Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Prakrit Grammar Of Hemacanra
Front matter
घोर तपरवी कर्नाटक गजकेसरी
श्री गणेशलालजी म. सा.
का
जीवन - चरित्र
लेखिका-
सर्वशास्त्र-पारगता पडितरला प्रतिनिजी
क्षमामूर्ति पूज्य श्री १००८ श्री मानकवरजी महामतीजी मा सा की
सुशिप्या- वा. द्र सिद्धान्ताचार्य साहित्य-रल
प्रभाकुँवर जी म. सा.
प्रका-
पत्रासालबोरावरमल वासनी
तिवरण (पुसद)
मुद्धक
६म रानडे
धाशा मुद्रण
अकोला
EXCE
सौ. फुलाबाई पासणी की मठाई की
तपश्चर्या के अपलसमें सविनय सप्रेम भट
DECE
SEX
प्रपमावृत्ती
वीरान्द २४८९
विकमाय२१९
बनी सन १९६६
मूस्य
मनुपरम
५मपवास
F
ॐ गुरुदेवाय नमः समर्पण जिन महा दिव्य ज्योतिने ज्ञानका प्रकाश देकर जीवनको प्रकाशमय बनाया, पंच महावतरूपी अमूल्य रत्ल देकर दारिद्र आत्माको राजा महाराजाओंकी वंद- नीय वनामी, त्यागका मार्ग, मोक्षका सुपथ दर्शाकर कृतार्य किया, मेरे जीवन-वाटिकाके फूलोंमें सद्गुण- रूपी सौरभ भरा, सद्गुरुनाथका जीवन-चरित्र लिखनेकी प्रेरणा दी, ऐसे परमपवित्र प्रवर्तनी पदालंकृत सर्वशास्त्र-पारगत पंडित रत्ना पूज्य श्री गुरणोजी मानकुंवरजी महासतीजी के वरण-कमलोमें सादर समर्पण । बा ब. म. प्रभाकुमारी जैन-सिद्धान्ताचार्य, सा० रत्न, विशारद.
श्री गणेश अष्टक
मपर सुवीरं वीरभूमी अजमत्, सुकुल ललवाणी मातुमूली सुकुक्षी
एजनियमि पूर्ण चंद्रो पिताश्री अवतरित भीलाडापूरी पावित्र्य क्षेत्र ॥१॥
सतत पातापाद्दीन तापापहारी असन वसन शुदिरेषणा इष्टकारी।
सव परण पुलिरष्ट कर्मापहारी गणपति गणश यच्छतु वाछित मे ॥२॥
निरत सतत घ्याने ज्ञान सम्यत्व दृष्टि तिमिर गलनवीपोखर पाखतकारी
कलीमल कुष्टिघ्नंतु अकोऽदितीय यवतु ज्योतियातिदाता गणेश ॥३॥
उदयति पदि वारा पक्षकोटसस्या न किमपि तमिव दूरी का समर्थ
गगन सधन ध्वान्ते पूर्ण बद्रोभवत ददतु ददतु सोस्य सौस्यदाता गणेश ॥४॥
श्रीमतमीहपां गुणिन प्रशस्तम्
गर्दा सुरक्षां कृतवानितान्तम्
नेत्रादमृत निवरा वह तम्
शरीर-सौम्य वर कीतिकान्तम ॥५॥
गुण निकायं विलसत् हृदन्तम्
रुणद्धि अशिष्ट पप प्रया चम
वक्ता सुस्पष्टं विदुषा महन्तम्
रराज ते प चिदुल्लसन्तम ॥६॥
चञ्चलमा घुच्च गुणान् परन्तम्
रलयं शाति वधू वहन्तम
णस्थान मुद्यद दुरित हन्तम
पचेषु मुख्यारि गर्ण जयन्तम
कर्पूर भासा यशसा स्फुरन्तम
जभारि पूज्य प्रतिम भदन्तम्
दे मदा सौस्य लता वसतम्
देवेद्र वद्य मनिराड भवन्तम् ॥८॥
इत्यं सस्तुति मागमज्वल गण-प्रामाभिराम स्फुरत्
कीतिस्त्व गमितो गणेश मुनिराड विघ्नान विनष्टु सय
मुस्प स्वकमाम पोडा दळांमोजन भरया मया
कर्नाटक सरीयि जय देहीति में प्रार्थना ॥९॥
॥७॥
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श्री गणेश अष्टक का भावार्थ
हरिगीत
वीरोकी है जो खान, ऐसी मरुस्थली सु-भूमिमें ।
ललवाणी कुल उज्वल किया मात धूली कुक्षीमें ।।
पूर्णचन्द्र पिताश्री, रजनि चतुर्य याममें ।
अवतार लिना आपने, परम विलाडा ग्राममें ॥१॥
लेके दीक्षा तपतेजसे, दीनोके दुख हरते रहे ।
आहार-वस्त्र-एषणामें, निशदिन सजग रहते रहे ।।
आपके चरणोकी रज, अष्ट कर्म हरती सदा ।
हे सघ नायक गणेश गुरु, मुझे दीजिए वाछित मुदा ॥२॥
शुक्ल धर्मध्यान अरु, सुदृष्टि सम्यकज्ञानमें ।
मिथ्या तिमिर हरण, दीपक दक्ष पाखड निरासमें ।
कलिकालमें कुदृष्टि मेटन सूर्य सदृश आप थे ।
दीजिए श्री गणेश सुखको, सौख्य दाता आप ॥३॥
लाखो करोडो तारिकाएँ, उदय होती आकाशमें ।
समर्थ हो सकती नही, स्वल्प तिमिर नाशमें ॥
चद्रसम थे आप श्री, जैन मत प्रकाशमें।
दीजिए श्री गणेश मुझको ज्ञान ज्योति कलिकालमें ॥४॥
काति अरु कीतिसे युक्त, गुणियोमें श्रेष्ठ आप थे।
गौओकी रक्षा करन तत्पर, रहते हरदम आप थे।
-सुदर सुनेत्रोसे सदा, अमृत झरता आपके ।
सौम्यता काति हमेशा, देहसे झलकती आपके ॥५॥
बाप हृदय, गुणीका बास बहनिश करता रहा।
कुमाग गामी व्यक्तियोंको सुमागपर लाता रहा ॥
स्पष्टवक्ता बाप और विद्वानभी महान ५ ।
पित्त रहता था प्रसन्न और तपसे कातिमान थे ॥m
शांति क्षमादि धमदशको पालते शढ़ भाषसे ।
भान दर्शन चारित्रयको रसते प्रण प्राणसे ।।
सयम सु-हमें वास करते शांति वधू रहे सायमें ।
इद्रिय विषयको जीतके पर ध्यान रहता मोसमें ॥७॥
पवेत कपुरसम शुष यशसे बाप ददिप्यमान थे।
देवताके वदनीय गुरुराज आप महान ये ॥
सुख लक्षामें वास करते कर नाश पापोंका सभी।
पदन में करती भापको बानद मगन होकर अभी New
इस तरह स्तुति मासे शुभगुण प्रकाशित हो रहे ।
विघ्न विनायक श्री गणेश मुनिराज प्रसिद्ध हो रहे ।
शुद्ध भक्तिसे मन कमसमें नाम अंकित है किया।
फ्नाटक गज केसरी तेरा शरण मैने लिया ॥९॥
इस ग्रंथके प्रकाशक- Hy Adamad दानवीर सेठ श्रीमान पन्नालालजी मा रेदासणी प्रकाशक की ओर से प्रिय सज्जनो, जब पृथ्वीपर अनाचार फैल जाता है तब लोग धर्मको भूलकर अधर्म को अपनाते है । सम्यक्त्व को छोड मिथ्यात्व को अपनाते है । ठीक मिसीसमय महापुरुष वहाँ पधारकर भूले हुवो को मार्गदर्शन करते है। अिसो अनुसार हमारे पिछडे हुये विभाग में गुरुदेव की कृपासे सर्वशास्त्रपारगता पडितरला प्रतिनिजी क्षमामूर्ति व पूज्य श्री १००८ श्री मानकंवरजी महाराजसाहब का आगमन हुवा। आपने ज्ञानरूपी अमृत पिलाकर समाजमें जागृति निर्माण की। आपकी गुणोसे युक्त शिष्य मडली सेवाभावी सरलस्वभावी श्री धनकवरजी महाराजसाब, बाल ब्रह्मचारी शास्त्रविशारद विदुषि मधुरव्याख्यानी श्री पुष्पाकँवरजी महाराज साहब, ज्ञानअभ्यासी श्री धिरजकंवरजी महाराजसाहब, बाल- ब्रह्मचारी सिद्धान्ताचार्य साहित्यरत्न श्री प्रभाकवरजी महाराजसाब, विद्याभिलापि जैनसिद्धान्तप्रभाकर श्री प्रमोद कवरजी महाराजसाब आदि सती वृदने लोगोको योग्य मार्गदर्शन कर, अनको जैनत्व का असली परिचय करवाया । और साथहि बाल ब्रम्हचारी सिद्धान्ताचार्य साहित्यरल श्री प्रभाकँवरजी महाराजसाबने गुरुदेव का चरित्र यहाँपरहि लिखना- प्रारभकर सम्पूर्ण किया। आप बडी विद्वान तथा शास्त्रपारगता है । आप कभी भाषाओं जानती है । जिनमेंसे हिन्दी, मराठी, संस्कृत, इग्रजी, प्राकृत, गुजरायी और थोडी भुर्दू आदि । आपने आयु के चौदहवे वर्षहि दीक्षा अगीकार की। आपने बहुतसे जैन तथा अजैन शास्त्रोका अध्ययन किया है। आपकी व्याख्यानशैली असामान्य है । नामके अनुसारही जनताको प्रभावित कर देती है। असे महान विभूति द्वारा लिखा हुवा चरित्र पाठकोके करकमलोमें देते समय हमें बहुत हर्ष हो रहा है । आशा है कि यह चरित्र पढकर पाठकगण श्री गुरुदेव का आदर्श तथा शिक्षा अपनायेंगे । सतीयाजीको हार्दिक बधाई है। तिवरंग विनम्र भवरलाल बोथरा, प्रकाश बडेरा. । दिनाक २८-१२-६२
प्रकाशक का संक्षिप्त परिचय
पिसपाटा असंख्य फूल खिलते है । और ऐसेही खिलते
और भगत, सब फूल परतीमकि गोदमें समा जाते है। लेकिन
भोप भो जीवनको परवाह न कर अन्यों के उपयोगमें आते है
aningषारते ह अपने आपको दुमरोंको भनाईमें अपण
reat उहीका जीपन सार्थक होता है।
और जो पुष्प दुसरोंकी कुछभी भलाई नहीं कर सकते दुसरों
सजीवामें उत्साह नहीं भर देते जिसकी पवित्रता भन्योंकि दुबके
भाग नही पोषकती उन पुष्पोका जीवन निरपक है।
पही पात मनुष्य के विषय नही पा सकती है। जो मनुष्य दुसरोंकी
र बिषयमें कुछ सोचता हो दुसरोको भलामीरे साथ साथ जिसके
राभपोषातिरी कुछ भलाई हो अपना वा गौरवशाली
कुमका नाम उषा हो असे कृत्य परसा हो उसी मार
साक है।
मनुष्यका जीवन फूलको तरह विकसित का है
परिपूर्ण है। परन्तु यदि इन सब गुणों का उपयोग बम्प
गही स्तिो असका जीवन
दानवीर सेठ श्रीमान् पन्नालालजी सा. रेदासणी की आदर्श पत्नी F e- . + ८ + NA " + । . 4 7 , 3 श्रीमती फुलबाई रेदासणी
नो
असे
महानुभावोका जीवन धारण करना कुछ सार्थक होता है। हम
यहाँपर जिनके जीवनको साधारण कल्पना आपको देनेका प्रयत्न कर रहे
है, उनका जीवन भी उक्त आदर्शोसे परिपूर्ण है ।
आबीए, असे गुणोंसे परिपूर्ण प्रकाशक महोदयको मै आपसे परिचित
करवा दूं।
दानवीर, श्रद्धेय, श्रीमान सेठ पन्नालालजी सा रेदासनी, स्थानकवासी
जैन समाजके मुत्रावकने मवत १९४८ सन १८९१ को तिवरग
(महाराष्ट्र) बीम ग्राममें जन्म लेकर रेदासनी कुलको अज्वल किया।
आपके पिता श्रीमान स्व मेठ जोरावरमलजी भी महान धार्मिक तथा
उच्च आदर्शोवाले व्यक्ति थे। आप मूल निवामी राजस्थानमें 'पी'
(थावळा) के है।
ठाणा
-
म्ब पूज्य श्री गणेगलालजी म
सा. के आप अनन्य भक्तोमैसे
एक है । आपने सर्व शास्त्र पारगता, पडितरला, प्रवर्तिनीजी,
भमामूर्ति, पूज्य श्री १००८ श्री श्री मानकुंवरजी म सा. आदि
६ का वाल पीपरी में अद्वितीय चातुर्मास करवाकर
समाजको जानरूपी लाभ दिलवाया । तिवरगही चातुर्मास करवानेकी
आपकी वडी इच्छा थी, परतु कुछ नैसर्गिक आपत्तियोसे वह पूरी नही हो
सकी। असकी पूर्ति शेवाल-पीपरी चातुर्मास करवाकर की । आप बडे सरल
स्वभावी, दयालु तथा परोपकारी है। किसीका दु ख अपनाही समझकर
अमे निवारण करते है । आपने अपने जीवन में ऐसे अनेक सत्कार्य किए
जिनका यहाँ वर्णन करना मेरे लिए असम्भव है । कुछ मुझे ज्ञात है वह
यहाँ देता हूँ।
दगड धानोराके (१९३०) के डकैती केसमे डाकुओके गोरोहको
पकडवाने में आपने पुलीसकी बहुत सहायता की जिसके उपलक्षमें पुलीसकी
ओरसे सर्टिफिकेट (प्रशस्तिपत्र) प्रदान किया गया ।
सन १९४७-४८ में जब भारत और पाकिस्थान विभाजित हुए, मुस समय हिंदु और मुसलमानोंमें जातीय दगल मच गया था। निधाम स्टेटके हिंदुओंपर मुसलमान ( साकार ) बहा अत्याचार कर रहे थे। बुस समय बापने निझामस्टेटकै बहुतसे हिन्दु परिवारों को आश्रय दिया। बापका लक्ष्य दानधमकी और पहलेसेही है। तिवरग मे खेत एक जगह पक्षियोके लिए बाप अनाज डलवाते है। बापका हृदय बहुत कोमल है। दुखियोंको देखकर जल्दी द्रवित हो पाता है । देहाती गरीब लोगोंको हरदम अन्न, पन तथा जाडेमें मोढनेक कम्बल देकर आप अनवी सहायता करते ह । बापन कुछ विद्याषियों को विद्या प्रदानकर बहे उपन्त दिया है। मापन दो निरपराध गरीब व्यक्तियोको प्रयत्नोंकी पराकाष्ठा कर उन्हें फांसीकी शिक्षासे मुक्त किया । शुनसे अभी भी एक व्यक्ति जीवित है। और मानदसे जीवन व्यतीत कर रहा है। बहुससे पार्मिक कार्यो में आप अपना सहकाय देकर उन्हें पूर्ण करते है। आप अपन जीवनम पानादि कार्योम हरदम अपसर रहे है। और बहुतसा दान दिया है । बापने चारह प्रतोंको प्रवरूपमें ग्रहण नहीं किया है फिर भी सुचारु रूपसे पालन कर रह ह । पापको अपहारिकता सादगी तपा उदारता हमारे लिए अनुकरणीय है। थापकी बादर्श धमपरली श्रीमती फूलबाई जिन्होने शेवालपीपरीके रायसोनी' परिवार बम लेकर दोनों पुलोंको उज्वलित किया है। माप सैठ साहब अनुकूल सब गुण पाय पावे है। धर्ममें माप अच्छी कची रखती है। माप मामानरूप फूलके समान हरदम संतुष्ट मार पाती है । आप स्थानीय महिला समाज में प्रमुख अग्रणीय है। पाकि बाद बनेका माप पालन करती है और उनको अपने अंगीकार भी या है। आप आदर्श श्राविका है । आपली माय माग ६५ वर्षकी wwe
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ग्यारह
होने परभी आप अपने सब कार्य स्वय करके अन्योको प्रेरित करती है।
और इस आयुमेंभी पूज्य गुरुणीजीके सानिध्यमें आपने अठाइकी तपश्चर्या
की है । आप विवेकशील, व्यवहारकुशल एव धर्मनिष्ठा है। आपको एक
पुत्ररत्न तथा एक कन्यारत्न प्राप्त हुवा था, परन्तु प्रकृतीने उनसे
सुख प्राप्त करनेका अवसर नही दिया । फिरभी विगतकी शोकपूर्ण
घटनाओको कभी न दोहराकर आप हरकार्यमे उत्साहसे भाग लेती है।
आज ऐसीही महिलाओकी समाजमे आवश्यकता है। आपकी
धर्माभिरूची एव ज्ञानरुची अनुकरणीय है।
अन्तमें, मै झुन महानुभावोका आभारी हूँ जिन्होंने मुझे असे
पुण्यात्माओके वारेमे दो शब्द लिखनेका अवसर दिया ।
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घरमचद बडेरा, वी. कॉम..
दस सन १९४७-४८ में जब भारत और पाकिस्थान विभाजित हुए.. भुस समय हिंदु और मुसलमानोंमें जातीय दंगल मच गया था। निशाम स्टेटके हिंदुओंपर मुसलमान ( रझाकार ) बा अत्याचार कर रहे थे। सुख समय मापने निझामस्टटके बहुनसे हिन्दु परिवारोंको बाश्रय दिया। मापका लक्ष्य दानधमकी और पहलेसेही है। तिवरग मे खेतम एक जगह पक्षियों के लिए बाप अनाज डलवाते है । आपका हृदय बहुत कोमल है। दुखियोंको देखकर जल्दी द्रवित हो जाता है। देहाती गरीब लोगोंको हरदम मन्न वन तथा जाडेमें मोढनके कम्बल देकर भाप सुनकी सहायता करते है । मापन कुछ विद्यायियोंको विधा प्रदानकर उहे उपकृत किया है। आपन दो निरपराध गरीब व्यक्तियोको प्रयत्नोंकी पराकाष्ठा कर उन्हें फांसीकी शिक्षासे मुक्त किया । अनसे अभी भी एक व्यक्ति जीवित है। और आनदसे जीवन व्यतीत कर रहा है। बहुतसे धार्मिक कार्योंमें आप अपना सहकाय देकर उन्हें पूर्ण करते है । भाप अपन जीवनमें दानादि कार्योमे हरदम अप्रसर रहे ह । और बहुतसा दान दिया है । मापने बारह प्रतोंको बतरूपमें ग्रहण नहीं किया है फिर भी सुधार रूपसे पालन कर रहे है । आपकी व्यवहारिकता सादगी तथा उदारता हमारे लिए अनुकरणीय है। आपकी बाबा धर्मपली श्रीमती फूलबाई जिन्होने वारुपीपरीके रायसोनी " परिवारमें जम कर दोनों कुलोंको उज्वलित किया है। आपमें सेठ साहबके अनुकूल सब गुण पाये जाते है । धर्ममें बाप बन्छी कची रखती है। बाप नामानुरूप फूलके समान हरदम सतुष्ट नजर बाती है। बाप स्थानीय महिला समाज में प्रमुख बनणीय है। भादकोंक बारह पोंका माप पालन करती है और उनको व्रतस्ममें अगीकार भी किया है। बाप मादध याविका है । आपको वायु आज ६५ वपकी
ग्यारह
होने परभी आप अपने सब कार्य स्वयं करके अन्योको प्रेरित करती है।
और इस आयुमेंभी पूज्य गुरुणीजीके सानिध्यमें आपने अठाइकी तपश्चर्या
की है। आप विवेकशील, व्यवहारकुशल एव धर्मनिष्ठा है । आपको एक
पुत्ररत्न तथा एक कन्यारत्न प्राप्त हुवा था, परन्तु प्रकृतीने उनसे
सुख प्राप्त करनेका अवसर नही दिया । फिरभी विगतकी शोकपूर्ण
घटनाओको कभी न दोहराकर आप हरकार्यमे उत्साहसे भाग लेती है।
आज ऐसीही महिलाओकी समाजमें आवश्यकता है। आपकी
धर्माभिरूची एव ज्ञानरुची अनुकरणीय है।
अन्तमें, मैं अन महानुभावोका आभारी हूँ जिन्होने मुझे असे
पुण्यात्माओके बारेमें दो शह लिखने का अवसर दिया ।
आकोला
२६ जानेवारी ६३
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घरमचद बडेरा, वी. कॉम.-
" णमोत्थुण समणस्स मगवो महावारस्य" प्राक्कथन सूरतसे कीरत बरी बिना पख उड़ जाय । सूरत तो जाती हो कीरत कमून जाय॥ फोटा सम्प्रदायके प्रतिनीजी स्मा. जन स्थवीर महासतीयांजी क्रिया पात्र बागम पारगत पहिवरला तपस्वी गुणनिधी समा मुनि श्री श्री १००८ मानकुंवरजी म. सा अपने अन्य सुशिष्यासहित इस विमाप विषरने लग, तब आपने यहापर पातुर्मास करना निश्चित किया। एसा करनमें बापके प्रकृतिनमी साथ दी। आपके साथ सेवाभावी सरल स्वभावी श्री धनकवरजी म. सा. बालवाचारी शास्त्र विषारद विदुषी मधुर व्यास्मानी श्री पुष्पाकवरजी म. सा ज्ञान अभ्यासी थी पिरजकुवरजी म. सा , बालबाचारी सिदान्ताचार्य साहित्यरत्न थी प्रभादरजी म. सा. विद्यामिलापी अन सिद्धांत प्रभाकर थी प्रमोद वरजी म. सा. है । जैसे तो अभी महसतीयाजी मोगी, त्यागी सरसस्वभावी अणगार गुणोंसे परिपूर्ण है। लेकिन थी पुष्पाक्वरजी म. सासयापी प्रमागरजी म. सा. के वाणीमें भिन्न भिन्न प्रकारका ओज है। श्री पुष्पा परजी म. सा. के पाणीम जितनी मधुरता बानी है अतनिहि पित्ताकी प्रखरता श्री प्रभापरजी म. सा. के धाणीमें प्रगट होती है। थापकोंके बिनती को मान देकर थी १००८ पूज्य प्रतिनिजी गुरुणीजी म. साने धावकोंकी इच्छा पूर्ति के लिये पूज्य स्व गुरुदेवका जीवन चरित्र लिसनेका भार भैसे प्रभावी वक्ता श्री प्रभाकवरजी म सा वो बोपा । वैसे तोपिसी महापुरपका जीवन परिष लिखना कठिन काम है। मैकौन धार्मिक महापुरुषोंका जीवन-परित लिखना अति कठिण काम है।
तेरह कारण अतिहासिक महापुरुषोके जीवन कार्यकी सुसबद्धता सुलभतासे प्राप्त हो सकती है। धार्मिक पुरुषोके वारेमे यह अति कठिन कार्य है । यह कार्य महा० लेखिकाने पूर्ण करके स्वर्गीय गुरुदेव के भक्तजनोपर महद् अपकार किया है। स्वर्गीय गुरुदेवका चरित्र यथार्थ रूप में समझनेके लिये निम्न लिखित विषयोको सही तौरसे समझना होगा। आज गुरुदेवके जो अनुयायी है, अनमें जो शकाये निर्माण हो रही है अनका कारण यह है कि स्व. गुरुदेवके कार्यों को सही रूपमें समझाहि नही और स्व गुरुदेवने जो त्यागमय जीवनका अपदेश दिया अन तत्वोकोमी सही अर्थ में समझा नही असा जान पडता है । जिसके दो कारण हो सकते है। (१) गुरुदेव को जितना समय मिलाहि नही, सुनके पवित्र हृदयमें एकहि लगन थी कि अधिक से अधिक जैन जनता को सत् पथपर किस प्रकार लाऊँ, अिसलिये अनके कार्यको विपद रूपसे समझानेको समय अपुरा था। (२) दुसरा यह कारण कि लोग गुरुदेव को शका या प्रश्न पूछनेमे बहुत डरते थे । यहाँतककि अगर कोई श्रावक गुरुदेव से प्रश्न, शकानिवारणार्थ पूछते थे तो अन्य श्रावक असे दबा देते थे। मेरेपरभी जैसाहि प्रसग गुजरा। स्वर्गवासके कुछहि महिने पूर्व गुरुदेव ढाणकी से विहार करते-करते यहाँपर पहुंचे। मिथ्यात्व, मुर्तिपूजा आदि विषयोपर मैने प्रश्न पूछ । जो श्रावक अस समय उपस्थित थे, उन्होने मुझे असा करनेसे रोकनेका प्रयत्न किया। लेकिन मनुष्य अगर पवित्र अत करणमे विनययुक्त होकर शका पूछे तो डरनेका कोई कारण नहीं रहता। स्व. गुरुदेव ने बडी उदारतासे शात चित्तसे मेरी शकाओका निरासन किया। यह चर्चा करिबन २ घटेतक चली। हाँ, तो जिन विषयोको समझना जरुरी है वह यह है । (१) अस समय समाजकी धार्मिक स्थिति (२) जैन धर्मका स्वरूप (३) जैन साधु (४) मिथ्यात्व (५) गुरुदेव का कार्य (१) जिस समय स्व गुरुदेवने भगवती प्रवज्या पू महासत त्यागी श्री श्री १००८ प्रेमराजजी म सा के पास वी मवत १९७० मिगसर बौदह सुष नवमी को ली भुस समय श्वेतावर स्था बैन समाजमें मिष्यात्वका दौरा दौर था। जन कहलानेवाले जन वर्मक तत्वको अच्छी तरहसे जानतेहि नही थे। किताब पढते समय बिस बात काबान हो जाएगा कर्नाटक मराठवाग मिस विभागक बोसवालोंको नषफार मंत्री पूरा नही माता था। वे जन साष सतीको किस प्रकार पाहार पाणी बहराये यह शान कहाँसे हो । अधिकांश जन जनता एकान्त पमकाहि पालन कर रही थी। उपवास करना और माला फेरना बितनाहि जानते थे। जैन जातिमें उत्पन्न होनसेहि वे लोग जैन कहलाते थे। आत्माभिमान वो मही के बराबर पा । जैसी परिस्थितिमें बोर विसी विमागमें स्वर्गीय गुरुदेवने पषिक प्रमाणमें अपना कार्य जारी रखा। और कर्नाटक केसरी अपाधि से जन जनताने मलकृत किया। (२) हम सूदको जन कहलाते है। लेकिन हमारा पम अन्य घाँस वैदिक इस्लाम धिरचन, पारसी पशिक नैयाधिक मादिसे किसप्रकार मित्र है और हमारे क्या मूलतय है यह हम बहुत कम प्रमाणमें जानते । बैन थम पानिक मात्मवादी पुरुपायवादी विकासवादी कमवादी क्रियावादी शोकवादी है। बिन समीका स्पष्टीकरण विचारपूण पाचाराग आदि मगप्रविष्टोंमें किया है।- भगवान महावीर स्वामीन आरसे करीवन२५० वप पूर्व कहा था कि शब्दरूपी पुद्गलमय है और विस तत्पर रेडियोका शोष लगा है। विज्ञान तो पहातक कूदनेका प्रयल कर हा २५०० वर्ष पूर्वके शव बेकत्रित करे। वनस्पती तथा जल में जीव है यह सबसे बडी देन ससारको जन धर्मावलबियोनेहि दी है। जन धमका कहना है कि मिस संसारमैं रूपि बार यज्ञपि बिन दो हवकि सिवाय कुछ नहीं है। बाग इन्हींको जीवाऽबीवाय बो ध पुष्र्ण पावासयोवहा । सदरो निग्जरा माक्खो सते य सदिया नव" य नवतत्त्व सत्य है। शिस प्रसारका कारण खावे हुए तीर्थकरोंने कहा कि जे गुणेथे मूलग से गुण तृष्णा हि संसार का मूल कारण है। बोर मह तृष्णा "मागास समा अणन्तिया है मिसिसिप इछाको तष्णाको ताबमें रखने के लिये अंतिम तीर्थकर भगवान बागार-अणगार, धर्मको प्ररूपणा पधराह करते समय फरमाया कि क्रोध, मान, माया, लोभ मिन कपायोंपर 'विजय प्राप्त करो और विजय प्राप्त करनेका मार्ग आगारों के लिये १२ तोका प्रतिपालन और निग्रन्थ, अणगारों के लिये पचमहाव्रतका पालन । यह पालन वाह्य तथा अभ्यन्तर तपोसे होता है। जैन धर्मका झुपदेश आत्माको ससारके सभी वधनौसे मुक्त करना है। और वह किस मार्ग से मुक्त हो सकती है असका अगोपाग में बहुत विस्तारपूर्वक वर्णन है। अगर हम सागरको घागरमें समाना चाहते तो जैन धर्मोके तत्वोको भी चार "म" में समाविष्ट कर सकते है। वह यह-अहिंसा अस्तेय अपरिग्रह और अनेकान्त । लेकिन अिन सब विपयोको निश्चय तथा व्यवहार- त्रयसेहि समझना चाहिये । नहि तो झुस विषयका अकान्तहि स्वरूप दृष्टि- गोचर होगा और एकान्त जन दृष्टिमें मिथ्यात्व है। मिसीलिये तो आधुनिक तत्ववेत्ता जैन धर्मको “समन्वयवादि" कहते है। भगवान महावीर स्वामिने उस समयके नास्तिकवादको, ब्रम्हवादको “ तज्जीव तच्छरीर वाओ" को "अक्रियावाद को," 'स्कववादको' 'नित्यवादको' 'नियतिवादको ' 'धातुवाद' को 'जगत् कर्तावाद' को, आदि ३६३ मतोका समन्वय किया और फरमाया कि यह सभी वाद किसी मेक अपेक्षासे कुछ हदतक सही है । लेकिन यह सभी वाद एकान्त होनेसे अपूर्ण है। ( देखो सूयगडाग सूत्र ) जिस प्रकार जैन धर्मका सक्षेपमें स्वल्प है। - (३) जैन साधुत्व:-सिस ससारमें कई जातीके साधु सत, पाद्री, मौलवी आदि नजर माते है । लेकिन जो त्याग, सयम तत्त्वपालन निष्ठा जैन श्रमणो मिलेगी वह अन्य किसी जातीके साधुओमें नहीं मिलेगी। कारण जैन सावु जब दीक्षा लेते तव उनका सपूर्ण लक्ष आत्मोन्नतीके तरफ, मोक्ष मार्गके तरफ रहता है। लेकिन जिसका यह अर्थ नहीं है कि जैन साधु अराष्ट्रीय साधु रहते है। मिस लिये छह काय के हिंसाको टालनेका अधिकसे अधिक प्रयत्न करना पड़ता है। जैसे सचित्त आहार चही लेना, कच्चा पानी नही पीना, किसीभी वाहन में बैठकर या अपना सामान लादकर प्रवास नही करना । किसीभी स्थानमें चातुर्मास छोडकर अषिकसे अधिक २९ दिनसे अधिक नहीं रहना। आदि नियमोंका पालन पालन अनिवार्य है। इसके व्यतिरिक्त वडी बोतपश्चर्या कोको निजंग करनेके लिम करते है। जिस ससारमें दो प्रकारके मनि पाये जाते है। क द्वन्यमे दुसरा मापसे । लिंग मात्रको धारण करनवाले द्रव्य मुनि और भाषको धारण करनवाले भाष मुनि । द्रव्य और मायके भेदसे चार प्रकारके मुनि पाय भावे ह । (१) दबसे सुप्त लेकिन मापसे जागृत (२) भावसे सुन लेकिन प्रष्यसे जागत (३) व्यसे जागृत व मावसे जागृत (४) और द्रव्यसेमी सुप्त और भावसेहि सुप्त-हमारे स्वर्गीय कथानायकनीकी गणना तीसरे प्रकारके मुनिमें होती है। कारण स्व गुरुदेव भावसेमी जागृत य और द्रव्यसेभी।द्रमसे तो यहांतक जागृत व कि स्वयं अप्रमादी व स्वावलवी थे। लेकिन जो भावक भापके घम परिषदम मा मापसे मिलनेको इच्छासे पाना चाहा तो असके महपर स्था अनियोंका चिन्ह सदोर महपसी होना अनिवाय था। माग चलकर बापन असा नियम बना दिया था कि जो भारतीय शख खादी के पोपाखमें ही सरपर ज्यादा माल न हो ससेहि बात करना | भावसे तो वे हरदम बागत रहते थे। भाचाराहम सूत्रके अध्याय ३ उदश १ सून १ में भगवानने फरमाया है मुता मणि समामणिणो जागरन्ति" मुनिने सदा जागृत रहना चाहिए। मोसमागसे जो विलिय नही होगा वह मुनि । मुनिन सभी कार्य यलपूर्वक करना चाहिय । हमारे स्व कथानायक लिन सभी आवरणो बति पागत रहते थे। वे पांच समिती तीन गुप्तिके धारक थे। बागमका पूरा अध्ययन होने के कारण निश्चम बोर व्यवहार स्थानपर योग्य नयकाहि अपयोग करते य । द्रष्याधिक नक्की जगह दव्या विक और पर्यायाविक नमकी जगह पापिक श्यका सदुपयोग करके जन समाजको अर्जन कायसे वाया। भजनोंकोमी भुमके-अनकै धम मदा रहकर पालन कामका आदेश देते थे। वस्तुका एमात रूमस कमी प्रति पादन मही करते था और यही बात बहुत कम मिप्यास्य त्यागी थपौंको समझी सा जान पड़ता है। कभी-कभी तो साइर छगता है कि गुरु- भयकी योग्य सतरह - । देवके भक्त कही एखादा नया पथ निकालकर न वैठ जाय । अिन सभी बातोपर श्री लेखिका महासतीजीने झुपमा अलकार सहित प्रकाश डाला है। स्व गुरुदेवके वारेमें एक प्रश्न जिसका कि लेखिका महासतीजीने अपने पुस्तकमें वर्णन नहीं किया है वह यह है कि वे एकाकी एकल विहारी थे। अपवाद के लिये श्री तपस्वी साधक श्री वमतीलालजी मुनी सरीखे सुनके साथ कुछ समयके लिये रहे होगे । वह बात अलग है। लेकिन अधिक दौरपर वै एकल विहारी रहते थे। तो प्रश्न यह मुठता है कि आचाराग सूत्रके श्रुतस्कन्ध एक, अध्याय पाच, उद्देश चार, सूत्र दो में भगवानने फरमाया कि " अय तेमा होऊ, येतत्ते मा भवतु " हे शिष्य, तू कभी भी एकाकी विहार करनेवाला नही होना । जैमी आना होते हुये भी महान् तपस्वी सर्व आगम पारगत क्रियापात्र " ज्ञान-क्रियाभ्याम् मोक्षमार्ग " के तत्त्वको जाननेवाले स्व पूज्य गुरुदेव एकल विहार क्यो करते थे? क्या अन्है पता नही था कि यह अकल्पनीय पथ है ? लेकिन यह पैसा नही था । कारण अन्य साधुजन अनके समान अकृष्ट क्रियावाले और नियमोका पालन करने में असमर्थ रहे। मिसलिये जो मुनि सुनके पास जाता था वह कुछ समय बाद अनमे अलग हो जाता था। सभी आचरणोको स्व गुरुदेव अच्छी तरहसे जानते थे। और जो ग्राह्य है असीको अगीकार करते थे। जैन शास्त्रोके बारेमें मेक वात स्मरण रखना जरूरी है कि साधु यह श्रावक के आचरणके सभी नियम अकहि सूत्र में नही गुंये गये । यद्यपि दशवकालिक और आचाराग साधु धर्मके मुख्य सूत्र है, फिर भी ठाणांग सुयगडाँग आदि सूत्रमें मुनियोके नियमोका वर्णन आता है । ठाणाग आदि सूत्र में चार प्रकारके मुनि कहे है । (१) श्रुत आगमसे अव्यक्त है। तथा वैसे भी अव्यक्त (२)श्रुत आगमसे व्यक्त है, लेकिन वैसे अव्यक्त (३) श्रुत आगमसे अव्यक्त है, लेकिन वैसे व्यस्त है। (४) श्रुत आगमसे भी व्यक्त है और वैसे भी व्यक्त है । जिसमें चतुर्थ- मंगके साधुको एकल विहार कल्पता है। कारण चतुर्थ भगवाला मुनि श्रुत मागमसे व्यक्त है । याने आगममें विद्वान है। तथा वयोवृद्ध है। वह आगमोसे सुसपन्न है, प्रतिमाओके धारक है । स्थविर कल्पि है तो . गणसे . जाम उतना एकारी विहार कल्पता है। असी में किसी प्रकारका दोप नहीं लगता। स्व पूज्य गुरुदेव में यह सभी गुण मौजद थे। पिसलिय शुनको एकाकी बिहार कल्पता था क्योकि- * স্নায়ু মু দিসই গীৰ মাল মুক্ত নাথ जो साधू भके भोजनके वो तो साधू नाय ! भगवानने फरमाया है मुमहि साहू अगहिसाहू साथ होता है अगुणसे असाधु । साधके लक्षण बताते हब दशवकालिक अध्याय ७ गाथा ४९ म कहा- नाण-दयण सपना सजमय तवेरय । एव गुण समा उत्त सजय साहू मालये ॥ पान ददान तप अिन गुणोसे जो अलमत है वह साधु है। विध्यारव यह विषय अति जटिल है। मिथ्यात्वपर जितना लिखा योडा हि है। गुरुदेवने मिप्यायको समलस उखाडनका झडा तो उठाया था लेकिन, कमको गति औरहि कुछ थी । मह काय अपूण छोडकरहि गुरुदेव थायथ्य पूर्ण कर देवलोक में पधार गय । यह विषय जटिल कहनका कारण कि जिन लोगोन मिध्यात्य का त्याग किया अनके सामने कई ससारित प्रा सम हो रहे है। जहाँपर वे लोग निणय नही कर पाते नही संयमें गिर जात । मिन सज्जनौमें कुछ लोग असे देखे गय कि 'मिप्याय के सही अथको भी जानत नही लक्नि, इतना जानते कि पत्थरी मूनिको नही पूजना । कारण क्या तो असा करनसे गुरुदेवको कृपा होगी और धन सपत्ती बढगी । सही दसा वाय तो यह कल्पनाही मिथ्या है इस विषयपर सैखिका महासतिजीन बहुत लिखा है वह भी मधिकार वाणीस इस विषयपर जितन पने रिख गय है अतन पन्ने फायहि बप पिछी एम विषयपर लिख गये होंगे। फिरभी भ भी मेरे पुछ विचार मापक सामन रख । सम्पर व और मिष्यास्स एक्मे विरोधी तत्व है। जैसा कि विरा महासतिगान माया व पौणिमानी रात है मिपाव अमाव उन्निस ? स्याकी " वैसाही, लेकिन मिथ्यात्व का अर्थ क्या और सम्यक्त्वका अर्थ 'क्या ? मिथ्यात्व याने झूटा तत्त्व याने जिस वस्तुमे जो भाव नहीं है, अस वस्तु मे वह भाव मानना । सक्षेपमें अरिहन्तके वचनोपर पूर्ण रूपसे श्रद्धा नही करना याने 'तत्त्वार्थ श्रद्धा' का त्याग । यह त्याग जिस 'प्रमाणमे अधिक होगा उतनाही मिथ्यात्व का जोर अधिक समझना । 'मिथ्यात्व यह अभाव ( NEGATIVE ) वाचक शब्द नही यह भाव ( POSITIVE ) वाचक शब्द है । अगर यह अभाव वाचक होता तो इस क्रियासे पापभी नही लगता था और पुण्यभी नही लगता था। लेकिन भाववाचक शद्ध होनेसे और पापमय मनोवृत्तिके तरफ लेजानेवाला होनेके कारण इसका त्याग करना अति आवश्यक है। यहाँ तक कि मिथ्यात्वी जीव कभी भी मुक्ति प्राप्त नही कर सकता। लेकिन मिथ्यात्व- त्याग कैसे किया जाय सम्यक्त्व ग्रहण करनेसे । सम्यक्त्व तो तभी ग्रहण हो सकता जबकि मिथ्यात्व का त्याग हो, यह एक बडी उलझन है और इस उलझन को सामर्थ्यवान गुरुका मार्गदर्शनहि हल कर सकता है। अिसी लिये गुरुदेव गर्जना करके फरमाते थे । धम्मो मगल मुकिछ अहिंसा सजमोतवो।" देवा वित नम सति जस्स धम्मे सया मणो ॥१॥ ससारमि अणते, जीवा पावति दुवई । जाव न करती धम्म, जिणवर भासिय पयत्तेण ॥२॥ अहो श्रावको, इतना श्रेष्ठ धर्म तुम्हारा है कि जिसको देवताभी नमस्कार करते है। फिर यह पत्थरके देव, देवीयाँ, भेरु, भोपा, यह सब 'मिथ्यात्वी देव तुम क्यो पूजते हो? वे देव तुम्हे क्या देनेवाले है जो स्वय असमर्थ है। सिर्फ जिनवरकाहि मार्ग असा है जो ससार भव से पार उतार सकता है। जैसा प्रचार करने का बडा भारी कारण था वह यह है कि जैनीयोने जैनत्व छोडकर तथा वीतराग प्रणित धर्मके आचरण को त्यागकर व्यवहारमे जैनधर्म सिद्धात विरोधी तत्त्वको अपनाने लगे। घरघरमें भेरु, भोपा, गणेश, हनुमान आदिकी मूर्तियाँ, पूजाअर्चा दिखायी देने लगी थी। यह परिस्थिति देखकर गुरुदेव का अत करण कपायमान हुवा । और गुरदेवने सब प्रकारके परिषह सह करके सम्यक्त्व बोस के प्रचारका अभिग्रह किया और सिप्रकार लसिकालीन लिखा 'भेस भोपा गुरुदेव के इदंगीद पर रहते म ' अस प्रकार परिस्थिती निर्माण हो गयी। भुले हय जनी फिर वीतराग प्ररूपित मागपर भाने लग गये। लकीन समय को यह बरदास्त नही हुवा और गुरुदेव को अपना कार्य अपूरा छोड़कर जाना पड़ा। गुरुदेवकी कमनी और करनी सरिती थी। इसीलिय समाजमें वे इवन पूजनीय हुमे । कपन तीन प्रकारका होता है। हेम उपादेय नम यान त्यागन योग्य अहण करने योग्य, मौर जानने योग्य । भव्य प्राणोपोंके उद्धार के लिये निगष्ठ नाय पुतन इन सभी तत्वोंका समन भरणीम उपदेश दिया । कारण सम्यक्त्वविना मोक्ष नहीं। धम्मक्य यान अनचा पान | जो बस्तु जैसी है उसको सम्यक दृष्टीसे देखना सम्यक बुद्धिसे जानना और सम्यक चारित्रसे भाचरणमें सुतारना । संयमका मूल पाया सम्यक्त्व और अयमको जानने के लिये जीव बजीव को जानना प्रमुन फरमाया है। जो बीवेनि न जाणई अजीदेवि न जाई जीवाऽजीवे बयाणतो कह सो नाहि मजमम यह जाननके लिय सच्चा देव सच्चा गुरु और सच्चे घम पर पता होना । लेकिन अपश्रद्धा जन धममें पुण्यके शिवाय पाप का माग है। इस विषयमें और एक बात ध्यानमें रकनकी है। वह यह है । गुष्वेवर्ने जिन-जिन भायों को मिथ्यात्व त्यागकै सौगन दिय भुनको पन तोमर प्रतिमाका तिरस्कार करो असा नहीं फरमाया देखो गुरुणीनी महासतीजी के पदोम- चीन प्रतिमा जीन सारखी कहे सो मिथ्या लोक प्रतिमाने प्रतिमा पहे माटो पहे सो भ्रष्ट अंमा गुरुदव पहते ५ अगर मिय्यासको हम मही अयमें समा जाय तो माज को प्रान निर्माण हो रहे है वे आपहिले माप हल हो जाएगा हमारे पानापकर पागेप्रमी थे। बापन जगह जगह गोशाला मुरबार जोयोग सा की। इस मानिक ममें बमकारोंपर कोई विशारा करे या नर लकिन लेविका महासतिमीन सी कई सत्य पटनामाका उल्लय लिया है बो भेष धमकार मालम होता है।
एक्कीस . । जीवनी मपूर्ण पढनेसे पाठकोको भलीभाँती ज्ञात हो जाएगा कि जिसमें गुरुदेवके जन्मसे अततक सभी विषयोपर लेखिका महासतिजीने पूर्ण रूपसे प्रकाश डाला है। किमीभी व्यक्तीका जीवन-चरित्र पढ़ते समय मन एकाग्र नही रहता। लेकिन विद्वान लेखिकाने मरल, सुगम प्रसादगुण युक्त शैलीसे जीवन-चरित्र लिखा है कि पढनेवाला अपन्यास सरिखा पढतेहि जाता है। उपमा अलकारो के वगैर एखादहि पन्ना खाली जाता होगा। जगह जगह योग्य संस्कृत तथा अग्रेजी कहावते देकर सुस विपयको अधिक प्रभावित और स्पष्ट किया है, यह लैखिका महा- सतिजीकी अक विशेषता है । और यह स्वाभाविक है । जव लेखिकाजीके गुरुणिजी हि असे है तब लेखिका महासतिजी असे क्यो न हो? क्योकि गुरुणिजीकि सुशिष्या | हिरोकि खदान मेंसे हिरेहि निकलेगे। आमके पेडको स्वादिष्ट आमहि लगेंगे। चद्रसे शीतल किरणेहि निकलेगी। जैसे वदनीय महासतिजी गुरुणिजीके असीहि मुशिष्या होगी। जैसे विद्वान प्रभावी लेखिकाके हाथसे जैसे महापुरुपकी जीवन-कहानी लिखी गयी अिमके लिये प्राक्कथन या प्रस्तावना लिखने के लिये अतनेहि योग्यताका विद्वान लेखक चाहिए था। मै न तो लेखक हूँ और न धर्मतत्ववेत्ता ! लेकिन यह जीवनी मिसी ग्राममें पूर्ण लिखी गयी । अिसलिये पू० गुरुणि- जीने मुझे आदेश दिया कि मै प्रस्तावना लिखू । इसिलिये यह लिखनेका वैर्य किया है । मालूम नहीं जिसमें कितनी तृटियाँ होगी । अतमे Lives of great men all remind us, We can make our lives sublime Icave behind us, Foot-prints on the sands of time - Long Fellow. इसलिये महापुरुपोके जीवन-चरित्र लिखे जाते है । सेवाल पिंपरी (विदर्भ) विनीत, चदनमल सोनी वकील H - And departiog, दिनाक ७११०१६२ BALLB.
बीस के प्रचारका अभिग्रह किया और विसप्रकार लखिकाजीने लिखा भर भोपा गुरुदेव के इदगीद पड रहते थे अस प्रकार परिस्थिती निर्माण हो गयी। भुले हुय जनी फिर वीतराग प्ररूपित मागपर पाने लग गये। मकीन समय को यह वरदास्त नहीं हुवा और गुरुदेव को अपना कार्य अधूरा छोडकर जाना पड़ा। गरुदेवकी कथनी और करनी सरिखी थी। इसीलिय समाजमें वे इतने पूजनीय हुये । कयन तीन प्रकारका होता है। हेय उपादेय ज्ञय पान त्यागन योग्य ग्रहण करने योग्य, मौर बानने योग्य । भव्य प्राणीयोके उद्धार के लिये निगष्ठ नाय पुत्तने इन पत्री तत्वोंका समय परणोमें उपदेश दिया। कारण सम्यक्त्वविना मोक्ष नहीं। सम्यक्त्व याने सच्चा ज्ञान । जो वस्तु बसी है उसको सम्यक दृष्टीसे देखना सम्यक बुद्धिसे जानना और सम्यक चारित्रसे आचरण बुवारना । सयमका मूल पाया सम्यक्त्व और सयमको जानने के लिये जीर अमीष को जानना प्रभुन फरमाया है। बो जीवेवि न जाणई अजीदेवि न जाणई जीवा जीवे अपाणतो कह सो नाहिईसजमम यह जाननके लिय सच्चा देव सचा गुरु और सच्चे धम पर पता होना । लेकिन अपनदा जन धर्म में पुण्यके शिवाय पाप का भाग है। इस विषयम और एक बात ध्मानमें रखनकी है। वह यह है कि गुरुदेवने जिन-जिन भाईयो को मिथ्यात्व त्यागके सौगन दिय झुनको जन तीयकर प्रतिमाका तिरस्कार करो असा नही फरमाया। वे तोपू गुरुणीवी महासतीजी के पागेमें जीन प्रतिमा जीन सारखी कहे सो मिथ्या लोक प्रतिमाने प्रतिमा कहे भाटो हे सो भ्रष्ट असा गुरुदेव कहते ५ अगर मिथ्यात्वको हम सही अयमें समा जाय तो मान जो प्रश्न निर्माण हो रहे है वे पापहिसे माप हल हो जाएगा। हमारे कथानायक कट्टर सारीप्रेमी थे। मापने जगह जगह गौशाला मुलवावर जीवोकी रक्षा की। इस बजानिक युगमें चमत्कारोपर कोई विस करे या न करे लेकिन लेखिका महासतिजीन भैसी कई खल पटनाश उल्लख किया है जो अंक चम'कार मालम होता है।
एक्कीस जीवनी सपूर्ण पढनेसे पाठकोको भलीभाँती ज्ञात हो जाएगा कि “जिसमें गुरुदेवके जन्मसे अततक सभी विषयोपर लेखिका महासतिजीने पूर्ण रूपसे प्रकाश डाला है। किसीभी व्यक्तीका जीवन-चरित्र पढते समय मन एकाग्र नही रहता। लेकिन विद्वान लेखिकाने सरल, सुगम प्रसादगुण युक्त शैलीसे जीवन-चरित्र लिखा है कि पढनेवाला अपन्यास सरिखा पढतेहि जाता है । उपमा अलकारो के बगैर एखादहि पन्ना खाली जाता होगा। जगह जगह योग्य सस्कृत तथा अग्रेजी कहावते देकर सुस विषयको अधिक प्रभावित और स्पष्ट किया है, यह लेखिका महा- सतिजीकी मेक विशेषता है । और यह स्वाभाविक है । जब लेखिकाजीके गुरुणिजी हि जैसे है तब लेखिका महासतिजी जैसे क्यो न हो ? क्योकि गुरुणिजीकि सुशिष्या | हिरोकि खदानमेंसे हिरेहि निकलेगे। आमके पेडको स्वादिष्ट आमहि लगेंगे। चद्रसे शीतल किरणेहि निकलेगी। जैसे वदनीय महासतिजी गुरुणिजीके असीहि सुशिष्या होगी। जैसे विद्वान प्रभावी लेखिकाके हाथसे जैसे महापुरुपकी जीवन-कहानी लिखी गयी जिसके लिये प्राक्कथन या प्रस्तावना लिखनेके लिये अतनेहि योग्यताका विद्वान लेखक चाहिए था। मै न तो लेखक हूँ और न धर्मतत्त्ववेत्ता! लेकिन यह जीवनी मिसी ग्राममे पूर्ण लिखी गयी । अिसलिये पू० गुरुणि- जीने मुझे आदेश दिया कि मै प्रस्तावना लिखू । इसिलिये यह लिखनेका धैर्य किया है । मालूम नही जिसमें कितनी तृटियाँ होगी । अतमें Lives of great men all remind us, We can make our lives sublime. And departing, leave behind us, Foot-prints on the sands of time. - Long Fellow. इसलिये महापुरुपोके जीवन-चरित्र लिखे जाते है। सेवाल पिंपरी (विदर्भ) विनीत, दिनाक ७।१०।६२ • - - चदनमल सोनी वकील BALL.B.
चरित्र ग्रंथ प्रारंभ - अ नु क्र म णि का प्रकरण पृष्ठ १. १ २. ३. १७ मडगल निवेदन प्राचीन इतिहास और गुरुपरपरा परम पूज्य गुरदेवका बाल्य काल वनपात भाईका वियोग विवाहकी तैयारी वैराग्य २३ २५ ६. २७ २८ ८. तप ३८. ९. ४२ ११. ४६ उपदेश शिष्य प्राप्ति जप ज्योतिका प्रारंभ चरित्र-चूडामणि के चमत्कार चातुर्मास चिरस्मरणीय चातुर्मास ४७ १२. १३. १४.
१५
६४
धमकी यंगामही
गौशामाए
सम्पयस्वका प्रचार
मिप्यास्यका लक्षण
सद्गुरनाय की सभा
सदगुरुनाप को दिनषी
प्रचार काय और क्षत्र
१८
१९
८१
८७
९०
खादी प्रचार
२२
२३
रविमरस
९३
१६
१००
मेरे अनुभव
२५
उपसहार
परिशिष्ट
पच विभाग
१०७-१३२
प्रकरण १ ला
मङ्गल निवेदन
विघ्नहरण मगलकरण जिनवाणी सुखदाय ।
जीवनकथा गुरुदेवको पढो सभी चित लाय ।
वीर सर्व सुरा सुरेन्द्रमहितो, वीर बुधा सश्रिता ।
वीरेणाभिहत स्वकर्म निचयो, वीराय नित्य नम ||
वीरातीर्थमिद
प्रवृत्तमतुल, वीरस्य घोर तपो।
वीरे श्री-धृति-कीति-काति-निचय , श्री वीरभद्र दिश ॥१॥
अज्ञानतिमिरान्धाना ज्ञानाञ्जल शलाकया।
चक्षुरुन्मिलित येन, तस्मै श्रीगुरवे नम
॥२॥
नाभेयादि जिनेश्वरा त्रिभुवने ख्याताश्चतुर्विंशति ।
श्रीमन्तो भरतेश्वरप्रभृतयो ये चक्रिणो द्वादश
|॥३॥
ये विष्णु प्रति विष्णुलागलधरा सप्ताधिकाविशती।
त्रैलोक्याऽभयदा विपप्टि पुरपा कुर्वन्तु मे मगलम् ॥४॥
मगल
"
मा विघ्नान् गाल यतीति मगरम्
सव विघ्नोका नाश करता
असे मगल कहते है । जिन महापुरपका हम चरित्र लिखने जा रहे है वे
स्वत हि मगलकारी है। सुनका नाम भी मगलकारी है। किन्तु यह
आस्तिक लोगोकी परपरा है। अत अस परपराका पालन करना परम
आवश्यक है । जिस उद्देश से यहाँपर मगल का उदाहरण दिया गया है ।
दुर्लभ सस्कृत वाक्य दुर्लभ क्षेमकृत सुत ।
दुर्लभा सहशी भार्या तपस्वी दुर्लभो जन
॥१॥
[२] तपोषिभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण संस्कृत का पठन मिलना दुर्लभ है। सेवाभावी पुष मिलना दुर्लभ है, सुलदाणी भा मिलना दुर्लभ है, वैसाहि सच्चा तपस्वी मिलना भी दुसम है। विस सृष्टिमें मुख्यत दो तत्व है। मेक पेवन और दुसरा जर। पारमा मर्मत शक्तीशाली है। भुसको भक्तो मप्रतिहस है। वह स्वतत्र है। मिसलिये भुसको किसीवी बावश्यकता नहीं है । जर पदार्प अनंत धीमान होते हुए भी वह स्वतंत्र कुछ नहीं कर सकते । पैतन्य शिवाय यह निरुपयोगी है। परंतु यीसवी सीको बनता जर पदापों की पकायमें पागल बनती जारही है । यह बारम-सस्थती तया शक्तीको प्रगट करलाभी नहीं चाहती है। पोद्गलिक पदार्थों पचामें कसो हुयी है। बस बुसको महापुरुष पागो महात्माका पीवनपरित सर्व लाट का काम परेगा भारमशक्ती जागस करनेको यहाम्पा बनगा । पारपास्य कवि सांग फेलोन कहा है कि Lives of greatmen all remind us We can make our lives sublime यही भोग योगका सपप पल रहा है वही बारमतरपके विरोध रियारपारा बहती है। मो योगप्रधान मापवर्स था यह भोगप्रधान पनमा जा रहा है। भोग जर पापणपाती है। भोर पोग समको पानेवाला है। भोग क्षणिक है । और योग यवल है । भोग विषमय अवंग है तो योग अमनगरी पिरा है। महायोगी महातपस्वी का जीवन स्थाम और तरो लयाला भरा है। जिनो जीवनका कोई दाग असा मही है, जहाँ त्यागको गोति नही अगमगाती हो । प्रमामय जीवनाहि पोस काजोति पिरष बलिन भुले चोसमे कोई सार नही है। । पाँ मानव प्राविसे मनुारणी है। वह पाप दुमरों का अनुकरण करता है। मा जनसले सामने मम्पारिम, पारमाधिक तपा श्यागमय पोपन लाने वाले महायुलोका पोरसाल रखनेरो बुनो जीवनमें २ला] मडगल निवेदन [३] . त्यागको तरगे तथा तपका तेज चमके और वह अपने जीवनको जीवन बनाये। महापुरुषका जीवन-चरित्र इस लोक तथा परलोक का सच्चा सुखका मार्गप्रदर्शन करने के लिये सच्चे शिक्षक का काम करता है । मनुष्य के जीवनमें कई वार जैसी आपत्तियाँ आती जिससे मानव किंकर्तव्यमुढ बन जाता है । हिम्मतवान बहादुरभी हिम्मत हार जाते है। बुद्धिवान ज्यक्तीको वुद्धि हतप्रभ हो जाती है। वह आपत्तिरूपी महारण्यमें अिधर "सुधर भटकता है । असे कहीभी मार्ग तथा आपत्ति से मुक्ति नहीं मिलती। अस समय महापुरुषोका जीवन एक ज्योतिका काम करता है। अपरोक्त बातोसे जीवनचरित्रकी महत्ता पाठकोके ध्यानमें आगयी होगी। किन्तु फिरभी जिज्ञासु व्यक्तीके हृदयमें स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जीवनचरित्र किसका लिखना चाहिये, किसके लिये लिखना चाहिये और लिखनेसे क्या फायदा? यह तीन प्रश्न सहन उठते है । अतः असपरभी हम थोडासा विचार करे। अिस अपार ससारमें अनत प्राणी जन्मते है और मरते है। परन्तु न कोई गिनती है न कोई नाम । जीवनचरित्र अन्ही महापुरुषोका लिखा जाता है कि जिन्होने दुनियामें आकर कुछ परोपकार किया हो तथा अगरबत्तीके समान खुद जलकर अन्योको सौरभ प्रदान की हो । वृक्षके समान खुद शीत तापको सहन करके औरोको मधुर मिष्ट फल प्रदान किये हो असेहि महापुरुषोका जीवन चरित्र लिखना सार्थक है। जीवन चरित्र लिखनेका प्रयोजन यह है कि भव्य आत्मा जैसे महान गुणोको धारण करके स्वर्ग तथा मोक्ष को प्राप्त करे। जीवनको सफल बनायें । क्योकि कहा है, " कारणमनुद्दिश्य मदोपि न प्रवर्तते कारण के विना मूर्खभी कार्यमें प्रवृत्त नहीं होता। अत महान आत्मकल्याण प्रयोजनको सामने रखकर अिस अथकी रचना की जारही है । पुस्तको कि कमी नही है । परतु " घासलेटो साहित्य " दुर्गन्ध फैलाकर जीवनको दुर्गन्धमय बना देता है जैसे साहित्यको लिख कर लेखक समय और बुद्धिकी वर्वादी करता है । और साथमें पाठकोकोभी हानी पहुंचाता है।
[४] सपोविभूति कर्नाटक गवकेसरी [प्रकरण सच्चा साहित्य जीवनको हीत पहुंचाता है । त्याग तपके झरणोसे जीवनका मल धोकर साफ सुथरा तया बादरा रूप बना देता है। बस यही जिस प्रथका प्रयोजन है। व्यक्ति स्वभाषसेही लाभका इच्छुक है बह प्रत्यक कार्यका फल चाहता है। शाता सूत्रमें प्रभुन फरमाया है तपस्वीका गुणग्राम करता हमा जीव कोंकी कोडी खपाता है, उत्कृष्ट रसायन आवे तो तीर्थकर गोत्र बांधे। भत नरसे नारायण जीवसे शीव तथा बारमासे परमात्मा बननका मागही महापुरुपोंका जीवन है। महापुरुष चद्रमाक समान ससार पापतापोंको हारकर सब जीवोंके लिये अपना जीवन प्रदान कर देते है। उच्च पराग्य और घोर तपश्चर्या निश्चल मनोवत्ति अनुरूप सहनशीलता कथानायकजी में अलोक्कि थी। तपस्वीजीका बीवन मय्य जीवोके हृदयपर महान असर डालनेवाला है। प्रकरण २रा प्राचीन इतिहास और गुरु परपरा चलती चक्की देखकर दिया बीरा रोय । दोनों पाटक वीचमें सावित बचा न कोय।। कबीरजीन चपरके दोहेमें काली निममताका वणन किया ह । पाल सबको निगल पाता है पारस्पी चक्की के पाटम सभीका पूरा होता जारहा है । यह देखकर क्वीरजीको रोना आगया। कुछ विचार करके दुसराहा कहा है- परती ह तो चलन दो पीस पीस चुरा होय । लग रहो पम्फोरको बालन बाका होय॥ अस पारस्पी पारीख बचन लिए एक महान सहारा है । वह ह धमस्पी बीए । प्रिसका आधार रन व्यक्ति अखर बच जाता ह। भमेही नावर गरीर नास हो जाय पर असका नाम अमर हो जाता है। बसीही समर बारमारा यहापर दिन्शनराया जारहा ह ।
'२ रा] प्राचीन इतिहास और गुरु परंपरा [५] जिस परम पवित्र भारत भूमिमें मीस अवसपिणीकालमे श्री ऋषभदेव भगवानसे लेकर श्रमण भगवंत महावीर स्वामितक चोवीस तीर्थकर हुए है। ( चरम अतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामि हुए है । अनका वर्तमानमे शासन चल रहा है )। भगवानका महावीर स्वामिका जन्म' आजमे २५८९ वर्ष पूर्व ( इ. स ५९९ वर्षपूर्व ) पूर्वस्थित विहारप्रानके कुडनपूर नगरके क्षत्रिय कुलभूषण ज्ञातवशी, काश्यप गोत्री सिद्धार्थ राजाके यहा हुवा था । माताका नाम त्रिशलादेवी था । प्रभू गर्भमे आतेही धनधान्य तथा राज्यकी वृद्धी होने लगी। अत मातापिताने अनका नाम 'वर्धमान' रखा । तप, सयम में महान पराक्रम करनेसे बादमे ' महावीर' नामसे प्रख्यात हुए। यौवनावस्थामें आनेपर महावीर स्वामिका विवाह " यशोमति नामकी सुदर कन्यासे हुवा । जिससे प्रियदर्शना नामकी सुदर पुत्री हुयी। 'प्रभु ससारमें जल कमलवात् रहे । अस समय यज्ञ याज्ञादिक का बहुतही जोर बढ रहा था। धर्मनिमित्तसे हिंसा दिन दूनी रात चौगुनी बढ रही थी। नर पशुओकी धर्म नामपर खुलकर हिंसा होती। मानव की दानवता आगे, मानवता थी रोती ॥ प्रगटे कोी अवतारी हो ऽ महिमडलमे अवतारी ।।१।। प्रभुने राज-पाटथाट को ठुकराकर तीस वर्षके वयमे दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा लेकर प्रभुने वारह वर्ष साडे छह महीनोतक कठीन तप करके केवलज्ञान प्राप्त किया । तदनन्तर अपदेश देना प्रारभ किया । गौतमस्वामि आदी १४ हजार साधु शिष्य हुए। चदनबाला आदि ३६ हजार साध्वीया शिष्या हुयी। प्रभू तीस वर्पतक केवली रहे। अनेक स्थलोमें विचरण करके भरत भूमिको पावन किया। अतिम चातुर्मास प्रभुने पावापुरीमें किया । वहा हस्तिपाल महाराज की राजसभा गृहमें दो दिनका अनशन व्रत करके प्रभु 'अत्तराध्ययन' फरमाते फरमाते मोक्ष पधारे । वह कार्तिक वदि अमावश्याकी रात्री थी। जहापर १८ देशके राजा . .
[६] सपीविभूति कर्नाटक गमफेसरी प्रमुका अंतिम अपदेश श्रवण करनको बाय पे। वे पौषष बठहए था। प्रभुका सपूर्ण बायुष्य ०२ चपका था। १ सुषर्मा स्वामि- भगवान मोक्ष पधारे अस समय सिफ २ ही गणधर मौजूद थे। ९ गणघर प्रभके निर्वाणके पहलेही मोक्ष पधार गय य । गौतम स्वामिको भगवान भोक्ष पधारनके बाद मोघही क्वल मान प्राप्त होगया। अत प्रमुक पाटपर सुधर्मा स्वामि विराज । सुषर्मास्वामि विचरते विचरते राजगह नगरी में पधारे। राजगह नगरमे अपमदत्त नामका एक धनवान सेठ रहता था। मुसके जम्बुकुवर नामका एक सुपूत्र था । असकी माठ पन्याओक साथ सगामी की हुयी थी। और विवाहको तयारी थी। जम्बु कुवरको सुधर्मा स्वामिका अपदेश श्रवण कर वराग्य बुत्पन्न होगया । अव माता- पितासे आशा मागन लग । मातापितान विवाह करनका अनुरोध किया। विवाह करके जिस रात्रा पर आय सी रात्री में प्रभवादी ५० चोरोने चोरी के लिए घर में प्रवेश किया । बिषर जम्बुकुवरने स्त्रियोंर्को अपन दीक्षा ऐनकी भावना प्रदान की। स्त्रियां ससारके तरफ खिचनका प्रयत्न कर रही थी । और जम्ब कुवर वैराम्य रसका झरना बहाकर वैराग्य का रण चढाने का प्रयान कर रहे थ। इनका सवाद सुनकर प्रमवादि ५० चोरोको वैराग्य बत्पन्न होगया। ५२७ व्यक्तियोन सुधर्मा स्वामिक पासमें एक साथ दक्षा ग्रहण की। अस समय जग्बजीकी आयु सोरह वर्षकी थी। प्रमक fणसे १२वें वपमें सुषमा स्वामिको केवल मान अत्पन्न हुवा । सौ वपकी पूर्ण आयुष्य भोगकर सुधर्मा स्यामिा मोक्ष पधारे। २ जम्बुस्वामि- सुषर्मा स्वामिक पाटपर पम्बस्वामि विराजे । वीर निर्वाणसे बीसा वर्ष बाद बग्वस्वामिको क्वल मान अपन हुवा । ८ वपकी आय पूणा - २ रा] प्राचीन इतिहास और गुरु परपरा [७] ३ ४. - करके मोक्ष प्राप्त की। जिस तरहसे ६४ वर्षतक केवलज्ञान रहा, बादमें विच्छेद होगया । क्योकि पचम कालके जन्मे हुएको केवलज्ञान नहीं, होता। प्रभवस्वामि- जम्वुस्वामिके पाटपर प्रभवस्वामि विराजे । ८५ वर्पकी आयु भोगकर स्वर्ग सिधारे । अस समय वीर निर्वाणको ७५ वर्ष हो चुके थे। शय्यभव स्वामि- शय्यभव स्वामि वीर निर्वाण संवत ९८ में स्वर्ग पधारे। (५) शय्यभव स्वामिक पाटपर यशोभद्र स्वामि विराजे । वे वीर निर्वाणके १४८ वर्षमे स्वर्ग सिधारे । (६) वे पाटपर सभूतिविजय स्वामि वे वी स १५६ वर्षमें स्वर्ग सिधारे । (७) वे पाटपर भद्रवाहू स्वामि वीर निर्वाणसे १७० वे वर्पमें स्वर्ग सिधारे। (८) वे पाटपर स्थूलीभद्र स्वामि वीर निर्वाणके पश्चात २१५ वे वर्पमें स्वर्ग पधारे। (९) वे पाटपर आर्य महागिरी १० वे बलिसिंहजी ११ वे सोवन स्वामि १२ वे वीर स्वामि १३ वे सडिल स्वामि १४ वे जिवनधर स्वामि १५ वे आर्यसमेत स्वामि १६ नन्दील स्वामि १७ नागहस्ती १८ रेवत स्वामि १९ सिंहगणीजी २० स्यडीलाचार्य २१ हेमवन्त स्वामि २२ नागजित स्वामि २३ गोविंद स्वामि २४ भूतदीन स्वामि २५ छोह गणिजी २६ दुसह गणिजी २७ देवधि गणिक्षमा श्रवण हुए। जिन्होने वीर निर्वाण स ८९० वर्ष तथा वि स ५६० मे वल्लभीपूरमें शास्त्र लेखन का कार्य किया। देवधिक्षमा श्रवणके पाटपर २८ वे अनुक्रमसे वीरभद्र २९ सकरभद्र ३० यशोभद्र ३१ वीर सेन ३२ वीर सग्राम ३३ जिनसेन ३४ हरीसेन ३५ जयसेन ३६ जगमल ३७ देवर्षि ३८ भिमऋषी ३९ कर्म ऋषि ४० राजऋपि ४१ देवसेन ४२ सकरसेन ४३ लक्ष्मीलाभ ४४ रामऋषि ४५ पद्मसुरि ४६ हरि स्वामि ४७ कुशल स्वामि ४८ अवणी ऋषि ४९ जयसेन ५० विजय ऋषि ५१ देवसेन ५२ सुरसेन ५३ महासूरसेन [८] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण ५४ महासेन ५५ गजसेन ५. जयराज ५७ मिनसेन ५८ विजयसिंह ५.सिवराजजी ६० लालजी ऋपिजी६१ग्यानजी ऋपि ग्यानजीऋषिजीके पास जो शास्त्र य शुसको दीमक लग गयी थी। परतु लिखनेको पुरसव कहा ? क्योकि मुस समममें साघु प्रमादि और आडम्बरमें पड़ गए थे। शुद्ध पारिपके लक्ष्यको भूलकर मान बढाओके दलदलमें फस गये थे। सं १५० में एक महान धर्म सुधारक गुजरायके पाय तक्त अमदाबाद शहरमें ओसवाल जावो, अत्पन्न हुए। उनका नाम लोकाशाह था। जौहरी का षदा करते थे। लोकाशाहके अक्षर बहुवही सुदर में । अमपर भता बहुत पी। ये शानजी ऋषिके पास आते जाते थे । ज्ञानजी ऋपिने सूत्रकी प्रतिलिपो करमको कहा। लोकाशाहने महा श्रुपकारका काम समाकर बोस कायको स्वीकार किया। जबसे सूत्र लिखने लगे तो उन्हें सूत्रके अचों में और अस समयके साधुओकी प्ररूपणा तथा आचरण जमीन अस्मानका असर दिखानी दिया। तब अन्होंने सब सूत्रों को लिखकर सत्यममका प्रचार करना शुरू किया। सत्यरूपी सूर्यसे भव्य मात्मा बाकषित होकर धान लगो । लोकाशाहन ४५ जनोंको पीक्षा देकर सत्यममका प्रचार करन लग । लाक्षी शुद्ध श्रद्धावाले जनी बनाम । दि. १५१में यह लोकागछ नामसे प्रख्यात हुए । ६२ मानजीऋषि ६३ रूपजी ६४ जिवराबजी ६५ वेजराजबी ६६ कूवरमी ६७ हरजी ६८ गोपाजी ६९ परसरामजी ७ लोकपालजी ७१ महारामजी स्वामि ७२ दौलतरामजी ७१ लालजी महाराज ७४ राजारामबी म ७५ गोविरामजी म. १९०२ कोटामे स्वर्गवास ७६ फोनवजी म १९११ कोटाके रामपूरमे स्वगवास हुआ । ७७ नामधवी म. १९२६ राणीपूरसे स्वर्गवास हुवा । ७८ बलदेवजी म ७९ छन लालजी म वि स १९५४ मे आकादमे स्वर्गवास हुवा । ८. रोडमलजी ८१ प्रमराजजीम ८२ कर्नाटक गजकेसरी गणशलालजी म सालजी म.८४ संपवलालजी म. कोटा संप्रदाय पू भी दौलतरामलीम अपन शिष्य परिवार सहित कोटा पधारे। वहार धर्मका युद्ध स्वरूप जाननेवाला कोई नही था। और न कोली ८३ मिस्त्री २ रा] प्राचीन इतिहास और गुरु परपरा [९] सन्तोकी अमृतमय वाणी सुननेको तैयार था । अतः वे अपने शिष्य समुदायको सन्मुख वैठाकर उपदेश देते थे। ऐसा करनेमे आपका उद्देश यह था कि -किमी न किसी प्रकारसे जनता धर्मका शुद्ध स्वरूप समझे । उपदेशामृतका लाभ उठानेके लिये जनता ईकट्ठी हो जाती थी। चाणाक्यने कहा है- श्रुत्वा धर्म विजानाति, श्रुत्वा त्यज्यति दुर्मतिम्" सुननेसेहि धर्मको जानता है सुननेसेही दुर्बुधिको त्यागता है। जनता सत्य उपदेशको श्रवण करके आकपित होने लगी तथा धर्मको अगीकार करने लगी। जब तक सूर्योदय नही होता है तबतक अन्धकारमे ठोकरें खानी पडती है । ज्ञान प्रकाश होनेपर अधेरेमें कोी रहना नहीं चाहता। पू श्री दौलतरामजी म० ने वहूतसी कठीनाइयाँ, धर्म प्रचारके लिये सही। वहाँपर जैन साधुके आचार विचारको नही जाननेसे शुद्ध अशन- पानादिकका योग नही लगता था, " मनस्वी कार्यार्थी न गणयति सुख नाऽपि दुखम् " कर्नव्य परायण व्यक्ती सुख दुख को कुछ नही समझता । कभी दिन तो चने खा खाकर निकाले । कहते थे, एक समय कोयी दातार ने चने दिये तो प्रत्येक सन्तके १७, १७ चने हिम्सेमें आये, सत्रह चनोपर दिन काटा, कमीवार कच्चा आटा पानीमे मिला कर पी जाते । अिस तरहसे परिषह सहन कर जीनवाणी का प्रचार किया । सेकडो घर शुद्ध धर्मके धारक बनाये। जिस कोटामें एकभी घर शुद्ध धर्मको जाननेवाला नही था, अमी कोटामें वर्तमानमें हजारोको सख्यामें घर है " । ११ धर्म स्थान है। मीमी शहरके नामसे यह सप्रदाय प्रसिद्ध होगयी। पूज्य श्री दौलतरामजी म. तथा श्री अजरामरजी म० ये दोनो महात्मा समकालीन थे। पू दौलतरामजी म० ने वि. स. १८१४ मे दीक्षा ग्रहण की थी। और अजरामरजी स्वामिने वि भ दीक्षा ग्रहण की थी। पु दौलतरामजी म० अति सर्मथ विद्वान, और सूत्र सिद्धान्तके पारगामी थे। वे मालवा मारवाड प्रदेशमें विचरते थे। आपके असाधारण ज्ञान सपत्तीको प्रशसा श्री अजरामरजी स्वामिने H १८१९ में [१] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण सुनी। अजरामरगी स्वामिका शानमी बढा पढा तो था ही पर सूत्र ज्ञानमे अधिक उन्नती करनके लिये पू श्री दौलतरामजी म. के पास अभ्यास करनेकी इछा हुभी मत लिबडी श्री सघने एक खास मनुष्य के साथ पू दौलतरामजी म० की सेवामें प्राथना-पत्र भेजा। बाचाय प्रवर यी दौलतरामबी म. अस समय कोटा बुदि विराजते थे। मुन्होंने इस विज्ञप्तीको सहप स्विकार करके काठीयावाइ की ओर शिघ्र ही विहार क्यिा । वह भेजा हुआ मनुष्य अहमदाबाद तक पूज्य श्री साम आया। वहसि वह मनुप्य लिषडी सघको पू बी अहमदाबाद पषार गय की बधाई देन लिबडी आया । अस समय लिंबी सघ बानन्द विभोर हो उठा और भुस वधाई देनेवाले मनुष्यको १२५० रु भेंट स्वरूप दिये। पू श्री लिबड़ी पधारे तब वहाँक सघने अनका अनुपम वथा अत्यंत बादर सत्कार किया । बिडी श्री सघकी अनुपम भक्ति देखकर पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज सानदाश्चय हुये। पडीत अजरामरजी स्वामिको पूय श्री दौलतरामजी महाराज खुले दिलसे सून सिद्धान्त का रहस्य समझाने लगे। दोनो मानो केशी गौतमसे प्रतीत होते य । सषमे अलौकिक आनद छा रहा था। असी समय समषित सारके कर्ता श्री जेटमलजी महाराज इस समय पालमपूर विराजते य । वे भी शास्त्र अध्ययन के लिये लिपटी पधारे और वे भी पानवृद्धि करते हुय अपूब आनदका अनमव करने लग । भिन्न प्रकारकै साघुबोमे उस समय कितना प्रममाव था और बालोंमे शाम पिपासा क्तिनी पीव्र पी यह अिसपरसे सिद्ध होता है। पडित श्री दौलतरामजी महाराजके साथ क्तिनही समयतक विचरकर परित अजरामरजी म ने सूत्र ज्ञानमें अपरिमित अभिवृद्धि की पी। और पूज्य बी दोस्तरामजी म के आग्रहस श्री अजरामरबी म एक चातुर्मासभी जयपूरमे सामील क्यिा था । जिस तरह बहुत क्षत्रोंको पावन करके बि स १८६ मे बणीयारेमे स्वगवास हुवा। ७३ पाटपे श्री लालबदजी म विराज । ७४ वे पाटपर श्री पौषिदरामजी म विराजे । वे बहुत विद्वान तथा क्रिपापात्र सत ।
२ रा] प्राचीन इतिहास और गुरु परंपरा [११] । पूज्य - अन्होने धर्मका प्रचार खूब किया। वि. स १९०२ को कोटामं स्वर्गवास हुवा । ७५ वे पाटपर श्री फत्तेचदजी म विराजे थे श्री फत्तेचदजी म टोकके क्षत्रिय जातिके थे। क्षतात् त्रायते इति क्षत्रिय." दीन दुखीयोको दु खसे छुडाता वही सच्चा क्षत्रिय है। पूज्य श्री दीन दुखीयोके दुखको निवारण करनेके लिए संसारके सुखोको त्यागकर वीरप्रभुके मार्गपर निकल पडे थे। उन्होने जनकल्याणके लिए अपने जीवनको न्योछावर कर दिया था। उन्होने वि सं १९११ में कोटेके रामपुरेमें स्वर्गारोहण किया। ७६ वे पूज्य श्री ज्ञानचंदजी म यथा नाम तथा गुणधारी थे । ज्ञानदानमें तत्पर रहते थे। वे अस समयके अद्वितीय विद्वान थे। अन्होने धर्म प्रचार खूब किया । वे अतमे सलेहणा सथारे सहित राणीपूरमें वि स १९२६ मे स्वर्ग सिधाये । ७७ वे पाटपर पूज्य श्री वलदेवजी म विराजे थे। ७८ पाटपर श्री छगनलालजी म थे । आप दो सग्गे भाई थे। वि स १९११ में दोनो भाईयोने लघुवयमे - साथमें दीक्षा ग्रहण की थी । दोनो ही बाल व्रम्हचारी थे । अनको आज्ञा लेते समय वहुतसे अपसगोंको सहन करना पड़ा था । परतु अटल वैरागी किसी तरहके प्रलोभनमें नही आये । अतमे दीक्षा लेकर बहुतसे सूत्रोका अल्प कालमें अभ्यास किया था । पाखडी लोगोका मद गालनेमे सिंहके समान थे। शास्त्रोके रहस्य वहुत जानते थे। दोनो का नामभी पूज्य श्रीने तुक मिलाते हुए एकसाही रखा था । छगनमुनी और मगनमुनी' दोनो भाइयोने साथमेंही अभ्यास प्रारभ किया था । अल्प समयमेंही। शास्त्राध्यापन करके निपुण बन गये थे। छगनमुनी बडे होनेसे तथा आचार्यके गुणोसे अलकृत होनेसे पूज्य श्री गोविंदरामजी म ने आचार्य पदसे विभूपित किया। आचार्य प्रवर श्री छगनलालजी म जिनवाणीका प्रचार करनेके लिए अनेक अपसर्गोको सहन किये थे। दक्षिण प्रदेशमें सर्व प्रथम श्री तिलोक ऋषिजी म और आचार्यवर श्री छगनलालजी म दोनों महासत पधारे थे। रास्तेमें दोनो महामुनीओने परीपहोपसर्गोको सहन करके धर्म प्रचार क्यिा था । आचार्य श्री छगनलालजी म. और तिलोकऋपिजी - - [१२] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण म दोनों समकालीन ५ । दोनों महापुरुप य । पूय श्री छगनलालबी म साबन वबई में चातुर्मास किया था। बबई बसे विशाल क्षेत्रका उद्घाटन का श्री गणय करलवाले महापुरुप श्री छगनलालजी म हो। आप प्रकांड विद्वान अदितीय पक्ता और गुणाक महार या आपक शिप्य मंबलीमेसे २ शिष्य विशेप अस्लेखनीय य । अनमें घोर तपस्वी श्री देवीलालजी म । मापकी तपश्चर्या पढकर पाठकों को मारचय होगा और आपका पराग्य कसा दृढ और शिघ्र प्राप्त हुवा यह कोसी कम पाश्चपकारक नही है। आपका जम तो दिगवर जैन बगेर वाल वयमे दुबा था। बाप आचार्य प्रपरको पहुचाने लिए साथ पधारे य । रास्ते सत्सगतीका प्रभाग एसा पा कि एक कविन कहा है- लोहेको सुवण करे वह पारस है कच्चा । लोहेको पारस करे वह पारस ह सच्चा । आचाय प्रवरको सगतीसे आपके हृदय में बराग्यका मरना फूट पड़ा। आपन आपाय धीसे पूछा कि आप मुझ दीक्षा दे सकते हो। आचाय श्रीन फरमाया 'आपको क्यो नही दे सकते माप तो जन ही भगवान महावीर स्वामिन बीरपुत्र हो यहाँ तो हरीकशी जसे चाहाल भी दीक्षित हुये ह । मापको भावना हो तो हमे किसी प्रकारको बाधा नही है । यदि ऐषाही है तो आप मुझ दीमा देकर बीब्रही कनार्य कीजिए। आचार्य योजीन फरमाया भाई दीक्षा बहुत कठीन है सोच लेना 'परतु बरागोजी तो श्वेत वस्त्र प । रग एकदम पक्का चढ गया था स्थायी भवति चायन्तं राग दक्लपट यथा । अनका वैराग्य का मरना तो नदीका रूप धारण करके यमण संघरूपी समुद्र में मिलनेक लिए तत्पर हो गया था। चुहोंने आचार्यधीसे करमाया ममें भाजही बहत प्रत्रज्या देकर कृताय कीजिए, शुम कायमें देरी नहीं करना चाहीए । एसी कहावत हा बाधाय धीने योग्यता देखकर असी दिन अन्हें भगवती दीक्षा दे दी भी। दीक्षा सिंहक समान वीरतासे ली और सिंहके समान वीरवासे पालन । सुभस्य श्रीन २ रा] प्राचीन इतिहास और गुरु परपरा - [१३] करने लगे । तपोवीर महामुनिजी चातुर्मासमे छह छह महिनेकी तपश्चर्या छाछ के आछके आधारसे करते थे। उसमेंभी । आछका आधार छोडकर अन्य तपश्चर्याभी करते थे। ग्रीष्मऋतुमें एक बजेसे तीन घटे तक धूपकी आतपना लेते थे। तपके प्रभावसे वचन सिद्धी प्राप्त हो गयी थी । छाछका 'तपसा कि न सिध्यते-' तपसे क्या नही सिद्ध होता है? अर्थात सब कुछ प्राप्त होता है । तपसे कर्ममल जलकर आत्मा पवित्र बन जाती है। यदि महा मुनिजीके अचानक सरल स्वभावसे कोमी वचन निकल जाता वह बराबर होकेही रहता था। आपके शारिरीक पुद्गलोमें भी औषध कीसी शक्ति उत्पन्न होगयी थी। एक सफेद कुष्ठ रोगी महामुनिजीके दर्शनार्थ आया। असकी महा- मुनिपर महान श्रद्धा थी। तपस्वी महामुनिजी लघुनिती करके परठाके आये थे। पिछेसे इस श्वेतकुष्ठीने जाकर वह गिली मिट्टी अपने शरीर पर लगाई और मागलिक श्रवण करके रवाना होगया। इसका सारा रोग जाता रहा । और कचनवर्णसी काया बन गयी। महामुनिजीके शारीरिक पुद्गलोमें ऐसी शक्ति प्राप्त होगयी थी, जिससे महारोग जैसे रोगभी नष्ट हो जाते थे। धन्य है ऐसे महामुनिको जिन्होने छाछकी आछ मात्रका शरिरको भाडा देकर जन कल्याणका कार्य किया। पूज्य गुरुवर श्री आचार्य प्रवर छगनलालजी म. का वि० स० १९५४ मे ' अलोदमे' सहलेखना सथारा सहित स्वर्गारोहण हुवा । जैन समाजका चमकता सितारा स्वर्गको सुशोभित करने लगा। पडित आचार्य प्रवर छगनलालजी म. के स्वर्गारोहणके बाद सुनके पाटपर रोडमलजी म. विराजे थे। पूज्य श्री रोडमलजी म० कठीनसे कठीन अभिग्रह लेते थे। तपमे बहुत वीर थे। चार प्रकारके वीर कहे है। १. दानवीर २ युद्धवीर ३. कर्मवीर ४ धर्मवीर १४] तपोविभूति कर्नाटक गसकेसरी [प्रास दानवीर कर्ण के समान मरते दमतक दान देते रहते है। पदवीर न्यतमे प्राणोंको दे देते है। परतु पिछ नही हटते । कमवीर मानके -समान । धर्मवीर धमके लिए प्राणोंका मोह नही रखनेवाले। बतुप नबरमे पूज्य श्री रोडमलजी म. थे। तपमें अपनी आत्माको हमेशा लगाई रखते थे। आपके अमिग्रह ऐसे कठिन होते थे जिनको भुनकर माश्चर्य उत्पन्न हुये बिना नही रहवा । एक समय पूज्य श्री रोडमलजी म. उदयपुर शहर में विराजमान थे। मापन गमिग्रह लिया था कि यदि हाथी लडू बहराय वो भोजन ग्रहण करना । भिक्षावरीक समय रोजाना अन्ते ध। जनता विविध प्रकारको वस्तुओं को लेकर मामंत्रणा करती। परतु महा तपस्वी वस्तुओं को देखकर लौट जाते थे। एकके बाद एक इस तरह पक्षालीस दिन बीत गमे । महातपस्वी सपमें पढथे। जनता कभी प्रकारके सकस विकल्प करती थी। वैह एकदम कुश हो गया था। गुरदेव का पारणा करेगें पारणा क्यों नहीं करते है अमीग्रहमी हो तो क्यों नहीं फलता इस तरह जनता को प्रकारके विचार करती थी। मापका तेज फैल रहा था। पूज्य श्री तपमें मग्न थे। पतालीस दिनके बाद महाराणा का हाथी अचानक मदमे आजाता है । और वधन तोडकर गशालासे भाग जाता है । शहरमें चारों और हल्ला मच जाता है । हाधीसे भयभीत होकर जनता इधर उधर दौडधुप करती ह । हाथी गुलगुलाट शा करता हुवा चोक और बाजारोमै घुमने लगता है। राज कमचारी असे पकडनक लिए अनेक प्रयत्न करने लगे । परतु वह पकडमे नही रहा था । इधर हाथी दौडवा जाता अषर दोगे दौडो की आवाम मावी पो । कही किसीको नुकसान न पहचा है। हायीको देखते ही बनता प्राणों को बचानक लिए घरॉम जाकर छुपती पी। एसे समयमें त्रिविमा समरण भय विष्प भुक्क पूज्य श्री हायमें खोली और भिक्षा पात्र लेकर भिक्षापरीको निकले। तपस्वीजी शान २रा] प्राचीन इतिहास और गुरु परंपरा [१५] मुद्रासे इरियासमिति पूर्वक शास्त्र मर्यादानुसार चल रहे थे। दशवका- 'लिक सूत्रमे श्रमण भगवान महावीर स्वामिने फरमाया है- ' दवदवस्स् -न गच्छे ज्जा भासमाणो अगोयरे । हासतो 'नाभि गच्छेज्जा कुल उच्चावयं सया' साधुको भिक्षाचरि को जाते समय बहुत जल्दी जल्दी नही चलना चाहीए । बातोके सपाटे मारता हुवाभी न जावे, हसता हुवा न जावे । ऊच नीच और मध्यम कुलमें भिक्षाचरीको जावे । वस, इसी तरह महामुनि तपस्वीजी भिक्षाचरीको निकले । ज्योही राजकर्मचारीयोने देखा कि चिल्लाने लगे 'अरे | तुम बीधर मत आवो, यह हाथी तुम्हे मार डालेगा'। “परतु श्री तपस्वीजी आगेही आगे बढ़ते जा रहे थे । कोइ कहते थे 'मरनेदो, नही मानता है तो' । परतु वे भोले प्राणी क्या जाने ? अिन महातपस्वीके प्रभाव से नगरका सारा उपसर्ग टलेगा और अिनका अभिग्रहभी फलेगा। हाथीके नजदीक ज्योही कठिन अभिग्रहधारी श्री महातपस्विजी रोडमलजी म पहुचते है त्योही हाथी का मद उतर जाता है । कहा भी है "साधु चंदन बावना, शितल ज्यारो अग । लहर उतारे भुजगकी, दे दे ज्ञानको रग ।। महा तपस्विजीकी दृष्टी पडतेही हाथी शात हो जाता है । अस बाजारमें एक हलवाइकी दुकान थी । हलवाइ हाथीको देख डरके मारे घरमें भाग जाता है। दुकान खुली रहती है । सुसमेसे हाथी सुडमे लड्डु लेकर मुनिके सन्मुख करता है। मुनिजी भिक्षापात्र सामने करते है । हाथी उसमे लड्डु वेहराता है । बस फीर तो राज कर्मचारीयोके आश्चर्य का पारही नही रहता है। जनताभी यह दृश्य देख रही थी। राज मार्ग म महा तपस्विजी और हाथी यह दोनो थे । गजराजका लड्डु वेहराना और मुनिराजका पात्रमे लेना यह दोनो दृश्य अद्वितीय थे। हाथी और मुनिराजका समागम सबको आश्चर्यचकित कर रहा था। महातपस्वी मुनिराजका अभिग्रह पूर्ण होनेकी बात विजलीकी तरह सारे शहरमें फैल गयी। चारो और जयनादको पुकारे झुठाने लगी। महामुनिने जो अभिग्रह [१६] तपोषिभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण चिठठी में लिख रखा था वह सबके सामने प्रकाशित कर दिया गया। जैन धर्मका महान प्रभाव बना । हाथीने भी अपन गजशालाका रास्ता मकर लिया। मुनिराज धर्मस्थानमें पधार गय । धन्य है । एसे महा तपस्विको। ऐसे कठीनसे कठीन अभिग्रह धारणकर मुनि श्री महा तपस्वि श्री रोडमलजी म जन समाष प्रकाश फलाकर कहा क्षेत्र में पतालोस दिनका सथारा करके स्वर्गवास हये। आजभी ससारमें बुनका नाम रोशन है। एसे पोपज मुनि तपकी ज्योतिसे सोये ससारको जगा पाते है। समाज अनका ऋणी है। अनकै बादमें धमप्रमका भरणा बहाते हुये श्री प्रमराजजी में पाटपर विराजे । यह भी महान तपस्वी थे। अपछ विद्वान महा परोपकारी तथा नम्र प्रकृति के सरल स्वभाववाले थ। आप स्वसमय पर समय कशाता थ । माप हिम बहादूर और निडर थे। वो दिलमै करना धारते वह करके दिखाते य । माप विघ्न धापायोंक लिए शुद मिन बापा मन जाते थ । मापका गया नाम तथा गुण था। आप स्वय धर्मरूपी सरोवरम प्रमक गोते लगाते भाऔर मानवाले भव्य प्राणीयोकी भी प्रममें सराबोर कर देते थ। सपावी श्री प्रमराजजी म साबके पास हमारे परित्र नायकजीसे पहिले वीन चार शिष्य हो पके प । परतु अहै और एक रान प्राप्त होमवाला था। बत पूष थी बिहार करते हुय नाशिक जिल्हेको पावन कर रहे थे। उस समय उन्ह एक अद्वितीय रत्न प्राप्त हवा था । जिसका अणेन मार्ग परिवरपमें दिया जानेवाला है। वे पर चरणमें आतेही पूज्य बी प्रेमराजजी म क प्रेमगगामें नहाने लग । पुज्य श्री तपस्विजीने उस रलको धमकानक लिए स्मारका रग पचान | कुछ अकर तो हमारे चरित्रनायकनीक हृदयम पहिले वो था ही । परतु पूज्य श्रीके उपदेशरूमी वर्शरी और भी बढ़ बन गया। कुछ दिन रस्नको परखकर नगरसूलमे दीदा देकर ताथ कर दिया । पाच महावत रूपी अमूल्म रलोको का २ रा] प्राचीन इतिहास और गुरु परंपरा [१७] और भी रत्नकी कीमत बढ गयी थी। आगे जाकर अमूल्य रत्न लेकर समाजके एक देदिप्यमान सूर्य निकले थे। कमी प्राणियोको अभयदान दिया था। 'खादीवाले तपस्वी श्री कर्नाटक गजकेसरी' गणेशलालजीके नामसे सारे देशमें प्रसिद्ध हुये । श्री गणेश सचमुचही श्री गणेश थे। सुनके खेमचदजी म अमरचदजी म ,राजमलजी म ,तथा मिश्रीलालजी म. चार शिष्य हुये ये। चार शिष्योमेसे वर्तमानमें सिर्फ तपस्वी श्री मिश्रीलालजी म विराजते है । आपके भी तीन शिप्य है । वा ब्र सपतराजजी म., रतनलालजी म तथा नवदीक्षित वा ब्र खुशालचदजी म । तिनो शिष्य मडलीसहित तपश्चर्या करते हुये गुरुवर की गादी दीपा रहे है । प्रकरण ३ रा. परमपूज्य गुरुदेवका बाल्य काल मानुष्ये सति दुर्लभा पुरुषता, पुस्त्वे पुनर्साधुता। साधुत्वे बहु विद्वताऽनिगुणता विद्यावतोऽर्थज्ञता ।। अर्थज्ञस्य विचित्रवाक्यपटता, तत्रापि लोकज्ञता। लोकज्ञस्य समस्तशास्त्रविदुपो धर्मे मतिदुर्लभ ॥१॥ मानस्सखसृदुल्लहम् " मनप्य भव महान दुर्लभ है। परतु कवि कहता है मनुष्य भव मिलनेपर भी पुस्पत्व मिलना बहुत कठिन है। पुरुपत्व भी मिल जाता है पर विद्वान गुणवान बनना दुर्लभ है। विद्वान बननेपर भी यथार्थ तत्वके ज्ञाता बनना कठिन है। उससे भी वचनकी चतुराई प्राप्त करना सुदुर्लभ है। वाक्पटुतासेभी लोगोके मनोगत भावोको समझना मुश्किल है । अससे भी समस्त शास्त्रोमे पारगत होना कठीन है। अपरकी सब बाते मिरनेपर भी धर्ममें बुद्धि रहना अति दुर्लभ है। धर्मके रगमें रमे हुये परमपूज्य श्री तपस्विजीका जन्म, मारवाड प्रदेशके " भावी विलाडा" पुरीमें हुवा था । मारवाडको साधारण १८) तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण बोलपालको मापामें कहा जाता है कि मारवाड मां का पेट है"। मारदार याने मारके बाडी बाट । अर्थात हिंदुस्थानपर जितने भी हमने हुये वे भारवाडकी तरफसे हुय । परतु वहां की जनता हमलेखोरोके सामने चाडके समान हटकर रही। और सारे देवकी रक्षा की। मिसलिय मिस प्रदेश का नाम मारवाड परा। वहाँ रहनवालोंको मारवाडी कहते है। यह प्रदेश राजस्थानक नामसे भी प्रसिद्ध है। राजाओंका मुख्य स्थान होनसे वीर प्रसपाभूमिने कई वीर-धीर महान व्यक्तियोको जन्म दिया है। जहांकि वीरागनाओंने विजयलक्ष्मी प्राप्त करनेको स्वपतियोको सजाकर रणभूमिमें सहर्ष मजा है । जहाँके रजकण सुवण कातिके सदृष्य चमककर यह बतात है सुषणमय जीवन बितानेवालेकी यही खान है। जैसे वीर भूमिन भावी भिसाडा नामक सदर धर्मप्रधान क्षेत्रमें पुनमबदनी नामक सठ रहते ५ । सठजी श्रष्ठ गुणोस सुशोभित थे। वर्तमानक ठाक समान नही थ। कलीकालक सठोका वणन कहता हुवा मेक कपि कहता है अचा मकान फिका पक्यान मोटासा पेट लवसे कान । फैशरका तिलक कपुरकी माला छोटा कपाट मोटासा ताला । पोषसोकी पूंजी साठ सौ का दिवाला। बैंस बाह्य बाबर करनपाले नही य । पठजी अत्यत सादगीमय बीवन बितानवाले थे। सम्जीको न्यायनीति प्राणोंसभी प्यारी थी। वर्तमान बना गजसे हि सठाव नापा पाता है। परत पहिले अंक पुगोस युक्त व्यक्तिकोहि सठ कहा जाता था। पन दो तरह का होता है। (१) दुष्यधन (२) भावभन । द्रव्यमान सणिक है। आलस्य प्रमाद वषा अभिमान को उत्पन्न करता है। दुसरोके सिर्पाका कारण बनाता है। कारण बह परिग्रह है। परतु भावयन इन दूपोंसे रहित है। चरित्रनायकजी के पिता श्री पुनमनदवी इध्ययनकी अपेता भावधनसे अधिक धनवान थे। दिका उग, ३ रा] परमपूज्य गुरुदेवका बाल्य काल [१९] । स्वाभिमानी, धर्मश्रद्धामय, अटल तथा श्रमणोपासक श्रावक थे । -सेठजीके घरको सुभोशित करनेवाली सेठानी श्री “ धुलीदेवी क्षमा में सचमुच पृथ्विके सदृष्य थी । रूपमे सुदर, शीलमें आभूपणोसे सुसज्जित तथा पतिव्रता थी। कविने कहा है सति सुरूपा-सुभगा विनीता प्रेमाभिरामा, सरल स्वभावा । सदा सुआचार-विचार-दक्षा सा प्राप्यते पुण्यवशेन पत्नी पुण्य विना योग्य स्त्री प्राप्त होना महान मुष्कील है। सती, स्वरूपवान, - सौभाग्यशाली, नम्र,पतिसे शुद्ध प्रेम करनेवाली, सरल स्वभावी, सदाचारी तथा विचार विमर्श करनेमें चतुर जैसी स्त्री पुण्यसेहि प्राप्त होती है । -वर्ना एक कवि कहता है आजकलकी नारीयाँ मुफ्तकि विमारीयाँ । काम कुछ करती नही और लडनेकी तैयारीयाँ। जैसी स्त्रीयोसे गृहवास नरक की तरह बन जाता है। अिसी तरह की स्त्रियाँ, क्या समाज और कुलको सुशोभित करनेवाली सतति पैदा कर सकती है? अर्थात कभी नही । मिट चुकी वो क्षत्राणियाँ, खुटी रत्नोकी खाण । प्रेम पुतलियाँ रह गयी, प्रसव रही पाषाण ॥ यह तो हुी वीसवे सदीकी स्त्रियोकी बात । परतु चरित्र नायकजी की मातोश्री श्री धुलीदेवी महान कार्य पारायण थी। वह पतिकी साह क्रनवाली थी। कभी भी निकम्मी नही बैठती थी। गृहकार्यसे थोडाभी -समय मिलाकी झट चरखा कातने वैठ जाती थी । सामाइक सवर, पौपध, तप तथा जपमेंभी तत्पर रहती थी । कहाभी है- " As is the father so Is the son जैसे मातापिता होते है वैमीही सतती होती है। जिस कहावतके अनुसार धार्मिक और पवित्र दम्पत्ति आनदमे गृहस्थाश्रमका पालन करते थे। अस समयमें माता धुलीदेवीके कुक्षिमें एक पुण्यशाली महान [२०] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरणी बारमा अवतरित हुयी। पुण्यशाली जीवके गभम बातेहि माता शुभ भावना भाने लगी। माताको अत्यत शानदका तथा सुखका अनुभव होन लगा। होनहार वीरवानक होत चिक्ने पात । तथा कहते है पुत्रके लक्षण पारण और बहुके लक्षण बारन । अग्लि कवि मिल्टन ने कहा है- The child hood shows the man as the morning shows the day ' लेकीन ज्ञानी कहते है, पुत्रक लक्षण गमसैहि प्रगट हो जाते है। जिसप्रकार भगवान महावीर स्वामिके गर्भ में आवेहि घमषान्यकी वृद्धि हुयी। माताक अपरही गभक सस्कारोंकी जवाबदारी रहती है। पुरानी बहने अक्षर शानसे अनभिज्ञ होनपरभी मातत्त्वक गुणोको जामती थी। अपनी जवाबदारी का पालन करती थी। जीव्हापर वाखोपर तया अपनी सब इनियोपर सयम रखकर सततिको समाजका देशका धर्मका लाल बनाना चाहती थी। समाज देश तथा धर्मकी धरोहर समझती पी। वर्तमानकी बहने पढीलिखी शान तो पुरुषोकी बराबरी करने जा रही है पर सततीको तो एक बोझा समझती है। वे यहाँतक मिसनी स्वार्थी बन गयी है कि बच्चोंको दूध पिलानाभी नहीं चाहती । कहती हमें कमजोरी आती है। बम की सामने भानपरभी दूध पिलाना नहीं चाहती तो गर्भका क्या तो अच्छी तरह पालन करेगी और क्या सरकार गलेगी? डिम्बका तो दूध पिलाती है, स्कूलमें पढनको भज देती है खानको होटलमें। फिर माता पिताओके सस्कार सतती में कहसि माये? चरित्र-नायकजी के मातान गमसैहि अच्छ सुदर सस्कार झाले कि- जिससे माग जाकर असी घमवी क्राती फ्शानेवाले महात्मा बन । माता असा पुष जन के दाता के शूर। नहि तो रहिय बांझही मती गमाज नूर माता पली वीने संवत् १९३६ कार्मीक शुक्ल ६ को रात्रीके पतुप प्रहरमें अस सूर्यको पूर्व दिशा बम देती है, असेहि देदिप्यमान ३ रा] परमपूज्य गुरुदेवका बाल्य काल [२१] तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। जन्म होतेहि चारो ओर आनद की लहरें उठने लगी। माता पुत्रके मुखकमल को देखकर प्रसूति वेदनाओको भूल जाती है। और अपने जन्म को सफल मानती है । परतु असी माताका जन्म सफल है, जिसका पुत्र कुलवशको प्रकाशित करता है, जैसा किं तेन जातु जातेन मातुर्यौवनहारिणा । नारोहति न च स्वस्य वशस्याग्रे ध्वजो यथा ॥ अस पुत्रके जन्मनेसे क्या जो कि सिर्फ यौवनका हरण करता है, किंतु -कुलकी, वशकी ध्वजाके समान उनति नहि करता है । चरित्र नायकजीकी आकृति, सौदर्य, तथा तेज देखकर मातापिता धन्य हो गये। चरित्र नायकजीकी भव्य ललाट, लबी भुजाये, तेजस्वी नेत्र, सुतीक्ष्ण नाक, गौरवर्ण, काली भुवाएँ और सुदर लक्षणोसे युक्त सुकोमल हाथ-पाव भविष्यको वता रहे थे कि, यह कोई सोये हुये जगको जगानेवाली महान आत्मा है। लवी ललाट, लबी भुजा, लबा नेत्र सिरेह । क्या देखो ऐ ज्योतिषि । बैठा राज करेह ।। मातापिताने सूर्यदर्शन पूजनादि कार्य करके, नामकरणके समय पहली ही सतती है, तथा सपूर्ण विघ्नोका नाश करनेवाली महान पुण्यगाली आत्मा है " अत श्री गणेशमल" नाम रखा । माता अपने सुपुत्रपर सुसस्कार डालनेमें प्रतिक्षण सावधान रहती थी। पहला शिक्षक सततिके लिये तो माताहि होती है । मातायें सततिको, चाहे जैसा बना सकती है। जैसे कुमार गिली मिट्टीसे चाहे जैसे वर्तन बना सकता है, या किसान छोटे पौवेको चाहे जिधर झुका सकता है, वैसे हि छोटे बच्चोमें जैसेभी सस्कार भरना चाहो वैसे सस्कार माता भर सकती है । दुसरा शिक्षक सततिका पिता है । बहुतसे पिता प्यारमे सततिको विगाड देते है । लडकी होती है तो कहते है " वाई तेरे विंद कैसे लाना?" । तव पहले सिखाई हुयी वच्ची कहती है 'गोरा गोरा' । यदि लडका हुवा तो कहते " जा तेरे माँकी चोटो खीचकर आ, मै तुझे चार आने दूंगा"।
[२२] तपोविभूति कर्नाटक पदकेसरी [प्रकरण नो जिधर माता कहती जा तेरे पिता घरकै बाळ खिचकर बा में तुझे आठ माने दूंगी । इत्यादि मद्दी मजाकस पश्चॉपर बुरे सस्कार पड पाते है। मातापिता जैसी मजाक करके आनंद मनाते है पर बाप पाकर आंसू बहान पढते है । जबकी ये भोले बच्चे न तो लग्नमें समझते है न पसेमें परतु अनके पास्मापर अखे भद्द संस्कार जरूर पड़ जाते है । . चरित्रनायकजीके पिता श्री भी बहुत विवेकवान गुणवान तथा सुसस्कारी थे। वे साहि अपन पुत्रको बनाना चाहते थे। एक समय चरित्रनायकजीने अगरखीको खिसा लगवाया। तो पितात्रीने गालपर पपट लगाकर कहा क्या पोरी करना सिखना ह? जिस छोटेसे अदाहरणस पिताश्रीकी धर्मनिष्ठा बोर सुसस्कारिता की सलक दिखाई देती है। दुसरे व्यसन तो गहि कैसे सकते थे? माता रिपुर्पिता शत्रबालोयाम्या न पाठयते । न शोभते सभामध्ये हसमध्ये बको यया ॥ अति जो माणपिता अपनी सततिको नही पढाते है वे मातापिता शत्रु कहलाते ह। अनकी सक्षति सभामें सुशोभित नहीं होती । असे हसोक विचमें बगला वर्तमानमें मातापिता दव्य शिक्षण काफी देते है। पर चारित्रकी सरफ बहुत कम ध्यान देते है । अक्षर जामकोहि शिक्षण समझते ह । परतु पारिभ्य फ बिना साक्षर ज्ञान मनुष्यको राक्षस बना देता है। परित्रनायकजीके पितायीन हमारे कया नायकजीको वयमें मातेहि शिक्षण दैना पार कर दिया । । धिक्षण भलेहि डिग्रीको अपेक्षा मोडाहि हुवा हो पर सच्चा पान हृदयपर बक्सि हो गया पा । तया बुदीको तीव्रताका कारण तेलका बन्द पानीमें बसे फैल जाता है बसी तरह गतिका विकास होता जारहा था। मातापिता सुपुत्रकी वदि विषक्षणता तथा स्वाभिमानताको देखकर फुले नही समावे।
४ था] वज्रपात [२३] घुली देवीने पाच वर्षवाद और एक पुत्रको जन्म दिया, जिनका नाम 'शोभाचन्द्र' रखा। दोनो पुत्रोका अति प्रेमसे पालन कर रही थी। दोनो भाई मानो रामलक्ष्मणसी जोडी थी। दोनो साथमें क्रीडा करते, एक दुसरोकी सहायता करते और आनदमें मग्न रहते थे। प्रकरण ४ था वज्रपात चरित्रनायकजीने पद्रह वर्पको पार करके सोलहवे वर्ष में पैर रखा था। छोटाभाई १० वर्पका था । जैसे समयमे निसर्गको मानो जिनका आनद सहन नही हुवा । अत. अचानक अघटित घटना घटी। जिसका सपनोमें भी खयाल नही था । वच्चोका सर्वस्व ज्यो माता होती है, असीके अपर कालचदजीकी क्रूर दृष्टी पडी, और वे असे ले गये । अर्थात माताका स्वर्गवास हो गया। दोनो बच्चे विलखने लगे। हृदयसे करुणास्रोत वहने लगा । सेठ पुनमचदजी के दुखका तो पारही नही रहा । क्योकि पहले एक पत्नि चल बसी थी । और दुसरीभी चली गयी । साथमें दो छोटे-छोटे फूलसे वच्चोको छोड गयी थी। अत. वच्चोको देख-देखकर सेठजी अधिक वैचन होने लगे । कुटुम्व परिवार काफी था। फिरभी माता की गोदका आनद तो कही भी मिल नहीं सकता। दोनो भाईयोने पितामें हि, माता और पिता का अनुभव किया। कहाभी है "कालाय तस्मै नम ।" अर्थात अस कालको नमस्कार है, जिस के सामने वडे योद्धा, राजा, रक सभीने हार खाई है । असका नगारा अखड वजताहि रहता है । असने तीनो लोकमें धाक जमा रखी है । वह सर्व- विजयी है। दोनोभाई पिताकी गोदमें आनद मान रहे थे, परतु अशुभ कर्मोको तो मानो इन किशोर वच्चोकी परीक्षाहि लेना था। अत. चोवीसदिन मातृवियोग को नही हुये थे कि पिताश्रीका देहावसान हो गया। अव तो दोनोभाई निराधार होगये । बडे तो अपने चरित्रनायकजी थे। । ।
[२४] तपविभूति कर्नाटक गजकेसरी प्रकरण चे चिंतारूपो समुद्रमें डब गये। अपने अधुभ कर्मोको योप देन लप। मावा पिताका वियोग हो जानेसे अनका महापर दिल नही लगता था। अत कभी माता-पिताकी स्मति में रो परते थे वो कभी भविष्यको कल्पना करते तो कभी संक्षारकी क्षणिकतापर विचार करते तो कभी अपन कोको दोष देत तो कभी हिम्मतपूर्वक अपने मनको कहते थे हिम्मत नही खोना चाहिये । हिम्मते मर्दा महते खदा- हिम्मत हारना यह तो कायरोका काम है। हिम्मत ने धौर को दिलगीर सून हो। तदबीरभी वो कर कुछ वकदीर को न रो। वीरताके संस्कार वो बचपनसे ढूंस-ठूस के भरे हुम थ। धीर पिताके पुत्र कायर कसे बन धकते थे? गावमें भाई बन्दोक बहुत घर पर भाई बन्दोन कहा तुम हमारे घर रह जायो। परतु धरित्र नायकजीका वहाँ मन नहीं लगता था। ननीहालवालोने कहा बाबू । हमारे यहाँ चलो । और और बम कुटमियोनो अपने यहाँ पलनका आग्रह किया। पर बीर पुत्र क्यों किसीक शरणमें जान लगे ? अपना सुख दुःख अपने मात्मवलसे सहनपरे। एक पाश्चात्य कवि कहता है- Be a map bear thine ono bordcu never Think to thrust thy fate upon another ! -Robert Browing वही मनुष्य है जो अपन धोक्षको आपहि सहता है। अपन माग्मको दुसरोपर डालनका विचार भी नहीं करता है। चरित्रनायकजीन कायरताका लो कमोमि पाठ नहीं पढ़ा था। असे समपमें साधारण व्यक्ति तो विपर अपर महारा लेनके लिये लालाईत होता है | समकोंकी सिफारिश करता है। कहयोकि घरकारे, सजना सुनता है और अपन जीवनको पूसरोंके सहारे छोड़ देता है। पर चरित्रनायकीन असे कठीण धमयमें अपने परोपर पहें रहनेका सोचा। पर किसीके शरणमें जाना नही। परिवनायकजीका मायके ६ वपमें पदापण हुआहि या कि जयपुर के एक पनि मानी निपुत्रिक मनुष्य बहीह ५५ वा] भाईका वियोग [२५] सेठने हमारे चरित्रनायकजीको गोद लेनेके इरादेसे ले गये। वे वहाँ कुछ दिन तो रहे, किंतु एक दिन स्वाभिमान झलकहि झुठा । चरित्र -नायकजीने कहा, मै तो यहाँ नही रहूँगा । मै मिस जिंदगीमे दो बाप करना नही चाहता। मुझे अपने घर भेज दीजिये। छह वर्पके बच्चे के मुंहसे यह बात सुनकर सेठजी आश्चर्यचकित हुये । अपरकी घटना तो छह वर्षको अवस्थाकी है। अब तो चरित्र नायकजी १५ वर्षके थे। भिलाडे मे माता-पिताके स्मृति चरित्र नायकजीके दिलको बेचैन बनाती थी। अत. चरित्रनायकजी मारवाड छोडकर छोटे भाईसहित विदेशमें आगये थे । मानो दोनो भाइयोकी जोडी रामलक्ष्मणसी प्रतित होती थी। विदेशमे आये तो मनमाडमें ललवाणी गोत्रके दसपद्रह लाखकी इस्टेटवाले सेठजी गोद लेना चाहते थे। अन्हे वही अत्तर मिला ' मै दो बाप करना नही चाहता'। असेहि जामनेरके बीस-पच्चीस लाखकी सपत्तीवाले सेठजीको भी निराश होना पड़ा। चरित्रनायकजीकी पुण्यवानीको देखकर सभीका दिल अपना अपना पुत्र वनानेको ललचाते थे । परतु वे धनसे अपनें वापका नाम चेचना नही चाहते थे । वे कहते ' यह तो कुपुत्र का काम है जो सोने चादीके टुकडोको देखकर अपने वापका नाम मिटा दे । देखिये, चरित्र नायक्जीका निस्पृहताका और स्वाभिमानका आदर्श । Oh, How sublime a thing it is to suffer and be strong अर्थात यह कितनी महान वस्तु है जो सहन करता जाता है और मजबूत बनता है । प्रकरण ५ वा भाईका वियोग कालचदजीने मानो इनकी पुरी परीक्षा लेनाहि ठान लिया था । ज्यो ज्यो ये धैर्य, दृढता रखने लगे, त्यो त्यो कालचदजी इनकी अधिक कमौटी करने लगे। देश छोडके दोनो भाई विदेशमे आये तो भी असने पिछा नहीं छोडा । जैसे लकामें लक्ष्मणजीको शक्ति लग गयी, वैसेहि - [२६] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकारक यहाँ पर प्रिय छोटे भाई शोमाचद्रजीको कालरूपी शक्ति लग गयो । और नै परिननायकत्रीको दुनियामैं अकेले छोडकर बल बसे । अब परित्रनायकजी अछे रह गय । इतने दिन माता पिताका स्वर्गवास होनेपरमी भाईका सहारा था पर अपनो अकेली बारमा रह गयी। चंद तो बहुत हुवा । अस दुखका तो वर्णन करना असम्भव है । क्योंकि यह दुख तो जिसपे बिती हो वही जाने तया केवली। कलममें यह शक्ति नहीं है बो यथार्थ वर्णन कर सके । कविने कहा है- घुष्टं प्रष्ट पुनरपि पुन चदन भारुगधम् । सप्त तप्त पुनरपि पुन काचन कातवणम ।। छिन्न छिन्न पुनरपि पुन स्वादर्द चक्षुखडम् ।। बदनको चाहे कितनाहि घिसो यह वो अधिक से अधिकही सुगी देगा । सुवणको ज्यों यों अधिक तपाया जाता है क्यों स्यों अधिक चमकता है । गलको काटत समय ज्यों ज्यों निचेके तरफ बाते यौं त्यो अधिक स्वादिष्ट लगता है। अिसी तरहसे सज्जन व्यक्तिपर चाहे जितनाभी कष्ट थामे तोभी प्रकृति में विकृति नही जाती है। परित्रनामकजीक जीवन में ज्यों ज्यों कष्ट आन मग त्यों त्यों के धर्मशाली बनते जारहे थे। वे हिम्मत हारना तो कभी जानतेहि नही थे। बकल रहनेपर भी बांद-सूर्यको देखकर बहत यह भी तो अफल ह दुनियाको प्रकाशित कहत है । मझे क्यो हताश होना चाहिए एसा विचार करके मनको अषिक दढ वनात प। बलापूर, पाकर एक सठके मही मुनीम रहै । सेठजी बढे अच्छे थे।परन्तु लोम किसको धक्कर में नही डालता है? एक समय सेठगीने मदतकी हुडी लिखनको कहा। चरित्रनायकजीने कहा लिजियसा आपकी बात और कलम समालिए । मै एसे शूट बद और अन्याम करना नहीं चाहता। ११ महिने नौकरीका एक पंखामी नहीं लिया। नौकरी छोड़कर चले गए। सब्जी देखतहि रह गये । सेवजीको क्या मासूम की जिसने लाखोंकी इस्टरपर ठोकर मार दी उसके लिये दो ढाइ वर्ष नौकरीक पसे क्या चीज है ? सठजीको पुस तो बहुत हुवा और मुनिमजीकी बाट जोहत है। पर स्वाभिमानी ६ टा] विवाह को तयारी [२७] . - व्यक्ति अन्यायके सामने झुकना कभी नहीं चाहता । मुनिमजीने तो नौकरीको सेवा रूपमें प्रवर्तित करदी। वे विचारने लगे " यदी मै पैसा लेता तो मजदूर कहाता।" किन्तु मै सेठजी की सहायता करके सेवा की। अच्छा हुवा सेठजीने पैसे न देकर मुझे नौकरपनेसे बचाया। सेठजीका मुझपर उपकार है। वहासे एक कच्छि मुसलीमके दुकानपर गये । और असे स्पष्टतासे जाकर कहा की 'भाजी, मैं सेठजीके यहासे छूट गया हू । मेरे पास एक कौडी भी नही है, अगर तुझे विश्वास हो तो, कुछ माल सुधार दे" । कच्छी अनके सत्यतासे आपित होकर उसने शिघ्रही माल दे दिया । माल लेकर " रास्ते "के पासको " पिपरीमें" दुकान की। बहुत धन कमाया । फिर " नदुर बाजार में " बड़ी भारी कपडेकी दुकान लगायी। न्यायनीतीके कारण दुकान खूब जोरदार चलती थी । सत्यके प्रभावसे लक्ष्मीनेमी अपना वास्तव्य वहीपर कर दिया था । लक्ष्मी " दिन दुनी रात चौगुनी" वढने लगी। --- - प्रकरण ६ टा विवाह की तैयारी नगर सूलके " निवासी श्री खेमचदजी वाफणाने अपने भाइकी पुत्रीके साथ चरित्रनायकजीकी शादी करना चाहा । सगाइकी तैयारी हो गयी । परंतु महान आत्मा इस ससारके फदेमें क्यो फसने लगे ? उन्होने कहा 'मुझे लग्नके फदेमें नही पडना है'। देखिए ससारसे कितना अदासिन भाव था । गादीके विपयमें एक कवि कहता है- देश प्रदेशा नर फिरे मनमें राख चाह । नाक खिचावे साससे वडी चीज है व्याह ।। जिस शादीके लिए लोग हजारो रुपये खर्च करते है, कमी प्रपर रचते है, वुढे जवान बन जाते है, शादीके लिए गालोमें सुपारी दवाकर .
[२८] सपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकर गाल फुगाते है। नये दातोको बत्तिसी बपाते है। बालोंको सफदी ढाकनेके लिए खिजाव लगाते है। चरित्रवेत्ता स्वय महसे फरमाते थ- भक्ति करी गुरुदेवने किया जगतसे दूर। नहीं तो मिलती राड फका पडति सिरमें घूर।। परिवनायकजी निस्पह पन गय । वे र मी एकातमें बिचार करने लगते तो ससारको असारसाको देखकर दिल बचन बन जाता था। पुण्य कर्मोदयसे मारमा पुकारती थी की तू ममों संधारमे पडा है ? इसमें कोबी सार नही है। यदी म शादी कागा तो ससार जालमें फेस जाभूगा। फिर निकलना कठिन हो जायगा । अत शादी न करनाहि मेरे आरमोत्थानके लिए यष्ठ है। प्रकरण ७ वाँ यराग्य जरा जायन पीडई वाही जापन पढई । जाविदिया म हाय इताव धम्म समायरे ॥३॥ प्रमु महावीर स्वामि फरमाते है है भद्रप्राणियो जबतक आयध्यक सय नहीं हुमा हो जबतक इद्रिय शक्ति क्षय नही हुयी हो व्यापि नई बढी हो तबतक धमका साधन कर लो। यावत्स्वस्थाम' कलेबरगह यावदायोनायुप । यावञ्चेद्रियशक्तिरप्रतिहता यावच्चदूरे जरा ।। मात्मश्रेयसी तावदेव विदुपी कार्यप्रय नो महान् । उद्दीने भुवन तु पखनन प्रत्युध विदृश ॥१॥ अठारह पुराण ये पर्ता थी व्यासजी महाराज कहते है- जबनक यह परीरस्मी घर स्वस्थ हो जस्तन मायुप्य वा क्षय नही हुमा हो जवतव इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट न हुी हो और बढ अवस्या दूर हो सवतकही भास्मकल्याण इच्छक व्यक्तियोकं है सूा जनो से ग्रीष्म ऋतुके समान है। मनुप्य फलक ममान है। जैग ग्रीप्म ऋतुमें फूल ७ व] वैराग्य [२९]. प्रयत्ल करना चाहिजे । घर जलानेके बाद कूआँ खोदनेका प्रयत्न करनेसे क्या ? अर्थात मूर्यो का काम है । बुद्ध को वृद्ध व्यक्ति देखकर वैराग्य उत्पन्न हुआ । अनाथि मुनि को रोगके कारणसे तो, किसिको सफेद बाल देखनेसे, इत्यादि अनेक कारणोसे वैराग्य उत्पन्न होता है। शास्त्रमेंभी, २७ कारण बताये है। कारणके बिना, कार्य नही होता है । यह न्याय- दर्शनका नियम है । कार्य कारणका अविनाभवि सबध है । रोग तो बहुतसे व्यक्तियोको आते है । अस समय कोी तो डॉक्टर की शरण लेता है, कोशी हाकीमकी । कोसी माँबाप को पुकारते है । भिस । तरहसे रोगकी अवस्थाको काटते है । पर महान आत्माओ अस समयभी उत्तम विचार करके उस रोगसे भी कुछ ना कुछ उपदेश शिक्षा प्राप्त करती है । अिसीलिओ कबीरजीने कहा है सुखके अपर शिल्ला पडो, राम न आवे याद । बलिहारी अस दुखकी, पल पल आवे याद ।। चरित्रनायकजी का एक समय रात्री मे पेट दर्द देने लगा। अन्हें विचार उत्पन्न हुवा कि, “ कही मर न जाऊ । यदि मर जाऊँगा तो गाली हाथ जाना पडेगा, मैने धर्म कमाी कुछभी नही की। मेरे मानाजी और पिताजी का ४० वर्ष की अवस्थामें ही स्वर्गवास हो गया था। पी मेरी भी मृत्यु ४० वर्ष मे हो जाय तो अब तो ५ हि वर्ष वाकी है। इसलिये अब मुझे जल्दी सावधान हो जाना चाहिये ।" क्योकि अपने 'फर- माया है - समय गोयम मा पमायए" हे गौतम एक गमयका भी प्रमाद गन करो। पाश्चात्य कवि Samual Johnson करना " Catch them. O, catch catch the transient hour, improve each moment as it flies' Life's, a short summer, man a flower, he dies alas, How soon he dies? है मनप्राणियाँ नम्बर समय को पकडो । असा विचार करो कि प्रत्येक क्षण उर रहा है। जीवन छोटे [३०] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकस शोधहि नाथ हो जाता है बसेहि मनुष्य का जीवन क्षणिक है। हाय ! मह कितना जल्दी भर जाता है। परित्रनायकजीन सोचा पापही वर्ष बाकी रहे अब समय पर्व नही खोना पाहिले, यदि मेरा पेटदर्द मिट जावे तो म धौघहि लिस अपचको त्यागकर महावीर प्रभुका मार्ग अंगीकार करूगा। मानो जैसे से मनापि मुनि का रोग दीक्षाका निश्चय करतेहि नाश हो गया था रस हि चरित्रनायकजीका पेटदर्द मिट गया। बस फिर क्या था बस हजार के मालसे भरी हुबी दुकान को छोडकर गुरुकी खोज निकल पर। वैशापूरमे कोटा सप्रदायके मुनि महातपस्वी श्री रोडमरुजी महाराज के सुशिष्य थी तपस्वी प्रेम भार मुनि श्री प्रमराजजी महा रामका चातुर्मास या। रोडमलजी महाराजने उदयपूरमें महान कठिन अभिग्रह किया था। हाथी यदि लडड बहराये तो माहार करना । आखिर ४५ दिनको तपश्चर्या के बाद हाथीन मध्य बाजारमें सूडमें उठाकर लाड बहराय थे। ऐसे महान कठिन अभिग्रहधारी तपस्वीजीके शिष्य सपप्रमी श्री प्रेमराजजी महाराजको १६ दिनकी तपश्चर्या थी । जितनी लम्बी तपश्चर्या होते हुमे भी व्याख्यान खद बापही फरमाते में । स्वाध्याय ध्यान में हमेशा तल्लीन रहते थे । वाणी अस्थत मघर और मोज मरी भी श्रोता जन मत्र मुग्ध से रह जाते थे । वाणीमें जादुमा प्रभाव था।तपो तेज भी द्वितीय पा । चरित्र नायकजी गुरुकी सोजमें निकले थे। सीहि मेलापूर माय गुरुदेवका व्याख्यान श्रवण करन लगे । भावन अधिक दर होती जा रही थी । गुरुदेव फरमाते थे गगन नगर कल्प सगमो वस्लमानाम् । अलद पटल तुल्य पौवन या धन वा। सुगन सुत शरीरादिनी विधुचलानि ।। शाणिकमिव समस्त विदि ससार वत्तम् ।।२॥ गधव नगरके समान (बादलों के चिन्ह ) नही लोगोंकी उंग क्षणिक है। पानी भरे बादलों के समान यह धन और यौवन अल्पका ।
७ वा] वैराग्य [३१] स्थायी है । स्वजन, पुत्र, मित्र और बन्धुजन बिजलीके चमत्कार के समान क्षणस्थायी है। अर्थात यह संसार चलाचलीका मेला है। यहाँ कोमीभी स्थिर रहनेवाला नहीं है। अस कषाय युक्त आत्माकी, ससार के उपभोगोसे कभी तृप्ति नही होती। अत जिसमे फँसना भोले प्राणीका काम है । असुर सुर पतिना योन भोगेषु तृप्त. कथमिह मनुजाना तस्य भोगेषु तृप्ति जलनिधि जलपानाद् यो न जातो वितृष्ण तृणशिखरगताम्म पानत किं स तृप्येत् ॥२॥ जो जीव देव तथा देवेन्द्रोके भोगोसे तृप्त नही हुआ वह मनुष्योके भोगोसे तृप्त कैसे हो सकता है ? समुद्रका जल पीनेसे जिस जीवकी 'प्यास नही वुझी, असकी तृणपर रहे हुमे जलविंदु से प्यास कैसे बुझ सकती है ? जैसे अग्नि, काष्ट से तृप्त नही हो सकती, असे यह आत्मा भोगोसे तृप्त नही हो सकती। "त्यागे असे आगे जहाँ भोग वहाँ रोग" ऐसा वैराग्यमय उपदेश श्रवण करके चरित्र नायकजीका मन अधिक से अधिक दृढ बन गया। गुरुदेवके पास आकर दीक्षा के भाव प्रगट किये। गुरुदेवने कहा देवानुप्रिय दीक्षा कोअी बच्चोका प्रसाद नही है। प्रभु महावीर का मार्ग अत्यत कठिन है । खाडेकी धारपर चलना है । आत्मा को वशमे करनी पड़ती है । अज्ञानियोकी कहावत है - मुड मुडाये तीन गुण मिटे, सरकी खाज खानेको लड्डु मिले लोक कहे महाराज ॥१॥" यह भोले लोगोकी साधुपनेकी मजाक है। साधुपना वोरोंका मार्ग है। कर्मोसे युद्ध करना पड़ता है। शत्रु, मित्रपर समभाव रखना पड़ता है, इत्यादि की गुणोको धारण करना पडता है साधुपणा न पणा खरबुजेका । जिसमें है मजा, असमें न मजा कोयी वीरही पार लगाते है " ॥१॥ " कभी घी घना कभी मुठ्ठी चना और कभी वो भी मना गुरु श्री तपस्वी प्रेमराजजी महाराजने जिस तरहसे अनेक प्रकारकी चारित्र्यकी ।
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कठिन
r.] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकल
भीमहि नाश हो जाता है बसेहि मनुष्य का जीवन क्षणिक है । हाम'
यह कितना जल्दी मर जाता है।
चरित्रनायकजीने सोचा पोषही वर्ष बाकी रहे अब समय बर्ष
नहीं सोना चाहिये, यदि मेरा पेटदर्द मिट जावे तो म धीमहि विस
अपचको त्यागकर महावीर प्रमुका माग अगीकार करूगा। मानो जैसे
अनाथि मुनि का रोग दीक्षाका निश्चय करनेहि नाश हो गया था यस
हि परित्रनायकजीका पेटदद मिट गया। बस फिर क्या था दस हजार
के मालसे भरी हुभी दुकान को छोडकर गुरुकी खोज निकल पड।
बेलापूरम कोटा संप्रदायके मुनि महातपस्थी श्री रोडमलजी
महाराज के सुशिष्य श्री तपस्वी प्रेम महार मुनि श्री प्रमराजजी महा
राजका चातुर्मास या । रोडमलजी महाराजन पदयपूरमें महान
अभिग्रह किया था। हाथी यदि लाहु बहराये वो बाहार करना । बाहिर
४५ वे दिनकी तपश्चर्या के बाद हाथीने मध्य बाजारमें सूडमें समाकर
लडर बहराय य। एसे महान कठिन अभिग्रहधारी तपस्वीजीके शिष्य
तपप्रमी श्री प्रमरामजी महाराजकी ६६ दिनको सपश्चर्या थी। मिनी
लम्बी तपश्चर्या होते हुब मी व्याख्यान खुद बापही फरमाते या स्वाध्याय
ध्यानमें हमेशा तम्लीन रहने पे ।बाणी मस्थत मधुर और मोर भरी थी
श्रोता बन मत्र मुग्ध से रह जाते थे । वाणी में जादुमा प्रभाव था।तपो
सेब भी दितीय था। परित्र नायकजी गुरुको सोनमें निकले थे।
सोहि बलापूर बामें गुरदेवका व्यारमान श्रवण करन लगे । भावना
अधिक दृढ होती जा रही थी। गुरुदेव फरमाने दे
गगन नगर कन्प सगमौ वल्लभानाम ।
जल्द पाल तुल्य यौवन वा बन था।
सुजन सुरु गरीदिनी विधु पलानि ।।
साणिमिव समस्त विदि ससार बत्तम ॥१॥
स वा] वैराग्य [३१] ? स्थायी है । स्वजन, पुत्र, मित्र और बन्धुजन बिजलीके चमत्कार के समान क्षणस्थायी है। अर्थात यह ससार चलाचलीका मेला है। यहाँ कोमीभी स्थिर रहनेवाला नही है। अस कषाय युक्त आत्माकी, ससार के उपभोगोसे कभी तृप्ति नही होती । अत जिसमें फंसना भोले प्राणीका काम है । असुर सुर पतिना योन भोगेषु तृप्त कथमिह मनुजाना तस्य भोगेषु तृप्ति जलनिधि जलपानाद् यो न जातो वितृष्ण तृणशिखरगताम्म पानत किं स तृप्येत् ॥२॥ जो जीव देव तथा देवेन्द्रोके भोगोसे तृप्त नही हुआ वह मनुष्योके भोगोसे तृप्त कैसे हो सकता है ? समुद्रका जल पीनेसे जिस जीवकी ‘प्यास नही बुझी, असकी तृणपर रहे हुअ जलबिंदु से प्यास कैसे बुझ सकती है ? जैसे अग्नि, काष्ट से तृप्त नही हो सकती, असे यह आत्मा भोगोसे तृप्त नही हो सकती। " त्यागे असे आगे" "जहाँ भोग वहाँ रोग" ऐसा वैराग्यमय उपदेश श्रवण करके चरित्र नायकजीका मन अधिक से अधिक दृढ बन गया। गुरुदेवके पास आकर दीक्षा के भाव प्रगट किये। गुरुदेवने कहा देवानुप्रिय दीक्षा कोभी बच्चोका प्रसाद नही है। प्रभु महावीर का मार्ग अत्यत कठिन है। खाडेकी धारपर चलना है । आत्मा को वशमे करनी पड़ती है। अज्ञानियोकी कहावत है मुड मुडाये तीन गुण मिटे, सरकी खाज खानेको लड्डु मिले लोक कहे महाराज ॥१॥ यह भोले लोगोकी साधुपनेकी मजाक है। साधुपना वोरोका मार्ग है। कर्मोसे युद्ध करना पडता है। शत्रु, मित्रपर समभाव रखना पडता है, इत्यादि की गुणोको धारण करना पड़ता है साधुपणा न पणा खरबुजेका । जिसमें है मजा, असमें न मजा कोयी वीरही पार लगाते है " ॥१॥ " कभी घी घना कभी मुठ्ठी चना और कभी वो भी मना गुरु श्री तपस्वी प्रेमराजजी महाराजने जिस तरहसे अनेक प्रकारको चारित्र्यकी ।
[३२] तपोषिभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण 7 कठीनाईयां बतलाई। वे चेलेके लोलपी नही य की साने पिनेका लोम बताकर शटचेला मुड । नवरागी हि असा या कठीनाईयोंको सुन अरबाये। परागीजीका वैराग स्मशानिया खिचडियां चटक तथा मक वैराग नही था। जो खिचडी खायो कि उतर जाय। स्मशानसे बायेकि वैराग उतर जाय । परागोजीका वराग ज्ञानगमित था। वह इतनीसी। कठीनाईयोको सुनकर कसे उतरे? वरागीजी गुरु श्री तपस्वी प्रमरामजी महाराजके पास में रहकर ज्ञानाध्ययन करन लगे। साथ साथ विहार करन लगे । भोले प्राणी अनकी परीक्षा के लिये सयम साधनाको कठीनाईयां बताते तो कोसी कहता क्या पहा है साघुपनम मया साधुपनसेहि मोक्ष मिलता है ? दृड वरागी अपने विचारोंसे टस से मस नही हुआ । अनको जैसा मुह तोड़ जवाब देते जिससे सुननेवाले चुप हो पाते। म दिवानी रामकी मोय दिवाना कहे लोग जिस कहावतके अनुसार दुनियाँ खुद ससारमै फेसी और दुसरोंको फसाना चाहती है। वरागीजीका वराग तो हाथी के दांत थ । एक दफा बाहर निकलने बाद कैसे अन्दर जा सकते? न भवति पुनरुक्त भापितम सज्जनानाम सज्जन व्यक्तियोका पवन कमी नही बदल सकता है। वरागीजीकी कमी तरहसे क्सोटी की गयी । पर वे खरेही उतरे। ग्रामानुग्राम विधरते हमे भव्य जीवों का उद्धार करते हुम परम पवित्र चरित्र चुडामनी थी उपम्बी प्रमराजजीम नगरसूल पधारे। वहांपर तपस्वीजीका भागमन सुनकर आनदको लहर उठने लगी अनता उमट पड़ी। गुरुदेव बड समारोहक साथ ग्राममें पधार। दढ धर्मीप्रिय धर्मी सुधावक श्री खेमपदजी याफणा वरागीजी को देखकर बहुतहि सुप हुने। उनकी परनी थी समबुवाई भी धमश्रदामें अनसे कम नही थी। यह भी परिये अधिक घममें प्रम रखनेवाली श्रमणोपसिका यो। जब पसिके में विचार अम मालुम हुवा बसन पतिको और भी प्ररणा दी।
७ वा]
वैराग्य
[३३]
शुभ महुर्त के
और कहा जिसको आप जवाई बनाना चाहते थे, असे अब अपना पुत्र
बनाकर दीक्षा का महान निर्जरा तथा तीर्थंकर गोत्र वाधनेका लाभ
लीजिये । असे अवसरको, हाथसे मत जाने दीजिये।
वैरागीजी तो उनके पहिलेसेहि परखे परखाए थे। अन्हे परीक्षा करनेकी
जरूर ही नही रही । अव शीघ्रही मूहुर्त दिखलाकर दीक्षाकी तैय्यारी
की। दीक्षाके निमित्तसे उत्सव होने लगा, वैरागीजी तो उत्सवसे
नि स्पृह थे, परतु सेठजी के दिलमे पहलेसेहि जो लग्न की उमग थी
अस उमग को अब धार्मिक रूप मिलनेसे सेटजी की उमग दूनी बढ गी।
सेठजी
खूब उत्सव करके
अनुसार
वि स १९७० मीगसर
सुद ९ मी के दिन महान दीक्षा निष्क्रमण कर, गुरु श्री तपस्वी प्रेम-
राजजी महाराजके पासमे ले गये और कहा,
" सिस्स भिक्ख दलयामो,"
अर्थात शिष्यरूपी भिक्षा देता हुँ । सो आप ग्रहण कीजिये । गुरुदेव
श्री तपस्वी प्रेमराजजी महाराज दीक्षाका महत्व बताते हुझे फर्माने लगे-
विश्वानदकरी भवाम्बुधि तरी सर्वापदा कर्तरी
मोक्षाध्वैक विलंघनाय विमला विद्या परा खेचरी
दृष्ट्या भावित कल्मषाय नयने बध्दा प्रतिज्ञा दृढा ।
रम्याहच्चरिता तनोतु भविना दीक्षा मनो वाछितम् ॥१॥
अर्थ - विश्वमें मानद फैलानेवाली, ससार-समुद्रसे पार अतारने-
वाली मोक्षके मार्गको पार करनेके लिये निर्मल आकाशगामिनी विद्याके
समान तथा दृष्टीमात्रसे पाप नाश करने की दृढ प्रतिज्ञावाली दीक्षा है ।
असी जो सुदर भगवती प्रव्रज्या वह भव्य जनोके लिये मनोवारित
फलको देवे। दीक्षा कर्मरूपी सापको कीलनेके लिये महामत्र है। वैराग्य
को रसकुप्पी है। ऐसी दीक्षा कोई भवि प्राणी हि लेता है । कहा
भी है-
कश्चिन्न् जन्म प्रासादे धर्मस्थपति निर्मिते ।
सद्गुण विशद दीक्षा ध्वज धन्योऽधिरोपयेत् ॥१॥
[३४] सपीविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण षमसे प्राप्त मनुष्य जमरूपी महलपर कोई एक सदगुणेसि यक्त दीक्षारूपी ध्वजा लगाता है। दीक्षाके गुणोंका वणन करता हुवा एक कवि कहता ह 'न च राज्य मयं न च पोर मय इहलोक-सुख परलोक हितम् । परकीतिकर नर देव न त अमणस्पमिद रमणीयतरम् ॥ भर्यात दीक्षामें राजाका भय नही है। न चोर का भय है । विस लोक में सुख देनेवाली परलोको हित कानवाली कोति फैलानेवाली राजा महाराजाओंकी बन्दनीय है। यह थमणत्व महान सुदर है । इलादिक दीक्षाकी महिमाका वर्णन करके गुरुदेवन वैरागी जीवको दीक्षाका पाठ सुनाया। करेमी मंते का पाठ सुनते समय रागीनी को अदितीय आनद हो रहा था । मानो तीन लोककी सपत्ति हायमें माही है। साघुका वेष धारण करनेपर घमनायक को अलौकिक वीरताका बनभव होने लगा। ठाणाग सूत्र के धीय गणेमें चार प्रकारकी दीक्षाका वर्णन चलता है। एक व्यक्ति सिंहके सदृश्य लेते है। और थियानके समान कायर बनकर पार लगाते है। एक व्यक्ति शियाल के समान लेते है। मोर सिंहके समान वीरवासे पालन करते है । एक व्यक्ति शिवाल क समान कायरवा लेने है। कायरतासे पार लगाते हैं। एक व्यक्ति सिहक समान वीरवासे लेने ह । और बोरतासे हो असवक पालने है। परिव-नायकजीन उत्साहक साम दीपा ग्रहण की। और दीक्षा लैनके वा उमाह दिन प्रति िन वदन लगा। गुरुवर श्री प्रमराजगी महाराज एसे मममी असाही शिष्य को प्राप्त करके मनही मन फुलेन समाते । नीतिमें कहा है -पुत्रको शिष्यकी और पतिको समु अचसा नही करना चाहिये। अस प्रत्यक्षमें कुछ न बोलते पर हृदय में (अपना जीवन सफल समझने । नदीक्षित मुनिजीने दोना लेतेही सैदियोंको बाम कर लिया हरीमा मुरीन मिनुको परिभाषा करते हुये कहा है खुषा मिनतीति ७ वा] वैराग्य [३५] रे जिव्हा 1 भिक्षु " अर्थात् सच्चा भिक्षु वही है जो क्षुधापर तावा कर ले । कमी इस रसनाके वशमें पडकर सयम के लक्ष्यको भूल जाते है । और इन्द्रियोमें एक एक गुण है किन्तु रसनेन्द्रियमें दो गुण है - बोलनेका और खानेका । कुरु मर्यादा भोजने वचने तथा वचने प्राण-सदेहो भोजने त्वप्यऽजीर्णता ।।१।। कवि अपने जिव्हासे कहता है- हे जिव्हा | तू दो वातोकी मर्यादा कर ले। भोजन करनेमे तथा बोलने में । क्योकि विना विचारे बोलनेसे प्राणोका सदेह हो जाता है । तथा अधिक भोजन करनेसे अजीर्ण रोग उत्पन्न हो जाता है । तथा प्रमाद, आलस्य, निद्रा, आदि घेर लेते है और जान, ध्यानमे अतराय आ जाती है । किसीकी जिव्हा वोलनेमें वश होती है खाने में नही, और किसी की खानेमे होती है तो वोलने में नही । दोनो विपयोमें जिव्हा को वशमें करनेवाले महापुरुप क्वचित् ही होते है । "दीपक झोको पवनको नरको झोको नार । साधु झोको जीभको डुवे काली धार साधुको अनेक प्रकारका भोजन मिलता है । रसनेन्द्रिय भी नित नये भोजन चाहती है । यदि इसे वशमें नहीं किया जाय तो वह साधुसे स्वादु वन जाता है। और असका पतन हो जाता है। उत्तराध्ययनके बहुश्रुत नामक अध्ययनमे प्रभुने फरमाया है - अह अहिं ठाणेही सिक्खा सिलीति बुच्चई अर्थात आठ स्थानोमे ज्ञान प्राप्त कर सकता है । असमें बतलाया है " न सिया अड लोलए" जो खानेमे अति लोलुपी नही हो, असे ही ज्ञान प्राप्त होता है। रमनेन्द्रियको वशमे करनेमे सब इन्द्रियाँ अपने आप वशमें हो जाती है । स्वादु भोजन चाहे नित, दुस्वादु पर छीः छोः करे जीभपर कब्जा नही, साधु हुआ तो क्या हुआ ॥ " । [३६] सपोविभूति कर्नाटक गयकेसरी नव दीक्षित मुनिजीने एक समय भोजन करना तो प्रारंभ कियाही या । सायमें सभी वस्तु एकही पात्र में महण करना और सब सामिल मिलाकर भोगना । खट्टा मिठा खारा तोखा आदि अलग २ रसप्रिय रसनन्द्रियक विषयको जीत लिया। कहा है इन्द्रिय शके बिना प्रव्रज्या कोसी कामकी नही है। 'कयामा यस्य नो छिन्न यस्यनात्मा वश मन । इन्द्रियाणि न गुप्तानि प्रव्रज्या तस्य निष्फला ॥ जिसके कपायोंका उच्छद नहीं हुआ हो जिसके आत्मा व मन शर्म नही हो जिसकी इद्रिया वशर्म न हो उसकी प्रव्रज्या निष्फल बतलाई है। यदि हम इसी सूत्रको साधुनोंपर कसके देखें तो ९९ प्रतिशत निष्फल प्रवज्यावाले मिलेगे। इद्रियोंको वशमें किये बिना ज्ञान भी प्राप्त नहीं हो सकता और ज्ञानके बिना तप-सयम और क्रिया अषी बतलाई है। इसलिये दश धकालोक सूत्रक चतुथ अध्ययनमें प्रमण भगवत महावीर स्वामिने फरमाया है- पढम नाणं सो दया एवं चिटई सव्व सजए अनाणी कि काही किवा नाही य सेय पावग॥१॥सव प्रथम पानको स्थान मिला है। बत पहले ज्ञान प्राप्त करना चाहिए फिर दयाका पालन हो सकता है। इसी तरहसे सव सपक्षी लोग (साधू) सजममें स्थिर रह सकने है । अज्ञानी क्या कर सकता है? क्या येयकारी है और क्या पापकारी है? यह वह नहीं जान सकता हमने उत्तराध्ययनके २८ वे अध्ययन में फरमाया है नागनविना नहुति घरण गुणा शानके बिना बारित्र्य महीं हो सकता। हमारे नव प्रजित मनिजी भानामत भोजनम् अर्थात शान- रूपी भोजन लिये एगभत्तष मोयण अर्यात एक वस्सही भोजन परने सग । शास्त्रध्ययन में तल्लीन रहने लगे नाण सब्य पया सरी । भान सबका प्रसारलवाला है। यों ज्यों शान होने लगा त्वौं त्यों संगम दृढ होने में।
७ वाँ] वैराग्य [३७] ज्ञान और क्रिया जान और क्रिया ये दो पख है। इन दोनोमे आत्मा ऊँची उठ सकती है । जैसे एक पखसे पक्षी नही उड सकता, ऐसेही सिर्फ ज्ञान तथा केवल क्रिया से मोक्ष प्राप्त नही हो सकता। कोई व्यक्नि नौकामें बैठ जाय और पानी काटनेकी क्रिया नही करे तो क्या वह समुद्रपार हो सकता है ? ऐसेही सयमरूपी नौकामें वैठ जाय और क्रिया न करे तो क्या मसार-समुद्रमे पार हो सकता ? इसीलिये पूज्यपाद उमाल्बामि महागजने तत्त्वार्थाधिगम सूत्र में फरमाया है - जान क्रियाश्या मोक्ष. जान और क्रियासेही मोक्ष प्राप्ति होती है । केवल नानभी निर्वाण नही दे सकता । जैसे किमीको लड्डुका ज्ञान है परतु मूंहमे डाला नही, तो क्या पेट भर सकता? इसी तरह ज्ञान मार्ग बतलाता है, क्रिया निश्चित स्थानपर पहुँचाती है । जैसे, धन और ऋण दोनों तारो के मिलनेसे विजलीका प्रकाश निकलता है ऐमेही ज्ञान और क्रिया से आत्म-ज्योति फैलती है । जैसे एक चक्कसे रय नही चल सकता। ऐसेही ज्ञान और क्रिया दोनो ही परमावश्यक है । क्रिया अवी है तो जान लगडा है । जब दोनोका सामजस्य होता है तभी दोनो मार्थक बन जाते है । हमारे कथानायकजी जान के साथ साथ क्रियामे दृढ बनते जारहे थे। ज्यिाके लिये बहुत सावधान रहते थे। भगवान महावीर स्वामीने 'उत्तराध्यायनके' २८ वे अध्ययन में फरमाया है - नागेन जाणइ भावे, दमणेण यसहहे । चरित्तेण निगिण्हइ तवेण परि मुज्झई ।। ज्ञानसे भावको जानता है, दर्शनमे श्रद्धा करता है, चारित्र से कर्मोको रोकता है, और तपसे आत्मा की शुद्धि होती है । एय चयरित्तकर त चरित्त आहिय कर्मोको क्षय करे उसे चारित्र कहते है ।
[३८] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरमा प्रकरण ८ वाँ तप कम-शत्रुओंका नाश करनेके लिय तप एक अमोष शस्त्र ह । तप कर्मकचरेको जलाकर भस्म कर डालता ह । सप सब रोगोका क्षय कर देता ह । तपसे अनेक लधियाँ प्राप्त हो जाती है। कांतार न मयतरो ज्वलयितु दक्षोदवाग्नि विना दावाग्नि न यषतरो घमयितु शस्तो विनाम्भो घरम निष्णास पवन विना निरसितु नान्योयथाऽम्भोघरम् भोपतपसा विना किमपर हतु समर्थों तथा ॥१॥ कवि कहता है जगलको जलानमें दावाग्निक सिवाय कोई समर्थ नहीं है। मेघको छिन्न भिन्न फरक उडानक लिय जोरदार वायुके सिवाय कोई समय नही ह । एसेहि कमसमूहको सपके बिना कोई नाम नही कर सकता | जनागमानुसार तप बारह प्रकारका है । छह प्रकारका आभ्यन्तर और छह प्रकारका बाए तप । हमारे क्यानायकजी कपायोंपर विजय मिलानके लिय और कर्म निर्जरा क लिये आम्पन्तर तथा बाह्य तप करने लग । तपश्चर्या करती हुमी पारमा कोंकी कोडी सपाती है । उत्कृष्ट रसायन आवे तो तीयकर गोत्र बाधवी ह । भरसे नारायण पनानेवाली एक तपश्चर्याहि है। कामदेवपर विजय प्राप्त करनवाला भसमव कायको सिद्ध करने वाला इद्रका यासन चलायमान करनवाला वीनो लोक में या लानवाला एक तपाहि है। मनिधीजीन दशवय सक एवासणा तप क्यिा। अब विशेष मारम- पुटिन लिय एकान्तर सपा प्रारम पर दिया । जसे भगवान महावीर स्वामीन साढवारहवपतक सपश्चर्या कर देवल ज्ञान प्राप्त पिया और बादमें उपदेश देना शुरू पिया बही आप हमारे मनीग्रीन रखा।
८ वा] तप [३९]' आपका निश्चय था कि 'सुधरके सुधारना'। जवतक आत्मशुद्धि न हो तवतक परोपदेश नही देना है। लेकीन आज ससारमें प्राय. यह देखते है कि थोडासा इधर उघरका पढ लिया कि उपदेप्टा बन जाता है ! परतु- 'Half knowledge is a dangerous thing' . . । आधा नान घोकेकी चीज है। " निमहकीम खतरे में जान ऐसा उपदेप्टा स्वकाहि अनहित करता है और दुसरोकाभी। इसीसे प्रवचन- कारका महत्व घट जाता है। शास्त्रमें फरमाया है - ' आचाराग ठाणाग सूयगडाग' आदि सूत्रोके अध्ययनके विना प्रवचनका अधिकारी नही हो सकता। वक्ता जितना अधिक त्यागी होगा, बुसका श्रोताओपर अतनाहि अधिक असर पडेगा। हमारे चरित्रनायकजी तपस्वी तो थे हि, क्रियामें दृढ, नियम-व्रतोमे दिन-प्रतिदिन वृद्धि कर रहे थे। प्रमादसे तो कोमो दूर रहते थे। दिन मे कभी आडा आसन ( सोना ) नहीं करते थे। घो चि पु लि यह पुराना सूत्र है । अर्थात पहले धोको, फिर चिंतन करो। चिंतन करते समय यदि का हो तो पूछो, वादमें उसे लिखो। इसी सूत्रानुसार कथानायकजी मुनिजीने पहिले अध्ययन किया। वादमें ४५ आगमोको अपने हाथसे लिखा । गम शुद्ध, सुदर अक्षरोमें लिखे हुये है । जिसे देखतेहि बनता है। हमारे चरित्रनायक मुनिजीका मस्कृत, प्राकृत, मराठी, गुजराथी और राजस्थानी भापायोपर पूरा यविकार था । कन्नड भी अच्छी तरहसे जानने थे। मुनिश्री ४५ आगमके पूर्ण वेत्ता थे। अकालका समय टालकर आदिने अततक स्वाध्याय करते रहते थे। अकालमें ध्यान जपादि करके समयको मफल करते थे। एक क्षण भी वे व्यर्थ नहीं जाने देते थे। गृहस्थीको वातोंसे सैकडो कोस दूर रहते थे। वे रात्रीमें भी बहुत कम सोते थे। निद्रापर भी पूर्ण तावा कर रखा था । ।
[४.] सपोषिभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण प्रकरण ९ वाँ उपदेश जो खदह नही समक्ष वह औरों को क्या समझाअगा। जो खुदहि सोया पड़ा हुआ सोएको क्या जगाएगा। ' जो व्यक्ति सुरहि अनभिज्ञ है वह दुसरोका कसे उद्धार कर सकता है? जो खुदहि मोया हमा है मह दूसरोंको कसे जगा सकता है ? मुनियौन उपदेश देना प्रारम किया। उपदेश म जादुसा प्रभाव था। साधना करनके बाद वाणी निकली थी । स्पष्ट वक्ता थे। भाचाराग सूत्रमें प्रभुन फरमाया है जहाँ तुच्छरस कम्यई सहा पुण्णस जहाँ पुण्णस्स कम्बई यहाँ सुउस्स जैसा उपदेश राजा महाराजाओ को देते ये साहि रक- भिकारीको देते थ। जमा रक मिकारीको देते थे वैसाहि राजा महाराजा को। एसे मुनिधी भी सबको एक समान उपदेश देते । उपदेश शास्त्रीय खत्वाँस लबालब भरा रहता है । वीपाई दृष्टात गायन आदि नाममात्र कोहि होते थे। वे फरमाते थे चौपाईन श्रोताबोको चौपट कर दिया पति चौपाई सुननको घटक लग जानके कारणसे थावक ज्ञानहीन बनते जा रह है।" गायनके लिय फरमाते थे नाटकीय लोगोंका काम है। गामन गाकर लोगोका मनोरजन करना दष्टात पहना पान बालयौंका मन बहलाना है। यदि दृष्टात देना भी है तो शास्त्रक शिवाय इधर उधरने नहीं देना चाहिये जिससे शास्नज्ञान हो। वीसवी सदी के साप प्राय करके राग रागनियों में पर है। वे कुछ कडी भरसे कुछ कडी उबरसे लेकर जोड लिगा नाम अपना रख लिया और कवि मन गम । हमारे तपस्वीजी जोड क लिये फरमाते पकि जोड माथा फोड । वर्षा व्यय सिर पच्चीमें पहना। स्वाध्याम ध्यानको छोडकर कषि धनने के मोहस समय वरवाद करना । कवि असे कहते है हृदयमें मरान आप पा स्फुरण होना। खचतान करना कोई कविका लक्षण नही है । गोवती परिमापा करता हुमा एक कषि कहना है गीत हो जी पाहो कभी न बह फीका हो ।
११ वा] उपदेश [४१] गीत याने दिलकी पुकार'। चरित्रनायकजीका प्रवचन सैध्दातिक होता था। वे श्रोताओके मनोरजनकी अपेक्षा मनोमजनका अर्थात मन साफ करनेका ध्यान अधिक रखते थे। अनकी वाणी औजभरी थी। जब वे सिंहके समान गर्जना करते तो श्रोताजन काँप उठते थे। उनके “वचनको कोई टाल नही सकता था। वे खरीखुरी सुनानेको जराभी आगा पीछा नही देखते थे । अनकी वाणी में स्वाभाविकहि विनोद भरा हुआ था। गर्जते गर्जते असा विनोद करते थे कि हंसते हँसते श्रोताओके पेटमें वल पड जाते थे। जैसे निगठ्ठ महावीरस्वामिने सद्धर्म-प्रचारार्थ कर्मकी निर्जरा करनेके लिये अनार्य लाट देशमें विहार किया था । ऐसाहि मुनिश्रीने कर्नाटकमें विहार किया। यह प्रदेश असा था कि साधु क्या है, यह भी मालुम नहीं था । वहॉपर आहारपानी मिलना तो दूरहि रहा । पर सिधा बोलनेकोभी कोई तैयार नहीं था। देखिये, अग्रविहारी तपस्वीजीका विहार सुनतेहि आपको आश्चर्य होगा । अपवासके दिन ५० मैलका विहार करते थे। दुसरे दिन ४० मैलका । इसतरह ९० मैलपर पारना करते थे । एकातर व्रतमेंतो कभीभी अतर नहीं डालते थे । ऐसा विहार सुनकर कायर तो कापने लगते है। कर्नाटक-गज-केसरी पदसे विभूषित कर्नाटक मे ऐमा धर्मप्रचार किया कि दृढ धर्मी, प्रिय धर्मी, व्रतधारी, ज्ञानी, ध्यानी, की श्रावक वनाये । अन्य की लोगोको मास मदिराका त्याग दिलाकर दानवसे मानव वनाया। जिससे जनता " कर्नाटक-गज- केसरी " के नामसे पुकारने लगी। कर्नाटक केसरीजी विचरते विचरते महाराष्ट्र देशमें पधारे, जिसमे “धनगर जवळा" नामका एक छोटासा ग्राम है, धर्मकी लगन अच्छी है । अनके वहापर पधारतेहि, जनतामे आनद की दौड पडी । महाराष्ट्रीय भापामें बहुत सुदर व्याख्यान फरमाते थे। नामदेवजीके, तुकाराम महाराज के अभग बहुत सुदर ढगसे वोलकर अर्थ समझाते थे। जैन और-जनेतर जनता व्याख्यानका लाभ लेने लगी । वहॉपर श्री खेमचदजी सचेतीको वैराग्य उत्पन्न हुवा ! और अन्होने अपनी भावना मुनिश्रीजीके सन्मुख प्रदर्शित की । केसरीजीने ।
[४२] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण फरमाया 'पहले कुछ साधना और अभ्यास कीजिए व तदनतर दीक्षा शिजीये। खेमचदजी परागीन गुरुषाशानुसार कुछ महिनतक साथ रहकर साधना की। दो प्रकरण १० वा शिष्य प्राप्ति तत्पश्चात तपप्रेमी तपस्वी श्री प्रेमराजजी म सा तया घोर तपस्वी वैयावच्ची श्री देविलालजी म सा और कनाटक गजकेसरीजी इस तरह तीन महान विभूवियाँ ग्रामोग्राम विचरण करती हुयी भव्य जनोंका उद्धार करती हुयी चिंचवड शहरम पधारी। चिचवड शहर मानो स्वरकी प्रतिस्पर्धा कर रहा था। तीनो महात्माओने पान दर्शन तथा पारित मानो साक्षात रूप लेकर अवतरित हुवा हो । साथम तीन वैरागीभी छ। जिससे एकका नाम और स्थान हम उपर दे चुके है। पिता-पुत्र राणी और थ । पिताका नाम प्रमराजजी पुत्र का नाम जीवराजजी था। ये फूलतावे के निवासी थ। आपका जम उघे धरानमें हुआ था। चिचवड शहरमें तीन दीक्षाकी धूमधाम होन लगी । जनता मानद विभोर हो उठी । इधर तो तीनों तपको साक्षात मूर्तियां थी । उधर सीनो वरागी बराग्य रंग में पूर्ण रग हुय थे। तीनो दीक्षा एक साथ होनकी शुभ वार्ता चारों ओर बिजलीकी तरह फैल गयो । हजारों बनवा दीक्षा निष्क्रमण देखनके लिय यान लगी। श्री सघ उत्सवपर उत्सव मनान लगी । सीना वरागी रथपर व हुम अहिया तप सयमको मूर्तियाँ प्रतित होती थी। दि स १९८४ पोप वदी १ के दिन तीनों बरामी मंसारी वस्त्राभूपण उवारपर साप वेप धारण करके गुरुके सन्मय सडे हुये । ऐसा प्रतित होना था कि मव दिरती चारित्रहिसाकार होकर पाया है। तीनों परागी मनियापहनार हाथ जोडकर चारित्र चितामणी लेनके लिये गुरुके रामुप खा होगप गुरुथी तपस्वी प्रमराजजी महा ता नदीक्षाभत्र ।
[४३ शिष्य-प्राप्ति १० वाँ] " करेमि भते सावज्ज जोग" का पाठ सुनाया। तीनो ससारिक द्रव्यको छोडकर पचमहाव्रतरूपी पचरलोको ग्रहण कर ऐसे खुश हुये मानो रक को राज मिला हो। नवदीक्षित, मुनिश्री वालव्रम्हचारी जीवराजजी म. सा, और उनके पिता श्री प्रेमराजजी मुनि, तपस्वी श्री देवीलालजी म सा के नेत्रायमें शिष्य वने । खेमचदजी मुनि, श्री कर्नाटक गजकेसरीजीके शिष्य बने । चिंचवडमें जो दीक्षा महोत्सव हुवा वह अद्वितीय था। मुनिश्री चरित्र- नायकजीके द्वितीय शिष्य श्री अगरचदजी म सा थे। वे सिकदरावादके रहनेवाले थे। कथानायक मुनिश्री विचरते-विचरते वहापर पधारे । अपदेश श्रवणकर अन्हे वैराग्य उत्पन्न हुवा । दीक्षा बहुतहि धूमधामसे हुयी । नवदीक्षित मुनिश्री स्वभावसेहि विनीत, नम्र और कोमल थे। तपश्चर्या तथा ज्ञानका ध्यान खूब मन लगाकर करते थे । गुरु आज्ञाको तथा वचनको कभीभि अल्लघन नही करते थे । गुरुजीके सेवामें तत्पर रहते' थे । गुरुदेवको अपना सर्वस्व मानते थे। प्रकृतिके सरल और भद्र थे । कर्नाटक गजकेसरी मुनिश्री शिष्य परिवार सहित 'वेंगलोर' पधारे।' तृतीय शिष्य -वहाँके श्री सघ ने बडेहि उत्साहके साथ स्वागत करके गावमे ले आये। चरित्रनायकजी रोजाना धर्मोपदेश फरमाते थे। धर्मोपदेश अत्यत आकर्षक था। जैन-अजैन धर्मसभामें उपस्थित रहकर उपदेश का लाभ लेते थे । कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचद्राचार्य कहते है वक्ता परोपकार वुद्धिसे उपदेश देता है । असे महान कर्मोकी निर्जरा " भगवान महावीर स्वामिने भी ज्ञाता सूत्रमे फरमाया है "धर्मको प्रभावना फैलाता हुवा जीव कर्मोकी कोडी खपावे, उत्कृष्ट - रसायन आवे तो तीर्थंकर गोत्र वावे"। कथानायकजी व्याख्यान द्वारा महान प्रभावना फैला रहे थे । श्रोताज नोका दिन प्रतिदिन उत्साह होती है। धर्मकी वढता जाता था। वहाँपर श्री मिश्रीलालजी छाजेड नामके एक युवक को वैराग्य उत्पन्न हुमा । वह युवक धनवान का पुत्र था।
। [४] सपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी लामी लागी सब को लागी मही लिगार लागी सबहि जानीये छोर चले घरवार व्याख्यानकी प्रशसा करनवाले बहुत मिलेग । परतु हृदयमें उतारने वाले सकडोमें एसादा मुस्किलसे मिलता है। नन्दो सूत्रमें थोताका वर्मन करते हुये प्रमु फरमाते है भक पहा तलेरो फुग हुआ और एक पेटसे फुटा हुमा एक गलेमसे फुटा हुआ और एक दिना पुरा हुवा अिनमसे सलेमेसे फुटे हय घडेके सदश्य जो श्रोताहोते है उहें उपदेश देना व्यय है। उपर भरे निचे सरे बांका सद्गुरू काई करे । पेटमेंसे फुट हुय पह के समान जो थोता होते है ये भाषा याद रखते है, भाषा भूल जाते है। गलेमें पुटे हुमे घडले समाजो योता होते है वे योग भूलते है और जादा याद रखते है। पूण घटके सदश्य तो कोई एक महान पुरुपहि होते है। चरित्रनायकजीका उपदेश तो बहुत से लोग सुनते ५ । लेकीन मिश्रीलालजी छाजपर पूण असर कर गया था। वह अपन मातासे बाशा लेकर दीक्षा लेनके लिय कटिबद्ध हो गया । तब सपपत्ति मुद्यावर श्री छगनलालजी मुथान बहुत धूमधामसे दीक्षा दिलाई। दीगा लेकर उहीन सब दिल लगाकर ज्ञानाध्ययन किया । ये भी घोर तपस्वी उप विहारी तथा कठिन क्रियाको पालते है। आता पना मते है। अनवे तीन शिष्य है। वर्तमानमें विचर रहे है नियम प्रतों में बढ़त दृड है । धतुथ शिष्य- चरित्रनायक मनिधीजीन पटरको तीन दफा स्पा था। कर्नाटकम विपरते समय आप थे। पम प्रचारसे लिय ये प्राणों प्रणरो तत्पर रहते थे। परोपकाराय मता विमतय- सजन लोगोषी विभति परोपकार के लिये होती है, महाभो है गरल गुप मोगको तार जगत कल्याणको निषल । मनोहर महल अनके फिर भय तो पूय बनहि है जगत को तारनवाले जगत में सतजनहि है। जगवारा परिवनायवजी अमममय जिनवाणी परसाने समै । विनमाणी + पिपागु भव्य जन वापर अपनी प्यास बुझाम लगे। राजन्द्रगढ पधारे १० वा] शिष्य-प्राप्ति [४५] - वाणी श्रवण करके श्रोताजनोके मनमयूर नाचने लगे। वहाँपर " श्री राजमलजी रजपुत " रहते थे। वे भी व्याख्यानमें आने लगे। वाणीकी वर्षासे सुनके हृदयक्षेत्रमे वैराग्य अकुर उत्पन्न हुवा । अनके दो पुत्र, . पत्नी आदि परिवार था । अत वे दिलमें सोचते " समारमें दिल लगता नही। यह वधन मुझे छोडना नहीं चाहते है। क्या करना चाहिये ?" वैराग्य-अकुर बलवान बना तो छत्ति ऋद्धिको छोडकर गुरुचरणोमें सुपस्थित हो गये थे। पत्नी एव स्वजनोकी पद्रह सालके पश्चात आज्ञा प्राप्त करके " जामठी" क्षेत्रमे दीक्षा ग्रहण की। अछदाजेन भुजति नसेचाईत्ति वुच्चई ॥ साहिणे चयई भोएसे हु चाईत्तिवुच्चई ॥१॥ अर्थात परवशतासे जो भोग नही भोगता है, वह त्यागी नही कहलाता। परंतु जो भोग स्वाधीन होनेपर भी त्याग देता है वही सच्चा त्यागी कहलाता है। हमारे चरित्रनायक मुनिश्रीने वैरागीजी को पहले वहुत दिनोतक सयम-साधना तथा जानाध्ययन कराया । वादमें विचरते विचरते मलकापुर ( बोदवड ) पधारे। वहाँपर वोदवडके पास जामठी नामक एक छोटासा क्षेत्र है। वहाँके नयमलजी राकाने दीक्षा निष्क्रमण (दीक्षा महोत्सव ) करके दीक्षा दिलवाई। नवदीक्षित मुनि बडे त्यागी, तपस्वी निकले । आतपना लेते थे। विनीत और नम्र थे। जिस तरहसे कयानायकने कइ व्यक्तियोका उद्धार किया। सरवर तरवर सतजन चवथा वरसे मेह । परोपकारके कारणे चारो धारी देह । सरोवर, वृक्ष, साजन तथा वर्षा ये चारो परोपकार करनेके लिये धरती तलपर अवतरीत हुये है । मक्खान तो जब स्वय को ताप लगता है, तव पिघलता है। पर सत जन तो दुमरोके तापसेहि पिघला जाते है। धर्मनायकजी मुनि श्री धर्मको साक्षात मूति थे। जहाँ जाते वहां धर्मका महान उद्योग करते थे। झुनका ध्यान विशेप करके अनभिज्ञ लोगोको सुधारनेकी ओर जादा था ।
[४६] तपोषिभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण प्रकरण ११ वाँ जप ज्योतिका प्रारभ मासनमें पधारे वो गावमें चारो ओर प्लेग फेल रहा था। सारे शहर, वाहि त्राहि मच रही थी । जनता महलोंको छोडकर झोपलीयों में अवतो लोगोंके समान जीवन बीता रही थी। चारो ओर प्लेग अपना सामान्य फला रहा था। किसीका पुत्र किसीकी माता, किसीका पिता को किसीकी पुत्रीको स्वाहा करता था। प्लेगकी बिमारी मानो अट्टाहात कर रही थी। जनता पराजित हो गयी थी। प्रति वर्ष प्लेगराष भाकर शहरमे अपना अड्डा जमाते थे । अस्थि प्राममे जसे प्रमुवीर पधारते ) वहापर मान महामारीका बवडर फला रखा था। प्रभुकै पधारतेहि का पांव हो गया । और यक्षमी प्रमुका भक्त बन गया। एही कथानायक मनिधीजीके पधारतेही शातीका वातावरण फलने लगा। प्लेगको हराने वाले महान पचकै चरण पडतेही प्लेग मानो कोसो दूर दूम दयाका भागनगा! उचमे नास्ति दारिद्रय नास्ति जागरसो मयम । मौनन कलहो नास्ति जपतो नास्ति पासकम् ॥ उघमसे दरिद्रताका माश होता है । मौनसे क्लहका नगनसे पोरका और पपसे पापा ना होता है। कर्नाटक गजकेसरी मुनिश्रीन पापनाशा जपको शुरू किया। जनतासे कहाकि ' शाविनाय भगवानका सप्ताह पर कौजिय ।शातीनाथ भगवान अब रोगमारी बिमारीके नाशक है । शाति सप्ताहका सूत्रपात करनवाले हमारे परित्रनायकलीही है । अप और का प्रारम पिया । शहरमें रोर एक अर्थविल अड होना चाहिए। अप सपा प्रभावसे प्लेग नस्तनावत हो गया । धर्मराजके सामन कौन नही पता रोगको मातही क्या जो ठहर सके । मिस पयकार को देखकर ग्रामो माम का प्रचार हो गया। स्थान-स्थानपर सप्ताह के प्रमावसे शाती पसी | महातक लोग मर रहकर एक महिनका जप करले को पहाँ पधारच पहाँ अपनीका मगल वाच बसवाया। पकी मंगा WAN १२ वा] चरित्र चूडामणिके चमत्कार [४७] । वहती थी। तपस्वीजीके चरण पडतेही तप साक्षात रूप धारण करके हाजीर हो जाता था । जप-तपके प्रभावसे कभीयोके विघ्नोका, आपत्ति- योका, दु खोका नाश हुवा । 'यदूर यदूराराध्यम् तपसा सर्व सिद्धयते' जो दूर है मुष्किलसे आराधना करने योग्य है, वे सब तपसे सिद्ध हो जाते है । जपसे शब्द ध्वनि वायुमडलमे फैलकर दूषित वायुको नाश कर देती है। प्रकरण १२ वाँ चरित्र चूडामणिके चमत्कार १) सापके साथ रहना. सापसे सव लोग ऐसे डरते है जैसे यमदेवसे । अज्ञानी लोग उसे देखतेहि मार देते है । पर हमारे कथानायक मुनिश्री विचरते विचरते अनेक क्षेत्रोको पावन करते हुए शाहागढ" पधारे। शाहागढमे जिस स्थानपर उतरे उस स्थानमें बहुत वडा भुजग आकर मुनिश्रीके एक हातकी दूरिपर बैठ गया । मुनिश्री स्वाध्यायमें तल्लीन थे । जनताने देखा तो मुनिश्रीको अन्य स्थानोमें चलनेकी प्रार्थना की। मुनिश्रीने फरमाया " भगवानके समवशरणमेंभी सिंह, साप, नकुल, हाथी, आदि सब प्राणी वैर भूल जाते थे । वीर वाणी में अद्वितीय शक्ति है । मेरे दिलमे किसीके प्रति चैर नही है । सर्प मेरा कुछ नही बिगाड सकता। तुम लोग जराभी मत डरिये । वीर प्रभुने चडकौशिकका खुद जाकर उद्धार किया था। यह तो मेरे पास आया है। अतः अिसे वीरवाणीसे वचित क्यो रक्खू । विचारेको क्यो अतराय दू? देखिए तपस्वीजीकी निर्भयता दृढता । साँप वहापर १० बजेसे ४ बजे तक बैठा रहा । जब मुनिश्री वहासे विहार करने लगे तब फरमाया "भाई, अब तुम तुम्हारे स्थानपर चले जाओ अन्यथा कोमी तुझे मार डालेगा" । वस मुनिश्रीका फरमाना था कि साँप वहासे चला गया । मुनि- [४८] तपोषिभूति कर्नाटक गजकेसरी श्रीका तप प्रमाव देखकर जनता आश्चयचकित रह गयी। इस तरह मुनिश्री सापके साम ६ घट विराजित रहे। २) मुनिमोके इप्टोसे सप-जहर उतरना सापका जहर भयकर होता है। कई मरवादी सत्रवादी, गैस्टर, वैचभी हार जाते है । पर चरित्रनायक मनिधी कुछभी नही करते थे। सिर्फ दृष्टी मात्रसे जहर उतर जाता था। वैजापुरके पास खडाला ग्राम है । वहाके एक धोबीके लडकेको सार इस गया। उस लडकेको मुनिश्रीके पासमें लाए । भनियोने फरमाया क्या साँप डस गया ! सौप इस गया कहते हो. पायो इसे शाति सप्ताहमें खडे कर दी। उस लडकेको जापमे खडा कर दिया गया। पहरका कुछभी असर नहीं हुवा । जनता यह दृश्य देखकर मनिथीपर अधिक पढ़ा रखन लगी। चौसालमें धनराजजी खिमसराके चरको चाप उस गया था। खिंवसराजीन यलको मनिधी के स मुख खड़ा कर दिया । मुनिश्रीकी दृष्टी पडतेही बल स्वस्थ हो गया। तपा चमत्कार देखकर जन, जनतर जनताकी जन धमपर श्रदा बनी। 1) चोर पलायन तुका म्हण द्रब्य गोमास समान' धन मासके समान है। जिसके पास यह होता है उसके आपत्तियां मगी रहती है। धरती बगन जल राजा धीरे धामी धरती में रखने तो इपरका उपर चला जाता है। अभी अग्नि बहा कर जाती है । कभी जमदेव बहाल जाता है । धनवानको राजाई तरहसे दर देना है । मराठीमबहावत है गळ तेय माशा गडके पिछे मक्खियाँ लगती है। मत पन बनपती ताण है । धनको सग्रह करनेमेंमी अष्ट उठाना पाता है । माह परना बाद रक्षण मला पडता है। चला जाता है। पिना व्यक्ति प्राणभी छोह देते है। पोरोनरी धनपर हमे नजर लगी रहती है। वैजनाथ परलीमें" "भगवान सी टोल माहेश्वरी रहते है। उनकी बुदरगांवपर १२ वा] चरित्र-चूडामणिके चमत्कार [४९J खेती है । वे खेतीकी देखरेख करने गये । वहापर रातमें २०-२५ चोरोकी टोली आ धमकी। चोरोने उनके पाससे ३००-४०० रुपये और घडी आदि थी वह सव ले लिया । और बादमें चोरोने कहा इसे जिंदा नही छोडना चाहिए। यदि यह अपनेको पहिचान जाय तो, फिर अपनेको सतायेगा । अत पिसे जला दो। भगवानदासजीने विचार किया मृत्यु तो सामने नाच रही है। पर एक दफा गुरुदेवका ध्यान तो कर लू । जितने चोरोंमे मै अकेला करही क्या सकता हूँ? ऐसा विचार करके झट गुरुदेवका ध्यान करने बैठ गये। चोरोने मिट्टीका तेल लेकर उनके सव अगपर छिडक दिया। सिर्फ दिया-सलाइ जलाना वाकी था । उतने में एक चोरने कहा कि, बिचारेका धनभी ले लिया और जानभी लेना यह महा अन्याय है। अपनेकोभी मरना है। जिसके बाल-बच्चे होगे। उनकी दुरापिश लगेगी। अत छोड दो । गुरुदेवके ध्यानमे चोरोका विचार बदल गया और जिंदा उन्हे छोडकर चले गये । दूसरे दिन फिर भगवानदासजी औरगाबादमें गुरुदेवके शरणमें आकर तेलेकी तपश्चर्या की और कहा "आपनेही मुझे बचाया है। ४) चोरोको दृष्टी बद दूसरी घटना वेंगलोर निवासी सुश्रावक धर्मप्रेमी गुस्महाराजके अनन्य भक्त श्री अनराजजी साकलाकी सुपुत्री सुरजवाई है। उसे खिंचनमे गोलेछा कुटुवमे व्याही है। वह लग्न होतेही ससुराल गयी। वहापर दिनमे चार बजेको डाका आया। डाकेवालोने उनके घरमें प्रवेश किया । सब घरवाले धुजने लगे । परतु नव परिणीता वधूने सारा दागीना, जेवर एक थाली में इक्ठा करके रख दिया । और उपरसे एक मैल-कुचैला वस्त्र डाल दिया। फिर गुरुदेवकी जोरजोरसे रट लगाई 'हे सद्गुरुनाथ' 'हे सद्गुरुनाथ' डाकेवालोने अिबरसे अधर तक खाक छान डाली परतु उन्हे कुछभी नही मिला । सुरजवाईसे पूछा की अिस थालमें क्या है ? उसने कहा जिसमे नो बच्चोके खिलौने है । डाकेवालोको कुछभी दिखाइ नही दिया । लाखों .
[५.] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकाप । रूपोंका डागिना सामने पहा हुधा था। परंतु चोरोंकी (हतियोंकी) बाल बाहो गयी थी। घरभेसे एक धागाभी नहीं गया। डाकेवात सुरजवाई को हमन लग। वह आपसमें कहन लग कि यह कोई पागल है। पलो यहापर कुछभी नही है । वही डाकेवालोंने पासक घरमें जाकर डाका सला। किन्तु गुरुदेवक अब जाप करनसे सुरजबाईका घर अखंड बप यया । यह है गुरुरेवक नामम शक्ति । ५) भूत प्रतोंका निकालना बैनागमोमें चार जातिके देवोंका वणन आता है। भवनपति ध्यंतर, पोतिषी और वमानिक। लोक तीन भागों में विभाजित किया है। वैमानिक देव जुर्ण लोकमें रहने है। ज्योतिषी और व्यतर तीर्ण छोकमें अर्यात मध्यलोकमें और भवनपति अपोलोकमें रहते है। ठाणाम सुरके चोये ठाण प्रभुने फरमाया है दिखा उपसग्गा पब्धिहा पण्णता संग्रहा। हासापासो विमसा पुढो वेमया । चार कारणसे देवता उपचम करते है। हसोसे दपसे विमशासे और पथककारणोंसे । मनुस्यमी तिर्ण लोक में रहते है । और व्यतरमी । अस अनकी भाशातना हो पानसे यह मनुष्यको सतान लगते है। मारवाडमें गौडवाह प्रदेशमे बम्हणा नामक गांव है। महापर वागरेचा कुसम्बकी एक बहन रहती है। वह बजापुर पागोसमें गरबके दानको मायी थी। उसकी प्रकृति अस्वस्थ रहती थी। पुरुदेव स्वाध्याय पर रह थे। वह आतही धुमन लगी। गरदेवने असे सपश्षयों पच्छाखा दी। वह कहती • तुम दयाल होकर हमारा १५पका परमा छा रहे हो तुष छहकायोंकी ती रक्षा करते हो। पुरयने कहा तुम कौन हो? तब वह बालो हम ५२ बीर ६४ जोपीनी है। पुदेवन पहा त्रिगे तुम क्यों सताते हो? वे कहन लगे हम सब पितकर किस कर रह थे। भुस समय जिसमें माकर हमारे अपर भनिती की मन हमन पिरो एकर लिया है। गुरुदेवने असे २२ निकी मारी करवायी। युगौ माप एक दुसरे बाई मंगमे भरुजी बाये । भी कहन सग में जाता है। अभी समय ५२ वोर र बोगिनीने १२ वाँ] चरित्र-चूडामणिके चमत्कार [५१] 4. । कहा हम भी जाते है। ऐसी रट लगायी। अतमे निकल गये। बाई स्वस्थ हो गयी। धुलियाके चपालालजीकी बहु कमलाबाईके अगमे कोसी व्यतर देव था। असे जब दर्शन करानेको लाये तो आँखे मुदकर वैठ गयी। जैसे श्रेणीक महाराजने अपने दादीको भगवान महावीर स्वामीके दर्शन करनेको कहा असने अपनी आँखे फोडली, वस वैसेहि वह व्यतरभी गुरुदेवके -सामने आतेहि आखे मुद लेता था। वह बाई करीब ३ मास वहापर रही, पर गुरुदेवके सामने आखे खोलकर भी न देखती । वदना-नमस्कार करना तो दूरही रहा । जब तपश्चर्या असे कराना प्रारभ किया, तो वह छिपकर भोजन करनेका प्रयत्न करती थी । व्यतरके कारण वह पति तथा -सासको मारती थी । सास तथा पति उसकी तपश्चर्यामे पुरी निगरानी रखते थे । गुरुदेवके पास न मत्र था न तत्र । न दोरा था न धागा। वे तो जो औषधी खुद लेते थे वही सब दीन दुःखियोको देते थे । कमलाबाई को ११ अपवास कराये । वह आँखे खोलने लगी और १५ अपवास कराये तब तो वह व्यतर भूखसे हैरान होकर अपना रास्ता नापा । वहन स्वस्थ होगी। गुरुदेव हमेशा यही फरमाते थे कि हमारे पास क्या है तपस्याके सिवाय ? किन्तु गुरुदेवके चरणोमें तपश्चर्या करने वालोको आनदका अनुभव होता था। तपस्वीजीके पासमें तपस्या जराभी मुश्किल नही मालूम होती थी। यही थी गुरुदेवके सेवामे शक्ति । " रजनीके" जवानमलजीकी बहु ताराबाई है । असको सौत शौक लग गयी थी। सौत असे भोजनही नही करने देती थी। करीब असने ५ वर्षतक पापड-खिचे खाकर निकाले। असका दिल भोजनपर बहुत जाता था। पर मुंहमे ग्रास लिया की गलेके नीचे नही अतरता था। "विचारी हैरान होगयी। की प्रयत्न किये, पर सब निष्फल हुये । आखिरमें गुरुदेवके शरणमें आयी । आतेही घुमने लगी । गुरुदेवने कहा कौन है ? असने कहा मै तो तुम्हारी चेली हू । क्या मुझे आप नही पहिचानते हो ? " तू मिसे क्यो सताती है"। असने कहा जवान मलजीको तेला और मिसको ११ अनवास कराये तो मैं चली जावूगी । दोनो पति- [५२) सपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण पत्नी ने परचर्या की वह चली गयी । अब वह बहन स्वस्थ है। बाल- बच्चे भी है । गुरुदेवक दशनसे महान कमकी मिजरा होकर महान फलकी प्राप्ति होती थी। १) भानुमतिका निकलना गुरुदेव बने क्षत्रोको पावन करते हुम गगावर पधारे। गरदेवको महिमा अपरंपार थी। गंगाखेडके पास 'दगडगाव नामक एक छोटामा ग्राम है । वहापर गणेशमलजी रहते थ। अनकी पत्नी बहुत दिनो बस्वस्य थी। गुरुदेवकी महिमा अनके कानपर पहुची। ये अस समय अपनी धमपानीको लेकर नादेड आय । अन्होंने पहिले कभी प्रयत्न किय। हजारो रपय खर्चे परतु कुछ नही हुवा । अठारह वपतक भानुमति अस बहनको सताती रही । गमवक पास भातेही यह घुमन लगी । गुरुदेवने बुखे सपश्चर्या पछत्सा दी। सिफ धमती पर किवनही दिन बोली महो। १५ अपवास किये। सब बोली मक्या एसीही आयी हू मुझे रहस्रो बुलाह सब मामी । जिसक चापान मेरे लिए पुतलियों, लिन्, सुइण वगैरे बक माहक निचे गहवामी है । अत म मिसे कसे छोडदू' कहते है यह बहन पब कुमारावस्या थी । सब असके चाचावी विच्छा दुसरेक साथ शादी करनकी पी। और असकी माने गणेशलालसीके साय शादी कर दी । मत विध्य असके चाचान असै भानुमती करवादी थी। गुरु वन १५ अपपासने बाद दिनकी तपाचर्या और करवायी। तब वह बोलत लगी म कहीभी प्रगट नही हुपा परतु मिस महात्मा सामने मन परयस प्रगट होनाही पस। भिनका पज मै सहन नहीं कर सकी। गुरदेवो सामन और स्थानमें अिधरसे अपर और सुपरस विपर लौटती थी। गुरुदेवने कहा अब मिसे छोड दे'। गुरुदेव बघनमें अदितीय शक्ति थी। पवनही मत्रका काम करता था । सब यह बोली में किसीभी हासतमें पिसे नही छोडती परंतु मिन महारमा साडौंका मुस्लपन रनकी मुझमें वापत नहीं । गुरुदेव स पहनको मौर २२ निसी सपश्चर्या परवायी । तब भानुमतिन कहा ' मेरे अमुक शार नीचे पाय पुतसे निकाले तो मैं अभी जाती है।' फिर मार स्पय देकर हूँ १२ वा] चरित्र-चूडामणिके चमत्कार [५३] -- "पधारे। "अिचोरकी लगी । गुरुदेवने कहा, तू . नीचे जाकर देखा तो पुतले, सुीयों आदि सब निकले । अस दिनसे वह बहन स्वस्थ हो गयी। भानुमतिने अपनी लिला समेट ली। विवारी गुरुदेवके गुण गाती अपने स्थानको चली गयी। ७) सिरसे नाचना गुरुदेव भव्य जिवोका उद्धार करते हुये लासलगाव रहनेवाली एक महेश्वराणी बहन पिहर जा रही थी। राम्तेमें लासलगाव पडता था । असने गुरुदेवका प्रभाव सुना तब वह गुरुदेवके दर्शनार्थ आयी । आतेही पैर अपर करके सिरकी तरफसे नाचने कौन है ? तब वह वोली "हम चार व्यतरीयाँ अिसे क्यो सताती है ? चली जावो' । तब वे वोली आज तो हम यहाँ थोडी क्रिडा कर ले, रास्तेमे हम अिसे छोडकर चली जावेगी । आपका वचन हमें मान्य है। ऐसा कहकर खुब सरके वलसे नाचने लगी। कुँए मे पडनेको गयी। फिर वहासे लौटकर वापिस आगयी । दर्शन करके चली गयी। रास्तेमें चारो व्यतरीयाँ चली गयी । गुरुदेवके तप तेज से दृष्टी भगते थे। दिल्ली, आगरा, बबइ, पाली, जोधपूर, मारवाड, मेवाड, मालवा, सौराष्ट्र, लुधियाना, खानदेश, बरार, बगलोर, मद्रास आदि अनेक क्षेत्रसे जैन जनेतर लोग दर्शनार्थ आते और जो जो अिच्छा लेकर आते थे वे सफल हो जाती थी। भूत तो एक एक दिनमें दो चार भी निकल जाते थे । भूतोकी तो अनेक घटनाएँ है । कहातक लिखे । ग्रथका कलेवर बहुत बढ जायेगा। की भूत तो कहते कि हमे गणेशबाबाका डर लगता है । की घरमे तो सताते और गुरुदेव के डरके मारे आते नही थे । कभी कहते " हमे भूग्वे क्यो मार रहे हो हमे भूखे क्यो मार रहे हो" ? को भी कहते । हम 'आपके चरण शरणमे रहेगे' कोओ वकता तो, कोभी रोता तो, कोणी गाता, कोी लौटता। हमेशा यात्रा लगी रहती थी, पर गुरुदेव अपने स्वाध्यायमे तल्लीन रहते थे। वे न तो अपने तपातेज का अभिमान करते थे। और न अनके प्रपच में पडते थे । जो कोणी भी रोगका, भूतोका, विमारीका, दु.खोका गित लेकर आता असे तपकी पुडीयाँ दे देते । मबके लिए एक दवा, एक जडी, एकही बटी थी। वह था तप । सबको पडतेही भूत - 4 [५४] तपोविभूति कर्नाटक गगकेसरी [प्रकरण समशितास तपकी दवा देत थ । न सा लगता था म टवा। पल्पवक्ष पितामणी रनक समान थ । ८) व्यवहारले पुन जीवन तुलसी मावत देसम राति नमायो जीप । चीर जीवो तुल बालमा अमर चूडा माशीप ॥१॥ एक बहन पा पति मर गया। बस यह अपन पतिले साथ सति होनको जा रही थी। मागमें तुलसीदासजीको मात देखकर सर झुराया। सब सुलतीदाराजीन अमर घुमा भाशीर्वाद दे दिया। सती यह भागीर्वाद गुनगर पमनी और कहा- पनि हमारे पल बस हम भी जावनहार । तुर मी तुम्हार बधनका होगा फोन हवाल ॥२॥ गस तुलसीदासजी यह दोहा गुनतेहि विचारमें पड गये। परतु उहे रामनामपर पूरा विश्वास था। बत मुको वही ठहरा लिया औरकहा- तुरुगी मग भठायके धरा शीपपर हाय । सुलमीदास गरीबी पत रामो भगवत ॥ ३॥ है प्रभी मैने तो बिना विचार जो बुधभी मह लिया है असको मुषा- रनयाले बाहि हो। मापने नाममें महान शामिन है। बिगडी सुधारन वाले मापहि हो। मिस सरह प्रश्रमी प्रापना रन लग । तब वह मुर्ग जीविष हो गया । गताकी लाज पानेवाले प्रमुहिह। गुरको मममी दो प्राणियोंगो पुनर्जीवन मिला। एक मद्रासमा भाई था। वहहत विमार था। डॉ 4. हदिम आदि कई व्यक्ति बाय। पिसीन 'जान रिय विगीने दवाई की बोतल पिलाई विगाने पुरीया पटाई। पर विमारी तो दिन-प्रतिदिन अनी गयी। अम भाईपी परनी हैरान थी। भव पया पिया जाय ? अगर तो वयात हो गया। अगम-गर्म पी पी। सनम तो बासोश्वामी प्रिया भी बहोगपी । मारी देवी तो मर गाम ममाप्त हो गया था । यस अव बहबहनवोनियमन बन गयी और चिल्लाना रोने लगी। गांवो १२ वा] चरित्र-चूडामणिके चमत्कार [५५] सब लोक स्मशान-यात्राके लिये आगये। सीढीकी तैयारी होने लगी। मुतने में अस बहनको गुरदेवका स्मरण हुवा। अमने कहा " गुरदेवने नामसे माला तो पहनाओ।" और पाच हजार रुपये लेकर जुन माईके हाथका स्पर्श कराके धर्मदान करनेका निश्चय करार लिया। बस, फिरतो पद्रह-बीस मिनटमे अस भाईने श्वासोछ्वास लेना शुरू कर दिया । यह गुरुदेवपर अटल थद्राका महात्म्य । असेहि वगलोरमें एक बहन वीमार होगयी। असके पति नेरु, भवानी। पीर-पंगबर, साईवावा, कुलदेवता आदि कई देवी देवतागेको मनौती की । किन्नु कुछ भी फायदा नहीं हुवा । डॉ०, वैद्योनेभी हाथ घड़क दिये । दुनियाका रिवाज है, जिसके पास जो वस्तु होती वह नहि बताता । है । व्यासजी महाराजने कहा - वैद्या वदति कफ-पित्तमद्विकारान्, ज्योनिविदोग्रह गतिविनवति । भूनाभिगिति भूनविदो वदति, प्रारबम बनवान् मुनगो बदति ॥ १ ॥ वैद्य लोग ५-पिन नया वायुका विकार वनाने है। योनिधि ग्रहका जोर बनाने है। मनोगे जाननेवाले भृनपरिन बनाते है। किंतु मुनिलोग तो कहते है । पूर्व में है । असे भोग बिना छुटकारा नहीं हैं। देव गुरु और वर्मका गरज लिये बिना वर्म नाम नहीं होते हैं। वह भाई विश्वंकट बन गया । श्विर बहनकी छिनी मृदेनी हो गयी । लेकिन झुम नईने हिम्मत नहीं हारी। असे एकदम गुन्द्रवनन्मृति हुयो । स्मृति होहि मानां वो काम मादय होपण हो मा मानद हुवा ! अन्नै गुम्देवका मा यिा और ५१ २० इनपर्च कराके धर्मादामें निकले कि शीहि बढ़ बहन ऑन्तु बोलकर बोली "क्यो पवन हो! में दो कमी है। उस माईत्री म दिन्न सारे देवीदेवताओं दान और गुर्दा प्रअ होगा। ९) (म) पागलपना दूर होना.- पागलन भी Trraf कि मप्र वन रे नी युने बेहतर मिति ईरानी है। बिन्द्र विनीट का मान बन [५६) तपोविभूति कर्नाटक गमकेसरी [प्रकरण पिवान पहा जाता है। पर अस विनोद से स्वयको कोई आनंद नही आवाह। शिव मेक पागलोंकी तो कुटम्बी लोग घरसे निकाल देते है । कोई पागलखानमें भगद्धे ह । पागलक सहाय्यक बहुत कम लोग बनते हैं। गुरुदेव दरवार में परातको स्थान मिलता था तो फिर मनुष्योक लिमे कहनाहि क्या ! निझामाबादमें एक माहेश्वरी रहता है। उसको १९-२० घषका एक लडका है। वह पाच-छह वपसे पागल था। असका पागलपन भर्यानासे बाहर था। मह माता-पिता-भाई आदि को खूब मारता था। दातों इंसता था। बजिरोसे वनपरभी तोडकर भग जाता था। गुरदेवकी महिमा सुनतेहि यह अपने पागल पुत्र को लेकर गुरुदेव दरवारमें पहपा। गरुदेवने मुसे महान कम निजरा को मैसी पुडीयो दी अर्थात तेला पनक्सापा जिससे तीनहि दिनमै असका पागलपन दूर हो गया । जो पुडियो कहीभी डॉ. वचन यहाँ नहीं मिलती थी। फिरतो असके हे महामुन । मेरे पुत्रको भाउ दिन दवा दे दिजिए । भर्यात बाठ दिनकी तपश्चर्या करा दिजीए । माठ दिन तपश्चर्याक बाद वह असा स्वस्प बन गया कभी पागल था या नही अक्षा पता तक मही लगता है । वह मामभी महबके गुण गा रहा है। (1) सानदेश में राजनी नामका एक छोटासा ग्राम है। वहाँपर मारमा एक व्यक्ति पागल बन गया था। वह तो दिनमा जाताहि रहता मा । बुमका मुह रेडीओ समान चोमीस पर पलसाहि रहता था। रेशीम और असमें सिफ बितनाहि असर पा कि रेडीओ मटन दबानपरब हो जाता है और वह पगला किसनेहि प्रपल करने पर भी ब नहीं होगा पा । परके लोग हैरान था परतु क्या किया जाय? पोईरहना पानाजोर है मत मिस निजली से दिया जाय। बोई पहना बनीपोंगर डाग लगा दो। रिपिट मतिमन्ना भात मिलन शारीर है अपनोहि पलिया है। Many men many minds रिनो माडीयो अननोहि बलिया र अनुसार सलाह होने मगी।परनु पो परान रहा गुरुदय के मारणमें ले जायो। सारी मार मिट जाएगा। मम भाईको भुमक परिवारवाले गुरुयस परण -लोहा - । १२ वा] चरित्र-चूडामणिके चमत्कार [५७] ला तो वह "ओ काकाजी ओ काकाजी । रोता हुवा आया, जिसको सुनकर सारे श्रोताजन हँस पडे । गुरुदेवने हमेशाकी दवा अस मरीजको दे दी। वस आतेहि तेला पच्चक्खा दिया । कुछ पागलपन में कमी दिखाई दी। फिर पारना होतेहि दुसरा तेला, जिस तरह पाच तेले कराये। पागल अच्छा हो गया। गुरुदेवके पासमें जो अमर जडी थी वह एक तपहि था । जिससे सव प्राणी सुखी हो जाते थे। असे कओ पगले सुघरे परतु ग्रन्थ-वृद्धि भयसे एक दो नमुनेस्वरूप लिख दिये है । १० महारोग के महावैद्य Death is better than disease ' रोगसे मृत्यु अच्छी ।' रोगीको अनेक प्रकारका दुख सहन करना पड़ता है । दुसरेका मुंह ताकना पडता है। कुछभी कार्य करने में असमर्थ होता है । अत असका 'जी' घबराता है । न वह योगका साधन कर सकता है, न भोग का। वह देखदेखकर तरसता रहता है । शरीरमें अस्वस्थता होने के कारण मनभी अस्वस्थ रहता है। रोग यह यमदूत है। जिसमें सिर्फ एकहि गुण है । भगवानका स्मरण करा देता है । नास्तिकभी आस्तीक बन जाता है। बबई शहर के रहनेवाले एक भाईको कुष्ठ रोग हो गया था। उसने सारे बबई शहरके डॉक्टरोके दवाखानोकी खाक छानी। किंतु न रोगका वर्वादी मिटी। नाश हुवा न पैसोकी घरवालेभी असे रोगवालोसे घृणा करने लग जाते हैं। असे अपनी जिंद- भी गीसे नफरत हो जाती है। वह भाई देव गुरु तथा धर्म को तो कुछ नही समझता था। "आर्ता देवान् नमस्यति"। रोगी लोग भगवानको नमस्कार करते है। अन्होने तो यह आस्तिक लोगोकी मश्करी की है । परतु दु ख में ईश्वर जरूर याद आता है। अस कुष्ठीकेभी कानपर गुरु- देवके महिमाको सौरभ पहुंची । अत वह सद्गुरुनाथके चरण-कमलोका "भाई विना तपके कर्म- सहारा लेने आया। गुरुदेवने देखतेहि असे कहा निर्जरा नही होती, आत्माको तपावो तो कर्म मैल कर्ट । कहा, 'फरमाईये । आपकी जो आज्ञा होगी वही मैं करूँगा' । मु अस भारी 1 [५८] तणविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण मला आजच परह दिन की तपश्चर्यारूप रामबाण दवा दे दी। बसे रामका बाप साली नहीं जाता था वसेही गुरदेवकी दवा भी खाली नही जाती थी। १५ दिनमें तो असका काचनवण शरीर बन गया। सुसदिनसे अस माईकी घमपर पूर्ण यदा हो गयी। () यवतमाल जिलमें ढाणकीक पास पलसपूर नामका एक छोटासा प्राम है। वहाँपर एक मराठा रहता है भुसे रक्तपिती अर्थात गलिवकुष्ठ हो गया था। अस भाईन अपने जीवनको आशा छोड़ दोषी। मिस भयर बिमारीसे सब इसे थ। मत असे कोईभी पासमें बैठन नहीं देता था। विचारा सबस निरस्कृत हुवा। गुरुदेवकी शरण थापा । अस समय गुरुदेव ढाणको विराजते प। वहाँ आकर वह मराठा मांखोसे नीर बहाता हुवा बोला बाबा मला तुमचच शरण माहे, आपण ज मला सांगाल तम मी करीन पण माझा रोग बरा वाश पाहिजे। गुपदेवन फरमाया तुप ए महिनकी सपश्चर्या करनी पडेगी। भुसन बाशा गिरोधाम परली और बोला आपण देवून टाका। लक्नि गुम्देन भुम २-२ दिनक पछरखाण कराने पे । मब माचम करते थ क्यापि जो लोग एकादशी करते है तो बिना पलाहार पिय नहीं रहन वह व्यक्नि मांस समण क लिय ग्रीम ऋतुमें कमर बम बैठा। यह वीना समय प्राथना व्याख्यान में माता पा । २९ दिनकी तपनर्या सानद समाप्त हो गयी। लकिन दो दिन सपकी न्यन- तास बसका राग मुछाप रह गया। यदि बह दो दिनमा तप औरपर लता सा सक रोग पना जाता। फिर सुमन सपर्या परनकी सवारी को। परतु गुरुदन पहा 'बह रम चला गया अब वह रसायन नहीं है। गांव व दरबार में कोईभी निराश होकर नहा जाता था। सभी हसने हमने जाते प। मगन बचा पासपोभा रोगी रिम दयाकी नमो नहीं दी। कपमान का मला ओपपाल्य सवालिय बला रहता था। जीवनमानमें श्रनाल है भनर गिय मारमी सना है। प्रत्न सम्यक या काममा प्रसारमा रोगी बयान हो गरुत्वन पागम सपापी वा सारभूषर जाना पा। दर गरु धर्मपरथदा हो जाती थी। सा- गुप्तापनगदीन पुगियोंगदुमापाहरण किया।
१२ वा] चरित्र-चूडामणिके चमत्कार [५९ । (११) भक्त-वात्सल्य - महापुरुषोका प्रत्येक क्षण चमत्कारोसे भरा पड़ा है। जिसे लिखते-- लिखते कई पुस्तके भर दी जाय तो पुस्तकोका अत हो जायगा परतु गुणोका नहीं । अनके गुणोका जो गान तथा वर्णन कर रहे है वह सिर्फ अपने आत्म-तृप्ति के लिये है। यह जो घटना लिखी जा रही है, वह गुरुदेवके अनन्य भक्त सुश्रावक दृढमि, प्रियमि रगलालजी कोठारीपर घटी थी। रगलालजी साहब को धर्मका रग तो पहलेसेहि था। वे गुरुदेव के भक्तिमे तो पूरे रगे हुये थे। जबहि अनके दर्शनकी इच्छा होती कि शीघ्रहि गुरुदेवके चरणारविंद मे हाजीर हो जाते थे, वे घरका, दारका, दुकान का कुछभी विचार नहीं करते थे। एक समय गुरुदेवके दर्शनकी उत्कट इच्छा जाग उठी। गाडीका समयभी बहुत जल्दीका था। अपनी शीघ्रातिशीघ्र जानेकी इच्छा प्रगट करनेको घरपर आये। अनकी धर्म- पत्नी पौषध लेकर धर्मस्थान में बैठी थी । घरमे इवर उवर देखा तो कुछ पडी हुी बरफी, शेव आदि दिखाई दी। अत थोडासा भाता, अपने हाथोसे वाध लिया और रवाना हो गये । गुरुदेव विहार करते हुबे रास्तेमें मिले । साथमें जो थोडासा पाथेय था वह तो रास्तेमेही समाप्त होगया था । मध्यान्हका समय था । सूर्य अपनी तीव्र किरणोसे मानो आग वरसा रहा था। दूसरी ओर पेटमे क्षुधाग्नि सता रही थी। मुँह उतर गया था। परतु तपस्वीजो साथ साथ चल रहे थे। क्षुबा तथा अपनी कायरता किस प्रकार प्रगट की जाय ? लेकिन भक्तवत्सल गुरुदेवने पूछा "क्यो भाभी, भूख लगी है ? " मानो गुरुदेवने अतरालकी बात जान ली हो। रगलालजीने कहा " कृपानाथ भूख तो जरूर लगी है लेकिन यहॉपर क्षुधा-शातिका कोजी साधन नहीं है। " करुणानिधान गुरुदेवने असी समय १२ बजेका ध्यान किया। इतनेमे एक भाी और एक बहन भोजन लेकर आये और कहा-"लिजीए थोडा भोजन आरोगीए" अनके पास जो, दही पुडी लाी हुई थी, वह रंगलालजीको दे दी। रंगलालजी को की क्या चाहिजे था, अन्होने अपनी क्षुधा शात कर ली। आगन्तुओके त. रंगलालजी देखतेही रह गए। लेकिन थोडी दूर तक वह भाई, का [५८] सपीविभूति कर्नाटक गजकेसरी पडेगी। पद्रह दिन की तपश्चर्यारुप राममाण दवा दे दी। जसे रामका बाण खाली नही जाता था वैसेही गुरदेवकी दवा भी खाली नहीं जाती थी। १५ दिनमें तो झुसका काचनवण शरीर बन गया। मुसदिनसे अस माईको धर्मपर पूण यदा हो गयी। (ब) यवतमाल जिलमें ढाणकीक पास पलसपूर' नामका एक छोटासा ग्राम है। वहाँपर एक मराठा रहता है असे रमतपित्री अर्थात गलिसकुष्ठ हो गया था। भुस भाईने अपने जीवनको माया छोड दीधी। मिस भयकर बिमारीसे सब डरते थ । अत असे कोईभी पासमें बैठने नहीं देता था। विचारा सबसे तिरस्कृत हवा । गुरुदेवकी शरपमें माया। युस समय गरदेव ढाणकी विराजते व बहाँ आकर वह मराठा खोसे नीर बहाता हुना बोला बाबा मला तुमचच धरण बाहे आपण ज मला सागाल तस मी करीन पण माझा रोग बरा झाला पाहिजे। गुरुदेवन फरमाया तुझ एक महिनकी तपश्चर्या करनी असन माशा निरोपाय परली और बोला मला भाजप अपम देवून टाका। लक्नि गन्देव अम २-२ दिनके पन्छाखाण कराते य। सब आश्चर्य करते ५ क्योंकि जो लोग एकादशी करते है तो विना पनाहार किम नहीं रहन वह व्यक्ति मास समण क लिय ग्रीष्म ऋतुम कमर स बैठा। वह तीनो समय प्राथना व्याख्यान में याताया। २९ दिनकी सपनयाँ सान- समाप्त हो गयी। किन दो दिनक उपको न्यन- सासे शुसका रोग कुछ सप रह गया। यदि यह पो दिनका तप और कर लता तो बच रोग पना आता। फिर सुसने सपश्चर्या करनी तयारी की। परतु गरदेवन बहा रह रम चला गया अब बह रसायन मही है। गुरुदेव दरबार में कोई भी निराश होकर नहा जाता था। सभी इसने इसने जाते थ। महान बयर पास कोईभी रोगी लिय दबाकी कमी नहीं दी। पमान का बस औषपारय सदलिय सरा रहता था। पो मतमानमें पवार है अना ग्यि आजभी खुला है। प्रश्न सम्यक अठा है।रिमोभी प्रकारका रागी मयों न हो ग वा पासस तपम्पी दवा लार मुपर जाता था। दर गुरु धर्मपर थक्षा हा भाती थी। सह- गुरुनानक दीन दुनियार दुसरा हरण दिया ।
१२ वा] चरित्र-चूडामणिके चमत्कार [५९ (११) भक्त-वात्मल्य- महापुरुणेका प्रत्येक क्षण चमत्कारोने भरा पड़ा है। जिसे लिखते-- लिखते कई पुस्तके भर दी जाय तो पुस्तकोका अन हो जायगा परतु गुणोका नहीं । अनके गुणोंका जो गान नया वर्णन कर रहे है वह सिर्फ अपने आत्म-तृप्तिके लिये है। यह जो घटना लिखी जा रही है, वह गुरुदेव अनन्य भक्त सुथावक दृढम, प्रियवमि रंगलालजी कोठारीपर घटी थी। रंगलालजी साहब को धर्मका न तो पहलेनेहि था। वे गुरुदेव के भक्तिम तो पूरे रंगे हुये थे। जवहि अनके दर्शनकी इच्छा होती कि गोवहि गुरुदेवके चरणारविंद ये हाजोर हो जाते थे, वे घरका, दारका, दुकान का कुछभी विचार नहीं करते थे । एक समय गुरुदेवके दर्शनकी उन्कट इच्छा जाग उठी। गाडीका समयभी बढन जल्दीका था। अपनी शीघ्रातिशीव जानेकी इच्छा प्रगट करनेको घरपर आये । झुनकी धर्म- पत्नी पोपव लेकर धर्मम्यान में बैठी थी । बरमे घर उघर देखा तो कुछ पडी हुजी वरफी, शेव आदि दिखाई दी। अन थोडासा भाना, अपने हाथोमे वाध लिया और रवाना हो गरे । गुन्देव विहार करते हुझे रास्ते मिले । साथमे जो श्रोटामा पाथेर था वह तो रास्तेमेही ममाप्त होगया था । मध्यान्हका समय था । सूय अपनी तीन किरणोसे मानो आग वरसा रहा था। दुसरी और पेट में क्षुधाग्नि मता रही थी। मुंह उतर गया था। परतु तपम्बीजो माय माथ चल रहे थे। भुवा तथा अपनी कायरता किम प्रकार प्रगट की जाय? लेकिन भक्तवत्सल गुरुदेवने पूछा "क्यो भाभी, भूख लगी है ? " मानो गुरुदेवने अतगलको वात जान ली हो। रगलालजीने कहा " कृपानाथ भृग्व तो जर लगी है लेकिन यहाँपर क्षुधा-गातिका कोजी सावन नहीं है।" कन्णानिधान गुरुदेवने अमी समय १२ वजेका ध्यान किया । इतने में एक भाषी और एक वहन भोजन लेकर आये और कहा-"लिजीए थोडा भोजन आरोगीए" अनके पाम जो दही पुडी लामी हुई थी, वह रंगलालजीको दे दी । रगलालजी को-श्री क्या चाहिने था, अन्होने अपनी क्षुधा शान कर ली। आगन्तुओं रंगलालजी देखतेही रह गए । लेकिन थोड़ी दूर तक वह [६.] तपोषिभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण दिसामी दिखे बाद में गायब हो गये । शुनके जानके बाद असालु भावकवीने गरदेवी विनमपूर्वक पूछा गुरुदेव वे कौन थ वो मुझे भोजन कराकर चले गये । गुरुदेवने फरमाया 'तेरा तो पेट भर गया तुम क्या करना पोबी भी हो? तुझ आम खानसे मतलब है कि पैड गिननसे? कभी बार पूछनेपर भी गुरुदेवन रहस्य नहीं बताया। कभी हसके रह जाते तो कमी उपरोक्त उत्तर देते । कारण गुरुदेव कभी भी अपनी स्तुति नहीं चाहते ।। अद्यापि स्तुति कन्या भजते चव कौमारम् सद्धि म रोचते सा संतोऽप्यस्मन रोचते । अभीतक स्तुतिरूपी कन्या कुमार अवस्था को भोग रही है क्योकि संत पुरुषोको वह सुहाती नहीं है । और दुर्जन लोग स्तुति रूपी कन्याको पमद नही बाते है । गरुदेव की कोओ प्रशंसा करता तो फरमाते थे तुम लोग मेरी झूटो प्रशसा करके मुझे सश करना चाहते हो। १२) रेल दुघटनासे पचमा - गरुदेवका मनमाडमें चातुर्मास था। कर्नाटककी तरफसे बहुतसे दशनार्थी आरहे थ । रास्ते में दुर्घटना हुई-गाडीके सारे हिच पटरीको छोडवर नीचे ढह गये । जिस सबमें दर्शनार्थी व ५ वे ज्योहि गाडी उगमगाने लगी त्योहि सदगुरुनाथकी जय सदगहनाथकी जय इस तरहसे जयनाद करन लग । जमनाद ध्वनिके प्रभावसे वह डम्बा बच गया। सब लोगोको आश्चर्य हुआ। सद्गुरुनाथको महिमा अषणनीय है। । 4 प्रकरण १३ पाँ चातुर्मास अहिंसा परमो धर्मसथा हिंसा पर तप । अहिंसा परम पान अहिंसा परम पदम् ॥१॥ पह श्लोक महाभारतका है। अहिंसा सब धर्मोम उत्कृष्ट धर्म है, तथा हिमाही पथ तप है। सर्व ज्ञानमें महिमा ही सर्व श्रेष्ठ ज्ञान १३ वा] चातुर्मास [६१] है । अहिमाही सबसे उत्तम पद है । दशवकालिक मूत्र में वीर प्रभुने फरमाया है सब्वे जीवावि इच्छति जीवि उन मरिज्जित तम्हा पाणि वह घोर निग्गया वज्जयतिण।। अर्थात मव जीव जीने की इच्छा करते है । मरनेकी नही । अत घोर प्राणी-ववको निग्रन्य लोग त्याग देते है । मूयगटाग मूत्रमें फरमाया है - ॥ दाणाण सेठं अभय प्यायाण ।। दानोमें अभयदानही श्रेष्ठ है,। चरित्रनायक अहिंमाके अग्रदून, महान उपकारी सद्गुरुनाथने : मिकद्राबादमें ' वि म. १९९२ में चातुर्मास किया था। वहाँपर प्रतिवर्ष 'लेग अपना अट्टा जमाता था। शहरके लोग हैरान थे । अनानी जनता वहाँपर "माग काली" नामकी देवीका कोप समझकर अने मनाने के लिये लाम्बी बकगेका बलिदान देने थे । एक गृजरायी कवि कहता है सवळा थी सहुको दरे, न वळानेज् नहाय । वाव तणो मागे नहीं, भख भवानी माय ॥१॥ भवानीको बकरोंकाहि भख क्यों देते है ? मिहया क्यो नही देने ? सिंहका भन्म देने जावे तो देनेवाला म्बन ही भक्ष्य हो जाता है। अन विचार गरीब नृणास बाजीविका चलानेवाल निग्पगधी प्राणियांकी देवी के बहाने वध करके जिव्हा लोलुपी लोग अपनी तृप्ति कर लेने है। किन्नु यह नही मात्रने कि, वृनमे मग दृश्रा बम्य वनगे बानपर कैम गृद्ध हो सकता है। गादमे रोगका आना; अग्नि यादि का उपद्रव होना; चलप्रवाहका आना; आदि जो अनुपान होते हैं, के नगर जनकि पापादयसे होते है। भोली जनता बिना समझम पापको हटाने के बदर और । बढाती है। ॥ वृप छिन्वा पशन इन्वा, कृत्वा विपदमम् यो गायन वर्ग नग्न गम्यते ॥शा [२] तपोषिभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकार बोका छदन कर पाका वध करके खूनका विषा करनसे यदि स्थगमें जाता है तो नमें कौन जायगा। अर्थात जीवोंका वष करन वारमा और महान कष्ट को प्राप्त करती है। अपने हायसि पंरपर कुल्हाड़ी मारती है। मिथ्यारिष लोग मिथ्या भ्रममें डालकर भोली बनताको उलटे मागपर ले जाती है। बस् यही हाल सिंकदराबादका था। यहाँपर गरदेव चातुर्मासाथ पधारे। जिपर अपने नियमानसार प्लेगनमी बाकर आसन जमाया। एक तरफ धमराजका बागमन दुसरी तरफ कमराजका। दोनो अपनी सम्यारो में थे। ज्योंही कमराजने प्लेग बहाने अपना राज फैलाया त्योहि धमराजने अपने अपतप और महिसारूप शस्त्रोंको लेकर सज धज कर सनद होगये। करुणाकी मति थी परिधनायकबीन शांति सप्ताह और शहरमें अखड भाषिक उप प्रारभ कर दिया। प्लेगको परामय होन लगी उसके पर सिमकन लगे। अिधर मिव्हा लोसपी लोग देवीके बहामसे बकरोंका परिदान छैन लिम प्यारी करन लगे। हिंसा के अवतारी श्री सद्गुरुनाथने सुश्रावक प्रिय धर्मी र धर्मा थी अमरावजी साहमसे फरमाया यह क्या अनर्थ हा रहा है? विचारे। निर्बल प्राणियोंगो क्या सता रह है? कबीरजीने कहा है धारी पाती सात है जिसको कार वाल। जो परीको सान है असका क्या हवाल ॥१॥ य बगानी लोग देवी नामपर महान हिंसाका तारध नत्य करते है। और आप जैस भगोपासक थाप कुरभी प्रयल नहीं करते थह बारचर्यको धान है। अनराजजीन महा गरदेव बाबुछ प्रयत्न पिया परन्तु बननाम प्रममा भून माहमा है। अत वह मानती नही। तब गरुदेवने 4 वरत और प्रमत्न किया जाय गुरुदेयकी मात्रा प्राप्त গন্যাল মন সাজ ভিী। পবি অক্ষয়ী हो गये और मोती नतास बहा - यदि देवीकोकरेकी आवश्यकता भोली परमाथा २४ वा] चिरस्मरणीय चातुर्मास हिंगनघाट [६३] होगी तो वह स्वय बकरेको मारकर भक्ष्य ले लेगी। मै बकरेको कमी नही मारने दूंगा। यह लो छुरा और मेरे गलेपर चलाया जाय बादमे चकरेपर। बहुत कुछ रस्साकस्सी हुओ लेकिन अनराजजी अडीग रहे । अनके सरपर गुरुदेवका पजा था, भुनको यह दृढता देखकर आर्यसमाजी लोग भी सहायक बन गये। अन लोगोने बहुत सहायता की । जो बगारे आते गये त्यो सबको अिकळे करके अन्य स्थानपर पहूँचाने लगे। चादमें सरकार द्वारा यह कानुन पास करा लिया गया कि आजरो इरा देवीके सामने एकभी बकरेका बलिदान न होगा, जो करेगा वह दण्डका “पात्र होगा। मिस तरह गुरुदेवने लाखो बकरोको अभयदान दिलाया था। तरह 'बिड जिलेमे' दशहरेके दिन बकरे काटे जाते थे। शाहिराागी 'भेरी वजानेवाले गुरुदेवने अपदेश दिया। जिससे 'जावबाई ' गोटेगाने कमर कसी। और कहा ' मुझे पचोलेके पच्छक्खाण दीजिये।' पपोला पच्छक्खकर वह बहन जहाँ बकरे काटे जाते थे वहाँ जाकर जन लोगोरों पहा 'जबतक तुम लोग बकरे मारना बद नही फरोगे उगवण में ही अन्न, जल नही लूगी'। तपके प्रभावसे जनता शिवही मान गयी। और दिगाफाटा फहराती हुयी सद्गुरुनाथकी जयनाद करती हुभी 'जगनबाई गुरुदेवको वदना की। जडावबाईने आजीवन एकातर तप भगिकार किया। जिसी प्र क र ण १४ वा चिरस्मरणीय चातुर्मास (हिंगनघाट) गुरुदेवने हिंगनघाटमें चातुर्माग किया। जनतांग मानदमी पहा अठने लगी । गुरुदेव सदुपदेशकी वर्षा कर रहे थे । धर्मदेव गाना गाक्षात रूप लेकर नबनरित हुवा हो, ऐमा प्रतित होना था। गुनी दांना पिपासु प्लेग भी वहाँपर आया । पुनदेयने पागमाया " की [६] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी बरूरत नहीं। यह तो धम परीक्षा करनेको आया है । परतु जनता डरने लगी और महिलोको छोड़कर जगलोका सहारा लेन लगी। श्रावक- बनान गुरुदेवको प्रार्थना की आपभी झोपडी में पषारिय । गुरुदेवन फरमाया मझरना नहीं मुझे जिसके सामन डटना है। मेरा यह क्या कर सकता'? सारा जनसमदाय सोपड़ी में चला गया। वीरके सन्चे सिपाही सद्गुरुदेव प्लगपर विजय प्राप्त करनके लिए वहीं पर रहे। सारी जनता चली जानक कारण आहार पानीका भी योग नही मिलता था। दढव्रतधारी गरुदेव निमक सुखे पत्ते साकर प्लेगसे झुत्रने का । गावमे बहोको मारनके लिए नगरपालीकाक तरफरी कोमी व्यक्ती माता तो उससे चहोंको शुढाकर जगलोमे भेज देते थ। मिस तरह बहिसाक अमर दूतन लाखो वहाँ प्राण बचाय । करीबन एक माहतक प्लग आरी था। परतु गरदेव अपने अटल नियमसे चलायमान नही हुये। एकातर तप निरतर चालू था। पारने में निमके सुख पत्तोका आहार लेते थे। बाहिरमें प्लगको महातपस्वीक सामन हार खानी पड़ी और बहाने सिसकना पग। गुरुदेवका विजय-हका बजा । अहिंसा की रणभरी गुम उठी। जनता एसी दृढता देखकर दावोतलें अगली दबाने लगी। धन्य है भत्यसम गुरुदेवको । एसो दबता रसना साधारण व्यक्तिका काम नहीं है। यह तो कोनी अदितीय दिव्य ज्योती थी जोकी पाया ससावीस गुणामे बतलाया है। जीवियास मरण भय विप्प मुक्क जीनी पिछी और मरमूके भपसे रही है। वे एसे दिव्य ज्योति गुदेवन भातक को हरा दिया। प्रकरण १५ वाँ धर्मकी गगा बही (गगाखेड) परभणी जिले में गगावर नामक गंगा किनारेपर एक छोटामा गांव है । गुरुदेवड़ी पास गंगाखापर हमी मोर चातुर्मास कर दिया। সুবৰ বিবাহ पटेलको सन्चा शिवपुरीका मापं बतलाया।
१५ वा] धर्मकी गगा बही गगाखेड [६५] अपने अमृतमय वचनोसे अमृत पिलाया जिससे प्रभावित होकर पटेल साहवने कमी व्रत नियम लिये । जसे आजीवन कच्चा पानी नही पिना, खद्दरके वस्त्र पहनना, और वहभी खुदके हाथसे कातकर बनाये हुये, पली तथा माताके हाथका भोजन करना अन्यके हाथका नही, आजीवन ब्रम्हचर्यव्रत पालना अित्यादिक अनेक मर्यादा की। कर्नाटक केसरीजीने फरमाया 'पटेलसाहव दुनियाँ कैसी है ? जिस गगाको पवित्र पावन मानते है, जिस गगाका भारतमें जितना मान है, असी गगाके मैल को साफ करनेवाली, असे पवित्र रखनेवाली मछलिगेको लोग पक्डते है और खाते है। वे गगाके भवत गगाका कितना बडा अपराध करते है। तथा जिस गगाके किनारेपर वैठकर ऋषि-म नि तप करते थे असी गगाके किनारेपर पापी लोग जीव हिंसा करते है । यह भारतके लिये क्तिनी लज्जास्पद पात है। । पटेल साहबने अपदेश श्रवण कर कार्यमे परिणत कर दिया । गावमें डौंडी पिटवा दी " जबतक सद्गुरुनाथ यहाँपर विराजेगे तबतक गगानदीमें कोसी मच्छी नही पकड सकेगा" । जिस डौडीको सुनकर सभी लोगोने मच्छी पक्डना वद कर दिया । परतु एक व्यवित के दिलमें यह बात नही जची और असने एक दिन कहा “ क्या होता है ? देखू आज मै मच्छी पकडता हूँ"। वह जाकर नदीमे जाल डालता है। एक छोटीसी मच्छी सुसमें आयी । असने ज्योही जाल खिची त्योही वह मच्छी बहुत बडी हो हो जाती है । असके आनदका पार नही रहा । किन्तु असमे जितना वजन हो गया की वह खेंच नही पाया । और वह मच्छी जितना जोर मारती है की अस व्यक्तिको खेचकर ले जाती है । असने जाल क्या डाली मानो कालको अपने हाथसे आमत्रण दिया और प्राण गमाया । "-जान जान नर करे धिटामी ताको काल घसीटत खाली " इतना प्रभाव देखकर भी दूसरा व्यक्ति और जाकर नदी में जाल डालनेका विचार करता है। उसी समय असे १०३ डिग्री वखार या जाता है । और बेहोश हो जाता है । घरवाले विती भविष्यवेत्तासे पूछते है।
२६ वा ] गौशालाएं [६७] ठाल और सफेद गौओसे 'स्टिवेन्सन' कहता है की मै हृदयसे प्रेम करता । क्यो कि छिलके और भुसा खाकर मुझे मलाई, दुध और घी देती है। का मान भारतमेही नही पर पाश्चात्य देशमेभी है। भारत में तो गौ को माता कहकर पुकारा जाता है । वैष्णव पुराणोमे तो गौ में ३३ कोटी वोका निवास दर्शाया है। अगी देव तेतीस कोटी, तिच्या पाठी मारी काठी लाज ना मना, गाय माय निज देशाची, धाव रक्षणा, अघडी नेत्र क्षणा रघुवश महाकाव्यमें दिलीप महाराज राज, पाट, थाठ को छोडकर नदनी गौकी सेवा करनेको वन वनमें फिरे थे। देवता ने झुनकी परीक्षा रने को सिंहका रूप धारण किया। और अस गय्या को दबोचना चाहता । अस समय दिलीप महाराज भुस गौकी रक्षाके लिए सिंहका सामना करते है। सिंह मानव भाषामें कहता है 'तेरे जैसा मूर्ख मैने कभी नही खा, जो एक गौके लिए राज, पाट और प्राणोसे हाथ धोता है' । दिलीप हाराज कहते है, ' मै जिते जी कभी मिस गायको नही खाने दूंगा, तू झे छलने आया है, यह मेरी जान है ' । श्रीकृष्णचद्र नारायणने तो स्वत्त गौ-सेवा करके भारतके सामने नादर्श रख दिया। अवतारी पुरुष और त्रिखडके स्वामि होकरभी गौ वासे लजाये नही । आधुनिक जनता कार, मोटारको साफ करनेमें गौरव मझती है, पर गौ सेवामे लजाती है । कुत्तेकी सेवा करती है, बिल्लीयोको गिल में बैठाती है, पर गौमाका आदर करना नहीं चाहती। अपरोक्त वक्तव्यमें दुसरोकेही घरके उदाहरण दिये। अब अपनाभी घर देखे। अपासग दशाग सूत्रमें" दस श्रावकोका वलता है। असमें किसीके पासमें ४० हजार गायें, किसीके पास हजार गाये, और किसीके पास ८० हजार गायें थी। आजके गसमें ४-६ गायेंभी मिलना मुष्कील है। श्रावकोको अपना पूर्व आदर्श याद दिलाने के लिये + - केसरीजोने गौ रक्षाका अपदेश दिया, जिससे प्रभावित होकर सर्व । .
[१८] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण -- १ कोपलमें श्रीमहावीर जैन गौशाला के नामसे स्थापना हुयी। गाव म्हैसूर राज्यके अतगत रायचूर जिल्हेमें है। इस प्रदेशम यव लोगोंकी बहुलता होनसे गौ वशका बहुत हास हो रहा था। व पोषनीजी सम्यक्त्व प्रचारक महामुनि श्रीजीके प्रभासे वि २००. के मागशीष वध , ar३-११-१९४४ के शमविनर गौशालाका प्रारभ हुवा । वतमानमें उस गौशाला, ६०-७. गायें है। उनका प्रवभ अच्छा है। ४०-५ शर दूध निकलता है, जिसस बनता शुद्ध बीर घत प्राप्त करती है। स्वास्थ्य के लिए गायका दूष एक औषध काम करता है । आधनिक जनता दॉक्टरोका हजारोंका विस मा है । पर गौ के नामसै सर दक्ष होन गया है। गौकी लोग पूजा ह पर तुम् हलदी लगाने मात्रसे कार्य समाप्त नहीं होता है ।स पूजा तो उनका पालन करनमें ह । आज यहिंसाप्रपान राज्य कहल का तो रायन लोप कर डाला । सद्गुरनाम गोय करुण रदन भुन न सके । और उहोने गो रक्षाका उपदेश प्रारम Pr कसाईके हायसे गायें छाई दुसरी श्रीमहावीर जन गौशाला बीड जिलेके अतगत जी मामक गांवमें ४ ३ १९५४ वा स्थापन की है। इस गौशाला की बडी विचित्रतास पदोह। गुरदेव गले में विराजमान थे । कुछ श्रावण सेवामें बैठ । समम एप साई ११ गोमाको पर जा रहा था। इसी समय । गोमाने पद्गुरुनाथरी पुगार की। पू श्री गुरुदेवकी पादष्टि गुरदेवो हायमें करणाला श्रोत बहन मा । और थावकोति “क्या हा चटो तुम वीरपुत्र हो जाओ गौओक प्राण बचाओ। उठो माईयों जमकर कमर तुम धमतरी रक्षा करो। श्रा बीसे पुत्र होकर गिरोस बयों रो॥ है परतु भ १६ वा] गौशालाएं [६९] 7 वस फिर क्या था कुछ भाई गये और उम कमाईके पामसे गायें छुडाकरके कम्पौंडमें ले आये। पिछेसे कसाई आया और गुरुदेवसे कहने लगा, " मेरी गायें मुझे मिलनी चाहिये । " गुरुदेवने फरमाया गौओकी कत्ल करना है तो तुम हिंदुस्थानमे नहीं रह सकते । जावो पाकिस्थानमें । भारतमे रहकर गौहत्त्या नही कर सकते हो। गौमें भारतकी है। तुम्हारा कोई अधिकार नही है। जावो तुम्हे गौमे नही । मिल सकती। . ? कसाई तहसीलदारके पास जाकर अपनी विती हुयी वातको सुनाता है। तहसीलदार गुरुदेवको वन्दन कर खडे रहते है। परतु उसकी बोलनेको हिम्मत नही होती । गुरुदेवने पूछा तुम कौन हो?" उत्तर मिला ' यह तहसिलदार साहब है ' । गुरुदेव बोले " यह क्यो आया है ?" अत्तर मिला 'गौओके लिये'। चरित्रनायकजीने फरमाया, तुम हिंदु हो या पुस्लिम ? असने कहा मै ब्राह्मण हूँ। सद्गुरुनाथने सिंह गर्जना की, तुम बाह्मण नही, चाडाल हो, जो कसाीका पक्ष लेकर आये हो । चलो हटो हाँसे, तुम्हारा कोई काम नही है। बिचारे तहसीलदार चुपचाप वहाँसे स्वाना हो गये । कसाीने जिल्हाध्यक्ष के पासमे रिपोर्ट दी। जिल्हाध्यक्ष मी वहाँपर आये, परतु गुरुदेवका तप तेज देखकर कहने लगे, अिन हात्माके सामने में कुछ नहीं कर सकता । और वदन करके अपना स्ता नापा। 'अिसीतरह “ जीवा पिपरी" में कसाी ११ गाये लेकर जा रहा । गुरुदेवने देखा और फरमाया त्योहि श्रावक जाकर छुड़ाकर ले वाये । परतु २-३ गाये बहुत जोर-जोर से रुदन करने लगी थी । गरुदेवने रमाया, जिनके बछडे होना चाहिये। अत अन्हेभी छुडाया जाय । रावक लोग गये और तलाश की तो एक बछडे के पैर वाधकर कसाई मे मारने की तैयारी मे थे त्योहि श्रावक पहुंचे और असे बहुन मुश्कीलसे डाया। अससे पूछा गया कि और भी बछडे होना चाहिये । वह जिनको त्रममे डालकर "बासी गावमे" बछडो को लेकर दौड गया। श्रावक नहाँ पहूँचे और तीनो बछडे छुडाके ले आये। गुरुदेवने गौओकी करुण -- [७.] तपोविभूति कर्नाटक ममकेसरी पुकार सुनकर यह अभिग्रह ले लिया था कि जबतक मिनक बार बायेंगे तमतक म मन ग्रहण नहीं करूंगा। जब बछड बायेव ग्रहण किया। आचाराग सूत्र में जो पाठ पाया गुरुदेवने साथक कर बतलाया। जो मूक प्राणिमोक लदको ज सेदश है। बिस तरहसे वहाँपर ३० गौ कसाईके हातसे छडाई । धान परिवार करिब अस्सीके नजदिक पहूँच गया है, जिसे चौसा अन्य लोगोंकी सहायता तथा कुछ अपने प्रयत्नसे उसे चला रहा २) औरंगाबादकी गौशाला औरंगाबादमें श्री महावीर जन गौशाला की स्थापना । १५-८-१९५९ में हुई थी। सपालक श्री नमीषदजी मिर्थ मुगादिया कर रहे है । प्रारभमें मेमीचदजीकी तरफसे एक गए थी। वतमानमें वहापर ६५ के नजदीक गायें बछडे आदि मिलान ४) जालनमें गौशाला पालनामें थी महागीर जन गौशाला नामकी गौशाला है गौशाला थी रगलालजी नमीचदजी कोठारी पला रहे है। गुरुदेवने गई प्राणिमोको अभयदान देकर प्राण पचाय । उन्होंन महावीर स्वामी वचनाको साकार कर बतलाया । हजारों लाख दाणाण सेतु अमयप्पमाण उपस्थिन किया। धन्य है कर्नाटक गजकेसरी तपोषनी महा पर है एप निभ्य ज्योतीको जिसन अपने दिव्य प्रकाश बालोमिटर दिया। माओबचाया। का पाठ जनता प्रकरण १७ बाँ सम्यवरवका प्रचार मन्य नीति अवस्था जागी दिन दिन रीति गह समताको छिन छिन रेसम्यकामामो समक्ति नाम बहाये ताने १७ वा] पोणिमाकी रात है तो मिथ्यात्व आमावस्या की। सम्यकत्व-प्रकाशमें शिव- खानी पडती है, जिससे अनेक कष्ट उठाने पडते है । सम्यक्त्व आत्माके बनाकर अधोगतिमें ले जाता है। सम्यक्त्व अमृत है । आत्माको अमर- सम्यक्त्वका प्रचार [७१] असमसुखनिधान धाम सविग्नताया। भवसुखविमुखत्वोद्दीपने सद्विवेक || नरनरकपशुत्वोच्छेदहेतुर्नराणा । शिवसुखतरुवीज शुद्धसम्यक्त्वलाभ ॥१॥ सम्यक्त्वके वराबर दुसरा सुखका खजाना नही है। वैराग्यका घर है । नश्वर तथा पौद्गलोक सुखोसे विमुख और सद्विवेकका उद्दीपन करती है । मनुष्यमें, स्त्री, नपुसक वेदका नर्कगति और पशुगतिका छेदन मुख्य कारण है। मोक्षके सुखरूपी वृक्षका वीज है। यह सम्यक्त्वका सम्यक्त्व और मिथ्यात्व यह दोनो विरोधी तत्त्व है । सम्यक्त्व परका मार्ग दृष्टी गोचर होता है, तो मिथ्यात्वमें इधर उधरकी ठोकरें मैलको धोकर हलका कर देता है, जहाँ मिथ्यात्व आत्माको बोझील । करनेमे फल है। पद प्राप्त कराता है । मिथ्यात्व विषके सदृश है, जो आत्माको जन्म-मरण के चक्कर में डालता है। पहले हम मिथ्यात्वका स्वरूप समझे । नीच-देवरतो जीवो मूढ कुगुरुसेवक । कुज्ञानतपसा युक्त कुधर्मात् कुगतिं व्रजेत् ॥ अर्थात नीच मिथ्यात्वि देवके प्रति राग और मूढ, कुगुरुकी सेवा करने- वाला और कुत्सित अज्ञान तपस्या करनेवाला, कुधर्मका आचरण अगिकार करके कुधर्मका सेवन करनेवाला जीव नर्कमे जाता है । अतः कहा गया है कि मृत्यु पाना अच्छा है, लेकिन मिथ्यात्वका सेवन करके जीवित रहना अच्छा नही है । सम्यक्त्व आत्माका सच्चा मित्र है। मिथ्यात्व कट्टर शत्रु है । दस प्रकारके धर्मको अगिकार करके सपूर्ण दोषोको टालकर भिक्षाचरि करे, किन्तु एक मिथ्यात्वको नही छोडा तो उसका कभी उद्धार नही हो सकता।
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तपोषिभूति कर्नाटक गजकेसरी
सम्यक्रवका शुद्ध स्वरूप
जीवादि सहहण समतं स्वमप्पणे ततु ।
दुराभिणिवेस विमुक्क माण सम्म सही दिसदि जम्दी।
अर्यात जीव अजीवादि पदापोमे अदा करना तथा आरमाके स्वरूपको
समझनाही सम्यक्त्व है। और वस्तु स्वरूपको संशय विषयय, वन
व्यवसाय अिन तीनों पुरमिनिवेपोंस रहित होकर थी जिनेद्र भगवान
भणित शुद्ध जीवादि तत्व विपय पच्चिस मलोंसे रहित होकर अदापूर्ण
रुचि है। वहीं सम्यक्त्व है। जमै निश्चय करके यह ऐसाही है।
सम्यक् २५ मल इस प्रकार है- असे तीन मूडता आठ मद छह
थायरान धौर कादि आरु दोप।
दीन मूढता - १) देव मूढता २) लोक मूढता ३) समय भूता
देवमूता - अठराह दोपोसे रहित जो जिनेंद्र देव है उन्हे छोडकर
पही मही भवानी भै भोपा पूजना देवमूढना कहलाती है।
लोकमूढता - लोगोको देखादेखी बीमौन स्नान करना गौ पूष्ट
पाकर मरना मरते समय हमें गगाजल डालना। बड आदिका पूजन
करना याद करता शवको रासको नदी में शालना इत्यादि अनः
प्रभारी है।
समममूगता - सपूण राम साल्पाको त्यापना आरमभाषको छोड़कर
परमायमे रमण परला समयमूरता कहलाता है।
१) गुवमद .) ज्ञानमद ३) एवमद ४) बलमद
५) पद ६) कुरमद ७) जातिमद
छहबापनन - १) मिथ्या देव २) मिथ्या बापामक) मिथ्या तप
४) मिव्यासपम्बि ५) मिय्या पात्र ६) मिथ्या पात्रो
मार वाप-(1) मस्यनावमें का पला १२) विन-णित भमय
मम्पिला() पिपरी बाधा (अगरीर तथा भोगामें ममत्व भावना
(५) अनिल पशिीयतामें विरार (२) मावि गणानराण नही
८) सपमा
. २०वा] [७३] सम्यक्त्वका प्रचार होना (७) किसीके दोप प्रगट करना (८) न्वत और दुसरेको जानकी वृद्धी नहीं करने देना। गौतमादि गणघर प्रभुवीरके पास गये । वे चार वेद और अठारह 'पुराण तथा मीमासादि ममम्त लौकिक शास्त्रोको जानने थे । फिर भी अनका जान सम्यग्दर्शनके विना मिथ्या जान था। परतु ज्योही प्रभुके *दर्शन किये और वाणी श्रवण की, त्योही दर्शनमोहनीय और चारित्र मोहनीयके क्षयोपक्षमसे सम्यगजान हो गया। ज्ञान होतेही सम्यग् चारित्र ग्रहण क्यिा । और मति, श्रुति, अववि, मन पर्यायज्ञान और सात ऋदियोके धारक गणधर देव हो गये। अत सम्यक्त्व वलसेही आत्मामोक्ष प्राप्त कर सकती है । सम्यक्त्वके विना, विपमिश्रित दूधके समान ज्ञान तपश्चर्यादि क्रिया व्यर्थ है। सम्यक्त्व के पाच मुख्य भेद मम्यक्त्व प्राय पाच भेदोमें विभाजित किया जाता है (१) सास्वादन- सम्यक्त्व (२) अपशम सम्यक्त्व (३) क्षयोपक्षम सम्यक्त्व (४) वेदक सम्यक्त्व (५) क्षायक सम्यक्त्व सास्वादन सम्यक्त्व - जैमे कोी व्यक्ति खीर पीकर उठता है और उठतेही असे वमन हो जाता है, खोरका स्वाद असके लिये कितना अल्पसमय रहता है ? झुमी प्रकार सास्वादन सम्यक्त्व छह आवलिकाही रहती है । परतु फिरभी सम्यक्त्वकी महिमा अपरपार है । छह आवलिका मात्रको सम्यक्त्वमे अर्व पुद्गल परावर्तन ही ससार वाकी रहता है । कृष्णपक्षीसे गुक्लपक्षी बन जाता है। जैसे किसी के सरपर लाख करोडका ऋण चुकाना है। अमने सब ऋण चुका दिया हो, सिर्फ एक पैसेका देनाही रहा हो । और असका जितना व्याज होता है अतनाही समार वाकी रहता है, यह सम्यक्त्व जीवनमें ५ बार आती है। उपशम सम्यक्त्व - अनतानुवधि, क्रोध, मान, माया,लोभ, सम्यक्त्व- मोहनी, मिथ्यामोहनी, मिश्रमोहनी, इन सात प्रकृतियोको उपशमावे। जैसे मगारेको राखसे दवा देना । उपरसे हाथ लगानेसे हाथ जलेगा नहीं, [४] सपीविभूति कर्नाटक गजकेसरी परतु मंदरसे अग्नि शोत नही हुबी है। तथा गदे जलमें फिटकरी फैरमसे सारी मिट्टी नीचे धठ जाती है । और पानी निमल हो जाता है। किन्तु ज्योहि असे धक्का लगता है क्योहि गदा हो जाता है। बिसी प्रकार सातो प्रकृतिका उपशमन होता है । परन्तु क्षय नही होता। भुसे उपकम सम्यक्रम कहते है। यह सम्यक्त्व जीवन में पाच बार आती है। व्यवहार दाद सम्यक्यको पालन करनेवाला जीव जघन्य ततीय भव में तथा पारखे भषम अवश्य मोसमें जाता है। एसा पनवणा सूत्रमै प्रभु फरमाते ह । सयोपक्षम सम्यक्त्व सात प्रवृत्तियोमसे कुछ अदय में मामी हुपी प्रभावियाँका क्षम करे और ससा रही हमी को अपशमावे असे भयोपक्षम सम्यक्रव कहते है। वेदक सम्यवरव- वेदक सम्यक्त्व एकही बार भावी है। विसको स्थिति एक समयकी है । यदि पहिले बाध्यका वधन न परा हो तो धात बोलका वध नही पडगा। नर्कमा मामुप्य भवनपतिका आयच्या तिमा मायप्य बाणव्यतरका आयुष्य ज्योतिषीका आमष्य स्त्री वेद और नपुसम वेद । क्षामक सम्यक्त्व मानक बाद कमिभी मही जाती है। यह सम्यक्ष आरमाको सिधी मोक्षमें ले जाती है। बिससे कवलशान केवलदर्शनकी प्राप्ति होती है । यह सादि मनत है। जिसका कभी अंत नहीं होता । और भी पाच भेद है। (१) पारा सम्यक्ष - स्वत सम्यक्त्यमें दृढ रहना और दूसरोको आपकसम्यगरव - । डरसना (२) रोपा सम्पब-रोवर मम्पमत्य बैस अणि महारानके हृदयम पूर्णतमा सम्मवय रुप गयो पी । देवसाने पाकर परीक्षा की। फिरभी एप रोम मात्रसभी चलायमान नहीं हुष । (३) मभ्यश्व-जमे दीप औरोको प्रकाश प्रदान करता है, पर अगर भोपे मधेरा रहता है एमही औराको सम्यगाव देता है परंतु पामियाब नहीं सन्ताहामगार मनापार्य समान । ।
१७ वा] सम्यक्त्वका प्रचार [५] (४) निसर्ग सम्यक्त्व - जाती-मरण-ज्ञानादिने तथा स्वाभाविकही सम्यक्व मोहनीयके नयने तथा क्षयोपगनने मम्यक्त्वकी प्राप्ति होती है, असे निसर्ग सम्यक्त्व क्त है । (५) व्यवहार सम्यक्त्र व्यवहार नम्यक्त्वके ६७ भेद है। असम से जानने योग्य को जानना, ग्रहण करने योग्यको ग्रहण करना नया त्यागने योग्यको त्यागकर गुद्र तथा व्यवहार मम्यत्रबका पालन करनेमे आस्मा ममारको परित (परिमिन) करती है । बवहार सम्यन्त्रका म पालन करेंगे तब निश्चय सम्यक्त्वपर पढ़येगे। व्यवहार मम्यक्त्व प्रायमरी है । पहिली कितावको पटे बिना बी की अपाची वैने हो सकती है ? जैसे एक्के वक विना विटीगांकी कोई किमत नहीं है, वमे सम्यक्त्वके बिना जप, तपादि त्रिया निम्मार है । अत ऐमा अमूल्य रन्न प्रदान करनेवाले श्री गुद्र सम्यक्त्व प्रचारक गुम्देवने यह कार्य 'ग्वटकाले नामक गावमे प्रारभ किया। 'बटकाला' गावमे गुरदेवको जैन समाजके अतर्गत जो मिथ्यात्वका कचरा भग दुवा था वह खटकने लगा। और यह ऋचग कैसे दूर किया जाय इसके विषयमें सोचने लगे। क्योकि मिथ्यात्वने जैन समाज में एमी जड जमा रख्खी थी कि हमे पूर्णतया उबाडना कोई मावारण काम नहीं था । यद्यापि अन्य मनमुनि उपदेश दे रहे थे, मम्यक्त्र की महना भी प्रदर्शित करने थे, पर फिरभी मिथ्यात्वको जडामूलमे उखाडने- वाले सत मुनियोकी मख्या नहीके वरावर थी। शुद्ध सम्यक्त्व प्रचारके लिये सद्गुरुनाथका त्याग' सम्यक्त्वकी ज्योती जगानेवाले सद्गुमनायने मोचा, विना त्यागके यह कार्य भीभी मिट्ट नहीं होगा । अत मुट्ठ मम्यक्त्व प्रचारक मद्गुरू- नायने स्वयने नियम लिया कि, गुट्ट सम्यक्त्वीके घरकाहि यमनादि लेना। यदि शुद्ध सम्यक्त्री न हो तो अन्य तीथिकके यहाँस अत, पत, अरस, विरम जैसामी एपणीय आहार मिले वैमा लेना। अन्यथा पारना नहीं करना । तपश्चर्या कर लेना, परतु मिथ्यात्विके घरसे आहार यादि नही [७ सपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण An लेने थे।बई ववत सदमुरुनाथके योग्य माहार आदि मसनादिप्राप्त नही होता पर दृढवृत्ति अन्य के उद्धारके लिय एसी कठिन प्रसिज्ञाका पालन परते थ। अन्य वीपिकके लियेभी दो नियम ले रखे थ। जिसके घरमें तुलसी हो और (२) जो आगनमे छिडकाव डालता हो उनके यहाँका भी आहार नही लेना। यह दोनो चिजे तो हिंदु लोगोंमें इतनी प्रचलित है कि असे भोजन बनाय विना एक दिनमी नही चकता एसेहि तुलमोको पाना हाले विना और आगनम शिकाष झाले बिना नहीं चलता। अत कईबार गुरदेवको एकान्तर उपमें उणोदरी तपमी करना पड़ता था । परतु गदैवन पर सभ्यवत्वका झम उठाया था। उसे में फहगतेहि विचरने लग | त्यागक सामने एसो कौनसी शक्ति है जो नही मुक सकती? aunch of practice is worth than twenty thousands of big talks अर्यात लय चौर उपदेश दनकी बजाम थोडासा परक दिसानाहि शक है। त्यागी महातपाची गुरुदेवन मिटमारवको छुडानक लिय स्बयनहि मिप्याचियों यहाँमा आहार लेना मदार दिया। कई बार गुरुन्धको बमावस्या उरवासका पारना किये बिनाहि विहार करना पडता मा। क्योकि अमची भात्मा स मिख्यात्व छोड साती है? मिथ्या व नहीं छोरनर सदानापरे दिलपर किसी प्रकारका असर नही होता था। वे परमाा भाई अभी भव भ्रमण करना है मत मिथ्याय पो रही घाम अम जालयो। भाईया मुष पावोगे । चौसष्ट दोष प्रप महान देवाधिवका छोड़कर क्यो तुम भिकारी दवाव पास आते हो। दारासानीन वहि बलवावर फिक्वान थ। ये पहन वोडनी लिय तो उसम मनुष्य कम मिला है । परतु तुम तो और व्य तथा भाव-वधन बान हो । मिथ्याच मवन करनग महान समया या होगा। सम्यक नहि सत्य श्रद्धा ह मार मिष्माय मपनम मनम ना पाना है। शिवतीबाई नामकी एन पी। पर महब म्यान्यानम पाई। वहाँ बढी बळी । थे।म यमनको सम्पबावका प्रचार आया ?. या आभूपण रूपमें है ? कोई कह आभूपण म्पमे है। आभूपण पर मिथ्या दृष्टि सिर्फ इतनाहि कहेगा चुडामणी है । १७ वा] [७७) घुमने लगी और रोने लगी। यादी प्रचारक ताम्बी श्री मदगन्नाथने फर्माया, " क्यो रोती हो? कौन हो?" तब कहती है, में 'माबाबा' है। 'यहा क्यो तब साईबावा बोला, मेरे म्यानपर मनौती पूरी करनेके लिये माई । अन मै इनके माय आगया।" गादेव ने फर्माया अच्छा अब चले जाओ। गुरुदेवका वचन सुनते हि माईबाबा चला जाना है । वादमें वह वह्न स्वस्थ होकर कहती है, "गरदेव में मेरे विमार पतिको लेकर यहाँ आरही थी, तो विमीने माईबाबाके यहां जाने की सलाह दी और मै चली गई। पतिदेव तो परलोक पव गये, और यह वावा मेरे अगमें आने लगा । लेनेमे देना पडा"। मिथ्यान्वी देवीका यही स्वभाव है। मम्यपत्वी देव कभी किमीको कप्ट नही देते । मिय्या याने झुटा । जिसमें जो गुण नही है, वह उसमें माननाहि मिथ्यात्व है। तथा वस्तुके मपूर्ण गुणोको न मानकर एक गुणको पकडके रहना, अमुक वस्तुम अमुकहि गुण है, अन्य का वडन करनामी मिथ्यात्व है । जमे किमी व्यक्तिने कहा सुवण है । सम्यक् दृष्टि पुछेगा मुवर्ण याने मुदर वर्ण है या कोई धातु है ? तव उत्तर मिला सुदर वर्णवाली धातु है, याने कचन है। कचन है तो क्या डली स्पमें है तो अनेक प्रकारके होते है । परके, हायके, सिरके, कटीके, अगुलीके इत्यादि । कहाँ उत्तर मिला कि सिरका। मिरका है तो क्या मुकुट है? या चुडामणी है? या और कोई अन्य तव कोई कहे, चुडामणी है। याने एक सुवर्ण कहनेसे सम्यग्ज्ञान नहीं होता। परतु उसका यथातथ्य स्वरूप समझनेके लिये उपरोक्त प्रश्न पूछेगा, तब वस्तुका निर्णय होगा, अन्यथा वह जान अधुरा रह जाएगा । और अधुरा ज्ञानहि मिथ्या ज्ञान कहलाता है । मोचिए, एकहि चुडामणीमें सोनाभी है, अभूपणत्वभी है, धातुभी है । मुदर वर्गभी है । ऐसे एकहि वस्तुमे अनेक गुण विद्यमान है। पहननेका आभूपण है? ? । अत कोईभी वस्तको अनेकात लिखना चानिये । fसे आधनिक [७८] तयोविभूति कर्नाटक गनकेसरी साधारण जनता कोयलेको काला कहती है। पर बनेकात बानी असमें सभी वण मानते ह। जैसे अगर कोयलेमें सफेद वा नही होता तो मलने के बाद मुसकी राख में सफेनी कहाँसे मावी? जब असे अग्निमें डाला जाता है तो असमें रक्तवण पिला हारा आदिवानी खिाई देते है। यदि सिर्फ कालाहि होता तो इन बाँकी उत्पत्ति कमी नहीं हो सस्ती कारण न मावो विद्यते । अत कोयलेको सिफ काला बनामी मिय्या है। सम्यग-दृष्टि अक वस्तु अनेक तरहसे देखकर सम्पप शान प्राप्त करता है। बस उसको दृष्टि सम्यग् दष्टि कहलाती है । ससारी बारमासमति विना अनादि काल्सेजम भरणके दुखोंको भोग हो है। से सूर्योदयसे सब जगह अषकार मान हो जाता है, एसेहि बम्पाय प्राप्ति के बाद सब तरह के दुख और दोष नाग हो जाते हैं। जब सम्यग् दष्टि छांछ रोटी की बादिमें सुखका अनुभव करता है व मिथ्या दृष्टि विलासी मनुष्य अनक प्रकारके व्यसन सुस्वादु खाय पदार्य मिलने परमी एमाद वस्तु को न्यूनताके कारण कोष भरचि और दुःखको प्राप्त करता है। बस जैसेहि सम्पग दष्टि जीव नारगोभी अपने पुराने किये हुये कोका नाम हो रहा है, मारमा पुल हो रही है ऐसा समझता है। शरीरका मोह करनस दुःख होता है। बारमा बजर अमर है, ज्ञानस्वरूप है ऐसा विचार करके साति प्राप्त करते है। मिया दृष्टि जीव बारहवे (१२) देवलोक महान देव होनेपरमी मिथ्यात्व बोर बझाम के कारण दुसरे देवोको विशेष संपत्ति देखकर इर्षा और तृष्णाके दुखसे दुखित होने है। इससे समस्ति याने सच्ची समझ सच्चा शान मही सुखका मूल कारण है। "प्रकृति मोहनी कहूँ जिनागम जोम बेनो उदय दूरस्चा सम्यग दर्शन होय ॥१॥ सात प्रकृतिका उदय दूर हो जाता है, तब सम्पग् दान उत्पन्न होता है। सम्पादन मोशका मूल कारण है। और समकित का मुख कारण बार भावना है।
व्यवहारमें कुदेव, कुगुरु और कुधर्मको सच्चा मानना मिथ्यात्व २७ वा] हरी गीत हित चाहना सबके दु.ख दूर करनेका प्रयत्न करना। रहना । सच्चा दुख अजान, मिथ्यात्व और कुचारित्र है जैसा समझकर जाननेवाले ज्ञान, दर्शन, चारित्र तथा तपके पालनेवाले। धर्म, अहिंसा व्यवहारसे सच्चे देव सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, वीतराग देव, गुरु, तत्वके मम्यक्त्वका प्रचार [७९] 'सौ प्राणि आ ममारना मन्मित्र मझव्हाला थजो। सद्गुणमा आनद मानु, मित्रके वैरी हजो ॥ दुखिया प्रति करुणा अने दुश्मन प्रति मध्यम्यता। शुभ भावना प्रभुचार मापा, मो-हृदयमें स्थिरता ॥१॥ मैत्रिभावना - मसारके सभी प्राणियोको हादिक मित्र समझ कर भावना .- गुणानुराग भावना । भला करनेवाले मित्र और दुख देनेवाले शत्रु दोनोमें गुण देखना । मित्र गुणोको पुष्ट करता है। शत्रु दोपोसे वचाता है और सत्यमें ढ रहनेको प्रेरणा करता है । दुखियोके दुख दूर करनेके लिये हमेशा तत्पर प्रमोद भावना करुणा भावना अपना और दुसरोका दुःख दूर करना चाहिये । माध्यस्य भावना - सपूर्ण जीवोपर और सपूर्ण सयोगोमें सम-भाव रखना। मिथ्यात्व याने झुठा ज्ञान। सम्यग् दर्शन याने सच्ची दृष्टि । सम्यग् ज्ञान याने सच्चा ज्ञान । कहलाता है। तथा विषय-कषायका त्याग । सम्यक्त्वका प्रकाश अद्वितीय है। श्रमण भगवत महावीर स्वामी उत्तराध्ययनके २८ वे अध्यायमें फरमाते है - नत्यि चारित समत्त विहूण दसणे उभइयव्व । समत्त चारिताई जुगव पुन्व वसमत्त ॥१॥ नाद सिणस्स णाण णाण विणान हुतिचरणगुणा । अगुणिस्स नत्थि मोक्खो नत्थि अमो कखस्स" [८.] तपोविभूति नाटक गजकेसरी [प्रकरण अर्यात सम्यक्त्व विना चारित प्राप्त नहीं होता । चारित्रम सम्पाव को भवना रहती है। सम्यक्स्व और पारित एक साथ प्राप्त होत। पहलै सम्यक्त्व और बादमें पारित प्राप्त होता है। सम्यग दर्शन के बिना सम्पग ज्ञान नहीं होता । सम्पग ज्ञान के बिना पारिष के गुण प्रगट नहीं होते । पारित के बिना मोक्ष नहीं मिलता। मोक्ष के बिना निर्वाप प्राप्त नहीं होता निर्वाण क बिना मानव-जीवन पथ है। मत सबका मूल सम्यक्त्व है। दृढ सम्पवस्वो अपन सम्यवस्व चितामणी रत्नको सभालकर इभिव फल प्राप्त कर सकता है। वह कभी किसीके छलनमे नही माता। और न कभी किसीको छलता है। असे की मिथ्यात्वी स्वयभी एला बाता और दुसरोंकोभी छलता है। उदाहरणार्थ एक घोर गावमें चोरी करने जाता है। जाते समय रास्ते में भरूजीका स्थान देखकर बोलवा करता है यदि मेरा कार्य सिद्ध हो जायगा तो दो नारियल चढाअगा। कार्य सिर होने के बाद विनार परला है नारियल चढाझुगा खो-पाठदस माने पचने पडा । मत पासमें बल का मार रहता है। यहाँसे धो बस- फस लाकर भस्जीसे कहता है- भरुजी महाराज गरिव निवाज बोलो दो सायो सौ पे सुखा मे लिला ये नारियल और यह बिल्ला । इसतरह सिफारीश करके भेजीको छल लेता है। भेरुजी भी कुछ नही कहते । मिम्पारवी भात्मा इस कपटसे भरी रहती है दूसरों माकर मानद मानसी है। वहाँ सम्यक्त्वी सरल स्वभावके होते है । येन दुसरेको उस्ते न दुसरोंको दुख देते ह । वे सबका हित चाहते है। व्यवहार सक्तिसे निरषय समकित प्राप्त होता है। सम्पादका पाच बोलोसे नाश होता है- १) शामका भाभिमान करनसे २) तत्त्व पानने में मर रवि सनसे ३) असत्य तपा निर्दय वपन योनले ४) कोषके परिणाम रसनसे और ५) मालस्य प्रमाद करलसे।
१८वां] मिथ्यात्वका लक्षण [८१] मोठा प्रकरण १८ वाँ मिथ्यात्वका लक्षण ( तर्ज राधेश्याम ) एकात पक्षी और सत्यलोपी और यथार्थ को विपरीत माने । सशयवान अजान कृष्णपक्षी मिथ्यात्व पच यही जाने" ।।१।। मिथ्यात्वी एकात को मनानेवाला सत्यका अपलाप करनेवाला यथार्थ वस्तुको विपरीत समझनेवाला होता है। जैसे बादामका हलवा मधुर होता है परतु ज्वरग्रस्त व्यक्तिको कडवा लगता है। शका करनेवाला कृष्णपक्षी उर्दकी राशीके सदृश्य होता है । " मीमासा कर्मकाल, वैपेशिक नय प्रमाण बताता है। पुरुषार्थ योग और साख्य प्रकृति वेदात ब्रम्ह जतलाता है। मीमासा दर्शन कर्मको प्रधानता देकर अन्य कालादिका खडन करता है। वैषेशिक दर्शन केवल कालको मुख्य मानकर अन्य कर्म पुरुषार्थादिका अपलाप करता है। न्यायदर्शन सिर्फ प्रमाण की बीणा बजाता रहता है। अन्य कर्म प्रकृत्यादि का निरास करता है। योग-दर्शन पुरुषार्थ के सिवाय किसीकोभी नही मानता । साख्यदर्शन प्रकृतिको प्राधान्य देकर क्रिया- काडका अन्मूलन करता है। वेदात-दर्शन ब्रम्हको सबका केद्रस्थान मान- कर अन्यका प्रलाप करता है। अतः यह छहहि दर्शन एकातरपक्षी होनेसे मिथ्या कहलाते है। जिनमें औशिक सत्य है। पूर्ण सत्य नही मिलता है। अिसलिये सत्यका लोप हो जाता है । यथार्थ ज्ञानभी नही हो पाता। शका बनी रहती है। अत कृष्णपक्षी भी है। ( राधेश्याम) सम्यग् दृष्टिको सम्यक्त्व विषम दृष्टिको विषम लखाता है। जैसा चस्मा हो आँखोपर वैसाहि रग दिखाता है ॥१॥ सम्यग् दृप्टिको सम्यग् दिखाई देता है, विषम दृष्टिको विषम । जैसे पिलीयाके रोगवाले को सारी वस्तुओं पिली हि दिखाई देती है, जैसे मिथ्या दोनोमें अतर- . (८२] सपोविभूति नाटक गजकेसरी [प्रकरण दृष्टिको सारी वस्तुओं विपरीत दिखाई देती है। जसी दष्टि वसी सुष्टि । वस्तु वही रहती है परतु जसी दृष्टि होती है पैसाहि दिखाई देता है। नन्दी सूत्र में प्रमुने फरमाया- एयाइ मिच्छत्त परिगहियाइ मिन्छासुर्य एयाई वसम दिहिस्स सम्मत्त परिग्गहियाई सम्मसुय । सम्यग् दष्टि मिथ्याश्रुत पढता है तो वे शुसके लिये सम्मग्थत बन जाते है क्योंकि मुसको सम्पम् दष्टि वस्तुका पचासभ्य स्वरूप प्रशित करती है। मियादृष्टि सम्यग्चत पडता ह परतु भुसके लिये वे मिया युत हो जाते है। क्योंकि खुसकि मिथ्यादृष्टि वस्तुका यथातथ्य स्वरस नही देखन देती । अत जिसकी दृष्टि साफ असको सृष्टिमी साफ दिखाई देती है। सम्यग् दशनसे सम्यग् ज्ञान होता है । सम्यग् ज्ञानके बिना निश्चित ध्येय प्राप्त कर नही सकते असे गावका नाम मालुम है पर जबसक रास्तेका यथार्थ ज्ञान नहीं होता चबतक अस गाव को प्राप्त करनमें कई दिक्कतें झुठानी पड़ती है। असेहि मानव जीवनका लक्ष्य मोक्ष है। मोक्षके मार्ग तीन प्रकार के है । पूयपाद अमास्वाती महाराजने सत्वाथ सूपमें फरमाया है सम्यग दशन सम्पग शान और सम्यग् पारित्र ये तीनों मोक्षके मार्ग है । सद्गुरुनाथने मिथ्यात्वको जन समाजसे निकालनके लिये पो त्याग किया था वह अद्वितीय था। मिथ्यात्व का त्याग कराते समय सहकुटुम्ब रयाग कराते थ । साथमैं देवी देवता फोटो तावीज सिंहासन छत्र फूल वादि सारी वस्तुणें लाकर गौशालामें दी जाती थी। न रहे बाँस न सजगी बांसुरी । जबकी देवी देवता आदि जो मिथ्यात्वके साधनहि नही रहते वो मिथ्यात्व व्यक्ति पुन पनपहि कसे सकता था? गुरुदेव के पाटके नीचे भर भवानी महादेव की पिड हनुमानजी साईरामा आदि सभी देवी देवताके फोगे भूतियो जब पड़ी रहती थी तब सम्यक्त्ल ज्योति जगाने वाले पुरुष विनोद करते हुये फरमाते 'देखो २८ वा] सम्बर वस्त्र यन्य मु दिगवर ।याने नग्न भाव । मनको नग्न वनावो ये," मिथ्यात्वत्पी दरिद्रतासे छुटकारा पाना होतो जाईये खादी प्रचारक ८. सुमति, तीन गुप्ति हनंग बाने! 'म्यानबानी,' ममग जान, नम्बर दीन, सम्यग् बारित्र आमामा यान है। जो उनमें स्थिर रहता है, वही स्थानकवासी है। अतः में न्यानवामीनी हूं। 'नवेगी' याने ससारमें उदासीन भाव रखना, जो समारिक पदार्गेमे अदानीन भाव रखता है, असे संवेगी न्हत है । अत में मवेगी हूँ । 'दिगवर' दिशा द्वेपन्यी वस्त्रने जिसको आत्मा मुक्त है, वहीं दिगवर है" । गुरुदेव सब जन भाईयोको सम्यक्त्व देते थे। वे क्सिीका खडन नही पूजा को - जिन प्रतिमा के सिवाय अन्य देवीदेव 'पूजनेका त्याग कराते थे । नेरह पीयोकोभी देते थे । आचार्य तुलमीभी इस कार्यको अनुमोदना करते है । और कहते है। धन्य है जैसे सम्यक्त्व अचारकोको श्रमण संघीय आचार्य आत्मारामजी महाराज फरमाते अति राग -- करते थे। वे मूर्ति पूजा को - तपस्वी गणेगमलजी महाराजके पास । शुद्ध सम्यक्त्व प्रचारके लिये गुरुदेव वृद्धावस्यामी कमर कसकर मिथ्यात्वका कचरा निकालनेमें जुट पडे थे। हजारोको समकित रत्न देकर निहाल कर दिया था। ७८ वर्षको अवस्थामें, कार्यका सूत्रपात किया था। चार पाँच वर्ष में की गावके गाव सम्यक्त्वी बना दिये थे । धन्य है जैसी महान आत्माको वे शरीरसे वृद्ध थे, परन्तु मन उत्साहसे पूर्ण भरा रहता था। अिस महान [४] तपोविभूति कर्नाटक गमकेसरी -- कमी भोले प्राणी कहते कि "गृहस्पको बेसी सम्या करनेसे पैसे चलेगा? पहले तो असे साथ कभी देखे नही, पर. वपस्बीके दशन करतेहि सम्यक्स्व ग्रहण करनेकी भावना अपन- जाती थी । अपरोक्त पधन बहने वाले गुरुदेव के चरणों में अर्जी थे कि, हमें सम्यक्त्व रत्न प्रदान कीजिए । गुरुदेव पहले से प्रा कठिनाईयोंकी मर्यादा बतलाते थे। कहते पे देख तुझे सब मि देवोंको त्यागना होगा। शुनको प्रसादी तक भी नही साना ध्यावहारिक मिध्यापिके त्यौहार नही करना होगा किसीको न फोडना बोलवां करना मादि छोडना पडगा सम्यक्त्व के सब नियम होंगे पालनको तुम्हारी हिम्मत हो तो सम्यक्प लेना धर्ना देखादेख । जिस तरहसे मुसको समझा बुझाकर सम्यक्त्व देत सम्यक्रवके प्रभावसे कई व्यक्तियोंकी भावना इतनी पवित्र बन जात कि ये दोपोसे अपने बाप हरने लगते थे। गहरणके तौरपर । घटना देखिय विदर्भमें इसापूर नामक ग्राम मिश्रीलालजी नामक सदगृहस्थ रहते है। अन्होंन अपनी लडकीकी सगाई कर २ . गुप्त रीतिसे लिय थ । किसीको पवा तक नहीं था। अब सहकीकी जन पदतिसे शादी होन लगी अस समय । दिल भावं अपने आप परट गये। कि 'ओहोहो! मै सम्यक्त्वी गया फिरभी मैन लडकी के पैसे लिये यह ठीक नहीं किया । चाहे का हो म दाल रोटी खिलाकर बरातियों को रवाना कर दूगा । बम्यक्त्वी बनकर पसे लेना अपाय है । असी समय शुन्हीन बरातीयोंके सामने पैसे लौटानकी प्रतिज्ञा की। और कहा भने रुपि शादीके लिए लिये थे। मुझे गरदेवन इस पापस पा लिया मेरा दिल पुकार ठा दू सम्यक्त्वी होकर लरकीके पैसे लेता। बरातीयोंको लहरू म जिमा। परतु जनता के सन्मुख सम्यक्त्व प्रा का भादर्श उपस्पित कर । अत यह रुपये लिये वो गुप्त रीति, प बबम सब पंचोंकी डाक्षीसे लौटा देता है । यह सारा प्रभाव सद्गुरु १९ वा] सद्गुरुनाथको सभा [८५] का ही है। उन्होनेही सम्यक्त्व देकर कृतार्थ कर दिया है। असे कमी उदाहरण मिलेगे। सम्यक्त्व ग्रहण करनेके वाद कई व्यक्तियोकी द्रव्य- दरिद्रता दूर हुी है। सम्यक्त्व की ज्योतिका प्रकाश हृदयको अलोकित कर देता है। गुरुदेवका त्याग, तप पर अधिक जोर था । जिस किमीमे यही कहते पुद्गलोसे मोह उतारो, त्याग सिखो। त्यागके विना मानव जीवन में कुछ नही है। त्यागका मूल सम्यक्त्व है। यही सम्यक्त्व पानेका अवसर है। बादमे अन्य गतियोमे नही मिलेगी, अत ले लो"। सम्यक्त्वकी विगुल अन्होने असी बजायो कि, जिधर पधारते उधर जनता कोसोसे देवीदेवता ला लाकर वहाँ रख देती, और गुरुदेवसे सम्यक्त्वरूपी रत्न ले लेती । धन्य है अनके प्रभावको, झुनकी वाणीको, अनके अतिशयको और सुनके महान प्रयत्नोको। प्रकरण १९ वाँ सद्गुरुनाथकी सभा सद्गुरुनाथकी सभा दर्शनीय थी। धर्मरूपी सरोवर के नजदीक हसहि बैठे हो। सब व्यक्ति खादीके पवित्र वस्त्र पहने हुये, सामायिक व्रत लेकर बैठते थे। मुहपत्तीके बिना तो वहाँ कोअीभी प्रवेश नही कर 'पाता था। जिधर सभामें दृष्टि डालो सबके मुखपर महावीर का शुभ्र पट्टा चमकता था। मानो कर्मरूपी शत्रुओपर विजय पाने के लिये महावीर के सिपाहीयोकी सेना बैठी है। सब लाईनसे बैठे बडेहि सुदर लगते थे । देखतेहि मन मुग्ध हो जाता था । सबके पास पुंजनी, आसन, माला आदि धर्मके सभी साधन होना आवश्यक है। यदि कोई साधनकी कमी होती तो असी समय " श्री जैन महावीर खादी भाडार" से दिया जाता था । वहाँपर कई व्यक्तीयोने मुहपत्ती बाँधना सिखा था। जैनी तो क्या, परतु [८] तपोषिभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण - भजन लोग भी मुहपत्ती बांधना सीख गये थे। बाजभी कई जनी असे है जिनको महपत्ती बांधना भी नही आता है। गुरुदेवकी सभा विसका प्रवेश होगया वह महावीर का पट्टा लगाना सीखहि गया था। गुरुदेव की समा अलौकिक और अनुपम छटा सकती थी । समा के बीच में गौर वण कृप देह जाड खद्दर के वस्त्र धारण किय हुय सम्यक्त्व और आपका वेज फलाते हुये देदिप्यमान सूर्य के सदृश सदगुरु- नाथ सुशोभित होते थे। जहा ससिको मुइ जोग जुन्तो नक्खस तारागण परि बुडोप्पा । रखे सोहा विमले अभ मुक्के एव गणी सोहई मिल्खुमज्य ॥१॥ अर्यात जसे चद्रमा नक्षत्रोसे और तारामोसे घिरा हुवा बद्दलोस रहित निमल आकाशमें शोभित होता है, असे सद्गुरुनाथ सभा सुशोभित होते थे। ! खद्दरप्रेनी सद्गुरुनाथ जब पाटपर बठकर सिंहगजना करते अस समय श्रोताजन भग्ध हो जाते थ । सद्गुरुनाथ स्पष्ट बोलने में जरा भी नहीं हिचकिचाते थे। जो बात होती वह खरी-खरी सुना देते थे। वे सादगी प्रिय बहुत थे। कोई बहन अधिक आभूषणोंसे सदकर भावी तो विनोद करते हुये सद्गरुनाथ फरमाते क्या पहाँ गणेशके व्याहमें बाई है महिन बस्त्र पहन हुये व्यक्ति का तो प्रवेश भी मही हो सकता था । व्याख्यान में शास्त्रकाही बाचन अधिक तौरपर किया जाता था । नीति मीर रीति की शिक्षा देते थे। त्याग और तपका महत्व घममा महारभ्य बताकर जनताके दिल दढता उत्पन्न करतेय। सदगुरनाम ८३ वषको अवस्थामें व्याख्यान के समय तो वही षोशपूर्वक वीर वाणीका का बनाते थे। सद्गुरुनाप की महिमा अपरपार थी जिनके गुणोंका सपूणतया वणन करना यान स्वणपुरी (लका) क सामने एक महिका बसलाना है। ॥
२० वा] सद्गुरुनाथकी दिनचर्या [८७ प्रकरण २० वाँ सद्गुरुनाथकी दिनचर्या जा जा वच्चई रय णीनसा पडिनियत्तइ अहम्म कुण माणस्स अफलाजति राइओ ॥१६॥ जा जा वच्चई रयणी नसा पडिनियत्तई धम्म कुण माणस्स सफला हवई राईओ ॥२॥ श्रमण भगवत महावीर स्वामी उत्तराध्ययनके १४ वे अध्ययन में फरमाते है "हे भव्य प्राणियो। जो रात्रियां बित जाती है वह लौटकर नही आ सक्ती। किंतु जो साधारण लोक पाप करते है, उनकी रात्रियां व्यर्थ जाती है। और धर्म करनेवाले व्यक्तियोकी रात्रीयाँ सफल हो जाती है। मानवका आयुष्य तो नदीके पूरके समान है। जो जल नदीका चला जाता है, वह वापस पलटकर नही आता, ऐसेहि मनुप्यकी बीती हुयी उम्र पलटकर वापस नहीं आ सकती। A Wonderful stream is the river time As it runs through the realm of tears with faultless rhythm and musical rhyme And broader sweep and a surge sublime As it blend with the ocean of years समयरूपी नदीका एक आश्चर्यकारक नाला है । मानो वह आसुओके राज्यमेंसे बढ़ता है। वह टोपोसे रहित ध्वनि और ताल मिलाता हुवा गायन करता है। और उठती हुयी उंची लहरोसे किनारोको साफ करता है। फिर मानो वर्षोके सग्रहस्पी समुद्रमें मिल जाता है। वह नाला , लौटकर नही आ सकता। अत एक सस्कृत कविने कहा है अवध्य दिवस कुर्यात् दानाध्ययन जापतो"। अर्थात दिनको व्यर्थ मत गमावो । दान अध्ययन तथा जपसे सार्थक करो। .
[40] तपोविभूति कर्नाटक मजकेसरी [प्रकरण महापुरुपोंका प्रत्येक क्षण सायक होता है। वे परोपकार उषा नात्मकल्याण, सावधान रहते है । चरिखनापक श्री सद्गुरुनाप एक मिनटका भी प्रमाद करना नहीं चाहते थे। उनकी सारी दिनचर्या बंधी हुपी है। प्रात काल बराबर ३ बजनेही शम्याको छोड़ देते थे। स्वाध्याय ध्यान और प्रतिक्रमण करते थे। सूर्योदय होतेहि प्रार्थना शुरू हो जाती पी। यावकलोग प्राथना करते उस समय में गुरुदेव योकडोंका पुनरावर्तन करते थे। बादमें बाहर भूमिका पधारते थे। वापीस पधारतेहि स्वाध्यायमें लीन हो जाते थे। स्वाध्याय के बाद यदि पारणका दिन होता तो पारणेके लिये निकलवे । यदि उपवास होता तो स्वाध्यायहि करते रहते थ । ९ बज स्वाध्याय पूर्ण करके फिर व्याख्यान फरमाते थे। १०॥बजनक व्याख्यान फरमाकर बादमें फिर स्वाध्यापमें लग जाते थे। या भिक्षापरिको जाना होगा उस दिन भिक्षाचरीको पधारते थे। ११॥ १२॥ ध्यान करते थे। १२॥से फिर स्वाध्याय लग जाय। २ बजक स्वाध्यायमें लीन रहते थे। २ बबके बस मिनटतक शारिरीक कार्यके लिये तथा थोडासा जलका सेवन करने के लिय उठते थे। फिर स्वाध्याय में मग्न हो जाते थे। तीन बजेतक स्वाध्याय करते थे। तीन बब बाद प्रसिलेमना करते थ! प्रतिलेखनाके बाद फिर ध्यान करते थे। दिनमर स्वाध्याय तपम लग रहते थे। प्रतिक्रमण होनेके बाद पतुर्विशासी स्तवन और थोकडौंका पुनरावसन करके प्रहर रात जावही द्रव्य निद्रामें मग्न हो जाते थ । मावसे तो वे हमेशा जागृतही थे । इस परहसे उनका दिनमरका कार्य वा हुवा था । परिवनायकजीको व्यर्थ गपसप तो बिलकुल पसद नही आनी थी। स्वाध्यायकी ध्वनि उनके प्रवास-प्रश्वास निकलती रहती थी। १५ बागम उनके स्वहस्तलिखित य। बै उनका मादिसे अत तक स्वाध्याय करते रहो य । नानकी पिपासा तो अनुपम थी। युद्ध अवस्थाभी स्टनेका काय करते ५.५६३ जियोषी मार्गणा २४३ मध्य लोकके बोल ११५ नीधे होक्के जीवोंकी मार्गणा उहोंन कठस्थ की थी। ज्ञान पर्चा बहुत मानत बाता था। ज्ञानवर्षा करनवालेपर बहुत सा होते थे।
२० वा] सद्गुरुनायको दिनचर्या [८९] दिनमें कभीभी शयन नहीं करते थे। चाहे उपवास हो चाहे पारणा हो । "दिनभर हातमें पन्ने लिए रहते थे । दुबला पतला शरीर, चमकता हुवा भालप्रदेश, हातमें पन्ने लिए स्वाध्याय करते हुये ऐसे सुशोभित होते थे मानो कोई कलाकार चित्र निकाल रहा हो । आत्मदर्शनमें तत्पर रहते ये। महामुनि कथानायकजी मार्गमे चलते समय जैमी भी जगह मिल जाती उमीमें ठहर जाते थे। कभी जगहका अभाव होता तो वृक्षके नीचे तथा सिमेंटकी बनी हुयी कोठीयोमे भी रात निकाल देते थे। परतु कभीमी दिलमें नाराजी दिखाइ नही देती थी। उनकी दिनचर्यामे साधारण व्यक्तिको प्रमाद परिहार की शिक्षा प्राप्त होती है। प्रमादसे वे काले नागकी तरह डरते थे। आलस्य हि मनुष्याणा, शरीरस्थो महारिपु । नास्त्युद्यमसमो वधु , कुर्वाणो नावसीदति ।। आलस्य मनुष्यका शरीरस्थ महान शत्रु है । और उद्यमके समान दुसरा माई नही है जो कार्य करता दिखायी नही देता है, और दुख को प्राप्त नहीं होता है। दशवकालिक सूत्रके चौथे अध्ययनमें बताया है - सुह सायगस्स समणस्स साया उलगस्स निगामसा इस्स । उच्छोलणा पहोयस्स दुलहा सुगइ तारिस गस्स ॥ अर्थात सुख और साता चाहनेवाले भिक्षुकको तथा साताके लिए आकुल रहनेवालेको और विनाकारणही सोये रहनेवालेको, धोनेधाने में लगे रहनेवाले भिक्षुकको सुगति दुर्लभ है । तपोगुण पहाणस्स अज्जुमी खति सयम रियस्स । परिसह जिण तस्स सुल्लहा सुगी तारिगस्सा' ॥१॥ अर्थात प्रधान तपोगुणमें तत्पर रहनेवाले भिक्षुकको सरल स्वभाव. वाले क्षमा और सयममे लगे हुये को, परिसहको जितनेवाले भिक्षुकको मुगति सुल्लभ है । अत असे महामुनिको क्यो नही अच्छी गति प्राप्त हो? .
। रती थी। णके बाँसुरीके मधुर ध्वनिके समान आकर्षित होती थी। श्रोता समु- समें आकठ मग्न होकर महान आनदका अनुभव किया करते थे। कई पुण्यात्मा तत्काल हि विविध प्रकारके त्याग प्रत्याख्यान ग्रहण किया आपकी व्याख्यान शैली सभी जातिवालोके लिए और सभी धर्मवालोके लिए समान रूपसे हितकारणी थी। हिंदी, गुजराथी, मराठी, प्राकृत, सस्कृत और कन्नड आदि भापाके ज्ञाता थे। व्याख्यान आप हिदी, गुजराथी, मराठी आदि भाषामें फरमाते थे । अहिंसा, सत्य, परोपकार, आत्मवाद, कर्मवाद, सम्यक्त्व, तप-नीति, व्यवहार-शुद्धि आदि आपके (दक्षिण), जालना, जामखेड, कुकनूर, रायचुर, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बरार, मराठवाडा और खानदेश आदि आपके विशेष १वा] प्रचार कार्य और क्षेत्र [९१] रिम दी थी । आपके सरल हृदयसे प्रस्फुटित होनेवाली वाणीसे जनता 14 आपके मुखारविंदसे निकली हुयो आगम वाणीसे वैराग्य एव त्यागके आपका विहार क्षेत्र बहुत विशाल है । नासीक, बम्बई, हैद्राबाद विहार और प्रचारके क्षेत्र रहे है । कर्नाटक प्रात तो आपकाही खोला हुआ क्षेत्र है । जिसी कारण आपको, जनताने, कर्नाटक गजकेसरी' के पदस विभूषित किया था। निम्नलिखित स्थानोमें आपने चातुर्मास किये थे चातुर्मासकी कुल संख्या ४८ है । (तर्ज क्रोधको तजो जन । ) सुनो सब धरकर ध्यान होजी, सब सुनो घरकर ध्यान, गुरुवर के गुण गाते है ।। म है शहर भीलाडा, मरुधर देश दरम्याना तात है "धूली" मातके लाल || खाण, जिनको शीप नमाते है ।सुनो० ॥१॥ व्याख्यानके प्रमुख अग थे। कुल "पुनम ...] तपौविभूति कांठक गजकेसरी [प्रकरण जिन्होंने प्रत्येक क्षणको सफल बनाया था। स्वाध्याय और घ्यामके बगिये में रमण किया था। • As idle as painted ship, Upop a painted occan भालस्य चित्र समुद्रपर चित्रित की हुयी जहाजके समान है । अर्थात चित्रकी जहाजसे समुद्रपार नहीं हो सकता। एसेही बालसी मनप्य कुछमी काय सिद्ध नहीं कर सकता। प्रकरण २१ वाँ प्रचार काय और क्षेत्र जिन शासन सुदर रनोंकी खान है । जिस खानके रल साषु भगवत है। बरिहत भगववभी साहि है। और सिद्ध पूर्व अवस्था साहि शासनके सिरताज आचाय पुगव तथा आगम समुद्र का पाह लेनवाले पाध्यम पाठकवरभी साधहि है। भारतीय सस्कृतिमें संतोंका सर्वोपरि- स्पान रहा है । महोंने जीवन के सभी क्षत्रीका अपने चिवन के प्रकाशसे अलोकित किया है । स भारतीय संस्कृतिक प्रहरी है । हम प्रत्यक युगः संतको अपने कायमें व्यस्त देखते है । हम देखते है कि वे अपनी विता नहीं धुल रहे है बल्कि दुसरोंके दुख को देखकर आसु बहा रहे है । अनका प्रवचन उपदेश जन रंजनके लिय नही होता था। प्रतिष्ठा एव पश तथा भानपत्र या अभिनदन पत्र के पुलिदे इकठठ करनके लिये नही होता था । मुनका अपदेश होता पा केवल समस्त प्राणियों के हित के किये, अनकी रखाके लिय, दयाके लिए। परिम-नायकजीने अपना जीवन अगरवतीके समान बनामा था। पसे अगरबत्ती जलकर दूसरोंको सुगध देती है। बस एसेहि स्पष्टोपदेशक सद्गुरुनायन स्वयं देश-देशमें परिभ्रमण करके जनताको सदुपदेशको
२१ वाँ]
प्रचार कार्य और क्षेत्र
[९१]
सौरभ दी थी । आपके सरल हृदयसे प्रस्फुटित होनेवाली वाणीसे जनता
कृष्णके बाँसुरीके मधुर ध्वनिके समान आकर्षित होती थी। श्रोता समु-
दाय आपके मुखारविंदसे निकली हुयी आगम वाणीसे वैराग्य एव त्यागके
रसमें आकठ मग्न होकर महान आनदका अनुभव किया करते थे। कई
पुण्यात्मा तत्कालहि विविध प्रकारके त्याग प्रत्याख्यान ग्रहण किया
करती थी।
-
आपकी व्यास्यान शैली सभी जातिवालोके लिए और सभी
धर्मवालोके लिए समान रूपसे हितकारणी थी। हिंदी, गुजराथी, मराठी,
प्राकृत, सस्कृत और कन्नड आदि भापाके जाता थे । व्याख्यान आप हिंदी,
गुजराथी, मराठी आदि भापामे फरमाते थे । अहिंसा, सत्य, परोपकार,
आत्मवाद, कर्मवाद, सम्यक्त्व, तप-नीति, व्यवहार-शुद्धि आदि आपके
व्याख्यानके
प्रमुख अग थे।
आपका विहार क्षेत्र बहुत विशाल है । नासीक, वम्बई, हैद्राबाद
(दक्षिण), जालना, जामखेड, कुकनूर, रायचुर,
वगलोर, घोडनदी,
महाराष्ट्र, कर्नाटक, वरार, मराठवाडा और खानदेश आदि आपके विशेष
विहार और प्रचारके क्षेत्र रहे है । कर्नाटक प्रात तो आपकाही खोला हुआ
क्षेत्र है । जिसी कारणसे आपको, जनताने, 'कर्नाटक गजकेसरी' के पदसे
विभूषित किया था। निम्नलिखित स्थानोमें आपने चातुर्मास किये थे
चातुर्मासकी कुल संख्या ४८ है ।
(तर्ज क्रोधको तजो जन ।)
सुनो सब धरकर ध्यान होजी, सव सुनो घरकर व्यान,
गुरुवर के गुण गाते है ।।
जन्मभूमि है शहर भीलाडा, मरुधर देश दरम्याना
ललवाणी कुल "पुनम" तात है "धूली" मातके लाल ।।
जन्मे गुण रत्नोकी खाण, जिनको शीप नमाते है ।।सुनो० ॥१॥
[१२]
तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी
[प्रकरण
चन्नीस सौ छत्तीस शुद्ध कार्तिक षष्ठी वार बुधवार ।
चौष याम चार बजको लिया गुरु अवतार ।
गुफासे सिह समान दुनियामें दरसाते है ।।सुनो ॥२॥
शिशु क्रीडा कर तरुणपनमें मारी जगको लात ॥
जान लिया सब सार अमका संयम से चित लात ॥
पय धन्य तातरू मात असे पुत्र रल प्रगटाते है ।। सुनो० ॥३॥
मिगसर सुदि नवमी और रविवार नगर सुलमें दीक्षामारी।
प्रमराज गुरु पास स्ववर का करने उदार
ये इनकी दष्टी है ॥ सुनो० ॥४॥
दीक्षा पिता थी बेमचंदजी ममकु बाई भात ।
जात बाफणा नगर सूलक
लिया धमका लाभ ।
उन्होको है धन्यवाद सुकृत लाम कमाते है । सुनो।॥५॥
चातुर्मासकी कह हिस्टरी नासिक रास्ता बाप्टी जान
'सातारा औरगाबाद और घोडनदी पहिचान ।
सप्तम पुन सातारा अष्टम बिचवह दरसाते है।सुनो ॥६॥
बम्बई लणार अमरावती जालना हिंगणघाट ।
पुन जालना सह कुप्पल बैंगलर किया उपगार ।
अठारवा नासिक पार गुरुक्षत्र उजलाते है । सुनो ॥७॥
खामगांव और जालना घरोडा सिंकद्रागव सुजान ।
रायपूर बेंगलर घोडनदी, नासीक हिंगणघाट ।
पुन सिकद्राबाद लासूर को दरसाते है ।। सुनो ॥८॥
जालना कुप्पल बालसीफेरी कुकनर परली जान
कुरुड वाडी जामखेड टेंभुर्णी भारशी जालना गणवान ।
मनमाड वजापूर धार मालेगाव दिपाते है । सुनो ॥९॥
'चालीसा पुन चिंचवड की जीवीको तारे मिथ्यात्व छमते ।
मुंहपत्ती वषावे करते की सुपारे असे गुरु गुणवान पुण्योदयसे
पाते उनको प्रणाम चरणों में शीश झुकाते है ।। सुनो ॥१०॥
२२ वा] खादी -प्रचार [९३ ॥ चिंचवड , गगाखेड, परभणी, छयालिसवाँ औरगाबाद पधारे। . चौसाला, अडतालीसवाँ नान्देड किया महान उपगार ऐसे गुरु पुण्योदयसे पाते है करते झुनको प्रणाम चरणोमे शीष झुकाते है ।। सुनो० ॥११॥ . प्रकरण २२ वाँ खादी-प्रचार (तर्जः रखिया बधाओ भैय्या ।) क्योकर भुलाई जावे, दादीसी खादीको ॥टेर 07 सौम्य है तनपर छावे , बधुत्व भाव बढावे, समताका राज लावे ॥दादी०॥ इज्जत रहती तनकी , थोडे दामोमे सबकी फिरभी क्यो न अपनावे ।।दादी० ॥ दिखने में मोटी मोटी, क्रोडोकी इसमें रोटी, पहनेसे, सो सुघड कहावे ॥ दादी० ॥ गर्मीमे थडी रहती, सर्दी में गर्म रहती, वर्षा में बहुत सुहावे ।। दादी० ॥ प्रगति धीरज आवे; दासस्त्व श्री का जावे तोपसी शक्ति रखावे ॥दादी०॥ खादी प्रचारके लिये उन्होने भरसक प्रयत्न किया था। क्योकि - खादी प्रचारके पिछे, क्या तत्व था ? वह जाडी बुद्धीसे समझना कठिन था। परतु खादीसे क्या क्या लाभ होते है ? विदेशी वस्तुसे क्या नुकसान है, जिसका हम थोडासा विचार करेगे। जीवन में तीन वस्तुमें आवश्यक है (१) भोजन (२) वस्त्र (३) रहनेको स्थान । उसमें दूसरा नबर वस्त्र का आता है। वस्त्र क्यों .
[१४] तपोविमति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण पहना जाता है? यदि हम विचार करे तो मुख्य तीन कारण दिखाई देते । शरीरकी रक्षा लज्जा ढांकना और शोभाके लिये । यह तीनों गुण खादीम ह अथवा नहीं? शरीरकी रक्षा खादीके समान दुसरा वस्त्र नही कर सकता । क्योंकी खादी गर्मीम यडी रहती है और सर्दी में गम । लज्जा तो खादीसे पूणत क जाती है। क्योंकि खादी स्वभावसेही जाडी होती है। फुलवान व्यक्तिको शोभा लज्जा होकन में ही है। तीनों ध्यय हमारे खादीमें सफल होते है। खादीमे बधुत्व भाव भरा हुआ है। खादी में सादगीका मूल स्थान है। खादीमें गरीब जनताका पोषण है। जहांकि फॅशनेबल वस्त्रों में दीनोंका शोषण है। खादी देशकी सपत्तिको देशम रखती है। विदेशी वस्त्र देशका धन लूटते है। खादीमें चटक मटक विकार नही है। नायलान, रेशम मलमल बादि अनक तरहके वस्त्रोमें विकार भरे हुये है। गौमाताकी चसि तन रहते है। विदेशी वस्त्र पहननेवालोंको उस चर्बीकी क्रिया लगती है। तीनों गुणोंका विदेशी वस्त्र में अभाव है। शरीर रक्षा पतले वस्त्रसे महीं हो सकती । नायलॉन आदि की वस्त्र टी बी जमी भयकर बीमारीको उत्पन्न करते है। क्योंकी बहुत चिकने होनेके पजहसे बायका आगमन नहीं होता है। गर्मीमें गरम रहते है सदमि थडे जिससे स्वास्थ्यको हानी पहुंचती है। द्रव्यमी बहुत खर्च होता है। टिकनेमॅमी थोडे समयमें फट जाते है। लज्जाका दिवाला निकल जाता है। शिपलके नाशक मुख्य कारण है- श्रमण भगवत महावीर स्वामीन फरमाया ह।-- लज्जा दया सयम चम चेर कल्याण मा गिरस्स बिसोहि ठाण २१ गुणोर्मेसे लज्जा मावकका नवों गुण है। While shame keeps watch, virtuo is not wholly custms uished from the heart, rior will noderation be utterly cxpelled fora the mind of the tyrant.
२२ वाँ] खादी-प्रचार [९५] अर्थात जहाँतक लज्जा तुम्हारे हृदयकी निगराणी रखती है, वहांतक सद्गुणोका दीपक चाहे जितना मद क्यो न पड़ जाय लेकिन बुझेगा नही। बैरीके हृदयमे भी यदि लज्जा होगी तो, कोमलता और नम्रता बिलकुल मृतप्राय न होगी। कल्याण चाहने वाले व्यक्तिके लिये, लज्जा, दया, सयम और ब्रम्हचर्य ये, आत्माको शुद्ध करनेके स्थान है। अतः लज्जा जैसी महान वस्तुको सिर्फ शौक के लिये लुटा देना यह बुद्धिमत्ताका कार्य नहीं है। लज्जाको महिन वस्त्रोके लिये बेच दी तो फिर मानव और पशुमें क्या अतर रहा लज्जा जानेके बाद शोभा कहाँसे रह सकती है ? केवल अपनी श्रीमताईके तथा दिखावेके लिये,धनका, देशका, लज्जाका, दयाका, शरीरका और शियलका नाश करना कहाँतक न्यायसगत हो सकता है ? ? अत सद्गुरुनाथके सदुपदेशसे कई गृहस्थोने खादी भडार खोले थे। जिससे कइ व्यक्तियोने खादी धारण की और पचेद्रिय' जीवोकी हिंसाकी क्रियासे बचे तथा राष्ट्र, धन, लज्जा, दया, सयम, ब्रम्हचर्य और शरीर-रक्षा की थी। कथानायकजीने यह प्रतिज्ञा कर ली थी, खद्दर- धारीयोसेही वार्तालाप तथा धार्मिक चर्चा करना, जिससे बहुतसे लोग खादी पहनना सिख गये थे। जिससे परोक्ष रूपसे जीवदया प्रतिपालक करुण हृदयी गुरुदेव बहुतसे प्राणियोके रक्षक तथा दीन दुखियोके सहायक बने थे । जसे खादीकी टोपी देखतेही सामनेवाला व्यक्ति समझ जाता था कि गाधीका भक्त है। ऐसेहि खद्दरके वस्त्र और महावीर का पट्टा ( मुंहपत्ती ) देखकर बडे बडे सत पुरुष झट पहिचान जाते थे और फरमाते थे, " खादीवाले गणेशमलजी महाराजके दर्शन करके आये है। आप खादीवाले गणेशलालजी महाराजके नामसे प्रसिद्ध थे। हमारे कथानायकजी धार्मिक सतही नही थे, अपितु राष्ट्रीय सत भी थे।
[१६] तपोषिभूति कर्नाटक गमकेसरी [प्रकरण प्रकरण २३ पाँ रवि-अस्त स्वप्नमेंभी जनता नही जानती थी कि तपस्वी सम्यकत्व प्रचारक पुरुदेवका यह अन्तिम चातुर्मासही है। ससारमें ऐसा कौन प्राणी है जो भमसे सप्त हो? परतु भाग्यन तो यह लिखही दिया था कि यह तिम प्रकाश है। नान्देड शहरमें सदगुरुनाथ पधारे उस दिन पूर्णास सिषा अठारह मा प्रवास (पदल) करके पधारे थे। रास्तेम गिर गय थ। सरमें बहुत बोट बागयी थी। खून बहने लगा तो फसकर एक पट्टा बाप लिया। परतु जरामी घबराय नहीं। यह एक अलौकिक बारमबल था। सद्गुरुनाथरे नादेडमें चरण पडतेही चारोंओर मानवको लहरें उठने कमी । अिधरसे मेष राजा उमड घुमड कर आता था। उपरसे दशनाधियोके मुंड के झुंड आने लग। एक तरफ मेष राजा बरसता था दुषरी तरफ मगलमूति गणश गरदेषके मुखारविसे जिनवाणी की वर्षा हो रही थी। एक ओर बिजली चमक चमक कर प्रकाश फैलाती पी मादल गर्ने रहे थे। दुसरी और मुनियों के सिरताज महामनि तपस्वीजी तपका प्रकाश फलाकर शुद्ध सम्पकत्व को ग्रहण करनकी गर्जना करते थे। मानो दोनों की प्रतिस्पर्धा हो रही थी। मेषगजाका उस वर्षा ऋतुर्मे बहुतहि जोर शोर था । अत जिस बगीवे मकान में तपोषनि तपस्वीजी विराजमान थे वहांतक नदी का प्रवाह या गया था। मानो उसेमी असे महातपस्वीजीके परण छनकी उरकला उत्पन्न हो गयी थी। परतु ज्योही पबतरेको स्पर्श किया योहि उसकी तृप्ति होगयो । बाग नहीं पढ सका। चार मासमें जिनवाणीको धारा वर्षात रहे मोर भय्य प्राणियोंका उद्धार करते रहे । तपस्वीजी महाराज जहाँ विराजते पे यहाँ त्याग और तप तो मानो साकार रूप धारण करके अवतरित हो जाते प। मास खमण अधमास खमण अठाईयां बादि सपश्चर्या की तो नही लग जाती थी।
२३ वाँ] रवि-अस्त [९] - यह अतिम चातुर्मास पूर्ण हो रहा था । गुरुदेवको ज्वर आने लगा था। निर्मोहि सद्गुरुनाय ज्वरकेभी ज्वर थे। वे उसकी क्यो मानते ? संघने प्रार्थना की “है सघ सिरताज, महापरोपकारी गुरुदेव कुछ दिन यहीं विराजिये। कारण आपका शरीर अस्वस्थ है" । यात्मवली सद्गुरुनाथने फरमाया - "वह उसका काम करता है, में मेरा करूँगा। यह देह तो नश्वर है। मै चेतन हूँ। इसके कहने अनुसार मै चलूं, या मेरे कहे अनुसार यह चले। मैं तो अपना नियम भग नही करूँगा। वस कार्तिक पौणिमा होतेहि दुसरे दिन विहार कर दिया। विहारमें १०२ डिग्री बुखार आता रहता था। सुबहके वक्त कुछ कम हुवा कि कमर कसके आत्मवली, वीरके योद्धा तैयार हो जाते थे। इसतरह १५-१५ मलका विहार करते रहते थे। आगे बढते जाते थे। नादेडसे बुखारहि बुखारमें जालना पहूँच गये। जालना पधारनेपर फरमाते है अव स्थानपर आगया हूँ। अब, कोई फिकर नही ।" वहाँ पहुँचने पर भी ज्वरने पिछा नहीं छोडा था। कोई वैद्य आता तो फरमाते " पहिले तुम तुम्हारी नाडी देखलो, मेरी नाडी क्या देखोगे " किसीकी हाथ लगानेकी हिम्मत नहीं होती थी। कभी दवाभी नही लेते थे। इस तरह २० दिन पूर्ण हो जाते है। शरीर के अवयव बहुतहि कमजोर हो जाते है । श्रमणमधीय आचार्य प्रवर श्री आत्मारामजी म. सा० का स्वर्गवास हो जाता है । यह बात कानपर पडतेहि फरमाते, " खादी भडारमेसे गरी- वोंको खादी वितरण कर दो"। गौ शालामे भी अग्नि लग जाती है। बुझाने परभी तीन दिनतक जलती रहती है। वह अग्नि मानो सूचित कर रही थी, " गौमोका रक्षक अव जा रहा है"। थॉमस ने कहता है- Full many a gem of purest ray serene The dark unfathom'd caves of occan bear, Full many a flower is born to blush unseen And wast its sweetness on the desert air -Thomas Gray [१८] तयोविभूति कमांटक गजकेसरी [प्रकरण , समुद्रकी गहराइये अप कारमें सुदर किरणवाले पमचमाते बहुत से रत्न पडे है और बहुतसे फूल विजन जगलों में उत्पन्न होते है खिलते ह और नाश हो जाते ह। विजन की हालपर फूल खिलता ह उपाके साथ मुस्करावा है । दिनके मध्यान्हमें वहमी तपता है। संध्याको अपनी सौरभ जुटाकर विश्व रगमचसे विदा लेता है। कुछ गुरू तो दिखलाके बहार अपनी है जाते कुछ सुखके काटोंकी तरह नजर भाते कुछ गुल ह फूले नही जामेंमें समाते गुचे बहुर एसे है जो खिलनेभी नही पाते। कालस्य गहना गति तथा कालाय तस्मै नम कालकी गति गहन है । उस कालको नमस्कार हो जिसके सामने सभी मुकते ह । ज्वर बढता जारहा था। खोसीभी पिछा नहीं छोड़ रही थी। बारमबली वीर योद्धाने मुत्युपर विजय प्राप्त करने को स्वर्ष ने माह यदि शुक्रवार प्रयोदशीके दिन सध्याके समय बास्मसाक्षी से स्वयं स्वमुखसे सथारा ग्रहण कर लिया था। जनताको भोट लग रही थी। क्योंकि गुरुदेवकी अस्वस्थवाफी सूचना चारों ओर फैल गयी थी। अष्ट महभी केंद्र स्थानपर आगये थे। काली अमावस्या की रात बंधेरेमें मानो मृत्यलोकके रत्न पुरानेको आई थी। जिसे भगवान महावीर स्वामोके बम राशीपर भस्मग्रह था जिसका प्रभाव उनके सघपर पग। ऐसेहि सदगुरुनायकी राशी से यह सब अष्टग्रह बारहवेथ । प्रमो वीरका निर्वाण कातिक बदी अमावस्याको हुवा और सद्गनायका स्वर्गारोहण माय बदी अमावस्याकी रातमें वि. सं. २०१८ तदनुसार दिनांक ४-२-६२ को ८-४५ को । रविवार तो सपके लिये रिपु बनके माया । इपर तो सूर्यदेव अस्त हुप और बघर सघ शिरोमणीका ८-४५ (भारतीय समय) को मस्त हवा । अमावस्याकी काली रासने द्रव्य और भावसे चारोऔर अपकार ॐला लिया । गुरुदेवका स्वगवास होनेही संघ, पारोमोर तिमिर माच्छा- - २३ वाँ] रवि-अस्त [९९] दित हो गया। मगल फैलानेवाले मगलमूर्ति गणेशमलजी म. सा. का स्वर्गवास तो सबके दिलोमेंसे करुणा श्रोत बहाये बिना नही रहा । हाय । करालकाल, तूने यह क्या किया ? तूने कितनेहि अमूल्य तथा देदिप्यमान रत्न निगले होगे पर अभीभी तू सतुष्ट नही हुवा और न तू कभी सतुष्ट होगा। अष्टग्रहके बीचमें यह महान देदिप्यमान रत्न मृत्युलोकसे चला गया। ऐसे रत्नकी सघको पुन प्राप्ति होना दुर्लभहि नही अपितु अशक्य है। सौरभमय जीवन - ठाणाग सूत्र में चार प्रकारके पुष्प चले है। एक रूपसे सुदर और सुगध से युक्त जैसे चपा और गुलाबके पुष्प । एक फूल रूपसहित परतु सुगध रहित, जैसे आवलेका फूल । एक फूल रूपरहित 'परतु सुगधसहित जैसे पोयनका पुष्प और चौथा पुष्प रूप तथा गध रहित, जैसे धतुरेका पुष्प । विश्व के विराट पुष्पोद्यानमे अनेक निर्गन्ध और रूपरहित पुष्प विकन "सित होते है और मुरझा जाते है। उनसे प्रकृतिकी सुदरतामें या मोहरूपतामें कोई परिवर्तन नहीं होता। बहुतोके सबधमे तो ससार यहभी नही जानता के वे कब विकसित हुये और कब कुम्हला गये । न जनताने आखोसे देखा उनका विकसित होना और मुरझाना । कहने मात्रके सिर्फ पुष्प थे। उसके अदर न जनमन नयनोका आकर्षण करने का रूप था, न सौरभ । पर गुलाब तथा चपाका पुष्प जब डालपर विकसित होता है, तब सुनके आँख खोलतेहि प्रकृति-माताकी गोद सौरभ तथा सुगर से भर जाती है । हजारो हाथोसे सौरभ लुटाकर भूमडलके कण-कण को महका देता है । इसी प्रकार इस धरा-धामपर न जाने कितने मानव जन्म लेते है और मरते है । ससार न अनका पैदा होना जानता है और न मरना । " करो परोपकार सदा, मरे बाद रहोगे जिदा । नाम जिनका जिंदा रहे अनका तो मरना क्या है । " वे स्वार्थवासनाके पतग और भोगविलासके किडे ममारकी अधेरी -गलियोमें कुछ दिन रेगते है और एक दिन काल कवलित हो जाते है ।
[१०.] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण 1 ॥ थुनके जीवनका न कोई ध्येय होता है न कोई लक्ष्य बुनका जीवन जिस साडेतीन हायके पिण्ड या अधिक से अधिक एक छोटसे परिवार की सीमा तक सीमित होता है। जिसके माग वे न सोच सकते ह और न समझ ही सकते है। परंतु कुछ महामानव धरणी तळपर गुलाब के पुष्प बनकर अवतीर्ण होते ह । अनके द्वारा मासे खोलतेहि घर परिवार का बगीचा खिल अठा है । समाज का सूना अगन मुस्कराहटसे भर जाता है। और राष्ट्र प्रसन्नता तथा आशामोकी हिलोरे लेने लगता है। वे स्वय जागरण की अंगडाई लेकर सोई हुपी मानवताके भाग्य को जगाते है । अनको पाकर मानव जगत नई स्फूर्ति नमी घेतना का अनुभव करता है । वे सुगषित पुष्प ससारसे चले जाते है, पर अपनी सौरभ सब के मस्तिष्कमें छोड़ पाते है। सम्यस्त्व ज्योति जगानवाले घोर तपस्वी खादी प्रचारक अवय थी तपस्वीजी महाराजभी मानवरूपी वाटिका के एक असेही पुष्प थ। दे स्वय महके और अपने बासपास के वातावरणकोभी सुवासित सौरभमया बनाया । त्याग सहिष्णुता और दढता सुनके जीवनको सौरम देखीर पाठी है। भकरण २४ वाँ मेरे अनुभव प्रथम क्शन थी घोर तपस्वी श्री गणेशमलजी म सा के दशन का थी गणश मझ १३१४ को अवस्थामें चार लोणारमें हुषा या । मस समय बडेय गुरुदेव के साथ दो शिष्य थे- (१) बगरचदजी म सा (२) राजमल्ची म सा । आप गांवके बाहर धारक घमशालामें अतरे थे । अस समय हम तीन बरागनियोके नामसे पुकारी पाठी थी। एक दोम दुसरे मेरे माताजी और तीसरी मेरे संसार पक्षम भैरे पास की २४ गं] मेरे अनुभव [१०१] में -- बहनकी नणंद । सचमी क्रियापात्र यी घोर तपस्त्रीजीने फरनामा, “ ले लो नुम तीनोको दीक्षा दे देता हूँ"। पन्तु अस समय हमें दीनाको आज्ञा नहीं मिली थी । दिल तो वहुत लुभाया, परतु चारित्र मोहनीय कर्मका जय नहीं हुवा था । वचन सिद्ध श्री तपन्त्रीजी की वाणी कब खाली जानेवाली थी? तीनोकीभी दीक्षा एक वर्षके अदरहि हो गयी । दर्शनका यह लाभ प्राप्त हुआ या शिष्या होनेका मौभाग्य प्राप्त हुआ । योही दीक्षा हुश्री तवये गुरुदेवके दर्शनकी अभिलाषा लग रही थी। परतु दीक्षा के बाद करीवन् १८ वर्ष बाद यह इच्छा पूर्ण हुई । मेरी दर्शन की उन्कट भावना जानकर प्रवर्तनीजी श्री जीने हमें ५ शिष्याओको दर्शनार्थ विहार करवाया । उनको स्वरकी भी दर्शनको उत्कृष्ट भावना थी। परतु वै गरीर से अस्वस्थ थे। अत वे न पवार सके । हम पाँचो 'ढाणकी में' आये, अस दिन गुरुदेवको मौन थी । अतः पहले दिनही मव श्रावक-श्राविकाओमे फरमाया " कल मनियॉजी म. मा० आरहे है"। मव श्रावक-श्राविका दूसरे दिन महावीर का पट्टा लगाकर, 'मद्गुरुनाथकी जय' का नारा लगाते हुये सामने आये । हम लोग मिचे गुरुदेवके दर्शन करने गये । गुरुदेवके दर्शन करके जो आनदका अनुभव हुवा, वह लेखनी वर्णन नही कर सकती । वह तो हमारी आत्मा अयवा मर्वनहीं जान सकते है । वह दिन जीवनका सुवर्ण-दिन था। वह दिन तो वही था। जनोकी दूसरे दिन सद्गुरुनायके चरणोमें शीप झुकाया तो पूज्य गुरुदेवने सब मुख-साता पूछी, तो मानो कोई दरिद्रीको राज्य मिला हो ऐसा 'तित हुआ। पूज्य गुरुदेवने शीघ्रहि मुझमे पूछा " क्या तूही प्रभा है" ? गुरुदेव के दर्शन १९ वर्षके बादमे हुये थे । परतु फिरभी गुरुदेवने शीघ्रही पहचान लिया। धन्य है ऐसी स्मरणशक्ति को। मुझे जीवन में सर्वप्रथम का अनुभव हुआ है। फिर पुज्य गुरदेव मुझे त्यागकी, मयमकी शिक्षा देने लगे। फरमाते " प्रभा, व्यक्ति की कोई महिमा नही है, त्याग ही महान है। पहले मै जिम गाव में जाता तो श्रोताओको वाट जोहता था। पुकारनेपरभी कोई नही आना चाहता था। उम दिन ही पितृप्रेम [१०२] सपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण प्रभा धाण मै मिनसे कहता हूँ कि म बद्ध हो गया हू मुझे बारम-साधना करन दो तो जनता मुझे नही छोडती है । यह सारी त्यागकी महिमा है। सयम को माछा पालना त्याग बढाना । इत्यादि बो शिक्पा देते ५ वे हृदयमें अक्ति हो जाती थी। जसे कोई पुत्र गाँवको जाता है, पिता अपन पुत्रको शिक्षा देता है वसे ही प्रेमपूण अमतमय चाणीसे शिक्षा फरमाते य । शास्त्रोंक प्रश्नोत्तरोसे शास्त्रीय ज्ञानका रहस्य दर्शाते य। कभी भी अपनी प्रशसा नहीं करते थ । प्रवतनीजी श्री गरणीजी म सा के लिये फरमाते कि जिनकी शिष्यायें इतनी विमा है तो वे तो बहुतहि विद्वान होंगे। गुरुणीजी म सा ने दशन किय थ परतु उसको २१ २२ वप हो चुक । हिम्मत और घयता उनके रोम रोम में झलकती थी। हमेशा यही फरमाते थे साधुको किसीभी हालतमें कायर नही होना चाहिए । मझ'साधकी चौरासी उपमा सिखाई और साथम फरमाते देखो ! जैसा मेरू पवत कभीभी कपायमान नही होता है एसे साघुको कभीमी सयम मागसे पलायमान नही होना चाहिए । ५६३ जीवोकी मागणाके बोल सीखन को फरमाया। पन्नवणा सूत्रक योकरे मुझसे सुनते और जहाँभी पही गलती हो तो फरमाते । गरदेव का त्याग भय सहिष्णुता स्पष्टवक्तापन के साथ अद्वितीय प्रम सतशिक्पा शानका मान समशिता तथा कठिन क्रिया सभी व्यक्तिपर प्रभाव डाले बिना नही रहत थे। विनोदमी गुरुदेव - मने गरुदेव से पूछा कि अपनसे जो दीक्षा में बडे है उनको कसे पुकारना चाहिए? गांवका नाम लेना चाहिए था उनक नामसे? वो गुरदेव फरमाते म तो तुम प्रभाहि कहता है। और क्या कहू? फिर फरमाया या तो उनके गोत्रसे तथा गणानसार नामसे। पूज्य गुरुदेवकी सेवाका सौभाग्य मम तो करीबन १ मासकाहि मिला था। परतु वह मास मेरी जीधन नया का पतवार बन गया था। बाजभी वह तपस श और तेजसे देदिप्यमान मूति पोंके सामने बाती है तो हृदय भानद विमोर हो अठता है। अबभी वह प्रमकी पुकार कानोंमें गज रही है। फिरसे प्रवर्तनीजी गुरुणोजी म सा के साथ दशन को अमर पाशा बा रही थी परतु भाग्यन कुछ औरही सोपाबीचही आशाकी माला तोड डाली।पहा भी है- जा पक्षका पाठ करना - २५ वा] उपमंहार [१०] It lies not in our poner to love or hate for will in us is over ruled by rate. कार्य यह अपनी भक्ति, प्रेम तया द्वैप पर व्वलंबित नहीं है । इन सबपर अपना भाग्य राज्य करता है, दिलकी माया दिलमही विलीन हो गयी। प्रक र ण २५ वा उपस हार पाठक गण! पूज्य श्री गुरुदेव, सम्यक्त्व प्रचारक, मादी प्रिय तपस्वी श्री कर्नाटक गज केसरीजी का जीवन-चरित्र ममाप्त हो रहा।। क्योकि हा गया हूँ तो गुण तो बहुत है। बुनका पूर्णतया वर्णन परना, यह मेरी बुद्धिक बाहरका कार्य है। कलिकाल मन धी मनमाना जैसे विद्वानने अन्ययोगव्यछेदिकाम स्तुति करते हुने फरमाया "परमय स्तोतुमह यतिप्ये" अर्थात म्बर नानको प्राप्त ऐने भगवानकी में कृति करनेका प्रयत्न करता हूँ। मन मेरे जैसी माधारण लेखिका जीवन- चरित्र पूर्ण लिखनेमें समर्थही कैने सरती है? पूज्य सद्गुम्नायके वाल्य जीवनपर हम दृष्टिपात करते है तो, उसमें मुख्यत दो गुण दृष्टिगोचर होते है। (१) स्वाभिमान और (२) निस्पृहता। गोद लेनेवालेके ललाइत होनेपरभी किसीके गोद न जाना, अपने पिताका नाम न गमाना। आगे चलकर धयंता साकार रूप लेकर आती है। माता पिता तथा भाई का वियोग होनेपरभी धैर्य नही छोड़ना। त्यागके मूलस्यान रही है, जोकि उनको त्यागकी ओर अग्रसर करते है, ज्योकि लग्न को छोडकर, वीतराग देवसे लगनी लगाते है। दीक्षा लेने के बाद त्यागका श्रोत ही वहाते है । परतु ऐसा नही । सज्जा दडा पाउरणम्मि अस्थि उप्पज्जई भोत्तु तहेव पाऊ कितनेक दीना लेने के बाद प्रमादी बन जाते है। परतु चरित्रनायकजी एकातर तप, स्वाध्याय तप, रसुपरित्याग तप, इत्यादिक १७ प्रकारका सयम और १२ प्रकारका तप करके कर्मोको महान निर्जरा करते है। यह अन्य साधुओंके लिये एक महान यादर्श है । ।
[१४] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी [प्रकरण 'सानोति स्वपरकार्यमिति साधु स्व और परका कार्य सिद्ध करताह उसे साष कहा जाता है। कया नायकजीने जनकल्याण के लिय कई एसे ठोस कार्य किये कि जिससे समाज उनका महान ऋणी ह । जसे खादी प्रचार शाति जाप गो- शालाएँ और सम्यक्त्व प्रचार ये कार्य उनके जीवनको और राष्ट्रको, समाजको तथा धर्मको प्रगतिशील बनाया है। अन्य महा मुनियोंस उनकी यह महान विशेषताएँ है । पटकायके प्रतिपालक गरुदेवने वायुकाय पलाके लिए महावीर के पट्टकामी जन-जनवरोंमें खूपही प्रचार किया है। उनका क्षर प्रचारमी बम-अनमिश जनता में ही विशष रहा है। क्योकि अन्धे को दृष्टि देना यह साधारण काम नहीं है । उनकी चारित्रोज्वलता के कारण उनमें महान महान शक्तियां भी प्राप्त हो गयी थी। जो कि भूत प्रत व्यतर उनके दर्शन मात्रसेही भाग जाते थे। स्पष्ट तत्व उनका अनपम गुण था। वे किसीसे भी नहीं संकुचाते थे। जो खरी बात होती ये स्पष्ट फरमा देते थे। हर तो उनसे डरता था। उरते थे सिर्फ कम धनसे । सूयक समान तीव्र और सेजस्वी होनेपरभी प्रम प्रकाशकी कमी नही थी। वे फरमाते थे में तुम्हारे भले क लिए करता हूँ। तुम्हे एसी खरी खरी बात सुनानवाले मेरे बाद क्वचितही मिलेगे । कुमकार क भाव उनमे पूणतया मरे हुए थे। बसे कुंमार कच्चे पतनको उपरसे ठोकता है पर अंदरसे हाप का सहारा रखता है। बस इसी तरहसे वे सष्ट बोलते ये परतु साथमें प्रम का सरणा भी बहना रहता था। जन कल्याण के लिय वे शरीरकी पर्वा नहीं करते थे। वे अन्तिम समय तक विचरते रहे। और जनताका उद्धार करते रहे । षय ह एसी महान मात्माको । One crowded hour of glorious life Is worth an age without a name. मुहुर्न ज्वलित श्रेयो न ब धूमायितं घिरम जीवन चाहे थोडा हो परतु उज्वलित हो । युगौतक जोये परंतु जिस जीवन में प्रकाश नहीं वह जीवन व्यथ है। सच्चा जीवनका मर्य महामुनिसे समझ ।
परिशिष्ट दीक्षा सवत १. पूज्य श्री गुरुदेवकी संक्षिप्त जीवनी मातापिताका नाम . धुलीबाई, पुनमचदजी जन्मभूमि राजस्थानमें बिलाडा "गुरु और सम्प्रदाय तपस्वी श्री प्रेमराजजी म० सा०, कोटा सम्प्रदाय जन्मसवत् : विक्रम स १९३६ कार्तिक शुक्ल पष्ठी १९७० मिगसर सुद नवमी रचनात्मक कार्य खादी प्रचार, सम्यक्त्व प्रचार, गौशाला, धर्मप्रचार 'शिप्य समुदाय : त खेमराजजी म० सा०, राजमलजी म. सा०, अगरचदजी म. सा. और मिश्रीलालजी म. सा. वर्तमानमें मौजूद शिप्य श्री तपस्वी मिश्रीलालजी म सा , सपतलालजी म सा. तप एकान्तर तप अतिम समय तक चालु था । जालना स २०१८ माघ वदी अमावस्या | रवीवार, ता ४-२-६२, रातमें ८-४५ को हुवा। मृत्यु सस्कार ता ५-२-६२, माघ सुदी १, सोमवार को ४ बजे को अतिम प्रयाणका. क्षेत्र और सवत } २. नांदेड चातुर्मासके संस्करण (हारा - श्री मिश्रीलालजी सकलेचा "नादेड") गुरदेवकी कृपासे जैन और अजैन लोगोपर त्यागका कितना प्रभाव पडा, उसे सक्षिप्तमे आपके सामने रख रहा हूँ। प्रथम यदि गुरुदेवका चातुर्मास 'नादेड' नहीं हुवा होता तो मेरो 'पिताजी 'मन्नालालजी सकलेचा' की कौनसी गति होती वह तो ज्ञानीही [१०६] सपोविमात कर्नाटक गजकेसरी जान सकते है। मेरे पिताजी को कॅन्सर की बिमारी थी। उससे उनको बहुत वेदना होती थी । वेदनायें न सहनके कारण वे विष पिनके लिये तयार हो गये य और विष मगवानके लिये एक आदमीको सेमी ६ दिये य । परतु गुरुदेवकी असीम कृपा से उनके विचारमें परिवतन हो गया। उन्होंने अपन भाव प्रगट किये कि म खुद ऐसा मारमाके पतन का काय करनको उतारू हो गया था ।गरदेवन अपने अमतमय वाणी द्वारा उपदेश देकर इस प्रकार महान कार्य किया कि एकदम अपने विचारों में परिपतन करके स्यागमय जीवनके साथ थे अतिम समयमें, सथारा करके पडित-मरणके साथ स्वर्ग सिषारे। ३ अजैन भाईयोंकी गुरुदेवके प्रति श्रद्धा (लेखक-मिश्रीलालजी सकलेचा नादेड ) नादेड नगरमें डा० श्रीनिवासजी शर्मा नामक एक ब्राह्मण रहते ह. बापकी मुरदेवक प्रति अपार श्रद्धा ह । एक दिन श्री गुरुदेव आपके यहाँ बाहार पानी के लिय पधारे। उस दिन आपको उपवास का पारणा था। मापकी पत्नी भक्को जानकी वजहसे आप लॉज ( भोजनालय) में पारणा करने गय ५। लौट आने पर आपको ज्ञात हुवा की गरदेव बाहार पानीक लिय पधारे थ बार उसी परों वापस चले गये। यह सुनतेहि आपकी आँखोसे बांसू बहन संग। थापकी आत्माको प्रत्यत फुख हुवा । (माप कदन करन लग मेरे हतभाग्य ह कि एसे महान पुरुष मेरे द्वारसे खालीपात्र वापस गप । म कितना पापी हूँ। किस जन्ममें मैंने पिसीको इतना दुख दिया जिसका फल मा भगतना पड़ा ।) उसी समय मापन प्रतिज्ञा कर ली कि जब तक गरदेव के पवित्र चरण मेरे घरपर नही पडग तबतक में जापान नहीं करूंगा। गुरदेव उस दिन तो बापके यहाँ मही पधारे । दुसरे दिन गुरुदेवको उपवास था। इस प्रकार बापन तीन दिनतक कुछमी ग्रहण नही किया। यह गुरुदेव के त्यागमय जीवन क प्रति अजन भाईकी यया का एक उदाहरण ।
परिशिष्ट [१०७] ? ४. महा प्रयाण (लेखक - डॉ पारसकुमार सोनी B. A.,D. H. B.) माघ वद्य ३० सवत् २०१८, तदनुसार दि. ४-२-६२ रविवार की रात, ससारी जीवोके लिये, सम्यकत्व-धारियोके लिये, दुखमय होनेवाली है, यह कोन जानता था उस दिन सायकाल से ही जालना-निवासी जन-अजैन जनता अति चिन्तातुर थी । कारण नियती ने यह निश्चय कर लिया था कि आज के रात को ठीक ८-४५ को एक महान आत्मा को पार्थिव शरीरसे अलग करना है। यह वही महान् आत्मा थी जो इस असार ससार में कर्नाटक गज केसरी' श्री. पू. १००८ गणेशमलजी महाराज के नामसे प्रख्यात थो । किसे मालूम था कि आजका गुरुदेवका दर्शन यह अतिम दर्शन ठहरने वाला है ? कौन जानता था कि सवत् २०१७ का नादेड का चतुर्मास यह अतिम चातुर्मास ठहरनेवाला है ? कौन जानता था कि मिथ्यात्व-तिमिर नष्ट करनेवाला रवि अस्त होने- वाला है ? लेकिन काल के सामने किसीकी चली। शरीर में तापमान तेजीसे बढ रहा था । प्रकृति के सभी सभाव्य विकारोने, इस दिव्य आत्म ज्योति को नश्वर प्रकृतिसे अलग करनेका गम लिया था । दृढ निश्चय करके वे आगे बढ़ रहे थे। उनका दोस्त मृत्यु भी समीप आरहा था। लेकिन वो म्लान-वदन था। कुछ घबरायासा पा । वो तो आखिर नियती का नौकर ही तो था । उसे इच्छा-अनिच्छा से आना ही पड़ा। श्री गुरुदेव शात थे। उन्होने मृत्युपर विजय पा ली थी। त्रयोदशी को ही स्वय स्वमुखसे सथारा ग्रहण कर लिया था । गुरुदेव जानते थे कि मृत्यु भी जीवन की एक पर्याय है । मृत्यु का अर्थ है मर गया याने मर- कर, यहाँसे बिदा होकर गया दूसरी जगह । आत्मा अमर है। जो बदलती वो पर्याय । गुरुदेव रत्नमय धारक थे इसलिये वो मृत्युको भी जीत सके। जो मिथ्यात्वी रहता है वही मृत्युसे घबराता है । लेकिन जिसने जीवन में मिथ्यात्व-तिमिर नष्ट करनेका व्रत ग्रहण किया है वह 4. J क्रिससे डरती?
१०८] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी ८ औरगाबाद नभोवाणीने गुरुदेव के स्वगवास की खबर पाहीर करते ही दूसरे दिन श्री गुरुदेष के पार्थिव देहके दशनार्य हजारो लोग भिन्नभिन्न स्थानों पालनामें आकर एकत्रित हुय। सोमवार के दिन प्रायः २०।२५ हजार जनसमदाय के साक्षी में ३६ मन चंदन जो कि बंगलोर से आया था उसमें उस निर्जीव देह पुद्गल को अग्नि सस्कार दिया गया। महाप्रयाण के समय गुरुदेव के समीप सेवाभाषी तपस्थी महान् माषक श्री १०८ बसतीलालजी मुनि तथा शास्त्रपारगत सेवाभावी गुणनिधि महासतीयांजी श्री श्री १० ७हिराकवरजी (म मानकवरजी महाराम की सुशिष्या) १००० षपावरजी एव १००७ जगत्कारजी (महासतीजी जनावकबरजी महाराज की सुशिष्या) उपस्थित थ । स्व गुरदेव को मतिम सेवा करनेका महाभाग्य भापहि को प्राप्त हुआ। आपमें से श्री १०७ जगतस्वरजीन महाप्रयाण के समय आगम शास्त्र पढकर सुनाया। कारण इच्छा होते हुमे भी प्रतिनीजी महासती ? मानकवरजी महाराजसा अपन अन्य पाच सुशिष्या सहित तथा सरल स्वभावी मागम पारगत श्रमण निग्गयो गुण सपन श्री १ ०७ म सतीषी जडाकवरजी तथा खादीधारी १ ०७ एलमकवरजी (म मान क्वरजीम की सुशिप्या) समयपर गुरुदेवके अतिम दशन करनको स्थानपर पहुँच न पाय । इसी को नहते मानव सोचता कुछ और होता कुछ। आपको (म जडावकवरजीको) गुरुदेव के समीप रहकर सेवा करतका सभाग्य प्राप्त हुआ था तथा सब आगमों में पारगत होन के कारण गुरुदेवसे शास्त्रीय चर्चा करनका सुअवसर आपन खोया नहीं। गुरुदेव समाज-सुधारका - धर्मावरणमें पवित्रता लानेका-पार्य अधूरा छोडकर गय । काय प्रचारके लिये गुरुदेव मय समय नि धक थ। कारण सुशिष्य थी थी १०८ मिसरीलालजी महाराज तथा १.८ प्रतिनीजी मानपरजी एव १०७ जढावकवरजी १ पुष्पाकंवरजी १.७ चपाक्वरजी १-०७ हिराकवरजी १ एलमकवरजी एक १.०७ प्रमावरजी पर अटल विश्वास था कि रहा हुवा अधूरा कार्य यह साधु-साध्वीयां पुरा करेंगे । पानवाला समय ही इमकी सारा दगा।
मी गुरूदेव के आज्ञामे विवरेलेवाल संत जतियोंकी नामावली
श्री कर्णाटक गजनेगरीजा अज्ञामें विचरनेवाले संत
बाल ब्रह्मचारी, तापना लनेवाल, महान घोर तपरवी स्पष्ट वक्ता, दृट,
प्रतिज्ञ, पडित खद्दरधारी गुरुदेव के प्रधान शिप्य श्री श्री १००८ श्री
मिश्रीलालजी महार ज सहार
वा व्र, सरल स्वभावी गुरु आज्ञाकारी विनम्री श्री संपतलालजी म मा
बा. व. निशामिल पि कर दिक्षित श्री खुशालचंदजी म पा
और भी- घोर तपरी ..त्म सावक नियापात्र सुन्। श्री वसंतीलालजा मस
सतियोकी नामावली प्रवर्तनी पद अलकृता सर्व शास्त्र पारगत पडित रस्ता
प्रिय वक्ता सागरबत गंभिरा, क्षमा मूर्ना श्रीमान कुंवरजी महास तिजी म सा
विदुपि पडिता व्याख्यान दात्री की जनाब कुंवरजी म सा
सेवाभावा पा धन कुंवरजी म. सा
विदुषि वैर्यशाली की वृद्धि कुंवरजी म सा.
बा. ब्र. बिनय गील शास्त्र विशारद श्री पुष्पा कुँवरजी म मा
स्पष्ट वक्ता I हिरा कुंवरजी म. सा.
सेवाभावी श्री सदाकुरजी न. सा
सेवाभावी श्री एलम कुंवरजा म सा.
धैर्यशाली श्री विरज कुँवरजी म सा,
ना व मिद्धान्ताचार्य श्री प्रभाकेवरजी म मा
बा व न्यायतार्थ प्रथमा भी रोशनकुंवरजी म. सा.
श्री चपाकंवरजी म सा.
विद्याभिलापी सिद्धान्तशाली श्री प्रमोद कुँवरजी म. सा
सेवामारी श्री जगत वरजी म सा.
सिद्वान्त विशारद विद्यामिलापी श्री दिलिप केवरजी म मा..
पद्यविभाग
[१०९।
१० श्री गुरुदेवाय नमः ।
श्री गणेशलालजी महाराजका सिलोका लिख्यते :-
सरस्वती माता तुम पाय लागू देव गुरुतणी अज्ञा मागु ॥
जीभ अग्रेतु बेसजे आय, वाणी तणी तू करजे सवाय ॥१॥
आघो पाछो कोई अक्षर थाय, माफ करजे दोष जो थाय ।।
कविजन आगल मारी शीमती, दोष टालजो माता सरस्वती ॥२॥
तपस्वीजी केरो कहूँ श्लोको, अक चित्तथी साभलजो लोको ।।
विलाडापूरते जन्म भूवास, वीसा ओसवाल, ललवाणी खास॥३॥.
पिता पुनमचदजीना नद, माता धुलीबाई आनद ।।
ललवाणी कुटुबे जन्म जो लिया, माता-पिताना मनोरथ
फलिया ॥४॥
अनुक्रमें गुरुजी मोटा थाय, गुरु प्रेमराजजीने शरणे जाय ॥
पैतीस वर्ष वयमे प्रवेशी, गुरुजीना हृदय दिधा संतोषि ॥५॥
त्यागी कुटुम्बने त्याग्यो है गाम, माता-पिताको राख्यो है नाम ।।
नगर शूलमे सयम लिध, उत्तम काम कर्युछे सिद्ध ॥६॥
एकांतर तपमा बाँधीछे वृत्ति, तपस्वीजी ये किधी शुभज मति ।।
स्वादिष्ट वस्तु सर्वे त्यागी, द्रव्य सहु मेलवी भोगे वैरागी ॥७॥
दही, शक्कर लेवानो जाणो, तेना तपस्वीजी किना पच्छक्खाणो।।।
लक्ष वृत्ति थई सुखडी मेली, मेवा मिष्ठान्न दिधाछे ठेली ॥८॥
ग्रामोगाममा जाप करावे पापना वृन्द शिघ्र अडावे ॥
ज्यां जावे त्या आनद वर्तावे, तपना प्रभावे विघ्न विरलावे ॥९॥
"खटकालमा" खटकी छे वात, सम्यक्त्व रत्न देवे छे हाथ,
मोक्ष नगरनी बतावे चावी, ज्ञान जेहनो एवो प्रभावी ॥१०॥
[११.]
तपोषिभूति कर्नाटक गजकेसरी
ज्या त्या गोशाला करी तयार, गौ मातानी सुनी पुकार ॥
केटली गायोंना प्राण बचाई, कसाी पासेथी लिनी छुडाई ॥१९॥
वीर वाणीने खुब गजावी मिथ्यात्विने दिधा हटावी ॥
अपदेश आपनो अमत तुल्य, तेनुन याय कोई थी मुल्य ॥१२॥
अधम उद्धारण गुरुजी आप, चारो सघमें मुक्यो ते काप ।
आशा तृष्णाना तारज तोडी, मोह ममताने दिघाछे छोडी ॥१३॥
करुणाना गुरुजी गुणनिधी, क्रिया करिछे बहुज विधि ।।
कला केलवणी खूब कहाय पुनित पगले तपस्या थाय ॥१४॥
जहना दर्शन थी रोग विरलाय भूत प्रेतने व्यतर सहु जावे ॥
द्रव्यने भावे सुखी सहु थावे, गुरुना दशन पी आनद पावे ॥१५॥
डगलेने पगले तपस्या बहु यावे, देखी जनता आश्चय पावे ॥
जन घममें सूय सम दीपे, जन जनतर आवे समीपे ॥१६॥
स्वमति अन्यमति कोई न गजे, पाखडी सहु देखीन भजे ॥
पारस लोहाने कचन बनावे, अज्ञानोने गुरु ज्ञान सिखावे ॥१७॥
सहिष्णुतानो गुण अजब उपसग परिषह सह्या गजब ।।
कपाय कालीमा किधी दूर क्षमा खडग घायु हजुर ॥१८॥
विजय पताका बापे फरकावी । आत्मा ज्योति दिधि जमावी ।।
कीति फलावी गामोंते गाम, सुधार्या मुरुजी सहुना काम ॥१९॥
एवो अगणित गुरुगुण बन्द केम कपि शकु मति रे मद ॥
गुण गाता तो दुखज जाय, नाम लेता मगल थाय ॥२०॥
तपस्वीजीना जण भरणज लोधा, चितित कारज करे छ सिधा।
नाग विच्छीनी घासज जाय स्थिरता जना मनमाथाय ॥२१||
गुममावसे गीलोको गावे राज काजमें फत्त सब पावे।
ऋद्धि सिद्धि मुससपति पावे, दुखमारी बिमारी सहु
विरलावे ॥२२॥
पद्यविभाग [१११] दोय हजारने साल अठारह गुरुजीना गुणनी जोडी माल ॥ भाव सहित जे कठमा धारे, भवसागरसे शीघ्र उबारे ॥२३॥ माघ वदी नवमी सोमवार, अरणी माहि जोड्यो है सार । जो कोई प्राणी हृदयमा धारे, मनवछित कार्य सबहि सारे ॥२४॥ आपनी चेली होश थी बोले, नावे कोई तपस्वीजीने तोले । गुणीना गुणनी एह छे माल, निश्चय मानजो बाल गोपाल ॥२५॥ २. जय होवे । (तर्ज . श्रीराम का डका लकामे बजवा दिया।) जय होवे, हा जय होवे, गुरुराज तुम्हारी जय होवे। जय होवे, हा जय होवे, तपसीराज तुम्हारी जय होवे ।।टेरा। है पुनमचदके पूर्ण चद्र हो, गुरुराज तुम्हारी जय होवे । हे धूली मातके अनुपम रत्न हो, सघ शिरोमणी जय होवे ।। हे समकित रत्न के दाता हो, गुरुराज तुम्हारी जय होवे । हे मिथ्याधकर मेटन हारे, योगेद्र तुम्हारी जय होवे ।। हे अधिव्याधि सब दुख हर्ता मंगलेश तुम्हारी जय होवे । हे आनद घन हो सब जीवोके मगल मुर्तिकी जय होवे ॥३॥ हे जैन सघके ज्योतिधर सूर्येश तुम्हारी जय होवे । हे अटल तपस्वी श्रमण संघमे श्रमणेश तुम्हारी जय होवे।४। हे ज्ञान कुज के इच्छानिधी, चारित्र चुडामणी जय होवे । वदन हम सब मिल करते है, वदनेश तुम्हारी जय होवे । ५ ।
११२] तपोविभूति कर्नाटक गजकेसरी ३ अमर जीवो (तब श्री महावीर स्वामिकी सदा जय हो। गुरुवर घोर तपस्वीजी अमर जीवो, अमर जीवो शुद्ध सम्यक्त्व दाता हो, अमर जीवो २ पिता पूनमचदजी ह, धूली माताके मोती हो । फलाई ज्योति समकित की ।। अमर० ॥१॥ युवा वयमें लिया सयम, त्याग प्रपच दुनियाका । गलाई देह तपस्याम ।। अमर० ॥२- दुःखी रोगी दरिद्रीभी, सताय भूत व्यतरसे । दश करके । सुखी होते ।। अमर०॥३॥ दवा तपस्याको देते हो नही मत्रादि टोना ह सुरा सुर सिर झुकाते ह ।। अमर० ॥ ४ ॥ हटा मिथ्या तीमिर तुमने सूय सम्यक्त्व चमकाया । मिले प्रकाश हमकोभी । बमर० ।५ ४ पवित्र पावन (तन पावन पुदपोतम भगवान ।) पावन घोर तपस्वी महाराज ज्ञान का रग चढाते ह। ज्ञानका रग चढाते ह, मिथ्यात्व को दुर भगाते ह ॥टेरा दूर दूरसे दशन करन नर नारी मिल आते है। चरण स्पश के भाग्यसराते मुखसे गुरु गण गाते ह 1पावन ॥१७ पद्यविभाग [११] गुरुसे मिथ्या अन्धकार को छिनमें हटाते है । रुसे रोके पाप प्रवृति धर्म बढाते है ॥पावन॥२॥ देसे देते जान दान का प्रकाश फैलाते है। वसे वसो हृदय मन्दिर मे भविजन मन भाते है।।पावन ।।३॥ गुरु पद को सार्थक करते हो देते तपका दान ले ले के भवी प्राणी खुश हो पाते अमर विमान ॥पावन॥४॥ मुझ पतित की यही विनती दे दो सम्यक्ज्ञान चारित्रमे दृढ बन जाऊ, होवे मेग कल्याण ॥पावन।।५।। ( तर्ज कदम-कदम बढाये जा।) सुवे शाम प्रेमसे ध्यान लगाए जा, गुरुजीके चरणोमे मस्तक झुकाये जा ।सुवे०। धुलीमाके लाल है, दोनोके दयाल है । सव कामोको छोडकर, इन्हीको तू ध्याए जा।सुबे०।१० गुरु आये वर्षाकाल, कितने हि दूरसे चाल । दर्शन करके प्यारे जीया आनद मनाए जा ।सुवे०१२॥ । करले जीनवाणीसे प्यार, तब होगा तेरा उद्धार ।। सच्ची श्रद्धा धारके जनम, मरण मिटाए जा ।सुवे०।३॥ मिथ्यात्व हटायके, शुद्ध समकित को पायके । सच्चा जैनी वनके प्यारे कर्तव्य निभाए जा ।सुवे०१४॥ तपस्वीजी महान है, गुण रतनोकी खान है ।। करके सेवा प्यारे तु तो, वधन हटाये जा । सुवे०।५।। २०१८ साल, नादेड सघको किया निहाल । युग-युग जीवो गुरुराज भावना ये भाये जा ।सुबे०१६॥
[११४
तपोषिभूति कर्नाटक गजकेसरी
'मिथीलाल'की यही पुकार देना गुरुजी मुझको तार ।
शरणे आय आपके लाज को रखाये जा । सुबे०७॥
६ धर्म परिवार
(तम बायो जावो ए मेरे साघु रहो गुरुके सग।)
प्यारा प्यारा लगता है गुरुवर आपतणा परिवार ॥टेरा।
दृढ धय ह पिता आपका, कभी न डिगने देता।
अष्ट प्रवचन माताकी गोदमें, निश दिन खुशी मनाता
प्या॥१॥
मन को सयममें रखना है सग्गा भाई सहाई ।
पुत्र आपका प्रिय सत्य ह, दया भगिनी सुखदाई
प्या०॥२॥
'शाती भापको चिर गृहिनी, सपको निधि महान ।
ज्ञानामत नित भोजन करते, और देते यही दान
प्या०॥३॥
'इसना है परिवार आपके भोले अकेले कहते है।
इस परिवार रहित भवि प्राणी, सौ में रह नही तरसे
प्यारा॥४॥
राजाओंके महाराजा हो, झुकते सबके शीश।
अनायोंके नाय आप हो, सयम के हो ईश
सप्यारा०॥५॥ इति
७ उपकारी
(तर्ज रयपति राघव राजाराम।)
घोर तपस्वी ह गणवान करते ह उपकार महान ।
झुकताह चरणोमें जहान ॥छोराटे
मिथ्या मस का करते नाश, ज्ञान ज्योतिका ह प्रकाश ।
देते समकीत रत्न का दान पोर०॥१॥
पद्यविभाग [११५] त्याग दिया संसार जजाल, तपमे देह दिनी गाल । शूर वीर है सिंह समान ॥घोर०॥२॥ नभमें तारे होते अपार, तद पिन दूर करे अधकार । मुनि मडलमे चद्र समान ॥घोर०॥३॥ प्रभाकुमारी" करती अरजी, ही जावे गुरुवर की मर्जी । छिनमें होवे आत्म कल्याण घोर०॥४॥ - ( तजं : तुमको लाखो प्रणाम ।) 'घोर तपस्वी गुरुराज, तुमको लाखो प्रणाम, तुमको क्रोडो प्रणाम ॥टेर॥ तपका है प्रभाव अनोखा, जनता ने आँखो से देखा। तपका तेज अपार,तुमको लाखो प्रणाम ॥१॥ महा वैद्य हो महा उपकारी, रोग शोग देते निवारी। तपकी दवा महान, तुमको लाखो प्रणाम ॥२॥ सुई, दवाई डॉक्टर देते, ऑप्रेशन भी है वह करते । मरीज सुधारे नाथ, तुमको लाखो प्रणाम ॥३॥ अठ्ठाईका देते इन्जेक्शन, मासखमण का करते ऑप्रेशन । आनंद शाती वरताय, तुमको लाखो प्रणाम तेले, चोलोकी देते दवाई, लेते है सब जन हर्षाई । लेने "प्रभा" आई, तुमको लाखो प्रणाम ॥५॥ ॥४॥ (तर्ज पन्नजी मुंडे बोल मोहन गारा । ) मोहन गारा रे, मोहन गारा रे, श्री घोर तपस्वी लागे प्यारा रे, जग हितकाग के टेर।।
[११६] तपोविभूति कर्नाटक मजफेसरी मरुभूमीमें जन्म लिया ह शहर बिलाडामाही रे। पूणचद्र' के लाल कहीजे, मिथ्या नशाया रे॥ मोहन० ॥१ धूली मातने जम दिया ह तपकी ज्योति जगाई रे। खडन कर पाखड अज्ञान की धूल उडाई रे। मोहन ॥२॥ सूपसदश ह तेज आपका अज्ञान उल्लु भग जावे रे । ज्ञान रश्मीसे भव्य जनोके, हृदय कमल विकसावे रे ॥ मोहन० ।। ३० बहुत दिनोंकी प्यासी गुरुवर, आप दर्शन तांई रे। ज्ञानामत का दान देयकर विजो मुझ भवपारी रे ॥ मोहन० ॥४॥ -१०- (तब मन डोले मेरा।) गुरु ज्ञानी को गुरु ध्यानी को हम नित उठ करे प्रणाम रे, गुरु गणेश हमारे है । टेर ।। मुखपर जिनके सोहे मुहपत्ती सादे वस्त्र अग । पवित्र निर्मल शरीर जिन्होंका साध रहे सत्सग ।। गुरु साध शुद्ध आचारी बने ब्रम्हचारी, जपे जीनदका नाम रे ॥ गुरु० ॥१॥ पुनमधदजीके पुत्र आप हो माता धुलीके लाल ! ग्राम बिलाडा मरुधर भूमि, जन्मे दीनदयाल ॥ जमे दीनदयाल जो मुख जोवे मन खुष होवे, कहे अति गुलजार ॥ गुरु० ॥२॥ रे