University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
मैट्रिक संस्कृत व्याकरण
Front matter
"मैट्रिक संस्कृत-व्याकरण
-
पं० गुरुदत्त शास्त्री प्रो., टी.,
लेखक
( व्याकरण मध्यम) वेद वाचस्पति
मुख्य संस्कृताध्यापक
डी. ए. वी. हाई स्कूल वटाला
पञ्जाब यूनीवर्सिटी की मैट्रिक परीक्षा के नबीन
(सिलेबस ) के अनुसार
CHECKED 1973
to tarkmra Prakr vire maximmya
प्रकाशक
Initel 17
अतरचन्द कपूर एण्ड सन्ज़,
अनारकली लाहौर।
Edition.
Copies 1,500
Price As. 12
Printed by Guran Ditta Kapur at The Kupur Art Printing
Abbott Road, Lahore, and published by
Uttar Chand Kapur & Sons, Anarkali, Lahore.
पं० गुरुदत्त जी प्रणीत व्याकरण नवम, दशम
श्रेणी के विद्यार्थियों के लिए लिखा गया है। पं० जी
ने अपने वर्षों के पढ़ाने के अनुभव का इस में बहुत
योग किया है । पुस्तक सरल और. बहुत उपयोगी है ।
नुवाद के लिए जो वाक्य दिए गए हैं, वे परिश्रम से
'नाए गए हैं और अभ्यास के लिए बहुत लाभकारी
गे। विद्यार्थियों को इससे पूरा लाभ उठाना चाहिए ।
भगवदत्त बी. ए.।
अध्यक्ष रिसर्च विभाग
दयानन्द ऐंग्लो वैदिक कालिज
लाहौर
सत्स्वप्यन्य व्याकरण निबन्धेषु गुरुदत्त शास्त्रिणा
विरचितोयं व्याकरण निवन्धो वालव्युत्पत्ति हेतवे साधू-
पकार कारक इति समस्त विषय समालोचन पुरस्सर
मनुमनुते विशेषतश्चानुवाद परिभाषा ज्ञान्तयश्लाध्यत्मः
परिश्रमः परीक्षार्थिना मर्थसाधक इति ।
पाठक पाठ्यश्रमाल्पता साधकस्याप प्रचार माद्रियते ।
मुल्कराज शास्त्री
१९१० वै० प्र०८
गुरुदत्त शास्त्रि कृत व्याकरण मैंने आद्योपान्त पढ़ा ।
पुस्तक पाव यूनिवर्सिटी के नियत किये नवीन सिलेबस
के अनुसार मैट्रिक परीक्षा के विद्यार्थियों के लिये अतीव
उत्तम ढंग से लिखी गई है। दूसरे व्याकरण निबन्धों की
तरह इस में क्लिष्ट नियमों की भरमार नहीं । सन्धियों के
नियम अत्यन्त सरल तथा सुगम किये गए हैं। सभी
विषय विद्यार्थियों की व्युत्पत्ति के लिए अत्यन्त उपयोगी
तथा लाभकारी हैं। प्रत्येक पाठ के अनन्तर हिन्दीवाक्यों
का अभ्यास तथा द्वितीय भाग में अनुवाद की परिभाषा
के ज्ञान के लिये लिखे गए साधारण नियम अत्यन्त
उपयोगी हैं।
पुस्तक छात्रों के लिए संस्कृत स्वयं शिक्षक का काम
देगी और इस से विद्यार्थियों का महान उपकार होगा
पं० जी का परिश्रम प्रशंसनीय है।
गो० अमरनाथ
मुख्य संस्कृताध्यापक
मिशन हाईस्कूल
२१-४-३३
वटाला
गुरुदासपुर मण्डलान्तर्गत बटालानगर वास्तव्य डी.
ए० वी० हाईस्कूल संस्कृत मुख्याध्यापकेन विद्रदवरेण पं०
गुरुदत्त शास्त्रिणा विरचितैयं व्याकरण पद्धतिः यूनिवर्सिटी
पाठ्यक्रमानुमारिणी मैट्रिक परीक्षादित्मनाम् छात्राणा-
मुपकृतये भविष्यतीति सन्तुष्य मयाप्यस्मै प्रशंसावादो
वितीर्ण इत्याशं मेऽहं विदुषाम् नितरां सन्तुष्टि मुत्पाद्ययं
धीमतोऽस्य परिश्रमसाफल्यं जनयिष्यति ।
पं० हंसराज
मुख्य संस्कृताध्यापक:
ऐम० बी० हाईस्कूल
बटाला
21st. April 1983
ॐ
व्याकरगा
हो उसे
जिस विद्या के द्वारा शुद्ध और अशुद्ध शब्दों का ज्ञान
व्याकरण कहते हैं।
२-व्याकरण के तीन भाग है-
वर्ण विचार
पदविचार নিৰা
१-वर्ण जिह्वा और कराठनालु आदि के संयोग मे पैदा हुई
ध्वनि को वर्ण कहते हैं।
२-पद+वर्ण वा वर्णों के सार्थक समुदाय को पद कहते हैं ।
वाक्य-पदों के समूह को वाक्य कहते हैं-
वों के दो प्रकार हैं
स्वर और व्यञ्जन
१-स्वर-जि' वर्गों का उच्चारण किमी दूसरे वर्ण की
सहायता के बिना होसके उन्हें स्वर कहत हैं।
( २ )
जैसे-अश्रा इई
प्रो औ अं अः
ऋऋ ललू ए ऐ
स्वर तीन प्रकार के हैं-हस्व, दीर्घ और प्लुत ।
जो एक मात्रा समय में बोला जाए वह हस्व
कहलाता
है
जिन के बोलने में दो मात्रा समय लगे उन्हें दीर्घ
कहते हैं।
जिन के बोलने में निगुणा समय लगे उन्हें प्लुत
कहते हैं
---
यथा-ऊ इ उ ऋल हस्व स्वर हैं अन्य मय दीर्घ स्वर हैं।
प्नुत के भागे ३ अंक लगाया जाता है । और ऊँची
ध्वनि से बोला जाता है।
यथा-अ प्रा प्रा ३ इ ई ई ३ उ ऊ ऊ ३ ऋ ऋ
ऋ ३ ल तृ तृ ३ ए ऐ ऐ ३ प्रो औ प्रो ।
व्यञ्जन
क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ
गा त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व
श ष स ह अनुस्वार विसर्ग : ये ३५ हैं ।
( ३ )
व्यञ्जन
इन का स्वरूप स्वरों से पृथक् होता है किन्तु
उच्चारण स्वरों की सहायता से होता है ।
कवर्ग-क ख ग घ ङ
चवर्ग-च छ ज झ ञ
टवर्ग-ट ठ ड
तवर्ग-त थ द न
पवर्ग-प फ ब
भ म-क से म तक २५ वर्ण स्पर्श
कहलाते हैं-
अन्नस्थ-य र ल व
ऊष्म-शप सह
वर्णों के उच्चारण स्थान
कराठ्य-अ आ कवर्ग ह विसर्ग ये कण्ट से बोले जाते हैं।
तालव्य-इ ई चवर्ग य और श ये नानु से बोले जाते हैं।
मूर्धन्य-ऋ ऋ ट्वर्ग र और प ये मूर्धा से बोले जाते हैं।
दन्त्य-ल तवर्ग ल और स ये दान्तों के समीप भाग से
बोले जाते हैं।
प्रोष्ठ्य-उ ऊ पवर्ग और उपध्मानीय ये अोठों से बोले
जाते हैं।
( ४ )
अनुनासिक- अ ण न म अनुस्वार ये नासिका की सहायता
से बोले जाते हैं।
कण्ठतालव्य-ए ऐ ये कंठ और तालु से बोले जाते हैं।
कण्ठोष्ठ्य-प्रो औ ये कंठ और अोठों से बोले जाते हैं।
अ इ उ (ण) ऋल ( क् ) ए ओ ( ङ्) ऐ औ ()
हय वर (द) ल (गा) अ म ङण न (म् ) म भ (३)
ध द ध (श ) जब गड द (श ) खफ छठ (थ) चट
त (व् ) क प ( य् ) श ष स ( र ) ह (ल
प्रत्याहार बनाने की विधि
यथा-अक् प्रत्याहार अ इ उ (ण) ऋ ल (कः ) असे
लेकर तक
नोट् ( ) में दिया x हल, अक्षर प्रत्याहार में नहीं
गिना जाता॥
यथा-अच्-अ से लेकर च तक अ इ उ ऋ ल ए ओ ऐ औ
तक अच् प्रत्याहार कहलाता है।
प्रत्याहार बनाते समय आदि के अक्षर म अन्तिम अक्षर
योजना करनी चाहिये।
यथा-झल् - झ सल तक
झ म ( ) घ द ध । श ) जव गढ दै (श ) खफ छठ
(थ) चट त (व् ) क प (य् ) श ष स (र) ह (ल)
( ५ ) सन्धि प्रकरण वों के मिलाप को सन्धि वा संहिता कहते हैं जिन के बीच में दूसरे वर्ण का व्यवधान न हो- सन्धि तीन तरह की होती है १-स्वर सन्धि-स्वर से परे स्वर हो । २-व्यञ्जन सन्धिः -हल से पर हल वा स्वर हो। ३-विसर्ग सन्धि-विसर्ग से परे स्वर वा हल हो । re- यण सन्धि - इ उ ऋ ल को क्रम से य व र ल हो जाता है यदि परे असवर्ण स्वर हो- यथा-नदी+अवु-नद्यभ्वु-अभि+ श्रागतः-अभ्यागतः । मधु+अरिःमध्वरिः । साधु+प्रादेशः साध्यादेशः । मातृ+उपदेशः-मात्रुपदेशः । लु+आकृतिः लाकृति । दीर्घ सन्धि अ इ उ ऋ लू से परे यदि सवर्ण स्वर हो तो दोनों की जगह एक दीर्घ स्वर हो जाता है। यथा-माता+अत्र-मातात्र । नदी+इरावती-नदीरावतीः । गौरी+ईशा गौरीशः । मधु+उदकं-मधूदकं । साधु+ उक्तम्-साधूक्तम् । पितृ+ऋणम् पितृणम् ।
गुण सन्धि
अ वा पा से परे यदि इ वा इ हो तोप-उ वा ऊ हो
तो पो ऋ वा ऋ हो तो अंर् ले वा लें, हो तो अल
हो जाता है।
यथा-सुर + ईशःसुरेशः । देव + इन्द्रः देवेन्द्रः । महा+
उत्सवः=महोत्सवः। तव+उपदेशः तवोपदेशः । राजा+
ऋषिः राजर्षिः । ग्रीष्म ऋतुः-ग्रीष्मतुः । तव+
लूकार-तवल्कारः।
, वृद्धिः
में क्रम
अ वा पा से परे यदि ए वा ऐ प्रो वा औ हो तो दोनों
के स्थान
मे ऐ वा नौ हो जाता है।
यथा-तव एषः तवैषः । मम+एकममैकः ।
नव+ोदनः नवदनः । उत्तम+ोजः उत्तमौजः ।
देव+ऐश्वर्य देवैश्यम् । मत+ऐक्यं मतैक्यम्। (
मधुर+औषधं मधुरौषधम् ।
IA
अयादि चतुष्टय
ए ऐ ओ औ से परे यदि ( स्वर ) अच् हो तो
ए ऐ ओ औ ( एच् ) को क्रम
से
अय् प्राय् अव् प्राव
हो जाते हैं।
( ७ )
यथा-ने+अनम्नयनम् । ने+अफः नायकः । भो+अति=
भवति । भौ+उका भावुकः । पौ+ग्रकः पावकः ।
य व लोप
पदान्त अय् अव प्राय् भाव का य व उड़ जाता है
विकल्प से यदि परे अश् हो-फिर सन्धि नहीं होती।
यथा--कवयेxएषः कवय पषः-वययेषः । गुरोxएतत्-गुर
एतत्-गुरवेतत् । श्रियै+उत्सुकः श्रिया उत्सुकः।
श्रियायुत्सुकः। साधौ+ अपि-साधा अपि-साधावपि ।
अलोप
है
पदान्त ए वा पो से परे यदि अहो तो उसका लोप
हो जाता है और परिचय के लिये ऽअर्धाकार चिन्ह
लग जाता
यथा-हरे+अब-हरे ऽव । विभो + अधुना विभो ऽ धुना ।
प्रकृतिभाव
द्विवचन के ई ऊ ए की प्रगृह्यसंज्ञा होती है फिर सन्धि
नहीं होती।
कपी + इमौ = कपी इमौ । साधू + प्रास्तिको =
साधू आस्तिको।
गंगे
अमू।
गंगे + अमू
( ८ )
अदसू के म के साथ होने वाले ई वा ऊ की भी
प्रगृह्यसंज्ञा हो जाती है
यथा-अभी + अश्वाः अभी अश्वाः अमू + प्रासाते
अमू
प्रासाते
%3D
व्यञ्जन सन्धि
स वा तवर्ग के पहिले वा पीळ यदि श वा चवर्ग हो तो
स को श वा तवर्ग को यथा क्रम चवर्ग हो जाता है।
यथा-तत् + चित्रम् + तच्चित्रम् । भवद + जयः = भवजयः।
प्राज् + न प्राज्ञः । कपयस् शेरते = कपयश्शेरते । दुस् +
शीलः दुश्शीलः।
(तवर्ग को स्वर्ग और स को ष) तवर्ग वा स के पहिले
वा पीछ यदि टवर्ग वा प हो तो तवर्ग को कम से दवर्ग
और स को प हो जाता है।
यथा-तत् + टीकते = तट्टीकते तत् + ठक्करः
तठकुरः
तद् + डिडिमः = तड्डिण्डिमः उत् + टङ्कणम् उङ्कणम्
शिष्-तः शिष्टः इष् + तम् = इष्टम् षष् + थः षष्ठः ।
तवर्ग को ल
तवर्ग के आगे याद ल हो तो तवर्ग को ल परन्तु न को
अनुनासिक ल ही होता है।
( ६ )
यथा-भवत् + लेखः-भवल्लेखः तत् +
विद्वान् + लिखति । विद्वाँ ल्लिखति
लयः-तल्लयः
( झल् को जश ) झ ल को जश हो जाता है यदि
परे झरी हो अर्थात् ( जिस वर्ग का चौथा अक्षर
हो उस को उसी का तीसराहो जाता है।
यथा-लभ् + धम् = लब्धम् । क्रुध + धः क्रुद्धः ।
kho
झ ल को ज श्
अन्तिम झ ल को ज श हो जाता है अर्थात् उसी वर्ग
का तीसरा अक्षर हो जाता
यथा-दिक + अम्वरः = दिगम्वरः । सम्राट् + गच्छति =
सभ्राड् गच्छति ग्रामात् + आगतः = ग्रामादागतः ।
दिक् + गजः = दिग्गज:-
झल को चर
झल को चर हो जाता है यदि परे खर हो तो
(जिस वर्ग का अक्षर हो उस को उसी का पहिला
हो जाता है)।
यथा-स पद + सु = संपत्सु विपद् + प्रतिकाराय =
विपत्प्रति-काराय।
हरादू+कपाटः-हशत्कपाटः। संपद् +करी संपत्करी ।
( १० )
ह को झय का चौथा वर्ग
मय
से परे ह को पहिले के वर्ग का स वर्णी चौथा अक्षर
विकल्प से हो जाता है।
यथा-वाक् + हरिः वाग्धरिः वाम्हरिः ककुभ् + हस्ती
ककुभस्ती-शकुम्हस्ती जगत् + हिताय = जगद्धिताय
जगदुहिताय । तत् हितम्-तद्धितम्
म्
को अनुस्वार
पद के अन्त में म् को अनुस्वार हो जाता है यदि परे
हल हो तो।
गुरुम् + वन्दते = गुरुं वन्दते ।
सर्वम् + सहः%3D
सर्व सहः।
अपदान्त न्म् को अनुस्वार
अपदान्त न वा म को अनुस्वार हो जाता है यदि परे
झल हो तो।
दन् ४ दशूकः = दहशूकः रम् + स्यते % रंस्यते ॥
अपदान्त अनुस्वार को उसी यय के के वर्ग का पांच वां
अक्षर हो जाता है यदि परे यय हो ।
यथा-कलंम् + कः = कलङ्कः । रम् + ता = रन्ता सशन +
कम् = सशङ्कम् । सम् + कल्पः सङ्कल्प:
पदान्त अनुस्वार को उसी यय के वर्ग का पांच वां
( १ ) -- - अक्षर विकल्प से हो जाता है यदि परे यय हो । यथा-धनम् + जयः = धनञ्जयः धनंजयः। वस्त्रं + तनोति वस्त्रन्तनोति वस्त्रंतनोति । किम् + क्रियते किङ्कियते किंक्रियते। पदान्त यर् को उसी वर्ग का अनुनासिक विकल्प से हो जाता है यदि परे अनुनासिक हो । यथा-पट् णाम् घण्णाम् षड्णाम्। प्राक मुखः प्राङ्मुखः प्राग्मुखः। सम्राट मम सम्रारामम सम्राड़मम। जगत् नाथः जगन्नाथः जगदनाथः । यर को अनुनासिक नित्य हो जाता है यदि परे मय और मात्र प्रत्यय हो तो। यथा-किंचित् मात्रं किंचिन्मात्रम् चित् मयं चिन्मय विकल्प से हो जाता झय मे परे यदि श हो और श से परे अम् हो । यथा-एतत्+श्रुत्वा एतच्छुत्वा । तत्+शुभम्-तच्छुभम् ॥ के से पहिले च लगाया जाता है यदि हस्व वा दीर्घ स्वर से परे छ हो तो। यया-इxछति इच्छति-तरु+छाया तरुज्छाया । श को छ sho
( १२ )
परन्तु पदान्त दीर्घ से परे यदि छ हो तो च विकल्प से
लगता है।
यथा-श्री+छाया-श्रीच्छाया ।
यदि ऊ ण न हस्व स्वर से परे हो, और उस ङ म् से
परे हस्व वा दोर्घ स्वर हो तो उस आगे के स्वर से
पूर्व एक पहिल जैसा ङम लगा दिया जाता है
यथा-आस्मान+इह-प्रास्तानिह सुगण+ईश:-सुगरणी :
प्रत्य+आत्मा प्रत्यङात्मा । तरन्+एव तरन्नेव ।
न को स हो जाता है और उसके पहिले अच् को
अनुनासिक किया जाता है अथवा उस से आगे अनु-
स्वार लगाया जाता है यदि पदान्त न से परे छ व हो ।
किन्तु यह कार्य प्रशान् के न में नहीं होते ।
यथा-
एतस्मिन्+तारे एतस्मिस्तीरे ।
चलन+चलनचलंश्चलन् ।
कस्मिन्+चित-कस्मिंश्चित् ।
सर्वान् +टिट्टिमान् सर्वाष्टिट्टिमान् ।
विसर्ग सन्धि
विसर्ग के आगे च छ हो तो श त थ हो तो स
ट ठ हो तो हो जाता है।
( १३ )
विसग को स
रामः + तं वदति-रामस्तं वदति
राम उसको कहता है
कृष्णः + तरति
कृष्णास्तरति
कृष्ण तैरता है।
एक:+स पव एकसएव
एक वह ही है।
विसर्ग कोश् ?
मृगः + चलति
मृगश्च-लति
हरिण चलता है-
शोभन: +छात्रः शोभनश्छत्रः
अच्छा विद्यार्थी-
विसर्ग को
देवः + टीकते देवष्टाकते
दव चलता है
क:+पष्टः
कौन छठा है--
एकः + ठक्कुरः एकष्ठक्कुरः
एक ठक्कुर है।
क्या लाभ।
( १४ )
विसर्ग को उ
विसर्ग से पहिले और पीछे अहो वा वर्ग का ३ या ४
थे ५ म अक्षर हो वा य र ल व ह हो तो विसर्ग को
उ हो जाता है।
कः + अत्रकोऽत्र यहां कौन है
कः + अर्थः कोऽर्थः
सिंहः + धावति=सिंहो धावति शर भागता है-
गजः + गर्जति जो गर्जति हाथी गर्जता है।
मनः + रथः मनोरथः मनोरथः
ईशः + जानाति = ईशो जानाति
प्रभु
विसर्ग को र
इकारि स्वर के परे विसर्ग हो उस से परे स्वर ह य व ल
न म वर्ग का ३ रा ४ था अक्षर हो तो विसर्ग को र
हो जाता है।
जानता
aho
यथा
कविः + याति-विर्याति काव जाता है।
शत्रुः + हतः = शत्रुहंतः
शत्रु मर गया
इन्दुः + अस्तगतः इन्दुरस्तगतः चांद अस्त हो गया।
रविः + उदात-रविरुदौत सूर्य उदय होता ह।
पतिः+प्रोषधीनां पतिरोषधीनाम् ओषधियों का स्वामी
है
विसर्ग का लोप
प्र के विना अन्य स्वर परे हो सो के आगे होने
वाली विसर्ग का लोप हो जाता है।
नरः + मायाति-नर आयाति प्रादमी पाता
देवः + आगतः देव आगतः देव आया ।
श्रा के आगे का विसर्ग लुप्त हो जाता है यदि परे
स्वर वर्ग का ३ रा ४ था ५ वां अक्षर वा य र ल वह
परे हों तो तथासः और ५षः का विसर्ग ३ उड़ जाता है
यदि परे व्यंजन हो।
यथा
cho
देवाः + यान्ति-देवा यान्ति देव जाते हैं।
मनुष्याः + गच्छन्ति मनुष्य जाते हैं
अश्वाः + धावन्ति-अश्वा धावन्ति घोड़े भागते
सः + देवः = स देवः
वह देव ।
एष: + रामः = पक्ष रामः यह राम ।
और दीर्घ
अई उ से परे र उड़ जाता है यदि परे र हो और
पूर्व स्वर दार्थ हो जाता है।
र लाप
।
यथा
पुनर् + रमते पुना रमते फिर खेलता है।
( १६ )
हरिर् + रम्यः हरीरम्यः हरि सुन्दर
है
गत्व विधिः
न कोण
न कोण हो जाता है यदि वह ऋ र बाष से परे
एक पद में हो।
यथा
पितरों का
पितृ + नाम्-पितृणाम्
नृ+ नाम-नृणाम्
मनुष्यों का।
चतुर्णा मुष्णति ।
ऋ ऋ ए और न के बीच यदि अट् कवर्ग पवर्ग
प्राङ् नुम् का व्यवधान भी हो पर पद एक हो तो न
कोण हो जाता है।
कृपणः रामाण वृंहणम्
पदान्त न को ण नहीं होता
नरान् + दातृन्मनुष्यान् ।
षत्व विधि स कोष
इण वा कग से परे म को व् हो जाता है यदि वह
प्रत्यय या आदेश रूप हो ।
यथा
दषु-त्रिषु-पाठष्याते-चतुषु
( १७ ) यदि इण वा कवर्ग और स के बीच में नुम् के नकार का अनुस्वार विर्सग इन में से कोई वर्ण हो तो भी स कोष हो जाता है अजन्त पुल्लिङ्ग (Masculine Gender) शर् हवींषि-धनुष्षु अकारान्त शब्दों की विभक्तियों के विकृत रूप नीचे दिये जाते हैं। एकत्रचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा औ प्राः द्वितीया म् प्रो গান तृतीया इन् भ्याम् ऐः चतुर्थी य भ्याम् भ्यः पंचमी प्रात् भ्याम् षष्ठी प्रोः मानाम सप्तमी इ श्रोः षु सम्बोधन ० औ प्राः विभक्ति भागे लगाने पर देव शब्द के रूप निम्न लिखित होंगे। देव (नाम) (A good) एकचन ৱিম্বৰৰ बहुवचन प्रथमा देवः देवो देवाः ( १८ ) द्वितीया देवम् तृतीया देवेन चतुर्थी देवाय पचमी देवात् (दू) षष्ठी देवस्य सप्तमी देवे सम्बोधन देव देवी देवाभ्यां देवाभ्यां दवाभ्यां देवयोः देवयोः दवा देवान् देवैः देवेभ्यः देवेभ्यः देवानाम् देवेषु दवा: निम्न लिखित अकारान्त पुंल्लिग वाची शब्दों के रूप भी देश की तरह होंगे। वाल लड़का भृत्य नौकर गाल गीदड़ घट घड़ा वात हपा चौर चौर सर्प सांप नाक स्वर्ग राजा मेघ वादल भूप सचिव चातक वजीर पांनी पाद प्रभंजन हाथ अश्व पपीहा अांधी घोड़ा विल्ला किनारा दर्या सजन माजार सुजन दुर्जन सिंह तट दुष्ट शेर नद ( १६ ) मयूर मोर चिड़ा बंदर कूप संसार चटक कुंपा संसार हरिण वानर मृग वृक्ष दरखत प्राश्रम प्राश्रम नर प्रादमी सेवक सेवक कव्वा मूर्ख प्राकारा प्रास्मान चालाक मूढ चतुर पंडित चकोर: छात्र शागिर्द पंडित चकोर अध्यापक उस्ताद इकारान्त शब्दों की विभक्तियों के रूप नीचे दिये जाते हैं। पकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथना RA द्वितीया ईन् भिः ना भ्यां तृतीया चतुर्थी पंचमी प भ्यां भ्यां प्रोः नाम् पंष्ठा सप्तमी संवोधन ग्रो प्रोः घु Char भं:
( २० ) - amera हरिभ्यः इकारान्त हरि (विष्णु) God) प्रथमा हरिः हरी हरयः द्वितीया हरिम् हरी हरीन् तृतीया हारेणा हरिभ्यां हरिभिः चतुर्थी हरये हारभ्यां पंचमी हरेः हरिभ्यां हरिभ्यः षष्ठी हरेः होः हरीणाम् सप्तमी हरौ हयों: हरिषु संबोधन हरे हरी इकारान्त अन्य शब्द जिन का उच्चारण हरि की तरह होगा। कवि कवि गिरि पर्वत वन्हि प्राग राशि ढेर नरपति राजा विधि भाग्य मणि अतिथि पाहुना रवि सूर्य प्रजापति कपि वानर अरि दुश्मन मुनि ऋषि ( २१ ) १० उकारान्त-साधु (Sage) उकारान्त साधु शब्द का उच्चारण भी हरि की तरह ही होगा प्रथमा साधुः साधू साधवः द्वितीया साधुम् साधू साधून तृतीया साधुना साधुभ्यां साधुभिः चतुर्थी साधव साधुभ्यां साधुभ्यः पंचमी साधोः साधुभ्यां साधुभ्यः षष्ठी साधोः साध्वोः साधूना सप्तमी साधौ साध्वोः साधुषु संबोधन साधा साधू साधवः उकारन्त अन्य शब्द ছন্ন पशु विभु पशु गुरु तरु विन्दु उस्ताद परशु कुल्हाड़ा वृक्ष बूंद इकारान्त-सखि-मित्र (Friend) सखा सखायौ सखायः सखायम् सखीन् सख्या सखिभ्यां सखिभिः प्रथमा द्वितीया तृतीया ( २२ ) चतुर्थी सख्ये सखिभ्यां सखिभ्यः पंचमी सख्युः षष्ठी सख्युः सख्योः सखीनाम् सप्तमी सख्यो सख्योः सखिषु संवोधन सखे सखायो सखायः इकारान्त-पति-स्वामी (Husband) प्रथमा पतिः पती पतयः द्वितीया पतिम् पती पतीन् तृतीया पत्या पतिभ्यां पतिभिः चतुर्थी पत्ये पतिभ्यः पंचमी पत्युः पतिभ्यां षष्ठी पत्युः पत्योः पतीनाम् सप्तमी पत्यौ पतिषु संवोधन पते पती पतयः यदि पति शब्द से पहिले कोई शब्द लगा हो तो उसके रूप हरि की तरह होंगे-यथा-प्रजापतिः प्रथमा प्रजापतयः (The creator of the world प्रजापतिः प्रजापती प्रजापतिम् प्रजापतिना-इत्यादि प्रजापतीन् द्वितीया तृतीया सुधियो ( २३ ) ईकारान्त-सुधी-बुद्धिमान् A (wise man) प्रथमा सुधीः सुधियः द्वितीया सुधियम् सुधियो सुधियः तृतीया सुधिया सुधीभ्यां सुधाभिः चतुर्थी सुधिये सुधीभ्यः पंचमी सुधिपः षष्ठी सुधियोः सुधियाम् सप्तमी सुधिधि सुधीषु सम्बोधन सुधी सुधियो सुधियः ऋकारान्त-पितृ-पिता (IFather) पिता पितरौ पितरः द्वितीया पितरम् पितृन् तृतीया पित्रा पितृभ्यां पितृभिः चतुर्थी पित्र पितृभ्यः पंचमी पितु: षष्ठी पितुः पित्रोः पितृणम् सप्तमी पितरि पितृषु संबोधन पितः पितरो पितरः ऋकारान्त कर्तृ-करने वाला (Docr) कर्ता कर्तारी कारः प्रथ प्रथमा ( २४ ) शेष पितृ वत् - द्वितीया कर्तारम् कर्तृन पत निम्न लिखित ऋकारान्त शब्दों के रूप फत की तरह होंगे- दातृ-देने वाला भोक्तृ-खाने वाला नपतृ-पोता वा दोता हन्त-मरने वाला गन्तृ-जाने वाला प्राकारान्त गो-बैल (Bullock) गौः गावौ SN प्रथमा गाव: द्वितीया गाम् गाः गधा गोभिः गोभ्यः गवे गोः गोभ्यः तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी सं० गोभ्यां गाभ्यां गोभ्यां गयो: गयोः गावी गवाम् गोः সৰি गौः गोषु गाव: अभ्यासः पिता पुत्रों को पालता है। चोर घर में दाखिल होते हैं। मोहर परिश्रम से पाठ नहीं पढ़ता।
६५ )
बन्दर वृक्ष की चोटी पर कूदते हैं ।
संसार के कर्ता को नमस्कार हो ।
कर्ण ने अपने वाहुबल में घटोत्कच को जीता।
राम मित्र को धन देता है।
साधु लोगों का धन परोपकार के लिये होता है
प्रजापति संसार को बनाता है ।
घोड़े घास खाते हैं।
कवि कालिदास रघुवंश का कर्ता है ।
भाई का भाई के साथ अपूर्व स्नेह है।
वुद्धिमानों के संग से दुर्गुण दूर हो जाते हैं
सज्जन पुरुष आपस में कलह नहीं करते।
बाना पशुओं को गांव को ले जाता है।
( २६ ) स्त्रीलिंग स्त्रीलिंग में प्राकारा शब्दों के आगे विभक्तियों के रूप नीच लिख गये हैं- एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथना इ म् इ भ्यां भिः ये भ्यां भ्यः द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्टी सप्तमी याः " " याः प्रोः नाम् याम् सु सं इ आकारान्त लता-वेल (creeper) प्रथप्रा लता लते लताः लताम् लतया लनाये लताभ्यां द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी लनाभिः लताभ्यः लतायाः लताभ्यां लताभ्यां लतयोः लताभ्यः लनाया: लतानाम् ( २७ ) सप्तमी लतायां लतयोः लतासु सं० लते लो लताः नीचे लिखे शब्दों के रूप लता की तरह होंगे- शाला स्थान प्रजा रिप्र.या रथ्या बाज़ार विद्या माला हार भार्या स्त्री सुधा अमृत प्रमदा स्त्री कन्या पुत्री বপন स्त्री बाला लड़की पीड़ा दद देवता देवी शिला चट्टान छाया साया तृषा प्यास जनता पब्लिक क्षमा क्षमा इकारान्त स्त्रीलिंग वाची शब्दों की विभक्तियों के रूप नीच दिये जाते हैं- प्रथमा औ ग्रः द्वितीया म् तृतीया प्रा भ्यां भिः चतुर्थी भ्यां भ्यः पञ्चमी प्राः षष्ठी प्राः सप्तमी प्राम प्रोः षु ऐ " प्रो:
( २८ ) " इकारान्त नदी-नहर (Stream) प्रथमा नदी नद्यौ नद्यः द्वितीया नदीम् नदीः तृतीया नद्या नदीभ्यां नदीभिः चतुर्थी ना नदीभ्यः पञ्चमी नद्याः षष्ठी नद्या: नद्योः नदीनाम् सप्तमी नद्याम् नधोः नदीषु नदि नद्यौ नद्यः इकारान्त अन्य शब्द जिन के रूप नदी की तरह होंगे। शब्द- अर्थ मही--पृथ्वी महिषी-रानी वापी-बावली सखी-सहेली राजकुमारी-राजपुत्री नगरी-शहर ऊकारान्त वधू-नौजवान स्त्री Maidan) वधूः वध्वौ वध्वः द्वितीया वधूम् वध्वौ वधूः प्रथमा Meturnea ( २६ ) वध्वाः वध्वः प्रथमा. तृतीया वध्या वधूभ्यां वधूनिः चतुर्थी वध्व वधूभ्यः पंचमी षष्ठी वध्योः वधूनाम् सप्तमी वयां वधूषु सम्बोधन वधु बध्वी ईकारान्त स्त्री-एक स्त्री (A roman) स्त्री स्त्रियो स्त्रियः द्वितीया स्त्रियं (स्त्री) स्त्री तृतीया स्त्रिया स्त्रीभ्यां स्त्रीभः चतुर्थी स्थिय स्त्रीभ्यः पंचमी स्त्रिया: षष्ठी स्त्रियोः स्त्रीण. सप्तमी स्त्रियां स्त्रियोः स्त्रीषु सम्बोधन स्त्रि स्त्रियो स्त्रियः ईकारान्त श्री--लक्ष्मी (Goddess of wealth)- प्रथना श्रीः थियो श्रियः द्वितीया श्रियं तृतीया প্রকা श्रीभ्यां श्रीभिः. चतुर्थी . " श्रिये (ये) :
( ३० ) " पंचमी श्रियाः (यः) 'पष्ठी श्रियोः श्रीणां श्रियां) सप्तभी श्रियां यि श्रीषु सम्बोधन श्रीः श्रियो श्रियः इकारान्त-मति-बुद्धि (Intelligence) प्रथमा मतिः मती मतयः द्वितीया मति मती: तृतीया मत्या मतिभ्यां मतिभिः चतुर्थी मत्यै . तये) मतिभ्यः पंचमी मत्याः (ते) षष्ठी मत्योः मतीनां सप्तमी मत्यां ( तौ) मतिषु सम्बोधन मते मती मतयः " " " उकारान्त रज्जु शब्द-रस्सी Rope) थमा रज्जूः ।" द्वितीया तृतीया चतुर्थ: पंचमी षष्ठी रज्जुम् रजवा रज्जुभ्यां रजा (ज्जवे) रज्ज्वाः ( जोः) रज्जवोः रज्जुभिः रज्जूभ्यः रज्जूनां ( ३१ ) सतमी रजयां (जौ) रज्ज्वोः सम्बोधन रज्जो रज्जू रज्जवः धेनु के रूप भी इसी प्रकार होंगे। ऋकारान्त मातृ-माता (Mother) प्रथता माता मातरी मातरः द्वितीया माता मातृः तृतीया मात्रा मातृभ्यां मातृभिः चतुर्थी मात्र मातृभ्यः पंवमी मा: पठी मात्रोः मातृणां सप्तमी मातार मातृषु सम्बोधन मातः मातरी मातरः ऋकारान्त स्वरह-बहिन (Sister) प्रथमा स्यमा स्वसारौ स्वसार: " द्वितीया स्पसा स्वस्ः - शेष मातृ वत्- बोकारान्त गो-गौ (Cord) गौः गावा प्रथमा गाव: गाम् द्वितीया तृतीया गा गोभ्यां गोभिः ( ३२ ) गवे गोभ्यः गोः चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी गवोः गवाम् गवि गोषु औकारान्त नौ-किश्ती (A Boat) नौः नावी नावं नावा नौभ्यां नौभिः नावे नौभ्यः प्रथमा नाव: नाव: " द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सतनी नाव: नावोः नावां नौषु नावि अभ्यासः तृष्णा से मनुष्यों की बुद्धि नष्ट हो जाती है । विद्या से मनुष्य की पूजा सब जगह होती है । विष्णु की स्त्री का नाम श्री है । काशी गंगा के तट पर स्थित द्रौपदी के स्वयम्वर में पांडव ब्राह्मणों के वेष में उपस्थित थे। मुभद्रा के पति का नाम अर्जुन और भाई का कृष्ण था। पूर्णिमा की रात्रि को चन्द्रमा का बिम्ब पूर्ण होता है ।
( ३३ )
रमा की सास उसके लिये एक घोड़ा लायेगी।
रस्सी को सांप न समझो।
गौ का दृध अमृत समान होता है
वेदों को श्रति और धर्म शास्त्रों को स्मृति कहते हैं ।
नारिये नदी पर स्नान के लिय जाती हैं।
लड़कियां बवली। जल के घड़े लाती हैं ।
प्राचीन काल में माता पिता अपनी लड़कियों का विवाह स्वयम्बर में
करते थे।
वर्षा ऋतु में नदियों का जल बढ़ जाता है और गंदला हो जाता है।
मनुष्य अपनी शक्ति हिंघ ज.वों को भी बरा कर लेते हैं।
( ३४ ) नपुंसक लिंग अकारान्त पत्र-पत्ता (A leaf) प्रथना पत्रम् पत्रे पत्राणि द्वितीया पत्रम् पत्रे पत्राणि शेष देव की तरह ए० प्रथमा ६ ई अकारान्त नपुंसक लिंग के आगे विभक्तियां निम्नलिखित हैं द्वि० म् द्वितीया इ सं० नपुंसक में दन्ति शब्द नहीं होने ---- इकारान्त उकारान्त ऋकारान्त शब्दों की विभक्तियां- नीचे दी गई हैं। ० द्वि० chao cho . इ प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी प्रा भ्यां भिः ए मरः असू " ( ३५ ) षष्ठी सप्तमी षु असू प्रो: प्राम इ प्रोः इकारान्त वारि जल (Water) वारि वारीणी वारामिण वारिभ्यां वारिभिः प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी पष्टी सप्तमी वारिभ्यः वारिणा वारिणे वारिणः वारिणः वारण वारे वारिणोः वारिणाम् वारिषु वारीणि सं० बारिणी दधि-दही (Curd) प्रथना दधि द्वितीया दवि तृतीया दना चतुर्थी पंचमी दधिनी दधिनी दधिभ्यां दधीनि दधीनि दविभिः दधिभ्यः षष्ठा दनोः सप्तमी सं० दनि धनि) दधे धि) दनाम् दधिषु दीनि दाधिन
( ३६ )
प्रथमा
अक्षिवत्
अस्थि-हड्डी (Boee)
अस्थि
अस्थिनी अस्थीनि
द्वितीया
तृतीया अस्था-शेष दधिवत्-
अति अांख
सक्थि
उकारान्त मधु-शहद (Honey)
मधु मधुनी मधूनि
द्वितीया
तृतीया
मधुना-शेष वारिवत्
ऋकारान्त कर्तृ-करने वाला
प्रथमा कर्तृ कर्तृणी कतणि
द्वितीया
तृतीया कर्तृणा कर्तृभ्यां-शेप वारिवत् ।
प्रथमा
"
"
अभ्यासः
कमल के पत्र बड़ कोमल हैं।
ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं होती।
गंगा का जल शीतल और मीठा है ।
दधीचि ने अपनी हड्डियां इन्द्र को दी।
भैसं का दही स्वादु होता है।
( ३७ )
मेरी वाणी शहद की तरह मीठी हो।
शहद की मिठास जिह्वा को आनन्द देती है।
ब्रह्मा संसार का कर्ता है।
तालाब के जल में सुन्दर क.मल खिले हैं।
दही और शहद से मधुपर्क बनता है ।
नदियों के जल से प्यास शान्त होती है ।
रघु का जन्म सूर्य कुल में हुआ था ।
मित्र विपत्ति में भित्र का साथ नहीं छोड़ते ।
वृक्ष के पत्तों में रात्रि का अन्धकार लीन होता है।
लड़की फूरने की माला बनाती है ।
गुलाब के फूल कैसे
सुन्दर
और सुगन्धित हैं।
मनुष्य जल के विना नहीं जा सकता।
शुद्ध भोजन से मनुष्य की बुद्धि शुद्ध होती है और शरीर बलवान्
होता है।
( ३८ ) सर्वनाम (Pronoun) संज्ञा की पुनरुक्ति दूर करने के लिये जो उस शब्द की जगह प्रयुक्त किया जाता है उसे सर्वनाम कहते हैं। संज्ञा शब्द के लिंग और वचन के अनुसार ही सर्वनाम के लिंग वचन और विभक्ति होती है अकारान्त सर्वनामों की पुल्लिंग में विभक्तियों के रूप नीचे दिये जाते हैं । एकवचन द्विवपन बहुधवन औ द्वितीया प्रान् तृतीया भ्यां ऐः चतुर्थी स्मै भ्यः पश्चमी स्मात् षष्ठी श्रोः पाम् सप्तमी घु प्रथमा मू : स्य स्मिन् " किम्--कौन who को प्रथमा के कम् कान् काभ्यां का द्वितीया तृतीया चतुर्थी पश्चमी केन कस्मै कभ्यः कस्मातू " ( ३६ ) षष्ठी कस्य कयोः केपाम् सप्तमो कस्मिन् केषु रालिंग में अकारान्त सर्वनामों की विभक्तियों के रूप प्रथमा chor cho भ्यां भिः प्रा स्ट भ्यः द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी पटी सप्तमी स्य: भ्यः भ्यां : स्पा: साम् स्य.म् किम्-स्त्रीलिंग प्रथा का क काः काम् काभ्यां काभिः द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी कस्य कस्याः कयोः कासाम् सन्नी कस्यां कासु नपुंसक के प्रथना किम् कानि (४० ) प्रथा द्वितीया किम् के कानि तृतीया केन-शेष रामवत् सर्व-( सब ) पुल्लिंग (All) सर्वः सर्वी हिनीया सर्वम् सर्वान् तृतीया सर्वे सर्वाभ्यां सर्वः चतुर्थी सर्वस्मै सर्वेभ्यः पञ्चमी स्मात् षष्ठी सर्वस्य सर्वयोः सर्वेपाम् सप्तमी सर्वस्मिन् संपु नपुंसक प्रथमा स सर्वाणि द्वितीया शेष पुल्लिंग की तरह। स्त्रीलिंग सर्वम् प्रथमा सर्व सर्वाः । द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी सर्वा सर्वाम् सर्वया सर्वस्य सर्वस्याः सर्वाभ्यां सर्वाभिः सर्वाभ्यः " प्रथा ( ४ ) षष्ठी सर्वयोः मर्वासाम् सप्तमी सर्वस्याम् सर्वासु पूर्व-पूर्वदिशा-पुल्लिंग (east) पूर्वः पूर्वी पूर्व पूर्वाः द्वितीया पूर्वम् पूर्वान् तृतीया पूर्वाभ्यां पूर्व चतुर्थी पूर्वस्मै (पूर्वाय) पूर्वेभ्यः पञ्चमी पूर्वस्मात् (पूर्वात्),, षष्ठी पूर्वस्य पूर्वयोः पूर्वेपाम् सप्तमी पूर्वास्मिन् पूर्वेषु (पूर्व) स्त्रीलिंग पूर्व पूर्वण प्रथमा पूर्वाः पूर्वा पूर्व द्वितीया पूर्वाम् तृतीया पूर्वया पूर्वाभ्यां चतुर्थी पूर्वस्यै र्वायाः) पञ्चमी पूर्वस्यः ( याः) षष्ठी पूर्वयोः सप्तमी पूर्वस्यां ( यां), पूर्वामिः पूर्वाभ्यः " पूर्वासां पूर्वासु ( ४२ ) नपुंसक पूर्व प्रथमा पूर्वाणि पूरम् द्वितीया शेष पुल्लिङ्ग वत् " तत् वह-पुल्लिंग (that) प्रथमा ते तो तौ तम् तान् तेः ताभ्यां तेन तस्मै तेभ्यः द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी सक्षमी तस्मात् ताभ्यां तस्य तयोः तेभ्यः तेषाम् तेषु तत्तिन् नपुंसक प्रथमा ततू तानि. द्वितीया शेष पुगि की तरह-- एतत्-(यह) प्रथमा में एषः यत्--(जो) प्रथमा में यः शेष किम् की तरह-- ( ३ ) युष्मद् तुम (you) प्रथमा त्वं युवाम् त्वां त्वया युवाभ्यां युवाभ्यां यूयं युप्मान् युष्माभिः युष्मभ्यम् युष्मत् युप्मारम् द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी सतमी तुभ्यं त्वत् तव युवयोः त्वयि युष्मासु अस्मद् हम (we) प्रायां प्रयता अहं वयं माम् अस्मान अस्माभिः मया ग्रावाभ्यां मा अस्मभ्यं " द्वितीका तृतीया चतुर्थी पञ्चमी पाठी सप्तमी winnerutane मत् अस्मत् पापयोः मपि अस्मासु इदम् (यह) पुल्लिंग (this) प्रय इमो इमा इमान् अनेन प्राभ्यां पनिः प्रथमा द्वितीया तृतीया ( ४४ ) प्रस्मै अस्मात् चतुर्थी पंचमी षष्टी सतमी अस्य अनयोः पषाम् अस्मिन् नपुंसक प्रथमा मे इमानि " " द्वितीया शर पुल्लिंगवत् स्त्रीलिंग हमे प्रथमा इमाः इमा प्राभ्यां ग्रामिः अनया अस्य प्राभ्यः " द्विती तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सत्ती अस्याः " अस्याः अनयाः प्रासाम् अस्यां प्रासु अदर वह -पुलिंग (that) असो अमू अमी अमुम् अमून् अमुना अमूभ्यां श्रमीभिः प्रथमा द्वितीया तृतीया ( ४५ ) अमीभ्यः अमीर अमीषु अनूनि अमाने AdSenioriament चतुर्थी अमुस्मै पंचमी अमुष्मात् पठी अमुष्य अमुयोः सप्तमी अमुष्मिन् नपुंसक प्रथमा प्रदः अमू द्वितीया अदः अमू शेर पुल्लिंग की तरह स्त्रीलिंग प्रयमा असो अमू द्वितीया अमूम् तृतीया अमुया अमूभ्यां चतुर्थी अमुष्यै पंचमी प्रमुप्याः अमूभ्यां षष्टा प्रमुष्याः अमुयोः सप्तमी अमुष्पां उभ (दोनों) (Both) पुलि। स्त्रीलिंग प्रथमा उभौ उभे द्वितीमा उभौ उभे अमृः अमूभिः अभ्यः अभ्यः अमूषाम् अमूषु नमक उभ उभे.
( ४६ )
उभाभ्यां
उभाभ्यां
उभाभ्यां
तृतीय
चतुर्थी
पंचमी
षष्ठी
सप्तमी
"
उभयोः
उभयोः
उभयोः
"
"
द्वितीय तृतीय का उच्चारण पूर्व की तरह होगा।
अभ्यासः
महाराजा रघु ने अपनी सारी सम्पत्ति भिक्षुओं को दे दी ।
सूर्य पूर्व दिशा में उदय होता है और पश्चिम में अस्त ।
महाराज पाण्डु के दूसरे पुत्र का नाम भीम और तीसरे का
अर्जुन था ।
महानुभावों के लिये सारा संसार अपना कुटुम्ब होता है ।
इस पुस्तक का कर्ता कौन है।
यह स्वर्ण मन्दिर किस ने बनवाया था।
यह सोने का कड़ा किस को दूं।
आप के पिता इन दिनों कहां रहते हैं।
यह वह ही बालक है जिसे मैंने सड़क पर देखा था।
इस को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं ।
कौन जानता है कि कल क्या होगा।
यह मेरा प्रिय मित्र विदर्भ का राजा है ।
( ४७ )
इस शून्य वन में पदिले कौन रहता था ।
जो सत्य नहीं बोलता लोग उसका विश्वास नहीं करत ।
मरते समय महाराणा प्रताप ने क्या प्रतिज्ञा की थी ?
छत्रपति शिव का नाम कौन नहीं जानता ।
(४८ ) हलन्त शब्द- (अन् अन्त) राजन् राजा a king प्रयता राजा गजानौ राजानः गजातम् राज्ञा राजभ्याम् राजभिः राजे राजभ्यः " द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी संबोधन गज्ञः " राज्ञो: राज्ञाम् राशि (जनि) रासु राजन् राजातो राजा: प्रात्मन्-अपना the stl: soul प्रथमा ग्रात्मा प्रात्मानौ प्रात्मान: श्रात्मानम् मात्मनः प्रात्मभ्यां मात्मभिः प्रात्मना प्रात्मने द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी समप्ती सन्योवन प्रात्मनः " प्रात्मनः प्रात्मनः प्रात्मनाम प्रात्मनः प्रात्मसु आत्मनि प्रात्मन् मात्मनों प्रात्मानः ( ४६ ) प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी सम्बोधन मघवन्-इन्द्र (Indra) मघवा मघवानी मघवानः मघवानम् मघोनः मघोना मघवभ्यां मघवभिः मघोने मघवभ्यः मघानः मघोनोः मघोनाम् मघोनि मघवसु मघवन् मधवानी मघवान: श्वन्-(कुत्ता) the Dog श्वानी प्रथमा श्वानः श्वानम् शुनः द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी श्वभिः शुना शुने श्वभ्यां श्वभ्यां श्वभ्यः शुनः षष्ठी " सप्तमी सम्बोधन थन् शुनोः शुनाम् शुनि श्वसु श्वानो श्वानः युवन्-जवान Young Man) युवा युवानी युवानः प्रथमा ( ५० ) द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी 38 युवानम् यूनः यूना युवभ्यां युवभिः यूने युवभ्य. यूनः यूनो: यूनाम यूनि यूनोः युवसु युवानी युवानः नामन्-नाम (nanme) नपुंसक सम्बोधन युवन् नाम प्रथम द्वितीया नाम प्रथमा कर्म कर्म नामनी नामानि नामनी नामानि शेष राजन् की तरह कर्मण्-कर्म (action) कर्मणी कर्माणि कर्मणी कर्माणि शष प्रात्मन् की तरह अहन्-दिन (a day) अन्ही (हनी) अहानि द्वितीया .. प्रथम अहः द्वितीय तृतीया चतुर्थी अहोभ्यां अन्हा अन्हें अहोभिः अहोभ्यः पंचमी षष्ठी सप्तमी सम्बोधन अन्हाम् ( ५१ ) अहोभ्यां अन्होः अन्हि (हनि) प्रहः अन्ही (हनी) अहानि इन् अन्त पथिन् रास्ता ( A road ) प्रथमा पन्थाः पन्थानो पन्थान: पन्थानं पथः पथा पथिभ्यां पथिभिः पथिभ्यः पथे द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी सप्तमी पथः . पथोः पथाम पथि पथिषु शशिन् चांद ( Moon) प्रथमा शशिनौ शाशनः शशी शशिनम् शशिना शशिने शशिनः द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी शशिभ्यां शशिभिः शशिभ्यः शशिनो: शशिनाम् ( ५२ ) सप्तमी शशिषु शशिनः सं० शशिनि शशिनोः शशिन् शशिनी भाविन् भावि भाविनी भावि भाविनी शेष शशिन्वत् शतृ अन्त प्रथमा भावीनि भावीनि द्वितीया - पठत्-पढ़ता हुअा (Reading) प्रथमा पठनू पठन्तो पठन्तः द्वितीया पठन्तम् पठतः तृतीया पठता पठभ्यां पठद्भिः चतुर्थी पठते पठभ्यां पठभ्यः पञ्चमी पठतः षष्ठी पठनो पठताम् सप्तमी पठति पठत्सु सम्बोधन पठन् पठन्तो पठन्तः इसी प्रकार गच्छत् प्रादि- नपुंसक प्रथमा पठत् (द) पठन्ती पठन्ति द्वितीया शेष पुंल्लिंग की तरह- " ( ५३ ) (Civing) ददत् ( देता हुश्रा) प्रथमा ददतू ददतौ ददतः द्वितीया ददतम् " ददभ्यां ददभिः तृतीया चतुर्थी पंचमी ददता ददते दद्भ्यः " ददतः " षष्ठी ददताः " ददताम् सप्तमी ददति स० ददत् ददतौ ददतः ददती स्त्रीलिंग नदीवत् नपुंसक प्रथमा ददत् दू ददती ददति न्ति द्वितीया सं० भवत् श्राप (You प्रथमा भवन्तौ भवन्तः भवान् शेष पठत् की तरह ( ५४ ) प्रथमा " मतुप् (मत् ) अन्त बुद्धिमत् बुद्धिमान् a wise बुद्धिमान् बुद्धिमन्तौ बुद्धिमन्तः द्वितीया बुद्धिमन्तं बुद्धिमतः तृतीया बुद्धिमता बुद्धिमभ्यां बुद्धिमदभिः चतुर्थी बुद्धिमते बुद्धिमभ्यः पंचमी बुद्धिमतः षष्ठी बुद्धिमतोः बुद्धिमताम् सप्तमी बुद्धिमति बुद्धिमतोः बुद्धिमत्सु सं० बुद्धिमन् बुद्धिमन्ती बुद्धिमन्तः स्त्रीलिंग बुद्धिमती नदीवत् नपुंसक बुद्धिमत् द् बुद्धिमती बुद्धिमन्ति द्वितीया सं० इसी तरह धीमन् आदि महन् बड़ा ( Great ) महान् महान्तो महान्तः द्वितीया महान्तम् महतः तृतीया महता शेष धीमन् की तरह- प्रथमा " " तए प्रथमा प्रथमा ( ५५ ) वस् अन्त विद्वस् विद्वान् ( A learned man ) विद्वान् विद्वांसो विद्वांसः द्वितीया विद्वांसम् विदुषः तृतीया विदुषा विद्वभ्यां विद्वभिः चतुर्थी विदुषे विद्वदभ्यः पंचमी विदुषः षष्ठी विदुषोः विदुषाम सप्तमी विदुषि विद्वत्सु सं० विद्वन् विद्वांसो विद्वांसः " स्त्रीलिंग विदुषी नदी की तरह नपुंसक प्रथमा द्वितीया सं० विदुषी विद्वांसि पुमस् अादमी (a man) विद्वत् दू पुमांसौ प्रथमा पुमान् द्वितीया पुमांसम तृतीया पुंसा चतुर्थी पुसे पंचमी पुंसः षष्ठी पुमांसः पुंसः पुंभिः 'भ्यः 'भ्याम् पुंसोः पुंसाम् प्रथमा सप्तमी पुंसि पुंसु सं० पुमन् पुमांसौ पुमांसः ईयस् अन्त श्रेयस् अच्छा Batter) श्रेयान् श्रेयांसो श्रेयांसः द्वितीया श्रेयांसम् श्रेयसः तृतीया श्रेयसा श्रेयोभ्यां श्रेयोभिः चतुर्थी श्रेयसे श्रेयोभ्यः पंचमी श्रेयसः षष्ठी श्रयसोः श्रेयसाम् सप्तमी श्रेयसि श्रेयःसु स० श्रेयन् श्रेयांसो श्रेयांसः स्त्रीलिंग श्रेयसी नदी वत् नपुंसक प्रथमा द्वितीया सं० श्रेयः श्रेयसी श्रेयांसि अप्जल (IVater) अप शब्द का केवल बहुवचन ही होता है । प्रथमा सं० प्रापः द्वितीया अपः तृतीया अभिः
५७ )
अद्भ्यः
चतुर्थी
पंचमी
अदभ्यः
अपाम्
षष्ठी
सप्तमी
अप्स
अभ्यास
प्रजा से कर लेकर भी जो राजा
प्रजा का पालन नहीं करता
प्रजा उसका शासन नहीं मानत।।
जैसा राजा वैसी प्रजा।
witho
----
मनुष्य अपने कर्मों से ऊंचा वा नीचा हो जाता
प्रत्येक युवक का कर्तव्य है कि वह देश और समाज का भक्त हो
बड़े लोग जिस से चल वही रास्ता है ।
एक साधु ने रास्ते में एक अन्धे को देखा ।
आप की सभा में विद्वान् लोग प्रति दिन शास्त्र चर्चा करते हैं।
विद्वान् का मान सब जगह होता है राजा का केवल अपने
देश में।
वह ही पुरुष अच्छा है जो अपने वंश क नाम उज्ज्वल करता है।
न चलता हुआ गरुड़ एक पद भी नहीं चल सकता ।
मैंने पढ़ते हुए छात्रों को एक पुस्तक दी।
स्वामी अपने कुत्ते की स्वामी भक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हुआ।
( ५२ )
चांदनी चांद के साथ जाती
बड़े लोग बड़ों को ही अपना विक्रम दिखाते हैं।
बुद्धिमान् लोग बुद्धि के बल से असाध्य कार्यों को भी सिद्ध कर
लेते हैं।
जो बलवान् निर्बलों की रक्षा नहीं करता उसके बल से क्या ।
होने वाले ( भाविन ) अनर्थो को कौन टाल सकता है ?
मधुलिहे " " हलन्त व्यञ्जनान्त मधुलिहू भौरा ( A bee) प्रथमा मधुलिट् (इ) मधुलिही मधुलिहः द्वितीया मधुलिहम तृतीया मधुलिहा मधुलिड्भ्यां मधुलिभिः चतुर्थी मधुलिड्भ्यः पञ्चमी मधुलिहः षष्ठी मधुलिहोः मधुलिहाम् सप्तमी मधुलिहि मधुलिट्सु सम्बोधन मधुलिट् ( ड्) मधुलिही मधुलिहः स्त्रीलिंग उपानह् जूता ( A shoe ) प्रथमा उपानत् (द) उपानही उपानह: द्वितीया उपानहम् तृतीया उपानहा उपानदुभ्यां उपानदभिः चतुर्थी उपानहे उपानदूभ्यः पञ्चमी उपानह: षष्ठी उपानह: उपानहोः उपानहां सप्तमी उपानहि उपानत्सु सम्बोधन उपानत् दू उपानही उपानह:
(६० ) चकारान्त जलमुच बादल (cloud) प्रथमा जलमुचः " जलमुग्भिः जलमुग्भ्यः जलमुक् (ग) जलमुचौ द्वितीया जलमुचं तृतीया जलमुचा जलभुग्म्यां चतुर्थी जलमुच पञ्चमी जलमुचः षष्ठी जलमुचोः सप्तमी जलमुचि सम्बोधन जलमुक (ग) जलमुची वाच वाणी Speech जलमुचाम् " जलमुतु जलमुचः प्रथम वाकग वाची वाचः शेष जल मुच् वत्- ऋत्विज् (यज्ञ कराने वाला) प्रथमा ऋत्विक् ग ऋत्विजी ऋत्विजः द्वितीया 'ऋत्विजम् तृतीया त्विजा ऋत्विग्भ्यां ऋत्विगभिः चतुर्थी ऋत्विजे ऋत्विम्भ्यः पञ्चमी ऋत्विजः पष्ठी ऋत्विजोः ऋत्विजां " " ( ६१ ) प्रथमा विश्वसृजः सप्तमी ऋत्विजि ऋत्वितु सम्बोधन ऋत्विक् ग् ऋत्विजो ऋत्विजः स्त्रीलिंग स्रज् माला Garland प्रथम स्रजी द्वितीया स्रजम् शेष ऋत्विज की तरह- (Creator of the world) विश्वरमृज् ब्रह्मा विश्वसृट् ड़ विश्वसृजौ द्वितीया विश्वसृजम् तृतीया विश्व सृजा विश्चमृड्भ्यां विश्व सृडभिः चतुर्थी विश्वसृजे पंचमी षष्ठी विश्वसृजः वित्र सृजाम् मसी विश्वसृजि (stage) परिव्राज्-सन्यासी परिव्राट् ड् परिवाजो परिव्राजः शेष विश्वसृज् की तरह भूभृत्-पर्वत ( Mountain ) भूभृत् दू भूभृतौ भूभृतः द्वितीया भूभृतम् विश्वसृभ्यः विश्वसृजः विश्स्ट प्रथमा प्रथमा ( ६२ ) " तृतीया भूभृता भूभृद्भ्यां भूभृद्भिः चतुर्थी भूभृते भूभृद्भ्यः पंचमी भूभृतः षष्ठी भूभृतोः भूभृताम् सप्तमी भूभृति भूभृत्सु सम्बोधन भूभृत् दू भूभृतौ भूभृतः स्त्रीलिंग सरित् नदी "प्रथमा सरित् दू सरितो सरितः द्वितीया सरितम् शेष भूभृत् की तरह नपुंसक जगत् संसार 'प्रथमा जगत् दू जगती जगन्ति द्वितीया शेष पुलिंग की तरह संपद् ऐश्वर्य (Wealth) प्रथमा संपत् दू संपर्दो संपदः द्वितीया संपदम् तृतीया संपदा संपदभ्यां संपदभिः चतुर्थी संपद संपदभ्यः पञ्चमी संपर: षष्ठी संपदोः संपदाम् " ( १३ ) संपत्सु संपदः सुधः तुद्भिः तुभ्यः " सप्तमी संपदि सम्बोधन संपत् दू संपदो तुध् भूख (Hunger) प्रथमा सुत् द् तुधौ द्वितीया तुधम् तृतीया तुधा तुभ्यां चतुर्थी तुधे तुभ्यां पश्चमी तुधः षष्ठी तुधोः सप्तमी तुधि तुधोः तुधौ पुर् स्त्रीलिंग पुर (town) पू. पुरी द्वितीया पुरम् तृतीया पुरः पूर्यो चतुर्थी पुरे पञ्चमी षष्ठी पुरोः सप्तमी पुरि पुरी तुधाम् तुत्सु तुधः सम्बोधन तुत प्रथमा पुरः पूर्भिः पूर्यः पुगम पूर्षु सम्बोधन पू. पुरः ( ६४ ) प्रथमा गिर-वाणी (Speech) गीः गिरौ शेष पुर की तरह- गिरः यादृश्-जैसा ( Alike ) यादृशः याहारमः यादग्भ्यः " याहशाम् याहतु याइशः प्रथमा यादग यादशौ द्वितीया यादशम् तृतीया यादृशा यादग्भ्याम् चतुर्थी यादृशे पंचमी यादृशः षष्ठी यादृशाः सप्तमी याशि सं० यादक् ग यादशौ इसी तरह तादृश् त्वादृश के रूप होंगे- दृश् स्त्रीलिंग-प्रांख प्रथमा हकग दृशो शेष पुल्लिंग यादृश् की तरह नपुंसक यादृश् प्रथमा द्वि० सं० यादृक् ग यादृशी शेष पुल्लिंगवत् दृशः याशि ( ६५ ) प्रथमा द्वितीया तृतीया विश् -वैश्य (Banya) विट ड् বিঘী विशः विशम् विशा विड्भ्यम् विड़भिः इत्यादि ব্রি যন্ত प्रथमा द्विट् ड् द्वियों द्विषः इत्यादि- धनुष्-धनुष नपुंसक (Bow) प्रथमा धनुः धनुषी धनूषि द्वितीया तृतीया धनुषा धनुभ्यों धनुभिः चतुर्थी धनुषे धनुर्व्यः पंचमी धनुषः षष्ठी धनुषोः धनुषाम् सप्तमी धनुषि धनुष्षु इसी तरह हविष् चतुष् आदि आशिष् आशीर्वाद स्त्रीलिंग प्रथमा प्राशी: ন্সী अाशिषः द्वितीया आशिषम् "" अाशिषा प्राशीभ्याम् तृतीया चतुर्थी प्राशीभिः प्राशीभ्यः माशिष पञ्चमी अाशिषः षष्ठी अाशिषोः आशिषाम् आशिष्षु सप्तमी आशिषि चन्द्रमस चांद (the moon. प्रथमा चन्द्रमाः चन्द्रमसौ चन्द्रमसः चन्द्रमसम् द्वितीया तृतीया चतुर्थी चन्द्रमोभ्यां चन्द्रममा चन्द्रमसे चन्द्रमोभिः चन्द्रमोभ्यः पञ्चमी चन्द्रमसः पष्ठी चन्द्रमसोः चन्द्रमसाम् सप्तमी चन्द्रममि चन्द्रमस्सु यशस् नपुंसक कीर्ति प्रथमा यशः यशपी यशांति द्वितीया सं. शेष चन्द्रमस् की तरह
( ६७ )
अभ्यास (Exercise)
भौरे कमल के फूल का रस पीते हैं ।
देव जूते से रास्ते के कांटों को चूर्णित करता है।
जिस के पाओं में जूता है सारी पृथ्वी उस के लिये चमड़े
से ढपी है।
बादल समुद्र का खारी पानी पीते हैं ।
आज आकाश बादलों से घिरा है।
मनुष्य वाणी से सारे संसार को अपना मित्र बना लेता है।
ऋत्विक लोग यज्ञ वेदी पर मंत्रों का उच्चारण कर रहे हैं।
यह फूलों की माला सक) राजा के गले में शोभा देता है
सृष्टिकता (विश्वसृज ) की विचित्र सृष्टि किस को मोहित नहीं
करती।
है
सन्यासी लोग परिबाज़ निष्काम कर्म करते हैं।
( मनस ) मन बड़ा चञ्चल
राजा का यश ( यशस् । पृथिवी पर फैलता है।
पर्वतों की भूभृत् ) चोटी पर बर्फ पड़ती है
गंगा नदियों में ( सरित् ) परम पवित्र है
संपत्ति में ( संपद् ) जिसे हर्ष नहीं विपत्ति में ( विपद् ) शोक
वह ही मनुप्य धीर है।
( ६८ )
वह बालक भूख से ( क्षुध् ) व्याकुल हो रहा है ।
जैसा ( यादृश् ) गुरु वैसा ( तादृश् ) चेला ।
वणियों का ( विश् ) धन विवाह के काम आता है ।
राजा का नाम सुनकर ही उसके शत्रु ( द्विषु ) भाग गये।
अर्जुन के धनुष का ( धनुष् ) नाम गांडीव था ।
गुरु के आशीर्वाद से ( आशिष ) मेरे सारे कार्य सिद्ध हुए।
आकाश में चन्द्रमा के ( चन्द्रमस् ) विम्ब को देखकर चकोर
प्रसन्न होता है।
( ६६ ) zate TT First Conjugation भ्वादिगण में धातु से आगे सार्य धातुक विभक्तियों में गण विकरण शप ( अ ) लगाया जाता है- भ्वादि गण पट् पढ़ना ( to read ) वर्तमान काल लट (Present tense) एकवचन द्वि बचन वहुवचन प्रथम पुरुष पठान पठन्ति मध्यम पुरुष पठसि पठथ पठामि पठावः पठामः लोट (Imperative mood) इसका प्रयोग प्राज्ञा, निमंत्रणा, उपदेश, प्रार्थना, आशीर्वाद आदि अर्थों में किया जाता है। पठतः पठथः उत्तम पुरुष एकवचन द्वि वचन बहुवचन पठत उ० पु० पठाव प्र. पु० पठतु ( तात् ) पटताम् पठन्तु म० पु० पठ (बात ) पठतम् पठानि पठाम भूतकाल ( लङ् ) (Past tense) अनद्यतन भूत अर्थ में लङ् की विभक्तियें की विभक्तिये धातु के आगे लगती हैं।
( ७० ) और प्रत्येक धातु से पूर्व अ लग जाता है- द्वि वचन एकवचन बहु वचन प्र० पु. अपठलू अपठताम् अपठन म० पु० अपठः अपठतम् अपठत उ० पु० अपठम् अपठाव अपठाम fare forte ( potential mood ) - इस की विभक्तियां धातु से आग प्राज्ञा निमंत्रण आमंत्रण सविनय-निवेदन प्रार्थना और विचार इन अर्थों में लगाई जाती हैं- प्र० पु० पठेत् पठताम् पंठयुः म० पु० पठेः पठेतम पठेत पठेयम् पठेव पटम जैसे उसे पढ़ना चाहिये। उ० पु० भविष्यत् काल लुट् (Future) प्र०पू० म० पु० पठिष्यति पठिष्यतः पाठेष्यन्ति पठिष्यास पठिष्यथः पठिष्यथ पठिष्यामि पठिष्याव: पठिष्यामः लुट् की विभक्तिये धातु से प्रागे भविष्यत् अर्थ में लगाई जाती हैं। जैसे पढ़ेंगे। उ० पु० ( ७१ ) भंवत्, बंदत्, वदिष्यति, , नीचे लिखे धातु परस्मैपद में पठ् की तरह होंगे। भू ( भव् ) होना to be | भवति, भवतु, अभवत्, भविष्यति, apart to speak. वदति, वदतु, अवदत, रक्ष रक्षा करना to protect | रक्षति रक्षतु अरक्षत् रक्षेत् रक्षिष्यति नम् अकना to bend | नमति नमतु अनमत् नमेत् नमिष्यति गम् ( गच्छ) togo गच्छति गच्छतु अगच्छत् गच्छेत् गमिष्यति 479 FIAT to cook ! पचति पंचतु अपचत् पचेत् पचिष्यति जि (जय ) to conquer | जयति जयतु अजयत् जयेत् जेष्यति । क्षि (क्षय ) नाश होना to inste away क्षयात क्षयत् अक्षयत् क्षयेत् क्षयिष्यति। धौ ( धाव ) भागना to run धावति घावतु थधातू धावत् धाविष्यति। सद् मीद्) क्षीण होना to decay सीदति सीदतु असीदत सीदिष्यति । Kammarwa सीदेत् ( ७२ ) -- oth- दंश ( दश् ) काटना to bite दशति दशतु प्रदशतू दशेत् दशिष्यति पा (पित्र ) पीना trdrink पिवति पिवतु अपिवत् पिवत् पास्यति । स्था (तिष्ठ) ठहरना to stand 1 तिष्ठति तिष्ठतु अतिष्ठत् निष्ठत् स्थास्यति । दा ( यच्छ) देना 10 vie यच्छति यच्छतु अयच्छन् यञ्छत दास्यति धमा (धम् बनाना to blour धमति धमतु अधमतू धमेत् ध्मास्यति । घ्रा (जिघ्र ) सूंघना (to smell) जिघ्रति जिघ्रतु प्रतिध्रत् जित् नास्यति शुच (शोच ) शोक करना to be wail) शोचति शोचतु असोचत् शोचिष्यति त्यज् त्यागना (to abandon) त्यजति त्यजतु प्रत्यजत् त्यजेत् त्यक्ष्यति दृश् ( पश्य ) देखना (to seee) पश्यति पश्यतु अवश्यत् पश्यत् द्रक्ष्यति वस् रहना (to direll) वसति वामतु अवसत् वसेत् वत्स्यति शोलत् ( ७३ ) स्मृ (स्मर् ) याद करना (to remember) स्मरति स्परतु अस्मरत् स्मरेत् स्मरिष्यति मृ (सर ) सरकना (to move) सरति सरतु ग्रसरतू सरेतू सरिष्यति चूष चूसना (to suck) चूपति चूषतु अचूपत् चूपेत् चूषिष्यति अात्मने पदी प्रत्यय लट इते प्र० पु० ते म० पु० से अन्त छ --- उ० पु० इ मह वह लोट प्र० पु० ताम् इताम् अन्ताम् म० पु० स्व इथाम् उ० पु० ऐ आवह प्रामहे ल प्र० पु० इताम् Trwir-n म० पु० थाः " - इथाम् आवह ध्वम् ग्राम है। उ० पु० ऐ ( ७४ ) विधिलिङ् इयाताम् इरन् प्र० पु० इन म० पु. इथाः उ० पु० इय इयाथाम् इवाह इध्वम् इमहि प्र० पु० ष्यते म० पु० उ० षु० प्र० पु० प्येते ष्यन्ते ध्यमे येथे प्यध्व प्ये यावह प्यामहे सेव सेवा करना लट् (to serve) सेवंत सेवते मेवन्ते मेवथे सेवध्वे मेव वावह मेवामहे लोट मेवेताम् सेवन्ताम् सेवेथाम् सेवध्वम् मवावहै सवामह म० पु० सेवसे उ० पु० प्र० पु० सेताम् म. पु० सवस्व उ० पु० सेवे प्र० पु० अमवत म० षु० असेवथाः लङ् असंवताम् प्रसेवथाम् असेवावहि असेवन्त प्रसवध्वम् असेवामहि उ० पुरु असेवे ( ७५ ) विधि लिङ् प्र० पु० म० पु० उ० पु० सेवेत सेवेथाः सवेय सवयाताम् मंवयाथाम रंबवाह मेवेग्न् सेवध्वम् सवमहि लुट् प्र० पु० मेविष्यते सेविष्यते सेविष्यन्ते म० पु० सेविष्यस मयिष्यंथे मेविष्यध्व उ० पु० सीवष्ये मेतिच्यावह सेविष्य महे भ्वादिगणी आत्मने पदी धातुओं के रूप भी इसी प्रकार होंगे- भाष वोलना (to speak) भाषत भाषिष्यते रमते रप्स्यते भाषताम् अभावत भाषेत र शुरू करना (to begin ) रमताम् अरभत रमेत लभ पाना (too obtain) लभताम् लभेत ईह चाहना (to desire ईहताम् ऐहत ईहत लभते अलमत लम्स्यते ईहते हिष्य ( ७६ ) स्वज् गले मिलना (to cmbrace) अस्त्रजत स्वजते स्वजताम् स्वजेत स्वजिष्यते वृध्-(वर्ष ) बढ़ना to increase) वर्धते वर्धताम् अवधत वधत वर्धिष्यते वृतु (वर्त) होना (to bc) वर्तते वर्तताम् अवर्तत वर्तिष्यते बद् (बद् ) नमस्कार करना (10) salute) वदते वंदताम् अवंदत वंदेत बंदिष्यते वतत कंप कांपना ( 10 tremble ) कंपते यतंत सहते कंपताम् अकंपत कंपत कंपियन यत् यत्न करना (1) 111) यतताम अयनन यतेत यतिरूपते सह सहना (to doubt) सहताम् असहत. सहेन सहिष्यते शक् शंका करना (to be glad) शंकताम् अशकत शंकेन शंकिष्यते मुद् (मोद) प्रसन्न होना (to praise) मोदताम् प्रमोदन मोदत मोदिष्यते शंकते मोदते ( ७७ ) श्लाघताम् अश्लाघत श्लाघ् तारीफ करना (to praisc) श्लाघते श्लाघेत लाधिष्यते शुभ् (शाभ ) शोभा करना (like) शोभते शोभताम् अशोभत शोभेत शोभिष्यते रुच (रोच ) पसन्द करना रोवते रोचताम् अरोचत रोचेत रोचिष्यते एध बढना (to increase) एधते ऐधत पधेत पाधष्यते ईक्ष देखना to see) ईक्षते ईक्षताम् ऐक्षत ईक्षेत इक्षिष्यते शिक्ष सीखना to learn शिक्षते शिक्षताम् अशिक्षत शिक्षेत शिक्षिष्यते- ऊह तर्क करना (to arguc.) ऊरते ऊहताम् ऊहेत औहत ऊहिष्यते- उभयी पदी नी ( नय् ) ले जाना (to carry) एधतामू ते - परस्मैपदी लट् प्र० पु नयति नयतः नयन्ति म. पुरु नयथः नयथ नयमि नयामि उ० पु० नयावः नयामः ( ७८ ) लोद प्र० पु० नयतु नयताम् नयन्तु म० पु० नय नयतम् नयत उ० पु० নখানি नयाव नयाम लड़ प्र० पुरु अनयत् अनयताम् अनयन् म पु० अनयः अनयतम् अनयत उ० पु० अनयम अनयाव अनयाम प्र० पुरु म पु० उ० पुरु नयेत् नयः नयेयम् विधि लिङ ননাম नयेतम् नयेव नययुः नयेत नयेम प्र. पु० नेष्यन्ति नेष्यथ म. पु उ०पू० नेष्याम: लद नेष्यति नेष्यतः नेष्यति नेपथः नेष्यामि नेष्याव: आत्मनेपदी लट् नयते नयंते नयन ཤཀཱ ཀྱི་ नये नयावहे प्र० पु? म० पु० नयन्ते नयध्वे नयामह उ. पु० ( ७६ ) लोट प्र० पु० नयतां नयन्ताम म० पु० नयस्व नये नयेतां नयेथाम् नयावहि नयध्वम् ययामहै उ० पु० प्र० ० ग्रनयन्त म० पु० अनयध्वम् अनयामाह उ० पु० अनयत अमयेताम् अन यथा: अनयेथाम् अनये अनयावहि विधि लिङ नयेत नयेयाताम् नयथा नयाथाम् नयेय नयवाह प्र. पु० नयरन म० पु० नयध्वम् उ० ० नयमहि लूद प्र० पुरु म० पु० नष्यते नेष्यते नेप्यसे ने येथे नेष्ये नेष्यावह नीचे लिख। उभयपदी धातुओं के ही होंगे- नेष्यन्ते नेष्यध्वे नेष्यामहे उ० पु रूप भी ऐसे ( ८० ) ह् (हर् ) छीनना (to snatch) हरति हरतु अहरतू हरेत् हरिष्यति हरते हरताम् अहरत हरेत हरिष्यते यज् (यज्ञ ) करना (to perform sacrifice) यजति यजतु अयजतू यजत् यक्ष्यति यजते यजताम् अयनत यजेत यक्ष्यते याच माँगना (to beg) याचति यावतु अयाचत् याचत याचिष्यात याचते यावताम् अयावत याचत याचिष्यते वह उठाना (to thise) वहतु अवहतू वहति वहते वहत् वहेत वहिष्यति वहिष्यते वहताम् अवहतू अभ्यास (exercise) शिष्य गुरू से अपना पाठ पढ़ते हैं । पण्डित लोग मूवी का बातें सुन कर हराते हैं। भगवान की कृपा से आपके घर एक सुन्दर बालक होगा। सभी छात्र प्रातः काल उठे और ईश्वर के गुणों का गान करें। देवदत्त वाग में सार्यकाल के समय सैर करने जाता हैं। मल्लाह नदी में बड़ ज़ोर से तैरते थे ।
( ८१ )
इस वृक्ष की चोटी पर जितने पक्षी रहते थे।
सभी कल सायं उड़ गये हैं।
जो विद्यार्थी अपना पाट स्मरण नहीं करेंगे।
गुरू, जी उन्हें पारितोषिक नहीं देंगे।
विद्या से ज्ञान और ब्रह्मचर्य से बल बढ़ता
कौत्स ने महाराज रघु ने चौदह करोड़ रुपया गुरू दक्षिणा के
whe
लये मांगा।
ब्राह्मण व्याघ्र के हाथ से सोने का कड़ा छीनता है ।
आज दास गौओं को बाहर नहीं ले जायेगा।
भवक तन मन से अपने स्वामी की गवा करते हैं।
दुर्योधन ने छन्न मे पागइयों का राज्य जीता।
अभिमन्यु का विराट का पुत्री उत्तरा में विवाह हुआ।
अग्नि, अर्जुन और कृष्ण की सहायता से खाण्डव वन को जला
दिया।
गवान राम का धरनः जान को पंचवटी वन में छल से
हर लिया।
रावण की मृत्यु के अनन्तर उसका भाई विभीषण लङ्का की राज्य
गद्दी पर बैठा।
गघनाद बन और शस्त्रविद्या में इतना निपुण था कि उसके
समान कोइ न था।
( ८२ ) - तुदादिगण (6th conjugation) इस गण में धातु के आगे श (अ) विकरण लगाया जाता है- भ्वादि में धातुओं में गुण हो जाता है तुदादि में नहीं यही इन दोन में भेद है- तुद् दुख देना लट् परस्मैपद (to pinch) तुदति तुदतः तुदन्ति तुदसि तुदथः तुदथ उ० पु० तुदामि तुदावः तुदामः - प्र० पु० म० पु० लोट प्र० पु० तुदतु तुदनाम तुदन्तु म० पु० तुदतम् तुद तुदानि तुदत तुदाम उ०पू० तुदाव लड़ प्र. पु. अदित अतुदन् मा पु० अतुदः अतुदत उ.पु. अतुदम् अतुदताम् अतुदतम् अतुदाव विधि लिङ तुदेताम् अतुदाम प्र० पु० तुदेत् तुदेयुः ( ८३ ) म. पु० उ० पु० तुदेः तुदेयम् तुदेतम् तुदेव तुदेत तुदेम प्र० पु० तोत्स्यतः - तोत्स्यति तोत्स्यन्ति तुदादि गणी परस्मैपदी अन्य धातु- इष ( इच्छ) चाहना (to wish) इच्छति इच्छतु एच्छत इच्छेत् पषिष्यति प्रच्छ् (पृच्छ) पूछना (to ask) पृच्छति पृच्छतु अपृच्छत् पृख्छेत् प्रक्ष्यति far AT (to throw) क्षिपति क्षितु अक्षिपत् क्षिपेत् क्षेप्स्यति मृज पैदा करना (to create) सृजति सृजतु अमृतत् सृजेत् स्रक्ष्यति स्पृश् छूना to touch) स्पृशात स्पृशतु स्पृशत् अस्पृशत् स्प्रक्ष्यति मस्ज् ( मज्ज ) डुबकी लगाना (to plunge) मजति मजतु अमजत् मजेत् मक्ष्यति (भृय् ) मरना आत्मनेपदी (to die) भ्रियते भ्रियत भ्रियन्ते प्र० पु० ( ८४ ) म०पू० उ० पु० प्र० पु० म० पु० उ० पु० प्र० पु० म० पु० उ० पु० भ्रियसे भ्रियेथे भ्रियध्वे भ्रिये भ्रियावहे भ्रियामहे लोद भ्रियताम् भ्रियेताम् भ्रियन्ताम् भ्रियस्व भ्रियेथाम् भ्रियध्वम् भ्रिय भियावह भ्रियामहै ल अभ्रियत अभ्रियताम् अभ्रियन्त अभ्रियथाः अभ्रियेथाम् अभ्रियध्वम् अभ्रिये अभ्रियावहि अभ्रियामहि विधि लिङ्ग भ्रियेत भ्रिययालाम् भ्रियेरन् भ्रियेथाः भ्रियेयाथाम् भ्रियध्वम् भ्रियेय भ्रियवाहि भ्रियेमाहि लद प्र० पु० भारण्यात भरिप्यत: भरिप्यन्ति भरिष्यसि भरिप्यथः मरिष्यध्वे भरिष्यामि भारप्यावहे भरियामहे उभयपदी सिच् सिंच छिड़कना परस्मैपदलद (To sprinkle) प्र० पु० सिञ्चति सिञ्चतः सिञ्चन्ति प्र० पु० म. पु० उ० पु म० पु० उ० पु० म० पु० मिश्चसि उ. पु० सिञ्चामि सिञ्चथ सिञ्चामः सिञ्चथः सिचावः लोट मिचताम् सिंचतम् मित्राव प्र० पु० म० पु. सिंचतु सिंच सिंचानि सिंचन्तु सिंचत सिंचाम उ० पु० प्र० पु. म० पु० असिंचत् असिंचः असिंचम् असिंचन असिंचत असिंचाम उ० पु? अमिचताम् असिंचतम् अमित्राव विधि लिङ् विचताम् सिंचतम सिंचव प्र० पु० म० पु० सिंचेत सिंचेः सिंचेयम् सिंचेयुः सिंचेत सिंचेम उ० पुरु प्र० पु० सेक्ष्यति सेक्ष्यीत प्र०पू० मक्ष्यतः आत्मनेपदी लट सिंचेते सिंचंथे सिंचावहे सिंचते सिंचसे सिंचे म० पु० उ० पु० सिंचन्ते सिंचध्वे मिंचामहे ( ८६ ) प्र० पु० म० पु० उ० पु. सिंचताम् सिंचस्व सिंचे लोद सिंचेताम् सिंचेथाम् सिंचाव है सिंचन्ताम् सिंचध्वम् सिंचामहे प्र० पु० मा पु० असिंचन्त अप्तिचध्वम् असिंचामहि उ० पु० लड़ असिंचत अमिचेताम् असिंचथाः असिचेथाम् असिंचे अमिंचावहि विधि लिङ्ग सिंचत सिंचेयाताम् सिंचेथाः सिंचेयाथाम् सिंचय सिंचेवहि प्र० पु० म० पु० सिंचरेन् सिंचध्वम् सिंचेहि उ० पु० सेक्ष्यते- मुच् मुंच छोड़ना (To leave) विद् विन्द पाना (To get) इत्यादि धातुओं के रूप भी इसी प्रकार होंगे-- अभ्यास (Exercise) विषयों के भोग मनुष्यों को दुःख देते हैं । --
( ८७ )
होली के दिनों में बालक मनुष्यों पर धूल फेंकते हैं ।
कौरवों ने पाण्डवों को अकारण दुःख दिया ।
मोहन ने मोहन का गेंद कुएं में फेंक दिया।
माली अपन वाग के छोटे २ पौदों को जल से सींचता है।
शकुन्तला जल के घड़ों से कगव के आश्रम में वृक्षों को सींचा
करती थी।
ईश्वर जो चाहता है वही होता है।
यदि मैने चाहा तो राम को बहुत गा धन दूंगा।
यदि वैद्य समय पर न पहुंचता तो वह अवश्य मर जाता ।
ईश्वर की कृपा से राजा के सभी शत्र मर गये ।
,
the
हरि हाथ से अग्नि को
छूता
मैं गुरु से धर्म के सम्बन्ध में प्रश्न पूछता हूँ ।
ब्रह्मा ने गारी सृष्टि पैदा की।
कृष्ण ने पाओं से मृत सांप को छुआ।
( ८८ ) Gallery 4th conjugation. श्यन् ( य ) विकरण सार्वधातुक विभाक्तियों के बीच में लगाया जाता है-- नृत् (नृत्य) नाचना (To dancc) इस गण में धातु के प्रागे परस्मैपद लट्र प्र० पु० नृत्यतः नृत्यन्ति नृत्यति नृत्यसि नृत्यामे नृत्यथः म० पु० उ० पु० नृत्यथ नृत्यामः नृत्यावः लोट प्र० पु० नृत्यतु नृत्यताम् नृत्यन्तु म० पु० नृत्यतम् नृत्यत नृत्य नृत्यानि उ० पु० नृत्याव नृत्याम लड़ प्र० पु० अनृत्यत् अनृत्यताम् अनत्यन् अनृत्यः अनृत्यतम् अनृत्यत म०पू० उ०पू० अनृत्यम् अनृत्याम अनृत्याव विधि लिङ नृत्येताम् नृत्येतम् प्र० पु० नृत्येत् नृत्ये: नृत्येयुः नृत्येत म० पु०
( ८६ )
म. पु०
नृत्येयम् नृत्येव
नृत्येम
लूट
प्र. पुरु
नतिष्यत ननिष्यतः नर्मिष्यन्ति
उ० पु.
नतिष्प'म नतिष्यथः नतिष्यथ
म. पु.
নবান नतिष्यावः नतिष्यामः
इमा प्रकार परम्पदा दिवादिगण के अन्य धातु भी होंगे
दिव ( दीव्य ) चमकना (To shine)
अदी व्यत्
दीव्यति दीव्यतु
दीवयेत् देविष्यात
श्रम् (श्राम्य) थकना (To get tincid)
श्राम्यति श्राम्यतु अश्राम्यत् श्राम्येत् श्रमिष्यति
ऋध् ( क्रोध करना) (To be angry)
क्रुध्यति क्रुध्यतु अक्रुष्यत् क्रुध्येत् कोत्स्यति
शुष् (सूखना ) (To dry)
शुष्यति
शुष्यतु अशुप्यत् शुष्येत शोक्ष्यति
तुष् ( प्रसन्न होना ) (To be happs)
तुष्यति तुष्यतु अतुष्यत् तुष्येत् तोक्ष्यति
1. पुष् ( पुष्य ) पुष्ट होना (To grow fat)
पुष्यति पुष्यतु अपुष्यत् पुष्येत् पोषिष्यति
शम् ( शान्त होना) (To be at peace) शाम्यति शाम्यतु प्रशाम्यत् शाम्येत् शमिष्यति अस् फेंकना (To throu) अस्यति अस्यतु प्रास्यत् अस्येत् असिष्यति क्षम् क्षाम्य ( क्षमा करना) (To excuse) क्षाम्यति ताम्यतु अक्षाम्यत क्षारयेत् क्षस्यति व्यध् (विध्य ) बैंधना (To perferate) विध्याति विध्यतु अविध्यत विध्येत वित्स्यति नश् ( नष्ट होना) (To be ruined) नश्यति नश्यतु अनश्यत् नश्यत् नक्ष्यति भ्रम् ( घूमना ) To londer) भ्राम्यात भ्राम्यतु अभ्राम्यत् भ्राम्यत् भ्रमिष्यति जन जा पैदा होना (Too the born) आत्मनेपद लट जायते जायत जायन्त म० पुरु जायमे जायथ जायध्वं उ० पु० जाय जायावह जायामहे लोट जायताम् जायेताम् जायन्ताम् - प्र० पु. प्र० पु.
(६१ ) म० पु० जायध्वम् जायस्व जाय जायेथाम् जायावह उ० पु० जायामह प्र० पु० अजायत प्रजायन्त म० पु. अजायथाः अजायध्वम् उ०पुरु अजाये लड़ अजायेताम् अजायेथाम् अजायावहि विधि लिङ जायथाताम् जायेयाथाम् अजायामाह प्र० पु० म० पु० जायेत जायेथाः जायेय जायेरन् जायेध्वम् जायेमाह उ० पुo जावाह म० पु० लुट प्र० पु० जनिष्यते जनिष्यते जनिष्यन्ते जनिष्यसे जनियेथे जनिष्यध्वे उ० पु० जनिष्य जनिष्यावह जनिष्यामह नीचे लिख दिवादिगणी आत्मनेपदी धातु इसी प्रकार होंगे युध् युध्य ( युद्ध करना) (To fight) युध्यते युध्यतां अयुध्यत् युध्येत योत्स्यते विद्-विद्य होना (To be present) विद्यते विद्यताम् अविद्यत् विद्यत वेत्स्यते
( २ )
अभ्यासः Exercise.
सूर्य आकाश में चमकता
वर्षा काल में आकाश पर मघों की घटा को देखकर मोर नाचते है।
अर्जुन की शिष्या उत्तरा बहुत सुन्दर नाचा करती थी।
रंभा अपनी माता का कहा नहीं मानती इसलिये वह उससे नाराज
होती है।
जो विद्यार्थि पाठ याद नहीं करेंगे गुरु, उन पर कुपित होंगे।
पथिक दिन भर कार्य करने से थक गया।
रथ का पहिया बड़ी तेजी से
घूमता
ग्राम में जल के अभाव से तालाब और छप्पड़ों का जल सूख
जाता है।
सूर्य की धूप मे वृक्षों के पत्र सूख जायेंगे।
बुढ़ापे में भी मनुष्यों की तृष्णा शान्त नहीं होती।
बालक मिठाई से तृप्त होते हैं।
क्षत्रियवीर मृत्यु का भय छोड़ कर युद्ध क्षेत्र में
महाराज उत्तानपाद के घर ध्रव नाम का एक आस्तिक पुत्र
युद्ध करते है।
पैदा
हुआ।
( ३ ) चुरादिगण चुर् चोर चुराना 10th conjugation इस गण में धातु के आगे अय विकरण लगाया जाता है- धातु प्रायः उभयपदी है। - लद (To steal) प्र० पु. चोरयति चारयसि चोरयामि चोरयतः चोरयथः चोरयन्ति चारयथ म. पु० उ० पु० चोरयावः चोरयामः लोद प्र० पुरु चोरयतु चोरय चोरयानि म. पु. उ० पु. चोरयताम् चोरयतम् चोरयाव चोरयन्तु चोरयत चोरयाम प्र. पु. मः पु' अचरगन् अचारयत उ) पु. দ্মনাম ल अचोरयत् अचोरयताम् अचारयः अचोरयतम् अचोरयम् प्रचारयाव विधि लिङ्ग चोरयेतू चोरयेताम् चोरये: चारयेतम् चोरयेयम् चारयेव प्र. पु. म. पु० चोरयेयुः चोरयेत चोरयेम उ० पु० प्र० पुरु म० पु० चोरयिष्यति चोरयिष्यतः चोरयिष्यसि चोरयिष्यथः चोरयिष्यामि चोरयिष्याव: चोरयिष्यन्ति चोरयिष्यथ चोरयिष्यामः उ०पु० उभयपदी धातु भत खाना (To eat) भक्षयति भक्षयतु अभक्षयत् भक्षयेत् भक्षयिष्यति भक्षयते भक्षयतां अभक्षयत भक्षयेत भयिष्यते तड़ ता पीटना (T) beat) नाइयात ताडयतु अताइयत् ताइयेत् ताइयिष्यति नाइयते ताड़यताम् अताड़यत ताड़येत ताइयिष्यते भूप सजाना (So dcorrate) भूपयतु अभूपयत् भूपयेत् भूषयिष्यति भूग्यते भूपयतां अभूषयत भूपयेत भूषयिष्यते कथ कहना (To say) कथयति' कथयतु अकथयत् कथयेत् कथयिष्यति कथयत कथयताम् अकथयत कथयेत कथयिष्यत गण गिनना (To count गणयांत गणयतु अगायत् गण येत् गणायिप्यति अगणयत गणयेत गगा यष्यत भूपयत गण यते गरण पता
( ६५ )
पाल पालना (To rear)
पालयति पालयतु अपालयत् पालयेत् पालयिष्यति
पालयते पालयतां अपालयत पालयेत पालयिष्यत
रच रचना (To crcate)
अरचयतू
रचयति
নম্বন
रचयतु
रचयता
रचयेत् रचयिष्यति
रवयेत रचयिष्यते
अरचयत
दंड दंड देना (1) punish)
दंडयतु
दंडयात
दंडयते
अंदायत दंडयेत् दंडयिष्यति
दंडातां अदंडयन दंड्यंत दयिष्यते
पी प्रीगा प्रसन्न होना (10 the gland)
प्राण यति प्रीण यतु अप्राणयत् श्रीगायत् प्राणायष्यति
प्रांगायत
प्रीण यतां प्राणायत प्राणयत प्राणायप्यते
स्पृह चाहना (To desire)
गृहयति स्मृहयतु
अस्पृह यत् स्पृहयत् स्पृहयिष्यति
म्ह यते सहयनां असहयत सहयंत सृहयिष्यते
तुल तोल तोलना (To reigh)
नोल यति तलयतु अलपत् तोलयेत् तोलायष्यति
तोलपत तोलयतां अतोलयत तोलयत तोलयिष्यते
( क )
क्रीड़ खेलना (To play)
क्रीड़यति की इयतु अक्रीड़यत् क्रीड़येत् क्रीड़यिष्यात
क्रीड़यते क्रीड़यताम् अक्रीड़यन क्रीड़येत क्रीड़ायिष्यते
चिन्त सोचना
परस्मैपद (To think)
चिन्तयति विन्तयतु अचिन्तयत् चिन्तयत् चिन्तयिष्यति
अात्मने पद
चिन्तयते चिन्तयताम् अचिन्तयत चिन्तयेत चिन्तयिष्यते
अभ्यास exercise'.
जानकी अशोक वन में रामकी चिन्ता करती थी।
।
चोरों ने राजा के महल है। बहुत सा बन चुराया ।
जिन छात्रों ने अपना पास स्मरण नहीं किया गुरू उन्हें पीटता है ।
बालक देश में पशुओं को नाड़ता है।
हे प्रभो मे कभी किसी के धन की चोरी न कर ।
महाराज राम की राजमभा में लव अं.र कुश ने वाल्मीकि रामायण
की कथा कही।
यदि आप मुझे क्षमा करें तो म अाप को सब सच सच कह दूंगा ।
शकुन्तला कगव ऋषि के अाश्रम में चिर तर दुप्यन्त की चिन्ता
करती रही।
राम सप्ताह में एक दिन कुछ नहीं खाता ।
काश्मीर में लोग प्रायः शाक और भात खात है।
(६७ )
वणिया तराजू से चावल तोलता है।
श्याम अपना भवन दीपमाला के दिन तरह तरह के चित्रों से
सजायेगा।
सखे तुम्हारा भाई कुशल है तुम्हें उसकी चिन्ता न करनी चाहिये।
मरी पाठशाला के विद्यार्थी सायंकाल को अपने खेल के मैदान में
फुटबाल खेलते हैं।
( ६८ ) Fallery 5th Conjugation. श्नु (नु) लगाया जाता है श्र सुनना परस्मैपद लट् (To hear) इस गण म धातु से शृणुतः यवन्ति म. पु० उ० पु० शृणोति शृणोषि शृणोमि श्णुथः श्टणुथ शृणुवः गवः गृणुमः रामः लोट शृणोतु तात् प्र० पु० म. पु० शृण्वन्तु शृणुताम् शृणुतम् टण शृणवानि श्णुत उ० पु० श्णवाव टणवाम लङ प्र० पुरु प्रगत अशृणुताम् प्रशृगवन् म.१० अश्या: श्रमणुतम् अटणुत उ० पु. अश्गावम् अशृण्व एव अशृणुम्मू एम विधि लिङ्ग प्र० पु. श्रेणुयात शृणुयाताम् उ० पु. टणुयुः टणुयात थापाः मृणुयातम् उ० पु० गुयाम् शृणुयाव शृणुयाम (१६) प्र० पु० म० पु० उ० पु० प्र२ पु० लद श्रोष्यति श्रोष्यतः श्रोष्यन्ति श्रोष्यसि श्रोष्यथः श्रोष्यथ श्रोष्यामि श्रोष्याव: श्रोष्यामः प्राप् पाना लट् (To obtain) प्राप्नोति आप्नुतः प्राप्नुवन्ति अप्नोषि प्राप्नुथः प्राप्नुथ प्राप्नोमि प्राप्नुवः प्राप्नुमः लोट आप्नोतु प्राप्नुतां प्राप्नुवन्तु प्राप्नुहि प्राप्नुताम् प्राप्नुत प्राप्नुवाव प्राप्नुवाम म० पु० उ०पू० प्र० पु० म० पु० उ० पु० आप्तवानि लडू आप्नुतां प्राप्नुवन् प्र० पु० प्राप्नोत् प्राप्नो: म. पु० प्राप्नुतम् प्राप्नुत उ० पु. प्राप्नुम अ.प्नुवम् प्राप्नुव विधि लिङ् प्राप्नुयात् माप्नुयातां प्राप्नुयाः प्राप्नुयातम् प्राप्नुयाम् प्राप्नुयाव प्र० पु० म० पुष उ.पु. प्राप्नुयुः प्राप्नुयात प्राप्नुयाम ( १०० ) प्र० षु० म० पु० उ०पू० प्र० पु० लूद प्राप्स्यति प्राप्स्यतः प्राप्स्यन्ति प्राप्स्यसि प्राप्स्यथः प्राप्स्यथ प्राप्स्यामि प्राप्स्याव: प्राप्स्यामः शक् समर्थ होना लट् (To be able) शक्नोति शक्नुतः शक्नुवन्ति शक्नोषि शक्नुथः शक्नुथ शक्नोमि शक्नुवः शक्नुमः लोद शनोतु शक्नुताम् शक्नुवन्तु शक्नुहि शक्नुतम् शक्नुत शक्तवानि शक्तवाव शक्तवाम म० पु० उ० पु० प्र० पु० म० पु० उ० पु० लङ अशक्नुताम् अशक्नुवन् प्र० पु० म० पुरु प्रशनोतू अशक्नोः अशक्नुतम् अशक्नुत अशक्नुम उ० पु० अशक्तवम् अशक्नुव विधिलिङ्ग शक्नुयुः शक्नुयात् शक्नुयाताम् शक्नुयात शक्नुयातम् प्र० पु० म. पु० उ. पु. शक्नुयाः शक्नुयाम शक्नुयाम शक्नुयाव प्र० पु० म० पु. उ० पु० शक्ष्यामि प्र० ० म. पु उ० पु. प्र० पु० लूट शक्ष्यति शक्ष्यतः शक्ष्यन्ति शक्ष्यासे शक्ष्यथ: शन्यथ शक्ष्याव: शक्ष्यामः हि भेजना लट् (To Send) हिनोति हिनुतः हिन्वन्ति हिनोषि हिनुथः हिनुथ हिनोमि हिनुवः न्वः हिनुमः नमः लोट हिनोतु हिनुताम् हिन्वन्तु हिनु हिनुतम् हिनुत हिनवानि हिनवाव हिनवाम लङ् अहिनोत् अहिनुतां अहिन्वन् अहिनोः अहिनुतम् अहिनुत अहिनवम् अहिनुव न्व अहिनुमन्म विधि लिङ् हिनुयात् हिनुयाताम् हिनुयुः हिनुयाः हिनुयातम् हिनुयात हिनुयाम् हिनुयाव हिनुयाम म०० उ० पु० प्र० पुरु म० पु० उ० पु० प्र० पु० म० पु० उ० पु० ( १०२ ) प्र० पु० म० पु० उ० पु० हेष्यति हेष्यसि हेष्यामि हेष्यत: हेष्यथः हेष्याव: हष्यन्ति हेष्यथ हेष्यामः सु परस्मैपद सुनोति सुनोतु सोप्यति असुनोत् सुनुयात् प्रात्मने पद असुनोत सुन्वीत सुनुते सुनुताम् सोध्यते अभ्यास Exercis. भक्त लोग ऋषि से धर्म की कथा सुनते हैं। आज रामनवमी का दिन है मैं किसी विद्वान से रामायण सुनूंगा। वह गत सप्ताह से ज्वर से पीड़ित है चल फिर नहीं सकता। कार्य अधिक होने से में आज आप के घर न आसकूँगा। उसके शिर में दर्द है वह कोई कार्य नहीं कर सकता। मदन ने अपनी बहिन कान्ता को १० रुपये रक्षा बन्धन के भेजे । जब रमि का दूत अंगद लंका में रावण की सभा में पहुँचा तो उसका बड़ा स्वागत किया। आशा है मैं आज की गाड़ी लाहौर पहुँच जाऊँगा। बहुत समय से वह अपने भाई के पास नहीं पहुंचा।
( २०३ ) तनादिगण 8th Conjugation. इस गण में धातु से भागे उावकरण लगाया जाता है- कृ करना (To do) परस्मैपद लुट कुरुतः कुर्वन्ति प्र० पु० म. पु० उ० पु० करोति करोषि करोमि कुरुथः कुरुथ कुर्मः कुर्वः लोट प्र० पु० करोतु कुरुताम् कुर्वन्तु म० पु० कुरुतम् कुरुत उ० पु० करवानि करवाव करवाम लड़ प्र० पुल अकुरुताम् अकरोत् अकरो: म० पु० अकुरुतम् अकुर्वन अकुरुत अकुर्म उ० पु० अकखम् अकुर्व प्र० पु० कुर्यात् कुर्याः उ० पु० कुर्याम् विधि लिङ्ग कुर्याताम् कुर्यातम् कुर्याव म०पू० कुर्युः कुर्यात् कुर्याम् ( १८४ ) प्र० ३० म. पु० करिष्यति करिष्यसि करिष्यामि लद करिष्यतः करिष्यथः करिष्यन्ति करिप्यथ करिष्यामः उ० पु० करिष्याव: आत्मने पद लद प्र० पु० म० पु० कुरुते कुरुषे कुर्वे कुर्वते कुरुध्व कुर्महे उ०पू० कुर्वाते कुर्वाथे कुर्वहे लोद कुर्वाताम् कुळथाम करवावह कुरुताम् प्र० पु० म० पु० उ० पु० कुरुष्व करवै कुर्वतां कुरुध्वम् करवामहै प्र० पु० अकुरुत म० पु० उ० पु० अकुरुथाः अकुर्वि अकुर्वत अकुरुध्वं अकुर्महि ल अकुर्वाताम् अकुर्वाथाम् अकुर्वहि विधि लिङ्ग कुर्वीयाताम कुर्वीयाथाम् कुर्वीवहि प्र० पु० म० पु० कुर्वीत कुर्वीथाः कुर्वीय कुर्वीरन् कुर्वीध्वम् कुर्वीमहि उ० पु० ( १०५ ) प्र० पु० म०पू० उ० पु० लद करिष्यते करिष्येते करिष्यन्ते करिष्यमे करिष्येथे करिष्यध्ये करिष्ये करिष्यावहे करिष्यामहे तनु-तन् फैलाना To spread) परस्मैपद लट् प्र० पुरु तनुतः तन्वन्ति तनोति तनोषि तनोमि तनुथः म० पु० उ० पु० तनुथ तनुवःन्त्रः तनुमान्मः लोट तनोतु तनुताम् तन्वन्तु प्र० पु० म० पु० तनुतम् तनुत तनु तनवानि उ० पू० तनवाव तनवाम प्र० पु० अतनुताम् प्रतन्वन् अतनोत् अतनोः म० षु० अतनुतम् अतनुत उ० पु० अननवम् अतनुव न्व अतनुमन्म विधि लिङ् प्र०पू० तनुयात् तनुयाताम तनुयुः ( १०६ ) म० पु. तनुयाः तनुयातम् अनुयात उ० पु. ननुयाम् तनुयाव तनुयाम प्र० पु० म. पु० तनिष्यति तनिष्यसि तनिप्यामि ननिष्यतः तनिष्यथः तनिष्यावः तनिष्यन्ति तनिष्यथ तनिष्यामः उ० पुर आत्मने पद लद प्र० पु. म० पु० उ० पु० तनुते तनुष तन्वे तन्वाते तन्वाथे तनुबह तन्वह लोद नन्वत ननुवं तनुमहे तन्महे प्र० पु० तन्वाताम तन्वताम् म. पु० ननुतां तनुष्व तनवे तन्वाथाम तनवावहै तनुध्वम् ननवामहै उ० पुरु लड़ प्र० पु० अतनुत प्रतन्वाताम् प्रतन्वत म० पु० अतनुथाः अतन्वि उ० पु० अतन्वाथाम् अतनुवाह अतन्वहि अतनुध्वम् अतनुमाह प्रतन्महि ( १०७ ) प्र० पु० तन्वीत तन्वीरन् विधिलिङ् तन्वीयानाम् तन्वीयाथाम् तन्वीवहि म० पु० तन्वीथाः तन्वीवम उ०पू० तन्वीय तन्वीमहि प्र० पु० म० पु० तनिष्यते तनिष्यसे तनिध्ये तनिप्यते तनिष्यथे तनिष्यावह तनिष्यन्ते तनिष्यध्वे ननिष्यामहे उ० पु० अभ्यास Exercise. मज्जन सोरे जगत् का उपकार करते हैं। जो किसी का हित नहीं करता ग्रभु उस पर प्रसन्न नहीं होता । जुलाह वस्त्र बुनन के लिये सूत्रों को फैलाता है । मैने उसका स्वप्न में भी कभी बुरा नहीं किया न मालूम वह मुझ से कुपित क्यों है मनुष्य का धर्म है कि वह प्राणिमात्र का कल्याण करे । मकड़ी अपने शरीर से ही तन्तु निकाल कर ताना तन देती है ॥ यदि बह जीवित रहा तो संसार में बड़े विचित्र कार्य करेगा। प्रिय शिष्य शुभ कर्म करो माता पिता की सेवा करो प्रभु प्रसन्न होगा।
( १०८ ) रुधादिगण 7th Con ugation. इस गण में धातु के अन्त में होने वाले स्वर से प्राग न विकरण लगाया जाता है यदि परे कित् ङित् विभक्ति हो तो और न का अ उड़ जाता ह- भिद् परस्मैपद लट् तोड़ना (To break) भिनत्ति भिन्तः भिन्दन्ति भिनत्ति भिन्थः भिन्य भिननि भिद्मः भिंद्वः लोद भिनत्तु भिन्ताम् भिन्दन्तु भिन्दि भिन्तम् भिन्त भिनदानि भिनदाव भिनदाम प्र० पु० म. पु० उ० पु. प्र०० म० पु० उ० पु० लड़ प्र० पुरु म० पु० उ०पू० अभिन्दन अभिन्त अभिद्य अभिनत् अभिन्ताम् अभिन्दः अभिन्तम् अभिनदम् अभिव विधि लिङ् भिंद्यात् भिंद्याताम् भिंद्याः भिंद्यातम् भिंद्याम् भिंद्याव प्र० पु० म० पु० उ० पु० भिंद्युः भिंद्यात भिंद्याम (१०६ ) प्र० पु० म० पु० भेत्स्यति भेत्स्यसि भत्स्यामि भेत्स्यतः भेत्स्यथः भेत्स्यावः भेत्स्यन्ति भेत्स्यथ भेत्स्यामः उ० पु० आत्मनेपद लट् प्र० पु० म० पु० उ० पु० भिन्ते भिन्मे भिन्दे भिन्दते भिंदध्ये भिद्महे भिन्दाते भिंदाथे भिन्द्वह लोद भिन्दातां भिन्दाथां भिन्दावह प्र०पुर म० पु० भिन्ताम् भिन्त्स्व मिन्दै भिन्दताम् भिन्दध्वम् भिन्दा उ० पु” प्र. पु. म. पुरु उ. पु. ल अभिनत् अभिन्दाताम अभिन्दाः अभिन्दाथाम् अभिन्द अभिहि विधि लिङ् भिन्दीयाताम् मिन्दीथाः भिन्दीयाथाम् अभिन्दत अभिन्दध्वम् अभिमाह प्र० पु. भिन्दं त् भिन्दं रन् मपुर मिन्दीध्वम् ११० ) उ० पु० मिन्दीय भिन्दीवहि मिन्दीमहि लूद प्र० पु० म० पु० भेत्स्यते भत्स्येते भेत्स्यसे भेत्स्येथे भत्स्ये भेत्स्यावहे रुध् रोकना (To obstruct) भत्स्यन्ते भेत्स्यध्वे भत्स्यामहे उ०पू० लट् परस्मैपद प्र० पु० रुगधः रुग्धन्ति रुणद्धि रुणतिम रुणधिम रुगघः म० पु० उ०पू० राध रुध्वः हराम: लोट प्र० पु० रुन्धाम रुन्धन्तु म. पुरु रुणदधु रुन्धि रुणधानि रुन्द्धम् २न्ध उ.पु० रुणधाव रुघाम लङ् प्र० पु० अरुणतू दू अरुन्धाम् अरुन्धन मरुन्धम् अहन्द्ध म० पु० उ० पु. प्रकाधम प्रन्ध्य अहम ( १११ ) विधि लिङ् रुन्ध्याताम् प्र० पु० रुन्ध्यात् रुन्ध्युः रुन्ध्या: ध्यातम् रुन्ध्यात म० पु० उ० पुरु रुन्ध्याम् रुन्ध्याव रुन्ध्याम प्र० पु म० पु० रोत्स्यन्ति रोत्स्यथ रोत्स्यामः उ० पुरु लट् रोत्स्यति रोत्स्यतः रोत्स्यास रोत्स्यथः रोत्स्यामि रोत्स्यावः आत्मनेपद लुटू स्न्याते रुन्धाथे सन्धे सन्ध्यह लोट प्र० पु० 1. पु० उ० पु० हन्धते सन्धध्वे रुन्धन रुद्धाम रुद्धात.म् रुन्धताम् १० पु० मापुर रुत्स्व रुगाधे रुद्धाथाम् रुणवावहै रुन्दध्यम रणधामह उ० पु. परुन्द्ध प्र० पुरु अरुन्धाताम् प्रहन्धन म० पु’ अहन्द्धाः अरुन्ध अरुन्धाथाम् अहमध्याह उ० पुरु अरुद्ध अमाह ( ११२ ) प्र० पु० रुन्धीत विधिलिङ् रुन्धीयाताम् रुन्धीयाथाम् रुन्धीवहि म० पु० रुन्धीथाः मन्धीय रुधीरन रुन्धीध्वम् रुन्धीर्माह उ० पु. प्र० पु० म० पु० रोत्स्यन्ते रोत्स्यध्ये रोत्स्यामह उ० पु० रोत्स्यते रोत्स्येते रोत्स्यसे रोत्स्येथे रोत्स्ये रोत्स्यावहे युज् जोड़ना लट युक्ति युक्तः युनक्षि युक्थः युनजिम युधः प्र० पु० म० पु० युञ्जन्ति युङ्क्य युज्मः उ० पु० लोद प्र० पु० म० पु० युनक्तु युधि युनजाधि युङ्क्ताम् युत्मम् युनजाव युजन्तु युक्त उ० पु० युनजाम अयुनक ग प्र०पू० म० पु० उ० पु० अयुक्ताम् अयुक्तम् प्रयुञ्जन् अयुक्तम् अयुनजम् अयुज्व ঘুম ( ११३ ) विधि लिङ् प्र० पु० युज्यात् युज्युः म. पु० युज्या: युज्यात उ० पुरु युज्याम् युज्याम युज्याताम् युज्यातम् युज्याव लद योदयतः योक्ष्यथः योक्ष्यावः प्र० पु. म० पुरु उ० पु० योक्ष्यति योक्ष्यसि योक्ष्यामि योदयन्ति योक्ष्यथ योक्ष्यामः श्रात्मने पद लट् प्र. पु. म० पु. युङ्क्ते युले युञ्ज युञ्जते युग्ध्वे युञ्जमहे उ० पु० युझाते युञ्जाथे युञ्जबहे लोट युजाताम् युञ्जाथाम् युनजावहै प्र. पु० युताम् म०पु० युय उ० पु. युनजे युञ्जताम युध्वम् युनजामहै लड अयुजलाम् प्र० पु० म. पुरु ग्रयुक्त अयुवथाः अयुञ्जि স্মথুস্তাঘমু अयुञ्जवाह अयुञ्जत अयुध्वम् अयुज्माह ( १९४ ) प्र. पु० युञ्जीत म० पु. युञ्जीथाः उ० पु. युञ्जीय विधि लिङ् युञ्जीयाताम् युजीयाथाम् युञ्जीरन् युञ्जीध्वम् युञ्जीमहि युञ्जीवाह प्र. पुर म० पु योक्ष्यते योक्ष्यमे योदये योदयने योक्ष्येथे यायावह योक्ष्यन्ते योक्ष्यध्वे योदयामहे उ० पुरु भुज् पालन करना इसका उच्चारण परम्मपद म गुज की तरह होगा। भुनाक भुनक्तु प्रभुनक भुज्यात् भोक्ष्यति भुज् खाना to cate भुङ् आत्मने पदी भुक्ताम् अभुङ भुञ्जीत भोक्ष्यते TESTU 2nd (congugation) इम में धातु के प्रांग कोई वकरण नहीं लगाया जाता। अद् खाना (ty eitt) परस्मैपद लट प्र० पु. अत्ति अदन्ति ( ११५ ) म० पु० प्रतिम प्रत्थः उ० पु० अनि प्रतः प्रमः लोद अत्ताम् अदन्तु प्र० पु० म० पुरु अत्तु अद्धि अत्तम् अत्त उ० पुग अदानि अदाव अदाम लड़ ग्रादत् प्रात्ताम प्रादन प्र० पु० म० पु. प्रादः प्रात्तम् उ० पु० प्रादम् प्राद्ध प्राम विधि लिङ् प्र० ० अद्यात् अद्याताम् अधुः अद्याः यद्यातम् प्रद्यात म० पु० उ० पुरु अद्याम् प्रद्यात्र अद्याम लूट प्रत्स्यतः अत्स्यन्ति प्र० पु. म० पु० उ. पु० अत्स्यति अत्स्यमि अत्स्यामि अत्स्यथः अत्स्यथ अत्स्यावः अत्स्यामः ( १९६ ) हन् मारना (to kill) लट् परस्मैपद घन्ति प्र० पुरु हतः म. पु. हन्ति हंसि हन्मि हथः हथ उ. पु. लोट हताम् प्र० पुरु नन्तु म० पु० हन्तु जहि हनानि हतम् हत उ. पु० हनाव हनाम लङ् प्र० पुरु प्रहन् ग्रहताम् अनन् म० पु० अहन् अहलम् अहत उ. पुरु अहनम् अहन्ध अहन्म विधि लिङ् प्र० पु० हन्यात् हन्याताम् हन्युः म पु० हन्याः हन्यातम् हन्यात उ.पु. हन्याम् हन्याव हन्याम प्र० पुग म० पु० होनेष्यति हनिष्यसि हनिष्यामि हनिष्यतः हनष्यथः हनिष्याव: हनिष्यन्ति हनिष्यथ हनिष्यामः उ० पु० ( १९७ ) अस होना (to be) लट् परस्मैपद स्तः सन्ति प्र. पु० म०पू० अस्ति असि अस्मि स्थः उ० पु० स्म लोट स्ताम् सन्तु प्र० पु० म० पु० उ० पु० अस्तु पधि प्रसानि स्तम् असाव असाम ल प्रास्ताम प्रामन् प्र० पु. म० पु० उ. पुरु प्रासीत् प्रासी प्रास्तम् आस्त प्रासम् प्रास्व प्रास्म विधि लिङ्ग स्यात् स्याताम् स्युः प्र० पु° म० पु० स्याः स्यातम् स्यात उ० पु० स्याम् स्याव स्याम लट् भविष्यतः प्र० पु. भविष्यति भविष्यन्ति ( ११८ ) म. पु० उ० पु० भविष्यथ भविष्यामः भविष्यसि भविष्यथः भविष्यामि भविष्याव: स्वप् सोना to sleep) लद परस्मैपद स्वपिति स्वपितः स्वपिषि स्वपिथः स्वपिमि स्वपिवः प्र०० म० पु० स्वपन्ति स्वपिथ स्वपिमः उ० पु० लोद प्र० पु. स्वपितु स्वपिनाम स्वपन्तु स्वपित म० पुरु स्वपिहि पितम् उ०पु० स्वपानि स्वपात्र स्वपाम प्र० पुरु अस्वपत् ल प्रस्थपिताम् अस्वपितम् अस्वपिव म० पु० अस्त्रपः पी: अस्वपन् प्रस्थापित प्रस्वपिम उ० पु० अस्वपम् विधि लिङ प्र० पु. स्वप्यात् स्वप्याताम् स्वप्युः म० पु० स्वप्याः स्वप्यातम् स्वप्यात उ० पु० स्वप्याम् स्वप्याव स्वप्याम प्र० पु० स्वप्स्यन्ति म० पु० स्वप्स्यथ उ० पु० स्वप्स्यति स्त्रप्स्यत: स्वप्स्यसि स्वप्स्यथः साप्स्यामि स्वप्स्यावः रुद् रोना (to weep) इस के रूर स्वप की तरह होंगे। रखपस्यामः प्र० पु० म० पु. शास शासन करना (t) govern) बट् परस्मैपद शास्ति शिष्टः शासति शास्मि शिष्टः शिष्ठ शास्मि शिष्वः शिष्मः लोट शिष्टाम् शासतु शाधि शिष्टम् शिष्ट शानानि शासात्र शासाम उ० पुल शास्तु रािष्ट्रात प्र. पु. म०पु उ० पुरु " प्र० पु० अशातू दू लङ् अशिष्टाम् अशिष्टम् স্থায় म० पु० अशा: तू द् प्रशासुः अशिष्ट अशिष्म उ० पु० प्रशासम् ( १२० ) प्र० पु० विधि लिङ् शिष्याताम् शिष्यातम् ঘিাষ शिष्यात् शिष्याः शिष्याम् शिष्युः शिष्यात म० पु० उ०पू० शिष्याम प्र० पु० शामिष्यतः शासिष्यति म० पु० शासिष्यति शासिष्यसि शासिष्यामि शासिघ्यथः शासिष्यथ शासिष्यामः उ. पु. शामिष्याव: GITT FITTET (to wake) परस्मैपद लट् प्र० पु० जागृतः जाग्रति म० पु० जागति जागर्षि जागर्मि जागृथः जागृथ उ०पु० जागृमः जागृवः लोट प्र० पु० जागृताम् जाग्रतु म० पु० जागर्तु 'जागृहि जागराणि जागृतम् जागृत उ०पू० जागराव जागरामू लङ् प्र० पु० अजागः अजागृताम् अजरुगा:
( १२१ ) अजागः प्रजागृतम् प्रजागृत म० पु. उ० पु० अजागरम् अजागृव प्रजागृम विधि लिड़ा प्र० पु० जागृयात् जागृयाताम् प्रागृयुः म० पु० जागृया: जागृयातम् जागृयात उ० पु० जागृयाम् जागृयाव जागृयाम प्र० पु० म. पु० जागरिष्यति जागरिष्यसि जागरिष्यतः जागरिष्यथः जागरिष्यावः जागरिष्यन्ति जागरिष्यथ उ०पू० जागरिष्यामि जागरिष्यामः या जाना (to go) परस्मैपद लट यानि यातः यान्ति प्र० पु० म. पु० उ० पु० यासि याथः याथ यामि यावः थामः लोट याताम् यान्तु प्र०पू० म० पु० उ० पु० यातु याहि यानि यातम् यात याव याम ( १२२ ) ल प्रयात् प्रयाताम् अयान् प्रयुः प्र० पु० म० पु० प्रयाः प्रयातम् प्रयात उ० पु० স্মথ प्रयाव प्रयाम विधि लिङ्ग प्र० पु० यायातू यायानाम् यायुः म० पु० यायाः यायातम् यायात उ०पु यायाम यायाव यायाम लूट प्र० पु० यास्यतः यास्यन्ति म० पु० यास्याति यास्यनि यास्यामि यास्यथः उ० पु० यास्यावः यास्यामः विद् जानना to knor) प्र० पु. म. पु० बत्ति वत्ति वनि परस्मैपद लट वित्तः धित्थः विद्यः विदन्ति वित्थ विद्मः उ० पु० लद् विदतुः प्र० पु० वेद विदुः ( १२३ ) वेत्थ म० पुरु उ०पु० विदथुः विद्ध विद विद्म वेद प्र० पु० लोद वेतु वितात् वित्ताम् विद्धि वित्तम् वेदानि वेदार विदन्तु म. पु वित उ० पुरु वेदाम लोद प्र० पु. म. पु० विदाकरोतु विदारुताम् विदाङ्गुरु पिदारुतम विदाङ्करवाणि विदाङ्करवाव विदाकुर्धन्तु विदाङ्कत विदाडूरवाम उ० पु. श्रवत् दू प्र० पु० म० पु० उ० पु० अचिताम् प्रचित्तम् अविद्व अविदुः अवित्त अवेः अवंदम अविद्म विधि लिङ् प्र० पु० विद्यात् विद्याः विद्याम् म० पुरु विद्याताम् विद्यातम् विद्याव विद्युः विद्यात उ० पु. विद्याम ( १२४ ) ल. वेत्स्यतः प्र० पु० म० पुरु उ० पुरु वेत्स्यति वेत्स्यमि वेत्स्यामि वत्स्यथः वेत्स्यावः वेत्स्यन्ति वत्स्यथ वेत्स्यामः आस् बैठना (to sit) आत्मनेपद लट प्र.पु. म. पु० प्रास्ते प्रास प्रासाते ग्रासाथ प्रामते प्राध्व प्रास्महे उ० पु० आने प्रास्वह ला प्रास्ताम् प्रासाताम् पासताम् प्र०पू० म. पु० उ० पु० प्रास्स्त्र प्राम आमाथाम् प्रामावह प्राध्वम् आसामहै ल प्रास्त प्रासाताम् प्रासताम् प्र० पु० म. पु० प्रास्थाः प्रामाथाम् प्राध्वम् उ०० प्रालि प्रास्माहि आस्वाह विधि लिङ्ग प्रालीयाताम् प्र० पु० प्रासीत प्रासीरन् ( १२५ ) प्रासीथाः म.पु० उ०पु० प्रासीयाथाम् प्रासीहि प्रासीध्वं प्रासीमहि प्रासीय प्र० पु० म० पु० प्रासिष्यते प्रासिष्यम प्रासिष्य आमिष्येते प्रासिष्यन्ते प्रासिष्पंथे आमिष्यध्वे आसिष्यावहे आसिष्यामहे उ० पु० शी सोना (to sleep) आत्मनेपदी लट प्र० पुरु शेते शर शय शयाते शयाथ म०पू० शरते शेध्ये शमह उ० पु. शवहे लोट प्र० पु. शयाताम् मापु उ० पु. शेताम् য शये शयाथाम् शधावह शरताम् शध्वम् शयामह अशयाताम् प्र. पु० म० पु० उ० पुरु अंरात अंशथाः স্বঘধি अशयाथाम् अशेरत अशध्वम् अंशमहि अशवहि ( १५६ ) विधि लिङ्ग प्र० पु० म. पु० शयीत शयीथाः शयीयाताम् शया याथाम् शयीवहि शयीरन् शयीय शीमहि उ० पु० शयाय शयिष्यते प्र० पु० म. पु० उ० पु० शयिष्यते शयिष्यम शायण मिप्यते शायष्यथ श यायावर शयिष्यन्ते शयिप्यध्व शयिष्यामह व्र बोलना (1) Speaks उभयपदी लट प्र० पु० व्रीति व्रतः ब्रुवन्ति म० पु० वीषि व्रयः व्रथ उ० पु० ब्रवीमि व्रमः लट् विकल्प में प्र० पु० प्राह पाहतुः पाहुः म० पु० प्रात्थ प्राहथुः ( १२७ ) लोट प्र० पु० ब्रवीतु व्रतात् व्रताम् ब्रुवन्तु म० पु० वहि व्रतम् व्रत उ० पु० वाणि जवाब व्रवाम ल प्र० पु. अब्रवीत अव्रनाम प्रतवन् म० पुर अत्री: अव्रतम अवत उ० पु० प्रवचम् व्रव अत्रम O विधि लिङ प्र० पु० व्रयात् व्रयाताम् युः म० पु० व्रया: वयातम् वयात उ० पु० व्रयाम রঘাষ बयाम स्तु-स्तुति करना शेष- दुह-दोहना इ-जाना अधि+इ-पढ़ना प्र० पु० वक्ष्यति वक्ष्यतः वक्ष्यन्ति ( १२८ ) म० पु० उ० पु० वक्ष्यसि वक्ष्यथ: वक्ष्यथ वक्ष्यामि वदयावः वक्ष्यामः व्र अात्मने पदी ( कहना) वर्तमान काल लद व्रते ब्रुवते व्रध्व स प्र० पु० बुधाते बुधार्थ म० पु० 66 व उ.पुर ब्रुवे व्रवहे महे लोट प्र० पु० व्रताम् व्रवाताम् व्रताम् म० पु. व्रध्वम व्रवाथाम् अद्यावह उ० पुरु व्रवे वामहे प्र० पु० अव्रत प्रवत्राताम् बवत 3 म० पु अत्रथाः प्रावायाम् अबध्त्रम् उ० पु० अववि अवमह प्र० पुरु अब्रर्वाह विधि लिङ् ब्रुवीयाताम् बुवीयाथाम् वीर्वाह ब्रवीत ब्रुवीथाः बुवीय म० पु बीरन् ब्रुवीध्वम् वीमहि उ० पु०
( १२६)
अभ्यास
अर्जुन ने अपने तीक्ष्ण बाणों से जयद्रथ को मारा। शिकारी लोग
प्राज जंगल में
बहुत
से
पशु
पक्षियों को मारेंगे।
भीष्म का पहिला नाम देवव्रत था । तोते आम के मीठे फलों को
खाते हैं । गोपाल गौ का दूध दुहता है । पृथिवीपत्ति पृथ्वीराज दिल्ली की
राजधानी पर शासन करता था । आज रात में खूब सोया । सूर्य उदय होने पर
भी न जागा | यज्ञदत्त गुरू से साङ्गोपाङ्ग वेदों को पढ़ता है । यह कौन जानता
है कि कल क्या होगा। योगी लोग जिस रात को जागते हैं सभी प्राणी सो
जाते हैं । मैं आज वर्षा के कारण प्राधीरात तक जागता रहा । यदि वह भाज
तक आया तो मैं उसे अवश्य मार दूंगा-
एक वन में एक हरिण और एक कौवा दो मित्र रहते थे। यदि माप
१० बजे तक न भाये तो में सो जाऊँगा ॥
क्रयादिगण | 9th Conjugation इस गण में धातु से आगे ना (ना) विकरण लगाया जाता है। क्री (खरीदना) परस्मैपद लट क्रीणाति क्रीणीत: कीणन्ति क्रीणासि कीणीथ क्रीणामि कोणीमः लोट क्रीणातु क्रीणीतात् क्रीणीताम क्रीणन्तु क्रीणीहि क्रीणीतम क्रीणीत क्रीणानि क्रीणाव क्रीणाम क्रीणीथः क्रीणीव . अक्रीणात् अक्रीणाः अक्रीणाम् प्रक्रीणन् अक्रीणीन क्रीणीम अक्रीगीताम् अक्रीणीतम अक्रीणीव विधिलिङ् कीणीयाताम् कीणीयातम् क्रीणीयाव क्रीणीयात् कीणीयाः क्रीणीयाम् क्रीणीयुः क्रीणीयात क्रीणीयाम ( १३१ ) लट् परस्मैपद वेष्यति ऋष्यसि ऋष्यामि केति ऋष्यथ ऋष्यामः कीगीते क्रीणीपे क्रीणे ऋष्यतः ऋष्यथ: ऋष्याव: आत्मनेपदी लट् कीणाते कोणाथे क्रीणीवहे लोट क्रीणाताम् क्रीणाथाम् कोणाव है क्रीणते क्रीणीध्ये कीणीमहे क्रीणीताम् क्रीणीव क्रीण कीणताम् क्रीणीध्यम् क्रीणामहे अक्रीणीत अक्रीणीथाः अक्रीण अफ्रीणत अक्रीणीध्वम् अक्रीणीमहि अक्रीणाताम् अफ्रीणायाम् अक्रीणीहि विधिलिङ् क्रीणीयाताम् क्रीणीयाथाम् कीणीवहि क्रीणीत कोणीथाः क्रीणीय कीणीरन् क्रीणीध्वम् कोणीहि ऋष्यते ऋष्यसे ऋष्य ऋष्येते ऋष्येथे ऋष्यावहे ऋष्यन्ते ऋष्यध्वे केवामहे ( १३२ ) ज्ञा (जा) (जानना) लट् परस्मैपद जानाति जानीतः जानन्ति जानासि जानीथः जानीथ जानामि जानीवः जानीमः लोद जानातु जानीतातू जानीताम जानन्तु जानीहि जानीतम जानीत जानानि जानाव जानाम आजानात् अजानन् अजानीत अजानीम 'अजानाः अजानाम् अजानीताम् अजानीतम् अजानीव विधिलिङ्ग जानीयाताम् जानीयातम् जानीयाव जानीयात् जानीयाः जानीयाम् जानीयुः जानीयात जानीयाम शान्यतः ज्ञास्यति ज्ञास्यसि शास्यामि ज्ञास्यन्ति ज्ञास्यथ ज्ञास्यामः शास्यथः ज्ञास्यात्रः आत्मनेपद लट् जानाते जानीते जानते ( १३३) জানাৰ जाने जानीध्वे जानीमहे जानाथे जानीवहे लोद जानाताम जानाथाम् जानावह जानीताम् जानीव जान जानताम जानीध्वम् जानामह अजानीत अजानीथाः अजानि अजानत अजानीध्वम् अजानीमहि अजानाताम् अजानाथाम् अजानीहि विधि लिङ् जानीयाताम् जानीयाथाम् जानीवहि जानीत जानीथाः जानीय जानीरन् जानीध्वम् जानीमहि ज्ञास्यते शास्यसे ज्ञास्य ज्ञास्यते ज्ञास्येथे सास्यावहे ग्रह (गृह) पकड़ना शास्यन्ते ज्ञास्यध्ये शास्यामहे लट् परस्मैपद गृहीतः गृहाति गृह्णासि गृह्णामि गृहीथः गृह्णीव गृह्णन्ति गृलीथ गृह्णीमः ( १३४ ) गृह्णातु गृहीतात् गृहाण गृह्णानि लोद गृहीताम् गृहीतम् गृहाव गृहन्तु गृहीत गृहाम अगृह्मात् अगृहाः अगृह्णाम् अगृहीताम् अगृहीतम अगृह्णीय अगृहन् अगृह्णीन अगृहीम विधि लिङ् गृह्णीयात् गृह्णीयाः गृह्णीयाम् गृहोयाताम् गृह्णीयानम् गृहीयाव गृह्णीयुः गृहीयान गृहीयाम ग्रहीष्यति ग्रहीष्यसि ग्रहीष्यामि ग्रहीष्यतः ग्रहीष्ययः ग्रहीष्याव: आत्मनेपद लट् ग्रहीष्यन्ति ग्रहीष्यथ ग्रहीष्यामः गृहाते गृहीते गुलीषे गृहे. गृहते गृहीध्वे गृह्णीमहे गृहाथे गृहीयहे लोद गृहाताम् गृहाथाम् गृहीताम् गृहीष्य गृह गृह्णताम् गृहीध्वम् गृलाम है गृह्णावह ( १३५ ) "अगृहीत अगृहीथाः अगृहि अगृहत प्रगृह्णीध्वम् अगृह्णीमहि अगृहाताम् अगृहाथाम अगृहीवहि विधिलिङ् गृह्णीयाताम् गृह्णीयाथाम् गृहीवहि गृहीत गृलीयाः गृहीय गृहीरन् गृहीध्वम् गृह्णीमहि ग्रहीष्यते ग्रहीष्येते ग्रहीष्यन्ते ग्रहीष्यसे ग्रहीष्येथे ग्रहीष्यध्वे ग्रहीध्ये ग्रहीष्यावहे ग्रहीष्यामहे बन्ध ( ब ) बांधना वध्नाति वध्नातु अवघ्नात् वन्नीयात् मत्स्यति खाना अश्नाति अश्नातु आश्नात् अश्नीयात् अशिष्यति अश मुष चुराना मुष्णाति मुष्णातु अमुष्णात् मुष्णीयात् मुषिष्यति पुष् पुष्ट करना पुष्णाति पुष्णातु अपुष्णात् पुग्णीयात् पुषिष्यति
(१३६ )
अभ्यास
चम्पा की सास प्राज बहुत सुन्दर वस्त्र खरीदेगी। मैं उसे अच्छी
तरह जानता हूं क्यों कि वह मेरे घर के समीप ही रहती है। चूहा वनिके
की
दुकान
से अन्न के छोटे २ कणों को चुराता है। यह वही अंगुठो है
जो कल सोहन ने चुरा ली थी। हे ऋषि ! अपने बालक को लो, यह प्राप
ही का तो है। राम ने स्वयंवर में धनुष तोड़ कर सीता के हाथ को पकड़ा
जो ब्राह्मण वेदों के प्रयों को नहीं जानता उसका परिश्रम वृथा है। यदि
रमा बनारस गई तो वह अवश्य एक नई साड़ी खरीदेगी। तुमने अभी तक
नई पुस्तक क्यों नहीं खरीदी। अर्जुन ने युद्ध में
द्रुपद
को जीत कर जीवितः
ही पकड़ लिया।
जुहोत्यादि गण 3rd Conjugation
इस गण में कोई विकरण नहीं लगता-धातुके आगे (श्लु)
गण विकरण लगता है-
धातु द्वित्व हो जाता है।
भी-डरना
परस्मैपद लट
विभेति विभितः विभीत: विभ्यति
विभेषि विभीथः विभिथः विभ्यथ
विभेमि विभीवः विभिवः विभीमः
लोट
विभेतु विभितात् विभीतात् विभितां (विभीतां) विभ्यतु
विभीहि विमोतं विभित विभीत विभित
विभयानि
विभयाव विभयाम
अविभेतू अविभीनां अविभितां
अविभयुः
अविभः अविभीतं अविभितं अविभीत अविभित
अविभयं अविभीव अविभिव अविभीम अविभिम
विधिलिङ्
विभीयातू विभीयाताम्
विभियुः
विभियात विभियाताम् विभियुः
घिभीया विभीयातम् विभियात
(१३८) विभिया: विभीयाम् विभियाम् विभियातम् विभीयाव विभियाव विभियात विभीयाम विभियाम भेष्यति भेष्यसि भेष्यामि जुहोति जुहोषि जुहोभि भेष्यतः मेष्यन्ति भेष्यथः भेष्यथ भष्याव. भेष्यामः हे-होमकरना जुहुतः जुह्वति जुहुथः जुहुथ जुहुवः जुहुमः लोद जुहुतात जुहुताम् जुह्वतु जुहुनम् जुहुत जुहवाव जुहवाम जुहोतु जुहुधि जुहवानि अजुहोत् अजुहोः अजुहवम् अजुहुताम् अज़हवुः अजुहुतम् अजुहुत अजुहव अजुहुम विधिलिङ् जुहुयाताम् जुहुयुः जुवातम् जुहुयात जुहुयाव जुहुयाम जुहुयात जुहुयाः जुहुयाम् ( १३९) होष्यति होण्यतः होण्यन्ति होण्यसि होष्यथ: होष्यथ होष्यामि होष्याव: होष्यामः घा-धारण करना दधाति दधातु अदधात् दध्यात् धास्यति धत्ते धत्ताम् अधत्त दधीत धास्यते दा-देना ददाति ददातु अददात् दद्यात् दास्यति दत्ते दत्ताम् अदत्त ददति दास्यते भृ-पालना लट् परस्मैपद विभर्ति विभृतः विभ्रति विभर्षि विभृथः विभ्रथ विभर्मि विभृवः विभृमः लोट विभतु (भृतात्) विभृताम् विभ्रतु विभृहि विभृतम् विभृत विभाणि विभराव विभराम अविभः अविभः अविभरम् अविभृताम् अविभृतम् अविभृव विधि लिङ्ग विभृयाता अविभुः अविभृत अविभृम विभृयात् विभृयुः
( १४०)
विभृयाः
विभृयाम्
विभृयातं
विभृयाव
विभृयात
विभृयाम
भरिष्यति
भरिष्यसि
भरिष्यामि
भरिष्यतः
भरिष्यथः
भरिष्यावः
भरिष्यन्ति
भरिष्यथ
भरिष्यामः
अभ्यास
युधिष्टिर प्रतिदिन प्रातः और सायं हवन करता है। राजा के न
होने पर प्रजा के लोग चोरों से डरते हैं। पृथिवीपति समस्त राज्य के
भार को धारण करता है -महाराजा भोज ने कवियों को बहुत धन दिया ।
वन में शिकारी को देख सभी पक्षी डर गए । प्रभो मैं कभी सांसारिक
पशुबल से न डरूं । महाभारत के युद्ध में कर्ण ने अर्जुन के वध का व्रत
धारण किया । ब्रह्मचारी प्राचार्य के समीप ब्रह्मचर्य पालन का व्रत
धारण करेंगे। उदार पुरुष अतिथियों को सर्वस्व तक दे देता है । जो
छात्र योग्य हैं गुरु उन्हें वार्षिकोत्सव पर पारितोषिक देगा--
मैं पूर्णिमा के दिन अपनी यज्ञशाला में हवन करूंगा। मेरे पिता मुझे
दश रुपये प्रतिमास दिया करेंगे।
( १४१ ) विभृते विभृषे विभ्र विभ्रते विभृध्वे विभृमहे भृ-आत्मनेपद लट विभ्राते विभ्राथे विभृवहे लोट विभ्राताम् विभ्राथाम् विभरावहै विभृताम् विभृष्व विभर विभ्रताम् विभृध्वं विभरामहै अविभृत अविभृथाः अविभरि अविभ्रत अविभृध्यम अविभृमहि अविभ्राताम् अविभ्राथाम् अविभृवहि विधि लिङ विभ्रीयाताम् विभ्रीयाथाम् विभ्रीवहि विभ्रीत विभ्रीथाः विभ्रीय विभ्रीरन विभ्रीध्वम् विभ्रीमहि भरिष्यते भरिप्यते भरिष्यन्ते भरिप्यसे भरिप्येथे भरिष्यध्वे भरिप्ये भरिष्यावहे भरिष्यामहे क्रिया के वाच्य भेद प्रयोग वाच्य भेद से क्रिया तीन तरह की होती है ( १४२ ) यथा-फतवाचक-कर्मवावक-भाववाचक । जहां गणों की क्रिया प्रयुक्त होती है वे सभी कर्तृवाच्य होते हैं। कर्तृवाच्य में फर्ता में प्रथमा और कर्म में द्वितीया प्रयुक्त होती है । कर्ता के पुरुष और वचन के अनुसार क्रिया होती है । यथा-कृष्णः पुस्तकं पठति-यहां प्रथमैकवचनान्त कृष्ण कर्ता के अनुसार ही प्रथम पुरुष एकवचनान्त पठति क्रिया प्रयुक्त हुई- मध्यम पुरुष-त्वं पुस्तकं अपठः उत्तम पुरुष-अहं ग्रामं गच्छामि कर्मवाच्य कर्मवाच्य प्रयोग में कर्ता में तृतीया, कर्म में प्रथमा, होती है और क्रिया का सम्बन्ध कर्म से होता है यथात्वया अंमो ताड्यते । यहां कर्ता युष्मद् तृतीया एकवचनान्त कर्म अदस पुल्लिङ्गप्रथमा एकवचानान्त है । भाववाच्य- -- इसमें क्रिया न कर्ता और नाही कर्म के अनुसार होती है। धातु के आगे केवल आत्मनेपदी प्रत्यय लगाये जाते हैं- यथा-मया स्थीयते-त्वया सुप्यते-तेन जाग्रियते । भाववाच्य सदा अकर्मक धातुओं में ही बनाया जाता है- कर्मवाच्य और भाववाच्य में धातु के आगे य लगाकर मने पद के प्रत्यय लगा दिये जाते हैं और रूप दिवादिगणी आत्मने पदी धातु की तरह होता है- D ( १४३) पठ्यते पठ्यसे पट्य पठ्यध्वे पठ्यामहे पठ्यताम् पठ्येयाम् पट्यस्त्र पठ्य जैसे - पठ-पढ़ना लद पठ्यते पठ्यन्ते पठ्येथे पठ्यावहे लोट पठ्येताम् पठ्यन्त पठ्यध्वम् पठ्यावहै पठ्यामहै। लङ् अपठेचताम् अपघ्यन्ताम् अपठ्यध्वम् अपठ्यावहि अपठ्यामहि विधिलिङ पठ्यरन् पठ्येयाथाम् पठ्यध्वम् पथ्यवाह पठ्येमहि अपठ्यत् अपठ्यथाः अपठ्यगाम अपठ्य पठ्येयाताम् पठ्येल पट्येथाः पठ्येय पठिष्यते पठिप्यसे पठिप्ये पठिष्येते पठिष्यन्ते पठिप्येथे पठिष्यध्वे पठिष्यावहे पठिष्यामहे अन्य धातुओं के रूप जायाजाता है गम्यते (१४४) हुआ जाता है है लिख्यते लिखा जाता है भूयते पीड्यते पीड़ा जाता है भक्ष्यते खाया जाता है दीव्यते चमका जाता है इच्छयत चाहा जाता सेव्यते सेवा किया जाता है लभ्यते पाया जाता है नृत्यते -नाचा जाता है । चोर्यते-चुराया जाता है । कथ्यते-कहा जाता है। मिच्यन्ते --सींचा जाता है। त्यज्यते-छोड़ा जाता है। पूज्यते-पूजा जाता है । हन्यते -मारा जाता है। तन्यते-फैलाया जाता है । इत्यादि। इकारान्त उकारान्त धातु के इ उ को दीर्घ हो जाता है। जैसे जि-जीयते । श्रु-श्रूयते । धातु के अन्त में आ हो तो ई हो जाता है- जैसे भा-भीषते-पा-पीयते-स्था-स्थीयते धा--धीयते-गा-गीयते-दा-दीयते कई एक धातुओं के य को इ व को उ और र को ऋ हो - - जाता है जैसे- - यज् इज्यते व्यध विध्यते ( १४५ ) उद्यते, व, , वद्, वच, उच्यते, वम्, उध्यते, स्वप् सुप्यते उप्यते वह, उहाते, ग्रह गृह्यते प्रच्छ, पृच्छयते। शंसू, वन्ध आदि धातुओं की उपचा का अनुनासिक उड़ जाता है। यथा:- शस्यते, वध्यते । यदि धातु ऋकारान्त हो तो ऋ को रि हो जाता है। यथाः क, क्रियते. हृ, हियते । यदि ऋयुक्तवर्णयुत हो तो तो अर हो जाता है। - Chan स्मृ, स्मर्यते यक् प्रत्यय मार्य सकु विम के यों में हो लगाया जाता है आर्धधातुक में नहीं । लट का प्रयोग प्रात्मनेपदी कर्तृवाच्य की तरह ही होगा। अभ्यास नौकरों से सेवा किया गया। दवाई से रोग नष्ट किए जाते हैं। सेनापति स सेना सिखाई गई। दो वीरों से युद्ध किया जायगा । पशु ग्वालों से ले जाए जाते हैं। शिष्यों से गुरु को नमस्कार किया जाता है । कवि राजा से बुलाये जायेंगे। दाता से धन दिया जावेगा । विद्वानों से धर्म प्रचार किया गया । अध्यापक से पाठ मुना गया। राजा से निर्धनों को अन्न दिया जायगा । हम से पर्वतों के ऊँचे शिखर देखे गये । भित्र विपत्ति में परख जाते हैं। देवदत्त से अपना पाठ याद किया जायगा ।
ण्यन्त प्रक्रिया नाययति تلو १ जहां पर कर्ता को प्रेरणा कर कोई क्रिया कराई जाय वहां प्रेरणार्थक क्रिया प्रयुक्त होती है। २ प्रेरणार्थक क्रिया के प्रयोग में धातु से परे णिच् ( अयू) लगाया जाता है । चुरादिगण के धातुओं की तरह प्रेरणार्थक क्रिया के भी रूप बनाये जाते हैं। ण्यन्त धातु के अन्तिम स्वर को वृद्धि हो जाती है । जैसे:- ह हारयति कारयति तृ तारयति सारयति स्तावयति पू पाययति नी भावयति उदाहरण:- देवः पशून् नयति । देवेन, पशून, नाययति । अश्वो घासं खादति-घोड़ा घास खाता अश्वं घासं खादयति-घोड़े को घास खिलाता है। प्रेरणार्थक क्रिया के रूप प्राय: उभयपदी होते हैं। यथा:- भावति भावयतु अभाधयत् भावयेत् भावयिष्यति भावयते भावयताम् अभावयत भावयेत भावयिष्यते । ण्यन्त धातुओं के वर्तमानकालिक रूप पठ्-पढ़ना पाठयति रुच-पसंद करना रोचयति चल-चलना चालयति स्मृ-याद करना स्मारयति - (१४७ ) त्यज छोड़ना त्याजयति हस-हंसना हासयति पच-पकाना पाच यति स्था-ठहरना स्थापयति रक्ष-रक्षा करना रक्षयति शा-जानना शापति गम-जाना गमर्यात जि-जीतना गापयति वोध्-जानना वोधयति स्ना-नहाना स्नापयति चुर-चुराना चोरयति श्रु-सुनना श्रावयति दश-देखना दर्शयति कृ-करना कारयति हन्-मारना घातयति अधि-पढ़ना अध्यापयति को-खरीदना काययप्ति लिख-लिखना लेखयति ग्रह-पकड़ना पाहयति क्षिप--फेंकना क्षिपति मुत्र-छाड़ना मोचयति मुच्च-छोड़ना मोचयति नत्-नाचना नर्तयत बिद्-जानना वेदयति रभ-शुरू करना रभयाति दा-देना दापयति लभ-पाना लभयति पा-रक्षा करना पालयति दिव-खेलना देवयति पा-पीना पाययति यत्-यत्नकरना यातयति तोल--तोलना तोलयति तुद-दुःख देना तोदयति वन्द-नमस्कार करना बंदयति मुद-खुश होना मोदयति नश-नष्ट होना नाशयति युध्र-युद्ध करना योधयति वा--बोना वपयति । द्युत-चमकना द्योतयति वस्-रहना वासयति घट-बनाना घटयति पत्-गिरना पातयति. वद्-बोलना बदयति कंप-कांपना कंपयति
( १४८ )
है
Rer
नम - झुकना नमयति
घाव-भागना घावयति
कथ-कहना कथयति
चिन्त्-सोचना चिन्तयति
अभ्यास
सारथि घोड़े को घास खिला रहा
और
खुजला रहा
। गुरू बड़े
प्रेम से खिलाता है और पाठ पढ़ाता है। प्रियवर ! यह मेरा कार्य करवा दो,
आपकी बड़ी कृपा होगी। सेवक यज्ञवेदी पर ब्राह्मणों के लिये भासन
बिछवाता है। नीच परधन को चुरवाते हैं माता बालक को मिठाई खिलाती
है और उसका मुख चूम रही है। प्रल्हादके पिता ने उसे पर्वत की चोटी से
गिरवा दिया । यदि आप मुझे मेरे घर तक पहुंचा दें तो बड़ा अनुग्रह हो ।
राजा माज न्यायालय में चारों को दण्डों से पिटवायेगा। द्वारपाल भोजराज
की सभा में कवि को प्रवेश कराता है । गुरु ने कहा जो अाज अपना सारा
पाठ सुनायेगा मैं उसे इनाम दूंगा ।
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अथ कृदन्ताः । %3D % 3D - - - कृदन्त प्रकरण में धातु के आगे जो प्रत्यय लगाए जाते हैं उन्हें कृत् कहते हैं । कृत् जिन के अन्त में हो उन्हें कृदन्त कहते हैं, इनकी प्रातिपदिक संज्ञा होने पर सुबन्त शब्द हो जाते हैं। तान्त Past passive participles कर्म अर्थ में भूतकाल में धातु से आगे क्त ( त ) प्रत्यय लगाया जाता है। जैसे-गम्-जाना से-त जो चला गया। पठ् पढ़ना से पठितः पढ़ लिया। भू-होना से भूतः हो गया। स्मृ-याद करना मे= स्मृतः = याद कर लिया। है - हरना से हृतः छीन लिया। कृ~-करना से = कृतः = कर लिया। क्री-खरीदना से कोतः खरीद लिया। अह... पकड़ना गृहीतः पकड़ लिया। दा-देना दत्तः दिया गया। पा---पीना = पोतः अन्य प्रसिद्ध रूप- भीतः आरूढ़ः भृतः कथितः उक्तः श्रुतः भृतः धृतः जितः ज्ञान: जोगाः तीर्णः भिन्नः छिन्नः खिन्नः मारितः पाठित स्थितः कारितः चोरितः हतः सुप्तः - - - - - - पिया गया। नतः ( १५० क्तवल्वन्त-Past active participles २-कर्ता के अर्थ में भूनकाल में धातु के आगे क्तवतु प्रत्यय लगाया जाता है। जिसने कर लिया कृतवान् जिसने पढ़ लिया पठितवान् जिसने खालिया खादितवान् कुछ अन्य रूप हृतवान् दत्तवान् पीतवान् कारितवान् झातवान् दृष्टवान् क्रीतवान् गृहीतवान् उक्तवान् पूर्णवान् ताड़ितवान् श्रुतवान् नतवान् वोधितवान् भूतवान् सुप्तवान् ३ धातु के आगे तुमुन् (तुम् ) प्रत्यय जोड़ा जाता है- जब वह क्रिया किसी दूसरी क्रिया का प्रयोजन हो । जैसे- पठ् पठितुम पढ़ने को कर्तुम् करने को भुज भोक्तुं खाने को ग्रह गृहीतु पकड़ने को तृ तर्तुम् तैरने को हन्तुम मारने को स्थातुं ठहरने को नम् जन्तुं गम् गन्तु जाने को झुकने को ( १५१ ) दिव अदू अत्तुं खाने को की क्रेतु खरीदने को शी शयितुं सोने को भृ भर्तु भरने को देवितु चमकने को कुछ अन्य रूप भवितुं सेवितुं भूषयितुं अध्येतु कारयितुं साधयितुं होतुं छेत्तुं भेत्तु तोलयितुं योद्धम एधितुं योक्तुं ताड़यितुं कथयितुम् ॥ ४-तव्य-अनीय धातु के आगे भाव और कर्म अर्थ में तव्य और अनीय-प्रत्यय लगाए जाते हैं। जैसे- गम्-गन्तव्यम्-जाना चाहिए गमनीयम् कृ कर्तव्यम् करणीयम् स्ना स्नातव्यम् स्नानीयम् दातव्यम् दानीयम् भक्ष भक्षितव्यम् भक्षणीयम् हर्तव्यम् हरणीयम् स्मृ म्मतव्यम् स्मरणीयम् पक्तव्यम् पचनीयम् ग्रह गृहीतव्यम् ग्रहणीयम् रक्ष रक्षितव्यम् रक्षणीयम् - पत्र ( १५२ ) - ठहरना में हरना से करना से यत् स्वरान्त धातुओं के आगे यत् ( य ) प्रत्यय लगाया जाता है। जैसे- चि चिनना से चेयम् दा देना से देयम् स्थेयम् ह हार्यम् कार्यम पीना से पेयम जि जीतना से जेयम् नी ले जाना से नेयम इत्यादि दातृ-शानच ५ वर्तमान काल में धातु के आगे शतृ ( अतू ) और शानच (आन वान ) प्रत्यय लगाए जाते हैं। जैसे- यदि धातु परस्मैपदी हो तो शतृ (अत् ) आत्मनेपदी हो तो शानन (आन वा मान) लगाए जाते हैं। गम् गच्छ जाना से-गच्छत् जाता हुआ मक्ष भक्षयत् खाता हुआ पठ पटतू हरतू भू भवतू क कुर्वत् दिव दीव्यत् यच्छ यच्छत दा ददत् धाव धावत् पा (पिव ) पिवत् जिघ्र जिघ्रत् - खाना से ( १५३ ) स्मृ स्मरतू दृश्य पश्य पश्यत् पच पचत् चारेय चोरयत् लिख लिखत् भूष भूषयत वस वसत् तिष्ठ तिष्ठत् शानव वर्ध-वर्धमान शी-शयान सेव-सेवमान गम्-गम्यमान हन्-हन्यमान-" इत्यादि तान्त पठित्वा-पढ़कर कृ-कृया भृ भृत्वा गम्-गत्वा स्था स्थित्वा नमू-नत्वा पा पीत्वा स्मृ-मृत्वा दा दत्वा कथयित्वा चल चलित्वा भक्ष-भक्षीयत्वा दृश क्षिप-क्षिपत्वा श्रु श्रुत्वा त---तीत्वा लिख लिखित्वा अथ स्त्री प्रत्यया:- अकारान्त और अजादि शब्दों के आगे टापू ( आ )प्रत्यय (१५४) लगाकर स्त्रीलिंग के रूप बन जाते हैं। जैसे अजा মালা चतुरा शोभना कान्ता मनोहरा कोकिला शूद्रा एड़का मक्षिका वैश्या देवता वलाका अश्वा श्रेष्ठा chor अकारान्त शब्द यदि जातिवाचक हों तो ई प्रत्यय लग जाता है- जैसे मानुषी सिंही सूकरी राक्षसी ब्राह्मणी देवी मृगी नापिती ऋकारान्त न अन्त जिनके हो (भत् वत् क्तवत् वस ईयस् जिनसे लगा हो)ई प्रत्यय लगाया जाता है। यथा:- दात्री हन्त्री धात्री दण्डिनी मालिनी कामिनी रात्री शुनी मधोनी मनोहारिणी बुद्धिमती श्रीमती दयावती विदुषी प्रेयसी ज्यायसी कनीयसी श्रेयसी মহামনী शत्रन्तों से भी ई लग जाता है पठन्ती गच्छन्ती पचन्ती इच्छन्ती की ( १९५) कुमारी मत्सी वैकल्पिक और ई लगाकर पृच्छन्ती आदि गौरसेगौरी कुमार किशोर किशोरी नर्तकी तरुणी अनड्वाही युवती अन्यरूप प्राणो क्षत्रिय क्षत्रियाणी इन्द्र इन्द्राणी भव भवानी रुद्र रुद्राणी हिम हिमानी आज्य अरण्याणी आचार्य प्राचार्याणी श्वशुर गार्ग्य गाायणी गार्गी पति पत्नी श्वश्रूः गुर्वी गुरुः लध्वी लघुः वही वहुः लघु बहु भगिनी कारक प्रकरण- जिसका क्रिया के साथ साक्षात् सम्बन्ध हो उसे कारक कहते हैं।
( १५६ ) संस्कृत में कारक छः होते हैं । सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति होती है उसका सम्बन्ध नाम से होने के कारण उसे कारक नहीं कहा जाता। विभक्तिये सात है, आठवां सम्बोधन- रामः २ द्वितीया ३ तृतीया ४ चतुर्थी कर्ता कर्म करण सम्प्रदान ५पंचमी ६ षष्ठी ७ सप्तमी अयादान सम्बन्ध अधिकारण आठवां सम्बोधन संस्कृत में किसी वस्तुमात्र का नाम निर्देश भी करना हो नो प्रथमा विभक्ति होती है -यथा गृहं पुस्तकम् इत्यादि कर्तृवाच्य में कर्ता में प्रथमा होती है । जैसा-- अश्वोधावति रामा भोजन पर्वात सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति होती है - जम्ने हेकृष्ण भोदेवाः हेवाली २ द्वितीया विभक्ति कर्मकारक क्रिया के व्यापार का फल जिस पर हो उसे कर्म कहते है। कर्म म द्वितीया विभक्ति होती है। यथा--- पुस्तकं क्रीगाति । ग्रामं गच्छति । शिष्यं ताड़यति । धनं हरति । ।
( १५७)
--
परन्तु यदि कर्मवाच्य हो तो कर्म में प्रथमा और कर्ता में
तृतीया होती है। यथा--शिष्यः, ताडयते, ग्रामो गम्यते ।
द्विकर्मक धातुओं के गौण कर्म में भी द्वितीया होती है । यथाः-
दुह्, याच , पच, दण्ड, रुघ, प्रच्छ, विक्, शाम, सु जिमन्य
मुष, नी, हू, कृष वह तथा इन्हीं के समानार्थक धातु द्विकर्मक
होते हैं, एक मुख्य दूसरा गौण (जैसः-
गां दुग्धं दोग्धि-गौ से दूध दोहता है।
दातारं अन्नं याचने भिक्षुः । तण्डुलानोदनं पनि ।
अपराधिनं शतं दण्डयति इत्यादि ।
विना
अन्तरेण
उभयतः
सर्वतः प्रति
उपर्युपरि
अधोवः इत्यादि शब्दों के योग में भी द्वितीया होती है ।
कविं बिना सभा न शोभने । उभयतो नगर प्राकारी वर्तते ।
कवि के विना सभा शोभा नहीं देनी । नगर के दोनों ओर
फसील है । इत्यादिः-
करण कारक
जिस साधन के द्वारा कर्ता अपना कर्म करता है उसे करण
कहते हैं।
उस में तृतीया होता है-
श्रीकृष्णः चक्रेण शिशुपालं अहन् । रामो वाणेन रावणं
हतवान् ।
कर्मवाच्य के कर्ता निषेधार्थक अलं कृतं और विना के योग
में नृतीया होती है । जैसे:-
--
( १५८)
त्वया न शोभनं कृतम् । हरिणावेदः पठ्यते । अलं महीपाल
तव श्रमेण । कृतं बहु प्रलापने । ईश्वरेण विना मम को बन्धुः।
चतुर्थी ( सम्पदान)
जिसके लिये दान किया जाय उसे सम्प्रदान कहते हैं ।
उसमें चतुर्थी होती है: विप्राय गां ददाति । भिक्षुभ्यः अन्न
अयच्छतू।
नमः स्वस्ति स्वाहा स्वधा अल वषट-इनके योग में भी
चतुर्थी होती है:-
गुरवे नमः । राक्षे स्वस्ति । अग्नये स्वाहा । पितृभ्यः स्वधा
अलं मल्लो मल्लाय । देवेभ्यः वषट् ।
रुच्, क्रुध् , द्रुह् आदि अर्थों को रखने वाले अन्य धातुओं
के योग में चतुर्थी होती है । जैसे:-
बालाय रोचते मिष्टम् । शिष्याय क्रुध्यातगुरुः । गक्षे
द्रुह्यति प्रजा।
पंचमी ( अपादान)
दो पदार्थो का विभाग जहां से हो उसे अपादान कहते हैं ।
उस में पंचमी होती है । जैसे:-प्रासादात् पतति कपोतः । गंगा
पर्वतेभ्यः निर्गच्छति । दूरादायाति । वृक्षात् पत्राणि अपतन् ।
व्याघ्रात् विमति।
ऋते, विना, नाना पृथक् इनके योग में भी पंचमी होती है।
-
-
ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः । काशी मरणात् मुक्तिः । विना
भाग्यातू न सुखम् । नाना नारी निष्फला लोकयात्रा।
( १५९ )
६ षष्ठी ( सम्बन्ध)
शेष अर्थात् सम्बन्ध में षष्ठी होती है-नद्याः नीरं, रामः
सेवकः गुरोः शिष्यः । मातुः वस्त्रम् । इत्यादि ।
७ सप्तमी ( अधिकरण)
आधार को आधिकरण कहते हैं । उसमें सप्तमी होती है।
गेहे शूरः । सभायां पण्डितः । कटे शेते । वाचि प्रवीणः । द्यूत
निपुणः । कलासु कुशलः ।
सम्बोधन
से
बुलाना
हो तो सम्बोधन का प्रयोग होता है-उस में
प्रथमा होती है।
हे कृष्ण आगच्छ । अत्र गौश्चरति ।हे बालौ युवयोभियः कः
सम्बन्धः । हे देव्यः स सुखी भवेत् ।
अथ समासः
१ कई पदों को मिलाकर एक पद बना देने को समास
कहते हैं।
जैसेः गंगायाः तीर-गंगातीरम
राक्षः पुरुषः राजपुरुषः
समास छः तरह का होता है।
अव्ययीभावः
तत्पुरुष,
वहुव्रीहि कर्मधारय द्विगु
कर्मधारय
तत्पुरुष
के अन्तर्गत माना जाता है-
और द्विगु
-
( १६०) अव्ययीभावः पूर्वेऽव्ययेऽव्ययीभावः- (३) अव्यय शब्द किसी सुवन्त से जोड़ा जाय तो अव्ययी- भाव समास होता है। जैसे दिनं दिनं प्रति इति प्रतिदिनम् शक्ति अनतिक्रम्य इति यथाशक्ति- नगरस्थ समीपं इति उपनगरम गोः पश्चातू अनुग घनस्य अभावः निर्धनम् मक्षिकाणां अभावः निमक्षिकम् तत्पुरुष अमादौ तत्पुरुषः द्वितीयान्तं सुवन्त के साथ श्रित अतीत पतित गत अत्यस्त प्राप्त प्रापन्न मिलाने पर तत्पुरुष समास होता है । द्वितिया तत्पुरुष कृष्ण श्रितः इति दृष्टिं अतीत इति दृष्टयतीतः कूपं पतितः इति कृपंपतितः ग्राम गतः इति ग्रामगतः कृष्णाश्रितः (१६१) अत्यस्तः दिगत्यस्तः दिशं ग्राम विपद प्राप्तः इति इति इति ग्रामप्राप्तः आपन्नः विपदापन्नः तृतीया तत्पुरुषः प्रभुणा रक्षित छिन्नः नखः पित्रा मासेन इति इति इति इति इति इति प्रभुरक्षितः नखछिन्नः पितृममः मासपूर्वः सम पूर्व गुरुणा गुरुदत्तः वाचा कलह वाकलह चतुर्थी तत्पुरुष यूपाय भूतेभ्यः ब्राह्मणाय कुंडलाय यूपदारू वलिः भूतबलिः हितं ब्राह्मणहितम् हिरण्यं कुंडलहिरण्यं पश्चमीतत्पुरुष भयं चोरभयं भीतः व्याघ्रभीत: पतितः वृक्षपतित: चोरात् व्याघ्रातू वृक्षात् (१६२) धर्मस्य यमुनायाः स्वर्णस्य षष्ठी तत्पुरुष- क्षेत्रं धर्मक्षेत्रम् जलं यमुनाजलम् कुंडलम स्वर्णकुंडलम् उपदेशः हितोपदेशः हितस्य सप्तमी तत्पुरुष- - इते निपुणः धूतनिपुणः अक्षेषु शौण्डः अक्षशौण्डः वाचि पटुः वाकपटुः सभायां पण्डित: सभापण्डितः अलुक तत्पुरुष जहां समास की दशा में भी विभक्ति लोप नहीं होता उनके मुख्य उदाहरण निम्न लिखित हैं- (२) द्वितीया परन्तपः (३) तृतीया आत्मनातृतीयाः (४) चतुर्थी परस्मैपदम् (५) पंचमी दूरादागतः स्तोकान्मुक्तः (६) षष्ठी चोरस्य कुलं वाचोयुक्तिः ७) सप्तमी गेहेशूर: युधिष्ठरः नभूतत्पुरुषः जो नञ् उत्तर पदों के साथ समस्त होता है उसे न तत्पुरुष कहते हैं- (१६३) जैसे अब्राह्मणः न ब्राह्मण न सत् असत् न भावः अभावः न अश्वाः अनश्वः नश्वरः अनीश्वरः कुपुरुषः कुपुरुषः न उत्तमः अनुत्तमः दुप्रकृतिः द्वन्द् समासः च के अर्थ में जो समास होता है उसे द्वन्द्व कहते हैं- दुः प्रकृति रामश्व लक्ष्मणश्च रामलक्ष्मण हरिहरी हरिश्च युधिष्ठिरश्च भीमश्च अर्जुनश्च युधिष्ठिरभीमार्जुनाः माता च पिता च पितरौ पार्वती च परमेश्वरश्च पावंतीपरमेश्वरी धर्मश्च अर्थश्च कामश्च मोक्षश्च धर्मार्थकाममोक्षाः इन्द्रावरुणौ इन्द्राग्नी सूर्याचन्द्रमसौ यूकाश्च लिताश्च आसां समाहारः यूकालितम् अनयो: समाहारः पाणिपादम् अहिश्च नकुलश्च तयोः समाहारः पाणी च पादौ च :
( १६४)
,
अहिनकुलम्
रथिकाश्च अश्वारोहाश्च तेषां
समाहारः
रथिकाश्वारोहम्
वहुब्रीहिः
यस्य येन वहुव्रीहिः
१ जिस में अन्य पद का अर्थ पाया जाता है, और यस्य
येन से विग्रह वाक्य बनता है उसे बहुव्रीहि कहते हैं । यथाः-
लम्बौ की यस्य सः लम्बकर्णः
पीतानि अम्बराणि यस्य सः पीताम्बरः
नीलो वर्णो यस्य सः नीलवर्णः
कण्ठे कालो यस्य सः कण्ठकाल:
न पुत्रो यस्य सः अपुत्रः
प्राप्त उदकं येन स प्राप्नोदकः
प्र पतितानि पर्णानि यस्य सः प्रपर्णः
द्वौ पादौ यस्य सः द्विपाद्
शोभनं हृदयं यस्य सः महृदयः
युक्तो योगो येन सः युक्तयोगः
भुक्ताः भोगाः येन स भुक्तभोगः
चक्रं पाणी यस्य स चक्रपाणिः
चन्द्रस्य कान्तिः इव कान्तिः यस्य सः चन्द्रकान्तिः ।
कर्मधारय
उपमान वाची पदों का दूसरे पदों में मेल हो तो कर्मधारय
समास होता है । यथाः--
--
(१६५) घन इव श्यामः घनश्यामः रक्तलता रक्ता दत्ता पुरुषो व्याघ्र इव मुख कमतं इव नीलं उत्पलं मुख्यः अमात्यः पुरुषव्याघ्रः मुखकमलम नीलोत्पलम् मख्यामात्यः कृष्णः सर्पः कृष्ण सर्पः - समाहृनौ त्रिपथम द्विगु जहां पूर्व पद संख्या वाचक हो वहां द्विगु समास होता है। यथा:- त्रयाणां फलानां समाहारः त्रिफला त्रयाणां कुटानां समाहारः त्रिकुटा त्रयाणां लोकानां त्रिलोकी द्वौ गावी द्विगवम् पञ्चानां रात्राणां समाहारः पश्वरात्रम् त्रयाणां पथां चतुर्गा युगानां चतुर्युगम् सप्ताना शतानां सप्तशती पंचाणां बटानां पंचवटी सख्या राचक शब्द इनके दो भेद हैं --संख्यावाचक और पूरण । (एक) एकवचनान्त पुल्लिङ्ग स्त्री० एका पकम् २ एक एकाम् एकम् (१६६) शेष पुल्लिंग की तरह ३ एकेन ४ एकरमै एकस्य ५ एकस्मात् एकस्याः ६ एकस्य एकस्याः ७ एकस्मिन् एकस्यां द्विवचनान्त द्वि स्त्री० पुं० न. aks द्व द्वे its ३ द्वाभ्यां शेष पु० वत् " २ द्वौ द्वाभ्यां ४ द्वाभ्यां द्वाभ्यां ६ द्वयोः ७ द्वयोः " " बहुवचनान्त त्रि त्रीणि १ त्रयः २ त्रीन ३ त्रिभिः ४ त्रिभ्यः तित्रः तित्रः तिमृभिः तिसृभ्यः त्रीणि शेष पुं० वत् " ६ त्रयाणां ७ त्रिषु निमृणां तिसृषु (१६७) चतुर १ चत्वारः चत्वारि २ चतुरः चतनः चत्वारि ३ चतुर्भिः चतसृभिः शेष पुं० वत् ४ चतुर्थ्यः चतसृभ्यः ५ ६ चतुर्णा चतसृणां चतुषु चतसृषु पञ्च ५ १ पश्च ३ पञ्चमिः ४ पश्चभ्यः ५ पञ्चभ्यः १ पश्चानाम् ७ पश्वसु षष २ षट् (इ) ३ षडभिः ४ षडुभ्या ५षड्भ्यः ६षष्णाम् सप्तन् ७ २सप्त ३ सप्तभिः ४सप्तभ्यः ५ सप्तभ्यः ६सप्तान ७ सप्तसु अष्टन् ८ १ अष्टौ (अष्ट) २ अष्टौ (अष्ट) ३ अष्टभिः (अष्टभिः) ४ (अष्टाभ्यः) ५ अभ्यः अष्टान्यः (अष्टभ्यः) ६ अष्टानां ७ अष्टासु (अष्टसु) नवदशन तक शेष शब्दों के रूप सप्तन् की तरह होंगे। १ एकः २ द्वौ ३ त्रयः ४ चत्वारः ५ पंच ६ षट ७ सप्त - अष्ट है नव १० दश ११ एकादश १२ द्वादश १३ त्रयोदश १४ चतुर्दश १५ पंचदश १६ षोडश १७ सप्तदश १८ अष्टादश १ षट् ड ७षट्सु (१६८) १९ एकोनविंशतिः २० विंशति २१ एकविंशतिः २२ द्विवि. शतिः २३ त्रयोविंशतिः २४ चतुर्विशतिः २५ पंचविंशतिः २६ षविंशतिः २७ सप्तविंशतिः २८ अष्टाविंशातेः २९ एकोन- त्रिंशत् ३० त्रिंशत् ३. एकत्रिंशत् ३२ द्वित्रिंशत् ३३ त्रय- स्त्रिंशत् ३४ चतुस्त्रिंशत् ३५ पंचत्रिंशत् ३६ षडत्रिंशत् ३७ सप्तत्रिंशत् ३८ अष्टात्रिंशत् ३९ एकोनचत्वारिंशत् ४० चत्वारिंशत् ४१ एकचत्वारिंशत् ४२ द्विचत्वारिंशत् ४३ त्रिचत्वारिंशत् ४४ चतुम्चत्वारिंशतः ४५ पंचचत्वारिंशत् ४६ षट्चत्वारिंशत् ४७ सप्तचत्वारिंशत् ४८ अष्टचत्वारिंशत् ४९ एकोनपंचाशत् ५० पंचाशत् ५१ एकपंचाशत् ५२ द्विपंचाशत् ५३ त्रिपंचायत ५४ चतु:पंचाशत् ५५ पंचपंचाशत् ५६ पट्- पंचाशत् ५७ सप्तपंचाशत् ५८ अष्टापंचाशत् ५९ एकोनषष्टिः ६० षष्टिः ६१ एकषष्टिः ६२ द्विषष्टिः ६३ त्रिषष्टि ६४ चतुःषष्टि ६५ पंचषष्टिः ६६ षट्पष्टिः ६७ सप्तषष्टिः ६८ अष्टषष्टिः ६९ एकोनसप्ततिः ७० सप्ततिः ७१ एकसप्ततिः ७२ द्विसप्ततिः ७३ त्रिसप्ततिः ७४ चतुःसप्ततिः ७२ पचमतीनः ७६ षट्सप्तनिः ७८ अष्टसप्ततिः ७९ एकोनाशीतिः ८० अशीतिः १ एकाशीतिः ८२ द्वयशीतिः ८३ व्यशीतिः ८४ चतुरशीतिः ८५ पंचाशीतिः ८६ षडशीतिः ८७ सप्ताशीतिः ८८ अष्टाशीतिः ८९ एकोन- नवतिः १० नवतिः ९१ एकनवतिः ९२ द्विनवतिः ९३ त्रिन- वतिः ९४ चतुर्नवतिः ९५ पंचनवतिः ९६ पण्णवतिः ९७ सप्तनवतिः ९८ अष्टानवतिः 8 एकोनशत १०० शतम् १०१ एकाधिकशतम् १०० सहस्र१०००० दशसहस्रम् लक्षम् कोटीः ।
( १६९)
के
गुण की
पूरण शब्दाः
प्रथमः द्वितीयः तृतीय: चतुर्थः पंचमः षष्टः सप्तमः अष्टमा
नयमः दशमः एकादशः द्वादशः त्रयोदशः चतुर्दशः पंचदशः
षोडपः सनदशः अपादश. एकोनविंशः विशः एकविंशतितमः
त्रिंशत्तमः चत्वारिंशत्तमः पंचाशत्तमः षष्ठितमः सप्ततितमः
अशीतितमः नवतितमः शततमः
अथ तडित प्रत्ययाः
तर-तम प्रत्यया
१---तुलना वाचक विशेषण में प्रातिपदिक मे आगे तर
प्रत्यय लगाया जाता है । जब दो व्यक्तियों वा पदार्थों में किसी
न्यूनता वा अधिकता दिखाना अभिप्रेत हो तो वहां
तुलना वाचक विशेषण प्रयुक्त होता है।
२- दो से अधिक में दिखाना अभिप्रेत हो तो अतिशय
वाचक विशेषण का प्रयोग होता है वहां प्रातिपदिक के आगे
तम लगाया जाता है।
यथा-gतरः । तस्मात् वालात् अयं वालः श्रेष्ठतरः--उस
बालक की अपेक्षा यह चालक श्रेष्ठ है।
तेषु पुरुषेषु अयं श्रेष्ठतमः-
उन पुरुषों में यह आदमी सबसे श्रेष्ठ है।
लघुतरः लघतम
दृढ़तरः हड़तमः
अल्पतमः
३--उपसर्ग से-तर तम-प्रत्ययों को प्रयोग
उत तरः उत्तरः उत्तमः।
अलपतरः
(१७०) -- -क्रिया-अव्ययों के अन्त में तरांतमा प्रत्यय लग जाते हैं- विजयतेतराम् विजयतेतमाम् । उच्चस्तरां- ५--तुलना में ईयस और अतिशय में इष्ठ प्रत्यय भी लगाये - जाते हैं। गुरु-ईयम-गरीयस-गुरु इठ गरिष्ठ लघीयस-लधिष्ठ- बलीयम-वलिप-नेदीयम-नेदिष्ठ-दवीयान्-दविष्ठ वलीयम् वलिष्ठ स्वादीयम स्वादिष्ट कनीयस कनि श्रेयम् श्रेष्ठ ज्यायम् ज्येष्ठ अल्पीयम् अल्पिष्ट अभ्यास दशरथ की सब से छोटी रानी का नाम कैकयी था । सभी छात्रों में हरि का आचार श्रेष्ठ है । राम से कृष्ण का लेख सुन्दर है । सभी धर्म पुस्तकों में वेद बहुत अच्छे है। महाराज उतानपाद की दो रानियां थीं बड़ी का नाम सुनीति और छोटी का सुरुचि । महाराज ययाति को अपनी रानी देवयानी की अपेक्षा शर्मिया अधिक री थी। पांचों भाइयों में भीम सवते बलवान था । दूसरे धर्म की अपेक्षा अपना धर्म निर्गुण भी अच्छा है। धारीवाल वटालय से नजदीक है परन्तु अमृतसर से दूर । सभी मन्दिरों में कृष्ण का मन्दिर बहुत मजबूत है । यह कमल का फल सभी फलों में अधिक कोमल है (भ्रदिन)
PART II
KEY
TO
SANSKRIT TRANSLATION
अनुवाद- किसी एक भाषा के शब्दार्थ को किसी दूसरी भाषा के शब्दों में बदलने का नाम अनुवाद है- हिन्दी से संस्कृत बनाने के लिये आवश्यक और उपयोगी जानने योग्य बातें नीचे दी जाती है १ पाठ: काल (Tense.) तीन हैं १ वर्तमान काल (Present Tense.) २ भूतकाल (Past Tense.) afura Fly (Future Tense.) प्रकार (mood) दो हैं। १ लोट ( लकार ) (Imperative Mood) a fafer fzs (Potential Mood.) पुरुष (Person) तीन हैं १ प्रथम पुरुष (Third Person) २ मध्यम पुरुष (Second Person) ३ उत्तम पुरुष (First Person) वचन (number) तीन हैं १ एक वचन (Singular) २ द्विवचन (Duel) ३ बहु वचन (Plural) (१७४) में २ पास वर्तमान काल धातु के आगे विभक्तियों के रूप नीचे लिखे जाते हैं। प्र० पु० ति (सः वह) तः (तौ वेदो ) अन्ति ( ते वेसव) म० पु० सि ( त्वं तुम ) थः ( युवां तुम दो )थ (यूयं तुम सष) उ० पु० आमि ( अहं मैं ) आवः (आवां हम दो) आमः (वयं हम सब) भूत काल की विभक्तियें- ताम् अन् प्र. पु. म. पु० उ० पु० तम् अम् आव आम भविष्यत् काल की विभक्तियों में प्रायः धातु के आगे इष्य लगाकर वर्तमान की विभक्तियें जोड़ दी जाती हैं। यथा इण्यति इप्यतः इष्यन्ति पठ् ( पढ़ना) से पठ् इष्यति पठिष्यति पठिष्यतः पठिष्यन्ति पठिष्यसि पठिष्यथः पठिष्यथ पठिप्यामि पठिष्याव: पठिष्यामः लोट ताम् अन्तु तम् आनि आव प्र० पु० म० पु० उ० पु. प्र० पु० म०पू० उ०पु० 100.
( १७५)
ईत्
प्र.पु०
म. पु०
उ०पू०
विधि लिङ्
ईताम् ईयुः
ईतम्
ईत
ईयम् ईव
ईम
३ पाठ
कारक ( Case.) ८ हैं
१ कर्तृ कारक (प्रथमा विभक्ति (ने)
२ कर्म (द्वितीया विभक्ति (को)
३ करण ( तृतीया (ने से साथ)
४ संप्रदान ( चतुर्थी ( लिये वास्ते)
५ अपादान ( पंचमी (से)
६ सम्बन्ध (काके की )
७ अधिकरण ( में पर विषय)
८ सम्वोधन ( हे अय)
fastor- (Adjective)
विशेषण का लिङ्ग, वचन तथा विभक्ति विशेष्य के समान
होती है।
४पाठः
(Voice) वाच्य-तीन हैं।
कर्तृवाच्य ( Active Voice )
कर्तृवाच्य में कर्ता में प्रथमा ( कर्म में द्वितीया, क्रिया गणों
की होती है) क्रिया का सम्बन्ध कर्ता से होता है । जैसे
रामः ग्रन्थं पठति
(१७६ )
कर्मवाच्य ( Passive Voice )
कर्मवाच्य में कर्ता में तृतीया, कर्म में प्रथमा क्रिया दिवादि
गणी आत्मनेपदी धातु के समान होती है ।
क्रिया का सम्बन्ध कर्म से होता है।
रामेण ग्रन्थः पठ्यते
भाववाच्य
भाववाच्य की क्रिया का कर्म नहीं होता। जैम--
रामेण स्थीयते।
मया शीयते।
राम मे ठहरा जाता है । मुझसे मोया जाता है।
"म् पाठः
वर्तमान काल की क्रिया के वाक्यों का अभ्यास ।
क्लिष्ट शब्द
छात्रालयः, काडाक्षेत्रम्, पाद कन्दुकम्, कुर्वन्ति, नश्यति
विविध, भूषयन्ति, स्मरसि, कदाचित्, स्नामि, शुध्यति ।
हिन्दी वाक्य
१-सभी छात्र रात्रि को बोर्डिग हौस में पढ़ते हैं ।
२--पाठशाला के समय के अनन्तर लड़के खेल के मैदान
में
फुटवाल
खलते हैं।
३--निर्दयो लोग दुःखियों पर दया नहीं करते।
४-लोभ से मनुष्यों की बुद्धि नष्ट हो जाती है ।
५-दिवाली के दिन लोग अपने घरों को तरह २ के
चित्रों से सजाते हैं।
६-राम ! परीक्षा का समय समीप है अपना पाठ याद
क्यों नहीं करते?
.
(१७७) ७-विद्या मब से उत्तम धन है। ८-जो गुरुओं का आदर नहीं करते वे कभी सफल नहीं होते। में प्रतिदिन प्रातः काल शीत जल से स्नान करता हूं। १०-शरीर जल से शुद्ध होता है और मन सत्य से। ६ पाठः भूत काल के वाक्य क्लिष्ट शब्द अहन् । पुष्पातम् । दुकूलानि । वाराणस्याः । आनयत् । तटे । अधस्तात् । अवादयत् । अवमन् । अपटनाम् । सत्य- वादिनः । आसन् । नाम्नी । धार्मिकः । अभवन । १-यह वह ही वन है जहां राम ने राक्षसों को मारा था । २-इन्दुमती महाराज अज की धर्मपत्नी थी, जिसकी मृत्यु फूल गिरने से हुई थी। ३ तूने वे रेशमी वस्त्र देखे थे जो मेरे पिता बनारस से लाये थे। ४ महाभारत का युद्ध क्षत्रिय जाति के विनाश का कारण हुआ। ५ श्री कृष्ण यमुना के किनारे वृक्षों के नीचे वंशी बजाते थे। ६ जानकी वाल्मीकि मुनि के आश्रम में चिर तक रही। ७ जानकी के पुत्र लव और कुश वाल्मीकि मुनि के आश्रम में रामायण पढ़ा करते थे।
(१७८)
८ पहिले इस देश का नाम आर्यावर्त था।
९ भारत के ऋषि मुनि सच बोलने वाले और धर्म में
स्थिर थे।
१० इस देश के ब्राह्मण सभी विद्याओं में निष्णात थे।
११ अवध देश में
सरयू
नदी के किनारे प्राचीन काल में
अयोध्या नाम की एक नगरी थी !
१२---इक्ष्वाकु वंश में दशरथ नामी बड़े प्रतापी और धर्मा-
स्मा राजा हुए।
७ पाठः
भविष्यत् काल
१-मगठन मे ही आर्य जाति का कल्याण होगा और
दुःख कटेंगे।
२-भारत के नर नारी शिक्षित होंगे तो देश की निर्धनता
और
दासता दूर
होगी।
३-मवे हिरण्यक ! मैं आप से अवश्य मैत्री करूंगा, नहीं
तो भूखा रह कर आप के द्वार पर प्राण त्याग दूंगा।
४-मोहन आओ पाठ यार करें, आज गुरु जी हमारा पाट
सुनगे।
५-इम वर्ष जो विद्यार्थी दशम श्रेणी की परीक्षा में प्रथम
रहेगा, मैं उसे मोने का तमगा इनाम दूंगा !
६-भले लोगों के संग से सदा सुखी रहोग।
७-आज मेरे सिर में पीड़ा है अतः मैं दरिया पर सर करने
नहीं जाऊंगा।
( १७६)
८-यह बालक बड़ा होनहार है, एक दिन अवश्य अपना
नाम उज्वल करेगा।
९-आलसी मनुष्य किसी काम में सफल नहीं होंगे।
१०-कवि लोग राजा से धन प्राप्त करेंगे।
क्लिष्ट शब्द
।
दुःखानि नश्यन्ति । दूरी भविष्यति । अनशनेन त्यक्ष्यामि ।
श्रोष्यति । स्वर्णपदकं । पारितोपिकम् । शिरसि । विहाराय ।
कम्मिञ्चित् । प्राप्म्यन्ति ।
८ मः पाठः
लोट
क्लिष्ट शब्द
उत्तिष्ठ । संजातः । वद । पालय । न करवानि । अपराधिनः ।
दडयन्तु । सत्कुर्वन्तु । रक्ष । अनृतवादित्वं । याचस्व । विन्दस्व।
निरामयाः। भद्राणि । कश्चिदपि ।
१-हे शिष्य ! उठो प्रातःकाल हो गया।
२-बालको ! सदा सत्य बोलो और ब्रह्मचर्य व्रत का
पालन करो।
३-प्रभो ! मैं कभी किसी का स्वप्न में भी अनिष्ट न करूं।
मेरा जीवन परोपकार के लिये हो।
४-राजा लोग अपराधियों को दण्ड दें और सज्जनों का
सत्कार करें।
५-पुस्तक की तैल और जल से रक्षा कर ।
६. -दुर्जनों का संग मत कर
और
७-अपने लिये किसी से कुछ मत मांग।
झूठ मत
बोल।
( १८० )
८-वत्स ! आचार्य को नमस्कार करो और उसका अनुग्रह
प्राप्त करो।
९-हे ईश्वर! संसार में सभी सुखी हों सभी नीरोगी हों।
१०-सभी जन कल्याण देखें कोई भी दुःखी न हो।
९पाठः
विधि लिङ्का अभ्यास
कठिन शब्द
यावत् । जीवेत् । इह । गुरूणां । भवेत् । वर्धते । पण्णाम् ।
ऋतूनां । भवेयुः । सेवेमहि । न त्यजेत् । मृतूपिण्डवत् ।
वाक्य
१-मनुष्य जब तक जीवे वह काम करे, जिससे इस लोक
और परलोक में सुखी हो ।
२-हमें चाहिये कि हम भी अपने गुरुओं का अनुकरण
करें।
३-ऋषियों का कथन है कि प्रत्येक बालक ब्रह्मचारी बने ।
४-ब्रह्मचर्य से हमारा वल और बुद्धि बढ़े।
५-प्रभो हमारे देश में छओं ऋतुओं का विकास समय पर
होता रहे।
६- इस देश में आर्य बालक शूरवीर और धर्मात्मा बने ।
७-हमें अपने माता पिता और गुरुओं की सेवा करनी
चाहिये।
८-भले लोगों का संग कभी मत छोड़ो ।
९-सदा धर्म के रास्ते पर चलो।
( १८१) १०-पर स्त्री को माता के समान और पर धन को मिट्टी के ढेले के समान समझो । प्रेरणार्थक क्रिया (Casual Verb) कठिन शब्द दर्शयति । श्रावति । प्रेम्णा पाययति । अधातयत् । लेख- यति । अकारयत् । मुख्याध्यापकः । वार्षिकोत्सवे । पारितोषिकं । अदापयत् । रचयति । सूदः । अपाचयत् । उत्सङ्गे ( गोदी में) आदाय ( लेकर ) खादयति । अभ्यास १--गुरु शिष्यों को भूगोल के चित्र में से भारत का चित्र दिखला रहा है। २--कमला निर्मला को तुलसी रामायण की कथा सुना रही है । ३--माता पुत्र को बड़े प्रेम से दूध पिला रही है। ४--श्रीकृष्ण ने चक्रव्यूह में अर्जुन से जयद्रथ को मरवाया। ६--अध्यापक बालकों से सुलेख लिखवाना है। ६-स्वानी विरजानन्द ने स्वामी दयानन्द से वेदों का प्रचार करवाया। ७-हेड मास्टर साहब ने विद्यालय के सालाना जलसे पर विद्यार्थियों को इनाम दिलवाया। ---सेट अपनी पुत्री के लिये सोने के भूषण बनवाता 8- मोहन रसोईथे से भात पकवाता है । १०--पिता पुत्र को गोदी में लेकर उसे मिटाई खिलाता है।
११ पाठ:
अथ कृदन्त
कत्वान्त
श्रुत्वा (सुन कर) पठित्वा (पढ़ कर) दत्वा (दे कर) दृष्ट्वा
देिख कर) हत्वा (मार कर) पीत्वा (पीकर)
कठिन शब्द
प्रतीक्षस्व । कम्पते। अनुन्धत् । अविभेत् ।
वाक्य
है
१ मित्र थोड़ी देर इन्तज़ार कर में पाट पढ़ कर अभी
अभी आता हूँ ।
२ सीता अशोकवन में राक्षसियों को देखकर डर गई ।
३ उस नीच का नाम सुन कर हृदय भय से कांप
उठता
४ महाभारत के युद्ध में अर्जुन अपने भाई कर्ण को मारकर
मोहित होगया ।
५ महाराजा रघु
ने
में सब कुछ देकर भी अतिथि
कौत्त को निराश नहीं किया।
१२ पाठः
तुमुन्नन्त
दातुम् ।देने को) गन्तुं (जाने को) भक्षितुं (खाने को) द्रष्टुं
(देखने को) श्रोतुं (सुनने को) पातुं (पीने को) स्मर्तु (याद
करने को) दण्डयितुं (दण्ड देने को)।
यज्ञ
( १८३ ) अभ्यास १ पान ने कहा, "यह सोने का कड़ा मैं जिस किसी को देना वाहता है। २ देव ! सूर्य अस्त हो गया है, मैं अब घर को जाना चाहता हूं। ३ पिङ्गलक नाम का शेर पानी पीने के लिए यमुना के किनारे गया । ४ मैं आज १० बजे आप की पाठशाला देखने आऊंगा । ५ हरि प्रतिदिन ज्ञान मन्दिर में वेदों की कथा सुनने पापा करता था। ६ राजा ने चोरों को राजसभा में दंड देने के लिए बुलवाया । ७ बन्दर ग्राम का फल खाने के लिए वृक्ष की चोटी पर चढ़ गया । ८ मोहन वेद मंत्रों को याद करने के लिए देव के घर जाश करता है।
पठ् (पढ़ना) पठित
१३ पाठः
क्त क्तवतु (Past Participal)
(पठितवान्)
दा (देना) दत्त
(दत्तवान्)
हन् (मारना) हत
(हतवान्)
(चोरितवान्)
ग्रह (पकड़ना) गृहीत
(गृहीतवान्
क्री (खरीदना) क्रीत
(क्रीतवान्)
कृ (करना) कृत
(कृतव न्)
दृश (देखना) दृष्ट
(दृष्टवान्)
तेन पठितम्-उसने पढ़ा
चुर (चुराना) चारित
अभ्यास
१ शिष्य ने संस्कृत की पुस्तक पढ़ी।
२ सेठ ने ब्राह्मणों को धन दिया।
३ राम ने रावण को बाण माग |
४ चोर ने राजा के रत्न चुराये ।
५ पति ने पत्नी का हाथ अग्नि के सामने पकड़ा।
६ हरि ने देव का घर खरीदा।
७ उस विचार ने कोई अपराध नहीं किया ।
हमने उस नीव को सड़क पर भागते देखा।
१४ पाठः
(तव्यान्त) (चाहिए) के अर्थ में
रक्षितव्यम् (रक्ष
भूषितव्यम् (भूष)
दातव्यमू
पातव्यम् (पा)
तोलितव्यम् (तोल)
यष्टव्यम् (यज)
पूजितव्यम्
गन्तव्यम् (गम्)
(पठ)
श्रोतव्यम् (श्रु)
कर्तव्यम्
(कृ)
१ राजा को प्रजा की पुत्र के समान रक्षा करनी चाहिए।
२ राजा का स्वागत करने के लिए हमें अपनी २ दुकानें
सजानी चाहिये।
३ अकाल के दिनों में निर्धनों को अन्न देना चाहिये।
४ गर्मी के दिनों में तृषा शान्त करने के लिए शीत जल
पीना चाहिए।
५ चावल वणिये से लेकर फिर भी तोलने चाहिए ।
६ द्विजों को प्रत्येक पर्व के दिन यज्ञ करना चाहिए।
पठितव्यम्
किया जाना है। छीना जाता ( १८६ ) ७ व्यास पूजा के दिन गुरु दक्षिणा दे कर हमें अपने गुरु की पूजा करनी चाहिए। ८ युक्ति युक्त कहा हुआ बालक का भी वचन हमें आदर से सुनना चाहिए। १५ पाठः वाच्य (Voice) कर्म वाच्य ( Passive Voice , पट् ( पठयते) पढ़ा जाता है। कृ ( क्रियते ) हु ( द्वियते) है। त्यज । त्यज्यते। छोड़ा जाता है। स्था ( थीयते वंद ( वद्यते । युध ( युध्यते) लम् ( उभ्यते ) अभ्यास १-गम से पाठ पढ़ा जाता २- सज्जनों से शुभ कर्म किये जाते हैं। ३-रावगा ये जानकी हरी जाती है। ४--गि से दुष्कर्म छोड़े जाते हैं। ५-हम से इस अवर समान नहीं ठहरा जाता । ६-शिष्य से नमस्कार किया जाता है । ७-भीम से शत्रुओं स युद्ध किया जाता है । ८-कवियों से इनाम पाया जाता है। 8.-.-जगदी से श्रीकृष्ण का चरित मुना जाता है। है को लिखता हुआ करता हुआ लं जाता हुआ १६ पाट शन ( अत ) (Present Participles) लिख (लिखत् ) क ( कुर्वत) नी ( नयत् ) हस (हान) हलता हुआ पट ( पटन्) पढ़ना हुथा वस ( वसन पहला हुआ ज्ञा ( जानन्) जानता हुआ थु ( पचल) म्मुनता हुआ दा (यात) मू( सवा ) गच्छ ( गन्ती) जाती हुई पट ( पदन्ती पढ़ती हुई अभ्यास १ --- पाट पढ़ते हुए गोविन्द को सोहन ने बुलाया । २-प्रश्न पूत्रते हुए गुरु को शिष्य ने नREEार किया। ३- वह पत्र लिखते हुए प्रकाश की ओर देख रहा है । ४-जल पति हुए कुत्ते ५-~-शिशुपाल ने कृष्ण को मी गालियां दी। ६ -- गुरु ने घर को जाते हुए एक अंधे मुसाफिर को देखा । दला हुआ होता हुआ कोसा ये पीटा । बड़ा जानते
( १८८)
७-योगेश हंसता हुआ आप से क्या पूछ रहा था ।
८-सुरेन्द्र पाट याद करता हुआ इन्द्र को पीटता था ।
९-योगीन्द्र रोता हुआ अपनी माता को दूध पीने के लिए कह
रहा है।
१.-बादल जल देता हुश्रा भी सबको प्यारा लगता है।
११-राजा प्रजा की रक्षा करता हुआ उससे आय का छठा भाग
लता है।
१२-वह लड़की रात को सोती हुई डर जाती है ।
Premomen
( १८९)
जाता
sho
१७ पाठ
कर्मकारक (द्वितीया विभक्ति)
१ कर्तृवाच्य में कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है
२ प्रति विना धिक् अन्तरेण उपसर्ग पूवर्क दुह और क्रुध
धातु के योग में द्वितीया विभक्ति होती है ।
यथा स ग्रन्थ पठति-वह ग्रन्थ पढ़ता
को मां मित्रं विना त्रातु समर्थ-मुझे मित्र क विना कौन
बचा सकता है । गोपः ग्राम प्रति गच्छति । ग्वाला गाओं को
ज्ञान अन्तरेण न मुक्तिः । ज्ञान के बिना मोक्ष नहीं
धिक तं जाल्मम् । उस दुष्ट को लानत है । पुत्र अभिक्रुध्यति
पिता । पिता पुत्र पर नाराज़ होता है । नृपं अभिदुह्यति प्रजा
प्रजा राजा से द्रोह करती है।
करण कारक तृतीया
१ करण में सह सांक सार्ध सम के योग में किम,
कार्य, अर्थः, प्रयोजन अलं, के योग में हेतु अर्थ में तृतीया
विभक्ति होती है।
यथा-रामः वाणेन रावणं अहन् ।
किंतया क्रियते धेन्वा या न सूते न दुग्धदा ।
कोडर्थः पुत्रेण जानने यो न विद्वान्न धार्मिकः ।
अलं महीपाल तव श्रमेण ।
मम तेन न किमपि प्रयोजनम् ।
रामेण सह लक्ष्मणः वन मगच्छत्
स मित्रः सार्ध कथां शृणोति ।
( १९० )
संप्रदान (चतुर्थी)
१ नमः स्वस्ति स्वाहा स्वधा अलं हित और सुख शब्दों
के योग में रुच कुए क्रुध स्मृह उपदिश धृ धातुओं के योग
में चतुर्थी होती है। दान के अर्थ में भी चतुर्थी होनी है ।
यथा-गुरवेनमः । पित्रे स्वस्ति । अग्नये स्वाहा । पितृभ्य
स्वधा । अलं श्रमाय । विप्रेभ्यः हितं कल्याणं भवेत् । वालाय
रोचते मिष्टम् । पुत्राय कुष्यति पिता । कोमलेभ्यः कमलेभ्यः
स्पृहदन्ति वालाः । शिष्येभ्यः धर्ममपदिशति । विप्राय धर
ददाति-
अपादान (पंचमी)
१ विना ऋते पृथक वहिर आरात् जा भी प्रतियर छ के
योग में पंचमी होती है ।
यथा-तस्माद् ऋते मम को
वन्धुः
धनात विना न सुखम् ।
नगराद् वहिः-नगर से वाहिर-मदः पात्राणि जायन्ते ।
मिट्टी से वरतन बनते हैं। स चौराह विनेति । वह चोरे से
डरता है । रूप्यकेभ्यः प्रतियच्छति वस्त्राणि । वनात् आरात्
मम कुटीरक मस्ति ।
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