन्त्रः
भंदा ॥२६॥-त० सू० अ०७।३ मुद्यन्तं स्वयमेव प्रयुक्त अन्येन का प्रोजयति, प्रयुक्तमनुमन्यते या यतः
स स्तेनप्रयोग. (क० टि०)। ४. नित्येपा-म०, ०,१०। ५ स्तेनप्रयोगनगाहनादानविरुद्धगज्यानित्रम-
होनाधिकमानाम्मानप्रतिपक्च्यवहायः ॥ २७ ॥ ६. परनिराहारणेत्वरिपरिगृहीता परिगृहीतागमनाना-
मीडाकामतीमाभिनिवेशाः ॥२८॥

- । हरिवंशपुराणे हिरण्यस्वर्णयोर्वास्तुक्षेत्रयोधनधान्ययोः । दासीदासाद्ययोः पञ्च कुप्यस्यते व्यतिक्रमाः ॥१७६॥ दिग्विरस्यतिचारोऽधस्तियंगूर्ध्वव्यतिक्रमाः । लोमात्स्मृत्यन्तराधानं क्षेत्रवृद्धिश्च पवधा ॥१७॥ प्रेष्यप्रयोगानयनपुद्गलक्षेपलक्षणाः । शब्दरूपानुपातौ द्वौ तद्देशविरनियंते ॥१७॥ पञ्च कन्दर्पकौन्कुच्य मौसर्याणि तृतीयके । अममीक्ष्याधिकरणोपभोगादिनिरर्थने ॥१७९॥ योगनिःप्रणिधानानि वीण्यनादरता च ते । पञ्च स्मृत्यनुपस्थानं स्युः सामायिकगोचराः ॥१८॥ द्वारा काम सेवन करना अनंग क्रीड़ा है। दूसरेके द्वारा अगृहीत व्यभिचारिणी स्त्रीके यहाँ जाना गृहीतेत्वरिकागमन है । दूसरेके द्वारा अगृहीत व्यभिचारिणी स्त्रीके यहाँ जाना अगृहीतेत्वरि- कागमन है। और स्वस्त्रीके साथ भी काम सेवनमें अधिक लालसा रखना कामतीत्राभि- निवेश है ।।१७४-१७शा हिरण्य-सुवर्ण, वास्तु-क्षेत्र, धन-धान्य, दासी-दास और कुप्य–वर्तन तथा वस्त्रकी सीमाका उल्लंघन करना ये पॉच परिग्रहपरिमाणवतके अतिचार हैं। रुपया, चॉदी आदिको हिरण्य तथा सोना व सोनेके आभूपग आदिको सुवर्ण कहते हैं। रहनेके मकानको वास्तु और गेहूँ, चना आदि के उत्पत्ति-स्थानोको क्षेत्र कहते हैं। गाय, भैंस आदिको धन तथा गेहूँ, चना आदि अनाजको धान्य कहते हैं। दासी-दास शब्दका अर्थ स्पष्ट है। वर्तन तथा वस्त्रको कुष्य कहते हैं। इनके प्रमाणका उल्लंघन करना सो हिरण्यसुवर्णातिक्रम आदि अतिचार होते है ।।१७६।। अधोव्यतिक्रम, तिर्यगव्यतिक्रम, ऊर्ध्वव्यतिक्रम, स्मृत्यन्तराधान और क्षेत्रवृद्धि ये पाँच दिग्बतके अतिचार हैं । लोभके वशीभूत होकर नीचेकी सोमाका उल्लंघन करना अधोव्यतिक्रम है, समान धरातलको सीमाका उल्लंबन करना तिर्यव्यतिक्रम है। ऊपरको सीमाका उल्लंघन करना ऊर्यव्यतिक्रम है। की हुई सीमाको भूलकर अन्य सीमाका स्मरण रखनास्मृत्यन्तराधान है तथा मर्यादित क्षेत्रकी सीमा बढा लेना क्षेत्रवृद्धि है ।।१७७॥प्रेष्य प्रयोग, आनयन, पुद्गल क्षेप, शब्दा- नुपात और रूपानुपात ये पाँच देशजतके अतिचार हैं। मर्यादाके बाहर सेवकको भेजना प्रेष्य- प्रयोग है । मर्यादासे बाहर किसी वस्तुको बुलाना आनयन है। मर्यादाके बाहर कंकड़-पत्थर आदि का फेंकना पुद्गलक्षेप है, मर्यादाके बाहर अपना शब्द भेजना शब्दानुपात है और मर्यादाके बाहर काम करनेवाले लोगोंको अपना रूप दिखाकर सचेत करना रूपानुपात है॥१७८॥ कन्दर्प, कौत्कुच्य, मौखर्य, असमीक्ष्याधिकरण और उपभोगपरिभोगानर्थक्य ये पॉच अनर्थदण्ड व्रतके अतिचार हैं । रागकी उत्कटतासे हास्यमिश्रित चण्ड वचन बोलना कन्दर्प है। शरीरसे कुचेष्टा करना कौत्कुच्य है । आवश्यकतासे बोलना मौखर्य है । प्रयोजनका विचार न रख आवश्यकतासे अधिक किसी कार्यमे प्रवृत्ति करना-कराना असमीक्ष्याधिकरण है और उपभोग-परिभोगकी वस्तुओंका निरर्थक संग्रह करना उपभोगपरिभोगानर्थक्य है ।।१७९|| मनोयोग दुष्प्रणिधान, वचनयोग दुष्प्रणिधान, काययोग दुष्प्रणिधान, अनादर और स्मृत्यनुपस्थान ये पॉच सामा- यिक शिक्षाप्रतके अतिचार हैं। मनको अन्यथा चलायमान करना मनोयोगदुष्प्रणिधान है, वचनकी अन्यथा प्रवृत्ति करना-पाठका अशुद्ध उच्चारण करना वचनयोग दुष्प्रणिधान है। कायको चलायमान करना काययोग दुष्प्रणिधान है । सामायिकके प्रति आदर वा उत्साह नहीं होना-वेगार समझकर करना अनादर है और चित्तकी एकाग्रता न होनेसे सामायिककी विधि या पाठका भूल जाना अथवा कार्यान्तरमे उलझकर सामायिकके समयका स्मरण १. क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनवान्यदासीदास कुप्यपमागातिकमाः॥ २६ ।। २. ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रम- क्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि ॥ ३० ॥ श्रानयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपाः ॥ ३१ ।। ४. कन्दको कुच्यनौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि ।। ३२ ।। ५. योगाष्पगिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ।।३३।। ३ स्मृत्यन्तराध्यान क.।

अष्टपञ्चाशः सर्गः ६७९ 'अनवेश्य मलोत्सर्गादानसंस्तरसंक्रमाः । स्युः प्रोषधीपत्रामस्य ते नैकाग्न्यमनादरः ॥१८॥ सचित्ताहारसंबन्धसम्मिश्रामिषवास्तु ते । उपभोगपरीमोगे दुष्पकाहार एव च ॥१८२॥ ते सञ्चित्तेन निक्षेपः सचित्तावरणं परम् । व्यपदेशश्च मात्सर्य कालातिक्रमतातिथौ ॥१८३॥ 'श्राशंसे जीविते मृत्यौ निदानं दीनचेतसः । सुखानुबन्धमित्रानुरागौ सल्लेसनामलाः ॥१८॥ सम्यग्ज्ञानादिवृद्धयादिस्वपरानुग्रहेच्छया । दानं त्यागोऽतिसर्गाख्यः प्रासुकस्वस्य पात्रगम् ॥१८५॥ विधिदेयविशेषाभ्यां दातृपानविशेषतः । भेदः फलस्य भूम्यादभेदात्मयभिंदवत् १८६॥ प्रतिग्रहादिपु प्रायः सादरानादरस्वतः । दानकाले विधौ भेदः फलभेदस्य कारकः ॥१८७॥ तपःस्वाध्यायवृद्ध्यादयभेदोऽपि हेतुतः । एक हि साम्यकृटेयं ततो वैषम्यकृत्परम् ॥१८॥ 'अनसूयाविपादादिरसूयादिपरस्वयम् । दायकस्य विशेषोऽपि विचित्रा हि मनोगतिः ॥१८९॥ नहीं रखना स्मृत्यनुपस्थान है ॥१८०॥ बिना देखी हुई जमीनमें मलोत्सर्ग करना, विना देखे किसी वस्तुको उठाना, विना देखी हुई भूमिमें विस्तर आदि बिछाना, चित्तकी एकाग्रता नहीं रखना और व्रतके प्रति आदर नहीं रखना ये पॉच प्रोषधोपवास व्रतके अतिचार हैं ॥१८॥ सचित्ताहार, सचित्त संबन्धाहार, सचित्त सन्मिश्राहार, अभिपवाहार और दुष्पक्वाहार ये पॉच उपभोगपरिभोगपरिमाण व्रतके अतिचार हैं। सचित्त-हरी वनस्पति आदिका आहार करना सचित्ताहार है। सचित्तसे संवन्ध रखनेवाले आहार-पानको ग्रहण करना सचित्त संवन्धाहार है। सचित्तसे मिली हुई अचित्त वस्तुका सेवन करना सचित्तसन्मि- श्राहार है । गरिष्ठ पदार्थोंका सेवन करना अभिपवाहार है और अधपके अथवा अधिक पके आहारका ग्रहण करना दुष्पक्याहार है ।।१८२॥ सचित्त-निक्षेप, सचित्तावरण, पर-व्यपदेश, मात्सर्य और कालातिक्रमता ये पाँच अतिथिसंविभाग व्रतके अतिचार हैं । हरे पत्ते आदिपर रखकर आहार देना सचित्त निक्षेप है ! हरे पत्ते आदिसे ढका हुआ आहार देना सचित्तावरण है । अन्य दाताके द्वारा देय वस्तुको देना परव्यपदेश है। अन्य दाताओंके गुणको नहीं सहन फरना मात्सर्य है और समय उल्लंघन कर देना कालातिक्रम है ॥१८३।। जीविताशंसा, मर- णाशंसा, निदान, सुखानुबन्ध और मित्रानुराग ये पॉच सल्लेखनाके अतिचार हैं। क्षपकका दीचित्त होकर अधिक समय तक जीवित रहनेकी आकांक्षा रखना जीविताशंसा है। पीड़ासे धवड़ाकर जल्दो मरनेकी इच्छा करना मरणाशसा है। आगामी भोगोंकी आकांक्षा करना निदान है । पहले भोगे हुए सुखका स्मरण रखना सुखानुवन्ध है और मित्रोंसे प्रेम रखना मित्रानुराग है ॥१८४॥ सम्यग्ज्ञानादि गुणोंकी वृद्धि आदि स्व-परके उपकारकी इच्छासे योग्य पात्र के लिए प्रासुक द्रव्यका देना त्याग कहलाता है, इसका दूसरा नाम अतिसर्ग भी है ॥१८५॥ जिस प्रकार भूमि आदिके भेदसे धान्यकी उत्पत्ति आदिमें भेद होता है उसी प्रकार विधि द्रव्य दाता और पात्रकी विशेषतासे दानके फलमें भेद होता है॥१८६॥ दानके समय पडगाहने आदिको क्रियाओंमें आदर या अनादरके होनेसे दानकी विधिमें भेद हो जाता है और यह फलके भेदका करनेवाला हो जाता है ॥१८७॥ तप तथा स्वाध्यायकी वृद्धि आदिका कारण होनेसे देयमें भेद होता है । यथार्थमें एक पदार्थ तो ऐसा है जो लेनेवालेके लिए समताभाव- का करनेवाला होता है और दूसरा पदार्थ ऐसा है जो विपमताका करनेवाला होता है। १ अप्रवेक्ष्य खा० । २. अप्रत्यवेदिताप्रमार्जितोत्सगांदानमस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ||३४|| ३. सचित्तसम्बन्धसम्मिश्राभिषवदुरमाहारा. ॥३५।। ४. सनित्तनिक्षेगारिधानएरव्यादेशमात्सर्यशालातिक्रमाः ।। ३६ ॥ ५ अन्यदातृदेयापणे परव्यपदेशः (का० टि०) ६. जीवितमरणाशंसामिनानुगगमुग्वानुबन्ध- निदानानि ॥३७॥ ७ निसर्गाश्य म०। ८ अनुग्रहार्थ स्वस्यातिमर्गा दानम् ॥३८॥ ९. विधिद्रव्यदातृ ग. विशेषातदिशेपः ॥३९॥ १०. हेतुना म.,ड.। ११. अनुसूया म० ।

- हरिवंशपुराणे हिरण्यस्वर्णयोर्वास्तुक्षेत्रयोर्धनधान्ययोः । दासीदासाद्ययोः पञ्च कुष्यस्यते व्यतिक्रमाः ॥१७६॥ दिग्विरत्यतिचारोऽवस्तिर्यगूर्ध्वन्यनिक्रमाः । लोमात्स्मृत्यन्तराधान क्षेत्रवृद्धिश्च पञ्चधा ॥१७७॥ नेप्यप्रयोगानयनपुद्गलक्षेपलक्षणाः । शब्दरूपानुपातौ द्वौ तहेगविरतिव्रते ।। १७८॥ पञ्च कन्दर्पकौत्कुच्यमौसर्याणि तृतीयक । असमीक्ष्याधिकरणोपभोगादिनिरर्थने ॥१७९॥ "योगनिःप्रणिधानानि वीण्यनादरता च ते । पज स्मृत्यनुपस्थानं स्युः सामायिकगोचराः ॥१०॥ द्वारा काम सेवन करना अनंग क्रीड़ा है। दूसरेके द्वारा अगृहीत व्यभिचारिणी स्त्रीके यहाँ जाना गृहीतेत्वरिकागमन है । दूसरेके द्वारा अगृहीत व्यभिचारिणी स्त्रीके यहाँ जाना अगृहीतेत्वरि- कागमन है । और स्वन्त्रीके साथ भी काम सेवनमें अधिक लालसा रखना कामतीवाभि- निवेश है ।।१७४-१७५।। हिरण्य-सुवर्ण, वास्तु-क्षेत्र, धन-धान्य, दासी-दास और कुप्य--वर्तन तथा वस्त्रको सीमाका उल्लंघन करना ये पॉच परिग्रहपरिमाणवतके अतिचार हैं । रुपया, चॉदी आदिको हिरण्य तथा सोना व सोनेके आभूषण आदिको सुवर्ण कहते हैं। रहनेके मकानको वास्तु और गेहूँ, चना आदि के उत्पत्ति-स्थानोंको क्षेत्र कहते हैं । गाय, भैंस आदिको धन तथा गेहूँ, चना आदि अनाजको धान्य कहते हैं। दासी-दास शब्दका अर्थ स्पष्ट है। वर्तन तथा वस्त्रको कुण्य कहते हैं। इनके प्रमाणका उल्लंघन करना सो हिरण्यसुवर्णातिक्रम आदि अतिचार होते हैं ।।१७६|| अधोव्यतिक्रम, तिर्यगव्यतिक्रम, ऊर्ध्वव्यतिक्रम, स्मृत्यन्तराधान और क्षेत्रवृद्धि ये पॉच दिनतके अतिचार हैं। लोभके वशीभूत होकर नोचेकी सीमाका उल्लंघन करना अधोव्यतिक्रम है, समान धरातलकोसीमाका उलंयन करना तिर्यग्व्यतिक्रम है। ऊपरको सीमाका उल्लंघन करना ऊर्ध्वव्यतिक्रम है। की हुई सीमाको भूलकर अन्य सीमाका स्मरण रखनास्मृत्यन्तराधान है तथा मर्यादित क्षेत्रकी सीमा बढ़ा लेना क्षेत्रवृद्धि है ।।१७०१ प्रेष्य प्रयोग, आनयन, पुद्गल क्षेप, शब्दा- नुपात और रूपानुपात ये पॉच देशवतके अतिचार हैं । मर्यादाके बाहर सेवकको भेजना प्रेप्य- प्रयोग है । मर्यादासे बाहर किसी यस्तुको बुलाना आनयन है। मर्यादाके बाहर कंकड़-पत्थर आदि का फेंकना पुद्गलक्षेप है, मर्यादाके बाहर अपना शब्द भेजना शब्दानुपात है और मर्यादाके बाहर काम करनेवाले लोगोंको अपना रूप दिखाकर सचेत करना रूपानुपात है॥१७॥ कन्दर्प, कौत्कुच्य, मौखर्य, असमीक्ष्याधिकरण और उपभोगपरिभोगानर्थक्य ये पॉच अनर्थदण्ड व्रतके अतिचार है। रागको उत्कटतासे हास्यमिश्रित चण्ड वचन बोलना कन्दर्प है। शरीरसे कुचेष्टा करना कोत्कुच्य है । आवश्यकतासे बोलना मौखर्य है । प्रयोजनका विचार न रख आवश्यकतासे अधिक किसी कार्य में प्रवृत्ति करना-कराना अममीक्ष्याधिकरण है और उपभोग-परिभोगकी वस्तुओं का निरर्थक संग्रह करना उपभोगपरिभोगानर्थक्य है ॥१७॥ मनोयोग दुष्प्रणिधान, वचनयोग दुष्प्रणिधान, काययोग दुष्प्रणिधान, अनादर और स्मृत्यनुपस्थान ये पाँच सामा- यिक शिक्षाप्रतके अतिचार हैं। मनको अन्यथा चलायमान करना मनोयोगदुष्प्रणिधान है, वचनकी अन्यथा प्रवृत्ति करना-पाठका अशुद्ध उच्चारण करना वचनयोग दुष्प्रणिधान है। फायको चलायमान करना काययोग दुष्प्रणिधान है । सामायिकके प्रति आदर वा उत्साह नहीं होना-गार समझकर करना अनादर है और चित्तको एकाग्रता न होनेसे सामायिककी विधि या पाठका भूल जाना अथवा कार्यान्तरमें उलझकर मामायिकके समयका स्मरण १. क्षेत्ररास्तुहिरएएमुरणपनवान्यदासीदासगुप्यसमा गातिकमाः ॥ २६॥ २. ऊभ्याधस्तिय व्यतिकमा देवदिग्मृत्यन्तराधानानि ॥ ३० ॥ ३ श्रानयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेगा. ॥ ३१ ॥ स्मृत्यत्तराध्यान क.. ४. कदाकीच्यनौग्रयांसमीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि ।। ३२ ।। ५. योगप्पणिधानानादरस्मृत्यनुस्थानानि ||३|| - अष्टपशाशः सर्गः समस्तव्यस्तरूपास्तु पञ्चैते बन्धहेतवः । मिथ्यादृष्टेहिं पञ्चोवं चत्वारमिषु पश्चिमाः ॥१९॥ विरत्यविरतिर्मिश्रा प्रमादायास्त्रयः परे । संयतासंयतस्योक्ताः कर्मबन्धस्य हेतवः ॥१९९॥ प्रमत्तसंयतस्यापि योगान्तात्रय एव ते । तत ऊर्च चतुर्णा तु कषायायोगसङ्गताः ॥२०॥ शान्तक्षीणकपायौ तौ सयोगकेवली तथा । बन्धका योगतन्मात्रादयोगो नैव बन्धकः ॥२०॥ पायकलुषो ह्यात्मा कर्मणो योग्यपुद्गलान् । प्रतिक्षणमुपादत्ते स बन्धो नैकधा मतः ॥२०२॥ प्रकृतिश्च स्थितिश्चापि स बन्धोऽनुमवस्ततः । प्रदेशवन्धभेदेन चातुर्विध्यं प्रपद्यते ॥२०३॥ प्रकृतिः स्यात्स्वभावोऽत्र निम्बादेस्तिततादिवन् । कर्मणामिह सर्वेषा यथास्वं नियतास्थिता ॥२०॥ अज्ञानं प्रकृतिज्ञेया ज्ञानावरण कर्मणः । दृश्यार्थादर्शनं ८श्या दर्शनावरणस्य मा ॥२०५॥ सदमलक्षणस्यापि वेदनीयस्य कर्मणः । संवेदनं विदा वेद्यं प्रकृतिः सुख-दुःखयोः ॥२०६॥ दृष्टादर्शनमोहस्य तत्त्वाश्रद्धानमेव सा । तथा चारित्रमोहस्य महतोऽसंयमः सदा ॥२०७॥ प्रकृतिः प्रतिपला तु भवधारणमायुषः । देवनारकनामादिकरणं नामकर्मणः ॥२०॥ । और अनुभव वचनयोगके भेदसे बचनयोगके चार भेद हैं। तथा औदारिक काययोग, औदारिक मिश्रकाययोग, वैक्रियिक काययोग, वैक्रियिक मिश्रकाययोग और कार्मण काय- योगके भेदसे काययोगके पॉच भेद हैं । इस प्रकार सब मिलाकर योगके तेरह भेद हैं। भावार्थ -प्रमत्त संयत गुणस्थानमें आहारक काययोग और आहारक मिश्रकाययोगकी भी संभावना रहती है इसलिए उन्हें मिलानेपर योगके पन्द्रह भेद हो जाते हैं ॥१९७|| ये मिथ्या- दर्शनादि पॉच समस्त और व्यस्त रूपसे बन्धके कारण हैं। अर्थात् कहीं सब बन्धके कारण हैं और कही कम । मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें पाँचों ही बन्धके कारण हैं । उसके तीन गुणस्थानों- में मिथ्यादर्शनको छोड़कर अन्तिम चार बन्धके कारण हैं ॥१९८।। संयतासंयत नामक पञ्चम गुणस्थानमें विरति, अविरति, मिश्रित तथा प्रमाद आदि तीन कर्मबन्धके हेतु कहे गये हैं ॥१९९।। प्रमत्तसंयत नामक छठे गुणस्थानवी जीवके प्रमाद, कपाय और योग ये तीन बन्धके कारण हैं। इसके आगे चार गुणस्थानों में अर्थात् सातवेंसे लेकर दसवें गुण- स्थान तक कपाय और योग ये दो बन्धके कारण हैं ।।२००॥ उपशान्तमोह, क्षीणमोह और सभोगकेवली इन तीन गुणस्थानोंके जीवमात्र योगके निमित्तसे कर्मबन्ध करते हैं । अयोग- केवली भगवान् योगका भी अभाव हो जानेसे कर्मोका बन्ध नहीं करते हैं ॥२०॥ कपायसे कलुपित जीव प्रत्येक क्षण कर्मके योग्य पुग्दलोंको ग्रहण करता है । वही वन्ध कहलाता है। यह वन्ध अनेक प्रकारका माना गया है ॥२०२|| सामान्यरूपसे बन्ध प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशके भेदसे चार भेदोंको प्राप्त होता है ।।२०३।। प्रकृतिका अर्थ स्वभाव होता है । जिस प्रकार नीम आदिको प्रकृति तिक्तता आदि है । उसी प्रकार समस्त कर्मोकी अपनी-अपनी प्रकृति नियतरूपसे स्थित है ।।२०४॥ जैसे ज्ञानावरण कर्मको प्रकृति अज्ञान अर्थात् पदार्थका ज्ञान नहीं होने देना है । दर्शनावरण कर्मको प्रकृति पदार्थोंका अदर्शन अर्थान् दर्शन नहीं होने देना है ॥२०५|| साता, असातावेदनीय कर्मको प्रकृति ज्ञानी मनुष्यों- को क्रमसे सुख और दुःखका वेदन कराना है ।।२०६|| दर्शनमोहकी प्रकृति तत्त्वका अश्रद्धान कराना है तथा अतिशय महान् चारित्रमोह कर्मकी प्रकृति सदा असंयम उत्पन्न करना है ॥२०७|| आयुफर्मको प्रकृति भवधारण करना है । नामकर्मको प्रकृति जीवमें देव, नारको - १. सापायवाज्जीर कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते स बन्धः ॥ २ ॥ ३० स० अ०८।२. प्रकृति. स्थित्यनुभवप्रदेशास्तविधय ॥३॥ त० ० अ०८।

हरिवंशपुराणे मोक्षकारणभूतानां दानानां धारणे सताम् । तारतम्यं मनःशुद्धेविशेषः पात्रगोचरः ॥१९०१ पुण्यास्त्रकः सुखानां हि हेतुरभ्युदयावहः । हेतु. संसारदु खानामपुण्यात्रव इप्यते ॥१९१॥ 'मिथ्यादर्शनमात्मस्थं हिंसाद्यविरतिस्तथा । प्रमादश्च कपायश्च योगो वन्धस्य हेनवः ॥ १९२॥ तन्मिध्यादर्शनं देधा निसर्गान्योपदेशतः । मिथ्याकोदयादाद्यं तत्याश्रद्धानलक्षणम् ॥१९३॥ परोपदेशपूर्व तु चतुर्धा मतभेदतः । क्रियावाद्यक्रियावादिविनयाज्ञानिकत्वतः ॥१९॥ एकान्तविपरीनत्वपिनयाज्ञानसंशयः । निमित्तः पञ्चधा चापि मिथ्यादर्शनामध्यते ॥१९५६ द्विपोढाऽविरतिया प्रमादोऽनेकधा स्थितः । नवभिनॊकपार्यस्तु कपाया. पञ्चविंशतिः ॥१९६॥ चत्वारः स्युमनोयोगा वाग्योगाश्च तथैव ते । काययोगास्तु पञ्चापि मतायोगास्त्रयोदश ॥१९॥ इस लिए देय द्रव्यमें भेद होनेसे दानके फलमें भी भेद होता है ॥१८८॥ कोई दाता तो ईया, विपाद आदि दुर्गुणोंसे रहित होता है और कोई दाता ईर्ष्या आदि दुर्गुणोंसे युक्त होता है। यही दानाकी विशेषता है । यथार्थमें मनकी गति विचित्र होती है ॥१८९॥ मोक्षके कारणभूत दानोंके ग्रहण करनेमें सत्पुरुपोंके मनको शुद्धिका जो तारतम्य होनाधिकता है यह पात्रकी विझोपता है ॥१९०॥ पुण्यात्रच अनेक कल्याणोंकी प्राप्ति करानेवाला होनेसे सुखोंका कारण कहा जाता है और पापास्रव संसारके दुःखांका कारण माना जाता है ॥१९१।। इस प्रकार आस्रव सत्त्वका वर्णन होनेके बाद भगवानको दिव्य ध्वनिमें वन्ध तत्वका वर्णन प्रारम्भ हुआ। आत्मपरिणामोंमें स्थित मिथ्यादर्शन, हिंसा आदि अविरति, प्रमाद, कपाय और योग ये बन्धके कारण हैं ॥१९२।। इनमें मिथ्यादर्शन, निसर्गज (अगृहीत ) और अन्योपदेशन (गृहीत ) के भेदसे दो प्रकार का है। मिथ्यात्वकर्मके उदयसे जो तत्त्वका अश्रद्धान होता है वह निसर्गज मिथ्यादर्शन है ॥१९३॥ और परोपदेशपूर्वक होनेवाले अतत्त्व श्रद्धानको अन्योपदेशज मिथ्यादर्शन कहते हैं । इसके क्रियावादी, अक्रियायादी, पैनयिक और अज्ञानी- के भेदसे चार भेद है ॥१९४।। इनके सिवाय एकान्त, विपरीत, विनय, अज्ञान और संशय इन निमित्तोंकी अपेक्षा मिथ्यादर्शन पॉच प्रकारका भी माना जाता है । वस्तु अनेक धर्मात्मक है परन्तु उसे एक धर्मरूप ही श्रद्धान करना एकान्त मिथ्यादर्शन है, जैसे वस्तु नित्य ही है अथवा अनित्य ही है । वस्तुका जैसा स्वरूप है उससे विपरीत श्रद्धान करना सो विपरीन मिथ्यादर्शन है जैसे हिंसामें धर्म मानना, सप्रन्यवेपसे मोक्ष मानना आदि । देव अदेव, और नत्त्व अतत्त्व का विवेक न रसकर मयको एक-सा मानना तथा सबकी भक्ति करना चैनयिक मिथ्यादर्शन है। हिनाहिनकी पगेना-रहित अज्ञानमूलक रूढिवा श्रद्धान करना मो अज्ञान मिथ्याइर्शन है और मम्यग्दर्शन मम्यग्मान तथा मम्यरचारित्र मोक्षका मार्ग है या नहीं ? अहिंमा धर्म है या हिंमाम । इस प्रकार संदेह रूप प्रदान करना संशय मिथ्यादर्शन है ॥१९५।। पॉच स्थावर और प्रम इन छह कायके जीवोंकी हिमाका त्याग नहीं करना, तथा पाँच इन्द्रिय और मनको यश नहीं करना यह यारद प्रकारकी अविरति है । प्रमाद अनेक प्रकारका है और नी नोक- पायोको साथ मिलाकर अनन्तानुयन्धीकोध,मान, माया, लाभ आदिके भेदसे फपायके पच्चीम भेद हैं ॥ १९६ ।। मत्यमनोयोग, असत्यमनोयोग, उभयमनोयोग और अनुभयगनोयोगके भदरी मनोयोग पार प्रकार है । सत्यवचनयोग, असत्यवचनयोग, उभयवचनयोग १. मिराशनारितिक मासापरोगा बन्पतिर ॥१॥ त० ए० ०८।२. चत्वारो मारोगाः पत्यागेषम्यो: परसपयोगा इति प्रयोदय यिाको योग.। आहारकायपोगा. आहारनियमापयोगयी प्रसार समय पञ्चदशमन्ति-स. मि.प्र.८॥

अष्टपञ्चाशः सर्गः ६८३ पञ्चधा ज्ञानावरणं नवधा दर्शनावृतिः। द्विधा नु वेदनीयं स्यान्मोहोऽष्टाविंशतिस्थितिः ॥२२॥ आयुश्चतुर्विधं नाम द्विचत्वारिंशदीरितम् । द्विविधं गोत्रमुद्गीनमन्तरायस्तु पञ्चधा ॥२२२॥ मतिश्रुतावधिज्ञानमन.पर्ययम्बलः । आवृत्यरावृतीः पत्र युत्तरप्रकृतीविदुः ॥२२३॥ द्रव्यादिशतः शतमनःपर्ययकवली। अमन्योऽप्यस्ति यत्तस्थं ज्ञानावरणपञ्चकम् ॥२२॥ व्यनियोग्यत्वसद्भावापेक्षा मध्यस्य भव्यता । कैपल्यव्यक्त्ययोग्यस्वादमध्यस्य रामभ्यता ॥२२५॥ चक्षुषोऽचक्षुपो दृष्टेरवधेः केवलस्य च । चत्वार्यावरणान्येवं निद्रायः पञ्चमिव ॥२२६।। मदखेदविनोदार्थः स्वापो निद्राधिकरवतः । उपर्युपरि वृत्तिनिद्रानिहामिघीयते ॥२२७॥ प्रकारका मूल प्रकृतिबन्ध कहा गया है, अब इसके आगे उत्तर प्रकृतियोंके भेद कहे जाते हैं ॥२२०॥ ज्ञानावरण पाँच प्रकारका है, दर्शनावरण नौ प्रकारका है, वेदनीय दो प्रकारका है, मोहनीय अट्ठाईस प्रकारका है, आयु चार प्रकारका है, नाम वयालोम प्रकारका है, गोत्र दो प्रकारका कहा गया है और अन्तराय पाँच प्रकारका है ॥२२१-२२२।। मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये पाँच आवरण करने योग्य गुण है। इन्हें आवरण करनेवाले मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मनःपर्ययज्ञाना- परण और केवलज्ञानावरण ये पाँच ज्ञानावरण कर्मको उत्तर प्रकृतियाँ हैं ।।२२३।। द्रव्यार्थिक- नयको अपेक्षाशक्तिरूपसे अभव्य जीव भी मनापर्यय और केवलज्ञानसे युक्त है, अतः उसके भी ज्ञानायरणके पॉचों भेद स्थित हैं ।।२२४|| भव्य जीयको भव्यता उक्त गुणोंके प्रकट होनेकी योग्यताके सद्भावकी अपेक्षा रखती है और अभव्य जीवकी अभव्यता केवलज्ञान तथा मन:- पर्ययज्ञानके प्रकट होनेको योग्यता न होनेकी अपेक्षासे है। भावार्थ-किसीने प्रश्न क्रिया था कि जब भव्य और अभव्य दोनोंके ही मनःपर्यय ज्ञान और केवलज्ञानकी शक्ति विद्य- मान है तब इनमें भव्यता और अभव्यताका भेद कैसे हुआ ? इसका उत्तर प्रन्यकर्ताने दिया है कि भव्य जोवके उन शक्तियों को प्रकटता हो जाती है और अभव्य जीव के उनकी प्रकटता नहीं होती ॥२२५|| चक्षुर्दर्शनावरण, अचक्षुर्दर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण और केवलदर्शनावरण ये चार आवरण तथा निद्रा आदिक पाँच अर्थान् निदा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलामचला और स्त्यानगृद्धि ये पॉच निद्राएँ सत्र मिलाकर दर्शनावरग कर्मको नी उत्तर प्रनियाँ हैं। जो जीवके चक्षुर्दर्शन-चक्षु इन्द्रियसे होनेवाले सामान्य अवलोकनको प्रकट न होने दे वह चक्षु- दर्शनावरण हैं । जो अचक्षुदर्शन-चक्षुको छोड़ कर अन्य इन्द्रियों तथा मनसे होनेवाले सामान्य अवलोकनको प्रस्ट न होने दे वह अचभुर्दर्शनावरण है। जो अवधिदर्शन- अवधिज्ञानके पहले प्रकट होनेवाले मामान्य अवलोकनको न होने दे यह अवधिदर्शनावरण है और जो केवलदर्शन-केवलज्ञानरे साथ होनेवाले सामान्यावलोकनको न होने दे यह फेवलदर्शनावरण है. ॥ २२६ ।। मद तथा खेदको दूर करने के लिए मोना निद्रा कहलानी है। कार-कार अविक रूपसे निद्रामा आना निद्रा निद्रा कही जानी है ॥२२७॥ १. शस्मिन.-म., स., . २ मभम्या:प्यन्ति क...। अत्र चोरने-अमान्य मनः पर्पज्ञानराक्तिः शनधि स्यादान या यदि स्यात् तम्बामात्रचामाव । अथ नामि तपायरपाय- कल्पना ध्ययेति । उच्यते-आदेशपचनान दोषः। द्रव्यादेशान्मन परंपरेला नसामा । पयांपायी. देगासदस्यमाय । यच भनाभरि नोदने; उभरस तन्दनिमझागत् । न शक्तिम गाभा- पेचपा मन्यामविल इत्युप्पो । कुवम् निमाराम नागापदपा । म. मि. अ.८र६।

7 ६८३ हरिवंशपुराणे गोत्रस्योञ्चैश्च नीचश्च स्थानसंशब्दनं तथा । अन्तरायस्य दानादिविनानां करणं धनम् ॥२०॥ तदेवं लक्षणं कार्य यत्तत्प्रक्रियते ततः । प्रकृतिस्तत्स्वभावस्य तथैवानच्युतिः स्थितिः ॥२०॥ यथाऽजागोमहिप्यादिक्षीराणां स्वस्वभावतः । माधुर्यादच्युतिस्तद्वकर्मणां प्रकृतिस्थितिः ॥२१॥ तोत्रमन्दादिमावेन क्षीरे रसविशेषवत् । कर्मपुद्गलमामर्थ्यविशेषोऽनुमवो मतः ॥२१२।। कर्मवपरिणत्यात्मपुद्गलस्कन्धसंहतेः । प्रदेशः परमाण्यात्मपरिच्छेदावधारणा ॥२१३॥ 'प्रकृतेः सप्रदेशाया नित्यं योगनिमित्तता । स्थितः सानुमायास्तु स्याकपायनिमित्तना ॥२४॥ अनेनानियते ज्ञानमावृणोतीति वा स्वयम् । ज्ञानावरणमाख्यातं दर्शनावरणं तथा ॥२१५॥ वेद्यते वेदयत्येवं चेदनीयमनेन था। मोह्यते मोहयत्येवं मोहनीयमपीरितम् ॥२१६॥ नारकादिमवानेति स्वनेनेत्यायुरित्यपि । नम्यतेऽनेन वाऽऽत्मानं नमयत्यपि नाम तत् ॥२१७॥ गूयते शब्द्यते गोत्रमुच्चैनीचैश्च यत्नतः। अन्तरायोऽन्तरं मध्यं देयादेरेति यततः ॥२८॥ एकात्मपरिणामेन गृह्यमाणा हि पुद्गलाः । नानाकर्मत्वमायान्ति प्रभुक्तानरसादिवत् ॥२१९॥ मूलप्रकृतिभेदोऽयमष्टभेदः प्रभावितः । उत्तरप्रकृतीनां तु भेदोऽनः परमुच्यते ॥२२॥ आदि संज्ञाएँ उत्पन्न करना है ।।२०८॥ गोत्र ककी प्रकृति उच्च और नीच व्यवहार कराना है तथा अन्तराय कर्मकी प्रकृति दान आदिमें तीव्र विन करना है ॥२०९॥ इसलिए ऐसा लक्षण करना चाहिए कि कौके द्वारा जो किया जाता है वही प्रकृतिबन्ध है और उनका अपने स्वभावसे च्युत नहीं होना सो स्थितिबन्ध है ॥२१०॥ जिस प्रकार बकरी, गाय तथा भैंस आदिके दूध अपने-अपने स्वभावसे ही माधुर्य गुणसे च्युत नहीं होते हैं उसी प्रकार कर्म भी अपनी-अपनी प्रकृतिसे च्युत नहीं होते हैं ।।२१।। जिस प्रकार दूधमें रसविशेप, तीव्र अथवा मन्द आदि भावसे रहता है उसी प्रकार कर्मरूप पुग्दलमें भी सामर्थ्य-विशेष तीव्र अथवा मन्द आदि भावसे रहता है । यही अनुभव- वन्ध माना गया है ।।२१२॥ आत्माके कर्मरूप परिणत पुद्गल स्कन्धोंके समूहमें परमाणुके प्रमाणसे कल्पित परिच्छेदों-खण्डोंकी जो संख्या है वह प्रदेशबन्ध कहलाता है ।।२१३॥ प्रकृति और प्रदेशबन्ध योगके निमित्तसे होते हैं तथा स्थिति और अनुभवबन्ध कपायके निमित्तसे माने गये है ॥२१४|| जिसके द्वारा ज्ञान ढंका जाये अथवा जो स्वयं ज्ञानको ढों के वह ज्ञानावरण कर्म है। इसी प्रकार दर्शनावरण कर्मकी निरुक्तिका जानना चाहिए अर्थात् जिसके द्वारा दर्शन ढका जाये अथवा जो स्वयं दर्शनको ढॉ के उसे दर्शनावरण कर्म कहते हैं ॥२१५|| जिसके द्वारा मुख-दुःखका वेदन-अनुभव कराया जाये अथवा जो स्वयं सुख-दुःखका अनुभव करे वह वैदनीय कर्म है। जिसके द्वारा जीव मोहित किया जाये अथवा जो स्वयं मोहित करे वह मोहनीय कर्म है ॥२१६।। जीव जिसके द्वारा नारकादि भवको प्राप्त कराया जाये अथवा जो स्वयं नारकादि भवको प्राप्त हो यह आयु कर्म है। आत्मा जिसके द्वारा नाना नामोंको प्राप्त कराया जाये अथवा जो स्वयं आत्माको नाना नामोंसे युक्त करे वह नामकर्म है ।२१आत्मा जिसके द्वारा प्रयत्नपूर्वक उच्च अथवा नीच कहा जाता है वह गोत्र कहलाता है और जो यत्नपूर्वक देय आदिके बीच में आ जाता है वह अन्तराय कर्म है ॥२१८॥ जिस प्रकार एक यार साना हुआ अन्न रस, रक्त आदि नानारूपताको प्राप्त होता है, उसी प्रकार एक आत्मपरि- णामके द्वारा ग्रहण किये हुए पुग्दल नाना कर्मरूपताको प्राप्त हो जाते हैं ॥२१९|| यह आठ १. नोगा पयडि.पदेशा ठिदिअणुभागा कसायदो होति । अपरिणदुछिएणेमु य बंधडिदिकारणं पत्थि ॥ गो. नमः॥ ।

अष्टपञ्चाशः सर्गः पञ्चधा ज्ञानावरणं नवधा दर्शनावृतिः । द्विधा तु वेदनीयं स्यान्मोहोऽष्टाविंशतिस्थितिः ॥२२॥ आयुश्चनुर्विधं नाम द्विचत्वारिंशदीरितम् । द्विविधं गोत्रमुद्गीतमन्तरायस्तु पञ्चधा ॥२२२॥ मतिश्रुतावधिज्ञानमनःपर्ययकेवलः । आवृत्यरावृती: पञ्च युत्तरप्रकृतीविंदुः ॥२२३॥ दयार्थादेशतः शास्तमनःपर्ययकवली । अमव्योऽप्यस्ति यत्तत्स्य ज्ञानावरणपञ्चकम् ॥२२४॥ ज्यनियोग्यस्वसभावापेक्षा मन्यस्य भव्यता। केरल्यम्यक्त्ययोग्यस्वादमध्यस्य धमन्यता ॥२२५॥ चक्षुषोऽचापो दृष्टेरवधैः केवलस्य च । चत्वार्यावरणान्येवं निद्रायः पञ्चभिनव ॥२२॥ मदग्वेदविनोदार्थः स्वापो निद्राधिकरवतः । उपर्युपरि ववृत्तिनिद्रानिद्रामिधीयते ॥२२७॥ प्रकारका मूल प्रकृतिबन्ध कहा गया है, अब इसके आगे उत्तर प्रकृतियोंके भेद कहे जाते हैं ।।२२०॥ - ज्ञानावरण पॉच प्रकारका है, दर्शनावरण नी प्रकारका है, वेदनीय दो प्रकारका है, मोहनीय अट्ठाईस प्रकारका है, आयु चार प्रकारका है, नाम वयालीम प्रकारका है, गोत्र दो प्रकारका कहा गया है और अन्तराय पाँच प्रकारका है ॥२२१-२२।। मतिज्ञान, श्रुतन्नान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये पाँच आवरण करने योग्य गुण है। इन्हें आवरण करनेवाले मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मनःपर्ययज्ञाना. वरण और केवलज्ञानावरण ये पाँच ज्ञानावरण कर्मको उत्तर प्रकृतियाँ हैं ॥२२३।। द्रव्यार्थिक- नयको अपेक्षा शक्तिरूपसे अभव्य जीव भी मनःपर्यय और केवलज्ञानसे युक्त है, अतः उसके भी ज्ञानावरणके पाँचों भेद स्थित हैं ।।२२४|| भव्य जीवकी भव्यता उक्त गुणोंके प्रकट होनेकी योग्यताके सद्भावकी अपेक्षा रखती है और अभव्य जीयकी अभव्यता केवलज्ञान तथा मनः- पर्ययज्ञानके प्रकट होनेकी योग्यता न होनेकी अपेक्षासे है। भावार्थ-किसीने प्रश्न किया था कि जब भव्य और अभव्य दोनोंके हो मनःपर्यय ज्ञान और केवलज्ञानकी शक्ति विद्य- मान है तब इनमें भव्यता और अभव्यताका भेद कैसे हुआ ? इसका उत्तर प्रन्यकर्ताने दिया है कि भव्य जोबके उन शक्तियोंको प्रकटता हो जाती है और अमन्य जोयके उनको प्रकटता नहीं होती ।।२२५॥ चक्षुर्दर्शनावरण, अचक्षुर्दर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण और कंवलदर्शनावरण ये चार आवरण तथा निद्रा आदिक पाँच अर्थात् निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलामचला और स्त्यानगृद्धि ये पाँच निद्राएँ सब मिलाकर दर्शनायरग कर्मको नी उत्तर प्रतियाँ हैं । जो जीवके चक्षुर्दर्शन-चक्षु इन्द्रियसे होनेवाले मामान्य अवलोकनको प्रकट न होने दे वह चक्षु- दर्शनावरण हैं । जो अचक्षुर्दर्शन-चक्षुको छोड़ कर अन्य इन्द्रियों तथा मनसे होनेवाले सामान्य अवलोकनको प्रकट न होने दे वह अचक्षुर्दर्शनावरण है। जो अवधिदर्शन- अवधिज्ञानके पहले प्रकट होनेवाले मामान्य अवलोकन को न होने दे यह अवधिदर्शनावरण है और जो केवलान-केवलज्ञानके साथ होनेवाले सामान्यावलोकनको न होने दे वह फेवलदर्शनावरण है ॥२२६ ।। मद तथा खेदको दूर करनेके लिए मोना निद्रा कहलाती है। कार कार अधिक रूपले निद्राका आना निद्रा निद्रा कही जाती है ।।२२।। १. राममन.-म०, २०,०। २ अमश्या प्यरत १०,०। अत्र चोरने-अमनस्य मनः पर्यजानरानिः फेशनराभि स्यादा न पा यदि स्यात् वायाभयवाभाव । अथ नामि तपावरपश्य- कल्पना व्यथेति ! उच्यते-आदेशरचनाग्न दोषः। ट्रम्यादेशमन यलहानराशिमा. पांगायी. देशातहातमाय । योयं मनामापति नारायने; उभस तन्दनिमझापात् । न तिम यामाया. पेवपा मन्याममविल इत्युच्यते । कुतुम्न पनिमझापानदावापेक्षा म. मि. अ.८ प ६ । - ६८४ हरिवंशपुराणे धमादिममवाग्मानं प्रचला प्रचलयत्यलम् । सा पुनः पुनरावृत्ता प्रचलाप्रचलामिधा ॥२२८॥ स्त्यानगृद्धिर्ययात्याने स्वप्ने गृभ्यति दीप्यते । प्रात्मा यदुदयाद्रौद्रं बहुकर्म करोति सा ॥२२९॥ शारीरं मानसं सौख्यं दुःसं चोदयते ययोः । स्याता ते वेदनोये स्तः सातामाते यथाक्रमम् ॥२३०॥ सम्यक्त्वं चापि मिथ्यात्वं सम्यग्मिध्यावमित्यदः । दृश्यं दर्शनमोहस्य झुत्तरं प्रकृतित्रिकम्॥२३॥ शुभात्मपरिणामेन निरद्धस्वरसे स्थिते । मिथ्यारवे श्रधानस्य सम्यक्रवप्रकृतिर्मवेत् ॥२३२॥ मिथ्याचे स्वर्धसंशुद्ध कोदवे मदशभिवत् । शुद्धाशुदात्मको मावः सम्यग्मिध्यात्वमुच्यते ॥२३३॥ द्वेधा चारित्रमोहस्तु नोकपायकपायतः । नग्धा नोकपायोऽन कषायाः पोडशोदिताः ॥२३॥ उदयाघस्य हासाविर्मावो हास्यं तदुस्सुकः । यस्योदयादतिः सा स्यादरतिस्तद्विपर्ययः ॥२३५॥ शोचनं यद्विपाकारस शोक उद्वेगकूद्भयम् । स्वदोषगोपनं यस्य जुगुप्सा सा जुगुप्सिता ॥२३६॥ भावांस्त्रैणान्यतो याति स स्त्रीवेदोऽतिगर्हितः । पुनपुंसकवेदी स्तः पस्निासापुंसकान् यतः ॥२३७ ॥ थकावट आदिसे उत्पन्न होनेवाली जो निद्रा जीवको बैठे-बैठे ही अत्यधिक चपल कर देवे वह प्रचला है। प्रचला जब वार-बार अधिक रूपमें आती है तब प्रथलाप्रचला कह- लाने लगती है ।। २२८ ॥ जिसके द्वारा आत्मा स्त्यान अर्थात् सोते समय गृद्धता करने लगे- किसी कर्ममें सचेष्ट हो जावे और जिसके उदयसे यह जीव अत्यधिक कठिन काम कर ले वह स्त्यानगृद्धि है । यह पाँच प्रकारको निद्रा, दर्शनावरण कर्मके उदयसे आती है और इन निद्राओंके माध्यमसे दर्शनावरण कर्म आत्माके दर्शनगुणको घातता है ॥ २२९ ॥ वेदनीय कर्मके दो भेद हैं--सातावेदनीय और असातावेदनीय । जिनके उदयसे शारीरिक और मान- सिक मुख-दुःख उत्पन्न होते हैं वे यथाक्रमसे सातावेदनीय और असातावेदनीय कहलाते हैं ।। २३०॥ मोहनीय कर्मके मूलमें दो भेद हैं-१. दर्शनमोहनीय, २. चारित्रमोहनीय । इनमें से दर्शनमोहनीयको सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और सम्यड्मिथ्यात्व ये तीन उत्तर प्रकृतियाँ हैं ॥ २३१॥ आत्माके शुभ परिणामोंसे जब मिथ्यात्वप्रकृतिका स्वरस-फल देनेकी शक्ति रुक जाती है तब श्रद्धान करनेवाले जीवके सम्यक्त्व प्रकृतिका उदय होता है। इस प्रकृतिके उदय- से आत्माका श्रद्धानगुण तिरोहित नहीं होला किन्तु चल, मल, अगाढ दोषोंसे दूपित हो जाता है ।। २३२ ॥ मिथ्यात्व प्रकृति के उदयसे श्रद्धान गुण विकृत हो जाता है और अतत्व श्रद्धानरूपी परिणति हो जाती है । अर्ध शुद्ध कोदोंकी मदशक्तिके समान मिथ्यात्व प्रकृतिके अर्द्ध शुद्ध होनेपर जीवका जो शुद्ध और अशुद्ध भाय एक साथ प्रकट होता है वह सम्यड्. तिके उदयसे जीवके परिणाम दही और गुड़के रूप होते हैं ।। २३३ ॥ नोकपाय और कपाय- कपायके नौ और कपायक 'सोलह भेद कहे गये हैं ।। २३४ ॥ हास्य, रनि, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसक वेद ये नौ नोपायके भेद हैं। इनके लक्षण इस प्रकार हैं-जिसके उदयमे उत्सुक होता हुआ हास्य प्रकट हो वह हास्यकर्म है। जिसके उदयसे रति-प्रीति उत्पन्न हो वह रति कर्म है। जिसके उदयसे अरति-अप्रीति उत्पन्न हो वह अरति है। जिसके उदयसे शोक हो वह शोक है। जो उद्वेग-भय उत्पन्न करनेवाला है वह भय है । जिसके उदयसे अपने दोप छिपानेमें प्रवृत्ति हो वह जुगुप्सा है। जिसके उदयसे यह जीव स्त्रीके भावको अर्थात् पुरुपसे रमनेकी इच्छाको प्राप्त होता है वह खीवेद है। जिसके उदयसे पुरुषके भावको अर्थात् स्त्रोसे रमनेकी इच्छाको प्राप्त होता है वह पुरुपवेद है। और जिसके उदयसे नपुंसकके भावको अर्थात् स्त्री-पुरुष दोनोसे रमनेको इच्छाको प्राप्त होता है वह अष्टपञ्चाशः सर्गः १ कपायाः क्रोधमानी च मायालोमा च घातकाः । सम्यक्त्वस्य सवृत्तस्य तत्रानन्तानुवन्धिनः ॥२३८॥ यदीयोदयतो ह्यात्मा प्रन्यारयातुं न शक्नुयात् । हिंसादीन्युदयास्त स्युरप्रत्याख्यानसंज्ञकाः ॥२३ ।। यदीयोदयतो जीवः संयम न प्रपद्यते । ने क्रोधमानमायाद्याः प्रत्याख्यानविनिःध्रुताः ॥२०॥ यदीयोदयतो वृत्तं यथाख्यातं न जायते । ज्वलन्तः संयमनामा ख्याताः संज्वलनास्तु ते ॥२४॥ नारकं नरकोद्भूतं तैयंग्योनं च मानुपम् । दैवं चायुर्मवेत्तेषु चतुर्विधमितीरितम् ॥२४२॥ यदीयोदयतो जन्तुर्मवान्तरमियति सा । गतिश्चतुर्विधा देवनरकादिविभेदतः ॥२३॥ यात्मनो नरकादित्वं यन्निमित्तं प्रजायते । तत्स्यानरकगत्यादि गतिनाम चतुर्विधम् ॥२४॥ गतिप्कीकृतार्था सा साम्येनाम्यभिचारिणा। जातिस्तस्या निमित्तं तु जानिनामात्र पञ्चधा ॥२४५।। एकेन्द्रियादिकां जानिमुदयाद्यस्य जन्तवः । प्रयान्त्येकेन्द्रियाद्यतनातिनामाभिधीयते ॥२४६।। शरीरपञ्चकस्यास्य निवृत्तिर्यस्य चोदयात् । यौदारिकशरीरादि नाम पञ्चविधं तु तत् ।।२४७॥ श्रङ्गोपाङ्गविवेकः स्याच्छरीराणां यतस्तु तत् । विधाङ्गोपाङ्गनामाख्यमौदारिकपुरस्मरम् ॥२४॥ चक्षुरादीन्द्रियस्थानप्रमाणे जास्यपेक्षया । ये निर्मापयतस्ते स्तो नाम्ना निर्माणनामनी ॥२४९॥ नपुंसक वेद है ।। २३५-२३७ ।। कपायके मूलमें अनन्तानुवन्धी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्या. स्यानावरण और संज्वलनके भेदसे चार भैद हैं । फिर प्रत्येकके क्रोध, मान, माया और लोभ- को अपेक्षा चार-चार भेद हैं । इस प्रकार कपायके कुल सोलह भेद हैं । इनमें से अनन्तानु- बन्धीसम्बन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ, सम्यग्दर्शन तथा स्वरूपाचरण चारित्रके घातक हैं ।। २३८ ॥ जिसके उदयसे आत्मा हिंसादि रूप परिणतियोंका त्याग करने में समर्थ न हो सके वे अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ हैं ।। २३९ ॥ जिनके उदयसे जीव संयम- को प्राप्त न हो सके वे प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया लोभ हैं ॥२४० ।। और जिनके उदयसे यथाख्यात चारित्र प्रकट नहीं होता तथा जो संयमके साथ विद्यमान रहते हैं वे संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ हैं ।। २४१ ।। नारक, तैर्यग्योन, मानुप और देवके भेदसे आयु कर्म चार प्रकारका कहा गया है। आयु कर्मके उदयसे यह जीव नारकादि पर्यायोंमें उत्पन्न होता है ॥२४२ ।। जिसके उदयसे जीव भयान्तरको प्राप्त होता है यह गति नाम कर्म है । देव तथा नारकादिके भेदसे गति नाम कर्म चार प्रकारका है ।। २४३ ।। जिसके निमित्तसे आत्मामें नरकादि पर्याय प्रकट होती है वह चार प्रकारका नरकादि नाम कर्म है ।।२४४|| उन नरकादि गनियोंमे जो अविरोधी समान धर्मसे आत्माको एक रूप करनेवाली अवस्था है उसे जानि कहते हैं । उस जातिका जो निमित्त है वह जाति नाम कर्म कहा जाना है इसके एकेन्द्रिय जानि आदि पॉच भेद हैं ।। २४५ ॥ जिसके उदयसे जीव एकेन्द्रियादि जातिको प्राप्त होते है वह एकेन्द्रियादि जाति नाम कर्म कहलाता है ॥ २४६ ॥ जिमके उदयमे औदारिक आदि पाँच शरीरीकी रचना होनी है वह औदारिक शरीरादि पाँच प्रकारका शगैर नाम कम है ॥ २४ ॥ जिसके उदयसे शरीरोंमें अगोपाद्गका विवेक होता है यह औदारिक शरीराद्गोगद्ग- को आदि लेकर तीन प्रकारका अद्गोपाङ्ग नाम कर्म है ॥२४८ ॥ जो जानिकी अपेक्षा चक्षु आदि इन्द्रियों के स्थान और प्रमाणका निर्माण करते हैं चे स्थाननिर्माण और प्रमाणनिर्माण १. ययान्तो नास्ति सोऽनन्तः मंसारतम्य कारणत्वात् मिप्यत्तमरि अनन्नं सन्नुवननं त्यनन्तानु. धनः । २. परमसापानमनत्याल्यानं तरपाररण लेगारारयानावरगाः । ३ प्रवामान चारित गयेने प्रत्याख्यानापरणा । ४. नामदेशेन सर्वदेशमरणात् सम् पदेन गंगस्य मागं टेन मापारी चलनम्। ५. एकीगताप म. 1 ६. यहपेदा मा.।

। हरिवंशपुराणे कर्मोदयवशोपात्तपुद्गलान्योन्यबन्धनम् । शरीरेपूदयाद्यस्य भवेद्वन्धननाम तत् ॥२५०॥ यस्योदयाच्छरीराणां नीरन्ध्रान्योन्यसंहतिः । संघातनाम तन्नाम्ना संघातानामनत्ययात् ॥२५१॥ शरीराकृतिनिवृत्तिर्यतो भपति देहिनाम् । संस्थाननाम तत् घोढा संस्थानकरणार्थतः ॥२५२॥ समादिचतुरस्रोतो न्यग्रोधपरिमण्डलम् । स्वातिसंस्थाननामापि कुजवामनहुण्डकम् ॥२५३।। यतो भवति सुश्लिष्टमस्थिसंधानवन्धनम् । तत्संहनननामापि नाना पोढा विमज्यते ॥२५४॥ तद्ववर्षमनारायपत्रनाराचकीलकाः । सनाराचार्धनाराचाः सासंप्राप्तस्पाटिकाः ॥२५५।। स्पर्शनस्योदयायस्य प्रादुर्भावेन भूयते । सर्शनाम भवरयेनत्प्रविभक्तमिवाष्टधा ।।२५६।। एयातं कर्कशनामकं मृदुनाम तथापरम् । गुरुनाम लघुस्निग्धरूक्षशीनोग्णनाम च ॥२५७।। । के भेदसे दो प्रकार के निर्माण नाम कर्म हैं ।।२४९||* जिसके उदयसे, कर्मोदयके वशसे प्राप्त पुद्गलोंका परस्पर संश्लेप होता है वह वन्धन नाम कर्म है । इसके औदारिक शरीर बन्धन आदि पॉच भेद हैं ।। २५० ।। जिसके उदयसे शरीरके प्रदेशोंका परस्पर छिद्ररहित संश्लेप होता है वह संघात नाम कर्म है। संघातोंका कभी अत्यय-विघटन नहीं होता इसलिए संघात नाम सार्थक है । इसके औदारिक शरीर संघात आदि पॉच भेद हैं ॥२५१ ॥ जिसके उदयसे जीवों के शरीरको आकृतिको रचना होती है वह संस्थान नाम कम है । संस्थान अर्थात् आकृतिको करे सो संस्थान है यह संस्थान शब्दकी निरुक्ति है। यह संस्थान, समचतुरस्त्र संस्थान, न्यग्रोध परिमण्डल संस्थान, स्वाति संस्थान, कुब्जक संस्थान, वामन संस्थान और हुण्डक संस्थानके भेदसे छह प्रकारका होता है । जिसके उदयसे सुडौल-सुन्दर शरीरकी रचना हो यह समचतुरस्र संस्थान नाम कर्म है। जिसके उदयसे शरीरके अवयव न्यग्रोध-वद वृक्षके समान नाभिसे नीचे छोटे और नाभिसे ऊपर बड़े हों वह न्यग्रोध परिमण्डल नाम कर्म है । जिसके उदयसे शरीरको रचना स्वाति--सॉपकी वामीके समान नाभिके नीचे विस्तृत और नाभिसे ऊपर संकुचित हो वह स्वाति नाम कर्म है। जिसके उदयसे शरीर में कूबड़ निकल आवे वह कुजक संस्थान है। जिसके उदयसे शरीर वामन-- -योना हो वह वामन नाम कर्म है और जिसके उदयसे शरीरकी आकृति वेडौल हो वह हुण्डक संस्थान नाम कर्म है ।।२५२-२५३।। जिमके उदयसे हड़ियोंका परस्पर मिलन और वन्धन अच्छी तरह होता है यह मंहनन नाम कर्म है । इसके वर्पभनाराच संहनन, वसनाराचसंहनन, नाराचसंहनन, अर्धनारायसंहनन, कीलकमंहनन और असंप्राप्तमृपाटिका महनन ये छह भेद है। जिसके उदयसे यमके वेष्टन, यसको कीलियाँ और पत्रके हाड़ हों उसे यर्पभनाराच संहनन कहते है। जिमय उदयसे कीलियों और हाड़ तो यमके हो परन्तु वेष्टन वम के न हों यह पमनाराच. संहनन है । जिमके उदयसे हाड़ तथा संधियोंको कीलें तो हो परन्तु ययय न हो इसी तरह वेष्टन भी यसमय न हो उसे नागचमंहनन कहते हैं। जिसके उदयसे हड़ियाँ आधी कीलोसे सहित हो उसे अर्धनाराचमंहनन कहते हैं। जिसके उदयसे हाई परम्पर फोलित हों उसे कोलक मंहनन कहते हैं और जिमके उदयमे हाड़ोंकी मंधियाँ कीलोंसे रहित हो नया मात्र नसों और माममे बँधी हो उसे असंप्राममृपाटिका संहनन कहते हैं ॥२५४-२५५ ।। जिसके उदयमे शरीरमें स्पसको उ पत्ति होती है यह स्पर्श नाम कम है। यह कड़ा, कोमल, गुरु, १ पाना नाम सतया म.रापाता नाम सत्ययात् ५०,६०, ग. गंधाता नाम सत्यया स.। २. महानामागि.. सांग नाम मोदी में आप है परन्तु पालीम भेरीकी गणनामें उस एक भेदही परिमगा।

भष्टपञ्चाशः सर्गः ६८७ यहेतुरसभेदः स्याद्रसनाम तदीरितम् । कटुतिककपायाम्लमधुरध्वनिनाम तत् ॥२८॥ यस्योदयाद्भवेद्गन्धो गन्धनाम बदुच्यते । द्विविधं तत्तु योग्यं मुरभ्य सुरमोति च ।।२५९।। यद्धेतुवर्णभेदस्तवर्णनामाण्यपञ्चधा । कृष्णनीलस्वरश्वपीतशुक्रवमोगतः ॥२६॥ उदयाद्यस्य पूर्वाग्मशरीराकृत्यसंक्षयः । चतुर्गस्यानुप्यं तत्तथागुरलघूदिनम् ॥२६॥ यस्योदयादयोवत्तु गुम्त्वास पतन्यधः । न गच्छति पुमानचं लघुत्वादकतूलवत् ॥२६॥ स्वकृतो बन्धनायैः स्यादुपधातो यतस्तु तत् । उपचातं समुदिष्टं परघातं परावधः ॥२६॥ यदीयोदयनिवृत्तं भवत्यातपनं महत् । प्रादित्यवद्वर्तमान मतमानपनाम तत् ॥२६॥ यद्धेनुद्योतनं देहे वेद्यमुद्योतनाम तत् । चन्द्रसयोतकायेपु वर्तमान यदीक्ष्यते ॥२६॥ उच्छ्वासकारणं यत्तु मतमुच्छनासनाम सत् । विहायोगतिराकाशे शस्ताशस्तगतिप्रभुः ॥२६॥ तत्प्रत्येकशरीराख्यं नाम स्वत्र शरीरकम् । सदेकारमापमोगस्य हेतुनिवर्तते यतः ॥२६॥ साधारणमनेकेषामेकं यस्माच्छरोरकम् । साधारणशरीराख्यं नाम तोगारणम् ॥२६॥ उदयायस्य जीवाना द्वीन्द्रियादिषु जन्म यत् । असनाम विपर्यस्वं स्थावराख्यं तु नाम तत् ॥२६॥ सर्वप्रीतिकरो यस्मात्राणी सुमगनाम तत् । यतोऽप्रीतिकरोऽन्येषां नाम्ना दुभंग नाम तत् ।।२७०।। लघु, स्निग्ध, रुक्ष, शीत और उष्णक भेदसे आठ प्रकारका है ।। २५६-२५७ ॥ जिसके निमित्त से रसमें भेद होता है यह रस नाम कर्म कहा गया है। इसके कटुक, तिक्त, कषाय, आम्ल और मधुरके भेदसे पॉच भेद हैं ।। २५८ ॥ जिमके उदयसे गन्ध होता है वह गन्ध नाम कर्म है। इसके मुगन्ध और दुर्गन्धकी अपेक्षा दो भेद जानना चाहिए ।। २५९ ॥ जिसके निमित्तसे वर्णमें भेद होता है वह वर्ण नाम कर्म है । यह कृष्ण, नील, रक्त, पीत और शुक्लक भेदमे । पाँच प्रकारका है ।। २६० ॥ जिसके उदयसे विग्रह गतिमें पूर्व शरीरकी आकृतिका विनाशन हो वह नरकगत्यानुपूM आदिके भेदसे चार प्रकारका आनुपूर्य नाम कर्म है। जिसके उदयसे यह जीव भारीपनके कारण लोहके समान नीचे नहीं गिरता है और लघुपनके कारण आकर्का रुईके समान ऊपर नहीं उड़ता है वह अगुरु लघु नाम कर्म कहा गया है ।।२६१-२६२।। जिसके उदयसे अपने ही धन्धन आदिसे अपना ही घात होता है यह उपधात नाम फर्म कहा गया है और जिसके उदयसे दूसरोंका घात होना है वह परधान नाम कर्म है ।। २६३ ।। जिसके. उदयसे शरीर में सूर्यके समान बहुत भारी आतापकी उत्पत्ति होती है. यह आताप नाम फर्म माना गया है इसका उदय सूर्यके विमानमें स्थित वादरधियोकायिक जीयोंके ही होता है। इसकी विशेषता यह है कि यह मूलमें ठण्डा होता है और इसको प्रभा उष्ण होती है ॥ २६४ ॥ जिसके उदयसे शरीरमें विशिष्ट प्रकारका प्रकाश दोना है यह उद्योग नाम फर्म है। यह उद्योत चन्द्रमा विमानमें स्थित पादरपृथि कायिक जीय तथा जुगनू आदिमें देखा जाता है ।।२६५ ।। जो उच्छवामका कारण है यह उन्छ्याम नाम कर्म माना गया है तथा जो आकाशमै प्रशस्त एवं अप्रास्त गनि करानेमें ममय है यह विहायोगनि नाम फर्म दै।।२६६ ॥ जिमके उदयसे ऐसे शरीरफी रचना हो जो मदा एफ ही आत्माफ उपभोग- फा फारण हो वह प्रत्येकशरीर नाम पर्म है ॥२६७ ॥ जिसके उदयमे एक ही शरीर अनेक जीबकि उपभोगका कारण होता है पद माधारण नाम पर्म ॥२६८ ॥ जिमफे उदयमे जीपी. का दीन्द्रियादिफ जीयोंमें जन्म होता है यह प्रमनाम पर्म है। जिसमे उदयमे दम विपरित मिर्फ. एपेन्द्रिय जीयों में जन्म हो यह स्थायर नाम पर्म ६।२६॥ जिस निमितमे यह जीय १. परमात म.। २. सगराइदिन म., ....परे १०। ४. मापन म.१५. RERA... सोदाम.. सगरम...।

। सदग्यक्षेत्रकालोक्तमवमावविभेदतः । विविधो हि विपाको यः सोऽनुमावः समुच्यते ॥२८॥ समुसेनानुभूपन्ते मूलमकृतयोऽखिकाः । उत्तरास्तुल्यजातीया द्वयान्मोहायुषो विना ॥२९॥ कपायोंकी तीव्रता, मन्दता आदि भावानवकी विशेषतासे जो उनका विशिष्ट परिसर होना है उसे अनुभव कहते हैं अथवा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भावको विभिन्नतासे कम का जो विविध नाना प्रकारका परिपाक होता है वह अनुभववन्ध कहलाता है।।२८८-२॥ शुभ परिणामांसे जिम प्रकार पुण्य प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभव बन्ध होता है उसी प्रकार पाप प्रकृनियोंका जघन्य अनुभव वन्ध होता है और अशुभ परिणामोंकी विशेषतासे जिस प्रकार असुम प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभव बन्ध होता है उसी प्रकार शुभ प्रकृतियोंका जघन्य जारी रहता। जिस समय शुभ परिणामोंकीप्रकर्पता होती है उस समय पुण्य प्रकृतियोंकावर अनुभव यन्ध होता है। भावार्थ-प्रत्येक समय पुण्य और पाप प्रकृतियोंका अनुभव बन्द अनुभव यन्ध होता है और पाप प्रतियोका जघन्य अनुभव होता है। इसी प्रकार जिस समय तियोंका जघन्य अनुभव वन्ध होता ।२९०.२९१॥ कौकी समस्त मूल प्रकृतियाँ स्वमुस्खसे अनुभ परिणामांकी विशेषतासे पापप्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभव होता है उस समय पुग्यो ही अनुभवमें आती है.---अपना फल देती है और मोहनीय तथा आयुकर्मको छोड़कर शेर कर्मों की तुन्य जातीय प्रकृतियों स्वमुख तथा परमुरा-दोनों रूपसे अनुभवमें आती है-पल देती है। भावार्थ-जिस प्रकृतिका जिस रूप बन्ध हुआ है, उसका उसी रूप उदय आना स्व. कहलाता है। कर्मोकी हानावरणादि मूल प्रकृतियाँ सदा स्वमुखसे ही उदयमें आती है अर्थात् सानायरणका उदय दर्शनावरणादि रूप कभी नहीं होता है परन्तु उत्तर प्रकृतियों में एक उदय अमानारूप भी आमकना और माता रूप भी। जिस समय अपने रूप उदय आना भारना RC पानि nिglनुमायुमा विश्मी। माना. हरिवंशपुराणे কথায়ী সমাধ্যবিহীন: বিষবাক হুধে বিহাঙ্গীশৰীয়া ৯২৫৫৫ प्रकृष्टोऽनुमतः पुण्यप्रकृतीनां शुमो यया । अशुभप्रकृतीनां तु निकृष्टोऽनुमवस्तथा ॥२९॥ अशुभप्रकृतीनां तु परिणामविशेषतः । प्रष्टोऽनुमवोऽन्यासां निकृष्टोऽनुभवस्तथा ॥२९॥ मुपसे उदय आना कहलाता है और अन्य प्रति आना परमुखसे उदय आना कमको प्रकृनियाँ स्वमुम्ब तथा परमप दोनों रूपसे फल देती हैं। जैसे वेदनीय कर्मकी साला रेदीय और अमाता वेदनीय ये दो उत्तर प्रकृतियाँ है। इनमें सातवेदनीयका उदय साना रूप भी आ सकता है और अमाता रूप भी आ सकता है। इसी प्रकार असाता वेदनीयका उस समय मुग उदय आना पहलाना । विशेषता महनीय कर्मफे जो दर्शन- मोह और पारिप्रमोद भेद है उनकी प्रतियों परस्सर एक दूसरे रूपमें उदय नहीं आती- सदा १.मर ॥१९॥ १. म. प्र. ८॥ विवि नानाभो या कोपिए। पूरोक MARHTTET शिष्ट मा वि या पालभाय सवनिमिय AIRPो नामाyि afrm । २. 'शुभाद' परिमान। .. शुभपरिकामा HTTOमोनो मारोतुमर । गुम Arr. परिक्षामान भाभ: मालो । शुभ | At meसोनमयो ANTEY मोर । करको गणेशानुपरः । नाना पागात भारी MER. Kailaritime I n. For in (९. 1 भरपयामः सर्गः 'कर्मणोऽनुभवात्तस्मात्तपसश्चापि निरा । विपाकजा तु तत्रैका परा धाप्यविपाजा ॥२९॥ संमारे भ्रमतो जन्तीः प्रारम्धफसकर्मयः । मंगैव निवृत्तिर्या निर्जराऽमो विपाका ॥२९॥ यसपायविपायं तदाम्रादिफलपाकवत् । भनुदोर्णमुदीर्याशु निर्जरा स्वविपाका ॥२९५॥ सर्वेशरमप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशकाः । धनालत्यासंख्येयमान क्षेत्रावगाहिनः ।।२९६॥ एकदिश्यादिसंप्ययसमयस्थित्यः सदा । प्रदेशयसन्तानेऽप्यासतं कर्मपुद्गलाः ॥२९७।। शुमायुर्नामगोत्राणि सहेपं च चतुर्विधः । पुण्यवन्भोऽन्यकर्माणि पापबन्धः प्रपशितः ॥२९॥ भास्रवस्य निरोधस्तु संवरः परिमाप्यते । स मावनग्यभेदाम्यां दैविध्येन निरुज्यते ॥२९९॥ "क्रियाणां भवहेतुना निवृत्तिावसंवरः । तस्कर्मपुद्गलादानविच्छेदो दम्यसंवरः ॥३०॥ स्वमुख ही उदय आती हैं परन्तु इन भेदोंकी जो अवान्तर उत्तर प्रकृतियाँ हैं उनका दोनोंसे उदय आता है । इसी प्रकार आयु कर्मको उत्तर प्रकृतियोंका सदा स्वमुखसे ही उदय आता है परमुरासे नहीं। जैसे नरकायुका सदा नरकायु रूप हो उदय आता है अन्य रूप नहीं ।।२९२ ॥ विपाकसे और तपसे कोंकी निर्जरा होती है। इस निर्जरामें एक निर्जरा तो विपाकना है और दूसरी अविपाकजा है। भावार्थ-निर्जराके विपाकजा और अविपाकजाके भेदसे दो भेद हैं ।।२९३ । संसारमें भ्रमण करनेवाले जीवका कर्म जब फल देने लगता है तब क्रमसे हो उसको निवृत्ति होती है, यही विपाकजा निर्जरा कहलाती है ।। २९४ ।। और जिस प्रकार आम आदि फलोको उपाय-द्वारा असमयमें ही पका लिया जाता है, उसी प्रकार उदयावलीमें अप्राप्त कर्मको तपश्चरण आदि उपायसे निश्चित समयसे पूर्व ही उदोरणा द्वारा जो शीव ही निर्जरा की जाती है वह अविपाकजा निर्जरा है॥२९५ ॥ आत्माके समस्त प्रदेशोंके साथ कर्मपरमाणुओंका जो पन्ध है वह प्रदेशबन्ध कहलाता है। इस प्रदेशबन्ध- फी सन्ततिमें अनन्तानन्त प्रदेशोंसे युक्त घनांगुलके असंख्येयभाग प्रमाणभेत्रमें अवगाढ एक दो, तीन आदि संख्यात समयोंकी स्थिनियाले कर्म रूप पुग्दल आत्माके समस्त प्रदेशों में मदा विद्यमान रहते हैं ॥ २९६-२९.७ ।। उपयुक्त कर्मरन्ध, पुण्ययन्ध और पापरन्धफे भेद से दो प्रकारका है, उनमें शुभ आयु, गुभ नाम, शुभ गोत्र और सद्वेध ये पार पुण्ययन्ध फे भेद है और शेष कर्म पापरन्ध रूप है ।।२९८॥ आस्रवका रुक जाना संवर कहलाता है। यह भावसंवर और द्रव्यसंवरके भेदमे दो प्रकारका कहा जाना है ।। २९९ ।। संसारकी फारणमन क्रियाओंका का जाना भाव १. तारच निजंग। तमा निजंग च । तमू. ३. तत्र चगंतावने कनातियापिने मंसार- मागवे चिर परिभ्रमत गुमायमस्य कर्मणः कमेग परपावालात गनुभयोदायनिसोधोऽनुपिटरवर. परमप या निति सा गिमा निजंग। ४. पतमांगतकारमोपनिविषमामांनी मशरोदयापनि मरिप वेपते मापनसाटियर का प्रशिग निमंग। समिमा ८५.२।। ५. मागे पत्रा-..... ममताः सतो पोतिरापमाथि सांसमो. घनसानदेवा ॥२४||-.ए.प.८। वे समु पुगसम्रा प्रभावनगा. मिशानन्नमागा. निदेय पनाहगरमाग पेशागादिनः एरिमलाममा. मा. पावरगिनामांमभाषा शिवांग योगसामनासम्म पितो...॥ ५. 'गुमायुगमगोवानि | wwer III..। ८. मानिiv. in. ॥१॥ १. म.।। १. रात्र मनानिनिनिभायम: गोरी भगार 18.मि.। - ६८८ हरिवंशपुराणे मनोज्ञस्वरनिवृत्तियतः सुस्वरनाम तत् । अनिष्टस्वरहेतुर्योकं दुःस्वरनाम तत् ॥२७१।। यतस्तु रमणीयत्वं शुभनाम तदीरितम् । अतिरूप्यहेतुश्च नामाशुममशोमनम् ॥२७२।। 'यत्त सूक्ष्मशरीरस्य कारणं सूक्ष्म नाम तत् । परवाधाकृतो हेतुः शरीरस्य तु वादरः ॥२०३।। यदाहारादिपर्याप्तिभेदनितिकारणम् । पर्याप्तिनाम तन्नाम्ना पड्विधमुदितं बुधै. ॥२७४॥ श्राहारस्य शरीरस्य प्राणापानेन्द्रियस्य च । पर्याप्त्यभावहेतुस्तु मापाया मनसोऽपरम् ॥२७५॥ कारणं स्थिरमावस्य स्थिरमस्थिरमन्यथा । नामादेयमनादेयं सप्रमाप्रमदेहकृत् ॥२७॥ हेतुः पुण्यगुणाख्यातेः यश कीर्तिरितीर्यते । अयशःकीर्तिनामापि तद्विपर्यासकारणम् ॥२७॥ समस्त प्राणियोंके लिए प्रीति करनेवाला होता है वह सुभग नाम कर्म है । जिसके निमित्तसे दूसरोंको अप्रीति उत्पन्न करनेवाला हो यह दुर्भग नाम कर्म है ॥ ७० ॥ जिससे मनोज्ञ स्वर: की रचना होती है वह सुस्वर नाम कर्म है। जो अनिष्ट स्वरका कारण है वह दुःस्वर नाम कर्म है ।। २७१ ।। जिससे शरीरमें रमणीयता प्रकट होती है वह शुभ नाम कर्म है । जो अत्यन्त विरूपताका कारण है वह दुःखदायी अशुभ नाम कर्म है ॥ २७२ ।। जो सूक्ष्म शरीरका कारण है वह सूक्ष्म नाम कर्म है । जो दूसरोंको बाधा करनेवाले शरीरका हेतु है वह वादर नाम कर्म है ।। २७३ ।। जो आहार आदि पर्याप्तियोंकी रचनाका कारण है वह पर्याप्ति नाम कर्म है। विद्वानोंने इसके आहारपर्याप्ति, शरीरपर्याप्ति, इन्द्रियपर्याप्ति, श्वासोच्छ्वासपर्याप्ति, भाषा- पर्याप्ति और मनःपर्याप्ति ये छह भेद कहे हैं ॥२७४ । जो आहार, शरीर, श्वासोच्छ्वास, इन्द्रिय, भापा और मन इन छह पर्याप्तियोंके अभावका कारण है वह अपर्याप्ति नाम कर्म है ।। भावार्थ-विग्रह गतिके वाद उत्पत्ति स्थानमें पहुँचनेपर ग्रहण किये हुए आहार- वर्गणाके परमाणुओंमें खल रसभाग रूप परिणमन करनेकी जीवको शक्तिको पूर्णताको आहारपर्याप्ति कहते हैं। जिन परमाणुओंको खल रूप परिणमाया था उन्हें हड्डी आदि कठोर अवयव रूप तथा जिन्हें रस रूप परिणमाया था उन्हे रुधिर आदि तरल अवयव रूप परिणमावनेको शक्तिको पूर्णताको शरीरपर्याप्ति कहते हैं। शरीर रूप परिणत परमाणुओंमें स्पर्शनादि इन्द्रियोंके आकार परिणमावनेकी शक्तिको पूर्णताको इन्द्रियपर्याप्ति कहते हैं । भीतरकी वायुको बाहर छोड़ना और वाहरकी वायुको भीतर खींचनेकी शक्तिको पूर्णताको श्वासोच्छ्वासपर्याप्ति कहते हैं। भाषावर्गणाके परमाणुओंको शब्द रूप परिणमायनेको शक्तिको पूर्णताको भाषापर्याप्ति कहते हैं। और मनोवर्गणाके परमाणुओंको हृदय-क्षेत्रमें स्थित आठ पॉखुड़ीके कमलाकार द्रव्यमनरूप परिणमावनेको शक्तिको पूर्णताको मनःपर्यानि कहते हैं । इनमें से एकेन्द्रिय जीवके भाषा और मनको छोड़कर चार पर्याप्तियाँ होती हैं । द्वीन्द्रियसे लेकर असैनीपञ्चेन्द्रिय तक मनको छोड़कर शेष पाँच पर्याप्तियों होती हैं और सैनी पञ्चेन्द्रिय जीवके सभी पर्याप्तियाँ होती हैं। जिसो ---- पर्याप्तक नाम कर्म है और जिसके उदयसे एक भी कर्म है । यहाँ अपर्याप्तक शब्दसे लब्ध्यपर्याप्तक जीव क्योंकि वह कर्मोदयकी अपेक्षा तो पर्याप्तक ही है सिर्फ निर्वृत्ति-रचनाकी अपेक्षा लघु अन्तर्मुहूर्त के लिए अपर्याप्तक होता है ।। २७५ ।। जो धातु-उपधातुओंकी स्थिरताका कारण है वह स्थिर नाम कर्म है और जो इससे विपरीत अस्थिरताका कारण है वह अस्थिर नाम है, जो प्रभापूर्ण शरीरका कारण है वह आदेय नाम कर्म है और जो प्रभा-रहित शरीरका कारण है वह अनादेय नाम कर्म है ।। २७६ ॥ जो पुण्य रूप गुणोंकी प्रसिद्धिका कारण है वह । १. यत्र म०, १० । २. पर्याप्तिभाव हेतुस्तु का । ३. भाषाया म ।

मपश्चाशः सर्गः १८९ हेतुस्तीर्थकररवस्य सत्तीर्थकरनाम तत् । नाना प्रकृतिमेदानिनवतिस्तूत्तरोत्तराः ॥२७८।। गोत्रमुशेश्च नीचैश्च तत्र यस्योदयारकुले । पूजिते जन्म 'तत्त्यैःचैनींचकुलेषु तत् ॥२७९॥ दीयते दानुकानं लब्धुकामैन लभ्यते । यदुदयात्रणीती तो दानलामान्तरायको ॥२८॥ मोनुकामोऽपि नो मुड्ने नोपमुहक्ने तथेच्छुकः । यदेतायन्तरायौ तौ ज्ञेयो मोगोपभोगयोः ॥२८॥ तथोरसहितुकामो यो यसो नोरसहते स हि । वीयर्यान्तराय एषोऽसौ बन्धः प्रकृतिलक्षणः ॥२८॥ स्थितिबन्धविकल्पस्तु जयन्योत्कृष्टभेदवान् । अष्टानां कर्मणामेषां द्विविधोऽपि निरूप्यते ॥२८३॥ ज्ञानदर्शनमवृरयोवेंदनीयान्तराययोः । सागरोपमकोटीना कोट्यविंशत्परा स्थितिः ॥२८॥ सप्ततिमोहनीयस्य विशति मगोत्रयोः । संशिपञ्चेन्द्रियस्येयं ज्ञेया पर्याप्तकस्य तु ॥२८५॥ आयुषस्तु प्रयनिशरसागरोपमिका परा । स्थितिः सा वेदनीयस्य मुहूर्ता द्वादशावरा ॥२८६॥ साधावेव मुहर्ता स्यानधन्या नामगोग्रयोः । पचानामपि शेषाणां स्थितिरन्तर्मुहूतिका ॥२८॥ यशोति नामकर्म कहलाता है और जो इससे विपरीत अपयशका कारण है वह अपयश- स्कीर्ति नामकर्म है ।। २७७ ॥ और जो तीर्थकर पर्यायका कारण है यह तीर्थकर नामकर्म है यह सातिशय पुण्य प्रकृति है। इस प्रकार नामकर्मको निरानवे उत्तर प्रकृतियाँ हैं IRel गोत्रकर्मके दो भेद है-१. उच्च गोत्र और नीच गोत्र । जिसके उदयसे लोकपूज्य पु में जन्म होता है उसे उच्च गोत्र कहते हैं और जिसके उदयसे नीच कुलोंमें जन्म होता हे वह नीच गोत्र है ।। २७९ ।। अन्तराय कर्मके पॉच भेद हैं-१. दानान्तराय, २. लाभान्तराय, ३. भोगान्तराय, ४. उपभोगान्तराय और ५. वीर्यान्तराय। जिसके उदयसे जीव दान करनेकी इच्छा करते हुए भी दान न कर सके वह दानान्तराय है। जिसके उदयसे लाभकी इच्छा रखते हुए भी लाभ प्राप्त न कर सकें यह लाभान्तराय है ।। २८० ।। जिसके उदयसे जीव, भोगको इच्छा रखता हुआ भी भोग नहीं सकता यह भोगान्नराय है। जिसके उदयसे उपभोगकी इच्छा रखता हुआ भी उपभोग नहीं कर सकता यह उपभोगान्तराय है ।।२८१ ।। और जिसके उदयसे कार्यों में उत्साहित होता हुआ भी उत्साह प्रकट नहीं कर सकना यह अन्तराय नामका फर्म है। इस प्रकार यह प्रकृतियन्धका निरूपण किया ॥२८२ ।। अब स्थितियन्धका निरूपण करते हैं। आठों काँका स्थितिवन्ध, जयन्य और उन्कृष्ट की अपेनासे दो प्रकारफा कहा जाता है।। २८३॥ शानायरा, दर्शनापरण, वेदनीय और अन्तराय इन चार कर्मोकी उत्कृष्ट स्थिति तीस फोडाफोड़ी सागर है ।।२८४ ॥ मोहनीय कर्मकी सत्तर कोड़ाफोड़ों सागर है और नाम तया गोत्र फर्मको बीस कोड़ाफोड़ी सागर है। यह उत्कृष्ट स्थिनि मंशो पवेन्द्रिय पयांना जीप ही थेंधती है ॥२८५ ॥ आयुफर्मको उत्कृष्ट स्थिति तेतीम मागर है। वेदनीय फर्मको जपन्य स्थिति पारह मुहूर्त है। नाम और गोसफी आठ मुहूर्न है गया शेष पांच को अन्नमुहूर्न ६।२८६-८७॥ १. सदुग्नेःमः । २ अादिननिमारास परिवारमागरीरमा पोरी. पारित ॥१४॥ समानीरस ॥ १५॥ पिराजिनामगंध ॥१५॥ अपरिषयमानगरमारापुराण दायमा थेदनी ॥१८नामगोरो ॥१९॥ देगानन ॥२०॥-1 स.प्र. मेराम पीपसामगे। पचर मोरे मुर उरहो माउम्म पोम ॥१२॥ पाम पेनीय पामे गोले सघाममा । गो... मिटिमोगा MRI ।

हरिवंशपुराणे
'कवायतीव्रमन्दादिमावावविशेषतः । विशिष्टपाक इष्टस्तु विपाकोऽनुभवोऽथवा ॥२८॥
सम्यक्षेत्रकालोकमवमावविभेदतः । विविधो हि विपाको यः सोऽनुमावः समुच्यते ॥२८॥
प्रकृष्टोऽनुमवः पुण्यप्रकृतीनां शुमो यया । भगुमप्रकृतीनां तु निकृष्टोऽनुमवस्तथा ॥२९०॥
अशुभप्रकृतीनां तु परिणामविशेषतः । प्रकृष्टोऽनुभवोऽन्यासां निकृष्टोऽनुमवस्तथा ॥२९॥
स्वमुखेनानुभूयन्ते मूलप्रकृतयोऽखिताः । उत्तरास्तुल्यजातीया द्वयान्मोहायुषी विना ॥२९२॥
कपायोंकी तीव्रता, मन्दता आदि भावानवकी विशेषतासे जो उनका विशिष्ट परिपाक
होता है उसे अनुभव कहते हैं अथवा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भावको विभिन्नतासे कर्मों-
का जो विविध-नाना प्रकारका परिपाक होता है वह अनुभववन्ध कहलाता है ।।२८८-२८९।।
शुभ परिणामोंसे जिस प्रकार पुण्य प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभव बन्ध होता है उसी प्रकार
पाप प्रकृतियोंका जघन्य अनुभव बन्ध होता है और अशुभ परिणामोंकी विशेषतासे जिस
प्रकार अशुभ प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभव बन्ध होता है उसी प्रकार शुभ प्रकृतियोंका जघन्य
अनुभव बन्ध होता है । भावार्थ-प्रत्येक समय पुण्य और पाप प्रकृतियोंका अनुभव बन्ध
जारी रहता है। जिस समय शुभ परिणामोंकीप्रकर्पता होती है उस समय पुण्य प्रकृतियोंका उत्कृष्ट
अनुभव बन्ध होता है और पाप प्रकृत्तियोंका जघन्य अनुभव होता है। इसी प्रकार जिस समय
अशुभ परिणामोंकी विशेषतासे पापप्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभव होता है उस समय पुण्यप्रक-
तियोंका जघन्य अनुभव बन्ध होता है ।।२९०-२९१।। कर्मोकी समस्त मूल प्रकृतियाँ स्वमुखसे
ही अनुभवमें आती है-अपना फल देती हैं और मोहनीय तथा आयुकर्मको छोड़कर शेप कर्मों
को तुल्य जातीय प्रकृतियाँ स्वमुख तथा परमुख–दोनों रूपसे अनुभवमें आती हैं-फल
देती हैं। भावार्थ-जिस प्रकृतिका जिस रूप बन्ध हुआ है उसका उसी रूप उदय आना स्व-
मुस्खसे उदय आना कहलाता है और अन्य प्रकृति रूप उदय आना परमुखसे उदय आना
कहलाता है। कोकी ज्ञानावरणादि मूल प्रकृतियाँ सदा स्वमुखसे ही उदयमें आती हैं अर्थात्
शानावरणका उदय दर्शनावरणादि रूप कभी नहीं होता है परन्तु उत्तर प्रकृतियोंमें एक
कर्मको प्रकृतियाँ स्वमुख तथा परमुख दोनों रूपसे फल देती हैं। जैसे वेदनीय कर्मको साता
वेदनीय और असाता वेदनीय ये दो उत्तर प्रकृतियाँ हैं। इनमें सातावेदनीयका उदय साता
रूप भी आ सकता है और असाता रूप भी आ सकता है। इसी प्रकार असाता वेदनीयका
उदय असाता रूप भी आ सकता है और साता रूप भी। जिस समय अपने रूप उदय आवा
है उस समय स्वमुखसे उदय आना कहलाता है और जिस समय अन्य रूप उदय आता है,
उस समय परमुससे उदय आना कहलाता है। विशेषता यह है कि मोहनीय कर्मके जो दर्शन-
मोह और चारित्र-मोह भेद है उनकी प्रकृतियाँ परस्पर एक दूसरे रूपमें उदय नहीं आती-सदा
१. विपाकोऽनुभव ॥२१॥ त० मू.अ. ८॥ विशिष्टो नानाविधी वा पाकोविपाकः । पूर्वोक.
पापतीप्रमादिमागमय विशेषाद् विशिष्ट पाको विपाक 1 अथवा द्रन्यदेमालमवमावलवानिमित्तमेद.
नितश्रूयो नानाविध पायो पिगक । २. 'शुभायपा' इति सम्पप्रतिभाति । ३. शुभपरिणामान
प्रमापागुमशातीना प्राटोऽनुभव । अगुमप्रकृतीना निकट. | प्रशुभपरिणामान प्रकर्षमावाटशुभ-
मातीनां प्राटोनुभय । गुमातीनो निः । स एवं प्रत्यश्वगानुपातोऽनुमवो दिषा प्रयतते स्वमुखेन
पामुमेन प। सयां प्रायोना स्पगेयानुभयः । उत्तरप्रवृतीना दत्यनातीयानां परमुभेनापि भवति
भारांनपारिवमोत्यांना | न हि नरमायुपेन विसंगापुमनुष्यायुवा रिपन्यने । नापि दरांनमोरमा.
विमोन, पारित्रमोहोमा दरानमारमगन । म. सि. एम ॥२१॥

अष्टपबागः सर्गः । - 'कर्मणोऽनुभवात्तस्मात्तपसश्चापि निर्जरा । विपाकजा तु तत्रैका परा चाप्यविपाजा ॥२९३॥ संसारे भ्रमतो जन्तोः प्रारब्धफसकर्मणः । क्रमेणेव निवृत्तिा निर्जराऽसौ विपाका ॥२९॥ यत्तपायविपाच्यं तदानादिफलपाकवत् । अनुदोर्णमुदोर्याशु निर्जरा त्वविपाका २९५॥ सर्वेष्वात्मप्रदेशेदनन्तानन्तप्रदेशकाः । घनाडुलत्यासंख्येयमान भेत्रावगाहिनः ॥२९॥ एकदिन्यादिसंख्येयसमयस्थितयः सदा । प्रदेशबन्धसन्तानेऽप्यासते कर्मपुद्गलाः ॥२९७।। "शुभायु मगोत्राणि सइयं व चतुर्विधः । पुण्यबन्धोऽन्यकर्माणि पापबन्धः प्रपशितः ॥२९॥ 'आस्रवस्य निरोधस्तु संबरः परिभाष्यते । स मावदम्यभेदाम्यां दैविभ्येन निरुच्यते ॥२९९॥ "क्रियाणां मवहेतूनां निवृत्ति वसंवरः । तस्कर्मपुद्गलादानविच्छेदो द्न्यसंवरः ॥३०॥ स्वमुख ही उदय आती हैं परन्तु इन भेदोंकी जो अवान्तर उत्तर प्रकृतियाँ हैं उनका दोनोंसे उदय आता है । इसी प्रकार आयु कर्मको उत्तर प्रकृतियोंका सदा स्वमुखसे ही उदय आता है परमुखसे नहीं। जैसे नरकायुका सदा नरकायु रूप ही उदय आता है अन्य रूप नहीं ॥ २९२ ॥ विपाकसे और तपसे कर्मोंकी निर्जरा होती है। इस निर्जरामें एक निर्जरा तो विपाकजा है और दूसरी अविपाकला है। भावार्थ-निर्जराके विपाकजा और अविपाकजाके भेदसे दो भेद हैं ।। २९३ ॥ संसारमें भ्रमण करनेवाले जीवका कर्म जब फल देने लगता है तब क्रमसे ही उसकी निवृत्ति होती है, यही विपाकजा निर्जरा कहलाती है ।। २९४ ॥ और जिस प्रकार आम आदि फलोंको उपाय-द्वारा असमयमें ही पका लिया जाता है उसी प्रकार उदयावलीमें अप्राप्त कर्मकी तपश्चरण आदि उपायसे निश्चित समयसे पूर्व ही उदोरणा द्वारा जो शीघ्र ही निर्जरा की जाती है वह अविपाकजा निर्जरा है ।। २९५ ।। आत्माके समस्त प्रदेशोंके साथ कर्मपरमाणुओंका जो बन्ध है वह प्रदेशबन्ध कहलाता है। इस प्रदेशबन्ध- की सन्ततिमें अनन्तानन्त प्रदेशोंसे युक्त घनांगुलके असंख्येयभाग प्रमाणक्षेत्रमें अवगाढ एक दो, तीन आदि संख्यात समयोंकी स्थितिवाले कर्म रूप पुग्दल आत्माके समस्त प्रदेशोंमें सदा विद्यमान रहते हैं ।। २९६-२९.७ ।। उपर्युक्त कर्मबन्ध, पुण्यवन्ध और पापबन्धके भेद से दो प्रकारका है, उनमें शुभ आयु, शुभ नाम, शुभ गोत्र और सद्वेद्य ये चार पुण्यबन्ध के भेद हैं और शेष कर्म पापबन्ध रूप हैं ।। २९८ ॥ आस्रवका रुक जाना संवर कहलाता है । यह भावसंवर और द्रव्यसंवरके भेदसे दो प्रकारका कहा जाता है ॥ २९९ ।। संसारकी कारणमत क्रियाओंका रुक जाना भाव १. ततश्च निर्जग। तपसा निर्जरा च । त० सू० । ३. तत्र चतुर्गतावनेकजातिविशेषावपूर्णिले संसार- महारे चिरं परिभ्रमत शुभाराभस्य कर्मणः क्रमेण परिपाककालप्राप्तस्यानुभवोदयावलिस्रोतोऽनुपविष्टस्यार- न्धफलस्य या निवृत्ति सा विपाकजा निर्जग । ४. यत्कर्माप्रासविपाककालमापक्रमिकक्रियाविशेषसामध्यदिनुदी] बलादुदीर्योदयावलिं प्रविश्य वेद्यते आम्रपनसादिपाश्वत् सा प्रविपाकजा निग॥ स०सि०अ० ८ २० २३ ।। ५. मागे क्षेत्रा-क० १० म०।६. नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मदेवावगाहस्पिताः सर्वात्मप्रदेशे- ध्वनन्तानन्तप्रदेशा ॥२४॥-त० सू० ऋ०८1 'ते खलु पुद्गलकन्या अभव्यानन्तगुणा. सिदानन्तमागप्र. मितप्रदेशा घनाइलस्या संख्येयमाग क्षेत्रावगादिनः एकदित्रिचतु संख्येयासंख्येयसमयस्थितिका. पञ्चवर्ण- पञ्चरसदिगन्वचतु सरस्वभावा अष्टविधकर्मप्रकृतियोग्या योगवशादात्मनाऽऽत्मसात् स्यिने ।। स० सि ।। ७. 'शुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम्' ॥२५॥ अतोऽन्यत्सारम् ।।२६॥त००। ८. आसवनिरोधः संवरः ॥१॥ तक सू० अ० ।। ९. तत्र संसारनिमित्तक्रियानिवृत्तिर्भावसवः । तनिरोधे तत्पूर्वकमपुद्गलदानपिच्छेदी द्रव्यसवर' ।। ससि०। , १९२ हरिवंशपुराणे 'त्रिमंन्या गुप्तयः पञ्चसंप्याः ममितयस्तथा । दशद्वादशधर्मानुप्रेक्षाश्चारित्रपञ्चकम् ॥३०॥ द्वाविंशनिभिदा मिनपरीपहजयोऽपि च । हेतयः संवरस्यते सप्रपञ्चा. समन्विताः ॥३०२॥ 'यन्यदतोरमावादि निजरातश्च कर्मणाम् । कात्स्न्येन विप्रमोक्षरतु मोक्षो निग्रंन्यरूपिणः ॥३०॥ 'जीवादिसप्ततत्त्वानामतेषां ज्ञानसंगनम् । श्रद्धानं तच्चरित्रं च साक्षान्मोक्षस्य साधनम् ॥३०॥ भवेनन मागंस्थाः केचिरसप्लाटमिः परे । भुकस्वर्गमुसा भव्याः सिद्ध्यन्ति ध्यानिनः सदा १३०५१॥ इनि श्रुत्वा जिनेन्द्रोक मोक्षमार्गमनाविलम् । प्रणेमुर्दादशगणाः प्रकृताञ्जलयो विभुम् ॥३०६॥ से सम्यग्दर्शनं कचिसंयमाध्यमं परे । संयम केचिदायाताः संसारावासमीरवः ॥३०७॥ दे सहने नरेन्द्रास्ते कन्याश्च नृपयोपितः । सहस्राणि बहून्यापुः संयमं जिनदेशितम् ॥३०॥ "शिवा च रोहिणी देवी देवकी रुक्मिणी तथा । देयोऽन्याश्च सुचारित्रं गृहिणां प्रतिदिरे ॥३०९॥ यदुभाजकुलप्रष्टा राजानः सुकुमारिकाः । जिनमार्गविदो जाता द्वादशाणुव्रतस्थिताः ॥३१०॥ कृतपूजाः सुरैरिन्द्राः प्रणम्य जिनमास्करम् । प्रयाताः स्वास्पदं रामकेशवाद्याश्च यादवाः ॥३१॥ शार्दूलविक्रीडितम् विश्वाशा विशदाः शरद्विदधती धीतं पयोदेस्तथा विस्पष्टग्रहतारकाकुमुमितं रम्यं नमोमण्डलम् । संपर है और कर्मरूप पुग्दल द्रव्यके ग्रहणका विच्छेद हो जाना द्रव्यसंवर है ॥ ३०० ।। तीन गुप्तियाँ, पाँच समितियाँ, दश धर्म, बारह अनुप्रेक्षाएँ, पाँच चारित्र और बाईस परिपह- जय ये अपने अवान्तर विस्तारसे सहित संवरफे कारण हैं ॥३०१-३०२ ॥ निर्यन्य मुद्राके धारक मुनिके धन्धके कारणोंका अमाय गथा निर्जराके द्वारा जो समस्त कर्मोंका अत्यन्त आय होता है वह मोक्ष कहलाता हे ।। ३०३ ।। इन जीयादि सात तत्त्वोंका सम्यग्दर्शन, सम्य- रज्ञान और सम्यकनारित्र ही गोषका सामान साधन है ॥ ३०४ ॥ मोक्षमार्ग में स्थित कितने ही अन्य जीय एकाही भयमें सिख हो जाते हैं और कितने ही भव्य स्वर्गके सुख भोग फर सदा मात्गाका ध्यान करते हुए सारा-आठ भयमें मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ॥३०५ ।। इस प्रकार नेमि जिनेन्द्र द्वारा कहा हुआ निर्मल मोक्षमार्ग सुनकर बारह सभाओं फे लोगांने हाथ जोड़कर, भगयान्को नमस्कार किया ॥ ३०६ ।। श्रोताओमें-से कितने ही लोगों- ने सम्यग्दर्शन धारण किया, कितने ही लोगोंने संयमासंयम प्राप्त किया और संसारवास- से उग्नेयाले कितने ही लोगोंने पूर्ण संयम-मुनित्रत स्वीकृत किया ।। ३०७ ॥ उस समय दो हजार राजाओने, यो हजार कन्याओंने एवं हजारों रानियोंने जिनेन्द्र भगवान के द्वारा फ. ए. पूर्ण मंयगको प्राप्त किया ॥ ३०८ ॥ शिवा देयी, रोहिणी, देवकी, रुक्मिणी तथा अन्य देवियोंने भाधकोंका चारित्र स्वीकृत किया ॥ ३०९ ।। यदुकुल और भोजकुलके श्रेष्ठ राजा तथा अनेक मुकुमारियाँ जिनमार्गकी ज्ञाता बन बारह अणुव्रतोंकी धारक हो गयीं ॥३१०॥ जो देयों के साथ पूजा कर चुके थे, ऐसे इन्द्र तथा घलभद्र और कृष्ण आदि यादव, जिनेन्द्र रूपी सूर्यको नमस्कार कर अपने-अपने स्थानपर चले गये ।। ३११ ।। तदनन्तर जो समस्त दिशाओंको उज्ज्वल कर रही है, मेघोंके द्वारा धुले हुए सुन्दर १. स गुतिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरिपहजयचारित्रैः ॥२॥ त० सू० अ०९। २. पन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां सनकर्मविप्रमोदो मोव. ॥ त० सू० अ० १० १ ३. सम्यग्दर्शनुवाणि मोदमान सू०० १ । ४. प्रारपालयो म०। ५. ३०९, ३१०, ३११ तमाः पुसकेऽपि पश्चात् यो जिता सन्ति । ख सन्तिक अष्टपञ्चाशः सर्गः 'बन्धकाजमुसप्तपणंसुरमिप्रत्यप्रणालि मुञ्चन्ती जिनपादयोरुपगता मक्तव लोकनयी ॥३२॥ इत्यरिटनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती श्रीनेमिनाथधर्मोपदेशवर्णनो नाम अष्टपञ्चाशः सर्गः ॥१८॥ आकाशमण्डलको जो निर्मल ग्रहों और ताराओंसे पुप्पित बना रही थी एवं जो धन्धूक, कमल और सप्तपर्णके सुगन्धित नूतन फूलोंकी अञ्जलि छोड़ रही थी ऐसी शरऋतु, भक्तिसे भरी लोकत्रयीके समान जिनेन्द्रदेवके चरणोंके समीप आयी ।। ३१२ ।। इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें श्रीनेमिनाथ भगवान्के घमोपदेशका वर्णन करनेवाला अंठावन सर्ग समाप्त हुआ ॥५८।। १. चन्भूबाज्वमुसप्तपर्ण म०, ख.।

एकोनषष्टितमः सर्गः विहारामिमुखेऽगोग्राजिनेन्द्रेऽवतरिष्यति । स्वर्गाप्रादिव भूलोकं समुदत भवोदधेः ॥१॥ गृयतां गृह्यतां काम्यं यथाकाममिहार्थिमिः । इति नित्यं धनेशेन घुष्यते कामघोषणा ॥२॥ कामदा कामवद्भूमिः कल्प्यते मणिकुटिमा । माल्पविजयोचोगे विभोः किं या न करप्यते ॥३॥ महाभूतानि सर्वाणि भतुर्भूतहितोयमे । सर्वभूतहितानि स्युस्ताको खलु सार्वता ॥४॥ प्रावृषेण्याम्बुधारेव वसुधारा वसुन्धराम् । दिवोऽन्वर्धामिधानरवं नयतीन्यपतस्पयि" ॥५॥ *प्रादुःष्यन्ति सुराः सधः प्रणामचलमौलयः । मासा व्याप्य दिशो म प्रभाकारानुरागिणः ॥६॥ ये द्वे [यद् द्वे] पूर्वोत्तरे पंकी हेमाम्युजसहययोः । साहनपत्रं तत्पूतं भुवः कण्ठे गुणाकृती ॥७॥ पद्मरागमयं मास्वचित्ररत्नविचिनितम् । प्रवृत्तप्रतिपप्रस्थपनामागमनोहरम् ॥८॥ सहसाक्षसहस्राक्षिभृङ्गावलिनिषेवितम् । देवासुरनरालोकमधुपापानमण्डलम् ॥९॥ पद्मोद्भासि परं पुण्यं पद्मयानं प्रकाशते । सद्यो योजनविष्कम्भं तचनुर्मागकर्णिकम् ॥१०॥ महिमाग्रे सुरेशाधमूर्तिस्पष्टगुणश्रियः । वसवोऽटो पुरोभाय वासवं परिवस्यया ॥११॥ अथानन्तर जिस प्रकार पहले संसार-समुद्रसे प्राणियोंको पार करनेके लिए भगवान् स्वर्गके अग्रभागसे पृथिवी लोकपर अवतीर्ण हुए थे, उसी प्रकार जब विहारके लिए सम्मुख हो गिरनार पर्वतके शिखरसे नीचे उतरने के लिए उद्यत हुए तब कुबेरने निरन्तर यह मनचाही घोषणा शुरू कर दी कि जिस याचकको जिस वस्तुकी इच्छा हो वह यहाँ आकर उसे इच्छा- नुसार ले ॥ १-२ ।। उस समय कामधेनुके समान इच्छित पदार्थ प्रदान करनेवाली मणिमयी भूमि बनायी गयी । सो ठीक ही है क्योंकि भगवान के मद्गलमय विजयोद्योगके समय क्या नहीं किया जाता ? अर्थात् सब कुछ किया जाता है ॥ ३॥ जब कि भगवान्का समस्त भूतों- प्राणियोंके हितके लिए उद्यम हो रहा था तब पृथिवी, जल, अग्नि और वायु रूप चार महा भूत भी समस्त भूतों-प्राणियोंके हितकर हो गये सो ठीक ही है. क्योंकि भगवानको सर्व- हितकारिता वैसी ही अनुपम थी॥ ४॥ धनकी बड़ी मोटो धारा वर्षा ऋतुके मेघकी जल- धाराके समान पृथिवीके वसुन्धरा नामको सार्थकता प्राप्त कराती हुई आकाशसे मार्ग में पड़ने लगी॥५॥ प्रणाम करनेसे जिनके मस्तक चञ्चल हो रहे थे तथा जो भगवानको प्रभा और आकारमें अनुराग रखते थे ऐसे देव अपनी कान्तिसे दिशाओंको व्याप्त करते हुए शीघ्र ही प्रकट होने लगे॥६॥ सर्व प्रथम देवोंने एक ऐसे सहस्रदल पवित्र कमलको रचना की जो पूर्व और उत्तरकी ओर स्वर्णमय हजार-हजार कमलोंकी दो पंक्तियाँ धारण करता था तथा वे पंक्तियों ऐसी जान पड़ती थीं मानो पृथिवीरूपी स्त्रीके कण्ठमें पड़ी दो मालाएँ ही हों॥७॥ वह कमल पद्मराग मणियोंसे निर्मित था, देदीप्यमान नाना प्रकारके रत्नोंसे चित्र-विचित्र था, प्रत्येक पत्रपर स्थित लक्ष्मीके भागसे मनोहर था, इन्द्र के हजार नेत्ररूपी भ्रमरावली- से सेवित था, देव धरणेन्द्र और मनुष्योंके नेत्ररूपी भ्रमरोंके लिए मानो मधुगोष्ठीका स्थान था, लक्ष्मीसे सुशोभित था, परम पुण्यरूप था, एक योजन विस्तृत था और उसके चौथाई भाग प्रमाण उसकी कर्णिका-डंठल थी॥ ८-१० ।। यह कमल पायानके नामसे प्रसिद्ध था । सेवाद्वारा इन्द्रको आगे कर आठ वसु उस पद्मयानके आगे-आगे चल रहे थे जो ऐसे जान पड़ते थे मानो इन्द्रके अणिमा, महिमा आदि आठ गुण ही मूर्तिधारी हो चल रहे हों। १. परतापात्-गिरनारशिखरत । २. कर्तुं -म० घ०। ३.-द्यते क० । ४. नयतीति पतत्प क० । ५. प्राइमुख्यन्ति । ६. जयोद्भासि इत्यपि पाठः इति फ• पुस्तकपा लिखितम् ।

एकोनषष्टितमः सर्गः ६९५ जय प्रसीद मस्ते वेला लोकहितोयमे । जातायेत्यानमन्तीश स हि विश्वसृजो विधिः ॥१२॥ ततः प्रक्रमते 'शम्भुरारोपप्रयानकम् । तरक्षणं भूयते भूम्या दृष्टसम्भ्रान्तयापि च ॥१३॥ विजयी विहरत्येष विश्वेशो विश्वभूतये । धर्मचक्रपुरस्सारी त्रिलोको तेन सम्पदा ॥१॥ वर्धता वर्धतां नित्यं निरौतिमरुतामिति । श्रूयतेऽस्यम्बुवानः प्रयाणपटहध्वनिः ॥१५॥ वीणावेणुमृदगोरुमलरीशलकाहलेः । त्यमङ्गलघोषोऽपि पयोधिमधिगर्जति ॥१६॥ सयाक्रोशगीताहासैः कलकलोत्तरः । पावापृथिम्यो प्राप्नोति प्रास्थानिकमहारवः ॥१७॥ वल्गु गायन्ति किसयों नृत्यन्त्यप्सरसो दिवि । स्थान्यातोधमानर्ता गन्धर्वादय इत्यपि ॥१८॥ स्तुवन्ति मङ्गलस्तोत्रैजयमङ्गलपूर्वकैः । तत्र तत्र सता वन्य वन्दिनो नृसुरासुराः ॥१९॥ चिनश्चित्तहरैदिग्यैर्मानुपैश्च समन्ततः । नृत्यसङ्गीतवादिभूतलेऽपि प्रभूयते ॥२०॥ पालयन्ति "सदिग्मार्गलोकपालाः सभूतयः । मनुसेवा हि भृत्यानां स्वाधिकारेषु सुस्थितिः ॥२१॥ भावन्ति परितो देवा केचिद्रामुरदर्शनाः । हिंसयो ज्यायसः सर्वानुत्सार्योत्सार्य दूरतः ।।२२।। उदस्तैरनवलयैर्वीचिहस्तैः कृताञ्जलिः । म प्रीतस्तदोदन्वान्वेलामूर्ना नमस्यति ॥२३॥ वे वसु यह कहते हुए भगवानको प्रणाम करते जा रहे थे कि हे भगवन् ! आप जयवन्त हों, प्रसन्न होइए, लोकहितके लिए उद्यम करनेका आज समय आया है। यथार्थमें वह सब भगवान्का माहात्म्य था ॥११-१२ ।। तदनन्तर उस पद्मयानपर भगवान् जिनेन्द्र आरूढ़ हुए थे और उस समय पृथिवी हर्षसे झूमती हुई-सी जान पड़ती थी ।। १३ ।। उस समय मेघों- के शब्दको पराजित करनेवाला देव-दुन्दुभियोंका यह प्रयाणकालिक शब्द सुनायी पड़ रहा था कि धर्मचक्रको आगे-आगे चलानेवाले ये जगत्के स्वामी विजयी भगवान सब जीवोंके वैभवके लिए विहार कर रहे हैं। इनके इस विहारसे तीन लोकके जीव सम्पत्तिसे वृद्धिको प्राप्त हों अर्थात् सबकी सम्पदा वृद्धिंगत हो, और सब अतिवृष्टि आदि ईतियोंसे रहित हों ॥१४-१५ ।। उस समय वीणा, बाँसुरी, मृदङ्ग, विशाल झालर, शङ्ख और काहलके शन्दसे युक्त तुरहीका मङ्गलमय शब्द भी समुद्रको गर्जनाको तिरस्कृत कर रहा था ॥ १६ ॥ प्रस्थान कालमें होनेवाला बहुत भारी शब्द, उत्तम कथा, चिल्लाहट, गीत, अट्टहास तथा अन्य कल-कल शन्दोंसे आकाश और पृथिवीके अन्तरालको व्याप्त कर रहा था ।। १७ । आकाशमें किन्नरियाँ मनोहर गान गातो थी, अप्सराएँ नृत्य करती थीं, झूमते हुए गन्धर्व आदि देव तबला बजा रहे थे और नमस्कार करते हुए मनुष्य, मुर तथा असुर, सज्जनोंके द्वारा वन्दनीय भगवान्को नमस्कार करते हुए जय-जयको मङ्गलध्वनिपूर्वक मगलमय स्तोत्रोंसे जहाँ-तहाँ उनकी स्तुति कर रहे थे ।। १८-१९ ॥ पृथिवीतलपर भी सब ओर मनुष्य चित्तको हरनेवाले नाना प्रकारके दिव्य नृत्य, संगीत और वादित्रोंसे युक्त हो रहे थे ॥ २०॥ विभूतियोंसे सहित लोकपाल समस्त दिग्भागोंके साथ सबकी रक्षा कर रहे थे। सो ठीक ही है क्योंकि अपने-अपने नियोगों- पर अच्छी तरह स्थित रहना ही भृत्योंकी स्वामि-सेवा है ।। २१॥ देदीप्यमान दृष्टिके धारक कितने ही देव समस्त हिंसक जीवोंको दूर खदेड़कर चारों ओर दौड़ रहे थे।। २२ ।। उस समय प्रसन्नतासे भरा समुद्र, रत्नरूप वलयोंसे सुशोभित ऊपर उठे हुए तरङ्गरूपी हाथोंसे १. क०, ख०, ग०, ५०, १०, सर्वपुस्तकेयु 'सिन्धुगरोद्ध' इति पाठो विद्यते, परं तस्यार्थसंगतिर्न प्रतिभाति । अतः मैसूरस्थित-प्राच्यविद्यासशोधनमन्दिरस्थितपुस्तके समुपलन्धः 'शम्भुरारोदु' इति पाठः स्वीकृत । अत्र शम्भुपटं मिनेन्द्रवाचकम् । २. दिए ग०, ७०, इष्ट म०, ० । 'इष्टसभ्रान्तयापि च' इति पाठोऽपि मैसूरस्थितपुस्तके समुपलन्धः । ३. विभये क०,४०, म | ४. विचरत्येष कः । ५. दिवः- पृथिव्यौ म०, क०, इ.1 ६. प्ररपानीकमारव. म०। ७. पल्गु म । ९ वन्दिता म० । १०. प्रभूतये म० 1 ११. सदिग्नागे-म० । १२. हिंसापापीयसः । हिसयान्वयि सर्वाक। - ८. मानार्ता म०, ०,१० हरिवंशपुराणे 'विलम्बितसहस्रार्कयुगपत्पतनोदयः । नमतामन्दितालोकनामोशामः पदे पदे ॥२४॥ सुराणां भूतलस्पशिमकुटैबहुकोटिमिः । भूः पुरःसोपहारेव शोभतेऽम्वुजकोटिमिः ॥२५॥ लौकान्तिकाः पुरो यान्ति लोकान्तन्यापितेजसः । लोकेशस्य यथालोकाः पुरोगा मूर्तिसम्मगः ॥२६॥ पद्मा सरस्वतीयुना परिवारात्तमङ्गला । पद्महस्ता पुरो याति परीत्य परमेश्वरम् ।।२७।। 'प्रसीदेत इतो देवेत्यानम्य प्रकृताञ्जलिः । तद्भूमिपतिमिः साधं पुरो याति पुरन्दरः ॥२८॥ एवमीश खिलोकेशपरिवारपरिष्कृतः । लोकानां भूतये भूतिमुद्दहन् सार्वलौकिकीम् ।।२९॥ पद्मकेतुः पविनामा परमं पद्मयानकम् । भव्यपद्मकसद्वन्धुर्यदारोहति तत्क्षणात् ॥३०॥ जय नाथ जय ज्येष्ठ जय लोकपितामह । जयात्मभूर्जयात्मैश जय देव जयाच्युत ॥३॥ जय सर्वजगद्वन्धो जय सद्धर्मनायक । जय सर्वशरण्यश्रीजय पुण्यजयोत्तम ॥३२।। *इत्युदोर्णसुकृयोषो रुन्धानो रोदसी स्फुटः । 'जयत्युच्चोऽतिगम्भीरो घनापनधनवनिः ॥३३॥ अञ्जलि बाँध कर वेलारूपी मस्तकसे मानो भगवान्के लिए नमस्कार ही कर रहा था ॥२३॥ उस समय डग-डग पर भगवानको नमस्कार करनेवाले देवोंके करोड़ों देदीप्यमान मुकुटोंका बहुत भारी प्रकाश बार-बार नीचेको झुकता और बार-बार ऊपरको उठता था । उससे ऐसा जान पड़ता था मानो हजारों सूर्योका एक साथ पतन तथा उदय हो रहा हो। उन्हीं देवोंके जव करोड़ों मुकुट पृथिवीतलका स्पर्श करते थे तव भगवान्के आगेकी भूमि ऐसी सुशोभित होने लगती थी मानो उसपर करोड़ों कमलोंकी भेंट ही चढायी गयी हो।।२४-२५ ।। जिनका तेज लोकके अन्त तक व्याप्त था, ऐसे लौकान्तिक देव भगवानके आगे-आगे चल रहे थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो लोकके स्वामी भगवान् जिनेन्द्रका प्रकाश ही मूर्ति- धारी हो आगे आगे गमन कर रहा था ।। २६ ।। जिनके परिवारको देवियोंने मगल द्रव्य धारण कर रखे थे, तथा जिनके हाथोंमें स्वयं कमल विद्यमान थे, ऐसी पझा और सरस्वती देवी, भगवानकी प्रदक्षिणा देकर उनके आगे-आगे चल रही थीं ॥ २७ ॥ 'हे देव ! इधर प्रसन्न होइए, इधर प्रसन्न होइए।' इस प्रकार नमस्कार कर जिसने अञ्जलि वाँध रखी थी ऐसा इन्द्र, तद्-तद् भूमिपतियोंके साथ भगवान्के आगे-आगे चल रहा था ॥२८॥ इस प्रकार जो तीनों लोकोंके इन्द्र तथा उनके परिवारसे घिरे हुए थे, लोगोंकी विभूति के लिए जो समस्त लोकको विभूतिको धारण कर रहे थे, जो कमलको पताकासे सहित थे, जिनकी आत्मा अत्यन्त पवित्र थी, और जो भव्य जीवरूपी कमलोंको विकसित करनेके लिए उत्तम सूर्यके समान थे, ऐसे भगवान नेमि जिनेन्द्र जिस समय उस पद्मयानपर आरूढ हुए उसी समय देवोंने मेघगर्जनाके समान यह शब्द करना शुरू कर दिया कि हे नाथ ! आपकी जय हो, हे ज्येष्ठ ! आपकी जय हो, हे लोकपितामह ! आपकी जय हो, हे आत्मभू! आपकी जय हो, हे आत्मेश ! आपकी जय हो, हे देव ! आपकी जय हो, हे अच्युत ! आपकी जय हो। हे समस्त जगत्के वन्धु ! आपको जय हो, हे समीचीन धर्मके स्वामी ! आपकी जय हो, हे सबके शरणभूत लक्ष्मीके धारक ! आपकी जय हो, हे पुण्य रूप ! आपकी जय हो, हे उत्तम ! आपकी जय हो । इस प्रकार उठा हुआ पुण्यात्मा जनोंका जोरदार, अत्यन्त गम्भीर एवं मेघ गर्जनाकी तुलना करनेवाला वह शब्द आकाश और पृथिवीके अन्तरालको व्यान करता हुआ अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥२९-३३ ।। १. इलयोरभेदात् विलस्वितपदेन विडम्बितस्य ग्रहणम् । २. पतनोदयोः म । ३. नन्दितस्य समृद्धस्य आलोकस्य नामोन्नामे । ४. शूराणाम् म०। ५. लोकान्तस्थापितै-म०। ६. प्रसीदेति द्रुतो देवे का । ७. इत्युदीसिद्घोष म.1 ८. जयत्युच्चेति- म० । ।

एकोनपष्टितमः सर्गः स देवः सर्वदेवेन्द्रध्याहृतालोकमङ्गलः । तन्मालिभ्रमरालीदभ्रम-पादपयोरहः ॥३४॥ तस्पयोरहवासिन्या पद्मयानन्दयनगन् । व्यहरत् परमोद्भतिर्भूतानामनुकमया ॥३५॥ देवमार्गास्थिते दिव्ये विन्यवान पदाम्बुजम् । स्वच्छाम्मोवाहमुखाम्मोजप्रतिविम्वधिणि प्रभुः।।३६ उद्यतस्तस्य लोकार्य राजराजः पुरस्परः । राजते राजयन्मार्ग पुरोमानोर्ययारुणः ॥३७॥ पदवी जानरूपाङ्गी रफुरन्मणिविभूषणा । श्लाघते मा मती भत्रे स्वम मामिनी यथा ॥३८॥ परितः परिमार्जन्ति मरुनो मधुररणः । भवदातक्रियायोगः स्त्रां वृत्ति साधबो यथा ॥३९॥ अभ्युक्षन्ति मुरास्तत्र गन्धाम्मोऽम्बुवाहनाः । स्फुरत्सौदामिनीदीप्तिभासितानिलदिङ्मुखाः ॥४०॥ मन्दारकुमुमैमनभ्रमभ्रमरचुम्वितैः । नन्यते मुरमहातैमार्गो मार्गविदुधमे ॥४॥ ज्योतिमण्डलसंकाश: सौवर्णरममण्डलः । सुलग्नः गोमते मार्गो रग्नचूर्णतलाचिन. ॥४२॥ गुह्यकाश्चित्रपत्राणि चिन्वते कौडमै रमः । "चित्रकर्मज्ञतां चित्रां स्वामाचिस्यासो, यथा ॥४३॥ कदलीनालिफेराक्रमुकायैः क्रमस्थित । "सपत्रैमागसीमापि रम्याऽऽरामायते द्वयी ॥४४॥ । तदनन्तर समस्त दन्द्र जिनके जय-जयकार और मगल शब्दोंका उचारण कर रहे थे, जिनके चलते हुए चरणकमल उन इन्द्रोंके मुकुटरूपी भ्रमरोंसे व्याप्त थे, जो उन कमलों में निवास करनेवाली लक्ष्मीसे समस्त जगन्को आनन्दित कर रहे थे, और जो अत्यन्त उत्कृष्ट विभूतिके धारक थे, ऐसे भगवान् नेमि जिनेन्द्र जीयोंपर दया कर विहार करने लगे।३४-३५।। वे प्रमु , आकाशमें, स्वच्छ जलके भीतर पड़ते हुए मुख-कमलके प्रतिविम्बकी शोभाको धारण करनेवाले दिव्य कमलपर अपने चरणकमल रख कर विहार कर रहे थे ॥३६ ।। उस समय भगवान के दर्शन करनेके लिए उद्यत एवं उनके आगे-आगे चलनेवाला कुबेर मार्गको मुमो- भित करता हुआ ऐमा जान पड़ता था जैसा सूर्यके आगे चलना हुआ उसका सारथि अरुण हो। ३७ ।। भगवानके विहारका वह मार्ग सुवर्णमय था एवं देदीप्यमान मणियोंके आभूषण- से सहित था। इसलिए अपने पति के लिए स्थित, सुवर्णमय शरीरको धारक एवं देदीप्यमान मणियोंके आभूषणोंसे सुशोभित पतिव्रता स्त्रीके समान प्रशंसनीय था ।। ३८ ॥ जिम प्रकार मुनिगण निर्मल क्रियाओंसे अपनी वृत्तिको मदा साफ करते रहते हैं-निर्दोष बनाये रखते हैं उसी प्रकार पवनकुमार देव वायुके मन्द-मन्द झोंकोंसे उम मार्गको साफ बनाये रयते थे ।। ३९ ।। कीदती हुई बिजलीकी चमकसे ममस्त दिशाओंके अग्रभागको प्रकाशित करनेवाले मेघवाहन देव उस मार्गमें मुगन्धित जल सींचते जाते थे ॥४०॥ मोममार्गके ज्ञाता भग- वानके बिहारकालमें, देवोंके समूह, जिनपर मदोन्मत्त भारे मँडरा रहे थे ऐसे मन्दार पृषके पुष्पोंसे मार्गको सुशोभित कर रहे थे ।। ४१ ॥ यह मार्ग, गले हुए सोने के रमके उन मण्डलोंसे जिनके कि तलमाग रत्नोंके चूर्गसे व्यान ये एवं नमत्रोंके ममूहफे समान जान पड़ते थे, अनिशय मुशोभित हो रहा था॥ ४२ ॥ गुहपक जानिके देव केशरके रममे नाना प्रकारफे घेल-यूट बनाते जाते थे मानो ये अपनी चित्रकर्मको नाना प्रकारको मुसालनाको ही प्रस्ट करना चाहते थे ।। ४३ ॥ मार्गके दोनों ओरकी मीमाएँ प्रमपूर्वक गड़े किये हुए पत्रोंसे युक्त फेला, नारियल, इंग तथा गुपारी आदिके मासे मुन्दर बगीचोंके ममान जान पड़तों १. माहतालोक म०.१०। २. विपत् ...। ३. सन्हामोरन्-म.। ४. भितिक., यमु.स.। ५. गवगरसर म.। मनोहरप्रेरणे । अ. याहन: म। ८. चलोनि. मा, दबञ्चितः १०९, कुमैः म• 1 १..चित्रमाणाम् मा, म... । ११. चिदासी पया म., प., ग.।१२. सम्पने-म, ग्व...।

हरिवंशपुराणे 'विलम्बितसहस्राकयुगपत्पतनोदयः । नमतानन्दितालोकनामोग्रामः पदे पदे ॥२४॥ सुराणां भूतलस्पर्शिमकुवंहुकोटिमिः । भूः पुरःसोपहारेव शोमतेऽम्बुजकोटिमिः ॥२५॥ लोकान्तिकाः पुरी यान्ति लोकान्तम्यापिवेजसः । लोकेशस्य यथालोकाः पुरोगा मूर्तिमम्मवाः ॥२६॥ पमा सरस्वतीयुक्ता परिवारात्तमङ्गला । पमहस्ता पुरो याति परोग्य परमेश्वरम् ।।२०।। 'प्रमादेत इनो देवेश्यानम्य प्रकृताञ्जलिः । तद्भूमिपतिमिः साधं पुरो याति पुरन्दरः ॥२४॥ एवमीशस्त्रिलोकेशपरिवारपरिष्कृतः । लोकानां भूतये भूतिमुद्रहन सावलौकिकीम् ॥२९॥ पद्मकेनुः पवित्रामा परमं पद्मयानकम् । मन्यपकमबन्धुर्यदारोहति तरक्षणात् ॥३०॥ जय नाथ जय ज्येष्ट जय लोकपितामह । जयारमभूजयारमेश जय देव जयाच्युत ॥३॥ जय सर्वजगद्वन्धी जय सद्धर्मनायक । जय सर्वशरण्यश्रीजय पुण्यजयोत्तम ॥३२॥ "इन्युदीर्णसुकृद्घोपो रन्धानो रोदसी स्फुटः । 'जयत्युच्चोऽतिगम्भीरो घनाघनघनध्वनिः ॥३३॥ अञ्जलि बॉध कर वेलारूपी मस्तकसे मानो भगवान्के लिए नमस्कार ही कर रहा था ।।२३।। उस समय डग-डग पर भगवान्को नमस्कार करनेवाले देवोंके करोड़ों देदीप्यमान मुकुटोंका बहुत भारी प्रकाश वार-बार नीचेको झुकताऔर वार-चार ऊपरको उठता था । उससे ऐसा जान पड़ता था मानो हजारों सूर्योका एक साथ पतन तथा उदय हो रहा हो । उन्हीं देवोंके जव करोड़ों मुकुट पृथिवीतलका स्पर्श करते थे तब भगवानके आगेकी भूमि ऐसी सुशोभित होने लगती थी मानो उसपर करोड़ों कमलोंकी भेंट ही चढ़ायी गयी हो ।।२४-२५ ।। जिनका तेज लोकके अन्त तक व्याप्त था, ऐसे लोकान्तिक देव भगवानके आगे-आगे चल रहे थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो लोकके स्वामी भगवान् जिनेन्द्रका प्रकाश ही मूर्ति- घारी हो आगे-आगे गमन कर रहा था॥ २६॥ जिनके परिवारको देवियोंने मगल द्रव्य धारण कर रखे थे, तथा जिनके हाथों में स्वयं कमल विद्यमान थे, ऐसी पद्मा और सरस्वती देवी, भगवानकी प्रदक्षिणा देकर उनके आगे-आगे चल रही थीं ॥२७ ।। 'हे देव ! इधर प्रसन्न होइए, इधर प्रसन्न होइए।' इस प्रकार नमस्कार कर जिसने अञ्जलि बाँध रखी थी ऐसा इन्द्र, तद्-तद् भूमिपतियोंके साथ भगवान्के आगे-आगे चल रहा था ॥२८॥ इस प्रकार जो तीनों लोकोंके इन्द्र तथा उनके परिवारसे घिरे हुए थे, लोगोंकी विभूति के लिए जो समस्त लोकको विभूलिको धारण कर रहे थे, जो कमलकी पताकासे सहित थे, जिनकी आत्मा अत्यन्त पवित्र थी, और जो भव्य जीवरूपी कमलोंको विकसित करनेके लिए उत्तम सूर्यके समान थे, ऐसे भगवान नेमि जिनेन्द्र जिस समय उस पद्मयानपर आरूढ हुए उसी समय देवोंने मेघ गर्जनाके समान यह शब्द करना शुरू कर दिया कि हे नाथ! आपकी जय हो, हे ज्येष्ठ! आपकी जय हो, हे लोकपितामह ! आपकी जय हो, हे आत्मभू! आपकी जय हो, हे आत्मेश ! आपकी जय हो, हे देव ! आपकी जय हो, हे अच्युत ! आपकी 'जय हो। हे समस्त जगत्के वन्धु ! आपको जय हो, हे समीचीन धर्मके स्वामी! आपकी जय हो, हे सबके शरणभूत लक्ष्मीके धारक ! आपकी जय हो, हे पुण्य रूप ! आपकी जय हो, हे उत्तम ! आपको जय हो। इस प्रकार उठा हुआ पुण्यात्मा जनोंका जोरदार, अत्यन्त गम्भीर एवं मेघगर्जनाकी तुलना करनेवाला वह शब्द आकाश और पृथिवीके अन्तरालको व्याप्त करता हुआ अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ।। २९-३३ ॥ १. इलयोरभेदात् विम्बितपदेन विम्बितस्य ग्रहणम् । २. पतनोदयोः म ०३. नन्दितस्य समृद्धस्य आलोकस्य नामोनामैः । ४. शराणाम् म०। ५. लोकान्तस्यापित-म०। ६. प्रसीदेति द्रुतो देवे 2०1 ७. प्रत्युटोसकृद्घोष. म. ।। ८. बयत्युच्चेति- म० । -- एकोनपष्टितमः सर्गः म देवः सर्वदेवेन्द्रव्याहनालोकमङ्गलः । तन्मीलिभमरालीउधमपाइपयोरहः ॥३॥ तस्पयोरहवासिन्या पमयानन्दयभगत् । ष्यहरन् परमोद्भनिभूतानामनुकमया ॥३५॥ देवमार्गस्थिते दिव्ये विन्यन्याम् पदाम्बुजम् । स्पच्छाम्मोगमुग्णाम्मीजप्रतिनिधिणि प्रभुः।।३६॥ उद्यतस्तस्य लोकार्थ राजराजः पुरस्मरः । राजते राजयन्मार्ग पुरोमानीयंथाहणः ॥३७॥ पदवी जानरूपाङ्गी रफुरन्मणिविभूषणा । श्लाघते सा मती मने समय मामिनी पथा ॥३८।। परितः परिमार्जन्ति मरतो मधुरेरणः । अपदानक्रियायोगः स्या पनि माधयो यथा ॥३९।। अभ्युक्षन्ति सुरास्तत्र गन्धाम्मोऽम्बुदवाहनाः । स्फुररमादामिनीदीप्तिभामिनापिदिदगुग्गः ॥१०॥ मन्दारकुमुमैमत्तभ्रमभ्रमरचुम्यितैः । नन्यते मुरमहानर्मा! मागंधिदुयमे ॥४॥ ज्योतिमण्डलसंकाश: मावर्णरममण्डलः । मुलग्नः गोमतं मागी रनचूर्णतलाचित. ॥४॥ गुह्यकाश्चित्रपाणि चिन्वते कौमै रस: । "चियकमजतो चिया स्वामाघिण्यागयों यथा ॥४३॥ कदलीनालिकराक्रमुकाद्यः क्रमस्थिते. । "सपनेमागसीमापि रम्यारामायत यी ॥१४॥ तदनन्तर समस्त इन्द्र जिनके जय-जयकार और मगल शब्दोंका उशारण कर रहे थे, जिनके चलते हुए चरणकमल उन इन्द्रोंके मुकुटरूपी भ्रमरोंसे व्याम थे, जो उन फमलीम निवास करनेवाली लक्ष्मीसे समस्त जगन्को आनन्दित कर रहे थे, और जो अत्यन्त उयष्ट विभूनिक धारक थे, ऐसे भगवान नेमि जिनेन्द्र जीवापर दया कर विहार करने लगे। ३४-३५॥ वे प्रमु, आकाशमें, स्वच्छ जलके भीतर पड़ते हुए मुग्य-कमलके प्रतिबिम्यकी शोमाको धारण फरनेवाले दिव्य कमलपर अपने चरणकमल ग्ब कर बिहार कर रहे थे । ३६ ।। उस समय भगयानके दर्शन करनेके लिए उद्यत एवं उनके आगे-आगे चलनेयाला फुघेर मार्गको मुमो- भिन करता हुआ पेमा जान पड़ना था जैमा सूर्यके आगे चलता हुआ टमका माथि अरुण हो ।। ३७ ।। भगवान्के विहारका वह मार्ग सुवर्णमय था एवं देदीप्यमान मगियोंके आभूगण- से महिन था। इमलिए अपने पनिफे लिए स्थित, सुवर्णमय शरीरको धारक एवं देदीप्यमान मणियोंके आभूषणोंसे मुशोभित पनियता स्त्री ममान प्रशंसनीय था।॥ ३८ ॥ जिम प्रकार मुनिगम निर्मल क्रियाओंसे अपनी निको मदा माफ करते रहते-निर्दोष पनाये रम्पते है उसी प्रकार पवनकुमार देव यायु मन्द-मन्द सोमे उम मार्गको माफ यनाये रमने ये ।। ३९. ।। कौंदती हुई बिजलीकी चमकमे ममन्न दिशाओयः अप्रमागो प्रकाशित करनेवाले अपवाहन देव उम मार्ग, मुगन्धित जल मोचने जाते थे ॥ ४० ॥ मोनमार्ग माता भग. वार विहारकालमें, देवा ममूह, जिनपर मदोन्मन भार मेंडग रहे ये पग मन्दार पृषक पुगेमे मार्गको मुंगोभिन कर रहे थे। ४१ ।। यह मार्ग, गहुए मानेके ग्मो टन मण्डलाये जिनके कि नलमाग ग्लॉके पूर्ण व्यान थे एयं ना कि ममूहके ममान जान पड़ते थे, अनिमय मुशोमिन हो रहा या ॥ ॥ गुरुगर जानिये देय कारक ग्ममे नाना प्रकारे येट-बूटे बनाने जाते थे मानो ये अपनी नियमको नाना प्रकारका युझरनाको हो प्रकट करना चाहते थे ॥ १३ ॥ मार्गके दोनों ओग्यो मामा, मयंक गई फिय दुम पत्रों में पुग्न केला, नारियल, ईय नया मुगर्ग आदि गांगे मुन्दर बगीचों ममान जान पड़नी 1.न:1 ८.रं वित: मा, १. मा....। २. दिन: ममेर- म. । ४. मिति, निम... गगन ! मगर । १९.६०।१०.वि.,....रिपोर मा. ...-..:.॥

६९८ हरिवंशपुराणे तन्नाक्रीटपदानि स्युः मुन्दराणि निरन्तरम् । यत्र 'हृष्टाः स्वकान्ताभिराम्रोड्यन्ते नरामराः ॥४५॥ भोग्यान्यपि यथाकामं भोगिनां मोगभूमिवत् । सर्वाण्यन्यूनभूतीनि संमवन्त्यन्तरऽन्तरे ॥४६॥ योजनत्रयविस्तारो मार्गो मार्गान्तयोईयोः । सीमानौ द्वे अपि'नेये गव्यूतिद्वयविस्तृते ॥४७॥ तोरणः शोभते मार्गः करणैरिव कल्पितः । दृष्टिगोचरसम्पन्नैः सौवर्णरष्टमङ्गलैः ॥१८॥ कामशाला विशाला. स्यु कामदास्तत्र तत्र च । भागवत्यो यथा मूर्ताः कामदा दानशक्तयः ।।४९|| तोरणान्तरभूतुगसमस्तकदलीध्वजैः । संछन्नोऽध्वा घनच्छायो रणद्धि सवितुश्छविम् 1.0॥ वनवासिसुरर्वन्यमञ्जरीपुञ्जपिञ्जर । स्वपुण्यप्रचयाकारः कल्प्यते पुष्पमण्डपः ॥५१॥ युक्तो रत्नलताचित्रभित्तिभिः सद्वियोजनः । चन्द्रादित्यप्रभारोचिर्मण्डलोपान्तमण्डितः ॥५२॥ घण्टिकावलनिर्दैि घण्टानादैनिनादयन् । दिशो मुनागुणामुनप्रान्तमध्यान्तरान्तरः ॥५३॥ सद्गन्धाकृष्टसम्भ्रान्तभृङ्गमालोलसद्युतिः । चियतीशयशोमूर्तवितानच्छविरीक्ष्यते ॥५४॥ , "मोत्तम्मस्तम्मसङ्कागः स्थूलमुक्तागुणोद्भवैः । चतुमिममिति विमान्तान्तराचितैः ॥५॥ तस्यान्तस्थो दयामूर्तिः प्रयाति दमिताहितः । हिताय सर्वलोकस्य स्वयमीशः स्वयंप्रमः ।।५६।। थीं ॥ ४४ ॥ मार्ग निरन्तर सुन्दर क्रीड़ाके स्थान बने हुए थे जिनमें हपैसे भरे मनुष्य और देव अपनी स्त्रियोंके साथ नाना प्रकारकी क्रीड़ा करते थे ॥ ४५ ॥ जिस प्रकार भोग-भूमिमें भोगी जीवोंको इच्छानुसार भोग्य वस्तुएँ प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार उस मार्गमें भी, बीच-बीच- में भोगी जीवोंको उत्कृष्ट विभूतिसे युक्त सब प्रकारकी भोग्य वस्तुएँ प्राप्त होती रहती थीं ॥ ४६॥ भगवान्के विहारका वह मार्ग तीन योजन चौड़ा बनाया गया था तथा मार्गके दोनों ओरकी सीमाएँ दो-दो कोस चौड़ी थी ॥४७॥ वह मार्ग, जगह-जगह निर्मित तोरणों तथा दृष्टिमे आनेवाले सुवर्णमय अष्टमङ्गलद्रव्योंसे ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो इन्द्रियोंसे ही मुशोभित हो रहा हो ।। ४८ ॥ मार्ग में जगह-जगह भोगियोंको इच्छानुसार पदार्थ देने वाली बड़ी-बड़ी कामशालाएँ बनी हुई थीं जो ऐसी जान पड़ती थीं मानो इच्छानुसार पदार्थ देनेवाली भगवानकी मूर्तिमती दानशक्तियाँ ही हों ।। ४९ ॥ तोरणोंको मध्यभूमिमें जो ऊँचे- ऊँचे केलेके वृक्ष तथा ध्वजाएँ लगी हुई थीं उनसे आच्छादित हुआ मार्ग इतनी सघन छाया- से युक्त हो गया था कि वह सूर्यको छविको भी रोकने लगा था॥ ५० ॥ वनके निवासी देवोंने वनकी मञ्जरियोंके समूहसे पीला-पोला दिखनेवाला पुष्पमण्डप तैयार किया था जो उनके अपने पुण्यके समूहके समान जान पड़ता है ।। ५१ ॥ वह पुष्पमण्डप रत्नमयी लताओं- के चित्रोंसे सुशोभित दीयालोंसे युक्त था, दो योजन विस्तारवाला था, चन्द्रमा और सूर्यको प्रभाके कान्तिमण्डलसे समीपमें सुशोभित था, छोटी-छोटी घण्टियोंकी रुनझुन और घण्टाओं- के नादसे दिशाओंको शब्दायमान कर रहा था, उसके दोनों छोर तथा मध्यका अन्तर मोतियों को मालाओंसे युक्त था, उत्तम गन्धसे आकर्पित हो सब ओर मॅडराते हुए भ्रमरोंके समूहसे उसकी कान्ति उल्लसिन हो रही थी, आकाशमें उसका चॅ देवा भगवानके मूर्तिक यशके समान दिसायी देना था, उम मण्डपके चारो कोनोंमें ऊँचे खड़े किये हुए खम्भोंके समान सुशोभित, बड़े-बड़े मोतियोंसे निर्मित तथा बीच-बीचमें मूंगाओंसे खचित चार मालाएँ लटक रही थीं उनसे वह अधिक मुशोभित हो रहा था। दयाकी मूर्ति, अहितका दमन करनेवाले, स्वयं ईश एवं स्वयं देदीप्यमान भगवान् नेमि जिनेन्द्र उस मण्डपके मध्यमें स्थित हो समस्त १. दान० २ साएपन्नभूतानि स० । ३ सीमानौ दावपि शेयी क०, ख०, ३० । ४. कारण म. 1 गभूतिदयविस्तृती म०, १०, १०, खः । ५. घटिकाकलनिहांदी म०। ६. मुत्तागुणामुक्तं प्रान्तमध्या- न्ततान्न: म०। ७ स्योनम्मरसम्भ-म०। ८-तगविले क.। ६. यिवाहित. म० ।

६५९ एकोनषष्टितमः सर्गः पश्यन्यात्मभवान् सवें सप्त सप्त परापरान् । यत्र तमामतेऽत्यक पश्चाद्भामण्डलं प्रमोः ॥५॥ 'त्रिलोकीवान्तसारामात्युपर्युपरि निर्मला । त्रिच्छनी सा जिनेन्द्रश्रीचैलोक्येशिवशंसिनी ॥८॥ चामरायमितो भान्ति सहस्राणि दमेश्वरम् । स्वयंवीज्यानि शैलेन्द्र हंसा इव नमस्तले ॥१९॥ ऋषयोऽनुप्रजन्तीशं स्वर्गिणः परिवृण्वते । प्रतीहारः पुरो याति वासना वसुमिः सह ॥६॥ ततः केवललक्ष्मीतः प्रतिपद्या प्रकाशते । सा शच्या त्रिलोकोरुभूतिलक्ष्मीः समगला ॥६॥ श्रीसनाथस्ततः सर्वैर्भूयते पूर्णमङ्गलः । मङ्गलस्य हि मागल्या यात्रा महलपूर्षिका ।।६२।। रासपनो ज्वलन्मौलिसार्थीयो सत्वकामदौ । निधिभूनी प्रवर्तेते हेमरवप्रवपिणी ॥६३॥ मास्वस्फणामणिज्योतिर्दीपिका भान्ति पन्नगाः । हतान्धनमसज्ञानदीपदीप्त्यनुकारिणः ॥६४॥ विश्वे वैश्वानरा यान्ति 'धृतधूपघटीद्धताः । यद्गन्धो याति लोकान्तं जिनगन्धस्य मूचक. ॥६५॥ सौम्याग्नेयगुणा देवभक्ताः सोमदिवाकराः । स्वप्रभामण्डलादर्शमङ्गलानि वहन्त्यहो ॥६६॥ तानीयमयश्नमस्तपनरोधिभिः । तपनरेव सर्वत्र संद्धमिव दृश्यते ॥६॥ जीवोंके हित के लिए विहार कर रहे थे ॥ ५२-५६ ॥ उसी पुष्पमण्डपमें भगवान्के पीछे सूर्यको पराजित करनेवाला भामण्डल सुशोभित होता था जिसमें सब जीव अपने आगे-पीछेके सात-सात भव देखते हैं ।। ५७ ॥ भगवान के शिरपर ऊपर-ऊपर अत्यन्त निर्मल तीन छत्र सुशोभित हो रहे थे जिनमें तीनों लोकोंके द्वारा सार तत्त्व प्रकट किया गया था और उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो वह जिनेन्द्र भग- वानकी लक्ष्मी तीन लोकके स्वामित्वको सूचित ही कर रही थी ।। ५८ ।। भगवान के चारों ओर अपने-आप दुलनेयाले हजारों चमर ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे आकाशत्तलमें मेक पर्वतके चारों ओर हंस सुशोभित होते हैं ।। ५९ ॥ ऋपिगण भगवान के पीछे-पीछे चल रहे थे, देव उन्हें घेरे हुए थे और इन्द्र प्रतिहार वन कर आठ वसुओंके साथ भगवानके आगे-आगे चलता था ।। ६० ॥ इन्द्र के आगे तीन लोककी उत्कृष्ट विभूतिसे युक्त लक्ष्मी नामक देवी, मङ्गलद्रव्य लिये शची देवोके साथ-साथ जा रही थी और वह केवलज्ञानरूपी लक्ष्मीके प्रतिबिम्बके समान जान पड़ती थी॥ ६१॥ तदनन्तर श्रीदेवीसे सहित समस्त एवं परिपूर्ण- मङ्गलद्रव्य विद्यमान थे सो ठीक ही है क्योंकि मङ्गलमय भगवान्की मङ्गलमय यात्रा मङ्गल- द्रव्योंसे युक्त होती ही है ।। ६२ ॥ उनके आगे, जिनपर देदीप्यमान मुकुटके धारक प्रमुख देव बैठे थे ऐसी शक और पद्म नामक दो निधियाँ चलती थीं। ये निधियाँ समस्त जीवोंको इच्छित वस्तुएँ प्रदान करनेवाली थीं तथा सुवर्ण और रत्नोंकी वर्षा करती जाती थीं ॥६३ ।। उनके आगे फणाओंपर चमकते हुए मणियोंको किरणरूप दीपकोंसे युक्त नागकुमार जातिके देव चलते थे और वे अज्ञानान्धकारको नष्ट करनेवाले केवलज्ञानरूपी दीपककी दीपिका अनुकरण करते हुए-से जान पड़ते थे ॥ ६४ ॥ उनके आगे धूपवटोंको धारण करनेवाले समरत अग्निकुमार देव चल रहे थे। उन धूपघटोंकी गन्ध लोकके अन्न तक फैल रही थी और यह जिनेन्द्र भगवान्की गन्धको सूचित कर रही थी।। ६५ ।। तदनन्तर शान्त और तेज रूप गुण- को धारण करनेवाले, भगवान्के भक्त, चन्द्र और सूर्य जातिके देय अपनी प्रभाके समूहरूप मगलमय दर्पणके धारण करते हुए चल रहे थे। ६६ ।। उस समय संतापके रोकने के लिए मुवर्णमय छत्र लगाये गये थे, उनसे सर्वत्र एसा जान पड़ता था मानो आकाश सूर्यासे ही - १.जिलोकोरावसारा-क। २. प्रयागा वाणाम् समाहारः विद्धनी। ३. विषयो प। ४. प्रतिपद्या ख० प्रतिप्राज्या का । ५. साऊं सन्या विलोपोभूतिलक्ष्मी १० । ६. धूनधूनस्टोरता. म० । ७. मगरादर्शमङ्गलानि क., ड. १८ तपनीयरेय म०, ख०,४० ।

७.. हरिवंशपुराणे पताकाहस्तविक्षेपैः संतज्यं परवादिनः । दयामूर्ता इवैशांसा नृत्यन्ति जयकेतवः ॥६॥ वैमवी विजयाख्यातिवैजयन्ती पुरेडिता । राजते विजगन्नेत्रकुमुदामलचन्द्रिका ॥६॥ भुवःस्वर्भूनिवासिन्यो भुवि यद्व्यन्तरा स्थिताः । नरीनृत्यन्ति देव्योऽग्रे प्रेमानन्दरसाष्टकम् ॥७॥ श्रामन्द्रमधुरधानाव्याप्तदिग्विदिगन्तरा। धीरं नानद्यते नान्दी जित्या प्राधनावलीम् ॥३१॥ जितार्को धर्मचक्रार्कः सहस्रारांशुदीधितिः । "याति देवपरीवारो वियतातितमोपहः ॥७२॥ लोकानामकनाथोऽयमैतैत नमतेति च । घुष्यते स्तनितैर?षणामयघोषणा ॥७३॥ भर्तृप्रभावसदृशा सत्पूर्व व्याप्य दिक्पथे । प्रकुर्वन्ति जयाद्वानं धावन्तः प्रथमोत्तमाः ॥७॥ देवयात्रामिमां दिव्यामन्वेत्य परमाद्भुताम् । अद्भुतान्यदृष्ट्यादिसर्वाण्यसुभृतां भुवि ॥७५।। *आधयो नैव जायन्ते व्याधयो व्यापयन्ति न । ईतयश्चाजया भर्तुति तद्देशमण्डले ॥६॥ अन्धाः पश्यन्ति रूपाणि शृण्वन्ति वधिराः श्रुतिम् । मूकाः स्पष्टं प्रभाषन्ते विक्रमन्ते च पङ्गवः।।।७७॥ नात्युष्णा नातिशीताः स्युरहोरात्रादिवृत्तयः । अन्यच्चाशुभमत्येति शुभ सर्व प्रवर्धते ॥७॥ व्याप्त हो रहा हो ॥६७। जगह-जगह विजय-स्तम्भ दिखायी दे रहे थे, उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो पत्ताकारूपी हाथोंके विक्षेपसे पर-वादियोंको परास्त कर दयारूपी मूर्तिको धारण करनेवाले भगवान्के मानो कन्धे हो नृत्य कर रहे हों ।। ६८॥ आगे-आगे भगवानकी विजय- पताका फहराती हुई सुशोभित थी जो ऐसी जान पड़ती थी मानो तीन जगत्के नेत्ररूपी कुमुदोको विकसित करनेके लिए निर्मल चॉदनी ही हो ॥६९ ॥ जो देवियों अधोलोक और ऊर्ध्वलोकमें निवास करती हैं तथा पृथिवीपर नाना स्थानोंमें निवास करनेवाली है वे भगवान्के आगे प्रेम और आनन्दसे आठ रस प्रकट करती हुई नृत्य कर रही थीं ।।७।। जिसने अपनी गम्भीर और मधुर ध्वनिसे समस्त दिशाओं और विदिशाओंके अन्तरको व्याप्त कर रखा था ऐसी नान्दी-ध्वनि (भगवस्तुतिकी ध्वनि ) वर्षा ऋतुकी मेधावलीको जीनकर बड़ी गम्भीरतासे बार-बार हो रही थी ॥७॥ जिसने अपनी प्रभासे सूर्यको जीत लिया था, जो हजार अररूप किरणोंसे सहित था, देवोंके समूहसे घिरा हुआ था और अत्यधिक अन्धकारको नष्ट कर रहा था ऐसा धर्मचक्र आकाश-मार्गसे चल रहा था ।।७२।। आगे-आगे चलनेवाले स्तनितकुमार देव अभय घोषणाके साथ-साथ यह घोषणा करते जाते थे कि 'ये भगवान तीन लोकके स्वामी हैं, आओ, आओ और इन्हें नमस्कार करो' ।।७३॥ उस समय बहुत-से उत्तम भवनवासी देव, भगवान् नेमिनाथके प्रभावके अनुरूप दिशाओं और मार्गको अच्छी तरह व्याप्त कर दौड़ते हुए जय-जयकार करते जाते थे।७४|| जो जीव अनेक आश्चर्योसे भरी हुई भगवान्की इस दिव्ययात्रामें साथ-साथ जाते थे, पृथिवीपर उन्हें अर्थ- दृष्टिको आदि लेकर समस्त आश्चयाँको प्राप्ति होती थी। भावार्थ-उन्हें चाहे जहाँ धन दिखायी देना आदि अनेक आश्चर्य स्वयं प्राप्त हो जाते थे ॥७॥ जिस देशमें भगवान्का विहार होता था उम देशमें भगवानकी आज्ञा न होने से ही मानो किसीको न तो आधि-व्याधि--मानसिक और शारीरिक पीड़ाएँ होती थीं और न अतिवृष्टि आदि ईतियाँ ही व्याप्त होती थीं ॥७६|| यहाँ अन्धे रूप देसने लगते थे, यहरे शब्द सुनने लगते थे, गूंगे स्पष्ट बोलने लगते थे और लँगड़े चलने लगते थे ।।७७॥ यहाँ न अत्यधिक गरमी होनी थी, न अत्यधिक ठण्ड पड़ती थी, न दिन-रातका विभाग होना था, और न अन्य अशुभ कार्य अपनी अधिकता दिसला सकते १. परियादिनः म० । २ इवेशाशा म.। ३, विभीरियं वैभवी। ४. 'मायोचितसंयुत्ता स्तुति- परमारपयुम्यते । देवदेजमपाटीनो तानान्दीति सांता ॥' ५. यनि म०, क०। ६. वियतीति म । ७. भापयनिय म.15.न. म०।६.वित्र पन्त च म.1 एकोनषष्टितमः सर्गः भूवधू सर्वसम्पन्नसस्यरोमाञ्चकञ्चका ! करोत्यम्भुजहस्तेन मर्तुः पादग्रहं मुदा ॥७९॥ जिनार्कपादसम्पर्कप्रोत्फुल्लकमलावलीम् । प्रथयत्युद्वहन्ती द्यौरस्थायिसरसोश्रियम् ॥८॥ सऽत्युक्ताः समात्मानः समदृष्टेश्वरैक्षिताः । ऋतवः समर्मधन्ते निर्विकल्पा हि संशिता निधानानि निधीरन्नान्याकराण्यभूतानि च। सूयते तेन विग्याता रतसूरिनि मेदिनी ॥४२॥ 'अन्तकोऽन्तकजिद्धीर्यपराजिनपराक्रमः । धर्मचक्रोजिते लोके नाझाले करमिच्छति ॥४॥ कालः कालहरस्याज्ञामनुकूलमयादिव । प्रविहाय स्वरैषम्यं पूज्यच्छामनुवर्तते ॥८॥ सस्थावरकाः सर्वे सुसं विन्दन्ति देहिनः । सपा विश्वजनीना हि विभुता भुवि वर्तते ॥८५॥ जन्मानुवन्धरो यः सर्वोऽहिनकुलादिकः । तस्यापि जायतेऽजयं संगतं सुगनाज्ञया ॥८६॥ गन्धवाहो वहद्गन्धं मनुस्तं कथमाप्नुयात् । अचण्डः सेवते सेवां शिक्षयतनुजीविनः ॥७॥ रजस्तिमिरिमापायमल्यामरणस्विषः । दिकन्याः पुष्पजापैस्तं पूजयन्ति दिशां पतिम् ॥८॥ थे । सव ओर शुभ-ही-शुभ कार्योंकी वृद्धि होती थी ॥७८उस समय सर्व प्रकारकी फली- फूली धान्यरूपी रोमाञ्चको धारण करनेवाली पृथिवीरूपी स्त्री कमलरूपी हाथोंके द्वारा बड़े हपसे भगवानरूपी भर्तारके पादमर्दन कर रही थी ॥७९|| जिनेन्द्ररूपी सूर्यके पादरूपी किरणों- के सम्पर्कसे फूली हुई कमलावलीको धारण करनेवाला आकाश उस समय चलते-फिरते तालाबको शोभाको विस्तृत कर रहा था ॥८०॥ उस समय विना कहे ही समस्त ऋतुएँ एक साथ वृद्धिको प्राप्त हो रही थीं, सो ऐसी जान पड़ती थीं मानो समष्टि भगवान्के द्वारा अवलोकित होनेपर वे समरूपी ही हो गयी थीं। यथार्थमें स्वामीपना तो वही है जिसमें किसीके प्रति विकल्प-भेदभाव न हो ॥८॥ उस समय पृथिवी जगह-जगह अनेक खजाने, निधियॉ, अन्न, खाने और अमृत उत्पन्न करती थीं इसलिए 'रत्नसू' इस नामसे प्रसिद्ध हो गयी थी॥८२॥ अन्तकजित्-यमराजको जीतनेवाले भगवान के वीर्यसे जिसका पराक्रम पराजित हो गया था ऐस यमराज, धर्मचक्रसे सबल संसारमें असमयमें करग्रहण करनेको इच्छा नहीं करता था। भावार्थ-जहाँ भगवान्का धर्मचक्र चलता था वहाँ किसीका अस- मयमें मरण नहीं होता था ॥८३॥ काल (यम) को हरनेवाले है (पक्षमें समयको हरनेवाले) भगवानकी आज्ञाके विरुद्ध आचरण न हो जाये, इस भयसे काल (समय) अपनी विप- मताको छोड़कर सदा भगवान्की इच्छानुसार ही प्रवृत्ति करता था। भावार्थ-काल, सर्दी- गरमी, दिन-रात आदिकी विषमता छोड़ सदा एक समान प्रवृत्ति कर रहा था ।।८४|| भगवान के विहार-क्षेत्रमें स्थित समस्त त्रस, स्थावर जीव सुखको प्राप्त हो रहे थे सो ठीक हो है क्योंकि संसारमें विभुता वही है जो सबका हित करनेवाली हो ॥८५॥ जो सॉप, नेवला आदि समस्त जीव जन्मसे ही वैर रखते थे उन सभीमें भगवानकी आज्ञासे अखण्ड मित्रता हो गयी थी ।।८६॥ भगवानकी वहती हुई गन्धको, पवन किस प्रकार प्राप्त कर सकता है इस प्रकार अनुजीवी जनोंको सेवाकी शिक्षा देता हुआ वह शान्त होकर भगवानको सेवा कर रहा था। भावार्थ--उस समय शीतल, मन्द सुगन्धित पवन भगवान्को सेवा कर रहा था सो ऐसा जान पडता था मानो वह सेवकजनाको सेवा करनेकी शिक्षा हो दे रहा था || धूलिरूपी अन्धकारके नष्ट हो जानेसे प्रकट हुई निर्मलतारूपी आभरणांकी कान्तिसे युक्त १. मलावी म० । २. प्रथयन्त्युदन्तो म०, क०, ३० । ३. स्वर्वेत्युनाः म० । सर्वे अत्युवाः इति पदच्छेद., उक्त अतिवान्ता इति अत्युक्ता अयिता एवेत्यर्थः । ४. निर्विकम्पा म०, १०, ख०, ४० ॥ ५. सूयन्ते म०, क०, ख०, १० १६. अने कौन्तकजिद् म० । ७. तर स्थावरकाः म०1 ८ तस्कथाप्नुयात् म. । तत्कथया-नुयात् क० । ६. सेव्यते क० । सेहते ख०।

rrierनासाना अनार नमो नमन मन art मन्टन संगमन Trminानिदानन्द rran aura नामः ॥ whatirerrari mm * मंत्र-- 11 Faaदेशमग मानले कदम नयम अनसनसनन्दन Antarमराxि Exar कन्या लॉटमनन पूजा कर रही: अनन्वय जगमग हरदगा देयमान अकम. समजा मनात दिन जिमझा र माग्न बन्छ हो गया या दवा रिन्नन दिन थापा उमममय भयकीनी बाद ही क्या प्राण भगवानोदुग्म की नमकार अन्दामाबाद पदुमदनसिक हिमाया राया दिम रहित था भगवान मन्दिर मारनामा प्रकारका रमौका अभाव या मा टस ही है क्योंचि ले अयि बाबा आप्रर्यकारी अनुन मानाय होता ही है जिनका कल्याहाला या an, हा युटनर भी आभार भगवानको नमस्कार कग्द में मोदई है क्योंकि उनमा प्रभाव अलमें आश्चर्य करनेवाला एवं प्रतिमाम रहित होता ही है। जिनके पागमाग बन्द चल रहा था में भगवान जिन जिम दिलाने पहुंक्त थे उनी उनी irani freपा पूजनकी मामग्री लेकर भगवानकी अगवानी दिनमा पहुँचते थे। मगर जिमजम दिमाग यापिम जाते थे उम-उम दिया दिसाल मनाल दव्य छिय हुद अपनी-अपनी मामानक पहुँचाने आते थे मो टीक ही है क्योंकि भगवान उमाप्रकारके सार्व- मोग-यमान थिीक अधिपति थे । निमार्गगा अर्थान् गङ्गानदी अपने निश्चित गीन माग चलना है परन्तु यह देवांकी सेना विना मार्गके ही चल रही थी उसके चलने- मागे अनेक थे। हम नरह, यह मेना अतिशय पवित्र भगवान से प्रभावित हो पृथिवी- firm यिन कर रही थी ॥१२॥ उम देवसेना वीच दण्डके ममान एक बहन ऊँचा कानिमाड यिणमान थाजी नीयमे लेकर पर लोकके अन्त तक फैला था और वापिस आयी किरणोग मा २२॥ अन्य तेजधारियों की अपेक्षा उम कान्तिदण्डका तेज तिगुना मा अपर रोज साग यह बड़ा स्थूल दिसायी देता था और सूर्य के सिवाय अन्य ज्योतिपियों- महको गिरफल करनेवाला था 1|२011 उस कान्तिदण्डका प्रकारा लोकके अन्त तक व्याप्त पा, फायरहित था, गाठ अन्धकारको नष्ट करनेवाला था, और सूर्यके प्रकाशको अति- IIT करनेवाला था । उस कान्तिदण्डके बीचमें पुरुषाकार एक ऐसा दूसरा कान्ति- रागद दियायी पेगा था जो रोगका धारक था, अन्य तेजोमयके समान जान पड़ता था, एक १. T10 । २. अनुयाया समोमानः सः । अनुपान्या स्वसीमानः म । ३. यानश्च क० । watts! ४ प्रशान्येय ६० । ५. भास्करदन्याज्योतिष्टमविरस्करः म०, स०। ६. नराकृतिः ६० !

००३ एकोनपष्टितमः सर्गः परितो 'मामिसत्सर्पद्धनो मर्तुमहोदयः । मासिगम्यूतिरिस्तारो युनोच्यायस्तन्माः ॥१०॥ दृश्यते दृष्टिहारीव सुखदृश्यः सुसावहः। पुण्यमूर्तिस्तदन्तस्थः पूज्यने पुरवानिः ॥१०॥ काधियोऽपुण्यजन्मानः स्वापुण्यजस्पान्धिताः । न पश्यन्ते च तद्भासं मानुमाममुल्लूकरत् ॥१०॥ तिरयन्ती खेस्तेजः पूरयन्ती दिशोऽसिलाः । ननमा मानवीयेव पूर्व न्याप्नोति भूतलम् ॥ १०३॥ तस्याश्शानुपदं याति लोक्शो लोकशान्तये । लोकानुदमासयन् माननिदीधितिमाप्रमः ॥१०॥ आसंवत्सरमामाः प्रथयात्रामवीं गतिम् । भासते रखपृष्टयाध्यामरीत्यरावतो यथा ॥१०॥ अनुबन्धावनिप्ररयं दिवि मार्गादि दृश्यते । त्रिलोकातिशयोद्भूतं नन्द्रिमामरमद्भुतम् ॥१०॥ पटूमवन्ति मन्दाश्च महिसास्वपर्धयः । खेदस्वेदातिचिन्तादि न तपामस्ति साक्षगे ..॥ विहारानुगृहीतायां भूमी न ढमरादयः । दशाभ्यस्तयुगं(?)मनुरहोऽत्र महिमा महान् ॥१०॥ विभूत्योदतया भूत्यै जगता जगतां विभुः । रिजहार भुवं मन्यान् वोधयन् पोधदः प्रमात् ॥ १०९॥ हजार सूर्यके समान कान्निका धारक था, जिससे बढकर और दूसरी आकृति नहीं थी, जो चारों ओर फैलनेवालो कान्तिसे घन रूप था, भगवान्के महान अभ्युदयके ममान था, जिसकी कान्तिका विस्तार एक कोस तक फैल रहा था, जो भगयान्की ऊँचाईके बराबर था, दृष्टिको हरण करनेवाला था, सुसपूर्वक देसा जा सकना था, मुसको उत्पन्न करने. याला था, पुण्यकी मूर्ति स्वरूप था और सबके द्वारा पूजा जाता था ।।२९-२०१॥ जिम प्रकार उल्लू सूर्यको प्रभाको नहीं देख पाते हैं उसी प्रकार दुर्युद्धि, पापी एवं अपने पापसे उत्पन्न कोधसे युक्त पुरुप उस कान्ति-समूहको नहीं देख पाते हैं ॥१०२।। उम कान्ति-समूहमें- से एक विशेष प्रकारको प्रभा निकलती थी जो सूर्यके तेजको आन्छादित कर रही थी, समस्त दिशाओंको पूर्ण कर रही थी और सूर्यको प्रभाके ममान पृधियीनलको पहलेसे व्यास कर रही थी ।।१०।। उस प्रभाके पीछे, जो समस्त लोकोंको प्रकाशित कर रहे थे तथा जिनकी प्रभा अत्यधिक किरणोंसे युक्त थी ऐसे भगवान नेमि जिनेन्द्र, लोकशान्ति के लिए-मंमाग्में शान्तिका प्रसार करनेके लिए विहार कर रहे थे ॥१०॥ जिम मार्गमे भगवानका विदार होता था वह मार्ग, अपने चिहोंसे एक वर्पतक यह प्रकट करता रहता था कि यहाँ भगवानका विहार हुआ है नधा रत्नवृष्टिसे यह मार्ग ऐमा मुशोभित होना जैमा नानॉफ ममूहसे ऐरावत हाथी मुशोभित होता है ।।१०५॥ जिम प्रकार विदारसे मम्यन्ध रखने वाली पृथियों में मार्ग आदि दिसलायी देते हैं उसी प्रकार आकाशमें भी मार्ग आदि दिपायी देते हैं मोटीरही है क्योंकि तीन लोक अतिशयसे उत्पन्न भगवान्का यह अनिशय ही आर्यगारी था।।१०६॥ उस समय मन्द बुद्धि मनुष्य तीक्ष्ण बुद्धिफे धारक हो गये थे। ममस्त हिंसर जार प्रभायदान हो गये थे और भगवान्क समीप रहनेवाले लोगोंको गेद, पीना, पोड़ा नया गिन्ना आदि पुट भी उपद्रय नहीं होता था|१०|| भगवान्के विद्यारमे अनुगृहीन भूमिमें दोमा योजनातक पिप्टय आदि नहीं होते थे । अधया दामे गुणिन युग अर्थान पनाम यर्प नफ उग भूमिमें पोई उपद्रयं आदि नहीं होते थे। भावार्थ-जिम भूमिमें भगयाना पिदार होता मा पदों ५० पर्प ना कोई उपद्रय-दुभिधर आदि नही होना था। यह भगवानपी पाहुन मार्ग महिमाही ममानी पाहिए ॥१०॥इम प्रफार उप विभूनिगे युग, पोधको देनयाद जगार म्यामा भगरान नेमिनायने भव्य जीवोंकोसंपोधिन करते हुए, जगतरे यमपर दिए प्रम पियार १. माधि मनी १०, म...। २. गरिगतान, ... .SHEETप म. । ४. नारा देपो म... समास भाग पा.. मभुमा सिर.............। E.ANTRA १.पा.मन (म..) ना। .

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७.१ हरिवंशपुराणे सुराष्ट्रमस्थलाटोरसूरमेनपटचरान् । कुरुजालपाञ्चालकुशाग्रमगधाञ्जनान् ॥१०॥ श्रङ्गवङ्गाकलिङ्गादीवानाजनपदान जिन. । विहरन् जिनधर्मस्थांश्चक्रे क्षत्रियपूर्वकान् ॥११॥ ततो मलयनामानं देशमागन्य म क्रमान् । सहलानवने तस्थौ पुरे मदिलपूर्वक ॥१२॥ पूर्ववचित तत्र चतुम मुरासुरैः । ममवस्थानभूमागे जिनोऽमाद् गणवेष्टितः ॥११३॥ तन्पुराधिपनि. पौण्डू: पारलोकममन्वितः । सस्तुतिजिनमानम्य समाप्तीनः कृताञ्जलिः ॥११॥ देवक्यास्तनया ये पद मुदृष्टयलकयोः स्थिताः । पुप्रीतिं प्रकुर्वाणास्तऽपि तत्रैव मंगताः ॥११५॥ अन्यक योषितस्तेषां द्वात्रिंशद्गणना गुणैः । रूपादिमिरपोन्द्रस्य जयन्त्यः शुचयः शचीम् ॥११६॥ अवतीर्य रम्यस्त पद्भ्यः पडपि सोदराः। नत्वा नुन्चा जिनं राज्ञा सहासीना महौजमः ॥१३॥ जिनः श्रावधर्म च सम्यग्दर्शनभूपितम् । यतिधर्म च कर्मघ्नं जगाद सदस तदा ॥११८॥ ततो विदिततत्त्वार्या. श्रुन्चा धर्मामृतं जिनात् । जातसंसारनिवेदा बन्धुम्यो विनिवेद्य ते ॥११९॥ जिनपादान्ति के दीक्षा मोक्षलक्ष्मीविधायिनीम् । भ्रातरः सहनिस्मंगाः पद्धपि प्रतिपेदिरे १२०॥ द्वादशाझं श्रुतज्ञान लघवीजादिबुद्धयः । अधिगम्य तपो घोरं चक्रुस्ते राजसूनवः ॥२१॥ पष्टादय. सहामीषां धारणापारणा. सह । योगास्त्रकालिका. सार्क साकं शय्यामनक्रिया. ॥१२२॥ तपां चरमदेहानां तपतां परमं तपः । देहानां परमा कान्तिः पूर्वतोऽपि विवर्धते ॥१२॥ उपमानोपमेयत्वमन्यान्यस्य तपस्यमी । सबाह्याभ्यन्तरं प्रापुस्तीर्थकृत्पदसवकाः ॥१२४॥ विहार किया ।।१०।। मुराष्ट्र, मत्स्य, लाट, विशाल शूरसेन, पटच्चर, कुरुबागल, पाश्चाल, कुशाग्र, मगध, अञ्जन, अङ्ग, वङ्ग तथा कलिग आदि नाना देशोंमें विहार करते हुए भगवान्ने क्षत्रिय आदि वर्णो को जैनधर्ममें स्थित किया ॥११०-११२|| तदनन्तर विहार करते-करते भगवान मलय नामक देशमें आये और उसके भद्रिलपुर नगरके सहस्राम्रवनमें विराजमान हो गये ॥१९२|| पहलेकी तरह चारों प्रकारके देवोंने वहाँपर भी समयसरणकी रचना कर दी और उसमें गणधरोंसे वेष्टिन भगवान् मुशोभित होने लगे ॥११३।। उस नगरका राजा पीण्ड, नगरवासियोंके साथ समवसरणमें आया और हाथ जोड़ स्तुति करता हुआ जिनेन्द्र भगवानको नमस्कार कर मनुष्योंके कोठेमें बैठ गया ॥११४ा देवकीके जो छह पुत्र मुदृष्टि सेठ और अलका सेठानीको पुत्रोतिको बढ़ाते हुए उनके यहाँ रहते थे वे भी समवसरणमें आये ॥११५|| उनमें से प्रत्येककी वत्तीस-बत्तीस त्रियाँ थीं जो अत्यन्न उज्ज्वल थीं और अपने रूप आदि गुणोंसे इन्द्रकी इन्द्राणीको भी जीतती थीं ॥११॥ बहुत भारी तेजको धारण करनेवाले वे छहो भाई अपने-अपने पृथक-पृथक् छह रथोंसे नीचे उतरकर समयमरणमें गये और जिनेन्द्र भगवानको नमस्कार कर तथा उनकी स्तुति कर राजाफे साथ मनुष्योंके कोटेमें बैठ गये ॥११|| उस समय भगवानने सभामं स्थित लोगों के लिए सम्यग्दर्शनसे मुगोभित धायकधर्म और कोका नाश करनेवाले मुनिधर्मका उपदेश दिया ॥१२८॥ तदनन्तर जिनेन्द्र भगवानमे धर्मरूप अमृतका श्रवण कर जिन्होंने तत्वके यास्तविक स्वरूपको जान लिया था ऐमे छहो भाई संसारसे विरक्त हो उठे और बन्धुजनोंको इसकी सूचना दे जिनेन्द्र भगवानके चरणोंके समीप निर्ग्रन्थ हो एक माथ मोक्ष-लक्ष्मीको प्रदान करनेवाली दीक्षाको प्राप्त हो गये ।।११९-१२०।। जिन्हें योज-बुद्धि आदि ऋद्धियाँ प्राम हुई थीं ऐमे उन राजकुमारोंने द्वादमान श्रुननानका अभ्याम कर घोर तप किया ।।१२।। इन रहों मुनियोंके बेला आदि अयाम, उनकी धारणाएँ, पारणाएँ, कालिक योग तथा शयन, आमन आदि क्रियाएँ माय-माय ही होती थीं ॥१२॥ उत्कृष्ट नप तपनेवाले उन चरमसरीरी मुनियोंरे शरीरको उत्कृष्ट कान्ति पहलमे भी अधिक बढ़ गयी थी||१२|| नीर्थकर भगवान के परणोंको सेवा करनेवाले ये छहों मुनि, वाद्याभ्यन्तर तपमें परस्पर एक-दूमरके उपमानोपमेय- पष्टितमः सर्गः पुष्पदन्तजिनेन्द्रस्य तीये म्युच्छेदमारतः । अमावे जिनमागंजमण्यानां मरतक्षिती ॥२॥ गांभूकन्याहिरण्यादिदानानि विषयानुरः । पापबन्धनिमिचानि विप्रः प्रज्ञाप्य सोवनी ॥१३॥ मोहयित्वा जर लोकं राजलोकपुरोऽगमत् । प्रवृत्तः पापवृत्तेषु सप्तमी पृथिवीमितः ॥१॥ उद्वापि परिभ्रम्य तिर्यमारकयोनिपु । काकतालीययोगेन मानुषवमुपागतः ॥१५॥ गन्धावतीपरिचौर गन्धमादनपर्वते । न्याषः पर्वतको नाम्ना बालरीवल्लमोऽमवत् ॥१५॥ श्रीधरं धर्मसंज्ञं च चारणश्रमणो गिरौ । टोपशमकृत्वाम्यां प्रोषितं धर्मकालमाक् ॥१७॥ ज्योतिर्मालास्यखेचर्यामलकायां महाबलात् । जातः शवलिभ्राता स पुत्रो हरिवाहनः ॥१८॥ राजा राज्य नियोज्यता प्रवज्य श्रीधरान्तिकं । प्रव्रज्यायाः पलं मुग्यं मोक्षमोग्ग्यमवाप सः ॥१९॥ निर्वासितो विरोधस्यो ज्येष्टेन हरिवाहनः । मगलीदेशीलेऽस्थादम्बुदावसनामनि ॥२०॥ श्रीधर्मानन्तवीर्याप्पयो चारणी वीक्ष्य सत्र सः। प्रवग्याराध्य स प्रापन कल्पमेशानमेव च ॥२॥ मुक्त्वा देवमुसं देवश्च्युस्त्रा संक्लेशमावतः । जाता स्वयंप्रमागमें मामा वं हि मुनुतः ॥२२॥ अत्र जन्मनि कृस्वान्ते तपो भूत्वाऽमरोत्तमः । च्युरया जैनं तपः कृत्वा निर्वाणमुग्यमाप्स्यति ॥२३॥ थाकाग्ममवानवं ज्ञात्वाग्मामननितिम् । आननाम जिनाधी सस्यमामा प्रमोदिनी ॥२४॥ मानता था ।। ११ ।। श्री पुष्पदन्त जिनेन्द्रके तीर्थ में धर्मका व्युच्छेद हो जानेसे जब भरत. क्षेत्रको भूमिमें जिनमार्गके ज्ञाता भव्य जीवोंका अभाव हो गया तब उस विषयोंसे पीड़ित ब्राझणने पृथिवीपर पापबन्धमे कारण भूत गाय, कन्या नथा मुवर्ण आदिसे दानकी प्रवृत्ति चलायी ।। १२-१३ ।। मूर्ख जनोंको मोहित कर वह राजपुरुपोंके आगे तक पहुंच गया अर्थान क्रम क्रमसे उमने राजा प्रजा सभीको अपने चक्रमें फँसा लिया और पापाचारमें प्रवृत्त हो अन्तमें यह मात नरक गया ॥ १४ ॥ वहाँसे निकलकर मी तिर्यच और नारकियोंकी योनिमें परिभ्रमण करता रहा। तदनन्तर कदाचित् काकनालीयन्यायसे मनुष्य पर्यायको प्राप्त हुआ।॥ १५ ॥ गन्धावती नदीके किनारे गन्धमादन पर्वतपर वह वल्लरी नामक श्रीका स्वामी पर्वतक नामका भील हुआ॥१६॥ कदाचित् उस पर्वतपर श्रीधर और धर्म नामके दो चारणऋद्विवारी मुनि आये । उनके दर्शन कर इसके परिणामांमें कुछ शान्ति आयो जिमसे मुनियोंने उससे उपवास कराया । अन्नमें वह धर्मपूर्वक मरणको प्राप्त हो विजया पर्वतकी अलका नगरी में महायल नामक विद्याधरसे ज्योनिर्माला नामकी विद्याधरी में शतबलीका भाई हरिवाहन नामका पुत्र हुआ ।। १७-२८ ॥ कदाचित् राजा महाबल, शनवली और हरियाइन नामक दोनों पुत्रोंको राज्य कार्य में नियुक्त कर श्रीधर गुरके पास दीभित हो गया और दोनाका मुख्य फल जो मोसमम्बन्धी मुम् उसे प्राप्त हो गया ॥ १९ ॥ किमी कारण वश शनयलो और हरिवाहनमें विरोध पड़ गया जिससे बड़े भाई दानवलीने उमे निकाल दिया। निवामित हरि- वाहन भगलोदेशक अम्बुदावन नामक पर्वतपर स्थित था ।। २० ।। उसी ममय वहाँ श्री- धर्म और अनन्नयीय नामक दो चारणद्विधारी मुनि आये। उनके दर्शन कर हरियाहनने दोनाले ली और अन्त मल्लेम्पना धारण कर यह ऐशान स्वर्गको प्राम हुआ ॥ २१॥ हरि- याहनके जीव देवने वहाँ देवोंके मुम्मोंका उपमोग किया परन्तु मंक्टेयामय परिणाम होने के कारण यहाँसे न्युन होकर यह गजा मुझेनुरी गनी स्वयंप्रमाणे गर्ममें तू सत्यभामा नामको फन्या हुई ॥ २३ ॥ इम जन्ममें नपरुर - अन्नमें उत्तम देय होगी और यहाँमे न्युन हो जिनेन्द्र प्रणीत नपफर मोन मुम्रो प्रान होगी ॥ २३ ॥ इम प्रसार अपने भय मुनसर नथा निकट फालमें हमें मोक्ष प्रान होनेयाला हे यह जानकर मत्यमामाने हरिन हो भगवानको नमस्कार किया ॥२४॥ १ पुरंगमन् म. । २. पारणभागी मा.. 1 षष्टितमः सर्गः अथ धर्मकथाछेदे प्रणिपत्य जिनेश्वरम् । कृताञ्जलिरपृच्छत् सा देवकी विनयं श्रिना ॥३॥ भगवन् भवने मेऽध जातरूपमनोहरम् । मुनियुग्मं प्रविश्य'त्रिरुपर्युपरि भुक्तवान् ॥२॥ भगवन् भुक्तिवेलायामकस्यामैकमुक्तये । बहुकृत्वो गृहं त्वेकं यतयः प्रविशन्ति किम् ॥३॥ अथातिशयरूपत्वाग्रतियुग्मययं मया । भ्रान्त्या नालक्षि में स्नेहो देहजेष्विव तेष्वभूत् ॥४॥ इत्युक्तोऽकथयनाथस्तनयास्ते परप्यमी । युग्मयतया सूता मवस्या कृष्णपूर्वजाः ॥५॥ देवेन रक्षिताः कंसात् सुरयलकयोः पुनः । सुतत्वेन च वृद्धास्ते पुरे मदिलनामनि ॥६॥ धर्म श्रुत्वा समं सर्वे मम शिष्यत्वमागताः । कृत्वा कर्मक्षयं सिद्धिं यास्यन्त्यत्रैव जन्मनि ॥७॥ स्नेहोऽपत्यकृतोऽमीषु भवत्याः समभूदतः । धर्मचारिषु सर्वेषु स्नेहः किमुत सूनुपु ॥८॥ प्रणनाम ततस्तुष्टा देवकी देहजान्मुनीन् । यादवाश्च समस्तास्ते कृष्णाद्यास्तुष्टुवुर्नताः ॥९॥ प्रणयात्ममवान् पृष्टो जिनेन्द्रः सत्यमामया । यदुलोकामराध्यक्षं दिव्यचक्षुर्जगाविति ॥१०॥ प्राग्मदिलपुरेऽनाभन्मरीचिकपिलामुतः । कान्यकृत्पण्डितम्मन्यो विप्रो मुण्डालायनः ॥६॥ अथानन्तर धर्मकथा पूर्ण होनेपर विनयको धारण करनेवालो देवकोने हाथ जोड़कर भगवानको नमस्कार किया और उसके बाद यह पूछा कि भगवन ! आज सुवर्णके समान सुन्दर दो मुनियोंका युगल मेरे भवनमें तीन बार आया और फिर-फिरसे उसने, तीन बार आहार लिया । हे प्रभो ! जब मुनियोंके भोजनको बेला एक है और एक ही बार वे भोजन करते हैं तब मुनि एक ही घरमें अनेक बार क्यों प्रवेश करते हैं ? ॥ १-३॥ अथवा यह भी हो सकता है कि वह तोन मुनियोंका युगल हो और अत्यन्त सदृश रूप होनेके कारण में भ्रान्तिवश उन्हें देख नहीं सकी हूँ । परन्तु इतना अवश्य है कि मेरा उन सबमें पुत्रोंके समान स्नेह उत्पन्न हुआ था ॥४॥ देवकीके इस प्रकार कहनेपर भगवान्ने कहा कि ये छहों मुनि तेरे पुत्र हैं और कृष्णके पहले तीन युगलके रूपमें तूने इन्हें उत्पन्न किया था ॥ ५॥ देवने कससे इनकी रक्षा को और भद्रिलपुर नगरमें मुदृष्टि सेठ तथा अलका सेठानीके यहाँ पुत्ररूपसे इनका लालन-पालन हुआ ॥ ६॥धर्म श्रवण कर ये सबके सब एक साथ मेरी शिष्यताको प्राप्त हो गये-मुनि हो गये और कोका क्षयकर इसी जन्ममें सिद्धिको प्रान होंगे।॥७॥ तेरा इन सबमें जो स्नेह हुआ था वह अपत्यकृत था-पुत्र होनेसे किया गया था सो ठीक ही है क्योंकि समस्त धर्मात्मा जनोंमें प्रेम होता है फिर जो पुत्र होकर धर्मात्मा हैं उनका तो कहना ही क्या है ? ॥८॥ तदनन्तर देवकीने संतुष्ट होकर उन पुत्ररूप मुनियोंको नमस्कार किया तथा कृष्ण आदि समस्त यादवोंने भी नम्रीभूत होकर उनकी स्तुति की॥९॥ तत्पश्चात् कृष्णको पट्टरानी सत्यभामाने भगवान्को प्रणाम कर अपने पूर्वभव पूछे । उत्तरमें दिव्य नेत्र-केवलज्ञानके धारक भगवान् यादवों और देवोंके समक्ष इस प्रकार उसके पूर्वभव कहने लगे ॥ १०॥ पहले मदिलपुर नगरमें मुण्डशलायन नामका एक प्राह्मण रहता था जो मरीचि प्रामण और कपिला प्रामणीका पुत्र था, काव्यको रचनामें निपुण था और अपने आपको पण्डित १. पारत्रयम् । २. पहेलेकम्म।

पष्टितमः सर्गः ७०९ अन्न 'सिद्धशिलां वन्द्या वन्दित्वा च स्थिता सती । कृत्वा नीलगुहायां सा सती सल्लेसनां मृता ॥३७॥ अच्युतेन्द्रमहादेवी नाम्ना गगनवल्लमा । वलमाऽभवदुत्कृष्टस्त्रीस्थितिस्तत्र देव्यसौ ॥३८॥ ततोऽवतीर्य भीष्मस्य श्रीमत्यां त्वं मुताऽमवः । नगरे कुण्डिनामिख्ये रुक्मिणी रुक्मिणः स्वसा॥३९॥ करवा चान भवे भव्ये प्रवज्यां विश्रुधोत्तमः । च्युत्वा तपश्च कृत्वात्र नम्रन्थ्यं मोक्ष्यसे ध्रुवम् ॥४०॥ भोप्मजा भीष्मसंसारमौरुराकण्यं सा भवान् । ज्ञात्वासनस्वमोक्षाप्ति प्रणनाम प्रभु मुद्रा ।।४।। जाम्बव त्या जिनः पृएस्तस्याः प्राह पुरामवम् । संसारभयभीनानां सन्निधौ निखिलाङ्गिनाम् ॥४२॥ सुतासीत् पुष्कलावस्यां जम्बूद्वीपस्य देविलात् । नगयां वीतशोकायां देवमत्यां यशस्विनी ॥४३॥ गृहपत्यात्मजायासौ गृहपस्य शरीरजा। दत्ता सुमित्रसंज्ञाय मृते तत्र मुदुःखिता ॥४४॥ जैनेन जिनदेन जिनधर्मोपदेशिना । शाम्यमाना न सम्यक्त्वं लेभे मोहोदयादसी ॥४५।। दानोपवासविधिना लौकिकन मृता सती । नन्दने व्यन्तरस्यासीत् सा मार्या मेरुनन्दना ।।४।। त्रिंशद्वर्षसहस्राणि लब्धाशीतियुतानि तत् । भोगं भुक्त्वा चिरं कालं संसारं संससार सा ॥४७॥ द्वीपेऽत्रैरावतक्षेत्रे पुरे विजयपूर्वके । बन्धुपैणस्य भूपस्य बन्धुमत्याः मुताऽभवत् ॥४८॥ नाम्ना बन्धुयशाः कन्या श्रीमत्या प्रोपधव्रतम् । कन्यया जिनदेवस्य प्रतिपद्य मृताऽमवत् ।।१९।। धनदस्य प्रिया पत्नी नामनः सा स्वयंप्रमा। च्युत्वातः पुण्डरीकिण्यां जम्बूद्वीपे पृथौ पुरि ॥५०॥ राजगृह नगर चली गयी ।। ३६ । वहाँ वन्दना करने योग्य जो सिद्धशिला थी उसकी वन्दना कर वह वहीं नीलगुहामें रहने लगी और सल्लेखना धारण कर मृत्युको प्राप्त हुई ।। ३७ ॥ मरकर वह सोलहवें स्वर्गमें अच्युतेन्द्रकी गगनवल्लभा नामकी अतिशय प्रिय महादेवी हुई । सोलहवें स्वर्ग में स्त्रियोंकी उत्कृष्ट स्थिति पचपन पल्यको है सो वह उसी उत्कृष्ट स्थितिकी धारक हुई थी॥३८॥ यहाँसे चय कर तू कुण्डिनपुरमें राजा भीष्मकी श्रीमती रानीसे रुक्मी- की बहिन रुक्मिणी नामकी पुत्री हुई है ॥ ३९ ॥ इस उत्तम पर्यायमें तू दीक्षा धारणकर उत्तम देव होगी और यहाँसे च्युत हो निम्रन्थ तपश्चरण कर निश्चित ही मोक्ष प्राप्त करेंगी ॥ ४० ॥ अपने पूर्व भव सुनकर रुक्मिणी भयंकर संसारसे भयभीत हो गयी और अपने लिए निकट कालमें मोक्ष प्राप्त होगा यह जानकर बड़े हर्पसे उसने भगवानको नमस्कार किया ।। ४१ ।। तदनन्तर कृष्णकी तीसरी पट्टरानी जाम्बवतीने श्री नेमिजिनेन्द्रसे अपने पूर्वभव पूछे सो संसारसे भयभीत समस्त प्राणियोंके समक्ष वे उसके पूर्वभव इस प्रकार कहने लगे ॥४२॥ जम्बूद्वीपकी पुष्कलायती देशमें एक चीतशोका नामकी नगरी थी। उसमें देविल नामका एक गृहस्थ रहता था। उसकी देवमती नामकी स्त्रीसे तू यशस्विनी नामकी पुत्री हुई थी ॥४३ ।। यशस्विनी, गृहपति (गहोई ) की लड़की थी और गृहपति (गहोई) के पुत्र सुमित्रके लिए दी गयी थी। परन्तु पतिके मर जानेपर यह बहुत दुःखी हुई ॥४४॥ जिनधर्मका उप- देश देनेवाले किमी जिनदेव नामक जैनने उसे उपदेश देकर शान्त किया परन्तु मोहके उदयसे वह सम्यग्दर्शनको प्राप्त नहीं कर सकी।॥ ४५ ॥ यह पतिव्रता लौकिक दान तथा उपवास करती रही और उनके प्रभावसे मरकर नन्दन यनमें व्यन्तर देवकी मेरुनन्दना नामकी त्री हुई ॥४६॥ नीस हजार अस्सी वर्ष तक वहाँके भोग भोग कर वह चिर काल तक संसारमें परिभ्रमण करती रही ।। ४७ ॥ तदनन्तर इमी जम्बूद्वीपके ऐरावत क्षेत्रमें विजयपुर नगरके राजा बन्धुपेणकी घन्धुमती नामक बीसे वन्धुयशा नामको कन्या हुई। उन्धुयशाने कन्या - अवस्थामें ही श्रीमती नामक आर्यिकासे जिनदेव प्ररूपित प्रोषधनत धारण किया था इसलिए वह मरकर कुबेरको स्वयंप्रभा नामकी स्त्री हुई। आयुके अन्तमे वहाँसे च्युन हो जम्बूद्वीपकी १. सिद्धशिला वन्द्या म.1२. दुत्कृष्टा म०, १०,०1३. मोक्षातिः म०1४. गृहपते ।

हरिवंशपुराणे रुक्मिण्यापि ततः पृष्टः पूर्वजन्मानि सर्ववित् । अयोचदिति लोकेऽसौ प्रणिधानपरे स्थिते ॥२५॥ अत्रैव भरतक्षेत्रे विषये मगधामिधे । ब्राह्मणी सोमदेवस्य लक्ष्मीग्रामऽग्रजन्मनः ॥२६॥ श्रासीलक्ष्मीमती नाना लक्ष्मीरिव सुलक्षणा । रूपाभिमानतो मूढा पूज्यान प्रतिमन्यने ॥२७॥ धाप्रसाधना वस्त्रं कदाचिञ्चित्तवारिणी । नेत्रहारिणि चन्द्राभे पश्यन्ती मणिदर्पणे ॥२८॥ समाधिगुप्तनामानं तपसातिकृशीकृतम् । साधु मिक्षागतं दृष्ट्वा निनिन्द विचिकित्सिता ॥२९॥ मुनेनिन्दातिपापेन सप्ताहाभ्यन्तरे व सा । हिलोदुम्बरकुष्टेन प्रविश्याग्निमगान्मृतिम् ॥३०॥ 'सहार्ता सा खरी भूत्वा मृत्वा लवणमारतः । शूकरी मानदीपेण जाता राजगृहे पुरे ॥३१॥ वराकी मारिता मृत्वा गोष्ठेऽजायत कुक्कुरी । गोष्टागतेन सा.दग्धा परुषेण दवामिना ॥३२॥ त्रिपदाख्यस्य मण्डूक्या भण्डूकप्रामवासिनः ! मत्स्यवन्धस्य जाना सा दुहिता पूतिगन्धिका ॥३३॥ माना स्यता स्वपापेन पितामह्या प्रवर्धिता । निष्कुटे वटवृक्षस्य जालेनाच्छादयन्मुनिम् ॥३४॥ बोधितावधिनेत्रेण प्रमाते करुणावता । धर्म समाधिगुप्तेन प्रोक्तपूर्वभवाग्रहीत् ॥३५॥ पुरं *सोपारक याता तत्रार्याः समुपास्य सा । ययौ राजगृहं तामिः कुर्वाणाचाम्लवर्धनम् ।।३६।। तदनन्तर रानी रुक्मिणीने भी अपने पूर्वभव पूछे सो समस्त पदार्थोंके ज्ञाता भगवान् नेमिनाथ, इस प्रकार कथन करने लगे। उस समय समस्त लोग सुननेके लिए एकाग्रचित्त होकर बैठे थे ॥२५॥ इसी भरत क्षेत्रके मगध देश में एक लक्ष्मी नामका ग्राम है। उसमें एक सोमदेव नामका ब्राह्मण रहता था। उसकी लक्ष्मीमती नामकी ब्राह्मणी थी जो कि लक्ष्मीके समान उत्तम लक्षणोंकी धारक थी और अपने रूपके अभिमानसे मूढ होकर पूज्य जनोंको भी कुछ नहीं समझती थी॥ २६-२७ ॥ चित्तको हरण करनेवाली यह लक्ष्मीमती, एक दिन आभूषण धारण कर नेत्रोंको प्रिय तथा चन्द्रमाके समान आभावाले मणिमय दर्पणमें अपना मुख देख रही थी उसी समय तपसे अतिशय कुंश समाधिगुप्त नामके मुनि भिक्षाके लिए आये। उन्हें देख ग्लानियुक्त हो उसने उनकी निन्दा की ।। २८-२९ ॥ मुनिनिन्दाके बहुत भारी पापसे वह सात दिनके भीतर ही उदुम्बर कुष्ठसे पीड़ित हो गयी और इतनी अधिक पीड़ित हुई कि वह अग्निमें प्रवेश कर मर गयी ॥ ३०॥ आर्तध्यानके साथ मरकर वह गधी हुई। उस पर नमक लादा जाता था। सो उसके भारसे मरकर वह मान कपायके दोपसे राजगृह नगर- में शूकरी हुई ॥३१॥ उस वेचारीको भी लोगोंने मार दिया जिससे मरकर वह गोष्ठ-गायोंके रहनके स्थानमें कुत्ती हुई । एक दिन उस गोष्ठमें भयंकर दावाग्नि लग गयी जिससे वह कुत्ती उसी दावाग्निमें जल गयी ॥ ३२ ॥ और मरकर मण्डूकग्राममें रहनेवाले त्रिपद नामक धोवरको मण्डूकी नामक स्त्रीसे पूतिगन्धिका नामक पुत्री हुई ॥ ३३ ॥ अपने पापके उदयसे माताने उसे छोड़ दिया अर्थात् उसकी माता मर गयो जिससे दादीने उसका पालन-पोषण किया। एक दिन इसके घरके उपवनमें यही समाधिगुप्त मुनिराज विहार करते हुए आये और वट वृक्ष के नीचे विराजमान हो गये। रात्रिके समय शीतकी अधिकता देख पूतिगन्धाने उन मुनिराजको जालसे ढक दिया ॥ ३४ ॥ मुनिराज अवधिज्ञानरूपी नेत्रके धारक थे इसलिए उन्हें उसकी दशा देख दया आ गयी। उन्होंने उसे समझाया और उसके पूर्व भव मुनाये जिससे उसने धर्म धारण कर लिया ॥ ३५ ॥ एक धार-यह पूतिगन्धा सोपारक नगर गयी । यहाँ आर्यिकाओंकी उपासना कर वह उन्होंके साध आचाम्ल नामका तप करती हुई १. लोकेशो म०। २. सा यार्तेन ख०,७०, म । ३. जाताथ म०, ५०। ४. सोपानकम् का । ५ समुपास्याम.......।

पष्टितमः सर्गः सुताऽभूदेवसेनायां यक्षिलस्य गृहेशिनः । यक्षाराधनतो लब्धा यक्षदेवी स्वनामतः ॥६३॥ सा यक्षगृहपूजार्थमन्यदा प्रगताऽत्र च । धर्मसेनगुरोरन्ते धर्म शुभाव गौरवात् ॥६॥ आहारदानमस्मै सा पात्रायातिथयेऽन्यदा । दस्वा मक्तिमती कन्या पुण्यवन्धं बबन्ध च ॥६५॥ ससीमिः क्रीडितुं याना कदाचिद्विमलाचलम् । तत्र चाकालवण पीडिता प्राविशद् गुहाम् ॥६६॥ नत्र सिंहन मंत्रस्ता प्रस्ता त्यक्तात्मविग्रहा। बभूव हरिवऽमौ द्विपल्योपमजीविता ॥६७।। ज्योतिलोकमतो गत्वा पल्योपमसमस्थितिः । तच्च्युस्वा पुष्कलावत्यां जम्बूद्वीपस्य भारते ॥६॥ वीतशोकाभिधानायामशोकस्य महीपतेः । श्रीमत्याममवत् कन्या श्रीकान्ता नामतः सुता ॥६॥ जिनदत्तार्यिकोपान्ते विनिष्कम्य कुमारिका । स्नावलि तपः कृत्वा माहेन्द्राधिपतेः प्रिया ॥७॥ भूत्वैकादशपल्यायुर्भुक्त्वा स्वर्गमुखं च्युता । सुज्येष्टायां सुराष्ट्रपु राष्ट्रवर्धनभूभृतः ।।७।। सुसीमा ननयाभूस्त्वं नगरे गिरिपूर्वके । देवो भूत्वा तपः शक्त्या मोक्ष्यसे नृमवे ततः ॥७२॥ निशम्यात्मभवानित्थं सुसीमा सौम्यमानसा । प्रकृष्टासन्ननिष्टेति निष्टितार्थ ननाम सा ॥७३॥ पृष्टी लक्ष्मणया नत्वा जिनः प्रोवाच तद्भवान् । जिनाः सर्वहिता. सर्वे यत्प्रश्नोत्तरवादिनः ॥७॥ द्वीपेऽस्मिन् कच्छकावत्यां सीताया उत्तरे तटे । राजारिष्टपुरे शासीद्वासको वासवोपमः ७५॥ सुमित्राख्या प्रियास्यासौ वन्दितुं साङ्गनो ययौ । गुरुं सागरसेनाख्यं सहस्राम्रवनस्थिम् ॥७६॥ रहता था। उसकी स्त्रीका नाम देवसेना था। ज्वलनवेगाका जीव इन्हीं दोनोंके एक पुत्री हुआ। वह पुत्री चूंकि यमकी आराधनासे प्राप्त हुई थी इसलिए उसका यक्षदेवी यही नाम प्रसिद्ध हो गया ।। ६२-६३ ।। किसी समय वह यक्षदेवी, यक्षगृहकी पूजाके लिए गयी थी। वहाँ उसने धर्मसेन गुरुके समीप बड़े गौरवसे धर्मका उपदेश सुना ॥ ६४॥ किसी दिन उस भक्तिमती कन्याने उक्त मुनिके लिए आहार दान दिया और उसके फलस्वरूप पुण्यवन्ध बॉधा ।। ६५ ॥ किसी समय वह यक्षदेवी सस्त्रियोंके साथ क्रोडा करनेके लिए विमल नामक पर्वतपर गयी थी वहाँ अकाल वर्षासे पीड़ित होकर वह एक गुफामें घुस गयी ॥ ६६ ।। उस गुफामें पहलेसे सिंह बैठा था सो उस सिंहने देखते ही यादेवीको खा लिया। यक्षदेवी अपना शरीर छोड़ हरिवर्प क्षेत्रमें दो पल्यको आयुकी धारक आर्या हुई ॥ ६७ ।। वहाँसे चयकर यह ज्योतिष लोकमें एक पल्यकी आयुवाली देवी हुई। तदनन्तर वहॉसे च्युत हो जम्यूद्वीप सम्बन्धी भरतक्षेत्रके पुष्कलायती देशमें वीतशोका नामक नगरीके राजा अशोककी श्रीमती नामक रानीसे श्रीकान्ता नामकी पुत्री हुई ।। ६८-६९ ॥ श्रीकान्ताने कुमारी अवस्था में ही जिनदत्ता आर्यिकाके पास दीक्षा लेकर रत्नावली नामका तप किया और उसके फल स्वरूप वह माहेन्द्रस्वर्गके इन्द्रको ग्यारह पल्यकी आयुवाली प्रिय देवी हुई । स्वर्गके सुख भोगकर वहाँ से च्युत हुई और मुराष्ट्र देशके गिरिनगरमें राष्ट्रवर्धन राजाको सुज्येष्ठा नामक रानीसे तू मुसीमा नामकी पुत्री हुई है । अव तू तपकी शक्तिसे देव होगी और तदनन्तर मनुप्य पर्याय प्राप्तकर मोक्ष प्राप्त करेगी ।। ७०-७२ ।। इस प्रकार अपने भव श्रवण कर तथा अपना संसार अत्यन्त निकट जानकर मुसीमा वहुत प्रसन्न हुई और उसने कृतकृत्य भगवान् नेमिजिनेन्द्रको नमस्कार किया ।। ७३ ।। तदनन्तर लक्ष्मणा नामक पाँचवीं पट्टरानीने नमस्कार कर भगवानसे अपने पूर्व भव पूछे सो भगवान् उमके पूर्वभव कहने लगे। चूंकि समस्त तीर्थकर भगवान प्रश्नोंका उत्तर, निरूपण करते हैं इसलिए वे सर्वहितकारी कहलाते हैं ||७|| उन्होंने कहा कि इसी जम्बूद्वीपकी सीता नदीके उत्तर तटपर एक कच्छकावती नामका देश है। उसके अरिष्टपुर नगरमें किसी समय इन्द्रकी उपमाको धारण करनेवाला एक वासव नामका राजा रहता था। उसकी मुमित्रा नामकी यल्लमा थी। एक दिन वह अपनी वल्लभाय सहन्नान साथ, ७१० । हरिवंशपुराणे वज्रमुष्टेः मुमदायां सुमतिस्तनयाऽभवत् । 'मुन्दर्यिकया पाचे कृष्वा रत्नावलीतपः ॥५१॥ सा त्रयोदशपल्यायुर्योन्द्राप्राङ्गनाऽमवत् । च्युताऽतो दक्षिणश्रेण्या विजयाधस्य मारते ॥५२॥ नगरे जाम्बवामिग्य जाम्बवस्य रागेशिनः । जाम्बवस्यां प्रियायां रवं जाता जाम्यवती सुता ॥५३॥ तपस्तपस्विनी करवा भूत्वा कल्यामरोत्तमः । युवा नृपारमजो भूत्वा तपसा सिद्धिमेष्यति ॥५४॥ सेरयुक्त स्याकशीतिः शीलालंकृतिशालिनी । प्रणम्य जिनमासीना मन्याना मवनिर्गमम् ॥५५॥ जननानि जिनो पृष्टो विनयेन सुसीमया । समाजनमनोहादजननध्यनिनाऽब्रवीत् ॥५६॥ धातकीखण्डपूर्वार्धमेरुपूर्व विदेहजे । विषय मगलावरयां नगरे रश्नसंचये ॥५७॥ भूपतिर्विश्वसेनोऽभूदार्यास्यानुन्धरीरिता। अमात्यः धावकोऽस्यैव विश्रुतः सुमतिश्रुतिः ॥५॥ पद्ममेनेन निहतोऽयोध्याधिपतिना युधि । विश्वसेनोऽस्य जायाय सोऽमात्यो धर्ममग्रवीत् ॥५९॥ मोहादप्राप्तसम्यक्त्वा विजयद्वारवासिनः । मृरवा ज्वलितवेगाभूद् व्यंतरी विजयस्य सा ॥६॥ दशवर्षसहस्राणि भुक्त्वा तय सुखं ततः । प्युता चिरं परिभ्रम्य मीमं संसारसागरम् ॥६१॥ जम्बूद्वीपविदेहेऽतः सीताया दक्षिणे तटे । रम्ये रम्यामिधे क्षेत्रे शालिग्राम महाधने ॥२॥ पुण्डरीकिणी नामक विशालपूरीमें वनमुनिको सुभदा स्रीसे सुमति नामकी पुत्री हुई । वहाँ उसने सुन्दरी नामक आर्यिकासे प्रेरित हो उनके समाप रत्नावली नामका तप किया जिसके प्रभावसे मरकर वह तेरह पल्यको आयुकी धारक ब्रह्मन्द्रकी प्रधान इन्द्राणी हुई । तदनन्तर वहॉ से भी च्युत होकर भरतक्षेत्र सम्बन्धी विजया पर्वतको दक्षिण श्रेणीमें जाम्बव नामक नगरके विद्याधर राजा जाम्बवकी जाम्बवती नामक रानीसे तू जाम्बवती नामकी पुत्री हुई ॥४८-५३ ।। इस भवमें तू तपस्विनी होकर तप करेगी और स्वर्गका उत्तम देव होकर यहाँसे च्युत हो राजपुत्र होगी । तदनन्तर तपके द्वारा मोक्षको प्राप्त होगी ॥ ५४॥ इस प्रकार भग- धानके द्वारा अपने पूर्वभव कहे जानेपर जिसका सव संशय दूर हो गया था तथा जो शील रूपी अलंकारसे सुशोभित थी ऐसी जाम्बवती रानी जिनेन्द्र देवको प्रणाम कर 'मैं संसारसे पार हो गयी' ऐसा मानती हुई सुखसे आसीन हुई ।। ५५ ।। तदनन्तर मुशीला नामक चौथो पट्टरानीने विनयपूर्वक जिनेन्द्र भगवानसे अपने भवा- न्तर पूछे सो भगवान् सभासदोंके मनको आनन्द उत्पन्न करनेवाली दिव्यध्वनिसे उसके भवान्तर इस प्रकार वर्णन करने लगे- धातकीखण्ड द्वीपके पूर्वार्धमें जो मेरु पर्वत है उससे पूर्वको ओरके विदेह क्षेत्रमें एक मङ्गलायती नामका देश है। उसके रनसञ्चय नामक नगरमें किसी समय विश्वसेन राजा रहता था उसकी स्त्रीका नाम अनुन्धरी था। इसी राजाका एक सुमति नामका प्रसिद्ध मन्त्री था जो श्रावक धर्मका प्रतिपालक था ॥ ५६-५८ ॥ कदाचित् अयोध्याके राजा पद्मसेनने राजा विश्वसेनको युद्ध में प्राणरहित कर दिया जिससे उसकी स्त्री अनुन्धरी बहुत दुःखी हुई । सुमति मन्त्राने उसे धर्मका उपदेश दिया परन्तु मोहके कारण यह सम्यग्दर्शनको प्राप्त नहीं हो सकी और आयुके अन्तमें मरकर विजयद्वारपर निवास करनेवाले विजय नामक व्यन्तर देवकी ज्वलनवेगा नामकी व्यन्तरी हुई ।। ५६-६० ।। दश हजार वर्ष तक वहाँ के मुख भोगकर वह वहाँसे च्युत हुई और चिरकाल तक भयंकर संसार-सागरमें परिभ्रमण करती रही ॥६१ ॥ तदनन्तर जम्बूद्वीपके विदेह क्षेत्रमें सीता नदीके दक्षिण तटपर एक रम्य नामका मुन्दर क्षेत्र है । उसके महाधनसम्पन्न शालिग्राम नामक नगरमें एक यक्षिल नामका गृहपति १. सुन्दर्यायिकायाः ख०१२ विजयो म० (१) । ३. विदेहेन्त म०।

पष्टितमः सर्गः । ततश्चात्रोत्तरश्रेण्या पुरै गगनवल्लभे । विद्युद्वेगस्य कन्याऽभूद्विद्युन्मत्यां महाद्युतिः ।।८।। विनयश्रीगुणैः ख्याता मित्यालोकपुरशिन 1 महेन्द्र विक्रमस्यैषा योपिद्गुणसमन्विता ॥१०॥ चारणश्रमणाम्यां तु धर्म श्रुत्या स मन्दरे । राज्य नियोज्य निष्क्रान्तो नन्दनं हरिवाहनम् ॥११॥ विनयश्रीस्तु कृत्वाऽमी सर्वममुपोषितम् । पञ्चपल्यस्थितिर्जाता सौधर्मेन्द्रस्य वल्लमा ॥२२॥ पुयां त्वं पुष्कलावत्यां गान्धारपु दिवश्च्युता । गान्धारीन्द्रगिरे राजो मेरमत्यामभूत्सुता ॥१३॥ तृतीयमवसिद्धिस्त्वमित्युत्ने सानमन्जिनम् । गौर्या विज्ञापितो नवा तद्भवानाह विश्ववित् ॥९॥ इभ्यस्येम्यपुरंऽत्राभूद्धनदेवस्य कामिनी । यशस्विनी स्थिता हम्य चारणौ वीक्ष्य साम्बरं ॥१५॥ सस्मार स्वमवान् सर्वान् धातकोखण्डमण्डले । पूर्वस्य मन्दरस्यासं विदेहेष्वपरवहम् ॥१६॥ आनन्दप्रेष्टिन; पत्नी नन्दशीकपुरेऽहंत । मितसागरनाम्नेऽत्र दानं दस्या समत का ॥९७॥ पञ्चाश्चर्याप्यहं प्रापं कृतानि निदर्शर्मुदा । पीत्वाकाशोदकं भर्ता सविषं मृतवत्यमा ॥९॥ भूत्वा देवकुरवासमैशानेन्द्रप्रिया ततः । जातानाहमिति ज्ञात्वा सा संवेगपरा यतिम् ॥९९।। नरवा मुमद्रनामानं प्रोपधव्रतमग्रहीत् । मृत्वा शक्रस्य देण्यासीपञ्चपल्यसमस्थितिः ॥१०॥ हुई ।।८।। तदनन्तर इसी विजयार्धकी उत्तर श्रेणीमें गगनवल्लभ नगरके स्वामी राजा विद्युद्वेगकी विद्युन्मती नामक रानीसे महाकान्तिकी धारक विनयश्री नामको कन्या हुई। यह कन्या गुणोंसे अत्यन्त प्रसिद्ध थी और नित्यालोक नगरके स्वामी राजा महेन्द्र विक्रमकी गुणवती स्त्री हुई। कदाचित् सुमेरु पर्वतपर चारण ऋद्धि के धारक युगल मुनियोंसे धर्म श्रवण कर राजा महेन्द्रविक्रम संसारसे विरक्त हो गया और उसने हरिवाहन नामक पुत्रको राज्य कार्य में नियुक्त कर दीक्षा धारण कर ली ।।८९-९१॥ विनयश्रीने भी संसारमे विरक्त हो सर्वभद्र नामक उपवास किया और उसके प्रभावसे वह पाँच पल्यकी स्थितिकी धारक सौधर्मेन्द्रकी देवी हुई ॥१२॥ अव तू स्वर्गसे च्युत होकर गान्धार देशकी पुष्कलावती नगरीमें राजा इन्द्रगिरिको मेरुमती नामक रानीसे गान्धारी नामकी पुत्री हुई है ।।१३।। तू तीसरे भवमें मोक्ष प्राप्त करेगी। इस प्रकार अपने भवान्तरके कहे जानेपर गान्धारीने जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार किया। तदनन्तर कृष्णकी सातवीं पट्टरानी गौरीने नमस्कार कर अपने पूर्वभव पूछे सो समस्त पदार्थोंको जाननेवाले भगवान् इस प्रकार उसके पूर्वभव कहने लगे ॥१४॥ इस भरत क्षेत्रके इभ्यपुर नगरमें किसी समय धनदेव नामका एक सेठ रहता था। उमकी यशस्विनी नामकी स्त्री थी। एक दिन यशस्विनी अपने महलकी छतपर खड़ी थी यहाँ उसने आकाशमें जाते हुए दो चारण द्धिधारी मुनि देखे ॥२५।। उन्हें देखते उसे अपने ममस्त पूर्वभवांका स्मरण हो गया। उसे मालूम हो गया कि मैं धानकीराण्ड द्वीप पूर्व मेरको पश्चिम दिशामें विद्यमान विदेह क्षेत्र अन्तर्गत नन्दशोक नामक नगरमें आनन्द नामक सेठको पन्नी थी। वहाँ मैंने अपने पनिके साथ, मितमागर नामक मुनिराज लिए आहार दान दिया। जिसके फलस्वरूप मैंने हर्षपूर्वक देवोंके द्वारा किये हुए पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये थे। फटाचिन् हम दोनोंने आकाशसे पड़ना हुआ वर्षाका पानी पिया। यह पानी विप- सहिन था इसलिए पनिके साथ मेरा मग्ण हो गया १२६-२८1मरफर मैं देयकुरमें आयी दुई। उमफे पाद ऐशानेन्द्रकी प्रिया हुई और उसके याद यहाँ याम्बिनी हुई है। इस प्रकार जानकर संमारमे भयभीत होनी हुई यशस्विनीने मुभद्र नामक मुनिराजको नमस्कार कर उनसे प्रोपधान ग्रहण किया। नदनन्तर मरफर पाँच पायकी आयुकी धारक प्रथम म्याफे १. समजा, नेमिजिनेन्द्रः।

७१३ हरिवंशपुराणे धर्म श्रुत्वा गुरो राजा राज्ये विन्यस्य देहजम् । वसुसेनमदीशिष्ट न पत्नी पुत्रमोहतः ॥७॥ पतिपुत्रवियोगोग्रशोकदुःखहता मृता। 'पुलिन्दीत्वं गता दृष्ट्वा नन्दिभद्रं खचारणम् ॥७॥ अवधिज्ञानिनं श्रुत्वा तस्मात्पूर्वमवं हि सा । स्मृतपूर्वमवा मृत्वा त्रिदिनानशनव्रता ॥७९॥ नारदस्यामवद्देवी नामतो मेधमालिनी । च्युन्वा च मरतक्षेत्रे रौप्यारेदक्षिणे तटे ॥८॥ सानुन्धयां महेन्द्रस्य पुरे चन्दनपूर्वके । सुता कनकमालाभूद्विद्याधरमनोहरा ।। हरिवाहनविद्येशं महेन्द्रनगरेश्वरम् । वृत्वा स्वयंवरे कन्या मान्या जाताऽस्य वल्लमा ॥४२॥ भन्यदा चैत्यपूजार्थ सिद्धकूटमियं गता 1 श्रुत्वा च चारणाज्जातिमार्या मुक्तावली तपः ।।८।। कृत्वा सनत्कुमारेन्द्रवलमाऽभून सुराङ्गना । नवपल्योपमायुष्का सौख्यं भुक्त्वा ततश्च्युता ॥८॥ जाताऽत्र श्लक्ष्णरोम्णस्त्वं कुरुमत्यां सुता भवे । तृतीये मुक्तिरित्युक्ते लक्ष्मणा प्रणता प्रभुम् ॥४५॥ स गान्धार्या कृते प्रश्ने तद्भवान्मगवान् जगौ । नगयों कोशलेवासीदयोध्यायां महीपतेः ।।८।। महिषी रुदत्तस्य विनयश्री श्रुताख्यया । श्रीधराय ददौ दानं पत्या सिद्धार्थके वने १८७।। मृत्वोत्तरकुरुष्वासीदानापल्यत्रयस्थितिः । पल्याष्टमागतुल्यायुः सातश्चन्द्रमसः प्रिया ll वनमें स्थित सागरसेन नामक मुनिराजकी वन्दना करनेके लिए गया ॥७५-७६॥ राजा वासव, मुनिराजसे धर्मश्रवण कर विरक्त हो गया और वसुसेन नामक पुत्रको राज्यभार सौपकर दीक्षित हो गया। राजा तो दीक्षित हो गया परन्तु पुत्रके मोहसे रानी सुमित्रा दीक्षा नहीं ले सकी ।।७।। कदाचित् पुत्रका भी वियोग हो गया अतः पति और पुत्रके वियोगजन्य तीव्र शोकसे उत्पन्न दुःखसे पीड़ित होकर वह मर गयी और मरकर भीलिनी पर्यायको प्राप्त हुई। एक दिन उस भीलिनीने अवधिज्ञानके धारक नन्दिभद्र नामक चारण ऋद्विधारी मुनिराजके दर्शन कर उनसे अपने पूर्वभव सुने। पूर्वभवोंको स्मरण कर उसने तीन दिनका अनशन किया और मरकर नारद नामक देवकी मेघमालिनी नामकी श्री हुई। वहाँसे च्युत होकर भरत क्षेत्रके दक्षिण तटपर चन्दनपुर नामक नगरमें राजा महेन्द्रको अनुन्धरी रानीसे विद्याधरोंके मनको हरण करनेवाली कनकमाला नामकी पुत्री हुई ॥७८-८१।। फनकमाला स्वयंवरमें महेन्द्र नगरके राजा हरिवाहन विद्याधरको परकर उसकी माननीय वल्लभा हो गयी ।।८।। किसी समय कनकमाला जिन-प्रतिमाओंकी पूजा करनेके लिए सिद्ध- फूट गयी थी । यहाँ चारण ऋद्धिके धारक मुनिराजसे अपने पूर्वमव श्रवणकर वह आर्यिका हो गयी और भुक्तावली नामका तप कर सनत्कुमार स्वर्गके इन्द्रकी प्रिय देवी हुई । वहाँ उसकी नी पल्यकी आयु थी। मुख भोगकर वह वहाँसे च्युत हो यहाँ राजा श्लक्ष्णरोमको कुरुमती रानीसे लक्ष्मणा नामकी पुत्री हुई है। तीसरे भवमें तेरी मुक्ति होगी। इस प्रकार मवान्तर कहे जानेपर लक्ष्मणा रानीने भगवान् नेमि जिनेन्द्रको नमस्कार किया ॥८३-८५।। तदनन्तर कृष्णकी छठी पट्टरानी गान्धारीके द्वारा प्रश्न किये जाने पर भगवान् उसके पूर्वभव कहने लगे। उन्होंने कहा कि कोशल देशको अयोध्या नगरीमें किसी समय रुद्रदत्त नामका राजा रहता था। उसकी विनयश्नी नामकी रानी थी। उसने एक समय सिद्धार्थक नामक वनमें अपने पतिके साथ, श्रीधर नामक मुनिराजके लिए आहार दान दिया ॥८६-८७॥ दानके प्रभावसे मरनेके बाद वह उत्तरकुरुमें सीन पल्यकी आयुको धारक आयां हुई। उसके बाद पल्यके आठवें भाग बरावर आयुको धारक चन्द्रमाको प्रिया १. रायगैरयां । २. चारणमुनि । ३. मृत्या निन्दितानयनत्रता म०1४. कृपया म.

पष्टितमः सर्गः ७१५ २ क्षुत्पीडिता जनास्तन्त्र दिग्मूढा मूढबुद्धयः । मृगा इव मृता दुःसात् किंपाकफलमक्षिणः ॥११॥ अनास्वाद्य फलान्येपा'पद्मदेवी दृढव्रता । प्रत्याख्यायकपल्यायुरन्ते हैमवतेऽभवत् ॥११५॥ देवी स्वयंप्रमस्यातो व्यन्तरस्य स्वयंप्रमा । स्वयम्भूरमणद्वीपे स्वयंप्रमगिरावभून् ॥११६॥ ततश्चागत्य मरते जयन्तनगरेशिनः । श्रीमत्यां विमल श्रीः सा श्रीधरस्य भुतामवत् ॥११७॥ प्रादायि मंघनादाय सा भदिलपुरेशिने । लेभे च तनयं ख्यातं मेघवोपाण्ययाऽवनी ॥११८॥ भर्तरि स्वर्गते साऽपि पद्मावत्यार्यिकान्तिक । भाचाम्लवर्धमानाख्यं तपः कृत्वा दिवं ययौ ॥१९॥ सा सहस्त्रारकल्पस्य पत्युभूत्वाकामिनी । नवपञ्चकपल्यैस्तु तुल्यं कालमजीगमत् ॥१२०॥ जातास्यन्न ततश्च्युत्वा स्वमरिष्टपुरेशिनः । श्रीमत्यां स्वर्णनाभस्य सुता पद्मावती श्रुना ॥१२१॥ तपसा नाकमारुह्म देवश्च्युत्वा तपोबलात् । सेत्स्यति त्वमिति प्रोक्ने ध्रुस्वा सा जिनमानमत् । १२२॥ रोहिणोदेवकीपूर्वा देव्योऽन्येऽपि च यादवाः । पृष्ट्वा श्रुत्वा स्वजन्मानि जाता संसारमीरवः ॥१२३॥ नुत्वा नवा जिनेन्द्रं तं सुराऽसुराश्च यादवाः। यान्ति स्वस्थानमायान्ति पूजनार्थ पुनः पुनः।१२४॥ विजहार पुनर्देशान् जिनो मव्यहिताय सः । सूर्यस्येव हि चर्यासीजगरकार्याय मवी ॥१२॥ इतश्च वसुदेवामं वासुदेवमन:प्रियम् । मुतं गजकुमाराख्यं देवकी सुपुवे शुभम् ॥१२६॥ उसके बन्धनमें स्थित शाल्मलीखण्ड ग्रामकी समस्त जनता छूटकर शरणरहित वनमें इधर- उधर भ्रमण करने लगी ॥ ११३ ॥ मूढबुद्धि लोग दिशाभ्रान्ति होनेसे उस बनमें मृगोंकी भाँति भटक गये और भूखसे पीड़ित हो किंपाक फल खाकर दुःखसे मर गये ॥ ११४ ।। पदादेवी अपने व्रतमें दृढ़ थी इसलिए उसने अज्ञात फल होनेसे उन फलोंको नहीं खाया और संन्यास मरण कर वह अन्तमें हैमवत क्षेत्रमें एक पल्यको आयुवाली आर्या हुई ॥ ११५ ।। तदनन्तर स्वयंभूरमण द्वीपके स्वयंप्रभ नामक पर्यतपर स्वयंप्रभ नामक व्यन्तर देवकी स्वयंप्रभा नामकी देवी हुई ॥११६ ।। वहाँसे आकर भरत क्षेत्रसम्बन्धी जयन्त नगरके स्वामी राजा श्रीधरकी श्रीमती नामक रानीसे विमलश्री नामकी पुत्री हुई ।। ११७ ।। विमलश्री, भद्रिलपुरके राजा मेघनादके लिए दी गयो । उसके संयोगसे उसने पृथिवीपर मेघघोप नामसे प्रसिद्ध पुत्र प्राप्त किया ॥ ११८॥ कदाचित् पतिका स्वर्गवास हो जानेपर उसने पद्मावती आर्यिकाके समीप दीक्षा लेकर आचाम्लवर्धननामका तप तपा और उसके प्रभावसे वह स्वर्ग गयी ।। ११९ ।। स्वर्ग में वह सहस्रार स्वर्गके इन्द्रकी प्रधान देवी हुई और पैंतालीस पल्य प्रमाण वहाँका काल व्यतीत करती रही ॥ १२० ।। अब वहाँसे च्युत होकर तू अरिष्टपुरके राजा स्वर्णनाभको श्रीमती रानीसे पद्मावती नामकी पुत्री हुई है ।। १२१ ।। तपकर तू स्वर्गमें देव होगी और वहाँ से च्युत हो तपके सामर्थ्यसे मोक्ष प्राप्त करेगी। इस प्रकार कहे जानेपर अपने भवान्तर सुन पद्मावतीने नेमि जिनेन्द्रको नमस्कार किया ।। १२२ ॥ रोहिणी, देवकी आदि देवियों और अन्य यादवोंने भी अपने-अपने भव पूछे तथा श्रवण कर वे संसारसे भयभीत हुए । १२३ ।। इस प्रकार सुर, असुर तथा यादव लोग जिनेन्द्र भगवानको स्तुति कर तथा उन्हें नमस्कार कर अपने-अपने स्थानपर चले जाते थे और पूजाके लिए बार-बार आ जाते थे ।। १२४ ।। तदनन्तर नेमि जिनेन्द्रने भव्य जीवोंके हितके लिए पुनः अनेक देशोंमें विहार किया सो ठीक ही है क्योंकि उनकी चर्या सूर्यके समान जगत्के हित के लिए ही थी ।। १२५ ॥ इधर देवकीने कृष्णके पश्चात् गजकुमार नामका एक दूसरा पुत्र उत्पन्न किया जो वसु- देयके ममान कान्तिका धारक था, श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय था एवं अत्यन्त शुभ था ॥१२६|| १ पद्मादेवी म० । २. बुद्ध्वा म० । ३. विभोरियं वैभवी ।

१४ हरिवंशपुराणे घ्युत्वाऽभूदिह कौशाम्ब्यां सुमित्रायां सुमद्रतः । इभ्याद्धर्ममतिर्माना कन्या धर्ममतिः सदा ॥१०॥ जिनमत्यापिकापावें तपो जिनगुणाभिधम् । गृहीत्वोपोप्य जातासि महाशुक्रेन्द्रबलमा ॥१०॥ एकविंशतिपल्यायुश्च्युत्वा चन्द्रमतिस्त्रियाम् । गौरी त्वं वीतशोकायां मेरुचन्द्रादभूत्सुता ॥१.३॥ मवैः सिदिखिमिस्ते स्यादित्युक्ते सा नता विभुम् । प्रणिपन्य ततः पृष्टः पद्मावस्या भवान् जगौ॥१०४॥ उज्जयिन्यामिहैवासीदपराजितभूभृत. । तनया विनयश्रीः सा विजयावनितागजा ॥१०५॥ हस्तिशोषपुराधीश हरिषेणमसौ पतिम् । प्राप्ता पतियुता दानं घरदत्ताय संददौ ॥१०॥ कालागुरकधूपेन भर्ना गर्मगृहे मृता । भूत्वा हैमवते भुक्त्वा सखं पल्यसमस्थितिः ॥१०॥ जाता चन्द्रप्रभादेवी ततश्चन्द्रस्य बलमा । पल्योपमाष्टमागायुरतश्च्युत्वा तु भारते ॥१०॥ ग्रामेऽभूच्छाल्मलीखण्डे मगधेषु गृहेशिनोः । दुहिता पद्मदेवीति देविलाजयदेवयोः ॥ ३०९॥ 'याचार्यावरधर्माख्यादेकदा व्रतमग्रहीत् । यावजीवं न मक्ष्यं मे फलमज्ञातमप्यसौ ॥१०॥ प्रचण्ड: शाल्मलीखण्डे प्रामेऽवस्कन्ददानतः । प्रकाण्डे चण्डवाणाख्यो ध्याधमुख्योऽहरञ्जनम् ॥११॥ वन्दिगेहें गृहोग्या ना पनदेवीं स्वदारताम् । निनोपुः शीलवत्यासौ प्रत्याख्यातोऽनया नयात्।११२१ स राजगृहनाभेन राज्ञा सिंहरथेन तु । हडेन निहतोऽरण्यं शरण्ये जनताऽभ्रमत् ।।११३॥ इन्द्रकी इन्द्राणी हुई ॥९९-१००। वहाँ से च्युत हो कौशाम्बी नगरीमें सुभद्र सेठकी सुमित्रा नामक स्त्रीसे सदा धर्ममें बुद्धि लगानेवाली धर्ममति नामकी कन्या हुई ।।१०१॥ धर्ममतिने जिनमति आर्यिकाके पास जिनगुण नामका तप लेकर उपवास किये और उनके फलस्वरूप वह महाशुक स्वर्गके इन्द्रकी वल्लभा हुई ॥१०२॥ वहाँ उसकी इक्कीस पल्यकी आयु थी। वहाँ से च्युत होकर अब तू वीतशोका नगरीमें राजा मेरुचन्द्रकी चन्द्रमति स्त्रीसे गौरी नामकी पुत्री हुई है ॥१०३।। तीन भवमें तुझे मुक्तिकी प्राप्ति होगी। इस प्रकार कहे जानेपर गौरीने नम्रीभूत होकर भगवानको प्रणाम किया। तदनन्तर कृष्णकी आठवीं पट्टरानी पद्मावतीने भी अपने पूर्वभव पूछे जिसके उत्तरमें भगवान उसके पूर्वभव इस प्रकार कहने लगे ॥१०४|| इसी भरत क्षेत्रकी उज्जयिनी नगरीमें किसी समय अपराजित नामका राजा रहता था। उसकी स्त्री विजया थी और उन दोनोंके विनयश्री नामकी पुत्री थी ॥१०५।। विनयश्री हस्तिनापुरके राजा हरिषेण पतिको प्राप्त हुई थी अर्थात् उसका विवाह हस्तिनापुरके राजा हरिपेणके साथ हुआ था। एक दिन उसने पतिके साथ, वरदत्त मुनिराजके लिए आहार दान दिया ।।१०।। कदाचित् वह अपने पति के साथ गर्भगृहमें शयन कर रही थी कि कालागुरुको धूपसे उसका प्राणान्त हो गया। मरकर वह हेमवत क्षेत्रमें एक पल्यकी आयुयाली आर्या हुई । यहाँ के मुख भोग कर वह चन्द्रदेवको चन्द्रप्रभा नामकी देवी हुई। यहाँ पल्यके आठवें भाग उसको आयु थी। यहाँसे च्युत हो भरतक्षेत्रके मगध देशसम्बन्धी शाल्मली सण्ड नामक प्राममें देविला और जयदेव नामक दम्पतीके पद्मदेवी नामको पुत्री दुई ।।१०७-१०९।। एक समय उसने घरधर्म नामक आचार्यसे यह प्रत लिया कि मैं जीवन पर्यन्त अशात फलका भक्षण नहीं करूँगी ।। ११०॥ किसी एक दिन असमयमें चण्डयाण नामक शक्तिशाली भील शाल्मली खण्ड प्रामपर आक्रमण कर यहाँको ममस्त प्रजाको हर ले गया ॥ १११ ।। माथ ही पादेयीको भी पकड़कर अपने कारागारमें ले गया। वह उसे अपनी ग्री यनाना चाहता था परन्तु शोलयती पद्मदेवीने किमी नीतिसे उसका निराकरण कर दिया ॥ ११२॥ उमी ममय राजगृह के राजा सिंहरथने हठपूर्वक उस भीलको मार डाला जिमसे १ नु. २, भाचानधर्मास्यात् ., स., ग०, १०, आचार्यारधारयात् प० । १.अपरग्रामसीम.,.,म...1४. परदनामत. म.,००। ५. स्तरण्ये का।

पष्टितमः सर्गः ७१७, विमलोऽनन्तजिद्धमः शान्तिः कुन्थुररो जिनः ! मल्लिः शल्यकुशोद्धारो मुनीन्द्रो मुनिसुव्रतः॥१४०॥ नमिश्च निनो नेमितमानोऽहमत्र तु । पाश्वश्चापि महावीरो मवितारी जिनेश्वरी ॥११॥ जम्बूद्वीपविदेहऽष्टौ भरते पञ्च ते जिनाः । सप्तव धानकोरसण्डे चत्वारः पुष्कराधंजाः ॥१४२॥ माग्भवे पुण्डरीकिण्यां वृपमः शान्तिरीश्वरः । अजितस्तु सुसीमायां क्षेमपुर्यामरो जिनः ॥१४॥ रवमय यजः कुन्धुः समवश्वामिनन्दनः । मल्लिश्च वीतशोकायां जम्बूद्वीपविदहजाः ॥१४॥ चम्पायामिह कौशाम्ब्यां गजादनगरेऽपि ते-ऽयोध्यायां मरनक्षेत्रे छत्राकारपुरे फ्रमात् ॥१५॥ मुनिसुव्रतनाथश्च नमिमिजिनस्तथा । पावास्यश्च महावीरः पञ्चामी पूर्वजन्मनि ॥ १४६॥ पुण्डरीकिण्यखण्डनीः मुसीमाक्षेमपुर्यपि । धातकीमण्डपूर्वाघे सक्रमं रत्नमञ्चयम् ॥१७॥ सुमरयादिचतुर्णा च पुरः पूर्वत्र जन्मनि । मुविध्यादिचतुर्णा च पूर्वपुष्करजास्वमू ॥१८॥ तथैव धातकीसपनु पश्चादेरावनक्षिती । अनन्तजिदभूपूर्वमरिष्टपुरसंभवः ॥१४९॥ पूर्वार्धमारते तस्य विमलस्तु महापुरे । महिलादौ पुरं धर्मस्नत्र नामान्यमूनि तु ॥१५॥ वजनामिरभूदाद्यो विमलस्तदनन्तरः । विपुली वाहनान्तोऽन्यो महाबल इतीरितः ।।१५१।। परोऽतिवल इत्यासीदपराजित इन्यतः । नन्दिपेणस्तथा पद्मो महापद्मः स्मृतः परः ॥१५२॥ पद्मगुल्मोऽपि नलिनगुल्मः पद्मोत्तरः परः । पद्मासनः पुनः पद्मस्तथा दशरथो नृपः ॥१५३॥ राजा मघरयः सिंहरथो धनपतिः परः । नान्ना वैध्रवणो राजा श्रीधर्माख्यस्ततः परः ॥१५॥ पामुपूज्य, विमलनाथ, अनन्तजित्, धर्मनाथ, शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ, शल्यरूपी कुशको निकालनेवाले मल्लिनाथ, मुनियों के स्वामी मुनि मुव्रतनाथ और नमिनाथ तीर्थकर हुए हैं। ये सभी निर्वाणको प्राप्त हो चुके हैं। वाईसवाँ तीर्थकर मैं नेमिनाथ अभी वर्तमान हूँ और पार्श्वनाथ तथा महायीर ये दो तीर्थकर आगे होंगे ।। १३८-१४१ ॥ इन तीर्थ- करों में से आठ तीर्थकर पूर्वभयमें जम्बूद्वीपके विदेहक्षेत्र में पाँच भरतक्षेत्रमें, सात धातकी- खण्डमें और चार पुष्करार्धमें उत्पन्न हुए थे ।। १४२ ।। जम्बूद्वीपके विदेह क्षेत्र में उत्पन्न हुए आठ तीर्थङ्करोंका विवरण इस प्रकार है-वृषभनाथ और शान्तिनाथ पूर्वभवमें जम्बूद्वीपसम्बन्धो विदेहक्षेत्रको पुण्डरीकिणी नगरीमें, अजितनाथ मुमीमा नगरीमें, अरनाथ क्षेमपुरीमें, कुन्थुनाथ, मंभवनाथ और अभिनन्दननाथ रत्नमंचय नगरमें और मल्लिनाथ बीतशोका नगरीमें उत्पन्न हुए थे ।। १४३-१४४ ॥ भरनक्षेत्रमें उत्पन्न हुए पाँच तीर्थकर इस प्रकार है-मुनि मुव्रतनाथ चम्पापुरीमें, नमिनाथ कौशाम्बी नगरीमें, नेमिनाथ हस्तिनापुरमें, पार्श्वनाथ अयोध्या और महावीर छत्राकारपुरमें पूर्वभयमें उत्पन्न हुए थे ।। १४५-१४६॥ धातकीम्बण्ड द्वीपके पूर्वार्धमें जन्म लेनेवाले मुमनिनाथ, पद्मप्रभ, मुपाय- नाथ और चन्द्रप्रभ, इन चार तीर्थकरोंको पूर्वभवको नगरियाँ क्रमसे अम्बण्ड लामीको धारक पुण्डरीफिणीपुरी, सुमीमापुरी, क्षेमपुरो और रत्नसंचयपुरी थीं। मुविधिनाथ, शीतलनाथ, श्रेयोनाथ और वासुपूज्य इन चार तीर्घरोकी पूर्व जन्मको नगरियाँ क्रममे पूर्व पुष्कराधसम्बन्धी पुण्डरीकिणी, मुसीमा, क्षेमपुरी और रत्नसंचयपुरी थी ॥ १४७-१४८ ॥ अनन्तजिन् (अनन्तनाध) भगवान पूर्वभवमें धानकोखण्ड द्वीपके पश्चिम ऐरावन क्षेत्र- सम्यन्धी अरिप्टपुर नगरमें उत्पन्न हुए थे ।। १४९ ॥ विमलनाथ पूर्वार्धमम्बन्धी भरन- क्षेत्रके महापुर नगरमें और धर्मनाय भदिलपुर नगरमें उत्पन्न हुए थे। इन तीथंकरोंके पूर्य- भवफे नाम इस प्रकार हैं-१. अनाभि, २. विमल, ३. विपुलवाहन, ४. महाबल, ५. अतियल, ६. अपराजित, ७. नन्दिपेन, ८. पद्म, ९. महापा, १०. पद्मगुन्म, ११. नलिनगुल्म, 4 १.६६म..

। सोमा नामको अत्यन्त सुन्दर कन्या थी जो उसको क्षत्रिया स्त्रीसे उत्पन्न हुई थी। श्रीकृष्णाने गजकुमारके लिए उसका भी चरण किया ।। १२८ ।। जब उसके विवाह के प्रारम्भका समय हो गये तब समस्त यादव अनेक मङ्गल द्रव्य लिये हुए उनकी वन्दना करने के लिए नगरसे वाहर निकले ।। १३० ।। द्वारिकामें होनेवाले इस आटोप (हलचल) को देखकर गजकुमारने किसी फञ्चकीसे पूछा और प्रारम्भसे ही जिनेन्द्र भगवान्की समस्त हितकारी चेष्टाको जान लिया ॥ १३१ ॥ तदनन्तर गजकुमार भी पैसे रोमाञ्च धारण करता हुआ सूर्यके समान आईन्त्य लक्ष्मीसे युक्त तथा बारह सभाओंसे घिरे हुए जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार कर गज- मुर तथा असुरोंकी उस सभामें उस धर्मका निरूपण किया जो संसार-सागरसे पार होनेका भगवानको नमस्कार कर श्रोताओंके हितकी इन्छासे तीर्थ करों, चक्रवर्तियों, अर्ध चक्रवर्तियों, पायास तीर्थकरांको उत्पत्ति इस प्रकार कहने लगे ॥ १३७ ।। उन्होंने कहा कि इस युगमें मयसे पहले तीर्थकर पृषभ नाथ हुए उनके पश्चात् कमसे अजितनाथ, संभवनाथ, अभि. १.निया म.। २. या म...वीयकृताम् । ४, नारायणानाम् । ५. मलमद्राणाम्। हरिवंशपुराणे यौवनं स परिप्राप्तः कन्याजनमनोहरम् । ततोऽस्मै वरमाञ्चक्र चक्री राजकुमारिकाः ।।१२७॥ अमिरूपतरां कन्यां सोमशर्माग्रजन्मनः । प्रजातां क्षत्रियायां च सोमारया वृतवान् हरिः ॥२५॥ विवाहारम्भसमय मुदिताखिलयादवे । जाते जिनपतिः प्राप्तो विहरन् द्वारिकां तदा ॥१२९।। समागत्योपविष्टं तमद्रो रैवतिकै विभुम् । वन्दितुं 'निर्ययुः सर्वे यादवा बहुमङ्गलाः ॥१०॥ दृष्ट्वा गजकुमारस्तमाटोपं द्वारिकोद्भवम् । पृष्ट्वा काकिन जैनं विवेद हितमादितः ॥१३१॥ ततो गजकुमारोऽपि प्रयातो वन्दितुं जिनम् । रथेनादित्यवर्णेन हर्षाद्रोमाञ्चमुहन् ॥१३२॥ पाहत्यविभवोपेतं गणेदशमितम् । जिनं नवोपविष्टोऽसौ कुमारचक्रपाणिना ॥१३३॥ जगाद भगवांस्तत्र नृसुराऽसुरसंसदि । संसारतरणोपायं धर्म रखत्रयोज्ज्वलम् ॥१३॥ प्रस्तावे हरिरमाक्षीजिनेन्दं प्रणिपत्य सः । अत्यन्तादरपूर्णेच्छः श्रोतृलोकहितेच्छया ॥१३५॥ अर्हतो चक्रिणामधंचक्रिणां सीराधरिष्णाम् । उत्पत्ति प्रतिशत्रूणां जिनानामन्तराणि च ॥३६॥ यथाप्रश्नमितस्तस्मै संभूति विष्णवे ततः । त्रिपष्टियुगमुख्यानां प्रोवाच पुरुषेशिनाम् ॥१३०१ आद्यो वृपमनाथोऽभूदजितः संभयः प्रभुः । अमिनन्दननाथश्च सुमतिः पद्मसंप्रमः ॥१३८॥ मुपाश्र्धनामधेयोऽन्यश्चन्द्रप्रम इतीश्वरः । सुविधिः शीतलः श्रेयान् वासुपूज्यश्च पूजितः ॥१३९॥ जब गजकुमार कन्याओंके मनको हरण करनेवाले यौवनको प्राप्त हुआ तब कृष्णने उत्तमोत्तम राजकुमारियोंके साथ उसका विवाह कराया ॥ १२७ । सोमशर्मा ब्राह्मणको एक आया तव समस्त यादव अत्यन्त प्रसन्न हुए और उसी समय विहार करते हुए भगवान नेमिनाथ द्वारिकापुरो आये ।। १२९ ॥ जब भगवान आकर गिरनार पर्वतपर विराजमान कुमार श्रीकृष्णके साथ मनुष्योंकी सभामें बैठ गया ।। १३३ ।। भगवान नेमि जिनेन्द्रने, मनुष्य, उज्वल था ॥ १३ ॥ अयसर आनेपर अत्यन्त आदरसे पूर्ण इच्छाके धारक श्रीकृष्णने जिनेन्द्र बलभद्रों और प्रतिनारायणों की उत्पत्ति तथा तीर्थंकरों के अन्तरालको पूछा ॥ १३५-१३६ ॥ तदनन्दर भगवान प्रश्नके अनुसार श्रीकृष्णके लिए वेशठ शलाकापुरुपोंमें प्रमु ६ ति: म.७ पतनागपणानाम् ।८. विशेषत, म.,.!

पष्टितमः सर्गः ७१९ उत्पनो मार्गशीर्षस्य पौर्णमास्यां हि संमदः । द्वादश्यां माघशुक्लस्य जिनेन्द्रस्वमिनन्दनः ॥१७॥ सुमतिः श्रावणस्यासोदेकादश्यां मितारमनि । उर्जकृष्णप्रयोदश्यां पाप्रमजिनेश्वरः ॥१७॥ द्वादश्यां ज्येष्टमासस्य शुक्लायां सप्तमो जिनः । पौषस्य कृष्णपनेऽभूदकादश्यां जिनोऽष्टमः ॥१२॥ सुविधिर्मार्गशीर्षस्य शुक्ल प्रतिपदि प्रमुः। शीतलो माघकृष्णस्य द्वादश्याममवजिनः ॥१७॥ फाल्गुनासितपक्षेऽभूदेकादश्यां जिनोऽपरः । पभेऽग्रेव चतुर्दश्यां वासुपूज्यजिनेश्वरः ॥१४॥ माघशुक्लचतुर्दश्यां विमलो विमलारमकः । द्वादश्यां ज्यटकृष्णस्य संजातोऽनन्तजिजिनः ।।१७५॥ माघशुक्त्रयोदश्यां जो धर्मो जिनाधिपः । ज्येष्टकृष्ण चतुर्दश्यां शान्तिनाथश्व शान्तिकृत् ।।१७६।। कुन्थुवेशासमासस्य शुक्लायां प्रतिपद्यभूत् । मार्गशीर्षस्य शुक्लायां चतुर्दश्यामरो जिनः ।।१७॥ एकादश्यां तु तस्यैव शुक्लायां मल्लिरीश्वरः । शुक्लायामाश्व युज्यां च द्वादश्यां मुनिसुव्रतः ॥१७८|| जातश्च कृष्णदशम्यामाषाढस्य नमिर्जिनः । नेमिवंशाखशुक्लस्य त्रयोदश्यां जिनेश्वरः ।।१७।। स कृष्णकादशी पार्श्वः पौषमासस्य भूषयन् । शुक्लपयोदशों वीरश्चैत्रस्य निजजन्मना ॥१८॥ पितरौ जन्मनक्षत्रं जन्मभूमि जिनैशिनाम् । चैत्यवृक्षं च निर्वाणभूमि वच्मि निबुध्यताम् ॥१८॥ विनीता मरुदेवी च नाभियग्रोधपादपः । कैलासश्चोत्तरापादावृपमो वृषभो नृणाम् ॥१८॥ अयोध्या विजया राजा जितशत्रुर्जिनोऽजितः । सम्मेदः सम्मदायास्तु रोहिणी विषमच्छदः ।।१८३।। श्रावस्ती संभवः सेना जितारिः शालपादपः । ज्येष्ठा नक्षत्रमेनांसि संमेदश्च पुनन्तु वः ॥१८१]] सरल: संवरोऽयोध्या सिदार्या च पुनर्वसुः । जिनोऽमिनन्दनः शैलः स एवास्नु मुदे सताम् ।।१८५।। नवमीके दिन, सम्भवनाथ मार्गशीर्ष शुक्ला पूर्णिमाके दिन, अभिनन्दननाथ माघ शुक्ल द्वादशीके दिन, मुमतिनाथ श्रावण शुक्ल एकादशीके दिन, पद्मप्रभ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीके दिन, सुपार्श्वनाथ ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशीके दिन, चन्द्रप्रभ पौष कृष्ण एकादशीके दिन, सुविधि- नाथ मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदाके दिन, शीतलनाथ माघ कृष्ण द्वादशीके दिन, श्रेयोनाथ फाल्गुन कृष्ण एकादशीके दिन, वासुपूज्य फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन, निर्मल आत्माके धारक विमलनाथ माघ शुक्ल चतुर्दशीके दिन, अनन्तनाथ ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशीके दिन, धर्मनाथ माघ शुक्ल त्रयोदशीके दिन, शान्तिके करनेवाले शान्तिनाथ ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशीके दिन, कुन्थुनाथ वैशाख शुक्ल प्रतिपदाके दिन, अरनाथ मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशीके दिन, मल्लिनाथ मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशीके दिन, मुव्रतनाथ आसौज शुक्ल द्वादशीके दिन, नमिनाथ आपाद कृष्ण दशमी दिन और नेमिनाथ वैशाख शुक्ल त्रयोदशीके दिन, उत्पन्न हुए थे । इसी प्रकार पार्श्वनाथ पोप कृष्ण एकादशीको और महावीर चैत्र शुद्ध त्रयोदशीको अपने जन्मसे अलंकृत करते हुए उत्पन्न होंगे ।। १६९-२८० ।। अब चौबीस तीर्थंकरोंके माता-पिता जन्मनक्षत्र, जन्मभूमि, चैत्यक्ष और निर्वाणभूमिको कहते हैं सो ज्ञात करो ॥ १८१ ॥ जिनकी जन्मनगरी विनीता-अयोध्या, माता मरुदेवी, पिता नाभि, चैत्यश्न वट, निर्वाणभूमि कैलास और जन्मनक्षत्र उत्तराषाढ था। वे यूपभनाथ भगवान् मनुष्योंमें अत्यन्त श्रेष्ठ थे ।। १८२ ।। जिनकी जन्मनगरी अयोध्या, माता विजया, पिता राजा जितशत्रु, निर्वाणक्षेत्र सम्मेदाचल, जन्म नक्षत्र रोहिणी और चैत्यक्ष सप्तपर्ण था वे अजितनाथ भगवान् सबके हर्पके लिए हों ॥ १८३ ॥ श्रावस्ती नगरी, सेना माता, जितारि पिता, शाल चैत्यक्ष, ज्येष्ठा जन्मनक्षत्र, सम्मेदाचल निर्वाणक्षेत्र और संभवनाथ जिनेन्द्र ये सब तुम्हारे पापांको पवित्र करें ।। १८४ ॥ चैत्यवृक्ष सरल, पिता संवर, माता सिद्धार्या, अयोध्या नगरी, पुनर्वसु नक्षत्र, अभिनन्दन जिनेन्द्र और सम्मेदगिरि निर्वाणक्षेत्र ये सजनोंके आनन्दके १. कार्तिक शुक्लद्वादश्याम् । २. चोदरापासपमः म., स.।

७१८ हरिवंशपुराणे सिद्धार्थः सुप्रतिष्टोऽहमानन्दो नन्दनो नृपः । पूर्वजन्मनि नामानि जिनानामानुपूर्वतः ।।१५५।। चक्री पूर्वधरः पूर्वी महामाण्डलिकाः परे । एकादशाशिनः स्वा' सर्वेऽपि कनकप्रमाः ॥१५६॥ सिंहनिष्क्रीडितं कृत्वा प्रायोपगमनं गताः मासक्षपणतः सर्वे यथास्वं स्वर्गलोकगाः ॥१५॥ वज्रसेन इति ख्यातस्तथारिन्दमसंज्ञकः । स्वयंप्रमामिपश्चाऽन्यः परो विमलवाहनः ॥१५८॥ सूरिः सीमन्धरामिख्यो गुरुश्च पिहितानवः । अरिन्दममुनिर्मान्यो वन्दनीयो युगन्धरः ।।१५९॥ सार्वः सर्वजनानन्दोऽप्युमयानन्दनामकः । वज्रदत्तोऽपरो वेद्यो वज्रनामिरमिष्टुतः ।।१६०॥ सर्वगुप्तस्त्रिगुप्तायश्चित्तरक्षाभिध. परः । विमलाचारसंपनो मान्यो विमलवाहनः ।।१६।। गुरुधनरथामिख्या संवरः संचरान्चित्तः । वरधर्मस्त्रिलोकोड्यः सुनन्दो नन्दसंज्ञकः ।।१६२|| व्यतीतशोकनामान्यो दामरः प्रौष्टिलः परः । जिनानां गुरवोऽमी न क्रमेणातीतजन्मनि ॥१६३ वृषो धर्मश्च शान्तिश्च कुन्थुः सर्वार्थसिदितः । चत्वारः प्रच्युता ज्ञेया विजयादमिनन्दनः ।।१६४॥ चन्द्रमममुमत्याख्यौ वैजयन्ताजयन्ततः । नेम्यसै नमिमल्लीशावपराजिततश्च्युती ॥१६५।। भारणारपुष्पदन्तेशः शीतलेशोऽच्युताच्च्युतः । पुष्योत्तरविमानेशः श्रेयोऽनन्तौ च सन्मतिः ॥१६॥ सहबारातु विमलश्रीपार्श्वमुनिसुव्रताः । क्रमासंभवसुापमप्रभजिनाः पुनः ।।१६७॥ अधो मध्योपरिप्रख्यमेवेयकपरिच्युताः । वासुपूज्यो महाशुक्रादितितीर्थकृतां दिवः ॥१६॥ वृपभश्चैत्रकृष्णस्य नवम्यामुदपद्यत । माघशुक्लनवम्यां नु तथैवाऽजिततीर्थकृत् ।।१६९॥ १२. पद्मोत्तर, १३. पद्मासन, १४. पद्म, १५. दशरथ, १६. मेघरथ, १७. सिंहरथ, १८. धनपति, १९. वैश्रवण, २०. श्रीधर्म, २१. सिद्धार्थ, २२. सुप्रतिष्ठ, २३. आनन्द और २४. नन्दन ।। १५०-१५५ ।। इनमें भगवान् वृषभनाथ पूर्वभवमें चक्रवर्ती तथा चौदह पूर्वोके धारक थे और शेप तीर्थकर महामण्डलेश्वर और ग्यारह अगके वेत्ता थे । उक्त सभी तीर्थकर पूर्व- भवमें अपने शरीरोंकी अपेक्षा सुवर्णके समान कान्तिवाले थे। १५६ ।। सभी तीर्थकरोंने पूर्वभवमें सिंह निष्क्रीडित तपकर एक महीनेके उपवासके साथ प्रायोपगमन संन्यास धारण किया था और सभी यथायोग्य स्वर्गगामी थे-अपनी-अपनी साधनाके अनुसार स्वाँमें उत्पन्न हुए थे ।। १५७॥ तीर्थकरोंके पूर्व जन्मके गुरु क्रमसे १. वनसेन, २. अरिन्दम, ३. स्वयं- प्रभ, ४. विमलवाहन, ५. सीमन्धर, ६. पिहितासघ, ७. अरिन्दम, ८. युगन्धर, ९. सबका हित करनेवाले सर्वजनानन्द, १०. उभयानंद, ११. वञदत्त, २२. वनाभि, १३. सर्वगुप्त, १४. त्रिगुम, १५. चित्तरक्ष, १६. निर्मल अचारसे सहित माननीय विमल वाहन, १७. धनरथ, १८. संवरसे सहित संवर, १९. तीन लोकके द्वारा स्तुति करनेके योग्य वरधर्म, २० सुनन्द, २१. नन्द, २२. व्यतीतशोक, २३. दामर और २४. प्रोष्ठिल थे ॥ १५८-१६३ ।। वृषभनाथ, धर्मनाथ, शान्तिनाथ और कुन्थुनाथ ये चार तीर्थकर सर्वार्थसिद्धिसे, अभिनंदन विजय विमानसे, चंद्रप्रभ और सुमतिनाथ बैजयंत विमानसे, नेमि और अरनाथ जयंत विमानसे, ममि और मल्लिनाथ अपराजित विमानसे, पुष्पदन्त आरण स्वर्गसे, शीतलनाथ अच्युत स्वर्गसे, श्रेयोनाथ, अनन्तनाथ और महावीर पुष्पोत्तर विमानसे, विमलनाथ, पार्श्वनाथ और मुनिसुव्रतनाथ सहस्रार स्वर्गसे, संभवनाथ, मुपार्श्वनाथ और पद्मप्रभ क्रमशः अधो- वेयक, मध्यप्रैवेयक और उपरिम प्रवेयकसे तथा वासुपूज्य महाशुक्र स्वर्गसे चयकर भरत- क्षेत्रमें उत्पन्न हुए थे। इस प्रकार ऋषभादि तीर्थकरोंके पूर्वभवके स्वर्ग कहे जाते हैं ॥ १६४-१६८॥ भगवान वृषभनाथ चैत्र कृष्ण नवमीके दिन उत्पन्न हुए थे। अजितनाथ माघ शुम्ला १. साङ्गेम। - पष्टितमः सर्गः ०१. 'चूनो गजपुरं मित्रा पार्थिवश्न मुदर्शनः । मम्मेदो रोहिणी चारो दुरितं दारयन्तु वः ॥१९॥ मिथिला रक्षिता कुम्मो जिनेन्द्रो मालरश्विनी । अशोकश्च तहः सोऽदिरशोकाय भवन्तु वः ॥२०॥ पद्मावती मुमित्रोऽस्तु कुशाग्रनगरं मुदे । चम्पकः श्रवणक्षं च सोऽद्रिवो मुनिसुव्रतः ॥२०॥ मिथिला विजयो प्रा वकुलो नमिरचिनी । नमयन्तु महामानं सम्मंदश महीधरः ॥२०२॥ नेमि. सूर्यपुरं चिया समुद्र विजयः शिवा । ऊर्जयन्ती जयं तेऽमी मेघनो दिशन्तु यः ॥२०॥ वाराणसी च वर्मा च विज्ञासा च धांहिपः। अश्वसेननृपः पार्श्व. सम्मेदश्च मुदेऽस्तु व. ॥२०॥ शालः कुण्डपुरं वीरः सिद्धार्थः प्रियकारिणी । उत्तराफाल्गुनी पावा पापानि ऽनन्तु वः सदा ॥२०५।। चैत्यक्षस्नु वीरस्य द्वात्रिंशद्धनुरुच्चिनः । देहोसेघाच शेषाणां म द्वादशगुणो मतः ॥२०॥ मुपायेंशोऽनुराधायां ज्येष्टामु च शशिप्रमः । श्रेयानपि धनिष्टामु वासुपूज्योऽश्विनीषु सः ॥२०॥ भरणीपु जिनो मल्लिवीरः सातिषु सिद्धिमा । जन्मनक्षत्रवर्गेषु शेषाणां परिनितिः ॥२०॥ शान्तिकुन्धरनामानस्तीर्धकृञ्चक्रवर्तिनः । शेषास्तीर्थकराः सर्वे पृथिवीपतयो नृपाः ॥२०९॥ चन्द्राम एय चन्द्राम. मुविधिः शद्धमाप्रमः । प्रियमुमारीपुजवर्णः सुपार्वतीर्थकृत् ॥२०॥ मेघश्यामवपुः श्रीमान् पाश्वस्तु धरणस्तुतः । पद्मगर्भनिमामश्च पमप्रमजिनाधिपः ॥२१॥ , a , , और कुंथुनाथ भगवान् ये तुम्हारे पापोंको नष्ट करें ॥ १९८ ।। आम्र पृश्न, हस्तिनापुर नगर, मित्रा माता, मुदर्शन राजा पिता, सम्मेद शिखर निर्वाणक्षेत्र, रोहिणी नक्षत्र और अरनाथ जिनेन्द्र ये सब तुम्हारे पापको खण्डित करें ।। १९९ ।। मिथिला नगरी, रक्षिता माता, कुम्भ पिता, मल्लिनाथ जिनेन्द्र, अश्विनी नक्षत्र, अशोक वृक्ष और सम्मेद शिखर निर्वाण क्षेत्र ये सब तुम्हारे अशोक-झोक दूर करनेके लिए हो ।। २०० ॥ पद्मावती माता, सुमित्र पिता, कुशाम नगर, पम्पक वृक्ष, श्रवण नक्षत्र और सम्मेद शिखर पर्वत ये सब तुम्हारे हर्पके लिए हो॥२०॥ मिथिला नगरी, विजय पिता, यप्रा माता, चकुल वृक्ष, नमिनाथ जिनेन्द्र, अश्विनी नक्षत्र और सम्मेद शिग्यर पर्वत महामानी मनुष्यको आपके समक्ष नम्रीभूत फरें ।। २०२॥ नेमिनाथ भगवान् , सूर्यपुर नगर, चित्रा नक्षत्र, समुद्र विजय पिता, शिवा माता, ऊर्जयन्त पर्वत और मेपन (मेदासिंगी ) वृक्ष ये सब तुम्हारे लिए जय प्रदान करें ।। २०३ ।। वाराणसी नगरी, बर्मा माता, विशाखा नक्षत्र, धय पैत्यवृक्ष, अश्वसेन राजा पिता, पार्श्वनाथ जिनेन्द्र और सम्मेद शिखर निर्वाणक्षेत्र ये सब तुम्हारे आनन्दके लिए हो ।२०४|| शाल पृक्ष, कुण्डपुर नगर, वीर जिनेन्द्र, सिद्धार्थ पिता, प्रियकारिणी माता, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, और पायापुरी निर्याणक्षेत्र ये मय मदा तुम्हारे पापोंको नष्ट करें ।। २०५॥ भगवान महावीरका चैत्यश्न बत्तीस धनुष ऊँचा होगा और शेष तीर्थंकरोंके चैत्यवृक्षों- की ऊँचाई उनके शरीर की ऊँचाई से यारहगुनी मानी गयो है ।।२०६ ।। सुपार्श्वनाथ भगवान अनुराधा नक्षत्र, चन्द्रप्रभ ज्येष्टा नक्षत्रमें, प्रेयोनाथ धनिष्ठा नक्षत्र में, वासुपूज्य अश्विनी नभनौ, मलि जिनेन्द्र भरणी नक्षत्र में, महावीर साति नक्षत्र में निर्वाणको प्राम हुए हैं और शेप नायकका निर्माण अपने-अपने जन्म नन्नाम ही हुआई ।।२०७-०८॥ शान्तिनाथ, गुन्भुनाथ और अग्नाथ ये तीन तीर्थकर नया पक्रवर्ती हुए तथा शेष मय तीर्थकर मामान्य राजा हुप ।। २०९॥ चन्द्रप्रम भगवान पन्द्रमा ममान आभायाले, मुविधिनाय शो ममान काग्निफे. धाग्य, गुपायनाय प्रियद्गुनकी मगर ममहरू समान हरितवर्ग, परणेन्द्र दाग म्गुन श्रीमान पायजिनेन्द्र मेयर ममान श्यामट शरीर, पनाम जिनगन , १. भू.:१२.frre R! ११ हरिवंशपुराणे हरिवंशपुराणे मेघप्रमो मघाऽयोध्या प्रियद्गुश्च सुमङ्गला । सुमति: 'सुमतिं नित्यं संमेदश्च दिशन्तु वः ।।१८६॥ कौशाम्बी धरणचित्रा सुसीमा जिनपुङ्गवः । पद्मप्रभः प्रियङ्गश्च मङ्गलं वः स पर्वतः ॥१७॥ पृथिवी मुप्रतिष्टोऽस्य काशी वा नगरी गिरिः । स विशाखा शिरीपश्च सुपाश्र्वश्च जिनेश्वरः ।।१८।। चन्द्या चन्द्रपुरी चन्द्रप्रमो नागतरुगिरिः । सोऽनुराधा महासेनो लक्ष्मणा जननी सताम् ।।१८९।। काकन्दी पुष्पदन्तश्च रामा सुग्रीवभूपतिः । मूलक्षं शालिवृक्षश्च मगिरिभूतयेऽस्तु वः ।।१९०।। मंद्रिला प्रथमाषाढा प्लक्षो दृढरयो नृपः । सुनन्दा शीतल: शैलः स एवं हितचेतसः ॥१९१॥ विष्णुश्रीविष्णुराजश्च सिंहनादपुरं जिनः । श्रावणः श्रेयान् शं दद्युस्तिन्दुकः स च भूधरः ॥१९२॥ चम्पा जन्मनि मुक्तोऽभूद्वासुपूज्यो जयाधिपः । पाटला वसुपूज्यश्च पूज्याः शतभिषापि च ॥१९३॥ शर्मा च कृतवर्मा च जम्बूः प्रोष्ठपदोत्तरा । काम्पिल्यं स गिरिः शल्यं विमलश्वौद्धरन्तु वः ॥९॥ साकेता सिंहसेनश्व रेवस्यश्वत्थपादपः । पान्तु सर्वयशा सोऽदिरनन्तश्चापि यः सदा ॥१९५॥ धर्मश्च दधिपर्णश्च मानुराजश्व सुव्रता । पुष्यो रत्नपुरं सोऽद्विर्धमें घुद्धिं ददातु वः ॥१९६॥ ऐरा च विश्वसेनश्च भरणीमपुरं तरुः । नन्दीश्च शान्तिनाथश्च सोऽगः शान्ति दिशन्तु वः ॥१९॥ *सोऽगो नागपुरं सूर्यः श्रीमती कृत्तिका तथा । तिलकश्च तरुः कुन्थुमथ्नन्तु दुरितानि व. ॥१९८॥ लिए हों ॥१८५ ॥ मेघप्रभ पिता, मघा नक्षत्र, अयोध्या नगरी, प्रियडगु वृक्ष, सुमङ्गला माता, सम्मेदशिखर निर्वाणक्षेत्र और सुमति जिनेन्द्र ये सब तुम्हें सुमति- सद्बुद्धि प्रदान करें ॥ १८६ ॥ कौशाम्बी नगरी, धरण पिता, चित्रा नक्षत्र, सुसीमा माता, पद्मप्रभ जिनेन्द्र, प्रियङ्ग वृक्ष और सम्मेद शिखर निर्वाणक्षेत्र ये सब तुम्हारे लिए मङ्गल रूप हो ॥१८॥ पृथिवी माता, सुप्रतिष्ठ पिता, काशी नगरी, सम्मेद शिखर निर्वाणक्षेत्र, विशाखा नक्षत्र, शिरीप वृक्ष और सुपार्च जिनेन्द्र ये सब तुम्हारे लिए मङ्गलस्वरूप हो ॥ १८८ ।। चन्द्रपुरी नगरी, चन्द्रप्रभ जिनेन्द्र, नाग वृक्ष, सम्मेदशिखर निर्वाणक्षेत्र, अनुराधा नक्षत्र, महासेन पिता और लक्ष्मणा माता ये सब सज्जनों के लिए वन्दना करने योग्य हैं ।। १८९ ।। काकन्दी नगरी, पुष्पदन्त भगवान्, रामा माता, सुग्रीव पिता, मूल नक्षत्र, शालि वृक्ष और सम्मेदशिखर पर्वत ये सब तुम्हारे वैभयके लिए हों ।। १९० ॥ भदिला पुरी, पूर्वापाढा नक्षत्र, प्लक्ष वृक्ष, दृढरथ राजा पिता, सुनन्दा माता, शीतलनाथ जिनेन्द्र और सम्मेदगिरि निर्वाणक्षेत्र ये सब तुम्हारा हित चाहनेवाले हो । १९१ ॥ विष्णु श्री माता, विष्णुराज पिता, सिंहनाद पुर, श्रवण नक्षत्र, श्रेयांस जिनेन्द्र, तेंदूका वृक्ष और सम्मेदशिखर पर्वत ये सब तुम्हें मुख प्रदान करें ।। १९२ ।। जन्मभूमि तथा निर्वाणभूमि चम्पापुरी, वासुपूज्य जिनेन्द्र, जया माता, चैत्यक्ष पाटला, वसुपूज्य पिता और शतभिषा नक्षत्र ये सब पूजनीय हैं ॥ १९३ ।। शर्मा माता, कृतवर्मा पिता, जामुन चैत्य वृक्ष, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, काम्पिल्य नगरी, सम्मेदशिखर निर्वागक्षेत्र और श्री विमलनाथ भगवान् ये सब तुम्हारी शल्यको दूर करें ।। १९४ ।। अयोध्या नगरी, सिंहसेन पिता, रेवती नक्षत्र, पीपल चैत्यवृक्ष, सर्वयशा माता, सम्मेदशिसर निर्वाणक्षेत्र और अनन्तनाथ जिनेन्द्र ये सदा तुम्हें सद्बुद्धि प्रदान करें। ९५ ।। धर्मनाथ जिनेन्द्र, दधिपर्ण चैत्य वृक्ष, भानुराज पिता, सुव्रता माता, पुष्य नक्षत्र, रत्नपुर नगर और सम्मेदशिखर सिद्धिक्षेत्र ये सब तुम्हें धर्मबुद्धि देयें ॥ १९६ ।। ऐरा माता, विश्यमेन पिना, भरणी नक्षत्र, हस्तिनापुर नगर, नन्दी चैत्यवृक्ष, शान्तिनाथ, , जिनेन्द्र और मम्मेदशिसर निर्वाणक्षेत्र ये सब तुम्हें शान्ति प्रदान करें।। १९७ ।। सम्मेद- शिखर निर्वाणक्षेत्र, हस्तिनापुर नगर, सूर्य पिता, श्रीमती माता, कृतिका नक्षत्र, तिलक वृक्ष १. मुमनिनित्य मः। २ मा वह, म०।३.मपुर-दस्तिनापुरम् । ४. स एव वृषः।

पष्टितमः सर्गः S । नाम्नोत्तरकुरश्चान्या दिव्या देवकुरुश्रुतिः । विमलामो च चन्द्रामा जिनानां शिविकाः क्रमान् ॥२५॥ दीक्षा कृष्णनवम्यां तु चैत्रस्य पशिनः । मुनिमुमनदीक्षास्यां वैशाखस्य यभूव मा ॥२२॥ .. वैशासस्यैव शुद्धस्य प्रतिपद्यमिनन्द्यते । कुन्थोर्निष्क्रमणं लोके नवम्यां सुमतेः पुनः ॥२२७॥. द्वादश्यां ज्येष्ठकृष्णस्य त्रयोदश्यां च संक्रमम् । अनन्तस्य च शान्तेश्च परिनिष्क्रमणं स्मृतम् ॥२२८॥ द्वादश्यां ज्येष्ठकृष्णस्य सुपार्श्वस्य जिगशिनः । नमेरापादकृष्णस्य दशम्यां कथिनं हि तत् ॥२२९॥ नेमः मितचनुयां तु श्रावणस्योपर्णितम् । पद्मामस्य त्रयोदश्यां कृष्णायां कार्तिकम्य तु ॥२३०॥ कृष्णस्य मार्गशीर्षस्य दशम्यां मुमनेस्तु तत् । शुक्कुप्रनिपदि प्रोक्तं पुष्पदन्तजिनेशिनः ॥२३॥ तस्यैवारो दशम्यां न पौर्णमास्यां च संमवः । एकादश्यां तु मल्लोशः परिनिष्क्रमणं श्रितः ॥२३२॥ पौषस्य कृष्णपक्षस्य ोकादश्यां मुकालजम् । ज्ञेयं निष्कमणं चन्द्रप्रमपाश्वजिनेन्द्रयोः ॥२३३॥ माघस्य कृष्णपक्षस्य द्वादश्यां शीनलस्य च । विमलस्य मितायां हि चनुध्यो परिकीर्तितम् ॥२३॥ अजितस्य नवम्यां नु द्वादश्याममिनन्दाः । धर्मस्य तु त्रयोदश्यां परिनिष्कमणं मनम् ॥२३५॥ फाल्गुनासितपक्षस्य त्रयोदश्यां जिनेशिनः । श्रेयमो वासुपूज्यस्य चनुदंश्यां तदीरितम् ॥२३६।। वर्षेण पारणाद्यस्य जिनेन्द्रस्य प्रकीर्तिता । तृतीयदिवमेऽन्येषां पारणाः प्रथमा मताः ॥२३७॥ आयेनेचरमो दिव्यः पारणायां पवित्रितः । अन्य गोशारनिष्पग्नपरमानमलालसैः ॥२३॥ 1,कुरु, २२ देवकुरु, २३ विमलामा और २४ चन्द्राभा ये क्रमसे ऋपभादि तीर्थकरों की शिविका- पालकियोंके नाम हैं ।। २२१-२२५ ।। चैत्र कृष्ण नवमीको भगवान् वृषभदेवकी, वैशाख कृष्ण नवमीको मुनिसुव्रतनाथकी, वैशाख सुदी प्रतिपदाके दिन कुन्थुनाथकी, वैशाख सुदी नवमी के दिन मुमतिनाथकी, ज्येष्ट- कृष्ण द्वादशीके दिन अनन्तनाथ जिनेन्द्रकी, ज्येष्ट कृष्ण त्रयोदशीके दिन शान्तिनाथको, ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी के दिन सुपार्श्व जिनेन्द्रकी, आपाढ़ कृष्ण दशमीके दिन नमिनाथकी, सायन मुदी चतुर्थीको नेमिनाथ को, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीको पद्मप्रभकी, मार्गशीर्ष कृष्ण दशमीको सुमतिनाथकी, मार्गशीर्ष मुदी प्रतिपदाके दिन पुष्पदन्त जिनेन्द्रकी, मार्गशीर्ष मुदी दहामीको अरनाथकी, मार्गशीर्ष सुदी पूर्णिमाको संभयनाथ की, मार्गशीर्ष मुदी एकादशीको मल्लिनाथकी, पोपकृष्ण एकादशीको चन्द्रप्रभ और पार्श्वनाथकी, माघ कृष्ण द्वादशीको शीतलनाथकी, माघ शुक्ल चतुर्थीको विमलनाधकी, माघ शुक्ल नवमीको अजितनाथकी, माघ शुक्ल द्वादशीको अभिनन्दननाथकी, माघशुक्ल त्रयो. दशीको धर्मनाथ को, फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशीके दिन श्रेयामनाथकी और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशीके दिन वामपूज्य भगवानको दीक्षा हुई थी ।। २२६-२३६ ॥ श्री आदि जिनेन्द्रको प्रथम पारणा एक वर्षमें [ मल्लिनाथ और पार्श्वनाथकी चौथे दिन ] तथा शेष तीर्थकरीको तीसरे दिन हुई थी। भावार्थ-आदि जिनेन्द्रने छह माहका योग लिया था और छह माह विधि न मिलनेम भ्रमण करते रहे इमलिए एक यर्प वाद उन्हें आहार मिला । मल्लिनाथ और पार्श्वनाथने दीक्षा ममय तीन दिनके उपवामका नियम लिया था इसलिए उन्हें चौथे दिन आहार मिला और शेप तीर्थंकरोंने दो दिनका उपवाम किया था ॥२३७ ।। श्री आदिनाथ भगवानले पारणाफे दिन उत्तम इक्षुरमको पवित्र किया था और शेष नाथंकरों- ने लालमासे रहिन हो गो-दुग्धके द्वारा निर्मित सीरफ द्वारा आहार किया था ॥ २३८ । . १. पारपा प्रथम मना म.। २. एक परिमेय उमझो उन्झुरमं बुगा पारणं अवरे । गोरगीरे जिपर अगाजिदियीय दिवसम्म अ०,६१ गाथा., ग्रहोस्यपति।

हरिवंशपुराणे रत्नाकिशुकपुष्पामो वासुपूज्यो जिनेश्वरः । नीलाक्षनाचलच्छायो मुनीन्द्रो मुनिसुव्रतः ॥२१२॥ नीलकण्ठस्फुरस्कण्ठरुचिर्नेमिः समीक्षितः । सुतसकनकच्छायाः शेषास्तु जिनपुगवाः ॥२१३॥ 'निष्क्रान्तिर्वासुपूज्यस्य मलेमिजिनान्त्ययोः । पञ्चानां तु कुमाराणां राज्ञां शेपजिनेशिनाम् ॥२१॥ वृषमस्य विनीतायां परिनिष्क्रमणं तथा । नेमेस्तु द्वारवत्यो तु शेषाणां जन्मभूमिपु ॥२१५॥ निष्कान्तिः सुमतेभुक्त्वा मल्ले साष्टममनका । तथा पार्श्वजिनस्यापि जयाजस्य चतुर्थका ॥२१॥ पष्ठमभृतां दीक्षा शेषाणां तीर्थदर्शिनाम् । श्रेयः सुमतिमलीशां पूर्वाह्न नेमिपार्शयोः ॥२१७॥ अन्येषामपराहे ना वीरो ज्ञातृवनेऽप्रयत् । कोदोयाने जयासूनुः स सिद्धार्थचने वृपः ॥२१८॥ धर्मस्तु धप्रकास्थाने विंशो नीलगुहाये । पार्थो मनोरमोद्याने तपोमागाश्रमाश्रये ॥२९॥ सहमा बनायेषु पुरोद्यानेषु भूमिषु । शेषनोर्थकृतां वेद्यं परिनिष्क्रमणं बुधैः ॥२२०॥ सुदर्शना तु शिविका सुप्रभा तदनन्तरा । सिद्धार्थाचार्थसिद्धा च तत्रामयङ्करी प्रमा ॥२२॥ सा निवृत्तिकरी पप्ठो सप्तमी सुमनोरमा। परा मनोहरा सूर्यप्रमाशुक्रममा परा ॥२२२॥ ततः परेण विज्ञेया शिविका विमलभा । पुष्पामा देवदत्ताख्या परा सागरपत्रिका ॥२२३॥ नागदत्तामिधा चान्या चावी सिद्धार्थसिद्धिका । विजया वैजयन्ती च जयन्ताख्यापराजिता ॥२२४॥ पद्मगर्भके समान लालवर्ण, वासुपूज्य जिनेन्द्र रक्त पलाश पुष्पके समान लालवर्ण, मुनियोंके खामी मुनिसुवननाथ नीलगिरि अथवा अञ्जनगिरिके समान नीलवर्ण, नेमिनाथ नीलकण्ठ मयूरके सुन्दर कण्ठके समान नीलवर्ण और शेप जिनेन्द्र तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिवाले कहे गये हैं ।। २१०-२१३ ॥ वासुपूज्य, मल्लिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और वर्धमान इन पाँच तीर्थकरोंने कुमारकालमें ही दीक्षा धारण की थी और शेष तीर्थंकरोंने राजा होनेके वाद दीक्षा धारण की थी ।। २१४ ॥ भगवान बृपभदेवका दीक्षाकल्याणक विनीतामे, नेमि- नाथका द्वारयतीमें और शेष तीथंकरोंका अपनी-अपनी जन्मभूमिमें हुआ था ॥२१५।। सुमतिनाथ और मल्लिनाथने भोजन करनेके बाद दीक्षा धारण की थी तथा दीक्षाके वाद तीन दिनका उपवास लिया था। पार्श्वनाथ तथा वासुपूज्य भगवान्ने दीक्षाके बाद एक दिनका उपवास धारण किया था और शंप नीथंकरोंने दो दिनका उपवास लिया था। श्रेयोनीथ, सुमतिनाय, मल्लिनाथ, नेमिनाथ और पार्श्वनाथ तीर्थकरोंने दिनके पूर्वालकाल- में और अन्य तीर्थ करोने अपराह कालमें दीक्षा धारण की थी। भगवान महावीरने शाह वनमें, यासुपूज्यने क्रोडोद्यानमें, वृपभदेवने सिद्धार्थ घनमें, धर्मनाथने वप्रका स्थानमें, मुनि मुमतनाथने नीलगुहाफ समीप, पार्श्वनाथने तापसीके तपोवनके समीप मनोरम नामक उद्यानमें और शेष तीर्थंकरोंने सहस्रावनको आदि लेकर नगरके उद्यानोंमें दीक्षा धारण की थी एमा विद्वानोंको जानना चाहिए ॥ २१६-२२० ॥ १ गुदर्शना, २ सुप्रभा, ३ सिद्धार्थ, ४ अर्थमिद्धा, ५ अभयंकरी, ६ निवृत्तिकरी, ७ मुमनोरमा, ८ मनोहरा, सूर्यप्रभा, १० शुक्रप्रभा, ११ विमलप्रभा, १२ पुष्पाभा, १३ देवदत्ता, १४ मागरपत्रिका, १५ नागदसा, १६ मिझार्थमितिका, १७ विजया, १८ वैजयन्ती, १९ जयन्ता, २० अपराजिता, २१ उत्तर- १.दो गुन्देन्दुसुमारहारधामो द्वारिन्द्रनीलयभी, दो बन्धुममप्रभी जिनापी दी च प्रियाप्रभो । गयोमपुरहिताः समनदेपरमाने संज्ञानदियाकाम. मुग्नुता. मिटिं प्रयन्यन्नु नः ॥६॥ स्यमानि । २. ऐनीमली पोरी मारवामि यामुपुग्यो य । पासो दिय गनिया सेसमिता रामचरिमम्मि ॥६५॥ प्रे... जपानी पानुसार । ४. नीटरिनाम । मगगन रामदेयो दोश लेनोवाद र माकी अनशनको कथा पत्र प्रमि। .

पष्टितमः सर्गः ७२५ वीरस्य केवलोपाद ऋजुकुलामरित्तटे । अन्येषां तु जिनेन्द्राणां स्त्रोद्यानेषु यथायथम् ॥२५५॥ वृपभस्य श्रेयमो मलेः पूर्वाह्न नमिपाश्चयोः। केवलोपत्तिरन्येपामपराहे जिनेशिनाम् ॥२५६॥ फाल्गुने कृष्णपक्षस्य स्वैकादश्यां वृषो मृतः । द्वादश्यां केवलं मलिः पष्टयां तु मुनिसुयतः ॥२५॥ ससम्यामेव संप्राप्तः पशे तत्रैव केवलम् । सुपाश्वजिनचन्द्रश्च चन्द्रप्रभजिनस्तदा ॥२५॥ चतुष्यां चैनकृष्णस्य पार्श्वदेवस्य कंवलम् । अमावास्यामनन्तस्य जिनेन्द्रस्य तदिष्यते ॥२५९॥ पक्षे मिते नृतीयस्यां नमः कुन्थोश्च केवलम् । दशम्यां मुमतेजानं पद्मप्रमजिनस्य च ॥२६॥ ज्ञेयं वैशाख शुक्लत्य दशम्यां वीरकेवलम् । मितेऽश्वयुजि पक्षेऽभूमेस्तरप्रतिपहिने ॥२६॥ कार्तिकामितपञ्चम्यां सम्भवस्य मितात्मनि । सुविधेस्तु तृतीयस्यां तद्वादश्यामरस्य तु ॥२६२॥ पुष्यकृष्ण चतुर्दश्यां शीतलः केवलं श्रितः । दशम्यां विमेलः शुक्ले शान्तिरकादशे दिन ॥२६॥ अजितोऽय चतुर्दश्यां केवलं प्रत्यपद्यत । अभिनन्दनधर्माख्या पौर्णमास्यामवाए तु ॥२६॥ ज्ञानोरपस्या स्यमावास्या मावन्य श्रेयसा कृता । श्रेयमी वासुपूज्येन द्वितीया शुक्लपक्षमा ॥२६५॥ माघकृष्णचतुर्दश्यां परय परिनिर्वृतिः । फाल्गुनस्यामित पश्ने चतुभ्यां पनमामिनः ।।२६६॥ पष्टया सुपार्श्वनाथस्य द्वादश्यां मानिमुनी । सिनफाल्गुनपञ्चम्यां मलिश्रीवासुपूज्ययोः ॥२६७॥ अमावस्या तु चैग्रस्य निवृताभ्यां पविनिता । अनन्तारजिनेन्द्राभ्यां शुक्लपक्षरय तु क्रमान् ॥२६८।। पसम्यामजित. पष्टयां संमत्रः परिनिर्वृतः । दशम्यां सुमति यः सुरनाथगणस्तुनः ॥२६९।। भगवानको आश्रमके समीप, महावीर भगवान्को ऋजुकूला नदीके तटपर और शेप तीर्थकरोंको अपने-अपने नगरके उद्यानांमें ही केवलज्ञान उत्पन्न हुआ था॥ २५४-२५५ ॥ धृषभनाथ, श्रेयांसनाथ, मल्लिनाथ, नेमिनाथ और पार्श्वनाथ भगवानको पूर्वाह कालमें तथा शेष तीर्थकरोंको अपराहण कालमें केवलज्ञानकी उत्पत्ति हुई थी ।। २५६ ।। फाल्गुन कृष्ण एकादशीके दिन वृपभनाथ, फाल्गुन कृष्ण द्वादशीके दिन मल्लिनाथ, फाल्गुन कृष्ण पष्ठीके दिन मुनिमुत्रननाथ, फाल्गुन कृष्ण सप्तमीके दिन सुपार्श्वनाथ और चन्द्रप्रभ, चैन कृष्ण चतुर्थीके दिन पार्श्वनाथ, चैत्रकृष्ण अमावास्याके दिन अनन्त जिनेन्द्र, चैत्र शुक्ल तृतीयाफे दिन नमिनाथ और कुन्थुनाथ, चैत्र शुक्ल दशमीके दिन मुमतिनाथ और पद्मप्रभ भगवान , वैशाख शुक्ल दशमीके दिन महावीर, आश्विन शुक्ल प्रतिपदाको नेमिनाथ, कार्तिक कृष्ण पञ्चमीको संभवनाथ, कार्तिक शुक्ल तृतीयाको मुविधिनाथ, कार्तिक शुक्ल द्वादशीको अरनाथ, पौष कृष्ण चतुर्दशीको शीतलनाथ, पाप कृष्ण दशमीको विमलनाथ, पीप.शुक्ल एकादशीको शान्तिनाथ, पीप शुक्ल चतुझीको अजितनाथ, पीप शुक्ल पूर्णिमाको अभिनन्दन और धर्मनाथ, माघकृष्ण अमावमको श्रेयामनाथ और माघ शुक्ल द्वितीयाको यामुपूज्य भगवान् फेवलमानको प्रार हुए थे॥२५७-२६५ ॥ माघ कृष्ण चतुर्दशीकै दिन वृषभनाथका, फाल्गुन कृष्ण चतुर्थकि दिन पद्मभका, फाल्गुन कृष्ण पाटीके दिन मुपायनाधका, फाल्गुन कृष्ण द्वादशीक दिन मुनिमुमननाथका, फाल्गुन मुक्ल पञ्चमीकै दिन मल्लिनाथ और श्रीवासुपूज्यका निर्वाण हुआ है। चैत्रको अमायाम्या निर्माणको प्रान हुए अनन्ननाथ और अरनाथ जिनेन्द्र के द्वारा पवित्र की गयी है। त्र मुक्ल पञ्चमी दिन अजितनाथ, पैत्र शुक्ल पटाके दिन मंभवनाथ और पैत्रमुगल दरामीफ दिन इन्द्रों. ममूहमे ग्नुन मुमनिनाय नियोगको प्रान हुए हैं ।। २६६-२६९ ।। १ मि मा । २. मीनिमा म.म.,८०, मनिगमस्यं मीनिमु प्रती परिनिमिसिनेन मम्दयः । निर्मिग म., म.

२४ - हरिवंशपुराणे श्रीहास्तिनपुरं रम्यमयोध्यानगरी शुमा । श्रावस्ती च विनीता च पुरं विजयपूर्वकम् ॥२३९॥ पुरं मङ्गलकं नाना पाटलीखण्डसंज्ञकम् । पद्मखण्डपुरं कान्तं तथा श्वेतपुरं परम् ॥२४॥ अरिष्टपुरमिष्टं तु सिद्धार्थपुरमप्यतः । महापुरमनो नाम्ना स्फुटं धान्यवटं पुरम् ॥२४१॥ धर्धमानपुर ख्यातं पुरं सौमनसायम् । मन्दरं हास्तिनपुर तथा चक्रपुरं मतम् ॥२४२॥ मिथिला राजगृहकं पुरं वीरपुरं तथा। पुरी द्वारवती 'काम्यकृतं कुण्डपुरं पुरम् ॥२४३॥ चतुर्विशतिसंख्यानां संख्यातानि यथाक्रमम् । जिनानां वृषमादीनां पारणानगराणि तु ॥२४४॥ स श्रेयान् ब्रह्मदत्तश्च सुरेन्द्र इव संपदा । राजा सुरेन्द्रदत्तोऽन्य इन्द्रदत्तश्च पद्मकः ॥ २४५॥ सोमदत्तो महादत्तः सोमदेवश्च पुष्पक. । पुनर्वसुः सुनन्दश्च जग्रश्चापि विशाखकः ॥२४६॥ धर्मसिंहः सुमित्रश्च धर्ममित्रोऽपराजितः । मन्दिपेणश्च पमदत्तो दत्तश्च सन्नयः ॥२४७॥ घरदत्तश्च नृपतिर्धन्यश्च वकुलस्तथा । पारणासु जिनेन्द्रेभ्यो दायकाश्च त्वमी स्मृताः ॥२४॥ 'सर्वेपामादिभिक्षामु दातारोऽपि जिनेशिनाम् । सर्वामु वर्धमानस्य वसुधारानियोगतः ॥२४९॥ अर्धग्रयोदशोत्कर्षाद्वसुधारासु कोटयः । तावन्त्येव सहस्त्राणि दशमानि जघन्यतः ॥२५०॥ आयौ द्वौ दायको झ्यामी ज्ञेयावत्यौ च वर्णतः । शेषास्तु दायकाः सर्वे सन्तप्तकनकप्रगाः ॥२५१॥ सपस्थिताच ते केचित्सिद्धास्तेनैव जन्मना । जिनान्ते सिद्धिरन्येषां तृतीये जन्मनि स्मृताः ॥२५२॥ वृषममल्लीशपार्शनामष्टमेन चतुर्थतः । जयाजस्य ययुः शेषाश्छद्मस्था हानिपष्टतः ॥२॥३॥ ज्ञानाहिः पूर्वतालेन्या वृषस्य सकटामुखे । ऊर्जयन्ते गिरी नेमे पार्श्वस्याप्याश्रमान्तिके ॥२५॥ १ श्रीसुन्दर हस्तिनापुर, २ शुभ अयोध्या, ३ श्रावस्ती, ४ विनीता, ५ विजयपुर, ६ मङ्गलपुर, ७ पाटलोखण्ड, ८ पद्मखण्डपुर, ९ श्वेतपुर, १० अरिष्टपुर, ११ सिद्धार्थपुर, १२ महापुर, १३ धान्यवटपुर, १४ वर्धमानपुर, १५ सोमनसपुर, १६ मन्दरपुर, १७ हस्तिनापुर, १८ चक्र पुर, १९ मिथिला, २० राजगृह, २१ चीरपुर, २२ द्वारवती, २३ काम्यकृत और २४ कुण्डपुर ."ये यथाक्रमसे पभ आदि चौबीस तीर्थंकरोंके प्रथम पारणाके दिन प्रसिद्ध हैं ।।२३९-२४४|| राजा श्रेयांस, २ ब्रह्मदत्त, ३ सम्पत्तिके द्वारा सुरेन्द्रकी समानता करनेवाला राजा सुरेन्द्रदत्त, ४ इन्द्रदत्त, ५ पद्मक, ६ सोमदत्त, ७ महादत्त, ८ सोमदेव, ९ पुष्पक, १० पुनर्वसु, ११ मुनन्द, १२ जय, १३ विशाख, १४ धर्मसिंह, १५ मुमित्र, १६ धर्ममित्र, १७ अपराजित, १८ नन्दिपेण, १९ वृषभदत्त, २० उत्तम नीतिका धारक दत्त, २१ वरदत्त, २२ नृपति, २३ धन्य और २४ यकुल ये पभादि तीर्थंकरोंको प्रथम पारणाओंके समय दान देनेवाले स्मरण किये गये हैं ।। २४५-२४८॥ समस्त तीर्थ करोंकी आदि पारणाओं और वर्धमान स्वामीको सभी पारणाओंमें नियमसे रववृष्टि हुआ करती थी। यह रत्नवृष्टि उत्कृष्टतासे साढ़े बारह फरोड़ और जघन्य रूपसे साढ़े बारह लाख प्रमाण होती थी ।। २४९-२५० ॥ इन दाताओम आदिके दो दाता और अन्तके दो दाता श्यामवर्णके थे और शेप सभी दाता तपाये हुए मुवर्णके समान वर्णवाले थे ।। २५१ ।। इनमें कितने ही दाता तो तपश्चरण कर उसी जन्मसे मोर चले गये और कितने हो जिनेन्द्र भगवान्के मोक्ष जाने के बाद तीसरं भवमें मोक्ष गये ।।२५२॥ पभनाथ मल्लिनाथ, और पार्श्वनाथको तेलाफे याद, वासुपूज्यको एक उपवासके पाद और शेष नीथयरोंको वेलाके याद केवलनानको प्राप्ति हुई थी।।२५३ ॥ धृपभनाथ भगवानको पूर्यताल नगरके शकटामुख यनमें, नेमिनाथको गिरिनार पर्वतपर, पार्श्वनाथ १.राम्या कृतं म.1 २. सम्वणपारणदिणे पिवहन पररयणवरिसमयादी। पगणदलका भिपर महामभागच ॥१०॥ प्र.४ मोस्यति ।

पष्टितमः सर्गः वीरस्य कंवलोपाद ऋजुकूलामरित्तटे । अन्येषां तु जिनेन्द्राणां स्वोयानंषु यथायथम् ॥२५॥ वृपमस्य श्रेयसो मल्ले पूर्वाह नेमिपार्श्वयोः । केवलोत्पत्तिरन्येपामपराहे जिनेशिनाम् ॥२५६॥ फाल्गुन कृष्णपक्षस्य स्वैकादश्यां वृषो भृतः । द्वादश्यां केवलं मलिः षष्टयां तु मुनिसुव्रतः ॥२५॥ सप्तम्यामेव संप्राप्तः पक्षे तत्रेय केवलम् । सुपाश्चंजिनचन्द्रश्च चन्द्रप्रभजिनस्तदा ॥२५८॥ चतुभ्यां चैनकृष्णस्य पाश्वदेवस्य कंवलम् । अमावास्यामनन्तस्य जिनेन्द्रस्य तदिप्यते ॥२५९॥ पभे मिते तृतीयस्यां नम. कुन्धोश्च केवलम् । दशम्यां मुमतेर्जातं पद्मममजिनस्य च ॥२०॥ ज्ञेयं वैशाख शुक्लस्य दशम्यां वीरयलम् । सितेऽश्वयुजि पोऽभूनेमेस्तत्प्रतिपनि ॥२६॥ कार्तिकासितपञ्चम्यां सम्मवस्य मितारमनि । सुविधेस्तु तृतीयस्यां तद्द्वादश्यामरस्य तु ॥२६२॥ पुष्यकृष्णचतुर्दश्यां शीतलः केवलं श्रितः । दशम्यां विमेलः शुक्ले शान्तिरकादशे दिन ॥२६३॥ अजितोऽय चतुर्दश्यां केवलं प्रत्यपद्यत । अभिनन्दनधर्माग्यो पार्णमास्यामबाप तु ॥२६॥ ज्ञानोत्पश्या त्यमावास्या माधय श्रेयमा कृता । श्रेयसी वासुपूज्येन द्वितीया शुक्लपक्षता ॥२६५॥ माघकृष्णचतुर्दश्यां वृषरय परिनिर्वृतिः । फाल्गुनस्यामित पो चनुथ्यां पद्ममामिनः ॥२६६॥ पष्टयां मुपाश्र्वनाथस्य द्वादश्यां मानिमुवती । मिनफाल्गुनपसम्यां मलिश्रीवासुपूज्ययोः ॥२६॥ अमावस्या तु चनस्य निवृताभ्यां पविनिता । अनन्तारजिनेन्द्राम्यां शुक्लपक्षरय नु क्रमात् ॥२६८।। पञ्चम्यामजित: पाटयां संभवः परिनिर्वृतः । दशम्यां सुमतिनाथः सुरनाथगणस्तुनः ।।२६९।। भगवान्को आश्रमके समीप, महावीर भगवान्को ऋजुकूला नदीके तटपर और शेप तीर्थकरोंको अपने-अपने नगरके उद्यानाम ही केवलज्ञान उत्पन्न हुआ था॥२५४-२५५ ॥ वृषभनाथ, श्रेयांसनाथ, मल्लिनाथ, नेमिनाथ और पार्श्वनाथ भगवानको पूर्यात कालमें तथा शेष तीर्थकरोंको अपराहण कालमें केवलज्ञानकी उत्पत्ति हुई थी ।। २५६ ।। फाल्गुन कृष्ण एकादशीके दिन वृपभनाथ, फाल्गुन कृष्ण द्वादशीके दिन मल्लिनाथ, फाल्गुन कृष्ण पष्टीक दिन मुनिमुत्रननाथ, फाल्गुन कृष्ण सप्तमीके दिन सुपार्श्वनाथ और चन्द्रप्रभ, चैत्र कृष्ण चतुर्थीक दिन पार्श्वनाथ, चैत्रकृष्ण अमावास्याकै दिन अनन्त जिनेन्द्र, चैत्र शुक्ल तृतीयाफे दिन नमिनाथ और कुन्युनाथ, चैत्र शुक्ल दशमीफे दिन सुमतिनाथ और पद्मप्रभ भगवान , वैशाख शुक्ल दशमीकै दिन महावीर, आश्विन शुक्ल प्रनिपदाको नेमिनाथ, कार्तिक कृष्ण पञ्चमीको संभवनाथ, कार्तिक शुक्ल तृतीयाको मुविधिनाथ, कार्तिक शुक्ल द्वादशीको अरनाथ, पौष कृष्ण चतुर्दशीको शीतलनाथ, पौष कृष्ण दामीको विमलनाथ, पौष शुक्ल एकादशीको शान्तिनाथ, पौष शुक्ल चतुदशीको अजितनाथ, पीय शुक्ल पूर्णिमाको अभिनन्दन और धर्मनाथ, माघकृष्ण अमावमको श्रेयामनाथ और माघ शुक्ल द्वितीयाको यामुपूज्य भगवान केवलज्ञानको प्राप्त हुए थे ।। २५७-२६५ ।। माघ कृष्ण चतुर्दशीकै दिन यूपभनाथका, फाल्गुन कृष्ण चनुयंकि दिन पद्मप्रमका, फाल्गुन कृष्ण पष्टीके दिन मुपार्श्वनाथका, फाल्गुन कृष्ण द्वादशीक दिन मुनिमुमननाथका, फाल्गुन शुक्ल पञ्चमीक दिन मलिनाय और श्रीवासुपूज्यका निर्वाण हुआ है। चैत्रकी अमावास्या निवांणको प्रात हुप अनन्तनाथ और अरनाथ जिनेन्द्र के द्वाग पवित्र की गयी है । चैत्र शुक्ल पञ्चमीकै दिन अजितनाय, चैत्र शुक्ल पटार दिन संभवनाथ और चैत्रशुक्ल दारि दिन इन्द्रोंके ममूहमे ग्नुन मुमनिनाय निर्माणको प्राप्त हुए है।। २६६-२६९ ।। १. विम म. । २. मौनिमा म.म.,.,मनिममारवयं मीनिगु नदी परिनिनिस्सिनेन सम्बन्धः । निर्मिम्मम...| ७२६ हरिवंशपुराणे वैशासस्यापुनासिद्धया नमिः कृष्णचतुर्दशीम् । सितां प्रतिपदं कुन्थुः सप्तमीमाभिनन्दनः ॥२७० ।। शान्तेः सिद्धितिथिः सिद्धा ज्येष्टकृष्णचतुर्दशी । तस्य शुक्ल चतुर्थी तु धर्मस्य प्रतिपादिता ॥२७॥ आषाढकृष्णपक्षस्य विमलस्याष्टमी मता । नेमेः शुक्लाष्टमी मान्या निर्वाणतिथिरिप्यते ॥२७२।। श्रावणे शुरूसप्तम्या पार्श्वस्य परिनिवृतिः । श्रेयसः पौर्णमास्यां तु धनिष्टासु प्रतिष्ठिना ।।२७३।। चन्द्राम शुक्लसप्तम्यां सिद्धो भाद्रपदस्य तु । अष्टम्यां पुष्पदन्तोऽस्य शीतलोऽश्वयुजस्य तु ॥२७॥ निर्वृतः सितपञ्चम्या कृष्णायां परिनिवृतिः । श्रीवीरस्य चतुर्दश्यां कार्तिकस्य विनिश्चिता ।।२७५।। वृषोऽजितोऽपि च श्रेयान् शोनलश्चामिनन्दन. । सुमतिश्च मुपाचश्च पूर्वाहे चन्द्रमस्तथा ।।२७६।। संमवः पद्मभासश्च पुष्पदन्तो मवान्तकः । अपराहे जिनाः सिद्धा वासुपूज्य जिनस्तथा ॥२७॥ विमलानन्तशान्तीनां कुन्योर्मलीशविंशयोः । प्रदोषसमये या नितिन मिपायोः ॥२७॥ धर्मस्यारजिनेन्द्रस्य नमिवीरजिनेन्द्रयोः । प्रत्यूपे सिद्विरुद्दिष्टा नष्टाष्टविधकर्मणाम् ॥२७९।। 'वृपस्य वासुपूज्यस्य नेमः पर्यअन्धतः । कायोत्सर्गस्थितानां तु सिद्धिः शेपजिनेशिनाम् ॥२८॥ धतुर्दशदिनान्याद्यः संहृत्य विहृतिं जिनः । वीरोहद्वितयं शेषा मासं संहृत्य मुनिगाः ॥२८॥ चीरस्यैकस्य निर्वाण पड्विंशतिसहितस्य तु । पार्श्वस्य सह नेमः षट्त्रिंशता पञ्चमिः शतैः ।।२८२।। वैशाख कृष्ण चतुर्दशीको नमिनाथ भगवान् , वैशाख शुक्ल प्रतिपदाको कुन्थुनाथने और वैशाख शुक्ल सप्तमीको अभिनन्दननाथने अपने निर्वाणसे पवित्र किया है ।।२७०।। ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी शान्तिनाथ भगवान्को, ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी धर्मनाथकी, आपाढ़ कृष्ण अष्टमी विमलनाथकी और आपाद शुक्ल अटमी नेमिनाथ भगवानको निर्वाणतिथि मानी जाती है ।।२७१-२७२।। श्रावण शुक्ल सप्तमीको पार्श्वनाथका और श्रावण शुक्ल पूर्णिमाको धनिष्ठा नक्षत्रमें श्रेयांस- नाथका निर्वाण हुआ है ।।२७३|| भाद्रपद शुक्ल सप्तमीको चन्द्रप्रभ, भाद्रपद शुक्ल अष्टगोको पुष्पदन्त और आश्विन शुक्ल पञ्चमीको शीतलनाथ निर्माणको प्राप्त हुए हैं एवं कार्तिक कृष्ण चतुदर्शीको श्री भगवान महावीरका निर्वाण निश्चित है ।।२७४–२०५।। वृपभनाथ, अजितनाथ, श्रेयांसनाथ, शीतलनाथ, अभिनन्दननाथ, सुमतिनाथ, सुपार्श्वनाथ और चन्द्रप्रभ ये पूर्यालकालमें, संभवनाथ, पद्मप्रभ, संसार-भ्रमणका अन्त करनेवाले पुष्पदन्त और वासुपूज्य ये अपराह्नकालमें सिद्ध हुए हैं ॥२७६-२७७।। विमलनाथ, अनन्तनाथ, शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रतनाथ, नेमिनाथ और पार्श्वनाथकी सायंकालमें मुक्ति जानना चाहिए ।।२७८|| और अष्ट प्रकारके कर्मोको नष्ट करनेवाले धर्मनाथ, अरनाथ, नमिनाथ और महावीर जिनेन्द्रकी प्रातःकालमें सिद्धि कही गयी है ॥२७॥ भगवान् वृषभनाथ, वासुपूज्य और नेमिनाथ पर्यङ्क आसनसे तथा शेष तीर्थकर फायोमर्ग आसनसे स्थित हो मोक्ष गये हैं ।।२८०|| आदि जिनेन्द्र भगवान् वृपभदेव, मुक्तिके पूर्व चौदह दिन तक बिहारको संकोचकर मोक्ष गये हैं। भगवान महावीर दो दिन और शेप तीर्थ कर एक मास पूर्व विहार वन्द कर मोक्षगामी हुए हैं ।।२८१।। एक महावीर भगवान्का छन्बीस मुनियोंके साथ, पार्श्वनाथ तथा नेमिनाथका १. उमहो य यामु पुग्नो प्रेमी पर करया मिक्षा | काउस्सग्गेण जिगा संसा मुत्ति समायएगा। ३०. चतुर्थ अधिकार ||१२१०॥ २. उसको चोदमदियमे दुटिणं चोरेसरस्म सेसाण', मासेण - विणिवते भीगादी मुतिसाम्यो ||१२०९ 2.प्र. च. अधिकार । ३. नियोगः म०, स्व०, ८० । मुक्ति. येवल्यनिर्माण भयो नियमामृतम् 'तामर- , पष्टितमः सर्गः ७२७ - महिः पञ्चशतः सिद्धः शान्तिनवशतैः सह । सैकैरष्टशर्धो द्वादशः सैकपटशतैः ॥२८॥ सहविमल: पमिरनन्तस्तैस्तु सप्तमिः । सप्तमः पञ्चशत्यामा पद्मामोऽष्टशस्विमिः ॥२८॥ वृपो दशसहस्रस्तु मुनिमिमुक्तिमाश्रितः । प्रत्येकं तु जिनाः शेषाः सहस्रेण समन्विताः ॥२८५॥ भरतश्चक्रवायः सगरो मघवांस्ततः । सनत्कुमारनामान्यः शान्तिः कुन्धुररस्तथा ॥२८६॥ सुभूमश्च महापद्मो हरिपेणो जयोऽपरः । ब्रह्मदत्तश्च पटलण्डनाथा द्वादशचक्रिणः ॥२८॥ निश्च द्विपृष्टश्च स्वयम्भूः पुरुषोत्तमः । पुरुषोपपदी सिंहपुण्डरीको प्रचण्डको ॥२८॥ दत्तो नारायणो कृष्णो वासुदेवा नवोदिताः । त्रिखण्डमरताधीशाः पराखण्डितपौरुषाः ॥२८९॥ विजयोऽचल. सुधर्माग्यः सुप्रभश्च सुदर्शनः । नान्दो च नन्दिमित्रश्च रामः पमो वला नव ॥२९०॥ अश्वग्रीवो भुवि ख्यातस्तारको मकस्तथा । निशुम्मः शुम्मदम्मोजवदनो मधुकैटमः ॥२९॥ चलि प्रहरणामिण्यो रावण. खेचरान्वयः । भूचरस्तु जरासन्धो नवैते प्रतिशत्रवः ॥२९२॥ ऊर्ध्वगा वलदेवास्ते निनिंदाना मवान्तरे । अधोगाः सनिदानास्तु केशवाः प्रतिशत्रवः ॥२९॥ वृषभे भरनश्वको सगरोऽप्यजिते जिने । मघवास्तुर्यश्चक्री च धर्मशान्त्यन्तरे भती ॥२९॥ निजं जिनान्तरं ज्ञेयं शान्तिकुन्थ्वरचक्रिणाम् । चक्रवर्ती सुभूमोऽभूदरमल्लिजिनान्तरे ॥२९५॥ पॉच सौ छत्तीस मुनियोंके साथ निर्वाण हुआ है ॥२८२।। मल्लिनाथ पॉच सो, शान्तिनाथ नौ सौं, धर्मनाथ आठ सौ एक, वासुपूज्य छह सौ एक, विमलनाथ छह हजार, अनन्तनाथ सात हजार, सुपार्श्वनाथ पाँच सौ, पद्मप्रभ तीन हजार आठ सी, वृषभनाथ दश हजार और शेप तीर्थ कर एक-एक हजार मुनियोंके साथ मोक्षको प्राप्त हुए हैं। ।।२८३-२८५।। भरत, सगर, मघवा, सनत्कुमार, शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ, सुभूम, महापद्म, हरिपेण, जय और ब्रह्मदत्त ये बारह चक्रवर्ती छह खण्डोंके स्वामी हुए ॥२८६-२८७॥ त्रिपृष्ट, द्विपृष्ठ, स्वयंभू, पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह, पुरुप पुण्डरीक, (पुण्डरीक) दत्त, नारायण (लक्ष्मण) और कृष्ण ये नी वासुदेव कहे गये हैं। ये तीन खण्ड भरत के स्वामा होते है तथा इनका पराक्रम दूसरोंके द्वारा खण्डित नहीं होता ॥२८८-२८९॥ विजय, अचल, सुधर्म, सुप्रभ, सुदर्शन, नान्दी, नन्दिमित्र, राम और पद्म ये नौ बलभद्र हैं ॥२९०।। अश्वग्रीव, पृथिवीमें प्रसिद्ध तारक, मेरुक, निशुम्भ, सुशोभित कमलके समान मुखवाला मधुकैटभ, बलि, प्रहरण, विद्याधर वंशज रायण और भूमिगोचरी जरासंध ये नौ प्रतिनारायण हैं ।।२९१-२९२।। बलभद्र ऊर्ध्वगामी-स्वर्ग अथवा मोक्षगामी होते हैं तथा भवान्तरमें कोई निदान नहीं बाँधते और नारायण अधोगामी होते हैं एवं भयान्तरमें निदान वाँधते हैं ।।२९३॥ चक्रवर्ती भरत पभनाथके समयमें हुआ, सगर चक्रवर्ती अजितनाथके कालमें हुआ, मघवा और सनत्कुमार धर्मनाथ तथा शान्तिनाथके अन्तरालमें हुए। शान्ति, कुन्थु और अरनाथ चक्रवर्तीका काल अपना-अपना अन्तराल काल है। सुभूम चक्रवर्ती अरनाथ और मल्लिनाथके अन्तराल में हुआ। महापद्म मल्लिनाथ और मुनिसुव्रतनाथके अन्तरालमें हुआ। १. खेचरान्वया. म० । २. अणिदागगदा सम्बे चलदेवा देसवा बिदाणगदा | उड्दगामी सब्वे पजदेवा केसवा अधोगामी ॥१४३६ त्रप्र० ४ अधिकार। + इस उल्लेखसे यह बात सिद्ध होती है कि छह माह आठ समयमें जो छह आठ जीवीके मोद जानेको बात प्रसिद्ध है वह कमसे कम जीवोंकी बात समझनी चाहिए। अधिक जीवोंकी संख्या निर्धारित नहीं है। कितने ही लोग कहते हैं कि इतने मुनि तीर्थकरके कालमें आगे-पीछे मोक्ष गये परन्नु यह उचित नहीं है, क्योकि तीर्थंकरों के मोक्ष जानेवाले शिष्यों को सख्या त्रैलोक्यप्रज्ञप्तिके चतुर्थ अधिकार गाथा नं. १२१८ से १२२९ तक अलग तन्गयी है। ।

७२८ हरिवंशपुराणे मुनिसुव्रतमल्ल्यन्तमहापमः प्रकीर्तितः । मुनिमुद्यतनम्यन्तहरिणस्तु चक्रभृत् ॥२९६॥ नमिनेम्यन्तरे चक्री जयमेनोऽमवत्ततः । प्रझदत्तोऽपि निर्दिष्ट नमिपाजिनान्तरे ॥२९॥ अष्टानां सिद्धिादिष्टा ब्रह्मदत्तमुभूमयोः । सप्तमो भयवांस्तुर्या मृतीयं कल्पमाश्रितो ॥२९८n श्रेयः प्रभृनिधर्मान्तान् पचापश्यन् बलोनितान् । ग्रिष्टाया नृमिहान्ताः पयसंख्यास्तु केशवाः ।।२९९॥ पुण्डरीकोऽरमल्ल्यन्तर्वासुदेवः प्रकीर्तितः । मुनिमुमतमल्ल्यन्नदंसनामा तु केशवः ॥३०॥ मुनिसुव्रतनम्योस्तु मध्ये नारायणः स्मृतः । प्रत्यक्षं यन्दको नेमेः कृष्णः पदासमन्यितः ॥३०॥ एकस्य सप्तमी पृथ्वी पचानां पछ्यदीरिता । पाम्यकस्य धान्यस्य पर्यन्तस्य तृतीयभूः ॥३०२॥ अष्टानां मुनिरुद्दिष्टा वलाना नु नपोयलात् । अन्तस्य ब्रह्मकल्पस्तु ती कृष्णस्य सेरस्यतः ॥३०॥ "धनुःशनानि पञ्चाये हानिः पञ्चाशतोऽष्टसु । दशानां पसु प्रोना पशानामष्टमु क्षयः ॥३०॥ उस्मेधः पाश्वनाथस्य नवारनिमितस्ततः । धीरस्यारन्नयः सप्त जिनोसिधः क्रमादयम् ॥३०५॥ महापद्म मल्लिनाथ और मुनिसुव्रतनाथके अन्तरालमें हुआ। हरिपेण, मुनिसुव्रत और नमि- नाथके अन्तरालमें हुआ। जयसेन चक्रवर्ती नमिनाथ और पार्श्वनाथके अन्तरमें हुआ और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती, नेमिनाथ तथा पार्श्वनाथ जिनेन्द्रके अन्तरालमें हुआ है ॥२९४-२९६।। इन बारह चक्रवतियोंमें आठको मुक्ति प्राप्त हुई है, ब्रह्मदत्त और सुभूम सातवीं पृथियी गये तथा मघवा और सनकुमार तीसरे स्वर्गको प्राप्त हुए हैं ॥२९७॥ त्रिपृष्ठसे लेकर पुरुपसिंह तकके पॉच नारायणोंने श्रेयांसनाथसे लेकर धर्मनाथ तकके पाँच तीर्थकरोंके अन्तराल कालको वलभद्रोंके साथ देखा है अर्थात् त्रिपृष्ठादि पाँच नारायण और विजय आदि पाँच वलभद्र श्रेयांसनाथसे लेकर धर्मनाथ तकके अन्तरालमें हुए हैं। पुण्डरीक, अरनाथ और मल्लिनाथके अन्तरालमें, दत्त, मल्लिनाथ और मुनिसुव्रतनाथके अन्तरालमें, नारायण (लक्ष्मण ), मुनि सुव्रतनाथ और नमिनाथके अन्तरालमें हुआ है और कृष्ण पद्मके साथ नेमिनाथकी वन्दना करनेवाला प्रत्यक्ष विद्यमान है हो ।२९८-३०१।। इन नारायणोंमें प्रथम नारायण त्रिपृष्ठ सातवीं पृथिवी गया। दूसरेसे लेकर छठे तक पाँच नारायण छठी पृथिवी गये। सातवाँ पाँचवीं पृथिवी गया और आठवाँ तीसरी पृथिवी गया और नौवॉ भी तीसरी पृथिवी जायेगा ॥ ३०२ ॥ प्रारम्भके आठ बलभद्रोंने सपके माहात्म्यसे मुक्ति प्राप्त की है और अन्तिम बलभद्र पाँचवें ब्रह्म स्वर्ग जावेगा। यह वहाँ से आकर जब कृष्ण तीर्थङ्कर होगा तब उसके तीर्थमें सिद्ध होगा-मोक्ष प्राप्त करेगा ॥३०३।। वृपभजिनेन्द्रके शरीरको ऊँचाई पाँच सौ धनुप थी, फिर आठ तीर्थङ्करोंकी ऊँचाई पचास-पचास धनुप कम होती गयी । उसके बाद पाँच तीर्थङ्करोंको दस-दस धनुष कम हुई। तदनन्तर आठ तीर्थङ्करोंकी पॉच-पाँच धनुप कम हुई ॥३०४|| पार्श्वनाथकी नो हाथ और महावीरको सात हाथ ऊँचाई होगी। इस प्रकार क्रमसे तीर्थङ्करोंकी ऊँचाई जानना चाहिए ॥३०५॥ १. सप्तमों म०। २. पदमहरीसत्तम्मिए पचच्छटाम्मि पचमी एक्को । एक्को तुरिये चरिमो तदिए गिरए तहेव पडिसत्तू ॥१४३८॥ त्रै० प्र०, अ० ४, त्रैलोक्यप्राप्तौ त्रिलोकसारे च लक्ष्मणस्य चतुर्थपृथिवीगमन प्रख्यातम् । हरिवशे पद्मचरिते च तृतीयपृथिवीगमनं प्ररूपातम् । ३. गिरसेयस मट्ठ गया इलिणो चरिमो बम्ह क्त्यगदो । तत्तो कालेण मदो सिम्झदि, केहस्त तित्यम्मि ॥१४३७।। त्रै०, प्र०, च०, अ० । ४. पंच- सयधणुपमाणो उसइजिगिंदस्स होदि उच्छेहो । तत्तोपण्णासूणा गियमेण य पुष्पदतपेरते ॥५८५।। एतो जाव श्रणत दम दस कोदडमेतपरिहीयो । तत्तो ऐमि जिणंतं पगप गचावेहि परिहीणो १५८६॥ पव हत्या पासजिणे सग हत्था वड्दमाग णामम्मि । एत्तो तित्थयराणं सरीरवाणं परवेमो ॥५८७॥ ३० प्र०, १० ४ ।

पष्टितमः सर्गः पञ्च चापशतान्याये चक्रिण्यु-संध इप्यते । चनु शतानि सार्धानि धषि सगरस्य तु ॥३०६॥ द्वाचवारिंशदिष्टानि साधांनि तु धनूंप्यतः । साधनेन युक्तानि चस्यारिंशद्धपि तु ॥३०७॥ चत्वारिंशदथोक्तानि पञ्चमस्य तु चक्रिणः । पञ्चत्रिंशत्ततस्निगदष्टाविंशतिरष्टमे ॥३०॥ द्वाविंशतिर्महापद्म विंशतिश्च चतुर्दश । ततः सप्त धपि स्यादुत्सेधश्चक्रवर्तिनाम् ॥३०९।। अशीतिः सप्ततिः षष्टिः पञ्चाशत्पञ्चमि मह । चत्वारिंशद्धपि स्युः पड्विंशतिस्ततः परः ॥३१०॥ द्वाविंशतिस्तथोक्तानि पीडशापि दर्शव तु । उस्मेधो वासुदेवानां वलदेवप्रतिद्विपाम् ॥३१॥ आयुश्चतुरशीतिश्च पूर्वलक्षा जिनेशिनाम् । वामप्ततिश्च पष्टिश्च पञ्चाशच यथाक्रमम् ॥३१२॥ चत्वारिंशत्तथा त्रिशद्विशनिश्च दशैव ताः । लक्षे लक्षं च पूर्वाणां दशानामायुरीरितिम् ॥३१३॥ वर्षलक्षास्ततो लक्ष्या अशीनिश्चतुरुत्तरा । द्वासप्ततिस्तत पष्टिस्त्रिंशदश तथैककम् ॥३१॥ ततो वर्षसहस्राणि सपञ्चनवनिश्चतु । श्रशीतिः पञ्चपञ्चाशस्त्रिंशदृश तथैककम् ॥३१५॥ ततो वर्षशतं पूर्ण हासप्तनिरिति क्रमात् । जिनानामायुराख्यातमायुर्वृद्धिं करोतु व. ॥३१६।। लक्षाश्चतुरशीतिस्तु द्वासप्तनिरिति क्रमात् । पूर्वाणां वर्षलक्षास्तु का प्रपञ्चिता. ॥३१७॥ ततो वर्षसहस्राणि नवति. पञ्चमियुना । तथा चतुरशीतिः स्यादष्टापटिस्तत. पुनः ॥३१॥ त्रिंशन् पड्विंशनिस्त्रीणि वर्षसप्तशतानि च । आयु प्रमाणमतत्तु कधितं चक्रवर्तिनाम् ॥३१६॥ वर्षाणां चतुरशीतिलंक्षा द्वासप्ततिस्तत । पष्टिनिंशशातोऽपि पञ्चपष्टिसहस्वकम् ॥३२०॥ द्वानिशद्वादशैकं च प्रोक्तं वर्षसहस्रकम् । केशवानां यथागंख्यमायु संख्या विदा मता ३२१॥ प्रथम चक्रवर्तीकी ऊँचाई, पॉच सौ धनुप, दूसरे सगर चक्रवर्तीकी साढ़े चार सौ धनुप, तीसरेकी साढ़े वयालीस धनुप, चौथेकी साढ़े इकतालीस धनुप, पाँचवेंकी चालीस धनुप, छठेकी तीस धनुप, सातवेंकी तीस धनुप, आठवेंको अट्ठाईस धनुष, नौवें महापद्म- की बाईस धनुप, दशवेंकी बीस धनुप, ग्यारहवेंकी चौदह धनुप, और बारहवेंकी सात धनुप थी। इस प्रकार चक्रवर्तियोंकी ऊँचाईका वर्णन किया ॥३०६-३०९।। अस्सी, सत्तर, साठ, पचपन, चालीस, छब्बीस, वाईस, सोलह और दश धनुप यह क्रमसे नारायण, बलभद्र और प्रतिनारायणोंकी ऊँचाई है ॥३१०-३११।। प्रारम्भसे लेकर दशवें तीर्थकर तककी आयु क्रमसे चौरासी लाख पूर्व, बहत्तर लाख पूर्व, साठ लाख पूर्व, पचास लाख पूर्व, चालीस लाख पूर्व, तीस लाख पूर्व, बीस लाख पूर्य, दश लाख पूर्व, दो लाख पूर्व और एक लाख पूर्व आयु कही गयी है ।।३१२-३१३।। तदनन्तर श्रेयांसनाथसे लेकर महावीर पर्यन्तको आयु क्रमसे चौरासी लाख वर्प, बहत्तर लाख वर्ष, साठ लाख वर्प, तीस लाख वर्प, दश लाख वर्ष, एक लाख वर्ष, पंचानवे हजार वर्ष, चौरासी हजार वर्ष, पचपन हजार वर्ष, तीस हजार वर्ष, दश हजार वर्ष, एक हजार वर्ष, सौ वर्प और यहत्तर वर्ष की है । इस प्रकार क्रमसे तीर्थङ्करोंकी आयु कही। यह तुम्हारी आयु वृद्धि करे ।।३१२-३१६॥ चौरासी लाख पूर्व, वहत्तर लाख पूर्व, पाँच लाख, तीन लाख, एक लाख, पंचानवे हजार, चौरासी हजार, अड़सठ हजार, तीस हजार, छब्बीस हजार, तीन हजार और सात सौ वर्ष यह क्रमसे चक्रवर्तियोंकी आयुका प्रमाण कहा गया है ॥३१७-३१।। चौरासी लाख, बहत्तर लाख, साठ लाख, तीस लाख, दहा लाख, पैंसठ हजार, बत्तीस हजार, वारह हजार और एक हजार वर्प यह क्रमसे नौ नारायणोंको आयुका प्रमाण विद्वानोंके द्वारा माना गया है ॥३२०-३२१ हरिवंशपुराणे आयुर्लक्षा वलानां स्युः सप्ताशीतिश्च सप्ततिः । सप्तोत्तरा तथा पष्टिः पञ्चशिदश क्रमात् ॥३२२॥ पष्टिवपमहखाणि निंशश च सक्षमिः । द्विशत्यान्दसहवं तु तचरमस्य यलस्य तु ॥३२३।। वृषाद्या धर्मपर्यन्ता जिनाः पञ्चदश फ्रमात् । निरन्तरास्ततः शून्ये त्रिजिनाश्शून्ययोयम् ॥३२॥ 'जिनः शून्यद्वयं तस्माजिनः शून्यद्वयं पुनः । जिनः शून्यं जिनः शून्यं द्वौ जिनेन्द्रो निरन्तरी ॥३२५।। चक्रिणी भरताद्यौ हो तो शून्यानि त्रयोदश । षट्चक्रिणस्त्रिशून्यानि चक्री शून्यं च चक्रभृत् ॥३२॥ तत: शून्यद्वयं चक्री शून्यं चक्रधरस्ततः । शून्ययोद्वितयं तस्मादिति चक्रधरनमः ॥३२७।। शून्यागि दश पञ्चातखिपृष्टावास्तु केशवाः । शून्यपट्कं ततश्चकः केशवो व्योमकेशवः ॥३२८॥ त्रिशून्यं केशवश्चकः शून्यद्वितयमप्यतः । केशवत्रीणि शून्यानि केशवानामयं क्रमः ॥३२९।। सतासी लाख, सत्तर लाख, सड़सठ लाख, पैंतीस लाख, दश लाख, साठ हजार, तीस हजार, सत्रह हजार और बारह सौ वर्ष यह क्रमसे बलभद्रोंकी आयु है ॥३२२-३२३।। तीर्थकरोंके कालमें चक्रवर्ती तथा नारायणोंका क्रम जानने के लिए चौंतीस कोठाका एक यन्त्र बनाना चाहिए । उसके नीचे चौंतीस-चौतीस कोठाके दो यन्त्र और घनाना चाहिए। ऊपरके यन्त्रमें तीर्थंकरोंका, वीचके यन्त्रमें चक्रवर्तियोंका और नीचेके यन्त्रमें नारायणोंका विन्यास करे । यन्त्रों में तीर्थंकरोंके लिए एकका अंक, चक्रवर्तियोंके लिए दोका अंक और नारायणोंके लिए तीनका अंक प्रयुक्त किया जाता है। ऊपरके यन्त्रमें ऋषभनाथसे लेकर धर्मनाथ तक पन्द्रह तीर्थकरोंका क्रमसे विन्यास करना चाहिए अर्थात् प्रारम्भसे लेकर पन्द्रह खानों में एक- एक लिखना चाहिए । उसके बाद दो शून्य, फिर तीन तीर्थकर,फिर दो शून्य, फिर एक तीर्थकर, फिर दो शून्य, फिर एक तीर्थकर, फिर दो शून्य, फिर एक तीर्थकर, फिर एक शून्य और फिर लगातार दो तीर्थकर इस प्रकार तीर्थकरोंका विन्यास करना चाहिए । तदनन्तर नीचेके यन्त्रमें भरत आदि दो चक्रवर्ती, फिर तेरह शून्य, फिर छह चक्रवर्ती, फिर तीन शून्य, फिर एक चक्र- वर्ती, फिर एक शून्य, फिर एक चक्रवर्ती, फिर दो शून्य, फिर एक चक्रवर्ती, फिर एक शून्य, फिर एक चक्रवर्ती और फिर दो शून्य इस प्रकार चक्रवर्तियोंका क्रमसे विन्यास करे । तदनन्तर नीचेके यन्त्रमें प्रारम्भमें दश शून्य, फिर त्रिपृष्ठ आदि पाँच नारायण, फिर छह शून्य, फिर एक नारायण, फिर एक शून्य, फिर एक नारायण, फिर तीन शून्य, फिर एक नारायण, फिर दो शून्य, फिर एक नारायण और फिर तीन शून्य इस प्रकार क्रमसे नारायणोंका विन्यास करे । इसको संदृष्टि इस प्रकार है- भावार्थ -भरत चक्रवर्ती वृषभनाथके समक्ष, सगर चक्रवर्ती अजिनेश्वरके समक्ष तथा १. जिने म०। २. जिने म1 ३. चक्रधरा. क्रमात् ड० । ॐ यह प्रकरण तिलोयपएणत्तिके चतुर्थ महाधिकार से लिया हुआ नान पड़ता है, वहाँ इस प्रकरणकी गाथाएँ इस प्रकार हैं- रिस हेमरस्स भरहो सगरो अजिगसरस्स पच्चरखं । मघवा सणकुमारो दो चक्की धम्म संति विद्याले ॥१२८३॥ अइ सति कुन्यु पर जिण तित्थयग ते च चक्कवद्वित्ते । एक्को सुभउमचकी अरमल्लीणंतराय- पष्टितमः सर्गः ७३१ 'पादः कुमारकालः स्यादायुपो वृषमस्य सः। न्यूनः संयमकालस्य राज्यकालस्तुतोऽपरः ॥३३०|| मघवा और सनत्कुमार ये दो चक्रवर्ती, धर्मनाथ और शान्तिनाथके अन्तरालमें हुए हैं। शान्ति, कुन्थु और अर ये तीन स्वयं तीर्थकर तथा चक्रवर्ती हुए हैं । सुभीम चक्रवर्ती अरनाथ और मल्लिनाथके अन्तरालमें, पद्म चक्रवर्ती मल्लि और मुनिमुत्रनके अन्तरालमें, हरियेण चक्रवर्ती सुत्रत और नमिनायके अन्तरालमें, जयसेन चक्रवर्ती नमिनाथ और नेमिनाथके अन्तरालमें तथा ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती नेमिनाथ और पार्श्वनाथके अन्तराल में हुए हैं। यहाँ जो चक्रवर्ती तीर्थकरोंके समक्ष न होकर अन्तरालमें हुए हैं उनके ऊपर तीर्थंकरोंके कोष्टकमें शून्य रखे गये हैं और जो तीथंकरोंके समक्ष हुए हैं उनके ऊपर तीर्थकरोंके कोष्ठकमें एक लिखा गया है । जिन तीर्थकरोंके समक्ष चक्रवर्ती हुए हैं उनके नीचे चक्रवर्तीके कोष्टकमें दो का अंक लिखा गया है और जिनके समक्ष अभाव रहा है उनके नीचे शून्य रखा गया है । इसी प्रकार नारायणोंके विषयमें जानना चाहिए अर्थान् पहलेसे लेकर दशम तीर्थकर तक तो कोई भी नारायण नहीं हुआ पश्चात् ग्यारहवेसे पन्द्रहवें तक पाँच नारायण हुए। तदनन्तर अर और मल्लिनाथके अन्तरालमें, मल्लि और मुनिसुत्रतके अन्तरालमें, सुत्रत और नमिके अन्तरालमें और नेमिनाथके समयमें नारायण हुए। जहाँ नारायणोंका अभाव है वहाँ कोष्ठकोंमें शून्य और जहाँ सद्भाव है, वहाँ तीनका अंक लिखा गया है ॥३१९-३२४।। भगवान् वृपभदेवकी आयु चौरासी लाख पूर्वको थी। उसका एक चतुर्थ भाग अर्थात् वीस लाख पूर्वका कुमारकाल था। शेष संयमके कालको घटाकर जो बचता है वह राज्यकाल था। भावार्थ- F-भगवान् वृषभदेवने वीस लाख पूर्व कुमारकाल बिताया, प्रेसठ लाख पूर्व राज्य किया, एक हजार वर्ष तप किया और एक हजार वर्ष कम एक लाख पूर्व केवलोकाल मि ॥ १२८४ ॥ अह पठमयमयी मल्ली मुणि सुव्ययाण विच्चाले। मुम्वरगमीण माझे हरिसेणो णाम- चकारी ॥ १२८५ ॥ जयसेगमयट्टी एमि-णेमिजिणाणमतरालम्मि। तह बादत पामो चाक मि. पासविच्चाले ॥ १२८६ ॥ चउसहिय तीस कोडा यादव्या तिरिय रूप पंतीए । उट्टणं वे कोट्ठा कादूर्ण पदमकोठेमुं ॥ १२८७ ॥ पणरसेम जिणिंदा गिरंतर दामु मुण्णया तत्तो । तीसु जिग्गा दो सुग्णा इगि जिण दो सुग्ग एक्क जिणे ॥१२८॥ दो सुरुमा एकक जियो इगि सुण्णी इगि जियो य इगि सुष्णो । टागि जिणा इदि कोटा गिट्ठिा तित्य कत्ताणं ।। १२८९ ॥ दो को?सु चक्की सणं तेरसमु चक्किगो छ । सुण्ण निय चक्कि सुगणं दो मुएणं चक्कि सुग्णो य ॥ १२६० ॥ चाकी दो मुण्याई छक्खंड वईण चक्क यहोई । एदे कोटा कमसो संदिछी एक्क दो अंका ॥ १२९१ ।। वनदेवासुदेवप्पटिसत्तणं जागावण संहिटी- पंच जिगिदे बंदंति वेसया पंच आणुपुग्धोए । सेयंस सामिपदि तिविपाहा य पतेक ३१४१४॥ अरमल्लि अंतराले भादव्यो पुंडरोमणामी सो। मनिमुगिमुव्यपाणं विचाले दत्तगानी सो॥ १४१५ ॥ सुव्ययणमि सामीया मन्मे पारायणो समुप्पण्यो। गेमि समयम्म किरणो एदे पर वासुदेवा य ॥१४१६॥ दस सुण्णा पर कैमय उसुमा केसि सुम्प सीओ। तिय सभ्य मेक केसी दो सुम्यं एक केसि तिय , सुग्णं ॥ १४१७ ॥ तिलीयपत्ति ४ अधिकार । १. पदम कुमारकालो मिगरिसहे बीस पुष्वलस्वागि । अजिआदिअर जिगते मगमग आइरस पादेगो ॥५८३ ॥ तत्तो कुमारकालो एगमय सगसहस्म पंचस या 1 पायीतमय निमया तसिं तीम च छरम ॥ ५८४ ।। त्रै......।

७३२ हरिवंशपुराणे पादोऽटादशसंख्यानां पूर्ण: शेपजिनशिनाम् । 'कुमारकालशेषस्य राज्यसंयमकालता ॥३३॥ कुमाराणां जिनानां तु संयमानेहसोज्झितः । आयुःकाल: स कुमारः पञ्चानामपि चण्यते ॥३३२॥ जिनसंयमकालस्तु पूर्वलक्षाथ सोग्झिता। पूर्वाङ्गेन चतुर्मिश्च ह्यष्टामिद्वादशाङ्गकैः ॥३३३।। तत: पोडशमिहीनो विंशत्या तु ततः परम् । चतुर्विशतिपूर्वाडैरष्टाविंशतिसंख्यकैः ॥३३४॥ दशानामायुषः पादः पादोनो द्वादशस्य सः । मलेवर्षशतेनोनो नेमेवपशतैरिभिः ॥३३॥ त्रिंशद्वर्षविहीनस्तु प्रत्येक पार्श्ववीरयोः। द्वेधा संयमकालोऽयं छामस्थः केवली स्थितः ॥३३६।। घृषछद्मस्थकालोऽत्र स्यात्महस्रवण्यतः । द्वादशाब्दानि पूर्णानि स्युवाणि चतुर्दश ।।३३७॥ ततोऽष्टादशवाणि विंशतिस्तु ततः परं । पण्मासा नव वर्षाणि त्रिचतुस्विद्विमासकाः ॥३३८॥ व्यतीत किया ॥३३०॥ अजितनाथसे लेकर अठारहवें अरनाथ तक तीर्थंकरोंकी जो पूर्ण आयु थी उसका एक चतुर्थ भाग कुमारकाल था, और पूर्ण आयुमें-से कुमारकाल छोड़ देनेपर जो शेष रहता है वह उनके राज्य तथा संयमका काल था। [अन्तिम छह तीर्थकरोंका कुमार- काल क्रमसे सौ वर्प, साढ़े सात हजार वर्प, अढाई हजार वर्प, तीन सौ वर्ष, तीस वर्प और तीस वर्ष था ] ॥ ३३१ ॥ वासुपूज्य, मल्लिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर ये पाँच तीर्थकर बाल-ब्रह्मचारी तीर्थकर थे, इसलिए इनको आयुका जो काल था उसमें संयमका काल कम देनेपर उनका कुमारकाल कहा जाता है ॥३३२।। श्री वृषभनाथ भगवानका संयम- काल एक लाख पूर्व था। अजितनाथका एक पूर्वाङ्ग कम एक लाख पूर्व, संभवनाथका चार पूर्वाङ्ग कम एक लाख पूर्व, अभिनन्दननाथका आठ पूर्वाङ्ग कम एक लाख पूर्व, सुमतिनाथका बारह पूर्वाङ्ग कम एक लाख पूर्व, पद्मप्रभका सोलह पूर्वाङ्ग कम एक लाख पूर्व, मुपार्श्व- नाथका वीस पूर्वाङ्ग कम एक लाख पूर्व, चन्द्रप्रभका चौवीस पूर्वाह्न 'कम, पुष्पदन्तका अट्ठाईस पूर्याङ्ग कम, वासुपूज्यका पूर्ण आयुका तीन चौथाई भाग, (चौयन लाख वर्ष) मल्लिनाथका सौ वर्ष कम पूर्ण आयु ( सौ वर्ष कम पचपन हजार वर्ष), नेमिनाथका तीन सौ वर्ष कम पूर्ण आयु (सात सौ वर्ष), पार्श्वनाथका तीस वर्ष कम पूर्ण आयु (सत्तर वर्ष), महायोरका तीस वर्ष कम बहत्तर वर्प (व्यालीस धर्प ) और शेप दस तीर्थंकरोंका अपनी आयुका एक चौथाई भाग संयम काल था। समस्त तीर्थकरोंका यह संयमकाल छद्मस्थ काल और केवलिकालको अपेक्षा दो प्रकारका है ।।३३३-३३६।। वृषभनाथका छद्मस्थ काल एक हजार वर्प, अजितनाथका बारह वर्ष, संभवनाथका चौदह वर्ष, अभिनन्दननाथका अठारह वर्प, सुमतिनाथका बीस वर्प, पद्मप्रभका छह मास, सुपार्श्वनाथका नौ वर्ष, चन्द्रप्रभ- का तीन मास, पुष्पदन्तका चार मास, शीतलनाथका तीन मास, श्रेयांसनाथका दो मास, , १. कुमारकाल शेषस्य म० । * तिलोयपणत्तिके च अ. गाथा नं० ५८४ का अनुवाद है। + नौवें पुष्पदन्तसे लेकर धर्मनाथ तकका छद्मय काल यहाँ ४, ३ श्रादि मास बतलाया है परन्तु तिलोयपण्णतीमे ४, ३ आदि वर्ष बतलाया है । तिलोयपणत्तिको गाथाएँ इस प्रकार है- उसहादीसुवासा सहरस वारस च उद्दसटरसा । भीम छदुमत्थकालो छच्चिय पउमप्पहे मासा ॥६७५।। वासाणिणव मुपासे मासा चदप्पाइम्मि तिणि तदो। चदु तिदु एक्का तिदु इगि सोलस चउवग्ग चउपदी वासा ॥ ६७६ ।। मल्लिजिणे छदिवसा एक्कारस सुब्बदे जिणे मासा । णमि णाहे णव मासा दिणागि छपण्ण णेभि. जिणे ।। ६७ ।। पासजिणे चऊमासा वारसवासाणि वढमाणजिणे । एत्तियमेते समये केवलणाण न ताण उप्पण।। ६७८॥

पष्टितमः सर्गः एकत्रिद्वयकमासाश्व वर्षाणि विश्व पीडश । पडकादशसंख्याहर्मासा वीण्यता नव ॥३३९।। पट्पञ्चाशदिनानि स्युर्मासाश्चन्वार एव च । वर्षाणि द्वादशैवातः परं कैवलिनो जिनाः ॥३४०॥ आद्यस्य गणिनी भतुरशीनिश्चतुरुत्तरा । नवतिः पञ्चसंयुक्तं शतम्न्युत्तरमप्यतः ॥३४१॥ शतमेव पुनज्ञेयं पोडशैकादशाधिकम् । पञ्चोत्तरा च नवतिस्युत्तरा नवतिस्तथा ॥३४२॥ वतोऽटकाधिकाशीति:२ सप्ततिः सामियुता । पट पष्टिः पञ्च पञ्चायस्पञ्चाशच ततः परम् ||३४२।। त्रिचत्वारिंशदेवातः पट् निशस्त्रिंशदन्विता । पञ्चमिस्त्रिंशदप्यस्मादष्टाविंशतिरेव तु ॥३४४॥ अष्टादश गणाधीशास्तथा सप्तदश क्रमात् । एकादश दशव स्युरेकादश च ते पुनः ॥३४५|| आद्यस्यायो गणी नाम्ना सेनान्तो वृपमः प्रमोः । सिंहसेनस्ततोऽप्यन्यश्वारुदत्त इतीरितः ॥३४६।। वज्रश्च चमरो बज्रचमरो वलिदत्तको। वैदर्भश्वानगारश्च कुन्धुश्चापि सुधर्मकः ॥३४७।। यासुपूज्यका एक मास, विमलनाथका तीन मास, अनन्तनाथका दो मास, धर्मनाथका एक मास, शान्ति, कुन्थु और अरनाथका सोलह-सोलह वर्ष, मल्लिनाथका छह दिन, मुनिसुव्रत- नाथका ग्यारह मास, नमिनाथका नौ वर्ष, नेमिनाथका छप्पन दिन, पार्श्वनाथका चार मास और महावीरका बारह वर्ष है। इस छद्मस्थ कालके वाद सभी तीर्थकर केवली हुए हैं ।। ३३७-३४०॥ भगवान ऋपभदेवके चौरासी गणधर थे, अजितनाथके नब्बे, संभवनाथके एक सी पाँच, अभिनन्दननाथके एक सौ तीन, सुमतिनाथके एक सौ सोलह, पद्मप्रभके एक सौ ग्यारह, सुपार्श्वनाथके पंचानवे, चन्द्रप्रभके तेरानवे, पुष्पदन्तके अठासी, शीतलनाथके इक्यासी, श्रेयांसनाथके सतहत्तर, वासुपूज्यके छयासठ, विमलनाथके पचपन, अनन्तनाथके पचास, धर्मनाथके तेतालोस, शान्तिनाथके छत्तीस, कुन्थुनाथके पैंतीस, अरनाथके तीस, मल्लिनाथके अट्ठाईस, मुनिसुव्रतनाथके अठारह, नमिनाथके सत्तरह, नेमिनाथके ग्यारह, पार्श्वनाथ. के दस और महावीरके ग्यारह गणधर थे ॥३४१-३४५॥ आदि तीर्थंकर ऋषभदेवके प्रथम गणधर वृषभसेन, अजितनाथके सिंहसेन, संभव- नाथके चारुदत्त, अभिनन्दनके वन, सुमतिनाथके चमर, पद्मप्रभके वनचमर, सुपार्श्वनाथके १. तनोऽटै कादशाशीतिः म० । २. तिलोयपण्णतौ तु शीतलनाथस्य सप्ताशीतिगणधराः प्रोक्ताः । ३. बलदत्तको ग०, ख.। * तिलोयपणत्तिमें शीतलनाथ ८१ के स्थानपर ८७ गणधर बतलाये हैं। गाया इस प्रकार है- चुलसीदि णउदि पग तिग सोलस एक्पारसूत्तरसयाई। पगणउदी तेणउदो गणहरदेवा हु अट्ठ परियंतं ।।६६१॥ अटसीदी सगसीदी सतत्तरि छक समाधिया छट्ठी। पगवाणा पासा ततो य अर्गत परियंतं ॥६६२॥ तेदाले छत्तीसा पणतीमा तीन अट्ट बीसा य । अट्टारह सत्तरमेक्कारस दस एक्करस य वीरंत ॥ १६॥च० अ०। तिणीयपत्ति में अन्तर है गाया इस प्रकार हैं- पटमी हु उसहसणो वेसरिसेणो य चारुदत्तो य । यत्रचमरो य यग्जो चमरो बलदत वेदमा ||९६४|| णागो कुन्थ् धामो मन्दिरणामा नग्रो अरिटो य । सेगो चक्कायुधयो सर्यभु कुभो विसाखो य ।। ६६५ ।। मल्लीगामो सुपश्यरटत्ता सयभु ईददीनी । उमहादीपं आदिम गणधर पामाणि पदाणि ॥ १६ ॥ एदे गुणधरदेवा सम्ने विहु प्रहरिधिमंगमा । तागं रिक्षिमस्व लव मेरी जिस्मो ॥६६७ ॥ २०१० 'ममेन केसरीन, चारदा', याचामर, वन, यमर', बलदन, मि, नाग, कुष, मन्दिर", ", मरिष्ट, सेन", चत्रायुधै', स्वयंभ , युम्भ', विशाख", मल्लि', सुम', परदन', रउपभू", और इन्द्रभूति", कामादि वीर्यको प्रथम गणघरोके नाम हैं। , - .

हरिवंशपुराणे
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मन्दरार्यों जयोऽरिष्टसेनश्चक्रायुधस्ततः । स्वयम्भूः कुन्थुनामा च विशासो मल्लिमोमको ॥३४८॥
वरदत्तः स्वयम्भूः स्यादिन्द्रभूतिगणप्रभुः । ऋद्धिमिः सप्तमियुक्ताः सर्वे ते श्रुतपारगाः ॥३४९॥
वीरस्यैकस्य निष्क्रान्तिस्त्रिशतैमलिपार्श्वयोः । पदुत्तरः शतैः पड्मिर्वासुपूज्यजिनस्य तु ॥३५०॥
चतुःसहस्रसंख्यानैर्निष्क्रान्तो वृपभो नृपैः । सहस्रपरिवारास्तु प्रत्येकमितरे जिनाः ॥३५१॥
चतुर्मिरधिकाशीतिः सहस्राणि वृषस्य तु । लक्षं लक्षे त्रिलक्षाश्च द्विखिलक्षाः सहस्रकैः ॥३५२॥
विशत्या त्रिंशता युक्तास्तास्तु लक्षात्रयं ततः । सार्धलक्षे पुनर्लक्षे लक्षाशीतिश्चतुर्युता ॥३५॥
सहस्रगुणिता सा तु द्वाससतिरपीदशी । अष्टापष्टिश्च पट्पष्टिश्चनुपष्टिसहस्रकम् ॥३५४॥
द्वापष्टिश्च सहस्राणि पष्टिः पञ्जादशेव च । चत्वारिंशत्सहस्राणि शिद्विशतिरव तु ॥३५५॥
अष्टादशसहस्राणि पोडशापि चतुर्दश । सहस्राणि यथासंख्यं गणसंख्या जिनेशिनाम् ॥३५६॥
'संघः सप्तविधः पूर्वधरशिक्षकभेदतः । सावधिः केवली वादी विक्रिया विपुलायुतः ॥३५७॥
बलि, चन्द्रप्रभके दत्तक, पुष्पदन्त के वैदर्भ, शीतलनाथके अनगार, श्रेयांसनाथके कुन्थु, वासु-
पूज्यके सुधर्म, विमलनाथके मन्दरार्य, अनन्तनाथके जय, धर्मनाथके अरिष्टसेन, शान्तिनाथके
चक्रायुध, कुन्थुनाथके स्वयंभू , अरनाथके कुन्थु, मल्लिनाथके विशाख, मुनिसुव्रतके मल्लि,
नमिनाथके सोमक, नेमिनाथके वरदत्त, पार्श्वनाथके स्वयंभू और महावीरके इन्द्रभूति
थे। ये सभी गणधर सात ऋद्धियोंसे युक्त तथा समस्त शास्त्रों के पारगामी थे ॥३४६-३४९||
भगवान महावीरने अकेले ही दीक्षा ली थी अर्थात् उनके साथ किसीने दीक्षा नहीं ली
थी। मल्लिनाथ और पार्श्वनाथने तीन-तीन सौ राजाओंके साथ, वासुपूज्यने छह सौ छह
राजाओंके साथ, घृषभनाथने चार हजार राजाओंके साथ और शेष तीर्थकरोंके एक-एक
हजार राजाओंके साथ दीक्षा ली थी।। ३५०-३५१ ।।
भगवान् ऋषभदेवके समस्त गणों-मुनियोंको संख्या चौरासी हजार थी । अजितनाथ-
की एक लाख, संभवनाथकी दो लाख, अभिनन्दननाथको तीन लाख, सुमतिनाथकी तीन लाख
बीस हजार, पद्मप्रभकी तीन लाख तीस हजार, सुपार्श्वनाथकी तीन लाख, चन्द्रप्रभकी अढ़ाई
लाख, पुष्पदन्तको दो लाख, शीतलनाथकी एक लाख, श्रेयांसनाथकी चौरासी हजार, वासु-
पूज्यकी बहत्तर हजार, विमलनाथकी अड़सठ हजार, अनन्तनाथकी छयासठ हजार, धर्मनाथ-
की चौंसठ हजार, शान्तिनाथकी बासठ हजार, कुन्थुनाथकी साठ हजार, अरनाथकी पचास
हजार, मल्लिनाथकी चालीस हजार, मुनिसुव्रतनाथकी तीस हजार, नमिनाथकी वीस हजार,
नेमिनाथको अठारह हजार, पार्श्वनाथको सोलह हजार और महावीरकी चौदह हजार संख्या
थी ॥३५२-३५६॥
तीर्थकर भगवान्का यह संघ १ पूर्वधर, २ शिक्षक, ३ अवधिज्ञानी, ४ केवलज्ञानी, ५
वादी, ६ विक्रिया ऋद्धि के धारक और ७ विपुलमतिमनःपर्यय ज्ञानके धारकके भेदसे सात
१. पुव्वधरसिक्खकोट्टीकेयलिवेकुश्विविउलमदिवादी। पत्तेक्क सत्तगणा समाणं तित्यक्ताण
॥१०९८॥ ति०प०, श्र० ४ ॥
*. तिलोयपग्गत्तिमें वासुपूज्य भगवान्के सहदीक्षितोंको संख्या छह सौ छिहत्तर बतलायी है। प्रकरणा-
नुसार गाथा इस प्रकार है-
पाजिदो मल्लिजिणो गयकुमारहिं तिसयमेरोहिं । पासजिणो व तह चिय एक्क चिय घड्दमाग.
जिणो ।। ६६८ ॥ छावारिजुद छरसयमंखेहि वासुपुज्ज सामी य । उसहो तालसएहि सेसा पुह-पुह सहस्स
मेतहि ॥ ६६६ ॥

पष्टितमः सर्गः स्युश्चत्वारि सहस्राणि तथा सप्तशतानि च । पञ्चाशच वृषस्यामी सर्वे पूर्वधरा विमोः ॥३५८॥ चतुःसहनगणनाः शतं पञ्चाशदुत्तरम् । शिक्षकाः सावधिज्ञानाः सहस्राणि नव स्मृताः ॥३५९॥ विशतिस्तु सहस्राणि पूज्याः कवलिनः सताम् । सहस्राण्येव तावन्ति घटातानि च क्रियाः ॥३६०॥ स्युदिशसहस्राणि मत्या विपुलया युताः । शतानि सप्तपञ्चाशत्तमंख्यावादिनोऽपि च ॥३६॥ अजितस्य सहस्राणि ब्रीणि सप्तशतानि च । पञ्चाशच सतां सेन्याः सम्यानां पूर्वधारिणः ॥३२॥ शिक्षकाः षट्शतैः साधं सहस्राण्यकविंशतिः । चतुःशत्या सहस्राणि नव सावधयो मताः ॥३६३॥ स्युविंशतिसहस्राणि केवलाप्तास्तु चैक्रियाः । ज्ञेयास्तावत्सहस्राणि पञ्चाशच चतुःशती ॥३६४॥ द्वादशैव सहखाणि प्रत्येकं च चतुःशती । मस्या विपुलया युक्ता वादिनो हितवादिनः ॥३६५॥ 'संभवस्य सहने द्वे शतं पञ्चाशता समम् । पूज्याः पूर्वभृनो नेयाः पूर्वसद्भाववादिनः ॥३६६॥ एकोनत्रिंशता लक्षा सहस्रस्त्रिशतानि च । संख्या शिक्षकसाधूनां संख्याताः प्रश्रयाश्रिताः ॥३६०॥ षट् शतानि सहस्राणि नव सावधयः स्मृताः । तथा दशसहस्राणि पञ्चमिः केवलाश्रिताः ॥३६८॥ तथैवैकोनविंशस्या सहरष्टमिः शतैः । पञ्चाशद्वैक्रियाः प्रोक्ता विक्रियाशक्तिधारिणः ॥३६९॥ द्वाभ्यां दशसहस्राणि विपुलां मतिमाश्रिताः । शताधिकानि तावन्ति सहस्राणि च वादिनः ॥३७०॥ शतानि पञ्च तुर्यस्य वे सहस्रऽथ पूर्विणः । द्विलक्षे शिक्षकारिनशसहस्राण्यर्द्धिनं शतम् ॥३७१॥ शतान्यष्टी सहस्राणि नवैवानधिवीक्षणाः । पोरशैव सहस्राणि मुनयः केवलेक्षणाः ॥३७२।। एकानविंशतिजेंया सहस्राणि तु वैक्रियाः । एकादशसहस्राणि पञ्चाशत्पटातानि च ॥३७३॥ विपुलोपगता ये ते योद्धम्या मध्यदेहिनाम् । वादिनोऽपि च तावन्ति सहस्राणीष्टवादिनः ॥३७४।। प्रकारका होता है ॥३५७|| भगवान घृपभदेवके समवसरणमें चार हजार सात सौ पचास पूर्व- धारी, चार हजार एक सौ पचास शिक्षक, नौ हजार अवधिज्ञानी, वीस हजार सत्पुरुपोंके द्वारा पूजनीय केवली, वीस हजार छह सौ विक्रिया ऋद्धिके धारक, बारह हजार सात सौ पचास विपुलमतिमनःपर्यय ज्ञानो और इतने ही यादी थे ॥३५८-३६१।। अजितनाथके समवसरणमें समीचीन सभ्य पुरुपोंके द्वारा सेवनीय तीन हजार सात सौ पचास पूर्वधारी, इक्कीस हजार छह सौ शिक्षक, नौ हजार चार सौ अवधिज्ञानी, बीस हजार फेवली, वीस हजार चार सौ पचास विक्रिया ऋद्धिके धारक, यारह हजार चार सी विपुलमति मतिज्ञानफे धारक और इतने ही वादी थे ॥३६२-३६५।। संभवनाथके समवसरणमें दो हजार एक सौ पचास पूर्वोके सद्भावका निरूपण करने वाले पूजनीय पूर्वधारी जानने योग्य हैं ॥३६६॥ एक लास उनतीस हजार तीन सौ शिक्षक साधुओंको संख्या स्मरण की गयी है ॥३६॥ नौ हजार छह सौ अवधिज्ञानी माने गये हैं, पन्द्रह हजार केवलज्ञानी स्मृत किये गये हैं ॥३६८॥ उन्नीस हजार आठ सौ पचाम विक्रिया शक्ति को धारण करनेवाले वैक्रिय साधु थे। यारह हजार विपुलमति ज्ञानके धारक थे और यारह हजार एक सौ वादी मुनि थे ॥३६९।। अभिनन्दननाथके समवसरणमें दो हजार पाँच सौ पूर्वके धारक, दो लाख तीस हजार पचास शिक्षक, नौ हजार आठ सौ अवधिज्ञानी, सोलह हजार केवलज्ञानी, उन्नीस हजार विक्रिया शुद्धिके धारक, ग्यारह हजार छह सौ पचास विपुटमतिमनापर्ययज्ञानी और मन्य जीवोंको हितका उपदेश देनेवाले उनने हो वादी थे ॥३७०-३७।। १. संयमस्य म. (१)। २. पूर्वसभाववेदिनः म.!

1. - हरिवंशपुराणे मुमते महझे तु चनुःशल्यपि पूर्विणः । द्वे लक्षे शिक्षा दयाश्चतुःपञ्चाशदेव च ॥३७५॥ महमाण्यमियुनानि पञ्चाशय शतप्रयम् । एकादशसहसाणि विमलावधयस्तथा ॥३७६॥ प्रयोदशसहमाणि कंवलज्ञानदृष्टयः । अष्टादशमहस्राणि चतुःसत्यपि बैंक्रियाः ॥३७॥ . या दशमहमाणि विपुलाप्ताश्चतुःशी । तावन्तो यादिनस्तेभ्यः सर्वे पञ्चाशताधिकाः ॥३७८॥ पग्रामस्य महसे वे शतानि योनि पूर्विणः । लक्षेद्वे शिक्षकाः पटिसहस्राणि नवापि च ॥३७९॥ भैया दशमहखाणि मुनयोऽवधिलोचनाः। द्वादशाष्टशतैयुंनाः सहस्राण्याप्तकेवलाः ॥३०॥ पोदशव महमाणि निशती चक्रिया नय । वादिनी विपुलाप्ताः षट् शस्यामा दश तानि वै ॥३८॥ दे महमे मुपाश्वस्य ग्रिंशता पविणश्चनुः । चत्वारिंशरसहस्राणि लक्षे नवशतैः सह ॥३८२॥ शिक्षका विशति प्राप्ताः सहस्राणि'नवायधिम् । एकादश महमाणि निशती केवलान्विताः ॥३८३॥ शतं पाशना पञ्च महम्राणि दशापि च । क्रियाविपुलाद्याः षट्शती नवसहस्रकैः ।।३८४॥ यादिनोऽयमहमाणि नतश्चन्द्रप्रमस्य तु । पूर्विणो द्वे महवे तु शक्षा लक्षे चतुःशती ॥३८५॥ मंघावष्टमहसाणि पृथक् सविपुलावधी । दशवलिनस्तानि क्रियाम्नु चतुःशती ॥३८६।। प्रयाः सप्तः महसाणि पट् शतानि च वादिनः । मुविधेः परिण. पर दशायुपयर्णिता ॥३८७॥ लक्षेका पयामाग्महस्राणि शतानि च । पर शिक्षकपाधूनामवधिज्ञानिनोऽष्ट तु ॥३८८॥ महस्राणि चतुःशरया पाशरया तु मप्त । महस्राण्यातकैवल्याः म्युस्त्रयोदश बैंक्रियाः ॥३८९॥ पट महयाणि विपुलां पाशरया मनि भिताः । धादिनः षट्शतैः सप्त सहस्राणि विनिश्चिताः ॥३९०।। नो मुमतिनाथके ममवसरणमें दो हजार चार मी पूर्वधारी, दो लाख चौवन हजार तीन सौ पचाम शिमफ, ग्यारह हजार निर्मल अवधिज्ञांनी, तेरह हजार केवलज्ञानी, अठारह हजार पार मी विक्रिया ऋद्धिके धारक, उतने ही विपुलमतिमनापर्ययज्ञानके धारक और उनसे पचाम अधिक अर्थान् दश हजार चार सौ पचास वादी थे ॥३७५-३७८।। पद्मप्रभफे ममयमरणमें दो हजार तीन सौ पूर्वधारी, दो लाख उनहत्तर हजार शिक्षक, दम हजार अयधिशानी, यारह हजार आठ मी केवलज्ञानी, सोलह हजार तीन मो विनिया दिक धारक, नौ हजार यादी और दम हजार छह मो विपुलमनिमनापर्ययशानी ये ॥३७७-३८११॥ मुपास्यनाथफे ममयमरणमें दो हजार तीस पूर्वधारी, दो लास चयालिस हजार मो यीम शिक्षक, नौ हजार अयधिमानी, ग्यारह हजार तीन मो फेवली, पन्द्रा हजार एक मी पचाम यिक्रिया दिफे धारक, नौ हजार छह मी विपुलमनिमनःपर्ययशानी, और आठ दजार पादी थे। पन्द्रप्रभ समयमरणमें दो हजार पूर्वधारी, दो लाय पार मी शिक्षक, आठ हजार पिपुलमनिमनापर्ययमानी, आठ हजार. अयधिशानी, दम हजार पेयलगानी, दम हजार पार मी विशियारदिफे. धारफ और मारा हजार ८६ मो यादी थे। गुपिधिनाय गमयमरपमें पार हजार पूर्वधार्ग, एक नाम पनपन हजार पाँच गो Prem.. आठ हजार पार मी अपभिमानी, मान हजार पाँच मी पेयलगानी, सेगदनार विरिया एदिप धारप, १६ पजार पांगमा पिपुलमनिमनःपर्ययानी और माननार एगी पारी ३८-३..॥ १.मा...भा.

पष्टितमः सर्गः शीतलस्य चतुःशस्या सहस्रं पूर्ववेदिनः । द्विशत्यकासपष्टिस्तु महस्राणि सुशिक्षकाः ॥३९॥ द्विशत्या सावधिः संघः सहस्राणि हि सप्त सः। सप्तकैवलिनस्तानि द्वादशैतानि वैक्रियाः ॥३९२।। पञ्चशत्या सहस्राणि ससते विपुलेश्वराः । सप्तशल्या सहस्राणि पञ्च महादवादिनः ॥३९॥ त्रयोदश शतानि स्युः पूर्विणः श्रेयमोऽष्टमिः । चम्बारिशरसहस्राणि द्विशती शैक्ष्यमाधवः ॥३९४॥ सावधिः पट् सहस्राणि गणः केवलिनामपि । पञ्चश या सहस्राणि तथैकादश क्रियाः ॥३९५।। ततोऽन्य पद महस्राणि पञ्च तानि ततः परं । शतानि द्वादशैव स्युर्वासुपूज्यस्य पूर्विणः ॥३९६।। द्विशत्या शिक्षकास्त्रिशम्महस्राणि नवापि च । चतुःशल्या सहस्राणि पञ्च सावधयो मताः ॥३९७।। सर्वज्ञाः पट् सहस्राणि चक्रियाः दश पट परे । वादिनस्तु सहस्राणि चन्वारि द्विशती तथा ॥३९८।। शतान्येकादश ज्ञेया विमलस्य तु पूर्विणः । अष्टात्रिंशरमहवाणि पञ्चशत्या तु शैक्षकाः ॥३९९|| श्रष्टशत्या सहस्राणि चन्वायंवधिलोचनाः। पञ्चशत्या सहस्राणि पञ्च केवलिनो नव ॥४००॥ क्रियाश्च सहस्राणि ततोऽन्ये कंवलिप्रमाः वादिननिमहस्री च पट्शती च विनिश्चिताः ॥४०॥ पूर्विणोऽनन्तनाथस्य महस्रगणनाः स्मृना. । पञ्चशत्या सहस्राणि त्रिंशनय च शिक्षकाः ।।४०२॥ स्याचवारि सहस्राणि विशत्या सावधिगंणः । अन्य पाष्टपञ्चत्रिसहसान्यन्तक' गते ॥४०॥ शतानि नव धर्मस्य पूर्विणः शिक्षकाः पुनः । चत्वारिंशत्सहस्राणि तथा सप्तशतानि च ॥४०४।। पट शतानि सहस्राणि श्रीणि सावधयः स्मृताः । पञ्चशत्या सहस्राणि चत्वारि सकलेक्षणाः ॥४०५॥ सन्तः सप्तमहस्राणि वैक्रिया विपुलान्विताः । पञ्चशत्या तु चत्वारि द्विमहस्रयष्टशत्यतः ॥४०६।। , शीतलनाथके समवसरणमें एक हजार चार सौ पूर्ववेदी, उनसठ हजार दो सौ शिक्षक, सात हजार दो सौ अवधिनानी, सात हजार केवलज्ञानी, बारह हजार विक्रिया ऋद्धिके धारक, सात हजार पाँच सौ विपुलमतिज्ञानके स्वामी और पाँच हजार सात सी उत्तम यादी थे ||३९१-३९३।। श्रेयांसनाथके समवसरणमें तेरह मी पूर्वधारी, अड़तालीस हजार दो सौ शिक्षक, छह हजार अवधिज्ञानी, छह हजार पाँच सौ केवलज्ञानी, ग्यारह हजार विक्रिया ऋद्धिके धारक, छह हजार विपुलमतिमनःपर्ययज्ञानी और पाँच हजार यादी थे। वासुपूज्यके समवसरणमें बारह सी पूर्वधारी, उनतालीस हजार दो सौ शिक्षक, पॉच हजार चार सौ अवधिज्ञानी, छह हजार केवलज्ञानी, दस हजार विक्रिया ऋद्धिके धारक, छह हजार विपुलमतिमनःपर्ययज्ञानी और चार हजार दो सौ वादी थे ।।३९४-३९८।। विमलनाथके ग्यारह सौ पूर्वधारी, अड़तीस हजार पाँच सौ शिक्षक, चार हजार आठ सो अवधिनानी, पाँच हजार पाँच सौ केवली, नौ हजार चिक्रिया ऋद्धिके धारक, नी हजार विपुलमति मनःपर्ययनानी और तीन हजार छह मी यादी निश्चित थे ।।३९९-४०१॥ अनन्तनाथके समवसरणमें एक हजार पूर्वधारी, उनतालीस हजार पाँच सी शिक्षक, चार हजार तीन सो अवधिज्ञानी, पाँच हजार केवल ज्ञानी, आठ हजार विक्रिया ऋद्धिक धारक और तीन हजार दो सौ वादी थे ।।४०२-४०३।। धर्मनाथके समवसरणमें नौ सौ पूर्वधारी, चालीस हजार सात सौ शिक्षक, तीन हजार छह सी अवधिन्नानी, चार हजार पाँच सौ केवलज्ञानी, सात हजार विक्रिया ऋद्धि- के धारक, चार हजार पाँच सौ विपुलमति मनापर्ययज्ञानी और दो हजार आठ सौ वादी थे ॥४०४-४०६|| १. न्यन्तगे म.1 हरिवंशपुराणे पूर्विणोऽष्टशती शान्तरष्टशस्य शिक्षकाः । चत्वारिंशमहसय के निमहलीगणः परः ॥४॥ चत्वारि पट (ब)चत्वारि दे सहये चनुदाती । कुन्योस्तु सप्तशत्येव पूणि: शिक्षकाः पुनः ।।३०८॥ चत्वारिंशत्महस्राणि पौषि पञ्चाशता शतम् । सावधिः पशवरया सुदे सहसे गणो मतः ।।४०९॥ विसहसी द्विशत्या तु गणः केवलिना स्मृतः । रातकं चैक्रियाः पन महखाणि च सम्मताः ॥१०॥ निशस्या त्रिमहस्री तु पञ्चायद्विपुलेश्वराः । वादिना जितवादानां महनद्वितया मता IIvam पूज्याः पूर्वभृतोऽरस्य पदशती तु दीत्तरा । दशैमास्तु पञ्चापनिशरसहयरष्ट मिः शतः ॥१२॥ पञ्चत्रिंशन्मताः सर्वे सावधिः परिपप्पुन. । मकवलावधिया द्विसहस्यष्टशस्यपि ॥१३॥ वक्रियास्तु सहस्राणि चत्वारि विशती तथा । सहने पचपचासन्मन्या रिपुलयान्विताः ॥१४॥ शतानि पोरशैव स्युर्यादिनः पवादिनः । महेस्नु पूर्षिणः सर्वे पञ्चाशत् सप्तशत्यपि ॥४१५॥ एकात्रिंशदुदिष्टाः सहस्राणि तु शिक्षकाः। द्वाविंशतिः शतानि स्युर्मुनयोऽवधिचक्षुपः ॥१६॥ सहसे पट व शस्यामा पञ्चाशञ्च संकंवलाः । चतुशाया सहवं तु वैक्रियाः यतयो मताः ।।४१७॥ द्वे सहसे शते द्वे च मता विपुरबुद्धयः । तावन्त एव जनारो वादिनः प्रतिवादिनाम् ॥४१॥ मुनिसुव्रतनाथस्य पूर्विण पजशत्यभून् । शिक्षकाः शिक्षया युक्ता सहस्राण्येकविंशनिः ।।४ १९॥ अष्टादश शतान्यच मता सावधिकवला. । द्वाविंशतिः पञ्चदश, द्वादशैतान्यतः परे ॥४२०॥ पञ्चाशता शतानि स्युश्वरवारि नमिपूर्विण. । पद्भिः दातैः सहसाणि द्वादशैव तु शिक्षकाः ।।४२१॥ शतानि षोडश स्याता केवलावधिलोचनाः । वैक्रियास्तु शतानि स्युस्तथा पञ्चदशैव तु ।।४२२॥ शान्तिनाथके समवसरणमें आठ सौ पूर्वधारी, इकतालीस हजार आठ सौ शिक्षक, तीन हजार अवधिज्ञानी, चार हजार केवलज्ञानी, छह हजार विक्रिया ऋद्धिके धारक, चार हजार विपुलमतिमनःपर्ययज्ञानी और दो हजार चार सौ वादी थे। कुन्थुनाथके समवसरणमें सात सौ पूर्वधारी, तैंतालीस हजार एक सौ पचास शिक्षक, दो हजार पाँच सौ अवधिज्ञानी, तीन हजार दो सौ केवली, पॉच हजार एक सी विक्रिया ऋद्धि- के धारक, तीन हजार तीन सौ पचास विपुलमतिमनःपर्ययज्ञानी और दो हजार वादोंको जीतनेवाले चादी थे ।।४०७-४१२।। अरनाथके समवसरणमें छह सौ दश पूर्वधारी, पैंतीस हजार आठ सौ पैंतीस शिक्षक, दो हजार आठ सौ अवधिज्ञानी, इनने हो केवलज्ञानी, चार हजार तीन सौ विक्रिया ऋद्धिके धारक, दो हजार पचपन विपुलमतिमनःपर्ययज्ञानी और सोलह सौ उत्तम याद करनेवाले वादी थे। मल्लिनाथके समवसरणमें सात मौ पचास पूर्वधारी, उनतीस हजार शिक्षक, बाईस मो अवधिज्ञानी, दो हजार छह सौ पचास केवलज्ञानी, एक हजार चार सौ विक्रिया ऋद्धि- के धारक, दो हजार दो सौ विपुलमतिमनःपर्ययज्ञानी और उतने ही प्रतिवादियोंको जीतने- वाले वादी थे ।।४१२-४२८॥ मुनि सुनतनाथके समवमरणमें पॉच सौ पूर्वधारी, इक्कीस हजार शिक्षासे युक्त शिक्षक, अठारह सौ अवधिज्ञानी, अठारह सौ केवलज्ञानी, बाईस सौ विक्रिया ऋद्धिके धारक, पन्द्रह सौ विपुलमतिमनःपर्यय जानो और बारह सौ वादी थे ॥४१९---४२०।। नमिनाथके समवसरणमे चार सौ पचास पूर्वधारी, वारह हजार छह सौ शिक्षक, सोलह सौ अवधिज्ञानी, सोलह सौ केवलज्ञानी, पन्द्रह मो विक्रिया ऋद्धिके धारक, बारह १. पूज्य: म० | २. लोचनाः म०। ३ नमिपूर्विताः म ।

पष्टितमः सर्गः शतानि द्वादश प्रोक्ताः पञ्चाशद्विपुलेक्षणाः । सहस्रपरिमाणास्तु वादिनोऽप्रतिवादिनः ॥४२३॥ चतुःशतानि नेमेस्तु पूर्विणः शिक्षकाः स्मृताः । एकादश सहस्राणि शतैरष्टभिरेव तु ॥४२४॥ सकेवलावधी संघौ सहस्रं पञ्चशत्यपि । सहस्रं वैक्रियाश्चापि शतं च शुमक्रियाः ॥४२५॥ शतानि नव विज्ञेयाः शान्ता विपुलबुद्धयः । वादिनोऽष्टौ शतानीह नि.प्रतिप्रतिमान्विताः ॥४२६।। पञ्चाशस्त्रिशती चापि स्युः पार्श्वस्य तु पूर्विणः । शैक्षा दश सहस्राणि शतानि नव च स्मृताः ॥४२॥ चतु शत्या सहस्रतु निर्मलावधिबोधनाः । सहस्र केबलालोका वैक्रियाश्च तथा मताः ॥४२८॥ शतानि सप्त पञ्चाशद्विपुलामल बुद्धय. । वादिनः पट् शतानि स्युदिन्यायविधौ बुधाः ॥४२९॥ वर्धमानजिनेन्द्रस्य त्रिशती पूर्वधारिण. । शैक्षा नत्र महसाणि शतानि च नवोदिताः ॥४३०॥ त्रयोदश शनानि स्युरवधिज्ञानिनः परे । ये सप्त नव पञ्च स्युश्चन्वारि च शतानि ॥४३१॥ आर्यास्तिस्रोऽमल्लक्षा जिनपञ्चकसंसदि । पञ्चाशदिशतिस्त्रिंशस्त्रिंशस्त्रिंशत्सहस्त्रकैः ।।४३२।। चतस्रो विदिता लक्षा. पनामस्य समान्तरे । विंशतिश्च सहस्राणि सहस्राणीव रोचिपाम् ॥४३३॥ तिसस्त्रिंशत्सहस्राणि सप्तमस्य समाम्बुधौ । तत. परं त्रयाणां तास्तिस्रोशीतिसहस्रकैः ।।४३४॥ स्याविंशतिसहवैस्तु लकान्यस्य संसदि । एका लक्षा त्रयाणां च पत्रिकाष्ट सहस्रकैः ।।४३५।। स्युषिष्टिसहस्राणि धर्मस्यापि चतु शती । शान्तः पष्टिसहस्राणि शतानां त्रितयं तथा ॥४३६॥ । सौ पचास विपुलमतिमनापर्ययज्ञानी, और एक हजार प्रतिवादियोंसे रहित बादी थे ॥४२१-४२३॥ नेमिनाथके समवसरणमें चार सी पूर्वधारी, ग्यारह हजार आठ सौ शिक्षक, एक हजार पाँच सो अवधिज्ञानी, एक हजार पाँच सौ केवली, एक हजार एक सौ शुभविक्रिया करनेवाले विक्रियाऋद्धिके धारक, नौ सौ विपुलमतिमनःपर्ययज्ञानके धारक और आठ सौ अनुपम प्रतिभासे युक्त यादी थे ॥४२४-४२६॥ पार्श्वनाथके समवसरणमें तीन सौ पचास पूर्वधारी, दश हजार नौ सौ शिक्षक, एक हजार चार सौ निर्मल अवधिज्ञानके धारक, एक हजार केवलज्ञानी, एक हजार विक्रिया ऋद्धिके धारक, सात सौ पचास विपुलमतिमनःपर्ययज्ञानी, और छह सौ वाद-विवादमें निपुण वादी थे ।।४२७-४२९।। और वर्धमान जिनेन्द्रके समवसरणमें तीन सौ पूर्वधारी, नौ हजार नौ सौ शिक्षक, तेरह सौ अवधिज्ञानी. सात सौ केवलज्ञानी, नौ सौ विक्रिया ऋद्धिके धारक, पॉच सौ विपुल- मतिमनःपर्ययज्ञानी और चार सौ वादी कहे गये हैं ।।४३०-४३१।। भगवान् वृषभदेवके समवसरणमें आर्यिकाएँ तीन लाख पचास हजार, अजितनाथके समवसरणमें तीन लाख बीस हजार, संभवनाथके समवसरणमें तीन लाख तीस हजार, अभिनन्दननाथके समवसरणमें तीन लाख तीस हजार, सुमतिनाथके समवसरणमें तीन लाख तीस हजार, पद्मप्रभके समवसरणमें हजारों किरणोंके समान चार लाख वीस हजार, मुपाय- नाथके समवसरणमें तीन लाख तीस हजार, चन्द्रप्रभके समयसरणमें तीन लाख अस्सी हजार, पुष्पदन्तके समवसरणमें तीन लाख अस्सी हजार, शीतलनाथके समवसरणमें तीन लाख अस्सी हजार, श्रेयांसनाथके समवसरणमें एक लाख वीस हजार, वासुपूज्यके समवसरणमें १ यादिनोऽप्रतिवादिनाम् म० । २. विमलयुद्धयः म । ३.-विमलामल म०, क० । तिलोयगतिमें श्रेयांसनायकी नायिकाओंकी सख्या, एक लाख तीस हजार बतलायो है 'तीससहरस भहियं लक्स सेयस देवम्मि' ॥११७०॥ च, अ.।

७४. । हरिवंशपुराणे कुन्थोः पटिसहसाणि पश्चाशच शतप्रयम् । पुनः पष्टिसहमाणि जिनस्यारस्य संसदि ।।४३७।। मलेस्तु पञ्चपञ्चाशरसहस्राणि समान्तरं । सहमाण्येव पञ्चाशन्मुनिसुग्रतसंसदि ।।४३८॥ चन्वारिंशरसहस्राणि नमः पञ्चोत्तराणि ताः । चत्वारिंशत्सहस्राणि नेमः सदसि ताः स्मृताः ॥४३९॥ अष्टानिंशत्सहस्राणि त्रयोविंशस्य संसदि । पञ्चत्रिंशस्सहमाणि चतुर्विशस्य सम्मताः ॥४०॥ तिसोऽष्टानां पृथग्लक्षा जिनानां धावकाः स्मृताः। द्वेलक्षे च ततोऽष्टानां लक्षाटन मता ततः ।।४४१।। पञ्चलक्षास्तथाष्टानां संसदि श्राविकाः स्मृताः। चतसस्तास्ततोऽष्टानां तिमोऽष्टानां जिनेशिनाम् ।।४४२॥ सिद्धाः पटिसहसाणि नवशत्या वृपस्य ते । सप्तसप्ततिरन्यस्य सहसाणि शतान्विताः ॥४॥३॥ शिष्या लक्षा नृतीयस्य सहस्राणि च सप्ततिः । शतं चातः शतं लक्षे सहाशीतिसहसूकैः ॥४४४॥ तिम्रो लक्षाः सहसूच पशतानि नतस्ततः । त्रयोदशसहमाणि तिम्रो लक्षाश्च पटशती ॥४४५॥ पञ्चाशीतिसहस्राणि द्वे लक्षे पटशती ततः । चतुस्विंशरसहस्राणि द्वे लक्षे च ततः परम् ॥४४६॥ लक्षकम विनाशीतिः सहमाण्यपि पाती । ततोऽशोतिसहस्राणि पशतानि च निवृताः ।।४४७॥ पञ्चषष्टिसहस्राणि श्रेयसः षट्शती यथा । चतुःपञ्चाशदेव स्यात्सहसाण्यपि पदशती ।।४४८॥ सहसाण्येकपञ्चाशत् त्रिशती विमलस्य तु । अनन्तस्यापि तावन्ति सहसाण्येव केवलम् ॥४४९॥ धर्मस्यैकानपञ्चाशत् सहसी सप्तशत्यपि । चन्वारिशत्ततोऽष्टौ च सहसाणि चतुःशती ॥४५० ।। चत्वारिंशत्सहस्राणि षट् चाष्टी च शतान्यतः । सप्तत्रिंशत्सहस्राणि द्विशत्यरजिनस्य तु ॥४५१॥ एक लाख छह हजार, विमलनाथके समयसरणमें एक लाख तीन हजार, अनन्तनाथके सम- वसरणमें एक लाख आठ हजार, धर्मनाथके समयसरणमें बासठ हजार चार सौ, शान्तिनाथ- के समवसरणमें साठ हजार तीन सौ, कुन्थुनाथके समवसरणमें साठ हजार तीन सौ पचास, अरनाथके समवसरणमें साठ हजार, मल्लिनाथके समवसरणमें पचपन हजार, मुनिसुव्रतनाथ- के समवसरणमें पचास हजार, नमिनाथके समवसरणमें पैंतालीस हजार, नेमिनाथके समः यसरणमें चालीस हजार, पार्श्वनाथके समवसरणमें अड़तीस हजार, और चौबीसवें महावीर भगवान के समवसरणमें पैंतीस हजार आर्यिकाएँ मानी गयीं हैं ॥४३२-४४०|| प्रारम्भसे लेकर आठ तीर्थंकरोंके समवसरणमें प्रत्येकके तीन-तीन लाख, फिर आठ तीर्थकरों के प्रत्येकके दो-दो लाख और तदनन्तर शेप आठ तीर्थकरोंके प्रत्येकके एक-एक लाख श्रावक थे ॥४४॥ इसी प्रकार प्रारम्भके आठ तीर्थंकरोंके समवसरणमें प्रत्येककी पॉच-पाँच लाख, फिर आठ तीर्थंकरोंकी प्रत्येककी चार-चार लाख और तदनन्तर शेप आठ तीर्थकरोकी प्रत्येककी तीन-तीन लाख श्राचिकाएँ थी।४४२॥ भगवान् घृपमनाथके मोक्ष जानेवाले शिष्योंकी संख्यासाठ हजार नौ सी, अजितनाथ- के सत्तर हजार एक सौ, संभवनाथके एक लाख सत्तर हजार एक सौ, अभिनन्दननाथके दो लाख अस्सी हजार एक सौ, सुमतिनाथके तीन लाख एक हजार छह सौ, पद्मप्रभके तीन लाख तेरह हजार छह सौ, चन्द्रप्रभके दो लाख चौतीस हजार, सुविधिनाथके एक लाख उन्न्यासी हजार छह सौ, शीतलनाथके अस्सी हजार छह सौ, श्रेयांसनाथके पेंसठ हजार छह सौ, वासुपूज्यके चौवन हजार छह सी, विमलनाथके इक्यावन हजार तीन सौ, अनन्तनाथ- के इक्यावन हजार, धर्मनाथके उनचास हजार सात सौ, शान्तिनाथके अड़तालीस हजार १ शिक्षा म०। तिलोय पणत्तिम पद्मप्रभ जिनेन्द्र के मुक्त होनेवाले शिष्योको सख्या तीन लाख चौदह हजार बतलायी है । 'चोदस सहस्स सदिदा पउमापह जिणवरस्त तियलवखा' ||१२२०|| १० च ।

पष्टितमः सर्गः ७४१ - अष्टशत्या सहसाणि ततोऽष्टाविंशनिस्तया। एकानविशतिस्तस्मात्सहस्राणि शतद्वयम् ॥४५२॥ नमर्नव सहसाणि षट् शतानि च निवृताः। नेमेष्टी सहस्राणि पट् सप्त द्वे शते द्वयोः ॥४३॥ यदेव केवलोत्पत्तिः पोडशानां जिनेशिनाम् । तदच तेषां शिष्याणां सिदिः कंपाञ्चिदिप्यते ॥४५४॥ एकद्वित्रिकषण्मासैरन्येषां शिष्यनितिः । एक द्वि-त्रिचतुर्वरपरपां विनिश्विना ॥४५४॥ त्रिविंशतिमहसाणि पञ्चानां द्वादशैव तु । तान्येकादशपञ्चानां पञ्चानां दश तान्यतः ॥४५६॥ अष्टाशीति शतान्येव शिष्याः पञ्चजिनेशिनाम् । पट सहसाणि वीरस्य शिष्यास्तेऽनुत्तरोद्भवाः ॥४५७॥ ऊर्ध्वमेवेयकान्तासु सौधर्मादिपु भूमिपु । शतं त्रीणि सहसाणि वभूवुग्रंपशिष्यकाः ॥४५८॥ एकाननिसहसाणि द्वितीयस्य दिवं गताः । नवान्यस्य सहसाणि शिष्या नवशतीयुताः ॥४५९॥ नवशत्या सहस्राणि तुरीयस्य तु सप्त वै । ततश्चनुःशतीयुक्ता षट्सहसो दिवङ्गता १४६०॥ चार सौ, कुन्थुनाथके छयालीस हजार आठ सौ, अरनाथके सैंतीस हजार दो सौ, मल्लि- नाथके अट्ठाईस हजार आठ सौ, मुनिसुव्रतनाथके उन्नीस हजार दो सौ, नमिनाथके नी हजार छह सौ, नेमिनाथके आठ हजार, पार्श्वनाथके छह हजार दो सौ और भगवान महा- वीरके सात हजार दो सौ है ॥४४३-४५३।। किन्हीं आचार्याका मत है कि-प्रारम्भसे लेकर सोलह तीर्थकरोंके शिष्य, जिस समय उन्हें केवलज्ञान हुआ था उसो समय सिद्धिको प्राप्त हो गये थे। तदनन्तर चार तीर्थकरोंके शिष्य क्रमसे एक, दो, तीन और छह मासमें सिद्धिको प्राप्त हुए और उनके बाद चार तीर्थकरोंके शिष्य एक, दो, तीन और चार वर्पमें सिद्धिको प्राप्त हुए* ॥४५४-४५५।। प्रारम्भसे लेकर तीन तीर्थंकरोंके वीस-बीस हजार, फिर पॉच तीर्थकरोंके घारह- बारह हजार, फिर पॉच तीर्थकरोंके ग्यारहग्यारह हजार, फिर पाँच तीर्थंकरोंके दश-दश हजार, फिर पाँच तीथंकरोंके अठासी-अठासी सो और महावीरके छह हजार शिप्य अनुत्तर विमानों में उत्पन्न होनेवाले हैं ।।४५६।। सोधर्म स्वर्गसे लेकर ऊर्ध्व प्रैवेयक तकके विमानोंमें भगवान् वृषभदेवके तीन हजार एक सौ, अजितनाथके उनतीस सौ, संभवनाथके नौ हजार नौ सी, अभिनन्दननाथके सात हजार नौ सौ, सुमतिनाथके छह हजार चार सौ, पद्मप्रभके चार हजार चार सौ, सुपार्च- नाथके दो हजार चार सौ, चन्द्रप्रभफे चार हजार, पुष्पदन्तके नौ हजार चार सी, शीतल- १. 'गवसयभन्मदिय दोसहस्सागि' ति०प०, अ०, ५० ॥१२३३॥ भगवान् महावीरके मुक्त होनेवाले शिष्योंकी सध्या तिलोय रणतिम चवालीन सौ बतलायी है.-- 'चउदालसया वीरेसरस्म'-. ॥१२२९॥ अच. *. इस विषयका तिलोयपण्यत्ति में इस प्रकार स्पष्टीकरण किया गया है- उसहादि सोलसाण केवलणाणप्पदि दिवसम्मि । पदम चिय सिमगणा गिरसेयस संयं पत्ता ॥१२३०॥ कुंथु चउक्के कमसो इगि दुति उम्मास समय परंते । णमि पहुदि जिणिदेसुइगि दुति छयाससखाए ॥१२३१॥-अ० चार अर्थात् अपमादिक मोलह तीर्थक्के शिष्यगण केवलज्ञान उत्पन्न होने के दिन पहले हो निःश्रेयम सपनाको प्राप्त हुए । कुन्युनाय आदि चार तीर्थकरोंके शिष्यगा क्रमसे एक, टो, तीन और छह मास तक तथा नमि आदि चार जिनेन्द्रोके शिष्यरण एक, दो, तीन और छह वर्ष तक नियम पटको प्राप्त हुए ॥१२३०-१२३१॥

१४२ हरिवंशपुराणे ततश्चतुःसहस्राणि चतु:शत्यान्वितानि तु । द्विसहसी चतुःशत्यातः सहसूचनुष्टयी ॥४॥ ततो नव सहस्राणि सहितानि चतुःशतैः । ततोऽष्टौ सप्त पड्वापि सहस्राणि चतुःशतैः ॥४६२॥ ततः पञ्चसहस्राणि सप्तशत्या ततोऽपि च । पञ्चैव तु सहस्राणि चत्वारि त्रिशतस्ततः ॥४६३॥ ततस्राणि सहसणि शते. पड्मिस्ततः पुनः । त्रीण्येव तु सहसाणि द्विशते च दिवङ्गताः ॥४६४॥ सहसद्वितयं चातो द्वयोरष्ट चतुःशतैः । द्वे सही ततोऽन्यस्य सहसू पट शतान्यतः ॥४६॥ द्विशत्यानः सहस्हि सहसू केवलं ततः । अष्टौ शतानि वीरस्य शिष्यास्ते स्वर्गगामिनः ।।४६६॥ कोटीलक्षास्तु पञ्चाशस्त्रिंशद्दश नवाब्धयः । नवतिश्च सहस्राणि नवतिश्च शतान्यपि ॥४६७॥ तथा नवशतान्येव नवतिर्नवकोटयः । जिनानां वृपमादीनामन्तराणि नव क्रमात् ॥४६८॥ पट्पष्टिवर्षलक्षामिः पविशतिसहसूकैः । विहीनाब्दशतेनाब्धिः कोटी दशममन्तरम् ॥४६९॥ चनु पञ्चाशदेवातस्त्रिशन्नव च सागराः । चत्वारस्ते त्रयस्तूनास्त्रिचतुर्मागपल्यकैः ॥४७॥ पल्याधं च चतुर्भागो हीनकोटीसहसूकः । कोटोसहसमब्दानां चतुर्लक्षाः शतार्धगाः ॥४७१॥ पट लक्षा. पञ्चलक्षाश्च त्रयोऽशीतिसहसकैः । साधंसप्तशतान्यर्धतृतीये च शते मते ॥४७२॥ वर्धमानजिनेन्द्रस्य सहसाण्यकविंशतिः । तीर्थकालस्तु तावन्ति सहसाण्यतिदु-पमः ॥४७३॥ आदावष्टौ तथान्तेऽष्टावव्युच्छिन्नानि पोडश । मध्ये तु सप्ततीर्थानि म्युच्छिन्नानीह मारते ॥४७४॥ नाथके आठ हजार चार सौ, श्रेयांसनाथके सात हजार चार सौ, वासुपूज्यके छह हजार चार सौ, विमलनाथके पाँच हजार सात सौ, अनन्तनाथके पाँच हजार, धर्मनाथके चार हजार तीन सी, शान्तिनाथके तीन हजार छह सौ, कुन्थुनाथके तीन हजार दो सी, अरनाथके दो हजार आठ सौ, मल्लिनाथके दो हजार चार सौ, मुनि सुव्रतनाथके दो हजार, नमि- नाथके एक हजार छह सौ, नेमिनाथके एक हजार दो सौ, पार्श्वनाथके एक हजार, और महावीर के आठ सौ शिष्य उत्पन्न हुए हैं ॥४५७-४६६।। पचास लाख करोड़, तीस लाख करोड़, दश लाख करोड़, नौ लाख करोड़, नब्बे हजार करोड़,नी हजार करोड़, नौ सौ करोड़, नब्बे करोड़ और नौ करोड़ सागर यह क्रमसे वृपभादि नौ तीर्थंकरोंके मुक्त होनेका अन्तर काल है ॥४६७-४६८॥ छयासठ लाख छब्बीस हजार एक सी कम एक करोड़ सागर प्रमाण दशवाँ अन्तर है अर्थात् शीतलनाथ भगवान्के मुक्ति जाने के बाद इतना समय बीत जानेपर श्रेयांसनाथ भगवान मुक्ति गये ॥४६९।। तदनन्तर चौवन, तीस, नो, चार और पौन पल्य कम तीन हजार सागर यह वासुपूज्यसे लेकर शान्ति जिनेन्द्र तकका अन्तरकाल है । तत्पश्चात् अर्धपल्य, एक हजार करोड़ वर्प कम पाय पल्य, एक हजार करोड़, चौयन लाख, छह लाख, पाँच लाख, तेरामी हजार सात सौ पचास और अढाई सौ वर्ष प्रमाण कमसे कुन्थुनाथसे लेकर महावीर पर्यन्तका अन्तर है ।।४७००४७२।। महावीर भगवानका तीर्थकाल इक्कीम हजार वर्षे प्रमाण पॉचवॉ काल और इतना हो छठवाँ काल इस प्रकार वयालीस हजार वर्ष प्रमाण है ॥ ४७३॥ आदिके आठ और अन्तके आठ इस प्रकार सोलह तीर्थ तो इस भरतक्षेत्रमें अविच्छिन्न रूपसे प्रवृत्त हुए १ तिलोयपण्णत्ते चतुर्थमहाधिकारे १२५०-१२७४ गाथामु वृषभादीना सर्वेषा जिनेन्द्रागां पृथक पृथक् तीर्थकालो निरूपित । दह तु यर्धमानजिनेन्द्रस्यैव निरूपितः 'इगियीमसहस्सागि दुलाल धीरस्म सा पालो' । ति० ५० ॥ २. उच्छग्णो सोधम्मो सुविहि पमुहेमु सत्ततित्येसुं । सेसेसु सोलसेसु गिरंतरंधम्म सन्ताग ॥१२७८॥ पल्लम्म पादमद्ध विवरणपल्लं सु तिचरणं अद्ध । पल्लस पादमत्त वौच्छेदो धम्म तित्यस्त ।।१२७६॥ हुंदावमपिणिस्म य दोषण सत्त होति विच्छेश। दिक्खाहि मुहामावे अथमिश्री धम्मरविदेशी ॥१२८०1। निप०, ४ श्रा।

पष्टितमः सर्गः ७४३ पादः पल्यस्य पल्या त्रिपादी पल्यमेव तु । त्रिपाद्यधं च पादश्च व्युच्छेदानेहसः क्रमात् ॥४७५॥ श्रादितः सप्ततीर्थेषु केवलश्रीनिरन्तरा । चन्द्रामस्य मुनेरन्ते सुविधेनवतिर्मता ॥४६॥ तीय चतुरशीतिस्तु शीतलस्य निरन्तरा । केवलज्ञानिनोऽन्यस्य द्वासप्ततिरुदाहृता ॥४७॥ चत्वारिंशचतुयुक्ता वासुपूज्यस्य पूजिता । चतुर्हानिस्तु दशसु द्वयोः केवलिगस्त्रयः ॥४७८॥ वीरकंत्रलिनां कालो द्वापष्टयन्दानि संस्तुनः । ततो वर्षशतं पूर्ण स्याञ्चनुर्दशपूर्विणाम् ॥४७९॥ त्रयोऽशोन्या शताब्दानि भवन्ति दशपूर्विणाम् । विंशत्यद्गभृतां युक्ताः कालो वर्षशनद्वयम् ॥१८॥ परन्तु वीचके सात तीर्थ न्युच्छिन्न होकर पुनः-पुनः प्रवृत्त हुए ॥ ४७४ ॥ पाच पल्य, अर्ध पल्य, पोन पल्य, एक पल्य, पीन पल्य, अर्धपल्य और पाव पल्य, यह क्रमसे व्युच्छिन्न तीर्थोके विच्छेदकालका प्रमाण है। भावार्थ-वृपभदेवसे लेकर पुष्पदन्त तक तो तीर्थ अविच्छिन्न रूपसे चलते रहे उसके बाद पुष्पदन्तके तीर्थमें जब पाव पल्य प्रमाण काल वाकी रह गया तव तीर्थ-धर्मका विच्छेद हो गया। तदनन्तर शीतलनाथके केवली होनेपर पुनः तीर्थ प्रारम्भ हुआ, इसी प्रकार धर्मनाथ पर्यन्त ऊपर लिखे अनुसार तीर्थ विच्छेद समझना चाहिए। शान्तिनाथसे लेकर महावीर पर्यन्त पोचमें तीर्थ का विच्छेद नहीं है । महावीरका तीर्थ बयालीस हजार वर्ष तक चलेगा, उसके बाद विच्छिन्न हो जायेगा। तदनन्तर आगामी उत्सर्पिणी युगमें जब प्रथम तीर्थ करको केवलज्ञान होगा तब पुनः तीर्थका प्रारम्भ होगा ।। ४७५ ।। प्रारम्भसे लेकर सात तीथंकरोंके तीर्थमें केवलज्ञानरूपी लक्ष्मी निरन्तर विद्यमान रही। उसके पश्चात् चन्द्रप्रभ और पुष्पदन्तके तीर्थमें नब्बे-नव्वे, शीतलनाथके तीर्थमें चौरासी, श्रेयांसनाथके तीर्थमें यहत्तर, वासुपूज्यके तीर्थमें चौवालीस, फिर विमलनाथसे लेकर नेमिनाथ तक दश तीथंकरोंके तीर्थमें चार-चार कम और अन्तिम दो तीथंकरोंके तीर्थमें तीन-तीन केवली अनुबद्ध हुए हैं अर्थात् एकके मोन जानेके बाद दूसरेको केवलज्ञान हो गया है। ॥४७६-४७८।। महावीर स्वामीके केवलियोंका काल बासठ वर्ष कहा गया है. उसके बाद सौ वर्प चौदह पूर्वधारियोंका काल है, तदनन्तर एक सौ तेरासी वर्ष दश पूर्वधारियांका समय है, फिर दो सौ बीस वर्ष ग्यारह अग के पाठियोंका काल है, और इसके बाद एक सी अठारह वर्ष आचाराङ्गाके धारियों- तिलोयाणत्तिमें अनुबद्ध केवलियोंका वर्णन करते हुए दो मन दिये हैं। प्रथम मतके अनुसार श्रादिनाथसे लेकर दसवें तीर्थंकर तक प्रत्येकके ८४, श्रेर्यास और वासुपूज्यके क्रमसे ७२ और ४४ विमलनाथके ४०, अनन्तनायके ३६, धर्मनाथके ३२, शान्तिनायके २८, कुन्युनायके २४, भरनायके २०, मलिरनायके १६, मुनिमुत्रतनाथके १२, नमिनाथके ८, नेमिनायके ४, पार्श्वनाथके ३ और महावीरके ३ । अनुबद्ध केवली हैं तथा दूमरे मत के अनुसार-आदिनाथमे लेकर सातवें तीर्थकर तक प्रत्येक १००, चन्द्र- प्रभो ६०, पुष्पदनके ९०, शीतलनाथके ६०, श्रेयांसनायके ९०, वासुपूज्यके ८४, विमलनाथके ४०, अनन्तनाथके १६, धर्मनायके ३२, शान्तिनाथ २८, कुन्युनायके २४, अरनायके २०, मल्लिनायके १६, मुनिमुव्रतनाथी १२, नामिनायके ८ नेमिनाथके ५, पार्श्वनायके ३ और महावीरके ३ अनुबद्ध फेवली हैं। गाथाएँ इस प्रकार है- दममते चउसीटी कममो अणुबह केवली होति । पाहारि चउडालं सेयमे वामुपुज्जे य ॥ १२१२|| विमल जिरी चालोमं पर नदी चार विविबिदा कमसो । तिगि स्चिय पामनिगे तिम्णि स्चिय यट्टमागम्मि ॥१२१३|| आ मामेवक मयं उपरितिए पाउटि गउदि च उमौटी। ममेमु पुनमाया वंति अपुरवली अावा ॥१२१४|| ति.. - ७४४ हरिवंशपुराणे आचारागभृताङ्गीतः शतमष्टादशोत्तरम् । त्रिपञ्चकादश ज्ञेया पञ्च चत्वार एव ते ॥४॥ वीरस्य गणिनां वर्षाण्यायुनिवतिश्चतुः । विंशतिः सप्ततिश्च स्यादशीतिः शतमेव च ॥४८२॥ का काल कहा गया है। महावीर स्वामीके केवलियोंकी संख्या तीन', चौदह पूर्वके धारियोंकी संख्या पाँच, दश पूर्वधारियोंकी संख्या ग्यारह', ग्यारह अङ्गके धारियोंकी संख्या पाँच और आचाराङ्गके पाठियोंकी संख्या चार है ॥४७९-४८१॥ महावीर भगवान्के गणधरोंकी आयु १. गौतम स्वामी, सुधर्माचार्य, जम्बूस्वामी ये तीन फेवली हुए। २. नन्दो', नन्दिमित्र, अपराजित, गोवर्द्धन और भद्रबाहुँ ये पाँच चौदह पूर्वके धारी हुए । ३. विशाख, प्रोण्टिल, क्षत्रिय, जय, नाग, सिद्धार्थ, धृतिघेण, विजय, बुद्धिल, गङ्गदेव और सुधर्म ये ग्यारह दर्श पूर्वधारी हुए। ४. नक्षत्र, जयगल, पाण्ड, ध्रुवसेन और कस ये पाँच ग्यारह अगके धारी हुए। ५. सुभद्र, यशोभद्र, यशोपाहु और लोहार्य ये चार श्राचारागके धारी हुए। ६ यहाँ तिलोयपण्णत्ति अधिकार ४, गाथा १४७६ से १४९२ तकका प्रकरण विशेष ज्ञानके लिए १ द्रष्टव्य है- जादो सिद्धो वीरो तद्दिवसे गोदमो परमणाणी । जादो तस्सि सिद्धे सुधम्मसामी तदो जादो ॥ १४७६ ।। तम्मि कदकम्मणासे जबू सामित्ति वेवली जादो। तत्थ सिद्धिपवरणे केवलिणो णत्थि अणुबहा ॥ १४७७ ।। वासट्ठीयासाणिं गोदम पहुदीण णाणवंताणं । धम्मपयट्टण काले परिमाणं पिंडरूवेणं ॥ १४७८ ॥ कुडल गिरिम्मिचरिमो केवलणाणीसु सिरिधरो सिद्धो। चारण रिसीसु चरिमो सुपासचदाभिधाणो य ॥ १४७९ ।। पएण समणेसु चरिमो वइरजसो णाम ओहिणाणिसुं । चरिमो सिरिणामो सुद विणय सुसीलादिसंपण्णो | १४८० ।। मउड धरेसुं चरिमो जिणदिक्खं धरदि चंदगुत्तो य । ततो मउडधरा दु पध्वजणेव गेण्हति ॥ १४८१ ॥ गंदो य णदिमित्तो विदिश्रो अवगजिदो तइज्जो य । गोवद्धणो चउत्थो पंचमनो भद्दवाहुत्ति ॥ १४८२ ॥ पच इमे पुरिसवरा चउदसपुवी जगम्मि विक्खादा । ते वारस अंगधरा तित्थे सिरि वट्टमाणस्स ॥ १४८३ ॥ पचाण मेलिदाणं कालपमाण हवेदि वाससदं । वीदम्मि य पंचमए भरहे सुदवेवली णस्थि ॥ १४८४ ॥ पदमो विसाहणामो पुट्टिल्लो खतियो जनो गागो । सिद्धत्यो चिदिसेणो विजओ बुद्धिल्लांगदेवा य ॥ १४८५ ।। एक्करसो य सुधम्मो दशपुवघरा दमे सुविखाण । पारंपरियोयगदो तेसीदि सदं च ताग वासाणि ।। १४८६ ॥ सन्वेमु वि कालवमा तेमु अदोदेमु भरह खेत्तम्मि वियसत भव्यकमला ण सति दसपुन्विदिवसयरा ॥ १४८७ ॥ णखतो जयपालो पंडुयधुवसेण कस आइरिया। एपकारसंगधारी पच इमे वीर तित्थम्मि ॥१४८८ ॥ ।

पष्टितमः सर्गः ७४५ योऽशीतिश्च नवतिः पञ्चमि: 'साष्टसक्षतिः । द्वाभ्यां च सप्तनिः पटिश्चत्वारिंशञ्च मंयुताः ॥१८३॥ पट्सु कालेषु पल्याप्टमागे शेपे तृतीयक । भूनिः कुलकराणां च ततोऽपि वृपमस्य तु ॥४८॥ जन्म क्रमेण शेषाणां जिनानां चक्रवर्तिनाम् । हलिनां वासुदेवानां तुयें काले विनिश्चितम् ॥४८५॥ ध्यब्दाष्टमासमासार्धशेषयोरिह कालयोः । तृतीयतुर्ययोः सिद्धिः प्रसिद्धा वृपवीरयोः ॥४८६॥ वीरनिर्वाणकाले च पालकोऽत्राभिपिच्यते । लोकेऽवन्तिमुतो राजा प्रजानां प्रतिपालकः ॥४८७॥ पष्टिवाणि तदाज्यं ततो विषयभूभूजाम् । शतं च पञ्चपञ्चाशद्वर्षाणि तदुदीरितम् ॥४८८।। चन्वारिंशत्पूरूद्वानां भूमण्डलमसण्डितम् । त्रिंशत्तु पुष्पमित्राणां पष्टिवस्वग्निमिन्नयोः ॥४८९॥ शतं रासमराजानां नरवाहनमप्यतः । चत्वारिंशत्ततो द्वाभ्यां चत्वारिंशच्छनद्वयम् ॥४९०॥ भगवाणस्य तदाज्यं गुप्तानां च शतद्वयम् । एकविंशश्च वर्षाणि कालविनिरुदाहृतम् ॥४९१॥ द्विचत्वारिंशदेवातः कल्किराजस्य राजता । ततोऽजितञ्जयो राजा स्यादिन्द्रपुरमंस्थितः ।।४९२ कौमार्य मण्डलेशत्वे विजय राज्यसंयमे । चक्रयादीनां यथायोग्यमितः कालो निरूप्यते ॥४९३॥ क्रमसे वानवे वर्प, चौबीस वर्ष, सत्तर वर्ष, अस्सी वर्प, सौ वर्ष, तेरासी वर्प, पंचानवे वर्ष, अठहत्तर वर्प, बहत्तर वर्प, साठ वर्ष और चालीस वर्ष है ॥४८२-४८३।। छह कालोंमें-से जव तृतीय कालमें पल्यका आठवाँ भाग चाकी रहा था तब क्रमसे चौदह कुलकरों और उनके याद वृपभदेवका जन्म हुआ था। शेष तीर्थंकरों, चक्रवर्तियों, वलभद्रों और नारायणोंका जन्म चौथे कालमें निश्चित है ।। ४८४-४८५|| जव तीसरे कालमें तीन वर्ष साढ़े आठ माह वाकी रहे थे तब भगवान ऋषभदेवका मोक्ष हुआ था और जव चौथे कालमें तीन वर्ष साढ़े आठ माह शेप रहे थे तव महावीरका मोक्ष होगा ॥४८६।। जिस समय भगवान् महावीरका निर्वाण होगा उस समय यहाँ अवन्तिपुत्र पालक नामके राजाका राज्याभिषेक होगा। यह राजा प्रजाका अच्छी तरह पालन करेगा और उसका राज्य साठ वर्ष तक रहेगा। उसके बाद तद्-तद् देशोंके राजाओंका एक सौ पचपन वर्ष तक राज्य होगा ।।४८०-४८८1। फिर चालीस वर्ष तक पुरूढ राजाओंकाअखण्ड भूमण्डल होगा। तदनन्तर तीस वर्ष तक पुष्पमित्रका, साठ वर्ष तक वसु और अग्निमित्रका, सौ वर्ष तक रासभ राजाओंका, फिर चालीस वर्ष तक नर- चाहनका, फिर दो सौ व्यालीस वर्ष तक बाणभट्टका, तदनन्तर दो सौ इक्कीस वर्ष तक गुप्ता- का और इसके बाद व्यालीस वर्ष तक कल्कि राजाका राज्य होगा। उसके बाद अजितंजय नामका राजा होगा जिसकी राजधानी इन्द्रपुर नगर होगी ॥४८९-४९२।। अब इसके आगे चक्रवर्ती आदिकी, कुमार अवस्था, मण्डलेश्यर, दशा, दिग्विजय, राज्य और संयममें जो काल व्यतीत हुआ है उसका यथायोग्य निरूपण किया जाता है ।। ४९३।। टोणि सया थीमजुदा वामागं ताण पिंड परिमाणं । तेमु अतीदे णस्थि हु भरहे एक्कारसगधग ॥ १४८६ ।। पटमो सुभद्दणामो जसमद्दो तह य होटि नमबाहू । तुरिमो य लोहगामो एदे आयारअगधरा || १४६.॥ सेसेकरसगाणं चोद्दसपुवाणमेवकदेसधग। एकसय अट्टारसबासजुदं वासबुदं ताण परिमाणं ।। १४६१ || -नि. प. अधिकार ४ १. साहसतभिःमः । २. सप्तभिः म०1३. अयाटमास-म० ।

। - हरिवंशपुराणे पूर्वलक्षाः कुमारेऽगुर्भरते सप्तसप्ततिः । वर्षाणां च सहस्रं तु मण्डलाधिपती मतम् ॥१९॥ पष्टिवर्पसहस्राणि विजयो राज्यमूर्जितम् । एकपूर्वविहीनास्तु पूर्वलक्षाः पडेव तु ॥४९५॥ अगलक्षास्त्रयोऽशीतिनवतिर्नवमिः सह । सहस्राणि नवान्यानि शतानि नवतिर्नव ॥४९६॥ वर्षलक्षास्त्रयोऽशीतिस्त्रिशन्नवसहस्रकैः । चक्रिसंयमकालस्तु पूर्वलक्षेव केवलाः ॥४९७ ।। पञ्चाशत्तु सहस्त्राणि पूर्वाण पूर्वकालयोः । त्रिंशदन्दसहस्राणि विजयः सगरस्य तु ॥४९८१ एकाचसप्ततिर्लक्षा पूर्वाणां नवतिनव । सहस्राणि नवापीह शतानि नवतिर्नव ॥४९९॥ पूर्वाङ्गप्रमितिः पूर्वाः सप्ततिश्च सहस्रकैः । राज्य लक्षास्त्रयोऽशांतिः पूर्वलक्षैव संयमः ॥५०॥ पञ्चविंशतिसंख्याब्दसहखाणि कुमारकः । मण्डलेशश्च मघवान् जये दशसहसवान् ॥५०॥ तिस्रोऽस्य वर्षलक्षास्तु नवरयन्दसहसकैः । राज्यं तपस्तु पञ्चाशत्सहखाणि तपस्विनः ।।५०२॥ सनरकुमारकौमार्य मण्डलेशस्वमेव च । सहस्राणि तु पञ्चाशद्विजयो दश तानि वै ॥५०३॥ नवस्यब्दसहस्राणि राज्यं प्राज्यमुदीरितम् । वर्षलक्षास्ततस्तस्य संयमः संयमात्मनः ॥५०॥ शान्तेर्माण्डलिकरचे नुपञ्चविंशतिरेव तु । सहस्राण्यष्टशन्येव विजये गदितं परम् ॥५०॥ पहले भरत चक्रवर्तीका आयुकाल चौरासी लाख पूर्वका था, उसमें सतहत्तर लाख पूर्व तो कुमार कालमें वीते, एक हजार वर्ष मण्डलेश्वर अवस्थामें व्यतीत हुए, साठ हजार वर्ष तक दिग्विजय किया, एक पूर्व कम छह लाख पूर्व चक्रवर्ती होकर राज्य किया तथा एक लाख पूर्व तेरासी लाख निन्यानवे हजार नौ सौ निन्यानवे पूर्वाग और तेरासी लाख नौ हजार तीस वर्ष पर्यन्त संयमी तथा केवली रहे ॥४९४-४९७॥ दूसरे सगर चक्रवर्तीकी आयु बहत्तर लाख पूर्व थी उसमें पचास हजार लाख पूर्व तो कुमारकालमें वीते, इतने ही मण्डलेश्वर अवस्था में व्यतीत हुए, तीस हजार वर्ष दिग्विजयमें गये, उनहत्तर लाख सत्तर हजार पूर्व, निन्यानवे हजार नौ सौ निन्यानवे पूर्वाद्ग और तेरासी लाख वर्ष चक्रवर्ती होकर राज्य किया और एक लाख पूर्व तक संयमी रहे ॥ ४९८-५००|| तीसरे मघवा चक्रवर्तीको कुल आयु पाँच लाख वर्षकी थी। उसमें पञ्चीस हजार वर्प पुमारकालमें, पमीम हजार वर्ष मण्डलीक अवस्थामें, दस हजार वर्ष दिग्विजयमें, तीन लाख नव्ये हजार वर्ष चक्रवर्ती होकर राज्यकार्यमें और पचाम हजार वर्प संयमी अवस्थामें व्यतीत हुए ॥५०१-५०२।। चौथे सनत्कुमार चक्रवर्तीकी कुल आयु तीन लास वर्षकी थी। उसमें पचास हजार वर्ष कुमारकालमें, पचास हजार वर्ष माण्डलिक अवस्था, दस हजार वर्ष दिग्विजयमें, नब्बे हजार यर्प चक्रवर्ती होकर राज्यके उपभोगमें और एक लास वर्ष मंयमी अवस्था में व्यतीत हुए ॥१०३-५०४|| पाँचय शान्निनाथ चक्रवर्तीको पुल आयु एक लाग्य यकी थी, उसमें पीस हजार वर्ष कुमार अयस्थाम, पगीम हजार वर्ष माण्डलीक अवस्था, आठ मी घर्ष दिग्विजयमें पीते १. तांगमास्नु म.। २. फेवन क.। . मतमतमरमर फ०, मसत्यममासः स.। ४. निमस्तु १.४., । ५ सागि । . शम्दात् बीमा (क..ि)। पनि चौरासी लाल पूर्व कुल प्रायु, मतहत्तर लान पूर्व युमारपाल, एक हजार वर्ष मारलेश्या , माठ हजार यदिग्विजय, रगट हजार वर्षमा माग पूयं चpril र सरकार भीर र माग पूर्व संपमधल तहापा1८.शिप पाशिम ची होकर पानेका बाल सीम (मार प म मा पूर्ण पाया है।

पष्टितमः सर्गः ७४७ कुन्थोमण्डलिकन्वे हि त्रिमहस्रेस्तु विंशतिः । पञ्चाशरसप्तशत्यामा पट्शनी विजयः पुनः ॥५०६॥ अरमाण्डलिकन्वेऽपि सम्राण्येकविंशतिः । चतुःशतानि विजयः शेषः प्रागेव भाषितम् ॥५०७।। सुमोमस्य सहखाणि पश्च कौमार्यमिप्यते । विजयः पञ्चशत्येव प्रचण्डस्य कुमण्डले ।।५०८॥ द्वापरयन्दमहमाणि तथा पञ्चशतानि च । वालवे गृढवृत्तस्य तस्य राज्यमिहोर्जितम् ॥५०९॥ शतानि पञ्च कौमार्य तथा मण्डलनाथता । नहापद्मस्य विजयो वर्षाणां तु शतत्रयम् ॥५१०।। अष्टादश सहसागि राज्यं सस शतान्यपि । दशवर्षसहमाणि संयमः संयमार्थिनः ॥५१॥ हरिणस्य कौमार्य त्रिशती पञ्चविंशतिः । पञ्चाशता तु विजयस्तस्य वर्षशतं मतम् ॥५१२॥ पञ्चविंशतिसंख्यानि सहसागि तथा शतम् । राज्यं च पन्चसप्तन्या पञ्चाशस्त्रिशती तपः ॥५१३॥ और शेप विवरण तीर्थकरोंके वर्णनके समयमें कहा जा चुका है ।।५०५।। छठे कुन्थुनाथ चक्रवर्ती की कुल आयु पंचानवे हजार वर्षकी थी, उसमें तेईस हजार सात सौ पचास वर्ष कुमारकालमें, इतने ही माण्डलिक अवस्थामें और छह सौ वर्ष दिग्विजय कालमें व्यतीत हुए तथा शेप वर्णन पहले कर चुके हैं ।।५०६।। सातवें अरनाथ चक्रवर्तीकी कुल आयु पचासी हजार वर्षकी थी। उसमें इक्कीस हजार वर्ष कुमार अवस्थामें, इतने ही माण्डलिक अवस्था में और चार सौ वर्ष दिग्विजयमें व्यतीत हुए । शेप वर्णन पहले किया जा चुकाई है ॥५८७।। आठवें सुभीम चक्रवर्तीकी कुल आयु अरसठ हजार वर्षकी थी उसमें, पाँच हजार वर्ष कुमार अवस्थामें, पाँच सौ वर्ष दिग्विजयमें और साढ़े बासठ हजार वर्ष चक्रवर्ती होकर राज्य अवस्थामें बीते । ये परशुरामके भयसे आश्रममें पले थे इसलिए मण्डलीक पद प्राप्त नहीं कर सके । ये पृथिवी मण्डलपर अतिशय तीक्ष्ण प्रकृतिके थे तथा अन्नानी दशामें रहनेके कारण संयम धारण नहीं कर सके और मरकर सातवें नरक गये ॥५०८-५०६।। नौवें महापद्म चक्रवर्तीकी आयु तीस हजार वर्षकी थी उसमें पॉच सौ वर्प कुमार अवस्थामें, पॉच सौ वर्ष मण्डलीक अवस्थामें, तीन सौ वर्ष दिग्विजयमें, अठारह हजार सात सौ वर्ष चक्रवर्ती होकर राज्य अवस्थामें और दस हजार वर्प संयमी अवस्थामें व्यतीत हुए हैं ॥५१०–५१॥ दसवें हरिपेग चक्रवर्तीकी आयु छब्बीस हजार वर्षकी थी। उसमें तीन सौ पचीस वर्प कुमार अवस्था में, एक सौ पचास वर्ष दिग्विजयमे, पच्चीस हजार एक सौ पचहत्तर वर्ष चक्रवर्ती होकर राज्य अवस्थामें और तीन सौ पचास वर्प संयमी अवस्थामें व्यतीत * शान्तिनाथने चाबीम हजार दा सौ वर्ष तक चक्रवर्ती होकर राज्य मोगा, सोलह वर्ष तक सयमी रहे और मोलह वर्ष कम पश्चीम हजार वर्ष तक केवली रहे । कुन्युनाथने तेईम हजार एक सी पचास वर्ष तक चक्ररवी होकर राज्य किया, सोलह वर्ष संयमी रहे और तेईम हजार सात सौ चीतीम वर्ष तक केवलीरहे । अरनाथने इक्कीस हजार घर मी वर्ष चक्रवती होकर राज्य भोगा, मोलह वर्ष संयमी रहे और से लद वर्ष कम कीम हजार वर्ष काली रहे। तिल्लोयात्तिमें मुभीम रानीकी आयु साठ हजार वर्षकी बतायी है। जि में पाँच हजार वर्ष कुमारकालमें, पाँच हजार वर्ष मादलीक अवस्थामें, पांच सौ वर्ष दिग्विजयमें और सादे उनचास हजार वर्ष राज्य अवस्थामें बीते हैं।

७४८ हरिवंशपुराणे जयसेनस्य कौमार्य त्रिशती मण्डलेशिता । विजयस्तु शतं राज्यं सहवं नवशस्यपि ॥५१४।। चतु शती तपस्तस्य ब्रह्मदत्तकुमारता । अष्टाविंशतिवर्षाणि पटपञ्चाशत्समण्डली ॥५१५|| विजयः पोइशान्दानि षट् शतानि तु राजता । ब्रह्मदत्तस्य विजेया केशवानां तु कथ्यते ॥५१६।। निष्टस्य सहस्राणि कौमार्य पञ्चविंशतिः । विज्ञेयोऽब्दसहस्रं तु विजयः स्नेहवाहिनः ॥५१७।। वर्षलक्षास्त्रयोऽशीतिसहस्राणि तु सप्ततिः । चतुमिरधिका तस्य राज्यं राजकराजितम् ॥५१८॥ द्विपृष्ठस्यापि कौमार्य मण्डलेश्यमपि स्फुटम् । सहस्राणि समाख्यातं प्रत्येकं पञ्चविंशतिः ॥५१९॥ विजयोऽन्दशतं लक्षा राज्यं तस्यैकसप्ततिः । चत्वारिंशत्सहसाणि नवतिर्नवशत्यपि ॥५२०।। द्वादशव सहस्राणि पञ्चशत्या स्वयम्भुवः । कौमार्य मण्डलेशत्वं विजयो नवतिः पुनः ॥५२॥ एकानपष्टिलक्षाश्च चतुःसप्ततिरेव च । सहस्राणि शतै राज्यं नवभिर्दश पज्ञकै ' (१) ॥५२२॥ पुरुषोत्तमकौमार्य मतं सप्त शतानि तु । अशीतिर्विजयस्त्रीणि शतान्यन्दमहसूकम् ॥५२३॥ मण्डलेशत्वमेतद्धि शिल्लक्षा विनककम् । नवतिश्च सहसाणि सप्तमिर्नवशत्यपि ॥५२॥ हुए ॥५१२-५१३।। ग्यारहवें जयसेन चक्रवर्तीकी कुल आयु तीन हजार वर्षको थी। उसमें तीन सौ वर्ष कुमार अवस्थामें, तीन सौ वर्ष मण्डलीक अवस्थामें, सौ वर्ष दिग्विजयमें, एक हजार नौ सौ वर्प चक्रवर्ती होकर राज्य अवस्थामें और चार सौ वर्ष संयम अवस्थामें व्यतीत हुए । और बारह ब्रह्मादत्त चक्रवर्तीकी आयु सात सौ वर्षकी थी। उसमें अट्ठाईस वर्ष कुमार अवस्थामें, छप्पन वर्ष मण्डलीक अवस्था, सोलह वर्ष दिग्विजयमें और छह सौ वर्ष राज्य अवस्थामै व्यतीत हुए । ये संयम धारण नहीं कर सके और मरकर सातवें नरक गये। इस प्रकार चक्रवर्तियोंकी आयुका विवरण कहा और नारायणोंकी आयुका विवरण कहा जाता है ॥५१४-५१६।। स्नेहको धारण करनेवाले त्रिपृष्ठ नारायणकी कुल आयु चौरासी लाख वर्षकी थी। उसमें ' पचीस हजार वर्ष कुमार अवस्थामें, एक हजार वर्ष दिग्विजयमें और तेरासी लाख चौहत्तर हजार वर्ष राज्य अवस्थामें व्यतीत हुए।।४१७-५१८।। द्विपृष्ठ नारायणकी कुल आयु वहत्तर लाख वर्षकी थी उसमें पचीस-पच्चीस हजार वर्ष कुमार अवस्था तथा मण्डलीक अवस्था, सौ वर्ष दिग्विजयमें और इकहत्तर लाख उनचास हजार नो मी वर्ष पर्यन्त राज्य किया ॥५१९-५२०॥ म्वयम्भू नारायणकी कुल आयु माठ लाख चपकी थी। उसमें बारह हजार पाँच सी वर्ष कुमार अवस्थाम, इतने ही मण्डलीक अवस्था, नव्य वर्ष दिग्विजयमें और उनसठ हजार लाख चौहत्तर हजार नौ सी दस वर्ष राज्य अवस्थामें व्यतीत हुए ॥५२१-५२२।। पुरुषोतम नारायणको कुल आयु तीस लाख वर्पकी थी। उसमें सात सौ वर्ष कुमार अवस्थाम, एक हजार तीन सौ वर्ष मण्डलीक अवस्था, अरसी वर्ष दिग्विजयमें और उनतीस - । १ नरभिदंशयां. (१० पुस्तके टिप्पण्या पाठान्तरम् )। ..निजीयरगत्ति में हरिपेग पकानों की भायु दस हजार वर्षकी बतायी है। उसमें तीन सौ पच्चीस कुमार भयरधाम, लने हो मण्डली अाया, एक मां पचास दिग्विजयमें, आठ हजार आठ सौ पचास वर्ष गम्य बरपाने वीर सौन सी पचास यां मममी अवस्था बोर । शायरमनिमें पन्चीम रनार यांमार अवस्थामें, पीस हजार घर मलीक अवस्था में, एक (जार या दिमियमें भोर देर रामो सास उनचास हजार पर राज्य आस्था प्यतीत हुए ऐमा लिाता है।

पष्टितमः सर्गः ७४९ विंशनिश्चैव वर्षाणि राज्यमत्यन्ठमूर्जितम् । पुरुषोत्तमतां भूमी भूम्ना तस्यह विभ्रतः ॥५२५॥ कौमार्य त्रिशती पञ्चविंशत्या शतमीरितम् । मण्डलैश्यं हि विजयः सप्ततिः प्रतिपादितः ॥५२६॥ नवलक्षा सहसाणि नवतिर्नव च स्मृता । राज्यं पुरुषसिंहस्य पञ्चमिः पन्चशत्यपि ॥५२७॥ पञ्चाशता शते द्वे तु कौमार्य मण्डलेशता । विजयः षष्टिवर्षाणि विजयोजिततेजसः ॥५२८।। चत्वारिंशच वर्षाणि स्याचरवारि शतान्यपि । चनुःषष्टिसहसाणि पुण्डरीकस्य राजता ॥५२९॥ शते दत्तस्य कौमार्य पञ्चाशत्कालयोदयम् । एकत्रिंशत्सहस्राणि सप्तशत्यापि राजता ॥५३०।। शतं लक्ष्मणकौमार्य चन्वारिंशद्विजेतृता । एकादशसहसाष्टशतपष्टयन्दराजता ॥५३१॥ कुमारकालः कृष्णस्य पोडशाब्दानि पट्युता । पञ्चाशन्मण्डलेशत्वं विजयोऽष्टाब्दकं स्फुटम् ॥५३२॥ शतानि नव विंशत्या कृष्णराजस्य सम्मिति. 1 तथैकादशरुद्राणां कालसंख्या निरूप्यते ॥५३३॥ तीथे भीमावलिर्जातो वृषमस्याजितस्य तु । जितशत्रुरिति ख्यातो रुद्राख्य. सुविधेः पुनः ॥५३४॥ विश्वानलस्तु दशमे श्रेयसः सुप्रतिष्टकः । अचलो वासुपूज्यस्य पुण्डरीकस्तु वैमले ।।५३५॥ C लाख सन्तानवे हजार नौ सौ बीस वर्ष पृथिवीतलपर नारायणपद धारण करते हुए राज्य अवस्थामें व्यतीत हुए ॥५२३-५२५।। पुरुप सिंह नारायणकी कुल आयु दस लाख वपंकी थी। उसमें तीन सौ वर्प कुमार अवस्थामें, एक सौ पच्चीस वर्ष मण्डलीक अवस्थामें, सत्तर वर्ष दिग्विजयमें और नौ लाख निन्यानवे हजार पाँच सी पाँच वर्ष राज्य अवस्थामें व्यतीत हुए* ॥५२६-५२७॥ पुण्डरीक नारायणकी कुल आयु पैंसठ हजार वर्षकी थी। उसमें दो सौ पचास वर्ष कुमार अवस्थामें, इतने ही मण्डलीक अवस्थामें, साठ वर्ष दिग्विजयमें, और चौंसठ हजार चार सौ चालीस वर्ष राज्य अवस्थामें व्यतीत हुए ॥५२८-५२९॥ दत्त नारायणको कुल आयु वत्तीस हजार वर्षकी थी। उसमें सौ वर्ष कुमार अवस्था- में, पचास वर्ष मण्डलीक अवस्थामें, पचास वर्ष दिग्विजयमें और इकतीस हजार सात सौ वर्ष अवस्थामें व्यतीत हुए ॥५३०॥ लक्ष्मण नारायणकी कुल आयु बारह हजार वर्पको थी। उसमें सौ वर्प कुमार अवस्थामें, चालीस वर्ष दिग्विजयमें और ग्यारह हजार आठ सौ साठ वर्ष राज्य अवस्थामें व्यतीतमें हुए ॥५३१॥ कृष्ण नारायणकी कुल आयु एक हजार वर्षकी है। उसमें सोलह वर्ष कुमार अवस्थामें, छप्पन वर्ष मण्डलीक अवस्थामें, आठ वर्ष दिग्विजयमें और नौ सौ बीस वर्ष राज्य अवस्था में व्यतीत होंगे। इस प्रकार नारायणोंके कालका वर्णन किया। अब ग्यारह रुद्रोंके काल और संख्याका वर्णन करते हैं ।।५३२-५३३॥ मद्र ग्यारह होते हैं। उनमें भगवान् वृपभदेवके तीर्थमें भीमावलि,अजितनाथके तीर्थ में जितशत्रु, पुष्पदन्तके तीर्थमें रुद्र, शीतलनाथके तीर्थमें विश्वानल, श्रेयांसनाथके तीर्थमें सुप्रतिष्ठक, वासुपूज्यके तीर्थमें अचल, विमलनाथके तीर्थमें पुण्डरीक, अनन्तनाथके तीर्थ में राज्य . * ति. प. में पुरुषसिह नारायणका मण्डलीककाल १२५० वर्ष तक और राज्यकाल नौ लाख अंटानये हजार तीन सौ अस्सी वर्ष बतलाया है। + ति. प. में लक्ष्मणका मडलीककाल तीन सौ वर्ष और राज्यकाल ग्यारह हजार पाँच सौ साठ वर्ष बतलाया है। + ति. प. में 'वैश्वानर' नाम आया है।

हरिवंशपुराणे अजितन्धरोऽनन्तस्य धर्मस्याजितनामिकः ! पीठाख्य, शान्तितीर्थेऽभूत्सुतो वीरस्य सत्यक. ॥५३६।। भीमाबलेस्तनूत्सेधः पन्चचापशतान्यतः । तान्यर्धपञ्चमान्येकं दशहानिस्तु पञ्चम् ॥५३७॥ अष्टाविंशतिरन्यस्य चतुर्विशतिरप्यतः । सप्तवारत्रयोऽन्त्यस्य वपुरुत्सेध इष्यते ॥५३॥ पूर्वाण्यायुस्त्रयोऽशीतिलक्षास्त्वेकसप्ततिः । वे लक्षे चैकलक्षा च 'लक्ष्यालक्ष्य विचक्षणः ॥५३९॥ लक्षाश्चतुरशीतिश्च षष्टिः पञ्चाशदेव च । चत्वारिंशच वर्षाणां विंशतिर्लक्षया क्रमात् ।।५४०।। आयुरेकादशस्यापि वर्षाण्येकान्नसप्ततिः । अभिन्नदशपूर्वाणां रुद्राणां रौद्रकर्मणाम् ।।५४१॥ त्रयः कालास्तु सर्वेषां दाणां क्रमशः स्थिताः । कौमारः संयमोपेतो गृहीतोज्झितमयमः ॥५४२॥ कालस्त्रिमागशेषेण चतुणं संयमाधिकः । समा द्वयोस्त्रयोऽप्यन्ये कौमाराधिक इध्यते ।।५४३॥ संयमाधिक एकस्य कौमारोऽन्यस्य साधिकः । दशमस्यापि रुद्रस्य संयमाधिक एव सः ॥५४४॥ वर्षाणि सप्त कौमार्य विंशतिः संयमेऽष्टभिः । एकादशस्य रुद्रस्य चतुस्त्रिंशदसंयमे ।।५४५।। द्वयोस्तु सप्तमी पृथ्वी पञ्चानां षष्ठयधिष्ठितिः । एकस्य पञ्चमी भूमिश्चनु तु द्वयोस्ततः ।।५४६॥ तृतीयान्त्यस्य निर्दिष्टा यथोद्दिष्टा इमाः पुनः । भूयसंयमभाराणां रद्राणां जन्मभूमयः ।।५४७।। अजितन्धर, धर्मनाथके तीर्थमें अजितनाभि, शान्तिनाथके तीर्थमें पीठ नामका रुद्र हुआ है , तथा महावीरके तीर्थ में सत्यकिपुत्र रुद्र होगा ॥५३४-५३६।। भीमावलीके शरीरकी ऊँचाई पाँच सौ धनुप, जितशत्रुको साढ़े चार सौ धनुप, रुद्रकी सी धनुप, विश्वानलकी नब्बे धनुप, सुप्रतिष्ठाको अस्सी धनुप, अचलकी सत्तर धनुप, पुण्डरोककी साठ धनुष, अजितन्धरकी पचास धनुप, अजितनाभिकी अट्ठाईस धनुप, पीठकी चौबीस धनुप, और सत्यकिपुत्रकी सात धनुप मानी जाती है ।।५३७-५३८।। इन रुद्रोंकी आयु क्रमसे तेरासी लाख पूर्व, इकहत्तर लाख पूर्व, दो लाख पूर्व, एक लाख पूर्व, चौरासी लाख वर्ष, साठ लाख वर्ष, पचास लाख वर्प, चालीस लाख वर्ष, वीस लाख वर्ष, दस लाख वर्ष और उनहत्तर वर्ष है। ये सभी रुद्र दश पूर्वके पाठी होते हैं और रोद्र कार्यके करनेवाले हैं ॥५३९-५४१॥ इन सभी रुद्रोंके क्रमसे तीन काल होते हैं-१ कुमारकाल, २ संयमकाल और ३ गृहीत संयमको छोडकर असंयमी होनेका काल ॥५४२।। इनमें चारका संयमकाल त्रिभाग शेपसे कुछ अधिक था अर्थात् कुमारकाल और असंयमकालसे कुछ अधिक था, दोके तीनों काल बराबर थे, मातयका कुमारकाल, आठवेंका संयमकाल, नोयेंका कुमारकाल, और दसवेंका संयमकाल अधिक था । ग्यारहवें रुद्रका कुमारकाल सात वर्षका, संयमकाल अट्ठाईस वर्पका और असं. यमकाल चौतीम वर्षका होगा ।।५४२-५४५|| इनमें प्रारम्भके दो गद् सातयी पृथिवी, पाँच न्द्र छठवीं पृथिवी, एक पाँचवीं पृथिवी और दो चौथी पृथियी गये हैं तथा अन्तिम रुद्र तीसरी भूमिमें जायेगा। उन न्द्रों के जीवन- में असंयमका भार अधिक होता है । इमलिए उन्हें नरकगामी होना पड़ता है ।।५४६-५४७॥ १. सातव्या (४० दि०)। २. 'दरारक्षामपितम्' इति सर्वहस्तलिखितमतिः सदया' इत्योपोपरि ममिनितम् । तेसोदी गिमत्तरि दोगि एकच पुण्यसाणि । मुलसीदि सदिपण्णा चालिम यरसागि लावागि ॥१४६६॥ बोम दम थे। लावा पामा एमतरी कममी। एकारमकहाण पमाणगरस गि १ | २. तपमेय--प, न्य- चतुत्रनवारिणां नारदानाम् (:. टि. )। जयहरि ति. . में तीनों बालों के अलग अलग अइ, देर पर किया गया है (चतुर्थ अधिकार माथा १८४८ मे १.६७ गाथा तक) पष्टितमः सर्गः मीमश्चाय महामीमो रुद्रनामा तृतीयकः । महारुद्रोऽथ कालश्च महाकालश्चतुर्मुख. ॥५४८।। नरवक्त्रोन्मुखाख्यौ द्वौ नबैते नारदाः स्मृताः । वासुदेवसमानायु स्थितिस्तेषां प्रजायते ॥५४९॥ कलहं प्रीतिसंयुक्ता. कदाचिद्धर्मवत्सलाः । हिंसानन्दवशास्वेते महामन्या जिनानुगाः ।।५५०॥ वर्षाणां पटाती त्यक्त्वा पञ्चाग्रं मासपञ्चकम् । मुक्ति गते महावीरे शकराजस्ततोऽभवत् ॥५५१॥ मुक्तिंगते महावीरे प्रतिवर्पसहसूकम् । एकैको जायते कल्की जिनधर्मविरोधकः ॥५५२॥ इहास्यामवसपिण्यां यथा तीर्थकरादय. । उन्सपिण्यां मविप्यन्न्यां मविष्यन्ति तथा परं ॥५५३।। भविष्यदुःपमाशेपे सहमपरिमाणके । चतुर्दश मविष्यन्ति प्रागिम कुलकारिणः ॥५५४॥ कनकनकसंकाश. कनक: कनकप्रमः । अय. कनकपूर्वाः स्युस्ते राजध्वजपुगवाः ॥५५५।। नलिनीदलसंकाशो नलिनी नलिनप्रमः । नलिनोपपदास्त्वन्ये ते राजध्वजपुगवा ॥५५६॥ ततः पद्मप्रभो शेयः पद्मराजस्ततः परः । पद्मध्वजश्व बोदव्यः पद्मपुङ्गव एव च ।।५५७।। तीर्थकृञ्च महापद्म तुरदेवो जिनाधिपः । सुपार्श्वनामधेयोऽन्यो यथार्थश्च स्वयंप्रमः ॥५५८।। सर्वात्मभूत इत्यन्यो देवदेवः प्रमोदयः । उदकः प्रश्नकीर्तिश्च जयकीर्तिश्च सुव्रतः ॥५५९।। अरश्च पुण्यमूर्तिश्च निष्कपायो जिनेश्वरः । विपुलो निर्मलामिण्यश्चित्रगुप्तो परः स्मृतः ॥५६०॥ भीम, महाभीम, रुद्र, महारुद्र, काल, महाकाल, चतुर्मुख, नरवक्न और उन्मुख, ये नौ नारद माने गये हैं। उनकी आयु नारायणोंकी आयुके बराबर होती है तथा वे नारायणोंके समय ही होते हैं। वे कलहमें प्रीतिसे युक्त होते हैं, कदाचित् धर्मसे भी स्नेह रखते हैं, हिंसामें आनन्द मानते हैं तथा महाभव्य और जिनेन्द्र भगवान्के अनुगामी होते हैं ।।५४८-५५०॥ भगवान महावीरके मोक्ष जाने के पश्चात् छह सौ पाँच वर्ष पाँच मास बीत जानेपर राजा शक* होगा और हजार-हजार वर्ष बाद एक-एक कल्की राजा होता रहेगा जो जैनधर्म- का विरोधी होगा ।।५५१-५५२।। जिस प्रकार इस अवसर्पिणीमें तीर्थङ्कर आदि हुए हैं उसी प्रकार आगे आनेवाली उत्सर्पिणीमें भी दूसरे-दूसरे तीर्थङ्कर आदि होंगे ॥५५३।। जब आने- वाले दुःपमा नामक कालमें एक हजार वर्ष शेप रह जायेंगे तब पहले क्रमसे ये चौदह कुलकर होंगे-१ देदीप्यमान स्वर्णके समान कान्तिवाला कनक, २ कनकप्रभ, ३ कनकराज, ४ कनक- ध्वज, ५ कनकपुङ्गव, ६ कमलिनीके पत्तेके समान वर्णवाला नलिन, ७ नलिनप्रभ, ८ नलिनराज, ९ नलिनध्वज, १० नलिनपुङ्गव, ११ पद्मप्रभ, १२ पद्मराज, १३ पद्मध्वज और १४ पद्मपुङ्गव ॥५५४-५५७॥ कुलकरोंके बाद क्रमसे निम्नलिखित चौवीस तीर्थकर होंगे-१ महापद्म, २ मुरदेव, ३ सुपार्श्व, ४ स्वयंप्रभ, ५सर्वात्मभूत, ६ देवदेव,७ प्रभोदय, ८ उदक, ९ प्रश्नकर्कीर्ति, १० जयकीर्ति, ११ सुव्रत, १२ अर, १३ पुण्यमूर्ति, १४ निष्कपाय, १५ विपुल, १६ निर्मल, १७ चित्रगुप्त, • शकराजाकी उत्सत्तिके विषयमें, ति प. में इस मतके सिवाय निम्नलिखित ३ मतोका उल्लेख और किया गया है-(१) वीर जिनेन्द्रकी मुक्ति होनेके बाद चार सौ इकसठ वर्ष प्रमाणकाल बीत नेपर शक राजा उत्पन्न हुआ। (२) नौ हजार सात सौ पचासी वर्ष और पाँच मास बीत जानेपर (३) सौदह हजार सात सौ तिरानवे वर्ष बीत जानेपर | गाथा निम्न प्रकार हैं-धीरनिणे सिद्धिगदे चऊसद गि सट्टियास परिमाणे ! कालम्मि अदिवक्ते उप्पणो एत्य शकरायो ॥१४६६|| अहया तीरे सिद्धे सहस्सण. कम्मि सगसयभहिये । पगसीनिम्मि यतीदे पगमासे सकणिो जादो ।।१४६७) चौदस सहस्स सगसय रेणउदी यासकाल विच्छेदे। वीरेसरसिद्धीदो उप्पगो सगणिओ अवा ॥१४६८॥ णिवाणे वीरजिणे छम्बास देमु पंचवरिसेमुं। पगमासेमु गरेमुं मजादो सगणिनो अहवा ||१४६६॥ ति. प. च. अ. 1 हरिवंशपुराणे समाधिगुप्तनामान्य, स्वयम्भूरनिवर्तक । जयो विमलसंज्ञश्च 'दिव्यपाद इतीरितः ॥५६॥ चरमोऽनन्तवीर्योऽमी वीर्यधैर्यादिसद्गुणाः । चतुर्विंशतिसंख्याना भविष्यत्तीर्थकारिणः ॥५६२॥ मरतो दीर्घदन्तश्च जन्मदन्तश्च चक्रिणः । गूढदत्तोऽपरो नाम्ना श्रीपेण इति विश्रुतः ॥५६३॥ श्रीभूतिरितिभूतोऽन्यः श्रीकान्तः पद्मनामकः । महापद्मस्तथैवान्यश्चित्रवाहनसंज्ञकः ॥५६॥ विमुक्तमलमंपर्को नाम्न. विमलवाहनः । अरिष्टमेन इत्येते चक्रिणो द्वादशोदिताः ॥५६५।। नन्दी च नन्दिमित्रश्च नन्दिनो नन्दिभूतिकः । महातिवलनामानौ बलभद्रश्च सप्तमः ॥५६६।। द्विपष्टश्च विष्टश्च वासुदेवा नवैव ते। मविप्यन्त्यञ्जनच्छायाश्च्छायाछन्नदिगन्तरा.॥५६॥ चन्द्रश्चापि महाचन्द्रस्तथा चन्द्रधरश्रुनिः। सिंहचन्द्रो हरिश्चन्द्रः श्रीचन्द्रः पूर्णचन्द्रकः ।।५६८।। सुचन्द्रो वालचन्द्रश्च नवैते चन्द्रसप्रमाः । बलाः प्रतिद्विषश्चान्ये नव श्रीहरिकण्ठको ।।५६९।। नीलकण्ठावण्ठी च सुकण्ठशिखिकण्ठको । अश्वग्रोवहयग्रीवो मयूरग्रीव इत्यपि ॥५७०॥ प्रमदः सम्मदो हर्पः प्रकामः कामदो मव: । हरो मनोमवो मारः कामो रदस्तथागजः ॥५७१।। भन्याः कतिपयरेव तेऽपि सेत्स्यन्ति जन्मभिः । रत्नत्रयपवित्राङ्गाः सन्तः सन्तो नरोत्तमाः ।।५७२।। वसन्ततिलकावृत्तम् अन्तर्मुहूर्तमपि लब्धविमुक्तमेकं सम्यक्त्वरखमचिरेण विमुक्तिहेतुः । रत्नत्रयस्य तु पवित्रतमस्य लोके साक्षावप्रमथनस्य किमन्न वाच्यम् ॥५७३।। १८ समाधिगुप्त, १९ स्वयंभू, २० अनिवर्तक, २१ जय, २२ विमल, २३ दिव्यपाद और २४ अनन्तवीर्य । ये सभी वीर्य धैर्य आदि सद्गुणोंसे सहित होते हैं ।।५५८-५६२॥ १ भरत, २ दीर्घदन्त, ३ जन्मदत्त, ४ गूढदत्त, ५ श्रीपेण, ६ श्रीभूति, ७ श्रीकान्त, ८ पद्म- नामक, ९ महापद्म, १० चित्रवाहन, ११ मलके संपर्कसे रहित विमलवाहन और १२ अरिष्टसेन ये आगे होनेवाले बारह चक्रवर्ती कहे गये हैं ।।५६३-५६५।। १ नन्दी, २ नन्दिमित्र, ३ नन्दिन, ४ नन्दिभूतिक, ५ महाबल, ६ अतिबल, ७ बलभद्र, ८ द्विपृष्ठ और त्रिपृष्ठ ये नौ भविष्यत्कालमें होनेवाले नारायण हैं। ये अजनके समान कान्ति. के धारक होते है तथा अपनी कान्तिसे दिशाओंके अन्तरालको व्याप्त करते हैं ।।५६६-५६७।। १ चन्द्र, २ महाचन्द्र, ३ चन्द्रधर, ४ सिंहचन्द्र, ५ हरिश्चन्द्र, ६ श्रीचन्द्र, ७ पूर्णचन्द्र, ८ सुचन्द्र और ९ बालचन्द्र ये नौ आगामीकालमें होनेवाले बलभद्र हैं। ये सभी चन्द्रमाके समान कान्तिके धारक होते हैं । १ श्रीकण्ठ, २ हरिकण्ठ, ३ नीलकण्ठ, ४ अश्यकण्ठ, ५ सुकण्ठ, ६ शिखिकण्ठ, ७ अश्व- ग्रीव, ८ हयग्रीय और मयूरग्रीव ये नौ प्रतिनारायण होंगे ॥५६८-५७०॥ १ प्रमद, २ संमद, ३ हर्प, ४ प्रकाम, ५ कामद, ६ भव, ७ हर, ८ मनोभय, ९ मार, १० काम और ११ अगज ये ग्यारह रुद्र होंगे। ये सब भव्य होंगे तथा कुछ ही भवों में मोक्ष प्राप्त करेंगे। इनके शरीर भी रत्नत्रयसे पवित्र होंगे तथा उत्तम महापुरुष होंगे ॥५७१-५७२।। एक सम्यग्दर्शनरूपी रत्न अन्तर्मुहूर्त के लिए भी प्राप्त होकर छूट जाता है तो वह भी शीघ्र ही मोक्षप्राप्तिका कारण होता है, फिर संसारमें अतिशय पवित्र एवं साक्षात् भवभ्रमण- को नष्ट करनेवाले रवनयकी तो बात ही क्या है ? ॥५७|| । १. दिव्यवाद म०। २. परित्रितमस्य मः।

पष्टितमः सर्गः
७५३
वाक्यं त्रिकालविषयार्थनिरूपणार्थमाकण्यं कर्णसुखमिस्थमिनस्य भूपाः ।
कृष्णादयो हरिरविप्रमुखाश्च देवा नरवा जिनं स्वपदमीयुरुपात्ततत्वाः ॥५७।।
इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतो त्रिपष्टिपुरुषजिनान्तरवर्णनो नाम
पतितमः सर्गः ॥१०॥
इस प्रकार भगवान् नेमिनाथको काँको सुख उपजानेवाली एवं त्रिकालचिपयक
पदार्थीका वर्णन करनेवाली दिव्यध्वनि सुनकर कृष्ण आदि राजा तथा इन्द्र और सूर्य आदि
देव, धर्मके यथार्थ तत्त्वको ग्रहण कर एवं नेमि जिनेन्द्रको नमस्कार कर अपने-अपने स्थानपर
चले गये ।। ५७४||
इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्यरचित हरिवंशपुराणमें प्रेशठ शलाकापुरुषोंका
चरित्र तथा तीर्थकरों के अन्तरालका वर्णन करनेवाला साउवा सर्ग समाप्त हुभा ॥६॥

एकषष्टितमः सर्गः आकूतं श्रेणिकरयाथ ज्ञात्वा गणभृदग्रणीः । वृत्तं गजकुमारस्य जगादेति जगतम् ॥३॥ श्रुत्वा गजकुमारोऽसौ जिनादिचरितं तथा । विमोच्य सकलान् बन्धून पितृपुत्रपुरस्सरान् ॥२॥ संसारभीरासाद्य जिनेन्द्रं प्रध्यान्वितम् । गृहीत्वाऽनुमतो दीक्षां तपः कतुं समुद्यतः ॥३॥ निरूपितास्तु याः कन्याः कुमाराय गजाय साः। प्रमावत्यादयः सर्वा निदिन्यः प्रवबजुः ॥४॥ कुमारश्रमणस्याथ गजस्यकान्तवर्तिन. । निशीथे प्रतिमास्थस्य सर्वद्वन्द्वसहस्य सः ॥५।। सोमशर्मा सुतात्यागक्रोधाग्निकणदीपितः । अदीदिपदुदाराग्नि शिरसि स्थिरचेतसः ॥६॥ दह्यमानशरीरोऽसौ शुक्ल यानेन कर्मणाम् । अन्तं कृत्वा ययौ मोक्षमन्तकृत्केवली मुनिः ॥७॥ सस्य देहमहं चक्रुः समुपैस्य सुराऽसुराः । यक्षकिमरगधर्वमहोरगपुरोगमाः ॥८॥ ज्ञात्वा तन्मरणं दुःखाद् यादवा बहवस्तथा । दशाश्चि विहायान्त्यं दीक्षिता मोक्षकाक्षिणः ॥९॥ देव्यः शिवादयो यह्वयो देवकों रोहिणी विना । वसुदेव स्त्रियो विष्णोः कन्याश्चापि प्रवद्रजः॥१०॥ ततः "सुरनराभ्यो नानाजनपदान् जिनः । विजहार महाभूत्या भव्यराजी प्रयोधयन् ॥११॥ उदीच्यान्नृपशार्दूलान् मध्यदेशनिवासिनः । प्राच्यानपि प्रजायुक्त्वान् स धर्म स्थापयन बहून् ।।१२।। अथानन्तर श्रेणिकका अभिप्राय जानकर गणधरोंके अधिपति श्री गौतम स्वामीने जगत् के द्वारा स्तुत गजकुमारका वृत्तान्त इस प्रकार कहना शुरू किया ॥ १॥ वे कहने लगे कि इस प्रकार गजकुमार, तीर्थकर आदिका चरित्र सुनकर संसारसे भयभीत हो गया और पिता, पुत्र, आदि समस्त बन्धुजनोंको छोड़कर बड़ी विनयसे जिनेन्द्र भगवान् के समीप पहुंचा और उनसे अनुमति ले दीक्षा ग्रहण कर तप करनेके लिए उद्यत हो गया ॥२-३ ।। गज- कुमारके लिए जो प्रभावती आदि कन्याएँ निश्चित की गयी थी उन सभीने संसारसे विरक्त हो दीक्षा धारण कर ली ॥४॥ तदनन्तर किसी दिन गजकुमार मुनि रात्रिके समय एकान्तमें प्रतिमायोगसे विराज- मान हो सब प्रकारको वाधाएँ सहन कर रहे थे कि सोमशर्मा अपनी पुत्रीके त्यागसे उत्पन्न क्रोधरूपी अग्निके कणोंसे प्रदीप्त हो उनके पास आया और स्थिर चित्तके धारक उन मुनि- राजके शिरपर तीन अग्नि प्रज्वलित करने लगा॥५६॥ उस अग्निसे उनका शरीर जलने लगा। उसी अवस्थामें वे शुमध्यानके द्वारा कोका क्षय कर अन्तकृत्केवली हो मोक्ष चले गये ॥७॥ यक्ष, किन्नर, गन्धर्व और महोरग आदि सुर और असुरोंने आकर उनके शरीरको पूजा को ।। ८॥ गजकुमार मुनिका मरण जानकर दुःखी होते हुए बहुत-से यादव तथा वसुदेयको छोड़कर शेष समुद्रविजय आदि दशाह मोक्षकी इच्छासे दीक्षित हो गये ॥९॥ शिवा आदि देवियों, देवकी और रोहिणीको छोड़कर वसुदेवको अन्य नियों तथा कृष्णकी पुत्रियोंने भी दीक्षा धारण कर ली ॥१०॥ तदनन्तर देव और मनुष्योंसे पूजित भगवान नेमिजिनेन्द्रने, भव्य जीयोंके समूहको प्रयोधिन करते हुए, नाना देशों में बड़े पैभवके साथ विहार किया ॥११॥ उन्होंने उत्तर दिशा, मध्यदेशके तथा पूर्व दिशाफे प्रजासे युक्त अनेक यड़े-बड़े राजाओंको धर्ममें स्थिर १. अभयान्वितं यया स्यात्तथा । २. दोसितः म०। ३. शरीरपूजाम् । ४. दु.मा म०। ५. मुर. यगम्पन्यों म।

७५५ एकपष्टितमः सर्गः विहृत्य चिरमीशानः पुनरागस्य पूर्ववत् । गिरी रेवतके तस्थौ समवस्थानमण्डनः ।।१३॥ तत्र स्थितं जिनेन्द्रं तं देवेन्द्राः सान्द्रतेजसः। प्राप्य नवा नतिं कृत्वा निजस्थानेषु मुस्थिताः ॥१४॥ वसुदेवो वलः कृष्णः सान्तःपुरसुहृजनः । द्वारिकाप्रजया युक्तः प्रद्युम्नादिसुतान्वितः ॥१५॥ विभूत्या परयागस्य शैवेयमभिवन्द्यते । आसीनाः समवस्थान धर्म शुश्रूपुरीश्वरात् ॥१६॥ तत्र धर्मकथान्तेऽसी जिनं नत्वा हलायुधः । पप्रच्छ वस्तुचित्तस्थं करकुड्मलितालिकः ॥१७॥ नाथ वैश्रवणेनेयं निर्मिता द्वारिकापुरी। कियतानेहसान्तोऽस्याः कृतका हि विनश्वराः ॥१८॥ निमजेत् स्वत एवेयं किमु कालान्तरेऽम्बुधा । निमित्तान्तरसानिध्ये कनचिद्वा विनाश्यते ॥१९॥ स्वान्तकाले निमित्तत्वं को वा कृष्णस्य यारयति । जातानां हि समस्तानांजीवानां नियता मृतिः ॥२०॥ संयमप्रतिपत्तिा कालेन कियता प्रमो। कृष्णस्नेहमहापाशबद्धचित्तस्य मे भवेत् ॥२१॥ इति पृष्टो जिनोऽगादोदृष्टाशेपपरापरः । याथातथ्यं यथाप्रश्नं यत्प्रश्नोत्तरवाद्यसौ ॥२२॥ पुरीयं द्वादशे वर्षे राममयेन हेतुना । द्वैपायनकुमारण मुनिना धक्ष्यते रुपा ॥२३॥ कौशाम्बवनसुप्तस्य कृष्णस्य परमायुषः। प्रान्त जरत्कुमारोऽपि मंहारे हेतुतां व्रजेत् ॥२४॥ "अभ्यन्तरस्य सान्निध्य हेतोः परिणतर्वशात् । बाझो हेनुनिमित्तं हि जगतोऽभ्युदय क्षये ॥२५॥ ५० करते हुए विहार किया था ॥ १२ ॥ चिरकाल तक विहार कर भगवान् पुनः आये और रैवनक (गिरनार ) पर्वतपर समवसरणको सुशोभित करते हुए विराजमान हो गये ।। १३ ।। प्रवल तेजको धारण करनेवाले इन्द्र वहाँ विराजमान जिनेन्द्र भगवान्के पास आये और नमस्कार तथा स्तुति कर अपने-अपने स्थानोंपर वैठ गये ।। १४ ।। अन्तःपुरको रानियों, मित्रजन, द्वारिकाकी प्रजा तथा प्रद्युम्न आदि पुत्रोंसे सहित वसुदेव, बलदेव तथा कृष्ण भी बड़ी विभूतिके साथ आये और भगवान् नेमिनाथको नम- स्कार कर समवसरणमें यथास्थान बैठ भगवानसे धर्म श्रवण करने लगे ॥१५-१६।। तदनन्तर धर्मकथाके बाद जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार कर बलदेवने हाथ जोड़ ललाटसे लगा, अपने हृदयमें स्थित बात पूछी ॥ १७ ॥ उन्होंने पूछा कि हे भगवन् ! यह द्वारिकापुरी कुवेरके द्वारा रची गयी है मो इसका अन्त कितने समयमें होगा। क्योंकि कृत्रिम वस्तुएँ अवश्य ही नवर होती हैं ॥ १८ ॥ यह द्वारिकापुरी कालान्तरमें क्या अपने-आप ही समुद्रमें डूब जावेगी अथवा निमित्तान्तरके सन्निधानमें किसी अन्य निमित्तसे विनाशको प्राप्त होगी ? कृष्णके अपने अन्तकालमें निमित्तपनेको कौन प्राप्त होगा ? क्योंकि उत्पन्न हुए समस्त जीवोंका मरण निश्चित है । हे प्रभो ! मेरा चित्त कृष्णके स्नेहरूपी महापाशसे बँधा हुआ है अतः मुझे संयमकी प्राप्ति कितने समय याद होगी? ॥ १९-२१ ।। इस प्रकार बलदेवके पूछनेपर समस्त परापर पदार्थीको देखनेवाले नेमि जिनेन्द्र, प्रश्नके अनुसार यथार्थ बात कहने लगे, सो ठीक ही है क्योंकि भगवान प्रश्नोंका उत्तर निरूपण करनेवाले ही थे ।। २२ ।। उन्होंने कहा कि हे राम यह पुरी धारहवें वर्षमें मदिराके निमित्तसे द्वैपायन मुनि- के द्वारा क्रोधवश भस्म होगी ॥ २३ ।। अन्तिम समयमै श्रीकृष्ण कौशाम्बीके घनमें शयन करेंगे और जरत्कुमार उनके विनाशमें कारणपनेको प्राप्त होगा ॥२४॥ अन्तरङ्ग कारणके रहते हुए परिणतिवश बाह्य हेतु जगन्के अभ्युदय तथा क्षयमें कारण होते हैं इमलिए वस्तुके १. युक्ताः म०। २. शिवाया अपत्यं पुमान् शैवेयस्तै नेमिनाथम् । ३, धर्मस्थाने म०। ४. 'शुश्रुवुरीश्यरात्' इति पाठेन भवितव्यम् । ५ द्राविनास्यते म०१ ६. का केन म०1७. मेऽभवत् म । ८.दीपायन म०।९ कौशाम्बीवन-स.1१०.अनन्तरस्य म ।

७५६ हरिवंशपुराणे । जानन्तो वस्तुसझावमतोभ्युदयनाशयोः । हपं भुवि विषादं च न गच्छन्ति मनस्विनः ॥२६॥ मवतोऽपि तपःप्राप्तिस्तन्निमित्तात्तदा मवेत् । मवपद्धतिमीतत्व ब्रह्मलोकोपपादिनः ॥२७॥ द्वपीयनकुमारोऽसौ रोहिण्या सोदरो यतिः । तदाकर्ण्य वचो जैनं निवेदी तपसि स्थितः ॥२८॥ अवधेः पूरणायातः पूर्वदेशमुपेत्य सः । तपश्चरितुमारब्धः कषायतनुशोषणम् ॥२९॥ दुःखी जरत्कुमारश्च दुःखितान् भ्रातृबान्धवान् । परित्यज्य गतः क्वापि स हरियंत्र नेक्ष्यते ॥३०॥ जररकुमारे प्रगते वनमेकाकिनि स्थिते । हरिः स्नेहाकुलो मेने शून्यमात्मानमारमनि ॥३१॥ चचार मृगसामान्य विजनो विजनं वनम् । हरिप्राणप्रियः प्राणान् प्रियान हातुमनाः कचित् ॥३२॥ इतोऽपि जिनमानम्य यादवा विविशुः पुरीम् । आगामिदुःखसंमारचिन्तासन्तप्तमानसाः ॥३३॥ घोषणां कारयाञ्चके चक्की पुरि बलान्वितः । मद्याङ्गानि च मद्यानि विसृज्यन्तामिति द्रुतम् ॥३४॥ पिष्टकिण्वादिमद्या स्तत्तो मद्यानि मद्यपैः । क्षिप्तानि सशिलाकुण्डै कादम्बगिरिंगहरे ॥३५॥ कदम्बवनकुण्डेषु मुक्ता कादम्बरी तु या । साश्मपाकविशेपस्य हेतुत्वेनावतिष्ठते ॥३६॥ तथान्या घोषणादायि कृष्णेन हितबुद्धिना। द्वारिकायां महापुर्या स्त्रीणां पुंसां च शृण्वताम् ॥३७॥ पिता में यदि वा माता सुता चान्तःपुराङ्गना । तपस्यन्तु मते जने वारयामि न तानहम् ॥३८॥ - स्वभावको जाननेवाले उत्तम मनुष्य अभ्युदय तथा क्षयके समय पृथिवीपर कभी हर्ष और विपादको प्राप्त नहीं होते ॥२५-२६ ।। संसारके मार्गसे भयभीत रहनेवाले आपको भी उसी समय कृष्णकी मृत्युका निमित्त पाकर तपकी प्राप्ति होगी तथा तपकर आप ब्रह्मस्वर्गमें उत्पन्न होंगे ॥२७॥ द्वैपायनकुमार रोहिणीका भाई-बलदेवका मामा था सो उस समय भगवान्के वचन सुनकर वह संसारसे विरक्त हो मुनि होकर तप करने लगा ।।२८। वह बारह वर्पकी अवधिको पूर्ण करनेके लिए यहाँसे पूर्व देशको ओर चला गया और वहाँ कपाय तथा शरीरको सुखानेवाला तप करने लगा ।।२९।। 'मेरे निमित्तसे कृष्णकी मृत्यु होगी' यह जानकर जरत्कुमार भी बहुत दुःखी हुआ और दुःखसे युक्त भाई-बन्धुओंको छोड़कर वह कहीं ऐसी जगह चला गया जहाँ कृष्ण दिखायी भी न दें ॥३०॥ जय जरत्कुमार वनमें जाकर अकेला रहने लगा तब स्नेहसे आकुल श्रीकृष्णने अपने-आपमें अपने-आपको सूना अनुभव किया ॥३१।। जो कृष्णको प्राणों के समान प्यारा था ऐसा जरत्कुमार कहीं प्रिय प्राणोंको छोड़नेकी इच्छासे अकेला ही मृगोंके समान निर्जन वनमें भ्रमण करने लगा ॥३२।। इधर आगामी दुःखके भारकी चिन्तासे जिनके मन संतप्त हो रहे थे ऐसे यादव लोग भगवानको नमस्कार कर नगरीमें प्रविष्ट हुए ॥३३॥ वलदेवके साथ कृष्णने नगरमें यह घोपणा करा दी कि मद्य बनानेके साधन और मद्य शीघ्र ही अलग कर दिये जायें ॥३४॥ घोषणा सुनते ही मद्यपायी लोगोंने पिष्ट, किण्य आदि मदिरा बनाने के साधनोंके साथ- साथ समस्त मदिराको शिलाओंके वीच बने हुए कुण्डसे युक्त कादम्ब गिरिको गुहामें फेंक दिया ॥३५॥ कदम्ब बनके कुण्डोंमें जो मदिरा छोड़ी गयी थी यह अश्मपाक विशेपके कारण उन कुण्डों. में भरी रही । भावार्थ-पत्थरकी कुण्डियों में जिस प्रकार कोई तरल पदार्थ स्थिर रहा आता है उसी प्रकार कदम्ब बनके शिलाकुण्डों में वह मदिरा स्थिर रही आयी ॥३६हितकी इच्छा रखनेवाले कृष्णने समस्त स्त्री-पुरुषोंके मुनते समय द्वारिकापुरी में दूसरी घोपणा यह दी कि यदि मेरे पिता, माता, पुत्री अथवा अन्तःपुरकी स्त्री आदि कोई भी जिनेन्द्र भगवान्फे मतमे दीक्षित हो तप करना चाहें तो में उन्हें मना नहीं करता हूँ-उन्हें तप करनेकी मेरी ओरसे १. दीपायन-म०, स.१२. हरिः प्रागप्रिय. म. | ३. सशिलापण्डवादम-क. । ४. धुता म. 1 एकपष्टितमः सर्गः ततः प्रद्युम्नमान्याद्याः कुमाराश्वरमागकाः। अन्ये च यहवो यातास्तपोवनमसहिनः ॥३९॥ रुक्मिणीसत्यमामाद्या महादयोऽष्ट सस्नुपाः । लब्धानुज्ञा हरेः स्त्रीमिः मपन्नीमिः प्रवग्रजुः ॥३०॥ सिद्धार्थमारथिर्धाता बलदेवेन याचितः' । बोधनं व्यसने स्वस्थ प्रतिपद्य तपोऽगृहीत् ॥४१॥ ततः संधेन महता जिनः पलवदेशमा । बभूव भव्यबोधार्थ मध्यान्मोहभास्करः ॥४२॥ राजनीनरसंघातो यावान् प्रवजितस्तदा । जिनेनैव समं सोऽयादुत्तरापथमुद्यमी ॥४३॥ 'पद्वादश चोद्वस्य पुर्याः लोकः चिद्वने । कृत्वा वास पुनस्तत्र स्वागतश्च विधेशात् ।।४४॥ इनो द्वारवतीलोकः परलोकमयान्वितः । व्रतोपवामपूजासु मुतरां निरतोऽभवत् ॥४५॥ द्वैपायनोऽपि महता वपसा सहितस्ततः । व्यतीतं द्वादशं वर्ष मन्वानी भ्रान्तिहेतुना ॥४६॥ व्यतिक्रान्तो जिनादेश इति ध्यान्वा विमूढधीः । मंग्राप्तो द्वादशे वर्षे सम्यग्दर्शनदुर्वलः ॥४७॥ नातापनयोगश्च तस्थौ प्रतिमया पथि । द्वारिकाबहिरम्याशे कदाचिनिकटे गिरः ॥८॥ धनक्रीडापरिश्रान्ताः पिपासाकुलिता जलम् । इति कादम्बकुण्डेषु शम्बाद्यास्तां मुरां पपुः ।।४९।। कदम्बवनसंन्यस्ता कदम्बकतया स्थिताम् । पीन्या कादम्बरी मृष्टां कुमारा विकृतिं गताः ।।५।। पूर्ण छूट है ।।३७-३८॥ घोषणा सुनते ही प्रद्युम्नकुमार तथा भानुकुमारको आदि लेकर चरम- शरीरीकुमार और अन्य बहुत-से लोग परिग्रहका त्याग कर तपोवनको चले गये।॥३९|| रुक्मिणी और सत्यभामा आदि आठ पट्टरानियोंने भी आज्ञा प्राप्त कर पुत्रवधुओं तथा अन्य सौतोंके साथ दीक्षा धारण कर ली ॥४०॥ सिद्धार्थ नामका सारथि जो बलदेवका भाई था जब दीक्षा टेनेके लिए उत्सुक हुआ तब बलदेवने उससे याचना की कि कदाचित् मैं मोहजन्य व्यसनको प्राप्त होऊँ तो मुझे संबोधित करना। बलदेवकी इस प्रार्थनाको स्वीकृत कर उसने तप ग्रहण कर लिया ॥४॥ तदनन्तर जो भव्यरूपी कमलांको विकसित करनेके लिए सूर्य के ममान थे ऐसे भगवान नेमिजिनेन्द्र, भव्य जीयोंको संवोधनेके लिए बड़े भारी संघके साथ पल्लव देशको प्राप्त हुए ॥४२॥ उस समय जो राजा-रानियों और मनुष्योंका समूह दीक्षित हुआ था वह जिनेन्द्र भगवान के साथ-ही-साथ उत्तरापथकी ओर चलनेके लिए उद्यमी हुआ 11४३।। द्वारिकाके लोग द्वारिकासे बाहर जाकर बारह वर्ष तक कहीं वनमें रहते आये परन्तु भाग्यको प्रबलतासे वे वहाँ नियाम कर फिर वहीं वापस आ गये ॥४४|| इधर द्वारिकामें जो लोग रहते थे वे परलोकके भयसे युक्त हो प्रत, उपवास तथा पूजा आदि सत्कायोंमें निरन्तर संलग्न रहते थे 12411 तदनन्तर बहुन भारी तपसे युक्त जो द्वैपायन मुनि थे वे भी भ्रान्तिवश बारहवें चर्पको व्यतीत हुआ मानते हुए बारहवें वर्षमें वहाँ आ पहुंचे। 'जिनेन्द्र भगवानका आदेश पूरा हो चुका है। यह विचार कर जिनकी बुद्धि, विमूह हो रही थी तथा जो सम्यग्दर्शनसे दुर्वल थे ऐसे द्वैपायन मुनि बारहवें वर्षमै वहीं आ पहुँचे ॥४६-४७ । वे किसी समय द्वारिकाके बाहर पर्वनके निकट, मार्गमें आतापन योग धारण कर प्रतिमायोगसे विराज- मान थे ।।१८।। उसी समय वनक्रीड़ासे थक एवं प्याससे पीड़िन झम्ब आदि कुमारोंने कादम्ब बनके कुण्डों में स्थित उम शरायको पो लिया ॥४२॥ कदम्ब वनमें छोड़ी एवं कदम्ब रूपसे टयरोंके रूपमें स्थित उस मधुर मदिराको पीकर वे सब कुमार विकार भावको प्राप्त १. बलदेवनयान्वित म1 २. प्रतिपाद्य १०, ग्व०, ५०, म०1३. पाया- म०, याया ख., घ.1 ४. वर्षान् द्वादश क०, वर्षे द्वादश म०। ५ दारवतीम् म० । ६. दीपायनापम० । ७. मुम्वाद्यां ता क० । , ७५८ हरिवंशपुराणे वारुणी सा पुराणापि परिपाकवशाशान् । तरुणानकरोद्गाद तरुणीवारुणेक्षणान् ॥५१॥ असंबद्धानि गायन्तो नृत्यन्तः स्खलितकमाः । मुक्तकेशाः कृतोत्तंसाः कण्ठालम्बिवनलजः॥५२॥ आगच्छन्तः पुरः सर्वे दृष्ट्वार्काभिमुखं मुनिम् । प्रत्यमिज्ञाय चायोचन् घूर्णमाननिरीक्षणाः ॥५३॥ सोऽयं द्वैपायनो योगी द्वारवत्याः किलान्तकृत् ।। भवितास्माकमद्याने व प्रयाति वराककः ॥५४॥ इत्युक्त्या तं कुमारास्ते लोष्टुमि. सर्वतोऽश्मभिः । प्रजध्नुनिघृणास्तावद्यावत्पतति भूतले ॥५५॥ क्रोधाधिक्यात्ततो दधे दष्टोटो भृकुटीकुटीम् । प्रलयाय यदूनां सः प्रायः स्वतपसोऽपि च ॥५६॥ प्रविष्टास्तु पुरीं व्याला व्याला इव चलाचलाः । कुमाराः कश्चिदुक्तं तु दुर्वृत्तं लघु विष्णवे ॥५७॥ बलनारायणौ श्रुत्या द्वैपायनमुपश्रुतम् । द्वारिकायाः क्षयं प्राप्तं मनाते जिनभाषितम् ॥५८॥ संभ्रमेण परिप्राप्तौ परित्यक्तपरिच्छदौ। मुनि क्षमयितुं क्रोधाज्ज्वलन्तमिव पावकम् ॥५९॥ दृष्टः संक्लिष्टधीस्ताभ्यां भ्रूभङ्गविषमाननः । दुनिरीक्ष्येक्षणः क्षीणः कण्ठप्राणो बिभीषणः ॥६०॥ कृतान्जलिपुटाभ्यां स प्रणिपत्य महादरात् । याच्यते याचना बन्ध्यं,जानदयामपि मोहतः ॥११॥ रक्ष्यतां रक्ष्यतां साधो चिरं सुपरिरक्षितः । क्षमामूलस्तपोमारो धक्ष्यते क्रोधवाहिना ।।६२।। मोक्षसाधनमप्येष तपो दूषयति क्षणात् । चतुर्वर्गरिपुः क्रोधः क्रोधः स्वपरनाशक, ॥६३॥ । हो गये ।। ५० ॥ यद्यपि वह मदिरा पुरानी थी तथापि परिपाकके वशसे उसने तरुण स्त्रीके समान, लाल-लाल नेत्रांको धारण करनेवाले उन तरुण कुमारीको अत्यधिक वशीभूत कर लिया ॥५१।। फलस्वरूप वे सब कुमार असंबद्ध गाने लगे, लड़खड़ाते पैरोंसे नाचने लगे, उनके केश बिखर गये, आभूपण अस्त-व्यस्त हो गये और उन्होंने अपने कण्ठोंमें जंगली फूलोंको मालाएँ पहिन ली ।। ५२ ।। जब वे सब नगरको ओर आ रहे थे तब उन्होंने सूर्यके सम्मुख खड़े हुए द्वैपायन मुनिको पहचान लिया। पहचानते ही उनके नेत्र घूमने लगे। उन्होंने आपसमें कहा कि यह वही द्वैपायन योगी है जो द्वारिकाका नाश करनेवाला होगा। आज यह वेचारा हम लोगोंके आगे कहाँ जायेगा ? ॥ ५३-५४॥ इतना कहकर उन निर्दय कुमारोंने लुट्टों और पत्थरोंसे उन्हें तबतक मारा जबतक कि वे घायल होकर पृथिवीपर नहीं गिर पड़े ॥५५॥ तदनन्तर क्रोधकी अधिकतासे मुनि अपना ओठ डंसने लगे तथा यादवों और अपने तपको नष्ट करनेके लिए उन्होंने भ्रुकुटी चढा ली ॥५६॥ मदमाते हाथियों के समान अत्यन्त चञ्चलकुमार जब द्वारिकापुरीमें प्रविष्ट हुए तब उनमें से किन्हींने यह दुर्घटना शीव ही कृष्णके लिए जा सुनायी ॥५७॥ वलदेव तथा नारायणने द्वैपायनसे सम्बन्ध रखने- वाली इस घटनाको सुनकर समझ लिया कि जिनेन्द्र भगवान ने जो द्वारिकाका क्षय बतलाया था वह आ पहुँचा है-अब शीघ्र ही द्वारिकाका क्षय "या है ।।५८|| बलदेव और नारायण घबड़ाहटवश सब प्रकारका परिकर छोड़, क्रो शान्त करने के लिए, उनसे क्षमा माँगने के लिए दौड़े गये ।।- अत्यन्त मंक्लेशमय थी, भ्रफुटीक भंगसे जिनका । रहा था, देसने योग्य थे, जिनके गत हो रहे थे मुनिको बलदेव और फर और 'हमारी याचना की। जिसकी जड़ है ऐसा यह तपका मिस जाये ॥३॥ यह क्रोधमा काम और मोक्ष इन चा समान जर मुनिको बुद्धि उन्होंने हाथ । ज. कहा कि, 'हे माधो!

एकपष्टितमः सर्गः क्षम्यतां क्षम्यतां मूढः प्रमादबहुलैः कृतम् । दुर्विचेष्टितमस्मभ्यं प्रसाद. क्रियतां यते ॥६४॥ इत्यादिप्रियवादिभ्यां प्राध्यमानोऽनिधर्तकः । सप्राणिद्वारिकादाहे पापधीः कृतनिश्चयः ॥६५॥ संजयाऽदर्शयत्ताभ्यामङ्गुलीद्वयदर्शनम् । युवयोरेव मोक्षोऽत्र नान्यस्येति परिस्फुटम् ॥६६॥ 'अनिवतंकरोपं तं विदित्वा विदिवक्षयो । विपण्णी तो पुरों यातौ किंकर्तव्यत्वविह्वलौ ॥६॥ शम्बाद्यास्तु तदाऽनेके यादवाश्चरमाङ्गकाः। पुर्या निष्क्रम्य निष्क्रान्तास्तस्थुगिरिगुहादिपु ॥६॥ मृत्वा क्रोधाग्निनिर्दग्धतपःसारधनश्च सः । बभूवाग्निकुमाराख्यो मिथ्यादृग्मवनामरः ॥६९॥ अन्तर्मुहर्तकालेन पर्याप्तः प्रतिबुद्धवान् । विमलेन विकारं स्वं कृतं यदुकुमारकैः ॥७॥ रौध्यानं स दध्यौ में तपस्थस्य निरागसः । हिंसकानां पुरों सवा दहामि सह जन्तुमिः ॥७॥ इति ध्यात्वा स दुर्वारो यावदायाति दारुणः । द्वारावत्यां महोत्पातास्तावजाताः क्षयावहाः ॥७२॥ वभूवुः प्रत्यगारं च रोमहर्षविकारिणः । प्रजानां निशि सुप्तानां स्वप्नाश्च भयशंसिनः ॥७३॥ प्राप्य पापमतिश्चासौ पुरीमारभ्य वाह्यतः । कोपी दग्धं समारेभे तिर्यग्मानुपपूरिताम् ॥७॥ धूमञ्चालाकुलान् वृन्दस्त्रीबालपशुपक्षिणः । नश्यतोऽना क्षिपत्येप कारुण्यं पापिनः कुतः ॥७॥ प्राणिजातस्य सर्वस्य ज्ञातवेदसि मनतः । आक्रन्दनस्वना जाता येऽत्र जाता न जानुचिन् ॥७६॥ हे मुनि राज ! प्रमादसे भरे हुए मूर्ख कुमारोंने जो दुष्ट चेष्टा की है उसे क्षमा कीजिए, क्षमा कीजिए, हम लोगोंके लिए प्रसन्न होइए' ॥६४|| इत्यादि प्रियवचन बोलनेवाले बलदेव और कृष्णने द्वैपायनसे बहुत प्रार्थना की पर वे अपने निश्चयसे पीछे नहीं हटे । उनकी बुद्धि अत्यन्त पापपूर्ण हो गयी थी और वे प्राणियों-सहित द्वारिकापुरीके जलानेका निश्चय कर चुके थे॥६५।। उन्होंने बलदेव और कृष्णके लिए दो अंगुलियाँ दिखायी तथा इशारेसे स्पष्ट सूचित किया कि तुम दोनोंका ही छुटकारा हो सकता है, अन्यका नहीं ॥६६।। जव वलदेव और कृष्णको यह विदित हो गया कि इनका क्रोध पीछे हटनेवाला नहीं है तब वे द्वारिकाका क्षय जान बहुत दुःखी हुए और किंकर्तव्य-विमूढ हो नगरीकी ओर लौट आये ।।६। उस समय शम्बकुमार आदि अनेक चरमशरीरी यादय, नगरीसे निकल कर दीक्षित हो गये तथा पर्वतकी गुफा आदिमें विराजमान हो गये ।।६८।। क्रोधरूपी अग्निके द्वारा जिनका तपरूपी श्रेष्ठ धन भस्म हो चुका था ऐसे द्वैपायन मुनि मरकर अग्निकुमार नामक मिध्यादृष्टि भवनवासी देव हुए ॥६९॥ वहाँ अन्तर्मुहूर्त में ही पर्याप्तक होकर उन्होंने यादव कुमारोंके द्वारा किये हुए अपने अपकारको विभङ्गावधिज्ञानके द्वारा जान लिया ।।७०|| उन्होंने इस रौद्रध्यानका चिन्तवन किया कि, 'देखो, मैं निरपराधी तपमें लीन था फिर भी इन लोगोंने मेरी हिंसा की अतः मैं इन हिंसकोंकी समस्त नगरीको सब जीवोंके साथ अभी हाल भस्म करता हूँ।' इस प्रकार ध्यान कर फर परिणामोंका धारक यह दुर्वार देव ज्यों ही आता है त्यो हो द्वारिकामें क्षयको उत्पन्न करनेवाले बड़े-बड़े उत्पात होने लगे ॥७१-७२॥ घर-घरमें जय प्रजाके लोग रात्रिके समय निश्चिन्ततासे सो रहे थे तब उन्हें रोमाञ्च खड़े कर देनेवाले भयसूचक स्वप्न आने लगे ॥७३॥ अन्तमें उस पापबुद्धि क्रोधी देवने आकर वाहरसे लेकर तिर्यश्च और मनुष्यों- से भरी हुई नगरीको जलाना शुरू कर दिया ॥४॥ वह धूम और अग्निकी ज्यालाओंसे आकुल हो नष्ट होते हुए वृद्ध, स्त्री, पालक, पशु तथा पक्षियोंको पकड़-पकड़ कर अग्निमें फेंकने लगा सो ठीक ही है क्योंकि पापी मनुष्यको दया कहाँ होती है ? |७|| उस समय अग्निमें जलते हुए समस्त प्राणियोंकी चिल्लाहटके जो शब्द हुए थे वैसे शब्द इस पृथिवीपर कभी नहीं हुए थे १. अतिवर्तक-म० । २. धनश्च म. म. । ३. सुदुवारो म । ४. बालाकगन् म०। ५. अग्नी । N हरिवंशपुराणे दिव्येन दह्यमानायां दहनेन तदा पुरि । नूनं धापि गता देवा दुर्वारा भवितव्यता ॥७॥ अन्यथा देवराजस्य राजराजेन शासनात् । निर्मिता रक्षिता चासो दह्यते कथमनिना ॥७८॥ रक्षा बलकृष्णौ नः चिरेणाग्निमयार्दितान् । इति स्त्रीबालवृद्धानामालापा ययुराकुलाः ॥७९॥ आकुलो बलकृष्णौ च मिस्वा प्राकारमम्बुधैः । विध्यापयितुमालमा प्रवाहस्तं हुताशनम् ॥८॥ सागराम्बुहलाकृष्टं हलिना बलशालिना । जग्याल ज्वलनस्तेन तैलमावमुपेयुषा l असाध्यतां विदिस्याग्नेर्जनन्यौ जनकं जनम् । सुवहुं रथमारोप्य संयोज्य गजवाजिनः ॥२॥ स्थं नोदयतोः क्षोण्यां रथचक्राणि पश्यत् । निमजन्ति विपत्काले क गजा वाजिनः क च ॥४३॥ स्वयमेव रथं दोामाकृष्य प्रयतोस्तयोः । निरुद्धः कोलयित्वाऽसाविन्द्रकीलेन पापिना ॥८॥ अवष्ट नाति पादेन यावरकोलं हलायुधः । पिहितं गोपुरद्वारं तावत्येन कोपिना ।।८५॥ कपाटं पादपातेन ताभ्यां पातितमाशु तत् । द्विषोक्तं निर्गमोऽन्यस्य युवाभ्यां नानुविद्यते ॥८६॥ ततः पिना च मातृभ्यां पुत्रौ यातमितीरिती। विनिश्चित्योपसंहारमात्मीयमिति दु.सिमिः ॥४७॥ भवतोः जीवतोः पुत्री कदाचिदंशसन्ततिः । न क्राम्येदप्यतो घातमिति तद्वाक्यमस्तकौ ॥१८॥ तान्प्रशाम्य गती दीनौ दुःखितौ दुःखपीडितान् । प्रपत्य पोदयोर्यातो गुरुवाक्यकरौ पुरः ॥१९॥ ॥७६।। दिव्य अनिके द्वारा जब नगरी जल रही थी तब जान पड़ता था कि देव लोग कहीं चले गये थे सो ठीक ही है क्योंकि भवितव्यता दुर्निवार है ।।७। अन्यथा इन्द्रकी आज्ञासे कुबेर- ने जिस नगरीकी रचना की थी तथा कुवेर ही जिसकी रक्षा करता था वह नगरी अग्निके द्वारा कैसे जल जाती ? 911 'हे वलदेव और कृष्ण ! हम लोग चिरकालसे अग्निके भयसे पीडित हो रहे हैं, हमारी रक्षा करो' इस प्रकार स्त्री, वालक और वृद्धजनोंके घराहट से भरे शब्द सर्वत्र व्याप्त हो रहे थे ।१७९।। घबड़ाये हुए वलदेव और कृष्ण कोट फोड़कर समुद्रके प्रवाहोंसे उस अग्निको बुझाने लगे ||८०॥ वलशाली वलदेवने अपने हलसे समुद्रका जल खींचा: परन्तु वह जल तेलरूपमें परिणत हो गया और उससे अग्नि अत्यधिक प्रज्वलित हो उठी 11८शा जब बलदेय और कृष्णको इस बातका निश्चय हो गया कि अग्नि असाध्य है- बुझायो नहीं जा सकती तब उन्होंने दोनों माताओंको, पिताको तथा अन्य बहुतसे लोगोंको रथपर बैठा- कर तथा रथमें हाथी और घोड़े जोत कर रथको पृथिवीपर चलाया परन्तु रथके पहिये जिस प्रकार कीचड़में फँस जाते हैं उस प्रकार पृथिवीमें फंस गये सो ठीक ही है क्योंकि विपत्तिके समय कहाँ हाथी और कहाँ घोड़े काम आते हैं ? ॥८२-८३॥ हाथी और घोड़ोंको बेकार देख जब दोनों भाई स्वयं ही भुजाओंसे रथ खींचकर चलने लगे तब उस पापी देवने यनमय कीलसे कील कर रथको रोक दिया ॥८४|| जबतक वलदेव पैरके आघातसे कीलको उखाहते हैं तब तक उस क्रोधी दैत्यने नगरका द्वार बन्द कर दिया। जब दोनों भाइयोंने पैरके आघातसे द्वारके कपाटको शीघ्र ही गिरा दिया तबतक शत्रुने कहा कि तुम दोनोंके सिवाय किसी अन्यका निकलना नहीं हो सकता ॥८६॥ तदनन्तर अय हम लोगोंका विनाश निश्चित है यह जानकर दोनों माताओं और पिताने दुःसी होकर कहा कि 'हे पुत्रो ! तुम जाओ। कदाचित् तुम दोनोंके जीवित रहते वंश घातको प्राप्त नहीं होगा। इस प्रकार गुरुजनोंके वचन मस्तकपर धारण कर दोनों भाई अत्यन्त दुःखी हुए तथा दुःखसे पीड़ित दीन माता-पिताको शान्त कर और उनके चरणों में गिर फर उनके यचनीको मानते हुए नगरसे बाहर निकल आये ॥८७-८९।। १. रवता म० । २. च खः । ३ मयादिता. म., स. । ४. वनयकोलोन (ए.टि.)। ५. पात F., रा.१०॥

एकपष्टिनमः मर्गः ७६१ । निगरय निगंती पुर्या मालालीलोढवेश्मनः । रुदिखा कण्ठलनी नी दक्षिणां दिशमाश्रिती ॥९॥ इतोऽपि यमुदेवाद्या यादवाश्च तदननाः । प्रायांपगमनं प्राप्ताः संप्राप्ता वहयो दिवम् ॥११॥ केचिश्वरमदेहास्नु बलदेवमुतादयः । गृहीतसंयमा नीता जम्मकर्जिनमन्निधिम् ।।९२॥ यदूनां यादवीनां च धम्यंध्यानयशाग्मनाम् । सम्यग्दर्शनशुद्धानां प्रायोपगममाश्रिताम् ॥१३॥ बहूनां दद्यमानानामपि देहविनाशनः । जातो हुताशनी रोद्रो न नु ध्यानविनाशनः ॥९॥ आतंध्यानकरः प्रायो मिथ्याष्टिषु जायत । उपयगंश्चतुर्मेद्रा न सदृष्टेम्तु जानुचिन् ॥९॥ आगाढे यान्यनागाढे मरणे ममुपस्थिते । न मुह्यन्ति जना जानु जिनशासनमाविताः ॥९॥ मिथ्यादृष्टेः सती जन्तोमरण गौचनाय हि । न तु दर्शनशुद्धस्य ममाधिमरणं शुचे ॥९७॥ मृतिर्जातस्य नियता मंस्ती नियतवंशात् । मा समाधियुजी भूयादुषमर्गऽपि देहिनः ॥९॥ धन्याः शिविशिवाजालकवलीकृतविग्रहाः । अपि साधुसमाधाना ये न्यजन्ति कलेवरम् ॥१९॥ तपो वा भरणं वापि शस्तं स्वपरमाध्यकृन् । न च द्वैपायनस्य स्वपरासुसकारणम् ॥१०॥ परस्यापकृतिं कुर्वन् कुर्यादकत्र जन्मनि । पापी परयधं स्वस्य जान्नुर्जन्मनि जन्मनि ।।१०१॥ कपायवागः प्राणी हन्ता स्वस्य भवे मवे । संसारवर्धनोऽन्येषां मवेद्रा वधको न वा ॥१०२॥ ज्वालाओंके समूहसे जिमके महल जल रहे थे ऐमी नगरीमे निकलकर दोनों भाई पहले तो गतिहीन हो गये-इस वातका निश्चय नहीं कर सके कि कहाँ जाया जाये ? वे बहुत देर तक एक-दूसरेके कण्ठसे लगकर रोते रहे । तदनन्तर दक्षिण दिशाकी ओर चले ॥२०॥ इधर वसुदेव आदि यादव तथा उनकी स्त्रियाँ अनेक लोग संन्यास धारण कर स्वर्गमें उत्पन्न हुए ॥११॥ वलदेवक पुत्रोंको आदि लेकर जो कुछ चरमशरीरी थे उन्होंने वहीं मंयम धारण कर लिया और उन्हें जृम्भकदेव जिनेन्द्रभगवान के पास ले गये ।।२२।। जिनकी आत्मा धर्मध्यान- के वशीभूत थी--जो मम्यकदर्शनसे शुद्ध थे, नथा जिन्होंने प्रायोपगमन नामक संन्यास धारण कर रखा था ऐसे बहुत-से यादव और उनकी स्त्रियाँ यद्यपि अग्निमें जल रही थीं तथापि भयंकर अग्नि केवल उनके शरीरको नष्ट करनेवाली हुई, ध्यानको नष्ट करनेवाली नहीं ॥१३-१४|| मनुष्य, तिर्यश्च, देव और जड़के भेदसे चार प्रकारका उपसर्ग प्रायः मिथ्या- दृष्टि जीवोंको ही आध्यानका करनेवाला होता है, मम्यग्दृष्टि जीवको कभी नहीं ।। ९५ ।। जो मनुष्य जिनशासनकी भावनासे युक्त हैं वे संभावित और असंभाविन किसी भी प्रकारका मरण उपस्थित होनेपर की मोहको प्राप्त नहीं होते ।।९६॥ मिथ्यादृष्टि जीवका मरण शोकके लिए होता है, परन्तु सम्यग्दृष्टि जीवका ममाधिमरण गोकके लिए नहीं होता ।। २७ ।। संसार का नियम ही ऐमा है कि जो उत्पन्न होता है उसका मरण अवश्य होता है, अतः मदा यह भावना रखनी चाहिए कि उपसर्ग आनेपर भी ममाधिपूर्वक ही मरण हो । ९८ ।। वे मनुष्य धन्य हैं जो अग्निकी शिखाओंके समूहसे ग्रस्तशरीर होनेपर भी उत्तम ममाधिसे शरीर छोड़ते हैं ।। ९९ ॥ जो तप और मरण निज तथा परको सुग्य करनेवाला है वही उत्तम है- प्रशंसनीय है, जो तप द्वैपायनके ममान निज और परको दुःखका कारण है वह उत्तम नहीं है ।। १००॥ दूसरेका अपकार करनेवाला पापी मनुष्य, दूमरेका वध तो एक जन्ममें कर पाता है 7 पर उसके फलस्वरूप अपना वध जन्म-जन्ममें करता है ।।१०१|| यह प्राणी दूमरोंका वध कर मके अथवा न कर मकै परन्तु कपायके वशीभूत हो अपना वध नो भव-भवमें करता है. १. दिव. म० 1 २. गमनाश्रिताम् का । ३. यातो म०,४.- प्रांतम्य म । ५. तच म । ९६ हरिवंशपुराणे परं हन्मीति संध्यातं लोहपिण्डमुपाददत् । दहत्यामानमेवादी कपायवशगस्तथा ॥१०३|| संसारान्तकरं पुंसामेकैषां परमं तपः । द्वैपायनस्य तज्जातं दीर्घसंसारकारणम् ॥१०॥ जन्तोः को वापराधोऽत्र स्वकर्मवशवर्तिनः । यत्नवानपि यजन्तुर्मोद्यते मोहवैरिणा ॥१०५॥ 'अपाक्रियेतापि परः कथञ्चिदतितिक्षुणों । उपक्रियेत यद्यारमा तथेहपरलोकयोः ।।१०६।। परदु.खविधानेन यरस्वदुःखपरम्परा । अवश्यम्माविनी तस्मात्तितिक्षेवातिमाश्यताम् ॥१०॥ शार्दूलविक्रीडितम् क्रोधान्धन विधेर्वशेन नगरी द्वैपायनेनाखिला वालस्त्रीपशुवृद्धलोककलिता द्वाराकुला द्वारिका । माम पड्भिरशेषिता विलसिता संत्यज्य जैनं वचो धिक क्रोधं स्त्रपरापकारकरणं संसारसंवर्धनम् ।।१०।। इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती द्वारायतीविनाशवर्णनो नामैकपतिम सर्गः ॥६॥ तथा अपने संसारको बढ़ाता है ।।१०२।। जिस प्रकार तपाये हुए लोहेके पिण्डको उठानेवाला मनुष्य पहले अपने-आपको जलाता है पश्चात् दूसरेको जला सके अथवा नहीं। उसी प्रकार कपायके वशीभूत हुआ प्राणी 'दूसरेका घात करूँ' इस विचारके उत्पन्न होते ही पहले अपने- आपका घात करता है पश्चात् दूसरेका घात कर सके या नहीं कर सके ॥१०३।। किन्हीं मनुष्यों- के लिए यह परम तप संसारका अन्त,करनेवाला होता है पर द्वैपायन मुनिके लिए दीर्घ संसार- का कारण हुआ ॥१०४|! अथवा इस संसारमें अपने कर्मके अनुसार प्रवृत्ति करनेवाले प्राणीका क्या अपराध है ? क्योंकि यत्न करनेवाला प्राणी भी मोहरूपी वैरीके द्वारा मोहको प्राप्त हो जाता, है ।।१०५॥ असहनशील पुरुष दूसरेका अपकार किसी तरह कर भी सकता है परन्तु उसे अपने- आपका तो इस लोक और परलोकमें उपकार ही करना चाहिए ॥१०६।। क्योंकि दूसरोंको दुःख पहुँचानेसे अपने-आपको भी दुःखकी परम्परा प्राप्त होती है, इसलिए क्षमा अवश्यम्भावी है- अवश्य ही धारण करने योग्य है ऐसा निश्चय करना चाहिए ।।१०७॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि देखो, विधिके वशीभूत हुए क्रोधसे अन्धे द्वैपायनने जिनेन्द्र भगवान्के वचन छोड़कर बालक, स्त्री, पशु और वृद्धजनोंसे व्याप्त एवं अनेक द्वारों से युक्त शोभायमान द्वारिका नगरी- को छह मासमे भस्म कर नष्ट कर दिया सो निज और परके अपकारका कारण तथा संसार. को बढानेवाले इस क्रोधको धिक्कार है ॥१०८।। इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराण के संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्यरचित हरिवंशपुराणमें द्वारिकाके नाशका वर्णन करनेवाला इकसठवाँ सर्ग समाप्त हुभा ॥६१|| १. अपिक्रियेतापि म० । २. अविचक्षणः ग०, अतितिक्षणः म., ख०, ८० । ३. भाष्यताम् म० ।

द्विषष्टितमः सर्गः पुण्योदयारपुरा प्राप्ताननि यो जनातिगाम् । चक्रादिरस पंपनी वलिनी वलकेशवा ॥१॥ पुण्यक्षयात्तु वावेव स्वबन्धुविवर्जिती । प्राणमानारीवारी शोकमारवशीकृतां ॥२॥ प्रस्थिती दक्षिणामाशां जीविताशावलम्बिनी । क्षुत्पिपामापरिधान्ना यात साकांक्षिणी पधि ॥३॥ उदिश्य पाण्डवान् यान्ती मधुरा दक्षिणामुमा । हस्तवनं पुरं प्राप्ता तोचाने हरिः स्थितः ॥३॥' गनोसपानमानेतुं कृतसंकेतकोऽप्रजः । वसपंवृतसागः प्रविष्टच 'ततः पुरम् ॥५॥ अच्छदन्तो मूपस्तत्र धार्तराष्ट्रोऽवतिष्ठते । पृथिव्यां प्रथिनो धन्वी यदुरन्ध्ररन्तधोः ॥६॥ जनैनितसंघ रूपवशीकृतः । प्रविश्य तत्पुरी वीरो दृश्यमान. सविस्मयः ॥७॥ कण्टकं कुण्डलं चापि दत्वा कस्यचिदारणे । अन्नपानमुरादाय निगच्छन् वीक्ष्य रक्षकैः ॥८॥ विज्ञाय बलदेवोऽयमिति राज्ञे निवेदितः । ततस्तन वधायास्य प्रेपितं सकलं यलम् ॥९॥ संघहोऽभूत्पुरद्वार सन्यस्य यलरोधिनः । यलेन संशयाहूत: कृष्णश्च द्रुतमागत. ॥१०॥ 'अग्नपानं सुसंस्थाप्य गजस्तम्म यलोऽग्रहीत् । कृष्णस्तु परिघं घोरं किञ्चिन्कुपितमानमः ॥११॥ n-THMAN जो बलदेव और कृष्ण पहले पुण्योदयसे लोकोत्तर उन्नतिको प्राप्त थे, चक्र आदि रत्नोंसे सहित थे, बलयान थे, बलभद्र एवं नारायण-पदके धारक थे। वे ही अब पुण्य क्षीण हो जानेसे रन तथा बन्धुजनांसे रहित हो गये, प्राणमात्र ही उनके साथी रह गये और शोक- के वशीभूत हो गये ।। १-२॥ केवल जीवित रहनेकी आशा रखनेवाले दोनों भाई दक्षिण दिशाकी ओर चले । यहाँ वे भूख-प्याससे व्याकुल हो मार्गमें किसी उत्तम आश्रयकी इच्छा करने लगे ॥ ३॥ पाण्डवोंको लक्ष्य कर वे दक्षिण मथुराकी ओर जा रहे थे कि मार्ग में हस्त- वप्र नामक नगरमें पहुँचे। यहाँ कृष्ण तो उद्यानमें ठहर गये और बलदेव संकेत कर तथा वस्त्रसे अपना समस्त भरीर ढंक कर अन्न-पानी लेने के लिए नगरमें प्रविष्ट हुए ॥४-५ ।। उस नगरमें अच्छदन्त नामका राजा रहताथा, धृतराष्ट्रके वंशका था, जो पृथिवीमें प्रसिद्ध धनुर्धारी और यादवोंके छिद्र ढूँढनेवाला था ॥ ६॥ वीर बलदेवने ज्यों ही उम नगरमें प्रवेश किया त्यों ही उनके रूप-पाशसे वशीभून हुए लोगोंके झुण्डके-झुण्ड आश्चर्यसे चकित हो उन्हें देखने लगे।॥७॥ वलदेवने बाजारमैं किसीके लिए अपना कड़ा और कुण्डल देकर उससे अन्न- पान-खाने-पीने की सामग्री खरीदी और उसे लेकर जब वे नगरके बाहर निकल रहे थे तब राजाके पहरेदारोंने देखकर तथा 'यह बलदेव है। इस प्रकार पहचान कर राजाके लिए खबर कर दी। फिर क्या था, राजाने उनके वधक लिए अपनी समस्त सेना भेज दी ।। ८-९॥ नगरके द्वारपर वलदेवको रोकनेवाली सेनाकी बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी। बलदेवने संकेतसे कृष्णको बुलाया और वे शीघ्र ही वहाँ आ गये ।। १० । बलदेवने अन्न-पानको किसी जगह अच्छी तरह रखकर हाथी वांधनेका एक खम्मा लिया तथा कृष्णने कुछ क्रुद्धचित्त हो भयं- १. प्रातामुन्नति म०। २. यत्काक्षिणी म, ख०, १०। ३. याती ख०, ८०, म ०४. 'स तपुर' ख०। ५. कण्ठक म०। ६. अन्न पान च मुस्थाप्य म । अन्नं पान च मस्थाप्य ख०।

७६४ हरिवंशपुराणे चतुरङ्ग ततः सैन्यं सनायकमितस्ततः । हन्यमानं ननाशाभ्यां विह्वलीभूतमानसम् ॥१२॥ समादायानपानं तो निर्गत्य नगरात्ततः । वनं विजयमागस्य सरो रम्यमपश्यताम् ॥१३॥ स्नारवा सरसि तो तन जिनं नत्वा मनःस्थितम् । चित्रमभ्यवहृत्यानं पयः पीत्वातिशोतलम् ॥१४॥ विधम्य च क्षणं घोरी प्रयोन्तौ दक्षिण दिशम् । कौशाम्ब्याख्यं वनं मोमं प्रविष्टौ परदुर्गमम् ॥१५॥ खगरावखरारावमुखरीकृतदिग्मुखम् । तृष्णामृगयूथानां गम्यं प्रोन्मृगतृष्णकम् ॥१६॥ ग्रोप्मोग्रतापपरुपवहन्मारुनदुस्सहम् । दावदग्धलतानालगुल्मपादपखण्डकम् ॥१७॥ असंमान्याम्मसि भ्राम्यत्श्वापदश्वासशब्दकं । वने वनेचरोगिसकुम्मिकुम्भास्तमौकिक ॥१८॥ धारोहति वियन्मध्य मुतीने तीघेरोचिपि । जगी जनार्दनो ज्येष्ठं गुणज्येष्ठमिति श्रमी ॥१९॥ पिपासाकुलितोऽत्यर्थमार्य शुष्कौटतालुक. । शक्नोमि पदमप्येकं न च यातुमतः परम् ॥२०॥ तत्पायय पयः शीतमार्य तृष्णापहारि माम् । सदर्शनमिवानादौ संसारे सारयर्जिते ॥२१॥ इत्युक्त स्नेहसञ्चारसमादीकृतमानसः । स जगाद यलः कृष्णामुणनिश्वासमोचिनम् ॥२२॥ "तात शीतलमानीय पानीयं पाययाम्यहम् । त्वं जिनस्मरणाम्मोमिस्तावत्तृष्णां विमर्दय ॥२३॥ निरस्यति पयस्तृष्णां स्तोमं वेलामिदं पुनः । जिनस्मरणपानीयं पीतं तां मूलतोऽस्यति ॥२४॥ कर अर्गल उठाया ॥ ११ ॥ तदनन्तर इन दोनोंके द्वारा मार पड़नेपर वह चतुरङ्ग सेना अपने सेनापति के साथ विह्वलचित्त हो इधर-उधर भाग गयी ॥ १२ ॥ तदनन्तर अन्न-पान लेकर दोनों भाई नगरसे निकल विजय नामक वनमें आये । यहाँ उन्होंने एक सुन्दर सरोवर देसा ॥ १३ ॥ सरोवर में स्नान कर हृदयमें स्थित जिनेन्द्र भगवान को नमस्कार कर नाना प्रकारका भोजन किया, अत्यन्त शीतल पानी पिया और क्षण-भर विश्राम किया। विश्रामके बाद दोनों वीर फिर दक्षिण दिशाकी ओर चले और चलते-चलते दूसरों के लिए अत्यन्त दुर्गम कौशाम्बी नामके भयंकर धनमें प्रविष्ट हुए ॥ १४-१५ ।। उस वनकी समस्त दिशाएँ पक्षियों तथा मृगालों के शब्दोंसे शब्दायमान थीं, प्याससे पीड़ित मृगोंफे झुण्ड यहाँ इधर-उधर फिर रहे थे, बड़ी ऊँची मृगतृष्णा वहाँ उठ रही थी, प्रीष्मके उप संतापसे कठोर बहती हुई चायुसे वह वन अत्यन्त असह्य था, तथा दावानलसे वहाँको लताओं के समूह. झाड़ियों और वृक्षों के समूह जल गये थे ॥१६-१७॥ जहाँ पानीफे मिलनेकी कोई संभावना नहीं थी, जहाँ दौड़ते हुए जङ्गली जानवरोंकी श्वासका शब्द हो रहा था, तथा जहाँ धनेचरोंके द्वारा विदीर्ण किये हुए हाथियोंके गण्डस्थलोंसे विखरकर मोती इधर-उधर पड़े थे. ऐसे यनमें पहुँच कर जय अत्यन्त तोश्ण सूर्य आकाशके मध्यमें आरूद हो रहा था तय थके हुए कृष्णने गुणांमे श्रेष्ठ बड़े भाई-बलदेवसे कहा कि 'हे आर्य ! मैं प्याससे यहुत व्याकुल हूँ, मेरे ओठ और नालु मुग्न गये हैं, अब इमफे आगे में पक ढग भी चलनेफे लिए ममर्थ नहीं हूँ ॥१८-२०॥ इमलिए हे आर्य ! अनादि एवं मारहीन संसार में सम्यादर्शनके ममान तृष्णाको दूर करनेयाला शीतल जल मुझे पिलाइए' ॥२॥ इस प्रकार कहनेपर ग्नेह के मंचाग्मे जिनका मन आई हो रहा था ऐसे यलदेयने गरम-गरम झ्यास छोड़नेवाले कृष्णमे कहा कि 'हे भाई ! मैं शीतल पानी लाकर अभी तुम्हें पिलाता हूँ तुम तयतक जिनेन्द्र भगवान- फे. म्मरणरूपी जलमे प्यामको दूर फगे ।। १२-२३॥ या पानी तो थोड़े ममय गम्फे लिए १.पानीम.२ । ३. मानर्मम ।।४. दीनिश्याम ग.१५. म.

७६५ द्विषष्टितमः सर्गः धायायामस्य वृक्षस्य शीतलायामिहास्यताम् । आनयामि जलं तेऽहं शीतलं शीतलाशयात् ॥२५॥ भप्रजः प्रतिपाद्यैव मनु मनसा वहन् । जगाम जलमानेतुं निनं श्रममचिन्तयन् ॥२६॥ कृष्णोऽपि च यथादिष्टां तहप्तायां धनां श्रितः । क्षिती मृदुमृदि श्लशवायसासंवृनागकः ॥२७॥ वामे जानुनि विन्यस्य दक्षिणं चरणं क्षणम् । श्रमध्यपोहनायासावर्शत गहने हरिः ॥२८॥ तं प्रदेशं तदैवासी जरासूनुर्यदृच्छया । एकाको पर्यटन्प्राप्ती मृगयाव्यसनप्रियः ॥२९॥ यो हरिस्नेहसंमारो हरिप्राणरिरक्षया । द्वारिकाया विनिर्गत्य प्राविशन्मृगवद्धनम् ॥३०॥ स तत्र विधिनानीय तदानीं विनियोजितः । अद्राक्षीदुरतंऽस्पष्ट किश्विदने धनुर्धरः ॥३१॥ मरुञ्चलितवस्त्रान्तजनितभ्रान्तिरन्तिकं । प्रमुप्तमृगकर्णोऽयं चलनीति विचिन्य सः ॥३२॥ गुल्मगृहवपुर्गाढमाकर्णाकृष्टकार्मुकः । विव्याध व्याधीस्तीक्षणशरण चरणं हरेः ॥३३॥ 'विद्धपादतल. शौरिरुत्याय महसाखिलाः । दिशो निरीक्ष्य सोऽदृष्ट्वा परमुच्चैर्जगाविति ॥३४॥ विद्धपादतलोऽहं मी कलाकारणवैरिणा । कथ्यतां कुलमात्मीयं नाम च स्फुटमत्र मे ॥३५॥ अज्ञातकुलनामानं नरं नावधिपं रणे । कदाचिदपि योऽहं ही किं ममेदमुपागतम् ॥३६॥ तद् नवीनु मवान् को भो योऽज्ञातकुलनामकः । अज्ञातवैरसंयन्धी वने जातो ममान्तकः ॥३७॥ ही प्यासको दूर करता है पर जिनेन्द्र भगवान्का स्मरणरूपी पानी पीते ही के साथ उस तृष्णाको जड़-मूलसे नष्ट कर देता है ॥ २४ ॥ तुम यहाँ इस वृक्षको शीतल छायामें बैठो, मैं तुम्हारे लिए सरोवरसे शीतल पानी लाता हूँ ||२५|| इस प्रकार छोटे भाई कृष्णसे कहकर उसे अपने हृदयमें धारण करते हुए वलदेव अपने श्रमका विचार न कर पानी लेनेके लिए गये ॥ २६॥ इधर कृष्ण भी बतायी हुई वृक्षकी सघन छायामें जा पहुँचे और कोमल बरसे शरीरको ढंक कर मृदु मृत्तिकासे युक्त पृथिवीपर पड़ रहे । उसी सघन बनमें वे थकावट दूर करनेके लिए बायें घुटनेपर दाहिना पाँव रखकर क्षण-भरके लिए सो गये ।। २७२८॥ शिकार-व्यसनका प्रेमी जरत्कुमार अकेला उस धनमें घूम रहा था, सो अपनी इच्छासे उसी समय उस स्थानपर आ पहुँचा ।। २९ ।। भाग्यकी बात देखो कि कृष्णके स्नेहसे भरा जो जरत्कुमार उनके प्राणोंकी रक्षाकी इन्छासे द्वारिकासे निकलकर मृगकी तरह वनमें प्रविष्ट हो गया था वही उस समय विधाताके द्वारा लाकर उस स्थानपर उपस्थित कर दिया गया। धनुर्धारी जरत्कुमारने दूरसे आगे देखा तो उसे कुछ अस्पष्ट-सा दिखायी दिया ॥३०-३१ ॥ उस समय कृष्णके वस्त्रका छोर वायुसे हिल रहा था इसलिए जरत्कुमारको यह भ्रान्ति हो गयी कि यह पास ही में सोये हुए मृगका कान हिल रहा है। फिर क्या था झाड़ीसे जिसका शरीर छिपा हुआ था और शिकारीके समान जिसकी कर बुद्धि हो गयी थी ऐसे जरत्कुमारने वड़ी मजबूतीसे कान तक धनुप खीचकर तीक्ष्ण वाणसे कृष्णका पैर चेध दिया ॥३२-३३ ॥ पढ़तलके विद्ध होते ही श्रीकृष्ण सहसा उठ बैठे और सब दिशाओं में देखने के बाद भी जब कोई दूसरा मनुष्य नहीं दिखा तब उन्होंने जोरसे इस प्रकार कहा कि किस अकारण वैरीने मेरा पादतल वेधा है। वह यहाँ मेरे लिए अपना कुल तथा नाम साफ-साफ बतलाये ।। ३४-३५ ।। जिस मुझने युद्धमे कभी भी अज्ञात- कुल और अज्ञात नामवाले मनुष्यका वध नहीं किया आज उस मुमके लिए यह क्या विपत्ति आ पड़ी? ॥ ३६ । इसलिए कहो कि अज्ञातकुल नामवाले आप कौन हैं ? तथा जिसके घेरका पता नहीं ऐसा कौन इस यनमे मेरा घातक हुआ है ? ॥३७॥ १ संभृताङ्गक ख०, क० । २. अमन्योइनाय + असौ + अशेन । ३. वदेवासी म० । ४. विद्धताल- पद म०। ५. यज्जज्ञात म०,क,ड.।

हरिवंशपुराणे इन्युने सोऽप्रयोदस्ति हरिवंशोहवी नृपः । वसुदेव इति एयान: पिता यो हलिचत्रिणीः ॥३८॥ सूनुर्जररकुमारोऽस्मि तस्याहमतिवलमः । एकवीरो भ्रमाम्यत्र वने मीरदुरासद ॥३९॥ सोऽहं नैमिनिनादशमीरवनचर्यने । द्वादशाब्दप्रमाणं च चमाम्यत्र प्रियानुजः ॥४०॥ इयन्तं वसता कालमरण्ये वचनं भया। आयलोकस्य कस्यापि न श्रुतं को मवानिह ॥४१॥ इति श्रुत्वा हरिज्ञांस्वा भ्रातरं स्नहकातरः । पझेहि भ्रानरति संभ्रमण तमाह्वयत् ॥४२॥ सोऽपि जान्यानुजं प्राप्ती हाकारमुसराननः । शितिक्षिप्तधनुर्वाणो निपस्यास्थाच पादयोः ॥४३॥ उत्थाप्य तं हरिः प्राह कण्ठलग्नं महाशुचम् । मातिशीकं कृथा ज्यष्ट दुर्लया भवितव्यता ॥४४॥ प्रमादस्य निरामाय निरस्तमुपसंपदा । चिरं पुरुषशार्दूल सेविता वनवामिता ॥४५॥ करोति सजनो यत्नं दुर्यश.पापभीरकः । देवे तु कुटिले तस्य स यत्नः किं करिष्यति ॥४६॥ ततस्तेन हरिः पृष्टो वनागमनकारणम् । आदिनोऽकथयवृत्तं द्वारिकादाहदारुणम् ॥४७॥ श्रुग्या गोत्रक्षयं सोऽपि प्रलापमुखरोऽवदन् । हा भ्रातः कृतमातिथ्यं मया ते चिरदर्शनात् ॥४८॥ किं करोमि क गच्छामि क्क लभ चित्तनिवृतिम् । दुःखं च दुर्यशो लोके हन्त्रा ते हा मयार्जितम् ॥४९॥ इत्यादि प्रलपनुक्तः कृष्णेनासी सुचेतसा । प्रलापं त्यज राजेन्द्र कृरस्नं स्वकृतभुग जगत् ॥५०॥ श्रीकृष्णके इस प्रकार कहनेपर जरत्कुमारने कहा कि हरिवंशमें उत्पन्न हुए एक यमुदेव नामके राजा हैं जो वलदेय और कृष्णके पिता हैं । मैं जरत्कुमार नामका उन्हींका अतिशय प्यारा पुत्र हूँ। जहाँ कायर मनुष्य प्रवेश नहीं कर सकते ऐसे इस वनमें मैं अकेला ही वीर घूमता रहता हूँ। नेमिजिनेन्द्रने आज्ञा की थी कि जरत्कुमारके द्वारा कृष्णका मरण होगा सो मैं उनकी इस आज्ञासे डरकर बारह वर्पसे इस वनमें रह रहा हूँ ! मुझे अपना छोटा भाई कृष्ण बहुत ही प्यारा था, इसलिए इतने समयसे यहाँ रह रहा हूँ , इस वीचमें मैंने किसी आर्यका नाम भी नहीं सुना । फिर आप यहाँ कौन हैं ? ॥ ३८-४१॥ जरत्कुमारके यह वचन सुन कृष्णने जान लिया कि यह हमारा भाई है तब स्नेहसे कातर हो उन्होंने 'हे भाई ! यहाँ आओ, यहॉ आओ' इस प्रकार संभ्रमपूर्वक उसे बुलाया ॥ ४२ ।। जरत्कुमारने भी जान लिया कि यह हमारा छोटा भाई है तब हाय हाय' शब्दसे मुखको शब्दायमान करता हुआ वह वहाँ आया और धनुप-बाणको पृथिवीपर फेंक श्रीकृष्ण- के चरणों में आ गिरा ॥ ४३ ॥ कृष्णने उसे उठाया तो वह कण्ठ में लगकर महा शोक करने लगा। कृष्णने कहा कि हे बड़े भाई ! अत्यधिक शोक मत करो, होनहार अलङ्घनीय होती है ॥ ४४ ॥ हे श्रेष्ठ पुरुप ! आपने प्रमादका निराकरण करने के लिए समस्त सुखसम्पदाओंको छोड़ चिरकाल तक वनमें निवास करना स्वीकृत किया। अपयश और पापसे डरनेवाला सजन पुरुष युद्धिपूर्वक प्रयत्न करता है परन्तु देवके कुटिल होनेपर उसका वह यन्न क्या कर सकता है ? ।। ४५-४६॥ तदनन्तर जरत्कुमारने कृष्णसे वनमें आनेका कारण पूछा तो उन्होंने प्रारम्भसे लेकर द्वारिकादाह तकका सब दारुण समाचार कह सुनाया ।। ४७॥ गोत्रका क्षय सुनकर जरत्यु मार प्रलापसे मुखर होता हुआ बोला कि हा भाई ! चिरकालके वाद आप दिखे और मैंने आपका यह अतिथि सत्कार किया ! ॥४८॥ मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? चित्तकी शान्ति कहाँ प्राप्त करूँ ? हा कृष्ण ! तुझे मारकर मैंने लोकमें दुःख तथा अपयश दोनों प्राप्त किये ॥ ४९ ॥ इत्यादि रूपसे विलाप करते हुए जरत्कुमारसे उत्तम हृदयके धारक कृष्णने कहा कि १. गोरक्षयः म०।

द्विषष्टितमः सर्गः 1 सुखं वा यदि वा दुःख दत्ते कः कस्य संमृनौ । मित्रं वा यदि वामित्र. स्वकृतं कर्म तत्त्रतः ॥५१॥ तोया मे गतो रामो यावन्नायाति सत्त्वरम् । प्रयाहि तावदशान्तिः कदाचित्स्यात्वयि प्रभौ ॥५२॥ गच्छ स्वमादितो वातां पाण्डवेभ्यो निवेदय । हितास्तेऽस्माकुलस्याताः करिष्यन्ति तव स्थितिम् ॥५३॥ उक्न्वेति कौस्तुमं तस्मै दत्वाभिज्ञानमादरान् । परावृत्यान्तरं स्तोक प्रति प्रतिपादितः ॥५४॥ उक्त्वाऽसौ क्षम्यतां देव ममति करकौस्नुमः । शरद्धन्य तं वाणं परावृत्तपदोऽगमात् ॥५५॥ तस्मिन्गत हरिस्तीवव्रणवेदनयादितः । उत्तराभिमुखो भूत्वा कृतपञ्चनमस्कृतिः ॥५६॥ कृत्वा नमिजिनेन्द्राय वर्तमानाय सान्जलिः । पुनः पुनर्नमस्कारं गुणस्मरणपूर्वकम् ॥ १७॥ जिनेन्द्रविहृनिध्वस्तै समस्तोपद्रवा यतः । ततः कृतशिराः शारिः क्षिनिशय्यामधिश्रितः ॥८॥ वस्त्रमंवृतसर्वाङ्गः सर्वसङ्गनिवृत्तधीः । सर्वत्र मित्रमावस्थः शुमचिन्तामुपागतः ॥५९॥ पुत्रपौत्रकलत्राणि ते भ्रातृगुरुवान्धवाः । अनागतविधातारो धन्या ये तपसि स्थिताः ॥१०॥ अन्तःपुरमहस्राणि सहस्राणि मुहृद्गणाः । अविधाय तपः कष्ट कष्टं वह्निमुख मृताः ॥६॥ कर्मगौरवदोषण मयापि न कृतं तपः । सम्यवं मेऽस्तु संसारपातहस्तावलम्बनम् ॥१२॥ हे राजेन्द्र ! प्रलापको छोड़ो, समस्त जगन् अपने किये हुए कर्मको अवश्य भोगता है ।। ५० ।। संसारमें कौन किसके लिए मुख देना है ? अथया कौन किसके लिए दुःख देता है ? और कौन किसका मित्र है अथवा कौन किसका शत्रु है ? यथार्थमें अपना किया हुआ कार्य ही सुख अथवा दुःख देता है * ॥ ५१ ।। बड़े भाई राम मेरे लिए पानी लानेके लिए गये हैं सो जयतक वे नहीं आते हैं तबतक तुम शीघ्र ही यहाँसे चले जाओ। संभव है कि वे तुम्हारे ऊपर अशान्त हो जायें ॥ ५२ ॥ तुम जाओ और पहलेसे ही पाण्डयोंके लिए सब समाचार कह सुनाओ। वे अपने कुलके हितकारी आप्तजन हैं अतः तुम्हारी अवश्य रक्षा करेंगे ॥५३॥ इतना कहकर उन्होंने पहचानके लिए उसे आदरपूर्वक अपना कौस्तुभमणि दे दिया और कुछ थोड़ा मुड़कर कहा कि जाओ। हाथमें कौस्तुभमणि लेते हुए जरत्कुमारने कहा कि हे देव ! मुझे क्षमा कीजिए । इस प्रकार कह कर और धीरेसे वह वाण निकाल कर यह उलटे पैरों वहाँसे चला गया ।।५४-५५ ।। जरत्कुमारके चले जानेपर कृष्ण व्रणको तीत्र वेदनासे व्याकुल हो गये । उन्होंने उत्तरा- भिमुख होकर पश्च-परमेष्ठियोंको नमस्कार किया ॥५६॥ वर्तमान तीर्थकर श्रीनेमिजिनेन्द्र- को हाथ जोड़कर गुणोंका स्मरण करते हुए वार-बार नमस्कार किया ॥ ५७ ॥ क्योंकि जिनेन्द्र भगवानके विहारसे पृथिवीके ममस्त उपद्रव नष्ट हो चुके हैं इसलिए शिर रखकर वे पृथियारूपी ग्यापर लेट गये ॥ ५८॥ तदनन्तर जिन्होंने वनसे अपना समस्त शरीर ढक लिया था, सब परिप्रहसे जिनकी बुद्धि निवृत्त हो गयी थी और जो सबके साथ मित्र- भावको प्राप्त थे ऐसे श्रीकृष्ण इस प्रकारके शुभ विचारको प्राप्त हुए ॥ ५९॥ चे पुत्र, पोते, नियाँ, भाई, गुरु और वान्धव धन्य हैं जो भविष्यन्का विचार कर अग्निके उपद्रवसे पहले ही तपश्चरण करने लगे। ६० ॥ बड़े कष्टकी बात है कि हजारों स्रियाँ और हजारों मित्रगण तपका कष्ट न कर अग्नि के मुखमें मृत्युको प्राप्त हो गये ।। ६१ ॥ कर्मके प्रयल भारसे मैंने भी तप नहीं किया इमलिए मेरा मम्यग्दर्शन ही मुझे संमारपातसे बचानेके लिए हस्तावलम्बन- १. प्रभो क० । २. वेदनमाटित म०। ३. विननिर्यल-मः । ४. अमिघाय म०, १०, ख०, ग०, घ01 * को मुख को दुख देत हे कर्म देत झकझोर । उरझे मुरझे श्राप हो वजा पवनके जोर ।।

७६८ हरिवंशपुराणे इत्यादि शुभचिन्तारमा मविप्यत्तीर्थकृद्धरिः । बदायुप्फनया मृत्या तृतीयां पृथिवीमितः ॥६३॥ शार्दूलविक्रीडितम् दक्षो दक्षिणमारतार्धविभुनामुमाव्य 'मव्यमजा. वन्धुर्वन्धुजनान् धेरहरहर्वृद्धि विधाय पूर्ण वर्षसहस्रमकमगमन्संजीव्य कृष्णो गति मोगी स्वाचरणोचिनो जिनतया यो योक्ष्यते दर्शनात् ॥६॥ प्रभुः। इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती हरिंगत्यन्तरवर्णनो नाम द्वापटितमः सर्गः ॥१२॥ रूप हो ।। ६२ ।। इत्यादि शुभ विचार जिनकी आत्मामें उत्पन्न हो रहे थे, और जो भविष्यत् कालमें तीर्थकर होनेवाले थे ऐसे श्रीकृष्ण पहलेसे ही चद्धायुष्क होनेके कारण मरकर तीसरी पृथिवीमें गये ।। ६३ ।। गौतम स्वामी कहते हैं कि जो आगे चलकर सम्यग्दर्शनके कारण तीर्थकर पदसे युक्त होंगे वे नीतिनिपुण, भव्य प्रजाके परम वन्धु, भोगी कृष्ण, दक्षिण भर- सार्धको विभुताको प्रकट कर, प्रति दिन वन्धुजनरूपी सागरकी वृद्धिको बढ़ाकर एवं एक हजार वर्ष तक जीवित रहकर अपने आचरणके अनुरूप तीसरी पृथिवीमें गये ॥ ६४ ।। इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें कृष्णके परलोकगमनका वर्णन करनेवाला बासठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१२॥ 6 १. सेन्यामा धुक-२. मननया म.।

त्रिषष्टितमः सर्गः रथोद्धतावृत्तम् म्नेहवानथ जलाधमाकुलो विष्णुमात्मनि वहन् हलायुधः । वारितोऽग्यशकुनः पदे पद दृरमन्तरमितो वनान्तरे ॥१॥ धावतोऽस्य मृगयूथवर्मना लोमिनस्य मृगतृप्णिकाम्ममा । प्रत्यभामत दिशा कदम्बकं प्रोत्तरङ्गमरमीमयं तदा ॥२॥ अभ्यलोकि कलिता कलस्वनश्चक्रवाककलहंसमारमैः । सीरिणाथ सरसी तरङ्गिणी भृगनादितमरोजसंकुला ॥३॥ चेनमास्य महमा नदीक्षणाहीर्घमुच्छ्वमिनमनमहिना । मारुनेन शिशिरेण साहदं मन्मुग्वेन गदितं मुगन्धिना ॥४॥ मंपनदिरमितः पिपामुमि श्वापदः समयमीक्षितस्ततः । आमपाद सरमी म मादरी वन्यहम्तिमदवारिवामिताम् ॥५॥ पारि तीर्थमवगाह्य शीतलं संप्रपाय निरपाम्य तृव्यथाम् । पद्मपग्रपुटिकां स चारिणा संग्रपूर्य परिवृत्य वाममा ॥२॥ आदधाव पदधूतलिमिधूंमरीकृतशरीरमधंजः। कम्पमानहृदयः स शंकया प्रत्यपाययहुले वने हरी ॥७॥ अथानन्तर स्नेहसे भरे बलदेव जल प्राप्त करनेके लिए बहुत व्याकुल हुए। वे हृदयमें कृष्णको धारण किये हुए आगे बढ़े जाते थे। यद्यपि अपशकुन उन्हें पद-पदपर रोकते थे तथापि वे दूसरे वनमें बहुन दूर जा पहुँचे ॥ १॥ जिस मार्गसे मृगोंके झुण्ड जाते थे बलदेव उसी मार्गसे दौड़ते जाते थे और वे जगह-जगह मृगतृष्णाको जल समझकर लुभा जाते थे । उम समय उन्हें ममम्त दिशाएँ ऐमी जान पड़ती थी मानो लहराते हुए तालाबोंसे युक्त ही हों।। २ ।। तदनन्तर वलदेवको एक तालाव दिखा जो मधुर शब्द करनेवाले चक्रयाक, कल- हंस और सारस पक्षियोंसे युक्त था, तरङ्गोंसे व्याप्त था एवं भ्रमर गुंजित कमलोंसे सहित था ॥३॥ तालाबफे देखते ही बलदेवके हदयने एक लम्बी सॉस ली और उसकी शीतल मुगन्धित यायु मम्मुख आकर इनके शरीरसे लग गयी जिससे पमा जान पड़ता था मानो उमने अपनी मित्रता ही प्रकट की हो ॥ ४॥ तदनन्तर चारों ओरसे आनेवाले प्यासे जंगली जानवर जिन्हें भयपूर्ण दृष्टि से देख रहे थे ऐसे बलदेव जंगली हाथियोंके मदजलसे मुवामिन उम सरोवरपर बड़े आदरसे जा पहुँचे ।।५।। उन्होंने घाटमें अवगाहन कर शीतल पानी पिया, अपनी प्यामको व्यथा दूर कर और कमलके पत्तोंका एक पात्र बनाकर उसे पानीसे भरा तथा कपड़ने उसे ढंक लिया ॥ ६॥ पानी लेकर ये बड़े बेगसे दौड़े। उम ममय पैरोके आयातमे उड़ी धूलिसे उनके शिरक याल धूमरित हो गये थे और मैं अनेक चिन्नोंसे भरे घनमें कृष्णको अकला छोड़ आया हूँ' इम आशवासे उनका दृदय बार-बार कम्पित हो रहा था ॥७॥ मदनन्तर बनके द्वाग १ बारितोरि कुनै म हरिवंशपुराणे ७ दूरतस्तमथ तत्र दृष्टवान् संवृताङ्गमभितोऽम्बरेण सः । आस्त एव भुवि यत्र शायितः सूरशौरिरिति दीघनिद्या ॥४॥ सुप्त एव सुखनिद्या हरि. सुप्रबोधमुपगच्छतु स्वयम् । इत्युपेक्ष्य हरिबोधनं तदा तत्वोधनमसौ प्रतीक्षते NEL वीर ! किं स्वपिपि दीर्घमित्यलं स्वापमुज्झ पिब तोयमिच्छया । इत्युदीर्णमधुरस्वरः पुन: सनिरुद्धवचनोऽवतिष्टते ॥१०॥ सीरिणा क्षतजगन्धतस्ततः कृष्णसंवरणवाससोऽन्तरे । संप्रवेशनिजनिर्गमाकुला प्रैक्षि तीक्ष्णमुखकृष्णमक्षिका ॥११॥ संकटोद्घटिततन्मुखो हरिं वीक्ष्य वान्तजनकान्तजीवितम् । हा हतोऽस्मि मृत एव तृष्णया विष्णुरित्युपरि तस्य सोऽपतत् ॥१२॥ मोहमूढमनसोऽस्य मूर्छया प्राप्तयोपकृतमप्यनिष्टया । स्नेहपाशदृढबन्धनो हली प्राणहानमकरिष्यदन्यया ॥१३॥ बोधमाप्य परितः परामृशन् केशवस्य वपुरात्मपाणिना। पश्यति स्म चरणव्रणव तीव्रगन्धरुधिरारुणक्षमम् ॥१४॥ सुप्त एव विषर्मपुणा हरिः विद्ध एप चरणेन केनचित् । दुष्प्रवोधहरिमारकोऽत्र कोऽपूर्वमद्य मृगयाफलं श्रितः ॥१५॥ सब ओरसे जिनका शरीर ढंका था ऐसे कृष्णको बलदेवने दूरसे देखा। देखकर वे सोचने लगे कि मैं शूरवीर कृष्णको जिस भूमिमें सुला गया था यह वहाँ गहरी नींदमें सो रहा है ॥ ८॥ पास आनेपर उन्होंने विचार किया कि अभी यह सुखनिद्रासे सो रहा है इसलिए स्वयं ही जगने दिया जाये। इस प्रकार कृष्णको जगानेकी उपेक्षा कर वे स्वयं ही उनके जागनेकी प्रतीक्षा करने लगे।॥ ६ ॥ जय कृष्ण बहुत देर तक नहीं जगे तय बलदेवने कहा, 'वीर ! इतना अधिक क्यों सो रहे हो ? बहुत हो गया, निद्रा छोड़ो और इच्छानुसार जल पिओ'। इस प्रकार मधुर स्वरमें एक-दो बार कहकर वे पुनः वचन रोककर चुप बैठ रहे ॥१०॥ तदनन्तर वलभद्रने देखा कि तीक्ष्ण मुखवाली काली एक मक्खो रुधिरकी गन्धसे कृष्णके ओदे हुए वस्त्रके भीतर घुस तो गयी पर परन्तु निकलनेका मार्ग न मिलनेसे व्याकुल हो रही है ॥ ११ ॥ यह देख उन्होंने शीघ्र ही कृष्णका मुख उघाड़ा और उन्हें निष्प्राण देख 'हाय मैं मारा गया' यह कहकर वे एक दम चीख पड़े। 'हाय हाय यह कृष्ण प्याससे मर हो गया है' यह सोच वे उनके शरीरपर गिर पड़े।। १२ ।। कृष्णके मोहसे जिनका मन अत्यन्त मोहित हो रहा था ऐसे पलदेयको तत्काल मूर्छा आ गयो । यद्यपि मूर्छाका आना अनिष्ट था तथापि उम समय उसने इ.का बड़ा उपकार किया। अन्यथा स्नेहरूपी पाशसे दृद वेधे हुए बलदेव अवश्य ही प्राण त्याग कर देते ॥ १३ ॥ सचेत होनेपर वे अपने हाथसे चारों ओर कृष्णके शरीरफा स्पर्श करने लगे। उसी समय उन्होंने तीन गन्धसे युक्त रुधिरसे लाल लाल पैरफा पाय देखा ॥ १४ ॥ और देखते हो निश्चय कर लिया कि सोते समय ही किसीने तीक्ष्ण थाणसे इसे पैर में प्रहार किया है। जिनका जागना कठिन है ऐसे कृष्णको मारनेवाला -- १. परिमौरि म.। २. इत्यपेक्ष्य म । ३. प्रतीक्ष्यते म०। ४. समिरुप पवनो म०,०,०। ५.- माला म. । ६. मचिका म... 1७, संघटोदयटित- म०,५०। ८. एव म ।

त्रिषष्टितमः सर्गः ७७१ इस्युदीर्य कुपितो हली वली सिंहनादमकरोद्भयङ्करम् । व्यापिनं विपिनदुर्गसञ्चरव्याघ्रसिंहकरिदर्पशातनम् ॥१६॥ संजगी च शयितो ममानुजः छाना विधिविधानयोगतः । यंन केनचिदहेतुवैरिणा संददातु लघु सोऽद्य दर्शनम् ॥१७॥ 'मुप्तमात्रमपशवमानतं मुक्तमानमसकृत्पलायिनम् । प्रत्यवाययुतमगनां शिशुं प्रन्ति शत्रुमपि नो यशोधनाः ॥१०n उनकरिति गदन् समन्ततः संप्रधाय कियदप्यवान्तरम् । सोऽन्यदीयपदवीमनाप्नुवनेत्य कृष्णमुपगृझ रोदिति ॥१९॥ हा जगन्मुमग ! हा जगत्पते! हा जनाश्रयण! हा जनार्दन ! हापहाय गतवानसि क मा हानुजैहि लघु हेति चारुदत् ॥२०॥ हारि वारि परितापहारि तं पाययत्यपि विचेतनं मुहुः । क्राम्यतीपदपि तन्न तद्गले दूरमन्यमनसीव दर्शनम् ॥२॥ मार्टि मार्दवगुणेन पाणिना सन्मुख मुखमुदीक्षते मुदा । लेढि जिम्रति विमूढधीर्वचः श्रोतुमिच्छति धिगारममुदताम् ॥२२॥ द्यारिवोरविभवामिभस्मिता द्वारिकति किमिवासि ततवान् । अक्षयैर्बहुविधाकरश्चिता प्रागिवास्ति ननु मारतावनिः ॥२३॥ कोन पुरुप आज यहाँ शिकारके फलको प्राप्त हुआ है ? ॥ १५ ॥ इस प्रकार कहकर बलवान् बलदेवने कुपित हो ऐसा भयंकर सिंहनाद किया जो समस्त वनमें व्याप्त हो गया तथा जिसने वनके दुर्गम स्थानों में चलनेवाले व्याघ्र , सिंह और हाथियोंका गर्व नष्ट कर दिया ॥ १६ ।। उन्होंने कहा कि भाग्यके फेरसे सोते हुए मेरे छोटे भाईको जिस किसी अकारण वैरीने छलसे मारा है वह आज शीघ्र ही मुझे दर्शन दे-मेरे सामने आवे ॥ १७॥ यशरूपी धनको धारण करनेवाले शूरवीर ऐसे शत्रुको भी नहीं मारते जो सो रहा हो, शत्ररहित हो, नम्रीभूत हो, मानरहित हो, बार-बार पीठ दिखाकर भाग रहा हो, अनेक विनोंसे युक्त हो, स्त्री हो अथवा बालक हो ॥ १८ ॥ इस प्रकार जोर-जोरसे कहते हुए वे इधर-उधर कुछ दूर तक दौड़े भी परन्तु जब उन्हें किसी दूसरेका मार्ग नहीं मिला तब वे कृष्णके पास वापिस आकर तथा उन्हें गोदमें लेकर रोने लगे ॥ १९ ॥ हाय जगन्के प्रिय ! हा जगत्के स्वामी ! हा समस्त जनोंको आश्रय देनेवाले! हा जना- देन! तू मुझे छोड़ कहाँ चला गया ? हा भाई ! तू जल्दी आ, जल्दो आ-इस प्रकार कहते हुए वे चिरकाल तक रोते रहे ।। २० ॥ वे चेतना शून्य-निर्जीव कृष्णको सुन्दर एवं सन्ताप- को दूर करनेवाला पानी बार-बार पिलाते थे परन्तु जिस प्रकार दूरानुदूर भव्यके हृदयमें सम्यग्दर्शन नहीं प्रवेश करता है उसी प्रकार उनके गलेमें वह जल थोड़ा भी प्रवेश नहीं करता था ॥२१॥ मूढबुद्धि यलदेव सामने बैठकर कोमल हाथोंसे उनका मुख घोते थे, हर्षपूर्वक उसे देखते थे, चूमते थे, सूंघते थे, और वचन सुननेको इच्छा करते थे। आचार्य कहते हैं कि ऐसी आत्म-मूढताको धिक्कार है ।। २२ ।। 'स्वर्गके समान विशाल वैभवसे युक्त द्वारिकापुरी अग्निसे भस्म हो गयी है इसलिए अब जीनेकी क्या आवश्यकता है? यह सोचकर क्या तू सप्त हो रहा है ? अरे नहीं भाई ! नाना प्रकारकी अविनाशी खानोंसे युक्त भरत क्षेत्रको भूमि १.मुसमच क..

७७२ हरिवंशपुराण मोजराजकुलयादवक्षय भ्रष्टवन्धुरिति किं विमुझसि । सत्यसन्ध मयि त मम त्वयि प्राणिनीह सकलास्ति बन्धुता ॥२॥ पूर्वजन्ममु बहुप्यनारन पश्यतो हि तव मामिहापि च । एकनान नयनस्य नौदभुत्तृप्तिरद्य किमिवासि तृप्तवान् ॥२५॥ त्वां पयोधमपहाय मोहतो हा गतने नररयभूषणम् । लोकमारमपहारितं मया सन्निधी तु मम कोऽस्य हारकः ॥२६॥ -- कंसकोपमदपर्वनाशने नभोगविषगहमनः । पीतमागधयशोऽम्युधेरभूद्गोप्पदे वत निमजनं तव ॥२७॥ शावर तिमिरमुग्रनेजसा शात्रयं खमिय निर्विधूय यः । विष्टपं तपति विष्टरश्रवः पश्य सोऽस्तमुपयारयहप॑तिः ॥२८॥ दीघनिद्रमिव वीक्ष्य संहृतरस्तमस्तकनिवेशितैः करः । स्वां विशीचति रवि या त्रय स्वाप एप तव कस्य नो शुचे ॥२९॥ वारणीमतिनिपेव्य धारणश्चक्रवाफनिवहरुदश्रुमिः । शोचितः पतति भानुमानध' को न वा पतनि वारुणीप्रियः ॥३०॥ शोकमारमपनीय मांप्रतं सन्निमजति पयोनिधी रविः। दातुमेप तव वा जलान्जलिं कालविद्धि कुस्ने यथोचितम् ॥३॥ पहले के समान अब भी मौजूद है ! ॥ २३ ॥ भोजराजका कुल तथा समस्त यादवोंका क्षय हो जानेसे मैं वन्धुरहित हो गया हूँ' यह सोचकर क्या तू मोहको प्राप्त हो रहा है ? पर ऐसा करना उचित नहीं। हे दृढप्रतिज्ञ ! यदि तू और मैं जीवित हूँ तो समझ कि हमारे समस्त बन्धुओंका समूह जीवित है ।। २४ ॥ अनेकों पूर्व जन्ममें तथा इस जन्ममें भी निर- न्तर मेरी ओर तू स्थिर नयन होकर देखता रहा फिर भी तुझे तृप्ति नहीं हुई फिर आज तू तृम कैसे हो गया ? ॥ २५ ॥ हाय ! मोहवश तुझे अकेला छोड़ पानीके लिए गये हुए मैंने लोकके सारभूत नररूपी रत्नोंका आभूपण अपहृत करा लिया। अन्यथा मेरे पास रहते इसे हरनेवाला था ? ।।२६।। अरे भाई ! तू तो कंसके क्रोध और मदरूपी पर्वतको नष्ट करने के लिए बनस्वरूप था। भूमिगोचरी और विद्याधररूपी सोको नष्ट करनेके लिए गरुड़ स्वरूप था और जरामन्धके यशरूपी मागरको पीनेवाला था पर खेद है कि तू इस गोपदमें डूब गया।। २७ ।। हे नारायण ! देख, जो सूर्य तरे समान अपने उग्र तेजसे शत्रु- तुल्य रात्रिक अन्धकारको नष्ट कर संसारको सन्तप्त करना है वही अब अस्ताचलकी ओर जा रहा है ।। २८ ॥ इस सूर्यने तुझे दीर्य निद्रामें निमग्न देखकर ही मानो अपने किरणरूपी हाथ अन्य स्थानांसे मंकोच कर अस्ताचलरूपी मस्तकपर रख छोड़े हैं और उनसे ऐसा जान पड़ता है मानो तेरे प्रति शोक ही कर रहा है । सो ठीक ही है क्योंकि तेरा यह सोना तीनों लोकोंमें किसके शोकके लिए नहीं है ' ।। २६ ।। जो वागणी-पश्चिम दिशारुपी मदिराका अधिक सेवन कर लाल-लाल हो रहा है तथा आँसुआंसे युक्त चक्रवाक पक्षियोंका समूह जिमकी दशापर शोक प्रकट कर रहा है ऐसा यह सूर्य नीचे गिरा जा रहा है सो ठीक ही है. क्योंकि वारुणी (मदिरा) का प्रेमी कौन व्यक्ति नीचे नहीं गिरता है ? ॥३० ।। अथवा यह । सूर्य, इम समय शोकका भार दूर कर समुद्रमें अवगाहन कर रहा है सो ऐसा जान पड़ता है मानो स्नान कर तुझे जलाञ्जलि ही देना चाहता है । ठीक ही है क्योंकि कालको जाननेवाला १. मतेन म. ! २ वा + अरुणः इतिच्छेदः ।

त्रिपटिनमः सर्गः सान्ध्यरागपटलेन सर्वतः पश्य मंस्थगितमङ्ग विष्टपम् । त्वय्यनिस्वपति रोदनोद्गतैरक्षिरागनिवहेरिहागिनाम् ॥३२॥ देवभक्त मज सान्ध्यवन्दना वन्ध्यया किमयि देव ! निद्या । संध्ययापि गलितं गलढुंचा वेगवद्रविरथा बन्धया ॥३३॥ एकवर्णमखिलं जगरतला कुर्वती समवसपंति द्रुतम् । ध्वान्तमन्ततिरपंतदर्शना कालवृत्तिरतिदुःपमा यथा ॥३४॥ श्वापदानि पदशब्दगन्धतो घाणकर्णयलवन्ति विन्दते । एहि दुर्गमिह संश्रयावहे क्षेमती प्रजति तत्र नौ निशा ॥३५॥ चित्रिते कुसुमचिनमण्डपे दत्तबन्धुनृपलोकदर्शनः । *श्रीपुपि स्वपिपि यो वधूजनः मापधानशयने महामृदा ॥३६॥ स्वं महीध्रवनरन्ध्रवृत्तिमिद्वकाककुलजम्बुकादिभिः । मोऽद्य गणेहपासितः श्रीपत स्वपिपि शारक्षिता ॥३७॥ कालिनीः प्रणयकलिकोपिनीस्त्यं प्रसाद कुपितः प्रसादितः । यः पुरा नयति यामिनी रतः सोऽद्य किं विगतचेतनात्मना ॥३८॥ चारवारवनितामुगीतकर्वन्दियन्दपटुपाटनिस्वनः । यः प्रयोधमुपसि प्रपद्यसे सोऽद्य वीर ! विरमः शिवास्तः ॥३॥ पुरुप यथायोग्य कार्य करना ही है ॥३१॥ हे भाई ! देख, यह समस्त संसार सन्ध्याको लाली- से सब ओरसे आच्छादित हो रहा है सो ऐमा जान पड़ता है मानो तुम्हारे दीर्घ निद्रामें निमग्न होनेपर संसारके सब मनुष्यांके रोदनजन्य नेत्रोंकी लालिमासे ही मानो लाल-लाल हो रहा है ।। ३२ ॥ हे देवभक्त ! यह सन्ध्या भी फीकी पड़ बड़े वेगसे जाते हुए सूर्यके रथके पीछे-पीछे चली जा रही है । उठ सन्ध्या-वन्दन कर । हे देव ! व्यर्थकी निद्रासे क्या कार्य सिद्ध होता है ? ।। ३३ ।। जो अतिदुःपमा नामक छठवें कालके समान समस्त जगन्को एक वर्ण (ब्राह्मणादि वर्णके भेदसे रहित एक वर्णरूप, पक्षमें एक झ्यामवर्ण रूप कर रही है, अतिशय दुष्ट है, एवं अपेतदर्शना-मन्यग्दर्शनसे रहित (पक्षमें शक्ति से रहित ) है ऐमी यह अन्धकारको मन्तनि बड़े वेगमे मब ओर फैल रही है ।। ३४ ।। देखो, ये घ्राणेन्द्रिय और कर्णे- न्द्रियक थलसे युक्त जंगली जानवर अपने पैरोंकी गन्ध और शब्दको ग्रहण कर दम और आ रहे हैं इमलिए आओ हम दुर्गमें चले यहाँ अपनी रात्रि कुदालपूर्वक चीन जायेगी ॥ ३५ ॥ है भाई ! जो तू फूलोंसे चित्र-विचित्र, आश्चर्यकारी मण्डपमें बन्धुजनों तथा राजाओंको दर्शन देता था और लक्ष्मीको पुष्ट करनेवाले, अत्यन्त कोमल एवं नकियोंमे मुशोभित शय्यापर स्त्रीजनोंके साथ शयन करता था हे लक्ष्मीपते ! यही तू आज पर्वत और वनको गुफाओंमें रहनेवालं गांध, कीये तथा शृगाल आदि भनक जन्तुओंके ममूहसे सेवित होता हुआ कक- रीली पथरीली भूमिपर मो रहा है ।।३६-३७ ।। जो तू पहले प्रणय क्रीड़ासे कुपिन नियोंकी प्रसन्न करता था और तेरे कुपित हो जानेपर वे तुझे प्रमन्न करती थी और इस तरह रति- फीडामे रात्रि व्यतीत करता था यही तू आज चननासे रहित हो रात्रि व्यतीत कर रहा है ॥ ३८॥ हे वीर ! जो नू पहले प्रातःकालमें मुन्दर धारयनिनाक ममंगीता एवं वन्दीजनों . किमरि म । २ स्थानुबन्यया म०। ३. प्राणकरावयन्ति म.11 भीयुषि म., स.। ५. सपनि म०। ६ ममितक्षिती . दिनदिनी म०, २० ।

७७४ हरिवंशपुराणे स्वत्प्रवृत्तिमिव वेदितुं 'पुरः पूर्वमिग्रपतिसुप्रयुक्तयो । संध्ययाप्युषसि सानुरागया रज्यते शयनती विरज्यताम् ।।४।। अभ्युदेति करमिनपकनधीसमप्रमुदयाचलादयम् । दाक प्रधानपुरुषायतेऽधुना दातुमघमिय धर्मदीधितिः ॥४॥ चाटुकारशतमय सीरिणा प्राणवलमतया कृतं हरी । निष्फलं सकलमप्यभूरपुरा गाढसुप्त इव मुग्धवालके ॥४२॥ तं प्रश्न्य मुमपन्जरोदरे स्पर्शनेन्द्रियमुसं मजन् शिशोः । जन्मनीव वनमध्यमाट सच्छनधारगुरुकंसाया ।।४।। इत्यनेकदिनरानियापनः सोऽस्यतन्दितमनीवचोवपुः । प्रत्यहं हरिवपुर्वहन् भ्रमन् प्रत्यपद्यत रतिं न कानने ॥४॥ तीवधर्मसमयात्यये ततः प्रावृषा शमितधर्मसंपदा । गर्जदम्बुदघटाम्बुवर्पणः प्रापितं जगदितस्ततः शिवम् ।।४५|| वासुदेवत्रचनाजरासुतः शावरं विषमवेपमुद्रहन् । दाक्षिणा मधुरलोकपंकुलांप्रीप पाण्डवपुरीमसण्डितः ।।४।। के उच्च पाठोंके शब्दोंसे प्रयोधको प्राप्त होता था-जागता था, वही तू आज शृगालियोंके विरस शब्दोंसे प्रयोधको प्राप्त हो रहा है ।। ३६ ॥ हे भाई ! अब प्रातःकाल हुआ चाहता है। पूर्व सूर्यरूप पति के द्वारा प्रेषित अनुरागवती सन्ध्या भी लाल हो रही है सो ऐसी जान पड़ती है मानो तुम्हारा समाचार जाननेके लिए ही सूर्यने उसे पहलेसे भेजा है अतः शय्यासे विरक्त होओ-उठ कर बैठो ।। ४० ॥ देखो, यह उदयाचलसे सूर्य उदित हो रहा है सो ऐसा जान पड़ता है मानो इस समय तुझ प्रधान पुरुपके लिए अपनी किरणोंसे विकसित कमलो- की लक्ष्मीसे युक्त अर्घ देनेके लिए ही शीघ्रतासे वढा आ रहा है ।। ४१ ॥ वलभद्रको कृष्ण प्राणोंसे अधिक प्यारे थे इसलिए उन्होंने उन्हें जगानेके लिए सैकड़ों प्रिय वचन कहे परन्तु जिस प्रकार पहलेसे प्रगाढ़ नोंदमें सोये भोले-भाले बालकके विषयमें कहे प्रिय वचन निष्फल जाते हैं उसी प्रकार उनके ये प्रिय वचन निष्फल गये ॥४२॥ जिस प्रकार जन्मकालमें कसके भयसे बलभद्रने कृष्णकोअपने भुजरूप पञ्जरके मध्य में ले लिया था तथा वसुदेवने उनपर छन लगा लिया था उसी प्रकार अब भी उन्होंने स्पर्शनेन्द्रियसम्बन्धी सुखका अनुभव करते हुए उन्हीं भुज़रूप पञ्जरके मध्यमें ले लिया और लेकर वे बनके मध्य में इधर-उधर घूमने लगे ॥ ४३ ।। इस प्रकार अनेक दिन-रात व्यतीत होनेपर भी उनके मन, वचन और शरीरमें जरा भी आलस्य नहीं आया वे प्रतिदिन कृष्णके शत्रको धारण किये हुए वनमें घूमते रहे तथा रञ्च मात्र भी प्रीतिको प्राप्त नहीं हुए ॥ ४४ ॥ जब ग्रीष्म ऋतु चली गयी और आतपके वैभवको नष्ट करनेवाली वर्षा ऋतुने गरजते बादलोंकी घटा तथा जल वर्षासे जगत्मे जहाँ-तहाँ हर्प प्राप्त करा दिया तब कृष्णके कहे अनुसार भीलके विपम वेषको धारण करता हुआ जरत्कुमार अखण्डित रूपसे मुन्दर लोगोंसे व्याप्त पाण्डवोंकी पुरी दक्षिण मधुरामें पहुंचा ।। ४५-४६ ॥ कृष्णके दूतका १. परः म०१२ पूर्वमित्रमुपतिपयुक्तया क० । ३. सफल-म० । ४. पुरु ड०.पुर म०, सच्छत्रधारो गुरुवसुदेवो यस्मिन्नटने ( क. टि. )। ५. मथुर म० । ६. प्राप्य म० ।

त्रिषष्टितमः सर्गः सोऽवगाह्म हरिदूतकार्यकृत् प्रश्रयेण विहितोचितस्थितिः । सन्निपण्णमुदपृच्छयतेशितु क्षेममिन्यथ युधिष्ठिरादिमिः ॥४॥ मन्युरुद्धगलगद्गइस्वरः सन्निवेद्य स जरात्मजोजगौ। द्वारिकास्वजनदाहपूर्वकं स्वप्रमादवशतो मृति हरेः ॥१८॥ प्रत्ययाय हरिदत्तकौस्तुमं प्रस्फुरकिरणजालकं पुरः । संप्रदय पुरुदुःखपूरितः पूरकृति व्यतनुतातनुस्वनः ॥४॥ तरक्षणेलमुदतिष्टदाकुलः कुन्त्यधिष्टितकलत्रकण्टजः। पाण्डुपुत्रभवनेऽखिले रुदत्याकुलस्य जलधेरिव ध्वनिः ॥५०॥ हा प्रधानपुरुषकधीर हा हा जगद्व्यसननोदनोद्यत । हा स्वयीह विधिना किमीहितं हा वर्तति रुदितं चिरं त्वभूत् ॥५॥ संहृतातिबहुरोदनैस्ततः पाण्डवादियहुवान्धवर्जगद् । वृत्तवेदिमिरदायि विष्णवे संस्थित स्वजनतृप्तये जलम् ॥५२॥ जारसयसपनीय पूर्वदुपीपदवीरिताधिकम् । अग्रतस्तमभिकृरय पाण्डवा जग्मुरातहलभृदिक्षया ॥५॥ कार्य करनेवाले जरत्कुमारने पाण्डयोंको सभामें प्रवेश कर विनयपूर्वक दूतकी सब मर्या- दाओंका पालन किया। तदनन्तर जव वह सभामें बैठ गया तव युधिष्ठिर आदिने उससे स्वामीको कुशल-वार्ता पूछी ॥४७॥ शोकसे जिसका कण्ठ मध गया था तथा स्वर गद्गद हो गया था ऐसे जरत्कुमारने द्वारिका तथा कुटुम्बीजनोंके जल जाने और अपने प्रमादसे कृष्णके मारे जानेका सब समाचार कह दिया और विश्वास दिलानेके लिए देदीप्यमान किरणोंसे युक्त, कृष्णका दिया कौस्तुभमणि उनके सामने दिखा दिया। तदनन्तर बहुत भारी दुःखसे भरा जरत्कुमार गला फाड़-फाड़कर जोरसे रोने लगा ।। ४८-४९ ॥ उसी समय माता कुन्ती तथा पाण्डवोंकी स्त्रियोंके कण्ठसे उत्पन्न रोनेका विशाल शब्द उठ खड़ा हुआ । यही नहीं, उस समय जो वहाँ विद्यमान थे वे सभी रोने लगे जिससे पाण्डवोंके भवनमें समुद्र जैसी ध्वनि गूंज उठी ।। ५०॥ वे सब रोते-रोते कह रहे थे कि 'हा प्रधानपुरुप ! हा अद्वि- तीय धीर! हा जगत्का कष्ट दूर करनेमें सदा उद्यत रहनेवाले ! विधिने तुम्हारे ऊपर यह क्या चेष्टा की। हाय हाय, बड़े दुःखकी बात है। इस प्रकार चिरकाल तक रुदन चलता रहा ॥५१॥ तदनन्तर जव रोना-चीखना बन्द हुआ तव जगत्का वृत्तान्त जाननेवाले पाण्डय आदि यान्धवाने सब ओर घेरकर बैठे आत्मीयजनोंके संतोपके अर्थ कृष्णके लिए जल दिया। ॥५२ ।। पहलेका निन्द्यवेप दूर कर जिसने मानसिक व्यथाको कुछ कुछ कम कर दिया था १. स्थितः क० । २. जरात्मको म०। ३. इंपत् किञ्चित् अवधीरितः श्राधिर्मनोव्यथा येन स तम् कपसमासान्तः। *मृतकके लिए नल देनेकी पद्धति जैन सस्कृतिमें नहीं है। फिर ग्रन्थक्तांने इसका वर्णन क्यों किया ! यहाँ उनका यह माव जान पड़ता है कि पाण्डव श्रादि स्वयं तो जल देनेके पदमें नहीं ये किन्तु उस समय उनके दु खमें समवेदना प्रदर्शित करने के लिए बो अन्य जनसमूह आकर एकत्रित हो गया था उनकी तृप्ति के लिए पाण्डवोंने कृष्णको जल दिया था। उस समय वैदिक संस्कृति के अनुसार लोकमें मृतकके लिए जल देनेकी पद्धति थी और पाण्डव लोककी सब विधियोंको जाननेवाले थे इसलिए लोकाचारसे उन्होंने यह कार्य किया था।

हरिवंशपुराणे ने कियनिरपि यासरतं द्रौपदीप्रभृतिमामिनीजनैः । मातृपुनमहिनाः ससाधनाः प्राप्य तं ददृशुराहना वने ॥५॥ व्यथिका. शवशरीरगोचगंहर्तनस्नपनमण्डनक्रियाः । वर्तयन्तमुपगृह्य तं चिरं यान्धवा रुरुदुरुषकै स्वनाः ।।५।। कुन्त्यधीनतनया विनम्म तं बोधयन्ति हरिमंस्त्रियां प्रति । कोपनः स न ददाति याचितस्तं तदा विषफलं शिशुयथा ॥५६॥ सज्यतां सुलघुमजनक्रिया पाण्डवास्तदनुपानभोजनम् । भोमिच्छति पिपासितः प्रभुः क्षिप्रमियभिहिते तथाकृते ।।५७।। मज्जयत्यमिनिवेश्य विष्टरे मोजयत्यपि स पाययस्यपः । व्यर्थतामपि तदास्य पाण्डवा मेनिरेऽनुचरणाः कृतार्थताम् ॥५८|| निन्युरिस्थमनुवृत्तितस्तु ते तत्र मंघसमयं पलानुगाः । मोहमघपटलं यलस्य वा भेत्तुमाविरमवत्तदा शरत् ।।५९।। सप्तपर्णसुरभैः सदा तदा चैष्णवस्य वपुपो वपुप्मतः । दूरदेशमगमद्विगन्धना गन्धयोहिं न तयोः सहस्थितिः ॥६॥ आययावथ कृतव्यवस्थितिर्धातृपूर्वनिजमारथिः सुरः । मोऽयमाभिमुसकाललब्धितः वोधनाय बलदेवसन्निधिम् ॥६१।। ऐसे जरत्कुमारको आगे कर पाण्डव लोग दुःखसे पीड़ित बलदेवको देखनेकी इच्छासे चले।।५।। द्रौपदी आदि रानियों, माता-पुत्रों एवं सेनाके साथ बड़ी शीघ्रतासे चलकर कुछ दिनों बाद उन्होंने घनमें बलदेवको प्राप्त कर देखा। उस समय बलदेव कृष्णके मृत शरीरको उबटन लगाना, स्नान कराना तथा आभूपण पहिनाना आदि व्यर्थ क्रियाएँ कर रहे थे। उन्हें देख सब बन्धुजन आदरके साथ उनसे लिपट गये और उच्च शब्द कर चिरकाल तक रोते रहे ॥ ५४-५५ ।। कुन्ती और उनके पुत्रोंने नमस्कार कर बलदेवसे कृष्णके दाह संस्कारकी प्रार्थना को परन्तु जिस प्रकार बालक विषफलको नहीं देता है उलटा कुपित होता है उमी प्रकार बलदेवने भी माँगनेपर कृष्णका मृतक शरीर नहीं दिया, उल्टा क्रोध प्रकट किया ।। ५६ ।। बलदेवने कहा कि, हे पाण्डवो! म्नानकी शीघ्र ही तैयारी करो और फिर उत्तम भोजन पानकी व्यवस्था करो, हमारा प्रभु (कृष्ण) प्यासा है तथा शीघ्र ही भोजन करना चाहता है । बलदेवके इस प्रकार कहनेपर पाण्डवोंने स्नान तथा भोजन-पानकी तैयारी की ।। ५७ ।। बलदेवने कृष्णको आसनपर बैठाकर नहलाया, भोजन कराया और पानी पिलाया परन्तु उनका वह सब प्रयत्न व्यर्थ गया। यद्यपि पाण्डव भी बलदेवके इस कार्यको व्यर्थ मानते थे तथापि वे उनके कहे अनुसार आचरण कर अपने आपको कृतकृत्य मानते थे ।। ५८ ।। इस प्रकार बलदेवके पीछे-पीछे चलनेवाले पाण्डवोंने उनके कहे अनुसार कार्य कर उस वनमें वर्षाकाल पूर्ण किया। तदनन्तर उनके मोहरूपी मेघपदलको भेदनेके लिए शरद्काल प्रकट हुआ ।। ५९ ॥ पहले कृष्णके शरीरसे सदा सप्तपर्णके समान मुगन्धि आती थी परन्तु उस ममय दुर्गन्ध आने लगी और वह दुर्गन्ध दूर देश तक फैल गयी सो ठीक ही है क्योंकि दोनों गन्धोंकी एक साथ स्थिति नहीं होती ।। ६० ।। अथानन्नर-कृष्णका भाई सिद्धार्थ, जो सारथि था, मरकर स्वर्गमें देव हुआ था और जिसने दीक्षा लेते समय सम्बोधनेकी व्यवस्था स्वीकृत की थी, काललब्धिको निकटतासे सम्बोधनेके लिए बलदेवके निकट आया ।। ६१ ॥ उसने एक मायामयी ऐसा रथ बलदेवके त्रिषष्टितमः सर्गः ७७७ भूभृतोऽतिविषमं तटं रथः संव्यतीन्य दलितः समे पथि । मंधिमस्य दधता पुरः पुनर्दर्शितः सपदि नेन सीरिणे ॥२॥ सीरिणाम गदितस्तटे गिरः स्यन्दनस्तव ने मज्यत स्म यः । मार्गशीर्णपतितस्य तस्य मा जन्मनीह पुनरुद्गतिः कुतः ।।६।। प्रत्युवाच विबुधो हरमहामारतामरणपारदर्शिनः । जारमेयकरकाण्डकाण्डकापानमानपतितस्य सा कुतः ॥६॥ इत्युदीर्य मृदुपद्मिनी पुना रोपयत्यसलिले शिलातले । पर्यपृच्छत्कुतः शिलातले पद्मिनीप्रभव इत्यनेन मः ॥६५॥ सोत्तरेण तु हली सुधाशिना सिञ्चता मुचिरशुष्कपादपम् । *गोकलेवरतृणाम्बुदायिना कृच्छ्तः प्रतिवियोधितस्तदा ॥६६॥ सत्यमेव विगतोऽसुमिह रिर्यद् ब्रवीपि मम मानुषेदृशम् । सत्यमेतदिह नान्यथेति सन् भव्य ! सर्वमगीर्यथास्थितम् ।।६७॥ सर्वमत्र जिनमापितं पुरा जानतापि मवता मवस्थितिम् । मामपटकमतिवाहिनं वृथा केशवस्य वहता कलेवरम् ॥६८॥ लिए दिखाया जो पर्वतके अत्यन्त विषम तटको पार कर तो दृटा नहीं और सम-चौरस मार्गपर आते ही टूट गया। वह देव उस रथकी सन्धिको फिरसे ठीक कर रहा था परन्तु वह ठीक होता नहीं था । ६२ ।। बलदेवने यह देख उससे कहा कि हे भाई ! बड़ा आश्चर्य है जो तेरा रथ पर्वतके विपम तटपर तो टूटा नहीं और यह समान मार्गमें टूट गया । अव इसका इस जन्ममें फिरसे खड़ा होना कैसे सम्भव है ? इसे ठीक करनेका तेरा प्रयत्न व्यर्थ है ।।६।। इसके उत्तरमें उस देवने कहा कि जो कृष्ण महाभारत-जैसे रणका पारदर्शी है अर्थात् उतने विकट युद्ध में जिसका वाल बाँका नहीं हुआ, वह जरत्कुमारके हाथमें स्थित धनुपसे छूटे वाणके लगने मात्रसे नीचे गिर गया। अब इस जन्ममें उसका फिरसे उठना कैसे हो सकता है ? ॥ ६४ ॥ इतना कह वह देव, जहाँ पानीका अंश भी नहीं था ऐसे शिलातलपर कोमल कमलिनी लगाने लगा। यह देख बलदेवने पूछा कि शिलातलपर कमलिनीको उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? ।। ६५ ॥ इसका उत्तर देवने दिया कि निर्जीव शरीर में कृष्णको उत्पत्ति कैसे हो सकती हे ? उत्तर देनेके बाद वह एक सूखे वृक्षको सींचने लगा। बलदेवने फिर पूछा-भाई ! सूखे वृक्षको सींचनेसे क्या लाभ है ? इसका देवने उत्तर दिया कि मृत कृष्णको स्नानादि करानेसे क्या लाभ है ? तदनन्तर वह देव एक मरे वैलके शरीरको घास-पानी देने लगा। यह देख बलदेवने फिर पूछा कि अरे मूर्ख ! इस मृतक शरीरको घास-पानी देनेसे क्या लाभ है ? इसके उत्तर में देवने कहा कि मृतक कृष्णको आहार-पानी देनेसे क्या लाभ है ? इस प्रकार उस देवने बड़ी कठिनाईसे बलदेवको समझा पाया ॥६६॥ प्रतिबोधको प्राप्त हुए बलदेव कहने लगे कि कृष्ण सचमुच ही प्राणरहित हो गया है। हे भद्र मानुप! तू जो कह रहा है यह ऐमा ही है, यही सत्य है, इसमें रख्वमात्र भी अन्यथा वात नहीं है; हे सत्पु. रुप! हे भव्य ! तूने ठीक ही कहा है ।। ६७ ।। इसके उत्तरमें देवने कहा कि यहाँ जो कुछ हुआ है वह सब नेमिजिनेन्द्र पहले ही कह चुके थे । मंसारकी स्थितिको जानते हुए भी आपने कृष्णका मृतशरीर धारण कर छह माह व्यर्थ ही बिता दिये ॥ ६८ । इस मंसारमें कौन 1 १ नु म । २. महाभारताम्भरण- म । महाभारतान्तरण- ख. 1 ३. सोन्तरे रुत मा, खः । ४. गोकुलेवस्तृणाम्बु-म०१५ हे मानुष ! इंटराम् इति च्छेद , मानुपेशी म०, क०, २०१६. सक०1 ७७८ हरिवंशपुराणे कोऽत्र कस्य पहिरनहिंसकः स्वान्तरङ्गशुभकर्म रक्षकम् । आयुरेव निजत्राणकारणं तत्क्षये मवति सर्वथा क्षयः ॥६९॥ संपदा करिकर्णचजला संगमाः प्रियवियोगदुःखदाः । जीवितं मरणदुःसनीरसं मोक्षमक्षयमतोऽर्जयेद्बुधः ॥७॥ पूर्वरूपधरवंशदवतो लब्धबोधिरिति वीतमोहकः । निर्बमी हलधरस्तदाधिकं धूतमेघपटलः शशी यथा ॥७॥ पाण्डवैः सह जरासुतान्वितैस्तुङ्गयमिख्यगिरिमस्तक ततः । संविधाय हरिदेहमंस्क्रियां जारसेयसुवितीर्णराज्यकः ॥७२॥ शृङ्गमवमचलस्य तस्य तैः संगतैः सविततं ततः श्रितः। संगहान कृतनिश्चयो बलो मङ्गुरं समधिगम्य जीवितम् ॥७३॥ पल्लवस्थजिननाथशिष्यतां संसृतोऽस्म्यहमिह स्थितोऽपि सन् । इन्युदीर्य जगृहे मुनिस्थितिं पञ्चमुष्टिमिरपास्य मूर्धजान ।।७४॥ पारणासु पुरसंप्रवेशने वैपरीन्यमवगम्य योषिताम् । मत्रियोगभृदतो रणवती संतुतोष चनभैक्ष्यवर्तनः ॥७५॥ पाण्डवास्तु बहुराजकन्यकाः संप्रदाय हरिवंशभूभुजे। पुत्रयोजितनिजश्रियोऽगमन पल्लवाख्यविषयं जिन प्रति ॥७६॥ किसका बहिरङ्ग हिंसक है ? अपना अन्तरङ्ग शुभ कर्म ही रक्षक है । यथार्थमें आयु ही अपनी रक्षाका कारण है, उसका क्षय होनेपर सब प्रकारसे क्षय हो जाता है ।। ६९ ।। सम्पत्ति हाथोके कानके समान चञ्चल है । संयोग, प्रियजनोंके वियोगसे दुःख देनेवाले हैं और जीवन-मरणके दुःखसे नीरस है । एक मोक्ष ही अविनाशी है अतः विद्वजनोंको उसे ही प्राप्त करना चाहिए ।। ७० ॥ इस प्रकार पूर्वरूपको धारण करनेवाले अपने वंशके देवसे जिन्हें रत्नत्रयकी प्राप्ति हुई थी और जिनका मोह दूर हो गया था ऐसे बलदेव, मेघपटलसे रहित चन्द्रमाके समान उस समय अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ॥७१ ॥ तदनन्तर जरत्कुमार और पाण्डवोंके साथ उन्होंने तुङ्गीगिरिके शिखरपर कृष्णका दाह-संस्कार कर जरत्कुमारको राज्य दिया और जीवनको क्षणभङ्गर समझ परिग्रहके त्यागका निश्चय कर साथियोंके साथ उसी पर्वतके शिखरका आश्रय लिया। उन्होंने, 'मैं यहाँ रहता हुआ भी पल्लव देशमें स्थित श्री नेमिजिनेन्द्रको शिष्यताको प्राप्त हुआ हूँ' यह कहकर पञ्च मुष्टियोंसे शिरके बाल उखाड़कर मुनि-दीक्षा धारण कर ली ॥७२-७४ । बलदेव शरीरसे अत्यन्त सुन्दर थे। इसलिए पारणाओंके लिए नगरमें प्रवेश करते समय त्रियोंको विपरीत चेष्टा होने लगी। यह जान त्रियोगको धारण करनेवाले रणव्रती बलदेव 'यदि वनमें भिक्षा मिले तो लेंगे अन्यथा नहीं' ऐसी प्रतिज्ञा कर संतोपको प्राप्त हुए ||७|| पाण्डवोंने हरिवंशके राजा जरत्कुमारके लिए वहुत-सी राज-कन्याएँ दीं, अपने पुत्रोंके लिए राज्यलक्ष्मी सौंपी और उसके बाद जिनेन्द्र भगवानको लक्ष्य कर सबके सब पल्लव देशकी ओर चले गये ।। ७६ ॥ १. श्रायुकर्म म०। २. संपदोऽत्र परिकर्णचञ्चला. ख.। ३. पूर्वरूपधरवासुदेवतो फ। ५. सविततस्तत. स्थित ३० । ५. इत ऊर्व म., क. पुस्तक्योरधोलिखितः पाटोऽधिको वर्तते । 'प्रेष्य सूर्य पुरसशिक निजानात्मजांच मुनिधाय शासने। त्यक्तरागमरि पाण्डुनन्दनाः सविभज्य निजसंपदो मृदा ।'

निषष्टितमः सर्गः द्रौपदीप्रमृतयस्तदगनाः संयम प्रति निविष्टबुद्धयः । पाण्डवाननुगता जनन्यपि संमूना विगतरक्षधी सती ॥३॥ द्वादशााममिदयासतामनुप्रेक्षणानुमतया हलायुधः । 'ग्यापूतोऽमवदण्डितस्थितिः सनिदण्टदरवण्नान्मुखः ॥७॥ तत्र नित्यमिति यत्र मूछंना स्थानदेहधनसौख्यबन्धुषु । तय कितिदापि नास्ति निरयता आत्मनोऽन्यदिति चिन्तयस्यमा ॥७९॥ मृत्युदुःरस्परिपीडितस्य मे व्यानवयमृगशायकस्य वा । यान्धवा न शरणं धनादि वा धर्मनाऽन्यदिनि चिन्तनामिनः ॥८॥ नकयोनिकुलकोटिकटमंमारचक्रमिह यान्ति जन्नवः । प्रेरिताः कटुककमंयन्त्रको स्वामिभृरयपितृपुत्रपूर्वताम् ॥८॥ एक एव मवमृत्प्रजायते मृत्युमति पुनरंक एवं नु । धर्ममकमपहाय नापरः सत्महाय इति धैकता स्मृनिः 11८२॥ निम्यता मम ठनोरनिग्यता चननोऽहमपचेतना तनुः । अन्यता मम शरीरनोऽपि यत्तकिमान ! पुनरन्यवस्तुनः ॥४३॥ शुक्रगोणितकुवीजजन्मके सप्तधानुमयकं त्रिदोषके । का शुचं तदनुवागुची शुची रम्यते स्वपरयोः शरीरकं ॥४४॥ संयमको ओर जिनकी बुद्धि लग रही थी ऐमो द्रौपदी आदि त्रियाँ तथा संमारमे जिसको बुद्धि विमुख हो गयी थी ऐसी माता कुन्ती भी पाण्डवॉक पीछे-पीछे जा रही थीं। ७७॥ इधर अखण्ड चारित्रके धारक एवं मन, वचन, कायकी प्रवृत्तिरूप तीन दण्डोंका दृढताके माथ खण्डन करने में तत्पर मुनिराज यलदेव, सजनोंको इप्ट अनित्यत्व आदि बारह अनुप्रेक्षाओंके चिन्नयनमें व्याप्त हो गये ।। ७८॥ वे विचार करने लगे कि जिन महल, शरीर, धन, सामारिक सुख और वन्धुजनांमें ये नित्य है', यह समझकर ममताभाव उत्पन्न होता है, उनमें आत्माके सिवाय किमीमें भी नित्यता नहीं है, सभी क्षणमद्गर है ।।७।। जिम प्रकार व्यानके मुख में पड़े मृगके यच्चेको कोई शरण नहीं है, उमी प्रकार मृत्युक दुःखसे पीड़िन मेरे लिए धर्मके सियाय न भाई-बन्धु शरण है और न धन ही शरण है । इस प्रकार वे अशरण अनुप्रेमाका चिन्तयन करते थे। ८० ॥ नाना योनियों और कुलकोटियांके ममूहसे मुक्त इम मंमारम्पी चक्रके ऊपर चढ़े प्राणी, महा विषम कर्मम्पी मन्त्रमे प्रेरित हो स्वामी भृत्य और पिनासे पुत्र आदि अवस्थाको प्राप्त होते हैं ।। ८१॥ यह जीय अफेलाही उत्पन्न होता है और अफेला हो मृत्युको प्रान होता है । एक धर्मको छोड़कर दुमग इसका महायक नहीं है। इस प्रकार ये एकत्य अनुप्रेभाका चिन्नयन करते थे। मैं निन्य हूँ और शारीर अनित्य है । में चेतन हूँ और नगर अचेतन है। जय शरीरमे भी मुसमें भिन्नता है तय मरो यग्नुओंमे भिन्नता क्यों नहीं होगी ? ।। ८३ ॥ यह अपना अथया पराया गरीर रज, यीर्यरूप निन्य निमित्नोंमें उन्पन्न है, मप्रधातुओंमे भगई एयं यान, पित्त, फफ इन तीन दोषांमे युक्त इमलिए ऐमा कौन पवित्र आत्मा होगा जो इम अपवित्र शरीरमें यियोग ममय शोरको प्रान होगा और संये.गर ममय गग फरंगा? ॥८? || फाययोग १ भादवाननुगठा नकार स्निग्या विगतम्घोग्नु पाप 1 पादयाननुगतारिमाला संमती दिएपंतु या ':..२.मालो. ३ 'पापा विपन रियादि मनु" लमः । १. बानुगुनी म.।

७८० हरिवंशपुराणे कायवाङ्मनसयोगभेदवानास्रवो भवति पुण्यपापयोः । कर्मबन्धदृढशृङ्खलश्चिरं संसरत्यसुभृदुप्रसंसृतौ ॥८५॥ स्याद् द्विधासवनिरोधलक्षण: संवरः समितिगुप्तिपूर्वकैः । संवरे सति सनिर्जरेऽसुभृत्मिद्ध्यति स्वकृतकमसंक्षयात् ॥८६॥ दुर्गविष्यकुशलानुबन्धिनी संयमान्नु कुशलानुबन्धिनी । निर्जरा निरनुवन्धिनी च सा चिन्तिता परमयोगिनामुना' ॥८॥ लोकपंस्थितिरनाद्यनन्तिकालोकगर्भबहुमध्यभागभाक् । अत्र ही पडसुकायसंहतिदुःखिनीति खलु लोकचिन्तना ॥८८|| स्थावरे त्रसकुलेऽखिलेन्द्रियः पूर्णतादिपु सुधर्मलक्षणा । घोधिलब्धिरतिदुर्लमा भवेत्सरसमाधिमरणाप्तिसरफला ॥८९॥ धर्म एप जिनभाषितः शिवप्राप्तिहेनुरवधादिलक्षणः । त्यागतोऽस्य भवदुःखिनेत्यनुप्रेक्षिकान्त्यशुमचिन्तनास्मिकाः ॥१०॥ इत्यनुश्रुतमननधीरनुप्रेक्षिकार्थमनुभावयन मुहुः । भ्रातृमोहमजयजयन्मुनिः सद्विविंशतिपरीपहद्विपः ॥११॥ वचनयोग और मनोयोग यह तीन प्रकारका योग ही आस्रव है। इसीके निमित्तसे आत्मामें पुण्य और पापकर्मका आगमन होता है। आस्रवके बाद यह जीय कर्मबन्धनरूप दृढ सांकलसे बद्ध होकर भयंकर संसारमें चिरकाल तक भ्रमण करता रहता है ॥ ८५ ।। द्रव्या सय और भावास्रवरूप दोनों प्रकारके आस्रवका रुक जाना मंवर है। यह संवर गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीपह जय और चारित्र से होता है। निर्जराके साथ-साथ संवरके हो जानेपर यह जीव स्वकृत कर्मोंका क्षय कर सिद्ध हो जाता है ।। ८६ ।। अनुबन्धिनी और निरनुपन्धिनीके भेदसे निर्जराके मूलमें दो भेद हैं। फिर अनुबन्धिनी निर्जराके अकुशला और कुशलाके भेदसे दो भेद हैं। नरकादि गतियों में जो प्रतिसमय कर्माकी निर्जरा होती है वह अकुशलानुवन्धिनी निर्जरा है और संयमके प्रभावसे देव आदि गतियोंमें जो निर्जरा होती है वह कुदालानुबन्धिनी निर्जरा है। जिस निर्जराके बाद पुनः काँका बन्ध होता रहता है वह अनुवन्धिनी निर्जरा है और जिम निर्जराके बाद पूर्वकृत कर्म खिरते तो हैं पर नवीन कर्माका बन्ध नहीं होता उसे निरनुवन्धिनी निर्जरा कहते हैं। परम योगी यलदेव मुनिराजने इसी निरनुवन्धिनी अनुप्रेक्षाका चिन्तयन किया था ॥ ८ ॥ लोककी स्थिति अनादि, अनन्त है, यह लोक अलोकाकाशक ठीक मध्यमें स्थित है। इस लोकके भीतर छह कायके जीय निरन्तर दुःख भोगते रहते हैं, ऐमा चिन्तवन करना लोकानुप्रेक्षा है ।। ८८ ॥ प्रथम तो निगोदसे निकलकर अन्य स्थावसमें उत्पन्न होना ही दुर्लभ है फिर नमपर्याय पाना दुर्लभ है, बसोंमें भी इन्द्रियोंकी पूर्णता होना दुर्लभ है और इन्द्रियों- की पूर्णता होनेपर भी समीचीन धर्म जिसका लक्षण है एवं उत्तम समाधिका प्राप्त होना जिसका फल है ऐसी योधि अर्थान् रबत्रयकी प्राप्ति होना अत्यन्त दुर्लभ है ।। ८९ ॥ जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहा हुआ यह अहिमादि लक्षण धर्म हो मोक्षप्राप्तिका कारण है। इसका त्याग करनेसे मंसारका दुःख प्राप्त होता है--इम प्रकार चिन्तवन करमा सो अन्तिम धर्मा- नुप्रेभा । ॥९० । इस प्रकार परम्परासे प्रसिद्ध बारह अनुप्रेक्षाओंका धार-यार चिन्तयन । २ परमयं गिनी गुमा म० । २. स्थावरे कुराले मिलेन्द्रियः क०, इ. | त्रिपष्टितमः सर्गः बदमिप्रहपरिग्रहोज्ज्वलजाठराग्निजठरोपरोधतः । मोक्षसाधनतयार्धमुग्व्यधारात्परीपहजयं महामुनिः ॥१२॥ दहगिर्यवयवाटवीप्लुपा दावमूर्तिनिमया पिपासया। नियतिक्रियतिनं विव्यधे क्षान्तिनीरदघटामिपितया ॥९३॥ स्थण्डिले निशि दिवा च योगिना तीवयात हिमवृष्टयनेहमि । घातवर्ष विषम तरोरधोऽयोधिशीतपरुषः परोपहः ॥९॥ पर्वताप्रशिग्वरस्थितोऽजयद् प्रेममुष्णममितः परीपहम् । दावधूमवलयातपत्रमच्छाययेव विनिवारितातपः ॥१५॥ गृवृत्तिमिरनास्थितन्तुमिर्गादपीतरधिरोऽप्यकम्पितः । सोढवान् रढमसौ परीपहं प्रौढदंशमशझोपलक्षितम् ॥१६॥ सोऽङ्गलप्रमनपायमप्यविश्वास्यमेकदिनदुःखपालनम् । सरकलत्रमिव समपं न्यधामागन्यमान्मवशगं परीपहम् ॥१७॥ ध्यानयोग्यगिरिमार्गदुर्गभुम्येक एव हि विहृन्य निग्रहे । धर्मसाधनरतियया रिपोापती रतिपरीषहस्य सः ॥९८॥ भूलताकुटिलचापयोजिसनीकटाक्षशरवर्षिणं वृथा । कुर्वता मदनयाधमूर्जिनम्त्रीपरीपहजयः कृतोऽमुना ॥१९॥ करनेवाले उत्कृष्ट बुद्धिके धारक बलदेव मुनिराजने वाईस परीपहरूपी शत्रुओंको जीनकर भाईके मोहको जीत लिया ॥९॥ नाना प्रकारके नियम-आखड़ी आदिके लेनेसे उनको जठराग्नि अत्यधिक प्रज्वलित रहती थी। उननेपर भी वे मोभकी सिद्धिके लिए भूखसे आधा ही भोजन करते थे। इस प्रकार वे महामुनि क्षुधापरीपहको जीतते थे । ९२ ।। प्रतिकाररहित धैर्यके धारक बलदेव मुनिराज, शान्तिरूपी घनघटासे अभिषिक्त होनेके कारण शरीररूपी पर्वतके अवयवभूत अटवीको जलानेवाली दायानलके समान तीन प्याससे पीड़ित नहीं होते थे "इस प्रकार के तृपापरीपहपर विजय प्राप्त करते थे ।। ९३ ॥ तीव्र वायु और हिमवर्षाके समय रात-दिन खुले चबूतरेपर बैठकर तथा वायु और वासे विपम वर्षा ऋतुमें वृक्ष के नीचे बैठकर वे कठोर शीत परीपहके साथ युद्ध करते थे ।। ९४ ॥ ग्रीष्म ऋतुमें पर्वतके ऊँची शिस्त्रपर स्थित होकर वे पारों ओरसे उस परीपह सहन करते थे। उम समय उनके ऊपर दावानलका धुआँ छा जाता था, उससे ऐमा जान पड़ता था मानो वे छनरीकी छायासे गरमीको याधाको ही दूर कर रहे हों ॥ ९५ ।। चुपके-चुपके आनेवाले हारहित जन्तुओं-डॉस, मच्छरोंमे उनका मधिर खूब पिया गया फिर भी वे निश्चल रहते थे। इम प्रकार उन्होंने दंश, मशक नामक कठिन परीपहको यही दृढनामे महन किया था ।। ६६ ।। जो शरीरम मंलग्न था, अपायरहित होने. पर भी विश्वामके योग्य नहीं था, जिसका एक दिन भी पालन करना कठिन था एवं जो उत्तम बीके ममान लजामे महित था, ऐमे नान्यपरीपदको ये अपनी इच्छानुमार सहन करते थे ॥६७॥ ध्यानके योग्य पहाड़ी मार्ग एवं वनकी दुर्गम भूमियों में अकेले ही बिहार कर मदा धर्ममाधनमें प्रीति रखते थे और शत्रुको नरह रनिपरीपदके निग्रह करनेमें मंलग्न रहते थे ।।९॥ ध्रु कुटि लनारूपी कुटिल धनुषपर चढ़ाये हुए विचार कटानी याणी- १. देर्शनपंदर-..। २. वरने म३. परसायमेव मः। ४.नध जन्नुमिः R.! ५. दुर्गभदेह एव ०,०। ६. माती म.। .

हरिवंशपुराणे तीर्थभूमिविहतिः ससंयमावश्यकैप्वपरिहाणिनी व्रजन् । वाहनाद्यनमिसध्य चर्यया खिद्यते स्म न परीपहाख्यया ॥१०॥ प्रासुकास्वध विविक्तभूमिपु ध्यानधौतधिषणो विभूतधीः । क्षेत्रकालनियतासनेष्यसी वाध्यते स्म न निषद्ययानिशम् ॥10॥ ध्यानतोऽध्ययनतो मुनिः क्रमादल्पकालनियताल्पनिद्रया। एकपाचकृतभूमिशय्यया नावृतोऽपि निशि न प्रपीडितः ॥१२॥ दुर्जनैनिशितदुर्वचोऽस्त्रकैराहतोऽपि हृदयेऽतिदुस्सहैः । क्रोशवाधसहनः क्षमावृतः स्यामिति स्मृतिमदत्त धीरधीः ।।१०३॥ अनशस्त्रनिवपुर्वधः प्राप्यते यदि नु मे तथाऽप्यलम् । सद्यते वधपरीपहो मयत्येप बुद्धिमधादनारतम् ॥१०॥ वाह्यमान्तरमसी तपश्वरनस्थिशेषवपुषः स्थिति प्रति । व्यापृतोऽपि समयव्यवस्थया याचनाख्यमजयत्परीषहम् ॥१०५॥ मौनिना निजशरीरदर्शिना संहितेन हितचन्दचर्यया । लब्ध्यलब्धिसुधियामुना जितोऽलामनामविदिनः परीपहः ॥१०॥ रूक्षशीतलविरुद्धभुक्तिनां वातपित्तकफकोपना रुजम् । सोऽप्रतिक्रियतयाऽवधीरयन् रोगसंज्ञमजयरपरीषहम् ॥१०॥ की वर्षा करनेवाले कामदेवरूपी योधाको व्यर्थ करनेवाले उन मुनिराजने अतिशय बलवान स्त्री परीपहको जीता था ॥ ९९ ।। वे संयमी मनुष्यों के आवश्यक कार्योमें हानि न कर सवारी आदिका विचार किये बिना ही तीर्थ क्षेत्रोंके लिए विहार करते थे और चर्या-परीपहसे कभी खेदखिन्न नहीं होते थे ॥ १०० ॥ प्रासुक और एकान्त भूमियोंमें ध्यान करनेसे जिनकी बुद्धि अत्यन्त निर्मल हो गयी थी तथा जो उत्कृष्ट बुद्धिके धारक थे ऐसे बलदेव मुनिराज, क्षेत्र अथवा काल में निश्चित आसनोंके बीच निपद्या-परीपहसे कभी दुःखी नहीं होते थे ।। १०१॥ वे मुनि ध्यान और अध्ययनमें सदा निमग्न रहते थे, इसलिए रात्रिके समय क्रम-क्रमसे बहुत थोड़ी निद्रा लेते थे वह भी पृथिवीरूपी शय्यापर एक करवटसे और बिना कुछ ओढ़े हुए हैं। इस प्रकार वे शय्या परीपहसे कभी पीडित नही होते थे ।। १०२ ॥ धीर-धीर बुद्धिको धारण करनेवाले बलदेव मुनिराज दुर्जनोंके द्वारा तीक्ष्ण कुवचन- रूपी शस्त्रोसे हृदयमें घायल होनेपर भी कुवचनोंको वाधा सहते हुए सदा इस बातका स्मरण रखते थे कि मुझे क्षमासे युक्त होना चाहिए ।। १०३ ॥ वे मुनि सदा एसी बुद्धि धारण करते थे कि यदि अस्त्र और शस्त्रके समूहसे मेरा शरीर वधको प्राप्त होता है तो भी मुझे अच्छी तरह वध-परीपह सहन करना चाहिए ।। १०४ ॥ बाह्य और आभ्यन्तर तपको करनेवाले वे मुनि, हड्डीमात्र अवशिष्ट शरीरकी स्थिरताके लिए यद्यपि चरणानुयोगकी पद्धतिसे उद्यम करते थे-चर्या के लिए जाते थे पर कभी किसीसे आहार आदिकी याचना नहीं करते थे, इस प्रकार वे याचना-परीपहको जीतते थे ।। १०५ ।। वे मौनसे आहारके लिए विहार करते थे, अपना शरीरमान दिखाते थे, चान्द्री-चर्यासे युक्त रहते थे अर्थात् चन्द्रमाके समान अमीर, गरीव सभीके घर प्रवेश करते थे और लाभ, अलाभमें प्रसन्न रहते थे, इस प्रकार उन्होंने अलाभ-परीपहको जीत लिया था ॥ १०६ ।। वे रूखे, शीतल एवं प्रकृतिके विरुद्ध आहार तथा १. व्या मृतोऽपि स० । २. दनागत म० | ३. चण्ड-म ।

निषष्टितमः सर्गः लाक्षलेशतृणशर्करादिभिः कशैः स शयनासनादिषु । पोहितोऽप्यविकृतान्तरस्तृणस्पर्शरूढिमरणपरीपहम् ॥१०८।। अस्पृशन करनस्तनुं मुनिः शोमते स्म धवलो मलावृतः । दौलतुगशिसराश्रितो यथा कालमेघपटलावृतः शशी ॥१०॥ नादरे परकृते कृतादरोऽनादरं च न मनोविकारवान् । शुद्धीविपहते स्म तत्पुरस्कारस्लमपरं परीयहम् ॥११०॥ वादिवाग्मिगमको महाकविः सांप्रतं सकलशास्त्रविद्धवि । नास्मदन्य इति हि स्मयो मनाक् प्रजया न परिपह्मादूपितः ॥19॥ अज्ञ एप न पानं मानुषो वीक्षतं न हि न मापते मृपा। मौनमित्यबुधवाच्यवझयाऽज्ञानमंप सहते परोपहम् ।।११२॥ वातंमुग्रतपमा महधंयः पूर्वमिन्यनुपलब्धितोऽधुना । इत्यनुक्तिरतिशुद्धदर्शनोऽदर्शनाख्यमसहत्परीपहम् ॥११३॥ इत्यशेषितपरीपहारिणा सोरिणा विषयदोपहारिणा । अभ्यतप्यस सपोऽनिहारिणा जनसचरणभूविहारिणा ॥११॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती वलदेवतपोवर्णनो नाम त्रिपष्टितमः सर्गः ॥१३॥ वात, पित्त और कफके प्रकोपसे उत्पन्न रोगका प्रतिकार नहीं करते थे । सदा उसको उपेक्षा ही करते थे। इस प्रकार रोग-परीपहको उन्होंने अच्छी तरह जीत लिया था ।। १०७ ।। शयन, आसन आदिके समय कठोर लाखके कण, तृण तथा कंकण आदिके द्वारा पीडित होनेपर भी उनके अन्तरगमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न नहीं होता था और भी तृणस्पर्श-परोपहको अच्छी तरह सहन करते थे ।। १०८ ॥ जो हाथके नाखूनोंसे शरीरका कभी स्पर्श नहीं करते थे-नखोंसे शरीरका मल नहीं छुटाते थे ऐसे मैलसे आवृत शुभ्रकाय मुनिराज, पहाड़की ऊँची चोटीपर स्थित काले काले मेघोंके पटलसे के चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे ।। १०९ ।। यदि दूसरे लोग उनका आदर करते थे, तो उन्हें प्रसन्नता नहीं होती थी और अनादर करते ये तो मनमें विकार भाव नहीं लाते थे । आदर और अनादर दोनों में ही अपनी बुद्धिको मदा विशुद्ध रखते थे, इस तरह वे सत्कार पुरस्कार-परीपहको अच्छी तरह सहन करते थे ॥११०।। इस समय पृथिवीपर मुझसे बढ़कर न कोई वादी है, न वाग्मी है, न गमक है और न महा. फपि है। इस प्रकारके अहंकारको उन्होंने प्रज्ञा-परीपहके द्वारा किञ्चित् भी दूपिन नहीं होने दिया था ।। १११ ।। यह अज्ञानी न पा है, न मनुष्य है, न देखता है, न बोलता है, व्यर्थ ही इसने मौन ले रखा है । इस प्रकारके अज्ञानी जनोंके वचनोंकी परवाह न कर ये अनान-परीपद- फो सहन करते थे ॥ ११२ ।। उप्र तपके प्रभावसे पहले बड़ी-बड़ी द्धियाँ प्राप्त हो जाती थीं यह कहना व्यर्थ है क्योंकि आज तक हमें एक भी ऋद्धिकी प्राप्ति नहीं हुई। इस प्रकार मुद्ध सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले बलदेन मुनिराज कभी नहीं कहते थे। इस तरह उन्होंने आ दर्शन परीपहको अच्छी तरह महन किया था ॥ ११३ ।। इस प्रकार जिन्होंने परीपहरूपी शत्रुओंको समाप्त कर दिया था। जो पञ्चेन्द्रियो विषयरूपी दोपको हरनेवाले थे, शरीरमे अत्यन्त मुन्दर थे, और जिनेन्द्रप्रणीन मम्यक चारित्रको भूमिकामें विहार करनेवाले ये मे मुनिराज पलदेयने चिरकाल तक तप किया। ११४ ॥ इस प्रकार मरिष्टनेमि पुराएके संग्रहसे युक्त, जिनमेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें पलदेवके तपका पर्सन करनेवाला प्रेसटा पर्व समाप्त हुआ | १... पुरतासोः १११-११४ रत्तोपो क्रममेटी यने । .

144 चतुःषष्टितमः सर्गः अथ ते पाण्डवाश्चण्डसंसारभयमोरवः । प्राप्य पल्लवदेशेषु विहरन्तं जिनेश्वरम् ॥१॥ चतुर्विधामराकीर्णममवस्थानमण्डनम् । तं ते ववन्दिरं देवं परीत्य परमेश्वरम् ॥२॥ पीरया धर्मामृतं लब्धजिनेन्द्रघनकालतः । पूर्वजन्मानि तेऽपृच्छन् जिनेन्द्रोऽप्यगदीदिति ॥३॥ अत्रैव मरतक्षेत्रे चम्पायां मेघवाहने । रक्षति क्षितिपे क्षोणी कुरुवंशविभूषणे ॥४॥ विप्रस्य सोमदेवस्य सौमिलायां यः सुताः । प्रथमः सोमदत्तोऽभूरसोमिल: सोमभूतिना ।।५।। अग्निभूत्यग्निलोद्भूतास्तेषां मातुलजाः क्रमान् । धनश्रीरपि सोमश्रीनागीरिति योषितः ॥६॥ शरीरभोगमंसारनिवेदं सर्ववेदवित् । सोमदेव. परिप्राप्य प्रावाजीजिनशासने 1॥७॥ प्रयोऽत्र श्रातरस्तेऽपि जिनशासनमाविताः । गृहधर्मरता जाता धर्मकामार्थसेविनः ॥८॥ मिक्षाकालेऽन्यदा तेषां गृहं धर्मरुचिर्यतिः । धर्मपिण्ड इवाखण्ड' प्रविष्टश्चन्द्रचर्यया ॥९॥ प्रतिगृह्य तमुस्थाय सोमदत्तो यमीश्वरम् । कार्यव्यग्रतया दाने नागश्रियमयोजयत् ॥१०॥ सा स्वपापोदयारसाधी कोपावेशवशाददात् । विषानमेप संन्यासकारीसर्वार्थ सिद्धिमैत् ॥११॥ नागश्रीदुप्कृतं ज्ञात्वा ते अयोऽपि महोदराः । दीक्षां वरुणगुर्वन्ते निर्विपणाः प्रतिपेदिरे ॥१२॥ धनश्रीश्चापि मिश्रीगुणवत्यार्यिकान्तिके । भदीक्षिपातां नि.शेपमववासविषादतः ॥१३॥ अथानन्तर संसारके तीव्र भयसे भयभीत पाण्डव, पल्लव देशमें विहार करते हुए श्री नेमिजिनेन्द्र के समीप पहुंचे। उस समय भगवान् चार प्रकारके देवोंसे व्याप्त समयसरणको सुशोभित कर रहे थे एवं अष्ट प्रातिहार्यरूप परम ऐश्वर्यसे युक्त थे। पाण्डवोंने प्रदक्षिणा देकर भगवानको नमस्कार किया ॥ १-२॥ तदनन्तर प्राप्त हुए जिनेन्द्ररूपी वर्षा कालसे धर्मा- मृतका पान कर उन्होंने अपने पूर्वभव पूछे और श्रीजिनेन्द्र इस प्रकार उनके पूर्वभव कहने लगे ।। ३ ।। इसी भरतक्षेत्रकी चम्पा नगरीमें जब कुरवंशका आभूपण स्वरूप राजा मेघवाहनं पृथिवीकी रक्षा करता था, तब वहाँ सोमदेव नामका एक ब्राह्मण रहता था। उसकी सोमिला नामको स्त्री थी और उससे उसके सोमदत्त, सोमिल और सोमभूति नामके तीन पुत्र उत्पन्न हुए थे।॥४-५ ।। इन पुत्रोंके मामाका नाम अग्निभूति था, उसकी स्त्री अग्निला थी और उन दोनोंके क्रमसे धनश्री, सोमश्री और नागश्री नामको तीन कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं जो कि उक्त तीन पुत्रोंको क्रमसे स्त्रियाँ हुई थीं ॥६॥ समस्त वेदोंका जाननेवाला ब्राह्मण सोमदेय कदाचित् शरीरभोग और संमारमे विरक्त हो जिनधर्ममें दीक्षित हो गया ।। ७॥ सोमदत्त . आदि तीनों भाई भी जिनशासनको भावनामे युक्त थे इसलिए धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थ- फा मेयन करते हुए गृहस्थ धर्ममें रत हो गये ॥ ८॥ किसी समय धर्मचि नामक मुनिराज जो धर्मके अखण्ड पिण्डके समान जान पड़ते थे, भिक्षाके समय घान्द्री-चर्यासे उनके घर प्रविष्ट हुए ॥९॥ मोमदत्तने उठकर बड़ी विनयसे उन मुनिराजको पडिगाहा । पहिगाहनेके याद किमी अन्य कार्यमें व्यग्र होनेसे यह तो चला गया और दान देने कार्य में नागश्रीको नियुक्त फर गया ॥ १० ॥ अपने पूर्यफन पापोदयसे मुनिराजके विपयमें कोपर्क वशीभून हो नागीने उन्हें विपमिश्रित अग्नका आहार दिया जिममे वे मुनिराज मंन्यास मरण कर मार्थसिद्धिको प्रान हुए ॥ ११ ॥ नांगी के इम दुष्कार्यको जानकर वे नीनों भाई यहुन दुःखी हुए और मंसाग्मे यिरक्त हो उन्होंने यरूण गुम्के मार दीशा धारण कर ली ॥१२॥ धनश्री और मित्राने भी ममग्न मंमार याममे- ७८५ धनुःषष्टितमः सर्गः जानपज्ञकसिद्धथै ते दर्शनत्रिकशुदये । चारित्रतपसां शुये प्रवृत्ताश्चरणोधताः ॥१४॥ स्यात्सामायिकचारित्रं सर्वत्र समभावकम् । सर्वसावधयोगस्य प्रत्याख्यानमखण्डितम् ॥१५॥ स्वप्रमादकृतानर्थप्रबन्धप्रतिलोपने । सम्यक् प्रतिक्रिया या सा छेदोपस्थापना मता ॥१६॥ विशिष्टा परिहारेण शुद्धियंत्र प्रतिष्टिना । परिहारविशुद्धयाख्यं चारित्रं तत्यकथ्यते ॥१७॥ संपरायाः कपायास्तु यत्र ते सूक्ष्मवृत्तयः। तरसूक्ष्मसांपरायाख्यं चारित्रं पापनोदनम् ॥१८॥ यथाख्यातमयाख्यातमिति वा परिमाषितम् । सुशान्तक्षीणेमोहं तच्चारित्रं मोक्षसाधनम् ॥१९॥ तप. पोढा मवेद्वाहमधानशनपूर्वकम् । अभ्यन्तरं तपः पोढा प्रायश्चित्तादिकं मतम् ॥२०॥ संयमादिकसद्ध्यानसिद्धिष्टफलाप्तये । रागाच्छिरय तपो नानाविधं घनशनं स्मृतम् ॥२१॥ दोषोपशमसन्तीपस्वाध्यायध्यानसिद्धये । संयमायावमोदयं प्रजागरणकारणम् ॥२२॥ मिक्षार्थिमुनिसंकल्पा ये वेश्मानाभिगोचराः । आशानिवृत्तये वृत्तिपरिसंख्यानमिप्यते ॥२३॥ घृतक्षीरादिवृप्यात्मरसानां विरहः परम् । तपो रसपरित्यागो निद्रेन्द्रियजयाय सः॥२४॥ पशुस्त्रीप्रविविक्तेषु स्थानेषु प्रासुकेषु यत् । वर्तनं व्रतशुद्धय तद्विविक्तशयनासनम् ॥२५॥ निकालयोगप्रतिमास्थानपूर्वः स्वयंकृतः । कायक्लेशः सुखत्यागो मोक्षमार्गप्रमावनः ।।२६॥ विरक्त हो गुणवती आर्यिकाके समीप दीक्षा धारण कर ली ॥ १३ ॥ इस प्रकार वे सब, पॉच ज्ञान, तीन सम्यग्दर्शन, चारित्र एवं तपकी शुद्धि के लिए प्रवृत्त हो चारित्रपालन करनेके लिए उद्यत हो गये ।। १४ ॥ चारित्रके सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्म- साम्पराय और यथाख्यात ये पाँच भेद हैं। सब पदार्थों में समताभाव रखना तथा सर्वप्रका- रके सायद्ययोगका पूर्ण त्याग करना सामायिक चारित्र है ॥ १५ ॥ अपने प्रमादके द्वारा किये हुए अनर्थका सम्बन्ध दूर करने के लिए जो समीचीन प्रतिक्रिया होती है वह छेदोपस्थापना चारित्र है ॥ १६ ॥ जिसमें जीव हिंसाके परिहारसे विशिष्ट शुद्धि होती है वह परिहारविशुद्धि नामका चारित्र कहलाता है ॥ १७ ॥ संपराय कपायको कहते हैं, ये कपाय जिसमें अत्यन्त सूक्ष्म रह जाती हैं वह पापको दूर करनेवाला सूक्ष्म साम्पराय नामका चारित्र है ॥१८॥ जहाँ समस्त मोहकर्मका उपशम अथवा क्षय हो चुकता है उसे यथाख्यात अथवा अथाख्यात चारित्र कहते हैं । यह चारित्र मोक्षका साक्षात् साधन है ॥ १९ ॥ तपके बाह्य और आभ्य- न्तरके भेदसे दो भेद हैं । इनमें वाह्य तप अनशन आदिके भेदसे छह प्रकारका है और आभ्य- न्तर तप भी प्रायश्चित्त आदिके भेदसे छह प्रकारका माना गया है ॥२०॥ संयमको आदि लेकर समीचीन ध्यानकी सिद्धि रूप प्रत्यक्ष फलकी प्राप्तिके लिए तथा रागको दूर करनेके लिए आहारका त्याग करना अनशन तप है । यह वेला, तेला आदिके भेद- से नाना प्रकारका स्मरण किया गया है ॥ २१ ॥ वात, पित्त आदि दोनोंका उपशम, संतोप, स्वाध्याय और ध्यानकी सिद्धिके लिए तथा संयमकी प्राप्तिके लिए भूखसे कम भोजन करना अवमौदर्य तप है । यह जागरणका कारण है-इस तपके प्रभावसे निद्राकी अधिकता दूर हो जाती है ॥ २२ ॥ भोजनविषयक तृष्णाको दूर करने के लिए भिक्षाके अभिलापी मुनि जो घर तथा अन्न आदिसे सम्बन्ध रखनेवाले नाना प्रकार के नियम लेते हैं वह वृत्तिपरिसंख्यान नामका तप है ॥ २३ ।। निद्रा और इन्द्रियोंको जीतनेके लिए जो घी, दूध आदि गरिष्ट रसोंको - त्याग किया जाता है वह रसपरित्याग नामका तप है ॥ २४॥ व्रतकी शुद्धिके लिए पशु तथा स्त्री आदिसे रहित एकान्त प्रामुक स्थानमें उठना, बैठना विविक्तगयनामन तप है ॥२५॥ आतापन, वर्षा और शीत ये तीन योग धारण करना तथा प्रतिमायोगसे स्थित होना १. चरणोदिताः १० । २. तीक्ष्ण म० । ३.-दिष्ट ग०। । ९९ ७८६ 'हरिवंशपुराणे बाह्यद्रज्यव्यपेक्षत्वात्परप्रत्ययहेतुकः । पदविधस्यास्य बाह्यस्वं तपसः प्रतिपादनम् ॥२७॥ मनोनियमनार्थवादाभ्यन्तरममिष्टुतम् । प्रायश्चित्तं कृतावद्यशोधनं नवधाऽत्र तु ॥२८॥ चतुर्धा विनयः पूज्यवादरो दशधा पुनः । बैश्यावृत्त्यं स्वकार्यनान्यद्रव्यरप्युपासनम् ॥२९॥ स्वाध्यायः पञ्चधा ज्ञानमावनालस्यवर्जनम् । स्वसंकल्पपरित्यागो व्युत्सर्गा द्विविधः पुनः ॥३०॥ चित्ताक्षेपपरित्यागो ध्यानं चापि चतुविधम् । पानं रौद्रं च दुर्थ्यानं धHशुक्त तु शोमने ॥३॥ समालोचनकं कृत्स्नं दशदोपविवर्जितम् । प्रमादकृतदोषाणां गुरवे विनिवेदनम् ॥३२।। मिथ्या में दुष्कृताधैर्यत्स्वामिन्यक्तिप्रतिक्रियम् । दोषव्यपोहनं साधु तत्प्रतिक्रमणं मतम् ॥३३॥ पालोचनाधनः गुद्धि प्रतिक्रमणनोऽपि च । तदुमयं तु तदुरिष्टं प्रायश्चित्तं विशुद्धिकृत ॥३४॥ स्याद्विवेकी विमजन यः संसकाळपानयोः । कायोत्सर्गादिकरणं व्युत्मर्ग. संप्रकीर्तितः ॥३५॥ तपरत्वनाशनायेव प्रायश्चित्तमुदीरितम् । प्रनग्याहापनं दो दिनमासादिमियतेः ॥३६॥ इन्हें आदि लेकर बुद्धिपूर्वक जो मुखका त्याग किया जाता है वह मोक्षमार्गकी प्रभावना करनेवाला कायक्लेश नामका तप है ॥ २६ ॥ यह अनशनादि छह प्रकारका तप बाह्यद्रव्यको अपेक्षा रखता तथा पर-कारणों से होता है, इसलिए इसे बाह्यतप कहा जाता है ।। २७ ।। मनका नियमन करनेके लिए आभ्यन्तर तप कहा गया है। इसमें किये हुए दोपोंकी शुद्धि करना प्रायश्चित्त तप है । यह प्रायश्चित्त आलोचना आदिके भेदसे नौ प्रकारका कहा गया है ॥ २८ ॥ पूज्य पदार्थों में आदर प्रकट करना विनय है। विनयके चार भेद हैं । अपने शरीरसे तथा अन्य द्रव्योंसे द्रव्योंकी सेवा करना वैयावृत्य है, इसके दश भेद हैं ।। २९॥ ज्ञानकी भावनामें आलस्य छोड़ना स्वाध्याय है, इसके पाँच भेद हैं । बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रहोंमें 'ये मेरे हैं। इस प्रकारके संकल्पका त्याग करना व्युत्सर्ग है, इसके दो भेद हैं ॥३०॥ और चित्तको चञ्चलनाका त्याग करना ध्यान है, यह चार प्रकारका होता है। इनमें आर्त और रीढ़ ये दो ध्यान खोटे ध्यान हैं और धर्म्य तथा शुक्ल ये दो उत्तम ध्यान हैं ॥३१॥ आलोचनाके नी भेद इस प्रकार हैं-१ आलोचना, २ प्रतिक्रमण, ३ तदुभय, ४ विवेक, ५ व्युत्सर्ग, ६ तप, ७ छेद, ८ परिहार और ९ उपस्थापन। इनमें प्रमादसे किये हुए दोपोंका सम्पूर्ण रूपमे दहा प्रकारके दोप छोड़कर गुरुके लिए निवेदन करना आलोचना नामका प्रायश्चित्त है ॥३२॥ 'मिथ्या दुष्कृतमस्तु' इत्यादि शब्दोंके द्वारा अपने-आप दोपोंको प्रकट कर उनका दूर करना प्रतिक्रमण नामक प्रायश्चित्त माना गया है ॥३३॥ आलोचना तथा प्रतिक्रमण दोनोंमे जोशुद्धि होती है वह विशुद्धिको करनेवाला सदुभय नामका प्रायश्चित्त फहा गया है ॥ ३४ ॥ समक्त अन्न-पानका विभाग करना वियेक कहलाता है। भावार्थ--- कुछ ममयके लिए अपराधी मुनिको इस प्रकारका दण्ड देना कि अन्य निर्दोप मुनियों के साथ चर्याक लिए न जाओ अन्य मुनियोंके भोजनफे याद किसी अन्य चौकामें भोजन करो तथा अपने पीछी कमण्डलु जुदै रयो दूसरोंके पीदी कमण्डलु अपने उपयोगमें न लाओ। इस प्रकारके दण्डको विक नामक प्रायश्चित्त कहते हैं। कायोत्मर्ग आदिका करना व्युत्सर्ग पहलाना है ॥ ३५ ॥ उपवाम आदि तप करना तप नामका प्रायश्चित्त कहा गया है । दिन, १. सामेन म । २. समस्त (:. दि.), हन्छु म.,.,म.। ३. तप गुरये प्रमादनिवेदन परामपरिस्तिमाल चनम् 'आइपिए भतुमागिय महिं पादरं च मुहम च । सह महाउलियं परमा भण्यात तस्मेरी ॥ इति दम दीमा-स.मि. । ४. विनिवेदितम् ।.। ५. ममतामयीपकरणादिविम- मन विक-म.गि।

चतुःषष्टितमः सर्गः पक्षमासादिभेदेन दूरत: परिवर्जनम् । परिहारः पुनर्दीचा स्यादुपस्थापना पुनः ॥३७॥ कालानतिक्रमादौ तु ज्ञानाचारऽष्टधामते । यधीनग्रहणादियः स ज्ञानविनयो मतः ॥३८॥ 'अष्टधादर्शनाचार निशङ्कादिपु संस्थिते । विनयो दर्शने दृश्यो गुणदोपविवेकिता ॥३९॥ त्रयोदशविधोदारचारित्राचारगोचरा । निरतीचारता चारुचरित्रविनयः परः ॥४०॥ याः प्रत्यक्षपरोक्षेषु प्रत्युत्थानादिकाः क्रियाः । गुर्वादिषु यथायोग्यं विनयश्चौपचारिकः ॥४१॥ - महीना आदिसे मुनिकी दीक्षा कम कर देना छेद नामका प्रायश्चित है । भावार्थ-मुनियोंमें नवीन दोक्षित मुनि पूर्वदीक्षित मुनिको नमस्कार करते हैं। यदि किसी पूर्वदीक्षित भुनिको दीक्षा कम कर दी जाती है तो वह नवीन दीक्षित मुनिसे पोछेका दीक्षित हो जाता है; इस तरह उसे, जिससे वह पहले पूजता था उसे पूजना पड़ता है, नमस्कार करना पड़ता है, यह छेद नामका प्रायश्चित है ॥३६॥ पक्ष, महीना आदि निश्चित समय तक अपराधी मुनिको संघसे दूर कर देना परिहार नामका प्रायश्चित्त है और फिरसे नवीन दीक्षा देना उपस्थापना नामका प्रायश्चित्त है। जिसे उपस्थापना दण्ड दिया गया है उसे संघके सब मुनियोंको नमस्कार करना पड़ता है, क्योंकि वे अव इससे पूर्वदीक्षित हो जाते हैं और यह नवीन दीक्षित कहलाने लगता है ।। ३७ ॥ ज्ञानविनय, दर्शनविनय, चारित्रविनय और उपचारविनयके भेदसे विनयतपके चार भेद हैं। इनमें कालानतिक्रमण आदि जो आठ प्रकारका ज्ञानाचार बताया है उसे आगमोक्त विधिसे ग्रहण करना वह ज्ञानविनय है। भावार्थ-१ शब्दाचार, २ अर्थाचार, ३ उभयाचार, ४ कालाचार, ५ विनयाचार, ६ उपधानाचार, ७ बहुमानाचार और ८ अनिल- वाचार, ये ज्ञानाचारके आठ भेद हैं । शब्दका शुद्ध उच्चारण करना शब्दाचार है । शुद्ध अर्थका निश्चय करना अर्थाचार है । शब्द और अर्थ दोनोंका शुद्ध होना उभयाचार है । अकालमें स्वाध्याय न कर विहित समयमें ही स्वाध्याय करना कालाचार है। विनयपूर्वक स्वाध्याय- करना-स्वाध्यायके समय शरीर तथा वस्त्र शुद्ध रखना एवं आसन वगैरहका ठीक रखना विनयाचार है। चित्तकी स्थिरतापूर्वक स्वाध्याय करना उपधानाचार है। शास्त्र तथा गुरु आदिका पूर्ण आदर रखना बहुमानाचार है और जिस गुरु अथवा जिस शास्त्रसे ज्ञान हुआ है उसका नाम नहीं छिपाना,उसके प्रति सदैव कृतज्ञ रहना अनिवाचार है । इन आठ ज्ञाना- चारोंका विधिपूर्वक पालन करना वह ज्ञानविनय है ॥ ३८॥ निःशवित आदि आठ अंगोंके भेदसे दर्शनाचार आठ प्रकारका है, उसमें गुणदोपका विवेक रखना यह दर्शनविनय है ॥३९॥ पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तिके भेदसे जो तेरह प्रकारका चारित्रा- चार है उसमें निरतिचार प्रवृत्ति करना चारित्र विनय है ॥४०॥ प्रत्यक्ष या परोक्ष दोनों ही अवस्थाओंमें गुरु आदिके उठनेपर उठकर अगवानी करना, नमस्कार करना आदि जो यथायोग्य प्रवृत्ति को जाती है उमे औपचारिकविनय कहते हैं ।। ४१ ॥ १. 'अर्थव्यञ्जनतव्याविकलताकालोपधप्रश्रयाः । स्वाचार्याधनपनयो बहुमतिश्चेत्यश्या व्याहृतम् । - रत्तप्रयपूजा 'अन्यार्थीमयपूर्णकाले विनयेन सोप्रधान च । बहुमानेन समन्वितमनिहय ज्ञानमाराध्यम् ॥३६॥ पु० सि. २. शङ्कादृष्टिविमोहकाङ्क्षणविधिव्यावृत्तिसन्नद्धता, वात्सल्यं विचिकित्सिनादुपरति धर्मोपबह- क्रियाम । शरत्या शामनदीपन हितपथाद् भ्रष्टय मंस्थापन, वन्दे दर्शनगोचर मुचरित मूनां नमन्नादरात् ।। २० पू० । ३. प्रत्युत्थानादिका क्रिया क.।

'हरिवंशपुराणे याह्यद्रग्यव्यपेक्षत्वात्परप्रत्ययहेतुकः । पद्विधस्यास्य बाह्यरवं तपसः प्रतिपादनम् ॥२७॥ मनोनियमनार्थत्वादाभ्यन्तरममिष्टुतम् । प्रायश्चित्तं कृतायद्यशोधन नवधाऽत्र तु ॥२८॥ चतुर्धा विनयः पूज्यवादरो दशधा पुनः । वय्यावृत्त्यं 'स्वकायनान्यद्रव्यैरप्युपासनम् ।।२९।। स्वाध्यायः पञ्चधा ज्ञानभावनालस्यवर्जनम् । स्वसंकल्पपरित्यागो व्युत्स! द्विविधः पुनः ॥३०॥ चित्ताक्षेपपरित्यागो ध्यानं चापि चतुविधम् । पातं रौद्रं च दुर्य्यानं धम्यंशुक्ले तु शामने ॥३१॥ तग्रालोचनकं कृत्स्नं दशदोपविवर्जितम् । प्रमादकृतदोपाणां गुरवे विनिवेदनम् ।।३२।। मिथ्या मे दुष्कृताधैर्यरस्वामिन्यक्ति प्रतिक्रियम् । दोपव्यपोहनं साधु तत्प्रतिक्रमणं मतम् ॥३३॥ आलोचनाद्यतः शुद्धि. प्रतिक्रमणतोऽपि च । तदुभयं तु तदुद्दिष्टं प्रायश्चित्तं विशुद्धिकृत् ॥३४॥ स्याद्विवेको विमजनं यः संसनोन्नपानयोः । कायोत्सर्गादिकरणं व्युत्सर्ग. संप्रकीर्तितः ॥३५।। तपस्स्वनशनायेव प्रायश्चित्तमुदीरितम् । प्रप्रज्याहापनं छेदो दिनमासादिमिर्यतेः ॥३६।। इन्हें आदि लेकर बुद्धिपूर्वक जो सुखका त्याग किया जाता है वह मोक्षमार्गकी करनेवाला कायक्लेश नामका तप है ।। २६ ॥ यह अनशनादि छह प्रकारका तपः अपेक्षा रखता तथा पर-कारणांसे होता है, इसलिए इसे बाह्यतप कहा जाता है ।। मनका नियमन करनेके लिए आभ्यन्तर तप कहा गया है। इसमें किये हु। शुद्धि करना प्रायश्चित्त तप है । यह प्रायश्चित्त आलोचना आदिके भेदसे नी प्रक गया है ।। २८ ।। पूज्य पदार्थोंमें आदर प्रकट करना विनय है । विनयके चार भेद शरीरसे तथा अन्य द्रव्योंसे द्रव्योंकी सेवा करना वैयावृत्य है, इसके दश भेट ज्ञानकी भावनामे आलस्य छोड़ना स्वाध्याय है, इसके पॉच भेद हैं । वाह्य और परिग्रहोंमें 'ये मेरे हैं। इस प्रकारके संकल्पका त्याग करना व्युत्सर्ग है, इसके दो में और चित्तकी चञ्चलताका त्याग करना ध्यान है, यह चार प्रकारका हो ।' आर्त और रौढ़ ये दो ध्यान खोटे ध्यान हैं और धर्म्य तथा शुक्ल ये दो उत्तम आलोचनाके नौ भेद इस प्रकार हैं-१ आलोचना, २ प्रतिक्रमण, ३ तदुभः ५ व्युत्सर्ग, ६ तप, ७ छेद, ८ परिहार और ९ उपस्थापन। इनमें प्रमाद सम्पूर्ण रूपसे दश प्रकारके दोप छोड़कर गुरुके लिए निवेदन करना आ प्रायश्चित्त है ॥३२॥ 'मिथ्यामें दुष्कृतमस्तु' इत्यादि शब्दोंके द्वारा अपने-आप कर उनका दूर करना प्रतिक्रमण नामक प्रायश्चित्त माना गया है ॥३३॥ प्रतिक्रमण दोनांसे जो शुद्धि होती है वह विशुद्धिको करनेवाला तदुभय नार कहा गया है ॥ ३४ ॥ संसक्त अन्न-पानका विभाग करना विवेक कहलाना कुछ ममयके लिए अपराधी मुनिको इस प्रकारका दण्ड देना कि अन्य निर्दोष चर्याके लिए न जाओ अन्य मुनियोंके भोजनके याद किसी अन्य चीकामे . अपने पीछी कमण्डलु जुद रखो दूसरोंके पीछी कमण्डलु अपने उपयोग प्रकारके दण्डको विवेक नामक प्रायश्चित्त कहते हैं। कायोत्सर्ग आदिन कहलाता है ।। ३५ ॥ उपयाम आदि तप करना तप नामका प्रायश्चित्त F १.स्वामेन म । २. समस्तं (ड.टि.], कृाछ म०, क.,ख.! ३.. दरादोपरिवर्जितमालं.चनम् 'आम्पिय अणुमागिय में दिटुं वादरं च सुहुर्म च । अध्यत्त तस्सेवी' ।। इति दस दौसा-१० सि.। ४. विनिवेदितम् ग०। ५. संस जनं विवेक-मसि ।

७८९ । चनुषष्टितमः सर्गः 'मध्यः पञ्चेन्द्रियः संज्ञी पर्याप्तो लब्धिमियुतः । अन्तःशुद्धिप्रवृद्धो स्याद्वहुकर्मविनिर्जरः ॥५२॥ ततः प्रथमसम्यक्रवलामकारणमग्निधौ । सम्यग्दृष्टिभंवत्स स्यादमख्यगुणनिरः ॥५३।। ततः श्रावक्रतापन्नोऽसंख्ययगुणनिर्जरः । ततोऽपि विरतस्तस्मादनन्तानां वियोजकः ।।५४॥ ततो दर्शनमोहस्य क्षपकः क्षायिकोद्धकृत् । ततश्चारित्रमोहस्य सपिशमको यतिः ॥५५॥ उपशान्तकपायोऽतोऽसंख्येयगुणनिर्जरः । ततश्चारित्रमोहस्य क्षपकः क्षपकामिधः ॥५६॥ ततः क्षीणकपायाख्योऽसंख्ययगुणनिर्जरः । जिनेन्द्रः कंवली तस्मादनन्तज्ञानदर्शनः ॥५॥ पुलाको वकुशश्चैव कुशीला गुणशीलवान् । निग्रंन्यः स्नातकश्चेति निर्ग्रन्याः पञ्चधा मताः ॥१८॥ पुलाका मावनाहीना ये गुणेपूत्तरेषु ते । न्यूनाः कचित्कदाचिन पुलाकामा व्रतप्यपि ॥५१॥ असण्डितव्रताः कायभूपोपकरणानुगाः । अविविक्तपरीवाराः शवला वकुशाः स्मृताः ॥६०॥ परिपूर्णीमया जातूत्तरगुणविरोधिनः । प्रतिसेवनाफुशीला ये अविविक्तपरिग्रहाः ॥६॥ २ परिणामोंमें भेद होनेसे प्रत्येक स्थानों में भेदको प्राप्त होती है ॥५१॥ यहाँ निर्जराके कुछ स्थान बताये जाते हैं-सर्वप्रथम संज्ञीपञ्चोन्द्रियपर्याप्रकभन्य जीव जब करणादि लब्धियों- से युक्त हो, अन्तरगकी शुद्धिको वृद्धिंगत करता है तब उसके बहुत कर्मोकी निर्जरा होती है। उसके बाद जब यह जीव प्रथमोपशमसम्यक्त्वकी प्राप्तिके योग्य कारणोंके मिलनेपर सम्यग्दृष्टि होता है तब उसके पूर्वस्थानकी अपेक्षा असंख्यातगुणी निर्जरा होती है ।।५२-५३॥ उससे असंख्यातगुणी निर्जरा श्रापकके होती है, उससे असंख्यातगुणी विरतके, विरतसे असंख्यातगुणी अनन्तानुवन्धीकी विसंयोजना करनेवालेके, उससे असंख्यातगुणी दर्शनमोहका क्षय कर क्षायिकसम्यक्त्व प्राप्त करनेवालेके, उससे असंख्यातगुणी चारित्र- मोहका उपशम करनेवाले उपशमश्रेणी में स्थित मुनिके, उससे असंख्यातगुणी उपशान्त- कपाय नामक ग्यारहवें गुणस्थानवक, उससे असंख्यातगुणी चारित्रमोहका क्षय करनेवाले क्षपकश्रेणीमें स्थित मुनिके, उससे असंख्यातगुणी श्रीणकपाय नामक यारहवें गुणस्थानवर्तक और उससे असंख्यातगुणी अनन्तज्ञानदर्शनके घारक केवलो जिनेन्द्रके होती है ।।५४-५७। पुलाक, चकुश, कुशील, निम्रन्थ और स्नातकके भेदसे निर्ग्रन्थ मुनियोंके पाँच भेद हैं ।।५८। जो उत्तर गुणोंको भावनासे रहित हों तथा मूल व्रतमें भी जो कही कभी पूर्णताको प्राप्त न हों वे धान्य टिलकेके समान पुलाक मुनि कहलाते हैं । ५९|| जो मूल प्रताफा तो अखण्ड रूपसे पालन करते हैं परन्तु शरीर और उपकरणोंको माफ-सुथरा रखनेमें लीन रहते हों, जिनका परिवार नियत न हो-जो अनेक मुनियोंके परिवारसे युक्त हों और मलिन- सातिचार चारित्रके धारक हों उन्हें वकुश कहते हैं ॥६०॥ प्रतिसेयनाकुझील और कपाय- कुशीलको अपेक्षा कुशील मुनियोंके दो भेद हैं। जो मूलगुण और उत्तरगुण दोनोंको पूर्णतासे युक्त हैं, परन्तु कदाचित् उत्तरगुणोंकी विराधना कर बैठते हैं एवं संघ आदि परि- १. सम्यग्दृष्टिावकविरतानन्तपियोभकदर्शनमोहलपकोपशमकोपशान्तमोहपाशीणमोहजिनाः क्रम. शोऽसख्येगगुगनिजंगः ॥४५॥ त० सू०, न०, अ.। सम्मनुपपतीये सावयविरदे मगन्तकम्मसे । टसण. मोहस्वयगे कमाय उवसामगे य उपसंडे ॥३६|| खबगे य खोममोहे जिगेमु टन्बा अस्वगुणिदकमा । तस्विरीया काला संखेत्रगुणवमा होनि ॥६७ ॥ गो० जी० । २. 'पुलाकर कुशकुशीलनियस्नातका निग्रन्थाः ॥ त० मू०, नवमाध्याय, ४६ सूत्र । ३. अनियतारिवारा: (१० टि.} । ४. मलिनचारित्र- युक्ता. (ट.दि.), सबलाःम, फ०, २०,१०। .

७९० हरिवंशपुराणे शामिवान्यक्रमाया ये ससंज्वलनमात्रकाः। ते कपायकुशीलाः स्युः कुशीला द्विविधा यतः ॥२॥ अन्यनोदयकर्माणो ये पयोदण्हरानिवत् । निर्ग्रन्यारते मुहूतावादिद्यमानात्मकंवलाः ॥६॥ प्रक्षीणवातिकमाण: स्नातकाः कंवलीश्वराः । एवं पञ्चापि निर्ग्रन्या नेगमादिनयाश्रयात् ॥६॥ 'संयमादिमिरष्टामिरनुयोगर्यथाक्रमम् । ते पुलाकादयः साध्याः साध्यसाधनमेदिनः ॥६५॥ प्रतिमेवनाकुलाः पुलाका वकुशा द्वयोः । प्रायायकुशीलाः स्युरन्तवज्ये चतुष्टय ॥६६॥ संयम च यथाख्याते निग्रंन्यस्नातकाः स्थिताः । श्रुतादयोऽपि पञ्चानां प्रकथ्यन्ते यथाक्रमम् ॥६॥ प्रतिसेवनाकुमीलाः पुलाका वकुशाः स्थिताः । दाण्यिमिवानि विभ्रत्युत्कर्षतः श्रुतम् ॥६॥ यं कायकुला ये निर्धन्याख्याश्च संयताः । ते चतुदंशपूर्वाणि सर्वे विभ्रनि सर्वथा ॥६९॥ जयन्येन पुलाकस्य श्रुतमाचारवस्तु तत् । निग्रंन्यान्तयतीनां वृष्टी प्रवचनमातरः ॥७॥ बताना रान्यमुक्तेश्व बलादन्यतमं प्रति । सेवमानः पुलाकः स्या परंपामभियोगतः ॥७॥ वकुमाः मोपकरणो बहूपकरणप्रियः । शरीरवकुशः कायसंस्कार प्रतिसेवते ॥७२॥ प्रतिसेवनाकुशील उत्तरपु विराधनाम् । गुगेषु सेवते काजिदविराधितमूलकः ॥७३॥ स्युः कपायकुशीलास्तु रहिवप्रतिसेवनाः। निग्रंन्याः स्नातकाचारि ते सर्वे सर्वतीर्थजाः ॥७॥ मावलिङ्गं प्रतीन्यामी निप्रन्याः पञ्च लिह्निनः । प्रतीत्य दयलिङ्गं तु मजनीया मनीषिभिः ॥७५॥ प्रहसे युक्त होते हैं वे प्रनिसेवनाकुशील हैं, जिनके अन्य कपाय शान्त हो गये हैं सिर्फ मंग्वलनका उदय रह गया है वे कपायकुशील कहलाते हैं ।।६१-६॥ जिनके जलमें खींची गयो दण्डकी रेखाके समान कमांका उदय अव्यक्त-अप्रकट रहता है तथा जिन्हें एक मुहूर्तके बाद केवलज्ञान उत्पन्न होनेवाला है वे निर्ग्रन्थ कहलाते हैं ॥६३॥ और जिनके घातियाकर्म नष्ट हो गये हैं, ऐसे केवली भगवान स्नातक कहलाते हैं। ये पाँचों ही मुनि नैगमादि नयोंकी अपेक्षा निर्घन्य माने जाते हैं ॥६४ा साध्यसाधनके भेदसे युक्त वे पुलाक आदि मुनि मंयम आदि आठ अनुयोगोंके द्वारा साध्य हैं ॥६५|| पुलाक, वकुश और प्रतिसेवना कुशील मुनि प्रारम्भके सामायिक और दोपस्थापना इन दो संयमोंमें, कपायकुशील यथाख्यातको छोड़ कर शेष चार संयमांमें और निम्रन्य तथा स्नातक यथाख्यात संयममें स्थित हैं। अब पाँचों मुनियोंके श्रुत आदिका भी यथाक्रमसे कयन किया जाता है ॥६६-६षा प्रतिसेवना कुशील, पुलाक और वकुटा ये उत्कृष्ट रूपसे अभिन्न दशपूर्व श्रुतको धारण करते हैं ।।६८॥ जो कपाय- कुशील और निर्गन्ध नामक मुनि हैं वे सब चौदह पूर्वको धारण करते हैं ॥६९॥ जघन्यकी अपना पुलाकमुनिक आचारयस्तुरूप श्रुत होता है और निम्रन्थपर्यन्त समस्न मुनियों के पाँच समिनि, तीन गुप्निरूप अष्टप्रवचन मातृका प्रमाणश्रुत होता है ॥७॥ प्रतिसेवनाको अपेक्षा पुलाक मुनि पाँच महावन नथा रात्रिभोजन त्याग इनमें से किसी एकका कभी दृमरोंका यत्पूर्वक जबर्दम्नीमे मेवन करनेवाला होता है ।।७। यकुशके मोपकरणया और शरीग्यकुशकी अपेक्षा दो भेट होते हैं। इनमें मोपकरणयकुशा अनेक उपकरणों के प्रमो होते हैं और शरीरव कुश शरीरमंस्कारको अपेक्षा रखते हैं-शरीरकी शोभा बढ़ाना चाहते 15 प्रतिमेवनाकुशील मूलं गुणों में विराधना नहीं करते किन्तु उत्तर गुणोंमें कभी कोई विराधना कर बैठते हैं |AI कपायकुशील निर्घन्य और स्नातकनिसेयनासे रहित होते । तीर्थकी अपेक्षा पुलाक आदि पाँचों मुनि मभी तीर्थकगेंक तीर्थमें होते हैं ।।७। लिगके माय और व्यकी अपेक्षा दो भेद होते हैं। मायलिगको अपेक्षा पुलाफ आदि पाँचों मुनि १ मग्मभुषविभवनातीयजिनसंपादयानविद्रसता माध्या. ||४|| d०, २०, नवमाध्याय । २.सिधन म. | ३ भायरिद तीर फर नियालिदिनी भानाव्यनिन प्रभागाः स.नि. ।

चतु.पष्टितमः सर्गः ७९१ पुलाकस्योत्तरास्तिस्रो वकुलपतिसेवना । कुशीलयोश्च 'पड्भेदाः कपाये चतुरुत्तराः ॥७६॥ स्यारसूक्ष्मसापराये च निर्ग्रन्थस्नातकेऽपि च । शुक्लैय केवला लेश्याऽयोगाः लेश्याविवर्जिताः ॥७॥ पुलाकस्योपपादः स्यात्महखारे परायुषः । प्रतिसेवनाकुशीलवकुशस्यारणेऽच्युते ॥७८॥ तथा सयंसिद्धा तु निर्ग्रन्यान्त्यकुशीलयोः । द्विसागरोपमायुष्काः सौधर्मे ते जघन्यतः ॥१९॥ संयमस्थानभेदास्तु स्यु. कपायनिमित्तकाः । असंख्येयतमानन्तगुणसंयमलब्धयः ॥४०॥ तय सर्वजवन्यानि लब्धिस्थानानि सर्वदा । स्युः कपायकुशीलस्य पुलाकस्य च योगिन ॥८॥ गच्छवस्लावसंख्येयस्थानानि युगपत्ततः । न्युच्छिद्यते पुलाकोऽन्यस्वसंख्येयानि गच्छति ॥८२।। वकुशेन कुशीली द्वौ स्थानानि युगपत्ततः । असंख्यानि च ती याती वकुशस्त्ववहीयते ॥४३॥ असंख्येयानि गावातः स्थानानि प्रतिसेवना। कुगीलो हीयते तस्मायः कपायकुशीलकः ॥८॥ स्थानान्यतोऽपायाणि निग्रंन्यः प्रतिपद्यते । सोऽमस्येयानि गत्वातो म्युच्छेदमुपगच्छति ॥४५॥ स्थानमेकमतस्तूवं गवानन्तगुणर्धिकः । स्नातकः कृसकर्मान्तो निर्वाणं प्रतिपद्यते ॥८६॥ निर्ग्रन्थ लिङ्गके धारक हैं और द्रव्यलिङ्गकी अपेक्षा विद्वानोंके द्वारा भजनीय हैं ॥७५|| लेश्याकी अपेक्षा पुलाकमुनिके आगेकी तीन अर्थात् पीत, पद्म और शुक्ल ये तीन, वकुश और प्रतिसेवनाकुशीलके छहों, कपायकुशीलके आगेकी चार अर्थात् कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल ये चार एवं सूहमसाम्पराय, निम्रन्थ और स्नातकके एक शुक्ललेश्या ही होती है। अयोग- केवलो स्नातक लेश्यासे रहित होते हैं ।।७६-991 उपपादकी अपेक्षा पुलाकका उपपाद सहस्रार स्वर्ग में होता है और वह वहाँ उत्कृष्ट आयुका धारक होता है। प्रतिसेवनाकुशील और वकुशका उपपाद आरण और अच्युत स्वर्ग में होता है । निर्ग्रन्थ ( ग्यारहवें गुणस्थान- वर्ती ) और करायकुशीलका उपपाद सर्वार्थसिद्धिमें होता है और जघन्यकी अपेक्षा पुलाक आदि पाँचों मुनियोंका उपपाद सौधर्मस्वर्गमें होता है और वहाँ चे दो सागरको आयुके धारक होते हैं ।।७८-७९॥ प्रारम्भमें, संयममें जो स्थानभेद होते हैं वे कपायके निमित्तसे होते हैं तथा उनमें असंख्येय और अनन्तगुणीसंयमकी प्राप्ति होती है ।1०। इनमें सर्व- जघन्य लन्धिस्थान कपायकुशील और पुलाक मुनिके होते हैं। ये दोनों मुनि असंख्येय स्थानों तक साथ-साथ जाते हैं, उसके बाद पुलाकमुनि नीचे विच्छिन्न हो जाता है-नीचे रह जाता है और कपायकुशील असंख्येय स्थान तक आगे चला जाता है।८१-८२।। तदनन्तर वकुम और दोनों प्रकारके कुशील साथ-साथ असंख्यात स्थानों तक जाते हैं, उसके याद वकुश नीचे रह जाता है और दोनों कुरोल आगे बढ़े जाते हैं। तदनन्तर असंन्येय स्थान तक साथ-साथ जाकर प्रतिसेवनाकुझील नीचे छूट जाता है और कपायकुशील असंख्येय स्थान आगे चला जाता है। इसके आगे कपायकुझील भी निवृत्त हो जाता है। तदनन्तर कपायरहित संयमके स्थान प्रकट होते हैं और उन्हें निर्धन्य मुनि प्राप्त करना है। वह असंख्येय स्थानों तक जाकर पीछे छूट जाता है ।।८३-८५।। इसके आगे संयमका एक स्थान रहता है जिसे अनन्तगुण रूप ऋद्धियोंको धारण करनेवाला स्नातक प्राप्त करता है और यह वहाँ फर्मोंका अन्त कर निर्वाणको प्राम होता है। १. कृष्णमेश्यादितिय तयो. कमिति चेदुच्यते-तयोरपकरणामक्तिममात् आतध्यान कहानि. संभवति, अार्तध्यानेन च कृष्णादि लेश्याश्रित संमयतीति । २. दकमांतीम हरिवंशपुराणे 'क्षेत्रकालादिमिः सिद्धाः साध्या द्वादशभिस्तु ते । अनुयोगर्यथायोग्यं नयद्वयविवक्षया ॥८॥ सिद्धिक्षेत्रे मता सिद्धिरात्माकाशप्रदेशयोः । प्रत्युत्पन्न प्रतिग्राहिनययोगादसङ्गिनाम् ।।८८॥ कर्मभूमिषु सर्वासु जन्म प्रति च संहृतिम् । संसिद्धिर्मानुपे क्षेत्रे भूतग्राहिनयेक्षया 1८९॥ एकस्मिन् समये कालात्प्रत्युत्पन्नमयेक्षया । भूतग्राहिनयेक्षातो जन्मतोऽप्यविशेषतः ॥९०॥- उत्सपिण्यवसर्पिण्योतिः सिद्धयति जन्मवान् । विशेषेणावसपिण्यां तृतीयान्ततुरीययो ॥९॥ दुःषमायां तु संजातो दुःपमायां न सिद्धयति । उत्सर्पिण्यवसपिण्योः संहारात्सर्वदा पुनः ॥१२॥ सिद्धिः सिद्धिगती ज्ञेया मुमनुष्यगतौ यथा । भवेदत्वेन लिङ्गेन भावतस्तु त्रिवेदतः ॥१३॥ न द्रव्याद्रव्यतः सिद्धिः पुल्लिग्नेनैव निश्चिता । निर्धन्धेन च लिङ्गन सग्रन्थेनाश्या न या ।।९।। तीर्थसिद्धिविधा तीर्थकारीतरविकल्पतः । सति तीर्थकरे सिद्धा असतीतीतरे द्विधा ॥१५॥ सिद्धिरव्यपदेशेन नयादेकेन वा पुनः । चतुर्मिः पञ्चमिर्वापि चारित्रैरुपजायते ।।९६॥ क्षेत्र, काल आदि बारह अनुयोगोंके द्वारा सिद्धोंमें भूतपूर्व प्रज्ञापन और प्रत्युत्पन्न- ग्राही नयको अपेक्षा भेद सिद्ध करने योग्य हैं ।। ८७॥ क्षेत्रअनुयोगसे जब विचार करते हैं तब प्रत्युत्पन्नग्राही नयकी अपेक्षा मुक्त जीवोंकी सिद्धि, सिद्धिक्षेत्रमें अथवा आत्मप्रदेशमें अथवा आकाशके प्रदेशोंमें होती है ।। ८८ ! और भूतपाही नयकी अपेक्षा जन्मसे पन्द्रह कर्मभूमियोंमें तथा संहरणसे मनुष्यलोक अर्थात् अढ़ाई द्वीपमें होती है ।।८९।। कालअनुयोग- से विचार करनेपर यह जीव प्रत्युत्पन्न नयकी अपेक्षा एक समयमें सिद्ध होता है और भूत- ग्राही नयको अपेक्षा जन्मसे सामान्यतया उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीमें उत्पन्न हुआ जीव सिद्ध होता है और विशेष रूपसे अवसर्पिणीको तृतीय कालके अन्तमें तथा चतुर्थ कालमें सिद्ध होता है। चतुर्थ कालका उत्पन्न हुआ जीव दुःपमा नामक पञ्चम कालमें सिद्ध हो सकता है परन्तु दुःपमाका उत्पन्न हुआ दुःपमा सिद्ध नहीं होता। संहरणकी अपेक्षा उत्सर्पिणी अवसर्पिणीके सभी कालोंमें सिद्ध होता है। भावार्थ-जिस समय भरत और ऐरावतक्षेत्रमें प्रथम आदिकाल विद्यमान रहते हैं उस समय यदि कोई व्यन्तरादि देव किसी विदेहक्षेत्रके मुनिको संहरण कर भरत अथवा ऐरावतक्षेत्रमें छोड़ दे तो उनकी वहाँसे सिद्धि हो सकती है ।।९०-२२॥ गतिअनुयोगसे विचार करनेपर सिद्धिगतिमें अथवा मनुष्यगतिमें सिद्धि होती है । लिङ्गअनुयोगसे विचार करनेपर प्रत्युत्पन्न माही नयको अपेक्षा अवेदसे सिद्धि होती है और भूतार्थग्राही नयको अपेक्षा भायवेदसे तीनों वेदोंमें सिद्धि होती है । द्रव्यवेदको अपेक्षा तीनों वेदोंसे सिद्धि नहीं होती सिर्फ पुरुषवेदसे ही होती है । अथवा लिङ्गका अर्थ वेप भी हो सकता है इसलिए प्रत्युत्पन्न नयकी अपेक्षा निर्ग्रन्थ लिङ्गसे ही सिद्धि होती है और भूतार्थनाही नयकी अपेक्षा सग्रन्थ लिङ्गसे होती भी है और नहीं भी होती है ॥९३-९४।। तीर्थअनुयोगसे विचार करनेपर सिद्धि दो प्रकारकी होती है, कोई तीर्थकर होकर सिद्ध होता है और कोई मामान्य केवली होकर सिद्ध होता है। अथवा कोई तीर्थकरके विद्यमान रहते सिद्ध होता है और कोई तीर्थकरके मोक्ष चले जानेपर उनके तीर्थमें सिद्ध होता है ।।१५।। चारित्रअनुयोगको अपेक्षा विचार करनेपर प्रत्युत्पन्नमाही नयकी अपेक्षा एक यथाख्यात चारित्रसे ही सिद्धि होती है और भूतार्थग्राही नयकी अपेक्षा चार अथवा पाँच चारित्रोंसे होती है । भावार्थ-यथाख्यातके पहले सामायिक, छेदोपस्थापना और सूक्ष्म १. 'क्षेत्रकालगतिलिङ्गतीर्थचारित्रप्रत्येकबुद्धबोधितशानावगाहनान्तरसंध्याल्पबहुत्वतः साध्या.' ॥६॥ त. सू०, दशमाध्याय।

चनु पष्टितमः सर्गः - । मितिः प्रत्येकबुद्धानां स्वतो वाधिमुपैयुपाम् । तथा बाधितबुद्धानां परतो वोधिलामिनाम् ॥९७॥ "सिद्धिज्ञानविशेष स्यादकद्वित्रिचनुष्कः । अवगाहन चोन्कृष्टजघन्यान्नर्मिदावता ॥९॥ अवगाहनमुन्कृष्टमूनं पक्षधनु शती। पञ्चविंशां च देशोनारत्न योऽर्धचतुर्थकाः ॥१९॥ मध्येऽनकविकल्पास्तु यथासमवसरिताः । नत्र सिद्धयति चैतस्मिन् कस्मिन्नवगाहने ॥१०॥ अन्तर. शून्यकाल. स्यादन्तरं सिद्धयना पुनः । जघन्येनैकममयो मामानां पटकमन्यथा ॥१०॥ जघन्येनैक "वैश्ममये सिद्धयनि ध्रुवम् । तथोकणाष्टशतमंन्यास्त संख्यथा स्मृताः ॥१०२॥ क्षेत्रादिभेदमिनानां संख्याभेदः परस्परम् । ख्यानमल्पवहुन्वं च मिद्विक्षेत्रे न विद्यते ॥१०॥ भूतपूर्वव्यपेक्षानश्चिन्यते तन्नु तद्यथा । जन्मनः संहृतेश्चेनि क्षेत्रसिद्धा द्विधा मताः ।।१०।। अल्प संहारसिद्धास्त जन्मसिद्धास्तु नत्त्वतः । स्युः संख्येयगुणाः सर्वे सार्वसर्वनशासने ॥१०५॥ अर्चलोकस्य सिद्धा ये स्तोकास्तऽधो जगद्गताः । स्युः संग्व्ययगुणास्नियंग्लोकमिदास्तथा ततः ॥१०६॥ माम्परायचारित्र अनिवार्य रूपसे सभीके होते हैं और परिहार विशुद्धि, किन्हीं-किन्हींके होता है इसलिए जिनके परिहारविशुद्धि नहीं होगा उनके चार चारित्रोंसे और जिनके परि- हारविशुद्धि होगा उनके पॉच चारित्रोंसे सिद्धि होती है, यह भूतार्थग्राही नयकी अपेक्षा है। प्रत्युत्पन्नग्राही नयकी अपेक्षा चौदहवें गुणस्थानमें एक परमयथाख्यात चारित्र ही होता है इसलिए एक चारित्रसे ही मिद्धि प्राप्त होनेका कथन है ।। ९६ ।। प्रत्येक बुद्ध और योधितबुद्ध- अनुयोगसे विचार करनेपर प्रत्येक बुद्ध जो कि अपने-आप रत्नत्रयको प्राप्त होते हैं और चोधित बुद्ध जो कि दूमरोंके उपदेशसे रत्नत्रय प्राप्त करते हैं-दोनोंको सिद्धि प्राप्त होती है. दोनों ही मोक्ष जाते हैं ॥९७|| ज्ञान अनुयोगसे विचार करनेपर प्रत्युत्पन्नग्राही नयकी अपेक्षा एक केवलबानसे ही मिद्धि होती है और भूतार्थप्राही नयकी अपेक्षा दो, तीन और चार ज्ञानोंसे सिद्धि होती है। भावार्थ-किन्हीं जीवोंकी केवलज्ञानके पूर्व मति और श्रुतमें दो ज्ञान होते हैं। किन्हींको मति, श्रुन, अवधि अथवा मति, श्रुत, मनापर्यय ये तीन ज्ञान होते हैं। और किन्हीको मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय ये चार ज्ञान होते हैं। अवगाहना अनुयोगसे विचार करनेपर अवगाहनाके उत्कृष्ट, जघन्य और मध्यमके भेदसे तीन भेद होते हैं। इनमें युक्त जीवोंकी उत्कृष्ट अवगाहना कुछ कम पाँच-सी पच्चीस धनुप है और जघन्य अवगाहना कुछ कम साढ़े तीन हाथ है। मध्यम अवगाहनाके यथा. मम्भव अनेक विकल्प कहे गये हैं । इन अवगाहनाओंमें-से जीव किसी एक अवगाहनासे सिद्ध होता है ।।९८-१००। अन्तर अनुयोगकी अपेक्षा विचार करनेपर अन्तरका अर्थ शून्यकाल- विरहकाल होता है सो मिद्ध होनेवाले जीवोंमें जघन्य अन्तर एक समयका और उत्कृष्ट अन्तर छह माह का होना है ।।१०१॥ संख्या अनुयोगकी अपेक्षा विचार करनेपर जघन्यरूपसे एक समयमें एक ही जीव सिद्ध होता है और उत्कृष्टतासे एक सी आठ जीव नक मिद्ध होते हैं ।।१०।। अल्पबहुत्य अनुयोगको अपेक्षा विचार करनेपर क्षेत्रादि भेदांसे भिन्न जीयों में जो परम्पर मरयाका भेद है वह अल्पबहुत्य कहलाता है। यह अल्पग्रहुत्य प्रत्युत्पन्नमाही नयी अपेक्षा सिद्धिक्षेत्र में नहीं है किन्तु भूतार्थग्राही नयी अपेक्षा उमका कुछ विचार किया जाता है। क्षेत्रमिद्ध जीव जन्म और मंहरणकी अपेक्षा दो प्रकारक माने गये हैं। इनमें संहरणमिद्ध थोड़ है और जन्ममिद्ध, महितकारी मर्वज्ञ जिनेन्द्र के शासनमें संहरण मिद्धोंकी अपेक्षा संख्यानगुणे बतलाये गये हैं।। १०३-१०५ ।। ऊलोकसे मिद्ध, होनेवाले थोड़े हैं, उनसे मंख्यातगुणे अधोलोकसे सिद्ध होनेवाले हैं और उनसे मंग्व्यानगुणे तिर्यग्लोकसे - १. मिदिर्शनविशेषेरेकनिश्चितुर्थकः म०। २. पञ्चविगा म०, पन्नविशान ख. 1३. यतःमः ।

हरिवंशपुराणे स्तोकाः समुद्रसिद्धास्तु स्युः संख्येयगुणाः पुनः। द्वीपसिद्धा इतीहत्यमविशेषेणभापिताः॥१०॥ 'लवणोदेऽत्र ये सिद्धाः सर्वस्तोकास्तु ते स्तुताः । कालोदसिद्धा बोद्धव्यास्तसंख्येयगुणाः सदा ॥१०॥ ये जम्बूद्वीपसिद्धास्ते स्युःसंख्येयगुणास्तथा । धातकोखण्डसिद्धाश्च पुष्करद्वीपगास्तथा ।।१०९।। यथा क्षेत्रविमागेन प्रोक्ताल्पबहुता तथा । सा कालादिविभागेन वेदितव्या यथागमम् ॥१०॥ इति दृग्ज्ञानचारित्रतपसामत्युपासकाः । सोमदत्तादयोऽन्त्ये ते पञ्च भूत्वारणाच्युते ।।११।। देवाः सामानिका भोग द्वाविंशत्यधिजीविनः । भुञ्जानास्तस्थुरस्यन्तशुद्धदर्शनदर्शनाः ॥१२॥ नागधीरपि मृत्वाप फलं धूमप्रमावनी । अनुभूय महादुःखं सा सप्तदशसागरम् ॥११३॥ भूस्वा स्वयंप्रमद्वीपे दुष्टो दृष्टिविषोरगः । त्रिमागरोपमायुष्कां मृत्वागावालुकाप्रमाम् ॥११॥ तत्रानुभूय दुःखौघांश्चिरादुद्वयं पापतः । सस्थावरकायेषु सानयत्सागरद्वयम् ॥११॥ ततो मातङ्गकन्याभूच्चम्पायां साऽन्यदा मुनेः । समाधिगुप्ततः कृत्वा मधुमांसादिवर्जनम् ॥११६॥ जीवितान्ते सुबन्धीः स्याच्चम्पायामेव वैश्यतः । धनवत्या सुता जाता नाम्ना च सुकुमारिका ॥१७॥ पापानुबन्धोपेण सुदुर्गन्धशरीरिका । रूपवत्यपि विद्वेष्या जावा युवजनस्य सा ॥१८॥ वैश्यस्य धनदेवस्याशीकदत्तासमुद्भवौ। तमयो जिनदेवश्च जिनदत्तश्च विश्रुतौ ।। ११९॥ कन्यां तामपि दुर्गन्धा वृतां बन्धुभिरग्रजः । परित्यज्य प्रववाज सुव्रतः सुप्रतान्तिके ॥१२०॥ सिद्ध होनेवाले हैं ।।१०६॥ समुद्रसे सिद्ध होनेवाले थोड़े हैं, इनसे संख्यातगुणे द्वीपसे सिद्ध होनेवाले है, यह सामान्यकी अपेक्षा कथन है, विशेपको अपेक्षा लबणसमुद्रमें जो सिद्ध होते हैं, वे सबसे थोड़े हैं, उनसे संख्यातगुणे कालोदधिसे सिद्ध होनेवाले हैं ॥१०७-१०८॥ जो जम्बूद्वीपसे सिद्ध होते हैं वे संख्येयगुणे हैं, उनसे संख्यातगुणे धातकीखण्डसे होनेवाले सिद्ध है और उनसे संख्यातगुणे पुष्करद्वीपसे होनेवाले सिद्ध हैं ॥१०९।। जिस प्रकार क्षेत्रविभागकी अपेक्षा अल्पबहुत्वका कथन किया है उसी प्रकार आगमके अनुसार काल आदि विभागको अपेक्षा भी जानना चाहिए ॥११०।। इस प्रकार सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रको अत्यन्त उपासना करनेवाले सोमदत्त आदि पाँची जीव अन्त समय मरकर आरण अच्युत स्वर्गमें सामानिक जातिके देय हुए । यहाँ वाईससागरको उनकी आयु थी । अत्यन्त शुद्ध सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले वे देव उत्तम भोग भोगते हुए यहाँ वाईस सागर तक स्थित रहे ॥१११-११२॥ विपमिश्रित भोजन देनेवालो नागश्री भी मरकर धूमप्रभानामक पाँचवें नरकफे फलको प्राप्त हुई। वह सत्तरह सागर तक यहाँके महादुःख भोगकर निकली और स्वयंप्रभद्वीपमें दृष्टिविप नामका सर्प हुई। तदनन्तर मरकर तीन सागरको आयुवाली वालुकाप्रभा नामक तीसरी पृथ्वी पहुँची ॥११३-११४॥ वहाँ पापके फलस्वरूप चिरकाल तक दुःखोंका समूह भोगकर निकली और अमस्थावर पर्यायमें दो सागर तक भटकती रही ॥११५॥ तदनन्तर चम्पापुरीमें एक चण्डालकी फन्या हुई । यहाँ उमने एक दिन ममाधिगुम नामक मुनिराजके पास मधु-मासादिका त्याग किया ।।११६|| जिससे अन्त ममय उसी चम्पापुरीमें मुबन्धु पैश्यकी धनयती श्रीसे मुफुमारिका नामकी पुत्री हुई ।। ११७ ॥ पापके पूर्व संस्कारसे उसके शरीरसे तीन दुर्गन्ध आती थी इसलिए रूपवती होनेपर भी यह युवाजनोंके द्वेषका पात्र हुई ।। ११८ । उनी नगरीमें धनदेय पक्ष्यको अशोकदत्ता नामक प्रोसे उत्पन्न जिनदेव और जिनदत्त नामक दो पुन रहते थे ॥ ११९ ।। जिनदेयके कुटुभ्यो जनांने उम दुर्गन्या कन्या माथ उसका विवाह १.-मप्यरोपेश म० । २. लागोदे वय. म० । ३. एप सब उल्लेग वेगालगत-इत्यादिस्य मांगमिष्यानुपाणिती यने । ४. दुसर.५. तत्र स्थावर-म.।

चतु.पष्टितमः सर्गः कनीयान् जिनदत्तस्तां वन्धुवाक्यांपरोधतः । परिणीयापि तस्याज दुर्गन्धामतिदूरतः ॥१२॥ आत्मानमपि निन्दन्ती सोपवासान्यदा च सा । क्षान्तार्यामायिंकायुना मोजयित्वातिमक्तितः ॥२२॥ अभिवन्द्य तदापच्छदायिक केन हेतुना । इमे परमरूपिण्यो स्थिते तपसि दुष्कर ॥१२३॥ सेति पृष्टा जगा हेतुमाययोस्तपसस्तयोः । प्रबोधनाय तस्याश्च करुणापरिनोदिता ॥२४॥ श्रूयतां सुकुमारि द्वे सुकुमारकुमारिकं । हेतु ा येन तापस्य तपस्विन्यो व्यवस्थित ॥१२५॥ सौधर्माधिपतेदेव्याविम पूर्वत्र जन्मनि । विमला सुप्रमा चेति सुप्रसिद्ध वभूवतुः ॥१२६॥ ते नन्दीश्वरयात्रायां जिनपूजार्थमागते । कयाञ्चिजातसंवेगे चित्तान्तरमिति धिने ॥१२७ ।। मनुष्यभवसंप्राप्ती करिप्यायो महत्तपः । आवां स्त्रीत्वनिमित्तं तु येन दुःखं न दृश्यते ॥१२८॥ इति संगीयं ते देव्यो दिवः प्रच्युत्य भूपतेः । श्रीपणस्यह साते श्रीकान्तायां सुयोपिति ॥१२९॥ हरिषणा सुता ज्येष्ठा श्रीपेणा च कनीयसी । जाते जाते च कान्त ते यौवनश्रीविभूषिते ॥१३०॥ स्वयंवरविधी स्मृन्वा पूर्व जन्म च मगरम् । वन्धुलोकं परित्यज्य कुमा? तपसि स्थिते ॥१३१॥ इनि ध्रुवार्यिकावास्यं निर्विष्णा सुकुमारिका । तदन्ते सा प्रधबाज संसारमयदेदिनी ॥१३२॥ तपस्विनीमिरन्यामिस्तपस्यन्ती तपस्विनी । कालं नीतवती नीन्या तपसा शोषितानिका ॥१३३॥ करना चाहा पर उसे वह स्वीकृत नहीं था इसलिए वह उस कन्याको छोड़ मुत्रत मुनिके समीप दीक्षित हो गया ।। १२० ।। बन्धुजनोंके उपरोधसे छोटे भाई जिनदत्तने यद्यपि उसके साथ विवाह कर लिया परन्तु दुर्गन्धके कारण उसे दूरसे ही छोड़ दिया ॥ १२१ ।। इस घटनासे मुकुमारिकाने अपनी बहुन निन्दा की । एक दिन उसने उपवास किया तथा अनेक आर्यिकाओं- से युक्त भान्ता नामकी आर्यिकाको बड़ी भक्तिसे भोजन कराया ।। १२२ ।। क्षान्ता आर्यिकाके साथ दो आर्यिका परम रूपवती तथा कठिन तपन तपनेवाली थी उन्हें देख उसने क्षान्ता आर्याको नमस्कार कर उनसे पूछा कि हे आर्ये ! ये दो रूपवती आर्यिकाएँ कठिन तपमें किस कारण स्थित हैं ? ॥ १२३ ।। इस प्रकार पूछे जानेपर दयासे प्रेरित क्षान्ता आर्याने सुकुमा- रिकाको सम्बोधन करनेके लिए उन दो आर्यिकाओंके तपका कारण कहा ।।१२४। उन्होंने कहना प्रारम्भ किया—कि हे सुकुमारि ! सुन, ये मुकुमार कुमारिकाएँ जिस कारण तपस्विनी बनकर तप करनेमें लगी हुई हैं ।। १२५ ।। ये दोनों पूर्व भवमें सौधर्म स्वर्गके इन्द्रकी विमला और मुप्रभा नामकी देवियाँ थीं ।। १२६ ।। एक दिन ये नन्दीश्वर पर्वकी यात्रामें जिन पूजाके लिए आयी थीं कि किसी कारण संसारसे विरक्त हो चित्तमे इस प्रकारका विचार करने लगी कि यदि हम मनुष्यभवको प्राप्त हों तो महातप करेंगी। सा महातप कि जिससे फिर यह स्त्री-पर्यायसम्बन्धी दुख दिखायी नहीं देगा ॥ १२७-१२८ । इस प्रकार प्रतिज्ञा कर वे देवियाँ स्वर्गसे च्युत हुई और यहाँ अयोध्या नगरीके राजा श्रीषणकी श्रीकान्ता नामक स्रोसे हरिपेणा नामकी बड़ी और श्रीपेणा नामकी छोटी पुत्री हुई। समय पाकर ये दोनों ही रूपयती और यौवनरूपी लक्ष्मीसे सुशो- मित हो गयीं ॥ १२९-२३॥ इन दोनों कुमारियोंका स्वयंवर हो रहा था कि उसी समय इन्हें अपने पूर्व जन्म नथा की हुई प्रतिज्ञाका स्मरण हो आया जिससे ये बन्धुजनोंको छोड़ तत्काल तप करने लगी ।। १३१ ।। क्षान्ता आर्यिका उक्त पचन सुन सुकुमारिका भी विरक्त हो गयी और संसारसे भयभीत हो उन्हींके ममीप दीक्षित हो गयी ।।१३।। अन्य तपस्विनियोंके माथ तप करती हुई १.-नोधन मा।

हरिवंशपुराणे वसन्तसेनां गणिकां कामुकैः परिवेष्टिताम् । दृष्ट्वा वनविहारंऽमावेकदा क्रीडनाद्यताम् ॥१३४॥ निदानमकरोक्लिष्टा दुर्यशःप्राप्तिकारणम् । सौभाग्यमीदृशं मेऽन्यजन्मन्यस्थिति सादरा ॥३५॥ स्वमर्नुः सोमभूतेस्तु मृत्याभूदारणाच्युते । देवी सा पञ्चपञ्चाशत्पल्यतुल्यनिजस्थितिः ।।१३६॥ च्युन्या ते पाण्डुराजस्य सोमदत्तादयस्वयः । कुन्त्यां युधिष्टिरो मीमः पार्थश्वेन्यमवन् मुनाः ॥ १३७॥ धनश्रीपूर्वको देवो मित्रश्रीपूर्वकस्तथा । नकुल. सहदेवश्च मयां जातो शरीरजी ॥१३॥ सा कुमारी दिवश्च्युवा द्रपदस्य शरीरजा । जाता दृढस्थाख्यायां स्त्रियां द्रौपद्यमिख्यया ॥१३९॥ द्रौपद्यर्जुनयोर्योग पूर्वस्नेहन साम्प्रतम् । सुव्यक्तं साम्प्रनं जातो राबावेधपुरस्सरः ॥१४॥ ज्येष्टानां भविता सिद्धिस्त्रयाणामिह जन्मनि । सर्वार्थसिद्धिर्हि तयोरन्त्यपाण्डवयोरिह ।।१४।। सम्यग्दर्शनशुद्धाया द्रौपद्यास्तपसः फलान् । आरणाच्युतदेवत्वपूर्विका सिद्धिरिष्यते ॥१४२॥ इत्थं ते पाण्डवाः श्रुत्वा धर्म पूर्वमवांस्तथा । संवेगिनो जिनस्यान्त संयमं प्रनिपंदिरे ॥१४॥ कुन्ती च द्रोपदी देवी सुमद्राद्याश्च योषितः । राजीमत्याः समीपे ताः समस्तास्तपसि स्थिताः ॥१४॥ ज्ञानदर्शनचारित्रैत समितिगुप्तिमिः । आत्मानं भावयन्तस्ते पाण्डवाद्यास्तपोऽचरन् ॥१४५॥ शार्दूलविक्रीडितम् कुन्ताग्रेण वितीर्णभक्ष्यनियमः क्षुरक्षामगात्रः क्षमः पण्मासरथ भीमसेनमुनिपी निष्टाप्य स्वान्तक्लमम् । वह समय व्यतीत करने लगी। नीतिपूर्वक-आगमानुकूल तप करनेसे उसका शरीर सूब गया ।। १३३॥ एक दिन उसी गाँवी गणिका वसन्तसेना कामीजनोंसे बेष्टित हो वन-विहारके लिए आयो । क्रीड़ा करनेमें उद्यत उस गणिकाको देखकर आर्यिका सुकुमारिकाने लिष्ट परिणामांसे युक्त हो बड़े आदरसे अपयशकी प्राप्तिमें कारणभूत यह निदान किया कि अन्य जन्ममें-मुझे भी ऐसा सौभाग्य प्राप्त हो ।। १३४-१३५ ।। आयुके अन्तम मरकर वह आरणाच्युत युगलमें अपने पूर्व भवके पनि सोमभूति देवकी पचपन पल्यको आयुवाली देवी हुई ।। १३६ ।। सोम- दत्त आदि तीनों भाइयोंके जोय स्वर्गसे च्युत हो पाण्डु राजाकी कुन्ती नामक नामें युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन नामक पुत्र हुए ॥ १३७ ।। और धनश्री तथा मित्रीके जीव देव भी उन्हीं पाण्डु राजाकी माद्री नामक दूसरी स्त्रीसे नकुल और सहदेव नामक पुत्र हुए। १३८ । सुकु- मारिकाका जीव भी स्वर्गसे च्युत हो राजा द्रपदकी दृढरथा नामक स्वाँसे द्रौपदी नामकी पुत्री हुई ॥१३९|| पूर्व भवके स्नेहके कारण इस भवमें भी राधावेध पूर्वक द्रौपदी और अर्जुन का संयोग हुआ है ।। १४० । तीन ज्येष्ठ पाण्डव -युधिष्टिर, भीम और अर्जुन इसी जन्ममें मोक्षको प्राप्त होग और अन्तिम दो पाण्डव-नकुल और सहदेवको सर्वार्थसिद्धि प्राप्त होगी ॥ १४१ ।। सम्यग्दर्शनसे शुद्ध द्रौपदी तपके फलस्वरूप आरणाच्युन युगलमें देय होगी और उसके बाद मनुष्यपर्याय रख मोक्ष जायेगी। १४२॥ इस प्रकार वे पाण्डयधर्म तथा पूर्व भव श्रवण कर संसारसे विरक्त हो श्री नेमि जिने न्द्र के समीप संयमको प्राप्त हो गये ।। १४३ ।। कुन्ती, द्रौपदी तथा मुभद्रा आदि जो रिया श्री के सब राजीमती आर्यिकाके समीप तपमें लीन हो गयाबा१४४॥ सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्य- क्चारित्र, महावत, समिति तथा गुप्तियांस अपनी आत्माके स्वरूपका चिन्तवन करते हुए वे पाण्डव आदि तप करने लगे ॥१४॥! उन सब मुनियों में भीमसेन मुनि बहुत ही शक्तिशाली १. मेऽन्ये चन्मन्यरित्यति म०१२ -त्यभवत्सुनाम। ३. क्रमात् म०१४. कुन्त्यमेण म०, ख० । ५ सुरक्षामगावश्य कः । ६. मुनिपो इति पाठः प्रतिमानि । मुनिभिनिष्ठाप्य क०, ख०, ८०, म.1 ७. स्वान्नकर्म म., .., सान्तकमक।

चतुःषष्टितमः सर्गः पष्टाघरपवासमंदविधिमिनिष्टाभिमुख्यः स्थित- ज्येष्टायविंजहार योगिमिरिलां जनागमा मधिमिः ॥१४६॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रह हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती युधिष्ठिरादिपञ्चपाण्डवप्रवज्यावर्णनो नाम चतुःषष्टितमः सर्गः ॥६॥ थे। उन्होंने भालेके अग्रभागसे दिये हुए आहारको ग्रहण करनेका नियम लिया था, क्षुधासे उनका शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया था और छह महीनेमें उन्होंने इस वृत्ति परिसंख्यात तप- को पूरा कर हृदयका श्रम दूर किया था। युधिष्ठिर आदि मुनियोंने भी बड़ी श्रद्धाके साथ वेला तेला आदि उपचास किये थे। इस प्रकार मुनिराज भीमसेनने जैनागमके सागर युधिष्ठिर आदि मुनियोंके साथ पृथियोंपर विहार किया ।। १४६ ।। इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराण के संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्यरचित हरिवंशपुराणमें युधिष्ठिर आदि पाँच पाण्डवोंकी दीक्षाका वर्णन करनेवाला चीसठवा सर्ग समाप्त हुआ ॥६४|| पञ्चषष्टितमः सर्गः अथ सर्वामराकीणस्तीर्थकृरकृतदेशनः । उत्तरापथतो देशं सुराष्ट्रममिती यया ॥१॥ उत्तरायणमुरक्रम्य दक्षिणायनमागते । जिना तेजसा वृत्तिः प्रायस्सर्वनगामवत् ।।२।। आहन्त्यविमवोपते मही विहरतीश्वरे । दक्षिणा दक्षिणा देशा रेजिरे स्वर्गविभ्रमाः ॥३॥ तत्रोर्जयन्तमन्तेऽसावन्तकल्याणभूनिभाक् । आरोह समावन मृमुरासुरसेवित: ॥४॥ पूर्ववत्समवस्थानभूमिस्तश्रामवत्प्रभोः । तियंग्मानवदेवौधरनघः समधिष्टिता ॥५॥ धर्म तत्र जिनोऽवोचदनविनयपावनम् । स्वर्गापवर्गसौख्यकमाधनं साधुसम्मतम् ॥६॥ निषद्यायो यथाद्यायां पूर्व सर्वहितो जिनः । अन्त्यायां च तथा धर्म स सविस्तरमब्रवीत् ॥७॥ ऊर्ध्वग्वलनमुष्णत्वं यथाग्ने. शोतताध्यपाम् । जवनं मरुतस्तिर्यग्मास्वरत्वं च तेजसः ॥८॥ अमूनस्वं यथा व्योन्नः स्त्रमावाद्धारण क्षिते । कृतार्थस्य जिनेन्द्रस्य तथा धर्मस्य देशनम् ॥९॥ अघातिकर्मणामन्तं ततो योगनिरोधकृत् । कृत्वानेकशतः सिद्धिं जिनेन्द्रो मुनिभिर्ययो ॥१०॥ परिनिर्वाणकल्याणपूजामन्त्यशरीरगाम् । चतुर्विधसुरा जनीं चक्रुः शक्रपुरोगमाः ॥११॥ अथानन्तर समस्त देवोंसे युक्त भगवान् नेमिनाथ उपदेश करते हुए उत्तरापथसे मुराष्ट्र देशकी ओर आये ।।१।। जिनेन्द्ररूपी सूर्य यद्यपि उत्तरायणको उल्लङ्घन कर दक्षिणायनको प्राप्त हुए थे तथापि उनके तेजकी वृत्ति पहले ही के समान सर्वत्र व्याप्त थी। भावार्थ-जब सूर्य उत्तरायणसे दक्षिणायनकी ओर आता है तब उसका तेज कुछ कम हो जाता है परन्तु नेमि- जिनेन्द्ररूपी सूर्यका तेज उत्तरायण-उत्तर दिशासे दक्षिणायन- दक्षिण दिशामें आनेपर भी कम नहीं हुआ था, पहले ही के समान सर्वत्र व्याप्त था ॥२॥समवसरणकी विभूतिमे युक्त नेमिजिनेन्द्र जब दक्षिण दिशामें बिहार करते थे तब वहाँ के देश स्वर्गके समान मुशोभित हो रहे थे ।।३।। तदनन्तर जब अन्तिम समय आया तव निर्वाणकल्याणकको विभूतिको प्राप्त होनेवाले नेमिजिनेन्द्र मनुष्य, सुर और असुरोंसे सेवित होते हुए अपने आप गिरनार पर्वत- पर आरूढ हो गये ॥४॥ वहाँ पहले ही के समान फिरसे कलुपतारहित तियश्च मनुष्य और देवोंके समूहसे युक्त समवसरणकी रचना हो गयी ॥५।। समवसरणके योच विराजमान होकर जिनेन्द्र भगवान्ने स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्तिका एक साधन, रत्नत्रयसे पवित्र एवं साधुसंयत धर्मका उपदेश दिया ॥६॥ जिस प्रकार सर्वहितकारी जिनेन्द्र भगवान्ने केवल. ज्ञान उत्पन्न होनेके बाद पहली बैठक में विस्तारके साथ धर्मका उपदेश दिया था उसी प्रकार अन्तिम बैठकमें भी उन्होंने विस्तार के साथ धर्मका उपदेश दिया । जिस प्रकार अग्निमें ऊर्ध्वज्वलन और उष्णता, पानीमें शीतलता, वायुमें वेग, सूर्य चन्द्र आदि तेजस्वी पदार्थोमें सब ओरसे प्रकाशमानता. आकाशमें अमूर्तिकपना और पृथिवीमें किसी पदार्थको धारण करनेकी क्षमता स्वभावसे ही होती है, उसी प्रकार कृतकृत्य जिनेन्द्र भगवानका धर्मोपदेश स्वभावसे होता था किसीकी प्रेरणासे नहीं ॥८-९॥ तदनन्तर योगनिरोध करनेवाले भगवान् नेमिजिनेन्द्र अधातिया फाँका अन्त फर अनेक सौ मुनियों के साथ निर्वाण धामको प्राप्त हो गये ॥१०॥ जिन आगे-आगे इन्द्र चल रहे थे ऐसे चारों निकायके देवीने, भगवान्के १. भ्रजिरे क०, भेजिरे म.! २. स्वभावाद्वारण म०।

पञ्चषष्टितमः सर्गः ७९९ गन्धपुप्पादिमिदिन्यः पूजितास्तनवः क्षणान् । जनाद्या द्योतयात्यो द्यां विलोना विद्युतो यथा ॥१२॥ स्वमावोऽयं जिनादीनां शरीरपरमाणवः । मुञ्चति स्कन्धनामन्ते क्षणाक्षणरुचामिव ॥१३॥ ऊर्जयन्तगिरौ वन्नी वज्रेणालिख्य पाविनीम् । लोके सिद्धिशिलां चक्रे जिनलक्षणपतिभिः ।।१४।। वरदत्तादिसंघ च वन्दित्वा वामवादयः । देवा नृपतयश्चापि ययुः सर्वे यथायथम् ॥१५॥ दशादियो मुनयः पट्सहोदरसंयुताः । मिद्धि प्राप्तास्तथान्यंऽपि शम्बप्रद्युम्नपूर्वकाः ॥१६॥ ऊर्जयन्तादिनिर्वाणस्थानानि भुवने ततः । तीर्थयात्रागतानेकमन्यसेव्यानि रजिरे ॥१७॥ ज्ञात्वा मगवतः मिदि पञ्च पाण्डवसाधवः । शत्रुञ्जयगिरौ धीराः प्रतिमायोगिनः स्थिताः ॥१८॥ दुर्योधनान्वयस्तत्र स्थितो 'क्षुयवरोधनः । श्रुत्वागत्याकरोद्वैरादुपसर्ग सुदुस्महम् ॥१९॥ तप्तायोमयमूर्तीनि मुकुटानि ज्वलन्त्यलम् । कटकैः कटिसूत्रादि तन्मूर्धादिप्वयोजयत् ॥२०॥ राई दाहोपमग ते मनिर हिमशीतलम् । वीराः कर्मविपाकज्ञाः कर्मक्षयकृती क्षमाः ॥२१॥ शुक्लन्यानममाविष्टा भीमार्जुनयुधिष्टिराः । कृत्याप्टविधकर्मान्तं मोक्षं जग्मुस्खयोऽक्षयम् ॥२२॥ नकुलः सहदेवश्च ज्येष्टदाहं निरीक्ष्य तो। अनाकुलितचेतस्को ज.तो सर्वाधमिद्धिजी ॥२३॥ अन्तिम शरीरसे,सम्बन्ध रखनेवाली निर्वाणकल्याणककी पूजा की ॥११॥ दिव्य गन्ध तथा पुप्प आदिसे पूजित, तीर्थकर आदि मोक्षगामी जीवोंके शरीर, क्षण-भर में विजलीकी नाई आकाशको देदीप्यमान करते हुए विलीन हो गये ॥१२॥ क्योंकि यह स्वभाव है कि तीर्थकर आदिके शरीरके परमाणु अन्तिम ममय विजलीके समान क्षण-भरमें स्कन्धपर्यायको छोड़ देते हैं ॥३|| गिरनार पर्वतपर इन्द्रने वज्रसे उकेरकर इस लोकमें पवित्र सिद्धशिलाका निर्माण किया तथा उसे जिनेन्द्र भगयानके लक्षणोंके समूहसे युक्त किया ॥१४॥ तदनन्तर वरदत्त आदि मुनियोंके संघकी वन्दना कर इन्द्रादि देव और राजा लोग सब यथायोग्य अपने-अपने स्थान- पर चले गये ॥१५॥ समुद्रगविजय आदि नौ भाई, देवकीके युगलिया छह पुत्र तथा शंव और प्रद्युम्नकुमार आदि अन्य मुनि भी गिरनार पर्वतसे मोक्षको प्राप्त हुए। इसलिए उस समयसे गिरनार आदि निर्वाण स्थान संसारमें विख्यात हुए और तीर्थयात्राके लिए आनेवाले अनेक भव्य जीवोंके द्वारा सेवित होते हुए सुशोभित होने लगे ॥१६-१७।। , धीर-चोर पाँचों पाण्डव मुनि, भगवानको मोम हुआ जान शत्रुजय पर्वतपर प्रतिमा- योगसे विराजमान हो गये ।।१८।। उस समय यहाँ दुर्योधनके वंशका क्षुयवरोधन नामका कोई पुरुप रहता था। ज्यों ही उसने यहाँ पाण्डवोंका आना मुना त्यों ही आकर उसने वैर वा उनपर घोर उपसर्ग करना शुरू कर दिया ||१९|| उसने तपाये हुए लोहेके मुकुट, कड़े तथा कटिसून आदि वनवाये और उन्हें अग्निमें अत्यन्त प्रज्वलित कर उनके मस्तक आदि स्थानों में पहिनाये ।।२०।। पाण्डय मुनिराज अत्यन्त धीर-वीर थे, कर्मके उदयको जाननेवाले थे एवं कर्माका भय करने में ममर्थ थे, इसलिए उन्होंने दाहके उम भयंकर उपमर्गको हिमके समान शीतल समझा था ॥२१॥ भीम, अर्जुन और युधिष्ठिर ये तीन मुनिराज तो झुला ध्यानसे युक्त हो आठों कर्माका क्षय कर मोझ गये परन्तु नकुल और सहदेव बड़े भाईकी । राहको देख कुछ-कुछ आकुलितचित्त हो गये इमलिए सर्वार्थसिद्धिमें उत्पन्न हुए ॥२२-२३॥ १ पावनी ख०, पावन म० । २. पुनिभिः म०, प० । ३. युधयोधनः घ०म० । ४. ईपटालिन चेतो ययोस्तो इंघटय नप्रयोग ।

८०० हरिवंशपुराणे नारदोऽपि नरश्रेष्टः प्रयज्य तपसो बलात् । कृत्वा मवक्षयं मोक्षमक्षयं समुपेयिवान् ॥२४॥ अन्यऽपि बहवो भव्याः मुरबत्रयधारिणः । मोक्ष प्राप्ता. परे स्वर्गमामनभवसंक्षयोः ॥२५॥ तुझिकाशिखरारूदी बलदेवोऽपि दुष्करम् । तपो नानाविधं चक्रे भवचक्रक्षयोद्यतः ॥२६॥ एकद्विव्यादिपण्मासपर्यन्तोपोपितरमा । कपायवपुषां चक्रे शोपणं पोषणं कृतेः ॥२७॥ कान्तारमिक्षया प्राणधारणां कर्तुमुद्यनः । भ्रमन् कान्तारमध्येऽन्यैव्य॑लोकि शशिविभ्रमः ॥२८॥ पुरनामादिपु ख्यातां श्रुत्वा वातां तथाविधाम् । पर्यन्तवासिनी भूपाः प्राप्ताः क्षुमितमानसाः ॥२९॥ शङ्कानिपसमापनानानाप्रहरणाश्रितान् । सिद्धार्थस्तान् तथालोक्य सृष्टवान् सिंहमन्वनिम् ॥३०॥ मुनिपादसमीपे तान् सिंहानालोक्य भूभृतः । ते ज्ञातमुनिमामाः प्रणम्योपशमं ययुः ॥३१॥ ततः प्रभृत्यसौ लोके नरसिंह इति श्रुनिम् । सिंहोरस्को हली प्राप्तः सिंहानुचरसंयतः ॥३२॥ एक वर्षशतं कृत्वा तपो हलधरो मुनिः। समाराध्य परिप्राप्तो ब्रह्मलोक सुरेशताम् ॥३३॥ तत्र पद्मोत्तरे नाग्नि विमाने रनमास्वरे । देवदेवांगणाकोणे प्रासादोद्यानमण्डिते ॥३४॥ मनुप्यों में श्रेष्ठ नारद भी दीक्षा ले तपके बलसे संसारका क्षय कर अविनाशी मोक्षको प्राप्त हुए ॥२४|| समीचीन रत्नत्रयको धारण करनेवाले अन्य अनेक भव्य जीव भी मोक्षको प्राप्त हुए तथा निकट कालमें जिनके संसारका क्षय होनेवाला था ऐसे कितने ही जीव स्वर्ग गये ॥२५॥ तुङ्गीगिरिकी शिखरपर स्थित बलदेवने भी संसार-चक्रका क्षय करनेमें उद्यत हो नाना प्रकारका तप किया ॥२६॥ वे एक दिन, दो दिन, तीन दिनको आदि लेकर छह माह तकके उपवासोंसे कपाय और शरीरका शोपण तथा धैर्यका पोपण करते थे ॥२७॥ वनमें मिलनेवाली भिक्षासे प्राण धारण करने के लिए उद्यत बलदेव मुनिराज, वनमें बिहार करने लगे और चन्द्रमाका भ्रम उत्पन्न करनेवाले उन मुनिराजको लोगोंने देखा ॥२८॥ 'बलदेव वनमें विहार कर रहे हैं। यह बात नगरों तथा गाँवोंमें फैल गयी उसे सुन समीपवर्ती राजा क्षुभितचित्त हो वहाँ आ पहुँचे ।।२९।। शङ्कारूपी विपसे युक्त तथा नाना प्रकारके शस्त्रोंसे मुसजित उन राजाओंको जब देव सिद्धार्थने देखा तो उस यनमें उसने सिंहोंके समूह रच दिये ॥३०॥ जय उन आगत राजाओंने मुनिराजके चरणोंके समीप सिंहोंको देखा तब वे उनकी सामर्थ्य जान नमस्कार कर शान्त भावको प्राप्त हो गये ।।३१॥ उसी समयसे वलदेव मुनिराज लोकमें नर- सिंह इस प्रसिद्धिको प्राप्त हो गये। वे सिंहके समान चौड़े वक्षस्थलसे सुशोभित थे तथा सिंहरूपी सेवकोंसे युक्त थे ॥३२॥ इस प्रकार एक-सौ वर्ष तक तप कर बलदेव मुनिराजने अन्तमें ममाधि धारण की और उसके फलस्वरूप ब्रह्मलोकमें इन्द्रके पदको प्राप्त हुए ॥३३।। यहाँ देव-देवियोंके समूहसे युक्त, महल और उद्यानांसे सुशोभित तथा रत्नोंके समान देदीप्य- मान पद्म नामक बिमानमें वे कोमल उपपाद शय्यापर उस प्रकार देव उत्पन्न हुए जिस प्रकार १. नारदस्य मोक्षमासिरन्यदिगम्बरप्रन्याविरुद्धा वर्तते, तेषु तस्य नरकगामित्यदर्शनात्। 'कलहपिया कदाई धम्माहा वासुदेवनमा ! भवा मिस्यगदि ते हिंसादोपेम गच्छति । त्रिलोकसार गाथा ८३५॥ 'हट्टावर अइरुद्दा पावणिक्षणा हवामि सन्चे वे! कलहमहा जुन्झपिया अधोगया वासुदेवव' ॥१४७० वि०प्र० अथवा अब नारदपदेन वमुदेवस्य सोमश्रीत्रीसमुत्पन्नः पुत्रो ग्राह्य.-नारदो मरुदेवोऽप सोमश्री तनयो चरी । मर्ग ४८, श्लोक ५७ हरिवशपुराणे । २. आसन्नभवसस्यया म० । ।

पञ्चषष्टितमः सर्गः
८०१
मृदूपपादशय्यायामुदपादि यलोऽमरः । महामणिरिवोदाररवाकरमहाक्षितौ ॥३५॥
भाषामनःशरीराक्षप्राणाहारप्रमिद्धिमिः । पद्दभिः पर्याप्तिमिः सद्यः पर्याप्तोऽभूत्सुरोत्तमः ॥३६॥
शयने सर्वतोमद्रे वनामरणमूपितः । विवुधः सुसनिद्रान्ते यथाऽत्र नवयौवनः ॥३७॥
विलोकमानमालोक्य शब्दरमरयोपिताम् । मुराणामनुरक्तानामप्यसावमिनन्दितः ॥३॥
चन्द्रादित्याधिकोदारप्रमावलयदेहभृत् । इति दध्यो तध्यानः प्रमदापूर्णमानमः ॥३९॥
कोऽयं रम्यतमा देशः कोऽयं प्रमुदितो जनः । कोऽहं वाद्य मवोऽयं में धर्मः को वार्नितो मया ॥४०॥
घोधितः सुरमुख्यैः स समवप्रत्ययावधिः । विवेद सहसा देवः पौर्वापर्यमशेषतः ॥४१॥
ज्ञातपूर्वमवाशेपवन्धुर्वन्धुहितोद्यतः । प्राप्तामिपेककल्याणः स्वीकृतात्मपरिच्छदः ॥४२॥
अवधिज्ञातकृष्णश्च गरवाऽसौ यालुकाप्रमाम् । दृष्ट्वाऽनुजं निजं देवो दुःसित दुःखितोऽमवत् ॥४३॥
महाप्रमावसंपन्ने देव तत्र तथास्थिते । शन्दगन्धरसस्पाः शुमतामगुमा ययुः॥१४॥
एरोहि कृष्ण योऽहं ते भ्राता ज्येष्टो हलायुधः । ब्रह्मलोकाधिपो भूत्वा स्वरसमीपमिहागतः ॥४॥
इत्युक्त्वा तं समुदाय स्वर्लोकं नेतुमुद्यते । देवे तस्य व्यलीयन्त गाग्राणि नवनीतवत् ।।४।।
ततः कृष्णो जगौ देव भ्रात: किं व्यर्थचेष्टिते. । किन ज्ञातं यथा सर्वे जीवाः स्वकृतमोगिनः ।।१७।।
यद्येन यादशं कर्म संसारे ममुपार्जितम् । नत्तेन तादृशं प्रातनियमादनुभूयते ।।४८॥
कि विशाल रत्नाकरकी महाभूमिमें महामणि उत्पन्न होता है ।।३५।। वह उत्तम देव वहाँ शोध
ही आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भापा और मन इन छह पर्याप्तियोंसे पूर्ण हो
गया ॥३६॥ नवयौवनसे युक्त एवं वस्त्राभरणसे विभूपित वह देव, सर्वतोभद्र नामक शय्यापर
ऐसा उठकर बैठ गया जैमा मानो सुखनिद्रा पूर्ण होनेपर ही उठा हो ॥३७॥ जय इस देवने
चारों ओर देखा तब अनुरागसे युक्त देवागनाओं और देवोंके शब्दोंने इसका अभिनन्दन
किया ॥३८॥ चन्द्रमा और सूर्यसे भी अधिक उत्कृष्ट प्रभावलयसे युक्त शरीरको धारण करने-
वाला यह देव, हर्पसे पूर्ण दृदय होता हुआ इस प्रकारका ध्यान करने लगा कि यह अत्यन्त
मुन्दर देश कौन है ? ये हर्षसे भरे जन कौन हैं ? मैं कौन हूँ ? मेरा यहाँ कहाँ जन्म हुआ
है ? और मैंने किस धर्मका संचय किया है ? ॥३९-४||
तदनन्तर मुख्य-मुख्य देवोंने उसे समझाया-सय वस्तुओंका परिचय दिया जिससे तथा
भयप्रत्यय अवधिज्ञानसे युक्त हो उसने शीघ्र ही आगे-पीछेका मब वृत्तान्त जान लिया
॥४१॥ तदनन्तर जिसने पूर्वभवके सय बन्धुओंको जान लिया था, जो भाईका हिन करनेमें
उद्यत था, जिसे अभिषेकरूप कल्याण प्राप्त हुआ था, जिसने यत्राभूपणादि सब मामग्री
पान की थी, और अवधिमानसे जिसने कृष्णका समाचार जान लिया था ऐमा वह देय
वालुकाप्रभा पृधिवीमें गया और अपने छोटे भाई कृष्णको दुःखी देख स्वयं यहुन दुःखी हुआ
।। ४२-४३ ॥ महाप्रभाषसे सम्पन्न यह देव जब वहाँ जाकर खड़ा हो गया तब वहाँके अशुभ
शब्द गन्ध रस और शब्द गुभरूपताको प्राप्त हो गये ।। ४४ ॥ यह कहने लगा कि हे कृष्ण!
आओ आओ, जो मैं तुम्हारा बड़ा भाई यलदेव था यही प्रलोकका अधिपनि होकर यहाँ
तुम्हारे पास आया है ॥४५॥ यह कहकर वह देव ज्यों-ही कृष्ण के जीवको उठाकर स्वर्ग:
लोकमें ले जानेके लिए उपत हुआ त्यों-ही उसका शरीर मक्यनके समान गलफर विलीन
हो गया ॥४६॥
तदनन्नर कृष्णने कहा कि हे देव ! ६ भाई ! व्यर्थको रेष्टाओंसे क्या लाभ है? क्या
आप यह नहीं जानते कि मय जाय अपने फियका फल भोगते है ॥ १७॥ मंमारमें जिमने
जमा फर्म आर्जन किया है, हे भाई! नियमसे उसे थैमा हो पल भोगना पड़ना ॥४८॥

८०२ हरिवंशपुराणे शक्नुयुः सुखमाहतुं हतुं वा दुःखमङ्गिनाम् । देवा यदि ततो नन्ति मृत्युदुःख निजं न किम् ॥३९॥ भातर्याहि ततः स्वर्ग भुव पुण्यफलं निजम् । आयुषोऽन्तेऽहमप्येमि मोक्षहेतुं मनुष्यताम् ॥५०॥ आवां तत्र तपः करवा जिनशासनसेवया । मोक्षसोख्यमवाप्स्यावः कृत्या कर्मपरिक्षयम् ॥५॥ आवां पुत्रादिसंयुक्तौ महाविमवसंगती । मारते दर्शयान्येषां विस्मयव्याप्तचेतसाम् ॥५२।। शङ्खचक्रगदापाणिर्मदीयप्रतिमागृहैः । मारतं व्यापय क्षेत्रं मकीर्तिपरिवृद्धये ॥५३॥ इत्यादि वचनं तस्य प्रतिपद्य सुरेश्वरः । सम्यक्त्वे शुद्धिमास्याप्य भारतं क्षेत्रमागतः ॥५४॥ भ्रातृस्नेहवशो देवो यथोदिष्टं स विष्णुना । चक्रे दिव्यविमानस्थेचकिलागलदर्शनम् ॥५५॥ चासुदेवगृहैश्वके नगरादिनिवेशितैः । विष्णुमोहमयं लोक स्नेहास्कि वा न चेष्टयते ।।५६।। ब्रह्मलोकं समासाद्य कृतजैनमहामहः । विन्दन् सुरसुखं सोऽस्थारसुरस्त्रीनिवहावृतः ॥५५॥ स्रग्धरा उच्चदेशस्थितोऽपि प्रतिमयपतमं याति पातालमूलं भुझे नैवोपलब्धं विषयसुसरसं सारसंसारसारम् । स्नेहाधिक्यादधीतं स्मरति न तनुभृत्सेवते प्रत्यनीक धिक् धिक स्वर्मोक्षसौख्यमतिघमतिघनरनेहमोहं जनानाम् ॥५८॥ - देव, यदि दूसरे प्राणियों के लिए सुख देने और दुःख हरनेमें समर्थ हैं तो फिर अपना ही मृत्युरूपी दुःख क्यों नहीं नष्ट कर लेते हैं ॥४९॥ इसलिए भाई ! स्वर्गको जाओ और अपने पुण्यका फल भोगो। मैं भी आयुके अन्तमें मोक्षका कारण जो मनुप्यपर्याय है उसे प्राप्त करूँगा ॥ ५० ॥ हम दोनों उस मनुष्यपर्यायमें तप करेंगे और जिनशासनकी सेवासे कर्मोंका क्षय कर मोक्ष प्राप्त करेंगे ॥५१॥ हाँ, एक काम आप अवश्य करें कि 'भरत क्षेत्रमें हम दोनों को लोग पुत्र आदिसे सहित तथा महावैभवसे युक्त देखें और हम लोगोंको देखकर दूसरोंके चित्त आश्चर्यसे व्याप्त हो जावें ।। ५२ ।। मेरी कीर्तिकी वृद्धिके लिए आप शङ्ख, चक्र तथा गदा हाथमें लिये मेरी प्रतिमाओंके मन्दिरोंसे समस्त भरत क्षेत्रको व्याप्त कर दें। बलदेवका जीव देवेन्द्र कृष्णके पूर्वोक्त वचन स्वीकार कर तथा उसे सम्यग्दर्शनमें शुद्धता रखनेका उपदेश दे भरत क्षेत्र आया ।। ५३-५४ ॥ भाईके स्नेहके वशीभूत हुए उस देवने कृष्णका कहा सब काम किया। उसने दिव्य विमानमें स्थित कृष्ण और बलदेवका सवको दर्शन कराया ॥५५ ।। तथा नगर-ग्राम आदिमें बनवाये हुए कृष्णके मन्दिरोंसे संसारको कृष्णविषयक मोहसे तन्मय कर दिया सो ठीक ही है क्योंकि स्नेहसे क्या-क्या चेष्टा नहीं होती है ? ॥५६॥ तदनन्तर देवने ब्रह्मस्वर्ग जाकर जिनेन्द्र भगवान की पूजा की और वहाँ वह स्त्रियोंके समूहसे आवृत हो देवों- के सुखका उपभोग करता हुआ रहने लगा।। ५७ ।। गौतम स्वामी कहते हैं कि देखो स्नेहकी अधिकतासे यह जीव उच्च स्थानमें स्थित होता हुआ भी भयपूर्ण पातालके मूलमें जाता है, श्रेष्ठ संसारके सारभूत प्राप्त हुए विषयसुखका उपभोग नहीं करता है, पहले अध्ययन किये हुए शास्त्रका स्मरण नहीं रखता है और विपरीत काम करने लगता है इसलिए स्वर्ग और मोक्षा- ? १. सम्यग्दृष्टिक्रतीर्थकरनाम प्रकृति. कृष्णस्य जीवः, एव मिथ्यात्ववर्धन कार्य कारयतीति विचित्रोऽय- मुल्लेख: प्रतिभाति । २. दिव्यविमानस्थं चक्रि म०, क०, ड० १३. समारा क० ।

पचपष्टितमः सर्गः
८०३
शार्दूलविक्रीडितम्
तीय नमिजिनस्य तन्त्र वहति व्यामोहविच्छेदन
संजाते घरदत्तनामनि मुनी कैवल्यचक्षुष्मति ।
राजासी हरिवंशमन्नतिधरी धीरो धरायाः मुतो
दभ्रे राज्यधुरां धुरन्धरधराधीशधियं धारयन् ॥५९॥
इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती भगवनिर्वाणवर्णनो नाम
पञ्चपष्टितमः सर्गः ॥१५॥
मुखके बाधक प्राणियोंके अत्यधिक स्नेहसम्बन्धी मोहको धिकार हो ।।१८।। तदनन्तर मोहको
नष्ट करनेवाले नेमिजिनेन्द्रके उस प्रचलित तीर्थमें वरदत्त नामक मुनिको केवलज्ञान हुआ
और हरिवंशकी सन्तनिको धारण करनेवाला धीर वीर जरत्कुमार धुरन्धर राजलक्ष्मीकी
रक्षा करता हुआ राज्यका भार सँभालने लगा ।। ५९॥
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनमेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें भगवान्
नेमिनायके निर्माणका वर्णन करनेवाला पैंसठवा सर्ग समात हुआ ॥ १५ ॥

षट्षष्टितमः सर्गः वंशस्थवृत्तम् प्रतापवश्याखिलराजके नृपे प्रशामति क्षमातलमुग्रशासने । जरत्कुमारे जनितादराः प्रजाः प्रक्राममापुः प्रमदं धरानले ॥१॥ कलिङ्गराजस्य नृपस्य देहजा जरत्कुमारस्य वधूर्वधूत्तमा । सुखेन लेभे जगतः सुखावह वसुध्वजं राजकुलध्वज सुतम् ॥२॥ स तत्र यूनि व्यवसायिनि क्षितिं जरत्कुमारो हरिवंशशेखरे । निधाय यातस्तपसे वनं सतां कुलवतं तोवतपोनिषेत्रणम् ॥३॥ सुतोऽभवचन्द्र इव प्रजाग्नियो 'वसुध्वजाख्यात्सुवसुर्वसूपमः । स भीमवर्मास्य कलिङ्गपालकस्तदन्ययेऽतीयुरनेकशो नृपाः ॥४॥ कपिष्टनामान्वयभूषणस्त्वभूदजानशत्रुस्तनयस्ततोऽभवत् । स शत्रुमेनोऽस्य जितारिरङ्गजस्तदननोऽयं जितशत्रुरीश्वरः ॥५॥ भवान किं श्रेणिक वेत्ति भूपतिं नृपेन्द्रसिद्धार्थकनीयसीपतिम् । इमं प्रसिद्धं जितशत्रुमाख्यया प्रतापवन्तं जितशत्रुमण्डलम् ॥६॥ जिनेन्द्रवीरस्य समुद्भवोत्सवे तदागतः कुण्डपुरं सुहृत्परः । सुपूजितः कुण्डपुरस्य भूभृता नृपोऽयमाखण्डलतुल्यविक्रमः ॥७॥ यशोदयायां सुतया यशोदया पवित्रया वीरविवाहमङ्गलम् । अनेककन्यापरिवारयारुहत्समीक्षितुं तुगमनोरथं तदा ॥८॥ तदनन्तर प्रतापके द्वारा समस्त राजाओंको वश करनेवाला, उप्रशासनका धारक राजा जरत्कुमार जब पृथिवीका शासन करने लगा तब उसके प्रति प्रजाने बहुत आदर किया और पृथिवीतलपर अधिक हर्प प्राप्त किया ॥१॥ कलिङ्ग राजाकी पुत्रो जरत्कुमारकी उत्तम पट्टरानी थी, उससे उसने जगत्को सुख देनेवाला एवं राजकुलकी ध्वजास्वरूप वसुध्वज नामका पुत्र प्राप्त किया ।।२।। व्यवसायी तथा हरिवंशके शिरोमणि उस युवापर पृथियोका भार रख जरत्कुमार तपके लिए बनको चला गया सो ठीक ही है क्योंकि तीव्र तपका सेवन करना सत्पुरुपोंका कुलवत है ॥३।। यमुध्वजके चन्द्रमाके समान प्रजाको आनन्द देनेवाला कुबेरतुल्य सुवसु नामका पुत्र हुआ। सुवसुके कलिङ्ग देशकी रक्षा करनेवाला भीमवर्मा नामका पुत्र हुआ और उसके वंशमें अनेक राजा हुए ॥४॥ तदनन्तर उसी वंशका आभूषण कपिष्ट नामका राजा हुआ, उसके अजातशत्रु, अजातशत्रुके शत्रुसेन, शत्रसेनके जितारि और जितारिके यह जित- शत्रु नामका पुत्र हुआ है ।।५।। हे राजन श्रेणिक ! क्या तुम इस जितशत्रूको नहीं जानते । जिसके साथ भगवान महावीर के पिता राजा सिद्धार्थकी छोटी बहिनका विवाह हुआ है, जो अत्यन्त प्रतापी और शत्रुओंके समूहको जीतनेवाला है ॥६॥ जब भगवान महावीरका जन्मोत्सव हो रहा था तब यह कुण्डपुर आया था और कुण्डपुरके राजा सिद्धार्थने इन्द्रके - तुल्य पराक्रमको धारण करनेवाले इस परम मित्रका अच्छा सत्कार किया था 11910 इसकी यशोदया रानीसे उत्पन्न यशोदा नामको पवित्र पुत्री थी। अनेक कन्याओंसे सहित उस १. यमुध्यमान्यामुयमु. म०। २. यन्त्रितशत्रु-म०।

पट्पष्टितमः सर्गः ८०५ "स्थितेऽथ नार्थ तपसि स्वयंभुवि प्रजातकैवल्यविशाललोचन । जगद्विभूत्य विहरत्यपि क्षिति क्षितिं विहाय स्थितवांस्तपस्यगम् ॥९॥ अमुष्य जानाद्य तपोबलान्मुनेरवाप्तकैवल्यफला मनुष्यता । मनुष्यमावो हि महाफलं मवे मवेदयं प्राप्तफलस्तपःफलात् ॥20॥ इतीरितयं हरिवंशसरकथा समासतः श्रेणिक लोकविध्रुना। त्रिषष्टिसंख्यानपुराणपद्धतिप्रदेशसम्बन्धवती श्रियेऽस्तु ते ॥११॥ 'मुगौतमात्पुण्यपुराणपद्धनि मपार्थिवे. श्रेणिकपार्थिवस्तदा । मुदृष्टिराकण्यं मकर्णतां गतो गतः पुरं प्रीतमतिः कृतानतिः ॥१२॥ चतुर्णिकायामरखेचरादयो जिनं परीत्य प्रणिपन्य मक्कितः । यथायथं जग्मुरजन्मकाक्षिणः प्रसिद्धसद्धर्मकथानुरागिणः ॥१३॥ विहरय पूज्योऽपि महीं महीयसां महामुनि चिनकर्मवन्धनः। इयाय मोक्षं जितशत्रुकवली निरन्तसौख्यप्रनिबद्ध मक्षयम् ॥१४॥ जिनेन्द्रवारोऽपि विवोध्य सन्ततं समन्तनो भव्यसमूहसन्ततिम् । प्रपद्य पायानगरों गरीयमी मनोहरोद्यानवने नदीयक ॥१५॥ चतुर्थकालेऽर्धचतुर्थमासविहीनताविश्वनुरन्दशेपर्क । म कानिक स्वानिपु कृष्णभूनमुप्रभातसन्ध्याममय स्वमावतः ॥१६॥ "यशोदाका भगवान् महावीरके साथ विवाह-मद्गल देखनेकी यह उत्कट अभिलापा रखता था। परन्तु स्वयंभू भगवान महावीर तपके लिए चले गये और केवलज्ञानरूपी विशाल नेत्र प्राप्त कर जगत्का कल्याण करनेके लिए पृथिवीपर विहार करने लगे, तब यह स्वयं भी पृथिवी- को छोड़ तपमें लीन हो गया ॥८-९॥ आज मुनि जितशत्रुको तपके फलस्वरूप केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है और उससे उनका मनुष्यपर्याय सार्थक हुआ है सो ठीक ही है, क्योंकि संसारमें मनुष्य- पर्याय महाफलरूप तभी होता है जब वह तपके फलस्वरूप इस केवलज्ञानरूपी फलको प्राप्त कर लेना है ।। १० । गीतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! मैंने यह लोकप्रसिद्ध तथा सठ- शलाका पुरुपोंके पुराणपद्धनिसे सम्बन्ध रखनेवाली हरिवंशको कथा संक्षेपसे कही है सो तुझे लक्ष्मोकी प्राप्ति के लिए हो ॥११॥ मम्यग्दर्श नसे सुशोभित राजा श्रेणिक अनेक राजाओं के माथ गीनमगणधरसे इस पवित्र पुराणका वर्णन मुन अपने कानोंको सफल मानने लगा तथा नमस्कारकर प्रसन्न होता हुआ अपने नगरको चला गया ।।१२।। मोरकी इच्छा रखनेवाले एवं प्रसिद्ध समीचीन धर्मकथाके अनुरागी चारों निकायके देव और विद्याधर जिनेन्द्र भगवानको प्रदक्षिणा देकर तथा प्रणाम कर अपने-अपने स्थानोंपर चले गये ।।१३।। बड़े-बड़े पुरुपोंके द्वारा पूज्य मा रहित हो अनन्त मुखसे तर सब ओरके भव्यस चनमें विराज- मान हो गय ॥१५॥ जय चतुर्थकालमें तीन वर्ष साढ़े आठ मास याकी रहे तब स्वाति नक्षत्रमें कार्तिक अमावास्या दिन प्रातःकालके समय स्वभावसे ही योग निरोध कर घानियाकर्म- रूप ईन्धनके ममान अघातियाफाको भी नष्ट कर यन्धनरहित हो संसारक प्राणियोंको १ मिनेऽथ म०। २ याताद्य क०, २०, ३०, म०। ३. मुगीतमायुध्यपुराण- म०। ४. रफीत- मतिः म, महातमति ख.। ५ महीयसी क.।

हरिवंशपुराणे अघातिकर्माणि निरद्धयोगको विधूय घातीन्धनवद्विबन्धनः । विबन्धनस्थानमवाप शङ्करो निरन्तरायोरुसुखानुबन्धनम् ॥१७॥ स पञ्चकल्याणमहामहेश्वरः प्रसिद्धनिर्याणमहे चतुर्विधैः । शरीरपूजाविधिना विधानतः सुरैः समभ्ययंत सिद्धशासनः ॥१८॥ ज्वलपदीपालिकया प्रवृदया सुरासुर दोपितया प्रदीप्सया । तदा स्म पायानगरी समन्ततः प्रदीपिताकाशतला प्रकाशते ॥१९॥ तथैव च श्रेणिकपूर्वभूभुजः प्रकृत्य कल्याणमहं सहप्रजाः । प्रजग्मुरिन्द्राश्च सुरैर्यथायथं प्रयाचमाना जिनवोधिमर्थिनः ॥२०॥ ततस्तु लोक. प्रतिवर्षमादरात्प्रसिद्धीपालिकयात्र मारते । समुद्यतः पूजयितुं जिनेश्वरं जिनेन्द्रनिर्वाणविभूतिभक्तिमाक् ॥२१॥ त्रयः क्रमाकैवलिनो जिनात्परं द्विषष्टिवर्पान्तरमाविनोऽभवन् । ततः परे पञ्च समस्तपूर्विणस्तपोधना वर्षशतान्तरं गताः ॥२२॥ ध्यशीतिक वर्षशते तु रूपयुत् दशैव गीता दशपूर्विणः शते । द्वयं च विशेऽङ्गभृतोऽपि पञ्च ते शते व साष्टादशके चतुर्मुनिः ॥२३॥ गुरः सुमद्रो जयमदनामकः परी यशाबाहुरनन्तरस्ततः । महार्हलोहार्यगुरुश्च ये दधुः प्रसिद्धमाचारमहागमन ते ॥२५॥ सुख उपजाते हुए निरन्तराय तथा विशाल सुखसे सहित निर्वन्ध-मोक्ष स्थानको प्राप्त हुए ॥१६-१७॥ गर्भादि पॉचों कल्याणकोंके महान अधिपति, सिद्धशासन भगवान् महावीरके निर्वाण महोत्सवके समय चारों निकायके देवोंने विधिपूर्वक उनके शरीरकी पूजा की ॥१८॥ उस समय मुर और असुरोंके द्वारा जलायी हुई बहुत भारी देदीप्यमान दीपकोंकी पंक्तिसे पायानगरीका आकाश सब ओरसे जगमगा उठा ॥१९॥ श्रेणिक आदि राजाओंने भी प्रजाके साथ मिलकर भगवान के निर्वाण कल्याणकको पूजा की। तदनन्तर घड़ी उत्सुकताके साथ जिनेन्द्र भगवान्के रत्नत्रयकी याचना करते हुए इन्द्र देवोंके साथ-साथ यथास्थान चले गये ॥ २० ॥ उस समयसे लेकर भगवान्के निर्वाणकल्याणको भक्तिसे युक्त संसारके प्राणी इस भरतक्षेत्र में प्रतिवर्ष आदरपूर्वक प्रसिद्ध दीपमालिकाके द्वारा भगवान महावीरकी पूजा लिए उद्यत रहने लगे। भावार्थ--उन्हींकी स्मृतिमे दीपावलीका उत्सव मनाने लगे ॥२१॥ भगवान महावीरके निर्वाणके याद बासठ वर्ष में क्रमसे गौतम, मुधर्म और जम्बूस्वामी ये तीन केवली हुए। उनके बाद मौ वर्पमें समस्त पूर्वोको जाननेवाले पाँच* श्रुतकेवली हुए ॥२२॥ तदनन्तर एक सो तेरासी वर्ष में ग्यारह मुनि दश पूर्वके धारक हुए। उनके बाद दो सो घीम वर्षमें पाँच मुनि ग्यारह अङ्गके धारी हुए। तदनन्तर एक सौ अठारह वपमें सुभद्रगुरु, जयभद्र, यशोवा और महापूज्य लोहार्यगुरु ये चार मुनि प्रसिद्ध आचारागके धारी हुए 1॥२३-२४॥ करनेके १. पूर्वभूभृत, म. । २. एकाधिका दग एकादशेत्यर्थः । ३. जयमद्रनामा- म०, १०,०, म । *. १ नन्दी, २ नन्टिमर, ३ आराजित, ४ गोवरन और ५ भद्रबाहु । ११ विशाख, २ प्रोटिन, क्षत्रिय, ४ र ५ नाग, मिनाथ, ७ धुतियण, ८ विजय, ९ बुदिल, १० गनदेष और ११ गुपर्म । + १ नत्र, २ असाल, ३ पातु, ४ ध्रुयमन और ५. पसार्य ।

पट्पष्टितमः सर्गः ८०७ महातपोभूद्विनयंधरः श्रुतामृषिश्रुतिं गुप्तपदादिकां दधन् । मुनीश्वरोऽन्यः शिवगुप्तसंज्ञको गुणैः स्वमर्हदलिरप्यधात्पदम् ॥२५॥ स मन्दरार्योऽपि च मित्रवीरवि गुरू तथान्या बलदेवमित्रको । विवर्धमानाय निरलसंयुतः श्रियान्वितः सिंहबलश्च वीरवित् ॥२६॥ स पद्मसेनो गुणपद्मखण्डमृद् गुणाग्रणीाघ्रपदादिहस्तकः । स नागहस्ती जितदण्डनामभृत्सनन्दिपेण: प्रभुदीपसनकः ॥२७॥ तपोधनः श्रीधरसेननामकः सुधर्मसेनोऽपि च सिंहसेनकः । सुनन्दिपेणेश्वरसेनको प्रभू सुनन्दिपेणामयसेननामको ॥२८॥ स सिद्धसेनोऽमयमीमसेनको गुरू परौ तौ जिनशान्तिषेणको । अखण्डपटखण्डमखण्डितस्थितिः समस्तसिद्धान्तमधत्त योऽर्थतः ।।२९॥ दधार कर्मप्रकृति श्रुतिं च यो जिताक्षवृत्तिर्जयमेनसद्गुरुः । प्रसिद्धवैय्याकरणप्रभावबानशेषराधान्तसमुद्रपारगः ॥३०॥ तदीयशिष्योऽमितसेनसद्गुरुः पवित्रपुन्नाटगणाग्रणीगणी। जिनेन्द्रसच्छासनवरसलात्मना तपोभूता वर्षशताधिजीविना ॥३॥ सुशास्त्रदानेन वदान्यतामुमा वदान्य मुल्यन भुवि प्रकाशिता । *यदप्रजो धर्मसहोदरः शमी समाधीधर्म इवात्तविग्रहः ॥३२॥ तपोमयों कीर्तिमशेषदिक्षु यः क्षिपन् बभौ कोर्तितळीतिपेणकः । उनके बाद महातपस्वी विनयंधर, गुप्तश्रुति, गुप्तऋपि, मुनीश्वर शिवगुप्त, अर्हद्वलि, मन्दरार्य, मित्रवीरवि, बलदेव, मित्रक, बढ़ते हुए पुण्यसे सहित रत्नत्रयके धारक एवं ज्ञान- लक्ष्मोसे युक्त सिंहवल, वीरवित्, गुणरूपी कमलोंके समूहको धारण करनेवाले पद्मसेन, गुणोंसे श्रेष्ठ व्याघ्रहस्त, नागहस्ती, जितदण्ड, नन्दिपेण, स्वामी दीपसेन, तपोधन श्रीधरसेन, सुधर्मसेन, सिंहसेन,सुनन्दिपेण, ईश्वरसेन, सुनन्दिपेण, अभयसेन, सिद्धसेन, अभयसेन, भीमसेन, जिनसेन और शान्तिसेन आचार्य हुए । तदनन्तर जो अखण्ड मर्यादाके धारक होकर परिपूर्ण पट्खण्डों (१ जीवस्थान, २ क्षुद्रवन्ध, ३ बन्धस्वामी, ४ वेदनाखण्ड, ५ वर्गणाखण्ड और ६ महावन्ध) से युक्त समस्त सिद्धान्तको अर्थरूपसे धारण करते थे अर्थात् पटखण्डागमके ज्ञाता थे, कर्मप्रकृतिरूप श्रुतिके धारक थे और इन्द्रियोंकी वृत्तिको जीतनेवाले थे ऐसे जयसेन नामक गुरु हुए। उनके शिष्य अमितसेन गुरु हुए जो प्रसिद्ध वैयाकरण, प्रभावशाली और समस्त सिद्धान्तरूपी सागरके पारगामी थे। ये पवित्र पुन्नाट गणके अग्रणी-अग्रेसर आचार्य थे । जिनेन्द्र शासनके स्नेही, परमतपस्वी, सौ वर्षको आयुके धारक एवं दाताओं में मुख्य इन अमितसेन आचार्यने शास्त्रदानके द्वारा पृथिवीमें अपनी वदान्यता-दानशीलता प्रकट को थी। इन्हीं अमितसेनके अग्रज धर्मवन्धु कीर्तिपेण नामक मुनि थे जो बहुत ही शान्त थे, पूर्ण बुद्धिमान थे, शरीरधारी धर्मके समान जान पड़ते थे और जो अपनी सपोमयी कीतिको समस्त दिशाओंमें प्रसरित कर रहे थे। उनका प्रथम शिप्य में जिनसेन हुआ। मोक्षके उत्कृष्ट मुखका उपभोग करनेवाले अरिष्टनेमि जिनेन्द्रकी भक्तिसे युक्त मुझ जिनसेन सूरिने अपने सामर्थ्यके अनुसार अल्पबुद्धिसे इस हरिवंशपुराणकी रचना की १. विनयंधरभूतो म, विनयंघरभुतो स्व०। २. मित्रोरवि फल, ख०, ग०, इ. । ३. पटवण्ड- सुमण्डितस्थितिः म० । ४. तदग्रतो म० ।

, हरिवंशपुराणे तदनशिष्येण शिवानमौख्यभागरिष्टनमीश्वरमनिमाविना । स्वशकिमाजा जिनसेनरिणा धियाल्पयोक्ता हरिवंशपद्धतिः ॥३३॥ यदा किचिद्रचितं प्रमादतः परस्परव्योहतिदपिपितम् । तदप्रमादास्तु पुराणकोविदाः सृजन्तु जन्नुस्थितिशक्तिवेदिनः ॥३४॥ प्रशस्तवंशो हरिवंशपर्वतः क मे मतिः काल्पतराल्पशक्तिका । अनेन पुण्यप्रभवस्तु केवलं जिनेन्द्र वंशस्तवनेन वान्छितः ॥३५॥ न काव्यबन्धव्यमनानुबन्धतो न कीर्तिसन्तानमहामनीषया । न कान्यवर्गण न चान्यीक्षया जिनस्य भक्त्यैव कृता कृतियथा ॥३६॥ जिनाश्चतुर्विंशतिरत्र कीर्तिताः मुकीर्तयो द्वादश चक्रवर्तिनः । नवविधा सीरिहरिप्रतिद्विपत्रिषष्टिरित्थं पुरुषाः पुराणगाः ॥३७॥ अवान्तरेऽनेकशतानि पार्थिवा महीचरा व्योमचराश्च भूरिश । क्षितौ चतुर्वर्गफलोपमोगिनः पुराणमुख्येऽत्र यशस्विनः स्तुताः ॥३८॥ श्रगण्यपुण्यं हरिवंशकीर्तनायन गण्यं गुणमञ्चितं मया । फलादमुष्मान्नु मनुष्यलोकजा मवन्तु मण्या जिनशासनस्थिताः ॥३९॥ जिनस्य नेमेश्चरितं चराचरप्रसिद्धजीवादिपदार्थमासनम् । प्रवाच्यतो वाचकमुख्यसजनैः समागते. श्रोत्रपुटैः अपीयताम् ॥३०॥ जिनेन्द्र नामग्रहणं भवत्यलं ग्रहादिपीडापगमस्य कारणम् । प्रवाच्यमानं दुरितस्य दारणं सतां समस्तं चरितं किमुच्यते ॥४॥ है ।।२५-३३।। इस प्रन्थमें मेरे द्वारा यदि कहीं प्रमादयश पूर्वापर विरोधसे युक्त रचना की गयी हो तो जीवीको स्थिति और सामर्थ्यके जाननेवाले पुराणोंके ज्ञाता विद्वान् प्रमादरहित हो उसे ठीक कर लें|३४||कहाँ तो यह उत्तम वंशों-कुलों (पक्षमें वाँसों) से युक्त यह हरिवंशरूपी पर्यंत और कहाँ मेरी अत्यन्त अल्पशक्तिकी धारक क्षुद्रबुद्धि ? मैंने तो सिर्फ जिनेन्द्र भगवानके वंशको इस स्तुतिसे पुण्योत्पत्तिको इच्छा की है।।३५||मैंने इस ग्रन्थको रचना न तो काव्यरचनाके व्यसनजन्य संस्कारसे की है, न कीर्तिसमूहको बलवती इच्छासे को है, न काव्यके अभिमानसे की है, और न दूसरेको देखा-देखीसे की है। किन्तु यह रचना मैंने मात्र जिनेन्द्र भगवान की भक्तिसे की है ॥३६॥ इस ग्रन्थमें चौबीस तीर्थकर, उत्तम कीर्ति के धारक बारह चक्रवर्ती, नौ बलभद्र, नो नारायण और नौ प्रतिनारायण इन पुराणगामी वेशठ शला- का पुरुपोंका वर्णन किया गया है ॥३७॥ इनके सिवाय इस श्रेष्ठ पुराणमें वीच-बीच में पृथिवी- पर चतुर्वर्गके फलको भोगनेवाले सैकड़ों भूमिगोचरी और अनेकों यशस्वी विद्याधरराजाओंका वर्णन किया गया है ॥३८॥ हरिवंशका कथन करनेसे जो असंख्य पुण्यका मञ्चय हुआ है उसके फलस्वरूप में यही चाहता हूँ कि मनुष्यलोकमें उत्पन्न हुए भव्यजीव जिनशासनमें स्थित हो ॥३९॥ तथा बसस्थावरके भेदसे प्रसिद्ध जीव आदि पदार्थीको प्रकाशित करनेवाले नेमिजिनेन्द्र के इस चरितको बाँचनेवाले मुख्य सजन बाँचे और सभामे आये हुए श्रीनाजन अपने कर्णरूप पात्रोंसे इसका पान करें ॥४०॥ क्योंकि जिनेन्द्र भगवानका मात्र नाम ग्रहण ही ग्रह-पिशाच आदिकी पीड़ाको दूर करनेका कारण है फिर सत्पुरुषों के पापको दूर करनेवाला पूरा चरित - १. षट्पदवृत्तम् । २ व्याहृति क०, म०, ख.1 म०, स०, ड.। ३. नवान्यदोर्यया ख०। ४. हरिवंशकीर्तिना ८०९ पट्पष्टितमः सर्गः कुर्वन्तु न्याख्यानमनन्यचनसः परोपकाराय स्वमुकिनवे । मुमङ्गलं मगलकारिणामिदं निमित्तमप्युत्तममर्थिनां मताम् ॥४२॥ महोपसमें शरणं मुशान्तिकृत सुशाकुन शास्त्रमिदं जिनाश्रयम् । प्रशासनाः शासनदेवताश्च या जिनॉश्चतुर्विशनिमाश्रिता. सदा ॥३॥ हिताः सतामप्रतिचक्रयान्विताः प्रयाचिताः सन्निहिता भवन्तु नाः । गृहीतचक्राप्रतिचक्रदेवता तीजयन्तालयसिंहवाहिनी । शिवाय यस्मिन्निह मनिधीयते व तत्र विनाः प्रभवन्ति शामने ॥४४॥ ग्रहोरगा भूतपिशाचराक्षमा हिनप्रवृत्ती जनविनकारिणः । जिनेशिनां शासनदेवतागणेप्रमावशक्त्या शमं श्रयन्ति ते ॥४५॥ प्रकाममाकाइक्षितकामसिद्धयः प्रसिद्धधर्मार्थविमोक्षलब्धयः । भवन्ति तेषां स्फुटमल्पयत्नतः पठन्ति मक्त्या हरिवंशमत्र ये ॥४६॥ निवार्य मात्सर्यमवार्यवीर्यया धिया सुधैर्योर्जितया जिनादराः । अनायवर्याः सहिताः सपर्यया पुराणमाः प्रथयन्नु विष्टपे ॥४॥ कि मेऽथवा प्रार्थनया यतस्ततः स्वभावतो विश्वमरक्षमाविदः। पयोधरोन्मुक्तमिवाम्बु भूधरा विधाय मूर्ति प्रथयन्तु भूनले ॥४८॥ यदि वाँचा जायेगा तो उसके फलका तो कहना ही क्या है ? ॥४१॥ विद्वज्जन एकाग्रचित्त होकर दूसरोंके उपकारके लिए और अपने-आपको मुक्तिके लिए इस ग्रन्थका व्याख्यान करें। यह ग्रन्थ मगल करनेवालोंके लिए उत्तम मङ्गलरूप है तथा मङ्गलकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुपोंके लिए मद्गलका उत्तम निमित्त भी है ॥४२॥ जिनेन्द्र भगवानका वर्णन करनेवाला यह शास्त्र महान् उपसर्गके आनेपर रक्षा करनेवाला है, उत्तम शान्तिका दाता है और उत्तम शकुन रूप है, अप्रतिचक्रदेवतासे सहित, सजनोंके हितेपी जो शासनदेव और शासनदेवियाँ सदा चौवीस तीर्थकरोंकी सेवा करती हैं उनसे भी मैं याचना करता हूँ कि वे सदा जिनशासनके निकट रहें। चक्ररत्नको धारण करनेवाली अप्रतिचक्रदेवता तथा गिरिनार पर्वतपर निवास करनेवाली सिंहवाहिनी-अम्बिकादेवी, जिस जिन- शासनमें सदा कल्याणके लिए सन्निहित-निकट रहती हैं उस जिनशासनपर विघ्न अपना प्रभाव कहाँ जमा सकते हैं ? ॥ ४३-४४॥ हितके कार्य में मनुष्योंको विघ्न उत्पन्न करनेवाले जो प्रह, नाग, भूत, पिशाच और राक्षस आदि हैं वे जिनशासनके भक्त देवोंकी प्रभाव शक्तिसे शान्तिको प्राप्त हो जाते हैं । भावार्थ-जिन शासनके भक्त देव स्वयं कल्याण करते हैं तथा अन्य उपद्रवी देवोंको भी शान्त बना देते हैं ॥४५॥ जो भव्य जीव यहाँ भक्ति पूर्वक हरिवंशपुराणको पढ़ते हैं उन्हें थोड़े ही प्रयत्नसे मनोवान्छित सिद्धियाँ तथा प्रसिद्ध धर्म, अर्थ और मोक्षको लब्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥४६जिनसे बढकर और कोई श्रेष्ठ आर्य नहीं तथा जो मान-प्रतिष्ठासे रहित हैं ऐसे जिनेन्द्र भगवानके भक्त आर्यपुरुष, मात्सर्यको दूर कर अवार्य वीर्यसे युक्त एवं उत्तम धैर्यसे बलिष्ठ बुद्धिके द्वारा इस पुराणको संसारमें प्रसिद्ध करें-इसके अर्थका विस्तार करें ।।४|| अथवा मुझे प्रार्थना करनेसे क्या प्रयोजन है ? क्योंकि - संसारका भार धारण करनेमें ममर्थ पर्वत, जिस प्रकार स्यभावसे ही मेघोंके द्वारा छोड़े हुए 1 १. बिनाश्चतुर्विशति म० । २. पट्पदत्तम् । ३. जिनविघ्न- स्व०। ४ गणाः म०। ५. मम म.1 ६. प्रथमं नु म। ७. प्रथम तु म । १०२ ८१० हरिवंशपुराणे सुपृष्टमुत्सृष्टमुदात्तशब्दकैनवं पुराणं च पुराणवारि मत् । महाभ्रकूजनतासरित्कुलश्चतुःसमुद्रान्तमिदं प्रतन्यते ॥४९॥ जयन्ति देवा. सुरसंघसविताः प्रजातिशान्तिप्रदशान्तशासनाः । विशुद्धकैवल्यविनिद्रदृष्टयो सुदृष्टतत्वा भुवने जिनेश्वराः ॥५०॥ जयत्वजय्या जिनधर्मसन्ततिः प्रजास्विह क्षेमसुमिक्षमस्विह । सुग्वाय भूयात्प्रतिवर्षवर्पणैः मुजातसत्या वसुधासुधारिणाम् ॥५१॥ शार्दूलविक्रीडितम् शाकैप्वन्दशतेषु सप्तसु दिशं पञ्चोत्तरपूत्तरां पातीन्द्रायुधनानि कृष्णनृपजे श्रीवल्लभे दक्षिणाम् । पूर्वा श्रीमदवन्तिभूभृति नृपे वत्सादिराजेऽपरां सूर्याणामधिमण्डलं जययुते वीरे वराहेऽवति ॥५२: कल्याणैः परिवर्धमानविपुलश्रीवर्धमाने पुरे श्रीपालयनन्नराजवसतो पर्याप्तशेप. पुरा । पश्चाटोस्तटिकाप्रजाप्रजनितप्राज्यार्चनावर्चने शान्तेः शान्तगृहे जिनस्य रचितो वंशो हरीणामयम् ॥५३॥ जलको अपने मस्तकपर धारण कर पृथिवीपर फैला देते हैं उसी प्रकार संसारका भार धारण करने में समर्थ विज्ञपुरुप स्वभावसे ही इस पुराणको पृथिवीतलपर फैला देंगे ॥४८॥ जो उत्तम शब्दोंसे युक्त (पक्षमें उत्तम गर्जना करनेवाले ) महाविद्वानरूपी मेघोंसे रचित है, जिसके विषयमें खूब प्रश्नोत्तर हुए हैं नथा जो नूतन होकर भी पुराणरूप है ऐसा यह पुराणरूपी जल जनसमूहरूपी नदियोंके समूहसे चारों समुद्रों पर्यन्त विस्तृत किया जाता है । भावार्थ- जिस प्रकार मेघोंसे बरसाये हुए पानीको नदियों समुद्र तक फैला देती हैं उसी प्रकार विद्वानों- द्वारा रचित पुराणको जनता परस्परकी चर्चा-वार्तासे दूर-दूर तक फैला देती है ॥४९॥ जो देवोंके समूहसे सेवित हैं, जिनका शान्त शासन प्रजाके लिए अत्यन्त शान्ति प्रदान करनेवाला है, जिनकी केवलज्ञानरूपी दृष्टि सदा विकसित रहती है और जिन्होंने समस्त तत्त्वोंको अच्छी तरह देख लिया है ऐसे जिनेन्द्र भगवान् सदा जयवन्त रहें ।।५०॥ वादियोंसे सर्वथा अजेय जिनधर्मकी परम्परा सदा जयवन्त रहे, प्रजाओंमें क्षेम और सुभिक्षकी वृद्धि हो तथा प्रतिवर्ष अनुकूल वर्षाके कारण उत्तम धान्यसे मुशोभित यह पृथिवी प्राणियोंके सुखके लिए हो ॥५१॥ सात-सौ पाँच शक संवत् में, जब कि उत्तर दिशाका इन्द्रायुध, दक्षिणका कृष्णराजका पुत्र श्रीवल्लभ, पूर्व दिशाका श्रीमान् अवन्तिराज वत्सराज और पश्चिमका सौर्योंके अधिमण्डल- सौराष्ट्रका धीर जयवराह पालन करता था तय कल्याणोंसे निरन्तर बढ़नेवाली लक्ष्मीसे युक्त श्री वर्धमानपुर' में नन्नराजा-द्वारा निर्मापित श्रीपार्श्वनाथके मन्दिर में पहले इस हरिवंशपुराणकी रचना प्रारम्भ की गयी थी परन्तु वहाँ इसकी रचना पूर्ण नहीं हो सकी। पर्याप्त भाग शेप बच रहा तब पीछे दोस्तटिका' नगरीकी प्रजाके द्वारा रचित उत्कृष्ट अर्चना और पूजा-स्तुतिसे युक्त यहाँ के शान्तिनाथ भगवान के सान्तिपूर्ण मन्दिर में इसकी १. अनिता सरिस्कुल म०, स०, ड०। २. 'ख' पुस्तके ५१-५२ श्लोक्योः क्रमभेटो वर्तते ३. अमुधारिणा प्रागिनाम् इत्यर्थ ।

पट्पष्टितमः सर्गः ८११ घ्युत्सृष्टापरमंघसन्ततिबृहत्पुरनाटसंघान्वये व्याप्तः श्रीजिनसेनरिकविना लामाय बोधेः पुनः । दृष्टोऽयं हरिवंशपुण्यचरितधीपर्वतः सर्वतो व्याप्ताशामुखमण्डलः स्थिरतरः स्थेयान् पृथिव्यां चिरम् ॥५४॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती गुरुपादकमलवर्णनो नाम षट्पष्टितमः सर्गः ॥६६॥ इति श्रीहरिवंशपुराणं सम्पूर्णम् । रचना पूण हुई ॥५२-५३।।- अन्य संघोंकी सन्ततिको पीछे छोड़ देनेवाले अत्यन्त विशाल पुन्नाट मंधके वंशमें उत्पन्न हुए श्रीजिनसेन कविने रत्नत्रयके लाभके लिए जिस हरिवंश- पुराणरूपी श्रीपर्वतको प्राप्त कर उसका अच्छी तरह अवलोकन किया था, सब ओरसे दिशाओंके मुखमण्डलको व्याप्त करनेवाला वह सुदृढ़ श्रीपर्वत पृथिवीमें चिरकाल तक स्थिर रहे ॥५४॥ इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराण के संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्यरचित हरिवंशपुराणमें गुरुओं के चरण-कमलोंका वर्णन करनेवाला छयासठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥६६॥ गल्लीलालतनूजेन जानक्युदरमंभुवा । दयाचन्द्रस्य शिष्येण पन्नालालेन सूरिणा ॥१॥ फाल्गुनामिधमासस्य शिशिरत विशोमिन. । शुक्लपक्षतृतीयायां तारापतिसुवामरे ॥२॥ निशाया प्रथम याम नक्षत्रनिचयाचिते । रसकर्मयुगद्वयाख्ये, (२४८६) वीरनिर्वाणवन्सरे ॥३॥ हरिवंशपुराणस्य जिनसेनकृतेरियम् । टीका समापिता, मयाद् विद्वजनमनोमुदे ॥४॥ नानाशास्त्ररहस्यज्ञान् विधान प्रार्थयाम्यहम् । क्षमध्वं स्खलनं यूयं यदन विहितं मया ॥५॥ १. बोधे म०, क० । २. श्रीपार्वत दृ०॥

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परिशिष्टानि

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१ हरिवंशस्थ सूक्तयः स० श्लो. म० श्लो. "निगुणापि गुणान् सद्भिः कर्णपूरीकृताकृतिः । 'कालीका वा स्वसा भ्राता को वै कार्या. विमत्येव वधूवक्त्रश्चूतस्येवाग्रमजरी ॥' ११४२ भिलाषिणः। 'साधुरस्यति काव्यस्य दोपवत्ता मयाचित. । वैरिणो ननु हन्तारो हन्तव्य नान दुर्यगः ।।१९।१०६ पावकः शोधयत्येव कलधौतस्य कालिकाम् ।। १२४३ 'निर्वाप्यते ज्वलनग्निजलेन सुमहानपि । 'दुर्वचो विपदुष्टान्तर्मुखस्फुरितजिह्वकान् । उत्तिष्ठेद् यद्यशो तस्मात्तस्य शान्तिः २०१३४ निगृह्णन्ति खलव्यालान् सन्नरेन्द्रा.स्वशक्तिभिः॥ १।४६ कुतोऽन्यतः ॥ 'रजो बहुलमारूक्षं खलं कालं विदाहिनम् । 'साधोः शीतलशीलस्य तापनं न हि शान्तये । सन्तः काले कलध्वानाः शमयन्ति यया धनाः ।।१।४७ गाढतप्तो दहत्येव तोयारमा विकृति गतः ॥' २०१३७ 'मालोके जिनभानुना विरचित ध्वान्तस्य वा :तदेवोपकृतं पुंसा यत् सद्भावदर्शनम् ॥' २११३२ वद स्थितिः?॥' ४॥३८४ 'दृष्टश्रुतानुभूतं हि नवं घृतिकरं नृणाम् ।। २११३७ 'मौनं सर्वार्थसाधनम् ॥ ९।१२९ 'शास्त्रव्यसनमन्येषां व्यसनाना हि वाधकम्' २१॥३९ "किं न स्याद् गुरुसेवया ।। ९।१३१ 'अक्षरस्यापि चैकस्य पदार्थम्य पदस्य वा । 'विद्या लामो गुरोर्वगात् ॥' ९.१३० दातारं विस्मरन् पापी किं पुनर्मदेमिनम्।। २१:१५६ 'सर्वतोऽपि सुदु.प्रेक्ष्या नरेन्द्राणामपि स्वयम् । 'पापकूप निमग्नेभ्यो धर्महम्तावलम्बनम् । दृष्टि दृष्टिविपस्यैव धिक्-विक लक्ष्मी ददता क. समो लोके मंसारोतारिणा नृणाम्।।२१।१५५ भयावहाम् ॥' ११।१४ 'स्त्रोणा प्रणयोपस्य प्रणामो हि निवर्तकः।। २२।४६ 'सति वन्युविरोघे हि न सुख न धनं नृणाम्।।११।९६ 'कुतो लुब्धम्य सत्यता ।' २०३५ 'अपवादो हि महत रक्तेन न मनोव्यथा ॥ १४॥३९ 'न मुह्यति प्राप्तकृती कृती हि ।' ३५१६२ 'तमःपतनकाले हि प्रभवत्यपि भास्वन ।' १४१०४ 'न राज्यलाभोऽभिमतोग्नपत्यः ।।' ३५।५८ 'पापोपदामनोपाया सन्त्येव सनि जीविते ॥' १४४६५ 'स्कुटवदनविकाराल्लक्षितं चित्तदुःयम् ॥' ३६२० 'अत्यम्य विपत्तोना मन्त्रिणो हि निवर्तका॥ १४॥६६ 'क्व पात्रभेदोऽस्ति धनप्रवपिणाम् ॥' ३७१३ "पटको भिद्यते मन्त्रो रक्षणीय. स यत्लत । १४४८३ 'बहुरत्ना वमुन्धरा॥' ४२।३१ 'तप्तं तप्तेन योज्यने ।' १४.९१ 'यही प्रमदहेतवोऽपि मुखयन्ति नो 'रहसि दुर्लभमाप्य मनोपित, न हि विमुञ्चति दुःखितान् ।' ४२११०२ लब्धरसो जनः ॥ १५।४ 'देवमेव परं लोके विक् पौरपमकारगम् ॥' ४३१६८ 'न सुलभं सुमुखे विमु भरि ।।' १५.५ 'सद्भूतस्यारि दोषस्य परकीयस्य भाषणम् । 'परिचितः प्रणयः खलु दुम्स्यज.।' १५॥४३ पापहेतुरमोघः स्यादसद्भूतस्य किं पुनः ॥' ४५।१५३ 'कामग्रहगृहीतस्य का मर्यादा क्रमोऽपि क. ।। १७१५ 'वक्ता श्रोता च पापस्य यन्नात्र फलमस्तुतं । 'तावद्भार्यादयो यावन्मर्यादा सस्थितः प्रभुः ॥१७१६ तदमोघममुत्रास्य वृदयमिति वृदयनाम् ॥' ४५३१५६ 'पातकात्पतनं ध्रुवम् ॥ १७१५१ 'त्यजन वाचममत्यमलोदता 'का या कठिनचित्तस्य जिनमासनममता।।१८।१४९ भजन सत्यवची निरवद्यताम् । 'पुनधिपरिप्राप्तिर्दुलभा भवसङ्कट ।।' १८.१५० निजयशो विशश सगुणोद्यना 'यनोपयुज्यते यस्य धन वा वपुरेव वा । विजयिनी विह विश्वविदोदिताम् ।।' स्वगायनाने तेन तस्य कि बन्धुतुना ॥ १८॥१४६ 'पृथ्वस्य किम टकरम् ॥

४ हरिवंशपुराणे 'अदेशकाल न हि नर्म शोभते ।।' जिनस्मरणपानीयं पीतं तां मूलतोऽस्यति ।। ६२।२४ 'क्लिशितधीहि जिनेप्वपि शकते ।।' ५५।१४ । 'दुर्लध्या भवितव्यता ।।' ६२४ 'भ्रमति हि स्वपतां भुवनं मन.' ५५।२३ 'करोति सज्जनो यत्न दुर्यशः पापभीरुकः । 'जनाना हि समस्तानां जीवाना नियता मृतिः।।'६१।२० देवे तु कुटिले तस्य स यत्नं किं करिष्यति ॥ ६२१६४ क्षमा मूलस्तो भारो वक्ष्यते क्रोधवह्निना ॥ ६११६२ 'सुखं वा यदि वा दुःख दत्ते कः कस्य संस्तृतौ । 'मोक्षसाधनमप्येप तपो दूपयति क्षणात् । मित्रं वा यदि वामित्रं स्वकृतं कर्म तत्वतः ।। ६२१५१ चतुर्वर्गरिपुः क्रोधः क्रोधः स्वपरनाशकः ।' ६६।६३ 'सुप्तमात्रमपशस्त्रमानत 'दुर्वारा हि भवितव्यता ।। ६११७७ मुक्तमानमसकृत् पलायितम् । 'अगाढे वाप्यनागाढे मरणे समुपस्थिते । प्रत्यवाययुतमङ्गनां शिशु न मुह्यन्ति जना जातु जिनशासनभाविनाः ॥ ६११९६ घ्नन्ति शत्रुमपि नो यशोघनाः ॥' ६२११८ 'परस्यापनि कुर्वन् कुदिकत्र जन्मनि । 'को न वा पतति वारुणी प्रियः' ६३०२० पापी परवधं स्वस्य जन्तुजन्मनि जन्मनि ॥ ६११०१ 'कोऽत्र कस्य बहिरङ्गहिंसकः 'कपायवशगः प्राणो हन्ता स्वस्य भवे भवे । स्वान्तरङ्ग शुभकर्म रक्षकम् । संमारवर्धनोऽन्येषा भवेद्वा वधको न वा ॥' ६१६१०२. आयुकर्म ( रेव ) निजत्राण कारणं 'परं हन्मीति सन्ध्यातं लोहपिण्डमुपाददत् । तत्क्षय भवति सर्वथा क्षयः ।।' दहत्यात्मानमेवादी कपायवशगस्तथा ॥' ६१.१०३ 'सम्पदा रिकर्णचञ्चला "धिक क्रोध स्वपरापकारकरण संसार- संगताः प्रियवियोग दुःखदाः । संवर्धनम् ॥ ६१११०८ जीवितं मरणदु खनीरस 'निरस्यति पयस्तष्णा स्तोकां वेलामिदं पुनः । मोसमक्षयमतोऽर्जयेद् बुधः ।। ६३१३९ ६३१७० अच्छदन्तो नृपस्तत्र २ हरिवंशपुराणस्थ श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः स. श्लो. म. इलो म० श्लोक [अ] अग्निपातं महावा १८६३१ अचेतनोरकरणाः ५६१४३ अंगवच्च ग्रहा ज्ञेया १९।२१५ अग्निभूत्याग्निलोद्भूताम् ६४१६ ६२।६ अंगास्तु पड्जकशिक्या १९४२२६ अग्निला ब्राह्मणी तस्य ४३३१०० अच्छिद्यन्त शिरांम्युप्र• २५।५८ अटिनवम्वष्ठ ४९18 अग्निशोध्यन दिव्यन ४८।१६ अच्युतान्ताधरज्ज्वन्त ४।२८ अकम्पनो महासेनो ४८.७० अग्निसाकरणे सक्त- ५२२५२ अच्युतान्तचतुप्के च अक्थयत्प्रणतः स वृता- ५५।८७ अग्नेरिवेन्धनमहानिचयर-१६।४६ अच्युतार्यवती चा:पि २२०६५ अस्माच्च तयोति ४६।११ अग्नेः शिखावदाविद्ध- ५६.८१ अच्युतेन्द्र महादेवी ६०1३८ अकस्माद्गच्छना क्वापि ४७९० अग्रजः प्रतिपायव ६।२६ अजघन्या निदाघे या ४।२७५ अकालयात्रया लोकः २०१७ अग्रजस्त्वं ततो जातो ४७.८९ अजयं सह कर्णेन ४५।४२ अक्रमस्य वदा हेतुं २१११२८ अग्रजाय मया देया ४७1८८ अजितस्य नवम्या तु ६०।२३५ अक्रूरः कुमुदो वोरः ५०।११५ अप्रायणीयपूर्वस्य १०७७ अजितस्य सहयाणि ६०1३६२ अकरो वारिपेणो यो २।१३९ अग्रे धीमण्डपोद्वासी. ५७११४२ अजितोष चतुर्दश्या ६०।२६४ अङ्करस्य कुमारस्य ५२।१३ अघातिकर्मणामन्तं अजितन्यरोनन्तस्य অলরানাম ४८।२४ अपातिकर्माणि निरत ६६।१७ धनि मग्जनक ५५०५४ अक्षरस्यापि चंक्स्य २१११५६ अर्धा च स्फुटिक चेति ६१६४ अनि साथ तयोर्दुहिता १५।२७ यारालेख्यगन्धर्व ६।२४ अराशिविधिश्चाष्ट १०११२२ अजनित जीवघातगुणतो ४९।१७ अहारालेस्पः गन्धर्व ८४३ अङ्के मोघः प्रवाले स्या ५१६०६ अजिताजिताच ५२।३५ अशान्निम्वत्र नो युक्ता ३१५४ अङ्गं विपाकमूत्र यद १०१४४ अजैर्यज्ञविधिःकार्य अभुगः शुदमामन्न. ४३३१६२ अङ्गप्रविष्टतत्त्वार्य २०१०१ अजयंष्टव्यमित्यत्र १७१६४ अशोम्यपूर्वकाचाटी ५०८१ अगवङ्गलिगादीन् .९।१११ अरित्यादिक वाक्ये १७११५ मक्षोम्पस्योदय: मनुव- ४८४५ अगरक्षापरा देश्यः ८.५२ अन एप न पर faখানা ५०७५ अगलक्षास्त्रयोदशीनिम्६०।४९६ अज्ञातकुलनामान यौहिणीप्रमाण च १।१०५ यदम्पर्मादिना तस्य १४८९ अमाननितिफले असोहिणोनिस्ता ५०१६९ अगस्फटिकम प ४॥५४ अमानं प्रकृति या ५८१२०५ अक्षौहिप्पो बहुगुणा ५०७४ अङ्गाररेण वृत्तान्ती यमानास्पतीनोच ५०४५ अनानिमीलनं पावन् ११३६७ बङ्गारपहर १२८१ अञ्जन वनमा प ६८ असाथमधुगणप १४१५ अनामनविधी काश्विन ८.४७ अटिरवा मधुरा सा- ३११८१ भराडमगमन्द्रो ८५२८ अंगुलीयानईप ४२.८९ अमिमादिगुणोकृष्ट २०१४ अगजितरि: प्राप्त ५४ अंगुष्टचरायाः अगुवनानि मा से अधिरताः शाप ६४.६० बीनमररमाया ५४१८ बारदिनापरं ५१.. अगमरियम ६. मनो नाममा मन राजनुभिः पर. भासामागार ६१३९भोगादिक, ૧૮૨૪૮ 4.शपायाना भगुगरपुष एम. ७१ अचिन्तय रमोन यत्र.वि निकाल महामार्ग २२१९. बरिनार २१११. अतः परं परं गौर. २८.१ ६ हरिवंशपुराणे ९।८५ ६५१ अतः पर पुनः प्राप्ता কাল যন্তু মান্না ५१११ अथवा दुखभीरत्वान् २३३११८ अत परं नृपाः सर्वे ५०1८६ अत्रास्ति भरतक्षेत्रे २७/२० अथ विज्ञापितो माथः अतः पूर्वविदेहेषु ४३२७९ अत्रैव कामदेवस्य २९।२ अथ विद्याधरो वृद्धा २२१४७ अत: प्राह यति. प्राप्तौ ४३।११२ अत्रवान्तःपरं स्थानं ५६९३ अथ विबुद्धसरोजवनस्पृशा १५१ अत दारीरबाधाया १७११४२ अत्रैव भरतक्षेत्र ६०१२६ अथ विस्वदलिज्या- अतश्चतुर्थभागेन ५०११०५ अत्रैव भरतक्षेत्रे ६४/४ अथ वैश्रवणो दिव्या ९७७ अतः सर्वात्मनाभाव्यं १८।१५३ अथ कालद्वयेनीते ७/१२२ अथ व्याख्यामसौ कुर्वन् १७१६३ अतस्तस्यानवद्यस्य ९।१४० अथ कार्तिकराकाया ३०११ अथ शम्बस्य सम्भूति ४८.१ अतिक्रम्य तथा कन्या ३४।२९ अथ कृत्वात्मजोत्पत्ती १११ अथ श्रुत्वा जरासन्धो ४०11 अतिक्रान्तेषु भूपेषु ४५।२१ अथ कोऽप्येकदा भतुर् २४१६१ अथ सकलुपभावा अति [जाति] तद्धित- १९३१४९ अथ गान्धारपञ्चम्या. १९४२४८ अथ स नेमिकुमार इवान्यदा ५५।१ अतिनिचिताग्निवायुजल- ४९/४७ अथ गगनसमुद्रे ३६१५३ अथ स प्रायितः प्राज्य- ३३१ अतिबालेन मुग्धेन ८।१२३ अथ गव्यूतमुद्विद्धं ५७७५ अथ स वीरक ईश्वर १५।३८ अतिरूपतमो धीरः अथ गिरिगुरुभित्ति ३६१४० अथ सप्तद्धिसम्पन्नः २।१११ अतिलघ समा प्राह २१।१०४ अथ गान्धर्वसेना तां २१११ अथ सभ्यममाको ४२११ अतिवर्तकरोप त ६११६७ अथ ज्ञात्वा गणाधीश. ७१०६ अथ सर्वामराकीर्णस् अतिवितप्य तपस्तनु- १५।४१ अथ तया सखगेन्द्र- १५॥३३ अय साधुनृपस्तत्र ३११९२ अतिविथम्भतःप्रेम. २९/३८ अथ तयोः परिपाक १५।१७ अथ सा रोहिणी भर्ना ३११ अतिवियम्भतस्तस्या २११५८ अथ तयोस्तनयो हरि- १५:५७ अथ सेनामुखं खिन्न ३११७८ अतिविपमं तपो घटयतो ४९।१६ अथ तीर्थकृतामा ८।३७ अथ हयंतले सुप्तः ३११ अतिवीर्यः मुवीर्योऽनस् १३।१० अथ ते पाण्डवाश्चण्ड ६४।१ अथातिशयरूपत्वात् ६०१४ अति [श्रुति] वृत्ति- १९.१४७ अथ लोक्यसारक- ५७:१२३ अथात्र यद्वत्तमतीव अनिमन्धापन मिथ्यो- ५८.१६६ अथ दिव्यध्वनरन्ते ३११८१ अयात्रावसरेऽपृच्छन् १८९६ अतिसन्धानपरता. ५८१०५ अय दुर्गवलाय ५०१४४ अथाध्ययनमन्यत् स्यात् १७।११८ अनिमम्मान्य सस्त्रीक ४३११७४ अयवाऽदृष्टकल्याणः ५२८१ अथानयद्भानुरूपेन्द्रमों- ३९१७५ अनीषणेनापि शम्ण ५६१६१ अथ देशोऽस्ति विस्तारी २।१ अथान्यदा प्रजा:प्राप्ता ९।२५ अनीन्द्रियेप भावे ५६२४९ अप नाभैरभूद्देवी ८॥६ अथापृच्छत् पृथुधोकः २०११ अतोऽनुप्टानमास्येय. १७४१०६ अय नेमिमनोन्द्रोऽपि ५६।१ अथाभ्युदयमम्येते ५३११ अतो मया वितीर्णय २९।६२ अप पुनर्विजयानगोत्तरे ५५।१६ अथासावेदारि- अनो वयमयो पनी ५७/२० अय पौरपदण ३११५७ च्यासो कीचकः साधु ४६४२ अतो विश्वजनीनाथ ५०.५४ भय प्रमूतौ मुतयुग्मस्याः ३५।४ अचासो प्रतिभास्थोऽपि ९।१३५ अतो विपरितेनाय ८1१२७ अप प्राप्तो घमन्ततः १४।११ अथासौ सौम्यनाराभि. ८.५६ अत्पन्नमविरागाहपा. ८1८१ अय प्राप्ना महामत्वाम् ४५॥१ अथाह गणनाथाय: अत्यनमय ४५1१५२ अय बाहयली चक्र १११७० अयेन्द्रेण कराइगुष्ठे अत्यनमारम्य ८1१०२ थप मथितमहा- ३९।४९० अथेन्दोरिव गुमाया अत्यामरामिनिजाग्या २९७२ अप मयुगूदनावरजया ४९।१ यदा घन्द्रसित भर जन्मनि कृयाने १०॥२३ ঘ মানি না यथास्पादिश्रवणे पक्षे ३५१ अधगिदिमा बन्दा ६०1० भय पोडगो पगो: मूनर १८१ यदत्तम्य स्वय ग्राही ५८।१३१ मनभाव YIY? अपरोब प्राम ४२१८४ अरसेति न पासप २९१६१ want गुगष्ट- अपना मागविण्डन अदपमपममूलान् ३७१ २४.१ २००६ ७ २०३६ इलोकानामकारायनुक्रमः अदाद् द्वादशवर्षाणि ११६१०४ अनशनाऽव्ययनादितपःश्रिया १५३८ अनुमेने वचो मन्त्री अदृष्टपूर्वतीर्यशाः १२।३ अनसूया विपादादि ५८।१८९ अनुयाताजुनं प्रेरणा अदृष्टश्रुतपूर्वत्वात् ९.१५४ अनादिनिधना जीवा ५६४२ अनुयोगयुतं द्वारः १०११३ अदृश्यायामकस्मात्तु ५४/२९ अनादिनिधनो जन्तु. ५८।२७ अनुरागवती वभ्रे १९।२६६ अधःप्रवृत्तकरण ३।१४२ अनादिरपि चानन्त. ३।१०६ अनुवम जरासन्धं ४०१२७ अधःपटिमहम्राणि ४।१६५ अनादिरन्तवान् भव्य ३।१०५ अनुष्ठाय चिरं श्रेष्ठं ४३३१५८ यघ.मंक्षेपणी द्रोणी ५।४४१ अनादेययश कीति ९६१०५ अनूनुदनृपाध्यक्ष २०१० अघरस्तननाम्यतः १४४४४ अनादी भवकान्तारे ४३३१३३ अनुभूनं श्रुतं दृष्टं ४८।२७ अधर्मपथपाताल- १११७ अनाद्यनिधनस्तस्य ४।४ अनेकपानेकपलोकना ३७।२७ अघश्चोव्वं च ४।३४४ अनानारमापि तदृत्तं ५८.१५ अनेकमुखदत्तमन् ३८/२१ अघस्तक्षपिलायास्ते ४३१४८ अनारतगलद्वाप्प. ५४१३४ बनेकरयलक्षास्ते ५०११२७ अधिवसत्यथ तद्दमनो हरी १५।२६ मनायंजनसंवृत्त २०३३ अनेकरथचक्रचूणि ४२।९८ अधिष्ठान प्रमादोज्य ५६।१८ अनाणा तु वेदाना- २३१४५ अनेकरदमवृत्त. अघोज्योज्याः पहेतस्याः ५।१७६ अनावृत्तप्रभुर्यज्ञो ५।६३७ अनेकावनियूंढ ५०७ अयो वेत्रासनाकारा ५७.९५ अनावृष्टिनलोपेतस् ४४/९ अनेकोपाययोगस्ता ४६१३१ अघो मध्योपरिप्रख्य- ६०.१६८ अनावृष्टिस्ततस्तस्य ४४।१४ अनेन धनरागिणा ४२१९९ अधोमुखमयूयोध- ८।६४ अनास्वाद्य फलान्येपा ६०१११५ अनेनानियते ज्ञान ५८०२१५ अयोलोकविभागस्ते ४॥३८३ अनिगृहितवीर्यस्य ३४११३८ अन्त.बलुपिणी साऽस्या.३३।१०६ अधोलोकस्य सप्ताध. ४९ अनिच्छन् यूरसेनोऽपि ३३६१२५ अन्तर्दधे धवलगोकुल- १६६३३ अघोलोकोरजवादि ४।२९ अनिच्छन् स्वच्छचोर्धारः ४७१७ अन्तर्घानमिता सोऽपि २९।६६ अध्यचक्रोशविस्तारा ५७१३९ अनिच्छास्यो महानि. ४।१५३ अन्तर्नाटक्याला स्यात् ५७१६८ अध्यतिष्ठन्नमिाथेष्ट ९।१३३ अनिवृत्तिगुणस्थान ५६९० अन्त.पञ्चशतायाम ५।१४६ अध्यढे हि सहसा अनीकमय यौवर्ज ३८।२२ अन्त.पुरमुतादीना ४११२८ अध्यापितास्त्रयस्तेन १७॥३९ अनीदृशस्तु ममारी १७१४१ अन्त.पुरसहस्राणि अध्रुवं सम्प्रणम्यन्तं १०७९ अनीलयशमस्तस्या २२२११४ अन्तर्वहिदपरिग्रहास्ते ३४११०५ अनन्तवलनान ५६।११३ अनुकर्णमूनेस्तस्य २०५५ अन्तर्मुहूर्नकालस्या ३।१२४ अनन्तमतिसंज्ञस्य २१११७ अनुकूलमिपं राजा ३१३१२६ अन्तर्मुहूर्नकालं तु ५६२७ अनन्तवार्यपर्याप्त अनुत्तरदशस्याय २६९४ अन्तर्मुद्तकालेन ६११७० अनन्तरम्य सान्निध्ये ६१।२५ अनुत्तरमुखोग्ग्बलः ३८०१३ अन्तर्मुहर्तकालेन १२२५ अनन्तरं स्वप्नगणस्य ३७॥२२ अनुदितेन परस्य महा- ५५।१९ अन्नमुंहतमपि लय- ६०५७३ अनन्तरा विनिर्दिष्ट ४१२६१ अनुपाल्प चिरं धर्मम् ४३३१४६ अन्तमहत रोपायु: अनन्ताननभागस्तु १०१५ अनुप्रेशाभिदाभि• ४३।२११ अन्तवली तदा पन्नी २५।११ अनन्नानन्तसम्यान ७.३७ अनुप्रेक्षाश्च धर्मश्च २०१३०१२२ अन्तर्बनी प्रमूना मा १८।१२० अनन्तामद्वयमवय. १०.२० अनुप्रेशामिरारमानं अनछिननटो भानि अन.गरीरामारा ३५४ अनुवभूव मुखं चिरमैतमा १५:३४ अन्तरः शून्यकाल. ६४.१०१ अनगारास्तयाज्य से ३१६२ अनुबन्धावनिप्रस्य सन्दरस्वरगंयोगो १९११७२ अनन्मिमहारल. अनुभवन्तममुं जिनधर्मजं २४१८६ अनरान्नरमम्थास्तु ५०।११. बननिनम्रपा निज ५५४० १६॥ अनयावस्पयामीन अनुमन्यम्य मे भूमिम् २०४८ अन्तहितवपूर्वात. २६११२१ अनवश्य मनोमुर्गा- ५८४१८१ अनुमन्यावीरित्यं २०१४ अन्तरेत हरिः मन्यां अनुभूप चिरं लक्ष्मी अन्तरिक्ष ममसम्त हरिवंशपुराणे अपवार प्रवृत्तस्त्व अन्तरेणोदयं प्रीति ५८॥३८ अन्योन्याशेपिणोपुंद ५२।४७ अायीद बलिराप्रिय २०१२१ अन्त.स्यानप्यपा पत्यः ५०।२७ अन्योन्यानुप्रयेशन ७७ अमग्नोत्माहमालोवय १८१६६ अन्ते कोन्तकजिवीर्य ५९।८३ अन्योश्यागमाराङ्गात् ३०।१९ अमणोद्गणमुपश्च २०१२ अन्ते वैश्रवणास्यं तु ५।२८ अन्योन्याभिमुगादेगा ५।५५७ अभयदूध्वंमुदारमुदारव:५५।१११ अन्ते माहेन्द्रकल्पान्त ३४॥३३ अन्योन्याहानपूर्व ते ५११५ अभवदस्य महागिरि- १५५९ अन्तै सम्मेदमारा ४३३२१४ अन्वये तनुजाते २३११४९ अमवस्य पुरस्य तु १५।२३ अन्तै स सम्मदविवापि १६७५ अन्वावायेऽस्मदीयेत्या २६०५२ अभयं नः प्रदाय त्वं अन्त्यदेह' प्रत्यय ४२०२२ ५२२७९ अमविष्यदिमक्रीडा अन्धा. पश्यन्ति रूपाणि ५९७७ अपराजित इत्याद्या १८।२५ अभापकान्तयोरचापि ५।४७४ अन्नपाननिरोपस्तु ५८।१६५ अपराजिनमर्यास्य ५७६० अभियन्द्र हास्यातो १८।१४ अन्नं पान च सुस्थाप्य ६२।११ अपराजित इस्यास्या ३४/५ अभितः स्वास्यथा दो त ५७१९२ अन्यथा कयमुत्सात- अपराद्यास्त्वमी चंद्या: ५।२४६ अभिननिजमर्यादा ४७२ अन्यथा चिन्तयत्येप ४५1८४ अपरायास्त्विमे प्रोवता ५४२५२ अभिपतदुरगेन्द्र अन्यथा तु वितीर्णायाम् ४२१६२ अपथनिपातपातनपना ४९।४ अभिपतदरिहस्तात् अन्यथा देवराजस्य ६११७८ अपध्यानं जयः स्वम्य ५८।१४९ अभिभूयावभो थाम्ना ३२३४ अन्यदागन्य सवेन ४३११०४ अपन्यासः कदाचित्म १९२२५९ अभिरामः स रामाख्या ३२।१० अन्यदा चंत्यपूजार्थ ६०1८३ अपनीय तनोः सर्व २०५२ अभिरूपोऽतिमुग्धोत्र. १९१३१ अन्यदा तु विबुद्धो.मौ २४।६७ अपरस्यामिलादेवी ५७१२ अभिरूपतमाः सर्वे ३३१३४ अन्यदा तु विनीतोऽसौ ४७।३१ अपरार्णवमामृत्य ४०।४५ अभिहपतरायां ६०११२८ अन्यदा नारदोवादि ४४॥३ अपरेम्यो विदेहेभ्यः २७१३ अभिवन्द्य तदापच्छद् ६४।१२३ अन्यदाऽन्यभवोपात्त २८१२६ अपरोत्तरदिग्भागे ५।२१० अभिपिक्तस्ततो देवः अन्यदा पुरवृद्धास्ते १९।१४ अपर्याप्ताः पुनः सत्त्वा १८७९ अभिपिवतो तत: सर्व ५३४३ अन्यदा मातृपुत्रास्ते २१:१६६ अपश्यत् स विदूरेण ४७१०१ अभिपिच्य नृपस्त्रस्तो २९।३३ अन्यदा मुनिपूजार्थ ४३।१५१ अपश्यन्ती पति शिष्यान् १७४ अभिषिच्य मधुं राज्ये ४३३१६० अन्यदा विहरन प्राप्त ९।२०५ अपि क्रियेतापि परः ६१।१०६ अभिषेकसभा तत्प्रा. ५१४१९ अन्यदा श्रुतपारस्थ. २०१५ अपि न्यायविदुत्तस्थौ ३१३१०० अभिसन्धितो बन्धः १७.११२ अन्यदाष्टापदं यातो १९।८७ अपातयद् ध्वज छत्र ३१४८५ अभूवन् गणिनो भर्तु- १२॥५४ अन्यम्यापि च दुर्बोध. ४३।११४ अपूर्वकरणो भूत्वा ५६४८९ अभूद्भवनवासिना अन्याय्ममुभय चैत- २९।१८ अपूर्वसुस्वप्नविलोक ३५।१४ अभृत चार्थवतीममिधामयं १५।२४ अन्या नागगुहा यातम् ४७१४२ अपूर्व सर्वतो रक्षा ८२०९ अभ्यर्थ्य गुरुमानीय अन्यानपिच कन्याय ३११३२ अपूर्वंयमही भिक्षा ४५.११२ अभ्यचिते तपोवृद्धयं अन्येाधु मणिद्योत- ५२११ अपृच्छच्च विबुद्धोऽमौ ३०.३० अम्यन्तरगृहद्वारे अन्येऽपि बहवो भव्या ६५।२५ अपृच्छत्सुमतिमन्त्री १४।५३ अभ्यर्क विकसद्भाति ५७।१७८ अन्येपामपि यद्येषा १८१६९ अपृथग्लक्षणैर्युक्ता १९.१८० अभ्यस्ताः सेतरस्त १०।१५० अन्येषामपि पूर्वाणा १०१८७ अप्रमत्तगुणस्थान ५६०५१ अभ्यलोकि कलिता ६३१३ अन्येणमपराले ता ६०।२१८ अप्रमृष्टाप्रदृष्टाया ૧૮૭રે अभ्रं सिंहनिरभ्रेऽपि अन्योन्यगन्धमासोढु ३।१७ अप्रशस्तमपोहवासा ५६।२ अम्युक्षन्ति सुरास्तत्र ५९।४० अन्योन्य दृष्टिसम्पात ३१३४२ अप्राक्षीत् पूर्वजन्मानि १८१११ अभ्युत्थाय ततो भक्तौ ५३।२६ अन्योऽन्यस्य तदा शक्तं ७.९८ अबाधित पुनाये १७.१०३ अभ्युत्थिता विभुवीक्ष्य ३०।२४ अन्योन्यप्रेमबद्धस्य २९।६९ अभक्षा वायुभक्षाश्च ३११३३ अभ्युद्गतेन तेनामी ४३।१६४ ३८।१४ ३३१२९ ९।१९ ८1५३ ८७३ श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः ९ अमुष्य याताद्य तपो अमूढमानमः गोरि अभ्युदेति करभिन्न ६३३४१ अरोमगममग्नं च २३३८४ अल्पं दक्षिणतो वक्र २३॥६५ अभ्युन्नती पदाङ्गुष्ठौ ८७ अरोमगं कृशं मध्यं ८1१६ अल्पप्रमाणपरमाणु १६।३३ अमङ्गलदृश पापाः २३।१०४ अहणं नवमं द्वोपं ५२६१७ अल्पस्य महतो वापि स११९ अमात्यदुहिनुर्जाना. ४८1५६ अचिर्माली कुमारोऽहं १९७१ अल्पमन्तरमालोक्य ४०।२८ अमात्यराजपुत्री तो २७१११ अचिर्माली प्रभुस्त्र १९८१ अल्पातितनुरोमान २३१६३ अमानुपं कम जगत्य ५४१७० अचिराद्यं पर पान- अल्पावमामलो मुग्नी २३३८५ अमानुपं कृष्णविचेष्टितं ३५।४९ अर्जुनेन च भीमन ४५.१४१ अल्पे संहारसिद्धास्ते ६४११०५ अमावास्या तु चैत्रस्य ६०॥२६८ अर्णवोपमयोस्त ५०८७ अल्पः पञ्चशतारैर् ५।२६५ अमितप्रभया तस्य २७।१३६ अर्थतः पूर्व एवाय ११६७ अवगाहः पुनस्तामा ५१६५७ अमी चतुविधा देवा १२।३६ अर्थध्यानाविलश्चासौ २७।४२ अवगाहनमुत्कृष्ट- ६४४९९ अमी पुण्यवतस्तस्य ११११११ अर्थसंकल्पमात्रस्य ५८।४३ अवगाहा महाबाहु- अमो विद्याधरा हयाय २६११४ अर्थव्यञ्जनयोगाना ५६५८ अवततार कदाचिद् अमुतोऽधित्यकातस्त्व. २६१४५ अर्थशब्दप्रधानत्वाच् ५८।५१ अवतीर्य ततो भूमि १८.१३४ ६६।१० अर्धकोटीकुमाराणा ५०।११३ अवतीर्य रथेभ्यस्ते ५९।११८ अम्बुनिम्बद्रुमै रोद्र ७११८ अर्धगव्यूतिविस्तारः ६११२ अवतीर्य विमानेभ्यो ५३।२५ ५२।४९ अर्धत्रयोदशोत्तपत् ६०१२५० अवतीर्य मधुर्जातो ४३।२१७ अमूर्तत्वं यथा व्योम्नः ६५२९ अर्धप्रयोदश प्रोना १८१६१ अवतीर्याऽच्युतेन्द्रस्तु ४३३३२ अमृतस्यैव धारा ता ३।१६ अर्धमन्दरविष्कम्भात् अवतीर्ण.स सिद्धयर्थी ९।९३ अमोघे स्वस्थितापाच्या ५१७०८ अयोजनविस्तीर्णी ५११५ अवतीर्णस्ततो भानु- ४७११०५ अयं पुत्रसहोण १२।४० अधंयोजनमुद्विद्धं ५।५१२ अवतीर्ण तमुद्गन्धि २३।१८ अयनद्वयमन्दं स्यात् ७१२२ अर्धयोजनवाहुल्यो ४।४१ अवदच्च पनि नाथ ४३१८ अयमास्ते समग्रात्मा ५७।१५८ अर्धयोजनमानस्तु अवदच्च वचो दक्षी ४३१६८ अयमेव क्रमो ज्ञेयः ४।७२ अर्धरज्ज्ववसानेऽन: ४।२६ अवददिति बलस्तं अयोधनसुनो मूल १७१३२ अर्धराज्यविभागेन ४५११४८ अवधिज्ञानिनं श्रुत्वा ६०१७९ अयोध्यामृता नीति ५७११२२ अर्धामनसुखामीनां ४२।८३ अवधिज्ञानकृष्णश्च ६५१४३ अयोध्या विजया राजा ६०११८३ अर्कोदितो बभौ भानुः २२।१३९ अवधेः पूरणायातः ६११२९ अयोध्येति विनीतेति ९।४२ अर्हता चक्रिणामर्ध- ६०1१३६ अवल्या. सुमुखश्चैव ४८।६४ अयोध्योद्घाटितेनासो ११:५५. अर्हन्सु योऽनुरागो ३४११४१ अवरा तु स्थिति. ४।२९१ अरजा विरजा वाना ५।२६२ अर्हत्पूजादि तात्पर्यम् ५८.९५ अवरामौ च विभ्रान्ते ४।२५५ अरमाण्डलिकत्वेऽपि ६०१५०७ अहद्दत्त इति ख्यातो १८।११५ अवरपा परापीष्टा ४।२६९ अररन्ध्राकृतीन्यव ५१४९८ यहदायतने पूजा २११९ अवलोक्य जिनेन्द्रस्य अरश्च पुण्यमूर्तिश्च ६०१५६० अर्हद्दासम्य तो देवी २७।११२ अवनति पादेन ६१८५ अरिष्ट देवमम्मीत ६।४९ अभ्य सर्वदा मर्व- २२१४३ ७५७ अरिष्टनेमिनायाय २२१३८ आरोग्याकृष्य पार्थेन ४५६१३१ अवाविमर्गमन्येषा अरिष्टनेमिनाथस्य १३५१ अलंकरिष्यत्यालगधीः ३७१२८ यवान्नरेजेक्शतानि अरिएनमश्चरितं निशम्य ३५॥१ अलकापतये दत्ता २७.७९ अविज्ञातमवहातों ४७१९१ अरिष्टनेमिनामाईन् ३४१३८ अलशित कमभटः अविज्ञातमुखच्छेदाः ४६१२२ अरिष्टपुरनाथस्य ४४१३७ अलजलममानानि ५.४४५ अवितमित्यमी विनय- ४९१३७ अरिष्टपुरमिष्टं तु ६०।२४१ अलव्यपारमुचुक्तं ४११५ अविद्याकुदाल न्वामी १९९४ अरिष्टाणि मूर्तीनि अलाभेचननम्नम्या अविद्यारागमविलष्टो ५८।१३ अवमर्पति वस्तूना हरिवंशपुराणे ४।१२६ ३४।४१ ५।६७८ अविद्यावरमायादि ५७.१६० अष्ट मस्येन्द्रनुष्टस्य अष्टाशीतं शतं दिशु ४।९१ अविरामवियोगायाः ३०११४ अष्टया स्पर्गनामापि ५६।१०२ अष्टाशीति शतान्येव ६०४५७ अविरह सुरतामृतपायिनो ५५।२५ अष्टधा दर्शनाचोर ६४।३९ यष्टाशीति सहैव म्या ६८४ अवीवृधदमो लम्वा ३३१९० अष्टमोऽकम्पनास्यानि ३४३ मटागोनिश्च वर्णा १०॥२५ अहि तापसात्मीयं ३३१६७ अष्टयोजनविषम्भः ५।१४३ अष्टानोतिर्महादिशु ४।१२१ अव्यवस्था निवृत्यर्थ. ७१४१ अष्टशरया सहस्राणि ६०४५२ अप्टाशीत्या सहगाने ६६८ अव्यक्ताः पाण्डवास्तत्र ४६।२४ अष्टविंगतिसम्मिथ यप्टासत्या सहयाणि ६०४० अव्यक्तोदयकर्माणो ६४/६३ अष्टादशशती प्रोक्ता ५।४३ अष्टापप्टिमहादिक्षु अनतोऽहमपि भ्रान्त्वा ४६५३ अष्टादसासहसाणां १०।२७ अष्टारमनवनवमो ३४१९२ अशक्यवर्णनां दिव्या ४११३२ अष्टादश सहस्राणि अष्टाष्टभाममामाघ ६०१४८६ अशनिपातसहोज्झित १५।१८ अष्टादश सहयाणि ६०१५११ अष्टाहं प्रविधायासो अगरीराः मुखात्मानः ६१३६ अष्टादशकुलास्तेषु ५।४८२ अष्टोन्द्रायश्चतुयासम् ५५३६८ अशितश्चापि भानुश्च ५०।१३० अष्टानिशसहस्राणि ६०४४० अष्टोछायश्चतुमि ५।३९१ अशितानि पुरा भद्र! २४.१७ अात्रिमात् म विभ्रान्ते ४४१७८ अष्टोन्द्रायाः शतायामा: ५।३४९ अगोतिश्चतुवा स्याद् ४।१२२ अष्टादश सहस्राणि ५।४३२ अष्टोच्छ्राय चतुर्यास- ५।५९८ अशीतिश्चापि चत्वारि ५४२७२ अष्टादश सहयाणि ५४१५ अष्टोत्सैघचतुाम- अशीनिश्च महमाणि ५.५१३ अहादश सहस्राणि देवश्च५।४१६ अष्टोत्तरशतं दिक्ष ४।११४ अशीति घनुरुद्विद्ध ५।१४७ अष्टादश सहमाणि ५।५०३ अष्टोत्तरशतं तेऽपि अगोति सप्तति. पटि-६०१३१० अष्टादशेति संख्याताः ४०१२३ अष्टोत्तरमहस्रोच्च ८॥२०४ अशुभप्रकृतीना तु ५८१२९१ अष्टादश सहस्राणि ६०१३५६ अष्टौ च विशतिरितस्य १६१७० अशून्यहृदयस्पर्श ८1३४ अशा शतान्येव ६०॥४२० अष्टौ चैव सहस्राणि ५।५२६ अशेषयादवाकीण ५०१३९ अष्टादश गणाधीशाम् ६०१३४५ अष्टो तीर्थकरोत्पत्ता अशोकवनमादौ च ५।४२२ अष्टाना मिद्धिरुद्दिष्टा ६०।२९८ अष्टौ तुष्टाः प्रकृयाग ८।१११ अशोकनगमाभामी ३१३१ अष्टाना मुक्तिरद्दिष्टा ६०.३०३ अष्टौ निःशङ्कतादीनाम् ५८।१६२ अगोकः सप्तपर्णश्च ५।४२४ अष्टानतिरस्यति ९।२३ अष्टो पोडशसंख्यातो अशोका नोक्हम्याध १९६९ अष्टान्तादिषु विज्ञेयः ३४/९४ असरलसपत्नीक- २३।१६ अश्मगर्भमहास्वन्धो ५।१७८ अष्टापञ्चाशदिष्टशनि ५।६३ असत्क्षेत्रे यथा क्षिप्त अश्रद्धाय मत जैन ४३३१४७ अष्टाभि. प्राप्तिहार्य- ५६।११८ , असन्तोपभुजाश्लेप- १४।१०१ अश्रौषीद् घोषणा राज्ञः ३३३३ अष्टार्जुनमयस्यास्य ५.७० अमाधारणपण अश्वक्रान्ता तथा पष्ठी १९३१६२ अटायामो द्विविस्तारः ५.३६० असाध्यता विदित्वाग्नेर् ६१८२ अश्वग्रीवो भुवि ख्यातः ६०१२९१ अष्टावक्षरकोटयस्तु १०११२६ असाध्यो लोवित्रासी. २४/२३ अश्वग्नोवो हतो युद्धे २८।४४ अष्टाविंशतिरिष्टास्ते ३४/५८ असारा. कदलीस्तम्भा. ८॥१३ अश्वमेधोऽजगोमेधो २३३१४१ अष्टाविंशतिरिष्टसाधन. ३४.९७ असावेव समादिष्टश ४॥२६६ अश्वस्पधरणामा ३०४२ अष्टाविंशतिरद्दिष्टा ४१४० असिचक्रगदापात- अश्वसेनामुपादाय ३२१३० अष्टाविंशतिलक्षास्तु ४।१८६ असिचक्रधनुःपाणि- अश्वसेनोऽश्वसे नाया ४८०५९ अष्टाविंशतिरेष स्यात् ५।२९४ असिना घातयाम्येनं ३३१११९ अश्विन्यामभवत्तस्मान् ४५।४८ अष्टाविंशतिसस्यानि ५।४६८ असिर्मपी कृषिविद्या अश्वः कनकपृष्टयों ५२।१६ अष्टाविंशतिरन्यस्य ६०१५३८ अमिशक्ति-गदाकुन्त- २३२९६ अश्वैरारक्तसवलं. ५२।१८ अष्टाविंश शतं दिक्षु ४११०९ असुरा मातृतीयान्त अष्टाञ्चाशदुत्सेध ४।३३१ अष्टावेव महादिक्षु ४॥१४७ अमुरा नागनामानः ५७११ १८६८९ ७११६ ४२।८२ श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः असुराणां च तत्रायुः ४॥६६ अहमिन्द्रविमानेषु ६३११२ आकुलो बलकृष्णौ च ६१६८० असुराणा घmपि स्याद् ४१६८ अहमिन्द्रसुखं भुक्त्वा १८.११० आकून श्रेणिकस्याय ६१।१ अमूत सुतमुद्गीर्ण २९।४६ अहमिन्द्रास्ततोऽनन्तं ६११२५ आकूपारं यशो लोके ११३८ असौ बाहुबली कान्ते १२।३८ अहं च मुनिमानम्य २११६४ आकेवलोदयान्मौनी असंख्यातप्रदेशात्मा ५८१३१ अहं तु दुःखमंभार ४०.४१ आक्रन्दनस्वनप्राप्त ४३॥६७ असंख्येयानि गत्वानः ६४।८४ अहंयव इवाजम ३।१८ आक्रान्तभेदपर्याय ५८।४४ असत्ययादकोटीना ७१५० अहंयवो दधावुस्ते ३४।२८ आक्रोडनगृहेप्पा ५.२०४ ভাসাণা ४१३५४ अहितं शातयन्ती सा ५८४६ साक्षेपण्यादयो यत्र १०१४३ असंख्यवर्पकोटीना ७.५३ अहितापकुलान्ताय ४५१५४ आगच्छ भर्नरादेश ९।१७७ असयतचतु.स्थानात् ३१७८ अहिंसादिगुणा यस्मिन् ५८।१३२ आगच्छन्ति तदाकर्तुम् २२।४ असंबद्धप्रलापस्य ४७.९७ अहो कषायपानस्य २३११२७ आगच्छन्त. पुरः सर्वे ६११५३ असंभाव्याम्भसि भ्राम्यत् ६२।१८ अहो कान्तः परं स्थान- ९।१४८ आगतं च पुनः पाणि ५२१८४ असवदानि गायन्तो ६११५२ अहो क्रीडनशीलायास् ३३।३५ आगतश्च महाकाल. २३३१३२ अस्ति तत्पूर्वसम्बन्ध. ३४.१४ अहो चेष्टितमार्यस्य २१११८२ आगताश्च समाहूताः २३१४९ अस्ति दुर्योधनी राजा ४७१८७ अहो परमवैचिश्य आगतास्मि तनो नेतुं २२।१२१ अस्ति नास्ति प्रवाद च ११८९ अहो दानमहो दान ९.१२१ आगतो वन्दनाभवत्या २८।४७ अस्ति राजगृहे राजा ४०।३५ अहो दु.सहमस्माक ७.१२९ आगतोऽनुपद विष्णुः ५४१६५ अस्ति वत्साभियो देशो १४१ अहो नैपुण्यमैतस्याः ३११४७ आगमिष्याम्यहं तावत् २२।१२३ अस्तीह किन्नरोद्गोतं १९८० अहोरा भवेत्तक्षस् ७१२१ भागत्य कपिलश्चम्पा ५४॥६२ अस्त्यात्मा परलोकोऽस्ति ५८।११ अहोरात्रादिको भेदो ७.१३६ आगत्य च तदाऽयोध्या ४३१२०० अस्पकौशफल्ये ४७।१३१ अहो लब्धिरहो धैर्य. १८३१६८ आगत्य चक्रवर्ती म ११.४७ अस्त्र नागसहस्राणा ५२।४८ अहो सर्वज्ञापस्त्व ४३११३१ घागत्य देवकीगर्भ ३३।१७३ अस्त्रं ब्रह्मशिरः शीघ्र. ३१।१२३ अहो ससार वैचियं २७१७२ आगत्या कम्पनाचार्यर २०११९ अस्त्रं ब्रह्मगिरो नाम्ना २५।४७ [आ] आगत्याभ्यय साध्यही३३।१२० अस्त्रेण पापणेनारिर् २५।६७ आफ्न्तोक्षुरस प्रोत्या २१० आगन्तुकदोपाणा ३४।१४६ अस्त्रं वरोचनं मुक्त ५२१५३ आकर्णय वचो वाले आगामि तीर्थक्त पाम् ४।३६९ ४२१५० अस्त्रास्त्रनिवहर आकर्णयस्व देवानाप्रिय- ३३४६ आग्नेयादिपु मध्ये:स्या ४१।२६ अस्त्र सवर्नरोद ५२।५० आपकोदण्ड. थाधर्मायास्तु देवाना• ६।११३ अस्पान्करनवस्तk ६३।११० आकर्णावृष्टचामोध- आवारागमता गोतः ६०।४८१ अस्पगन्तो भुव मर्वा दा२०० आदर्णायतनेवाभ्या ४५.७४ आचारागस्य तत्त्वार्थ २१९२ अम्मदीयं विभोग्नम्भ आर नारदीयं तद् ४३१२३८ आचाम्नवर्धमान ३४०९५ अम्मादार. परः कोऽपि४३१०७ आर्य मेघनादस्त २५/२३ आचार्यायानदयादि १८१६७ अस्मा नगवीरागां ५॥२४ आरण्यंता यथा नाप ५०१२० आचार्या मनादोना २०१२६ अस्मिन्पो देवा ५.६८५ आरयता ममाधाय ५०४१ भाचार्या दुरधर्माम्याद ६०।११० अस्या ज्यायाः महगाणि ५.३४ आत्मभवाने ६०२४ आचार्य पाप्यपाध्याये ६४४२ अम्यामादोयमगि ८३१३० आरपितामनतिरीट- १६१४ अचिन्नकदमो सग्य ४५/६४ अध्यारचतुरमोतिश्च आरस्मिस्मयोनिग्नाः १२७ आश्चलमोलीना दा११८ अम्योपरि विमर्ष में २८२१ भावारंगाशम्ना १०१.. थारगाम च तेनैव भरवस्यामपरंदना आवारगोरिएकाम्भो ४१३३ आग्मोनिलाकमुतवादम् ६१.३ प्राम्यो तपना मुरतामिन १५३५१ आपोमव निय २०१४ भारमनी गरादि ५८ १२ हरिवंशपुराणे १६१० ५४।१३ आरमाधोना. प्रतीहारा:५७।१६६ आनकेन मुनेः प्रश्न १६९० आयुरेकादशस्यापि ६०१५४१ आत्माधीनं यदत्यन्त ९।५६ भानकेन सुपुत्रेण ५३।१५ आयुर्लक्षा वलाना स्युः ६०॥३२२ आत्मापराधबाहुल्यात् ४०।३७ आनतप्राणतम्या च आयुवर्णगृहाहारः आत्मान्त स्थापितानन्त- ४१६८ आनतप्राणतादीच आयुवर्षसहयाणि १८१५ आत्मानमपि निन्दन्ती ६४।१२२ आनत प्राणतास्यं च आयु:शुक्रमहाशुक्र- आत्मेति व्यवहारोग्य २८॥३५ आनतप्राणतोदता आयुश्चतुर्विधं नाम ५८।२२२ आतपत्रमिदं यम्य ३१०२० आनतादिचतुप्पेमा ६।११५ आयुश्चतुरशीतिश्च ६०1३१२ आत्तध्यानकर. प्रायो ६११९५ आननं सम्भृत सौम्य २३०९९ आयुस्त्रिद्वय कपल्यरतु आत्रेयः प्रथमस्त ४५/४५ आननानि यदूना स ७३१७५ आयुपस्तु प्रयस्त्रिंशत् ५८०२८६ आदधाव पदधूत- थानयामि तवाभीष्टा ४३।१० आरणाच्युतकल्पे ता ४३६२१५ आदरेण स तैर्दृष्टः ५४१५ आनन्दं नन्तुर्यन ५३।३० आरणाच्युतसुस्कन्धो ४॥३० आदर्श गजवक्त्राख्या ५१४७६ आनन्दश्रेप्टिन' पत्नी ६०१९७ आरणाच्युतकल्पान्त- आदावष्टौ तथान्तेऽष्टा ६०1४७४ आनन्दासपरीताक्ष ४३११३० आरणात्पुष्पदन्तशः ६०१६६ आदावुत्तरमन्द्रा स्यात् १९११६१ आनन्दोऽभिरुचिर्यपा ५६०२० आरण्यकममो वेद १७४० आदित्यनगर रम्य २२६८५ आनाय्यानाय्यवृत्तोऽगौ ४५।१४९ आरात्सहयपदपूर्व आदित्ययशम पुत्रः आनोताः शुद्धशीलास्ताः २०१३ आराध्यदसो तीन ५४.१२ आदित्ययशमा मार्द्ध ११११३० आनोनयनृपं मक्षु ३३.१५ आराधितेन देवेन आदित्यवंशमभूताः १३११२ आनीय नीतिविद्वीरो ४४११५ आराध्याराधना सम्यक् १८।१०८ आदित्याभस्तमागत्य २७११८ आनीय नीतिकुशला. १६१८ आरम्भे क्रियमाणेऽन्यः ५८१७९ आदिनः कुरुवश्याना ४५।५ आनीयादात्मुसस्कृत्य २४।१६ आरस्तारच माररच ४।८२ आदितः सप्ततीर्थेपु ६०।४७६ आनीलचूचुकविपाण्ड- १६३११ आरूढवारणेन्द्राणा ८।१४५ आदिमध्यान्तनिर्मुक्तं ७३२ आनुपूर्व्यसुवृत्ते च ८1११ आरूढ पक्णि आदिष्ट पितृपष्टेन २९८ आन्तरस्वरसंयुक्ता १९1१७० ११।२४ आदेशो दीयताम्वामिन्२१।१६१ आन्ध्री च नन्दयन्ती च १९।१८९ आरुरोह गिरि तत्र २०६२ आधसस्थानमवात ७११७३ आपतन्तं स न हन्तुं १९।६३ आरुरोह रथं शौरिस् ३१।६९ आद्यस्य गणिनो भर्तुर् ६०।३४१ आपिशङ्गजटाभार ४२।२ आरे या प्रथमा प्रोक्ता ४॥२८ आद्यस्याद्यो गणो नाम्ना६०1३४६ आपूर्यावार्यवेग ५६।११५ आरोडा क्षरकणी ५६४८८ आद्या गुणप्रभा तासु ४५।९८ आपृच्छय ज्ञातिवगं च '९.९७ आरोप्य जिनमात्माङ्क- ८।१५४ आद्यामसझिनो यान्ति ४।३७३ आपृष्टेन स तुष्टेन ४७१८२ आरोग्य शिधिका क्यापि २४२ आद्येनेक्षुरसो दिव्य ६०।२३८ अप्राक्षीत् पुण्डरीकाक्षि । ३०१३ मारोहति वियन्मध्य आये विश शत व्याय. ६।९४ आवद्धमुकुटापीड २६।१३ आरोहणीयौ तौ कार्यों १९।२२३ आधेपु त्रिपु कालेपु ७६४ आभिमुख्यं प्रति प्रायः ५८।६४ आर्दवस्थमपि न्यस्त- १४१८७ आद्यो गोमूत्रवर्गोत्र ४।३४ आमन्द्रमधुरध्वाना ५९।७१ आर्यपुत्र ! गृणु श्रीमन् ३०५ आद्यो यो वृद्धिहीनोऽमो ५१५५६ आयताधि निरीक्षस्व ५४।१७ आर्यस्तातसमो राजा १९/४७ आद्यो वृषभनाथोऽभूद् ६०।१३८ आययावय वृत- ६३१६१ आर्याभाह नरो नारी ७१०२ आयो वृषभसेनोन्य. आयातस्य ततस्तस्य ५४॥६१ आयिकास्तास्तथा ३३११२९ आद्यौ द्वौ दायको श्यामौ६०१२५१ आयात्यामन्नकालोऽसौ ५०१४७ आस्तिस्रोग्भवल्लक्षा'६०१४३२ आधिव्याधिरिवारमोपि १९१२५ आयामस्तु निलोकाना ४।११ आर्षम्यास्तु तथा त्वंशी १९६२२० आध्यात्मिक च पित्तादि ५६०१५ आयामो भागयोस्तम्य ५।२३७ आस्त्विम्हि किं वेदान् २३।३४ माध्यात्मिक तु वातादि ५६।१० आयुर्मासातशेष ते ३४/३९ आर्हन्त्यविभवोपेते ६५/३ ९२०८ आरुह्य दण्डरत्नेन ६२।१९ श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः आहन्त्यविमोपेतं ६०।१३३ आमीत्कलिङ्गसनात्र २१६४१ माहेन्त्यश्वर्यमालोक्य ९।२१८ आमीच्चित्ररथो राजा ३३११५० आलानस्तम्ममामञ्च २४१४३ आसोदयममाघाना २४.१२ आलिलिङ्गतुरन्योन्यं ३०।२५ आसीदर्थव वश्येश २१०६ आलोको यस्य लोकान्त- ५९९८ आसोदन्धकवृष्णेश्च १८/१२ आलोचनाद्यतः शुद्धि. ६४।३४ आमीदमोघविक्रान्तिः २९।२४ आलील कुण्डलालोक- ८॥१०७ आसीनृपः कलिन्ने २४।११ आवयोनव जायन्ते ५९७६ आसीत्प्रवरको नाम्ना ४३।११६ आवयोः प्रथम यस्याग् ४३३२५ आसीलदमीमती नाम्ना ६०१२७ आवलिस्थविमानाना ६१६९ आमोत्सौर्य पुरस्यान्ते ४२११४ आवश्यकक्रियाणा ३४११४२ आसीनयामनवरें १६८ आवापश्चापि नि.कामो १९।१५० आमीनानवमप्यस्मान् ४०१८ आवा तत्र तप कृत्वा आसो मेघावन स्वतम् ६।११४ आवा पुत्रादिसंयुक्तो ६५०५२ थास्ते कंमोपरोधन ३३३० आविदेह च विष्कम्भान् ५।५८४ आस्थानस्थितमागत्य ५४॥३२ आगइनानार्यतत्त्व ७१३४ आस्यानो समय तस्थौ १७५८२ आशङ्का च न कर्तव्या १७१०७ आस्थाने ते यथास्थानं ५६।३ आशङ्किन. म नमितं २५।१८ बास्महे वयमप्यत्र ५०।२९ यायाः स्वच्छता जग्मुर १२ आसवस्य निरोधस्तु ५८।२९९ भागने जोवित मृत्यौ ५८।१८४ यास्वहे तत्र नौ द्वीपे २१५१०५ आश्लिप्य दयिता पार्यो ५४.५३ थाह चात्यनुकूलम्न. १४।६७ याशिलप्यग्दतीयोः ३१.१३० आह चैनमयो साचो २०१४२ आश्वास्य जिनमलेन २२१५५ याहारदानमस्मै सा ६०.६५ आश्वास्य शोकमतप्ता १७:५२ आहारमिष्टमिह १६४४० थाश्चर्यपञ्चकमिद १६६६३ आहारस्य शरीरम्य ५८।२७५ थापाकृष्ण पक्षस्य ६०।२७२ आहारामयदान ३४।१३७ थापादकलपन्या दु २।२३ आमा तु रक्तमान्यार्या १९।१९३ आपाद मानव सूर्य २२।९५ आमाद्य फलक दृष्ट्राद् २१८० आपोडसादनीत्यान्या ५।६२२ आमा मध्ये च दाक्रम्य ५।३३६ आसक्तच चिर तत्र २११५७ आहूय रहमि कुटः ४७१६९ आमनम्य प्रकम्पेन ८1१२२ याहूच तया घोर २९।२२ आमन शयनं तपा ४५.६८ आहूतस्तरमो भावनु- ३३६१४७ आमनादवतीयाँ ८1१२८ यासने प्रायने ये ४॥३० थामने गयने स्नाने २११७३ इक्ष्वाकवो विधादित्य- १३.१९ वामनभव्यता हेतो ३३१०२ इश्वाकुलजी राजा ३९।४२ धामन्नटो मयाणि इश्वात्रियज्येष्ठ ९।४३ आसव-मरमात्माई. ५९।१०५ इश्वाकु प्रथम प्रधान-१३।३३ आमाधगा तस्तस्य ३१०४३ इश्वाकु वंगना जाया १७०५७ आसमाद विमानं तच् ३१३७ इच्छा द्वेषः प्रयन्तश्च ५८१२३ इन दर्शनमात्रेण इतरस्यामभूत्पुत्रो २१११२१ इतरे गनदेवस्य २३११४२ इतः कदाचिद् वरुणेन ३५१३७ इत: केनचिणिजा ५०११ इतः पश्य वरारोहै ! ३१.४० इतः पूजा नृपात्राप्य ५०।६३ इतः प्रभृति च स्त्रीणां २७११३१ इतः मुलमदम्भोज- २३॥११० इतश्च रुक्मिणीमूनुं ४३१६२ इतश्च वसुदेवानं ६०११२६ इनश्चावमरक्षेन ४२०६७ इति गान्धर्वसेनायाः २१११८१ इति नं नारदस्तन्वी ४३३८९ इति तदा मनमा ५५।१०१ इति तु वनेचरः कृतमनी-४९।२९ इति ते शुलिपामाये- ९।१११ इति तेषा वचः श्रुत्वा १७४६ इति दुरापमहोदयपर्वते ५१।१३५ इति दूरवचः श्रुत्वा ४३।२२ इति दृग्नानचारित्र- ६४।१११ इति देवकृतभूमी ३१३० इति द्वादगर्नेदेषु २१८८ इति द्विष्टी द्विपे कृष्ण, ५४१३८ इनि घ्यायन्समुत्पत्य ४२।३३ इति घ्यायन्मनश्चत १४।३९ इति ध्यायन्तमायान ४२१४१ इति ध्यायन्तमेवन १९१६७ इतिध्यात्वा स्वयं शक्तम् ९११४१ इति च्यात्वा मुढर्वारी ६११७२ इति नक्नदिवं दृएवा ८१५४ इति नारदवाक्यन ४४१८ इनि निगद्य तदा विबुध १५।५२ इति निगम्य तु काश्चन ५५।६३ इति निगम्य वनोग्य इति निनाम्य निशाम्य ५५1८८ इति निदिचत्य तन्योन्यं ११२४ इनि पन्या ममादिष्टं ३२६ इनि पर्वतमामाप्य २१११३७ इति प्रणोद्य तः सार- २७११६ १४ ८1७८ पृश जगुस्ते तं इति पृष्टा समाचष्टे २७११२७ ६५५४ ४५११३ हरिवंशपुराणे इति प्रबलदुःखेयं ४७१५५ इति थुत्वाऽवदनमन्त्री १४॥६१ इत्याकर्ण्य नपो पृच्छत् २७:३५ इति प्रबोध्यामानोऽयं ४३११८७ इति ध्रुत्वा स जिज्ञासुः २५।२१ इत्याकण्यं स तस्याश्च २४४१ इति प्रवाच्यमानेऽसौ २३३१०८ इति श्रुत्वा हरित्विा ६२२४२ इत्याकण्यं तदा तस्याः २१११४४ इति प्रवृत्तमकल्प ४७१५४ इति संगीयं ते देव्यौ ६४।१२९ इत्यादयस्तु ते स्तुत्या २२।१०६ इति प्रवृत्तिश्रवणात्प्र. ३५।७४ इति सञ्चिन्त्य सन्त्यज्य ११।९८ इत्यादयो विबोधाय पृष्टः प्रभुः प्राह ७।१३० इति संचिन्त्य रागान्धः ४३११७० इत्यादिचरितं दिव्यं ४८०३२ २८।४ इति संचिन्त्य पुण्येन ४३४७ इत्यादि चिन्तयन् वीरो २६६३९ ४०1३३ इति संमन्य ते मन्त्रं ४०११९ इत्यादि तस्य वचनं ४६६० इति पृप्टेन तेनोक्तं २११११८ इति समये प्रयाति तु ४९:१३ इत्यादित्याभदेवेन इति पृष्टो जिनोऽगादीत् ६११२२ इति सह चिरवासे ३६१८ इत्यादि प्रलपमुक्तः ६२।५४ इति पृष्टो मुनिः प्राह ३३१४५ इति साक्षात्कृते तेन ४३।१२९ इत्यादिप्रियवादिभ्याम् ६११६५ इति पृष्टोऽवदत्सोऽस्म २११५ इति सानुनयं प्रष्टा ४५।७८ इत्यादिबहुवादी स ४३१७० इति पृष्टोऽवदरमोऽस्मै ४२१४८ इति सिद्धार्थवागर्य ९.१७६ इत्यादिमन्त्रिभिः पथ्य ५१३१ इति प्रसाद्यमानोऽसौ २०५९ इति सुविहितमन्यु ३६२२ इत्यादिव वनं तस्य इति प्रियवदोऽवादि २११३१ इति सुस्वप्नफल श्रुत्वा ८९६ इत्यादिशुभचिन्तात्मा ६२।६३ इति भार्योपदेशेन २६।२४ इति स्तुतिशतैः स्तुत्वा ८।२२८ इत्यादिश्रुतिकोटोना- ५७।१४५ इति मन्त्रिभिरामभ्य ५०५६ इति स्तुत्वा मुनि नत्वा१८।१७० इत्यादिश्य तदा यात. ४२१५३ इति मातृवच. श्रुत्वा ५०1९६ इति स्वष्टार्थसंवादे १४।९४ इत्यादिपु व्यतीतेपु इति मार्गस्तुतिं कृत्वा ४७४१२ इतिहासमनुस्मृत्य ९।१९८ इत्यादि स यथायोग्यं १९।२६२ इति राजानुज भक्त १९३८ इतीमा घोषणा श्रुत्वा ४५।१२८ इत्याद्यस्य जिनेन्द्रस्य १०१६० इति वचन गुरोरभि- ४९१२१ इतीरितं ताः प्रतिपद्य ३५।४१ इत्याद्या ह्यार्यमातङ्गा ५१६४ इति वन्दिजनन्द्या ८1८८ इतीरितेयं हरिवश ६६।११ इत्याद्या: सुत विन्यस्त- १३३२५ इति वसन्तमनन्तमसौ युवा५५।४९ इतोऽपि जिनमानम्य ६१।३३ इत्याध्यात्मविशेषस्य ५८।१४ इति विचिन्त्य स्पा १५.४७ इतोऽपि तापसाकारं ४५।९३ इत्याभाज्य मनोदेगं ४३.१९९ इति विज्ञापितो नत्वा १४०६९ इतो द्वारवती लोकः ६१।४५ इत्यावेदितवृत्तान्तः इति विज्ञाय निस्मार ४३।१२८ इतोऽपि देवक्यपि भत ३५।१० इत्यावेदितसम्बन्ध. २४।५९ इति वितर्फमतकित ५५।२४ इतोऽन्यदुत्तरं नास्ति १०।१५९ इत्यावेद्य तदादेशाद् इति विहितमहाजो ३६१११ इतोऽपि वसुदेवाद्या ६११९१ इत्यावेद्य वधस्थान ३०१५१ इनि ध्यावणित द्वीप ५.३७७ इत्यनुथुतमनून ६३१९२ इत्यावंद्य वयोवृद्धाः २४।२४ इति व्याहृत्य रुद्वाग्रे १९।१०४ इत्यनेकदिनरात्रि ६३१४४ इत्याश्वास्य रहस्यैना- ३९।४३ इति श्रमणधर्मोग्य २।१३१ इत्यनेकविकल्पेऽस्मिन् १८०९४ इत्यासाद्य मुनराशा ४३३१४४ इति श्रुतयथातत्त्वा ९।२०२ इत्यनेकाद्भुताकीर्णः ५।६११ इत्युत्तरमसौ दत्वा १९।१२० इति श्रुत्वा जिनेन्द्रोवन ५८।३०६ इत्यन्योन्यकृतालापा ९.१५१ इत्युदीर्य कुपितो इति श्रुत्वा तदाधीत्य २३।१५१ इत्यन्योऽप्यस्वरूपज्ञा २१११८५ इत्युदीर्य मृदुपधिनी इति ध्रुत्वा प्रतोहार्या २३।११ इत्यन्योन्याश्रितालापा ५३.५ इत्युदीर्णा सकृद्धोपी इति श्रुत्वा प्रमादेन ५३।९ इत्यशेषितपरोपहहारिणा६३।११५ इत्युर्वीन्द्र. स विज्ञप्तः १७१९८ इति श्रुत्वा भवान् पूर्वान् १८३१७६ इत्यस्यामवसपिण्याम् श२६ इत्येकान्तकुतण २८।४० इति श्रुत्वा मनो ज्ञात्वा ४२।५९ इत्याकी कृपायुक्तो ३०१४७ इत्युक्त प्रतिपद्यासी ४६५ इति श्रुत्वा मह क्रोध २३११२६ इत्याकर्ण्य तदा तेन २११६९ इत्युक्तमखिलं श्रुत्वा २३१५५ इति श्रुत्वापिकावास्य ६४।१३२ १९।२४ इत्युक्तमनुमन्यते २७११३२ २६१४६ २४१७५ इत्याकण्यं नृप. प्राह १५ इत्युक्ता इत्यवोचस्ते श्लोकानामकाराधनुक्रमः इत्युक्तविधिर्तासो ३४६१३१ इत्युक्त्वा सुपरावृत्य ३०।३२ इन्द्रियायुबलप्राण ५८०६८ इत्युक्तः सोऽभ्यधान् सद्यो१४॥५९ इत्युक्त्वासो सुरप्रेण- ४२१८८ इभवाहननामाद्याः ४५.१५ इन्युक्तस्स तमाहंव १८।१६० इत्युक्त्वोच्चः प्रधाव्यामौ १९४८ इम्यस्येभपुरेऽत्राभूद् इत्युक्तस्तं प्रति प्राह ५२।७८ इत्य कुलकरोत्पत्तिः ७.१७७ इभ्योऽपि प्रियमित्रा ४५११०० ३०१५ इत्थं कृतरणक्रीडा ३१११२५ इभ्यो राजममस्तस्य १८।११३ इत्युक्ता प्रतिपद्यानु ७।१४६ इत्यं कृत्वा स्तवं भक्या २२१४१ इयन्तं कालमज्ञाता ५०।१७ इत्युक्ता सा जगौ राजन् २७१३४ इत्थं वृत्वा समचं १२.८० इयन्तं वमता काल ६२।४० इन्युक्ता सोणनिश्वास-१४१८२ इत्थं तत्र महानन्दे ८.१६१ इयमेव जयग्या स्यात् ४।२५१ ४।२५३ इत्युवतास्तेन ते प्रोत्- १९।२६ इत्थं ते पाण्डवाः श्रुत्वा६४।१४३ इयमेव जघन्या स्याद् इत्युक्ते कषयमाप ६०१५ इन्य मतिश्रुनयुतावधि १६:४९ इयमेव तु विक्रान्ते ४।२५८ इत्युक्त कुपितश्चक्री ५२।८३ इत्थमाक्र्ण्य माधम ३३१७८ इयमेव भ्रमे हम्बा ४।२८७ इत्युक्ते दर्शिताया च ३३१२२ इत्थं राजा मयौ मासे १४४२७ इयमेवाप्रतिष्टाने ४।२९४ इत्युक्ते तापमः काप्ठं ३३।६८ इत्थं साधुमहायोह- ११४९ इयमेवावरा वा ४।२७१ इत्युक्ते तेषु चतोऽस्या ३१।२६ इद विष्णुकुमारस्य २०१६४ इयमेवोरगीता सा ४।२७३ इत्युक्ते प्रणिपत्यामो ४७।१२० इदमेवेति तत्त्वार्थ १८१४९ इयमेवावरान्धेसा ४।२८९ इत्युक्त मुक्तमाध्यस्थ्यो३१।११५ इदानी छिन्नभिग्नाच ९।२८ इला चलेयमावृत्य १७११७ इत्युक्ते यतिनाद्यन्ता २१३१२४ इन्द्रः पुरन्दरः शक्रः ८।१२५ इला देवी ततो रष्टा १७११६ इत्युक्ने रपिरोऽतोपि ३१॥६६ इन्द्रकाणां द्वितीयायां ४॥२२९ ३८।३४ इला नवमिकासुरा इत्येवं वदतो दृष्टि १०१६१ इन्द्र के त्वियमेव स्यात् ४४२६४ इला सुरा पृथिव्याख्या ८३११० इत्युक्ते सान्त्वयित्वा ता ४३।५७ इन्द्रकेपु त्रयः क्रोशार ४॥२२२ इष्टानिष्टेन्द्रियार्थेषु ५८.१२२ इत्युक्ते सोऽनवोदस्ति ६२।३७ इन्द्रकेषु तु बाहुल्यं ४।२१८ इप्वाकाराद्रिणाप्येप ५1५७८ इत्युक्ते सोऽवदद्वशे इटार्थस्य प्रदानेन २७१२ इन्द्रकै: सह सप्त स्युः ४४१३६ १४।५५ इत्युक्ते सोऽवदत्स्वामिन् ३१३१०८ इन्द्रकैः सह सर्वाणि ४१४३ इप्ट्वा च सगरं यागे २३।१४६ इत्युक्ते स्नेहसंचार ६२।२२ इन्द्रचन्द्रार्क जैनेन्द्र- इह जन्मनि मे मातश् २११५१ इत्युक्ते प्रणतेनोक्तः ४८१२८ इन्द्रनीलचयेनेव २०५४ इह जही वसुधा शिवि ५५३११८ इत्युक्तेन मया प्रोक्त २१६१६२ इन्द्रनीलमहानील ८1१४८ इह भारतजाताना ३।१९४ इत्युक्तो नोदयद्वेगात् २०२० इन्द्रनीलनिभान् केशान् ९।२१९ इह भारतवऽभूद् ४३३९९ इत्युक्तो नोपसहृत्य २७.५२ इन्द्रनीलमहानोल १११११९ इह वनदेवनास्थितवतीय ४९।२८ इत्युक्तोऽन्यनिवृत्तेच्छः ५४.२५ इन्द्रनीलमयो भूमि ५७.८ इहापरविदेहेऽस्ति २७१५ इत्युक्तोऽपि स दुर्मोच- १७६७० इन्द्रनीलादिभिर्नील ७७२ इहान्तरे सा सुतदर्शनेन ३५।६० इत्युत्रतो विदितश्यामा २२११४६ इन्द्रभूतिरिति प्रोक्तः ३१४१ इहास्ति दक्षिणघेण्या ३०१६ इत्युक्त्वा तं कुमारास्ते ६१०५५ इन्द्रसामानिकानेक- इहास्यामवपिण्या ८१७१ ६०।५५३ इत्युक्त्वा तं समुदृत्य ६५।४६ इन्द्रा. सामानिका देवाम् ६।१२४ इत्युक्त्वा महतीमद्धि २१३१५९ इन्द्राग्निवायुभूत्याख्या २०६८ ईक्षिता घातकोखण्डे ५४.३३ इत्युक्त्वा मुनिरन्यस्म १७१४२ इन्द्राद्या. कल्पना देवा ३।१५१ ईदृशमीश विभुत्वममानं ३९।११ इत्युक्त्वा वसुदेवस्य ५३।१९ इन्द्राद्यस्तिदशैस्तस्मिन् ५९।१२७ ईदृशी दृक्स्वनेपथ्या १४।६० इत्युक्त्वा विरते तस्मिन्२१३१५२ इन्द्रियाणि कपायाश्च ५८६० ईदृग्लक्षणयुक्तोऽपि २३।११६ इत्युक्त्वा गङ्खमापूर्य ४७११२८ इन्द्रियाद्या दश प्राणाः ५८११२७ ईपिथनिमित्ता या इत्युक्त्वा स विसृष्टस्तै- ५०४८ इन्द्रियानिन्द्रियै. षड्भिः१०११४७ ईश्वरताधर धोर नमस्ते ३९।१४ इत्युक्त्वा मुलसा साधु २३३५४ इन्द्रियानिन्द्रियोत्थं १०।१४५ ईपदूनसमाकारा ५८।६५ १७१३ १७११२६ [क] १८ हरिवंशपुराणे एकात्मपरिणामेन ५८।२१९ एतास्तु दिवकुमारोणा ५१७२४ एह्यहि कृष्ण योऽहं ते ६५।४५ एकादश गणाधीशा ५९।१२८ एतास्तीर्थकरोत्पत्ती ५.७०७ एहि स्वागतमित्याह २२।१२९ एकादश त्रिके पूर्वे. ६।६२ एतास्त्रयोदश ख्याताः ५६।१०९ [ऐ] एकादयः प्रणीता ३४।८८ एते जनपदाः सर्वे ११७३ ऐन्द्रं दक्षिणमैतेषा एकादश सहस्राणि ५।३१२ एतेषु तु विशुद्धेषु ६७७ ऐन्द्राः कुम्भमहाम्भोदाः ८११६६ एकादशैव लक्षा हि ५।५४१ एतेषु विधयः कार्या ३४.१३० ऐरा च विश्वसेनश्च ६०।१९७ एकादश्या तु तस्यैव ६०११७८ एतैतेक्षणसाफरय. ९।१५० ऐरावतं समारोप्य २४० एकादश्यां प्रातिहार्यः ३४।१२८ एतरप्यष्टबालाने ७.३९ ऐलेयः स्थापितो राजा १७१९ एकादिपूपवासेपु ३४१५२ एत: सर्वरयं द्वीपो ५।१२ ऐलेयाख्यामलाया स एकाद्या यत्र पञ्चान्ता ३४।६९ एते स्वदारसन्तोष. ५८।१७५ ऐशानलोकपालस्य एकाशीतिशतानि स्यात् ५।६८ एवमाद्यास्तथान्येऽपि १८।४ ऐश्वयं रूढिशब्दस्य एकाष्टलोकभीमङ्गः ५७।१३३ एवमाद्यानि चान्यानि २५।५० [ो] एवेनवाह्वयं नीताम् ४६०४१ एत्रमाद्येष्वतीतेपु ४५/२० एकेन्द्रियादिका जाति- '५८१२४६ एवमस्त्विति मीत्वाऽसौ २२।१४८ ओपधीश्चापि विद्याश्च २२१७६ एकैकं कूपके रोम २३॥६४ एवमस्त्विति सन्त्रस्ता ४२।९१ एकैकाक्षरवृत्या तु १०।२६ एवमीशस्त्रिलोकेश ५९।२९ क एप भगवान् बंशो ३२१९२ एककं स त्रिधा ठित्वा ३१११२० एवमुक्त्वा प्रजा यत्र ९/९६ ककुभोऽभासयद्यस्य १८ एककस्यैव चन्द्रस्य ६।२९ एवमुक्त्वा निशान्ते सा १७१७८ कच्छश्चापि महाकच्छः १२१६८ एककस्य तु बाहुल्यं ४।५५ एवमुक्ताऽवदत्कन्या ३११३५ कच्छाख्यविजयायाम एकैकस्य नरेन्द्रस्य ५०१०४ एवमन्योऽन्यससक्त ५७११०७ कच्छा सुकच्छा महाकच्छा ५।२४५ एकैकस्य हृदस्यात्र ५।२०० एवमेकातपत्रायां २५।१६ कच्छादिषु यथासंख्य- एककस्मिस्ततो रोम्णि ७१४९ एवमेता बधशैंया १९.१९९ कटकैः कटिमूत्रायः ११११२२ एकैको हीयते चाध. ४।८८ एवं तु द्वादशवेह १९/१९५ कटिस्थकरयुग्मस्य एकोत्तरा तु वद्धि स्यात् ३।१५६ एवं दक्षः प्रजावाक्य १७.१४ कठिनस्तनचक्राम्या ८।१७ एकोनत्रिशदेव स्युः ५।५१७ एव द्वादशवर्गीयैर् ५७११६१ कण्टकं कुण्डलं चापि ६२१८ एकोनत्रिशता लक्षो ६०३६७ एवं नित्योत्सवानन्त ५८.१ कण्ठलग्ना रुदन्तीत एको द्वीच नव त्रिका- ३४/७४ एवं वसन्ततिलकप्रचुर. १६४७९ कण्टारलेषोचिताः पूर्व एकोनपदकोटीक १०१९० २९.९ कतिपयाहभवं यत किं पुनः ५५।९९ एकोनविंशतिर्दण्डास् ४।३१८ १९/२३ कतिचित्पूर्वजन्मानि एकोनविंशतिर्लक्षा ४।१९८ एव समितयः पञ्च २।१२७ कञ्चिद्यदि मोक्ष. ४३३१४० एकोनविंशति पष्टया ४।१६६ ऐशानधारितस्फोत २।३८ एकोपाध्यायशिष्याणा क्थमपि कार्यसिद्धिमुप• ४९।४० १७१६८ एप सोमप्रभो देवि १२।३९ कथ नाथ जिनो भावी ३४ार एको लाभान्तरा यम्य ३३१७१ एप यादवमम्बन्ध २१११७८ कथं वा मम पुत्रोस्य ३३१४४ एकोऽवतिष्ठते यत्र ६११३५ एपा चैवापरा भ्रान्ते ४।२५२ क्थ वा तापसि! प्राप्तो २९।५४ एणीस्वरूपिणी स्तन्य २९।४९ एवोक्ता विपश्चिद्भिर् ४।२५७ कथितं मुनिना दिव्य. १९८९ एत एव [पन्यामा १९:२५८ एव च तमिमेऽपि ४/२९० कथ द्वैविध्यमेतेपा- एतावदत्र कार्य तु ५०.९९ एपैव हि झपे होना ४।२८८ क्था पुनर्नवीभूता एतावतव पर्याप्त २।१२ एपैवानन्तरा वैद्या ४/२६७ कथेयं कुरुवीरस्य ४७/२० एतापानेव पुरुपो ५८।२८ एपंवावादि विद्वद्भिर् ४४२६२ कदम्बवनकुण्डेषु एता विद्युत्तुमारीणा ५।७२७ एषोऽमी गरुडव्यूहो ५०।१३३ कदम्बवनमंन्यस्ता ६११५० ५।५४८ ५।५८ ४८ ५०८९ एवविधवच' श्रुत्वा एवं सति सुखे दुःख ४६१४८ २३१३५ ४८१३७ श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः १९ कदन पाण्डुपुत्राणा १११०८ करोति सज्जनो यत्नं ६२।४६ कश्चिद्भवाब्धिदुःखोमि- १८३१२६ कदलीनालिकेरेक्षु ५९।४४ कर्कोटकहपोकेगी ५२॥३६ कश्चिन्महाकुलीनोऽपि ३११५५ कदाचित् पाडवीभूताः १६३१८६ कर्णः सुदर्शनोद्याने ५२१८९ कपायकलुपो ह्यात्मा ५८५२०२ ४३१२८ कपायतीव्रमन्दादि- कदाचित्सह सुप्तोऽसौ २४७८ कर्णामृतमिवाकय ५८.२८८ २४/१५ कदाचित्तु हृते मासे कर्णान्तरततासक्त. २०३४ कपायाः क्रोधमानौ च ५८।२३८ कनक. कनकाभश्च ५।६४३ कर्णचामरशह्वाई ८।१४४ कपायप्रशमोद्भूतं ३२८७ कनकनकदण्डानि ८।११३ कर्णावक्षतकायस्य ८1१७६ कपायवागः प्राणी ६१११०२ कनकनकमालया ४७११३७ कणे कथितमतस्य ४७१७२ कपायान्तमसो कृत्वा ११११०२ कनकनकचित्रया ३८.३६ कर्तव्य मम नास्तीति ३३१७७ कष्टं ख्यातिमवाप्य १७११६३ कनकनकसंकाशः ६०५५५ कमंस्थितिकमित्युक्तं १०८६ कस्तस्य तान् गुणानुदान् २०१५ कनिष्ठोऽत्राजयज्ज्येप्टं ११४८२ कर्मभूमिगता मा ७११०७ कस्तां योजयितुं शक्तस. २०१८ कनीयान् जिनदत्तस्ता ६४।१२१ कर्मभूमि भवनापि १२।२९ कस्येदमटवीमध्ये ४७१८५ कनीयासं महाकाले ३३३१०२ कर्मभूमिषु सर्वासु ६४१८९ कस्येयं भगवत्कन्या ४२।४७ कन्दर्पस्य विजेतापि ४२१२१ कर्मारवी च सम्पूर्णा १९१८२ कंमः कलिन्दसेनाया. ३३।२६ कन्याया भ्रातरौ नाना २१११७१ कर्मणोऽष्टविधस्येवं ३०९९ कंसवाक्यमिति श्रुत्वा ३३११४ कन्याऽनन्यसमा तस्य १९।५५ कर्मक्षयसमुद्भूत १०६ कंसमञ्जूपिका द्वेषा ३३।२१ कन्यार्थी च यगोऽयी च १९।१२६ कर्मप्रकृतभावो हि ५६१८४ कंसं जामातरं हत्वा ५०.१४ कन्यादानकृतारम्भ ४२०६५ वर्मणोऽनुभवात्तस्मात् ५८।२९३ कमकोपमदपर्वता ६३।२७ कन्या मदनवेगांच २४॥८४ कर्मोदयवशोपात्त ५८।२५० क्व वाविजम्बूद्रुममण्डित। ५४.७५ कन्याया मानप्रग्ने २२१११९ कर्मगौरवदोपेग ६२१६२ क्व परदयापर- परमधर्म-४९॥३८ कन्याकूनविदूचे स ३४॥२० कर्मोदयवशात्पापाद् ५८८२ क्वचित्पुण्यफलप्राप्त्या ५७८१ कन्या. पञ्चशतान्यत्र २४।९ कर्मभूमिपु सर्वासु ३६१३२ क्वचिच्चित्तं स्निग्धसुकृष्ण ३५।५१ कन्याऽसौ नृत्यगीतादि २११४२ कर्मवपरिणत्यात्म. ५८१२१३ क्वचिदालेख्यहृद्यानि ५७१८० कन्या तामपि दुर्गन्धा ६४।१२० कर्मासवाणा भेदोऽयं ५८.९१ क्व चेद सौकुमार्य ते ८।२०३ कन्यया हृतचित्ताच १७१८ कलहे प्रीतिसंयुक्ता ६०५५० क्वचिरम क्वचिञ्चम ७१०० कपाट पादधातेन ६१८६ कलागुणविदग्धाभिस् १९२७० क्रमयतमवनत्या ३६१४६ कपिलो वासुदेवोऽपि कलापारमिता रूप ३११११ क्रमात् गतमहनेषु १८०२१ कपिल तत्र पुत्र स्वं ३२।३१ क्लापारमितम्याम्ब २१७१ क्रमणो मानुपाख्यस्तु ५।६०५ कपिट नामान्ययभूषणम ६६।५ कलागुणविदग्याना १९६६ क्रमेण स द्वन्द्वयुग प्रयातं ३५१७ कमलविमलयोद्यन् कलागुणान् प्रत्यहमेत्य ३५६६४ क्रमेणाद्यन्तमध्येषु ३४॥६२ कमलायाम्नदा मा ३३११०३ कलिगराजस्य नृपस्य ६६०२ क्रमेण क्षीयमाणेपु ७.१२३ परपदमुद्रिकाक्टवनपुर- ४९।११ कल्याणपूजनमिनस्य कावन्दी पुष्पदन्तश्च ६०.१९० करतलेन महोतलमुद्धरेज् ५५।८ कन्याणहेतव. प्राणा ४५१८५ वाक्षास्यस्य महाकाड़म:४।१५१ करालब्रह्मदरोन २३११५० वल्याणानिविशेष ३४११२२ काशिनासारिकागा. १९७२ कराङ्गलिस्पर्शमुमं स रासे ३५६६६ कल्याण परिवर्धमान- काकिण्यालाक्षणं कृत्वा ११॥१०६ करिक्टेप युगच्छदगन्धिपु ५५३८ कयितश्चतुरस्रोग्यं ३४.५३ काञ्चनास्यगृहायांत २७1८४ परिण निर्मदीय २४॥४६ वल्पस्ते तयायांना ૭૬૨ का थियोऽपुण्यजन्मानः ५९५१०२ करोन्द्रमपरम्फरन् ३८७ क्यानच्युतपर्यनान् ६।१०५ कान्ताविरहमन्नापा ४३२२० परणावानमो योगो ४३११४२ चल्यो लान्तवाहिश कानया कुमुमावल्या चरण सदा ४०१२ वच सेटर सड़ पाना व्यन्तरदेवानां २१८० हरिवंशपुराणे ५९।१२५ उग्रसेनादिभूपाना २०११ १७४९२ क्षिप्रं ईपटुनपरिक्षेपः ५।२९९ उक्सप्रत्युक्तयुक्ताईन् १४.९९ उत्तराफाल्गुनीप्राप्ते ईपत्याग्भारमज्ञाऽमा- ६.१२७ उक्तश्च वीर! विद्धि त्वं ३०१५२ उत्तराफाल्गुनोवेव २३५१ [3] उक्त्वेति कौस्तुभं तस्मै ६२१५४ उत्तरीयाम्वरं स्वच्छ ८।१८८ उक्त्येति प्रगतो लब्ध्वा ३३।११३ उपकारमतिस्तात उत्तरे च सुरः प्रोक्तो ५७०३ उक्त्वासौ क्षम्यता देव ६२१५५ उत्तरोत्तरतन्त्रस्य उपचरन्ननुवासरमादरात् ५५३१५ उपचितो जनताभिरमौ ५५।३३ उग्रवशप्रमूताया १७१३७ उत्तीर्णः स्यन्दनादाशु ३१३१२९ उपन्यामस्तथा चैव १९४२२९ उग्रसेनसुतायादाद् ५३१४५ उत्तीर्य सइक्रमाक्रान्त्या १११२९ उपपादश्च मर्धामा उग्रसेनपितृव्यस्य ४३१२०८ ४८६४० उत्तुङ्गगिरिशृङ्गेषु ३११६१ उपपादोऽस्त्यभव्याना- ६१०६ उग्रसेनस्य तनया ४८।३९ उत्पत्ति वासुदेवस्य ११९१ उपभुक्तानपानोऽमी १८१६५ उग्रसेनस्य राज्यं च ११९३ उत्तिष्ठ पुत्र गच्छामो ५०९२ उपमानोपमेयत्व- ४१॥३१ उत्थाप्य तं हरिः प्राह ६२१४४ उपयम्य समानीय उग्रसनोऽन्यदा दानु ४४।२४ ३३१७९ उत्पन्नदिन एवास्यो २८०२० उपर्युपरि सौधर्मात् ३११६९ उच्चै कुलाद्रिसभूना २०१६ उत्पन्नश्चाचिरेणाऽह उपलभ्य मत जैन २७११२५ उच्चकैरिति मदन ६३३१९ उत्पन्नस्यास्य चाभावः ५६।१३ उपवन समुपेत्य वनधियं ५५।८४ उच्चैर्गन्धकुटीदेश ५७७ उत्पन्नो मार्गशीर्षस्य ६०१७॥ उपवने वृजिने शिवि ५१११७ उच्चैर्देशस्थितोऽपि ६५/५८ उत्पन्नोत्थानवादीभ- उपवासविधिर्यो य १८1१३६ उच्चर्यशोध्वजो लोक ९1१६२ उत्पलोज्ज्वलमंज्ञा स्यात् ५।३३५ उपविष्टः शिलापट्टे ९.२०७ उच्यते तु गुणस्थानात् ५६१८६ उत्पत्स्यते सुतः उपशान्तपायात प्राग ३१८२ उच्छायः पुनरद्दिष्टो ५।३३७ उत्पत्तिन्यश्च सर्वासु उपशान्तकपायोऽनो ६४/५६ उच्छाय. पुनरस्य स्यात् ५।८१ उत्पादपूर्वपूर्वस्य उपमानवपायादे ५८/५९ उच्छायमूलविस्तार. ५/२०१ उत्पादनादपूर्वस्य ५८.७१ उपमग विनाश्याशु २०१६० उच्छायस्तस्य पादोनः ५।३१ उत्सवः परमो जातः उपसर्गजय पञ्च १२१२३ उच्छायश्चैत्यगेहस्य ५।५०८ उत्सपिण्यवमपिण्योः उपमर्गमहास्तऽपि २०२४ उच्छाय. पट् शतान्याये ६१९५ उत्सपिण्यवपिण्यो. उपमहर हे दुष्ट २७१५१ उच्छ्रायोऽपि सर्वेषा ५।२२४ उत्सुको निपश्चापि ५०।१२४ उपमहृनयोगं त ४६१४६ उच्छायो मूलविस्तारो ५१६९७ उत्सेघाङ्गलमेतत्स्याद् उपसंहृतनृत्या च २११५० उच्छायो मूलविस्तारम् ५३३३१ उत्सेधः पार्श्वनाथस्य ६०१३०५ उपाध्यायः प्रमिदोन १९१२९ उच्छायो योजनशन ५।९० उत्सघश्चाप्रतिष्ठाने ४/३३९ उपायविचय तामा ५६४१ उच्छायो वस्तुतस्तेषा ४१३५१ उदश्चीदवासश्च उपायम्तस्य मोक्षस्य ५८.१८ उच्छ्वागवारण यत्तु ५८।२६६ उदकोऽप्युदवासोऽपि उपेक्षिता कुतो हो- ५०१० उज्जयिन्यामभूदाजा २०१३ उदग्रो मण्डपोऽप्यने उपोपिनाएमायाम्मै ११।५४ उज्जयिन्यामिहेवासीद् ६१०५ उदतरत्प्रभुणा तरुणीघटा ५५।५५ उभयकोटितटीटिनी- १५:१९ उज्जयिन्या वणिग्भिन. २१८६ उदयात्तु पायाणा उभये मन्त्रिणो मन्त्र ११८० उद्दिण्टिकारिमम्बन्ध १२।१८ उदगद्यम्य हासाविद् ५८।२३५ उर्वरा मर्षमस्यौपः १९।१८ उवर्षाद् वीन्द्रियेषु स्यात् १८७६ उदयाचस्य पूरिम- ५८।२६१ उरमि चुम्मति पठिन-५५४६ उत्कृष्टोज्वलिने येयं ४॥२७७ उदयादम्य जीवानाम् ५८।२६९ उना बरण्डाम्ने ५७११२८ उत्तमा जातिव ७१०३ उदयो विजयः प्रीतिः उरगिनिनाननीठ. उत्तरस्पा महमाणि ५।४१२ उदभरत्नमालेव उबार निमशाग्यम् गयणमुत्रम्यण ६५।२ उदस्तै रलवलयर उपमा ५७३३ उत्तरागाच्युतानाना ६१९२० उदारम्पलावण्या ३२५ २०६८ २।९७ ४७१३ ६४९१ ७४ ५४६१ ५८९७ ५७३६ ५७८४ श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः उदियाय यदुम्तत्र उदात्तस्यानुदात्तस्य १७१८७ ऊवभागे जलं तेषां ५।४४७ एकद्विश्यादिसंख्येय ५८।२९७ १८६ ऊछलोकस्य सिद्धा ये ६४११०६ एकपर्वा द्विपर्वा च २२०६७ उदियाय स तत्रव १८१०९ ऊर्ध्वाधस्त्रिसहस्राणि ४१२४७ एकपादस्थितश्चासा. ३३१४८ उदीच्या गजकर्णाश्च ५।९६८ मिभ्रुवश्चटुलनेत्र १६॥२५ एकमष्टौ च चत्वारि १०११३९ उदीच्याञ्जनशलस्य ५।६६४ ऊपरक्षेत्रनिक्षिप्त- ७१११७ एकमेव महादिक्षु ४।१५० उदोच्यान्नृपशार्दूलान् ६१२१२ ऊहागमूहमप्यस्याल ७५२९ एकमेवाणु पर्यायं उद्धः सङ्घोऽस्य मौनः १२८२ [] एकमेवासृजत्पुत्र ७।१६६ उद्घाटिते गुहाद्वारे १११२५ २९६३७ ऋतुमानीन्द्रकं प्राहुस एकयेव कृतानिथ्यस ६५४३ उद्दिश्य पाण्डवान् यातो ६२१४ एकयोजनविष्कम्भ ६।१८ ऋतुरियाय म धर्ममयस्ततो ५५६७४ उद्यतस्तस्य लोकार्थम् ५९:३७ ऋषिपूर्वो गिरिस्तत्र एकलक्षा सहस्राणि ५।४५४ ३१५३ उद्यानबनखण्डेपु १४॥२१ एकवर्णमखिल जगत् ६३१३४ ऋपभः पञ्चमश्चैव १९४२५० उदापि ततो भ्रान्त्वा २७.१०४ एक वर्षशतं कृत्वा ६५।३३ ऋपभोऽभात्स्वयम्बुद्धो ९/७३ उद्वापि परिभ्रम्य ६०११५ २११०२ ऋपभाय नमस्तुभ्य २२॥३१ एकवाक्यतया तेन उन्नताग्रममस्निग्ध- ८1८ एकविंशतिपल्यायु ६०११०३ उन्नतः कुक्षिभिर्भूपाः ऋपय प्राक्ततस्तथुर ३॥६१ २३१७१ एकविंशतिलक्षाश्च ५।५४५ उनिद्रपद्मनयना ऋपयोऽनुव्रजन्तीश ५९.६० एकविंशतिलक्षा में ४।१९६ उन्मीलित मनोनेत्र ४३११३२ [५] एकविंशतिहस्रं तु ६७६ उन्मुण्डो निषधश्चातौ ४८०६६ एक एव भवभूत् ६३।८३ एकविंशतिवारांश्च २५१३२ [] एक एव तयोरासी- ४३१२०६ एक संख्येयविस्तार ४।१६८ ऊचे कनकमाला ता एकच्छत्रमिदं राज्य ४७१७७ १४।५४ एकपष्टिकृता भागा ६.१० ऊचे गत्वेति मुग्रीव १९.१३० एकजन्मापकारेण २७११२३ एकस्मिन्समये कालात् ६४।९० ऊचे वनवती देवी एकत्रिद्वय कमासाश्च ६०३३९ ५३।१० एक्स्य सप्तमी पृथिवी ६०१३०२ एकत्रिंशत्सहस्राणि ५।२९२ ऊढाच यौवनस्थेन २११३८ एकस्या एक्वीरोग्य १८।२६ ऊटाया सिंहदष्ट्रेण २३१६ एकत्रिंशत्सगव्यूति ५।४०१ एकस्यापि महानरस्य १११२७ ऊरू सन्धिनितम्बश्च ४।३२५ एकस्यामेव चामुष्या २८।२२ ३३.१५५ एकत्रिंशत् गव्यूत्या ४१३५७ एक्स्यामेव रात्री तु ४८।२० ऊर्जयन्ताद्रिनिर्वाण ६५।१७ एकत्वेन वितकोऽस्ति एकस्त्रयस्तत सप्त ३।११७ ऊर्जघन्तगिरी वचो ६५।१४ एकदा नारदश्छात्र. १७३६१ एवमादिष्वतीतेषु २५।३७ ऊर्जयन्तनगारोह ११११५ एकदा प्राग विबुद्धासौ ३०।२९ एका कोटि: पुनर्लक्षा ५।५८५ ऊध्र्व साधरज्ज्वन्ते ४।२१ एकदा मुखताम्बूलं ४३१४ एकातपत्रमैश्वर्यम् ३२३६ ऊवं नवनसा जाता ९।९१ एकदा रामदत्तार्या २७६० एकान्तत्रिसहस्राणि ६०.४५९ ऊवं नवनवत्यास्तु एकदा तु शिवादेव्य- १६४१ एकान्तं प्रासुकं क्षेत्र ५६.३० ऊर्ध्व क्षीणकपायोस्मात् ३३८३ एक्दैव रस वर्ण ७।३३ एकान्तविपरीतत्व ५८।१९५ उध्वं च पुनरुद्यातो ५।६४ एकद्वित्रिकगव्यूति ४१३५० एकान्ते पृष्टया कृच्छ्रात् २४१५५ ऊर्ध्वगा वलदेवास्ते ६०१२९३ एकद्वित्रि चतु पञ्च ३४।९३ एकान्ते सुस्थितं हर्षे २२०४८ ऊर्द्धवेयकान्तामु ६०४५८ एकद्वित्रिचतुतिकानि २४७६ एकानत्रिशदुत्सेध ४।३२४ ऊर्वज्वलनमुष्णत्व ६५।८ एकद्वित्रिचनु पञ्च १०।२३ एकान्न विशदुद्दिष्टाः ६०१४१६ ऊवं तस्यापुरा प्रोक्तं एकद्वित्रिचतु पञ्च ५८.५ एकान्नविशतिज्ञेया ६०१३७३ ऊर्ध्वपादानधोवक्वान् ४७७४ एकद्वित्रिषण्मास ६०.४५५ एकानसप्ततिलंक्षाः उध्वं प्रदेशवृदयातः ४१. एकद्विध्यादिपण्मास ६५।२७ एकानपष्टि लक्षाश्च ६०१५२२ ८।१४ एकत्रिंशत्तु कोदण्डा- ऊर्जयन्तगिरौ मृत्वा १८ [श्रो] हरिवंशपुराणे एकात्मपरिणामेन ५८४२१९ एतास्तु दिक्कुमारीणां ५।७२४ एह्येहि कृष्ण योऽहं ते ६५।४५ एकादश गणाधीशा ५९।१२८ एतास्तीर्थकरोत्पत्ती ५।३०७ एहि स्वागतमित्याह २२११२९ एकादश त्रिके पूर्वे- ६१६२ एतास्त्रयोदश ख्याता: ५६।१०९ [2] एकादयः प्रणीता ३४।८८ एते जनपदाः सर्वे ११।७३ ऐन्द्र दक्षिणमेतेषा ५।३५२ एकादश सहस्राणि ५।३१२ एतेषु तु विशुद्धेषु ६७७ ऐन्द्रा. कुम्भमहाम्भोदाः ८।१६६ एकादशैव लक्षा हि ५।५४१ एतेषु विधयः कार्या ३४.१३० ऐरा च विश्वसेनश्च ६०१९७ एकादश्या तु तस्यव ६०।१७८ एतैतेक्षणसाफल्य- ९।१५० ऐरावतं समारोप्य २४. एकादश्या प्रातिहार्य- ३४।१२८ एतैरप्यष्टबालाने ७.३९ ऐलेयः स्थापितो राजा १७१९ एकादिषूपवासेषु ३४१५२ एतः सर्वैरयं द्वीपो ५।१२ ऐलेयाख्यमिलाया स १७३ एकाद्या यत्र पञ्चान्ता ३४।६९ एते स्वदारसन्तोष- ५८.१७५ ऐशानलोकपालस्य एकाशीति शतानि स्यात् ५।६८ एवमाद्यास्तथान्येऽपि १८०४ ऐश्वयं रूढिशब्दस्य १७।१२६ एकाष्टलोकभीभङ्ग ५७।१३३ एवमाद्यानि चान्यानि २५/५० एके नवाह्वयं नीतास् ४६।४१ एवमाद्येष्वतीतेपु ४५/२० एकेन्द्रियादिकां जाति- ५८।२४६ एवमस्त्विति नीत्वाऽमो २२।१४८ ओषधीश्चापि विद्याश्च २२१७६ एकक कूपके रोम २३१६४ एवमस्त्विति सन्त्रस्ता ४२।९१ [क] एककाक्षरवृद्धया तु १०॥२६ एवमीशस्त्रिलोकेश ५९।२९ क एप भगवान् वंशो ३११९२ एककं स त्रिधा छित्वा ३१.१२० एवमुक्त्वा प्रजा यत्र ९।९६ ककुभोऽभासयद्यस्य १८ एकस्यैव चन्द्रस्य ६।२९ एवमुक्त्वा निशान्ते सा १७१७८ कच्छश्चापि महाकच्छ• १२०६८ एककस्य तु बाहुल्यं ४।५५ एवमुक्ताऽवदत्कन्या कच्छाख्यविजयायाम ५१५४८ एकैकस्य नरेन्द्रस्य ५०।१०४ एवमन्योऽन्यससका ५७११०७ कच्छा सुकच्छा महाकच्छा ५।२४५ एककस्य हृदस्यात्र ५२०० एवमेकातपत्राया २५।१६ कच्छादिषु यथासंख्य- ५1५८ एकैकस्मिंस्ततो रोम्णि ७.४९ एवमेता बधया १९।१९९ फटकः कटिसूत्राद्यः ११।१२२ एकैको हीयते चाध. ४।८८ एवं तु द्वादशैवेह ४८ एकोत्तरा तु वृद्धि स्यात् ३३१५६ एव दक्षः प्रजावाक्य १७.१४ कठिनस्तनचक्राम्या ८।१७ एकोनत्रिशदेव स्युः ५१५१७ एव द्वादशवर्गीय ५७११६१ कण्टकं कुण्डलं चापि ६२८ যক্ষানষিকারা কী एवं नित्योत्सवानन्त- ६०१३६७ ५८।१ कण्टलग्ना रदन्तीत ५०1८९ एकोहोच नव त्रिका. ३४१७४ एव वसन्ततिलकप्रचुर. १६७९ कण्ठालेपोचिताः पूर्व एकोनपदकोटीक १०१९० २९९ कतिपयाहभवं यत किं पुनः ५५।९९ एकोनविंशतिर्दण्डास् ४।३१८ एवं सति सुखे दुःख १९।२३ कतिचित्पूर्वजन्मानि एकोनविंशतिर्लक्षा ४।१९८ एवं समितयः पञ्च २।१२७ कथञ्चिद्यदि मोक्षः एकोनविंशति पटया ४।१६६ ऐशानधारितस्फोत- २।३८ क्यमपि कार्यसिद्धि मुप. ४९।४० एकोपाध्यायशिष्याणा १७१६८ एप सोमप्रभो देवि १२।३९ कथं नाथ जिनो भावी एको लाभान्तरा यम्य एप यादवसम्बन्ध २१११७८ कथ वा मम पुत्रोऽस्य ३३१४४ एकोऽवतिष्ठते पत्र एपा वापरा भ्रान्त ४१२५२ क्थ वा तापसि ! प्राप्नो २९१५४ एणीस्वरूपिणो स्तन्य. २९।४९ एवोक्ता विपश्चिद्भिर ४।२५७ कथितं मुनिना दिव्य- एन एव एपन्यामा १२।२५८ एपंव च तमियेऽपि ४/२९० कथं वैविध्यमेतेपा- एनावस्त्र कार्य तु ५०।९९ एपैव हि अपे होना ४/२८ एतावतैव पर्याप्त क्या पुनर्नवीभूता २।१२ एक्वानन्तरा वैद्या ४॥२६७ एतापाने पुरपो ५८।२८ एपंवावादिविद्भिर ४४२६२ कदम्बवनकुण्डेय एता विखुमारोगा ५।७२७ एपोगो गरउम्यूको ५०११३३ पदम्बवनमंन्याता १९।१९५ कटिस्थकरयुग्मस्य ९।३१ एवविधवचः श्रुत्वा ४६८४८ ३४/२ १९८९ २३१३५ ४८३७ ४७१२. क्यं कुम्वीरस्य इलोकानामकाराद्यनुक्रमः कदन पाण्डुपुत्राणा १।१०८ करोति सज्जनो यनं ६२१४६ कश्चिद्भवाब्धिदुःखामि- १८।१२६ कदलीनालिकेरेक्षु ५९।४४ कर्कोटकहपोकेगी ५२॥३६ कश्चिन्महाकुलोनोऽपि ३११५५ कदाचित् पाध्वीभूताः १६१८६ कर्ण सुदर्शनोद्याने ५२६८९ कपायकलुपो ह्यात्मा ५८।२०२ ४३१२८ कदाचित्मह मुप्तोऽसौ २४६७८ कर्णामृतमिवाकर्ण्य कपायतीव्रमन्दादि ५८।२८८ २४.१५ कदाचित्तु हृते मासे वर्णान्तरततासक्त २१३४ कपायाः क्रोधमानौ च ५८०२३८ कनक. कनकाभश्च कर्णचामरराहावं ८1१४४ कपायप्रशमोद्भूतं ३१८७ कनतनकदण्डानि कर्णावक्षतकायस्य ८।११३ ८1१७६ कपायवशग: प्राणी ६१११०२ कनकन कमालया ४७११३७ कर्णे कथितमतस्य ४७१७२ कपायान्तमसौ कृत्वा ११११०२ कनवनचित्रया ३८।३६ कर्तव्य मम नास्तीति ३३१७७ कएं ख्यातिमवाप्य १७११६३ कनवनवसंकाशः ६०१५५५ कर्मस्थितिकमित्युक्तं १०1८६ कस्तस्य तान् गुणानुदान् २०१५ कनिष्ठोऽत्राजयग्ज्येप्ट ११३८२ कर्मभूमिगता मा ७११०७ कस्ता योजयितुं शक्तस. २०१८ कनीयान् जिनदत्तस्तां ६४४१२१ कर्मभूमि भवनापि १२।२ कस्येदमटवीमध्ये ४७१८५ कनीयास महाकाले ३३३१०२ कर्मभूमिषु सर्वासु ६४१८९ कस्ययं भगवत्कन्या ४२।४७ कन्दर्पस्य विजेतापि ४२१२१ कर्मारवी च सम्पूर्णा १९१८२ कंमः कलिन्दसेनाया. ३३।२६ कन्याया भ्रातरी नाना २१११७१ कर्मणोऽष्टविधस्येवं ३.९९ कंसवाक्यमिति श्रुत्वा ३३११४ कन्याऽनन्यसमा तस्य १९।५५ कर्मक्षयसमुद्भूत १०।६ कममञ्जूपिका ह्येपा ३३१२१ कन्यार्थी च यगोऽयीं च १९६१२६ कर्मप्रकृतभावो हि ५६१८४ कसं जामातरं हरवा ५०११४ कन्यादानकृतारम्भ ४२०६५ वर्मणोऽनुभवात्तस्मात् ५८।२९३ कमकोपमदपर्वता ६३३२७ वन्या मदनबैगा च २४१८४ कर्मोदयवशोपात्त ५८२५० क्व वाबिजम्बूदुममण्डिता ५४.७५ कन्याया मान प्रश्न २२१११९ कर्मगौरवदोपेग ६२०६२ क्व परदयापरः परमधर्म-४९।३८ कन्याकूनविदूचे स ३४॥२० कर्मोदयवशात्पापाद् ५८८२ क्वचित्पुण्यफलप्राप्या ५७.८१ कन्याः पञ्चशतान्यत्र २४९ कर्मभूमिपु सर्वासु ३६१३२ क्वचिच्चित्तं स्निग्धसुकृष्ण ३५१५१ कन्या:मी नृत्यगीतादि २११४२ कर्मवपरिणत्यात्म- ५८२१३ वचिदालेख्यहृद्यानि ५७.८० कन्या तामपि दुर्गन्धा ६४११२० कर्मानवाणा भेदोश्य ५८.९१ क्व चेद सौकुमार्य ते ८।२०३ कन्यया हृतचित्तश्च १७१८ क्लहे प्रोतिसयुक्ता. ६०५५० क्वचिस्म क्वचिच्च ७११०० कपाट पादपातेन ६१६८६ कलागुणविदग्धाभिम् १९६२७० क्रमयुतमवनत्या ३६४६ ५४५६ कलापारमिता रूप ३११११ क्रमात् शतमहपु १८१२१ कपिलं तत्र पुत्र स्वं ३२।३१ क्लापारमितम्याम्ब २१७१ ५२६०५ कपिष्टनामान्वयभूषणम् कलागुणविदग्धाना १९६६ क्रमेण स द्वन्द्वयुग प्रयात ३५१७ यमक्सिलयोद्यन् कलागुणान् प्रत्यहमत्य ३५१६४ क्रमेणाद्यन्तमध्ये ३४॥६२ कमलायाम्तदा मा ३३१०३ कलिद्गराजस्य नृपस्य ६६२ क्रमेण क्षीयमाणेषु ७.१२३ करपदमुद्रिकापटकनपुर-४९११ कल्याणपूजनमिनस्य काकन्दी पुष्पदन्तश्च ६०१९० करतन महीतलमुदरज् ५५।८ कल्याणहनव प्राणा ४५1८५ काइमास्यस्य महाकाक्षः४१५१ करालबहादतेन २३॥१५० वल्याशातिविशेष ३४४१२२ काशिनामारिकागाः १९७२ परागलिस्पर्शमुम म रामे ३५।६६ कल्याण परिवर्घमान- ६६५३ बाकिण्यालाक्षणं कृत्वा ११११०६ परिक्टंप युगच्छदन्धिषु ५५३८ कान्तिश्चनुरयोग्य ३४०५३ पाश्चनाम्यगृहायात २७१८४ परिण निमंदीकृत्य २४॥४६ वल्यस्ने तयाना ७।६३ का धियोःपुष्पजन्मान: ५९।१०२ परोन्द्र मकरम्पुरत् ३८७ पपानच्चतपयनान् ६।१०५ वान्ताविरहमन्नापा ४३२२० परणवानमौ योगी ४३११४२ बल्यो सानवालिटी कानया कुमुमावल्या परेण पोरा ४०1१० वन पंटर रात पान्ना व्यन्नरदेवाना २।८० कपिलो वासुदेवोऽपि क्रमणी मानुपाख्यस्तु हरिवंशपुराणे ४६४२७ कान्ता चारुमतिश्चारु २९२५ काल, पल्योपमाख्योऽसौ ७५४ कियन्त. समतिक्रान्ता: ३.१९३ कान्तारभिक्षया प्राण ६५।२८ कालसवरमुन्मुच्य ४७१८० किरन्नमृतदोधिति ४२।१०१ कान्तो गरुडसेनी हो ३३।१३३ कालानतिकमादौ तु ६४।३८ किरातवेपभृत्पल्या ४६१० कान्दिशीकान् करोम्यद्य ३११६५ कालागुरुकधूपेन ६०१०७ क्रियाविशालपूर्वस्य २१०० कापिधानेऽधरज्ज्वन्ते ४।२४ कालातिपातिभिर्व्यथे. २२।१४७ क्रियासु स्थानपूर्वासु २११७ कामकरीन्द्र मृगेन्द्र नमस्ते ३९।१३ कालिङ्गो पूरणश्वा: क्रियाविशालपूर्व तु १०१२० कामगैन विमानेन ३२।२१ कालिन्दोस्निग्धनीलाम्बु १४।२ क्रियाणा भवहेतूना ५८०३०० कामदा कामवद्भूमिः ५९१३ कालिन्दी निलका कान्ता ३३१९९ क्रियाधिकारिणीत्युक्ता ५८०६७ कामदृष्टिा हपती १।२८ काले तत्र मुनी व्योम्नस् ३४।१२ क्रियातश्चाक्रियातोऽन्या- १०४७ कामवृष्टिं वशास्तेऽमी ११६१२३ काले सम्प्रति साधूनां १८।१४० किरीटं वरहार च कामदः कामदेवेन २९.१२ काले विद्याधरास्तर २३।१४ किरोटसत्कुण्डलपूर्व ३७।४३ कामशाला विशाला. स्यु. ५९।४९ काले पितृष्वसा तस्मिन् ४२।४९ क्लिष्टाः स्थावरकायेव- १२१४ कामदत्तो जिनागार २९११ काले स तत्र मुनि १६१२८ कोकः प्रथमस्तंपा कामदेव सति प्रेक्षा २९३ काले तत्र हरिं प्राप्तो ४३१७४ कीचकं शतसंख्यास्ते कामिनीप्रणय के लि ६३१३८ काले तस्याभवच्चक्री १३।२७ कामुकाणि तु चत्वारि ४।२९९ कोचकानुजवत्तान्ते कालेन तावता तपा ७१९४ कीर्तन क्षत्रियादीना कायवाड्मनसयोग ६३३८६ कालेन यावर्तव स्याद् ७११८ कायवाड्मनसा कर्म ५८।५७ कालोदस्थाः प्रवेशेन ५६५७४ ४३३९८ कायाज्ञादिसरन्येपा ५८।६३ कालोदं पुष्करद्वीपः ५.५७६ कार्यन्द्रियगुणस्थान २१११६ कालोदे दिशि निश्चेया ५१५६७ क्रीडार्थमागतस्यास्य कायोत्मर्गस्थितं साधु २७1८६ काव्यस्यान्तर्गत लेपं क्रीत्वा तत्रच काप्पम २११७६ कायोत्सर्गेण षण्मासान ९।१०१ काशिकौशलकौशल्य- क्रोडया स पजिग्ये कायोत्सर्गस्थित रात्रौ ४३११३७ ४८॥२२ काश्चिद्भपास्रगाघाने कायोत्सर्गविधानेन २२०२५ काञ्चित्कालकला तस्य १४५१ कुक्सश कां वहताग्रजेन ३५१७९ कारयित्वा तत. पौर ३२।३९ का स्त्री का वा स्वसा १९१०६ कुक्षे!मक्षिकायाश्च कारणं स्थिरभावस्य ५८१२७६ किञ्चिद्रे निवश्यक कार्यः स्वरान्तमार्गश्च १९।२४० किञ्चिदारक्तवस्त्रा कार्तिक्यामन्यदा रात्रा. ३४०४६ २६।९ कि करोमि क्व गच्छामि ६२१४९ बार्तिकासिमपञ्चम्या ६०१२६२ कालसंवरमामन्य ४३१२२६ कालमटादसाम्भोधि. ८।२१८ किं भोगरोदृशः वृत्य ४३११८५ बुणिम: क्षणिक मत्वा १७५२४ कि मेथवा प्रार्थनया फालसवरसंग्राम १११०२ कितावश्यते यत्र कालभावविवास्थ ५६५२ २।४ कुण्डलोमलगण्डस्य मालश्चापि महाकाल: १११११० किमहो देवदण्डोऽस्य ४३।१८१ कुतस्त्योऽयं नमामादः २४।१० पालस्त्रिमागण किमत्र ते स्वानफलं ६०1५४३ ३७५२६ कुतीर्थध्वान्तमुधुप पालः पञ्चास्तिकायारच ४॥५ विमर्थ क्षेमवार्ता नो ५३१४ कुतुपेषु यथास्थान कालवेशपुरं रम्य विमत्र बहुनोत्रतेन २२।१८ १७७१ कुतो होरयं लोको २३०२ पाल कृत्वा युवा जातो ४३११२. किमेतदिश्यमो ध्यात्वा ४३५१ कुतोऽपवर्तने माय २०१२८ नामस्वभावभेदन किमर्थमागतो भत्तः ४३३९५ कुदेवपापाणमयानिवय- ३५।४८ रामपालदरम्याज्ञा ५९४८४ स्पिक्षि जगतीपतिौरपं ५५।१४ पुग्यशासमारास्य ४७१ १७७ कोया लोकान्तिर्वाचः ९७१ कोदश चरित तस्य १२१२२ ११४४ ४८.१५ ८१४९ क्रीडापूर्व गतो गैह- २११४७ १९१४६ कुचकलशकलो कुचानिव निजानिमा ३८॥३२ कुटजनीपकदम्बदम्बकैः ५५।७८ २३१२८ कुटुम्बिनोजडप्रायो ३३३१५८ कि केनात्र महादान ६६६४८ कुणिमश्च विदर्भेषु १७२३ ८४२६ २२।१४ ६०1१७७ कुलमानधरा धोरा . श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः कुन्योर्माण्डलिकत्वे तु ६०५०६ कुलमुवाह विवाहविधोचितं १५।२८ कृताध्यापकलासा १३।२९ कुन्थोः पष्टि सहस्राणि ६०४३७ ५०११०९ कृते दायादवर्गण ४७६ कुन्तक्रकचशूलायर् ४।३६३ कुलक्रमागता तेपा ४०।३९ कृताञ्जलिपुटाम्या स कुन्ती च द्रौपदी देवी ६४।१४४ कुलशलनितम्वेषु १२।२८ कृताञ्जलिपुटस्तोत्र ४३१९१ कुन्ती मद्री च कन्ये द्वे १८३१५ कुलालेनेव चान्येन ३।९८ कृताणुव्रतदीक्षश्च २०१२ कुन्ती पप्रच्छ ता प्रीत्या ४५।७७ कुलिशकठिनमुष्टि ३६।४२ कृतेप प्रणभङ्गेपु ५३१२ कुन्ती गतिवदशेनते ४५।६१ कुलोनाना समाजेऽस्मिन् ३११५० कृनोचितकथस्तत्र ४२१७० कुन्ती निष्णातसम्बन्ध- ५०८८ कुशलं नाथ युष्माकं २१११६ कृतोऽभिवादने तेन १७१६२ कुन्त्यवीनतनया ६३०५६ कुशलाचरणाचार.. ५८।१०४ कृत्वा सनत्कुमारेन्द्र ६०1८४ कुन्त्यग्रेण वितीर्णभक्ष• ६४।१४६ कुशली चारुदत्तात्र २१।११५ कृत्वा नेमिजिनेन्द्राय ६२१५७ कुपूतना पूतनभूतमूर्तिः ३५।४२ कुसुममारभृता प्रणताभृशं ५५।३९ कृत्वा शासनवात्सल्य. २०६२ कुपात्रदानतो भूत्वा ७।११५ कूर्चप्रारोहिणस्तत्र १७५९० कृत्वा जिनमहं खेटाः २६३ कुम्भकण्टकनामायं २१।१२३ कूटं वैश्रवणाख्यं तु कृत्वामराश्च जिननिष्क्रमण १६१५८ कुमुदा नलिनी पद्मा ५७१३४ कूटं च लोहिताक्ष च २१२१८ कृत्वा चात्र भवे भव्ये ६०४० कुमारकाल: कृष्णस्य ६०५३२ कूटान्येकादशैवाने ५।१०५ कृषिमाकृत्रिमेभ्यश्च २२॥४० कुमारस्य गजास्यस्य ११११६ कूटाना सप्तगत्यासु ५७॥१३१ कृपया स मयात्रायं २८।२४ कुमारदेवसज्ञोऽहं कूष्माण्ड गणमाता च २२१६४ कृपास्नेहवशात्माप्ता २९।४८ ३१११३ कृतरणं परिभूय पुर. ४४।५२ कृम्यादिद्वीन्द्रियवेके ३।१२२ ९।४ कृतनः कृतदोषेषु ४०७ कुस्तु चिबुकींपर् २३३९७ कुमाराणा जिनाना तु ६०१३३२ कृतमण्डनमारूढो १४.२८ कृष्णवर्णेल्ययुक्तो ५२।८ कुमारश्रमणस्याथ ६११५ कृतदोपेप्वपि प्रायः ५४०४९ कृष्णदक्षिणपार्वे त्व. बुमारी त्वद्गतप्राणा ३२।१४ कृतवतोऽपति विपमा १५।४६ कृष्ण भीमसुनाचित्त- ४२१४४ कुमारोऽपि शिवादेव्या' १९४० वृतसाहाय्यकः संख्ये ३१११३६ कृष्णकोटिशिलोत्क्षेप ११११० कुमारी चारुदत्तोऽयं २१:१२६ वृतप्रणतिरध्यास्य ५०४० कृष्णस्य पुण्यसामर्थ्य ४०१० कुमारयोस्तयोस्तत्र ३११८४ कृतरूपपरावतिः २४०६५ कृष्णस्य मार्गशीर्षस्य ६०१२३१ कुमाविव वैराग्यात् २१०१३३ कृतपूजाः सुररिन्द्रा ५८३११ कृष्णा नीलाश्च रक्तादच ६८९७ कुम्भनिरन्तराराघर ८।१६५ कृतः सामन्तमवातर २११४९ कृष्णा कृष्णपदं नत्वा ५४/५२ दुयोन्यमोतिलक्षासु १८०५६ कृतस्मरणया देवि! २९।६५ कृष्णा नीला च कापोता ६।१०८ कुरवः कुशेशा ९।४४ कृतकृष्णवचा भामा ४३।१७ कृष्णोऽपि च योद्दिष्टा ६१२७ धुरु धर्मोपदेशं यो २८४१२ कृततीर्थोदक्स्नान. ११०४२ कृष्णाजिनघरास्त्वैते २६.१८ कुरु काय गुणं कण्टे ३१॥३३ वृतमङ्केतया पूर्व २१॥५४ वृष्णेनाभिमुखीभूना कुरजालदेशस्य कृतककोपविवार. ५५।५९ वेचित् मख्येयविस्तारा ४११७० पुरते भूपति नाभिः २३।७४ कृततापमयमस्य ३३॥६९ केचिद् द्वित्रिभवाश्चान्ये ३१७३ कुरूणामोश्वर पुष ५०१९३ कृतपरिप्वजनः स्वइनः ५५७१ वंचित् पूर्वभवाम्पस्तु. ३।१७४ पुरजालपञ्चाल १११६४ वृतपयोदयोद्योता १४३४ वैचिचरमदेशस्नु ६११९२ भुर्वाणश्चन्द्रमहाशा कृता पूज्य ते जन्म ४७९ वंचिदूदुर्जनास्तत्र १११ कुर्वनिर्वामिएम्तीन कृतिच बंदनास्पर्ग: १०८२ केचित् निरन्वयध्वस्त. ९०११० पुर्वन्तु न्यास्यानमन.प. ६६४२ कृतावधानम्ममिटि ५७१२४ विद्वस्त्राणि चित्राणि ९।१५२ कुर्यात्र हिमश्चा १९४७ नाम्या वर्गारोग ८1१७. तुमाली महामानो ५२।० कुमारः स्वरभेदेन कुमारः क्रीडित चक्र ५२१७ ११॥४३ ५।१६५ ५८ ५४.३१ २२ हरिवंशपुराण केदाराकृतयः केचित् ४॥३९४ कोऽभिप्रायः प्रभोरस्य ९।११७ क्षिप्रं चिर पातय. २५१६६ केनापि हेतुना कोऽपि २८७ कोऽवधीत् कामधेन्वयं २५४९ क्षिप्रं शिप्रं निरस्या सा २५१६९ केनायं पूरितः शङ्को ५४५७ क्रोधमानमहामाया ३।११९ क्षुत्पिपासानिहरणं २१११०० केवल कायसन्तापं ३३१६५ क्रोधानुबन्धमित्येक २८०४८ शुत्पीडिता जनास्तत्र ६०१११४ केवलैवत लक्षका ४१२१७ क्रोधाद्धम्मिल्लपूर्वेण २७१६९ शुभिताः पूर्वमैवाऽऽसन् ३११५९ केवलस्य प्रभावण २।६० क्रोधाधिक्यात्ततो दनं ६१५६ क्षुभिताम्भोधिगम्भीरा ८1१५७ • केवलिश्रुतसद्धेषु ५८.९६ क्रोधावेशवशात्प्रादुर् ५८.६६ क्षुभितमभिपतन्त ३६१४६ केशकुण्डलसङ्घातं २१५३ क्रोधाद्यम्यन्तरोपाधेः ६४।४९ क्षुल्लक पुष्पदन्तस्तं २०१२७ केशवेन वितीर्ण में ४७/९४ क्रोधान्धन विधेशेन ६१५१०८ क्षुल्लक हिमवत्कूटं केशकुन्तलभारोऽभान् ९.११ क्रोशार्द्ध मत्तिकांगन्धः ४१३४२ क्षेत्रपर्वतनद्याद्या केशरीहृदत सीता ५६१३४ क्रोशः सार्धस्तु वंशायाम् ४१२१९ क्षेत्रकालादिभिः सिद्धाः ६४४८७ कैटभश्च तदा च्युत्वा ४८.४ क्रोशद्वादशभागाश्च ४॥२२६ क्षेत्रस्याद्यस्य विस्तारः ५।१७ कैटभोऽपि दिवश्च्पुत्वा ४३।२१८ क्रोशस्य सप्तमो भागम् ६११४ क्षेत्राद् द्विगुणविस्तारः कैकेयात्रेयकाम्बोज ३१५ कौतुकारकरपद्माभ्या ४३१९३ क्षेत्राणि सन्ति सप्नात्र केशिकी चेति विज्ञेया १५११८५ कौन्तेयाना कृतातिथ्या- ४५६७६ क्षेत्राणि भरतादौनि ५१४९६ कोऽय रम्यतमो देश. ६५१४० कौमारं पतिमुज्झित्वा २११६८ क्षेत्रान्तरहृता मत्वा कोकिलाकलकण्ठीना १४४२५ कौमार्य निशती पञ्च ६०५२६ क्षेत्राणा च भवेच्छेदो ५।५०१ कोऽत्र कस्य बहि. कौमार्य मण्डलेशत्वे ६०॥४९३ ६३१६९ क्षेत्रादिभेदभिन्नाना कोटीकोटयो दशामीषा कौरवाय पुरवाई ७१५१ ४५१८० क्षेमं यदि नृपस्तेभ्यो कोटीकोटी च लक्षाश्च १८।६३ कौरवान्वयसम्भूतो २५३८ क्षेमा क्षेमपुरी ख्याता कौशाम्बदनसुप्तस्य ६११२४ कोटीलक्षास्तु पञ्चाशत् ६०।४६७ क्षेमन्धरः स मत्वार्थ- ७.१५३ कौशाम्बोधरणश्चित्रा ६०११८५ कोटी तु परिधिलक्षा ६।१३० क्षोरेक्षुरसधारोघर् कौशिकीना च विद्याना २२१७८ कोटीकोटयो दशामीपा ७।५५ क्षोणार्थोऽपि पयोधि- २१४१८६ कौशिकायात्र तस्तस्यां २९॥३१ कोटीकोटयो दर्शतासा क्षीरसावित्वमक्षीण ३४/६५ ७५६ कौस्तुभः कौस्तुभासश्च ५।४६० कोटीकोटयश्चतसश्च ७६० क्षोरापूर्णाः सुरः क्षिप्ताः ८1१६४ क्षत्रिया. क्षतितस्त्राणात् ९।३९ कोटी तु परिचिर्लक्षा ५।५९४ क्षीरोदान्या च सीतोदा ५।२४१ क्षामियबहुभियुक्तो ५२।२५ कोटीनामेकलक्षा स्यात् ५।५६० क्षत्रियेषु तथान्येषु २५/१० कोटोभागसहस्र स ७११६८ क्षम्यता यक्षा दोपोऽय- ४३११४३ खगरावखराराव- कोटीभाग सहमतु ७११६४ क्षम्यता क्षम्यना सौम्ये ५४।४७ खङ्गदीपकरः सोय ३३।१११ कोटीभाग सपन्यस्य ७.१५७, क्षम्यता क्षम्यता मूढ ६११६४ १५९,१६१,१६३ क्षयोपशमभाव च १०।१४४ कोटोशत त्रिपष्टयन- क्षयोपशमसापेक्ष १०११४६ खचरदेवनूपामरजन्मज ५५।९८ कोटीशतानि मप्त स्युः ५।६ भारोष्णतीप्रमद्भाव ४।३६६ खण्डस्वप्नानिमान् दृष्ट्वा ८७५ कोटी च दशलक्षाश्च १०१११३ क्षितिमतः क्षितित: ५५१११० खरभाग नवाना तु कोट्य पड्विशतिर्यस्मिन् १०।११५ क्षितेः क्षितीश्वरोरिक्षप्ता ९।८८ खरनखरकठोरी कोटयो यत्र कुमाराणा ५०।२६ क्षितेरसुरनागविद्यु. ३८।१७ खावतीर्णाभिनन्धका कोटयश्चैव चतु स्त्रिशत् १०।२४ क्षिप्तमस्मात्प्रदेशात्त्व २२।१९ साष्टाष्ट चतुरस्त्यक्षो- ५७:१३५ कोटयः पविशनियंत्र १०।१०८ क्षिप चक्र किमर्थ स्व ५२१७७ खे मातङ्गनिकायस्य कोटवस्तिस्रोऽद्धकोटी च ८।२३५ क्षिप्रमुक्षिप्प वाहुभ्या ४७३१२६ खेचराणा निकायस्य ६४।१०३ ५४॥२४ ५.२५७ २२१ ख ६२०१६ खगखेटकहस्तं तं ५११३९ खङ्गाङ्गारकपोण्डाश्च ११।६८ ४।५१ ३२११२ इलोकानामकाराद्यनुक्रमः २३ गहाद्या देवकोगमें खेचर: स्थापयाञ्चक्रुस २७५१३३ गता सा शोकिनी बुद्ध्वा १७:४७ गर्भश्वरोऽहमन्यपा ५२१७३ खेटो दधिमुखः शौरि ३११६७ गतिस्थित्योनिमित्त तो ५८५४ गवाश्वमणिमुक्तादौ ५८।१३३ खेटेऽस्यवान लाभोऽस्ति १९:११२ गतिस्थित्यवगाहाना ७२ गवेषयामि तल्लोके ४३७२ ख्यात कर्वशनामक ५८०२५७ गतियुद्धे जितास्तेऽपि ३४॥३२ गवाश्वमहिषादीनां ७.१०१ गतिरोधकरी वन्धो ५८।१६४ गवाक्षरोहजालानि ५१३६६ [ग] गतिप्वैत्रीगतार्था सा ५८।२४५ गब्यूतिद्वितयं साध ४॥३५६ गर्भाधानात्पूर्वमर्वाक् प्रमूते ३५।८० गत्वा मातङ्गवेषण ४८।१२ गोष्ठे गोपवधूवून २३।२५ मङ्गश्च गङ्गदत्तश्च ३३११४३ गरवा योजनलमा पुर् ५।६५५ गाढाश्चार्द्धतृतीयं ते ५१६७४ गङ्गा पूर्वेण पयस्य ५११३२ गत्वाऽसौ स ममारुह्य ३३१९ गाढाकल्पकल्याय २१।२६ गङ्गा सिन्युश्च रोह्या च ५।१२३ गत्वा वध्य स्वयं प्राप्न: २५१५२ गाटमोहोदयात्तस्याः ४७१५१ गङ्गादेवी विदित्वा तं १२५१ गत्वा हिमगिरि हत्वा ४४०४८ गान्धारसप्तमोपेतं १९।२३२ गङ्गानुकूलमागत्य १९६३ गत्वा निपुणमत्या च २७१३७ गान्धारस्य विशेषण १९/२५७ गङ्गा चव नदी रोह्या ५।१६० गत्वा पञ्चशतीमूज़ ५।२९० गान्धारश्च तथा न्यासः १९२२५१ गङ्गाद्वारगतामग. ४४७ गत्वा म विजयार्धादि ५३१११ गान्धारपड्जयोश्चात्र १९४२३८ गङ्गासिन्यू प्रतिक्षेत्र ५।२६७ गत्वागत्याशु दूतस्त ४४/२१ गान्धारश्च भवेन्यासो १९।२२७ गङ्गाकूटं श्रिय कूट गत्वा पञ्चायती दिक्षु ५।४७७ गान्धारः मिन्धुमौवीर- ११॥६७ गङ्गामिन्धुमहानद्योर ७१२४ गते शौरी यथास्थान २४॥४९ गान्धारपञ्चमी चैव १९.१८८ ३३।१६८ गतोऽनपानमानेतुं ६२१५ मान्धारी रक्तगान्धारी १९:१९१ गच्छत्वमादितो वाता ६२१५३ गतो मानलिरापृच्टर ५२१९१ गान्धारसप्तमापेत १९६२४२ गान्मार्गवगाववापि १९६० गतो रहमि नि शड्को २९।३९ गान्धारी मध्यमा चैव १९६१७६ गजकाननरम्यस्य ४०।२६ गत्वकानुचरो मन्त्र १९४४५ गान्धार्या पचधैवाशा १९४२३४ गजबश्वकर्णाना गन्तव्यं यत्र ते नाम ४६४ गान्धारो रक्तगान्धार्या १९।२१३ गजाः गजेः सम लग्नाम् ५११६ गति स्म ततस्तम्मै ३११८५ गान्यारोदीच्यवायाश्च १९।२०८ गगावरयसंवट्ट ८1१३३ गदा कुमुहतों शक्ति ४१४३४ गान्धारोदीच्यवायास्तु १९।२३९ गच्छेतस्तावसंख्येय ६४१८२ गदासिचक्रामगढपद्म-३५६३५ गान्धारोत्र भवन्यामो १९:२३५ गजावरचपादान २५।६१ गन्धमाल्यानपानादि ५८।१५५ गाह रथमान्दम् ५१११० गणइम अचिमोचिपा ३८.१९ गन्धर्वादिक्लापार गिरस्ता मरता पुत्वा ५३१२० गणी भद्रबलोनन्दी १२१६९ गन्धर्व इव देवोसो १९।२६७ गिरिमितः सहिनाम• ५५६११३ गणी महेन्द्रदत्तश्च १२।६६ गन्धपुष्पादिभिर्दिव्यैः ६५।१२ गिरिव्यामममायाम ५।२६८ गण्युवाच वचो गण्यः ४२११३ गन्धयुक्तिविशेषण ४६।२९ गिरिमिलानपयोग ५५५८० गण्डस्थलमदामोद ૨૨૨ गन्यवाहो वहदगन्धं ५९४८७ गीयमानं नरैः ग्रुत्वा २६१२९ गणिको वृद्धिसेनास्या २७१०१ गन्धावतीमरित्तीरे ६०.१६ गुणग्रतान्यपि त्रीणि ५८।१४३ गणे स्पविरमुन्नान ६४१४३ गधाम्बुवर्ष दुः गुणनिशायनम्पाना २६६४३ गण्या पुरुराजाना ४५।४ गभोरगिरिराजनाभि ૨૮૨ गुणिन पञ्च मप्तत्या ५।६३६ गतस्य चिह्नमात्रण ५४॥६. गम्भीर स्तम्भमूतिः गुरुः मुमद्रो अय- ६६२४ गतनिगलबलः गस्मान् वेदारीच ५२॥३९ गुरपूर्वक्रमादर्यात् १७१११७ गनो राजममोमो ३३३५२ ग प्रतिरोत २३२८९ गरधनरपाभिश्य. गा देवभिनं नत्वा २८.५० गर्भम्पोऽपि मनो:न्युनः ३३१२३ गाराहावधिज्ञान• ४३१५३ गता प्रमेषतं धीगः ४६.१४ गर्भधेऽपिपिता तम्मिन् १८३१२८ গাননা २४.१४० गता मानमर्वगम्य २०१८ गर्भाधानात् ३३१८० যাবি বা २०१८२ २४ ८1१३१ गोतमोत्रान्तरे पृष्टः ग्रहस्तु सर्वजातीना चक्रव्यूहन्यपोहार्य हरिवंशपुराणे गुप्तिश्च प्रिविधा प्रोक्ता १८६४४ गृहाण यल लघु ३८१५० [च] गुप्तेन्द्रियकलापस्य ४६।४५ गहियमणगंधात ६४.४४ गुरुवाक्यामृनं मन्त्र २१॥६३ गृहीतदविग्रहः चक्रव्यूह विदित्वा तं ५०११२ ३८०४८ गुरुनितम्वधनम्तनमारिणी ५५।२१ गृहीतचामरत्र: चक्रव्यूहम्तमा दक्ष- ५०११११ ९।८६ गुरोमहेन्द्रसेनाच्च चक्रस्यारमहये हि ४११५० गृहीत्वा वरपनाम्या २०३१ चक्रवाक्वला- गुर्वादेशाच्च महोऽपि २०९ गृहीत्वान्याः स्वमार्याः रा ३२।३६ गुरुमगूढवपुर्गाढ- ५।६९ ६२।३३ ग्रहीला करुणोपेत चक्रहस्त हरिं दृष्ट्वा गुह्यकाश्चित्रपत्राणि चक्रविक्रममंमार ५२२ ५९.४३ गृह्यतां गृह्यता काय ५९।२ गूढधीः कृतमल्लापम् ३३१११६ ग्रन्यार्थयोः प्रदान हि चक्रवतिन मुत्पन्न ६४०४६ गूढवृत्तिभिरना ६३।९७ ग्रन्यितेन मुरस्त्रोभिर् चक्ररत्नानुमार्गस ८.१९१ गूढगर्भा महादेवी चरच्छतामिदण्डास्ते ११३१०८ ४३१५९ ग्रामस्याम्यव सीमान्ते ४३।११५ गूयने शब्दयते गोत्र. ५८१२१८ ग्रामारण्यखलंकाने चक्रवति पियो भर्ता १८२१ ३४।१०२ गोगजाम्वादिभस्वाभा- ४३४८ चक्रवर्ती चमू मूने ११॥४१ ग्रामादीनां प्रदेशस्य ५८।१४५ गोतमो नामतोद्वीपो चक्रवर्ती च तद्धेतोः २०१४ ५।४७० ग्रामेऽभूत्शाल्मलीखण्डे ६०।१०९ २७१ चक्रवर्यपि सम्प्राप्तः १११७१ १९।२०४ गौतमाख्यः सुरो वादि ४१।१७ चक्रतुस्ती तपो घोरं ४३२०५ ग्रहायशाश्च चत्वारम १९।२११ गोनस्थोच्चश्च नोश्च ५८०२०९ ग्रहोरगाभूतपिशाच- ६६१४५ गोरमुच्चैश्च नीचश्च ५८१२७९ ग्रहोपन्यासविन्याम- चक्र सुदर्शनमदृष्टमुखं ५३०४९ १९.२०१ गोत्राख्यया तुता: ख्याता ४।४६ ग्रीष्मोग्रतापपरप ६२११७ गोधका रसपानाय २११९२ चक्रायुघाभिधानस्य गोपुराणा तु मध्ये स्यात् ५१४०३ [य] चक्रिणी भरताचो द्वौ ६०३२६ गोपुरण समो मान ५।४०५ पटिकाकलनिहाँदी ५९५३ चक्रिणा रध्यमानोऽपि १२४९ गोभूक्न्याहिरण्यादि ६०११३ घटीयन्त्रघटीजाले ४३३१२७ चक्री पूर्वघरः पूर्वो ६०१५६ गौतमश्रेणिकप्रश्ने ११७६ १९/२० चक्रे सुदर्शनेऽयोध्या गौतमं च समासाद्य २११४० घण्टारावोरसिंह- ५६।११४ चक्रे कुरवको यूना गौतमेनेन्द्रवचनात् ११९९ घण्टारत्नमहाघोषः ८।१२१ चक्रे व्याधिविनाशाय २३११३८ गौरीनामाभवत्तस्या ४४/३४ घनघनाघनजितजिता ५५४७९ चक्रोत्पत्ति तदा विष्णो १२१०९ गौरवातिशयाधानी ८1१०० घननिनादनताम्वरमम्बुजं ५५।६१ चक्षुर्मसूरमन्वेति गौरीगृहसमीपे च ४४|४४ घननिवहविघाताद् ३६।२ चक्षुषोऽचक्षुषो दृष्टे ५८०२२६ गौरीणा गौरिका वेद्या २२०७७ घनोदधिरिम लोकं ४॥३३ चक्षुरादीन्द्रियस्थान- ५८१२४९ ग्रेवयकपरास्तेऽन्ये ५७.१०० घाटस्य विशतिर्लक्षा ४।१८८ चक्षुर्गोचरजीवौधान् ग्रेवयकास्त्रिधैव स्यु- घाटे त्वैकादश प्रानर ४१३१० गृहद्वीपसमुद्राणा ५।११९ घातयित्वा वहून् जीवान् २३३१४५ चचार गुरुसन्देशा- गृहपत्यात्मजा यासो ६०४४ घूर्णमानमुदोर्णोन ४१५४ गृहमरण्यमरण्यनृणोदक ५५।८९ धूमिता मृदुवातेन चचार मृगसामान्य ८1८६ चचार खचरीसखः गृहार्थमन्नमत्यल्प १९/२१ धृतक्षीरादिध्यात्य ६४/२४ चण्डगाण्डीवकोदण्ड- ४५।१२७ गृह सीधुगृहीत्यर्थ ३३११९ घोषणा कारयाञ्चके ६११३४ चण्डवैगम्ततस्तस्म गृहीतरत्नत्रयभूषणा पुरा १०११६१ घोरमुद्गर घातेव २५१६० चतम्र. प्रतिमारतेषु महाश्रमी श्रावकमुख्य- १०।१६३ घ्राणेन्द्रियप्रियसुगन्धि- १६४१ २९.५३ घ्नतोऽस्य घनवरेण २७।१२४ चतस्रः पट्स्वरा ह्येता १९।१८३ चक्रायुधः श्रियं न्यस्य २७१९३ २७१९० घटोध्न्यो घटपूर हि १४१६ १८८७ २११२२ चक्षुष्माश्च यशस्वी च ७.१७४ १८.१३४ ६११३२ २३।१५४ २५१४६ ५।४२५ गहाण गृहिणीत्यवत. चतस्रस्तत्सुताः कन्या ४४।४१ २५ श्लोकानामकारायनुक्रमः चतस्रः पदस्वराश्चान्या:१९:१८१ चतुःपष्टिगुणोत्कृष्टा ८.३० चतुराहारहानं यन् ५८।१५४ चतम्रस्तुर्यरज्ज्वन्ते ४।१९ चतुःषष्टिसहस्रर्यत् चतुराशामुखद्वार २०६५ चतस्रो विदिता लक्षाः ६०१४३३ चतु.शती तपस्तस्य ६०१५१५ चतुर्नवतिसंख्यानि ५.८२ चतसृप्वात्मरक्षाणां ५६३४२ चतु शतानि तत्रान्ये ५९।१२९ चतुर्देवनिकायाश्च ९।२११ चतुःशतानि नेमेस्तु ६०४२४ चतु शतानि जेतारो ३।४९ चतु.पञ्चाशता साध- १८९० चतुःपष्टिमहादिक्षु ४।१२९ चतुर्दिक मिटरूपाय ५७५३ चतुरमानुयोगाना ५८।४ चतुर्विश शत दिक्षु ४।११० चतुर्दिक्षु नगस्यो ५१७२८ चतुर्गुणस्तु विस्तारो ५६४८५ चतुरगवलं तस्य ५४१४२ चतुदिक्षु चतु.पष्टि .. ३॥३३ चतुर्गेजनहीनं तु ५.२६६ चतुर्विशतिरन्ध्रस्थ ४।१४१ चतुणिकायदेवेषु २७.९ चतुःशिरस्त्रिविनत १०११३३ चतुविंशतिलक्षाश्च ४।११७ चतुणिकायदेवैः स २८०२९ चतुर्भूतसमूहेऽस्मिन् २८/३४ चतुभिश्च गत दिक्षु ४।११५ चतुर्णिकायामरखेचरा ६६।१३ चतुर्गतिमहादुर्गे ९।६६ चतुर्णवतिरेव स्युस् ६१७० चतुःसहयगणनाः ६०६३५९ चतुश्चतुर्यान्वितपटकन ३४८६ चतुर्विशति संस्थानि ६५८ चतु सहस्रसंख्यानर ६०६३५१ चतुभिः पञ्चमश्चद १९३१५७ चतुःपञ्चाशदेवातः ६०1४७० चतु सहस्रसंख्याता ३४.४८ चतु.सप्ततिसंख्यानि ५१५६ चतु गत्या सहस्रं तु ६०।४२८ चतु:श्रुतिश्च विज्ञेयो १९।१५८ चतुदिगोपुरद्वार ५७१७२ चतुःषष्टि. स्मृता लक्षा ४।६० चतुरङ्गवलं तच्च ४०१३० चत्वारः स्युमनोयोगा ५८०१९७ चतु.पष्टया शतं दिक्षु ४।९७ चनुरङ्गवरेशानां ५०३४ चत्वारः खलु को- ४/३०० चतुःपष्टिशतान्येव ४।२२७ चतुरङ्गमहासेनो १११२ चत्वारोऽपि च ते दिक्षु ५।३१८ चतुःपष्टिश्च पत्रिंशत् ४४२३८ चतुरङ्गं ततः सैन्य ६२११२ चत्वारोऽनन्तर तस्य ५६१८४ चतुर्दशविधं यस्याः ८/३५ चतुरङ्गबलं काल: ५२।७१ चत्वारोमन्त्रिणस्तस्य २०१४ चतुर्दशस्वहिंसार्थ ३४।१०० चतुरङ्गेण तेनाशु ३१।७२ चत्वारि च सहमाणि ५।२९६ चतुर्दशविधं पूर्व १०७२ चतुर्विधस्य निःशेप ३७० चत्वारि च गिरि च चतुर्दशप्रकारं स्याद् १०।१२५ चतुर्वर्गे हि देहिम्यो ५६८३ चत्वारि च ततो गत्वा चतुर्दश सहस्रस्तु ५।१४९ चतुर्णा लोकपालानां १९९ चत्वारि म्युः सहस्राणि ६.६७ चतुर्णामपि तपाः स्यात् ५।४५२ चत्वारि पट् चत्वारि ६०४०८ चतुर्दशसहस्राणि ५।२७५ चतुर्विधसुरासुरा ३८.३८ चत्वारिंशत्महतैश्च १०।२९ चतुर्दशसहस्राणि ५।४१ चतुविधामराकीर्ण ६४।२ चत्वारिंशसमुहिता ५।३०२ चतुर्दशदिनान्यद्य ६०१२८१ ७.८४ चतुर्विधं गुभं बाह्य चतुर्दश विनिर्गत्य चत्वारिंशाच्च चवारः ५१५५९ ५.१२२ चतुर्दशमहारत्नेर चतुर्घकालेज्यचतुर्थ ६६।१६ चत्वारिंशत्सवाणि ५९।१३२ ११११०३ चतुर्दशमहारन. चतुर्थी च चतुर्वारान् ४।३७६ चत्वारिशच्चतुर्लभाम् १०।१४२ चतुर्थकानि यत्र स्युर ३४.६७ चत्वारिंशत्महमाणि ५.५८० चतुर्दशसहयाणि ४१६२ चतुर्या कृष्णम्य ६१२५९ चत्वारिंगत्युरुढाना ६०४८९ चतुर्विशतिलक्षास्तु ४/१९३ चतुर्थेभ्योद्धहीनाश्च ५।४०९ चत्वारिशचतुर्भिश्च ४।३२८ चतुर्विज्ञनिरन्त स्याम् ५१९७५ चतुर्विशतिमंख्यात -२४ चतुर्घा विनयः पूज्येप्वा. ६॥२९ चत्वारिंशत्सहस्राणि ६०४३९ - चतुर्विशतिरस्याद्रेः ५१४७ चतुभिः समये. कृत्वा ५६७५ चत्वारिंशतया त्रिसद् ६००३१३ चतुर्विगति चापानि ४३२१ चतुभिरपिकाद्योतिः ६०३५२ चत्वाग्दिादयोक्तानि ६.३०८ चतुविशति तीर्थेगा १२ चतुविधेषु देवेषु अ१३३ चावारिशत्तपातार ४१३२७ चस्त्रिशत्ततोला. ४।१८३ चतुर्षानिहयाच्चास्य ९२२१० चत्वारिंशत्तय च ६०१ पस्निगदो लभा ४११८२ चतुष्पपाया नव नोक-३ ॥१०४ चवारिंशच्चनुयुवता ६०४८ चतुर्दश गुहाद्वार हरिवंशपुराणे ५९।२० चत्वारिंशच्च वर्षाणि ६०१५२९ चरणकण्टकबंधभयाद्भूटा५५५९२ चित्रकारपुरेऽत्राभूत् २७१९७ चत्वारिशच्च लक्षा ४।१७५ चरणो मणिमकोण. ८।१८५ चित्रबुद्धिस्तथा मन्त्री २७३९८ चत्वारिंशत्ससम्भ्रान्ते ४:१७६ चरमोऽनन्नवीयोऽमी ६०५६२ चित्रं तदा हि परमान्न १६६१ चत्वारिशत्महाष्टाभिर, ४।२३५ चरमोत्तमदेहस्य ११।९० चित्र चिक्रोड तत्रादौ ४६२१ चत्वारिंशत्सहाष्टाभिर् ४॥३७ चरमोत्तमदेहास्तु ३३।९४ चित्राम्बराम्बुरमनाम् १६६ चत्वारिशं शत दिक्षु ४।१०१ चरमोत्तमदेहस्य ५६३८५ चित्रा कनकचित्रा च ८.११४ चत्वारिंशत्तु पञ्चाग्रा ६७४ चरितमिदमकाल- ३६।१२ चित्राघोदेशतस्तूचं ४।१४ चत्वारिंशत्सहस्राणि ६०१४५१ चरितं तस्य विप्रस्य ४३३१३५ चित्राख्यं पटल पूर्व ४/५२ चत्वारिंशत्तु विस्तारो ॥१२९ चरित नेमिनाथस्य १।७२ चित्रापोभागतो रज्जुर् ४१२ चत्वारिंशश्चतुभिश्च ४१३४ चरित चारुदत्तस्य ११८२ चित्रिते कुमुमचित्र- चत्वारिंशत्सहस्राणि ६०४०९ चलमुजङ्गमभोगविभूषणं ५५६६५ चित्रश्चित्तहरदिव्य- चत्वारिंशन्महादिक्षु ४।१३५ चलजलधिसमाने ३६७१ चिन्ता प्रबन्धसम्बन्ध ५६३४० चत्वारिंशच्चतम्रश्च ४११७३ चलतडित्सवलाकवलाहके ५५।७७ चिन्तानन्तरमेवात्र ५२०५८ चत्वारिंशत्सहाष्टाभि- ४१३३ चलच्चामरसवात. ९७९ चिरवियुतकनीयो ३६।१४ चत्वारिंश शनं दिक्षु ४।१०६ चलढुकूलकोपीन ४२।४ चिरयसि किमिति त्वं ३६३१७ चत्वारिंश शतं दिक्षु ४११०५ चाटुकारशतमत्र ६३१४२ चिरं पर्यटय संसार ४६५६ चन्द्रमिन्द्रध्वज मेरु ९.१५९ चापपञ्चकमुत्सेघ. ४॥३०१ चिरं प्रेक्षकयोर दा२३४ चन्द्रप्रभसुमत्याख्यौ ६०११६५ चापरत्नममारोपं ११९२ चिरायनि तयोश्चित्त २११८ चन्द्रश्चापि महाचन्द्रः ६०५६८ चापं पञ्चशतोच्छग्य ५।३५१ चिरेण रतिसम्भोग २३३२१ चन्द्र चन्द्रमुखीपूर्ण ३।३ चापं च कौसुमं प्राय- ४७.४१ चिरेण दानवाकारो २४१७ चन्द्रश्चन्द्रिकया रात्री ९।१३ चापोनपीठिका व्यासा ५७।१४ चिरं संसृत्य जातोऽहं २८१४५ चन्द्रसूर्यो च मालान्तौ ५।२३२ चामराण्यभितो भान्ति ५९५९ चूडामणिः शतानीकः २२।१०५ चन्द्रकान्तकरस्पर्शाच २७ चामरेन्द्रभुजोत्क्षिप्त २।३९ चूतो गजपुरं मित्रा चन्द्रकान्तशिलास्यो: ७.७४ चामीकरबृहद्दण्ड ५२।१५ चूलायां स्निग्धनीलाया ८.१७८ चन्द्रकान्ताशव. शीता: ७७५ चारणधमणाभ्यां तु ६०.९१ चूलिका चकसप्तत्या चन्द्राभश्चन्द्रगौराभम् ७११७५ चारित्रमोहपरमोपशमात् १६॥५३ चूलिका विजयार्द्धस्य ५.३८ चन्द्राभ. शुक्लसप्तम्या ६०१२७४ चारुदत्त शृणु श्रीमान् २१११६७ चन्द्रामा चन्द्रिकेवास्य ४३६१६५ चारुहंमविमानेन चूलिका नगरी राजा ४६।२६ २१११७३ चेतयन्तोऽपि तत्रान्ये चन्द्राभायास्तु यद् ४३।१७५ चारुदत्तस्ततस्तुष्टो चन्द्राभालापवार्ति. ४३३१७८ १९४२६८ चेतनाचेतनद्रव्य. चारुदत्तेन मे जनो २१११५० चेतसास्थ महसा ६३४ चन्द्राभासंगसंजान ४३३१६९ चारुवारवनिता चैतश्चेटकराजस्य चन्द्राभयोपगूढस्य ४३।१६८ चारुगोष्ठोसुखास्वादस् २०२ चैत्यचैत्यालया ये ते चन्द्राम एव चन्द्राभ. ६०१२१० चित्तप्रसादनेनाशु २५।६८ ६०१२०६ चन्द्रादित्याधिकोदार• ६५।३९ चंत्यवृक्षस्तु वोरस्य चित्तद्रवीकरणदक्ष- चन्द्राभं चन्द्रवतान ३२।२८ चित्ताक्षेपपरित्यागो ६४।३१ चंत्यालया जिनेन्द्राणां ४६१९ चम्पाजन्मनि मुक्तोऽभूई०११९३ चित्तेन्द्रियनिरोधश्च १३१२८ चैतन्योत्पत्त्यभिव्यक्ती ५८।२६ चम्पाया रममाणस्य २२११ चित्ररत्नघटाटोप- टा६२ चौरास्ततः समागत्य ३३॥१२४ चम्पायाम्हि कौशाम्या ६०६१४५ चित्रचूलमोहर्योद् ३३३१३२ च्युतवतविशेषकमाकुल ५५१५६ घमावासी जनः स्यों २२१५ चित्रकारसहनाणि ११११२६ व्युत्ता गजपुरे जने ६०.१९९ १०११०३ १६४२ चैत्यप्रवचनार्हत्सद् ५८६१ ३४०४३ श्लोकानामकारायनुक्रमः ५७।१७४ जनजनितसंघट्ट भुत्वाभूदिह कौशाम्यां ६०१०१ जने वमुरयस्तस्मात् ४५।२७ जरासन्धस्ततः प्राप्त ४५१९२ बननानि जिनो पृष्टो ६०५६ च्यत्वा कल्पान्महामुक्रात् ३२१७ जरासन्धसुतास्तत्र ५२।२८ च्युत्वा पुनरयोध्यायां ४३६१५९ जनयन्ति नृणा भोगाः ११२९७ जरासन्धोत्र संप्राप्तः ५०६५ जनस्तदालोक्य तदाति- ३५१७८ च्युत्वा ते पाण्डुरजस्य ६४।१३७ जरासन्धस्य हन्तार २६।३१ जनिताङ्गसुखस्पर्यो १२० जलक्रीडारतस्तत्र [] जनिध्यमाणेन जिनेन्द्र ३७१४५ जलगर्भजपर्याप्ताः १८।८१ छत्रचामरभृङ्गार- ६२७ जलजशयनचापम् छत्रचामरमगारः २१७२ जन्तोः को वापरा?त्र ६१०५ जलप्रमविमानेगो ५.३२६ छत्रच्छायापटच्छन्न ८1१५५ जन्नक्रमण शेषाणां ६०४८५ जलं मुरजनिोपं १९६२ छयाणि शशिमुभ्राणि ३२८२ जन्मजरामरणामय. ३४१३६ जलनिधिर्मुखरःस्वतर- ५५।८३ छन्ना तेन कुमाराणा ५२।४३ जन्मनिष्क्रमणज्ञान २२२३ जलस्थलपयंस्तेपा ५४॥२३ जलस्थलगताकाश १०११२३ छास्थकालमतिबाह १६३६४ जन्मान्तरेऽपि काइक्षन्ती ४५८७२ जलार्थ तत्र लोकाना- ३३१४९ छास्यकालनिर्मुक्ता १२।७९ जन्मान्तरमहाप्रीत्या ४३३२१९ २७४९५ जलावगाहनायास्य उपस्थे द्रव्ययाथात्म्य- १०१०६ जन्मानुवन्यवरो यः ५९।६ जलावगाहनान्यस्य ९.१२६ छगिताहमिति ज्ञात्वा ४७।६७ जम्बूद्वीपस्य यावन्तो ५।४८१ डादयामि द्विपच्छेलं ४५।५१ जम्बूद्वीपतदम्बुधिप्रति ५।७३५ जलाई द्विकोशमुहिद ५१९८ जवनापरथाहर्ट खाद्यमान तया पौण्डे २५.६० ३१९० जम्बूद्वीपजगत्या च ५।४८४ जवन लघु लड्छ यद् ३८।२३ छायायामस्य दृक्षस्य ६२।२५ जम्बूवृक्षस्य तस्याघस् ५।१८२ जातकर्म जिनस्पताम्- ८११७ जम्बूद्वीपविदेहेऽष्टी ६०११४२ [ज] जातकर्मणि वर्तव्ये ८.१०५ जम्बूद्वीपविदेहे यो २७.११५ जगत्यभावसम्भारी १७५२६ जम्वृदोपविदेहेन्तः जाताहण्ययावाचि ४३३१७९ ६०१६२ जगप्रसिद्धबीयस्य जातबान्धवसम्बन्धे १३३० . जम्बूद्वीपस्य विष्कम्भे ४५११४५ जातमात्रमपत्राणं २१११४२ जगत्या. पञ्चनवति ५।४४२ जम्बूद्वीपं यया क्षारः जगह पइभियर- जाता चन्द्रप्रभा देवी ६०1१०८ ७॥१७८ जम्बूद्वीपा प्रतिष्ठान ६९० जगाद गौतम: स्याने जातिवर्णस्वरमान १९५१४८ ३।१९६ जम्बूस्थलममै तत्र ५.१८८ जानविद्याधरा शङ्काः जगाद गोपी भवती ३५६५९ जयत्वजय्या जिनधर्म- ६६.५१ जगाद च म ता देवीम् ४३११८८ जात. म लान्तवेन्द्रोह- २७.११४ जय नाथ जय ज्येष्ठ ५९।३१ जातव कृष्णदशम्या ६०१९७९ जगाद जगतानाथ २।९६ जयन्तामिलसारंच ५७५९ जात: मर्वयशो देन्या २३०५२ जगाद भगवास्तत्र जयन्ति देवाः मुरमव- ६६०५० जगावमो कोपि ममास्ति३५४० जयन्ती सर्वरले तु जान. सुवरथस्तस्माद् १८१९ ५.७२६ जगुः निरगळ ८1१५८ जय प्रमोद भर्नुस्तं जातात्र रणरोम्पस्त्वं ६०1८५ जगुरच कृतार्था वा ५३७ जय पुलस्त्यो विजयो २२।१०८ जातानुगलिनी नित्यं जगौच देवी विपिन पि ३५।५८ जय सर्वमगदबन्धी ५९.३२ जातास्यत्र ततश्च्युन्या ६०।१२१ जगी वमन्नमेना ता. २११६२ जयमेनस्य कौमार्य जानीना लक्षण तारो १९।१९८ जपनमुर. बुचादर ४२३ जय जास्मिर जाने १२११२ जानु मनादिभिः शिष्यर् ३३ार সনমান- जरकुमारमन्पाय ३३२ ३१७ जानुविभूनिवेलाया जपान मुष्टिपाउन ३१२ जरत्कुमार प्रगत जानेन तेन मलक्षण- १६.१३ ६४७० बरनारोग्यमापस्तु ४१.६ जातीदरमहापारी जपान एवं जरामन्यादयतुश जात नि.मने जागवलनाला जगन्धरले हर ५०1१०२ जाने योजनाविन्तीन उपन्यन पुलावस्य १११९१ ७८० २४७९ जिनेशजनको जगद् २८ हरिवंशपुराणे जातो वृहद्रयो राजा १८।२२ जिनस्य किविंशस्य २२११११ ज्याया ज्याया विशुद्धायां ५।९८ जातोह जिनधर्मण २१११५१ जिनाकंपादसंपर्क ५९।८० ज्याया दशसहस्रागि जात्यमुक्ता फलाभानि २. जिनांचा चैत्यगेहाचर्चा ३४।११ ज्यारवै रथानोंपै जानतापि त्वया पुत्र १७१८. जिनाश्चतुर्विशतिरत्र ६६१३७ ज्यासो नवसहस्राणि जानन्तो वस्तुसद्भाव- ६१।२६ जिनन कथिते तत्त्व ५४।५८ ज्या स्याच्छतसहस्राणि ५।९२ जानास्यैव जघन्या नो २१६६४ जिनेन्द्रदेवलज्ञान. ३२६ ज्येप्टपुत्रे विनिक्षिप्त- १८०११ जानुनी मृदुभी यस्या ८।१२ जिनेन्द्रनामग्रहण ६६.४१ ज्येष्ठनातरमालोक्य जामातृ भ्रातृघातीत्थ- ४०८ जिनेन्द्रपितनिर्वाण ३४.१० ज्येष्ठानपूजयत्सर्वान् ५३।२७ जाम्बवत्या जिनः पृष्टस् ६०१४२ जिनेन्द्रपितरौ ततो ३८।१ ज्येष्ठानाभविता सिद्धिम६४।१४१ जाम्बवत्या विवाहेन ४४१६ जिनेन्द्रमुखचन्द्रकं ३८.४१ ज्येष्ठो मुमोच यान्वाणान्३१।११९ जाम्बूनदमये तत्र ५।१७५ जिनेन्द्रवदनापूर्व १२।२७ ज्येष्ठो लक्ष्मीमती लेभे ४७११८ जायते भिन्नजातीयो ७।१४ जिनेन्द्र विनंतिर्वस्त. -६२१५८ ज्येष्ठो हिरण्यनाभात्यस् ३१३१० जायतेऽत्र नटस्येव ४३।१२६ जिनेन्द्रवीरोपि विबाध्य ६६३१५ ज्योतिगणस्य सञ्चार १०११६ जायन्तेऽभ्युदयश्रीशा ८/२२० जिनेन्द्रवीरस्य समुद्भवा- ६६७ ज्योतिगृहप्रदीपाङ्गस जायन्ते चातिशीतोष्ण. ३१११३ जिनेन्द्रोऽय जगो धर्मः १४ ज्योतिर्देवस्त्रियोत्तश्च जायास्य जिनदत्तासो ३४।४ ३८८ ज्योतिनिमित्तशास्त्राणि ११:११४ जारसैयमपनीय ६३३५३ जिने शून्यद्वयं तस्माज ६०।३२५ ज्योति:पटलमेतद्धि जाह्नवीमवतीर्णा तु ४४१६ जिनोद्भवै स्वप्नफलान- ३७॥४७ ज्योतिर्मण्डलसवाशः ५९१४२ जिगमषु तपसे जिन- ५५।१०७ जिनोच्छ्वासमुहुः क्षिप्त- ८१६७ ज्योतिर्मालाख्यखेचर्याम् ६०१८ जिगीपता परान् देशान् १७।२१ जिह्वाये द्वादशवोक्ता ४३१२ ज्योतिरङ्गमहावृक्ष जिगीपयेव विकसन् १४॥१८ जोयेत येन कन्येयं ३४१२५ ज्योतिराद्रुमा ज्योतिश् ७८१ जितशत्रु. क्षितो ख्यातो ३११८७ जीवनाहं गृहीत्वाऽमो ३३३५ . ज्योतिर्लोकप्रकटपटल- ६१३९ जिनार्को धर्मचक्राक. ५९१७२ जीवसिद्धिविधायीह १२२९ ज्योतिला विभागस्य जितात्मपरलोकस्य जीवस्य भावभावोऽयं ३.१०४ ज्योतिर्लोविमानाना जनकृष्ण बलालीक ४२।१० जोवस्य लक्षण लक्ष्य- ज्योतिलोकमतो गत्वा ५८।२२ जिन के राध रामादीन् ५११८ जीवद्यशसमाशान्त ३३१७ ज्योतिषा साधिकं पल्य ३३१४० जिनजन्माभिषेकादि ४२१२३ जीवद्यशो विलापंच १९४ ज्योतिपो भावना भौमा ३।१६२ जिनदत्तायिकोपान्ते ६०७० जीवामि जिनवाक्येन ४३।२४२ ज्वलदीपालिकया जिननिष्क्रमणं दृष्ट्वा २२५५ जीत्रादिमप्ततत्त्वाना- ५८१३०४ ज्वलवहज्ज्वालहुताश- ३५११३ जिनपादान्तिके दीक्षा ५९४१.० जीवादीना पुद्गलाना च ज्वलद्विपाणो वृपभः ७४ जिनभायाधरस्पन्द- ४०६३१ जीवाधिकरणश्चाप्य- ज्वालारुद्धपथस्तत्र ५८/८४ जिनमत्यायिका पावें ६०११०२ जीवाजीवायवा बन्ध ५८।२१ ज्योतिश्चक्राधिपावतो ७७१३२ जिनरूपशरो दूराज् जीवितान्ते सुबन्धो स्यात्६४।११७ ज्ञानपूर्वभवाशेप- जिनशासनवात्सल्य ११११०५ जीवोपयोगशक्तेश्च जिनशासनतत्त्वज्ञा ४३३८८ जेना वेदविचारेऽस्याः २३।३० ज्ञातमायादुरीहोऽसौ जिन धावकधर्मच ५९।११९ जैन एव हि सन्मार्ग ज्ञातमेव हि ते नूनं जिनस्तविधानाख्य. १०११३० जैनेन जिनदेवेन ६०.४५ ज्ञानोत्पत्त्या त्वमावास्या-६०१२६५ जिनसंयमकालस्तु ६०१३३३ जनर्वाष्णवणव- ४११५७ यो मूलनयावता- जिनम्यनेमेश्चरितं ६६४० ज्या च तेषा विपञ्चाशत्५।१६९ ज्ञेया दशसहस्राणि जिनम्य नेमस्त्रिदिवा ३२ ज्यायामज्ञातसम्बन्धः ३११२२ ज्ञेया स्वदारसन्नु ७१३४ ६२२ ३५।२७ ६५१४२ १०११८ ज्ञातपूर्वभव तस्मिन् ४७१७८ २४.५१ ५८।४० ६०१३८० २३१७६ इलोकांनामकाराद्यनुक्रमः ज्ञेयाः सप्तसहस्राणि ६०१३८७ तं पाण्डुकवने रम्य २२४१ तत कृष्णो जगौ देव ६५।४७ ज्ञेया ह्येकोनपञ्चाशद् ४।८५ तं प्रणम्य विदग्धोऽमो २०१८ ततः केवललक्ष्मीत. ५९।६१ ज्ञानने स्त्रिभि. पश्यन् ८१०२ त प्रदेश तदेवासो ६२।२९ तत: क्षीणकपायाख्यो ६४।५७ ज्ञानाप्तिः पूर्वतालेऽन्त्या ६०१२५४ तं प्रधृत्यभुज ६३३४३ तत. खण्डितविद्यास्ते २७।१२८ ज्ञानावरणशत्रुचे ९।२०९ सं शकुन्युपदेशेन ४६३३ ततः पञ्चसहस्राणि ६०॥४६३ मानस्य मनसाम्यासो ६४।४७ तं'सा कृपावती प्राह ५४।४८ ततः पतन्नसौ वेगाद् २६०३३ ज्ञानादिपु तद्वत्सु च ३४.१३३ तं स्वयंवरमालोक्य ३११४६ ततः पद्मप्रभो ज्ञेय. ६०१५५७ ज्ञानामुशनिरुद्धोऽपि ४३।१९२ तत्कथ कथमित्युक्ते २११३० ततः परं द्वयोज्ञेया ३१४६ ज्ञानवृत्तिविशेषस्य २८।३८ तत्कल्पव्यवहाराख्यं १०।१३५ ततः परं प्रसिद्धान्या ५।३३३ ज्ञानदर्शनसम्यक्त्व ५६।६७ तत्काले सत्यभामापि ४३३३३ तत. परमधत्ताग २९/६० शानलब्धिपरिप्राप्तिर् २०१३१ तत्कालऽपत्यमुक्षिप्य ७।१६२ तत परबलं दृष्ट्वा ५१११८ ज्ञातसंसारनिःसारा ४३११५७ तत्कृतो शक्तिवैकल्ये २१११५८ ततः परेण विज्ञेया ६०.२२३ झातिवर्गः समस्तोऽयं ५०५१ तत्क्षणेऽलमुदतिष्ठ- ६३३५० ततः पर्वतमारुह्य २१.११३ ज्ञात्वा च जैनधर्मस्थ ३३१७० तच्च दर्शनमोहन्धि ५८/२० तत. परिकर बवा ३४/२७ ज्ञात्वा तन्मरणं दुःखा ६१२९ तच्चरणपूजनं कृत्वा ९.१८५ ततः पश्यामि भामाया ४२१३२ ज्ञानपञ्चकसिद्धये ते ६४।१४ तच्चत्वारि सहस्राणि ४२४३ तत पित्रा च मातृभ्या ६१३८७ ज्ञात्या पुण्यस्य माहात्म्ये ४७१४५ तच्छरीरस्य पूजार्थ २७११७ तत पुण्यदिने पुण्य- २२।१५२ ज्ञात्वा भगवतः सिद्धि ६५।१८ तच्छुत्वाशु जरासन्धः ३११५८ तत. पुत्रशतेनापि ९१३७ ज्ञात्वा भामा हरोष्टा ता ४३।३ तच्छुत्वा यादवाः सर्वे ५११७ तत. पुरोहितेनाशु २३४५६ ज्ञात्वाभिप्रायमस्या: स ४५/६५ तटरहविटपान ३६१८ ततः पूरितसर्वाशा. ४७१४ सात्वा महानरं त च ४५१११० तटाद् गत्वा सहस्राणि ५।४५९ तत. पूर्णेषु मासेषु ३२१८ ज्ञानत्रय सहजनेत्र १६११९ तटान्तात्पञ्चनवति तनः प्रक्रमते शम्भु- ५९.१३ ज्ञानदर्शनचारित्र ३४४४९ तटोपाटितगात्रोऽहं २१२९५ तत प्रथमसम्यक्त्व ६४.५३ ज्ञानदर्शनसंवृत्योर ५८।२८४ तटे तु दक्षिणे तस्याः ५।२०७ ततः प्रद्युम्नभान्वाद्या' ६११३९ ज्ञानदर्शनचारित्र ६४।१४५ तडिच्चलाङ्गं सरसी ३७।१३ तत. प्रणतमाश्लिष्य ४७११३३ ७/२४ ततं च विततं चंद ८।१५९ तत. प्रणम्य देवेन्द्रा २।१४१ [2] तत चाप्यवनदंच १९।१४२ ततः प्रवुद्धवृत्तान्त- २०६३ टइण देशमासाद्य ततं तन्त्रीगतं तेपा तत प्रभृत्यसौ लोके ६५।३२ २१११०३ ततः कच्छमहाकच्छ ९।१०४ तत प्रमितयामिनी ४२।१०५ [त] तत बन्या सभामध्य. १९।१३४ तत प्रसाद इच्छामि ४७१६४ त एव चाष्टपर्यन्ता ३४॥७९ ततः कम्बलवृत्तान्त ५०१९० तत. प्रासादवर्येषु ४७११७ त एव सुखिनो घोरास् २६॥३७ ततः कल्पनिवासिन्यो २१७७ तत. प्राह जिनस्तत्त्व ४३३९४ तं कल्पव्यवहार च २।१०४ तत कापिष्टकल्पा ४१५ तत.प्राह प्रजास्तत्र ९।१४ तं चतुर्दशरत्नानि २५/३० ततः किनारगन्धर्व २२८३ तत. यात इति ख्यातस् १७१३५ तं छलव्यवहारस्य २०१५१ तत. कुन्त्या. समीप सा ४५।१३९ ततःशक्षा सभेरीका. ९८९ तं दृष्ट्वा केनचित्प्रोक्तं ३३६८२ तत कुवेरदत्तस्य २४/५० ततः शत्रुजयो लग्न. ३११९४ तं द्रौपदीमयं ग्राह्य ५४।११ तत. कुपितचित्तोडमो ४६॥३३ ततः शावरसेनाभिः ४७.९८ ३११८३ ततः कुलो युधि ग्लेच्छ- ११०३१ ततःशीकरिणं मत्त. ४११२ तं निश्चित्य पिता पुत्र २५॥४० सत कृतसुसङ्गमे ३८।९ ततः शोउलमानीय ६२१२३ त पट्वबलं भाग ४।५० तत वृततदाश्वासः २१७५ तत गून्यदय चको ६०३२७ ५।४३५ ज्ञेय वर्षसहस्रं तु तं निशम्य मुनिश्रेष्ठ . ४५/५८ ५/४१८ ३५/५४ ३० हरिवंशपुराणे ततः शौरिः समस्तैस्त: २५७१ ततस्तस्मै पराभूति १७११५८ ततोऽनन्तसुखं मोक्ष. ३१४६. ततश्च धृतपूजनो ३८६४५ ततस्तमपभं नाम्ना ८1१९६ ततोऽन्तःपुरलोकस्य १२।१६ ततश्चपललोकस्य ४५।१३७ ततस्तिथौ प्रशस्ताया ३१११३४ ततोऽन्तः कल्पवासाख्याः ५७।९९ ततश्चन्द्रावदाताग- २०३२ ततस्तिथी प्रशस्तायां ४१४१५ ततोऽन्त्यजिनमाहात्म्यात् २२२६ ततश्चक्रमहं कृत्वा ५३१३१ ततस्तु लोक. प्रतिवर्ष- ६६।२१ ततोऽन्ये पट्सहयाणि ६०१३९६ ततश्चकितचित्तोऽहं २११८५ ततस्त्रिभुवने तत्र ३१६५ ततोऽन्योऽन्यभुजक्षिप्त- १११८३ ततश्च तत्कालभवा ३५.३० ततस्त्रीणि सहस्राणि ६०.४६४ ततोऽपरागोलोकस्य ततश्चण्इरुपा पोण्ड्रो ३११८६ ततस्ते ललिताकाराः ततोऽपि धृतराजोऽभूत् ५५१३३ ततश्चाश्चर्यकृत् कार्य २८।१९ ततस्ते तन्निमित्तेन ११६१ ततोऽपि नगराधाता ४५।१०५ ततश्चागत्य भरते ६०१११७ ततस्ते मन्त्रिणो भोताः २०१२० ततोऽपि नीलकण्ठेन ३११४ ततश्चतुविधै सद्धे ९२२२१ ततस्ते पितास्त्रस्ता ९.११५ ततोऽपि वैदिर्श याता ४५।१०७ ततश्चतुःमहस्राणि ६०१४६१ ततस्ते ब्राह्मणाः प्रोक्ताः ११।१०७ ततोऽप्यग्निकुमाराद्या २२८२ ततश्चात्रोत्तरश्रेण्या ६०१८९ ततस्ते धैर्य सम्पन्नाः ४११७ ततोऽप्यन्तर्वणं नाना ततश्चोद्वर्त्य पर्यटय ३३११५७ ततस्तेन प्रिया पृष्टा २६॥४१ ततोऽप्युत्तरदिग्भागे ततश्च्युत्वाऽग्रजोऽत्रव ३३।१४१ ततस्तेन हरिः पृष्टो ६२।४७ ततोऽभिनन्दी हृदि तत श्रावकतापनो ६४।५४ ततः सोमश्रिया युक्तश् ३२।३३ ततो भीतमतिर्मुक्त्वा ३३॥३७ ततः श्रुतवयोवृद्धा ४०१५ ततो गजकुमारोषि ६०११३२ ततो भीमकमुद्वत्तं ४३।१७१ ततः पोडशभिहीनो ६०३३४ ततो गणभूदावस्या ५०८ ततोऽभूत् सुबल: सूनुः १३।१० ततः सङ्घन महता ६११४२ ततो गन्धर्वसेनाऽभू. २२।१७ ततोऽभ्यर्य जिनेन्द्राः २९१० ततः स तत्क्षणं जातस् ४७।१२१ ततो गन्धोदकैः कुम्भ• ८६१७४ ततो भ्रमरघोपाख्यो तत स दुहितुस्तस्या. १७११५ ततो घातकशोकं च १११२१ ततो मलयनामानं तत. सनत्कुमारोऽभूच ४५।१६ ततो घृतवरद्वीप ५।६१५ ततो मातङ्गकन्याभूच् ६४।११६ तत. सप्तभिराधिक्ये ३।१६० ततोऽञ्जनमहारजो ४२११०० ततो मानसवेगेन तत' सम पुरं देवस् ८.१५१ ततो जगी जरासन्धो ३११९३ तत समगलं तेन १९७४ ४३१५८ ततो मेघमुखादेवा तत सम्भवनाथोऽभूत् १३१३१ ततो जज्वाल कोपेन ततो मेघमुखैम्लेंच्छाः १११३८ ततः सरभसोद्यात ८२२९ ततो जिगमिपू राजा २०१८ ततो यादवमवास्ता- ततः मर्वस्य लोकस्य २११४९ ततो जिनगृहस्तुङ्गं २।१४८ ततोऽलङ्कृतनारीभि- २२७८ तन सरासि चत्वारि ५७११९ ततो जिनोक्ततत्त्वार्थ २।११४ ततो लब्धजया पित्रा तत सा प्राञ्जलिः प्राह ४२।९० ततो दर्शनमोहस्य ३११४३ ततो लोकस्तको दृष्ट्वा ४३।१११ तत. सुचारुश्चारच ४५।२३ ततो दर्शनमोहस्य ६४.५५ ततोऽवतीर्य सोपानः ५७।१७७ तत सुपर्णकुमाराणा ४.६७ ततो द्यूतच्छलेनैव २७/३६ ततोऽवतीयं भीष्मस्य ततः सुरपतिस्त्रियो ३८१५४ ततोऽध्यक्षनरैराशु २५।२८ ततो वनवती देवी तत सुरवराम्पर्यो ततोऽर्धरज्जुपर्यन्ते ४१२३ ततो वलिहवाचामी ततः स्वर्गसुख पुंसा १७११३३ ततोऽरज्जुमानान्ते ४/२५ ततो वर्षशतं पूर्ण तत स्व वञ्चन ज्ञात्वा १९.४४ ततो नवसहमाणि ६०1४६२ ततो वर्षसहस्राणि ततः स्वयं जरासन्धः ५२।४६ ततो नागकुमारादि २१८१ ततो वर्षसहस्राणि १२१८ ततो निधिपतिः क्रुद्धो ११॥३७ ततो विचित्रवीर्योऽभूत् ४५।२८ तत स्वयंवरान्तर्भू ३१.१५ ततो निरस्तमन्युश्च ४४ ततो विदिततत्त्वार्थाः ५९।१२० तन स्तनन्धयो जाती ४७१२२ ततो निर्गत्य जातोऽस्मि २१३१४८ ततो विदितवृत्तान्तो ५९।११३ ततो जग्राह तुष्टा सा ततो मृत्युभयात् प्रस्तः १७१६२ ११२३३ ४१४१ ३४॥३१ ६०१३९ ३२।३८ २०४६ ६०३१६ ६०३१८ ६०३१५ ततः स्वयवरारम्भे श्लोकानामकाराधनुक्रमः ततो विनिश्चितास्माभि-२२२१२० तत्र सिंहेन संत्रस्ता ६०।६७ तत्पुराधिपतिः पौण्डः ५६११५ ततो विद्याप्रमावेण १२।२६ तत्र सोमप्रमस्याभूत ४५।८ तत्पुराधिपति युद्धे २४/२६ ततो विस्मिततुष्टास्ते ५४१६८ तत्र स्वर्ग इवातिष्ठन् २१।१६५ तत्प्रदक्षिणवृत्तानि ५१५९९ ततो वोक्ष्य क्षुधाक्षोणाः ९।३३ तत्र स्थावरकाः सर्वे ५९.८५ तत्प्रत्येकशरीराख्यं ५८/२६७ ततो यजस्थः कृतजातकर्मा३५।३४ तत्र स्वान्यकपायाणा- ५८०९८ तप्प्रभावममो बुद्धवा २४॥३६ ततोऽष्टमास्यानशन ३५।३८ तत्रस्थापि तद्देशात् ५७।१३९ तत्प्रकीर्णकवासेपु ५७१८९ ततोटादशवर्षाणि ६०१३३८ तत्र स्थित जिनेन्द्रं तं ६१।१४ तत्प्रश्नानन्तरं धातु ५८१३ ततोऽप्टकादशाशीतिः ६०१३४३ तत्र स्थितस्य कृष्णस्य ४१।४६ तत्प्रसाद्यापि चुक्षोभ ४७१५ ततोऽस्ति क्रोश विस्तारं ५७।१०८ तपस्थितश्चिरं राज्यं १७१२२ तत्प्रासादपुरः दाक्र- ४१०३० ततो हठानामिताभिः ३३१५१ तत्र स्त्रीजनमध्यस्था १४।३२ तस्मामानि जगुः केचिज् १७५८५ ततो हरिप्रेक्षणलब्धसौख्या ३५।६३ तत्राक्रोडपदानि स्युः ५९।४५ तत्सुवर्णाक्षरं यत्र ५२।९० ततोऽहिनकुलेभेन्द्र- २१८७ तत्राखण्डलनेवाली २।५ तत्तद्गुणं च पूर्वानं ७॥२५ ततो हिरण्यनाभोऽपि ३१५८७ तत्रातापनयोगस्थः २।५८ तत्तु क्षायिकमभ्यक्त्वात् २।१३७ ततो हृदयसुन्दर्या ४५।११८ तत्रातापनयोगस्थ. २११११२ तथाकृते समस्तेम्यो ४८।३० तत्र कर्तृत्वमोक्तृत्व- १०:१०९ तत्रानुभूय दुःखौघांम् ६४।११५ तथा च स्थितनेपथ्य ४७१४९ तत्र कर्मवशज्ञाना ४३३८७ तापत्यविहीनाया ४३१२६ तथा चारित्रमोहस्य ३।१४५ तत्र कुण्डपुरे लेभे ३११३ तत्रापणे निविष्टोऽसौ २४.३५ तथा चोत्तरपूर्वस्यां ५.३४५ तत्र केवलिनां सौख्यं ३१८६ तत्रापाच्या नृपाः देवि- ५०/६७ तथा जयपताकाया १९।२६५ तत्र चक्रमह कृत्वा तत्राम्यन्तरकोणस्था ५।६७५ तथा जीवद्यगोलाभ ११८८ तत्र चिक्षिपव: पापाः ४६१४० तत्रामनोज्ञस्य दुखस्य ५६.९ तथा तस्य तदाश्रद्धा तत्र चित्रमणिस्तम्भ ३१११३ तत्रात्तिरर्दन वाधा ५६४ तथा त्रीणि सहस्राणि ५।११ तत्र चोत्तरशाखाया ५।१८१ तत्रासीनं जिनाधीश ५७११४३ तथा दशगुणाश्वाष्टो १३।१४ तत्र तस्थौ जिनःदीले ३१५९ तत्रालोचनकं कृच्छ, ६४।३२ तथा दश सहस्राणि ५।८५ तत्र तीर्थकरः कुर्वन् २।१४६ तत्रका दशभिमेह- ६।२५ तथा धर्मकपाछेदे ६०११ तत्र दक्षिणशाखायां ५.१८९ तत्रैव नगरे या सा ३०.१० तथा नवशनान्येव ६०1४६८ तत्र दोवारिका भौमा- ५७।२५ तत्रवारिञ्जयो राजा ३४.१८ तथा नामविशेपस्य ५८।११२ तत्र धर्मकपान्तेऽसौ ६१।१७ तत्रवास्मिन्न सस्येय ५।२ तथा निपद्यकां प्रायः २०१०५ तत्र नेमिकुमारोऽपि ४११४८ तमोत्तानशयं भद्रा २१११३९ तथा नोडवित कुर्याद् १९।२६० तत्र पारपश्चक्री ४३१९२ तत्रोद्यानं महोद्योगः ९.२०६ तथान्या घोषणादायि ६११३७ तत्र पद्मावती लेभे २४।३० तत्रोत्पथव्युदासेन १०१३५ तधान्यो गणभून्नाम्ना १२१६५ तत्र पद्मोत्तरे नाम्नि ६५।३४ तत्रोन्मग्नजला नाम्ना १११२६ तथापराजितस्यापि १९९५ तत्र पूर्वधरास्त्रीणि ३१४७ तत्रोर्जयन्तमन्तेऽमा ६५।४ तथाप्यनूद्यते वस्तु २२१५० तत्र प्रत्यक्षधर्माणो ५७१४९ तत्रोपपादिके देश १०.४१ तथा मानसवैगश्च ५११३ तत्र भीमो महानागं ४५।१०६ तत्त्वया न निवार्योव्ह- १४॥६५ तथा यथागमं नायः ९1१५६ तत्र वाह्ये परित्यज्य ५७११७१ तत्ववादिनमशुद १७१५६ तथा रक्तवती कूट ५।१०७ तत्र विष्णोर्महादेवों ४२।२५ तरित्रकालनियोगेन ७.७० तथारिष्टविमानेशो ५।३२५ तत्र सर्वजघन्यानि ६४।८१ तत्यक्षरक्षणे दक्ष. ५०.१२० तथाऽस्त्विति निगद्यता ५४/२७ तत्र सस्येयविस्तारा तत्पयोरहवासिन्या ५९।३५ तथाकमणिमूर्तीनि तत्र संस्त्रेददेशेषु ५७१३७ तत्सायय पयः शीत ६२।२१ तपार्धाक्षौहिणीनाथ: ५०७१ तत्र सामायिकं नाम १०११२९ तत्पुत्रो वाहनीकृत्य ७।१५६ तयाविधमहाभूत्या ५९।१२६ हरिवंशपुराणे तथवाःबहुले भागे तथाविधविभूतिभिः ३८।४४ तदाकर्ण्य रुपा तेन ३३३८३ तद् ब्रवीतु भवान् को भो ६२३६ तथा व्यर्थप्रयासोमो ५२२५७ तदाकर्ण्य करीन्द्रोऽसौ २७१०६ तबाहुनोर्ध्वमुक्षिता तथा सर्वार्थसिद्धी तु ६४।७९ तदाकर्ण्य निज प्राह ५२।२६ तद्यथा पूर्वविद्ध्यायन् ५६६० तथा सति विरोध. स्यात् ५८।३५ तदाकर्ण्य वचस्तूणं १११६० तद यत्तद स्थितं चित्ते १७:१३ तथाऽस्त्वित्यभिधायासा-३४॥२२ तदाकण्यं वचस्तेन ३२।१५ तद्रूपश्रवणाद् येषां तथा हि विजया स्मृता ३८६३१ तदा च सर्वभूपालैर् ३१११६ तद् रूपास्त्रविमोक्षण १७१७ तथा हि मूलतन्त्रस्य तदा च सप्ताहमहातिवर्षे ३५।२२ तद्वन्दनार्थमद्वन्द्व ४३३१०५ तथा ह्यनेन भो दृष्टा ९।११८ तदा तौ दम्पती शैलं २३।१५ तद्वन्दनार्थमिन्द्रौघाः १८३३२ तथैव कामदेवश्च १२१७० तदा तप्तो प्रवीणेद्वी १४.९१ तद्वद्भासुररूपापि ८१३२ तथैवाचलनामान्यो १२:५९ तदात्वेऽभ्येति शब्दश्चेद्-२३३१११ तद् द्वादशसहस्राणि ५।३९८ तथैव च श्रेणिक ६६।२० तदात्यन्तपरोक्षोऽपि ८1१६९ तदशीकरणार्थ तो तर्थवोज्ज्वलितो ज्ञेयम् ४६८१ तदात्मनः स्वयं वेयं ५६६६ तद्वापीपुष्पसन्दोह ५७१३७ तथवाजनका ज्ञेया ५।६७६ तदा देवकुमाराभो- २४।१३ १९६ तनयस्तस्य सोदासः तथैवात्राजशब्दस्य १७.१०५ तदा नागपुरे चक्री २०११२ तनया कनकावर्ता तथव घातकीखण्डे ६०११४९ तदानीमेव संप्राप्तो ४७१७९ तनयाः पञ्च विख्याता ४८०४६ तथैव मूलवीर्यास्तु २२१७९ तदा प्रबजता तपा ४८.५३ ९।२२० तनयावसुदेवस्य ४१४९ तदाहृदये नद्धा १९७८३ २६१४८ तनयोऽङ्गारको राशो तयवाल्परमास्वाद- ७.११३ तदा वद विधेयं मे २९।४१ तनुमदुरोमराजिल तथैव सपशोधरा ३८/३३ तदा विष्णो. प्रभावेण २०५४ तनुवातान्तपर्यन्तम् तर्थरावतमध्यस्थ- ५।१०९ तदा विद्याधरौद्वोतं २११२५ ५।२६१ तदा शौरिरिवार्कोऽपि २२११३८ तनुविशददुकूल तथैवैकोनविंशत्या ६०1३६९ तदा स्त्रीपुंसयुग्माना तथोदित स तं प्राह ७।९२ ८२४ ५२।८० तनुरेखभ्रुवो यस्या तदा हि पुरुपो लोके २०५० तनुलग्नमलद्दारं २११६५ तथोत्साहितुफामो यो ५८।२८२ तदित्यमुपशान्तेषु १८.५० २०४५ तन्मदीयमभिप्राय ४२०५८ तदीयशिष्योऽमितसेन. ६६॥३१ १७.१२५ तन्मध्ये सर्वतोभद्रः तदुच्यतां प्रभोऽयव १४४५८ १७१९६ तन्मात्रा याचितः पौरिः३०३८ तदेवस्यापि हि जाते ५०५३ तदा यदि सौभाग्य- ३११५६ तमिच्यादर्शन देषा ५८।१९३ तदेय जायतेऽन्येपो तनयायदापत्य- तन्मूलमुखविस्तार २११९३ तदनन्तरमाकोण तनिमित्तमिति यत्र तदेवान्तवदत्पानीः ४५।८६ तमिवर्तय दुव ताद २०१३६ तदनगरमेवात्र ४३१४९ तदेवं लक्षण कार्य ५८।२१० तग्निशम्य वचो राजा १९.३३ तदननरमेवोन्नम् ३१२३ तद्देशविन्तरायामाग तदा यशस्वीनि ५।२५५ ७.१६० तनूजो बालचन्द्राया तदेष योग्यतामद्य २११२९ तस्यसोवपमुरो मिषन १५४९ तपनीयमय पीट तदेव हि धनं सस्य १८।१४७ तरस्प पीनमारस्प तपनीयरसालिप्त ५७1०८ तदप्रपालिकानद्ध- तम्या गपगौमार- ५४३ तपनीयमयस्यास्य ५.८० ४२१३० तगोपुरपुरो भान्ति तालोरोल तपसा सम्लानो हि ४३।१८३ सपनेम्यवरांव ४/२३२ २१७३९ सरपंरागनिमांग सपने विशतिसाम् ५११३८ तायामनाराष. ५८२५५ तप:मदनिष्टस्न: २०४३ বানালে ५८८ वाणिोपर मा तप:पोहा भववाह तनुवातस्य तस्यान्ते तथैवाश्वपुरी ज्ञेया ४१२७ तथोपगृहनं मार्ग- दप चोदनावाक्ये सदन भवतोऽध्यक्ष- ३३१३१ ४०।१५ तदेत्युक्तवते धर्म ६३.८० २४१८२ ४८६५ ५७१९. ५७।२७ सपनीयमयंवर बालरं भवपन्या सापानम्तर कन्या ६४॥२.

श्लोकानामकाराधनुक्रमः तवानुरूपकन्येय तपःस्तम्भसहस्रस्थो ५७.८६ तयोः सम्भोगसम्भारः २३।२० तस्य प्रभावती भार्या ४५३६२ . तपःस्वाध्यायवृद्धमादेर् ५८।१८८ तयोक्तं ते पिता पुत्र! २१।१४१ तस्य मानधनस्यान्त ३३१६ तपस्थिताश्च ते केचिद् ६०१२५२ तयोक्न त मुनिस्त्वेष ३३१५५ तस्य मेघनिनादस्य २७४९६ तपस्त्वनशनाद्येव ६४.३६ तर्कानुसारिणः पुंसः ५६५० तस्य रक्ततलः पादो २०१५६ तरस्तपस्विनी कृत्वा ६०१५४ तरङ्गिणीसरित्तोरे ४६.४१ तस्याः कृते कृता. सर्वे ४५।१२३ तपस्विनीभिरल्याभिस ६४।१३३ तरणदूरनिमज्जनक क्रियाः ५५.५२ तस्याः कौमारभर्वा तु ४३।१७७ तपसा निझरा मुक्त्यै तीर्थकृत्पुनरन्यूनर् ४११३९ तस्यागमनवेलाया ४३१२३३ तपसा नाकमारुह्य ६०११२२ तलं तिखो जगत्यश्च ५७११२६ तस्या निर्बन्धचित्ताया तपो घोरमसो कृत्वा २०१६३ तलासहस्रमुद्गत्य ५।२८७ तस्यान्तस्थो दयामूतिः ५९५६ तपो दुष्करमन्येपाम् ३११८९ तव दर्शनमैतस्याः २२।११६ तस्यान्तस्तैजसो भर्ता ५९४९९ तपोधनः श्रीधरसेन ६६.२८ तव दुहितः सुराष्ट्रविषये ४९।१५ तस्याः प्रसादने तेन २४।७३ तपोमयी कीतिमशेपदिक्षु ६६३३३ तव पदशरणास्ते तस्यापि हि मनोवृत्ति १४१९७ तपो वरप्रसादो में ३४।२१ तव शोकापनोदाय ४३१२३५ तस्या भ्राता महासेनः ४४।२५ तपोवा मरणं वापि ६१।१०० ४५।१११ तस्यामजनयत्पुत्रं २४१२७ तपोविधिविशेषःस ३४।५० तवैव गृहमुद्योत्यं ८८० तस्या दत्ते बुधस्तस्मिन् २१४६ तपो वर्पसहस्राणि १८।१३९ तस्थुर्दक्षिणतो जिनस्य ९४२२३ तस्यामशनिघोपोऽपि ५।६०४ तपो विष्णुकुमारोऽसो २०६१५ तस्मात्कुरुरभूत्तस्मात् तस्यामितगतिर्नाम्ना २१२३ तप्तदीप्तादितपसः ३१४४ तस्मादप्यङ्गजो जातस् १८५१८ तस्यामकः ममुत्तुङ्गो ५९।९६ तप्तश्च तपितश्चान्यः नस्यामैतदवस्थाया तस्माद्रावण इत्यासीत् ४५०४७ ४१८० २२।११८ तप्तस्यापि मतं दिक्षु ४११८ तस्माद्विष्णुः कमासस्मात् १२६१ तस्यामेव च वेलाया ४३१३९ तप्तायोमयमूर्तीनि ६५।२० तस्मात्सासारिक सौख्यं ९२६१ तस्याः शोकसमुद्रंस ४३१८३ तप्ते सप्तदशोत्सेधो ४१३१७ तस्मिन् काले गुरुविष्णोर २०१२५ तस्याश्चामुपदं याति ५९।१०४ तमन्योन्यातिशामिन्यो ३४७ तस्मिन् गते हरिस्तोत्र. ६२५६ तस्याः श्वसुरबुद्धिस्तु ४५।१५१ तमन्वेष्ट्र प्रभाते तो १७४८ तस्मिन् गर्भस्थिते देवी ३३३८५ तस्याश्चरणमूले वः २७११३० तमागत्याबवीद् देव ३३११७ तस्मिन्नद्री जिनेन्द्रः १२२८१ तस्यासीत्वमरस्तेन १७.३३ तमादाय गता सापि ३२।१६ तस्मिन्नरागिणीं बुद्ध्वा ३११२३ नस्या समुचि नाम्नाभूत् ४४।२७ तमित्युक्त्वान्तिकं प्राप्ता२२।१३२ तस्मिन्नवमरे चण्डेम् ४३११८० तस्यां दर्शनमात्रेण ४६.३० समिमेऽपि च तान्येव ४॥३३५ तस्मिन्नस्तमिते दीप्ते सस्यकनवतिलक्षा २५.७० समुत्तानरायं यावत् ४२।१६ तस्मिन् सोमप्रम. श्रेयान ९:१५८ तस्यैव माऽभवत्पत्नी २६.५३ समुपवैश्य ततः ५५।१०५ सम्मै नम कुमिदान्तः तस्पद मध्यभागे तु ५०11०७ तमोनामनि चोसेघ ४।३३३ तस्म:मो कययद राजो ३०।४५ तस्यवोतरपूर्वस्या ५।३३९ तमो भ्रमोसपोश्न ४८३ तस्मै तु रहिमवेगाय २७१८१ तस्यैवोपरि लस्प तया पम्पा वमुषारया ३७१३ तस्मै स शुल्लको गत्वा २०१२१ सत्यवोपरि पूर्वस्यां ५६७०४ सया प्रपमवटा ४२११०६ तम्य काले प्रजादृष्ट्या ७४१२६ तत्यवारोदाम्यां तु ६०२३२ तपा सह मुर्स तस्य २४० तस्य वित्तपरीक्षा स्यकनरागमपि ४६४३ तस्य जन्मोरम दृश्या ३२६९ त्यसदिनजरातीत- ३११३ सयोः दुरालगंप्रने ४११८ तस्य देहमह वः ६११८ त्यजादायममत्य- सपोः प्रेमना मिस्तम् २२११३४ तत्यन्यापपरस्या त्यापिमान बोकव ४३८४ सयो हितरी भदा २१११३२ तम्य पश्यातीध्यामो ५।१७४ स्यक्तावाश्यगरम्य २०१२३ सपोरर इति स्यात. ४५.२२ तम्य पृषागतंजावाः १७१३१ प्रयः मालास्तु मरेपी ६.१५४२ सवैत्य पतिता गहा ६६।२३ पुनः शिशुपालाय ४२१५५ स्वमहं च खगेन्द्रोऽयं २७११९ ८२१५ ४२१६० २०४१ हरिवंशपुराणे श्रयः केवलिन: पञ्च ११५८ त्रिपञ्चाशत्सहस्राणि ५।६५ त्रैलोक्यासनकम्पशक्त- ३४.१५० त्रयः क्रमाकैवलिनो ६६।२२ त्रिपदास्यस्य मण्डूक्यां ६०.३३ त्रैलोक्ये जिनशासनोरुपदवी ९।२२४ प्रयस्त्रिशदुदन्वन्तः ३११५८ त्रि.परीत्य पुरं देवाः २।२९ यशीतिश्च शतान्यष्टो त्रयस्त्रिशत् समुद्राः क्व २११३८ त्रि.परीत्य प्रणम्याने ४७३६६ यशीतिके वर्षशते तु त्रयस्त्रिशरसहस्राणि ५.९१ त्रि:परीत्य स तं नत्वा ३३१११२ गृहाण विभो विद्या २६०५४ त्रयस्त्रिशत्सहस्राणि ५१४४६ निपृष्ठस्य सहवाणि ६०५१७ त्वं प्रकाशय सौभाग्यं ३१३४ त्रयोऽत्र भ्रातरस्तेऽपि ६४.८ त्रिपृष्टश्च द्विपृष्टश्च ६०१२८८ त्वं त्रयोदश यथासख्य ४१७५ त्रिवर्णान्जनिभे यस्या ८।२३ त्वं महीध्रवनरन्ध्र. प्रयोदशशतानि स्यु. ६०१३९४ त्रिविधाङ्गलषट्कः स्यात् ७४५ त्वं मज्जनविधि सद्यः १४१६८ त्रयोदशशतानि स्युर् ६०४३१ त्रिविधेऽपि बुधपात्रे ११० त्वं राजावरजाग्रस्ते ५०1९४ त्रयोदशसहस्राणि ५७९ त्रिवोधशुविचक्षुषः ३८।१० त्व वर्तय त्रिभुवनेश्वर- १६५२ त्रयोदशसहस्राणि ६०३७७ त्रिमागंगा प्रयात्येवं ५९९५ त्वं विधाता स्वयम्वुद्धम् ८०२१३ त्रयोदशसहस्राणि १०११२७ त्रियोजनसहस्राणि ५.४५३ त्व संसारमहाचक्राद् त्रयोदशविधस्यव ३४।१०९ त्वगस्थिशेपभूतोऽहं २१४८७ त्रिलोकसारं श्रीकान्तं ५७१११२ त्रयोदशस्तु यो द्वीपो ५६६९९ त्रिलोकाधीशितां छत्र. ५७।१६३ त्रयो द्रव्यायिकस्याद्या. ५८०४२ त्रिलोकोवान्तसाराभा- ५९।५८ त्वमन नभुजङ्गस्य त्रयोदशविधोदार ६४/४० त्रिविष्टपपुराकारं १७११८ स्वन्नामग्रहणाहार- प्रयोविंशतिलक्षास्तु ४।१९४ त्रिविशतिसहवाणि त्वमेव भगवन् गत्वा ६०।४५६ प्रयोविंशतियुक्तानि ५३५९३ त्रिशती च त्रयस्त्रिंशत् ५।४३८ त्वयि सकलधरित्री प्रयोविंशतिलक्षास्तु ४।१९५ १९१७ त्रिशत्या विसहमी तु ६०४११ त्वयि राजनि राजन्ते प्रयोविंशतिलक्षाश्च १०1३८ स्वत्यादन्यासलीलाया- प्रयोऽयोतिश्च नवतिः ६०१४८३ त्रिशत् पड्विंशतिस्त्रीणि ६०३१९ त्रिशदेव सहमाणि, त्वत्प्रवृत्तिमिव वैदितुं ५/५१५ प्रयोजीत्या शताब्दानि ६०॥४८० त्रिंशद्वर्षमहस्राणि त्वद्वियोगमहादुःख- त्रयो हस्ता घनूंप्यप ४॥३१५ त्वा पयोऽर्थमपहाय प्रसबादरपर्याप्त- त्रिशदर्पविहीनस्तु ५६.१०८ त्वां मुक्त्वाम्ब न मे प्रसस्थावरवायेपु त्रिशदक्षमितः कूटर् ५५१२९ ५८१३८ असिते स्वपरा प्रोता त्रिशद्गुणप्रथितवर्षसहस्र-१६७४ विपा राजतमूर्तीनि ४।२५६ त्रिशिरा इति देवी स्याद् ५।७२० तां कृत्वा दक्षिणे भागे ५७८७ त्रिकालयोगप्रतिमा ६४/२६ तां ददर्श च गुदाते त्रिकोणा मण्डलाकारा ५७.३० त्रिशून्य वैशवश्चकः ६०१३२९ त्रिषष्टिरिन्द्र कः साचं निखण्डासण्डिताज्ञोऽन्य ता प्रद्युम्नकुमारोऽपि ४७११५ ४।१४८ विपष्टिपटलानि स्युः ता वार्तामुपलभ्यासी *६४२ विगम्यूतिश्चतुर्भाग- ४४३५५ विषष्टिपपुरुषोद्भूति ताशुश्रूषाकरी श्व २१।१७६ त्रिगुणीकृसतेजस्कः ५९.९७ विषष्टिः त्रिशती यत्र २।९५ त्रिचत्वारिंशत संक- ५।१७० विसहस्रो द्विशत्या तु ६०४१० ताडितश्च विबुद्धेन विचत्वारिंपादिष्टास्ताः ११७३ त्रिमहसो गतारे स्यात् सादा तनयं दृष्ट्वा वियत्वारितादेवात. ६०1३४४ त्रिसंध्या गुप्तयः पञ्च ५८।३०१ तानघीत्य तदुवतेन २३.४ त्रिज्ञानोपचितो राज्य तानवोचदमो राज्ञः ३०४९ विविस्तृताश्चित्राः ५४४२ प्रोणि त्रीणि हि कूटानि ५६०१ तानि पञ्चतोत्सेध- विरागिनविकराती १५।५४ घरतेन प्रयोगस्त- ५८।१७१ सानाश्चतुरशीति- १९।१७१ विशाबूधतुहेर्नु २१११२९ त्रैलोक्यस्य मुखामुसानु• ३।१९७ तानि वर्षमहह्माणि ७.६२ पिया ममयदतीना प्रैलोक्य मदि स्पष्ट २।११२ तान् प्रमाम्य गोदीनी ६०८९ cick ६३४० ३०११ ६३१२६ १४१८३ ६०४७ ४२०३५ ४३२३ ताडितः पुनरुत्ता ४८०१८ २४॥७९ ४७/२७ त्रीणि त्रीणि तु शुक्राणां तान् प्रशस्य ततश्चक्री सुता लेभ श्लोकानामकाराधनुक्रमः १२।६ ताश्चत्वारिंशदेकोना ४।१७७ तीर्थकरनामकर्मणि ३४१४९ सान् सम्मान्य यथायोग्यं ५१०५ ताश्चापि द्विविधाः सुद्धा १९।१७९ तीर्थकञ्च महापद्म- ताः पवित्रजलापूर्ण- ६३११०१ ५७१७४ ताश्च पल्योपमायुप्काः ५३१३१ तीर्थभूमिविहृतिः तापसा बालतपसः ११३४ तासां वचमयो मिदिर ५७।१२७ तीर्थयात्रागतानेक ३१५८ तापस्यापि २९.३४ तासां मध्ये वापीनां ५५६६९ तीर्थसिदिद्विघा तीर्थ ६४।९५ ताभिरभिरप्युक्ता तासु भक्त्या प्रनृत्यन्ति ५७५४० तीर्थे चतुरशीतिस्तु ६०१४७७ ७.३८ ताभ्यां जिगमिपोस्तस्य ३२११९ तास्तु निश्चिन्तचित्त- ४५११०४ तीर्थ भीमावलिर्जातो ६०१५३४ ताम्मामिन्दुपुरं चक्र तितिक्षो पृथिवी यस्य तीर्थ नेमिजिनस्य १७१२७ ९।१६९ ६५३५९ ताम्यामकदिनौपम्य. ४३११९ तिथिपर्वचतुर्मासो १८.९९ तीर्थेनकोनविशेन १२१ तामप्यादाय सम्प्राप्त: ३२।२६ तिमिरभरं विमृढिमयमत्र ४९।४६ तुङ्गमङ्गतरगोद्य- तिरयन्ती रम्तेजः तामयोध्यां परायोध्या ८१२३१ ५९।१०३ तुङ्गाभिमानिनः केचिद् २८।१० तिर्यञ्चोऽपि यथाशक्ति. २११३५ तुङ्गासौ साङ्गदी वृत्ती ९।८ तामुत्तरविदेहेषु ५।२४२ तिर्यग्गतावपर्याप्त ३४।११८ तुङ्गिकाशिखराख्दौ ६५।२६ तामसास्त्रं परिक्षिप्त ५२२५५ तिर्यञ्चो मानुपा देवा ३३१२० तुटयाङ्ग तुटपमप्यस्माद् ७५२८ ताम्बूलरागनिर्मुक्त ३०१२३ तिलमात्रोऽपि देहस्य २३।११४ तुमुलरणशतानि ३६७३ तारकापटलाद् गत्वा तिलकाद्यानि दिव्यानि ११।२२ तुम्बुरुनारदः किं वा १९।२६३ ताराभरलजातीना ९७८ तारामण्डलमत्यला तिष्ठ तिष्ठ दुराचार १९।१०२ ६.१३ तुरगम्त्वरया दिश्यः ४७११०३ तारे या परमा प्रोवता ४४२८१ तिष्ठन्यत्र पिता भ्रष्टः १९।८६ तुरगङ्गमातग. ९.१५३ तारे चापि ग्रहे कार्यस् १९२५५ तिप्ठन्नेव महोदय ३४।११२ २११५१ तुर्यव्रतोपवासंस्तु ताक्ष्य केतुमनोभिज्ञा ५११९ निष्ठन्वन्यदिहामुप्प- २३॥११५ तुपच्छविनखः वलीवाः २३.९२ तिष्ठन्तु तावदन्यानि ता वनस्पतिका १९।२९ तुष्टोऽनावृष्टिरप्याशु. ५१४३ १८१५८ तिष्टत्वेकोऽपराधी हि २७१५० ताग्निवायुभूती तु ४३।१३६ तणाम्बतृप्ताः स्तनलग्न- ३५१५२ दा९७ तिमृणामपि जातीना १९६२१० तृतीयकालरोपेऽया- ताबच्च दो विमानानाद २१११२७ तिमः कोटयोऽर्थकोटी व ४८७४ तृतीयभवसिद्धिस्त्वम् ६०१९४ तावच्च सहमा प्राप्ताः २४॥४२ तावच्च मणिवाप्यन्ते ४२१११ निमः खेटकसंगूढा २१११८ तृतीय शुकटमामान्यात् ५६७१ तावच्च महमा बुद्ध्वा १९.१०१ तिया लक्षाः महमाणि ५।५३६ तृतीयाया द्वितीयाया तावचिन्तयता साधो ४३१३९ निमो लक्षा: परिक्षेपः ५।४ तृतीयान्त्यस्य निर्दिष्टा ६०५४७ तावदान वयं पर ४०1१६ तिम्रो लक्षा. सहस्राणि ५।५३८ तृतीय नियतिः पक्षः १०७० तावदाध्मातमाध्यान्ह तिम्रो लभाः सहयाणि ५।५८७ ते कास्यप्यामारयन्तः ४०1३८ तावदृयोनिनाशास्ता तिया लक्षाः महमच ६०1४४५ ते विद्भिरपि वामु सावतव्यमनं श्रुत्वा ४३३१४१ तिग्नस्त्रिंशसहस्राणि ६.४३४ ते चत्वारिंशदशभिः ६।११ ताबदेव समागत्प ५१५८ वियोगटाना पृथग्लक्षा ६.४१ तेचादेशयशानन्य तावदेव गनाशले मोऽस्य पूर्वलशास्तु ६०५०२ ते चाटपोजनागाधा सावन्न एव माना: ४१८७ तोरणदंष्ट्राः समाःस्निग्या २३३९८ तंजम्नी चाग्निमित्रश्च १२१५८ तावन्न एप मंस्याना: १२।७७ तीधर्मममयारपये ६६५ संजोहोन गुना लोके ७.१३५ तावन्येव भवन्रयस्था ४४५ तोत्रमन्दादिमायन ५८२१२ सन पाहमपान तावरदेव च बायन्ते ४२३१ तीमित्वमम्बदा ४१३७२ तेन ते यातायात ४।२३२ तीय गवनारास्व तेन नमितिशदेश- सावत्येव महापानि १२।३ वीर्य पतुर्यमवर्ष तेन प्रोपोपि ११७ तागको प दोर सीय मुसिमुदाय तेन भी भिवादाम २८18 ताबनदेव पुनम्नानि ८१३३ १०११३२ २२।१४५ १२।४५ हरिवंशपुराणे तेन मानसवैगेन ३०१३९ तोरणान्यवगाहेन ५११५२ दध्याविति स लोकेऽस्मिन् ४२।२८ तेन स्वहिण्डनाख्यानं ११३ तोरणः शोभते मार्गः ५९॥४८ दध्यौ वधूरियं कस्य १४॥३६ तेनान्त.पुरमात्मापि ५४४ तोपः साधुप मे नायौ ३४१३ दध्मौ नेमीश्वरः शव ५१२० तेनायममरैः सर्वे ३११९० तोपित मयि नृत्येन ९१५३ दन्तास्थिभिरयं तुष्ट. २७१७१ तेनाहं शान्तवेषण तोपो लोकप्रकाशार्थ २१६८१ २९१७० दमघोपं यशोघोषं ३१०२७ ते नीलनिपधधाप्तो ५।२१३ 'तो च निर्वाणधामानि २७१. दया सत्यमथास्तेयं तेनंव पोडशाभ्यस्त ५।४८० तो दृष्टिमुष्टिसन्धान ३११७९ दया सकलभूतेषु ५८.९४ तेनोक्नं सोमदत्तेन २४॥३९ दर्पणग्रहणे काश्चिद् ८/५१ तेन-दीश्वरयात्रायां ६४।१२७ दर्भशय्याधिते तस्मिन् ४११६ दक्षप्रजापतेवृत्तम् ११७८ ते पञ्च नवतं भाग ५।४७९ दर्शनस्पर्शनाम्पा या दक्षिण पक्षमाथित्य ५०१११९ तेऽपि तस्थुर्यथास्थानं ३१६४ दर्शनशानचारित्र- दक्षिणस्या महाश्रेया ५।२३ तभ्यः करणभूतेभ्यः ७११ दर्शनानन्तरं यत्र तभ्यो विरतिरूपाण्य. ५८४१३४ दक्षिणापरदिग्भागे ५।४२८ दर्शनामृतसिक्ताया ४४।११५ दक्षिणापरदिश्यन्ते ५७२३ तेऽवनहमेमोति १४८ दर्शनीयतमाङ्गस्य १७१४५ ते महर्दिकदेवानां ३११३७ दक्षिणापरतो मेरोः ५।१८७ दर्शनेन तवास्यासु तेर्हन्तः सन्तु नः सिद्धाः १२२८ दक्षिगाभिःसमा नद्यः दर्शयन्तिति कान्ताये तेपा सुरक्षामगात्राणां ९।१०५ दक्षिणाशारणान्ताना ६१११९ दर्शयन्ति स्वयं काश्चित् ८४४ तेपा चरमदेहाना- ५९।१२४ दक्षिणाक्षिभुजास्पन्दो ३११०६ दवदिवाकरदग्धवनावली ५५।७६ तेपा तस्य च संग्रामो ५२।४२ दक्षिणोत्तरतो दैर्ध्यात् ५।२६४ दश चतुर्दशाटी चा १०१७३ तेषां तु मध्यदेशेषु ५।१२० दक्षो जित्वा सुभानु तं ४८।१४ दश दशाहंकुमारगणावृतः ५५।३१ तेपा पुत्राश्च पौत्राश्च ४८०७३ दक्षो दक्षिणभारतार्ध- ६॥६४ दशधा सत्यसद्भावे १०९८ तपा मध्ये तु यो भग्नी २२०५३ दण्डः किकुद्वयं दण्डः ७.४६ दशधाध्यात्मिक धय- ५६३८ तेपामन्ये महादिक्षु ५३४०७ दण्डा हस्तोऽगुलान्येषु ४१३१३ दशमो दशमो भागो ५।५२९ तेषामष्टशतं जातिर ५७४५ दण्डाकारा घनीभूता ४॥३५ दशलक्षा: चतु यष्टि ५.२७४ तेपामुपरि प्रत्येक ५।२०२ दण्डाकारपरित्यागे ४॥३७ आणि ४॥२४९ तेपामनुविमानं स्याद् ६.४४ दण्डाः पञ्चदर्शवासी ४३१६ दशवर्षसहस्राणि १८६६ तेपा विहरता साध ૨૮ दण्टे मनोगजो मत्तो ४३११९४ दशवर्षसहस्राणि ६.१६१ तेषु संध्येयविस्तारा ६७८ दण्डोपायप्रधान तं ५०११९ दशवकालिक वक्ति १०११३४ से मंस्यविस्तारा ४॥१६१ दत्तववास्ततो दत्त. ३१२९६ दश मप्तशती चान्या ५।३९२ ते सम्यग्दर्शनं वेचित् ५८:३०७ दत्तप्रयाणमेनं त्व- ४०४ दशपूर्वी विगासाख्यः ते सच्चित्तेन निरः ५८११८३ दत्तनागलि. कन्या ४२।६८ दशमनहरिहस्ति- तेरमातलं दृप्तम् दत्तं किमिच्छकंदानं २१३१७७ दशधा कल्पवृक्षोत्य ७९१ १७१६५ दत्त गृहाण ते राज्य - २०१२२ दापोडशभिस्तस्य ५७१२५ तैरामिल्लिया ७/४० दत्तास्थानो नृपदेवर दगाना कोटिलशाणा ७।१७० तेरवालिरामह ७१९ दनायामुत्तरघेण्यां २७१८० दशानाममुरादीना ४।५९ तः सह या याना दत्तो नारायणः कृष्णो ६०१२८९ दशानाममुरादीना त: मरम्भगमारम्भः ५८.८५ दत्तोत्तरी विनिगम्य ४३८० दशानामायुषः पादः १०१३३५ सम्वतः मर २०७५ दस्वागावभयं तस्य दशार्धवर्णभासन्दिर ५।३७० में गतो रामो १२१५२ यानि तम्मै पापोतमाय ३५१७३ दमाश्चिापि विम्याता:५०।१२२ तोरणावरभान दपार मंतिथति ष६६.३० दयादियो मुनयः २६४ तैरजः खलु यष्टम्यम् १७ दिव्येन दह्यमानाया श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः दशाहतनयास्तास्ते ५८.९३ ४७.१९ दिइमुखानि प्रसन्नानि ८1८७ दुःखशोकवधाक्रन्द- दशाहवदनाम्भोज ४११४९ दित्या चाष्टो निकायास्ते २२१५९ दुःखमेवेति चाभेदाद् ५८५१२४ दशाहो. सान्त्वना भोजाः ५०१६८ दिदृक्षया ततो याता. दुःखास्यश्च महादु खो । ४।१५४ दशार्णवोपमायुष्का ३११५३ दिनं दिनं दृश्यमुख ३७११२ दु.खी जरत्कुमारश्च दशार्णवास्तमो नाम्नि ४।२८६ दिनान्येकोनपञ्चाशत् १८९६७ दुरस्ता बन्धुसम्बन्धा २६.३५ दशोत्तरशतं तेषां २२१८४ दिवः पतितुमारब्धा ६३३८८ ८॥३८ दुर्गतिप्वकुशलानु- दर्शवोत्तरपूर्वाणां १०७४ दिवश्चुता विदेहेषु ३३१७१ दुर्जयमप्यरिलोकमने कैः २५१७२ दर्शवोपरि मूले च ५।४३४ दिवि वदाचिदसौ १५।४३ दुर्जयो दुर्मुखश्चापि ५२१३७ दशोपसगंजेतारः १०१३९ दिव्यरूपं तमालोक्य ४७।९९ दुर्जननिशितदुर्वचो ६३६१०४ दह्यमानशरीरोसो ६१७ दिव्यं वदरतन्मान- ७६६९ दुर्वलस्य वराकस्य २७.३२ दह्यते विपुल: कस्य ४०1३२ दिव्यामोपधिमाला स ११।४६ दुर्भाग्याग्निशिखालीढः १८।१३२ दष्टः श्रीभूतिपूर्वेण २७१६५ दिव्यान्यन्यानि चास्त्राणि ५२।५६ दुर्भुजङ्गचरी कृत्वा २७१६६ दंष्ट्राभाजनमग्रेऽस्य २५।२७ दिव्यामोदसमाकृष्ट- ८।१७३ दुर्मणादयस्तेऽमी १२।४१ दाक्षिणात्या जनपदा १११७१ दिव्यान् भोगान् सुरानीतान्९।४६ दुर्योधनाञ्जयस्तत्र ६५।१९ दाक्षिण्यभङ्गभीतेन ४५।१२४ दिव्यायुधं हलमभादपरा-५३३५१ दुर्योधनार्जुनौ योद्धं ५१०३१ दानपूजादिधर्माशा ५७११५९ ६१७७ दुर्योधनोऽन्यदा दूतं ४३।२० दानपूजातपःशील २७१७४ दिव्यैक्षुरसतृप्ताना ९।२७ दुर्लभेऽप्यभिलापस्य १४१८५ दानपूजातपःशील १०१८ दिव्योपधिप्रभावेण २४।३२ दुर्वचो विपदुष्टान्तर ११४६ दानशीलतप.पूजा ५७१८२ दिशा मुखैभ्यः समिता ३७॥४ दुष्कर्मोपशमाल्लब्ध्वा १८९५ दानोपवासविधिना ६०.४६ दिशा वैश्रवणस्यैव ९।१७३ दुपमा चावसपिण्या ७५९ दायादः शकुनीरः ५०1७२ दिशागजेन्द्रकूतानि ५३५११ दु.पमाया तु सजातो ६४।९२ दारेषु परकीयेषु ५८।१४१ दिशावली प्रिया राज्ञो ४५।१०८ दुप्पूरो दुर्मुखाभिस्यो ४८।५१ दाहदुःखमृतं कान्तं ४५1८२ दिशि चोत्तरपूर्वस्यां ५/३४७ दु संसारस्वभावज्ञा १२१५१ दिक्कुमारी प्रसिद्धामी ५७१० दिशि प्राच्या प्रतीच्या च ५।६९६ दुहितुरिति विलाप ३६।६७ दिक्कुमारी तथा ज्ञेया ५७०९ दिष्टया त्वं वर्द्धसे स्वामिन् १९१७२ दुहितातुलस्यासी १८.१३१ दिवकुमारीकृताभिख्या २२२४ दिष्टयाभ्युपगतं तत्तु २१११७० दूनप्रेषणपूर्व स दिवकुमार्यस्तु कूटेषु ५।३३२ दीक्षा कृष्णनवम्या तु ६०।२२६ दूतो गत्वा जरासन्धं ५०१६१ दिक्षु चत्वारि कुटानि ५७१८ दीक्षा जग्राह जैनेन्द्री १३१२ दूरतस्तमय तत्र ६३८ दिक्षु पट्सप्ततिया ४१२४ दीक्षित्वा पुण्डरीविण्या ३४॥३६ दूरादिन्द्रादयो यस्या ५७१९ दिक्षु द्वासप्ततिः मा ४।१२५ दीर्दीपशिखाजालेर २२।२३ दूराकटाक्षविक्षेपि १४.४३ दिक्षु विशं शत शेयं ४।१११ दोप्रेणाप्युपशान्तेन ९।१८१ ५९९० दिक्षु पण्णवतिद्वाभ्या दूराच्चारपधियः सर्वे ४।११९ दीयते दातुवामन ५८।२८० दृढगुणगूढगुल्फ- ४९।३ दिक्षु द्वानवतिः सा दीर्घनिद्रमिव वीक्ष्य ४१२० ६३।२९ दृढपदहतिगाढा ३६३४ दिश्वमोतिविदिक्षु . ४१२३ दीर्घजीवितसद्भावं ४३३८५ दृढवर्मा च विक्रान्तस ५०।१३२ दिग्गता शतन्द्रा स्युः ५।४७८ दोर्घमुष्णं च निश्वस्य २४१४८ दृढमुष्टियनाघात २४१६ दिग्वश्चन्दनपड्वेन ८११८७ दीर्घस्वस्तिकवृत्तस्तैर् ५।३८९ दृढेन निगडेनेव ३१९७ १४.८६ दीर्घा दीर्घायुषा पुंसा २३८७ दृश्यते दृष्टिहारी ५९।१०१ दिग्वस्त्रविभूपाभिः ६.१२२ दोघी नीत्वा निशामपा ८1८४ दृश्या दशसहस्राणि ६०३७८ दिग्विरत्यभिचारोऽध- ५८.१७७ दुकूलमणिभूपण ३८.५५ दृष्टथुतानुभूतस्य ७।१३९ दिङ्नागनासिकाजवा ९।८२ दुखनयमहावर्ते ९।६८ दृष्ट. संक्लिष्टधीस्ताम्यां ६१६० दिग्धं चन्दनपङ्केन हरिवंशपुराणे ३३१०८ १०1१०७ देवेन नीयमानः सन् दाग निवृत्य निज स्थान ४०४३ ५।१६८ ५.८० ७६१ दृष्टः सुरगणेयः प्राक् ८१६८ देवा नन्दीश्वरं द्वीप २२२२ द्वन्द्वयुद्धे प्रवृत्तेऽनो ५३११४ दृष्टः सप्रथयं श्रीमा- २२।१५१ देवाः सामानिका भोगं ६४।११२ द्वय तच्च समायुक्तं ४१०२ दृष्टं तं मिरिक कैश्चिद् ९।१०६ देवाः शुक्रमहाशुक्र ३३१६५ द्वयोरन्वैपितः श्रेण्योर् २६४२ दृष्टा दर्शनमोहस्य ५८।२०७ देवा वायुकुमारास्ते ३।२२ द्वयोस्तु सप्तमी पृथ्वी ६०५४६ दृष्टिवादप्रमाणं स्याद् १०४६ देवाः कन्दर्पनामानो ३३१३६ द्वयोयोविमानानि ६.१०० इष्टिमुष्टिरतावृष्टि ४८०६१ देवाचनार्थमायात १९३११६ द्रव्यपर्यायरूपत्वात् दृष्टिरश्मिभिराकृष्य १४।७२ देवी स्वयंप्रभस्यातो ६०१११६ द्रव्यभावभवक्षेन- ३१७ दृष्टो मयाद्य सद्रूपः १४१८४ देवी सुदर्शना तस्य ४५।११५ द्रव्यपर्यायभेदाना दृष्टो रुक्मिणि ते पुत्रो ४३।२३१ देवी च रुक्मिणी दृष्ट्वा ४३३३० द्रव्यस्यानन्तशक्तित्वात् ५८५० दृष्टो विद्याधरो वृक्षे २१११७ देवो त्वं च निजं येन २९।५५ द्रव्याद् द्रव्यान्तरं याति ५६०६२ दृष्टया दहामि दायाद• ४५१५३ देवन रक्षिताः कंमात् ६०१६ द्रव्यानिर्विकारत्वात् ७८ दृष्ट्वा गजकुमारस्त• ६०११३१ ५४।४० द्रव्याणामपि जीवाना ५६४४ दृष्ट्वा विवाहमुर्वीशास् ३१३१३५ देवविद्याधरोरः २००५८ द्रव्ये क्षेत्रे काले ३४/१४५ दृष्ट्वा तुष्टेन तेनामा- ३९।४४ देवोपपादमाचष्टे १०११३७ द्रव्ये क्षेत्रे च कालादौ १०११३१ दृष्ट्वा हृष्टा जगी त सः ४७।६३ देवी देवसुख भुक्त्वा ४३।१४८ दृष्ट्वा ज्येष्ठरथं दूरात्३१११०२ देवो गन्ध-महागन्यौ ५.६४४ द्वाचत्वारिंशदिष्टानि ६.३०७ दृष्ट्वास्त्रकोशलं तस्य ३१।१२१ देव्य. शिवादयो नम्र ३२१४१ द्वाचत्वारिंशदष्टौ च दृष्ट्वा चित्रगता कन्या ४२।४६ देव्यः शिवादयो बढयो ६१।१० द्वाचत्वारिंशदष्टौ च दृष्ट्वा कस्मात्समानीताः ५०१२ देशप्रत्यक्षमेव स्यान् ११५३ द्वाचत्वारिंशदब्दाना दृष्ट्वा च त तदाध्यक्ष. २६॥३२ देशप्रत्यक्षमुद्भूतो १०।१५२ द्वाचत्वारिंशदादित्या. ६१२७ दृष्ट्वा वृष्टि ततश्चक्री ११॥३५ देशानेताननुज्ञातान् १११७६ द्वात्रिंशता चतु पष्टया ३४६१२३ दृष्ट्वा श्रुत्वा च वृत्तान्तं ३३११२६ देशाश्चापि हि तावन्तो १११२७ द्वाविंशच्च महादिक्षु ४॥१३९ दृष्ट्वा च तेन तुष्टेन ३३३१२ देशक मुक्तिमार्गरम १७११३१ द्वात्रिंशं हि शतं दिक्षु ४११०८ दृष्टवाऽपो विस्मितो ४२।३९ देशानुल्लङ्घय निःशेपान् ४०।२५ द्वात्रिंशत् त्रिदशेन्द्रः स देवकालबलोपेता देशेष्वकादशानां तु ५०२८ ५.३१० द्वाक्सिवादशैकं च देवभक्त भज माध्य- देहः सूक्ष्मनिगोदस्य १८७३ द्वात्रिशदथ बाहुल्य- ४/५७ देवमागोत्थिते दिव्ये देहनिर्यदवयवा ६३३९४ द्वाविंशच्च गहस्राणि ५।१८५ देवयामिमा दिव्या- ५९६७५ देहदन्तप्रभाक्रान्त- द्वादश स्यु. सहस्राणि ५।२६६ देव! वेगवती पत्नी ३२।१३ देस्थितन शुद्धेन ४२२५ द्वादमागधरी जातः देवस्वस्य विनाशेन १८।१०२ देहे देहे मवृत्तित्वे ५८.३३ द्वादशाङ्ग श्रुतज्ञानं ५९।१२२ देवदर्शनपर्यन्त- ३०२२ देवपौरुपमामयं. ४०१९ द्वादशाझं श्रुतज्ञान देवदानवचस्य ८.१२४ देवं तु विकले काल. ५२।७२ द्वादशानं शतं दिक्षु देवपूजा यजेरर्थम् १७३१२९ दोामालिङ्गध ता ४४।११ द्वादशाङ्गविकल्पेषु देवक्या सह वन्दित्वा ३३१४२ दीपाकरकराप्राप्ता १४.५ द्वादशात्मभिदया देवक्याः सप्तम. मूनुः ३३।९३ दोपाकर: कलङ्कव ८७९ द्वादशव सहस्राणि देवक्याम्तनया ये पट ५९:११६ दोषाविष्करणं दृष्टः १०१९३ द्वादशव सहयाणि देव केटभपूर्वोऽमो ४८/२ दोपोपशमसतोप ६४।२२ द्वादशव सहस्राणि देवताधिष्ठिनायास्त ४५।१२९ दौर्भाग्ये वा भाग्यहीने ५५।१३६ द्वादशव सहस्राणि देवताकृतमायानो १३९८ मयुद्धे तदा जाते देव देवनायाभं द्वन्दयुद्धे शिरस्तुह्न द्वाशय महस्राणि १३.४ ६०1३२१ १२२५२ १०१११ २३:४२ ६३१७९ ५४१४ ५४६९ ६०१५२१ द्वादशव महादिक्षु १२१७६ ३९ पदस्य सगोषस्य श्लोकानामकारायनुक्रमः द्वादर्शव सहस्राणि ६०.३६५ द्विघ्ने संकलिते हि ३४।७५ द्वोपेऽस्मिन्कच्छकावत्या ६०७५ द्वादश्यां ज्येष्ठकृष्णस्य ६०१२२८ द्विचत्वारिंशदेवातः ६०४९२ द्वोपेऽत्रैव सुपायां ३४॥३ द्वादश्यों ज्येष्ठकृष्णस्य ६०१२२९ द्विचत्वारिंशदुक्तास्ता ४११७४ द्वीपे तु दो मतो पूर्वो ६.२६ द्वादश्यां ज्येप्छमासस्य ६०।१७२ द्विजैः सामग्यजुर्वेद १७४८८ द्वीपो वापि समुद्रो वा ५।६३४ द्वापञ्चाशन्महादिक्षु ४११३२ विट्प्रयुक्तरारासार ३११८१ द्वीपो भूतवरश्चान्यः ५।६२५ · द्वाभ्यां दशसहस्राणि ६०१३७० द्वितीयायाञ्च पट्कृत्वः ४१३७७ द्वीपोऽपि धातकीखण्ड: ५।४८९ द्वयासना यासु शुद्धा• ३४११४४ द्वितीये तु महापीठे ५७।१४१ द्रुपदोऽस्यस्तदा भूपस् ४५।१२१ द्वघाद्यास्तै यत्र पञ्चान्ता-३४१६४ द्विपञ्चाशं शतं दिक्षु ४११०० ४५॥१४॥ द्वारस्य चोच्छ्यस्तेषां ५।३५६ द्विपृष्ठश्च त्रिपृष्टश्च ६०१५६७ द्रुमकोटरमध्यास्य ४५।११७ द्वारिकायघि तिष्ठन्तः ५०.१६ द्विपृष्ठस्यापि कौमार्य ६०१५१९ द्रुमसेन महावीर्य ४४.२३ द्वारिका विभवालोक ४२१८ द्वियोजनशतक्षोणी ३३१४ द्रुमपेणपिमेकान्ते ३३११४९ द्वारेणोद्घाटितेनासी ११४ द्विरष्टवर्पसु स्त्री ४३३१०३ द्युमणिद्योतितं धोत्यं ११५२ द्वावंशावथ पञ्चम्या- १९॥२४५ द्विविधं कर्मबन्ध च २।१०९ द्यूते तत्रोत्तरीयं ध २११५५ द्वाविंशतिस्तयोक्तानि ६०३११ द्रव्यार्यादेशतः शकिर् ५८।२२४ द्यूते निजितमादाय २७१३८ द्वात्रिंगतिप्रमाणोऽयं १९।१५२ ३३११०१ द्विशत्यशोतिश्चतुरुत्तराः ३४.७३ द्यूतवेश्याप्रसङ्गेन द्वाविंशतिस्त्विमा वेद्याः १९।१६० द्विशत्यष्टौ च कोदण्टा ३३७ द्यूते जित्वा हिरण्यस्य २६.३० द्वाविंशतिभिदाभिन्न- ५८१३०२ द्विशत्या सावधिः सव-६०१३९२ द्वधा चारित्रमोहस्तु ५८।२३४ द्वाविंशतिधनुभिश्च ४॥२३९ द्विशत्यात: सहवं हि ६०४६६ द्वे लक्षे च सहस्राणि ४११४४ द्वाविंशतिरतस्तूवं ३४|११९ हे लक्षे च सहस्राणि ५५३५ द्विशत्या शिक्षका ६०.३९७ द्वाविंशतिधपि द्वी ४१३२ द्विप तमन्बेष्टुमितः द्वे सहस्रशतैर्युक्त ५।९५ ३५॥६८ द्वाविंशतिसहस्राणि १८१६४ द्वे सहले नरेन्द्रास्ते ५८१३०८ द्वाविंशतिपृथिव्यङ्गा द्विषड्योजनविस्तीर्णा १११३६ १८६५९ द्वे सहस्र शते द्वे च ६०६४१८ द्विषड्योजनदृश्यास्ते ५७।१५ द्वाविंशतिशतान्याहुर् ५७।१३२ द्वे सहवे सुपार्श्वस्य द्विषष्टियोजनोत्सेवा ५।६८२ ६०1३८२ द्वाविंशतिपयोराशि ४३।२१६ द्वे सहस्र शतान्यष्टो ५।४८८ द्वाविंशतिर्महापद्धे ४॥३५८ द्विपष्टियोजनान्यूज़ ६०.३०९ द्वे सहस्र गतं पञ्च द्विष्टियोजनान्यत्र ५।३०१ द्वाविंशतिसहमे ५।२८२ द्रोणाश्वत्थामवीराम्यां ४५११४३ द्विपाष्टिस्तु धनूपि द्वी द्वाविंशतियतिशतानि ४।३३२ १६७२ द्विपोदाविरतिज्ञेया ५८.१९६ द्योतमाने जिनादित्य ३२८ द्वावकः पुनरेक एव हि ३४.९९ द्विसहस्ररथ सैन्यं द्योतिर्मण्डलवासिन्यो ५७१५२ द्वापष्टयब्दसहस्राणि ६०५०९ द्विसह्माश्रयो नाना ५७।१६ ग्रामिकीना जातीना १९।२०५ द्वापष्टिश्च सहस्राणि ६०३५५ द्विहानिक्रमतोऽतोऽप्रे ६.१०२ द्यौरिवोरुविभवाग्नि- ६३१२३ द्वापष्टय क शतं त्रीणि ५२५२७ द्वौ च सर्वप्रियो देवो द्वीपं च घातकोखण्ड १२।६० ५२५६२ द्वासप्ततिसहवाणि १८१६८ द्वीपं तु कुण्डलवरं ५।६१८ द्वौ द्वौ दीवारिकावासा-५७११३० द्वासप्लतिसहयाणि ५।४६७ द्वीप कुशवर नाम्ना ५।६२० द्वी नवानुदिशेवेतो ३४.१२० द्वासप्तत्युत्तर कोटी ५।६५० द्वीपानतीत्य संख्यातान् ५।१६६ द्वी नीलयासः पुत्री ४८.५७ द्वासप्तत्या शत्तं दिक्षु ४।९५ द्वीपायनकुमारोऽसौ ६११२८ द्रौपदीप्रभृतयस्तदङ्गनाः ६३।७८ द्विकोटयो नवलक्षाश्च १०॥१२४ द्वीपायनोऽपि महता ६१।४६ द्रौपदी दीपिबासौ ४५।१४६ द्विगुणद्विगुणायाम ५।१२९ द्वीपेऽस्मिन् काञ्चनस्तुल्या५।२८० द्रौपद्यर्जुनयोर्योग. ६४।१४० द्विगुणद्विगुणव्यासा ५।६२१ द्वीपे च धातकीखण्डे २७.१११ द्रौपदीशीलनिर्भद ५४।२१ द्विगुणितासहस्रवधूगणे. ५५/४३ द्वीपेत्ररावतक्षेत्र ६०1४८ द्वी द्वो चंकादय अस्ता: ३४।७८ द्विगुणास्त्रिगुणाश्च स्युर् ५५३८५ द्वीपेप्वर्धतृतीयेषु २२।२७ द्रौपदी च द्रुतं माला ४५।१३५ धर्म तत्र जयः श्रुत्वा धृतराष्ट्रस्य तनया श्रुत्वा समं सर्वे ६१४८ हरिवंशपुराणे द्रौपदीग्रवश्यानां ४५॥१२५ धर्मदानं जिनेन्द्रस्य ३।२८ धिक् मखेतोरयं दुःखं ३३३१४८ द्रौपदीहरणं कृत्वा ५४॥३७ धर्म एव परं लोके १८१३९ धिग्जन्तो. परतन्त्रस्य ९।५४ द्वी पड्जमध्यमावंशी १९।१९४ धर्मरलमहाद्वीपो ९।१६३ धीरमध्वनि देवाना द्वो सुतौ तु प्रभावत्या ४८०६३ धर्मध्यानं धवलमुदितं ६.१४० धोरपुत्रशतस्यासो ९१७४ [ध] धर्मसाधनमा हि १८।१४३ धीरा राज्यधुरा त्यक्त्वा १३६१५ धर्मशास्त्रार्थ कुशलः घनदस्य प्रिया पत्नी १४।९ धीरा' प्रच्छन्न सामाः २०३८ ६०१५० धनश्रीपूर्वको देवो धर्म तत्र जिनोऽवोचद् ६५०६ धोरो विस्मययुक्तस्ता २४॥६८ ६४।१३८ धनधीश्चापि मित्रधी धर्नामेव हि शर्माप्त्यै १७११४५ धुनो समुत्तीर्य ततोऽभि- ३५।२८ ६४.१३ धनश्च जिनदेवो च धर्मस्यारजिनेन्द्रस्य १८।११४ ६०.२७९ धूतासनोऽवधिज्ञानात् ९।१२९ धनदत्तो गुरुश्चैव धर्मस्यकानपञ्चाशत् ६०४५० १८५११८ धूमज्वालाकरान् वृद्ध- ६१७५ धनु सप्तकमुत्सेध. ४१३०४ १२॥४७ धूमसिंहोऽपि चामुष्या २११२७ धर्म प्रवदता तेन धनुःशनानि चत्वारि १८४८८ १०१ धूमाङ्गारप्रमाणाख्यैः ९१८८ धनुःशतानि पञ्चव ४।२४१ धर्मस्तु वप्रकास्याने ६०।२१९ धूलोः कदम्बमदधूलि. १६॥२७ धनु पृथक्त्वमुत्कर्षात १८५८० धर्मसिंहः सुमित्रश्च ६०१२४७ धृतधर्मा ततस्तस्य धर्मश्च दधिपणश्च ४५।३६ धनु.सहस्रमेकं च ५।३९५ धर्मः प्राणिदया दयापि १७११६४ धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च ४५१३४ धनु शतं शतं सार्द्ध ५।३८२ धर्म धनु पञ्च शतोत्तुङ्गा- ५।२०३ ६०१७ ६०१२८ धृतप्रसाधना वक्त्र धर्म धनु पृष्टं पुनस्तस्याः श्रुत्वा गुरो राजा ६०७७ धृतातापनयोगश्च धर्माधर्मकजीवाना धनु मतानि पञ्चाये ६०1३०४ १०॥३१ धृताकल्पेऽभिषेकार्थ ८१६२ धर्माधर्मनभोद्रव्यं घनुपा पञ्चशत्यामा- ३३१७६ ६१९३२ ७३ धृतातपनयोग त धनुस्ततोऽधिज्यमसो धर्मार्थकाममोक्षेपु ३५७७ ९।१३७ धुतिदेवो घृतिकरो धर्म चाय च कामे च धनुपोऽस्य त्रयस्त्रिशत् ५१८४ १४१५६ धृतिः सुदर्शने देवी धर्मेणायोजयद्वीरो ४५।१४२ धनुपोऽस्य सहस्राणि ३७ धृष्टद्युम्नरपस्थेन ५.६७ धनुरन्यदुपादाय ५११३८ घों धामनि सन्धते १८॥३६ धृष्टद्युम्नोऽप्यनावृष्टिः ५०७८ धनूपि त्रीणि सम्भ्रान्ते ४१२९८ धर्मो जगति सर्वेभ्यः १८॥३८ घेवत्या धैवतश्चंव १९४२२१ धनूंष्यकौनपञ्चासद् ४।३२९ १८।३७ धंवत्या अपि कर्तव्यो १९४२२५ धनूपि सत्रिपञ्चाशद् ४।३३० धर्मोक्तो योजनव्यापी ३१३८ धवत्याश्च तथा घंशी १९।२०७ घनूपि च पडुत्सेपः ४।३०२ धर्मध्यानप्रकारं स घेवतश्च निपादोऽपि १९।२५६ धन्या कनकमालासो ४७१११९ धर्ता धरणनिधूत- ११२५ धेनोरिव निजवरसे ३४।१४८ धन्विन स्थानमन्यम्य ४५६१३३ घातकोखण्डनायौ तु ५।६३८ धौतवासं गृहीत्वाऽसो ८1८९ धन्याः शिखिशिवाजाल- ६११९९ धातकीखण्डपूर्वाध. ६०१५७ ध्यायन्नित्यादि निश्चित्य ५२१७६ परणेन रव्येन २२०५४ धातकोवण्डजेम्पस्तु ध्यानतोपध्ययनतो घरणम्यात्मजाःपञ्च ४८।५० धातक्यादिपु चन्द्रार्काः ध्यान मेकाग्रचिन्ताया धरणेन्द्रवितीण च २२।७४ ध्यानयोग्यगिरिमार्ग- ३१॥२४ धर्माधर्मा तपापा ५८.५३ धात्री मानुष्य प्राप्ता ३३।१६७ घ्वजसितानपवारण• ५५।१०९ धर्मास्तियाभावान ५६१८२ धान्यानासाला भेदाः १११११६ ध्रौव्यनाम्नो गुरो. २३३१३४ धर्माधिवगंनिष्पत्तिम् १८.३५ धाम घाम निज धाम ९।१७५ धर्मार्थकाममोसा घाग्नि मानसूयंगस्य ૨૨૮ नक्षत्राख्यो यसपालः धर्मस्यापरितस्य पूर्व- ११३१३९ ६६०२ धर्म एप प्रिनमापित. ३३९१ न बालादावनी हेतोः पानि परितो देवा: ५,२२ न पाम्पबायध्ययनानु-६६३६ ५१७१७ धर्मों मङ्गलमुत्कृष्ट धात्रीचतो विदूचे ता पायमोडम्य मगध ७१३ श्लोकानामकाराधनुक्रमः नकिञ्चिदपि चास्त्यत्र ३३।१२३ नन्दश्च पुण्डरीकञ्च २५६३५ नमिना भापितो धर्मः १८१४१ नकुलः सहदेवश्च ४५।३८ नन्दनं मन्दरं कूटं नमिश्च विनमिश्चोभो ९।१२८ ६५।२३ नकुलः सहदेवश्च नन्दनात समरन्द्रोऽद्रिः ५।५२८ ४४।२९ नमुचिश्च सुमोमा च ५०1९६ नकुलः सहदेवन नन्दने भद्रशालेच ५६३५८ नमः खेचरनाथस्य १३१२० न केवलमयं वैदे १७११०० नन्दन नलिन चंव ६१४५ नमेनवमहमाणि ६०।४५३ नक्रचक्रमहारौद्रे ४३१४५ नन्दा नन्दोतरा चोभे ५७०६ नमस्तु तनया जाता २२।१०७ नखमणिमण्डलेन्दु ४७२ नन्दा नन्दवनी चान्या ५।६५८ नमोऽस्तु नमिनापाय २२।३७ नखमुखदंष्ट्रिका विक्ट• ४९।३१ नन्दाभद्राजयापूर्ण ५७१७३ नमोऽस्तु वासुपूज्याय २२।३४ नखानदंष्ट्रादृढदृष्टि ३७.१७ नन्दा नन्दोत्तरानन्दा ५७१३२ नमोऽष्टादगतीर्थन १२० न गतिनं स्थितिस्तन ४१३ नन्दिपेणमुनिश्चंव १८११५७ नमो भृर्म फलभरण १६॥२६ नगरमभिविन्ती ३६।३२ नन्दो च नन्दिमित्रश्च ६०६५६६ न युक्तमोदृशं कर्म ४३३१८९ मगरी द्वादशायामा नन्दीश्वरवरद्वीप गयोऽनेकात्मनि द्रव्ये ५८।३९ नगर्यो पुष्कलावत्या ४४।४५ नन्द्यावर्तेऽमर. प्राच्या ५७०२ नरप्रधान ! कावता ७१२८ नगरे जाम्बवाभिध्ये ६०१५३ मन्वाज्ञा फलमैश्वर्य- २०१३५ नरवक्रोन्मुखात्यो द्वौ ६०५४९ नगरे मदिलाभिख्ये ३२।२९ न पृथिव्यादिभूतानी ५८।२४ नरा देवकुमारामा ७.९६ नगौ शङ्खम्हारावी ५।४६२ नमः स्वच्छतरं स्पष्ट ५९४८९ न रागो न च विद्वेपो ३११३७ न चाय सम्प्रदायोऽस्मा-१७॥१२० नभ.स्फटिकनिर्माणम् ५७१५६ नरोजपोतगन्धोऽप. १७४१०१ म चागम्यमगम्थान ३०१६ नम.स्फटिकमूर्द्धस्थ- नलिनीदलसंकाशी ६०१५५६ न चेदेव करोत्यप ३११५१ नभस्तलमिनस्ततः ३८।४७ न लोक्यन्ते यतस्तम्मिन् ४।२ न तद् द्रव्यं न तत्क्षेत्र ३६११४ नभस्तिलकनाथश्च २५।४१ नववेयकावासा ३।१५० मतकोप्रेक्षणक्षिप्त २२०४५ नभस्तिलकनाथश्च २५।४ नव चैव सहवाणि ५.५१६ न तृप्तिन्तरभूद मोगर ९६० नभस्यागच्छनस्तस्य ५२०६० मद तत्र महन्त्राणि ५।२९१ नत्वा जिनं जिनगुरु १६.१६ मममि शुक्लतुरीयतया ५५:१२६ नवतिश्च सहस्राणि ४/१५९ नत्वा मुभद्रनामानं ६०११०० नमसोऽवतरन्ती व ८।१४६ नवतिनव चनानि ४॥२२८ नत्वा पृष्ट्वा ततो ज्ञात्वा ४७३६१ नमये मुनिमुख्याय ११२३ नवतिकार्मुकपूर्वसुलक्षित- १५।५५ नत्वा पृष्टवते भूयः ४८.३८ नमः सर्वविदे सर्व नवत्यब्दसहस्राणि ६०१५०४ नवेति ज्ञापितस्तेन १९/७३ नमः सुमतिनाथाय २२१३२ नवपरिभ्रमसौख्य- ५५।४१ नद्यः सरास्यरण्यानि ५६५०९ नमः पाश्र्वजिनेन्द्राय २२।३९ नवपल्लवरागाढया १४।१२ नद्यः पोडश गद्गाद्या: ५।२६९ २२।३६ नव पूर्वाङ्गमानं स्यात् १८०६९ नीविस्तारहीनस्य ५।२५४ नमस्ते मृत्युमल्लाय ८।२२४ नवमिश्च नवत्या च ४।२३० नदी तप्तजला पूर्वा ५/२४० न मोहो न भयद्वेषो ५७११८१ नवभिनवभिलक्षा नदीमुखेषु कालोदे ५।६३१ नमस्तेऽनन्तबोधाय ८।२२५ नवमासेष्वतीतेपु २१२५ नदीमगीपकूटेषु ५॥२३५ नमस्ते लोकनाथाय ८/२२६ न वयं तु तथाम्यात ५।११२ नदी गङ्गा समुत्तीर्य ४५।६. नमस्ते जिनचान्द्राय ८१२२७ नवराजेन मूदापि न दूराल्पफलप्राप्ता ८1९३ २२।३३ नवराज्यस्यमागत्य २०११६ न दम्पाद् द्रव्यन मिद्धि. ६४१९४ नमस्यामनदानादि ४२१९ नवलशाः सहस्राणि ६०१५२७ न नवस्य न तुगस्य ८१२५ नमिर्महारथश्चापि ५०१२१ नववध्या तया मा ३२११८ ननन्द नन्दिपणास्यम् १८४१३५ नमिश्च निवृतो नमिर ६०११४१ म विसस तत.म्वपतंगाई ११४ न नागोन रयो नाश्वी ३११८० नमिश्च विनमिः २२।१०९ नवगल्या सहमाणि ६०४६० नन्तुरप्परस. सहमा. ५५११२ नमिनेम्यन्तर चक्री ६०१२९७ नवष्टिहयाणि नमस्ते कुन्थुनाथाय नमस्ते पुष्पदन्ताय ३।१० हरिवंशपुराणे नवस्थानेषु निग्रन्या ३१८४ नानाजनपदोपेतो २२१७५ निधायौ चापरी ख्याती २२१५८ नवसङ्गममजात ३११४५ नानावर्णमणिच्छन्न. ७७९ निवारायोऽग्रसेनस्य ३३१४ नवहस्तिसहस्राणि ५०७६ नान्योन्यदर्शनं जातु ५४/५९ निक्षेपणं यदा दान २।१२५ नदानुदिशदेवाना- नान्तरीयकर्मतस्या ३४।७० निविलखेचरसाधितवि- १५३३२ नवानुदिगनामानम् ५७.१०१ नापि प्राप्तैप्सितार्थाना ३१२९ निगद्य वसवे सर्व १७१७९ नवानुदिशनामानि ६४. नाभिपर्वतमानानि ५।१९३ निगद्य तानवमसो ५४७१ नवोर परिसपु १८।६२ नाभेरूज़ मनोवृत्ति ५६।३४ निगूगूढसुश्लिष्ट. २३१८९ न शक्ताश्चरितुं चयाँ ९।१२३ नामविणवतित्वादी ३४.१२१ निगूढनिजगभरा ३८४ न पड्जो लवनीयोऽशो १९:२५४ नामागुरलघुच्छ्वास• ५६।१०३ निजं जिनान्तरंज्ञेयं ६०१२९५ मप्टस्त्व दृष्ट इत्युक्त्वा १७१७४ नाम्ना गन्धर्वसेनेति १९१२३ निजमजबलशाली• ३६७ न समशीशमदस्य शशो १५।३९ नाम्ना क्षौरक्दम्बोऽभूत् १७:३८ निजमगारमगाग्जिन- ५५।१४ न सचिदानमात्मा ५८।२९ नाम्ना बन्धुपगाकन्या ६०४९ निजवपूजनलालितनेमिना५५।२९ न सा कान्तिन सा दीप्तिर ९।२० नाम्ना साधारणेनोक्तास् ५।२७१ निजमारथिमाजिस्थः ३१११०५ न सास्नाति न सा भुइक्ते २२।११७ नाम्ना चाङ्गारको दुरी १९८५ निजाज्ञया च कथित १२।२४ नस्मरत्यजशब्दस्य १७१६९ नाम्ना तत् स जलावत- १९६१ निजोज्छिति चतुर्भाग- ५।२१४ न हि चित्रगुरित्यत्र १७:१२३ नाम्ना विभङ्गनद्यस्ता: ५।२४३ नितम्बास्फालनरग- १४१०२ न हि पौरुपमीदृक्षं २११८३ नाम्ना भूरिथवाः पुनः २४.५२ नित्यमस्वंदना कक्षा: २३१८२ न हि महिपायपानवि- ४९।३५ नाम्नोत्तरकुरश्चान्या ६०।२२५ नित्यशो भुक्तभोगा च २४॥६६ नागवल्यपदेशेन ४२२६३ नारकस्यायुषो योगो ५८1१०८ नित्य निर्मलनि.स्वदं नागवेलन्धराधीशा ५।४६५ नारीकूटं तुरीय तु नित्यं द्वारवतो पुरी ४८७५ नागदत्ताभिधा चान्या ६०१२२४ नारी च नरकान्ता च ५११२४ नित्यता मम तनो ६३३८४ नागयक्षयुगे तासा ५।३६३ नारकं नरकोद्भूतं ५८।२४२ नित्यान्धकारमुद्वास्य ११०२७ नागलोक विजित्येव ८1७२ नारकाणां तनूत्सेधो ४।२९५ निदानदोषदुष्टोऽयं ३३१९१ नागश्रीरपि मृत्वाप- ६४।११३ मारकस्वर्गतिर्यक्त्व. २८१३७ निदानमकरोत् क्लिष्टा ६४।१३५ नागश्रीदुष्कृतं ज्ञात्वा ६४.१२ नारकादिभवानेति ५८/२१७ निदानी वनदंष्ट्रस्य २७१२१ नागाना च सहस्राणि ५।४६६ नारदस्तु विनीतात्मा १७.५१ निदाघेऽप्यवरपव ४/२७४ नागोक्षसिंहकमला नारदस्य सुनायासी २३१४८ निद्रा तन्द्रा परिवलेश- ५७।१८२ ५९।७८ नारदस्याभवद्देवी ६०1८० निद्रापाये गृहं गत्वा २११७४ नाथ वैश्रवणेनेय ६१११८ ३.८८ नारदस्य वच. सत्यं १७१७६ निनेन्द्रियकषायारि. नाथावाच्यमचिन्त्यं च ३३१८६ नारदेन समात्यात ५४।१८ निधानानि निधीरना ५९।८२ नादरे परकृते कृतादरो ६३।१११ नारदेन ततोऽवाचि १७१७२ निधीनिव निशाशेपे ८1५८ नानन्तेनापि कालेन ९६५७ नारदोऽपि नरश्रेष्ठ ६५/२४ निन्दितं नाकरिप्यच्चन् १८।१७३ नानद्धियतिमियुक्ता १२।३७ नारदोऽप्सरसा सङ्घः ५१४२५ निन्दित्वात्मानमाकर्ण्य १८०१३३ नानादेशागतर्भव्यर् ४६।२० नारदोऽपि जिन नत्वा ४३३२२५ निन्युरित्यमनुत्ति- नानापुष्पधने दीर्घ ८।६३ नारदो बहुविद्योऽसौ ४२१२० निपत्य पादयोस्तस्याः ४३।१४ मानास्त्रव्यर्थताक्रुद्ध ५२१५९ नारायणो नरहरिः ४५।१९ निपत्य युगपत्सर्वे ४७१७१ निकोलो निर्वणश्चासो २१:१९ नाल्पः कल्पच्युत. पुत्रो ४३७१ निपात्य शरवण नानानीक. सुरैरूध्वं ९।९० नास्तिकस्य तथा तस्य २८१४२ निपातनं च स्यात्र नामावर्णमयस्वर्ण २६८ नास्तिककान्तवादी स २८.३३ नि:प्रमादतमा याति १९९७ नानाविद्याघराधीशा ५३१२३ निचिता कचर्मपदमा-५५।१२२ निमज्जेत् स्वत एवेयं नात्युष्णा नातिशीताः ६३१५९ ५११२६ १७।१०१ ६११९ श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः निरस्यति पयस्तृष्णा निमित्तमान्तर तत्र ७६ निवृत्ते युधि जीवामो ५०११०० निहितकमलभारान् ३६.१० निमेपोन्मेपविगम ३११२ निवृत्ताः स्थूलहिंसादेर् ७१११४ नोचेन नीलकण्ठेन २३२४ निम्न: करतलै: क्लीवा: २३३९० निवार्य मात्सर्यभवार्य- ६६१४७ नीतश्च निशि निस्त्रिश-२२११२६ नियन्त्रितो जनः सर्वस् ७४१४३ निवेदितं ततस्ताभ्या ४३।१०६ नीता मानसवैगेन २४/७२ नियतिश्च स्वभावश्च १०४२ निवेदिता सुरेणासो ५४.१४ नीत्वा तं कुञ्जरावर्त १९६८ नियुतं नियुतं गत्वा ६।३२ निविष्टश्चक्रिणः पावें १२०४६ नीरजोभिरहोरात्रं ३।२७ नियुताङ्ग पर तस्मान् ७.२६ निशम्य वनमालायास् १४।९२ नीरन्ध्रशरजालेन ३११७५ नियतेः कालत. स्वन्तर् १०५३ निशम्य सा स्वप्नफलं ३७०४६ नीलवंडूर्यवर्णानि २६.१७ नियस्यास्ति स्वतो जीवः १०१५१ निशम्य सा स्वप्नफलं ३५१६ नीलकण्ठाश्वकण्ठौ च ६०५७० निरन्तरविशन्निर्यद् ५७१७६ निशम्य शमिनो वाक्य २७१७३ नीलकण्ठस्फुरत्कण्ठ- ६०२१३ ६२।२४ निगम्यात्मभवानित्थं ६०७३ नीलकुञ्चितसुस्निग्ध ८१२७ निरस्य नै निशितै ३७११ निशम्यार्णवमुद्गीण. ४११० नीलमन्दरमध्यस्था ५११६७ निरस्यन्तमनन्तानु ४१०९ निशम्येति गुरुं नत्वा ४३।१५४ नीलकेसरवालार् ५२।९ निरीक्ष्य मधुसूदनेन ५२।९२ निशम्येति बच सौम्या ४५७८३ नीलस्तस्य सतः कन्या २३१४ निरुपायानुपायज्ञो ४७१८१ नि.गकाद्यष्टगुणा ३४।१३२ नीलस्योदूढभार्यस्य २३१७ निरुद्धच निशितैर्दण्दैर् ४३३१९३ निशि निशितासि निर्मल. ४९।२७ नीलं नीलयशो यशो २२११५४ निरुद्धातिनिरुद्धाख्यो ४।१५६ निश्चितश्चापि पण्मासान् ८५५ नीलाम्बुदचयश्यामा २६.१५ निरध्य प्रसभं धैर्य ४३।१९८ नि.दोपनिलितनीर १६।३० नोलादिस्पृष्टभागस्थ ५।६१० निरुपायास्ततो गत्वा ५४।३० निःशेपेपु निकायपु २२१६९ नीलाद्रिस्पृष्टभागस्थे ५.६०८ निरूप्य रुक्मिणी सत्या ४३।१३ नि.श्री!तमनामाऽमौ १८१०४ नीलाद् ग्राहवती सीता ५।२३९ निरूपितास्तु या कन्याः ६११४ निपद्यकात्यमाख्याति १०११३८ नीलाद्याः परयोश्योवं ६।९८ निर्गमे च प्रवेश च १९।२८ निषधम्पृष्टभागस्थं ५।३०९ नीलाख्यश्च महानीलो ४१५७ निर्गत्य निर्गती पुर्या ६१४९० ५।६०७ नीलाद्रदक्षिणाशाया निषघस्पृष्टभागस्थे ५।१९१ निर्गुणाऽपि गुणान् सद्भिः १।४२ निषधादुत्तरो नद्या ५६१९६ नीलोत्पलदलश्यामा २२।९ निमित्सानन्तरं भत्तुंर ५७।१११ निषघस्योत्तराशाया ५।१९२ नीलोत्पलनिर्भरेप ५२।११ निर्यदायद्विशत्पश्यत् ५७।१८० निषघान्नीलतस्तावत् ५।२७० नदेवाचिततिर्यक ३४।१३ निर्याति मूर्यदीप्ताङ्गे १९१० निषद्याया यथाद्याया ६५।७ नृत्यत्सुराङ्गनोद्भासि ८२३३ निर्वर्तनाधिकरण ५८।८७ निपादश्च निपारागो १९।२२४ नृत्यद्विद्याधरीवृन्द- निर्वनना च निक्षेपी ५८1८६ निपाद. पाइजश्चैव १९२०९ नृत्यन्त्या च नृपादेशात् २९।२८ निर्वाण च तथा ज्ञेया १०८० निपिद्धोऽपि वधाद्रौद्रो २२॥१०६ नृत्यारम्भेऽन्यदा तस्या २१:४३ निर्वाहकस्तयोरामोत् ४२१७५ निष्क्रान्ति सुमते त्रत्वा ६०१२१६ नृप ! कस्य न विज्ञानम् १६३१ निर्वाप्यते ज्वलन्नाग्निर् २०१३४ निष्क्रान्तामि वहिकान्तै २४१६४ नृपसहमममानमिना ५५३१२१ निर्वासितो विरोधस्यो ६०१२० निष्क्रान्तानामनेनामा ९।१२२ नृपदत्तोऽग्रजस्तेपा ३३३१७० निर्वितिपश्चिमार्धा ३४।११० निष्क्रान्तिर्वासुपूज्यस्य ६०।२१४ नृपः स नगरद्वार ५४।४३ निर्विकृति पूर्वाध ३४१९६ नि स्वस्य चिपटा ग्रीवा २३१८३ नृपं शयान सुमुखं १४।१०७ निवृत्त सितपञ्चम्या ६०१२७५ नि मद्भिर्विद्भिश्च २०१४३ नृपस्त्वं रक्षणान्नृणा निवेदो दौनता त्यक्त्वा ४३।१५५ निस्मङ्गनिर्भयत्वाय ६४।५० नृपास्तेऽपि तथा तस्थ: ९।१०२ निवृत्तकरणग्राम ५६६३३ निमृष्टातिनिसृष्टास्यो ४।१५५ नृपस्तरनुयातोऽपि ५०३६ निवृत्य कमःपुरि घोषणा३५।७१ निहतश्च जरामन्यस् ५३।१८ नपर्वपममनस्तं ९।२१५ २९१४५ निहता पाण्डवः केचिद् ५११३२ नृपोत वगसम्बन्ध ३६१९२ निवेदितमिदं वृत्त ४४ पञ्चपा ज्ञानावरणं पञ्चविंशतिरेव स्याद् ४।१८१ हरिवंशपुराणे नृपो दुर्योधनी द्रोण. ५२६८८ पञ्चवर्णसुवस्स ७७७ पञ्चलक्षास्तथाना ६०१४४२ नुपोऽवादीत्तया योगो १४॥६२ पञ्चप्रज्ञप्तयः प्रोक्ता- ११६२ पञ्चचापशतान्याये ६०१३०६ मृभवाभिमुखेनैव ८1१९८ पञ्चपञ्चककं पट् च १०१४० पञ्च पञ्चत्वतोचारा ५८१६३ नुसुरश्रीप्रसूनस्य ३.१७६ पञ्चविंशतिलक्षाश्च १०१२८ पञ्च कन्दपंकोत्कृच्य. ५८।१७९ नमुरा मानवस्तम्भा- ५७१२ पञ्चलोहादयो लोहा ११॥११५ ५८२२१ ने मनश्च भवत्र १६६३७ पञ्चभिनियतिपृष्टम् १०५. पन्चमुष्टिमिटत्पाटप नेदुस्ततस्त्रिदशदुन्दुभयो १६६६२ पञ्चमेन च विज्ञेया १९१६९ पश्चनिगमताः सर्वे ६०४१३ नेदुरम्बुदनिर्घोषा ९.१९२ पञ्चमे शुद्धपजा १९।१६६ पञ्चशरया सहलागि ६०१३९३ नेपालोतमवर्णश्च १११७४ पञ्चम्यामजितः षष्टयां ६०।२६९ पञ्चपष्टिश्च पट्चिात् ४।२३६ नेमिसामर्थ्य विज्ञान ११११२ पञ्चसप्ततिवष्ट- २।२२ पञ्चविंशतिसंख्याब्द- ६०५०१ नमितीर्थकरस्यापि ४०.११ पञ्चविंशतिसंस्पानि ६०५१३ पञ्चविंशति-सन्मित्र- ४१३५९ नेमिः सूर्यपुरं चित्रा ६०।२०३ ६५७ पञ्चकौरवराजमार्घ ४५/५० पञ्चविंशतिसंख्यानि नमिनाथागमोद्भूत ४१।११ पञ्चपष्टिसहस्राणि ५।५८३ पञ्चमभहीनं तु १९४२३० नेमीशहरिरामादि ४७११४ पञ्चलक्षास्तु कोटीना- ५/५६५ पञ्चधाणुव्रत केचित् २०१३४ नेमीशस्ववधिज्ञात ५२।६४ पञ्चस्वरस्तथा चैव ११२९७ नेमुः समप्तपदमेत्य पञ्चविंशतिरस्यैव ५.४८ पञ्च में सप्रपञ्चाय नेमेः सितचतुया तु ६००२३० पञ्चविशतिरसेघ. पञ्चत्रिशदतो लक्षा नेमेः सारथिरूपेण १११०७ पञ्चविंशश तानि ५।४५७ पञ्चविंशतिलक्षास्तु ४।१९२ नैकयोनिकुलकोटि ६३६८२ पञ्चविंशतिरायाम. ५.३५५ पञ्चविंशत्सहवाणि १८३१७१ नंगम. संग्रहचान ५८।४१ पञ्चलक्षाः सहस्राणि ५।२७३ पञ्चषाप्रविभक्तार्थ नैमिप हास्तिविजयं २२४८९ पञ्चमेपु प्रदेशेषु ५।३१३ पञ्चाना सङ्गमे तासा २७४१४ नष्ठिकन्नतमास्थाय ९।१२१ पञ्चादयो द्विपर्यन्ताः ३४६६ पञ्चचापशतव्याम ५।३८० नोध्लिोरमहोद्योगैर् ५०१३ ३४४८१ पञ्चचापशतव्यासा ५।४०४ नोदयास्तमित तत्र २।१४५ पञ्चचापशतोत्सेधा ५।६७९ पञ्चानामानुपूर्वेण नोदिनस्तः समारूढो ४७१३२ पञ्चपष्टिसहस्राणि पञ्चान्ता यत्र चैकाद्या: ३४७१ मोदितेऽथ रथे तेन ५२।२७ पञ्चचापशतव्यामा ५।१७३ पञ्चाद्या यत्र रूपान्ता ३४॥६९ नोपमा जिनरूपस्य ४११५४ पञ्चमीमपि सिंहास्तु ४॥३७४ पञ्चादिपु नवान्तेषु नौभिर्गङ्गा समुत्तीर्य ५४१६४ पञ्चत्रिंशदनूप्यारे ४॥३२६ पञ्चाशच्च सहस्राणि ५।६५१ स्यायनावसिते ह्यन १७.९७ पञ्चपष्टिमहस्राणि ६०१४४८ पञ्चाशद्योजनायाम- ५५९७ न्यायेन च तयोरन २३।१० पञ्चभिर्गुणितास्ते स्युः ३४१५४ पञ्चाशच्च सहस्राणि क्यासश्चवाश्र गान्धार. १९।२४९ पञ्चकृत्व. कृतावश्य ३४।१११ पञ्चाशद्योजनो मौलो न्यासश्चात्र भवेत् षष्ठो १९४२१९ पञ्चविंशतिकल्याण- ३४।११३ पञ्चाशदात्मकसहस्र- १६॥७३ पञ्चदशोपर्यन्ता ३४.१२६ पञ्नाशच्चापविस्तारा ५।३८३ पञ्चकल्याणपूजाना १८६४२ पञ्चाशरकोटिलक्षाश्च १३३९८ पक्षमासादिभेदेन ६४॥३७ पञ्चधाणुगतं प्रोक्त १८५४५ पञ्चाशतत्रिशती चापि ६०४२७ पञ्चचापशतोत्संधा १८।८२ पञ्चाशता ते द्वे तु ६०१५२८ पक्षे मिते तृतीयस्या ६००२६० पञ्चम्यन्त चतुर्थी च ४४१३ पञ्चाशता शतानि स्यः६०१४२१ पडूपमा विनिर्यातो २०१०७ पवलपुर पूर्त ३२५२ पञ्चाशना विमिधं तु ४।३६० पङ्कपमा चतुर्थी तु ४४४ पञ्चत्रिंशत्सहस्राणि पञ्चाशश्च सहमाणि पञ्चमुष्टिभिरुत्खातान् ९.९८ पञ्चमंस्यस्य विध्वंसाद् पञ्चाशत्पदलक्षाभिः १०११२१ पञ्चाना संकलित ३१४५ ५.७३ पक्षास्तु घिरस्यक परस्तात्तु गिरेस्तस्य पञ्चव नियुतानि स्युः पटप्रकृतिना सम्यग श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः पञ्चाशत्तु महस्राणि ६०१४९८ पदलक्षा द्विपञ्चाशत् १०६६ पय.कणे घ्राणपुटं प्रविष्टे ३५।२४ पञ्चागीतिसहस्राणि ६०१४४६ पदवी जातरूपाङ्गो ५९।३८ परस्परकराइलेप ७७६ पञ्चानुत्तरसदपत्र. ४।३१ पदानां सप्ततिलक्षा १०९८८ परस्परवचं चक्रम् ३३.१३८ पञ्चाश्चर्याण्यहं प्रापं ६०१९८ पदाना पञ्चलक्षामि- १०६४ ५१७३२ पञ्चाग्नितपमि प्रायो ३३६६२ पदाना तु सहस्राणि १०.३४ परस्त्रीहरणं मत्यं ४३।१८४ पञ्चेन्द्रियप्रकारेषु ३११२३ पदार्थान्नव को बेति १०१५४ परस्परं समालापे ४५.८७ पञ्चव च सहस्राणि ५।४२० पदाष्टाशीतिलक्षा हि १०१६९ परं हन्मोति मंध्यातं ६१५१०३ पञ्चवास्य सहस्राणि ५५१ पदः पञ्चसहह्मस्तु १०७१ परस्यापति कुर्वन् ६१११०१ ६.७९ पद्मश्चापि महापद्मः ५.१२१ परस्त्रहरणप्रोतः २७१४१ पञ्चैवैकादशाङ्गानां ११५९ पद्मरागमयं भाम्वच ५९८ परस्परगृहाजय. ४४०१९ पञ्चैव तु भवन् पड्जे १९।२१८ पद्मगुल्मोऽपि नलिन- ६०।१५३ परतः क्रमहानिस्तु ७.१७२ पञ्चोनापि च लक्षका ४।७४ पद्मरागमहास्तूप ५७.५५ परतस्त्वप्रवीचारा ३।१६७ पद्मश्रीस्तस्य कन्याभूत् २५।३ परमानन्दरूप ते ३।१७७ पटहाकृतयश्चित्रा ५।६५३ पद्मरागमणिस्फीति २।९ परस्तात्पुष्कराद्धे तु ६.३० पट्टचीनमहानेत्र ११११२१ पद्ममाल: सुभौमश्च ४५।२४ परप्रमाणको मुग्यो २३।१२३ पट्टचीनदुवूलानि ७1८७ पद्मश्च पुण्डरीक्श्च ५.६३९ परमतभेदममर्थ ३४।१४७ पटुमदाकरिण- क्षुभिठा ५५६६७ पासेनेन निहतो ६०५९ परत. साधरज्ज्वन्ते ४।२२ पटूभवन्ति मन्दाश्च ५९.१०० पग्रखण्डपुर गत्वा २७।४४ परमदर्शनगुद्धिविगुडघी- १५।७ पण्डितेषु यथा स्यानं १७१९३ पाकेतुः पवित्रात्मा ५९।३० परवधूप्रिय वीरक्वैरिणं १५।५० पण्यास्ये रमते सोमम् ५।३१७ पाथियमुपादाय ३२२३५ परस्परविरुद्धात्म ३१९२ पण्यायं दिशि पूर्वस्याम् ५।३१५ पद्मराज क्मिारब्धं २०1३२ परं कौगलमस्त्रेषु ३१११२४ पतद्भिरपि तथान्य ९।१०८ पद्मस्ततो नतःप्राह २०१४० परमेश्वरभामग्न ५७११५७ पतन्प्रामादशालौघ ५४०४५ पद्माभस्य महो दे ६०१३७९ परद्रव्यस्य नष्टादेर् ५८.१४० पतञ्जललवस्वच्छ ९।८१ पद्मावत्या गृहोपान्ते ४४॥४२ परविवाहाकरण ५८।१७४ पतिनामाङ्किता दृष्ट्वा २७॥३९ पद्मावती गुभाभिख्या ५।२६० परलोक्क्याशेढ २८.४१ पतितश्व शन. गौरिम् २४॥२९ पद्मा मुपग्रा महामा ५।२४९ परदुःखविधानेन ६१११०७ पद्धिमत्तमातङ्गः ३११७७ पद्मादिगुह्यते सूची परारतिविधानं च ५८।१०१ पतन् मनुजमात गम् ५२१४१ पद्मावती मुमियोऽस्तु ६०१२०१ परावृत्य पुन. पश्यन् ४६१३८ पताका हस्तविक्षेप ५९।६८ पद्मागं पद्ममप्यस्मात् ci૨૭ परा प्रज्वलित येय ४।२७६ पतिभिक्षा पयाचे.मा- ४६।१३ पद्मा सरस्वतीयुक्ता ५९।२७ पराचरितसावद्य ५८.७६ २६१४० पमा शतमहर हि ५।१९९ परावृत्य ततः कन्या ३११४१ पतिरसौ मम कोनि ५५॥६२ पद्मावती ममृत्पन्ना ४॥३८ पराभूतिमिमा राजा ३११४९ पनितम्य तटे लेन २११९१ पये पावनी ज्ञेया ५.७१३ परा तु तमके याउमा ४।२८४ पनिनिदेशजपो हरियो- ५५४४ पयोद्भामि परं पुण्यं ५९।१० परिभ्रम्य चिरं शोभा २०१९ पठित्वा पादयोस्तस्य ९.१७८ पाताशनिनिर्घोगी ११।४५ परिमाण तयोर्यत्र ५८।१५६ पन्यद्गारवती तस्य २४।१० परात मुमनोवृष्टि ९।१९४ परित्यज्य गजं यान्नं २४॥४७ पत्रिपारच्छन्न २६१२० पपात मुभट बद्द २५.५९ परिवप इवाकया ५७.११० पथि तपश्यति तत्र कृतं.५५।१३० पपात मायया बाप्या ४७३ परिम पमहत्त्वेऽपि ५८३४ पदमपीदमार्वमियत ५५।२३ पप्रच्छ तापमं कश्विन २०४८ परिपर्यवनम्नम्मिन् ५१४८ पदमयंपदाय १०॥२२ पप्रच्छ विमेकं मां २८।१६ परिकरं परिवध्य तरी. ५५११ पनि वेगवनी दृष्ट्या ५८।१४८ ५८११४७ ५७५१६२ हरिवंशपुराणे परितस्ताश्चतस्रोऽपि ५.६७१ पल्लवस्थजिननाय. ६३१७४ पादावस्थापितो तुङ्ग. ८1१९९ परिणीय हरिगोरी पल्या च चतुर्भागो ६८४७१ पादावष्टम्भसंभिन्न ११७८५ परिणीय सभायों तो ४४४३ पल्यानि पञ्च सौधर्म ११५९ पादोऽष्टादशसंख्यानां ६१३३१ परिक्षेपः पुनस्तस्य ५।२९७ पवित्र पञ्चकल्याण ५७७११८ पापहेतु विनिन्द्याक्ष- ३३६१३९ परिक्षेपो वर्न चान्यन् ५.३०८ पशुस्योप्रविविक्तेपु ६४१२५ पापकूप निमग्नेम्यो २१११५५ परिणीय ततः कामः ४८.१३ ४३३१२१ पगुरपि निरपार्य पापपाकेन दोगत्यं परिपन्प्रावृपि स्फूर्जद् १७५१४६ पशुरश्मिमृगाक्षाशा १११२२ पापनिर्जरणाकश्चित् ३११२७ परिती भाति तत्सर्पद् ५९।१०७ पशुपुत्रकलादि पापस्योपशमात पश्चाद् १८३१०३ परिणामं प्रपन्नस्य ७.१७ पशुपाल्यं ततः प्रोक्न पापशीला विकुर्वाणा: ५७५१७३ ९।३६ परिपूर्णोभया जान ६४।६१ पापादानादिवृत्तीना ५८/७५ पश्यता च दिशो रम्या २१.१११ परितः परिमार्जम्ति १९१३९ ६४।११८ पश्यन्त्यात्मभवान् सर्वे ५९५७ पापानुबन्धदोपेण परिहत्यातरी ५६३२९ पापापदेशोऽध्यान ५८१४६ पश्यन् दिशः सकल १६२९ परिपदमथ दत्त- पापोपदेश आदिष्टो पश्यन्नपि क्षणविभङ्गर- १६॥३८ परिनिर्वाणकल्याण ६५.११ पापोपदेशहेतुर्थो पश्य पश्य प्रिये चिय १२।४४ पारमेष्टयमनन्यस्थं परिजनाहृतवस्त्रविभूषण-५५।५७ पश्चात्तापहतो दुःखी १९५१ ३३.८० परीत्य जिष्णुधिष्ण्यं तौ २२१४४ पारणासु नृपस्तस्य पश्चाद्विदितवृत्तान्तः ३३१४१ परीत्य परिवातोऽस्याज् ५७।२१ पारगः मर्वशास्त्राणा- २१११४० पश्चात्प्रचण्टतरमारुत. १६।३१ परुपजाम्बवतीवचसो पारम्पर्येण धर्मस्थ ५५७० पश्चातटेऽपि सौताया ५।२०८ पारम्पर्येण मोक्षस्य १०११५५ परशुश्च रस पीत्वा २११९४ पाञ्चजन्यं हरि शत ५२।८५ परेपामनुमेयं स्यात् ५६५६ पाञ्चजन्यमतो दध्मौ ४२१७९ परैर्घटितमप्यतो विघटयन्४२।१०८ पाटलामोदनुभगो- पारावतनिर्भः पत्र १४॥१७ परै राजन्नजम्यस्य परिधिः पूर्वमूच्यास्तु ५१४९१ पाणिपादमुखाम्भोज ४२१३७ परोऽतिबल इत्यासीद् ६०१५२ पार्थदर्शनपर्यन्त- पाणिग्रहणमाद्यं हि २२।१३५ परोक्षस्य प्रमाणस्य पार्थप्रतापविज्ञान- ४५.४९ १०.१५५ पाण्डवैः सह जरा ६३।७२ परोपदेशपूर्व तु पार्थिवन सता तेन १७४२० ५८।१९४ पाण्डवाना सपुत्राणा ५१०२९ परी नन्दोश्वराम्भोधे- ५/६८३ पार्थिवा पट् परिक्षेपा पाण्डवास्तु बहुराज ६३१७६ पर्वतोऽपि खलीकार १७.१५७ पालयन्ति सदिग्नागैर् पाण्डुक कोशिक वीर पर्वलाप्रशिखरस्थितो ६३१९६ पाण्डुकं दशमं प्रोक्त ५.३०९ पर्यस्त मन्यमानोऽय पाश्चात्याञ्जनशैलस्य ५।६६२ ५४.१० पाण्डुकं च सहयाणि पर्यटघ चिरमागत्य १५१९ पाश्चात्यपुष्कराचस्प ३४१५ १९।३४ पाण्डुके सन्ति चत्वारो ५१३५४ पर्यटनटवो तत्र पाश्चात्य साधयन् विश्वं ११४१५ ३१६ पाण्डो कुन्त्या समुत्पन्न: ४५।३७ पाशुक्रीडा विधायाम्बा ४७॥१२४ पर्यटन्नटवी वीरस २८।२ पाण्डो स्वर्ग गते देव्या ४५॥३९ पाव मदनवेगाया २६१४३ पर्यन्तेऽझुलसख्येय. ६४१२८ पाताल स्थितकायोऽसौ १७३१५२ पाणिग्राहिनयानुमार्गम- ४०४६ पर्याप्तमः पडाहार १८1८३ पात्राणि स्थालकं बोल- ७८६ पिङ्गल धंयुक्तास पर्यायानन्तनागन १०.१९ पादनामाधिरोधेन १७५१३७ पिण्डशुद्धिविधानेन पत्यम्य दशमं भाग २३३११३ पत्यस्य गलतम भाग ७१५० पादपद्म जिनेन्द्रस्य ६०११८१ १२४ पितरी भ्रातरी लोके ५०१९७ पाद. पल्यस्य पल्याचं ६०।४७५ पित_परते तावत् २४/२० पत्य जीवन्ति चन्द्राख्याम् ६८ पादः कुमारवाल स्याद६०३३० पिता काञ्चनदष्ट्रोऽथ ३२१२० पारणासु पुरसंप्रवेशने ५।२० ५४.२० ५/३०४ २२१८८ पालिकामुखपद्मस्थ- ५७११७ २०१२४ ७११४८ पादमस्तकपर्यन्तान पितरी जन्मनक्षत्र पल्यानं तु जोवन्ति ४७ श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः पिता मे यदि वा माता ६११३८ पुत्राः पटिसहस्राणि १३१२८ पुरुषपुरसरेऽभिरुचि ४९।५० पिता में पृष्टवाने १९२८८ पुत्राः पभिचन्द्रस्य ४८।५२ पुरुषोत्तमकौमार्य ६०१५२३ पितापुत्रौ च तो नील २३९ पुत्रि सर्वरहस्येषु १४।८१ पुंरुपान्वेषिणीमन्या ३१५८ पितृसुतपूर्वकस्य यदु ४९।१२ पुत्री चक्रभृतस्तत्र ३४।६ पुरे विजयखेटो च ३१३४ पितृपुरःसरवन्धुजनं जिन ५५६१०८ पुत्रो मे ते यदा कन्या २३१५ पुरेपु तेषु च स्तम्भाम् २२।१०२ मित्रा हिरण्यनाभस्य ४४६४० पुत्रो दन्त ततः श्रुत्वा ४७१७५ पुरे राजगृहे सोऽथ १८।१२९ पिपासाकुलितोऽत्यर्थ ६२।२० पुत्रो मे सिंहदंष्ट्रास्यस् २२।११३ पुरेपु ग्रामघोपेषु २।१५० पिप्पलादस्य शिष्योऽहं २१३१४७ पुत्री विजयसेनाया ४८१५४ पुरव परिशोधित ३८/२ पिष्टकिण्वादिमद्याङ्गस् ६१३३५ पुद्गलात्माभिधानं च १०८५ पुरोऽभ्यष्टाग्रदेवोना ५।३४० पिष्टकिण्वोदकापु ५८।२५ पुनर्जन्मकथेवेयं ४२१५४ पुरोधा सोभ्यदाद्भनंर् ११३५१ पिष्टेनापि न यष्टव्यं १७३१३४ पुनरपि जितजेयं ३६७२ पुरो बहिरसौ दृष्ट्वा २४१३८ पोठानि त्रीणि भास्वन्ति ५७।१४० पुनः पृष्टे कथं नाथ ! १९१९० पुर्या त्वं पुकलावत्यां ६०९३ पोठाही श्रीपदद्वार ५७१९१ पुनः प्रणम्य पप्रच्छ ४६।४७ पुर्या प्रभुरभूत्तस्याः १४१६ पीत्वा धर्मामृतं लब्ध ६४।३ पुनस्तापसवेषण ४५।६९ पुर्यास्तेऽमरककाया ५४।४१ पीनस्तनस्तवकभार १६७ पुनः कृत्वा मुविश्रव्यास्ते ९।११६ पुर्याम,चतुर्यानि ४११४५ पीनी ममौ प्रलम्बी च २३१८६ पुनरुत्पत्य पञ्चोवं ५०।२५ पलाको वकुशश्चव ६४।५८ पीतेन जानुना ह्याढयो २३३८१ पुनः प्रणम्य भक्त्यासो ३.१९१ पुलाका भावनाहीना ६४१५९ पुण्यपापकृदेकोऽय २६६३६ पुनः प्रदेशहान्यवं ४/४० पुलाकस्योपपाद. स्यात् ६४१७८ पुण्यवान् ननु पूज्योऽहं २१:३३ पुन: पुनर्जागरणेन ३७.२३ पुलाकस्योत्तरास्तियो ६४१७६ पुण्यमित्यमुपात्तं यत् ९/२०१ पुनश्चासनमारुह्य ८।१२९ पुलोमपुरमेतेन १७१२५ पुण्यक्षयात्तु तावेव ६२।२ पुनर्मघमुन्वा घोर ११॥३४ पुंवेदे नोकपायाणां ५६।९४ पुण्यपञ्चनमस्कार २२।२६ पुरग्रामादिषु ख्याता ६५।२९ पुष्पवृष्टि प्रवर्पन्तो ३।१८२ पुण्यासवः मुखाना हि ५८।१९१ पुरस्ताद्गोपुराणां च ५७१५२ पुष्पवृष्टिभिरानम्र- ३१३२ पुण्यापुण्यविधाता यो २८/३६ पुर सोपारकं याता ६०३६ पुष्पदन्तजिनेन्द्रस्य ६०११२ पुण्डरीकोऽरमल्ल्यन्तर ६०१३०० पुर मङ्गलकं नाम्ना ६०।२४० पृप्यकृष्णचतुर्दश्या ६०१२६३ पुण्योदयात्पुरा प्राप्ता ६२११ पुरस्य राजगहस्य ९११६४ पुष्करिण्यः शिलाकूट. ५१५३० पुण्डरीकस्य पत्रेण ९।१४ पुरजनोऽय यथाः ५५।३२ पुष्करेषु वसन्त्युच्च. ५११३० पुण्डरीक क्टोमात्र- ५३।३८ पुरग्रामनिवेशाश्च ९:३८ पूजयन्तो यथाकामं ५७१७६ पुण्डरीकिण्यखण्डश्री. ६०।१४७ पुरं गन्धसमृद्ध द्राक ३२।२३ पूज्य पूर्वभूतोरस्य ६०१४१२ पुत्रपौत्रकलत्राणि ६२।६० पुरं गिरितटं तत्र २३।२६ पूज्या तापसलोकस्य ४५।७५ पुश्चक्षुर्मुसालोकाच ७।१५८ पुरं गन्धसमृद्ध च २२।९४ पूरयित्वा रमं तेन २११९० पुत्रपुत्रवियोगोन ६०७८ पुरमथोत्तरदिग्जगतीमित १५।२५ पूरणं गलन कुर्वन् ५८।५५ पुषशोकाग्निदग्याह ४३।२४० पुरमिहोत्तरमस्ति मुसक्षम १५।२२ पूरित कोटियो द्युम्नर् २११७० पृषचक्रममुत्पत्या ९।२१३ पुराणवस्तुनो वोर ! २२१४९ पूर्यमाणः पुरोनियंन् १४॥२९ पुत्रं च मुनतमसो १६५५ पुरातपःमाधितदेवनास्ता- ३५४३९ पूर्णमद्रोपदिष्टेषु ४१०४३ पुर्व पात्र थिया तम्या २४॥३३ परिवितोयं नु तत्र ५५५१२९ पूर्णचन्द्र इनोन्द्राम, २७४७ पुत्रा गन्धर्वसेनायास् ४८।५५ पुरि विघुतायिकागण- ४९।१४ पूर्णचन्द्रमुनेः श्रुत्वा २०५७ पुत्रास्त्रयस्तयोश्चिन्ता ३४१७ पुरीयं द्वादशे वर्षे ६१॥२३ पूर्णचन्द्रस्तु राज्यस्य: २७५९ पुगन् मिमिलारूद्वान् १८११२१ पुष्परमहमोमा ३६६१५ पूर्णमदम्नयोग्यप्टो ४३३१४९ हरिवंशपुराणे पृष्टा वदत यूयं मे पृष्टा पूर्वापर राज्ञा पृष्टया वमुदेवेन २७.५५ ८।२०२ ४६१८ पूर्णप्रसवमासे त्र ४३।३५ पूर्वाचार्येभ्य एतम्य. ११६६ पृष्टः कमो नृपेणास्यत् ३३।१३ पूर्णेप नवमासेषु ४८७ पूर्वापरसमुद्रान्ता १८।२८ पृष्टस्तथा तथा गोरिस् २८४१३ पूर्णेपु तेषु मासेपु ८।१०३ पूर्वात्पूर्वादधोऽध: स्यात् ३।११८ पूर्णर्दधिमधुक्षीरे ७७८ पूर्वाख्यातचतु.पष्टि ५।६८१ पूर्वकोपानुबन्धेन २८४६ पूर्वाद्यास्तु त्रिकूटश्च ५।२२९ २६५ पूर्वजाना च दत्तानि २५।४४ पूर्वादयस्त्वमी वेद्या ५।२४८ पृष्टी लक्ष्मणया नत्वा ६०७४ पूर्वलक्षा कुमारस्वे १३।५ पूर्वापर विदेहान्ता ५।२८१ पृष्ठकाण्डकसंख्यानं ७६८ पूर्वजन्ममु वहुप्वना. ६३।२५ पूर्वार्धभारते तस्य ६०११५० पृष्ठरक्षा नृपास्तस्य ५०१११८ पूर्वमम्यत्य तत्रैव ५०.६६ पूर्वापरौ महामरोर ५।४९४ पृष्ठे चन्द्रयशा भूपः ५०११२८ पूर्वमेव मया तस्मै २३६५३ पूर्वान्मदरतः पूर्व ५।५५८ पोदने चूर्णचन्द्रो यो पूर्वकायप्रमाणः मन् ५६७६ पूर्वापरान्तयोरद्रे ५।३९ पौण्डः पारपश्चापि ५०८२ पूर्वप्रच्युतदेवस्य २४।५६ पूर्वाण्यायुस्त्रयोऽशीति- ६०१५३९ पौरुपाधिकमानीतं पूर्वमालवमासाद्य ५०।५८ पूर्वान्तमपरान्त च १०1७८ पोलोम्या मातुरुत्सझे ८०२३२ पूर्वलक्षा कुमारेऽगु- ६०।४९४ पूर्वापरायताना हि ५।११३ पोपस्य कृष्णपक्षस्य ६०१२३३ पूर्ववत्पुनस्त्थान २२।४२ पूर्वाङ्गप्रमितिः पूर्वा ६०५०० प्रकटितलोकपालचरिता: ४९।३९ पूर्वमेवीपशमिक २११४४ पूर्वापरविदेहाना ४२।११ प्रकाममाकाइक्षितकाम- ६६।४६ पूर्वकोट्यायुपं नाभि ७५१६९ पूर्वाह्ल ग्वयुजस्थातः ५६।११२ प्रकाशभीरुः महसा ततोऽमौ३५।६२ पूर्वरूपधरवश ६३७१ पूर्विणोऽष्टशती शान्तेः ६००४०७ प्रकीर्णकासुरी सूनुः पूर्वस्या त्रिशिरा वने ५।६९० पूर्विणोऽनन्तनाथस्य ६०1४०२ प्रकृतिः प्रतिपन्ना तु ५८०२०८ पूर्वस्या विमले चित्रा ५७१९ पूर्वे पन्चदशान्तास्तु ३४३८० प्रकृतिदेशरसानुभवस्थितिः ५५।९५ - पूर्ववैरवगात्क्रुद्धस् २७११२ पूर्वेणैव क्रमेणामी प्रकृतिः स्यात्स्वभावो ५८/२०४ पूर्वमानार्द्धमानाच ५।४०८ पूर्वे. सहकनामानः ५।४९७ प्रकृतिश्च स्थितिश्चापि ५८४२०३ पूर्वदक्षिणदिग्भागे ५.३३४ पूर्वोत्तरे तु विजया ५१७२५ प्रकृत्या मधुमासादि पूर्वत. प्रभृति प्रोक्त्ताः ५।२५० पूर्वोत्तरस्या वैडूर्ये ५७२२ प्रकृतेः सप्रदेशाया पूर्वम्य विजयस्या ५।५५० पूषा किंवा भवेदेप ९.१४७ प्रकृतेः स्थितितोऽनुभवाच्च ३९।२ पूर्वस्मादुत्तरो भूभृद् ५।१६ पृच्छति स्म स ता कामः ४७१५७ प्रक्रमोपक्रमो प्रोक्ना पूर्वम्माद् द्विगुणो व्यासो ५।५०५ पृथिव्यप्तेजमा वायोः ३३६६३ प्रकृष्टवैदग्व्यहृतात्मनो• १४११०५ पूर्वस्मान्मन्दरात्पूर्व ५।५४० पृथिवी सुप्रतिष्ठोऽस्य ६०११८८ प्रकृष्टद्युम्नधामत्वात पूर्ववत्तीयंकृन्मेधस् ५९।१३३ पृथिवीति महादेवी पूर्ववत्समवस्थान- ३०७ प्रकृष्टोऽनुभवः पुण्य- ५८१२९० ६५।५ पृथिवीपरिणामस्य ५।१८० प्रकृष्टौ ज्येष्ठमाणिक्य- ८१८१ पूर्वपक्षमपन्यस्त २१३१३६ पृथिव्यप्कायभेदेषु ३।१२१ प्रक्षीणः कल्पवृक्षात्मा पूर्वस्मिन् घातको खण्डे ३३।१३१ पृथिव्योराधयोर्युक्ता ४१३४३ प्रक्षीणघातिकर्माणः पूर्वमुत्पादपूर्वाख्य १०७५ पृथिव्यप्तेजसा काये १८।५४ पूर्वजन्मनि युष्माभिर् ७।१३८ पृथु शतधनुश्चापि ५०.१२६ प्रणिनोत्तुगतरङ्ग- पूर्ववचिते तर ५९।११४ पृथु. शतधनुश्चैव ४८।६८ प्रचण्डशाल्मलोखण्डे पूर्वदेशजगालीना १८११६१ पृथुरथं चतुरश्वयुतं तदा ५५।८१ प्रचण्डवाहनस्तत्र पूर्व प्रच्युत्य माहेन्द्रात् ३४१३७ पृथुभिरश्वयुतर्ययुरोश्वरा ५५:३० प्रच्युत्य पुष्कलावत्या पूर्व सत्यप्रवादास्य १०1९१ पृथग्माव पृथक्त्व हि ५६०५७ प्रजधान शमैनासो पूर्व कृतोपकारम्य २१।१५७ पृषवत्वेन वितर्कस्य ५६५९ प्रजाः प्रकृतिभि.सर्वाम् ४०१२२ पूर्वः सर्वपुराणानां ८।२११ पृथ्वों रत्नप्रभा पातो २७१११३ प्रजाना च तदा जात: ५८/२१४ १०1८३ टार ६४०६४ ३२६८ ३७११६ प्रक्षयात् पञ्चभेदस्य ४५९६ ३४१३४ प्रतीत्य गप्तभूमीना श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः प्रजातमा खलु देवयोगात् ३५.५ प्रतिग्रहोऽतिथेरुच्च: ९।१९९ प्रथमो हिमवानन्यो ५११५ प्रज्वाल्याप्रान्तरे गेहान् २६।२६ प्रतिमेरुविदेहाश्च ५१५३९ प्रदक्षिणकृतावर्त ८.१५ प्राप्तिश्च प्रभावत्या ३०३७ प्रतिवन्धमिहान्धस्य १७१६६ प्रतिजगजोम्यो २२१५१ प्रज्ञप्ति: ग्रेणिक ज्ञाता ५१७३४ प्रतिवर्ष विनिष्पन्न- २।२ प्रदानुं नेच्छनोदानो. २७१२९ प्रज्ञप्ती रोहिणी विद्या २२१६२ प्रतिगृह्य तमुत्थाय ६४।१० प्रदीपवदयं देही १७१४० प्रणतप्रिय ! संप्रति प्रतिग्रहादिषु प्राया ५८।१८७ प्रदाप्तमुद्यन्तमिनं तमो. ३५११२ प्रणयसहितमित्यं ३६।२० प्रतिकारसमर्थोऽपि १८३१४५ प्रदेशहानितः पञ्च ४।३८ प्रणम्यारमभवान् पृष्टो ६०१० प्रतीक्ष्य कथमोदृश्यः २१३३ प्रदेशबुद्धितः सप्त ४।३२ प्रणम्य पितरं स्नेहान् ४७८३ प्रतीक्षया प्रमादस्य ५६।२४ प्रदेशिनी सता रेखा २३.९५ प्रणम्य जिनमादाय ८.१५३ प्रतीत्य वर्तते भावान् १०१०१ प्रदोषसमये हारं ४८५३ प्रणनाम ततस्तुष्ट ६०१९ ३४।११७ प्रदोपसमये ४२।१०३ प्रणन्तव्यः प्रयलन ८।२२२ प्रतीक्षमाणया तस्य ४५।६६ प्रदोपनिह्नवादाने ५८।९२ प्रणतश्च स तं प्राह ३११६८ प्रत्यभिज्ञा कुनो नाय २११११७ प्रद्युम्न इति नाम्नाऽमो ४३.९६ प्रणतेस्ते कृती कायो ८।२२६ प्रत्यगमगजमत्तगज- १६:३६ प्रद्युम्नशम्बनामाद्याः ४८1७२ प्रणेमुरहमिन्द्रास्त्वं ८.११९ प्रत्यक्षीकृमविश्वार्थ २२८९ प्रद्युम्नागमचिङ्गानि ४७३११३ प्रणामेनाचितस्तेषा ४३३२२८ प्रत्यक्ष सर्वलोकस्य १७.१५४ प्रद्युम्नो रक्षितोऽपायान् ४३।२२३ प्रतापवश्याखिलराजके ६६१ प्रत्य परया भूत्या ४६२ प्रधानपुरुपादीनां ५३१३९ प्रतापविध्वस्तरिपुः ३५४१५ प्रत्ययाय हरिदत्त. ६३।४९ प्रपद्य शरणं सवें ११।६२ प्रतिसेवनानुशीलाः ६४।६८ प्रत्यह शिखिना माम २४।१४ प्रवलशोकवशा प्रवि- ५५।१३१ प्रतिसेवनाकुशोलाः ६४।६६ प्रत्यासमापवर्गस्य २१११८० प्रबुद्धश्च हरिदिष्ट्य ४३१३७ प्रतिमेवनाकुनील. ६४७३ प्रत्याख्यातस्य घटम्य ४६.३२ ५४.१५ प्रतिकृतिरचिता भुवि क- ४९।४३ प्रत्याख्यानस्य विद्यान २१९९ प्रबोघाख्या भवन्त्यन्ये ५७११०६ प्रतिनिधिराश्रयश्च सध- ४९१४२ प्रत्यासनममुञ्चन्तो १२।३४ प्रभवप्रलयस्थिति- ३९७ प्रतिघातमनेकान्भूत् १९६१०९ प्रत्यावादग्यचित्तश्च २७४२६ प्रभासा भास्वती भापा ५७.३५ प्रतिविहितसुपूजः प्रत्युवाच विबुधो ६३।६४ प्रभाते च जनो दृष्ट्वा ४३।१३८ प्रतिपद्य वचस्तो तत् ११३८१ प्रत्येककायापर्याप्त. ५६.१०४ प्रभाते तो कुरुप्रेष्ठी ९।१६० प्रतिपद्य स तद्वाक्य- ४३।९ प्रत्येकं प्रत्यह हानि २२१२१ प्रभासतीर्थतीरस्य ४४।३० प्रतिविबुध्य युवा महसा ५५।२० प्रत्येक मेरुमध्यौ तो प्रभात पौरलोक्स्त २४.८ प्रतिदिनं वसति स्म हरि-५५।५० प्रत्येक तस्य चत्वारि ५।६८९ प्रभावतीममी সবিনিমুৱাখনু, ७।१२५ प्रत्येक पोडशस्वपु ५।२३४ प्रमावत्याः परिप्राप्ति १।८६ प्रतिश्रुतं वचस्ताभिर् ७।१४७ प्रत्येक शासनं देव्यो ८१४१ प्रभातपटहस्फुटध्वनन- ४२११०७ प्रतिभव भयदु.खखनी- ५५५९६ प्रत्येक प्रकृती: पञ्च ५६।९८ प्रभामण्डलसंवीत ७११३१ प्रतिशत्रुस्त्रिविष्टस्य २८।३१ प्रत्येक्मष्टावुपवासभेदा ३४।९८ प्रभासममर तत्र ११११६ प्रतिष्ठा ब्रह्मनिष्ठो: ५७११२१ प्रत्येक सनलक्षाः स्युर १८०५७ प्रभातकाले कृतमङ्ग- ३७१२४ प्रतिक्षिप्तेन स क्षिप्र- ३१.११६ प्रत्येकं सहिताः सर्वे २०६९ प्रभुत्वमखिलस्त्रीणा ४३।१७६ प्रतिशत्रुरयं राजा ४०।१४ प्रत्येकं नामचिह्नाद्य ५२।४ प्रभुविभुरविध्वंसो १३।११ प्रतिदधिमुखं चत्वा ३४१८४ प्रत्येक योपितस्तेषा ५९।११७ प्रभुतया प्रविघाय परामवं१५।४५ प्रतिवनं प्रतिगुल्मलता. ५५।४२ प्रथमनववधूको ३६६३ प्रभूतदानधारा ८०५९ प्रतिमा व्योमगाः सर्वे २७।१२९ प्रथमगजितगीतपयःकणा ५५।७५ प्रभू भद्र सुभद्री तु प्रतिविबुद्धपथ स्वयमेव ५५।१०३ प्रथममदनरंगे- प्रभो । मे दुहितुर्भर्ता २५७ प्रवुद्धा सर्वतोम ४८ पृष्टा वदत यूर्य में पृष्टा पूर्वापर राज्ञा पृष्टया वसुदेवेन २६९ पौण्ड्रः पारपश्चापि २७११५ ५०८२ २०२ प्रकाममाकाइक्षितकाम- ६६४६ प्रकाशभौरुः सहसा ततोऽमौ३५।६२ ४६१८ ३०७ प्रकृष्टोऽनुभव. पुण्य. ५८०२९० हरिवंशपुराणे पूर्णप्रसवमासेऽत्र ४३॥३५ पूर्वाचार्येभ्य एतेभ्यः १।६६ पृष्टः कसो नृपेणाख्यत् ३३६१३ पूर्णप नवमासेपु ४८७ पूर्वापरसमुद्रान्ता १८/२८ पृष्टस्तथा तथा शौरिस् २०१३ पूर्णपु तेषु मासेषु ८३१०३ पूर्वात्पूर्वादधोऽधः स्यात् ३।११८ पूर्णर्दधिमधुधीरे ७७८ पूर्वाख्यातचतु.पष्टि ५.६८१ पूर्वकोपानुवन्धेन २८१४६ पूर्वाद्यास्तु त्रिकूटश्च ५।२२९ पूर्वजाना च दत्तानि २५४४४ पूर्वादयस्त्वमी वेद्या ५।२४८ पृष्टो लक्ष्मणया नत्वा पूर्वलक्षा. कुमारत्वे १३.५ पूर्वापर विदेहान्ताः ७६८ ५।२८१ पृष्ठकाण्डकसंधान पूर्वजन्मसु बहुप्वना ६३।२५ पूर्वार्धभारते तस्य ६०११५० पृष्ठरक्षा नृपास्तस्य पूर्वमभ्येत्य तत्रैव ५०।६६ पूर्वापरौ महामेरोर् ५।४९४ पृष्ठे चन्द्रयशा भूपः ५०।१२८ पूर्वमेव मया तस्मै २३।५३ पूर्वान्मदरतः पूर्वर् ५।५५८ पोदने चूर्णचन्द्रो यो पूर्वकायप्रमाणः सन् ५६६७६ पूर्वापरान्तयोर। पूर्वप्रच्युतदेवस्य २४.५६ पूर्वाण्यायुस्त्रयोऽशीति- ६०५३९ पौरपाधिकमानीत पूर्वमालवमासाद्य ५०१५८ पूर्वान्तमपरान्तं च १०७८ पौलोम्या मातुरुत्सङ्गे ८०२३२ पूर्वलक्षा कुमारेऽगु. ६०१४९४ पूर्वापरायतानां हि ५।११३ पोपस्य कृष्णपक्षस्य ६०१२३३ पूर्ववत्पुनरुत्थान २२१४२ पूर्वाङ्गप्रमितिः पूर्वा ६०५०० प्रकटितलोकपालचरिताः ४९१३९ पूर्वमेवोपगमिक २११४४ पूर्वापर विदेहानां ४२१११ पूर्वकोट्यायुपं नाभि ७।१६९ पूर्वाल्हेम्वयुजस्थातः ५६।११२ पूर्वरूपधरवश ६३१७१ पूर्विणोऽष्टशती शान्तः ६०४०७ प्रकीर्णकामुरी सूनुः पूर्वस्या विशिरा वज्र ५।६९० पूर्विणोऽनन्तनाथस्य ६०/४०२ प्रकृतिः प्रतिपन्ना तु ५८०२०८ पूर्वस्या विमले चित्रा ५७१९ पूर्वे पञ्चदशान्तास्तु ३४१८० प्रकृतिदेशरसानुभवस्थितिः ५५३९० पूर्ववरवशारक्रुद्धस् २७११२ पूर्वणव क्रमेणामी ५४।६३ प्रकृतिः स्यात्स्वभावो ५८४२०४ पूर्वमानाद्धमानाश्च ५।४०८ पूर्व. सहकनामानः ५।४९७ प्रकृतिश्च स्थितिश्चापि ५८०२०३ पूर्वदक्षिणदिग्भागे ५१३३४ पूर्वोत्तरे तु विजया ५।७२५ प्रकृत्या मधुमासादि पूर्वतः प्रभृति प्रोक्ता ५।२५० पूर्वोत्तरस्या वेड्ये ५१७२२ प्रकृतेः सप्रदेशाया पूर्वरय विजयस्याद्रे ५।५५० पूपा किंवा भवेदेष ९।१४७ प्रकृते. स्थितितोऽनुभवाच्च ३९।२ पूर्वस्मादुत्तरो भूभृद् ५११६ पृच्छति स्म स ता कामः ४७१५७ प्रक्रमोपक्रमो प्रोक्ता पूर्वस्माद् द्विगुणो व्यासो ५५०५ पृथिव्यप्तेजसा वायोः पूर्वस्मान्मन्दरात्पूर्व ३३॥६३ प्रकृष्टवेदाध्यहृतात्मनो. १४१०५ ५।५४० पृथिवी सुप्रतिष्ठोऽस्य ६०।१८८ प्रकृष्टद्युम्नधामत्वात् पूर्ववत्तीकृन्मेधम् ५९।१३३ पृथिवीति महादेवी पूर्ववत्ममवस्थान ६५।५ पृथिवोपरिणामस्य ५११८० पूर्वपक्षमुपज्यस्त २१३१३६ पृथिव्यप्कायभेदेषु ३।१२१ प्रक्षोण कल्पवृक्षात्मा पूर्वम्मिन् धातकीखण्डे ३३।१३१ पृथिव्योराद्ययोयुक्ता ४/३४३ प्रक्षीणघातिकर्माण. पूर्वमत्पादपुर्वास्य १०.७५ पृथियप्तेजसा काये १८.५४ प्रक्षयात् पञ्चभेदस्य पूर्व जामनि युष्माभिर ७१३८ पृथु. शतधनुश्चापि ५०११२६ प्रणिनोत्तुजतरग- पूर्ववचित तत्र ५९.११४ पृथुः शतधनुश्चंव ४८।६८ प्रचण्डशाल्मलोखण्डे पूर्वदेशजगालोना १८.१६१ पृथुरथं चतुरश्वयुतं तदा ५५।८१ प्रचण्डवाहनस्ता पूर्व प्रच्युत्य माहेन्द्रान् ३४॥३७ पृथुभिरश्वयुतर्ययुरीश्वरा ५५।३० प्रच्युत्य पुष्कलावत्या पूर्व मत्यप्रकादास्य १०॥९१ पृथग्भाव. प्यत्व हि ५६०५७ पूर्व वृतोपकारस्य २१३१५७ पृथक्वन वितर्वस्य ५६५९ पूर्व मवपुराणानां ८१२११ पृथ्वी रत्नप्रभा यानो २१११३ प्रजानां च तदा जात: ५८।२१४ १०८३ ४३१६१ प्रकृष्टौ ज्येष्ठमाणिक्य- ८1१८१ ८/२ ६४१६४ ३४४४ प्रजधान शमैनासो प्रजाः प्रकृतिभि.सर्वान ४०।२२ ७.१५ बलनारायणो पुत्वा इलोकानामकाराधनुक्रमः प्राप्त सप्तद्धिसम्पद्भिः २०४० प्रिये ! किमिदमित्युक्ने ४३।५५ बभूव हरिवंशानां प्राप्तः पामरको दृष्ट्वा ४३११२२ प्रियोगमैनेन नृपेण दत्तां ३५।२५ बभूवतुरिमो भूमी ४३.१०१ प्राप्प पम्बाती प्राची ५।१३८ प्रीतिकल्याणमध्ये स्थर ५७६४८ यो प्रालम्बमूण ८1१८३ प्राप्य गन्धसमुदं च ३०५४ प्रीतिरविमानः २७४८९ बरा यमनाभीरः ५०७३ प्राप्य पापमतिश्चामो ६१७४ प्रेक्षमाणा निज रूप ४२१२६ बलायम्यसमाते ५३।१३ प्राप्तावपश्यतां विप्रा ४३।१०८ प्रेशकः सुरसवातः १११८७ बलदेवममुहात्ति ११८७ प्राना मार्गदशादिश्व ४५।१३० प्रेक्षाशाले विनाले स्तः ५७५९३ बलरिपुश्च तदा चलिता• ५५।१३ प्राप्ता कदाचिदय १६३२२ प्रेत्यभावो भवोमीपा ५६४७ बलवता गणनास्वप ५५.५ प्रेयप्रयोगानयन- प्राप्तां धनताश्लेषा २३।१२ ५८.१७८ बसवेशवचक्रित्वं ४।३८२ प्राप्नोऽभिषेकममरेन्द्र- ८१२३६ प्रोक्तं सीमन्यरेशेन ४३१२४१ घलवेशवयोश्चापि ५०१२४ प्राप्तो मौमविहारेण ४३०५० प्रोद्यदादित्यवर्णाभाः ७६७ बलेन महता तस्य ४२०६६ प्रायः स्वर्गच्युताना ४८1७६ प्रोद्दष्ट्रान्तरविस्फारि- ८१४३ ६११५८ बलदर्शनको जित्वा प्राजद्रामदत्ता सा २७१५८ ४८.१७ प्रौढयौवनोयोग १४।९७ बसवेशववीराभ्या प्राविक्षद् यागदीक्षाय २०१७ ५११४४ प्रोस्ताभिमुर्य यस्त- १४१७१ प्रावग्याम्बुधारेव यलस्तस्मादभूत्पुनः १३८ प्रासादस्योपकण्ठेच [फ] बलिनो दुवैलाश्चापि ४४०१७ २७१३१ प्रामादस्थोऽन्यदा श्रुत्वा २३।१ बली हलधरतत्र ५०.११४ फणा मणिद्योतविभिन्नः ३७।१९ बहिविजयपुर्यास्तु प्रासादादिकमत्रापि ५.३४६ ५.४२१ फलपुष्पमरानम्र- प्रासादा: सद्गतास्तस्या ४११२३ बहुसंस्थानमाजस्तु १८१७१ प्रासादमण्डपश्चान्य. फरमस्य विध. ग्रेट ३४.६१ बरसपूर्णवर्णकुलदील. ५७१७९ ४९।५ प्रासादे विजयस्यात्र ५४११ फरचगुरुमारा बहुत्रिदशपक्तिभिः ३८१४९ प्रामादेपु शिरम्यैषा ५1१६४ फलभारवमानना ९.२९ बहुजनपदराज. ३६१३९ प्रासादेषु यथास्थान फा गायन्ति किन्नर्यो ५९।१८ बहुप्रसारस्फुरदंदा ३७।४१ प्रामुकद्रव्ययोगेन १८१४२ फाल्गुनासितपक्षेद् ६०1१७४ बहुपु तु वर्षवासरगणेषु ४९।२६ प्रामुकास्वप विविक्त- ६३।१०२ फाल्गनासितपक्षस्य ६०१२३६ यहुदिनानशन प्रतधारणः १५।१४ पितृप्वयापि साऽवाचि ४२१७२ फाल्गुनाप्टाहिकायेषु ५१६८० बहुप्वैवमतीतपु २७१३० प्रियगुसुन्दरो तस्य २८६ फालगने कृष्णपक्षस्य ६००२५७ बहुराजसहस्राणा ४२०४७ प्रियङ्गसुन्दरीलाम २८.१४ फेनपुजप्रतीकारी ५२।५ बहुवर्षसहस्राणि ४३१२१३ प्रियमुमुन्दरी शौरी २९.६७ [व] बहूना दह्यमानाना. ६११९४ प्रिय सुन्दरी तं च २९.१४ बह्वभिग्रहपरिग्रहो ६३.९३ प्रियद्गुलतिके त्वस्य ३३१५० बदमूल भुवि स्यात ११५० ब्रह्मदत्तमुपाध्याय २३।३३ प्रियङ्गुसुन्दरी माना २९१५८ वन्धमोक्षफल यत्र २।११० ब्रह्मब्रह्मोत्तरोद्भूना: ३।१६४ प्रियसर्वहितार्थ. ३९१८ वधहतोरभावादि ५८।३०३ ब्रह्मलोकं ममासाद्य ६५।५७ प्रियवचनपयोभिर् ३६॥७० बन्धुपेणस्तथा पिह- ४८६६२ ब्रह्मलोकोपपादं च १।१२२ प्रियवकरघारितसत्क- १५:११ बन्धुमप्युपगूढाझं २९.२० ब्रह्माणं विष्णुमीशान १७१३२ प्रियवादीति विश्वस्य २११८९ वन्धुपार्यमिद साधु ४३३२३९ बालक्रीडामृतरम: प्रियालापेक्षिमि: स्निग्ध. १४.४५ बन्धकौमुदखण्डाना ९।१६१ बालकाप्रभभूमयों २७४८५ प्रियामुखमिवात्मीयं ८।२१ वाण भगवानन्त १८।१२५ बाल्यादारभ्य लावण्य. ४७१२३ प्रिया मदनवेगा ता. ३२१२२ यभार गर्भ युगलात्मकं सा ३५।३ बाहुः प्रसारितस्तेन २०१३० प्रिये यदुरसत्तिमिय ३७१२५ वधु'प्रत्यगारञ्च ६१.७३ बाह्यद्रव्यध्यपेक्षत्वात् ६४२७ ४०१३ ५८.६२ प्रामारभूनरक्षेत्र ८।२१६ प्रागुपोप्य कवलस्य ४०।२४ प्राइमुसास्ते सतायामाः ५ हरिवंशपुराणे प्रमोः लामाः पूर्व ९।२६ प्रविश्य कंसः स्वसमूतिगह ३५।६ प्राकारोऽन्तःपरीयाय ५७१२४ प्रमोस्तस्य समादेशान् प्रविश्य नगरी रम्या ५०.३८ प्राकारोन्तःमरीयाय ५७ प्रमदमारवशीकृतमान- १५।१० प्रविश्य विश्विद्भक्त्या ५७।१७५ प्राकृतास्त्रस्तयोरासीत् २५६५ प्रमदमय वहन्तः. ३६७४ प्रविलसतिभास्वत् ३६१ प्राकृतानामपि प्रीत्या ४५११५४ प्रमदः समदो हपः ६०.५७१ प्रविच वय चम्पा २११३७ प्रागेव मदनावेश- प्रमत्तसंपतस्यापि ५८२०० प्रविएश्च विशिष्टाना. ५३॥४१ प्राग्मदिल पुरेऽत्राभून् २०११ प्रमादस्य निरासाय ६१८९ ६२।४५ प्रवृत्तिरवृतादग्य. प्रमादालस्यदसम्यो २३११२४ प्राग्दिवाकरदेवास्यः २३४१ प्रवृत्तिवेगवत्यास्तु ३०१९ प्रमाणे दक्षिणा यद प्रवेशितः पुरं सोऽय २४१८३ प्रागशोषवनं तर प्रमागयोजनम्याम. प्रवेगितस्तया सस्त ३०१२० प्रादूर्वाकुरमासाद्य १४॥ प्रमाणप्रमितानी १०११५७ प्रास्ततिथिन ३०१५५ प्राग्भवे पुण्डरीक्षियां ६०१४ प्रमाणनयमाम्या. ७.२२१ प्रशस्तस्तिमितध्यान- प्रमाणनयनिर्भर ५८।३८ प्रशस्तवमो हरिवंग- ६६५३५ प्राणिकोऽद्य सोममाफ- ९।१७२ प्रमाणा गुलमेक स्यात् ७४२ प्रशस्ततिपिनक्षत्र- प्रमितभिरस्पतिभ्रमर. ४९.१० प्रशस्ततिधिन १९७५ प्राच्या एक विगुदाया ८१४ प्रमिताप्रमिन सत्र १०१११२ प्रास्ताम्यवसाया ६४१४८ प्राच्या दिशि तु वेड्ये ५९.२ प्रमोनमियुनोन्मेप. ८१६९ प्रदास्यं पयास्य च ४३३२७ प्राध्या पातालमाशाय ५४ प्रमोहा नाम समपन्ये ५७११०५ प्रसमसमाधिमागनगन. ४९।३० प्राचुर्यञ्च पायाणा ५८it." प्रयत्नेन मनोहस्ती प्रशसितोयनिष्ठोऽय. प्राणताप्राधान्त ४॥ प्रयाहि भातपूना• ५०१०१ प्रग्नितेन या सेन ४२४३ प्राणाधिष्टानतनिष्ट ५।१३८ प्रपश्य प्रति क्ष ८४. पोपितमोजोषत् १७७३ प्रगवमविभूति- प्राणाः राप्त पुनः स्ती पार प्रसवगमयतोग ३६।२४ प्राणते पुनराभिम् प्रसारानुपरवा २१॥२. प्रशापंपरपुरी गा ४२५४ प्राणिनी दु.पहेतुस्वाद ५८११२८ प्रदानासालान २०१२१ प्रसारित विधे प्राणिशमय गर्यस्य प्रोमानवताम्मरया ३१७४ प्रागिपातात सर्गः १११ प्रोनगमपमिम ॥१२ प्रगिन गहन प्रापंमानसपता संपु ३५९ २५ प्रागिनीनियर प्राय: प्रगतो देखें प्राविमा २१४७ ५९२८ प्राणी भीषमंगः पूर्व. २७॥१ प्रमोरगान् ! दोnt ४३१३४ प्राणीप्रपाराय བས ནུག འre། 1: प्रोगरा प्रामरविहि मे गाए २१॥ Fit vani २५।२४ पता: गरि ४०१२ प्रापिहाताभिर २१२ ༣།ཀཾ ་ प्रना हरिरमा ३५ प्रान मिया ५२ निमारक प्रातारापविण्याप nt. प्रामाविमेपामार Ranid ४११२ प्रगतमायोग्य १९७ माग Alina २३१४. दिमाग २॥ प्राय गुणमय aftaar २ भावना ५॥१. प्राहियपि alone qा traen ५८ प्रतिशत गार मोद affairmirent afanोभि. 1८11: प्रापा : mantict Het: १५. पारा ॥२२९ in irgam साना ARTERTit ४५।५. गिरणा मिला २०११ ५१ बलदयस्य संपाते श्लोकानामकारागनुक्रमः प्राप्तसप्तद्धिसम्पद्भिः २०४० प्रिये ! किमिदमित्युक्ते ४३०५५ बभूव हरिवंशानां प्राप्त: पामरको दृष्ट्वा ४३।१२२ प्रियोगसेनेन नृपेण दत्तां ३५।२५ बभूवतुरिमो भूमी ४३११०१ प्राप्य पञ्चराती प्राची ५११३८ प्रीतिकल्याणमध्ये स्युर् ५७१४८ भी प्रालम्बमूण ८1१८३ ३०.५४ प्रीतिङ्करविमानेशः प्राप्य गन्धसमृद्ध च २७।८९ बर्वरा यमनाभीरः ५०1७३ प्राप्य पापमतिश्चासो ६१७४ प्रेक्षमाणा निजं स्य ४२।२६ ५३३१३ प्राप्तावपश्यता विप्रा ४३६१०८ प्रेक्षकः सुरसवातः ११३८७ बलदेव समुतात्ति १९८७ माना मार्गवशाद्विश्व ४५११२० प्रेक्षाशाले विशाले स्त: ५७१९३ बलरिपुश्च तदा चलिता-५५४१३ प्राप्ता कदाचिदथ १६।२२ प्रेत्यभावो भवोऽमीषा ५६१४७ बलवतां गणनास्वथ ५५३५ प्राप्ता धनकृताश्लेषा २३३१२ प्रेष्यप्रयोगानयन ५८।१७८ वलकेशवचक्रित्वं ४।३८२ प्राप्नोऽभिषेकममरेन्द्र- ८।२३६ प्रोक्तं सीमन्वरशेन ४३१२४१ बलकेशवयोश्चापि ५०।२४ प्राप्तो मोमविहारेण प्रोद्यदादित्यवर्णाभा. बलेन महता तस्य ४३१५० ४२०६६ प्रायः स्वर्गच्युताना प्रोद्दष्ट्रान्तरविस्फारि. ८1१४३ चलनारायणी धुत्वा ४८५७६ ६११५८ बलदर्शनतो जित्वा ४८.१७ प्राजद्रामदत्ता सा २७१५८ प्रौढयौवनयोयोग १४।९७ बलकेशववीराम्या ५११४४ प्राविक्षद् यागदोक्षायै २९।२७ प्रौढऽस्तामिमुखे ध्वस्त. १४१७१ प्रावृषेण्याम्वुधारेव बलस्तस्मादभूत्पुत्रः १३१८ प्रासादस्योपकण्ठे च [फ] बलिनो दुर्वलाश्चापि ४४०१७ २७१३१ बली हलघरस्तम प्रासादस्थोऽन्यदा श्रुत्वा २३।१ ५०१११४ फणा मणिद्योतविभिन्न- ३७।१९ प्रासादादिकमत्रापि ५१३४६ बहिविजयपुर्यास्तु ५.४२१ फलपुष्पभरानम्र- प्रासादा: सङ्गतास्तस्या ४११२३ बहुसंस्थानभाजस्तु १८७१ प्रासादमण्डपश्चान्यः फरमस्य विधे श्रेष्ठ ३४६१ बहुरसपूर्णवर्णकुलशेल. ५७७९ ४९।५ प्रासादे विजयस्यात्र ५।४११ फलकुचगुरुभारा ३६४ बहुत्रिदशपवितभिः ३८०४९ प्रामादेषु शिरस्येपा ५।१६४ फलभारवशान्नम्रा ९।२९ बहुजनपदराज. ३६.३९ प्रासादेषु यथास्थान फागु गायन्ति किन्नयों ५९।१८ ७।१४५ बहुप्रसारस्फुरदंश ३७४१ प्रासुकद्रव्ययोगे १८४१४२ फाल्गुनासितपक्षेऽभूदू ६०११७४ बहुपु तु वर्षवासरगणेषु ४९।२६ ६०।२३६ प्रासुकास्वथ विविक्त- ६३११०२ फाल्गुनासितपक्षस्य यहुदिनानशनबनधारणः १५।१४ पितृवमापि साऽवाचि ४२१७२ फाल्गुनाप्टाह्निकाद्येषु ५।६८० बहुप्वेवमतीतेपु २७.३० प्रियद्गुसुन्दरो तस्य २८६ फाल्गुन कृष्णपक्षस्य ६०१२५७ बहुराजसहस्राणा ४१.४७ प्रियङ्गुसुन्दरीलाभ- ५२१५ २८.१४ फेनपुञ्जप्रतीकाश- बहुवर्षसहस्राणि ४३३२१३ प्रियङ्गसुन्दरी शोरी २९६६७ [व] बहूना दह्यमानाना ६११९४ प्रियड गुमुन्दरी तं च २९।१४ बह्वभिग्रहपरिग्रहो ६३३९३ प्रियङ्गुलतिके त्वस्य ३३१५० बदमूल भुवि स्यात ११५० ब्रह्मदत्तमुपाध्याय २३१३३ प्रियमुसुन्दरी नाम्ना २९०५८ बन्धमोक्षफल यत्र २।११० ब्रह्मब्रह्मात्तरोद्भूताः ३।१६४ प्रियसर्वहितार्थ- ३९।८ बन्धहतोरभावाद्धि ५८१३०३ ब्रह्मलोकं समासाद्य ६५।५७ प्रियवचनपयोभिर् ३६१७० बन्धुपेणम्तथा सिंह ४८.६२ ब्रह्मलोकोपपादं च १११२२ प्रियवकरधारितसत्क. १५:११ बन्धुमप्युपगूढाङ्गं २९।२० ब्रह्माणं विष्णुमीशानं १७१३२ प्रियवादीति विश्वस्य २११८९ वन्धुकार्यमिदं साधु ४३३२३९ बाल क्रोडामृतरमः प्रियालापेक्षिमिः स्निग्य. १४१४५ वन्धुकौमुदखण्डाना ९१६१ वालकाप्रभभूमेयों २७१८५ प्रियामुखमिवात्मीयं ८॥२१ वभाण भगवानन्ते १८1१२५ बाल्यादारभ्य लावण्य ४७/२३ प्रिया मदनवेगा ता- ३२१२२ बभार गर्भ युगलात्मकं सा ३५४३ वाहुः प्रसारितम्तेन २०३० प्रिये यसत्तिमिय ३७.२५ वयु प्रत्यगारच ६७३ बाह्यद्रव्यध्यपेक्षात्वात् ६४।२७ हरिवंशपुराण बाह्यचत्यगृहोद्याने २४॥३ भरत्यायन त्रिभुवनेश्वर १६।६७ भ्रमच्चक्रममारुढो बाह्यमूच्यास्त्वसो लक्षा: ५।४९३ भक्त्या शक्रानया चाभूत् ९६ भवनानां तया लक्षा घामान्तरमसो ६३३१०६ भक्षणं फलमूलादे. भवन नन्दने तपा बाह्यवाह्यालिका भानु- ४७।१०२ भगवन् भुक्तिवलाया ६०३ भवनबूटतटान्यपतन् ५५।६८ बाह्याध्यात्मिकभावानां ५६०३५ भगवान कमोऽयम् ३३१४३ भवनानां परिक्षेर ५६३२० बाह्याम्पन्तरभेदेन भगवन् तिष्ठ तिष्टेति ९६१८४ भवनालयवासिन्यो वाह्याभ्यन्तरवतिभ्यः २६१२१ भगवन् यूहि किनामा ३११८४ भवपनियाधम्य ५८१७ वाह्यान्तराणि लोद्वे ५।६६८ भगवन् भवते मेऽद्य ६०१२ भवतह भुवां त्रिनये ३९४ बाह्यस्त्रीणि सत्याणि ५।५२४ भग्नभोगा भुजगी तु ३३।१६० भवमुखानि यहि विषयो- ५५३९७ वाह्यस्तस्य सहयाणि ५५२५ भग्ने कञ्चमहापच्छ- ९।१७० भवतोजोंवतो: पुत्री ६१४८८ वाह्याः सप्तदरा न्यस्ता ५७॥१०९ भजाजम्माशितोद्वार• ५६॥३७ भवतोद्भुतसल्यं मा २०३० वाह्योद्याने च तचासो २८.१५ भटमण्डलमध्यस्थो २२१८ भवतो न भुजिप्योऽह- ११३८ वाह्योद्यानेऽथ चम्पाया- १९६११४ भट्टपुत्र ! निमित्येव १७.६७ भवतोऽपि तपःप्राप्तिम् ६१॥२७ बाह्यो यो गिरिविष्कम्भः ५।२९८ भद्रशालवनोदतै- भवपञ्चकसम्बन्ध १२।२९ बाह्रोकायकाम्बोजा १९६६ भद्रशालवन मेरो. ५।२३६ भवन्त्यम्बहुले भागे वाहाद्य. पड्भिरम्पस्ताम् २०११४९ भद्रवालवने भान्ति ५।२०९ भवत्यनन्तरवपा ४।२६८ ब्राह्मणस्य स्वभावेन २७१६२ भद्रशालवनं भूमो ५.३०७ भवान्न किणिक वत्ति ६६६ ब्राहाणाः क्षत्रिया वैश्या. १७५८४ भद्रगाले बने स्त्रीभिर् २०११ भविता तव न्यायाः १९९१ ब्राह्मी च सुन्दरी चोमे ९४२१७ भद्रशाले जगत्युच्चर ८1१९२ भविता यो हि देवश्या ३३६३६ ब्राह्मीयं मुन्दरीयं च १२।४२ भद्रवत्स विदेहाश्च १२।७५ भविष्यदु.खमाशेपे बिभ्राणो वसुदेवोत्र २४।८५ भद्रकाली महाकाली २२०६६ भवेत्तु भत्ता भव विभेद पादनिति ५४०४४ भद्रवाणस्य तद्राज्य ६०.४९९ भवेनैवेन मार्गस्थः बिभैम्यत: प्रियेऽवश्यं ३३१११८ भद्र! दत्ता यथा प्राणा २१२१ भवेद्वपंसहमं तु बुद्धदातों जरासन्ध ५०1९ भद्रके भद्रभावन भव: मिदिस्त्रिभिस्तै ६०११०४ २८।२८ बुदवा नत्वा जिनेन्द्र ६.११२४ भद्रासनस्थितायास्म ८।९१ भव्यसत्त्वममा बुद्ध्वा १८।१०६ बुदबुदापाण्डुगण्डान्ता ९.८० बुवा स्वावधिकात्याप्त ११३१९ भद्रिला प्रथमापाढा ६०।१९१ भव्य. पञ्चेन्द्रिय. संजी ६४०५२ भयाम्लेच्छास्ततो याता. १११३२ बुद्धवायगारक श{ १९.१०० भयोत्पादनमन्येपा बुद्बोपवामिन तत्र भव्यसत्वयंदा कश्चित् ३३१४१ ५८५१०३ ११:४९ भरतश्चक्रवाद्यः ६०॥२८६ भव्याः कतिपयरेव ब्रुवाणामिति ता शाही ४२१८७ भरतमविष्कम्भो भव्याभन्याभवेऽनन्ता बदमुरिति ज्ञेय १७/५८ ५॥५८१ बोयत्रयाम्बुनिधूत- भरत भुजयन्त्रण ११३८६ भव्यत्वाद्विप्रकृष्टेष्वपि च ३३१९८ बोघमाध्यरित भरतानन्दनं नन्दा ९।२१ भव्यन्वाहारपर्यन्त- ६३११४ बोधित सुरमुख्य म भरतामनमहास्य ६५१४१ ८/२१२ भस्मयामि द्वपि- लघु भरतो दीर्घदन्तश्च बोधिलानिमित्ताया १८१५० ६०१५६३ भस्वा कृला सशस्त्रमा २१।१०८ बोधिलाभपरिप्राप्ता १८१५१ भरतोऽयं नृपै. साद्ध १२१४३ भागः पञ्चदशः शुक्ले ५४४९ बौधिनावधिनत्रण भरणोपु जिनो मल्लिर ६०२०८ भागाश्चास्य शतं प्रोक्दा ५.५८२ भर्तरि स्वर्गत सारि ६०१११९ 'बोध्यं यथास्वमुसंध भाजनं भोजन शय्या ७.४३ भर्ना योजनगन्धाया ४५०३१ [भ] भाण्डशाला: समस्तासु २७.२३ भर्नुर्या भूनयो बाह्यास् ५७११५० भाण्डागारप्रविष्ट च मक्तपानापकरण. ५८.८९ मत प्रभावसदा ५९।७४ भाण्डागारहुनाशो ३७४० ५८.३०५ ७.२३ भव्यकूटास्यया स्तूपा ५७११०४ ६०१५७२ ३११०७ ५८.३७ २७।४८ ३४।१३९ भानुना वर्धमानेन श्लोकानामकारायनुक्रमः भानुः प्रावनदन्तेऽसौ ३३३१०० भास्वते हरिवंशादि १२२४ भृतधात्रो पुराक्ल्पः ५७।१२० ४४.२ भास्वराम्बरभूपंपा ८1८३ भूत्वा जातिस्मरा मू. १२।१३ भानुः मुभानुभीमौ च ४८/६९ भिन्नपात्रःम चागत्य २७४२५ भूत्वा स्वयंप्रमद्वीप ६४।११४ भारये कादशकूटानि ५।५२ मिक्षाकालेऽन्यदा तपां • ६४९ भूत्वा देवकुरुष्वाम ६०1९९ भान्ति मूर्यविमानानि ६।१५ भिक्षाथिमुनिसंक्ला ६४।२३ भूत्वा क्षीणकपायस्पो- ५६३९७ भात्यशोषवनं प्राच्या ५७१२८ भिक्षोपयोपकरण ५८.१५९ भूत्वकादशपल्यायु ६०१७१ भाद्रपदशुक्लपक्षे ३४।१२७ भीतानामभयं दत्त्वा ११.३९ भूपतिविश्वसेनाऽभूद् ६०१५८ भीमसेनो महाभीमं ४५४६४ मामायास्तनुजः श्रीमान् ४४।१ भूपाः सम्भूय भूयांसो २८१८ भ्राजते वातवलय. भीमदर्शनयाऽऽकृप्ट- २२।१२६ भूपोद्धृता नभसि देवगण- १६५६ ४।४२ भ्रातरी रामकृष्णी ५४१२२ भीमश्चान्यमहाभीमो ६०।५४८ भूपो धारणयुग्मभूत २३१४६ भ्रातरोऽपि दशाहस्तेि ४११३८ भीमावलेस्तनूरसंघः ६०५३७ भूभृत्महस्रपरिवारभूदेप १६५७ भ्रातर्याहि तत. स्वर्ग ६५।५० मोमो राजगृहे राज्ञा ४५।१०९ भूभृतायुपरिज्ञेया ५।११८ भ्राता मदनवगायाः २५1१ भीष्मश्च विदुरो द्रोणो ४५५४१ भूभनोऽतिविषम ६३१६२ भ्राता मै कुपितः प्राप्त. ४२१८५ भीष्मजा भीष्मससारः ६०४१ भूभृतोद्धनृतीयेषु भीष्मोरिशान्तनोरेव ४५।३५ भ्रामा हयपुरीन्द्राय ४४/४७ भूभृतो रत्नवीर्यस्य २७११३५ भ्रात्री राज्याभिषेकं च १११११ भोप्या स्वपक्षपशुन्य- ३४११०१ भूभृतोऽतिवलस्याभूत २७१७८ भ्रान्ते द्वे घनुपी हस्ता ४१२९७ भृङ्गाभृगनिभाप्यन्या ५३३४३ भूमिशय्यावत दन्त २।१२९ भार्गवाचार्यवंशोऽपि ४५४४ भृगारं कुम्भतोयं च १११२० भूमिभिः सप्तदामिः ५.४०२ भार्गवाचार्यकंट्रोणो ४५।४३ भङ्गारकलशादर्श ५।३६४ भूमेः स्वभावभूताया ५७५ भारतं दक्षिणं तत्र ५।१३ भृतघोरतपोभाराः ३३३१३० भूमौ निपात्य पादाभ्याम् ४६।३५ भारतापरवंदेहा ५।३५३ भृत्यपुत्रकलत्राणि ९.१०३ भूमौ राजसुतान् काम- २९:५९ भारुण्टरण्डजः पूर्व २६३४ भुक्त्यभावो जिनेन्द्रस्य ५९।९१ भूमो कोनिरभूतस्य १७१५६ भारण्डश्चण्डतुण्डाम्या २१:१०९ भुक्त्वा देवसुखं देवश् ६०।२२ भूमौ रथ्या यया स्त्री. १९३१२ भार्या विजयसेना में २१११२० भुक्त्वा समृतिसार- ३४।१५१ ५९७९ भार्या वेगवती दृष्ट्वा ३२।१७ भुजलतयोः मिरीपमा ४९।८ भूपितादित्यवंशस्य २३१४७ ४६.१२ भावादिरपि श्रेष्ठा ५६.३१ भुजयुद्धे ततो लग्ने भूपोपधिप्रमापिण्ड- २२११३७ भावलिङ्ग प्रवीत्यामी ६४.७५ भुजगकोटिमणिशुनि- ५५।६० भैरो-दुन्दुभि-शावादि १४१ भावना पापम्यम्य ५७१५५ भुजगशय्यामिह मिह. ३५।७२ भेरीगवानकीणा ११११२० भावनानां भवत्यधि भुजानः म तया २४१३७ भर्यास्तस्या रव श्रुत्वा ४०२० भावलेल्या पायस्था- ५६०२८ भुजान पापमं पाया २५।२९ भोक्तुबामापि नो ५८।२८१ भावमात्राम्युपगमेर भुजानस्य तथा नाभे- भोगनमारनिवेद- ३४।११६ भावना व्यन्तरा देवा भुजानानाहराजन्यान् ३६११४६ भोगत णोमिनिमग्ना २६१३८ भावामावदयात ५८1१० भुवः स्वभूनिवामियो ५९।७० भोगमंमारधारीर ४३२०२ भावस्पिायनोयाति ५८२३७ भुवः स्वर्भूस्तपः सत्य ५५५११४ भोगकुरा भोगवती ५।२२७ भाविना स्वामिना भुवि हरिबलदेवी ३६।६० भोगार स्यपरयोर्ये ४६१८६ भाविनी न सन: सेयं ४१९२ भूपरान् संचरान् भूपा- ५३४७ भोगामिलापविपमानि. १९४७ भावशेषमाम्यवहार ३४।१०७ भूचरे' तनोन्येषु १२०५३ भोग्यान्यपि यथाराम भापामन राराक्ष ६५॥३६ भूतपूर्वध्यपेशात ६४।१०४ भोग्याचा दगुदेवस्य भास्वरसस्पष्टनारद ४१२२ मुनमन्तरमहामान् ११११२ भोजराजकुसयादव ६६२४ भास्वगाणिज्योनि- ५९.६४ भवसलेपत्रातस्य २८।३९ भोजन.यासने वित्रः ४०1११० भूवधूः सर्वसम्पन्न- ५४ हरिवंशपुराणे ४३३२२१ ६४।१२६ ३८५ भो धीर ! ते यथा दृष्टं ३१११११ मत्स्यो भद्रपुर जित्वा १७७३० मध्ये वापि चतस्रोऽत्र ५७११३ भो भो नागसुपर्णाद्याः १११४४ मां हिमवतोरप्रे ५।५७१ मध्ये भारतमन्योऽदि- भो भो माऽनेन रूपेण ९:११४ मास्त्वकोहकाः पूर्वे ५।४७१ मध्ये तस्य चतुर्दिक्षु भो भो बुध्यस्त्र युध्यस्व २४४ मत्वंतरमनुष्याणा ९।१३६ मध्येऽनेकविकल्पास्तु ६१०० भौमा ममूरसंस्थाना १८७० मथुरायामिवासीत् ३३१४७ मध्ये चानुदिशाख्याना- ५४ मनकस्यापि विस्तारी ४।१८६ भ्रातृस्नेहसमुद्रेकात् ३१११२८ मथुरायामय सम्प्राप्तो ३३७५ भ्रातृस्नेहवशी देवो मदखेदविनोदार्थः ६५.५५ मनके नवदण्डाश्व ५८०२२७ भ्राम्यन्तं तं तथा नाथं ९।१४५ मदनमङ्गवृत्तप्रभवे भवें ५५११२७ मनसि शुभे निजे वचसि वा ४९।४५ मद्यभेदाः प्रसन्नाद्या ७१०० मनःपर्ययपर्यन्त २०५६ भ्रूकक्षिशिरःकण्ठ- ४२१३८ मधुपानमदोन्मत्त. धूलताकुटिलचाप- २३।१७ मनुजदेवनरामरमर्यज- ४३१२४४ ६३।१०० मलिहा मधुपानजुपा ५५।३७ मनुष्यभावमापन्नः [म] मधुपैः परपुष्टश्च १४१२६ मनुष्यभवसम्प्राप्ती मकरध्वजमुत्तुङ्ग ४७३३५ मधुकैटभवोरी ता २२१५७ ४३११६१ मनुश्च मानवस्ता मक्षिकापक्षसूक्ष्मान्तो ५।४३९ मधुपानमदोन्मत्त- १४।२४ मनुष्यात्वेऽपि जन्तूनाम् ३।१२८ मक्षिकादेशमशक: ४७११०८ मधुः सकेटभः श्रुत्वा ४३।२०१ मनो भुवनरक्षणे मगधासारनलका २२३९९ मधुरस्निग्धशीलानां ११।९३ मनोज्ञस्वरनितिर् ५८।२७१ मङ्गलोत्तमकल्याण- ५७।११६ मधुरस्निग्धगम्भीर ५८९ मनोज्ञविप्रयोगस्य मञ्चस्थस्योपकण्ठेऽस्य ३११४४ मधुरा त्वं रामदत्ताऽभू. २७१६४ मनोज्ञविप्रयोगस्य मज्जयत्यभिनिवेश्य ६३१५८ मधुदियोग्रखङ्गान- मनो हरनरस्त्रीणा मज्जेतापि यदीदृशी ५२१७४ मधुमासमुराहारा ३।११२ मनोवाक्कायशुद्धस्य मणिगणाशुलसत्पटली. ५५॥१२३ मधूदकोभयस्वाद' ५।६२९ मनीवेगरिपोलेंभे मनोवचनकायाना ९.२०० मणिसुवर्णमुवर्णवराघरे ५५।११६ मध्यलोकस्वरूपान्तर ५७१९७ मणिराशिविवाम्भोधी ५०१६ मध्य विभेद सेनानी ५११२२ मनोनियमनार्थत्वा- मणिकाञ्चनकूट च ५।१०४ मध्यत्वं च समासान ५०१०६ मनोहरशिशुक्रीडा ४७११२५ मणिधुमणिनित्याभे मध्यदेशे जिनगेन मनोवाकायदानाना मणिगणच्छविविच्छुरितोदये १५।१६ मध्यमग्रामजाश्चापि १९।१६७ मन्दमत्र गुरो बाह्यो ३१३१०३ मणितोरणपार्थेषु ५७१२६ मध्यमं तु भवेत्पात्र ७।१०९ मन्दमध्यातितीव्रत्वात् ५८८३ मणिकुट्टिमभूमौ ता ९।१६८ मध्यमा दक्षिणत्या स्याद् ५।३४१ मन्दरस्तूपनामानो मणिकाञ्चनसज्ञाया ४२११८ मध्यमा पद्मलेश्या तु ६४११० मन्दरार्यों जयो रिट- ६०३४८ मण्डलेशत्वमेतद्धि ६०१५२४ मध्यमाया विधिर्योऽत्र १९।२४६ मन्दारकुमुमर्मत्त. माता स्वमा च तनुजा ४६।५८ मध्यमाया भवेदशौ १९।२४१ मन्दारादिद्रुमाणा मतिज्ञानविकल्पोऽय १०.१५१ मध्यमाया गहाशौ तु १९१२१२ मन्द्रात्वं पसरो नास्ति १९४२०३ मतिषु बोधचतुष्क- ५५।१२५ मध्यमोदीच्यवाया' स्या-१९॥२४४ मन्मयो मदनः कामः मतिश्रुतावविज्ञान ५८।२२३ मध्यमो दिव्यत्रा १९।१७७ मन्युरुद्धगलगद्गद- मतिध्रुतावधियेष्ठ ८.१९७ मध्यमोदीच्यवायास्तु १९४२०६ भन्य दिवसमप्यपा मस्या विपुलया युक्ताः ५९।१३१ मध्यस्था एव सर्वत्र ७११०४ मन्त्रवादिपरिवाजा ३०४६ मत्तभं तमिवान्वेष्टु ८०६१ मध्यान्तराणि लक्षका मन्त्रशवितरिय किन्तु मत्यादे. कैवलान्तस्प २११०६ मध्याह्नपु पुरग्राम ९.१४४ मन्त्राविदार्यगलया मत्स्यशलाकुशाद्यड्डी २३१५९ मध्ये च मध्यदेशास्तु ५०।१०८ मन्त्राशा वाहने साक्षाद् १७११०८ मत्स्यकूर्मविभुक्तश्च ५।३७२ मध्ये कालिन्दमेनास्या १८०२४ मन्त्रिणो हि प्रभोश्चक्षुर् ५०।११ ५६।१७ ५६८ ४७१४७ १६८ ४७१४० ६४.२८ १०६० ५७४९८ ५६५११६ ४७१२५ ६३.४८ १४॥६३ ८.२०१ १९।१५१ महाभूतानि सर्वाणि ३८५६ ४१४३ महोदक्तेन नगर इलोकानामकाराद्यनुक्रमः मन्त्रगरुडदण्डेन २७४४९ ५९।४ मात्र निवेद्य वृत्तान्तं १७५० मया खेटपुराम्भोधि ४८।२६ महातपोभू विनयंधर- ६६६२५ माथुरा: सौर्यजा वीर्य• ४११४४ मयासी माहितो धर्म २९।५१ महारक्षाधिकारस्य ४३६४२ मादृक्षोऽपि यदीदृक्ष ४३६१९० मरुच्चलितवस्त्रान्त ६२॥३२ महाभुजगशोभाङ्क २६।२२ माधवोऽपि निजं राज्यं ४३।२०४ महदेवस्य काले च ७।१६५ महावैराग्यसम्पन्न ४६.३७ माथुर्यः शौर्यपूर्वञ्च ४०।२१ मर्यादा रक्षणोपाय ७.१७६ महाशत्रुरसो मृत्वा २७१८८ माध्यस्थ्यकत्वगमनं ५८।१५३ मर्यादोल्लङ्घनेच्छस्य ७११४२ महामृतरसायनैः मानस ज्वलने तंच ५६.९५ मत्यलोके सुखं तद यच ११२९६ महानेमिघराकर ५०६८३ मानस्तम्भादि सलक्ष्यं १९:११५ मलदो भार्गवश्वामी १११६९ महाग्रतयुक्तानां ५८।११७ मानस्तम्भस्तथा स्तूपैम् २१७४ मलग्रस्तशरीरोऽमा १८१३० महाराज्यपदोदार ४७१२८ मानितामतदानाचे १४.७८ मल्लि: पञ्चगत:सिद्ध.६०१२८३ महितं महता मह ३९१६ मानोन्मानस्वरं देहं २३।१०७ मल्लेस्तु पञ्चपञ्चाशत् ६०१४३८ महिपमृगध्वजवृत्तं २८।५१ मानसर्वाचिकं काय. २३।१०५ म्लेच्छः शृगालदतस्तद् २७१७० महिमाग्रे सुरेशाष्ट ५९।११ मानुपस्यायुपो हेतु- ५८१०९ म्लेच्छराजसहस्राणि ११।३० महिपी रुद्रदत्तस्य ६०८७ मानुषोत्तरशलस्य ५७३ मसारगल्वगोमेद ४५३ महिपाभ्यामिव क्षोभो ४३।१०९ मानुषोत्तरत: पूर्व ६.२३ महत्तस्पर्द्धयेवोवं १७।२९ मानुपोत्तरपर्यन्ता ५।६३३ महत्तरप्रतीहारी ४३।२ महोजय सुफल्गुश्च ४८०४४ मानुपक्षेत्रमर्यादा ५।५७७ महावलेपानखिला. ३७।२९ महेन्द्रो मलय सहयो ४८०४९ मानुपक्षेत्रविष्कम्भर ५।५९० महासमुद्रस्य महामृता. ३७।३७ महेमकुम्भाभकुचा. ३७४९ मान्यो मान्याभिरन्यस्त्री ४७.१३६ महादेवोभिरिभि ४४।५० महोपसर्गे शरणं ६६१४३ मा भैपोरेप विद्याना ३०॥३१ महापद्मो महानागो ५२।३८ महोनभग्नसञ्चार ३३।२७ मायया शायितं सन्यं ४७११३४ महाप्रभावसम्पन्नास् ९२२२२ मागधः शाम्यमानोऽपि ५०५५ मायामर्कटमायाश्वर् ४७।१०७ महातमःप्रभा प्राप्ती २७।१०९ मागधामिघदेशेऽसौ १८११२७ मायायुद्धमिदं दृष्ट्वा १९।११० महापग्रहदाद् रोह्या ५।१३३ मागधोऽत्रान्तरेऽप्राक्षीत् ४५॥३ मारे तु या परा सैव ४।२८२ महाभुजोऽपि तस्या स्यात् ५।६९१ माघत्रयोदशतियो सित- १६७६ मार्गणास्थानभेदैश्च २०१०७ महासरासि पट् तेषु ५।९ माघशुक्लत्रयोदश्या ६०१७६ मारिण सता तेन १२।१९ महातम. प्रभा भूमिः ४।४५ माघस्य कृष्णपक्षस्य ६०१२३४ माटि मार्दवगुणेन ६३२२२ महापुरुषकोटीस्थ. ४५।१५५ माघशुक्ल चतुर्दश्या ६०।१७५ मालतीवल्लभा मासय १४०१९ महादिक्षु चतम्रोऽस्या ५७.१० माघकृष्णचतुर्दश्या ६०१२६६ मालतीमल्लिकाद्युद्यन् ७५८८ महामेनस्य तनय ४८.४१ मातङ्ग इति मा मस्था २२।१३० मालावली कदल्याचा ५३८६ महाहिमाय्यामिह सज्जिता ३५६७६ मातगोभिर्भृशं भृङ्गी २२।१२८ माल्यवाश्च नदीमध्ये ५।१९५ महायुद्धमभूत्तस्य ५१।२४ मातङ्गीनां च विद्याना २२६८१ माल्यदानापदेशेन ३३३१०८ महाप्रभावमम्पन्न ६५।४४ मातङ्गो विनमः मूनुः २२६११० मासस्याम्यन्तरे भूप ५४/२६ महाश्वेतापि मायूरी २२१६३ मातल्यधिष्ठितं शास्त्रं ५१११ मासान् पञ्चदशाऽऽजन्य- २।४५ महापुरं पुष्पमालं २२१९१ माता सुता. समाराध्य १८।१२३ मासे मासे ममाजश्च १९।१२७ ११३३ माता ज्ञात्वा सुताचित्तं २११५२ मासोपवामिने तस्मै ३३१७८ महायतानि साधूना. १८०४३ मातुल मारं पत्नी २१११७५ मांसमद्यमघुघूत १८।४८ महालब्धिमतस्तस्य १८११३८ मातुः शि, विकृत्यान्य २।३० मासमद्यमघात. ५८।१५७ महापुरात्ममादाय ३२०२८ मात्सर्योपहतास्त्वन्ये ३१४८ मांसदोष नृपः श्रुत्वा ३३।१५२ महाबलस्य विधेशो २०५८ माना त्यक्ता स्वपापेन ६१३४ मामप्रियम्य तस्यामीत् ३३६५१ महासेनस्य मधुरा हरिवंशपुराणे ६५।५५ मदखेदविनोदार्थः ६४।१२८ ४७१३५ मधुकैटभवोरी ता ५।४३९ मधुपानमदोन्मत्त- ५६.१७ भो धीर ! ते यथा दृष्टं ३१११११ मत्स्यो भद्रपुर जित्वा १७३० मध्ये वापि चतस्रोऽत्र ५७१३ भो भो नागसुपर्णाद्याः १११४४ मा हिमवतोरने ५.५७१ मध्ये भारतमन्यौपद्रि ५।२० भो भी माऽनेन रूपेण ९।११४ मास्त्वेकोरुकाः पूर्वे ५।४७१ मध्ये तस्य चतुदिक्षु भो भो बुध्यस्व बुध्यस्व २४४ मत्वेतरमनुष्याणा ९।१३६ मध्येऽनेकविकल्पास्तु ६४।१०० भीमा ममूरसंस्थाना- १८५७० मथुरायामिहवामीत् ३३१४७ मध्ये चानुदिशाख्याना• ६५४ ४।१८६ भ्रातृस्नेहसमुद्रेकात् ३१३१२८ मथुरायामय सम्प्राप्तो ३३१७५ मनकस्यापि विस्तारो मनके नवदण्डाश्च ५८।२२७ ४॥३०८ भ्रातृस्नेहवशो देवो भ्राम्यन्तं तं तथा नाथं ९।१४५ मदनभङ्गकृतप्रभवे भवे ५५॥१२७ मनसि शुभे निजे वचमि वा ४९।४५ मद्यभेदाः प्रसन्नाद्या ७.९० मनःपर्ययपर्यन्त- भूकक्षिशिर कण्ठ ४२१३८ भ्रूलताकुटिलचाप- मधुपानमदोन्मत्त- ६३३१०० २३।१७ मनुज देवनरामरमर्त्यज- ४३/२४४ मधुलिहा मधुपानजुषा ५५१३७ मनुष्यभावमापन्नः ४३३२२१ मधुपै. परपुष्टश्च १४/२६ मनुष्यभवसम्प्राप्ती मकरध्वजमुत्तुङ्ग ४३।१६१ मनुश्च मानवस्त्र २०५७ मक्षिकापक्षमूक्ष्मान्तो १४।२४ मनुष्यात्वेऽपि जन्तूनाम् ३३१२८ मक्षिकादंशमशक: ४७११०८ मधु. सकैटभः श्रुत्वा ४३।२०१ मनो भुवनरक्षणे ३८.५ मगधासारनलका २२।९९ मधुरस्निग्धशीलाना ११४९३ मनोज्ञस्वरनिर्वृत्तिर् ५८।२७१ मङ्गलोत्तमकल्याण. ५७।११६ मधुरस्निग्धगम्भीर- ५८.९ मनोज्ञविप्रयोगस्य मञ्चस्थस्योपकण्ठेऽस्य ३११४४ मनोज्ञविप्रयोगस्य ५६८ मधुरात्व रामदत्ताऽभू- २७१६४ मज्जयत्यभिनिवेश्य ६३।५८ मधुदिग्धोग्रखङ्गान- मनो हरनरस्त्रीणा ४७/४७ मज्जेतापि यदीदृक्षो ११६८ ५२।७४ मधुमाससुराहारा ३१११२ मनोवाक्कायशुद्धस्य मणिगणाशुलसत्पटली. ५५।१२३ मधूदकोभयस्वादः मनोवेगरिपोर्लेभे ४७१४० ५।६२९ मणिसुवर्णमुवर्णपराधरे ५५।११६ मध्यलोकस्वरूपान्तर मनोवचनकाथाना ९/२०० ५७१९७ मणिराशिविवाम्भोधी ५०१६ मध्य बिभेद सेनानी ५११२२ मनोनियमनार्थत्वा ६४.२८ मणिकाञ्चनकूट च ५।१०४ मध्यत्व च समासान ५०१०६ मनोहरशिशुक्रीडा मणिधुमणिनित्या* ४॥६५ मध्यदेशे जिनशेन ३३१ मनोवाकायदानाना मणिगणच्छविविच्छुरितोदये १५।१६ मध्यमग्रामजाश्चापि १९११६७ मन्दमत्र गुरी बाह्यो ३१।१०३ मणितोरणपार्थेषु ५७.२६ मध्यमं तु भवेत्पाय ७।१०९ मन्दमध्यातितीयत्वात् ५८८३ मणिकुट्टिमभूमो ता ९।१६८ मध्यमा दक्षिणस्या स्याद् ५।३४१ मन्दरस्तूपनामानो मणिकाञ्चनसंज्ञाया ४२११८ मध्यमा पालेश्या तु ६११० मन्दरार्यो जयो रिष्ट- ६०१३४८ मण्डलेशत्वमेतदि ६०१५२४ मध्यमाया विधिर्योऽत्र १९।२४६ मन्दारकुसुमर्मत्त- माता स्वमा च तनुजा ४६१५८ मध्यमाया भवेदशो १९६२४१ मन्दारादिद्रुमाणा मनिशान विरलोड्यं १०।१५१ मध्यमाया गृहाशौ तु १९४२१२ मन्द्रात्वं सरोनास्ति १९४२०३ मतिषु बोधचतुका ५५११२५ मध्यमोदीच्यवायाः स्या. १९४२४४ मन्मयो मदनः कामः मतिश्रुतावविज्ञान ५८.२२३ मध्यमो दिव्यथा १९५१७७ मन्युरुद्धगलगद्गद. मतिधुनावधियेष्ट ८।१९७ मध्यमोदीच्यवायास्तु १९।२०६ मन्ये दिवसमप्यपा मम्पा विपुलपा युक्ताः ५९१३१ मध्यस्था एव सर्वत्र ७१०४ मन्त्रवादिपरिग्राजा ३०४६ मत्तंभ समिदान्वेष्टुं ८६१ मध्यान्तराणि लक्षका ५१६६७ मन्त्रशवितरिय किन्तु मायादेः वातस्य २१.६ मध्याह पुरग्राम ९।१४४ मन्त्रविदार्यगलया ময়না। २३१५९ मध्मे च मध्यदेशाम्तु ५०१०८ मन्त्रागा वाहने साभाद् १७११०८ मम्पत्रिभुवनच ५.३०२ मध्ये कालिन्दमनारया १८२४ मन्त्रिणो हि प्रभोरचार ५०११ ४७।१२५ १०१६० ५७.९८ ५९.४१ ४७/२५ ६३१४८ ८२०१ १९।१५१ श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः यमित्रो यज्ञदत्तः मृदा क्रोधाग्निनिर्दग्ध- ६११६९ यथाक्रम नभोयानाः ५३३२८ यदुभोजकुलप्रेष्ठा ५८/३१० मृत्वा ममायणो राज- २४१६३ ययाक्रममशेषाणां ४७:१५ यदुवतिमिति युवा ५०१५ मृरहसदगाकाराः ५।६८४ यया क्षेत्रविभागेन ६४।११० यदुपु विषमदृष्टिप्वेक- ३६४७ मृदुतरङ्गपने दायनस्थले १५।२ ययाख्यातमथास्यात ६४।१९ यदुष्वतिरयो नेमि ५०७७ यथागतं यथा दृष्टं ४३१२२९ यदूनां यादबीना च ६११९३ य ] ययाग्निहोत्रं जुहुयान् १७।१०४ यदि च परस्परव्युदमन- ४९।४९ य एव विषया रम्या ९।४९ यथाजागोमहिप्यादि. ५८०२११ यदि नाम महश्वर्य ५०1१२ यः प्रसिद्धरभिज्ञान: ५८।१४४ यथा नदीसहवाणां १७११२ यदीयं नानुभूयेत १४॥३७ यः प्रागुत्पत्स्यते यग्या ४३३२१ यया यथासो परिवर्धतेऽ.३५१७ यदीयोदयतो जीवः ५८०२४१ यः सिंहरयमुवृतं यः स्वर्गमौस्यजलधो. १६०४५ यथायथं नृपा जग्मुः ४८।३६ यदीयोदयतो जन्तुर् ५८१२४३ यथायथमनीकिनः ३८१३० यदीयोदयतो ह्यात्मा ५८०२३९ १२६४ यदीयोदयतो दत्त यथायथं विनोदेन ४६।२५ ५८/२४० यतः सारमितं यत्प्राक् ८1१५० ५८।२६४ यतस्ततः पुराणार्य. यथा देवसभेऽस्तोपोन् १८१६७ यदीयोदयनिवृत्त २७० यपादेशमिति प्रोच्य २१११६३ मदेव जायते नृत्वं यनस्तु रमणीयत्वं ५८।२७२ यथोद्दिष्टं ततस्तेन ३१११०४ पदेन्दति तदेवेन्द्रो ५८०४९ यतस्तस्गामुदाराय ५३३३३ यथायोगपरावृत्त ५।४५८ यदेव केवलोत्पतिः ६०.४५४ यतयात्मधिया जिन- ३९६९ यथायोग्य मभोग्यास्ते ५३०४२ पदमिलक्ष्मीरभिपैकिणी ३७१३० यनिधर्मविधानतः ३३७४ १४०४८ यतिवर्गादयः मर्वे यथा पुरा तो मथुरा सुपुयाँ ३५।२ यमुनोत्तममुद्यानं ५७.१४७ यत्वल्पाकल्पसं स्यात् १०।१३६ पतीनम्यन्तरीकृत्य यथास्वमिन्द्रवहींना ૬૮૬ २०१२३ यग्रामनगराचार १०.१०५ यथा स्वस्वं निमित्रोम्य. ८१३२ यतो यतश्च यातीशम् ५९।९४ यथा स्व शिविरस्थानं ३१०१३३ यद्रागद्वेपमोहादेः ५८1१३९ यनो भवनि मुश्लिष्ट. ५८।२५४ पथा स्वमपि सप्तभिः ३८२० यद्रागपमोहम्प: २१११८ यस यामततृप्ताना ९1१७१ पयेवं दोयना मां ४७१९६ यथा स्थित्या तथा शुन्या ३३१६८ यरकुण्डलबरो द्वीपम् ५।६८६ यथाप्रश्नमिनस्तस्मै योन चिन्तित एथ्य. १८।१४१ यत्तूरायविपाच्य तद् ५८।२९५ यया हरीभूरिजनानुरागी ३५ ६७ ययेन यादव यम ६५1८८ यत्ताप त्वया वस्तु १६।१४१ यद्यपदग्धदेवन २३।११७ पयोक्तीपा हि समो. ३४१८९ पत्तन्मानपायो म ९।१२० वयोक्तादानमवतस्य यद्यप्पविरता तृष्णा १९१ ५८७७ यत्रयोदयापोटीभिः १०१११८ ययामत्त्वं यथाभावं यद्यप्पनवगाह्माधि- यासा: पाण्डवारचण्डाः५०१२५ पर्थव मूचा पुंमा २३।१२२ यद्यमोम्य. पर. कोपि १३८ यरस्वतन्त्राभिमानस्य ११० यात युक्तमाघार्नु पत् पतिशमहबस्तु १०२८ पढेतृयोतन देहे पदा विञ्चिाचिन ६६११४ यमरयापुतस्यागो ५८।१७० ५८०६० पदा निमिठे संन्ये ४९५ यदेतृवर्षभर पत्र वायचिकित्मादि १११९ पार्थ रक्षिता कन्या १११ पटेतुरमुभवः स्यात् ५८०२५८ पत्र पाति परितोय २०१४ पायर्या मनिपान:ति पग्निमाधिकरण ५८. ययः स्वंय. ४.४ योगदने माय पर पटोरयामाः स्यु १४०६८ साना नानारत्र. ११.४ यममर्थशान 41४८ पर धमारीरस्य ५८ पदा परीक्षिती राजा पगारापमानीति साविपिनरी भो। ४।७३ पदा हारादिराप्ति. ५८ पामा पवनीपत- १० तु मत्रतो मायार. १३६ सोसायो मुनमायनमा ८ पापिनाम १९.१ पासदों तो ४१ पोरया दामन जानु ५.५ १९३२ यवानुनुवनेनय पर प्रामाद घरादाराव ५६ हरिवंशपुराणे मेचकं वस्त्रयुगल मित्रश्रिय प्रगृह्यागान् मिथिला राजगृहक ६०।४१९ मैपाकृतिगिरी लेभे मांमल हृदय राज्ञां २३१७९ मुक्ति गते महावीरे ६०५५२ मेघायामिन्द्रवे पून ४॥२२० मासलमृदुल पार्वैर् २३७७ मुक्त्वा लोकपुराण श१२८ मासे पक्षेऽह्नि चामुष्मिन् २७।२८ मुक्त्वोरकरणं क्षेत्र ४३३११७ मेरावेकक्रमोन्यस्तो २०१५३ मासोपवामिनी दृष्ट्वा ५०५९ मुखरनिर्झरपातपतविमिर ५५।१५ मेरुरक्षौहिणोस्वामी ५०1७० मा स्प्राक्षोस्त्वं रस भद्र २१५८४ मुखरशवरवेण दिशां ५५।६६ मेरुचूलिकया सार्द्ध ६१३५ माहिपाद्यश्च नावाद्य- ८॥१३१ मुखेन्दौ नेत्रयुग्मान्जे १४॥३३ मेरुप प्रतिवनं तु पष्ठतः ३४१८५ माहेन्द्रेऽष्टौ तु लक्ष द्वे मुग्य. सदुग्धिको रज्जदा २१६८२ मेरचव मुमरुश्च माहेन्द्रे नियुनं प्रोक्तं ६.८१ मुदितभोजमुतानगराङ्गना ५५।८२ मे प्रदक्षिणीकृत्य ३४।२४ मित्रश्रियः मुमित्राख्य ४८५८ मुद्रिकाभरणेनाभाद् ८।१८६ मेरो: पूर्वोत्तरादायां ५।१७२ मिनकार्यममुद्युक्ती २१११७२ मुनिमासाद्य तो धर्म ४३३१४५ मेरोः प्रारदक्षिणाशायाँ ५।२१२ ३२।३२ मुनिराह भवरमूनोर् २५३९ मेरोः पूर्वोत्तराशाया ५।२११ मिथुनमर्भकयोः मुखलालितं१५।२९ मुनिसुव्रतनाथश्च ६०११४६ मेरी, प्रभृतिकूटानि ५।२१६ ५.३२८ मिथुनानि यथा नृणा ७९९ मुनिसुव्रतमल्लयन्तर ६०।२९६ मेरोरुत्तरपूर्वस्या मिथिलानाथमुत्पाद्य १७१३४ मुनिसुव्रतनम्योस्तु मेरो जन्माभिषेकं च १६९७ ६०१३०१ ६०॥२४३ मुनिसुव्रतनायस्य ४७१३६ मिथिला रक्षिता कुम्भो ६०१२०० मुनिपादसमीपे तान् ६५.३१ मंत्रीप्रमोदकारण्य ५८।१२५ मिपिला विजयो वा ६०१२०२ मुनिवचनमवन्ध्य ३६।२३ मोक्षकारणमूताना ५८.१९० मिथ्यादर्शनमात्मस्थं ५८११९२ मुनिपादापकण्ठेऽयौ ३३।११४ मोक्षमिक्ष्वाकदो जग्मुर १३॥१३ मिथ्यादृष्टियथार्थोऽन्य. ३१८० मुनिधैर्यपरीक्षार्थ मोक्षमाधनमप्यप १८।१५८ मिथ्या ये दुष्कृताद्य- मुनीन् कालान्तरेणामून ३३।१२८ मोहमूढमनमोऽस्य ६४।३३ मिथ्यादर्शनवाक सा या १०१९७ मुर्गेविनयदत्तस्य मोहस्य प्रकृतिः सप्त ५६२८७ ४६१५५ मिथ्यादृष्टे सतो जन्तोर ६१३९७ मुनिन्दातिपापेन मोहस्योदयनो जीवः ३७९ ६०३० मिथ्यात्वं त्वर्धसशुद्धे ५८०२३३ मुरजार्धमधोभागे ६०1१४ मोहयित्वा जड लोक मिनोमि पाप पश्य स्वं २०१५२ मोहनास्थानसज्ञाश्च ५.३८७ मुरारिरपि रुक्मिणो ४२११०४ नियमाणोऽतिदु खेन १७॥१४३ मूकोभूय स्थितास्तावद् ४३।२३६ मोहादप्राप्तसम्यक्त्वा ६०१६० २३॥६६ मूच्छिता विपवेगेन मौकमत्स्यदनीयाश्च ३३।१०९ मिलित खलभूपाल. २३३१२१ मूच्छितेनापि तत्यादौ मौनिना निजदारीर- ६३।१०७ मिश्राः मतमहम तु ९।१८२ ५।१८६ मूढसत्यविमूढेन १७।१४९ मौलिकुण्डलक्यूर- मीनी कृतजलक्रोडौ ८1६६ मूलकाश्मकदाण्डोक- १९९० मगध्वजमुनिः प्राह मुक्तश्च दु चिना विन्न १९।१११ मूलमध्यान्तदु.स्पर्श ११।९५ मृगमोक्षविवानं च मुक्तदन्या च नत्वा मा २६४९ मूलप्रतिभेदोऽय- ५८१२२० मृतवतामृतदीधितिकोनिना १५।५३ मुक्न कारवं तत्र २६१२२ मूले तन्मात्रमेवेषां ५२९ मना नागवधूर्जाता मुक्तान्मुक्तानपणामा- ३१३११७ मूले गन्यूति विस्तीर्ण. ५।१७७ मृतितिम्य नियता मुक्तामरक्तालोकर २०१० मून्ये द्वादशमध्येऽष्टी ५.३७८ मृतो गृहीतधर्मो है मुक्तावलीवदेतेषा मदुशय्यासनं वस्त्रं मुक्तावालुकविस्तीर्ण. ५७१७७ मेबलात्रयमयुक्त ९५ मृत्युज-मजरानिष्ट- ५।२८४ मृत्यु मारिपीडितस्य ६३८१ मुक्ताफलनया दानान् ६०1८८ मुक्यभावे कुन मौम्य- १८११५२ मेघश्यामवपुः योमान् ६०।२११ ५२१३४ मृत्वोतररुप्वामीद २७१११. मान्या मातुलमान मुक्तिपूनमहानय. मुत्वा श्वनाम्बिका पुर्या ३३११६१ १७. मेघनादोऽपि तस्याने २५.६ ४७ नियन्ते स्वल्पवृषणा ३४ २२८५ २८.३० २१११५४ १४५ मेघनादमहानादी मुत्वा थावधर्मग २१७३ मंघप्रभो मघायोध्या. ६०१८६ मृत्वा पागेपदेगेन यमित्रो यज्ञदत्तः श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः ५७ मृत्वा क्रोधाग्निनिर्दग्ध- ६११६९ यथाक्रम नभोयानाः ५३।२८ यदुभोजकुलप्रेष्ठा ५८.३१० मृत्वा मृगायणो राज्ञ- २८१६३ यथाक्रममशेषाणां ४७।१५ यदुवृद्धिमिति श्रुत्वा ५०.५ मृदङ्गसदृगाकारा. ५.६८४ यथा क्षेत्रविभागेन ६४।११० यदुपु विषमदृष्टिवक- ३६०४७ मृदुतरङ्गपने शयनस्थले १५।२ यथाख्यातमथाख्यात ६४।१९ यदुप्वतिरयो नेमि ५०७७ यथागतं यथा दृष्ट ४३।२२९ यदूनां यादवीनां च ६११९३ [य] ययाग्निहोत्रं जुहुयान् १७११०४ यदि च परस्परब्युदमन- ४९५४९ य एव विपया रम्या ९/४९ यथाजागोमहिष्यादि. ५८०२११ यदि नाम महेश्वर्य ५०१२ य प्रसिद्धरभिज्ञानः ५८१४४ यथा नदीसहस्राणा १७.१२ यदीयं नानुभूयत १४।३७ यः प्रागुत्पत्स्यते यस्या ४३१२१ यथा यथामा परिवर्धतेऽ-३५।१७ यदोयोदयतो जीवः ५८।२४१ यः सिंहरयमुद्वतं यः स्वर्गसौख्यजलधी- १६४४५ यथायथ नृपा जग्मुः यदीयोदयतो जन्तुर ५८।२४३ यथायथमनीकिनः ३८१३० यदीयोदयतो ह्यात्मा ५८।२३९ १२१६४ यथायथं विनोदेन ४६।२५ यदीयोदयतो वृत्त ५८।२४० यतः सामितं यत्प्राक् ८३१५० यथा देवसभेऽस्तीपोत् १८१६७ यदीयोदयनिवृत्त ५८।२६४ यतस्ततः पुराणार्थः १७० यथादेशमिति प्रोच्य २११६३ यदेव जायते नृत्वं ३।१३० यतस्तु रमणीयत्वं ५८०२७२ यथोद्दिष्टं ततस्तैन ३१११०४ यदेश्दति तदेवन्द्रो ५८।४९ यतस्तस्यामुदाराय ५३१३३ यथायोगपरावृत्त ५.४५८ यदेव केवलोत्पत्तिः ६०।४५४ यतयात्मधिया जित- ३९६९ यथायोग्य सभोग्यास्ते ५३०४२ यदक्षिलक्ष्मीरभिपेकिणी ३७१३० यतिधर्मविधानज्ञः ३३१७४ १४।४८ यतिवर्गादयः मर्वे यथा पुरा तो मथुरा सुपुयाँ ३५।२ यमुनोत्तममुद्यानं ५७.१४७ यत्वरपाकल्पसंझं स्यात् १०११३६ यथास्वमिन्द्रकहीना ६५८६ २०१२३ यद्ग्रामनगराचार. १०.१०५ यथा स्वस्वं निमित्रोभ्य. ८1१३२ यतो यतश्च यातीशस ५९९४ यद्रागद्वेषमाहादेः ५८।१३९ यथा स्व शिविरस्थान ३११३३ यतो भवति सुश्लिष्ट. ५८०२५४ यद्रागद्वेपमोहेम्य. २।११८ यथा स्वमपि सप्तभिः ३८०२० यत्कथामृततृप्ताना ९1१७१ यद्यवं दीयत महा ४७१९६ यथा स्थित्या तथा शुत्या ३३१६८ यत्कुण्डलबरो द्वीपस् ५.६८६ यथाप्रश्नमितस्तस्मै ६०।१३७ योन चिन्तित पथ्य- १८।१४१ यत्तूपायविपाच्य तद् ५८०२९५ यथा हरी भूरिजनानुरागो ३५ ६७ यद्येन यादृशं कर्म ६५।४८ यत्तदद्य स्वया वस्तु १६१४१ यद्यपदग्धदेवेन २३१११७ यथोक्तमेपा हि तपो. ३४१८९ यत्तन्मानकषायी स ९।१२७ यथोक्तादानसक्तस्य ५८७७ यद्यप्यविरता तृष्णा यत्त्रयोदशकोटीभिः १०१११८ १४११०३ यद्यप्यनवगाह्याब्धि ५०.१५ यथासत्त्वं यथाभावं यक्षाः पाण्डवाश्चण्डाः ५०.२५ यद्यमीम्य. पर कोऽपि ३१३८ यथैव सूचक पुंसा २३११२२ यरस्वतन्वाभिमानस्थ ९२५५ १७.१० यदव युक्तमाधातुं यत् पत्रिंशत्महस्रस्तु १०२८ यद्धे तुद्योतन देहे ५८१२६५ पदव किञ्चिद्रचित ६६/३४ यत्मत्याणुव्रतस्यामी ५८११७० ५८१२६० यदत्र निखिने सैन्ये ४७।९५ यद्धतुवर्णभेदस्त या कायचिकित्सादि १०११२९ पदर्थ रक्षिता कन्या २१३१७९ यद्धेतुरसभेदः स्यात् ५८।२५८ यत्र पाति धरित्रीय २।१४ यदर्या सन्निधानेऽपि १०.९९ यग्निमाधिकरणं ५८.९० २०६ १८।१४६ यत्वोऽपि ययुः स्वेच्छ- ४०४४ यग्नोपयुज्यते यस्य यत्र पप्टोपवासाः स्यु ३४॥६८ यदार्यानार्य नानात्व. १०१०४ यमदण्इमर्थधान २५:४८ पत्र मूदमारीरस्य ५८।२७३ १४।४० मा.प्रकाशमानो.पि यदा परीक्षिनो राज्ञा यदा हारादिपर्याप्ति. ५८०२७४ यशसा घवलीकृत- १०३७ यदुक्तं मन्त्रनो मन्योर १७११३६ यशोदयायांमुतया मनोदया ६८ या वृपिस्तपात्यर्थ १९१९ यदुपाण्डववर्गों तो यगोदया दामगुणेन जातु ३५४५ यतोनम्यन्तरीकृत्य १९।३२ यद्वस्तुभुवनेऽनध्य पत्र प्रासादमड्वातः यत्रापि पितरो भद्रे! ४११७३ पर्वका दशलक्षाश्च ५८ हरिवंशपुराणे ४।२२५ यशोदयानीय यशोदयाढ५३५।५७ युक्तियुक्तमुपन्यस्तं १७१५० योजनानि हि तावन्ति ४।२३७ यश्चचार चतुर्वेदस् २३:३९ युक्तो रत्नलताचित्र. ५९०५२ योजनानि हि यावन्ति ४१२३४ यस्तीर्थ स्वार्थसंपन्नः १३९ युक्त्यागमबलादेव ७.१५ योजनानि विपञ्चाग- ५१६४९ यस्य चाज्ञाकराः सर्वे ३१२१ युगप्रधानमम्भोधि ४१।१३ योजनानि विनवति ५।१५० यस्य पल्लवतल्पोऽपि १४.८८ युग्मधर्मभुजो भूत्वा ७/६५ योजनानि नवोद्विद ५।१३७ यस्याश्च चरणी चारु ८।१० युनं च संघेन चतुविधेन१०।१६२ योजनानि दशातीत्य ५।२४ यम्यां यस्या दिशोशः ५९।१३ युद्धे रंध्रमसौ लावा २५६४२ योजनानि शितेरुध्वं ५।२२ यस्यानुपालनव्यग्रा' ४०।१२ युद्धे भेयस्तथा गह्वा ५१४१४ योजनाना सहयं स्यात् ५१६२ यस्माद् भूमिगृहे जातः २५।१३ युद्धे बद्धेऽककीर्ती च १२।९ योजनामा शतान्यक- १८९१ यस्मिन् भवति रागश्च १९१२०० युद्धे मिहरयं जित्वा ४७।२६ योजनानां सहयागि ४।५८ यस्योदयाच्छरीराणा ५८।२५१ युधिष्ठिरकुमारेन्दु योजनाना महमाणि यस्योदयाद्भवेद्गन्धो ५८०२५९ युधिष्ठिरोऽत्र माल्यन. ५११३० योजनाना महस्राणि ४॥४८ यस्योदयादयोऽवतु ५८०२६२ युधिष्ठिरोऽर्जुनो ज्येष्ठो ४५।२ योजनाना सहस्राणि ५.५० यच्चतुर्विधबन्धस्य ५६१४५ युधिष्ठिराय वीराय ४५।१०२ योजनाना सहस्राणि ५।४२३ पजूपि प्रणवारम्भ १७८६ युधिष्ठिराय ता. सर्वाः ४५०९९ योजनानां शते द्वे यागकर्मणि निर्वृते २९।३० युधिष्ठिराय सा दत्ता ४५।७१ योजनाना चतुःषष्टि याज्ञवल्क्यो वृतो वादे २१:१३७ युध्यमाने तथा तस्मिन् ३११८३ योजनाना सहलं तु याज्ञवल्क्य इति स्यात: २१३१३४ युवयोः पृथुसेनाम्या. ४२।८६ योजनाना सहस्रं तु याति राग श्रुतिश्चैव १९।१७३ युवराजः स ममुचिः ४४/२८ योजनाना प्रसिद्धेषु यात्युपाधिवशाद् भेद ७।१२०० युवानी तो ततो भुक्त्वा२७११३७ योजनानात लक्षेद्वे यात्वा दक्षिणतः कुण्डात् ५।१४८ युष्माकं पश्यतामेव ४७११२७ योजनाना तु लक्षका यादवा कोरवा भोजा ४०१४० युष्माभि. सर्वकालेन ४८।२३ योजनार्द्धन न प्राप्ता यादवस्य ध्वज तुङ्गं ५०४२ योजनोद्धृतविष्कम्भं ५।१२८ यादवाना सभाक्षोभ १।१०४ ये कपायकुशीला ये ६४।६९ योऽतिमुक्तक इत्यासो- ४/७५ यादवाना च माहात्म्य ५०।४ ये जम्बूद्वीपमिद्धास्ते ६४।१०९ यो नामस्थापनाद्रव्यर १७।१३५ यादवान्वयसंभूनाः ५०१२१ येऽनीतापेक्षयानन्ता. २७ यादवेन्द्रशिवादेव्योर योऽपि नेमिकुमारोऽत्र ४३७८ ५०१३ ये तु चारित्रमोहस्य ३११४७ ९।१२५ यो मरोचिकुमारस्तु यादृशी समवस्थान ५७४ ये द्वे पूर्वोत्तरे पडतो ५९७ योमावस्योपवासी या प्रत्यक्षपरोक्षेपु ६४।४१ येन तीर्थमभिव्यक्तं १४ येन सप्तदश तीर्थ योऽशेपोक्तिविशेषेषु या प्रवर्तयति स्तये १०॥९६ यामिताभ्युदये पार्वे योऽमो बाहुबली तस्मा १३।१६ पंडमो पोडश नागेन्द्रा ५१६९५ १४० यो हनिष्यति तं विध्ये ४५।११६ यामिनीपु मनीषिभ्या ४३१२१० ९.४८ या मिथ्यादर्शनारम्भ- ५८८१ ये लक्षास्त्रिशदेकोना यो हरिस्नेहराभारो ४११०४ यावन्तोऽपि वचो मार्गास ५८०५२ में प्रध्वम्तमहाध्वान्त- ५७१६२ योद्वी धर्माश्रमो धर्यो २३१४१ यावच्च मार्यते तावत् २१।१०७ योगस्थो योगभवत्यासी २११११४ यौवन स परिप्राप्तः ६०।१२७ यावच्चोद्धतयो युद्ध २०९८ यौवनं स परिप्राप्त ४७।२४ यावद्वानवती तपा ५३।२४ यौवनेन कृताश्लेपा १७५ या सम्प्रज्वलिने दीर्घा ४।२७९ योजनभूरिसहस्रनभोग ३९।१० [र] यियामवस्तु युक्ताना योजनत्रयविस्तारो ५९/४७ रक्तान्तः पधपत्राभेर २३।१०३ युक्त प्राप जिनो जन्या ३।११ योजन तु अय क्रोशा' ४१३४१ रक्नायाश्चित्तमादाय १४।४७ ५१४३० ५/४६४ ५११३७ यूयमेव स्फुट दूत ३४१९० ११३७ ये रागहेतवो बाह्या ६।३० योगनिःप्रणिधानानि ५८.१८० योऽयो विद्याघराधारो ९:१३१ इलोकानामझारायनुक्रमः राजपुत्राश्च ते सर्वे रक्तापाण्डुकयोदय ५.३५० रथपष्टिसहस्रस्तु ५०।१२९ राजक्षत्रोग्रभोजाद्यास् २२५२ रक्तया सह रक्तोदा ५।१२५ रथमथचतुरश्वं ३६१४८ ३३।१६४ रक्तमालाधराश्चते २६७ रथ: पद्मरथस्यप ५२।१९ राजन् ! वस्तु विसंवादा १७५९४ रक्तपल्लवसन्तान ५।१७९ रथस्यो मागधो युद्धे ५२।३ राजतीन्द्रध्वज. सोऽयं ५७1८५ নকিৎলামী ६०१२१२ रथं हिरण्यनाभ स्व ३१६६२ राजा राज्यं च मलिने १९८४ रक्तहस्ततलो श्रेष्ठ ८1१८ रथं नोदयतः क्षोण्या ६११८३ राजा मेघपुरे चैव ३३३१३५ रुक्मिणीसत्यभामाद्याः ६११४० रथं दिव्यास्त्रसंपूर्ण ४११३७ राजा राज्य नियोज्यतो ६०११९ रक्षणार्थमनर्थ म्यः ७।१४४ रथादुत्तीर्य विनत ४७१५० राजा प्राह प्रिये ! वा! २७/३३ रक्षता बलकृष्णौ च ६११७९ रथः केचिद्गज- केचित् २२१६ राजा दशरथश्चापि ५०।१२५ रक्षिता दात्रुमात्राहं ३०१३ रथ. पष्टिसहस्त ४२२८१ राजा सिंहकटिः प्रोक्नो २३१६९ रक्ष्यं यक्षसहस्रेण ११७८९ रथ्याभिरभिरामान्त. ४१।२४ राजा मनोहरोद्याने ३४।८ रक्ष्यता रक्ष्यतां साधो ६१६२ रन्ध्र व्याघ्रवदापत्य.. २४/२२ राजा हिरण्यनामस्तु ५१११३ रङ्गसेना च गणिका २९।२६ रममाणोऽद्य तेनाहं २०२८ राजा मेघरथः सिंह- ६०।१५४ रचितः परिवर्गण ९।१६७ रमिता यदुमूर्येण २९॥६८ राजा सभार्य इभ्यश्च ४५।१०३ रजतं पूर्णभद्रास्य ५२२० रम्यं नागलताश्लिष्टः १४.४९ राजाद्या प्राब्रजन् श्रुत्वा २८।४९ रजस्तिमिरिकापाय ५९।८८ रम्यकाद्यप्टमं कूट- ५१०१ राजा तत्र तदा धीरो ३११९ रज्जु. प्रथमरज्ज्वन्ते ४।१७ ९।४५ रम्याङ्गनाश्च कुलशेल- १६०२० राजानश्च तथैवान्ये रज्जुद्वितीयरज्ज्वन्ते ४।१८ ररक्ष गर्भ प्रमवव्यपेक्षः ३५।१८ राजीमत्यास्तप प्राप्ति ११११४ रजोबहुलमारूक्ष राजीमत्याश्चारुराजी. ५५५१३४ रविणा शौरिणेवागु २२११४१ रटत्पटहराबशब्द- राजोपरिचर पृष्टम् १७।१४८ ३८.४६ रविनिशाकरयोरभया- ५५३११४ रणन्नूपुरचारस्त्री १४।१४ रश्मिवेगोऽन्यदा यातः २७1८३ राज्ञः स गन्धमित्रस्य २७।१०२ रणमुखेपु रणाजितकीर्तय.५५।९० रश्मिवंगोऽमृत' करपे २७.८७ राज्ञा मद्वचनात् ज्ञात्वा २४।५८ रतिव्यतिकरम्लान २१११६ रसभावविवेकस्य २११४८ राज्ञा विज्ञाय चाज्ञप्ते २८।२७ रतिमिव रतिमालो रसकूपे परिवाजा. २१११५३ राज्ञा ह्यानाय्य पृष्टोऽमी ३३१५३ रत्यरत्यभिधे वोभे १०१९४ रसाभिनयभावाना २२११५ राज्ञा कोटिपु कालेन ४५.१० रत्नचित्रतटाः सर्वे रमाया मूलमासाद्य २११८३ राना स पोडशसहस्र गुण-५३०५२ रत्नकाञ्चननिर्माणा. ५।३६२ रमितचूतलतारसकोक्लिा५५१३६ राज्ञी चाप यात्रीका ३३११६५ ६०११४४ राज्ञो मोजक्वृणेर्या १८।१६ रहम्यावाह्य चापच्च्य २९।१५ रत्नचित्राम्बरधरा १४।४ रहम्यकृतवक्षसा २३।१५३ १६२१ राज्यस्थितः स हरि- रत्नत्रयसमृदस्य ६११०७ रहोऽभ्याख्यानमेवान्त- ५८।१६७ राज्यस्थोऽपि न मन्तुष्टः १९११०३ रत्नचिह्नाभिधानोऽस्मात् १३१२१ राक्षसोग्द्य महाकाय. २७४१५ राज्यं प्रज्ञप्तिविद्या च १९८२ रन्नप्रभादिपु नेयं ३।११६ राक्षसास्त्रं परिक्षिप्त ५२।५४ राज्य मानसर्वच २४.७१ रलसिंहासने तस्म रागादीना ममुत्पत्ता. ५८१६१ राज्यं यदनया युक्न ४३।१६७ रत्नाञ्चननिर्माण: ४११२० रागाद्रकृतचित्तत्वा. २३१३८ राज्ये पुत्रशतं प्राज्ये ५८।६९ रत्नप्रभा यथा भाति ७७१ राजक्षयोग्रभोजाद्या ९.१०० राज्य भोजर वृष्णिश्च १८१७९ रलोच्चयो दिशामादिर् ५।३७५ राज्ये तो यौवराज्य च २११२२ राजधाग्यश्चतुस्त्रिशत् १० रयमपत्य हम्तेन ५४.६७ राजा को रक्षणे दा. ९.९५ राज्य मस्याप्य मा रथमारोप्यतामा राजस्त्रानरमंघाती ६१।४३ रात्री प्रतिभया तस्यो १८।३० रनपुरमानन्द २२१९३ राजयुद्धक्यामरता. २८३ रचरशान्विनी राम. ५०१११७ राजलक्षणयुक्तः स ४५।८८ रामकृष्णमुने महो ५१२८ रत्नसंचयज कुन्यु समाश्या प्लष्ट ६० हरिवंशपुराणे ४।१३७ ४।२०१ रामदत्तासुतौ राज २७१५४ रूपविज्ञानपाशेन २२।१६ लक्ष्मी स तत्र निक्षिप्य १८२ रामदत्तापि सम्यक्त्वात् २७१७५ स्पमादिरधि यत्र पञ्च-३४।८७ लक्षकात्र सहयाणि ५२८३ रामदत्ता प्रिया तस्य २७१२१ पलावण्यसौभाग्य ४७१५३ लौका भोजनानां स्यात् ४१४३ रामदामोदरानन्द ४१६५० रूपयौवनसम्पूर्णा २९७ लक्षवन विनाशीतिः ६०१४४७ रामभद्रमताना ३३३९५ रूपमौभाग्यतो ह्यन्या ४२६३१ लक्षका पञ्चपञ्चाशत् ६०।३८८ रामिद्वयान्तराले स्यु. ५।६२७ रुपलावण्यसौभाग्य. १९।१२५ लक्षा नरकभेदाना ४॥७३ राष्ट्रवर्धनराजोऽपि ४४१३२ रूपलावण्यसौभाग्य १९६८ लक्षाशीतिसहस्राणि १०.१४१ राष्ट्रवर्धन इत्यासीत् ४४।२६ रूपं नाम च तस्यासौ ३०१२७ लक्षाविंशतिरद्दिष्टा ४।१९७ राहुभद्रमुने. पावें २७१५६ स्पातिशयसम्पूर्णा. ४५।१७ लक्षाद्वानवतियंत्र १०१४० रिङ्गतामपि सप्तव ७.९३ रूपातिशयतो लोके ८।२०५ लक्षा पर्विंशतिज्ञेयाः ५७११३६ रिपुरयमिह कसो ३६।३८ रूपान्तराः पञ्चदशाव. ३४।७२ लक्षा नवसहस्राणि रिपु कालमुखं प्राप्न ३११९७ रूपक कृत्रिमः स्वर्णर ५८।१७३ लक्षा द्वादश-त्र्यंशी च ४।२०५ रिपोभयात् पत्र वियो- ३५४६१ ४।२०६ रुपि द्रव्यमरूपं च १०६६८ लक्षा द्वादश वर्चस्के रिप्यका [ हुप्यका ] १९।१६४ रेजे शाल्यादिसस्यौधर लक्षा दश पडस्योक्ता ४/२०७ ३१२५ रुक्मिणी तु शिर.स्नाता ४३०२९ ४।२०८ रेमे प्रियमुसुन्दा २९/७१ लक्षा नवसहस्राणि रुक्मिणी रोक्मिणेयाय ४८।११ रेमे काम स कामिन्या १९७६ लक्षास्तमः श्रुतेरष्टो रुक्मिणीहरणं भास्वद्- १११०० रोधो नितम्बगलदम्यु १६।२४ लक्षाः सप्तभ्रमण्यासौ ४।२१० रुक्मिणीजाम्बवत्यौ ते ४७५१३५ रोहिणी देवकी पूर्वा ६०११२३ लक्षा: पडेव विस्ताराः ४२११ रुक्मिणी परिणीयासो ४२।९६ रोह्याया रोहितास्यायां ५।२७६ लक्षाः पञ्चव चान्ध्रस्य ४१२१२ रुक्मिण्यास्तनुज दृष्ट्वा ४३३२२७ रौक्मस्य रक्मिणोऽप्यने ५।१०२ लक्षाः सप्तसहयाणि रुक्मिण्यापि ततः पृष्ट ६०१२५ रौद्रध्यानं स दध्यौ में १०७६ ६११७१ रुक्मिण्यादि हरिस्त्रीणा १२११८ रौद्रं दाहोपसर्ग ते ६५।२१ लक्षाः पञ्चदशाशीत्या ५।४३१ रुक्मिण्याः सुतमालोक्य ४३६४१ रौद्राध्यानाविलात्मानो ३११० लक्षाः पट् च सहस्राणि ५।५४४ रुक्मिण शिशुपालस्य ४२१७८ रोधिरं युधि सानिध्य ३११७१ लक्षा. पोडशसंख्येय- रुक्मिीति तनयस्तस्य ४२।३४ ४/२९६ लक्षाः पड्विगतिः प्रोक्ता ४।१९१ रुवमी विदितवृत्तान्त ४२१८० [ल]. लक्षाः सप्तदश प्रोक्ता ४१२०० रुचकादिवरद्वीप ५।६१९ लक्षाः पोडशविस्तारो ४।२०१ लक्षद्वयं चतुर्थ्या तु ४।१६४ रुचवा दिक्कुमारीणा ८।११६ लक्षा:पञ्चदशश्यंशो लक्षद्वय सहस्राणि रुचिर च तथाकंच ५।४५० ६।४६ लक्षास्तिस्रो हिमस्यापि ४।२१४ लक्षभागं स पल्यस्य ७११५५ रुद्र क्रूराशयः प्राणी ५६१९ लक्षण द्विविध बाह्य लक्षाश्चतस्र उद्दिष्टास ४।२१३ स्द्रदत्तः पितृभ्यो में २११४० लक्षण द्विविध तस्य लक्षाश्चैव चनु पष्टिर् ५।५६६ रुधिरविलिप्नगुप्तपथ. ४९।३२ लक्षणं द्विविधं तत्र ५६०२१ लक्षाश्चास्या. परिक्षेत्र. ५१५४२ रुधिरी मधुरक्पिर् ३११६२ लक्षण द्विविधं तस्य लक्षाश्चतुरशीतिश्च ६०५४० रुद्र चन्द्रममच्छाय ३२।२ लक्षण रक्तगान्धार्या १९६२३७ लक्षाश्चतुरशोनिस्तु ११:१२९ रुष्टयो झरजालन ४२१९२ लक्षणाना ममस्ताना २३।१०६ लक्षाश्चतुरशीतिर्या रुक्षाशीतलविद्ध ६३११०८ लक्षया पर्वतरुद्धं रूढया प्रियावादाच्ये १७५१२४ लक्षद्वयं विभागस्य ५१४९९ लक्षाश्चतुरशीतिस्तु १०११११ ४१२१५ लक्षाश्चतुरशीतिस्तु ६०॥३१७ रूपशोमाममस्तेयं. ९।१७ लक्ष्यलक्षणयोगेन १९५७ लक्षाः स्वर्गविमानाना रूपलावश्यमौभाग्य- ४५।१२२ लक्ष्मणाभवनाभ्पण रूपयौवनलावण्य- ४४॥३१ लगाश्चतुर्दशाष्टाभिर् ४।१२८ ८४२ लक्ष्मीमत्यात्मजं राज्ये ९४२१६ लक्षास्तियस्तृतीयाया ४१६३ लक्षा: पणवनियंत्र ६२८७ रोरुके धनुरुत्सेधम् ४/२०२ १०१६७ सव्यसमा ममुत्थाय वचकूट विनिर्दिष्ट- इलोसनामकारायनुनमः लशाश्चतुर्दमोवोकताः ४।२०३ लेखायमिति तत्त्वार्थ- ४२१६४ वायामः कुरूणा स्याद् ५।५२७ लक्षास्त्रयोदय यंश ४।२०४ लणवैदिक्या तुल्या ५।४१० वक्रान्त धनुपा पटक ४॥३०३ लघु निरध्य रथं सहम• ५५।८६ लेभे मान्तानकं तस्मात् ११३१७ वक्षारापामवृद्धिस्तु ५२५५२ लघु विमुच्य मृगान्मृग-५५।१०४ लेभे नागगुहायां च ४७१३४ वसाराणा च तासा च ५।२४ लघु मर्मत्य नतानत- ५५।१०२ लेभे च सोडवलग्राम २४/२५ वक्षोभिश्च क्षमंराधाः २३१८० लव्योष्टप्रसेनाद्या १०।११४ लेक्ष्यायाः परिणामश्च १०८४ वक्षोद्वयसमुक्षिप्ता ५३।३७ लवनीयो च तो नित्य- १९६२३६ लोकमंस्थितिरनाद्य ६३१८९ वचनमनस्तनुभिरभियः ४९।१९ लता व्यपनयन्तीम्चा ११११०१ लोकपालास्त एवान ५।३२१ वचः पत्युरसो युवा लव्यपोडशलामोऽयं ४३३२३२ लोक्मस्थानमत्रादौ १७१ वचौऽनन्तरमैपाहं व्यप्रत्यागया कन्या २९।१९ लोकस्य प्रतिबोधार्थ १।१५५ वोहरवचः श्रुत्वा ५०४६ लन्यवानों स्पा गत्वा २११४५ लोकं वीक्ष्य तु तत्रामौ १९१२१ वञ्चनाप्रवणं जीवं १०१९५ २४॥५४ लोकस्य मार्यमाणस्य २४॥४४ वज्रमूल. सर्व ५.३७३ लम्यस्त्वमचिरणव १९९२ लोक. शौर्यपुरोद्भवोऽपि ३२।४४ वच वचप्रम नाम्ना ५।३१९ लब्धपोः साहशौर्यादीन् ३१।२५ लोकाञ्जलिपुटालोर ९।८७ ५।३३० लव्यं दिव्यं रथं शुभ्रंर् ४१४६ लोकानामेक्नायोग्य ५९।०३ वश्व चमरो वन- ६०३४७ साधासत्यफले सद्यो १७४१५५ लोकाना भूतये भूति- ५७११६७ वचनाभिरभूदायो ६०।१५१ लम्यादेशा जनन्याः सा ८1१५२ लोकान्धीकरणे दक्षा ५२१७५ वयमुष्टः सुभद्राया लब्धादेशाम्तलस्तुशम् ४७७० लोकालोकविभागोक्ति ४८०३१ वचारविचारिण्यः एम्पादेशा तपेन्युक्त्वा २६५५ लोवालोकप्रकामाद्यो ५७१११३ वचमहननोनन्त ३४।८३ सल्या गुन्धेन रम्नं १९।२७१ लोरे प्रतारको भूत्वा ११५९ वनसेन इति स्वानस ६०।१५८ लम्पिाचवोपयोगाच १८।८५ लोके भावनदेवानां ८1१२० वचात्ममंहनन-गहन १६.३४ लत्यो वर्णविनोन १४१७६ लोकोऽयमैक्नो भूयान १४:३८ वायुधाय सा दता २०१९२ सत्यनिद्रौपदीवारी लोकोपालम्मता भीत्या ३३।२० वाघोपि विन्यस्य २०१४ भनारिनिर्वाण ४।३८० लोभसंज्वलनं मूक्ष्म ५६१९६ वसायुधचरमच्युत्वा २०१२२ १८१६३ लोलपच लोलुपचाप ४।०९ बजामो वयबाहुरच १६॥२३ नलारविश्यम्ता ८1१०९ मोना निपतिता दृष्टि १४॥३५ वणि मुमित्रदत्तोम्नि २७१२४ राम्य तुला ४।२१६ लोले धनुर्दगंवामी ४॥३१४ बत्मा मुवरमा महावामा ५२४० रम्लरे तुजपायय ४॥२९३ लोहरवचोरयन्त ५०॥६२ यत्म बन्सेस्वरणाद লাবিধির सोहिनासमय पूर्व वदरिद्यापरी च २१६४ सोहिमाचश्य व वनावरमानम्य ५८।२ लादेन ये रिक्षा ६०१०८ लोरिनाम्जनहारित- वामि गणतंजयिन् ४०३४ सोशनिया ललित वप्नाना.मनपा- सासगारंग. ६३१०९ सोनिया. पुरोमान्नि ५.१२६ बनाम्यातिविस्तारी १८० मासाभरीव निग्या ९१ धनोगडाको माम पायोनिम्न [य] बनौहरियाना ६१: PIR: माघारमा ३।११५ बाम मोरगरपो ६४.३२ बनमहिन निग्य विमर्म ४ म मानवेगामा १८५ दागन पुगोलो को ६४१८३ बनमाने चिम्ने बमाधोना पापम्म ४५।१५६ बनमालानुगत ६१८२ वाः योगदर ग. १.१५. वनगिनुप- गिगापनमस्त ५८४० व भूमरिमन्न 4GLY नाशिन्दा- लम्र यादमा एवमो सयमम्वाद स्यानो माममा सादर नमुनाकामांना ८१९: गुनिभर १९३५ यपरंपर गुम्परा गया पित रिगपुराने ११ मा ५५०५ पनि पमान गरी म. मा समगीनामा गम aiबिनेदार Ric ११८ laganो १.८ मामा Anit बागेमा सानिमामा १६. वामन वापर परेम: माग प ... .१८ परम आ यायमा WRITE ४पनि Entent their Pus रेपER वातामा दामो ४॥२८१ बरेjan irrifm. ४।२९२ गुना ब. in यार par IAL REMIRET It marri 4partian REATM..Intent Antim " Taratोमा urinair. 10. in ap arati ना NTERTAIT .. 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लोकानामकारायनुक्रमः वादी चापि च संवादी १९:१५४ विकृत्य दिव्यमामा ४०।२९ विनहार बने हृद्ये १४।५० वाधेः क्षीरवरस्येशी ५.६४२ विक्रान्ते मप्तचापानि ४।३०५ विजितदीपपायपरीपद १५४९ वापीकोणममीपस्था ५।६७३ विस्यानामृतधारं च २२।१०० विजित्य भारतं वर्ष ११८५६ वापीपुष्करिणी दी ४१०२१ विचित्रभक्तिध्वज ३७।१८ विहार पुनर्देशान् ६०.१२५ वामदेवः सुतस्तस्य ४५।४६ विचित्रकीटनासत्रित ५८1१०० विज्ञाय वलदेवोऽय- ६२।९ वामपक्षमुपाश्रित्य ५०११२३ विचित्रपुप्पाम्बुजवण्ड. ३७६३६ विज्ञाय मुमुखाकून १४/७० वामे जानुनि विन्यस्य ६२।२८ विचित्रस्योपरिस्थेन ८५१८४ विज्ञेया: पबद्दलाच् वायव्य व्यमुचच्चस्त्र- ५२।५१ विचियरममस्पर्ग १४१४२ विटपकरपि मालतमालज-५५।४७ वायव्यवारणास्ती ३१३११८ विचित्रकुण्डलाटोपा २६।१२ वितकः कर्कगं दृष्ट्वा ४५।१३२ वायुगर्मा सुवाच १२१५७ विचित्रवर्णविम्तीर्ण ४२२३ विदर्भपनिपुत्री तन् ४२०५० वायोच्छ्वामनिस्वामी ५/४४८ विचिन्त्य गड्वाकुलिनम्न.३५:३२ विदिक्ष शाकर्णास्तु ५।४७२ वारयन्त्यनुभादा ५८७ विचित्रीपधिहस्नाम्नु २६।१० विदिक्षु क्षुद्रपाताल- ५।४५१ वाराणमौ च वर्मा च ६०२०४ विच्छिन्नमम्प्रदायस्य ९।६७ विदिक्षु मनमा हमी ५।३४८ वाराणसी ममासाद्य ३३३५९ विजयं वैजयन्त च ६।६५ विदेहवपरप्वने ५।२३१ वाराणस्या पुराणार्थ. २१३१३१ विजय वैजयन्तं च ५३९० विदहक्षेत्रमध्यस्यः ५।२८३ वारिधारारफुरधारा ९८३ विजयं वैजयन्तं च २२२८६ विदेहे चित्रकूटाम्पः ५।२२८ वारितीर्थमवगाह्य विजयस्व महादेव ५७।१४४ विदितहरिममोहम् वारिवन्धैन्यदा गग्य- २४॥२८ विजयस्यापि पट् पुत्रा ४८०४८ विदिनरिपुविचेष्टाम् ३६११३ वारीबन्धमिवायात ४६३४ विजयोऽचलः मुधर्मा. ६०२९० विद्या माधयनम्नस्य २४१८० वारुणीकाञ्चनास्ये स्था ५।७१६ विजयःपोमान्दानि ६०१५१६ विद्याशापाबलेनोल्या १९।१०८ वारुणीवरवाघींशी ५.६४१ विजयो विप्र तं कीतिर ५७१५७ विद्यादान बालचन्द्रा- वारणीवरनामानं विजया वैजयन्ती च ५।६६० विद्यावलेन निम्मोप ४७११३० वामणी सा पुराणापि ६१५१ विजयोन्दगतं लक्षा ६०.५२० विद्याविकृतगन्येन ४७१७६ वाणीमतिनिपन्य- विजयश्रीरिति स्थान: १२६१ विद्याफरिवर प्रार वारे पप्ठे तु तन्निष्ठ- २८०२३ विजयादिचतुविका ५७५१०२ विद्याधरमवं पूर्व १२।१५ वामुग्रनपमा ६३।११३ ५.४१७ विद्यानां वृक्षमूलाना विजयादुत्तराबाया २२।८३ वा निवेदनायाई २४।७४ विजया वैजयन्ती च ५।२६३ विद्याना पाण्डुकीता च २२०८० वार्ता प्रादुरभून्पुर्या २९/१३ विजयामिजमा जंगी ५७३३ विद्याधगंचिता विद्या ४७१२२ वार्यमाणं तु तच्चक्र ५२।६५ विजया वैजयन्ती च ८1१०६ विद्यानामदिनिम्बष्टी २२१५६ वाणेय नपानेन विजयाजिरकोणेषु ५७१९४ विद्यायराम गच्छनि ५।६१२ वासुकिमिवाभियो ४५।२६ विजयाकुमारास्यं ५।२७ विद्याधरजनो धीरी ९।१३४ वासुदेवश्चक्रे विजयतिस्थिति पित्रोर १३१०१ विद्युत्कुमारनामानी ४०६४ वामुदेवस्य पुण्येन ३।३५९ विद्युत्युमार्य एताम् ५७२१ वासुदेववचनाजरा ५७।६३ विद्युढे गोपि गौरीणा २६४ वामुपूम्यजिनाधीयाद् ३१५७ विजयामाराध्य ५।१११ विद्यत्यमो नरपतिर ४८४७ वाहमानन नामो ४११०४ विजयागिरी रम्ये ४१२१ विद्युन्मनः मुवकरच १३१२४ विकाममगमद विधी. ४२॥१०२ विजयो हिलामास्यो विदपातलोई भी ६२।३५ विरीधनीकर ३८/२६ विजयन जयन्ताभ ५५११७ विटतालपासोरि ६२१३४ ३८४० विजया वैजयन्ती च ८११५ विधाय च मुरदिए २८॥४२ वित्य सौला वेग ४३१११ विजय विहश्यप विधाय पूर्ववय्यूटी કેસર ४१।१८ विजयापु सवें ६३६४६ विजयादिपुरद्वाः विवृष्य मुरमायया हरिवंशपुराने विधिदेवदिशामा ५८१८६ विमलानन्नमानीना ६०२७८ विनिम्न सहनानि विचिनानने वरहारिन्५५।१३२ विनलार नमो नित्य -२२॥३५ विजिन्तु महादिभु विधानामिह नपा- २०१२९ विमलामलगाईला ५०४९ विगत्वभिमानुजाः ३।१५५ दिनमः हुन्नु कम्बो १०१५: विन्लोनदिमः १४. विदिस्ते स्मानि विनोतु कृलामो ६०१९२ विमानं काम कामः ४१०० विपतिस्तु महवानि ६०३६० दिनमश्री स्थाना ६०.९. विमाननापामरनाथ- विसनिस्व अम्बिम- ३८२ विनि नृत्य महारयात् २१०९९ विमानानि वम्बिग १३५ विवि दर्यानि ६०५२५ विनिनालिउनत्रामा ५४११६ दिमानानि ममारता ८1१३६ दिधत्वाविशवायुजान।३१३ विनिम्ततः पुष ४१२१ किमाने श्रीरभ वर विशेषको नवामोसो ८/१९३ विनिद्रा रोदनादन २४॥५ दिनानश्च महामानेर २०५५ विशस्य तस्य चरितस्य १६७८ विनीतः नंबरचोमा- १२०६३ विनुतनारदेनोनी ४१३२ विशिष्ट परिहारेन Ents दिनीता मरदेवी च ६०१८२ विमुक्तमलापकों ६०५६५ विगु दर्शन पत्र ४१. दिन तु पञ्चाम ४।२३३ रिमुवोपचंदन ४२. विमुदतमदृष्टयो २८.१६ दिन्दन् मोगरलं मूरि ४५१ दिमुच विपतः गौरि २६।२८ विगुदान्दसम्भूताः ४३।२०३ विन्दुमारः मुनुम्दस्मात् १८२० विपदतात्य भुदो दशको- १५।२७ विश्वस्तपसाः पुत्रो ४४०५ विन्ध्याप्टेभिचन्द्रप १७६३६ विपद्भ योनिमीमङ्ग- ५७१३४ विश्वसेनस्ततो जातः ४५१८ দ্বিধাক্কি २०४६ विनोनिता मया नून• ४३६४ विश्वाश विशवायर५८०३१२ विधाडसपोपरा ३८.११ विरचिना बुनुमविनिधः ५५५४८ विश्वानलस्तु दशमे ६०५३५ विपुलराग्यादस्थिति ५५४९४ दिरत्या विरतिनिधा ५८११९९ विश्वावमू रविः मूर्यः १९९ विपुलमाया प्रगत ४९।४१ विरयोहत्य पोन्डोजी ३११८८ विस्वाभ्युदरसोयानां १८४ विमुलोगिता देते ६०३४ विरह दुःखमपोह्य ततो• ५५१२८ विश्वाः सतोरणा लपान५७०३१ विगुलन्दिनन- विरागस्वापि निय्यादा ३३॥६४ विश्वास्य विश्वमोसौ ९।१३० विसस्य मोमदेवस्व ६४१५ ४११२८ दिवान् विद्याधरान् ३४१२३ वियोगच में मानूदू- ५६३१६ विस्गवस्तूनां १८१६४ विश्वपश्वरवात्तम्मान २८०११ विमपि २३९८ विश्व वश्वानरा यानि ५९॥६५ विकी तदा माला ४५1१३६ बिरलाप च हा पूर्व ४३॥६३ विथमन्तधुना गत्वा विबुनु पतिः पत्नी २४॥६२ विलम्बिनसहवाई ५९।२४ विषम्य यत्र ते सौम्या ४६१७ दिवुद्धा च प्रमाने तान् विद्वितक्ष्मान्त ३७८ विधम्म चक्ष वीरौ ६२०१५ दिबुद्धा च समायो ४३१३० दिलासमिति कुर्वन्त्या ४३१६५ विपकष्टक्शस्त्राग्नि- ५८।१५१ विदुद्धो देहपामा २९।२१ विलिस्य पट्टके सष्टं ४२।४५ विश्यम्या मनोडस्य दिबुध्य सहना मात्रा विलोक्य मनसरचोरों १४॥९५ विपते स्म वियोगविपं १५३ विबुध्यस्व विद्योपाय ८1.3 विलोक्यमानमालोवर ६५३८ विषयायामवृद्धिस्त्र विनय कौरव राज्य ४५६४० विवाहमङ्गलं दृष्ट्वा ४५१४७ विषयापामवृत्यायो विमन नरेन्द्रोसो विवाहारम्भममय ६०१२१ विषये पुष्पलावल्या ४३.९० विभ्रान्नाच तया अम्तो विवाहसमवस्तेऽपि ४२।१६ दिवादविपति विभिन्नमपि सप्नया ३८/२५ विविधकरणदशी ३६१२१ विष्कम्भविश्य ५११०४ दिनुमति प्रति दा. ५५.९३ विविगारिका भूत्या ४१४२ विष्णगोतामोद्देश १९।२६४ विभूत्योदया नये ५।१०९ विशयकारिणी चैव २२।३१ विष्णुरूचे स्वघोगस्था २० विमून्या परयागम विशल्दारमं चास्त्र २५।४१ विप्नोविष्णुराजश्च ६०।१९२ विमलाप नमस्तम्भ ११५ विधागायनमाखाभिः ७१८३ विमुष्टारच पयास्थान ५६१४८ विराटनगरं जातु १॥५४ वीर्यप्रदादपूर्वार्थ- ४० ६५ ५.९९ वृषाद्या धर्मपर्यन्ता इलोकानामकारानुक्रमः विमृष्टचापि गङ्गायां २४॥३४ वृतवृदय विगुदात्मा ९५१७९ वडूर्ये विजया देवी ५७०५ विस्मयं परमं प्राप्ताः ४८।३५ वृद्धः शोतमयूखस्य ९।२ वैष्टूर्यमयनीलस्य विस्मितः स्वयमेवायो १९६६५ वृद्धमेवाविवृद्धा मे बताइये ऽस्ति नप. श्रेण्या २११२२ विस्मृतन्यस्तसंख्यस्य ५८।१६८ वृपमस्य विनीतायां ६०।२१५ वैताइयवृत्तवताड्याम् ५।५८८ विसधा भयमुझिवा ५४।२८ वृपमस्य श्रेयसो मल्ले: ६०।२५६ वैदिकार्थविचारोज्यं १७१९५ विस्ताररहिता सूची ५६४८६ वृपभस्य सुती भोव्हं ११।४८ वैनयिक विनेयेभ्यः २।१०३ ব্রিগামী ५.३ वृषभश्चत्रकृष्णस्य ६०.१६९ वैपरीत्यं ततो मात्वा ४१५८ विस्तीर्णोन्नतगम्भीर- २३१७२ वृषभ भरतश्चक्री ६०१२९४ वपञ्ची वैणिकरचंव २२।१३ विहरन्नन्यदा यात: २७१७ वृपस्य वामुपूज्यस्य ६०१२८० वैभवी विजया ख्याति ५९।६९ बिहरनय नाथोऽमो २०५७ वपमल्लोशपाश्र्वाना- ६०२५३ वैभारो दक्षिणामा विहरत्युपकाराय ३१२१ वृपच्छग्रस्थकालोऽत्र ६०३३७ दयावृत्त्यप्रवृत्तो यः १८।१५६ विहारा तु गृहीतायां ५९१०८ ६०३२४ वैयावृत्त्यमहानन्द १८.१५९ विहाराभिमुखेऽगाप्रान् ५९१ वृषो धर्मश्च शान्तिश्च ६०।१६४ वरवमिति ज्ञात्वा २०११२६ विहिनतत्समयोचितमज्जनो ५५।७३ वृपो दममहौस्तु ६०३२८५ वगावस्यापुनासिद्धया ६०२७० विहृत्य पूज्योऽपि महीं ६६।१४ वषोऽजितोऽपि च श्रेयान् ६०।२७६ वैशाखस्येव शुदस्य ६०१२२७ विहृत्य चिरमुद्यानं ४३३१८ वृष्णिदीक्षा तथा राज्य १७९ वैश्यस्य धनदेवस्या ६४।११९ विहृत्य चिरमीशानः ६१।१३ वृष्णिरप्यागतो मक्त्या १८३३ व्यक्तियोग्यत्वमद्भावा- ५८।२२५ विहृत्य विविधान् देशान् ४५।११९ वेगश्रमागतस्वंद ३४.३० प्रजन्ति खलु जन्तवः ५२।९३ विह्वलान्तःपुरस्त्रीभिः १२॥११ वेगाद् वेगवती मात्रा ३०॥३६ प्रजनि नित्यमुने सुमुगिनः१५:१५ वीणा घोपोत्तरणो २०१६१ वेगाद्विपाद्य ता भस्त्रां २१।११० जिज्ञपत् ततस्तं सा २९४० वीणावाद्यविदग्धेषु १९।१३५ वेणुश्च वेणुदारी ता प्रतगुणमंयमोपवसनादि. ४९।२५ धोणावणमृदङ्गो ५९।१६ वेणुदारी च विक्रान्ती ५०८५ प्रताप्तिसमित्या ४७११ वीणा वशश्च गानं च १९।१४५ वेत्रासनमृदङ्गोर अतगुमशीलराशिरति- ४९१५१ वोतनीम्य प्रजाभ्यस्तै ४५।९५ वेदाध्ययननिर्घोप २३३२७ प्रतानां रायमुक्तेश्च ६४१७१ वीतशोकाभिधानाया वेदार्थभावनात्रात ४३।१०२ व्यतिक्रान्तेषु वह २९६ दीरनिर्वाणकाले च ६०1४८७ वेदाध्ययनमक्तानां १७४१ व्यतीतगोक्नामान्यो ६०१६३ धोरस्य देवलोवाः ६१२५५ वदिकान्तरदेगेषु ५॥१८३ व्यपहृतभूषणयगिय ४९/२२ वोरस्य गणिना वर्षा ६०१४८२ वैदिकावदवीयोपु ५७०६० ध्यपनीय प्रियारलेप- ३०१४ वीरस्यरस्य निर्वाणः ६०१२८२ वदिकाम्यन्तर कान्तं ५.३८१ व्यपगतेषु नपैपुवहुवतः १५६१ वेद्यते वेदयत्येवं ५८/२१६ व्यनिवानी जिनादेश- ६१४७ वीरस्यवस्य निष्क्रान्तिम ६०।३५० वीरक्वलिना वालो ६०॥४७९ वेदोत्पत्तिमुपास्यानं १२८३ व्ययिका शरीर वंद्यमेक मनुष्यायुर वीर ! त्रिपिपि ५६११०७ ध्यन्तराः मुन्दराकारा ५७१५६ ६३३१० वेलाया तत्र संमाश्य १४१७ व्यवस्थाया विधानावं ८२०८ वीरभद्रगुपचागात् वेश्ममूलगिलापोट ६१९२ व्यास्या प्राप्तिहृदयं २।९३ ५२०३३ २२. क्रियास्तु महयागि ६०४१४ व्यायपानि सप्तम्या- २०११८ चोरको होपलीकम् १४८० बैंक्रियाश्च मस्राणि ६०४०१ व्याधिमिथ्याखसरात- ६४४५ घोरागदे च पटके वचिश्यमेतदवगम्य भवम्य ४६५९ ध्यापी विजयविस्तारः अगोदरोबरहोमि ५४।६६ वैजयन्त्यं शिवं ज्येष्ठ ५१५८ पामियाशिमदन्नः २४० झादिन्छेदन भूमि• ५८॥१५० वैजयन्नादयो देवा ५।०२९ सामोहप पोरलो ४१०९ मोप्य रोहिलो त ३१॥२२ वंधारचापि शारीरा ११॥१४ म्याम्नि दुन्दुमयो नेहु. ५१६, वीराम्चो गद्गदत्तश्च पोरेश्वरति त्रा हरिवंशपुराणे व्युत्सृष्टापरमङ्घमन्तति ६६५४ शतावरभुजोद्धृतर् ३८.५२ समयति रिपुलोको शतानि द्वादशैव स्यात् ५।५३१ शमितशोकभरा वचन- ५५।१३३ [श] शतानि नव धर्मस्य ६०१४०४ शमितान्यक्षाया ये शकटाकृतयः सर्वे १११११२ शतानि नव तथापि ४.१४९ गम्बः क्रीडामु सर्वामु ४८०१० शक्तस्य शातने शेप- ५६७४ शतानि नव संकानि ५७५ नम्बाधास्तु तदाने के शक्तस्योपेक्षमाणस्य १८।१४८ शतानि मव गत्वोच ६१२ शयने सर्वतोभद्रे शङ्कुकर्णा महीपालाः २३।१०१ शतानि नवविंशत्या ६०१५३३ शयनासनवम्तूनां १११११८ शङ्खनैव ततः कर्णे २०६७ शतानि नव विज्ञयाः ६०४२६ शय्यासनविधौ काश्विद् ८.५० शक्रप्रसनादेत्य १२।३० शतानि पञ्च तुर्यस्य ६०॥३७१ शरः पपात वचामो ११७ शकचक्रिगणेशत्वं ३४०६३ शतानि पञ्च कौमार्य ६०१५१० शरदभ्रावलीशुभ्रे ८1५७ शक्रस्य लोकपालाना शतानि पञ्चविंशत्या ५।४२ शरद्वीपश्च राजासो ४५.३० शक्राज्ञया प्रतिदिन १६२ शतानि पोडशंव स्युर् ६०॥४१५ परभसिंहवनद्विपयूथपान् ५५।९१ शकुनिर्यवनो भानु ५०१८४ शतानि पोडश स्याता. ६०१४२२ शरान् शत्रुजयोक्षिप्तान् ३१३९५ शवनुयु' सुखमाहतुं ६५।४९ शतानि पोडशाद्री तु ५।१५४ शरावपर्वते लेभे ४७१३८ शङ्खचक्रगदापाणिर् ६५४५३ दातानि सप्त पञ्चाशद् ६०४२९ शरीरभोगसंसार ६४७ शतपनो ज्वलन्मौलि. ५९।६३ शतानि सप्त गत्वोल' शरीरपञ्चरस्यास्य ५८०२४७ शह्वभेरीहरिध्वान २१२७ शतानि सप्त कालेन ३१४८ शरीरमपि संन्यस्त ९।१२० शववच च नामान्तं २२०९६ शतान्यवधिनेवास्तु ५९६१३० शरीरमशुधिर्मोगाः ५६४६ शङ्खश्च शङ्खखचितस्य च ५३।५० शतान्यद्धचतुर्थानि सहस्रा-५।५२२ शरीरं दर्शनं ज्ञान १८.१५४ शहतूर्यरवस्यान्ते ३१।१९ शतान्यर्द्धचतुर्थानि ५१५२० शरीराकृतिनि तिर् ५८०२५२ शङ्खाना निनदं श्रुत्वा ५१।२१ शतान्यष्टो जयेनामा १२।५० शरीरान्तमलत्यागः २११२६ शह्वावर्तसमग्रीवा ८.१९ शतान्यष्टो महस्राणि ६०१३७२ शरैः शरान निवासी ३१०९१ शङ्काविपममापनान् शतान्यष्टादशोत्सेधो ७११७१ शर्मा च कृतवर्मा ६०११९४ शङ्खो यातोऽन्यदादाय ३३।१४५ शतान्य कादश शेया ६०॥३९९ शल्यं रथेन सम्प्राप्त ३११९८ शतमखप्रतिमाः शतशस्ततः१५।६० शतारश्च सहस्रार. ६॥३८ शशलोहितसकाशेर ५२०२१ शतमेव पुनर्जेयम् ६०1३४२ शतारे पञ्चपञ्चाशत् ६७२ शशाङ्कविशदैरश्व- ५२।१० दातयोजनमाकाश ५।१३९ शते दत्तस्य कौमार्य ६०१५३० शशाङ्कम्य करस्पर्शान १४॥९८ शतयोजनमान स्यात् ५४४५ शतेनाष्टमहस्राणि मष्कुलोकर्णनामानः शत कोटीभिरभि. १०॥४५ शत्रुघ्नो जितशत्रुस्ता ३३११७१ दाम्जालकरच्छन्न- शतं चतुरशीतिश्च ४.९२ शयुञ्जयो महासेनो ५०११३१ शस्त्रशास्त्रकठोरापि ४३।१६६ शतानि तनयाः पञ्च ४७०२९ शत्रुमुत्प्लुत्य फैसस्तं ३३११० शस्त्रशास्त्रार्थनिपुणाः ५०८० शतानि त्रीणि षष्टया तु ११३१२४ शत्रौ मित्रे सुख दुखे २२।२९ शस्त्रशास्त्राणवस्यान्ते २५।२४ शतद्वय च पञ्चाशद् ४१३३८ शनैः स प्रेरितस्तेन २५/२५ शस्त्रार्थ. प्राकृतोधा: २५१६२ सतं द्वावनतं दिक्षु ४/९० शनवत्थाय गच्छन्त २११९६ शभवे वा विमुक्ती वा शत पञ्चदाता पञ्च ६०1३८४ शनर्याति तत काले १२।७ शाकेष्वन्दशर्तपु ६६५२ शतं रासभराजाना ६०१४९० शनैश्चरविमानानि ६२१ शाण्डिल्यावृतिरूपोऽद्य २३३१३३ शतं लक्ष्मणकौमार्य ६०१५३१ शब्दगन्धरमस्पर्श १०११४८ शातकुम्भमपस्तम्भो ८३ मत पण्णदतं दिक्षु ४८९ शब्दभेदेश्यभेदार्थों ५८०४८ शाधि कि करवाणीश दातं पश्याधिक दिक्ष ४॥९८ शब्दरूपरसस्पर्श ४३।१९७ शान्तक्षोणक्पायौ तौ ५८.२०१ शतानि द्वादश प्रोक्ता ६०४२३ दाब्दस्यार्थ स्वतो वेत्ति १७३११९ गारीर मानम सौख्य ५८।२३. ५५४७३ २५/५६ इलोकानामकाराद्यनुक्रमः शृणु कारणमैतस्य शान्तचित्तं कदाचित २०४९ शोलनाकाररक्षाह ३०१२ शूराश्चान्य वृष्ण्याद्याः १८।१० शान्तये नाम लोकस्य ५०५० शोलमात्रमहाश्वासा ५४।३५ शूराणा भूतलस्पशि ५९।२५ सान्तस्यापि च वक्रोक्ती ११३६ शीलयतरक्षाया ३४।१३४ शूलवाधाश्च दारिद्रघं २०७३ शान्तायुधसुतः श्रीमान् २९४३६ शुकवर्णसमरस्व. ५।६ शृङ्गमेवमचलस्य ६३१७३ शान्तिकुन्थ्वरनामानः ६०।२०९ शुकान परभृतान् क्रौञ्चान् ८११३८ शृणु देव ! नमेवंशे २५।२ शान्तर्माण्डलिकत्वे तु ६०५०५ शुक्रशोणितकुवीज ६३६८५ शृणु देवास्ति बोलेऽस्मिन् २३३३ शान्तः सिद्धितिथिः सिद्धा ६०१२७१ शुक्रे विशतियुक्तानि शृणु त्व दक्षिणघेण्या २६५० शापितश्चास्य दास्याहं ३३३५४ शुक्लध्यानसमाविष्टा ६५।२२ १९७९ शारीरं मानसं दुःसं ४॥३६५ शुक्लः सोम मुतस्यैव ५२०१७ शृणु व घोर ! विश्रब्धो २९।२३ शार्वरं तिमिरमुग्र- ३६५६ ६३।२८ शुक्लं तत्प्रथमं शुक्ल- ५६॥६३ शृणुत विनुत राजा ३११९५ शाही शक्तिगदाद्यानि ५२६६१ शुक्लं शुचित्वसम्बन्याच ५६।५३ शृणोमि चरितं सर्व थाङ्गों स पोडशसहस्र- ३३५३ शृण्वन्तु महचः सन्त: १७५११४ शुक्लाष्टम्या हि माघस्य ४२०६१ शालशलमहावप्र- ५।४८३ २०११ मुक्ल पञ्चसहस्राणि ५।४३७ शेषपुष्पफलाहारा: ५।२२६ शाल: कुण्डपुर वीरः ६०।२०५ शुचिशीतलतीर्थस्य १।१२ शेषोभयान्तकूटेषु सालास्वयोऽप्यमी त्वेक- ५७६६४ शुचिदत्तस्तुरीयस्तु ३१४२ शैलं वपभसेनाद्यः १३॥६ सालीशुक्षेत्रनिक्षिप्तं ७.११२ सुद्धज्ञानप्रकाशाय ११२ शंशव एव जनातिगसत्त्वः ३९।१२ ६११२१ शोकवानपिचित्तेन ४३३८१ शासनस्थितिविद् विद्वान् १८।१५५ शुद्धदेवोयुतान्याहुर् ४२३ शोकमारमपनीय घास्त्रव्यसनिनो मेऽभून् २१॥३९ शुद्धप्रकृतिरत्यन्त- ९।१५ शोकारातिमयोग ५६।११ शास्त्रकोशलतायुक्तो २९।२९ गुद्धमौक्तिकसङ्घात २०४८ शोचनं यद्विपाकात्स. ५८०२३६ शास्त्रार्थी स्त्रीप्रियो नित्य-२३।७५ गुदवृत्तं न भोगेषु ५२।१२ शिक्षकाः विंशतिः प्राप्ता:६०३८३ सुद्धं दर्शयता भावं २१॥३२ शोणवर्णहये ति ३४.१२९ शिक्षकाः पट्शत. साधं ६०३६३ शोधित बहवो मस्याः ३३१५६ शोमनाभिनयं काचिद् ८.४५ शिक्षा लक्षा. तृतीयस्य ६०४४४ युद्ध ग्रेणिक ! शीतलस्य १३१३४ शिखरच गिरेस्तस्य ३६।२७ शोभयाहृतचित्तं त २३३२३ शिखावलीलीढनमस्त- ३७१४२ गुभः पुण्यस्य सामा- ५८।११५ शोमन्ते तद्विपापु ५७१५१ शिखाकरालं शिखिन २३।११९ शोरिपक्षतया के चित् ३०1३५ शिखिशिखावलिधर्म- ४५।१६० गुभयवो नमन्त्येत्या ५९९२ सौरिरश्वरयार: २२।७ शिखिहमगरुत्मत्प्रक ५७४४ शुभायुर्नामगोत्राणि ५८।२९८ शौरिमंदनवेगावा २६१२५ शिरःपकम्पितं प्रोक्तं शुभारमपरिणामेन ५८।२३२ शौरिम्तदा नियुक्तस्तु ३०४८ चिलावलेन विज्ञातो ५३।४० शुभाम्बुपूर्ण जलपुष्प ३७१५ शौरि हिरण्यवत्या २२।१४२ शिलाया तत्र कृस्वादौ ५३१३४ गुम्भद्रलमहास्तम्भ ५।३६१ सौरमंदनवगाया २६१ शिवा च रोहिणी देवी ५८१३०९ गुप्का तद्गतवैलाया ४३१२३४ शौर्यप्रभावमुवीत. १६३६ करामुरतः गह ४७१३९ गौर्यशैल ! तोतुग ३१११२ शिशुपारमुखाश्चैव गन्यानि दश पञ्चानम् ६०।३२८ दमनानास्थितोसमा शिगुमुद्घस्य वाहम्यो ४३४३ गन्यायमोचितागार• ५८११२० दामयाशनिवेगस्य २२।१४ गिनोनिरज्जनस्यास्ये ८1१९४ गरः सुवीरमास्थान १८०९ श्यामाकणमात्रीन ५८.३२ पीताधितिरस्वाभी ७.१३७ गुरश्चाति सुबीरथ १८१८ स्यामाया वचनं शुरवा शोतलम्य चतुःसत्या ६॥३९१ गरमेनस्तमादपर्य दयामामादाय मम्मानः ३२१२. ५५०१४ गरमेनहम सप्नते २६॥९८ श्यामिके स्त्रीधोलोक १९१०५ १६॥३२ मूरमेनन पानि ३३॥९६ पारिगुपयपूर्ण: ९1१८६ शुद्धस्य मार्गशीर्षस्य ५।१४५ गुभारिमलसद्यस् ३७।२१ शुमलक्षणपूर्णस्य शिवादेपा. सुनोत्सत्ती गोवापि च या कटे जीर्ण: गरजलपर:

हरिवंशपुराणे श्रवणीयं वचः श्रुत्वा श्रद्धावान् सुप्तसिद्धोऽदिर ५।२३० श्रीशोतलादिह परेषु १६१ येण्यां तु दक्षिणस्या २२११०१ श्रद्धावान् विजयावाश्च ५।१६१ श्रीसनाथस्ततः सर्वेर ५९।६२ श्रेण्योः स्युनगराण्येषा ५।२५६ घद्वैयपरलोरस्य ५६।२३ श्रीहास्तिनपुर प्रीत्मा ५३।४६ धेयःप्रभृतिधर्मान्तान् ६०।२९९ श्रमजवारिलवाञ्चित. ५५।१२ श्रीहास्तिनपुरं रम्य ६०१२३९ श्रेयः श्रेयस्करस्तीर्थ ५५११५ थमप्रस्विन्नसड्विो १४.१०४ श्रुतगुरुरसि विद्वान् ३६२१ श्रेयसा पात्रनिक्षिप्त ९।१९५ श्रमादिप्रभवात्मान ५८।२२८ श्रुतज्ञानविकल्पः स्यात् १०१४ श्रेयाम श्रेयमा पात्र ९।१९० श्रवणापि पापघ्ना ३४१५१ श्रुतं च स्वसमासेन १०।१२ श्रेयसो दानधर्मस्य ८२१४ ३४|४० श्रुतं शब्दात्मक विश्वं ९।१०७ श्रेयान् सोमप्रभश्चेति ४५७ धान्तोऽत्यन्तं कुमार! त्वं १९१३५ श्रुतानुभूतवार्तादि ३०१४१ थेयोदानयशोराशि ९.१९३ श्रावणस्यासिते पक्षे २३९१ थुतितूलततो वृद्धी ३११८ श्रेष्ठी तु कामदत्तोऽत्र २८.१८ श्रावणे शुक्लसप्तम्या ६०।२७३ श्रुतीन्धनसमृद्धोऽनु ४२०६९ श्रेष्ठी सुरेन्द्रदत्तोऽभूत् १८९८ थावस्तीसंभवः सेना ६०१८४ श्रुत्वा कन्यापिता क्रुद्धः ४४.१३ धोत्र गीतरवे रूपे ७.९७ श्रावस्त्यामस्ति विस्तीर्ण- २८०५ थुत्वा कंसभवान्तरं ३३११७४ श्लाघात्मम्मिल्ल ३७१४४ श्रित्वा मदनवैगाया २६१४४ श्रुत्वा कसोऽपि शङ्का ३३१३८ श्लक्ष्णधीः श्लक्षारोमा-४४०२० श्रियं ह्रियं धृति बुद्धि २२।११ श्रुत्वा क्षीरकदम्बोऽपि १७४४३ लिागुलिंदलो गूढ- ८९ श्रिया च धृतिराशया ३८।३५ श्रुत्वा चकितचित्ता सा ५४११९ श्वस्तन्यो कृतसङ्केतो २९६३ श्रीकान्ता प्रथमा वापी ५।३४४ श्रुत्वा च तत्तया तेऽपि २४७६ श्वसुरोऽशनिवेगोऽसौ ५११२ श्रीचन्द्रभुप्रतिष्ठाद्या ४५।१२ श्रुत्वा गजकुमारोऽसौ ६११२ श्वसुरास्तस्य यावन्त. ३१११३१ श्रीचन्द्रात्मजराजोऽमी ३४।४५ श्रुत्वा गोत्रक्षयः मोऽपि ६२६४८ श्वापदानि पदशब्द- श्रीचूलारत्नभा चक्र ५७।१८ श्रुत्वा तत्सत्यभामोचे ४३११६ स्वतभानुरयं किग्नु ९।१४६ श्रीधरं धर्मसज्ञं च ६०११७ थुत्वा तद्धिशतक्षत्र- ३३।१६३ श्वेतच्छवजश्चित्र ८1१४० १६५९ ध्रुधा ता घोपणा श्रव्या ३३८ श्वेतैर्मुक्तादिभिभूमि ७७३ श्रीधरापूर्वको देव. २७१९१ श्रुत्वा दधिमुखस्योक्तं २५।४५ श्रीधर्मानन्तवीर्याख्यो ६०१२१ श्रुत्वा देवनिकायेभ्यः ९।१९७ श्रीध्वजा नन्दनश्चैव ४८.६७ थुत्वा नारदमाकाशे ४७१९३ ५।४० श्रीप्रमश्रीवरी नायौ ५.६४० धुत्वा सभाजनाश्चापि ४८३४ पट्कर्मणा विधातार १७:१३० श्रीभूतिरिति भूतोऽन्य ६०५६४ थुत्वैति खेचरास्तस्थुर. ३४।२६ षट्कर्मसु प्रजाः प्राप्ताः २३६३६ श्रीमण्डपस्थितान् सर्वा. ३२१११ श्रुत्वनि चारुदत्तीय २११८४ पट्खण्डप्रभवः केचिद् ३३१७२ थीमन्तं प्रवदन्तीम २२।१४३ ध्रुवेति जरतीवाक्यं ४०।४२ पड्गुणास्तेषु विज्ञेया १९४२१६ श्रीमतामनुरुपं य. ८.१ धुत्वैवं कृपया तेन २८।२५ पट्चत्वारिंशद्दोपा ३४।१०८ श्रीमती वनजवाम्या ९।१८३ श्रुत्वव शब्दमात्रेण २३३३२ पट् च चत्वारि च ५.३६७ योमतोऽस्य महाराज ३।१८६ श्रूयता मुकुमारि द्वे ६४१२५ षट्पष्टि द्वे शते दण्डा ५।४४० थीमातङ्गान्वयव्योम- २२६११२ ५४.१ पट्योजनसहस्राणि ५।५०० श्रीललाटस्य नासाया ९।१२ श्रेणिकन तु मत्पूर्व २०१३६ पट्सहमाणि विधुला ६०३९. थीलक्ष्मीधतिकीपाद्या श्रेणिोऽपि च सप्राप्नः २७१ पट्शतानि सहस्राणि ६०३६८ धीवत्मरक्षणेनोरु २।१४२ पट्मस्थानभूतो मास् १२ श्रीविद्युविकुमारोभिः ८९० श्रेणीवदान्तरं चास्या ४।२४८ पट् च पष्टिसहयाणि ६२८ श्रीवृक्षलशितोररके श्रेणिवदानि चैतानि ४११६ पट्युगलेषु दोपेप श्रीवतो नपर्माच ४५।२९ थेगिवदानि चामूनि ४१२७ पतिसत्पदलक्षाभि' पोशचीनिलदमौभिः ८।१९५ श्रेणिवदायमूनि स्युः ४४१०३ पति हि शनं दिशु ४११०७ श्रीधरस्य सुरेशस्य पट्कला भरतज्योत्स्ना ग्रेणिकेन पुन. पृष्ट श्रेणिकोऽपि गुणधेणि श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः ६९ पत्रिंगच्च महादिक्षु ४११३८ पडप्यविघ्ना वसुदेवपुत्रा ३५।८ [स] पत्रिंशच्च तथा लक्षा. ४१८० पभिः कर्मभिरामाच ९५४० स आह वर्धते वैरी २५।१९ पत्रिंशच्च शतानि स्याद् ५।६० पड्योजनी सगम्यूता ५।१४० स एवैकेन्द्रियादीना १८७४ पत्रिंशच्च सहस्रं च ५.६४८ पड्योजनानि गव्यूतं ५।१३६ स एप नारदो राजन ४२।२४ पत्रिंशच्च सहस्राणि ५९।१३३ पड़सान्यतिमृष्टानि ७१८५ स एप बन्धुमध्यस्थो ४३।१२४ पट् पञ्चाशद् द्विकोत्थे ३४.७७ पड्वपलक्षपरिमाण १६७७ स एव च सहस्रोनो ५।२९३ पट्पञ्चाशं शतं दिक्षु ४.९९ पड्विंशतिसहस्राणि ५।५२३ सकपायाकपायौ द्वौ ५८।५८ षट्पञ्चाशमहादिक्षु ४।१३१ पड्विंशतिधध्येष ४।३२२ सकलयदुमनोज्ञ पट्पञ्चाशत्सहस्राणि १०३६ पड़ताः सप्तभागेन ४।२० सकलथुतमत्यवधि ३९।१ पट्पञ्चाशत्सहस्राणि ५।२७७ पण्णवत्या नवशती ६।८३ सकालयवनः काल ५२।२६ पट्पञ्चाशत्सहस्राणि ५७१४७ पण्मासानशनस्यान्ते ९।१४२ स कथं युधि जीयेत ५०।२३ पटपञ्चाशद्दिनानि ६०१३४० पण्मासवसुवृष्ट्या च ८।९४ सकृक्षुतं धनेशानां २३।१०२ पट्पञ्चकस्बरास्तानाः १९।१६९ पष्टियोजनविस्तीर्ण ५।१४२ स कुलशैलसर. सरिता तया१५।३६ पटपञ्चाशत्सहस्राणि ५५३३ पष्टिवर्पसहस्राणि २५॥३३ सकृदपि जीवघातकृद- ४९।१८ पद चापविस्तृतान्येपा ५।३८४ पष्टिराद्येऽवगाहोऽपि सकेवलावधी सङ्घी ६०१४२५ पटलक्षा.पञ्चलक्षाश्च ६०1४७२ पष्टिरेव महादिक्षु ४।१३० स कृष्णकादशी पावः ६०।१८० पशतकान्न पञ्चाशत् ६४८८ पष्टिवर्पमहस्राणि ६०।३२३ सक्रियाः शतधाऽशीत्या १०४८ पट्शतानि सहस्राणि ६०१४०५ पष्टिवर्षाणि तद्राज्य ६.१४८८ सक्रोशोऽपि च सत्रिंशद् ५१५९२ पट्शतानि च कालोद. ५/५६४ पष्टिवर्पसहस्राणि ६०१४९५ स खलु पश्यति तत्र तदा ५५३८५ पट्पष्टिदिवसान् भूयो २०६१ पष्ठभक्तभृता दीक्षा ६०.२१७ स खलु खेचरराजसुतं सुर १५:४८ पट्पष्टिवर्पलक्षाभि ६०१४६९ पष्ठाष्टमादिपण्मास ४३।२०७ सखीभिः क्रीडितुं याता ६०६६ पट्पष्ट्या पट् कोदण्डा ४।३३६ पष्ठादयः सहामीपा ५९।१२३ सखीनामभवत्तुङ्ग ४४।१२ पट्सप्तत्या शतं दिक्षु ४।९४ पष्टीतस्तु विनिर्यातो ४॥३७९ सखेटखटाटोप २।३ पट्स्वराश्व विज्ञेया १९:१८७ पष्ठे दशोपवासा. स्यु- ३४।१०६ सगरः क्षत्रलोकेन २३११३९ पस्वरे सप्तमस्त्वशो १९।१९० पष्ठो गणधरो धीमान् १२।५६ सगरस्य प्रतीहारी २३१५० ५।१५३ पप्ठोगवासिनि परेधु १६५९ स गतीन्द्रियपटुकाय ५८१३६ पटुसु कालेषु पल्याट ६०४८४ स गत्वा पञ्चनति ५।४३६ पठ्या सुपार्श्वनाथस्य ६०।२६७ पट्सहस्रनृपस्त्रीभिः ५७।१४६ स गान्धार्या कृते प्रश्ने ६०८६ पडे पप्ठ्या च कृष्णयेवो; ४॥३४५ तुपरमा यासो ४।२८५ स गोपति दृप्तमशेषधोप- ३५।४७ पाड्जी स्यादामी १९।१७४ पड्गुण, स्वावगाहस्तु ५।५०७ स गौरवमिमौ दृष्टश ४४.३९ पाव धंवतो नास्ति १९११९२ पड्जश्चत् श्रुतिश्चैव १९६१५९ स गौरीश्यामयोर्मध्ये ९१९ पोडशानां निकायाना २२०६१ पड्जश्चाप्यपभश्चैव १९६१५३ सङ्गताश्च समस्तास्ता ५।२७८ पोडसाना सवाणा ४२१५२ पड्जश्च मध्यमश्व १९४२२८ सङ्गत्यागारक: स्वरं १९९८ पड्जनात्तरमन्द्रा स्याद् १९३१६५ पंडिशाग्र शतं दिक्षु ४।११२ सङ्ग्रहादधिकार स्वः ११७३ पइजोशेच्यवती चव १९१८४ पोडशाल्पकलावस्या ८०२९ सङ्ग्रहेण विभागेन १७४ पड्जमध्या तथा चंच १९।१७५ पोडशास्य सहवाणि ५।७७ सघटः सुरमट्वातर ८1१६३ पश्चनु निश्च पोडोप्वपि चैतेषु सङ्घः परिपदि श्रीमान् १२।७१ पड्जपञ्चमहीनं च १९।२२२ पोडसव महादिक्षु ४।१४५ सवः सप्तविधः पूर्व. ६०३५७ पजमध्यास्तु सर्वेपा- १९:२३१ पोडीव सहयाणि ६०३८१ सद्यावष्टसह्याणि ६०३८६ पड्जमध्यमयोपचार १९:२४३ पोडशोद्गम दोपश्च ९।१८७ सहि क्लस्यते विषयभोग- १६४ पट्सप्तति क्लापटक ४३.४४ ७. हरिवंशपुराणे " सज्यता सुलघु ५५१२ सन्तापहेतुरन्त स्थो सङ्कोचः पखण्डाना १४।७४ स तामुत्तोर्य सम्प्राप्तस् ३०४३ सद्योजातं पिता नद्यां सचतुर्गोपुरातोऽन्तर् ५७५४ स तां पप्रच्छ शङ्कावान् १९।४३ स द्रव्यक्षेत्र कालोवत- ५८।२८९ सचतुर्गोपुरातोऽपि ५७०४१ सत्या सुतार्थमानो ४८।१९ स द्वाविंशत्यहोरात्रो ३४।४२ स चन्द्रसंदर्शनतः ३७॥३२ सत्यातिमुक्तकादेश १८९ सद्वात्रिंशत्सहस्राणां ११११३४ स चाराध्य महाशुक्रे १८।१७४ सत्या क्षित्यादि सामप्रया १७।१२८ सद्वात्रिंशत्सहमाः स्युर् ५७४६ स चाष्टाविंशतिलक्षाः ५।४९२ सत्येन धावितेनास्या १७१८१ स द्वादशस्वथ गणेपु १६३६८ स पाटादशलक्षास्ताः ४।१९९ सत्संख्याद्यनुयोगश्च २११०८ सद्वेषं चाप्यमद्वेचं ५६०९९ सचित्ताहारसम्बन्ध ५८.१८२ सत्रमध्ये व्यवस्थाप्य २५/२२ स धर्नो मानुपे देहे १८५५२ सचिवस्तम्य निस्तीण. २८॥३२ स तोपमपरेऽपि ते ३८१५३ सनरकुमारकौमार्य सचिवा नय कऱ्यांशु ५०३२ ६५८० स दक्षः शौर्यसम्पन्नः ५०५७ सनत्कुमारकल्पे तु सचिवो पायमस्तस्या ३३१८८ स दक्ष दक्षनामानं १७१२ स नमिर्दक्षिणश्रेण्या ९।१३२ सचेतनानुबन्धो यः ५८.७० सदसदनेकमेकमथ नित्य- ४९।४८ स नवव्यञ्जनशते सच्छिद्रो सकपायो च २३१६२ सदसल्लक्षणस्यापि ५८।२०६ सम्म ह्य ते नृपाः केचिद् ४५।१४० स जगत्त्रयरूपिण्या ९।१८ सदर्थमसदर्थ च ५८।१३० स निषण्यमधीयानं १७४९ सञ्जयन्तचरितं जगत्त्रय२७।१३१ सदपि दुरीहित रहसिज हि ४९।३६ सनोवृ त्त्यनुत्सेको ५८५११४ सञ्जयश्वरमस्वासीत् १७१२८ सदवक्तव्यजीवज्ञो १०५६ स नीलयशसा शौरि २२।१५३ सज्यचापाकृतिस्तस्य स दष्टोऽमोघमन्त्रेण २९.५० सन्तः सप्तसहस्राणि ६०४०६ सजयं च जये सक्तं ३११२९ सदः सागरसक्षोभ १७१९१ सन्तप्तं च स यण्मासान् ३३१७३ ६३१५७ सदसि सम्यकथामृत सञ्जयोऽरिजमो नाम्ना२२।१०४ स दध्यो च स्वयंबुझी सन्तानपारिजातादि ९।५० सजातो वजदष्ट्रोऽस्मा- १३॥२२ स दिव्यध्वनिना विश्व- सन्तान मेघनादस्य १९० सज्जीवभावरिको वा १०१५५ स दुर्जयवने लेभे सन्ति सस्यविस्तारा. १९६२ ४७.४३ स तत्र मूनि व्यवसायिनि ६६।३ स दूतोऽजितसेनोऽपि ५०.३७ सन्ति चानन्तभेदार स तत्र विधिनानीय ६२।३१ स दृष्टिमुष्टि सन्यान- सन्ति योषा यथास्माक- ५०१५२ स तदु.खविधानाय ५४७ सदृगाजीवकानां च ६१०४ सन्ध्याकारेऽन्तरद्वीपे ४५३११४ सत्यवादी नरेन्द्रस्य २७१२२ स देवः सर्वदेवेन्द्र- ५९/३४ सन्ध्यारागानुसन्धाने सत्यमेव विगतोs ६३१६७ स देवकीमानसतापकारो ३५।३३ सन्ध्यारागेण चच्छन्नं सत्यवचो निवई सुरमंघा ३९।१५ सद्गन्धाकृष्टमंभ्रान्त- ५९।५४ सन्ध्यारागाङ्गरागादयं सत्यदेव इतिज्ञेयः १२१६२ सद्गन्धस्य सुवृक्षस्य ४५।१३८ सन्दाघानयने काश्चित् सत्यभूतः स्वयं जीवो ५८.३० सद्गुणाच्छादन निन्दा ५८।११३ सन्नासिकातिमध्यस्था सत्यमेतद् द्विज ! ज्ञानं १९११८ सद्धर्मदेशना जैनी ३११८० सनिद्रानिद्रामचला सत्यपियनसम्बन्धे ५८.१३५ सटिज्ञानचारित्र- सम्मानितयथायोग- सत्यं यदि मयि प्रेम ४२११ सदाप्तवचनादेव सपञ्चनवतिलक्षाः सरये हि हितं साधो ! २४.१८ सद्बोधक्रियोपाय. शपञ्चासत्महरास्ता मरयमामादिदेवीना ४८।२१ सद्भदिलपुरे राजा १८११२ स पम्चाग्निवपः कुर्वन २७।१२० सस्यमामागृहाम्यर्ण ४३११ सद्भाव दर्शयन्तीह ९५२ स पवाल्याण महामहेश्वरः६६।१८ सध्यमामा लिये रूप ४२१२९ सद्भावोत्पत्तिविद् वा १०५७ सपदि मुनजलाम्बरपोलने ५५।५८ सत्वंपामरको विप्रः ४३॥१२५ सद्भूतस्यापि दोषस्य ४५।१५३ स प्रमेनो गुणपन. सरवर सतनो गस्वा ४४०२२ म चूत वेश्याव्यमनी १८॥१.. सपनरागोयलवस- म साम्वी सनालासो ३५१६९ सो विद्याधरी वन्द २२।१३६ स पर्पगनाहतो- ८1१०१ ८१८९ २५१३४ १८.५५ १४१७५ १४.७३ ८।६५ CIC ८।२२ १०1१४३ १२१७८ ६६२७ ३७४२ श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः सपुत्रनप्तकः क्षेमी ५३१८ सप्रणाममिति प्रोक्तो ४३१२४३ समातृभ्रातृकस्यास्य ४५१८१ सपुत्रानमितानेक २२८६ सप्रणामस्ततो दृष्ट्वा ४७१४८ स मातृपितृसेवाख्यं २१११४६ सपोरान्त.पुरो राजा ५४।४६ स प्राहानन्दभेर्या त्वं ४८।२९ समाधिगुप्तनामानं ६०।२९ सप्तपर्णपुरं पूर्व ५.४२७ सप्तान्तेष्वेकपूर्वेषु ३४.५७ समाधिगुप्तनामान्यः ६०१५६१ मप्ततिश्च सहस्राणि ४।१६७ स प्राच्यानां प्रतीध्याना- ५०॥३३ समागमश्च विज्ञातः २४१५७ सप्तत्रिशदतो लक्षा ४।१७९ स प्राह भरतेऽत्रव २७.६१ समादिचतुरस्रोतो ५८०२५३ सप्तत्रिंशत्सहस्राणि स प्राईवमिहवाभूत् २८.१७ समानश्रुतिकाः शब्दाः १७५१२१ सप्तत्रिशद् भवेन्मूले ५।३०३ सबालभावात्सुकुमारभावम् ३५.६५ समागत्योपविष्टं तं ६०११३० सप्तप्रकृनिमिश्रेण स बुभुजे भुजदण्डवशीकृत-१५।५६ समादायानपानं तो ६२११३ सप्तकृत्वः कृतान्ताभ. २५.१५ समारोप्य विमाने तां स भानुः काञ्चनरयो ५२०३१ ३२।२४ सप्रलम्बजटाभार ९।२०४ स भुक्तमुरसौख्यस्ते १८.१७५ समुद्रदत्तनामान १८५१०५ सप्तविंशति लक्षाः स ४.१९० स भुक्त्वाऽमाऽनया काम २७।१०३ समुद्रविजय. ध्रुत्वा ४५१९१ सप्तविंशतिचापानि ४।३२३ म भूतरमणाटव्या- २७१११९ समुद्रविजयाभोम्य ५२।६३ सप्तजीवादितत्वानि १०१५२ स भ्रात्रा वार्यमाणोऽपि ३३६१५९ समुद्रविजयो भूभृदष्टाना १९९२ सप्तमस्य च पष्टस्य ४१।१४ १९।२५२ समगुणात्परिणामविशेषतः १५।१३ समुद्रविजयाक्षोभ्य सप्नशस्या सहमेढे ५१५५४ सम च चतुरसंच ८।१७५ समुद्रविजयोद्भता ४८।४३ सप्तमस्तु मुतो देव्या ३३११४४ समपादो पुरः स्थित्वा २२।२४ समुद्रविजयाद्याश्च ५११२७ सप्तमेऽपि च वारेऽहं २१३१४९ समस्तव्यस्तरूपास्तु ५८.१९८ समुद्रविजयस्त्वं चेत् ३१३११४ सप्तम्यामप्रतिष्टाने ४।२२४ समन्ततोऽधान्तमदाम्वु ३७१६ समुद्रविजयादेशात् ३११०१ सप्तसु श्रुतवार्तामु ३३११२७ समस्त वाङ्मनोयोगं ५६७० समुद्रविजयो राजा ५०1७८ सप्तमीस्थनिगोदोत्थाः ४॥३६१ समस्तसामन्तकृतानुयानकः ५४१७२ समुद्रवेलासु मनोहरासु ५४।७४ सप्तपष्टिसहस्रार्द्ध ५।५२१ समस्तयदुपत्नीनां ४११५१ ममुद्रा इव चत्वारस् ४५.५१ मतपएिशतान्यस्याः ५।६२ समस्तरसपुष्टिकं ३८।२८ ममुद्रयात्रया यातः २११७९ सप्ततिर्मोहनीयस्य ५८/२८५ समस्तशास्त्रसन्दर्भ १७१७७ समुद्रविजयं दृष्ट्वा ३२।४३ सपउमीतो विनिर्यातः ४।३७८ समस्तयदुनाशाय ४०।२ समुद्रविजयः शिवा १८.१८० मनप्राणप्रमाण तु २२।३० समस्तबलसंयुक्ती ५३।२९ समुद्रविजय प्राह ३१४९९ सप्तसु प्रतिबोद्धव्यः ४॥३४० समस्ततेजस्विजनस्य ३७॥३३ समुद्रविजयो शोभ्यः १८.१३ सप्तपर्णसुरभे ६३१६० समयावलिकोच्छ्वास. ७।१६ समुत्क्षिप्य शिला स्वर- ४३१५२ सप्तभिः पञ्चभिः पूज्या १८५११९ ममन्दरार्योऽपि च ६६।२६ समूलादितकवल्य २३१४० सप्तम्युतितो यायान् ४।३७५ समवसरणभूमी ५७११८३ स मेमरुनिष्कम्पः २७११३८ सप्नाप्याराध्य माहेन्द्रे ३३११४० समन्ततः शिवस्थानाद् ५८1८ समेत्य पत्यातिमय ३७५ सप्तानोकमहाभेदाः २।२८ समयनीतयथोचितवाहना ५५॥३४ सम्यत्रकायकपायाणां ५८.१६० सप्ताहचव पक्ष : स्यान् ४।३७१ समवादि समापादि ५७१ सम्यक्त्वज्ञानचारित्र- ७११०८ सप्ताप्कापिकजीबाना १८०६५ समवतारमिनोऽङ्गिपावनं५५:१२४ सम्यक्त्वविनयज्ञान ३४।११४ सप्ताहान्ताविरोमाग्न ७१४८ समविशत्समदभगति. ५५।२ सम्यक्त्वगुद्धिशुद्धे तु १८।१४९ सभ्यवत्वं च प्रतित्वं च ५८।११० सप्तम्यामेव सप्राप्तः ६०१२५८ समग्रबलयुक्तास्ते ५३३१२ सप्ताहोरात्रवण मम्यक्त्व शीलसदानं २।१४० समयं ताम्यामरहस्यभेद २५।२९ ४३१११८ मप्रकीर्णकनक्षत्र २।२४ समग्र वसुदेव व १८११७८ सम्यक्त्वज्ञानचारित्र- १०११५८ सप्रज्ञप्तिमहाविद्या समप्प तं स्वविद्याया १९३११३ सम्यक्त्व स्थिरमूलस्य सप्रदक्षिणमागत्य ८१५६ समाजः समतीतश्च १९.१२८ मम्यग्दर्शनमुद्रल २।११५ सम्यक्त्वं वमतामन्तर सर्वतोऽथ नमन्तीपु सर्वप्रकारतः सिन्धुः हरिवंशपुराणे सम्यक्त्वपरमानन्त ३७२ सर्वर्तुकुसुमाकीर्ण. ५।११४ सर्वामामेव शुद्धीनां १२।३१ सम्यक्त्वं चापि मिथ्यात्वं ५८०२३१ सर्वतुकुसुमेनान्य ५७।१६४ सर्वान् संपूज्य संपूज्य ४३३१७३ ३।९३ सर्वतोऽपि सुदुःप्रेक्ष्यां ११०९४ सर्वेषामेव भावाना ७५ सम्यग्दर्शनमशुद्धो ४७१६२ सर्वतोऽनन्तविस्तार ४१ सर्वेष्वात्मप्रदेशष्व ५८।२९६ सम्यग्दर्शनसंशुद्धाः २।१३३ सर्वतोभद्र संज्ञोऽमो ८४ सर्वेन्द्रकनिगोदास्ते ४।३५२ सम्यग्दर्शनमूलोऽयं १०१९ सर्वतोभद्रनामाय ३४५५ रपामादिभिक्षासु ६०१२४६ सम्यग्दर्शनमशुद्धि २१७ २११९ सर्वोदितमभात्याच्या- २२।१४० मम्यग्दर्शनशुद्धाया ६४।१४२ सर्वत्रवात्र संख्येय ६५८५ सर्वो द्वारवतीलोको ५७२ सम्यग्दर्शनमोष्टं ५८।१९ सर्वत्राङ्गलमानादी सललितमभितस्थी सम्यग्दर्शनलाभस्य ३।१३८ सर्वथा सर्व कल्याण- ८.९५ सल्लकीपल्लवोल्लासि १४॥२३ सम्यग्ज्ञानादिवृद्धयादि ५८।१८५ सर्ववर्णनिर्भरश्व- ५२।२३ सबजद्वारवंशश्च सम्यग्दृष्टि : पुनः पात्रे ७।१२१ सर्वज्ञवीतरागस्य ३२९ स वज्रमुष्टये मङ्गी ३३३१०४ सम्यग्दष्टिरशेषोऽपि १८१४४ सर्वज्ञाः पट्सहस्राणि ६०३९८ सवत्सधेनुध्वनयोऽतिधीरा ३५।५३ सर्वथा मम पुण्येन सविशेषमसौ तत्र मम्पातश्च तयोतिः १९०९६ ४५।८९ ३११७३ सम्पूर्णावधयो गत्वा ५३१५१ सवाग्गुप्तिमनोगुप्ती ५८।११८ ४७।३ सम्पूर्णनिन' पावर् २३७० सर्वपूर्वधरस्येदं ५६४६४ स विनिगृह्य चिरा. १५/४० सर्वमत्र जिनभाषितं सम्पज्यमानचरणो नृसुरा ४६।६१ ६३।६८ सविदिक् दिक्कुमारीणां ५।७२९ सम्भावयामि नेदृक्ष- ८।१२६ सर्वप्रत्यक्षमन्त्य स्यात् १०११५४ सविधियाचितभोजसुता ५५।७२ मम्मान्य भ्रातरं तस्या ४४।१८ सर्वबन्धास्रवाणा हि ५६७८ स विन्ध्यवनमध्यास्य ४७१८ सम्भ्रान्ते तु जघन्येयं ४।२५४ सर्वलोकमलोकं च ६।१३७ सवीचारविवीचार मम्भ्रान्त्यान्वितलोकस्य ९१७४ सर्वविद्यास्पदं कर्म ३१५ सराह्मचक्रादिसुलक्षिता. ३५।२० सम्प्रयुक्तमपि वल्लभः ३०१५७ सर्वस्वराणा प्रवरो १९।१९७ सशब्दमूत्राः सुखिनो २३१६७ सम्प्राप्य प्रातराक्रन्द- १९५० सर्वस्वराणा नाशस्तु १९।१९६ स थीगौतमसंज्ञान: १८।१०७ सम्प्राप्तश्च त्वमस्माभि. २५१४३ मर्वस्यास्यामनोज्ञस्य ५६।१२ स श्रुत्वा तदवस्था तो २२२१२२ सम्प्राप्तः कुरुभौजाद्यम् ९।२१४ सर्वस्यैव हि जीवस्य १०।१७ स श्रेयान् ब्रह्मदत्तश्च ६०२४५ मम्प्राप्ति चाकहासिन्या २८४ मर्वप्रोतिकरो यस्मात् ५८।२७० स श्रेयानीक्षमाणस्तं माप्राप्ते दिवसे तस्मिन् १९:१३२ सर्वरत्नमर्यस्तुङ्गं ४११२५ सपड्जो मध्यमश्चात्र १९२६१ सम्प्राप्तोऽथ मदा दानैर् ९।१५७ सर्वरत्नात्ममध्या सा ५।३७९ रा पट्पष्टिसहस्राणा ५।३२४ सयोगवली स्थान- ५६।१०६ सर्वोरिति भार्यास्य २७.६ स पोडशसहसंच स रस पितृमदिरा ७.१४९ सर्वश्रेणी विमानाना- ६।९१ स रायमस्य वृदयर्थ- ५८४१५८ मरल मरायोप्या- ६०1१८५ २११३४ समिदसेनोमयभीम मरागमयमधेष्ठा १९४२३३ समिद्धप्रतिमाशोतः ५७१२९ म राजगृहनाधेन ६०१११३ मर्वात्मभूत इत्यग्यो ६०१५५९ सस्त्रोकः स्त्रोताकारः ५४०५० म राजमुनया सया २९७२ सवाय श्रीमतीजम्मा २०१३ सस्त्रीकाः रोचरा याता २६०२ गृहमागाय सर्वार्थसिदा सिमा २२१७० सस्यावरातपोचौत- ग रावणगमो भूत्वा १८.२३ सर्वानुदिशामी ९०३४ सस्मार स्वभवान् रार्यान् ६०९६ मरित पोप्रायम् ५५२३३ मर्वाः परितविद्यास्ताः २०७३ राह दवाईयोण गीभूपातिहमायो गर्वाः परमल्यायः २२१७२ महदेव पनि म्याती गगनविण्याापा १६१ मर्वायुपतं दिय ४१३५ मह प्रदक्षिणीय मरगुममोर २६११ मर्या मनानन्दी मह गमाभिनयोदमुषी ५१t. ११११३२ सर्वसाधारणं नृणाम् सर्वस्वराणां सञ्चार गराची - ५२६८२ इलोकानामकारायनुक्रमः ५।४९५ सहयारं हसद्दीप्त्या सहयारात्तु विमल. , ५।१२६ सहस्राम्रबनायेषु ३1८५ सहसा कन्ययादशि सह ज्ञानत्रयेणार ८/२०७ महस्राणि नवाधौता १२।७४ संपतद्भिरभितः वि ६३३५ सहनगुणितोदिता ३८।२९ सहयाण्येकपञ्चाशत् ६०१४४९ संपदत्र करिकर्ण ६३१७० ७।१५२ सवाण्यभियुक्तानि ६०१३७६ संपरायाः कपायास्तु सहयभागमाजीव्य ६४११८ सहनयोजनव्यासी ३।२९ संपृष्टः कामदेवेन ४७१८६ सहस्रमवगाहश्च ५।४५६ ६०.१६७ सपृष्टस्तेन भोः कस्त्वं २१४८८ सहस्रयोजनव्यास ५।७०१ सहस्राक्षसहस्राक्षि संभवः पद्मभामश्च ५९।९ ६०२७७ सहसाधं च गत्वोवं' ५।५१८ सनमेण परिप्राप्ती ५।७०० सहस्रमवगाहः स्याद् ६११५९ सहस्रयोजनायामः ६०१२२० मंमूर्छनजमत्वाना १८१७८ सहस्रमवगाहोऽस्य ५।६८७ सहने पट् च शत्यात्मा ६०४१७ संयतासंयतोऽन्वर्थः ३८१ सहस्रमबगाढास्तु ५.६७० सहनैः पञ्चविंशत्या १०१६५ संयतामयता ये च ३।१४८ सहस्रपत्रसच्छन्नाः सहयः सप्तभिः सत्रा १८१९३ सयतामयतान्तेषु सहस्रयोजनं पा १८७५ सहविमलः पड्मि. ६०।२८४ संयमप्रतिपत्तिर्वा ६१२१ सहस्रयोजनो मत्स्यः १८५७७ स हन्ता जामदग्न्यस्य २५६१४ मयमादिकसद्ध्यान- ६४/२१ सहस्रमवगाहोस्य ५।२८५ सहसा दु.प्रमृष्टाना ५८८८ संयमादिभिरष्टामि- ६४/६५ महनगुणिता सा तु ६०1३५४ ४४११० संयमाधिक एकस्य सहस्रगुणिता द्वीपे ५७ सहायं मा परिप्राप्य २३।१३६ सयमस्थानभेदास्तु ६४१८० सहस्रमवगाढाच ५३५१४ सहायः सहजैः स्वच्छः ९19 मंयमस्य राहने द्वे ६०।३६६ सहमवर्ष वृषभो ९।२०३ स हास्तिनपुराधीशः १२६१० संयमे च यथाख्याते सहरमेकमष्टौ च ५।४४ म हि सुमित्र इति श्रुत- १५।६२ संयोगाश्च वियोगाश्च ४३२८६ महयद्वितयं तेषा ५२५३ स हि मुष्णन् सह १८.१०१ संयोज्य हरिणा कन्या ४२।४० सहनसिक्यः कवलो ११।१२५ सहेन्दुना वन्धुरयाग्र- १४३१०६ सरक्ततालुजिह्वाग्र ८।२० सह द्वितयं चातो ६०४६५ सहैव रुचक्प्रभा ३८।३७ सविधानकमाकप्यं २९।४ सन' विस्तृतिस्त्रेधा ५।६८८ सहस्वोच्चारणवतोः ५६।११० संवद्धितः शिशू राजन् ३३३१७ महर' पञ्चात्येक- सवादी मध्यमग्रामे ५।४९ संकथाभिर्विचित्राभिर् ४७१८४ १९।१५५ सहस्राणि च पञ्चाशत् ५।४३३ संकथाक्रोशगीताट्ट ५९.१७ सविभज्य मनोदुःखं १४१५७ महमाणि द्विपष्टिच ५।२९५ संकर्षणस्य हत्वैच्छा ४७१११२ संसपंन्नुरसा जातस् ४७।१२३ सहस्राणि स्त्रिशत् ५।१७१ सक्रोडमानमेकान्ते ४२११७ संसारहेतवः प्रायम् ५६३९ सहस्राणि चतुःसत्या ६०३८९ संदलेशेच्छानिरोधस्य ३४।११५ संसारस्थितिविच्चक्री सहस्राणि नव द्वे ६१३ ५।६९ तु संसारभोरुरासाद्य संक्षोभ मनमो विष्णो २०५७ ससारतरणं तीर्थ १०१२ सह्माणि तु चत्वारि संध्ययद्वीपपर्यन्ती ५।३९७ मंमारभोरवः शुद्ध- २।१३२ सहस्राणि दशामीपा ५।३५ संख्येयव्यामयुक्ताना ४४३५३ सह्माणि पुनस्त्रिशन् ५।२१५ संग्रहाक्षिप्तसत्तादेर ५८।४५ मंमारान्तकरं पुंसा. ६११०४ सहस्राणि तु पञ्चाशत् ६।३१ संघट्ट पुरनारीणा १९।११ मंमारोत्साचलस्थान- १९।२०२ सहस्राणि नव श्रेणी ४।१६० मंघटोद्धटितमम्मुखो समारे भ्रमतो जन्तोः ५८।२९४ सहस्राणि नवान्यानि ५७८ मंघट्टोऽभूत्पुरद्वारे ६२।१० सस्थाननाम पटकं च ५६१०१ सहस्राणि पडेवास्या ४॥२४६ सघाटे द्वादशोत्मेचो ४३११ संस्थाप्य विबुधानीत २०४२ सहस्राणि च चत्वारि ४॥२४२ संघातपञ्चकं चापि ५६११०. संस्थाप्य सहदेव स ५३४ सह्माणि च पट्पटयां ४।२४४ मंजगौ च शक्तिो ६३११७ मस्याप्य पाण्डुशिला १६१७ महराणि तु चत्वारि ४॥२४० संज्ञया दर्शयताम्या ६१६६६ मंहति नृपसिंहो मी १८।२७ सहपाणि च चत्वारि १२०७२ संन्यस्तवपुराहारः १८११७२ मंहताति वहुरोदनम् ६३३५२ ७४ हरिवंशपुराणे सामंशुमता यातो २४॥३१ साधुना बधिरेणैव ४६।४४ सारमैयौं पुरेऽत्रव ४३।१५६ साकारमन्त्रभेदोऽमौ ५८।१६९ साधुनावधिनेत्रेण ४३३११० साधं मासमिह स्थित्वा ४५।११३ सा कुमारी दिवश्च्युत्वा-६४।१३९ साधो शीतलशीलस्य २०१३७ सार्धाः पष्ठया त्रयः ४॥२२३ साकेता सिंहसेनश्च ६.१९५ साध्वसाधुसमाकार १२४८ सार्वत्वमभयाधान ५७११६५ साकेते रनवीर्यस्य १८.९७ साध्वी साध्वी सुवीणेयं १९।१३८ सा द्वाविन्द्रप्वेतो ४।२२१ साक्षाच्चकार युगपत्स. १६॥६५ सादहस्तत्रयं पूर्व ६।१३४ सालद्वारं परित्यक्त ९।११९ साक्षादभ्युदयोपाय. १८०५१ सानत्कुमारमाहेन्द्र ३।१६३ सावद्ययोगविरह ३४।१४३ सागरत्रयमेवपा ४॥२७० सानन्दा साकुलाक्षो त ४७१११६ सावधाने स्थिते धर्म १८०३४ सागराम्बुहलाकृष्ट ६१.८१ सा निवृत्तिकरी पष्ठो ६०१२२२ सावधानसभान्तस्थं ५८।१६ सागारदचानगारश्च ५८.१३६ सा निशम्य हतास्मीति १७७५ सावधिः षट्सहस्राणि ६०॥३९५ सागारो रागमावस्थो ५८।१३७ सानुधयाँ महेन्द्रस्य ६०1८१ सा वसन्तोत्सवे रन्तुं ३३।१०७ सा चानुमतिका नाम्ना ४६।५७ साऽनुज्ञाता करेणास्य २२।१३३ सावष्टम्भभुजस्तम्भः ८७० सा चुक्षोभ सभा १९।१३३ सानुरक्ता अपायुक्ता ४२।७४ सा विभङ्गनदी वृद्धिः ५५५३ साञ्जलि' प्रणनामासी ४२१४२ सानुत्सेफतनुक्रोध ५८।१०६ सा व्यालस्यादि शास्त्री- ५८१७८ सा जगाद ततो रुष्टा १९।४२ सान्तःपुरैण कर्णेन ५०१९१ सा शिला योजनोच्द्राय- ५३३३५ सा तं पोडशसुस्वप्न २।२१ सान्तःपुरान् स्वसाम- ४३।१७२ साशीतिक शत दिक्ष ४।९३ सा तं पितृसमं दृष्ट्वा ४३१८२ सान्त्वयित्वाश्रुसंधौत- ४३।७३ साशीतिपदलक्षक १०१११० सातासातविकल्पस्य ३२६९ सान्ध्यरागपटलेन ६३।३२ साथ लोचनयाऽजन ३०११५ सातिरेकाऽवरा सेव ४।२५९ सापराधतया यूय ५०॥४३ साष्टषष्टिशतं दिक्षु ४।९६ सातिवरलभिका तस्य ३३।१०५ सापायमत्र दित्रास- २२।१८ साष्टत्रिंशत्सहस्राणि सानोऽचिन्तयदत्यन्त- ४७।११४ सापि तस्मै यथावृत्त- ४७१५९ साष्टभाग त्रिकं चाग्रे सात्यकिः प्राह सत्यं भो.४३।११३ सापि दर्शनतस्तस्य १४।४१ साष्टावेव मुहूर्ताः स्यात् ५८।२८७ सा त्रयोदशपल्यायु ६०.५२ सा पारिवाहिको ज्ञेया ५८५८० सा सहस्रारकल्पस्य ६०११२० साऽदर्शयच्च पत्येऽङ्ग ४७१६८ सा प्रणम्याभणीत्सौम्य २४०६९ सा सप्तदशतन्त्रीका १९७७ साधयन्ती महाविद्या २६१५१ सा प्रणम्य वरं वने १९७८ सा स्वपापोदयात्साधी ६४।११ साधारणमने केपा ५८।२६८ सा प्राप्तानुमतिः प्रीता ३०१८ सास्य निबंन्धतो वाचा ३३।८७ साधिते भारते वास्ये १११५८ साभिज्ञानमभिज्ञोऽसौ ३०१७ साऽसूत सूतिसमयेन्द्र- १६॥१२ साधिकका दशाशाभ्याम् ५।३१४ साभिमानमुदस्यान्तं २९।१७ सा सेना सर्वतः सर्वा ५७.१७९ साधिका तु परे चासा. ४।२५० सामग्रीकृतकायस्य १०।१०२ साऽस्ये साधिकान्नपञ्चाशद ५।५८६ सामश्चीपप्रदानस्य ५०११८ साह विष्णुकुमारस्य १९:१४० साधुमाधितकाया सा ३०१२६ सामायिक त्रिसन्ध्य तु १८०४७ सा ह्यार्तेन खरी भूत्वा ६०.३१ साधुकारी मुहुर्दत्तस् १७११४७ सामायिक यथास्यं सिताख्या विजयः स्याता १९६४ साधुरस्यति काव्यस्य सामायिक करोमीति सितेन तापसेनान्त ४६।५४ २।२८ साधुदर्शनतः शान्तः ४६।५० सामुद्रिकोऽन्यदादाक्षीत् २३।११२ सिद्धविद्यः प्रणम्यासो २४.८१ साधु दर्शनयोगेन २७.१०५ सामुद्रिकवच प्रत्वा २३३१२० सिद्धविद्या प्रसिद्धासो ३४०१९ साधु ससाध्य युक्तेन ११४८८ सा संप्रज्वलित होना ४।२७८ सिद्धशब्दार्थसम्बन्धे १७११०२ साधुदानानुमोदन १२।२० साम्येनव ततो व ५०१६४ सिद्धः सिद्धेतरचनो साधु पृष्टं या पूज्यै ! ४५.७९ सा योपिद्गुणमनपा २३१४८ सिदं विद्युत्प्रभामिख्यं ५।२२२ साधप्रकृतय. चित् ३१॥६० सा यक्षग ६.१६४ सिद्ध नौव्यग्ययोत्पाद- माधु नाप सपाख्यान ५२।४४ सिई सोमनमाभिव्य ५।३९९ मुग्धायदत्तस्य २९।१६ सारणेन कुमारण ५।२२१ श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः सिद्धाः पष्टिसहस्राणि ६०१४४३ सीताकूटं चतुर्थ स्यात् ५।१०० सुता चेटकराजस्य २२७० सिद्धाः शुद्धाः प्रबुदार्थाः ६११३८ सोतोदाकूटमन्यत्तु ५।२२३ सुतागमनवेललैर् ४३१२३७ सिद्धायतनकूटं प्राक ५५३ सोतोदापि गिरिं गत्वा ५६१५७ सुताभूदेवसेनाया सिक्षायतनकूटं प्राक ५।२६ सोतोत्तरतटे कूट ५।२०५ सुतासोत्पुष्कलावत्यां सिद्धायननकूटे च ५.३० सीमन्तकस्य विस्तारी ४१७१ सुतास्तु पाण्डोहरिचन्द्र. ५४।७३ सिद्धायतनकूटं स्यात् ५।११० सीमन्तके चतुर्दिक्षु ४४८६ मुतो नरपतिस्तस्मात् १८७ सिद्धायतनकूटं स्यात् ५७१ सीमन्तकेन्द्रकस्यामी ४।१५२ सुतोभवच्चन्द्र इव सिद्धायतनकूटं स्यात् ५।२१७ सीमन्तको मतः पूर्वो ४७६ सुनो हिमगिरिस्तस्या ४४१४६ सिद्धायतनकूटं च ५।८८ सीमन्धरजिनेन्द्रेण ४३।२२४ सुनैर्दशभिरन्योन्य- सिद्धार्थप्रियकारिण्योः २।४४ सीरिणाक्षत जगन्यतः ६३।११ सुतौ गगनमुन्दा ३४/३५ सिद्धार्थसारथिता ६११४१ सीरिणा स गदितस् ६३।६३ मुत्रामाद्यैश्च सम्प्राप्तथ ९७२ सिद्धायतनकूटेपु सीरिरक्षणम् तस्य ५२२५ सुदर्शनममोघं च १६१२० ६५२ सिद्धादेशस्य सत्साघो २३८ सीतोदापूर्वतीरे तु सुदर्शना तु शिविका ६०२२१ ૨૦૬ १८।११७ सिद्धाना तु परं स्थानं ६।१२६ मुकण्ठगोपालकलोपगीतं ३५५० सुदर्शनायिकापावें मिद्धाख्यं माल्यवस्कूटं ५।२१९ मुक्षेत्रे विधिवक्षिप्तं ७१११ सुनन्दगोपेन यशोदया च ३५।४६ सिद्धार्थपादपाः सन्ति ५७१७० सुकिंपुरुषकिन्नरा ३८.१८ सुनन्दा बाहुबलिनं ९।२२ सिद्धार्य: सुप्रतिष्ठोऽह- ६०११५५ सुकुमारः सुतस्तस्य ४५।१७ सुनन्दामूनवे दत्त्वा ३४।४७ सिद्धिः प्रत्येकबुद्धाना ६४।९७ सुकुमारः कुमारस्तैर. ११॥६३ सुनिमित्तविसवादो ३१।१०७ सिद्धिरव्यपदेशन ६४।९६ सुकृष्णनीलकापोत. ५६।२६ सुनील घनकै शाऽसौ ९।८४ सिद्धिक्षेत्रेश्मला सिद्धि ६४.८८ सुकृष्णगिखराः शैलाम् ५।६५४ सुन्दरश्च विशालश्च ५।६९४ सिद्धस्तूपाः प्रकाशन्ते ५७।१०३ सुखदु खरसोन्मिश्र. १२।१७ ४५/२५ सिद्धिसामन्तवयं ५०३२ सुखनिद्राप्रसुप्तोऽसौ ७।११९ सिद्धि नविशेपर ६४॥९८ सुखमृत्युः श्रुतेः पुंमा १०५ सुपार्वश्च जिनेन्द्रोऽस्मात् १३।१२ सिद्धिः सिद्धिगती ज्ञेया ६४४९३ मुखं कृतकीडझपद्वये ३७१३४ सुपार्श्वनामधेयोऽग्यम् ६०११३९ सिस्यनिहव ससिद्ध ५६५८० सुर्य देवनिकायेषु १०१५ सुपार्वेशोऽनुराधायां ६०।२०७ सिन्दूर. श्यामको द्वीपस् ५।६२३ सुस्व वा यदि वा दु ख ६२५१ सुगतवासीयुगलं वसान ३५१५५ सिन्धुक्क्षं महाक्क्ष २२।९७ मुखासि कापि नकान्तान् १७११३८ सुपूर्णकुम्भद्वयदर्शनात् ३७:३५ सिन्धुदेव्यभिषिच्यनं ११३४० सुगतगताममूं परमका- ४९।३४ सुपृष्टमुत्सृष्टमुदात्त ६६१४९ मिन्धुदेशाधिपो मेह ४४।३३ सुगन्धसर्वगन्धाख्या ५।६४६ सुप्रतिष्ठं प्रतिष्ठाय ३४४४ सिंहमेनो मतो जातः २७५३ सुगन्धिमुनिश्वासम् ४२१७६ सुप्रतिष्ठं प्रणम्येयुम १८४१७७ सिंहचन्द्रमुनि. सम्यगा- २७७६ सुगन्धवायुभि साधं. ५२०६८ सुप्रतिष्ठिनमाकाश ५६४८ सिंहविद्यारय दिव्यं ५११९ सुप्रीव इत्यनुग्राही १९१५४ सुप्त एव विपमेएणा सिंहदंष्ट्रात्मां दृष्ट्वा ३२१२५ सुग्रीवश्च यशोग्रीव १९।२६९ सुप्त एव सुम्पनिद्रया ६३०९ सिंहविक्रीडितं कृत्वा ६०1१५७ मुग्रीवेण सनोपेण १९५८ सुप्तमात्रमशस्त्र ६६.१८ सिंहसेनो महाराजो २०२७ मुगौतमायुष्यपुराण ६६।१२ सुप्रतिध्वनिविक्षिप्त ८६० मिहहंसगजाम्भोज ५६३६९ मुघनाङ्गुलयोऽडिया २३६९४ सुप्रभ तु महापयो ५।६९२ मिहामनं सुरेन्द्रस्य ५३३३८ सुघने जघने तस्या १४०३४ मुप्रमन्नं भ्रमग्ग्वालं ८1७४ मिहामनस्यमा भिर् १७८९ मुघोपात्रा ततो वोणा १९१३७ मुबन्धूराघरच्छाया २२०१० ३३७ सुचन्द्रो वालचन्द्रश्च सुभगाः स्युरनु तर २६७८ मिही ध्यानी च किं. १९१०७ मुनयानरयासा सुभद्रः म.गरो मद्रो सुपमः पद्मदेवरच ३०१२ सुपात्रे सुफलं दानं सिंहासनं नरेन्द्रौपर १११२३ हरिवंशपुराणे सुभद्रोऽतो यशोभद्रो सुलसा व परित्यज्य २३३१०९ मूनोः क्षौरकदम्बस्य २३३१३५ सुभानुरककोतिश्च ३३३९७ मुलसे ! शृणु वत्से में २३५१ मूपकारो मतः प्राप ३३३१५६ सुभूमश्च महापयो ६०।२८७ सुवर्णवरनामातो ५।६२४ मूयन्ते यत्र राजानः २३११४२ सुभृतभारतभूरिगिरिशते १५:२१ सुवर्णकणिकारीह ८॥२३० मूररोनमहाराष्ट्र- सुभूतमाचरणं शरणं भ-४५।१५९ सुवर्ण कूलया रयता ५।१३५ सूर्य चक्षुदिशं श्रोत्रं १७४११० सुभौमस्य सहस्राणि ६०५०८ मुवर्णरिक्षया चार्या २०३५ सूर्यप्रमसुरश्च्युत्वा २/७३ सुभौमे वर्धमाने तु २५११७ सुवर्णद्वीपमाविष्य- २११०१ मूर्यकान्तकरामगात् २१८ सुमतिः थावणस्यासीद् ६०१७१ मुवर्णमणिरत्नरोप्य ३८१५१ सूर्यश्च चन्द्रवर्मा च ४८1७१ सुमतेढे सहस्रं तु ६०३७५ सुवर्णकर्णामरणोज्ज्व- ३५।५६ मूर्याचरणविस्याति ५।३७६ सुमत्यादिचतुर्णा च ६०११४८ सुवास्तु मनोहस्ती ४३३१९६ मूर्याचन्द्रमसस्तेषा ૬ર૪ सुमनः सौमनस्य च ६।५३ सुवसोस्त्वभवत्सूनुः १८।१७ मूर्याचन्द्रमसामगोचर- ४.३८४ सुमन्दरगुरोः पार्वे १८।११६ सुविधिर्मार्गशीर्षस्य ६०१७३ सूर्याभो विभुरस्यासा- ३४.१६ सुमित्रस्तापसस्तत्र ४२११५ सुविशालश्च वज्रश्च १२।६७ मूर्याश्चन्द्राश्च तत्रस्था सुमित्रदत्तिका तस्य २७।४५ मुवीरादित्यनागारुयो ५२६३२ मूर्याकारी सिरानी २३४६१ सुमित्राच्या प्रियास्यासौ ६०७६ सुवृत्तदीर्पसञ्चारि २०३७ सूरिः सीमन्धराभिस्यः ६०।१५९ सुमुग्धमुखकोशक ३८।२४ सुव्यवस्थाप्य वाया- २१११७४ सेति पृष्टा जगौ हेतुम् ६४।१२४ सुमुखराजकृत च पराभव १५।४४ सुशाल्मलोखण्डसुमण्ड- ३५७० सेन्युक्त्यानुज्ञया मुक्ता २२।१२४ सुमुखमुख्यवधूजनमुख्यता १५।५ सुशास्त्रदानेन वदान्यता. ६६३३२ सेत्युक्ते त्यक्तसंशोति ६०१५५ सुमदुसुरभिगन्ध्युद् ३६१२८ सेनापतिरयोध्यश्च सुशृङ्गमुत्तुङ्ग ३७७ सुमृदुनापि तदा मृदुनि ५९१८ सुश्लिष्टपदजसोद्य सेनाना नायक शूर- ९।१० मुरं वरतनुं तत्र ११११३ सेनानी. परसेनान्या सुपमासुपमाऽऽया स्यात् ७१५८ सुरत्नसिंहासनदर्शनेन ३७१३८ सुष्ठुकारे प्रयुक्तेऽस्याः २११४५ सेनानीः परिघ शक्ति ५२१६२ सुरत्नहेमने यूर ८।१८० सुसीमा तनया भूत्वा ६०७२ सेन्द्रा सुरास्तदागत्य सुरत्नपरिणामानि ५।११७ सुसोमा कुण्डलाभिख्या ५।२५९ सेयं त्वा नाप्तितो सुरत्नासनमध्यस्था ५७.६१ सृमूक्ष्मत्वादवध्योऽय- १७११३९ सेव्यमानः सुरैरोगः सुरवधूनिवहादिपरिग्रह १५।४२ सुस्थिता प्रणिधान्यासु ८१०८ मैकम्त्रिशत्सहस्राणि सुरवधूवरसुन्दरकन्दरे सुरभिपुष्परजःसुरभी १५.३५ सुस्नातोऽलङ्कृतोभूत्या २२॥१५० सकास्त्रिंशत्सहस्राणि ५।२८६ ५५।३५ सुस्वप्नदर्शनानन्द ८.७६ सैकादशगणाधोशस् सुरभिगन्धशुभाक्षत १५।१२ सुसौरभाम्भोभरकुम्भ- ३७।१४ संवाद्या विघाटेऽपि सुरभीणा घटोघ्नीना ९।३० मुहरिविष्टरवर्तितमीश्वरं५५३१०६ सोऽगो नागपुरं मूर्य, ६०।१९८ सुरासुरनराधीश २१४७ सूचिरभ्यन्तरा पञ्च ५।४९० सोङ्गलग्नमनपाय- सुराणाममुराणाञ्च ८।१४९ भूचिनाटकमूच्यग्ने २११४४ सोऽर्चनोयोऽभिगम्यश्च ५६१६८ सुराष्ट्रमत्स्यलाटोरु- ५९।११० सूतकस्येव सङ्घातः ४।३६४ सोऽटन् यदृच्छयादाक्षीत् २६१४७ सुस्पमिन्दोवरवर्णशोभं ३५/३६ सूदेन कुपितेनासो ३३११५४ सोऽथ नीलाञ्जमा दृष्ट्वा ९।४७ सुरेन्द्रवर्धनः खेन्द्रः ४५११२६ मूनवो विनमयुक्ताः २२६१.३ सोद्दण्डपुण्डरीकौधं ८.६८ सुरेन्द्रदत्तनाम्नाऽहं २११७८ सूनुर्मदनवैगाया ५०१११६ सोद्यानभूमयश्चित्राः मुरेभवदनत्रिके ३८५४३ मूनु विजयसेनाया १९१५९ सोऽध्वा द्विगुणितो रज्जुस् ७५२ सुलसायाज्ञवल्क्यौ तौ २१११३८ सूनु सीमङ्करं नाम्ना ७११५४ सोऽन्यदा मुनिमप्राक्षी- २५:३८ सुलसा जल्पकालेऽस्य २१११३५ सूनुनाशुमताज्यन्त ३१।३० सोऽन्तर्मुहूर्त सुलसापहनि धात्वा २३३१२८ मूनुर्जरत्कुमारोऽस्मि ६२॥३८ सोजन्तरेणतु हली ५११२३ ९४१ २२११३१ ९।९२ ५।२८८ ४२६३ ६३.९८ ७1८२ ५६७२ ५४.३ सोमदत्तो महादत्तः सोमशर्मा मुतात्याग इलोकानामकारायनुक्रमः सोपचारं नृपं दृष्ट्वा २९।५२ सौधर्मेन्द्रस्य भोग्याद्या ५।६५९ स्थानमेकमतस्तूवं ६४१८६ सोपवासव्रतधान्तः २७१६७ सौधर्मशानदेवानां ६१०९ स्थानकमास्त्रिक द्वेच ५१५५५ सोऽपि भूधमनिगोदस्या १०१६ सोधौ च विमानाना ६१५५ स्थानान्यतोऽपायाणि ६४६८५ सोऽपि विश्रम्भदूरास्त १४११०० सौधर्मशानयोर्देवाः ४१६९ स्थानेषु नियमेनोवं ३।१०० सोऽपि मृत्वा सुतस्यैव ४३।१२३ सौधर्मशानयोरायुः ३११५२ स्थावरत्रसकायेषु १८१५३ सोऽपि शास्वानुज प्राप्तो ६२२४३ सौन्दर्येण सुखात्मानो ५७।१५८ स्थावरे त्रसकुले ६३१९० सोऽपि लब्धाभिमानेऽसौ १८१३ सौभाग्यहृतचेतस्कं १९१३ स्थितं प्रति मया रात्री २०११ सोऽप्यविज्ञातवृत्तान्तो २३३४० सौभाग्यरूपनवयौवन- १६:३५ स्थित सिंहबलं दुर्ग २०१७ सोपासिता नवनवत्युप- १६४ मौभाग्यातिशयं सत्या- ४३१७ स्थिताः कालमहाकाल- ४१५८ सोऽब्रवीच्चारुदत्ताख्यः १९।१२२ सौम्याग्नेयगुणा देव ५९।६६ स्थितो रङ्गविभागेऽत्र २२:१२ सोऽभवद्रामदत्तायाः २७४६ सौराज्ये पाण्डुपुत्राणां स्थिता द्वोपिमुखाश्चाने ५।५७२ सोऽभिनन्दिततद्वाच्यः ३१११० सौप्यस्य पराकोटिः ९।१४९ स्थितिरेपैव बोधव्या ४।२६५ मोमदत्तसुतायास्तु ४८.६० सोपंकाङ्गारवंगारि २५।६३ स्थितिबन्धविकल्पस्तु ५८.२८३ सौलक्षण्य च सौहप्य ४२०३६ ४०१२४६ स्थितिमितं विजयाघ- १५:३७ सोमिनी भामिनी तस्य ४५४१०१ सौवीरी हरिणाश्वा च १९:१६३ स्थितिरक्व विज्ञेया ४१२६० सोमप्रभस्य देवीमिर ९।१७१ सृष्टपोडशतीर्याय १।२८ स्थितेपु हास्तिनपुरे ५४.२ स्तनस्य तु विस्तारो ४११८५ स्थित्युत्सेघप्रवीचारा ६१११८ सोमश्रीवन्धुभिस्तर ३०१४० स्तनके नवदण्डास्तु ४।३०७ स्थित्वा तत्रापि सौख्येन ४६६१८ सोमथीनिशि हम्यस्था २४१५३ स्तनरम्यस्त्रियाः क्लेशा.२१११४३ स्थिरमनसि विधाय. ३६.३० सोज्यं वर्पयतेऽतीते ३१११२७ स्तरक्स्य त्रयस्त्रिशत् ४६१८४ स्थापिता वसुराज्येऽप्टौ १७:१६१ सोऽयं द्वैपायनो योगी ६११५४ स्तरवेऽष्टौ धनपि द्वी ४॥३०६ स्थापितोऽन्य पदे तस्य २७१४३ सोऽयं यक्षलिको नाम्ना३३३१६२ स्तम्भितेन विमानेन ४३३४० स्थूलमुक्ताफलेनास्य ८।१८२ सोऽयोगवली ह्यात्मा ५६।७९ स्तरका स्तनश्चय ४१७८ स्थूलस्फिक् च पुमानिः- २३१६८ सोल्वावृष्टविगाश्च ११६६५ स्तवनपूर्वममी च ५५१२८ स्यूला धनविमुक्ताना २३1८८ मोऽवतीय विमानाग्राद् ३२।४० स्तुवन्ति मङ्गलस्तोत्रर् ५९:१९ स्नानभोजनवेलाया १९।३७ सोऽवरोधनराजीव. १४।१० स्तूपा द्वादशभूभूपा ५७७१ स्नानासनमभून्मेरुः ८1१७० सोऽरगाह्य हरिदूत. ६३१४७ स्तोकाः समुद्रसिद्धास्तु ६४।१०७ स्नात्वा भुक्त्वा स तेनामा१९:३९ सोऽवोचदक्षिणश्रेण्या ४४।४ स्त्यानगुद्धिर्ययास्त्याने ५८५२२९ स्नात्वा मुत्तवा कृतातिथ्या ५४१५४ सोऽवोचसुदेवोऽय २३।२९ स्त्रीणामाचं पारतच्यं ५५।१३५ स्नात्वा पयोधरोन्मुक्तै२२।१२५ सोवोचच्चारुदत्तस्य २१।१६८ स्त्रोवरविपदग्यस्य २३।१२९ स्निग्चताननखी पादौ २३॥६० मोह नैमिजिनादेश ६२।३९ स्त्रीवक्त्रमनपत्याना २३११०० स्निग्याभिरपि सुस्निग्धा ८३३१ सौगन्धिक ततोऽपाच्या ५।६०३ स्त्रीपुंनपुमकैस्तियंग १०४२ स्नुपा बुद्धिरभूत्तस्या ४५।१५० तत् २४।१९ स्त्रीपुसलक्षण पूर्णा ७९५ स्नेहपाश दृढं छित्वा १२०४८ ६।३६ स्त्रीपुंसद्गपरित्यागः २।१२० स्नेहानपेक्ष्य कैवल्य. ८२१७ सौधर्मपूर्वविवृधाश्च १६।५४ स्त्रोपुसपशुसंपाति ५८७२ स्नेहवानथ जलार्य- सौधर्माधिपतेच्या ६४।१२६ स्त्रीरलं प्रतिगृह्याम्या ११६५० स्नेहग हरमोहिन्यो १८११२२ सौषधिस्तदा देवः २०६४ स्त्रीरललामतुष्टेन २५।३१ स्नेहोऽपत्यकृतोऽमी' ६०1८ स्त्रोरागकपाश्रत्या ५८११२१ स्पर्म रगं च गन्यं च १८.९२ सौधर्मादिपु देवेषु ३१६० स्त्रीलक्षणरती लक्ष्मी ४२०५१ स्पर्शनस्योदयायस्य ५८१२५६ सोयन्द्रस्तदारुढो ८1१४२ स्थण्डिले निशि दिवा स्पर्शन नमस्थानं ૧૮૮૬ सौदामोऽपिच सौधर्म. प्रथमः कल्प. सौधर्माद्यः सुरैरेत्य हरिवंशपुराणे स्पर्शनं रसनं घ्राणं १८४८४ स्वत एवाग्रतो जन्म ७.१२ स्वयम्भूरमणद्वीप ५१७३० स्पर्सनोष्णेन वाध्यन्त ४॥३४६ स्वतनुवृद्धिमतश्च शनैः १५॥३१ स्वयमुपा दुहितास्य- स्पृष्टा नृपोकिरण- १६०९ स्वदोपच्छादनायासौ ३३।१२२ स्वयम्प्रभविमानेश. ५.३२३ स्फटिके लम्बुमा त्वङ्के ५७१५ स्वपक्षमित्यु मन्यस्य १७१११३ स्वयमेवात्मनात्मानं ५८।१२९ स्फुरत्पुलकससक्त. ५७१८३ स्वपक्षगेहेषु तदाऽविरासन्३५:२१ स्वयोगवक्रता चाय- ५८६१११ स्मितऽथ नाथे तपसि ६६।९ स्याच्चत्वारि सहस्राणि ६०।४०३ स्वारिग्रहभेदे तु स्वपनिषोदनुरसा प्रसर्पन ३५४४३ स्वरसाधारणगतास्तिस्रो १९११७८ ५६१२५ स्वरस्नित्रयहीनौरत ५७.६५ स्यादष्टौ हि सहस्राणि ५।७४ स्याद् द्विधानवनिरोध• ६३।८६ स्वपुर्याश्च मनोहर्याः २७११० स्वराः सर्वे च विज्ञेया १९।२२४ स्वपूर्ववैरिणा दाह १२।२१ स्यात्परस्परल्याणा स्वरूपालोकनाक्षिप्त. ४२।२७ ३४॥१२४ स्यात्पर्यायसमासेपु स्वप्रमादकृतानर्थ ६४।१६ स्वररपि च सप्तभिर् ३८।२७ १०॥२१ स्यान्मिथ्यात्व स्त्रोत्व. ५५।१३७ स्वप्रदेशपरिस्पन्द ५६७७ स्वर्गच्यवनपर्यन्त १२।२३ स्वप्रशंसापरानिन्द्या: ३११११ स्वर्गसौन्दर्यसन्दर्भ स्याद्विवेको विभजनं ८७१ ६४।३५ स्वसुः प्रसूति प्रतिविद्य. ३५।३१ स्वर्गश्रिय श्रिया जेत्री स्यादिशतिसहस्रस्तु ५७६ ६०१४३५ स्वप्नार्थमिति बुद्धा तौ ९।१६५ स्वर्गावतारकाले यः स्याद् पत्रिंशत्सहस्राणि ५।३०० ५०.२२ स्वप्नार्थ सोऽवधार्यता स्यात्संरम्भसमारम्भा ८।९२ स्वर्गावतरणं जन ८॥९८ ५६०२२ स्वप्नान्तरिक्षभौमाग- १०१११७ स्यात्सामायिक चारित्र स्वर्गावतारजननाभिपव- २।२३७ ६४/१५ स्यात्सूक्ष्मसाम्पराये च ६४७७ स्वभर्तुः सोमभूतेस्तु ६४।१३६ स्वर्गापवर्गमूलस्य १०।१० स्यु कपायकुशीलास्ते ६४।७४ स्वभावमत्सरारम्भा ८.८२ स्वर्गापवर्गमार्गस्य ८/२१९ स्युविशतिसहस्राणि ४३१५ स्वर्गानादवतीर्याऽथ १३.२६ स्युदिशसहस्राणि ६०३६१ स्वभावगहनाहीन ३।७३ स्वर्णदासगृहक्षेत्र- स्युपष्टिसहस्राणि ६०.४३६ स्वभावादावोपेता. ३।१२५ स्ववेत्युक्ता. समात्मानः ५९८१ स्युश्चतुर्विशतिर्भागा ५।४८७ स्वभावाच्दण्डतुण्डोऽय- ३३।१८ स्वर्णपोडशकोटीपु २११६१ स्युश्चतुर्दशलक्षास्तु स्वभावोऽयं जिनादीना ६५६१३ ५।२७९ स्वल्पाकाशषडशाश्च ७.३५ स्युश्चत्वारि सहस्राणि ६०॥३५८ स्वमन्टेणेष्टमात्रेण १७११११ स्ववंशभाविनं श्रुत्वा स्युस्ता पञ्चशतपूर्वधरा १६७१ स्वमुखेनानुभूयन्ते ५८.२९२ स्वविमानावधिस्तू ६.११७ स्युस्तेपामशुभतराः ४॥३६८ स्वयमेव वलोद्रेकात् २५।५१ स्ववेपकृतसञ्चारा २६२३ स्रजचक्रदुकूलाज २०७३ स्वयंवरे प्रवृत्तेऽत्र ४४।४२ स्वशोकोत्पादन चान्य. ५८.१०२ सजमिनोऽथ सवस्त्र- ५५।११९ स्वयवरविधौ तस्याः ३१।१२ स्वसम्बन्ध ततः श्रुत्वा ४७।६० साजो सुगन्धायतयोः ३७१३१ स्वयवरमगुस्तस्या स्वस्वभावविभक्तान्य १९।२२ सजी प्रलम्बे विमलाम्बरे ३७११० स्वयवरविधौ स्मृत्वा ६४४१३१ स्वसवेगादि रागार्थ ५८।१२६ स्वकर्मबन्धभीरुत्वान् २०१४४ स्वयवरगता कन्या ३११५३ स्वसंन्यं परमन्यं च ५२२८७ स्वकलोऽपि यत्राय स्वयंवरविधेः कन्या ४३।१९१ ८.५ २४|४० स्वस्थानमेककोऽनल्प- स्वकृतो बन्धनाये. स्याद्५८।२६३ स्वयवरधरोत्खात. २३१५७ स्वस्थानाच्वलयेदल २०१६५ स्वक्रोधलोभभीरुत्व- ५८।११९ स्वयंवरायिना तेषा २३१५८ स्वं विवेश शोरी ४२२९७ स्वचरणभुजदण्डा ३६१३७ स्वयंवरे नरश्रेष्ठ २३११२५ स्वं विशतितम तीर्थ ११२२ स्वच्छस्फटिकरूपास्ते ५७१९६ स्वय कृतं नर्म ततो. ५४१६९ स्व बुद्ध्वा हियमाणं खे १९९९ स्वच्छानामनुकूलाना ११।९२ स्वय कर्म करोत्यात्मा ५८०१२ स्वाङ्गरस्याङ्गसङ्ग या ४७।५२ स्वजनकृताभिनिष्क्रमण- ४९।२४ स्वयमेव रथं दोा- ६११८४ स्वाधीनमप्रतिहतं स्वजननिजवधूना ३६॥५२ स्वयंभूरमणाभिस्यो स्वाधीने सति रूपास्त्रे १७६ ग्वजननीस्तनपान १५।३० स्वयम्भरमणेऽप्यादी ५१६३२ स्वाध्यायध्यानयोगस्थो ४३३२१२ ६०३६४ स्वभावमुखसौगन्ध्य- ५८।१४२ ३४।१ १६.६० ७९ श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः स्वाध्यायः पञ्चधा ज्ञान- ६४।३० हरिवंशशशाङ्कस्य ३३।१७२ हिंसानन्दमपानन्द १७११५३ स्वान्तरङ्गजनजातु ४११५५ हरिवाहनविद्येशं ६०८२ हिंसामृतपरादत्त ३१८९ स्वान्तःपुरगृहालीभिः ४१०२९ हरिरवत्य निजाम्बुज- ५५।६९ हिमानृतवचश्चौर्या- ५८।११६ स्वान्तःगुदि जिनेशाय ६११९ हरिरय प्रभवः प्रथमोऽ- १५॥५८ हिंसानोदनयानापन् २३३१४० स्वान्तकाले निमित्तत्व ६११२० हरिरतो वलशम्वमनो• ५५।२६ हिन्दोलग्रामरामेण १४॥२० स्वाभिप्रायवशावेदे १७।११६ हरिरपि हरिशक्ति ३६१४६ हिमवत्प्राक प्रतीच्योः स्यु:५।४७५ स्वामिनं कोलपुत्रांश्च ९।११२ हरिरिति हरिवना ३६।२५ हिमवत्कूटतुल्यानि ५।१०८ स्वामिकार्य परित्यग्य ५०९८ हरिसभागतराजकभारती ५५७ हिमवद्वेदिका तुल्या ५।१२७ म्वामिन्नगनिवेगस्य १९६७० हरिश्मश्रोईरीहस्य २८॥४३ हिमवर्दललल्लवकास ४।८४ स्वामिनि ! स्वामिनी ४३।२४ हरिपेणस्य कौमार्य ६०१५१२ हिमविन्ध्यस्तनाभोगां २३१३७ स्वामिन् वरप्रसादो मे ३३।३९ हरिणा सुता ज्येष्ठा ६४४१३० हिमशिशिरवसन्तग्रीष्म- ५३१५४ स्वाम्यादेशे कृते तेन ८1१३१ हरि मस्यापि मंप्राप्ता ४८.५ हिरण्यनाभवीरें ५११३५ स्वायम्भुवं सुधाधात्री ५७।११९ हरेरन्यास्वपि स्त्रीषु ४८०९ हिरण्यवर्मपूर्वोऽह १२।१४ स्वायम्भुवै महामागे ११३१३६ हलकोटी तथा गावस् १२।१२८ हिरण्यवृष्टिरिष्टाभूद् ८।२०६ स्वायाम. क्षेत्ररक्षार ५१५४७ हलधरं बलवन्तमलं ५५।६ हिरण्यरोमतनया २११२५ स्वास्यारविन्दमौगन्ध्य- २४॥६० हलमृदवधूतार्थो ३६।१६ हिरण्यस्वर्ण योर्वास्तु ५८११७६ स्वीकृत्य वारुणीमाशां ४०1१७ हली जर्जरितं कृत्वा ४२।९५ हिंसारिप्विह चामुम्मिन् ५८३१२३ स्वीपयोगविदोपस्य ५६७३ हसन्ती नर्ममावन ३३॥३३ हिमादेर्देशनो मुक्ति १८.४६ स्वासे पत्रिगुणात्मीय- ५७१११ हस्त्यश्वरथपादात. ३११७४ हिमाद्यवर्तुः कर्तुर्वा २०१९२ स्त्रोदरस्थितनि:शेप ४॥३२ हस्तसंवाहने काश्चिद् ८६४६ हिंसारागादिमवधि ५८।१५२ स्वोत्तामस्तम्भमंकाश: ५९५५ हस्तपादशिरश्छेदं ४३।१८२ होनेन दानमित्येषाम् ५८।१७२ स्वष्टाय तेऽटवर्याय ४२११९ हस्तास्नयस्तथैव स्याद् ५।२८९ होः श्रोः धृतिः परा सा ८।११२ म्वष्टाङ्गनामुखरनूपुर. १६६४३ हस्तास्त्रयोऽङ्गलानि ५।३९३ ह्रीकूटं हरिकान्तादि ५.७२ स्व स्वे काले मनुष्याणा- ७४ हस्ताभ्यां किमु मनामि ४३।४४ ह्रीकूटं धृतिकूट च ५६८९ हस्तिशीपंपराधीश [ह] ६०।१०६ होदयाक्षान्तिशान्त्या- ५७।१५१ हस्ते स्तनानुलप्ता ता १४.९६ ह्रीमन्तं पर्वतं ताम्या २११२४ हदाटक्पोटस्थाः ५७१५० हंसक्रौञ्चासनमुण्डर ५।३८८ हविद्या यवम्तम २७४१३४ हुनधनियस हाना २५॥२० हंसालीपातलील. ५६।११७ हतो यक्षकुमारीभ्यां १९।११९ ह्ते सेनापतो तत्र ५११४२ हा जगरसुभग- ६३३२० हृदयान्तस्पिरोऽप्यष्ट्ये ५।६९३ यस्तित्तिरकल्मापः ५२।१४ हा प्रधानपुरुषक. ६३.५१ हृदयेन सम तस्मिन् ११८ हरनि देयमिह प्रवरा ५५५२२ हारकुण्डलपूर ७८९ हृदिकातिधर्मासी ४८०४२ हरिकृताभिगतिहरि ५५।३ हारं स पृथिवीसारं हृष्टा प्रद्युम्नसम्वाभ्यां हरिचन्दनगन्यादयर २२०२२ हारिणा स्वगिणा धात्री ३३।१६९ हेतिग्यालादहरेभिः हरिण र रोद ४२१९३ हारिणो वारिणा पूर्णी २७४ ५.३०६ हारिवारि परिताप ६३०२१ हेतु. पुष्पगुणाल्यात. ५८०२७७ हरिदती मरिचण्ड २७११३ हावभावविदग्धाभिर ६।१२३ हेतुस्तीर्यपरत्वाय ५८१२७८ हरिवनिएहसरोधितः ५५०५१ हावभावाभिराम च ८.१६. हमाम्भोजरज.पुश्मा ५१२२ होरखगनमचन्द्र २२।११५ हिनमहातयोत्य- ३६।२६ मङ्गोनमुत्तमः १८।१६२ हरिवमपुराणस्य १।१२६ हिता: मनामनिया ६६४ हरमवस (मौ). ५.१४ हरिवंधननोमानः ३१९८८ हित्वा हतो विषयमौर. १६४८ हरण्यरतमित्यन्यत् हरिवंगप्रसपम्प १।११४ हिमादिन्यो पयागणित. ३९. हैरण्यानपूट प ४८.८ ८६७ हेतुना कैन नायन हरितालमय पष्ठः शब्दानुक्रमणिका इस स्वन्धमे हरिवंश पुराणमें आगत व्यक्तिवाचक, भौगोलिक पारिभाषिक और कुछ साहित्यिक शब्दोंका अर्थ अवगत कराया गया है। व्यक्तिवाचकके आगे कोष्ठकम (व्य ), भौगोलिकके आगे ( भौ) और पारिभाषिक शब्दके आगे (पा) दिया गया है । साहित्यिक शब्द = चिह्न देकर खाली छोड दिये गये है । इन शब्दोमे ६०वें सर्गमे आगत तीर्थकरोसे सम्बद्ध शब्द संकलित नहीं है क्योकि उनका विवरण पृथक् स्तम्भमें दिया गया है। इसी प्रकार अन्तिम सर्ग, वणित आचार्य-परम्पराके नाम भी संगृहीत नहीं है क्योकि उनका प्रस्तावनामें उल्लेख कर दिया गया है। इस ग्रंथमे एक-एक शब्द अनेको स्थानोंपर प्रयुक्त हुआ है परन्तु उनका एक बार ही उल्लेख किया जा सका है। शब्दोके आगे सर्ग और श्लोकोके अंक दिये गये हैं। ममानता रखनेवाले वे ही शब्द पुनरुक्त किये गये है जिनका भिन्न अर्थ होता है। [अ] अतिदुःपमा (पा) अवसपिणीका अजितञ्जय = कृष्णका धनुष अकम्पन (व्य) कृष्णका पुत्र छटवां काल ७५९ ३५१७२ ४८1७० अजित (व्य) जरासंघका पुत्र अजितक्षित = चक्रवर्तीका रथ पगारक (भी) देशका नाम ५२।३५ ११६४ ११।६८ अजित (व्य) द्वितीय तीर्थकर अजनभूलक (भी) रत्नप्रभाके अग्निगतिदक्षिणा २२०६६ १३१२६ खर भागका ग्यारहवा पटल अनारक (व्य) ज्वलनवेगको अटट (पा) चौरासी लाख अटटा- ४/५३ विमला रानीसे उत्पन्न पुत्र ङ्गोंका एक अटट ७१२८ अञ्जनमूलकूट (भी) मानुपोतर. १९८३ घटटान (पा) चौरासी लाख वर्षों की पश्चिमदिशाका एक कूट अधर्म (पा) जीव और पुद्गल का एक अटटाङ्ग ०७२८ ५।६०४ को स्थितिम कारण एक अटनप्रिय - घूमनेको शौकीन भजितसेना (व्य) अरिजयपुर- द्रव्य ७२ १९॥३६ अधर्मास्तिशय (पा) जीव अग्निभूति (व्य) पुत्रविशेष ६४।६ ३४।१८ और पृद्गलके ठहरनेमें सहा. भग्निमति (व्य) भगवान् ऋप. अतिमुक्तक (व्य)एक मुनि१८९ यकद्रप४३ भदेवका गणधर १२१५७ अतिपिपाम (भी) प्रथम पृथियो अधिकारिणी (पा)एक क्रिया अग्निमित्र (य) भगवान् ऋपभ- के प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी ५८१६७ देवका गणघर १२०५८ सीमन्तक इन्द्राको उतर अधिपयका = पर्वतका जारी अग्निला (व्य) सोमदेव ब्राह्मण- दिशामें स्थित महानरक मैशन २।३३ को स्त्री ४३११०० ४।१५१ अकम्पन (व्य) भगवान् महा. भतिनिस्ट (भौ) पांचवीं पपिवी भग्निशिखर (व्य) कृष्णका पुत्र वीरा अष्टम गणधर ३४३ के प्रथम प्रस्तारमम्बन्धी ४८/६९ भाापन (व्य) सात गो मुनियों तम इन्द्ररी पश्चिम दिशा. भप्रजन्माप्राह्मण ४३९९ के प्रमुग मापार्य २०१५ में स्थित महानरक ४०१५६ चग्निला (व्य) एक स्त्री ६४.६ भनिधिर्मविभाग (पा) मिजास अधिनमेन (व्य) जरागंधका भक्षय (पा) स्फटिक माला काभेर ५८१५८ एकदून ५०३२ उत्तर गोपुर ५७१९. भनिवारण (व्य) एप भोला भनिन (य) रामधा पुत्र अक्षर (पा) नमाना और पर २१.७ १०११२ के राजा अरिजयकी स्त्री भक्षरसमाम (पा) श्रुतज्ञानका भेद १०१२ भधाव्यतिक्रम (पा) दिग्बतका अतिचार ५८।१७७ भध्या (पा) समस्त द्वीपमागरों- का एक दिशाका विस्तार ७१५२ अध्रुव (पा)) याग्रायणी पूर्वको वस्तु १०७८ भध्रुव सम्प्रणधि (पा) आग्रायणी पूर्वको एक वस्तु १०७९ अगज (व्य)द्र ६०१५७१ अाज = कामदेव १६१३९ भनङ्गक्रीडा (पा) ब्रह्मचर्याणुबन- का अतिचार ५८११७४ अनहारीरत (व्य) प्रद्युम्नका पुत्र अनिरुद्ध ५५:१९ अधोक्षज-कृष्ण ३५.१९ अग्निवाल (भी) वि० उ० नगरी २२.९० भनौम्य (पा) स्फटिक मालवा पश्चिम गोपुर ५७१५९ बझार (व्य) एक विद्याधर राजा २५।६३ अगुल (पा) याठ यवोंका एक अद्गुल ७.४० अग्निकुमार = भवनवामी देवीका एक भेद २१८२ भनीय विचय (पा) घHध्यानका भेद ५६१४४ भनिनिमृष्ट (मी) चौयो पृथियोके प्रथम प्रनारमम्बन्धी आर इन्द्रयको पश्चिम दिशामें म्पित महानरक ४०१५५ प्रतियीयं (व्य) प्रतापवान्का पुत्र भनिवेगा (व्य) पृपिवौतिला राजा प्रियंरकीस्त्री २०११ भनिवेगाव (व्य) मानुषोत्तर शम्दानुक्रमणिका वेलम्बकूटका वायो देव ५।६०९ अनीनानागत (पा) आग्रायणी पूर्वको वस्तु १०८० भनुलार्थ (पा) स्फटिक मालका उत्तर गोपुर ५७६. अदगु (व्य) मगर चक्रवर्तक माठ हजार पुत्रोमें ज्येष्ठ पुत्र १३३२८ अनिमुक्तक (व्य) कंस के बड़े भाई जो मुनि हो गये थे ३३।३२ भर्वकानि (व्य) भरत चक्रवती. का पुत्र १२९ भगन्धन (व्य) श्रोभूति मरकर 'अगन्ध' माप हुआ २७।४२ अगतं (भो) देशका नाम ११।७२ अगस्त्य एक नक्षत्र जिनका उदय शरद् ऋतुमें होता है। ६२ अग्निकुमार = भवनवामी देवो. का एक भेद ४१६४ अमपाननिरोध (पा) अहिमाणु व्रतका अतिचार ५८४१६५ अनम्नजिद् (व्य) अनन्न मंमार- को जीतनेवाले चौदहवें तीर्थकर १११६ अद (भी) अनुदिश ६६४ प्रचलावती (व्य) दिवकुमारी देवी ५२२७ अचेलना (पा) मुनियों का एक मूगुण वस्त्रवा परना, मग्न रहना २०१२८ प्रकासन (व्य) वाराणमोका गजा मुलोचनाका पिता १२६९ भा (भी) गरि गिरिका उत्तर- दिमामम्बन्धी मूट ५।७१५ भाट (भी) मानुषोत्तरको उत्तर दिशाका एक फूट प्रकावती (भी) विदेहकी एक नगरी ५६२५९ अणुव्रत (पा) पाव पारोंका एक- देगत्याग, इसके अहिंसा- णुवन मादि पांच भेद है। २०१३४ अझपन (व्य) विजय का पत्र ४८१४८ प्रकर (व्य) वसुदेवका विजयसेना नामक स्त्रोमे उत्पन्न हुमा पुत्र १९६५० श्रकर (व्य) राजा श्रेणिकका एक पुत्र २०१३९ अकर (व्य) एक राजा ५०८३ प्रक्रियावादी (पा) मिथ्यात्वका एक भेद ५८।१९४ अपित (व्य) एक रामा ५०११३० अक्षौहिणी (पा) विशिष्ट सेना ५०७५,७६ प्रकृतीमयत:-किपीसे भय न होने के कारण १९५ अर, अप्रम (भी) कुण्डलगिरि- के पश्चिम दिशामम्बन्धी कूट ५१६९३ अमारक (व्य) श्यामाका पत्र १९७९ अगना-स्त्री २१ भावाद्य (पा) द्वादशाह परि. मागमे बाहरका शून २११०१ अनारिणी -एक विद्या २२०६२ प्रहारपती (व्य) स्वर्णामपुर चित्तवैगी स्त्री २४७० अनारक (व्य) एक विद्याधर ११८१ मा (भी) रनमारे घर बाग- पा बारहवा पट- ४९४ स्पाग- ८२ हरिवंशपुराणे अङ्ग = तालगत गान्धर्वका एक प्रकार १९१५१ अनावर्त (भौ) वि० ८० नगरी २२।९५ अङ्ग (पा) अष्टांगनिमित्तज्ञान- का एक अंग १०१११७ अचार्य महावत (पा) अदत्त वस्तुका ग्रहण नहीं करना २१११९ अच्युत (भौ) अच्युत स्वर्गका तीसरा इन्द्रक ६.५१ अच्युत (भी) मोलहवा स्वर्ग ६.३८ अच्युन (व्य) श्री कृष्ण नारायण ५०१२ अच्युत (व्य) जरामंधका पुत्र ५२।३६ अग्रायणी पूर्व (पा) पूर्वगत श्रुत. का एक भेद २१९७ अचल (व्य) भगवान् महावीरका नवम गणधर ३४३ अंचल (व्य) अन्धक वृष्णि और सुभद्राका पुत्र १८:१३ अचल (व्य) अचलका पुत्र ४८०४९ अचल (व्य) दूसरा बलभद्र ६०।२९० अचल ग्राम (भी) एक ग्राम, जहाँ बमुदेवने वनमाला कन्याको प्राप्त किया २४/२५ अनागिरि (व्य) रुचकगिरिके वर्धमान निवासी देव ५७०३ भानगिरि (भी) मेहसे दक्षिण- घी और पोतोस नदीके पश्चिम तटपर स्थित एक पूर ५४२०६ भान द्वीप (मी) अन्तिम सोलह द्वीपोमे पांच द्वीप ५।६२३ अञ्जन पर्वत (भी) नन्दीश्वर द्वीप- की चारो दिशाओमें स्थित पर्वत-विशेप ५१६५२ अञ्जनमूलक कूट (भौं) रुचिक गिरिका एक कूट ५७०६ अच्युता-एक विद्या २२६५ अच्यवनलब्धि (पा) आग्रायणी पूर्वको वस्तु १०७८ अञ्जनक (भौ) रुचिक गिरिका उत्तरदिशासम्बन्धी ५७१५ अञ्जन (भौ) सानत्कुमार युगलमें पहला इन्द्रक ६१४८ अञ्जन (भी) पाण्डुकवनका एक भवन ५।३२२ अञ्जन (भौ) पूर्वविदेहका क्षार- गिरि ५१२२९ अञ्जन (भौ) रत्नप्रभाके खरभाग- का दसवा पटल ४/५३ अञ्जना (भौ) पंकप्रभाका रूढि नाम ४।४६ अञ्जनकूट (भौ) मानुषोनर पर्वत- की दक्षिण दिशाका एक कूट ५१६०४ अननकूट (भौ) रचिक गिरिका एक कूट ५॥७०६ अग्निभूनि (व्य) वैदिक विद्वान् २०६८ अनिरुद्ध (व्य) प्रद्युम्नका पुत्र ५५.१७ अनिवृत्तिकरण (पा) परिणाम विशेष ३३१४२ अनिवृत्तिकरण (पा) नौवाँ गुण- स्थान ३१८२ अनिवृत्ति (व्य) एक मुनि २७.११३ अनिलवेग (य) वसुदेवकी श्यामा स्त्रोसे उत्पन पुत्र ४८1५४ अनवेदयमस्तरसंक्रम (पा) प्रोप- घोपवास प्रतका अतिचार ५८/१८१ अनवेक्ष्यादान (पा) प्रोपयोपवा- सका अतिचार ५८॥१८१ अनवेश्यमलोरम (पा) प्रोप- धोपवास का अतिचार ५८.१८१ अनाकांक्षा (पा) एक क्रिया ५८.७८ अनादर (व्य) जम्बूवृक्षार रहने धाला देवविशेष ५:१८१ अनादर (पा) प्रोषधोपवास व्रत- का अतिचार ५८११८१ अनादरना (पा) सामायिक व्रतका अतिचार ५८४१८० अनामोग क्रिया (पा) एक क्रिया ५८/७३ अनावृत यक्ष (व्य) जम्बूद्वीपका रक्षक यक्ष ५१६३७ अनावृष्टि (व्य) वसुदेव और मदनदेगाका पुत्र ४८१६१ अनावृष्टि ५११३५ अनावृष्टि (य) एक राजा ५०७९ अनिकाचित (पा) आग्रायणी पूर्व- के चतुर्थ प्रामतका योग- द्वार १०१८५ अनिच्छ (भौ) दूसरी पृथिवीके प्रथम प्रस्तार सम्बन्धी तरक इन्द्रकको पूर्व दिशा स्थित महानरक ४/१५३ अनिन्दिता (व्य) मन्दनवनमें रहनेवाली दिवकुमारी देवी कृष्णका सेनापति अनध (पा) स्फटिक सालका दक्षिण गोपुर ५७१५८ भनगार (व्य) शीतलनापका प्रथम गणधर ६०१३४७ अनगार सामान्यमुनि ३१६२ घनन्नयीय (व्य) जयकुमारका शब्दानुक्रमणिका ८३ पुत्र १२।४८ अनुत्तरोपपादिकदशाङ्ग (पा) अनन्तवीर्य (य) चारणमुनि द्वादशांगका एक भेद २२९४ ६०१२१ मनुस्मेक - गर्व नही करना अनन्तवार्य (व्य) आगामी तीर्थ ५८.११४ कर ६०१५६३ अनुन्धरी (य) विश्वसेनको स्त्री अनन्तमित्र (व्य)उग्रसेनके चाचा ६०१५८ सान्तनुका पुष ४८०४० अनुदात्त- वेदमे प्रयुक्त होने अनन्तमति (व्य) एक मुनि वाला स्वरविशेष (नीचरनु २७१११७ दात्त.) १७५८७ अतिवल (व्य) परणीतिलक अनुदिश (भौ) ग्रेवेयकांके ऊपर नगरका राजा २७१७८ स्थित नौ विमान ६१४० अतिबल (व्य) साकेत नगरका अनुदिशस्तूप (पा) समवसरणका राजा २७१६३ स्तूप ५७१०१ अतिबल (व्य) महाबलका पुत्र अनुदिश (भी) वैयकोके ऊपर १३८ स्थित एक पटलके नौ अतिबल (व्य) आगामी नारायण विमान ३११५० आतेबल (व्य) ऋपम देवका अनुपम (व्य) ऋपभदेवका गण- घर १२०६९ गणवर १२१६८ अतिमारारोपण (पा) अहिंसाणु अनुप्रेक्षा (पा) अनु + प्रा + ईक्षा पदार्थके स्वरूपका व्रतका अतिचार ५८।१६४ बार-बार चिन्तन करना। अनिवर्तक (य) आगामी तीर्थ- कर ६०१५६१ इसके अनित्य, मशरण आदि १२ भेद है २११३० अनीक = सेना-यह सेना, पदाति, अनुभवबन्ध (पा) बन्धका एक अश्व, वृषभ, रथ, हाथी, भेद ५८२०३ गन्धर्व और नर्तकीके भेदसे सात प्रकारको होती है अनुमतिका (व्य) द्रौपदीका ३८१२२ भवान्तर ४६१५७ अनीकदत्त (व्य) देवकोका पुत्र अनुमति (व्य) कापिष्ठलायनको स्त्री १८५१०३ ३३।१७० अनीक पालक (व्य) देवकीका अनुयोग (पा) श्रुतज्ञानका भेद पुत्र ३३३१७० अनुत्तर (भौ) अनुदिशाके ऊपर अनुयांग (पा) प्रथमानुयोग, स्थित पाँच विमान ६.४० करणानुयोग, वरणानुयोग, अनुत्तर (भौ) नो अनुदिशोके द्रव्यानुयोग २११४७ ऊपर एक पटलमे स्थित अनुयोग (पा) दृष्टिवाद अगका विजय आदि पांच विमान एक भेद १०.६१ ३११५० अनुवादो = स्वर प्रयोगका एक अनुसर (वि) श्रेष्ठनय २६१३८ प्रकार १९।१५४ अनुवीर्य (व्य) एक राजा ५०११२६ अनेकप - अन्नककी रक्षा करने- वाला ३७॥२७ अनंकप = हाथी ३७।२७ अनेकाय (पा) प्रोपधोपवास व्रतका अतिचार ५८।१८१ अन्तकृदशाङ्ग (पा) द्वादशाग- का एक भेदरा३ अन्तप (भी) देशविशेष ११७४ अन्तराय (पा) विघ्नका कारण ५८।२१८ अन्तरिक्ष (पा) अष्टाग निमित्त- ज्ञानका एक अंग १०१११७ अन्तरेण (अ) विना २।११३ अन्तदिप - अन्तरंग शत्रु १।२३ अन्ध्र (भी) धूमप्रभा पृथिवोके चतुर्थ प्रस्तारका इन्द्रक विल ४।१४१ अन्धकवृष्णि (व्य) यदुवंगी शूर- का पुत्र १८।१० अन्तर्भूमिचर = विद्याधर जाति २६११ अन्तर्वस्नी = गर्भवती १८।१२० अन्तर्विचारिणी = २२१६८ अन्ववाय - कुल ४५४४ अपघन - शरीर १६११९ अपथाशिन् (वि) कुमार्गको नष्ट करनेवाले १११२ अपदर्शन कूट (भी) नौलकुला- चलका नौवों कूट ५१०२ अपध्यान (पा) अनर्थदण्डा भेद ५८।१४६ अपराजित (व्य) राजा जरासंध. का भाई १८१२५ अपराजित (पा) स्फटिक सालका उत्तर गोपुर ५७१६. अपराजित (भी) जम्बूद्वीपका जातीका उत्तर एक विद्या ८१ हरिबंशपुराणे ५४३९० अपराजित (व्य) एक श्रुतवली आवाय १०६१ अपराजित (भौ) अनुत्तर विमान भ्यन्तर परिग्रहका स्याग २१२१ अपवर्ग मोक्ष १०१० अपाय (पा) जो स्यूल हिंगादिक अनिवृत्त है ७५११४ अपाय विचय (पा) पम्यंध्यान- का एक भेद ५६।३९.४० अपूर्वकरण (पा) परिणामविशेष भमितवेग (व्य) गगनचन्द्र और गगनमुन्दरीका पुत्र ३४४३५ अमिनन्दन (व्य) चतुर्य तीधार १३।३१ अभिनन्दन (व्य) चतुर्य तीर्थकर अपराजित (य) जरामधका भाई ५।१४ अपराजित (भी) दि० २० नगरी २२।८७ अपराजित (व्य) सिंहपुर के राजा अहंदास जिनदत्ताका पुत्र। भगवान् नेमिनाथका जीव अमिनन्दिनी (पा) समवसरणक अशोरवनी वापिका ५७१३२ अभिसन्धि - অমিদাষ १७१११२ अमिषव = अभिषेक १५० भमिपवाहार (पा) भोगोपभोग- घनका अतिचार ५८०१८२ प्रमाणज्ञानोपयोग भावना ३४११३५ अभ्यर्ण = निकट ४३१ अभिचन्द्र (य) अन्धकर्षिण और सुभद्राका पुत्र १८।१४ अभिराम सुन्दर - पहज ग्रामको अपराजित (व्य) भगवान् वृषभ- देवका गणधर १२२६१ अपराजित (य) चक्रपुरका राजा २७४८९ अपराजित (य) एक राजा ६०११०५ अपराजिता (व्य) रुचिकगिरिके अरिष्टकूटपर रहनेवाली देवी ५१७०५ अपराजिता (व्य) रुचिकगिरिके रत्नांच्चय कूटपर रहनेवाली देवी ५१७२६ अपराजिता (पा) समवसरणके सप्तपर्ण वनकी वापिका ५७.३३ अपराजिता (भौ) नन्दीश्वर द्वीपके दक्षिण दिशासम्बन्धी अजनगिरिको उत्तर दिशा- सम्पन्धो वापिका ५४६६० अपराजिता (भी) विदेहको एक नगरी ५१२६२ अपरान्त (पा) आग्रायणीपूर्वकी एक वस्तु १०७८ अपरविदेहकूट (भौ) नीलकुला- चलका सातवा वट ५.१०० अपरिग्रह महावत (पा) वाया- अपूर्वकरण (पा) आठवा गुण- स्थान ३३८२ अप्रगति माषा (पा) सत्यप्रवाद पर्वको १२ भाषाओ से एक भापा १०१९५ अप्रतिष्ठान (भी) महातम प्रभा पृथिवीका इन्द्रक विल ४११५० अप्रतिघ (पा) स्फटिक सालका दक्षिण गोपुर ५७१५८ अप्रत्याख्यान क्रिया (पा) एक क्रिया ५८/२२ अप्रमत्तसंयत (पा) सातवा गुणस्थान ३२८१ अब्ज-शंख ३५१७२ अमय (व्य) राजाश्रेणिव का पुत्र २११३९ अभयनन्दी (व्य) एक मुनि ३३११०० अभ्याख्यानभाषा (पा) सत्य- प्रवाद पूर्वको १२ भाषाओ- में से एक भाषा १०१९२ अभिस्या % शोभा ॥२४ अभिचन्द्र (व्य) राजा भद्रका पुत्र १७१३५ अभिचन्द्र (व्य) दसर्वा कुलकर ७।१६१ अभिज्ञया (पा) समवसरणके सप्तपर्णवनकी वापिका ५७।३३ अभिरद्गता मूर्च्छना १९।१६२ अमर (व्य) राजा सूर्यका पुत्र ३३ अमरकङ्का (भी) पातकीखण्डके भरतक्षेत्र अंगदेशकी एक नगरी ५४६८ अमरावर्त (य) कौथुमिका शिष्य ४५/४५ अमम (पा) चौरासी लाख अम- मागाका एक ७/२८ श्रममाङ्ग (पा) चौरासी लाख अटटीका एक अममाग ७/२८ अमल (व्य) समुद्रविजयका मन्त्री ५०४९ श्रमा (अव्यय) साथ ५५२९ अमिनगति (य) चारदत्तके अमम ८५ शब्दानुक्रमणिका द्वारा उपकृत और चारुदत्त अम्बुज श्रीकृष्णका पाचजन्य अरिञ्जयपुर (भी) विदेहका एक शंख ५५।६१ उपकार करनेवाला नगर ३४।१८ विद्याधर २१०२३ अम्बुदावर्त (भौ) भगली देशका अरिञ्जय (व्य) अरिजयपुरका अमितगति (व्य) वसुदेवका एक पर्वत ६०१२० राजा ३४६१८ गन्धर्वसनासे उत्पन्न पुत्र अम्बालिका (व्य) राजा धृतराज अरिञ्जय (भी) वि० उ० नगरी २२।८६ की एक स्त्री ४५।३३ ४८1५५ अमितनेज (व्य) गगनचन्द्र और अम्भोधि (व्य) समुद्रविजयके भरिन्दम (व्य) विनमिका पुत्र गगनसुन्दरोका पुत्र ३४.३५ भाई अक्षोम्यका पुत्र ४८०४५ २२११०५ अमितरमण्डल - मित्रमण्डल अयन (पा) तीन ऋतुओ-छह अरिन्दम (व्य) एक मुनि १९८२ मूर्यमण्डल २।११ मासका एक अयन होता है अरिष्टनेमि (व्य) राजा महीदत्त- अमितसार (पा) स्फटिक साल. का पुत्र १७१२९ ७.२१ का पश्चिम गोपुर ५७१५९ अरिष्ट (भी) ब्रह्मयुगलका पहला अयुत -दहा हजार ४२१८१ अमितप्रभ (व्य) वसुदेव और प्रयोगकेवली (पा) चौदहवा इन्द्रक ६।४९ अरिष्टपुर (भी) विदेहका एक वालचन्द्राका पुत्र ४८०६५ गुणस्थान ३२८३ अमूमपायिन् - देव ५५।२५ नगर ६०७५ अयोध्य (व्य) भरत चक्रवर्तीका अमृतप्रम (व्य) अभिचन्द्रका सेनापति १११२३ अरिष्टपुर (भौ) एक नगर जहाँ राजा रुधिर रहता था पुत्र ४८०५२ अयोधन (व्य) धारणयुग्म नगर ३११९ अमृनयल (व्य) अतिबलका पुत्र का राजा २३३४६ अरिष्टविमान (भी) यमलोक- १३२८ अयोधन (व्य) राजा मत्स्यका सौ पालका विमान ५।३२५ अमृतरसायन (व्य) चित्ररथका पुत्रो ज्येष्ठ पुत्र १७६३१ अरिएपेन (व्य) आगामी चक्र० रसोइया ३३१५१ अयोध्या (भी) विदेहको एक ६०.५६५ अमोघ (भी) रुचिकगिरिका नगरी ५।२६३ भरिष्टमेन (च्य) धर्मनापका दक्षिण दिशासम्बन्धी फूट आयुकर्म (पा) नरकादिपर्यायका प्रथम गणधर ६०1३४८ ५७०८ कारण कर्म ५८४२१७ अरिष्ट (भी) रुचकगिरिका एक अमोघ = चक्रवर्तीका वाण १११६ अर (व्य) सप्नुम चक्रवर्ती वूट ५७०५ अमोघ (भी) अघोग्रेवेयकका भर (व्य) आगामी तीर्थकर अरिष्टा (मी) धूमप्रभाकारूढि दूसरा इन्द्रक ६.५२ ६०१५६० नाम ४४६ अमोधक (पा) स्फटिक साला अरम् - शीन ३५।३० अरिष्टनेमि (व्य) वाईमवें तीर्थ- उत्तर गोपुर ५७०६० ग्रर (व्य) अठारहवें तीर्थकर कर १२४ अमीचमूला (शमि.) = घृष्णा सातवें चक्रवर्ती ४५।२२ अरिष्टनेमि (व्य) ममुद्र विजयके भक्तिनामा अस्त्र ५३३४९ अरजा (भी) विदेशको एक नगरी पुत्र वाई तीर्थकर भमापदर्शन (ख्य) चन्दनवन ५।२६२ ४८.४३ नगरवा राजा २९।२४ अरनिमापा (पा) सत्यवाद अरिपद्वगं = काम, क्रोध, लोभ, अम्बा (स्य) रामा पृतराजकी पूर्वको बारह भाषाओम में मोह, मद और मारमय यह एकत्रो ४५६६३ एक भाषा १०९४ अन्तरंग एह है १७१ सम्बर (पा) सब दम्याको स्थान अरिक्षय (व्य) विनमिरा पुत्र चरण, अरणाम (व्य) मरदीप- देनेवाज बासा ट्रम्प ७२ २२११०४ केशक देव ५१६४५ अरिजय (भी) वि० ८० नगरी भरण (भी) मौषम युगला एक स्त्री ४५४३३ २२१९३ एटा इन्द्रक भषिका (स्य) रामा तराजकी ८६ हरिवंशपुराणं बल, अरुण (त्य) हरिक्षेत्र के नाभि महंत - अरहन्त ११३ गिरिपर रहने वाला व्यन्तर अहात्त (व्य) धनदत्त और भन्द. देव ५११६४ यशाका पुत्र १८।११५ अहणद्वीप (भा) नौवां द्वोप अहंमति भावना ३४।११ ५६१७ अहंदाम (य) गघिला देशकी अरणयागर (भी) नौवा सागर अयोधा नगरीका राजा ५।६१७ २७१११२ अरण (य) लोकान्तिक देवका अहंदाम (व्य) धनदत और एक भेद ५५।१०१ नन्दयाका पुष १८०११४ अरगादासद्वीप (भी) दसर्वा द्वीप अहंसाम (व्य) ज. वि. सुपमा ५।६१७ देशक सिंहपुर नगरका भरणोदास सागर (भी) नौवा राजा ३४१३ सागर ५।६१७ अलका (व्य) मदिलमा नगरीके अकं (व्य) लोकान्तिक देवका एक सेटकी स्त्री ३३११६७ भेद दूसरा नाम आदित्य अलका (व्य) मेघदलपुरके सेठ ५५।१०१ मेघवी स्त्री ४६४१५ अर्क (व्य) राजा वसुका पत्र अलका (भी) विद्याधरोंकी नगरी १७१५८ ६०१८ अलङ्कारविधिदारीर स्वरका अकंप्रम (व्य) कापिष्ठ स्वर्गका भेद १९.१४८ एक देव (रश्मिवेगका जीव) अलोक (पा) लोर के बाहरका २७.८७ अनन्त आकाश २।११० अमूल (भी) वि. द. नगरी अलीकाकाश (पा) चौदह राजु २२।२९ प्रमाण लोकके बाहरवा अर्चात्य (पा) स्फटिक सालका अनन्त आकाश ४१ उत्तर गोपुर ५७।६० अलाल = गोली ५१४४५ अर्चि (भौ) पहला अनुदिश अलम्बुप (व्य) विजयका पुत्र ४८.४८ अचिौली (व्य) विसरोद्गीत आलोक-प्रकाश २०१० नगरका राजा १९८१ अलंकार - वैणरवरका एक भेद अचिमालिनी (भो) दूसरा अनु १९११४७ दिन ६।६३ अवक्रान्त (भी) रत्नप्रभा पृथिवी- अचिमान् (य) जरामघका के बारहवें प्रस्तारका इन्द्रक पुत्र ५२।४० विल ४७७ अर्जुन (व्य) पाण्डव ४५।२ अवग्रह (पा) मतिज्ञानका भेद अर्थपद (पा) अर्थबोधक पद १०११४६ समूहको अर्थपद कहते है अवतंस कानका आभूषण १०१२३ ४३।२४ अर्थ (पा) आग्रायणी पूर्वको वस्तु अवदात- उज्ज्वल २१३२ १०७ अवधिज्ञानचक्षुष = अवधिज्ञानके धारक ४० अश्या (भी) विदेहको एक नगरी ५।२६३ अवनद- चमड़े मढे हुए मृदंग आदिवादित १९१४२ अवयव - तालगत गान्धर्वका प्रकार १९।१५१ भवाय (पा) मतिज्ञानका भेद १०।१४६ अवर्णवाक् (पा) मियादीप पथन ५८ा९६ अवसर्पिणी (पा) जिसमें बुद्धि, विद्या यादि सद्गुणोका हास हो ऐसा कालभेद ११२६ अवसर्पिणी (पा) दश कोडा कोड़ी अदा सागरांवी एक अवसर्पिणी ७५६-५७ अवसं (पा) अनन्तानन्त-पर- माणुओका समूह ७।३७ अवन्तिसुन्दरी (व्य) वसुदेवकी एक स्त्री ३१७ अविदार्य एक प्रकार १९।१५१ अविपाकजा (पा) निर्जराका भेद ५८।२९५ अविस (व्य) विभुका पुत्र १३।११ अशनिधोप (व्य) मानुषोत्तरके अजनकूटपर देव ५।६०४ अशनिवेग (व्य) विजयार्घ पर्वत- के कुजरावर्त नगरका राजा १९१७० अशनिवेग (व्य) अचिर्भाली और प्रभावतीका पुत्र १९८१ अशनिवेग (व्य) वसुदेवा सम्बन्धी ५१२ अशय्याराधिनी - एक विद्या २२१७० - तालगत गान्धर्वका रहनेवाला एक विद्याधर ८७ शब्दानुक्रमणिका अशित (व्य) एक राजा ५०११३० अश्वपुरी (भी) विदेहको एक अमितपर्वत (भी) वि० ३० नगरी अगुमश्रुति (पा) अनर्थदण्डका नगरी ५।२६१ २२।९६ भेद ५८।१४६ अश्वयुज आश्विन माह अमुधारिन् = प्राणो २०२० ५६१११२ अशोक (य) एक राजा ६०१६९ अमुर = भवनवामी देवोंका एक अशोक (भी) वि० उ० नगरी अश्विनी (व्य) द्रोणाचार्यको स्त्री भेद ४॥६३ ४५४४८ अमुरोद्गीन (भी) विद्यापरीका २२।८९ अश्वसेन (व्य) वसुदेव और एक नगर ४६१८ भोगपुर (भी) अशोक नामक अश्वसेनाका पुत्र ४८०५९ देवका निवास स्थान ५१४२६ अस्वष्ट (भौ) देशविशेप ३।३ अष्टभष्टम = प्रतविशेप ३४।९३-९४ अशोकयन (भी) विजयदेवक अस्तिकाय (पा) बहुप्रदेशी द्रव्य अष्टम = तीन उपवाम ३४।१२५ नगरमे २५ योजन दूर पूर्व में (कालको छोडकर जीवादि स्थित अष्टगुणारमक (वि) ज्ञान, दर्शन, एक दन ५२४२२ पाँच द्रव्य) ४५ अव्यावायत्व, सम्यक्त्व, भगोका (भी) नन्दीश्वर द्वोपके अस्ति-नास्तिप्रयाद (पा) पूर्वगत- पश्चिम दिशामम्बन्धी अञ्जन- अवगाहनत्व, सूक्ष्मत्व, अगुरु- श्रुतका एक भेद २।९८ लघुत्व, वीर्य इन आठ गुण- गिरिको पूर्व दिमाम स्थित अम्रान (पा) मुनियों का एक मूल वापिका ५६६६२ रूप मोक्ष २११०९ गुण जोव-रक्षा के लिए स्नान अशोका (व्य) राजा प्रचण्ड- श्रष्टापद - कैलास पर्वत १९८७ न करना २।१२८ अष्टमानिहार्य - अशोक वृक्ष, वाहनकी पुत्री ४५३९८ अहमिन्द्र (पा) वैयक आदिक प्रशोका (भी) विदेहको एक मिहासन, छत्रत्रय आदि वामी देव ३३१५१ नगरी ५।२६२ आठ प्राविहार्य २०६७ अहिमामहामत (पा) पट्यायिक अश्मक (भी) देशका नाम ११७. अष्टमानिहाय (पा) समवमरणम जीवोंको हिमामे निवृत्ति अश्मगर्म-नोलमणि ५।१७८ प्राप्त होनेवाले जिनेन्द्र के २१११८ भस्मगमंकूट (भी) मानुपौत्तर बाट विशेष भूपण-१ अहोरान (पा) तोम मुहूर्ता अमोक, पर्वतको पूर्व दिशातरा एक २ मिहासन, ३ एक दिन-रात होता है छत्रय, ४ भामण्डल, ५ फूट ५/६०२ ७/२१ प्रश्वकपट (व्य) आगामी प्रति. दिव्यप्वनि, ६ पुष्पवृष्टि, चतु पष्टि चामर, ८ दुन्दुभि अंशुमान् (व्य) यमुदेवका माला नारायण ६०१५७० घाजा पपिलासा भाई २४२७ परमानना = पड्जम्बरको अंशुमान् (व्य) नमिमा पुत्र भटममा तीन दिनरा उप- मना १९६१६२ २२।१०७ वाम १३९८ मापीर (य) आगामी प्रति भ्रमा (य) वधमरा पुत्र [आ] नारायण ६.१५७० ४८०४२ भाकर (पा) मोना-पात आदि. भयोर (व्य) प्रिपिप्टिर ना. भमानान (भी) रलप्रमा को सानाम पृत नगर দিনায় पषियोके. माठ प्रातारा २।। २८०३१ टावित it भाकागगता (पा) दृष्टिगार अंग भाव (en) एक भारत भपौराधिनग (पा) मनयं * भूतिगासा वाट शाग अनिषार ५८१४९ भाग्मार (व्य)पामा प्रतितारा पपनमाया (1) चतुर्थ भामगरम् - मा ८ गरपान १८. ame (व्य) भरपामा () मारात मतिमा भाग्यान ( निस) माNि:

८८ हरिशंशपुराणे आनन्द (पा) असाता वंदनीयका आयव ५८४९३ आगति-नालगत गान्धर्वका एक प्रकार १९६५१ आग्नेय -विद्यास्त्र २५।४७ आचाराङ्ग (पा) द्वादमागमा एक भेद २२९२ आचाम्लवधन त विशेष ३४।९५.९६ आचार्यमनि भावना ३४।१४१ आचिना-व्याप्त ५५।२ आजवन्नव संसार १११३ आज्ञानिक (पा) मिथ्यात्वा एक भेद ५८११९४ आमाविचय (पा) धर्म्यध्यानका भेद ५६०४९ आज्ञाव्यारादिकी (पा) एकक्रिया ५८७७ आमाजन (भी) पूर्व विदेहका घक्षार गिरि ५।२२९ श्रामप्रवाद (पा) पूर्वगतश्रुतका एक भेद २।९८ पानेय (व्य) भार्गवाचार्यका प्रथम शिष्य ४५१४५ आत्रेय (भौ) देश विशेष ३५ श्रादित्य विद्या निकायका नामान्तर २२०५८ आदित्य (व्य)लौकान्तिक देवोका एक भेद ९।६४ पादिन्य (भी) अनुदिशांका इन्द्रक ६.५४ आदिम्य (भी) अनुत्तर विमान पुत्र ५२।३२ भान्धी मध्यमग्रामके आथित धादित्ययशम् (व्य) भरत जाति १९१७७ चक्रवर्तीश पुत्र प्रचलित भाप्त = रागादिदोप तथा ज्ञाना. नाम अर्थकोनि १३३१ বংলাদি ঘনিষা না यादिग्याम (व्य) लाग्नयेन्द्र रहित १०.११ २७१११४ आप्प जलाधिक जीव १८५७० घाधि = मानसिक व्यपा ८२८ भामियोग्य- देवाको एक जाति आनक (व्य) वसुदेव १३९० अानकदुन्दुभि (व्य) वसुदेव भामार (भी) देशका नाम १९६६ ५१७ भाभ्यन्तरपरिमह (पा) मिपाव आनत (भी) तेरहवा स्वर्ग क्रोध, मान, माया, लोम तथा हास्यादि ९ नोक्पाय. ६१३८ के भेदसे १४ प्रकारका आनत (भी) आनतस्वर्गका प्रथम इन्द्रक६५१ आम्यन्तर परिग्रह २१ आमलक आंवला ७१६९ आनन्द (भी) वि. द. नगरी भामोद - गन्ध २०३३ २२२९३ अानन्द (व्य)एक राजा ५०।१२५ आर (भी) पंकप्रभा पपिवीके प्रथमपटलका इन्द्रक४४१२९ मानन्दा (भी) नन्दीश्वर द्वीपसे उत्तर दिमामम्बन्धी अञ्जन- आरण (भी) पन्द्रहवां स्वर्ग गिरिको पश्चिम दिशामें आरण (भी) अच्युत स्वर्गका स्थित वापिका ५१६६४ दूसरा इन्द्रक ६।५१ आनन्दा (व्य ) रुचिकगिरिके थारण (भी) पन्द्रहर्वा स्वर्ग अंजनकूटपर रहनेवाली देवी ४।१६ ५७०६ आरम्म (भी) कार्य करना शुरू आनन्दा (पा) समवसरण करना ५८८५ अशोकवनको वापिका ५७१३२ आय कृष्माण्ड देवी = एक विद्या आनन्द (भी) वि० उ० नगरी २२१६४ २२१८९ आतध्यान (पा) खोटा ध्यान आनन्द कूट (भी) गन्धमादन- १ इप्टवियोगज २ अनिष्ट का एक कूट ५।२१८ योगज ३ वेदनाजन्य ४ आनन्दरती (पा) समवसरणके निदान ५६४ अशोकवनको वापिका ५७ ३२ आर्य - विद्या निकायका नामा- आनन्दपुर (भी) जरासंघके नष्ट न्तर २२०५८ होनेपर यादवाने जहां आर्य (व्य) पवनगिरि और आनन्द नृत्य किया था५३।३० मृगावतीका पुत्र-सुमुखका आनन्द श्रेष्ठी (व्य) एक सेठ जीव १५।२४ ६०१९७ प्रार्या= साध्वो रा७० आनन्दिनी% भेरी ४०।१९ आर्यवती एक विद्या २०६५ आनयन (पा) देशवतका पापमो = पड्ज स्वरसे सम्बद्ध जाति ११३१७४ प्रादित्य (व्य) लौकान्तिक देवोकी एक जाति रा४९ श्रादित्यधर्मा (य) जरासंघका पुत्र ५२।३८ आदित्यनगर (भी) विजयाचंकी उत्तरघेणीकी नगरी २२३८५ आदित्यनाग (व्य) जरासंघका अतिचार ५८१७८ ८९ शब्दानुक्रमणिका भावार = तालगत गान्धर्वका एक आधि = मानमिव्यथा २८०२८ इन्द्रपुर (भी) पौलोम और चरम. प्रकार १९.१५० के द्वारा रवाके तटपर प्रावतं (भी) दि० ८० नगगे बमाया हुआ नगर १७४२७ इक्षुवरद्वीप (भी) मानवों द्वोप २२।९५ इन्द्रभूति (व्य) भगवान महावीर- भावतं (भी) देवाका नाम का प्रथम गणधर अपर नाम १२।७३ इक्षुवर मागर (भी) माता गौतम ३२४१ सागर ५४६१५ भाषा (भी) पश्चिम विदेहका इन्द्रवीय (व्य) कुरवंशका एक एक देश ५२४५ इक्ष्वाकु (व्य) = इक्ष्वाकु वंशमें राजा ४५४२७ भावली (पा) असंख्यात ममयको उत्पन्न हुए राजा २४ इन्द्र शर्मा (व्य) गिरितट नगर- एक आवली होती है ।१९ इन = मूर्य २.९ का एक ब्राह्मण २४.१ घावश्यकापरिहानि इन =स्वामी ३५:१५ - भावना इला (व्य) चिवगिरिक लोहि- इम्य = सेठ ४५।१०० ३४।१४२ ताख्य कूटपर रहनेवाली देवो श्रावृष्ट (भी) देशका नाम इमपुर (भी) हस्तिनापुर९६१५७ ५.७१२ इमयाहन (न्य) कुरुवंशका एक इला (न्य) राजा दक्षरी स्त्री आशा-सिमा १२७ गजा ४५११५ १७१३ भागा (व्य) रचिागिरिक काचन इन्दीवरा (व्य) राजा प्रचण- इलाट (भी) हिमवत् पुलाचल- बूटपर रहनेवाली देवी ५७१६ वाहनको पुत्री ४५।२८ का चोया कूट ५१५३ भागाविश्वरमराः -दिशाम्पी इन्दु-चन्द्रमा २०२५ इलावधन (भौ) राजा ददाकी पिवियाँ ३३३२ इन्दुवर (भी) अन्तिम सोलह इला रानी द्वारा बमाया पाशीविष (भी) पश्चिम द्वीपोमें पन्द्रहवा द्वीप५।६२५ हुमा नगर १७११८ विदेहका वक्षारपीठ ५।२३० इन्द्र (पा) देवोके स्वामी ३३१५१ इलावधनपुर (भी) एक नगर भाशीविषयधू = मरिणी ५४१२४ इन्द्रक (भी) रलप्रभा आदि जहाँ वमुदेव पहुँचे २४१३४ पृथिवियोंके पटलोकै मध्यगत भाषाद (भी) वि०६० नगरी इप्पाकार (भी) घातकोखण दिल ४११०३ और पुष्करा दीपमें स्थित, २२।९५ इन्द्रक निगोद मरवाके इन्द्रक भामादन (पा) नाना. और पूर्व योर पश्चिम भागरे नामा विन ॥३५२ दर्शनारामायद ५८९२ विभाजक पर्यन ५।४९४ मामि (भी) द्वारा नाम इन्द्रगिरि (व्य) एक राजा वाधार परंत (भी) कर गान्धारीका पिता ६०९३ तोरदक्षिण और उत्तरमैं दगिरि (व्य) गापार देशी पित पूर्व और पश्चिम भाग- पामुयमु (व्य) यमुध्यनका पुत्र पुष्पलावतो नगरीका राणा पादिमाग परवामपन ४४५ ५४५७८ भारयाणा (पा) ममवगरणको पगुट (वि) इन्द्रद्वारा मेदित एक भूमि ५७।१२ इंनि अनियष्टि, मनावृष्टि, राम, भाव-भोरा माता मंगाएर एमपुग्न (न्य) गूरापुर पमम, गर और निकटनी रासामोरे रामे गामि (पा) गायनरा पद्रपा (पा) ममदरसो एर भेट एम भूमि, रिमोट ईपांरप (पा) मारा: म (भी) दिहती मगरी एमनोदना : इमरी प्रेरणा पir fr (पा) Tm irin -: मारा १८ उदक (व्य) आगामीवीर्य नक्षत्र हरिवंशपुरागे इर्यासमिति (पा) प्रमादरहित उत्तरकुरु कूट (भी) माज्यवान् हो चार हाथ जमीन देदिकर पर्वतका कूट ५।२१९ चलना २।१२२ उत्तरकुर कट (भी) गन्धमादन ईश्वर (व्य) नेमिनाथ भगवान् पर्वतका एक बूट ५१२१७ ५५।१०६ र रमन्द्रा पट्ज स्वरको इंपत्याग्मार पृथिवी (भी) प्राठवीं मूछना १९६१६१ पृथिवी ६४० उत्तरश्रेणी (भी) विजयापर्यत- इंहापुर (भी) एक नगर ४५०९३ की उत्तर बंगार, जिसपर ईहा (पा) मतिज्ञानका भेद माठ नगर स्थित है ५।२३ १०११४६ उत्तराध्ययन (पा) अङ्गवाहथुन. [3] का एक भेद २११०३ उप्रमेन (व्य) मयुराका राजा उत्तराफाल्गुनी = एक :३ २२३ उग्रसेन (व्य) पोकृष्ण पक्षका उत्तरायसा = पड्जस्वरको राजा ५०१६९ मूच्छंना १९।१६१ उग्रमेन (व्य) भोजकवृष्णि और उत्तरार्ध (भी) विजयाका बाटवा पद्मावतीका पुत्र १८।१६ कूट ५।२७ उच्छ्वास-निश्वास (प) संख्यात उत्तराध कूट (भी) ऐरावतके आवलियोका समूह ७१९ विजयाधका दूमरा फूट उजयिनी (मी) नगरी ६०१०५ ५।११० उज्वलित (मी) वालुकाप्रमा उत्तानशाय - चित्त मोनेवाला पृथिवीवे समस्त प्रस्तरका बालक ४२११६ इन्द्रक बिल ४१२४ उत्पला (मौ) मेरुको आग्नेय उस्कोलन =एक दिव्य ओषधि दिशाम स्थित एक वापी २११८ ५।३३४ उत्कृष्ट शानकुम्म-प्रतविशेप ३४१८७-८९ उत्पलगुल्मा (भौ) मैरुपर्वतकी आग्नेय दिशाम स्थित वापी उस्कृष्टसिंह निष्क्रीडित-एक उपवास व्रत ३४.८० ५।३३४ उत्तमपात्र (पा) रलत्रयसे युक्न उत्पलोज्ज्वला (भी) मेरुको मुनि आदि ७१०८ आग्नेय दिशामें स्थित एक उत्तमवर्ण (भी) देशविशेष १११७४ उत्पाद (पा) नवीन पर्यायका उत्तरकुरु (भी) नील कुलाचल उत्पन्न होना ११ और मेरुके बीच स्थित उत्पादपूर्व (पा) पूर्वगत धुतका प्रदेश, जहाँ भोगभूमिकी एक भेद २२९७ रचना है ५५१६७ उत्पातिनी-एक विद्या २०६८ उत्तरकुरु (भी) नीलपर्वतसे साढ़े उत्सर्पिणी (पा) दस कोड़ाकोटी पांच सो योजन दूर, नदीके अद्धा सागरोकी एक उत्स- मध्यमें स्थित हद ५।१९४ पिणी ७५६-५७ उदक, उवाम (भौ) सवन- समुद्र में दक्षिण दिशाके कदम्वक पातालके दोनों ओर स्थित दोपर्वत ५४६१ उदक, उदयास (य) लबग- समुद्र में शंख और महारास पर्वतके निवासी देव ५५४६२ उदधि (व्य) दुर्योधनको पुत्री, जो प्रद्युम्नको दिवाही गयो ४४४९१ उदधि (व्य) कृष्णका पुत्र ४८1७० उदधिकुमार-मवनवासी देवी- वा एक भेद ४॥३ उदय (पा) स्फटिक सालका पूर्व गोपुर ५७४५७ उदय (पा) आग्रायणी पूर्वके चतुर्थ प्राभूतका योगद्वार १०१८३ उदय (पा) स्फटिक सालका उत्तर गोपुर ५७६० उदयपर्वत (भी) वि० ८० नगरी २२।९९ उदात्त= वेदमें प्रयुक्त होनेवाला स्वरविशेष ( उच्च रुदात्तः) १७१८७ उदितपराक्रम (व्य ) सुवीर्यका पुत्र १३३१० उदीच्यवा=पड्जस्वरसे सम्बद्ध जाति १९।१७४ उद्ध% उत्कृष्ट २०१५ उद्धव (व्य) समुद्रविजयके भाई अक्षोम्यका पुत्र ४८०४५ उद्दारपल्य (पा) बालका एक परिमाण ७४९-५० उदारसागर (पा) दश कोडा- कोडी उद्धारपत्योका एक उद्धार सागर ७१५१ उद्भ्रान्त (भी) रत्नप्रभाके पंचम प्रस्तारका इन्द्रक विल ४७६ वापी ५।३३५

शब्दानुक्रमणिका
उद्यमाषण (अनुवोदिमापण }%3D उपाध्याय (पा) बागायणीपूर्व जह (पा) चौरामो लाख ऊहागों
बागमानुकूल वचन बोलना
की ३४ १०८०
का एक ऊह ७.३०
५८११९
उपायविचय (पा) पयंघान उहाङ्ग (पा) चौरामो लाख अम.
उदंग, उदवाम (व्य) लवण का भेद ५६१४१
मागोंका एक ऊहान ७५३०
समुद्र के कौस्तुभ और कौस्तु उपायानाय = आयरूपो जाल
[ऋ]
मास पर्वतके निवासी देव
५०१५
५।४६०
उपशमक (पा) चारित्रमोहका ऋजुकूलापगा (भी) गिरीडीहके
उन्मग्नजला (मौ) विजयाघको उपशम करनेवाला ३८२
पामको वराकट नदी
गुहामे पड़नेवाली नदो
२०५७
उपशान्त कषाय (पा) ग्यारहवा
११।२६
ऋजुमनि (पा) मन पर्पयज्ञानका
गुणरयान ३१८२
उन्मत्तजला (भी) विदेह क्षेत्रको
उपसर्ग
= पदगत गान्धर्वको विधि
एक भेद १०।१५३
एक विभंगा नदी ५।२४०
१९।१४९
ऋजुसूय (पा) एक नम
उन्मुग्न (व्य) नौवां नारद
उपसर्ग (पा) देव, मनुष्य, पशु
५८।४१
६०१५४८
और अचेतनकृत उपद्रव
अनु (भी) सौधर्म युगलमें प्रथम
उन्मुण्ड (व्य) बलदेवका पुत्र
इन्द्रक ६४
१।१२३
४८।६६
उपांशु = एकान्त १९।१४
ऋतु (पा) दो मासको एक ऋतु
उन्मूल व्रणरोह - एक दिव्य
उर्वरा भूमि ३६४
होती है ७३२१
ओषधि २११८
ऋद्धीश (भी) सौधर्म युगला
उरश्उद-कव१११३
उपक्रम (पा) आम्नायगो पूर्व के
उलूक (व्य) कृष्ण और जरासंघक
तेरहवां इन्द्रक ६४५
चतुर्थ प्राभतका योगद्वार
ऋपम-एक स्वर १९३१५३
युद्धका एक पात्र जिसका
१०1८३
नकुलके माय युद्ध हुआ
ऋषम (व्य) प्रथम तीर्य कर
उपनन्दन (भी) मेकका एक वन
५.३०८
उस्मुक (व्य) एक राजा ५०८३
ऋपि = ऋद्धिधारी मुनि
उपपाण्डुक (भी) मेरुका एक वन उशीरावर्त (भौ) एक देग, जहाँ
५.३०९
ऋपिगिरि (भी) राजगृहीकी एक
चारदत्त व्यापारके लिए
उपभोग (पा) जो एक बार भोगने
गया था २१७५
पहाड़ीका नाम ३।५३
में आये ५८४१५५
उपा (व्य) शोणितपुर निवासी
ऋपिगुप्त (व्य) ऋपभदेवका
उपमोगपरिभाग परिमाण
वाण
विद्याधरकी पुत्री
गणघर १२१६३
(पा) शिक्षा प्रतका भेद
५५।१७
ऋषिदत्त (व्य) ऋपमदेवका
५८११५५-५६
गणधर १२।६३
उपमोगादिनिधन (पा)
ऋपिदत्ता (व्य) अमोपदर्शनको
भनयंदण्ड वाश अतिचार
ऊजयन्त (भौ) गिरिनार पर्वत
चारुमति स्त्रीसे तापमौके
५८।१७९
१.११५
वन में उत्सन बन्या २९॥३४
उपसामनय (भी) मेरका एक वन
अतिक्रम (पा) दि० प्रता
५।३०८
अतिचार ५८११७७
[ए]
उपाधिवाइ मापा (पा) सत्य. अमिमान् (व्य) स्तिमिनमागर.
एक कल्याण विधि- द्रविशेष
प्रबार पूर्वको द्वादश भाषाओ.
का पुत्र ४८।४६
३४।११०
में से एक मापा ११९४
उर्मिमालिनी (भी) विदेहको एकश्यवितवीचार (पा) शुक्ल-
उपाध्याय (व्य) उपाध्याय
भिंगा नदी ५।२४२
ध्यानका दूसरा भेर ५६१६५
परमेष्ठी ११२८
ऊरधर्म (व्य) एक मुनि ६०११. एकावा - एक विद्या २२॥६॥

९२ हरिवंशपुरागे ऐगवती (मो) एक नदी एकमना (पा) मनियोंका एक मूलगुण, दिनमें एक सर ही भोजन करना २।१२८ एकौल (भी) पूर्वदिदेहरा दसारगिरि ५१२२८ एकातपत्र = अद्वितीय ३१३६ एकादशाह = आचारांग आदि ग्यारह बंग एकावलीविधि - एक उपवास ३४४६० एणीय (व्य)यावस्तीका राजा २८०५ एणीपुत्र (व्य) थावस्ती राजा धोलाययको ऋपिदत्ता स्त्री से उत्पन्न पुत्र २९०५३ एरा (व्य) राजा विश्वसेनको स्त्री, भगवान् शान्तिनायकी माता ४५११८ एवंभूत (पा) एक नय ५८४१ एपणा ममिति (पा) दिन में एक बार शुद्ध बाहार ग्रहण करना १२४ एपणा समिति प्रत - व्रतविशेष ३४११०८ [2] ऐरावण (मी) नील पर्वइसे साढे पांच मी योजन दूर नदी मध्यमें स्थित एक हद ५।१९४ ऐरावत = सौधर्मेन्द्रका हाथी २८०२१ ऐरावतकूट (भी) शिवरिकुला- चलका दावा कूट ५।१०७ ऐरावत (भी) जम्बू टोपा उत्तर दिशाम गिसग्नि कुलाचल और लबणममुद्रके मध्य स्थित सातवां क्षेत्र १४ ऐरावती (भौ) एक नदी २७११९ ऐलेय (व्य) राजा दक्ष और इलाका पुत्र १७१३ ऐशान (भी) द्वितीय स्वर्ग ४११४ ऐशान - विद्यास्त्र २५।४९ ऐशान (मौ) दूसरा स्वर्ग ६३६ ऐशान = द्वितीय स्वर्गका इन्द्र २।१८ [क] काम - पूर्वादि दमों दिशाएँ १२८ कन्ठ (व्य) ऋषमदेवका गणघर १२।६८ कन्टकावती (भी) पश्चिम विदेह का एक देश ५।२४५ कच्छा (मी) पश्चिम विदेता एक देश ५१२४५ कच्चा कूट (भी) माल्यवान् पर्वतका एक दूट ५।२१९ काला (भी) मेरले नेऋत्यमें स्थित एक वापी ५.३४३ कबरप्रमा (भी) मेहके नैऋत्यमें स्थित एक वापी ५।३४३ कपटक = गलेका बाभूषग ६२१८ कदन = युद्ध ११०८ कदम्बुक (भी) लवणसमुद्रका पश्चिम दिशास्थित पाताल ५/४४३ कनक, कनकाम (व्य) पृतवर समुद्र के रक्षक देव ५।६४२ कनक (व्य) आगामी प्रथम मनु ६०१५५५ कनक कूट (मा) मानुयोत्तरी पश्चिम दिशाका एक कूट ५६०४ कनकशी (व्य) समालो तापस की स्त्री २७/११९ कनकपुङ्गधी (व्य) नमिकी पुत्री २२।१०८ कनक फूट (भो) रचितिरिका एक ट ५1०५ कनक (मी) पृष्टलगिरिको पूर्व दिशामा एक लूट ५।६९. कनकचिया (व्य) चिनिरि- * निन्यालोक कूटपर रहने- वाली देवी ५।७१९ कनकप्वज (व्य) यागामी चोया मनु ६०१५५५ कनकर (व्य) आगामी पांच मनु ६०५५५ कनकप्रम (भी) कुण्डलगिरिको पूर्व दिशाका एक कूट ५।६९० कनकम (व्य) यागामी दूसरा मनु ६०५५५ कनकपामार (पा) समवसरणका स्वर्ण निर्मित कोट ५७२४ कनकमारी (व्य) नमिकी पुत्री २२।१०८ कनकमाला (व्य) राजा काल- संवरकी स्त्री ४३।४९ कनकमाला (व्य) महेन्द्र और सानुघरीकी पुत्री ६०८१ कनकमालिनी (व्य) गिरिनगर- के राजा चित्ररथको स्त्री ३३३१५० कनकमेखला (व्य) मेघदल नगरके राजा सिंहको स्त्री ४६।१४ कनकराज (व्य) आगामी तीमरा मनु ६०५५५ कनकावलीविधि =एक उपवास व्रत ३४।७३-७७ कनकावर्त (व्य) सिंह और क्नक मैखलाकी पुत्री ४६:१५ कनीयम् (भौ) देशविमोप ३।४ कन्दर्प = देवविशेष ३।१३६ कन्दपं (पा) अनर्थदण्डानका अतिचार ५८।१७९ शम्दानुक्रमणिका क्षपकप्रेणी (पा) जिसमे चारित्र कमलाह (पा) चौरासो लास मोह कर्मका क्षय होता है मलिनोंका एक कमला। ५६४८८ ७/२७ कपाट (पा) लोक्पूरण समुद् कम्बल (व्य) जरारांधका पुत्र घातका दूमरा चरण ५६७४ ५२।३७ फपिल (व्य) एक राजा ५०८२ कर-मूंड २२३७ कपिल (व्य) धातकीखण्डके कराल ब्रह्मदत्त (व्य) एक मुनि भरतक्षेत्रका नारायण २३११५० ५४५६ फरिका-झारी १५.११ कपिल (व्य) वमुदेव और कोटक (व्य) परणका पुत्र कपिलाका पुत्र २४२७ ४८.५० कपिला (व्य) वेदमामपुरके कर्कोटक (भी) कुम्भवष्टक द्वीप राजा कपिलश्रुतिको पुत्री का एक पर्वत २१११२३ २४॥२६ कर्कोटक (य) जरासंघका पुत्र कपिल (व्य) वमुदेव और मित्र- ५२०३६ घोका पुत्र ४८५८ कर्ण (व्य) राजा पाण्डका कन्या कपिला (व्य) सत्यभामाके अवस्था कुन्तीसे उत्पन्न भवान्तर वर्णनसे सम्बद्ध पुन ४५१३७ एक स्त्री ६०११ फर्णसुवर्ण (भी) जहाँ राजा वर्णने कपिलश्रुति (व्य) वेदसामपुर- कर्णकुण्डल छोड़े थे ५२।९० मा राजा २४॥२६ कर्बुक (भौ) देशका नाम १९७१ कपिटल (व्य) वामदेवा कर्मक्षयविधि =यतविशेष सिय ४५४६ ३४।१२१ सपक (पा)पक श्रेणीवाला कर्मन् (पा) आग्रायणी पूर्व के चारितमोहना क्षय करने. चतुर्थ प्राभूतबा योगद्वार वाला मुनि ३१८२ १०१८२ कपल (पा) एक हजार चावल कर्मप्रयाद (पा) पूर्वगन धृतवा पा एक बयलपाम होता है एक भेद २१९८ कमभूमि (पा) नही मि, म्यो कमल (पा) चौरामी लास आदिएहममि आजीविका ममलामारा एकमल होती है ६१११२ ७२० कमारपीमध्यममामा पापित कमत (पा) ममय गरज जाति १९१० परसबनीवापिस कर्मरिपनि (पा) बापानी पूर्वक पतुएं प्रातरा योगदार कमला (व्य) उमपिनीर १.१८१ इत्यापर गमागेको कमायो ११११९ भामाश (पा) मा. ममा (य) निधि को को १२ भागमा गएर मारा ११९२ कलधौत स्वर्ण १२४३ कलध्यान =मधुर शब्द करने. वाले १२४७ कलरव% कबूतर ३६३१ कलिङ्ग (भो) देशाका नाम ११६७० कलिङ्गमेना (च्य) चम्पापुरीको एक प्रसिद्ध गणिका २१४१ कलिन्दसेना (व्य) राजा जरा. सन्धको स्त्री १८०२४ कलोपनना=मध्यम ग्रामकी मूच्छंना १९६१६३ का (पा) बोस कोडाकोडो कालको कल्प कहते है अब+ उत्मरिणी ७१६३ कल्प (पा) सोलह स्वर्ग ३१४९ कल्प-स्वर्ग ४॥१६ कल्प (पा) आग्रायणी पूर्वको वस्तु १०1७९ कल्पाकल्प (पा) अंग याह्यश्रुत. का एक भेद २।१०४ कल्पपुर (भी) राजा महोदतका बसाया नगर १७१२९ करभूमि (पा) ममवमरणको आधारभूमि ५७.५ पलगामिन् = स्वगोमें रहनेवाले वैमानिक देव ३११३५ कत्सम्यवहार (पा)अंग वाहन पावामस्तूप (पा) समयमरपर स्तूर ५७९९ कपानियामिनी स्वर्गमी देवामनाएं २०७० Ti (पा) मोर स्वर्गात बारदेव १५० कल्याण (पा) पूर्वगन्यारा ए: २०१५ कम्यागारग (पा) नवमरकरी भूमि ५० पनागन (भी) माम १११ 31.८ ९४ हरिवंशपुराणे काक्षि (भी) देशका नाम १११७२ काकणीमणि = चक्रवर्तीका एक मणि जिससे प्रकास होता काकली = चौदह मूछनाओका एक स्वर १९।१६९ काहक्ष (भी) प्रथम पृथियो सम्बन्धी प्रथम प्रस्तारके सीमन्तक इन्द्रकको पूर्व दिशामें स्थित एक महानरक ४।१५१ काञ्चन (भी) दि. उ. नगरी २२१८८ काञ्चन (भी) रुचिकगिरिका उत्तर दिशासम्बन्धी कूट ५.७१६ काशना (भी) सौधर्म युगलमा मौवा इन्द्रक ६।४५ काञ्चन (व्य) रुचिकगिरिक कुमुद कूटपर रहनेवालो देवो ५७१३ काजनक (व्य) मेरु पर्वतके कूटो- पर बसनेवाले देव ५।२०४ काञ्चनकूट (भौ) सीता सोतोदा नदियोके तटपर स्थित पर्वतविशेष ५।२०० काचनकूट (भौ) रुचिकागरिका एक कूट ५७०५ काञ्नकूट (भी) सौमनस पर्वत- का एक कूट ५।२२१ काञ्चनपुर (भी) कलिंगदेशका एक नगर २४/११ काञ्चनरथ (व्य) जरामंधका पुत्र ५२।३१ कान्ता (य) भानुषेणकी स्त्री कानीन-कन्या अवस्थाका पुत्र दिशाम स्थित महानरक कर्ण ५०1८८ ४१५८ कापथमलाविल (वि) कुमार्ग- काल (य) कालोदपिका रक्षक कपी मनसे मस्नि १.१५ देव ५६३८ कापिष्ट (भी) आठवौ स्वर्ग ४४१५ काल. (पा) चक्रवर्तीको एक निधि कापिटलायन (व्य) एक ब्राह्मण १८।१०३ काल (व्य) पाचा नारद कापीतलेश्या - लेश्याका एक ६०१५४८ भेद ४॥३४३ काल =दिति देवीके द्वारा प्रदत्त काम (व्य) रुद्र ६०५७१ विद्यानिकाय २२१५९ काम (व्य) प्रद्युम्न ४८.१३ कालांशपुर (भी) वि०६० कामनीवामिनिवेश (पा) ब्रह्म- नगरी २२।९८ चणुियनका अतिवार कालमुख (व्य) एक राजा ५८।१७४ ३१४९७ कामद (व्य) रुद्र ६०१५७१ कालमुखी - एक विद्या २२०६६ कामदत्त (व्य) थावस्तीका एक कालयवन (व्य) राजा जरा. सेठ २८।११८ सन्धका पुत्र १८।२४ कामदृष्टि (व्य) चक्रवर्तीका कालश्वपाकी = विद्याधरोंकी रहपतिरल ११:२८ एक जाति २६१८ कामदेव (व्य) श्रावस्तीके काम- कालसंवर (व्य) मेघकूट नगरका दत सेठक वशमें प्रसन्न हुआ राजा४३१४९ एक सेठ २९४६ कालाअला- एक अटवी ४६७ कामदेव (व्य) ऋषभदेवका गण- कालातिक्रम (पा) अतिथिका घर १२०६९ अतिचार ५८।१८३ कामपताका (व्य) रगसेना कालिङ्गी (व्य) पूरणको स्त्री गणिकाकी पुत्री २९।२७ १९६५ काम्बोज (भौ) देशका नाम कालिन्दी (भौ) यमुनानदी १४।२ कालिन्दी (व्य) सुभानुको स्त्री कायोत्सर्ग = निश्चित समय तक ३३०९९ शरीरसे ममता त्याग कालियाहि (व्य) यमुनाके हृद- ३४।१४६ में रहनेवाला एक सर्प ३६४७ कार्ण (भौ) देशविशेष ३६ काली- एक विद्या २२०६६ कार्तवीर्य (व्य) गजपुर-(हस्तिना- कालोदसागर (भौ) यातकोसण्ड पुर) के कौरव वशमे उत्पन्न द्वीपको घेरकर स्थित कालो- हुआ एक राजा २५1८ दधि समुद्र ५।५६२ काल (पा) परिणमनमें सहायक काव्य-रमणीयार्थके प्रतिपादक एक द्रव्य ५८।५६ शब्दविशेपोका समूह ११४४ काल (भी) सातवी पृथिवीके काशि (भौ) देशका नाम १११६४ अप्रतिष्ठान इन्द्रको पूर्व काष्टा = दिशा ५४/७३ कादम्बरी मदिरा ६११३६ कान्दिशीक-भयसे पलायमान ३११६५ ९५ शम्दानुक्रमणिका किन्नरोद्गीन (भी) विजयाका कुण्डलयर मागर (भी) ग्यारहवा कुमारमेन (व्य) एक आचार्य एकनगर १९५८० गागर ५६१८ फिरोटी (व्य) अर्जुन ५५५ कुण्डलवर द्वीप (भी) ग्यारहवा कुम्म (व्य) भगवान् ऋषभदेवरा किदिवपक- देवोयी एक जाति द्वीप ५।६१८ गणधर १२:५५ कुण्डला (भी) विदेहको एक कुमुद (पा) चौरामी लास कुमा किकन्ध (भी) देशका नाम नगरी ५।२५९ दाङ्गोका एका कुमुद २६ १११७३ कुण्डिन (भौ) विदर्भ देशको वरदा कुमुद (व्य) पमुदेवका पुत्र किकु (पा) दोहापोंका एक नदी के तटपर बमा एक नगर, ५०१११५ पिप्पु ७४५ इमे कुणिमने बसाया था कुमुद (भी) रुचिकगिरिका कीचा (व्य) राजा चूलिकका पुत्र १७१२३ पश्चिम दिशामम्बन्धी फूट कोति (पा) स्फटिफ सालका पूर्व कुण्डिन (भी) एक नगर ६०१३९ ५।७१३ गोपुर ५७१५७ कुन्डिन (भी) एक नगर रुक्मिणी नमुद फूट (भी) मैकमै पदिनमो कीति (दितीय) (य) कुरवंशका या जन्म स्थान ४२।३३ और शीतोदा नदीसे दक्षिण एका राजा ४५/२५ कुतुप = नटोका समूह २२।१३ तरपर स्थित एक कूट कीनि (व्य) सरि सरोवरमे कुनीधंधान्त = দ্বিাদশমী ५।२०६ रहनेवाली देवी ५।१३० अन्धकार १.१४ फुमुदाह (पा) चौरासी लास कीरिकूट (भी) नील कुलामलका कुन्तल (भी) देवाया नाम ११७० निपुणोंका एक कुमुवान पाचवा बूट १।१०० पुन्नी (व्य) अन्यवभूष्णिको २६ कीर्तिमतो (य) पिकनिरिक यहन, पाण्डुरो स्त्री १८११५ कुमुदामेलक (व्य) भरतपक- पथकोत्तर यूटार रहनेवाली कुन्थ (व्य) यासनापमा प्रथम वति पोहा ११॥२३ गणपर ६०1३४७ कुमुदनमा (मी) मेहले ऐशान सुन्दर-नितमोमें परनेवाले में स्थित एकथानी ५४५ पुन्थ (न्य) गवह तोयंकर, घटवें गतविशेष १० चक्र ४५४२० घुमुवा (भी) मेरफे ऐशानमें सराप (भी) वि. द. नगरी कुन्धु (व्य) मरनाषका प्रथम स्थित एक पारी ५१३४५ गणपर ६०३८ कुमुदा (भी) नदीवरसीपक निम (व्य) ऐलया पुत्र पश्चिम दिलासम्बन्धी गय (पा) मिजान माग १७१२३ पारित्री पा ११४ कजननिरिसीपरियम दिया- गीयान् (भी)रा नाम में स्पिन पारित ५१९६२ पकना (व्य) सपो मन सम्बन्धी विधा देवता :५४२ मुदा (पा) गमगर पार TITY (भी) गोदावरीके निकट पुप्पप्रमाणानिझम (पा) परिह यमरोबारिश ५७१४ एम १३ परिमापामा अनिवार इगुता (मी) विमा पुगपुर (भी) महार सामी. देश ५१२४९ सापानी कुम (व्य) परि १९: पुग्मरर (मी) एक और TIR (भा) राति परदन (स्य) पर तर निधी पर (स्य) मारपुर पुष्पा (ग) fontीम Trt (भी) TURK पुर(Trn cामी inik free or माय (प) Rirst NEERISTimes नाममा देवी ५१.

काक्षि (भी) देशका नाम १११७२ कारुणीमणि = चक्रवर्तीका एक मणि जिससे प्रकाश होता है ११॥२७ काकली = चौदह मूच्छंनाओका एक स्वर १९।१६९ काझ (भौ) प्रथम पृथिवो. सम्बन्धी प्रथम प्रस्तारके सीमन्तक इन्द्रकको पूर्व दिशामें स्थित एक महानरक ४।१५१ काञ्चन (भौ) वि० उ. नगरी २२८८ काञ्चन (भौ) रुचिकगिरिका उत्तर दिशासम्बन्धी कूट ५।७१६ काञ्चना (भौ) सौधर्म युगलका नौवा इन्द्रक ६४५ काञ्चन (व्य) रुचिकगिरिक कुमुद कूटपर रहनेवालो देवो ५७१३ काशनक (व्य) मेरु पर्वतके कूटो- पर बसनेवाले देव ५।२०४ काञ्चनकूट (भी) सीता सीतोदा नदियोके तटपर स्थित पर्वतविशेष ५।२०० काञ्चनकूट (भौ) रुचिकगिरिका एक कूट ५१७०५ काञ्चनकूट (भौ) सौमनस पर्वत- का एक कूट ५।२२१ काञ्चनपुर (भौ) कलिंगदेशका एक नगर २४/११ काधनस्थ (व्य) जरामंघका पुत्र ५२।३१ कान्ता (व्य) भानुपेणकी स्त्री हरिबंशपुराणे कानीन - कन्या अवस्थाका पुत्र दिशाम स्थित महानरक कर्ण ५०1८८ ४।१५८ कापथमलाविल (वि) कुमार्ग. काल (व्य) कालोदधिका रक्षक रूपी मलसे मलिन १३१५ देव ५१६३८ कापिष्ट (भौ) आठवां स्वर्ग ४१५ काल: (पा) चक्रवर्तीको एक निधि कापिटलायन (व्य) एक ग्राह्मण १८।१०३ काल (व्य) पाचा नारद कापोतलेश्या = लेश्याका एक ६०१५४८ भेद ४॥३४३ काल =दिति देवोके द्वारा प्रदत्त काम (व्य) रुद्र ६०५७१ विद्यानिकाय २२२५९ काम (व्य) प्रद्युम्न ४८।१३ कालो शपुर (भी) वि०६० कामतीग्रामिनिवेश (पा) ब्रह्म- नगरी २२।९८ चर्याणुनतका अतिचार कालमुख (व्य) एक राजा ५८.१७४ कामद (व्य) रुद्र ६०५७१ कालमुखी - एक विद्या २२६६६ कामदत्त (व्य) थावस्तीका एक कालयवन (व्य) राजा जरा- सेठ २८५११८ सन्धका पुत्र १८।२४ कामदृष्टि (व्य) चक्रवर्तीका कालश्वपाकी विद्याधरोकी गृहपतिरत्न ११।२८ एक जाति २६१८ कामदेव (व्य) श्रावस्तीके काम- कालसंवर (व्य) मेघकूट नगरका दत्त सेठके वश में प्रसन्न हुआ राजा ४३३४९ एक सेठ २९/६ कालाञ्जला - एक अटवी ४६।७ कामदेव (व्य) ऋषभदेवका गण- कालातिक्रम (पा) अतिथिका धर १२१६९ अतिचार ५८।१८३ कामपताका (व्य) रगसेना कालिङ्गी (व्य) पूरणकी स्त्री गणिकाकी पुत्री २९।२७ काम्बोज (भौ) देशका नाम कालिन्दी (भौ) यमुनानदी १४२ ११३६६ कालिन्दी (व्य) सुभानुको स्त्री कायो-सगं = निश्चित समय तक शरीरसे ममता त्याग कालियाहि (व्य) यमुनाके ह्रद- ३४।१४६ में रहनेवाला एक सर्प ३६७ कार्ण (भौ) देशविशेष ३।६ काली - एक विद्या २२२६६ कार्तवीर्य (व्य) गजपुर-(हस्तिना- कालोदसागर (भी) धातकोखण्ड पुर) के कौरव दशमे उत्पन्न द्वीपको घेरकर स्थित काली- हुआ एक राजा २५1८ दधि समुद्र ५१५६२ काल (पा) परिणमनमे सहायक एक द्रव्य ५८।५६ शब्दविशेषीका ममूह ११४४ काल (भौ) सातवी पृथिवीके काशि (भौ) देशका नाम ११।६४ अप्रतिष्ठान इन्द्रकको पूर्व काष्टा-दिशा ५४/७३ काव्य% रमणीयार्थके प्रतिपादक कादम्बरी = मदिरा ६१॥३६ कान्दिशीक - भयसे पलायमान ३१६५ शम्दानुक्रमणिका ९५ किमरोद्गीत (भी) विजयाका कुण्डलवर मागर (भौ) ग्यारहवां कुमारमैन (य) एक आचार्य एक नगर १९८० सागर ५।६१८ ११३८ फिरोटी (व्यअर्जुन ५५५ कुण्डलवर द्वीप (भौ) ग्यारहवा कुम्म (व्य) भगवान् ऋषभदेवका किल्यिपक- देवोंकी एक जाति द्वीप ५६१८ गणधर १२१५५ ३३१३६ कुण्डला (भी) विदेहको एक कुमुद (पा) चौरामी लास कुमु. विष्कन्ध (भी) देशका नाम नगरी ५।२५९ दागोका एक कुमुद १२६ १११७३ कुण्डिन (भी) विदर्भ देगको वरदा कुमुद (व्य) वसुदेवका पुन किस्कु (पा) दो हापोंका एक नदीके तटएर बसा एक नगर, ५०१११५ विष्कु ७।४५ इमे कुणिमने बसाया था कुमुद (भी) रचिकगिरिका कीचक (व्य) राजा चूजिकका पुत्र १७॥२३ पश्चिम दिशामम्बन्धो कूट घोति (पा) स्फटिक सालका पूर्व कुण्डिन (भौ) एक नगर ६०३३९ गोपुर ५७१५७ कुण्डिन (भी) एक नगर विमणो. कुमुद फूट (भी) मेहसे पश्चिमको कीति (द्वितीय) (व्य) कुरुवंशका का जन्म स्थान ४२०३३ और शीतोदा नदीसे दक्षिण एक राजा ४५।२५ कुतुप नटोका समूह २२।१३ तटपर स्थित एक कूट कीनि (य) पेमरि सरोवरम कुतीर्थधान्त - मिथ्यामतरूपी ५२०६ रहनेवाली देवी ५।१३० अन्धकार १.१४ कुमुदाग (पा) चौरासी लास कीनिष्ट (भी) नोल कुलाचलका कुन्तल (भी) देशमा नाम १९७० निपुणोंका एक कुमुशन पाचा कूट ५।१०० कुन्ती (व्य) अन्धकमणिको ७/२६ कीर्तिमनी (य) रुचिफगिरिक पहन, पाण्डुको स्त्री १८।१५ कुमुदामेलक (य) भरतपक- पवकोत्तर कूटार रहने वाली व का घोडा १११२३ कुन्थु (व्य) श्रेयान्सनायका प्रथम गणधर ६०1३४७ कुमुदनमा (भी) मेहफे ऐशान -निमम्बोम पहनेवाले में स्थित एक यापी ५१३४५ कुन्धु (व्य) मत्रहवें तीर्थकर, छठवें गतविशेष ८१० चक्रवर्ती ४५।२० मुमुदा (भी) मेहकै ऐशानमें गुजरायतं (भी) वि० ८० नगरी कुन्यु (व्य) भरलापका प्रथम स्थित एक पापी ५३४५ २२१९६ गणधर ६०1३४८ कुमुदा (भी) नदीदारदीप अणिम (य) ऐलयका पुत्र कुगत्र (पा) मिपान जान पश्चिम दिशासम्बन्धी १७१३ भारिप धारक ११४ अजनगिरिसीपदिनमामिला- गीयान (भी) देसरा नाम पुपूलना (व्य) गमो इमर. में स्पिन वापिसा ५६६२ मम्बन्धी विद्यादेवना ३५४२ अमु (पा) गमयगरण पास पपुर (भी) गोदावरी के लिएर पुष्पप्रमापानिजम (पा) परिप्रह चनमोवानि ५७३४ एकामा परिमाणावरा भनिधार मुगुता (मी) पूर्व विधा इमर (भी) महापौर मी. ५८.१७६ राजमापान (स्य) सविध ॥ पुरमाटा (भी) एक TIR (मी) सिनिता पुरात (त्य) महापुराएर सरशिामापीर पर (स्य) हमारा या (व्य) गिगाएर पनि (भी) पुनर this fesgrt गुगा (स्प) और wn६८९ नाम देवी ५१७१० पर (ग) संग रानी पाय (य) MAR हरिवंशपुराणे कुरुजाङ्गस देश (भौ) हस्तिना- कूटलेस क्रिया (पा) सरयाणुव्रत पुरका समीपवर्ती प्रदेश का अतिचार ५८।१६७ कृष्माण्ड गणमाता=एक विद्या, कुरुद्वय = देवकुरु, उत्तरकुरु २२.६४ ५.८ कृतमाल (व्य) तमिस्रगुहाका कुरुमती (भी) एक नगरी निवासी देव १२२१ ६०.८५ कृतवर्मा (व्य) एक राजा ५०१८३ कुल (पा) जोधोके शरीरनिर्माण- कृनात्मन् (वि) = कृतकृत्य ११९ के योग्य पुद्गल वर्गणाएं कृति (पा) आग्रायणी पूर्वक कुलकोटी २।११६ चतुर्थ प्राभृतका योग द्वार कुलकर (पा) मनु, ये १४ होते है १०१८२ ७११२३ कृतिकर्म (पा) अङ्गबाह्यश्रुतका कुलकीति (व्य) कुरुवशका एक एक भेद २११०३ राजा ४५.२५ कृतिधर्मा (व्य) हदिकका पुत्र कुलिशायुध = इन्द्र, ३८।२२ ४८/४२ कुश (भी) देशविशेष ११७५ कृष्ण (व्य) निर्नामिक जोव, देव- कुशद्य (भौ) देशविशेष १८९ कीका पुत्र ३३।१७३ कुशवर द्वीप (भौ) पन्द्रहवां द्वीप कृष्ण (व्य) नौवां नारायण ५।६२० ६०१२८९ कुशवर सागर (भौ) पन्द्रहवा कृष्णलेश्या (पा) लेश्याका एक सागर ५।६२० भेद ४॥३४४ कुशाग्र (भौ) देशका नाम कृष्णा (व्य) द्रौपदी ५४१३३ केनुमती (व्य) जरासन्धकी पुत्री, कुशासपुर (भौ) राजगृहीका जितशत्रुको स्त्री ३०।४५ केतुमती (व्य) एक कन्या, जो दूसरा नाम १५/६१ कुशील (पा) मुनिका एक भेद पुण्डरीक नारायणकी स्त्री ६०५८ हुई २६१५२ कुसन्ध्य (भी) देशविशेष केतुमाल (भी) वि० ज० नगरी २२।८६ ३।३ केनुमाली (व्य) जरासघका पुत्र कुमुमकोमला (व्य) राजा वर्णको ५२१३५ पुत्री ४५६६२ केतुमालिन् (व्य) जरासंघका कुसुमचित्रममा -श्री कृष्णकी पुत्र ५२१४० सभा ५५।२ केवलज्ञान (पा) सकल प्रत्यक्ष कुमुमवती (भी) वरुण पर्वतके ज्ञान १०.१५४ समीप पश्चनद समागमकी केवलिन्केवलज्ञानके धारक एक नदी २७।१४ कुसुमावली (य) मुनार विद्याधर- केशव =कृष्ण १२११९ को स्त्रो ४६९ केशरिन् (व्य) विजयका पुत्र फूटदोष = मिथ्यादोप ४५।१५५ ४८१४८ कैसरिन् (भी) नीलकुलाचलका- ह्रद ५।१२१ कैकय (भौ) देशका नाम १११६६ कैटभ (व्य)हेमनाथ और घरावती- का पुत्र ४३३१६९ कैशिकी=मध्यम ग्रामके आश्रित जाति १९१७७ कोदण्ड =(पा) धनुष (चार हाथ का एक धनुप होता है) ४।३३६ कौण्डिन्य (व्य) वैदिक विद्वान् २०६८ कौरकुच्य (पा) अनर्थदण्डयनका भतिचार ५८११७९ कौथुमि (व्य) आत्रेयका शिष्य ४५।४५ कौन्तेय = युधिष्ठिर आदि पाण्डव ४५।४३ कौमुदी (व्य) श्रीकृष्णको गदा ५३३४९ कौबेर (पा) स्फटिक सालका उत्तर गोपुर ५७१६० कौशल (भौ) एक देश ४६।१७ कौशल्य (भी) देशविशेष कौशाम्ब वन (भौ) एक वन ६२।१५ कौशाम्बी (भौ) एक नगरी ३३३१३ कौशाम्बी नगरी (भी) वरम देश- की राजधानी १४॥२ कौशिक = विद्याधरोकी जाति २६।१३ कौशिक (व्य) एक ऋपि २५।११ कौशिक (भी) वि० उ० नगरी २२१८८ कौशिक = अदिति देवीके द्वारा माओका एक निकाय २२०५७ सर्वज्ञ ११५८ समुद्र ५।६१४ भेद ५८।१९४ शब्दानुक्रमणिका कौशिक (व्य) एक जटाधारी क्षायोपशमिक (पा) सम्यग्दर्शन खण्डक प्रपात कूट (भौ) ऐरावत- ऋषि २९।२९ का एक भेद ३।१४३ के विजयार्धका सातवां कूट कौशिका (भौ) एक नगरी ४५।६१ क्षुत = छोक ३५।२४ कौस्तुभ, कौस्तुभास (भौ) लवण क्षीणकपाय (पा) वारहवां गुण खण्डका पात (भी) विजायाको समुद्र में पूर्व दिशाके पाताल स्थान ३१८३ गुफा १११५३ विवरकी दोनो ओर स्थित क्षीरवर द्वीप (भौ) पांचवां द्वीप खण्डिका (भौ) वि० उ० नगरी दो पर्वत ५।४६० ५१६१४ २२।८९ क्षीरसागर = (भौ) पांचवां समुद्र खद्योत - क्रम-चरण ८८ जुगनू ११५२ २०४२ खमाली (व्य) एक तापस क्रमण (व्य) मानुपौत्तरके कनक २७१११९ कूटपर रहनेवाला देव ५।६०५ क्षीर कदम्ब (व्य) एक वेदविद् क्वायतोय (भौ) देशविशेष ३१६ ब्राह्मण १७४३८ खर निदाघ = तीक्ष्ण उष्णऋतु क्वाथतोय (भौ) देशका नाम क्षीरोद सागर (भी) पांचवा ५५।५० ११.६६ खरभाग (भौ) रत्नप्रभा पृथिवी- क्रियावादी (पा) मिथ्यात्वका एक क्षीरोदा (भी) विदेहकी एक का पहला भाग ४।४८ विभंगा नदी ५।२४१ खर्चट (पा) पर्वतसे घिरा नगर क्रियाविशाल पूर्व (पा) पूर्वगत क्षुद्र (व्य) एक म्लेच्छ ४६।४९ २।३ भेद श्रुतका एक भेद २।१०० क्षेत्र (पा) खेत–अन्न उपजनेका खरी= गधी ६०१३१ फर (व्य) वसुदेवकी विजयसेना स्थान २३ खलन्याल = दुर्जन रूपी सांप स्त्रीसे उत्पन्न पुत्र ४८१५४ क्षेत्रवृद्धि (पा) दिग्वतका ११४६ कौन्चवर द्वीप (भी) मोलहवां अतिचार ५८११७७ खलीकार-तिरस्कार १७११५७ द्वीप ५१६२० क्षेमङ्कर (व्य) तीसरा कुलकर खेट (पा) नगर और पर्वतसे घिरा क्रौञ्चवर सागर (भौ) सोलहवां ७.१५० नगर २।३ क्षेमन्धर (व्य) चौथा कुलकर सागर ५।६२० ७११५२ [ग] कंस (व्य) वसुदेवका शिष्य राजा क्षेमधूर्त (व्य) एक राजा ५०८२ गगनचन्द्र (व्य) गगनवल्लम उग्रसेन और पद्मावतीका पुन क्षेमपुरी (भी) सुकच्छा देशको नगरका राजा ३४॥३५ ३३२ राजधानी ५।२५७ गगनायन-आकाशगमन कंस (य) जरासंधका जामाता उग्रसेनका पुत्र ५०।१४ क्षेमा (भौ) कच्छा देशको राज- घानी ५२५७ कंस (व्य) मथुराका राजा ११८७ गगनमण्डल (भौ) वि० उ० क्षोणी- पृथिवी ३३१४ कंसाचार्य (व्य) ग्यारह अगके नगरी २२३८५ ज्ञाता एक आचार्य ११६४ [ख] गगनवलम (भी) वि० उ. नगरी २२१८५ क्षत्रिय (व्य) दशपूर्वके ज्ञाता एक खग= विद्याधर ४४।४ आचार्य १२६२ खग - विद्याधर १।१०४ गगनबल्लभ (भी) पुष्कलावती देशके वि.उ. का एक क्षान्ति (पा) सातावंदनीयका खड्ग (भी) देशका नाम १११६८ नगर ३४॥३४ आरव ५८1९४ खड्गा (भो) विदेहको एक नगरी क्षायिकमम्यक्त्व (पा) दर्शन ५.२५७ गगनवाहमा (व्य) अच्युतेन्द्रको मोहको तीन और अनन्तानु। खड्गा (भी) विदेहको एक नगरी महादेवी ६०३८ बन्धीको चार इन सातके ५।२६३ गगनसुन्दरी (व्य) गगनवल्लम क्षयमे होनेवाला सम्यग्दर्शन खण्डक प्रपात (भी) विजयाघ नगरके राजा गगनचन्द्रकी २।१३७ का तीसरा फूट ५।२६ स्त्री ३४॥३५ हरिवंशपुराणे गल, गादत्त (व्य) हस्तिनापुरके राजा गङ्गदेव और नन्दयशा- के युगल पुत्र ३३३१४१ गादत्त (व्य) कृष्ण ३६।२२ गगदत्त (व्य) जरासंघका पुत्र ५२१३३ गङ्गदेव (व्य) कुरुवशका एक राजा ४५।११ गङ्ग देव (व्य) दसपूर्वके शाता एक आचार्य १२६३ गङ्गरक्षित, नन्द (ख्य) यगलयुक्त ३३।१४१ गङ्गा (भौ) चौदह महानदियोम- से एक नदी ५।१२३ गडाकूट (भौ) हिमवत् कुलाचल- का पांचवां कूट ५/५४ गङ्गादेवी (व्य) गङ्गाकूटपर रहनेवाली देवी ११:५१ गङ्गानुकूलं - गङ्गाके किनारे- किनारे १११३ गङ्गा-सिन्धु (भी) विदेह क्षेत्रके कच्छा आदि देशो बहने- वाली नदियाँ ५।२६७ गजकुमार (व्य) श्रीकृष्णके एक भाई ११११६ गजपुर (भौ) हस्तिनागपुर १८११०३ गजवती (भौ) वरुण पर्वतके समीप पञ्चनद समागमकी एक नदी २७।१४ गणधारिन् = तीर्थकरवी सभा प्रमुख श्रोता ४ ज्ञानके धारी अपर नाम गणधर ३१४१ गणभृद्-गणधर ११७५ गणबद्ध (व्य) भरत चक्रवर्तीके आज्ञाकारी देव ११॥३७ गण्यपुर (मो) ज. प० विदेहके रूप्याचलकी उत्तर श्रेणीका एकनगर ३४०१५ गति '- तालगन गान्धर्वका एक प्रकार १९४१५१ गन्ध (व्य) इशुबर समुद्रका रक्षक देव ५३६४४ गन्धकुटी (पा) रामवसरणका एक स्थान जिसमें तीयंकर विराजते है ५७७ गन्धदेवी फूट (भी) शिमरिकुला. चलका नौवा यूट ५।१०७ गन्धमादन (भी) मेरुपर्वतकी पश्चिमोत्तर दिशामें स्थित स्वर्णमय एक पर्वत ५।२१० गन्धमादन (व्य) हिमवत्का पुत्र ४८/४७ गन्धमादन (भी) वि०३० नगरी २२।९७ गन्धमादन = शौर्यपुरके उद्यानमैं स्थित गन्यमादन नामका एक पर्वत १८।२९ गन्धमादन (व्य) जरासंघका पुत्र ५२०३२ गन्धमादन (भौ) एक पर्वत ६०११६ गन्धमादन कूट (भी) गन्धमादन पर्वतका एक बूट ५५२१७ गन्धमादिनी (भौ) विदेहको विभंगा नदी ५।२४२ गन्धमालिनी (भौ) जम्बूद्वीप विदेह क्षेत्रका एक नगर २७१११५ गन्धमालिनी (भी) पश्चिम विदेहका एक देश ५।२५१ गन्धमालिनी (भौ) जम्बूद्वीप विदेह क्षेत्रका एक देश २७.५ गन्धमालिनीका कृट (भी) गन्ध. मादनका एक कूट ५।२१७ गन्धमित्र (व्य) एक राजा २७४१०२ गन्धर्व (भी) मेरुके नन्दन वनको पश्चिम दिशामें स्थित एक भवन ५.३१५ गन्धर्व -विद्याकै निकायका नामान्तर २२२५८ गन्धर्वसेना (य) एक कन्या जिमका वसुदेवके साथ विवाह हुआ १८१ गन्धर्वसेना (व्य) चारुदत्तकी पन्या १९।१२३ गन्धर्वसेना (य) अमितगति विद्याधरकी विजयसेनासे उत्पन्न पुत्री। जो चारुदत्तके द्वारा वसुदेवको दी गयो २१३१२० गन्धवत् (भी) हरण्यवन क्षेत्रके मध्यमें स्थित एक गोलाकार पर्वत ५।१६१ गन्धसमृद्ध (भी) वि०८० नगरी २२।९४ गन्धसमृद्ध (भौ) वि० ८० के गान्धार देशका एक नगर गन्धा (भौ) पश्चिम विदेहका एक देश ५।२५१ गन्धार (व्य) वसुदेव और प्रभा- वतीका पुत्र ४८६६३ गन्धार (व्य) वि० ८० के गन्ध- समृद्ध नगरका राजा ३०१६ गन्धावती (भी) एक नदी ६०११६ गम्मीर (व्य) एक राजा ५०११३१ गम्मोर (व्य) कृष्णका पुत्र ४८४७० गरुड (भौ) सानत्कुमार मुगल- का चौथा इन्द्रक ६.४८ गरुडकान्त (व्य) सेनकान्त (व्य) चित्रचूल और मनोहरीके युगल पुत्र ३३३१३३ गरुडदण्ड (व्य) सिंहपुरका एक गारुटिक, सर्पविषको दूर करनेवाला २७१४९ शब्दानुक्रमणिका गुवक देव विशेष ५९:४३ गूढदत्त (व्य) आगामी चक्रवर्ती गहडम्बज गरुडयाहन चित्रचूल गिरि (व्य) वसुगिरिका पुत्र और मनोहरी के युगल पुत्र गिरि (व्य) अचलका पुत्र ४८१४९ गरदन्यूह (पा) समुद्रविजयको गिरिकूट (भी) एक पर्वत सेनाका निवेश प्रकार २११०२ ५०१११३-१२९ गिरितट (भी) विजयाका एक गरदा (व्य) वृषभध्वजका पुत्र नगर २३१२६ १३।११ गिरिनगर (भी) सौराष्ट्रका एक नगर ६०७२ गरुमान् (व्य) जरामंधका पुत्र गीति वालगत गान्धर्वका एक ५२।३९ गम्यूति = कोस ४१३५५ प्रकार १९:१५१ गाण्डीव = एक धनुष ४५।१२६ गुणश्रेणी (पा) सम्यग्दृष्टि श्रावक गान्धर्वसेना (यो एक विद्याधर- विरतास्त वियोजक आदि पुत्री जो चारुदत्तके द्वारा स्थानोमें होनेवाली निर्जरा वसुदेवको विवाहो गयो गुणधर (व्य) राजा उग्रसेनका २१११ पुत्र ४८१३९ गान्धर्वसेनक (य) विद्याओका गुणप्रमा (व्य) राजा प्रचण्ड वाहनकी पुरी ४५१९८ एक भण्डार २२।५६ गुणवती (व्य) एक आयिका गान्धार-एक स्वर १९४१५३ २७१८२ गान्धार (भो) देशविशेष गुणवती (व्य) आयिका ६.१३ गुणवन (पा) जो अणुब्रतोंका गान्धार-अदितिदेवीके द्वारा उपकार करे इसके दिम्वत, विद्याओंका एक निकाय देशवत और अनर्थ दण्डके २२०५७ भेदसे ३ भेद है २।१३४ गान्धार विद्याधर - विद्याघरोको गुणस्थान (पा) मोह और योग- एक जाति २६७ के निमित्तमे होने वाला गान्धारी (व्य) इन्द्रगिरि और आत्माका क्रमिक विकास मेरमतोत्री पुत्री कृष्णको एक ३१७९ पट्टरानी ४४४४६ गुप्ताला (व्य) ऋपमदेवका गान्धारी-एक विद्या २२१६५ गणधर १२०६४ गान्धारी-मध्यम प्रामकेबाधित गुप्ति (पा) योगोंका निग्रह करना जाति १९१७६ १ मनोगुप्ति, २ वाप्ति, गान्धारातीरयामध्यम ग्राम ३ वायाप्ति ये तीन गुप्तियां के आथित जाति १९।१७६ है । २।१२७ गन्धिका (भी) पश्चिम विदेडया गुरपांच परमेष्टी १९२८ एकदेश ५।२५१ गुरु-पिता २११२२ गन्धिका (भी) पातको खण्डके गुरु वृहस्पति, परमें आचार्य पूर्व से पश्चिम विदेशका एकदेश २७११११ गुरु-पितापना २०१५ गृहाग एक कल्पवृक्ष ७८० गृहीना गृहीतत्वरिकागमन (पा) ब्रह्मचर्याणुव्रतका अतिचार ५८.१७४ गोकुल (भी) मयुरासे कुछ दूरी- पर स्थित एक प्रदेश ३९१ गौतम (व्य) लवणसमुद्र के अन्त- गत गोतम द्वीपका अधिष्ठाता देव ५१४७० गोतम (भी) लवणसमुद्र के मध्य- में स्थित एक द्वीप ५१४७० गोतम (व्य) सोबर्मेन्द्र का आना- कारो एक देव ४११७ गोत्र (पा) उच्च नीच व्यवहार का कारण ५८।२१८ गोमुख (य) चारुदत्तका मित्र २१.१३ ६ गोमद (भी) रत्नप्रभाकै स्वर- भागा छठा भेद ४१५३ गोवर्धन (य) एक श्रुतके वली भाचार्य १०६१ गोविन्द (व्य) श्रीकृष्ण ४४।५१ गौतम (य) मगवान महावीर- के प्रथम गणघर २२८९ गौतम (व्य) कृष्णका पुत्र ४८७० गौतम (व्य) एक राजा ५०।१३१ गोनम (य) कापिष्ठलायन और अनुमनिका पुत्र १८१०४ मातम (न्य) ममुद्रविजयका पुत्र ४८४ गौतम (व्य) गौतम नामका देव गौतम (व्य) वसुदेवने मुप्रोव गन्धर्वाचार्यको अपना कृत्रिम गोर बनाया गौसम' गौरमुण्ड (व्य) अमितगति विद्या- घरका मित्र २०२३ गौरिक (भौ) वि० उ० नगरी २२१८८ गौरिक = अदिति देवीके द्वारा दत विद्याओका एक निकाय २२।५७ गौरिक विद्याधर विद्याधरोंको एक जाति २६१६ गौरिकूट (भी) वि० द० नगरी २२।९७ गौरी (व्य) वीतभय नगरके राजा मेरु और चन्द्रमतीकी पुत्री कृष्णकी पट्टराशी ४४।१४ गौरी- एक विद्या २७११३१ गौरी- एक विद्या २२१६२ ग्राहवती (भौ) विदेह क्षेत्रको विभङ्गा नदी ५।२३९ ग्राम= समूह २०५७ प्राम (पा) बाड़ीसे घिरा छोटा गाँव २।३ प्राम- शारीर स्वरका भेद १९११४८ ग्राम-वैण स्वरका एक भेद १९६१४७ प्रैवेयक = हार ११११३ प्रैवेयक (भी) सोलह स्वोंके ऊपर स्थित नौ पटल ३११५० ग्रेवेयक स्तूप (पा) समवसरणके स्तूप ५७।१०० [घ] कोसके झांश मजीरा आदि १९११४२ धनवात (पा) एक वातवलय ४॥३३ घनोदधि (पा) एक वातवलय ४।३३ धर्मा (भी) रत्नप्रभाका रूदि नाम ४४६ हरिवंशपुराणे धर्मा (भौ) रत्नप्रभा पृथिवी चक्रेश (वि) चक्ररलके स्वामी ४।२१८ चक्रवर्ती ११८ घाट (भी) शर्कराप्रभा पृथिवीके चक्षुप्मान् (व्य) मानुषोत्तर पर्वत- मञ्चम प्रस्तारका इन्द्रक- का रक्षक देव ५१६३९ । विल ४१०९ चक्षुप्मान (व्य) आठवां कुलकर घातिसझातं (पा) ज्ञानावरण, ७/१५७ दर्शनावरण, मोहनीय और चम्चत् (भी) सौधर्म 'युगलका अन्तराय इन चार कोका ग्यारहवा इन्द्रक ६।४५ समूह २०५९ चञ्चला - बिजली १५:१७ घृतवर द्वीप (भौ) छठवां द्वीप चण्डरोचिप - सूर्य ३॥३४ ५।६१५ चण्डवाण (व्य) एक व्याध घृतवर समुद्र (भौ) छठवां समुद्र ६०११११ ५।६१५ चण्डवेग (व्य) विद्युद्वैगका पुत्र घोष (पा) अहीरोको वसति २५१४० २।३ चण्डवेगा (भी) वरुण पर्वतके [] समीप पञ्च नदोके समागम- की चक्र (भौ) सानत्कुमार युगलका एक नन्दी २७११४ सातवा इन्द्रक ६।४८ चतुरङ्गा (बि) हाथी, घोडा, रथ, चक्रपाणि पैदल सिपाही इन चार अङ्गों- -कृष्ण ३५१३९ चक्रपाणिजिनार-चक्रवर्ती और से सहित, सेना २०७१ चतुर्थक = एक उपवास ३४६१२५ चतुर्थ काल (पा) सुषमा काल रहवें अरनाथ जिनेन्द्र १।२६ चतुर्दश पूर्विन् = उत्पाद पूर्व आदि चक्रपुर (भौ) एक नगर २७१८९ १४ पूर्वोके ज्ञाता १५८ चक्रवर्तिन् (वि) छठखण्ड चतुर्मुख (व्य) सातवां नारद पृथिवीके स्वामी १।१९ ६०१५४८ चक्रवाल (भौ) वि० ६० नगरी चतुर्विशतिस्तव (पा) अङ्गबाह्य २२।९३ चक्रव्यूह (पा) सेनाके निवेशका चतुरस्त्र - चौकोन ३१५३ एक प्रकार ५०११०३-१११ चतुरष्टका बत्तीस ५।२४४ चक्रा (भौ) विदेहको एक नगरी चतुरस्रानुयोग (पा) १ प्रथमा- ५।२६३ नुयोग, २ करणानुयोग, ३ चक्रायुध (व्य) शान्तिनाथका चरणानुयोग, ४ द्रव्यानुयोग प्रथम गणधर ६०३४८ ५८।४ धक्रायुध (व्य) चक्रपुरके राजा चतुष्क- चौक ५।२६६ अपराजित और सुन्दरीका पुत्र चतुस्त्रिंशद् महाद्भुत = चौतीस २७१९० अतिशय १० जन्मके १० धको श्रीकृष्ण नारायण केवलज्ञानके १४ देवकृत २०६७ तीर्थकर पदके धारक अठा: १४२० ध्रुतका एक भेद २११०२ घन शब्दानुक्रमणिका चन्द्रमति (व्य) मेरुचन्द्रको स्त्री ६०११०३ चन्द्रमाल (भी) पश्चिम विदेह- का वक्षार गिरि ५।२३२ चन्द्रयश (व्य) एक राजा ५०११२८ चन्द्रस्थ (व्य) रत्नचिह्नका पुत्र १३३२१ चन्द्रवती (व्य) वीतभय नगरके राजा मेरुको स्त्री ४४॥३३ चन्द्रवर्मा (व्य) कृष्णका पुत्र ४८७१ चन्द्रवर्मा (व्य) एक राजा ५०११३२ चन्द्रानन्द (व्य) एक राजा ५०११२५ चन्दाभ (भौ) रत्नप्रभाके खर भागका चौदहवां पटल , चन्दनपुर (भी) एक नगर ६०८१ चन्दनवन (भी) एक नगर २९।२४ चन्दना (व्य) राजा चेटकको কৎসা বাও चन्द्र (भौ) रुचिकगिरिका दक्षिण दिशासम्बन्धी कूट ५१७१० चन्द्र (व्य) आगामी बलभद्र ६०१५६८ चन्द्र (व्य) चन्द्र नामक देव ६०११०८ चन्द्र (भी) नील पर्वतसे साढे पांच-सो दूर, नदोके मध्यमे स्थित एक हद ५११९४ चन्द्र (य) अभिचन्द्रका पुत्र ४८1५२ चन्द्र (व्य) राजा उग्रसेनका पुत्र ४८।३९ चन्द्र (भौ) सौधर्म युगलका तीसरा इन्द्रक ६४४ चन्द्रकान्त (व्य) वसुदेव और सोमदत्तको पुत्रीका पुत्र ४८४६० चन्द्रकान्ता (य) शूरसेनकी स्त्री ३३१९९ चन्द्रचूड (य) ऋषभदेवका गणधर १२॥६७ चन्द्रधर (व्य) आगामो बल ६०.५६८ चन्द्रदेव (व्य) जरासघका पुत्र ५२२४० चन्द्रपर्वत (भी) वि० ८० नगरी २२१९७ चन्द्रप्राप्ति (पा) परिकर्म श्रुतका एक भेद १०६२ पन्द्रप्रम (व्य) अष्टम तीर्य कर १1१० पन्द्रप्रभा (व्य) चन्द्रको स्त्री ६०1१०८ चम्पकवन (भौ) विजयदेवके नगर- से २५ योजन दूर पश्चिममें स्थित एक वन ५।४२२ चम्पा (भौ) अङ्गदेशको राजधानी चम्पापुरी वर्तमान नाम नाथ- नगर (भागलपुर) ११८१ चम्पा (भी) घानक खण्डके भरत क्षेत्रकी एक नगरी ५४.५६ चम्पा (भी) वि० १० नगरी २२।८८ चर्चिका (पा) चौरासी लाख हस्त प्रहेलिकाओको एक चचिका होती है ७१३० चरम (व्य) पुलोमका पुत्र १७१२५ चर्या (व्य) राजा प्रचण्डवाहनको पुत्री ४५।९८ चाणूर (व्य) कसका एक मल्ल ३६.४० चान्द्रायणविधि : | = व्रतविशेष ३४॥९० चाप (पा) धनुप (चार हाप) ४/३४२ चार = गुप्तचर ५०।११ चारण (भी) मेरुके नन्दनवनवी दक्षिण दिशामें स्थित एक भवन ५।३१५ चारित्र (पा) सामायिक, छैदो- पस्यापन, परिहार विशुद्धि, मूक्ष्म साम्राय और यथा- रूपान-ये चारित्रके पांच भेद है ।१२९ चारित्र माह (पा) मोहनीय कर्म. का एक भेद ३१४५ चारिन शुद्धि प्रतविशेष (अहिंमामहायत) ३४।१०० चार (व्य) पुरवंगी एक राजा ४॥५४ चन्द्राम (व्य) अभिचन्द्रका पुत्र ४८.५२ चन्द्राम (व्य) ग्यारहवां कुलकर चन्द्राम (व्य) एक विद्याधर २७११२० चन्द्राम (भी) ब्रह्मस्वर्गका एक विमान २७।११७ चन्द्रामा (व्य) वटपुरके वीरमेन राजाकी स्त्री ४३।१६५ चपल गति (व्य) मूर्याभ और धारिणीका पुत्र ३४।१७ घमर (व्य) सुमतिनाया गणधर ६०१३४७ चमर चम्पा (भी) वि०३० नगरी २२।८५ चम्पक (य) कंसका एक हापो ३६१३३ चम्पकपुर (भी) चम्पक देवना निवास स्थान ५.४२८ पारकृष्ण (व्य) वृष्णा पुत्र ४८१ हरिवंशपुराणे चारकृष्ण (व्य) एक राजा ५०८३ चित्र (व्य) कुरुवंशका एक राजा चारुचन्द्र (व्य) चन्दनवनके राजा ४५।२७ अमोघदर्शनके चारुमति स्त्रीसे चित्रक (भौ) मेरुके नन्दनवनको उत्पन्न पुत्र २९।२५ उत्तर दिशामें स्थित एक भवन धारुदत्त (व्य) शंभवनाथके प्रथम ५।३१५ गणधर ६०1३४६ चित्रक (व्य) समुद्रविजयका पुत्र पारुदत्त (व्य) बलदेवका पुत्र ४८।४४ ४८.६६ चित्रकारपुर (भौ) भरतक्षेत्रका चारुदत्त (व्य) चम्पानगरीका एक नगर २७१९७ प्रसिद्ध सेठ १९५१२२ चित्रकूट (भी) पूर्व विदेहका चारुदत्त (व्य) श्रीकृष्णका हितैषी वक्षारगिरि ५।२२८ एक राजा ५०७२ चित्रकेतु (व्य) जरासंधका पुत्र चारुपम (व्य) कुरुवंशी एक राजा ५२।३० । ४५।२३ चित्रगुप्त (व्य) आगामी तीर्थकर चारुमति (व्य) चन्दनवन नगर- ६०१५६० । के राजा अमोघ दर्शनकी स्त्री चित्राङ्गद (य) चित्रचूल और २९/२५ मनोहरीका पुत्र सुभानुका चाररूप (व्य) कुरुवंशी एक राजा ४५.२३ जीवा ३३३१३२ चारुलक्ष्मी (व्य) मेघ सेठ और चित्राङ्गद (व्य) जरासंधका पुत्र अलका सेठानीको पुत्री४६।१५ ५२।३३ चारुहामिनी (व्य) भद्रिलपुरक चिनचूल (व्य) नित्यालोकनगर- राजा पोण्डकी पुत्री जिसे का राजा ३३११३२ वसुदेवने वरा २४१३१ चित्रबुद्धि (व्य) प्रीतिभद्रका मन्त्री घारहासिनी (व्य) वसुदेवकी स्त्री २७.९८ १९८४ चित्रमाला (व्य) चक्रायुधको स्त्री चालन एक दिव्य औषधि २७१९० २११८ चित्रमाली (व्य) जरासका पुत्र चितवेग (व्य) स्वर्णाभपुरका ५२।३१ राजा विद्याधर २४॥६९ चित्ररथ (व्य) कुरुवसका एक चिसन्द्रिय निरोध (पा) मुनियों राजा ४५०२८ का एक मूल गुण चित्ररथ (व्य) गिरिलगरका राजा पाँच इन्द्रियों तथा मनको ३३११५० वसवरना ।१२८ चिग्रलेखिका (य) वाण विद्या- चिन्तागति (व्य) मूर्याभ और घरको पुत्री उपाको सखी धारिणीका पुत्र ३४॥१७ ५५।२४ चिन (भौ) नील कुलाचलकी चित्रयमु (व्य) राजा वमुका पत्र दक्षिण दिया और सौनानदी १७७५८ २ पूर्व तटपर स्थित एक चिमाइन (य) आगामी चक्र ६०१५६५ चित्रसमालमन = अनेक प्रकारके विलेपन ५५१५४ चित्रा (व्य) रुचिकगिरिक विमल कूटपर रहनेवालो देवी ५७१९ चिन्ना (व्य) रुचिकगिरिक सुप्रतिष्ट कूटपर रहनेवाली देवी ५७१० चित्रा (भी) मेरु पर्वतसे एक हजार योजन विद्यमान चित्रा नामकी पृथिवी ४१२ चित्रा (भौ) रत्नप्रभाके खर भाग- का पहला पटल ४:५२ धूडामणि (व्य) विनमिका पुत्र २२११०५ धूडामणि (भौ) वि० उ० नगरी २२।९१ चूतपुर (पाम्रपुर) (भौ) आम्र. देवका निवास स्थान ५।४२८ चूतवन (ग्राम्रवन) (भौ) विजय- देवके नगरसे २५ योजन दूर उत्तरमै स्थित एक बन ५।४२२ चूलिक (व्य) धूलिका नगरीका राजा ४६२६ चूलिका (पा) दृष्टिवाद अङ्गका एक भेद १०६१ चूलिका (पा) अङ्गप्रविष्ट धतका एक भेद २०१०० चूलिका (भी) एक नगरी ४६१२६ चेटक (व्य) वंशालीका राजा राजा सिद्धार्थका श्वसुर २०१७ पंदिराष्ट्र (भी) अभिचन्द्र के द्वारा विन्ध्यपष्टपर वसाया देश १७४३६ धेश्यालय '-जिन मन्दिर ४०६१ चोदना घाश्य- • 'अजयष्टव्यम्' इम वंदवाययमे १७११२५ जयन्त (भी) वि० उ० नगरी २२१८७ जयन्त (भी) भरतक्षेत्रका एक नगर ६०.११७ उपन्त (भी) अनुत्तर विमान भेद ६४।१६ शब्दानुक्रमणिका [छ] जम्बुद्वीप (भी) आधद्वीप- छायाकामिपी-एक विद्या २२१ २२।६३ जम्बूद्वीर (भी) अमंलात द्वीप छिन्न (पा) अष्टाङ्ग निमित्त शान- समुद्रोंको सल्लंघन करने के बा एक अद्ग १०१११७ बाद स्थित दोपविगेप টর () অগি ५।१६६ अतिचार ५८।१६४ जम्यूपुर (भी) वि० ८० का एक वेदन = विद्यास्त्र २५।४१ नगर४४४ देवोपस्थापना (पा) चारित्रका एक जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति (पा) परिकर्म थुङका एक भेद ११६२ [स] अम्यूशहपुर (मो) वि०६० नगरी २२११०० जगत् (भी) मौषमं युगलका उनतीया इन्द्रक ६४० जम्यूस्थल (भौ) मेरपर्वतका जगी (भी) जम्बूढोरको चारो ऐमान दिलामें सीता नदीके ओरमे घेरे हुए श्यमयी पूर्वतटपर नोलकुलाचलका निकटवर्ती प्रदेश जहाँ जगकुमुम (भो) रुचिकागरिका जामुनका वृक्ष है ५।१७२ पश्चिम दिशासम्बन्धो बूट जय (व्य)दरा पूर्वक साता एक आचार्य १६२ ५०१२ जगरम्पामा (व्य) मपिटरा पुत्र जय (व्य) नमिरा पुत्र २२।१०८ जयकुमार (व्य) हस्तिनापुरके লবার () বি राजा गोमत्रमरा पुत्र दूसरा गम्यग्दष्टि ७।१०९ नाम मंपस्वर ४३८ अपन्य घातकुम्मयिधिएक जय (व्य) वसुदेवसा पुत्र प्रक्रि३४.८७ अपम्यसिंह निष्कातिए जप (व्य) मागामा तोर सपनामवत३४।८ जननामिष = जन्माभिक जय (व्य) एमाण पत्र ८२३७ १०२८० समान माप (पा)मा जय (स्य) मनग्नतापरा पम पापर.३४८ जानि (य) जापानी सोदार समारंग प्य) धीर अगमा (य)शामापाता उपदेव (व्य) जयन्त (मी) जम्बूदोपको जगती का पश्चिम द्वार ५१३९० जयलगिरि (भौ) एक पर्वत ४४३ अयम्नी-एक विदा २०७० जयन्ती (भी) परमके द्वारा धमाया हुआ एम. नगर १७१२७ जयन्ती (मौ) नन्दीश्वर द्वीपर दक्षिणसम्बन्धी पञ्जनगिरि दीपश्चिम दिशाम स्पिन वापिका ५१६६० जयन्ती (व्य) पिकगिरिक सर्व. रस्न यूटपर रहनेवाली देयो ५७२६ अपन्ती (व्य) रुचिमगिरिफे बना मित्ति ५।३७० फूटपर एनेगलो यो पोरेगे एप गाय उपरती (भी) विदेहमी एक मगरी ५।२६३ जपपुर (भी) एक मगर नही नमुरेव गये २४॥ अपरार (ख्य) पुसा एक गजा४५.५ अपमेन (स्य) गरिसरा १४८४३ जणएnिer-21. नपा (1) गरजती र बानिस ५ सस () माती भूमि नपापा (भी) ... को २३८८ उमावि (स्य) पदराती उपाय (न्य) मनोरा नगर रा" अपन (पा) नागा पिहर गर (ग) माया Mut.

१०४ हरिवंशपुराणे जयोत्तरा (पा) समवसरणके सप्त. पर्ण वनको वापिका ५७.३३ जरत्कुमार (व्य) श्रीकृष्णके मरण- मे कारण प्रवामी यादव १११२० जरकुमार (व्य) श्रीकृष्णका एक भाई ५२११६ मररकुमार (व्य) वसुदेव और जराका पुत्र ४८।६३ जरा (व्य) म्लेच्छ राजाको कन्या, जिसे वसुदेवने वरा ३१६ जरासन्ध (व्य) बृहद्रथका पुत्र, राजगृहीका राजा (नौवा प्रतिनारायण) १८।२२ जरासुन (व्य), जरत्कुमार जलकेतु (व्य) जरासघका पुत्र ५२।३० जलगना (पा) दृष्टिवाद अङ्गके चूलिकाभेदका उपभेद १०११२३ जलगनि दक्षिणा = एक विद्या २२१६८ जलधि (व्य) समुद्रविजयके भाई अक्षोभ्यका पुत्र ४८१४५ जलप्रम विमान (भी) वरूण लोपालपाविमान ५१३२६ अलावतं (भी) वि० ८० नगरी २२१९५ जातरूप - मुवर्ण ६०२ जातिशारीरस्वरवा एक भेद १२।१४८ জানি = पनपन गान्धी विधि १९४१४९ जानुनम्न = पुटना प्रमाण जाम्बर (व्य) वि० द० के जम्बू जिनदत्ता (व्य)ज. वि० सुपमा. पुर नगरका राजा ४४।४ देशके सिंहपुर नगरके राजा जाम्बवनी (व्य) जम्बूपुरके राजा अर्हद्दासकी स्त्री ३४॥४ जाम्बद और रानी शिव जिनदास (व्य) धनदत्त और चन्द्राको पुत्रो कृष्णकी एक नन्दयशाका पुत्र १८६११४ पट्टराज्ञो ४४.५ जिनपाल (व्य) घनदत्त और जारसय (व्य) जरत्कुमार ६३।५३ नन्दयशाका पुत्र १८।११४ जितपद्मप्रमा (वि) कमलको जिनसेन (व्य) पाश्र्वाभ्युदय आदि कान्तिको जीतनेवाली के रचयिता जिनसेनाचार्य १६४० १८ जितशत्रु (व्य) एक राजा, राजा जिनेन्द्र (व्य) तीर्थकर १६ सिद्धार्थकी छोटी बहिनका जिनेश्वर (व्य) आगामी तीर्थकर पति ६६।६ ६०.५६० जितशत्रु (व्य) थावस्तीका एक जित (भौ) शर्करानभा पृथिवीके इक्ष्वाकुवंशीय प्राचीन राजा सप्तम प्रस्तारका इन्द्रक विल ४।१११ २८.१७ जिह्नक (भी) शर्करा पृथिवीके जितशत्रु (व्य) देवकोका पत्र अष्टम प्रस्तारका इन्द्रक विल ३३११७० ४।११२ जितशत्रु (व्य) जरासघका पुत्र जिविका (भौ) हिमवत् पर्वतके ५२।३४ दक्षिण तटपर स्थित एक जितशत्रु (व्य) हरिवंशका एक प्रणाली ५।१४० राजा १११२४ जितशत्रु (व्य) एक राजा जीवधराम (व्य) जरासन्धको पुत्री, जो कसको विवाही गयी ३१९८७ ३३१७ जितशत्रु (व्य) कलिङ्गदेशाके जीवद्रव्य (पा) चैतन्य लक्षण काचनपुर नगरका राजा युक्त जीव २१०७ २४/११ जिन = कर्मरूप शत्रुओको जोतने. जीवपिचय (पा) धम्य॑ध्याना भेद ५६४३ जीवसिद्धि (व्य) समन्तभद्राचार्य के जिनगुण सम्पत्ति = व्रतविशेष द्वारा रचित जीवमिद्धि ३४११२२ नामक ग्रन्थ और जीवोंकी जिनदत्त (व्य) धनदत्त और मिदि ११२९ नन्दपाया पुत्र १८।११५ जीवस्थान (पा) जोवसमास जिनदत्ता (व्य) एक आपिका २।१०७ ३३१०० जीवाधिकरण (पा) भासमा जिनदत्ता (व्य) एक आपिरा एक भेद जिसके १.८ भेर 10100 होते है ५८1८४ मिनता राजा महासकी जीवितासंमा (पा) सहमेगातारा ती २११२ अनिचार ५८१८४ वाले जिनेन्द्र ११६ भाषण (य) एप विदापर माम्पा (भी) एक मार ०५३ शब्दानुक्रमणिका १०५ जृम्मक (व्य) देवविशेष [2] विल ४|११८ ४२।१७ रकण देश (भी) एक देग तप्तनला (भी) विदेहक्षेत्रको एक जुम्मणः =विद्यास्त्र २५१४८ २११०३ विभगा नदी ५।२४० नम्मिक ग्राम (भौ) विहार प्रान्न- तप.गुद्धि = %3D एक प्राविशेष [त] का एक गांव २।५७ ३४।९९ जैत्री (पा) समवसरणके सप्तपर्ण तटिरप्रम (भी) निषध पर्वतम तमा (भी) पद्धप्रभा पृथिवीके वनकी वापिका ५७१३३ उत्तरकी ओर नदीके मध्य में पञ्चम प्रस्तारका इन्द्राविल स्थित एक हद ५११९६ जैन (पा) जिनेन्द्रदेवके द्वारा ४।१३३ तत-तारसे बजनेवाले बाजे प्रणीत ११ नमस् (भी) धूमप्रभा पथिवीके १९६१४२ मातृधर्मकथाङ्ग (पा) द्वादशाह प्रथम प्रस्तारका इन्द्रकविल तद्धित-पदगत गन्धर्वकी विधि ४११३८ का एक भेद २।९३ १९।१४९ तमःप्रभा (भी) नरकोनी छठी जानप्रवाद (पा) पूर्वगत श्रुतका तनयसोम (व्य) ननिका पुत्र भूमि ४४४४ एक भेद २।९८ २२।१०७ नमस्तम (भी) मातवां नरक झानावरण (पा) ज्ञानगुणको सनुवात (पा)) लोकको चारो २।१३६ घातनवाला कर्म ५८।२१५ ओरसे घेरनेवाला तीसरा तमिस्र (भी) धूमप्रभा पृथिवीके ज्योनिक= मूर्य चन्द्रमा आदि वायुमण्डल (वातवलय) पञ्चम प्रस्तारका इन्द्रकविः ज्योतिषी देव ३३१३५ ४।१४२ ज्योतिरङ्ग =एक कल्पवृक्ष ७८० तप (पा) अनशनादि छह बाह्य तमित्र गुहा (भी) विजयापी ज्योतिदेव - ज्योतिष्क देव मूर्य और प्रायश्चित्त आदि छह गुहा १९१२१ चन्द्रमा आदि २१७९ अन्तरङ्गके भेदमे बारह तमोऽन्तक (व्य) चाग्दत्तवामिय ज्येष्ट (पा) स्फटिक सालका प्रकारका तप २।१२९ २१०१३ दक्षिण गोपुर ५७०५८ तपन (भौ) वालुकाप्रभा पृथिवी- तरङ्गिणी (भी) एक नदी ४६१४९ ज्योतिर्माला (व्य) एक विद्याधरी के तृतीय प्रस्तारका इन्द्रक ताश्य कनु (व्य) पृष्य ५११९ ६०१८ विल ४१२० নাথ (বা) সমাপনী चलन (व्य) वमुदेवको स्यामा तपन (व्य) तेजम्बीरा पुत्र १३॥९ आगव ५८।९३ नामक स्त्रीसे उत्पन्न पुत्र सपनकूट (भी) विद्युत्तमानमा तापन (भी) वालुवाप्रमा पृथियोय ४८.५४ एक कूट ५।२२२ चतुर्य प्रग्नाग्या इन्द्राविल मलनवेग (व्य) अधिर्मालो और तपित (भी) बालुकाप्रमा पृथिवी ४।१२१ के.द्वितीय प्रस्तावा इन्द्रक नापस (भी) देगका नाम विट४।११९ १९८१ ११।७२ गलनमा (व्य) दिव्य नागान्या सपनीयक (मी) मानुपौत्तरको नामिन् (वि)र AT २९/२० आग्नेय दिशारा कूट ५५६०६ गरिनवेगा (य) विजय नामक तपनीयक (भी) गोधर्म युगला गामियगुहरु (भी) विजयादा पन्नरसी स्त्री ६०६० उनीरावा इन्टक ४६ माटो पुट ५२७ तपनीयक कट (भी) मानगोत्तर सामिपगुष्ट (भी) ऐगा [2] पवंतसाम्नेय दिशामा एक विजयानगरापर: m (भी) गमप्रभा दिशेके तृतीय নাতি सप्त (भी) बानुगामा पितो गानिस (मी)गानगर ४१४० के प्रथम प्रसारका इन्दर प्रभावतारापुत्र .

हरिवंशपुराणे ताम्नलिप्ति (भी) एलेयके द्वारा तुट्याङ्ग (पा) चौरासो लाख त्रिपुर (भौ) देशविशेष ११३७३ अङ्गदेशमें बसाया हुआ एक कमलोका एक तुटयाग निष्ठ (व्य) आगामी नारायण २८ ६०१५६७ नगर १७२० तुलिङ्ग (भौ) देशका नाम विलक्षण (वि) उत्पाद, व्यय, तार (भौ) पङ्कप्रमापृथिवीके ध्रौव्य रूप तीन लक्षणोंसे द्वितीय प्रस्तारका इन्द्रक विल नुपित (व्य) लोकान्तिक देवका सहित २।१०८ ४।१३० एक भेद ५५।१०१ सारा (व्य) राजा कार्तवीर्यको त्रिलोकसार विधि - एक उपवास तूर्याङ्ग गर्भवती स्त्री २५।११ '= एक कल्पवृक्ष ७८० ग्रत ६४।५९-६१ तारक (व्य) दूसरा प्रतिनारायण तृणबिन्दु (व्य) चन्द्रवंशी एक त्रिवर्ग-धर्म, अर्थ, काम राजा २३१४७ २१।१८५ ६०१२११ तृतीय काल (पा) सुषमादु.पमा त्रिविष्टपपुर - स्वर्गपुरी ५।२३ सार्ण (भौ) देशविशेष ३६६ काल ११२६ तिर्यग्लोक (भी) मध्यलोक ५।१ त्रिशृङ्ग (भौं) एक नगर ४५१९५ तोक-पुत्र २७।११९ तिर्यग्न्यतिक्रम (पा) दिग्नतका त्रिशिरम् (व्य) कुण्डलगिरिक वय. तोमर (व्य) एक राजा ५०११३० अतिचार ५८४१७७ कूटपर रहनेवाला देव ५।६९० तिरस्करिणी तोयधारा (व्य) नन्दनवनमें रहने- 3एक विद्या २२०६३ त्रिशिरस (व्य) रुचिकगिरिक वाली दिक्कुमारी ५.३३३ तिलका (व्य) भानुकीतिको स्त्री स्वयमभ कूटपर रहनेवाली भ्रसरेणु (पा) आठ त्रुटिरेणुओका देवी ५७२० ३३४९९ एक सरेणु होता है ७३८ तिलकानन्द (व्य) एक मुनि त्रिशिखर (व्य) नभस्तिलक नगर- त्रमित (भौ) रत्नप्रभा पृथिवीके का राजा २५४१ ५०१५९ दशवें प्रस्तारका इन्द्रक विल निलवस्तुक (भी) एक नगर, त्रिशिरस (व्य) जरासंघका पुत्र ५२१३७ जहाँ वसुदेव पहुंचे २४।२ अस्त (भी) रत्नप्रभा पृथिवोके तीर्थ (पा) धर्मको आम्नाय ११४ विपष्टि पुरुष (पा) शठ शलाका नौवें प्रस्तारका इन्द्रक विल तीर्थकर (पा) धर्मको आम्नाय चलानेवाला, ये २४ होते हैं अटिरेणु (पा) आठ संज्ञा संज्ञाओं. यण, ९ बलभद्र ११११७ २११४६ का एक त्रुटिरेणु होता है कान्ति ११११ तीर्थकृत् (पा) तीर्थकर ११८ ७३८ [द] तोर्णकर्ण (भी) देशका नाम विष्ट (भौ) पूर्व विदेहका वक्षार १११६७ गिरि ५।२२९ दक्ष चतुर १७०२ तंज सेन (व्य) समुद्रविजयका विगत (भौ) देशविशेष ३।३ दक्ष (य) सुग्रतका पुत्र १७२ पुत्र ४८४ शिगिन्छ (भी) निषध कुलाचल. दक्षप्रजापति (व्य) राजा दश ११७८ तेजस्वी (व्य) प्रभूत तेजका पुत्र का हद ५११२१ दक्षिणनिपुण ३।१९३ विगुप्ति, श्रिममितिमत =त. उदार तेजस्वी (ख्य) भगवान् ऋषभदेव. विशेष ३४।१०६ ५४॥३८ पागणधर १२०५८ ग्रिदा देव १८।१२ तेजोराशि (ख्य) ऋषभदेवरा दक्षिणधेणी (भी) विजया पर्वत बिदिव = स्वर्ग २१३१६३ को दक्षिण दिशानी मार मगधर १२२६६ निषद (व्य) एक ढीमर ६.३३ निमपर ५. नगर स्थित है गिरि (भो) मागोमुंगो नाम प्रिपर्वा एक विद्या २२१६७ ५.२३ पर्व ६३०२ দ্বিানি। -एक विश २०१८ तुम (पा) पोरामो लाम तुटपा. विराट (स्य) पहला नारायण दक्षिगास्ट (भी) ऐरावतरे दि. जयाधका माटो र नाएर नुरप २८ ૧૦૨૮૮ Is ४७७ पुरुप,२४ तीर्थकर, १२ चक्र- वर्ती, ९ नारायण, ९प्रतिनारा- विप दक्षिण प्रकृतिवाला १०७ 9 - एक राजा दक्षिणादकट (भी) विजया- का दूसरा कूट ५।२६ दण्ड (पा) लोकपूरण समुद्रात- का प्रथम चरण ५६७४ दण्ड (पा) दो विप्कुओका एक दण्ड ७१४६ दण्डभूतसहस्रक= एक विद्या २२१६५ दण्डाध्यक्षगण = एक विद्या २२०६५ दत्त (व्य) सातवां नारायण ६०.२८९ दत्तक (व्य) चन्द्रप्रभका प्रथम गणधर ६०1३४७ दत्तवती (व्य) एक आयिका २७१५६ दत्तवस्य (व्य) एक राजा ३१४९६ दत्तमलमार्जनवर्जन (पा) मुनि. योका एक मूलगुण-दातोन नहीं करना २।१२९ दधिमुख (व्य) इस नामका विद्याधर २४१८४ दभिमुख (व्य) एक विद्याधर जो रोहिणीके स्वयंवरके समय होनेवाले युद्ध में वसुदेवका सारथि था ३१११०३ दधिमुस (भी) नन्दीश्वर द्वीपको वापिकाओम स्थित पर्वत ५।६६९ दभ्रगवाक्ष-झरोखा ५।२६५ दमवर (व्य) एक मुनि ३४।३२ दमरक (व्य) वमुदेवके भवान्तर- से सम्बन्ध रखनेवाला एक पुरुप १८1१३१ दमघोषज शिशुपाल ४२।९३ दर्शन -नेत्र ८।२३ दर्शनक्रिया (पा) एक क्रिया ५८६९ शब्दानुक्रमणिका दर्शनावरण (पा) दर्शनको ढकने- वाला कम ५८।२१५ दर्शनविशुद्धि भावना ३४।१३२ दर्शनशुद्धि - व्रतविशेष ३४.९८ दशापत्रिका - एक विद्या २०६७ दशविन् दशपूर्वके ज्ञाता ११५८ दशम-चार उपवास ३४।१२५ दशरथ (य) बलदेवका पुत्र ४८।६७ दशरथ (व्य) ५०११२५ दशवकालिक (पा) अंग बाह्य श्रुतका एक भेद २११०३ दशार्णक (भी) देशका नाम १११७३ दशाई = यादव ४११४९ दशाह = योग्य अथवा पूज्य १८।१४ दशाह (व्य) राजाविशेष ५०१६८ दशेरुक (भी) देशका नाम ११।६७ दासीदास प्रमाणातिक्रम (पा) परिग्रह परिमाणाणुयतका अभिचार ५८1१७६ दान (पा) सातावेदनीयका आस्रव ५८.९४ दाडीक (भौ) देशका नाम १११७० द्वारवती (भी) सौराष्ट्र देशमै स्थित नगरी ११७२ दारु (व्य) वसुदेवको स्त्री पना- वतीका पुत्र ४८।५६ दारुक (व्य) वसुदेवकी स्त्री पद्मावतीका पुत्र ४८५६ दारण (व्य) एक भील २७११०७ दिक्कुमार= भवनवासी देवांका एक भेद ४१६४ दिग्गजेन्द्र (व्य) देवाको एक जाति ५२०९ दिग्नन्दन (भी) रुचिकगिरिका एक कूट ५७०६ दिति (व्य) धरणेन्द्रको देवी २२।५४ दिति (व्य) धारणयुग्म नगरके राजा अयोधनको स्त्री २३१४७ दिग्यचक्षु = अवधिज्ञानी ४२०५० दिव्यध्वनि (पा) भगवान्को निरक्षरी वाणो ३११८१ दिव्यपुर (पा) समवसरणका एक भाग जिसके त्रिलोकसार आदि सौ नाम है ५७।११२ दिग्यलक्षण पंक्निविधि प्रतविशेष ३४।१२३ दिन्यवाद (व्य) आगामी तीर्थ- कर ६०१५६२ दिव्यौपध (भी) वि०८० नगरी २२।९९ दिशानन्दा (व्य) वैदिशपुरके राजा वृपध्वजको पुत्री ४५।१०९ दिशावली (व्य) वदिशपुरके राजा वृषध्वजको स्त्री ४५.१०८ दीपन (व्य) सुखरथका पुत्र १८/१९ दीर्घदन्त (व्य) आगामी चक्र ६०१५६३ दीर्घबाहु (व्य) सुबाहुका पुत्र १८२ दीर्घहस्थ (पा) आग्रायणीपूर्वक चतुर्थ प्राभूतका योगद्वार १०१८४ दुःख (पा) असातावदनीयका आस्रव ५८।९३ दुःख (भी) तीसरी पृथिवीके प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी तप्त नामक इन्द्रकी पूर्वदिशामें स्थित महानरक ४११५४ हरिवंशपुराणे दु.सहरण विधि - व्रतविशेष दृढनेमि (व्य) समुद्रविजयका देवकुरु (भौ) निपघ पर्वतसे ३४।११७ पुत्र ४८०४३ उत्तरकी ओर नदीके मध्यम दुग्धवारिधि (भौ) अरिसमुद्र दृढबन्ध (व्य) एक राजा ५०।१२६ स्थित एक हद ५.१९६ नामका पांचवां समुद्र नमुष्टि (व्य) राजा वृषभध्वजका देवकुरकूट (भो) सौमनस्य पर्वत- २०५३ योद्धा ३३११०३ का एक कूट ५।२२१ दुन्दुभि = दुन्दुभि नामका वर्ष दृढमुष्टि (व्य) वसुदेव-मदनवेगा- देवकुरुकूट (भी) विद्युत्प्रभ पर्वत- १९॥२२ का पुत्र ५०1११६ दुर्ग (भौ) देशका नाम ११६७१ का एक कूट ५।२२२ दृढवर्मा (व्य) एक राजा ५०।१३२ देवगर्भ (व्य) बिन्दुसारका पुत्र दुर्जय (व्य) जरामधका पुत्र दृढव्रत (व्य) समुद्रविजयके भाई ५२।३७ १८.२० अक्षोभ्यका पुत्र ४८०४५ दुर्दर्श (व्य) पूरणका पुत्र ४८१५१ देवच्छन्द (भौ) अकृत्रिम चैत्या- दृढरथ (व्य) भगवान् ऋषभदेव- दुधर (व्य) जरासंधका पुत्र लयोका गर्भगृह ५।३६० का गणधर १२।५५ ५२।३१ हदरथ (व्य) बृहद्रथका पुत्र देवदत्त (व्य) राजा अमरका पुत्र दुर्धर (व्य) राजा उग्रसेनका पुन १७१३३ १८.१८ ४८।३९ दृढरथ (व्य) नरवरका पुत्र देवदत्त (व्य) अर्जुनके शह्वका दुर्धर (व्य) पूरणका पुत्र ४८०५१ नाम ५१०२० १८.१८ दुभंग = भाग्यहीन १८३१२८ रदरथ (व्य) राजा मेघरथ और देवदत्त (य) जरासधका पुत्र दुर्मुस (व्य) जरासंघका पुत्र सुभद्राका पुत्र १८।११२ ५२१३६ ५२।३७ देवदत्त (व्य) कृष्णका पुत्र दुर्मुग्न (व्य) पूरणका पुत्र ४८१५१ दृढायुध (व्य) वैदिशपुरका ४८.७१ दुर्मुय (व्य) वमुदेव और अवन्ती युवराज ४५।१०७ दृति=मशक ४३।१२२ देवदेव (व्य) आगामी तीर्थकर का पुत्र ४८१६४ ६०१५५९ दुर्मुग (व्य) एक राजा ५०८३ दृष्टियादाङ्ग (पा) द्वादशाङ्गका देवपाल (व्य) देवकीका पुत्र दुर्मुख (व्य) वमुदेवका पुत्र ३३११७० ५०१११५ दृष्टिमोह (पा) सम्यग्दर्शनको दुर्योधन (न्य) कौरवाग्रज हस्ति- घातनवाला दर्शनमोह देवपाल (व्य) धनदत्त और नन्दयशाका पुत्र १८१११४ नापुरका राजा ४३३२० २१११३ दुर्विध = दरिद्र १८११२७ देवमति (व्य) देविलकी स्त्री रष्टिमुष्टि (व्य) वसुदेव और मदनवेगाका पुत्र ४८०६१ ६०.४३ दु.शासन (व्य) एक राजा (कौरव) देवनन्द (व्य) राजा गङ्गदेवका ५०.८४ दृष्टिविय - सर्पविशेष ११३९४ दुःपमा (पा) अवमपिणीका देव (व्य) देवनन्दी, अपर नाम देवनन्द (व्य) बलदेवका पुत्र पांच काल ७५९ पूज्यपाद आचार्य १३१ ४८/६७ दुष्पक्वाहार (पा) भोगोपभोगका देवको (व्य) कमको बहिन जो देवरमण (भौ) मेरुका एक वन अतिवार ५८।१८२ वसुदेवको विवाही गयी ५/३०७ दुप्पूर (व्य) पूरणका पुत्र ४८०५१ ३३१२९ देववर (भौ) अन्तिम सोलह दूपण (पा) ज्ञाना और दर्शना. देवकुरु (भौ) सुमेरु और निषधके द्वीपोमे चौदहवां द्वीप ५१६२५ वरणवा आयव ५८/९२ बीच स्थित प्रदेश, जहाँ देवशर्मा (व्य) भगवान् ऋषभ• दधर्मा (व्य) हृदिता पुत्र भोगभूमिको रचना है देवका गणवर १२०५५ ४८१४२ ५।१६७ देवशर्मा (व्य) एक राजा ५०1८४ एक भेद पुत्र ३३३१६३ शब्दानुक्रमणिका दवसम्मति (भौ) ब्रह्मयुगलका द्रव्यादि (पा) द्रव्य, क्षेत्र, काल, दूसरा इन्द्रक ६१४९ भाव १११ देवसेन (न्य) भोजकवृष्णि और द्रव्यार्थिक नय (पा) सामान्य- पद्मावतीका पुत्र १८।१६ ग्राही नय ५८।४२ देवसेना (व्य) यक्षिलको स्त्री द्रुतम्-शीघ्र ही ५१६४२ दुपद (व्य) माकन्दोका राजा देवस्व = देवद्रव्य १८।१०२ ४५११२१ देवाग्नि (व्य) भगवान् ऋषभदेव- द्रुपद (व्य) एक राजा ५०८१ का गणधर १२०५७ द्रुम (व्य) जरासघका पुत्र देवानन्द (व्य) जरासंघका पुत्र ५२।३० ५२।३५ द्रुमपेक (व्य) एक मुनिराज देवानन्द (व्य) एक राजा ३३३१४९ ५०।१२५ द्रुमसेन (व्य) जरासघका पुत्र देवारण्य (भी) विदेहक्षेत्र स्थित ५२।३० वन ५।२८१ द्रुमसेन (व्य) सिंहलके राजा देवावतार (भी) पूर्वमालव देशमें लक्ष्ण रोमका सेनापति स्थित एक तीर्थ ५०१६० ४४॥२३ देविल (व्य) एक मनुष्य ६०१४३ द्रोण (व्य) द्रोणाचार्य ४५।४१ देविला (व्य) जयदेवकी पत्नी द्रोणाचार्य (व्य) विद्रावणका पुत्र ६०११०९ ४५१४७ देशसभ्य (पा) दस प्रकारक द्रोणामुख (पा) नदोके तटवत्ती सत्यो मे एक सत्य १०।१०५ नगर २१३ देशावधि (पा) अवविज्ञानका एक द्रौपदी (व्य) मापन्दीके राजा भेद १०११५२ द्रुपदकी पुत्री ४५।१२२ देवकय = देवकोका पुत्र थोकृष्ण द्वादश विमाग-समवसरणको ३५१२५ बारह सभाएं २०६६ दो - भुजा ३६।२२ द्विकावलीविधि = एक उपवास. दोपत्रय =राग, द्वेष, मोह विधि ३४।६८ २।८९ द्विपर्वा - एक विद्या २०६७ युति (व्य) सूरदतको स्त्री द्विप (व्य) दूसरा नारायण ६०१२८८ पुमणि = मूर्य ४।६४ दिएष (व्य) आगामी नारायण पुम्नधारा-रलधारा २१४५ ६०१५६७ पोति: (भी) रत्नप्रभाकै सरभाग द्विविधर्मबन्ध = शुभ-प्रगम का आठवा पटल ४४५३ कर्मवन्ध २०१०९ पोनितस्य तथा तस्य ११५३ द्विशतनाव (न्य) वलि प्रति- दम्य (पा) उत्सादम्पय प्रोग्यमे नारायणके वग उत्पन हुआ युक्त अपवा गुण और पर्याय एक राजा २५१३६ में मुक्त जीवादि छह द्रव्य द्वीप (व्य) कुरुवंगरा एक राजा द्वोपकुमार = भवनवासी देवोका एक भेद ४।६३ द्वीपसमुद्र प्रज्ञप्ति (पा) परिकर्म थुतका भेद १०१६२ द्वीपायन (व्य) कुरुवंगका एक राजा ४५.३० द्वीपायनमुनि (व्य) द्वारिकादाहमें कारणभूत एक मुनि १४११८ [ध] धनक्षय (व्य) अर्जुन ५०१९४ धनञ्जय (व्य) मेघपुरका राजा ३३११३५ धनञ्जय (व्य) धरणका पुत्र ४८.५० धनञ्जय (व्य) विनमिका पुत्र २२।१०४ धनञ्जय (भी) वि० उ० नगरी २२।८६ धनञ्जय (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२।३६ धनदेव (व्य) भगवान् ऋपमदेव- का गणधर १२१५६ धनदेव (व्य) इभ्यपुरका सेट ६०१९५ धनद (न्य) कुवेर ५५११ धनदत्त (व्य) एक मेटका नाम १८।११३ धनदेव (व्य) एक वैश्य ४६५० धराधर (भी) वि० ८० नगरी २२।९७ धनपाल (व्य) जरासन्यता पुष ५२।३२ धनपाल (व्य) धनदत्त और नन्द. यशारा पुन १८।११४ धनमिय (य) धनदत्त संटका स्त्री नन्दपशाका पुत्र १८.१२. पनवाहिक (व्य) ऋपमदेवना गणपर १२०६५ हरिपंगपुराणे धनधान्य प्रमाणातिमम (पा) धर्ममार्ग (व्य) गुमर और परिवह परिमाणाणुगता गुमित्रानो पुत्री ६०१०१ अतिचार ५८।१७६ धर्मरचि (व्य) एक मुनि ६४४९ धनश्री (व्य) स्त्रो ६४।६ धमरपि (व्य) धनदत्त और नन्द- धनश्री (व्य) मेघपुरके राजा मसाला पुत्र १८३११५ धनन्जय और रानी सबंधी धर्ममं (पा) एक पारण ऋदि. मी पुत्री ३३।१३५ पारी मुनि ६०१७ धनुष (पा) दो विष्णु-चार हाप धर्मसेन (ज्य) एक मुनि ६०६४ का एक धनुष ७४६ धमंमेन (व्य) दसपूर्य के साता धनुर्धर (व्य) जरासन्धका पुत्र एक याचार्य १०६३ ५२।३० धारण (पा) रपटिर गाला धम्मिल (व्य) श्रीभूति ग्राह्मण- दक्षिण गोपुर ५७१५८ के स्थानपर रखा गया एक धारण (व्य) पुस्यंगका एक ब्राह्मण २७४३ रामा ४५१२९ घर (व्य) एक राजा ५०1८३ धारण (व्य) एक राजा ५०1११८ धर (व्य) राजा उग्रसेनका पुत्र धारण (व्य) अग्याष्णि और ४८।३९ सुभद्रारा पुत्र १८।१३ धरण (व्य) भवनवासियोका इन्द्र धारण (व्य) जरामन्यका पुत्र ९११२९ ५२१३७ धरणीतिलक (भी) वि. द. का धारणयुग्म (भी) भारत वर्ष एकमगर २७७७ मा एक नगर २३।४६ धरणेन्द्र (व्य) जयन्त मुनिका धारणा (पा) मतिज्ञानका भेद जीव २७११७ १०।१४६ धरावती (य) अयोध्यके राजा धारिणी (य) सूर्याभवी स्त्री हेमनाभकी स्त्री ४३११५९ ३४।१७ धर्म (व्य) धर्मनाय-पन्द्रहवें तीर्थ- भारिणी (व्य) अयोध्याके समुद्र कर ११७ दत्त सेठको स्त्री ४३११४९ धर्म (पा) जीव और पुद्गलके गमनमें कारण एक द्रव्य ७।२ धारिणी = एक विद्या २२।६८ धर्म (पा) इमके उत्तम क्षमा धार्तराष्ट्र (व्य) दुर्योधन आदि सौ कौरव ४५।४३ आदि १० भेद है २।१३० धर्मतीर्थ धातकीखण्ड (भौ) दूसरा द्वीप आम्नाय ५।४८९ धर्मचक्र (पा) तीर्थकर जिनेन्द्रके धातु = वैणस्वरका भेद १९।१४७ समवसरण में विद्यमान देवी श्रीमान् (व्य) बलदेवका पुत्र पनीत चक्र २११४५ ४८।६७ धर्मचक्रिन् - धर्मचक्रके धारक धीर (व्य) कृष्णका पुत्र ४८७० जिनेन्द्र-तीर्थकर ५४५८ धुनी = नदी ( यमुना) ३५।२८ धर्म्यध्यान (पा) प्रशस्त-ध्यानका धूपिन = एक जहरीला सांप भेद ५६।३५ ३३।१०८ धूमप्रगा (भी) नरकोंको पाँचौं भूमि ४४ धूम (व्य) एक अमुर प्रयुग्न का पैरी ४३१३९ धमकनु (व्य) प्रद्युम्नका पूर्वभव मावरी देवविशेष ११.. धममिद (व्य) अमितगति विद्याधरका मित्र २११२३ एल (व्य) पुवंशका एक राजा ४५।२९ एति (व्य) अशोम्यकी स्त्री १९३ एनि (व्य) निगिच्छ सरोवरमें रहनेवाली देवी ५।१३० एति (व्य) चिकगिरिक सुद- पनि मूटपर रहनेवाली देवी५।०१६ एतिकर (व्य) पुरवंशका एक राजा ४५४१३ एतिकर (व्य) कुरवंशका एक राजा ४५।११ प्रतिवर (व्य) शुभकरका पुत्र ४५.९ निकूट (भी) निपघाचलका छटवां कूट ५८९ प्रतिक्षम (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४३१११ तिद्युति (व्य) कुरवंशका एक राजा ४५११३ सृष्टद्युम्न (व्य) राजा द्रुपदका पुत्र ४५।१२१ दृष्टद्युम्न (व्य) एक राजा ५०1७९ धृततेजस (व्य) कुस्वशका एक राजा ४५/३२ प्रतिदृष्टि (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५1१३ धृतिदेव (व्य) कुरवशका एक राजा ४५।११ तधर्मा (व्य) कुरुवशका एक राजा ४५१३२ = धर्मको शब्दानुक्रमणिका नन्दा (पा) समवसरणके अगोक वनको वापिका ५७१३२ नन्दा (व्य) ऋषभदेवको स्त्री ९।१८ नन्दा (पा) समवसरणको एक वापिका ५७७३ नन्दा, नन्दवती, नन्दीत्तरा, मन्दीघोपा (भौ) नन्दीश्वर द्वीपके पूर्वदिशासम्बन्धी अजनगिरिकी पूर्वादि दिशाओम स्थित वापिकाएं ५१६५८ नन्दिन (व्य) आगामी नारायण एनपम (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५।१२ एतमाम (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५।३२ निमित्र (व्य) कुरवंशका एक राजा ४५३११ एनयशम् (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५५३२ एतराज (व्य) कुरवंशका एक राजा ४५१३३ एतराष्ट्र (व्य) राजा धृतराज और अम्बिकाका पुत्र ४५।३४ एतराष्ट्रमुत = कोरव १।१०८ एनग्यास (व्य) राजा शन्तनुका पुन ४५।३१ नवीय (व्य) कुरुवाका एक राजा ४५.१२ इतिपेण (व्य) दगपूर्वके ज्ञाता एक आचार्य ११६२ एनेन्द्र (व्य) कुरवंशका एक राजा ४५।१२ एतोदय (न्य) कुरुवंशका एक राजा ४५।३२ धैवत = एक स्वर १९३१५३ धैवनी - पड्जस्वरमे मम्बन्ध रखनेवाली जाति १९६१७४ ध्रुर (व्य) एक राजा ५०।१२४ भुष (पा) आग्रायणी पूर्वको वस्तु नकुल (व्य) पाण्डव ४५।२ नग (व्य) अचलका पुत्र ४८१४९ नन्द (व्य) वलभद्र २५:३५ नन्दक (व्य) एक मुनि ५०५९ नन्द (भी) अकृत्रिम चैत्यालयों- की पूर्व दिशाम विद्यमान एक हद ५।३७२ नन्दन (भी) वि. ३० नगरी २२।९० नन्दन (व्य) मानुपोत्तरके रुचक कूटपर रहनेवाला देव ५।६०३ नन्दन (भी) सौधर्म युगलका सातवा इन्द्रक ६४५ नन्दन (व्य) बलदेवका पुत्र ४८।६७ नन्दन (व्य) भगवान् ऋपभदेव. का गणघर १२०५६ नन्दन = पुत्र ९१२१ नन्दन (भी) नन्दनवनका एक कूट ५।३२९ मन्दन (भी) मेवा एक वन ५।३०७ नन्दनवन (भी) मेपर्वतपर स्थित एक वन ५।२९० नन्दघोषा (पा) समवसरणके अशोक्वनी वाधिका ५७१३२ नन्दयन्ती मध्यम प्रामके याधिन जाति १९५१७७ नन्दयशा (व्य) घनदत सेठको स्थी १८।११३ नन्दयशा (भी)वताम्बिकापुरी- के राजा वामको वसुन्धरा स्त्रोसे उतरन्न नन्दिनी (भी) वि० उ० नगरी २२०९० नन्दिमद्र (व्य) एक चारण मुनि ६०1७८ नन्दिभूतिक (व्य) आगामी नारायण ६०१५६६ नन्दिमिन (व्य) आगामी नारायण ६०.५६६ मन्दिमित्र (व्य) सातवा बलमा ६०१२९० नन्दिमित्र (व्य) ऋपमदेवका गणधर १२०६९ नन्दिमित्र (व्य) एक शुनदेवली आचार्य १६१ नन्दियन (व्य) एक मुनिरा नाम ४६११०४ नन्दिपेग (व्य) वमुदेवरा भवान्तर १८।१३५ नन्दी (व्य) ऋपमदेवरा गणघर पुत्र नामक धुर (व्य) वलदेवका ४८०६६ भुगमन (व्य) ग्यारह बनके दाता एक याचार्य ११६ धीय (पा) पूर्वोत्तर पायम स्थिर रहना ११ विनी-मेना ३१५२ [न] नक्षत्र (य)ग्यारह बदरे जाता एक आनायं ११६४ नन्दशोकपुर (भी) एक नगर नन्दी (व्य) आगामी नारायण ६०१५६६ नन्दी, मन्दिमम (व्य) नन्दीयर होकरशाद ५/६४ नन्दावर प्रविधि- एक प्रर. विष३४॥८४ चिगिरिक ग्निन्दन एटसर रहनेवारी देवी ५।०५ ११३ हरिवंशपुराणे नन्दीश्वर द्वीप (भौ) आठवां द्वीप नमुचि (व्य) उज्जयिनोके राजा धीधर्माका मन्त्री २०१४ नन्दीश्वर समुद्र (भी) आठवां नय (व्य) यादव ५०३१२१ सागर ५२६१६ नयनसुन्दरी (व्य) त्रिशृङ्गपुरके नन्दोत्तर (व्य) मानुषोत्तरके सेठ प्रियमित्रकी पुत्री लोहिताक्ष कूटपर रहनेवाला ४५११०१ देव ५१६०३ नरकान्तक कूट (भौ) नीलकुला- नन्दोत्तरा (पा) समवसरणके चलका छठवां कूट ५।१०० अशोकवनको वापिका नरकान्ता (भी) एक महानदी ५७१३२ ५।१२४ नन्दोत्तरा (व्य) रुचिकगिरिके नरकालय = नारकियोके विल स्वस्तिक नन्दन कूटपर रहने ४।७० वाली देवी ५१७०६ नरदेव (व्य) बलदेवका पुत्र नन्द्यावतं (भी) सौधर्म युगलका ४८१६८ छब्बीसवां इन्द्रक ६१४७ नरपति (व्य) राजा यदुका पुत्र नन्द्यावर्त (भौ) रुचिकगिरिकी १८७ पूर्व दिशासम्बन्धी कूट नरवक्र (व्य) आठवां नारद ५७०२ ६०१५४९ नमम् = सावनका महीना ६५।१२६ नरवर (व्य) दृढरथका पुत्र १८।१८ नमस् (पा) अवगाह दान में समर्थ नरहरि (व्य) कुरुवंशका एक आकाश ५८१५४ राजा ४५११९ नमस्तिलक (भी) वि० उ० नर्मद (भौ) देशका नाम नगर २२।९८ ११७२ ममस्निलक (भी) विजयागिरि- नमंदा (व्य) वमुन्धरपुरके राजा षा एक नगर ९।१३३ विध्यसेनको स्त्री ४५६७० नमस्तिलफ (मी) एक नगर २५।४ नर्मदा (भी) एक नदी नममेन (व्य) हरिणका पुत्र १७३४ नलिन (भी) चिवगिरिका नमस्या - नमस्वार,पूजा ४२१९ पश्चिम दिशामम्बन्धी कूट ममि (ख्य) ऋपभदेवका गणधर ५.०१२ १२।१८ नमि (व्य) सोमवें तीर्थंकर नलिन (भी) पूर्व विदेहका वक्षार. १८५ गिरि ५।२२८ ममि (व्य) भगवान् ऋषभदेवके नलिनगुल्मा (मो) मेरक ऐशान सारा पुष ११२८ में स्थित एक वापरी ५।३४५ ममि (व्य) मा ५.१२१ नहिन (व्य) आगामी एटा मनु ममुचि (स्य) अनागुरीरे राजा राया गयपना पुत्र मशिनराज (व्य) आगामी माट्य मनु०५५६ मलिनध्वज (व्य) मागामो नौवां मनु ६०१५५७ नलिन (भौ) सौधर्म युगलका आठवां इन्द्रक ६।४५ नलिन (पा) चौरासी लास नलि. नाङ्गोका एक नलिन २७ नलिनपुङ्गव (व्य) आगामो दशवा मनु ६०१५५७ नलिनप्रभ (व्य) आगामी सातवा मनु ६०१५५६ मलिना (भौ) मेरुको आग्नेय दिशाम स्थित एक वापी ५.३३४ नलिना (भौ) मेरुके ऐशानमें स्थित एक वापी ५.३४५ नलिना (पा) चौरासी लाख पद्मोंका एक मलिनाङ्ग ७/२७ मलिनी (भी) पूर्व विदेहका एक देश ५।२४९ नलिनी(पा) समवसरणके चम्पका वनकी वापिका ५७।३४ नवनवम = प्रतविशेष ३४।९३-९४ नवमिका (व्य) रुचिकगिरिके सौमनस कूटपर रहनेवाली देवी ५७१३ नवराष्ट्र (भौ) देशका नाम १११७० मवधी (व्य) आगामी प्रतिनारा- यण ६०१५६९ नाग: भवनवागी देवीता एr. भेद ४०६३ नाग (व्य) दशपूर्वके माता एर माधार्य १६२ नाग (भी) सानत्कुमार युगल का तोमरा इन्द्रक ४८ नागकुमारादि-भवनमामी देश २१८१ नागपुर (भी) हग्निनागपुर १७११९२ शब्दानुक्रमणिका না (মা) বলসমা বৃথিৱীক द्वितीय प्रस्तारका इन्द्रक बिल ४७६ नागपुर (भो) हस्तिनापुर २०१२ नागमाल (भी) पश्चिम विदेहका वक्षारगिरि ५।२३२ नागरमण (भी) मेरुका एक वन ५.३०७ नागवर (भी) अन्तिम मोलह द्वीपर ग्यारहवां द्वीप ५१६२४ नागवेलन्धर (व्य) लन्धरजाति के नागकुमार देव ५।४६५ नागधी (व्य) एक स्त्रो ६४१६ नाटयमाल (व्य) एक देव नाही (पा) दो किकु-चार हाय को एक नाडी ७.४६ मान्दी (व्य) उठा बलभद्र ६०।२९० मान्दीवर्धना (व्य) रुचिकगिरिके अञ्जनमूलक कूटपर रहने वाली देवी ५७०६ नामिगिरि (भी) हैमवत, हरि- रम्यक और हैरण्यवत क्षेत्र के मध्य स्थित श्रद्धावत आदि पर्वत ५११६३ नामिराज (व्य) चौदह्वां कुल- कर ७१६९ नामेय (य) भगवान् वृषभदेव ९१२५ नाम (सुबन्त) = पदगत गान्धर्व की विधि १९११४९ नामकर्म (पा) गरीरादि रवना का हेतु कर्म ५८।२१७ नाममस्य (पा) दश प्रकारके सत्योम में एक सत्य १०९८ नामादिक (पा) नाम, स्थापना द्रम्प, भाव ये पार निक्षर २११०८ नामान (भी) वि०६० नगरी २२।९६ नारद (व्य) एस देव ६१८० नारद (व्य) क्षीरकदम्बका एक शिष्य १७१३८ नारद (व्य) पदवीधर नारद ५४॥४ नारद (व्य) वसुदेव और सोम- श्रीका पुत्र ४८५७ नारमिह (व्य) वसुदेवका सम्ब- ग्धी एक विद्याधर ५११३ नारायण (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५०१९ नारायण (व्य) आठवी नारायण ६०१२८९ नारी (भौ) एक महानदी ५।१२४ नारीकूट (भी) रुक्मिकुलाचल का चोथा कूट ५।२०३ नासारिक (भी) देशका नाम १११७२ निकृतिमाषा (पा) सत्यप्रवाद पूर्वको १२ भापात्रोमें एक भापा १०१९५ निक्षेप (पा) अजीवाधिकरण बायका भेद ५८०८६ निक्षेपादान समिति (पा) योग्य वस्तुको देखकर रखना उठाना २११२५ निगोद (पा) नरको विल निदाघ (भी) बालुकाप्रमा पृथिवीके पश्चम प्रस्तारका इन्द्रक विल ४।१२२ नित्योद्योत (भी) रुचिकगिरिका उत्तर दिशासम्बन्धी एक विशिष्ट कूट ५/७२० निधत्तानिधत्तक (पा) आग्नायणी पूर्वके चतुर्थ प्राभुतका योग- द्वार १०१८५ निपुणमति (व्य) रानी रामदत्ता को धाय २७१२१ निबन्धन (पा) आग्रायणी पूर्वके चतुर्थ प्राभूतका योगद्वार १०८२ निमग्नजला (भी) विजयाको गुहाके भीतर मिलनेवाली एक नदी १११२६ नियुत (पा) चौरामी लाप नियुताङ्गोंका एक नियुत ७।२६ नियुताग (पा) चौरासी लाख पूर्वागीका एक नियुताङ्ग ७/२६ निरुद्ध (भी) पांचवीं पपिवीके प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी तम इन्द्रककी पूर्व दिगामें स्थित महानरक ४१५६ निरोध (भी) चौपी पृथियों के प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी पर इन्द्ररकी दिमाम स्पिन महा नरक ४४१५५ निपुण (वि) निस्य ११३९१ निपुणता निर्दयता ५५४८९ निन्य (पा) मनिरा एक भेद ६४५८ निक्ष शाहयला एक विद्या २२०६३ निर्नामक (व्य) रानी नन्दपमा सादुर ३३१४ नियालोक (भी) पातकोखण्ड वि०६०वा एक नगर ३३११३१ निस्यालोक (भी) रचिकगिरि या दक्षिण दिशामादायी एक विशिष्ट पूट ५७१९ निदान (पा) मन्लेखना ना अनिमार ५८५१८४ १४ हरिवंशपुराणे वस्तु १०८० निवर्तना (पा) अजीवाधिकरण निपाद - भील ३५०६ आस्रवका भेद ५८०८६ निषादजा = पड्ज स्वरसे सम्बन्ध निर्विचिकित्मा-बिना किमी रखने वाली जाति १९५१७४ ग्लानिके १८।१६५ निष्कम्प (व्य) विजयका पुत्र निर्वाण - मोक्ष ११२५ ४८।४८ निर्वाण (पा) आग्रायणी पूर्वको निप्क्रमण -दीक्षाकल्याणक २२५५ निर्विण = विरवत १११२१ निष्क्राम '- तालगत गान्धर्वका निनि (व्य) प्रतिमाओके समीप एक प्रकार १९११५० विद्यमान एक देवी ५।३६३ निष्क्रान्त = दीक्षित हो गया निवृति = एक विद्या २२१६५ १८।१७८ निवृत्ति (पा) इन्द्रियाकार पुद्गल निसर्गक्रिया (पा) एक क्रिया का परिणमन १८१८५ ५८.७५ निशान्त = घर ३५०१ निसर्ग (पा).अजीवाधिकरण निशान्त -प्रातःकाल ३५।११ आसवका भेद ५८१८६ निशुम्भ (व्य) चौया प्रति निसृष्ट (भी) चौथी पृथिवीके नारायण ६०।२९१ प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी आर निश्चयकाल (पा) लोकाकाशके इन्द्रककी पूर्व दिशामें स्थित प्रत्येक प्रदेशपर स्थित महानरक ४/९५५ अमूर्तिक कालाणु ७१३ निहतशत्रु (व्य) शतधनु के वंश निष्कपाय (व्य) आगामी तीर्थकर का एक राजा १८०२१ ६०१५६० निद्वव (पा) ज्ञाना० और दर्शना० निषद्यका (पा) = अङ्ग बाह्यभूत का आस्रव ५८.९२ का एक भेद २११०५ नील (भौ) छठी पृथिवीके प्रथम निषध (व्य) निपय देशका राजा प्रस्तारसम्बन्धी हिम इन्द्रक ५०1१२४ को पूर्व दिशामें स्थित महा निषध (भी) जम्बूद्वीपका तीसरा नरक ४।१५७ कुलाचल ५५१५ नील (व्य) नीलवान् विद्याधरका निपध (भी) निषध पर्वतसे उत्तर पुत्र २३४ को और नदीके मध्य स्थित नील (भी) जम्बूद्वीपका एटा एक हद ५११९६ बुलाचल ५।१५ निपा (भी) नन्दनवनका एक नीलक (व्य) रुचगिरि श्रीवृक्ष फूट ५.३२९ कूटका निवासी देव ५।७०२ निपध (व्य) एक गजा ५०८३ नीलकण्ठ (व्य) नीलका पुत्र निपध (व्य) वरदेवका पुत्र २३७ ४८।६६ नीलकण्ट (व्य) आगामी प्रति. निषध फूट (भी) निगमाचलका नारायण ६०१५७० दुपयपूट ५।८८ नीलकण्ठ (व्य) एक विद्याधर निशाद एक बर १९११५३ राजा २५.६३ नीलकूट (भी) नील कुलाचलका दूमरा कूट ५।९९ नोलगुहा (भौ) राजगृहके समीप- वर्ती एक गुफा ६०१३७ नीलयशा (व्य) सिंहदंष्ट्र और नीलाञ्जनाकी पुत्री २२१११३ नीलयशा (व्य) चारुदत्तकी स्त्री १६८२ नोलाक्षना (व्य) नीलवान् विद्या. धरकी पुत्री २३।४ नीललेल्या = लेश्याला एक भेट ४/३४३ नीलाक्षना (व्य) सिंहदष्ट्रकी स्त्री २२।११३ नीलाक्षसा (व्य) इन्द्रकी नर्तकी ९।४७ मीलवान् (व्य) शक्टामुख नगर का स्वामी विद्याधर २३३३ नीलवान् (भी) नील कुलाचलसे साढे पाँच-सौ योजन दूर नदीके मध्यमें स्थित एक हद ५।१९४ [प] पङ्क (भी) छठो पृथिवीके हिम नामक इन्द्रको दक्षिण दिशा में स्थित महानरक ४१५७ पकप्रभा (भौ) चौथी पृथिवी ४.४४ पदबहुल (भी) रत्नप्रमा पृथिवीका दूसरा भाग ४|४८ पक्ष (पा) व्यवहार कालका भेद १५ दिनका पक्ष होता है ७.२१ पण्डक नपुंसक ३।११३ पसरल्याणविधि (पा) एक अनका नाम ३४|१११ पसम (पा) एक स्वरका नाम शब्दानुक्रमणिका पद्म (व्य) पुष्कर द्वीपका रक्षक देव ५।६३९ पञ्चममहावत (पा) परिग्रह त्याग महावत २।१२१ पचमी (पा) मध्यम प्रामके आश्रित एक जाति (संगीत- का भेद) १९१७६ पञ्चशिरम् (व्य) कुण्डलवर गिरिपर रहनेवाला एक देव ५४६९० पञ्चशत नीच (व्य) बलिके वंशका एक राजा २५६३६ पञ्चशैलपुर (मी) विहार प्रान्त- का 'राजगृही नगर' ३१५२ সন্ত্রাৰবি জাগাৱৰাখিছি (पा) एक व्रतका नाम ३४.११३ पवाल (भी) भारतवर्षका एक पद्मनिधि (पा) चक्रवोंको एक निधि १९१२१ पद्मपुगव (व्य) आगामी कुलकर ६०१५५७ पनाम (व्य) एठे तीर्थंकर २२।३२ पद्मग्रम (व्य) आगामी कुलकर ६०१५५७ पद्ममाला (य) एक राजा ४५।२४ पद्मयान (य) कमलयान जि. पर भगवान्का विहार होता है ५९१० पद्यरथ (व्य) एक राजा ४५।२४ पारय (व्य) कुण्ड ग्रामका राजा देश ३।३ पद्म (व्य) कुण्डलगिरिका वासी एक देव ५१६९१ पद्म (भी) हिमवत्कुलाचलका हद ५११२१ पद्म (य) वमुदेवका पुत्र ४८५८ पा (व्य) अनन्तनाथ भगवान्- का पूर्वमवका नाम ६०११५३ पद्म (व्य) हस्तिनापुरके राजा महापाका पुत्र २०११४ पद्म (व्य) चन्द्रप्रम भगवान के पूर्वभवका नाम ६०।१५२ पद्मक (व्य) वसुदेवका पुत्र ४८/५८ परकूट (भी) एक वक्षार गरि ५।२२८ पत्रकूट (भा) विद्युत्नभ पर्वत- का एक कट ५।२२२ पभ कूट (भी) स्वागिरिका एक कूट ५७१३ पनवण्डपुर (मी) एक नगर २७४४४ पसगुल्म (व्य) नौतननाथ भगवान्का पूर्वभवका नाम ६०११५२ पनदेव (व्य) एक गजा४५३२५ पञ्चदेवी (न्य) भरतक्षेत्रके शामिलो बदनामक प्राममें दविला और जपदेवरा पुत्र पञ्चाश्चयं (पा) भगवान् के दान देते समय प्रकट होने वाले 'महोदान' भादिकी ध्वनि रूप पांच बारचय ९१९० पटयर (भी) एक देगका नाम पद्मरागमय (भा) मेल्को एक परिधि ५।३०५ पद्मराज (व्य) आगामी कुलकर ६०१५५७ पनवेदिका (भी) विदेहक्षेत्रको रत्नमयी बंदिकाकी लघु- वैदिका ५।१७६ पद्मश्री (व्य) अरिजयपुर के गजा मेघनादकी पुत्री पण % एक बाजा २१३९ पण्य (भी) नन्दन वनको पूर्व दिशाम स्थित एक भवन पद्ममेन (व्य) पातकीसण्डद्वीप पी अयोध्याता एक राजा पपिढतम्मन्य अपने आपको पण्डित मानवाला ६०।११ पत्तन (भी) एक देश ११७४ पद (पा) नानका भेद पकायती (मी) एक विदेह पवन (ज्य) यागाची पुरकर पदममाय (पा) जाना भेद १०११२ पम (पा) एक निधि ५९६६३ पम् (पा) व्यवहारकालका एक भैद ७२० पर (भी) मोधर्म वर्गका एक परम ६४६ पमनाम (व्य) यातको ड. के भरत क्षेत्रको अमरपदा पुरीश रात्रा ५४१८ पसनामा (व्य) आगामी :- धनी ६०५६४ पमा (व्य) विशहनगर राजा प्रयाबाहनकाधी५।९८ पा (मी) एक वापिका५७१३४ पा (मी) एक विदेश ५.२४९ पमार (पा) व्यवहार काला एक भेद ७२० पगार (मी) विसाधं उत्तर नोएकमगर २०1८६ हरिवंशपुराणे पद्मासन (व्य) विमलनाथ परावर्त (पा) तालगत गान्धर्वका भगवान्का पूर्व भवका नाम एक भेद १९:१५० ६०११५३ परिकर्म (पा) द्वादशाङ्गका एक पद्मावती (व्य) रुचिकगिरिके भेद २१९६ पद्मकूटपर रहनेवाली देवी परिसा-खाई ५७१२१ ५७१३ परिणाम (पा) कालद्रव्यका कार्य पद्मावती (व्य) वसुदेवको एक ७१५ स्त्री ११८३ परिदेवन (पा) असातावेदनीयका पद्मावती (भौ) विदेहको एक आस्रव ५८।९३ नगरी ५।२६० परिव्राजक = सन्यासी २१११३४ पद्मावती (व्य) मुनिसुव्रत परोक्षप्रमाण (पा) मतिश्रुतज्ञान भगवान्को माता राजा १०.१५५ सुमित्रको रानी १६२ पर्याय (पा) श्रुतज्ञानका भेद पद्मावती (व्य) एक दिक्कुमारी १०.१२ देवी ८११. पर्याय समास (पा) थ तज्ञानका पद्मावती (व्य) भोजक वृष्णिको भेद १०१२ स्त्री १८।१६ पर्याप्ति (पा) नाम कमका एक पात्तर (भौ) मेस्पवंतसे पूर्वको भेद ५६।१०४ ओर सीमा नदीके उत्तर पर्वत (व्य) क्षोरकदम्बका पुत्र- तटपर स्थित कूट ५।२०५ मिथ्या मार्गको चलानेवाला पोत्तर (व्य) कुण्डलगिरिका १७१३९ वासी एक देव ५१६९१ पोत्तर (व्य) रुचक गिरिके पर्वतक (व्य) एक भीलका नाम ६०१६ नन्द्यावर्तकूटपर रहनेवाला देव ५१७०२ पलाश कूट (भी) सीतोदा नदीके पभोत्तर (व्य) वासुपूज्य भगवान- उत्तर तटपर स्थित एक कूट ५।२०७ का पूर्वभवसम्बन्धो नाम पल्य (पा) व्यवहार कालका एक भेद ३११२४ परमाणु (पा) पुद्गलद्रव्यका सबसे छोटा हिस्मा ७१७ पल्लव (भी) दक्षिण भारतका परमावधि (पा) अवपिज्ञानका एक देश ६११४२ एक भेद १०११५२ पाणिग्रहण = विवाह ४५।१४६ परविवाहकरण (पा) ब्रह्मचर्याणु पामजन्य (व्य) कृष्णके दाह्ववा प्रका अतिचार ५८४१७४ नाम १।११२ परशुराम (व्य) जमदग्निका पुत्र पाण्डव (व्य) युधिष्ठिर आदि पाण्डु (व्य) ग्यारह अङ्गके ज्ञाता एक मुनि ११६४ पाण्डक (भौ) मेरुका एक भाग ५.३०९ पाण्डुक (भी) राजगृहीके पांच पहाडोमें-से एक पहाड ३५५ पाण्डुक (भौ) वि०३० थे० का एक नगर २२।८८ पाण्डुक (व्य) कुण्डलगिरिके महेन्द्र कूटका वासी देव ५।६९४ पाण्डुक % विद्याघरोको एक जाति २६।१७ पाण्डका (भी) सुमेरुके पाण्डुक वनमें स्थित एक शिला २०४१ पाण्डुकम्बला (भी) पाण्डुक वन- को एक शिला ५६३४७ पाण्डुकी (व्य) विद्याविशेष २२१८० पाण्डुकेय (व्य) पाण्डुकी विद्या सम्बद्ध विद्याधर २२१८० पाण्डुर (व्य) कुण्डलगिरिक हिम- वत् कूटका वासी देव ५।६९४ पाण्डर (व्य) क्षीरवरद्वीपका रक्षक देव ५१६४१ पात्र (पा) जिन्हें दान दिया जाता हो ऐसे मुनि, श्रावक और अविरत सम्यगदष्टि ७.१०८ पानी = एक मगल द्रव्य ५।३६४ पाद (पा) छह अङ्गालोका एक पाद होता है ७.४५ पाद माग (पा) तालगन गान्पर्व. का एक प्रकार १९१५१ पापोपदेश (पा) अनर्थदण्डा भेद ५८।१४६ पारणा (पा) बनके बाद होनेवाला भोजन ३३१७९ पारशर (व्य) एक राजा ४५।२९ परम्पर कल्याणविधि (पा) एक प्रमानाम ३४॥१२४ पराम्य (व्य) भगवान ऋपमदेव. पाएकगणर १२२६१ पाण्ड (भी) पाण्डापनका एक भवन ५।३२२ पाण्टु (व्य) युधिष्ठिराविक पिता ४५३४ शब्दानुक्रमणिका पारिणामिक भाव (पा) कोके पुण्डरीक (व्य) एक नारायणका उपशमादिके बिना स्वयं होने नाम ६०१५२९ वाला एक भाव ३७९ पुण्डरीक (पा) प्रकीर्णक्थुनका पारिग्राहिकी क्रिया (पा) पच्चीस एक भेद २११०४ क्रियाओंमें से एक क्रिया पुण्डरीकिणी (व्य) एक दिक्षु. ५८1८. मारी देवी ८११२ पार्थ (व्य) अर्जुन ४५।१३१ पुण्डरीकिणी (व्य) रुचि गिरि पार्थिव (व्य) एक राजा ५२॥३३ के अजनक कूटपर रहने- पावतेय = विद्याधरॉकी एक जाति वाली देवी ५१७१५ २६१२० पुण्डरी किणी (भी) विदेहको एक पाव (व्य) तेईवें तीधर नगरी ५२५७ १२२५ पुपरीकिणी (व्य) एक देवी पांमुमल (भी) वि० ६० श्रेणीका ३८.३५ एक नगर २२।९९ पुण्यमूर्ति (व्य) भागामी तीर्थ- पिनल (व्य) वसुदेवका पुत्र कर ६०१५६० ४८.६३ एद्गल (पा) रूप, रस, गन्ध और पिण्डशुद्धि भोजन शुद्धि स्पर्शसे युक्त एक द्रव्य ४॥३ २११२४ पुद्गलामा (पा) कर्मप्रकृति पितृवसा=बुआ ४२१७२ वस्तुका एक अनुयोगद्वार पिाम (भी) प्रथम पृथ्वौके सोम १०८५ तक इन्द्रकके दक्षिण दिशा में पुष्कर-कमल ५१५७६ स्थित महानरक ४११५१ पुष्करीप (भी) एक द्वीपका पिपराद (य) याज्ञवल्क्य और नाम ५।५७६ मुलसाना पुत्र २१।१३९ पुष्फोट मध्यलोकका एक पिहितानब (ख्य) एक मुनि समुद्र ५।५९६ २७८ पुफ्ला (भी) पश्चिम विदेहक्षेत्र. पिहिताम्ब (व्य) एक मुनि में स्थित एक विदेह ५।२४५ २७४९३ पुफलावती (भी) पश्चिम विदेह- पिहितास्त्रब (ख्य) पद्मप्रभ भग• क्षेत्र स्थित एक विदेह वान्कै पूर्वमा गुरु पुरु (भी) वि० उ० श्रेणीका पोटिरा (भी) विदेहक्षेत्रके जम्बू एक नगर २२१९१ स्थलका एक भाग जो मूल पुरष (भी) एक देवा ११६७० में १२ मध्यमें ८ और अन्तु. पुरपसिंह (व्य) एक नारायणका में ४ कोश चौहा है ५।१७५ नाम ६०१५२७ पुण्डरीक (व्य) पुष्करद्वीपमा पुरषोत्तम (व्य) एक नारायणका रक्षक देव ५।६३९ नाम ६०१५२३ पुण्डरीक (भी) शिम्परीकुलाचल पुरहूत (व्य) एक विद्याधर पाहद ५१२१ २२११०७ पुरोधम् (पा) चक्रवर्तीका एक रल (चेतनरत्न) ११।१०८ पुलस्त्य (व्य) एक विद्याधर २।१०८ पुलोम (व्य) कुण्डिनपुरके राजा कुणिमका पुत्र १७:२४ पुलामपुर (भी) राजा पुलोमका बसाया एक नगर १७४२५ पुष्पक (भी) आनत स्वर्गका एक इन्द्रक ६५१ पुप्पदन्त (स्य) नौवें तीर्थकर ११११ पुष्पदन्त (य) क्षीरवर द्वीपका रक्षक देव ५।६४१ पुष्पदन्त (व्य) एक शुल्लक २०१२७ पुषव्ह (भी) वि० उ० ० का एक नगर २२१९१ पुष्पमाल (भी) वि० उ० श्रेणी- का एकनगर २२१९१ पुष्पमाला (व्य) एक दिवमारी देवी ५१३३३ पुणोत्तर (भी) स्वर्गका एक विमान १२० पूतिगन्धिका (व्य) सविमणीका एक भवान्तरमा नाम ६०१३३ पूरण (य) समुद्रविजय आदि दम भाइयो बाटवा माई १८।१३ पूर्ण (व्य) इशुवरद्वीपका रक्षक देव ५।६४३ पूर्णभद्र (भी) विजयापर्वतका एक फूट ५.२६ पूर्णमद (व्य) अयोध्या समुद्र- दत मेटका पुत्र।६।१४९ पूर्णमद्र (व्य) एक या नाम पूर्णचन्द्र (व्य) आगामी बलमद्र ६०.५६८

Kavindrakalplata

Author
Sarswati, Shrimad Kavindracharya
Title
Kavindrakalplata
File name
Kavindrakalplata
Text
OCR done
Citation
1958
Published
2011/08
Publisher
Jaipur, Jaipur Printers
Language
Sanskrit
Pages
1043
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314055
Barcode
99999990312207.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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