Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Naye Prakash
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प्राच्यदर्शनमदीपान्तर्गत
न्यायप्रकाश
रचयिता
महामहोपाध्याय गंगानाथ झा एम० ए०, डी० लिट्,
प्रिंसिपल, संस्कृत कालेज, बनारस।
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श्री.
6 प्राच्यदर्शनप्रदीप
भूमिका
११ फरवरी १०६ नं० २१६० पत्रद्वारा नागरीप्रचारिगी
समाने प्राच्यदर्शननिरूपणपर एक ग्रन्थ रचना करने की माशा
दी इस भाशाफे अनुसार मैने न्याय तथा वैशेषिक दर्शन के सम्बंध
में कुछ लिख कर समाके कार्यालय में भेज दिया । वेदान्तादि
भारतीय दर्शन तथा एशिया के देशान्तरों के दर्शनोंक प्रसङ्ग भी बहुत
कुछ विषय संगृहीत कर लिया। परन्तु समस्त ग्रन्थ २००-२५०
पृष्ठका होना चाहिये ऐसी सभाकी, माझाधी-मोर न्याय पेशेषिक
निरूपणही में प्रायः इतने पृष्ठ पूरे होगये ऐसा देख कर क्या कर्तव्य
है सो सभासे फिर पूछा तो (नं
१७०७
ता०२२। .१२ । १९१६)
उत्तर मिला कि- "मापर्ने जितना लिखा है उतना छप जाना
चाहिये......यदि भवसरमिला तो वेदान्तसम्बन्धी लेख माप फिर
लिख दीजियेगा।
इन्ही कारणोसे इस प्राच्यदर्शनप्रदीपनामक ग्रन्थका केवल
न्याय-रोपिफ प्रकाश लिखेगये और अनेफ विध्नोंके अनन्तर..
भय छपकर सजनों के सामने उपस्थित है।
मुझे हिन्दी लिखन का प्रयास नहीं। इससे मेरी उटी फूटी
हिन्दीको देखकर पक
.
.
।
हमी कारण जो कुछ दोष वा गुण विषयसम्बन्धी या भागा-
सम्बन्धी इस ग्रन्थमें पाये जांय सपके भागी महीं है। दूसरों
से ऊपर फाईभी भार नहीं दिया गया।
केवल प्राचीन ग्रन्थों के संग्रह में मेरे परम मित्र घाबु गोविन्द
दास जी मुझं सदा सहायता देते आये हैं इसके लिये में
हृदय से कृतज्ञ हु।
इतना कहकर मैं इस ग्रन्थ फो उन महापुरुषोंके चरणों पर
अर्पित करता है जिनका ही मैं हूं और मेरा सब कुछ है-
पित्रोस्तीथलतातीर्थनाघयो पादयोरिदम् ।
भ्रातु.श्रीविन्ध्यनाथस्यार्पितलक्ष्मीश्वरस्यच ॥
संस्कृतकालेज, बनारस
कोजागरा, १९७७
गङ्गानाथ झा
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न्याय प्रकाश। H :- न्याय दर्शन के प्रथम प्रवर्तक सूत्रकार गौतम तपाद' के नाम से भी प्रसिद है। इस नाम का मूख पंडितों में ऐसा प्रसिद्ध है:- मिथिला देश में जो म्यान अब दरभंगा शहर के नाम से प्रसिद है यहां से दस कोश उत्तर-पश्चिम की तरफ गौतम भूपि रहते थे घा लड़कपन हो से हर वम विचार में मग्न रहा करते थे। उस समय और कुछ भी उन्हें नहीं सूझता था। एक दिन ऐसे ही मनन फरते करत घह सामने कुएं को न देख सके, और उसमें गिर पड़े। यहुत मुश्किल से गांव के मादमियों ने उनको यहां से निकाला । यह देख कर ईश्वर को दया भाई और उन्हों ने गौतम फो एक मांख । मक्ष ), पैर (पाद) में भी दे दी जिससे कि ये मनन करने के ममय भी रास्ता देख सकें। तभी से ये 'प्रदपार के नाम से प्रसिद्ध हुए। न्यायमूत्र,' 'गौतमसूत्र' इन नामों से अय तक प्रसिद्ध है । इन सूत्रों पर वात्स्यायन मुनि ने भाष्य लिखा । इम भाष्य पर उद्योतकर (पक्षिल स्वामी । ने वार्तिक- लिग्नाइस वार्तिक की व्याख्या वाचस्पति मिश्र ने न्यायपातिक तात्पर्यटीका के नाम से लिखी। इसकी टीका उदयनाचार्य फत तारपर्यपरिशुद्धि है । इस परिशुद्धि पर वर्धमान उपाध्याय कृत प्रकारा है। प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धान्त, अवयव, तर्फ, निर्णय, घाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभांस, छल, जानि, निमह- स्थान, इन सोलहों पदार्थों के यथार्थ ज्ञान से पुरुष का अभीष्ट जो मोक्ष उसकी प्राप्ति होती है, यही गौतम का प्रथम प्रतिज्ञासूत्र है। -इस स्वरूप की प्रतिज्ञा कुक सिर पैर की मालूम पड़ती है। इसी . गौतम के सूत्र न्याय प्रकाशा से कुछ लोगों ने न्यायदर्शन पर असम्बद्धप्रलापता का दोष लगाया है। किन्तु भागे चलकर सोलहों पदार्थों से क्या अर्थ है इसका निरूपण करने के उपरान्त फैसं सम्बद्ध और एक दूसरे से गठे हुए ये खुत्र हैं सो विचार किया जायगा। (१) 'उद्देश-नाम कहना, (२) 'लक्षण'-किस पदार्थ का क्या चिह है जिससे वह पहचाना जा सकता है इसका निरूपण और (३) परीक्षा--जो चिद यतलाया गया सो इस पदार्थ में है या नहीं यह विचार,-ये तीन बातें जब तक न की जायं तय तक किसी पदार्थ का यथार्थ ज्ञान नहीं हो सकता। इससे इसी तीनों कम से उक्त सोलहो ,पदार्थों का अलग अलग विचार शास्त्रकारों ने किया है। प्रत्येक पदार्थ का विचार आरम्भ करने के पहिले इसका विचार फग्लेना उचित होगा कि गौतम ने इन सोखहों पदार्थों ही को क्यों मुख्य माना है। अपना ग्रंथ लिखने से पहिले गौतम ने यह समझा कि विषय के यथार्थ स्वरूप निरूपण करने का सब से उत्तम ढंग यह है कि दो मादमियों को घादा और प्रतिवादी कल्पना करके एफ तीसरे मध्यस्थ के आगे दोनों पक्षों को उपपादन करा कर फिर उस कल्पित मध्यस्थ के द्वारा यथार्थ तत्त्व का निर्णय कराया जाय । इसी मतलब से ये सोलहो पदार्थ इस क्रम से उद्दिष्ट लक्षित और परीक्षित हुए हैं। इस क्रम पर यहुतेरों ने आक्षेप किया है। परन्तु जिस मतलय स यह ग्रन्थ रचा गया वह मतलब विना इस फ्रम के पूरा न होता । (२) किसी विषय में जब दो आदमियों में विषाद उपस्थित होता है तब वाद आरम्भ होने के पहिले इसका निर्णय भावश्यक होता है कि इस बाद में कौन कौन प्रमाण दोनों पादियों से माने जायगे। इससे सब से पहिले 'प्रमाण' पदार्थ का निरूपण आवश्यक है। (२)इसके अनन्तर किन किन विपणे पर मतभेद है जिन बाद प्रतिवाद होगा यह निश्चय करना आवश्यक होगा। इसी को सूत्र में 'प्रमेय पद से कहा है । (३) विषयों के सूचित होने के अनन्तर मध्यस्थ पर , । . । न्याय प्रकाश! के चित्त में सन्देह उत्पन्न होगा कि इन विषयों का असंल "स्वरूप क्या है। इसी सन्देह को सूत्र में 'संशय' पद से कहा है। (४)सन्देहः के उपरान्त फिर मध्यस्थ , के चित्त में. यह विचार उपस्थित होता है कि इन, विपयों पर विचार करने से क्या मतलय, इस विचार से क्या फल होगा । इसी को सूत्र में : प्रयोजन' पद से कहा है । (५) विचार का प्रयोजन दिखलाने के लिये दो आदमियों में से एक माकर प्रयोजन यतलाता हुआ अपना जो पक्ष सन्दिग्ध विपयों पर है उस को दृष्टांत दिखलाकर पतलाता है । यही 'दृष्टान्त' पांचवाँ पदार्थ सूत्र में कहा गया है। (६.). जिस पक्ष को वादी ने पुष्ट कर के बतलाया उसी को उसने अपना 'सिद्धान्त' माना । यही छठवां पदार्थ सूत्र में कहा गया है.। (७.) बादी का पक्ष सूचित होने पर प्रतिवादी सामने आकर उसके पक्ष के साधन में जो कुछ युक्तियाँ कही गई उनका विचार करता हुआ उनके खंड खंड की विवेचना प्रारम्भ करता है। उन युक्तियों में क्या क्या बात कही गई गौर क्या क्या मानी गई इसका स्पष्ट रूप से विभाग करता है और इनका खंडन करता है। इन्हीं युक्ति के खंडों को '. अवयव पद से कहा है। (८) अपनी युक्तियों को खंडित देख कर वादी फिर और युक्तियां यतलाता है जिन से प्रतिवादी की यतलाई दुई युक्तियों का उत्तर हो जाय । इसी को 'तर्क' कहा है 1() तर्फ द्वारा जो अपना पत्त स्थिर किया जाय वही 'निर्णय 'हुमा। (१०) प्रतिवादी इतने से सन्तुष्ट न होकर मध्यस्थ से प्रार्थना करता है. कि तत्व- निर्णय करने के लिये शास्त्रार्थ की आवश्यकता है। इसी शास्त्रार्थ 'को सूत्र में 'वाद'पद से कहा है । (११)शास्त्रार्थ प्रारम्भ होने पर यदि प्रतिवादी यथार्थ में तत्त्वनिर्णय ही करना चाहता होगा तो कुछ काल तक उत्तर प्रत्युत्तर रूप से शास्त्रार्थ होने पर सत्य पक्ष को मान लेगा । पर यदि केवल अपनी चतुराई को दिखलाना और चादी को हरा देना यही उसका दुष्ट मंतलंव होगा तो वह किसी तरह अपनी हार नमान कर उत्तर प्रत्युत्तर करता ही रहेगा। इसी दुष्ट शास्त्रार्थ को 'जल्प' कहते हैं (१२) । जब तककुछ अच्छी मच्छी युक्तियां मिलती जायंगी तब तक तो ठीक ही है । पर .
पाय प्रकाप्रा। कुछ काल के प्रनन्तर यह कंवल ऊटपटांग बकना प्रारम्भ करेगा। इसी को वितण्डा' कहते हैं (१३)। इस वितयडा में जितनी युक्तियाँ यह कहेगा घे सर या तो सरासर मशुद ही होगी जिन को 'हत्वाभाम' पद से कहा है (१४ ।। अथवा जान बूझ कर भंड घंड होगी जिनका इन्च पद से कहा ह (१५) । ऐसे अंड यंड पकने में घा परस्पर विरुद्ध मोर प्रशुद्ध पाते यकेगा जिस से ले गो को यह मालूम दाने लगेगा की उसकी हार हुई। इसी को 'जाति' पद से कहा है। (१६) इस भरस्था में समा के सब लोगों का यह निश्चय मालूम होगा कि प्रतिगदी का पक्ष अशुद्ध और चादी का पद शुद्ध है । तय मध्यस्थ प्रतिवादी फो मागे पकन से रोक देना है। इसी रोकने को 'निग्रह' कहते है और इसी अवस्था का 'निग्रह स्थान' पद से सूत्र में कहा है। भय हम लोग समझ सकते है कि मिस फारण सगौतम ने अपने सूत्रों में इस क्रम का ग्रहण किया है। प्रथम पदार्थ-प्रमाण । सब पदार्थ का उद्देश ' तो पहिले ही सून में किया गया। मर क्रम से सरों के 'लवण' कहे जायंगे और उनकी परीक्षा की जागी। पहिला पदार्थ है 'प्रमाणु' 'प्रमा' -यथार्थ ज्ञान-का जो 'फरण' मुख्य हेतु-उसी को प्रमाण कहते है। जैसे काटने के काम में फरसा हेतु' या हथियार होता है इसी तरह जिसके द्वारा यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो उसी को उसका करण कहते हैं। वही करण 'प्रमाया' है। यद्यपि ज्ञानों के उत्पन्न होने में बहुतेरे कारणों का व्यापार होता है परन्तु मान उत्पन्न करने में जिस कारण का व्यापार सब न्याय प्रकाश ५ से अधिक प्रपेक्षित हो, जिंस के विना जो शान नहीं उत्पन्न हो सके। वही उमका, साधकतम'' उत्कृष्ट माधन हुमा । और वही उस मान का. 'प्रमाण ! कहलाता है । जैसे किसी वस्तु के दखने में यद्यपि उस घस्तु के रंग, रोशनी इत्यादि सभी अक्षित होते हैं तथापि आँख ही एक ऐसी वस्तु है जिसके विना वस्तु का देखना कभी सम्भव नहीं। इस से माँख ही देखने का.'करण' कहला सकती है। प्रभा-यथार्थ ज्ञान उसी ज्ञान को कहते हैं जो नतो मशय रूप का हो औरन एका दम मिथ्या ही हो और जो न स्मरणरूप हो । जय कोई पेड़ को देखता है और समझता है कि 'मैंने पेड़ को देखा तब उसका धान प्रमा हुमा । पर यदि पेड़ को देख कर यह समझे कि मैं एक भूत देख रहा हूँ तो उमका ज्ञान एक दम मिथ्या हुमा । इसी को 'विपर्यय' शान भी कहा है फिर यदि पेड़ को देख कर उसके मन में पेसा ध्यान हो कि क्या मैं गेड़ देख रहा हूं, या भूत' तो उसका झान 'संशय' हुमा। भाज एक पेड़ को देखा फिर दस दिन के बाद यदि किसी कारण से उसके विना देख फिर यह वृक्ष चित्त में मा जाय तो यह शान 'स्मरण'हुमा । कोई एक शान यथार्थ है या नहीं यह हम कैसे जान सकते है -जय तक हम यह नहीं जानेंगे तय तक प्रमाण क्या है यह कैसे समझ सकते हैं। इस विषय में बड़ा मतभेद पाया जाता है। मीमांसकों ने माना है कि जितने ज्ञान उत्पन्न होते हैं. अपने माप यथार्थ ही उत्पन्न होते हैं। खाली पीछे से जय हम यह देखते हैं .. किशोन मिथ्या है तो भी यह दोष शान का नहीं होताः पर उसके विपय ही में होता है। जिस विषय को जैसा हमने समझा था वैसा वह नहीं है। या उस ज्ञान के उपाय. ही का.दोष हमें मालूम पड़ता है । जिम इन्द्रिय से.या जिस अनुमान से या जिन शन्दों से हमको ज्ञान हुमा पा :शुद्ध नहीं थे। हाल में किसी तरह का दोप कभी नहीं होता। भैयापिकोका ऐसा मत नहीं है। उनके मत . १ ६ न्याय प्रकाशा से ज्ञान जिन कारणों से उत्पन्न होता है वे जघ निर्दुष्ट पाये जाते है तभी ज्ञान प्रमा है,ऐसा निश्चय होता है । इसी तरह उन कारणों में जय दोप पाया जाता है तब वे अप्रमा माने जाते हैं। इस विषय का पूरी तरह से विचार न्यायमंजरी (पृ० १६० ) में किया गया है। न्यायमत से दोप ज्ञान ही में है, अर्थ में नहीं। घोड़ातो घोड़ा ही रहता है। खाली मेरे ज्ञान में गलती होती है। (वार्तिक पृष्ठ ३६) शान का प्रथमतः दो अंशों में विभाग होता है। (१) अनुभव, जो किसी वस्तु फा साक्षात् ज्ञान हो । मोर (२) स्मरण, जो ज्ञान कोई दूसरे शान के द्वारा उत्पन्न हो। स्मरण के कारण सूत्र ३। २४३ में पच्चीस गिनाये गये हैं। फिर अनुभव को तीन प्रकार फा माना है (१) प्रमा (२) विपर्यय (३) संशय । जब हम घोड़े को घोड़ा समझते है तब हमारा झान 'प्रमा' कहलाता है । अर्थात् जो वस्तु जो है और जैसी है उसको जन हम घही वस्तु या वैसीही समझे तव हमारा ज्ञान प्रमा हुमा । पर घोड़े कोयदि हमने गदहा समझा । अर्थात् जो वस्तु जो नहीं है या जैसी नहीं है उसको वह या वैसा जय मैंने समझा तो मेरा शान अप्रमा या 'विपर्यय' हुआ । विपर्यय ज्ञान के स्वरूप में भिन्न दर्शनों में बड़ा मतभेद है। इसका विचार न्याय- मंजरी (पृ० १८०-८८) में किया गया है । जय 'यह घोड़ा है या गदहा' यह मुझको निश्चय नहीं होता, कुछ चिद्ध मुझे घोड़े के से मालूम पड़ते और कुछ गदहे के से, तो मेरा शान 'सराय' कहलाता है। 'करण' को प्रधान कारण कहा है। इसी प्रसंग में कारण क्या है और के तरह का होता है इसका विचार भी यहां आव- श्यक है । जव कोई कार्य उत्पन्न होता है तब उसके पहिले जिस दूसरी वस्तु का रहना आवश्यक होगा और जो वस्तु फेवल उस कार्य को छोड़ कर किसी दूसरे कार्य के उत्पन्न करने में न लगी होगी उसी को उस. कारण कहेंगे। जैसे कपड़ा जय जय, उत्पन्न होगा तब तब उसके पहिले सत अवश्य रहेंगे। इसलिये सूत कपड़े का कारण हुमा । परन्तु उन्हीं सूतों की लम्बाई या लाल रंग इत्यादि गुण इस कार्य का . .
न्यायप्रकाया - कपड़े के कारण नहीं होंगे। क्योंकि सूत का रंग पा खम्याई कपर, के रंग वा लम्बाई को उत्पन्न करता है, कपड़े को नहीं । तात्पर्य यह है कि जिस वस्तु फे उत्पन्न होने में जिस वस्तु की आवश्यकता हो, जिसके बिना कभी यह वस्तु उत्पन्न ही न हो सके धही उसका कारण हुमा । और जो वस्तु जिसके अनन्तर भवश्य हो, और जो जिसके बिना नहीं हो सके यही उसका 'कार्य' हुआ। कारण तीन प्रकार का होता है (१) समवायि कारण-(२) मसमवायि कारण-(३) और निमिस कारण। (१) जिस कारण में कार्य 'समवेत 'रहता है मर्यात जिस में, जिसके भीतर, जिससे मिला हुमा, जिस का रूपान्तर छोकर, कार्य, उत्पन्न होता है और रहता है वही उसका 'समवायि कारण' है । जैसे कुंडल के लिये सोना मधया कपड़े के लिये सूत । सोने ही के भीतर, उसी से मिला हुमा, उसी के रूपान्तर होने से. फुडल उत्पन्न होता है । इस से सोना कुंडल का समवायि कारण हुमा । समवापि कारण का कार्य से नित्य सम्बन्ध रहता है । जय तक कुंडल रहेगा तब तक सोने से उसका सम्बन्ध नहीं छूटेगा । इसी नित्य सम्बन्ध का नाम यैशेषिकों के यहां समवाय सम्बन्ध अयुतसिद्धि इत्यादि पारिभाषिक शब्दों से कहा जाता है। (२) किसी कार्य के उत्पन्न होने के समय जो वस्तु उसके सम. वायि कारण से सम्बद्ध हो और जिसका व्यापार उस कार्य के उत्पन्न होने में साफ मालूम पड़े यही उस कार्य का समवाय कहलाता है। कार्य के उत्पन्न होने में उसका व्यापार मावश्यक होता है, इस से यह 'कारण' अवश्य हुआ। पर वह कार्य उसी वस्तु में नहीं उत्पन्न होता इस से 'मसमवायी '. कहलाया। जैसे कपड़े में जो सूत रहते हैं उन सूतों का एक दूसरे के साथ जो संयोग (मिलना) है उसके बिना कपड़ा,नहीं उत्पन्न हो सकता । इससे सूत्रसंयोग. कपड़ों का कारण अवश्य होगा। पर यह कपड़ा उस संयोग में नहीं.उत्पन्न होता है जिस तरह वह सूतों में उत्पन्न होता है। इसी से वह 'असमघायी' हुआ । (३) जिस वस्तु का व्यापार कार्य के उत्पन्न होने में मावश्यक, . कारण . . - १ न्याय प्रकारा। " - ॥ हो, पर पहन समयायि कारण और न असमघायिकारया हो, तो उसी को 'निमित्त कारण' कहते हैं । जैसे कुंडल सोनार के व्यापार के यिना नहीं उत्पन्न हो सकता । पर सोनार कुंडल का न तो 'समवाय कारण' है और न 'असमवायि कारण'। इन दोनों कारणों के जो लक्षण कहे गये है सोनार में नहीं पाये जाते। इस से सोनार कुंडल का ' निमित्त कारण फहलाता है। प्रय यह विचार उपस्थित होता है कि प्रमा के किस तरह फे कारण को 'प्रमाण' कहते हैं। प्रमा का 'समवाय' कारण हैमात्मा। उसकामसमवायिकारण मात्मा-मन-इन्द्रिय का संयोग है। जिस घस्तु का ज्ञान होता है वह उस ज्ञान का निमित्त कारण है। इन में से मात्मा-मन-इन्द्रिय के संयोग ही को प्रत्यक्ष शान के प्रति प्रमा का फरण' घा 'प्रमाण' माना है । क्यों कि वस्तु घामात्मा के रहते भी जय तक वह संयोग नहीं होता तब तक झान कमी नहीं उत्पन्न होता। ज्ञान के कारण को 'प्रमाण' कहा है। जिन सामग्रियों से किसी वस्तु का शान उत्पन्न होता है-जैसे कि प्रत्यक्षादि प्रमाण निरूपण में वर्णित होंगे-उनको प्रमाण फहा है । पर बहुतेरे ग्रन्थों में वस्तु के शान को भी 'प्रमाण' कहा है । पर इस पक्ष में भी ज्ञानही का कारण प्रमाण होता है । जव सामग्री को 'प्रमाण' मानते हैं तय उस करण का फल उस वस्तु का ज्ञान होता है और जब उम वस्तु के ज्ञान को 'प्रमाण' मानते हैं तब यह चीज अच्छी है, रखने योग्य है, यह चीज बुरी है, फेंकने योग्य है इत्यादि शान फल होता है। दोनों पक्षों में शानही फल और ज्ञान का कारणही प्रमाण है। प्रत्यक्षादि के लक्षण में गौतम ने इन्द्रियसन्निकर्ष से उत्पन्न ज्ञान को प्रत्यक्ष ' कहा है। जिससे यह स्पष्ट है कि इन के मत से ज्ञान ही प्रमाण है। गौतम ने तीसरे सूत्र में चार प्रमाण माने हैं। "प्रत्याक्षानुमानोपमानशब्दाःप्रमाणानि"। (१) प्रत्यक्ष (२) मनुमान (३१ उपमान-(४ शब्द-ये चार प्रमाण हैं। + न्याय प्रकारा। प्रत्यक्ष । "इन्द्रियार्थसन्निकर्योत्पन्नशानमध्यपदश्यमव्यभिचारि ध्यघ- सायात्मक प्रत्यक्षम्,"-ऐसा प्रत्यक्ष का स्वरूप गौतम ने कहा है। किसी चीज कासम्बन्ध जब किसी इन्द्रिय से होता है. ता इस सम्बन्ध से जोहान उत्पन्न होता है उसी को प्रत्यन कहते हैं। खेकिन 'यह किताब है ऐसा जो शब्दों से ज्ञान का स्वरूप कहा जाता है सो ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं है। इसी से प्रत्यक्षाको सूत्र में अन्यपदेश्य' यतलाया है। और जैसी यह चीज़ असल में है वैसीही इस शान से मानी जानी चाहिये। इससे इस शान को अव्यभिचारी'कहा है.। फिर यह सान संदिग्ध नहीं होता । यही सूत्र में व्यवसायात्मक' पद से कहा है। जिनके मत से इस ज्ञान का कारण ही प्रमाण है उनके मत से.इन्द्रिय 'प्रत्यक्ष प्रमाण' हुमा और ज्ञान जो उत्पन्न हुमा सो 'प्रत्यक्ष शान' हुमा। प्राचीन मत के अनुसार इन्द्रिय- सम्बन्ध से उत्पन्न शान. ही 'प्रत्यक्ष प्रमाण हुआ। सूत्र में जो 'भव्यपदेश्य' पद है इससे साफ मालूम होता है कि वस्तुमात्र का जो शान निर्विकल्पक होता है..वही. प्रत्यक्ष प्रमाण' है । और यह चीज लेने लायक है या फेकने के लायक है, इस तरह का ज्ञान 'प्रत्यक्ष ज्ञान' है । नवीन अन्धकारों ने दोनों मत को मानकर ऐसा कहा है कि भिन्न भिन्न.मवस्थामों में (१.) इन्द्रिय (२) इन्द्रिय का सम्बन्ध (३) इन्द्रियसम्बन्ध से उत्पन्नशान, ये तीनों प्रत्यक्ष शान के कारण.अर्थात् 'प्रत्यक्ष प्रमाण' होते है ।। जब इन्द्रिय करण है तब उसका फल अर्थात प्रत्यक्ष शान यह शान होगा जो कि पहिले पहिल चीज के सामने .माने से होता है। जैसे कि 'यह कोई चीज मेरे सामने हैं, इस ज्ञान को 'निर्विकल्पक ज्ञान कहते हैं ! कुछ देर के बाद उसी चीज का शान ऐसा उत्पन्न होता है 'जैसे 'यह चीज जो मेरे सामने है वह एक फिताब है' । इस शान को 'सविकल्पक ज्ञान कहते हैं ! जयं. यह भान प्रत्यक्ष शान हुमा तय इस शान का करण प्रत्यक्ष प्रमाण 'इन्द्रिय का सम्बन्ध है । मौर जय इन्द्रियं के सम्बन्ध से उत्पन्न झान करण होता है तब 'यह चीज खेने लायक षा फेकने लायक है, ऐसा शान-प्रत्यक्ष शान हुमा ।
न्याय प्रकारा। . . इन मतमतान्तरों से यह मालूम होता है कि प्रत्यक्ष ज्ञान का रूप ऐसा होता है। जब कोई किताब मेरी आखों के सामने आती है तब जब तक मेरी नजर अच्छी तरह उस किताय पर नहीं पड़ती तय तक यही ज्ञान होता है कि यह कोई एक वस्तु है । यह घस्तु क्या है, उसका नाम या गुण क्या है, सो सय कुछ भी उस समय मालूम नहीं होता । इस शान को 'निर्विकल्पफ शान' कहते है। इसका कारण इन्द्रिय मात्र है। और इस करण से जो निर्विकल्पक ज्ञान उत्पन्न होता है उसमें इन्द्रिय के सामने उस किताव का माना भी आवश्यक होता है । जैसे फरसे से लकड़ी काटने में फरसा फरण होता है और फरसं का लकड़ी पर गिरना आवश्यक होता है। फिर जय आंख उस किताब पर अच्छी तरह पड़ती है तब 'यह घस्तु जो में देख रहा हूं वह एक किताय है, इसका रंग लाल है, इसमें सोनहरे अक्षरों से इसका नाम लिखा है, इस किताय में काले काले अक्षर लिखे है इत्यादि झान उत्पन्न होते हैं। इस शान को 'सविकल्पक' कहते हैं । इसका करण इन्द्रियसम्बन्ध है। इन्द्रियसम्बन्ध से जो सविकल्पक ज्ञान उत्पन्न होता है उसमें बीच में निर्विकल्पक ज्ञान का होना आवश्यक होता है। कुछ देर और देखने के बाद यह मालूम पड़ता है कि यह किताव रखने और पढ़ने के योग्य है-' वा 'यह बुरी है यह फेकने के लायक है।' इस ज्ञान को ' 'हानादिबुद्धि' कहते है । इस ज्ञान का करण, 'प्रत्यक्ष प्रमाण' आगे का निर्विकल्पक ज्ञान होता है। मोर इन दोनों के बीच में सविकल्पक ज्ञान आवश्यक होता है। जितने ज्ञान होते हैं सय मात्मा में उत्पन्न होते हैं। प्रात्मा के बिना कोई 'शान नहीं हो सकता। इसी तरह मन के बिना कोई भी ज्ञान नहीं हो सकता । सब तरह के शान में आत्मा और मन का संयोग मावश्यक है। इस से प्रत्यक्ष शान में- (१) वस्तु से इन्द्रिय का सम्बन्ध (२) इन्द्रिय से मन का सम्बन्ध (३) मन से आत्मा का सम्बन्ध इतने सम्बन्ध आवश्यक होते हैं। शन्द्रिय के जिस सम्बन्ध से प्रत्यक्ष ज्ञान उत्पन्न होता है यह छ प्रकार का होता है। (१) संयोग-जिस हालत में इन्द्रिय का .
न्याय प्रकाश । . उस चीज से मामूली सम्बन्ध रहता है। जैसे जब किताय सांखों के सामने आई तव जो माखों का उस किताय से सम्बन्ध है। (२) संयुक्तसमचाय । जो चीज माखों के सामने आई उसमें कोई ऐसा गुण हो जो उसमें हर दम रहता हो, उस गुण फेविना वह चीज कमी रह ही नहीं सकती यह गुण जोपाखा से देखा जाता है उस गुण के साथ मांखों का जो सम्बन्ध है वह 'संयुक्त समवाय' कहलाता है । अर्थात् जब मांखों के सामने माई किताय की सुरत रंग इत्यादि हम देखते हैं, आंखों से किताय का सम्बन्ध संयोग सम्बन्ध है, इससे किताव मांखों से 'संयुक्त' हुई । फिर किताव का रंग एक ऐसा गुण है कि जय तक यह किताव है तब तक उसका वह रंग भी उसके. साथ है इससे इन दोनों का सम्बन्ध नित्य है, इसी 'नित्य संबंध' को 'समवाय' कहते हैं। इससे किताब के रंग का मांखों से 'ओ सम्बन्ध है वह संयुक्त समवाय' हुआ। (३) संयुक्त समवेत समवाय-नैयायिकों के मत से जितनी चीजें एक तरह की हैं ये सब मिलकर एक 'जाति' कहलाती है । जैसे जितनी कितावें हैं वे सब 'किताय ' जाति की है। 'जितने रंग है वे सब 'रंग' जाति के हैं। और सब चीजों में उनकी जाति हरदम साथही लगी रहती है। रंग' जाति से ''शुदा कभी रंग नहीं रह सकता । इससे 'रंग' जाति हर एक रंग में 'समवेत' नित्यं सम्बद्ध' हुआ। इससे जब किताब सामने आई य उसका रंग देखा । फिर जो मैं देख रहा हूं सो 'रंग' है, यह 'रंग' जाति का है, यह जो मांस्त्रों से देखा गया इसमें 'रंग' जाति का मांखों से सम्बन्ध 'संयुक्त समवेत समघाय' हुआ। मांखों से 'संयुक' है किताय, किताव में 'समवेत' है रंग, और रंग में समवाय सम्बन्ध है 'रंग' जाति का। (४) समवायः। सय इन्द्रिय और जिस चीज का शान होता है उसका ऐसा सम्बन्ध हो पनो कमी जुदे न होते हों तय दोनों को सम्बन्ध नित्य है । जैसे जब कान से शब्द सुना जाता है। नैयायिकों के मत में कान के भीतर जो भाकाय है वही . - न्याय प्रकाशा - . इन्द्रिय' है, उसी से शब्द सुना जाता है। और फिर उनके मत में शब्द आकाशही का नित्य गुण है। इससे शब्द और आकाश का सम्बन्ध नित्य है। जब आकाशरूपी कान से शब्द सुना जाता है तन इन दोनों में सम्बन्ध 'समवाय' ही हुआ। (५) समवेत समवाय । 'यह शब्द जिसे में सुन रहा हूं यह शब्द जाति का है' यह शान जब 'कान' इन्द्रिय से होता है उसमें कान और 'शब्द' जाति का सम्बन्ध समवेत समवाय', हुमा । कान में समवेन है शब्द, शब्द में समवेत 'शब्द ' जाति । (६) संयुक्त विशेषणता।' इस टेबुल पर किताब नहीं है। इस तरह जो टेवुल पर किताब का नहीं होना देख पड़ता है सो वहां पर किताब का अभाव' अर्थात् 'नहीं दाना' देखा गया। वहां भभावही देखा गया ऐसा नैयायिक मानते हैं। यहां पर अभाव' टेवुल का 'विशेषण' हुमा, और टेवुल प्रभाव से संयुक्त' हुमा, इससे 'श्रभाव' का मांस से सम्बन्ध 'संयुक्त विशेषणता' हुमा । कई ग्रन्थों में इस सम्बन्ध को विशेषणवि- शेप्यभाव कहा है। पर विशेषण विशेष्य भाव सम्बन्ध अभाव का टेवुल के साथ हुमा। ऐसाही इन ग्रंथों में कहा भी है (तर्क भाषा ३२ )।फिर सम्बन्ध का 'इन्द्रियसलि फर्ष' इन्द्रिय के साथ सम्बन्ध' कहना ठीक नहीं मालूम पड़ा इससे यहां पर इस छठवें सम्बन्ध का नाम 'संयुक्त विशेषणता' कहा है, । तर्क मापाही में कुछ पंक्ति भागे चलकर इस सम्बन्ध को 'सम्बद्ध विधेपण विशेष्य भाव ' कहा है। इन्द्रिय के संयोग से वस्तु का ज्ञान होता है। यह किस तरह से होता है इस विषय में कुछ मत भेद पाया जाता है। जय मुझको किसी वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, 'जब मैं किताब को छूना हूं, तब मेरा इन्द्रिय (हाथ' उस किनाव पर पड़ता है तब वह किताब छुई जानी है। इसी तरह जय मैं उस किताब को मांखों से देखता हूं तब मांखों की ज्योति निकल 'फर किताब पर पड़ती है। इसी तरह अब मैं शयद सुनता हूं तय श्रवणेन्द्रिय (कान से निकल कर उस शब्द पर पड़ता है । अर्थात् तय इन्द्रिय 'प्राप्यकारी' होते हैं। ऐसा मत कुछ लोगों का पृ० .
न्याय प्रकारा। हैं। कुछ और लोग कहते हैं कि भौर इन्द्रियों में इन्द्रिय बाहर जाकर पड़ता है, पर आंख और कान में पंसा नहीं होता। मर्थात ये दो इन्द्रिय ' अप्राप्यकारी' है। सब इन्द्रिय 'प्राप्यकारी' हैं ऐसा नैयायिकों का मत है ( वार्तिक पृ० ३७) । इनका कहना है कि यदि इन्द्रियों का विषयों पर पड़ना आवश्यक न होता तो हमारे नजदीक जितनी चीजे हैं उन सभों को हम देख सकते। अनुमान । . द्वितीय प्रमाण है मनुमान | इस का लक्षण गौतम सूत्र में 'तत्पूर्वक 'अधांत् 'प्रत्यक्ष पूर्वक' इतनाही कहा है। इस के ध्याख्यान में भाष्य में कहा है-लिङ्ग लिङ्गि इन दोनों का जो प्रत्यक्ष ज्ञान होता है इन प्रत्यक्ष शानों से उत्पन्न जो शान उसी को अनुमान ' ज्ञान कहते हैं। जैसे प्रत्यक्ष में प्रत्यक्ष ज्ञान को तथा प्रत्यक्ष ज्ञान के कारण दोनों को प्रत्यक्ष कहते हैं उसी तरह यहां भी लिङ्ग का प्रत्यक्ष ज्ञान और लिङ्गि का प्रत्यक्ष ज्ञान इन दोनों से उत्पन्न जो ज्ञान उस को भी मनुमान कहा है- ( इसको मनुमिति' भी कहते हैं।)-पार उक्त दोनों प्रत्यक्ष शानों का साथ मिलकर जो एक शान होता है, जिस. मिले हुए शान से अनुमिति ज्ञान होता है उस को भी अनुमान कहा है । हम अपने दिन दिन के काम में ऐसा पाते हैं कि जहां जहां हम घूत्रां देखते हैं वहां वहां आग ज़रूर पाते हैं । इस तरह धूओं मौर माग का हरदम साय रहना जब हमने ठीक ठीक समझ लिया तो धूएं को आंग का 'लिङ्ग' प्रथात् चिह्न कहा। इसके वाद जय हमने फिर कहीं घूत्रां निकलते देखा तो पहिलो जो ठीक की हुई यात घी उस का स्मरण हुआ कि हमने पहिले जहां जहां धूमां देखा था यहां छहां प्राग जरूर पाया था-इस से में स्थिर जानता हूं कि--"जहां धूम है वहां प्राग जरूर है।' यही दो चीजों के हरदम साथ रहने का जो ज्ञान उसी को नैयायिकों ने उपाति ज्ञान कहा है। अनुमान की पहली सीढ़ी यही व्याप्ति .
(१) "जहां धूआं है तहां आग है " ( व्याप्ति) परामर्श १४ न्याय प्रकाश। है। इस के बाद जब हम किसी जगह पर धूमां देखते हैं तो इस देसने का हमारे मन में इस प्रकार होता है-"इस जगद्द धूभा है: । इसी को ' लिङ्गि कहते हैं-अर्थात् जहाँ पर लिंग है-धूएं को देखते ही पहला जो व्याप्ति शान था वह मन में आजाता है। ये दोनों शान मिल कर मेरे मन में इस प्रकार भासित होते हैं 'जिस धुएं के साथ साथ हरदम हमने माग पाई है उस धूरं को मैं यहा देख रहा हूं । इसी को 'परामर्श वा व्याप्ति विशिष्ट पक्ष धर्मता ज्ञान, कहते हैं। इसी के अयन्तर यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि " इस जगह पर भाग है ॥ भनुमान की सीढ़ियां इस प्रकार होती हैं। शान (२)" यहां पर धूमां है " (पक्षता ) (३), यहां पर आग है " ( अनुमिति । परन्तु नैयायिकों के मत से यह प्रकार खूब ठीक नहीं है । यद्यपि अपने मतलब के लिये यह क्रम ठीक हा भी सकता है पर दूसरों के मन में ठीक तरह से ज्ञान कराने के लिए यह प्रकार ठीक नहीं है। इस से अनुमान का खास कर परार्थ ( दूसरों के वास्ते ) अनुमान का पांच खंड कहा है । घे पांच खंड 'अवयव' कहलाते हैं । ये अवयव यों हैं। (१)प्रतिज्ञा-साध्य का निर्देश अनुमान से जो बात सिद्ध करना है उसका वर्णन जिस वाक्य में हो । जैसे-'यहां पर आग है ' सू १. १.३३॥ (२) हेतु-जिस निशान से बात सबूत करनी हो उस मिशान की सूचना जिस वाक्य से हो-जैसे- क्योंकि यहां घूमा है। सू. १.१.३४। (३) उदाहरण-पदिले जहां पर सबूत करनेवाली वस्तु घतलाये हुए निशान के साथ देखी गई है सो जिस धाक्य से पतलाया जाय । जैसे-जहां जहां धूम रहता है तहां तहां माग रहती है। जैसे-रसोइ घर में । सू. १.१.३६ । (४) उपनय-कहा हुआ निशान यहां पर है इस बात का u . . ' न्याय प्रकाशं । जिस वाक्य से स.फ सूचना होती है। जैसे-'यहां पर धूमां है। सू. १.१.३८ । (५) 'निगमन'-सबूत करनेवाली बात सबूत हो गई यह जिम वाक्य से साफ़ मालूम पड़े। जैसे- इस लिए यहां माग है। सू. १.१. ३६ । अनुमान का पूरा रूप यों है- यहां पर आग है' (प्रतिज्ञा) क्योंकि यहां पर धूम है ' ( हेतु) जहां धूनां रहता है वहां माग रहती है जैसे रसोइ घर में ' (उदाहरण) 'यहां पर धूमां है ' (उपनय) यहां पर माग है ' (मिगमन) इन पांचों अवयवों के नाम प्रशस्तपादभाष्य में-'प्रतिक्षा-उप- देश-निदर्शन-मनुसन्धान-प्रत्यामनाय'-कहे हैं। गौतम के सूत्र की नाई उनकी भनुमान की प्रणाली भी दो वादी प्रतिवादी के बीच में विचार के क्रम से ही मानी गई है। इसी से परार्थ अनुमान पर इतना जोर रखकर अनुमान को पंचावयव माना है । जब दो भादमी किसी बात पर • सन्देह करके विचार भारम्भ करते हैं जैसे जल द्रव्य है वा नहीं तो एक श्रादमी कहता है- जल द्रव्य है" । यही साध्यनिर्देश कहलाता है। (१) दूसरा पूछता 'यह तुम कैसे जानते हो । " तो इस के उत्तर मे पहिया भादमी कहता है "क्योंकि जल में रूप है "-यही 'हेतु' हुमा । (२) इस पर फिर दुसरा आदमी पूछ सकता है-" जल में रूप होने ही से वह द्रव्य क्यों होगा"। इसके उत्तर में कहा जाता है-"जिस जिस घस्तु में रूप है यह द्रव्य अवश्य है जैसे घड़ा, फिताब, वृक्ष इत्यादि इसी को दृष्टान्त' कहते हैं (३) प्रतिवादी फिर कहता है- हमने माना कि वृक्ष घट इत्यादि में रूप हैं इस से वे द्रव्य है पर इससे जल क्यों द्रव्य होने लगा ? । इस के उत्तर में यादी कहता है-"जल में रुप है" यही हुमा 'उपनय(४) है " न्याय प्रकाश - , अव इन चारो यातों पर एकट्टा विचार कर वादी हद रूप से कहता है' "इन सब बातों से सिद्ध हुआ है कि जल द्रव्य है" इसी को 'निगमन' कहा है (५)। नवीन नैयायिक पांच अवयवों का मानना आवश्यक नहीं समः झते । इन के मत से तीन ही वाक्य सबूत करने के लिये काफी होते हैं। प्रतिज्ञा, हेतु, दृष्टान्त ॥ मीमांसक और वेदांतियों ने भी इन्हीं तीन को माना है । यौद्ध नैयायिका ने दो ही माना है-प्रतिज्ञा मोर हेतु ! वार्तिककार का मत है को यह ठीक नहीं है। अधिक पुराने नैयायिकों ने दस अवयव भी कहीं कहीं पर माने हैं। इनका वर्णन वात्स्यायनमाप्य (सु. १२३) में है-- ऊपर कहे हुए पांच, और उनके अतिरिक्त ये पांच- (१) जिज्ञासा-यात के जानने की इच्छा। (२) संशय-जिस चीज को मैं जानना चाहता हूं वह कैसी होगी-अच्छी या बुरी-मै उसको लूंगा या फेक दूंगा- इत्यादि। (३) शक्यप्राप्ति-उक्त वस्तु के जानने का जो उपाय है उनसे वह चीज जानी जा सकती है। (४) प्रयोजन-इस बात को जानन से क्या मतलब- (५) संशयव्युदास-जो बात सवून की गई उसके विरुद्ध जो जो बातें मालूम पड़ें उनका निराकरण करना- इनका विचार सूत्र १-१-३२ में किया गया है। वार्तिककार (पृ०-१११) ने लिखा है कि इनको अवयव मानना है क्योंकि दूसरों को समझाने में इनका प्रयोजन नहीं पड़ता और दूसरों को समझाना ही अनुमान का असल मतलब समझा गया है। उनका यह कहना है कि दूसरों के समझाने के लिये जितने वाक्यों की आवश्यकता है उन्हीं को अनुमान का अवयव 'मानना चाहिये । जिज्ञासा-जानने की इच्छा है। यह कोई चाक्य नहीं है इसको किसी तरह के अनुमान-स्वार्थ या परार्थ-का अवयव कैसे कह सकते हैं"? प्रत्यक्ष और अनुमान में एक बड़ा भेद यह भी है कि प्रत्यक्ष से केपल वर्तमान काल की चीजें जानी जा सकती है और न्याय प्रकाशा अनुमान से भूत, वर्तमान और भविष्यत् तीनों काल की चीजें जानी जा सकती हैं। अनुमान का विभाग कई तरह से किया गया है । ऊपर कहा गया है कि मनुमान दो प्रकार का है [१] स्वार्थ अपने लिये अपने मन के विश्वास के लिये जो अनुमान किया जाय उसको 'स्वार्थ' कहते है । [२] 'परार्थ-जो अनुमान दूसरों को विश्वास दिलाने के लिये कहा जाय । स्वार्थानुमान में अनुपान को शब्दों में कहने की जरूरत नहीं है। अपने मन में दो एक बातें आई, जैसे 'जिसमें रूप है सो द्रव्य है, जल में रूप है' वस 'जल द्रव्य है' यह बात फौरन मन में जम जाती है। इन बातों को भी स्पष्ट रूपसे उच्चारण करने की जरूरत नहीं है। परंतु परार्थ अनुमान में जब तक पाचों वाक्य साफ साफ नहीं कहो जाय तब तक दूसरे आदमी का संदेह दूर 'नहीं हो सकता। इसी कारण से धर्मोत्तराचार्यने कहा है कि स्वार्थ भनुमान ज्ञानात्मक है और परार्थ शब्दात्मक है । और इसी आधार पर कुछ लोगों का कहना है कि परार्थ अनुमान अनुमान ही नहीं है, उसको शब्द शाम कहना उचित है । पर कुछ विचार करने से यह साफ मालूम होगा कि परार्थ अनुमान का रूप तो ऐसा है कि - शब्दों से स्पष्ट कहना मावश्यक है । पर इन : शब्दों से ज्ञान जो दूसरे आदमी के मन में उत्पन्न होता है से। शब्दों ही से नहीं । शब्दशान तो तय होता जय ' जल इतना ही कहने से उसके मन में निश्चय, हो जाता कि सचमुच जल द्रव्य ही है। ऐसा तो होता नहीं । पांचों- पाक्यों को सुनकर वह आदमी विचार करता है और तय स्थिर करता है कि ऐसा ही है । असल में पांचों वाक्यों को वह प्रादमी फिर अपने मन में कह फर ही विश्वास करता. है। इससे जैसा स्वार्थ अनुमान में विचार करने वाला जल में रूप होना रूप पाली चीजों का द्रव्य होना. इत्यादि मन में लाकर जल का . द्रव्य होना स्थिर करता है उसी तरह पराथै अनुमान में भी उन्हीं बातों को विचार कर दुसरा मादमी विश्वास करता है कि जल'द्रव्य है । फरक इतनाही होता है कि स्वार्थ अनुमान में किसी दूसरे से इन बातों के सुनने की जरूरत . द्रव्य है ।
- - . १८ न्याय प्रकाश नहीं होती परार्थ अनुमान में दूसरे का यताना आवश्यक , होता है । पर इतनेही से इसको शब्दशान कहना उचित नहीं है। इसी कारण से गौतम ने अपने सूत्रों में 'स्वार्थ' और 'परार्थ' इन दोनों को अलग अलग दो तरह का अनुमान नहीं माना है। उन्होंने पंचम सूत्र में तीन प्रकार के अनुमान को 'पूर्ववत् ' शेषवत् और 'सामान्यतोदृष्ट बतलाया है। इसके व्याख्यान में वात्स्यायन भाष्य में कहा है कि-'पूर्ववत् । मनुमान उसे कहते हैं जिसमें कारण से कार्य का अनुमान किया जाय । जेसे मेघ को देखकर जब हम अनुमान करते है कि- अब पानी धरसेगा, क्योंक मेघ पानी का कारण है-तो यही अनुमान 'पूर्ववत् ' कहलाया । इसी तरह जहां कार्य से कारण का अनुमान होता है उसको 'शेषवत् ' अनुमान कहते हैं। जैसे नदी में वाद माई देख कर जव में 'पानी बरसा ऐसा अनुमान करता हूं। क्योंकि नदी में पानी का घढ़ना पानी के घरसनेही से होता है, पानी वढ़ना बरसात का कार्य है, तो यही 'शेषवत् ' मनुमान हुआ । एक जगह में एक अवस्था में एक चीज को देखकर फिर दूसरी जगह वैसी ही अवस्था देखकर विना देश भी । वह चजि यहां होगी ' ऐसा जो अनुमान किया जाता है उसी को सामान्यतोदृष्ट. कहते हैं। जैसे हमने धारवार देखा है कि जो चीज एक जगह से दूसरी जगह जाती है वह चलती है। फिर सूर्य को देखते हैं कि वह एक जगह से दूसरी जगह जाता है, इस से हम अनुमान करते है कि सूर्य चलता है। इन तीनों की दूसरी व्याख्या भी भाष्य में यों की गई है। दो चीजों को देखा फिर कुछ बाद एक को देखा तो उसी से दूसरी चीज का भी जो अनुमान किया जाता है उसको 'पूर्ववत् कहते हैं । जैसे धूमां और माग को देख कर फिर कुछ काल के पीछे जहां धूमा देखा वहां माग को न देखकर भी यहां भाग जरूर होगी यह अनुमान किया जाता है । जितनी बातें एक चीज के विषय में हो सकती हैं उनमें से और सब का होना जय भसम्भव पाया जाय तब जो बाकी रह जाय उसका अनुमान जव होता है, . " ।
न्याय प्रकारा। - तब 'शेपवत् कहलाता है । जैसे शब्द यातो द्रव्य या गुण अथवा कर्म हो सकता है यह जान कर फिर वह द्रव्यं वा कर्म नहीं हो सकता इसे विचार कर फिर यह अनुमान किया जाता है कि-वह गुण है, तो यही सेपयत् अनुमान हुआ। जब दो चीजों का, सम्बन्ध हम जानते हैं पर उनमें से एक देखने के लायक, नहीं है तव जो देखने योग्य है उसको देखकर दूसरी चीज फा.अनुमान किया जाता है वह 'सामान्यतादृष्ट ' कहलाता है। जैसे इच्छा द्वेप इत्यादि देखकर आत्मा का अनुमान किया जाता है। पूर्ववत् अनुमान में जिस चीज का अनुमान किया जाता है उस जाति की चीज़ देखी गई है और देखी जा सकती है पर सामान्यतोदृष्ट से सिमका अनुमान किया जाता है उस का लक्षण उस जाति की चीज कभी देखा नहीं जा • सकती है। यह मुख्य भेद इन दोनों अनुमानों में है। ये दोनों 'वीत. ' अनुमान भी कहलाते हैं । इन में यह बात है.' इसी से दूसरी बात का अनुमान किया जाता है जम 'धूमा है' इससे. आग है ' ऐसा अनुमान किया जाता है । शेपवत् को 'श्रवीत भी कहा है । इसमें यह यात नहीं है' इससे दूसरी बात का मनुमान किया जाता है । जैसे 'शब्द द्रव्य वा कम नहीं है' इससे यह अनुमान होता है कि 'शन्द गुण है । 'ऊपर जो अनुमान के नमूने दिखलाये गये हैं। उन सभों में 'ऐसी यात है' इसका सबूत है । इनको 'अन्वयी अनुमान कहते हैं अकसर अनुमान ऐसे भी होंगे जिन में ऐसी यात नहीं है ऐसा भी सबूत होता है । इन. अनुमानों को. 'व्यतिरेकी अनु- मान कहते हैं । प्राचीन नैयायिकों ने इस विमाग को नहीं माना है। उसका कारण यह है कि 'ऐसी बात नहीं है' इसको यदि दूसरी तरह से हम कहें तो ऐसा भी कह सकते हैं कि 'इस यात का अभाव है, तो यह भी 'मन्वयी अनुमान ही. होगा। इसी.यात को प्राचीन ग्रीक नैयायिफों ने भी माना है। इसी से उनका कहना है कि सब शुद्ध अनुमात Barbara के रूप में बदले जा सकते हैं। जिनका यह रूपान्तर न हो सके वे शुद्ध - . , .
२० याय प्रकाश अनुमान ही नहीं है । परन्तु नधीन नैयायिकों ने अनुमान को तीन प्रकार का माना है- (१) केवलान्वयी-अन्वयी हेतु से जो मनुमान किया जाय उसको केपलान्वयी अनुमान कहते हैं । अर्थात् जहां जहां हेतु ६ वहाँ वहां जो यान सबूत करनी है चद्द भी पाई जाती है। और हेतु ऐसा हो जिसका कि नहीं होना कहीं सम्भव न हो तो उस हेतु को केवलान्वयी हेतु कहते है । ऐसे हेतु मे जो मनुमान होता है उसी को केवलान्वयी' अनुमान कहते है। जैसे यह वस्तु मभिधेय है-अर्थात् इसका नाम कुछ जरूर है-श्यों फी यह प्रमेय है-मर्षात् यह जाना जा सकता है । यहां पर प्रमेय ' होना ऐसा हेतु है कि इस का नहीं होना कहीं कभी भी सम्भव नहीं है । कोई चीज ऐसी नहीं है जो जानी न जा सके। (२) केवल व्यतिरेकी-जो हेतु ऐसा हो कि उसका होना सबूत करने वाली चीजों में कभी भी न हो तो उसको केवल व्यतिरेकी हेतु कहते हैं । और उससे जो अनुमान होता है उसको केवल व्यतिरेकी अनुमान कहते हैं । जैसे-'जो चीज- घड़ा-मैं देख रहा हूँ सो पानी या भाग नहीं है क्योंकि इसमें गन्ध पाई जाती हैं"-यहांपर गन्ध फा होना ऐसा है कि घह कभी भाग या पानी में हो ही नहीं सकता । इससे इसको केवल व्यतिरेकी हेतु कहते हैं। (३)मन्वयव्यतिरेकी-जो हेतु ऐसा हो की कहीं कहीं है और कहीं कहीं न ही भी हैं तो उसको अन्वयव्यतिरेकी हेतु कहते हैं। और ऐसे हेतु से जो अनुमान किया जाता है वह 'अन्वयव्यतिरेकी' भनुमान हुआ । जैसे 'जहां धूमां है तहां माग है जैसे रसोई घर में'। इस में अनुमान धूमां का होना कहा और देखा जाता है और 'जहां आग नहीं है वहां धूआं नहीं है जैसे कूप में ' यहां धूम्रा का न रहना हेतु में कहा गया इसी धूभा 'मन्वयव्यतिरेकी हेतु हुमा । यह विभाग असल में हेतु ही का विमाग हुमा और उसी के - ८ .
न्याय प्रकारा.. . A , 1. द्वारा अनुमान का भी - । इसी से प्राचीनों ने इस विभाग को नहीं कहा है। प्राचीन नैयायिकों ने इन तीन प्रकारों को न मानकर फेवल दो प्रकार का अनुमान 'घीत' और 'अवीत' माना है। ऐसी यह चीज है' यह जिस अनुमान से सबूत किया जाय उसको यीत.' कहते हैं । और ऐसी यह चीज नहीं है' यह जिससे सबूत किया जाय उसको 'प्रवीत' कहते हैं। अनुमान के कहने में पांच वाक्यों की जरूरत होती हैं सो कह भाये हैं। जैसे- "पंर्वन में आग है। "क्योंकि यहां धूनां देख पड़ता है "जहां धूमां है वहां आग जरूर है जैसे रसोई घर में " यहां पर धूआं है यहां पर आग है। इन वाक्यों में 'पर्वत--आग-धूनां रसोई घर-यही चार चीजों के नाम पाये गये । (१] पबतं वह है जिस में भाग का होना सबूत करना है। इसको कहा है 'पक्ष' अर्थात् जिस के विषय में संदेह हो कि सबूत करनेवाली यात इस में है या नहीं (२] माग वह चीज है जिसका होना सबूत करना है। इस का नाम है 'साध्य' जिस .को अनुमान से सिद्ध या सबूत करना है ॥ (३] घूमां वह चीज है जिस के द्वारा भाग का होना सबूत करते हैं । इस का नाम है 'हेतु' या 'लिंग' । (४) रसोई घर में आग और धूमां साथ पाया जाता है इसी के दृष्टान्त से पर्वत में धूमां के साथ मांग का रहना सबूत करते हैं। इस को 'सपन' कहते हैं । अर्थात् जिस में साध्य का रहना ठीक मालूम है। इसी तरह जिसमें साध्य का न रहना ठीक मालूम हो उस को 'विपक्ष' कहते हैं... - इन पाचों अवयवों में से भौर चार पर बहुत कुछ लिंबना मावश्यक नहीं है । परन्तु अनुमान का मूल है हेतु इस से इस का विचार आवश्यक है । अब यहां पर यह विचार " किया जायगा कि हेतु धा लिंग क्या है, सत् या अच्छा शुद्ध हेतु - १२२ न्याय प्रकाश " . - - कैसा होना है और असत् वा अशुद्ध बुरा हेतु कौन सा है इत्यादि। असत् हेतुओं ही का नाम हेत्वाभास है। अनुमान के पाचा अवयवों से दूसरे का नाम कहा है 'हेतु गौतम सूत्र में ऐसा ही कहा है । परन्तु यथार्थ में उस अवयव का नाम ' हेतुबचन' कहना ठीक है। ऐसा ही टीकामों में कहा भी है। इस हेतु' या ' हेतुबचन' का लक्षण गौतम सूत्र भाष्य । ११४०) में यों किया है-यो धर्म उदाहरण या दांत में देखा गया है उमी का जो बात जहां सबूत करनी हो वहां रहना सूचित किया जाय जिस वाक्य से उसी को कहते हैं ' हेतु' इस से 'हेतु ' वा लिंग का लक्षण ऐमा निकला कि-'जो धर्म दष्टांत में सबूत करनेवाली चीज के साथ देखा गया है और जहां पर वह चीज सवून करनी है वहां भी वह धर्म हो वही धर्म हुआ 'हेतु :चा 'लिंग'। ठीक ठीक लक्षण इस का एक प्राचीन कारिका में यों कहा है- [१] पक्ष में साध्य के साथ रहै अर्थात् जहां पर जो चीज सबूत करना है वहां पर उस चीज के साथ रहै- [२] सबूत कीजानेवाली चीज जहां जहां हो वहां वहां रहे। (३) जहां जहां सबूत करनावली चीज न रहे यहां यहां कभी न रहै- ये तीन बात जिस में पाई जावें वही है 'हेतु' वा 'लिंग'। जिस में ये तीनों बातें पाई जाएँ वह है 'सत् हेतु' भौर जिन में ये न पाई जाएँ वह है 'असत् हेतु'। प्राचीन नैयायिकों ने हेतु के तीन विभाग नहीं माने हैं। गौतम सूत्र में तथा भाष्य चार्तिक में दो तरह का हेतु' बतलाया है। पहिला वह जो साधयं या सादृश्य के द्वारा किसी बात को सबूत करती है -जैसे यहां आग है इस का सबूत 'यहां पर भी धूम है और रसोई घर में जहां हम ने आग देखा है वहां भी धूमां था' इस से इस जगह के साथ रसोई घर का साधर्म्य या सादृश्य दोनों जगह धूमां का रहना हुआ, इस बात से जो यहां पर आग का अनुमान किया गया सो साधम्र्य हेतु द्वारा हुमा । यही अनुमान 'वीत' अनुमान हुआ । (स. १.१.३४)। और जहां पर जिस चीज के प्रसङ्ग कुछ सबूत करना है उस के साथ कोई .
. न्याय प्रकाश २३. दुसरी जानी हुई चीज के साथ किसी वैधयं के द्वारा जो किसी यात को सबूत करें वह दूसरा घेधर्म्यहेतु हुआ । ( सू०१.१. ३५) इस का उदाहरण न्यायवार्तिक में अच्छा देखलाया है हमारा शरीरमात्मा से शून्य नहीं है क्योंकी यदि आत्मा नहीं होता तो इसमें जान भी न होती । हम अपने शरीर में जान पाते है ईट पत्थर में जान नहीं पाते यद्दी हुमा दोनों का वैधयं । फिर ईट पत्थर में प्रात्मा नहीं है सो भी हम को मालूम है । इससे हम यो अनुमान कर लेते हैं कि यदि मेरे शरीर में भी मात्मा न होता तो इसम जान भी न होती। : इन दोनों तरहों के हेतु में असल फरक यह हैं कि साधयं. हेतु जिसका दूसरा नाम अन्वयी हेतु भी है-उसके द्वारा चीजों का रूप कैसा है सो सवृत किया जाता है । और वैधय॑हेतु जिसको व्यतिरेको हेतु' भी कहते है-उस के द्वारा किसी चीज का रूप जो दूसरा मादमी मानता हो सो चैसा नहीं है यह सबूत किया जाता है। ये दो प्रकार के हेतु जो प्राचीनों ने माना है उसी से नवीन 'नैयायिकों ने तीन प्रकार निकाला है। ये तीन प्रकार यों हैं। हेतु तीन तरह के होते हैं, जैसे पहले. कह आये हैं । अन्वय- व्यतिरेकी, केवलान्वयी, केवलव्यतिरेको जिस हेतु के निस्यत ऐसा समझा जाय कि जहां जहां वह है तहां तहां साध्य और जहाँजहां साध्य नहीं है तहां कहीं यह नहीं है, तो यह हुआ अन्वयव्यतिरेकी. हेतु। अर्थात् इस हेतु फा साध्य के साथ व्याप्ति अन्वय और. व्यतिरेक दोनों तरह से हुआ ऐसा है' यह जिस वाक्य, में कहा जाय उसी को 'अन्धय' कहते हैं। और ऐसा नहीं, है ' यह जिसमें कहा जाय उसी को कहते हैं 'व्यतिरेक...। भाग के सबूत करने में जय आंग साध्य है. तय धूमो अन्वय- व्यतिरेकी इंतु है। क्योंकि इन के निस्बत हम यह जानते हैं: कि 'जहां जहां धूमां है यहां आग है जैसे रसोई घर में ' मोर जहां मांग नहीं हैं वहां कही भी धृां नहीं है ' जैसे तालाब में। इसमें दोनों तरह के दृष्टांत हैं। और दोनों तरह के हेनुमा में एकही तरह का इशंत मिचता है। कोई हेतु पेसा .
न्याय प्रकाशा है जिसका नहीं होना कभी सम्भव नहीं, जैसे 'मिधय 'प्रमेय ' इत्यादि । क्योंकि ऐसी कोई चीज़ नहीं है जो भामधेय न हो, जिसका नाम नहीं हो । और न कोई ऐसी चीज है जो प्रमेय नहीं हो जिसका ज्ञान न होसके । इन हेतुओं के निसरत भी यह नहीं कहा जा सकता कि 'जहां माध्य नहीं है वहां ये नहीं है। इससे इनके निसवत जव होगी तब अन्वयव्याप्ति ही होगी-'जहां प्रमेयत्व हैं वहां मभिधयत्व है' इसी लिये ये हेतु केवलान्वयी हेतु कहलाये। इसी तरह कई हेतु ऐसे है जिन के प्रसंग ऐसा दृष्टांत न पाया जाय जिससे यह सबूत हो मकै कि जहां ये हैं तहां साध्य हैं। 'जैसे' पृथिवी और चीजों से भिन्न है क्यों को इस में गन्ध है यहां पर गंध है हेतु-सके निसयत हम ऐसे ही हपान्त पा सकते हैं जिससे यही सूचित हो की 'जहां इतर भेद नहीं है अर्थात् जो पृथिवी से भिन्न है उनमें गन्ध नहीं है जैसे वायु में इत्यादि । पर ऐसा कोई भी दृष्टान्त नहीं मिलता जहां हम कह सफें की जहां गन्ध है वहा इतर भेद है 'क्यों की गंध खाली पृथिवी में रह सकता है। इससे इसको छोड़ और कोई चीज ऐसी नहीं हैं जहां गंध पाया जाय या इतर भेद पाया जाय । इसी से इसको कहते है 'केवलव्यातरेकी हेतु । इनतीनो तरह के हेतुओं का ठीक ज्ञान नीचे के चित्रों से होगा- जल में अन्धयव्यतिरेकी घूम पनि -- - प्रमेय-श्राभिधेय कैवलान्ययी 1 " न्याय प्रकाश २५ गन्ध:पृथिवी (पृथिवीतरभेद) पृथिवीतर केवलव्यतिरकी . जैसे 'धूम से प्राचीनों का विभाग बहुत ठीक था। 'ऐसी बात है' यह जिस से सिद्ध किया जाय वह हुमा अन्ययी हेतु और 'ऐसी बात नहीं है' इसका सिद्ध करने वाला हुमा 'व्यतिरे की हेतु । नवीनों ने. जो तीन भेद बतलाये हैं उनके प्रसंग की तरह की शंकाएं उठती ह । यूरोप देश के तर्कशास्त्र (Logic) के पढ़ने वाले यह कहते हैं की भनुमान में एक बड़ी जानि से छोटी जाति का अनुमान होना उचित है अर्थात् व्यापक से व्याप्यका अनुमान होना चाहिये। आग का अनुमान । इससे अन्यव्ययतिरेकी हेतु ही ठीक है। केवलान्वयी में किसी व्यापक से व्याप्य का अनुमान नहीं होता, दोनों यरायर रहते हैं । जैसे जितनी चीजे अभिधय हैं, जिनका नाम हो सकता है, वे सब प्रमेय भी हैं, जाने जा सकते हैं । इस से अभिधेयत्व से प्रमेयत्व का अनुमान ठीक नहीं। अर्थात केवलान्वयी हेतु को असल हेतु नहीं मान सकते हैं। इस शंका के मूल ही में कमजोरी देन पड़ती है । ऐसा किसने कहा है की व्यापक से ब्याप्यके अनुमान ही को 'अनुमान' कहते हैं । इस यात को जो स्वीकार करेंगे उनके लिये . अवश्य केवलान्यायी हेतु नही हो सकता । परंतु नैयायिकों ने ऐसा नही माना है । उनका कहना इतना ही है की जहां दो चीजों में नियत सम्बन्ध है वहां एक से दूसरे का अनुमान होता है । अभिधेयत्व और प्रमेयत्व का नियत सम्बन्ध है ऐसा सभी स्वीकार करते हैं। तप यदि अभिधेयत्व से प्रमेयत्व का अनुमान किया जाय तो इसमें क्या गलती हो सकती है। केवलव्यांतरफो के प्रसंग वेदान्त मीमांसा के प्राचीन ग्रन्ध. कारों ने भी शफा की है । 'पृथिवी और चीजों से भिन्न है क्योंकि इसमें गन्ध है' यही व्यतिरेकी अनुमान का उदाहरण है। जहां गन्ध है यह प्रथिवी को छोड़ और चीजों से मिन्न है ऐसी व्याप्ति इस अनुमान का मूल नही मानी गई है। क्योंकी इस व्याप्ति के लिये पृषियी को छोड़ कर कोई घटान्तं नही है। इससे इस मनु- २६ न्याय प्रकाशा मान को मूलव्याप्ति को इस तरह से माना है-'जहां जहां गन्ध नही है वह चीज पृथिवी से भिन्न नहीं है ऐसा नही देखा जाता है' इसके लिये जल इत्यादि दृष्टान्त मौजूद हैं। इसके प्रसंग यह दोप दिया जाता है की व्याप्ति तो बतलाते हैं 'गन्धाभाव' (गन्ध का न होना ) को और अनुमान कहते हैं 'गन्ध' से पृथिवी से भिन्न नहीं होने को । यह ठीक नहीं है। इसका समाधान नैयायिकों ने जो दिया वह मन में ठीक नहीं बैठता। वेदान्ती और मीमांसको ने व्यतिरेकी हेतु नहीं माना है। जो इष्टान्त ऐसे अमुमानों का नैयायिकों ने दिखलाये हैं उनके लिये उन्होने एक और प्रमाण 'अर्थापत्ति' नामका माना है । जहां पर जो धात ठीक देखी जाय वह वात यदि और एक दूसरी घात के विना नहीं होती यदि ऐसा भी ठीक मालूम हो, तो पहली बात से दूसरी बात के होने का जो ज्ञान होता है सो प्रर्थापत्ति प्रमाण से होता है। जैसे 'यहां गन्ध है' सो हम को साफ मालूम है-फिर हमें यह भी मालूम है कि जहां पृथिवी म हो वहां गन्ध नहीं रहता--इससे गन्ध के रहने से' पृथिवी । से अलग और कोई चीज़ यह नहीं है, यह शान शुद्ध अर्था- पत्ति ही हुमा । प्रमाणों की संख्या कम रखने ही के आग्रह से नैयायिकों ने अर्था- पत्ति न मानकर उस की जगह केवल व्यतिरेकी अनुमान माना है । हेतु 'सत्' या शुद्ध 'कैसा है सो ऊपर कह पाये हैं। इससे यह मालूम है कि हेतु में इन तनि बानों का होना आय- श्यक है-(१) पक्ष में होना-(२) मपक्ष में होना-३) विपक्ष में न होना । इसी से 'असत् ' हेतु क्या है सो भी हम समझ सकते है । परन्तु किस तरह का दोप इस हेतु में है यह नहीं बतलाया जा सकता । इस लिये गौतम ने हेतुदोपों का यहुत अच्छी तरह वर्णन किया है । असत् हेतु को 'हेला- भास' कहते है । यद्यपि हेत्वामाम को गौतम ने तेरहवां पदार्थ माना है। इस से अन्त में इसका विचार करना सो ही क्रम । . , न्याय प्रकाश २७ ठीक होता तो मी हेतु का विचार जहां है वहां हो उसके प्रसंग कुल बातों का विचार करना उचित मालूम पड़ता है। जितने हेतु अनुमान में उपन्यस्त होते हैं व सच साध्य के साथ रहने वाले समझे जाकर हेतु बनाये जाते है । साभ्य साथ रहने वाले धर्म सोलह प्रकार के होते है-(१) साध्य से अतिरिक्त भी सभी पदाथों के साथ जो सदा रहता है जैसे 'प्रमेयत्य-जाना जाना' नित्य पदार्थों में भी है और अनित्य पदाधों में भी। (२) साध्य के सजातीय चीजों में रहे और किसी एक ऐनी जगह भी रहे जहां साध्य नहीं रह सकता-जैसे 'सीध' कुल घेलों में भी है और भैंसों में भी रहता है। (३) साध्य के सजातीय कुल चीजों में हो और जहां .साध्य नहीं है यहां कभी भी न हो-जैसे 'उत्पत्ति होना' कुल भनित्य चीजों में है नित्य चीजों में कहीं भी नहीं । : () साध्य के सजातीय किसी चीज में न हो-जहां जहां साध्य नहीं है यहां सब जगह हो-जैसे उत्पन्न का होना' यदि नित्य सिद्ध करने में हेतु कहा जाय तो यह ऐसा हेतु है जो किसी नित्य .वस्तु में नहीं है-सकल प्रनित्य चीजों में है । (५) साध्य के सजातीय में कही भी न हो, जहां साध्य नहीं है तैसा एक जगह में हो-जैसे 'जाति और व्यक्ति रूप ..से रहकर वाह्यइन्द्रियों से जाना जाना कुल नित्य चीजों • में नहीं पाया जाता है । और कई अनित्य चीजों में पाया :जाता है। (६) जो साध्य के सदृश चीजों में न हो और जहां साध्य नहीं है वहां भी न हो-जैसे कान से सुना जाना' नित्य चीजों में नहीं 'है-मौर न नित्यही चीजों में, केवल शब्द में पाया जाता है । (७) साध्य के समान किसी एक चीज में हो-पर 'जहां साध्य नहीं है वैसा सब जगहों में हो-जैसे 'सींघ' भैस में है, जो 'अगौः, गायं नहीं है और 'भगौः जहां नहीं है" अर्थात् कुल गावों में भी है । इत्यादि न्यायवार्तिक (पृ. १६६.७) में गिनाया है 1. इसी तरह हिसाय करने से दो हजार से ऊपर - २८ न्याय प्रकाश। . संख्या तक बतला कर इनके अनन्त मेद हो सकते हैं ऐसा कहा है इन में पांच तो असल ' हेतु' है और सब गलत हेतु- या हेत्वाभास हैं। पर यहां केवल गौतम सूत्र में गिनाये हुप पांच प्रधान- हेत्वामासों का वर्णन करते हैं। (१) सव्यभिचार ( अनेकानिक )-(२) विरुद्ध-(३) प्रकरणसम (सत्प्रतिपक्ष )-(४) (मसिद्ध) साध्यसम्-(१) कालातीत ( बाधित )-ये पांच हेत्वाभस गौतमसूत्र में (१.२.५- १) निरूपित है। (१) सव्यभिचार। (१) सव्यभिचार.( जिसको नवीन ग्रन्थकार 'मनकान्तिक' भी कहते हैं) हेतु वह है जो साध्य के साथ भी रहे और उससे फरक भी रहै । जैसे 'शब्द नित्य है क्योंकी इसका स्पर्श नहीं हो सकता' यदि ऐसा अनुमान किया जाय तो यहां स्पर्थ का न होना' है हेतु और 'नित्य' है साध्य । और हम देखते हैं की यद्यपि घड़ा इत्यादि पदार्थों में स्पर्श का न होना' भौर नित्यता 'दोनों साथ पाये जाते हैं तथापि और कितनी चीज है जहा दोनों साथ नहीं है-जसे पृथ्वीपरमाणु में यद्यपि स्पर्श है तथापि यह अनित्य है और बुद्धि में यद्यपि स्पर्श नहीं है तथापि यह भनित्य है । इससे 'नित्यता' सिद्ध करने में । स्पर्श का न होना सव्यभिचार हेतु हुभा । क्योंकि पृथिवी परमाणु में और बुद्धि में दोनों का व्यभिचार' पाया जाता है अर्थात् दोनों साथ नहीं पाये जाते । इसको 'मनकान्तिक' इस लिये कहते हैं की किसी चीज का होना हुमा एफ 'अन्त'-उसी का न होना हुआ दूसरा 'अन्त' । 'है' या नहीं है। यह एक यात के साथ जो रहै सो हुमा 'एकान्त' जो एक के साथ नहीं बल्कि दोनों के साथ रहे वही हुमा 'मनकान्तिक' ॥ यह हेतु दुष्ट इस से हुआ कि ऐसे हेतु से 'है' नहीं है यह दोनों सिद्ध हो सकता है । जैसे यह नित्य है पयोंकी इसका स्पर्श नहीं होता-जैसे मात्मा' इस अनुमान से नित्यता सिद्ध होती है। इसी तरह 'यह अनित्य है क्योंकि म्याय प्रकारा इसका स्पर्श नहीं होता-जैसे वुद्धि'-इस से अनित्यता मी. सिद्ध होती है। सव्यभिचार हेतु दो तरह का होता है । (२) साधारण-बह ; हेतु है जो पक्ष में भी है-जहा साध्य है वैसी सब जगह में है-और '.. जहां साध्य नहीं है वैसी भी सब जगहों में है । जैसे 'शब्द नित्य है क्योंकी यह जाना जाता है। यह 'जाना जाना' शब्द में है- मात्मा माकाशं जितनी नित्य चीजें हैं उन में हैं और घड़ा कपड़ा इत्यादि जितनी अनित्य चीजें हैं उनमें भी हैं। (२) भसाधारण-जो पाली पक्ष में हो और फहीं भी न हो-जैसे 'पृथिवी नित्य है क्योंको इसमें गन्ध है' यहाँ 'गन्ध केवल पृषिधी में है और किसी भी नित्य या अनित्य चीज में नहीं है-ऐसे हेतु से कुछ भी सबूत नहीं हो सकतां ॥ कुछ नान नैयायिकों ने 'मनुपसंहारी' एक तीसरा भी भेद सव्यभिचार का माना है। अनुपसंहारी हेतु वह है जो पक्ष को छोड़ फर और कही भी साध्य के साथ न पाया जाय । प्राचीनों ने इसको नहीं बतलाया क्योंकी ऐसा हेतु केवल उसी अनुमान में पाया जाता हैं जिसमें 'कुल चीजे' पक्ष हो । जैसे 'कुल चीजें अनित्य हैं क्योंकी वेप्रेमय है' । यहां कुल ची को छोड़ कर और कोई चीज नहीं है जो दृष्टान्त । हो सके। शान्त होने से पंच अवयवं पूरे न होने से अनुमान का स्वरूप पूरा न होता यही इसमें दोष है । असल में हेतु दुष्ट । नहीं कहा जा सकता। यदि प्रमेय वस्तु भनित्य हो तो कुले । चीजों का भनित्यं होना सिद्ध होहीगा । यदि प्रमेय वस्तु नित्ये "भनित्य दोनों है इससे हेतु दुष्ट हुमा तो यह 'साधारण ही में आ गया फिर तीसरा प्रकार मानने से फल ही क्या। इससे प्राचीनों का दोही भेदं ठीक शान होता है। (२) विरुद्ध। जो:यात सबूत करना है उसका उल्टा ही जिस हेतु से सिद्ध हो..उसको 'विरुद्ध हेतु कहते हैं । जैसे, 'यह पानी टंढा है- क्योंकी भभी भाग पर चढ़ा है'1.जो सिद्धान्त मान बीया गया है जिसका सबूत करना इष्ट हो-उसका उलटा दी जो सिद्ध करे, भोर, सिद्धान्त को मिथ्या ही.सिद्ध कर दे ऐसे हेतु को भी विरुद्ध --- રૂર न्याय प्रकाश। . साध्यसम ( असिद्ध) जो हेतु किसी बात के सिद्ध करने में पेश किया जाय वह यदि खुद भी सन्दिग्ध ही हो,उसके विपय में भी शक हो,तो वह हेतु'साध्य- सम' कहलाता है। जैसा सन्देह साध्य के विषय में है-जिस सन्देह के दूर करने के वास्ते अनुमान पेश किया जाता है वैसा ही सन्देह यदि हेतु के विषय में भी हो तो वह हेतु साध्य के सम अर्थात् वरावर दुमा । इसी से उसे “साध्यसम" कहते हैं। जैसे-शया द्रव्य है क्योंकि वह चलती है ' इस अनुमान में छाया का चलना' हेतु है लेकिन छाया के चलने में उतना ही सन्देह है जितना उसके द्रव्य होने में । इससे यह हेतु 'साध्यसम' हुआ । इसीको 'असिद्ध भी कहते हैं । यह नाम (साध्यसम) वार्तिक में पाया जाता है और भाग्य में भी पाया है। जैसे 'प्रसिद्ध' हेतु साध्य का व्याप्य नहीं होता वैसे ही 'सव्य- भिचार हेतु भी है। इससे इन दोनों का भेद साफ नहीं मालूम हो सकता । भेद सूक्ष्म है। 'सव्यभिचार' में यह निश्चय रहता है कि हेतु साध्य का व्याप्य नहीं है । इससे अनुमान की जड़ जो व्याप्ति सो इस में नहीं रहती । पर 'असिद्ध ' में हेतु साध्य का व्याप्य है या नहीं, इसका निश्चय नहीं रहता वरन् इसमें पूरा शक पैदा हो जाता है जिससे व्याति की मजबूती जाती रहती है और कमज़ोर व्याप्ति के आधार पर अनुमान दृढ़ नहीं हो सकता। साध्यसम या असिद्ध हेतु तीन प्रकार के होते है । वार्तिक में इन तीनों प्रकारों का नाम यों लिखा है (१) प्रज्ञापनीयधर्मसमान जिसको तात्पर्य टीका में 'मसिद्ध'और नवीन ग्रन्थों में 'स्वरूपासिद्ध' भी कहा है । (२) आश्रयासिद्ध । (३) अन्यथासिद्ध जिसे नवीन अन्धों में व्याप्यत्वासिद्ध' कहा है। स्वरूपासिद्ध हेतु का उदाहरण इस प्रकार है-"घोड़ा गाय है क्योंकि उसके सींग है"। यहां सींग का होना घोड़ों में कभी सम्भव नहीं है। इससे यह हेतु स्वरूप ही से,अपने स्वभाव से ही,असिद्ध हुआ। भाष्य में तीनों प्रकार का एक ही उदाहरण कहा गया है । 'छाया द्रव्य है क्योंकि न्यायप्रकाश। का - वह चलती है । इस में जिस प्रकार छाया का द्रव्य होना सिद्ध करना है वैसेही उसका चलना भी सिद्ध करना है.। इस से 'छाया का चलना प्रसिद्ध हुमा । आश्रयासिद्ध का उदाहरण वार्तिक में इस प्रकार बतलाया गया है-'शाया द्रव्य है क्योंकि वह चलती है'। इस अनुमान में छाया चलना हेतु रक्खा गया है । परंतु छाया का चलना तब तक नहीं मानाजा सकता जब तक पहिले ही उसका द्रव्य होना भी न मान लिया जाय । और यदि उसका द्रव्य होना मान ही लिया जाय तो 'फिर अनुमान का प्रयोजन ही क्या रह जायगा? दूव्य ही चल सकता है, दूदय ही चलने का 'माश्रय' हो सकता है। इससे जय तक छाया का दूव्य होना न सिद्ध हो तब तक वह चलने का माश्रय' ही नहीं है। इससे यह हेतु आश्रयासिर हुमा । माश्रयासिस हेतु का दूसरा उदाहरण वाचस्पति मिश्र ने बत- लाया है-'ईश्वर संसार का कर्ता नहीं है क्योंकि उसको शरीर नहीं है'। इस अनुमान में ईश्वर के 'शरीर फा न होना' तब तक हम नहीं मान सकते जब तक यह न मान लिया जाय कि 'वह फर्ता नहीं है।' इससे शरीर का न होना' इसका आश्रय नहीं रहा। नवीन ग्रन्थों में 'आश्रयामिद्ध का लक्षण इस प्रकार दिया है-'जिस हेतु का आश्रय हो ही नहीं अर्थात् जिस चीज़ में हेतु का रहना बतलाया जाय वह चीज़ ही यदि ऐसी हो कि उसका होना सर्वथा असम्भव हो तो वह हेतु आश्रयासिद्ध हुआ । उदाहरण-'अमर आदमी को दो आंखें हैं क्योंकि यह आदमी है' इस अनुमान में 'आदमी का होना' हेतु है। उस हेतु का रहना 'अमर आदमी' में घतलाया जाता है। 'पर अमर आदमी का होना सम्भव ही नहीं है । इससे यह माश्रयासिद्ध हुमा । 'एक लक्षण 'माश्रयासिद' का ऐसा भी किया गया है कि जिसके पक्ष में पक्ष का लक्षण ही न हो। किन्तु यह दोष तो पत्त का होगान कि हेतु का। यदि पक्षप्तम्भव है तो यह दोष पक्ष का हुमा।इससे प्राचीनों का जो उदाहरण है घही ठीक मालूम पड़ता । उन उदाहरणों से 'भानयासिद्ध' का यह लवण माता है कि न्याय प्रकाशा जिस हेतु का जो पच आधार बतलाया जाय वह यदि ऐसा हो कि उसका निश्चय न हुमा हो तो वह हेतु आश्रयासिद्ध होता है। इसी लक्षण से यह 'असिद्ध' का एक अवान्तर भेद हो सकता है। और जिसके पक्ष में पक्ष के लक्षण न हों' ऐसा यदि आश्रयासिद्ध का लक्षण किया जाय तो यह असिद्ध' का श्रवान्तर भेद कैसे होगा ? मसिद्ध का लक्षण सूत्र में कहा है जिसका साबित करना वैसा ही आवश्यक हो जैसा साध्य का । 'अमर मादमी के दो आंखें हैं क्योंकि वह मादमी है' या 'गगनकुसुम में सुगन्ध है-क्योंकि वह कुसुम है'। इन अनुमानों में हेतु ऐसे नहीं हैं जिनको साबित करने की जरूरत हो । आदमी तो भादमी है ही, कुसुम तो कुसुम है ही, फिर ये हेतु 'असिद्ध' किस तरह कहे जा सकते हैं ? परन्तु 'छाया द्रव्य है क्योंकि वह चलती है इसमें ' छाया चलती है इस बात के सावित करने की उतनी ही ज़रुरत है जितनी छाया के द्रव्य होने की। जिस यात के सावित करने के लिये कोई ऐसा हेतु उपस्थित किया जाय कि उस हेतु के बिना भी वह बात सिद्ध समझी जाय तो उस हेतु को 'भन्यथासिद्ध' कहते हैं। जहां ऐसा हो वहां हेतु साध्य का व्याप्य नहीं माना जा सकता। अर्थात् 'जहां जहां हेतु है वहां वहां साध्य है' यह वहां पर नहीं कहा जा सकता । इसी से इसको 'व्याप्यत्वासिद्ध' भी कहा है भर्थात जिस हेतु में साध्य का व्याप्य होना सिद्ध न हो । जैसे- "यह पंडित है क्योंकि काशी में रहता है"। 'जो काशी में रहते हैं वे सय पंडित होते हैं ऐसा यदि पाया जाता तो यह अनुमान ठीक होता। लेकिन ऐसा नहीं पाया जाता । 'काशी में रहना" इसके स्थान पर मेहनत से पढ़ना' इत्यादि दूसरे ही कारण 'पंडित होने के पाए जाते हैं । इससे 'काशी में रहना' यह हेतु पंडित होना' जो साध्य है उस का 'व्याप्य' नहीं हुमा । इसी से वद्द 'व्याप्यत्वासिद्ध हेतु हुमा । स्वरूपासिद्ध से इसका यह भेद है कि स्वरूपासिद्ध हेतु न्याय प्रकाय। ३५ पक्ष में नहीं रहता.। व्याप्यत्वासिद्ध हेतु पक्ष में तो रहता है पर वह साध्य का व्याप्य नहीं रहता। साध्य का व्याप्य न होना दो तरह से हो सकता है। (२) एक तो इस प्रकार से जिसमें साध्य के साथ हेतु का रहना ठीक ठीक सावित न हुमा हो। जैसे 'शब्द क्षणिक है क्योंकि वह सब है'- इस भनुमान में जो सत् है सो क्षणिक है' यह ठीक उकि सावित नहीं है, इससे यह नहीं माना जा सकता । (२) दूसरा वह जो साध्य के साथ तो पाया जाता हो पर जिस रूप से अनुमान में कहा गया हो उस रूप से न उसी हेतु में कुछ और विरोपण गाने पर उस हेतु का साध्य के साथ रहना उसका ठीक माना जा सकता हो । जैसे 'यह पंडित है क्योंकि काशी में रहना है'--'यहां काशी में रहना' 'पंडित होने के साथ पाया तो जाता है-पर केवल 'काशी में रहना' इसका हेतु नहीं है । 'काशी में रहना.और मेहनत से पढ़ना' इसका हेतु कहा जा सकता है। मर्थात् हम ऐसा पाते हैं कि काशी में रह कर जो कोई 'मेहनत से पढ़ता है' वह अवश्य पंडित होता है । इससे 'काशी में रहना ' इसमें 'मेहनत से पढ़ना' ऊपर से विशेषण लगा देने से 'पंडित होना' इस साध्य का व्याप्य हेतु होता है। जिस विशेषण को इस तरह ऊपरसे लगाना पड़ता है उसका नाम है उपाधि'। इसका लक्षण उदयनाचार्य ने इस प्रकार किया है । 'किसी मनुमान में जो साध्य का व्यापक होकर हेतु का अव्यापक हो वही उस अनुमान में उपाधि है' । जैसे 'यह पंडित है क्योंकि 'काशी में रहता है' इस अनुमान में 'मेहनत मे पढ़ना' एक ऐसी बात है जो साध्य का अर्थात् 'पंडित होने का व्यापक है। 'जो जो पंडित है वे सब मेहनत से पढ़ते हैं। पर 'काशी में रहना' जो हेतु बताया गया है-इसका व्यापक 'मेहनत से पढ़ना नहीं है। अर्थात् 'जो काशी में रहता है वह मेहनत से पढ़ता है'- ऐसा नहीं पाया जाता । इससे इस अनुमान में 'मेहनत से पढ़ना' उपाधि हुआ । " न्याय प्रकाश। कालातीत (कालात्ययापदिष्ट बाधित) सूत्र भाष्य और वार्तिक में बतलाया है कि जो हेतु अनुमान में उपन्यस्त होता है वह यदि ऐसा पाया जाय कि जिस समय पर उस हेतु का रहना बतलाया जाता हो, उस समय वह न रहता हो तो वह हेतु 'कालातीत' अर्थात् अपने समय से हटा हुआ कह- लाता है। जैसे शब्द नित्य है क्योंकि वह संयोग से उत्पन्न होता है। इस मनुमान में हम देखते हैं कि जिस समय हम शब्द सुनते हैं उस समय उसका किसी से संयोग नहीं पाते । हेतु के बतलाने का समय कौन सा है जिसके बीत जाने से या जिस वक्त हेतु के न रहने से वह 'कालातीत' होता है-इस बात को विचार कर वाचस्पति मिश्र ने कहा है कि जब किसी बात के विषय में ऐसा सन्देह रहे कि 'यहां ऐसा है या नहीं'–'यहां माग है या नहीं'-तो ऐसी हालत में हेतु' पेश किया जाता है-'यहां ऐसा है क्यों कि हम यहां ऐसा हेतु पाते हैं'-'यहां भाग जरूर है क्यों कि हम यहां धुमा देखते हैं । यदि इस तरह का सन्देह ही न रहे, यदि ऐसा ही है' या 'ऐसा नहीं है। यह ठीक मालूम हो जाय तो किसी हेतु के कहने का काल (समय) नहीं रहता। ऐसे काल में उपन्यस्त हेतु को 'कालातीत' कहते हैं। पर यहां इतना फरक होगा कि यदि ऐसा है मालूम हो तो वहां ऐसा होने के हेतु का बतलना खाली व्यर्थ कहा जा सकता है, अशुद्ध नहीं। पर जहां ऐसा नहीं है' यह ठीक मालुम हो तो ऐसा है' इसका हेतु यदि बतलाया जाय तो अशुद्ध ही होगा । जैस 'आग गरम है' यह हम प्रत्यक्ष जानते हैं। ऐसी हालत में यदि यह अनुमान किया जाय कि 'आग ठंढी है क्योंकि वह चमकती है जैसे पानी'-तो यह हेतु अशुद्ध जम्र होगा । इसी हेतु को 'कालातीत' या 'कालात्ययापदिष्ट' कहने हैं। ऐसा साफ लक्षण वार्तिक में नहीं पाया जाता | इसको वाच- स्पति मिभ ने साफ किया है । ऐसे हेतु का विषय जो चात हमको ठोक मालूम है उसके खिलाफ पड़ता है। इस से नवीनों ने इस का नाम 'वाधित' वा 'याधित विषय' भी रक्खा है। सत्प्रतिपक्ष से इसका फरक यह है। सत्प्रतिपक्ष हेतु वह होता है जिसके निसयत ऐसा पाया जाता है कि उस हेतु से ऐसा यह ठीक न्यायप्रकाश है' सो सावित होता है और एक दूसरा हेतु वैसा ही जबरदस्त पाया जाता है जिससे ऐसा नहीं है'सोभी सिद्ध होता है। दोनों हेतु इसमें बरावर जबरदस्त रहते हैं। इससे ठीक बात क्या है, इसका सन्देह बना ही रहता है। परन्तु 'याधित' हेतु के विषय में ऐसा पाया जाता है कि ऐसा नहीं है। इसके सबूत में उस हेतु से ज्यादा जबरदस्त दूसरा हेतु रहता है । इससे ऐसा नहीं है' सो ठीक ही रहता है और सन्देह नहीं रहता। हेतु के पांचों दोष यों वर्णित किए गए हैं। अनुमान के पांच श्रव- यव होते हैं । अनुमान के जितने दोष होते हैं सब इन्हीं पांचों हेत्वाभासों में अन्तर्गत हैं या इनसे अलग हैं ? अनुमान के पक्ष में दृष्टांत में, साध्य में सभी में कुछ न कुछ दोप हुआ करते हैं । इन कानिरूपण गौतम ने किया या नहीं ? यदि किया तो कहां किया ? यदि नहीं किया तो क्यों नहीं किया ? धर्मोत्तराचार्य ने अपनी न्यायविन्दुटीका में जैसे हेत्वाभासों का वर्णन किया है वैसे ही हांताभास का भी किया है। फिर क्या कारण है कि गौतम के सूत्रों में या भाष्य वार्तिक इत्यादि ग्रन्थों में इनकी चर्च नहीं पाई जाती? जो लोग ऐसी शंका करते हैं घे यह भूल जाते हैं कि अनुमान के कुल दापों को गौतम ने हेत्वाभासों ही में नहीं कह दिया है । इनके अतिरिक्त और भी बहुतेरे अनुमान और तर्क इत्यादि के दोष गौतम ने 'जाति 'उल' निग्रहस्थान' इत्यादि नामों से कहे हैं जिनका निरूपण आगे किया जायगा । फिर 'अन्योन्याश्रय' 'अनवस्था' धकक' इत्यादि कितने एक दोप तर्क के और भी ग्रन्थों में पाए झाते हैं। यद्यपि ये सब तर्क, अनुमान इत्यादि के दोप बहुत गए हैं तथापि याद विचार किया जाय तो अनुमान के जितने भंग है हेतु, पक्ष, साध्य दृष्टांत इत्यादि-इनके जितने दोप होंगे लगभग सभी पांचो हेत्वाभासों ही में अन्तर्गत होंगे। अनुमान के तीन प्रधान वाक्य होते हैं-(१) पक्षता, अर्थात् पन ऐसा हो जिसमें साध्य है या नहीं यह साबित करना बाकी हो (२)पक्ष धर्मता अर्थात् हेतु पक्ष में है इसका निरूपण (३) जहां जहां हेतु है वहां साध्य है, इसका निरूपण, । अव इनमें से पक्ष धर्मता में जो भूल होगी, से पतलाप न्याय प्रकाश वह हेतु को ही बिगाड़ेगी-इससे पक्षधर्मता के दोपःसय हेतुदोप ही होंगे। पक्ष में दो तरह की गलतियां हो सकती है । या तो धैसी कोई चाज़ ही न होगी, अथवा अगर होगी भी तो उसमें हेतु का रहना ही असम्भव होगा। यदि ऐसी चीज़ ही न होतो हेतु का माश्रय नहीं रहेगा मौर हेतु 'आश्रयासिद्ध ही होगा। यह दोप हेतु ही का होगा । अगर पक्ष में हेतु नहीं रहेगा तो यह दोष भी हेतु हो का होगा । यह दोप 'स्वरूपासिद्ध ' हेत्वाभास होगा। इसके सिवाय यदि व्याप्ति में दोष होगा तो हेतुही में व्याभिचार दोप होगा । यह 'सव्यभिचार' हेत्वाभास होगा। आगे चल कर जो निग्रहस्थान, छल, जाति-इत्यादि बतलाय जायंगे-वे सभी किसी न किसी तरह से हेतुदोष ही ठहराए जा सकते हैं । इस तरह अनुमान के कुल दोपों को हेतुदोप ही में अन्तर्गत करने से एक बड़ा उपकार यह होता है कि इनका पकड़ना सुगम हो जाता है । केवल हेतु को अच्छी तरह देखने ही से अनुमान के कुल दोष नज़र पर चढ़ जाते है । अंगरेजी न्याय में किसी अनुमान के विचार में प्रत्येक टर्म के ऊपर विचार करना पड़ता है कि कौन 'टर्म' किस प्रेमिस · में 'Distributed' है। फिर प्रत्येक प्रेमिस पर भी विचार करना पड़ता है। फिर प्रेमिसों के साथ Conclusion कासम्बन्ध इत्यादि अनेक विषय पर अनेक विचार करने पर यह समझ सकते हैं कि भनुमान शुद्ध वा अशुद्ध । संस्कृत न्याय में ऐसा नहीं है। केवल हेतु का विचार कर लेने से, इस में पांचों हेत्वाभास के लक्षण घटते हैं या नहीं- इतना ही ठीक कर लेने से, अनुमान का शुद्ध वा अशुद्ध होना साफ मालूम हो जाता है । ग्रीक न्याय और संस्कृत न्याय में एक और घड़ा भेद यह है कि ग्रीक में 'ऐसा है 'ऐसा नहीं है। इसको दो तरह से परस्पर विरुद्ध रूप से लिखते हैं। इस से 'अन्वयी पाक्य ऐसा है'-और व्यतिरेकी वाक्य ऐसा नहीं है'-इनको पृथक पृथक् मानकर अनेकप्रकार के 'मुड' माने गए हैं जिस से चार 'फिगर के कुल मुड' के क्रम से अनुमान के दोष का विचार बहुत कठिन हो जाता है और किसी प्रकार के दोप का निश्चय जल्दी नहीं हो सकता। खास कर जब पहिले 'फिगर' के रूप में अनुमान को लाना है न्याय प्रकाश। ३१ . होता है तब आयवर्शन (obversion) करना पड़ता है जिससे मक्सर वाश्य का मतलव खप्त हो जाता है । संस्कृत में प्रभाव पद के प्रयोग से फुल यातों को 'ऐसा है' इसी रूप से कर लेने से कुल अनुमान वाक्य इसी 'मन्वयी रूप से कर लिए जा सकते हैं और वाक्यों के लिखने का भी क्रम ऐसा रक्खा गया है कि किसी तरह का कोई मनुमान क्यों न हो सय एक ही कूम से लिखा जा सकता है। इससे हेतुदोप का पकड़ना बहुत सुगमता से होता है प्राक न्याय के मुख्य हेत्वाभास तनि प्रकार के हैं-'अनाडस्ट्रि- व्यूटेड मिड्ल' 'Undistributed middle' जिसमें हेतु' किसी वाक्य में अपने कुल रूप से न कहा गया हो-(2) इलिसिट प्रोसेस आफ़ दी मेजर टर्म' (Illicit Process of the major term)- जिसमें 'साध्य' परामर्शवाक्य में तो कुछ अंश लेफर कहा जाय पर प्रतिक्षा में अपने सम्पूर्ण रूप से कहा जाय (३) 'इलिसिट प्रोसेस आफ दी माइनर टम' ( Illicit Process of the minor term-जिसमें पर्वं परामर्शवाक्य में अंश लेकर कहा जाय और प्रतिज्ञा में कुल रूप से । अनडिस्ट्रिब्यूटेड मिड्ल का उदाहरण है 'कांच सोना नहीं है क्योंकि वह चमकता है-जो चमकता है सो सोना नहीं है- जैसे हीरा'-इसमें किसी वाक्य में भी चमकती हुई चीजें' सय नहीं ली गई हैं। संस्कृत न्याय में यह 'साधारण' हेत्वाभास हुआ। इलिसिट मेजर का उदाहरण- 'जिसको सब लोग मानते हैं वह सत्य है 'ईश्वर को सब लोग नहीं मानते 'इससे ईश्वर सत्य नहीं है- यहां पर 'सत्य' सिद्धान्त में अपने कुल रूप से कहा गया है पर पहिले वाक्यों में केवल अंश रूप से । अर्थात् 'ईश्वर सत्य नहीं है' इसमें कुल सत्य चीज़'अन्तर्गत है-तात्पर्य यह है कि कोई भी सत्य वस्तु ऐसी नहीं है जो ईश्वर हो सकती हो। किन्तु जिसको सबलोग मानते हैं सोसत्य है यहां पर कुल सत्य वस्तु मन्तर्गत नहीं है क्योंकि बहुत सी 'सत्य वस्तु' ऐसी हैं जिनको लोग जानते भी नहीं है। १२ ४० न्याय प्रकाश। संस्कृत न्याय के अनुसार यह व्याप्यत्वासिद्ध' हेत्वाभास हुमा-1 इलिसिट माइनर का उदाहरण 'सव कितावों में अशुद्धियां होती हैं 'सव कितावें आदमी की बनाई होती हैं 'इससे जितनी चीजें आदमी की बनाई है वे अशुद्ध हैं। यहां पर सिद्धान्त में 'मनुष्य की बनाई'कुल चीजें अन्तर्गत है। पर पहिले वाफ्यों में ऐसी कुल चीजें अन्तर्गत नहीं हैं। संस्कृत न्याय में यह 'असिद्ध' हेत्वाभास हुआ । इसी तरह जितनी 'फलेसी' (Tallacies) ग्रीकन्याय में मानी गई हैं वे ऊपर कहे हुए हेत्वाभासों में अन्तर्गत है। एक चीज़ को देखकर दूसरी चीज़ का जो ज्ञान होता है उसे अनुमान कहा है। इससे कुछ लोगों ने प्रत्यक्ष को भी एक प्रकार का अनुमान बतलाया है । जैसे गौतम सूत्र २।११३० में कहा है कि जैसे धुआं देख कर आग के ज्ञान का अनुमान होता है वैसे ही जब हमको किसी पेड़ का प्रत्यक्ष शान होता है तब समूचे पेड़ के देखने के पहिले हमको पेड़ के हिस्सों का ज्ञान होता है-अर्थात् पेड़ की जड़, उसकी शाखाओं आदि को देख कर फिर समन पेड का ज्ञान होता है। इस लिये यह शान भी अनुमान ही हुआ । इसका उत्तर ३१ सूत्र में कहा है कि यदि यह मान भी लिया जाय तो भी पेड़ के हिस्सों का जो ज्ञान होता है वह अनुमान नहीं हो सकता। वही प्रत्यक्ष ज्ञान होगा । कुछ ऐसा नियम तो है ही नहीं कि समूची चीज़ के ज्ञान ही को प्रत्यक्ष कहें। जितनी. जिस चाल की, जिस तरह की, चीज़ों का ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा हो वे सब प्रत्यक्ष ही हैं। उपमान-तीसरा प्रमाण । प्रसिद्ध साधात साध्यसाधनमुपमानम्” ऐसा लक्षण उपमान का गौतम सूत्र में किया है। किसी जानी हुई चीज़ के सादृश्य से दूसरी चीज़ का ज्ञान जिस प्रमाण से होता है उसको उपमान प्रमाण कहते हैं। जैसे घर में देखी हुई गाय के सादृश्य से न्याय प्रकाश। किसी दूसरे जानवर का ज्ञान होता है । जंगल में जाने वाले से हमने सुना है कि गाय के सदृश जा जानवर होता है उसको गवय' कहते हैं। फिर जंगल में जाकर हमने एक जानवर देखा और यह भी देखा कि यह जानवर गाय के सहश है। इस पर हमको उस आदमी के वाक्य का स्मरण हुमा कि जैसी गाय है वैसा ही गवय होता है, तब हम जान लेते हैं कि यही जानवर गवय है। यह ज्ञान जिससे होता है उसको 'उपमान प्रमाण-'उपमिति ज्ञान का करण' कहते हैं। उपमिति ज्ञान स्वरूप क्या है ? नैयायिकों का मत है कि जानवर का नाम ऐसा है' 'इसी जानवर का नाम गवय है'-यही उस ज्ञान का रूप है। किसी चीज़ का उसके नाम के साथ सम्बन्ध उपमिति ज्ञान का विषय है । भाष्य में कहा है 'अस्य गवयशब्दः संशा' इतिसंशासंझिसम्बन्धम्प्रतिपद्यते । बार्तिक में भी कहा है। 'समाख्यासम्बन्ध प्रतिपत्तिपमानार्थः' । इसका वर्णन करते हुए भाष्यकार और वार्तिककार ने कहा है-'किसी विश्वासी पुरुप के मुँह से सुना कि जैसी गऊ होती है वैसा ही गवय होता है। फिर जिस जानवर को गऊ के सदृश देखते हैं उस समय पहले की सुनी हुई बात का स्मरण हाता है । फिर यह ज्ञान होता है कि इसी जानवर का नाम गवय है।' कुछ दार्शनिकों का मत है कि इस शान में प्रत्यक्ष और शब्द शान को छोड़ कर और कोई तीसरा शान नहीं है जिसको हम उपमान कह । 'गऊ के सदृश गवय होता है, यह शान 'शाब्द' या आगम शान हुमा क्योंकि यह विश्वासपात्र मादमी के मुंह से सुने हुए शब्द से उत्पन्न हुआ है । फिर यह जानवर जिसको हम देखते हैं वह गाय के सदृश है' यह ज्ञान प्रत्यक्ष ही हुआ।क्योंकि इस जानवर फो देखने ही से ऐसा मान होता है और 'गाय के सदृश यह है' सो भी भांख ही से देखा जाता है। इन दोनों ज्ञानों को छोड़ कर और कुछ इस शान में नहीं है। इससे प्रत्यक्ष और शान्द ज्ञान को छोड़ कर उपमान में और कुछ नया ज्ञान नहीं है। इसका उत्तर वार्तिककार यह देते हैं कि इतनी दूर तक जो मापने कहा सो ठीक है । येही दो ज्ञान होते हैं। परंतु इनके मम- કર न्याय प्रकाशन न्तर एक तीसरा ज्ञान यह होता है कि 'इसी जानवर का नाम गवय है'। यह ज्ञान न तो प्रत्यक्ष ही है न अनुमान और नशाब्द । और इसी ज्ञान को उपमान ज्ञान कहा है ऊपर की शंका बौदों की है। वैशेपिक भी उपमान प्रमाण को अलग नहीं स्वीकार करते । इनके मत से 'उपमान' एक प्रकार का शाब्दज्ञान है (प्रशस्तपादभाष्य पृ० २२० ) । कई दार्शनिकों ने उपमान को अनुमान ही बतलाया है । गौतम ने २२११४४-16 में इसका समाधान किया है। ४८ सूत्र में शंका की गई है कि जैसे देखे हुए धुएं से बिना देखी हुई भाग का अनुमान होता है, वैसेही देखी हुई गाय से विना देखे गवय का ज्ञान भी अनुमान ही होगा। इस का उत्तर ४५.४६ सूत्र में दिया गया है कि गवय का ज्ञान उपमिति ज्ञान नहीं है । 'इसी जानवर का नाम गवय है' यह ज्ञान उपमिति शान है और यह ज्ञान किसी तरह अनुमान नहीं कहा जा सकता। नवनि ग्रन्थकारों ने उपमान को इस तरह अनुमान में अन्तर्गत किया है कि जब हमको 'इसी जानवर का नाम गवय है' ऐसा ज्ञान होता है तो ऐसा अनुमान होता है कि 'इसी जानवर का नाम गवय है क्योंकि यह गाय के सहश है-जो जो जानवर गाय के सहश होते है उनका नाम गवय होता है। इसका समाधान यह है कि 'जो जो जानवर गाय के सदृश हैं वे सब गवय हैं' यह वात मन में नहीं माती । खाली इतनी ही बात मनमें आती है कि हमने अच्छे आदमी के मुंह से सुना था कि गषय जानवर गाय के सदृश होता है। एक और शंका उपमान के विरुद्ध बहुत प्राचीन समय से यह भी की जाती है-" दो चीज़ के सादृश्य के ज्ञान से उपमिति ज्ञान उत्पन्न होता है ऐसा कहा गया है। परंतु सादृश्य तीन तरह का होता है १) एक दम अत्यन्त सादृश्य, जैसे दोगऊ के वीच का सादृश्य (२) कई अंश में साहश्य, जैसे गाय और भैंस का साहश्य और (३) किसी एक अंश में साहश्य, जैसे पर्वत और कंकड़ में। अब इन में से किसी तरह के सादृश्य के ज्ञान से कुछ भी ज्ञान नहीं हो सकता । जैसी गाय है वैसी गाय होती है' इस ज्ञान से किसी प्रकार का कुछ भी मार ज्ञान नहीं हो सकता। फिर जैसी गाय है न्याय प्रकाशा . - . वैसी ही भैंस है' इससे भी किसी तरह का ज्ञान नहीं हो सकता। और 'जैसा पर्वत है वैसा कंकड़ है' इससे भी किसी तरह का ज्ञान नहीं होता। फिर साहश्य के ज्ञान से उपमिति ज्ञान होता है, यह कहना विलकुल अनर्गल है"। यह शंका गौतम सूत्र २१४२ में उठाई गई है और ४३ सूत्र में इसका समाधान किया गया है। अत्यन्त साहश्य, कई अंश केसादृश्य वा एक ही अंश के साहश्य के शान से उपमिति ज्ञान होता है, ऐसा उपमान के लक्षण में नहीं कहा है । जो सादृश्य प्रसिद्ध है, अच्छी तरह जाना हुआ है, उसी साहश्य के ज्ञान से उपमिति ज्ञान होता है। कितना ही अत्यन्त सादृश्य क्यों न हो जब तक वह अच्छी तरह जाना न गया हो तब तक वह उपमिति ज्ञान को नहीं पैदा कर सकता । और जो सादृश्य अच्छी तरह जाना गया है वह अत्यन्त हो या कई अंशों में हो या किसी एक ही अंश में क्यों न हो, उस सादृश्य का ज्ञान अवश्य और शानों को उत्पन्न कर सकता है। किस तरह के सादृश्य को मैं जानता हूं सो प्रकरण से जाना जाता है । शंका में जो साहश्य बतलाए गए हैं ये भी अवसर अवसर पर अवश्य दूसरे शानों को उत्पन्न करते हैं । जैसे जैसी यह गाय है वैसी यही गाय है' यह जो अत्यन्त साहश्य है उसके जानने से हमें यह ज्ञान होता है कि इस गाय के ऐसी गाय दूसरी नहीं है। जैसे 'रामरावणयोर्युद्धम् रामरावणयोरिव' फिर जैसा भंसा होता है वैसा ही यह बैल है' यह जो कई अंश का साहश्य है उसके ज्ञान से 'यह बैल बड़ा बलवान है ऐसा ज्ञान उत्पन्न होता है। 'जैसा पवंत होता है वैसा कंकड़े इस एक अंश के सादृश्य के जानने से हम यह जानते हैं कि जैसे पर्वत सत् पदार्थ है वैसा कंकड़ भी है। इससे प्रसिद्ध जो सादृश्य उसके ज्ञान से उत्पन्न ज्ञान उपमिति ज्ञान है' यह जो उपमान का लक्षण है सो ठीक है। इसमें कुछ शंका नहीं है। उपमिति ज्ञान के उत्पन्न होने के पहिले दो ज्ञान आवश्यक होते हैं जैसी गाय है वैसा ही गवय होता है' यह एक, और दूसरा 'यह जानवर जिसे मैं देखता हूं गाय के सहश है'। उपमिति ज्ञान के करणा-साक्षात् कारण-को उपमान कहते हैं, तो न्याय प्रकारा। . अब यह सन्देह उठता है कि इन दोनों छानों में से कौन सा ज्ञान उपमिति शान का साक्षात् कारण है और कौन सा केवल सहकारी है। इस में कुछ सन्देह नहीं कि 'यह जानवर गाय के सदृश है' यही ज्ञान उपमिति ज्ञान का मुख्य-साक्षातू-कारण है और जैसी गाय होती है वैसा ही गवय हाता है' इस शान का स्मरण सहकारी है। कुछ लोग कहते हैं तर्फसंग्रह फे 'नोट' में पृ० ३३३)कि प्राचीन नैयायिकों के मत से 'जैसी गाय वैसा ही गवय' इसका स्मरण ही उपमिति ज्ञान का फरण है और नवीनों के मत से इसका एक दम उलटा है । पर ऐसा प्राचीन नैयायिकों का मत है, इसका प्रमाण कहीं नहीं मिलता । भाप्य में कहा है-'यदा खण्वयं गवा समानधर्म प्रतिपद्यते तदा प्रत्यक्षतस्तम प्रतिपद्यते...गवा समान धर्ममयमुपलभमानोऽस्य गवयशब्दः संज्ञा इतिसंशासंशिसन्यन्धं प्रतिपद्यते पृ० २१) । वार्तिक में (पृ.६.) मागमाहित-संस्का. स्मृत्यपेक्षं सारूप्यज्ञानम् उपमानम् ' । तात्पर्यटीका में बाच स्पति मिश्र ने कहा है-पिंडस्यहि गवय शब्द याच्यता पुरुपोऽति देशा. वाक्य स्मरणसहकारिणः प्रत्यक्षात गवयगतात् गोसादृश्यात प्रजानन् तेन प्रज्ञाप्यते इति प्रमाणव्यापारः (पृ. १३२ )। इन तीनों वाक्यों से स्पष्ट है कि सादृश्य का ज्ञान हीं साक्षात् कारण है और वाक्य का स्मरण सहकारी है। फिर किस प्राचीन नैयायिक के मत से वाक्यस्मरण साक्षात् करण और सादृश्य ज्ञान सहकारी माना गया है सो नहीं समझ पड़ता। शब्द-चौथा प्रमाण । गौतम ने कहा है ( सून १।१ . ७) प्राप्तोपदेशः शब्दः । अर्थात् प्राप्त पुरुष के उपदेश को ' शब्द ' प्रमाण कहते हैं। जितनी चीजें हैं-इन्द्रियों से सम्बद्ध या इन्द्रियों से परोक्ष-उनका झान जब किसी विश्वस्त पुरुप के वाक्यों से होता है तो इन वाक्यों को 'शब्द' वा 'श्रागम' कहते हैं । और ऐसे ज्ञान को 'शान्द ज्ञान' कहते हैं। 'माप्त' पुरुष वह है जिसने धर्म की और सब पदार्थों की असली. यत को अच्छी तरह से जान लिया हो। जितनी चीजें है हित,आहित, रखने के लायक-फेंकने के लायक-उन सबों का मसल रूप जिसने - .
न्याय प्रकाश। निस्सन्देह रूपसे जान लिया हो, जो सव जीवों पर दया रखता हो और असल यांत के कहने की इच्छा रखता हो वही 'आप्त' पुरुष है। इस लक्षण से यह साफ है कि आप्त'केवल वेदही या ऋपि ही या मार्यदेश वासी ही नहीं कहलाते परंतु पि हो-या आर्यावर्त निवासी हो या देशान्तर वासी हो जो कोई सब चीजों को अच्छी तरह जानता हो वही प्राप्त है । यह वात भाष्य में साफ कह दी गई है। किसी आदमी को हम मनमाने 'आप्त' नहीं कह सकते । जिसके विषय में यह पाया जाय कि यह बराबर असली बातों को फ़हता है वही आदमी 'आप्त' माना जा सकता है। भाष्य में इतना और भी कहा है कि ऐसे आदमी के भी सभी वाक्य 'आप्तोप देश नहीं कहे जाते । किन्तु जितने वाक्यों को वह इस इच्छा से कहे कि लोगों को इन चीजों की असलीयत समझ में आ जाय वेही चाक्य 'आप्तोपदेश' कहे जायंगे । वेद का भी कर्ता नैयायिक ईश्वर को मानते हैं । इश्वर सब चीज जानता है-उसमें वैसाही कहने की इच्छा का भी अनुमान किया जाता है-इस से वेद भी प्राप्त का उपदेश है । ईश्वर मय से बढ़ कर प्राप्त है क्योंकि झूठ कहने के कारण सामान्य मनुष्यों में जितने होते हैं वे ईश्वर में कभी नहीं हो सकते । इससे ईश्वर जो कुछ कहेगा सब सच ही कहेगा, इसमें सन्देह नहीं। आप्तोपदेश' यदि शब्द का लक्षण हुआ तो यह अनुमान या प्रत्यक्ष ही में अन्तगर्त होगा-ऐसी शंका वार्तिक (पृ०६३) और तात्पर्य (पृ. १६८) में उठाई गई है माप्तोपदेश, तात्पर्य है ? यदि इसका मतलब यह है कि ऐसे लोगों का उपदेश जिन का वचन मिथ्या नहीं है तो यह यात अनुमान ही से जानी जा सकती है । अर्थात् प्राप्त पुरुप ऐसा विश्वसनीय है फेवल इससे अर्थ का ज्ञान होना असम्भव है । 'यह कहने वाला विश्वसनीय है। केवल इससे वह जिस बात को कहता है उसका ज्ञान नहीं हो सकता | ऐसा ज्ञान केवल किसी प्रकार अनुमान करने से मालूम हो सकता है। अर्थात् अच्छी . . " से क्या न्याय प्रकाश। - तरह जानी हुई वात को जो कहने की इच्छा रखता है और इस इच्छा के अनुसार उसी तरह उस बात को कहता है यह बात जब हम जानते है-तव किसी ऐसे आदमी की बात को सुन कर हम ऐसा अनुमान करते हैं। यह आदमी बोलता है इससे इस को बात कहने की इच्छा है-इस कहने की इच्छा से कही हुई बात का ज्ञान इसको है'। फिर इस ज्ञान से जिस बात का या जिस चीज़ का वह ज्ञान है उसका अनुमान करते है । इस तरह कही हुई चीज अनुमान से जानी गई, यह मानना पड़ेगा। इस आशंका से बचने के अभिप्राय मे यदि यह कहा जाय कि 'आप्तोपदेश' अर्थात् 'शब्द प्रमाण वह है जिस शब्द से किसी चीज को जान कर फिर उस चीज को वैसी ही पावें, तो इसमें यह दोप पड़ेगा कि यहचीज ठीक वैसी ही है जैसी इन शब्दों से कही गई'-यह ज्ञान प्रत्यक्ष ही होगा। इस शंका के उत्तर में वार्तिककार कहते है कि 'आप्तोपदेश शब्द, का तात्पर्य यह नहीं है कि 'शब्द ऐसा होना चाहिए जिसकी सत्यता वोलने वाले की विश्वसनीयता से सिद्ध हा, (जिस हालत में यह शाब्द ज्ञान अनुमान हो जाता है)-न उस से यही तात्पर्य है कि ' शब्द वह है जिससे कही हुई चीज़ ठीक वैसी ही पाई जाय' (जिस हालत में यह प्रत्यक्ष हो जाता है ।। 'उपदेश' पद का अर्थ यहां है 'शब्द'-जिससे कोई चीज़ कही जाय, वतलाई जाय-वह चीज़ चाहे इष्ट हो वा मदृष्ट । विश्वस्त पुरुष के वाक्य को सुन कर सुनने वाले के मन में ऐसा ज्ञान होता है । इसने जो शन्द कहे हैं उनसे उन शब्दों के अर्थ के स्मरण के अनन्तर मुझे उन अर्थो का ज्ञान हो रहा है यही ज्ञान 'शब्द ज्ञान' कहलाता है और जिन शब्दों से यह ज्ञान होता है उसको 'शब्द प्रमाण', 'मागम' इत्यादि पदों से कहते है। 'उपदेश' वह है जिससे अथवा जिसके द्वारा कोई बात कही जाय! 'ऐसा करो' ऐसा जो वाक्य कहे उसी को मामूली व्यवहार में ' उपदेश' कहते हैं । पर यहां पर ऐसा नहीं है । ऐसा हो नो वेद में या लौकिक व्यवहार में जिन वाक्यों में चीजों के वर्णन . " - न्यायप्रकारा। पाए जाते हैं 'मोप्तोपदेश नहीं कहला सकते । इससे वाय, का ज्ञान' भोर पाक्यार्थ का ज्ञान' दोनों को 'उपदेश' कह सकते हैं । माप्त पुरुष के.कहे हुए वाक्य का ज्ञान अथवा उस वाक्य के अर्थ का शान-शब्द प्रमाण-शब्दज्ञान का कारण जय वाक्यशान को प्रमाण-कारण मानेंगे तो अर्थशान उसका फल होगा । और जब अर्थशान प्रमाण होगा तो यतलाई हुई चीज़ का ग्रहण या त्याग ज्ञान का फल होगा। प्राप्तापेदश दो प्रकार का होता है। इष्टार्थ और महार्य (गौतम सूत्र २।१।)। प्रत्यक्ष जानी हुई बातों को जो बतलाये उसे 'दृष्टार्थ' कहते हैं और प्रत्यक्ष जानने के योग्य जो चीज़ नहीं है 'जिनका शान अनुमान से हो सकता है, ऐसी चीज़ों को जो वाक्य बतलावे उसे 'महष्टार्थ' कहते हैं। जैसे स्वर्ग याग म- पूर्व इत्यादि वस्तु है इस बात को हम खाली अनुमान से जान सकते हैं। ये चीजें ज़रूर होंगी क्योंकि ये वेद में कही पाई जाती हैं मार वेद प्राप्त ईश्वर का यनाया है । दृष्टार्थ मामूखी भादमियों का भी हो सकता है, पर अहवार्थ वाक्य यथार्थ केवल ईश्वर काही । ऐसा अर्थ 'दृष्टार्थ 'महष्टार्थ' का भाष्यकार ने किया है। वार्तिक में कहा है कि दृष्टार्थ शब्द यह है जिसका वक्ता कही हुई चीज़ को देख कर दूसरों को अल्पक्ष जानकर उनके उपकारार्थ कहता है। और 'महा' पब्द वह है जिसका वक्ता कही हुई चीज़ को देख कर नहीं किन्तु अनुमान या और प्रमाणों से जान कर कहता इस व्यास्या से मामूली भादमी के भी शब्द 'टाय''मष्यार्थ दोनों तरह के हो सकते हैं। माप्त पुरुष का उपदेश-विश्वसनीय पुरुष के कहे हुए वाक्य को शब्द प्रमाण' कहा है। आप्त क्या है सो ऊपर कह पाए है। मब 'वाफ्य' क्या है सो विचार करते हैं। कई पदों के मिलने से वाक्य बनता है। पर कोई किसी तरह के पदों के इकट्ठा होने ही से धाक्य नई होता। वाक्य का वर्णन वार्तिक (पृ. १७ ) में है-'जहां पर का पद हैं और वे ऐसे सम्बद्ध हैं कि जब उनका उच्चारण होता है तय मन्त. के पद का मर्प मालूम होने पर उसके साथ ही है . - १३ न्याय प्रकाश। का या - तरह जानी हुई यात को जो कहने की इच्छा रखता है और इस इच्छा के अनुसार उसी तरह उस बात को कहता है यह बात जब हम जानते हैं-तब फिसी ऐसे आदमी की बात को सुन कर हम ऐसा अनुमान करते हैं। यह आदमी बोलता है इससे इस फो बात कहने की इच्छा है-इस कहने की इच्छा से कही हुई घात का ज्ञान इसको है'। फिर इस ज्ञान से जिस बात जिस चीज़ का वह ज्ञान है उसका अनुमान करते हैं । इस तरह कही हुई चीज अनुमान से जानी गई, यह मानना पड़ेगा। इस आशंका से बचने के अभिप्राय मे यदि यह कहा जाय कि 'माप्तोपदेश' अर्थात् 'शब्द प्रमाण वह है जिस शब्द से किसी चीज को जान कर फिर उस चीज को वैसी ही पात्रं, तो इसमें यह दोप पड़ेगा कि यहचीज ठीक वैसी ही है जैसी इन शब्दों से कही गई'-यह ज्ञान प्रत्यक्ष ही होगा। इस शंका के उत्तर में वार्तिककार कहते हैं कि 'प्राप्तोपदेश' शब्द, का तात्पर्य यह नहीं है कि 'शब्द ऐसा होना चाहिए जिसकी सत्यता बोलने वाले की विश्वसनीयता से सिद्ध हो, ( जिस हालत में यह शाब्द ज्ञान अनुमान हो जाता है)-न उस से यही तात्पर्य है कि ' शब्द वह है जिससे कही हुई चीज़ ठीक वैसी ही पाई जाय' (जिस हालत में यह प्रत्यक्ष हो जाता है। • उपदेश' पद का अर्थ यहां है 'शब्द' जिससे कोई चीज़ कही जाय, वतलाई जाय-वह चीज़ चाहे दृष्ट हो वा महष्ट । विश्वस्त पुरुष के वाक्य को सुन कर सुनने वाले के मन में ऐसा ज्ञान होता है । इसने जो शन्द कहे है उनसे उन शब्दों के अर्थ के स्मरण के अनन्तर मुझे उन अर्थो का ज्ञान हो रहा है यही ज्ञान शब्द ज्ञान' कहलाता है और जिन शब्दों से यह ज्ञान होता है उसको 'शब्द प्रमाण', 'आगम' इत्यादि पदों से कहते हैं। 'उपदेश' वह है जिससे अथवा जिसके द्वारा कोई बात कही जाय। 'ऐसा करो' ऐसा जो वाक्य कहे उसी को मामूली व्यवहार में उपदेश' कहते हैं । पर यहां पर ऐसा नहीं है । ऐसा हो तो वेद में या लौकिक व्यवहार में जिन वाक्यों में चीजों के वर्णन न्यायप्रकारा। . । चोला .. . पाए जाते हैं वे'माप्तोपदेश' नहीं कहला सकते। इससे वाक्य काभान' और . पायार्थ का ज्ञान' दोनों को 'उपदेश' मह सकते हैं। आप्त पुरुष के कहे हुए वाक्य का शान मथया उस वाक्य के अर्थ का ज्ञान-शब्द प्रमाण-शब्दज्ञान का कारण जय वाक्यज्ञान को प्रमाण-कारण मानेंगे तो मर्थज्ञान उसका फल होगा । और जव अर्थज्ञान प्रमाण होगा तो घतलाई मेक्षिा हुई चीज़ का ग्रहण या त्याग ज्ञान का फल होगा। आप्तापेदश दो प्रकार का होता है। यार्थ और महष्टार्थ कान से 1 (गौतम सूत्र २११) प्रत्यक्ष जानी हुई बातों को जो पतलावे अनिवारपी उसे 'दृष्टाफ कहते हैं और प्रत्यक्ष जानने के योग्य जो चीज़ नहीं बाद प्रास् है ' जिनका शान अनुमान से हो सकता है, ऐसी चीज़ों को रिम जो वाक्य यतलावे उसे 'अष्टार्थ' कहते हैं। जैसे स्वर्ग यागम- इबोज ठीक ने पूर्व इत्यादि वस्तु हैं इस बात को हम खाली अनुमान से जान सकते हैं। ये चीजें ज़रूर होंगी क्योंकि ये वेद में कही पाई जाती र म काठोपर हैं और वेद प्राप्त ईश्वर का बनाया है । दृष्टार्थ मामूली भादमियों का भी हो सकता है, पर अहष्टार्थ वाक्य यथार्थ केवल ईश्वर काही। ऐसा अर्थ 'टा 'महष्टार्थ' का भाप्यकारने किया है। वार्तिक में कहा है फि दृष्टार्थ शब्द वह है जिसका वक्ता कही हुई चीज़ को यहां चोर देख कर दूसरों को अल्पश जानकर उनके उपकारार्थ कहता है। और 'अहयार्थ' शब्द वह है जिसका वक्ता कही हुई चीज़ को देख कर नहीं किन्तु अनुमान या और प्रमाणों से जान कर कहता है। इस च्याल्या से मामूली मादमी के भी शब्द 'इष्टाप मष्टार्थ दोनों तरह के हो सकते हैं। माप्त पुरुष का उपदेश-विश्वसनीय पुरुष के कहे हुए वाक्य को ‘शन्न प्रमाण' कहा है। आप्त क्या है सो ऊपर कह पाए हैं।मय 'वाक्य ' क्या है सो विचार करते हैं। कई पदों के मिलने से वाक्य घनता है । पर कोई किसी तरह के पदों के इकट्ठा होने हो से धाक्य नहीं होता। वाक्य का वर्णन वार्तिक (पृ. १७) में है-'जहां पर कई पद है और वे ऐसे सम्बद्ध है कि जब उनका उच्चारण होता है तय, अन्त के पद का अर्थ मालूम होने पर उसके साथ ही १३ ऐसा होना का हो जाता है। . यच हो जाता है। A •- . .. होम घामन में 'उन शब्दों के . से यह ज्ञान पदों से कहते हैं। कोई बात कही . : मामूली व्यवहार है।पेसा हो में चीजों के पर न्यायप्रकाश। ' . . . पहले कहे हुए पदों के अर्थ का स्मरण होता है-फिर सब पदों के मर्थ का स्मरण एक साथ होकर सभी का मिला हुआ एक अर्थ भासित होता है-ऐसा ज्ञान जिन पदों से होता है उन्हीं पदों के समूह को 'वाक्य' कहते है । जैसे 'किताब पढ़ो' इस में जब पढ़ो' पद का अर्थ मालूम हुआ तब किताव' पद के अर्थ का भी स्मरण होता है। फिर 'किताब' और 'पढ़ो' इन दोनों पदों के अर्थ का साथ साथ मिला हुआ ऐसा एक अर्थ भासित होता है कि 'किताव का पढ़ना मुझसे कहा जाता है' यही किताब ' पद के मर्थ का पढ़ो' पद के अर्थ से विशिष्ट-मिला हुमा-शान हुआ। इस विशिष्ट ज्ञान का करण 'किनाव'-' पढ़ो' इन दोनों पद का समूह है-इससे यह वाक्य हुआ। जितने पदों का समूह पाक्य कहलाता है वे पद ऐसे होने चाहिये जिससे उन में परस्पर सम्बन्ध रहे । 'हाथी, घोड़ा, बैल, पत्थर, कंकड़' ये पद भी जब साथ उच्चरित होंगे तो सम्भव है कि 'कंकड़' पद के अर्थ के शान के बाद 'हाथी' इत्यादि पदों के अर्थ का भी स्मरण हो । 'हाथी' पद के अर्थ के साथ मिला हुमा 'कंकड़' पद के अर्थ का ज्ञान होगा इसमें कोई भी कारण नहीं है । यदि 'हाथी' और 'कंफर' पद के अर्थों में कोई सम्बन्ध ऐसा होता जिसके द्वारा एक के शान से दूसरे का स्मरण अवश्य होता तभी दोनों का मिला हुमा ज्ञान हो सकता। जो सम्बन्ध पदों में आवश्यक है वे तीन प्रकार के माने गए है-आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि (तात्पर्यटीका पृ०३८)। इसी से नवीन नैयायिकों ने वाक्य का वर्णन यों किया है-'पर. स्परमाकांक्षा योग्यता सन्निधि इन तीन सम्बन्धों को रखते हुए पदों फे समूहाको वाक्य कहते हैं (तर्कभापा पृ. ६-६-७०)। जय तक ये तीनों सम्बन्ध नहीं हों तव तक किसी पदसमूह से किसी एक बात का ज्ञान नहीं हो सकता । 'किताब पढ़ो' यहां इन दोनों पदों में ये तीनों सम्बन्ध हैं । इसी से 'किताव पढ़ने के लिये मुझसे कहा जाता है', इस रक वात का ज्ञान इन दोनों पदों के सुनने से होता है । 'हाथी, घोड़ा, कंकड़, पत्थर' इन पदों में ये तीनों सम्बन्ध नहीं हैं। इससे इन पदों से किसी एक बात का ज्ञान नहीं होता। . .
. - । न्यायप्रकाश। जब दो-पदों में ऐसा सम्बन्ध हो कि एक के विना दूसरे में कोई कमी पाई जाय-जिससे यह किसी सम्बद्ध यात को न कह सके-तो इसी सम्बन्ध का नाम 'आकांक्षा' है। जैसे फित्ताव पढ़ो' यहां इन पदों का ऐसा सम्बन्ध है । क्योंकि जब तक 'पढ़ो' पद नहीं कहा जाता तब तक यह नहीं मालूम हो सकता कि किताय को क्या फरें-'किताब' पद से फिसीसम्बद्ध अर्थ का ज्ञान नहीं होता। इसी तरह जब तक 'किताब' पद न कहें तब तक 'पदो' पद से किसी सम्बन्ध का ज्ञान नहीं होता- क्या पढ़ा जाय, यह नहीं मालूम होता। इससे इन दोनों पदों में कोई ऐसी कमी है जो कि एक की दूसरे ही से पूरी हो सकती है। 'किताब' का क्या करना है, सो किसी क्रिया पद ही से मालूम हो सकता है। इसी तरह क्या पढ़ा जाय सो किसी कर्मकारक पद से ही मालूम हो सकता है । इससे इन दोनों में परस्पर 'आकांक्षा' है.। हाथी-घोड़ा-कंकड़-पत्थर' इसमें 'हाथी' और 'घोड़ा' इन पदों के बीच कोई ऐसा सम्बन्ध नहीं है-हाथी को क्या करना है सो 'घोड़ा' पद से नहीं मालूम हो सकता । इसी तरह और.पदों में भी समझना चाहिए । इसी से इन पदों में 'आकांक्षा नहीं है। दुसरा सम्बन्ध है 'योग्यता' । दोनों पद ऐसे होने चाहिये जिससे एक दूसरे के अर्थ में किसी तरह का विरोध न हो । अर्थात् दोनों के अर्थ जब मिलाए जायं तो कोई असम्भव वात नहीं कहा जाय । दोनों मिलकर ऐसी बात कहैं जो कि हो सकती हो । जैसे पानी ठंढा है' यहां पर पानी पद का ऐसा सम्बन्ध — ठंढा' पद से है । पर 'माग शीतल है' यहां पर माग' पद का अर्थ जय शीतल' पद के अर्थ से मिलाया जाता है तो.' माग का शीतल होना' ऐसा मिला हुआ अर्थ कहा जाता है पर हम जानते हैं कि ऐसा होना सम्भव नहीं है। इससे 'आग' और 'शीतल':इन दोनों पदों में योग्यता सम्बन्ध नहीं हो सकता है। नैयायिकों के मत से 'माग शीतल है' यह वाक्प असम्भव अर्थ को कहता है ऐसा नहीं-इस वाक्य का कोई अर्थ ही नहीं हो सकता है । पर यहां यह विचारने की रात है कि जब तक 'यांग शीतल है इस वाक्य से कोई मर्य नहीं मालूम होगा तब तक इन पड़ों से विशिष्ट . .
न्यायप्रकाश। अर्थ जो कहा गया सो असम्भव है ऐसा कैसे जान पड़ेगा ? तीसरा सम्बन्ध है 'सनिधि जिन दो पदों से कोई एक बात कही जाय उनका उच्चारण साथ साथ होना चाहिये। ऐसा नहीं कि 'किताब' पद का उच्चारण सवेरे किया जाय और 'पदो पद का उच्चारण शाम को । ऐसे मलग अलग उच्चारण करने से दोनों के मर्थ का साथ मिला हुमा स्मरण नहीं हो सकता भौर इसी से मिले हुए मर्थ को ज्ञान भी नहीं हो सकता है। यदि दोनों पद लगातार कहे जांय तो दोनों के अर्थों का मिला हुमा शान यह होता है कि 'किताव का पढ़ना' कहा जाता है । वाक्य दो प्रकार के होते हैं-वैदिक और कौकिक । नैयायिकों के मत से समस्त वेद ईश्वर का रचा हुमा है और ईश्वर सर्दा 'माप्त', विश्वासपात्र, सब चीजों की असलीयत जानने वाला है। झूठ कहने की इच्छा उसको कभी क्यों होगी। इससे उसके कहे हुए जितने वाक्य है सभी सत्य और विश्वसनीय है । लौकिक वाक्यों में ऐसा नहीं है । वे तभी सत्य माने जा सकेंगे जब उनका वक्ता प्रामाणिक समझा जायगा । जब तक किसी मादमी को हम नहीं जानते कि यह सच्चा है या झूठा-जिस बात को यह कह रहा है उसे जान कर कहता है या विना जाने ही कुछ पक रहा है- तब तक उसके वाक्य में मेरा विश्वास नहीं हो सकता। वेदवाक्य सर्वथा विश्वसनीय है, ऐसा नैयायिकों का सिद्धान्त है । गौतमसूत्र २११५७ में वेद के प्रामाण्य के विषय में शंका की गई है। वेद प्रमाण नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें कई सरासर झूठी यातें पाई जाती हैं, कई परस्पर विरुद्ध पाई जाती हैं और कई जगह यातें दोबारा कही गई है । 'पुत्रकामः पुरेष्टया यजेत' 'जिसको पुत्र की इच्छा हो वह पुत्रेष्टि करे' अर्थात् पुत्रेष्टि यज्ञ करने से पुत्र होता है ऐसा वाक्य वेद में पाया जाता है। परन्तु हम देखते हैं कि कई आदमी पुष्टि करते हैं पर उनको पुत्र नहीं होता । इससे सिद्ध दुमा कि यह वेदवाक्य झूठ है । इस वाक्य को झूठ पाकर हम यह भी मनुमान कर सकते हैं कि जैसे पुत्रे. प्टि से पुत्र नहीं होता वैसे ही प्राग्नहोत्र से स्वर्ग भी नहीं होगा। इससे जितने यह वर्णन करने वाले वाक्य हैं सब झूठ ठहरे। - न्यायप्रकाशा फिर मग्निहोत्र के प्रकरण में वाक्य है 'उदिते जुहोति' 'सूर्य के ब्दय होने पर हवन करना', कुछ आगे चल कर कहा है 'अनुदिते जुहोति' 'जब तक सुर्य का उदय न हुआ हो तभी हवन करना'। ये दोनों वाक्य परस्पर विरुद्ध है। इससे दोनों ठीक नहीं हो सकते । दोनों में कौन सा ठीक है सो नहीं कहा जा सकता। इससे दोनों के ठीक होने में सन्देह रहेगा । फिर 'त्रिः प्रघमामाह' 'तीन दफे पहिला मंत्र कहना ' ऐसा कहा है । फिर कहा है- त्रिरुत्तमामाह मन्तिम मंत्र को तीन बार कहना' । इस तरह फिर फिर एकही मंत्र को कहना, चार बार एकही वाक्य को व्यर्थ यकना, पागलों का काम है ! इससे ऐसे वाक्यों के सत्य होने में वैसाही सन्देह होता जैसे पागल के पाक्य में । इन शंकाओं का समाधान सूत्र २२११५८ में किया गया है। पुत्रे- ष्टि याग करने से पुत्र नहीं उत्पन्न होता है इससे यह नहीं सिद्ध होता कि 'पुष्टि करने से पुत्र होता है' यह वेदवाक्य झूठा है। किसी काम से ठीक ठीक फल होगा इसमें काम करने घाला निर्दोष होना चाहिये । आदि से अन्त तक काम अच्छी तरह होना चाहिये। फिर काम में जितनी चीजें लगाई जाती हैं वे निर्दोष होनी चाहिये । ये स्य सामान निर्दोष जुट जायंगे सो घडा कठिन है।कुछ न कुछ कमी किसी बात में, किसी अंग में रहही जाती है। इसी कारण से काम सफल नहीं होता । जैसे पुत्रेष्टि याग में और कई छोटे छोटे याग किये जाते हैं, जैसे समिद याग इत्यादि, इनका अनुष्ठान यदि न किया गया तो इष्टि में हीन्यूनता हुई । इसी तरह याग करने वाला यदि मूर्ख हो या दुराचारी हो तो उसका याग सफल कैसे होगा । या याग करने वाले की पत्नी यदि वन्ध्या हो तो पुत्र कहां से होगा । यही यागकर्ता की न्यूनता हुई ।. फिर याग के साधन हैं द्रव्य, मंत्र इत्यादि । यदि घृतादि द्रव्य में किसी तरह की अपवित्रता माजाय, जैसी शुद्धि उनकी वेद में बतलाई गई है घेसी न हो सके, या मंत्र के उच्चारण में कुछ हानि होजाय, स्वर में, मात्रामों में, अक्षर में, किसी तरह फित्रुटि होजाय, तो ये त्रुटियां कर्म के साधन में हुई। जहां ये सब दोष एक भी न पाए जाएं यहां यदि पुत्रेष्टि से पुत्र न हो तो वेद पर कुछ माक्षेप किया भी न्यायप्रकाशा . , तरह उस काम को यदि और लोग करते हों तो यह जिस वाक्य में बतलाया जाय- ऐसा इस काम को करना-फलाने इस काम को दूसरी तरह करते हैं सो ठीक नहीं है,- इस वाक्य को 'परकृति-मर्थवाद' कहते हैं । जैसे 'चपा होम करके फिर पृपदाव्य का होम करना पेला विधिवाक्य में कहा है। इसी के सम्बन्ध में कहा है-'चरकाध्वर्यु लोग पहिले पृपदाज्य ही का होम करते हैं। इससे विधिवाक्य में बतलाए हुए काम की तारीफ सूचित होती है। (४) जिस काम का करना विधिवाक्य में कहा है-उसके समर्थन में अकसर ऐसा कहा जाता है कि 'पुराने ज़माने में लोग ऐसा ही करते थे' ऐसा जिस वाक्य में कहा जाय उसको 'पुराकल्प-मर्थवाद ' कहते है। इससे भी विधियाक्य में कहे हुए काम की प्रशंसा सूचित होती है। जैसे 'वहिप्पवमान सामस्तोम का गान करना' इसके समर्थन में कहा है 'पुरान जमाने में ब्राहाणों ने इसी को गाया' इत्यादि । इससे यह साफ मालूम होता है कि विधिवाक्य से सम्बद्ध होने ही से अर्थवाद वाक्यों का प्रामाण्य है-जैसा मीमांसकों ने माना है। विधिवाक्य से जो घात कही गई है वही बात फिर भी किसी मतलव से कही जाती हे इन्हीं वाक्यों को 'अनुवाद वाक्य कहते है । एक ही बात का फिर कहना कई मतलवों से हो सकता है' (१) उसी बात की तारीफ़ करने के लिये-जैसे 'मश्वमेध याग करना' ऐसा कहने के बाद फिर कहा है जो अश्वमेध यज्ञ करता है सो कुल पापों से मुक्त होता है। यहां जो अश्वमेध याग करता है' यह चास्य 'अश्वमेध याग करो इस विधिवाक्य का अनुवाद' हुमा । (२) इसी तरह निन्दा करने के मतलव से भी अनुवाद होता है। (३) विधिवाक्य में जिस काम का करना कहा गया है उस काम के करने के लिये जितनी बातों का जानना मावश्यक है वे सब सर्वत्र उसी वाक्य से नहीं ज्ञात होती-इनके बतलाने के लिये दूसरे वाक्यों की अपेक्षा होती है-ऐसी हालत में इन दूसरे वाक्यों का पहिले चाक्य से जो सम्बन्ध है इसको सूचित करने के लिये इन दूसरं वाक्यों में पाहिले घाक्य में कहे हुए का फिर से कहना आवश्यक होता है यही . . । .
न्यायप्रकाश - . . - फिर से कहना मनुवादकहलाता है। जैसे मिष्टाकपाल:पुरोड़ाश को आग्नेय बनाना, इत्यादिपायों में माग्नेय मादि: छ.: याग पूर्णमासी भोरं प्रमावास्या के दिन करने को कहे गये हैं। पर यह नहीं कहा गया है कि इन यागों के करने से क्या लाभ होता है। इसको यतलाने के लिये दुसरा वाक्य है-जो कोई पौर्णमासी याग करता है जो कोई ममावास्या :याग करता है, उसको ये पे लाभ होते हैं । यहाँ पर 'पौर्णमासी और अमावास्या' याग फिर से कहे गये हैं। : : "अनुवाद "मीर: पुनराक ! में यह भेद है कि जो कोई पांत किसी मतलय से दोयारा कही जाय तो वह दोबारा कहना 'अनुवाद : फहलाता है। परंतु यदिभ्यर्थ विना मतलय के दोबारा कही जाय तो बह पुनरुक्ता' कहलाता है। यही तीन भेद लौकिका पाक्यों में भी पाये जाते हैं। भात पकाम यह विधि धाक्य दुमा । ' मन:के खाने से बला होता है।यह मातम्पकाने की प्रशंसा 'मर्थवाद' है । ' भात पकामी भात पकामोत्यहां जल्दी पकाओ' इस मतलप से दोबारा कहा गया यह । मनवाद। हुमा । सूत्र २१ में यह शंका उठाई गई है कि-दम कैसे जान सकते हैं कि वेद का वक्ता ईश्वर विश्वासपात्र है । लौकिक चाफ्यों में तो देखते है कि वह मादमीभच्छा पंडित है अतः जो बात यह कह रहा है उसको भली भांति:जानता है-इसका स्वभाव हम-ऐसा देखते हैं कि इसको : लोगों को प्रसल यातः घतलाने की इच्छा है,"-इत्यादि समझ कर हम विचार कर लेते हैं कि यह. मादमी, विश्वासपात्र है-इसका वाक्य प्रमाण है। येदवाइयों के कहने वालों...को.. तो हमने कभी देखा ही नहीं, फिर वह मात है या नहीं,यह हम कैसे समझ सकते हैं। इसका समाधान- यह किया है कि.. लौकिफ पायों में भी हमने जिस आदमी के वाक्यों : को.,दो चार इस पार सच पाया उस भावमी को हम 'माप्त' मानने लगते है। इसी तरह पेदों में भी मायुर्वेद में कहे हुए उपदेशों के अनुसार जय हम काम करते हैं तो उनका फल जैसा कहा है वैसा ही पाते हैं। प्रथात हरीतकी के सेवन से मलरोध नहीं रहता.इसको बार बार ..
न्यायप्रकाया - - जांच कर सत्य मानते हैं। इसी तरद भायुर्वेद के पाक्यों को सचे पाकर 'इनका कहने वाला सत्य वक्ता है। इसमें माप्त पुरुष के कुल लक्षण पाए जाते हैं। यह हम जान लेते हैं। फिर इस पुरुष की कही हुई कुल यातों पर हमारा विश्वास हो जाता है। नैयायिकों ने वेद को ईश्वर का बनाया हुआ माना है। और ईश्वर में भाप्त के सब लक्षण है-यहासय पदार्थों का ज्ञान रखता है-उसको भूतो पराया है और मनुष्यों के उपकार के लिये ठीक ठीक उपदेश करने की इच्छा है। इससे उनके वाक्य अवश्य प्रमाण होगें । जो लोग ईश्वर को नहीं मानतेघेघेदों को अपौरुषेय-किसी पुरुष का 'घनाया नहीं मानते हैं । इसी से उनके मत में वेद नित्य है। मीमांसकों के मत से वेद ही नहीं-राद मात्र-कुल शब्द-उनकेोमर्थ-सही नित्य है। इसका प्रतिपादन मीमांसादर्शन के प्रकरण में किया जायगा । प्राप्तोपदेश को 'भागम' कहते है। इसी से वेद 'को 'मागम भी कहा है। ऋषभदेव, बुद्धदेव प्रमृति के घाक्याभी 'मागम माने जाते हैं। वाचस्पति मिश्र नोइन भागों से घेद में मधिक विश्वास योग्यता यतलाई है (तात्पर्य पृ० ३००)। उनका कहना है कि वेद उस ईश्वर का बनाया है जो संसार की रचना करने पाला है। जिसको इतनी बडी शक्ति होगी उसी में 'माप्ता के पूरे लक्षणं पाये जा सकते है। अपभदेव, बुद्धदेव यड़े विद्वान कारुणिक सदुपदेष्टौ थे तो सही परन्तु वे संसार के रचयिता न थे। इससे उनके कहे हुऐ मागम अपने माप' प्रमाण नहीं माने जा सकते । सांसारिक मामूली पुरुषों में जवर हम कुछ मिाप्त के लक्षण'पा लेते हैं तब उनकी बातों को प्रमाण मानते है। इसी तरह अपभदेव बुद्धदेव के वाक्यों के प्रसंग जय हम इनमें भात के लक्षण पाएंगे तभी इन वाक्यों को प्रमाण मान सकते है। वेद में ऐसा नहीं है। वेद में यह बात है। केवल इतना देखने ही से 'यह अवश्य प्रमाण है। ऐसा मानना पड़ता है। । जयन्त भट्ट ने न्यायमंजरी में (पृ०२६) ऐसा नहीं माना है। उनका मत है कि जितने आगम है सबकाकर्ता ईश्वरही है। अपम देव बुद्ध देव भी ईश्वर घी के अवतार है। भेद इतना ही है कि न्यायप्रका, A H - वेद में जो उपदेश हैं: वेन्सकल साधारण समस्त संसारभर के मादमियों के उपकारार्थ ।मौर जैनाबौद्ध.मागम में जो उपदेश उन्हें कुछ चुने हुए लोगों के उपकार के हेतु: ईश्वर ने रचा जय जैसे लोगों को जैसे उपदेश की आवश्यकता देख पड़ती है तब ईश्वर उनके हेतु वैसा ही उपदेश करता है। इनकामत.से और नागमों के प्रति वेद की मधिकता-इतनी ही है की वेद से मधिक मनुष्यों का उपकार होता है और बौद्ध जैनागमों से कम लोगों का यदि जयन्तभट्ट आज कल होते. तो प्रायाः यौद्ध दीमागमाको सब से श्रेष्ठ मानते क्योंकि आजकल संसार मेंउसी.:आगम मानने वालों की संख्या अधिक पाई जाती है। समाप्तोपदेश शब्द है। इसाउपदेशासे उत्पन्न झाताको शब्दशात' कहते हैं । अर्थात माप्त-पुरुपीकोकहे हुए पाक्य से उत्पन्न, झान 'शब्दज्ञान होता है। इस शानका साक्षात् कारण-करण क्या है। प्राचीन नैयायिकोफे मत से. वाक्य ही. इस शान का करण है। वाक्य का अर्थ क्या है इस विषय में बहुत मतभेद पाया जाता है। मीमांसकोकमत सेंनियोग याप्रेरणायाक्या है मात् ऐसांकरो, "ऐसारामत करो यही.यात:सब पाक्यो. से कही जाती है। जिनमें ऐसा साफासाफ नकहा गया हो वह भी किसी दूसरे उसापानीले वाक्या से सम्बन्ध रखते हैं। इसमता की व्याख्या मीमांसाप्रकरण की जायगी । नैयायिकों के मत से कई एक पदों कार्य जय एक दूसरे के साथ सम्बन्ध रखते हैं तय यही परस्पर सम्बद्ध पदों के अर्थ याक्या कहलाते हैं। जैसे कपड़ा.लामो:यहां कपड़ा.' पद से कहा हुमा :कपड़ा, और लामो' शब्द सेकदा हुमा लाना-ये दोनों-अर्थ-कपड़ा और लाना किया-जय परस्पर सम्बद्ध होते हैं : तय यही वाक्य कहलाताहि।। चाक्याथं का ज्ञान कैसे होता है ? परस्पर सम्बद्ध पदों के मी ही को नैयायिकों ने :वाक्यार्थ : माना है , । पर इसपर यहा सन्देह. उपस्थित होता है कि इस वाक्य का ज्ञान पदों से होता है:या: समस्त वाक्य ही से।। न्यायमंजरी - i- , न्यायप्रकाश।। . 1 (पृ३६७) में स्पष्ट लिखा है कि वाक्यार्थ ज्ञान का कारण धाक्या है जैसे पदार्थ ज्ञान फाफारण पद है। किन्तु जैसे पद के अर्थ के जानने के समय हम एक एक फर पद के अक्षरों को सुनकर एक एक का स्मरण रखते हुए मन्त कामिक्षर सुन कर समस्त पद के अर्थ के ज्ञान को प्राप्त करते हैं। इसी तरहावाक्य में भी होता है। जब कोई वाक्य कहा जाता है उसमें कई पद होते हैं । जैसे 'कपड़ा-लाभो यहां दो पद-सुने जाते हैं । पहिले कपड़ा'- पद सुना गया फिर इसका क्या अर्थ है।सोस्मरण हुआ यह स्मरण जवातकामनमें है तभी तक 'लामो पदक अर्थ का भी स्मरण हुमा फिर इन दोनों पदों मेंमाकांक्षा योग्यता सनिधि इन तान सम्यन के द्वार दोनों पदों के अर्थ का स्मरण जवातक मनम है तभी तक दोनों मों के सम्पन्धाका भीमान होता है। यही क्रम वाक्यार्थ के जानने का है। इस प्रकाएपद के अर्थका ज्ञान होता है.सोन्यायातिक (.३.२.५५ ) में कहा है-पूर्व पूर्व अक्षर के स्मरण की सहायता से मन्तके अक्षर के ज्ञान से पदके मर्थकारावान होता है। इस क्रम से जवावाक्यार्थशान होता है तःसाक्षात्कारण तो मूल ज्ञान में वाक्य हुमा परन्तु वाक्य मेंजोगपद हैं उन्हीं। को बाक्यार्थशाना का मूल कारण मानना चाहिये | एक एक कर अक्षरों को सुनकर पद का ज्ञान होता है । फिर एक एक कर पदों को सुनकर वाक्यार्य का ज्ञान होताहै।। परन्तु वर्ण का स्वयं प्रपना कुछ अर्थ नहीं होता है इससे पदों हीको वाक्यार्थ के ज्ञान का कारण मामा है। इससे पदों में दो तरह की शक्ति मानी गई है। एक मभिधात्री शक्ति जिससे पद' अपने अर्थ को बाधित करता है । दूसरी तात्पर्यशक्ति 'जिससे कई पद के अर्थों का परस्पर सम्बन्ध घोधित होताहै।यदी तात्पर्य- शक्ति वाक्यार्थ ज्ञान का कारण होता है (न्यायमंजरी. पृ. ३८६,४०४) पदों का समूह वाक्य है ।"पदया है। "ते विभक्त्यन्ताः पदम्' ऐसा लक्षण गौतमः सूत्र (२.२.५५ ) में है। जब कई मक्षरों के अन्त में कोई विभक्ति होती है तो वे पद कहलाते है। 7 - न्यायप्रकाश . ܕܐ - - - पद यघिमनि दो तरह की होती है. नामविभक्ति, “गालयात: विभक्ति। इस से नामः (संशा) और पाख्यात (क्रिया) दो. ही तरह के पद नैयायिकों ने माने हैं: (न्यायवार्तिक पृ.३१४.) जिस शब्द का अभिधेय-जो वस्तु उस से कही जाय और किसी क्रियासे सम्बन्ध रखता हो उस शब्द को नाम पद' कहते हैं । इसी से कहा है कि जिस वाक्य में कोई क्रिया न पाई जाया तो वहां मस्ति' या भिवति' क्रिया का मध्याहार, होता है क्योंकि विना एक क्रिया के किसी नाम पद का अर्थ सम्पन्न नहीं होता। जय कमी किसी चीज़ का 'नाम' उचारण किया जायगा तव किसी क्रिया से सम्बद्ध यह चीज़ अवश्य होगी। इसीसेवाचस्प- ति मिश्र ने (तात्पर्य पृ: ३३०) कहा है कि नाम,पदाफ़िसीहाकिया से सम्याध रखता है.इतनाही.नहीं-किन्तु बिना किसी क्रिया के उसका स्वरूप सम्पन्न ही नहीं हो सकता । यही भदा क्रिया' से इसका है। किसी क्रिया से सम्बन्ध, तो; क्रियापदाभी कभी फभी रखता ही है. जैसे (खाते खोत जाता है। यहां जाना किया साना फ्रिया से सम्बद्धः है। किन्तु क्रिया:पदः में ऐसा नहीं कि किया सम्बन्ध के विना वह रहाही नहीं सकता क्योंकि राम जाता है यहां जाना क्रिया किसी क्रिया से सम्बद्ध नहीं है इस तरह क्रिया के बिना किसी नाम पद का प्रयोग नहीं हो सकता। जिस शब्द का मुख्य अर्थः कोई क्रिया ही हो. और..जो उस क्रियाफा भूत वर्तमान या भविष्यत् काल से सम्बन्धासूचित करे- उसको किया: पद कहते हैं। "इस पर यह शंका होती है कि यदि नाम औरक्रिया दोही पद हैं तो क्या-अव्यय पद.नहीं है । इसका समाधान भाष्यकारने किया है कि प्रत्यय पद मघश्य. है । पर वे 'नाम' में अन्तर्गत हैं। इन में यद्यपि नामविभक्ति कोई नहीं पाई जातीःतथापि,इनमें विभक्ति नहीं है ऐसा नहीं कह सकते हैं। इनमें भी और नाम,पदों की तरह सुबत्त विभक्तियां रहती है पर उनका लोप हो जाता है । यही मेदामव्यय पद मीर नामा पद में है । एफ में सुयत्त विभक्ति वर्तमान रहती है और दूसरे में सुप्त रहती है। वाक्यों ही से कुछ विरोप:पात कही जा सकती है-स्वामी पद . .
. न्यायप्रकारा। सेकोहाभी.यातानही कही जा सकती है-खाली 'घोड़ा' कह दिया तो इससे कुछानहीं जाना जाता है । जब इसके साथ दौड़ता है, इसको लगा देते हैं गौर पूरा पाक्य बना लेतेहैं तभी 'घोड़े का दौड़ना' कहा जाता है। इससे कुछ लोगों का कहना है कि पद घाचक नहीं है वाक्यही घाचक है। - इसकाासमाधान वार्तिककार ने किया है कि यदि 'घोड़ा' पदका कुछामर्थ ही न होता तो 'दौड़ता है' पद लगाने से भी इसका समर्थ कहासिमाजाता। इससे सिद्धान्त यह है कि जब तक केवल 'घोड़ा पर कहा गया है तब तक सामान्यतः-मामूली तौर पर:एक तरह के जानवर का ज्ञान होता है, उमाप्रसंग में किसी विशप घात का जान नहीं होता। जय कोई क्रिया पद-दौड़ता है'-उसके साथ लगाया गया तव मामूली तौर से एक तरह के जानवर का जोमान हुमा या उसके विषय में एक विशेष बात जानी जाती है । मघायह सन्देह उठता है कि पद का अर्थ क्या है.गौतमसूत्र २।२।५६ में यह प्रश्न उठाया है कि जब हमने 'घोड़ा'- पद का उच्चारण किया तो इससे किस अर्थ का,शान होता है। क्या किसी खास घोड़े का ? (२) मघवा घोड़ों के शरीर का, जो आकार होता है उसका? या (३) मामान्यतः जिस.जातिका जानवर घोड़ा है उस जाति का ? 'व्यक्ति प्राकार और जाति में क्या भेद है सो ६४,६५,६६, सूत्रों में गौतम ने बतलाया है। वह भूत-पदार्थ- जिसमें खासखास गुण रहे मोर जो मांखों से देखा जाय यामार इन्द्रियों से जाना जाय -उसीको 'व्यक्ति कहते हैं । जिन अवयवों से वस्तु की जाति सूचित हो-जिन जिन अंगों के रहने से ग्रहगवस्तु अमुक जाति की है ऐसा ज्ञान हो-उन्हीं मिवयों को मारुति' कहते हैं । जिससे बहुत वस्तुओं का शान एक साप करायाजाताहै जिसके द्वारा भिन्न भिन्न वस्तु एक मानी जाती है-उसको 'जाति' कहते हैं। मीमांसकों ने जाति और गायति' को एकही माना है।। सूत्र ५७ में 'घोड़ा पदामे किसी एक खास-घोड़े का ज्ञान होता है सो पत्त उठा कर सूत्र ५८ में उसका खंडन किया है-याद कोई खास-एक घोड़ा इस शब्द से कहा जाता तो फिर उस घोड़े . .
न्यायप्रकाशा -- को छोड़ कर और दूसरा कोई घोड़ा उस पद से नहीं कहा जा. सकता । और फिर यदि एक एक कर प्रति घोड़े को.इसर पद : का अर्थ माने तो एक पद के अनन्त अर्थ :मानने पड़ेंगे। इससे यह पक्ष स्वीकार के योग्य नहीं है । सूत्रः६० में श्राकार ही.शब्दार्थ है। इस पक्ष को कहा है-जब हम घोड़ा पदकोसुनते. तो घोड़ो के शरीर का जो प्राकार है--जिस ऑफर के रहने से जानवर 'घोड़ा' कहलाता है उसी आकार का ज्ञान हमको होता है। अनुभव भी ऐसा ही होता है जानवरों के शरीर के माकार ही को देखकर हम यहाजानःमकते हैं कि यह घोड़ा है या गाय | इस पक्षा में भी वही दोप-जितने घोड़े हैं उतने ही आकार भी हैं । इमसे यदि एक का:पाकर घोड़ा पद से कहा जायगा तो दूसरे घोड़े का प्राकार उस पद से नहीं कहा जा सकता। जैसा आकार : एक घोड़ेरका है-ठीक वैसाही दूसरे घोड़े का कभी नहीं रो.. सकता। इससे फिर भी घोड़ा' पदकी अनन्न शक्कि :माननी पड़ेगी और यदि माकार हो 'घोड़ा' पद का अर्थ होता. तो मिट्टी का घोड़ा भी घोड़ा महलाता है। उसके शरीर का आकार भी घोड़ों की तरह होता है। सूत्र में इस पक्ष को उठाया है कि घोड़ा पद काम जाति है। जो दोष व्यक्ति या भाकार पक्ष में हैं ने इसापक्ष में नहीं पाए' जाते। जिन चिह्नों से कुल घोड़े:एक जाति के.जानवर माते जाते हैं उन्हीं चिह्नों की एक साथ जो कल्पना की जाती है उसीको 'जाति' कहते हैं-यह जाति एक-एक घोड़े में. भिन्न नहीं है-सबमें एकही जाति है। इससे इस पक्ष में अनन्त शक्ति की आवश्यकतानहीं होगी. सूत्र ६२ में इस पक्ष का भी खंडन किया है। किसी शब्द से शुद्ध जाति मात्र का ज्ञान नहीं होता । जब कभी घोड़ा जाति का! शान होता है तय पहिले खास किसी घोड़े का और उसके शरीर का ज्ञान हो लेता है तमी जाति का ज्ञान होता है। इससे जाति का शान-पद से यदि हो भी तो और नये दोपकोई हों या न हो जितने दाप व्यक्ति और माफार चाले 'पक्षों में 'यतलाये गएर-च सय इस पंच में भी अघश्य होंगे। इन तीनों पक्षों का खंडन करके सू. ६३ में यह सिद्धान्त किया है फिजय की 'घोड़ा पद'ईम सुनते हैं तब खानी किसी .
न्यायप्रकारा। - मास घोड़े का-याखाली घोड़ों के शरीर के प्राकार । का-या, खाली, घोड़ा जाति का ज्ञान नहीं होता। लो ज्ञान धोडा पद के सुनने से उत्पन्न होता है उसमें व्यक्ति आकार और जातितीनों भासित होते है। इस पक्ष में कोई भी दोष नहीं है। यद्यपि इन तीनों का ज्ञान होता है तथापि फही एक प्रधान होता है और कहीं दूसरा । जिस वाक्य से किसी खास घोड़े के प्रसंगा में कुछ खास बात कही जाती है, जो कि और घोड़े में नहीं है उस वाक्य में 'घोडा पद के अर्थ में वह स्वास एक घोड़ाप्रवान रहता है और माझार जाति गौण रहते हैं । जैसे यह घोड़ा काला है' यहां पर यद्यपि.घोड़ा पद से व्यक्ति माकार और जाति नीनों का ज्ञान होता है तथापि प्रधानत उसमा खास एक घोड़े का ज्ञान होता है । इसी तरह जिस वाक्य से कुल घोड़े के प्रसंग में कोई बात कही जाय उस चाय में घोड़ा पर के मर्थ में जाति ही मुख्य रहती है, व्यक्ति-माकार गोग रहते है जैसे 'घोड़े के चार पैर होतेहैं जिस वाक्य में'माकार ही भूचित करने के लिये पद का प्रयोग होता है यहां माफार ही प्रधान होता है-जैसे 'यदि असला घोडा नहीं मिलता है तो मिट्टी का घोडायनालो'-इसा वाक्य में घोडे के शरीर कामाकार हो घोड़ा' पद से कहा जाता है । कई पद ऐसे हैं जो एक ही चीज़ के नाम है-जेस 'माकाश' ईश्वर इत्यादि- ये केवल व्यक्ति ही को यतलाते हैं। नाम पद का अर्थ यो होता है। क्रिया पद का अर्थ व्यापार हो। जैसे घोडा दौड़ता है' इस नाक्य में 'दौड़ता है' क्रिया पद है। इस से दौड़ना रूपी व्यापार को ज्ञान होता है। पर्दशक्ति पद से व्यक्ति, आकार तथा जाति का ज्ञान होता है। पदों में कौन सी शक्ति है जिससे वे ऐसे ज्ञान को उत्पन्न करते है। मीमांसकों का मत है कि शब्द में एक स्वाभाविक शक्ति है। जिससे वह अपने मर्थ को घोधित करता है। शब्द का अपने अर्थ से सम्बन्ध नित्य है बाली इमका शान हमको वृद्धों की बातों को सुन कर होता है । 'घोड़ा पद का घोडा जानवर के साथ सम्पन्ध नित्य है । जब से . , -- है . - न्यायप्रकाश यह जानघर है तब से इसका नाम घोड़ा ही रहा है और रहेगा। इसका व्यवहार भी अनादि काल से चला आया है। वृद्धों की घात चीत सुनकर हमको इस सम्बन्ध का ज्ञान होता है। नैयायिकों का ऐसा मत नहीं है । शब्द का अपने अर्थ के साथ कोई नित्य सम्बन्ध नहीं है। शब्दों से अर्थ का जिसके द्वारा शान होता है उसका नाम 'समय' या "संकेत" है अर्थात् “ यह शब्द इस अर्थ कायोधन करें" ऐसा जो संकेत शब्दों के प्रमंग में किया जाता है यही सम्बन्ध शब्द और अर्थ का होता है । किसी शब्द में स्वभावतः कोई ऐसी शक्ति नहीं है जिससे वह अपने अर्थ का बोधन करे। भाष्यकार (२॥ ११५५-५६ ) के मत से यह संकेत या समय इस प्रकार का है-'इम शब्द से यह अर्थ समझा जाय' ऐसा जय कोई ठीक कर देता है तब से उस शब्द के साथ उस अर्थ का ऐसा सम्बन्ध हो जाता है कि जब उस शब्द का उच्चारण होगा तब उस अर्थ का शान उत्पन्न होगा। यदि नित्य स्वाभाविक सम्बन्ध शब्दों का अर्थ के साथ होता तो एकही शब्द से भिन्न देशों में भिन्न भिन्न अर्थ का शान नहीं होने पाता । देशभेद में भिन्न मर्थ कहे जाते हैं इससे यह साफ शात होता है कि जिस अर्थ के प्रसंग में जिम शब्द का संकेत जिस देश में किया गया ? उस देश में वह शब्द उसी अर्थ का ज्ञान उत्पन्न करता है। इस संकेत का ज्ञान लोकव्यवहार से होता है । माता की बातों को सुन सुन कर बचा यह समझ लेता है कि इस शब्द का यह अर्थ है। भाग्य और वार्तिक में इतनाही कहा है। इनमें ईश्वर ही का किया टुमा संकेत संकेत है' ऐसा नहीं फहा, वरन् स्वाभाविक सम्बन्ध के विरुद्ध जो हेतु यहां कहा है उसी हेतु से 'ईश्वर का किया हुआ संकेत हैं' इसका भी खंडन होता है। यदि ईश्वर का किया हुआ संकेत होता तो सब देशों में सब लोगों को एक शब्द से एक ही अर्थ का ज्ञान होता। पर ऐसा नहीं है। इससे संकेत ईश्वर का किया हुआ नहीं हो सकता। विश्वासपात्र भादमी जय संकेत कर देता है तो उसी से उस शब्द के अर्थ का शान होता हैं, ऐसा मत प्राचीन नैयायिकों का साफ शात होता है। परंतु वाचस्पति मिश्र ने (पृ० २०९) लिखा है कि सृष्टि के मादि में ईश्वर ही ने न्यायप्रकारा। . . संकेत को करता है कि अमुक शब्द से अमुक वस्तु कही जाय, इत्यादि । इसी पक्ष को न्यायमंजरी में (पृ. २४१ ) पुष्ट किया है। जो शब्द इसी तरह अनादि व्यवहार से पाये जाते हों उन्ही में शक्ति है। ईश्वर का किया हुया संकेत जिन शब्दों का है वेही शब्द शक्ति कहलाते हैं । माज कल जो मनुष्यों के वा और वस्तुओं के नाम धरे जाते हैं घे भी उन मनुष्यों का या उन वस्तुओं का घोध तो अवश्य कराते हैं और इनके प्रसंग में किसी पुरुष का किया हुआ संकेत अवश्य रहता है 'अमुक का नाम मैं यह धरता हूं', और जैसे पुराने शब्दों के संकेत का ज्ञान वृद्धों की बात चीत में ज ना जाता है उसी तरह इनके अर्थ का भी ज्ञान होता है, पर इन पदों में वैसी वाचकता शाक्त नहीं है जैसे पुराने शब्दों में। क्योंकि उनका संकेत सर्वज्ञानवान् ईश्वर का किया हुआ है और इनका संकेत आज कल के मनुष्य करते हैं जिस में अशुद्धियों का होना बहुत सहज है। इन दोनों तरह के शब्दों फे मौर भी भेद हैं। जिन शब्दों का अर्थ सृष्टि के आदि में ईश्वर के संकेत से सिद्ध है उनका रूप या अर्थ यदल नहीं सकता । 'अश्व' पद से धोड़ा ही कहलावेगा । लौकिक शब्दों के अर्थ में हेर फेर होता रहता है । एकही नाम से एक श्रादमी एक चीज़ को पुकारेगा और दूसरा मादमी उसी नाम से दूसरी चीज़ को। इसके अनुसार नवीन नैयायिकों का सिद्धान्त है कि ईश्वर कृत सकेत ही को 'शक्ति' कहेंगे, माधुनिक संकेत को 'परिभाषा' कहेंगे। इससे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि संस्कृत भाषा ही के शब्दों में वाचकता शाक्त है । और भाषामों के शब्द वाचक तो हो जाते हैं, क्योंकि पुरुप का किया हुआ संकेत इनमें भी है. पर शाक्त इनमें नहीं मानते, ये केवल पारिभाषिक है, क्योंकि इनके संकेत का फरने वाला सर्वश ईश्वर नहीं है । ईश्वर के किये हुए संकेतों में किसी तरह का सन्देह नहीं हो सकता। यहां एक शंका उठती है । ईश्वर जब आदि में संकेत करता है तो किन शब्दों द्वारा करता है । 'अमुक शब्द से अमुक अर्थ का बोध हों, अस्मात् शब्दात् अयमों बोद्धव्यः 'इन शब्दों का व्यवहार जो ईश्वर करता है सोये शब्द कहां से आते है और इनका . .
न्यायप्रकाश। संकेत किसने किया है। ईश्वर ने तो अब तक कोई संकेत नहीं किया है। इसका समाधान नैयायिक इतना ही करते हैं कि ईश्वर सर्व- शक्तिमान सर्वज्ञ है, ऐसा जव इस प्रमाण से सिद्ध कर देते हैं तय ईश्वर ने कैसे इस काम को किया या कर सकता है, ये सब प्रश्न व्यर्थ है । वह सब कुछ कर मकता है, वह कैसे करता है सो हम लोगों के समझ में नहीं आ सकता। प्रति सृष्टि के आदि में वह 'प्रति- पाद्य प्रतिपादक' शरीरद्वय बनाकर सव शब्दों का व्यवहार करता है। नवीन नैयायिकों ने भाष्यकार ही के मत का समर्थन करते हुए माना है कि ईश्वर की इच्छा से पद की शक्ति है ऐसा नहीं, पुरुष मान की इच्छा से शक्ति होती है। इसी से सब काल के सब भापामों के सब तरह के शब्दों में एक तरह का संकेत सिद्ध होता है। और इसी संकेत के द्वारा इन शब्दों से भी शाब्द- ज्ञान होता है। पद फी शक्ति नैयायिकों ने तीन प्रकार की मानी है । (१) कई पद ऐसे हैं जिनका प्रर्य वही है जो उनके खंडों से मुचित होता है जैसे 'पाचक' शब्द-इसका अर्थ है पकानेवाला । इस शब्द से जो पच' धातु और 'गबुल' प्रत्यय है इनका अर्थ भी 'पकानेवाला' है। इससे यह शब्द यौगिक' कहलाता है और, इनकी शक्ति अवयव शक्ति' वा ' योगशक्ति' कहलाती है। (२) कई पद ऐसे हैं जिनके अपने खंडों से या तो कोई मर्थ ही नहीं प्रतीत होता है, या यदि होता भी है तो उनका जो अर्थ है उससे इस अर्थ का कुछ सम्बन्ध नहीं- जैसे' घट पद में घ' और ''ये दो अक्षर है । इनका कुछ अर्ध नहीं है। यदि कुछ एकाक्षर कोप से इन अक्षरों के अर्थ निकल भी जाय तो इन अर्थों का घड़े के साथ किसी तरह का सम्बन्ध नहीं है और घट' पद से घड़े ही का बोध होता है। ऐसे पद : रूढ़ पद' कहलाते हैं और इनकी शक्ति को । समुदाय शक्ति' वा 'रूदि- शक्ति' कहते (३) कई पद ऐसे हैं जिनके खंड से जो अर्थ प्रतीत होता है उसका सम्बन्ध उनके संकेतित अर्थ से भी रहता है। जैसे 'पंकज' . . , न्यायप्रकाश। संकेत को करता है कि अमुक शब्द से अमुक वस्तु कही जाय, इत्यादि । इसी पक्ष को न्यायमंजरी में (पृ. २४१ ) पुष्ट किया है। जो शब्द इसी तरह अनादि व्यवहार से पाये जाते हों उन्हीं में शक्ति है। ईश्वर का किया हुश्रा संकेत जिन शब्दों का है वेही शब्द शक्ति कहलाते हैं । आज कल जो मनुष्यों के वा और वस्तुओं के नाम धरे जाते हैं वे भी उन मनुष्यों का या उन वस्तुओं का योध तो अवश्य कराते है और इनके प्रसंग में किसी पुरुप का किया हुमा संकेत अवश्य रहता है 'अमुक का नाम मैं यह धरता हूं', और जैसे पुराने शब्दों के संकेत का ज्ञान वृद्धों की बात चीत में ज ना जाता है उसी तरह इनके अर्थ का भी जान होता है, पर इन पदों में वैसी वाचकता शाक्त नहीं है जैसे पुराने शब्दों में । क्योंकि उनका संकेत सर्वज्ञानवान ईश्वर का किया हुआ है और इनका संकेत आज कल के मनुष्य करते हैं जिस में अशुद्धियों का होना बहुत सहज है। इन दोनों तरह के शब्दों फे और भी भेद है। जिन शब्दों का अर्थ सृष्टि के आदि में ईश्वर के संकेत से सिद्ध है उनका रूप या अर्थ बदल नहीं सकता। 'अश्व' पद से घोड़ा ही कहलावेगा । लौकिक शब्दों के अर्थ में हेर फेर होता रहता है । एकही नाम से एक श्रादमी एक चीज़ को पुकारेगा और दूसरा आदमी उसी नाम से दूसरी चीज़ को। इसके अनुसार नवीन नैयायिकों का सिद्धान्त है कि ईश्वर कृत सकेत ही को 'शक्ति' कहेंगे, आधुनिक संकेत को 'परिभाषा' कहेंगे। इससे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि संस्कृत भाषा ही के शब्दों में वाचकता शाक्त है । और भाषामों के शब्द वाचक तो हो जाते हैं, क्योंकि पुरुप का किया हुआ संकेत इनमें भी है. पर शक्ति इनमें नहीं मानते, ये केवल पारिभाषिक हैं, क्योंकि इनके संकेत का करने चाला सर्वज्ञ ईश्वर नहीं है । ईश्वर के किये हुए संकेतों में किसी तरह का सन्देह नहीं हो सकता। - यहां एक शंका उठती है। ईश्वर जब आदि में संकेत करता है तो किन शब्दों द्वारा करता है । 'अमुक शब्द से अमुक अर्थ का बोध हों, अस्मात् शब्दात् अयमर्थो चोद्धव्यः 'इन शब्दों का व्यवहार जो ईश्वर करता है सो ये शब्द कहां से आते हैं और इनका - न्यायप्रकाशा गौतम २.२.१ सूत्र में शंका उठाई है कि और दर्शनों में इन चार के अतिरिक्त मपत्ति, ऐतिह्य, सम्भव और अभाव-ये चार और प्रमाण माने हैं । जव किसी भादमी को बिना रोगादि के मोटा देखा और साथही यह जाना कि यह श्रादमी दिन को नहीं खाता तो इससे यह मालूम हो जाता है कि यह रातही में खाता है। इसी शान के कारण को अर्थापत्ति प्रमाण माना है। जिस बात के बिना किसी देखी हुई या सुनी हुई बात-'अर्थ' में 'कोई अपत्ति'- दोष-देख पड़ता हो उस बात का ज्ञान 'अर्थापत्ति ज्ञान' कहलाता है। किसने कहा सो ठीक नहीं मालूम है पर कोई बात लोगों में प्रसिद्ध हो जाती है जैसे इस पेड़ में भूत रहता है इसको लोगों ने 'ऐतिह्य' माना है। किसी चीज में उनके टुकड़ों का रहना जिस प्रमाण से माना जाता है जैसे सेर में छटांको का होना इत्यादि-उसको 'संभव' प्रमाण माना है । 'यहां पर अमुक घस्तु नहीं है' यह शान जिस प्रमाण से होता है उसको 'प्रभाव' प्रमाण माना है। अफसर लोगों ने लिखा है कि नैयायिकों ने इन प्रमाणों को नहीं माना है । जिन उपायों से किसी तरह का यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो उनको न्यायप्रिय नैयायिक प्रमाण न माने यह कव हो सकता है। इन चारों से जब कभी यथार्थ शान उत्पन्न होगा तव ये 'प्रमाण' अवश्य हैं। पर मीमांसक वेदान्ती तथा पौरा- णिको से नैयायिकों का भेद इतना ही है कि इन्हों ने इनको अपने कहे हुए चार प्रमाण ही में अन्तर्गत माना है । अर्थापात एक तरह का व्यतिरेक-अनुमान ही है । प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष का शान किसी नियत सम्बन्ध द्वारा जो होता है वहीं अनुमान है। अर्थापत्ति में मी आदमी का मोटा होना प्रत्यक्ष है इससे रात को खाना जो अप्रत्यक्ष है उसका ज्ञान होता है। जब आदमी मोटा है तय खाता जरूर है यह खाना क्या रात को हो सकता है या दिन में-दिन में यह नहीं नाता है तो निश्चय है कि रात में खाता -यह एक तरह का अनुमान ही हुमा । ऐतिह्य से जो शान होता है सो यथार्थ या सत्य तभी होगा जय इसका प्रथम कहने- पाला कोई विश्वासपात्र अदमी होगा । और ऐसी दशा न्यायप्रकाश। के लिये तो ठीक है। पर यड़े होने पर भी हम लोग कितने नये नये पद के अर्थ सीखते हैं। मये नये पदा के अर्थ जानने के प्रकार आठ घतलाये गये हैं। (१) व्याकरण के द्वारा धातुप्रत्यय और विभक्तियों के अर्थ को जान फर जब हम पद के अर्थ को जानते हैं। जैसे 'पाचक' पद में 'पच' धातु और गवुल प्रत्यय है यह समझ कर हम उस पद का अर्थ 'पाक करने वाला समझते हैं। (२) उपमान से । 'गवय' पद का अर्थ क्या है सोहम उपमान प्रमाण से जानते है । जैसा ऊपर फह आय है। (३) कोश मे । कोश में पदों के अर्थ कई हुए है । उसको देख कर हम समझ जाते हैं कि इस पद का यह अर्थ है। (४) विश्वासपात्र आदमी के वाक्यों से । जव विद्यार्थी किसी पद का अर्थ नहीं समझता तो गुरु यता देता है कि इस पद का यह अर्थ है । (५) वृद्धों के व्यवहार से । जब एक वृद्ध एक जवान आदमी से कहता है 'लोटा लामो' इस पर जवान आदमी लोटा ले आता है। फिर वह कहता है 'लोटा ले जाना, गिलास लामो' फिर जवान आदमी एक को रख कर दूसरी चीज़ ले माता है। बुद्धिमान लड़का इन सब व्यवहारों को देख कर समझ जाता है कि 'लोटा' 'गिलास' 'लामो' 'ले जामो' किसे कहते हैं। (६) वाक्य शेप से। जैसे मालिक ने कहा 'तरकारी भून लो' 'घी में या तेल में भूनो यह नहीं कहा-थोड़ी देर के बाद कहता है'यह तरकारी घी की भुनी अच्छी होती है। इस वाक्य के शेप से नौकर समझ जाता है कि तरकारी घी में भुनी जायगी। (७) ब्याख्या से गलभ पद का अर्थ न जानने वाला आदमी जब किसी टीका में देखता है-'रासभो गर्दभ तव समझ जाता है कि यसम गदहा है । (८) प्रसिद्ध पद का सान्निध्य । 'इस सहकार वृक्षपर काकिल कूज रही हैं, इस वाक्य को सुनने वाला 'सहकार' पद का अर्थ न जानता हो तो भी कोकिल पद के अर्थ को जानकर समझ जाता है कि 'सहकार' आम है। शक्ति और लक्षणा के अतिरिक्त तीसरी वृत्ति 'व्यंजना' भी आलंकारिकों ने माना है पर नैयायिक इसे पृथक वृत्ति नहीं मानते ॥ नैयायियों के मत से प्रमाणों की संख्या चारही मानी गई है ।
न्यायप्रकाश। गौतम २.२.१ सूत्र में शंका उठाई है कि और दर्शनों में इन चार के अतिरिक्त मर्यापत्ति, ऐतिहा, सम्भव और भाव-ये चार और 'प्रमाण माने हैं। जब किसी मादमी को बिना रोगादि के मोटा देखा और साथही यह जाना कि यह आदमी दिन को नहीं खाता तो इससे यह मालूम हो जाता है कि यह रातही में खाता है। इसी ज्ञान के कारण को अर्थापत्ति प्रमाण माना है। जिस बात के बिना किसी देखी हुई या सुनी हुई यात-'अर्थ'-म 'कोई अपत्ति'- दोप-देख पड़ता हो उस बात का ज्ञान 'अर्थापत्ति ज्ञान' कहलाता है । किसने कहा सो ठीक नहीं मालूम है पर कोई बात लोगों में प्रसिद्ध हो जाती है-जैसे इस पेड़ में भूत रहता है-इसको लोगों ने 'ऐतिह्य' माना है। किसी चीज में उनके टुकड़ों का रहना जिस प्रमाण से माना जाता है जैसे सेर में छटांको का होना इत्यादि-उसको 'संभव' प्रमाण माना है । 'यहां पर अमुक वस्तु नहीं है। यह ज्ञान जिस प्रमाण से होता है उसको 'प्रभाव' प्रमाण . माना है। अफसर लोगों ने लिखा है कि नैयायिकों ने इन प्रमाणों को नहीं माना है। जिन उपायों से किसी तरह का यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो उनको न्यायप्रिय नैयायिक प्रमाण न माने यह कय हो सकता है। इन चारों से जब कभी यथार्थ शान उत्पन्न होगा तब ये 'प्रमाण' अवश्य हैं। पर मीमांसक वेदान्ती तथा पौरा- णिको से नैयायिकों का भेद इतना ही है कि इन्हों ने इनको अपने कहे हुए चार प्रमाण ही में अन्तर्गत माना है । अर्थापात्री एक तरह का व्यतिरेक-अनुमान ही है । प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष का शान किसी नियत सम्बन्ध द्वारा जो होता है वही अनुमान है। मर्यापत्ति में भी आदमी का मोटा होना प्रत्यक्ष है इससे रात को खाना जो अप्रत्यक्ष है उसका ज्ञान होता है। जय प्रादमी मोटा है तय खाता जरूर है यह खाना क्या रात को हो सकता है या दिन में-दिन में यह नहीं खाता है तो निश्चय है कि रात में खाता है-यह एक तरह का अनुमान ही हुमा । ऐतिय से जो शान होता है सो यथार्थ त्या सत्य तभी होगा जब इसका प्रथम कहने- घाला कोई विश्वासपात्र अदमी होगा । और ऐसी दशा में यह ७२ न्यायप्रकाश किसका त्याग । फिर इनफे प्रसंग जो मिथ्याशान है उनको वह दूर करता है। इस तरह भज्ञान तथा मिथ्याज्ञान के दूर होने से अपवर्ग रूप परम पुरुषार्थ प्राप्त होता है । जितने पदार्थ गौतम ने प्रथम सूत्र में दिखाये हैं-जिनके शान से परम पुरुषार्थ कहा गया है-वे सब 'प्रमेय' में अन्तर्गत हैं। प्रमेय ही के ज्ञान से अपवर्ग होता है, ऐसा भाष्य में (पृ.२) स्पष्ट कहा है। प्रथम में पदार्थो का उस क्रम से परिगणन किस्त मतलब से है सो इस ग्रंथ के आरम्भ में विचार किया गया . . है। आत्मा। । 4 मात्मा सव का द्रष्टा, सब का भोक्ता, सब का जानने वाला, सय का पाने वाला है-ऐसा भाष्य (पृ. २३) में लिखा है। इसका अर्थ वाचस्पति मिश्र ने तात्पर्यटीका ( पू. १४१) में यों किया है- 'सव का द्रष्टा'--सुख और दुःख देनेवाली जितनी चीजें हैं उनका देखनेवाला । 'सघ का भोक्ता'-सब सुख दुग्न का भोगने वाला। 'सवका जानने वाला' जितनी चीजें है सब सुख दुःख देती हैं भोर मात्मा ही कुल सुख दुःख का भोग करता है. इससे मात्मा सय चीज़ों का जानने वाला कहलाता है । 'सब का पाने वाला'--जब तक कोई चीज़ पाई या पहुँची नहीं जाती, तब नक उसका ज्ञान नहीं हो सकता, इससे सब का जानने वाला आत्मा सव का पाने वाला कहलाता है। ऐसा आत्मा है । अब यह सन्देह उठता है कि मात्मा को हम प्रत्यक्ष देख नहीं सकते--तो क्या आत्मा है सो हमको फेवल भाप्तोपदेश चेद ही के भरोसे पर मानना होगा या इसमें और भी कोई प्रमाण हो सकता है। गौतम ने १।१ । १० सूत्र में कहा है कि आत्मा है यह बात अनु. मान से सिद्ध होती है । ऐसा मत भाष्यकार का है। पर न्याय मञ्जरीकार से लेकर नवीन नैयायिकों तक सभी आत्मा को प्रायः प्रत्यक्ष भी मानते हैं। न्यायमञ्जरी (पृ.३३-३४) में कहा है वृद्धों के न्यायमका। मत से आत्मा अनुमेय है, प्रत्यक्ष नहीं। इससे यदि ऐसा मान भी लें तो हानि नहीं। पर असल में मात्मा का प्रत्यक्ष ही मानना ठीक समझ पड़ता है। क्यों कि जितने ज्ञान होते हैं उन सभों में मात्मा भी ज्ञातारूप से भासित होता है-ऐसा भाष्यकार का मत है। इससे यदि प्रत्यक्ष ज्ञान में आत्मा भासित होगा तो फिर इस का प्रत्यक्ष ज्ञान क्यों न माना जाय? फिर आज हम एक चीज़ को देखते हैं, फिर चार दिन के बाद उसी चीज़ को देखते हैं तो हमको ऐसा ज्ञान होता कि है 'उस दिन जिस चीज़ को हमने देखा था उसी को मैं माज देखता हूं' । प्रत्यक्ष और इस प्रत्यभिज्ञान में दोनों दिन का देखने वाला भी भासित होता है। इससे मां आत्मा का प्रत्यक्ष शान मानना उचित समझ पड़ता। इसी मत का स्वीकार करके नवीन नैयायिकों ने वैशेपिक मत के अनुसार आत्मा का इन्द्रियों का 'अर्थ' माना है। इसका प्रत्यक्ष किस इन्द्रिय से होता है ? इसके उत्तर में नवीन नैयायिकों ने मन को एक इन्द्रिय माना है। मन ही से मात्मा और सुख दुःख का प्रत्यक्ष शान होता है। इच्छा-उप-प्रयत्न-सुख-दुःख-शान ये ही आत्मा के भनुमान के साधन चिन्ह हेतु-माने गए हैं । जब कोई आदमी कई चीजों को देख कर इनमें कौन दुःख देती है कौन सुख इसका विचार करता है तो सुख देने वाली चीज़ मुझको मिले, ऐसी ममिलापा उसके मन में होती है।' इसीको 'इच्छा' कहते हैं। यह इच्छा उसी को हो सकती है जो चीजों को देने मोर उनका विचार करै । चीजों का देखने वाला मात्मा ही है। इससे जहां इच्छा है वहां की चीजों के देखने वाले प्रात्मा का अनुमान • हो सकता है । (२) इसी तरह यदि किसी चीज़ से द्वेष हो तो 'मुझे वह चीज नहीं मिले ऐसी अभिलापा भी चीजों के देखने वाले ही को हो सकती है। इस से द्वेष से भी मात्मा का अनुमान होता है। (३)प्रयल या व्यापार दो तरह का होता है। किसी चीज को ग्रहण करने का अथवा उसे त्याग करने का । ग्रहण उसी वस्तु का किया जाता है जिससे ग्रहण करने वाले को सुख की भाशा हो और वही चीज त्यागी जाती है जिससे उसको दुख का डर हो । .
७६ न्यायमका। का भागी कोई एक चिरस्थायी वस्तु है। वही वस्तु मारमा । (सूत्र ३१४)। (३) किसी चीज़ को दाहिने हाथ से एक समय किसी ने छना। फिर थोड़ी देर के बाद बायें हाथ से उसी चीज़ को छुकर वह यह जान लेता है कि यह वही चीज है । यदि इन्द्रिय ही छूने वाली शाता होती तो दोनों वस्तु की छूने वाली तो इन्द्रिय एक नहीं थी फिर यह पहचान कैसे होती ? इससे सिद्ध होता है कि इन्द्रिय के दो रहने पर भी असल ज्ञाता-छुने वाला एकही है। वही एक आत्मा है । ( सूत्र० ३।१।७)। दोनों हाथ मिल कर एक ही 'स्पर्श' इन्द्रिय है या दोनों आँख मिल कर एकही 'चक्षु' इन्द्रिय है ऐसा नहीं माना जा सकता क्योंकि यदि ऐसा होता तो एक हाय कट जाने से वा एक मॉख के गिर जाने से वे इन्द्रिय एक दम नष्ट होजाती और एक हाथ या एक ऑष से कुछ काम नहीं हो सकता। (४) जब मैं पका नाम देखता हूं तब उसके स्वाद का स्मरण होता है और मुंह में पानी भर माता है । अर्थात् देखी गई चीड पक इन्द्रिय-ऑख-से और उसका विकार हुआ दूसरी इन्द्रिय- जिह्वा-में । इससे भी शात होता है कि दोनों इन्द्रियों के द्वारा जो ज्ञान हुआ है-माज का फल देखना और पहिले कभी फल खाना इत्यादि सव का ज्ञाता एकही है। (सूत्र २०१२ ) यदि यह कहा जाय कि एकही चीज का नाना प्रकार का ज्ञान-स्मरण इत्यादि मन के ही माने जा सकते हैं. इनसे प्रात्मा की सिद्धि नहीं होती तो इसके उत्तर में सूत्रकार ने (सू०३।१ । १७) कहा है कि अभी मेरा इतना ही कहना है कि कुल ज्ञानों का ज्ञाता' कोई एक है। यदि उसका नाम माप'आत्मा ही कहें तो मेरी कुछ हानि नहीं । एक ज्ञाता सिद्ध हुमा उसी ज्ञाता को हम 'प्रात्मा कहते है। इन हेतुओं से बौद्ध मत का तो खंडन हुमा । अर्थात् क्षणभङ्गी मात्मा नहीं है सो सिद्ध हुमा । चा कों ने तो जन्म से मरण तक एक अनुभविता और स्मर्तामाना है। इस मत से प्रात्मा मरण के बाद नहीं रहता मरण ही से उसका नाश होजाता है। इसके विरुद्ध , न कह कर 'मन' 1 - womantat न्यायप्रकाशा --- 1 मात्मा का नित्यत्व-जन्म जन्मान्तर रहना-१ से लेकर २७ सूत्र तक सिद्ध किया है। (५) जब वालक का जन्म होता है तो थोड़े ही दिनों में-जय तक कोई भी सुख या दुःख का कारण उपस्थित नहीं होता तभी उसको सुख दुःख हर्ष शोक होने लगता है। चारही दिन का घालफ विछौने पर पड़ा पड़ा इंसता है। इंसना विना खुशी के नहीं हो सकता । यह खुशी कहाँ से आई ? इस जन्म में तो कोई खुश होने का कारण अभी तक हुआ ही नहीं । इससे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि पहिले जन्म में जो कुछ खुशी की बातें उसके मनुभव हुई हैं उन्हीं के संस्कार वा पासना के बल से स्मरण उसको होता है और इसी से वह हंसता है । इससे यह सिद्ध होता है कि कोई वस्तु जो इस बालक के शरीर में है उसका पहिले भी जन्म होगया है और उस वार के जन्म के शानों का स्मरण इसको भव हो रहा है। शरीर इन्द्रियादि तो यह वस्तु नहीं हो सकते । इससे इनके अतिरिक्त कोई स्थायी वस्तु है, यह मानना पड़ेगा। (सत्र ३।१।१९.)। इसका संक्षेप न्यायमंजरी में यों कहा है (पृ.४७०) न 'तस्मान्मुसविकासस्य हो, हर्पस्य च स्मृतिः । 'स्मृतेरनुभयो हेतुः, स च जन्मान्तरे शिशोः ॥ (६) फिर जन्म होते ही बालक को दूध पीने की प्रभिलापा होती है। यह अभिलापा तभी हो सकती है जब पहिले इसका दूध पीने का अभ्यास रहा हो। इससे इस बालक के शरीर में ऐसी वस्तु का होना सिद्ध होता है जिसका पहिले भी जन्म हुमा है और वही पूर्व जन्म की बातों का स्मरण करके दूध पीने की इच्छा करता है। यही वस्तु मात्मा है। (सुत्र,३११।२२।। प्रवृत्तिमात्र के प्रति इष्टसाधनताशान कारण हैं । घालक की स्तनपान में प्रवृत्ति के प्रति भी जन्मान्तरीय इएसाधन शान कारण मानना पड़ता है। तादृश ज्ञानाश्रयरूपेण मात्मा द सिद्ध होता है। (७) हम देखते हैं कि जिस मादमी को राग बिलकुल नहीं है हो सका जन्म नहीं होता-जिसका राग है उसी का जन्म होता ज महो - - प्रतएव भ न्यायप्रकाश है । अर्थात् जन्म होने के पहिले किसी चीज की कामना जब होता है तभी उस कामना की पूर्ति के लिए जन्म होता है। इससे कामना चाले जन्म के पहिले कोई या-और वह अपने मागे के अनुभावों को स्मरण करके ही सुखदायी वस्तुमों की फामना करता है-यह अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा । इससे भी भात्मर का पुनर्जन्म सिद्ध होता है। (३।१।२५) (८) फिर हम यह भी देखते हैं कि जितने मनुप्य संसार में है उनके स्वभाव में, अवस्था में, बड़ा भेद है। कोई सुशील सदाचारी है-कोई दुष्ट और दुराचारी ई-कोई गरीव है और कोई धनी है. इत्यादि । इस भेद 'का कारण क्या है ? पूर्व जन्म में जो कर्म किए गए हैं उन्हीं के कारण इस जन्म के स्वभाव अवस्था इत्यादि होते है। इसको छोड़ और कोई कारण इस भेद का नहीं हो सकता एक ही काल में उत्पन्न हुए यमज भाइयों के स्वभाव में और धन लाभ आदि में बड़ा भेद होता है । यद सब बिना पूर्वजन्म कृत कर्मों के माने नहीं ठीक समझा जा सकता। इसके विरुद्ध प्रायः यह कहा जायगा कि सब से पहिले जो संसार हुआ होगा उसमें आत्मामों में भेद कैसे हुमा-उसके पहिले तो कोई जन्म नहीं था फिर मात्मामों के किन कर्मों के फल चे भेद हुए होंगे । इसका समाधान यह कहा जाता है कि यह संसार चक्र अनादि चला आता है। सृष्टि का मादि जो शास्त्रों में वर्णित है सो प्रति कल्प की सप्टिका मादि है। इससे कल्पादि में जो भेद है सो पूर्व कल्प के कर्मों के फल से होते हैं। ऐसा ही कल्प कल्पान्तर से सम्बद्ध अनुस्यूत एक मात्मा है सो सिर होता है। जो मात्मा अच्छा काम करता उसको उससे धर्म होता है, जो बुरा काम करता है उससे अधर्म होता है । यही धर्म अधर्म चीज की तरह मात्मा में लगे रहते हैं मौर मागे जाकर इसी जन्म में या मागे के जन्म में इन्हीं घीजों के फल सुख दुखः सुशीलता दुस्वभाव इत्यादि होते हैं। यदि जन्म जन्मान्तर में वर्तमान एक आत्मा नहीं होता तो ये बीज रूप म अधर्म कहां रहते और इनका फल उन आत्मा ही को कैसे होता जिन्होंने वैसे कर्म किए होंगे। (न्यायमञ्जरी) पृ.४७ १-४७३ .
न्यायप्रकाशा ७६ . त मात्मा के कई जन्म होते हैं यह जिन हेतुमों से सिद्ध होता है उन्हीं से यह भी सिद्ध होता है कि आत्मा नित्य है । अर्थात् जैिसे इस जन्म की बातों से इससे पहिले का जन्म सिद्ध होता है वैसेही इस जन्म में हुई पातों से अग्रिम जन्म सिद्ध होगा। क्योंकि जन्म न होगा तो इस जन्म के किए हुए कर्म का फल कब होगा? जन्म लेने वाले के पूर्व जन्म के किये हुए फर्मों ही के अनुसार जय जन्म सिद्ध हुमा तय आत्मा नित्य है सो भी सिद्ध होता है। इस सब का संक्षेप तात्पर्य यह है कि चीजों का देखने वाला मौर उनका स्मरण करने वाला कोई एक ही वस्तु है यह अवश्य मानना पड़ता है । यह एक वस्तु ऐसी होगी जो कि देखने के समय से लेकर स्मरण के समय तक अवश्य स्थिर रहेगी। कभी कभी ऐसा देखा जाता है कि बीस पचीस बरस पहिले की देखी हुई चीज़ का माज स्मरण होता है। इससे यह एक वस्तु परसों तक स्थिर रहने वाला अवश्य होगा। यह एक वस्तु थरीर नहीं हो सकता क्योंकि शरीर दस बीस बरस तक एक नहीं बना रहता। यह इन्द्रिय भी नहीं हो सकता क्योंकि एक इन्द्रिय की देखी हुई चीज दूसरे इन्द्रिय से नहीं अनुभूत हो सकती है। देखा हमने मांस्त्र से, फिर दस बरस बाद स्मरण करेंगे दूसरे इन्द्रिय ही : से, ऐसा नहीं हो सकता। इससे अनुभव और स्मरण दोनों का { करने वाला इन्द्रिय नहीं हो सकता। (तात्पर्यटीका, पृ. १४२) श्रात्मा अनेक है। वेदान्तियों की तरह नैयायिकों ने मात्मा को एक नहीं माना है । यह न्यायमंजरी ( पृ. ५२६) में स्पष्ट कहा है । मोर सूत्र १११।१० से भी स्पष्ट सूचित होता है । जय इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख दुःख और ज्ञान ये ही आत्मा के चिह्न है, येही इसके गुण है, तो फिर एक मात्मा कहां से होगा ? इच्छा द्वेष इत्यादि तो अलग पाये जाते हैं। हम इच्छा करते हैं कि मिठाई साय, मेरा मित्र खटाई खाने की इच्छा करता है। मुझे सुन है, मेरे मित्र को दुःख है । इन सब बातों से यह स्पष्ट है कि आत्मा अनेक है । इसी से नैयायिकों का मत है कि मात्मा अनेक है, यह यात प्रत्यक्ष सिद है। जो श्रात्मा संसार कोरचता है वह ईश्वर है। इसका निरूपण + न्यायप्रकाश - गौतम ने चतुर्थ अध्याय के प्रथम आहिफ में किया है। ईश्वर या ब्रह्मा के शरीर ही से जगत् की उत्पत्ति है या स्वत- न्त्र ईश्वर ही संसार का कारण है, इन दोनों पक्षों का २० सूत्र तक खंडन करके २६ सूत्र में गौतम ने अपना सिद्धान्त बतलाया है। परन्तु जिस ढंग से ये सूत्र पाए जाते हैं उससे सूचित होता है। कि यह सिद्धान्त गौतम का नहीं है । मतान्तरों में इस मत का निरूपण पाया जाता है । और इन मतान्तरों को भाष्यकार ने 'प्रवादुकानाम्प्रवाद' कहा है । यद्यपि वार्तिककार कहते हैं कि यह सिद्धान्त गौतम का ही है । इस मत का सारांश यह है। ईश्वर जगत् का निमित्तकारण है । परन्तु स्वतन्त्र नहीं । संसार में जन्म लेने वाले जितने जीव हैं उनके पहिले के कर्मों के अनुसार ईश्वर संसार में पदार्थों को उत्पन्न करता है। जब जीवों के धर्म के फल के भोग का समय आता है तो उनके सुख के अनुकूल पदार्थों को मौर जब अधर्म के फल दुःख के भोगने का समय माता है तब दुःख देने वाले पदार्थों को, ईश्वर उत्पन्न करता है । ईश्वर का ज्ञान केवल मागम से होता है, प्रत्यक्ष अनुमान तथा शब्द इन प्रमाणों से ईश्वर मतीत है। वह इन प्रमाणों से नहीं जाना जा सकता। इससे ईश्वर का मस्तित्व स्थिर करना असम्भव है, ऐसा भाग्य में लिखा है (पृ-२०१) परन्तु वार्तिक में कहा है कि ईश्वर है, इसमें यही प्रमाण है कि प्रकृति या परमाणु सब अचेतन है। इससे इनका पहिला व्यापार बिना किसी चतन की प्रेरणा से नहीं हो सकता, विनाचेतन की प्रवृत्ति पदि रहे भी तो ऐसी प्रवृत्ति परायर होती ही रहेगी, होगी कभी नहीं ऐसा नहीं हो सकेगा। इनके व्यापार के बिना कोई चीज बनही नहीं सकती। इसी से यह सिद्ध हो गया है कि प्रकृति या परमाणु, जो कुछ संसार का समवायिकारण माना जाय, इनफा प्रवर्तक कोई नित्य ज्ञान क्रियाशक्ति वाला चेतन अवश्य है। इसी का नाम ईश्वर है। जीव मात्मा ही का ऐसा प्रवर्तक नहीं मान सकते क्योंकि यदि ये प्रवर्तक होत तो ये अपने को दुःन देने वाले पदार्थों को नहीं उत्पन्न होने देते। जीयों के धर्म अधर्म के अनुसार ईश्वर सृष्टि करता है । इस पर एक शंका यह होती है कि ईश्वर का व्यापार क्यों होता है । -- कभी , न्यायप्रकारा। किसी प्रयोजन, किसी मतलये ही से चेतन की प्रवृत्ति होती है।ईश्वर को तो किसी बात की माकांचा नहीं हो सकती जिसके पूर्ण करने के लिये उसका व्यापार होता, फिर ईश्वर किस मतलव से सृष्टि करता है । इसका समाधान वाचस्पति मिश्र ने यह किया, है कि जगत् की सृष्टि करने में ईश्वर का स्वार्थ कारण नहीं है, दूसरे जीवों के ऊपर कृपा करके ही वह सृष्टि करता है। इस पर, '. यह शंका हो सकती है कि यदि कृपा ही से मुष्टि होती तो संसार में फिर सुखही सुख होता, दु:ख कमी नहीं होता । . इसका उत्तर यह है कि धर्म से सुख अधर्म से दुःख, इस न्याय का उबटना ईश्वर का काम नहीं है । जो अधर्म करेगा उसको दुस्ख अवश्य होगा। इसका कारण इतना ही है कि जो जैसा धर्म अधर्म कर माया है उसी के अनुसार सुख दुःख वह भोग करेगा । कम या बेशी नहीं । इसी से सृष्टि के आरम्भ ही में ईश्वर का व्यापार होता है, ऐसा मानना भ्रम है। नित्य हर दम ईश्वर का व्यापार हो रहा है (बार्तिक पृ०४७१)। जीव मात्माओं की तरह ईश्वर में भी संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, बुद्धि, इच्छा, प्रयत्न ये सब गुण हैं । भेद रतना ही है कि जीवात्मामों में ये सब गुण भनित्य हैं, ईश्वर के नित्य । जीवात्माओं में अधर्म, महान, प्रमाद इत्यादि दोप घतमान हैं और ईश्वर में ये नहीं है। ईश्वर में धर्म, ज्ञान समाधि मोर मणिमा लधिमा महिमा इशिता इत्यादि गुण हैं। जीवात्मामों का ज्ञान बुद्धि भनित्य है, ईश्वर के नित्य हैं। ईश्वर के गुण के विषय में' न्याय मंजरी ( २०१) में यो लिखा है- ईश्वर सर्वज्ञ है, उसका ज्ञान नित्य है, सभी इसके प्रत्यक्ष ही नित्य हैं, सकल विषय में ईश्वर का ज्ञान. एकही है, दुःख द्वेष संस्कार को छोड़ और सघ मात्मा के गुण ईश्वर में हैं, पर सभी नित्य है। धर्म इनमें है सो मान लेने में कुछ हानि नहीं है। सुख नित्य है, इच्छा भी नित्य है प्रयत्न और ज्ञान भी नित्य है। ईश्वर का शरीर नहीं है (पृ०.२०२)। इससे आत्मा के जितने अच्छे गुण हैं सभी ईश्वर में हैं । इसी से ईश्वर को एक मात्मा-विशेष माना है।
न्यायप्रकारा।
ईश्चर में मी धर्मही के भाव से अणिमादि मनित्य गुण
हैं-ऐसा भाष्यकार ने कहा है (पृ० २०१) पर वाचस्पति
मिश्र कहते हैं कि वास्तव में ईश्वर के धर्म अधर्म नहीं है, उनकी
जितनी क्रिया होनी है सब उनकी ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति के
प्रभाव से और ये दोनों शक्तियां नित्य हैं । वार्तिक (पृ०४६८)
में लिखा है कि ईश्वर को धर्म नहीं है। ईश्वर के शान और इच्छा
भव्याहत हैं।
- न्यायप्रकाशा ८३ दूसरा प्रमेय-शरीर मात्मा का जन्म मनादि है और घराबर होता जायगा ऐसा कह माये हैं । जन्म तभी होता है जब मात्मा को किसी शरीर १ से सम्बन्ध होता है । अर्थात् शरीरग्रहणही जन्म है। शरीर का ग्रहण भी पूर्व जन्म में किये हुए कर्मों के द्वारा मुख या दुःख के भोगने ही के लिये होता है। फिर आत्मा के जितने सुख दुःस्त्र होते हैं सब. इन्द्रियों ही के द्वारा और ये इन्द्रियां शरीरही में रहते हैं । इससे शरीरही सब सुखों का और दुःखों का निदान है। इसी से भात्मा के अनन्तर दूसरा प्रमेय 'शरीर घतलाया गया है। शरीर क्या है, इसके क्या लक्षण हैं, इत्यादि विचार गौतम ने १।१ । ११ और ३।१ । २८, सूत्रों में किया है। चेष्टा इन्द्रिय और अर्थ के आश्रय या माधार को शरीर कहते हैं । जिस पदार्थ से सुख होने की आशा है उसके लेने के लिये, और जिस पदार्थ से दुःख की सम्भावना है, उसको दूर करने के लिये जो मनुष्य व्यापार करता है उसी को 'चेष्टा कहते हैं । सुत्र तथा भाष्यकार ने ऐसा ही कहा है। यह लक्षण प्राणी मात्र के शरीर में तो लगता ही है, वृक्षादि में भी लग सफता है, क्योंकि वृक्ष में भी इस तरह के व्यापार पाए जाते है। जिस तरफ धूप रहती है उस तरफ वृक्ष अधिक फैलता है। लता के पास एक खूटा गाड़ दीजिये तो कुछ हटी हुई भी बता उस पर चढ़ जायगी। इससे यह ज्ञात होता है कि वृत्त यही समझ कर अपना शरीर उधर को फैलाता है कि उधर मुझे सुख मिलेगा। इससे सुख देने वाले पदार्थ के ग्रहण करने का व्यापार यहां भी पाया गया तो यह भी चेष्टाश्रय " शरीर" हुमा । पर वाचस्पति मिश्र ने (तात्पर्य पृ. १४७) साफ कहा है कि वृक्षादि के शरीर में यह लक्षण नहीं लगता क्योंकि उनका व्यापार सुसमाप्ति के लिये या दुःख हटाने के लिये नहीं होता, और यहां पर शरीर' पद का मनुष्यशरीर ही से मतलय है। वार्तिक में कहा है कि सूत्र ३।१।२८. में शरीर को 'पार्थिव (पृथिवी का यना हुमा) बतलाया है। यदि देवतामों के शरीर से . --- ग्यायप्रकापा मतलब होता तो ऐसा न कहते क्योंकि देवतामों के शरीर जल अग्नि वायु इत्यादि के भी होते है। शंकरमिश्र ने वैशेषिकसूत्रोपस्कार (४।२५) में कहा है कि असल में वृक्षों के भी शरीर है, परन्तु इनमें चेष्टा इन्द्रिय इत्यादि स्पष्ट नहीं देख पड़ते इससे इनका शरीर नही कहलाता। इन्द्रियों का माश्रय भी शरीरही है। इसका अर्थ वार्तिककार कुछ बचाकर करते है। प्राश्रय पद से यहां माधार नहीं लेते। क्योंकि शरीर माधार तभी होता जब वह इन्द्रियों का ममवायि कारण होता। और इन्द्रियो का तो कारण हो भी सकता है, परंतु मन और श्रोत्र ये दो इन्द्रियां नित्य माने गये है। इससे इनका कारण नहीं हो सकता । इससे शरीर को इन्द्रियों का माधार नहीं कह सकते । इसलिये 'शगर इन्द्रियों का माश्रय है ' ऐसा कहनं का यह मतलब है कि शरीर की अवस्थानों के अनुसार इन्द्रियों की अवस्था होती है जब शरीर पुष्ट होता है तब इन्द्रियां भी अच्छी दशा में रहती हैं और जय शरीर में हानि पहुंचती है तब इन्द्रियों में हास होता है । " जो आदमी देश काल मौर अपनी अवस्था के अनुसार पथ्याभाजन तैलमर्दन और कसरत से अपने शरीर को अच्छी दशा में रखता है उस मादमी की इन्द्रियां मधिक यलवान और शुर होती है उस पुरुष की अपेक्षा को कुपथ्य भोजन और मालस्य इत्यादि से शरीर को बुरी हालत में रखता है" (न्यायमञ्जरी। पृ० ४७५)। मर्थ का भी माश्रय शरीर है । यहां मर्थ पद स गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द विवक्षित है। इन्हीं के अनुभव से सुख दुःस होता है इससे ये अर्थ कहलाते है (सूत्र १ । १ । १४)-इसका भी माश्रय शरीर है । अर्थात इनसे जब इन्द्रियो का सम्बन्ध होता है उस सम्बन्ध से उत्पन्न सुख दुःख उसी आत्मा को होता है जिस का शरीर है। शरीर के रहने ही से रूप रस इत्यादि से सुख दु:ख होता है । शरीर न हो तो इन प्रों के रहते भी इनका अनुभव या उनसे सुस दुःख प्रात्मा को नहीं होता। इसी से शरीर रूप रस इत्यादि अर्थों का माश्रय कहलाता है। शरीर ही सब मुख दुःखों के अनुभव की जड़ है। इससे वह न्यायप्रकाश ।" . हेय है। मर्थात् यदि मनुष्य मुक्त होना चाहे तो उसका शरीर से छुटकारा पाना ही इष्ट होगा। क्योंकि सुख दुःख के भाग का घर ही शरीर है। यह जब तक है तब तक माग से छुटकारा नहीं। और जब तक भोग है तब तक मुक्ति असम्भव है। इसी लिये शरीर क्या है सो शान मुक्ति के लिये आवश्यक होता है। यह शरीर किन चीज़ों से बना है ? कुछ लोगों का मत है कि परीर पृथिवी जल वायु मग्नि प्राकाश इन पांचों भूतों से मिला कर राना है। शरीर में यदि पृथिवी का भंश नहीं होता तो इसमें गन्ध नहीं होता । यदि जल का अंश नहीं होता तो शरीर में जो माता देख पड़ती है सो नहीं होती, यदि घायु का अंश न होता तो श्वास प्रश्वास नहीं होता, यदि अग्नि का अंश न होता तो उष्णता वा मन्न का पचाना न होता, यदि मासाश का भंश न होता तो परीर के भीतर जो कहीं कहीं खाली है सो नहीं होता। शरीर की उत्पत्ति तो इसका किस कारण से होता है सोविचार सूत्र ४-२-११ में किया है। नैयायिकों का सिद्धान्त ऐसा है। अनेक मात्माओं में वर्तमान जो धर्म और अधर्म के संस्कार तिसके पीरपाक का अवसर-मर्थात् उन धर्म अधर्मों के फल भोगने का अवसर- :-जय आता है तब उस भोग के अनुकूल शरीर उत्पन्न करने की इच्छा ईश्वर को होती है। उसी इच्छा के प्रभाव से परमाणुओं में चलन पैदा होती है । इस चलन से परमाणुमों में परस्पर संयोग होकर. धणुक बनकर प्रसरेणुकार्दिक्रम से समय शरीर तयार हो जाता है। नैयायिकों के मत से शरीर पांच भूतों से नहीं बना है। सूत्र ३।१। २८२ में कहा है की शरीर पृथियी ही से घना है। मर्यात् शरीर केवल पृथिवी के परमाणुमो के मिलने से बना है। इनका कहना है कि शरीर यदि पृथियी और जब या भन्य भूतों के परमाणुओं के मिलने से घना होता तो इसमें गन्ध नहीं हो सकता । क्योंकि गन्ध पृथिवी ही में पाया जाता है। और जब दो तरह की दो गुण वाली चीजों के मिलने से कोई तीसरी चीज घनती है तो उन दोनों चीजों का जो प्रधान गुण है वह उस 'तीसरी चीज़ में नहीं पाया जा सकता। जैसे बाल । - 1 न्यायप्रकाश - - और पीला पानी अगर साथ मिलाया जाय तो पानी का रंग न तो लालही रहेगा और न पीला। एक तीसरी ही नारंगी का रंग उस जल में हो जायगा। इसी तरह यदि पृथिवी और जल पर- माणुनों के मिलने से कोई चीज़ बनती तो उस चीज में न तो गन्ध ही पाई जाती और न जल के गुण ही, एक विलक्षण तीसरा ही गुण उसमें होजाता । इसी तरह और भी किसी दो या अधिक भूतों के परमाणुमों के मिलने से जो कोई चीज़ पैदा होती तो उनमें इनके गुण जो शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध है इनसे विलक्षणही कोई गुण उस चीज में पाया जाता। परन्तु हम स्पा देखते हैं कि शरीर एक कठोर पदार्थ है और उसमें गन्ध एक प्रभान गुण है-इससे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि यह गरीर भवश्य ही ऐसे भूत के परमाणुमों के मिलने से बना है जिनमें कठिनता और गन्ध ये दोनों गुण हैं। ऐसा केवल पृथिवी भूत हैं। अब यह शंका होती है कि यदि शरीर पृथिवीपरमाणु से धना है तो शैत्य इत्यादि जलादि भूत के जो चिह्न इसमें पाये जाते हैं वे कहां से आए । इमका समाधान यह है कि यद्यपि शरीर प्राथवी के परमाणुओं से बना है और इसका समवार्यि कारण पृथिवीपरमाणु ही हैं, तथापि और चार भूत जल, वायु, भग्नि, आकाश भी इसमें सहकारी कारण होत है जमे दीवार मिट्टी ही की बनती है, मिट्टी ही उसका समवायि कारण है, परन्तु पानी चूना, इत्यादि भी उसमें सहकारी कारण होते हैं। शरीर पृथिवीपरमाणु से बना है इसमें श्रुति भी प्रमाण है। अग्निटोमयाग में जय पशु को मारते हैं तब उसके एक एक मंग को अपने अपनं समवायिकारण में लीन हो जाने के सूचक मन्त्र कहे जाते हैं। 'चक्षुरिन्द्रिय सूर्य में जाय' इत्यादि कद्द कर " शरीर तुम्हारा पृथिवी में लीन हो जाय" ऐसा कहते हैं। इससे स्पष्ट है कि गरीर का समवायिकारण पृथिवी ही है। एक एफ आत्मा का अधिष्ठानरूप शरीर कैसे उत्पन्न होता है सो सूत्र २. २.६२-६३ के भाग्य में लिखा है। पूर्व जन्म में किये हुए कमों के अनुरूप शरीर उत्पन्न होता है। इस जन्म में जो मैं फर्म करता हूं उससे मेरी मात्मा में धर्म अधर्म रूप संस्कार उत्पन .
न्यायप्रकाश होता है इन्ही संस्कारों के द्वारा भगले जन्म में मेरा सुख दुःख होने वाला है, इसी से पैसे सुख दुःख भोगने के योग्य शरीर की उत्पत्ति इन्हीं संस्कारों के द्वारा होती है। इन्हीं संस्कारों के द्वारा पृथिव्यादि द्रव्य संघटित होते हैं, इन्हीं से मेरा दूसरा शरीर बनता है। प्रायः लोगों को ऐसा विश्वास है कि स्त्री पुरुष के संयोग से शरीर की उत्पत्ति होती है। परन्तु यदि ऐसा होता तो जय जय : पेसा संयोग होता तब तब हर चार शरीर उत्पन्न होता । पर ऐसा ..नहीं होता। इस लिये स्वीकार करना पड़ता है कि स्त्री पुरुष संयोग के अतिरिक्त अवश्य और कुछ कारण है। यह कारण शरीर ग्रहण करनेवाली भात्मा का पूर्व कर्म है। इसी के द्वारा शरीर बनता है (सूत्र ३,२,६८-६९)। फिर मगर केवल स्त्री पुरुप संयोग द्वारा पृथिव्यादि द्रव्य के मिलने ही से शरीर उत्पन्न होता तो सब मनुष्यों के शरीर एक ही से होते, सयों को एक ही तरह के रोगादि होते । पर ऐसा नहीं होता । ऐसे शरीर के स्वरूप या रोगादि भवस्था के भेद का कारण केवल पूर्वजन्म का फर्म ही हो सकता है (३, २७०)। इसी से भोग से पूर्व कर्मों का चय हो जाने से मुक्ति होती है, फिर शरीर उत्पन्न नहीं होता । तीसरा प्रमेय । - इन्द्रिय तीसरा प्रमेय इन्द्रिय है। इसका विचार इस लिये मावश्यक है कि इन्द्रियों ही के द्वारा सांसारिक सुख दुःख होते हैं। 'जन्म मरणादि इन्हीं के द्वारा होता है इससे ये देय है'-ऐसा विचार करते हुए मादमी को इनसे भौर इनके द्वारा उत्पन्न सुख दुःस्त्र से वैराग्य उत्पन्न होता है। यह घेराग्य मोक्ष-प्राप्ति में उपफार करता है (न्या. म. ४७७)। • इन्द्रिय नाम उन फरणों का है जो स्वयं किसी इन्द्रिय से बात न हों पर जिनके द्वारा उनके अर्थों का-रूप रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द मादि विषयों का ज्ञान होता है। (भाष्य-वार्तिक १।१।१२) । d न्यायप्रकारा। , ऐसे करण पांच है-(१) घ्राण, जिससे गन्ध का ग्रहण होता है (२) रसन, जिससे रस मर्थात् खट्ट मीठे इत्यादि का ग्रहण होता है। (३) चक्षु, जिससे रूप-रंग का ग्रहण होता है। (४) त्वक्, जिससे स्पर्श अर्थात ठंढे गरम का ग्रहण होता है। (५)श्रोत्र, जिससे शब्द का ग्रहण होता है। ये पांचों इन्द्रियां किसी एक ही भूत के परमाणुओं से नहीं बनती। यदि ऐसा होता तो पांचों एक ही तरह की, एक ही स्वभाव की, होती भौर सब एक ही चीज़ के ग्रहण के निमित्त-कारण होती। ऐसा देखा नहीं जाता। ये पृथक पृथक् पांच चीजों के ग्रहण के करण होती हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि जिस अर्थ के ग्रहण में जो इन्द्रिय करण होती है वह इन्द्रिय उसी भून से बनती है जिस भूत का वह अर्थ खास गुणवाला होता है। प्राणेन्द्रिय से गन्ध का ग्रहण होता है इस लिए यह इन्द्रिय पृथिवी से बनी है क्योंकि गन्ध पृथिवी ही में होती है। रसनेन्द्रिय जल से बनी है क्योंकि रस जल ही का खास गुण है। चक्षु तेज से बना है क्योंकि रूप तेज ही का खास गुण है । त्वक् वायु से बना है क्योंकि स्पर्य घायुही का खास गुण है। श्रोत्र आकाश से बना है क्योंकि शब्द माकाशही का खास गुण है। (सूत्र.१ १. १२) ये भूत पांच ही हैं। पृथिवी, जल, तेज (अग्नि), वायु और आफाश (सूत्र १।१।१३) । इन्हीं के गुण गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द है (१।१।१४) । घ्राणेन्द्रिय नाक में है, रसनेन्द्रिय जिला में, चतुरिन्द्रिय आंख में, त्वक, इन्द्रिय शरीर भर के चर्म में, और श्रोत्रेन्द्रिय कान के भीतर । इन्हीं इन्द्रियों के द्वारा सुख दुःख होते हैं । इससे सुख दुःख के कारण जो धर्म-अधर्म हैं ही इन्द्रियों के भी कारण होते हैं । जो मादमी धार्मिक है और उस धर्म के मनुसार सुख भोग करने वाला है उसकी इन्द्रियां सुख उत्पन्न फरनेवाली होती हैं। पापियों की इन्द्रियां दुःस उत्पन्न करनेवाली होती हैं। इन्द्रियों के विपय में मतभेद कई तरह के पाए जाते हैं। सांख्य फे मत से इन्द्रिय सहकार का विकार है अर्थात् महंकार ही से इन्द्रियां उत्पन्न होती हैं। नैयायिकों के मत से मन को न्यायप्रकाशे। . छोड़कर [ मतान्तर में श्रोत्रव्यतिरिक्त ] चारही इन्द्रियां भौतिक है अर्थात् पृथिव्यादि पांच भूतों से बनी हुई हैं । यौद्धों के मत से शरीर में जो प्रत्यक्ष गोलक देखा जाता है-जैसे मांख की पुतली-वही इन्द्रिय हैं, पर नैयायिकों के मत से जो अंग देखे जाते हैं वे इन्द्रियाँ नहीं है वे केवल इन्द्रियों के अधिष्ठान हैं। जैसे 'चक्षु' इन्द्रिय तेजस-आग का बना हुआ-पदार्थ है जो आंखों की पुतलियों में माश्रित है। इन के मत से इन्द्रियों का प्रत्यक्ष नहीं होता, ये मतीन्द्रिय हैं । इन्द्रिय पृषिव्यादि पांचों भूतों की यनी हुई है-इसका प्रमाण यह है कि हम देखते हैं कि पृथिवी के अतिरिक्त और कोई वस्तु गन्ध का व्यंजक नहीं होती है । पृथिवी से अलग कहीं गन्ध नहीं पाई जाती। इसी तरह जल से पृथक रस का ग्रहण नहीं होता । अग्नि से पृथक रूप का ग्रहण नहीं होता और आकाश से पृथक् शब्द का ग्रहण नहीं होता । पांचों भूत पांचों अर्थात गन्धादि के व्यंजक हैं । ये ही पांचों अर्थ घ्राण आदि इन्द्रियों से प्रतीत होते हैं । इससे यह सिद्ध हुआ कि जिस इन्द्रिय से गन्ध का प्रहण होता है वह गन्धव्यञ्जक भूत अर्थात् पृधिवी से बनी है। रस का ग्रहण करनेवाली इन्द्रिय रसव्यंजक भूत जल से बनी है-इत्यादि । ये मतभेद अमुलक नहीं हैं। आंखों की पुतलियाँ जब तक खुली रहती हैं तभी तक चीज देखी जाती हैं । इससे मालूम होता है कि पुतलियों में जो भौतिक पदार्थ देखा जाता है वहीं' चक्षु 'इन्द्रिय है। परन्तु साथ ही हम यह भी देखते हैं कि जो चीजें प्रास्त्रों से देखी जाती हैं वे आंखों से बहुत दूर रहती हैं। यदि इन्द्रिय भौतिक पदार्थ होती तो दूर की चीजों का ग्रहण कैसे कर सकती। इससे ज्ञात होता है कि यह इन्द्रिय एक ऐसी वस्तु का विकार है जो सर्वत्रगामी है। ऐसी ही वस्तु को सांख्य ने अहंकार माना है । यदि इन्द्रिय पृघिी आदि से धनी होती तो दूर की चीजों का ग्रहण कभी न कर सकती । सर्वत्रगामी यस्त का विकार इन्द्रिय है यह इससे भी सिद्ध होता है कि इन्द्रियों से बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी चीजों का प्रहण न्यायप्रका। झोता है-मांखों से हम पर्वत को भी देखते हैं और सरसो के दाने को भी । इन्द्रिय यदि भौतिक होती तो इन्द्रिय या तो बड़ी ही चीजों का ग्रहण करती या छोटी ही चीजों का । (सूत्र.३१ ११३१)। इसका समाधान नैयायिकों ने इस प्रकार किया है कि दूर की चीजें जो देगी जाती दै और जो बड़ी छोटी सब चीजें देखी जाती है इसका कारण यह है कि मांखों की ज्योति बाहर जा कर जिन जिन चीजों पर पड़ती है उनका ग्रहण मॉखों से होता है। इससे हर चीज़ के ग्रहण मात्र से यह नहीं सिद्ध होता कि इन्द्रिय सर्वगामी है या सर्वगामी वस्तु का विकार है। जय कोई चीज़ देखी जाती है तय आंखों की रोशनी बाहर जा कर उस चीज का प्रकाश करती है। यह यात इससे भी सिद्ध होती है कि जय ऑस्त्रों के सामने कोई भावरण आता है तब उस आवरण की दूसरी ओर की चीज़ नहीं देखी जाती। दीवार से छिपी हुई चीज़ नहीं देखी जाती । यदि इन्द्रिय सर्वगामी होती तो दीवार के भीतर भी जाती, उसका व्यापार दीवार से रुफ न सकता। भौतिक होने पर 'चतु' इन्द्रिय दूर की चीज़ों को कैसे ग्रहण कर सकती है इस प्रश्न का कोई उत्तर न होता यदि मांख की पुतलियां जो देखी जाती हैं वे ही 'चतु' इन्द्रिय होतीं। पर नैयायिकों के मत से ऐसा नहीं है। पुतलियों के भीतर एक सुक्ष्म तैजस पदार्थ ज्योतिस्वरूप है, वही 'चतु' इन्द्रिय है। यह तैजस पदार्थ प्रांखो से बाहर जा सकता है। इस से दूर की चीज़ों का ग्रहण अच्छी तरह हो सकता है। यदि कुल इन्द्रियां प्राप्यकारी होती, अर्थात उन्हीं चीज़ों का ग्रहण कर सकतीं जिन पर वे जाकर पड़ती हैं तो ऊपर कही हुई युक्तियां ठीक होती। पर इसमें मत भेद है। कुछ लोग कहते है कि रसन' 'स्पर्श' ये दो इन्द्रियां तो स्पष्ट प्राप्यकारी हैं। जब तक खाने की चीज़ जिह्वा में नहीं लगतीं तब तक रस का ग्रहण नहीं होता, इसी प्रकार जय तक चीज त्वचा से नहीं जाती तब तक उसके स्पर्श का ग्रहण नहीं होता। पर 'माण' से दूर की महक 'चतु' से दूर के रूप का और भोत्र से दूर क शब्द का - न्यायप्रकाश महण होता है। इससे ये तीनों इन्द्रियां अवश्य 'अप्राप्यकारी हैं। मर्थात् . इन इन्द्रियों से जिन चीज़ों का ग्रहण होता है इन्द्रियां उनके ऊपर जा कर नहीं पड़ती। नैयायिकों का मत ऐसा नहीं है। सामान्यतः हम यह देखते हैं कि जितने कारक हथियार है वे अपनी चीजों के ऊपर अवश्य जा कर पड़ते हैं। जय कुठार से लकड़ी काटी जाती है तब जब तक कुठार उस लकड़ी पर जाकर नहीं गिरता तब तक कटना नहीं होता। इन्द्रिय भी एक प्रकार का कारक-हथियार है। इसका भी अपने ग्राह्य वस्तु पर जाकर गिरना आवश्यक होगा। चतु, घ्राण, श्रोत्र यदि अप्राप्यकारी होते तो दीवार में छिपी हुई चीज़ों का रूप, दस बीस कोस का शब्द या गन्ध, ये सव भी इन्द्रियों के द्वारा प्रत्यक्ष गृहीन हो सकते । शिन्द आकाश में उत्पन्न होकर इन्द्रिय से जब सम्बद्ध होता है तभी उस शब्द का ग्रहण होता है। इसी तरह दूर की गन्ध भी वायु द्वारा जय शरीर के भीतर के पार्थिव इन्द्रियों में माकर लगती है तभी उस गन्ध का ग्रहण होता है। दूर के रूप का ग्रहण जन होता है तब मात्र के भीतर का तैजस पदार्थ बाहर जा कर उस रूप के ऊपर जा कर लगता है। आंखों की ज्योति बाहर जाती हुई कभी देखी नहीं जाती सो ठीक है। पर इससे यह नहीं सिद्ध होता कि ऐसी ज्योति है ही नहीं । जिसको हम प्रत्यक्ष नहीं देखते उसको अनुमान से जान सकते हैं । 'चतु' इन्द्रिय का तैजस ज्योतिस्वरूप होना अनुमान से सिद्ध है। प्राप्यकारी सब इन्द्रियां हैं, यह भी अनुमान से सिद्ध है । यह प्राप्यकारित्व तब तक नहीं. हो सकता जब तक मांख की ज्योति का बाहर निकलना न माना जाय । इससे यह भी मनुमान सिद्ध हुमा । मांख की ज्योति की किरणें नहीं देख पड़ती इसका कारण यह है कि वे किरणें उतनी तेज नहीं हैं जितनी बाहर की ज्योति । इसी से उनकी रोशनी दय जाती है। जैसे दोपहर दिन को लम्प की रोशनी फैलती नहीं देख पड़ती तो इससे यह नहीं सिद्ध होता कि वह रोशनी फैलती ही नहीं। उसकी रौशनी सूर्य की रोशनी से दब जाती है इसी से घई फैलती नहीं देखी जाती। (सूत्र.३।११३८) यह भी नहीं कहा जा सकता कि चक्षु इन्द्रियों से निकलती हुई , ४२ न्यायप्रकाश ज्योति कभी नहीं देखी जाती। क्योंकि वृपदंश जो एक प्रकार का जन्तु है वह जब अन्धकार में रहता है तब उसकी मांखों से निकली हुई रोशनी साफ देख पड़ती है। (मत्र ३१-४३) दीवार से घिरी हुई चीजों पर आंख की रोशनी नहीं जा सकती पर स्फटिक, शिला, पानी इत्यादि पदार्थों से ढकी हुई चीजों का रूप अवश्य देखा जाता है । इसका कारण यह है कि स्फटिकादि पदार्थ मांख की रोशनी को नहीं रोक सकते। ये रोशनी को नहीं रोकते यह बात हम साफ देखते हैं । जय सूर्य की ज्योति स्फटिक के ऊपर पड़ती है तब उसके भीतर भी वह ज्योति देख पड़ती है और उसकी दूसरी मोर भी। दर्पण में या जल में जो प्रतिविम्ब देख पड़ता है उसका कारण सूत्र ३।१ । ४६ में कहा है। यदि मांख की पुतली ही इन्द्रिय होती या 'चक्षु' कहलाती, अर्थात् जो देखी जाती हैं वही इन्द्रिय होती तो आंख में लगा हुमा अंजन क्यों नहीं देख पड़ता ? सम्बद्ध तो वह रहताही है। हमारे मत से तो मांख से जो रोशनी निकलती है वह मंजन के ऊपर ही ऊपर बाहर निकल जाती है। इससे मंजन का देखना सम्भव नहीं होता है । जब दर्पण आयों के सामने आता है तब मात्रा से निकली हुई ज्योति दर्पण पर जाकर गिरती है । दर्पण इससे स्वयं देख पड़ता है। परन्तु दर्पण का स्वभाव है कि उसके भीतर ज्योति नहीं जाती। इससे ज्योति उसमें लग कर फिर मुख की ओर लौट कर मुरा पर आ गिरती है, इससे मुख देखा जाता है । जिन जिन चीजों पर यह खौटती हुई रौशनी पड़ती है वे सब चीजें प्रतिविम्ब में देखी जाती हैं । इसीसे मुख के साथ साथ मकान, दीवार आदि के भी कुछ मंश दर्पण में देखे जाते हैं। चीजों का स्वभाव ऐसा क्यों है यह शंका नहीं हो सकती। जैसी जो चीज़ देखी जाती है, जैसा जिसका स्वभाव भनुमानादि प्रमाण से सिद्ध होता है वैसा क्यों है उस से दूसरे तरह का क्यों नहीं है यह शंका कोई बुद्धिमान मादमी नहीं कर सकता। [सूत्र०३।१।१०] इन्द्रियां पृथिव्यादि भूतों से बनी हैं क्योंकि जैसे पृथिवी, जल, घायु,माग, माकाश के गन्ध, रस, स्पर्श, रूप, शन्द खास गुण हैं वैसे न्यायप्रकाशा में ।" ही गुण क्रमशः धारण, रसन, स्वक, चक्षु, श्रोत्र इन्द्रियों से गृहीत होते हैं । घाण इन्द्रिय पृथिवी की बनी है क्योंकि गन्धादि पांचों गुणों में यह गन्ध ही का खास कर ग्रहण करती है रसन इन्द्रिय जल की है क्योंकि यह रस ही का ग्रहण करती है । स्वक् इन्द्रिय धायु की है क्योंकि यह स्पर्श ही फा ग्रहण करती है । चतु इन्द्रिय तेजस है क्योंकि यह रूप ही का ग्रहण करती है। श्रोत्र इन्द्रिय गाफाश की है क्योंकि यह शब्द ही फा ग्रहण करती है। [सू० ३।१।६०] इन्द्रिय एक है या नाना ? कुछ लोगों का मत है कि जितनी इन्द्रियां हैं सब शरीर में हैं और सभी इन्द्रियां त्वचा चमड़े-ही में पाई जाती हैं। आंख की त्वचा में 'चतु' इन्द्रिय-नाक की त्वचा घाण' इन्द्रिय इत्यादि। इस लिये एकही इन्द्रिय-'त्वक् ' मानना चाहिये, नाना इन्द्रियां मानने की कुछ आवश्यकता नहीं है । इसी एक इन्द्रिय से सय प्रत्यत्त ज्ञान होंगे [सूत्र-३ १-५१ ] ! नैयायिकों ने ऐसा नहीं माना है। इनका कहना है कि यदि एक ही इन्द्रिय होती तो जब हमको एक वस्तु का प्रत्यक्ष होता है तय उसकी सारी विशेषताएं प्रत्यक्ष हो जाती, जैसे जब हम मामके रंग को देखते उसी क्षण साथ ही हम को उस फल की महक, उसका स्वाद, उसकी ठंढक इत्यादि भी प्रत्यक्ष हो जाती। मात्मा के साथ मन का संयोग और मन के साथ इन्द्रिय से सम्बंध है ही, फिर रूपरस-गन्धस्पर्श सभी के प्रत्यक्ष होने में पया पाधा होती। परन्तु ऐसा नहीं देखा जाता । जब हम रूप देखते हैं उस समय गन्ध का ज्ञान नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि उस समय प्रात्मा और मन का सम्बन्ध उसी इन्द्रिय के साथ है जिससे रूप देखा जाता है, जिस इन्द्रिय से गन्ध का शान होता है उसके साथ उस समय सम्बन्ध नहीं है भर्थात् गन्ध की इन्द्रिय रूप की इन्द्रिय से पृथक् है (सूत्र ३.१.५३) । फिर यदि त्या ही एक इन्द्रिय होती तो जैसे दूर की वस्तु 'फा रूप देखा जाता है वैसे ही दूर की वस्तु का स्पर्श भी जाना जाता । मर्यात मांस्त्र और त्वक् यदि एक ही होती तो दूर की चीज़ की ठंढ़क या गरमी भी हम त्वक् से जान सकते। ऐसा न्यायप्रकाशा नहीं हो सकता। इससे भी सिद्ध होता है कि देखनेवाली इन्द्रिय स्व' नहीं हो सकती। (सु०३।१।१४)। . फिर यदि त्वक ही एक इन्द्रिय होती तो जिस मादमी की माने फूट गई हैं उसको भी रूप का ज्ञान होता, वह रूप देख सकता, क्योंकि त्वक तो उसके शरीर पर विद्यमान ही है। इन्द्रियों के 'अर्थ'-जिनका ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा होता है, पांच ही हैं जैसा सूत्र १।१।१४ में कहा है। इन पांचों विषयों के ग्रहण के लिये एक एक खास इन्द्रिय होगी, इसलिये इन्ही पांचो में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पांच विषय पृथक् पृथक् हैं । इनके ग्रहण के लिये भी ऐसीही पॉच पृथक् पृथक् इन्द्रियां अवश्य होगी। ये इन्द्रियां प्रत्यक्ष नहीं देखी जाती, शरीर के भीतर रहती हैं। पर इनके अधिष्ठान या आश्रय शरीर में पृथक् पृथक् देखे जाते हैं। जिस इन्द्रिय से स्पर्श का ग्रहण होता है उसका नाम 'स्व' है । यह समस्त शरीर में रहती है-समस्त शरीर से हमको गरम ठंढे का ज्ञान होता है। जिस इन्द्रिय से रूप का ग्रहण होता है वह पाख से बाहर निकलनेवाली ज्योति है। उसका नाम है 'चक्षु' । आँख के भीतर जो काली पुतली है वहीं ज्योति का अधिष्ठान है। गन्ध फा ग्रहण जिससे होता है वह 'घाण' है। उसका अधिष्ठान नाक है। रसका ग्रहण 'रसन' इन्द्रिय से होता है । यह जिला में है। शब्द का ग्रहण 'श्रोत्र' इन्द्रिय से होता है। यह कान के छिद्र के भीतर है। (भाष्य. पृ. १५) इन्द्रियों के व्यापार में भी फरक पाया जाता है। चक्षु इन्द्रिय मांस से बाहर जा कर अपने विषय का ग्रहण करती है, त्वक इन्द्रिय बाहर नहीं जाती,विषय हीमा कर उसमें लगता है । यदि एक ही इन्द्रिय होती तो व्यापार में ऐसा भेद न पाया जाता। या तो रूप रस आदि सब के ग्रहण में इन्द्रिय बाहर जाती या सष ही भाकर इन्द्रियों ही से मिलते। सांख्यों के मत में ग्यारह इन्द्रियां है-पांच ऊपर कही हुई। पांच 'कर्मेन्द्रिय' चाक-पाणि पाब-पायु-उपस्थ और मन । नैयायिका ने 'कर्मेन्द्रियां नहीं मानी है । शरीर के भिन्न भिन्न अंग भिन्न भिन्न १ न्यायप्रकाश। कार्य करते हैं इससे ये 'इन्द्रिय' नहीं कहला सकते । मन के प्रसंग भी सूत्रकार और भाष्यकार का मत तो ऐसा ही ज्ञात होता है कि मन 'इन्द्रिय' नहीं है। सूत्र (शराब) में 'इन्द्रिय' को तीसरा प्रमेय कहकर मन को छठा 'प्रमेय' बताया है। फिर १९०१२ सूत्र में स्पष्ट रूप से पांच ही इन्द्रिय बतलाये हैं। इसी से इनके 'अर्थ' भी १।१ । १४ सत्र में पांच ही बतलाये गये हैं। फिर भाष्यः (पृ. २७-२८ ) में स्पष्ट कहा है कि स्मृति-अनुमान-शब्द- संशय प्रतिभा-स्वप्न-ऊह-सुख, दुःख, ज्ञान, इतने तरह के शान का कारण 'मन' है। फिर 'मन' है इसके सबूत में १।१ । १६ सूत्र में युक्तियां दिखलाई हैं। अब इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि 'मन' इन्द्रिय माना जाय तो इसके द्वारा उत्पन्न जितने ज्ञान सब 'प्रत्यक्ष होंगे। क्योंकि ये ज्ञान भी 'इन्द्रिय के सन्निकर्पजन्य' वैसेही होंगे जैसे रूप-रस आदि का ज्ञान । फिर तो मनुमान-शाब्द सभी ज्ञान प्रत्यक्ष' हो जायंगे । इससे यद्यपि मन 'शान करण' है तथापि उसको इन्द्रिय कहना ठीक नहीं-ऐसा सूत्र भाष्य का तात्पर्य भासित है। 'न्यायमंजरी (पृ.४९७) में यों लिखा है । मन के इन्द्रिय होते भी सूत्रकार ने इसका इन्द्रियों में परिगणन नहीं किया क्योंकि इन पांचों से मन का बड़ा भेद देख पड़ता है। पांचों इन्द्रिय घ्राण मादि-भौतिक हैं और एक ही अर्थ गन्ध आदि का ग्रहण करा सकते हैं। मन भौतिक नहीं है-और सव अर्थों के ग्रहण में कारण होता है इससे इसको अलग कहा है। सूत्रकार ने मन को इन्द्रिय नहीं माना है । पर भाप्य (पृ. १९) में कहा है कि वैशेपिकों ने इसको माना है और सूत्रकार ने इसका निषेध नहीं किया है इससे उनका भी यह स्वीकृत है। भाष्यकार की पंक्तियों से एक प्रकार का सन्देह उत्पन्न होता है। परंतु वार्तिककार, (पृ. ४०) ने स्पष्ट कह दिया है कि मन इन्द्रिय है । मनको पांचों इन्द्रिय से अलग सूत्रकार ने कहा है. इसका कारण यह है कि इनमें उसमें बड़ा भेद है। वे एक ही एक ही अर्थ का ग्रहण करते है-मन सय प्रयों का प्रदगा करता है-इत्यादि। -- न्यायप्रकाश। . फिर (१।१।१६) सूत्र के भाग्य में स्मृत्यादि ज्ञान को 'भनिन्द्रियनिमित्त-इन्द्रिय से उत्पन्न नहीं-ऐसा बतलाया है। नवीन नैयायिको ने मन को छठां इन्द्रिय-मन्त्राह्य-माना है। धाचस्पतिमिश्र ने इसलिये भाष्य के 'अनिन्द्रियनिमित्त' पद का मर्थ 'मवाद्येन्द्रियनिमित्त' घतलाया है । इनके ऐसा मानने का कारण ऐसा है। सुख दु:ख के ज्ञान को प्रत्यक्ष माना है, नवीन नैयायिकों ने मात्मा के ज्ञान को भी प्रत्यक्ष माना है-फिर जिस करण के द्वारा इनका ज्ञान होता है वह 'इन्द्रिय अवश्य होगा । नहीं तो फिर 'सुखदुःखशान' इन्द्रियार्थसन्नि. कर्पजन्य कैसे होगा। इससे जो लोग मन को छठां इन्द्रिय मानते है वे इसका लक्षण 'सुखदुःखोपलब्धिसाधन' । ऐसा करते हैं। और जैसे रूपोपलब्धिसाधन चक्षु को भांख के भीतर बतलाते हैं वैसाही हृदय के भीतर मन इन्द्रिय को बतलाते हैं। मात्मा को प्रत्यक्षगम्य मानने से मन का इन्द्रिय होना अवश्य मानना पड़ता है । (तर्कभाषा पृ.१।१०१६) प्राचीन नवीन दोनों मत को मिलाकर न्यायमंजरी (पृ. ४८०) में कहा है- न्यूनाधिकत्वरामनादत इन्द्रियाणि पंचव वाह्यविषयग्रहणक्षमाणि । मन्तःसुखादिविषयग्रहणोपयोगि षष्ठम्मनस्तु कथयिष्यति सूत्रकारः । इसका तात्पर्य यह है कि सूत्रकार ने जो पांच ही इन्द्रिय घतलाया उसका अर्थ यह है कि बाहरी वस्तुमों के ज्ञान के कारण पांच ही इन्द्रिय हैं। परन्तु सुख दुःखादि जो भाभ्यन्त. रिक-भीतर की चीजें हैं इनके ज्ञान का कारण इन्दिय मन है । - चौथा प्रमेय 'अर्थ' है। अथाही के भोग से सुपा दुख होते हैं इन्हीं अर्थों के द्वारा राग द्वेष होता है और गग द्वेष है। संसार का मुख्य कारण है-इससे संसार से बचने के लिये सके यथार्थ स्वरूप का शान आवश्यक होता है। पांचों इन्द्रियों के वि- पय जिनका शान पांचों इन्द्रियों से होता है 'मर्थ' कहलाते है। ये न्यायप्रकाशा ६७. पांच है।-रूप-रस-गन्ध स्पर्श-शब्द । इनमें रूप, तेज या भग्निका गुण, 'चतु' इन्द्रिय का अर्थ है। रस, जल का गुण, रसन इन्द्रिय का अर्थ है । गन्ध, पृधिची का गुण, 'माण इन्द्रिय का अर्थ है। स्पर्श, वायु का गुण, 'त्यक्' इन्द्रिय का अर्थ है । और शब्द, माकाश.का गुण, 'धोत्र' इन्द्रिय का अर्थ है। (सूत्र १.१.१४) गन्ध-स्पर्श-रूप-रस-ये चार गुण पृथिवी के हैं । रस-रूप-स्पर्श-जल 'मैं, रूप स्पर्श तेज में, स्पर्श वायु में, शब्द-माकाश में । ऐसा घूत्र । ३११-१२ में कहा है। इसके विरुद्ध सूत्र ६३.६४, ६५ में ऐसी शंका की गई है। "पृथिवी का गुण गन्धही है क्योंकि इन पांचों अर्थों में से गन्ध क्षी का व्यजक यह होता है। अर्थात् पृथिवी की बनी हुई चीजों में विशेषतया गन्ध ही गृहीत होता है । इसी तरह जल में विशेषतया रस-मग्निमें रूप-माकारा में शब्द गृहीत होता है। यद्यपि पृथिवी की धनी हुई चीजों में रस स्पर्श भादि भी गृहीत होते हैं जैसे मिट्टी के टुकडे में भी स्वाद होता है-वह ठंढा या गरम शात होता है तथापि ये गुण रस या स्पर्श पृथिवी के नहीं है, किन्तु उस चीज में पृथिवी से मिले हुए जो और भूतजल और वायु हैं-उन्ही के ये गुण हैं। अर्थात् मिट्टी के टुकड़े में जो जल मिला हुमा है उसी से उसमें स्वाद भासित होता है- वह स्वाद उसी जल का है-इसी तरह गरमी या ठंढक उस टुकड़े के भीतरवाला वायु का गुण है । प्रायः समी वस्तु पांचो भूतों के मिलने से बनते हैं-तथापि एक वस्तु 'पार्थिव' कहलाता है. दुसरा 'जलीय' इत्यादि-इसका कारण यह है कि जिसमें जिस गुण का प्रधानतः ग्रहण होता है उस गुण के व्यंजक भूत का बना हुभा वह माना जाता है। इस मत का खण्डन ७ सूत्र में किया है। यदि पृथिवी में रूप नहीं होता तो पृथिवी आंख से कभी न देखी जाती। इससे जैसा ६९-रसूत्र में कहा है सो ठीक है । इतना अवश्य है कि गन्धही पृथिवी का प्रधान गुण है-रसही जलका स्पर्शही वायुका रूपही । 'अग्नि का और ग्रन्द ही माफाश का । इनके प्रधान गुण होने का te न्यायप्रकाश यह कारण है कि अपने चारों गुणों में से गन्धही मात्र काव्यजक पृथिवी है-रस मात्र का व्यंजक जल इत्यादि । इसी से पृथिवी के बने हुये इन्द्रिय-घ्राण में गन्धद्दीप्रधान गुण है। इससे इस इन्द्रिय से घ्राण ही का ग्रहण होता है । (२.१.६८) ऐसा मत माग्यकार का स्पष्ट है सो १.१.१८ सूत्र के भाष्य से ज्ञात होता है। वार्तिककार इसको नहीं स्वीकार करते। उनका कहना है कि (पृ.७४ ) "पृथिवी आदि के गुण-गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द-ये पांचो इन्द्रियों के अर्थ है"। ऐसा सूत्र का अर्थ करने से गन्धादि गुणही इन्द्रियों से गृहीत होते-पृथिवी जलादि इन्द्रियों से नहीं गृहीत होते ऐसा अर्थ होगा-सो ठीक नहीं क्योंकि पृथिवी जल इत्यादि सभी इन्द्रियों से प्रत्यक्ष गृहीत होते हैं । ३.१.१. सूत्र में सूत्रकार ने स्पष्ट कहा है कि एकही वस्तु दर्शन इन्द्रिय मोर स्पर्शन इन्द्रिय दोनों से गृहीत होता है। यदि रूप-स्पर्शही इन्द्रियों से गृहीत होते तो जिस वस्तु में ये दो गुण है वह इन्द्रियों से गृहीत होता है-यह कैसे कहा जा सकता । इससे सूत्रकार के मत में जिन वस्तुओं में रूपादि गुण रहते है वे अवश्य इन्द्रियों से गृहीत होते है। इससे सूत्र का अर्थ ऐसा उचित है-'पृथिवी इत्यादि गुण ये इन्द्रियों के अर्थ है।" और इनमें गन्ध-रस-रूप-स्पर्य और शब्द ये पांचो गुण क्रम से घ्राण-रसन-चतु-त्व और श्रोत्र इन्द्रिय से ही गृहीत होते हैं । " 'पृथिव्यादि' से यहां पृथिवी- जल-अग्नि से तात्पर्य है (वार्तिक पृ. ७५ )-ये तीन भूत इन्द्रिय से गृहीत होते हैं, और 'गुण' पदसे जितने गुण वस्तुओं में होते है वे सब विवक्षित है। ये गुण चार्तिककार के मत से यों हैं। (पृ०७५) संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभाग-परत्व-मपरत्व- स्नेह-वेग-कर्म-सामान्य-(पृ०७५) और अभाव (पृ०७६ ) विशेष- समवाय । इनमें समवाय को छोड़ और सवगुण आधितगुण' कहलाते हैं ( वार्तिक पृ०७५)। और गन्ध-स्पर्श-रूप-रस-शब्द- ये पांच सूत्र ही में कहे हैं । इन पांचो गुणों के अतिरिक्त पृथिवी- जल-मग्नि दो दो इन्द्रियों से गृहीत होते है और चाकी गुण समवाय और मभाव-ये सब इन्द्रियों से गृहीत होते है । (घा.' तिक पृ०७६)। और न्यायप्रकाश ह ऐसा मत वार्तिककार का है। न्यायमंजरी (पृ. ४८४-४५ )में पार्तिक के मत का खंडन करके भाष्यकार के मत का स्थापन किया हैं। इनका कथन है कि द्रव्य कर्म सामान्य और संख्या परिमाण मादि गुण भी अवश्य इन्द्रियों से गृहीत होते हैं परन्तु सूत्रकार का उद्देश्य यहां इन्द्रियों से जितने वस्तु गृहीत होते हैं उनके 'गिनाने से नहीं है उनका उद्देश्य केवल उन्हीं मों के बतलाने से है जो कि इन्द्रियों से गृहीत होकर रागद्वेष के मुख्य कारण होते हैं। ऐसे रूप रस गन्ध स्पर्श तथा शब्द ये ही पांच हैं ।येही पांच'मर्थ' रागवेप साक्षात कारण होते हैं। इससे सूत्रकार ने इन्हीं पांचों को कहा है। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि 'येही पांच इन्द्रियों से गृहीत होते हैं-ऐसा सूत्रकार का तात्पर्य है। ...नवीन नैयायिकों ने चार्तिककारही का अर्थ स्वीकार करके द्रव्य गुण कर्म सामान्य विशेष समवाय अमाव'-इन सातों 'वैशेषिक' पदार्थों को 'मर्थ' पद से विवक्षित माना है । (तर्कभाषा पृ० १०७-१४६) भाष्यकार ने (सू. १. १०६ पृ. २४) द्रव्य गुण 'कर्म विधेपसामान्य समवाय ये प्रमेय है-ऐसा मतान्तर करके बत- लाया है। वार्तिककार ने पृ.७० पंक्ति २१-२२ में जो लिखा है उससे ज्ञात होता है कि उनके मत से द्रव्य गुण कर्म सामान्य विशेष समवाय इतने ही में सकल पदार्थ अन्तर्गत हैं। वार्तिककार ने केवल पृथिवी जल-अग्नि-और शब्द स्पर्श रूप रस संख्या परिमाण इत्यादि और गुण ही के साथ कर्म सामान्य विशेष समवाय अभाव इतने ही को 'अर्थ' यतलाया है (पृ० ७५-७६) यहां वैशेषिकों के पदार्थगुण-कर्म-सामान्य विशेप-सम. घाय तो कहे हैं । भेद इतना ही है कि कर्म-सामान्य-विशेप-समवाय- प्रभाव को गुण ही में अन्तर्गत कर लिया है। वैशेषिक द्रव्यों में से पृथिवी-जल-अग्नि को तो कहाही है । यहां यह स्पष्ट नहीं समझ पड़ता कि वायु और माफाश को क्यों अलग कर दिया। कारण इसका इतना ही हो सकता है कि पृथिवी जल और तेज में एक से अधिक गुण है इस से हनका गुण से अतिरिक्त प्रत्यक्ष होना अवश्य मानना पड़ता है। परन्तु वायु में केवल स्पर्श है और भाकाश में केवल शब्द है, इससे इनका जब प्रत्यक्ष होगा तय उसी. गन्ध न्यायप्रकाशा और माकारा . एक गुण का होगा । जय स्पर्श गृहीत होगा तभी वायु गृहीत होगा-जब शब्द गृहीत होगा तभी आकाश भी। पृथिवी जल अग्नि में ऐसा नहीं होता। पृथिवी कागाधनमी प्रत्यक्ष होगा तभी उसका अपने रूप के द्वारा प्रत्यक्ष होगा। इस लिये वायु को गुणों से पृथक प्रत्यक्षयोग्यता नहीं है। इसी लिये इनका मयों 'से पृथक परिगणन करना उचित नहीं होता । तर्कभाषा में इनका पदार्थों में परिगणन किया है-परन्तु साक्षात् इनका प्रत्यक्ष नहीं होता है, इनका अनुमिति ज्ञान ही होता है, स्पर्श से इनका अनुमान किया जाता है ऐसा कहा है (तर्कभापा पृ. ११२)। इसी से इनका इन्द्रियो का 'अर्थ' के साथ परिगणन उचित नहीं। इसी तरह आकाश को भी ( ११६) शब्द से अनुमेय कहा है । इससे इसको भी 'मर्थ' नहीं कह सकते। तब बाकी रहे काल दिक- मात्मा-और मन ये चार वैशेषिक द्रव्य ! इनमें आत्मा का प्रत्यक्ष शान नहीं होता उसका मनुमान होता है और शाब्दज्ञान होता है ऐसा भाप्य (पृ. २४) में कहा है। इससे आत्मा को इन्द्रियों का 'अर्थ' नहीं कह सकते । वृद्धों का यही मत है । परन्तु नवीन नैया- यिकों ने मात्मा को प्रत्यक्ष माना है जैसा ऊपर निरूपण कर माये हैं। इससे मात्मा को इन्द्रिय का अर्थ ' भी माना है। वार्तिककार ने (पृ. ४९८) कहा है कि मात्मा द्रव्य है। परमात्मा (ईश्वर) को भाग्य (पृ.२०१) में मागममात्र से जानने के योग्य प्रत्यक्षानु- मानशब्द इन प्रमाणों से प्रतीत वतलाया है। मन को नवीनों ने इन्द्रिय माना है। पर इन्द्रियों का प्रत्यक्ष शान नहीं होता। मन का सुपादि प्रत्यक्ष से अनुमानहीं होता है ऐसा सभों का सिद्धान्त है (तर्कमापा पृ. १२६ )। फिर तर्कभाषा में मन को किस तरह 'मर्थ' कहा है सो नहीं समझ पड़ता। काल और दिक् के प्रसंग न्यायमंजरी में (पृ. १३६-१४१) सिद्ध किया है कि इनको प्रत्यक्षगम्य और अनुमानगम्य दोनों मान सकते हैं । इससे इनको यदि 'मर्थ' कहें तो कुछ हानि नहीं। भय इन 'अर्थों ' का प्रत्येक विचार करते हैं । यद्यपि घेषिको की तरह द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य विशेष-समवाय- अमाव-इस तरह सात पदार्थ प्राचीन ग्रन्थों में नहीं कहे हैं तथापि वातिककार - . ।
. न्यायप्रकाग्र! -१०१ के अनुसार भौर नवीन नैयायिकों के अनुसार पृथिवी जलन्तेज- घायु-आकाश-काल-दिक-मात्मा इतने को धैरोपिक पदार्थ द्रव्य में अन्तर्गत मान सकते हैं । मन को इनके साथ परिगणन करने की साहस नहीं होती। नवीनों के मनुरोध से हम इसको भी इनके साथ कर लेते यदि सूत्रकार ने इसको 'अर्थ' से पृथक प्रमेय नहीं माना होता । इससे इन माटों का विचार यहां करते हैं मन का विचार छठा प्रमेय रूप से किया जायगा । आत्मा का विचार पहिले ही प्रथम प्रमेय रूप से हो चुका है, गुण- कर्म सामान्य विशेष-समवाय-प्रभाव-इन ६ वैरोपिक पदार्थों का गुण' के साथ विचार करेंगे। प्राचीन न्याय अन्थों में इन द्रव्यादियों का विस्तृतकम से विचार नहीं पाया जाता नवीन अन्यों में वैशेपिकशास्त्र के साथ एकवाक्यता करके जो बनाये गये हैं उनमें इनका निरूपण किया है। उन्हीं के भनुसार यहां विचार करते हैं। कुछ दार्शनिकों का मत कि गुण से पृथक् द्रव्य नहीं है-गुण ही द्रन्य है. अर्थात जय हम किसी चीज़को देखते हैं तय उसके गुणों ही को देखते हैं-उसके गुण के मतिरिक्त और कुछ नहीं देख पहता। इसके उत्तर में वार्तिक (पृ. ७६ ) और तात्पर्यटीका (पृ.५६) में कहा है कि जिस तरह हमको वस्तु का ज्ञान "होता है-'यह चन्दन है'-उसी तरह यह भी ज्ञान होता है कि इस ''चन्दन की ठंढक इस चन्दन का रंग' है इस शान का आकार ठीक वैसा ही है जैसा 'ब्राह्मण की लाठी' इस ज्ञान का। इससे जैसे 'लाठी से अतिरिक पदार्थ ब्राह्मण को मानते हैं उसी तरह ठंढक से अतिरिक्त चन्दन पदार्थ अवश्य मानना पड़ेगा ! सय लोग ऐसा ही मानते भी हैं। - पृथिवी-कठिन और कोमल अवयवों से बनती है, घाण इन्द्रिय जीवों के शरीर-मिट्टी-पत्थर-पहाड़ इत्यादि रूप में पाई जाती है। यद्यपि इसका प्रधान गुण गन्ध ही है तथापि इसमें और भी गुण पाये जाते हैं। जैसे रूप-रस-गन्ध-स्पर्श संख्या--परिमाण-पृथक्त्व---संयोग-विभाग--परत्व---मप- १०२ न्यायप्रकाशा रत्व-गुरुत्व-द्रवत्व संस्कार।यह नित्य और अनित्य है। परमाणुरूप में नित्य, और स्थूलवस्तुरूप में अनित्य । इसके रूप, रस, गन्ध, स्पर्श अनित्य होते हैं और गरमी के संयोग से उत्पन्न होते हैं। पृथिवी में जब गरमी लगती है तब उसका रूप, रस, गन्ध, स्पर्श बदल जाता है । अर्थात् पहिला नष्ट होकर दूसरा उत्पन्न होता है। कई चीजों में यद्यपि गन्धादि गुण हम लोगों को ज्ञात नहीं होते तथापि उनका उसमें होना सिद्ध हो सकता है। जैसे पत्थर में यद्यपि कुछ गन्ध नहीं मालूम होता तथापि जलाने से उसमें गन्ध साफ ज्ञात होता है। इसमें नैयायिकों का सिद्धान्त है कि जय तक जो गुण मालूम नहीं होता तब तक वह अनुभूत-अव्यक्ता रहता है, और किसी कारण वश जैसे गरमी के संयोग से वह गुण व्यक्त होता है। परमाणु रूप में पृथिवी नित्य है। जितनी चीजें हम देखते है वे सब कई अवयवों के मिलने से बने हैं।न्यायमंजरी, (पृ. ५५० ५१) में इतना ही कहा है कि जो चीज़ हम देखते हैं.सो अवयवी है-कई अवयवों के मिलने से बना है-सो हम प्रत्यत्त देखते हैं। मार जय तक इस प्रत्यक्ष ज्ञानका कोई बलवान् वाधक नहीं प्राप्त होता तब तक इसको मर्त्य मानना मावश्यक है। हम स्पष्ट देखते है कि खेत से उठाया हुआ ढेला जब फोड़ा जाता है तब उसके कई टुकड़े हो जाते है । उसी तरह कई छोटे छोटे टुकड़ों को जय हम मिला देते हैं तब उनके मेल से एक बड़ा ढेला वन जाता है । इसी से सिद्ध होता है कि जितनी चीजें है वे सय कई छोटे छोटे टुकड़ों के मिलने से धनी हैं। जहां तक छोटे टुकड़े हम करते जायें-जब तक वह टुकड़ा देख पड़ेगा तब तक उसके और टुकडे होंगे-सो अवश्य मानना पड़ेगा। जब इतने छोटे छोटे टुकड़े हो जायंगे कि देर नहीं पड़ेंगे तब उनके चार टुकड़े नहीं हो सकते क्योंकि हमने इतना ही देखा है कि जो चीज़ देखी जाती हैं सो टुकड़ों के मिलने से बनी है। यह माखिरी टुकड़ा, जिसका मागे और टुकड़ा नहीं हो सकता उसी को 'परमाणु' कहते हैं। यदि कोई ऐसा टुकड़ा करने न्यायप्रकाश . का मन्त या विश्राम न माना जाय तो जितनी चीज़ हैं उन सय के मनन्त टुकड़े हो सकेंगे फिर सब चीजें वरावर मानी जायेंगी और छोटे बड़े सा भेद न रहेगा। (गौतमसूत्र, भाष्य. ४।२।१६-२५ न्याय मंजरी ५०२)। इन परमाणुओं के गौर टुकड़े नहीं हो सकते इससे ये स्थूल नहीं हैं-सूक्ष्म है। ऐसे ऐसे दो परमाणुमों के मिलने से घणुक 'बनता है-तीन घणुकों के मिलने से त्रसरेणु, चार प्रसरेणुमों के मिलने से एक चतुनेणु-इसी तरह अनन्त परमाणुओं के मिलने से सब चीजें बनती हैं। परमाणु सूक्ष्म है-स्थूल नहीं। तब दो परमाणुमों का संयोग कैसे हो सकता है या इनके मिलने से इनसे मोटा स्थूलह्यणुक कैसे होगा क्योंकि एफ एफ सेरं के दो टुकड़ों के मिलने से एक दो मेर का वस्तु बनता है। परन्तु जघ परमाणु सूक्ष्म है-उसके अंश या हिस्से नहीं है तो ऐसे दो के मिलने से मोटी चीज कैसे उत्पन्न होगी? इस बात का शंकराचार्य ने शारीरक भाष्य में अच्छी तरह उपपा- वन किया है । इसका समाधान ठीक ठीक नहीं मिलता | वार्तिक ४-३-२५ म. और 'तात्पर्यटीफा १-४६० में इतना ही कहा है कि जिनका संयोग होता है उनके अंश या टुकड़े होंगे ऐसा भावश्यक ही है । केवल उनको मूर्त अर्थात् फ्रियावान होना चाहिए प्रात् वे इधर उधर चलने योग्य हों-इतना ही आवश्यक है। जय दो चीजें मूतं होंगी तो उनका संयोग अवश्य होगा और उनके संयोग से एक ज्यादे मोटा मूर्त वस्तु उत्पन्न होगा। अस्तु यह तो ठीक है-दो परमाणु जय इधर उधर चलेंगे तो उनका संयोग अवश्य होगा, परन्तु यह.संयोग जय दो ढेलों में होता है-तय एक का एक अंश दूसरे के एक अंश से मिलता है, दो आदमी जंय मिलते हैं तप एक का दाहिना हाथ दूसरे के पाएँ हाथ से मिलता है परन्तु परमाणुभों में ऐसा भंग ही नहीं है-फिर इनका संयोग कैसे होता है? इस प्रश्नका स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता। परमाणु के संयोग के विषय में नैय्यायिकों की सम्मति यह है कि ईश्वर को चिकीपा से परमाणु में क्रिया उत्पन्न होती है । क्रिया न्यायप्रकाशा से संयोग होता है । संघोग होने से ही परमाणु मनिस्य हो जायगा, यह बात नहीं है । एक जगह सावयव संयोग तपासावयय होने से सर्वत्र ही चैसा है यह यात नहीं है। अप्राप्त घस्तु की प्रालि फा नाम संयोग है । सो परमाणु में भी है । यद्यपि शांकर भाष्य में लिखा है कि एक परमाणु का परमाण्वन्तर के साथ संयोग सर्वा. स्मना है या एकदेशेन यह विफरप करके दोनों पक्ष का खंडन किया है। पर नैय्यायिक ने संयोग प्रादेशिक माना है, और मान कर भी आत्ममनः संयोग भी माना है। मात्मा भी निष्प्रदेश, मन भी निष्प्रदेश खेकिन संयोग होता है। उसी चाल का परमाणु का भी संयोग होने में भी याधा नहीं है। जल। रसन इन्द्रिय जल से बना है। जल के विषय समुद्र, नदी, पाला इत्यादि हैं। रूप, रस, स्पर्श, स्नेह, संख्या, परिमाण, परव, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, संस्कार इतने जल फे गुण हैं। जलपरमाणु नित्य है। और सघ जलीय विषय मनित्य है। । तेज। चक्षु इन्द्रिय तेजस है। सूर्य, चन्द्र, तारागणा, सोना, चांदी, माग, विद्युत् इत्यादि तेजस विषय हैं। रूप, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, द्रवत्य, संस्कार ये तेजके गुण है। तेजस परमाणु नित्य है और सब विषय भनित्य है। तेजस विषय चार तरह के होते हैं। (१) जिनके रूप और स्पर्य उद्भूत व्यक्त हैं। जैसे धधकती हुई भाग | सोना या चांदी का भी रूप स्पर्श व्यक्त है, परन्तु इसमें जो रूप देख पड़ता है सो तेज का नहीं है, क्योंकि तेज का रूप शुक्ल भास्थर माना गया है। इसका स्प जो अनुभूत होता है सो तेज का नहीं है-क्योंकि तेज का स्पर्ण गरम माना गया है। इससे सोने चांदी के मसली रूप स्पर्श जो तेज के है सो व्यक्त नहीं है-धे दये हुए हैं-उन पायों में मिवामा जो पृथिवी का अंश है उसका रूप स्पर्श व्यक्त होता है। सोना चांदी तैजस पदार्थ है इसमें प्रमाया यही है कि इनमें कितनी 4 न्यायप्रकाश १०५ " भी भाग लगाई जाय तो भी ये पिघल तो जायंगे पर उनमें और कुछ कमी किसी तरह की नहीं होगी। जल पृथिवी मादि के जितने पदार्थ है उनमें भाग के सम्यन्ध से घटी भपश्य हो जाती है-घटते घंटते एकदम जल जाते हैं। ऐसा सोना चांदी इत्यादि में नहीं होता। इससे यह सिद्ध होता है की ये तेजस पदार्थ है। (२) जिसमें रूप और स्पर्श व्यक्त नहीं है। जैसे चतु इन्द्रिय । मांखों में तेज का रूप (शुक्ल भास्वर) या स्पर्श (गरम) नहीं गृहीत होता इससे इसमें ये व्यक्त नहीं है ऐसा माना गया है। (३) जिसमें रूप व्यक्त नहीं है, स्पर्श व्यक्त है । जैसे गरम किए दुए पानी के अन्तगर्त जो तेज है उसका शुक्ल भास्वर रूप व्यक्त नहीं है किन्तु गरम स्पर्श व्यक्त है। (४) जिसका कप व्यक्त है-स्पर्ण नहीं व्यक्त है। जैसे दूर से माती हुई दीप की रोशनी। इसका गरम स्पर्य नहीं गृहीत होता है-रूप गृहीत होता है। वायु त्या स्पर्शन-इन्द्रिय घायु का है। विषय है जीवोंका श्वास. प्रश्वास और बाहर की हवा । इसके गुण है-स्पर्श, संख्या, परि- माण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, मपरत्व,धेगाघायु का प्रत्यक्ष नहीं हो तो स्पर्श से इसका अनुमान होता है। स्पर्श घायु का ही विशेष गुण है। इससे जहाँ स्पर्श है वहां घायु अवश्य होगा । वायु का पर्य मनुष्णाशीत माना गया है अर्थात् वायु न ठंढा ही है न गरम । जब इसमें जख की फणाएं मिल जाती है तब इसमें ठंढक मालूम होती है और जय इसमें तेज फी कणा मिलती है तब यह गरम मालूम होता है। घायुपरमाए नित्य है-और विषय भनित्य है। आकाश शब्दगुण का माधय प्राकारा है । इसके गुण-ब्द, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग है। यह एक ही है--विभु (अर्थात् सर्वत्र पर्तमान)--ौर नित्य है। इसका भी प्रत्यक्ष नहीं होता। सद से इसका अनुमान होता है। शब्द विशेष गुण है यह सभी स्वीकार करते हैं। गुण है तो किसी द्रव्य में होगा। पृथिवी, www - - . 'पीछे। १०६ न्यायप्रकाश। जल, तेज, वायु और आत्मा का गुण शब्द नहीं हो सकता क्योंकि इसका ग्रहण श्रोत्र-इन्द्रिय से होता है और पृथिव्यादि के विरोप- गुण धोत्रइन्द्रिय से कभी गृहीत नहीं होते। काल, दिक् और मनका भी गुण शब्द नहीं है क्योंकि ये तीन किसी भी विरोपगुण के आश्रय नहीं होते। तब इनके अतिरिक्त द्रव्य आकाश ही रह गया जिसके गुण होने में कोई बाधक नहीं देख पड़ता। इससे शब्द गुण का माश्रय आकाश ही माना जाता है काल संसार के व्यवहार में अकसर विपयों के प्रसंग ऐसे शान हुमा करते हैं-' इसके बाद यह हुआ' 'इसके पहिले यह. हुमा यह जल्दी हुआ' 'यह देर करके हुआ' 'ये दोनों साथ ही साथ आए' 'यह आदमी जवान है' 'यह बुढ़ा है' इत्यादि । यह व्यव. हार जिसके द्वारा होता है वही काल है। फाल ही के द्वारा 'भागे' साथ देरी' 'जल्द,' इत्यादि समझा जाता है। इसके गुण है-संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग । यद्यपि इसमें रूप नहीं होता. तथापि इसका प्रत्यक्ष नैयायिकों ने माना है । प्रत्यक्ष होने में रूप की अपेक्षा नहीं है क्योंकि यदि बिना रूप के प्रत्यक्ष नहीं होता तो रूप ही का प्रत्यक्ष कैसे होता? रूप में तो रूप नहीं है। और फिर परमाणु में यद्यपि रूप है भी तो भी इसका प्रत्यक्ष नहीं होता। इससे कालका प्रत्यक्ष होता है इसमें सन्देह नहीं । प्रत्यक्ष ग्रहण इसका विशेष रूप से होता है-अर्थात् 'छडीवाले मादमी' का जप प्रत्यक्ष होता है तब छड़ी उस आदमी की विशेषगा ही रूप से देखी जाती ह-वैसे ही जय किसी वस्तु को देखा उसके प्रसंगसे यह ज्ञात हुआ कि 'यह चीज जल्द माई' तो इसमें काल का जो भान होता है सो उस चीज के विशेपण रूप में है (न्याय मंजरी पृ. १३६-३७)। ऐसा कुछ लोगों का मत है । पर और नैयायिक लोग इसफो अनुमेय मानते हैं। तर्कभाषा में ऐसा ही लिखा है (पृ. १२१)। न्यायमंजरी में भी इस मत फा उपवादन किया है (पृ. १३७-३८) । ज्योतिपियों ने ग्रहों के चलने ही को काल माना है-जो नैयायिक नहीं स्वीकार करते । चलनादि क्रिया .
न्यायप्रकाश। १०७ मत है। . से अतिरिक्त एक अलग पदार्थ ही काल है, यह नैयायिकों का. जैसे प्राकारा सर्वत्र एक ही है वैसे ही काल भी है इसके अनेक भेद मानने में कोई प्रमाण नहीं है । जहां कहीं कोई घस्तु है वह अवश्य किसी काल में है । सब चीजों को काल का सम्बन्ध अवश्य रहता है । इससे काल को विभु- सर्वगामी माना है। इसके अवयव नहीं है, यह एक ही है, इससे नित्य भी है। यद्यपि काल एक ही है तथापि क्रियाओं के द्वारा इसके मवान्तर भेद माने जाते हैं। जैसे एक ही आदमी जव कई तरह का काम, रसोई करना, पढ़ाना, इत्यादि करता है घो उन क्रियाओं के द्वारा वह 'रसोईदार' ' पाठक ' इत्यादि भिन्न भिन्न नाम पाता है। इसी तरह यद्यपि काल एक ही है तथापि जय कई क्रियाएँ-रसोई करने के समय वरतन के चढ़ाने से लेकर पका हुआ भात फे उतारने तक होती है, तब उनमें से एक एक क्रिया को काल से जो सम्बन्ध होता है उन्हीं सम्बन्धों के द्वारा काल के नाना भेद कल्पित होते हैं। इसी तरह हमारी मांखों. के सामने जो क्रिया हो रही है जिसका फल अभी तक नहीं हुमा है, 'उस क्रिया के होने के कारण हम काल को वर्तमान' कहते हैं। जो काम पहिले ही हो चुका है अर्थात् सका फल हो चुका है, उससे सम्बन्ध होने के कारण हम काल को 'भूत कहते हैं। और अभी तक जो नहीं हुई और फिर होनेवाली है तो उस क्रिया के साथ सम्बन्ध होने से काल 'भविष्यत् ' कहलाता है। इसी तरह काल के ये तीन मुख्य विभाग होते हैं। नाना क्रियाएँ हुमा करती हैं इसी से काब के नाना अनन्त विभाग 'क्षण: 'कला' 'मिनट 'घंटा'। प्रहर''दिन''रात पत्न मास तु''वर्ष' इत्यादि माने जाते हैं। ये जितने विभाग है सो सब क्रियासम्बन्ध द्वारा ही हैं । सूर्य की पक राशि से दूसरी रायि में जाने की जो क्रिया है उसी क्रिया के सम्बन्ध से काल 'मास कहलाता है-इत्यादि । न्याय मंजरी में उपसंहार में कहा है- सिद्धः कालश्चाक्षुपो लैंगिफोवा तन्नानात्वं सिद्धभोपाधिकं च । (प १४१ ) 1 . .
न्यायमफाश। . दिक वह इससे पूरब है यह उत्तर है, 'यह इसके मागे घेडा' वह पीछे बैठा' इत्यादि व्यवहार जिसके द्वारा होता है उसको 'दिक्' कहते हैं। यह भी काल ही की तरह विभु नित्य है। वैसेही इसको भी कई लोगों ने प्रत्यक्ष माना है, कोई अनुमेय ही मानते हैं। एफ होने पर भी इसके अवान्तर विभाग क्रियामों ही के सम्बन्धद्वारा होते है । जैसे सूर्य का उदय होता है, इस उदय रूपी क्रिया के सम्बन्ध से दिक् 'पूर्व' कहलाती है। सूर्य ही के अस्त होने की क्रिया के सम्बन्ध से दिक् 'पश्चिम' कहलाती है। फाल की तरह दिक के भी गुण मंण्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग हैं। प्राकारा और दिन में बहुत मेद है। भाकाय केवल शब्द का कारण है-विक सय चीजों फा । माकाश स्थूल भौतिक द्रव्य है। शब्द के द्वारा इसका साक्षात् प्रत्यक्ष होता है, दिक् का साक्षात् प्रत्यक्ष नहीं होता।विशेषण रूप ही से इसका प्रत्यक्ष हो सकता है. मागे' 'पीके' 'पूर्व' 'पश्चिम' इत्यादि व्यवहारही के लिये माना जाता है। आकाश प्रत्यक्ष शब्द का कारण है। - प्रात्मा इसका विचार प्रथम प्रमेयरूप से हो चुका है (पृ०७२-८०) मन । इसका विचार मागे चलकर छठे प्रमयरूप से किया जायगा । गुण वार्तिककारने जिनका 'गुण' कहकर 'अर्थ' में अन्तर्गत किया है मय उनका विचार करते हैं। उनमें से रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द, का विचार हो गया है। इसको नैयायिको ने चैपिकों की तरह अन्त्य व्यवच्छेदक नहीं माना है। वाचसाति मिभने तात्पर्यटीका । (पृ० १५३) में कहा है कि विशेष पद से अन्स्यव्यवच्छेद से मतलब नहीं क्योंकि अन्त्यव्यवच्छेदकों का ग्रहण इन्द्रियों से नहीं हो सकता न्यायप्रकाप, इससे यहां 'विशेष' पद से 'रेखोपरेख' विवक्षित है। अर्थात् व्यवच्छेदमात्र। कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, प्रभाव, ये वैशेषिकों ने द्रव्यगुण से भिन्न पदार्थ ही माना है। इससे इन्हीं का विचार पहिले करते है। द्रव्य जिसका श्राश्रय है-जो द्रव्य में आश्रित है वही गुण है- ऐसा गुण का जय लक्षण है तब इसको 'गुण' मानना ही ठीक है। क्योंकि द्रव्य से अलग कभी कर्म, सामान्य, विशेप, समवाय, प्रभाव नहीं रह सकते। कर्म 'कर्म' पदका अर्थ यहां काम नहीं है, यहां चलने से मतलब है । दो अलग अलग चीजें जिससे संयुक्त हों या दो संयुक्त चीजें जिससे अलग अलग हो जायँ उस व्यापार को 'कर्म' कहते हैं। ऐसे 'कर्म' पांच प्रकार के होते हैं.(१) उत्क्षेपण (ऊपर फेंकना) (२) अघचे. पण नीचे फेंकना (३) माकुञ्चन-अपनी ओर खींचना (४) प्रसारण-अपनी ओर से दूसरी ओर हटाना ( ५ ) गमन-अर्थात् चबना, बहना, गिरना, उड़ना इत्यादि । सामान्य भनेक चीजों का एक ज्ञान जिसके द्वारा होता है उसी फो सामान्य' कहते हैं। इसी को 'जाति' भी कहते हैं। (सूत्र-२२ ३६) द्रव्य, गुण, फर्म इन्हीं तीन के जाति होती हैं। जाति नित्य है। यह दो तरह की है, पर और अपर | जिसमें अधिक व्यक्तियां-एक 'एकचीज़-अन्तर्गत हों उसफो 'पर' या 'पड़ी' कहते हैं। और जिसमें थोड़ी व्यक्तियां हो उसको 'मपर' या 'छोटी' कहते हैं जैसे 'जानवर' जाति में 'घोड़ा' जाति मे अधिक व्यक्तियां हैं इससे घोड़ा की अपेक्षा: 'जानवर' जाति 'पर' हुई और 'जानवर' जाति की अपेक्षा 'घोड़ी' जाति 'अपर' हुई । भाष्यकार ने इन दो तरहों को 'सामान्य 'भीर 'सामान्यविशेष' जाति कहा है । जिसके द्वारा केवल अनेक चीजों का एक शान होता है--मौर जिसके द्वारा कभी कोई चीजों का मतग अलग शान नहीं होता है वही शुद्ध 'सामान्य' वही 'जाति' है। जैसे 'चीज'-यह जाति ऐसी है कि " . . - - .
न्यायप्रकाशा - . इससे जितनी चीज हम लोग जान सकते हैं सभी अन्तर्गत है इससे'चीज' कहने से हमको कुल चीजों का एक शान उत्पन्न छोता है। कोई चीज इससे अलग नहीं जो कि इस शान से याहर हो, इससे यह 'शुद्ध जाति' हुई। परन्तु 'जानवर' जाति ऐसी है कि जितने जानवर हैं-घोदा हाथी इत्यादि-उन सपका शान एक इसके ही द्वारा उत्पन्न होता है परन्तु यहुत सी चीजें येजान की हैं जो कि इस ज्ञान से अलग की जाती हैं। इससे यह 'जानवर' जाति जाति भी है और विशेष भा; अर्थात् अलग करने घाली भी। विशेष वैशेपिकों के मत से 'विरोप' ऐसे ही गुण को कहते हैं जिस- के द्वारा केवल एक चीज का दूसरी चीज से भेद हो सके। ऐसा मामूली गुण कोई नहीं है। क्योंकि 'लाल' 'पीला' इत्यादि जितने गुण हैं वे लाल चीजों को मौर रंगवाली चीजों से अलग तो करते हैं पर उसके लिये ही कुछ लाल चीजोको इकट्ठा भी फरते हैं। इसी से चैशेषिकों ने केवल नित्यपदार्थ-जैसे परमाणु जितने हैं उन्हींके उन गुणों को 'विशेष' कहा है जिनसे एक दुसरे से अलग जाना जाता पर प्राचीन नैयायिकों ने ऐसा नहीं माना है। भाष्य में अपर छोटी छोटी-जाति को सामान्य विशेष' कहा है। इस से स्पष्ट होता है कि जिसके द्वारा चीजों में भेद जाना जाय उसी को इन्होंने 'विशेष' माना है। पाचस्पति मिभ ने भी तात्पर्य टीका (पृ० १५३) में स्पष्ट कहा है कि वैशेषिकों के 'विशेष' से यह मतलब नहीं है क्योंकि यह विशेष इन्द्रियों से नहीं गृहीत होता है। और यहां जितने गुण वार्तिककार ने गिनाए हैं घे इन्द्रियों के 'मर्थ' है। इससे 'घिरोप' पद से यहां उन्हीं गुणों से मतलय है जिनके द्वारा एफ चीज दूसरी से अलग समझी जाय । समवाय जैसे और गुण शब्दों में ग्राथित रहते हैं पैसा समवाय नहीं है। समवाय एक प्रकार का धर्म है--मोर इसी समवाय को वार्तिककार ने 'गुण' कहा है। (पृ०७५)। नित्य सम्बन्ध को 'समवाय' . - न्यायप्रकाश। . माइते हैं। जाति से अलग व्यक्ति कभी नहीं रहती, गुणी से अलग गुण नहीं रहता, लाल चीज ही में लाल रंग रहता है । यही जो नित्य सम्बन्ध है उसी को 'समवाय' कहते हैं। जिस जगह गुणी . रहता है उसी जगह गुण भी रहता है, कभी दूसरी जगह नहीं रहता। यही इनका नित्य सम्बन्ध है, इसी को समवाय कहते हैं। यह सर्वथा = प्रत्यक्ष ही देखा जाता है कि गुणी और गुण में नित्य सम्बन्ध है • इससे समचाय को प्रत्यक्ष मानते हैं (न्या० मंजरी पृ० ३१२ )। = संयोग सम्बन्ध उन्हीं में होता है जो पहले अलग थे और कभी कभी मिल जाते हैं और फिर अलग हो जाते हैं। जैसे घोड़े से सवार अलग रहता है। जब वह उसपर बैठता तब उन दोनों का संयोग होता है और फिर जब वह उतर पड़ता है तब वह संयोग नष्ट हो जाता है। इसी से संयोग को 'अनित्य सम्बन्ध ' कहा है। अभाव। : जहां पर जिस चीज़ का होना और देखा जाना सम्भव हो वहां यदि वह न पाई जाय तो वहां उस चीज़ का अभाव' है, ऐसा कहा जाता है। कुछ लोगों का मत है कि अभाव कोई वस्तु नहीं है; किसी चीज का कहीं परन होना फिसी प्रमाण से नहीं जाना जा सकता, इसी से अभाव कोई घस्तु नहीं है । इस मत का उप. पादन न्यायमंजरी में ( ५-५४-५८) बहुत अच्छी तरह किया है। मैयायिकों का ऐसा मत नहीं है सो सूत्र २०१७-१२ से स्पष्ट है। इनका मत है कि प्रभाव एक वस्तु अवश्य है। अभी हमने एक चीज़ देखी, फिर थोड़ी देर के बाद उसी को नहीं देखते, इसका क्या कारण है ? उसके देखने के जितने कारण इन्द्रियादि हमारे धे घे सब हैं ही फिर वह चीज़ क्यों नहीं देखी जाती? जैसे दर्श- नादि ज्ञान से किसी चीज का भाव गृहीत होता है वैसेही उसके प्रदर्शनादि से उसका प्रभाव गृहीत होता है फिर यदि वस्तुओं का प्रभाव नहीं माना जाय तो सब वस्तु नित्य हो जायंगे। एक घढ़ा हमारे सामने रखा है उस पर हमने एक लाठी मार दी उससे घड़ा नष्ट हो गया, यह अवश्य माना जायगा ।. घड़े के उसी नष्ट हो जानेही को हम.प्रभाव कहते हैं। माप.कहते हैं कि घट का नाश हो गया मैं कहता हूँघट का अभाव हो गया' केवल नाम २१ - - - ११२ न्यायप्रकाश का झगड़ा रह गया इत्यादि । न्यायमंजरी, (५-५६-५३ ) में बहुत विशद रूप से लिखा है। अभाव एक वस्तु है । इसके ज्ञान के विषय में नैयायिकों का मत है कि इसका प्रत्यक्ष होता है। इसी से वार्तिककार ने इसका अर्थ माना है। सम्बद्धविशेषणता सम्बन्ध से इसका प्रत्यक्ष होता है अर्थात् जिस जगह में किसी वस्तु का अभाव है उस जगह का वह अभाव विशेषण हुमा। इससे जब उस जगह का प्रत्यक्ष होता है तब उसका विशेषण जो है प्रभाव, उसका भी प्रत्यक्ष होता है। न्यायमंजरी में कहा है (५-६३ )- तस्मादभावाख्यमिदम् प्रमेयं तस्येन्द्रियेण ग्रहणं च सिद्धम् । सूत्र २।२।१२ में और भाप्य वार्तिक में प्रभाव को दो तरह का, यतलाया है। (१) 'प्राग्भाव' जो आगे उत्पन्न होनेवाला है, अभी उत्पन्न नहीं हुमा । (२) ध्वंस जिसमें उत्पन्न हो कर नष्ट हो गया । न्याय मंजरी में ऐसे दो प्रकार माने हैं (५-६३)। वाचस्पति, मिश्र (पृ.३०७ ) ने चार तरह का कहा है। इनके मत से प्रभाव पहले दो प्रकार का है (१) तादात्म्याभाव या इतरेतराभाव या अन्योन्याभाव जैसे घोड़े में हाथी का प्रभाव और हाथी में घोड़े का अभाव । (२) संसर्गाभाव अर्थात् किसी चीज़ का किसी जगह पर न होना। और यह संसर्गाभाव ' तीन प्रकार का है। (२) प्राग्भाव-कोई वस्तु. जब कहीं माने- वाला है। जब मैं काशी जानेवाला हूं तब वहां पर मेरा प्रागभाष है । (२) साभाव-जहां पर जो चीज़ उत्पन्न होकर फिर नष्ट हो गया। जैसे एक घड़ा अगर फूट गया तो उसका साभाव - हुआ। (३) अत्यन्ताभाव, जहां पर कोई वस्तु न तो कभी पाया, म अभी है और न कभी आनेवाला है उसका अत्यन्ताभाव: हुआ। जैसे 'आकाय कुसुम' | प्राकारा कुसुम न कभी हुमान कभी. होनेवाला है। इस तरह अत्यन्ताभाव, प्रागभाव, ध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव ये चार प्रकार के प्रभाव हुए। येही चार विभाग नवीन नैयायिकों ने माने है। कुछ लोग छः प्रकार का प्रभाव मानते हैं। ऊपर, कहे हुए चार और उनके अतिरिक्त दो और अपेक्षाभाव और सामर्थ्याभावः न्यायप्रकाश ११३ क्षाभाव उस वस्तु का होता है जो एक जगह से दूसरी गह चला गया हो। जैसे मैं जव प्रयाग से काशी गया तो प्रयाग अभाव 'भपेक्षाभाव' हुमा। किसी आदमी को कोई सामर्थ्य वह नष्ट हो गया तो उस आदमी में उस सामर्थ्य का सामाभाव' कहा जाता है। । के मतानुसार गुणों में अय वाकी रहे-संख्या, परि- संयोग, विभाग, परस्य, अपरत्व, स्नेह और वेग । niu. नवीन नैयायिकों ने वैरोपिकों के अनुसार गुरुत्व, , सुख, दुःख, इच्छा, द्वेप, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, संस्कार पंक्ति नामान्तर माना है (सूत्र.१-२-७५) इससे मागे चल कर इसका विचार है कि यह मात्मा का गुण १६ और वार्तिक ( पृ०७०, मानस प्रत्यक्ष होता है (तर्क- . के गुण हैं (स । दुःख को ग्यार विचार ता है ऐसा ।भाप्यकार वाचस्पति है। जम सघस्तु मन ११२ न्यायप्रकाश . गया। का झगड़ा रह गया इत्यादि । न्यायमंजरी (५-५६-५३) में बहुत विशद रुप से लिखा है। अभाव एक वस्तु है। इसके ज्ञान के विषय में नैयायिकों का मन है कि इसका प्रत्यक्ष होता है। इसी से वार्तिककार ने इसका अर्थ माना है। सम्बद्धविशपणता सम्बन्ध से इसका प्रत्यक्ष होता है अर्थात् जिस जगह में किसी वस्तु का अभाव है उस जगह का वह अभाव विशेपण हुआ। इससे जब उस जगह का प्रत्यक्ष होता है तब उसका विशेषण जो हे अभाव, उसका भी प्रत्यक्ष होता है। न्यायमंजरा में कहा है (५-६३)- तस्मादभावाख्यमिदम् प्रमेयं तस्येन्द्रियेण ग्रहण च सिद्धम् । सूत्र २२।१२ में और भाप्य वार्तिक में प्रभाव को दो तरह का घतलाया है । (१) 'प्राग्भाव' जो आगे उत्पन्न होनेवाला है, अभी उत्पन्न नहीं हुआ। (२) ध्वंस जिसमें उत्पन्न हो कर नष्ट हो न्याय मंजरी में ऐसे दो प्रकार माने हैं (५-६३)। वाचस्पति मिश्र (पृ.३०७ ) ने चार तरह का कहा है। इनके मत से अभाव पहले दो प्रकार का है (१) तादात्म्याभाव या इतरेतराभाव या अन्योन्याभाव जैसे घोड़े में हाथी का प्रभाव और हाथी में घोड़े का अभाव । (२) संसर्गाभाव अर्थात् फिसी चीज़ का किसी जगह पर न होना। और यह संसर्गाभाव तीन प्रकार का है। (१) प्राग्भाव-कोई वस्तु जब कहीं माने. वाला है । जब मै काशी जानेवाला हूं तब वहां पर मेरा प्राग्भाव है । (२) ध्वंसाभाव-जहां पर जो चीज़ उत्पन्न होकर फिर नष्ट हो गया। जैसे एक घड़ा अगर फूट गया तो उसका ध्वंसाभाष हुआ। (३) अत्यन्ताभाव, जहां पर कोई वस्तु न तो कभी आया, म अभी ह और न कभी पानेवाला है उसका अत्यन्ताभाव हुमा। जैसे 'आकाश कुसुम'। आकाश कुस्सुम न कभी होनेवाला है। इस तरह अत्यन्ताभाव, प्रागभाव, ध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव ये चार प्रकार के प्रभाव हुए। येही चार विभाग नवीन नैयाग्निकों ने माने है। कुछ लोग छः प्रकार का प्रभाव मानते हैं। ऊपर कद्दे हुए चार और उनके अतिरिक्त दो और । अपेक्षाभाव और सामर्थ्याभाव- कभी हुमान ग्यायप्रकाश ११३ अपेक्षाभाव उस वस्तु का होता है जो एक जगह से दूसरी जगह चला गया हो । जैसे मैं जब प्रयाग से काशी गया तो प्रयाग में मेरा प्रभाव 'मपेक्षाभाव' हुमा। किसी आदमी को कोई सामर्थ है फिर वह नष्ट हो गया तो उस आदमी में उस सामर्थ्य का अभाव 'सामर्थ्याभाव' कहा जाता है। चार्तिककार के मतानुसार गुणों में अब बाकी रहे-संख्या, परि- माण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, स्नेह और वेग । इनके अतिरिक्त नवीन नैयायिकों ने वैशेषिकों के अनुसार गुरुत्व, द्रवत्व, वुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, संस्कार इतने और गुण माने हैं। इनमें बुद्धि को ज्ञान ही का नामान्तर माना है (सूत्र-१-१-७५) इसको पांचवां प्रमेय माना है। इससे मागे चल कर इसका विचार होगा। यहां इतनाही कहना आवश्यक है कि यह आत्मा का गुण है। जैसा सूत्र १-१-१० भाष्य पृ० १६ और वार्तिक ( पृ० ७०, पंक्ति — २१.२२) में स्पष्ट लिखा है । वुद्धिका मानस प्रत्यक्ष होता है (तर्क- भापा पृ०१४०)। सुख, दुःख, इच्छा, द्वेप, प्रयत्न भी मात्मा ही के गुण हैं (सूत्र. ३.१-१०, और वार्तिक पृ०७०, पंक्ति २१.२२) । दुःख को ग्यारहवा प्रमेय माना है । उसका और उसीके साथ सुखका विचार आगे चल कर होगा। इनका मानस प्रत्यक्ष ज्ञान होता है ऐसा न्याय मंजरी (पृ० ४३४, पंक्ति १६-२०) में कहा है । भाष्यकार ने भी (पृ. २७) 'सुखादि' का प्रत्यक्ष माना है । वाचस्पति मिश्र ने 'सुखादि' से सुख, दुःख, इच्छा, द्वेप, प्रयत्न लिया है । जब फिसी वस्तु से सुख होता है तब फिर फिर यह चीज हमको मिले, ऐसा में आता है; इसी को इच्छा कहते हैं। जिस घस्तु से दुःख हुना और उसके विपयं में 'वह हमसे दूर रहे' ऐसा मन में होता है, इसीको द्वेप कहते हैं। फिर सुख देनेवाली चीज़ के पाने के लिये यो दुःख देनेवाली चीज को दूर करने के लिये जो काम आदमी करेगा उस काम के करने के लिये जो आत्मा का उत्साह होता है उसीको प्रयत्न कहते है। याग, दान, होम, परोपकार, इत्यादि अच्छे कामों से आत्मा में . मन न्यायप्रकाश। जोगुण उत्पन होता है उस को 'धर्म' कहते हैं और अनुचित कर्म करने से आत्मा में जो गुण उत्पन्न होता है उस को 'अधर्म' (न्याय मंजरी पृ० २७६)। इनका भी मानस प्रत्यक्ष योगियों को होता है। हम लोग केवल सुखप्राप्ति से पूर्व जन्म के धर्म का भौर दुःख से पूर्व जन्म के अधर्म का अनुमान ही कर सकते है और शास्त्र प्रमाण से जान सकते है (तर्क भापा १४०)। संस्कार तीन प्रकार का है-भावना, वेग, स्थितियापक | भावना उस संस्कार का नाम है जो आत्मा में ज्ञान से उत्पन्न होता है और जिससे मागे चल कर उसको उसी ज्ञान से जानी हुई चीज का स्मरण होता है। आज जिस चीज को देखा उसका कल स्मरण होता है, इसका कारण यह है कि उस शान से मामा में एक संस्कार गुणविशेष या शक्तिविशेप उत्पन्न हुमा जिसके द्वारा उसको उस चीज का स्मरण होता है। दुसरा संस्कार है वेग या तेजी जिससे वस्तु में क्रिया चलन पैदा होती है। वार्तिककार ने इसी का नाम गुणों में कहा है। यह पृथिवी, जल, वायु, तेज और मन में होता है। तीसरा संस्कार है स्थिति स्थापफ जिसके द्वारा रबड़ खीचा जाने के बाद फिर अपनी पुरानी जगह पर आजाता है, या पेड की शाख नीचे खींचे जाने पर फिर लौट कर अपनी पुरानी जगह पर चली जाती है। गय वाफी रहे संख्या, परिमाण इत्यादि । इनका विशेष रूपसे विचार वैशेपिक प्रकरण में होगा। यहां थोड़ा सा विचार करते हैं। संख्या वह गुण है जिससे 'एक' 'दो''तीन' इत्यादि व्यवहार होता है। एक से ले कर परार्ध तक संख्या होती है। एकत्व नित्य चीजों में नित्य है-अनित्य चीजों में अनित्य । एक से अधिक जितनी संख्याएं हैं वे सब अपेक्षाधुद्धि से उत्पन्न होती है। कई चीजें जब एक जगह पाई जाती है तब उनमें से एक एक के विषय में ऐसा ज्ञान होता है कि-'यह एक चीज़ है 'फिर 'यह एक है' इसी तरह जो शान होता है उसी को अपेक्षावद्धि' कहते है। . . - . . न्यायप्रकाश १९९५ इसी से उन चीजों में द्वित्व, नित्वादि संख्याएं उत्पन्न होती है। 'दो चीजें रहें तो द्वित्व संख्या, तीन रहें तो नित्य इत्यादि। परिमाण वह गुण है जिस के द्वारा घस्तु नापा जाता है। यह चार तरह का होता है-अणु (छोटा) महत् (वड़ा) दीर्घ ( लम्या) हस्व (नाटा)। पृथक्त्व वह गुण है जिल के द्वारा 'यह चीज़ उस चीज़ से अलग है' ऐसा ज्ञान होता है। संयोग वह गुण है जिस के द्वारा ' यह वस्तु उस से संयुक्त होगया अथवा मिल गया है ' ऐसा ज्ञान होता है। यह तीन तरह का होता है-(१) दो वस्तुओं में किसी एक की क्रिया से उत्पन्न-से जव दौड़कर भादमी कुरसी पर बैठ जाता है-कुरसी स्थिर है-मादमी की चाल से उस का यह संयोग भाभी के साथ हुमा । (२) दोनों वस्तुओं की क्रिया से उत्पन्न- जैसे दो तरफ से दो भेडे दौड़ कर जय टक्कर लड़ते हैं तव इनका संयोग दोनों के चलने से उत्पन्न हुआ। (३) संयोग से उत्पन्न जैसे जव आदमी का हाथ दीवार में लगा तव हाथ के संयोग द्वारा आदमी के शरीर का संयोग उस दीवार के साथ हुआ । विभाग वह गुण है जिस के द्वारा ' यह घस्तु उस से अलग हो गया है' ऐसा ज्ञान होता है। यह भी संयोग की तरह तीन प्रकार का होता है। परत्व वह गुण है जिस के द्वारा 'यह चीज़ उस से दूर है' ऐसा शान होता है। यह काल और दिक् दोनों के विषय में होता है जैसे जब एक चीज़ 4 फासिले.पर दो गज, - . OFT.
न्यायप्रकाश।
चार गज पर है तब वह उससे दूर कहलाती है। और जब
वह उससे दो चार दस महीने पहिले हुई तो भी 'दुर'
कहलाती है। इसी तरह अपरत्व वह गुण है जिसके द्वारा
'यह उससे नजदीक है' ऐसा ज्ञान होता है।
गुरुत्व।
भारीपन-वह गुण है जिसके द्वारा चीज़ गिरती है।
स्नेह ।
चिकनाहट को कहते है।
द्रवत्व
वह गुण है जिसके द्वारा जल जैसे पदार्थ यह चलते है।
-
न्यायप्रकाश , प्रमेय (५)-बुद्धि नैयायिकों के मत से बुद्धि और शान एक ही चीज है। (सु० १-१-१५) सांख्यों की तरह ये ज्ञान को बुद्धि की वृत्ति नहीं मानते.। यद्यपि यह स्वयं प्रमेय-शान का विषय है तथापि इसफो और वस्तुओं का प्रकाराफ या ज्ञान करानेवाली अवश्य मानना पड़ता है। (भाप्य० पृ० २७ )। बुद्धि एक गुण है। अर्थ, इन्द्रिय, मन और आत्मा इन्हीं चारों में से किसी एक का गुण हो सकता है। इनमें • शरीर, इन्द्रिय और मन अपनी अपनी क्रियानों में परतंत्र पाए जाते है अर्थात् जब तक आत्मा का प्रयत्न नहीं होगा तय तक शरीर, इन्द्रिय या मन का कोई व्यापार नहीं होता। इससे इन तीनों को चेतन नहीं मान सकते। इन्द्रिय और अर्थ (ज्यादि) के नष्ट होने पर भी शान होता है इससे इन दोनों में से किसीका गुण ज्ञान, (शुद्धि) नहीं हो सकता (सू०३-२-१८)। शरीर का गुण नहीं हो सकता इसका व्युत्पादन सूत्र ३-२-४८ ५८ में किया है । इससे मात्मा ही कां गुण बुद्धि हो सकती है, ऐसा सिद्धांत. सूत्र ३.२.४१ में सिद्ध किया है। यह वाद्ध नित्य है या अनित्य ? सांख्यों के मत से नित्य है। नैयायिकों ने इसे अनित्य माना है। ऐसा सिद्धान्त सून ३-२-२-१७ में किया है। यद्यपि नित्य विभु श्रात्मा का यह गुण है तथापि अनित्य है । जैसे विभु शब्द नित्य, आकाश का गुण हो कर भी अनित्य होता है। जिस तरह दूसरे शब्द की उत्पन्न कर पहिजो शब्द नष्ट हो जाता है उसी तरह दूसरे ज्ञान को उत्पन्न कर के पहिला ज्ञान नष्ट हो जाता है। बुद्धि अनित्य ही है ऐसा मिद्धान्त प्राचीनों का है। परन्तु नवीन ने ईश्वर के ज्ञान को नित्य माना है (तर्कभाषा पृ०१३८-४०)। धुद्धि या ज्ञान दो प्रकार का है। अनुभव और स्मरण। दो प्रकार का है-यथार्थ (सत्य ) और अयथार्थ (मिथ्या, भाई जैसा चीज का असल स्वरूप है वैसा ही जिस है वह यथार्थ ज्ञान है जैसे घोड़े को. देन.. ऐसा ज्ञान होता है । यही मनु .
Hि - अनुमान, उपमान और शब्द ज्ञान, जैसा प्रमाण प्रकरण में निरूपण किया गया है । जैसा किसी चीज का असल स्वरूप है वैसा ज्ञान में नहीं भासित होताहै उस ज्ञान को मिथ्या या अयथार्थ कहते है। जैसे जघ घोड़े को देख कर-'यह ऊंट है ऐसा ज्ञान होता है। मिथ्या ज्ञान तीन प्रकार का है संशय, तर्क और विपर्यय । संशय और तर्क का निरूपण आग होगा । विपर्यय ही असल मिथ्या ज्ञान है। (तर्क भापा १४६-५०) जिस वस्तु का एक दफे प्रत्यक्षादि शान हुआ वहीं चीज़ जब फिर किसी समय में मन में भासित होती है जिस समय उस चीज़ के प्रत्यक्षादि ज्ञान की सामग्री नहीं उपस्थित है, तब उस ज्ञान को स्मरण कहते हैं। स्मरण के २७ कारण सूत्र ३-२-४३ में गिनाए हैं। (१) प्रणिधान-जय किसी चीज़ को हम देखते हैं तब यदि हमारे मन में यह इच्छा होती है कि इस चीज़ का स्मरण मुझ को फिर फिर हुश्रा करे इस इच्छा से हम उस चीज़ को खूप ध्यान दे कर देखते हैं, इसी ध्यान देने को 'प्रणिधान' कहते हैं। जितनी ध्यान देकर जो चीज़ देसी जायगी उतनी ही अच्छी तरह स्मरण होगा। (२) निवन्ध व कई चीजें साथ साथ देसी जाती है और इन में किसी तरह का घनिष्ट सम्बन्ध मन में जम जाता है तब इन में से एक के देखने दूसरे का स्मरण होता है-जैसे दो आदमियों को यदि हर दम साथ देखें तो जब कभी पस सामने आता है तब दूसरे का भी स्मरण होता है। (३) अभ्यास जब किसी चीज को मैं चार बार देखता हूं तव उससे मेरे प्रात्मा में एक संस्कार बन जाता है जिसके द्वारा उस चीज का मुझे स्मरण हुआ करता है-जैसे चार चार घोखने से शब्दों का स्मरण होता है। (४) लिङ्ग-जय कोई चीज दूसरी चीज का चिह्न होता है-तय उस को देख कर उस चीज़ का स्मरण होता है। जैसे धूनां देखने से भाग का स्मरण होता है। निबन्ध से इस का इतनाही भेद है कि लिंग और लिंगी का सम्बन्ध सदाही बना रहता है-एक दूसरे से अलग कदापि नहीं देखा जाता। (५) बक्षण-जैसे किसी राजा के निशान को देख कर राजा का स्मरण होता है। स्वाभा- विक सम्बन्धवाला 'लिंग' कहलाता है और सांकेतिक सम्बन्ध घाले को 'लक्षण' कहते हैं। ।
न्यायप्रका। :: (३)सारश्य-जैसे फिसी मादमी की तसंधीर को देखकर हमको उस भादमी का स्मरण होता है । (७),परिप्रह-जैसे नौकर को देखकर मालिक का या मालिक को देखकर नौकर का स्मरण होता है। (८) माश्रय-किसी मादमी को देखकर उसके घर का स्मरण होता है। (६) माभित-घर देखकर उस घरके मालिक का मरण होता है । (१०) सम्पन्ध-रिश्तेदारी-जैसे पिताको देखकर पुत्र का स्मरण होता है। (११) मानन्तर्य-जैसे किसी अभ्यस्त काम के करने के समय एक अंश के किये जाने पर उसके धागे के अंश का स्मरण होता है। (१२) वियोग-जैसे मित्र में अलग होने पर उस का स्मरण होता है । (१३) एक कार्य-एक विद्यार्थी को देखकर दूसरे विद्यार्थी का स्मरण होता है-एक मिट्टी खोदने वाले को देखकर दुसरे मिट्टी खोदनेवाले का स्मरण होता है। (:१४) विरोध-दो मादमी के बीच जप बहुत झगड़ा हुमा करता है तब उनमें से एक मादमी के देखने से उसके दुश्मन का स्मरण होता है। (१५) अतिशय-जिस चीज में कोई पात बहुतायत से पाई जाती है तो इस चीज का स्मरण प्रकसर, हुमा करता है। (१६) प्राप्ति-जिस चीज के पाने की या उसके अलग करने की इच्छा यड़ी जोर से होती है उस चीज का स्मरण अकसर हुमा करता है । (१७) व्यवधान- तलवार के मेयान को देखकर उस से ढपी हुई तलवार का, फैद । लाने को देखकर भीतर के कैदियों का स्मरण होता है।. (EE) -मुख से सुख के कारण और (१६) दुःख से दुःख के कारण का स्मरण होता है। (२०) इच्छा से-जिस चीज की इच्छा है उस चीज का स्मरण होता है। (२१) द्वेष से-जिस चीज से मेष होता है उस चीज का स्मरण होता है। (२२) भय से-जिसं चीज से मादमी डरता है उसका स्मरण, उसको अकमर होता है। (२३) प्रथित्व-जो मादमी जिस चीज को चाहता है उस, बीज को देखने से उस भादमी का स्मरण होता है । (२४) क्रिया-रथ को , देखकर रथ के चलाने वाले का स्मरण होता है । (२५) राग-जिस स्त्री से प्रीति होती है उस स्त्री का स्मरण अकसर होता है।" Re) धर्म-जा बड़ा धर्मात्मा है उसको अपने पूर्वजन्म के ૨૨ .
१२८. न्यायप्रकाशा । अनुमान, उपमान मोर शब्द ज्ञान, जैसा प्रमाण प्रकरण में निरूपण- किया गया है । जैसा किसी चीज का असल स्वरूप है वैसा मान , में नहीं भासित होता है उस ज्ञान को मिथ्या या अयथार्थ कहते हैं जैसे जप घोडे को देख लर-'यह ऊंट है ऐसा ज्ञान होता है। मिथ्या ज्ञान तीन प्रकार का है संशय, तर्क और विपर्यय । संशय और तर्क का निरूपण आग होगा । विपर्यय ही असल मिथ्या ज्ञान है। ( तर्क भापा १४६-५०) जिस वस्तु का पक्ष दफे प्रत्यक्षादि ज्ञान हुया वही चीज जय फिर किमी समय में मन में भासित होती है जिस समय उस चीज़ के प्रत्यक्षादि ज्ञान की सामग्री नहीं उपस्थित है, तब उस ज्ञान को स्मरण कहते हैं। स्मरण के २७ कारण सूत्र ३-२-४३ में गिनाए हैं। (१) प्रणिधान-जय किसी चीज को हम देखते हैं तय यदि हमारे मन में यह इच्श होती है कि इस चीज का स्मरण मुझ को फिर फिर हुश्रा करे इस इच्छा ले हम उस चीज को खूब ध्यान दे कर देखते हैं, इसी ध्यान देने को 'प्रणिधान' कहते है। जितनी ध्यान देकर जो चीज देसी जायगी उननी ही अच्छी तरह स्मरण होगा। (२) निबन्ध व कई चीजें साथ साथ देसी जाती है और इन में किसी तरह का घनिष्ट सम्बन्ध मन में जम जाता है तब इन में से एक क देखने से दूसरे का स्मरण होता है-जैसे दो आदमियों को यदि हर दम साथ देखें तो जब कभी एक सामने आता है तब दूसरे का भी स्मरण होता है। (३) अभ्यास जब किसी चीज को मैं बार बार देखता तव उससे मेरे आत्मा में एक संस्कार बन जाता है जिस के द्वारा उस चीज का मुझे स्मरण ' हुआ करता है-जैसे चार वार घोखने से शब्दों का स्मरण होता है । (४) लिङ्ग-जव कोइ चीज दूसरी चीज का चिह्न होता है-तव उस को देख कर उस चीज का स्मरण होता है। जैसे धूनां देखने से भाग झा स्मरण होता है। निबन्ध से इस का इतनाही भेद है कि लिंग और लिंगी का सम्बन्ध सदाही बना रहता है-एक । दूसरे से अलग कदापि नहीं देखा जाता। (२) लक्षण-जैसे किसी ! राजा के निशान को देख कर राजा का स्मरण होता है। स्वाभा- : चिक सम्बन्धचाला 'लिंग' कहलाता है और सांकेतिक सम्बन्ध घाले को 'लक्षण' कहते हैं। ।
न्यायप्रकाश . (३)सारश्य-जैसे किसी मादमी की तसवीर को देखकर हमको उस मादमी का स्मरण होता है। (७),परिग्रह-जैसे नौकर को देखकर मालिक का या मालिक को देखकर नौकर का स्मरण होता है। (७) माश्रय-किसी मादमी को देखकर उसके घर का स्मरगा होता है। (8) माभित-घर देखकर उस घरके मालिक का,स्मरण होता है । (१०) सम्बन्ध-रिश्तेदारी-जैसे पिताको देखकर पुत्र का स्मरण होता है। (११) मानन्तर्य-जैसे किसी मध्यस्त काम के करने के समय एक मंश के किये जाने पर उसके, मागे के अंश का स्मरण होता है। (१२) वियोग-जैसे मित्र में अलग होने पर उस का स्मरगा होता है । (१३) एक कार्य-एक विद्यार्थी को देखकर दूसरे विद्यार्थी का स्मरण होता है एक मिट्टी खोदने वाले को देखकर दूसरे मिट्टी खोदनेघाले का स्मरण होता है। (.१४) विरोध-दो मादमी के बीच जध "बहुत झगड़ा हुमा करता है तब उनमें एक मादमी के देखने से उसके दुश्मन का स्मरण होता है। (१५) प्रतिथय-जिस चीज में कोई बात बहुतायत से पाई जाती है तो इस चीज का स्मरण प्रकसर हुमा करता है। (१६) प्राप्ति-जिस चीज के पाने की या उसके अलग करने की इच्छा पड़ी जोर से होती है उस चीज का स्मरण भकसर हुमा करता है। (१७) व्यवधान- तलवार के मयान को देखकर उस से ढपी हुई तलबार का, फैद लाने को देखकर भीतर के कैदियों का स्मरण होता है।. (१८) मुख से सुख के कारण और (१६) दुःख से दुःन के कारण का स्मरण होता है। ( २० ) इच्छा से-जिस चीज की इच्छा है उस चीज का स्मरण होता है। (२१) द्वेष से-जिस त्रीज से 'देष होता है उस चीज का स्मरण होता है। (२२) भय से-जिसं. चीज से पादमी डरता है उसका स्मरण, उसको अकसर होता है। (२३) मायन-जो मादमी जिस चीज को चाहता है उस चीज. को देखने से उसे प्रादमी फ़ा स्मरण होता है । (२४) फ्रिया-रय को संसकर रथ के चलाने वाले का स्मरण होता है। (२५) राग-जिस स्त्री से प्रीति होती है उस स्त्री का स्मरण मकसर होता है।' (२५) धर्म-ओ बड़ा धर्मात्मा है उसको अपने पूर्वजन्म । .. -- 70 . १२० न्यायप्रकाशा - 1 1 न वृत्तान्तों का स्मरण होता है। (२७) प्रधर्म-जब कोई मधर्म करता है तो उसको इस बात का स्मरण होता है कि यह मधर्म किसी समय मेरे दुःख का फारण टुमा घा। इतने ही कारण स्मृति के नहीं है। यह केवल हटान्तरूप में कहा है ऐमा भाष्य में ( पृ १७६ ) में लिया है। माराय यह है जय किसी कारण से किसी देगी हुई चीज का संस्कार मन मे हद जम जाता है तब उस संस्फार के द्वारा उस चीज का स्मरण होता है। स्मरण भी दो प्रकार का है-सत्य और मिथ्या 1 मिथ्या स्मरण स्वप्न में होता है क्योंकि स्वप्न में किसी संस्कार के द्वारा स्मरणा नहीं होता है निद्रा रूप दोप से ही स्मरणरूपी ज्ञान होता है । जागे में जो स्मरण होता है सो सत्य मिथ्या दोनों प्रकार का होता है तर्फभाषा पृ. १५०) प्रमेय (६) मन मन इन्द्रिय है ऐसा नैयायिकों का मत है। सत्र में इसके प्रसंगमें कुछ नहीं लिखा है । भाष्यकार ने कहा है कि और शास्त्रों में मनको इन्द्रिय माना है इस यात का निषेध गौतमने नहीं किया इससे मालूम होता है कि गौतम ने इस पातको स्वीकार किया। माप्यकार की कई पंक्तियों से मालूम होता है कि उनके मन में । भी इस बात का सन्देशही रहा। जैसा ऊपर इन्द्रिय प्रकरण में का आये हैं। परंतु बार्तिककार से प्रारम्भ करके नवीन नैयायिकों । तक सभी ने मनको इन्द्रिय माना है स्मरण-अनुमान-शाब्दशान-संशय--प्रतिभा-स्वप्नज्ञान-सुख- 'दुःस्त्र का शान-इतने प्रकार के शान जो होते हैं सो धाण रसन त्वक् चक्षु कर्ण इन पांच इन्द्रियों के द्वारा नहीं होते । इससे इन शानों का करण कुछ मौरही होना चाहिये। इसी करण को उठां इन्द्रिय 'मन' कहा है। यह एक युक्ति मनके होने में है। दूसरी युक्ति सूघ १. १. १६. में कहा है। हम देखते हैं कि जब एक ग्राम का फल हमारे सामने पाता है तब यद्यपि घड फल मेरे कई इन्द्रियों से प्राख स्वक् घाण से संयुक्त है तथापि . ៗ न्यायप्रकाश पंककाल में हमको उसके रूप स्पर्श और गन्ध का ज्ञान नहीं होता एक बार में क्या उसके रूपहीका या स्पर्शही फा या 'गन्धंद्दी का ज्ञान होता है। इससे यह मालूम होता है कि इन्द्रियों के संयोग रहते हुये भी कोई और यात मावश्यक है जिसके विना ज्ञान नहीं उत्पन्न होता और यह बात कंवल किसी और दूसरे तरह के करण के व्यापार रूपकी हो सकती है। इससे सिद्ध हुमा कि उक्त ज्ञानों में उपयोगी इन्द्रियों के अति- रिक एक और करण की अपेक्षा होती है। यही करण मन है। 'एक घर में एकही मन है। यदि अनेक मन होता तो एक चण में अनेक शान होसकते । (सूत्र० ३.२.५८) । एक काल में कई शान नहीं होते जब कभी ऐसा मालूम भी पड़ता तय यही होता है कि वे ज्ञान इतना पीघ्र होते हैं कि उनका क्रम मालूम नहीं पड़ता यथार्थ में एक दूसरे के वादही उत्पन्न होते हैं। एक क्षण में अनेक शान नहीं उत्पन्न होते इससे यह भी सिर घोता है कि एक क्षण मन का संयोग एकही वस्तु से होसकता है। यदि मन बड़ा होता तो ऐसा नहीं होता । यही चील का संयोग एक कालमें कई चीजों से होसकता है जैसे बड़ी चौकी पर कई मादी एफ काल में बैठ सकते हैं इसी कारणसे नैयायिकों ने मनको . बहुत छोटा-अणु-माना है (सू. ३. २.२)। यद्यपि यह मूरी द्रव्य है तथापि इसके मणु होने के कारण इसके अवयव नहीं है। इन्द्रियों से इसका संयोग होता है इसी संयोग के द्वारा प्रत्यक्ष शान उत्पन्न होता है। अनेक इन्द्रियों से इसका संयोग - होता रहता है इससे इसको वेगवान माना है मन अचेतन है। चेतन केवल मात्मा है फिर एकही शरीर में दो चेतन पदार्थों का मानना व्यर्थ है। (न्या. म. पृ. ४७८) मनही के द्वारा सुख दुःख का भोग होता है और मनही के द्वारा, इन्द्रियों का व्यापार होता है और यही धन्धन के कारण हैं इससे शानियों ने इसको हेय समझा है। '(पृ. ४७७) प्रमेय (७)-प्रवृत्ति। रन्द्रिय मन भोर गरीर के व्यापार को 'प्रवृत्ति' कहते हैं। . - न्यायप्रकाश I मन यह प्रवृत्ति दो प्रकार की होती है ज्ञान को उत्पन्न करने वाली और क्रिया को उत्पन्न करने वाली । जय किसी शब्द के उच्चारण से दुसरे आदमी का शान उत्पन्न होता है तो यह वाक् की प्रवृत्ति शान को उत्पन्न करने वाली हुई। इसी तरह मन के द्वारा देवता का ध्यान शरीर के द्वारा इन्द्रिय से उत्पन्न प्रत्यक्ष शान भी। किया उत्पन्न करने वाली प्रवृत्ति शरीर के द्वारा भार मन के द्वारा होती है। ये दोनों दश प्रकार की होती है जैसा वार्तिककार ने लिखा है। वातिकमार ने (पृ.८५) तीन प्रकार की प्रवृत्ति घाक् और शरीर के व्यापार रूप को दश प्रकार में बांटा है। दों प्रवृत्ति दो तरह की होती है, पुण्य और पाप ! पुण्य प्रवृत्ति यों है। तीन घरीर की प्रवृत्ति (१) दूसरों की रक्षा (२) सेवा (३) दान । चार चाक् की प्रवृत्ति (४) सत्य. (५) प्रिय, (६) हित का बोलना और (७) वेद का पढ़ना । तीन मन की प्रवृत्ति (८) श्या (६) लोभ का रोकना (१०) श्रद्धा। इन्ही के विरुष दश पाप प्रवृत्ति होती है। प्रवृत्ति ही धर्म अधर्म का कारण होता है और इमसे इसी के द्वारा सुख दुःख भोग करने के लिये बारम्बार अन्म ग्रहण की प्रावश्यकता होती है। प्रमेय (८) दोष। जिसके द्वारा प्रवृत्ति होती है उसी को 'दोष' कहते है (स. १.. १.१८)। राग द्वेप मोह येही तीन दोप है। (सु. ४.१.३.) इन्हीं के द्वारा मनुष्य सब प्रवृत्तियां होती है। ये भीमात्मा ही के गुण हैं। किसी चीज की तरफ कि मासक्ति उसमें मन लग जाना उसी को 'राग' कहते हैं। इसके ५ भेद है (१) काम स्त्रीपुरुपविष्ठ रिरंसा है, विजातीय संयोगही रति है। स्त्री की अभिलाषा अगर काम फहै तो स्त्री के काम में अव्याप्ति होगी। (२) मत्सर-जो अच्छी चीज हाथ से चली जा रही है सो हाथ से न जाय ऐसी इच्छा । (३) स्पृहा दुसरं प्रादमी की चीजों के लेने की इच्छा। (१) तृष्णा फिर फिर सुख भोगने की इच्छा। (५) लोभ-अनुचित कॉम चोरी इत्यादि करके भी दूसरे की चीजों के खेने की इच्छा । जय किसी चीज संभादमी याप्रको की तबियत विक होजाती है तो उसीको 'द्वेष' कहते हैं। इसके भी५ भेद है। (६) क्रोध-ऐसा चित्त का विकार जिससे शरीर में मांख भी हैं इत्यादि में विकार उत्पन्न होजाय। (२) ईर्ष्या-काई चीज जिस पर मेरा और दूमेरे मादमी का घराबर अधिकार है उसके प्रसंग ऐसी इच्छा कि वह उस आदमी को न मिले मुझकोही मिले । (३) असूया-दुसरे के गुणों पर डाह । (७) द्रोह- दूसरों को नुकसान पहुंचाने की इच्छा । (१),मभर्प-दुसरों को नुकसान पहुंचाने की इच्छा होने पर भी यदि वह नुकसान नहीं पहुंचा सके तय जो चित्त में एक तरह की जलन होती है उसी को अभप कहते हैं : किसी भावमी या चीज के प्रसंग प्रतथ्य ज्ञान को 'मोह' "कहते हैं। इसके चारं भेद है। (१) मिथ्या शान-जैसा जो नहीं है उसको वैसा समझना । (२) विचिकित्सा संशय-यह चीज ऐसी है या वैसी। (३) मान-मनमाने अपने को पड़ा सम- झना । (४) प्रमाद-मसावधानता-जो कर्तव्य है उसको न करना । (भाग्य पृ. १४/१५) रोग द्वेप मोह इन तीनों दोषों मे मोह को सथ से. दुष्ट माना है (सूत्र. ४. १.६)। क्योंकि विना मोह के राग या वेष नहीं हो सकता । समझ के उलट फेरही से राग द्वेप होते हैं। दोपोंही से प्रवृत्ति होती है और प्रवृत्तिही से धर्माधर्म, धर्मा- धर्म से पुनर्जन्म होता है इससे दोषों का त्याग आवश्यक होता है। प्रमेय (E) प्रेत्यभाष । 'प्रत्य भाव' पुनर्जन्म को कहते हैं। (१.१. १९:) अर्थात जय कोई जीव एक शरीर में मरकर दूसरे शरीर में जन्म देता है तो उसको 'प्रेत्यभाव' कहते हैं 'प्रेत्य' मरकर, अर्थात् एक देहें. विन्य मन बुद्धिसे अलग होकर-'भाव'. उत्पत्ति-दूसरी देहेन्द्रिय मन बुद्धि से सम्बन्ध होना । यह जन्म पुनर्जन्म अनादि है इसका अन्त तभी होता है जप यह जीव अपवर्ग को प्राप्त करता है। --- 1 १२४ न्यायप्रकाश - मात्मा नित्य है इसका मरण नहीं होसकता इसीसे 'प्रेत्यमाव' सिद्ध होता है (सू. ४.२ १०) प्रात्मा नित्य है उसकी उत्पत्ति, या नाश नी दासुकता पर शरीरादि की उत्पत्ति और नाश प्रत्यक्ष देने जाते हैं। इससे आत्मा के शरीरादि सम्बन्धी से जन्म और शरीरादि बदलनेही को मरण कहने हैं। जब तक आत्मा का अपवर्ग नहीं होता तब तक धर्माधर्म प्रयुक्त कर्म फलों के भोगने के लिये प्रात्मा को पुनः पुनः शरीरादि सम्बन्ध होताही रहता है। इसी पारंवार शरीरादि सम्बन्ध को 'पुनर्जन्म' 'प्रेत्यभाव' कहते हैं। शरीर इन्द्रियादि की उत्पत्ति किस तरह होती है सो 'शरीर' प्रकरण में निरूपित है। प्रमेय (१०) फल। प्रवृत्ति पौर दोष जो पहिले कह आये है-उन्हींसे जो अर्थ उत्पन्न होता है-उसीको 'फल' कहते हैं (सू. १. १. २०)। जितने व्यापार होने हैं वे क्या धर्म या अधर्म रूपसे होते है और धर्म अधर्महीसे घामाके शरीर इन्द्रिय आदि धनते हैं और उनके द्वारा उनके सुख दुःख होते है। सुख दुखही के भोगको मुख्य फल माना है (भाप्य० पृ० २६, न्यायमजरी पृ०५०५) और शरीर इन्द्रियादि भी सुख दुःस्ल के द्वारा होते हैं इससे उनको और फल । माना है। इसी तरह सुख दुःख भोगने को जन्म ग्रहण करना पड़ता है-मेरे सर व्यापारोंका फल यही है इस वातको विचार फरनेसे मनुष्यको संसारसे विरक्ति होती है-इससे इसका विचार अपवर्गफा साधन होता है। कई फर्म तो ऐसे हैं कि उनका फल उसी क्षण हो जाताहै-जैसे मिठाई खाया और उसी समय मीठा स्वादका सुख मिल गया- परंतु कई कर्म ऐसे हैं जिनका फल उसी काल में नहीं मिल जाता। जैसे यशादि-तीर्थ यात्रा-इत्यादि-औरभी कितने तरह के धर्म या मधर्म ऐसे गिने जाते हैं जिनका फल अभी कुछ नहीं मालूम होता इनके प्रसंग यह सिद्धान्त है कि इन कर्माके द्वारा प्रात्मा में धर्म मधर्म दोसरहके संस्कार उत्पा होते है और ये संस्कार भारमा , .
। न्यायप्रकाश। १२५ में 'वरायर वर्तमान रह कर कालान्तरम-जन्मान्तरमें अपना अपना फल उत्पन्न करते हैं। - (सू. भाष्य-४१-४७) प्रमेय ( ११) दुःख। : ग्यारहवां प्रमेय दुःख कहा है । पीड़ा या सन्तापहीको दुःख कहते हैं (सू. १. १. २२) दुःख २१ प्रकारका है-(१) शरीरका-या इन्द्रियोंका-इनके द्वारा भोग्य पदार्थ के प्राप्त होनेसे छ प्रकारको बुद्धि द्वारा दुःख होनका दुःख-गौर सुखके साथ मिला हुमा यह सुख मेरा शीघही लुप्त हो जायगा इस प्रकारका दुःस्न सब सुखोंके साथ रहता है-(तर्क भाषा पृ० १५३ ) यद्यपि सुख दुःख दोनों ‘फल में अन्तर्गत ई तथापि यही दुःखको अलग फिर कहनेका मतलब है कि इस संसारमें सुखकी मात्रा इतनी कमी है कि सभों को दुःखही मान लेना अच्छा है-संसारके कुल भोगोंको दुःख माननेहीसे विरक्ति होता है-इसीसे दुःखही पर विशेष ध्यान देकर उसीको समझना उचित है। प्रवृत्तिसे सुख दुःस्त्र दोनों होतेहैं इससे इन दोनोंको 'फल' रूपसे निरूपण करना उचित था। परंतु फिर सुख भी दुःख- ही समझनेसे कल्याण है इस बात पर जोर देनेके मतलय से दुःखको अलग भी कहा है-संसारमें दुःख बहुत है सुख्ख जो है 'मी तो वह दुःख से मिला ही हुमा पाया जाता है इससे गौतमने सू. ४. १. ५५ में जन्म कोही दुःस कहा है। और इस बात पर जोर देनको उद्देश्य यह है कि जमी जन्म हुमा अर्थात् शरीरेन्द्रियका संयोग हुमा नीदुःख अवश्य हुमा देवशरीर चालेको कम-मनुप्य शरीरवालों को उससे कुछ प्राधिक और शुद्ध जानवर शरीरवालोंकी । इससे भी अधिक, दुःखसे छुटकारा नहीं जबतक शरीर है-यह विचार करनेसे शरीर और सकल संसारसे विरक्ति होगी-विरक्ति होनेसे संसारके किसी पदार्थ की तरफ तृष्णा नहीं रहेगी-मौर तृष्णाके दूर होनेसे सकल दुःख दूर हो जायंगे (भाष्य.१.२१५.१६) प्रमेय ( १२) अपवर्ग। दुःख रूप जो जन्म उससे छुटकारा पानेको 'मोक्ष' या 'मप. वर्ग' कहते हैं. (सू. १. १. २२)। ऐफ वार जिसका प्रपवर्ग न्यायप्रकाश। गया उसका फिर जन्म नहीं होता है। नैयायिकोंने अपवर्गको दुम्बनिवृत्ति रूपही माना है-उनके मतमें नित्य सुखरूप मोक्ष नहीं है (भा० १.६०-३४)। जहां जहां वेदमें मोक्षको परम सुख कहा है यहां सुख पदसे दुःख निवृसिही समझना चाहिये । मोक्ष सुख रूप नहीं है इससे लोग इसको नहीं चाद मकते ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि लोग जैसे मुझको मुख हो ऐसा चाहते हैं वैसेही मुझे दुःख नहीं सोभी चाहते हैं। अपवर्ग है या नहीं सो विचार गौतमने सूत्र भा० ११५८-१८ में किया है। अकसर लोगों का ऐसा कहना है कि जी मादी जन्म लेता है तभी उसके पीछे तीन तरहके ऋण लगते है.इस प्रयासे छुटकारा पानेके लिये कर्म करनेकी मावश्यकता होती है- इस परम्परासे कभी फुरसत नहीं मिल सकती। इससे शास्त्रों में कहा है कि जन्म लेना और मरना यही मनुष्य का काम है। पर यह कहना ठीक नहीं। जयतक फल-सुख भोगनेकी मामांचा धनी रहती है तभीतक जन्म मरणकी परम्परा बनी रहती है। पर जय रागद्वेप नहीं रहते तब यद्यपि पुरुष कर्म करेगा तथापि उनसे वह यद्ध नहीं होता। (सू. ६४ ) सकल पदार्थको जानकर जब भादमी यह समझ लेता है कि कोईभी पदार्थ नहीं जिससे दु स्त्र नहीं होता-तव सभी पदार्थोसे विराग उत्पन्न होताहै। अपवर्गफिस तरह होता है सो सूत्र १. १. २ में वर्णित मात्मा इन्द्रिय इत्यादि जो बारह प्रमेय गिनाये है उनके असल स्वरूप का जघशान होजाता है तप उनके प्रसंग जितना प्रेम मिथ्या छान रहता है सो सय दूर होजाता है अर्थात् यह साफ मालूम होजाता है कि ये सब चीज़ यथार्थ सुख देने वाली नहीं फिर इनमें से किसी के पाने की इच्छा नहीं होती सय चीजों से दुःखही दुःस्त्र होने वाला है.तय किसी से यदि किमी प्रकार का दुरा हु उत्पन्न होता है। राग द्वेष रूप भी व्यापार करने की आवश्य प्रकार का पापार नहीं होता तब १ है F- । न्यायप्रकाशा मांगे जन्म होने का कोई कारण नहीं चाकी रह जाता । जन्म में होने से दुख की सम्भावना दूर होजाती है। और इसी दुःख. दूर होने को अपवर्ग कहते हैं। तर्कभाषा में यों संग्रह कर के कहा है। शास्त्रों से कुल पदार्थो का मसल स्वरूप जान लेने पर जितने विषय भोग के हैं उनके जो जो दोप है सो सब मालूम होजाते हैं। इससे मादमी के मन में बैराग्य उत्पन्न होता है । इसके बाद मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा से घह आदमी ध्यान धारणा इत्यादि का अनुष्ठान करके मात्मा के असल रूप को जानता है । जय राग द्वेष नहीं रह जाते और सघ कार्य निष्काम होकर करने से उस 'मादमी के भौर धर्म अधर्म नहीं उत्पन्न होते । पहिले के जो उसके धर्म अधर्म है उनको योगयल से जानकर सभी कि फलों का इकट्ठा भोग करता है। इससे पहिले के अधर्म धर्म के खतम होजाने पर उस आत्मा को फिर शरीर सम्बन्ध होने का कारण नहीं रह जाता । अर्थात् उसका फिर जन्म नहीं होता। इससे शरीर इन्द्रियादि द्वारा जो २१ प्रकार के दुःष हैं इनसे उसका छुटकारा होजाता है। इसी को अपवर्ग या मोत कहते हैं। केवल दुःख का नहीं होनाही अपवर्ग नहीं कहलाता । दुःख का जब इस प्रकार नाश होजाता है कि फिर किसी प्रकार का दुःख "नहीं होता तभी उसको अपवर्ग कहते हैं। इसीसे 'मास्यान्तक' दुःख निवृत्ति को मोक्ष कहा है। जब तक मात्मा के राग द्वेपादि गुण बने रहते हैं तबतक जिन चीजों में राग है उनके पाने की और जिनसे द्वेष है उनको अलग करने की इच्छा और तदनुसार व्यापार होतेही रहेंगे। ये व्यापार. कभी धर्मरूप होंगे कभी मधर्मरूप जिस व्यापार से जो धर्म होगा उस धर्म का फल, जो सुख होने वाला है और जो गधर्म हुमा उसका फल जो दुःख होने वाला है इन दोनों के भोग करने के लिये जन्म लेना पड़ता है। पर जप राग द्वेषही नहीं रह जाते तय व्यापराही न होते। व्यापार के न होने से धर्म अधर्म नहीं होसफते, धर्म अधर्म नहीं होंगे तो सुख दुःख होहीगा कैसे। फिर किस के भोग करने के निये जन्म लेने की भावश्यकता रहेगी। इसी से भारमा के २३ । "-. ..
१२६ न्यायप्रकाश E . जो नधो गुण है उनकदी उच्छेद को भी अपवर्ग नैयायिको ने. माना है ( न्यायमंजरी पृ. ४०८) तत्वज्ञानही अपवर्ग का मूल कारण है। यह तत्वज्ञान कैसे होता है। इन्द्रियों को चिपयों से हटाकर धारणा पूर्वक जब मन एकान करके मात्मा से संयुक्त होता है तब इधर उधर शान नहीं उत्पन्न होते। और फिर इधर उधर की चीज़ों के प्रति राग द्वेप नहीं होसकते। इसी तरह मोक्ष होता है (सू. ४. २. ३८)। ऐसी मन की एकाग्रता हो इस लिये यमनियम तपस्या प्राणायाम, प्रत्याहार. ध्यान, धारणा इत्यादि जो योग शास्त्र में वर्णित है उनके द्वारा मात्मा का संशोधन मावश्यक होता है (सु. ४.२.४६ ) और मात्म-विद्या का अभ्यास और उन शास्त्रों के जानने वालों से पालाप उनसे भुनी हुई बातों का विचार और अपने ऐसे और साथियों के साथ परामर्श ( सू. ४. २. ) इत्यादि तत्त्वज्ञान के उपाय चतुर्थाध्याय में वागत है। तृतीय पदार्थ-संशय । संशय क्या है सो जानने की मावश्यकता होती है, क्योंकि कई तरह के ज्ञान में स्वासकर अनुमान ज्ञान में संशय का होना आवश्यक होता है। जब मुझे संशय होगा कि यहां आग है या नहीं तभी मै यह अनुमान करूंगा कि यहाँ माग अवश्य है क्योंकि धूमा निकल रहा है। इसीसे गौतम ने संशय का बक्षण सूत्र १. १. २३ में किया है। विमर्शज्ञान को अर्थात् जिस ज्ञान में एक कोई चीज़ परस्पर विरुद्ध कई चीजों की तरह भासित होती है उसी को 'संशय' कहते हैं । अर्थात् ईश्वर के प्रसंग ऐसा ज्ञान होता है 'ईश्वर है या नहीं है जिसमें ईश्वर के प्रसंग होना' और 'न होना' ये दोनों परस्पर विरुद्ध स्वभाव भासित होते हैं। यही संशय कहलाता है। वाचस्पति मिश्रादि प्राचीन नैयायिको ने और केशन मिश्रादि नवीनों ने भी सूत्र २३ के अनुसार तीनप्रकार के संशय माने हैं। (१) जब कई चीजों के जो समान गुण है -- न्यायप्रकारा। अर्थात उन सभों में जो गुण हैं उन्ही का ज्ञान होता है और बनफे एक एक के जो स्वास खास गुण हैं उनका शान नहीं होता, तब जो उनके प्रसङ्ग परस्पर विरुद्ध कई शान घाला एक ज्ञान स्त्पिन्न होता है उसी को संशय कहते हैं। जैसे अन्धेरे में हमने कोई एक बम्पीसी चीज़ देखी । यह कोई चीज लम्बी खड़ी..है इतनाही साफ मैंने देखा और उस चीज का खास गुण कुछ मैं न देखसका। तो मेरे मन में यह शान उत्पन्न होता है- "क्या यह एक स्वम्भा खड़ा है या कोई आदमी। यहां पर लम्बाई जो गुण मैंने देखा सो खम्मा और भादमी दोनों में समान हैं। स्नम्मे के जो खास गुण हैं जिनके द्वारा खम्भा का आदमी से भेद होता है या आदमी के जो खास गुण हैं जिनके द्वारा यह खम्भे से भिन्न समझा जाता है ऐसे कोई गुण नहीं देने गये। तभी ऐसा संशय होता है कि यह भादमी है या खम्मा। यह पहिली तरह को संशय हुमा। (२) जपकी किसी चीजके प्रसङ्ग पढ़े लिखे लोगोंमें मत भेद पाया जाता है और किसी एक मत की तरफ कोई खास मजबूत सबूत मैं नहीं जानता तय मेरे मन में ऐसा दुविधा होता है कि 'यह चीज ऐसी है या धैसी'। यही दूसरी तरह का संशय है जैसे नैयायिकोंके मतसे, शब्द अनित्य है और मीमांसकों के मत से नित्य । जब तक कोई खास सबूत एक तरफ का मैं नहीं जानता तब तक मेरे मन में यही होगा कि 'शब्द नित्य है या भनित्य'। (३) जय कि किसी चीजका में । केवल कोई ऐसाही. गुण जानता हूं जो उस चीज को छोड़ कर मौर किसी चीज में नहीं है तो मुझे उस चीजके प्रसंग संशय होता है। यही संशय तीसरी तरह का है। जैसे . पृथिवी का में केवल गन्ध गुण जान . हूं और इसके प्रसंग में कुछ नहीं जानता तो इसमें रंग है या नहीं रस है या नहीं यह नित्य है या मनित्य इत्यादि संशय होंगे। इन तीन प्रकारोंके.अतिरिक्त न्यायमंजरी (पृ० ५६१-५८२.) में भाष्य (पृ०३५) के अनुसार और दो तरह के संशय बिने हैं। जब कोई.जीज देस्त्री जाती है तब कभी-ऐसा मनमें माता है कि मुझे इस चीज का भान हो रहा है, मैं इसे देख रहा हूं। . ना - न्यायप्रकाशा यह चीज यहां पर है ही यह निश्चय नहीं होता क्योंकि मकसर ऐसा होता है कि जो चीज जहाँ देख पड़ती है वहां वह रहती है जैसे तालाब में पानी और कभी ऐसाभी होता है कि जहां जो चीज देख पड़ती है यहां वह नहीं रहती है जैसे बालूमय भूमि में मृगतृपिणका का जल । इस घातको स्मरण करके जब कभी मैं जल देखूगा तो मेरे मनमें यह मावेगा 'यहां जल सचमुच है या नहीं। यह चौथा प्रकारका सन्देह हुमा। इसी तरह जो चीज मैं नहीं देखता वह हैही नहीं यह ठीक नहीं कहा जा सकता। ऐसा हो सकता है कि वह चीज है पर मैं नहीं देख सकता । जैसे दीवारसे छिपा हुमा भादमी । और कभी ऐसा भी होता है कि जिसे मैं नहीं दखता यह है ही नहीं जैसे घोड़ेके सींघ । यह घात जब मेरे मनमें मागी तय जय कभी मैं किसी चीज़ को न देखूगा तो मेरे मन में यह संथय होगा कि 'सचमुच यह चीज़ यहां है या नहीं। यही पांचवीं तरह का संशय हुमा । धार्तिककारने भाष्यके इस मतको नहीं माना है (पृ०६-१००)। इसको न स्वीकार करनेका यह कारण है कि ऐसा यदि संशय का कारण माना जाय तो फिर सब चीजोंके प्रसङ्ग संशय ही हुमा करेगा। फिर तो निश्चयज्ञान कभी होहीगा नहीं। मेरी मांखों के सामने जो चीज़ है उसके प्रसंग भी यदि होने न होनेका सन्देह हुमा तो फिर होने का निश्चय कौनसी चीजके प्रसंगमें होगा। पार्तिककार और वाचस्पति मिश्रके मतसे ये दोनों अलग संशय के कारण नहीं है। पूर्व कहे हुए तीन कारणों ही में ये भी मिले रहते हैं। चतुर्थ पदार्थ--प्रयोजन । जिस अर्थ के मतलय से पुरुप की प्रधान होती है सो प्रयो. अन' है (सू० १.१. २४)। जब कभी पुरुष कोई व्यापार करता है मनका, वचनका, या शरीरका तप या तो किसी चीजों पाने के लिये या किमी चीज़ के त्याग करने के लिये । जिस को पानेके लिये या छोड़ने के लिये पुरुष व्यापार करता चीज 'प्रयोजन' कहलाता है। 'गौण' और 'मुख्य' दो पा AN A r न्यायप्रकाथ। . प्रयोजन होते हैं। असल में जिस चीज से सुख मिलने की 'प्राण होती है उसी चीजके पानेकी इच्छा होती है और जिस चीज से दुःख होने का डर होता है उसीके त्यागनेकी इच्छा होती है। और इन्हीं दो तरह की इच्छाभोंके अनुसार पुरुपकी प्रवृत्ति भी होती है। इससे 'सुख की प्राप्ति' और 'दुःख का त्याग' येही दो प्रवृत्तियों के मुख्य प्रयोजन हैं। (वार्तिक पृ-१०५)। मौर जिन चीजोस सुख या दुःख होता है वे चीज भी प्रयोजन अवश्य हैं क्योंकि सुख पानेकी.जय इच्छा होती है तय सुख जिन पदार्थों से होता है उन्हीं के पाने के लिये व्यापार होता है। उसी तरह जम : दुम्म से बचने की इच्छा होती है तव दुःख देनेवाले पदार्थोही से बचने के लिये व्यापार किया जाता है। पर मसल प्रयोजन सुख का पाना और दुःबसे घचना ही है इससे सुख दुःख देनेवाले पदार्थों को गौण प्रयोजन कहा है (न्यायमंजरी पृ० ५६३)। पांचवां पदार्थ दृष्टान्त । जब कि दो आदमी किसी घातके प्रसंग विचार कर रहे हैं मोर दोनों दो पक्षोंका ग्रहण किये हैं, उस विचारमें यदि कोई पेसा विषय मालूम हो जिसके प्रसंग दोनोंकी राय-एक हो तो यही रशन्त हुधा (सू. १.१.२५)। कठिन विपर्योक समझने और समझानेमें इप्टान्त से पड़ा काम निकलता है : रान्त दो प्रकार के हैं । साधम्र्य दृष्टान्त और धैर्यत । मादमी अमर है या नहीं इसका जय विचार दो मादमी करेंगे तो • एक मादमी कहेगा कि जिसका जन्म होता है वह अवश्य मरता है भौर इसके सबूतमें यह फहेगा 'जैसे बकरा' । यफराका जन्म होता है मौर वह मरता है इस यातको दोनों भादमियोंने देखा है और दोनो मानते हैं। यह साधर्म्य दृष्टान्म हुआ। अर्थात् जो धर्म दया- भादमीकी है वही घरेफीभी है। दोनोंका जन्म मौर मरण होता है। फिर वही मादमी योभी फा सकता है। 'जो मरता नहीं उसका जाम भी नहीं होता। और इसके सबूत में पह कहेगा जैसे माका'।माकायको उत्पन्न होते किसी ने नहीं देखा मौर नाप भी नहीं होता यह भी दोनों भावमी मागते उसका .in न्यायप्रकाश। ܝ ܨ ܫ . + यह चीज यहां पर है ही यह निश्चय नहीं होता क्योंकि अकसर ऐस होता है कि जो चीज जहां देख पड़ती है वहां वह रहती है जैः तालाय में पानी और कभी ऐसाभी होता है कि जहां जो चीज देर पड़ती है यहां यह नहीं रहती है जैसे पालूमय भूमि में मृगतृष्णिक का जल । इस घातको स्मरण करके जब कभी मैं जल देखूगात मेरे मनमें यह गावेगा 'यहां जल सचमुच है या नहीं' या ' चौथा प्रकारका सन्देह हुमा। इसी तरह जो चीज में नई देखता यह हैही नहीं यह ठीक नहीं फहा जा सकता। ऐसा हो सकता है कि वह चीज है पर मैं नहीं देख सकता । जैसे दीवारसे शिपा हुमा भादमी और कभी ऐसा भी होता है कि जिसे मैं नहीं .. दखता यह है ही नहीं जैसे घोड़ेके सींध । यह बात जब मेरे मममें, मावेगी तय जप कभी में किसी चीज़ को न देखूगा तो मेरे मनमें - यह संशय होगा कि 'सचमुच यह चीज़ यहां है या नहीं। यही , पांचवी तरह का संशय हुमा । पातिककारने भाष्यके इस मतको नहीं माना है (पृ. २६-१००)। इसको न स्वीकार करनेका यह कारण है कि ऐसा यदि संशय : का कारण माना जाय तो फिर सब चीजोंक प्रसङ्ग संघय ही - हुमा करेगा। फिर तो निश्चयज्ञान कभी होहीगा नहीं। मेरी । मांखोंके सामने जो चीज़ है उसके प्रसंग भी यदि होने न होनेका सन्देह हुमा तो फिर होनेका निश्चय कौनसी चीजके प्रसगमें होगा। घातिककार और वाचस्पति मिश्र मतसे ये दोनों अलग संशय के कारण नहीं हैं। पूर्व कहे हुए तीन कारणों ही में ये भी मिले F - चतुर्थ पदार्थ--प्रयोजन । जिस अर्थ के मतलय से पुरुष की प्राप्ति होती है सो 'प्रयो- जन' है (सू० १. १. २५)। जय कभी पुरुष कोई व्यापार करता है मनका, वचनका, या शरीरका तप क्या तो किसी चीजके पाने के लिये या किमी चीज़ के त्याग करने के लिये । जिस चीज को पाने के लिये या छोड़ने के लिये पुरुष व्यापार करता है वही बीज ' प्रयोजन' कहलाता है। 'गौण' और 'मुख्य' दो तरह के न्यायप्रकाया . - में या पार किसी अन्य में नहीं पाया जाता है। और यदिपाया जाता तो पार्तिककारने इसी २५ सूत्रको सिद्धान्त के बक्षण रूपसे व्याख्यान करते । और फिर. चार तरहके. सिद्धान्तोंका निरूपण भागे के सूत्रमें किया है तब इस सूत्र में भी तीन तरह के सिद्धान्तका निरूपण व्यर्थ होगा। सिद्धान्त चार प्रकारफे हैं। । (१) सर्वतंत्रसिद्धान्त-जो बात सय शास्त्रोंके मतसे घिरुद्ध नहीं है और अपने ग्रास्त्र में स्वीकृत है जैसे 'गन्ध रूप रस इत्यादि का प्रहण इन्द्रियों से होता है। घ्राण रसन नेत्र इत्यादि इन्द्रिय हैं। इसी प्रकारकी बातें न्याय शास्त्र में स्वीकृत हैं और दूसरे शास्त्रोंके मतसे भी इन घांतो कोई विरोध नहीं है। (सू०:१-२-२९) । (१) प्रतितंत्रसिद्धान्त-ऐसा सिद्धान्त जो किसी पास्त्र में स्वीकृत हो किसी शास्त्र में नहीं जैसे पृथिव्यादि परमाणु से सृष्टि होती है यह जो नैयायिकोंका सिद्धान्त सो पेशेपिक शास्त्र में स्वीकृत है और शास्त्रों में नहीं' (सूत्र. २९) (३) मधिकरणसिद्धान्त-एक घात जो स्वीकृत.हो उसी बात से जो और पातें सिद्ध होती हैं, जिन पातोंके हिले स्वीकृत बातें सिद्ध नहीं हो सकती ऐसी घात 'माधि- 'कहलाती हैं। जैसे 'इन्द्रियों से अतिरिक्त विषयों. ! भात्मा है, यह जय मानलिया जाता है तब इसीसे गोवा है कि 'इन्द्रिय नाना है, एक नहीं"एफ इन्द्रिय नहीं हो सकता है इत्यादि । जाननेवाला इन्द्रियोंसे तो किसी एक इन्द्रियही सय ज्ञान भार मात्मा POEM किसी खास बात मान १ कहलाता विवाद m . बायकांश। यह वैधयं अपान्त हुना। क्योंकि भावमी की जो दशा है उससे एक दम उलटी दया माकाथ को है। मादमी के जन्म मरण दोनों होते हैं। माफाश का एक भी नहीं। भनुमान का अवयव जो 'उदाहरण' कहा है उससे रपांत का भेद इतना ही है कि जिस बात का अनुमान जिस हेतु से किया जाता है उस हेतु के साथ उस घातका अविनामाष ज्याप्ति जो कि पहिलेसे नहीं ठीक मालूम है। उसको उदाहरण धारा सिद्ध करते हैं। और हटान्तका यह मतलब नहीं जिस बीज का विचार कर रहे हैं ठीक यही हालत इसका भी है-यह देखवानाही केवल हटान्त का प्रयोजन है। छठां पदार्थ-सिद्धान्त । 'सन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः'। ऐसा लक्षण सिद्धान्तका गौतमने (सू.१.१. २५) किया है । इसका तात्पर्य है जो पात प्रामाणिक प्रमाणासिय मानली जाय वही सिद्धान्त है अर्थात किसी बात को प्रमाण से मानकर फिर जब कहा जाय कि 'यह ऐसा है तो वह सिद्धान्त कहलाता है। यही व्याख्या वार्तिकने इस सूत्रका किया है और न्याय मंजरीमें (पृ ५६५) भी इसी ज्याग्याको स्वीकार किया है। नवीन नैयायिकोंने भी इसे स्वीकार किया है। तर्कभाषा (पू १९०) में लिखा है-जो यात प्रामाणिक समझी जाय वही 'सिद्धान्त' है। परन्तु भाष्यकारकी व्याख्यासे ऐसा मालूम होता है कि इस सुत्रमें तीन तरह के सिद्धान्तोंका निरूपर (१) तन्त्र सस्थिति शास्त्र-सिद्ध मत ऐसा है इस । (२)'प्रधिकरण सस्थिति शास्त्र सिद्ध जो के अनुसार जो और कुछ मतका भनुमान किया संस्थिति-जो बात पैसेही मानली जाती है, स्थिर नहीं की गई है। इस व्याख्याको जो वो करते हैं उनके मतसे इस सूत्रमें तीन प्रकारके सि | इससे इसके पहिले सिद्धान्तके लक्षण छोड़ दिया है। ऐसा वाचस्पति मिश्रने (११७८ ) लिखा है। परन्तु ऐसा कोई सुत्र पायप्रकारा 10 में या भोर किसी प्रन्थ में नहीं पाया जाता है। और यदि पाया • जाता.तो धार्तिककारने इसी २५ सूत्रको सिद्धान्त के अक्षय रूपसे व्याख्यान करते । और फिर. चार तरहके. सिद्धान्तोंका निरूपण मागे के सूत्रमें किया है तब इस सूत्र में भी तीन तरह के सिद्धान्तका निरूपण व्यर्थ होगा। सिद्धान्त 'चार प्रकारफे हैं। (१) सर्वतंत्रसिद्धान्त-जो पात सय शास्त्रोंके मतसे विरुद्ध नहीं है और अपने शास्त्र में स्वीकृत है जैसे 'गन्ध रूप रस इत्यादि का ग्रहण इन्द्रियों से होता है 'माण रसन नेत्र इत्यादि इन्द्रिय हैं। इसी प्रकारकी यातें 'न्याय शास्त्रं में स्वीकृत हैं और दूसरे शास्त्रोंके मतसे भी इन बातोमें कोई विरोध नहीं है। (सू० १-२-२९) । (१) प्रतितंत्रसिद्धान्त-ऐसा सिद्धान्त जो किसी शास्त्र में स्वीकृत हो किसी शास्त्र में नहीं जैसे पृथिव्यादि परमाणु से सृष्टि होती है यह जो नैयायिका सिद्धान्त है सो वैशेपिक शास्त्र में स्वीकृत है और शास्त्रों में नहीं: (सूत्रः १-१.२६)। (३) भधिकरणसिद्धान्त -एफ यात जो स्वीकृत हो गई है उसी बात से जो और पातें सिद्ध होती हैं, जिन बातोंके विना पहिले स्वीकृत पाते सिद्ध नहीं हो सकती ऐसी बाते 'भधि- करण सिद्धान्त' कहलाती हैं। जैसे 'इन्द्रियों से अतिरिक विषयों 'को जाननेवाला आत्मा है, यद्द जय मानलिया जाता है तब इसीसे यह भी सिद्ध होता है कि 'इन्द्रिय नाना हैं, एक नहीं"एक इन्द्रिय से कई तरह की चीजों का प्रहण नहीं हो सकता है इत्यादि । इन बातों के मानने ही से सबका मसल जाननेवाला इन्द्रियोंसे अतिरिक्त है सो सिद्ध हो सकता है नहीं तो किसी एक इन्द्रिय ही को कुल चीजों का जाननेवाला मान लेनेही से सय शान मोर स्मरणादि सिद्ध हो जायंगे। फिर इन्द्रियोंसे अतिरिक्त आरमा मानने की मावश्यकता नहीं रह जायगी (सूत्र० १-१:३०) । (8) माभ्युपगमसिद्धान्त-जहां किसी वस्तु के प्रसंग किसी खास पांत का विचार करने के मतलय से उसके प्रसंग कोई बात मान ली जाती है तो यह मानी हुई यात 'मभ्युपगमसिद्धान्त' कहलाता है। जैसे शब्द नित्य है या अनित्य यह जय विचार: मीमांसकोंके 'माय करना है तव शब्द क्या है द्रव्य या गुण इस विवाद - 11 न्यायप्रकाशा . यह वैधय॑ हपात हुआ। क्योंकि भादमी की जो दशा है उससे पक वम उलटी दशा भाकाश को है। भादमी के जन्म मरण दोनों होते हैं। भाफाश का एक भी नहीं। भनुमान का अवयव जो 'उदाहरण' कहा है उससे दांत का भेद इतना ही है कि जिस बात का अनुमान जिस हेतु से किया जाता है उस हेतु के साथ उस यातका अविनामाव ग्याप्ति जो कि पहिलेसे नहीं ठीक मालूम है। उसको उदाहरण मारा सिद्ध करते हैं। और हष्टान्तका यह मतलब नहीं है जिस चीज़ का विचार कर रहे हैं ठीक वही हालत इसका भी है-यह देखबानाही केवल शान्त का प्रयोजन है। छठां पदार्थ-सिद्धान्त । 'सन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः '। ऐसा लक्षण सिद्धान्तका गौतमने (सू.१.१. २५) किया है । इसका तात्पर्य है जो पात प्रामाणिक प्रमाणसिद्ध मानली जाय वही सिद्धान्त है अर्थात किसी बात को प्रमाण से मानकर फिर जव कहा जाय कि 'यह ऐसा है तो वह सिद्धान्त कहलाता है। यही व्याख्या वार्तिकने इस सूत्रका किया है और न्याय मंजरी में (पृ. ५६५ ) भी इसी व्यापयाको स्वीकार किया है। नवीन नैयायिकोंने भी इसे स्वीकार किया है । तर्कभाषा (पू. १४०) में लिखा है-जो पात प्रामाणिक समझी जाय वही 'सिद्धान्त' है। परन्तु भाष्यकारकी व्याख्यासे ऐसा मालूम होता है कि इस सूत्रमें तीन तरह के सिद्धान्तोंका निरूपण है। (१) तन्त्र सस्थिति शास्त्र-सिद्ध मत ऐसा है' इस प्रकार से कहा गया। (२) 'मधिकरण सस्थिति शास्त्र सिद्ध जो सिद्धान्त है उसके अनुसार जो और कुछ मतका अनुमान किया जाय। (३) अभ्युपगम संस्थिति-जो धात पैसेही मानली जाती है, मौर ममाणसे स्थिर नहीं की गई है। इस व्याख्याको जो लोग स्वीकार करते हैं उनके मतसे इस सत्रमें तीन प्रकारके सिद्धांत कहे हैं। इससे इसके पाहेले सिद्धान्तके खक्षण वाला सूत्र भाष्यकारने छोड़ दिया है। ऐसा वाचस्पति मिश्रने तात्पर्य टीका (पृ. १७८) जिला है। परन्तु ऐसा कोई सुत्र न्यायसूचीनिबंध न्यायप्रकाश, . । में या मार किसी अन्य में नहीं पाया जाता है। और यदि पाया जाता.तो घार्तिककारने इसी २५ सूत्रको सिद्धान्त के अक्षणं रूपसे व्याख्यान करते । और फिर.,चार तरहके, सिद्धान्तोंका निरूपणं मागे के सूत्रमें किया है तब इस सूत्र में भी तीन तरह के सिद्धान्तका निरूपण व्यर्थ होगा। : सिद्धान्त चार प्रकार हैं। (१) सर्वतंत्र सिद्धान्त-जो बात सय शास्त्रोंके 'मतसे घिद्ध नहीं है और अपने शान में स्वीकृत हैं जैसे : गन्ध रूप रस इत्यादि का ग्रहण इन्द्रियों से होता है। घ्राण रसन नेत्र इत्यादि इन्द्रिय हैं। इसी प्रकारकी बाते न्याय शास्त्र में स्वीकृत हैं और दूसरे शास्त्रोंके मतसे भी इन बातो कोई विरोध नहीं है। (सू०१-१-२९) । (२) मतितंत्रसिद्धान्त-ऐसा सिद्धान्त जो किसी शास्त्र में स्वीकृत हो किसी शास्त्र में नहीं जैसे पृथिव्यादि परमाणु से सृष्टि होती है यह जो नैयायिकों का सिद्धान्त है सो धेशेपिक शास्त्र में स्वीकृत है और शास्त्रों में नहीं: (सुत्रः १-१-२६)। (३) भधिकरणसिद्धान्त -एक यात जो स्वीकृत हो गई है उसी बात से जो और पातें सिद्ध होती हैं, जिन पातोंके विना पहिले स्वीकृत यातें सिद्ध नहीं हो सकती ऐसी बातें 'मधि- करण सिद्धान्त' कहलाती हैं। जैसे 'इन्द्रियों से अतिरिक्त विषयों को जाननेवाला आत्मा है, यह जय मानलिया जाता है तब इसीसे । यह भी सिद्ध होता है कि 'इन्द्रिय नाना है, एक नहीं"एक इन्द्रिय से कई तरह की चीजों का प्रण नहीं हो सकता है इत्यादि । इन बातों के मानने ही से सयका मसल जाननेवाला इन्द्रियोंसे अतिरिक्त है सो सिद्ध हो सकता है नहीं तो किसी एक इन्द्रिय ही को कुल चीजों का जाननेवाला मान लेनेही से सय ज्ञान और स्मरणादि सिद्ध हो जायंगे। फिर इन्द्रियोंसे भतिरिक्त पारमा मानने की आवश्यकता नहीं रह जायगी (सूत्र० १-१:३०) । (४) अभ्युपगमसिद्धान्त-जहां किसी वस्तु के प्रसंग किसी खास पांत का विचार करने के मतलब से उसके प्रसंग कोई बात मान ली जाती है तो यह मानी हुई घात 'मभ्युपगमसिद्धान्त' कहलाता है। जैसे शब्द नित्य है या अनित्य यह जय विचारमीमांसकोंके साथ करना है तय शब्द क्या : गुण इस वांतका विवाद . पेसाही है कि यह पस्तु ऐसी होगी चसी नहीं। इसी सम्भावना १३४ न्यायप्रकाश न करके अपने पक्षको प्रचलता जानता हुमा नैयायिक इस बात पर मीमांसकोका मत को स्वीकार कर लेता है कि मच्छा चन्द द्रव्यही है जैसा आप कहते हैं ' ऐसा जिस मतका स्वीकार कर लिया जाय घह र भ्युपगमसिद्धान्त' हुमा। यदि इतना दुसरे की बात को मान फर भी नैयायिक 'शब्द अनित्य है 'सो सिख कर दे तो उसकी बुद्धि की अधिक प्रशंसा होगी। (खून १-१-३१) ऐसी व्याख्या भाग्यकार की है। पर वार्तिककार ने दूसरी व्याख्या की है। उनके मतसे नैयायिकोंका 'मयुपगमसिद्धान्त' यह कहलायेगा जो सूत्रों में नहीं है पर आगे जाकर शास्त्रकारोंने मान लिया है जैसे 'मन इन्द्रिय है' यह यात सूत्रोम कहीं भी नहीं है पर नैयायिकोने मान लिया है। चार्तिककार का मत ठीक मालूम होता है। क्योंकि १-१-२५ सूत्रमें 'प्रमाणसिद्ध ' मानकर जो बात 'ऐमी है' इस प्रकार से कही जाय उसीको 'सिद्धान्त' कहा है। फिर खाली अपनी वुद्धिकौशल देखलानेके लिये दूसरे के मत को थोड़ी देरके लिये यदि हमने मान भी लिया तो भी वह मेरे लिये 'सिद्धान्त' नहीं कहला सकता क्योंकि मैने उसको प्रमाणसिद्ध नहीं माना है। सातवां पदार्थ--अवयव । अनुमान वाक्यके अंशों को 'अवयव ' कहा है । इनका वि चार अनुमान प्रकरणमें पहले हो गया है। आठवां पदार्थ-तर्क। जब किसी आदमी को फिमीवस्तुका असल रूप जानने की इसका होती है और उस वस्तु में कई तरह के विरुद्ध गुण होनेकी शंका होती है तब उसको उस वस्तु के प्रसंग संशय होता है क्या यह वस्तु ऐसी है या वैसी है। फिर कुछ सोच विचार कर कुछ युक्तियां घर ऐसी देखता है जिनसे उसको यह बुद्धि होती है कि सम्भव धूधि को तर्फ कहते हैं। (सूत्र. १.१.४०)। जैसे मात्मा का क्या न्यायप्रकाश रूप है यह जानने की इच्छा हुई। फिर यह उत्पन्न होता है या नहीं उत्पन होता है ये दो विरुद्ध गुण की शंका उस आत्मा के प्रसंग होती है । फिर वह विचार करता है कि यदि पारमा की उत्पत्ति या नाश होता तो एक जन्म में किये हुये कर्म फलका भोग . दूसरे जन्म में कैसे हो सकता क्योंकि जिसने पूर्व जन्म में कर्म किये हैं वह तो मरने पर एक दम नष्ट हो गया। इन विचारों से मालूम होता है कि श्रात्मा की उत्पत्ति नहीं होती होगी। यही त कहलाता है। मात्मा की उत्पत्ति नहीं होती' ऐसा तर्फका स्वरूप नहीं माना है क्योंकि यह तो यथार्थ ज्ञान ही होगा और तर्क को यथार्थ शानका कारण माना है। और फिर तर्फ में पढ़ता नहीं रहती। ऐसाही है' ऐसा दृढ़ निश्चय नहीं होता 'ऐसा होगा: इसी प्रकार कुछ सन्दिग्धही रहता है। संशय और 'निश्चय के बीच में तर्क प्राता है 'आत्मा उत्पा होता है या नहीं। यह संशय दुगा । 'आत्मा नहीं उत्पन्न होता' यह निश्चय हुआ। परन्तु प्रारमा उत्पन्न होगा या नहीं इस संशय के बाद हमारे मनमें यह भाता है कि 'मालूम होता है कि प्रात्मा उत्पन्न नहीं होता' तय इसके बाद यह निश्चय होता है कि 'मात्मा नहीं उत्पन्न होता है। ऐसाही क्रम सब संशयों में पाया जाता है। तर्क सम्भावना रूप होने पर भी मसल वातका ज्ञान जल्द मौर ज्यादे दृढ़ होता है इसी से तर्कको 'तत्त्वज्ञानार्थ' कहा है। प्राचीनों का ऐसा लक्षण तर्क का है। नवीनों ने तर्क को 'अनिएप्रसंग' कहा है (तर्कभाषा पृ. १६२)। तात्पर्य इसका, यह है कि संशय में दो तरह की बात की सम्भावना की जाती 'श्रात्मा उत्पन्न होता है या नहीं' । फिर यह विचार होता है 'कि 'यदि मात्मा उत्पन्न होता तो पूर्व जन्म के कम्मों के फल का भोग इस जन्ममें नहीं होता'। इसी युक्ति को जिसमें एक पक्षके स्वीकार से क्या अनिष्ट या गलती होती है सो दिखलाया जाता है- 'तर्क' कहते हैं। प्राचीन नवीन मत में भेद इतनाही है कि इस युक्ति से जो दूसरे पक्ष के होने की सम्भावना मन में पाती है उसको प्राचीनों ने 'तर्क' माना है, और नवीनों ने उस युक्ति ही को।
m- न्यायप्रकाश नवम पदार्थ-निर्णय जिस वस्तु के प्रसंग तर्क होता है ऐसा होगा' उसी वस्तु के प्रसंग इस तर्क के बाद निश्चय ज्ञान होता है यह ऐसा है'। जब दोनों पक्षों का विचार करने पर तर्क के द्वारा 'यह वस्तु ऐसीही है' यह निश्चय होता है उसी निश्चयात्मक ज्ञान को निर्णय' कहते है (सुत्र १.१.४१) । 'हात्मा उत्पन्न होता है- नहीं होता है'-इन दोनों पक्षों के साधक बाधक युक्तियों को विचार कर जय मुझे यह निश्चय हो जाता है कि 'प्रात्मा नहीं उत्पन्न होता तब यह मेग ज्ञान 'निर्णय' शुमा। दोनों पक्षों का विचार करने से जो निश्चय होता है वह यदि निर्णय है तो प्रत्यक्ष या शाब्दज्ञान 'निर्णय नहीं कहलावेगा। इससे भाष्यकार ने (पृ. ४८ ) कहा है कि शसल में निश्चयरूप ज्ञानही को निर्णय कहते है- इससे प्रत्यक्ष या शाब्दभान भी जब निश्चय रूप से होगा तव अवश्य 'निर्णय' कहलावेगा। तब दोनों पक्षों का विचार करने से ऐसा जो सूत्रकार ने लिखा उसका तात्पर्य केवल चैसे झानों से है जिनके प्रसंग मतभेद है या संशय हो गया है। इसका कारण यह है कि सूत्रकार ने वादी प्रतिवादी के बीच जो विचार होता है उसी को चिश में रखकर सब यातें कही है इसीलिये इस सूत्र में भी ऐसा कहा है। असल में निश्चय ज्ञान मात्र को 'निर्णय' कहना चाहिये। नवीन नैयायिकों का भी ऐसाही मत है। तर्कगाषा में लिखा है (पृ. १६५) 'निश्चय ज्ञान को निर्णय कहते है-वह प्रमाणों का फल है। यदि प्रत्यक्ष शाब्दशान को निर्णय न मानते तो 'प्रमाणों का फल' इसे नहीं कहते। परन्तु न्यायमंजरी के मत से तर्क को न्याय ( अनुमान) का अवसान माना है इससे अनुमान ज्ञानही को निर्णय कर सकते हैं-इसी से सूत्रकार ने 'दोनों पक्षों के विचार करने से' ऐसा फता है। इनके मत से इन्द्रियादि अन्य प्रत्यक्ष ज्ञान कभी 'निर्भय' नहीं कहला सकते (न्यायमंजरी पृ. ५६१) 1 .1 स्यायप्रकाश .१३७ दसवां, ग्यारहवां; बारहवां पदार्थ-बाद-जल्प-वितंडा जब दो प्रातमी वादी और प्रतिवादी किसी बात का विचार करते हैं तो उन दोनों के बीच जो यातें होती हैं उनको कथा' कहते हैं । (भाष्य. पृ. ४६ ) यह कया तीन प्रकार की होती है, बाद जल्प और वितंडा। (१) जिस कथा में दोनों श्रादमी विचारणीय विषय में- प्रसली पात क्या है-ईश्वर है या नहीं यह निश्चय करने के लिये प्रवृत्त होते हैं और इस मतलब से एक मादमी एक पक्ष का भघलम्बन कर लेता है--'इश्वर' है और उस पक्ष की जितनी साधन युक्तियां हैं उनको कहता है और दूसरे पक्ष के विरुद्ध जो जो युक्तियां हैं उनको भी कहता है-इसी तरह दूसरा मादमी भी दूसरे पक्षका ग्रहण करता है-'ईश्वर नहीं है' और उसका साधन भौर पहिले पक्ष के याधन युक्तियों को कहता है और दोनों छादमी शास्त्रीय मत के अनुसार सब बातें करते हैं शास्त्रीय प्रमाणों का शास्त्रीय रीति से प्रयोग करते हैं। और ज्योही एक के पक्ष में कोई भी निग्रहस्थान (आगे निरूपण किया जायगा.) ऐसा दोप जिसका समाधान नहीं हो सकता-दिखला दिया जाय तो उसी दम वह अपने पक्ष को शेडता है. और दूसरे के पक्ष : सत्य मान कर कथा समाप्त करता है। यह कथा 'वाद' कहलाती जिसमें दो मादमी तत्व सचचात क्या है इसीफे निर्णय करने के मतलव से कथा करते है। (सू. १.२.१). (२) दूसरी कथा है 'जल्प' है। इसमें भी चादी प्रतिवादी वाद की तरह कथा करते हैं और कुल रीति वाद की तरह होती है किन्तु क्या तत्व है सो निर्णय करना इसमें किसी का मतलब नहीं मतलब रहता है केवल दूसरे को हराने का- अपनी जीत हो । इससे शास्त्रीय ही प्रमाण या शुद्धही अनुमान युक्तियों का प्रयोग इसमें नहीं होता। मनमानी युक्तियों का भी प्रयोग होता है हम जो हेतु पाह रहे हैं सो ठीक नहीं हैं ऐसा जानते हुए भी यह माश्मी यदि समझता है कि इसके कहने से मेरा प्रतिवादी उत्तर न दे सकेगा चुप हो जायगा तो वह अवश्य , - -किसी तरह रहता। .
- १३८ न्यायप्रकाशा उस हेतु का प्रयोग करेगा। और यद्यपि अपने पक्ष की मिथ्या भी जानता रहेगा तौभी केवल अपनी जीत के लिये वह मनमानी हेतु- भों का उपन्यास करता ही रहेगा। किली तरह जो पक्ष भने लिया है वह स्थिर होना चाहिये वह सत्य है या मिथ्या उससे कुछ मतलब नहीं। यही भेद वाद और जल्प में है। इसीसे चाद मे अपने पक्ष में यथार्थ होप देख कर वादी दूसरे के पक्ष को सत्य मान लेता है और दोनो उर्स पक्ष को 'तत्व' समझते हैं। जल्प में ऐसा नहीं एक वादी बार भी जाता तौभी क्या तत्व है सो सन्देह रही जाता है क्योंकि दोनो जानते हैं कि इस फ़था में जितने हेतु फहेगये है लो शुद्ध हेतु है ऐसा नहीं इससे यधपि में मध उत्तर नहीं दे सकता तथापि असल पात क्या है तो मैं नही जानता। (१.२.२. .) (३) तीसरी कथा है वितंडा । इसमें दोनो चादी अपना अपना पक्ष एफ एका लेते हैं सो नहीं। वितंडा में अपने पच के साधन से कुछ मतलब नहीं रहता केवल दूसरे के मत को पांड- नही करना उद्देश्य रहता है। जल्पसे इसका यह भेद है कि जल्प में दूसरे को हराने ही से केवल मतलब नहीं रहता दूसरे को हराकर मैं अपना पक्ष स्थिर कर्क यह मतलय रहता है । वितंडा में तो अपना पक्षही कोई नहीं "मैं नहीं कह सकता क्या घात सच है पर तुम जो कुछ कहते हो सो ठीक नहीं" इसी आधार पर केवल वकचार करता है और इससे वाद जल्प की तरह इसके साधक बाधक दोनों युक्तियों का प्रयोग नहीं होता क्योकि साधक किस बात का होगा अपना तो पक्षही नहीं है। केवल बाधक युक्तियोंहीं का प्रयोग होता है। जिससे दूसरे के पक्ष के दोष दिखलाये जायं। तेरहवां पदार्थ हेत्वाभास । अनुमान के प्रयोग में हत्यामास दुष्ट या अशुद्ध हेतु पा जाते हैं इससे इनका विचार अनुमान प्रकरण में किया गया न्यायप्रकारा। चौदहवां पदार्थ-छल । जल्प-रूपी कथा में जय प्रतिवादी फी घातों का इस तरह से. उलटा तात्पर्य निकालाजाय जिससे उसका मुंह बन्द हो जाय वह फिर कुछ न कह सके इसीको छल कहते है (सूत्र. १. २..१०) छल तीन प्रकार का होता है। (१) वाक् छल--प्रतिवादी ने जब कुछ ऐसे शब्द कहे जिनके कई अर्थ हो सकते हैं तब जिस मतलय से उसने उन शब्दों को कहा है उसको छोड़ कर दूसराही अर्थ उसका लगा कर उसका निषेध कर दिया जाता है और इससे प्रतिपादी को फिर कुछ कहने का अवसर नहीं रह जाता । जैसे फिसीने एक नया कम्बल मोढे चालक फो देख कर कहा-'नवकम्यलोऽयं बालकः' इसके दो श्रर्थ हो सकते है इस बालक का कम्बल नया है' और 'इस पालक के कम्बल है'। इसपर उसफा भतिवादी यदि कहदे 'तुमभूठेही इसको तो एकही फम्पल है । नय फम्बल नहीं है। फिर पहिला मादमी चुप हो जाता है । ( १. २. १२) (२) सामान्य छल-जय कोई वादी किसी शब्द का प्रयोग करता है तब उस शब्द के अर्थ को बहुत अधिक फैला कर उसकी , कही हुई पात को अशुद्ध साबित जय कोई करता है तो यह सामान्य छल कहलाता है। जैसे राजा फी सभा में किसी ब्राह्मण की कोई तारीफ करता है 'यह घडा विद्वान् है। उसपर दूसरा अदमी कहता है 'ब्राह्मण है तो विद्वान् क्यों नहो' । इसपर तीसरा मादमी कह सकता है यदि ब्राह्मण होनेहीसे विद्वान होतो जिसने. पठन पाठन नहीं किया यह भी विद्वान् हो सकता प्रादमी ब्राह्मण शब्द का अर्थ अच्छी तरह ब्रह्मचर्य पालन करके जिसने शास्त्रों का अभ्यास किया' समझ कर कहा कि जब ग्रामण है तो विद्वान क्यों न हो' पर तीसरे मादमी ने 'ब्राह्मण' पदः क्षा इतनाही अर्थ नहीं रखना-माहाण के कुलमें जिस किसी का जन्म है' सभी को उसने ब्राह्मण पद से लेकर अपना मत प्रकाश किया। और जय पक्षिता घोलने वालेने सन्दिग्ध अर्थ वाले पद का प्रयोग किया तप उसको भागे उत्तर में कुछ कहने का अवसर नहीं रहता इससे उसका मुंह धन्द हो १. २.,१३, .. है । दूसरा १४० न्यायप्रकाश। (३) उपचार छल-जय वादी किसी शब्द को सांशयिक अर्थ में प्रयोग करता है उस समय यदि प्रतिवादी उस शब्द का मसल अभिधेय अर्थ लगा कर उसके वाक्य का निषेध कर दे तो यह उपचार छल कहलाता है। जब कोई आदमी कहता है 'यह गांव गंगा में है तो यहां उसकातात्पर्य 'गंगा' पदसे नदी का नहीं रहता किन्तु 'गंगातीर' से रहता है। परन्तु प्रतिवादी कर सकता है 'भला ऐसा भी कहीं होसकता है कि कोई गांव गंगा में हो' भर्षात गंगा नदी के भीतर किसी गांव का होना असम्भव है। इसके उत्तर में पहिला प्रादमी कुछ नहीं कह सकता (सु. १.२.१४) तीनों तरह के छल में चादी के शब्दों का उलटा मर्थ समझ कर निषेध किया जाता है। इसस नवीन नैयायिकाने एकही प्रकारका छल माना है (तर्कभापा. पृ. १८१-८१) । परन्तु सूत्रकारने इस पत्त का निराकरण किया है (सू. १, २. १५-१६) । पंद्रहवीं पदार्थ--जाति-असत् उत्तर । बादी की कहोहुई युक्तियों का जप प्रतिवादी असल उत्तर देने में असमर्थ होकर कुछ अंड फंड उत्तर देता है तो ये ऐसे असत उत्तर 'जाति' कहलाते हैं। जाति के २४ भेद सूत्र में (५. १.१.) कद्दे है। यद्यपि मसल में इस के भेद अनन्त हो सकते हैं (सु. १.२.६१) (१) (२) साधर्म्य वैधयं रुप-वादी ने साधर्म्य चैधर्म हटान्त देकर जिस हेतु को कहा उसका निषेध सीधे न कर के उलटा यांत देकर यदि प्रतिवादी उसका निषेध करता है। जैसे चादी ने कहा 'शब्द प्रनित्य है क्योंकि प्रयत्न से इसकी निष्पत्ति होती है जैसे घट'-या 'जैसे माकाश जो कि प्रयत्न से निष्पन्न नहीं होता इससे अनित्य भी नहीं है। इस हेतु में कोई साक्षात रोष नहीं देकर प्रतियादी दुसरा हेतु कहता है। 'शब्द नित्य/ क्योंकि इसके अवयव नहीं है जैसे आकाश' 1 (सू५ १.२.) (३) उत्कर्पसम-वादी किसी एक अंश का सारश्य रांत का प्रयोग करता है प्रतिवादी उसी दृष्टांत के और साघश्य नहीं है सो दिखलाता है, अर्थात् साध्य वस्तु में H .
'१५१ न्यायमकाए। मौर मधिक धोका मारोप करके निषेध करता है। जैमें वादीने कहा 'शब्द अनित्य है क्योंकि प्रयत्न से निष्पन्न होता है जैसे घटे' प्रतिवादी कहता है 'यदि शब्द घट के सहश है तो घट की तरह वह मूर्त भी होगा सो असम्भव है इससे घट का साक्ष्य शब्द में नहीं हो सकती इससे घट की तरह रान्द मनित्य भी नहीं हो सकता। (४) अपकर्षसम में टांत में जो न्यूगतायें हैं उनका साध्य में, भारोप किया जाता है। जैसे जय प्रतिवादी कहे 'अगर घट का सादृश्य शब्द में है तो जैसे घट का प्रत्यक्ष श्रवणेन्द्रिय से नहीं होता इसी तरह शब्दका भी श्रवणेन्द्रिय से प्रत्यक्ष नहीं होगा। . .(५) (६) घरायसम-मवण्यर्यसम में घादीने जो पक्षके सहय किसी को हटांत कहा उसमें पक्ष का सादृश्य लगा कर उस युक्तिका निषेध किया जाता है। जैसे शब्द भनित्य है क्योंकि प्रयत्न से निष्पन होता है जैसे 'घट' इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है 'यदि शब्द के सदृश घट है तो शब्द सन्दिग्धसाध्य- धान है अर्थात् शब्द अनित्य है या नहीं यह सन्दिग्ध है तभी तो कहे हुये अनुमान का प्रयोग हो सकता था-तय घट भी सन्दिग्ध साध्यवान होगा-मर्थात घट भी अनित्य है या नहीं यह सन्दिग्ध होगा-फिर इस दृष्टांत से शब्द की भनित्यता कैसे सिद्ध हो सकती-यह उत्तर 'घरायसम हुमा'। यदि यों कहा जाय कि यदि घट सन्दिग्धसाध्यवान् नहीं तो शब्द भी सन्दिग्धसाध्यवान् नहीं होगा-तय इसके प्रसंग अनुमान श्रमम्भव है'-तो यह उत्तर भवर्यसम' होगा। .: (७) विकल्पसम-जो हेतु पेय किया गया उसमें कई तरह के धर्म है सो दिखलाकर फिर पक्ष के प्रसंग भी कई तरह के धमों का होना जव दिखलाया जाय तो यह उत्तर 'विकल्पसम' कहलाता है। शब्द अनित्य है क्योंकि प्रयत्न से निप्पन्न होता है जैसे घट' यहाँ ऐसा कहा जा सकता है-'प्रयल से निष्पन्न: वस्तु सय एक प्रकार की नहीं पाई जाती-घट प्रयत्न से 4 है सो कठोर है, फपड़ा प्रयरन से यनता है सो कोमल - .
न्यायप्रकाश। प्रयत्न से धनी हुई बस्तु कठोर. कोमले दोनों होती हैं. इसी तरह प्रयत्न से निष्पन्न शब्द नित्य अनित्य दोनो. हो सकता है। (८) साध्यसम-वादी में जिस दृष्टांत को पेश किया है उसको भी साध्य ही के सश बना देना-'साध्यसम" उत्तर कहलाता है। जैसे-घट के सदरा शब्द है इससे तुम शब्द को अनित्य कहते हो~-अच्छा यदि घट के सदृश शब्द है तो धट भी शब्द के सदृश होगा-राब्द की अनित्यता साध्य है अर्थात् अभी सिद्ध नहीं है-इससे घट की भी अनित्यता साध्य होनी चाहिये-और जो स्वयं साध्य है सो दूसरे को कैसे सिद्ध कर सकता । इसलिये घर की अनित्यता से शब्द की अनित्यता:नहीं सिद्ध हो सकती।'' (E) (१०) प्राप्तिसम-अप्राप्तिसम |, जहां ऐसा कहा जाय- तुम जो हेतु कहते हो क्या वह हेतु और जो तुम्हारा साध्य है सो एक आधार में वर्तमान है या नहीं यदि वर्तमान है तो दोनों बराबर है फिर किस को तुम हेतु करोगे किस को साध्य ?'.. यह उत्तर प्राप्तिसम हुधा | फिर जब कहा जाय-यदि दोनों : एक श्राधार में नहीं रहते तो तुम्हारा हेतु साध्य का साधन कैसे कर सकता 'यह उत्तर 'अप्राप्तिसम "हुमा । (११) प्रसंगसमदृष्टांत जो कहा जाय 'शब्द अनित्य है क्योंकि प्रयत्न से निष्फन्न होता है जैसे घट ।. इसके उत्तर में यदि कहा जाय-'घट अनित्य है इसमें क्या प्रमाण जबतक इसका सबूत नहीं कहा जाय तब तक क्षेतु ठीक नहीं माना जा सकता'-यह उत्तर 'प्रसंगसम'हुमा। (१२) प्रतिष्टांतसम-जिंस बात के सिद्ध करने के लिये एक दृष्टांत पेश किया गया उसके जवाब में यदि दुसरा पति उसका उलटा सिद्ध करने के लिये पेश कर दिया जाय- जैसे- जैसे प्रयत्न से निष्पन्न घट तुम अनित्य का दृष्टांत बताते हो। धैसेही प्रयत्न से निष्पन्न घट का धंस मैं नित्य फा दृष्टांत वता, सकता हूँ'- यह उत्तर प्रतिदष्टांतसम कहलाता है। -:(१३) अनुत्पतिसम-जिस चीजके प्रसंग फोई हेतु कहा आय- उस चीज के प्रसङ्ग यदि यह दिखलायाःजाय कि जयती चीज 14 .
. ܕ न्यायप्रकाश १४३ की उत्पत्ति ही नहीं हुई फिर कहा हुगा हेतु कहां रहेगा-तो रस उत्तर को अनुत्पत्तिसम कहते हैं। जैसे--- --जय यादी में कहां- 'शब्द भमित्य है क्योंकि यह प्रयत्न से उत्पन्न होता है.'-तो इसपर प्रतिवादी फह सकता है- यदि शब्द प्रयत्न से उत्पन्न होता है, तो प्रयत्न से पहिले इसकी उत्पत्ति नहीं होगी-मोर: अप शब्द उत्पन्न नहीं हुआ तब प्रयत्न सं उत्पन्न होना यह गुण कहां पर रहेगा-इस गुण का आधार ही जय नहीं रहा तो यह मनित्यत्व' का साधन क्योंकर कर सकता। इससे शब्द को नित्य मानना अवश्य पड़ेगा। .: (१४) संशयसम-जप किसी बात के साधन के लिये कोई हेतु उत्पन्न होता है तब प्रतिवादी यदि उसी तरह के, छेतु उस पात के विरुद्धसाधन का बतलाकर वादी को संशय में डाल दे-तो यह उत्तर 'संशयसम' कहलाता है। जैसे यादी ने कहा-'शब्द अनित्य है क्योंकि यह प्रयत्न से उत्पन्न होता जैसे घट'--इसपर प्रतिवादी कहता है-'शब्द नित्य है क्योंकि इन्द्रियग्नाहा है-जैसे सामान्य'-इससे दोनों पक्ष के हेतुओं को देखकर पादी संशय में पड़ जाता है । (१५) प्रकरणसम-एक ही वस्तु के प्रसंग यदि दो तरह की घात सिद्ध कर दी जाय-तो यही उत्तर 'प्रकरणसम' कहलाता है। जैसे 'शब्द प्रनित्य है क्योंकि प्रयत्न से उत्पन्न होता है' ऐसा कहे जाने पर प्रतिवादी कह सकता है-'शब्द नित्य है क्योंकि इसके.अवयव नहीं-जैसे प्राकाश'। साधर्यसम जाति से इस जाति का इतना ही भेद है कि उसमें दूसरे की कही हुई घात के खंडन ही से तात्पर्य रहता है पर इसमे उसके कहे हुये के विरुण 'पक्ष का साधन ही मुख्य उद्देश्य रहता है। (१६) महेतुसम-वादीने हेतु उपन्यास किया उसके प्रसंग यदि यह कहा जाय कि भूत भषिप्य या वर्तमान किमी कालमें वह हेतु हेतु नहीं हो सकता तो यही उत्तर 'पहेतुसम' कहलाता है। जैसे वादीने किसी घातक सिद्ध करने के लिये कोई हेतु कहां उसपर प्रतिवादी यों कह सकता है 'यदि तुम्हारा जो हेतु है घहसाध्य--जो धर्म उस हेतुसे सिम होता है के पहिले जकर .
न्यायप्रकाशा , प्रयत्न से धनी हुई वस्तु कठोर कोमल दोनों होती है इसी तरह प्रयत्न से निप्पन्न शब्द नित्य अनित्य दोनो हो सकता है (C) साध्यसम-वावी ने जिस दृष्टांत को पेश किया है उसको भी साध्य ही के सहश बना देना-'साध्यसम' उत्तर कहलाता है। जैसे-घट के सहा शब्द है इससे तुम शब्द को अनित्य कहते हो-अच्छा यदि घर के सदृश शब्द वे तो घर भी शब्द के सहश होगा-शब्द की अनित्यता साध्य है अर्थात् अभी सिद्ध नहीं है इससे घट की भी अनित्यता साध्य होनी चाहिये--पोर जो स्वयं साध्य है मो दसरे को कैसे सिद्ध कर सकता। इसलिये घट की मनिस्यता से शब्द की अनित्यता नहीं सिद्ध हो सकती। (E) (१०) प्राप्तिमम-अप्राप्तिसम। जहां ऐसा कहा जाय-- तुम जो नेतु कहने धो क्या यह ऐतु और जो तुम्हारा साध्य है सो एक माधार में वर्तमान में या नहीं-यदि वर्तमान है तो दोनों बराबर हैं फिर किम को तुम हेतु करोगे किस को साध्य ? - यह उत्तर प्राप्तिसम दुया। फिर जा कहा जाय- यदि दोनों एक आधार में नहीं रहते तो तुम्हारा ऐतु साध्य का साधन कैसे कर सकता यह उत्तर 'अप्राप्तिलम' हुमा। (११) प्रसंगसम-दृष्टांत जो कहा जाय क्योंकि प्रयत्न ले निष्पन्न होता है जैसे घर'। इसके उत्तर में यदि कहा जाय--'घट अनित्य है इसमें क्या प्रमाण जपत इसका सबूत नहीं कहा जाय तब तक तु ठीक नहीं माना जा सकता'-यह उत्तर प्रसंगसम' दुमा । (१२) प्रतिशतसम-जिस बात के सिद्ध करने के लिये एक दृष्टांत पेरा किया गया उसके जवाब में यदि दुसरा अंत उसका उलटा सिद्ध करने के लिये पेत्र कर दिया जाय-जैसे- जैसे प्रयल से निष्पन्न घट तुम अनित्य का दृष्टांत बताते हौ। धैसेही प्रयत्न से निष्पन्न घट का धंस में नित्य का दृष्टांत बता सकता हूँ'-यह उत्तर प्रतिक्षांतसम कहलाता है। (१३) अनुत्पत्तिसम-जिस चीजके प्रसंग कोई हेतु कहा जाय- उस चीज़ के प्रसङ्ग यदि यह दिखलाया जाय कि जबतक चीज शब्द 'अनित्य ~ - न्यायप्रकारा। . की उत्पत्ति ही नहीं हुई फिर कहा हुआ हेतु कहां रखेगा--तो इस उत्तर को अनुत्पत्तिसम कहते हैं। जैसे--जय वादी मे कहा- शब्द भगित्य है क्योंकि यह प्रयत्न से उत्पन्न होता है तो . इसपर प्रतिवादी कर सकता है-'यदि शब्द प्रयत्न से उत्पन्न होता है, तो प्रयत्न से पहिले इसकी उत्पत्ति नहीं होगी और जय शब्दं उत्पन्न नहीं हुमा तष प्रयत्न से उत्पन्न होना यह गुण कहां पर रहेगा-इस गुण का आधार ही जय नहीं रहा तो यह अनित्यत्व'का साधन क्योंकर., कर सकता। इससे शब्द को नित्य मानना अघश्य पड़ेगा।. (१५) संशयसम-जय किसी यात के साधन के लिये कोई हेतु उत्पन्न होता है तब प्रतिवादी यदि उसी तरह के हेतु उस पात के विरुद्धसाधन का यतलाकर वादी को संशय में डाल दे-तो यह उत्तर 'संशयसम' कहलाता है। जैसे घादी ने कहा-'शब्द अनिरय है क्योंकि यह प्रयत्न से उत्पन्न होता है जैसे घट'--इसपर प्रतिवादी कहता है-'शब्द नित्य है क्योंकि इन्द्रियप्राय है-जैसे सामान्य'-इससे दोनों पक्ष के हेतुओं को देखकर पादौ संशय में पड़ जाता है। ११५) प्रकरणसम--एक ही वस्तु के प्रसंग यदि यो तरह की • घात सिद्ध कर दी जाय तो यही उत्तर प्रकरणसम' कहलाता है। जैसे शब्द अनित्य है क्योंकि प्रयत्न से उत्पन्न होता है ' ऐसा 'कहे जाने पर प्रतिवादी कह सकता है--'ब्द नित्य है क्योंकि इसके अवयव नदी-जैसे प्राकारा', साधर्यसम जाति से इस जाति का इतना ही भेद है कि उसमें दूसरे की कही हुई घात के खंडन ही से तात्पर्य रहता है पर इसमे उसके कहे हुये के विरुप पक्ष का साधन ही मुख्य उद्देश्य रहता है। (१६) अतुसम-वादीने हेतु उपन्यास किया उसके प्रसंग यदि.यद कहा जाय फि भूत भविष्य या पर्तमान किसी काल में यह हेतु हेतु नहीं हो सकता तो यही उत्तर 'महेतुसम' कहलाता है। जैसे चादीने किसी पातंके सिद्ध करने के लिये कोई कहां उसपर प्रतिवादी यों कह सकता है यदि तुम्हारा जो यह साध्य--जो धर्म उस तुसे सिम होता है-के पहिले . .
१४२ न्यायप्रकाश। " . प्रयत्न से बनी हुई बस्तु कठोर कोमले दोनों होती है इसी तरह प्रयत्न से निष्पन्न शब्द नित्य अनित्य दोनो हो सकता है। (८) साध्यसम-चादी ने जिस त को पेश किया है उसको भी साध्य ही के सहश बना देना-'साध्यसम' उत्तर कहलाता. है। जैसे-घट के सहरा शब्द है इससे तुम शब्द को अनित्य कहते हो-अच्छा यदि घर के सदृश शब्द है तो घर भी शब्द के सहश होगा-शब्द की अनित्यता साध्य है अर्थात् श्रमी सिद्ध नहीं है इससे घट की भी अनित्यता साध्य होनी चाहिये और जो स्वयं साध्य है सो दूसरे को कैसे सिद्ध कर सकता। इसलिये घट की अनित्यता से शब्द की अनित्यता नहीं सिद्ध हो सकती। (६) (१०) प्राप्तिसम-प्राप्तिसम। जहां ऐसा कहा जाय- तुम जो हेतु कहते हो क्या वह हेतु और जो तुम्हारा साध्य है सो एक आधार में वर्तमान है या नहीं यदि वर्तमान है तो दोनों घरावर हे फिर किस को तुम हेतु करोगे किस को साध्य ?'- यह उत्तर प्राप्तिसम हुमा। फिर जन कहा जाय-'यदि दोनों एक आधार में नहीं रहने तो तुम्हारा हेतु साध्य का साधन कैसे कर सकता '-यह उत्तर 'अप्राप्तिसम' हुषा । (११) प्रसंगसम-दृष्टांत जो कहा जाय शब्द अनित्य है क्योंकि प्रयत्न से निष्फन्न होता है जैसे घट'। इसके उत्तर में यदि कहा जाय-'घर अनित्य है इसमें क्या प्रमाण जपतक इसका सबूत नहीं कहा जाय तब तक हेतु ठीक नहीं माना जा सकता'--यह उत्तर 'प्रसंगसम' हुमा । (१२) प्रतिष्टांतसम-जिस बात के सिद्ध करने के लिये एक दृष्टांत पेश किया गया उसके जवाब में यदि दुसरा हांत उसका उलटा सिद्ध करने के लिये पेश कर दिया जाय-जैसे- जैसे प्रयत्न से निष्पन्न घर तुम अनित्य का दृष्टांत बताते हो। वैसेही प्रयत्न से निष्पन्न घट का धंस म नित्य का दृष्टांत बता सकता हूँ'-यह उत्तर प्रतिहटांतलम कहलाता है। (१३) अनुत्पत्तिसम-जिस चीजके प्रसंग कोई हेतु कहा जाय- उस चीज़ के प्रसङ्ग यदि यह दिखलाया जाय कि जबतक चीज 1 न्यायप्रकाश। '१४५ शब्द आनत्य यह उत्तर उपलब्धिसम' कहलाता है, जैसे- है क्योंकि प्रयत्न से उत्पन्न है। इसके उत्तर में कहा जाता.है- हवा के झोके से जप वृक्ष गिरता है, सो तो प्रयत्न से उत्पन्न नहीं होता है-पर तो मी यह शब्द अनित्य पाया जाता है। (२१) अनुपलब्धिसम-वादी किसी बात के न पाये जाने के आधारपर किसी बात को सिद्ध करना चाहता है, उस पर यदि प्रतिवादी किसी और यात के न पाये जाने से उसकी उलटी यात सिद्ध करे तो यह उत्तर गनुपलब्धिसम' कहलाता है । जैसे- चादी कहता है-'जय तक घोलनेवाला प्रयत्न नहीं करता तयतक राब्द नहीं सुनाई देता-और शब्द न सुनाई देने का कोई कारण नहीं पाया जाता है-इससे सिद्ध होता है कि शब्द नहीं रहता है प्रयत्न से उत्पन्न होता है। इसके विरुष प्रतिवादी यों उत्तर करते हैं जैसे शब्द के न सुनाई देने का कोई कारण नहीं पाया आता:-धैसेही इस कारण के न देखे जाने की बात भी तो नहीं देखी जाती और पापही के कहने के अनुसार-जो नहीं देखा जाता तो नहीं है-तब उन.कारणों की अनुपलब्धि नहीं है- यह मानना पड़ेगा-मर्थात घे कारण देखे जाते हैं। इससे शब्द के न सुने जाने के कारण यदि देखे जाते हैं तो 'शब्द पहिले नहीं था-प्रयत्न से उत्पन्न हुमा' यह कहना ठीक नहीं' (२२) अनित्यसम-घट का साहश्य शब्द में है इससे शब्द नित्य है-तो घर का सादृश्य तो कोई न कोई संब वस्तुओं में होगा-तो फिर सभी वस्तु अनित्य होगी। यह उत्तर अनित्य- सम हुश्रा। (२३) नित्यसम-जो यात सिद्ध करने की कोशिश घादी करता दैवही नित्य है या अनित्य सो विचार उठाकर उसके पक्ष का यदि खंडन किया जाय तो यह उत्तर 'नित्यसम' कहलाता है। जैसे-धब्द प्रनित्य है यह माप कहते हैं। गच्छा यह शब्द की अनित्यता नित्य है या अनित्य-पदि मनित्य हैं तो फमी रहेगी कमी न रहेगी-जय नहीं रहेगी तय शद नित्य हो जायगा । यदि शब्द की अनित्यता नित्य है-तों यदि गुण. नित्य है तो उस गुण का माधार प्रनित्य नहीं हो सकता--पोंकि -- घड़ा घोष १४४ *न्यायप्रकाश होगा नहीं तो घर धर्मही कहीसे हो सकेगा। और जब तक यह साध्यही नहीं है तब तक वह हेतु साधनही किसका होगा। यदि साध्यके पीछे साधन होगा, तो जय तक साधन नहीं तप तक साध्यही कैसा ! अगर दोनों साथ्य और साधन सापही उत्पन हो तो उनमें परस्पर साध्यसाधनसम्बन्ध नहीं हो सकता। जय तक कुछ मागे पीछे न होगा तय तक यह सम्बन्ध होही नहीं सकता।' (१७) अर्धापत्तिसम-'यदि मेरा कहना न स्वीकार करो तो यहा कोप पड़ेगा' इस प्रकारसे उत्तर कहा जाय उसीको 'अर्धाप. तिसम' कहते हैं। जैसे 'शब्द' नित्य है क्योंकि घटकी तरह यह प्रयान से उत्पन होता है' इसके उत्तरमें कह सकते हैं 'शब्द नित्य है क्योंकि प्राकाश की तरह इसके अघयच नहींयदि इसको नित्य न मानो तो इसके निश्चय न होने में पड़ा दोष पड़ेगा और यदि निश्चय न मान लिया तो फिर मनित्य मानने में पड़ेगा। कई जातियों का तात्पर्य एक सा है परन्तु कहनेके ढंग में.जो भेद पाता है उसी भेदसे इन्हें भिन्न भिन्न जातिमें गिनाया है। (१८) भविशेषसम-धादी किसी चीजफे सादृश्य से कोई पात सिद्ध करता है जैसे घटके सादृश्य से शब्दको प्रनित्य सिद्ध करते हैं। इसके उत्तरमें कहा जायगा यदि प्रयत्नसे उत्पन्न होता इतनीही साहश्य घट पौर शब्द में होनेके पारण शब्द भनित्य हो तो इतना स्वल्प सादृश्य तो सभी चीजों में ई-फिर इस सारश्य के द्वारा सघ चीजोफे धर्म एकही होंगे यहभी मानना पढ़ेगा। (१३) उपपत्तिसम-वादी जिस घातको सिद्ध करने की कोशिश करता है उसको स्वीकार करके फिर उसके विरुद्ध पक्षके साधनकी भी युक्ति थैलीही प्रयल यदि पतलाई जाय तो यह उपपत्तिसम' उत्तर कहलाता है । उहाहरण समाभी 'साध- यसम' के समान है-घल्ल कहने के ढंग में फरक है। (२०) उपलब्धिसम-जो तु चादी कहता है उसके पिना भी उसका साध्य पाया जाता है यह यदि दिखलाया जाय तो न्यायप्रकाश . -- ...(१० प्रतिज्ञाहानि--वादीने अपने सिद्धान्त मे हेतु और दृष्टांत दिखलाया. उसपर प्रतिवादीने दूसरा दृष्टांत देकर दोप दिखलाया इसपर यदि प्रतिवादी के दृष्टांत को वादी स्वीकार करले जिससे उसको अपने सिद्धान्त का विरुद्ध पडता हो तो उसकी प्रतिक्षा की अपने पक्षकी हानि हुई। जैसे ... धादी--ब्द भनित्य है क्योंकि इन्द्रियग्राह्य है जैसे घट प्रतिवादी-- सामान्य भी तो इन्द्रियग्राह्य है और तिस पर भी यह नित्य है। पादी-'सामान्य · इन्द्रियग्राह्य है और नित्य है तो घर भी ऐसा ही है। इससे यह माया कि घट यदि नित्य है तो शब्द भी नित्य है-- घादी के मत के विलफुल उलटा। (२) प्रतिज्ञान्तर-किसी वस्तु के प्रसंग किसी बात का साधन करने चलें-उसपर यदि प्रतिवादी ने कुछ दोप दे दिया तो उसी वस्तु के प्रसंग कुछ और ही घात कह चले । जैसे पादी-शब्द प्रनित्य है क्योंकि इन्द्रियग्राह्य है जैसे घट । प्रतिवादी-सामान्य भी शन्द्रियग्राह्य है पर वह नित्य है । घादी-सामान्य सर्वव्यापी है शब्द सर्वव्यापी नहीं है। इसमे शब्द की भनिस्यता को छोड कर वह सर्वव्यापी नहीं है सो एक नई घात कह चले । (३) प्रतिक्षाविरोध-जो हेतु पेश किया सो यदि अपने सिद्धान्तं के विरुद्ध पडे-जैसे । ईश्वर दयालु हैं- क्योंकि संसारी मनुष्यों को पड़ा क्लेश देते हैं। (१) प्रतिशासंन्यास अपना सिद्धान्त कहकर जयं दोष दिया गया-तय यदि उस सिद्धान्त को अपने अलग करले- जैसे- घादी' शब्द अनित्य है क्योंकि इन्द्रियग्राह्य है-जैसे घट । प्रतिवादी-'सामान्य भी तो इन्द्रियग्राख है-पर वह तो नित्य है। पादी-'पह फिसने कहा कि राम मनित्य है। - १४६ न्यायप्रकाश क माधार के गुण रहो नहीं सकता। इस तरह भी शब्द नित्य हो जाता है। (२४) कार्यसम-प्रयत्न से उत्पन्न जो कार्य होते हैं उनका विचार जिस उत्तर में करके वादी के पक्ष का संडन पिया जाता है सो असर 'कार्यसम' कहलाता है। जैसे 'प्रयत्न से उत्पन्न हुआ इससे शब्द को भाप अनित्य कहते है-पर प्रयत्न से उत्पन्न कई घस्तु नित्य भी होती है जैसे कोई प्रादमी जवघडा को फोड डालता के तप जो घट का ध्वंस-नारा-उत्पन्न हुमा सो नित्य ही होता है। इससे 'प्रयत्न से उत्पन्न घुमा' इसीसे भनित्यत्व नहीं सिद्ध हो सकता। जिस कथा में वादी प्रतिवादी दोनो ऐसे ऐसे अनुचित उत्तरी का प्रयोग करते हैं सो कथा छ कक्षा से अधिक नहीं चलती। इतने मे यातो एक न एक अवश्य चुप हो ही जायगा। या दोनो भागे फजूल विषाद घढाना नहीं पसन्द करेंगे इससे छठीही कक्षा में कथा समाप्त होगी। इसीको 'पटपक्षी' कहा है। जिस का उदाहरण गौतम ने ५.१.४०., ४२--४४ सूत्रों में दिखलाया है। सोलहवां पदार्थ निग्रहस्थान । 'निप्रह' पराजय के 'स्थान' कारण को निग्रहस्थान कहते है। मर्थात जिन कारणों से वादी पराजित होजाय, हार जाय । ये कारण दो तरह के हो सकते हैं (१) यातो उसकी समझ ही उखरी सबूत हो जाय जिससे शुद्ध को अशुद्ध और अशुद्ध को शुद्ध घद समझता हो। (२) या वह कुछ समझ न सके अर्थात् अपने पक्ष का साधन और दूसरे के पक्ष का दूपण न कर सके । इनही दो करणों से वादी हारता हैं। यातो जो करना चाहिये (मपना साधन दूसरे का दूपण ) सो नहीं करने से या जो करना चाहिये उसका उलटा ही करने से। (सूत्र. १.२.१०) निग्रह- बहुत भेद है (सूत्र १ २ ६१)। परन्तु ५ २ १ सूत्र में २२ तरह के निग्रह स्थान गिनाये हैं। और ५ २. २--२५ सूत्रों में इनके प्रत्येक का लक्षण और उहाहरण दिखलाये हैं । स्थान के 16 न्यायप्रकारा। - - (१० प्रतिशाहानि--वादीने अपने सिद्धान्त में हेतु और टांत दिखलाया उसपर प्रतिवादीने दूसरा हटांत देकर दो दिखलाया इसपर यदि प्रतिवादी के दृष्टांत को वादी स्वीकार करले जिससे उसको अपने सिद्धान्त का विरुद्ध पडता हो तो उसकी प्रतिज्ञा. की अपने पक्षकी हानि हुई । जैसे घादी--'शब्द अनित्य है क्योंकि इन्द्रियग्राह्य है जैसे घट' प्रतिवादी-- सामान्य भी तो इन्द्रियग्राध है और तिस पर भी यह नित्य है। पादी-'सामान्य इन्द्रियग्राह्य है और नित्य है तो घट भी. पेसाही। . इससे यह पाया कि घट यदि नित्य है तो शब्द भी नित्य है- धादी के मत के विलकुल उलटा । (२) प्रतिज्ञान्तर-किसी वस्तु के प्रसंग किसी वात का साधन करने चले-उसपर याद प्रतिवादी ने कुछ दोप दे दिया-तों उसी वस्तु के प्रसंग कुछ और ही बात कह चले । जैसे चांदी-शब्द प्रनित्य है क्योंकि इन्द्रियप्राह्य है जैसे घट । 'प्रतिवादी-सामान्य भी इन्द्रियग्राह्य है पर वह नित्य है । वादी सामान्य सर्वव्यापी है शब्द सर्वव्यापी नहीं है। इसमे शब्द की भनित्यता को छोड कर घह सर्वव्यापी नहीं है सो एक नई बात कह चले । (३) प्रतिज्ञाघिरोप-जो हेतु पेश किया सो यदि अपने सिद्धान्त के विरुद्ध पडे-जैसे। ईश्वर दयालु हैं- क्योंकि संसारी मनुष्यों को पड़ा क्लेय देते हैं। (४) प्रतिशासंन्यास-अपना सिद्धान्त कहकर-जयं दोष दिया गया-तघ यदि उस सिद्धान्त को अपने अलग फरले- जैसे- घादी-' शब्द अनित्य है क्योंकि इन्द्रियग्राह्य है जैसे घट । प्रतिवादी सामान्य भी तो इन्द्रियप्राय है-पर यह तो नित्य है। घादी-'यह फिसने कहा कि सद, मनित्य है।
. - १४८ न्यायप्रकाश (५) हेत्वन्तर-सामान्य रूप से एक हेतु कहा--उस पर जय दीप दिया गया तब उसी हेतु में विशेषण लगाकर पेरा करते हैं जैसे- सावयशास्त्री ने कहा--'जितनी व्यक्त वस्तु है समों का मूल फारण एकही है क्योकि ये सब परिगामी है। प्रतिवादी--'परिणामी वस्तु कई ऐसी पायी जाती है जिनके मूलकारण एक नहीं--कई हैं।। साजन्य--'मजी सो नही--सुखदुःखमोहसमन्वित जितनी व्यक बस्तु हैं सव परिणामी है-इसी हेतु से मूलकारण एक ही होगा। यहां इस मन्तिम वाक्य में एक दम्म दूसरा प्रयोग हो गया। (६) अर्थान्तर--जो यात प्रस्तुत है उससे कुछ और ही अंडयंड वका जाय। जैसे वैयाकरण-शब्द नित्य है-पयोंकि निरवयव है-यह म लोग पाणिनि के अनुयायी मानते है-और पाणिनि कैसे हैं जिन्होंने महादेव से अक्षरसमाम्नाय को पाकर समस्त व्याकरण शाख पनाया । महेश्वर भी कौन-जिनसे पाणिनिने मदरसमुदाय को पाया इत्यादि। (७) निरर्थक-अर्थशून्य विना मतलय के शब्दों का जव प्रयोग करता है-' शब्द नित्य है क्योंकि कचटतप जबगडरा है इत्यादि । () अविज्ञातार्थ-वादीने जो कुछ कहा उसका अर्थ नहीं समझ पड़ा-और कहना पड़ा-'जो आपने कहा सो बड़ा कठिन विषय है-मेरी समझ में नहीं पाता (e) अपायक-जब ऐसे ऐसे अनेक पापयों का प्रयोग किया जाय जिनका परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं है-जैसे 'दस अनार, छपूरी, मां, चमडा' (१०) अप्रातकाल-किसी बात के साधन प्रमाण कहने का एक काल नियत -जैसा अनुमान के अवयवों के प्रसंग में का आये हैं इस फाल को छोड़ कर यदि वाक्यों का उखरा पलटा प्रयोग फिया जाय । जैसे-'यहां भाग ई-जैसे रसोई घर में क्योंकि यहां धूमा है-जहां धूनां है तहां भाग है'। 4 .
न्यायप्रकाश-1 २५६ (१२) न्यून- अनुमान के पांच अवयव आवश्यक है-उनमें से यदि कोई छोड़ दिया जाय। (१२) अधिक-एक अनुमान में एक ही हेतु और एक ही दष्टांत आवश्यक और उचित है यदि अनेक हेतु यो : इष्टांत' उपन्यस्त किये जाय तो यहां अधिक हुआ। (१३) पुनरुक्त-जो यात ऐक बार कह दिया है या जो कहा है उसी से सूचित हो गया---उसको यदि फिरसे बिना कोई खास मतलब के कहें। (१५) अननुभापणवादी ने तीन बार समझा कर कहा, सभा के और लोगों ने उस घातको समझ भी लिया-तिस पर भी यदि प्रतिवादी उसफो समझ कर उसका अनुवाद न कर सके तो उसका 'भननुभापण' रूप निग्रहस्थान होता है । (१५) अज्ञान-बादी ने जो बात कहा उसका सभासदों ने समझ लिया-पर प्रतिवादी न समझ सका तो उसका 'प्रज्ञान' हुआ। (१९) अप्रतिमा चादी के प्रक्ष को समझ कर भी यदि उसका उत्तर मन में न पाये तो 'पप्रतिभा हुई। । (१७) विक्षेप--'मैं इस बात को सिद्ध करता है ऐसी प्रतिज्ञा फरने पर ज्योंही प्रतिघादी और सभासद लोग सुनने को तैय्यार हुये त्योही यदि यह कह कर सरफजाय की-'मेरा काम का हर्ज हो रहा है भय मैं जाता तो उसका विक्षप रूप पराजय हुगा । (१८) मतानुक्षा-बादी ने अपना सिद्धान्त कहा-प्रतिवादी ने उसमें दोप दिया-इस दोप का उद्धार अपने सिद्धान्त से मही परके उन्हीं छोपों को यदि प्रतिवादी के सिद्धान्त में. लगायें तो उन दोपों का समाधान नहीं हो सकता यह स्वीकार सूचित छोता है-इस से यह भी पराजय हुशा-श्योंकि अपने सिद्धा- न्तमें ये दोष ई-यह स्वीकार हो जाता है। ... (१६) पर्यनुयोज्योपेक्षण-घावी पराजित हो गया पर प्रति.. घादी. यह न समझ सका और वह इस बात पर जोर न दे सका फि तुम पराजित हो गये तो यह एक प्रकार की हार प्रतियादी ही की हुई।
१४८ न्यायप्रकाश + - 444 - .. (५) इत्वन्तर-सामान्य रूप से एक हेतु फहाउस पर जप दोष दिया गया-तब उसी इतु में विशेपण लगाकर पेश करते ई-से- सालयशास्त्री ने कहा--'जितनी व्यक्त वस्तु है सभों का मूख फारण एकही है क्योकि ये सब परिणामी है। प्रतिवादी--'परिणामी वस्तु कई ऐसी पायी जाती है जिनके मूलकारण एक नहीं--कई है। सावन्य-पजी सो नहीं--सुखदुःखमोहसमन्वित जितनी व्यक्त वस्तु हैं सव परिणामी ई-इसी हेतु से मूलकारण पक ही होगा। यहां इस अन्तिम वाक्य में एक दम्म दूसरा प्रयोग हो गया। (५) अर्धान्तर-जो घात प्रस्तुत है उससे कुछ और ही अंडपंड घका जाय। जैसे चैयाकरणा-'शब्द नित्य दै-क्योंकि निरवयव है-यह इम लोग पाणिनि के अनुयायी मानते है-और पाणिनि फैसे हैं जिन्होंने महादेव से अक्षरसमाम्नाय को पाकर समस्त व्याकरण शास्त्र बनाया। महेश्वर भी कौन-जिनसे पाणिनिने प्रतरसमुदाय को पाया इत्यादि। (७) निरर्थक-अर्थशून्य विना मतलय के शब्दों का जब प्रयोग करता है-' शब्द नित्य है-पयोफि, कचटतप जयगडरा है इत्यादि । (८) अधिशातार्थ यादीने जो कुछ फहा उसका अर्थ नहीं समझ पड़ा-और कहना पड़ा-'जो आपने कहा सो बड़ा कठिन चिपय ई-मेरी समझ में नही माता () पार्थक-जब ऐसे ऐसे अनेक पापयों का प्रयोग किया जाय जिनका परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं है-जैसे 'दस अनार, छपूरी, कूमां, चमड़ा। (१०) अप्राप्तकाल-किती घात के साधन प्रमाण कहने का एक काल नियत है-जैसा अनुमान के अवयवों के प्रसंग में कद आये हैं-इस काल को छोड़ कर यदि वाक्यों का उलटा पलटा प्रयोग किया जाय । जैसे-'यहां भाग है-जैसे रसोई घर में क्योंकि यहां धूम है-जहां धूमां है तहां भाग है'। प ,
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