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Jainsiddantkoomudi Purvadda

Muni, Ratnachandra · 2009/11

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अनुभमणिका
विपय
मस
-
...
१ संज्ञा प्रकरण
..
२ परिभाषा प्र०...
...
३ स्वरसम्धि
प्र०
४ व्यसनसन्धि प्र०
५ स्वरविकार
६ व्यसनविकार प्र०
७ पुलिन्द प्र०
...
...
८ सर्वनामशब्द प्र.
...
...
२८
५ स्त्रीलिङ्गप्र०
१० नपुंसकलित प्र०
११ संख्यावाचक प्र०
.
...
१२ अध्पय प्रकरमा

दु-वन्त्रक पू. पं० अशुद्ध शुद्ध १ १० प्रन्थादो प्रन्यादी श्री महावीरस्य or १२ श्री महावीम्य ३ १४ । ध. घ ७ ४ घृद्धि वृद्धि ८ यावन २१ धवयवो ११ १० यानतू धवयवो लुखो म्नोनुस्वार म्नोरऽनुस्वारो १३ १५ . १३ १६ . १६ लुक्खो मनोरनुस्वारः मनोरनुस्वारो असंयुक्त प्रत्यययोरिति वृद्धावोकारे रुभयोः . ३० ૨૮ असयुक्त प्रत्वययोरिति वृध्द्यावीकारे रूभयोः विहारामि * १८ ४४ १७ - ४५ or विहामि भयोः ४६ रूमयोः ४६ २१ १ ४८ तुम्भ माला इहितो बहुलमि तुम्भ माला+इहितो बहुलंमि • ५१ १४ श्री महावीराय नमः प्रस्तावना। जै .. -- न आगमों की भाषा के विषय में कितने ही समय से विद्वत्समाज में मतभेद पड़ा हुआ है। कुछ समय पूर्व समाचार पत्रों में इस तिपयं की चर्चा भी चली थी । एक पक्ष का कहना था कि आगमों की भाषा प्राकृत है। जबकि अन्य पक्ष का कथन था कि आगमों की भाषा अर्ध-मागधी है। :: वस्तुतः संस्कृतातिरिक्त समस्त भापायें प्राकृत "ही कही जाती थीं । अतः प्रथम पक्ष की मान्यता भी निस्सार न थी । परन्तु "प्राकृत" यह शब्द संस्कृतातिरिक्त समस्त भाषाओं के लिए. सामान्य शब्द है ...पाली, शौरसेनी, अपभ्रंश आदि समस्त भागाओं का समावेश: प्राकृत में ही है। श्री हेमचन्द्राचार्यजी ने अपने स्वयं निर्माणित “प्राकृत व्याकरण" में अपभ्रंशादि छहाँ ही भेदों को प्राकृत में सम्मिलित किया है, तथैव छहों ही के लक्षणादि का प्रतिपादन किया है। परन्तु हां, विशेष नामःछहों ही भापाभों के भिन्न, २ हैं.। जैनागमों की भापाका विशेप'नाम प्राकृत नहीं परन्तु अर्धमागधी है । जिस प्रकार कि बौद्धों का आगम साहित्य पाली भाषा में है, उसी प्रकार जैन आगम साहित्य अर्धमागधी भाषा में है. कारण कि तीर्थंकर भगवान् अर्धमागधी भाषा में ही उपदेश देतःथे तथा. गणधर उसी भाषा में सूत्र प्रथित करते थे। !. जैनागमों में मुख्यतया द्रव्यानुयोग, गणितानुयोग, धर्मकथानुयोग तथा चरणकरणानुयोग अर्थात् तत्वज्ञान, गणितज्ञान, महापुरुषों के चरित्र तथा आचार विचार सम्बन्धी विषय वर्णित किये गये हैं। तथैव इन संवका उद्देश्य मोक्षसाधन ही है । परन्तु वह भांपा जानने में न आवे तब तक विषय की - यथार्थता एवं महत्वंता समझ में नहीं आ सकती। " ". : किसी भी भापा के साहित्य का ज्ञान प्राप्त करना हो तो उस भांपा का व्याकरण तथा कोप इन दोनों अंगों का ज्ञान प्राप्त करना परमावश्यक है । जैन आगमों पर भाष्य, नियुक्ति, चूर्णिका, दीपिका, टोका बालावबोध टवा आदि रचे गये, एवं पृथक पृथक भाषाओं में भोपान्तर भी हुवे। परन्तु उस भाषा को साक्षात् समझने के लिये जो ब्याकरण और कोष की कमी थी, वह ज्यों की त्यों बनी रही। श्री हेमचन्द्राचार्य जी तथा चण्ड ने व्याकरण बनाये परन्तु प्राकृत भाषा तथा महाराष्ट्रीय प्राकृत भाषा के । अर्धमागधी का नहीं । जैन साहित्य क्षेत्र में इस त्रुटि को पूर्ण करने के लिये भारत रत्न शतावधानी श्रीरत्नचन्द्रजी, महाराज • ने कितने ही वर्षों से प्रयत्न किया। सात वर्ष पर्यन्त सतत् परिश्रम द्वारा अर्धभागधी कोप तैयार किया एवं तदन्तर ही ज्याकरण बनाना प्रारम्भ किया। बीकानेर निवासी श्रीयुत अगरचन्द्रजी भैरोदानजी सेठिया की हार्दिक सहानुभूति से "जैन सिद्धान्त कौमुदी' नामक अर्धमागधी व्याकरणं उन्होंने स्वकीय प्रेस में छपाया। कितने ही जिज्ञासुओं की यह

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स्वर्गीय बन्धु रा०प० श्री चांदमलजी नाहर के स्मरणार्थ मेंट. 64000 stavec INCT TOB श्रीमहावीराय नम श्री तत्त्वदीपिकाव्याख्यासमेता R . 500K जैनसिद्धान्तक [अर्धमागधीव्याकरणम् ] पूवार्द्ध-अव्ययपर्यन्तम् दा रचयिता- भारत रत्न शतावधानी पण्डित मुनि श्री रत्नचन्द्रजी महाराज pa प्रकाशक- बरेलीनिवासी श्री. नगराजजी नाहर, मु० जयपुर प्राप्तिस्थान-श्री जैन गुरुकुल, ब्यावर ( राजपूताना) प्रथमावृत्ति श्रमूल्य विक्रमाव्द १९९२ वीराब्द २४६१

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अनुक्रमणिका विषय पृष्ठ १ संज्ञा प्रकरण" ... २ परिभाषा प्र... ... ३ स्वरसन्धि प्र० ... '... ... ९ ४ व्यसनसन्धि प्र० १२ ५ स्वरविकार '... प्रल ::. : १४ ...: ... ६ व्यवनविकार प्र० ... ७ पुल्लिङ्गशन्द प्र० २५ . ८ सर्वनामशब्द प्र. ... :.. ३८ ९ खीलिङ्गप्र० ... ४७ १० नपुंसकलिङ्ग. प्र. ११ संख्यावाचक प्र० ... .. १२ अव्यय प्रकरण :.. ५५ मुदि-पन्नक पृ . पं० शुद्ध १० प्रन्थादो प्रन्यांदी १ १२ श्री महावीस्य श्री महावीरस्थ w १४ . ध घ 9. घृद्धि वृद्धि . ४ ३ ८ यावत् यावतू घवयबो ८ २१ धवयवो ११ १० लुकखो १३ १५ म्नोनुस्खार मनोरऽनुस्खारो १३ .१६ लुक्खो म्नोरनुस्वार म्नोरनुस्वारो असंयुक्त प्रत्यययोरिति १७ १६ ~ असयुक्त प्रत्वययोरिति वृध्द्याबोकारे रूभयोः ३८ १८ वृद्धावीकार रुभयोः ४५ .. विहारामि A ४६ or रूमयोः ४६ २१ विहरामि भयोः तुम्भ भाला+इहितो बहुलमि ४८ तुभं माला इतिो बहुलमि ८ .१४ . के श्री महावीराय नमः * प्रस्तावना। जै - न आगमों की भाषा के विषय में कितने ही समय से विद्वत्समाज में मतभेद पड़ा हुआ है। कुछ समय पूर्व समाचार पत्रों में इस निपय की चर्चा भी चली थी । एक पक्ष का कहना था कि आगमों की भाषा प्राकृत है। जबकि अन्य पक्ष का कथन था कि आगमों की भाषा अर्ध-मागधी है। वस्तुतः संस्कृतातिरिक्त समस्त भापायें प्राकृन ही कही जाती थीं । अतः प्रथम पक्ष की मान्यता भी निस्सार न थी। परन्तु “प्राकृत" यह शब्द संस्कृतातिरिक्त समस्त भापाओं के लिए सामान्य शब्द है । पाली, शौरसेनी, अपभ्रंश आदि समस्त भाषाओं का समावेश प्राकृत में ही है। श्री हेमचन्द्राचार्यजी ने अपने स्वयं निर्माणित "प्राकृत व्याकरण" में अपभ्रंशादि छहों ही भेदों को प्राकृत में सम्मिलित किया है, तथैव छहों के रक्षणादि का प्रतिपादन किया है । परन्तु हां, विशेष नाम छहों ही भापाभों के भिन्न २ हैं । जैनागमों की भाषाका विशेष नाम प्राकृत नहीं परन्तु अर्धमागधी है । जिस प्रकार कि चौद्धों का आगम साहित्य पाली भाषा में है, उसी प्रकार जैन आगम साहित्य अर्धमागधी भाषा में है। कारण कि तीर्थकर भगवान् अर्धमागधी भाषा में ही उपदेश देते थे तथा गणधर उसी भाषा में सूप प्रथित करते थे। जैनागमों में मुरयतया द्रव्यानुयोग, गणितानुयोग, धर्मकथानुयोग तथा चरणकरणानुयोग अर्थात् तत्वज्ञान, गणितज्ञान, महापुरुषों के चरित्र तथा आचार विचार सम्बन्धी विषय वर्णित किये गये हैं। तथैव इन सवका उद्देश्य मोक्षसाधन ही है। परन्तु वह भापा जानने में न आवे तव तक विषय की यथार्थता एवं महत्वता समझ में नहीं आ सकती। किसी भी भापा के साहित्य का ज्ञान प्राप्त करना हो तो उस भाषा का व्याकरण तथा कोप इन दोनों अंगों का ज्ञान प्राप्त करना परमावश्यक है । जैन आगमों पर भाष्य, नियुक्ति, चूर्णिका, दीपिका, टीका बालावबोध टवा आदि रचे गये, एवं पृथक पृथक् भाषाओं में भापान्तर भी हुवे। परन्तु उस भाषा को साक्षात् समझने के लिये जो याकरण और कोप की कमी थी, वह ज्यों की त्यों बनी रही। श्री हेमचन्द्राचार्य जी तथा चपड ने व्याकरण बनाये परन्तु प्राकृत भाषा तथा महाराष्ट्रीय प्राकृत भाषा के ! अर्धमागधी का नहीं। जैन साहित्य क्षेत्र में इस त्रुटि को पूर्ण करने के लिये भारत रत शतावधानी श्रीरत्नचन्द्रजी, महाराज ने कितने हो वर्षों से प्रयत्न किया । सात वर्ष पर्यन्त सतत् परिश्रम द्वारा अर्धभागधी कोष तैयार किया एवं तदन्तर ही व्याकरण बनाना प्रारम्भ किया । बीकानेर निवासी श्रीयुत अगरचन्द्रजी भैरोंदानजी लेठियाकी हार्दिक सहानुभूति से "जैन सिद्धान्त कोमुदी" नामक अर्धमागधी व्याकरण उन्होंने स्वकीय प्रेस में छपाया। कितने ही जिज्ञासुओं की यह ..२ मांग आई कि संस्कृत के विद्वान् अर्धमागधी भाषा से अपरिचित होने के कारण उन्हें इस म्याकरण के समझने तथा समझाने में कितनी ही कठिनाइयाँ आती हैं । अतः इसकी यदि कोई सरल,टीका वनजाय तो अध्ययनार्थी तथा अध्यापक दोनों के अनुकूल हो। इस मांग की पूर्ति के लिए श्री शतावधानाजी महाराज ने "जनसिद्धान्त कौमुदी" की संस्कृत टीका लिखमी; प्रारम्भ की। साथ ही साथ मूल में पर्याप्त परिवर्तन किया गया। कितने ही मूत्र तो बिलकुल ही नवीन योजित किये गये और पुराने निकाल डाले गये । कितनी ही में अल्पाधिक परिवर्तन किया गया । प्रथमावृत्ति में समस्त धातु अकारान्त ही रखे गये थे, परन्तु इस आवृति में धातुओं को व्यन्जनान्त बना कर तत्पश्चात् अकार, एकारादि विकरण संबोजित किये गये हैं। इस तरह करने से सूत्रों में लाघवता भी आ गई है, जो कि पद्धति व्याकरणकारों ने वहु माननीय मानी कहा भी है कि अर्धमाना लाघवेन वैयाकरणाः पुत्रोत्सव मन्यन्ते।" पहली आवृत्ति में समयाभाव के कारण कुछ अच्यवस्था सी प्रतीत होती यो, वह इस आवृत्ति में सुधार दी गई है। सं० १९९० के साल में जब श्री शतावधानाजी महाराज का चौमासा जैपुर नगर में था, जैन सिद्धान्त- कौमुदी की टीका तभी तैयार हो चुकी थी तथा मुद्गार्थ श्रीयुत अगरचन्द्रजी भैरोशन जी सेठिया जी के पास बीकानेर प्रेषित - की जा चुकी थी। किन्तु उनके प्रेस में छपने का कार्य उन दिनों में न चल रहा था । अतः छपने की व्यवस्था न हो सकी। इसी मध्य में बरेली निवासी श्रीयुत सेठ नगराजंजी नाहर नो लि जंबलपुर निवासी सेड राजा गोकलदासजी की जयंपुर वाली दुकान पर मुनीम हैं। उनके भाई रायबहादुर सेठ बांदमलजी का स्वर्गवास हो जाने पर उनकी स्मृत्यर्थ जैन सिद्धान्त कौमुदी व्याकरण टीका सहित प्रकाशित करने की इच्छा प्रकट की। तदनुसार बीकानेर से न्या- करण की प्रति मंगाकर "प्रभात प्रिंटिंग वर्क्स अजमेर से प्रकाशित करने की व्यवस्था की । परन्तु वहाँ भ्रूफ सुधारने की व्यवस्था न होने से मान सात आठ फमैं ही छप सके। इस कठिनाई के कारण पुस्तक प्रकाशन का कार्य लाहौर लाना पड़ा। जहाँ कि पुनः प्रथम से ही यह अन्य स्पेगा. छपे हुए साढ़े सात फर्मों में सन्धि, पलिंग पूर्ण हो जाते हैं । सेठ श्री नगराज़जी नाहरकी इच्छानुसार अभी मात्र उतना ही भाग विद्यार्थियों के उपयोगार्थ प्रकाशित कर पाठक वर्ग की सेवा में अर्पण किया जा.रहा है। आशा है जिज्ञासु सहृदय इससे लाभ उठायेंगे ! कुछ मास के पश्चात् सम्पूर्ण ग्रन्थ; प्रकाशित हो सकेगा, ऐसी पूर्ण सम्भावना है, सुनेपुः किं बहुना ?... . - विनीत सेवक- ता० १९-७-३५ अमृतसर रामकुमार "स्नातक विद्याभूषण

स्व. बन्धु रा० ब० चांदमलजी नाहर के स्मरणार्थ भेंट
SNEDRESS
तत्वबोधिनी व्याख्योपेता
जैन सिद्धान्त कौमुदी
(अई मागधी व्याकरणम्)
।
स्व० रा०प० चांदमलजी नाहर
रचयिता-
भारत रत्न शतावधानी पं० मुनि श्री रत्नचन्द्रजी महाराज

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॥ ॐ नमोऽहद्भ्यः॥ श्रीतत्त्वदीपिकाव्याख्योपेता जैनसिद्धान्तकौमुदी (अर्द्धमागधीव्याकरणासह) प्रणम्य श्रीमहावीरं मोक्षमार्गप्रकाशकम् । . . . रच्यते तत्त्वबोधाय जैनसिद्धान्तकौमुदी॥ अथ तत्त्वदीपिका PORNER .. श्रीपार्श्वपदपाथोजं नत्वा देवेन्द्रसेवितम् । कौमुद्याः क्रियते वृत्तिः स्वोपझं तत्त्वदीपिका ॥१॥ प्रारिप्सितग्रन्थसमातिपरिपन्धिप्रत्यूहव्यूहविधाताय विहितं नमस्कारात्मक मङ्गलं शिष्टाचारपरिपालनार्थ अन्धादो निबन्धन चिकीर्पित प्रतिजानीते प्रणम्यति-प्रणामं कृत्वेत्यर्थः प्रणामश्च स्वावधिकोत्कर्षबोधनानुकूलों व्यापारः स च काशिरोविलक्षणसंयोगरूपः। तादृशव्यापारजन्यज्ञानरूपफलाश्रयतया श्रीमहावीस्य कर्मत्वम् । श्रीमहावीरमिति- महान् कपायोपसर्गपरिषहेन्द्रियादिरिपुनिवहजयादतिशायी चीरो विक्रान्तः । विक्रान्त्यर्थस्य वीरधातो:रयति स्मेति- विग्रहेण साधनात् । अथवा विशेषेणेरयति प्रापयति शिवं कल्याणं स्फेटयति वा कर्मेति वीरः । महांश्चासौ वीरश्च महावीरः. . पूर्वापरेति बाधित्वा सन्महदिति समासः। प्रकृतशासनपतिश्चरमस्तीर्थकरः । श्रियाऽलौकिकया शोभया सहितो महावीरः श्रीमहावारस्तम् । मोक्षमार्गेति-मोक्षस्य कृत्स्नकर्मात्यन्तोच्छेदरूपस्य मार्गः साधनं सम्यगज्ञानादिरत्नत्रयं तस्य प्रकाशकः प्रज्ञापकस्तम् । अनेनान्येच्छानधीनेच्छाविषयरूपस्य स्वतःप्रयोजनस्य साधकत्वात्स एव नमस्कार्य इति ध्वनितम् । रच्यत इति-मयेति शेषः रचना च स्वज्ञानं परान् बोधयितुं तदनुकूलवाक्यानां लिपिसन्निवेशविशेपः तत्त्वबोधायेति -तत्त्वानि जीवाजीवादिपदार्थाः । तानि च जैनागमेष्वर्द्धमागधीभापायां हेतुयुक्तिदृष्टान्तपूर्वक प्रतिपादितानि । आगम- भाषासत्कपदानां साधुत्वासाधुत्वज्ञान विना न भवति तत्तत्पदार्थानां यथार्थबोधः । पदानां साधुत्वासाधुत्वज्ञानजनक भवति तदभाषाच्याकरणम् । अतस्तत्वबोधमुद्दिश्यवारय व्याकरणास्य रचनाप्रवृत्तिरिति भावः॥ जैनसिद्धान्तकौमुदीति-- जैनसिद्धान्तकौमुदी मोदषतीति मुदः कोदः कुमुदचन्द्रः तस्येयं कौमुदी चन्द्रिका "चन्द्रिका कौमुदी ज्योत्स्नेत्यमरः" जैनसिद्धान्तानामागमादि प्रतिपाद्यपदार्थसार्थानां कौमुदीव कौमुदी जैनसिद्धान्तकौमुदी पदार्थप्रकाशकत्वादिगुणैश्चन्द्रिकासादृश्यमस्याः । अनेन अन्यारंभेऽवश्यप्रदर्शनीयमनुबन्धचतुष्टयमपि प्रदर्शितं तथा हि अर्द्धमागधीभाषाज्ञानद्वारा तत्वजिज्ञासुरनाधिकारी भाषाहानि सन्धिविभक्तिकारकसमासतद्धितधातुरूपकृदन्ताधास्य विषयः। भाषाज्ञानद्वारा तत्त्वबोधः फलम् । प्रतिपायप्रतिपादक- भावन सम्बन्धः । ननु व्याकरणरूपस्यास्य कथं तत्त्वबोधजनकत्वं तत्र तत्त्वप्रतिपादनाभावादिति चेन्न तत्वप्रतिपाद- कागमभाषाज्ञानसम्पादनद्वारा तत्वबोधजनकत्वस्य सुविदितत्वात् । तथा च भाषाज्ञानं साक्षातफलं। तस्वबोधश्च परम्पराफळमिति विवेकः। अथ संज्ञाप्रकरणम् संज्ञाया लाघवेन शास्त्रव्यवहारप्रयोजकतया तद्घटितत्वेन सर्वप्रकरणागतया पूर्वमेव तत्प्रकरण- माह अथेति। अ आ इ ई उ ऊ ए ओ स्वराः।११।८॥ स्पष्टम् । अ-श्रा-इति-अभेदानुकरणत्वादन न विभक्तिः । संहिताया अविवक्षया च न सन्धिः । अकारादेः स्वरत्वेन सर्वत्र प्रसिद्धत्वेऽपि प्रकृतानामष्टानामेवात्रोपयोगितया तेषामेव तत्संज्ञा कृता एवमने व्यजन- संज्ञायामपि बोध्यम् ॥ कखगघङ चछजझन टठडढण तथदधन.पफबभमयरलव सहा व्यञ्जनानि ॥१६॥ एते व्यजनसंज्ञाः स्युः। कखति-अकारः सर्वत्र स्पष्टमुच्चारणार्थः । ननु स्वरविहीनानामपि व्यन्जनानां वर्णान्तरसाहाय्येन यथा कश्चिदेकाकितया वोवारणमनुभूयत इति चेन्न । असहायतया स्पष्टत्वेन परश्रवणगोचरत्वस्यैवोच्चारणे निषेधात् । अत्रेतरेतरयोगो द्वन्द्वः। व्यञ्जनसंज्ञाया विचारस्तु पूर्वमुक्तप्राय एव। अत एवषशयोः संज्ञायां न प्रवेशः। - अइउ ह्रस्वाः।।१।१।१४॥ एते हस्वसंज्ञाः स्युः॥ अईति-सन्ध्यभावादिविचारस्तु पूर्ववत् । अत्र व्याकरणे प्रकृतस्वरत्रयस्यैव ह्रस्वतया प्रदर्शनेन प्रयाणामेव हरवसंज्ञा कृता । अत्र प्रत्येकरवरस्य संज्ञा भवति न त समुदायस्य तादृशप्रयोगासम्भवात् । न नच . 'संशामकणरम् समुदाये वाक्यपरिसमाप्तिरिति न्यायेन समुदायस्यैव संज्ञोचितेति वाच्यं प्रत्येक वाक्यररिसमाप्तिरिति न्यायस्यै- वात्राश्रयणादुभयोयवस्थितविषयत्वात्... आईऊ दीर्घाः॥१।१।१३ ॥ स्पष्टम् । आईति-पत्र न समासः किन्त्वभेदानुकरणत्वाद्विभक्तरभावः । समासे तु समुदाये संज्ञापत्तिर्दुनि- वारा स्यात् समासस्य समुदाये शक्तत्वात् कथंचिद्वारणकल्पनाया वाक्यमेव वरं प्रत्येक संज्ञासिद्धये । एवमेव सर्वत्रताहशस्थले बोध्यम्-शेषविचारस्तु पूर्ववत् । कादिमान्ताः स्पर्शाः॥१।१।१५ ॥ स्पष्टम् । तत्र कादिङान्ताः कवर्गः। चादिनान्ताश्चवर्गः। टादिणान्ताष्टवर्गः। तादिनान्तास्तवर्ग: पादिमान्ताः पवर्गः। कादीति - आदिर्येषान्ते कादयः । मः अन्तो येषां ते मान्ताः । कादयो मान्ताश्च कादिमान्ताःमन्चविंश- तिर्वर्णाः स्पर्शा उच्यन्ते । तत्रेति-तच्छब्दस्य प्रक्रान्तादिपरामर्शकत्वेन व्यजनेवित्यर्थः ॥ कादिङान्ता इत्यादि-कादयश्च अन्ताश्च कादिान्ताः क ख ग घ अः कवर्गशब्देन बोध्या एवमप्रेऽपि ॥ वर्गसंकेतप्रदर्श- नफलन्तु स्कुटीभविष्यत्यप्रे॥ अन्त्यात्पूर्व उपधा।११।२०॥ अन्त्यवर्णात्पूर्वो वर्ण उपधासंज्ञः स्यात् । अन्त्यादिति-अन्त्यशब्देनान्त्यावयवो गृह्यते । अवयवत्वञ्च प्रस्तावाद्वर्णानामेवेत्यन्त्यवर्णो लभ्यते । तथा च यज्जातीयकोऽन्त्यस्तजातीयक एवान्त्यांपूर्व इति पूर्वो वर्णो लभ्यते ॥ - अनुस्वारः।१।१।१०॥ अनुस्वारो.व्यञ्जनसंज्ञः स्यात् । अनुस्वार इति-व्यजनानीत्यनुवर्तते । अभेदानुरोधादचनविपरिणामः । श्र इत्यत्र स्वरात्परो विद्य- भानो विन्दुरनुस्वार उच्यते । तस्य व्यजनसंज्ञाविधानफलन्तु व्यजनान्तरेण सह संयुक्तसंज्ञासिद्धिः । तेनो- वउज्जेत्यादौ व्यजनत्रयसंयोगे सति व्यजनीभूतस्य पूर्वस्यानुस्वारस्य त्रयाणामिति सूत्रेण लोपः सिष्यति । स्वराणामन्त्यादिष्टिः ॥१।१ । १९ ॥

- जैनसिद्धान्तकौमुदी स्वराणां मध्ये योऽन्त्यः स आदियस्य स टिसंज्ञः स्यात् ।। स्वराणमिति अत्र निर्धारणे पष्ठी तेन मध्ये इत्यस्य लाभः । तदन्त्योऽपि स्वर एव ग्राहो न तु व्यञ्जनम् । सजातीयस्यैव निर्धार्यमाणत्वात् । अंत एव गंवां मध्येऽन्त्यमानयेति प्रयोगे प्रयुज्यमानो गामेवानयति न महिषादिकमिति । न हि विजातीयस्य निर्धार्यमाणत्वे षष्ट्या अपि सम्भवः । अन्त्यादिरिति यद्यप्यत्र सामान्ये नपुंसकमेवोचितं तथापि शब्दशाखे शब्दस्यैव प्राधान्यं सूचयितुमध्याहृतशब्दरूपविशेष्य- मपेक्ष्य पुंस्त्वस्यापि सम्भवेनाऽन्त्यादिरित्युक्तम् । तत्रादिः क्वचितप्रधानं कचिच्चातिदेशिकः यथा छिन्द्धातोडेंज- प्रत्यय इन्भागस्य टिसंज्ञा तत्रादिमुख्यः । खाधातोर्डजप्रत्यय श्राकारस्य टिसंज्ञा तत्रादिरातिदेशिका असहायत्वात् । अप्रयुज्यमानः सफल इत् । १।१ । १६ ॥ लौकिकप्रयोगेषु न प्रयुज्यमानः किञ्चित्कार्य विधातुं प्रत्ययादावनुबद्धो वर्ण इत् संज्ञः स्यात् ॥ अप्रयुज्यमान इति-इत्संज्ञकस्यापि प्रत्ययादौ प्रयुज्यमानत्वादप्रयुज्यमान इत्यसंगतमित्याशंक्याह- प्रयोग इति । प्रकृतिप्रत्ययादेरपि प्रयोगत्वात्तत्र प्रयुज्यमानत्वस्यैव सत्त्वेन दोषस्तदवस्थ एवेत्याशङ्कायामाह लौकिकेतिलौकिकत्वंचार्थवोधनाय प्रयुक्तत्वं शास्त्रे तु शब्दानां शब्दपरत्वाददोषः । प्रकृत्यादावपि स्थायित्वा- - भावात् करिष्यमाणेसंज्ञकस्योचारणं व्यर्थमित्याशङ्कायामाह किंचित्कार्य विधातुमुपात्त इति अलौकिक प्रयोग इति शेषः । अलौकिकश्च साध्यावस्थापनः प्रकृतिप्रत्ययादिः । किञ्चित्कार्य-टित्त्वकित्त्वादि तत्सम्पादनेन साफल्यमस्य बोध्यम् ।। प्रसक्तस्यादर्शनं लोपः॥ १।१ । १७ ।। स्पष्टम् । प्रसक्तस्येति-प्राप्तस्येत्यर्थः न तु स्थित्तस्यैवेत्यर्थः तेन तार्थकस्याविद्यमानत्वेऽपि "आसणाओ पासई" इत्यादौ चार्थकान्तस्य शब्दस्य प्राप्त्यैव तदभावस्य लोपसंज्ञायां पञ्चमी सिद्ध्यति अदर्शन-दर्शनाभावः। अभावायऽव्ययीभावः इतः ॥३।४। ५२ ।। इत्संज्ञकस्य लोप- स्यात् ।। इत इति-तीपि तस्येति सूत्राल्लोपं इत्यनुवर्तते नन्वित्संज्ञां विधाय लोपक्ररणापेक्षयेत्संज्ञकत्वेना- हिंष्टानां लोप एवं विधीयताम् । किं लोपशास्त्रस्य परमखनिरीक्षगोनेति चेत्र हिताहिक आवश्यकत्वात् ।

५ संज्ञाप्रकरणम् स्वरादनन्तराणि संयुक्तम् ॥ १। १ । ११ ।। खराव्यवहितानि व्यञ्जनानि संयुक्तसंज्ञानि स्युः ।। स्वरादिति-जात्यपेक्षयैकवचनं तेन स्वरदयादिव्यवधानेऽपि संयुक्तसंज्ञा न भवतीति—यद्यायव्य- बहितानि संयुक्तानीत्यनेनापि स्वराज्यवहितानीत्यस्य लाभः संभवति विजातीयेनैव व्यवधानस्य प्रसिद्धतया व्यअनानां स्वरेणैव व्यवधानसम्भवेन तेनैवान्यवधानस्यापि लाभसम्भवात् । तथापि स्पष्टतया तत्प्रतिपादना- यैव स्वरादित्युक्तम् । व्यञ्जनानाति-- अनुस्वारो व्यवनमिति सूत्राद्व्यञ्चनमित्यस्यानुवृत्तिः । वहुत्वमन्त्राविव- तितं द्वयोरपि संयुक्तसंज्ञादर्शनात् प्रत्येकं तु न संयोगसंज्ञा लक्ष्यानुरोधात् । आयी दण्ड्यन्तामितिवत् समुदाये वाक्यपरिसमाप्तः। आदेदोद् वृद्धिः॥११॥१२॥ आत् एत् ओत् इत्येते वृद्धिसंज्ञाः स्युः ।। आदिति-अत्र पदत्रयम् । स्पष्टप्रतिपत्त्यर्थं तकारत्रयनिवेशः । समुदायसंज्ञावारणादिप्रकारस्तु दर्शित एव । अत्रादेदोष संज्ञिनः वृद्धिः संज्ञा न तु विपरीतमनुवाद्यमनुद्दिश्य न विधेयमुदीरयेदिति वचनात्पू- चिारिताः संज्ञिनः परोचारिता संज्ञेति नियमात् । अदिदुतामदाताविदीदेत उदूदोतः सवर्णाः ।।१।२१॥ अदिदुतां क्रमेण अदातौ इदीदेतः, उद्दोतः सवर्णा भवन्ति । अदिदुतामिति-श्रच इच्च उच्च अदिदुतस्तेषाम् । अञ्च आच अदातौ । इच ईञ्च एव इदीदेतः । उप मा भोष उदोतः । इति त्रयः समुदाया प्रकारेकारोकाराणां त्रयाणं क्रमेण सवर्णा भवन्ति । तथाचाकारस्या- काराकाराविकारस्येकारकारैकारा उकारस्योकारोकारौकाराः सवर्णा भवन्तीति सिद्धम् । वर्गेषु प्रथमद्वितीययोः प्रथमस्तृतीयचतुर्थयोस्तृतीयः । १११ १२२ ।। कचटतपवर्गेषु करखयोश्चछयोष्टठयोस्तथयोः पफयोः कचटतपाः गधयोर्जझयोर्डढयोर्दधयोर्चभयोः क्रमेण गजडदवाः सवर्णा भवन्ति ।। वर्गेष्विति-कवर्गचवर्गटवर्ग तवर्ग पवर्गेष्वित्यर्थः प्रथमत्वादिव्यवहारश्च मातृकावर्गपाठापेक्षया बोभ्यः। अदिदुतामिति सूत्रात्सवर्णा इत्यस्यानुवृत्तिः क्रमेणेति तथा च कखयोः ककारश्चछयोश्चकारष्ठठयोष्टकारस्तथयो- स्तकारः पफयोः पकार एवं गघयोर्गकारो जझयोर्जकारो डडयोर्डकारो दधयोर्दकारो वभयोर्वकारः सवर्ण इति सिद्धम् । विशेषणं तदन्तस्य ।। १।१ । २३|| विशेषणं तदन्तस्यापि संशा स्यात् ।

. : जैनसिद्धान्तकौमुदी विशेषणमिति-अत्र शास्त्रे विशेषणत्वेन यदुपादीयते तदेव विशेषणपदेनाभिधीयते । विशेषणं व्यावर्तकम् । तथा च नान्न इत्याद्यनुवृत्तौ तद्विशेषणमदादिपदं तदन्तस्थ संज्ञाकरणेनादन्तादिबोधकं भवति अतएव तत्तस्थलेऽभेदान्वयः सम्पद्यते यथाऽदितः पुंस्यत इत्यादि सूत्रेऽत इत्यनेनादन्तस्य ग्रहण नामपदस्याभेदान्वयेऽदन्ताभिन्ननाम्नः परस्येत्याद्यर्थो लभ्यते । सुप्त्यादि.विभाक्तिः ॥११॥ २८ ॥ सुपू त्यांदि च विभक्तिसंक्षे स्तः ॥ सुप्त्यादीति-अत्र सुप्पदेनोदादीवन्तो गृह्यते। त्यादिपदेनाज्ञाप्रवर्त्तनावर्त्तमानभूतभविष्यदर्थकाः प्रत्ययाः । अन्यत्र तु त्यादिपदेन तिन्तिसिहमिमव एव गृह्यन्ते तेन त्यादिपदेनाज्ञाद्यर्थकं प्रत्ययमुपादाय तस्मिन् पर विधीयमान प्रत्यया न विधेया इतिसिद्धम् ।।उक्तसुरस्यादेविभक्तिसंज्ञायाः फलन्तु अविभक्ति नामेति' सूत्रेण तदन्तस्य नाम संज्ञानिषेधः तत्र विभक्तिरहितस्यैव नामसंज्ञाविधानात् । इति संज्ञाप्रकरणम्। इतीति-सन्धिकार्योपयोगिनीनां व्यापिकानां च संज्ञानां प्रकरणं समाप्तमित्यर्थः । । अथ परिभाषाप्रकरणम् । . . स्वरस्य ह्रखदीर्घवृद्धयः ॥ १। १ । १.॥ हस्खदीर्घवृद्धिशब्दैर्यत्र हस्खदीर्घवृद्धयो विधीयन्ते तत्र खरस्येतिपदमुपतिष्ठते ॥ स्वरस्येति-इदश्च न विधायकं तत्तत्सूत्रेणैव हस्वादिसिद्धेर्नचानेनैव हस्खादिसिद्धौ माऽस्तु तत्तत्सूत्रमिति वाच्यम्।सामान्यतया तद्विधानेहस्वस्वराणामेव विलयापत्तेः । नापि नियामकम् । नियामकत्वं हि द्विविधं स्वरस्यैव हस्वदीर्घवृद्धय इत्येकम् । स्वरस्य ह्रस्वदीर्घवृद्धय एवेति द्वितीयम् । तत्र व्यञ्जनस्य तदसंभवादाचं व्यर्थम् । द्वितीयमपि न सम्यक् स्वरलोपादिविधायकस्य वैयर्थ्यापत्तः। नचेष्टांपत्तिरिति वाच्यम् । बहुलक्ष्यासिद्ध्या- पत्तेः । नापि संज्ञासूत्र तत्तसूत्रेणैव स्वरस्य हस्वादिसंज्ञासिद्धः । न चानेनैव तन्निर्वाहः सम्भवति स्वरसामान्य- स्य संज्ञात्रयकरणेऽनिष्टापत्तेः । नापि प्रतिषेधक नबोऽश्रुतेः । नाप्यधिकारसूत्रमुत्तरत्रानुवृत्त्यभावाद्वैयर्थ्या- पत्तेः । नाप्यतिदेशः वतिघटितत्वाभावात् किन्तु परिशेषात्परिभाषासूत्रमिदम् । षड्विधान्येव हि सूत्राणि संज्ञा च परिभाषा च विधिनियम एव च ।। अतिदेशोऽधिकारश्च षड्विधं सूत्रलक्षणमित्युक्तः । तथाच .

७ . .. परिभापामकरणम् स्वदीर्घवृद्धिशब्दानां ढखदीर्घतिशब्दैविहितहस्वदीर्घवृद्धिपु लक्षणया हदीर्घवृद्धिशरदैर्यत्र स्वदीर्घ- द्धीनां विधानं तत्र स्वरस्येति पदमुपतिष्ठते इत्यर्थसिद्धौ पदोपस्थापकत्वमस्य सिद्ध्यति इतिपदस्योपतिष्ठत ति पदस्य चान्याहारः । हखदीर्घवृद्धिशब्दैरित्यस्याभावे भगवया भगवओ इत्यादाविणस्सयोर्विधीयमानस्या- रोकारस्यापि दीर्घघुद्धिरूपत्वेन तत्रापि स्वरस्येति पदोपस्थित्या "इणस्सयोः स्वरस्यैवादेशापत्तेः । प्रत्ययस्य लोपः सर्वस्य।१।१।२॥ प्रत्ययस्थानिको लोप सम्पूर्णस्थाने बोध्यः ।। प्रत्ययस्येति-पष्ठी निर्दिष्टत्वादन्त्यस्य प्राप्ताविद सूत्रम् । तथा चान्त्यस्य षष्ठ्या, इति सूत्रस्यापवादः । प्रत एष हेरत इति सूत्रेण विधीयमानो -लोपोऽन्त्यमात्रस्य न । किन्तु हेः समुदायस्यैव । तनासति. तात्पर्य त्यपि बोध्यम् । अत एव यत्र प्रत्ययस्यान्त्यमात्रलोपे तात्पर्यमस्ति तत्र न समुदायलोपशंकावसरः । त्पर्यज्ञानं च प्रकरणादिना बोध्यम् । ननु अवयवे प्रत्ययत्वाभावेन तत्स्थानिकलोपस्य सुतरां प्रत्ययस्थानि- हत्त्वाभावेनैवास्य सूत्रस्याप्राप्त्या व्यर्थमेवेद्रं . सूत्रमितिचेन्न । न ह्यवयवेऽपर्याप्तस्य समुदाये पर्याप्तिरस्तीति नेयमेनावयवेऽपि प्रत्ययत्वपर्याप्तिसम्बन्धस्य सत्त्वेन प्रत्ययस्थानिकत्वानपायात् । तथा च प्रत्ययावयवस्य रातो लोपः तदवयवघटितसमुदायस्यैव स्यादिति फलितार्थः । (एतेन प्रत्ययस्थानिक इत्यस्य प्रत्ययत्व- पर्याप्तस्थानिताक इत्यर्थः तथा च प्रत्ययावयवस्य लोपवाधनार्थमिदं सूत्रमित्यसंगतमेव प्रत्ययावयवे नत्मयत्वस्याभावेन तत्रैतत्सूत्राप्रवृत्ते पर्याप्तिसम्बन्धेन समुदाय एव प्रत्ययत्वस्य सत्त्वादित्यपास्तम्)। अवयवे पर्याप्त्याऽवर्तमानस्य धर्मस्य समुदायेप्यसम्भवात् प्रत्येकमिलितस्यैव समुदायरूपत्वात् । तदुक्तं महाभाष्ये 'एकस्तिलस्तैलदाने यतः समर्थोऽतस्तत्वार्यपि ददाति । एका च सिकता.न समर्थाऽतस्तत्वार्यपि न ददातीति ।" तथा च प्रत्येकावृत्तः समुदायावृत्तित्वमिति सिद्धम् । प्रत्येकापर्याप्तस्यापि समुदाये पर्याप्तिरस्ति । अन्यथैकस्मिन् मृत्येऽवर्तमानस्य शिबिकावहनसामर्थ्यस्य तत्समुदायेपि वृत्तित्वं न स्यादिति पक्षाश्रयणे तु प्रत्ययपदस्य प्रत्ययावयवे लक्षणया प्रत्ययावयवस्थानिकलोपः तद्धटितसमुदायस्यैवेत्यर्थो वोध्यः ॥ स्वराणामन्त्याल्परो:मित् ॥१।१।४॥ स्वराणां मध्ये योऽन्त्यस्वरस्तस्मात्परोः मिदागमः स्यात् ॥ स्वराणामिति-निर्धारणे पष्ठी । तेनान्त्यखर इति लभ्यते सजातीयस्यैव निर्धार्यमाणत्वादित्युक्तमेव । मकार इत् यस्मिन्निति मित् । इणाणेहीसीसूनां ममिति -सूत्रेणेणादेर्ममागमे विहितेऽनेन तस्यान्त्यस्खरापर इति स्थाननिश्चये जिणेण मित्यादिः सिद्ध्यति । आगमस्य किद्भावेप्यन्त्यावयवत्वसिद्धौ व्यर्थमेतदिति तु न शङ्कयं लभादेर्ममागमे सफलमेतत् । तत्र ममागमे भकाररय स स्यात्तथाच लभेत्यादिरूपासिद्धेः ॥ -- . स्यात् । जैनसिद्धान्तकौमुदी समानयोर्विरोधे परम् । १।१॥५॥ तुल्यवलयोर्युगपदेकत्र प्रसङ्गे परं कार्य समानयोरिदि-समानस्तुल्यवलः अन्यत्रान्यत्र लब्धावकाश इति यावतू । विरोध एकत्र तयो- ढूयोर्युगपत्प्राप्तिः । एतेन निरवकाशस्याधिकवलस्य व्यवच्छेदः कृतः तथा तुल्यवलस्याविरुद्धस्य च निवारणं कृतम्। अन्त्यस्य षष्ट्या: ॥१।१।६॥ पष्ठयन्तस्य क्रियमाणं कार्यमन्त्यस्य बोध्यम् । अन्त्यस्यति-कार्यमित्यध्याहृतम् पप्ठ्या इत्यत्र स्थान्यादेशभावः पष्ठ चर्थः । तेन क्रियमाणमिति लभ्यते प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणमितिपरिभाषया पाठ्यन्तस्येति लभ्यते। यत्र स्थानषष्टी विद्यते तत्रैवारय सूत्रस्य प्रवृत्तिर्न त्ववयवावयविभावार्थकषष्ठीस्थले तेनागमेऽस्य न प्रवृत्तिः। षष्ठ्यन्तस्येत्यस्य षष्टयन्सपद- बोग्यस्येत्यर्थः। अनेकवर्णसित्॥ १।१।३॥ अनेकवर्णादेशः सिदादेशश्च सर्वस्य वोध्यः । अनेकवर्णति-आदेश इत्यध्याहारलब्धः। अन्त्यस्य षष्ठया इत्यस्यापवादः । अनेको वर्णो यत्रेति- बहुब्रीहिः । सकार इयत्र स सित् अनेकवर्णश्च सिञ्चेति समाहारद्वन्द्वः तेनैकवचनं सिद्ध्यति । न चेतरेतरयोगेऽपि सौत्रत्वादेकवचनं सिद्ध्यतीतिवाच्यम् । सिद्धगत्यैव निर्वाहे सौत्रत्वकल्पनाया व्यर्थत्वात् । सर्वस्येति पूर्वसूत्रादनुवर्तते ॥ टकितावाद्यन्तौ ॥१॥१७॥ टिरिकतौ यस्य विहितौ तस्यायन्तौ भवतः । टकिताविति-टश्च कश्च टको । टकावितौ ययोस्तौ टकितौ । आदिश्च अन्तश्चायन्तौ । टकारेऽकार उदारणार्थः । अत्र क्रमेणान्वयाहित्कार्यमाद्यवययो भवति कित्कार्यमन्त्यावयवो भवति । ननु एक धर्मावच्छिन्न एकरूपेणैकसम्बन्धेनान्वयरूपस्य साहित्यस्यात्राभावेन कथं द्वन्द्वसम्भवः टित आदौ कितोऽन्तेऽ न्वयादिति चेत्सत्यम् । शत्रु मित्रं विपत्तिं च जय रश्चय भञ्जयेत्यादौ लोके समसंख्यानां यथासंख्येनैवान्वयस्य दृष्टवेन व्याकरणेपि तथैव सिद्धौ पाणिनीयतन्त्रे यथासंख्यसूत्रारम्भसामर्थ्याद् व्याकरणे साहित्याभावेपि द्वन्द्वो भवतीति ज्ञापनात् । ॥ इति परिभाषा प्रकरणम् ।।

अथ स्वरसन्धिप्रकरणम् - वृद्धिरतः स्वरे परस्य सवर्णः।३।२।३०। अकारात्स्वरे परे पूर्वपरयोः परस्य सवर्णा वृद्धिरेकादेशः स्यात् ॥ जिणसरो। चाउलोदगं । समणोचासगो । घृद्धिरिति-पूर्वसूत्रात्पूर्वपरयोरित्यस्यानुवृत्तिः । विशेष्यानुरोधात् सवर्णस्य सीत्वम् । जिण + ईसरो इत्यत्र पूर्वपरयोरकारेकारयोः रथाने परत्येकारस्य सवर्णा वृद्धिकारः । आकारादेवद्धित्वेऽपि नेकारसावण्यमितिन जिणासरो अपितु जिणेसरो । चाउल+ उदगमित्यत्रोकारस्य सवर्णा वृद्धिरोकारः । एवंसमण + उवा सगोइत्यत्रापि । अदिदुतःसवणे दीर्घः।३।२।३१॥ अकारादिकारादुकाराच सवर्णे स्वरे परे पूर्वपरयोदीर्घ एकादेशः स्यात् ।। गमणागमणे । अईति । भाणूदयो॥ अदिदुत इति-अत्र समाहारद्वन्द्वः । अत एवैकवचनम् । तपरकरणमसन्देहाथै न तु समानकालाह- सार्थम् । तेनादीर्घाणामप्याकारादीनां ग्रहणम् । एकारादेरपीकारादिसावयात्तस्मिन्परे पूर्वपरयोर्दीर्घ एकादेशःस्या- दित्यतः खरादित्यनुक्त्वाऽदिदुत इत्युक्तम् ॥ गमणागमण इति-अत्राकाराकारयोः स्थामे दीर्घ एकादेशः । एवं भइ + इति । भाणु + उदयो इत्यत्रेकारयोरकारयोश्च स्थाने दीर्घादेशः ॥ स्वरयोरव्यवधाने ।३।४।२१॥ स्वरयोर्व्यवधानाभावे प्रकृतिभावो बहुलं .स्यात् । अाअगरो । अइई । अइहीं । अउज्झा । अइयारो | पंजलिउडा । स्वरयोरिति-प्रकृतिभावो बहुलमिति पूर्वसूत्रादनुवर्तते । बाहुल्यश्च "कचित्प्रवृत्तिः कचिवप्रवृत्तिः कचिद्विभाषा कचिदन्यदेव । विधेविधानं बहुधा समीक्ष्य चतुर्विधं वाहुलकं वदन्ति" बाहुलकमित्यत्र स्वार्थे कम् वेन बहुलमित्यर्थः। तथा च रूढशब्दघटकस्वरस्य तद्घटकवरेण नित्यं प्रकृतिभावः । समासादौ त्वसवर्णयोः खरयोर्यथाप्रयोगं सः । सवर्णयोस्तु प्रायो दीर्घ एव । असवर्णेऽपि प्रायोऽतः स्वरे परे वृद्भिरेव ! केवलमिका- रोकाराभ्यामेवासवणे खरे परे प्रायः प्रकृतिभावः ।

जैनसिद्धान्तकौमुवी लोपोऽन्यतरस्य।३।४।२४॥ स्वरयोरव्यवधानेऽन्यतरस्य लोपो बहुलं स्यात् । इक्कसीई। तहात्त । तेसी । तस्थिमं । नोवलभामहं । रमामहं । जिणामहं । नस्सामहं ।। लोप इति-मन्त्रानुक्तस्य पूर्वसूत्रादनुवृत्तिः । अन्यतरस्येति-पूर्वरय वा परस्थेत्यर्थः । प्रयोगेषु यथा यथोपलभ्यते तथा तथा पूर्वस्य वा परस्येति निर्धाय तेन विनिगमनाविरहाद्विपरीतलोपरतु न शक क्यः । इक + असीइ । तह + इति। ते + असी। इत्युदाहरणत्रये परस्य वरस्य लोपः। तत्थ + इमं दिस०६, ९; नोवलभामि + अहं । उत्त० १९, १३, रमामि + अहं । उत्त०१९, १४,जिणामि + अहं । उत्त० २३,३६, नस्सामि + मई ! उत्त०२३, ६१, इत्युदाहरणपनके पूर्वस्य लोपः ॥ पूर्व एकः पूर्वपरयोः । ३।२।२॥ इदुतोरसवर्णे रवरे परे पूर्वस्य सजातीय आदेशः स्यात् । पल्लको । समभितो । पूर्व इति- पूर्वस्येति पूर्वसूत्रादनुवर्तते । इदुतोदित्यत्र तकारः स्पष्टार्थो न तु दीर्घादिनिवृत्त्यर्थः तेनेदुतो रित्यनेन हवदीर्घयोरिकारेकारयोरुकारोकारयोश्चं ग्रहणम । पूर्वशब्देनोपात्तत्वास्थान्यव्यवहिरुपूर्वस्यैव बोध्यम्। तेन पूर्वशब्देन यत्किश्चिदादाय न पकारादिसदृशरयापत्तिः । साजात्यञ्च पूर्ववर्णवृत्त्यानुपूर्व्या न तु वर्णत्वादिना तेन नापत्तितादवस्थ्यम् । बाहुलकात्पंजलिउडेत्यादौ प्रकृतिभाव एव । पलि + अंको इत्यत्र लकारोत्तरवर्तीकारस्य लकारादेशः । समनु + इतो इत्यत्र नकारोत्तरवयुकारस्य नकारादेशः ।। समानयोः पूर्वस्य सवर्णः । ३।२।२२ ॥ समानवर्णद्वयाव्यवधाने पूर्वस्य स्वसवर्ण आदेशः स्यात् । अब्भुटेमि ॥ समानयोरिति-सदृशयोरित्यर्थः सादृश्यच्चानुपूर्व्या तथा चैकानुपूर्वीकवर्णद्वयस्याव्यवधानमित्यर्थः । पदन्यवच्छेदार्थ वर्णेति पूर्वरयेति स्थानषष्टी पूर्वस्य स्थाने इत्यर्थः । सवर्ण इति कस्य सवर्ण इत्याकांक्षायामाह- स्वसवर्ण इति स्थानिना सह गरिष्टसम्बन्धास्थानिसवर्ण एव भवतीति भावः । द्वयमिति फलिताथै व्यजन- त्यसममिव्याहाराभावात् । सावण्यं च वर्गेविति सूत्रे दर्शितम् । अभि + उट्टेमि झ्यत्रेकारय भकारे जाते पूर्वभकारस्प सवर्णो वकारः। तरहेभ्यश्चजमा इदुतोरसवर्णे स्वरे । ३।२।२४॥ तकाररेफहकारेभ्यः परयोरदुतोः क्रमेण चजझा आदेशाः स्युरसवर्णे स्वरे परे । पच्चपिणइ । पज्जुवासणा।। अझयणं ।। कमवणे वर इति स्थान्मावेशानां यथासंख्यत्वाभावेऽपि निमित्तावेशानां यथा संख्यत्वेन . तरोभ्य इति--- . स्वरसन्धिप्रकरणम् ११ क्रमेणेति लाभः । तथा च तकारात्परयोरिदुतोश्चकारः । रेफात्परयोर्जकारः । हफारात्परयोश्च मकार इत्यर्थः । पति+ अप्पिणइ इति प्रथमोदाहरणेऽनेनेकारस्य चकारे तकारस्य परसवर्णः । परि + उवासणेति द्वितीय इकारस्य जकारे रेफस्य परसवर्णः । अहि + अयणमिति तृतीय इकारस्य जकारे,हकारस्य परसवर्णे झकारः ।। सिस्तादिषु संयुक्तस्य वा तस्मिन्पूर्वस्य दीर्घः।४।१।११॥ एषु संयुक्तस्या लोपो वा तस्मिन्सति पूर्वस्वरस्य दीर्घः स्यात् । सीसो, सिस्सो । दूसहो, दुस्सहो । णोणेइ । वीसमइ, विस्तमह । आसासिम ॥ पासो, अस्तो । आसत्थो, अस्सत्यो । आभक्खाणं, अब्भक्खाणं ॥ सिस्सादिष्विति-'चोरवणिग्भ्या'मिति सूत्रादादेरित्यस्य 'लोपोऽन्यतरस्येति' सूत्रालोप इत्यस्य 'चानुवृत्तिः । सिस्लादिषु-सिस्सादिगणपठितेषु शब्देषु धातुषु च सिस्सो, दुस्सहो, णिएणेह, विस्समइ, अस्सासिअ, असो, असत्यो, अभावाणं, मगुस्लो, लुकखो, अमावस्सा, जिन्भा एते सिंस्सादयः । आकृविगणोऽयम् सूत्रत्यै कस्मिन्प्रयोगे सत्प्रवास करजोपदोघयोः 'प्रवृत्ती न पुनस्तथा । तेनाम्भ- क्खाणमित्यादिषु आभक्खाणमित्येवरूपं न त्वाभाखाणमित्यपि शास्त्रेषु तथानुपलब्धेः प्रयोगानुसारित्वाव सूत्रप्रवृत्तः । खरादस्य यडू बहुलम् । ४।१।५६ ।। खरास्परयोरकाराकारयोर्यडागमो बहुलं स्यात् ॥ विपरियासो, विपरित्रासो । पलिय कों, पलिअंको। स्वरादिति-अकारणाकारस्यापि ग्रहणादाह अकारकारयोरिति विपरि + आसो इति स्थिते इकारात्परस्याकारस्य यडागमे टिस्वादाकारस्याधनयवने विपरियासो । यहागमाभावे विपरिआसो एवं पलि + अंको इत्यत्र यडागमे पलियंको पक्षे पल्लको । स्वराद्यस्य. स्वरे ॥३।४ । २५ ॥ स्वरात्परस्य यकारस्य -लोपो बहुलं स्यात् स्वरे परे । जिइंदिए । गइंदों ॥ स्वरादिति बहुलं लोप इत्यनयोः पूर्वसूत्रादनुवृत्तिः । जिय+ इदिए इत्यत्रकाराकारयोर्मध्ये स्थितस्य यकारस्य लोपः । गय+ इंदो इत्यत्राकारद्वयमध्यस्थितस्य यकारस्य लोपः। यलोपे सत्यवशिष्ठस्याकारस्य लोपो- ऽन्यतरस्येति सूत्रेण लोपः । संयुक्ते ॥३॥ ३ ॥२॥ संयुक्त परे पूर्वस्य स्वरस्य हस्वो बहुलं स्यात् । अकोसइ । किरणो। पत्तं । भारियत्ता । गाच्छज्जा । गच्छज्जा । हुज्जा । होज्जा ॥

१५ जैनसिद्धान्तकौमुदी संयुक्त इति-बाहुलकादाहरणचतुष्टये नित्यं हवः । अन्तिमोदाहरणद्वये विभाषयां हस्तः । हस्थो बालमित्यनयोः पूर्वसूत्रादनुवृत्तिः । स्वरस्य हस्वदीर्घवृद्धय इति परिभाषया स्वरस्येति लाभः । पूर्वस्येति फलि- वार्थः । बा+कोसइ = अकोसह। की+ एणो= किरणो। पा+तं = पत्तं । भारिया + ता=भारियत्ता । गच्छ+ एजागपिछज्जा, गच्छेज्जा । हो+जा= हुजा, होजा ।। इति स्वरसन्धिप्रकरणम् । - अथ व्यञ्जनसन्धिः। अहे व्यञ्जनस्य परस्य ॥ ३ । २। २३ ॥ हमिन्ने व्यञ्जने परे पूर्वव्यञ्जनस्य परसवर्ण आदेशः स्यात् ॥ सकारो । उकसो । निचरइ । इड्ढी ॥ अह इति-न हा अहः तस्मिन् हभिन्न इत्यर्थः अत्र लाघवान् नत्रः पर्युदासार्थो गृह्यते न तु प्रसज्यप्रतिषेधार्थः । ननः क्रिययाऽन्वयेनाऽसमर्थसमासकल्पनेन च गौरवात् । पर्युदासो भेदः सादृश्यञ्च तथा च हभिन्ने हसदृश इत्यर्थलाभः । सादृश्यञ्च व्यजनस्त्रेनेत्यत आह हमिन्ने व्यञ्जने परे पूर्वस्येति सवर्ण इति च पूर्वसूत्रादनुकृष्येते । अहे इति किम् ? । तुम्हे अम्हे इत्यादौ मकारस्य हकारो माभूदिति । सत् + कारो। उत् + कसो । निर् + चरइ । इत्युदाहरणत्रये पर एव परसवर्णः । इध् + ढी इत्यत्र तु डकारः ढकारस्य सवर्णः । त्रयाणाम् ॥४।१।१२।। त्रयाणां व्यञ्जनानां संयुक्तस्यादेर्लोपः स्यात् । निच्छुभइ । पुट्ठो ॥ प्रयाणामिति-लोपोऽन्यतरस्येति सूत्राल्लोपः । चोरवणिग्भ्यामित्यत आदेः। सिस्सादिवितिसूत्रा- संयुक्तस्येत्येतत्पदत्रयमनुकृष्यते । व्यञ्जनानामिति विशेष्यं विशेषणबलाल्लभ्यते । शास्त्रेषुव्यञ्जनद्वयस्यैव संयोग उपलभ्यतेऽसो यत्र त्रयाणां व्यन्जनानां संयोगस्तत्र त्रयाणामादिव्यञ्जनस्य लोप इत्यर्थः । निर् + च्छुभईत्य- त्रादिव्यजनस्य रेफस्य पुच्छ ठो इत्यत्रादिव्यन्जनस्य चक्रारस्य च लोपः ।। अपूर्वस्य ॥ ४ । १ । १३॥ संयुक्तस्यादेलोपः स्यात् संयुक्तमपूर्व चेत् । कमइ । किणेइ । अपूर्वस्य किम् । निकमई । विकेह॥ अपूर्वस्येति-पूर्ववत्पदन्त्रयस्यानुवृत्तिः । अपूर्वस्येत्यत्र न पूर्वो यस्मात्तदपूर्वमिति विग्रहस्तेन संयुक्तम- पूर्व चेदिति फलितार्थः । नि+ कमईत्यत्र संयुक्तत्य निपूर्वकत्वात् वि + केहेत्या विपूर्वकत्वाब न लोपः ।।

अथ ध्यजनसन्धिप्रकरणम् दो हो धः॥३।४।६॥ दकारात्परस्य हकारस्य धकारः स्यात् । उद्धरो ॥ द पति-दः हः ध इति पदत्रयं क्रमेण पञ्चम्यन्तं पाठयन्तं प्रथमान्तञ्च । उद्+हर इत्यत्र हकारस्य हभिमचाभावादहे व्यसनत्येति सूत्र त्याप्राप्तावनेन हकारस्य धकारो विधीयते । अहणमित्यादिषु प्रकारात्परस्य माभूदिति प्रथमं पदम् ॥ उदः सश्छो, वा ॥३॥ ४ ॥ ४ ॥ उदः परस्य सकारस्य छकारोवा स्यात् । उच्छाहो । उच्छयो । पक्षे उस्साहो । उस्सयो । उद इति-उदःसाछ इति पदत्रय कमेगपञ्चम्यन्तं पश्यन्तं प्रथमान्तश्च । उद उदुपसर्गादित्यर्थः । उद्+ साहो इत्यत्र विशेषविहितत्वानिरवकाशबाघ, सकारस्य छकारस्ततोऽहे व्यञ्जनस्येतिसूत्रेण दकारस्य पर- सवर्णश्चकारः । एवं उद्+सयो-इत्यत्रापि । पो-छकारस्य वैकल्पिकत्वात्तदभावपक्षेऽहे न्यजनस्येति दकारस्य परसवर्णे सकारः ॥ वर्णानामभाचोऽवसानम् ॥१।१।१८ ॥ स्पष्टम् ॥ वर्णनामिति यदनन्तरं कोऽपि वर्णो नास्ति तादृशः पदस्य वाक्यस्य वाऽन्तोऽवसानमित्युच्यते । संज्ञासूत्रमिदम् । अस्य फलन्तुम्नो नुस्वार इत्यत्रानुपदमेव व्यक्तीभविष्यति ।। नोरऽनुस्वारोऽवसानव्यञ्जनयोः।३।४।१॥ अवसाने व्यञ्जने च परे मकारनकारयोरनुस्वारः स्यात् । निओइडं । संसमरइ । अच्छति । नोरनुस्वार इति-नोरिति पष्ठोद्विवचनम् । वर्णोपरि विन्दुरनुस्वार उच्यते । नन्ववसानस्या- भावरूपत्वात्सरवव्यवहारो न स्यादिति चेत्सत्यम् । बुद्धिकृतपरत्वव्यवहारस्य तत्रापि सम्मतत्वात् । निश्राइडं इत्यवसानस्योदाहरणम् । सम् + सरइ = संसरईति । व्यञ्जनस्योदाहरणम् । अच्छ+न्ति-इत्यत्र तकाररूपन्यजने परे नकारस्यानुस्वारः । अहे व्यञ्जनत्येत्यत्यापवादभूतमिदम् । रवरे वा ॥३।४।२॥ मकारस्यानुस्वारो वा स्यात्स्वरे परे । कुंथु अरं च । उसममजिनं च ।। स्वर इति-नोरनुस्वार इति पूर्वसूत्रानुकृष्यते । कचिदेकदेश इति न्यायेन । कुंथुम् + अरं चेत्यत्रा- कारे परे मकारस्यानुस्वारो जातः । पक्षे कुंथुमरं चेत्यपि । उसमम् + अजिअं चेत्यत्र मकारस्यानुस्वारा- भावः प्रदर्शितो वैकल्पिकत्वात्-पक्षेऽनुस्वारोऽपि ।।

२५ जैनसिद्धान्तकौमुदी तस्य स्पर्शेषु तवर्गपञ्चमः । ३ । ४ । ३ ॥ स्पर्शेषु परेष्वनुस्वारस्य परवर्णवर्गस्थः पञ्चमो वर्ण आदेशो वा स्यात् । सङ्कमइ । सञ्चरइ । सण्डीणो । सन्तपइ । सम्पावेइ । पक्षे संकमईत्यादि। तस्यति-तच्छदस्य पूर्वपरामर्शकत्वाद्विधीयमानोऽनुस्वारः परामृश्यते । स्पृशन्ति स्वस्वस्थानं स्पष्टतयेति स्पर्शाः कादयो मान्ता वर्णाः पञ्चविंशतिस्तेषु परेन्नित्यर्थः ॥ नखर्गेति-द्वितीयतच्छब्देन स्पर्शवर्णः परा- मृश्यते । तेन स्पर्शरूपपरवणे लभ्यते तस्य यो वर्गः कवर्गादिः तत्र स्थितः पञ्चमो वर्णः उकारादिः सोऽनुस्वारस्यादेशो वा स्यादित्यर्थः । सम् + कमईत्यत्र नोरनुस्वार इति सूत्रेणानुस्वारेऽनेनाजुस्वारस्य परवर्णवर्गः कवर्गस्तस्य पञ्चमो वर्णः कुकारो जातः । .संचरईत्यत्र वकारः । संडीणो इत्यत्र णकारः संतपईत्यत्र नकारः । संपावेईत्यन मकारश्च । पक्षपञ्चमवर्गादेशाभावेऽनुस्वारस्यानुस्वार एव तिष्ठनोति भावः ।। अनुस्वारस्य पलिवा॥४।१।३६ ॥ अनुस्वारस्य लोपोचा णमि परे । अहणं । अहएणं । तेसिणं । तेसिएणं ॥ अनुस्वारस्येति लोप इत्यनुवर्तते । णमित्यव्ययं वाक्यालंकारे वर्तते । अहं + णमित्यत्रानेनानु- स्वारलोपे अहणं । लोपाभावे तस्य स्पशेष्वित्यनेन वर्गपञ्चमवर्णादेशे अहरणं । एवं सिंणमित्यत्रापि ।। च्चे जादिभ्य प्रोः।.३।४।४५ ॥ जादिशब्देभ्यः परस्य प्रथमैकवचनस्य लोपः स्यात् च्चे परे। जच्चेव । तच्चेव । जीवच्चेव । अजीवच्चेव के इति-लोप इत्यस्यानुवृत्तिः । ओरित्युशब्दस्य षष्ठयेकवचनम् । उश्च प्रथमैकवचनप्रत्ययः । श्वेत्यव्ययं समुच्चयादौ ज आदिर्येषां ते जादयस्तेभ्यः । ज, त,जीय, अजीव इत्यादयो जादयः । श्राकृतिगणोऽयम् । न, उ, वेत्यत्रोलोपे जव एवमन्यत्रापि ।। इति व्यसनसन्धिप्रकरणं समाप्तम् अथ स्वरविकारप्रकरणम् इ. किवणादीनां मध्यस्य स्वरस्य ॥३।३।४२ ॥ किवणादिगणपठितानां मध्यस्वरस्येकारो वा । किविणो, किवणो । चरिमं, चरमं ।

.. अथ स्वरधिकारप्रकरणम् पुरिसो, पुरुसो। भुइंगो, भुभंगो॥ इरिति-बहुलाधिकाराद्विकल्पलाभः । बहुलशब्दस्थाने तदर्थकवाशब्दोपादानेन वैकल्पिकमेवेदमि- ति लभ्यते । एवमन्यत्रापि । यत्रानेकविध कार्य तत्र बहुलमित्येवोच्यते यत्र विविधमेषकार्य तत्र बहुलग्रहण- फलितो वा शब्द एव पठ्यते । किवणचरमपुरुसभुभंगेत्येते किवणादयः । सुरभिदुरभ्योर्लोपः । ३।३। ४३ ॥ एतयोर्मध्यस्वरस्य लोपो वा स्यात् । सुभि, सुरभि । दुभि, दुरभि । सुरभीति-मध्यस्य स्वरस्येति पूर्वसूत्रादनुकृप्यते । सुरभिदुरभिशब्दयोमध्य-स्वरोरेफोत्तरवर्त्यकारः तस्या- नेन लोपेऽहे व्यजनस्येतिसूत्रेण रेफस्य परसवर्णो वकारादेशः तथा च सुम्मिमिति सिद्धमेवं दुन्भिमित्यपि । मध्य- स्वरलोपाभावे सुरभि दुरभिमिति । श्रोस्तंबूलस्य । ३।३।४४ ॥ तंबूलस्य मध्यस्वरस्यौकारो वा स्यात् । तंबोलं, तंबूलं ।। श्रोरिति-मभ्यस्य स्वरस्येत्यस्य चानुवृत्तिः । कारेलस्येयः ।३।३।४५॥ कारेलस्य मध्यस्वरस्येयादेशो वा स्यात् कारियलं, कारिलं, कारलं ।। कारल्लस्येति-अत्रापि पूर्ववदनुवृत्तिः । मध्यस्वरोऽत्रैकाररतस्येयादेशे कारियल्लं । इयादेशाभावे संयुक इति सूत्रेण वा हस्वत्वे कारिल्लं । पक्षे कारल्लमिति । अश्चिक्खिलादीनाम् । ३।३।४६ ॥ एषां मध्यस्वरस्याकारो वा स्यात् । चिक्खलं, चिक्खिलं । अगरू, अगुरू ॥ अ इति-पूर्ववदनुवृत्तिः। चिक्खिलशब्दे मध्यस्वर इकारः । अगुरुशन्दे मध्यवरसकारःतयोरकारोबात- स्तथा व चिम्खलं,अगर इत्यादिरूपसिद्धिः । चिक्खिलादिराकृतिगणः । अद्वंटगुरुययोः स्वरस्य । ३।३ । ७७ ॥ वेंटगुरुयशब्दयोः स्वरस्यादरकारो वा स्यात् । वंटे, वें । गरुयं, गुरुयं ।।। अदिति-आदेरित्यस्यानुवृत्तत्वान्मध्यस्येति निवृत्तम् । अदिति प्रथमान्तम् । वेटशब्द आदिस्वर एकार: गुरुयशन्द उकाररतयोरदित्यकारो जायते वटवृन्तं । गरुयं-गुरुकम् अफाराभावपक्षे वेंट गुरुयमिति । न च वेंटादीनां व्यअनादित्वात्स्वरादित्वं नास्तीति कथं सूत्रप्रवृत्तिरिति । वाच्यम् श्रादिशब्दस्यान प्रथमवाचकत्वं नत्वा- यवयववाचकत्वं दुर्योधनादयः कौरवा इत्यादौ प्रथमार्थकस्यैव दृष्टत्वाच तथा च वेटादिशब्दे य ादिस्वरःप्रथमः खरः तस्याकारः स्यादिति फलितार्थः ।। ३ ..

१६ जैनसिद्धान्तकौमुदी इनगिणस्य । ३।३ । ७८॥ नगिणशब्दस्यादेः स्वरस्येकारो वा स्यात् । निगिणं, नगिणं ॥ इरिति-इरिति प्रथमान्तपदम् । श्रादेःस्वरस्येत्यनुवृत्तिः ॥ नगिणमिति-नममित्यर्थः आदिवर- स्याकारस्येकारे जाते निगिणमिति । इकाराभावे नगिणमिति ।। उउंबरस्य वा।४।१।१६॥ अस्यादेः स्वरस्य लोपो वा स्यात् । उपरो, उउवरो ॥ उउंबरस्यति-लोपोऽन्यतरस्येति सूत्रालोप इत्यनुवर्तते आदेः रखरस्येत्यस्य पूर्ववदनुवृत्तिः । आदिस्वर- स्योकारस्य लोप ऊंबर इति रूपम् । लोपाभावे उउंबरो वा उदुंबरो वृक्षविशेषः ।। श्रोत्कुतूहलस्य । ३।३ । ७६ ॥ कुतूहलशब्दस्यादेः स्वरस्यौद्वा स्यात् ।। कोऊहलं, कुऊहलं । ओदिति-ओदिति प्रथमान्तमादेशः । अनुवृत्तिः पूर्ववतालोप इति निवृत्तम् । कुतूहलशब्द आदिस्वर उकारः । तस्यौकारे । तकारस्य 'बहुलंगचे'त्यादिना यकारे लोपे च कोउहलं । ओकाराभावे कुऊहलमिति । ऊतः कुतूहलस्य । ३।३।१२। कुतूहलस्योतो हूस्वो वा स्यात् । कोउहलं, कुउहलं । ऊत इति-हस्वो वेत्यनयोरनुवृत्तिः । ऊत इत्यनेन दीर्घोकार एव गृह्यते हस्खविधिसामर्थ्यात् । तथा प कुतूहलशब्दान्तर्गतसकारोत्तरवयूकारस्य हस्खत्वे कोहलं कुउहलं हस्वाभावे दीर्घरूपं तूपरि दर्शितमेव । खुड्डस्य के।३।२।४४॥ अस्य दीर्घो वा कप्रत्यये पर खुड्डाक, खुड्डकं ॥ खुड्डस्येति-दीर्घो वेत्यनयोरनुत्तिः । स्वरस्य ह्रस्वदीर्धेत्यादिना स्वरस्योपस्थितिः । अन्त्यस्य षष्ठया इति परिभाषयाऽन्त्यस्वरस्यैव दीर्घः के इति सप्तमीनिर्देशादप्यव्यवहितपूर्वस्यैव दीर्घविधानादकारस्यैव दी| नतू- कारस्य खुइ (क्षुद्र) शब्दात्स्वार्थेक प्रत्ययस्तथा च खुड+ कं इत्यत्राकारस्य दीर्घ खुट्टाक दीर्घाभावे खुडूकमिति॥ ककारस्य विकल्पेन गकारयकारसद्भावे खुडाग,खुडुगं, खुडाय खुड्डयमिति रूपचतुष्टयमने साधयिष्यते । वईत ऊत् । ३ ।१ । ७६ ॥ वईशब्दस्योकारो वा स्यात् वऊ, वई ।। वईत इति-तकारउवारणार्थः। वईत इति षष्ठयेकवचनान्तम् । अन्त्यस्य षष्ठया इत्यनेनान्त्यस्यादेशः । चईशब्दो वाकपर्यायः वाणीतियाषत् । तस्योकारे जाते वऊ । ऊकाराभावे वईति ॥ - व्यञ्जनविकारप्रकरणम् १७ विच्छियस्य चस्य मः।३।४।१२॥ अस्य चकारस्य मकारो वा स्यात् । विछिए । विच्छियस्येति-वृश्चिकपर्यायविच्छियशब्दघटकचकारस्य मकारादेशरतत्राकार उच्चारणार्थः । मकारस्प मोरित्यनुवारे विछिए। उसियस्य । ३।४।१३ ॥ विच्छियशब्दस्येयस्योसादेशो वा । विच्छू, विच्छिए । उसिति-विच्छियस्येति पूर्वसूत्रानुवर्तते । उसादेशे सकारस्येत्त्वादनेकवर्णसिदित्यनेन सर्वादेशः । वेन पिच्छियशब्दघटकेयस्य स्थान उसादेशे विच्छू । उसादेशाभावे विच्छिए । प्रालिसिन्दस्य सरत् ॥३।४।११॥ आलिसिन्दशब्दसम्बन्धिसरकारोऽन्तादेशो वा आलिसन्दो, प्रालिसिन्दो ॥ प्रालिसिन्दस्यति- अन्त्यस्य षष्ठथा इति परिभाषयासकारोत्तरेकारस्याकारादेशालिसन्दो । अकारा- देशाभावे भालिसिन्दो॥ ॥ इति स्वरविकारप्रकरणम् ॥ अथ व्यञ्जनविकारप्रकरणम् । अनादरसंयुक्तस्य कस्य गः।३।३।६१॥ असयुक्तानादिककारस्य गकारो वा स्यात् अहिगरणं; अहियरणं, अहिअरणं, अहिकरणं । अनादेरिति किम् । करणम् । असंयुक्तस्य किम् । विकिणइ । अनादेरिति-न आदिरादिभूतः सोऽनादिः पदस्यादाववर्तमान इत्यर्थः । न संयुक्तो व्यवनान्तरेणेत्य- संयुक्तः पदश्चात्र समस्तमसमस्तमुभयं गृह्यते यत्र समासस्तत्रोत्तरपदापेक्षयादिभूतत्वेपि समस्तपदापेक्षयाऽना- दित्वं प्राह्यं तेनाहिगरणमित्यादौ न दोषः अहि+करणमित्यत्रानेन ककारस्य गकारे अहिगरणं । बहुल गचेत्यादिना गकारस्य यकारे अहियरणं स्वरायस्येति यकारलोपे अहिअरणं । गकारस्य वैकल्पिकत्वाद्गकारामाबे महिकरणमिति । अनादेरित्यस्य प्रत्युदाहरणं करणमिति असंयुक्तस्य प्रत्युदाहरणं विकिणईति ॥ बहुलं गचजतदबवानां यः।३।३।६३ ॥ अनादिभूतासंयुक्तानामेषां यकारो बहुलं स्यात् । जयं, जगं । सोयं सोचं । प्रायणं, जि- णं । अवयरणं, अवतरणं । उयर, उदरं । अलाऊ, अलाबू । जुयलं, जुवलं !!

२८. जेनसिद्धान्तकौमुदी बहुलमिति-बाहुलक चतुर्विधं पूर्व व्याख्यातमेव ततः कचिनित्यं यकारः कपिदिकल्पेन कचिन्न भव- त्येव-गचेत्यादि-गश्च चश्व जश्च तश्च दश्च बश्च वश्च गचजतदबवाः इतरेतरयोगद्वन्द्वः तेषां गचजतदबवा- नाम् । अनादेरसंयुक्तस्येति पूर्वसूत्रादनुवर्तते । तस्य बहुवचनान्तत्वेन विपरिणामः विशेष्यस्य बहुवचनान्तत्वात् । गकारादिसप्तवर्णानां विकल्पेन यकारसद्भावे जयं, जगमित्यादीनि सहोदाहरणानि क्रमशो दर्शितानि । प्रत्येक रूपयमुदाहृतम् । स्वरायस्येति यकारलोपे तु तृतीयमपि रूपं भवति तत्स्वयमूहम् ।। रुधिरादीनां धभयोहाँ वा । ३।३।६४॥ एषामनाघसंयुक्तधकारभंकारयोर्हकारो वा स्यात् । रुहिरं, रुधिरं । एहन्तो; एंधंन्तो। नहं, नर्म॥ रुधिरादीनामिति-अनादेरसंयुक्तस्येत्येतस्यानुवृत्तिः एकवचनान्तस्य द्विवचनान्तत्वेन विपरिणामेन धभयोविशेषणत्वम् अनादेरिति किं १ धम्मो । असंयुक्तस्य किं ? रुध्धो । धकारस्य हकारत्वेरुहिरमित्यायुदाहरण- द्वयम् । भकारस्य हकारत्वे नहमित्याधुदाहरणम् ।। नो णः।३।४।१५॥ . आदावनादौ च नकारस्य बहुलं णकारः स्यात् । णमंसइ, नमसइ । णिचरइ निचरइ । आकएणइ, आकन्नइ । किरणं, किन्न। न इनि-षष्ठ्यन्तं पदं नकारस्येत्यर्थः । णइतिप्रथमान्तमकार उधारणार्थः । णमंसह इत्यत्र धावावादिभूत नकारस्प णकारः । आकएणइ इत्यत्रानादिभूतसंयुक्तनकारस्य णकारः णिचरइ इत्यत्रोपसर्गस्थादिभूतासंयुक्त नकारस्य णकारः । बहुलग्रहणात् क्वचिद्विकल्पेन क्वषिन्नित्यं यथाप्रयोगं द्रष्टव्यमित्युक्तं प्रागेन । कोडंबादीनां डोलः। ३।४।२२ ॥ कोडंबादिशब्दसंबन्धिडकारस्य लो बहुलं. स्यात् । कोलंबो, कोडंबो। :: कोडबादिग्विति' इति षष्ठ्यन्तं पदम् । डकारस्थेत्यर्थः ल इतिप्रथमान्तमकार उचारणार्थः बहुल-: नित्यनुवर्तते डंफारस्य लकारे कोलंबो । लकारामावे कोडंबो।। पोक्खरादीनां । ३।४ । २३ ॥ ... पोक्खरादिशब्दसंबंधिरेफस्य बहुलं लः स्यात् । पोक्खलं, पोक्खर पलिहा, परिहा" "पालयामि। पोखरादिष्विति-बहुलं ल इत्यनुवर्तते । बहुलग्रहणात पोक्खलमित्यादौ विकल्पेन ला पालवामी- त्यादौ नित्यम् । मारुतिगणोपम् ॥ - 7 1 .

. . है न्यजनविकारप्रकरणम् लुक्खादीनां हः।२।३।८०॥ एषामुपधाया हकारो वा स्यात् । लूह, लुक्खं । जीहा, जिब्भा । रिसहो; रिसभो। ककुह, ककुई । गाहा, गाथा । वुहो, बुधो । दिवह, दिवसं भेसंह, भेसज । खुहा खुधा। एषामेति-उपधाया वा इत्येतयोरनुवृत्तिः लुक्खजिम्भाशब्दयोरुपधाभूतयोः खकारमकारयोर्हकारे सि- स्सादित्वात्संयुक्त यादेर्लोपे पूर्वत्य च दी लूहं जीहा हकारलोपदीर्घामावेच लुक्खं, जिन्भा । स्वरविशेषवाचक- :रिसभशब्दे भकारस्य हकारे रिसहो हकाराभावे रिसभो । एवं ककुदादिष्वप्युपधाभूतानां दकारादीनां विकल्पेन हकारे ककुहं कदमित्यादि लुक्वं, जिन्भा, रिसभो, ककुई, गाथा, बुधो, दिवस,खुधा, भेषजमेते लुक्सादयः याकविगणोयम्॥ प्रातपादीनां पोकः।३।४।१६ ॥ एषां पकारस्य वकारादेशो वा स्यात् । आतवो, आतपो । कवोतो, कपोतो । वाहणा, पाहगा। जूबो जूपो । दुरूवं, दुरूपं । अणुवालयं, अणुपालयं । विवरीयं, विपरीयं-। वत्तिय पत्तियं । पिवीलिका, पिपीलिका। पातपादीनामिति चेत्यनुवर्तते । आतपो, कपोतो, पिपीलिका, पाहणा, जूपो, दुरुपं, अणुपालयं, विपरीयं पत्तियमित्येत प्रातपादयः । आकृतिगणोयम् । अनादेमध्यस्य वान्त्यस्य पकारस्य विकल्पेन यथाप्रयो- -ग:वकारः । पिपीलिकाशब्दे पकारद्वयमध्ये द्वितीयपकारस्यैव वकारस्तथा प्रयोगदर्शनात् ॥ .:. वा कुतूहलादीनाम् । २।३। ७१ ॥ कुतूहलादीनामुपधाया द्वित्वं वा स्यात् । कोऊहल्लं, कोउहन्लं, कुऊहन्लं, कुउहाँलं पचे कोऊहलमित्यादि । दुगुल्लं, दुगूलं, दुकूलं । जुहिछिल्लो, जुहिठिलो । वेति--उपधाया द्वित्वमित्यनयोः . पूर्वसूत्रादनुवृत्तिः । कुतूहलशब्दस्य विकल्पेन प्रथमोकारस्यौत्त्वेन द्वितीयोकारस्य हस्वत्वेन च रूपचतुष्टयं भवतीति प्रानिदर्शितम् । तत्रोपधाभूतस्य. लकारस्य, विकल्पेन द्वित्वे लद्वयषटितं रूपचतुष्टयमेकलकारघटितं रूपचतुष्टयं च तदुक्त कोऊहलमित्यादीनि आदिशब्देन कोउहलं, कुऊ. हलं, कुउहलमिति त्रीणि रूपाणि ज्ञेयानि । दुज़राब्दे कस्य गकारे लस्य द्विवे संयुक्ते हखत्वे च दुगुल्लं । द्वित्वाभावे दुगूलं । गवाभावे च दुकूलं । जुहिट्ठिल (युधिष्ठिर) शब्दे लस्य द्वित्वे । जुहिटिल्लो । द्वित्वोभावे । जुहिटिलो आकृतिगणोयम् ।। वज्जादीनां वस्योः।३।४।१६ ॥ वज्जादिशब्दानां वस्योसादेशो वा स्यात् । आउज्जो, आवज्जो । आउज्जणं, आवज्जणं । उसहो, उसमो, बसहो, यसभो। ।

जैनसिद्धान्तकौमुदी रज्जादीनामिति-उससकारस्येत्त्वाइनेकवर्णसिदित्यनेन सर्बादेशस्तयां चाकारसहितवकारस्योसादेशः । भाबलाबनणयोर्वत्योसादेशे, प्रकृतिमावे च आउज्जो, आउज्जणं आदेशाभावे श्रावज्जो, आवजणं । लुक्खा- दिलादुपधाभूतभकारत्य विकल्पेन हकारे वत्योसि च उसहो उसमो । उसादेशाभावे वसहो, वसंभो। वीभत्यस्य छो वा । २।३।६०॥ अस्योपधायाश्छकारो वा स्यात् बीभच्छो, बीभत्यो । बीभत्यल्येति-उपधाया वेत्यत्यानुवृत्तिः । अघाभूतस्य यकारत्यछारे अहेव्यञ्जनस्वे त्यनेन तकारस्य परसव बीमच्छो । छारामात्र बीमत्यो । वीभत्स इत्यर्थः ॥ इतो बीभत्यस्य । ३।३।१४ ।। अस्य ईतो इस्वो वा स्यात् । विभच्छो, विभत्यो। ईत इति-पथ्येकवचनान्तम् । तकार वारणार्थः । ईशः ईकारस्येत्यर्थः । माइनिमित्य चो हस्थ इत्यनुवर्तते । कारयकारवटिवल्पयत्य हवाचे विमच्छो, विभत्यो इति ।। पुडपुरयारत्तरपदयोः।४।१।१७ ॥ अनयोरादेर्लोपो वा स्यात् । तालउई, तालपुडं । गोउर गोपुरं ॥ पुडेति-आदेोपावेत्येतेषामनुतिः। उत्तरपशन्दत्य समासचरमावयवलइत्वात् समास उत्तरपद भूतयोः पुडपुरशब्दयोरित्यर्थः । आदिभूतपकारस्य लोपेतालाई । लोपासावे तालपुडं । एवं गोरं गोपुरमिति ॥ परिवारस्य ल२३१६४ ॥ अस्योपधाया लकारों का स्वाद परिवालो, परिवारों। परिवारत्येनि-त्रीमत्वत्येत्या उपधाया इत्यत्यानुवृत्तिः पंवारशन्द व्ययाभूतो कारमतत्य लकारा- देशे परिवालो। आदेशाभावे परिवारो॥ उजस्य वः।२।३।६२॥ अस्योपधाया वकारो वा स्यात् । उडवं, उड्यं, उडनं । उडजस्येति-उपधाया वा इत्येनयोरनुवृत्तिः । उहजराम उपाभूतो. जकारस्तस्य वकारे उहवं । वकारामाचे जकारस्य यचार उहचं । यकाराभावे उहजमिति ।। स्तित्राः।३।३।७२ ॥ उउशब्दस्यादरिरित्यादेशो वा स्यात् । रिऊ उऊ ।

व्यजनविकारप्रकरणम् २१ रिरिति-रिरितिप्रथमान्तम् । उओरितिषष्ठ्यन्तम् । खेत्तस्यादेरिति सूत्रादादेरित्यनुकृष्यते । आदेरित्य- स्य विशेषेणोपादानादन्त्यस्य षष्ठ्या इत्यस्य न प्रवृत्तिः । अनेनादेशे रिऊ । आदेशाभावे उऊ । ऋतुरित्यर्थः । उोरन्त्यस्य डुदुयाः। ३।४।५॥ अस्यान्त्यस्य डुदुय इत्येते आदेशाः स्युः उडू, उदू , उओ । उओरिति-उउशब्दस्य षष्ठयैकवचनम् । त्रयाणामादेशानामनेकवर्णत्वादन्त्यस्य षष्ठया इति परिभाषां, बाधित्वाऽनेकवर्णसिदित्यनेन, सर्वादेशे प्राप्त सूत्रेऽन्त्यस्येति, विशेषेणोपात्तं, तत्सामर्थ्यान्न सर्वादेशः, किन्त्वन्त्यस्यो- कारस्यैव । दुइत्यादेशे उडू । डुइत्यादेशे, उदू । यादेशे, स्वराद्यस्येति यलोपेच उओ इति ॥ खेत्तस्यादेश्छः। ३।३।६६ ॥ अस्यादेश्छकारो वा स्यात् । छेत्तं, खेत्तं । खेत्तस्येति चेत्यनुवर्तते श्रादेरित्यस्योपादानादन्त्यस्य षष्ठ्या इति न प्रवर्तते । आदिभूतस्य खकारस्य छकारे छेत्तं । छकाराभावे खेत्तमिति ।। सणियमः सणिम् । ४।४।२८॥ सणियं शब्दस्य सणिम् , आदेशो, वा स्याच्चरे परे । सणिचरो, संणियंचरो। सणिमिति-चर इति, पूर्व सूत्रानुवर्तते । सणियमित्यव्ययम् । शनैरित्यर्थः । सणियं चरति इति विग्रहे सणियमित्यस्य सणिमादेशे मकारस्यानुस्वारे सणिंचरो । आदेशाभावे सणियंचरो॥ सणियमश्वरश्च्छो वा ।२।४।८७॥ अस्मात्परस्य चर्धातोरादेशच्छकारो वा स्यात् । सणिच्छरो । सणियच्छरो । सणियमइति-श्रादेरित्यस्यानुवृत्तिः । एक देशविकृतमनन्प्रवदिनि सणिमादेशेपि सणियमः परत्व- मक्षतम् । आदिभूतस्य चकारस्य च्छकारादेशे त्रयाणामित्यनुस्वारस्य लोपे सणिच्छरो। सणिमादेशामावे सणिय- च्छरो॥ अदसेलेसे । ३।४ । १७॥ असिशब्दस्याकारान्तादेशो वा लेसाशब्दे परे । असलेसा, असिलेसा । अदिति-अन्त्यस्य, षष्ठ्या, इत्यनेनासे:, पष्ठ्यन्तत्वादन्तादेशः, असिशब्दघटकेकारस्याकारादेशे अस- लेसा। अकारादेशाभावे असिलेसा अश्लेपानक्षत्रविशेषः । सो द्विः।३।४।१८॥ असेः सकारस्य द्वित्वं वा स्यालेसाशब्दे परे अस्सलेसा, अस्सिलेसा । असेरिति-बसेर्लेस इति पदद्वयं पूर्वसूत्रानुकृष्यते । स इति षड्यन्तं सकारस्येत्यर्थ असिशब्द- J 1 . " - - २२ जैनसिद्धान्तकौमुदी सम्बन्धिसकारस्यनतु लेसाशब्दसम्बन्धिसकारस्य। तथाचानेन सकारस्य द्वित्वे पूर्वसूत्रेणेकारस्याकारादेशे अस्स- लेसी हित्वाभावेऽकारादेशाभावे न अस्सिलेसा । इलोरस्सिलेसयोः।३।४।६६ ॥ अस्सिलेसाशब्दपटकयोरिकारलकारयोर्वा लोपः । अस्लेसा ॥ 'इस्लारिति-वा लोप · इति पदद्वयमनुवर्तते । अस्सिले साशब्दसंबन्धोकारलकारयोोपे अस्ससा । सकारदयघटितरूपत्यैव सूत्र उगदानादे कस कारवटितम्ये जोन तोर । इलोोगमावरूपवतुष्टयं तूरहरितमेव।। मिलेच्छस्थ खुः।२।३।६३ । । मिलेच्छशब्दस्योपधाया खुरदेशो वा स्यात् । मिलेखू । मिलेच्छुस्येति-उपधाया वेत्येतस्नुवर्तते । उधाभूास्य छ कारस्य खु इत्यादेशेऽवशिष्टस्य चकारस्य परसवर्ण मिलेक्खू । एतोऽदुतौ । ३ । ३ । ५१ ॥ मिलेच्छशब्दसम्बन्धिन एकारस्याकारोकारौ वा स्तः मिलक्खू, मिलुक्खू पक्ष मिलिच्छो, मिलेच्छो । एताति-वामिलेच्छस्येत्यनुवर्तते मिलेच्छशब्दघटकेकारस्याकारेखादेशे परसवर्णे मिलक्खू। एकारस्यो कारे मिलुक्खू । अकारोकाराभावे संयुक्ते हस्व मिलिच्छो । हस्तत्वाभावे मिलेच्छो । मेच्छः । ३।३।५०॥ मिलेच्छस्य मेच्छादेशी वा स्यात् । भच्छो, मिच्छो । मेच्छइति वा मिलेच्छस्येत्यनुवर्तते । मेच्छादेशे सति न खुर्नवाकारोकारौ । संयुक्त हत्त्वस्तु भवत्येव । तन रूपद्वयम् मेच्छो, मिच्छो॥. मत्तिये तोष्टौ । ३।३। ५८ ।। मत्तियाशब्दस्थिततकारद्वयस्य टकारद्वयं वा स्यात् मट्टिया, मत्तिया । मत्तियइति-सोरिति षष्ठीद्विवचनं तस्य तकारयोरित्यर्थः टाविति प्रथमाद्विवचनं तस्य टकारावित्यर्थः अहेरत्तस्य ठथी । २।३ । ६५ ।। अहेरुपसर्गात्परस्यात्तस्यापधायाष्ठकारथकारी पर्यायेण वा स्याताम् । अझंड, अज्झत्थं ।। अरिति-अहि + अत्तमित्यत्रोपधाभूतस्य द्वितीय तकारस्य ठकारादेशे पूर्वतकारस्य परसवर्णेन टकार- अहि+ अहमितिजाते तरहेभ्यश्चजमा इत्यनेन हकारोत्तरवर्ती कारस्य भकारे हकारस्य परसवर्णेन जकारे अज्मटुं । एवं यकारे अज्मथमिति ।। . ।" . -- . S ध्यअनधिकारप्रकरणम् २३ २ पिच्चे च्चस्य तियः।३।३१५७ ॥ णिचशब्दघटकस्य चस्य तियादेशो चा स्यात् । लिइयं, णितियं, णिच्छ । विचइति-श्रादेशस्यानेकवर्णवादकारसहितचकारद्वयम्य स्थाने तियादेशः । कारस्य यकारे यलोष. गिह । काराभावे णितियं । तियादेशाभावे हि ।। गिहस्य गहधरहराः।३।३॥ ५५ ॥ एते आदेशाः पर्याय वा स्युः । गह, घरं, हरं गिहं ।। गिहस्थति-अनेकवर्णत्वात्सर्वादेशाः वेत्यनुवर्तते ॥ पर्यायेणेति-कचिद्गहादेशः कचिघरादेशः कविध्धरादेश इत्यर्थः पज्जाये ज्जायस्य रियागः।३।३।५६॥ पजायशब्दघटकल्प जायस्य रियागादेशो वा स्यात् परियागो, पजायो। पजायइति-अनेकवर्णत्वात्समप्रस्य जायभागस्य रियागादेशे परियागो । यकारस्य लोपे परिमागोपि भादेशमाने पायो।। परिवाट्या डः।२।३।६६॥ परिवार्टीशब्दस्योपधाया डकारादेशो वा स्यात् । परिवाडी, परिवाटी। परिवाट्याइति-उपधाया वा इत्येतत्पदद्वयमनुवर्तते उपधाभूतस्य टकारस्य डकारे परिवाडी । सकारा- भावे परिवाटी । बाहुलकाद्वकारस्य न यकारः । उ इत्यत्राकार उवारणार्थः ।। तत्थस्य तहः। ३.३। ५३ ॥ तत्थस्य तहादेशो वा स्यात् । तह, वत्थं । तत्यस्येति-भनेकवर्णत्वात्सर्वादेशः । वेत्यनुवर्तते तत्यं सत्यम् ॥ धणोहक्कखको । ४।२।४॥ घणुशब्दस्य हक्ख इत्येतावागमौ वा स्तः । धणुहं, धणुक्वं, धणुं । धणोरिति-हक्खकोः कित्त्वादन्त्यावयवत्वं अवयवावयविभावस्य षष्ठ्यर्थस्य निश्चयात्सयापहगागने धणुएं क्लिागागमे अणुक्खं । तदभावे धणुं । परिहे पः फः । ३।४।१४ ॥ परिहाशब्दघटकपकारस्य फकारो वा स्यात् । फरिहा, परिहा । परिहइति-परिहइति सप्तम्यन्तम् । सप्तम्यर्थः पटकत्वम् ।पइति षष्ठ्यन्तम् । पकारस्पेत्य इत्या कारभावार्थः। ।

२४ जैनसिद्धान्तकौमुदी महरहस्य मरहट्ठः । ३।३।५२ ॥ अस्य मरहट्ठादेशो वा स्यात् । मरहट्ठ, महरई । महरहस्येति-अनेकवर्णत्वात् सर्वादेशः । महाराष्ट्रमित्यर्थः पउमस्य पांम्मः।३।३। ५६ ॥ पउमशब्दस्य पोम्मादेशा वा स्यात् । पोम्मं, पउमं । पउमस्येति-अनेकवर्णत्वात्सर्वादेशः। पोम्ममित्यत्र बाहुल्याद् ह्रस्वोन।पउममित्यत्र प्रका वानसन्धिः। यजोर्जः। ३।३ । ७३ ॥ यजुशब्दस्यादेजकारो वा स्यात् । जजुव्वेदो, यजुव्वेदो । यजेरिति-खेत्तस्यादेरिति सूत्रादादेरित्यनुवर्तते । श्रादिभूतस्य यकारस्य जकारेजजुन्वेदो । जकाराभावे यजुवेदो। उसिणपसिणयोः सिणस्य रहः।३।३।६०॥ श्रनयोः सिणस्य एहादेशो वा स्यात् । उएह, उसिणं । पण्हं, पसिणो। उसिणेति-अनेकवर्णत्वात्मिणस्यसर्वस्यादेशः । उसिणमित्यत्र सिणस्य बहादेशे उण्ह । पक्षे उसिणं । उष्णमित्यर्थः एवं परहो, पसिणो । प्रश्न इत्यर्थः । ने कसो घः। २।४।७४ ॥ नेः परस्य कस्धातोरादेषकारो वा स्यात् । निघसो, निकसो । नेरिति-न्युपसर्गादित्यर्थः । कस् आकर्षणे । आदिभूतस्य किकारस्य छकारे निघसी । पकाराभावे निकसो । आदेरित्यस्य खेत्तस्यादेरित्यतोनुवृत्तिः ।। गिम्हस्य धिंसुः।३।३ । ५४ ॥ अस्य पिंसु इत्यादेशो वा स्यात् । प्रिंस, गिम्हो । गिम्हस्येति-अनेकवर्णत्वादनेकवर्णसिदित्यनेन सर्वादेशः । संदिशे घिसू । आदेशाभावे गिनी ।। : ।। इति व्यसनविकारप्रकरणम् ॥

अथ विभक्तिप्रकरणम् तब पुल्लिगशब्दाः अविभक्ति नाम।१।१।२४ ॥ विभक्तिरहितं शन्दस्वरूपं नामसंज्ञं स्यात् । अविभक्तीति-विभक्तिच सुपत्यादिरित्युक्तप्राक् ।नास्ति, विभक्तिय॑स्य तदविभक्ति-विभक्तिरहितमित्यर्थः विशेषणस्य, नपुंसकत्वासदनुरोधेन विशेष्यं शब्दस्वरूपमध्याहियते । नचैव धातोरपि नामत्वं स्यादिति वाच्यम् । सत्यपि नामत्वे तस्मान नामविभकयो भवन्ति किन्तु निरवकाशत्वात्यादय एव प्रत्यया भवन्ति । विभकिसहित- स्यापि नामसंज्ञायां विभक्तचन्तादपि पुनर्विभक्तिप्रत्ययः स्यादित्यत आहाविभक्तीति शब्दस्वरूपं चार्थवदेव नस्वर्थ- शून्यमर्यवद्रग्रहणपरिभाषया तेन घडो पडो इत्यादौ प्रत्येकवर्णस्य धकारादेर्न नामसंज्ञा किन्तु घड इति समुदाय- स्यैव । नामसंज्ञायाः फलन्तु सत्यां नामसंज्ञायां तस्मात् सुविभक्तिः । उदन्मदिणेहएदणातोदिहिंतोस्साणमीसवः सुप् । १ । १।२५ ॥ उत् भत्, म इत्, इण इहि, अएत् अण, अतोत् इहितो, स्स अण; मि इसु, एते सुप् संज्ञाः स्युः । तत्र उत्; अत् इति प्रथमा । म, इत् इति द्वितीया । इण, इहि इति तृतीया । अएद, अण इति चतुर्थी । अश्रोत्, इहितो इति पंचमी । स्स, अण इति षष्ठी । मि, इसु इति सप्तमी। उदिति-उब अब मश्व इस इणश्व इहिश्च भएच अणश्व अतोच इहिंतोश्च स्सश्च प्रणश्च मिश्च इसुश्चेति- द्वन्दः । उदादावन्त्यत्कारोऽसन्देहार्थः । द्वितीयैकवचने मकारेऽकार उच्चारणार्थः । संस्कृतवद्विवचनमत्र नास्ति । एकातिरिक्तस्यैव बहुत्वेन बहुवचने तदन्तर्भावाद्विवचनस्यानर्थक्यात् । विभक्तयस्तु संस्कृतवत्सप्तैव । तथाच सप्तकवचनप्रत्ययाः सप्त बहुवचनप्रत्ययास्तेषां सुविति संज्ञा विधीयतेऽनेनेति ॥ सुपश्च । १।१।३३॥ सुपः प्रथमादिक्रमेण द्वौ द्वावेकवचनबहुवचनसंज्ञौ स्तः । कमेणेति-प्रयमादिषु सप्तविभक्तिषु पूर्वोचरितमेकवचनसंज्ञं स्यात् पश्चादुश्चरित बहुवचनसंज्ञस्यात् यथा भत्, अत्रोतः प्रथमोवरितत्वादेकवचनसंज्ञा । अतः पश्चादुचरितत्वादहुवचनसंज्ञा । एवं सप्तस्वपि ।। . times २६ जैनसिद्धान्तकौमुदी ... एकवचनम् । १।२।६।। " नाम्न एकवचनं स्यात् । - एकवचनमिति-- अत्रैकत्वविवक्षाया अपेक्षा नास्ति सामान्यतो नानो विधानात् । अतएवाव्ययेभ्यां भावतिछन्तेभ्यश्चैकवचनं भवति ।। बहुत्वे बहुवचनम् । १।२ । १०॥ बहुत्वविवक्षायां बहुवचनं स्यात् । बहुत्वइति-एकत्वातिरिक्तमत्रः बहुत्वं विवक्षितं तेन द्वित्वस्याप्येकातिरित्तत्वेन बहुत्वाक्षतिः । प्रत्ययः परः।१।२॥१॥ अधिकारोयमाद्वितीयाध्यायद्वितीयपादसमाप्तः । अंधिकार इति-अधिकारत्वं च स्वदेश वाक्यार्थबोधांजनकत्वे सति विधिशास्त्रेण सह वाक्यार्थ- बोधजनकत्वमित्युक्तमेव प्राक् सूत्रमिदं द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयपादसमाप्तिपर्यन्तमनुगच्छति । ir; ::::: नान्नः सुंए । १।२।८॥ नामसंज्ञकाच्छब्दस्वरूपात्सुष्प्रत्ययाः स्युः । अकारान्तः पुल्लिंगो जिणशब्दः । .... नान्न इति-पञ्चम्यन्तमिदमधिकृतपरशब्देनान्वेति विभक्तिरहितशब्दस्वरूपस्य चामेतिसंज्ञेत्युक्तमनुप- दम् । सुबिति प्रथमान्तं विशेषणमधिकृतेन विशेष्याभूतप्रत्ययशब्देन युज्यते । प्रत्यय इत्यस्य बहुवचनत्वेन वि- परिणामः सुष्प्रत्ययानों बहुत्वात् । नामानि त्रिविधानि पुल्लिङ्गकानि स्त्रीलिङ्गकानि नपुंसकलिङ्गकानि च तत्र पुल्लिङ्गस्य प्राधान्यात्प्रथमन्तान्येवोदाहियन्ते । तत्राप्यकारान्तत्वादिनाऽनेक विधत्वेप्यकारस्य स्वरेषु प्रथमोश्चरित-. त्वेन प्रथममकारान्तनाम्न उदाहरणत्वेनोपन्यासः तदुक्तंमकारान्तः पुल्लिङ्गो जिणशब्दः। जिणो रागद्वेषजेता जिन- स्तीर्थकर इत्यर्थः । इदुतः पुंसि । ४।३।२॥:: :: : : अकारान्तपुंल्लिंगानाम्नः प्रथमैकवचनस्योकारस्येकारो वा स्यात् । जिणे; जिणो जिणा। जिणं, जिणे।।326 ... इदिति-अतो नाम्न इत्यनुवर्तते, इत् + उतः + पुसिं इति पदत्रयम् । तत्रोत इतिषड्यन्तम् । विशेषणे तदन्तस्येति परिभाषयाऽकारान्तादिति लाभः पुंस्यनन्तरं वर्तमानांदिति शेषः । तथाच' पुल्लिंगो वर्तमानाद- कारान्तनान्न इत्यर्थः । जिण+ उ इति स्थितेंऽनेनोकारस्यकारे वृद्धिरूपे परसवर्णे जिणे । इकाराभावे वृद्धिरूपे परसवर्णे जिणो । जिण+अ इति स्थितेऽदिदुतः सवर्ण इति दी जिणा। जिण + इति स्थिते मोरित्यनु- स्वारे जिणं । जिण + इ-इति स्थितेऽतः स्वर इत्योच परसवर्णे जिणें ॥ - ...

: विभक्तिप्रकरणम् . २७, इणाणेहीसीसूनां ।४।२।१४॥ एपां ममागमो वा स्यात् । जिणेणं, जिणेण । जिणेहिं, जिणेहि । इणेति-इसाश्च अणश्च इहिश्च इसिश्च इसुश्चेति द्वन्द्वः । इणादयः पञ्च सुष्प्रत्ययाः । तत्रेणेति तृतीयैकवचनम् । अणेति षष्ठीबहुवचनम् । इहीति तृतीयाबहुवचनम् । इसीति सव्वणामोत्तरषष्ठीबहुवचनम् । इसु इति सप्तमीबहुवचनम् । मम् वा इति पदद्वयं पूर्वसूत्रादनुवर्त्तते । जिण-+ इणेति तृतीयैकवचनेऽनेन- ममागमे तस्य चान्त्यस्वरात्परत्वे मकारस्यानुस्वारेऽकारेकारयोः परसवर्णे जिणेणं । ममागमाभावे जिणेण । एवं तृतीयावहुवचने जिणेहिं जिणेहि इतिरुपद्वयम् ॥ अएत: सोनाम्नः । ४।३.३० ॥ . नाम्नः परस्य चतुर्येकवचनस्य स्सादेशो वाऽखियाम् । जिणस्स, जिणाए । जिणाणं, जिणाण । . :: . एतं इति-'या स्त्रियामिति पूर्वसूत्रादनुवर्तते । अएत इति षष्ठ्यन्तम् । नाम्न इति पञ्चम्यन्तम् । अए. दिति चतुर्येकवचनप्रत्ययस्तत्र तकार उच्चारणार्थः । जिण + अए इत्यत्रानेन स्सादेशे जिणस्स । स्सादेशाभावे जिणाए । जिण+ अणेत्यत्र ममागमे सवर्णदीपेऽनुस्वारे जिणाणं । ममागमाभावे जिणाण ॥ अतोऽएदतोतोरवाही कचित् । ४।३। ३१ ॥ अकारान्तानाम्नः परयोश्चतुर्थीपञ्चम्येकवचनयोः क्रमेणायाही आदेशौ स्तः क्वचिदस्त्रि- याम् । जिणाय । जिणाहि । अत इति-विशेषणं तदन्तस्येति परिभापयाऽत इत्यस्याकारान्तादिति लाभः । वा त्रियां नान इत्य- स्यानुवृत्तिः । समानां स्थान्यादेशादीनां यथासंख्यं स्यादिति न्यायादएतः अयादेशः अतोतः अह्यादेशः स्यादि- त्यर्थः । एतावादेशौ न सर्वत्र भवतः किन्तु कचिदेव शास्त्रे तथाप्रयोगदर्शनादुक्तं कचिदिति । अनेकवर्णत्वात् सर्वादेशः । जिण + अए इति स्थितेऽनेनायादेशे सवर्णदोघे जिणाय । जिण+ अतोत् इति स्थितेऽतोतः ब्रह्मादेशे सवर्णदीधैं जिणाहि । अखियामित्यनुवर्तते स्त्रीभिन्ने पुंसि क्लोवे चेति तदर्थः । .... अतोतोऽतः।३।४।६१॥ अकारान्तानाम्नः परस्य पञ्चम्येकवचनस्यातोतोऽन्त्यस्य लोपो वा स्यात् । जिणा, जिणायो । जिणेहिंतो । जिणस्स | जिणाणं, जिणाण । अतोत इति-अन्त्यस्य षष्ठ्या इति परिभाषयाऽन्त्यस्येति लाभः । अत इत्यस्य विशेषणत्वाद्विशेषणं तदन्तस्येत्यनयाकारान्तादिति लाभः । लोपो वेति पदद्वयमनुष्यते। जिण+ अतोदितिस्थितेऽनेनान्त्यस्यौकार- स्य लोपे तकारस्य यकारे तस्य लोपे सवर्णदीप॑ च जिणा । लोपाभावे च जिणाओ। कचिज्जिणाहि इत्युक्त. 7- ... अनसिद्धान्तकौमुदी बानुपदम् । पयामीबहुवचने जिण+ इहिंतो इत्यत्र परसवर्णे जिणेहितो । षष्ठ्या एकवचने किचिद्विकारा- भावादेकमेव रूपम् । बहुवचने तु ममागमविकल्पेन जिणांणं जिणाणेति रूपदयम् ।। सिः।४।३।३२॥ नाम्नः परस्य सप्तम्येकवचनस्य मेः स्यादेशो वा स्यादस्त्रियाम् । सिरिति-नानः मेः अखियां वेति पदचतुष्टयं पूर्वसूत्रादनुवर्तते । अनेकवर्णलात संपूर्णस्य मेः स्थाने सिरित्यादेशः । अखियामित्यस्य पुसि क्लीवे चेत्यर्थः । मौ व्यञ्जनादौ नाम्नः । ४।२।१८॥ व्यञ्जनादौ सप्तम्येकवचने परे नाम्नो ममागमः स्यात् । जिणंसि, जिणंमि । माविति-ममिति पूर्वसूत्रादनुवर्तते । माविति सप्तम्यन्तम् । व्यजनादाविति तद्विशेषणम् । व्यसनमा- दियस्येति बहुव्रीहिः । यदा मेरिसादेशस्तदा व्यञ्जनादित्वं नास्तीति तनिवृत्त्यर्थ व्यञ्जनादाविति स्त्रीलिंगोऽपि मे- व्यंजनादित्वाभावात्तनिवृत्तिः। स्वराणामन्त्यादिति परिभाषया नानोऽन्त्यस्वरात्परो ममागमः । ममि मकारो मित्कार्यार्थः । अकार उच्चारणार्थः । अवशिष्टस्य मकारस्यनोरित्यनेनानुस्वारः । जिण+मि इत्यत्र मेः स्यादेशे ममागमे जिसि । स्यादेशाभावेऽप्यनेन ममागमे जिणंमि स्यादेशे मिपरत्वं नास्तीति न शक्यं यदादेशस्तद- अवतीति न्यायास्यादेशोपि मिवद्भवतीति न ममागमे बाधः । मेरिरतो नाम्नो वा । ४।३।१॥ अकारान्तानाम्नः परस्य सप्तम्येकवचनस्य मेरिसादेशो वा स्यात् । जिणे । जिणेसुं, जिणेसु । मेरिति-सित्त्वात्सर्वादेश: जिण+मि इति स्थितेऽनेन मेरिसादेशे परसवर्णे जिणे इति सिद्धम् । जिण+इसु इति स्थिते इणाणेहीत्यगेन ममागमेऽनुस्वारे परसवर्णे च जिणेसुं । ममभावे जिणेसु । अत्पुंसि वातः।४।३।। अकारान्तानाम्नः परस्यामन्त्रणार्थकप्रथमैकवचनस्योतोऽद्वा स्यात्पुंसि । भो जिणा, भो जिणे । भो जिणो । भो जिणा । एवं गोयमप्रभृतयः । दिति-नाम्नः आमन्त्रणे उतः इति पदत्रयमनुवर्तते आमन्त्रण इति सप्तम्यन्तपदस्यानुवृत्तेनोत इत्यनेन सहान्वयः। सप्तम्यर्थो - वाचकत्वं । आमन्त्रणं चेह स्वाभिमुखीकरणं । सम्बोधनमिति यावत् । नपुंसकलिंगानिवृत्त्यर्थ पुंसीति । जिण + इति स्थितेऽनेनोकारस्याकारे सवर्ण दीर्धे जिणा । नदभावे इकारा- देशे परसवर्णे जिणे । आदेशाभावे परसवणे भो जियो । जिण+ अदिति बहुवचने सवर्णदीर्घे भो जिणा । . । 4 विभक्तिप्रकरणम् अट्ठादएतोः।४।३।६५॥ अट्ठशब्दात्परस्याएत्प्रत्पयस्यासादेशी वा स्यात् । अट्ठा, अट्ठस्स, अट्ठाए । शषे जिणवत् अट्ठादिति-वेत्यनुवर्तते । सित्त्वात्सर्वादेशः । अट्ट + अएदिति चतुयंकवचनेऽनेनासादेशे-सवर्णदी अट्ठा । पक्षे त्सादेशे अट्ठस्स । तदभावे सवर्णदीर्घ अट्टाए । न्तस्य सोन्मस्य मः।४ । ३।४८॥ प्रथमाद्वितीयैकवचनसहितस्य न्तमन्तसम्बन्धिन्तस्य वा म आदेशः स्यात् । भगवं, भग- बन्ते, भगवन्तो । भगवं, भगवन्तं । मतिमं, मतिमन्ते, मतिमन्तो । मतिम, मतिमन्तं । एवं कारयं कारयन्ते कारयन्तो इत्यादि। न्तस्येति-न्तमन्तयोरिति पूर्वसूत्रादनुवर्तते । उच्च मश्च उन्मौ ताभ्यां संहितः सोन्म: तस्य । उदिति प्रथमैकवचनप्रत्ययः । म इति द्वितीयैकवचनप्रत्ययः । आदेशे सकारस्येत्त्वाद्विभक्तिप्रत्ययमस्तिस्य न्तस्य स्थाने मादेशः । प्रकार उचारणार्थःमकारः शिष्यते तस्य नोरित्यनेनानुस्वारः । अन्तादिशब्देषुन्तस्यादेशो माभूदिति न्तमन्वयोरिति न्तो वर्चमानार्थककृत्प्रत्ययः । मन्तश्च सम्बन्धार्थकतद्धितप्रत्ययो बोध्यः । भगवन्त + उदिति स्थिते 'मादेशेऽनुखारे भगवं । मादेशाभावे उत इकारादेशे परसवर्णे भगवन्ते । इकारादेशामावे पर सवर्णे भगवन्तो। एवं प्रथमैकवचने रूपत्रयम् । गकारस्य यकारे तु रूपषटकम् । द्वितीयैकवचने मसादेशे - भगवं । मसादेशाभावे भगवन्तं .एवं मतिममित्यादीनि । ननु न्तस्य मन्तसम्बन्धित्वेपि न्तसम्बन्धित्वं कथं ? खस्मिन्वसम्बन्धित्वाभावादिति चेन लौकिकन्यायात् व्यपदेशिवद्भावात्स्वस्मि: मपि स्वसम्बन्धित्वं विशिष्टोऽपदेशः-मुख्यव्यवहारो व्यपदेशः सोऽस्यास्तीति व्यपदेशी यथा: मन्तः पटको न्तशब्दः तत्र सम्बन्धित्वस्य मुख्यव्यवहारात् । तेन तुल्यं तद्वत् तद्भावात् । यथा मन्तशब्दे..मुख्य- सम्बन्धित्वव्यवहारस्तथा केवलन्तशब्देपि व्यवहारो भवतीत्यदोषः । न्तमन्तयोन्तात् । ४।३।४६ ॥ न्तमन्तसम्बन्धितात्परयोः प्रथमाद्वितीयावहुवचनयोरुकारादेशो वा स्यात् । भगवन्तो, भगवन्ता । भगवन्तो, भगवन्ते । मतिमन्तो, मतिमन्ता । मतिमन्तो, मतिमन्ते । न्तमन्तयोरिति-अदितोरुर्वेति पदद्वयमनुवर्तते । अदितिप्रथमाबहुवचनप्रत्ययः । इदिति द्वितीया- बहुवचनप्रत्ययः । श्रञ्च इञ्चादितौ तयोः। तकार उच्चारणार्थः । भगवन्त +अ इति स्थितेऽनेनाकारस्योकार परसवर्ण भगवन्तो । इकाराभावे सवर्णदीर्घे भगवन्ता । द्वितीयावहुवचने भगवन्त + इ इति स्थिते इकारस्यो- कारादेशे परसवणे भगवन्तो । उकारादेशाभावे परसवर्णे भगवन्ते ! एवं मतिमन्तो इत्यादीनि ।

. :: जैनसिद्धान्तकौमुदी इणस्सयोरसुसौ । ४।३।४७॥ .:.::इन्तमन्तसम्वन्धिन्तात्परयोः तृतीयाषष्ठ्येकवचनयो क्रमेणासुसादेशौ स्तः । - इणेति न्तमन्तयोन्तादित्यनुवर्तते । इणश्च स्सश्चेति द्वन्द्वः । यथासंख्यमिणस्यास् स्सस्य चोसादेशः न्तस्यासुसोः।४।१।१०॥..: अस्यादेर्लोपः स्यादसुसोः परयोः । भगवता, भगवया । भगवतो, भगवो । मतिमता, :: :! ki .. मतिमतो। न्तस्येति-आदेर्लोप इतिपदद्वयमनुवर्तते । प्रत्ययाप्रत्वययोरितिपरिभाषया न्तमन्तप्रत्ययस्यैवप्रहणम्, तेनान्तादिशब्दघटको न्तो न गृह्यते । न्तस्यादिर्नकारस्तस्य लोप इत्यर्थः । भगवन्त + इणेति स्थितेऽ- सादेशेऽनेन नकारलोपे सवर्णदीर्घ भगवता । तकारस्य यकारे भगवया । भगवन्त + स्स इत्यत्रोसादेशे न. लोपे परसवणे भगवतो । तकारस्य यकारे लोपे च भगवओं एवं मंतिमतेत्यादि । :... इह्यएदनोदिहितोऽणेषु न्तस्य । ४।१।२५ ॥ :: : एषु परेषु,न्तस्यादेलोपो वा स्यात् । भगवएहि, भगवतेहिं । भगवयाए, भगवंताए । भग- वया, भगवयाओ, भगवंता, भगवंताओ। भगवएहितो, भगवंतेहितो । भगवयाणं भगवंताणं । . शेषं जिणवत् । इद्दीति आदेर्लोपो वेत्यनुवर्तते । इहिश्च अंएच्च अओच्च इहिंतोश्चाणश्चेतीतरेतरयोगद्वन्द्वः ।। भाग- पन्त इंहिमित्यत्र "न्तस्यादे कारस्य लोपे तकारस्य यकारे लोपे : भगवाई। पंक्षे भगवन्तेहि। चतुर्येकवचनें, भगवयाए भगवन्ताए । पञ्चम्यां भगवया, भगवय़ाओ, भगवन्ता, भगवन्ताओ । षष्ठीबहु- वचने भगवयाणे, भगवन्ताणमित्यादि । शेष-सप्तम्येकवचनादिकं जिणशब्दवत् .. .. : सादिदणस्य भवंतस्य भे वा। ४ । ३।२३ ।। प्रथमाद्वितीयाषष्ठीबहुवचनसंहितस्यं भवंतस्य भे वा स्यात् । भे । भवंतो, भवंता । भवंते, भवंताणं : 'सादिदणस्येति-अञ्च इच अणश्चेति द्वन्द्वः । तैः सहितः सादिदणस्तस्य । अदिति इदिति अणेति च कमेण प्रथमाद्वितीयाषष्ठीबहुवचनानि । स्थलत्रयेप्यनेन में इत्यादेशेभे । पक्षे भवन्तो भवन्ते इत्यादीनि रूपाणि : सोतोरस्य तारस्य । ३।४।६७ ।।। .....:.:. 'तारप्रत्ययसम्बन्धिनों रस्य प्रथमैकवचनसहितस्य वा लोपः स्यात् । कत्ता; कत्तारे, कत्तारो। पसत्था, पसत्थारें, पसत्यारों। . . . . . , • • . " ...

विभक्तिप्रकरणम् : . “सोतइति-उतासहितस्येति समासः वां लोप इति पदद्वयमनुवर्तते ।' कर्तरि ताराकणाविति सूत्रण जॉयमानस्य कर्थकतारप्रत्ययस्यात्र ग्रहणं प्रत्ययाऽप्रत्यययोमध्ये प्रत्ययस्य ग्रहणमिति परिभाषया । तेन समवंतार इत्यादिस्थले. नातिप्रसङ्गः । एकदेशविकृतमनन्यवदिति परिभाषाश्रयणेन पसत्यारशब्दे थारस्यापि तारत्वमा तम् । कत्तार + उदित्यत्र प्रत्ययसहितस्य रस्य लोपे कत्ता । लोपाभावपक्षे कत्तारे, कत्तारो । पसत्था इति- प्रपूर्वकसस्धातोस्तारंप्रत्यये तकारस्य थकारे सकारस्य परसवर्णे पसत्यार इति सिद्धम् । पंसत्यार + उदि- त्यत्र सोतोरस्य लोपें पसत्था । पक्षे पसत्थारे, पसत्यारो इति ॥ उस्ताराद्वा।४।३।४५ ॥ तारप्रत्ययान्तात्परयोः प्रथमाद्वितीयाबहुवचनयोरुकारादेशो वा स्यात् । कत्तारो, कचारा । कत्तारं । कत्तारो, कत्तारे । एवं पसत्थारो, भत्तारो इत्यादि । उरिति-अदितोरुर्वेति पदनयं पूर्वसूत्रानुवर्तते । कत्तार+अदित्यत्र प्रथमावहुवचनस्योकायदेशे वृद्धौच कत्तारो । आदेशाभावे परसवर्णे कत्तारा । कत्तारमिति-द्वितीयैकवचनान्तमिदम् । कंचार + इदित्यना- नेनोकारादेशे कत्तारो । पक्षे वृद्धौ कत्तारे । एवमिति-पसत्यारो, पसत्यारा । पसत्यारं । पसत्थारो, पसत्यारे। भत्तारो, भत्तारा । भत्तारं । भत्तारो, भत्तारे इत्यादीनि रूपाणि कत्तारवद्वोध्यानि ॥ उस्तारस्यारस्य तृतीयादौ वा ॥ ४।३।१६।। तारप्रत्ययसम्बन्धिन आरस्योसादेशो वा स्यात्तृतीयादिषु परेषु । उस्तारस्येति-वेत्यनुवर्तते । सित्त्वात्सर्वादेशः । अस्त्रियामिणस्य पाः । ४ । ३ । ५२॥ इदुद्भया परस्येणप्रत्ययस्य पादेशः स्यादस्त्रियाम् । कत्तुणा | प्रसत्थुणा । भत्तुणा । पक्षे कत्तारेणं । पसत्थारेणं । भत्तारेणं । इणस्येति- इदुयामित्यनुवर्तते । कत्तार + इणेत्यत्रारभागस्योकारे 'जातेऽनेनेणप्रत्ययस्य णादेशे कसुणा । उकाराभावे कत्तारेण । ममागमे कत्तारेणं । एवं पसत्थुणा । पसत्यारेण, -पसत्यारेणं । भतुणा । भतारेण,भत्तारेणं । उसादेशपक्षे शेष साहुवत् । उसादेशाभावे जिणवदिति । आमन्त्रणेतु विशेषस्वमेव दर्शयति उतोऽत्तारादारस्यामन्त्रणे ॥३।४ । ४२ ॥ तारप्रत्ययान्तानाम्न: परस्यामन्त्रणोतोऽकारादेशः स्यादारस्य लोपथ । हे कत्तहि भत्त ! .' हे पसंत्थ ! पक्षे जिणवत् । उतइति-प्रत्ययमहणे यस्मात्स विहितस्तदादेस्तदन्तस्य ग्रहणमिति परिभाषया प्रत्ययान्तादिति: नाभः। ... प 1 ~ i .

. - .. . 1 s जैनसिद्धान्तकौमुदी लोप. इत्यस्यानुवृत्तिः । कत्तार + उ इति- स्थितेऽनेनोकारस्याकारादेशे आरभागस्य च लोपे कत्त इति । एवं भत्त. इत्यादि । अन्त्यस्य षष्ठ्या इत्यनेनान्त्यस्य लोपो न. भवति आरस्येति विशेषोपादानादुक्तपरिभाषया अत्राप्रवृत्तेः । किन्तु सर्वस्यैव । योरायादिभ्यः । ४।३। १५ ॥ .... एभ्यः परस्य प्रथमाया एकवचनस्याकारादेशः स्यात् । राया । अप्पा । अत्ता। श्र इति-ओ इति प्रथमान्तम् । उत. इत्यनुवर्तते । आदिशब्देनाप्पादयोः गृह्यन्ते । राय.+ उदित्य- मानेनाकारादेशे सवर्णदी राया । एव मप्पादयः रायादिभ्यो डम् । ४ । ३ । १३ ॥ एभ्यः परस्यामन्त्रणैकवचनस्य डमादेशः स्यात् । रायादिभ्य इति-उत आमन्त्रण इति चानुवर्तते । वर्तमानस्येति शेषः आमन्त्रणे वर्तमानस्य प्रथमैक- वचनस्येत्यर्थः । हे राय + उदित्यत्रानेनोतो डमादेशो भवति । डिति टेः।४।१।२६ ॥ डिति परे टेलोपः स्यात् । हे रायं ।.. डितीति-लोप इत्यनुवर्तते । टिसंज्ञा समाख्याता पूर्वम् । डमादेशे सति तस्मिन्नतो लोपे हे रायं । अत- एव न दीर्घः। ::- अणो रायादिभ्यः । ४।३।३७.॥ रायादिभ्यः परयोः प्रथमाद्वितीययोबहुवचनयोरणो इत्यादेशः स्यात् । रायाणो । अदितोरिति-अदितोरित्यस्यानुवृत्तिः । अञ्च इच्च अदिती तयोः। अणोरिति प्रथमैकवचनान्तम । राय + अदित्यत्राननाणवादेशे सवर्णदीर्घ रायाणो। द्वितीयाबहुवचनेपि रायाणो। मोऽणड्रायादिभ्यो वा । ४।३।१५॥ :...: "रायादिभ्यः परस्य मप्रत्ययस्याणडागमो वा स्यात् । रायाणं, रायं । म इति म इति षष्ठ्यन्तम् । अणडिति प्रथमान्तम् । राय + म् इत्यत्रटिक्वान्मकारस्यादावणागमे संवर्णदीधैं मोनुस्वारे रायाणं । आगमाभावें रायं। सेणस्य । ४।३।१६ ॥ :: : तृतीयकवचनसहितस्य रायशब्दस्य रनेत्यादेशः स्यात् । रना। रायस्येति-अनेकवर्णत्वात्सर्वादेशः । कचिदेकदेशन्यायेन' सेणस्येति विशेषणबलाब रायशब्दमात्रा- नुवृत्तेविशेषणानुरूपविभक्तिविपरिणामाच वृत्तौ रायशब्दस्यत्युक्तम् : . ...

विभातिप्रकरणम् इह्यणयोरिः । ४ । ३ । १७ ॥ रायशब्दस्यकारोऽन्तादेशः स्वादिहणयोः परयोः । राईहि, राईहिं । इहीति-रायस्येत्यनुवर्तते । अन्त्यस्य षष्ठ्या इत्यनेनान्त्यादेशः। राय + इहि-अत्र यकारोत्तराकारस्ये- कारादेशे यलोपे सवर्णदीर्घे राईहि । ममागमे राईहिं । सस्सस्य रनोः।४।३।१८॥ षष्ठ्येकवचनसहितस्य रायशब्दस्य रन्नो इत्यादेशः स्यात् । रनो । राईण, राईणं । शेष जिणवत् । सस्सस्येति-रायस्येत्यस्यानुवृत्तिः । स्सेन सहितः सस्सस्तस्य । रनोरिति प्रथमैकवचनान्तम् । राय+ स्सेत्यत्रानेनादेशे रनो। राय + प्रणेत्यत्राकारस्येकारादेशे यलोपे सवर्णदीर्घे राईण । ममागमे राईणं । पंचमी- सप्तम्यादिषु जिणवद्रूपाणि बोध्यानि ।। अत्ताप्पाभ्याम् । ४।३। ५३ ॥ आभ्यां परस्येणप्रत्ययस्य णा इत्यादेशः स्यात् । अत्तणा । अप्पणा । अत्तति-इणस्य णेत्यस्यानुवृत्तिः । अनेकवर्णत्वात्सर्वादेशः । अत्ताप्पशब्दावात्मवाचकौ । तद्रूपाणि- प्रथमाद्वितीययो रायवद्भवन्ति तृतीयैकवचनेऽनेन णादेशे भत्तणा, अप्पणा । स्सस्य णोः।४।३।५४ ॥ आभ्यां परस्य स्सप्रत्ययस्य णो इत्यादेशः स्यात् । अत्तणो । अप्पणो । शेषं जिणवत् । सस्सस्येति-अत्ताप्पाभ्यामिति पूर्वसूत्रादनुवर्त्तते । अनेकवर्णत्वात्सर्वादेशः । चतुर्थीषष्ठ्येकवचनेऽनेन णो इत्यादेशे अंतणो । अप्पणो । अन्यानि रूपाणि जिणशब्दवज्ञयानि । इणातोत्स्सेषु जसादीनां सक् । ४।३। ६६ ॥ एपु परेषु जसादीनां सगागमो वा स्यात् । इणेति-चेत्यनुवर्तते । जस, मण, वय, काय, तेय, चक्खु, जोग, एते जसादयः । कित्वादन्त्यावयवः तेन जसादीनां सान्तत्वं निष्पद्यते । सान्तादिणस्याः। ४।३॥ ५५ ॥ सकारान्तानाम्नः परस्येणप्रत्ययस्यासादेशः स्यात् । जससा । मणसा । वयसा । कायसा। तेयसा । चक्खुसा । जोगसा । सान्तादिति-सान्तादिति पञ्चम्यन्तं विशेषणम् । नाम्न इति विशेष्येण तदन्वयः । श्रासादेशे सकार इत्संज्ञकस्तेन सिरवात्सर्वादेशः । जसादीनां सगागमेन सान्तत्वे निष्पन्नेऽनेनेणस्यासादेशे जससा, मणसा, . । ३४ जैनसिद्धान्तकौमुदी वयसा इत्यादि । सगागमाभावे तु जसेण, मणेण, वएण, कारण इत्यादि । अतोत्स्सयोरो।।४।३। ५६ ॥ सकारान्तानाम्नः परोरतोत्स्सयोरोसादेशः स्यात् । जससो । मणसो । वयसो । कायसो । तेयसो । चक्खुसो । जोगसो । असोदिति-सान्तादित्यस्यानुवृत्तिः । अतोच्च स्साश्च अतोत्स्तो तयोः। सित्त्वात्सर्वादेशः । जसादीनां सगागमे सति सान्तोऽस्य सूत्रस्य प्रवृत्तिः । पञ्चमीषष्ठ्येकवचनयोरोत्वेजससो, भणसो इत्यादि । सगागमा- भावे जसस्स । मणस्स । वयस्स इत्यादि । मण + मि इत्यत्र मेरादेरित्यनेन मकारस्य सकारे मौ व्यञ्जनादा- विति ममागमे मणंसि । ममागमस्य वाहुल्येन कचित्तदभावे मणसि । सकाराभावे ममागमे मणमि ।। कधस्त्रयोहा! ४।३। ६७॥ ' एतयोरुकारादेशो वा स्यादिणप्रत्यये परे । कम्मुखा । धम्मुणा । शेषं जिणवत् । कम्मधस्मयोरिति इणे वेति पदद्वयानुवृत्तिः । अन्त्यस्य पाठ्येति परिभापयाऽन्त्यादेशः । एतयो:-कम्मधम्मशब्दयोः । उकारादेशे सतीणस्य रणेत्यनेन णादेशे कम्मुणा | धम्मुणा । पक्षे कम्मेण । धम्मेण तृतीयैकवचन विनाऽन्यन्नं जिणंशब्दवद्रूपाणि ज्ञेयानि । इकारान्तः पुल्लिंगो मुणिशब्दः। आदिदु या स्वरे सुपि पूर्वस्य । ३ । २ । ३२॥ आकारादिकारादुकाराञ्च स्वरादौ सुपि परे पूर्वपरयोः पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेशः स्यात् । मुणी आदिदुध इति--पूर्वपरयोः सवर्णः दीर्घ इत्येतत्पदन्नयमनुवर्तते । सवर्णे खरेऽदित इति सूत्रेण दी सिद्धेप्यसवर्णखरादौ सुपि दीर्घविधानार्थमिदं सूत्रम् । तथा च सवणे सुप्यप्यनेनैव-दीर्घो विशेष- विहितत्वात्।आच इच्च उच्चा दिदुतस्तेभ्यः । स्वरे सुपीति सप्तम्यन्तं वर्णविधौ तदादाविति परिभाषयास्वरादाविति लाभः । मुणि+ उदित्यत्राने कारोकारयोः पूर्वसवर्णदीधैंकादेशे मुणी । इदुङ्ग्यां जोरदितोः। ४।३ । ४६ ॥ इदुद्भ्यां परयोः प्रथमाद्वितीयाबहुवचनयोों इत्यादेशो वा स्यात्पुंसि । मुणिणो, मुणी । मुणिं । मुणिणो, सुणी । बुणिणा । मुणीहि, मुणीहि । इदुझ्यामिति-पुंसि वेति पदद्वयस्यानुवृत्ति । मुणि+अइत्यत्रानेन णो इत्यादेशे मुणिणो । आदेशा- भावे पूर्वसवर्णदीचे मुणी । एवमपि ॥ मुणि + इणेत्यत्र इणस्य णेत्यनेन णादेशे मुणिणा। मुणि+ इहि अत्र सवर्णदीचे ममागमे च मुणीहिं । ममागमाभावे मुणीहि ।। अएदतोत्स्नानासस्त्रियाम् । ४।३॥ ५० ॥ इदुद्यां परेषामेषां णो इत्यादेशो वा स्यादस्त्रियाम् । मुणिणो, मुणिस्सा मुणीए । मुणीणं, ore उकारान्तपुल्लिंगाः २५. सुर्णाण । मुणिणो, मुीओ । मुणीहिन्तो । मुणिणो, झुणिस । मुणीणं । मुांणसिं, लुणिमि, मुणीसु॥ अएदिति- इदुद्भयाम् , णो, वेति पदत्रयस्यानुवृत्तिः । अएञ्च अतोच्च स्सश्च अएदतोत्सास्तेषामिति विग्रहः । मुणि+ ए इत्यत्रानेन हो इत्यादेशे मुणिणो पक्षे अएतः स्स इति स्लादेशे मुणिस्स पने आदि- 'दुद्भय-इत्यादिना पूर्वसवर्णदोघे मुणीए इति रूपं भवति । मुणि + अण इत्यत्र 'आदिदुद्भय' इत्यादिना पूर्व- सवर्णदीचे इणाणेहीसीसूनामित्यनेन वैकल्पिके ममागमे मुणीणं; ममागमाभावे मुणोण । मुणि+ अश्रोत् अत्रानेन हो इत्यादेशे मुणिगो; पक्षे अकारस्य पूर्वसवर्ण दीर्घादेशे प्रकृतिभावे मुणीभो । मुणि +इहिंतो अत्रा- दिदुतः इति सूत्रं प्रवाध्य पूर्वसवर्णदीचे मुाहिन्तो। मुणि + स्स इत्यत्रानेन सूत्रेण णो इत्यादेशे मुणिणो; पक्षे मुणिस्स । मुणीणं पूर्ववत् । मुणि+मि इत्यत्र सिरिति स्यादेशे मौ व्यजनादौ नान इत्यनेन ममागमे । मुणिसि; स्यादेशाभावे मुर्णिमि । मुणि + इसु अत्र सवर्णदीचे मुणीसु । इद्भयामासन्त्रण उत्तः । ३।४।६८॥ इकारोकाराभ्यां परस्यामन्त्रणैकवचनस्य लोपो वा स्यात् । भो ! मुणि !! सुणी । झुणिणो, मुणी । एवं तवस्सिगिरिजलहिप्रभृतयः । इदुन्दयामिति-लोपो वेति पदद्वयमनुवर्तते। मुणि + उ इत्यत्रानेनोतोलोपे भो ! मुणि ! पक्षे पूर्वसवर्ण- दीर्धे भो ! मुणी ! । मुणि + अ इत्यत्राएदतोत्सानामस्त्रियामिति सूत्रेण णो इत्यादेशे भो ! मुणिणो, पक्षे पूर्व- सवर्णदोघे भो ! मुणी । एवं सर्वत्र चोध्यम् ।। अथ उकारान्ताः पुल्लिङ्गाः साहू। अतोऽयोडवोडौ पुंसि ॥ ४ । ३ । ५१ ॥ इकारोकाराभ्यां परस्य प्रथमावहुवचनस्य क्रमेणायोड् अवोड् इत्यादेशौ वा स्यातां पुंसि । साहवो, साहुणो, साहू । साहुं । साहुणो, साहू । साहुणा । साहूहिं, साहूहि । साहुस्स साहुणो । साहूए । साहूणं, साहूण । साहुणो, साहूओ । साहूहिन्तो । साहुस्स, साहुणो । साहूणं, साहूंण । साहुंसि, साहुंमि । साहूसु । भो साहु ! साहू ! साहबो, साहुणो, साहू । एवं सवन्नुभाणुप्रभृतयः। अतोऽवोडेति-इदुद्भयाम, वा, इति चानुवर्तते । अत इति पाठ्यन्तम् । अयोडवोडौ इति प्रथमा- द्विवचनान्तम् । पुंसीति सप्तम्यन्तम् । इकारात्परस्यायोड् उकारात्परस्याबोडियर्थः । साहु +9 इत्यत्रानेन ३६ जैनसिद्धान्तकौमुदी सूत्रेणाकारस्यावोडादेशे डिवाट्टेलॊपे साहवो, एतदभावे णो इत्यादेशे साहुणो, पक्षे पूर्वसवर्णदीर्घ साहूँ ॥ साहु+म् इत्यत्रानुस्वारे साहुं । साहु इ इत्यत्रेकारस्य णो इत्यादेशे साहुणो, पक्षे पूर्वसवर्णदीर्घे साहू ॥ साहु + इणत्यत्र 'इणस्य णा' इत्यनेन णादेशे साहुणा । साहु + इहि इत्यत्रेणाणेहीसीसूनामिति वैकल्पिके ममागमे पूर्वसवर्णदीचे साहूहिं, ममागमाभावे पूर्वसवर्णदीचे साहूहि ।। साहु + अए इत्यत्र 'अएतः स्सो नाम्नः' इत्यनेन स्सादेशे साहुस्स, तदभावे णो इत्यादेशे साहुणो। तदभावे पूर्वसवर्णदीर्घे साहूए । साहु + अण इत्यत्र पूर्वसवर्णदीर्घ इणाणेहिसीसूनामिति सूत्रेण वैकलिसके ममागने मस्यानुस्वारे साहूणं, पक्षे साहूण ॥ साहु + तो इत्यत्र अएदतोत्स्सानामस्त्रियामित्यनेन णो इत्यादेशे साहुणो, पक्षे तकारस्य यकारे लोपे पूर्व- सवर्णदीचे प्रकृतिभावे साहूओ । साहु + इहिन्तो इत्यत्र पूर्वसवर्णदीर्घे साहूहिन्तो । साहुस्स, साहुणो साहूणं, साहूण ।। अन्न पूर्ववज्ज्ञेयम् । साहु+मि इत्यत्र सिरिति सूत्रेण स्यादेशे मौ व्यजनादौ नान इत्यनेन ममागमेऽनुस्वारे साईसि, स्यादेशाभावे साहुंमि, साहु + इसु इत्यत्र पूर्वसवर्णदीचे साहूसु । साहु + उ इत्यत्रोतो लोपे भो ! साहु ! पूर्वसवर्णदीचे भो ! साहू ! शेषं पूर्ववत् ।। एवं सवन्नुभाणुप्रभृतयो बोध्याः ।। बहोरवेडतो वा पुंसि । ४ । ३ । ५७ ॥ बहुशब्दात्परस्य प्रथमाबहुवचनस्यावेडादेशो वा स्यात् बहवे, बहवो, बहुणो । बह बहोरिति-बहोरिति पञ्चम्यन्तम् । अवेडिति प्रथमान्तम् । अत इति षष्ठयन्तम् । वेत्यनुवर्तते । बहु + अ इत्यत्रानेन सूत्रेणावेडादेशे डित्वादुकारस्य लोपे बहवे, अवेडादेशाभावेऽतोऽयोडवोडौ पुंसीति सूत्रेणा- वोडादेशै उलोपे बहवो, पक्षे णो इत्यादेशे बहुणो पूर्वसवर्णदीर्घ बहू । बहुशब्दो बहुत्वसंख्याविशिष्ट- अतो वाचकः नित्यं बहुवचनान्तः ।। शेषं साहुवत् ।। पितुप्रभृतिभ्यो डाः।४।३। ४ ॥ एभ्यो विहितस्योत्प्रत्ययस्य डादेशः स्यात् । पिया, पिता । पितुप्रभृतिस्य इति--उतइत्यनुवर्तते । पितु + उत् इत्यत्रानेनोतः स्थाने डादेशे तकारस्य यकारे पिया । थकाराभावे पिता ।। अतोडरोः। ४ । ३ । ५ ॥ पितुप्रभृतिभ्यः शब्देभ्यः परस्यातो 'डरो' इत्यादेशः स्यात् । पियरो, पितरो । अत इति-पितुप्रभृतिभ्य इत्यनुवर्तते । पितु + अत इत्यत्रानेन सूत्रेणातो डरो इत्यादेशे डस्य लोपे डित्वाहिलोपे तस्य यत्वे पियरो, यत्वाभावे पितरो॥ अयश्चादेशो नित्यम्तेन पक्षे पूर्व सवर्णदीर्घ विधाय पितू इत्येवं न भवति । मो डरम् । ४ । ३ । ७॥ पितुप्रभृतिभ्यः शब्देभ्यः परस्य मस्य डरमित्यादेशः स्यात् । पियरं पितरं ।

उकारान्तपुल्लिङ्गाः में इति-पितुप्रभृतिभ्य इत्यस्यानुवृत्तिः । पितु + म इत्यत्रानेन सूत्रेण मकारस्य डरमित्यादेशे डलोपे डिवाहिलोपे तकारस्य यकारे मस्यानुस्वारे पियर, यकाराभावपक्षे पितरं । अनादेशस्य नित्यत्वात् पितुमिति न ।। ए: स्सस्य वा।४।३।६॥ पितुप्रभृतिभ्यः शब्देभ्यः परस्य स्सस्यैसादेशो वा स्यात् । पिउए, पिउस्स, पिउणो । एः स्लेति-पितुप्रभृतिभ्य इत्यनुवर्तते । अत्र स्सप्रत्ययस्य सामान्यतयोक्तत्वेन चतुर्येकवचने स्सादे- शेऽप्ययमादेशो बोध्यः । पितु + अए इत्यत्राएतः स्सो नान्न इति सूत्रेण स्सादेशेऽनेन सूत्रेणैकारादेशे तकारस्य यकारे लोपे प्रकृतिभावे च पिउए, एतदभावे पिउस्स, स्सादेशाभावेऽएदतोस्सानामस्त्रियामिति सूत्रेण 'णो' इत्यादेशे पिउणो । एवं षष्ठ्येकवचनेऽपि ॥ उत आमन्त्रणे उश्च । ४।३।८॥ पितुप्रभृतिशब्देभ्यः परस्यामन्त्रणैकवचनस्योतो डडरमावादेशौ स्यातां पर्यायेण । हे पिय ।। हे पियरम् ! । शेपं साहुवत् एवं भातु, नत्तु, जामात्वादयः । उत इति-पितुप्रभृतिभ्य इत्यनुवर्तते डरमिति च पितु +उ इति स्थितेऽनेनोकारस्य डादेशे डलोपे डिस्वाहिलोपे तकारस्य यत्वे 'स्वराद्यस्य स्वरे, इत्यत्र बहुलमित्यनुवृत्त्या यलोपाभावे हे पिय ! उकारस्य डरमा- देशपले डलोपे डिवाहिलोपे तकारस्य यकारे हे पियरम् ! अत्रापि पूर्ववद्यलोपाभावः बहुवचने प्रथमा- बहुवचनवत् ।। शेषमिति पिउणो, पिऊ द्वि० व० पिउणा, पिऊहिं, पिऊहि ॥१०॥ पिउणं, पिऊण च० बहु० ॥ पिउणो, पिऊओ, पिऊहिंतो पञ्चमी । पष्ठी चतुर्थीवत् ॥ पिउंसि, पिउमि । पिऊसु । स० । श्रोत उदिहीहिंतविसुषु । ३ । २।२६ ॥ श्रोतः परेषु उत् इहि इहितो इसु इत्येतेषु परेपु पूर्वपरयोः पूर्वसजातीयः स्यात् गो। प्रोत इति-पूर्वपरयोः पूर्व इत्यनुवर्तते । गोशब्दादुति प्रत्ययेऽनेनौकारस्योकारस्यचोभयोः स्थाने प्रोकारे गो । एवमेव गोहिं । गोहितो । गोसु ॥ डावोगाः।४।३।३९ ॥ गोः परयोरदितो वोरादेशो भवति । गावो । आयोरिति-अदितोरित्यनुवर्तते । प्रथमाबहुवचनेऽतो द्वितीयाबहुवचने इतश्चानेन डावोर्भवति । तथा च गोशब्दादति विभक्तो डाबादेशे डिति टिलोपे गावो । एवमेव द्वितीयाबहुवचने बोध्यम् । मिणाएवात्स्समिषु गोर्गवः। ४।३।२० ।। एषु परेषु गोशब्दस्य गवादेशः स्यात् । गवं । गावो । गवेण । गोहिं । गवाए । गवं । गवा. गवाओ । गोहितो । गवस्स ।

जनसिद्धान्तकौमुदी मिणाएदिति-मश्चेणश्चाएचाओञ्च त्सश्च मिश्वेति विग्रह इतरेतरयोगद्वन्द्वः । अनेकवर्णवात्सर्वादेशः । 'देशोऽदन्तः । अतएवैतदादेशे जिणवत्कार्याणि भवन्ति ।। स्मर्त्तव्यानि । गोहिं इत्यादौ तु गोवत्कार्याणि नन्ति ॥ गोशब्दादमि विभक्तौ वक्ष्यमाणसूत्रेण डवमादेशे टिलोपे गवं । एवमेव पष्ठीबहुवचनेऽपि ॥ श्रणव उपश् । ४ । ३॥ २१ ॥ गोः परस्याणप्रत्ययस्य डबमादेशः स्यात् । गर्ने । गवे, गवंसि, गवंमि । गोसु । हे गो! । गावो।। अणल्य इति डावोरिति सूत्रतोगोरित्यनुवर्तते । अनेकवर्णवात्सर्वादेशः। गोशब्दादणस्य डवमादेशे टेलोपे गवं । मस्यानुस्वारः । सम्बोधने प्रथमावत् सामान्यतया उदतोरुपादानात् ।। । . अथ सब्वणामशब्दाः सव्वादीनि संवणामानि।१।१ । २६ ।। सन्नादयः शब्दाः सव्वणामसंज्ञाः स्युः सव्वे, सब्यो । लव्यादय इति- सव्वादीन्युद्दिश्य सव्वणामसंज्ञा विधीयते न तु सब्बणाममुद्दिश्य सव्वादिसंज्ञा लाघवार्थमेव संज्ञाया आवश्यकतयैकस्यानेकसंज्ञाकरणे लाववाभावेन तत्करणं व्यर्थ स्यात् । किञ्च यच्छन्दयोगः प्राथम्यमित्याधुद्देश्य लक्षणलक्षिततया सव्वादेरेवोद्देश्यत्वमुचितम् । न च संज्ञाया लावव' प्रयोजनकतया सादिसंज्ञामपहाय नववर्णघटितगुरुसंज्ञाविधाने किं फलमिति वाच्यं, सब्वेसि णामं सव्वणा- ममिति महासंज्ञया सर्वार्थवाचकस्यैव सव्वणामसंज्ञाया लाभेन यत्र कस्यचित् सव्वेति नाम कृत्वा सवशब्दः प्रयुज्यते तत्र सवशब्दस्य सर्वार्थवाचकत्वाभावेन सन्चणामसंज्ञाया अप्रवृत्तेरेव फलत्वात् । एवमपि । सव्व+ उ इति स्थिते 'इद्रुतः पुंस्यत' इत्यनेनोकारस्येकारे वृद्धावेकारे सन्चे; इकाराभावे वृध्द्यावोकारे सव्वो ॥ हः सदणामात् । ४।३।५८ ।। अकारान्तसवणामशब्दात्प्रथमावहुवचनस्येकारादेश: स्यात्पुंलि । लब्बे । सन्छ । सचे। सम्वेणं, सव्वेण । अहि, सम्बेहि । सबस्स, सन्चाए । ३. सम्बेति-पुंसीत्यनुवर्तते अत इति च यद्यपि सामान्यतः प्रथमाविभक्तौ विधानेऽपि नक्षतिः प्रथमैक. बचनेऽपि 'सव्वें' इत्यस्येष्ठत्वात् । ननु तथा सति सन्धी इति कथं भवेदिति चेन्न, बहुलग्रहणसम्बन्धात्प्रयमैक- वचने विकल्पेन प्रवृत्त्योक्तरूपसिद्धेः । तथापि वहुलग्रहणसम्बन्धाभावसूचनायैव तथोक्तमन्यथाऽत्रापि विकल्पः सवणामशब्दाः सम्भवेत् । तथा चात्रापि सवो इत्यनिष्टं रूपं विकल्पेन स्यात् । सव्व + अ इत्यत्रानेनाकास्येकारे वृद्धावेकारे सन्चे ।। सव्व+में इत्यत्रानुस्वारे सव्वं । सव्वे पूर्ववत् ॥ सव्व + इण इत्यत्रेणाणेहोसीसूनामिति सूत्रेण विकल्पेन ममागमेऽनुस्वारे वृद्धौ सव्वेणं, ममागमाभावे सम्वेण । सव्व + इहि अत्र ममागमेऽनुस्वारे वृद्धौ सव्वेहि, ममागमाभावपक्षे सव्वहि ॥ सव्व+अए इति स्थितेऽएतः स्स-इत्यादिना स्सादेशे सव्वस्स, पक्षेऽ- दिद्युत इति सूत्रं प्रबाध्य पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे सव्वाए ॥ अणस्यसिरस्त्रिया । ४।३।६१॥ अकारान्तसवणामशब्दात्परस्याणप्रत्ययस्यसिरादेशः स्यादस्त्रियाम् । सव्वेसि, सव्वेसि । सव्वा, सबाओ । सव्वेहितो। सदस्स । सव्वेसि, सव्येसि | सव्वंसि, सव्वंमि, सच्चे । सव्वेसु । अणस्येसिरिति-सन्त्रणामात्, श्रत इति पदद्वयमनुवर्तते । अनेकवर्णत्वात्सर्वादेशः । सव्व+ अण इत्यत्रानेन 'इसि' इत्यादेशे इणाणेहीसीसूनामित्यनेन वैकल्पिके मनागमेऽनुस्वारेऽतः स्वर परस्य सवर्ण इति सूत्रेण वृद्धौ सव्वेसि, ममागमाभावे सव्वेसि ॥ सच + अतोदिति स्थितेऽतोतोऽतः इति सूत्रेणौकारस्य लोपे तकारस्य यकारे लोपे पूर्वसवर्णदीचे च सवा, पक्षे पूर्वसवर्णदीर्घं तकारस्य यत्वे यस्य लोपे प्रकृतिभावे सव्वायो । सव्व + इहिंतो इति स्थिते वृद्धौ वहुलग्रहणात्तकारस्य · यकाराभावेसव्वेहितो ।। सव्वस्स । सव्येसि पूर्ववत् ॥ .. सेः स्सि वा।४।३। ५६ ॥ अकारान्तसव्वणामशब्दात्परस्य सप्तम्येकवचनस्य सेः स्तिमादेशो वा स्यात् । सवस्ति । ले स्तिमिति-अतः सव्वणामादिति पदद्वयमनुवर्तते । सव्व +मि इत्यत्र सिरित्यनेन स्यादेशेऽनेन सूत्रेण सेः स्सिमादेशेऽनुखारे । सव्वस्सिं ।। पने-सच + मि इत्यत्र सिरित्यनेन स्यादेशे मौ व्यञ्जनादौ नाम्न इत्यनेन ममागमेऽनुस्वारे सव्वंसि, स्यादेशाभावे सव्वंमि पक्षे 'मेरिस्' इति सूत्रेण इसादेशे वृद्धौ सव्वे । सव्व + इसु इत्यत्र वृद्धौ सव्वसु ।। जतकेभ्योऽतोतो.वा म्हाः । ४ । ३।६२॥ सर्वनामसंज्ञकेभ्य एभ्यः परस्य पञ्चम्येकवचनस्यः म्हादेशो वा स्यादस्त्रियाम् । जम्हा । शेष सव्वशब्दवत् । जतकेभ्य इति-जश्च तश्च कञ्चेति द्वन्द्वः । सव्वणामात् , अस्त्रियामिति पदद्वयमनुवर्तते ! अनेकवर्ण- त्वात्सर्वादेशः । ज+अतोदित्यत्रानेन सूत्रेण विभक्तेहादेशे जम्हा, म्हादेशाभावेऽतोतोऽतइति सूत्रेणौकारस्य लोपे तस्य यत्वे यलोपे पूर्वसवर्णदीधैं च जा, पक्षे पूर्वसवर्णदीचे तकारस्य . यकारे लोपे प्रकृतिभावे जाओ। शेषमिति-जे, जो । ने॥ प्र० ॥जं । जे ॥ द्वि० ॥ जेणं, जेण, जेहिं, जेहि ॥ १०॥ जस्स, जाए । जेसिं, : .. . :

४० जैनसिद्धान्तकौमुदी जेसि ॥ च ॥ जेहितो॥ पं० बहु० ॥ जस्स । जेसि, जेसि, ॥ १० ॥ जसि, जमि, जे, जस्ति । जेसु ।। स० ॥ शेषं सव्वशब्दवदित्यत्र जशब्दस्येति शेषः । तादिशब्देषु विशेषरूपार्णा मूल एव । दर्शितत्वात् । उत्येततयोरक्लाबेसः।२।३ । ७८॥ एततशब्दयोरुपधायाः प्रथमैकवचने परे सकारादेशः स्यादक्लीवे । उत्येतेति-उपधाया इत्यनुवर्तते । उति, एततयोः, अक्लीवे, स, इति पदचतुष्टयम् । एतश्च तश्चेति द्वन्द्वः अन्यवचने परे छीबे च सकाराभावादुतीति अक्लीवे इति चोक्तम् । सकारोत्तराकार उच्चारणार्थः । एतताभ्यां पुंशि वा । ३।४ । ७० ॥ आभ्यां परस्य प्रथमैकवचनस्य लोपो वा स्यात्पुंसि । स, से, सो । ते । एतताभ्यामिति-उत इति लोप इति द्वयोरनुवृत्तिः । त+उ-इत्यत्रोत्येततयोरक्लीवे स इत्यनेन तकारस्य सकारेऽनेन विभक्तोंपे स, लोपाभावे 'इदुतः पुंस्यत्' इति सूत्रेणोकारस्येकारे वृद्धौ से, तदभावे वृद्धौ सो। ते । तं । ते ॥ तेणं, तेण । तेहिं, तेहि । तस्स, ताए । तेसिं, तेसि । त+अतोदित्यत्र 'जतकेभ्योऽतोतो वा म्हा' इति विभक्तम्हादेशे तम्हा, एतदभावेऽतोतोऽत इति सूत्रेणौकारस्य लोपे तकारस्य यकारे यलोपे पूर्वसवर्णदीधैं च ता, पक्षे पूर्वसवर्णदीघे तस्य यत्वे लोपे प्रकृतिभावे ताश्रो । तेहितो । तस्य सस्स्सय सेः।४।३। ७२ ॥ तशब्दस्य षष्ठयेकवचनस्ससहितस्य 'से' इत्यादेशो वा स्यात् । से, तस्स । तेसिं, तेसि । शेष जशब्दवत् । तस्येति-स्सेन सहितः सस्सस्तस्येत्यर्थः । वेत्यनुवर्तते । षष्ठयेकवचन एवायमादेशो नतु चतुर्थ्यामप्यनमि- धानात्तदाह पष्ठयेकवचनेति । त+ स्सेत्यत्रानेन प्रकृतिप्रत्ययोरुभयोः स्थाने 'से' इत्यादेशे से, तस्येत्यर्थः । पते तकारस्य स्सादेशे तस्स । तेसिं, तेसि । तसि, तमि, ते तस्सिं । तेसु । के, को। के। कं । के। केणं, केण । केहिं, केहि । कस्स, काए । केसि, केसि । कम्हा, का, काओ ॥ कादिहिन्तोरितो डओः । ४ । ३।३३ ॥ कशब्दात्परस्येहितोप्रत्ययस्यादे डओ' इत्यादेशः स्यादस्त्रियाम् । कोहितो । शेषं जशब्दवत् । कादीति-कात्, इहितोः, इतः, डओरिति पदचतुष्टयम् । अस्त्रियामित्यनुवर्तते । क + इहितोऽत्रानेन विभ- तरादेरिकारस्य 'डओ इत्यादेशे डलोपे डित्त्वाहिलोपे प्रकृतिभावे कओहिंतो। कस्स । केसि, केसि । इत्यादि । इमस्य सोतः पुंस्ययम् । ४।३ । २४ ॥ इमशब्दस्योप्रत्ययसहितस्यायमित्यादेशो वा स्यात्पुंसि । अयं, इमे । । । .

सवणामशब्दा इमस्येति-उता सह+सोत् तस्य सोत इत्यर्थः । वेत्यनुवर्तते । इम+8 इत्यत्र प्रकृतिप्रत्यययोरभयोः स्थानेऽयमित्यादेशे अयम् , पक्षे 'इदुतः पुंस्यत्' इत्यनेनेकारादेशे वृद्धौ इमे । इमस्य मोर्णट् । ४।२।५॥ इमसम्बन्धिनो 'मो' इत्यस्य एडागमो वा स्यात् । इणमो, इमो । इमे । इमस्येति-वेत्यनुवर्तते । इम . उ इत्यत्रे काराभावे वृद्धौ 'इमो' इति स्थितेऽनेन सूत्रेण मो इत्यस्य णडा- गमे टित्त्वादाद्यवयवे इणमा, णडागमाभाव इमो । इणमो इत्यत्र "जंबू ! इणमो अण्हयसंवरविणिच्छयं पवयणस नित्संई" इति परह० १, १, प्रमाणमस्ति । इम+ अ इति स्थिते 'इ: सवणामादत' इत्यनेनाकार- स्येकारादेशे वृद्धावेकारे इमे । मस्य गोमि । ४।३।२७॥ इम शब्दसम्बन्धिमकारस्य णकारादेशो वा स्यान्मप्रत्यये परे । इणं, इमं । इमे । मस्येति- इमस्येति वेति चानुवर्तते । इम+म् इत्यत्रानेन मकारस्य णकारेऽनुस्वारे इणं,पक्षे इमं । इणमित्यत्र "गोयमो इणमन्वमी । उत्त० २३ । ३१ ॥ इणमक्खेवं पुच्छे, भग० २ । १, इति प्रमाणमस्ति । इमे ।। पूर्ववत् । अस्त्रियामिणेऽणः।४।३।२८॥ इमशब्दस्याणादेशो वा स्यादिणप्रत्यये परेऽस्त्रियाम् । अणेण, इमेणं, इमेण । इमेहि, इमेहि । इमस्स, इमाए । इमेसि, इमेसि । इमा, इमाओ । इमेहिन्तो । इमस्येति-इमस्येत्यनुवर्तते अनेकवर्णत्वात्सर्वादेशः । इम + इण इत्यवस्थायामनेनेमस्याणादेशे वृद्धौ श्रणेण, पक्षे वृद्धौ वैकल्पिके ममागमे च कृते ऽनुस्वारे इमेणं, ममागमाभावपक्षे इमेण । इम + इहि अत्र ममागमे वृद्धौ इमेहि, ममागमाभावे इमेहि ॥ इम X अए इत्यत्राएतः स्सोनान्न, इत्यनेन स्सादेशे इमस्स, स्सा- देशाभावे तु पूर्वसवर्ण दीर्घ प्रकृतिभावे इमाए । झXण इत्यत्राणस्येसिरस्त्रियामिति सूत्रेण 'इसिरित्यादेशे 'इणाणेहीसीसूनाम् , इति विकल्पेन ममागमेऽनुस्वारे 'अतः स्वरे परस्य सवर्ण इत्यनेन वृद्धौ इमेसि ममागमा- भावे इमेसि ॥ इमxअतोदित्यत्रातोतोऽत,इति सूत्रेणौकारस्य लोपे तकारस्य यकारे लोपे पूर्वसवर्णदीचे इमा, पक्षे पूर्वसवर्णदोघे तस्य यत्वे यलोपे प्रकृतिभावे इमाओ । इम X इहिंतोइत्यत्र वृद्धौ इमेहितो ॥ स्सिस्सयोरस् । ४ । ३ । २६ ॥ इमशब्दस्यासादेशो वा स्यात् स्सिस्सयोः परयोरस्त्रियाम् । अस्स, इमस्स । इमेसि, इमेसि ।

: जैनसिद्धान्तकौमुदी स्सिस्सयोरिति इमस्य, वा, अस्त्रियामिति पदनयमनुवर्तते । सित्त्वात्सर्वादेशः । अन्न रसशब्देन पष्टयेकवचनस्यैव प्रहणं नतु चतुध्यकवचनस्य चतुर्थी ताशप्रयोगस्यादर्शनात् । इम + रस इत्यत्रानेन सूत्रेणे- मस्यासादेशे इत्संज्ञकस्य सस्य लोपे अस्स,पक्षे इमस्स । इमेसि, इमेसि ॥ पूर्ववत् । इमरिस कस्सिंवत् ।। श्रयः सौ।४।३।२६॥ इमशब्दस्यायादेशो वा स्यात् सौ परे । अयंसि, अस्सि, इमरिंस, इमंसि, इममि इमे. इमेसु । एस. एसे, एसो । एए। एयं । एए । एएणं, एएण । एएहि, एएहि । एयस्स, एयाए. एएसिं. एएमि । एया, एयाओ। एएहितो । एयस्स । एएसिं एएसि पयसि. एनीम, एए, एयरिंस, एएसु। एवमन्नकयरेयरादयः । अय इति-इमस्य, वा, इतिषानुवर्तते । अनेकवर्णत्वात्सर्वादेशः । इम+मि इत्यन्न 'सिः' इति सूत्रेण स्यादेशेऽनेन सूत्रेणेमस्यायादेशे ममागमेऽनुस्वारे अयंसि, "अयंसि लोए ॥ इत्युत्त० १७१२० ।। पते सेः स्ति- मिति. सेर्विकल्पेन सिमादेशे 'स्सिस्सयोरस्' इति सूत्रणेमस्यासादेशे. मस्यानुस्वारे अस्ति, असादेशाभावे इमस्सि, सिमादेशाभावे ममागमेऽनुस्वारे इमंसि, स्यादेशाभावे तु इमंमि पक्षे मेरिसिति सूत्रेणेसादेशे वृद्धौ इमे । इम+इसु इत्यत्र वृद्धौ इमेसु ॥ एत+ उ इत्यत्रोत्येततयोरकीबे स इत्यनेनोपधायास्तकारस्य सकारे एतताभ्यामछीबे वो, इत्यनेन विभक्तलोंपे एस, लोपाभावे 'इदुतः पुंस्यत इति सूत्रेणोकारस्येकारे वृद्धौ एसे इत्वाभावे वृद्धौ एसो । एत+ अ इत्यत्र 'इ: संवणामादतः' इति सूत्रेणाकारस्येकारे तकारस्य यकारे लोपे वृद्धौ प्रकृतिभावे एए ॥ एतम् इत्यत्र तकारस्य यत्रे लोपाभावेऽनुस्वारे एयं । एत+इ इत्यत्र तस्य यत्वे लोपे वृद्धौ एए ॥ एत + इण इत्यत्र तस्य यत्वे लोपे ममागमेऽनुस्वारे वृद्धौ च एएणं, ममागमाभावे एएण। एत+इहि अत्र तस्य यत्वे लोपे वैकल्पिके ममागमेऽनुस्वारे वृद्धौ च एएहि, ममागमाभावे एएहि ॥ एत+भए इत्यत्राएतःस्सो नान्नः' इति सूत्रेण स्सादेशे एयस्स, बहुलग्रहणात्तकारस्य यकाराभावे एतस्स, स्सादेशाभावे तकारस्य यकारे पूर्वसवर्णदीधैं प्रकृतिभावे बहुलग्रहणाद् यकारस्य लोपाभावे एयाए। एत+अण इत्यत्र 'अणस्ये सिरस्त्रियामिति सूत्रेणस्यादेशे 'इणाणेहीसीसूनाम्' इति वैकल्पिके ममागमेऽनुस्वारे तकारस्य यकारे : लोपे च वृद्धौ एएसिं, ममागमाभावपक्षे एएसि ।। एत+अतोदित्यत्रातोतोऽत इति सूत्रेणौकारस्य लोपे तकारस्य यस्ले लोपे एत + अ इति जाते पूर्वसवर्ण दीर्धे तकारस्य यकारे बहुलग्रहणाल्लोपाभावे. एया, ओकारस्य लोपा भावपक्षे पूर्ववत् सर्वकायें प्रकृतिभावे एयाओ । एत + इहिंतो इत्यत्र वृद्धौ एतशब्दस्थतकारस्य यकारे लोपे बहुलमहणाद्विभक्तिस्थतकारस्य यत्वाभावे प्रकृतिभावे एएहितो ॥ एयस्स । एयसिं, एएसि ॥ पूर्ववत् ॥ एत । मि इत्यत्र स्यादेशे तस्य यत्वे ममागमेऽनुस्वारे एयसि, स्यादेशाभावे एयमि; पने मेरिसादेशे तकारस्य यकारे . ..

P सचणामशब्दा लोपे वृद्धौ प्रकृतिभावे एए । सेस्सिमिति स्सिमादेशे तकारस्य यकारे एयसि । एत + इसु इत्यत्र वृद्धौ पका- रस्य यकारे लोपे प्रकृतिभावे एएसु ।। अम्हस्य हमहमो सोतः । ४ । ३ । ७६ ॥ उप्रत्ययसाहितस्याम्हशब्दस्य ह अहमित्यादेशौ पर्यायेण स्याताम् । हं, अहं । प्रम्हत्येति-उता सह वर्तमानः सोत् तस्येति बहुव्रीहिः। अम्हशब्दस्यानेन हमादेशेऽनुस्वारे हं, अह- मादेशे अहं। वा सातो वयम् । ४ । ३ । ८२ ॥ अप्रत्ययसहितस्याम्हशब्दस्य वयमित्यादेशो वा स्यात् । वयं, अम्हं ।। ना सात-अम्हस्येत्यनुवर्तते । अता सह वर्तमानः सात् तस्येति बहुव्रीहिः । अम्ह +अ इत्यत्रानेन प्रकृतिप्रत्यययोरुभयोः स्थाने वयमादेशेऽनुस्वारे वयं; पक्षे 'इ. सव्वणामादतः' इति सूत्रेणाकारस्येकारे वृद्धी अम्हे ।। समो नेमंगलमसमः । ४।३ । ७७ ॥ मप्रत्ययसहितस्याम्हशब्दस्य से, मं, मम, ममम् इत्येते आदेशाः पर्यायेण स्युः । मे, मं, मम ममम् ।। सम इति-अम्हस्येत्यनुवर्तते । मकारेण सह वर्तमानः सम तस्येति बहुव्रीहिः । अम्ह + म् इत्यत्रानेन प्रकृतिप्रत्यययोरुभयोः स्थाने में इत्यादेशे मे, तदभावे 'म' इत्यादेशे म, तदभावे 'मम' इत्यादेशे मम, एतदा भावे मममित्यादेशेऽनुस्वारे ममं ॥ एवं रूपचतुष्टयम् ।। सेतो नेनाचौ । ४।३।८३ ॥ द्वितीयाबहुवचनसहितस्याम्हशब्दस्य ने नो इत्यादेशौ वा स्याताम् । णे; ने, णो, नो, अम्हे । सेतो नेनेति-अम्हस्य, वा, इतिपदद्वयमनुवर्तते । इता सह सेत् तस्येति बहुव्रीहिः। अम्ह+इ इत्यत्रानेन प्रकृतिप्रत्यययोरुभयोः स्थाने ने, इत्यादेशे णत्वे णे, णत्वाभावे. ने, एवं णो, नो, पक्षे वृद्धौ अम्हे ।। सेणस्य मेमएभयाः। ४।३। ७८ ॥ इणप्रत्ययसहितस्याम्हशब्दस्य मे, मए, मया इत्येत आदेशाः पर्यायेण स्युः । मे, मए, मया । मेणस्यनि-अम्हस्येत्यनुवर्तते । इणेन सह वर्तमानः सेणस्तस्येति बहुव्रीहिः । मेश्च, मएश्च मयाश्चेति द्वन्द्वः । अम्ह + इण इत्यत्रेणसहितस्याम्हशन्दस्य स्थानेऽनेन सूत्रेण मे इत्यादेशे मे, मए इत्यादेशे प्रकृतिभावे मए, मया इत्यादेशे मया ।

जैनसिद्धान्तकौमुदी मेहेर्नेः। ४।३।८४॥ इहिप्रत्ययसहितस्याम्हशब्दस्य ने इत्यादेशो वा स्यात् । णे, अम्हेहिं, अम्हेहि ।। सेहरिति-अम्हस्य, वा, इतिद्वयोरनुवृत्तिः । इहिसहितः सेहिस्तस्येति वहुव्रीहिः। अम्ह + इहि इत्य- त्रानेनेहिसहितस्याम्हशब्दस्य ने इत्यादेशे णत्वे णे; पक्षे वृद्धौ वैकल्पिके ममागमेऽनुस्वारेऽम्हेहि, ममागमाभावेऽ म्हेहि । दिटुं च.णे सुयंच णे । आचा० । १।४।२॥ सातोतो समायोममाहिंताचौ। ४।३।८०॥ पञ्चम्येकवचनसहितस्याम्हशब्दस्य ममाओ ममाहितो इत्येतावादेशौ पर्यायेण स्याताम् । ममाओ, ममाहितो । अम्हेहितो । सातोत इति-अम्हस्येत्यनुवर्तते । अतोता सह सातोत् तस्येति वहुव्रीहिः ममाओश्च ममाहितोश्चेति द्वन्द्वः । अम्ह + अतोदित्यत्रानेन सूत्रेणातोत्सहितस्याम्हशब्दस्य स्थाने ममाओ इत्यादेशे प्रकृतिभावे ममाओ, पक्षे ममाहिती इत्यादेशे ममाहितो । अम्ह + इहिंतो इत्यत्र वृद्धौ अम्हेहितो । बहुलग्रहणान्न सर्वत्र तकारस्य यकार:॥ सस्सस्य मेमममममझमहंमोमझाः । ४ । ३ । ७६ ॥ स्सप्रत्ययसाहितस्याम्हशब्दस्य मे मम ममं मज्झं महं मो मज्झ इत्येते आदेशाः स्युः पर्या- येण । मे, मम, मम, मझ, मह, मो, मज्झ । सस्सस्यति-अम्हस्येत्यनुवर्तते। स्सेन सह सस्सस्तस्येति विग्रहः। मेश्च ममश्च ममञ्च ममञ्च महश्च मोश्च मन्मश्चेति द्वन्द्वः । अम्ह + स्स इत्यत्र प्रकृतिप्रत्यययोरुभयोःस्थानेऽनेन सूत्रेण मे इत्यादेशेमे, ममादेशेमम, मममादेशेऽ नुस्वारे मम, मज्झमादेशे नुस्वारे मझ,महमादेशेऽनुस्वारे मह, मो इत्यादेशे मो, मज्मादेशे मज्म ।। अम्हं साणस्य । ४।३।८५॥ अणसहितस्याम्हशब्दस्याम्हमादेशो वा स्यात् । अहं । अम्हमिति-श्रणेन सह साणस्तस्येति बहुव्रीहिः । अम्हस्य, वेति द्वयोरनुवृत्तिः । श्रम्ह + अंण इत्यत्रानेन प्रकृतिप्रत्यययोरुभयोःस्थाने 'अम्हामि' त्यादेशेऽनुस्वारे अम्हें । नेनवस्साकमः। ४।३।८६ ॥ अणसहितस्याम्हशब्दस्य ने, नो, अस्साकमित्येत आदेशा वा स्युः । णे, ने, णो, नो,अस्साक, अम्हाणं । नेनवेति-साणस्य, अम्हस्य, विति पदत्रयमनुवर्तते । अम्ह अण : इत्यत्रानेन ने इत्यादेशे णत्वे णे, - तुम्हशब्दाः ४५ णत्वाभावे ने, नो इत्यादेशे णत्वे णो, णत्वाभावेनो, अस्साकमादेशेऽनुस्वारे अस्साक, एतदभावे ममागमे पूर्वस- वर्णदीऽनुस्वारे अम्हाणं ॥णे इत्यत्र “एयं णे पेच्च भवे" ओव० २५, इति प्रमाणम् ॥ एतदस्मार्क प्रेत्य भव इति तदर्थः मम्हि ससेः।४।३।८७॥ सिप्रत्ययसहितस्याम्हशब्दस्य महिमादेशा वा स्यात् । मम्हिं । मम्हिमिति-अम्हस्येति वेति चानुवर्तते । सिना सह ससिस्तस्येति विग्रहः । अम्ह+मि इत्यत्र 'सिः' इतिसूत्रेण मेः स्यादेशेऽनेन सिसहितस्याम्हस्य 'महिम्' इत्यादेशेऽनुस्वारे मम्हि ॥ दृश्यते च "तं भई णं भवतु देवाणुपियाणं मन्हि जस्स अणुप्पभावेण अक्किठे नाव विहरामिः" भग० ॥३-१॥ तद्भद्रं भवतु देवानुप्रियाणां मयि यस्यानुप्रभावेणाक्लिप्टो यावद्विहारामि ।। पक्षे- ममम् । ४।३।१।। अम्हशब्दस्य मममित्यादेशः स्यात् सप्तम्येकवचने परे । ममंसि, ममंमि । अम्हेसु ॥ माविति-अम्हस्येत्यनुवर्तते । अम्हामि इत्यत्र मेः स्यादेशेऽम्हशब्दस्यानेन सूत्रेण मममादे- शेऽनुस्वारे+ममंसि स्यादेशाभावेऽनेन मममादेशेऽनुस्वारे ममंमि । अत्र बाहुलकाल्लोपो न । अम्ह+इसु इत्यत्र वृद्धो अम्हेसु ॥ अथ तुम्हशब्दः॥ सांतस्तुम्हस्य तन्तुमेतुममः । ४ । ३ । ८८ ॥ उप्रत्ययसहितस्य तुम्हशब्दस्य तं तुमे तुमम् इत्येत आदेशाः पर्यायेण स्युः । तं, तुमे, तुमम् । सोत इति-उता सह सोत्तस्येति बहुव्रीहिः । तञ्च तुमेश्च तुमश्चेति द्वन्द्वः तुम्ह + उ इत्यत्रानेन सूत्रेणोप्रत्ययसहितस्य तुम्हशब्दस्य तमादेशेऽनुस्वारे तं, तुमे इत्यादेशे तुमे,, तुममित्यादेशेऽनुस्वारे तुम । बहुवचनेषु तुम्भतुज्झौ वा । ४।३।८६ ॥ तुम्हशब्दस्य बहुवचने परे तुभ तुज्झ इत्येतावादेशौ वा स्तः पर्यायेण । तुम्भे, तुझे, तुम्हे । बहुवचनेबिति-तुम्हस्येत्यनुवर्तते । तुभश्च तुमश्चेति द्वन्द्वः । तुम्ह +अ इत्यत्रानेन तुब्भादेशे ': सम्वणामादतः' इत्यनेनाकारस्यकारे वृद्धौ तुन्भे, तुज्झादेशपक्षे तुझे, एतदभावे तुम्हे ।। समस्तेः।४।३।१०॥ मप्रत्ययसहितस्य तुम्हशब्दस्य 'ते' इत्यादेशो वा स्यात् । ते । पक्षे ।

. ४६ जैनसिद्धान्तकौमुद्री सम इति--तुम्हस्येति वेति चानुवर्तते । म सहितः सम् तस्येति समासः तुम्ह + म् इत्यत्रानेन प्रकृति- प्रत्यययोरूभयोः 'ते' इत्यादेशे ते, पक्षे ते इत्यादेशाभाव इत्यर्थः । मिमोस्तुम्हस्य हस्य । ३ । ४ । ५७ मिप्रत्यये म्प्रत्यये च परे तुम्हसम्बन्धिहकारस्य लोपः स्यात् । तुमं । तुम्भे, तुज्मे, तुम्हे । मिमोरिति-लोप, इत्यनुवर्तते । मिमोरिति सप्तम्यन्तम् । तुम्ह - म् इत्यनानेन हकारस्य लोपेऽ नुस्वारे तुमं । तुम्ह + इ इत्यत्र 'बहुवचनेषु तुम्भतुज्मो वा' इतिसूत्रेण तुम्भादेशे वृद्धौ तुन्भे तुझादशपक्षे तुज्के पक्षे तुम्हे ॥ सेणस्य तुमः । ४ । ३। ६२ ।। इणप्रत्ययसहितस्य तुम्हशब्दस्य तुमे इत्यादेशः स्यात् । तुम । तुन्भेहि, तुज्झहि, तुम्हेहि, तुम्भेहि, तुज्झहि, तुम्हेहि। सेणस्यति-इणेन सहितः सेणस्तस्येति विग्रहः । तुम्हस्येत्यनुवर्तते । तुम्ह +-इण इत्यत्रानेनेणसहि- तस्य तुम्हस्य ते इत्यादेशे तुमे। तुम्ह +इहि इत्यत्र 'वहुवचनेषु तुम्भतुझौ वा' इतिसूत्रेण तुब्भादेशे 'इणणेहीसीसूनामिति' सूत्रेण ममागमेऽनुस्वारे वृद्धौ तुम्भेहि, ममागमाभावे तुम्भेहि, तुझादेशे तुझेहि, तुज्झहि, आदेशाभावपक्षेतु तुम्हेहिं, तुम्हेहि ।। सातोतस्तुमाहितोः । ४ । ३ । ६४ ॥ अतोत्प्रत्ययसहितस्य तुम्हशब्दस्य 'तुमाहितो' इत्यादेशः स्यात् । तुमाहिन्तो । तुम्भेहितो तुज्झहिन्तो, तुम्हेहिंतो। सातोत इति-अतोता सह वर्तते सातोत्तस्येति बहुव्रीहिः । तुम्हस्येत्यनुवर्तते । तुम्ह + अतोदित्य- त्रानेन प्रकृतिप्रत्ययसमुदायस्य तुमाहितो इत्यादेशे तुमाहितो। तुम्ह इहितो इति स्थिते तुम्मादेशे वृद्धौ तुन्भेहितो, तुज्झादेशे तुज्झहितो, एतदभावे वृद्धौ तुम्हेहितो ।। सस्तस्य तेतवतुझंतुमं तुहंतुसंतुज्झाः । ४।३।६३ ।। स्सप्रत्ययसहितस्य तुम्हशब्दस्यैत आदेशाः पर्यायेण स्युः । ते, तब, तुझ, तुम, तुई, तुम्भ, तुज्झ। सस्सस्यीत-सेन सहितः सस्सस्तस्येति समासः । तुम्हस्येत्यनुवर्तते । तुम्हस्स इत्यवस्थायां स्ससहितस्य तुम्हस्यानेन सूत्रेण ते इत्यादेशे ते, एवं तव तुज्झमित्यादिकमपि बोध्यम् । चतुर्येकवचनेऽ येता- शमेव "एतःस्सो नाम्नः" इत्यत्र बहालमित्यनवर्तनानित्यमेवात्र प्रवत्तौ तमाए इत्यादेरसम्भवात् ।।

स्वरान्ताः स्त्रीलिङ्गाः अपस्य मः । ४।३।११॥ . तुम्हशन्दसम्बन्धिनोऽणप्रत्ययस्य मादेशो वा स्यात् । तुभ, तुझं, तुम्हं, तुम्हाणं । तुमंसि, तुमंमि । तुन्भेसु, तुज्मेसु, तुम्हेसु । अणस्येनि-अणस्येति षष्ठ-यन्तम् । मः प्रथमान्तम् । अकार उच्चारणार्थः तुम्ह + अण इत्यत्र "बहु- वचनेषु तुम्भतुज्मो वा" इत्यनेन तुम्भादेशेऽनेन सूत्रेण मकारेऽनुस्वारे तुम्भ, तुझादेशे तुझ, तदभावे तुम्हें । मादेशाभावे तुम्हाणं । तुझागं, तुम्भाणं, इत्यपि बोध्यं सूत्रप्राप्तेः समानत्वात् । एवं चतुर्थीबहुवचनेप्येताह- शमेव रूपं बोध्यम् । तुम्ह + मि इत्यत्र मिमोस्तुम्हस्य हस्येति सूत्रेण हलोपे मौ व्यञ्जनादौ नाम्न इति सूत्रेण ममागमेऽनुस्वारे 'सि' रित्यनेन सूत्रेण स्यादेशे तुमंसि, स्यादेशाभावे तुममि । मकारस्य लोपस्तु बाहुलकान्न । तेन 'तुमे' इति न भवति । तुम्ह + इसु इत्यत्र तुन्भादेशे वृद्धौ तुन्भेसु एवं तुज्मेसु पक्षे तुम्हेसु । ॥ इति स्वरान्ताः पुल्लिङ्गाः ॥ अथ स्वरान्ताः स्त्रीलिङ्गाः॥ - ननाकारान्तो मालाशब्दः । माला ॥ नत्रेनि-तत्र तेषु स्वरान्तस्त्रीलिङ्गेषु मालाशब्दः कथ्यते । माला + उ इत्यत्र .."आदिदुद्भधः-' इति सूत्रेण पूर्वसवर्णदीर्घ माला । अदितोरोगादिदुद्धयः स्त्रियां वा । ४ । ३ । ७० ॥ आदिदुद्यः परयोः प्रथमाद्वितीयाबहुवचनयोरोगागमो चा स्यात् स्त्रियाम् । मालाओ, माला । आदिनोगिनि-अच्च इच्चेति द्वन्द्वः । माला + अ इत्यत्रानेनौगागमे कित्त्वादन्त्यावयवे माला+अ भो इति जाते पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे मालाओ, ओगागमाभावे पूर्वसवर्णदीघे माला ॥ आदीदूतां हखो वहुलमि । ३ । ३।१॥ श्राकारेकारोकाराणां मपरे हस्वो बहुलं स्यात् । मालं । मालाश्रो, माला । श्रादीनामिनि-आच्च ईच्च ऊच्चेति द्वन्दः । माला+म् इति स्थितेऽनेनाकारस्य हस्खत्वेऽनुस्खारे च मालं । माला+ इ इत्यत्र 'आदितोरोदादिदुद्भधः स्त्रियां वेति सूत्रेण 'ओक्' इत्यागमे माला + इओ इति जाते पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे मालाओ, पक्षे पूर्वसवर्णदीचे माला ॥

जैनसिद्धान्तकौमुदी इएस्समीनामएः। ४ । ३ । ७१ ।। आदिदुद्भवः परेषामेषां विभक्तीनामए इत्यादेशः स्यात् स्त्रियाम् । मालाए । मालाहिं, मा- लाहि । मालाए । मालाणं । मालाओ मालाहिन्तो। मालाए । मालाणं । मालाए । मालासु इणस्समीति-आदिदुद्भयः स्त्रियामिति पदद्वयमनुवर्तते । अनेकवर्णत्वात्सर्वादेशः । माला + इण इत्य त्रानेन 'अए' इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीधै प्रकृतिभावे मालाए । माला : इहि इत्यत्रेणाणेहीसीसूनामिति सूत्रेण वैकल्पिके ममागमेऽनुस्वारे पूर्वसवर्णदीर्घ मालाहि, ममागमाभावे मालाहि । माला + अए इत्यन्न पूर्वसवर्ण- दीर्घ प्रकृतिभावे मालाए । माला+अण इत्यत्र ममागमेऽनुस्वारे पूर्वसवर्णदीचे मालाणं ॥ माला+अतोदित्यत्र पूर्वसवर्णदीघे तकारस्थ यकारे लोपे प्रकृतिभावे च मालाओ । माला इहिती इत्यत्र पूर्वसवर्णदीचे मालाहितो । माला+स्स इत्यत्रानेन सूत्रेण स्सस्याए इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीर्धे प्रकृतिभावे मालाए । अत्र माला स्स इति दशायां 'संयुक्ते' इति सूत्रेण हस्वस्तु न भवति, 'निमित्त विनाशोन्मुखं दृष्ट्वा तत्प्रयुक्त कार्य न कुर्वन्ति' इति परिभाषया स्सकारस्य विनाशभावित्वेन तन्निमित्तकहस्वाप्रवृत्तेः । मालाणं पूर्ववत् ॥ माला मि इत्यत्रानेन सूत्रेण मे 'भए' इत्यादेशे पूर्वसवर्णदो प्रकृतिभावे मालाए । माला + इसु इत्यत्र पूर्वसवर्णदीर्घ मालासु ॥ आतो डे: ।४।३।१० ॥ श्राकारान्तानाम्नः परस्यामन्त्रणैकवचनम्य डे इत्यादेशो वा स्यात् । भो माले ! माला । आत इति-बा, उतः, आमन्त्रणे, नाम्न इत्येतेषामनुत्तिः । माला+3 इत्यत्रानेनोकारस्य 'डे' इत्या- देशे डिवादाकारस्य लोपे भो माले !, पक्षे पूर्वसवर्णदीचे माला ! । बहुवचने प्रथमाबहुवचनवत् ।। अम्माया डोश्च । ४।३।११ ॥ अम्मा शब्दात्परस्यामन्त्रणैकवचनस्य डो इत्यादेशो वा स्यात् । भो अम्मो ! भो अम्मे ! भो अम्मा!। अम्मेति-आमन्त्रणे उतः वा इति पदन्नयमनुवर्तते । अम्मा+उ इत्यत्रानेनोकारस्य डो इत्यादेशे डित्त्वाहिलोपे भो अम्मो !, डे इत्यादेशे भो अम्मे ! आदेशाभावपक्षेतु पूर्वसवर्णदीर्घे भो अम्मा !। शेषं मालावत् ॥ मिमातोऽणस्य । ४।३। ६० ।। आकारान्तसव्वणामशब्दात् परस्याणस्य सिमादेशः स्यात् । सव्वासि ॥ षष्ठी बहुवचनेऽ प्येवमेव ॥ शेष मालावत् ॥ सिमात इति-विशेषणन्तदन्तस्येत्यनेनाकारान्तादिति लाभः । सव्वणामात् इति पदमनुवर्तते । भनेकनर्णत्वात्सर्यादेशः । सन्या+भण इत्यत्रानेन सूत्रेण सिमादेशेऽनुस्वारे सव्वासि ॥ शेषमिति सन्या ।

४६ - स्वरान्ता स्त्रीलिङ्गा सव्वाओ, सव्वा ॥१॥ सम्वं । सव्वाश्रो, सव्वा ॥ २ ॥ सव्वाए । सव्वादि, सव्वाहि ॥ ३॥ सवाए । चतुर्थी एक ० ॥ सव्वाओ। सव्वाहितो ।। ५ ।। सवाए । सव्वासिं ॥ ६ ॥ सव्वाए । सव्वासु ॥७॥ हे सव्वे ! हे सव्वा !! हे सव्वाओ ! हे सव्वा ।। आमन्त्रणम् ॥ इणे जातयोरिः ४।३।६६॥ जाताशब्दयोरिकारादेशो वा स्यादिणे परे । जाए, जाए | जाहि, जाहि ।। इण इति-अन्त्यस्य पठथेति परिभापया जाताशब्दयोरन्त्यस्येकारादेशः । वेत्यनुवर्तते । जा। जाओ, जा ॥ जं । जाओ, जा॥ जा + इण इत्यत्रानेन सूत्रेण जाशब्दस्येकारादेशे 'इणस्सगीनामए:' इति सूत्रेणेणस्याएं' इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे जीए, इकारादेशाभावे पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे जाए । जा+इहि ममागमेऽनुस्वारे पूर्वसवर्णदी जाहिं, ममागमाभावपक्षे जाहि ।। अएस्समीनां जाकातेमाभ्यो डीसे । ४।३।६८ । जा का ता इमाशब्दभ्यः परेषां चतुर्थीषष्ठसिप्तम्येकवचनानां 'डीसे' इत्यादेशो वा स्यात् । जांसे, जाए ३॥ शेषं सव्वाशब्दवत् । एवं काताशब्दौ । श्रएस्सेति चेत्यनुवर्तते । अएश्च स्सश्च मिश्च अएस्समयस्तेषामिति विग्रहः । जो च काच ता घेमा च जाकातेमास्तेभ्य इति समासः । जा+ अए इत्यत्रानेन विभक्तेः 'डीसे"इत्यादेशे डिवाहिलोपे जीसे, पते पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे जाए। जासिं ॥ जाओ । जाहिंतो ॥ जा + स्स इत्यत्राप्यनेन डीसे इत्यादेशे आकारलोपे जीसे, पक्षे जाए। जासिं ॥ जीसे, जाए । जासु ॥ हे जे ! हे जा!। हे जाओ !, हे जा !॥ एवं काशब्दे ताशब्दे चाप्यूह्यम् ।। स्त्रियामियम् । ४ । ३ । १५ ॥ इमशब्दस्योप्रत्ययसहितस्येयमित्यादेशो चा स्यात् स्त्रियाम् । इयं, इमा । स्त्रियामिति-इमस्य सोतः वेति पदत्रयस्यानुवृत्तिः।इमा + उ इत्यत्रानेन सूत्रेण प्रकृतिप्रत्यययोरुभयो स्थाने इयमित्यादेशेऽनुस्वारे इयं, पने पूर्वसवर्णदीर्थे । डेरिमास्त्रियाम् । ४।३।३८ ॥ इमशब्दात्परयोरदितो. इत्यादेशो वा स्यात् स्त्रियाम् । इमे, इमाओ, इमा । इमं । इमे, इमाओ, इमा । इमाए । इमाहिं, इमाहि ॥ इमीसे, इमाए । इमासि ॥ इमायो । इमाहिन्तो ।। डेरिति-अदितोति पदद्वयमनुवर्तते । इमा + अ इत्यत्रानेनाकारस्य डे इत्यादेशे डित्त्वादाकारलोपेइमे, एतदभावे श्रोगागमे पूर्वसवर्णदीधै प्रकृतिभावे इमाओ, तदभावे पूर्वसवर्णदीर्घ इमा ॥ इमं । इमे, इमाओ. 9.

- जैनसिद्धान्तकौमुदी इमाः॥२॥ इमाए । इमाहि, इमाहिः॥ ३ ॥ इसीसे, इमाए । इमासि ॥ ४॥ इमाओ । इमाहितो ॥५॥ एतेषां साधुत्वं पूर्ववद्वोध्यम् ।। रस्सस्य डीए: स्त्रियालिमात् । ४।३।६३॥ इमाशब्दात्परस्य स्सप्रत्ययस्य 'डीए' इत्यादेशो वा स्यात् स्त्रियाम् ॥ इमाए, इमीसे, इमाए। इमासि ॥ इमासे, इमाए। ; स्तस्शेति-चेति पदमनुवर्तते । इमा+स्स इत्यनानेन स्सस्य 'डीए' इत्यादेशे डिवादाकारस्य लोपे प्रकृतिभावे इमीए, पक्षे 'अएस्सीना', इत्यादिना विभक्त 'डौंसे' इत्यादेशे डिवादाकारलोपे इमीसे, तदभावे 'इणस्समोनामए' रित्यनेन स्सस्याए इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीचे व्यस्तोचारणसामर्थ्यात् प्रकृतिभावे इमाए । इमासि ॥ पूर्ववत् ॥ इमा+ मि इत्यत्र परत्वाद् । “अएस्समीन" इत्यनेन 'डोसे' इत्यादेशे डिवादाकारलोपे इमीसे पक्ष मेः 'अए' इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीर्धे प्रकृतिभावे इमाए । . मेडींसाएः कचिद् । ४ । ३। ६४.॥ इम शब्दात्परस्य मिप्रत्ययस्य डीमाएरित्यादेशो वा स्यात् स्त्रियां. क्वचित् । इमीसाए । इमासु ॥ * एसा । एयाओ, एया ।। शेषं सव्वावत् ।। भेरिति-इमास्त्रियां वेत्यनुवर्तते । 'इमीसाए' इत्यपि प्रयोगः कचिद् दृश्यते, अतएवोक्तं कचिदिति इमा + मि इत्यनानेन मेः 'डीसाए' इत्यादेशे डिवादाकारलोपे इमीसाए । इमा+ इसु इत्यत्र पूर्वसवर्णदीर्धे इमासु ॥ एता + उ इत्यत्र 'उत्येततयोरक्कीचे सः' इत्यनेन सूत्रेण तस्य सत्वे पूर्वसवर्णदोघे एसा । एसो + अ इत्यत्र तकारस्य यकारे "अदितोरोगादिदुद्भयः स्त्रियांवा" इत्यनेनौगागमे एया+अ ओ इति जाते पूर्वसवर्णदी प्रकृतिभावे एयाओ, ओगागमाभावे एया ।। शेषं सव्वाशब्दवद्वोध्यम् ।। इकारान्तः स्त्रीलिङ्गो दिट्टिशब्दः ।। दिट्टी। दिट्टीओ, दिही । दिहि । दिट्ठीओ, दिही ॥ दिट्ठीए । दिट्ठीहि, दिट्ठीहि ॥ दिहीए. दिट्ठीणं । दिट्ठीओ । दिट्टीहितो ॥ दिहाए । दिट्ठीणं ॥ दिट्टीए । दिट्ठीसु.॥ भो : दिही ! भो दिट्टीओ ! भो दिट्टी ! ॥ दिट्टीति-दिद्धि + उ इत्यत्र 'आदिवर्णोवर्णेभ्य' इति सूत्रेण पूर्वसवर्ण दीर्धे दिछी । दिठ्ठि + अ इत्यत्र 'अदितोरोगादिदुद्भयः स्त्रियां वा इति सूत्रेण विकल्पेनौगागमे दिदि + अ ओ इति जाते. पूर्वसवर्णदीचे प्रकृति- भावे दिट्ठीओ, पक्षे पूर्व सवर्णदीर्घ दिछी । दिद्धि+म् इत्यत्रानुस्वारे दिद्धिं । दिहि + इ इत्यत्रागांगमे पूर्व संवर्ण- दीर्घ प्रकृतिभावे दिट्ठोओ, ओगागमाभावे पूर्वसवर्णदीचे दिट्ठी ॥ दि@ि + इण इत्यत्रेणस्समीनामएरिति सूत्रेण विभक्त 'रए' इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे - दिट्टीए । दिदि + इहि इत्यत्रेणाणेहीसोसूनामिति ममांगमे । स्वरान्ता स्त्रीलिङ्ग अनुस्वारे पूर्वसवर्णदोघे दिट्ठीहिं, ममागमाभावे दिट्ठीहि ॥ दिठ्ठि + अए अत्र पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे दिठ्ठीए । दिद्धि + अण इत्यत्र ममागमे पूर्वसवर्णदीपेऽनुस्वारे दिट्ठीणं ॥ दिद्धि + अतोदित्यत्र पूर्वसवर्णदीचे तकारस्ट यकारे लोपे प्रकृतिभावे दिट्ठीओ । दिठ्ठि + इहिंतो इत्यत्र पूर्वसवर्णदीः दिट्ठीहितो । दिठि + स्स इत्यत्र स्स्स्य 'अए' इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीर्घ प्रकृतिभावे दिट्ठीए । दिट्ठीणं । पूर्ववत् ।। दिढि + मि इत्यत्र विभक्ते 'रए' इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे दिट्ठीए । दिट्ठि + इसु इत्यत्र पूर्वसवर्णदीर्षे दिट्ठीसु । दिद्वि + उ इत्यत्र पूर्वसवर्णदीधैं भो दिट्ठी! । दिट्ठी+ अ इत्यत्रौगागमे पूर्वसवर्णदीर्धे प्रकृतिभावे भोदिट्ठीओ ! ओगागामावे भो दिट्ठी॥ ईकारान्तः स्त्रीलिङ्गः समणाशब्दः ।। समणी । समणीओ, समर्णा ॥ समणि । समीओ, समणी ।। समणीए:। समणीहि, समणीहि ॥ समणीए । समणीणं ।। समणीओ । समणीहिन्तो ।। समाए। समणीणं । सम- पाए । समणीसु॥ समणीति-समणी + उ इत्यत्र 'आदिव!वर्णेभ्य' इति पूर्वसवर्णदीर्घ समणी । समणी + अ इत्यत्र अदितोरोगा-इत्यादिनौगागमे पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे समणीओ, ओगागमाभाव पूर्वसवर्णदीचे समणी ।। समणी+म् इत्यत्रादीदूतां वहुलं मि' इति सूत्रेणेकारस्य हस्वत्वेऽनुस्वारे समणिं । समणी + इ इत्यत्रौगागमे समणी + इओ इति सजाते पूर्वसवर्णदोघे प्रकृतिभावे समणीओ, पक्षे पूर्वसवर्णदीर्घे समणी ॥ समणी + इणेत्यत्रेणस्याए इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीर्घ प्रकृतिभावे समणीए । समणी + इहि इत्यत्र ममागमेऽनुस्वारे पूर्वसवर्ण दोघे समणीहि, ममागमाभावे समणीहि ॥ समणी + अए अत्र पूर्वसवर्णदीर्धे प्रकृतिभावे समणीए.। समणी + अण इत्यत्र ममागमे पूर्वसवर्णदीऽनुस्वारे समणोणं ।। समणी + अतोदित्यत्र तकारस्य यकारे लोपे पूर्व- सवर्णदीर्धे प्रकृतिभावे च समणीओ । समणी + इहितो अत्र पूर्वसवर्णदीर्घ समणीहितो ।। समणी+स इत्यत्र स्सस्याए इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीर्घ प्रकृतिभावे समणीए । समीणं । पूर्ववत् ।। समणी + मि इत्यत्र मेः 'अए' इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे समणीए । समणी + इसु इत्यत्र पूर्वसवर्णदीचे समणीसु ॥ इदूद्धयां डिस्। ४।३। १२ ।। 'ईदूदन्ताभ्यां परस्यामन्त्रणैकवचनस्य डिडू इत्यादेशौ क्रमेण वा स्तः हे सगणि !, हे समणी !! हे समणीओ!, हे समणी ! ।। ईदूझ्यामिति-आमन्त्रणे, उतः, वाइति पदत्रयमनुवर्तते । डिश्च दुश्च डिडू इति द्वन्द्वः । यथासंख्या- नादीकारात्परस्य विभक्तर्डिः, ऊकारात्परस्य विभईर्भवतीत्याह क्रमेणेति । समणी + उ इत्यत्रानेनोकारस्य -- . , जैनसिद्धान्तकौमुदी 'डि' इत्यादेशे डित्वादीकारलोपे हे समणि ! पक्षे पूर्वसवर्णदीघे हे समणी ! । हे समणीओ !, हे समणी ! ॥ प्रथमाबहुवचनवत् ॥ उकारान्तः स्त्रीलिङ्गो घेणुशब्दः। धेणू । धेणूत्रो, धेणू ॥धेणुं । धेणूत्रो, धेणू ॥ धेणूए । धेराहि, घेणूहि ।। धेणूए । धेरणं ।। घेणूओ । धेणाहन्तो ॥ घेणूए । घेणूणं ॥ घेणूए, धेणूसु ॥ भो धेणु , घेणू ! । भो धेणूओ ! भो घेणू !॥ धेविति-धेणु + उ इत्यत्र "आदिवोंवणेभ्य" इति सूत्रेण पूर्वसवर्णदीघे घेणू । धेणु + अइत्यत्रा- दितोरोगादिदुद्भयः त्रियां वा इति सूत्रेणौगागमे घेणु + अ श्रो. इतिस्थिते पूर्वसवर्णदीर्धे प्रकृतिभावे घेणूओ ! पक्षे पूर्वसवर्णदीचे घेणू ॥ घेणु+म् इतिस्थिते ऽनुस्वारे घेणु । घेणु + इ इत्यत्रौगागमे पूर्वसवर्णदीचे प्रकृति- भावे घेणूओ पक्षे पूर्वसवर्णदीधे घेणू ॥ धेणु + इण इत्यत्रेणस्समीनामएरितिसूत्रेण विभक्तेरए इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे घेणूए । घेणु+ इहि इत्यत्र ममागमे ऽनुस्वारे पूर्वसवर्णदीघे घेणूहि, ममागमाभावे घेणूहि ॥ घेणु+अए इत्यत्र पूर्वसवर्णदीर्धे प्रकृतिभावे घेणूए । घेणु + अण इत्यत्र ममागमे पूर्वसवर्णदीर्घ ऽनुखारे घेणूणं ॥ घेणु + अतोदित्यत्र पूर्वसंवर्णदीचे तकारस्य यकारे लोपे प्रकृतिभावे घेणूओ । घेणु + इहितो इत्यत्र पूर्वसवर्णदीर्धे घेणूहिंतो ॥ धेणु + स्स इत्यत्र स्सस्याए इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीधैं प्रकृतिभावे च घेणूए । घेणूणं । पूर्ववत् ।। धेणु + मि इत्यत्र मेः 'अए' इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे घेणूए । धेणु + इंसु इत्यत्र पूर्वसवर्णदीचे घेणूसु ।। धेणु +उ इत्यत्रेदूद्भयां डिडू' इति सूत्रेण विभक्ते 'ई' इत्यादेशे डित्त्वादुकारलो हे घेणु ! पक्षे पूर्वसवर्णदीचे घेणू ! । धेणु +अ इत्यत्रौगागमे पूर्वसवर्णदीर्धे प्रकृतिभावे हे घेणुओ ! पक्षे पूर्व- सवर्णदीचे हे घेणू !॥ ऊकारान्तः स्त्रीलिङ्गो वहूशब्दः ।। वहू । वहूओ, बहू । वहुं। बहूओ, बहू ॥ वहूए । वहूहि , वहूहि ॥ वहुए। वहूणं । वहूओ। वहूहितो । वहूए । बहूणं ।। वहूए बहूसु ॥ भो वहु ! भो बहू ! भो बहूओ! भो वह ! ॥ वह्निति-बहू + उ इत्यत्र पूर्वसंवर्णदीर्धे वहू । वहू + अ इत्यत्रादितोरोगा-' इत्यादिनौगागमे वहू + अ ओ इति जाते पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे वहूओ, पक्षे पूर्वसवर्णदीर्घ बहू । बहू +म् इत्यत्र "आदि. दूतां वहुलं मि” इति सूत्रेण हस्तेऽनुस्वारे वहुं । वह + इ अनौगागमे पूर्वसवर्णदीधे प्रकृतिभावे वहूओ, ओगागमाभावपक्षे पूर्वसवर्णदीर्घे वह ॥ वहू + इण अत्रेणस्याए इत्यांदेशे पूर्वसवर्णदीर्घ प्रकृतिभावे वहूए । वहू + इहि इत्यत्र ममागमेऽनुस्वारे पूर्वसवर्णदीधै वहूहि, ममागमाभावे वहूहि ॥ वह + अए इत्यत्र पूर्वसवर्ण- शीर्षे प्रकृतिभावे वहूए । वहु + अण इत्यत्र ममागमे पूर्वसवर्णदीऽनुस्खारे वहूणं । वहू + अतोदित्यत्र स्वरान्त नपुंसक लिङ्गाः तकारस्य यकारे लोपे पूर्वसवर्णदीधै प्रकृतिभावे वहूओ। वहू + इहिती इत्यन्न पूर्वसवर्णदीर्घ वहूहितो ।। वहू + स्स इत्यत्र स्सस्य 'अए' इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीर्घे प्रकृतिभावे वहूए । वहणं ॥ पूर्ववत् ॥ वहू + मि इत्यत्र विभक्त 'रए' इत्यादेशे पूर्वसवर्णदीचे प्रकृतिभावे वहूए । वहू + इसु इत्यत्र पूर्वसवर्णदी वहूसु ॥ वहू + उ 'इत्यत्रेदूदयां डिहू' इत्यनेनोकारस्य 'ई' इत्यादेशे डित्त्वादूकारलोपे भोषहु !, पक्षे पूर्वसवर्णदीधै भो बहू !। भो वहूरो!, ॥ भो वहू ! प्रथमाबहुवचनवत् ॥ ॥ इति ॥ - -- GH अथ स्वरान्तनपुंसकलिङ्गाः - क्लीवान्मो वा।४।३।३॥ नपुंसकात्परस्य प्रथमाया एकवचनस्य मादेशो वा स्यात् ॥ वणं । दहि । महुं ॥ क्लीवादिति-उत इत्यनुवर्तते । अकार उच्चारणार्थः । क्लीवो नपुंसकस्तदाह नपुंसकादिति । वण + उ इत्यत्रानेनोकारस्य मकारेऽनुस्खारे वणं । दहि + 3 इत्यत्रानेन मकारेऽनुस्वारे च दहिं । महु + उ इत्यत्रानेन मकारेऽनुस्वारे महुँ । पक्षे पुंवत् ।। णिती।४।३।४४॥ क्लीवात्परयोः प्रथमाद्वितीयावहुवचनयोः प्रत्येकं णि ति इत्येतावादेशौ पर्यायेण स्तः॥ णितीति-लीवात् अदितोः प्रत्येकमिति पदत्रयमनुवर्तते । णिश्च तिश्चेति द्वन्द्वः । वण + अ इत्यत्रानेन सूत्रेणाकारस्य 'णि' इत्यादेशे-चण+णि इति जाते- पित्योनाम्नः । ३।२ । ३७ ॥ नाम्नः स्वरस्य दीर्घः स्यारिणत्योः परयोः । वणाणि । दहीणि । महूणि ।। णित्योरिति-दीर्घ इत्यस्यानुवृत्तिः। णिश्च तिश्च णिती तयोणित्योः। वण + णि इत्यत्रानेन सूत्रेण णकारोत्तरत्तिनोऽकारस्य दीर्घे वणाणि । दहि + अ इत्यत्र 'णिती' इति सूत्रेणाकारस्य ण्यादेशेऽनेनेकारस्य दीघे दहीणि । एवं महु + अ इत्यत्र णितीत्यनेनाकारस्य ण्यादेशेऽनेन सूत्रेणोकारस्य दीघे महूणि । एवं सर्वत्र बोध्यम् ।। तेर्वा । ४।२।१६॥ आदेशभूतस्य तिशब्दस्य समागमो वा स्यात् । वणाई, वणाइ । दहीई, दहीइ । महुई, महूइ । एवं द्वितीयायामपि ॥ .

. ५४ जैनसिद्धान्तकौमुदी तेरिति-ममित्यनुवर्तते । तिशब्दश्वादिस्थानिक एवान्यस्यासम्भवात् । वण + अ इत्यत्र णितीत्यनेन विभक्तेः 'ति' इत्यादेशेऽकारस्य 'णित्यों रिति दी वणा+ति इति जातेऽनेन वैकल्पिके ममागमेऽनुस्वारे तका- रस्य यकारे लोपे प्रकृतिभावे वणाई, ममागमाभावे वणाइ । एवं दहाई, दहीइ । महूई, महूइ । एवं द्वितीया- यामपि । तद्यथा वणं । वणाणि; वणाई, वणाइ ।। दहिं । दहीणि, दही, दहीइ ॥ महुँ । महूणि, महूई. महूइ ॥ क्लीवे नित्यम् । ३।४। ६६ ।। नाम्नः परस्यामन्त्रणार्थकप्रथमैकवचनस्य नित्यं लोप: स्यात् ।। हे वण! । हे वणाणि !, वणाई, वणाइ ॥ हे दहि ! । हे दहीण !, हे दहीई !, हे दहीइ ॥ हे महु !! हे महाण ! हे महूई !, हे महूइ ! ।। शेषं पुंवत् ॥ सव्वं । सवाणि, सवाई, सच्याइ । जं । जाणि, जाई, जाइ । तं । ताणि, ताई, ताइ ।। कं । काणि, काई, काइ ॥ इमं । इमाणि, इमाई, इमाइ । एयं । एयाणि, इयाई, एयाइ ॥ शेषं पुंवत् ।। क्लीव इति-आमन्त्रणे उतः लोप इति पदनयमनुवर्तते । वण + उ इत्यत्रानेनोकारस्य लोपे हे वण ! वणाणीत्यादि तु पूर्ववत् । एवं हे दहीत्यादि बोध्यम् । शेपं पुंवदिति, तत्र वणशब्दस्य रूपाणि जिण शब्दवत् । दहिशब्दस्य रूपाणि मुणिशब्दवत् । एवं सव्वादे रूपाणि यथाययं योध्यानि ।। इति नपुंसकलिङ्गाः॥ संव्यावाचकास्त्रिलिङ्गाः॥ वेडोरणी प्रत्येकम् । ४।३। ४३ ।। दुशब्दात्परयोरदित्प्रत्यययोः प्रत्येकं वे डोरिण इत्येतावादेशौ वा स्तः ॥ दुवे, दोषिण ॥ वेडोरणीति-अदितोरिति दोरिति चानुवर्तते । वेश्च डोरिणश्च वेडोएणी । दु+ अ इत्यत्रानेनाकारस्य 'वे' इत्यादेशे दुवे, 'डोरिण' इत्यादेशे तु दोरिण ।। एवं द्वितीयावहुवचनेऽपिबोध्यम् ॥ 'अतोऽयोडवोडौ पुसि' इत्यादि सूत्राणां त्वत्र न प्रवृत्तिः, विशेषविहितेनानेन बाधात् । न च दुशब्दस्य द्वित्ववाचकत्वेन बहुवचनान्त- त्वमयुक्तमिति वाच्यम् , एकातिरिक्तस्यैव बहुत्वेन बहुवचनान्तत्वाचतेः एवमग्रेऽपि ।। डोदाः।४।३।४१॥ दुशब्दात्परयोरदित्मत्यययो '?' इत्यादेशः स्यानित्यम् । दो॥

संख्यावाचकास्त्रिलिङ्गा डोरिनि-अदितोः नित्यमिति च द्वयमप्यनुवर्तते । नित्यमित्यनुवर्तनाद्वहुलमित्यस्यासम्बन्धः । दु+भ इत्यत्र पूर्वसूत्रस्य वैकल्पिकत्वेनाप्रवृत्तावनेन 'डो' इत्यादेशे डित्त्वाटुकारलोपे दो । एवं द्वितीयाबहुवचनेऽपि ॥ अोदिधणेहितविसुषु दोः॥ ४ । ३ । २२ ।। दुशब्दस्यौकारादेशो नित्यं स्यादिहि अण इहितो इसु प्रत्ययेषु ।। श्रोदिति-नित्यमित्यनुवर्तते । इहिश्च अणश्च इहिंतोश्च इसुश्च इह्मणेहितविसवस्तेष्विति विग्रहः । इहीहिंतविसूनां द्वादिभ्यः स्वरस्य । ४।१।१५ ॥ दुप्रभृतिभ्यः संख्यावाचकेभ्यः परेपामेपामादिस्वरस्य लोपः स्यात् । दोहिं, दोहि ।। इहीहितेति-श्रादेः लोप इति पदद्वयस्यानुवृत्तिः । इहिश्च इहितोश्च इसुश्च इहीहिंतविसवस्तेषामित्यर्थः । दु प्रभृतीनां संज्ञाभूतत्वे एतदप्रवृत्त्यर्थमुलं संख्यावाचकेभ्य इति । एवमन्यत्रापि बोध्यम् । दु+ इहि इत्यत्र 'मोदिहारणेहिंतविसुपु दोः' इतिः सूत्रेण दुशब्दसम्बन्धिन उकारस्यौकारेऽनेन विभक्तरादिखरस्येकारस्य लोपे 'इणाणेहीसीसूनामिति' सूत्रेण ममागमेऽनुस्वारे दोहिं, ममागमाभावे दोहि ।। संख्याया अणस्य एहः । ४।४।५॥ संख्यार्थकशब्दात्परस्याणप्रत्ययस्य रह इत्यादेशः स्यात् । दोण्हं ।। दोहितो । दोण्हं ।। दोसु ।। संख्याया इति-दु+अण इत्यत्र दोरुकारस्यौकारेऽनेनाणत्य बहादेशे "तत्स्थानापन्नस्तद्धमै लभते" इति न्यायाद् बहादेशस्याणवेन ममागमेऽनुस्खारे । दु+ इहिंतो इत्यत्रोकारस्यौकारे विभक्तरादिखरस्येकारस्य लोपे दोहितो ॥ दोण्हं ।। पूर्ववत् दु+ इसु इत्यत्रोकारस्यौकारे विभक्तरादिस्वरस्य लोपे दोसु ।। तेरिणी । ४ । ३ । ४२ ॥ तिशब्दात्परयोरदिप्रत्यययोरिण इत्यादेशो वा स्यात् ॥ तिरिण । तेरिति-अदितोरित्यस्यानुवृत्तिः । ति + अ इत्यत्रानेनाकारस्स 'रिण' इत्यादेशे तिरिण । एवं द्वितीयायामपि ।। डयो।४।३।४०॥ तिशब्दात्परयोरदितो 'र्डयो' इत्यादेशः स्यात् । तओ ॥ तो ॥ तिहिं, तिहि ॥ तिराई ॥ तिहितो ।। तिण्हं ॥ तिसु ।। डयोरिति-तेः अदितोरितिद्वयोरनुवृत्तिः । ति + अ इत्यत्र 'रिण' इत्यादेशाभावेऽनेनाकारस्य 'डयो' इत्यादेशे डिवारिकारस्य लोपे यकारलोपे प्रकृतिभावे तो॥ एवं द्वितीयायामपि ॥ ति+ इहि इत्यत्र इणाणेहीसोसूनामिति सूत्रेण विकल्पेन ममागमेऽनुस्वारे तिहिं' ममागमाभावे तिहि ॥ ति + अण इत्यत्र, जैनसिद्धान्तकौमुदी 'संख्याया अणस्य रहः' इत्यनेनाणस्य राहादेसे "तत्स्थानापन्नस्तद्धर्म लभते" इति न्यायेन बहादेशस्थाणत्वेन ममागमेऽनुस्वारे तिरह ॥ ति + इहिंतो इत्यत्र विभक्तराद्यस्वरस्य लोपे तिहिंतो। तिण्हं । पूर्ववत् ।। ति+इस इस्यत्र विभक्त राधस्वरस्येकारस्य लोपे तिसु॥ रोरदितोर्वा । ४।३।३६ ॥ चतुशब्दात्परयोरदितो 'रो' इत्यादेशो वा स्यात् ॥ चउरो ॥ चउरो ॥ रोरिति-चतोरित्यनुवर्तते । रोः अदितोः वा इतिच्छेदः । चतु + अ इत्यत्रानेनाकारस्य 'रो' इत्यादेशे तकारस्य यत्वे लोपे प्रकृतिभावे चउरो॥ एवं द्वितीयाविभकावपि चतु+ई इत्यत्रेकारस्य 'रो' इत्यादेशे तकारस्य यकारे लोपे प्रकृतिभावे च चउरो॥ • . सादितश्चत्तारि चतोर्नित्यम् ।४।३ । १५ ॥ अदिअत्ययसहितस्य चउशब्दस्य 'चत्तारि इत्यादेशो नित्यं स्यात् ।। चत्तारि ।। चत्तारि ।। चउहि, चउहि ॥ चउरहं ॥ चउहिन्तो ॥ चउण्हं चउसु ॥ सादित इति-अच्च इच्च अदिती अदिभ्यां सहितः सादित् तस्येति विग्रहः । चउथ इत्यत्र 'रों' इत्यादेशाभावपतेऽनेन प्रकृतिप्रत्यययोरुभयोः स्थाने 'चत्तारि' इत्यादेशे चत्तारि ॥ एवं द्वितीयायामपि ।। घउ + इहि इत्यत्र ममागमेऽनुस्वारे विभक्तरादेः ग्वरस्य लोपे चाहिं । ममागमाभावे चहि ।। चड + अण इत्यत्र बहादेशे ममागमेऽनुरवारे चच्रहं । चउ+ इहिंतो इत्यत्र विभक्त रादेः स्वरस्य लोपे चहितो । पह ॥ पूर्ववत् ॥ घड+इसु इत्यत्र विभक्त रादेःस्वरस्य लोपे चउम्॥ अदितोः पञ्चादिभ्यः। ३।४।४३॥ संख्यावाचकेभ्यः पञ्चादिभ्यः परयोरदितोर्लोप: स्यात् ॥ पञ्च ॥ पञ्च ॥ पचहि, पंचहि ॥ पचएहं ॥ पंचहिन्तो ॥ पंचण्हं ।। पंचसु ॥ एवं छ शब्दादारभ्याहारसपर्यन्तं बोध्यम् ॥ . अदितोरिति लोप इत्यनुवर्तते ।। पञ्च+ इत्यत्रानेन विभक्तलोपे पश्च ।। एवं द्वितीयायामपि पथ+इहि इत्यत्र ममागमेऽनुस्वारे विभक्तरादिस्वरस्य लोपे पञ्चहि, ममागमाभावे पञ्चहि ।। पञ्च+पण इत्यत्र राहादेशे ममागमेऽनुस्वारे पंचण्हं ॥ पञ्च + इहिंतो इत्यन्न विभक्तरादेः स्वरस्य लोपे पञ्चहिन्तो ।। पञ्चण्डं । पूर्ववत् ।। पंच + इसु इत्यत्र विभक्ते रादिस्वरस्य लोपे पंचसु ।। एवं । वीसादौ विशेषकार्यस्य वक्ष्यमाणत्वेनाद्वारसपर्यन्तमित्युक्तम् ॥ •.

श्रथांव्यय प्रकरणम् संख्या तेः।३।४।४४॥ संख्याकतिप्रत्ययान्तात्परयोदितालोपःस्यात् ॥ कति । जति । तति । वीसाद्याः शब्दाः संख्यासंख्येयोभयवाचकाः, तत्र संख्येयवाचकत्वे नित्यमेकवचनान्ताः, संख्यावाचकत्वे तूमय- वचनान्ताः। संख्येति-अदितोर्लोप इत्यनुवर्तते । संख्यायों वर्तमानादित्यर्थः । प्रत्ययाप्रत्यययोरिति परिभाषया ति प्रत्ययान्तादिति लाभः । कति + अ इत्यत्रानेन विभक्तेलोपे कति शेष तिशब्दवत् ॥ एवं द्वितीयायामपि वोध्यम् । एवं जतिततिशब्दावपि । वोसादिशब्दानां संख्यासंख्येयवाचकत्वेऽपि संख्याविशिष्टवाचकत्वे नित्यमेक- वचनान्तता। संख्यापरत्वे तु वहुवचनान्ततापि ॥ वीसादिभ्यः ४३३१४॥. . नउइशब्दपर्यन्तानां वीसादिशब्दानां प्रथमायां नपुंसकवद्रूपं स्यानित्यम् । वीसं । चत्तालीसं । तृतीयादौ तु वीसाए । चत्तालीसाए इत्यादि । वीलादिभ्य शति-उत इति डमिति रदद्वयस्यानुवृत्तिः । वीसाशब्दादारभ्य नउइशब्दपर्यन्तान नित्यस्त्रीलिङ्गानां प्रथमायां नपुंसकरूपातिदेशोऽनेन क्रियते सतादीनां तु सर्वविभक्तौ पुनपुंसकत्वमिति तत्राति- देशापेक्षा नास्ति । द्वितीयायां नपुंसकत्रविधानं व्यर्थ, मप्रत्यये परे स्वत एव हस्वसिद्धरतः 'प्रथमाया' मित्येवोक्तं ॥ वीसाशब्दापूर्वेषामपि संख्यावा वकानां विलिङ्गत्वम् ॥ नउइशब्दोपादानेन नवनउइपर्य- न्तस्य ग्रहणं नवनउइशब्देऽपि नउइशब्दस्य विद्यमानत्वात् ।। वीसा + अ इत्यत्रानेनाकारस्य डमादेशे डिवादा- . कारलोपेऽनुस्वारे वीसं॥ ॥ इति ॥ अथाव्ययप्रकरणम् ॥ सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिः । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्यति तदव्ययम् ॥१॥ समिति-त्रिषु लिङ्गेषु सहशं समानमेकप्रकारमिति यावत् , सर्वासु च विभक्तियु समानं सर्वेषु वचनेषु च समानमत एव यन्न व्येति विविधप्रकारं प्राप्नोति तदव्ययम् ॥ १ ॥ अव्ययमहादि।१।१।३५ ॥ अहादिगणपठितमव्ययसंज्ञकं स्यात् ।।

जैनसिद्धान्तकौमुदी भह । अ । अण | अइरा । अइव । अईव । अंग। अंतर । अंतरेण । अंते । अंतो । अकम्हा । अचिरं । अजस्सं । अज । अजयाए । अजसुए । अणिसं । अति । अस्थि । अदु । अदुत्तरं । अदुवा । अधो । अमि । अभिक्खं । अभिक्खणं । अलं । अलमंथु । अवि । अवित्र । अविआई। असई । असति । अहवणं । अहावरं । अहे । अहो । आ। आई । आउ । आए । आविर् । इई। इइ । इति । इत्ति । इय । इव । ईस । इसि । ईसिं । उ । उण। उणो। उदाउ । उहाई । उपरि । उम्पिं । उवरि । उस्सरणं । उस्सन्नं । ए। एम । एमाइ । एमेव । एयावति । एव । एवं । एवरह। किं । किञ्च । किणाई । किरणं । फिर । किल । कोस । कद् । कु । खलु । खिप्पं । च । चण । चणं । चि । चिट्ठ। चिय । थे । च । जइ । जति । जदि । जा । जाउ । जाव । जावं । जावन् । जुगवं । झत्ति । ण । रणं । णवरं । णवरि । गहु । णाइ । णाणा । णिहो । णु । पूर्ण । णो । एणं । एहं । तं । ता । ताव । तावं । तावत् । ति । ति । तु । थ । दिया । दुद्छ । दूरा। परिणयं । धिद्धि । धिर । धिसि । न । नणु । नमो । नवरं । नवरि । नहु । नाणा | नूणं । नो। नोणं । पए । पगे । पच्छा। पमिइ । पमित्ति । परेव्वं । पसढं । पाउ । पाउर् । पाए । पाओ । पातो । पायं । पि । पिव । पिहं । पिहु । पिहो । पुढो । पुण । पुणो । पुरच्छा । पुरत्या ! पुग । पुरे । पुला । बहि । बहिं । बहिया। भंते । भिसं । भुजो । भूजो । भे । भो। मज्झे । मणयं । मणा | माहं । मिव । मिहो । मुसा । मुहा । मुहु । य । युगवं । रह । रहो । राओ । रिते । वि । विव । विसं । विसु । व्य । सई । सद् । संपइ । संपयं । संपाओ । सक्खं । सणि। सद्धिं । समं । समनं । समंता। सयं । सययं । सयराहं । सायं । सुइरं । सुए । सुदछु । सुतरं । सेवं । हता। हंद । हंदि । हभो । हउँ । हणि हणि । इद्री । हव्वं । हिजो । ही । हुरस्था । हुलियं । हे । हेटु । हेडा । हेट्ठि । हेछिल्ला । हेहो । अव्यवभिनि-अहशब्द आदिर्यस्य तदहादि इति तद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः । स्वान्वयिनि स्त्र विशेषणस्याप्यन्वयेऽयं समासः । यथा लम्बकर्ण पुरुपमानयेत्यादौ । पुरुषान्त्रयिन्यानयने लम्बकर्णस्यापि सम्वन्धात्तद्गुणसंविज्ञानस्तद्भिन्नोऽतद्गुणसंविज्ञानो यथा दृष्टसागरं पुरुपमानयेत्यादौ, अत्र हि पुरुपान्वयिन्या- नयने सागरस्य नान्वयः । तथा प्रकृतेऽपि वान्वयिसंज्ञायामहशब्दस्यापि सम्बन्धात्तद्गुणसंविज्ञान एव ।। न व्येति लिङ्गसंख्याकारकप्रयुक्तविकारान्न प्राप्नोति यत् तदव्ययम् । अत एव 'सशं त्रिषु लिङ्गषु, इति श्रुतिरपि सङ्गता । अहशब्दस्यान्यार्थे नोयमानकलशादिवत् स्वतो मङ्गलवेन तमेव शब्दमाद्यवयधीकृत्य गणो निर्दिष्टः । अत एव विपरीतशंकालेशोऽपि न । अहादिगणस्तु मूल एव निर्दिष्टः । तत्र क्रमेणार्था उच्यन्ते । अह आनन्तर्यादौ । अ अण निषेधे । अइरा तत्काले । अइव आई। अधिके । अंग धामन्त्रणे । अन्तर अन्तरेण अभाववति । अंते अंतो मध्यदेशे । अकम्हा दैवादित्यर्थे । अचिरं शीघ्रतायाम् । अजस्सं निरन्तरे । अन्ज अस्मिन्नहनि । अन्जयाए अद्यप्रभृत्यर्थे । आजसुए अद्यश्व इत्यर्थे । अणिसं सतते । अति अतिशये. । अस्थि अस्तीति तिङन्तप्रतिरूपकमव्ययम् । अदु अदुत्तरं आनन्तर्यादौ । अदुवा पक्षान्तरे । अधो नीचैरित्यर्थे । अभि आभिमुख्ये । अभिक्खणं अभिक्खं पौनः पुन्ये । अलं पर्याह्यादौ । अलमंथु अलमस्त्वित्यर्थे । अवि समुच्चयादौ । अविअ पक्षान्तरे । अवियाई सम्भावनायाम् । असई असतिं पौनःपुन्ये। अहवणं अयवार्थे । अहावरं अहे ततः परमित्यर्थे । अहो नीचदशे । या मर्यादा भिविध्यादौ । आई वाक्यालंकारे। आउ पक्षान्तरे । आए समीपे । आविर् प्रकटीभावे । इ ई प्राकट्ये । इइ इति इत्ति इय प्रकारे । इव सादृश्ये । ईस ईसि ईसिं अल्पत्वे । उ, उण उणो पुनरित्यर्थे । उदाहु उहाई .

अबाव्यय प्रकरणम् ५६ ५ - -- पक्षान्तरे । उपरि उप्पिं उवरि उपर्यर्थे । उस्सरणं उस्सन्न प्रायोऽर्थे । उपरि पूर्वप्रकारे । ए सम्बोधने एतत्- प्रकारे च । एम एमाइ इत्यादौ । एमेव एतत्प्रकारे। एयावंति-इयत्तायाम् । एव अवधारणे । एवं पूर्वोत्तरीतौ । एहं वाक्यालकारे । किं जिज्ञासायां । किंच पक्षान्तरे । किणाइ किञ्चिन्मानमित्यर्थे । किरणं जिज्ञासायाम् । केर किल निश्चये । कीस कस्मादित्यर्थे । कद्, कु कुन्सायाम् । खलु निश्चये वाक्यालङ्कारे च । खिप्पंशीघ्रतायाम् च, छ, समुच्चयादौ । चण, चणं, चि, चे, चेदित्यर्थे । चिठ्ठ भृशमित्यर्थे । चिय चैवार्थे । जइ, जति, जदि, यद्यर्थे । जाउ कदातिदित्यर्थे । जा, जाव, जावं, जावत् यावदित्यर्थे । जुगवं एकस्मिन्काले । झत्ति शीघ्रतायाम् । ण निषेधे । णं वाक्यालङ्कारे । णवरं, णवरि कैवल्यार्थे । णहु णाइ निषेधे । णाणा अनेकस्मिन् । णिहो नीचदेशे। गु प्रश्न । णूणं निश्चये । णो निषेधे । एणं रहं वाक्यालङ्कारे । तं तत्रेत्यर्थे । ता, ताव, तावं, तावत् तावदि- त्यर्थे । ति त्ति पूर्वोक्तप्रकारे समाप्तौ च । तु समुच्चये । थवाक्यालङ्कारे ! दिया दिवसे । दुद्छु असम्यगर्थे । दूरा दूरदेशे। धणियं भतिशये । धिद्धि, घिर, थिसि, विकारार्थे । न निषेधे । नणु शङ्कायाम् । नमो नमस्कारे । नवरं नवरि कैवल्यार्थे। नहु निषेधे । नाणा अनेकस्मिन् । नूणं निश्चये । नो, नोणं, विषेधे । पए, पगे, प्रभाते । पच्छा उत्तरत्र । पभिय, पमित्ति प्रारभ्येत्यर्थे । परेव्वं परदिने । पसढं प्रसह्येत्यर्थे । पाउ, पाउर् प्रादुर्भावे । पाए प्रायोऽर्थे । पाओ, पातो प्रभाते, पायं प्रायोऽर्थे प्रभाते च । पि अप्यर्थे । पिव इवार्थे । पिहं, पिहु, पिहो, पुढो, पृथगर्थे । पुण, पुणौ पुनरित्यर्थे । पुरच्छा, पुरस्था, पुरे अग्रे इत्यर्थे । पुरा, पुला पूर्वकाले अग्रेच । बहि, बहि, वहिया, वाह्ये । भंते पूज्यसम्बोधने । मिसं अतिशये । . भुज्जो भूज्जो वाहुल्ये । भे, भो सम्बोधने । मज्झे मध्ये । मणयं, मणा अल्पे । माहं निषेधे । मिव इवार्थे । मिथो परस्परस्मिन् । मुसा असत्ये । मुहा निष्प्रयोजने । मुहु पौनःपुन्ये । य चार्थे । युगवं एककाले । बह रहो एकान्ते । राओ रात्रावित्यर्थे । रिते विनार्थे । वि अप्यर्थे । विव इवार्थे । विसं वीसु पृथक्त्वे । व्व इवार्थे । 'सई सकृदथें सदार्थे च । संपइ, संपयं एतत्काले । संपाओ प्रभाते । सक्खं प्रत्यक्षज्ञाने । सणिभं रानैरित्यर्थे । सद्धिं समं सहार्थे । समंतं समंता सर्वप्रकारेणेत्यर्थे । सयं सकृदित्यर्थे स्वयमित्यर्थे वा । सययं सतते । सयराह सत्वरमित्यर्थे । सायं सूर्यास्तमनसमये । सुइ दीर्घकाले । सुए अनागतदिने । सुद्छ सौष्ठवे उतरं सहजत इत्यर्थे । सेवं तदेवमित्यर्थे । हंता स्वीकारे । हंद आश्चर्यार्थे । हंदि, हंभो आमन्त्रणे, क्रुद्ध बोधने विकल्पविषादपश्चात्तापनिश्चयेषु च । । हउँ हा इत्यर्थे । हणि हाण प्रतिदिनम् । हद्धी खेदे । हन्वं शीघ्रतायाम् । हिजो अतीतदिवसे । ही आश्चर्ये । हुरत्था बहिर्देशे । हुलियं शीघ्रतायाम् । हे सम्बोधने । हु, हेट्ठा, हेट्ठि, हेडिल्ला नीचदेशे। हे, हो, आमन्त्रणे ॥ अत्यादय उपसर्गाश्च । १।१।३॥ अत्यादय उपसर्गसंज्ञा अव्ययसंज्ञाश्चस्युः ।

m जैनसिद्धान्तकौमुदी अति, अइ, अणु, अनु, अधि, अहि, अभि. अच, उंच, आ, ओ, उद्. उप, उब, णि नि, णिं, निर दुर्, प. प. पडि, पति, परा, पार, पलि, त्रिपम् एतेऽत्यादयः । अत्यादय इति चकारोऽत्राव्ययसंज्ञासमावेशार्थः । तेनोभयसंज्ञाः भवत्येपामत आ तत्रोपसर्गसंज्ञा क्रियायोगेऽव्ययसंज्ञातु क्रियायोग - विनापोति विशेषः । अनि, नई उत्कोतिशय गणादिमु । अणु, अनु, पश्चात्सादृश्यसमीपलक्षणार्थेषु । अधि, अहिं, अधि, अहिं अधिकरणाधिकाराबर अभि आभिमुख्यादौ । अथ उव. निश्चयावंगत्यनादरालम्बनादिषुः । सम्यगादौं । ओ. अववत् उादौ । उप,उव समीपादौः। श्रोव व्ववत् । ओंशब्दस्यापि समीपादौ वृत्तिः, णिनि निषेधादार श्रमावे निश्चयादौ । दुर पीडादौ । पप्प प्रकर्षाडौ। पडि पत्ति, न्याप्रिलक्षणादों पर प्राधान्यादौ । परि, सर्वत्रादौ । वि, वियोगादौ.॥ सोप्रभृतितद्धिताः।१।१३६ ॥ सोप्रभृतितद्धितप्रत्ययान्ताः शब्दा अव्ययसनाः स्युः । कमसो इत्यादयः ।। जो प्रभृतीति- अव्ययमित्यनुवर्तते । प्रभृतीति कथनेन स्स स्मि ह ह हा हि अम् आ आवन्ति इ इण इराण इह ई ए क्खुचो चणं चि चिया एहं सिंह राहु ना ति तो त्यत्वं दा दाणि धा.या सि हिय इत्यादि तद्धितप्रत्ययान्तानामपि अव्ययसंज्ञा भवति । अत्र प्रत्ययप्रणारिभाषया. तदन्तविधिः यद्यपि संह विधौ अन्यत्र प्रत्यवग्रहणे तदन्तविधिन तयाधि प्रयोजनं सर्वनामाव्ययसंज्ञायामिति वचनात्तदन्तविधिः केवलयोः कृत्तद्धितयोः संज्ञाया निकलवात् । अब एवोक्तप्रत्ययान्तेभ्यः शब्भ्यः परस्य सुपः "अव्ययासे वल्यमाणसूत्रेण लोपो भवति । कमसो क्रमश इत्यर्थे । सोप्रत्ययान्तोऽयं शवः । एवं बहुतो, दवदवस्स, एकस्सि इत्यादयः॥ हेत्वादि कृतः १ । १।३६ ।। हेवादिकृत्प्रत्ययान्ताः शब्दा अव्ययसंज्ञकाः स्युः ॥ गच्छित्तए । गच्छित्ता । अभिगन्द गणि। पेतुं । गहिउँ । पागहिं तु । नेऊण । मंजिऊणं । गमेऊण । पडिविसजिय। उस्सक्किया किच्च । किच्चा । कटु । उवागम्म । पकत्थ ॥ हेत्वयनि-अन्ययमित्यनुवर्तते। हेतुरर्थो येषां ते हेवास्त आदयो येषां ते हेत्वर्थादयः । ते च विप्रहः । उदाहरणन्तु क्रमेण मूल एव स्पष्टम् । अत्रापि पूर्ववचदन्तविधिः । अव्ययीभावश्च । ११॥ ३७ ॥ अव्ययीभावोऽव्ययसंज्ञा स्यात:। अध्ययोभावइति-भव्ययमित्यनुवर्तते । जदाहरणच मूल एवं तत्प्रकरणे प्रदर्शयिो । इत्यन्यव प्रकरणमा

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Jainsiddantkoomudi Purvadda

Author
Muni, Ratnachandra
Title
Jainsiddantkoomudi Purvadda
File name
Jainsiddantkoomudi Purvadda
Text
OCR done
Citation
1935
Published
2009/11
Publisher
Jaipur, Nagarajaji Nahar
Language
Sanskrit
Pages
74
Library
Sanmati Library
Classification
Jain sahitya
DLI number
344374
Barcode
99999990234241.00
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Banasthali University
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